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Chaturdashshlok - Rahashya

Bharat Dharm Mahamandal · 2009/09

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विज्ञापन।
यह सवको विदित हो है कि, काशीका निगमागम
डिपो' नामक पुस्तकालय बहुत वर्षोंसे हिन्दू समाज
हिन्दी संसारकी सेवा करता माया है। अब तक यह
कालय श्रीविश्वनाथ अन्नपूर्णा दान भण्डार द्वारा स्थ
होकर उसीके अधीन रहकर संचालित हो रहा था।
मनातनधर्मावलम्बियोंकी सर्वाङ्गीण उन्नतिमें सह
पहुँचानेके लिये १० लाख रुपयेके मूलधनसे "
सिण्डिकेट लिमिटेड नामक एक कम्पनी संस्था
उसके अन्यान्य उद्देश्यों में दो लाख रुपये लगाकर एक
जातीय, भण्डार स्थापित करना भी एक उद्देश्य
कम्पनी ने अपनी इस रहेश्यकी पूर्तिके लिये उक्त ti
वुकडिपोको दानभण्डारसे ले लिया है, और उसका
बदलकर 'निगमागम बुकडिपो हो कायम रक्खा है।
इस बुकडिपो विभाग द्वारा धार्मिक, सामाजिक और देश
सम्बन्धीय अनेक पुस्तके प्रधानतः हिन्दीमें और अंग्रेजी
अन्यान्य प्रान्तीय भाषाओं में शीघ्र प्रकाशित होगी।
नोट-दूस पुस्तकके पिछले पृष्ठोंमें विज्ञापन द्रष्ठन्य

ओतत्सत् । चतुदेशलोक रहस्य ! मनुष्य पश्वादि जीवजन्तुओंसे पूर्ण यह पृथिवी ग्रह तथा योनि केन्द्रखरूप सूर्यके द्वारा प्रकाशमान, नाना जीवोंसे असोभित मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्रादि ग्रह और चन्द्रादि उपग्रह समूहकी समष्टि ही चतुर्दशलोकनामसे आर्यशास्त्रमें घिण्यात है, अथवा स्थूल जीवोंके अतिरिक्त देवशरीरधारी देवजीवोले व्याप्त, स्थूल ग्रहोंके अतिरिक अतीन्द्रिय सूक्ष्मो- पादानसे निर्मित सूक्ष्म लोकोको ही चतुर्दश लोक या चतुर्दश भुवन कहते हैं, अथवा स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रकारके जीव तथा लोकोकी ही चतुदेश लोक संज्ञा की गयी है, इस विषयमें . अनेक प्रकारके मतभेद तथा वादानुवाद देखने में आते हैं और श्रीमद्भागवत, देवीभागवत, मार्कण्डेयपुराण आदि पुराण ग्रन्थोंमें जम्वुलक्ष आदि द्वीप,भूर्भुवः स्वरादि अवलोक तथा अतलवितलादि अधोलोकोंके ऐसे अनेक विचित्र वर्णन देखनेमें माते हैं, जिनका वर्तमान भौगोलिक वर्णनोंके साथ कुछ भी सामञ्जस्य नहीं पाया जाता। इस लिये प्रकृत प्रवन्धौ चतुर्दश लोकोपर समीक्षा करते हुए ऊपर कथितः-- * यह लेख महामण्डल द्वारा प्रकाशित प्रीधर्मकल्पद्रुम नामक अन्धके सातवें खण्डमें प्रकाशित होंगी सर्वसाधा... रणके उपकारार्थ पृथक् प्रकाशित किया जाता है ।...१.

२ - चतुर्दशलोक रहस्य । परस्परविरुद्धरूपले प्रतीयमान नाना प्रकारके वर्णनवैचित्र्यका समाधान तथा सामञ्जस्य विधान किया जायगा। श्रार्यशास्त्रका यह सिद्धान्त है कि, समस्त स्थूल पदार्थ उसके सूक्ष्म प्रतीकके ही परिणाम तथा विकाशमात्र हैं। अतिसूक्ष्म कारण शरीरसे ही सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होता है और स्थूलशरीर भी सूक्ष्मशरीरका विकाशमात्र है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीरोंके मूलमें सूक्ष्मातिसूक्ष्म जीवात्माको सत्ता है। अतः स्थूलके मूलमें सूक्ष्म के होनेसे आर्यशास्त्र में सृष्टितत्त्वका सभी वर्णन स्थूलसूक्ष्ममय देखने में श्राता हैं। दैवजगत् स्थूलजगत्की अपेक्षा सूक्ष्म है, स्थूलजगत्की समस्त क्रिया दैवाधीन है। इसी कारण पूज्यपाद महर्षियोंने स्थूल मृत्युलोकके वर्णनके साथ सूक्ष्म दैवलोकोका भी वर्णन किया है। चतुर्दश लोक इन्हीं स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रकारके भुवनोंकी समष्टिसे बना हुआ है। इस लिये केवल सूक्ष्म लोकोको या केवल स्थूल ग्रहोपग्रहोको चतुर्दश लोक न कह कर स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रकारके लोकोंका उसमें समावेश करना आर्य- शास्त्रसम्मत होगा। एक दृष्टान्तके द्वारा इस वैज्ञानिकतथ्यको समझ सकते हैं। भारतवर्ष की उत्तर सीमा हिमालय पर्वत है। हिमालय पर्वत एक स्थूल वस्तु है । तथापि देवीको हिमालय. दुहिता और हिमालयान्तर्गत कैलाशशिखरको शिवका स्थान करके क्यों प्रार्यशास्त्र में वर्णन देखने में आता है ? स्थूलदृष्टिके द्वारा अन्वेषण करनेसे हिमालयमें न देवी ही मिलती हैं और ३ । चतुर्दशलोक रहस्य । न शिवजी ही मिलते हैं। इस प्रकारका वर्णन स्थूलजगत् तथा सूक्ष्मजगत्के वर्णन-समन्वयके सिवाय और कुछ भी नहीं है। ब्रह्मके सत् , चित् ,आनन्दरूपी त्रिविध सत्तात्री में से विष्णुमें चित्सत्ता, ब्रह्मामें श्रोनन्दसत्ता और शिवमें सत्सत्ता. का प्राधान्य है। सत्सत्ताके साथ स्थूल विश्वका सम्बन्ध होनेसे स्थूल पृथिवीमें सर्वोच्च तथा सर्वप्रधान, सर्वरत्नगर्भ स्थान हिमालयको ही सत्सत्ताके अधिनायक शिवका स्थान कहा गया है। और सत्की स्त्री सती देवीकों शिवहिनी तथा हिमालयदुहिता कहा गया है। यही कारण है कि, भारतवर्षके स्थूल भौगोलिक वर्णनोंके साथ महर्षियोने देवतात्मा हिमालय तथा पार्वती और देवादिदेव महादेयके भी अधिदेव सम्बन्धका वर्णन किया है। यही कारण है कि, महर्षियोंने स्थूल वसुन्धराका वर्णन करते हुए भी असुरभारा- कान्ता वसुमती देवीका करणकन्दन तथा ब्रह्मादिकी शरण लेनेका भी वृत्तान्त बताया है। यही कारण है कि, स्थूल चन्द्रग्रहके वर्णनके साथ साथ आर्यशास्त्र में मनोऽधिष्ठात्री चन्द्र- देवता तथा स्थूल सूर्यग्रहके वर्णनके साथ साथ बुद्धयधिष्ठात्री सूर्यदेवताका भी वर्णन देखनेमें आता है। अतः चतुर्दश भुवनों- के विषयमें पार्यशास्त्र में जो कुछ वर्णन देखनेमें आते हैं उनको केवल स्थूल भौगोलिकदृष्टिले देखनेपर कदापितथ्य निर्णय नहीं हो सकेगा। स्थूलदृष्टि तथा अतीन्द्रिय दैवी दृष्टि दोनोंकी सहायता लेनेपर तभी पुराणादि वर्णित चतुर्दश लोकोंका चतुर्दशलोक रहस्य । रहस्य पूर्ण परिज्ञात हो सकेगा, इसमें अणुमात्र सन्देह नहीं है। अव नीचे पृथिवी आदिके विषय में कुछ पुराणोक वर्णन देकर भौगोलिक वर्णनों के साथ उनका सामजस्य किया जाता है श्रीमद्भागवतका पञ्चम स्कन्ध, देवीभागवतका अष्टम स्कन्ध, मार्कण्डेय पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों में सप्तद्वीप सप्तलसुद्रमय विचित्र भुवनकोशके भूरिभूरि वर्णन देखनेमें पाते हैं, जिनमेंसे कुछ वर्णन · स्थूल पृथिव्यादि लोक- सम्बन्धीय हैं और कुछ वर्णन पृथिव्यादिसे सम्बन्धयुक्त देवलोक सम्वन्धीय हैं । यथा देवीभागवत्में :- स्थनेमिसमुत्थास्ते परिखाः सप्तसिन्धवः । यत आसंस्ततः सप्त भुवो द्वीपा हि ते स्मृताः ।। जम्बुद्वीपः प्लक्षद्वीपः शाल्मलीद्वीपसंज्ञकः । कुशद्वीपः क्रौञ्चद्वीपः शाकद्वीपञ्च पुष्करः ।। तेषां च परिमाणं तु द्विगुणं चोत्तरोत्तरम् । समन्ततश्चोपक्लृप्तं वहिर्भागक्रमेण च ।। क्षारोदेक्षुरसोदौ च सुरोदश्च घृतोदकः । ज्ञीरोने दधिमण्डोदः शुद्धोदश्चेति ते स्मृताः ॥ प्रियव्रत राजाके रथचकाघात द्वारा जो सात खाई उत्पन्न हुई थी, वे ही सप्तसिन्धु वन गई और उसी सप्त समुद्रवेष्टित सप्तद्वीप भुवनकोशमें विद्यमान हैं, जिनके नाम जम्वु, सक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौञ्च, शाफ और पुष्कर हैं। वे सप्तद्वीप उत्तरोत्तर द्विगुणित परिमाणके हैं और क्रमशः सात समुद्र के द्वारा वेपित हैं, जिनके नाम लवणसमुर, इक्षुरस- ।

चतुर्दशलोक रहस्य । ५ समुद्र, सुरासमुद्र, घृतसमुद्र, क्षीरसमुद्र, दधिसमुद्र और शुद्धजलसमुद्र हैं। जम्बुद्वीप लवणलमुद्रके द्वारा वेधित है, सतद्वीप इतुरससमुद्र के द्वारा, शाल्मलीद्वीप सुरासमुद्र द्वारा, कुशद्वीप घृतसमुद्र द्वारा, क्रौञ्चद्वीप क्षीरसमुद्र द्वारा, शाकद्वीप दधिसमुद्र द्वारा और पुष्करद्वीप जलसमुद्र द्वारा वेष्टित है, ऐसा प्रमाण देवीभागवतके उसी स्कन्धमें मिलता है। लवण- समुद्रवेष्ठिन जम्बुद्वीपके विषयमें देवीभागवत तथा श्रीमद्भाग. वतमें लिखा है कि, जम्बुद्वीपमें इलोवृतवर्ष, कुरुवर्ष, हरिवर्ष आदि नौ प्रकारके वर्ष हैं, उनमेंसे भारतवर्ष भी एक प्रधान वर्ष है। इन सब वर्णनोंसे प्रतीत होता है कि, जम्बुद्वीप ही पृथिवीस्थानीय है, क्योंकि लवणसमुद्रके द्वारा पृथिवी ही चेष्टित है और भारतवर्ष भी पृथिवीमें ही है। सक्ष, कुश, शाल्मली श्रादि द्वीपोंके जिस प्रकार 'वर्णन देखनेमें आते हैं, उससे देवलोकों के साथ उनका सम्बन्ध स्पष्ट प्रतीत होता है, क्योंकि उनमें वर्णित समुद्र, नदी, वृत, पर्चत तथा जीव. समूहका कोई भी प्रमाण प्रत्यक्ष भूगोल विद्या द्वारा सिद्ध नहीं होता है। और श्रीभगवान वेदव्यासने भी योगदर्शन ग्रन्थमें लिखा है कि,-"सर्वेषु द्वीपेषु पुण्यात्मानो देवमनुष्याः प्रतिघसन्ति अर्थात् सातो द्वीपोंमें पुण्यात्मा देवतागण तथा मनुष्यगण निवास करते हैं। जम्बुद्वीपमें भी जो नौ प्रकारके वर्षों का वर्णन देखनेमें आता है, उनमेंसे भी भारतवर्षको छोड़ और सभी वर्षे देवलोकसे सम्बन्ध रखते हैं, क्योंकि - ६ चतुर्दशलोक रहस्य। श्रीमद्भागवतके वर्णनोंके द्वारा ऐसा ही उसके विषयमें सिद्धान्त स्थिर होता है । श्रीमद्भागवतमें लिखा है :- "तत्रापि भारतमेव वर्ष कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट- वर्षाणि स्वर्गिणं पुण्यशेपोपभोगस्थानानि भौमवर्ग- पदानि व्यपदिशन्ति । भारतेप्यस्मिन् वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवः। मलयोमैनाकस्त्रिकूटः सह्यो विन्ध्यो गोवर्धनो रैवतको नील इति चान्ये शतसहस्रशः शैला- स्तेषां नितम्वपभवा नदा नद्यश्च संन्यसंख्याताः । एता- सामपो भारत्यः पजा नामभिरेव पुनन्ती नामात्मना चोपस्पृशन्ति तामपर्णी कावेरी तुङ्गभद्रा गोदावरी तापी नर्मदा चर्मण्वती महानदी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती हषद्वती गोमती सरयू शतद्रुश्चन्द्रभागावितस्ता इति महा- नद्यः । अस्मिन्नेव वर्षे पुरुपैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहित- कृष्णवर्णेन खारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुपनारकगतयो बह्वय आत्मन आनुपूर्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयन्ते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति ।" जम्बुद्वीपान्तर्गत नौ वर्षों से भारतवर्ष ही कर्मक्षेत्र है, वाकी आठ वर्ष भौमवर्ग कहलाते हैं, जिनमें स्वर्गवासिनण पुण्यशेष भोगके लिये निवास करते हैं। भारतवर्षमें नदी, पर्वत अनेक हैं, यथा-मलय, मैनाक, त्रिकूट, सा, विन्ध्य, गोवर्धन, रैवतक आदि शत शत पर्वत हैं और ताम्रपर्णी, चतुर्दशलोक रहस्य । - कावेरी, तुगभद्रा, गोदावरी, तापी, नर्मदा, चर्मरावती, महा- नदी, गङ्गा, यमुना, सरखती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, शतद, चन्द्रभागा, वितस्ता श्रादि असंख्य नदियां हैं। इसी भारत- वर्षमें जन्मलाभ करके सात्विक राजसिक तथा तामसिक कर्मानुसार मनुष्योको यथाक्रम दिव्यगति, मानुषगति और निरयगति प्राप्त होती है और पुण्यविपाकसे शोन द्वारा अप. वर्ग भी प्राप्त होता है। इन सब वर्णनोसे वर्तमान भारतके साथ पुराणवर्णित भारतवर्षकी सम्पूर्ण एकतो सिद्ध होती है और इसी विचारसे जम्बुद्वीपके साथ पृथिवीका भी सम्बन्ध स्पष्ट प्रतीत होता है। जम्बुद्वीपके विषयमें श्रीमद्भागवतमें और भी लिखा है। यथाः- "जम्बुद्वीपस्य च राजन्नुपद्वीपानष्टौ हैक उपदिशन्ति तद्यथा वर्णपस्थश्चन्द्रशुक्ल आवर्तनो रमणको मन्द- हरिणा पाञ्चजन्यः सिंहलो लंकेति" जम्बुद्वोपके अन्तर्गत आठ उपद्वीप भी हैं, उनके नाम खर्णप्रस्थ, चन्द्रशुक्ल, आवर्तन, रमणक, मन्दहरिण, पाञ्चजन्य, सिंहल और लङ्का हैं। इनमेंसे सिंहल और लङ्काके नाम तो अब तक भी वही हैं, शेषों के नाम कालानुसार बदल दिये गये होंगे। अतः यह भी वर्णन प्रत्यक्ष भौगोलिक वर्णनोंके साथ ठीक ठीक मिलता है। इलावृतादि वर्षों के विपयमें देवीभागवतमें लिखा है- यदुपस्पर्शिनो देवा योगैश्वर्याणि विन्दते देवोद्यानानि चत्वारि भवन्ति ललनासुखाः ॥ . .

चतुर्दशलोक रहस्य। नन्दनं चैत्ररथकं वैधाजं सर्वभद्रकम् । येपु स्थित्वाऽमरगणा ललनायूथसंयुताः ॥ उपदेवगणैतिमहिमानो महाशयाः । विहरन्ति स्वतन्त्रास्ते यथाकामं यथासुखम् ।। इस प्रकार श्रीमद्भागवतमे भी लिखा है:- देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चैत्ररथं वभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति । येष्वमरपरिवृताः सह सुर- ललनाललामयूथपतय उपदेवगणैरुपगीयमानमहिमानः किल विरहन्ति । इलाकृतादि वर्षों में नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राजक और सर्व. भद्रक नामक चार देवांद्यान हैं। इनमें ऊपर कथित भौम- खर्गवासी पुण्यशेपभोक्ता देवतागण देवललनाओके साथ खच्छन्द विहार करते हैं। उपदेवगण इनकी महिमा गान करते रहते हैं। अतः भारतवर्षके सिवाय और आठ वर्ष देवलोकसे सम्बन्ध रखते हैं, यह सिद्धान्त प्रमाणित हुश्रा। जम्बुद्वीपके साथ पृथिवीका किस प्रकार सम्बन्ध सो पहले ही बताया गया है। यही भुवनकोशान्तर्गत उपद्वीप द्वीप तथा वर्षों के साथ सूक्ष्मलोक तथा प्रत्यक्ष भूगोलसिद्ध पृथिवीग्रहका वर्णन-सामञ्जस्य है। अतःपर स्थूलसूक्ष्म- लोकसमन्वित चतुर्दश भुवनोंका वर्णन क्रमशः नीचे किया जाता है।

&
चतुर्दशलोक रहस्य ।
आर्यशास्त्र में ब्रह्माण्डमय विराट् पुरुषका वर्णन करते
समय उनके नाभिदेशसे ऊपरके अंशमें सात अवलोक तथा
नाभिसे निम्नदेशोंमें सात अधोलोकोका स्थान बताया गया
। यथा श्रीशम्भुगीतामे:-
मम ब्रह्माण्डरूपस्य विराड्देहस्य कल्यदाः ।
लोकाः सप्तोद्ध्वगा नाभिमुपयुंपरि सन्यहो ।
अधोऽधः सप्त वर्तन्ते ध्रुवं नाभिश्च संस्थिताः ।।
अतः समष्टिरूपेऽस्मिन् ब्रह्माण्डे वै चतुर्दश ।
भुवनानि प्रधानानि विद्यन्ते नात्र संशयः ।।
ब्रह्माण्डरूपी विराट् शरीरफे नाभि या कटिदेशसे ऊपर
सात लोक और नीचे सात लोक इस प्रकारसे चतुर्दश लोको.
की कल्पना की गयी है। श्रीमद्भागवतके द्वितीय स्कन्धके
पञ्चमाध्यायमें वर्णन है :-
स एव पुरुपस्तस्मादण्डं निर्मिद्य निर्गतः ।
सहस्रोवधि वाहक्षः सहस्राननशीर्षवान् ॥
यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः ।
कट्यादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्व जघनादिमिः ॥
भूर्लोकः कल्पितः पद्यां भुवोकोऽस्य नाभितः ।
हदा स्वलोक उरसा महर्लोको महात्मनः ।।
ग्रीवायां जनलोकोऽस्य तपोलोकः स्तनद्वयात्
मूर्धभिः सत्यलोकश्च ब्रह्मलोकः सनातनः ।।
.

चतुर्दशलोक रहस्य। तत्कट्याश्चातलं क्लुप्तमुरुभ्यां वितलं विभोः । जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जवाभ्याञ्च तलातलम् ।। महातलन्तु गुल्फाभ्यां पूपदाभ्यां रसातलम् । पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान् ।। सहस्रशीर्ष, सहसान, सहस्रपाद, सहस्रबाहुं विराट पुरुषने अण्ड अर्थात् ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति की। मनीपिगण उनके काटिदेशसे अधोभागमें सप्त अधोलोक और जंघाके ऊर्ध्वभागमें सप्त ऊर्ध्वलोककी कल्पना करते हैं। . भूर्लोक नाभिके आस पास है, भुवर्लोक नाभिसे ऊपरकी ओर है, हृदयदेशमें खर्लोक है, वक्षस्थलमें महर्लोक, गलेमें जनलोक, स्तनोंके ऊपर तपोलोक और मस्तकमे सत्यलोककी कल्पना की जाती है। इसी प्रकारले कटिदेशमें अतललोक, उरदेशमें वितललोक, जानुदेशमै सुतललोक, जंघाओंमें तलातललोक, गुल्फोमें महातललोक, पांवमें रलातललोक, और चरणतलमें पाताललोककी कल्पना की जाती है। अतः भूः, भुवः, खः, महः, जन, तपः और सत्य ये सात अवलोक तथा अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल ये सात अधोलोक इस प्रकारले चतुर्दश लोक हुए ।. इनमेले भुर्लोक. के अन्तर्गत चार लोक हैं, यथा-मृत्युलोक, प्रेतलोक, नरक- लोक और पितृलोक। प्रेतलोक, नरकलोक तथा पितृलोकके विपयमें श्रीधर्मकल्पद्रुम खण्ड ७ के 'परलोक समीक्षा' नामक अध्यायमें कहा जायगा । मृत्युलोक भूलॊकका चतुर्थांश है और चतुर्दशलोक रहस्य। चतुर्दशभुवनके एक चतुर्दशांशका भी एक चतुर्थांश है । इसीमें मनुष्यादि पाञ्चभौतिक स्थूलशरीरविशिष्ट जीवगण उत्पन्न होकर नरक, स्वर्ग, प्रेत, पितृ, देवता, असुरादि भिन्न भिन्न लोकों में कर्मभोगके लिये जाया पाया करते हैं और इसी प्रकार जीवोका आवागमनचक्र बना रहता है। अतः निश्चय हुआ कि, चतुर्दरा लोकोमेंसे यह मृत्युलोक ही स्थूल है, वाकी सभी ऊर्ध्व तथा अधोलोक सूक्ष्म हैं। अब नीचे इन सब सूक्ष्म लोकोंकी स्थितिके विषयमें क्रमशः वर्णन किया जाता है। सूक्ष्म लोकोंकी स्थिति स्थूल लोकोंकी तरह देशपरिच्छिन्न नहीं है ; अर्थात् जिस प्रकार पृथिवी आदि स्थूल लोकान्त. र्गत ग्रहोंकी स्थूल सीमा है और एककी सीमाके भीतर दूसरा नहीं रह सकता है, अतल, वितलादि अधोलोक तथा भुवः स्वरादि लोकोंकी इस प्रकार स्थूल सीमा नहीं है। इनकी स्थिति केवल सूक्ष्मताके तारतम्यानुसार ही है और इस कारण एक अति सूक्ष्मलोक उससे कम सूक्ष्म किसी दूसरे लोकके भीतर अनायास ही रह सकता है। जिस प्रकार जीवदेहमें स्थूलशरीरके भीतर ही सूक्ष्मशरीर रहता है और सूक्ष्मशरीरके भीतर ही अति सूक्ष्म कारण शरीर रहता है तथा इसी प्रकारके पञ्चकोषमय जीवदेहमें अन्नमय कोषके भीतर ही प्राणमय कोष रह सकता है और प्राणमय कोषके भीतर ही मनोमय, विज्ञानमय श्रादि कोषोंकी अनायास स्थिति हो सकती है, इनके लिये अलग अलग देशावच्छिन्न सीमाओंकी ।

। चतुर्दशलोक रहस्य । कल्पना करनेकी मावश्यकता नहीं होती है, ठीक उसी प्रकार एक सूक्ष्मलोकके साथ अन्य सूक्ष्मलोकका देशावच्छेदसे कोई भी सीमा निर्देश नहीं है और श्रावश्यकतानुसार एक दूसरेके भीतर रह भी सकते हैं। द्वितीयतः समष्टि और व्यष्टिरूपसे ब्रह्माण्ड और पिण्डके एकत्व सम्बन्धले युक्त होनेके कारण जिस प्रकार चतुर्दश लोकोंकी स्थिति ब्रह्माण्डमें है,इसी प्रकार पिण्डदेहमें भी चौदह लोकोंकी स्थिति है और जिस प्रकार पिण्डदेहमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, श्रानन्द- मय इन पांचकोषोंकी स्थिति है, उसी प्रकार ब्रह्मएडमें भी पञ्चकोषोंकी स्थिति है। इस लिये सूक्ष्मलोकमें रहनेवाले दैवजगत्के जीव तथा देवता असुरादिका सम्बन्ध और प्रभाव प्रत्येक पिण्डशरीरपर भी है और पिण्डदेहान्तर्गत प्राणमय, मनोमयादि कोपोंकी सहायतासे तत्तत् कोषोंसे सम्बन्ध रखनेवाले दैवजगत्के जीव तथा देवासुरादियोंके साथ भी स्थूललोकके जीव नानाप्रकारका सम्बन्ध स्थापन कर सकते हैं। पुराणादि शास्त्रोंमें जो मृत्युलोकके जीवोंके साथ इन्द्र- लोक, वरुणलोक आदि लोकोका तथा तत्तत् लोकवासी इन्द्र, घरुण, कुवेर आदि देवताओंके साथ नानाप्रकारके आदान प्रदानका वृत्तान्त देखने में आता है, ऊपर कथित ब्रह्माण्ड पिण्डकी एकता तथा पञ्चकोषका विस्तार ही इसमें कारण खरूप है। यही पिण्डशरीरमें प्राणमयादि सूक्ष्म कोपोंकी स्थितिके सदृश ब्रह्माण्डशरोरमें उन्नतावनत चतुर्दश लोकोंकी

चतुर्दशलोक रहस्य।
स्थिति है। अतःपर इनके पृथक् पृथक् अधिवासियों के
विषयमें कहा जाता है।
संघर्ष के विना क्रिया नहीं होती, परस्पर विरोधी शक्तियों-
के वात प्रतिघातसे ही संघर्षकी उत्पत्ति हुआ करती है, इस
लिये चतुर्दश लोकव्यापिनी क्रियाके भीतर भी परस्पर विरो-
धिनी शक्तिद्वयका संघर्ष अवश्य विद्यमान है। इन दोनों
शक्तियोंको श्रार्यशास्त्र में दैवी शक्ति तथा श्रासुरी शक्ति
कहा गया है। यथा बृहदारण्यकोपनिषद् -
"द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च त एषु लोकेष्वसन्त'।
प्रजापतिकी सृष्टि में देवता और असुर दोनोंका नित्य
समाम है । वे चतुर्दशलोकमय ब्रह्माण्डशरीर तथा पिण्डशरीर
दोनों ही व्याप्त रहते हैं, यथा-श्रीशम्भुगीतामे :-
संस्थापयितुमर्हन्ति खाधिपत्यं स्वधाभुजः ।
देवासुरंगणाः सर्वे जीवपिण्डेष्वनुक्षणम् ॥
चतुर्दशलोकव्यापी देवता तथा असुरगण सदा ही जीव
शरीरमै अपने प्रभावको जमा सकते हैं। देवता और असुर
नाना श्रेणिके होते हैं। उनके निवासस्थानके विषयमें शम्भु-
गीतामें लिखा है :-
वसन्ति देवाः पितरः ! अवलोकेषु सप्तसु ।
सन्तिष्ठन्तेऽसुराः सर्वे धोलोकेषु सप्तसु ॥
..

www
.
चतुर्दशलोक रहस्य ।
तमोमुख्यतया सृष्टेरसुराणं हि सप्तमे ।
लोकेऽस्त्यसुरराज्यस्य राजधानी वधस्तने ।
दैन्याः सत्त्वपधानत्वात् सृष्टे राजानुशासनम् ।
उच्चैदेवेषु लोकेषु नैवावश्यकमत्यहो ।
अस्त्यतो देवराजस्य राजधानी तृतीयके ।
अवलोके स्थिता नित्यं नात्र कार्या विचारणा ।।
विशेषतोऽसुराः सर्वे सदा प्रावल्यसञ्जुपः ।
कुर्वाण विप्लवं देवे राज्ये सृष्टेः पूवाधितुम् ।।
सामञ्जस्यं विचेष्टन्ते नितान्तं सन्ततं बहु ।
अतोऽपि देवराजस्य राजधानी तृतीयके ।।
ऊर्द्ध सप्त लोकों में देवताओंका निवास है और अधः
सप्त लोकोंमें असुरोका निवास है। असुरगणकी दृष्टि
तमःप्रधान होनेसे असुरराजकी राजधानी सप्तम अधोलोक
अर्थात् पातालमें स्थित है। परन्तु देवी सृष्टि सत्त्वप्रधान
होनेके कारण और उन्नत देवलोकोंमें राजानुशासनकी श्राव
श्यकता न रहनेसे देवराजकी राजधानी तृतीय ऊवलोक
अर्थात् स्वर्गलोकमें स्थित है। विशेषतः असुरगण सदा
प्रवलता लाभ करके देवराज्यमें विप्लव करते हुए सृष्टि-
सामञ्जस्यमें बाधा डालने सचेष्ट रहते हैं, इस कारणसे भी
देवराजको राजधानी संदा तृतीयं अवलोकमें स्थित रहती
है। देवता और असुरोको प्रकृतिमें यह भी एक विशेष अन्तर

चतुर्दशलोक रहस्य । १५ है कि, देवतागण अपनी राज्यसीमाको अतिक्रम करके असुरोके राज्यपर कभी आक्रमण नहीं करते हैं, क्योंकि न्याय पथा- वलम्बी, धर्मपरायण देवतागण यह भलीभाँति जानते हैं, कि, देवराज्य तथा असुरराज्यके अधिकारिगण जब तक नियम- पूर्वक अपने अपने राज्यका सुशासन तथा परिचालन करेंगे और निरर्थक अनधिकार प्रवेशसे निवृत्त रहेंगे, तभी तक ब्रह्माण्डमाण्डमें शान्तिसुधा सुशोभित रहेगी। इसी कारण देवतागण कभी असुरलोकोपर आक्रमण नहीं करते हैं। किन्तु असुरोंकी बुद्धि दम्भ दर्प अभिमान अहंकार अज्ञानमयी होनेके कारण वे सदा ही दैवराज्यपर अधिकार जमाकर देवताओं- को कष्ट देने तथा विश्वप्रकृतिकी शासन शृंखलाके विगाड़नेमें कटिबद्ध रहते हैं। किन्तु इस प्रकारके अत्याचारमें वे तभी सफल हो सकते हैं जव भोगादि द्वारा देवताओंकी बुद्धि पर तमोगुणका श्रावेश हो जाय और तपःक्षयके द्वारा उनका वलक्षय तथा सत्वगुणका अपलाप होने लग जाय। श्रीमद्- भागवतमे लिखा है :- एधमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते । असुराणाञ्च रजसि तमस्युद्धव ! रक्षसाम् ॥ सत्त्वगुणफी वृद्धि में देवताओंका बल बढ़ता है, रजोगुण- की वृद्धि में असुरोका बल बढ़ता है और तमोगुणकी वृद्धिमें राक्षसोंका वल बढ़ता है, इस प्रकार गुणवैचित्र्यानुसार चतुर्दशलोक रहस्य। देवासुरोकी बलवृद्धि तथा सूक्ष्मजगत्में कोलाहल और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। परन्तु इन सब कोलाहलोंकी भूमि ऊव तृतीय लोक तक ही है, इससे परे विशेष सत्वगुण- प्रधान महर्लोक जनलोकादिमें अन्य गुणोंकी विकाशसम्भावना न रहनेले उन लोकोंमें न तो असुरोंका ही प्रवेश हो सकता है और न प्रथम तीन उन्नत लोकोंकी तरह वहाँ पर राजानु- शासन, शब्दानुशासनकी श्रृंखला बाँधनेका प्रयोजन रहता है। यथा-श्रीशम्भुगीतामें :- उन्नतेषूवलोकेपु प्रवेशोऽप्यस्त्यसम्भवः। असुराणामतोऽन्येपु देवराजानुशासनम् नावश्यकत्वमानोति विशेषेण कदाचन । विभिन्नोपासकेभ्यो हि स्वरूपं सगुणं धरन् ।। सालोक्यश्चैव सामीप्यं सारूप्यं पितरस्तथा । दातुं मोक्षं च सायुज्यं नानारूपैहि सप्तमे ।। अवलोके तथा षष्ठेविराजेऽहमनुक्षणम् । उन्नतेषू ध्वलोकेषु सात्त्विकेयु स्वधाभुजः ॥ राजानुशासनस्यातः का वार्ता वर्तते खलु । शब्दानुशासनस्यापि नास्ति तेषु प्रयोजनम् ।। उन्नत अवलोकोंमें असुरोंका भी प्रदेश संभव नहीं है, इस कारण वहाँ देवराजके राजानुशासनकी विशेष प्राव- श्यकता नहीं रहती । अन्तिम दो लोक अर्थात् षष्ठ और सक्षम अव लोकोंमें परमात्माके उपासकोंको सालोक्य, सामीप्य, । चतुर्दशलोक रहस्य । १७ सारूप्य तथा सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है। इस कारण उनमें राजानुशासनकी यात ही पया है, शब्दानुशासनकी भी यहाँ. पर आवश्यकता नहीं होती। इन दोनों प्रकारकी देवयो. नियों के अतिरिक्त और भी बहुत प्रकारकी देवयोनियाँ है, जो इन लोकों में बसती हैं। उनमेंसे पि और पितृगण प्रधान है। फर्मराज्यके चलानेवाले देवता कहाते हैं, शानराज्यके चलानेवाले ऋपि कहाते हैं और प्रत्येक ब्रह्माण्डके स्थूल- राज्यके चलानेवाले पितृ कहाते हैं। देवता लोग ऊध्य सप्त- लोकोमें वसते हैं। ऋपि लोग चौदह लोकोंमें वसते हैं, क्योंकि असुरों में भी अपने अधिकारानुसार ज्ञान होता है, जिसके चलानेवाले शुक्राचार्य श्रादि सुरगुरु ऋषिलोग हैं। पितृगण फेवल पितृलोकमें बसते हैं। ऋपि, देवता, पितरीका निवासस्थान तथा उनकी श्रेणी और कार्य- कलापके विषयमै धर्मकल्पद्रुमके ऋपि देवपितृनामक अध्यायमें पहले ही बहुत कुछ कहा जाचुका है। अतः इस विषयमें पुनरुक्ति न करके नीचे सप्त अधोलोक तथा सप्त ऊव लोकों से किस किसमें कैसे कैसे जीव और देवासुर बसते हैं, सो ही क्रमशः बताया जाता है। देवीभाग- बतके अष्टम स्कन्धमें लिखा है:- । अधस्तादवनेः सप्त देवर्षे विवराः स्मृताः । एकैकशो योजनानामायामाच्छायतः पुनः २

S
चतुर्दशलोक रहस्य।
अयुतान्तरविख्याताः सर्व सुखदायकाः ।
अतलं पृथम पोक्तं द्वितीयं वितलं तथा ।।
तृतीयं सुतलं पोक्तं चतुर्थं वै तलातलम् ।
महातलं पञ्चमञ्च षष्ठं पोक्तं रसातलम् ।।
सप्तमं विप पातालं सगैते विवराः स्मृताः ।
एतेपु विलस्वर्गेपु दिवोऽप्यधिकमेव च ॥
कामभोगैश्वर्यसुखसमृद्धभुवनेषु च ।
नित्योद्यानविहारेपु सुखाखादः पूवर्तते ॥
दैत्याच कावेयाश्च दानवा बलशालिनः ।
नित्यं प्रमुदिता रकाः कलत्रापत्यवन्धुभिः !!
निवसन्ति सन हृष्टाः सर्वर्तुसुखसंयुताः ।।
भूलोकके अधोभागमें सप्त विवर हैं, जिनको सात अधो.
लोक कहते हैं । इनमेले प्रथम लोकका नाम अतल, द्वितीयका
नाम वितल, तृतीयका नाम सुतल. चतुर्थका नाम तलातल,
पञ्चमका नाम महातल, षष्ठका नाम रसातल और सप्तमका
नाम पाताल है। इन लोकोंमें कामादि विषयभोग खर्गसे
भी अधिक है। चलवान् दैत्य दानवगण पुत्रकलत्रादिके साथ
इनमें सदा विहार करते हैं। यही सप्त अधोलोकका साधा.
रस स्वरूप है। अब इनमेंसे एक एकका वर्णन किया जाता
है। प्रथम अधोलोकके विषयमें देवीभागवतमें लिखा है :
पूथमे विवरे किए अतलाल्ये मनोरले ।
'भयपुत्रों वलो नाम वर्ततेऽखर्वगर्वकृत् ॥
.
1
।

१
चतुर्दशलोक रहस्य।
घण्णवत्यो येन सृष्टा मायाः सर्वार्थसाधिकाः ।
जृम्भमाणस्य यस्यैव वनस्य बलशालिनः ॥
स्त्रीगणा उपपद्यन्ते त्रयो लोकविमोहनाः ।
पुंश्चल्यश्चैव स्वैरिण्यः कामिन्यश्चेति विश्रुताः ।।
या वै विलायनं प्रेष्ठं-पविष्टं पुरुपं रहः ।
संलापविभ्रमाद्यैश्च रमयन्त्यपि-ताः-स्त्रियः ॥
यस्मिन्युपयुक्त जनो मनुते बहुधा स्वयम् ।
ईश्वरोऽहमहं सिद्धो नागायुतबलो महान् ॥
आत्मानं मन्यमानः सन्मदान्ध इव कथ्यते ।
एवं पोक्ता स्थितिश्चान अतलस्य च नारद ॥
प्रथम अधोलोकका नाम अतल है। उसमें मयदानवके
पुत्र बलदानव बसते हैं। उन्होंने ६ प्रकारकी मायाकी सृष्टि
की है। उनकी जिम्हाईसे पुंश्चली, स्वैरिणी, कामुकी स्त्रियाँ.
उत्पन्न होती हैं, जो उनके पास आये हुए पुरुषोंको नाना
विलासकला द्वारा सुग्ध करती रहती हैं। अतललोकवासि.
गण बड़े मदान्ध होते हैं और अपनेको सिद्ध, बलवान्, ईश्वर
समझते हैं। अही-पतललोककी स्थिति है। द्वितीय लोकके
विषयमें देवीभागवतमें लिखा हैः-.
भूतलाधस्तले-चैव वितले भगवान् भवः ।
: हाटकेवरजामाऽयं स्वपार्श्वदगंणैर्वृतः ।।

२०
चतुर्दशलोक रहस्य।
।
पूजापतिकृतस्यापि स्वर्गस्य बृंहणाय च ।
भवान्या मिथुनीभूय आस्ते देवाधिपूजितः ।।
भवयो वीर्यसम्भूता हाटकी सरिदुत्तमा ।
समिद्धो मरुता वह्निरोजसा पिवतीव हि ॥
तन्निष्ठ्युतं हाटकाख्यं सुवर्ण दैत्यवल्लभम् ।
दैत्याङ्गना भूषणार्ह सदा संधारयन्ति हि ।।
अतललोकके नीचे वितललोक है। इसमें दैत्यगण, उनकी
स्त्रियाँ तो रहती ही हैं, अधिकन्तु हाटकेश्वर महादेव अपने
पार्श्वचरोंके साथ वहाँपर निवास करते हैं और भवानीके
संसर्गसे प्रजापतिकी सृष्टिकी वृद्धि करते हैं। उनके वीर्यसे
यहाँपर हाटकी नामक नदी निकली है, उनके निष्ठीवनले
सुवर्ण उत्पन्न होता है, जिससे भूषण बनाफर असुरकामिनी-
गण धारण करती हैं। इसके नीचे सुतललोक है। यथा
देवीभागवत्तम:-
तद्विलाधस्तलात् पोक्तं सुतलाख्यं विलेश्वरम् ।
पुण्यश्लोको चलिर्नामा आस्ते वैरोचनिमुने ।।
महेन्द्रस्य च देवस्य चिकीर्षुः पियमुत्तमम् ।
त्रिविक्रमोऽपि भगवान सुतले वलिमानयत् ।।
एवं दैत्यपतिः सोऽयं बलिः परमपूजितः ।
सुतले वर्तते यस्य द्वारपालो हरिः स्वयम् ।।
प
.

. चतुर्दशलोक रहस्य। वितलके नीचे सुतललोक है। इसमें पुण्यश्लोक वलिराज घसते हैं। श्रीभगवान्ने देवराज इन्द्रकी हितकामनासे वामना- वतार धारण करके बलिको सुतललोकमें भेज दिया..था। तबसे दैत्यगणसहित बलिराज इस लोकमें निवास करते हैं और स्वयं हरि निज प्रतिज्ञानुसार इनके द्वारपालका कार्य करते हैं। सुतललोकके नीचे तलातललोफ है। यथा देवीभागवतमें- ततोऽधस्वात्विवरकं तलातलमुदीरितम् । दानवेन्द्रो मयोनाम त्रिपुराधिपतिर्महान् ॥ त्रिलोक्याः शंकरेणायं पालितो दग्धपूस्त्रयः । देवदेव प्रसादात्तु लब्धराज्यसुखास्पदः । आचार्यों मायिनां सोऽयं नानामायाविशारदः । पूज्यते राक्षसैघोरैः सर्वकार्यसमृद्धये ॥ सुतलके अधांस्थित तलातल ' लोकमें त्रिपुराधिपति दानवेन्द्र मय निवास करते हैं। भगवान शंकरने उनकी तीन पुरियोको दग्ध कर दिया था। उसके बादसे मयदानव देव- देव महादेवके प्रसादसे तलातललोकके अधिपति होकर वहीं निवास करते हैं । मयदानव मायावियोंके प्राचार्य तथा नाना मायामें निपुण हैं । भीषण राक्षसगण सकल कार्योकी सिद्धि- के लिये मय दानवकी पूजा करते हैं। इसके बाद कौन लोक है, इस विषयमें देवीभागवतमें लिखा है- " २२ चतुर्दशलोक रहस्य। ततोऽधस्तात् सुविख्यातं महातलमिति स्फुटम् । सर्पाणां काद्रवेयाणां गणः क्रोधवशो महान् ।। तलातललोकके नीचे सुप्रसिद्ध महातललोक है। दैत्योंके निवासस्थान इस लोकमें कद्रुको सन्तान बड़े बड़े भीषण क्रोधी सर्प रहते हैं। महातलके नीचे रसातल है। यथा देवीभाग- पतमें :- ततोऽधस्ताच विवरे रसातलसमाह्वयें । देतेया निवसन्त्येव पणयो दानवाश्च ये ।। निवातकवचा नाम हिरण्यपुरवासिनः । कालेया इति च प्रोक्ताः पूत्यनीका हविर्भुजाम् ॥ महातलके नीचे रसातललोक है। इसमें पणि नामक दानवगण निवाल करते हैं, ये निवातकवच तथा हिरण्यपुर- वासी हैं । इनको कालेय भी कहते हैं । वे सर्व देवताओके घोर शत्रु हैं। रसातलके नीचे अन्तिम अधोलोक पाताल है। यथा देवीभागवतमे:- ततोऽप्यधस्तात् पाताले नागलोकाधिपालकाः । वासुकिप्रमुखाः शंखः कुलिकः श्वेत एव च ॥ धनञ्जयो महाशंखो धृतराष्ट्रस्तथैव च । महामर्षा महाभोगा निवसति विषोल्वणाः ॥ सबसे अधःस्थित लोक पातालमें नागलोकाधिपति वासु- किप्रमुख, शंस, कुलिक, धनञ्जय, महाशंख प्रादि महाक्रोधी चतुर्दशलोक रहस्य । २३ विषधर सर्पगण निवास करते हैं। पाताललोक ही.असुरोकी राजधानी है। श्रासुरी शक्तिका सर्वप्रधान केन्द्रस्थानायही लोक है। इस प्रकारसे प्रार्यशाला में सप्त अधोलोकोंका वर्णन किया गया है। इन सूक्ष्म लोकों का वर्णन जो पुराणों में आता है, उनके विचित्र, अलौकिक और आश्चर्यजनक स्वरूप पढ़ कर अवश्य कई प्रकारकी शंकाएं हो सकती हैं। उन शंकाओं के समाधानार्थ कहा जाता है कि, पूज्यपाद महर्षिगणं अपनी समाधिलभ्य योगहटिके द्वारा इसी मृत्युलोकमें बैठ. कर ही वहाँकी आवश्यकताको देख सकते थे। और इन लोकोकी अलौकिक आश्चर्यजनक अवस्थाएँ जो वर्णित की गई हैं, वे सव भी समाधिभाषा द्वारा नहीं कही गई हैं, किन्तु, लौकिक भाषा द्वारा कही गई हैं, जैसा कि पहले ही कहा गया है। सुतरां इस प्रकारकी शंकाओका अवसर विज्ञ तथा विचारवान शास्त्ररहस्य समझनेवालोंके पास रह ही नहीं सकता है। अब नीचे सप्त ऊद्ध्व लोकोंका वर्णन किया जाता है। श्रीभगवान् वेदव्यासने 'भुवनज्ञान सूर्ये संयमात् ' इस योगसूत्रके भाष्यमै सप्त ऊध्व लोकोका उत्तम वर्णन किया है, जिसमेंसे कुछ अंश निम्न लिखितरूप है यथा- " अवीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येष भूर्लोकः, मेरुपृष्ठादारभ्याध्रुवात् प्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरिक्ष- लोका, तत्परः खोकः पञ्चविधः, माहेन्द्र तृतीयो..

7 चतुर्दशलोक रहस्य। लोका, चतुर्थः 'पाजापत्यो महर्लोकः, विविधो ब्राह्मः तद् यथा जनलोकस्तपोलोकः सत्यलोक इति । ब्राह्म- स्त्रिभूमिको लोकः पाजापत्यस्ततो महान् । माहेन्द्रश्च खरित्युक्तो दिवि चाराभुवि पूजा इति संग्रहश्लोकः।" अवीचि नामक नरकस्थानसे मेरुपृष्ठपर्यन्त समस्त देश भूर्लोकके अन्तर्गत हैं। मेरुपृष्ठले लेकर ध्रुव नक्षत्र पर्यन्त ग्रहनक्षत्रतारामय विचित्र लोकको भुवर्लोक या अन्तरिक्ष लोक कहते हैं. इसके अनन्तर स्वर्गलोक.पाँच प्रकारके होते हैं। उनमेंसे माहेन्द्रलोक तृतीय लोक है, जिसको स्वर्लोक या इन्द्रलोक भी कहते हैं। इसके ऊपर महलोंक है, जिसको प्राजापत्यलोक कहते हैं। इसके ऊपर तीन प्रकारके ब्राह्मलोक हैं। यथा जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक !, संग्रह श्लोकमें इसका प्रमाण भी मिलता है यथा-ब्राह्मलोक त्रिविध है, प्राजा- पत्यलोक महर्लोक है, माहेन्द्रलोक स्वर्लोक है, तारागणयुक्त भुवोंक है और मनुष्यादि जीवयुक्त भूौक है। भूलॊकके विषयमें पहले ही वर्णन किया गया है और उसमें स्थूल मृत्युलोकके अतिरिक्त नरक, प्रेतादि सूक्ष्मलोक. भी होते हैं, ऐसा भी कहा गया है। इसी प्रकार भुवलॊकमें भी- स्थूल नक्षत्र लोक तथा सूक्ष्म देवलोक हैं । स्थूललोकके विषयमें योगभाष्यमें लिखा है यथा- ग्रहनक्षततारकास्तु ध्रुवे निवद्धा वायुविक्षेपादिनियमेनोपल- क्षितपूचाराः सुमेरोरुपयुपरि सन्निविष्टा विपरिवर्तन्ते ।।

. -- . चतुर्दशलोक रहस्यं । . भुवर्लोकमें सूर्यादि ग्रहगण, अश्विनी 'भरणी 'आदि 'नक्षत्रगण तथा अन्यान्य तारागण ध्रुवताराके साथ सम्बन्ध निवद्ध होकर मेरुपर्वतके ऊपर ऊपर वायुसञ्चार द्वारा निय. मित-गतिसे सदा धूमते रहते हैं। इन स्थूल नक्षत्रलोकोंके सिवाय भूवर्लोको जो सूक्ष्मलोकसमूह हैं, उनमें देवयोनिके जीव निवास करते हैं। किन्नरलोक, विद्याधरलोक आदि इनके अन्तर्गत हैं। भुवर्लोकके ऊपर स्वर्लोक है। इसको महेन्द्रलोक कहते हैं। यह देवराजको राजधानी है। इसमें कितने प्रकारके देवता' रहते हैं, इसके विषयमें योगभाष्यमै लिखा है:- " माहेन्द्रनिवासिनः षड्देवनिकायाः, विदशा अग्निप्वाता याम्याः तुषिता अपरिनिर्मितवशवर्तिनः परिनिर्मितवशवर्तिनश्चेति, सर्वे संकल्पसिद्धा अणिमा- धैश्वर्योपपन्नाः कल्पायुषो वृन्दारका कामभोगिन औपपा- दिकदेहा उत्तमानुकूलाभिरप्सरोभिः कृतपरिवाराः ॥" महेन्द्रलोकमें छः प्रकारके देवता रहते हैं, यथा त्रिदश, अग्निवात, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मितवशवतों और परिनि. मितवशवर्ती। वे सभी सङ्कल्पसिद्ध हैं अर्थात् इच्छानुसार भोगसमर्थ हैं, अणिमादि ऐश्वयोंसे युक्त फाल्पान्त आयु युक्त हैं, पूज्य, कामभोगी और पितृमातृसम्बन्ध विनाही उत्पन्न दिव्य शरीरसे युक्त हैं । वे सुन्दरी अनुकूली अप्सराओं के साथ हैं,

२६
चतुर्दशलोक रहस्य।
सदा-विहार करते रहते हैं। महाभारतके वनपर्व में स्वर्लोकर्ष
विषयमें वर्णन है। यथा-
उपरिष्टाच खोके योऽयं स्वरिति संज्ञितः ।
आई वगः सत्पथः शश्वदेवयानचरो मुने ।।
नातप्ततपसः पुंसो नामहायज्ञभाजिनः ।
नानृता नास्तिकाश्चैव तत्र गच्छन्ति मुद्गल ।।
धर्मात्मनो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः ।
दानधर्मरता मर्त्याः शूराश्वाहवलक्षणः ।।
तत्र गच्छन्ति धर्माप्रय कृत्वा शमदमात्मकम् ।
लोकान्. पुण्यकृतान् ब्रह्मन् सद्भिराचरितान् नृभिः ।।
देवाः साध्यास्तथा विश्वे तथैव.च महर्षयः ।
यामा धामाश्च मौद्गल्य गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥
एषां देवनिकायानां पृथक् पृथानेकशः ।
भावन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥
त्रयस्त्रिंशत् सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः ।
मेरुः पर्वतराड्यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ॥
नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणम् ।
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ।।
बीभत्समशुभं वापि तत्र किञ्चिन्न विद्यते ।
मनोज्ञाः सर्वतोगन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ।।

२७
चतुर्दशलोक रहस्य।
शब्दाः श्रुतिमनोग्राह्या सर्वतस्तत्र वै मुने।
न शोको न जरा तत्र नायासपरिदेवने ॥
ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः ।
सुकृतस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ॥
तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् ।
कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ।।
न संखेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीपं मूत्रमेव वा ।
तेषां न च रजो वस्त्रं चाधते तत्र वै मुने ॥
न म्लायन्ति स्रजस्तेपां दिव्यगन्धा मनोरमाः।
संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते ॥
इर्ष्याशोकलमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः ।
सुखस्वर्गजितस्तत्र वर्तयन्ते महामुने ।
अव तृतीय लोकको खलोक कहते हैं। उसमें तपोहीन,
यशहीन, असत्यपरायण नास्तिकलोग नहीं जा सकते हैं।
शान्त, दान्त, दानधर्मशील, जितात्मा, समरवीर पुरुष ही वहां
जाते हैं। देवता, साध्य, विश्व, महर्षि, याम, धाम, गन्धर्व,
अप्सरा आदिके तेजोमय लोकसमूह' खर्लोकके अन्तर्गत हैं।
वहांपर तीस हजार योजन व्याप्त पर्वतराज मेरुपर नन्दन
'आदि देवोद्यान-समूह स्थित है, जिनमें देवतागण विहार
करते हैं। क्षुधा, पिपासा, ग्लानि, भय, किसी प्रकार
बीभत्स या अंशुभ वहां नहीं है। शीतल मन्द सुगन्ध पवन
,

है।
२
चतुर्दशलोक रहस्य ।
तथा श्रुतिप्राणमोहन लंगीनका आनन्द वहाँ मिलता रहता
है। वहांपर शोक दुःख जरा या श्रायासाका लेशमात्र भी नहीं
पुण्यबलसे वहां जानेवाले जीवको कर्मज तैजस शरीर
प्राप्त होता है। पितामातासे वहां शरीर नहीं मिलता है।
खेद, मल, मूत्र, दुर्गन्ध आदिसे वहांपर वन अपवित्र नहीं
होता है । स्वर्गवासियों के गलेमें जो दिव्यगन्धयुक्त माल्य रहता
है, वह कभी मलिन नहीं होता है। वे दिव्य विमानपर
चढ़कर घूमा करते हैं। ईर्ष्या, शोक श्रमादि वर्जित तथा
मोहमालयशून्य होकर श्रानन्दके साध लोग इस लोक
निवास करते हैं। स्वर्लोकके विषयमें कठोपनिषद्म
लिखा है-
खर्गे लोके न भयं किश्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया विभेति ।
उभे ती|ऽशनायापिपासे, शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।
स्वर्गलोकमें किसी प्रकारका भय नहीं है, वहां किसीको
जराका भी भय नहीं है, वुभुक्षा, पिपासा तथा शोझसे रहित
होकर वर्गवासिगण सदा आनन्द करते हैं। और भी
स्मृतिमें-
यन्न दुःखेन संभिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् ।
अभिलाषोपनीतञ्च तत् सुखं स्वःपदास्पदम् ॥
जहांपर सुख दुःखसे युक्त नहीं है, जहां सुखके अनन्तर
भी ढुःख नहीं होता है, और जहां इच्छा करते ही भोग्य पदार्थ
प्राप्त होते हैं, वही खर्ग तथा वही वर्गसुख है। यही सब
,

चतुर्दशलोक रहस्य। २६ स्वर्गलोकके शास्त्रकथित वृत्तान्त हैं। उसके ऊपर महलोंक है, जिसके विषयमे योगभाष्यमें लिखा है- महति लोके प्राजापत्ये पञ्चविधो देवनिकायः कुमुदाः ऋभवः प्रतर्दना अजनाभा पुचितामा इति, एते महा- भूतवशिनो ध्यानाहारा कल्पसहस्रायुपः । प्राजापत्य महर्लोकमै कुमुद, ऋभव, प्रतर्दन, अञ्जनाम और प्रचिताभ ये पांच प्रकारके देवता निवास करते हैं। पञ्चमहाभूत इनके वशवर्ती हैं। वे ध्यानाहार अर्थात् ध्यानमात्रसे ही तृप्त होते हैं, इनकी आयु फाल्प सहस्र वर्ष है। इसके ऊपर तीन घालोक हैं, जिनमेसे प्रथम ब्रह्मलोक अर्थात् जनलोकके विपयमे यागभाष्यमें लिखा है- पूथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनिकायो ब्रह्मपुरोहिता ब्रह्मकायिका ब्रहामहाकायिका अमरा इति, एते भूतेन्द्रियवशिनः । प्रथम ब्रह्मलोक अर्थात् जनलोकमें चार प्रकारकी देव- • जातियां वसती हैं, यथा ब्रापुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहा- कायिक और अमर । पञ्चभूत तथा इन्द्रिय दोनों ही इनके वशीभूत हैं। स्मृतिशास्त्र में लिखा है कि, सतीलोक भी इसी पञ्चमलोकके अन्तर्गत है, जहांपर सती स्त्रियां अपने पाति- प्रत्यके वलसे पतित पतिका भी उद्धार करके इस लोकमें उनके साथ निवास करती हैं। यथा पराशर स्मृतिमें- व्यालाही यथा व्यालं बलादुद्धरते बिलात् । एवमुद्धृत्य भारं तेनैव सह मोदते ॥

३० चतुर्दशलोक रहस्य । जिस प्रकार मदारी लापको विलसे खींचकर ऊपर उठाता है, उसी प्रकारले सती स्त्री अपने तपोवलसे निजपतिको अधो. गतिसे खींचकर पञ्चमलोकमें लेजाकर उसके साथ. विहार करती है। जनलोकके ऊपरत्तपोलोक है, जिसके भी विषय- में योगभाष्यमे लिखा है यथा- द्वितीये तपसि लोके त्रिविधो देवनिकायः अभाखरा महाभाखराः सत्यमहाभाखरा इति । एते भूतेन्द्रिय प्रकृतिवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः, सर्वे ध्यानाहारा, कध्वरेतसः अद्ध्वमप्रतिहतज्ञाना अधरभूमिष्वनावृत- ज्ञानविषयाः । द्वितीय ब्रहालोक अर्थात् तपोलोको अभावर, महाभाखर, सत्यमहा-भाखर नामक त्रिविध देवजातिका निवास है। 'पञ्चभूत, इन्द्रिय, प्रकृति इन तीनोपर इनका अधिकार है। 'अभावरले महाभाखरको श्रायु द्विगुण और महाभाखरसे 'सत्यमहाभाखरकी आयु द्विगुणपरिमित है। वे सब ध्यानाहार 'तथा उद्ध्वरेता हैं, सत्यलोकमें भी इनके ज्ञान प्रतिहत हैं, अधोलोकीके ज्ञान तो इनके करतलगत हैं ही। शिवलोक, 'विष्णुलोक, सरिद्वीप अर्थात् देवीलोक श्रादि समस्त सगुण- ब्रह्मोपालनास्वन्धीय लोक 'इसी तपोलोकके अन्तर्गत है, जहांपर सगुगनेझोपासनाके फलसे उपासनासिद्ध पुरुषगण सालोयादि मुकिलाम करते हैं । विष्णुलोकके विषय में श्रीमद्भागवतके ३-यस्कन्धमें लिखा है- , ३१ चतुर्दशलोक रहस्य । त एकदा भगवतो वैकुण्ठस्यामलात्मनः । ययुर्वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनमस्कृतम् ।। वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः । येऽनिमित्तनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ यत्र चायः पुमानास्ते भगवान्छव्दगोचरः । सत्त्वं विष्टभ्य विरजं स्वानां नो मृड़यन् वृषः ।। यत्र नैःश्रेयस नाम वनं कामदुधैर्दुमैः । सर्वर्तुत्रीभिर्विभ्राजत् कैवल्यमिव मूर्तिमत् ॥ वैकुण्ठलोकके निवासी चैकुण्ठपति विष्णुभगवान्की तरह चतुर्भुज शरीरधारी होते हैं, वे सब निष्काम भावसे श्रीभग- वान् हरिकी आराधना करते हैं। वहांपर वेदान्तवेद्य धर्ममूर्चि विष्णुभगवान् शुद्ध सत्वगुणका अवलम्बन करके अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं। यहाँका उद्यान ही निश्रेयस है, जो सकल ऋतुओंमें शोभामय तथा यथाकाम फलंप्रेस होता है। इसी प्रकार मणिद्वीप श्रादिके विषयमें भी आर्यशास्त्र में प्रमाण मिलता है। यथा देवीभागवतमें- भक्तौ कृतायां यस्यापि पारब्धवंशतो नग । न जायते मम ज्ञानं मणिद्वीपं स गच्छति ।। तत्र गत्वाऽखिलान् भोगाननिच्छन्नपि चार्छति । तदन्ते मम चिद्रूपज्ञानं सम्यग् भवेन्नगः॥ : 'इष्टोपासनापूर्ण होनेपर भी प्रारब्यवश जिस भक्तको . .. .

३२ चतुर्दशलोक रहस्य । खरूपज्ञान नहीं प्राप्त होता है वह मणिद्वीपमें जाता है। वहां इच्छा न रहनेपर भी अनेक प्रकारके भोग उनको प्राप्त होते हैं और अन्त में स्वरूपज्ञान प्राप्तिके बाद मुक्ति होती है। यह सव षष्ठ लोकके वृत्तान्त हैं। अन्तिम लोकको लत्यलोक या ब्रह्मलोक कहते हैं, जिसके विषयमें योगभाप्यमें लिखा है यथा- तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके चत्वारो देवनिकायाः अच्युताः शुद्धनिवासाः सत्याभाः संज्ञासंज्ञिनश्चेति । अकृतभवनन्यासाः स्वप्रतिष्ठाः उपर्युपरिस्थिताः पूधान- वशिनो यावत्सर्गायुपः। तत्राच्युताः सवितर्कथ्या- नसुखाः, शुद्धनिवासाः सविचारध्यानसुखाः, आनन्दमात्रध्यानसुखाः, संज्ञासंजिनचास्मितामात्रध्यान- सुखाः, तेऽपि त्रैलोक्यमध्ये प्रतितिष्ठन्ति । त एते सप्त सत्याभा लोकाः। तृतीय ब्रह्मलोक अर्थात् सत्यलोकमें चार प्रकारके देवता- गण निवास करते हैं । यथा-अच्युत, शुद्धनिवास, सत्याभ और संज्ञासंज्ञी। इनका.गृहविन्यास नहीं है, वें सव ख. प्रतिष्ठ है। अच्युत देवताओंके ऊपर शुद्धनिवास देवतागण रहते हैं, इस प्रकारसे ऊपर ऊपर इनके निवासस्थान हैं। प्रधान अर्थात् प्रकृति इनके वशीभूत है और यावत् सृष्टि इनकी आयु होती है। अच्युतगण सवितर्क ध्यानमें तृप्त रहते हैं, शुद्धनिवासगण सविचार ध्यानमें, सत्याभगण

।
चतुर्दशलोक रहस्य।
आनन्दमात्र ध्यानमें और संघासंशिगण अस्मितमात्रा ध्यानमें
निमन्न रहते हैं। ये ही सत्यलोकके वृत्तान्त हैं। 'ब्रह्मलोकमें
ऊपर कथित देवताओंके सिवाय और भी अनेक देवता तथा
महर्पिगण निवास करते हैं। था महाभारतके वनपर्वमें :-
पुरस्ताद् ब्राह्मणा तत्र लोकास्तेजोमयाः शुभाः।
यत्र यान्त्युषयो ब्रह्म पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ।।
ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः।
तेषां लोफात् परतो यान् यजन्तीह देवताः ।।
स्वयंपभास्ते भावन्तो लोकाः कामदुधाः परे ।
न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ॥
न वर्तयन्त्याहुतिभिस्तेनाप्यमृतभोजनाः ।
तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ।।
न सुखे सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः ।
न कल्पपरिवर्तेपु परिवन्ति ते तथा ।।
जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः पीतिः सुखं न च ।
न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ।
देवतानाञ्च मौद्गल्य वाञ्छिता सा गतिः परा !
दुष्पाप्या परंमा सिद्धिरगम्या कामगोचरैः।।
पूर्वदिशामें तेजोमय शुभ ब्रह्मलोक स्थित है। वहाँ पर
पवित्र ऋषिगण अपने शुभ फर्मोके फलसे जाते हैं। इस
३

है चतुर्दशलोक रहस्य । लोकमें ऋभु नामक एक प्रकारके अति उत्तम कोटिके देवता रहते हैं, उनका लोक सर्वोत्कृष्ट है। देवतागण भी उनके निमित्त यज्ञ करते हैं । वे स्वयंप्रभ, भगवान् , इष्ट फल-प्रदाता हैं। उनको स्त्रीजन्य सन्ताप या ऐश्वर्यजन्य मात्सर्य स्पर्श नहीं कर सकता है। श्राहुति या अमृत किसीसे वे जीवन धारण नहीं करते हैं, दिव्य शरीरधारी स्थूलविग्रहशून्य होते हैं। इनमें किसी प्रकारकी सुखेच्छा नहीं होती है, वे देव- देव, सनातन हैं, कालमें भी इनका कोई परिवर्तन नहीं होता । जरा, मृत्यु, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, राग, द्वेष इनको कुछ भी स्पर्श नहीं करता है। यह दुर्लभ गति देवताओंको भी कारणीय तथा विषयी जीवोंको सम्पूर्ण अगम्ब है। वेदमें जो देवयान गतिका वर्णन है उसी गतिके द्वारा ज्ञान- प्रधान संस्कारके फलसे ब्रह्मलोकप्राप्ति होती है, अथवा उपा- सना द्वारा षष्ठ लोक प्राप्तिके वाद षष्ठ लोकमें उत्तम संस्कार अर्जन करके भी सप्तम लोकमें साधक ना सकते हैं। इसके विषयमें छान्दोग्योपनिषद्में लिखा है :- ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभि- सम्भवन्त्यषिोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्णमाणपक्षा-- द्यान् षडुङ्डेति मासांस्तान् । मांसेभ्यः संवत्सरं संवत्स- रादादित्यमादित्याचन्द्रमसंचंद्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमा- नवः स एनां ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ।

. , चतुर्दशलोक रहस्य । ३५ निवृत्तिसेवी जो मुनिगण अरण्यमें निवास करके श्रद्धा साथ तपस्या, उपासना आदिका माचरण करते हैं, शरीर त्यागानन्तर उनको उत्तरायण गति मिलती है। वे प्रथमतः अचिरभिमानिनी देवताके लोक, तदनन्तर क्रमशः दिवसा- सिमानिनी देवताओंके लोक, आपूर्यमाणपक्ष देवलोक,परमास देवलोक, संवत्सर देवलोक, आदित्यदेवलाक और चन्द्रदेव- लोकको अतिकम करके विद्युद् देवलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँसे एक अमानव पुरुष प्राकर उन्हें ब्रह्म लोकमें ले जाते हैं । इसोको देवयान पन्था कहते हैं। इस प्रकारसे ब्रह्मलोकमें पहुँच कर वे सब ब्रह्मलोकमें वर्षोंतक निवास करते हैं । पश्चात् ब्रह्माके लयके साथ ही साथ परब्रह्ममें विलीन हो जाते हैं। यथा स्मृतिमें :- ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्पाप्ते प्रतिसञ्चरे । परस्यान्ते कृतात्मानः पविशन्ति परं पदम् ।। वे ब्रह्मलोकमें परमात्माका साक्षात्कार लाभ करके ब्रह्माके लयके साथ परब्रहमें विलीन होकर निर्वाणमुक्तिपद लाभ कर लेते हैं। इस विषयमै मुण्डकोपनिषदें लिखा है, यथा :- तपः श्रद्ध ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्षचयो चरन्तः । सूर्य्यद्वारेण ते विरजाः पूयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो अव्ययात्मा ।। वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥

चतुर्दशलोक रहस्य। भिक्षान्नग्रहण करते हुए जो शान्त विद्वान् पुरुषगण पर- स्यमै निवाल करते हैं और श्रद्धासहित तपस्यादि करते हैं ये सूर्यद्वारपथ अर्थात् देवयानपथ द्वारा अव्यय अमृत पुरुषके लोक ब्रह्मलोकमें गमन करते हैं। वेदान्तज्ञानले लब्धतत्व, संन्यासयोगके द्वारा शुद्धसत्व यतिगण ब्रह्मलोकमें ब्रह्माकी आयुःकाल तक निवास करके उन्हीं के साथ परब्रह्ममें विलीन हो मुक्त हो जाते हैं। यही सब ब्रह्मलोकके अधिवासी तथा वहाँसे मुकिलाभका वृत्तान्त है। ब्रह्मलोकमें कैले कैसे पदार्थ ब्रह्मलोकवासियोंको प्रात होते हैं, इसके कौषितकी तथा छान्दोग्योपनिषत्कथित प्रचुर वर्णन धमकल्पद्रुमके 'मुक्तितत्त्व' नामकअध्यायमें पहले ही बताये गये हैं, अतः पुनरुक्ति निष्प्रयोजन है। चतुर्दशलोक समीक्षा प्रसंगमें चतुर्दश लोकोका वर्णन करके अब उनके उत्पत्ति तथा विनाशकालपर विचार किया जाता है। लोकोंकी उत्पत्तिके विषयमें श्रीभगवान् मनुने कहा है:- तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्ता परिवत्सरम् । खयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद्विधा ।। ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ।। श्रीभगवान्के अन्तःकरणमें प्रजासृष्टिको इच्छा होनेपर प्रथमतः एक स्वर्ण वर्ण भएड और उसमें प्रजापति ब्रह्माको

चतुर्दशलोक रहस्य।
उत्पत्ति होती है। ब्रह्मा उत्पन्न होकर उस अण्डपर अपने मानके
एक वर्ष कत निवास करते हुए अपने ही ध्यानसे उस
अण्डको द्विधा विभक्त कर देते हैं। उसके एक भागले ऊपरके
सातलोक और दूसरे भागले सप्त अधोलोककी उत्पत्ति होती
है। इन प्रमाणोले सिद्ध होता है कि, महाप्रलयानन्तर सृष्टि के
माकालमें चतुर्दश लोकोंकी उत्पत्ति होती है। तदनन्तर सृष्टि-
नियमानुसार इन सव लोकोंमें पूर्ववर्णित नाना श्रेणीके जीव,
ऋषि, देवता, पितृ श्रादि उत्पन्न हो जाते हैं। और
श्रीभगवान्के स्थिति नियमानुसार ब्रह्माण्डकी स्थितिदशाम
इन सब लोक तथा लोफवासियोंकी स्थिति रहती है।
सदनन्तर प्रलयदशामें प्रलयनियमानुसार इन लोकोंका नाश
भी हो जाता है। वह नियम क्या.है, इसके विषय में शास्त्रमें
निम्नलिखित वर्णन मिलता है। यथा विष्णुपुराणमें :-
ब्राझो नैमित्तिको नाम तस्यान्ते प्रतिसञ्चरः ।
तदा हि दह्यते सर्व त्रैलोक्यं भूर्भुवादिकम् ।।
जनं पूयान्ति तापार्ता महोकनिवासिनः ॥
चार युग सहस्त्रवार बीत जानेपर ब्रह्माका एक दिन होता
है। दिन के बाद जव रात्रि श्राती है तव ब्रह्मा निद्रित हो
जाते हैं, उस समय नैमित्तिक प्रलयका उदय होता है, जिसमें
मौके सात लोक और ऊपरके तीन लोक अर्थात भूः, भुवः.
स्वः लोक दग्ध हो जाते हैं। और महर्लोकवासी सिद्धगण
दद्यमान नीचेके लोकों के उत्तापसे दुःखित होफर जनलोकको

. । ३८ चतुर्दशलोक रहस्य। चले जाते हैं । अतः सिद्ध हुआ कि, नैमित्तिक प्रलयके समय नीचे के सात लोक और ऊपरके तीन लोक इस प्रकारसे दस लोक नष्ट हो जाते हैं । तदनन्तरं विष्णुके निद्रावस्थामें नीचेके सात लोक और ऊपरके चार लोक अर्थात् महर्लोक तक नष्ट हो जाते हैं। यही सब नैमित्तिक प्रलयमें लोकनाशकी व्यवस्था है। इस प्रकारसे नैमित्तिक प्रलय और शांशिक लोकनाश कई बार होते होते जब अन्तमें महाप्रलय या प्राकृतिक प्रलय- का उदय होता है, तब चौदह लोकोंका एक बार हो नाश हो जाता है। यथा श्रीमद्भागवतके १२ स्कन्दमें:- एष प्राकृतिको राजन् ! पूलयो यत्र लीयते । अण्डकोशस्तु संघातो विघात उपसादिते ।। अर्थात् प्राकृतिक प्रलयके समय ब्रह्माण्डशरीरका समस्त उपादान अलग अलग होकर महाप्रकृतिमें समस्त ब्रह्माण्ड- प्रकृतिका विलय हो जाता है। इसीको सांख्यदर्शनमें " नाशः कारणलयः" निज कारणमें लय होना ही सृष्टिका नाश है, इस प्रफारसे वर्णित किया गया है। अतः शास्त्रममाणसे निश्चय हुधा कि, महाप्रलयानन्तर ब्रह्माण्डसृष्टिके समय सप्तधोलोक तथाऊवलोकों की उत्पत्ति होती है, नैमित्तिक प्रलयमें पिता- मह ब्रह्माकी निद्राके समय दस लोकोका नाश तथा भगवान् विष्णुको निद्राके समय ग्यारह लोकोंका नाश होता है। और महानलयकालमें जव ब्रह्मा विष्णु रुद्र सभी ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं, तब चौदह लोक एक बार ही नष्ट होकर स्वकारणमें -PM - चतुर्दशलोक रहस्य। ३६ विलीन हो जाते हैं। यही श्रुति स्मृति पुराणादि प्रतिपादित चतुर्दश लोकोंकी समीक्षा है। सारांश यह है कि, अनादिअनन्तरूपधारी सर्वव्यापक विराटपुरुष श्रीभगवान्के विराट् देहमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं और रहते हैं। उनमेंसे हमारे ब्रह्मा- एडकी अवस्था, स्वरूप और स्थितिका जो कुछ घर्णन हमारे वेदादि शास्त्रों में पाया जाता है उसका संक्षेप वर्णन यह है कि, हमारे ब्रह्माण्डके सृष्टि स्थिति लय करनेवाले त्रिदेव ही सगुण ब्रह्मरूप में ब्रह्माण्डमें अधिष्ठान कर अपना अपना कार्य करते हैं। हमारा यह मृत्युलोक हमारे इस ब्रह्माण्डके चौद- हवे अंशका एक चौथा अंश है। हमारे चारों ओर प्रेतलोक है। वह भी सूक्ष्मलोक है। उसके अतिरिक्त हमारे इस भूलोकसे सम्बन्धयुक्त और दो सूक्ष्म लोक हैं, जिनमेसे दुःख- भोग लोक नरक और सुखभोगलोक पितृलोक फहाता है। इस प्रकारसे भूलोकके चार अंग हुए यथा-मृत्युलोक, प्रेत- लोक, नरकलोक और पितृलोक। इसके अतिरिक्त छः और ऊपरके लोक और सात नीचेके अधोलोक ये सभी सूक्ष्मलोक । हमारा यह मृत्युलोक सबका केन्द्र है। क्योंकि यहीं मातृगर्भमें जन्म लेना पड़ता है, अन्य लोकों में मातृगर्भमैं जन्म लेना नहीं पड़ता है। आवागमनचक्रमें घूमते हुए सभी लोकोंके जीवोंको इसी लोकमें आना पड़ता है। क्योंकि पृथिवी कर्मभूमि है, यहां अच्छे बुरे कर्मों के संग्रह करनेका ।

चतुर्दशलोक रहस्य । मौका अधिक मिलता है, अन्य सर लोक भोगभूमि होनेके कारण उनमें ऐसा मौका अधिक नहीं मिलता है। शास्त्र में जो सात समुद्रोंका वर्णन है, उनमेले केवल लवणसमुद्र मृत्यु. खोकका समुन्द्र है। साक्षी छः समुद्र. सूक्ष्मलोकसम्बन्धीय तथा अन्य प्रकार के हैं। सालों में जो सप्त द्वीपका वर्णन है, उनमें से केवल जम्युद्वीपका एक विभाग हमारा मृत्युलोक है, बाकी रसव सूक्ष्मलोक है। इस कारण यदि लौकिक भूगोलशास्त्रके साथ पुरायोक ब्रह्माण्डले सन पनिोंकी एकता न मिले तो पाठकोंको भ्रममें नहीं पड़ना चाहिये। दूसरी ओर वेद पुरा णादि शालोमें जो नाना विभिन्न लोकोको वर्णनशैली पाई जाती है, उन वर्णनशैलियोंको ग्रन्थान्तरमें कहे हुए समाधि- माश परकीयभाषा तथा लौकिकभाषाभय से लौकिकमाषाके लाले मिलाकर समझना चाहिये। इस प्रकारसे विचार फरनेपर किसी के भी चित्तमें कोई शङ्का नहीं रह सकेगी तथा पूज्यपाद महर्षियोंके निकालदर्शी होनेका प्रत्यक्ष प्रमाण अनु- सन्धित्तु जनोंको भली भाँति विदित हो सकेगा। , इति शुभम् ।

श्रीविश्वनाथो जयति। धर्मप्रचारका सुलभ साधन। समाजकी भलाई ! मातृभाषाकी उन्नति ॥ देशसेवाका विराट् आयोजन !!! - इस समय देशका उपकार किन उपायोले होलकता है। संसारके इस छोरसे उस छोर तक चाहे किसी चिन्ताशील पुरुषसे यह प्रक्ष कीजिये, उत्तर यही मिलेगा कि, धर्ममायके प्रचारसे; क्योंकि धर्मने ही संसारको धारण कर रखा है। भारतपर्प किसी समय संसारका गुरु था, आज वह अध:- पतित और दीनहीन दशामें क्यों पच रहा है ? इसका भी उत्तर यही है कि, वह धर्मभावको सो वैठा है। यदि, हम भारतसे ही पूर्छ कि, तू अपनी उन्नतिके लिये हमसे क्या याहता है ? तो वह यही उत्तर देगा फि, मेरे प्यारे पुत्रों ! धर्मभावकी वृद्धि करो। संसारमें उत्पश होकर जो व्यक्ति भी सत्कार्य करनेके लिये उधत हुए हैं, उन्हें इस बातफा पूर्ण अनुभव होगा कि, ऐले कार्यों में कैसे विज और कैसी बाधाएँ उपस्थित हुश्रा करती हैं। यद्यपि धीर पुरुप उनकी प्रर्याह नहीं करते और यथासम्भव उनसे लाभ ही उठाते हैं, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि, उनके कार्यों में उन विन- बाधाओंसे कुछ रुकावट अवश्य ही हो जाती है। श्रीभारत- धर्ममह्यमण्डलके धर्मकार्य इस प्रकारको अनेक बाधाएँ होने पर भी उसे जनसाधारणका हित-साधन करनेका सर्व- । ( २ ) शक्तिमान् भगवान्ने सुअवसर प्रदान कर दिया है। भारत अंधार्मिक नहीं है, हिन्दुजाति धर्मप्राण जाति है, उसके रोम रोममें धर्मसंस्कार श्रोतप्रोत है। केवल वह अपने रूपको, धर्मभावको, भूल रही है। उसे अपने खरूपकी पहिचान करा देना-धर्मभावको स्थिर रखना हो श्रीभारतधर्ममहा- मण्डलका एक पवित्र और प्रधान उद्देश्य है। यह कार्य २२ वर्षोंसे महामण्डल कर रहा है और ज्यों ज्यो उसको अधिक सुअवसर मिलेगा, त्यो त्यो वह जोर शोरसे यह काम करेगा। उसका विश्वास है कि, इसी उपायले देशका सञ्चा उपकार होगा और अन्तमें भारत पुनः अपने गुरुत्वको प्राप्तं . कर सकेगा। इस उद्देश्यसाधनके लिये सुलभ दो ही मार्ग हैं। (१) 'उपदेशकों द्वारा धर्म-प्रचार करना और (२) धर्म-रहस्य- सम्बन्धीय मौलिक पुस्तकोंका उद्धार और प्रकाश करना । महामण्डलने पृथम मार्गका अवलम्वन आरम्भसे ही किया है और अव तो उपदेशक महाविद्यालय स्थापित कर,महामण्डलने वह मार्ग स्थिर और परिष्कृत कर लिया है। दूसरे मार्गके संम्बन्धमें भी यथायोग्य उद्योग प्रारम्भसे ही किया जा रहा है, विविध ग्रन्थोका संग्रह और निर्माण करना, मासिकपत्रि- काओका सञ्चालन करना, शास्त्रीय ग्रंथोंका आविष्कार करना, इस प्रकारके उद्योग महामण्डलने किये हैं और उनमें लफलता भी प्राप्तकी है, परन्तु अभी तक यह कार्य संतोषजनक नहीं हुआ है। महामण्डलने अब इस विभागकों 'उन्नत करनेका विचार किया है। तदनुसार दस लाखके मूलधनसे भारतधर्म सिण्डिकेट लिमिटेड नामकी कम्पनी महामण्डलने स्थापितकी है, उसके द्वारा कमसे कम दो लाख .. .

( ३. ) मूलधन लगाफर पुस्तकप्रकाशनका कार्य प्रारम्भ हो गया है । महामण्डलने अपनी संरक्षकतामें परिचालित निगमागमबुकर डिपो भी उक्त सिण्डिकेटको दे दिया है। उपदेशकों द्वारा जो धर्मप्रचार होता है, उसका. प्रभाष: चिरस्थायी होनेके लिये उसी विषयकी पुस्तकोंका प्रचार होना परम आवश्यक है, क्योंकि वक्ता एक दो बार जो कुछ- सुना देगा, उसका मनन विना पुस्तकोंका सहारा लिये नहीं हो सकता। इसके सिवाय सब प्रकारके अधिकारियोंके लिये एक वका कार्यकारी नहीं हो सकता। पुस्तकप्रचार; द्वारा यह काम सहल हो जाता है। जिसे जितना अधिकार होगा, वह उतने ही अधिकारकी पुस्तके पढ़ेगा और महा-: मण्डल भी सब प्रकारके अधिकारियोंके योग्य पुस्तके निर्माण करेगा। सारांश, देशको उन्नतिके लिये, भारतगौरवकी , रक्षाके लिये और मनुष्यों में मनुष्यत्व उत्पन्न करनेके लिये महामण्डलने यब पुस्तकप्रकाशन विभागको उक्त सिण्डिकेट, द्वारा अधिक उन्नत करनेका विचार किया है और उसकी सर्वसाधारणसे प्रार्थना है कि, वे ऐसे सत्कार्यमें इसका हाथ बटावें एवं इस शानप्रचारक कार्यमें इसकी सहायता कर, अपनी ही उन्नति कर लेनेको प्रस्तुत हो जावें। श्रीभारतधर्ममहामण्डलके व्यवस्थापक पूज्यपाद श्री १०८ . खामी शानानन्दजी महाराजकी सहायताले काशोके प्रसिद्ध विद्वानोंके द्वारा सम्पादित होकर प्रामाणिक, सुबोध और सुदृश्यरूपसे यह ग्रन्थमाला निकलेगी। ग्रन्थमालाके जो ग्रंथ छपकर प्रकाशित हो चुके हैं, उसकी नीचे सूची प्रकाशित की जाती है। - प्रकाशित हुए स्थिर प्राहकोंके नियम। (१)इस समय हमारी ग्रंथमालामें निम्नलिखित ग्रंथ हैं: संत्रयोगसंहिता (भाषानुवाद- पष्ठ खण्ड २॥) सहित) १) भीमद्भगवद्गीता प्रथम खंड हठयोगसंहिता m) (भाषाभाष्यसहित) १) पोगदर्शन (भाषाभाष्य. गुरुगीता(भाषानुवादसहित) सहित) २) शम्भुगीता (भापानुवाद- देवीमीमांसावर्शन प्रथम भाग लहित) (भाषाभाष्यसहित) ११) धीशनीता कल्किपुगण (भाषानुवाद- शकिगीता सहित) १॥) सूर्वगीता नवीन इष्टिमें प्रवीस भारत १) विष्णुगीता प्रवीण दृष्टिमें नवीन भारत २) संन्यासगीता उपदेश पारिजात (संस्कृत)) रामगीता (भाषानुवाद और भारतधर्ममहामण्डल रहस्य) टिप्पणी सहित सजिल्द)२॥) धर्मकल्पद्रुम प्रथम स्मएड २) भाचारचन्द्रिका ॥) द्वितीय स्वएड ११) नीतिचन्द्रिका तृतीय स्त्रएड २) धर्मचन्द्रिका १) -" चतुर्थ खण्ड २) साधन चन्द्रिका 1) पञ्चम खण्ड २). नित्यकर्म चन्द्रिका (२) इनमेंसे जो हमसे कम ४) मूल्यकी पुस्तके पूरे गुल्पमें खरीदेंगे अथवा स्थिरत्राहरू होनेका चन्दा १) भेज'. देंगे उन्हें शेप और आगे प्रकाशित. होनेवाली सवं पुस्तके हैं मूल्यमें दी जायेंगी। " 3 1

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(३) स्थिर प्राइकोको मालामें प्रथित होनेवाली हर एक
पुस्तक खरीदनी होगी। जो पुस्तक इस विभाग द्वारा छापी
जायगी, यह एक विद्वानोकी कमेटी द्वारा पसन्द करा ली
जायगी।
(४) हर एक प्राहक अपना नम्बर लिखकर या दिखा-
कर हमारे कार्यालयसे अथवा जहां वह रहता हो वहां महा-
भएडलफी शाखासमा हो, तो यहाँसे, स्वल्प मूल्यपर पुस्तके
खरीद सकेगा।
(५) श्रीमहामण्डलकी जो धर्मसभा इस धर्मकार्य में
सहायता करना चाहे और जो साजन इस ग्रन्थमालाके
स्थायी प्राहक होना चाहे, वे मेरे नाम पम भेजनेकी
कृपा करें।
गोविन्द शास्त्री दुगवेकर, अध्यक्ष शास्त्रप्रकाश विभाग,
श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय,
मार्फत भारतधर्मसिण्डिकेट लिमिटेड भवन,
स्टेशनरोड, जगत्गल, वनारस शहर।
इस विभाग द्वारा प्रकाशित समस्त धर्मपुस्तकोंका विवरण
लदाचारसोपान-यह पुस्तक कोमलमति बालक पालि.
फाओंके धर्मशिक्षाके लिये प्रथम पुस्तक है। अपने बच्चोंकी
धर्मशिक्षाके लिये इस पुस्तकको हर एक हिन्दूको मँगवाना'
मूल्य) एक प्राना।
कन्याशिक्षासोपान-कोमलमति फन्याओको 'धर्मशिक्षा
देने के लिये यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी है । मूल्य )
धर्मसोपान यह धर्मशिक्षा विषयक बड़ी उत्तम पुस्तक
है। बालकोंको इससे धर्मका साधारण ज्ञान भली भांति हों
चाहिये।

. (६), जाता है। धर्मशिक्षा-पानेकी इच्छा करनेवाले सजन भी अवश्य इस पुस्तकको मँगावे । मूल्य चार पाना। ब्रह्मचर्य सोपान-ब्रह्मवर्यव्रतकी शिक्षाके लिये यह ग्रंथ बहुत ही उपयोगी है। मूल्य तीन श्राना। साधनसोपान-यह पुस्तक उपालना और साधनशैलीकी शिक्षा प्राप्त करनेमें बहुत ही उपयोगी है। यह पुस्तक ऐसी उपकारी है कि, वालक और वृद्ध समानरूपसे इससे साधन; विषयक शिक्षा-लाम कर सकते हैं। मूल्य शास्त्रसोपान-सनातनधर्मके शास्त्रोकासंक्षेप सारांश इस ग्रंथमें वर्णित है। मूल्य !) चार धाना। धर्मप्रचारसोपान यह अन्य धर्मोपदेशक देनेवाले उप- देशक और पौराणिक पण्डितोंके लिये बहुत हितकारी है। मूल्य राजशिक्षासोपान राजा महाराज और उनके कुमारोंकों धर्मशिक्षा देनेके लिये यह ग्रंथ बनाया गया है, परन्तु सर्व साधारणको धर्मशिक्षाके लिये भी यह ग्रंथ बहुत ही उप- योगी है। मूल्य ३) तीन आना। मन्त्रयोगसंहिता-योगविषयक भोपानुवादसहित ऐसा अपूर्व ग्रंथ आज तक प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें मंत्रोंका खरूप और उपास्यनिर्णय वहुत अच्छा किया गया है और नास्तिकोके मूर्तिपूजा, मन्त्रसिद्धि प्रादि विपर्यो में जो प्रश्न होते हैं उनका अच्छा समाधान है। मूल्य एक रुपया। हठयोग संहिता-योगविषयक ऐसा अपूर्व ग्रन्थ आज. तक प्रकाशित नहीं हुआ है। इसमें हठयोगके. ७. अङ्ग और क्रमशः उनके लक्षण, साधन प्रणाली प्रादि सब अच्छी तरह पर्णन किये गये हैं। मूल्य पारह माना। तीन माना।

र ७ )
। योगदर्शन-हिन्दीभाष्य सहित। इस प्रकारका हिन्दी
भाष्य और कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। प्रत्येक सूत्रका
भाष्य प्रत्येक सूत्रके आदिमें भूमिका देकर ऐसा क्रमबद्ध
धना दिया गया है कि, जिससे पाठकोंको ऐसा प्रतीत होगा
'कि महर्षि सूत्रकारने जीवोंके क्रमाभ्युदय और निःश्रेयसके
लिये मानो एक महान् राजपथ निर्माण कर दिया है।
मूल्य २) दो रुपया।
देवीमीमांसा दर्शन प्रथम भाग-वेदके उपासनाकाण्डका
यह अगिरा दर्शन है। इस प्रथम भागमें इस दर्शन शाखके
प्रथम दो पाद हिन्दी अनुवाद और हिन्दी भाष्यसहित
प्रकाशित हुए हैं।
मूल्य १॥) डेढ़ रुपया।
कल्किपुराण-कल्किपुराणका दम किसने नहीं सुना है।
वर्तमान समयके लिये यह बहुत हितकारी ग्रन्थ है। विशुद्ध
हिन्दी अनुवाद और विस्तृत भूमिका सहित यह ग्रंथ प्रकाशित
हुआ है। धर्म जिज्ञासुमात्रको पढ़ना उचित है। मूल्य १॥)
नवीन दृष्टिमें प्रवीण भारत-भारतका प्राचीन गौरव और
आर्यजातिका महत्त्वजानने के लिये यह एक ही पुस्तक है । मू०१)
उपदेशपारिजात-यह संस्कृत गद्यात्मक अपूर्व ग्रंथ है।
मूल्य 1)आठ पाना
श्रीभारतधर्ममहामण्डलरहस्य-धर्मके गूढ़ तत्त्व भी इसमें
बहुत अच्छी तरहसे बताये गये हैं। मूल्य १) एक रुपयाः
'श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम खण्ड-हिन्दी भाष्य, सहित !
गीताका अध्यात्म, अधिदेव, अधिभूतरूपी त्रिविध खरूप,
प्रत्येक श्लोका विविध अर्थ और सब प्रकारके अधिकारियों के
समझने योग्य" गीता-विज्ञानको विस्तारित विवरण इस
भायमें मौजूद है।
मूल्य १) एक रुपया।

R - मूल्य।) तस्ववोध-भाषानुवाद और वैज्ञानिक टिप्पणी सहित । यह मूल ग्रन्थ श्रीशङ्कराचार्यकृत. है । मूल्य =) दो श्राना। स्तोत्रकुसुमाजंलि मूल-इसमें पञ्चदेवता, अवतार और ब्रह्मकी स्तुतियोंके साथ साथ श्राज फलकी आवश्यकता- नुसार धर्मस्तुति, गंगादि पयिन सादोंकी स्तुति, चेदान्तप्रति- पादक स्तुतियाँ और काशीके प्रधान देवता श्रीविश्वनाधादिकी स्तुतियाँ हैं। निगमागसन्द्रिका-प्रथम और द्वितीय · भागती दो पुस्तकें धम्मानुरागी सजनाको मिल सकती हैं। प्रत्येकका. मूल्यं १) एक रुपया। (१) वर्लड्स इंटरनमा रिविजन यह सम्प्रति अंग्रेजी भापामें एक ऐसा अन्य छप गया है, जिसके द्वारा सब अंग्रेजी पढ़े व्यकियोंको सनातनधर्मका महत्त्व, उसका सर्वजीव हितकारी स्वरूप, उसके सब अङ्गोका रहस्य, उपासनातत्वं, योगतत्त्वं, काल और सृष्टितरथ, कर्मतस्व, वर्णामधर्मतत्त्व इत्यादि सब पड़े २ विषय मच्छी तरह समझने में माजावंगे। इंसको मूल्य राजसंस्करणका ५) और साधारण संस्करणका ३) है। अंग्रेजी भाषामें आजतक सनातनधर्मका कोई भी अन्य ऐसा प्रकाशित 'नहीं कुत्रा था। त्रिवर्ण चित्र भी। इसमें दिये गये हैं। व्रतोत्सव चन्द्रिका (अर्थात् हिन्दू लोहारोंका शास्त्रीय विवेचन) लेखक महामहोपदेशक पं० श्रवणलालजी वाणी विभूषण मूल्य ३). मैनेजर, निगमागमबुफडीपो। भाजधर्म सिण्डिकेट भवन, स्टेशनरोड जगतगंज, बनारस (शहर) 40 श्रीआर्यमहिला-हितकारिणी महा. कार्यसम्पादिकाः-भीमार्य महिला हितकारिणी महा. परिषद्की सम्पादकीय समिति । भारतवर्षको प्रतिष्ठित रानी महारानियों तथा विदुषी भद्र महिलाओं के द्वाग, श्रीभारतधर्ममहामण्डलकी निरीक्षकतामें प्रायनाताओंकी उन्नतिकी लदिच्छाले यह महापरिपश्रीकाशी. पुरीमें स्थापित की गई है। इसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं- (क) आमहिलाओं की उन्नतिके लिये नियमित कार्यव्यव- स्थाका स्थापन (ख) श्रुति-स्मृति प्रतिपादित पवित्र नारीधम- काप्रचार (ग) स्वधर्मानुकूल स्त्री-शिक्षाका प्रचार (घ) पारस्परिक प्रेम स्थापित कर हिन्दु सतिया में एकताकी वृद्धि (ङ) सामा- जिक कुरीतियोंका संशाधन,और (च) हिन्दीकी उन्नति करना। परिपद्के विशेष नियमः--१म-सब प्रकारको सभ्यानीको इसकी मुनपत्रिका "आर्यमहिला" मुफ्त मिलेगी। श्य-स्त्रियाँ ही सभ्याएँ हो सकेंगी। श्य-यदि पुरुष भी परिपद्की किसी तरहकी सहायता करें तो वे पृष्ठपापक समझे जायेंगे और उनको भी पत्रिका मुफ्त मिला करेगी। ४थ-परिषद्को चार प्रकारकी सभ्यानी ये नियम हैं:- (क) कमसे कम १५०) एक वार देनेपर "श्राजीवन-सभ्या", (ख) १०००) एक ही धार या प्रतिमाल १० देनेपर "संरक्षक- सभ्या" (ग) १०) वार्षिक देनेपर "सहायक सभ्या और (घ) ५) वार्षिक देनेपर वा असमर्थ होनेसे ३) ही वार्षिक देनेपर "सहयोगिसभ्या" आर्यमहिला मात्र बन सकती हैं। -- . पत्रव्यवहारका पता- - कार्याध्यक्षा, भार्यमहिलाहितकारिणी महापरिषत्कार्यालय, श्रीमहामण्डल सदन, जगत्गल, बनारस ।

श्रीभारतधर्ममहामण्डल प्रधान कार्यालय काशीसे ए. हिन्दी भाषा और दूसरा अंग्रेजी मापसका इस प्रकार दो एवं प्रान्तीय कार्यालयोंसे अन्यान्य भाषात्रोंके फई मासिकप प्रकाशित होते हैं। श्रीमहामण्डलके पाँव धेशीके सभ्य होते हैं। यथाः-वार धीन नरपति और प्रधान प्रधान धर्माचार्यगण संरक्षक होते हैं। भारतवर्ष के लव प्रान्तोंके बड़े बड़े जमींदार सेठ साहूकार धादि सामाजिक नेता उस उस प्रान्तके चुनावके द्वारा प्रतिनिधि सभ्य चुने जाते हैं । प्रत्येक प्रान्तोंके अध्यापक ब्राह्म. गोमेंसे उस उस प्रान्तीय मण्डल द्वारा चुने जाकर धर्मय. वस्थापक उन्ध बनाये जाते हैं। भारतवर्ष के सब प्रान्तोंसे पांच प्रकार के सहायक लम्प लिये जाते हैं, विद्यामम्बन्धीच सहायकसभ्य, धर्मकार्य करनेवाले सहायक सभ्य महामण्डल प्रान्तीय मण्डल और शाखालभानोको धनदान करनेवाले सहायक सभ्य, विद्वान् ब्राह्मण सहायकसभ्य और साधु संन्या. सीसहायक सभ्य। पांचची श्रेणी के सभ्य साधारण सभ्य कहाते हैं जो २॥ वार्षिक देनले हिन्द स्त्रीपुरुप हो सकते हैं। इन सब प्रकार सस्यों और श्रीमहामगइलका प्रान्तीय मण्डल.शाखा- लभा और संयुक्त सभाओंको श्रीमहामण्डलका हिन्दी अथवा अंग्रेजी मासिकपन विना मूल्य दिया जाता है। इसके अति. रिक्त समाजहितकारीकोषके द्वारा उनके उत्तराधिसरियोको, विशेष लाभ मिलता है। पत्रव्यवहार इस पते परं करें- -- प्रधानाध्यान, श्रीभारतधर्ममहामण्डल, जगत्गा, तांश

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Chaturdashshlok - Rahashya

Author
Bharat Dharm Mahamandal
Title
Chaturdashshlok - Rahashya
File name
Chaturdashshlok - Rahashya
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2009/09
Publisher
Benares, Jagatganj
Language
Sanskrit
Pages
52
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
shlok - rahashya
DLI number
345437
Barcode
99999990233778.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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LARcv7NCOwS
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