Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Rasta Idhar Hai
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रास्ता इधर है.......
सपादक मडल
Dडा भीष्म साहनी
- शमशेर बहादुर सिंह
. राजीव सक्सेना
D डा विश्वनाथ त्रिपाठी
D केवल गोस्वामी
O राजकुमार सैनी
Dश्याम कश्यप
चयन एव सयोजन
वल गोस्वामी
- राजकुमार सैनी
श्याम कश्यप
राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ का प्रकाशन
नयी दिल्ली
रास्ता इधर है......
[विभिन कालखडो के प्रमुख प्रगतिशीन ावियो की प्रतिनिधि सविताए]
दिसम्बर, १९५६
प्रथम सस्करण
मूल्य साधारण सस्मरण ५९ एव सजिल्द करु मात्र
प्रकाशक
राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ
मुद्रक
यू एज प्रिंटिंग प्रेस, रानी झासी रोड, नयी दिल्ली ५५
आवरण
D सुरेन्द्र राजन
प्रमुख वितरक
पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस,
रानी झासी रोड नमी दिल्ली ५५
AN ANTHOLOGY OF POEMS RASTA IDHAR HAI
भीष्म साहनी द्वारा राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ की ओर से
यू एज प्रिंटिंग प्रस से मुद्रित एवं प्रकाशित ।
अनुक्रम १० मीटम साहनी प्रस्तावना D यह सकलन 0 पहला खड (समारम्भ) पृष्ठ ३ ६ (१) केदारनाथ अग्रवाल (२) निलोचन (३) नागाजुन (४) शमशेर बहादुर सिंह (५) राजीव सक्सेना (६) मोहन श्रीवास्तव (७) कुमारेद्र पारसनाथ सिंह (6) विश्वनाथ त्रिपाठी (६) केदारनाथ सिंह -कविता की जरूरत -~-साच समझकर चलना होगा -मैं तुम्ह अपना चुबन दूगा नजरल के लिए --सुरग के पार -एवं उमडतर सैलाव -चवरी -पाक म खेलते हुए बच्चे -पूर्वाभास १२ १७ OD दूसरा सड (विकास) पृष्ठ (१) धूमिल (२) विजेन्द्र (३) मलय (४) जुगमदिर तायल (५) कुमार विकल (६) लीलाधर जगूडी (७) ऋतुराज (4) श्रीप (8) श्रीराम तिवारी --लोहसाम - अपने प्रिय कवि के लिए -रचना कम का स्वाद ----कविता का अथ -यह सब कैसे होता है ---पाटा वडान -नया मोर्चा -बापसी २५ २८ २६ OOD तीसरा खड (स्वस्पान्तर) पृष्ठ Yo ४५ (१) कहैया मेरी पार्टी (२) शलभ थीराम सिंह --जिन्दाबाद इपलान (२) मानसिंह राही -चल अवाम के लश्कर चल (४) रमेश रजक -हडतास का गीत (५) मुशी -राह आगे सुलेगी (६) चचल चौहान -पन पुरुष के प्रति (७) इब्बार रब्बी -झुग्गी वालों का गीत (८) सगेद्र ठाकुर -दद का समुदर (९) अजय तिवारी -माक्स के प्रति (१०) भारत भारद्वाज --एक विश्वास की हत्या (११) मोहन श्रोत्रिय नवसाम्राज्यवादियो के नाम (१२) देवेद्र उपाध्याय -आदमी का दद DDDD चौथा खड (गुणातर-१) ४७ ४८ ५२ ५३ पृष्ठ ५६ (१) वेणु गोपाल (२) ज्ञानेन्द्रपति (३) मोहदत्त (४) अशोक चक्रधर (५) पक्ज सिंह (६) अरुण कमल (७) मालोक घन्वा (क) चद्रभूषण (8) उदय प्रकार (१०) श्यामसुपर मिश्र -बात सिफ इतनी है -अपना बधवा -वापसी -ठेवेदार भाग लिया -हम इतिहास के बेटे हैं -यात्रा -मैं केवल एक जल-आकार -बाहा -इनलाब -रक्तप्रवाही मोड़ ७१ " DDDDD पाचवां खड (गुणातर-२) पृष्ठ ७६ ८३ (१) नीलक (२) वरयाम नेगी (३) प्रणय रजन (४) दिवक रमेश (५) अक्षय उपाध्याय (६) चारुमित्र (७) गोविंद श्रीवास्तव (क) राजेश जोशी (8) प्रभाती नोटियाल (१०) सुरेश शर्मा -खडहर के बारे में --अकाल -~-वे जो आगे निकल गये -फसल का गीत -~-कविता के इद गिद -सनाटा बोलता है --वोल्गा से गगा तक -जाडे की रात -जगली मुर्गे से --निर्णायक वक्त द६ ६३ ६४ और अन्त मे पृष्ठ - केवल गोस्वामी -पटाक्षेप O राजकुमार सैनी -साथ साथ १०२ - श्याम कश्यप --एक कविता शैली के लिए हिदी की प्रगतिशील कविता एक पुनर्विचार-डा० कमलाप्रसाद १०७
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0 प्रस्तावना यह संकलन ? संग्रह को 'रास्ता इधर है' का नाम दिया गया है। यह कौन सा रास्ता है और किस दिशा में जाने वाला रास्ता है आज के जमाने में कौन छाती पर हाप रखकर कह सकता है कि इस रास्ते पर चलोगे तो अपनी मजिल तक पहुच जाओगे । आज कल रास्ते भी बहुत हैं और रास्ता दिखाने वाले भी बहुत हैं और कौन जाने, रास्ता दिखाने वालो के सामने मजिलें भी अलग- अलग है फिर क्या इस सग्रह का शीपक क्सिी छिपे दम को व्यक्त नहीं बरता 'रास्ता इधर है' शब्द किसी कवि की क्लम से निकले शब्द हैं, जिसके दिल की तडप, अपने बाहर की किसी व्यापक तडप मिलकर उस रास्ते का भास पाती है जिस पर चलना उसके लिए अनिवाय सा हो चला है । यो तो यह रास्ता नया नहीं है और केवल आज का भी नहीं है। सहस्री शताब्दियो से, जब से इसान ने इतिहास में कदम रखा है वह अपनी मुक्ति के लिए, अपने अस्तित्व को साथ बना पाने के लिए, अपने समाज मे से अन्याय और असमा नता को दूर कर पाने के लिए इसी रास्ते पर चलता आया है। और इसी रास्ते का सकेत पवि बार बार करता रहा है । यह रास्ता जीवन की कोख में से ही निकलता है, उस सपप को कोष में से जिसमे इसान एक बेहतर ससार की सृष्टि कर पाने के लिए जूमता है। इस तरह यह रास्ता उस सघपमय जीवन ना ही रास्ता है जिप्तमे आज हमारे देश के लाखो करोडो अपहत लोग जूझ रहे हैं, उन्ही का रास्ता कवि का रास्ता है, उही की पदचाप कवि की कविताओ में गूंजती है, उसी से यह उत्प्रेरित और अनुप्राणित होता है, यही उसकी कविता का सम्बल बनती है और यही उसका पप निर्देश भी करती है। आज की विषमताओं का विकराल रूप विसी से छिपा नहीं हैं। जहा हरिजनो को जिंदा जलाया जाये या नदी में जिंदा डुबो दिया जाये, जहा लाखा लाख बेरोजगार शहरो और वस्त्रों की सडको पर धूमें, जहा सूपा और बाढ, हर साल किसी महामारी की तरह पायें, और उनके सामने बस्तिया मोर गाव उजडते चले जाये, जहा पाला धन इतना प्रवल हो उठे कि देश की सरकार भी उसके सामने खम खाये, और उधर, बडे-बडे दाहरो मे गगनचुम्बी भवन और इमारतें उठ रही हो, और सहको पर बढिया से बढ़िया कारें धूमती फिरें, तो कोई भी सवेदनशील पवि इनसे अछूता नहीं रह सकता। अगर वह उन विषमतामो की बात करता है जो आस-पास के जीवन में उसके लिए असह्य हो उठी हैं, और अपना दद वह आपके साथ वाटना चाहता है तो वह सचमुच आपके प्रति अपना क्तव्य निभा रहा है, आपके प्रति भी पौर अपनी क्ला के प्रति भी। इस संग्रह मे हमारे हि दी जगत के जाने माने कवियो की हाल की लिखी कुछ कविताए संग्रहीत हैं । यह पुस्तक एक और बात की ओर भी हमारा ध्यान दिलाती है, कि देश के राजनीतिक जीवन की उठक-पटक में प्रगतिशील कवि को नजर अपनी कला के प्रति तथा जन जीवन के प्रति घुधलायी नहीं है, उसकी नजर बराबर इस वगगत समाज के भीतर पाये जाने वाले अतद्वन्द्वों, और सघप के प्रति लगी रही है और उसी को वह निष्ठा के साथ पाकता रहा है, उसे वाणी देता रहा है। बहुत दिन के बाद प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से ऐसा एक प्रयास किया जा रहा है। पाठमो तथा बुद्धिजीवियो ने इस प्रयास का स्वागत किया है, यह इस बात से भी जाहिर हो जाता है कि छपने से पहले ही हमारे पास सकडो प्रतियों के लिए प्राडर पहुच चुके हैं । हमे पूर्ण प्राशा है कि इस प्रकार के प्रयास भविष्य में भी सम्भव होंगे, और कविगण से उनका अमूल्य सहयोग मिलता रहेगा। एक दूसरे को समझने, अपनी भूमिका को पहचानने मोर मिलकर उस साझेदायित्व को निभा पाने की दिशा म, इस प्रकार के प्रयास एक शक्तिशाली मच का काम दे सकते हैं। D भीष्म साहनी महासचिय, राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ - निराला जल्द जल्द पर बढाओ, माओ, माओ। आज अमीरो की हवेली किसानो की होगी पाठशाला, धोबी, पासी, चमार, तेली खोलेंगे अन्धेरे का ताला, एक पाठ पढेंगे, टाट बिछाओ । यहाँ जहाँ सेठ जी बैठे थे बनिये को बास दिखाते हुए, अनेक ऐठाये ऐंठे थे धोखे पर धोखा खाते हुए, बैंक किसानों का खुलाओ। सारी सम्पत्ति दश की हा, सारी आपत्ति देश की बने, जनता जातीय वश की हो, वाद से विवाद यह ठने, वाटा काटे से कढामा! O मुक्तिबोध मुझ पर क्षुब्ध बारदी धुए को झार आती है व उन पर प्यार पाता है कि जिनका तप्त मुख सवला रहा है - धूम लहरा मे कि जो मानव भविष्यत्-युद्ध में रत हैं, जगत् की स्याह सडका पर। कि मैं अपनी अघूरी दीघ कविता में सभी प्रश्नोत्तरी की तुग प्रतिमाए गिरा कर तोड देता हू हथोडे से कि ये सब प्रश्न कृत्रिम और उत्तर और भी छलमय, समस्या एक- मेरे सभ्य नगरो और ग्रामा मे सभी मानव मुखी, सुदर व शोषण क्व होगे? कि मैं अपनी अधूरी दीध दविता में उमग कर, जम लेना चाहता फिर से कि व्यक्तित्वातरित होकर, नये सिरे से समझना और जीना चाहता हूँ, सच ।
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-पहला खड
समारम्भ
[दिशा, दृष्टि और प्रस्थापन]
D केदारनाथ अग्रवाल
- त्रिलोचन
- नागार्जुन
- शमशेर बहादुर सिंह
राजीव सक्सेना
कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह
विश्वनाथ त्रिपाठी
मोहन श्रीवास्तव
- केदारनाथ सिंह
000 "कला के सम्बध मे पत्र मे क्या लिखू ? उसके विकास और सौन्दय की बातें लाखो तरह की हैं--एक देखिए--- कोई न छायादार पेड, वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार, श्याम तन, मर वधा यौवन, नत नयन, प्रिय कम रत मन गुरू हथौडा हाय, करती बार बार प्रहार- सामने–तरु मालिका-अट्टालिका, प्राकार । यहा सीधा वणन होने पर भी, हपौडे की चोट पत्थर पर पड़ने पर भी, देखिए किस तरह अट्टालिका पर पडती है। लेखक के वणन-प्रकार के कारण और निर्देश से । वह जहा बठी है वह पड छायादार नहीं है और अट्टालिका तर-मालिका है। -अट्टालिका भो तरुमालिका है, फिर आदमी क्तिनी छाह मे है ।। "मैं तोडती पत्थर"-अत का स्वभावत समझ मे आ जाएगा-"में तोडती पत्पर हृदय ।" D सूयकांत त्रिपाठी 'निराला' (जानकीवल्लभ शास्त्री को लिखे गए एक पत्र से) ॥ बाध्यका उलप केवल प्रेम भाव को मोमल व्यजना म ही नहीं माना जा सकता जैसा कि टालस्टाय के अनुयायी या कुछ पलावादी पहते हैं। मोष मादि उग्र और प्रचड भावो के विधान में भी, यदि उनकी तह मे मरणा भाव अव्यक्त रूप मे स्थित हों पूग सौदय का सालावार होता है । स्वतत्रता में उमत्त उसमय, पोर परिवतनयादी गली में महागाय्य The Resolt of Islam ( रिवाल्ट आफ इमलाम) नायक नापिरा अत्याचारिया पाम उपग दन वाले गिरगिडान दाने, मपनी साधुता, महन पोरता और पति पत्ति का घमस्रारपूण प्रगान बरन याले नहीं है। ये उत्साही उमग में प्रगड येग से युद्ध क्षेत्र म बदन वार पापड, लोर पोटा मोर अरपार दम पुनीत पाप माचिस तन मे तमतमान याने, भय या स्पापया मातापियों को गवा स्पोरारपरनयाताप्रति उपेक्षा प्राट परा यामे है। 7 मादाय रामधन गुगल २ कविता की जरूरत D केदारनाथ अग्रवाल अंधेरा फाड कर रार यो तिरोहित कर देन का काम नहीं वरन् सृष्टि की समग्रता को धूप के पारदर्शी माइने में उजागर कर देने का काम सृजन करता है। और ऐसे हो समय और साहसी सूरज को ----उसके ताप-दाप और प्रकाश के साथ- शब्गे में बिम्बित करने का साथक काम कविता करती है। जो आदमी की बनायी हुई- उसो की सही पहचान होती है और उसी की सम्पृक्तता मोर सम्बद्धता का सारगभित मौलिक वमान हाती है । दिक और क्ला काव्य भी जिसमे समाहित रहते है-- मानवीय निरतरता मे प्रगल्भित और प्रवाहित रहत हैं इसीलिए तो आदमी को कविता की जरूरत है और कविता को आदमी की जरूरत है। (जनयुग) ३ सोच-समझ कर चलना होगा अगति नहीं जीवन लक्षण का D निलोचन ०१. परिवतन होते रहते है उह न रोक सका है कोई परिवतन की शक्ति अतुल है उसे न वाध सका है कोई तुम परिवतन की गति समझो तुम परिवतन को पहचाना तुम परिवतन को अपना कर विश्व बना लो अपने मन का ॥२॥ अब तक जो होता आया है उसमे जन सम्मान नहीं है उसमे मानद को मानव के सुख दुख का कुछ ध्यान नहीं है उससे व्यक्तिवाद पनपा है उससे पूजीवाद हुआ है र हे नष्ट कर शोषित मानव, शाप काट दो जग जीवन का अव कुछ ऐसी हवा चली है जिसस सुप्त जगत जागा है जिससे कम्पित जीण जगत ने आज मरण का वर मागा ४ उनको बहुत जल्द दफ्नाओ नवयुग के जन आगे आओ नव निर्माण करा तुम जग का जीवन का, समाज का, मन का 0x0 यह समाति काल माया है हम इसका कुछ लाभ उठाए आज पुरानी निर्बलता की जगह शक्ति नूतन बैठाए आख खोल, बन कर तटस्थ निष्किय दक्षान का समय नहीं है आज हमारी एक-एक गति पर निभर भविष्य जीवन का विगुल बजाओ और वढ चलो यह सम्मुख मैदान पडा है मानवता के मुक्ति दूत तुम कोन तुम्हार साथ अडा है यह सघप-काल आया है आई जय-यात्रा की बेला तुम नूतन समाज के स्रष्टा पग ध्वनि मे गजन जीवन का जीवित मानव महिमा तुम से तुम मानव जीवन के धर्ता तुम मानव-जीवन के कर्ता तुम मानव-जीवन के हर्ता विपुल शक्तिया के निधान तुम अपमानित जीते धरती पर अपना शक्ति प्रकाश दिखा दो क्षय कर अत्याचार अनय का श्रमिक कृपक मोगो वह समत जो फ्ल है जीवन मथन का।
मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूगा
- नागार्जुन
तुम उनकी साजिशो को सत्म कर दोगे
तुम प्रवचना की उनकी कुटिल चालो का मत कर दोग
हत्याए भरने-करवाने की-
घुपचाप जहर घोलन धुलवाने को-
कारागार की नाटकीय कोठरियों में
मानवता को गलाने गलवान की-
यानि, उनी एक एक साजिश को
तुम खत्म कर दोगे
हमेशा हमेशा के लिए।
,
मैं तुम्हारा ही पता लगाने के लिए
घूमता फिर रहा हू
सारा सारा दिन सारी-सारी रात
आगामी युगा के मुक्ति-सैनिक कहा हो तुम
7
निपीडित शोषित मानवता के उद्धारक, वहाँ हो तुम
प्राओ, सामने आओ बेटे ।
मैं तुम्हारा चुम्बन लुगा
मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूगा
7
में तुम्हीं को अपनी यह शेप मास्था अपित करूगा
मै तुम्हारे ही लिए जियूगा, मर गा
मैं तुम्हारे ही इदगिद रहना चाहूगा
मैं तुम्हारे ही प्रति अपनी वफादारी निबाहूगा
भाओ, खेत मजदूर और भूमिदास नौजवान
मामओ, खदान-यमिक और फैक्ट्री वकर नौजवान
भामओ, पंपस के छात्र और फैल्टियो के नवीन प्रवीण प्राध्यापक
६
हा, हा, तुम्हारे ही अदर तैयार हो रहे हैं
आगामी युगो के लिबरेटर
आमो भई, सामने आओ।
मैं तुम्हारा चुम्बन लूगा
मैं तुमम से एक एक का सिर सूघूगा
आमो भई सामने आओ।
मुझ पगलेट के साथ बातचीत करो
हसो सेला मेरे साथ
मैं तुम्हारी जूतिया चमकाऊगा
दिल बहलाऊगा तुम्हारा
कुछ भी करू गा तुम्हारे लिए
मैं तुम्ह अपना चुम्बन दूगा
(उत्तराख-६)
न, न,न। नज़रुल के लिए - शमशेर बहादुर सिंह -क्या देखते, जाने क्या सोचते स्वत अनजाने ही वो शोकगीत के होगे, तीन देशो के एक साथ नागरिक विजय के ही होंगे निरतर तीन दशो की विप्लवी सदा की तरह। एकता मे वही क्या तुम बोल न उठे चित्त बसाये यकायक भी? हमारे लिए तीन इतना कुछ हो गया जो तुम्हारे लिए एक दुनिया मे मौन शाति दृष्टि से हीराशिमा नागासाकी ही नहीं क्या अवलोकन करते पूरा वियतनाम जाने क्या अवलोकन करत कौन सी कविता लिखत क्सि नय वास्मिन विद्रोह और पूरी अरव दुनिया निर्माण की। ---ये सब आकाशे दामामा बाजे ." मानव चेतना के इतिहास में विद्रोही । व्याप्त हो गया क्या अव भी दामामे बज रहे हैं हम अपनी सास मे -और क्सि प्राकारा मे इन सबको जीत है। किन किन परतिया के ऊपर और तुम। मानव हृदयो मै युद्ध समाप्त हुआ दमामे बज रह हैं । जिसम से और "चल | चल चल गुन शुन, शुन वह शोरगीत के दमामे हैं गायद पश्चिम का दानवी रूप मगर उनकी चाट कसी कडी है, विद्रोही ! तीसरी दुनिया 7 जम लिया परा चीन पूरा अमोका " भीष्णतर युद्ध आरभ हुए, 1 प्रक्ट हुआ, ६ - . मोर भासें साती यहूदियो परया ईसाइया की आने वाली क्यामत अभी पट तो नहीं पड़ी है इस धरती के सर पर, मगर इसी विस्फोट पे लिए 'प्राण पा से अमरीका निरतर अहर्निग घोर अभ्यास वर रहा है तुम्ह सबर नहीं? दायी ओर से, बायी आर से, नि और उनके बीच से गुल तूफानो से भीगे और बढे गुट्ठल और रडे जैसे मध्य प्रमरीमा ये बयावानो मे होते हैं बोक्टाई बडे नसो वाले क्टस रग बिरगी कठोर वाटेदार सुरा और हरे और सफेट मौर हीरे-नीलम-से निगघ चमत्कार से। - तुम अपने अपने सुदूर और गुल विद्रोही अवचेतन में गौन मे महाकाव्य की भूप रचना करते रह नजरल, जा सोनो दुनियाओ के उत्तुगतम थपडे तुम्हे उठा नहीं पाय तुम्हारी सहज समाधि से? अव तुम उसी मूक महाकाव्य के साथ हमारी सबकी प्यारी धरती में सहज हो समाधिस्प हो गये हो घरती का अपनी चेतना से देशो देदोक आभासको अपनी मुगध से मस्त बनाते हुए सुर गुलाब का एक उभरता दरिया सुस गुलाबो के शिशु मुख उल्लास से तमतमाये हुए आनन्द में नहाय हुए अनेक ऊर्जानो वो हारमनी से सगीतमय, माना अपने नत्य दाल से प्यारी मासूम धरती को उद्वेलित किये हुए अधिक उवरा परने । नही जानता अभी इतिहास मे क्या क्या दूर तक गुलाबो का एक और छारहीन दरिया अरे नज़रुला तुम हमारे बीच म - गुल खिलेंगे थे। अब तक -मगर हमे तो अब पता चला दि तुम हमारे ही बीच मे थे अब तक तुम्हारी अतिशय अतिशय मध्यम गुमसुम तुम्हारा धात महाकाव्य हमे बेमालूम तौर से --अपना साम जैसे तुम्हारे विद्रोही सग्रह की पहली ही कविता को मैं लगातार तीन दिन तक पढता रहा और उसी से मेरे जिन गीतो ने जम लिया है उहें ही तुम्ह इस कारागृह में भेट दने के लिए स्वय तुम्हारे सम्मुप आ पड़ा हुआ है इहे स्वीकार कर मुझे घय फरो! तुम एशिया की महाशक्ति हो भाई।" और तुमने क्या कहा पा, याद है? "गुरुदेव, सहज सगीत में लिए हुए या बब तक मोर मब भी क्या कोई अन्तर आ गया है? गौर से देखो अनुभव करो तुम मममुर गुरुयो एक म मया कोई अन्तर मा गया है। जहां सुम से सर भी पहो हो इस मौन में अजब एमधा -रो पर पहले नहीं। समसा में पहा पुगतारे युगयुगीन विद्रोही तरान --जो अभी से पहले इतनी भावन्ताव लिए हुए नहीं , पार, मार, माद है गुरदेव मे पहा पा भाई मगर बहन ।
एक पवित्र सपने की तरह प्राजे बैठ हो निरतर बजता हुआ मैं तुम्ह सुनता हूँ और दखता हूँ सरो की नोकीली काली हरी कतारो अब भी बैठे हो हमारी आखो के सामने हमारे हृदय आज दामा की उस पावन धरती पर थता और प्रेम के फूल बन कर अपित हो रहे हैं पारा ओर से जहा भी धान का कोई एक दाना है, वहा~ जहा भी कोई बात गोनार" जोर शोणित" से शुरू होगी वहा तुम हो अचल सर झुकाये एकटक सामने से देखते न देखते हुए मूक मौन मुखर तीनो भौतिक देशा की आतरिक एक्ता मे मुखर अचल मूक लबवत अशीपवत तीनो दशो के युद्ध वैमनस्य नाना योजना के परे दृद्ध, अचल, एक रूप जसे कि हा अल्लाह एक है जैसे कि कविमनीषी। ओ हमारी सोने को मिट्टी के प्राण। ओ हमारे प्राणो के अमर विद्रोही और हमारी विश्व शांति के अमर समायोजन --जो मौन मूक और भुलाया हुआ सा है वही हमारे साथ सास लेता भी रहा है हम भी उसके साथ बराबर निरतर सांस लेते रहे है और अब भी उसकी सास हमारी सास में इतिहास बनती हुई चल रही है। (जनयुग) उसकी मखलूक यह प्यारी दुनिया हम-तुम एक हैं । इम एक्ता को अपनी भवो मे उठाये अपनी आखो मे ६१ अबवर -मरहम तो पर पता मिम मारे ही बीप में तुम्हार विद्राही सग्रह की पहनी हो मविता या मैं सगातार तीन दिन तक पाता रहा और उसी से मेरे जिन गीतोन जम सिया Tী প্রায় সায়ম मम्पम गुमगुम गुजारा " महासाप में माम तौर म -बाना मांग अंग उहें ही तुर मदन गनी में निपा परर पौर पर भी र माया' Print इस पाराग्रा भेंट घोलिए रथम तुम्हारे मम्मुग या गडाहमा तस्वीर पर मुपापरा शुमगिया मी मागस हो भाई" भार तुमने बारहापा, माभाग पाद" माया" गुम गपमुप गुरव हो।"
निरतर बजता हुना मैं तुम्ह सुनता हू और देखता हूँ सरा की नोकीली काली हरी कतारो मे--- जहा भी धान का कोई एक दाना है, वहा-- जहा भी कोई बात "शोनार" जोर "शोणित" से शुरू होगी वहा तुम हो अचल सर झुकाये एकटक सामने से देखते न देखते हुए मूक मौन मुखर तीनो भौतिक देशो की मातरिक एकता मे मुखर अचल मूक लबवत अशीपवत तीनो देशो के युद्ध वैमनस्य नाना योजनामों के परे एढ़, अचल एक स्प जैसे कि हा अल्लाह एक है जसे कि एक पवित्र सपने को तरह प्राजे बठे हो अब भी बैठे हो हमारी आखो के सामने हमार हृदय आज ढाया की उस पावन धरती पर श्रद्धा और प्रेम के फूल बन कर अपित हो रहे है पारो ओर से ओ कविमनीषी। ओ हमारी सोने की मिट्टी के प्राण। ओ हमारे प्राणो के अमर विद्रोही और हमारी विश्व शांति के अमर समायोजक । --जो मौन मूक और भुलाया हुआ सा है वही हमारे साथ सास लेता भी रहा हम भी उसके साथ बराबर निरन्तर सास लेते रहे हैं और अव भी उसकी सास हमारी सास मे इतिहास बनती हुई चल रही है। (जनयुग) उसकी मखलूक यह प्यारी दुनिया हम-तुम एक हैं। इस एकताको अपनी भवो मे उठाये अपनी आखो मे १ सुरंग के पार D राजीव सक्सेना भेडिया की जमात का साशात भय सड़ा कर हमारी सुरक्षा की खातिर एक शातिर नायिका ने यकाय वीस बीस मशालो से भौंचक चकाचौध पर हमे रेत ठेल दिया एर अधी सुरग में जहा चीत्कारो के चीखो के जगल मे मशालें वन गयी थी काली काली डायनें और मास पर रहा या कानूनी वडाहो मे तुम कहा थे वह कहा था मैं कहा था क्या पूछे क्या पूछे सभी को पता है कि हम सब एक सुरग मे खडे थे जाल में या जेल में कुछ भरमाये कुछ शरमाये कुछ घवराये कुछ चकराये और संघे अधेरे मे टूट पडे हम पर देशी और विदशी डायनो के दांत नख बहराये से मौन मे हमें सुनायी दी अपने ही रक्त की चुप चुप चप चप-गडप गप पावाजे अपनी ही हड्डियो को क्ट-कट चटक-गटक और हमने महसूसा कि आपात काले आखो से अधिष दख पाता है आदमी अपने कानो से कानो से अधिक सुनता है अपने झनयनाते तन और तन से कही अधिक यत्रणाए महसूसता है टीसते ज्ञान बाप से और सूक्ष्म ज्ञान बोध क्वच ही नही है सुरक्षा का साधन है युद्ध मे विजय या निर्णायक वे डायने समझती यो हमे भेड बकरिया पालतू और फालतू हम बताना पडा राक्षसी जबडा को तोड कर उनका एक सच्चाई कि हम है मनुष्य और शक्ति है हमारी दुदमनीय और अजेय खेता में उपजती और कारवानी में तपती इस्पाती भुजानो मे मोर खूनी जबडो को ताडने का नाम है राशनी रोशनी राशनी भोर इस रागनी को रक्षा जरूरी है आख की पुतली जैसी मित्रो मत भौंचक खड़े रहो औचक इस रोशनी मे य किरणें स्वयं अपने कलेजे मे ही फूटी थी जब हमन ताडे ये वे सूनी जबडे और इस रोशनी का श्रेय लेते हुए आड मे खडी है नेय और अज्ञेय भेडिया भी जमात फिर साक्षात गाया और बकरिया के भेष मे और फिर चढा रह ह ये बडे बडे साजिगावे पढाह अपनी मादो मे फिर इस रोगनी की रक्षा जरूरी है आस पी पुतली जैसी (जनयुग) - और है फॅवत्ता पाए एक उमड़ता रैलाब - मोहन श्रीवास्तव हममे ही डूबा है वह नितिज हम सबके बीच एक खिडकी जहा से उचित होता है सबका बावाश जहा तमाम सड़कें, रेल की पटरिया ऋतुए, वय, सवत्सर पानी और वाओ के रास्त उछालता सब एक दूसरे से मिलते हैं। व्यय है प्रतीभा चिडिया सोच रही हैं राह उन अश्वा के दापो की इस वन से-- जो दो गहरे लवे सनाटो उस वन के मौत के बीच के बीच शाम इस तट की सुबह हम छोड जात हैं उस तट ले जा रही है एवं उखडै पुल के विध्वस सा भटकते रीत मेघ-वड व्यय है प्रतीक्षा उन सूर्यो की जोड रहे हैं सवा आकाश । जिनका प्रकाश समुद्र के नीचे भी प्रवाहित हैं हमे मौंप गया अपना अधियारा धाराए और अधापन । एक क्षण और दूसर क्षण के बीच अब जब कभी भी भोर होगी कुछ भी न घटने पर होगी, इम अपनी ही माग से घटित होता है भविष्य और प्रतिध्वनित हाती है चुप्पी या विशाल नीला घटा जब भी घनघनाएगा अनगिन गुमनाम यात्राए और अतीत मे जड फेंक्ता अपने ही कठ से। इतिहास ठूठ हा जाता है। न हिले व्यय है उन अटल वह तिलम्म द्वार ध्र वताराआ की खोज -तिल भर भी न हिले जहा से पके गये जो मिलने नहीं देता है दिशाओं के बर्छ एक उमडता सैलाब लहू लुहान कर जाते हैं उभरते उन क्षितिजो को एक द्वीप दूसरे द्वीप से जो हममे डूबे हैं। (जनयुग) दूसरे सैलाब से च वरी ० कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह कभी चदवा रूपसपुर सभी चवरी। यह चवरी कहा है ? भाजपुर यानी बाबू कुवर सिंह के जिला शाहाबाद यानी दलिता के पंगवर महात्मा गाधी के हिंदुस्तान यानी अव इस नये समाजवाद में- आखिर कहा है चदरी? जलियावाला बाग से कितनी दूर- वियतनाम के कितनी रीब? कोई भी ठीक ठीक नहीं बोलता । फिर, तू ही बोल-कहा है चवरी? तूने तो देश विदेश के ड्राइंग स्मा मे सजे किसिम किसिम के आइनो मे झाका होगा- मही चवरी को भी देखा। जो सन्क चवरी से निकलकर दिल्ली जाती है चवरी की हरिजन टोली व नौजवानो के घुधुआते पेट से खीच पर वाहर लाया गयी अतडियो की लवाई क्या है (कुछ पता है, वे वय फिर पलीता वन जायेंगी।) ? २ चदना रुपसपुर से चवरी पहुंचने मे ममय को कितना कम चलना पड़ा है। -और क्तिनी कम बरबाद हुइ है राजधानी को नीद
पुलिस की पूनी और न्यायपासिरा पे यूचर साने
बन जाने में।
३
जिस पहले है
मुल
“यायपालिका
उमा रामातीरे लिए या अप रह गया है?
रामवली गुम हो पर सोचती है
और उगी समा म बुध नहीं आ रहा है।
साली गौन आयी है
और सात मोहर उससे छोन पर मिटा दिया गया है-
यह समय के सामन
अवेले, बुत बनी रहती है-उममी बेबाक आखो के लिए
दिन और रात में कोई पक ही रह गया है।
दीना और बंजू और रसुवा यो घाह मे नीचे
"जनता
विभी बहुत बहुत बड़े कुकृत्य के मुजरिम सा
'सिर नीचा दिये बैठा है
और वही कुछ नहीं हो रहा है।
मजदूरी का नाम महात्मा गांधी है
पिर, भूष और तबाही और जोरो जुल्म का क्या-
नाम होगा?
क्या नाम होगा इस नय जनतन और समाजवाद का?
नक्सलबाडी या श्रीमानम बहुत घाटा नाम होगा।
फिर, मही नाम क्या होगा
?
तुझे
मुल्क ने जाने अनजान
जी जान से अधिक चाहा है
तेरी मुसमान को तरोताजा रखने के लिए (खुद भूखा रह कर भी) एक से एक खूबसूरत गुलाब पदा किया है। तेरे फूल को (जब तू नहीं रहेगी) गोद में ले लेने के लिए हरी से हरी घास उगायी है। और तेर होठा को चूमने के लिए वडा से वडा जानदार आईना तैयार किया है । पिर, क्या कमी रह गयी है, कि उसकी सुवह अब तक, शाम से अलग नहीं हो सकी है? ६ ठंडे लोहे पर टगी काठ की घटिया के सहारे आगन के पार द्वार कठपुतली उवशी का यह नाटक आखिर कब तक जारी रहेगा? ७ ~~ यात्महत्या के लिए सबसे माकूल वक्त तब होता है जब रोशनी से अधकार का फक मिट जाता है बोल, फिर क्या बात है-आत्म हत्या कर लेगी? या अधेरे से घबडापा हुआ कोई हाप बढ़ कर तेरा गला दबोच देगा? छिप कर नहीं रहेगी माज सारा हिंदुस्तान चवरी है जिमके हिस्से से रोशनी गायब है . धियाँ- F १६
पार्क में खेलते हुए बच्चे और वे लोग
विश्वनाथ त्रिपाठी
पाक म खेलते हुए बच्चे
आममान का लिया पर रम कर, मुठ्ठियो मे वर वर लेत हैं
फिर मुटिव्यों सोनत है
ता भग्नग पर सक्डो गुब्बारे उड पडते हैं।
हरेक बन्चा अपनी अस्थिर और व्यस्त उगलियो मे
आसमान पर एक चिन बनाता है,
और महसा पूरा आसमान माट गलरी बन जाता है।
मैं अपनी बच्ची की उगली थामे इस गैलरी के
एक एक चित्र को देखने म व्यस्त रहता हू कि
पता नही कहाँ से या जात हैं--लम्बी लम्बी घडियाल जसी
काराम---
बच्ची की हमो-शताब्दिया के पार की धूप हाती है
दि उनको चुरट के धुए के बादल
उस घूप पर मडराने लगते हैं
पता नहीं दितनी सुरगा और तहखानो के स्वामी वे
आममान, पाक और बच्चा सवतो, झोले मे बद करके
घडियार मरीखी कारो में रस लेत है
मस्त और अवाक् म घर लौटता ह और मन के
रगिस्तान म घूमता हुआ था कर सो जाता है
ता काल जवादे ओढे, रात के अधेरे में पता नही कसे
मेर गयन कक्ष में आ जाते है पिस्तौल तान डराते है
मैं घटकते हुए वा वाना एक तरफ अपनी बच्ची को
और दूसरी तरफ अपनी पत्नी को टटोलता हुआ
धमक्यिा और हाहाकार सुनता रहता है।
(प्रतिबद कविता-१)
पूर्वाभास
- केदारनाथ सिंह
रात- --कही कोई मोनार टूटने की आवाज़
इधर आई थी
क्या यह सच है?
सुबह--एक मदिर के पास किसी अजनवी
फरिश्ते के पस पडे दीखे थे
क्या यह सच है।
दोपहर-किसी टूटे दरवाजे से होगर
फूलो के रथा का जुलूस एक गुजरा या
क्या यह सच है?
शाम-विसी बच्चे ने बुद्धमूर्ति के आगे
कपा का एक नया मत्र
गुनगुनाया था
क्या यह सच है?
गालियो से ये जवा प्राग युझ न पायेगी
गस फूसग तो कुछ और भी सहगयेगी
यह जवा आग जा हर शहर मे जाग जठ्ठी है
तीरगी देस के इस बाग का भाग उट्टी है
हबीब जालिब
-
DD दूसरा खंड
विकास
[वस्तु-रूप अन्तर्विरोध और निपेध का निषेध ]
- धूमिल
D विजेन्द्र
Dमलय
- जुगमन्दिर तायल
- कुमार विकल
- लीलाधर जगूडी
- ऋतुराज
श्रीहर्ष
19 श्रीराम तिवारी
।
६
100 "फटसी के प्रयोग में, कई प्रकार की सुविधाए होती हैं । एष तो यह विजिये और भाग गय जीवा की वास्तविक्ताओ ये बौद्धिक अपवा सारभून निष्कपों का मथात जीवन ज्ञान मा, (वास्तविक जीवन चित्र उपस्थित न करत हुए) कल्पना क रगो म प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रकार की मान गभ फरसी बाम्नविक जीवन हो का प्रतिनिधित्व करती है। लेबर वास्तविकता के प्रदीप चित्रण से बच जाता है । यह सक्षेप में, पार गभ पटमी द्वारा, सार रूप में जीवन की पुनरचना करता है। किंतु फटती का प्रयोग कुछ विशेप असुविधाए भी उत्पन करता है, जिनमे से यह है कि पटेसा म कभी कभी जीवन मध्य इस प्रकार प्रस्तुत हाते हैं कि उह पहचानना मुश्किल होता है। यहा तक कि कभी-कभी उनका क्रम स्थापित करने में भी अडचन हान लगती है। प्रतीकात्मत्र रूप से प्रस्तुत होने के कारण, वास्तविक्ता या जीवन तथ्य, अधिकतर अनुमान ही से सवेदनात्मक अनुमान ही से पहचाने जा समत हैं। सोप म फटेती एक झीना परदा है जिसम से जीवन तथ्य पाप झान उठते है।" 0 मुक्तिबोध DOD "उदात्तता अतिचेतनावाटी दिय अनुभूतिया में नही, इतिहास से जूबत हुए मानव के चेतन प्रयासो में है कलात्मक सिद्धि शिल्प के अति सरलीकृत रूपा म नहीं, सजनात्मक भाषा के साथक उपयोग में है। काव्य के इन मूल्या का कोई चाह तो अपन ताप के लिए 'रस का नाम भी द सरता है।" 0 डा नामवर सिंह
लोहसाय
धूमिल
टेलू टोह पर जाता है
और जुगाड जमाता है
पाटा काटे पर फ्टि हा रहा है
कोल मे पील भीड रही है
न मूतभर इधर
न सूतभर उधर
यह रहा कमासुत हथोडा-
बजर हनता है
छेनी सडसी मे ऐसे तनी है
जसे गुदार मास मे घसा हुआ दात
पेंच जहा ढीले थे, घर दिये गये हैं
मशीन बिल्कुल तैयार है
खराद के लिये
मगर कहा है विलाक
नक्शा कहा है
रहा हैं औजारो की बाक
भौर सबसे जरूरी-सधे हुए हाप
रहा है
रोटो क्तिने मशक्कत से मिलती है
इस पैने वक्त
जबकि चीजें बेशुमार
बनली शक्ला मे बदल रही हैं
और लोहा जहा गलत मुड गया है
ठाक कर ठीक हो सकता है
पलद टेम पर नही आता
ठेलू को मिस्त्री से शिकायत है
ठेलू ठोह पर जाता है
धुक्नी की मरी हुयी खाल को निहारता है बुझे हुये कायले छाट पर भाषी घघकाता है लोहसाय चालू हाती है एक एक कर आते हैं किसान- सेतिहर मजूर गाव गिराव से सलाम - रमरम्मी के बाद ठेतू फरगता है फाल-- गटसा, खुरपी, कुदाल हसी मजाक बतकही चलती रहती है इसी के दौरान घर उधर दखवर धीरे से कहता है टेकू वनिहार -'हसुये पर ताव जरी ठीक तरे देना फि धार मुडे नहीं आजक्ल छिनार निहाई ने लाह को मनमाफिक हनने के लिये हयोडे से दोस्ती की है। सब ठठाकर हसते है ठेलू मतलव दहाकर मुसकाता है और आच लहकाता है। "अर्थात" २२ अपने प्रिय कन्नि कॅलिाशनेर विजेन्द्र यहा नछही टहनिया क्ब फूलेगी ये भदैया नामुने निष्कप खडी हैं ये देले यो ही पडे है सब एक अग्निदाह से गुजरने को है यह, सब- जो उठके खड होते हैं उह वैरिको म ठेला जाता है अघाकुप्प पाल कोठरियो म उनकी आत्माए प्रकाश को छटपटाती हैं। ये भूरे भूरे बद्दल अपनी शक्त बदल रहे हैं । जमली बेर सुख होने को है । घने के पक्षी धीरे धीरे वापस जात है-ओ कवि तुम्हारी कविताए कही नहीं दिग्वीं हां-कही, कही, कहीं कभी कभार मरुस्थल मे एक साथ रत गम हो उठती है और पौडने वाली लतर सुख, गघहीन फूलो से लद जाती हैं । इनके नाम हम नही जानत । इनके गाव मने नहीं देखे जिनकी वजह से यह धरती मुगह है वे इतने ज्यादा इतने सधन हैं इतने, इतने-कि उन सबके नाम हम नहीं जानते। पीठ पर ये दास प्रथा के निशान ह । य र दमन के गड्ढे माथे पर चमरत हैं। य निहत्य लोग सन्यदल के विरुद्ध खड़े हैं । य उन सुरक्षादलो के खिलाफ आगे आये। और अपनी चमडी का कवच पहने चिल्ला जाड में ठिठुरे। यहा उत्तराखड के बहुत वडे हिम्स म विल्कुल छम्माटा है। राजस्थान म अरावली की भ्रा चट्टाने है सूखी नदिया के पेटे म मिलवर्ट दिखाई देती है । यहा उजाला कव आयगा, क्व- - २३ कब ये चिप्पिया खत्म होगी वे रचनाए कहा है । वे आवाहन कहा ह आ कवि कवि- उन सारे अराजपत्रित कमचारिया के दम पर हम सब उवासिया लेत हैं हर पत्थर में एक दरार है । हर पड़ की जड साखली है । पट म घूसे लगत। व पुतलिया चमकती है बस तापरा त यहा जलकुभी काली पड़ गई हैं और नई जमीन निकल पान पर पछाई हिम्सा बर्द्धच द्राकार हो गया है। ये जो चट्टाना मे खनिज पढ़ें दिखाई दती हैं य जो डरावनी शक्लें चन गई ह-यह जो रितु अपने छिलके उतार कर पंक गई है । उहें अपन नपन बदलने हाग- जह काख के वालो को यहां जगह दनी होगी, उद अब खनिका की यह भापा समयनी होगी। (जनयुग) वा जग ही क्या वो भम्न ही क्या दुश्मन जिसमे नाराज न हा वो दुनिया, दुनिया क्या हामी जिस दुनिया में सौराज न हो वो आजादो आजादी क्या मजदूर का जिसम राज न हा ये जग है जग आजादी आजादी में परचम के मखदूम मोहियुद्दीन तल
रचना कर्म का स्वाद
. मलय
बइमानी से लदी हुइ हवाओ
गडगडाती धुए की रेखाए दौडती हैं
और पत्तियो के पख छितरा जाते हैं
बिखरे देशो से
दूब की तरह सूखता है हृदय
अघड में फ्मी आखा की दृष्टि
और छात्ती से चिपका
मनुष्य की जिदगी का सरोकार
नमुद्र की तरह गहरा होकर
कपा देता है चेतना का विस्तार
सिर यकाये उकडू बैठने की तरह
हड्डिमा को फमल
लहराकर सेतो से वापस होती है--
और-असत की चिडिया
मेडो पर नाक रगडती हुइ
सडक के किनारे
धूल मे छटपटाती है
पोस्टरों का पूरा प्रकाश
मधेरे की दरकार के साथ आगे आता है
और हाथो मे पडी नीली नसो मे
जजीरो की तरह लपेट लेता है।
पुरसत के ठहाके और भूखता का माहौल
खाली वक्त पर
चलते चाकुआ के बीच
अपना सिर न झुकाने का आकाश
कुत्ते के दातो मे से
लटका होता है
२५
और प्रासो के पल उठने के बजाय सूखे मैदानी म विछे हुए हैं। किसी रोशनी या पत्थर आवाजो से घायल होने के लिए। चुभना समाप्त हाता गया है चौंधियाती भुरभुरी भाषा की रस्सियो के बीच जा किसे नहीं ढूढता और समय वे आघात परते शब्दो के साथ स्याही मे डूबकर करत हैं नौकरी के कागज में छेद । सुरगो वे रिपटोले भेद। और जिन तक पहुचता हूँ या तो धूल साते लोगा को पा नहीं सुनती या मससरा के माथे पास्टरा की दीवाल बनकर सुरक्षित है इस डकारते मौसम में रात का धुआ कितना उठेगा और चिरपिराती नाक के पानी मे सूधने का अय, क्तिनो को एक साथ खडा करगा? कौन जाने? कोन जान । मेरी तारीख के पहले क्सिी सन की वारदात पडी हाती है या नहीं? नही और हा के तमागे से निकला जा रहा हूँ- वशरम की हरा झाडियो के बाच से- पर 1--आखा से अधिक सतक हैं जा रहे है वहा
जहा इतजार की जमो घास के सिर
सफेद होते होते
चौडा गये हैं-
और सूय के उगते प्रकाश को
तनी हुई चादर पर
जिदगी के हथियारा को बाटा जा रहा है
गुजाइश के गवारपन
और उम्र की हसोड दोस्ती से
अलग--
रचना कम का स्वाद
बेईमानी से घिरी हुइ हवाओ के
तौर तरीको मे छिदने के लिए
हवाओ को चीरने के लिए ।
(उत्तराध)
नम शाखो ने लचक्ने की सजा पायी है
एक-एक फूल को तरसा के बहार आयी है
तारे उतरे हैं जमी पर कि खिला है वेला
डाक फूला है कि शोलों को घटा छाई है
है बहुत गम शाख झुकाने वाले
फूल चुराने वाले
तुयको पहचान लिया टूर से आने वाले
- कैफी आजमी
फज्जा
२७
कविता का अर्थ
M
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यह सब कैसे होता है O कुमार विकल मैंने चाहा था कि मेरी कविताए नह बच्चों की लोरिया बन जाए जिह युवा माए शंतान बच्चा को सुलाने के लिए गुनगुनाए । मैंने चाहा था कि मेरी कविताए लाक गीतो की पक्तियो मे खा जाए जिहे नदियो मे मछुआर खेतो म निसान मिलो में मजदूर झूमते गाए । कितु मेरी कविताआ की अजीब ही धुन है खुले विस्तार से बन्द कमरा की आर जाती है उजली घूप मे रहकर अधेर के विम्ब बनाती है। मैं हैरान हूँ कि मेरी पविताए काली हवाआ के बिम्ब कहा से लाती हैं अधी गुहाजा वी हिम गिलाए और वेगवती काली नदिया कहा से आती है तिम प्रक्रिया में शहर जगल म बदल जात है। जिनम हिंसक जानवर दहाडत है। मैं समझना चाहता हू यह मे हाता है यह सब क्से होता है और जब दुनिया पाराम से सा रही हाती है तब नीद की दुनिया से दूर- मेरा हमनाम एक आदमी अन्तर्यात्राए कर रहा होता है । २६ हर यात्रा के बाद वह आदमी मुझे बताता है 'दिइन यात्रामा म- मैंने काई वाली हवा नहीं देखी क्सिी काली नदी म नहीं तरा पिसी जगन या अघी गुहा म नही भटवा मैं भटवा हू इमी कुटिल नगरी रे सहसानो मे जहा आदमी के खिलाफ साजिशें होती हैं। हर यात्रा में मुझे बडी बडी इमारतें मिलती हैं जहा कोइ गोली नहीं चलती कोई बम नही पूटता रितु जहा मुर्दा गाडिया हर रात आती हैं जाहिर है, कुच रहस्यमयी हत्याए होती हैं । इन इमारतो म मुझे दनदनाता हुआ 'एक हिंसव, जानवर-नुमा आदमी मिलता है जिसके हाथा म खजानो की चाबिया और कुटिल नगरी की नाली योजनाए होती हैं।' मेरा हमनाम मुझे बहुत कुछ बताता है कि जब वह इन यात्राओं से लौटता है- तो एक जगल मी दहात उसे महसूस होती है और उसे-- मेरी विताओ के विम्ब याद आते है। मैं उसकी अतकथाओ से डर गया हू और आतक से भर गया है। नही मुये अपनी कविताओ की हिमशिलाआ अघी गुहा और काली हवाओं के सोत नही ढूढने हैं मैं सिफ इन चित्रो बिम्बा से मुक्ति चाहता हू मैं इनकी अघी दुनिया से निकलकर लोकगीतो को सुली दुनिया मे लौटना चाहता हूं। मेरी मा इतजार महागी मैं मा के चेहरे की युरियो पर एक महाकाव्य लिखना चाहता है।
मेरी मा वा चेहरा
गोकी को 'मा' से मिलता है
और अब भी उसका खुरदरा हाथ
कुछ इस तरह से हिलता है-
निजैसे दिन भर की मशक्कत के बाद
वह विजन मे कोइ लोकगीत गा रही हो।
मैं चाहता हूँ कि मेरी कविताए
माने गीतों की पक्तियो में खो जाए
चन्द कमरो से खुले चौपालो मे लौट आए।
(समारम्भ, जनयुग)
[विजन-पजाब को ग्रामीण महिलाओ का गोष्ठी स्थल ।]
यह मजलूम मसलूक गर सर उठाये
तो इसान सब सरकशी भूल जाये
ये चाहे तो दुनिया को अपना बना लें
ये पायाआ की हड्डिग्ण तन चबा लें
कोई इनको एहसासे जित्लत दिला दे
कोई इनकी साई हुई दुम हिला दे ।
-फैज अहमद 'कंज'
पाटा
O लोलार जाडी
रात | तुम पाली सा हो
तारो । तुम अच्ची नम्ल के बीज हा
चाद | तुम हसिया हो
आकाश तुम सेत हो
मैं तुम सबका इस्तेमाल करना चाहता हू
लेक्नि मेर पास चल नहीं है
आवाश।
कुछ लोग तुम्ह हवाई जहाज से जोत रह हैं
रोज
इतने हवाई जहाजो स उडत हुए
य कौन लाग हैं ?
इनमे हमारे गाव का
हमार रिस्ते का
हमारी जान पहचान का
एर भी प्रादमी नहीं है
मैं सोचता हू (क्योकि मरी इच्छा होती है)
कि सारी धरती पर पाटा लगा दू।
(मालोचना)
१२
उड़ान
ऋतुराज
मैंने उन चारो को एक साथ
सिमट हुए बैठे देखा
तारपर।
अगल बगल मा बाप
बीच मे बच्चे । फूलचूसनी चोचें
तोर जैसी पूछे।
पलती हुइ तारें पर।
हा तव ही मेरी नजर पड़ी
उन प्यारे प्यारो पर।
हमारे घर मे भी तो
इसी तरह का झूलना है
बीए मे बच्चो को बठाकर
दूर दूर तक देखना है।
बाहर का दृय
राक्षसो के हाथा में जलता है।
एसे ही एक क्षण मैंने
उह परस्पर के कामकाजी
सम्बधो से पहचाना या
मा बाप के पास होने की गर्माई में
दूर दूर तक उडने की आशा लिये
वे गात गात चुप हो गये।
आंखें सुख से भीगी
१३
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नया मोर्चा
10 श्रीहर्ष
फिर अपने जूतो के फोते कसने लगे हैं लोग
चील की छाया--गिद्ध बने
उसके पहले ही
भीतर का भय पोछ
ट्राम-बसो म सफर करते-खामोश होठ
फिर हिलने लगे हैं।
हवा के बदलते रुख ने माकाश के पजे को
दवाकर कर दिया है-छोटा
हथियारों की नोक-नोड नही सकी
प्रतिवादी मन
ढोल और नगाडो के भीतर की पोल को
खोल दिया बडी आवाज ने
अब कौन सा नया करिश्मा-
भटकायेगा सबको।
चीजो में लगी आग फैल रही है सारे देश मे
मार सबकी पीठ पर पड़ रही है
जुवान वालने वालो की कट रही है।
-
इतिहास के हर पृष्ठ
से
गगे लोग चीख चीखकर पूछ रहे हैं-
क्या वर्षों बाद
लालटेन लेकर-फिर खोजनी होगो रोटी?
जिसकी तलाश ही आदमी को बनाती है खौफनाक । मानसिक गुलाम में लूट खसोट के राज्य में ले रहा हूँ सास जहा बक बैलेस मोर शारीरिक शक्ति का नाम है-नागरिक्ता माजादी-जिसका प्रय किराये के पडित बता रहे हैं कालगल- प्रतिवाद का पुरस्कार है-मौत । देश के हर कोने से खतरे की घटिमा बजने लगी हैं फीरड-माशल अपने तमगो को पा रहा है-धूल नये सामठो के बावर्ची भून रहे हैं मास गुलाम बन जाने के अधड में फसे लोग फिर अपने जूतो के फोते कसने लगे हैं। ("अति') वे फिकरे धन दौलत वाले ये माखिर क्यों खुग रहते हैं इनका सुख मापस मे बाटे ये भी आखिर हम जसे हैं हमने माना जग कडी है सर फूटेंगे खून बहेगा खून भी गम भी बह जायेंगे, हम न रहें, गम भी न रहेगा अहमद वापसी - श्रीराम तिवारी चौबीस साल तक भारतीय सत्तनत से मुक्त हुए आदश की गिरफ्तारी की छाती, डाह और भुजाओ मे सामूहिक अनुभव का मासल प्रकाश देखकर देश का उपभोक्ता मनुष्य-वग डर गया। चहार दिवारी में यह कसे सभव हो गया। आदश काल्पनिक नहीं, प्राकृतिक थे हवा और सामाजिक परिवेश अत्याचार मे घटना की तरह शामिल और सही। मैं सर्वोत्कृष्ट प्रातिकारी पदाथ की वापसी पर जन-समितियो के बलिदानी लोक्ता की जय मे कूद गया और काया शुद्ध कर ली। अब मैं सिफ प्रादमी नही उसका स्वाथ भी हू- मशीन पर कब्जा करने के भापा उपकरण मे आप बहुसख्यक मष्य मेरे लिए नागरिव और चुनाव नहीं चसीयत है ! नीव पर आपसे हाथ मिलाता हूँ स्वागत। (वाम २)
DDD तीसरा खंड
स्वरूपातर
[ सपाटवयानी और प्रगीत ]
- कन्हैया
- शलभ श्रीराम सिंह
D मानसिह राही
- रमेश रजक
- मुशी
- चचल चौहान
0 इब्बार रब्बी
- खगेन्द्र ठाकुर
RAAN
● भारत भारद्वाज
0 अजय तिवारी
D मोहन श्रोत्रिय
DD पूजीवादी समाज मे बलाकार की स्वाधीनता, सम्बधी धारणा एक भ्रम मात्र है, क्योकि ऐसे समाज मे जो पैसे के बल पर टिका हो, जहा मजदूर गरीबी और बदहाली में और मुटठी भर अमोर कामचोरी में अपना दिन गुजारते हो, कोई वास्तविक और सच्ची स्वाधीनता हो ही नहीं सक्ती । क्या लेखक पूजीवादी प्रकाशक से स्वतत्र हो सकता है ? मजदूर वग का साथ देने वाला, सघप, विजय और निर्माण में उसके साथ बढने वाला, ऊचे वर्गों के बदले कामकाजी भावास की सेवा करने वाला साहित्य ही सही अर्थों मे आजाद हो सकता है। 0 डा रामविलास शर्मा DOD"अपनी बिकी हुई मेहनत वे सहारा जिदगी की माकाक्षाए, सामाजिक उलयनी से होने वाले मानसिक तनाव, स्थिति परिस्थिति की क्रिया प्रतिक्रियारमक सम्वेदनाए मादि को अपने मे सम्मिलित करने वाला विचार वेदना महल जन लोक मुक्ति की नयी प्रातिकारी विचारधारा से और भी सशक्त, और भी सम्वेदनमय हो जाता है, तब जिस साहित्य का आविभाव होता है उसमें महान 'मनुष्य सत्य' होता है।" - गजानन माधव मुक्तिबोप । --
मेरी पार्टी
कहैया
मेरी पार्टी
सृजनात्मक जीवन का पथ आलोकित करती है
मेरी पार्टी
द्वद्वात्मक दशन की विभा प्रसारित करती है
जब धनघोर घटाए सक्ट की घिर आती हैं
जब प्रचण्ड आसुरी शक्तिया शोर मचाती हैं
जब आधिया प्रलय की अपना ज़ोर दिखाती हैं
जब काली रातें विनाश के बिगुल बजाती हैं
मेरी पार्टी अटल हिमालय सी तन जाती है
मेरी पार्टी अगम सिधु वनकर लहराती है
मेरो पार्टी
शाति प्रगति के नये क्षितिज उद्घाटित करती है
मेरी पार्टी
सृजनात्मा जीवन का पथ मालाक्ति करती है
एक बीज लयु छाया तर कसे बन जाता है--
एक बिदु किस भाति सिघु बनकर लहराता है-
एक शब्द कसे समग्र भाव को समेटता है-
एकछद कसे अनत छवि विभा जगाता है-
मेरी पार्टी भव विकास की दिशा दिखाती है
मेरी पार्टी भेद सप्टि का सहज बताती है
मेरी पार्टी
विश्व मनुज के दृष्टिकोण नव व्यजित करती है
मेरी पार्टी
समनारमक जीवन या पय मालोक्ति करती है
भीषण बघन शोषण उत्पीडन या पडित है
नयो विमा से विश्व सभ्यता सप्रति मडित है
यम पर भाषारित समाज वदित-अभिनदित है
वग मुक्ति दशन से भव मानव अनुप्राणित है
मेरी पार्टी विश्व सवहारा की आशा है
मेरी पार्टी अटल वग योद्धा की भाषा है
मेरी पार्टी
वचारिक सघर्षों को अनुप्रेरित करती है
मेरी पार्टी
सजनात्मक जीवन का पथ मालोकित करती है
मेरी पार्टी युग दपण है, नूतन दशन है
मेरी पार्टी विश्वप्राण है, एक निष्ठ मन है
समर नीति औ' परपरा है भिन भिन्न लेकिन
मेरी पार्टी केन्द्र बिंदु है, प्रेरक चिंतन है
मेरी पार्टी मटल प्राण रणधीरो की पार्टी है
मेरी पार्टी बलिदानी वीरों को पार्टी है
मेरी पार्टी
विश्व प्राति के तलो को सयोजित करती है
मेरी पार्टी
मजनात्मक जीवन का पय अलोक्ति करती है
('जनयुग')
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ज़िदाबाद-इंकलाव 0 शलभ धीराम सिंह नफस-नफ्स, पदम कदम बस एक पिम दम व दम घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये। जवाब दर सवाल है कि इवलाब चाहिये । इक्लाव । जिनवाद। जिंदाबाद । इक्लाच ॥ जहा अवाक के खिलाफ साजिशें हा शान से जहा प वेगुनाह हाथ पा रहे हो जान से जहा पे लप जे अम्न एक खौफ्नान राब हो जहा कबूतरा मा सरपरस्त एक वाज हो वहा न धुप रहेगे हम कहगे, हा कहेंगे हम हमारा हक । हमारा हक । हम जवाव चाहिये । घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये । जवाब दर सवाल है कि इलाब चाहिये। इक्लाव । जिंदाबाद ॥ जिंदाबाद । इक्लाब। यकीन आख मूद कर किया था जिन पे जान कर वही हमारी राह मे खडे हैं सीना तान कर उही की सरहदो मे कैद हैं हमारी वोलिया वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियां जो इनका भेद खोल दे हर एक बात बोल दे हमारे हाथ मे वही खुली किताव चाहिये । घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये । बवाव दर सवाल है वि इकलाब चाहिये । इकलाब जिंदाबाद। जिदावाद । इक्ताब ।। ४२ वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बै वतन उही की माह में असर, उन्हीं की लाश बे-कफन लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके करें तो क्या करें भले न जी सकेंन मर सकें सियाह जिंदगी के नाम जिनकी हर सुबह व शाम उनके आसमा को सुख माफताब चाहिये । घिरे हैं हम सवाल से हमे जवाब चाहिये। जवाब दर सवाल है कि इक्लाब चाहिये । इक्लाब। जिंदाबाद। जिंदाबाद । इक्लाब ॥ हे शियार । मह रहा लहू के रग का निशान ए किसान होशियार । होशियार नव जवान । होशियार । दुश्मनो की दाल अब गले नहीं। सफेदपोश रहजनो की चाल अब चले नहीं । जो इनका सर मरोड दे गरर इनका तोड दे वह सरफरोश आरजू वही सवाब चाहिये। घिर हैं हम सवाल से हमें जवाव चाहिये। जवाब दर सवाल है कि इकलाब चाहिये। इक्लाव । जिंदाबाद। जिंदाबाद । इक्लाब। तसल्लियो के इतने साल बाद अपने हाल पर निगाह डाल, सोच बोर सोच कर सवाल कर किधर गये वो वायदे ? सुखो के ख्वाध क्या हुए? तुझे था जिसमा इतजार वो जवाब क्या हुए तू इनकी जूठी बात पर न और ऐतबार कर कि तुझको सास सास का सही हिसाव चाहिये । जबाब दर सवाल है कि इक्लाम चाहिय । इक्लाब जिंदावाद ।। जिंदाबाद । इकला। "क्यों"-४ चल अवाम के लश्कर चल... मानसिंह राही चल आधी चल अपड चल ॥ चल तूफान बवण्डर चल ।। चल गरीब के लकर चल ।। चल अवाम के लश्कर च ॥ नारी से गरीबी नहीं मिटेगी, चल अब इस पर करें अमल ॥1॥ हर दिन नई नई बातें, हर दिन नइ नइ घातें। नई रोशनी लाने वाले, ले आये काली रातें। इस परिवतन के नये दौर मे चलो मचा उपल पुथल ॥०॥ चल अवाम के लश्वर चल चल गरीब के लश्वर चल || नारा से गरीबी नहीं मिटगी- भटक रही दर दर तरुणाई, भासमान छूती महगाई । जितने गडढे पाटे जाते उतनी गहरी होती साई ।। लूट व शोषण के डेरे हैं, झपट रहे हैं टिड्डी दल ॥०॥ चल प्रवाम के लश्कर चल- छीन ले रोटी छीन ले काम, विना लक्ष्य कैसा विधाम धन व धरती बट के रहगी, भेद को खाइ पट के रहेगी फिर आस्तीना के सापो के फन डालो रे इस बार कुचल || चल अवाम के लश्कर चल-- बहुत सह लिया अब न सहेंगे, जो कहना है साफ कहगे नये दौर में चल न सकेगा, बढा कारवा हक न सकेगा ठोकर से राह बना डालें डालें युग को तस्वीर वदत चल प्रवाम के लश्कर चल- (जनयुग)
हड़ताल का गीत
D रमेश रजक
आज हम हडताल पर है
हड्डियो से जो चिपक कर रह गयी
उस खाल पर हैं।
यह खबर सबको सुना दो
इश्तहारो में लगा दो
हम लडाई पर खडे हैं
ठोस मुद्दो पर अहे हैं
तुल गये हैं जेल भरने के लिए
इस हाल पर हैं।
अब न ये जत्थे रुकेंगे
अब न य बनर झुकेंगे
हर सिपाही जोश में है
और पूरे होश में है
किन्तु जो खामोश है उनके लिए
भूचाल पर हैं।
आग ये आसमान की है
मान की है, बान की है
भाग ये इमान की है
हर दुखी इसान की है
मुटिठयो की माग के तेवर
हमारे माल पर हैं
आज हम हडताल पर हैं।
(जनयुग)
४५
राह आगे खुलेगी! D मुशी मागे अभी और आगे वहा पर अंधेराक्टेगा लहू भी गिरेगा जहाँ पर- वही, हा वही बात मागे खुलेगी। यहाँ क्या यहाँ अपने से अजननी हैं, अधेरे में चाकर पहा के नवी हैं। वही शान है, आन खोटी खरी तो वही पर तुलेगी! गिरा कोई पीछे गिरा, तो गिरा वह, गजव मौत की बात को यह नयी राह, नयी जिंदगी से सहादत के मडप मे भावर पडेगी। भागे अभी और भागे वहा पर लहू भी गिरेगा जहा पर- वही, हा वहीं राह आगे खुलेगी। (जनयुग) फिर अगली स्त की फिम करो जब फिर इब बार उजडना है इक फस्ल पकी तो भर पाया जब तक ता यही कुछ करना है -फैज अहमद 'फैन'
घन-पुरुष के प्रति
चचल चौहान
धौंकनी की फूक
से
जव लोहा लाल होता है।
उस समय तगडी भुजाओ से
हुई धन मार से
पिटता हुआ दिक् काल होता है
कि कमाल होता है।
हम जानते हैं श्रम के बिदु का भी मूल्य ।
लोहा बदल कर
वस्तु बनता है
ओ धन-पुरुष
तुम्हारा पराक्रम ही
इतिहास खनता है
तब टूटता है
जो कुछ झूठा बाग्-जाल होता है।
कि कमाल होता है
हम जानते हैं सत्य के सिधु का भी मूल्य ।
।
(प्रतिबद्ध कविता-२)
झुग्गी वालों का गीत
0 इब्बार रब्बी
हम पच्चीस साल से दरवाजे पर खडे हैं
किरायेदार अदर पसरे पडे हैं
तुमने तो कहा था-
"मामो इस किरायेदार को निकालें
तुम्हारा मकान तुम्हे मिलेगा"
हम उससे भिड, नब्बे साल तक लडे
और निकाल कर ही माने,
अब हमारा ही प्रवेश निषेध क्यो?
क्या फ्क है नये और पुराने किरायदार भ
हमें तो नहीं सौंपा उसने हमारा घर ।
जब उसका सामान जा रहा था
तुम्हारा आ रहा था
हम उसका विस्तर लाद रहे थे
तुम्हारा ढो रहे थे
हम तो नही ये सफेद खादी मे सलामी लेते हुए
हम तो नहीं थे बगुलो की तरह सत्यमेव जयते रहते हुए
हम पच्चीस साल स वही के वहीं खडे हैं
अपने ही सीने मे खूटे की तरह गडे हैं।
हम अधिक मन उपजा कर टाप रहे हैं
तुम उपवास के चमत्कार समझा रहे हो
हम उत्पादन बढा कर होफ रह है
तुम सस्वर निर्यात धमका रहे हो
हम पेट पर डिग्रियां लाद रहे हैं
तुम योजना के घोह हाँक रहे हो
हम मोर्चे पर दम तोह रहे हैं
तुम वीरचक्र उभाल रहे हो
४८
हम मातृभाषा म खीज रह हैं
तुम अग्रेजी म मुस्करा रहे हो
हम क्त्तव्या में डब रह है
तुम अधिकारा मे नहा रहे हो
तुमने भाषण दिया हमने सुना
तुमने वोट मागा हमने दिया
बदने मे हमने कुछ नहीं लिया
तुमने हमार लिए कुछ नहीं किया
हम पच्चीम साल से इतजार मे खडे हैं
हलुए को कडाही मे भुनगे-से जड़े हैं
हर बार सुबह धोखा होता है
जो अपना बन कर आता है
वही लाठी गाली बरसाता है
जिसे भी सौंपत ह अपना विश्वास
वही हमार खिलाफ चालान लेकर आता है
नही चुभते तुम्हारी आख म 'डिफेस' और 'कला'
हमारी झुग्गी गिराने आते हो वार-बार
पांच साल में एक वार करते हा नमस्त
पिर दरवाजा बद भीतर से
पव तर खडे रहें जनवरी म ठिठुरते
जून मे जलते, जुलाई में भीगते
कब तक पडे रहे
सन्यिो से मिला नहीं प्रवेश
सदियों से सोय नही, हसे नही
बद हैं बिडकियां डयोढी तर म घुसे नही
सड बड सूज गय पाव
पाखें हुइ फीलपाव
इम पच्चीम साल से वही के वहीं गडे हैं
नपनी ही दहलीज पर परायो की तरह पडे हैं ।
(युग परिबोध
दर्द का ज्योतित गर्जित समुन्दर 0 खगेद्र ठाकुर उहोंने पाहा या आदमी के दद की मीनार पर अपनी शान का दीपक जलाना, कितु आदमी पा पद नहीं होता इट या पत्थर का टुक्हा, वह हाता है उत्तप्त तरल जीवन रस, जो बह-बह कर, मिल मिल कर एक दूसरे से एक दिन समुदर बन जाता है । हमन देखा उस दिन आदमी का दद हाता है लाल, पूर्व भितिज उगत सूरज की तरह, आदमी के सून की तरह, खून जब वहता है, ता रग लाता है, दद जव उठता है तो कहर ढाता है और दद चल पडता है तो तूफान लाता है। हमने देखा उम दिन सूय किरण से पालोक्ति आदमी के दद का लाल समुन्दर चलाभाया था उमड़ता राजपथ पर। वह दद जिस पर न जाने कितनी गोलिया दगी, वह दद झोका गया जिसे लहकती आग म, वह दर जो हर चोट, हर आघात के वार अधिक जीवत अधिक घारदार बन कर निकला। r तुमने देखा -
रक्तिम समुदर आया था
उस दिन तुम्हारे द्वार,
बढ गया है भागे
वह तुम्ह देकर डाक,
रक्तिम समुदर माया था
मानो समय का सूय आया था,
अपनी लाल किरणो से
चमकती रेखाए खीच कर
बना गया है रास्ता तुम्हारे चलने का,
तुमने देखा उस दिन
एक दद जब दूसरे से मिलता है
तरे करुणा नही ज्योति पैदा होती है,
और उस दिन जो आया ज्योति ममुहर
वह ले जायेगा तुम्हे उस जगल के पार नक
वह ले जायगा तुम्हे मुक्ति के द्वार तक
हमने तो देखा यह भी कि
ज्योति का उमडता समुदर देग्व कर
भाचक थी हवा, भौंचक था आसमान
जो वहा बैठ कर इतिहास के कचरे पर
मायूस, चिन्तित सहला रहा है
अपने चेहरे की कुटिल रखाए,
स्तब्ध है वह सोच कर
कि इतिहास में नहीं हुआ है
ऐसा कोई अगस्त्य
पी जाए जो
वह दद का ज्योतित, गजित समुदर
जिसने पानी की चमर छा गयी
अनगिनत आदमियो वे चेहरा पर ।
(जनपुग)
दर्द का ज्योतित गर्जित समुन्दर D खगेद्र ठाकुर उहोने चाहा था आदमी के दद की मीनार पर अपनी शान का दीपक जलाना, वितु आदमी का पद नहीं होता ईट या पत्थर का टुकडा, वह होता है उत्तप्त तरल जीवन रस, जो वह-बह कर, मिल मिल कर एक दूसरे से एक दिन समुदर बन जाता है । हमने देखा उस दिन आदमी का दद हाता है लाल पूर्व क्षितिज उगत सूरज की तरह, आदमी के खून की तरह, खून जर बहता है, ता रग लाता है, दद जव उठता है तो क्हर दाता है और दद चल पडता है तो तूफान लाता है। हमने दखा उम दिन सूय किरण से पालोकित आदमी के दद का लाल समुन्दर चला आया था उमडता राजपथ पर। वह दद जिस पर न जाने चितनी गोलिया दगी वह दर झोका गया जिसे नहकती भाग म, वह दर जो हर चोट, हर आघात के बार अधिक जीवन्त, अधिक धारधार बन कर निकला। तुमने देखा -
-
रक्तिम समुदर आया था
उस दिन तुम्हारे द्वार,
बढ़ गया है माग
वह तुम्ह देकर डाक,
रक्तिम समुदर आया था
मानी समय का सूय आया था,
अपनी लाल किरणा से
चमकती रेखाए खीच कर
बना गया है रास्ता तुम्हारे चलने को,
तुमने देखा उम दिन
एक दद जब दूसरे से मिलता है
तोरणा नही ज्याति पैदा होती है,
और उस दिन जो आया ज्योति ममुरर
वह ले जायेगा तुम्हे उस जगल के पार नक
वह ले जायगा तुम्हें मुक्ति के द्वार तक
हमने तो देखा यह भी कि
ज्योति का उमडता समुदर देख पर
भाचक थी हवा, भौंचक था आसमान
जो वहा बठ कर इतिहास के कचरे पर
मायूस, चितित सहला रहा है
अपने चेहरे की कुटिल रेखाए,
स्तब्ध है वह सोच कर
कि इतिहास में नहीं हुआ है
ऐसा कोई अगस्त्य
पी जाए जो
वह दद का ज्योतित, गजित समुदर
जिसके पानी की चमक छा गयी है
अनगिनत आदमिया के चेहरों पर ।
(जनयुग)
मार्क्स के प्रति C अजय तिवारी माक्स ? तुम अभी जिंदा हो अपन विवेक मोर क्टुतम सघर्षों में तुम्ह आज भी दश निकाला दे सकते हैं वे लोग कि उन लोगो के लिए तुम्हारा अथशास्त्र सतर की तरह मूलता रहता है और गूजता रहता है उनके कानो मे और चीसता रहता है एक शोर वे लोग तुम्हारी पुस्तकें पढने वाले बुद्धिजीवियो को कैद कर सकत हैं चिली देश की तरह और तुम्हारी पुस्तकें जला सकते हैं वे लोग कुछ भी कर सकत हैं अपनी झुकती हुई रीढ धनुप की तरह ताने रहने के लिए कुछ भी कर सक्त हैं वे लोग उहें डर है कि कही उनके चेहरे तुम्हारे विवक की आच मे झुलस न जाए सचमुच डरते हैं वे लोग तुम्हारे नारे पर इकटठा होत हुए दश और देशो के मेहनतस्शा से और तुम उन्ही लोगा म जीवित हो जीवित हो आज भी। (जनयुग)
एक विश्वास को हत्या
9 भारत भारद्वाज
क्या पक पडता है
'क'के 'ज' में बदल जाने से
रामू आज भी दफ्तर की खाक छानता फिरता है
बदूकें आज भी
उगलती हैं गोलिया उसी रफ्तार से
गाडियो की रफ्तार भी वहो है
तुमने भूल की थी सडक को चौडाई देखकर
अस्पताल के गेट पर पहुचकर दम तोडने से ही
क्या यह साबित हो जाता है कि डाक्टर डयूटी पर नहीं था
भूख से तुम्हारी मौत हुई या बीमारी से
इसका क्या है सबूत तुम्हारे पास ?
क्या तुमने नहीं मुना
गरीबी ने सावजनिक घोषणा कर दी है
देश छोड़ने की
और लाल किले से फिर ऐलान हुआ है
दूसरी आजादी का।
क्या पक पडता है
मुननी पडी यदि पिडकी
जाज भी तुम्हे अपने बास को बीच में
या श्याम लाल गुप्त मर गये
देवा का झडा नहीं झुवा ।
नवसाम्राज्यवादियों के नाम --- D मोहन श्रोनिय तुम्ह पता है वहा की दूर की नोक कितनी चमवती थी फसलें कैसे लहराती थी/स्कूल जाते बच्चे क्तिने सुदर लगते थे। तुम्ह लोगा का सुश रहना अपने रास्ते चुनना असह्य हो जाता है अक्सर बार बार इतिहास गवाह है और तुम/इतिहास को नकारने पर तुले हो शाति नाम पर/भडियो से शाति की बातें सुनकर अव अचरज नही हाता/लुच्चों को अतिम गरण नतिकता/हाती है। हमे पता है तुम्हारे मस्त्रागार कभी खाली नहीं होगे न वद होगा/नये बाजारा मडिया की तलाश का सिलसिला बढ़ती ही जायेगी हथियारा को पैदावार अनाप शनाप स्वतनता की (देवी की) प्रतिमा तुम्हारा एक मुसोटा है जिसे/योर झोर कर दिया है तुम्हारी हरकतो ने वियतनाम, क्यूबा, बोलिविया/चिली, कत्रोदिया बागलादेश और अगोला तुम्हारे वहशीपन के कीति स्तम्भ हैं । जिस तरह धम को खतरे में बतावर पड और मौलवी/लोगो के गाबदूपन का फायदा तुम डर/दिखाते हो लुटेरों को गाषण के खत्म हो जाने का उहे सगठित करते हो जासूस छोडने होदिंग करवाते हो और अचानक भरलारें पलट दी जाती हैं प्रतिरोध हाने पर छटा वेडा सातवा वहा फरम जहाज/बम भोर सगीनें वम और सगीन/जिस्म के टुपले कर देती हैं वेगव/मनोवल नहीं तोड़ पाती/यह तुमन देख लिया है दिन रात उठाते हैं समझ नहीं पाये हो मनोबल जो माटी को गप से पैदा होता है पनपता है इसानी घराबरी भोर लक्ष्य निष्ठा/जिसे सींचती है तुम्हारी वहशियाना हरपत जिसे मजबूत परती हैं एक दम इम्मान तुम्हारी नसें हर वक्त तनीरहती हैं और उनमन वदूर पोर मशीन बनाने में कोई नाम पर नहीं तुम्हारी बवरता ने क्लिोरो का/पक्रया युवक यना दिया द प्रतिश मागावान्/गारियो की मोमलता बदल गयी फौलादी साहस मे बूढो की शिराओं म प्रवाहित हाने सगा/और इसीलिए माटी येलोंदे तुम्हार सैनिन स्वदा सौटने में हो उठेअब तो तुमने यह भी सुर ही लिया हागा वि कटाली पाडिया/उगने लगी हैं वहा (सून वी साद अपना रग ता दिपलाती हो) तनी कटीली सिगोना यो भेद जाए युद्ध पे (तुम्हार) सार अत्याधुनिक | सागर पर लानत र दी उन्हनि उनके मनाउन मनोबल जिसे तुम बुचल नही पाय : नये स्थल/लडाई के ऐसे मुल्क जहा वे लोगा/का मनोदन मां या जिह तुम्हारा डालरक्मीना : तुम्हारी यह इच्छा कि जहा जन- वहा वहाँ बस्तियां स्कूल raar में बदल जाय/अव पूरी नहीं ह- ताकत का जवाव ताक्न - इकटठे हो रह हैं एनिको और लातीनी यमरीश:27 एक साप
आदमी का दर्द
0 देवेन्द्र उपाध्याय
सूने पहाड के जिस्म को
रौंदता कोहरा
बरसाती नदी की तेज धार में
सरपट भागत रपटोले पत्थर
और पत्थर
दूर कही आसमान म चमकती
बिजली
यादा
बोनी हो जाती है
हर बार चीड बनी हवाआ मे ठिठुरता
मौसम का हर पल (बच्चो की तरह)
रात की खामाशी
वार बार टूट जाती है
दूर खडे सहमे जगल
मार गया
कोई धारदार नोकीले हथियार से
रिसता हुआ हर पेड का दद
आदमी के दर्द के
बहुत पास चला आता है।
DDDD चौथा खंड
गुणान्तर--एक
- वेणु गोपाल
9 ज्ञानेन्द्रपति
- मोहदत्त
अशोक चक्रधर
10 पकज सिंह
0 अरुण कमल
D आलोकधन्वा
चन्द्रभूषण
उदयप्रकाश
श्यामसुन्दर मिश्र
१७
- 000 किसी शुभ बीज भाव की प्रेरणा से प्रवर्तित तीक्ष्ण मोर उग्र भावो को सुदरता की मात्रा उस चीज भाव की निविशेषता और व्या पक्ता के अनुसार होती है। जैसे, यदि कपणा किसी व्यक्ति की विशेषता पर अवतरित होगी--कि पीडित व्यक्ति हमारा कुटबी, मित्र आदि है तो उस फरणा के द्वारा प्रयतित तीक्ष्ण या उग्र भावो में उतनी सुदरता न होगी। पर बीज रूप मे मतस्सशा में स्थित करुणा यदि इस ढव को होगी कि इतने पुरवासी इतने देशवासी या इतने मनुष्य पीडा पा रह है तो उसके द्वारा प्रवर्तित तीक्ष्ण या उग्र भावो का सौदय उत्तरोत्तर अधिक होगा। यदि पिसी काव्य म वणित दा पात्रो म से एक तो अपने भाई को अत्याचार और पीडा स बचाने के लिए अग्रसर हो रहा है और दूसरा किसी बडे मारी जनसमूह का, तो गति में बाधा डालने वालो के प्रति प्रदर्शित क्रोध के सोदय, के परिणाम मे बहुत अन्तर होगा। -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल . JO 'आज का कवि तब तक अपनी चेतना का संस्कार नहीं कर सक्ता तब तक वह वस्तुत आत्मचेतस हो ही नहीं सकता, जब तक वह विश्वचेतस् न हो। इसी बात को हम दूसरे शदो में इस प्रकार महेंग कि कवि हृदय आज के जगत के मूल द्वद्वो का अध्ययन करें अर्थात् अपनी सम्पूर्ण चेतना द्वारा प्राश को वास्तविक्ता की तह में घुसे और ऐसी विश्व दृष्टि का विकास करे, जिससे व्यापक जीवन-जगत की व्याख्या हो सके और अतजगत के महत्वपूर्ण आदोलनो का बोध हो। तभी उसका विषय सक्लन सम्य धी विवेक भी अधिक पुष्ट होगा। तभी हम आसपास फैली हुई मानव वास्त- विक्ता के मार्मिक पक्षो का उद्घाटन और चित्रण कर सकेंगेxxxउस बौद्धिर प्रतिभा र फ्लस्वरूप सवेदनारमक ज्ञानात्मक सवेदन अधिक पुष्ट होंगे और अनुभूति का पान प्रेरणा प्राप्त होती जाएगी।" -~-मुक्तिबोध १८ बात सिर्फ इतनी है 0 वेणु गोपाल आप बठे हो । खडे हो । लेटे हो । हाय बढ़ायें। या न बढायें। हरे हालत म काली जजीर को महसूमा जा मक्ता है । घुआ जा सकता है। जो पखो में भी । खोपडी मे भी। कुण्डली मारे है और थोबडे पर भी ।फिर भी माप बुद्धिजीवी विस्म की कोई चीज होने की वजह से मासूम बने रहगे। पूछेग- आखिर इस सारी छटपटाहट का सदभ क्या है ? और प्रासगिक ? बात सिफ इतनी है मित्र कि माप है और जजीर हैं और ऐन सिर पर बगावत के बादलो को गडगडाहट है। क्योकि करोडा बफ-निगाहे अब धधकने लगी है। क्मान-पीठो ने बोरे गिरा दिये हैं और तन कर सीधी हो गयी हैं। लुजपुज भिखारी हाय फौलादी पूसों में बदल गय हैं। सारा निरीह गाय वजूद मरने मारने का लसमसाने लगा है।
मंतर
जायें माम। उन मोगा को देखिए।
परपर भी फॅरन हैं। ताजगीर को एकाप बडी
पिटरा जाती है और-बिना नाम फ्तेि में
मौर बिना
प्रधान मत्री से भाषण
पदर अगस्त हा गाताहै।
"पुरुष"
पर मापा
fort मागे गुमामोनिया
मा
maraरोमी।
अगीगारा
१.
अपना बघवा 0 ज्ञानेन्द्र पति स्साले तू इसके बाद मालिक ये लड बघवा के नाम पर हसत उसे रोडो से मारते और पुकारते हाय रे वाघ । मिमियाता भी नहीं है | बघवा उसी तरह गोहाल था नाला साफ करता मुस्कराने की काशित करता लेकिन इस कोशिश में उसके उपरले उठे होठ के नीचे से झाकते मसूढ़े और भी निरीह हो उठते मालिक यानि मुखिया जी अक्सर उसे झिडक्ते पच का पुतर हाके भी इत्ता वोदा बाहे है और अइहास करते बधवा का बाप दुसाध टोली का मुखिया या पचायत में चुनाव में वह पच के लिए खडा हुआ था मालिस ने उसकी पीठ ठोकी थी लेकिन उसे अपने टोले के भी वोट नहीं आये एसा क्यो हुमा यह कभी न मुखिया जी समझ पाये न बघवा का बाप मुखिया जी अक्सर बघवा के बाप को गरियाते स्साले तू कमनाशा मे नहा के प्राया है फिर जब बघवा के बाप को हफनी हो गयी बधवा ही काम पर आवे लगा बघवा का बाप अपनो झोपडी के सामने बैग दिन भर मुत्ते की तरह हाफ्ता रहता कभी कभी मालिक के दुआर पर आता और बघवा को उसकी सुस्ती के लिए हुमच कर लताडता अरे मुडगिरवा साला मालिक वा नीमक तो सघाओ बधवा के होठ उसो तरह खुले रहते उसके झाकते मसूबे पर बेचारगी का रंग धीरे धीरे गाढा होता जाता और वह किसी दुबले प्रेत की तरह काम करता हुआ भी गायब रहता उस दिन जब कलेसरा की दादी उमे झिंझोडने लगी वह बड़ा या वहा से आने और यह समझने म उसे थोडा वक्त लगा कि उसका बाप अब लारा हो गया है अपनी झोपडी के सामने उक्डू पडा और उसके हाफने के लिए अब तक सुले मुह में बेटे के बहाने पूरी दुनिया के लिए एक
गाली अटकी हुई है
जिस दिन इस गाव ला सबसे वहा परज घटा उस दिन भी बपदा के
खुले मसूढ़ो पर दीनता की यही सलयात धमन पी बल्लि पुष
भषिर' गाढी माय में इलाज के लिए मालिक स वह एक रपया
लेने पाया था जिस मुट्ठी में दवाये जय वह दुआर में उतर रहा था तभी
वह घटा था जिसकी वजह पी अटालें गांव में लोग अभी तक लगाते हैं
मुखियाजी न अपनी आदत के मुताविय उस हाया था
अरे मुन मादररिया पल उनरे मुह में भूटपर रह
गय थे लोगान बघाबी पलटती पाली पीठ दसी थी और
उस पर घमाती पसीने को धारिया मासिर मुन होने
ये पहले भी उसरे उठे पजे ये बनले मोघ या नहीं ममा पाये थे न
उसने सुल ममूढा पर उपलायो सूस्वार पमप या जमीन पर
गिरने से पहले बघया के कठ म फमी गुर्राहट भी क्वल
उन्होंने ही मुगी थी।
उत्तराध-६
जरा हिद में रुख हवाआ वा देवा,
जा मुमकिन हा तो वक्त को नन्ज परखो।
वो हो जेल, गोली हो, पासी हो, जा हा,
यह इनक्लाव आया, आया ही समयो।
रघुपति सहाय 'फिराक'
.
वापसी
D मोहदत्त
एक लम्बे अर्से बाद,
अपने घर में वापसी,
'कितनी अच्छी लगती है,
और कितनी बुरेदती सी,
'इसका अहसास मुझे हुआ,
जब मैंने अपने चेहरे को,
झुरियों को, तपती हुई भूड की,
रेतीली दरारो मे देखा।
जब फूस पतील के एड मे से,
'निकल कर जलती हुई रेत पर,
एम खरगोश सरपट दौडा।
मुझे लगा वह मेरा वचपन पा।
तब रेत के कण जलते हुपे,
मेरी आखो मे चुभने लगे थे,
और एक कहानी बनने लगी थी।
सब कुछ वसा ही, उतना ही पुराना,
जजर टूटा टूटा सा, गिरागिरासा,
वैसा ही कबड खाबड साखेत,
दूर कही सूखा सा बरगद का पेड
वही जाने पहनाने, भूले विसरे से,
मटमले जिस्म, बच्चे औरतें।
इतने लम्बे असे मे-
सभ कुछ बदल जाना चाहिय या,
मगर जस्म प्रमी हरे हैं।
एक मुट्ठी दाना का उगाने के लिये,
६३
गानी अटको हुई है
जिस दिन इस गावासबसे बड़ा बरज पटा उ"
मूले ममूढा पर दोनता को वही सनयौन पमर पी
घधिय गाढ़ी माय में इतार के लिए मालिस में
नने आया था जिस मुद्रो में दवाये पर वह दुसर
वह पटा था जिसकी वजह की अटात गाव का
मुमियाजी ने अपनी भारत ने मुनाबिर उसे हवा
अरे मुन मादरवरिया पर उनके मुह में पुटप
गयय लोगों ने बाकी पलटतो ती पीठ
उम पर चमकती पसीने को पारियो मालि
ये पहले भी उमरे उठे पजे से बसे कोमबार
उसरे खुले मसूढो पर उपतापो सूस्वार पमम
गिरने में पहले रपवा के क3 में फनी गुर्राहट
उन्होंने ही मुनी पो।
जरा हिन्द म रूप हवाआमा
जा मुमकिन हो तो यती
वो हो जेल, गोती हो, फासी
यह इनकलाब आया आया।
रघुप
ठेकेदार भाग लिया
D अशोक चक्रपर
पावडे ने मिट्टी बाटने से इकार कर दिया
पौर परपुर पर जा चंठा
एक पोर
एसे मे तसले का मिट्टी दाना
कसे गवारा होता
काम छोड आ गया फावडे वी बगल में
पुरमुट की कदमताल रुक गई
बुगल के इशारे पर तत्काल,
झाल ज्योही कुढती हुई, रोती बडबडाती हुई
आ गिरी भोघे मुह
रोडी के ऊपर।
'मासिर ये कब तक?
कब तक सहगे हम
गुम्स म ऐंठी हुई
काम छोड वठ गइ
गुनिया और वमूली भी
इंटो से पीठ टेव
सिमट माया नापासूत, फनी के बराबर ।
'आखिर कब तक?
कब तक सहग हम
?
गारे म गिरी हुई बाल्टी ता
वहीं को वही खडी रह गई
ठगी सी।
घसी हुई बालू में
सबल अडी खडीपी
सो पड़ी मेहनत मजूरी,
बसा ही बदबूदार पसीना।
वही वाजर की रोटी और साग।
यही अधी वुझ्या पा पानी।
लगता है कुछ नहीं बदला।
नहन म यादा की ताजा,
सरोच-यही अपना सा।
लगती है सपना सा,
अपने घर में वापसी।
वही फौजें, वहीं सगीनें, वही रामशीरें,
वही जल्लाद, वही वार वही जजीरें।
जग्म सीने का हसी म न दिपाओ हमसे,
रहबरो, आज निगाह ता मिला हमसे ।
Orफी आजमी
ठेकेदार भाग लिया
0 अशोक चक्रधर
फावडे ने मिट्टी पाटने से इकार पर दिया
और वनरपुर पर जा बैठा
एव मोर
१
एसे म तसने दो मिट्टी ढाना
कैम गवारा होता
काम छोड आ गया फावडे की बगल मे
धुरमुट की कदमताल रुक गई
बुढाल वे प्रशारे पर तलास,
झाल ज्योही कुढती हुई, रोती बडबडाती हुई
मा गिरी औंधे मुह
रोडी के ऊपर ।
'पाखिर यब तक?
कब तक सहगे हम
गुम्स म ऐठी हुई
काम छोड वठ गई
गुनिया और वसूली भी
इटोस पीठ
सिमट आया नापासूत, पन्नी के बराबर ।
'आखिर ये कर तर?
क्ब तक सहगे हम
7
गार म गिरी हुई बाल्दी तो
वहीं की वही खडी रह गई
ठगी सी।
घसी हुई बासू मे
सबल अड़ी खही थी
६५
कई वार जालिम ठेकेदार से लडी थी
'आखिर ये कब तक
7
पब तक सहगे हम
"
'मामला ये अकेले झाल का नहीं है
घुरमुट चाचा!
बुदाल का भी है
वन्ती वसूली का
गुनिया का, नम्बत का
मोर नापासूत का भी है।
क्यो धुरमुट चाचा ' फावडे ने
जरा जोश से कहा
और,
ठेक पडी हथेलिया
कसने सगी क्सती गई
एक साथ उठी भासमान में
आसमान गूज गया
काप उठाहरकर
ठेकेदार भाग लिया टेलीफोन करने ।
पहल ५
शहनामे लिखे हैं सररात की हर इंट पर
दफ्न है हर क्न मे अफसाना तेरे शहर मे
.
.
.
जुम है तेरी गली मे सिर झुका के गुजरला
कुफ है पपराव से घबराना तेरे शहर में
-~-कैफी आजमी
हम इतिहास के बेटे हैं
10 पकज सिंह
एक कसे हुए ढोल की तरह बजायी गयी
दुखो से भरी हुई हमारी आत्मा
मार खाती रही पीठ और रौंदी आखे
समयहीन सस्कति में एक भूरी उदासी भीगती रही
पानी हो रहा है हर तरफ पुराने ईमान का नमक
इस बढते हुए तापमान में बचाओ कुछ जरूरी चीजें
अगर वचा पाओ
बचायो स्वाधीनता जो हरियाली है भादो मे बची
बचामो एक कोपल जो विपरीत मौसमो के खिलाफ भडी है
भीतर कही आहटो से थरथरातो हवा में
चुप्पिया मे दबी चीखो तक जाने दो दौडते हुए खून को
और फिर वही तुम्हे कहेगा
कि अब कुछ भी बचा पाने के लिए
इरादो और हायों के एक जगह इकठ्ठा कर
उहें देना है एक शब्द हमला'
बटोरो एक बार अधेरे मे गुम होते हुए सपना को
अपनी मानवीय लालसामओ को रोशन करते हुए
पोछो उनके चेहरे से गर्दो गुबार
पहा तुम आदमी हो और मादमियो की तरह जीना चाहते हो
खुरा क्साइया के खिलाफ लडते हुए
हम इतिहास के बटे हैं अपनी मिट्टी की सुगध
हम नौद को गुजाती जाग हैं
इम अधेरे और जगंल मे फैलती हुई आग है
"मामोधना"
यात्रा - अरुण कमल रात के अधेरे मे दौडती जाती है पजाब मेल खिडपियों से छुट-घुट पर गिरते हैं रोशनी के पट्टे हवाए लोह प्रहरियों सी बजती तलहथियो की आड मे बगलगीर मुसाफिर ने सुलगायी मापिस और उचारती गमी लौ चेहरे के अनगिनत रहस्प- कलकत्ते कारखाने में बहाल जल पर था एक मजदूर जा रहा है वापस फिर काम पर छूट गया है मुल्क बहुत दूर वस तलवो मे बाकी है पोडी सी धूल पजाव की। दौडती जा रही है पजाब मेल पच्छिम से पूरव, पच्छिम से पूरव- "पजाय तो बहुत खुाहाल है, निहाल सिंह 7 सुनते हैं वहा लोग दूध और मठठे से तर हैं, निहाल सिंह फिर तुम क्यों जात हो पश्चिम बंगाल, बोलो निहाल सिंह" 'कौन नहीं चाहता जहा जिस जमीन से उगे वही की मिट्टी बन जाय, पर बोनट नहीं तपता हुमा रत ही है घर तरबूज का जहाँ निभे जिदगी वही घर वही गाव ।"
फैलता जाता है घुआ
लोहे को छातियो को धोता जाता है धुआ,
खिडकिया से झाकता है पजाबी मजदूर
दूर षधकार, गहन गसा अधकार
कही कही बसे हुए रोशनियों के परिवार
और यहा पजाबियों से भरा हुआ डिब्बा ।
।
1
पजाबी मद, पजाबी लडकिया---औरतें, बच्चे
सब के सब जा रहे है वापस फिर काम पर,
ये परिवार मजदूरो के
जूट कारखानों के, लोह कारखाना के
कोई नही जानता कव बद हो जायेंगी कौन सी मिलें
किनकी होगी छटनी, किनकी कटेंगी तनखाहे-
सब रह गये थे घर पर दो एक दिन फाजिल ।
जनयुगा
उठो मेरी दुनिया में गरीवा को जगा दो
वाखे उमराह के दरो-दीवार हिला दा
जिस खेत से दहका को मयस्सर हो न रोटी
उस खेत के हर गोश ए गदुम वो जना दो
--मोहम्मद इक्वाल
मै केवल एक जल-आकार
0 आलोकयन्या
मैं उसका मस्तिष्क नहीं है
में महज उस भूखे बच्चे की आंत हूँ।
उस बच्चे की भात्मा गिर रही है ओस की तरह ।
जिस तरह बांस के अखुवे बजर में तडकते हुए कपर उठ रहे हैं
उस बच्चे का सिर हर सप्ताह हवा मे ऊपर उठ रहा है
उस बच्चे के हाथ हर मिनट हवा मे लम्बे हो रहे हैं
उस बच्चे की त्वचा वडी हो रही है
हर मिनट जसे पत्तिया बडी हो रही हैं
और
उस बच्चे की पीठ चौडी हो रही है जैसे कि पास
और
घास हर मिनट पूरे वायुमडल में प्रवेश कर रही है।
लेकिन उस रच्चे के रक्तसचार में
में सितुहा भर घुधला नमक भी नहीं हू
उस बच्चे के रक्तसचार में
मैं केवल एक जल आकारहू
केवल एक जल उत्तेजना हू
"पहल"-2
७०
बाड़ा
0 घद्रभूषण
साथी मैं बहुत दूर से आया हू।
जिन्दगी के नमाम रास्ते गुफामो से गुजरे
लेकिन कल तक मेरा सफर अधूरा था । अब
गाव को हर दीवार पर उभर रही है-
इबारत । पलस्तर उघड चुका है और
इटो को जगह चुना इतिहास बहुत साफ है ।
यह गली-बैलगाडी की लीक है
यह सडक-मोटरकार का निशान
यह पट्टी-पहा लोहे का हाथी दौडता है
लेकिन यह ज्यादती है यात्रा का गलत भूगोल है
आदमी जगल मे है, जहा
कडी सर्दी में बाढ़ के गिद जिन्दगी
सस्त मुहनियों पर सिर टिकाए
जाग रही है ।।
वहा तुम्हार शहर का पुल है,
नीचे से गोडिया गुजरती हैं ऊपर से रिक्गे
तुम वहाँ से शहर की शाम देखते हो और म
अपनी पत्नी व बच्चो से साय
बगल की सीढी से नीचे उतर जाता है ।
महा झोपडियां परेड के लिए तैयार हैं
लेकिन मुझे रिश्ता तय करना है
रामलाल मेरा पडौसी था गाव मे वह सामने आकर मेरे झोले मे मुह डाल चम्म चम्म करने लगता है मैं उदास हाता हूँ मूजर बाड मे घिरे हैं ये सब--प्रादमी। यह काटो का पूरा झाड है जा हर जगह फैला है। रमजू का पूरा परिवार, गुलाम हुसंनी पत्रकार- और तू भी यार इससे छलनी हो गया है इसीलिए मैं यहा आया हू, देख क्तिना-बच्चा कच्चा लोहा है अपने गावा मे इसे ढालें हथियारो-औजारो में जहा अनपढ इवारतें गढते हैं अनाम साथी इकाई दर इकाई झाड से लडते हैं । 11 "जनयुग गरीब शहर के तन पर लियास बाकी है अमीरे शहर के अरमा अभी कहा निसले साहिर लुध्मानयो ७२
इनकलाब!
उदय प्रकाश
तुम जानते हो
वह भायेगा। कभी भी । शायद कुछ देर से ।
शायद बहुत जरद । फिर भी तुम जानते हो।
वह पायेगा । पक्का।
अगर तुम्हारी आख मे
तक की दूरबीन है तो तुम उसे देख सकते हो।
दूर । अरे चिथडे की तरह रोशनी का थक्का ।
आकाश के आईने म । शहर के तिरस्कृत मोहल्लो के
कपर । खदानो को तोडकर उठता हुआ। चिमनी के
धुए की कलाकृति । खेत की धूल का शिल्प ।
वह एक धब्बा । जो हिलता है । डुलता है । बुझता है । उगता है ।
किरणा का घटाटोप जगल ।
रोशनी की रगीन मशालें हापों मे पामे हुए।
तुम जिसे सुबह कहते हो।
वह आयेगा । तुम्हारी रग रग की मात्मा में
तुम्हारे रोये रोये के दिमाग में
यह सच्चाई पैठ चुकी है। तुम अकेले के
ईमानदार क्षणा मे मान चुके हो
कि वह आयेगा।
उसके आने का फैसला हो चुका है । उसका आना
समय की धडकन मे अकित है। उसका आना
तुम्हारे होने से ज्यादा सच है। पड़ से अधिक कद्दावर ।
चट्टान से ज्यादा ठोस ।
--
तुम्हारी तकलीफ और दद से ज्यादा सच । तुम्हारी बीमार बेटी की एक दिन अचानक मौत से अधिक सच । तुम्हारी जिदगी से ज्यादा सच । तुम जानते हो कि माने पर वह देर से आने के लिए माफी नही मागेगा। झेंपी हुई हसी नही हसेगा । बीबी के सामने तुम्हारी हसी की तरह । वह तुम्हारा पढा हुआ नक्शा बदल डालेगा । तुम्हारी देखी हुई चीजें इधर उधर कर देगा। बच्चो का रग बदल देगा। सिपाही के डण्ड मे पीतल का गुट्टा नहीं निब होगी। मजिस्ट्रेट की आखो में मास्साब का चश्मा । सभव है तुम्हे बाद म कई चीजें गायब मिलें। जैसे स्कूल के सरल अक गणित से ब्याज के सवाल । जैसे आसू गैस । जैसे हत्या लूट बलात्कार सकटकाल । जैसे मंगजीन से रेहाना सुल्तान की नगी टाग । जैसे केटी मिर्जा की उघडी छाती । जैसे इनकम टैक्स कमचारी। तुमने अपने बारे में सोचा है ? तुम उसे कहा मिलोगे? उसके आने के इन्तजार मे तैयार या डर मे फरार । तुम किस सडक को कौन सी खदक मे होंगे। खिडकियो के परदे हटाते, दरवाजो को खोलते या चाभी लेकर किसी कुए मे अपने जुम मे डूबते ' तुम्हे उजाले मे अपना चेहरा कसा लगेगा? डरावना 7 अपनी गदन का तुम्हारे पास क्या मतलब होगा? शम जुलूस के आगे आगे अपने उत्साह में जिन्दा तुम्हारे कदमो की परपराहत में कौन सा सगीत होगा? तुम्हारे हायों मे स्वागत होगा या क्षमा याचना 7 ७४
1
तुम चाहते हो कि उसके बाद
तुम सफाई के शिकार न । तुम्हें घसके हुए मलबो
और कूडों के टीलो मे न गिना जाये । तुम्हें
नगर के बन्द और विषारत नावदानो से न
घोडा जाय । तुम न गीदडों की जमात में शामिल
होना चाहते हो न भेडिया की । तुम चाहत हो
कि तुम्हारी कविता वफादार दरबान का
धुत्ता चोपन्नापन न हा । तुम चाहते हो तुम्हारी भाषा के
गले में किसी की नमकदारी का पट्टा न हो।
तो उठो । आने वाली मुबह को सलामी ठोको।
तयार हो जामा । अपनी ईमानदार छेनी और
हमलावर हयोडे की चोटी का
सस्मरण सहजो । उहें ठोस आकार की सापक
सच्चाई दो। रोशनी के खिलाफ दीवार का
एन एक पत्थर दरकाओ।
छेनी और पत्थर की मुठभेड को तरतीब दो। नोक से
शक्लें उभारा। कोई एक शक्ल ।
जिससे लोग एकाएक चीख उठे-
"यही है-~चगेज खा !!"
अपनी सुविधा और सस्कार को छाती पर
बटन की जगह टाफ लो। और फेफडो में
आने वाले वक्त की सास भर कर
सीना फुला दो । बटन को टूटने दो।
अपनी देह मे भविष्य की ठण्डी फुरहरी
महसूस करो।
(जनयुग)
रक्तप्रवाही मोड़ उदास औरतो भूखे बच्चो और चिल्लाते पुरषा के आगे खडी तनी मुटिठयो के चेहरे आज भी वही हैं जो क्ल इनके साथ थे। एक पूरी की पूरी अधेरी- घाटी की भयावहता, भौर अकेले घिर जाने की छटपटाहट के रहते सभी लोग एक दूसरे को पहचानने के सक्ट से ग्रस्त थे, और माज भी- आदमी को पहचानने की ललक के साथ उदास हैं। एक पूरी शताब्दी तक थादमी ये सही अथ की तलाश इस गहरे पानी से घिरे उपमहाद्वीप के- भीतरी हिस्सो म जुडे मादमी के आदमी से लाखो सवाल आसन समट के समय एक दूसरे के हाथ टटोलते मौजूद हैं। उसी तरह-नारे लगाते लोग उसी तरह-व्यवस्था बदलने के मौजूद माश्वासन, (उसी तरह आदमी को बाटने के घातक पहयत्र और उनके बीच सत्ता को अपनी तिरछी हो रही मुटिठयो म मजबूत जबह के साथ बद करने की मागि। 0 डा० श्यामसुन्दर मिश्र कुछ भी तो नही बदला हरे भरे वक्ष के नीचे खह भेडिया के स्थान पर- हालियो मे लटकी चमगादडो के सिवाय और क्सिी गहरे आतरिव आश्वासन के पैदा होते ही लोग इस पूरे चल रहे नाटक और दश्य परिवतन मे भीड के रूप में मौजूद थे नये नाटक के पटाक्षेप के साथ ही एक मनारजक एकाकी की तलाश में पहले से अधिक व्याकुल होकर भटक रह हैं। यह भटक्न । यह सबंध तलाशने की पीडा। पानी के मारे स्वाद के बाद उठ रहे ज्वारो की व्याकुलता और आक्रोश के साथ मिलकर पूरे इतिहास की शमना अमानवीय पासटीक कामदी बनते जाने के कारण हास्यास्पद होती जा रही है । समय जो अन त और अपरिमित विस्तार की भयावह दुर्भात सक्टापन्न व्याख्या में काल खड नही है माज भी गहरे सच के अहसास और नगे आदमी की ठह और कोहरे म अक्डने वाली दह एक नय रक्त प्रवाही मोड पर उपस्थित है।
DORED पांचवां खंड
गुणान्तर-दो
०+---
rametests
0 नीलकठ
and
F
0 वरयाम नेगी
0 प्रणय रजन
D दिविक रमेश
D अक्षय उपाध्याय
N
0 चारुमित्र
0 गोविन्द श्रीवास्तव
Ime
Wary
vi
राजेश जोशी
10 प्रभाती नौटियाल
D सुरेश शर्मा
७७
000 "माज ऐसे कवि चरित्र की आवश्यकता है, जो मानवीय वास्तविकता का बोद्धिक और ताविक आक्लन करते हुए सामान्य जनावै गुणा और उनके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करे, उनके सचित जीवन विवेक को स्वय ग्रहण करे तथा उसे और अधिक निखारकर क्लात्मक रूप में उन्ही की चीज का हे लौटा दे" 0 मुक्तिबोध 100"किसी भी साहित्यकार की कला का विवेचन कठिन काय है । बहुत सी सैद्धातिक समस्याए विवेचन आरम्भ होने से पहले अपना समाधान चाहती हैं । साहित्यकार मी स्थापत्यकार की तरह अपना निर्माण कौशल प्रदर्शित करता है। इस कौशल का हम कसे परखें ? निर्माण कोशल के लिए उमकी रचना सामगे क्या है ? भापा, शन्दा का अय, उनकी ध्वनि, छन्द प्रवाह, मूर्ति विधान-इनका परस्पर सम्बध क्या है, काव्य की सरचना से इनका सम्वध क्या है (इन प्रपनो से उलझते हुए ही किसी भी रचनाकार की काव्य क्ला मा विवेचन किया जा सकता है।) ॥ रामविलास गर्मा ७८ खण्डहर के बारे में नीलकण्ठ यह है बरोठ । इसके बाद ओसारी फिर आगन और फिर पूरी इमारत यहा से रोज भुनसारे न जाने क्या टूटता है झाय पाय होती है-जाने क्या टूटता है हिम्मत बाध एक दिन विस्मय के तिनके सब झाड दिए टोह लेते हाथो को पसार दिया खिडक्या दरवाजे टटोलता आया बरोठ तर-फिर भीतर को पठ गया। जरडे हुए हाथ अपने ही हाडो की तात से गदन पर अपनी ही जटाओ का वोझ रखे सदियो पुरारी उस मेहनत के घनीभूत खण्डहर में झोक दिया--हवा न हवा मुझे अक्सर ही ठेल ठेल जाती है इस पमरानुमा पेटी में जाने किस भाषा मे जाने किस भाशा में कौन लिख गया-ये रहस्य व्यूह भेद ये? पौन है ? कौन है ? यौन है ??? कसी यह गूज है कपती दीवार पर घप्प धप्प,ठप्प ठप्प- कोलाहल फूट फूट पडता है। आगे को हवा मुझे ठेल ठेल जाती जहा और भी अधेरा है- अनजाने महो- -मा आगन के भार पार ७६ 1 72 शौर आता शोर जाता यही कही घुधले से दिखते निशान अगूठो के नखो के दीवार को ढहाने की कोशिशो के काले धब्बे से ग्वड खडे सुनते हैं कान यहा पर्दो से हिलते टूटने का सगीत-टूटा हुआ गीत वाहर जोर की छपाक कौन है ? चीखती आवाजो को थामे यह कौन है ? कौन यह ठहरो मुनो यह आवाज पौधे की जड़ें जमीन मे धसी हैं यही खीच लाती खीच खीच लाती। यह आह । यह कराह यह जवान कारीगर की मौत है जिसे लम्बे डग भरता यह अदृश्य ढोता है गध भर आती है-आकार नहीं दिखता यह कौन है ? हर मौत का हिसाब जा ढोता है पावो मे जक्डन सी दरें ये पिछले भूकम्प के धरती का कटा हुआ पेट सब कडिया गायब हैं नायक वह आसमान ऊपर को उछालता है किसके ये धड कट सर सब कडिया गायब हैं-क्यो? गध भर आती है पसीने की जीने की । नायक का दिखता नही चेहरा यह इमारत नक्शे फडफडाती है देखो यह स्याह सनाटा यही वही दज है पुलिस गोली चाज का यायिक जाच यह मास के जलन की आच हवा मुझे ठेल ठेल जाती है ८० वन्द दरवाजोपर चौखट पर नदियो की राह चल माथे पर भावर सी पडती। पिरले भूकम्प का कमाल यह धधकती हुमी भट्ठी गरम गरम लावा- धरती के नीचे-जरूर कुछ होता है । उडत परिदो के पख टकराते दीवारो से यह आसमान कैद है कही-कही दमकते-दहकते सदों पर जबड चकराते इन बच्न से दिमागो का इन्द्रजास धरती की छाती पर अपनी गदन का बोझ अपने ही हाडो का तात बार बार ऊपर उछालता टूटता सगीत हिम्मत के कट हुए हाथो को ठार ठाक जाता है कीन? मालिक इस कुहरे का यहा वहा रिसने सा लगता है बोध पेंच वौन कसता कौन यहा माता चिल्लाता-गला फाड़ फाड कसा यह प्रहसन कमा तमाशा यह सब कुछ क्यों मुझे नहीं दिखता आखो मे तिरत ह झण्डा ने हस- यह सरमराहट है रेत के खिसकन की ढेर का ढेर बारूद्ध यह यह छाती से चिपका विध्वस कौन हैं मालिक इस भावो शमशान का ?? क्या नहीं दिखता निर्माण यहा हो रहा निश्चय ही- हवा बार बार यहा मुझे ठेलं जाती है- बच्चे की जमपत्री। बारूद के ढेर पर क्यो नहीं टिकते है पर खण्डहर इमारत के क्यों नहीं होता पटाक्षेप क्यो नही यह आवाज अश्व शक्ति यहाँ है इसया सूत्रपार बारूद टम्ग-उस्स । य बादल मे बूतर यह नया यह रटे भीम पत्री जिदा वान्द या गगा पुम्बी र यह कौन है ' आसमान पा सहपर जो रात को दिा से जोट देता है यह जागरण यह हिमता हुआ भू मण्डल यह मुक्ति दूत- दिए सा टिमटिमाता- यह इमारत यह पाताब्दी उधर- -दूर-दिसते है उठते हुए सम्भ-पाठशाला रे ? (जनमुग) लो मुस सबेरा आता है माजादी का आजादी का गुलनार तराना गाता है आजादी का माजादी का देखो परचम लहराता है आजादी का आजादी का ये जग है जंगे आजादी आजादी के परचम के तले मखदूम मोहियुद्दीन ८२ . अकाल मा0 वरयाम नेगी अकाल उपजेगा, मामा, अवॉल जिसे भी अपना समझ कर खेत वीजोगे जिसकी मिट्टी की बुझाओग तुम अपने खून और पसीने से प्यास वहीं उपजेगा अकाल, मामा, वही उपजेगा अकाल तुम्हारी गोदी मे बैठा बच्चा तुम्हारी दाढी पर हाथ फेरत फेरते तुम कहोगे, अचानक, लुढक जायेगा एक दिन जिसकी खुली छूटी आखो को बद करन का साहस कर न पायेंगे तुम्हारे हाथ शुम्हारी पाखो से बहते आसुओ का धिक्कारना तुम्हे सिफ तुम्हें मनाई देगा, मामा, भयानक विस्फोट की तरह वे सथ सात्वना देने आयेंगे तुम्ह एक से एक बद कर जो दो दिन के लिए एक जोडी बैल देने का राजी न थे तुम्हारी अपनी तो जिदगी निकल गयी इसी सोच मे जमीन बेची जाये या एक जोडी बल खरीदे जायें दो हाथो और एक गेंती से जितनी भी बीज पात जमीन तुम पसल पाने की उम्मीदो से लटकाये तो रखती है पर हर बार तुम्हारे श्रम से करती है तुम्हारा ही उपहास, मामा, फमल के नाम पर तुम्हारे हाथा थमा कर सूखी घास हर बार टलते रहे इस सच्चाई से कि जिसे भी बीजोगे खेत समझकर यही उपजेगा अकाल जानते हुए भी तुम जिसे अपना समझत जामोगे खेत वहीं उपजेगा अकाल भहुत भोले हो, मामा, तुम समझ नहीं पाते वक्त ये अकाल जसे इशारे भी "अनयुग" ८३
वे जो आगे निकल गये
0 प्रणय रजन
क्या तुम रहें जानते हो
वे जो आग निकल गये
तुम जानते हो न
कैसे उद्घाटित करता है शहर स्वय को
कसे खुलता है जीवन पत पर पत
कैसे छा जाते हैं रग सुबह के आकार में
कसे भर देती है सार वातास को खुशबू फूलों की
कसे बसली चेहरे नजर आते हैं नवाबपोशो के
और कैस उतारते ही अपरी नकाब को वे डाल देते हैं
शहर पर, जीवन पर, रगो पर, फूलो पर
क्या तुम उह जानत हो
वे जा आगे निकल गये
वे जो पहली तारो मे थे
वे जिनकी आखें चमकती थी
लिय गय मला से
उन फसलो से तुम दस सक्ते हो
शहर, जीवन, रगा, फूलो को
और नकाब को अलग,अलग
(प्रतिवद्ध कविता--१)
m
ऐ जुल्म के मारा लब खालो चुपके रहने वालो चुप कब तक
कुछ हश्र ता उनसे उठेगा, कुछ दूर तो नाले जाएंगे
फज अहमद फज
I
फ़सल का गीत - दिविक रमेश । फसल की फसल खडी हो गप चप गम -अक्सर इसी से अदाजा लगाने वाले लोग उसे कमजोर कहते हैं। - पोधे पौधे के बीच बधा रिपता नजर नहीं माता। उदास उदास अपने में डूबे ये पोधे भी तो भरी जवानी मे मरियल से लटके लटके रह रह चुप हो जाते हैं। लेकिन है सच मानिए ये तो इतने कमजोर नहीं जितने दिखते हैं। जरूरत दरअसल हवा की होती है एक सही हवा जो इनके मन को आन्दोनित कर इनकी ही भाषा के शब्दों में इनके ही भावो से, २५
इनको ही परिचित पर
दूरदूर तम
दूर-दूर तम
बहती है।
अपनी जमीन में गडे हुए मजबूत
ये पौधे
लिपट लिपट कर
दूम जात हैं मस्ती म
लहरा उठता है शक्ति का सागर
तब इहें
कोई नहीं रोक सकता
(जनयुग)
-
हम वह राही हैं जो मजिल की खबर रखते हैं
पाव कांटो पे, शगूफो पे नजर रखते हैं
मितने स्वावों से निपोहा है उजाला हमने
रात की कद्र पे बुनियादें सहर रखते हैं
कफी माजमी
T
।
८६
कविता के इर्द-गिर्द D अक्षय उपाध्याय यह कविता नहीं है कविता के इद गिद भटकता हुआ दद है जिसकी शासा पर मौसम के इ तजार मे एक गधहीन फूल खिला करता है मुमकिन है तुम इसे तोडकर ले जामा ओर खिडकी के किनारे रखे गुलदस्ते मे सजाने की कोशिश करो जहा तुमने रखे थे रजनीगधा के फूल तुम समझत क्यो नहीं कविता के न बन पाने का दुस कविता के बन जाने के सुख से कितना बड़ा होता है । एक आदमी हजारो वगमील फैल हुए भूखों को लेकर मर रहा होता है रोशनी की तरह पसर रहा होता है यह कविता नहीं है दातो के बीच दबी सच्चाई है शायद तुम इसे काट कर ले जाओ और अपनी क्तिाबो पर चस्पा कर दो ना फिर किसी भी मनचली को अपने प्यार की याद के बदले भेंट कर दो तुम नहीं समझ सकते कि जमीन के बीच लोह की तरह सख्त अनुभवो को कविता में बदलते वक्त कितना पिघलता पडता है एक पूरी की पूरी चेतना होती है जो आने वाली नई ताक्तो के साथ खून खून हो रही होती है अपनी ही जमीन पर । 11 'पुरुष" सन्नाटा बोलता है 0 चारुमित्र पड़ा का हिलना तक बद है फूलो पर उदासी अटकी है और पत्तिया चुपचाप घर रही हैं । यह कैसा मौसम है वि लाग लगभग चीखना चाहते हैं और वे हैं कि सनाटा बुन रहें हैं । लगातार शब्द का कुचलकर वार्षिक जयन्तिया मना रहे हैं खामोशी को खुशी मे । उह नापसद है मा की लोरी बच्चा की क्लिकारी मजदूरो का गान- शब्दो का अभियान हमारा यहा होना या इस तरह चलना भी रह बेहद नागवार लगता है -~-कि हम रात को रत क्यो कहते हैं --वि हमारे घरो मे घूप भौर हवा क्यो आती है। ? पूरब से" -कि हम क्यो चलते हैं । सहक की बायी तरफ 77 हम क्यो करते हैं सूरज के स्वागत की तैयारिया ???? अंधेरी रात सिफ उल्लुमा के लिए होती है और ये नही चाहते कि यह रात खत्म हो । इतिहास गवाह है कि जब भी ऐसी रात माती है- खामोश और खौफनाक- ६६
।
उस्ताद उल्लुओ की बन आती है
नीद डूब घासले भी उजाड दिए जाते हैं
और निदोष पक्षियो और उन बच्चो की
असहाय चीख के बीच
वहशी अश्वत्थामा
आक्रमण करता है चुपनाप
पाण्डवो के शिविरो पर
उठो ! मेरे दोस्त,
अब कोई भी रात पाराम के लिए नही वची
माओ । अब हम निक्ल चलें-
मैदानो, जगलो और जडो की भोर
कह दो सनाटा बुनने वाला से
कि वे शब्द को न पुचलें,
कुचले हुए शब्द मे बेहद ताक्त से होती है-
वह अपनी टकार दुगनी तायत से फैलाता है
भूगम के अधेरे मे भी।
कह दो उनसे कि
सन्नाटा धुप नहीं रहता
सन्नाटा बोलता है
सन्नाटा सुनता है
सन्नाटा सच को खोज निकलता है !
(प्रतिबद्ध कविता २)
-
८६
वोल्गा से गंगा तक
गोविन्द श्रीवास्तव
x
x
मैं कहना चाहता है
एक कोमल, नाजुक सा शब्द
'चिडिया'
और वह ऊचे आसमान पर
घूमता हुआ
चील बन जाता है
कितनी सनसनीखेज़ है
शब्द की यह भयावह यात्रा !
x
बायें हाप मे पक्षाघात का जोरदार दद
सिर पर भयानक बोझ,
भारीपन पर हजारो मील लम्बा और
घोडा हिमाच्छादित पठार ।
और इधर
पाप के हरे भरे बागानो में
गश्त लगाते हैं जोक
चूसते है महू ।
भारी भरकम ट्रक सादे जा रहे हैं
पाय, जूट के भण्डार
बच्चों का सिर कुचलते हुए गुजरते है
• मेरे देखते-देखते
कोलतार को सहक सुख हो उठती है
X
पश्चिमी हवाओ के साथ
उडती आती है दियागो गासियों की
माणविक धूल
गिरती है मुडेरों पर आगन म सेहन में दालान मे खेत मे खलिहान मे आहिस्ता आहिस्ता कराहते हैं कैसर के रोगो, अपग, अपाहिज पूरा दश बन जाता है 'वाड न० सिक्स फ्लती फूलती हैं हरी होती हैं बीमारिया की नयी नयी फसलें माहमारियो की नयी-नयी किस्मे सूपा, बाद, अकाल, दरिद्रता, कालाजार भव्य महला और ऐतिहासिक प्रासादों के मेहरावो मे रगे हुए हैं हरिजनो के कटे हुए सिर मानसूनी जलपारामो मे मिलते हैं बड़ बड मगरमच्छ..nxn rrrrr साकों का पेट फूलता जाता है फूलता जाता है खा खाकर अमरीकी सहाघ । पूछता हू सभी से पूरब से पश्चिम-उत्तर से दक्षिण कितने शिशुओ की हत्याए हो चुकी हैं भोर क्तिने दुधमुहे अभी भी रो सकते हैं। x मोटता हूँ बिल्कुल अकेला ~~~-whe . - x उनके पास जिनकी जिह्वाए कट चुकी हैं नामों से गिजा दी जा रही है या फिर ३१
X
X
पर कट चुके हैं लोगो के सतखडा पर।
असत्य आसे लेकिन
देखती हैं दूर
समुद्र में एक प्रकारास्तभ
और पामीर की चोटियो के पार
एक छिपता सितारा ।
x
आती है ग्वयर
साइबेरिया से आ गए हैं
एक लाख सारस
हजारो राजहस
अनगिनत चक्रवाफ
वोल्गा से गगा तक
पना से कोसी कधार तक
छा गए हैं चिर प्रतीक्षित
आगन्तुक ||
(जनयुग)
ये हर एक की ठोकरे खाने वाले
ये कानून से सक्ता के मर जाने वाले,
ये मजलूम मसलूफ गर सर उठायें
तो इसान सव सरक्शी भूल जाए
ये पाहे तो दुनिया को अपना बना ले
ये आकामो की हड्डिया तक पवा से
फज अहमद फैज
६२
जाड़े की रात राजेश जोशी सो रह फ्लत हुए दौडता है रात के दूसरे पहर में जब लोग गम बिस्तरो और बद कमरो मे होते हैं या धीमी आवाज पर बजत रेडियो पर लोरियों की अतिम सभा सुनते हुए बोझिल हा रही होती हैं उनसी पलक सेइ की तरह बार-बार अपने मुई म नुकोले बालो को हमले के लिए सडको पर झपट्टे मारता एक खौफनाव काला जाडा और फुटपाथ पर एक घाटी सी दुलाई में दुबके बच्चो की बार बार बाहर निक्ल माती पगथलिया क्सिा भयभीत खरगोश सी वापस रजाई मे सिमट जाती हैं मुबह रात भर जागता है जबडा को भीचता हुआ रह रह कर झुर्रादार अगुलियो को मुटठी म क्सता हुआ, किनारे पर सायी औरत की किट क्टिी फिर फिर बजती है और वुयी हुई आग के पास बठा सूगला सा बच्चा कनीदार पतग की तरह थरथराता है और किचकिचाकर अलाव की रास की प्रतीक्षा करता बूढ़ा खपालता है चिंगारिया की तलाश जारी रहती है यू ही "क्यो"
जंगली.मुर्गे से
0 प्रभाती नौटियाल
झाडियो से लौटत
रास्ते पर
भारी बूटो को टाप
बहुत साफ है
जगल मे खड लम्बे पेडों के
बचे ठूस
छिलको की गम राख मे
जिन्दा हैं
जगल
जानवरो का अपना कब रहा
वे बफ से बचते हुए
वस्ती में फसते है
और बफ पर जमे खून के कतरे
सिफ धूप निकलने तक
सच हैं
दाल के पतीले ने
आदमी ब्रह्माड मे फेंका
यह भी सच है
लेकिन
इस कक्षा से बाहर
इस बात की कोई गारटी नही
कि मृत्यु अपने गाडी के पहिये
नही बदल रही है
बादल अगर छट भी रहे है
तो पश्चिम का ज्वार कहां घटा है
देलो-
मछुआ सिफ मछमी फ्सा रहा है
या फिर रोटो
मोती नहीं है
फसाने की चीज
इतिहास
उम जगल से भी नही गुजरा
और तुम गाली पढकर
जगली फूलो को याद करते हो
-अपने फेफडो मे
पावन की गध को
खुशबू समझते हो।
वह नीली मील का पानी पीकर
लौट रहा है
एम धनी लम्बी शाखाओ वाले
पेड के नीचे
मोर जाडेगा अगले जगल की
बेशुमार शुमारी पा हिसाब
हमेशा की तरह
लौटता है वह फिर
बतौर शौकीन शिकारी
जगली मुर्गे को टाग से पकडे
शाम होने तक
झाडियो से लोटते
रास्ते पर
भारी बूटो की टाप
बहुत साप है।
"आसोचना'
-
१५
निर्णायक वक्त 0 सुरेश शर्मा निरतर शोर करती नकाबधारी चेहरोने चीखती और इस जुलूस मे बेतरतीब तेज भाती कुछ भी न कर बैठना इस दुनिया मे कितना खतरनाक हो गया है कितना मुश्किल है पूरे हुजूम के लिए- किसी का तटस्थ पूरे हुजूम के लिए और निर्लिप्त बने रहना कितना भयानक आ गया है आ गयी है जहा तक यह कारवा रात चकाचौध खबरो 'सूरज' के विरद्ध खुसट हिदायता शिविरो मे और ओढ लिबादो मत्रणायें चल रही है के दम पर और खामोश बढ नही सकेगा सतरी एक दूसरे के चेहर चुनना होगा ताक रह हैं। तनाव, आतक और मोर्चे एक वीभत्सता के लिए म से कोई ऐसा क्या होता है एक चीज क्या हाता है एसा कविता भी की जा सकती थी पा जाने के बाद इस स्थिति पर लाग भेडिये हा जात हैं। कितना लाचार है बहुत नहीं मोचा जा सकता भोक्ता इस सत्र पर जो दद सहलाने वहुत नहीं या कुरेदने म से यह एक प्रामद कुछ भी नहीं चुनौती भरा और कर सकता। निर्णायक वक्त है। पूरे के पूरे आगे। कि बहुत कुछ जनपुग
.....और अंत मे-
कविताए
D केवल गोस्वामी
राजकुमार
सनो
-श्याम कश्यप
निबन्ध
- डा. कमला प्रसाद
१७
"नहीं होती, कही भी खतम कविता नहीं होती
कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है ।
व मैं उसका नही क्र्ता
पिता धाता
कि वह कभी दुहिता नहीं होती,
परम स्वाधीन है वह विश्व शास्त्री है ।
गहन गम्भीर छाया आगमिष्यत् को
लिय, वह जन चरित्री है।"
D मुक्तिबोध
"बशर्ते तय करो,
किस आर हो तुम, अब
सुनहले ऊध्व आसन के
दबाते पक्ष मे, अथवा
कही उससे लुटी टूटी
अधरी निम्न रक्षा म तुम्हारा मन,
कहा हा तुम ?"
- मुक्तिबोध
पटाक्षेप
। केवल गोस्वामी
हमारा रिश्ता
पच्चे धागो स नहीं बचा था
न ही उखही सांसोपे
सम्मलित सगीत के सायी ये हम
हमें बाह रही थी हमारी भूस
पौर श्रम से ऐठी हुई मौत पेशियों
वह पून
जो दूर तक विधी
सार पी एडो का गर्माता है
दरअसल देश का भाग्य निर्माता है।
यह साबित हा धुरा है दास्त
नि* यह सौह-पाश
हमारे निषु रा रा
धारा सपूत है
गिन स गर गाते हुए
पसाती पहिया की आवाज
हमारी प्रतिनी नहीं है
मिजनों मे निरस्ती सपर्ट
और गुए में गुवार
नही पटगान हमारे सीको हाही
चिन्नु ! हिना रापले और पानी के
भाप और
परत मागिरहर
frगी नामामुम मरेपन की
नामाम मौलानी में
Re
बेकार पुर्जे की तरह फे जाते रहेंगे-भूसे बीमार जिस्म और टूटी चूडियों के साथ सिसकियों की आवाज इजन की शाटिंग समझ ली जाती रहेगी। ऐडिया रगहने और भूख को नियति समझने का भ्रम टूट चुका है दोस्त श्रम और भूख पोषण और शक्ति का समीकरण अपनी सीमाओ से लिपट रहा है जहा से हर भूखा इन्सान अपने कमजोर पांवों के साप पाकर और कमजोर पांव एक आंधी का वेग महसूसता है अपने भीतर । जब तक हमारी रोटिभो वा हिसार बद रहेगा वातानुकूलित भवनो में पडी फाइलो मे हमारे लिए रेल की ठण्डी पटरी और जेल की सलाखो में भोई अन्तर नहीं चूकि प्रजातत्र और प्रचारतत्र समानापक हैं उनके लिए जिन्होंने सरकारी भोज की पालियों में पडे व्यजनो में हमारी रक्त गध कभी नही सूची घुघरूमो की शकार में कभी नहीं सुना हमारे दद का भावानुवाद हो सकता है कि हमारे जेल से लौटने तक दाग दी जाए हमारे बच्चो की जबाने उनकी माताओ के सामने सटका दिया जाए एक गूगा भविष्य
और गद्दारी का पट्टा
हमारी गदनों में डालकर
घार दिया जाए हम ससद के आस-पास
चूति हम गवाह है
उन तहसानों के
जहाँ हमारे हिस्से का अनाज छिपा है
जब तक
उन तहसानों के दरवाजे
खुलते रहेगे
काली मरियो में
बोर हमारे बौने वेतन
नहीं पाएगें
पारामान पर लटकी मूल्य सूचियो
हमारा देश गरीब रहेगा।
हम पटिबद्ध है
मुठनी इस गीता के हर अध्याय का
सत्य में रूपांतर करने के लिए
मकार मूत्रधारको
ने पथ्य समय पर लाने का पुण्य काय
जिसने जीने मोहर सम्भावना पर
बंगा दिया है मौत का पैरोकार
और मेहनत मा पारितोपर दिया है
मात्र पिसार
इस मपीसे नाट से
कर पा है हम सब
पटाक्षेर प्रतीयाका दिना
परेंगे अपनी अपनी नयी भूमिका रा
पूषभ्यास
ना भविष्य के लिए।
(मनपुण)
“साथ-साथ"
राजकुमार सैनी
अन्तभू गुफा मे
या जुलूस के आगे-आगे
जनपथ पर जय जयकार करते हुए
या राजपथ पर हाहाकार मे,
गहरे जगलो, नदी-नालो-
को पार करते हुए,
खेतो, खलिहानों मे रात रात ठिठुरते हुए,
दफ्तरो, फक्ट्रियो खदानों, कारखानो की
चक्किया में पिसते हुए
तुम जहा कही भी हो
तुम्हारे साथ साप हूँ
उठाया जिस ध्वजा को तुमने
मेरी बाहो, स्क घो घुटनो,
मेरे वथ, हृदय और मस्तिष्क
की शिराओ में बहते हुए रक्त से
इसका रग मिलता है।
रगते ही रहेगे अपने रक्त से
फीका नहीं होने देंगे
इसका रग।
गिरने नहीं देंगे इस ध्वजा को जमीन पर
इसके गिरते ही
गिरेगा हमारा रक्त भी
उठाने के लिए ऊपर
और पर
पहरायेंगे एक दिन
१०२
Mem जरूर फहरायेगे गोल गोल गुम्बद के ऊपर, आयताकार दिले की प्राचीर पर स्मामल, सफेद पहाडियो के शिखरों पर, घाटियों, दगें के बीचोंबीच अशान्त और प्रशात समुद्री के किनारों पर जन जन के हृदय पर दुश्मनों को सोपडियो पर । साथियो! अपनी उपली लिए- पलता हूँ तुम्हारे पीछे पीछे 'विमनीपी परिभू स्वयभू होने का नहीं कोई भी दम्भ, सहपार या नम। जानता हूँ पहले उरित हाता मादित्य पूप-छाया में उसोनी उगते हैं बाद में जीवन अनगणित सत्य और तर सिलते हैं ज्ञान-विमान-शाहिए। मची पहियों ना पकी महों पर, मन्दीगृह में या उसके बाहर । परपरा से सस या परपरों से पागल ! मायतरी माप म तपते हुए पसी में भीगते हुए गे हापों या महमुहान उमषही कही भी हो म्हारे साप-शाप (जनपुग) या
न
एक कविता : शैली के लिए
Oश्यामकश्यप
0
तुम्हारी उम्र के साथ हरी हो रही हैं
मेरी सवदनाएं
फिर जी रही हैं
अनोखे स्पदन
आगे बढ़ते, ढसते, अनगिनत आकार
हवा मुझे कर फिर हो रही है, कोई रग, मोई गध, कोई नाद
मैं इसे क्या नाम -
भाषा
भाषा?
मेरी बच्ची
मैं इसे क्या नाम दू?
मिहनत की सगी
मादिम समुदायों से चली है जो
मैं एक अशक्त कवि इसे क्या नाम ।
मेरी नही
तुम्हारे साथ फिर सीख रहा हू दोबारा
तुतलाहट शब्दो को गढ़ने की कला
अप दर अय पक्ड रहा हू माकृतियो की छाया
प्रागातिहासिक कन्दरामो के चित्र, लिपिया, ध्वनियां
और मनगद हापों से उपजी विजयी सम्पदा
मेरी बिटिया
तुम्हारी खोजी माखो से फिर दूर रहा हू
ऐतिहासिक यात्राओ ये तिरते मस्तूल
शलो-कवि की बेटी का नाम
१०४
अनोखी सभ्यताए विद्युत तरंगें जग-लगे खजर और जमीन में गडे हुए नगर हाथी दात के पहाड जगल की भूरी पगडहिया और माफिलो से कुचली हुई पत्तियो की भाग मेरी जहें घस रही हैं और भी गहरे नीचे जहां खनिज कोलाहल द्रव प्रवाहित हैं अनवरत सामाजिक सबधो की सतर, घनीभूत परतें । तुम्हारे नौ महीने के अधेरे और जिदगी के उजालो के बीच हल्की झीनी-सी मासल झिल्ली टूटने की-मर्मान्तक वाघ मेरी सुगबू । मैं झेल नहीं पाया पा अपनी समूची उदारता, उत्सुकता और स्वागत के साथ- तुम, जो अपने अस्तित्व की पूरी ताकत के साथ हमारे बीच उगो हो, नवजात, तुम्हे मैं क्या उपहार दू? जलते जगल में घोसला तलाशती गौरैया की चुनमुन' तुम्हारी मावाज जैसे भरी बरसात में नदी का उबाल यमुना की उत्तग उबाल- जस किसी प्राचीन कबीले में ढोल की थाप् अलाव के इद गिद थिरकते आदिम सगीत की मादक धुन जैसे बफ के भाग मे पिघलने का स्वर जसे पपती पर माझी का गीत जसे जसे जैसे गाव की पाठशाला की घटी ! सख्त काली धरती की नमी पर तुमने जब डगमगाता पहला कदम होले से रखा था तब हमारी दो जोडी पाहत आखो मे मेरी बुलबुल १०५
तिर भाये ये, प्रसमय सपने, हार,
और असीम सागरा निस्मीम गहरा नीमापन
सालदर-साल
उम्रपीर पर
बदसती दुनिया
और दुनिया को बदलने की सवीरा के साथ
जमाने मी मापास्ति मापदामों के बीच
तुम्हें क्या मेरी वापी-
तुम्हारी यांट पर
माखिर तुम्हें भोर मा ? मेरी मुस्तर दिन ।
नापे गये
पदमथरबदम
सामूहिक अनुभम, सही गयी दूरिया, निमम सच्चाइया
अपनी मिट्टी से मिले तमाम इन्सानी जज्बात
और सूरज की रिपो से होड लेती प्रसस्य आखो को दीप्ति ।।
['ओर" ए "तो"]
योल मरी को घरती बोल
राज सिंहासन गवाहोल
बादल बिजली रन अधियारी, दुख को मारी परजा सारी
बच्चे - बूढ़े सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं दुखिपा नारी
बस्ती बस्ती सुट मनी है
सब बनिय हैं सब व्योपारी
कब तक जनता की बेचनी, पब तक
की बजारी
कब तक सरमाए के धंधे, का।
बोल अरी ओ
राज सिंहासन
?
हिन्दी की, प्रगतिशील कविता : एक पुनर्विचार -डा० कमला प्रसाद 7 लेखको के सम्मेलन में बोलते हुए एक बार प्रेमचन्द ने कहा था कि "साहित्य कार या कलाकार स्वभावत प्रगतिशील होता है। और उसका स्व भाव यह न होता, तो शायद वह साहित्यकार न होता। उसे अदर भी एक कमी महसूस होती रहती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसको आत्मा बेचैन होती है। अपनी यल्पना मे वह व्यक्ति और समाज को सुख मोर स्वच्छ दता की जिस अवस्था मे देखना चाहता है, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसीलिए वतमान मानसिक और सामाजिक अवस्थामो से उसका दिल पुढता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्याओ का मत कर देना चाहता है जिससे दुनिया में जीने और मरने के लिए उससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय । इस पर शायद इस विशेषता पर जोर देन की जरूरत इसलिए पडी कि प्रगति या उन्नति से प्रत्येक लेखक या प्रकार एक ही अय ग्रहण नही करता।" [' हस" में प्रकाशित १९३६ के प्रगतिशील लेखक संघ के वक्तव्य का श] ' विचारणीय यह है कि वह कमी कौन सी है, जिसका दद्व रचनाकार को सकझोरता है । जाहिर है कि इस कमी का सबध बाहरी सामाजिक व्यवस्था से है। रचनाकार चाहता है कि जिस व्यवस्था मे मनुष्य जीता और रहता हो उसमे भाईचारा हो, उसमे विकास की सभावनायें मौजूद हों, स्वाथ, ईर्ष्या, द्वेष की प्रतियोगितायें न हो, लगातार बेहतर भविष्य के लिए उसको शक्ति का उपयोग हो, यथास्थितिया, प्रगतिशीलता को बाधित न कर पावें और कुल मिलाकर यह शोषणविहीन हो। जब उसके मन का समाज नहीं होता, तभी वह उस व्यवस्था का विरोध करता है । विरोध के पीछे "यथास्मै रोचते विश्वम" अर्थात उसको सार कल्पना मे निहित रहता है । ठीक है कि उसके हाथ में राजनीतिक सत्ता नहीं होती, जिससे वह उस व्यवस्था का मत कर सके, परन्तु यह भी तय है कि उसकी रचना परिवतन के लिए जन - - १०७ -- मत तैयार करती है जनता के बीच वह यथास्थिति और गतिशीलता में फक करती है । व्यवस्था विरोधी सगठन और निर्माण मे रचनाकार को सतत चेष्टा कालजयी प्रभाव छोडती है । इस प्रसग मे जब हम अपने देश की ओर नजर दौड़ाते है, तो व्यवस्था विरोधी रचनाकारो की शानदार परम्परा यहा भी दिखाई पड़ती है। बाल्मीकि, कालिदास, सरहपा, कबीर, अनेक सिद्ध सत, तुलसी जैसे कितने नाम हैं जिन्हे समाज का शोषक वाचा पसद नहीं था। मतलब यह कि रचनाकार को यदि व्यवस्था के पक्ष मे खरीद नहीं लिया गया तो स्वभाव से उसमें गतिशील ससार का स्वप्न होता है। यही गतिशील ससार प्रगतिशील रचना की सारवस्तु है । इसी सारवस्तु को निरतर माज माज कर मब नियमित, विश्वसनीय और अनिवाय बना लिया गया है। दुनिया में आज प्रगतिशीलता यदि अनिवाय हो गई है तो उसमे कालजयी रचनाकारो का स्वप्न ही मूत हुआ है । लम्बे सघप के परिणाम स्वरूप राजनीतिक शक्ति को अपने पक्ष मे कर लेने के कारण उनके स्वप्न धरती में उतर आये हैं । बीसवीं शताब्दी उनके लिए महत्वपूण इसीलिए हो गई है कि इसी मे उन्हें खोया हुमा सामाजिक विश्वास मिला है, खोई हुई अभिव्यक्ति रचनाकार को मिली है भोर खोया हुआ ढाचा समाज को। वतमान मे प्रगतिशील लेखन माक्सवादी चितन का रचनात्मक रूपाकार है। इसका अर्थ यह नही कि इस विचारधारा के पूर्व का लेखन प्रगतिशील नहीं रहा । हिन्दी के पिछले इतिहास की प्रगतिशीलता के विवादास्पद पहलुमो क फिलहाल स्थगित कर दें तो भी माधुनिक भारतदु युग से हमें व्यवस्था विरोधी लहर क्रमबद्ध रूप से मिलती रही है। रीतिकालीन सामतवादी मूल्यो को समाप्त करने का पहली बार यूत इसी युग मे लिया गया। भारतेन्दु के नेतृत्व में इस समय नाट्य मण्डलिया जन मानस का रूपान्तरण कर रही थीं। लेखक सामाजिक विषयो पर कहानियां, विचारपूण निवध लिखते थे और कवि जातीय चेतना को सहेजने के नाम मे सलग्न ५। 'कपि पचन सुधा' मे भार तेदु की एक विज्ञप्ति प्रकाशित हुई पी कि "भारत वर्ष की उन्नति के जो अनेक उपाय महारमागण आज कल सोच रहे हैं उनमें एक और उपाय भी होने की आवश्यक्ता है। इस विषय के बडे-बडे लेख और वार्ताए प्रकाशित होती हैं किन्तु वे जनसाधारण मे दृष्टिगोचर नहीं होती। इसके हेतु मने सोचा है कि पातीय सगीत की छोटी-छोटी पुस्तकें बनें और ये सारे देश में गाव गांव में साधारण लोगों में प्रचारित की जाये। इस विषय में जिनकी कुछ भी रचना शक्ति है उनसे सहायता पाहता है कि वे लोग भी इस विषय पर पोत घर बनाकर स्वतत्र प्रसाशित परया मेरे पास भेज दे,म उनको प्रकाशित करूगा और सब लोग अपनी-अपनी मण्डली में गाने वालों को यह पुस्तक दे।" ("दवि वचन सुषा"-मई १९ अक में प्रकाशित विज्ञप्ति का अपा), विज्ञप्ति का प्रभाव पड़ा कि सावनी, पजती, विरहा, रेसता, मल्हार, ठुमरी, तथा गजलो में जातीय चेतना का चयन होने लगा। मारते दु युग का काम्य भादोलन एप प्रकार से जनता को शिक्षित करने के लिए था। उनकी शिक्षा के माधार जन घादी थे। मै यथार्य को दुनिया को जनमानस में विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने समझा कि "विलायती माह के पापकार से देश में औद्योगीकरण होगा इसलिए उसी सूत्र को आदोलन का प्रेरक पुना। घे मजदूर सगठनों के परधर थे, सामाजिव रचना के सदम में थे विकासवाद पर मास्था रखते थे, रूस की क्रांति पो उन्होंने जनता की शक्ति का नया सूय कहा था । वे सामाजिक ढांचे में वामूल परिवतन चाहते थे। वे चाहते थे कि रचनाकार सघन विचारों और भावों की अभिव्यक्ति परमात्मा और मास्था का लेखकीय कर्म परे । जो विरासत कायम करना चाहते थे उसको प्रेमचन्द और निराला ने पहचाना था। रामचन्द्र शुक्ल ने पतत उसे विस्तार दिया। द्विवेदी युगीन कवियों में प्रमुख थे मैपिती शरण गुप्त । गुप्त जी ने देशप्रेम जातीय एकता, साम्राज्यवाद विरोध की काफी कविताए लिखीं। वे उस समय एक तरह से जनावि हो गये थे। उन्होंने बगला की व्यवस्था विरोधी कविताओं का अनुवाद कर अपनी आस्था को प्रफ्ट किया। गया प्रसाद शुक्ल 'विपूल', तो उस समय तक साम्यवादी प्रभाव की रचनाए लिखने लगे थे। धागीपवर मिश्र कविताए लिखते थे, जिनमें हिदी उर्दू की एकता प्रयोग पे । द्विवेदी जी ने खुद जन शिक्षा की दृष्टि से "माल्हा" बैसवाडी बोली में लिखा, जिसमें विषय की ताजगी है। उनकी युग शिक्षा के केद्रीय विषय थे-देश प्रेम, जनभाषा, किसान मजदूरों भडतो के संगठन, मकाम के कारणों का बोध भादि। वास्तव में प्रगतिशील साहित्य का मूल सन्दर्भ यदि मानवता के प्रति प्यार और आस्था है, अय एव धर्म के रूढ़ ढाचे का विरोष है, सामा य जन की पक्ष- घरता है और उसके लिये सघप का बाह्वान जरूरी है तो छायावादी काव्य भाव घोष के स्तर पर अधिक और विचारधारा के स्तर पर कम प्रगतिशील है। उसी 'युग मैं वे रचनायें भी हैं, जो वैचारिक गतिशीलता को द्विवेदी युग से आगे बढ़ाती हैं जैसे युगात, युगवाणी, ग्राम्या, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, भये पते, रानीबानी, खजोहरा, मास्को डायलाग्स, गर्म पकोडी, आदि। भारम्भिक छाया- बानी काय में सामन्ती सरकारों के बजाय पूजीवादी सस्कार अधिक मिलते हैं, लेकिन वे सस्कार नयी कविता जैसे विकृत न होकर उस श्रेणी के हैं जिनमें
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करने की आकाक्षा है । सन् १९४७ मे प्रतीक, के प्रकाशन से शुरू होने वाली नयो कविता प्रयागवादी कविता है जो समाजपरकता और प्रगतिशीलता का विराध करती है जो पुण्ठा और पुटन के सघप को आवश्यक न मानकर उसे जीवन मूल्यो के रूप में स्वीकार करती है। सन् १९५४ मे नयी पविता के प्रकासन से शुरू होने वासी नयी कविता अस्तित्ववादी कविता है जाकि छाया वादी शिशु आस्था के विरुद्ध व्यक्तिनिष्ठ विवेक पर बल देती है, जो मानव को लघुमानव बनाकर उसकी विवशता और पराजय के भोगने को कवि की परम उपलब्धि मानती है । सन् १९५८ में कृति के प्रकाशन से शुरू होने वाली नयी कविता क्रमश उस पराजित पीढी की कविता बनती जाती है जो व्यक्तिनिष्ठ मूल्यो के बदले मूल्यहीनता का झण्डा लेकर मागे बढ़ती है । भूखी पीढी, नगी पीढी, अकविता, ताजी कविता की अनेक क्षिप्त प्रविक्षिप्त पीढियां इसी मूल्य- हीनता के पण्डे के नीचे एक दूसरे को ललकारती है । इस ललकारने की क्रिया बावजूद इन सब मे मातरिक सगति है क्यो कि वे सभी साहित्य और राज नीति के प्रगतिशील तत्वो को अस्वीकार करती हैं-नयी कविता का आरम्भ न तार सप्तक से हुआ, न तारसप्तव तक यह सीमित रहो" (मालोचना ४४ पृ ७५ लेख न दकिशोर नवल)। जाहिर है कि प्रेमपद, यशपाल, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, रागेय राघव भोर रामविलास शर्मा-कहानी, उपयासकार और कवितामो के जरिये जिस यथाथवादी रुझान को केद्र म रखकर रचना कर रहे थे, उसकी खोज दूसरे तीसरे दशक से ही की जाने लगी थी। चौमे दशक में तो ये शक्ति शाली रचनाप्रवृति का रूप ले चुकी थी। प्रगतिशील कविता का आदोलन विकास की दृष्टि से तीन चरणो में विभक्त है। पहला चरण आजादी पूर्व काव्य उभार का है। इस उभार मे कई तरह के कवि सक्रिय थे। जैसे छायावादी तर रोमानी कवि, प्रगतिशील, राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि आदि। कवियो मे निराला, पत (छायावादी), बच्चन, नरेंद्र शर्मा, अचल, आरसी प्रसाद, भग- वती चरण (रोमानी) नागार्जुन केदार त्रिलोचन, रागेय राघव, शील रामविलास शर्मा, सुदशन चा, शिवमगल सिंह 'सुमन' (प्रगतिशील) नवीन, दिनकर, (राष्ट्रीय काव्यधारा) की रचनायें इस दौर में साम्यवादी प्रभाव मे हैं । इन कवियो का रचनाजगत बहुत सुलझा हुआ नहीं था। वे क्राति को समपे विना अतिरिक्त उत्साह मे रूसी क्रांति के गीत लिखते थे, साम्यवाद का स्वागत करते थे, मानवता को परिभाषित किये बगैर दुलारते थे, उमाद मे आकर रक्तपव मनाते थे । लाल निशान की प्रशसा करते थे, क्रातिकारी पार्टी में शामिल हुये बिना काति की मराजक बातें करते थे, गावो के नाम पर या तो वहाँ के निवासियों के भोलेपन में झूमते थे या उनको दोनता पर दूर से मासू पूंजीवाद की गतिशील मानवीय भूमिका थी और यह सामन्तवाद या विरोधी पा । यहा तक कि महादेवी के माध्य में गहरे स्तर पर नारी को जड सामन्ती जातिगत व्यवस्था से मुक्त करने की पीहा है । छायावादी कविया में निराला का व्यक्तित्व सर्वाधिर विद्रोही जनतांत्रिय तथा गतिगीत रहा है। वे भारतीय क्सिान का तेजस्वी वगबोध लेकर उभरे थे । उहोंने चेतना के अह भोर विलम दोनो प्रकार की कवितायें लिखी। उनकी प्टि में आरम्भ से ही काति की आकाक्षा थी जो कि 'बादल राग' जसो रचनाओ में प्रकट हुई है । छायावादी युग में राजनीतिक धुरी गाधी के हाथ थी, जिसमें मूल्या की दृष्टि से राष्ट्रप्रेम, जनता की भावना, साम्राज्यवाद विरोष के साथ साथ समझौतावादी आत्म परक दलीलें भी थीं, ठीक उसी प्रकार छायावादी वाव्य मे इन सभी भावनाओ का मिश्रण है। चौथे पाच दशक-प्रगतिवादी कविता, रामानी तथा नयी कविता के आरम्भिक रूप के मिले जुले चरित्र से भरे हुपे हैं । इस समय भारतीय राज- नीति में अक्तूबर माति का प्रभाव फैलने लगा था । सघप और चितन में यथाप के प्रति गहरी ललक और माग मे गुणात्मक असर मा जाने से माक्सवादी विचारधारा वास्तविक यथाथ तक ले जाने लगी थी। गावगाव मे किसाना क सगठन, ट्रेड यूनियनो की एकजुटता, मध्यवग की वेचनी, राष्ट्रीय बाजादी के सघप में वामपथी नेतामो का प्रभाव आदि कारणो से साम्राज्यवादी अग्रेजी, सत्ता डगमगाने लगी थी । वामपथ के प्रति जो नया उत्साह था, उसी की पृष्ठ भूमि म मुल्कराज पान द, हीरेन मुखर्जी, सज्जाद जहीर, (बन्नेभाई) आदि की प्रेरणा से "अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक सघ" का गठन हुमा । प्रेमवाद की अध्यक्षता म सगठन का पहला अधिवेशन १६३६ में हुआ। मजदूर-सग ठनो की भाति जिले एव तहसीलो मे इसकी शाखायें फली । रचनाकारो ने यहा तक कि घायावादी कवियों ने जन रुचि को केद्र मे रखकर कवितायें लिखी। इसी समय "तारसप्तक" का प्रकाशन हुआ। "तारसप्तक" मे सकलित सात मे से पाच कवि कम्युनिस्ट थे, पर वे इसलिये वहा थे क्यो कि नयी चिता दृष्टि की शुरुमात उन्ही के पास थी। वे हो जनभाषा मे जनकथानक लिख रहे थे। सभव न था कि अज्ञेय नये काव्य आन्दोलन के अगुया उन्हें छोड कर बनत । उहोने प्रगतिवादी कवियो को साथ लेकर उस आदोलन को तोडना चाहा । रामविलास शर्मा ने लिखा था कि नयी कविता का आरम्भ तारसप्तक से जोडना गलत है, वहीं के शब्दो मे ' मन् १९३८ मे रूपाम के प्रकाशन के साथ शुरू होने वाली नयी कविता प्रगतिशील कविता है, जो माक्सवाद से प्रभा विन है ययायवादी रुझान जिसमे प्रबल है जिसम कुण्ठा और अप्ति से सघप करने की आकांक्षा है । सन् १९४७ मे प्रतीक, के प्रकाशन से शुरू होने वाली नयो कविता प्रयोगवादी सविता है जो समाजपरकता और प्रगतिशीलता का विराध करती है जो पुण्ठा और मुटन के सपप को आवश्यक न मानकर उह जीवन मूल्यो के रूप में स्वीकार करती है। सन् १९५४ मे नयी कविता के प्रकाशन से शुरू होने पासी नयी कविता अस्तित्ववादी कविता है जोकि छाया वादी शिशु आस्था के विरुद्ध व्यक्तिनिष्ठ विवेक पर बल देती है, जो मानव को लमुमानव वनापर उसकी विवशता और पराजय के भोगने को कवि की परम उपसन्धि मानती है । सन् १९५८ में कृति के प्रकाशन से शुरू होने वाली नयी कविता क्रमश उस पराजित पीढी की वविता बनती जाती है जो व्यक्तिनिष्ठ मुल्यो के बदले मूल्यहीनता पा झण्डा लेकर आगे बढती है । भूखी पीढी, नगी पोढ़ी, अकविता, ताजी कविता की अनेक संक्षिप्त प्रविक्षिप्त पीठिया इसी मूल्य- हीनता के झण्डे के नीचे एक दूसरे को ललकारती है । इस ललकारने की क्रिया के बावजूद इन सब मे आतरिक सगति है क्यो कि वे सभी साहित्य और राज नीति के प्रगतिशीन तत्वो को अस्वीकार करती हैं-नयी कविता का आरम्भ न तार सप्तक से हुआ, न तारसप्तक तक वह सीमित रही" (मालोचना ४४ पृ ७५ लेख नन्दविशोर नवल)। जाहिर है कि प्रेमचन्द, यशपाल, नागाजुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, रागय राघव भोर रामविलास शर्मा-कहानी, उप यासकार और कवितामो के जरिये जिस यथायवादी रुझान को केद्र में रखकर रचना कर रहे थे, उसकी सरोज दूसरे तीसरे दशक से ही की जाने लगी थी। चौमे दशक में तो वे शक्ति का रूप ले घुकी थी। प्रगतिशील कविता का मा दोलन विकास की दृष्टि से तीन चरणो में विभक्त है । पहला चरण आजादी पूर्व काव्य उभार का है। इस उभार मे कई तरह के कवि सक्रिय थे। जैसे छायावादो तर रोमानी कवि, प्रगतिशील, राष्ट्रीय काव्यधारा के कवि आदि। कवियो मे निराला, पत (छायावादी), बच्चन, नरेंद्र शर्मा, अचन, आरसी प्रसाद, भग वती चरण (रोमानी) नागार्जुन, केदार, त्रिलोचन, रागेय राघव, शील रामविलास शर्मा, सुदशन चक्र, शिवमगल सिंह 'सुमन' (प्रगतिशील) नवीन, दिनकर, (राष्ट्रीय काव्यधारा) की रचनायें इस दौर में साम्यवादी प्रभाव मे हैं । इन कवियो का रचनाजगत बहुत सुलझा हुआ नही था । वे क्राति को समये बिना अतिरिक्त उत्साह मे रूसी क्रांति के गीत लिखते थे, साम्यवाद का स्वागत करते थे, मानवता को परिभाषित किये बगैर दुलारते थे, उमाद मे आकर रक्तपव मनाते थे। लाल निशान की प्रशसा करते थे, क्रातिकारी पार्टी में शामिल हुये दिना क्रांति की अराजक बातें करते थे, गावो के नाम पर या तो वहां के निवासियों के भोलेपन मे झूमते थे या उनकी दोनता पर दूर से पासू पाली रचनाप्रवृति महाते पे। प्रलप, विप्लव, वार, ललकार उनके प्रिय दाद ऐ । विडम्बना यह विमधिकांश कवि प्रसय पौर विप्लव के गीत मिसते पेमौर गांधी के उपवास के सामने नतमस्तर हो जाते थे। रोमांस, उपल पुपल पा प्रांतियों से छनफर इस युग के रचनाकारों में बो-त्रित्तोपन, मागार्जुन, केदार, मुक्तिबोध भाक्षि त्रिलोधन, भागाजुन और कदार की पवितायें सामाय जन को ही सम्बोधित होती रही । त्रिलोचन की पविता में मेहनतमा सामान्यजन गाय मारपना ये माफत यह उस आदमी को परिवेश की जानकारी देता, नायकर्ता की तरह तैयार करता है। त्रिलोधन का सामा य पन करतम जटिमतामो से अनभिज्ञ नही है। "नगई महरा" मे मगई की सादगी यासान नहीं है. वह परिवेश की सामान्यजनीन मारमीयवा से जमी है । यही प्रारमीयता मजदूरों की एकता और सघष की समावना पंचा करती है । इसमें प्रेम, उत्साह, शांति, कीप और चोक को जनसरकारी भावनायें जमा विकसित होती हैं । पवि पा प्रेम औसत आदमी को सामूहिकता प्रदान करता है । तारीफ की बात यह है कि इस कवि ने अग्रेजी के परम्परागत काव्य छद सानेट में वष्य की उ मुक्तता और सहजता रुपया दी है। 'धरती' और "दिगत' मे सपाटरयानी परस्पर विचार सूत्रों में उलझती जाकर ऐतिहासिक गहराई प्राप्त करती है । अनुशासित पायेग वा मह कवि हिंदी जनवादी कविता रे क्षेत्र में महत्वपूर्ण है। नागार्जुन जनवादी पविता के लोप कवि हैं। लोक मानस की राजनीति, अयनीति घमदृष्टि, लोक कथायें, मिथक और परम्परायें नागार्जुन को मालूम है । इसी ज्ञान के जरिये लोर मयानक के भीतर से वे ययास्थितियों को तोडते हैं। यथास्थिति भजन में, पर्वत, बादल और नदिया को पार बना डालत हैं, निरन्तर समय की राजनीति से जुडे रहते हैं वग सधप के द्वारा नागरिक घम निभाते हैं । सवहारा की ओर से परीक होकर नागाजुन निष्ठावान जनवाद का परिचय देते हैं। इतने सवेदनशील हैं कि सवहारा पर होते हुये जुल्म के विरोध में ठिठरी काया के भीतर से फनफनाने लगते हैं। जनवादी राजनीति को ऐसी कवितायें लिखते हैं, जि हे गुनगुनाया जा सके। नागाजुन की कविता के नायक मजदूर किसान हैं । शोपण से मुक्त कराने के लिये प्राति के हर दौर में उनकी कविता साथ निभाती है । युगधारा 'सतर, पखो वाली, 'प्यासी पय राई माखें, सबलनों में रवि की सवहारा पक्षधरता जीवन के सभी क्षेत्रो मे नजर आयी है । हाल में प्रकाशित कविता "ऐसा तो कभी नहीं हुआ था', (हरिजन गाथा) लोक मिप के प्रदर से क्राति की पृष्ठभूमि घोषित करती है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता का क्षेत्र भी उपरोक्त दोनो सहमोगियो की तरह गांव का ही है, साथ ही कस्बे कामजद्दर भी । आरम्भ मे वे प्रेम और प्रकृति विषयक कविताओ में किचित रोमानी रहे, पर शीघ्र ही मुग्य रुझान जनवादी हो गया। 'युग की गगा", "लोग और आलोग', "आग का आइना" म उनकी महत्वपूर्ण प्रगतिशील रचनायें हैं। केदार ने ग्राम्य जीवन के रेखाचित्र कविता के जरिये बनाये है । उहोंने समूह गीत लिसे हैं जिसे गांव के लोग मिलजुल कर गाते हुये अपने बदलते सस्कारो की बानगी देते हैं । "कराडो वा गाना" और "कटुई का गीत" इसी तरह के समूह गीत हैं । लोक धुन पर आश्रित में गीत किसान, मजदरा में बदलने की शक्ति देते हैं । स्पष्ट है कि इन कवियों में अघिकाश को जमीन ग्रामीण है । ऊपर से देखने पर गावो की हालत अधिक नही सुपरी वस्तुत वहा भी राजनीतिक क्समसाहट जागी है । यह कहीं कहीं वग संघर्ष को मूत रूप भी देती है। नागार्जुन का किसान राजनीतिक समझ रखता है, केदार का किसान चौथे दाव की रोमानियत से पूरा मुक्त नहीं है । प्रिलोचन का विसान धीरे धीरे सास्कृतिक लहाई की ओर है । नागा र्जुन का किसान मजदूर अपेक्षाकृत अधिक समकालीन है। स्वतंत्रता पूर्व जमी जनवादी कविता को दबाकर मायवर्गीय पूजीवादी आधुनिक्ता पो उभारते जो काव्य प्रवृत्ति आई, उसके खतरे को बारीकी से मुक्तिबोध ने पहचाना । "तारसप्तक" मे जिस समय वे प्रकाशित हुये, इस खतरे को उतनी गहराई से नहीं देखा पा । वे निजबद्धता और सामाजिक समय के द्वद्व से गुजर रहे थे। वाद मे जिस ढग से "प्रतीक", 'नयी कविता" तथा द्वितीय और तृतीय सप्तको में नयी कविता के नाम पर जन विरोधी कवियों को एकत्र किया जा रहा था और सीधे-साधे जनवादी आदोलन को ध्वस्त करने की मुहिम तेज की जा रही थी, मुक्तिबोध ने उस खतरे को महसूस किया और रचनात्मक उत्तर दिया । उत्तर कविता और आलोचना के दोनों क्षेत्रो मे वजन दार सिद्ध हुआ, एक साहित्यिक की डायरी, नयी कविता का प्रात्मसघष तथा अय निबध, नये साहित्य का सौंत्यशास्त्र और 'चाद का मुह टेढा है' के प्ररा- शित होते ही अशेयपथी खेम म भगदड मच गई। 'राहो का अन्वेषण' क्षणवाद, लघूमानव, मुक्तचेतना, स्वायत्तता, अस्मिता की रक्षा के सिद्धातो की पूजी- वादी प्रेरणाभूमि को मुक्तिबोध ने जिस ढग से खोखला सिद्ध किया, उससे सातवें और आठवें दशक के कवियो को भम मुक्त होने में सहायता मिली । मुक्तिबोध ने आगाह किया कि पूर्वा लोक्ता के बहाने आयातित साम्राज्यवादी सस्कृति कितनी खतरनाक है । मुक्तिबोध का बोध और सम्बोधन क्षेत्र मध्यवग था। वे इस वग को आवादमिक शू यता तथा मूल्यहीन विद्वता का असली चरित्र जान सके। उनकी जन चेतना की स्पष्ट और वकल्पिा आकृति थी। ‘ब्रह्मराक्षस", "अंधेरे में", 'एक अभूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन" आदि रचनाओं में फटेसी के माध्यम से मुक्तिबोध ने सामाजिक सरचना के वतमान और भविष्य को बखूबी रखाकित किया है । उनकी पविता ने भात्मानुभूति, वक्तिमता, अभि व्यक्ति को आजादी और जनतत्र जसी मूल्य प्रक्रियाओ को जनवादी प्रथ प्रदान किया है। प्रगतिशील कविता के दूसर दौरभ शमशेर का कवि व्यक्तित्व रचना के क्षेत्र में काफी टेढ़े मेढे जटिल रास्ता से गुजरा है। वे हल्की रोमानियत और पश्चिमी प्राधुनिकता से लेकर प्रगतिवादी रास्तो मे रुकते मोर रमते रहे । मांस की चित्रकला और शिल्प प्रादोलना से वै प्रभावित हुये । वले, लारेन्स, इलियट पाउड, कमिन्स, हापकिस ओर डायनल टामस का रचनात्मक साक्षातार किया, उदू गजला को यात्मसात किया। शमशेर की कविताओ फा कमान सामाय जन की सामा यतायो का नहीं है, रोमास की कुछ कवितामा को छोडकर । उन्होने बूा जनता क्सिान, मजदूरो की आनाक्षाओ, इतिहास का भविष्य अंस प्रमगा को माक्सवादी दृष्टिकोण से चित्रात्मक शैली में बाधा, साम्यवादी जनादोलनो की अनिवायता महसूस करते हुये 'म शाम है 'काम र दत्त भारद्वाज की शहादत की पहली बरसी पर" 'चीन' हमारे दिल सुलगते हैं जैसी रचनाये लिखी। "अमन का राग" शमशेर की प्रसिद्ध जनवादी कविता है । नयी कविता के क्षेत्र में माक्सवादी रुझान के साथ कविता, रामविलास शर्मा, नेमीचद जैन ने भी लिखी किंतु ये बाद मे मालोचना और नाटक की मार झुक गये । केदारनाथ सिंह ने जन-सस्कृति को बिम्बो के माध्यम से जाना पह पाना और मध्यवर्गीय दुनिया में तैरते रहे । नरश मेहता ने कुछ दिन माक्स का नाम लिया फिर वैष्णव हो गये। प्रगतिशील कविता को अपनी पहचान कायम करने में कठिनाई प्रगति विरोधी कवियों की तुलना में तथाकषित भरा जय समाजवादियो के कारण हुई। इस वग के प्रतिनिधि कवि, विजय देव नारायण साही, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि रहे हैं। ये कवि परिमल ग्रुप मे वैचारिक दृष्टि से लोहिया-समयक थे। इनका समाजवाद कम्यु निस्ट विरोधी रहा है।होंने अतर्राष्ट्रीयता, अनुभववादी भराजक विचार हीनता मयवा व्यक्तिवादी अमूतता को रचना की प्रेरक दृष्टि माना, इसलिये ये किसान मजदूरों को साम्यामूलक वैकल्पिक सथप प्रदान नहीं पर सके, प्रयोग वाद स विलग घोपणाओ के बावजूद परिणति तक ये उसी माय सत्य की दुनिया मेजा मिले। जनवादी कविता का तीसरा चरण उन रचनामो से बनता है जो पिछली प्रगतिशील पविताओ को पृष्ठभूमि म छाहर आग बढती है । सामान्य रूप से पौधे के कवि जभी सक्रिय हैं, पर मनोगत रचना, काव्य और शिल्प को अवि भाजित इकाई के रूप म देखते हुये जो कवि नये उत्साह म सधप के अधिक सायर ययाप म सलग्न होकर बूर्वा शीतयुद्ध से मुक्त होने का प्रभन वायत्रम लेकर चले हैं, वे अपनी स्थिति पूर्व पीढी से आगे बना लेते है । प्रगतिशील कविता की यह पौड़ी पिछलो कमजोरियो से उबरने के प्रयास से जमी है। प्रयास का स्वरूप स्पष्ट करने के पहले पिछली कमजोरियों को सश्लिष्ट रूप से जानना जरूरी है। चालीस वर्षों का जनवादी लेखन अनेक उतार चढावो से गुजरा । राजनीति के जितने क्षेत्रीय प्रयोग थे, सभी रचना में दिखाई देते रहे। मराज मनोवृनि, सशस्त्र क्राति तथा संसदीय काति आदि सभी प्रकार के चरित्र की कवितायें लिखी गई, परिणाम हुआ कि जन चेतना की स्पष्ट भाकृति नहीं बन पायी । दो परस्पर काव्य प्रवृत्तिया पूरक नही विरोधी जैसी लगती रही। अपनी जवानी मे जिन कवियो ने राही होने के बजाय 'राहो के अवेपी' कह कर आधुनिक चिता के आगमन का नेतृत्व करने का दावा किया था, उनम से पई श्वेत केशी होने के बावजूद अभी भी राहो का प्रवेपण (१) ही कर रहे हैं। गुमराह लोग समझते होंगे कि वे किसी न किसी दिन रास्ता मिल जाने की "घोषणा करेंगे। ऐसी कल्पना काफी लुभावनी है । लेकिन हकीकत है कि उह रास्ता कभी नहीं मिलेगा। राहो के मवेपकों को करारा उत्तर देते हुये आज के युवा प्रगतिशील कवि यह कहन के हकदार हैं कि असली राम्ता किधर है। रास्ते की ओर इशारा करने वाले कवियो ने केवल उपदेश ही नहीं दिया, उहान इसकी सच्ची सीख को रच कर भी साबित किया है । वस्तुत , गस्ता तो पहले ही से बडा स्पष्ट था । "रास्ता इघर है" मे अनेक कवियों ने वै रचनायें दी हैं, जिनका सम्बघ सामा यजन या कार्यकर्ता से है। कार्यकर्ता कवितायें सपाटबयानी के करीब इसलिये होती हैं कि वे सीध या तो अशिक्षित जनता को सम्बोधित होती हैं या उसके उस सगठित वग को जो जनता को यथाय की दुनिया में ले जाने की बेचनी रखता है। ये कवितायें सामाय समस्याओ और जन भाषा से बुनी होती हैं। नोक वाता से इनकी शक्ति प्रजित की जाती है । सकलन के पहले खण्ड मे केदारनाथ अग्रवाल और नागाजुन की कवितायें इसी तरह को हैं । ऐसे कवियो म क हैया, शलभ श्रीरामसिंह, मानसिंह राही, मुशी, इव्दार रवी, खगेन्द्र ठाकुर, वेणुगोपाल, पक्जसिंह, अरण मल, आलोधवा, चद्रभूषण आदि की भी कवितायें हैं। ये कवितायें दो तरह की है प्रथम वे जो जनगीतों मे हैं जमे रमेश रजक और मानसिंह राही को कवितायें। दूसरी वे जो कायकर्ता को सम्बोधित करती है, जसे पकज सिंह, वेणुगोपाल खगेद्र ठाकुर की कवितायें । सकलन म ऐसी कविताओ को इसलिये अधिक स्थान दिया गया है, या कि रास्ते की स्पष्ट पहवान के सम्प्रेषण का काय अनिवाय बन गया है।
ये कवितायें जनमानस में छिपी सच्चाई को परजोरती है। मसलन त्रिलोचन, की कविता "सोच समझकर चलना होगा, प्रगति नहीं सक्षण जीय का स्थिरजीवन वे सिलाफ तूपानी गतिशीलता, प्रलयर मनुष्य की सक्रियता, का आव्हान करते हुये पवत जसा साहरा प्रदान करती है । पविता सीय जनता मथवा जुलूस मे शामिल मनुष्य को सम्बोधित है । नागार्जुन की पविता मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूगा' में तुम कोई एक आदमी नहीं वह सेत मजदूर, भूमिदास, कारखाने का प्रमिय, नौजवान छात्र मोर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी है । वविता शोपको की मोटी मोटी चालें और फदा पी याद दिलाती है, वग सगठन पर जोर देती है । कहैया की कविता "मेरी पार्टी", अर्थात भारतीय पम्युनिस्ट पार्टी है । रचना जन भाषा म मजदूरो की एफ्ता प्रदर्शित करती है। यह एकता हिमालयी अटलता, सिधु की उमगित अल्हडता पोर विराटता का मूतरूप है। उसकी सारवस्तु सवहारा की आस्था है। "जिदावाद इन्कलाब", म शलभ श्रीरामसिंह मुक्ति सैनिको का सम्बोधित करते हैं। सामाय जन के जलते प्रश्नों को रचना सघप मे रूपातरित करती है। वह पूंजीवादी दुनिया की अथहीन भाषा का आगाह भी करती है । वह जनता से कहना चाहती है कि सघप ही एक मात्र मुक्ति का बचा हुआ रास्ता है। मानसिंह राही का "चल प्रवाम के लश्कर" माचिंगसाग है। मातिकारी गाते हैं कि काति, उद्देश्यो से भरी शोपितो भी जन सेवा की आधी, तूफान, हलचल और बवडर का नाम है । कातिवारी लश्कर का मुकाम वगहीन समाज है। "हडताल का गीत" रमेश रजक का है। हडतालियो के सकल्प को घोपित करती यह कविता फोलादी साहस और भाषा प्रदान करती है, विवेक के साथ । मुशी की रचना, "राह आगे खुलेगी," जनता को साहसिक मनोबल देती है। चचर चौहान की कविता धनपुरष का प्रतीक लोहा है, जो गलकर अर्थात् रूपातरित होकर पौलाद बन जाता है । यही स्थिति सवहारा की होती है । इयार रवी, झुग्गी वालों का गीत लिखत हैं । खादी उपवास चमत्कार, वाला का पर्दाफास करती रचना रहती है कि देश उनका है जो उसे बनाते हैं । खगेद्र ठाकुर ने "दद का ज्योतित समदर" में कहा कि आदमी के दद के कार महल तथा मीनारें उठी है । सामायजन को अक्तूबर जाति की ज्योति मिली, जिससे उसने दुनियां के शोषण के खिलाफ युद्ध छेड दिया । रचना जनता को प्रात्मविश्वास प्रदान करती है। वेणुगोपाल की "बात सिफ इतनी है" मे निम्न माय वग का तथापित बुद्धिजीवी सम्बोधित है । रचना कहती है कि शोषण का चरित्र अब बौद्धिक हो गया है । वह दिखाई दन के बजाय महसूस होता है। वग योद्धा ही उसे बेखते और ताडने का सकल्प लेत है । अशोक चक्रधर की रचना है "ठेकेदार मग लिया"। ठेकेदार के औजार हैं फावडे तमले, धुरमुन, बुतात, झाल, गुनिया, बननी नापासूत, वन्नी, बाल्टी पार सबल । सभी औजार संगठित होकर धन गय ता ठेोदार भाग गया, साधारण रूपक । इसम सगठन का परिणाम इगित है । पकज सिंह की रचना "हम इतिहास के बेटे है" म इतिहास की परता में सदियो से दबकर जीता मनुष्य, जो लडाकू योद्धा हो गया है अपनी ऐतिहासिक यात्रा को याद करता है। वह कहता है कि उसकी नयी ज्योति को सुगध और आग भी इतिहास की देन है । एक तरह से यह रचना जनवादी इतिहास के प्रति आस्था पैदा करती है। "यात्रा", अरण कमल को कविता है। यात्रा उन पजाबी मजदूरो की है, जो घरबार छोडकर वगाल के कारखानो म माम करते हैं उनको नौकरी और छटनी का सम्बध मालिक की जरूरत है गरीबो का रोजगार नहीं । कविता का मम है, 'जहा निभे जिंदगी वही घर वही गांव ।" च द्रभूषण की कविता "बाडा", का वाडा वह व्यवस्था है जिसम आदमी पशुप्रो को तरह बद रहता है । सामा यजन की भोर से वह कहता है कि शोषक इतिहास ने हो गतत रास्ते से भूगोल की यात्रा की है। किन्तु अव इस यात्रा का भम टूट चुका है। कविता म पास पडोस को नये रास्ते में चलने की प्रेरणा है। सूत्र वाक्य है-- यहा झोपडिया परेड के लिए तयार हैं। पालोक धवा ने "मैं केवल एक जल प्राकार" मे नई पीढी को भूख के ममाजशास्त्र पर आधारित आकार देने की कोशिश की गई है। कायकर्ता को सम्बोधित कवितामो मे वृछेक-जनता के उमडते सलाव का चित्र भी खींचती हैं। इनमें-"एक उमडता सैलाब"-मोहन श्रीवास्तव नया मोर्चा-श्रीहर्ष, 'इन्कलाब'-उदय प्रकाश और 'उडान'- ऋतुराज की रचनाए हैं। मोहन की कविता में एक आर सामा यजन है, जिसने सपनो का यथाथ आकाश, सुखो की ऊपा, ऋतुए वप, सम्वत सन रचे थे कि तु उनको भोगने का अधिकार पाया मामातो, अवतारो और मालिकाने । कवि चाहना है कि जनता भम पना करते तिलस्मो का भजन कर उमड पडे । प्रेरक है- 'जगलो मे रास्ता खोजती चिडिया, आसमान जोडले मेघ घरती के टुकडे जाडती भू जलधारा । 'उडान मे प्रेरक है-तार पर बठे विडियो के बच्चे और आस पास उनके माता पिता।' बच्चे माता पिता से जीवा कियाए सीखते हैं। कवि की दृष्टि म हमारी पीढी को आकाश में उडने का उत्साह चाहिए, लेकिन यह वतमान श्यों को बन्ल कर, लुटेरों को नौका डुबाकर और जनता को आजादी दार हो सम्भव है। रचना म जनता के जागत मात्र का ११७ आह्वान है। "नपा पोर्चा" मे मुक्ति सनिका की नय साम्राज्यवादियो के खिलाफ कायवाही का जिक्र है तथा इलाव" म दुनिया के मजदूरा का मिनी नई एतिहामिक, मचाई का। बवि जानता है कि वग विभाजन भोर सघ जरूरी है । वह कहता है कि सदान, खेत, शहर, गाव तथा पिछडे मुहल्लो से आती खबरों में लूट, हत्या, बलात्कार, आपातकाल आदि के खिलाफ ममाचार हैं जाहिर है कि जनता इ बलाबी हो गई है। सकलन मे दूसरे प्रकार की कवितायें शोषर व्यवस्था की खूखार अथवा कूटनीतिक हरकतो को रूपापित करती हैं। वित्ताओ म कही कही भविष्य की आहट भी है। साम तबादी-~पूजीवादी सतरनाक पतरोन केवल अपने देश में नहीं बल्कि दुनिया के किसी योने के सामाय जन का जीना दूभर दिया आपातकाल, मुद्रा म्फीति, काला बाजार अमवा मण युद्ध उसके ही विभिन्न कापक्रम हैं। राजीव सक्सेना की कविता "सुरग के पार" में मापातकालीन सता, पूण जनतत्र तथा उसके बाद की तथाकथित लोक- शाही की वर्गीय एकता को व्यक्त किया गया है। नायिका ने गही को बचाने के लिए जसे मापातकाल रचा और सी० आई० ए. की प्रेरणा से लोगो को अधी गुफाओ में डाल दिया ता उसमे उभरे जन अमतोप को नये डिमो ने अपनी ओर मोडा। इनमें भी वे तर छिप हैं..जो नर महार करते हैं । रचना मे जनशक्ति पर अटूट आस्था व्यक्त है। कुमारद पारसनाथ सिंह ने प्रतीक कविता 'चवरी' में अब तक के तथाकथित जनता का उपशी का नाटक महा है। विडम्बना है कि समूचा गाधीवाद मजबूरी का पर्याय हो गया है। "चवरी" एक वह जगह जहा नाटम को ध्वस्त करने का समय जमा। वह सकल्प जो नक्सलवादी और श्रीकाकुलम से भी बडा समूचे दश मे फैलन के लिए उत्साहित है । विश्वनाथ त्रिपाठी की "पाक मे खेलते हर बच्चे और वे लोग' में पूजीपतियो को मानव भविष्य का हत्यारा और आतोत्पादक यहा गया है। सुरगो के तहखानो के मालिक ये लोग आकाश से खेलत बच्चों को भाजादी धुरुट के धुए से छीनते हैं । धीराम तिवारी ने "वापसी" म आजादी के पिछले वर्षों में जनतम के हीरो को लोक्तव के नाम पर सलनत सुख भोगने वाला बहुसरयर जनता को लुभावने नारों स भ्रम मे डालने वाली वसीयत बाडने वाला स्वार्थी भनुप महा है। रचनाकार भी मशा है कि सहारा की सत्ता ही एकमात्र जनतय की स्थापना पर सरती है। दूसरी ' वापसी" रविता मोहदत्त की है। ववि जनता को जनता का घर बहता है। प्रमी बह जनता पराये पर म है, जहा धूप, अपरा तथा आतक ही मातक है। 'प्रमाण है-नरपो जनताबारनामा को चतान ।" यदि को पूरा विश्वास है कि देश म अमी तर योई परिवतन नहीं हुआ। उसने - - लिखा, "सब कुछ बदल जाना चाहिए था, पर जरम भभी हरे है।" 'एक विश्वास को हत्या" कविता मे भारत भारद्वाज ने कहा कि कृषिम जनता की पहली और दूसरी आजादी में कोई फक नहीं। मन सत्ता परिवतन जन- विश्वासो को लगातार हत्या है। प्रणय रजन की कविता "वे जा पागे निकल गये" में रचनाकार उन शक्तियो की ओर इशारा करता है, जो आगे की फतार में होने के कारण जीवन, शहर, आवास, रंग और फूलों की खुशबू के मालिक बन बैठे। वे नकाब ओढकर मसली को नकती बनाते हैं। यह बात अलग है कि उनके दिन लद गये। जनता ने जो फैसले लिय है, उससे उनके पडयत्र का पर्दाफाश हो गया है । गोविंद श्रीवास्तव ने "बोल्गा से गगा त" रचना में कहा है कि पश्चिमी आणविक सस्कृति ने विकासशील देशो में भया- नक जहर घोला है । उसके कारण अन त जनता अपग, अपाहिज, सर जसे रोगो से पीडित और महामारी को शिकार है । सूखा, बाढ, अकाल, दरिद्रता, को विसने जमा- -इन्हीं भव्य महलों तथा ऐतिहासिक प्रासादों ने। ये मनुष्य भविष्य की हत्या के कारण हैं । जीवन की यात्रा इस माहौल में बड़ी सघपमय है, कि तु रचनाकार की आस्था समाजवादी प्रकाश स्तम्भ के प्रति है, जो बोल्गा से गगा तक ज्योति देता है। राजेश जोशी की कविता "जाडे की रात" है। कविता जाड की रात के जरिये समाज के समकालिक मतविरोध को उभारती है। कहती है कि बद कमरो गम विस्तरो में लोरिया सुनवर सोते लोग एक ओर तथा फुटपाथ मे सोते- बूढे बच्चे तथा जवान औरतें दूसरी ओर। काला अंधेरा जो महलो से चलता है, पुट पाथ के आदमी पर हमला करता है, जिससे वे रात मे बहा भी न सो सके। खुशी इस बात की है कि इसी घुप्प अधेरे मे लोग अलाव से भाग की चिन्गा- रिया तलाशने लगे हैं । "जगली मुर्गे से" मे प्रभाती नौटियाल ने व्यवस्था को जगल कहा है । जगल मे शिकारी मुर्गों को खुशी खुशी जीने नहीं देता। वह रोज उन्हें मारकर टाग उल्टीकर युलाता है । वह निरतर मौत की योजनाए बनाता है। यह इसलिए हो सका कि परम्परागत इतिहास इस जगल से नहीं गुजरा । जाहिर है इतिहास के इस अधेरे की पहचान के बिना धूप की कपना असभव है । श्यामसु दर मिश्र को कविता "रक्त प्रवाही मोट" मे आग्रह है कि देश में केवल नाटक के दृश्य बदले हैं, भटकन और अविश्वास बढा है, मानवीय त्रासदी को फामदी में बदला गया है, आम आदमी के हित में वस्तुत कुछ नहीं बदला । उसे यदि कुछ मिला तो आश्वासन । मलबत्ता यह सही है कि सामाय जन सघप नये रास्ते पर चल पड़ा है। यही सथप निर्णायक होगा। मोहल श्रोत्रिय की कविता "नव साम्राज्यवादियो के नाम" म पश्चिमी देशा के चरित्र का खुलासा है । उन देशो को हरियाली, भविष्य, प्रसन बच्चे और जनता पसन्द नहीं। वे स्वत व्रता और आरम निभरता के भक्षक हैं। वै चक्ति हैं- वियतनाम, क्यूबा, वोलविया, चिली, कम्बोडिया, बगलादेश, अगोला की जनता के सथप का देखार, क्योकि यहा सातवें बडे की धमकी तथा उनके खतरनाय औजार व्यथ सिद्ध हुए हैं। वस्तुत यह आगाह कविता है । मलन मे तीसरे प्रकार की कवितायें वे हैं, जो परिवश की जटिलता को रखाक्ति करती हैं। इनमें से कुछ रचनायें ग्राम परिवेश के यथाय तथा कुछ मध्यवर्गीय मानसिक सक्ट को व्यक्त करती है। ग्राम परिवेश मे जसे धूमिल की कविता "लोह साय" तथा अय हैं। धूमिल ने कथ्य लिया लाहार की भट्टी का, जहा किसान मजदूरो के औजार काटा, कील, हथौडा, सहसी, छेनी गढे जाते हैं। ये हथियार बनाते है-लोहार के कुशल हाय । उसकी चौपाल म मजदूर कहता है कि निहाई और हयोड ने दोस्ती करके घातक आक्रमण शुरू कर दिया, इसलिये हसिये की धार का तेज होना जररी है। यहा माति का जनबोध सुनाई देता है। लीलाधर जगूडी की रचना है-"पाटा'। रचना आग के प्रतीक से शापितो की आजाद और साथक त्रियाशीलता की पक्षधर है। आकाश के खेत मे रात्रि काली खाद, तारे वीज, चाद हसिया, मौजूद है, जरूरत शेष है-बलो की। ताज्जुब है कि आप श मे आधकार है-हवाई जहाज मे दौडने वालो का तथा धरती मे जा जोत नही सकत । रचना की चेतावनी है कि इन केद्रो में अधिकार बदलेगा । बदलने का काम जनता करने लगी है। "अपना बधवा" मे ज्ञानेद्र पति ने गाव के बधुवा मजदूरो की दारणा क्था का मार्मिक बयान बधवा तथा उसके मा बाप के जरिये क्यिा है। बाप और उसके असमथ होने पर बधवा मालिक के घर को सब कुछ समझ कर काम करते है। बदले मे मानिक ने मा की इलाज के लिये पैसे मागने के कारण वधवा को पीटा। वह इसे बर्दाश्त न कर सका। वह हमले के लिय मालिक की ओर मुड पड़ा। यह गाव की इतिहास की अपूर्व घटना थी। रचना का तक है कि मजबूरी ही सघष में रूपा तरित हो जाती है। वरयाम नेगी की रचना है- "अकाल"। मजदूर के पास न खेत है और न जमीन । वह मालिक के लिये ही जोतता और बोता है। खेत की फसल मालिक की और पास मजदूर की। यही मादत अकाल का कारण है। अकाल मे मरे मजदूर के लड़के को सातवना मिल सकती है, पर उसय मुक्ति नहीं। यही सामयिक सच्चाई हैं। "फसल को गीत" में दिविक रमेश ने खेतो मे फसल के कमजोर पौधों से जनशक्ति की कल्पना की है। इन पौधो को कमजोर वही कहते हैं जो शापक हैं। कवि का विश्वास है कि सही हवा (क्राति का समय) आते ही पोध (किसान मजर) अपनी लोह एक्ता का जूझारू परिचय दगें । "पटाक्षेप" - १२० रचना में केवल गोस्वामी कहते हैं कि मजदूरो की एकता का आधार भूस, ताक्त का धम, क्रोध का शोषण है। भूख के ही कारण मजदूरो में लोह शक्ति पैदा होती है जिससे वे आंधी बन कर निकलते हैं। उनको यह समाज शास्त्र ज्ञात होता है कि तहसानो की गोपनीयता में शरण अकाल पैदा होत हैं । वतमान में जो तथापित जनता हाजिर है वह वस्तुत प्रचारतन्न है । इसका लक्ष्य है--मनुष्य मी अहेतुक यात्रा। कवि माहोल को बदलना चाहता है । राजकुमार सैनी को रचना "शाप साय" का मन्तव्य है कि दुनियां में जहा भी शोषण हो- मनुष्य धक्की पिसता हो, चाह चे दफ्तर, फैक्ट्री, कारखाना, खदान, खेत पलियान, राजपथ जनपथ जो भी हो, यहा या मनुष्य यगामी लडाई में एक होगा । उसने जो लाल झण्डा हाथ म लिया लिया है उसे पहरा कर रहेगा । इस रचना मे अटूट जन विश्वास की अभिव्यक्ति हुई है। मध्यवर्गीय बोध और सभावना के लिहाज से केदारनाथसिंह, नीलकण्ठ, चारूमित्र, देवेद्र उपाध्याय, सुरेश शर्मा आदि की कवितायें है । केदारनाथ सिंह को छोटी कविता है-"पूर्णमास"। इसमें कहा गया है कि अब रात, सुबह, दोपहर, शाम-अर्थात पूरा दिन-~-क्रान्ति का आभास देता है । वहतो मानार, सुनाई देती प्राति, दप्टा को पदचाप, सड' का जुलूस, ये सब क्रान्ति के सदेश हैं। रचना बिबात्मक है। "खण्डर के बारे मे" रचना-नोलक्ठ को है। इसमें स म ती पूजीवादी देश का वाचा खण्डहरनुमा पुगना महल है, जिसके मदर दवे हुए लोगो की मावाजें गूजती हैं गोली चाज, न्यायिक जाच, जसन मास की गध-~-इज है, मनुष्य के भविष्य को शमशान में बदलत वादी ढेर हैं, जिसमें असमान कद है । खण्डहर के बाहर का आदमी पदर जाकर भी नहीं लौटा। यह अब की बात है कि आखों की सच्चाई मनुष्य को उसके अदर धकेल ही देती है। प्रकारान्तर से कविता म जनवादी एतिहासिक दृष्टि विकसित करने की सकल्पबद्ध इच्छा है। यही इच्छा व्यवस्था के भीतर दिपी मोती, कारगुजारिया और अधकार का रहस्य समयायगी। बत में आगत मुक्ति की भावना का संकेत है। पूरी कविता सामयिक सच्चाई और ऐतिहासिक समय के द्वद्वात्मक प्रात्मसपप का परिणाम हैं। "सनादा बोलता है" कविता मे चारुमित्र कहते हैं कि दुनिया के समकालोप मौसम का युद्ध प्रेमिया ने खतरनार बना दिया है । इस मौसम मे मा की लोरी बच्चो की खुशी, मजूरी के गीत गायब है। उनका ता अधकार चाहिये और नागरिको के नाम पर उल्लू । रात के अधर मे पक्षियों की हत्या परता अश्वत्थामा उनका प्यार का प्रतीक है। कवि कहता है कि इन सबके होत आगे की स्थिति यह है वि स नाटे से ही दुनिया न प्रकाश का नया माग खोज लिया है। देवेद्र उपाध्याय की कविता जनता पसन्द नही । वस्तव्रता और आरम निभरता भगक हैं। वे पक्ति है--वियतनाम, पूरा, योलपिया चिली, कम्बोडिया, २गलादेश, गोला की जनता म सधप या पार पयोगि यहां मातवें वडे की धमकी तथा उनके सतसाप औजार व्यथ सिद्ध हुए हैं । यस्तुत यह आगाह यविता है । मक्लन मे तीसरे प्रकार की यविता चे हैं, जो परिवा मी जटिलता यो रसारित करती हैं। इनमे से कुछ रचनायें ग्राम परिवेश के यथाथ तथा कुछ मध्यवर्गीय मानसिक सकट को व्यक्त करती है। माम परियेग मे जसे पूमिल यो पयिता "लोह साय" तथा प्रय हैं। धूमिल ने मध्य लिया लाहार पी भट्टी का, जहा मिसान मजदूरो के औजार काटा, कील, हपौडा, सहसी, थेनी गढ़े जाते हैं । ये हपिपार बनाते है-लाहार में पुशल हाय । उसकी चौपाल म मजदूर रहता है कि निहाई मौर हपौड ने दोस्ती करके घातक आक्रमण शुरू कर दिया, इसलिये हसिय को पार का तेज होना जररी है। यहा माति का जनबोध गुनाई देता है। लीलाधर जगूडी को रचना है---"पाटा' । रचना आपके प्रतीर से शापितो की आजाद और साथक क्रियाशीलता को पक्षधर है। आपाश के खेत में रात्रि काली खाद, तार बोज, धाद हसिया, मौजू" है, जरूरत शेष है-चला की। ताज्जुब है कि आकश मे आधार है-हवाई जहाज मे दौडने वालो का तथा धरती में जो जात नही सकत । रचना की चेतावनी है कि इन केद्रो मे अधिकार बदलेगा । बदलन का काम जनता करने लगी है । "अपना बधवा" मे ज्ञानेन्द्र पति ने गाव के बधुवा मजदूरो की दारणा पथा का मार्मिक बयान वधवा तथा उसवे' मा नाप के जरिय दिया है। बाप और उसके असमय होने पर बधवा मालिक के घर को सब कुछ समझ कर काम करते है। बदले मे मालिक ने मा की इलाज के लिय पैसे मागने के कारण वधवा का पीटा। वह इसे बर्दाश्त न कर सका। वह हमले के लिय मालिक की ओर मुड पडा। यह गाव की इतिहास की अपूर्व घटना थी। रचना का तक है कि मजबूरी ही सघप में रूपा तरित हो जाती है। वरयाम नेगी को रचना है- "प्रकाल" | मजदूर के पास न खेत है और न जमीन । वह मालिक के लिये ही जोतता और बोता है । खेत की फसल मालिक की और पास मजदूर की। यही आदत अकाल का कारण है। अकाल में मरे मजदूर के लडके को सा तवना मिल सकती है, पर उसम मुक्ति नहीं। यही सामयिक सच्चाई हैं। "फसल की गीत" मे दिविक रमेश ने खेतो मे फसल के कमजोर पोधो से जनशक्ति की कल्पना की है। इन पौधो को कमजार वही कहते हैं जो पापक हैं। कवि का विश्वास है कि सही हवा (क्राति का समय) आते ही पौध (किसान मजर) अपनी लोह एक्ता का जूझारू परिचय दगें । "पटाक्षेप" १२० । रचना में केवल गोस्वामी कहते हैं कि मजदूरो को एकता का आधार भूख, ताकत का श्रम, क्रोध का सोपण है । भूख के ही कारण मजदूरो म लोह शक्ति पैदा होती है जिससे वे आधी बन कर निकलते हैं । उनको यह समाज शास्त्र ज्ञात होता है कि तहखानो को गोपनीयता के कारण अकाल पैदा होते हैं । वतमान मे जो तथाकथित जनतन हाजिर है वह वस्तुत प्रचारतत्र है । इसका लक्ष्य है-मनुष्य की अहेतुक यात्रा। कवि माहोल को बदलना चाहता है। राजकुमार सैनी की रचना "साप-साय" का मन्तव्य है कि दुनिया में जहा भी शोषण हो--मनुष्य चक्की पिसता हो, चाहे वे दफ्तर, फक्ट्री, कारखाना, खदान, खेत खलियान, राजपथ जनपय --जो भी हो, वहा का मनुष्य अगामी लडाई मे एक होगा। उसने जो लाल झण्डा हाथ मे लिया लिया है उसे पहरा कर रहेगा। इस रचना में अटूट जन विश्वास की अभिव्यक्ति हुई है। -- मध्यवर्गीय बोध और सभावना के लिहाज से केदारनाथसिंह नीलकण्ठ, चारूमिभ देवेद्र उपाध्याय, सुरेश शर्मा आदि की कवितायें है । केदारनाथ सिंह को छोटो पविता है-"पूर्वाभास"। इसमे कहा गया है कि अब रात, सुबह, दोपहर, शाम-अर्थात पूरा दिन-प्राप्ति का आभास देता है । ढहतो मीनारें सुनाई देती प्राप्ति, दृष्टा की पदचाप, सडक का जुलूस, ये सब प्राति के मदेश हैं। रचना बिबामप है। "सण्डर के बारे मे" रचना--नीलकठ की है। इसम स म ती पूजीवादी देश का ढाचा खण्डहरनुमा पुराना महल है, जिसके अन्दर दबे हुए लोगों की भावाजें गूजती हैं गाली चाज, यायिक जाच, जलते मास की गध-बजे हैं, मनुष्य के भविष्य को शमशान मे बदलत बारुदी ढेर हैं, जिसमें असमान कद है । खण्डहर के बाहर का प्रादमी भदर जाकर कभी नहीं लौटा। यह अब की बात है कि माखो की सच्चाई मनुष्य को उसके अदर धकेल ही देती है। प्रकारान्तर से कविता मे जनवादी एतिहासिक दृष्टि विकसित करने की सकल्पबद्ध इच्छा है। यही इच्छा व्यवस्था के भीतर छिपी मौतो, कारगुजारियो और अधकार का रहस्य सममायगी । म त मे आगत मुक्ति की सभावना का सकेत है। पूरी कविता सामयिक सच्चाई और ऐतिहासिम समझ के द्वद्वात्मक प्रात्मसधप का परिणाम हैं । "सनाटा बोलता है" कविता मे चारुमित्र कहते हैं कि दुनिया के समकालीक मौसम को युद्ध प्रेमियो ने खतरनाक बना दिया है । इस मौसम मे मा की लोरी, बच्ची की खुशी, मजूरो के गीत-गायब है। उनका ता अधकार चाहिय और नागरिका के नाम पर उल्लू । रात अधर मे पक्षियो की हत्या करता अवस्थामा उनका प्यार का प्रतीक है। कवि कहता है कि इन सबके होते आग की स्थिति यह है कि सनाटे से ही दुनिया ने प्रकाश का नया माग खोज लिया है। देवेद्र उपाध्याय की कविता 'प्रादमी का दद' कहना चाहती है कि दद ही मनुष्य के आगामी सघप को तापत प्रदान करेगा। उसी की एकता सघप को निर्णायक बनायेगी। सुरेश शर्मा ने "निर्णायक वक्त" में लिखा कि तटस्थ तथा सन्त युद्धिजीवियो की निरपेक्षता वस्तुत यथास्थिति का ही नाम है। व्यवस्था मे पवि को तीन तरह के लोग दीखते हैं जैसे-आतवादी (साम्राज्यवादी शोषय) तनावग्रस्त (नपुसक) तथा मोर्चे के लोग । मोर्चे के लोगा को नयी ज्योति सूय (माक्म) ने दी है जिसे नष्ट करने में पश्चिमी देश लगे रहते है। कवि की आस्था है कि पारवा बढ कर रहगा- साजिपा के बावजूद । "रास्ता इधर है" में कुछ ऐसी रचनाए भी है, जो समकालिन' काव्य कम को परिभाषित करती हैं। ये रचनायें कवि द्वारा, कवि के लिये काव्य प्रनिया के सदभ मे हैं । पवि के पात्मालोचन, सकल्प दृष्टि और दायित्व के प्रसग इससे जुड़े हैं । इन कवितायो के फर्ता है--केदारनाथ अग्रवाल, विजेद्र, मलय, जुगमदिर तायल, कुमार विक्ल और अक्षय उपाध्याय । केदारनाय अग्रवाल ने कविता की जरुरत मे कहा कि कवि सृष्टि के आर पार तब देख सक्ने की शक्ति वाले सूय की खोज करता है। वह कविता के शब्दो, प्रतीयों और विम्बो की माफत उसी सूय को विम्बित करता है। कविता वास्तव में सूय को पारदर्शी दृष्टि की ही अभिव्यक्ति है । यह सूय मनुष्य की निरतरता का नाम है । कवि की दृष्टि में कविता और आदमी एक दूसरे के पूरक हैं। अधेरा, रात्रि, धूप, सूरज और प्रकाश जैसे शब्दो का ध्व याथ भाववादी नही--भौतिकवादी है। विजेद्र ने लिखा है-"अपने प्रिय कवि के लिये" । यह रचना कवि के आत्म आहवान के बहाने जन काव्य की उत्प्रेरक है। कवि कहता है कि रेगिस्तान मे खनिको की श्रम साध्य जिन्दगी है और उपलब्धि के नाम उनके पास क्षीण सहारे । वषा की फुहारो से जमी वनस्पति को तेज गर्मी सुखा देती है, जैसे खनिको की जवानी मूखी हुई। अघेरा और अग्निदाह का राज्य सवत्र है । जहा खनिक प्रकाश की वग चेतना से उठे हैं वही उनको जेल यातनायें मिलीं। चिली और वियतनाम की तरह ही पोषक मालिक यहा है। खरिपत यह है कि अत्याचार के बावजूद धरती में--पक्षी, सुखबनवेर अर्थात श्रमजीवी सवहारा प्रसन । वह सुरक्षा दल-देशी और प्रामक दल-दोनो से निपट लेता है। राजस्थान का उत्तरी इलाका तो अभी आजादी का नाम भी नहीं जानता। वहा नौकरशाह भी उन पर अत्याचार करते रहते है। कवि रचनाकारो से कहता है वि बदले हुए प्रतिमानो से वहा की भाषा और सस्कारो से सरोकार रखकर ही रहें बदला जा सकेगा। मलय ने "रचना तम का स्वाद" मे प्रतीयो की भाषा में एम मोर बुद्धिजीवियो की बहस, फुरसत के ठहाके, तया दफ्तरिया मूल्यहीन १२२ शहर में कमलीला पर करारा व्यग किया है। राजनेतामा को पार भो उसका प्रहार है षयोकि आम आदमी के लिये यह मौसम चाहे जितना सूखा हो, उनके लिये तो सुखद है। रचनाकार इन अतविराघो से गुजरने का सघषपूर्ण स्वाद चखता है। यह स्वाद खतरनाक होते हुए साहस तथा जनहितकारी उद्देश्यो से जुड़े होने से मनमोहक है। यहा, सामयिक -हवामो को चीरने के लिये कवि बौदिक तयारी करता है। भाषा, शब्द तथा पोस्टरा के बार बार दुहराते नाटक की ओर इगित कर मागाह करता है तथा कविता को सघपजीवी मनुष्य को जीवन -क्रिया का प्रतीक बताता है । जुग मदिर तायल ने कविता का अथ' के जरिये कविता का कम बताया- दुनिया की पहचान जनसधप की सभावना का अनुमान, जन एक्ता का विकास, व्यक्ति के मतविरोधो पर चोट तथा मुक्ति आदि । एसा कवि यथास्थिति को तोडने को बेचनी पदा करता है । कविता का मुख्य कम बन जाता है-यर्थाय की ओर भादमी को खोजना और कविता का अन्तर मिटाना । कुमार विकल को कविता "यह सब कसे होता है' में यह समेत है कि प्राज के अनेक कवि मध्यवर्गीय सस्कारो तथा विशेषणों में फसे हैं। वे नही जानते कि यहा~मछुआरे, मजदूर, किसान और बच्चे हैं । वे लारियो तथा जनगीतो से बखवर हैं । वे फसकर देश के बड़े भूभाग से कटे हैं। वे बिना अनुभव के गाव और किसानो की बातें करता है। यदि शहरो के हिंस्र पाशव चरित्र में होते रूपान्तरण को आश्चयजनक रहता है। यहा आकर मध्यवर्गीयता गुमराह होती है। ऊपर से आजादी रात्रि में लाशें--क्तिना स्पष्ट विरोधाभास है ? कवि लोक जीवन की वापसी चाहता है । मा की झुरियो मे महाकाव्य देखन वाला~-गोर्की की मा' जैसा। रचना मध्यवर्गीय मानसिकता को तोडना चाहती है । अक्षय उपाध्याय "कविता के इद गिद" मे मानते है कि पविता करना आसान काय नहीं है समाज में भटक्ता माम नागरिक का दद जितना जटिल और बडा है, कविता का कम भी उसी तरह । बल्कि सच्चाई यह कि दोनो एक हैं। कविता मे गुफामो कदरामओ मे छिपी अनिवाय सच्चाई होती है । सच्ची कविता रचने के पूर्व रचनाकार की चेतना जन शक्तिजय साहस और घातक शक्तियों की फरता के मानसिक द्वद मे गल गलकर लोह की तरह कठोर हो चुकी होती है । कविता-इसी तरह गल गलकर सजीव होती नयी आकृति का स्व- स्प होती है। सकलन में एक आर वाव्य प्रवृत्ति है, व्यक्तियो पर लिखी गई पविताओ की जसे-~-शमगेर की कविता- नजरूल के लिए, अजय तिवारी-माक्स के प्रति तमा श्याम कश्यप को 'शेली के लिए। शमोर ने यह कविता जनावि नजरूल इस्लाम को मत्यु (२६ अगस्त७६) के अवसर पर लिखी है। यह - - १२३ वस्तुन शोक गीत है । नजरूल की आजादी के सपने तीन हिस्सा-पान भारत बगला देश में पर गय । साम्प्रादायिक जहर ने जैसे मनुष्य का ही तीन हिस्सो म बाट दिया हो । ववि ने तीनो दशो की नागरिकता देवी और चुप रहा-जंस विस्फाट की कारगर तैयारी म लीन रहा हो । जनवादी शाय गीतों म मामू नही हाता-उनमे आसुओ से मुक्ति के सपने हात हैं । मसलनन् नजस्ल के सपने ही इस कविता को प्रेरणा है । नजरूल का सपना था-समाज वादी वगहीन समाज । लेकिन उसके बदले साम्राज्यवाद हीरोशिमा, नागा साको, वियतनाम, दक्षिणअफोगा, लातीनी अमेरिका में नरसहार करता रहा । रचनाकार सोचता है कि शायद 'विद्राही' और 'सवहारा' कविताआ का रचयिता इसलिए चुप है क्योंकि वह निर्णायक महाकाव्य रच रहा है । रचना एक कवि वी चेतना को दूसरे द्वारा पुनरचना है। अजय तिवारी की कविता का बोध है कि माक्स की सजीवता उनकी लेखनी से अधिक जनता के हितो मे है। वह यमिको के साहस, सधप और आग का तत्व है। इसी भाग में पूजीवाद जलता है । रचना का अभिप्रेत है कि मनुष्य के मूल्यो म रूपा तरित होने के बाद ही वह (माक्स) जीवत होता है । श्याम कश्यप की कविता बेटी शेली का केद्र मे रखकर लिखी गई है। रचना महसास कराती है कि पिता अपनी स तान के मा यम से उसके विकास के साथ एक बार पुन जिंदगी जीता है । अतर यह होता है कि उसकी दुबारा की जिंदगी में पिता की समझ और स्वप्न मूत रूप लेते ह । बच्चे की प्रत्येक गति विधि मे पिता की रचना के जागरूक सरोकार होते है। वतमान व्यवस्था स क्रातिकारी सामाजिक सरचना के बीच कातिकारी चेतना के विभिन्न स्तरीय रूपातरण बिटिया के विकास के रूप में दिखाई पड़ते जाते ह ।पिता की फोशिश होती है कि वह उसे ऐसा वातावरण दे, जिससे सतान अनिवाय रूप से सवहारा के वग चरिन में ढल सके । श्याम कश्यप की यह कविता उन लोगो के लिए जवाब है, जो सोचते ह कि समाजवादी मूल्यो मे प्रेम और स्नेह के लिए स्थान नहीं है । वे देखें वि जनवादी मूल्यो पर विश्वास करती पिता की सतान का जनता के भविष्य के साथ कसे सवध जुडा हाता है । "रास्ता इधर है' की कविताओं के आधार पर सबसे महत्वपूर्ण बात जा इन कवियो के माफत सामने आई है, वह है रचनाकार का सामाय जन से सीधा सारोकार । युग को अनिवाय चिताधारा, माक्सवाद की जीवन दृष्टि का अपनाकर लिखने वाला की सरया मे गुणात्मक विस्तार पाया है। हर गली, चौराहे शहर और गाव में रहते ये कवि अपने परिवेश के एतिहासिक अनुभवो का व्यापक और मानवीय जन इतिहास से जाहवर रचना की विश्वसनीय जमीन की पहचान दे रहे हैं। 1 १२४ अनेक रचनाओ में गुरिर चेतना का स्वर है। यह कहने मे सकाच नहीं होना चाहिए कि गुरिल्ला चेतना जैसी रचनामो म पम को सही पहचान नही दिखती उनमें मध्यवर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय इसानियत का बड़बोलापन अक्सर झलकता है। बिना तैयारी और समाज सेवा युद्ध की घोषणा, सफलता का अतिरिक्त आशावाद, सपाट वक्तव्यता तथा अरविता जय अराजक्ता के चि ह इन रचनाओ मे मिल जाते है । ये रचनाए जनता का मानसिक परि वतन करने की हैसियत नहीं रखती। रचनाकार विवेक, वहाँ अधवचरा और अधूरा है । इस सदभ मे यह भी सही है कि कभी के गरिरमा ववि अव पाफी धारदार और पैने हुए है। अपनी उग्रता को होन सवेदना या घटर बताया है वे अनुभव के मूल मुद्दे तक पहुंचने लगे हैं । प्रगतिशील कवियो में व्यक्ति-केद्री पविताए अपनी अलग पहचा रखने लगी है । शोक गीत को जिस भिन रोली की शुष्मात निराला ने "सरोज स्मृति" मे वी थी, उसका इजाफा हुमा है । बल्कि या पहें वि भामरोर की कविता इस दिशा में पूरे सामाजिक परिपेक्ष्य के साथ खडी है । नजरूल बहाने युग की तस्वीर इस रचना में आकृति पाती है। 'सराज स्मति' में यदि कही रामानियत है तो इस रचना मे नहीं। बसे रोमानियत अपने सामाजिष' सदभ मे निंदनीय नहीं, बल्लि जरूरी चीज होती है । श्याम पश्यप की पपिता व्यक्तिवारी कविताओ में विशिष्ट है, इसीलिए यह जनवादी रपना दोन ये लिए उल्लेखनीय है । ऐसी रचनाए और भी कवियो ने लिखी है, जैसे नागार्जुन, विश्वनाथ त्रिपाठी प्रादि। नागार्जुन की कविता केदार जी पर है सपा डा० विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने 'पलि' विषयक कविता लिसी है। ये तीनो रचनाएं गहरी सवेदनाओं से जुडी हैं । मुक्तिबाध ने कवितामो के जरिये जो उत्तर दिया था उसे घर पे इन कवियों ने भागे बढाया है । राजनीतिय-आयिय सारवस्तु पर आधारित चिंतन कासास्कृतिक स्वरूप कविताओं के रूप में पहचाना जा राया है । आप रचाए ता राजनीतिक क्षेत्र मे बहुत समय तक दिशा निर्देशक बनती रही है । उहोने यथाथ का रचनात्मक ससार दिया है । साहित्य या कला के रचाय और प्रभाव से संबंध में लेनिन का कथन है कि, "क्ला जनता पी थाती है। उसकी जहें मेहनतकश जनता के बीच गहरी होनी चाहिए इसी जनता द्वारा उसे समझा और प्यार किया जाना चाहिए। उसे जनता की भावनाओ, विचारो और इच्छाओ को एक जुट करना और उदार बनाना चाहिए। उसे जनता की कर्मशीलता का जगाना चाहिए । और उसमे अदर पसात्मव प्रवृत्ति पैदा करनी चाहिए।" प्रगतिशील लेखन की प्रेरणा के तथ्य यही हैं । क्ला के क्षेत्र में सारवस्तु १२५ के रूप में जनता के मनाजगत म मादन के प मे सचित मूल्या, स्थितिया, का कच्चो सामग्री समझ वस्तु जगत के साथ दद्वारमा सम्ब व खोजकर रचनाकार निर्णायक विचारधारा के रूप म ढालता है। यह रचना प्रक्रिया फौरी एव उनत दानो प्रकार के साहित्य की हातो है । यह बात अलग है कि फौरी साहित्य की रचना, प्रेषणीयता, प्रभावशीलता म जितनी त्वरा होती है, उतनी ही त्वरा उसके पोण होने स भी हाती है । उ नत साहित्य लम्बे सपप से उपगने के कारण देर तक असर डालता है। जनता का प्यार दोनों को मिलता है । म ममझता हूं कि हि दो का आगामी प्रगतिशील लेखन इ ही वाता का केन्द्र में रखकर आगे बढ़ता रहेगा। १२६
राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ तथा इस पुस्तक
का सपादफमडल सकलन मे सकलित कवियो तथा
उन पन-पत्रिकाओ के प्रति अत्यत आभारी हैं, जहा ये
रचनाए पहले प्रकाशित हो चुकी हैं । साथ ही "न्यू एज
प्रिटिंग प्रेस" के उन अनेकानेक साथियो का भी,
जिन्होंने इसके प्रकाशन मे आयोजको से भी बहुत अधिक
दिलचस्पी और सक्रियता दिखायी। कई कवियो की
रचनाए बार-बार मागने पर भी हमे प्राप्त नहीं हुई।
इसी तरह कुछ कवियो की जो कविताए हम देना चाहते
थे, वे कुछ तो उपलब्ध न हो पाने के कारण और कुछ
लबाई और अपनी सीमाओ के कारण भी हम नहीं ले
सके। लेकिन फिर भी सकलन को भरसक प्रतिनिधि
सकलन बनाने का प्रयास किया गया है । भन्त मे, सभी
कवि-मिनो और सहयोगियो के प्रति हमारी ओर से
एक बार और विनम्र आभार ।।
-सपादक मडल
- राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासघ
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