Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vishnu Puran (khand-ii)

Sharma,pt.shriram · 2012/08

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दो शब्द विष्णुपुराण के इस द्वितीय खण्ड में जिन विषयो का विवेचन दिया गया है वह भनेक दृष्टियो से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं । इसके चतुर्थ अश मे जो सूर्य पौर चन्द्रवश के राजानो का वर्णन किया गया है वह सक्षिप्त होते हुये भी अन्य "पुराणो की अपेक्षा अधिक क्रमवद्ध है और उसके पढने से भारतवर्ष के इन दो प्रमुख शासक परिवारो के नरेशो का.सामान्य परिचय अच्छी तरह मिल जाता है। यद्यपि पौराणिक वर्णनो मे प्राचीन घटनामो का को समय दिया गया है वह ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी नहीं कहा जा सकता, क्योकि उनमे हजारो और लाखो की सख्या से कम की बात ही नहीं की गई है, तो भी भारतवर्ष के प्राचीन इतिहास की खोज करने वालो ने पुराणो की वशावलियों का उपयोग किया है और अनेक पुराणो तथा अन्य ग्रन्थो मे दी गई राजाओ की नामावलियो की तुलना करके उस अजात काल की एक मोटी रूपरेखा प्रस्तुत को है। ऐतिहासिक विद्वानो ने इस निगाह से 'विष्णुपुराण' को अधिक प्रामाणिक माना है और उसका जिक्र हम अनेक देशो और विदेशी इतिहास ग्रन्थो मे पाते हैं । पञ्चम अरा मे जो कृष्ण चरित्र दिया गया है उसमे भी ऐसी ही विशे- पताएं पाई जाती हैं । यो तो 'भागवत' मे भगवान कृष्ण का जो वर्णन मिलता है वह भक्ति भौर साहित्यिक उच्चता की दृष्टि से सर्वाधिक प्रसिद्ध है और ब्रह्म- वैवर्तपुराण मे भी गोकुल, वृन्दावन मे निवास करने के समय का वर्णन बहुत विस्तार, रोचकता और शृङ्गार-रस के साथ वर्णन किया गया है, पर 'विष्णु- पुराण' मे थोडे से पृष्टो मे समस्त कृष्ण चरित्र जिस प्रकार स्वाभाविक ढग से लिखा गया है और व्रज तथा द्वारिका के कार्यकलापो के वर्णन मे जो उचित अनुपात तथा सतुलन का ध्यान रखा गया है उससे इसकी लेखन सम्बन्धी थेष्ठता स्पष्ट सिद्ध हो जाती है । यही कारण है कि सभी पुराणो से छोटा होते हुये भी इसका महत्त्व अधिक माना गया है और विद्वन्मएडली मे भागवत के पचाल, इसी का प्रचार अधिक देखने मे पाता है।

प्रन्तिम अश मे कलियुग की जो विशेषताएं भोर मध्यात्म मार्ग की शिक्षाएं मिलती हैं उन्हें भी अपने वेग की अनूठी ही कहा जा सकता है । लेखक ने वर्तमान युग की उपयोगिता जिस प्रकार प्रतिपादित की है वह निस्सन्देह प्रशसनीय है । मनेक पौराणिक लेखको ने जिस प्रकार कलियुग को पापो की खान पोर दुष्कर्मों का मागार वतलाने मे हो अपनी शक्ति खर्च कर दी है उसे व्यक्ति तथा समाज के कल्याण की दृष्टि से उपयोगी नहीं कहा जा सकता। किसी के दोपो का इडा पीटकर हम उसका मधिक सुधार नहीं कर सकते । इसका मार्ग तो यही है कि उसकी पच्छाइयो को सामने लाकर उसे सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाय । "विष्णुपुराण' मे यही किया गया है । इन बातो पर विचार करने से हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यह पुराण निस्सन्देह प्राचीन धार्मिक साहित्य मे अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। इसमे धार्मिक शिक्षामो को सरल तथा सुवोध रूप मे उपस्थित करके पाठकों के लिये एक लाभकारी माध्यम प्रस्तुत किया गया है। -सम्पादक विष्णु पुराण के द्वितीय खराड की विषय-सूची चतुर्थ अंश अध्याय ४७ ३. मान्धाता की संतति, सगर की उत्पत्ति और विश्व-विजय 8 ४. सगर के साठ हजार पुत्रो का भस्म होना, भागीरथ, खटवांग और भगवान राम का चरित्र १४ ५. इग्छाकु के दूसरे पुत्र निमि के वश का वर्णन २५ ६. चन्द्रवश का वर्णन, राजा पुरुरवा तथा उर्वशी का सम्मिलन ७. जन्हुका गगा पान, जमदग्नि मोर विश्वामित्र की उत्पत्ति ५. क्षत्रवृद्धि वश वर्णन, धन्वन्तरि का जन्म ६. रजि के वंश का वर्णन, दैत्यो भोर देवतामो के युद्ध मे रजि की विजय १०. नहुप पुत्र ययाति का चरित्र, पुरुरवा का अपने पिता को यौवन-दान ५१ ११. यदुवंश का वर्णन और सहस्रार्जुन चरित्र १२. राजा ज्यामघ का चरित्र ५७ १३. सत्वत सतति का वर्णन, स्यमन्तक मणि की कथा, श्रीकरण को अपवाद १४. पनमित्र वश वर्णन ८२ १५. वसुदेय जी की संतति का वर्णन, कंस के हाथ छ. पुत्रो का वध श्री कृष्ण जन्म ८६ १६. दुर्वसु वा वर्णन १७. .ह. वश वर्णन १०२ १०७ १०६ १८ मनु वश-वर्णन १६ पुरु वश वर्णन, शकुन्तला की कथा २० कुरु वश वर्णन २१. भविष्य में होने वाले कुरुवशीय नरेश २२ भविष्य में होने वाले इक्ष्वाकुवशीयानरेश २३ भविष्य मे होने वाले मगधवशीय राजा २४ कलियुगी राजानो और कलि भवस्था का वर्णन, राजवश वर्णन और उपसहार पंचम अश १ वसुदेव जी का विवाह, दैत्यो के भार से पीड़ित पृथ्वी का देवतापो सहित भगवान की शरण मे जाना २ देवतानो द्वारा देवकी की स्तुति ३ भगवान कृष्ण का जन्म और योगमाया द्वारा कस को चेतावनी ४ कस का असुरो को कृष्ण बध का आदेश और वसुदेव देवकी का १२७ १३६ १४२ जेल से छुटकारा ५ पूतना बघ १४७ १४६ १५३ ६, शकट भजन , यमलार्जुन उद्धार वृन्दावन निवास ७, कालिय दमन धेनुकासुर का वध ६ प्रलम्ब नामक दैत्य का मारा जाना १०॥ शरद वर्णन तथा गोवर्धन पूजा ११. भगवान कृष्ण का गोवधन धारण १२ इन्द्र द्वारा भगवान कृष्ण को पूजा १३ गोपो द्वारा भगवान का स्तपन, श्रीकृष्ण का गोपियो केसाप रास क्रीडा १४ वृपमासुर का बघ, १७५ १८० १८८ २०४ ७ २१४ १५. श्रीकृष्ण जी को बुलाने के लिए कंस का प्रक्र र जी को भेजना २०७ १६. केशी-वध २१० १७. प्रक्र र जी की गोकुल यात्रा १८, श्रीकृष्ण का मथुरागमन, गोपियो का विरह विलाप, अक रजी का जमुना मे भगवद्द शंन २१६ १६. भगवान का मथुरा में प्रवेश और माली पर कृपा २२८ २०. कुब्जा से भेंट, धनुष भंग, कुवलियापीड़ तथा चाणूर' मादि का नारा, कंस-वध २३२ २१. उग्रसेन का राज्याभिषेक, सदीपन के पास विद्याध्ययन २४८ २२. जरासन्ध का मथुरा पर याक्रमा २५२ २३. कालयवन की उत्पत्ति मोर मथुरा पर भाक्रमण, श्री कृष्ण का द्वारका गमन, कालयवन का भस्म होना २५५ २४. बलराम जी का ग्रज गमन, गोपियों से भेंट २६२ २५. बलराम काजमुना-माकर्षण, रेवती से विवाह २६. श्रीकृष्ण का रुक्मिणी जी से विवाह २६८ २७. प्रद्युम्न का जन्म मोर शम्बरासुर द्वारा उसका हरण २७० २८. प्रद्युम्न का विवाह, बलराम को घूत क्रीड़ा २७५ २६. नरकासुर-वध २७६ ३०. स्वर्ग से पारिजात हरण, इन्द्र से सग्राम २८४ ३१. सोलह हजार कन्याप्रो से ग्रीकृष्ण का विवाह २६६ ३२. उपा का स्वप्न पनिरुद्ध को देखकर मोहित होना २६६ ३३. श्रीकृष्ण प्रोर बाणासुर का मुख ३४. पौंड्रक मोर काशीराज का यघ ३५. साम्य का दुर्योधन की कन्या के साथ विवाह ३१० ३६. बलराम जी द्वारा द्विविद-यय ३७. अपियों के साप मे यदुवंश का विनाश और श्रीकृष्ण का परमधाम सिधारना ३२६ ३८. यादवों का अन्त्येष्टि-सस्कार, परीक्षित का राज्याभिषेक मोर पाण्डवो का हिमाचल गमन पष्टम अंश १. कलिधर्म निरूपण २. श्री व्यास जी द्वारा कलियुग, शूद्र मौर स्त्रियों का महत्व वर्णन ३. निमेषादि काल-मान ३६२ ४, नैमित्तिक और प्राकृतिक प्रलय ५. माध्यात्मिक मादि विविध तापों का वर्णन भगवान के सगुण- निर्गुण रूप का वर्णन ३७४ ६. कैशिध्वज और खाण्डिक्य संवाद ७. अध्यात्मविद्या तथा योग वर्णन विष्णु पुराण पटन-पाठन का फल विष्णु पुराण का निष्पक्ष नतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक प्रध्ययन ४१०-५०४ श्रीविष्णुपुराण (द्वितीय भाग) चतुर्थ अंश नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवी सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ तीसरा अध्याय अतश्च मान्धातुः पुनसन्ततिरभिधीयते ।। अम्बरीपस्य मान्धा- तृतनयस्य युवनाश्वः पुत्रोऽभूत् ।२। तस्माद्धारीतः यतोऽङ्गीरसो हारीताः १३॥ रसातले मौनेया नाम गन्धर्वा बभूवुष्पट्कोटिसख्यातास्तरशेषारिण नागकुलान्यपहृतप्रधानरत्नाधिपत्यान्यक्रियन्त ।४। तैश्च गन्धर्ववीर्या- वधुतैरुरगेश्वरः स्तूयमानो भगवानशेपदेवेशः स्तवच्छ्रवणोन्मीलितोन्निद्र- पुण्डरोकनयनो जलशयनो निद्रावसानात् प्रबुद्धः प्रणिपत्याभिहितः भगवन्नस्माकमेतेभ्यो गन्धर्वेभ्यो भयमुत्पन्न कथमुपशममेष्यतीति ॥५॥ माह च भगवाननादिनिधनपुरुषोत्तमो योऽसौ यौवनाश्वस्य मान्धातुः पुरुकुत्सनामा पुत्रस्तमहमनुप्रविश्य तानशेपान् दुष्टगन्धर्वानुपशम नयि- प्यामीति ।६। तदाकर्ण्य भगवते जलशायिने कृतप्रणामाः पुनर्नागलोक- मागताः पनगाधिपतयो नर्मदां च पुरुकुत्सानयनाय चोदयामासुः ।। सा चैनं रसातलं नीतवती।।

१०] [ श्रीविष्णुपुराण . अब मान्धाता की सन्तति का वर्णन किया जाता है ॥१॥ मान्धाता के पुत्र अम्बरीष के जो युवनाश्व नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई, उससे हारीत नामक पुत्र हुमा, जिससे प्रागिरम हारोतगरण उत्पन्न हुए ॥२-३॥ पूर्व- काल की बात है-पाताल मे मौनेय नाम के छ: करोड गन्धर्व रहते थे, उन्होने सभी नागकुनो के प्रमुख-प्रमुख रत्नों और अधिकारी का अपहरण कर लिया ॥४॥ जब गन्धों के पराक्रम से तिरस्कृत हुए नन नागराजो द्वारा स्तुति की गई, तब उसे मुनते हुए जिनके पद्म के समान विकलिन नेत्र खुल गये, ऐसे उन निद्रा से जगे हुए जलशायी सवदेवेश्वर प्रभु को प्रणाम करके उन नागो ने निवे. दन किया-हे भगवन् ! इन गन्धवों से जो भय उत्पन्न हो गया है, उसकी शान्ति किस प्रकार हो सकेगी ? ॥१॥ इस पर आदि-अन्त-शून्य भगवान् श्री पुरुषोत्तमदेव बोले-हे नागगण ! युवनाश्व-पुत्र राजा मान्धाता के पुरुकुत्स नामक पुत्र के शरीर में प्रविष्ट होकर मैं उन सभी दुष्ट गन्धवों को नष्ट कर डालूगा ॥६॥ यह सुन कर सब नागगरण उन जलशायी भगवान श्रीहरि को प्रणाम करते हुए नागलोक मे लौट और पुरकुत्स को लाने के लिए उन्होने अपनी बहिन नर्मदा को प्रेरित किया जो पुरुकुत्स को रसातल में लिवा लाई ।।७-८॥ रसातलगतश्चासौ भगवत्तेजसाप्यायितात्मवीर्यस्सकलगन्धर्वा- निजघान ।। पुनश्च स्वपुरमाजगाम ।१०) सकलपन्नगाधिपतयश्च नर्म: दाय वरं ददुः यस्तेऽनुस्मरणसमवेतं नामग्रहणं करिष्यति न तस्य सर्प- विपभयं भविष्यतीति ।११। अत्र च श्लोकः ।१२। नर्मदाय नमः प्रात- नर्मदायै नमो निशि । नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मा विपसर्पतः ।१३। इत्युच्चार्यानिशमन्धकारप्रवेशे वा सर्न दश्यते न चापि कृतानु- स्मरणभुजो विपमपि भुक्तमुपघाताय भवति ।१४। पुरुकुत्साय सन्तति- विच्छेदो न भविष्यतीत्युरगपतयो वरं ददुः ॥१५॥ भगवान् विष्णु के तेज से प्रबद्ध हुए उस पुरुकुत्स ने रसातल में पहुंच कर सभी गन्धों का वध पर डाला और तब वह अपने नगर में लौट माया 18-१०॥ उस समय सभी नागो ने नर्मदा को यह वर दिया कि तेरे स्मरण 1

चतुर्थ अंश-अ०३]
[११
पूर्वक जो कोई तेरे नाम का उच्चारण करेगा, उसे सर्प-विप का भय नहीं रहेगा
॥११॥ इस विषय मे एक श्लोक है नर्मदा को प्रात.काल नमस्कार, रात्रिकाल
में भी नमस्कार । हे नर्मदे ! तुम्हे बारम्बार नमस्कार है, नुम विष मोर
सपं से मेरी रक्षा करो ॥१२-१३।। इसके उच्चारण पूर्वक दिन या राभि मे,
किसी भी समय कही अंधेरे मे जाने पर भी सर्प नहीं काटता तथा इसका
स्मरण करके भोजन करने से, भोजन में मिला हुआ विप भी मारक नहीं होता
॥१४॥ उस समय पुरुकुत्स ने भी नागो को कर दिया कि तुम्हारी सन्तनि अन्त
को कभी भी प्राप्त नहीं होगी ॥१५॥
पुरुकुत्सो नर्मदाया त्रसद्दस्युमजीजनत् ॥१६॥ त्रसद्दस्युतस्सम्भू-
तोऽनरण्यः यं रावणो दिग्विजये जपान।१७। अनरण्यस्य पृपदश्वः पृपद-
श्वस्य हर्यश्वः पुत्रोऽभवत् ।१८। तस्य च हस्तः पुत्रोऽभवत् ।१९। ततश्च
सुमनास्तस्यापि त्रिधन्वा विधन्वनस्त्रय्यारुरिणः ।२०। त्रय्यारुणेस्सत्यवतः
योऽसौ निशकुसज्ञामवाप ।२१। स चाण्डालतामुपगतश्च ।२२। द्वादश-
वापिक्यामनावृष्ट्या विश्वामियकलवापत्यपोपरणार्थ चाण्डालप्रति-
ग्रहपरिहरणाय च जाह्नवीतीरन्यग्रोधे मृगमासमनुदिनं वयन्धा२३। स तु
परितुप्टेन विश्वामित्रेण सशरीरस्स्वर्गमारोपितः।२४॥
पुरकुरस ने अपनी उस भार्या नर्मदा से प्रसद्दस्यु नामक पुन उत्पन्न किया
॥१६॥ सहस्यु का पुत्र पनरण्य हुप्रा, जिसका दिग्विजय के समय रावण ने
पप किया था ॥१७॥ उस अनरण्य का पुत्र पृपदश्व हुप्रा पृषदश्व का हमेश्व,
हर्यश्व का हस्त, हस्त का मुमना, सुमना का निधन्या भोर नियन्या या पुन
अम्पारुणि हमा ॥१८-२०॥ प्रग्यारुणि का पुत्र सत्यव्रत हुमा, वही फिर निराकु
नाम से प्रसिद्ध हुमा ॥२१॥ वह विश पाण्डाल हो गया ॥२२॥ एक समय
यारह वर्ष तक या नही हुई। उस समय यह विश्वामित्रजी के सभी बालको के
पोपए के निमित सपा प्रपने चाडालरय को दूर करने के लिए गमातट स्थित यट
गृक्ष पर मृग या मांस यांप देता पा॥२३॥ उसके इस कार्य से प्रसार ए मपि
विश्वामित्र ने उसे देह सहित स्वर्ग में भेज दिया ॥२४॥

१२] [ श्रीविष्णुपुराण त्रिशकोहरिश्चन्द्रस्तस्माच्च रोहिताश्वस्ततश्च हरितो हरितस्य चञ्चुश्चञ्चोविजयवसुदेवौ रुरुको विजया रुकस्य वृक. १२५॥ ततो वृकस्य वाहुर्योऽसौ हैहयतालजङ्घादिभि पराजितोऽन्तर्वल्या महिन्या सह वन प्रविवेश ।२६। तस्याश्च सपन्या गर्भस्तम्भनाय रो दत्त १२७॥ तैनास्या गर्भस्सप्तवर्षारिण जठर एव तस्थौ ।२८। स च बाहुवृद्धभावा- दौर्वाश्रमसमीपे ममार १२९ सा तस्य भार्या चिता कृत्वा तमारोप्या- नुमरणकृतनिश्चयाभूव १३०१ अर्थतामतीतानागतवर्तमानकालत्रयवेदी भगवानौर्वस्स्वाश्रमात्रिर्गत्याब्रवीत् ।३१। उसी भिशकु से हरिश्चन्द्र हुए । हरिश्चन्द्र से रोहिताश्व और रोहिताश्व से हरित हुा । हरित से चञ्चु, चञ्चु से विजय और वासुदेव तथा विजय से रुरुक और रुक वृक उत्पन्न हुमा ॥२५॥ वृत का बाहु हुमा, जिसे हत्य तथा तालजधादि क्षत्रियो ने युद्ध मे हरा दिया, इस कारण वह अपनी गर्भवती राजमहिपी को साथ लेकर वन मे चला गया ॥२६॥ परन्तु राजमहिपी की सौत ने उसके गर्भ का स्तम्भन करने के विचार से उसे विष दे दिया ॥२७॥ उस विप के प्रभाव से उसका गर्म सात वर्ष तक गर्भाशय मे ही रुका रहा ।२८१ अन्त में वृद्धावस्था को प्राप्त हुए दाह की और्व ऋपि के पाश्रम के निकटवर्ती स्थान में मृत्यु हो गई ॥२६॥ तब उसकी महिषी ने चिता बनाकर उसमें अपने पति का शव रखा और उसके साथ सती हो जाना चाहा ॥३०॥ तभी भूत, भविष्यद, वर्तमान के ज्ञाता महपि पौवं ने अपने भाश्रम से निकल कर राजमहिपी से कहा ॥३१॥ अलमलमनेनासन्द्राहेणाखिलभूमण्डलपतिरतिवीर्यपराक्रमो नैकयज्ञकृदरातिपक्षक्षयकर्ता तवोदरे चक्रवर्ती तिष्ठति ।३२ नवमति- साहसाध्यवसायिनी भवती भवत्वित्युक्ता सा तस्मादनुमरगनिर्वन्धा- द्विरराम ॥३३॥ तेनैव च भगवता स्वाश्रममानीता ॥३४॥ तत्र कतिपय- दिनाभ्यन्तरे च सहैव तेन गरेणातितेजस्वी बालको जज्ञे ।३५१ तस्योर्वो जातकर्मादिप्रिया निष्पाद्य सगर इति नाम चकार ३६३ कृतोपनयन चनसौर्यो वेदशास्त्राण्यस्न चाग्नेयं भार्गवाख्यमध्यापयामासा३७। उत्पन्न- चतुर्थ अंश-अ०३ ] [ १३ बुद्धिश्च मातरमब्रवीत् ।३८ अम्ब कथमत्र वयं क्व वा तातोऽस्माकमि- त्येवमादिपृच्छन्तं माता सर्वमेवावोचत् ॥३६॥ ततश्च पितृराज्यापहरणा- दमर्पितो हैहयतालजवादिवधाय प्रतिज्ञामकरोत् ।४०) प्रायशश्च हैह- यतालजवाअधान १४११ हे साध्वी ! यह दुराग्रह त्याग देने योग्य है । क्योकि तेरे उदर में प्रत्यंत बलवीर्ययुक्त, अनेक यज्ञों का मनुष्टाता, सम्पूर्ण पृथिवी का स्वामी तथा सभी समो को मारने वाला चक्रवर्ती सम्राट स्थित है ॥३२॥ इसलिए, तू ऐसे दुस्. साहस का प्रयत्न न कर । मुनि के वचन सुन कर उसने सती होने के प्राग्रह का परित्याग किया ॥३३।। तब महर्षि पौवं उसे अपने माश्रम पर लिवा ले गये ॥३४॥ कुछ कालोपरान्त उस रानी के उदर से 'गर' (विप) के सहित एक तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुमा ॥३५॥ तब महर्षि गौवं ने उसका जातकर्म संस्का- रादि कर उसका 'सगर' नाम रखा मोर उपनयनादि संस्कार के पश्चात् उसे सम्पूर्ण वेद, शास्त्र एवं भार्गव नामक प्राानेयास्त्रो की शिक्षा प्रदान की ||३६. 11३७।। जब उसकी बुद्धि विकसित हो गई तब वह बालक अपनी माता से बोला ॥३८॥ हे माता ! हम इस सप तपोवन में क्यों रह रहे हैं ? हमारे पिता कहां हैं ? इमी प्रकार के अन्य प्रश्न भी उसने पूछे तब उसकी माता ने उसे सब बातें बता दी ॥३६॥ माता के मुख से राज्यापहरण की बात सुन कर उस बालक के हहय पोर तालबद्धादि क्षत्रियो का संहार करने की प्रनिशा ली मोर कालान्तर में उसने उन सभी राजापो को मार डाला ।।४.४१॥ शकयवनकाम्बोजपारदपलवाः हन्यमामास्तत्कुलगुरु वशिष्ठ शरणं जग्मुः १४२ अयनान्यसिष्टो जीवन्मृतकान् कृत्वा सगरमाह ॥४३॥ वत्सालमेभिर्जीवन्मृतकरनुसृतः ॥४४॥ एते च मयंव त्वत्प्रतिज्ञापरिपाल- नाय निजधर्मद्विजराङ्गपरित्यागं कारिताः ।४५॥ तथेति तद्गुरुवचनम- भिमन्य तेषां वेपान्यत्वमकारपत् ॥४६॥ यवनान्मुण्डितगिरसोई मुण्डि- ताम्छाकान प्रलम्बकेशान् पारदान् पल्लवान श्मश्रुधरान् निस्स्वाध्या- पवपट्कारानेतानन्यांन क्षत्रियांवकार ॥४७॥ एते चात्मधर्मपरित्यागा.

१४] : [श्रीविष्णुपुराण ब्राह्मणैः परित्यक्ता म्लेंच्छतां ययु १४८॥ सगरोऽपि स्वमधिष्ठानमा- गम्यास्खलितचकस्सप्तद्वीपवतोमिमामुर्वी प्रशशास ।४९। इसके अनन्तर उसने शम, यवन, काम्बोज, पारद और पलवगण को भी हताहत किया, जिससे वह सगर के कुलगुरु वसिष्ठजी की शरण को प्राप्त हुए ॥४९॥ वसिष्ठजी ने उन्हे जीवित रह कर मृतक समान करके राजा सगर से कहा ॥४३॥ हे वत्म ! इन जीवामृत मनुष्यों को मारने से क्या लाभ है ? ॥४॥ मैंने तेरी प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए ही इन्हे स्वधर्म और द्विजातियो के संसर्ग से बहिष्कृत कर दिया है ॥४५॥ राजा सगर ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य कर उनकी वेश-भूषा में परिवर्तन करा दिया ॥४६॥ उमने यवनो के शीश मुड़वाये, शको के माधे सिर को मुडवाया, पारदो के लम्बे बाल वाले बनाया,पलवो के मूछ-दाढी रषवाई तथा इन सब को और अन्यान्य वैरियो को भी स्वाध्याय तथा वषट्कार मादि से वंचित कर दिया ॥४७॥ स्वधर्म हीन होने के कारण ब्राह्मणो ने भी इनका परित्याग कर दिया, इसलिए यह सब म्लेच्छ बन गये ॥४८॥ फिर महाराज सगर अपनी राजधानी में आ गये और सेना से युक्त होकर सात द्वीपो वाली इस सम्पूर्ण पृथिवी पर राज्य करने सगे ।।४६॥ चौथा अध्याय काश्यपदुहिता सुमतिर्विदर्भराजतनया केशिनी च भायें साग- रस्थास्ताम् ॥१ताभ्या चापत्यार्थमौवं. परमेण समाधिनाराधितो वर- मदात् ।। एका वशकरमेकं पुत्रमपरा पष्टि पुनसहस्राणा जनयिष्य- तोति यस्था यदभिमत तदिच्छया गृह्यतामित्युक्त केशिन्येकं वरयामास १३. सुमति. पुनसहस्राणि पष्टिं वा ।।। तथेत्युक्त अल्परहोभिः केशिनी पुत्रमेकमसमासनामान वंशकरमसूत ।। काश्यपतनयायास्तु चतुर्थ अश-अ० ४] सुमत्याः पष्टि पुत्रसहस्राण्यभवन् 1६1 तस्मादसमञ्जसादंशुमान्नाम कुमारो जज्ञे ७ स त्वसमञ्जसो बालो वाल्यादेवासद्वृत्तोऽभूत् ।। पिता चास्याचिन्तयदयमतीतवाल्यः सुबुद्धिमान् भविष्यतीति ।। अथ तत्रापि च वयस्यतोते असच्चरितमेन पिता तत्याज ११० तान्यपि पष्टिः पुत्रसहस्त्रनाण्यसमञ्जसचरितमेवानुचक्र : ११ थी पराशरजी ने कहा-काश्यपपुत्री सुमति और विदर्मराज की पुत्री केशिनी यह दोनो राजा सगर की भार्या हुई ॥१॥ उनके द्वारा सन्तानोत्पत्ति की कामना के लिए माधारित होकर भगवान भोवं ने यह वर प्रदान किया ॥२॥ तुम मे से एक से वश-वृद्धि करने वाला एक पुत्र उत्पन्न होगा और दूसरो से साठ हजार पुत्रो को उत्पत्ति होगी । इनमे से दो वर जिस अच्छा लगे, उसी वर को वह मांग ले । ऋषि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर केशिनी ने एक पुत्र मौर मुमति ने साठ हजार पुत्रो का वर मांगा ॥३-४॥ महर्षि के 'ऐसा ही हो' कहने पर केशिनी ने वश की वृद्धि वाले असमजस नामक एक पुत्र को उत्पन्न किया और सुमति ने साठ हजार पुत्रो को जन्म दिया ।।५.६।। के अंशुमान नामक एक पुत्र हुआ ॥७॥ वह असमञ्जस अपने बाल्यकाल से ही दुराचरण वाला हुमा ।।८॥ पिता ने समझा नि जर इसकी बाल्यवस्था व्यतीत हो जायगी, तब यह सुघर जायया ॥६॥ परन्तु उस अवस्था के निकलने पर भी उसके पाचरण में परिवर्तन न देख कर पिता ने उसका त्याग कर दिया ।।१०॥ तथा सगर के साठ हजार पुत्र भी असमजस के हो अनु. गामी हुए ॥११॥ ततश्चासमञ्जसचरितानुकारिभिस्सागरैरपध्यस्तयज्ञादिसन्मार्गे जगति देवास्सक्लविद्यामयमसस्पृष्टमशेषदोपैभंगवतः पुरुषोत्तमस्याश- भूत कपिल प्रणम्य तदर्थमूचुः ।१२भगवन्नेभिस्मगरतनयरसमञ्जस- चरितमनुगम्यते १३३ कयमेभिरसवृत्तमनुमद्भिर्जगद्भविष्यतीति ११४। अत्यातजगत्परित्राणाय च भगवतोऽत्र शरीरग्रहणमित्याक भगवानाहाकैरेव दिनविनड क्षयन्तीति ।१५॥ मसमजस

ज्ञाता
[ श्रीविष्णुपुराण
अत्रान्तरे च सगरो हयमेधमारभत ।१६। तस्य च पुत्र रधिष्ठित-
मस्याश्व कोऽप्यपहृत्य भुवो विल प्रविवेश ।१७। ततस्तत्तनयाश्वाश्व-
खुरगति निबन्धेनावनीमेकैको योजन चख्नुः ।१८। पाताले चाश्व परि-
भ्रमन्त तमवनीपतितनयास्ते ददृशुः ।१६। नातिदूरेऽवस्थितं च भगव-
न्तमपघने शरत्कालेऽर्कमिव तेजोभिरनवरतमूर्ध्वमधश्चाशेपदिशश्चोद्भा-
सयमान हयहर्तारं कपिलर्पिमपश्यन् ॥२०॥
उन असमजस के चरित्र का अनुगमन करने वाले साठ हजार सगर पुत्रों
ने विश्व से यज्ञादि सन्मार्ग का उच्छेद किया, तब सकल विद्यानों
भगवान् के अंशभूत श्री कपिलजी को देवतामो ने प्रणाम कर उन सगर-पुत्रो
के विषय मे निवेदन किया ।।१२।। हे भगवन् ! सगर के यह सभी पुत्र मस-
मंजस के चरित्र का अनुकरण करने वाले हुए हैं ॥१३।। इन सब के सन्मार्ग के
विपरीत चलने से यह जगत किस दशा को प्राप्त होगा? ॥१४॥ हे भगवन् !
मापने दीनो की रक्षा करने के लिये ही यह देह धारण किया है। यह बात
सुनकर कपिलजी बोले-~इन सब का कुछ ही दिनो मे नाश होना है ॥१५॥
इसी अवसर पर महाराज सगर ने अश्वमेघ का अनुष्ठान पारम्भ किया ॥१६॥
तब उसके पुत्रों द्वारा सुरक्षित प्रश्व का अपहरण करके कोई पृथिवी मे प्रविष्ट
हो गया ॥१७॥ तब उस प्रश्व के खुर-चिह्नो का अनुसरण करते हुए सगर-
पुत्रो में से प्रत्येक ने चार-चार योजन भूमि खोद डाली ॥१८॥ और पाताल
मे पहुंचकर उन्होने अश्व को विचरण करते हुए देखा ॥१६॥ उमके निकट ही
मेष पावरण से रहित पारदकालीन सूर्य के समान अपने तेज से सब दिशात्रों
को प्रकाशमय करने वाले महर्षि कपिल अश्वहर्ता के रूप में बैठे हुए
देखा ॥२०॥
तनश्योद्यतायुधा दुरात्मानोऽयमस्मदपकारी यज्ञविघ्नकारी
हन्यतां हयहर्ता हन्यतामित्यवोचनभ्यधावंश्च ॥२१॥ ततस्तेनापि भग-
बता किश्चिदीपत्परिवत्तितलोचनेनावलोकितास्स्वशरीरसमुत्थेनाग्निना
दह्यमाना विनेशुः ॥२२॥

चतुर्थ अश-अ० ४] [ १७ सगरोऽप्यवगम्याश्यानुसारितत्पुनवलमशेपं परमपिणा कपिलेन तेजसा दग्ध ततोऽशुमन्तमसमञ्जसपुनमश्वानयनाय युयोजा२३।सतु सग- रतनयसातमार्गेण कपिलमुपगम्य भक्तिनम्रस्तदा तुष्टाव ।२४। अयनं भगवानाह ।२५। गच्दैन पितामहायाश्व प्रापय वरं वृणीष्व च पुत्रक पौयश्च ते स्वर्गाद्गङ्गा भुवमानेष्यत इति ।२६॥ अथाशुमान पि स्वर्या- ताना ब्रह्मदण्डहतानामस्मत्पितॄणामस्वर्गयोग्याना स्वर्गप्राप्तिकर वरम- स्माक प्रयच्छेति प्रत्याह ।२७। उन्हे इस प्रकार देख कर ये सब दुरात्मा सगरपुत्र माने शास्त्रास्त्रों को सम्भाल कर 'यही हमारा पपवार करने वाला और यज्ञ मे बाधा डानने वाला है, इस प्रश्वचोर को मार दो, चप कर डालो' रहते हुए कपिलजी की भोर दौड पडे ॥२१॥ तब भगवान् कपिल ने अपने परिवर्तित नेत्रों से देसा, जिससे ये राय पाने ही देह से प्रकट होते हुए अग्नि में भस्म हो गये ॥२२॥ जब राजा सगर को यह ज्ञात हुमा हिमश्व के पाछे रयाक रूप से जाने वाले उनके सभी पुत्र भस्म हो गए हैं, तो उन्होंने प्रसमजस ये पुत्र म गुमान दो पश्य प्राप्ति पायं में नियुक्त रिया ॥२३।। तब वह उन राजपुत्रों द्वारा सोदै हुयै मा से पपिलदेव के पास गया और उसने पन्त भक्तिभाय रो नग्न होरर उनको प्रसन्न रिया ॥२४ । फिर प्रसन्न हुए उन पपितगी ने पशुमान से कहा-हे या । इस पश्व यो लेजार पो दादा को मोर पोर जो पू पाहे यही मुभम माग ते । तेरा पौत्र गगाजी यो स्यगं से पृपियो पर लाने में गमय होगा ॥२५-२६॥ इस पर पगुमान ने पहा- मेरे यह स्पर्ग पो न प्राप्त हुए - यण प्रसादएड से भस्म हुए हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राति पराो पासा पर प्रदान बीजिए ॥२७

१८ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
प्रतित सद्यश्शरीरिण स्वर्ग नयतीत्युक्त प्रणम्य भगवतेऽश्वमादाय
पितामहयज्ञमाजगाम ।३१। सगरोऽप्पश्वमासाद्य त यज्ञ समापयामास
।३। सागर चात्मजप्रीत्या पुनत्वे कल्पितवान् ॥३३॥ तस्याशुमतो
दिलीप पुत्रोऽभवत् ॥३४॥ दिलोपस्य भगीरथ. योऽसौ गङ्गा स्वर्गादिहा-
नीय भागीरथीसज्ञा चकार ।३५॥
अशुपान की बात सुनकर भगवान् कपिलजी बोले-यह मैंने पहिले ही
कहा है कि तेरा पुत्र गगाजी को स्वर्ग मे उतारेगा ॥२८॥ और जैसे ही उनके
जल का स्पर्श उनकी अस्थियों से होगा, वैसे ही यह सब स्वर्ग को प्राप्त होगे
॥२६॥ भगवान् विष्णु के पादागुष्ठ से मिर्गत हुए उम जन का यह माहात्म्य है
कि वह पेवत अभीष्टमय स्नानादि कार्यों म ही प्रयुक्त नहीं होता, किन्तु बिना
रिसी कामना के ही मृतक की हड्डी, चर्म, स्नायु या केशादि का उससे स्पर्श
होने या जिसमे उसके किसी अङ्ग के गिर जाने भी उस प्राणी को तत्काल
स्वर्ग मिलता है । भगवान् कपिल का वचन सुन कर मशुमान ने उन्हे प्रणाम
दिया और अश्व वो साथ लेकर अपने दादा को यज्ञशाला में जाकर उपस्थित
हुमा ॥३०.३१।। तब राजा सगर ने उस प्रश्व को प्राप्त कर अपने यज्ञ को
सम्पूर्ण रिया और अपने पुयो के द्वारा सोदे हुए उत्त सागर को ही उन्होंने अपना
पुत्र माना ॥३२-३३॥ उस प शुमान ये दिलीप हुमा । दिलीप के भगीरय हुमा,
जिसके प्रपल से गङ्गाको स्वर्ग पर उतर पाई भोर उनका नाम उसके नाम
पर ही भागीरय हुमा ॥३४-३५||
भगीरथात्सुहोनस्सुहोगाच्छ तः तस्यापि नाभागः ततोऽम्बरीपः
तत्पुत्रस्सिन्धुद्वीप सिन्धुद्वीपादयुतायुः ॥३६॥ तत्पुत्रश्च तुपर्ण. योऽसौ
ननमहायोऽशयनोऽभूत् ॥३७। प्रतपणपुरस्सर्वकाम ॥३८॥ ततनय.
म्गुहाग.३६ सुदामात्सोदामो मित्रगहनामा 1001 म चाटव्या मृग-
पायाँ पर्यटन व्याघ्रद्वयमपश्य । ४११ ताभ्या तद्वनमपमृग मृत मरवक
तयोगिन जपान १४२० म्रियमाणश्चामायतिभीपणानिरतिागल-
पदनो गक्षमोऽभूत् ।४३ मिनोयोऽपि प्रतिक्रिया ते परिप्यामीत्युपत्रा-
तर्धान जगाम ॥४॥

. 'चतुर्थ अंश-अ०४ ] [ १६ भगीरथ का सुहोन हुमा । सुहोय से थुति, ध्रुति से नाभाग, नाभाग से अम्बरीप, अम्बरीप से सिंधुदीप, सिंधुदीप से अयुतायु और अयुतायु से ऋतपर्ण हुआ, जो द्यूत क्रीडा का ज्ञाता और राजा नल का सहायक था ॥३६.३७।। ऋतुपर्ण का पुत्र सर्वकाम हुप्रा । सर्वकाम का सुदास और सुदास का सौदास मिनसह हुा ।।३८-४०।। उसने एक मृगया के लिए वन में विचरण करते-करते दो व्याघ्रो को देसा ॥४१॥ उनके सम्पूर्ण वन हीन को मृगहीन हुआ समझ कर उनमें से एक को उसने मार दिया ॥४२॥ मरणकाल मे अत्यन्त घोर रूप और विकराल मुख वाला राक्षस बन गया ॥४३॥ और दूसरा जो मरने से बच गया वह 'मैं इसका प्रतिशोध लूगा' कहना हुमा तत्काल अन्तर्धान हो गया ॥४४॥ कालेन गच्छता सौदासो यज्ञमयजत् ।४५॥ परिनिष्ठितयज्ञे प्राचार्य वसिष्ठे निष्क्रान्ते तद्रक्षो वसिष्ठरूपमास्थाय यज्ञावसाने मम नरमांसभोजन देयमिति तत्सस्क्रियतां क्षणादागमिष्यामीत्युक्त्वा निष्क्रान्तः ।४६। भूयश्च सूदवेपं कृत्वा राजाज्ञया मानुपं मांसं सस्कृत्य राज्ञे न्यवेदयत् ।४७। असावपि हिरण्यपात्रे मासमादाय वसिष्ठागमन- प्रतीक्षकोऽभवत् ॥४८॥ मागताय वसिष्ठाय निवेदितवान् ।४६। स चाप्य- चिन्तयदहो अस्य राज्ञो दौश्शील्य येनैतन्मांसमस्माकं प्रयच्छति किमेत- द्रव्यजातमिति ध्यानपरोऽभवत् ।५०। अपश्यञ्च तन्मासं मानुपम् ॥५१॥ अतः क्रोधकलुपीकृतचेता राजनि शापमुत्ससर्ज ॥५२॥ यस्मादभोज्यमेत- दस्मद्विधाना तपस्विनामवगच्छन्नपि भवान्मह्य ददाति तस्मात्तवैवात्र लोलुपता भविष्यतीति ।५३। पुछ समय व्यतीत होने पर सौदास ने एक यज्ञ का अनुशन किया ॥४॥जब यज्ञ के समाप्त होन पर प्राचार्य वसिष्टजी वहाँ मे चले गए तव वह राक्षम वसिष्टजो वा रूप धारण कर वहाँ भाकर कहने लगा-यज्ञ को समाप्ति पर मुझे मनुष्य-मास युक्त भोजन पराया जाना चाहिए, इसलिए तुम वैसा भोजन बनवामो, मैं क्षण भर में लौट कर पाता हूँ। यह कहता हुप्रा वह वहाँ से चला गया ।।४। फिर उसने रसोइये का स पारण कर राजाला से मनुष्य २० ] [ श्रीविष्णुपुराण मांसमय भोजन बना कर राजा के समक्ष लाया !!४७॥ राजा ने उसे स्वर्गपात्र मे रखा और वसिष्ठजी के आने पर उसने उन्हे वह नरमांस निवेदन किया ॥४८-४६। तब वसिष्ठजी ने मन में विचार किया कि यह राजा कितना कुटिल है जो जानते हुए भी मुझे यह मास दे रहा है। फिर यह जानने के लिये कि यह किस जीव का मास है, उन्होने समाधि का आश्रय लिया और ध्यानावस्था मे उन्होंने जान लिया कि मनुष्य का मांस है ॥५०-५१॥ तब तो धसिष्टजी अत्यन्त क्रोधित और क्षुब्ध मन हुए और उन्होंने तत्काल ही राजा को शाप दे डाला कि तूने इस अत्यन्त अभक्ष्य नर मांस को मेरे जैसे तपस्वी को जान-बूझ कर पाहार हेतु दिया है, इसलिये तेरी लोलुपता नरमास में ही होगी ॥५३॥ अनन्तरं च तेनापि भगवतैवाभिहितोऽस्मीत्युक्त किं किं मया- भिहितमिति मुनिः पुनरपि समाधौ तस्थौ ।५४। समाधिविज्ञानावगता- र्थश्चानुग्रहं तस्मै चकार नात्यन्तिकमेतद्वादशाब्द तव भोजनं भविष्य- तीति ।५५॥ असावपि प्रतिगृह्योदकाञ्जलि मुनिशापप्रदानायोद्यतो भगव- नयमस्मद्गुरुर्हिस्येन कुलदेवताभूतमाचार्य शप्तुमिति मदयन्त्या स्व- पल्या प्रसादितस्सस्याम्बुदरक्षणार्थंतच्छापाम्बु नोर्व्या न चाकाशे चिक्षेप किं तु तेनैव स्वपदी सिपेच ॥५६॥ तेन च क्रोधाश्रितेनाम्बुना दग्धच्छायौ तत्पादौ कल्माषतामुपगतौ ततस्स कल्माषपादसंज्ञामवाप १५७। वसिष्ठाशापाच्च पप्ठे षष्ठे काले राक्षसस्वभावमेत्याटव्यां पर्यटन्न- नेकशो मानुपानभक्षयत् ।।८। फिर जब राजा ने यह कहा कि 'भगवन आपकी ही ऐसी माज्ञा थी' तो वसिष्ठजी ने कहा कि 'अरे क्या कहता है, मैंने ऐसा कहा था? और वह पुन: ध्यानावस्थित हुए ॥५४॥ तब उस ध्यानावस्था मे उन्हे वास्तविकता का ज्ञान हुग्रा और वह राजा पर अनुग्रह करते हुए बोले-तू अधिक समय के लिये नरमासभोजी नही होगा, नेवल बारह वर्ष हो ऐसी अवस्था रहेगी ।।५५।। जब वसिष्ठजी का ऐसा वचन सुना तो राजा सौदास ने अपनी प्रजलि मे जल ग्रहण दिया और मुनिवर वसिष्ठ को शाप देने लगा, परन्तु उसकी पत्ती मदयन्ती ने उसे यह कह कर शान्त किया कि हे स्वामिन् ! यह हमारे कुल गुरु हैं, इसलिये, चतुर्य अंश-अ० ४ ] [ २१ इन्हें शाप नहीं देना चाहिये । तब शाप के लिये ग्रहण किये हुये उस जल को राजा ने प्रश्न और मेघ की रक्षा के लिये पृथिवी या प्राकाश में नहीं फेंका, किन्तु उसे अपने ही पाँवों पर डाल लिया ॥५६॥ उस क्रोधमय जल के पड़ने से उसके पाव दग्य होकर चितकबरे वणं के हो गये। तभी मे वह कल्माषपाद पहा जाने लगा ॥५७। फिर वसिष्ठजो के शाप के प्रभाव वह राजा तीसरे दिन के अन्तिम भाग में राक्षस स्वभाव होकर वन में विचरण करने और मनुष्यों को हाने में प्रवृत्त हुप्रा ||५|| एकदा तु कश्चिन्मुनिमृतुकाले भार्यासङ्गत ददर्श ५६। तयोश्च तमतिभोपण राक्षसस्वरूपमवलोक्य त्रासाद्दम्पत्योः प्रधावितयोर्ब्रह्मरणं जग्राह ।६०। ततस्सा ब्राह्मणी बहुशस्तमभियाचितवती ।६१॥ प्रसोदे- क्ष्वाकुकुल तिलकभूतस्त्वं महाराजो मिनराहो न राक्षसः ।६२नार्हसि स्त्रीधर्मसुखाभिगो मय्यकृतार्थायामस्मद्भर्तारं हन्तुमित्येव बहुप्रचारं तस्यां विलपन्त्यां व्याघ्रः पशुमिवारण्येऽभिमतं तं ग्राहगमभक्षयत् ।६३। ततश्रातिकोपसमन्विता ग्राह्मणी त राजानं शशाप 1६४। यस्मादेव गय्यतृतायां त्वयायं मत्पतिर्भक्षितः तस्मात्त्वमपि कामोपभोगप्रवृत्तो- ऽन्त प्राप्स्यसीति ।६५। शप्त्वा चैवं साग्नि प्रविवेग ।६६। एक दिन उस राक्षसत्व प्राप्त राजा ने एक मुनि पो तुमगन में अपनी परनी रो रमण मारते हुये देसा ॥५६॥ उस परयन्त भीपण रास रूप वाले राजाको देशकर मपसे भागते हुये उन दम्पति मे मे उमने मुनि को पकर लिया ॥६०॥ उस समय मुनिररली ने उगमे अनेक प्रकार अनुनय पिनप करते हुये महा-रामन् ! प्रगान होइये । माप रासप नहीं. इशा के गिलक रूप महारान मित्रमह है ॥६१:१२॥ पार मग मुल के गाता है, मुझ मतृप्ता के पनि की हत्या करना पापके सिरे समिरा नही है। इस प्रशर उम बाह्मणो द्वारा भनेक प्रसर से पिसाप लिये जाने पर भी वो प्यान अपने नियत पशु मोगा में परमाण रमेना है. मे ही उग मानणरो पार कर TAIT उग बामपनी ने अपना गोमूक रागोमा PETTE परे ! तूने मेरे ममापामे परे भी मेरे खामोश २४ ] [ श्रीविष्णुपुराण पाकर अपनी बुद्धि से तीनो लोको को पार किया और सत्यरूप भगवान् श्रीहरि सो प्राप्त कर लिया ||१.८२॥ खट्वाङ्गादीर्घबाहु. पुनोऽभवत् ।८३। ततो रघुरभवत् ।०४। तस्मादप्यज ८५! अजाद्दशरथ १८६॥ तस्यापि भगवानब्जनाभो जगतः स्थित्यर्थमात्माशेन रामलक्ष्मणभरतरानुघ्नरूपेण चतुर्द्धा पुनत्वमाया- सीत् ।८७ रामोऽपि वाल एव विश्वामित्रयागरक्षणाय गच्छस्ताटका जधान ।८यज्ञे च मारोचमिपुवाताहत समुद्र चिक्षेप ।६। सुवाहुप्र- मुखाश्च क्षयमनयत् ।। दर्शनमाणाहल्यामपापा चकार ।६१ जनक- गृहे च महेश्वर चापमनायासेन वभञ्ज ।।२। सीतामयोनिजा जनकराज- तनया वीर्यगुल्या लेभे ६३। सकलक्षत्रियक्षयकारिणमशेपहैहयकुलधू- मवेतुभूत च परशुराममपास्तवीर्यवलावलेप चकार ।६४! खट्वाग का पुत्र दीर्घबाह हुमा। दीर्घबाहु का रघु और रघु का पुत्र पज हुमा । मज के पुत्र दशरथ हुए, जिनके पुत्र रूप मे भगवान् पपनाम इस विश्व की रक्षा पे निमित्त अपने चार अन्गो से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न हमे ।।८३.८७॥ वाल्यकाल में ही श्री राम ने विश्वामित्रजी के यश की रक्षा परने में लिये जाते हुए मार्ग में ही साटवा नाम नी राक्षसी पा वध किया और यशाला मे पहपार प्रपने वाण रूपी वायु से मारीच पर पाघात कर उसी समुद्र में फैरा मोर सुबाहु मादि राक्षसों को मार डाला।।८८-६०। उनके दर्शन मरले से ही मुनि-परनी महल्या पाप से मुक्त हो गई। उन्होंने राजा जनक के यहां पहुंच पर बिना किसी श्रम पे हो शिवजी या पनुप तोड डाला पौर यस पुरपापं से मिलने वाली जनगुना प्रयोनिका गीता पो भार्या र म प्राप्त किया HERE पिर सप पत्रिों का सहार पर देने याले तपा हैहप पर रूपी पा! लिए पशि में समान श्री परसरामनी या यलपोयंयुक्त गयं सएशन रिया॥ पिठ्यपनायागणिराज्याभिलापो भ्रातृभार्यासमेतो वनं प्रवि- येगा विराधारपणादीन गवन्धयालिनी च निजघान ६६। यद्- [२७ .. चतुर्थ अंश-अ० ४ ] ध्वा चाम्भोनिधिमशेषराक्षसकुलक्षयं कृत्वा दशाननापहृतां भाया धादपहृतकलङ्कामप्यनलप्रवेशशुद्धामशेपदेवसङ्घः स्तूयमानशीला बलो कराजकन्यामयोध्यामानिन्ये ।६७। ततश्चाभिषेकमङ्गलं मैत्रेय वर्षशते. नापि वक्तु न शक्यते सङ्क्षेपेण श्रूयताम् ।। फिर पिता के वचन के मागे राज्य को तुच्छ मान कर वह अपने छोटे भाई लक्ष्मण और अपनी भार्या सीताजी को साथ लेकर यन मे गये ॥६५वहाँ उन्होने विराध, खर, दूपण प्रादि राक्षसो को भोर कबंध तथा बाली को मारा भोर समुद्र पर सेतु बन्धन कर सम्पूर्ण राक्षस कुल का संहार किया। फिर वह राक्षसराज रावण द्वारा हरण की गई और उसके मरने के कारण निष्क्लक होने पर भी अग्नि मे प्रवेश करके शुद्ध हुई तथा सभी देवतानो द्वारा प्रशसित आचरण वाली अपनी धर्मपत्नी जनकपुत्री सीताजी को अपसे साथ लेकर प्रयो- ध्या में आ गए 1९६-९७॥ हे मैत्रेयजी! उनके प्रयोध्या में लौट पाने पर राज्याभिषेक का जैसा महोत्सव हुआ, उसका वर्णन तो सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। फिर भी मैं उसे संक्षेप मे कहता हूं, श्रवण करो ॥८॥ लक्ष्मणभरतशत्रुघ्नविभीषणसुग्रीवागदजाम्बवद्धनुमत्प्रभृतिभि- स्समुत्फुल्लवदनश्छत्रचामरादियुतैः सेव्यमानो दाशरथिन्न ह्येन्द्राग्निय- मनिऋतिवरुणवायुकुबेरेशानप्रभृतिभिस्सर्वामरैर्वसिष्ठवामदेववाल्मीकि- मार्कण्डेयविश्वामित्रभरद्वाजागस्त्यप्रभृतिभिर्मुनिवरैः ऋग्यजुस्सामाथर्व- भिस्संस्तूयमानो नृत्यगीतवाद्याद्यखिललोकमङ्गलवाद्य वीणावेणुमृदङ्ग- भेरीपटहशङ्खकाहलगोमुखप्रभृतिभिस्सुनादैस्समस्तभूभृतां मध्ये सकल- लोकरक्षार्थ यथोचितमभिषिक्तो दाशरथिः कोसलेन्द्रो रघुकुलतिलको जानकीप्रियो भ्रातृत्रयप्रियसिंहासनगत एकादशाब्दसहस्र राज्य- मकरोत् ।। श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या के राज्य सिंहासन पर विराजमान हुए। उस समय लक्ष्मण, भरत, शत्रघ्न, विभीषण, अंगद, जाम्बवन्त और हनुमान प्रादि छत्र- चमर आदि सेवा करने लगे । श्री ब्रह्माजी, इन्द्र, मग्नि, यम, निति, वरुण, वायु, कुवेर और ईशानादि सब देवता यथास्थान स्थित हुए। पसिष्ठ, वामदेव, २४ ] [ श्रीविष्णुपुराण विश्वामित्र, भरद्वाज और अगस्त्यादि मुनि श्रेष्ठ ऋग्वेद, प्रयर्ववेद के द्वारा स्तुति करने लगे (नृत्य, गीत, वाद्यादि र वीणा, वेणु, मृदग, भेरी, पदह, शख, कातल तथा के बाजे बजने लगे ) उस समय सभी गजानो की उप- यात म लोक की रक्षा के निमित्त विधि पूर्वक उनका राज्याभिषेक हुआ। इस प्रकार दशरथ नन्दन, कोसलेन्द्र, रघुकुलतिलक, जानकीनाथ, अपने तीनों भाइयो के परमप्रिय भगवान श्रीराम ने राज्यपद प्राप्त भर म्यारह हजार वर्षों तष यज्य किया MET भरतोऽति गन्धर्व विपयसाधनाय गच्छन् संग्रामे गन्धर्वकोटी- स्तिस्रो जधान ।१००। शत्रुघ्नेनाप्यमितवलपराक्रमो मधुपुत्रो लवणो नाम राक्षसो निहतो मयुरा च निवेशिता ।१०१। इत्ये द्यतिवलपरा- क्रमरतिदुष्टसंहारिणोऽशेषस्य जस्तो निष्पादित स्थितयो रामलक्ष्मण- भरतशत्रुघ्नाः पुनरपि दिवमारूढाः ।१०। येऽपि तेषु भगवदशेष्वनु- रागिरा. कोसलनगरजानपदास्तेऽपि तन्मनसस्तत्सालोक्यताम- वापु. ११०३३ फिर भरतजी गन्यवलोक को जीतने के लिये गये और यहां युद्ध में उन्होंने तीन वरोर गन्धवों या सहार किया तथा शत्रप्नजो ने अत्यन्त बलवान एव महान पराक्रमी मधुपुर लवणासुर को मार कर मयुरा नामक नगर बसाया ॥१००-१०१॥ इस प्रकार मरने महाद बल-पराक्रम से विकराल दुष्टों का राहार परने याने श्रीराम, लक्ष्मण, भरत पौर पर घ्न ने सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था मी और फिर देवलोर को चले गये ।।१०२॥ जो भयोध्या नियासी उन भगयाव देशो में प्रत्यन्त पासत थे, वे सब भी उनमे तल्लीन होने के कारण उन्ही के साथ सासोश्य को प्राप्त हुए ॥१०॥ प्रतिदुष्टसंहारिणो रामस्य पुशलयो दो पुत्री लक्ष्मणस्याङ्गद- पन्द्रयेतू तापुणती भरतस्य सुवाहगूरसेनौ शत्रुघ्नस्य ।१०४। कुशस्या- तिपिरतिपेरपि निराध: पुरोऽभून् १०५॥ निपस्याप्पनलस्तम्मादपि गमाः नभमः पुष्टरोयस्ततनय, क्षेमपन्या तस्य च देवानीपस्तस्याप्य- चतुर्थ अंश-०४] [२७ हीनकोऽहीनकस्यापि रुरुस्तस्य च पारियात्रकः पारियात्रकाद्देवलो देवलाद्वच्चलः तस्याप्युत्क: उत्काच वज्रनाभस्तस्माच्छवरणस्तस्माद्य- पिताश्वस्ततश्च विश्वसहो जज्ञे ।१०६। तस्माद्धिरण्यनाभ. यो महायोगी- श्वराज्जैमिने रिशप्याद्याज्ञवल्क्याद्योगमवाप ।१०७। हिरण्यनाभस्य पुत्रः पुष्यस्तस्माद्बुवसन्धिस्ततस्सुदर्शनस्तस्मादग्निवर्णस्ततश्शीघ्रगस्तस्मादपि मरुःपुत्रोऽभवता१०।योऽसौ योगमास्थायाद्यापि कलापग्राममाश्रित्य तिष्ठति ११०६। आगामियुगे सूर्यवशक्षत्रप्रवर्तयिता भविष्यति ।११०। तस्या- स्मजः प्रसुश्रुतस्यापि सुसन्धिस्ततश्चाप्यमर्पस्तस्य च सहस्वास्ततश्च विश्वभव. १११। तस्य बृहदलः योऽर्जुनतनयेनाभिमन्युना भारतयुद्ध क्षयमनीयत ११२। एते इक्ष्वाकुभूपाला. प्राधान्येन मयेरिताः। एतेपा चरित शृण्वन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।११३। दुष्टो का सहार करने वाले श्रीराम के दो पुत्र हुए, जिनका नाम कुश और लव था । लक्ष्मण के भी अगद और चन्द्रकेतु नामक दो पुत्र हुए। भरत के तक्ष और पुष्कल तथा शत्रुघ्न के सुबाहु और शूरसेन नामक दो-दो पुत्र ही हुए ॥१०४।। कुश का पुत्र प्रतिथि हुअा। अतिथि का निपध, निषध का मनल, का नम और नभ का पुण्डरीक हुमा। पुण्डरीक का पुत्र क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वा का देवानीक, उसका अहीनक उसका रुरु और कर का पारियात्रक हुआ । पारियात्रक का देवल, देवल का वच्चल, वच्चल का उत्क और उत्क का वज्रनाभ हुआ। वचनाभ का शंखण और उसका पुत्र युपिताश्व हुआ तथा युपिताश्व का पुत्र का नाप विश्वसह हुमा ॥१०५-१०६॥ उसी विश्वसह के पुत्र हिरण्यनाभने जैमिनि के शिष्य महायोगेश्वर याशल्क्यजी से योग्य विद्या ग्रहण की थी ॥१०७।। हिरण्यनाभ का पुत्र पुष्य हुआ, उसका पुत्र ध्र वसन्धि और उसका सुदर्शन हुआ । सुदर्शन का पुत्र अग्निवर्ण, अग्निवर्ण का शीघ्रग और शीघ्रग का पुत्र मरु हुमा । वह शीघ्रग-पुत्र म अब भी कलाप- ग्राम मे योगाम्यास-परायण रहता है ।।१०८-१०६माने पाले. युग. मे. यही सूर्यवंशी क्षत्रियो का प्रवर्तक होगा ॥११०॥ उस मरु का पुत्र प्रसुधृत हुआ। प्रसुश्रुत या सुसन्धि, सुसन्धि का प्रमर्प, पमपं का सहस्थान, सहस्वान् का मनल [ श्रीविष्णुपुराण विश्वभव और विश्वभव का वृहबल हुआ, जो महाभारत युद्ध मे अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु द्वारा मारा गया था ॥१११-११२॥ इस प्रकार यह इक्ष्वाकु वश के सब प्रमुख-प्रमुख राजामो का वर्णन मैंने तुमसे किया है। इनके चरित्र का प्रवण करने से सभी पापो से छुटकारा होता है ॥११३|| पाँचवाँ अध्याय इक्ष्वाकुतनयो योऽसौ निमि म ससस्त्र वत्सरं सत्रमारेभे ॥१॥ वसिष्ठं च होतार वरयामास ।२। तमाह वसिष्ठोऽहमिन्द्र ण पञ्चवर्षश- तयागार्थ प्रथम वृतः ।३। तदन्तरं प्रतिपाल्यतामागतस्तवापि ऋत्वि- गभविष्यामीत्युक्त स पृथिवीपतिर्न किञ्चिदुक्तवान् ।४। वसिष्ठोऽप्यनेन समन्वीप्सितमित्यमरपतेर्यागमकरोत् ५। सोऽपि तत्काल एवायंगीत- मादिभिर्यागमकरोत् ।। श्री पराशरजो ने कहा- इक्ष्वाकु के निमि नामक पुत्र ने सहम्न वर्षों में सम्पन्न होने वाले यज्ञानुदान का प्रारम्भ किया ॥१॥ उस यज्ञ मे उमने होता के रूप में वसिष्ठजी का वरण किया ॥२॥ तब वसिष्ठ ने उससे पहा कि इन्द्र ने पांच सौ वर्षों में सम्पन्न होने वाले यज्ञ के लिए मुझे पहिले से ही वरण किया हुधा है ।३। इसलिए तुम भी इतने समय और स्को,मैं वहाँ से लौटमर तुम्हारा ऋत्विक बनूगा । उनकी बात सुनकर राजा उन्हे कोई उत्तर न देकर चुप हो गया ॥४॥ यसिष्टगो ने सममा वि राजा ने उनकी बात मान ली है, इसलिये वह इन्द्र का या करने लगे। इधर राजा निमि ने गौतमादि मन्य होतामो को वरण बर उनके द्वारा अपना या प्रारम्भ करा दिया ॥६॥ समाप्ते चामरपतेर्याग त्वरया वसिष्ठो निमिया करिप्यामी. त्याजगाम १७ तत्वमर्तृत्वं च गौतमस्य दृष्टा स्वपते तस्मै राज्ञे मा प्रत्याख्यायंतदनेन गौतमाय कर्मान्तर समर्पित यस्मात्तस्मादय विदेहो R चतुर्थ अंश-अ०५] [ २६ भविष्यतीति शापं ददौ ।। प्रवुद्धश्वासाववनिपतिरपि प्राह । यस्मा- न्मामसम्भाष्याज्ञानत एव शयानस्य शापोत्सर्गमसौ दुष्टगुरुश्चकार तस्मा- त्तस्यापि देहः पतिष्यतीति शापं दत्त्वा देहमत्यजत् ।१०। उधर वसिष्ठजी सोच रहे थे कि मुझे निमि का यज्ञ कराना है, इसलिये इन्द्र का यज्ञ समाप्त होते ही वह शोधता पूर्वक वहां आ गये ॥७॥ उस यज्ञ मे अाने स्थान पर गौतम को कर्म करते हुऐ देखकर सोते हुए राजा निमि को शाप दिया कि इसने गौतम को होता नियुक्त करके मेरा तिरस्कार किया है,इस- लिये यह देह-रहित हो जायगा । जव राजा निमि सोकर उठा और उसे यह मालूम हुआ कि वसिष्ठ जी ने ऐसा शाप दिया है, तब उसने भी शाप दिया कि इस दुष्ट गुरु ने मुझमे सम्भापण किये बिना हो अज्ञानवश मुझ सोते हुये को शाप दिया है, इसलिए यह भी देह-रहित होगा। इस प्रकार शाप देकर राजा ने अपना देह त्याग दिया 16-१०॥ तच्छापाच मित्रावरुणयोस्तेजसि वसिष्ठस्य चेतः प्रविष्टम् ॥११॥ उर्वशोदर्शनादुद्भुतबीजप्रपातयोस्तयोस्राकाशाद्वसिष्ठो देहमपरं लेभे ॥१२॥ निमेरपि तच्छरीरमतिमनोहरगन्धतैला दिभिरुपसस्क्रियमाणं नव क्लेदादिक दोषमयाप सद्यो मृत इव तस्थौ ।१३। यज्ञसमाप्तौ भागग्रह- गाय देवानागतानृत्विज ऊचुर्यजमानाय वरो दीयतामिति ११४१ देवश्च छन्दितोऽसौ निमिराह ।१५। भगवन्तोऽखिलससारदु.खहन्तारः ।१६। नह्य तादृगन्यदु खमस्ति यच्छरीरात्मनोवियोगे भवति ।१७। तदहमि- च्छामि सकललोकलोचनेषु वस्तु न पुनश्शरीरग्रहण कर्तु मित्येवमुक्त - देवरसायशेपभूताना नेनेष्यवतारित १८ ततो भूतान्युन्मेषनिमे चक्र ।१६॥ राजा निमि के शाप मे वसिष्ठजी का प्राण मित्रावरुण के वीयं प्रविष्ट हुप्रा और जब उर्वशी को देखकर कामवश मित्रावरुण का वीर्य स्खलन होने से वसिष्ठ को उसी से पुनर्देह की प्रासि हो गई ५११-१२॥ राजा निमि का देह भी अत्यन्त मनोहर गन्ध और तेल प्रादि के द्वारा सरक्षित किया जाने से खराब नही हुप्रा और उसी समय मरे हुए के समान वना रहा ॥१३॥ जब यज्ञ समाप्त २ ३० ] [श्रीविष्णुपुराण हुआ, तब सब देवता अपना-अपना भाग लेने के लिए वहां उपस्थित हुए । उस समय प्रत्विकों ने उनसे कहा कि यजमान, को वर प्रदान करिये ॥१४॥ पह, सुन कर देवतायों ने राजा निमि के शरीर को,प्रेरित किया, तब उसने उनसे कहा ।।१५।। हे भगवन् ! आप सम्पूर्ण ससार-दु:ख के हरण करने वाले हैं ॥१६।। मैं समझता हूँ कि देह और प्रारमा का वियोग होने मे जो दुःख है, वैसा दुःख अन्य कोई भी नही है ।।१७। इसलिए अब मैं देह को पुनःग्रहण नही करना चाहता, सब प्राणियों के नेत्रो मे रहना चाहता हूँ। यह सुन कर देव- तामों ने राजा निमि को सब प्राणियों के नेत्रो में स्थित कर दिया ॥१८॥ उसी समय मे प्राणियों में उन्मेप-निमेप का प्रारम्भ हुमा ॥१६॥ अपुत्रस्य च भूभुजः शरीरमराजकभीरवो मुनयोऽरण्या ममन्युः १२०॥ तत्र च कुमारो जज्ञे ।२१। जननाञ्जनकसंज्ञा चावाप ।२२। अभूद्विदे- होऽस्य पितेति वैदेहः मथनान्मिथिरिति ।२३। तस्योदावसुः पुत्रोऽभवत् ।२४। उदावसोनन्दिवर्द्धनस्ततस्सुकेतु: तस्माद्देवरातस्ततश्च बृहदुक्थः तस्य च महावीर्यस्तस्यापि सुधृतिः ।२५। ततश्च धृष्टकेतुरजायत ।२६॥ धृष्टकेतोहर्यश्वस्तस्य च मनुमनो प्रतिकः तस्मात्कृतरथस्तस्य देवमीढः, तस्य च विबुधो विबुधस्य महाधृतिस्ततश्च कृतरातः ततो महारोमा तस्य सुवर्णरोमा तत्पुत्रो ह्रस्वरोमा ह्रस्वरोम्णस्सोरध्वजोऽभवत् ।२७। तस्य पुत्रार्थं यजनभुवं कृपतः सीरे सीता दुहिता समुत्पन्ना ॥२८॥ फिर अराजकता फैलने को प्राशका से मुनियो ने उस पुत्रहीन राना के देह को अररिण से मयना प्रारम्भ किया ॥२०॥ उससे एक बालक उत्पन्न हुआ जो स्वय जन्म लेने के कारण 'जनक' कहा गया ॥२१-२२।। इसके पिता के विदेह होने के कारण इसका नाम 'वैदेह' हुमा तथा मन्थन करने से उत्पन्न होने के कारण मिचि' भी कहनाया ।।२३।। उसके पुत्र का नाम उदावसु हुमा ॥२४॥ उदावसु का पुत्र नन्दिवद्धन, नन्दिवर्द्धन का सुकेतु और सुकेतु का पुत्र देवरात हुमा । देवरात का बृहदुक्य वृहदुक्य का महावीर्य और महावीर्य का सुधति नामक पुत्र हुमा । सुति के पुत्र का नाम धृष्टकेतु हुा । धृष्टकेतु का पुत्र हर्षश्व हमा, जिससे मनु का जन्म हुआ । मनु से प्रतिक, प्रतिक से कृतरण, कारण से - चतुर्थ अश-अ०५] [३१ देषमीढ, देवमीढ से विदुध और विबुध से महावृति हुप्रा । महाति का पुत्र कृतरात, कृतरात का महारोमा, महारोमा का सुव गरोमा, उसका पुत्र ह्रस्वरोमा तपा उसका पुत्र सीरध्वज हुआ ॥२५ २७।। वह सोरध्वज पुत्र प्राप्ति की इच्छा से यज्ञ भूमि को जोत रहा था, तभी उसके हल के अगले भाग से एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम सीता हुआ ॥२८॥ सीरध्वजम्य भ्राता सामाश्याधिपति कुशध्वजनामासीत् ॥२६॥ सीरध्वजस्यापत्य भानुमान् भानुमतश्शता म्न तस्य तु शुचि तस्मा- चोर्जनामा पुत्रो जज्ञे ।३०। तस्यापि शतध्वज तत कृति कृतेरञ्जन तत्पुन कुरुजित् ततोऽरिष्टनेमि तस्माच्छ तायु श्रुतायुप सुपार्श्व तस्मात्सृञ्जय तत क्षेमावी क्षेमाविनोऽनेना तस्माद्भोमरथ तस्य सत्यरथ तस्मादुपगुरुपगोरुपगुप्त तत्पुन स्वागतस्तस्य च स्वानन्द तस्माच्च सुवर्चा तस्य च सुपारर्व तस्यापि सुभाप तस्य सुश्रुत तस्मा- सुश्रुताञ्जय तस्य पुनो विजयो विजयस्य त मतात्सुनय सुनया- द्वीतहव्य तस्माद्धृतिर्धतेर्बलाश्व तस्य पुत्र कृति ।३१। कृती सतिष्ठ- तेऽय जनकवश 1३२। इत्येते मैथिला ।३३। प्रायेगते आत्मविद्याश्न- यिणो भूपाला भवन्ति ॥३४॥ साकाश्या धपति कुशध्वज सीरध्वज का भाई था ॥२६॥ सीरध्वज का पुत्र भानुमान् हुन्ना । भातुमान का शतय म्न, शतधम्न का शुचि, शुचि का ऊज- नामा, ऊर्जनामा का शतध्वज शतध्वज का कति कृति का अञ्जन, प्रञ्जन का कुरुजित् और कुरुजित् का अरिष्टनेमि हुा । अरिष्टनेमि का श्रुतायु, श्रुतायु का सूपाश्व सूपार्श्व का सृञ्जय, सृञ्जय का क्षेमावी, क्षेमावी का अनेना, मनेना का भीमरथ, भौमरथ का सत्यरथ, सत्यरथ का उपगु, उपग का उपगुप्त, उपगुप्त का स्वागत, स्वागत का स्वानन्द स्वानन्द का सुवर्षा, सुवर्चा का सुपार्श्व, सुपार्श्व का सुभाष, सुभाष का सुश्रुत और सुश्रुत का जय हुआ। जय के पुत्र का नाम विजय रखा गया। विजय का पुत्र ऋत, ऋत का सुनष सुना का वीतय, वीतह-य का धृति, धृति का बहुलाश्व तथा बहुताश्व का पुत्र कृति हुअा।३०-३१॥ कृति पर पाकर यह जनक वा समाप्त हो गया। यह सभी मैथिल देश के राजा , ३२ ] [ श्रीविष्णुपुराण गण ये ॥३२-३३॥ तथा यह सब पृथिवी-पालक नरेश धात्म विद्या के प्राश्रय- दाता हुए ॥३४॥ छठा अध्याय सूर्यस्य वश्या भगवन्कथिता भवता मम। सोमस्याप्य खिला- न्वश्याञ्छोतुमिच्छामि पार्थिवान् ।१। कीर्त्यते स्थिरकीर्तीना येपामद्यापि सन्तति.। प्रसादसुमुखस्तान्मे ब्रह्मन्नाख्यातुमर्हसि।२। श्रूयता मुनिशार्दूल वश प्रथिततेजस । सोमस्यानुक्रमात्ख्याता यनोर्वीपतयोऽभवन् ।३। अय हि वशोऽतिवलपराक्रमा तिशीलचेष्टावद्भिरतिगुणान्वितनहुपय- यातिकार्तवीर्यार्जुनादिभिभूपालेरलड कृतस्तमह कथयामि श्रूयताम् ।४। श्री मैनेयजी ने कहा-हे भगवन् । आपने सूर्य वश के राजापो का वर्णन किया, अब मैं चन्द्रवश के शासको का वर्णन सुनने की इच्छा करता हूँ। मिन स्थिर यश वाले राजामो की सन्तान का श्रेष्ठ यश प्राज गाया जाता है, उन सभी का प्रसन्नता पूर्वक वर्णन करिये ॥१-२॥ श्री पराशरजी ने कहा-हे मुने । अत्यन्त तेजस्वी चन्द्रव श का वर्णन सुनो । उस वश मे भनेको प्रसिद्ध कीति वाले राजा हुए हैं ।।३।। इस वश को अलकृत करने वाले राजा नहुष, ययाति, कार्तवीर्य, अर्जुन आदि अनेक अत्यन्त वली, पराक्रमी, तेजस्वी, क्रिया- शील और सद्गुण-सम्पन्न राजा हुए हैं उनका वर्णन सुनो।॥४॥ अखिलजगत्त्रष्टुर्भगवतो नारायणस्य नाभिसरोजसमुद्भवाब्ज- योनेह्मण पुरोऽनि । अत्रेस्सोम १६१ त च भगवानब्जयोनि. अशेषोपधिद्विजनक्षत्राणामाधिपत्येऽभ्यषेचयत् ।७। स च राजसूयमक- रोत् ।। तत्प्रभावादत्युत्कृष्टाधिपत्याधिष्ठातृत्वाच्चैन मद आविवेश ।। मदावलेपाच्च सकलदेवगुरो हस्पतेस्तारा नाम पत्नी जहार ।१०। बहु- चतुथ-अंश-अ०६] शश्च बृहस्पतिचोदितेन भगवता ब्रह्मणा चोधमानः सकलैश्च देवर्षिभि- यांच्यमानोऽपि न मुमोच ।११। तस्य चन्द्रस्य च बृहस्पतेद्वपादुशना पाणिग्राहोऽभूत् ।१२। अङ्गिरसश्च स काशादुपलब्धविद्यो भगवान्रुद्रो वृहस्पतेः साहाय्य- मकरोत् । १३॥ सम्पूर्ण विश्व के रचने वाले भगवान श्री नारायण के नाभि-कमल से प्रवतीर्ण हुए श्री ब्रह्माजी के पुत्र अत्रि प्रजापति हुये ॥४॥ इन्ही अत्रि के पुत्र चन्द्रमा हुये ॥६॥ पद्मयोनि भगवान ब्रह्माजी ने उनका सब प्रौषधि, द्विजजन और नक्षत्रों के प्राधिपत्य पर ग्राभिषेक किया ॥७॥ तब चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ किया ।। ।। अपने अत्यन्त उच्चाधिपत्य के अधिकार और प्रभाव से चन्द्रमा राजमद मे भर गया ॥६॥ इस प्रकार मदोन्मत्त हुये उस चन्द्रमा ने देवताओं के पूजनीय गुरु बृहस्पतिजी की पत्नी तारा का अपहरण किया ॥१०॥ फिर उसने बृहस्पतिजी के प्रेरित किये हुये श्री ब्रह्माजी के बहुत बार अनुरोध करने पर तथा देवर्षियो द्वारा मागे जाने पर भी उसे मुक्त न किया ॥११॥ वृहस्पतियो से द्वैप होने के कारण शुक भी चन्द्रमा के सहायक हुए और अगिरा से विद्या प्राप्त करने फे कारण भगवान् रुद्र बृहस्पति के सहायक हो गये ॥१२-१३॥ यतश्चोशना ततो जम्भकुम्भाद्या. समस्ता एव दैत्यदानवनिकाया महान्तमुद्यमं चक्र ।१४। बृहस्पतेरपि सकलदेवसैन्ययुतः सहायः शक्रो- ऽभवत् ।१५। एव च तयोरतीवोग्रसग्राममस्तारानिमित्तस्तारकामयो नामाभूत् ।१६। ततश्च समस्तशस्त्राण्यसुरेपु रुद्रपुरोगमा देवा देवेपु चाशे- पदानवा मुमुचुः ।१७. एव देवासुराहवसक्षोभक्षुब्धहृदयमशेपमेव जग- द्ब्रह्माण शरण जगाम ।१८। ततश्च भगवानब्जयोनिरप्युशनस शङ्क- रममुरान्देवाश्च निवार्य वृहसतये तारामदापयत् ।१९ ता चान्त.प्रस- वामवलोक्य वृहस्पतिरप्पाह ।२०। नंप मम क्षेत्रे भवत्यान्यस्य सुतो धार्यसमुत्सृजनमलमलमतिधाष्ट्रय नेति ॥२१॥ शुक ने जिधर का पक्ष लिया, उधर से हा जम्भ पौर कुम्भादि सभी दैत्य-दानवो ने भी सहायता का प्रयल किया ॥१४॥ इधर सव देवनामों की ३४ ] [ श्रीविष्णुपुराण सेना के सहित इन्द्र ने बृहस्पति की सहायता की ॥१॥ इस प्रकार Bारा की प्राप्ति के लिए तारकामय घोर सग्राम उपस्थित हो गया ॥१६॥ तव रुद्रादि देवता दानवो पर मोर दानव देवतामो पर विभिन्न प्रकार के स्त्रो से प्रहार करने लगे ॥१७॥ इस प्रकार देवासुर-सग्राम से सत्रस्त हुए सम्पूर्ण विश्व ने भगवान् श्री ब्रह्मामा की शरण ली ॥१८॥ तब उन कमलयोनि भगवान् ने शुक्र, शकर प्रादि दानवो और देरयो को शान्त किया और युद्ध रुकवा कर बृहस्पनिजी को तारा दिलवा दी॥१६॥ उसके गर्भाधान हुमा देखकर बृहस्पति ने उससे कहा ॥२०॥ मेरे क्षेत्र में दूसरे के पुत्र को धारण करना मनुचित है, इस प्रकार की धृता ठीक नहीं है, इसे निकाल कर फैक दे ॥२१॥ सा च तेनैवमुक्तातिपतिव्रता भर्तृवचनानन्तर तमिपीकास्तम्बे गर्भमुत्ससर्ज ।२२। स चोत्सृष्टमात्र एवातितेजसा देवाना तेजास्याचिक्षेप २३. बृहस्पतिमिन्दु च तस्य कुमारस्यातिचारुतया साभिलापी दृष्ट्वा देवास्समुत्पन्नसन्देहास्तारा पप्रच्छु ।२४। सत्य कथयास्माकमिति सुभगे सोमस्याथ वा बृहस्पतेरय पुन इति ।२५। एव तैरुक्ता सा तारा ह्विया किञ्चिन्नोवाच ।२६। बहुशोऽप्य भिहिता यदासो देवेभ्यो नाचचक्षे ततस्स कुमारस्ता शप्तुमुद्यत प्राह ।२७। दुप्टेऽम्ब कस्मान्मम तात नाख्यासि ।२८। अद्य व ते व्यलीकलञ्जावत्यास्तथा शास्तिमह करोमि ।२६। यथा च नैवमद्याप्यतिमन्थरवचना भविष्यसीति ।३०। वृहस्पतिजी का यह कथन सुनकर उसने उनकी आज्ञा के अनुमार उस गर्भ को सीको की झाडी मे फेक दिया ।।२२।। उस फेके हुए गर्भ ने अपने तेज से सब देवतामो का तेज फीका कर दिया ॥२३॥ तब उस बालक को अत्यन्त सु दर और तेजस्वी देख वर बृहस्पति और च द्रमा दोनो ही उमे ग्रहण करने के अभिलापी हुए। यह देखकर देवताओ का सदेह हुआ और उन्होने तारा म पूछा नि हे सुभगे । यह पुत्र वृहस्पति का है या चन्द्रमा का, यह बात हमे यथार्थ रूप से बता ? ॥२४-२५।। उनके प्रश्न का उसने लज्जा के कारण कुछ उत्तर न दिया और वारम्बार पुछने पर भी उमने देवतापो को उत्तर न देकर मौन धारण कर लिया। तब वह बालक ही क्रोर पूर्वक शाप देने को उद्यत चतुर्थ अंश-अ० ६ ] [ ३५ होता हुआ कहने लगा कि परी दुष्टा माता ! तू मेरे पिता का नाम क्यों नही बताती है ? तू व्यर्थ ही ऐसी लज्जावती क्यो बन रही है ? यदि नही बतायेगी तो मैं तुझे इस प्रकार अत्यन्त धीरे-धीरे बोलना भुला दूंगा ।।२६-३०॥ अथ भगवान् पितामहः त कुमारं सन्निवार्य स्वयमपृच्छत्तां ताराम् ॥३१॥ कथय वरसे कस्यायमात्मजः सोमस्य वा बृहस्पतेर्वा इत्युक्ता लज्जमानाह सोमस्येति ।३२। ततःप्रस्फुरदुच्छ वसितामलकपोलकान्ति- भगवानुडुपति: कुमारमालिङ्गय साधु साधु वत्स प्राज्ञोऽसीति बुध इति तस्य च नाम चक्र ।३२॥ तदाख्यातमेवैतत् स च यथेलायामात्मज पुरूरवसमुत्पादयामांस ॥३४॥ पुरूरवास्त्वतिदानशीलोऽतियज्वाति- तेजस्वी । य सत्यवादिनमतिरूपवन्तं मन स्विनं मित्रावरुणशापान्मानुपे लोके मया वस्तव्यमिति कृतमतिरवंशी ददर्श ३५॥ दृष्टमाने च तस्मिन्न- पहाय मानमशेपमपास्य स्वर्गसुखाभिलापं तन्मनस्का भूत्वा तमेवोपतस्थे ३६। सोऽपि च तामतिशयितसकललोकस्वीकान्तिसौकुमार्यलावण्यगति- विलासहासादिगुणामवलोक्य तदायत्तचित्तवृत्तिर्वभूव ॥३७उभयमपि तन्मनस्कमनन्यदृष्टि परित्यक्तसमस्तान्यप्रयोजनमभूत् ।३८। तब पितामह श्री ब्रह्माजी ने उस बालक को निरागण करके स्वयं ही तारा से पूछा कि हे वत्से ! तू यथार्थ रूप से बनादे कि यह वृहमति का पुत्र है या चन्द्रमा का ? इस प्रकार उसने लजाते हुए कह दिया कि चन्द्रमा का है' ॥३१-३२॥ यह सुनते ही चन्द्रमा ने उस बालक को अपने हृदय से लगा लिया भौर उससे कहा कि 'याह, पुत्र ! तुम अत्यन्त बुद्धिमान हो' यह कह कर उसका नाम बुध रख दिया। इस समय उनके स्वच्छ पोतो की कानि प्रत्पन्त तेज- मुक्त हो रही थो ॥३३॥ उनी बुध ने इला ये पुरुरवा को उसन्न किया था, जिगरा वणन पहिन किया जा चुका है ||३४|| पुरपा प्रत्यन्त दानी, याज्ञिक पोर तेजस्वी हुमा । उर्वशी को मित्रावरण का जो शाप था, उसका विचार परते कि 'मुझे उस शाप के कारण मृत्यलोक में निवारा करना होगा' राजा पुरूरया पर उमकी रष्टि पड़ी भोर यह प्रत्यन्त सत्यभापी, रूपवन्त पौर मेघावी राजा पुरुरवा के पाय, अपनी मान-मर्यादा पौर स्वर्ग-गुस पो कामना को त्याग

[ श्रीविष्णुपुराण
कर तन्मयता पूर्वक प्राफर उपस्थित हुई ॥३५-३६॥ राजा पुरूरवा ने भी उसे
सब स्त्रियो मे विशिष्ट लक्षण वाली, सुकुमार, कान्तिमयी सौंदर्य, चाल-ढाल,
मुसकान आदि मे श्रेष्ठ देखा तो वह उसमे आसक्त हो गया ॥३७॥ इस प्रकार वे
दोनों ही परस्पर तन्मय पोर अनन्य चित्त वाले होकर अन्य सभी कार्यों को
छोड़ बैठे ॥३८॥
राजा तु प्रागल्भ्यात्तामाह १३९। सुभ्र त्वामहमभिकामोऽस्मि
प्रसीदानुरागमुद्हेत्युक्ता लज्जावखण्डितमुर्वशी तं प्राह ॥४०॥ भवत्वेवं
यदि मे समयपरिपालन भवान् करोतीत्याख्याते पुनरपि तामाह ॥४१॥
आख्याहि मे समय मिति ॥४२॥ अथ पृष्टा पुनरप्यब्रवीत् ॥४३॥ शयनसमीपे
ममोरणकद्वयं पुत्रभूतम् नापनेयम् ।४४॥ भवाश्च मया न नग्नो द्रष्टव्यः
।४५। घृतमात्र च ममाहार इति ।४६। एवमेवेति भूपतिरप्याह ।४७
उस समय राजा ने सकोच रहित भाव से कहा है श्रेष्ठ भ्रू वाली !
मैं तुम्हे चाहता हूं, तुम मुझ पर प्रसन्न होकर अपना प्रेम प्रदान करो। राजा
की बात सुन कर उर्वशी भी लज्जावश खण्डित स्वर में कहने लगी ।।३६-४०।।
यदि पाप मेरी प्रतिज्ञा का परिपालन करा सके तो, मैं अवश्य ही ऐसा करने
को प्रस्तुत हूँ। यह सुनकर राजा बोला कि-तुम अपनी उस प्रतिज्ञा को मेरे
प्रति कहो ॥४१-४२॥ उसके इस प्रकार पूछने पर उर्वशी ने कहा- मेरे यह दो
मेष शिशु सदा मेरे पास रहेगे । आप इन्हे मेरो शय्या से कभी न हटाये गे?
मैं प्रापको कभी भी नग्न न देख सकूगी तथा घृत ही मेरा भोजन होगा। इस
पर राजा ने वहा कि 'यही होगा' ॥४३-४७।।
तया सह च चावनिपतिरलकायां चैत्ररथादिवनेप्वमलपाखण्डेपु
मानसादिसरस्स्वतिरमणीयेपु रममारण: पष्टिवर्षसहस्राण्यनुदिनप्रवर्द्ध-
मानप्रमोदोऽनयत् ।।८। उर्वशी च तदुपभोगात्प्रतिदिनप्रवर्द्ध मानानुरागा
अमरलोकवासेऽपि न स्पृहा चकार ।४६। विना चोर्वश्या सुरलोको:-
प्सरसां सिद्धगन्धर्वाणा च नातिरमणीयोऽभवत् १५० ततश्चोर्वशी-
पुरूरवसोस्समयविद्विश्वावसुर्गन्धर्वसमवेतो निशि शयनाभ्याशादेव-
मुरणकं जहार ॥५१॥ तस्याकाशे नीयमानस्योर्वशी शब्दमशृणोत् ॥५२॥

[३७ चतुर्थ अश-अ० ६ ] एवमुवाच च ममानाथाया पुन केनापह्वियते व शरणमुपयामीति ॥५३॥ तदाकर्ण्य राजा मा नग्न देवी वीक्ष्यतीति न ययौ ।५४। अथान्यमप्यु- रणकमादाय गन्धर्वा ययु १५५॥ तस्याप्यपह्वियमारणस्याश्र्ण्य शब्द- माकाशे पुनरप्यनाथास्म्यहमभर्तृका कापुरुपाश्रयेत्यार्तराविणी बभूव ।५६ फिर राजा पुरूरवा दिनो दिन वृद्धि को प्राप्त होते हुए सुख के साथ कभी अलकापुरी के चैत्ररथ प्रादि वनो म और कभी श्रेष्ठ कमलखण्डो वाले अत्यन्त रमणीय मानसादि सरोवरा मे उराके साथ विहार करते रहे। इस प्रकार उन्होने साठ हजार थप व्यतीत कर दिए ॥४॥ उपभोग सुख और प्रासक्ति के प्रत्यन्त बढ जाने मे उवशी भी अब स्वग म रहो की इच्छा से विमुख हो गई ॥४६।। उधर म्वर्गलार में प्रप्सरारो, सिद्धो भौर गन्धर्वो को उर्वशी के प्रभाव म उतनी रमणीयता प्रतीत नही होती थी ।।५०।। इसलिए उवशी और पुरुरवा मे मध्य हुई प्रतिज्ञा यो जानने वाले विश्व वसु ने एक रात्रि म गन्धवों के साथ पुरुरवा ये शपनागार मे जाकर उसके एक मेप का अपहरण किया और जब वह पाकाश मार्ग से लेजाया जा रहा था, तब उवशी ने उसका शम्द सुना और वह योली वि मुझ प्रनाथा के पुत्र का प्रमहरण करके कौन लिए जा रहा है ? अब में विसयी शरण मे जाऊ ? ॥५१-५३॥ पर तु उवधी की पुकार सुनकर भी राजा इस भय स नहीं उठा कि वह मुझे वस्त्र विहीन स्थिति म देख लेगी ॥५४॥ इसी अवसर म गन्धयों ने दूसरे मेप का भी हरण पर लिया और वे उसे लपर पल । य ॥५५॥ उमा लजाय जारी ता शरद भी उर्वशी ने सुन निया मोर वह चीरहार पर उठी नि अरे, में मनाया मोर स्वामी विहीन नारी एव यापुरुष थे यश म पड गई है। इस प्रकार बहती हुई उर्वशी प्रात स्वर म रोने लगी ॥५६॥ राजाप्यमर्पयशादधाारमेतदिति सड्गमादाय दुष्ट दुष्ट हतोऽ- सीति व्याहरनभ्यधावत् ।। तापच्च गन्धर्वरप्यतीवोज्ज्वला विद्यु- जनिता ८ तत्प्रभया चोवंशी राजानमपगताम्बर दृष्ट्वापवृत्तसमया तयाणादेवापमान्ता ।५६परित्यज्य तावप्युरो गन्धर्वास्मुरलोक- - ३] [ श्रीविष्णुपुराण मुपगताः ।६०। राजापि च तो मेपावादायातिहृष्टमनाः स्वशयनमायाती नोर्वशी ददर्श ।६११ तां चापश्यन् व्यपगताम्बर एवोन्मत्तरूपो बभ्राम १६२। कुरुक्षेत्रे चाम्भोजसरस्यन्याभिश्चतसृभिरप्सरोभिस्समवेतामुवंशी ददर्श ।६३। ततश्चोन्मत्तरूपो जाये हे तिष्ठ मनसि घोरे तिष्ठ वचसि कपटिके तिष्ठेत्येवमनेकप्रकारं सूक्तमवोचत् १६४ प्राह चोवंशी १६५। महाराजालमनेनाविवेकचेष्टितेन ॥६६॥ अन्तर्वल्यहमन्दान्ते भवताना- गन्तव्य कुमारस्ते भविष्यति एका च निशामह त्वया सह वत्स्यामी- त्युक्तः प्रहृष्टस्स्वपुर जगाम ।६७) उस समय राजा ने सोचा कि अभी अधेरा है और तब क्रोधपूर्वक तल- पार हाथ मे लेकर अरे दुष्ट तू नष्ट हो गया' कहते हुए शीघ्रतापूर्वक दौड पडा ॥५७।। तभी गन्धर्वो ने अत्यन्त प्रकाश वाली विद्युत प्रकट कर दी और उसके प्रकाश में उर्वशी ने राजा को वस्त्र-विहीन देख लिया। इस प्रकार प्रतिज्ञा भग हो जाने के कारण उवंशो वहाँ से तत्काल चली गई ॥५८-५९॥ तब गन्धों ने भी उन मेपों को वही छोड मिया और स्वर्गलोक को चले गये ॥६॥ जब राजा उन मेपो को लेकर अत्यन्त प्रसन्न होता हुआ अपने शयनगृह मे माया तब यहाँ उसने सर्वशी को न पाया ॥६१॥ उसको न देखकर वह उन्मत्त-सा हो गया और उस वस्त्र-विहीन अवस्था मे ही सर्वत्र विचरने लगा ॥६२॥ इस प्रकार विचरण करते हुए उसने कुरुक्षेत्र के पद्म-सरोवर मे उर्वशी को अन्य चार मप्स- राम्रो के सहित देखा ।।६३॥ वह उसे देखते ही बोला-हे जाये ! हे निष्ठुर हृदय वानी ! हे कपटिके ! पोडी देर तो ठहर, किचित् सम्भापण तो कर ॥६४॥ नसके ऐसे भनेक वचनो को सुनकर उर्वशी ने कहा-हे महाराज ! इस प्रकार की प्रविवे-युक्त चेष्टा न करो। इस समय गर्भवती हूँ, इसलिए एक वर्ष के पश्चात् पाप यही पावें उस समय प्रापके एक पुत्र होगा और मैं भी एक रात्रि मापके साथ व्यतीत करू गी । उर्वशी की बात सुनकर पुरूरवा प्रसन्न हुमा और यह अपने नगर में लौट प्राया ॥६५.६७॥ तासां चाप्सरसामुवंशी कथयामास १६८। अयं स पुरुषोत्कृष्टो येनाहमेतावन्त कालमनुरागाकृष्टमानसा सहोपितेति ।६। एवमुक्तास्ता- 1 क -- चतुर्थ अंश-अ०६ ] [ ३६ श्चाप्सरस ऊचु १७०। साधु साध्वस्य रूपमप्यनेन सहास्माकमपि सर्व- कालमास्या भवेदिति ७१। अब्दे च पूर्णे स राजा तत्राजगाम 1७२। कुमार चायुपमस्मै चोर्वशी ददौ १७३। दत्त्वा चैका निशा तेन राज्ञा सहोपित्वा पञ्च पुत्रोत्पत्तये गर्भमवाप 1७४। उवाचन राजानमस्मत्प्रीत्या महाराजाय सर्व एव गन्धर्वा वरदास्सवृत्ता प्रियता च वर इति ७५। अाह च राजा १७६। विजितसकलारातिरविहतेन्द्रियसामर्यो घन्धु- मानमितवलकोशोऽस्मि, नान्यदस्माकमुर्वशीसालोक्यात्प्राप्तव्यमस्ति तदहमनया सहोर्वश्या काल नेतुम भिलपामीत्युक्त गन्धर्वा राशेऽग्नि- स्थाली ददुः १७७। ऊचुश्चनमग्निमाम्नायानुसारी भूत्वा त्रिधा कृत्वोवंशी- सलोकतामनोरथमुद्दिश्य सम्यग्यजेथा. ततोऽवश्यम भिलपितमवाप्स्य- सीत्युक्तस्तामग्निस्थालीमादाय जगाम ७८॥ इसके पश्चात् उर्वशी ने अपने साथ की अप्सरामो से कहा कि-यही पह पुप थे। महाराज हैं, जिनके साथ प्रेमामक्त चित्त से रहने हुये मैंने पृथिवी पर निवास किया था ।।६८-६६॥ यह मुनवर वे प्रप्पराएँ कहने लगी-याह, धाह, कैसे सुन्दर हैं, इनका रूप पथार्थ मे ही चित्ताकर्षण है, इनके साथ तो हम भी कभी रह सकें ॥७०.७१।। एक वर्ष की समाति पर राजा पुरूरवा पुनः यहाँ पहुंचे ॥७२॥ तब उर्वशी ने उन्हे 'मायु' नामक एक शिशु प्रदान किया ॥७३॥ फिर उसने उनके साप एक रात्रि रह कर पांच पुत्रो की उत्पत्ति के लिए गर्भ धारण किया ॥७४। इसके पश्चात् बोली कि हमारी पारस्परिक प्रीति में पारण सभी गन्धर्व प्राप महाराज को वर देने की इच्छा करते हैं, इसलिए पाप अपना इच्छित वर मागिए ॥७।। तब राजा ने कहा- मैंने अपने सभी बरिमो पर विजय प्राप्त की है, मेरी इन्द्रियां भी सामध्यं से होन नही हुई है, मेरे पास पन्धु-बाधव, असत्य सेना और बोस की भी कमी नहीं है, इसलिए इस समय उवंशी के सारे अतिरिक्त पौर मुछ भी मैं नहीं चाहता तथा इसी के साथ भपना जीवन व्यतीत करना चाहता हूँ । राजा की बात सुन कर गन्धवों ने उन्हे एक पग्निस्थाली प्रदान करते हुए कहा-बैदिक विधि से इस मग्नि के गाहंपरप, पाइपनीय मौर दक्षिणाग्नि रूप में तीन भाग परके उर्वशी मग पे मनोरप के

४० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
साथ इसमे यअन करने पर तुम्हे अवश्य ही अपने प्रभीष्ट की प्राप्ति होगी।
गाधों शारा इस प्रकार कहे जाने पर उस अग्निस्थाली को ग्रहण करके राजा
पुरुरवा वहां से चल दिया ।।७६-७८।।
अन्तरटव्यामचिन्तयत् अहो मेऽतीव मूढता किमहमकरवम् १७६।
वह्निस्थाली मवैपानीता नोर्वशीति 101 अथैनामटव्यामेवाग्निस्थाली
तत्याज स्वपुर च जगाम ।। व्यतीतेऽद्ध रात्रे विनिद्रश्वाचिन्तयत्
८ ममोर्वशीसालोक्यप्राप्त्यर्थमम्निस्थाली गन्धर्दत्ता सा च मयाटव्या
परित्यक्ता ८३१ तदह तन तदाहरणाय यास्यामोत्युत्थाय तनाप्युपगतो
नाग्निस्थालीमपश्यत् १८४॥ शमीगर्भ चाश्वत्थमग्निस्थालीस्थाने दृष्ट्वा-
चिन्तयत् ।८५॥ मयात्राग्निस्थाली निक्षिप्ता सा चाश्वत्थश्शमीगर्भोऽभूत्
१८६॥ तदेनमेवाहमग्निरूपमादाय स्वपुरमभिगम्याररिंग कृत्वा तदुत्प-
नाग्नेहपास्ति करिष्यामीति ८७
फिर वन मे जाते हुए राजा ने सोचा-प्ररे, मैं भी कितना मूर्ख हूँ, जो
इस अग्निस्थाली को ही लेकर चला पाया और उर्वशी को साथ नही लामा
॥७६-८०॥ यह सोच कर उसने उस अग्निस्थाली को वन में ही छोड दिया
भोर अपने नगर को लोट पाया ॥१॥ भद्धं रात्रि के समय जब राजा को निद्रा
भग हुई, तब उसने पुन विचार किया-उर्वशी या सग प्राप्त होने के निमित्त
हो उन गन्धों ने मुझे वह अग्निस्थाली प्रदान की थी, परन्तु मैं उसे मन मे ही
छोर पाया ।।६२.८३५ इसलिये मुझे उसे लने के लिये वहां जाना उचित है।
यह सोर वह तुरन्त उठकर उस वन मे गया, परन्तु वह स्थाली उसे कही
भी दिखाई न पडी ॥४॥ उस पग्निस्थाली के स्थान पर एक शमोगभं पीतल
पा वृक्ष उसने देखा मोर विचार करने लगा कि मैंने यह अग्निस्याली इसी स्थान
पर फ्यो पो, वही मग्नि स्थाली शमीगर्भ पीतल हो गई जान पड़ती है ॥८६)
इसलिए मर इस अग्नि रूप पीतल को ही अपने नार मे ले चलना चाहिए,
जिससे इसकी मरणि बनाकर उससे उत्पन्न हुए भग्नि की उपासना की जा
सरे ॥७॥

चतुर्थ अंश-अ०७ ] [ ४१ एवमेव स्वपुरमभिगम्याररिंग चकार 1८८। तत्प्रमाणं चाङ्ग लैः कुर्वन् गायत्रीमपठत् ।। पटतश्चाक्षरसख्यान्येवाङ्गलान्यरण्यभवत् Tror तत्राग्नि निर्मथ्याग्नित्रयमाम्नायानुसारी भूत्वा जुहाव ।६१। उर्वशीसालोक्य फलमभिसहितवान् ।१२। तेनैव चाग्निविधिना बहु- विधान यज्ञानिष्ट्वा गान्धर्वलोकानवाप्योर्वश्या सहावियोगमवाप ।६। एकोऽग्निरादावभवद् एकेन त्वन मन्वन्तरे त्रेधा प्रवर्तिताः ।९४॥ यह सोचकर राजा उस पीपल वृक्ष को लेकर अपने नगर मे पाया और उसने उसकी परणि बनायी १८८|| फिर उन्होने उस काष्ठ के एक-एक अगुल के टुकडे करके गायत्री मन्त्र का पाठ किया II गायत्री का पाठ करने से वे सब गायत्री मन्त्र मे जितने प्रक्षर हैं, उतनी भरणियाँ हो गई ॥६०॥ उनके मन्धन द्वारा तीनो प्रकार के अग्नियो को प्रकट कर उनमे वेद विधि से पाहु- लिया दी और उर्वशी का सग प्राप्ति रूप फन का मनोरथ किया ॥६१-६२॥ फिर उसी मग्नि से अनेक प्रकार के यशो का अनुठान बरते हुए राजा पुरूरवा ने गन्धर्व लोक में जाकर उर्वशी को प्राप्त किया और कभी उसका उससे वियोग नही हुमा ।।६३|| प्राचीन काल में एक ही अग्नि था और इस मन्वन्तर मे उसी एक अग्नि से तीन प्रकार के मग्नि प्रवर्तित हुये ॥४॥ >K सातवाँ अध्याय तस्याप्यायु(मानमावसुविश्वावसुः श्रुतायुश्शतायुरयुतायुरिति- सज्ञा. पट् पुना अभवन् ।१। तथामावसोर्मीमनामा पुनोऽभवत् ।२१ भीमस्य काञ्चन काञ्चनात्सुहोन. तस्यापि जह्न ।३। योऽसौ यज्ञवाट- मसिल गङ्गाम्भसा प्तावितमवलोक्य क्रोधसरक्तलोचनो भगवन्त यज्ञ- पुरुषमात्मनि परमेण समाधिना समारोप्यासिलामेव गङ्गामपियत् ४. अर्थन देवर्पयः प्रसादयामासुः ।। दुहितृत्वे चास्य गङ्गामनयन् ।।

कराया ४२ । [ श्रीविष्णुपुराण जह्नोश्च सुमन्तु म पुनोऽभवत् ।७तस्याप्यजकस्ततो बला- काश्वस्तस्मात्कुशस्तस्यापि कुशाम्वकुशनाभाधूर्तरजसो वसुश्चेति चत्वारः पुत्रा बभूवुः ।। तेपा कुशाम्बः शक्रतुल्यो मे पुत्रो भवेदिति तपश्चकार । त चोग्नतपसमवलोक्य मा भवत्वन्योऽस्मत्तुल्यवीर्य इत्यात्मनवा- स्येन्द्रः पुनत्वमगच्छत् ॥१०॥ स गाधिर्नाम पुनः कौशिकोऽभवत् ।११। श्री पराशरजी ने कहा-उस राजा पुरूरवा के छः पुत्र हुए जिनका नाम मायु, धीमान, ममावसु, श्रुतायु, शतायु पोर अयुतायु हुप्रा ॥१॥ अमावसु का पुत्र भीम हुप्रा । भीम का काचन, काचन का सुहोत्र और सुहोत्र का पुत्र जह्न. हुमा, जिसकी सम्पूर्ण यज्ञशाला गगाजल से प्राप्लावित हो गई थी, तब उसने क्रोध से लाल नेत्र करके भगवान यज्ञ पुरुष को समाधि के द्वारा अपने मे स्थापित कर लिया और फिर सम्पूर्ण गङ्गाजल का पान कर लिया ॥२-४।। तब देवर्षियो ने इन्हें प्रसन्न करके गगाजी को इनका पुत्रीत्व भाव प्राप्त ॥५-६।। उसी राजा जह्न. का पुत्र सुमत हुप्रा ॥७॥ सुमत का मजक, अजक का बलाकाश्व, बलाकाश्व का कुश और कुश के चार पुत्र हुए कुशाम्ब, कुशनाम, अधूर्तरजा और वसु । उनमे से कुशाम्ब ने इन्द्र के समान पुत्र-प्राप्ति की कामना से तप किया | उसकी उन तपस्या को देखकर बल मे अपने समान होने की प्राशवा से इन्द्र स्वय ही कुशाम्ब के यहाँ पुत्र रूप से उत्पन्न हुआ ॥१०॥ उस पुत्र का नाम 'गाघि' हुआ जो बाद मे 'कौशिक' कहलाया ।।११॥ गाधिश्व सत्यवती कन्यामजनयत् ।१२। तां च भार्गव ऋचीको वने ।१३। गाधिरप्यतिरोषणायातिवृद्धाय ब्राह्मणाय दातुमनिच्छन्ने- कतश्श्यामकर्णानामिन्दुवर्चसामनिलरहसामश्वाना सहस्र कन्याशुल्क- मयाचत ।१४। तेनाप्यपिणा वरुणसकाशादुपलभ्याश्वतीर्थोत्पन्न तादृशमश्वसहस्र दत्तम् ॥१५॥ ततस्तामृचीक. कन्यामुपयेमे ।१६। ऋचीकन तस्याश्चरुमपत्यार्थ चकार 1१७ तत्प्रसादितश्च तन्मात्र क्षत्रवरपुत्रोत्पत्तये चरुमपर साथ- यामास ।१८एष चर्भवत्या अयमपरश्चरुस्त्वन्मात्रा सम्यगुपयोज्य इत्युक्त्वा वन जगाम १६ चतुर्थ अंश-म०७] [४३ गाधि के सत्यवती नाम की कन्या हुई जो भृगुपुत्र चीक को व्याही गई ॥१२-१३॥ गोधि ने अत्यन्त क्रोधी तथा वृद्ध ब्राह्मण को कन्या न देने के विचार से ऋचीक से कन्या के बदले में चन्द्रमा जैसे तेजस्वी पोर पवन के समान वेग वाले एक हजार श्यामकर्ण प्रश्वो की माग की ॥१४॥ इस प्रकार ऋचीक ने अश्वतीर्थ से उत्पन्न वैसे ही गुण वाले एक हजार अश्व वरुण से लेकर गाधि को दे दिये ।१५। फिर उस कन्या से ऋचीक ऋपि का विवाह हुमा ॥१६॥ कालान्तर में सन्तान की कामना करते हुए ऋचीक ने सत्यवती के लिये चर सिद्ध किया ॥१७॥ और उस सत्यवती द्वारा प्रसन्न किये जाने पर महर्षि ऋचीक ने एक क्षनिय श्रेष्ठ पुत्र की उत्पत्ति के निमित्त एक चर उसकी माता के लिये सिद्ध किया।१८फिर 'यह चरु तुम्हारे लिये और यह दूसरा चर तुम्हारी माता के लिये है' यह निर्देश करते हुये महपि वन को चले गये ॥१९॥ उपयोगकाले च तां माता सत्यवतीमाह ।२०। पुत्रि सर्व एवात्म- पुत्रमतिगुणमभिलपति नात्मजायाभ्रातृगुणेष्वतीवाहतो भवतीति ।२१॥ अतोऽहंसि ममात्मीयं चरुं दातु मदीय चरुमात्मनोपयोक्तम् ।२२। मत्पु- त्रेण हि सकलभूमण्डलपरिपालनं कार्य कियद्वा ब्राह्मणस्य वलवीर्यस- म्पदेत्युक्ता सा स्वचरु मात्रे दत्तवती ।२३। चरुमो के उपयोग के समय सत्यवती की माता ने उससे कहा कि-हे बेटी ! अपने लिये सभी सब से अधिक गुण वाले पुत्र की इच्छा करते है, अपनी भार्या के भ्राता के अधिक गुणवान् होने में किसी को विशेष कामना नहीं होती ॥२०-२१।। इसलिये तू अपना चर मुझे देकर मेरा चरु त ले ले, क्योकि मेरे जो पुत्र होगा, उसे सम्पूर्ण पृथिवी की रक्षा करनी पडेगी और तेरे पुत्र प्राह्मण कुमार को बल बीर्य और सम्पत्ति का करना ही क्या है ? गाता द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सत्यवती ने अपना चह उसे दे दिया ॥२२-२३॥ अथ वनादागत्य सत्यवतीमृपिरपश्यत ।२४१ प्राह चनामतिपापे किमिदमकायं भवत्या कृतम् अतिरीदते वपुर्लक्ष्यते ।२५॥ नूनं त्वया त्वन्मातृसात्कृतश्वरुरुपयुक्तो न युक्तमेतत् ।२६। मया हि तम चरो सक- लैश्वर्यवीर्यशौर्यवलसम्पदारोपिता त्वदीयचरावप्यसिलशान्तिज्ञानतिति- ४४ ] [ श्रीविष्णुपुराण क्षादिब्राह्मणगुणसम्पत् ।२७। तच्च विपरीत कुर्वत्यास्तवातिरौद्रास्नधा- रणपालननिष्ठ क्षत्रियाचार पुनो भविष्यति तस्याश्चोपश मरुचिर्दा- ह्मणाचार इत्याकण्यैव सा तस्य पादौ जग्राह ।२८। प्रणिपत्य चैनमाह १२९ भगवन्मयतदज्ञानादनुष्ठित प्रसाद मे कुरु मैवविध पुत्रो भवतु काममेव विध पौत्रो भवत्वित्युक्त मुनिरप्याह ।३०। एवमस्त्विति।३१। महर्षि ने वन से लौटकर जब पानी पत्नी से देखा, तब उममे बोले- अरी दुर्मति पापिनी । तू यह क्या प्रकार्य कर बैठी है, जिसके कारण तेरा शरीर अत्यन्त भयङ्कर लगने लगा है ।।२४-२५॥ तूने निश्चय ही अपनी माता के लिये बने हुये चरु का उपयोग कर लिया है जो तेरे लिए उचित नहीं था ॥२६॥ मैंने उसमे सम्पूर्ण ऐश्वयों के साथ पराक्रम, शौय, बल आदि को स्था- पित किया था और तेरे चरु मे शान्ति, ज्ञान, तितिक्षादि सभी ब्राह्मणोचित गुणो का प्रारोपण किया था ॥२७॥ परतु उन चरमो के विपरीत उपयोग से तेरे अत्यन्त भयङ्कर शस्त्रास्त्रो का धारण करने वाला क्षत्रियोचित प्रावरण युक्त पुत्र उत्पन होगा और तेरो माता के ब्राह्मणोचित पाचरण वाला शान्ति प्रिय पुत्र की उत्पत्ति होगी। यह सुनकर सत्यवती ने महर्षि के चरण पकड लिये और प्रणाम करके अत्यन्त विनयप्वक कहा ॥२८-२६।। हे भगवन् । मुझसे अज्ञानवश ही ऐसा हो गया है, इसलिये प्रसन्न हूजिये। मेरा पुत्र इस प्रकार का न हो, चाहे पौत्र वैसा हो जाय इस पर ऋषि ने 'एवमस्तु' कहा ॥३० ३१॥ अनन्तर च सा जमदग्निमजीजनत् ।३२॥ तन्माता च विश्वामित्र जनयामास ।३३। सत्यवत्यपि कौशिकी नाम नद्यभवत् ।३४। जमदग्निरिक्ष्वाकुवशोद्भवस्य रेणोस्तनया रेणुकामुपयेमे ॥३५॥ तस्या चाशेषक्षत्रहन्तार परशुरामसज्ञ भगवतस्सकललोकगुरोर्नारायण- स्याश जमदग्निरजीजनत् ॥३६! विश्वामित्रपुनस्तु भार्गव एव शुनश्शेपो देवदत्त ततश्च देवरातनामाभवत् ॥३७॥ ततश्चान्ये मधुच्छन्दोधनञ्जय- कृतदेवाप्रककच्छपहारीतकाख्या विश्वामिगपुरा बभूवु २ रेषा न्य बहूनि यौशिक गोत्राणि ऋप्यन्यन्तरेषु विवाह्यन्यभवन् ॥३६॥ 1

चतुर्थ अश-ग्र०८
]
[ ४५
फिर सत्यवती के उदर से जमदग्नि ने और उसकी माता से विश्वा-
मित्र ने जन्म लिया। फिर सत्ययती कौशिषी नाम को नदी होकर प्रवाहित
हो गई ॥३२-३४॥ इक्ष्वाकु कुल मे उत्पन्न हुए रेगुका से जमदाग्नि का विवाह
हुप्रा ॥३॥ जमदग्नि मे उसमे सम्पूर्ण क्षत्रियो का विनाश करने वाले भगवान्
परशुराम को उत्पन्न विश, जो लोक गुर नारायण अश भूत थे ।३६। देवगण
दे भृगुवशी पुनः शेष विश्वामित्रजी को पुत्र रूप मे प्रदान किया, इसलिये बाद
में उसका नाम देवरात पर गया । उसके पश्चात् भी मधुच्छन्द, धनञ्जय, कृतदेव,
प्रष्टक, पच्छप, पथा हारीनक प्रादि अन्य भनेक पुत्र विश्वामित्र जी के
हुए।
॥३७.३०।। उन पुत्री से मन्पान्य ऋपियशो में विवाहे हो जाने योग्य अनेक
पौशिप गोत्रीय उत्पन्न हुए ।।३६।।
अाठवाँ अध्याय
पुरुरवसो ज्येष्ठ पुत्रो यस्त्वायुर्नामा स राहोर्दतिराना
तस्या च पञ्च पुयानुत्पादयामास ।२। नहुपक्षनवृद्धरम्भजिनमानयंत्र-
नेना पश्चम पुरोऽभूत् ।। क्षप्रवृद्धारमहोयः पुनोऽभवन् । कान्ना-
रागृत्ममदाग्यम्तस्य पुत्रा बभूव ।। गृत्समदस्य शौनकरवाय.
तंगिताभूत् ।।
मास्यस्य कामेय वाशिराज. तस्माद्राष्ट्रः राष्ट्रस्य
सुनोभया । धन्यगरि दीर्णतपसः पुत्रोऽभवत् ।। महि मन्द्धि-
धारणग्गालगम्भूतिप्पोपज्ञानविद् भगवता नारान बीत-
गातो तम्मै यरो दत्त । कागिराजगोऽवतीय न्दनका मन्ना-
'तुः गम्प्यिसि याभागभुम्भविष्यगोनि ॥१०॥

४६ ] [ श्रीविष्णुपुराण रजि और अनेना नामक पांच पुत्र उत्पन्न किये ॥२-३॥ क्षत्रवृद्ध का पुन सुहोत्र हुमा और सुहोत्र के तीन पुत्र हुए, जिनके नाम काश्य, काश और गृत्समद थे । गृत्समद का पुत्र शौनक चारो वर्णों का प्रवत्तंक हुग्रा ॥४.६॥ काश्य का पुत्र काशी नरेश काशेम हुआ । उसका पुन राष्ट्र और राष्ट्र का दीर्धतया तथा दीर्घतया का पुत्र धन्वन्तरि हुमा ॥७.८॥ यह धन्वन्तरि जरादि विकारो! से रहित देह और इन्द्रिय वाला तथा सभी जन्मो मे सर्व शास्त्र ज्ञाता हुआ था । भगवान् नारायण ने उसे पूर्व जन्म मे यह वर प्रदान किया था कि तुम काशिराज के वश मे उत्पन्न होकर आयुर्वेद के पाठ भाग करोगे और यज्ञ. भाग के भोक्ता बनोगे 18-१०॥ तस्य च धन्वन्तरेः पुत्रः केतुमान् केतुमतो भीमरथस्तस्यापि दिवोदासस्तस्यापि प्रतर्दनः ।११। स च मद्रश्रेण्यवशविनाशनादशेषशन- वोऽनेन जिता इति शत्रुजिदभवत् ।१२। तेन च प्रीतिमतात्मपुत्रो वत्स वत्सेत्यभिहितो वत्सोऽभवत् ११३। सत्यपरतया ऋतध्वजसज्ञामवाप ।१४। ततश्च कुवलयनामानमश्वं लेभे ततः कुवलयाश्व इत्यस्या पृथि- व्या प्रथितः ।१५तस्य च वत्सस्य पुत्रोऽलर्कनामाभवद् यस्यायमद्यापि श्लोको गीयते ॥१६॥ धन्वन्तरि का पुत्र केतुमान हुआ । केतुमान का भीमरथ और भीमर का दिवोदास हुमा । दिवोद स के पुत्र का नाम प्रतर्दन रखा गया ॥११॥ प्रतर्दन ने मद्रश्रेण्य वश का विध्वश करके सब बैरियो को जीत लिया था इमलिए वह शत्रुजित् नाम प्रसिद्ध हुमा ॥१२॥ अपने इस पुत्र को दिवोदास स्नेह वश 'वत्स ! वत्स' कह कर पुकारा था, इसलिये यह वत्स भी कहलाय ॥१३॥ अत्यन्त सत्य परायण होने कारण - इसे ऋतुराज भी कहने लगे |१४|| फिर इसे कुवनय नामक अपूर्व प्रश्व की प्राप्ति हुई, इसलिये य कुवलयाश्व के नाम से विख्यात हुआ ।१५। इस यत्म नामक राजा का पुत्र अल हुमा, जिसके विषय मे यह श्लोक अब तक कीतन किया जाता है ।।१६॥ पष्टिवर्षसहस्राणि पष्टिवर्षशतानि च । अलर्कादपरो नाय बुभुजे मेदिनी युवा ।१७॥

चतुर्थ अश-अ०६] [ ४७ तस्याप्यलकस्य सन्नतिनामाभवदात्मज ॥१८॥ सन्नते. सुनीथ- स्तस्यापि मुकेतुस्तम्माच्च धर्म केतुर्यज्ञे ।१६। ततश्च सत्यकेतुस्तस्माद्विभु- स्तत्तनयस्सुविभुस्ततश्च सुकुमारस्तस्यापि धृष्टकेतुस्ततश्च वी तिहोत्र- स्तस्माद्भार्गो भार्गस्य भार्गभूमिस्ततश्चातुर्वण्र्यप्रवृत्तिरित्येते काश्यभूभृत कथिता १२० रजेस्तु सन्तति श्रूयतरम् ॥२१॥ पूर्वकाल मै अलक के अतिरिक्त अन्य किसी भी व्यक्ति ने छियासठ हजार वर्ष तक युवावस्था में स्थित रह कर पृथिवी को नहीं भोगा ॥१७॥ अलक का पुत्र सन्नति हुा । सति वा सुनीथ और सुनीथ का सुकेतु हुा । सुकेतु का धर्मकेतु धमकेनु का सत्यकेतु और सत्यकेतु का पुत्र विभु हुमा । विभु रो सुविभू की उत्पत्ति हुई । मुविभु से सुकुमार और सुबुमार से धृष्टकेतु हुा । धृष्ट. केतु का पुत्र वीतिहोत्र, वोतिहोत्र का भागं और भार्ग का पुत्र भार्गभूमि हुमा, जिराने चार वर्णों को प्रवृत्त किया । इस प्रकार यह काश्यवशीय राजामी का वृत्तान्त वहा गया, भय रनि की सन्तान का वर्णन श्रवण करो ॥१८२१॥ पश्च नयाँ अध्याय रजेस्तु पुत्रशतान्यतुलवल पराक्रमसाराण्यासन् १११ देवासुरसग्रामारम्भे च परस्पर वधेप्सवो देवाश्वासुराश्च ब्रह्माणमुपेत्य पप्रच्छु ।२। भगवनस्माकमन विरोधे कतर पक्षो जेता भविष्यतीति १३. अयाह भगवान् ॥४॥ येषामर्थे रजिरात्तायुधो योत्स्यति तत्पक्षो अथ दैत्यरुपेत्य रजिरात्मसाहाय्यदानायाभ्यर्थित प्राह ।। योत्स्येऽह भगतामर्ये यद्यहममरजयाद्भवतामिन्द्रो भयियामोत्यारण्ये- तत्रभिहितम् ७। न वयमन्यया वदिष्यामोऽन्यया करिष्यामोऽम्मा- यमिन्द्र प्रह्लादस्तदर्थमेवायमुद्यम इत्युक्त्वा गतेष्वसुरेषु देवरप्य- सावनिपतिरेवमेयोक्तस्तेनापि च तथैवोक्ते देवरिन्द्रस्त्व भविप्यसीति समन्वीप्सितम् । जेतेति ।।

४८ ] [श्रीविष्णुपुराण थी पराशर जी ने वहा-रजि के अत्यन्त बली और पराक्रमी पांच सौ पुत्र उत्पन्न हुए ॥१॥ एक बार देवासुर-मग्राम का प्रारम्भ होने पर परस्पर मे मारने की इच्छा करते हुए देवताओ और दैत्यो ने ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे प्रश्न किया- हे भगवन् ! हमारे पारस्परिक कलह में किस पक्ष की विजय होगी? ॥२-३॥ इस पर ब्रह्माजी में कहा कि राजा रजि शस्त्र घारण पूर्वक जिसके पक्ष में युद्ध करेगा वही पक्ष जीतेगा ॥४-५॥ यह सुन कर दैत्यगण ने राजा रजि के पास जाकर उनसे सहायता मांगी, इस पर उन्होंने कहा कि यदि देवतानो पर विजय प्राप्त करके मैं दैत्यों का इन्द्र हो साता हूं तो अवश्य ही आपके पक्ष मे युद्ध करने को तैयार हूँ। ॥६-७॥ यह सुन कर दैत्य गण ने उनसे कहा- हे राजन् ! हम जो यह देते हैं, उससे विपरीत पाचरण कभी नहीं करते । हमारे इन्द्र प्रह्लाद हैं और उन्ही के लिये हम इस सग्राम मे तत्पर हुए हैं। इतना कह कर दैत्य गण वहाँ से चले गये । तब देवताग्रो ने वहाँ पाकर उनसे वैसी ही प्रार्थना की, जिसे सुन- कर उन्होने जो कुछ दैत्यो से कहा था, वही सब देवतामो से कह दिया । तर देवतामो ने उनकी बात स्वीकार करते हुए कहा-अच्छी बात है, आप ही हमारे इन्द्र होगे ॥६॥ रजिनापि देवसैन्यसहायेनानेकर्महास्त्रैस्तदशेपमहासुरवलं निपूदितम् ।। अथ जितारिपक्षश्व देवेन्द्रो रजिचरणयुगलमात्मनः शिरसा निपीड्याह ।१०। भयत्राणादन्नदानाद्भवानस्मत्पिताशेपलोका- नामुत्तमोत्तमो भवान् यस्याहं पुत्रत्रिलोकेन्द्रः ।११। स चापि राजा प्रहस्याह ।१२। एवमस्त्वेवमस्त्वनतिक्रमणीया हि वैरिपक्षादप्यनेक- विधचाटुवाक्यगर्भा प्रणतिरित्युक्त्वा स्वपुरं जगाम ।१३। शतक्रतुग्पीन्द्रत्व चकार ।१४। स्वर्याते तु रजौ नारदर्पिचोदिता रजिपुत्राश्शतक्रतुमात्मपितृपुत्र समाचाराद्राज्यं याचितवन्तः ॥१५॥ अप्रदानेन च विजित्येन्द्रमतिबलिन. स्वयमिन्द्रत्व चक्र . ।१६। इस प्रकार राजा रजि ने देवतामो की सहायता की और युद्ध भूमि मे उपस्थित होकर अपने महान प्रस्त्रो से दैत्यो यी सम्पूर्ण सेना का सहार कर * चतुर्थ अश-अ० ६ ] [४६ का डाला ॥६॥ जब शत्रु-पक्ष पर विजय प्राप्त हो गई, तब देवराज इन्द्र ने महा- राज रजि के दोनो चरणो को अपने शिर पर धारण करके पहा ॥१०॥ हे राजन् । भय से बचाने और अन्न-दान करने के कारण आप हमारे पिता के समान हैं क्योकि पाप तीनो लोको मे सर्वोत्कृष्ट है, इसलिए मैं तीनो लोको का प्रापका पुत्र ही हूं ॥११॥ इस पर राजा ने हंसते कहा-ऐसा ही हो । क्योकि शत्रु-पक्ष भी अनेक प्रकार वी चाटुकारिता पूर्ण प्रार्थनामो को मान लेना ही उचित समझा जाता है । यह कह कर राजा रजि अपने नगर को चले गये ॥१२-१३। इस प्रकार शतक्रतु इन्द्र ही इन्द्र पद पर बना रहा । फिर जब राजा रजि की मृत्यु हो गई, तब देवर्षि नारद जी की प्रेरणा से उसके पुत्रो ने अपने पिता के पुन- भाव को प्राप्त हुए इन्द्र से स्वग के राज्य की मांग की और जब इन्द्र ने उन्हे राज्य न दिया, तब उन रजि पुत्रो ने इन्द्र पर पाकगण करके उसे जीत लिया और स्वय ही इद्र पद पर अभिपिक्त होकर स्वर्ग का राज्य भोगने लगे ।।१४-१६॥ ततश्च बहुतिथे काले ह्यतीते बृहस्पतिमेवान्ते दृष्ट्वा अपहृत-लो कायज्ञभाग शतक्रतुरुवाच ।१७। बदरोकनमात्रमप्यर्हसि ममाप्यायनाय पुरोडाशसण्ड दातुमित्युक्तो वृहस्पतिरवाच ।१८। यद्य व त्वयाह पूर्वमेव चोदितस्स्या तन्मया त्वदर्थ किमर्त्तव्यमित्यल्परेवाहोभिस्त्वा निज पद प्रापयिप्यागोत्यभिधाय तेपामनुदिनमाभिचारिक बुद्धिमोहाय शाम्य तेजोऽभिवृद्धये जुहाव ।१६। ते चापि तेन वुद्धिमोहेनाभिभूयमाना ब्रह्म द्विपो धर्मत्यागिनो वेदवादपराड मुसा वभूव ।२०। ततस्तानपेत- धर्माचारानिन्द्रो जघान २११ पुरोहिताप्यायिततेजाश्च दशको दिवमा- प्रमत् ।२२॥ एतदिन्द्रस्य स्वपदच्यवनादारोहण श्रुत्वा पुरुप स्वपदभ्र र दौरात्म्य च नानोति ॥२३॥ फिर अब बहुत पाल उपतीत हो गया, तर एक दिन अपने गुरु वृह- पति जी को एकान में बैठ हुए देय रानीय थे यश-भाा से वक्ति ।

५०] [ श्रीविष्णुपुराण इन्द्र ने उनके प्रति कहा-क्या मेरी तृप्ति के लिये मुझे पाप बदरीफल के बराबर भी पुरोडाश का अश दे सकते हैं ? यह सुन कर वृहस्पति नी बोले ॥१७-१८॥ यदि तुम यह चाहते थे तो तुमने मुझे पहिले ही क्यो नही बताया ? तुम्हारे लिये मुझे अकर्तव्य क्या है ? अब मैं कुछ ही समय मे तुम्हे तुम्हारे पद पर बिठा दूंगा । यह कह कर वृहस्पतिजी ने रजि के पुत्रो को बुद्धि को भ्रमित करने के लिपे अभिचार कर्म मौर इन्द्र के तेज को बढाने के लिये भजन करना प्रारम्भ किया ॥१६॥ बुद्धि को मोहित कर देने वाले उस अभिचार कर्म के प्रभाव वश रजि-पुत्रो ने बाह्मणो से द्वेप, धर्म का परित्याग और वैदिक कर्मों से विमुखता प्रारम्भ की ॥२०॥ इसके पश्चात् धर्माचरण से हीन हुए उन रजि पुत्रो का इन्द्र ने वध कर दिया ॥२१॥ देव पुरोहित वृहस्पनि जो के द्वारा उसको तेजोवृद्धि की जाने पर ही इन्द्र इस प्रकार स्वर्ग पर अधिकार करने में समर्थ हुआ ॥२२॥ अपने इद्र पर से पतित हुए इन्द्र के उस पुनः प्रारूढ होने वाले इस प्रसग को जो पुरुष श्रवण करता है, वह अपने पद से कभी नहीं गिरता और न उसमे कभी दौरात्म्य का ही प्रवेश होता है ॥२३॥ रम्भस्त्वनपत्योऽभवत् ।२४। क्षत्रवृद्धसुत. प्रतिक्षत्रोऽभवत् ।२५। तत्पुत्रः सञ्जयस्तस्यापि जयस्तस्यापि विजयस्तस्माच जज्ञे कृतः ।२६। तस्य व टंधनो हर्यधनसुतस्सहदेवस्तस्माददीनस्तस्य जयत्से- नस्ततश्च सस्कृतिस्तत्पुत्र.क्षनधर्मा इत्येते क्षत्रवृद्धस्य वंश्याः ।२७। ततो नहुपवश प्रवक्ष्यामि । प्रायु-पुत्र रम्भ के कोई सन्तान नही थी ॥२४॥ क्षत्रवृद्ध का जो पुत्र हुआ, उसका नाम प्रतिक्षन था। प्रतिक्षत्र का पुत्र सजय, सजय वा जय, जय का विजय और विजय का पुत्र कृत हुमा । कृत का हबंधन, हयंधन का सहदेव, सहदेव का प्रदीन और उसका पुत्र जयत्सेन हुप्रा । जयत्सेन के पुत्र का नाम सस्कृति और सस्कृति का पुरा क्षत्रधर्मा हुमा । ये सभी क्षत्रवृद्ध के वश हुए । मैं नहुपदश के विषय मे कहूंगा ।।२५-२८।। प्रब चतुर्थ-अंश-अ०१०] दसवाँ अध्याय यतिययातिसंयात्यायातिवियातिकृतिसंज्ञा नहुपस्य पद पुत्रा महावलपराक्रमा वभूवुः ।। यतिस्तु राज्यं नैच्छत १२॥ ययातिस्तु भूभृदभवत् ।३। उशनसश्च दुहितरं देवयानी वार्यपर्वणी च शर्मिष्ठामु- पयेमे।४। अत्रानुवंशश्लोको भवति ॥५॥ यदु च दुर्वसु चैव देवयानी व्यजायत । द्रुह्य चानुच पूरुच शर्मिष्ठा वापपर्वणी ।६। श्री पराशर जी ने कहा-नहुष के छः हुए, उन महान बल विक्रम- शालियो का नाम यति, ययाति, सपाति, प्रायाति, यियाति और कृति था ॥१॥ यति को राज्यपद की कामना नहीं थी, इसलिये ययाति ही राज्यपद कर अभिषिक्त हुन्ना ॥२-३।। ययाति शुकाचार्य को कन्या देवयानी और दृषपर्वा की कन्या शमिष्ठा का पाणिग्रहण किया 1४1 उनका वंश-विषयक यह श्लोक प्रचलित है-देवयानी के उदर से यदु और दुर्वसु तथा वृपपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा के गर्भ से व ह्य., अनु, और पूरू उत्तम हुर ॥५-६॥ काव्यशापाच्चाकालेनैव ययातिर्जरामवाप १७। प्रसन्नशुक्रवच- नाच्च स्वजरा सङ्कामयितु ज्येष्ठ पुत्र यदुमुवाच ।। वत्स त्वन्मा- तामहशापादियमकालेनैव जरा ममोपस्थिता तामहं तस्यैवानुग्रहाद्भव- तस्सञ्चारयामि । एक वर्षसहस्रमतृप्तोऽस्मि विषयेषु त्वद्वयसा विषयानह भोक्तुमिच्छामि ।१०। नात्र भवता प्रत्याख्यन कर्त्तव्यमि. त्युक्तस्स यदुनैच्छत्तां जरामादातुम् ।११। त च पिता शशाप त्वत्प्रसूतिन राज्याही भविष्यतीति ।१२। शुक्राचार्य जी के शाप के वारण ययाति को मे ही बुढापा जब शुक्राचार्य जी प्रसाद हो गये तब उनके कहने से ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से उस वृद्धावस्था को रहण करने के लिये महा 10 हे पृ! मैं तुम्हारे नानाजी के शाप से असमय मे ही वृद्ध हो गया हूँ, अब उनको ही कृपा मुझे प्राप्त हुई है, जिसके, पारण वह वृद्धावस्था मैं अब तुम्हे देना चाहता हूँ | विषयो के भोग असमर प्रागया ॥७॥ कालान्तर १२] [ श्रीविष्णपुगग पभी मरी मृमि नहीं हो पाई है, इसलिए मैं तुम्हारी युवायम्पा या उपभोग एयर या तर परना पाहता ॥१०॥ तुम्हें इस विषय में कोई रिनार परम की भावना नहीं है। मपो पिना मी ऐगो पामा मुन पर भी या ने पोनि की सायम्मा पहल परने की इच्छा नहीं नी । यह देस गर ति ने उसे मागि मितेरी मति राधिकार से यपित होगी ॥१२॥ प नुवंगु दु मनु च पृथिवीपतिरामहणायं म्ययोग्नप्रसनाप नापयामाग || नरपेवेन प्रत्यारयातस्तान्छ- गार पर मिहाननयमभेषानीयाम पूरे तयार ॥१५॥ म पारिवानि गयमान पितर प्रगम्य महाप्रमादोज्यमम्मामि- रनुसारमभिधाय जग जमार ।१६म्यारीय प योरन म्यपिो ददौ १७॥ गांरिपोरम नमामाच पाविरोधेन गमाराम गयामातो. গনমা fামনা ?! শ ণ মায়ানমার १६॥ रिचाया दंग्याला २ गोपनोग गुगना पामानामन्न प्रागागानि उ.मागी पभूग 101 मनुदित पोपभोगत. पामारम्बातावमाया।

चतुर्थ अश-अ० १० ] [ ५३ अनेक प्रकार के सुसो का उपभोग करते हुए अपनी कामनामो को समाप्त करने की बात सोचते सोचते अनमने से रहने लगे ॥२०॥ निरन्तर अपने इच्छित विपयो के भोगते रहने से उन कामनानो मे ही उनकी प्रीति बढती गई तव उन्होने इस प्रकार कहा ॥२१-२२।। न जातु काम वामानामुपभोगेन शाम्यति हविपा कृष्णवमेव भूय एवाभिवर्द्ध ते १२३। यत्पृथिव्या व्रीहियव हिरण्य पशव स्त्रिय । एक्स्यापि न पर्याप्त तस्मात्तृष्णा परित्यजेत् ॥२४॥ यदा न पुरुते भाव सर्वभूतेपु पापकम् । समदृष्टेस्तदा पु स सर्वास्सुखमया दिश ॥२५॥ या दूस्त्यजा दुमतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत । ता तृष्णा सन्त्यजेत्प्राज्ञस्सुयेनेवाभिपूर्यते 1२६। जीर्यन्ति जीर्यत केशा दन्ता जीयन्ति जीर्यत । धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यत ।२७। पूर्ण वर्षसहस्त्र मे विषयासक्तचेतस । तथाप्यनुदिन तृष्णा मम तेपूपजायते ॥२८॥ तस्मादेतामह त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् । निर्द्वन्द्वो निर्ममो भूत्वा चरिणय मि मृगस्सह ।२६। भोगो वे भोगते रहने से उनकी तृष्णा पभी शान्त नहीं होती, किन्तु प्राण्याहुति से प्रवृद्ध होने वान अग्नि के रामान निरन्तर बढती जाती है ।।२३।। भूमण्डन पर जितने भी धा य, जौ, स्वर्ण पशु और स्त्रियां हैं वे सब एक मनुष्य के लिये भी तृप्त नहीं कर सकते, इमलिय इस तृष्णा का सर्वथा त्याग करना चाहिए ॥२४॥ जब काई पुरप स्मिी भी प्राणी के प्रति पापमयो दृष्टि नही रसता तब उस समदर्शी के लिए दिशायें ग्राम ददायिनी हो जाती है ॥२५॥ जो तृष्णा खोटी युद्धि वालो के लिये प्रत्य त कठिनाई पूर्वय त्यागी जा सकती है और जो वृद्धावस्था म भी शिथिनता को प्राप्त नहीं होती, उसी [ श्रीविष्णुपुराण तृष्णा को त्याग वर बुद्धिमान पुरप पूर्ण रूप से सुखी हो जाता है ॥२६॥ जीविस्था के प्राप्त होने पर बाल और दांत जो जीर्ण हो जाते हैं, परन्तु उनके जीर्ण होने पर भी धन और जीवन को माशा जीर्ण नही हो पाती ॥२७॥ इन विषयो मै प्रासक्त रहते हुए मेरे एक हजार वर्ष व्यतीत होगये, फिर भी उनके प्रति नित्य ही इच्छा रहती है। इमलिये, अब मैं इसको त्याग कर अपने चित्त को ब्रह्म मे लगाऊंगा और निर्द्वन्द्व तथा निर्मम होकर मृगो के साथ विचरण करूंगा ॥२८-२६॥ पूरोम्सकाशादादाय जरां दत्त्वा च यौवनम् । राज्येऽभिपिच्य पूरुच प्रययौ तपसे वनम् ॥३०॥ दिगि दक्षिणपूर्वस्या तुर्वसु च समादिशत् । प्रतीच्यां च तथा द्रुह्य दक्षिणायां ततो यदुम् ॥३१॥ उदीच्यां च तयवानुकृत्वा मण्डलिनो नृपान् । सर्वपृथ्वीपति पूर सोऽभिषिच्य वनं ययौ ॥३२॥ श्री पराशरजी ने कहा-इमके मनन्तर राजा ययाति ने पूरु से अपनी वृतापापा वापिस लेकर उसकी युवावस्या उसे लौटा दी और उसका राज्या- मि पर स्यय यन को पने गये ॥३०॥ उन्होंने दक्षिण-पूर्ण मे तुवंगु, परिनम में दाय, दक्षिण में यदु पोर उत्तर में अनु को माएडलिय राज्य दिया पौर पर पो गमस्त पृथियों के राज्यपद पर भिषिक्त कर स्वयं यन के सिव एम दिये ॥३१-३२॥ ग्यारहव अध्याय प्रतः परं ययाः प्रयागम्य यदोयंगमहं यथयामि ॥१॥ समारोपनीर निवामो मनुष्यमिदगन्धयाराक्षारगुणारिपुरप्परउर- गपिगरपदानगरियादयस्पश्चिमायाभिमुमुशुभिर्धपिपाममो- चतुर्थ अंश-अ० ११] [ ५५ क्षाथिभिश्च तत्तत्फललाभाय सदाभिष्टुतोऽपरिच्छेद्यमाहात्म्यांशेन भगवाननादिनिधनो विष्णुरवततार ।२। अत्र श्लोक ।३। यदोर्वशं नरः श्रुत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते । यत्रावतीणं कृष्णाख्यं परं ब्रह्म निराकृति ।४। सहस्रजित्कोष्टुनलनहुपसंज्ञाश्चत्वारो यदुपुत्रा बभूवुः ।। सहस्र जित्पुत्रशतजित् ।६। तस्य हैयहेहयवेणुहयात्रयः पुत्रा बभूवः १७। हैहयपुत्रो धर्मस्तस्यापि धर्मनेत्रस्ततः कुन्तिः कुन्तेः सहजित् ।। तत्तनयो महिष्मान् योऽसौ माहिष्मती पुरी निवासयामास ।। श्री पराशर जी ने कहा- अव मैं ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु का वश तुमसे कहता हूं ॥१॥ जिस वश मे मनुग्य, सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, गुह्यक, किंपुरप, अप्सरा, उरग, विहग, दैत्य, दानव, आदित्य, रुद्र, वसु, अश्विनीद्वय, मरवण, देवपि, मुमुक्षुजन और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के अभिलापीजनो द्वारा रादा स्तुत होने वाले सकल विश्व के आश्रय, आदि अन्त से रहित भगवान् विष्णु ने अवतार धारण किया था ॥२॥ इस विषय मे यह श्लोक कहा जाता है ।।३॥ जिम वश मे श्रीकृष्ण नामक निराकार परब्रह्म प्रवतीर्ण हुये थे, उस यदुवंश को सुनने से सभी पापो से छुटकारा मिलता है ॥४॥ यदु के चार पुत्र हुए, सहस्रजित, कोष्टु, नल और नहुप उनके नाम थे। सहस्रजित का पुत्र शतजित् और शतजित् के हैहय, हेहय और वेणुहय नामक तीन पुत्र हुए ॥५-७।। हैहय का पुत्र धर्म हुआ, धर्म या धमनेत्र, धर्मनेत्र का कुन्ति, कुन्ति का सहाजित् और सहमित का पुन महिष्मान हुआ, जिसने माहिष्मतीपुरी को बसाया था ॥८-६।। तस्माद्रश्रेण्यस्ततो दुर्दमस्तस्माद्धनको धनकस्य कृतवीर्यकृता- ग्निकृतधर्मकृतौजसश्चत्वार. पुत्रा बभूवुः ॥१०॥ कृतवीर्यादर्जुनस्सप्त- द्वीपाधिपति हुसहस्रो जज्ञे ११ योऽसौ भगवदशमग्रिकुलप्रसूत दत्ता- श्रेयाख्यमाराध्य बाहुसहस्रमधर्मसेवानिवारण स्वधर्मसेवित्वं रणे पृथिवीजयं धर्मतश्चानुपालनमरातिभ्योऽपराजयमसिलजगत्प्ररयात- पुरुषाच्च मृत्युमित्येतान्यरानभिलपितवांल्लेभे च ।१२। तेनेयमशेपद्वीप-

५६ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
-
वती पृथिवी सम्यक्परिपालिता ।१३। दशयज्ञसहस्राण्यसावयजत् ॥१४॥
तस्य च श्लोकोऽद्यापि गीयते ॥१५॥
न नूनं कार्तवीर्यस्य गति यास्यन्ति पार्थिवाः ।
यज्ञैनिस्तपोमिवो प्रश्रयेण श्रुतेन च ।१६।
अनष्टद्रव्यता च तस्य राज्येऽभवत् ॥१७॥ एव च पञ्चाशीतिवर्प-
सहस्राण्यव्याहतारोग्यश्रीवलपराक्रमो राज्यमकरोत् ।१८।
महिष्मान् का पुत्र भद्रभ्रेग्य, भद्रश्रेण्य का दुर्दम, दुर्दम का धनक
और धनक के कृतबीयं, कृताग्नि, कृतधर्म और कृतीजा नाम चार पुत्र उत्पन्न
हए ॥१०॥ कृतवीर्य का पुत्र सातो द्वीपो का अधिश्वर सहस्रबाहु अर्जुन हुआ
॥११॥ उसने अतिकुलोत्पन्न भगवान् के अंशरूप श्री दत्तात्रेयजी की आराधना
पर हजार भुजायें, अधर्माचरण की शान्ति, अपने धर्म का सेवन, सग्राम
द्वारा सम्पूर्ण भूमण्डल पर विजय, धर्मानुसार प्रजापालन, शत्रुप्रो से अजेयता
मोर अखिल जगत प्रसिद्ध पुरुप के हाथ से मरण आदि अनेक वर प्राप्त किये
थे ॥१२॥ उस अर्जुन ने इस सात द्वीप वाली सम्पूर्ण पृथिवी का पालन करते
हुए दस हजार यज्ञ किये थे ॥१३-१४॥ उसके विषय में यह श्लोक अब तक
गाया जाता है ॥२५॥ यज्ञ, दान, तपस्या, विनम्रता और विद्या मे कोई
भी राजा कातवीर्य के समान नहीं हो सकता ॥१६॥ उसके राज्य काल में
कोई भी पदार्थ नष्ट नही हुआ ॥१७॥ उसने बल, पराक्रम, प्रारोग्य और
सम्पत्ति की भले प्रकार सुरक्षा-व्यवस्था पूर्वक पिचासी हजार वर्ष तक इस
पृथिवी पर राज्य किया था ॥१८॥
माहिप्मत्या दिग्विजयाभ्यागतो नर्मदाजलावगाहनक्रीडाति-
पानमदाफुलेनायत्नेनैव तेनारोपदेवदैत्यगन्धर्वेशजयोद्भूतमदावलेपोऽपि
रावण. पशुरिव वद्ध वा स्वनगरकान्ते स्थापितः ।१६। यश्च पञ्चाशीति-
वर्पसहस्रोपलक्षणकालावसाने भगवन्नारायणाशेन परशुरामेगोसपहृतः
१२०॥ तस्य च पुत्रशतप्रधानाः पञ्च पुत्रा वभूवुः शूरसूरसेनवृपसेन-
मधुजयध्वजमज्ञा. ॥२१॥

चतुर्थ अंश-अ० १२ ] [ ५७ जयध्वजात्तालजवः पुनोऽभवत् ।२२। तालजङ्घस्य तालजङ्घाख्यं पुत्रशतमासीत् ।२३। एपा ज्येष्टो वीतिहोनस्तथान्यो भरतः ।२४। भरतावृपः ।२५। वृपस्य पुनो मधुरभवत् ।२६॥ तस्यापि वृष्णिप्रमुखं पुत्रशतमासीत् ।२७॥ यतो वृष्णिसज्ञामेतद्वोनमवाप ।२८। मधुसज्ञाहेतुश्च मधुरभवत् ।२६। यादवाश्च यदुनामोपलक्षणादिति ३० एक दिन की बात है कि वह अत्यन्त मद्य-पान के कारण व्याकुल होकर नर्मदा के जल मे क्रीडा कर रहा था, तभी सब देवता, दैत्य, गधर्व और राजानो पर विजय प्राप्त करने के मद से उन्मत्त हुए दिग्विजय के अभिलापी रावण ने उसकी राजधानी माहिष्मतीपुरी पर आक्रमण कर दिया, तब सहस्रार्जुन ने उसे अनायास ही पशु के समान बांधकर अपनी पुरी के एक जन-हीन स्थान मे डाल दिया ॥१६॥ पिचासी हजार वर्ष राज्य करने के उपरान्त भगवान नारायण के अशावतार श्री परशुराम जी ने उसे मार दिया ॥२०॥ इसके सौ पुत्र ये, जिनमे शूर, शूरसेन, वृपसेन, मधु और जयध्वज प्रमुख हुए ॥२१॥ जयध्वज का पुन तालजय था, उसके सौ पुत्रो मे सबसे बडा बोतिहोच और दूसरा भरत हुआ ।।२२-२४।। भरत का पुत्र वृप हुमा, वृष का पुत्र मधु और मधु के सौ पुत्र हुए, जिनमे वृष्णि सबसे बडा था। उसी के नाम पर यह वश 'वृष्णि' नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥२५-२८।। मधु के कारण यह मधु सशक हुमा और यदु के कारण इस वश के पुरुप 'यादव' कहे जाने लगे ॥२६-३०॥ वारहवाँ अध्याय क्रोष्टोस्तु यदुपुनस्यात्मजो ध्वजिनीवान् ।। ततश्च स्वातिस्ततो शडक रुशङ्कोश्चित्ररथः ।। तत्तनयशशि विन्दुश्चतुर्दशमहारले. सापकवयंभवत् ।३। तस्य च शतसहस्र पत्नीनामभवत् ।४। दशलक्ष- संख्याश्च पुत्रा. ५॥ तेपा च पृथुश्रवाः पृथुकर्मा पृथुकीति, पृथुयशाः ६०]. [ श्रीविष्णुपुराण नाहं प्रसूता पुत्रेण नान्या पल्यभवत्तव । स्नुपासम्बन्धता ह्ये पा कतमेन सुतेन ते ॥२६॥ ऐसा विचार राजा ज्यानघ ने उस राज्यकन्या को अपने रथ पर चढाया और अपने नगर को चल दिये ॥३॥ विजय प्राप्त करके लौटे हुए, राजा के दर्शनाय प्राने सब पुरजनों, मेवको कुटुम्बियो और मविर्षों के सहित रानी शव्या स्वय राजद्वार पर उपस्थित थी ॥२४॥ उसने जैसे ही राजा के वामाङ्ग मे उस राज्यकन्या को वैठी हुई देखा, वैसे ही प्रत्यत क्रोध के कारण कांपते हुए अधरो से कहा ।।२५।। हे चपलचित्त वाले महाराज ! पापने अपने रथ मे किपे बिठा रखा है ? ॥२६॥ यह सुन कर राजा को कोई उत्तर न सूझा और उसने भय पूर्वक कहा~यह मेरी पुत्र-वधू है ॥२७॥ इस पर शव्या ने कहा~मेरे ता कभी कोई पुत्र ही नहीं हुआ और आपको कोई अन्य पत्नी भी नहीं है, फिर यह प्रापको पुन व किस प्रकार से हुई ? ॥२८-२९।। इत्यात्माकोपकलुपितवचनमुपितविवेको भयाद्दुरुक्तपरिहा- रार्थमिदमवनीपतिराह ।३०) यस्ते जनिष्यत पात्मजस्तस्येयमनागत- स्यैव भार्या निरूपितेत्याकोद्भूतमृदुहासा तथेत्याह ३११ प्रविवेश च राज्ञा सहाधिष्ठानम् ।३२१ अनन्तर चातिशुद्धलग्नहोराशकावयवोक्तकृतपुत्रजन्मलाभगुणा- द्वयस. परिणाममुपगतापि शेव्या स्वल्परेवाहोभिर्गर्भमवाप ।३। कालेन च कुमारमजोजनत् ।३४। तस्य च विदर्भ इति पिता नाम चक्र १३५ स च ता स्नुपामुपयेमे १३६॥ तस्या चासो ऋथकैशिकसज्ञी पुनावजनयत् ।३७ श्री पराशरजी ने कहा-रानी शव्या के इन ई और कोय मिश्रित वचनो को सुनकर विवेकहीनता और भय के कारण कहे हुए अपन मसम्बद्ध वचनो से उत्पन्न हुए सदेह को मिटाने के विचार से राजा ने कहा-मैंने तुम्हारे होने वाले पुत्र के लिए अभी से यह पत्नी निश्चित कर दी है। यह सुन कर रानी ने मुसकाते हुए मृदु शब्दो मे कहा- ऐसा ही हो । इसके पश्चात् राजा के साथ नगर मे प्रविष्ट हुई ॥३१-३२॥ इसके

चतुर्थ अश-प्र० १२ ]
[६१
पश्चात् पुत्र प्राप्ति के गुरो वाली उस अत्यन्त शुद्ध लग्न मे, होराशक अवयव
के समय जो पुष-विषयक सम्भाषण हुअा था, उसके प्रभाव से, गर्भधारण योग्य
अवस्था के निकल जाने पर भी शेष्या गर्भवती हो गई और समय प्राप्त
होने पर उसके उदर मे पुत्र का जन्म हुमा ॥३३.३४॥ पिता ने उसका नाम-
फरण करते हुए विदर्भ राज्ञा दी ॥३५॥ फिर उसी के साथ उस राजकन्या
का विवाह हुमा ॥३६॥ विदर्भ ने उससे क्रय और कैशिक नाम के दो पुत्र
उत्पन्न किये ॥३॥
पुनश्च तृतीय रोमपादसज्ञ पुनमजीजनद्यो नारदादवाप्तज्ञानवान-
भवत् ।३८। रोमपादाभ्रर्यभ्रो तिघृते. कैशिक. कैशिवस्या प चेदिः
पुनोऽभवद् यस्य सन्तती चैद्या भूपाला. १३६॥
क्रथस्य स्नुपापुनस्य कुन्तिरभवत् ।४०। कुन्ते धूिप्टेनिधृति-
निवृतेर्दशाहस्ततश्च व्योमा तस्यापि जीमूस्ततश्च विकृतिस्ततश्च भीम-
रथ तस्मान्नवरथस्तस्यापि दशरयस्ततश्च शकुनिः तत्तनयः करम्भिः
करम्भेदेवरातोऽभवत् ।४१। तस्माद्दे वक्षस्तस्यापि मधुर्मधो कुमारवशः
कुमारवशादनुग्नो पुरुमित्र. पृथिवीपतिरभवत् ।४२। ततश्वाशुस्तस्मा-
च्चसत्वत.१४३॥ सत्वतादेते सात्वता ॥४४॥ इत्येता ज्यामघस्य सन्तति
सम्यक्ट्रद्धासमन्वित श्रुत्वा पुमान् मैनेय स्वपापै प्रमुच्यते ॥४५॥

६२] [ श्रीविष्णुपुराण सात्वत वश का प्रारम्भ हुमा ॥४४॥ हे मंडेयजी । ज्यामद्य की सतति के इस वर्णन को जो श्रद्धा सहित सुनता है, वह अपने सभी पापों से छूट जाता है।४५॥ तेरहवाँ अध्याय भजनभजमान दिव्यान्धकदेवावृधमहाभौजवृष्णिसज्ञास्सत्वतस्य पुना बभूवु ११ भजमानस्य निमिकृकणवृष्णयस्तथान्ये द्वैमात्रा. शतजित्सहस्रजिदयुत जित्सज्ञानय. २॥ देवावृधस्यापि वभ्र पुत्रोऽभवत् १३। तयोश्वाय श्लोको गीयते ॥४॥ यथैव शृणुमो दूरात्सम्पश्यामस्तथान्तिकात् । वभ्र श्रेष्ठो मनुष्याणा देवैर्देवावृधस्सम ।५। पुरुषा पट् च पष्टिश्च षट् सहस्राणि चाट च । तेऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि ।। महाभोजस्त्वतिधर्मात्मा तस्यान्वये भोजा मृत्तिकावरपुरनिवा- सिनो मातिकावरा बभूवु 1७। वृष्णे सुमित्रो युधाजिच्च पुनावभूताम् It ततश्चानमिनस्तथानमिनान्निध्न । निघ्नस्य प्रसेनसत्राजितो ११०॥ तस्य च सत्राजितो भगवानादित्य. सखाभवत् ॥११॥ श्रीपराशरजी ने कहा-सत्वत के पुत्री के नाम भजन, भजमान, दिव्य, अन्धक, देवावृध, महाभोज और वृष्णि थे ॥१॥ भजमान के छ पुत्र हुए-निमि, कृष्ण पौर वृष्णि तथा इनके विमाता-पुत्र शतजित सहस्रजित और अयुतजिति ये ॥२॥ देवावृध के पुत्र का नाम बम्र था ।३। इन दोनो के विषय मे यह श्लोक गाया जाता है-जैसा दूर से सुना वैसा ही समीप से देखा, अभ्र मनुष्यो में घेठ तथा देवावृध देवताओं के सदृश है। बभ्र, और देवावृध के मार्ग से छ: हजार चौहतर मनुष्यो को अमृतत्व को प्राप्ति हुए पो ।।४-६॥ महाभोज अत्यन्त धर्मात्मा पुहुप था, उसको सन्तान भोजवशी मात्तिकावर राजापो के रूप में चतुर्थ अंश-अ०१३ ] [६३ प्रसिद्ध हुई ॥७॥ वृष्णि के दो पुत्र-सुमिन और युवजित् नाम से हुये । उनमे से सुमित्र का पुत्र अनमित्र, अनमित्र का निधन और निघ्न से प्रसेन और समाजित् को पुत्र हुए ॥८-१०॥ भगवान् श्रादित्य उसी सत्राजित् के मित्र हो गये थे ॥११॥ एकदा त्वम्भोनिधितीरसंश्रयः सूर्य सत्राजित्तुष्टाव तन्मनस्कतया च भास्वानभिष्ट्रयमानोऽग्रतस्तस्थौ ।१२। ततस्त्वस्पष्टमूर्तिधरं चैनमा- लोक्य सत्राजित्सूर्यमाह ।१३१ यथैव व्योम्नि वह्निपिण्डोपम त्वामहम- पश्य तथैवाद्याग्रतो गतमप्यत्र भगवता किञ्चिन्न प्रसादीकृत विशेपमुप- लक्षयामीत्येवमुक्ते भगवता सूर्येण निजकण्ठादुन्मुच्य स्यमन्तकं नाम महामणिवरमवतार्यकान्ते न्यस्तम् ।१४। । ततस्तमालासोज्ज्वलं ह्रस्ववपुरमीपदापिझलनयनमादित्यम- द्राक्षीत् ॥१५॥ कृतप्रणिपातस्तवादिकं च सत्राजितमाह भगवानादित्य- स्सहस्रदीधितिर्वग्मस्मत्तोऽभिमतं वृणीष्वेति ।१६। स च तदेव मरिण- रत्नमयाचत ।१७। स चापि तस्मै तद्दत्त्वा दीधितिपतिवियति स्वधिष्ण्यमारुरोह ॥१८॥ एक दिन समुद्र के किनारे पर बैठे हुए सत्राजित् ने भगवान् मादित्य की स्तुति की तब उसके तन्मयतापूर्वक भाराधन को देखकर भगवान् सूर्य उसके सम्मुख प्रकट हो गए ॥१॥ उस समय उन्हे प्रस्पष्ट स्वरूप में देखकर सत्राजित् ने उनसे कहा ॥१३॥ जिस अनि पिण्ड के रूप में मैंने प्रापको प्राकाम में देखा था, जैसे ही रूप मे महाँ प्रत्यक्ष पधारने पर देख रहा हूँ। इस रूप में आपको रूपी कोई विशेपता मुझे दिखाई नहीं दे रही है। सवाजिन की बात सुन कर सूर्य ने स्यमन्तक नाग की श्रेठ महामणि को अपने कद से उतार कर पृथक् रख दिया ॥१४॥ तब सत्राजित् नै उनके स्वरूप को देखा कि वह कुछ ताम्रपणं, अत्यन्त उज्वल भोर छोटा था तथा उनके नेत्र पुछ पोले रंग के से थे ॥१॥ इसके पश्चात् समानित ने उन्हें प्रणाम, स्तुति मादि से प्रसन्न रिया तय भावान भास्कर ने उममे अपना प्रभारी वर मांगने को कहा ॥१६॥ इम पर सत्राजित [ श्रीविष्णुपुराण ने उस स्यमन्तक मणि को ही याचना को ॥१७॥ भगवान भास्कर उसे वह मरिण प्रदान कर अपने स्थान को अन्तरिक्ष-माग से चले गये ॥१८॥ सत्राजिदप्यमलमणिरत्नसनायकण्ठतया सूर्य इव तेजोभिरशेप- दिगन्तराण्युद्भासयन् द्वारका विवेश ।१९। द्वारकावासी जनस्तु तमायान्तमवेक्ष्य भगवन्तमादिपुरुप पुरुषोत्तममवनिभारावतरणायाशेन मानुपरूपधारिण परिणपत्याह ।२०। भगवन् भवन्त द्रप्टु नूनमयमादित्य आयातीत्युक्तो भगवानुवाच ।२१। भगवान्नायमादित्य. सनाजिदयमा- दित्यदत्तस्यमन्तकारय महामणिरत्न विभ्रदनोपयाति १२२॥ तदेन विश्रब्धाः पश्यतेत्युक्तास्ते तथैव ददृशु ।२३। स च त स्यमन्तकमणिमात्मनिवेशने चक्रे ।२४। प्रतिदिन तन्मणिरत्नमष्टौ कनकभारान्स्रवति ॥२५॥ तत्प्रभावाच्च सकलस्यव राष्ट्रस्योपसर्गानावृष्टिव्यालाग्निचोरदुर्भिक्षादिभय न भवति ॥२६॥ अच्युतोऽपि तद्दिव्य रत्नमुनसेनस्य भूपतेर्योग्यमेतदिति लिप्सा चक्र १२७ गोत्रभेदभयाच्छक्तोऽपि न जहार ।२८॥ इसके पश्चात् उस स्वच्छ मणि रत्न धारण से सुशोभित कराठ वाले सत्राजित् ने सभी दिशाओ को सूर्य के समान प्रकाशित करते हुए द्वारकापुरी मे प्रवेश पिया ॥१६॥ उस समय द्वारकावासी पुरुषो ने उसे आता देखकर भू-भार हर- णार्थ श रूप से पृथिको पर उत्पन हुये मनुष्य रूपी अादि पुरुष भगवान् श्री कृष्ण से कहा ॥२०॥ हे भगवन् । भगवान सूर्य प्रापके दर्शको के लिए पा रहे प्रतीत होते हैं। उनके द्वारा ऐमा कहे जाने पर भगवान् ने उनम कहा ॥२१॥ यह भगवान भास्कर नहीं, समाजित है। भगवान भास्कर से प्राप्त हुई स्यमन्तक नाम की महामरिण को धारण करके वह यहां पा रहा है ।।२२।। अब तुम सब उस ठीक प्रकार से दखो। भगवान् के वचन सुनकर सब द्वारकावासी उसे यथाय रूप मे देखने लगे ॥२३॥ उस स्यमन्तक मणि को सत्राजित् ने अपने घर में ले जाकर रख दी ॥२४॥ नित्य प्रति वह मणि पाठ भार स्वर्ण प्रदान करती थी ॥२५॥ उमो प्रभाव से सम्पूर्ण राष्ट्र रोग, मनावृष्टि, सर विष, अग्नि, चोरी, दुभिक्षा मादि भयो से सर्वया वचा रहता था ॥२६॥ भगवाद अच्युन को यह चतुर्थ अंश-अ० १३ ] [६५ इच्छा थी कि वह दिव्य रत्न महाराज उग्रसेन के योग्य है ॥२७॥ परन्तु, जाति में विद्रोह फैलने के डर से उन्होने समर्थ होते हुए भी उसे उरासे नहीं लिया ॥२८॥ सत्राजिदप्यच्युतो मामेतद्याचयिप्यतीत्यवगम्य रत्नलोभाभ्रात्रे प्रसेनाय तद्रत्नमदात् २९ तच्च शुचिना घियमारगमशेपमेव सुवर्णस्वादिकं गुरगजातमुत्पादयति अन्यथा धारयन्तमेव हन्तीत्यजा- नन्नसावपि प्रसेनस्तेन कण्ठसक्तेन स्यमन्त केनाश्वमारुह्याटव्यां मृगयामगच्छत् ।३०। तत्र च सिहाद्वधमवाप ।३१। साश्वं च तं निहत्य सिंहोऽप्यमलमणिरत्नमास्याग्रेरणादाय गन्तुमभ्युद्यत्त: ऋक्षाधिपतिना जाम्बवता दृष्टो घातितश्च ।३२१ जाम्बवानप्यमतमरिणरत्नमादाय स्व बिले प्रविवेश ।३३। सुकुमारसंज्ञाय वालकाय च क्रीडनकम करोत् ।३४१ सत्राजित् को ज्ञात हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण उस मरिण को उससे ले लेना चाहते हैं तो उसने लोभ के वश मे पड कर वह रत्न अपने भाई प्रसेन को दे दिया ॥२६॥ परन्तु प्रसेन को यह मालूम नहीं था कि उस मणि के पवित्रता पूर्वक धारण से तो यह स्वर्ण-दान प्रादि गुण बाली होती है और अपवित्रता से धारण करने पर घातक हो जाती है । इसलिए वह उसे कठ में धारण कर, अश्व पर बैठ कर मृगया करने के लिए वन को चला गया ॥३०॥ वहाँ वह एक सिंह के द्वारा मार डाला गया ॥३१॥ उसे पोडे के सहित मार कर सिंह ने उस निर्मल मणि को भरने मुंह में रखा और चलने को उद्यन हुमा, तभी अक्ष- राज जाम्बवान ने उस सिंह को मार डाला ॥३२॥ और उप निर्मल मरिसरल को ग्रहण करके जाम्बवान् पानी गुफा मे पहुंचा ॥३३॥ वहां जाकर उपने अपने सुकुमार नामक शिशु के लिए खिलौने के रूप में दे दिया ॥३५॥ अनागच्छति तस्मिन्प्रसेने कृपणो मणिरत्नमभिलपितवान्स च प्राप्तवान्नूनमेतदस्य कर्मेत्यखिलएव पदुलोकः परस्परं कर्णफकथयत् 1३५। विदितलोकापवादवृत्तान्तश्च भगवान् सर्वयदुरीन्यपरिवारपग्वृितः प्रसेनाश्वपदचीमनुससार ३६॥ ददर्श चाश्वसमवेतं प्रसेनं सिंहेन [ श्रीविष्णुपुराण विनिहतम् ॥३७। अखिलजनमध्ये सिहपददर्शनकृतपरिशुद्धिः सिंहपदम- नुससार ३८। ऋक्षपतिनिहतं च सिंहमप्यल्प भूमिभागे दृष्ट्वा ततश्च तद्रत्नगौरवादृक्षस्यापि पदान्यनुययो ।३६। गिरितटे च सकलमेव तद्यदुसन्यमवस्थाप्य तत्पदानुसारी ऋक्षविलं प्रविवेश ।४।। जब प्रपेन वन से लौट कर न पाया, तब यादवगण परम्पर में चर्चा करने लगे कि- उस मणि को कृष्ण हथियाना चाहते थे, इसलिए इन्ही ने ले लिया होगा। यह कार्य अवश्य ही कृष्ण ने किया है ॥३५॥ जब इस लोकाप. वाद को श्री कृष्ण ने मुगा तो वह सम्पूर्ण यादव सेना सहित प्रसेन के घोडे के पद-चिह्नो पर चल दिए और वन मे पहुंच कर देखा कि प्रसेन को उसके प्रश्व सहित सिंह ने मार डाला है ॥३६-३311 इस प्रकार मिह के चरण चिन्ह दिखाई देने पर भी अपने उपर लगे प्रारोप को दूर करने के लिए ये उस चिन्हों का अनुसरण करते हुए सब के सहित भागे बड़े और कुछ दूर जाने पर ही उन्हे ऋक्षराज द्वारा मारा गया वह निह भी मिल गया। फिर उस महामरिण की महिमा के कारण उन्होने ऋक्षराज के पद चिन्हो का भो अनुसरण किमा ॥३८- ३६॥ उस समय उन्होंने सब यादव-सेना पर्वत के किनारे छोड दी और जाव. पान के पद चिन्हों के सहारे चलते हुये उसकी गुफा मे प्रविष्ट हो गये ॥४॥ अन्तः प्रविष्टश्च धाव्या. सुकुमारकमुल्लालयन्त्या वाणी शुधाव ।४१ सिंहः प्रसेनमवधीसिहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्यप स्यमन्तकः ॥४२॥ इत्याकोपलब्धस्यमन्तकोन्तः प्रविष्टः कुमारकोडनकीकृतं च धात्र्या हस्ते तेजोभिर्जाज्वल्य मान स्यमन्तकं ददर्श ४३॥ तच स्यमन्तकाभिलपितचक्षुषमपूर्वपुरुषमागत समवेक्ष्य धात्री वाहि वाहीति व्याजहार ॥४४॥ तदातरवश्रवणानन्तरं चामपंपूर्णहृदयः स जाम्बवानाजगाम ।४५। तयोश्च परस्परमुद्धतामर्पयोयुद्धमेकविंशतिदिनान्यभवत् ।४६॥ च यदुसनिकास्तम सप्ताष्टदिनानि तनिष्कान्ति मुदीक्षमाणास्तस्थुः ॥४०॥ ते चतुथ अंश-अ० १३ ] [६७ अनिष्क्रमणे च मधुरिपुरसाववश्यमन विलेऽत्यन्तं नाशमवासो भविष्यत्यन्यथा तस्य जीवतः कथमेतावन्ति दिनानि शत्रुजये व्याक्षेपो भविष्यतीति कृताध्यवसाया द्वारकामागम्य हतः कृष्ण इति कथया- मासुः 1४८ तद्वान्धवाश्व तत्कालोचितमखिलमुत्तरक्रियाकलाप चक्र: १४६ गुफा मे पहुंचकर उन्होंने सुकुमार यो बहलाती हुई धाय के वचन मुनै- सिंह ने प्रसेन को मारा और ऋक्षराज ने सिंह को मार दिया। हे सुकुमार ! अब यह स्यमन्तक मरिण तेरी ही है, तू रुदन न कर ४१-४२॥ इम वाणी के सुनने से श्री कृष्ण को यह पता लग गया कि स्यमन्तक मरिण यही है तो उन्होने भीतर जाकर देखा कि धाम के साथ पर रखी हुई सुकुमार की खिलोना रूपिणी स्यमन्तक मणि अपने तेज से जाज्वल्यमान हो रही है ॥४३॥ तब स्यमन्तक मणि पो भोर कामना-भरी दृष्टि को देखते हुये एक अपूर्व पुरुष को वहां पापा हुमा देखकर 'माहि-त्राहि' कहती हुई धाय चीत्कार करने लगी ॥४४॥ उसकी पार्स-पुकार को सुनकर क्रोधित हुअा जाम्बवान वहाँ प्रा पहुंचा ॥४४॥ फिर दोनो मे परम्पर अत्यन्त रोप की वृद्धि हुई और इसकीस दिनो तक घोर सग्राम होता रहा ॥४६॥ श्री कृष्ण की प्रतीक्षा करती हुई यादव-सेना को जब सात- आठ दिन व्यतीत हो गये और लौट कर नही भाये तब उन्होंने सोचा कि 'कृष्ण अवश्य ही इस गुफा मे मृत्यु को प्राप्त हो गये, अन्यथा शत्रु को जीतने में उन्हे इतने दिन कदापि नही लग सकते थे। ऐना विचार धिर कर वे सब द्वारपा लोटे और वहाँ भी वे मारे जाने की बात कह दी 11४:४८1। यह सुन कर उनके बन्युमो ने उनको सम्पूर्ण मरणोत्तर क्रिया सम्पन्न कर दी uru ततश्चास्य युद्धघमानस्यातिश्रद्धादत्तविशिष्टोपपायुक्तानतोया- दिना श्रीकृष्णस्य बलप्राण पुष्टिरभूत् ॥५०॥ इतरस्यानुदिनमतिगुरुपुरप भेद्यमानस्य अतिनिष्ठुरप्रहारपातपीडितासिलावयवस्य निराहारतया बलहानिरभूत् ॥५१॥ निजितश्च भगवता जाम्बवान्परिणपत्य व्याजहार १५२। सुरासुरगन्धर्वयक्षराक्षसादिभिरप्पसिलवान जेतु शमः किमुतावनिगोचररल्पवीर्यनरेनरावयवभूतच तियंग्योन्यनुगृतिमि. कि ६८ ] [ श्रीविष्णुपुराण पुनरस्मद्विधैरवश्यं भवतास्मत्स्वामिना रामेणेव नारायणस्य सकलजगत्परायणस्याशेन भगवता भवितव्यमित्युक्तस्तस्मै भगवान खिलावनिभारावतरणार्थ मवतरणमाचचक्षे ।५३ प्रीत्यभिव्य. ञ्जितकर तलस्पर्शनेन चनमपगतयुद्धवेद चकार ।५।। इस प्रकार प्रत्यन्त श्रद्धा सहिन प्रदान किए हुये विशिष्ट पात्रो मे अन्न और जल दानादि की प्राप्ति मे श्री कृष्ण के दैहिक बल और प्राण पुष्ट हो गये ॥५०॥ तथा अत्यन्त महान् पुरुष के घोर प्रहारा क प्राघात से मदित और पोडित देह वाले जाम्बवान् के निराहार रहने से उसका बन नितान्त क्षीण हो गया ॥५१॥ अन्तमे जाम्बवान् की हार हुई और तब उसने भगवान् मधुसूदन को प्रणाम करके कहा- हे भगवन् ! देवता, अमुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षसादि मे से कोई भी प्रापको नहीं जीत सकता तो भूतल पर रहने वाले अल पराक्रमी मनुष्य अथवा हमारे जैसे तियं योनि में उत्पन्न हुये जीवो का तो कहना ही क्या है ? मुझे विश्वाप्त हो गया कि पाप हमारे स्वामी भगवान श्री राम के समान सकल विश्व के पालक भगवान नारायण के ही प्रश रूप हैं जब जाम्बवान ने विनम्रता पूर्वक ऐसा कहा तब भगवान् श्रीकृष्ण ने भू-भार हरण करने के निमित्त अपने प्रवतीर्ण होने का सब वृत्तान्त उससे कहा और प्रीति सहित उसके देह को अपने हाथ के स्पश से श्रम-रहित और स्वस्थ कर दिया ॥५२-५४॥ स च परिणपत्य पुनरप्येन प्रसाद्य जाम्बवती नाम कन्या गृहागताया_भूता ग्राहयामास १५५। स्यमन्तकमणिरत्नमपि प्रणिपत्य तस्मै प्रददौ ।५६। अच्युतोऽप्यतिप्रणतात्तस्मादग्राह्यमपि तन्मरिणरत्न- मात्मसंशोधनाय जग्राह ।५७। सह जाम्बवत्या स द्वारकामाजगाम १५८ भगवदागमनोदभूतहोलपस्य द्वारकावासिजनस्य कृष्णावलोक- नात्तत्क्षणमेवातिपरिणतवयसोऽपि मवयौवनमिवाभवत् १५६ दिष्टयादिष्ट्ये ति सकलयादवाः खियश्च सभाजयामासुः 1દol भगवानपि यथानुभूतमशेपं यादवसमाजे यथा वदाचचक्षे ।६११ स्यमन्तकं चतुर्थ अश-अ० १३ ] [६६ च सनाजिते दत्त्वा मिथ्याभिशस्तिपरिशुद्धिमवाप १६२१ जाम्व वती चान्तः पुरे निवेशयामास ।६३। तदनन्तर ने जाम्बवान् उन्हे पुन. प्रणाम द्वारा प्रसन्न किया और अपने घर पर पाये हुए भगवान रूप अतिथि को अपनी जाम्बवनी नाम की कन्या अयं रूप से प्रदान की तथा प्रणाम पूर्वक स्यमन्तक मरिण भी उन्हे भेट कर दी ॥५५-५६।। उस अत्यन्त विनीत से ग्रहण करने योग्य न होने पर भी भगवान् ने अपने ऊपर लगे पारोप की मिद्धि के लिए उम गरिण को ले लिया और जाम्बवती को साथ लिए हुए द्वारका पहुँचे ॥५७-४८) उनके प्रागमन की बात सुनते ही द्वारकावासियो मे हप की अत्यन्त वृद्धि हुई और वृद्धावस्था के निकट पहुंचे हुये पुरुष भी मानो उनके दर्शन करके नवयुवर बन गये ।।५६ । उस समय सभी यादवो और उनकी स्त्रियो ने 'अहोभाग्य' कह-महकर उनका मभिवादन किया ||६०।। जो घटना जिस प्रकार हुई, उसका सम्पूर्ण विवरण श्रीकृष्ण ने यादवो को सुनाया और सत्राजित् को म्यमन्तक मणि लोटा कर मिध्यापवाद से मुक्ति प्राप्त की। तदनन्तर जाम्बवती को अपने अन्त पुर में प्रविष्ट किया।६१-६३॥ साजिदपि मयास्याभूतमलिनमारोपित मिति जातसन्लासा. स्वसुता सत्यभामा भगवते भार्यार्थ ददौ ।६४। ता चाक रवृतवर्मशत- धन्वप्रमुखा यादवा प्राग्वरयाम्बभूवु १६५। ततस्तत्प्रदानादवज्ञातमेवा- स्मान मन्यमाना समाजिति वैरानुबन्ध चक्र ।६६। अक रकृतवर्मप्रमुखाश्च शतधन्वानमूचु ।६७। अयमतीव दुरात्मा समाजिद् योऽस्माभिर्भवता च प्रार्थितोऽप्यात्मजामस्मान् भवन्त चावि- गएय्य कृष्णाय दत्तवान् ।६८तदलमनेन जीवता पातयित्वेन तन्महा- रत्न स्यमन्तकास्य त्वया कि न गृह्यते वयमभ्युपपत्स्यामो यद्यच्युतस्त- वोपरि वैरानुवन्ध करिष्यतीत्येवमुक्तस्तथेत्यसावप्याह ।६६। जतुगृहदग्धाना पाण्डुतनयाना विदितपरमार्थोऽपि भगवान् दुर्योधनप्रयत्नशंथिल्यवरणार्थ कुल्यकरणाय वारणावत गत. 1001 ७२ ] [ श्रीविष्णुपुराण कृतोद्यमौ च तावुभावुपलभ्य शतधन्वा कृतवर्माणमुपैत्य पाणिपूरणकर्मनिमित्तमचोदयत् ।८१॥ प्राह चैन कृतवर्मा 1८२ नाह बलदेववासुदेवाभ्या सह विरोधायालमित्युक्तश्चान रमचोदयत् ।। असावप्याह ।२४। न हि कश्चिद्भगवता पादप्रहारपरिकम्पितजगत्त्रयेण सुररिपुवनितावैधव्यकारिणा प्रबलरिपुचक्राप्रतिहतचक्रण चक्रिया मदमुदितनयनावलोकिताखिलनिशातनेनातिगुरुवरिवारणापकर्पणावि कृतमहिमोरुसीरेण सीरिणा च सह सकलजगद्वन्द्यानाममरवराणामपि योद्ध समर्थ किमुताहम् १८५। तदन्यश्शरणमभिलष्यतामित्युक्तश्शत- धनुराह ६६। यद्यस्मत्परित्राणासमर्थ भवानात्मानमधिगच्छति तदयमस्मत्तस्तावन्मणि सगृह्य रक्ष्यतामिति 1८७। एवमुक्त सोऽप्याह ।८। यद्यन्त्यायामप्यवस्थाया न कस्मैचिद्भवान् कथयिष्यति तदाँत ग्रहीष्यामीति ८६ तथेत्युक्ते चाक रस्तन्मणिरत्न जग्राह 1801 जब शतधन्वा ने कृषण बलदेव को अपने मारने के प्रयल मे उद्यत हुये जाना तब यह सहायता के लिये कृतवर्मा के पास गया ॥१॥ इस पर कृत- वर्मा ने कहा कि 'कृष्ण बलदेव से विरोध करने की समायुं मुझ मे नही है । उसके ऐसा कहने पर शतधन्वा अक र के पास गया और उसने उससे सहायता मांगी। इस पर प्रकर ने कहा ।।८२-८४॥ निनके पाद-प्रहार से ही तीनो लोक काप उठते हैं और उसी से देवताओं के शत्रु असुरो की स्त्रिया वैधव्य को प्राप्त होती हैं तथा जिनका चक्र महाबली शत्रुओं को सेना में भी अतिहर रहता है उन चक्रधारी श्रीकृष्ण से और जो अपने मदोन्मत्त नेनो की चितवन से है शत्रुनो का दमन करने में समर्थ तथा भयङ्कर शत्र समूह रूपी हाथियो को में वशमे करने के लिए प्रखण्ड महिमा वाले प्रचण्ड हल को धारण किए रहते है उन हलधर बलदेव से अखिल विश्व मे वन्दनीय देवतानो मे से कोई भी सम नहीं हो सकता तो मैं ही क्या कर सकता हूँ॥८॥ इसलिए तुम्हे किसी पर व्यक्ति की शरण लेनी चाहिये। अक्रूर की बात सुन कर शतधन्वा बोर ॥५६॥ अच्छा यदि भाप मेरी रक्षा करने में असमर्थ पाते हैं, तो लीजिए, इ चतुर्थ प्रश-अ० १३ ] मणि की ही रक्षा करिये ॥७॥ इस पर प्रकर बोला-मैं इस मरिण को तभी ग्रहण कर सकता हूँ, जब तुम यह प्रतिज्ञा करो कि मरणकाल उपस्थित होने पर भी तुम इसके मेरे पास होने के विषय मे किसी से न कहोगे ॥६ मह सुन कर शतधन्या ने कहा 'ऐसा ही होगा' और अब अक्रूर ने उस मणि- रन को उससे लेकर अपने पास सुरक्षित रखा IIon शतधनुरप्यतुलवेगा शतयोजनवाहिनी बडवामारुह्याधकान्तः 10१शैव्यतुप्रीवमेवपुष्पबलाहकाश्चचतुष्टययुक्तरथस्थिती बलदेवकातु- देवी तमनुप्रयाती ९२ सा च बडवा शतयोजनप्रमाणमार्गमतीता पुनरपि वाह्यमाना मिथिलावनोद्देशे प्राणानुत्ससर्ज ।६३१ शतधनुरपि ता परित्यज्य पदातिरेवाद्रवत् १६४। कृष्णोऽपि बलभद्रमाह ६५॥ तावदन स्यन्दने भवता स्थेयमहमेनमधमाचार पदातिरेव पदातिमनुगम्य यावद्घातयामि अन हि भूमागे दृष्टदोपास्सभया अतो नैतेऽश्वा भवतेम भूगिभागमुल्लङ्घनीया ६६। तथेत्युक्त्वा बलदेवो रथ एव इसके पश्चात् शतधन्वा एक अत्यन्त वेगवती पौर निरन्तर सौ योजन तक चलने मे सामर्थ्य वाली एक घोडी पर चढ़कर भाग निकला ।।६१ तब शेयप, सुग्रीव, मेघपुष्प और बबाहक नामक चार घोडो से सयुक्त रथ पर आरूढ होकर कृष्ण-बलदेव ने उसका पीछा किया ।।६२॥ सौ पोजन मार्ग के पूरा हो जाने पर भी जव शतधन्वा जिसे भागे ले जा रहा था, उस घोडी ने मिथिला के वर प्रदेश में अपने प्राण त्याग दिये ।।६३।। तब उस घोडी को पहीं पड़ी छोड कर शतधन्वा पैदल ही भागने लगा ॥१४॥ यह देखकर श्रीकृष्ण ने बलदेव जी से कहा ॥६५॥ अभी भाप रथ में ही बैठे रहे, इस पंदन भागते हुए मघमा. पारी वो में भी पैदल जाकर मार दूंगा ॥६६॥ इस पर बलदेव 'पच्या' पह. कर रथ मे ही बैठे रहे ॥१७॥ कृष्णोऽपि द्विकोशमान भूमिभागमनुसृत्य पूरस्थितस्यैव चम क्षिप्त्वा शतधनुपरिवारश्चिच्छेद II तच्छरीराम्बरादिपु च बहुप्रकारमन्विच्छन्नपि स्यमन्तवमरिंग नावाप यदा तदोपगम्य तस्थौ । .

७४ ] [ श्रीविष्णुपुराण वलभद्रमाह ।६९। वृक्षवास्माभि शतधनुर्धातितो न प्राप्तमसिलजगत्सा- रभूत तन्महारत्न स्यमन्तकारयमित्यापर्योद्भूतकोपो बलदेवो वासुदेवमाह 1१०० धिक्त्वा यस्त्वमेवमर्थलिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान्मया तदय पन्यास्स्वेच्छया गम्यता न मे द्वारपया न त्वया न चाशेपबन्धुभि कायंमलमलमे भिर्ममाग्रतोऽलीयशपथरित्याक्षिप्य वचित्प्रसाद्यमानोऽपि तस्थौ ।१०१। स विदेहपुरी क्षान्त तत्कथा न प्रविवेश ।१०२। श्रीकृष्ण ने दो कोस तक पंदन चलते हुए उसका पीछा किया और दूर से अपना चक्र चलानर शतधन्वा का मस्ता बाट डाला ॥६८॥ परन्तु उसके शरीर के वस्त्रादि मे वहुन कुछ सोजने पर भी उन्हे स्यमन्तक मणि न मिली, तब उन्होने बलदेवजी के पास पहुँच कर यहा IIEI शनधन्वा वा वध व्यर्थ ही हुमा, न्योकि विश्व की सारभूता स्यमन्तक मणि उसके पास नही मिली । यह सुनार बलदेवजी प्रत्यात क्रोधित हुए और श्रीकृष्ण की बात को भेद पूर्ण समझकर उन्होने कहा ॥१०॥ तुमको धिक्कार है, तुम अत्यन्त ही धन-लोलुप हो, मैं तुम्हे भाई होने के कारण ही क्षमा कर रहा हूँ। तुम अपने मार्ग पर स्वेच्छापूर्वक जा सकते हो क्योकि मुझे अब द्वारका से, तुमसे अथवा अन्य सब वधु-बांधवो से कोई प्रपोजन नहीं है । मैं इन निरथा सौग धो को भी नहीं मानता । इस प्रकार कहते हुये वलदेवजी अनेक प्रकार से समझाने और विश्वास दिलाने पर भी वहा न रुक कर विरेह नगरको चल पडे ॥१०१-१०२॥ जनकराजश्चार्घ्यपूर्वकमेन गृह प्रवेशयामास ।१०३। स तत्रैव च तस्थौ ।१०४। वासुदेवोऽपि द्वारकामाजगाम ।१०५॥ यावच्च जनक- राजगृहे वलभद्रोऽवतस्थे ताबद्धार्तराष्ट्रो दुर्योधनस्तत्सकाशाद्दाशिक्षा- मशिक्षयत् ।१०६। वर्णनयान्ते च बभ्र ग्रसेनप्रभृतिभिर्यादवैर्न तद्गत्न कृष्णेनापहृतमिति कृतावगतिभिविदेहनगरी गत्वा वलदेवस्सम्प्रात्याय्य द्वारकामानीत ११०७ उनके विदेह नगर पहुंचने पर राजा जनक ने अादि के द्वारा उनका स्वागत किया और फिर उन्हें अपने घर मे ठहराया ॥१०३-१०४॥ इधर श्री चतुर्थ अश-अ० १३ ] [ ७५ होकरी कृष्ण द्वारका मे लोट पाये ॥१०५॥ राजा जनक के यहा बलदेवजी ने जितने दिन निवास किया, उतने दिनो तक धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन ने उनसे गदायुद्ध की शिक्षा ग्रहण पी१०६॥ फिर स्यमन्तक मणि श्रीकृष्ण के पास नहीं है, यह जानने वाले यध्र और उग्रसेन आदि यादवो ने विदेहनगर जाकर बलदेवजी को शपथ पूर्वक विश्वास दिलाया, तब वह तीन वर्ष व्यतीत होने पर द्वारका मे लोटे ॥१७॥ अक्रू रोऽत्युत्तममणिसमुदभूतसुवर्णेन भगवद्धयानपरोऽनवरत यज्ञानियाज ॥१०८। सवनगतौ हि क्षनियवैश्यौ निघ्नन्त्रमहा भवतीत्ये- वम्प्रकार दीक्षाकवच प्रविष्ट एव तस्थौ ११०६। द्विपष्टिवण्येव तन्मणिप्रभावात्तनोपसर्गदुभिक्षमारिवागरणादिक नाभूत् ११०॥ अथाक रपक्षीय जैश्शत्रुघ्ने सात्वतस्य प्रपौने व्यापादिते भोजैस्स- द्वारकामपहायापकान्त ।१११॥ तदपमान्तिदिनादारभ्य तनोपसगभिक्षव्यालानावृष्टिमारिकाध पद्रवा बभूवु ११२। भगवान के ध्यान म निरन्तर लग रहते हुए प्रकरणी उस मणि रत्न द्वारा प्राप्त होने वाले सुवर्ण से पानुष्ठानादि वम परने लगे ॥१०८॥ यज्ञ मे दीक्षित क्षत्रियो और वैश्यो या वध करने से ब्रह्महत्या का पाप लगता है, इस कारण प्रकर ही यज्ञ दीक्षा रूपी उस ववच को सदा ही पहिने रहते थे।१०। उस मणि के प्रभाव से ही द्वारकापुरी म बासठ वर्ष रोग, दुर्भिक्षा महामारी पथवा मृत्यु मादि का प्रकोप नहीं हुआ ॥११०॥ फिर मन र-पदा ये भोज. यशियो के द्वारा सात्वत के प्रपौत्र शत्रुघ्न का वध कर देने पर अन्य भोजवशियो थे साप प्रक्र न भी द्वारका का परित्याग कर दिया ॥११॥ प्रकर ने वहा से आते ही टारका म रोग, दुर्भिक्ष, सर्प भनावृष्टि और महामारी प्रादि उपद्रव होने लग गगे ॥११२॥ अथ यादवबलभद्रोग्रसेनसमवेतो मन्त्रममन्ययद्भगवानुरगारि- वेतन १११३१ पिमिदमेक्दैव प्रचुरोपद्रयागमनमतदानाच्यतामित्युपते- न्धानामा यदुवृद्ध प्राह ११४॥ अस्यान रस्यपिता वफल्यो यम यमाभूतत्र तत्र दुर्भिक्षमाशिनावृष्टयादिय नाभूत् ॥११॥ माशिराजस्य ७६ ] [ श्रीविष्णुपुराण विपये त्वनावृष्ट्या च श्वपल्को नीत ततश्च तत्क्षरणादेवो ववर्ष १११६। काशिराजपल्याश्च गर्भ कन्यारत्न पूर्वमासीत् ।११७। सा च कन्या पूर्णेऽपि प्रसूतिकाले नैव निश्चक्राम ।११८। एव च तस्य गर्भस्य द्वादशवपण्यिनिष्कामतो ययु. ११९ काशिराजश्च तामात्मजां गर्भस्थामाह ११२०। पुत्रि वस्मान्न जायसे निष्कम्यतामास्य ते द्रष्टुमि- च्छामि एता च मातर किमिति चिर क्लेशयसीत्युक्ता गर्भस्थैव व्याजहार ।१२। तात यद्य कैका गा दिने दिने ब्राह्मणाय प्रयच्छसि तदाहमन्य खिभिर्वरस्माद्गर्भात्तावदवश्य निष्क्रमिष्यामीत्येतद्वचनमाकर्ण्य राजा दिने दिने ब्राह्मणाय गा प्रादात् ११२२। सापि तावता कालेन जाता ।१२३॥ तब भगवान श्रीकृष्ण ने बलदेवजी और उग्रसेन प्रादि प्रमुख यदुवशियो के साथ भत्रणा की और कहने लगे ११३॥ एक साथ ही इतने उपद्रव पाकर उपस्थित हो गये, इसके कारण पर विचार करना चाहिए । उनको यह बात सुनकर अन्धक नाम एक वृद्ध यादव ने कहा ॥११४॥ अक्र र के पिता श्वफल्क जब-जब जहा-जहा रहे, तब-तब वहा-वहा दुर्भिक्ष, महामारी, अनावृष्टि नादि कोई भी उपद्रव कभी नहीं हुआ ॥११५। एक बार जब काशिराज के राज्य मे वर्षा नहीं हुई, तब ३वफलक को वहा ले जाते ही वर्षा प्रारम्भ हो गई ॥११६॥ उस समय काशिराज की भार्या गर्भवती थी और कन्या उसमे स्थित थी ।।११७॥ वह कन्या बालक उत्पन्न होने मे जितना समय लगना चाहिये, उतने समय में उत्पन्न न हुई ॥११८।। इस प्रकार उसे गर्भ मे रहते-रहते बारह वर्ष व्यतीत हो गये ॥११९।। तब काशिराज अपनी उस गर्भस्थ कन्या से बोले ॥१२०॥ हे सुते ! तू गर्भ से बाहर क्यो नही पाती तू उत्पन्न हो, मैं तेरे मुख को देखने की इच्छा कर रहा हूं ॥१२१॥ अपनी माता को इतने समय ते तू ऐसा पष्ट क्यो दे रही है ? राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस कन्या ने गर्भ में से ही कहा-हे पिताजी! यदि प्राप नित्य प्रति एक गो किसी माण को प्रधान परें तो तीन वर्ष व्यतीत होने पर मैं अवश्य ही उत्पन्न हो चतुर्थ प्रश-अ० १३ ) [७७ जाऊँगी । यह सुन पर राजा ने नित्यप्रति एक गाय ब्राह्मण को देना प्रारम्भ किया ॥१२२॥ इस प्रकार तीन वर्ष व्यतीत हो जाने पर वह कन्या उत्पन्न हुई ॥१२३॥ ततस्तस्या पिता गान्दिनीति नाम चकार ।१२४। ता च गान्दिनी कन्या श्वफल्कायोपकारिणे गृहमागताया_भूता प्रादात् ॥१२॥ तस्यामयमक र श्वफल्काञ्ज १२६॥ तस्यवड गुणमिथुनादुत्पत्ति ११२७। तत्कथमस्मिन्त्रपक्रान्तेऽत्र दुर्भिक्षमारिकाद्य पद्रवा न भविष्यन्ति ११२८॥ तदयमनानीयतामलमतिगुणवत्यपराधान्वेषणेनेति यदुवृद्धस्यान्ध- कस्यैतद्वचनमाकर्ण्य केशवोनसेनबलभद्रपुरोगमैयंदुभि कृतापराधतिति- क्षुमिरभय दत्त्वा श्वफल्कपुन स्वपुरमानीत ११२६1 तन चागतमान एव तस्य स्यमन्तकमणे प्रभावादनावृष्टिमारिवादुर्भिक्षव्यालाद्युपद्रवो- पशमा बभूवु ।१३० उस कन्या का नाम पिता ने गान्दिनी रखा और उसे अपना उपकार पारने वाले वफल्क को, जब वह काशिराज के यहा गये थे, तब अभ्य रूप में प्रदान किया ॥१२४-१२५ ॥ श्वफाक ने उसी वे गभ से इन प्रकरजी को उत्पन्न किया था ॥१२६ । इन अ र नी का ज म जन एसे गुणी माता से हुआ है, लो उनो इस नगर पा त्याग कर देने से यहा दुर्भिक्ष और महामारी प्रादि उपद्रव भला क्यो नही होंगे? ॥१२७ १२८।। इसरिए उन पक रमी यो यहा लिया. लाना चाहिये, जो मनुष्य अत्यधिक गुणवाला हो उससे यदि कुछ अपराध हो भी जाय तो उसका अधिक वेपण उचित नहीं है । वयोवृद्ध यादव पपफ की बात सुनार श्रीरण वनदेव, उपमन मादि ने वफल पुन अकर जी के अपराध को क्षमा पर दिया पौर उ ह अभय प्रदान पूर्वक द्वारका म ले पाये ॥१२६॥ जैम ही यह नगर म पाये, वैसे ही स्पमन्तक मणि के प्रभाव से प्रना. वृष्टि, महामारी, दुर्भिक्ष, सपभय प्रादि सभी उपदया को शाति हो गई ॥१३॥ कृपाश्चिन्तयामास ।१३१॥ स्वल्पमेतसारण यदय गान्दिन्या श्यफल्सेनामा रो जनित ॥१३॥ सुमहाश्चायमनावृष्टिदुर्भिक्षमारिकाध - परवप्रतिपेपपारी प्रभाव ।१३३॥ तन्नूनमस्य साागे स महामणि - ७८ ] [ श्रीविष्णुपुराण स्यमन्तकारयस्तिष्ठति ।१३४। तस्य ह्य व विधाः प्रभावा. यूयन्ते १३५॥ अयमपि च यज्ञादनन्तरमन्यत्क्रत्वन्तर तस्यानन्तर मन्यद्यज्ञान्तर चाजन्नमविच्छिन्न यजतीति ।१३६। अल्पोपादान चास्यासशयमत्रासौ मरिणवरस्तिष्ठतीति कृताध्यवसायोऽन्यत्प्रयोजनमु- द्दिश्य सकलयादवसमाजमात्मगृह एवाचीकरत् ।१३७॥ इसके पश्चात् श्रीकृष्ण सोचने लगे कि वफक के द्वारा गान्दिनी के गर्भ से अकर का उत्पन्न होना एक साधारण बात है ॥१३१-१३२।। परन्तु, उसका अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रवो को रोकने वाला प्रभाव अत्यन्त महिमा युक्त है ॥१३३॥ इसके पास अवश्य ही स्यमन्तक महामणि होनी चाहिये ।।१३४॥ क्योकि उस मणि का ही ऐसा प्रभाव सुना गया है ॥१३५।। इस अक र को एक यज्ञ के पश्चात् दूसरा, दूसरे के पश्चात् तीसरा यज्ञ करते ही देखा जाता है । इसके अनुरानो का क्रम कभी टूटता नहीं ॥१३६।। इसके पास यज्ञ के लिए साधनो की भी न्यूनता है, इसलिये इपके पास स्यमन्तक मरिण होने में सदेह नहीं रहता। ऐसा स्थिर कर उन्होने अपने घर मे सभी यादवो को किसी विशेष प्रयोजन के लिये एकत्रित किया ॥१३॥ तत्र चोपविष्टेप्वखिलेषु यदुपु पूर्व प्रयोजनमुपन्यस्य पर्यवसिते च तस्मिन् प्रसङ्गान्तरपरिहासकथामक रेण कृत्वा जनार्दनस्तमक र- माह ।१३८। दानपते जानीम एव वय यथा शतधन्वना तदिदमखिलज- जगत्सारभूत स्यमन्तक रल भवत समर्पित तदशेपराष्ट्रोपकारक भवत्सकाशे तिष्ठति तिष्ठतु सर्व एव वय तत्प्रभावफनभुज कि त्वेष बलभद्रोऽस्मानाशङ्कितवास्तदस्मत्प्रीतये दर्शयस्वेत्वेत्यभिधाय जोप स्थिते भगवति वासुदेवे सरत्नस्सोऽचिन्तयत् ।१३६। क्मिनानुष्ठेय- मन्यथा चेद्धीम्यह तत्वताम्बरतिरोधानमन्विण्यन्तो रत्नमेते द्रक्ष्यन्ति अतिविरोधो न क्षेम इति सञ्चिन्त्य तमसिलजगत्कारणभूत नारायणमाहाकर ११४०। भगवन्ममैतत्स्यमन्तवरत्न शतधनुपा समर्पितमपगते च तस्मिन्नद्य श्व. परश्वो वा भगवान् याचपिप्यतीति वृतमतिरतिकृच्छतावन्त कालमधारयम् ।१४१॥ तस्य च धारण- .

चतुर्थ अंश-अ० १३ ] [ ७६ क्लेशेनाहमशेपोपभोगेष्वसङ्गिमानसो न वेनि स्वसुखकलामपि ।१४२। एतावन्मात्रमप्यशेष राष्ट्रोपकारि धारयितुं न शन्कोति भवान्मन्यत इत्यात्मना न चोदितवान् ।१४३। तदिदं स्यमन्तकरत्नं गृह्यतामिच्छया यस्याभिमतं तस्य समर्प्यताम् ।१४४॥ जब सव पदुवंशी वहा पाकर बैठ गए तो पहिले उन्हे अपना प्रयोजन बनाया और उमका उपस हार हो गया तब उन्होंने प्रसङ्ग बदलकर अक्रूर के साथ परिहास-पूर्वक कहा ॥१३८॥ हे दानपते ! शतान्या ने जिस प्रकार वह स्यमन्तक मणि तुम्हे दी थी, वह सब विषय हमे ज्ञात है। यह सम्पूर्ण राष्ट्र का उपहार करती हुई यदि तुम्हारे पास रहती है तो उससे हमे कोई हानि नहीं है. क्योकि उसके प्रभाव से प्राप्त होने वाले फन को तो हम सभी भोगते हैं। परन्तु, इन बलरामजी का मुझ पर संदेह रहा है, इसलिए यदि आप उसे एक वार दिखला दें तो हमें प्रत्यन्त प्रपन्नता होगी । जब भगवान् श्रीकृष्ण ऐमा वह कर मौन हो गये तब मणि के साथ होने के कारण प्रकरजी विचार करने लगे ॥१३६।। अब मैं क्या करूं ? यदि कुछ बहाना बनाता हूँ तो यह मेरे यस्त्रों में टटोल कर ही मणि को देख लेगे। फिर यदि इनसे विरोर हो गया तो किसी प्रकार भी पुशल नहीं है । इस प्रकार स्थिर कर प्रकरजी ने सम्पूर्ण रामार के कारण रूप भगवान् श्री कृष्ण से पहा ॥१४०।। हे भगवन् ! वह नगि शतपन्या ने मुझे दे दी थी और उमा मृत्यु होने पर प्रत्यन्त सारधानी पूर्वक मैंने इसे रसा है, पयोकि मैं सोनता था कि पार इमे माज-कल में मुझो माग हो लेंगे ॥१४॥ इगरी सुरक्षा के क्लेश से मैं पिसी प्रकार के भोग में भी माना मन ग लगा साने ये पारण किचिन भी मुघी नही रहा हूँ। पशु पापगे मैंने स्वयं इसलिये नही कहा कि यही पाप यह न सोचने लगे कि यह सम्पूर्ण राष्ट्र पा उमार गारने वाले इन स्सल भार को भी गहन नही कर गया ॥१४॥ भासी यह स्पमन्ता मारण यह है, इमे भाप ग्रहण कीजिए मोर माप जिरो पार उसे दीलिए ॥१४॥ ततः स्वोदरवम्बनिगोपितमतिलपानपगमुहागतं प्राटोरत- वान् ॥१४॥ ततश्च निष्काम्य स्थमन्तकमणि तस्मिन्यनगमाजे ८० ] [ श्रीविष्णुपुराण मुमोच १४६। मुक्तमात्र च मुक्तमात्रे च तस्मिन्नतिकान्त्या तदखिलमास्थानमुयोतितम् ।१४७ प्रथाहाक र. स एप मणि: शतधन्वनास्माक समर्पितो यस्याय स एन गृह्णातु इति ।।४८ तमालोक्य सर्वयादवाना साधुसाध्विति विस्मितमनसा वाचोऽश्रूयन्त १४६॥ तमालोक्यातीव बलभद्रो ममायमच्युतेनैव मामान्यस्समन्वीप्सित इति कृतस्पृहोऽभूत् ।१५०। ममैवाय पितृधन- मित्यतीव च सत्यभामापि स्पृहयाञ्चकार ।१५१३ बलसत्यावलोकना- स्कृष्णोऽप्यात्मान गोचक्रान्तरावस्थितमिव मेने ।१५२। सकलयादवस- मक्ष चाक रमाह ।१५३॥ यह कह कर प्रक्र रजी ने अपने कटिवसन में छिपी हुई एक छोटी सी स्वर्ण-पिटारी म रखी हुई उस स्थमानक मणि को निकाल कर यदुवशियो के समाज में रख दिया ॥१४५-१४६।। पिटारी से निकलते ही उस मणि की काति से वह सम्पूर्ण स्थान अत्यन्त प्रकाशमान हो उठा ॥१४७।। फिर अक रजी बोले कि यह मरिण मुझे शतधन्वा से प्राप्त हुई थी, जिसकी यह हो, वह इसे ग्रहण करले ॥१४८।। मणि को देखो ही सब यादवगण विस्मय पूर्वक 'साधु' 'साधु' शब्द कहने लगे ।।१४६।। उसे देखकर इस पर कृष्ण के समान ही मेरा भी अधिकार है, यह सोचते हुए बनदेवजी अधिक स्पृहानान् हुए ॥१५०॥ सत्य- भामा ने भी उसे अपनी पंता सम्पत्ति मानकर अपनी अधिक उत्कठा प्रकट की ॥१५१॥ बलदेव और सत्यभामा की अभिलाषा को देखकर श्रीकृष्ण ने अपने को रथ के बल भोर पहिये के मध्य पड़े हुये जन्तु के समान संकटग्रस्त पाया ॥१५२॥ तब उन्होने सब यादवो की उपस्थिति मे अक रजी से कहा ॥१५३।। एतद्धि मणिरत्नमात्मसशोधनाय एतेषा यदूना मया दर्शितम् एतच्च बलभद्रस्य च सामान्य पितृधन चैतत्सत्यभामाय नान्यस्यतत् ।१५४। एतच्च सर्वकाल शुचिना ब्रह्मचर्यादिगुणवता ध्रियमाणमशेषराष्ट्रस्योपचारतमशुचिना ध्रियमाणमाधारमेव हन्ति १५॥ अतोऽहमस्य पोडशस्त्रीसहस्रपरिग्रहादसमर्थो धारणे कयमेतत्सत्यभामा स्वीकरोति 1१५६। पार्यवलभद्रेणापि मम चतुर्थ अंश-०१३ ] [८१ मदिरापानाद्यशेपोपभोगयरित्याग कार्य. १५७। तदलं यदुलोकोऽय बलभद्र अह च त्वा दानपते प्रार्ययाम १५८। तद्भवानेव धारयितु समर्थः ।१५६। त्वद्धृत चास्य राष्ट्रस्योपकारक तद्भवानशेषराष्ट्रनिमित्त- मे तत्पूर्ववद्धारयत्वन्यन्न वक्तव्यमित्युक्तो दानपतिस्तथेत्याह जग्राह च तन्महारत्नम् ।१६० तत प्रभृत्यकर. प्रकटेनैव तेनातिजाज्वल्यमाने- नात्मकण्ठावसक्तेनादित्य इवाशुमाली चचार ।१६१। इत्येतद्भगवतो मिथ्याभिशस्तिक्षालन य स्मरति न तस्य कदाचिदल्पापि मिथ्याभिशस्तिर्भवति अव्याहतासिलेन्द्रियश्वाखिल- पापमोक्षमवाप्नोति ।१६२। इस मणि को अपने ऊपर लगे आरोप को दूर करने के विचार से ही मैंने सबके सामने निकलवाया है। इस पर मेरा और बलदेवजी का तो समान अधिकार है ही, साथ ही सत्यभामा का यह पितृयन है, इनके अतिरिक्त किसी अन्य का अधिकार इस पर नही है ॥१५४।। सदा पवित्र और ब्रह्मचर्यादि धारण पूर्वक रहने से यह मणि सम्पूर्ण राष्ट्र का हित करने वाली होती है, परन्तु अप- वित्र अवस्था धारण करने पर यह अपने प्राश्रयदाता के लिए घातक सिद्ध होती है ॥१५५।। मेरे भोलह हजार रानिया होने के कारण इसे धारण करने मे मैं तो असमर्थ हूँ ही साथ ही सत्यभामा भी इसमे समर्थ नहीं है ।।१५६।। यदि श्रायं बलरामजी इसे अपने पास रखते हैं तो उन्हे अपने मदिरापान आदि सभी भोगो को छाडना पडेगा ॥१५७॥ इसलिये हे दानपते । यह बलरामजी, यह सभी यादवगण, यह सत्यभामा और में - सभी यह मानते हैं कि इस मरिण के धारण करने की सामथ्य प्राप मे हा है ॥१५८|| यदि आप इसे धारण करेंगे तो यह सम्पूर्ण राष्ट्र का हित-साधन करने वाली होगी, इसलिये सम्पूर्ण राष्ट्र के कल्याणाय माप ही इ पहिने के समान धारण करते रहिए, अब इस विषय मे आप कुछ प्रन्यया वच । न पहे। श्रोष्ण के एसा कहने पर दानपति अकरने उस महामरिण को ग्रहण कर लिया । उस समय से भक रजो उस सत्य-न प्रा. शज रूपी मणि को मरने पर मे धारण कर भगवान प्रादित्य के समान रश्मियो से युक्त हुए सबके सामने विचरण करने लगे ॥१६०-१६१।। भगवान ८२] [ श्रीविष्णुपुराण श्रीकृष्ण के मिथ्या-कनक को शुद्ध करने वाले इस प्रसग को जो मनुष्य स्मरण करेगा, उसे कभी किचित् भी मिथ्या-कलक नहीं लगेगा, उसकी सब इन्द्रिया सशक्त रहेगी तया वह सभी पापो से छूट जायगा ॥१६॥ चौदहवाँ अध्याय अनमिनय पुन. शिनिर्नामाभवत् ।। तस्यापि सत्यकः सत्यकात्सात्यकियुयुधानापरनामा ।२। तस्मादपि सञ्जय तत्पुनश्च कुणि कुणेर्युगन्धर ।३। इत्येते शैनेया ।।। अनमिनस्यान्वये पृश्नस्तस्मात् श्वफल्क तत्प्रभाव. कथित एव १५) श्वफल्कस्यान्या कनीया चित्रको नाम भ्राता ।६। श्वफल्कादक रो गान्दिन्यामभवत् ७। तथोपमद् मृदामृदविश्वारिमेजयगिरिक्षनोपक्षत्र- शतघ्नारिमर्दनधर्मदृग्दृष्टधर्मगन्धमौजवाहप्रतिवाहाख्या पुना 11 सुताराख्या कन्या च ।। देववानुपदेवश्चाक पुनौ ।१०। पृथुविपृथुप्रमु. खाचित्रकस्य पुना बहवो बभूवु ।११। श्री पराशरजी ने कहा-मामित्र का पुन शिनि हुआ, शिनि का पुत्र सत्यक और सत्यक का पुत्र सात्यकि हुमा, इसको युयुधान भी कहते थे ॥१-२॥ सात्यकि का पुत्र सजय, सजय का कुणि और कुणि का पुन युगन्धर हुआ । यह सभी शैनेय नाम से प्रसिद्ध थे ॥३-४॥ अनमित्र के वश मे ही पृश्नि उत्पन हुआ। पृश्नि का हो पुत्र ३वफल्क हुमा, जिसके विषय मे पहिले फह चुके हैं । वफल का एक छोटा भाई चित्रक था ।।५-६।। गान्दिनी के गर्भ से श्वफलक ने अकर को जन्म दिया ॥७॥ फिर उपमृदु, मृदामद, विश्वारि, मेजय, गिरिक्षा, उपक्षत्र, शनन, अरिमर्दन, घमटक, दृष्टधर्म, गन्धभोज, वाह और प्रतिवाह नामक पुत्र तया सुतारा नाम की चतुथ-ग्रंश-अ०१४] [८३ एक कम्या हुई ।।८-६।। अफर के देवदान और उपदेव नाम: दो पुत्र हुए।१०॥ चिश्य के पृथु, विपृथु प्रादि अनेक पुन उत्पन्न हुये थे ॥११॥ कुकुरभजमानशुचिकम्बलवहिपाख्यास्तथान्धकस्य चत्वारः पुत्राः ।१२। कुकुराष्टः तस्माद कपोरोमा ततश्च विलोमा तस्मादपि तुम्गुरुस खाऽभवदनुसजश्च ।१३। अनोरानकदुन्दुभिः ततश्वा- भिजि अभिजितः पुनर्व नुः ॥१४॥ तस्याप्पाहुक पाहुको च कन्या ।१५॥ पाहुकस्य देवकोग्रसेनौ द्वौ पुत्रौ ।१६। देववानुपदेवः सहदेवो देवरक्षितो च देवकस्य चत्वारः पुत्राः ।१७। तेपां वृकदेवोपदेवा देवरक्षिता श्रीदेवा शान्तिदेवा सहदेवा देवकी च सप्त भगिन्यः ।१८। ताश्च सर्वा वसुदेव उमयेमे ।१६। उग्रसेनस्यापि कंसन्यग्रोधसुनामानकाह्वशंकुसभू- मिराष्ट्रपालयुद्धतुष्टिसुतुष्टिमत्सशाः पुत्रा बभूवुः ।२। कंसाकंसवतीसुत- नुराष्ट्रपा लिकाह्वाश्चोग्रसेनस्य तनूजा. कन्याः ।२१॥ प्रत्यक ये चार पुत्र थे - कुकुर, भ नपान, शुचि कम्बल मौर वहिप ।१२। फुपुर का पुत्र धृष्ट हुप्रा, धृष्ट का पुत्र करातरोमा, पोनरोमा का विनोमा मोर विलोमा या पुष अनु हुप्रा, जो तुम्बर का नित्र था ॥१३॥ प्रनु का पुन पान- दु दुभि, उसका पुत्र अभिजिन्, उमा पुष युगु पोर टस हा पुप पाहा सपा पुत्री का नाम प्राहकी हगा ॥१४.१५॥ माह के दो पुत्र हुये देयक भोर उग्र- रोन ॥१६॥ देवक के चार पुष हुपे, जो नार देयर, उादेव, महोय पोर देयरक्षित थे ॥१॥ पारो पुत्रो पी सात यहीं हुई, निनो नाम यावा, उपरेवा, देवरक्षिना, श्रीदेवा, शालिग, महमा पोर देसीरे ॥१८॥ इन सवमा वियाह यमुदेवजी के साप हमापा ॥१६। उन के नौ पुत्र फम, ग्यग्रोप, सुनाम, पान. मुभूमि, राष्ट्रात, पुष पोर माटिमान हुगे पोर यसा, सपा, गुपु एक राष्ट्रानिक नाम पी पुत्रियों (२०.२१॥

८४ ] [ श्री विष्णुपुराण स्यापि शूरः ।२५। शूरस्यापि मारिपा नाम पल्यभवत् ।२६। तस्या चासौ दशपुत्रानजनमद्वसुदेवपूर्वान १२७ वसुदेवस्यातमात्र स्यैव तद्गृहे भगवदशावतारमव्याहतदृष्ट्या पश्यद्भिर्देवैदिव्यानकदुन्दुभयो वादिता ।२८। ततश्वासावानकदुन्दुभिसज्ञामवाप ॥२६॥ तस्य च देव- भागदेवश्रवोऽष्टकककुचक्रवत्सधारकसृञ्जयश्यामशमिकगण्डूपसज्ञा नव भ्रातरौदभवन् १३० पृथा श्रुतकीर्तिः श्रुरश्रवा राजाधिदेवी च वसुदेवादीना पञ्च भगिन्योऽभवत् ॥३॥ भजमान का पुत्र विदूरथ हुआ । विदूरय का पुत्र शूर, शूर का पामी, शमी का प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्र का सयभोज और म्वय भोग का पुत्र हृदिक हुआ ॥२२-२३॥ हृदिक के कृतवर्मा, शतप-वा, देवाहं तया देवगर्भ आदि अनेक पुत्र हुए ॥२४॥ देवगर्भ का पुन शूरसेन हुमा ॥२॥ शूरमेन की पत्नी मारिपा हुई, उसके गर्भ से वसुदेवादि दस पुत्रों ने जन्म लिया ।।२६-२७॥ वसुदेव के उत्पन्न होते ही देवताग्रो ने यह जानकर कि इनके पुत्र रूप से भगवान् श्रीहरि का प्रशावतार होगा, मानक और दु दुभि और आदि वाद्यो को बजाया ॥२८॥ इसीलिये इन वसुदेवजी को पानक और दुंदुभि भी कहा गया ॥२६॥ इनके नौ भाई थे, जिनके नाम देवभाग, देवश्रवा, मष्टक, ककुच्चा, वत्सधारक, सृज्य, श्याम, शमिक और गडूप थे ।।३।। तथा इन सब की पांच वहिने थी, जिनके पृथा, श्रुतादेवा, श्रुतकीर्ती, श्रुतश्रवा घोर राजाधिदेवो नाम थे ॥३१।। शूरस्य कुन्तिर्नाम सखाभवत् ॥३२॥ तस्मै चापुत्राय पृथामात्मजा विधिना शूरो दत्तवान् ।३३। ता च पाडूरुवाह ।।४। तस्या च धर्मानिलेन्द्र युधिष्टिरभीमसेनार्जुनाख्यालय पुनास्समुत्पादिता. ॥३५॥ पूर्वमेवानूढायाञ्च भगवता भास्वता कानीन कर्णो नाम पुत्रोजन्यत १३६। तस्याश्च सपत्नी माद्री नामाभूत् ।३७। तस्या च नासत्यदस्राभ्या नवुलसहदेवी पाण्डो, पुत्री जनिती ॥३८॥ शूरसेन का कुन्ति नामक एक मित्र हुमा ॥३२॥ उराके सन्तान-हीन होने के कारण शूरसेन ने अपनी पृथा नाम की कन्या उन्हें दतक-विधि से प्रदान पर दी ॥३३॥ उसी पृया या विवाह राजा पाएडु के साय हुमा ॥३४॥ धर्म, वायु - चतुर्थ अश-अ० १४ ] [८५ और इन्द्र के द्वारा उसके युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र उत्पा हुए ॥३५॥ इसी पृथा की कान्यावस्था मे, विवाह से पहिले सूर्य के द्वारा कर्ण नामक पुत्र पहिले ही उत्पन्न हो चुका था ॥३६॥ माद्री नाम की इसकी एक सोत थी ॥३७।। उसके गर्भ से अश्विनीकुमारी द्वारा नकुल और सहदेव की उत्पत्ति हुई । यह सभी पाएडु पुन कहलाये ॥३८।। श्रुतदेवा तु वृद्धधर्मा नाम कारुप उपयेमे 1३९। तस्या च दन्तवको नाम महासुरो जज्ञे ।४०। श्रुतकीतिमपि केकयराज उपयेमे १४१॥ तस्या च सन्तर्दनादय कैकेया पश्च पुना वभूवु ।४२। राजाधि- देव्यामावन्त्यो विन्दानुविन्दौ जज्ञाते ॥४३॥ श्रुतश्रवसमपि चेदिराजो दमघोपनामोपयेमे ।४४। तस्या च शिशुपालमुत्पादयामास ।४५। स वा पूर्वमष्युदारविक्रमो दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुरभवत् ।४६॥ यश्च भगवता सकललोकगुरुणा नरसिंहेन घातित ।४७। पुनरपि अक्षयवीर्य- शौर्य सम्पत्पराक्रमगुणस्समानान्तसकलत्रैलोक्येश्वरप्रभावो दशाननो नामाभूत् ।४१ शूरसेन की दूसरी पुत्री श्रुतदेवा कारूप नरेश वृद्धधर्मा को विवाही गई ॥३६॥ उससे दन्तक नामक एक महादत्य की उत्पत्ति हुई ॥४०॥ श्रुतकीति का विवाह के कयराज के साथ हुआ ॥४१॥ उससे कैकयराज ने सन्तन प्रादि पांच पुत्र उत्पन हुये ॥४२॥ अवन्तिनरेश को व्याही गई राजाधिदेवी से विद और अनुविन्द की उत्पत्ति हुई ।।४३॥ चेदिराज दमघोष के श्रुतश्रवा का विवाह हुमा, जिससे शिशुपाल उत्पन्न हुआ ॥४४ ४५ । यही शिशुपाल अपने पूर्व जन्म मे हिरण्यकशिपु नामक दैत्यराज था, जिसका वध लोकगुरु नृसिंह भगवान ने किया था ॥४६ ४७॥ फिर यही प्रक्षयवीर्य, शौर्य, वैभव और पराक्रम मादि से मुक्त और लोक्यपति इन्द्र के प्रभाव को फीका करने वाला दशशिर का रावण हुप्रा ॥४८॥ बहुकालोपभुक्तभगवत्सकाशावाप्तशरीरपातोद्भवपुण्यफलो भग- वता राघवरूपिणा सोऽपि निधनमुपपादित ।४६॥ पुनश्चेदिराजस्य दमघोपस्यात्मेजश्शिशुपालनामाभवत् १५० शिशुपालत्वेऽपि भगवतो ८६ ] [ श्रीविष्णुपुराण भूभारावतारणायावतीशिस्य पुण्डरीकनयनास्यस्योपरि द्वे पानूवन्ध- मतितराञ्चकार ५१ भगवता च स निधनमुपनीतस्तव परमात्मभूते मनस एकाग्रतया सायुज्यमवाप १५२। भगवान् यदि प्रसन्नो यथाभिल- पित ददाति तथा अप्रन्नोऽपि निघ्नन् दिव्यमनुमम स्थान प्रयच्छति ॥५३॥ स्वय भगवान के द्वारा मारे जारे जाने के पुण्य रूपी फल से बहुत काल तक अनेक भोगो को भोग कर अन्न भगवान राम के हाथ से ही मारा गया ॥४६॥ फिर यह चेदिराज दमघोप के यहां शिशुपाल नाम से उत्पन्न हुमा ॥५०॥ इस जन्म मे भी वह पृथिवी का भार हरण करने के लिये प्रक्ट हुये भगवान् पुण्डरीकाक्ष के प्रति वैर-भाव रखने लगा ५१। अन्त मे उन परमात्मा के ही हाथ से मारा जाने के कारण और उन्ही मे तन्मय चित्त होने के कारण उसे सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति हुई ॥५२॥ प्रसन्न हुये भगवान् जिस प्रकार अभीष्ट फल प्रदान करते हैं, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर वध करते हुये भी वे अपने दिव्यलोक को प्राप्त कराते हैं ॥५३॥ पंद्रहवाँ अध्याय हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना। अवाप निहतो भोगानप्राप्यानमरैरपि । न लय तत्र तेनैव निहतः स कथं पुनः । सम्प्राप्तः शिशुपा सायुज्यं शाश्वते हरौ ।२। एतदिच्छाम्यह श्रोतु सर्वधमभृतां वर । कौतूहलपरेणैतत्पृष्टो मे वक्तुमर्हसि ।। दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा पूर्व तनुग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम् ।४। तत्र च हिरण्यकशि- [८७ । चतुर्थ अंश-अ० १५ ] पोविष्णुरयमित्येतन्न मनस्यभूत् ५। निरतिशयपुण्यसमुद्भूतमेतत्सत्त्य- जातमिति 1। रजउद्र प्रेरितकाग्रम तिस्तद्भाबनायोगात्ततोऽवाप्तवध- हेतुकी निरतिशयामेवाखिलबैलोक्याधिक्यधारिणी दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप 11 न तु स सस्मिन्ननादिनिधने परग्रह्यभूते भगवत्यनालम्बिनि कृके मनसस्तल्लयमवाप 141 श्रीमं नेय जी ने कहा है भगवन् । पहिले हिरण्यकशिपु और फिर रावण होने पर यह भगवान् विष्णु द्वारा मारा जाकर देवताओं को भी दुर्लभ भोगो को तो प्राप्त हुमा, परन्तु उनमे लीन नहीं हो सका। परन्तु इस जन्म मे शिशुपाल होकर उन्ही भगवान् के द्वारा मारा जाकर वह सायुज्य मोक्ष को किस प्रकार प्राप्त हुआ ।।१-२॥ हे सभी धर्मज्ञो मे श्रेष्ठ मुने | इस विषय मे मुझे जिज्ञामा हुई है और अत्यन्त कुतूहन के वशीभूत होकर ही मैंने इस विषय मे श्रापसे पूछा है, कृपया मुझे बताइये ॥३॥ श्रीपराशरनी ने कहा--पूर्व जन्म मे इसके हिरण्यरशिपु नामक दैत्य शरीर का महार करने के लिये, सब लोगो की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करने वाले भगवान नृसिंह रूप से प्रकट हुये थे ॥४॥ उस समय हिरण्यकशियु के चित्त मे उनके भगवान् विष्णु होने का भाव उत्पन्न नहीं हुआ था। ५॥ उसने केवल यही समझा कि यह कोई निरतिशय पुण्यो से उत्पन्न जीव है ॥६॥ रजोगुण के उद्रेक की प्रेरणा वाली उसकी मति हद होने से उसके हृदय मे ईश्वरीय-भाव का योग नहीं था, इसलिये केवल भग. वान् के हाथ से मारे जाने के पुण्य से ही उसने रावण होकर सब से अधिक भोगो को प्राप्त किया ।।७।। और उन प्राद्यन्त-रहित भगवान् मे तन्मय चित्त न होने के कारण वह उनमें लीन नहीं हो सका ||८|| एव दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकीसमासक्तचेतसा भगवता दाशरथिरूपधारिणा हतस्य तद् पदर्शनमेवासीत् नायमच्युत इत्यासक्तिविपद्यतोऽन्त करणे मानुपवुद्धिरेव केवलमस्याभूव ।। पुनरप्पच्युत विनिपातमानफलमखिलभूमण्डलरलाध्यचेदिराज- कुले जन्म अव्याहतैश्वयं शिशुपालत्वेऽप्यवाप ।१०। तर त्वखिलानामेव स भगवन्नाम्ना त्वङ्कारकारगमभवत् १११ ततश्व तत्कालकृताना ८८] [ श्रीविष्णुपुराण तेपामशेषाणामेवाच्युतनाम्नामनवरतमनेकजन्मसु वर्धितविद्वपानुवन्धि- चित्तो विनिन्दनसन्तर्जनादिपूच्चारणमकरोत् ।१२। तच्चरु पमुत्फुल्लप- बदलामलाक्षमत्युज्ज्वलपीतवस्रधार्यमलकिरीटकेयूरहारबाटकादिशोभि- तमुदारचतुर्बाहुशङ्खचक्रगदाघरमतिप्रस्ढवरानुभावादटनभोजनस्नानास- नशयनादिष्वरोपावस्थान्तरेषु नान्यत्रोपययावस्य चेतसः ॥१३॥ इसी प्रकार जब वह रावण हुमा, तब जानकीजी के प्रति उसके चित्त में कामासक्ति थी और जब वह राम रूप धारी भगवान् हाथ से मारा गया, तब केवल उनके रूप को ही देख सका था और उनमे अच्युत-भाव का प्रभाव तथा केवल मनुष्य-भाव ही रहा भाया । परन्तु, भगवान् के हाथ से मारा जाने के कारण ही उसने पृथिवी पर प्रशसित चेदिराज के वश मे शिशुपाल रूप से उत्पन्न होकर अक्षय ऐश्वर्य को प्राप्त किया ॥१०॥ इस जाम मे उसने भगवान् के प्रत्येक नाम मे तुच्छ भाव ही रखा पौर क्योंकि उसका हृदय अनेक जन्मो मे उनके प्रति द्वे पयुक्त था, इमलिये वह उनके तिरस्कार पूर्वक उनकी निन्दा करता हुआ निरन्तर उनका नामोच्चारण करता रहता था ।११-१२॥ विकमित कमल दल के समान स्वच्छ नेत्र वाले, शुभ्र पीताम्बर, निर्मल किरीट, केयूर, हार तथा कटकादि धारण किये, चार दीर्घबाहु वाले, शंख-चक्र-गदा- पद्मधारी भगवान् का वह दिव्य स्वरूप घूमते, स्नान करते, भोजन करते, बैठते और सोते-आदि सभी अवस्थाप्रो मे उसके चित्त से कभी भी अलग नही होता था ॥१३॥ ततस्तमेवाक्रोशेपूच्चारयंस्तमेव हृदयेन धारयन्नात्मवधाय यावद्भगवद्धस्तचक्रांशुमालोज्ज्वलमक्षयतेजस्स्वरूपं ब्रह्मभूतमपगतद्व- पादिदोप भगवन्तमद्राक्षीत् ११४। तावच्च व्यापादितस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघसञ्चयो भगवतान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव लयमुपययौ ।१५॥ एतत्तवाखिलमयाभिहितम् ।१६। अय हि भगवान् कीर्तितश्च पूस्मृतश्च द्वेषानुवन्धेनापि अखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति किमुत सम्यग्भक्तिमतामिति ॥१७॥ भगवच्चक्रणाशु चतुर्थ अंश-अ० १५ ] [८६ जब वह उन्हे गाली देता, तब उन्ही के नाम का उच्चारण और हृदय मे उन्ही का ध्यान करता हुआ सहार हेतु हाथ मे चक्र धारण किये, पक्षय तेजस्वी, द्वेपादि दोपो से रहति उन ब्रह्मभूत भगवान् का दर्शन कर रहा था ॥१४॥ ऐसी ही अवस्था मे वह भगवान् के चक्र से मारा गया। भगवान के स्मरण से उसके सभी पाप समूह भस्म हो गये थे । इस प्रकार जैसे ही उसकी मृत्यु हुई वैसे ही यह भगवान् में लीन हो गया ॥१५॥ यह सम्पूर्ण रहस्य मैंने तुम्हे यथार्थ रूप से बता दिया है ॥१६॥ वे भगवान् तो ऐसे दयालु है कि द्वेष का नाता रखकर कीर्तन और स्मरण करने पर भी सभी दैत्यो और देवताग्री को दुर्लभ फन प्रदान करते है, फिर भले प्रकार भक्तिमय पुरुषो का तो कहना ही क्या है ? ॥१७॥ वसुदेवस्य त्वानकदुन्दुभे. पौरवीरोहिणीमदिराभद्रादेवकीप्रमुखा वह्वयः पल्योऽभवन् ।१८। बलभद्रशठसारणदुर्मदादीन्पुत्रानोहिण्यामान- कदुन्दुभिरुत्पादयामास ११६। बलदेवोऽपि रेवत्या विशठोल्मुको पुत्रावजनयत् ।२०। साष्टिमाष्टिशिशुसत्यधृतिप्रमुखा सारणात्मजाः ।२१॥ भद्राश्वभद्रवाहुदुर्दमभूताद्या रोहिण्या. कुलजाः ।२२। नन्दोपनन्दकृत- काद्या मदिरायास्तनयाः ।२३। भद्रायाश्चोपनिधिगदाद्याः ।२४। वैशाल्यां च कौशिकमेकमेवाजनयत् ॥२५॥ प्रानकदुन्दुभेर्देवक्यामपि कीर्तिमत्सुपेणोदायुभद्रसेनऋजुदासभद्र- देवाख्याः पट् पुत्रा जज्ञिरे ।२६। ताश्च सर्वानेव कसो घातितवान् ।२७। प्रानक दुदुभि नाम वाले वसुदेवजी की पोरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा, देवकी नाम की अनेक पलियां थी ॥१८॥ उनमे रोहिणी से बलभद्र, शठ, सारण, दुर्मद आदि अनेक पुत्र हुये ॥१६॥ बलभद्रजी की पत्नी रेवती विशठ उल्मुक नामक दो पुत्रो को जन्म दिया ।२०॥ सारण के पुत्र साष्टि, माटिं, शिशु, सत्य, धृति आदि हुए ॥२१रोहिणी के भद्राश्व, भद्रबाहु, दुर्दम और भूतादि के नाम से और भी सन्तान हुई थी गरगा मदिरा के पुत्र नन्द, उपनन्द और कृतक आदि हुये तथा भद्रा ने उपनिधि और गद आदि अनेक पुत्रो को जन्म दिया ॥२३-२४॥ वैशाली के गर्भ से एक ही पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ६० ] [ श्रीविष्णुपुराण - पौशिक था ॥२५॥ देवको के गर्भ से उत्पन्न हुए कीर्तिमान, सुपेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास और भद्रदेव नामक छ पुषो को कस ने मार डाला ।२६-२७॥ अनन्तर च सप्तम गर्भमर्द्धरात्रे भगवत्प्रहिता योगनिद्रा रोहिण्या जठरमाकृष्य नीतवती ।२८। कर्षणाच्वासावपि सङ्कपरणा- ख्यामगमत् ॥२६॥ ततश्च सकलजगन्महातरुमूलभूतो भूतभविष्यदादिस- कलसुरासुरमुनिजनमनसामप्यगोचरोऽब्जभवप्रमुखैरनलमुखै प्रणम्याव- निभारहरणाय प्रसादितो भगवानना दिमध्य निधनो देवकीगर्भमवततार वासुदेव ।३० तत्प्रसादविवर्द्ध मानोरुमहिमा च योगनिद्रा नन्दगोपप- ल्या यशोदाया गर्भमधिष्ठितवती ॥३१॥ सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादिग्रहम- व्यालादिभय स्वस्थमानसमखिलमेवैतज्जगदपास्ताधर्ममभवत्तस्मिश्च पुण्डरीकनयने जायमाने ॥३२॥ जातेन च तेनाखिलमेवैतस्सन्मार्गवत्ति जगदक्रियत (३३॥ फिर भगवान द्वारा प्रेरित योगमाया ने अद्धं रात्रि के समय देववी के सातवें गर्भ को खींच कर रोहिणी की कोख में स्थापित कर दिया ॥२८॥ इस गर्ग का प्रार्पण होने के कारण हो सकर्षण नाम पडा ॥२६॥ पिर इस रासार वृक्ष के मूल, भूत भविष्यत वनमान के सभी देवताओ दैत्यो और मुनियो की वृद्धि के लिये अगम्य, ब्रह्मा और अग्नि प्रादि देवतामो द्वारा पृथिवी का भार हरण करने के लिए प्रसन किए हुए तथा जिनका मादि, पन्त, मध्य बुध गही है ऐसे भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से वसुदेव रूप में अवतार धारण किया और उन्ही के प्रभाव से महिती महिमामयो योगनिद्रा न द पत्नी यशोदा के गर्भ में अवस्पिन हुई ॥३० ३१।। जब वे पमनाकर भगवान् बट हुये, तब यह सम्पूर्ण विश्व प्रान हुपे आदित्य और चन्द्रमा प्रादि ग्रहों से परिपूरा, रादि के भय से रहित, अपर्मादि दोषो से शूय उपा स्वस्य हृदय हो गया ॥२॥ उहोंने प्रयतीर्ण होकर इस सम्पूर्श विश्व को सन्माग पर चलो की प्रेरणा दी ॥३३॥ भगवतोम्यर मयंलोवेऽवतीसंस्य पोडशसहस्राण्ययोत्तराताधिानि भार्याणामभयन् १३४१ तासा च रुक्मिणीसत्यभामाजाम्यवतीचार-

चतुर्थ अश-अ० १५ ]
[६१
हासिनीप्रमुखा ह्यष्टौ पल्य प्रधाना बभूवु ॥३५॥ तासु चाष्टावयुतानि
लक्ष च पुत्रारणा भगवानखिलमूर्तिरनादिमानजनयत् ॥३६॥ तेपा च
प्रद्युम्नचारुदेष्णसाम्वादय नयोदश प्रधाना ।३७। प्रद्युम्नोऽपि
रुक्मिणस्तनया रुक्मवती नामोपयेमे ।३८॥ तस्यामनिरुद्धो जज्ञे ३६।
अनिरुद्धोऽपि रुक्मिण एव पौत्री सुभद्रा नामोपयेमे १४०। तस्यामस्य
वजो जज्ञे 1४१ वज्रस्ल प्रतिवाहुस्तस्यापि सुचारु ।४।
एवमनेकशतसहस्रपुरुषसख्यस्य यदुकुलस्य पूनसख्या वर्षशतैरपि
वक्तु न शक्यते ॥४३॥ यतो हि श्लोका विमावत्र चरिताथों ॥४४॥
इस मृत्यु लोक मे प्रकट हुए भगवान् वासुदेव की सोलह हजार एक सौ
एक रानियां हुई ॥३४॥ उनमे रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवतो, पारुहासिनी
मादि माठ रानियां प्रमुख थी ॥३५।। उन सब रानियो के उदर से भगवान् ने
एक लाख अस्सी हजार पुन उत्पन्न किये थे ॥३६॥ उनमे प्रद्य म्न, चाादेष्ण,
साम्ब प्रादि तेरह पुत्र प्रमुख माने जाते थे ॥३७॥ प्रद्य म्न का विवाह रुक्मी.
तनया रुक्मवती से हुआ था ॥३८॥! रुक्मवती से मनिरुद्ध उत्पन्न हुमा ॥३९॥
मनिरुद्ध का विवाह रुक्मी की पौत्री सुभद्रा से हुमा ।।४०|| उसमे वन नामक
पुत्र उत्पन्न हुपा ॥४१।। वज्र का पुत्र प्रतिवाहु और उसका पुत्र सुचाए हुमा
॥४२।। इस प्रकार यह यदुवश सैकडो हजार पुरुष सख्यक था, जिसकी गणना
सौ वर्षों मे भी पूण नही हो सकती ॥४३॥ इस विषय मे यह दो श्लोक हे
जाते हैं ।।४४॥
तिस्त्र कोठ्यस्सहस्राणामष्टाशीतिशतानि च ।
कुमाराणा गृहाचार्याश्चापयोगेषु ये रता ।४५
सख्यान यादवाना क करिष्यति महात्ममाम् ।
यनायुतानामयुतलक्षणास्ते सदाहुक ।४७॥
देवासुरे हता ये तु देतेयास्सुमहावला. ।
उत्पन्नास्ते मनुष्येषु जनोपद्रवकारिण ।।
तेषामुत्सादनार्थाय भुवि देवा यदो कुले।
अयतीणा कुलशत यनैकाभ्यधिक द्विज ॥४॥

१२] [ श्रीविष्णुपुरण विष्णुस्तेपा प्रमाणे च प्रभुत्वे च व्यवस्थित । निदेशस्थायिनस्तस्य ववृधुस्सर्वयादवा ।। इति प्रसूति वृष्णीना यशृणोति नर सदा । स सर्व पातकमुक्तो विगुलोक प्रपद्यते ॥५०॥ यादव कुमारों को धनुर्विद्या सिखाने वाले गृहाचायं तीन करोड मट्ठासी लाख थे, तो फिर उन यादवो की गणना करने मे कोन समय हो सकता है, जिन लाखों करोडो के सहित उपसेन सदा स्थित रहते थे ॥४५-४६। देवासुर युद्ध मे जिन महाबलो दैत्यो का हनन हुमा था, वे मत्य लोक में उत्पन्न होकर सभी उपद्रवकारी राजागण हुये ॥४७॥ उनका सहार करने के लिये देवताओं ने एक सौ एक वश वाले मदुकुल में जन्म पारण क्यिा ॥४॥ उनका स्वामित्व और व्यवस्था के अधिकार पर भगवान् विष्णु ही अधिष्ठित हुये और उन्ही की माशा मे चलते हुए व समस्त यादवगण सब प्रकार की वृद्धि को प्राप्त हुये ४६ इस प्रकार से वृष्णिवशि की उत्पत्ति के वृत्तान्त को जो मनुष्य सदैव श्रवण फरता है, यह अवश्य ही सब पापो से छूट जाता है, और उस विष्णु लोक को प्राप्ति होती है ॥५०॥ सोलहवाँ अध्याय इत्येष समासतस्ते यदोवंश कथित ॥१॥ अथ दुर्वसोवंशमवधा- रय ॥२॥ दुर्वसोवह्निरात्मज वर्भार्गो भार्गाद्भानुस्ततश्च नयीसानुस्त- स्माच करन्दमस्तस्यापि मरुत्त ।३। सोऽनपत्योऽभवत् ।४। ततश्च पौरव दुष्यन्त पुत्रमकल्पयत् १५१ एव ययातिशापात्तद्व श पौरवमेव वश समाश्रितवान् ।। श्री पदारजी ने कहा- इस प्रकार सक्षिप्त रूप से मैंने तुम्ह यदुवा का वृत्तान्त सुनाया ॥६॥ अब दुर्वसु के रा का श्रवण करो ॥२॥ दुर्वसु का चतुर्थ अंश-अ० १६, १७, १८ ] [६३ पुत्र वह्नि हुमा, उसका पुत्र भार्ग और भार्ग का भानु हुग्रा। भानु का पुत्र त्रयीमान्, उसका पुत्र करन्दम और करन्दम का पुत्र मरुत्त हुा ।।३।। मरुत्त के कोई सतान नहीं थी, इसलिये उसने पुरुवंशोत्पन्न दुष्यन्त को पुत्र रूप से रखा ॥४-५॥ इस प्रकार ययाति के शाप के फल रूप मे दुबसु के वश, पुरवश के रूप मे चला ॥६॥ सत्रहवाँ अध्याय द्रुह्योस्तु तनयो बभ्रः ।। बभ्रोस्सेतुः ।२। सेतुपुत्र प्रारब्धनामा ३१ प्रारब्धस्यात्मजो गान्धारो गान्धारस्य धर्मो धर्माद् घृत: घृताद् दुर्दमस्ततः प्रचेताः ।४। प्रचेतरा. पुनश्शतधर्मो वहुलानां म्लेच्छानामुदी- च्यानामाधिपत्यमकरोत् ।। श्री पराशरजी ने कहा-द्र ह्य, का पुत्र बभ्र, हुमा और बभ्र, का पुत्र सेतु था । इ-२।। सेतु का प्रारब्ध, पारव्य का गाधार, गाधार का धर्म, धर्म का घृत, घृत का दुर्दम और उसका पुत्र प्रचेता हुआ ॥३-४॥ प्रचेता का पुत्र शन- जो कि बाद मे होने वाले म्लेच्छो का अधिपति हो गया ।।५।। धर्म हुआ, अठारहवाँ अध्याय ययातेश्चतुर्थपुत्रस्यानोस्सभानलचक्षुः परमेपुसंज्ञास्त्रयः पुत्रा वभूवुः ।। सभानलपुत्रः कालानलः ।। कालानलात्सृञ्जयः ।३। सृञ्जयात् पुरञ्जयः ।४। पुरञ्जयाञ्जनमेजयः । तस्मान्महाशालः ।६। तस्माच्च हामनाः ७ तस्मादृशीनरतिति शूद्वौ पुत्रावुत्पन्नौ ।

१४] [ श्रीविष्णुपुराण श्री परागरजी ने कहा- ययाति का जो चौया पुर अनु था, उसके तीन पुत्र हये--सभानल, चक्षु और परमेषु। समानन का पुत्र कालानल हुपा । १-२॥ कालानल का पुत्र सृञ्जय, राजय का पुरजय पुरजय का जनमेजय, जनमेजय का महाशाल, महाशाल का महामना मोर महामना के दो पुत्र हुये- उशीनर और तितिक्षु । ३.८।। उगीनरस्यापि शिविनृगनरकृमिवर्मास्याः पञ्च पुत्रा बभूवु ।। पृपदर्भसुवीरकेकयमद्रकाश्चत्वारशिविपुमाः ।१० तितक्षोरपि रुद्रयः पुत्रोऽभूत् ॥११॥ तस्यापि हेमो हेमस्यापि सुतपाः सुतपसश्च बलिः ११२॥ यस्य क्षेत्र दीर्घतमसाङ्गवङ्गकलिङ्गसुमपाण्डाख्यं वालेयं क्षत्रमजन्यत ११३॥ तन्नामसन्ततिसंज्ञाश्च पञ्चविषया बभूवुः ॥१४॥ अङ्गादनपानस्ततो दिविरथस्तस्माद्धर्मरथः ।१५। ततचित्ररथो रोमपा- दसंज्ञ ११६॥ यस्य दशरथो मित्रं जज्ञे ।१७। यस्याजपुत्री दशरथश्शान्तां नाम कन्यामनपत्स्य दुहितृत्वे युयोज १८) उशीनर के पांच पुत्र हुये, जिनके नाम शिबि, नृग, नर, कृमि और धर्म थे। शिवि के पृपदभ. सुवीर, केकय और मद्रक नामक चार पुत्र हुये ॥१०॥ तितिक्षु का पुत्र रुशद्रय हुआ, उमका हेम नामक पुत्र हुआ। हेम का सुतपा और सुतपा का पुत्र बलि हुमा ॥११-१२|| इस बलि की रानी के उदर में दीर्घतमा नामक मुनि ने गर्भ स्थापित कर अङ्ग, वङ्ग, कलिंग, सुह्म और पोण्ड नामक पांच पुत्र उत्पन्न किये ॥१३।। इनके नामो पर पांच देशों का वैसा ही नाम पडा ।।१४॥ अग का पुत्र अनपान हुआ, मनपान का दिविरथ और दिवि. रथ का पुत्र धर्मग्य हुआ ॥१५॥ धर्मरथ का पुत्र चित्ररथ हुमा, जिसको रोम- पाद भी कहा गया ॥१॥ इम रोमपाद के मित्र मज-पुत्र दशरथ हुये, जिन्होंने रोमपाद के नि.संतान होने के कारण उसे अपनी कन्या शान्ता गोद दे दी थी ॥१७.१८॥ रोमपादाच्चतुरङ्गस्तस्मात्पृथुलाक्षः १६ ततश्चम्पो यश्चम्पां निवेशयामास ।२०। चम्पस्य हर्यगोनामात्मजोऽभूत् ।२१। हर्यगाद्भद्ररथो भद्ररथावृहद्रयो बृहद्रथाद्रबृहत्कर्मा वृहत्कर्मणश्च बृहद्भानुस्तस्मान्च चतुथ अश-अ० १६ ] [ ६५ वृहन्मना बृहन्मनसो जयद्रथ ।२२। जयद्रथो ब्रह्मक्षयान्तरालसम्भूत्या पल्या विजय नाम पुत्रमजीजनत् ।२३। विजयश्च धृति पुनमवाप ॥२४॥ तस्यापि वृतमत पुनोऽभूत् ।२५॥ धृतवतात्सत्यवर्मा १२६॥ सत्यकर्मण- स्त्वतिरथ ।२७। यो गङ्गाङ्गतो मञ्जूपागत पृथापविद्ध कर्णं पुनमवाप ।२८। कर्णादृपसेन इत्येतदन्ता अङ्गवश्या १२९। अतश्च पुरुवश श्रोतुमर्हसि ॥३०॥ फिर रोमपाद वा पुत्र चतुरग और उसका पुत्र पृथुलाक्ष हुमा ॥१६॥ पृथुलाक्ष वा पुत्र चम्प हुअा, जिसने चम्पापुरी को बसाया ॥२०॥ चम्प का पुत्र हयंग हुप्रा । हयंग का भद्रय, भद्ररथ या वृहद्रय, वृहद्रय का वृहत्कर्मा, वृह- कर्मा का बृहद्भानु, वृहद्भानु का वृहामना मोर बृहन्मना का पुत्र जयद्रथ हुप्रा ॥२१.२२॥ जयद्रय की उत्पत्ति ब्राह्मण और क्षत्रिय के ससर्ग से हुई ॥२३॥ विजय का पुत्र धृति था, उपका पुत्र पृतवत हुपा ॥२४-२५॥ धृतव्रत का पुत्र सत्यकर्मा और स यकर्मा का पुत्र अतिरथ हुआ, जिसने पृथा द्वारा प्रवाहित किये फण को गगा स्नान के समय पुत्र रूप मे प्राप्त किया था। इस कर्ण का पुत्र वृपसेन हुआ। अगवश का वर्णन यहा पूर्ण हो गया । प्रव पुरुवश का वर्णन करता हूं, उसे सुनो ॥२६-३०॥ उन्नीसवाँ अध्याय पुरोर्जनमेजयस्तस्यापि प्रचिन्वान् प्रचिन्वत प्रवीर प्रवीरान्म- नस्युर्मनस्योश्चाभयदस्तस्यापि सुध स्सुद्योबहुगतस्तस्यापि सयातिस्स- यातेरहयातिस्ततो रौद्राध ।११ मृतेपुकक्षेपुस्थण्डिलेपुकृतेपुजलेपुधर्मपुतेपुस्थलेपुसन्नतेपुवनेपु- नामानो रोद्राश्वस्य दश पुत्रा बभूवु । ऋतेपोरन्तिनार पुत्रोऽभूत ३। सुमतिमप्रतिरथ ध्र व चाप्यन्तिनार पुत्रानवाप ॥४॥ अप्रतिरथस्य ६६ ] [ श्री विष्णुपुराण कण्व. पुनोऽभूत् ।। तस्यापि मेधातिथि ।६। यत काण्वायना द्विजा वभूव 1७1 अप्रतिरथस्यापर पुनोऽभूदलीन 14। ऐलीनस्य दुष्यन्ताद्याश्चत्वार पुत्रा बभूवु ।।। दुष्यन्ताचक्रवर्ती भरतोऽभव ॥१०॥ यन्नामहेतुर्देवैश्श्लोको गीयते ॥११॥ माता भस्ना पितु. पुत्रो येन जात स एव सः । भरस्व पुत्र दुष्यन्त मावमस्थाश्शकुन्तलाम् ॥१२॥ रेतोधा पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।। त्व चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ।१३। श्री पराशरजी ने कहा-पए का पुत्र जनमेजय हुआ । जनमेजय का पुत्र प्रचि वान् पौर उसका पुन प्रवीर हुमा। प्रनोर का मनम्यु, मनस्यु का अभयद, अभयद का सुङ मोर सुद्य का बहुगत हुमा । बहुगत सयाति की उत्पत्ति हुई तथा सयाति से अहयाति और अहयाति से रौद्राश्व का नाम हा ॥१॥ रोद्राश्व के दस पुत्र हुरे-ऋतेषु कोपु. स्थण्डिलेपु, कृतेषु जलेप, धर्मेषु, धृतेषु, स्थतेषु सनने और वनेषु उनके नाम थे ॥२॥ तेषु के पुत्र का नाम अन्तिनार और पन्तिनार के मुमति अअतिरथ और ध्रुव नामक तीन पुत्र हुये । ॥३४॥ इनमे से अतिरथ के पुत्र का नाम कराव था, जिसस मेवानिधि उत्पन हुआ । इसी को सन्तान काएवायन नामक ब्राह्मण हुये ।।५-७।। अप्रतिरय का द्वितीय पुत्र ऐनीन हुमा, जिपके दुष्यान्तादि चार पुन उ पन्न हुये ॥१६॥ दुष्यन्त का पुत्र भरत हुमा, यह चक्रवर्ती राजा था, जिसके विषय मे देवतामो ने गाया था ।।१०-११॥ माता के चर्म धोनी के समान होने के कारण पुत्र पर पिता का ही अधिकार होता है । पुत्र जिसके द्वरा जन्म पाता है उसी पिता का रूप होता है । है दुष्यन । शकु त ना का तिरसार न कर इस पत्र का पालन करो। क्योकि अपने वीर्य से उत्पन हुप्रा पुत्र ही पाने पिता का यमा• लय से निकालता है । शकुन्तला का यह कयन सत्य है कि इस पुत्र का प्राधान तुम्ही ने किया है ॥१२-१३॥ भरतस्य पलोनये नव पुना वभूवु ११४. नैते. ममानुरूपा इत्यभिहितास्तन्मातर परित्यागभयात्तत्पुनाञ्जघ्नु ।१५॥ ततोऽस्य - चतुर्थ अंग-अ० १६ ] [६७ वितथे पुत्रजन्मनि पुयायिनो मरुत्सोमयाजिनो दीर्घतमस: पाण्यंपास्ताबृहस्पतिवीर्यादुतथ्यपल्या ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजाख्यः पुयो मरुद्भिर्दत्तः ।१६। तस्यापि नामनिर्वच- नश्लोक: पठ्यते ।१७। मढे भर द्वाजमिमं भर द्वाजं वृहस्पते । यातौ यदुक्त्वा पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥१८॥ भरत की तीन भाएं थी, उन्होने नौ पुष उत्पन्न किये ॥१४॥ भरत ने जब उन्हे अपने अनुरूप न बताया तो उनकी मातानो ने श्राने परित्याग किये जाने की प्राराका से, उन पुत्रो की हत्या कर दी ॥१५॥ इस प्रकार पुत्रो- त्पत्ति के व्ययं होने पर पुय हामी भरत ने मरपोप नामक यज्ञ का अनुष्ठान किया। उस यज्ञ की समाप्ति पर मरुद्गण ने भरत को भरद्वाज नामक एक शिशु प्रदान किया। यह बालक वृहस्पतिजी के वीयं मे उतथ्य-पत्नी ममता के गर्भ से उत्पन्न हुग्रा या ।१६। उसके नामकरण के विषय में एक नोक प्रचलित है ।१७। हे मूढ़े ! यह पुत्र द्वाज अर्यात् हम दोनो मे उत्पन्न हुआ है, इसलिए तू इसका भरण कर । इसके उत्तर में ममता ने कहा था हे वृहम्पो ! यह पुत्र दाज है, इसका भरण तुम करो । इस प्रकार विवाह करते हुए माता-पितापो के चने जाने पर भरण और द्वाग शब्दों से उसका नाम भरद्वाज हमा॥१८॥ भरद्वाजस्स वितथे पुत्रजन्मनि मरुद्भिर्दत्त. ततो वितथसंज्ञाम- वाप ।१९। वितथस्यापि मन्युः पुत्रोऽभवत् ।२०। वृहत्क्षत्रमहावीर्यनरगर्गा अभवन्मन्युपुनाः ।२१। नरस्यस कृतिस्सड कृतेगुरुप्रीतिरन्तिदेवौ ।। गर्गाच्छिनि. ततश्व गारिशन्याः क्षत्रोपेता द्विजातयो बभूवुः ।२३। महावीर्याच्च दुरुक्षयो नाम पुत्रोऽभवत् ।२४। तस्य अय्यारुरिण: पुष्क- रिण्यो कपिश्च पुत्रत्रयमभूत् ।२५। तच्च पुत्रत्रितयमपि पश्चाद्विप्रतामुप. जगाम ।२६। वृहत्क्षत्रस्य सुहोत्रः ।२७। सुहोनाद्धस्ती य इद हस्तिनापुर- मावासयामास ॥२८॥ पुत्रोत्पत्ति के वितय (निष्फन) होने पर मरुद्गग ने भरत को भरद्वाज प्रदान किया था, इसलिये उसे वितथ भी कहा गण ॥१६॥ वितथ के १८] [ श्रीविष्णुपुराण पुत्र का नाम मन्यु था, जिसके बृहत्सव,महावीर्य नर और गर्गादि अनेक पुत्र हुये ॥२०-२१॥ नर का पुत्र सकृति हुप्रा, सकृति के दो पुत्र गुरुप्रीति और रन्ति. देव हुये ॥२२॥ गर्ग से शिनि हुअा, उससे गार्य और शैन्य नामक प्रसिद्ध क्षत्रो- पेत ब्राह्मण उत्पन्न हुए ॥२३॥ महावीर्य के पुत्र का नाम दुरुक्षय हमा ॥२४॥ दुक्षय के अभ्यारुणि पुष्करिण्य और कपि नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए ॥२५|| कालान्तर मे यह तीनो पुत्र ब्राह्मण हो गये ॥२६॥ बृहत्भत्र का पुत्र सुहोत्र हुा । सुहोय के पुत्र हनी ने ही हस्तिनापुर नाम का नगर बसाया ॥२७.८॥ अजमीढद्विजमीढगुरुमीढायो हस्तिनस्तनपा १२६। अजमीढाकण्व १३०। कण्वान्मेधातिथि १३११ यत काण्वायना द्विजा १३२१ अजमीढ- स्थान्य पुनो बृहदिपु ।३३। बृहदिपोवूहद्धनुर्बुहद्धनुषश्च वृहत्वर्मा ततश्च जयद्रथ स्तस्मादपि विश्वजित् ॥३४। ततश्च सेनजित् ।३५॥ रुचिराश्वकाश्यहढहनुवत्सहनुसशासेनजित पुना १३६। रुचिराश्वपुन पृथुसेन पृथुसेनापार १३७। पारातील १३८। तस्यैकशत पुत्राणाम् १३९। तेषा प्रधान काम्पिल्याधिपतिस्समर १४०। समरस्यापि पारसुपा- रसदश्वात्रय पुत्रा १४१। सुपारात्पृथु पृथोस्सुकृतिम्ततो विभ्राज ॥४२॥ तस्माच्चागुह ॥४३॥ यश्शुकदुहितर कीर्ति नामोपयेमे ।४४॥ अरगुहाग- ह्मदत्त ।४५॥ ततश्च विष्वक्सेनस्तस्मादुदक्सेन ।४६। भल्लाभस्तस्य चात्मज 1४७ हस्ती के अजमीढ, द्विजमीढ और पुरुमीट नामक तीन पुत्र हुए । अजमीढ का पुत्र करव और कएव का पुत्र मेधातिथि हुप्रा, जि' के बाएवायन ब्राह्म गो की उत्पत्ति हुई ॥२६-३२॥ अजमीढ का द्वितीय पुत्र बृहदिपु हुप्रा ॥३३॥ उपका पुत्र बृहदनु हुना, बृहद्धतु का वृहकर्मा तथा वृहत्तर्मा का जयद्रथ था । जयद्रष से विश्वजित् पौर विश्वजित् सेनजित हुआ। सेनजित् के चार पुत्र हुए जिनके नाम रुचिराश्व, काश्व, हदहनु पोर वत्सहनु थे ॥३४ ३६॥ रुचिराश्व का पृथु- सेन, पृथुसेन का पार और पार का पुत्र नील हुधा। इसी नील के सौ पुत्र हुये ये जिनमे से एक काम्पिल्याधिपति समर प्रमुख था ॥३७-४०॥ समर के तीन चतुर्थ अंश-अ०१६] [ ६६ पुत्र थे-पार, मुगार और सदश्व ॥४१।। सुपार का पुत्र पृथु, पृथु का सुकृति, सुकृति का विभ्राज और विभ्राज का अणुह नामक जो पुत्र हुग्रा, उसने शुक- पुत्री कीर्ति का पाणिग्रहण किया था ॥४२-४४॥ अणुह का पुत्र ब्रह्मदत्त हुषा, जिससे विष्वक्सेन, विष्वक्सेन से उदकमेन हुअा। उदकमेन का पुत्र भल्लाभ हुप्रा ॥४५.१७॥ द्विजमीढस्य तु यवीनरसंज्ञः पुत्रः ।।८। तस्यापि धृतिमांस्त- स्माच सत्यधृतिस्ततश्च दृढनेमिस्तस्माच्च सुपाश्वस्ततस्सुमतिस्ततश्च सन्नतिमान् ।४६। सन्नतिमतः कृतः पुत्रोऽभूत् ॥५०॥ यं हिरण्यनाभो योगमध्यापयामास ५१। यश्चतुर्विशति प्राच्यसामगानां संहिताश्चकार १५२। कृताच्चोग्रायुधः ।५३। येन प्राचुर्येण नीपक्षयः कृतः ॥५४॥ उग्रायु- धात्क्षेभ्यः क्षेम्यात्सुधीरस्तस्माद्रिपुञ्चयस्तस्माच्च बहुरथ इत्येते पौरवाः ।५५ अजमीढस्य नलिनी नाम पत्नी तस्यां नीलसंज्ञः पुत्रोऽभवत् ॥५६॥ तस्मादपि शान्तिः शान्तेस्सुशान्तिस्सुशान्तेः पुरञ्जयस्तस्माच्च ऋक्षः १५७। ततश्च हयश्वः ।५८। तस्मान्मुद्गलसृञ्जयवृहदिपुयवीनरका म्पिल्य- संज्ञाः पञ्चानामेव तेपा विपयाणा रक्षणायालमेते मत्पुत्रा इति पित्राभिहिता पाञ्चाला. १५६। द्विजमीढ का पुत्र यत्रीनर हुअा ॥४८ उमका पुत्र धृतिमान, घुतिमान का सत्यवृति, सत्यति का दृढनेमि, हडनेमि का सुपार्श्व, मृयाश्व का सुमति, सुमति का सन्नतिमान् और मनिमान् का पुत्र कृत हुआ। हिरण्यनाभ ने इस कृत को योग विद्या सिखाई और फिर इसने प्राच्य सामग श्रुतियो की चौबीस सहितामो की रचना की ।।४६-५२।। कत का पुत्र उग्रायुध हुअा, जिसने अनेको नोपवशीय क्षत्रियो का सहार किया था ॥५३-५४॥ उग्रायुध का पुत्र क्षेम्य हुप्रा, क्षेम्य का सुपीर, सुधीर का रिपुजय और रिपञ्जय का बहुरथ हुआ । यह सब राजाएँ पुरवशीय हुए ॥५५॥ अजमीढ की नलिनी नाम की पली से नील नामक एका पुत्र हुआ ॥५६॥ नील का पुत्र शान्ति, शान्ति का सुशान्ति, सुशान्ति का परनप. परञ्जय का ऋक्ष और ऋक्ष का पुत्र हर्यश्व हुमा ५७-५८। हर्यश्व १०० ] [ श्रीविष्णुपुराण के पांच पुत्र हुए उनके नाम पुद्गल, सृजय वृदिषु, यवीनर और काम्पिल्य थे। पिता ने अपने उन पुत्रो को अपने प्राधीन पांचो देशो की रक्षा मे समर्थ बताया, इसलिए वे 'पाञ्चाल' कहे जाने लगे ।।५।। मुद्गलाच्च मौहल्या. क्षतोपेता द्विजातयो बभूवु. १६०१ मुद्गलाद्- वृहदश्वः ।६१। बृहदश्वाद्दिवोदासोऽहल्या च मिथुनमभूत् ॥६२। शरद्वत- श्वाहल्याया शतानन्दोऽभवत् ।६३। शतानन्दात्सत्यधृतिर्धनुर्वेदान्तगो जज्ञे १६४॥ सत्यधृतेर्वराप्सरसमुवंशी दृष्ट्वा रेतस्कन्न-शरस्तम्वे पपात ॥६५॥ तच्च द्विधागतमपत्यद्वय कुमार. कन्या चाभवत् ॥६६॥ तौ च मृगयामुप- यातश्शान्तनुदृष्ट्वा कृपया जग्राह ।६७। ततः कुमार. कृपः कन्या चाश्व. त्थाम्नो जननी कृपी द्रोणाचार्यस्य पत्ल्यभवत् १६८। मुद्गल से मौद्गल नामक क्षत्रोपेत ब्राह्मण उत्पन्न हुए ॥६०॥ मुद्गल का बृहदश्व नामक जो पुत्र उत्पन्न हुमा, उससे देवोदास नामक एक पुत्र और अहिल्या नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई ॥६१-६२।। उमी पहिल्या के गर्भ से गौतम द्वारा शतानन्द उत्पन्न हुमा ॥६३॥ उस शतानन्द का पुत्र धनुर्वेद का पारदर्शी सत्यति नामक पुन हुमा ॥६४॥ एक बार सत्यवृति ने असरा श्रेट उर्वशी को देखा तो उसके प्रति कामासक्त होने से उनका वीर्य स्खलित होकर सररराडे पर जा गिरा ॥६५ । उसके वहा दो भागो मे विभक्त होने पर पुत्र- पुत्री रूप दो सताने उत्पन्न हो गई ॥६६॥ राजा शान्तनु जब मृगया के लिए वन मे गये थे, तब उन्हे अनाथावस्था मे देखकर कृग-पूर्वक अपने घर ले पाये, इससे पुत्र का नाम कृर' और कन्या का नाम 'कृती' रवा गपा, वही बाद में अश्वत्थामा को जन्म देने वाली दोणाचार्य की भार्या हुई ॥६७-६८ । दिवोदासस्य पुत्रो मित्रायु १६६ मित्रायोश्च्यवनो नाम राजा 1७० च्यवनात्सुदास सुदासात्सौदास. सौदासात्सहदेवस्तस्यापि सोमकः ७१। सोमकाज्जन्तु: पुनशतज्येष्ठोऽभवत् १७२। तेपा यवीयान् पृषत. पृपताद्रुपदस्तस्माच्च धृष्टद्युम्नस्ततो धृष्टकेतु १७३। अजमीढस्यान्य ऋक्षनामा पुत्रोऽभवत् ।७४। तस्य सवरण: 1७५। सवर- रणात्कुरु १७६॥ य इद धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र चकार १७७ सुधनुर्जह्न परीक्षित्प्र-

चतुर्थ अंश-अ० १६]
[ १०१
मुसाः कुरोः पुत्रा बभूवुः ७८) सुधनुपः पुत्रस्सुहोनस्तस्माच्च्यवनश्च्य-
वनात् कृतकः ७६। ततश्वोपरिचरो बसुः 1८०) बृहद्रथप्रत्यनकुशाम्बुकु-
चेलामात्स्यप्रमुखा वसो. पुत्रास्सप्ताजायन्त 1८१। वृहद्रथात्कुशाग्नः
कुशाग्रावृपभो वृपभात् पुष्पवान् तस्मात्सत्यहितस्तस्मात्सुधन्वा तस्य
च जतु: ।। वृहद्रथाच्चान्यश्शकलद्वयजन्मा जरया संहितो जरासन्ध-
नामा ।३। तस्मात्सहदेवस्सहदेवात्सोमपस्ततश्च श्रुतिश्रवाः ।।४।
इत्येते मया मागधा भूपाला कथिताः ।।५।
दिवोदास का पुत्र मित्रायु था, जिसका पुत्र राजा च्यवन हुआ ॥६६-
७०॥ च्यवन का पुत्र सुदाम, सुदास का सौदास, सोदास का सहदेव, और सह-
देव का सोमक हुा । इस सोमक के सौ पुत्र उत्पन्न हुये, जिनमे ज्येष्ठ पुत्र का
नाम जन्तु और सबसे छोटे पुत्र का नाम पृपत था । पृषत का पुत्र द्रुपद हुआ।
द्रपद का धृष्टद्युम्न और धृष्टद्युम्न का पुत्र घृष्टकेतु हुप्रा ॥७१-७३।। आढमीक
के अक्ष नामक तीसरे पुन को सवरण नामक तनय हुआ। संवरण का पुत्र
कुरु हुमा,
जिसने धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र स्थापित किया ।।७४-७७।। कुरु के सुधनु,
जह्न और परीक्षित प्रादि अनेक पुन हुये ॥७८। सुघनु का पुत्र सुहोत्र हुमा ।
सुहोन या च्यवन, उमका कृतक और उसका पूत्र ठपरिचर वसु हुआ ॥७६-८०।।
वसु के बृहद्रय, प्रत्यग्र, कुशाम्बु, कुचेल, मात्म्य प्रादि सात पुष हुये १८१|| इनमे
से वृहद्रथ का कुशाग्र हुअा । कुशाग्र का वृषभ, वृषभ का पुष्पवान्, पुष्पवान्
का रात्यहित, सत्यहित का सुधन्वा और सुपन्वा का पुन जतु हुअा।।२।। उसी
बृहद्रथ के एक पुत्र और हुअा था जो दो खण्डों मे था तथा जरा द्वारा जोड देने
पर वह जरासन्ध के नाम में प्रसिद्ध हुआ 1८३|| उस जगसव का पुत्र सहदेव
हुअा, सहदेव का सोमप और सोमप का पुत्र श्रुतिश्रवा हुअा ||२४|| इस प्रकार
माग भूपालो का यह वृतान्त मैंने तुमसे कह दिया है ॥५॥

१०२] [ श्रीविष्णुपुराण वीसवाँ अध्याय परीक्षितो जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्वत्वारःपुत्राः ।११ जह्नोस्तु सुरथो नामात्मजो बभूव ।२। तस्यापि विदूरथ. ।३। तस्मात्सा- वभौमस्सार्वभौमाज्जयत्सेनस्तस्मादाराधितस्ततश्वायुतायुरयुतायोरको- धनः ।४। तस्माद्देवातिथिः ।। ततश्च ऋक्षोऽन्योऽभवत ।६। ऋक्षाद्भी- मसेनस्ततश्च दिलीपः।७। दिलीपात् प्रतीपः ।। तस्यापि देवापिशान्तनुबाह्नोकसज्ञास्त्रयः पुत्रा बभूवुः ।। देवापिलि एवारण्यं विवेश 1१०। शान्तनुस्तु महीपालोऽभूत् ।११ अयं च तस्य श्लोकः पृथिव्यां गीयते ॥१२॥ य यं कराभ्यां स्पृशति जीणं यौवनमेति सः । शान्तिं चाप्नोति येनाग्रयां कर्मणा तेन शान्तनुः ।१३। श्री पराशरजी ने कहा-परीक्षित के चार पुत्र हुए, जिनके नाम जन- मेजय, श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन थे॥१॥ जन्हु के सुरथ नाम का एक ही पुत्र था ॥२॥ सुरथ का पुत्र विदूरथ हुआ। विदूरथ का पुत्र सार्वभौम, सार्व- भौम का जयत्सेन, जयत्सेन का पाराधित, पाराधित का प्रयुतायु और अयुतायु का पुत्र अक्रोधन हुआ ॥३-४॥ अक्रोधन का पुत्र देवातिथि और देवातिथि का पुत्र द्वितीय ऋक्ष था ॥५-६॥ ऋक्ष का पुत्र भीमसेन, भीमसेन का दिलीप और दिलीप का पुत्र प्रतीप हुमा ७.८प्रतीप के तीन पुत्र देवापि, शान्तनु और बालीक हुए ॥६॥ इनमे से देवापि के वाल्यकाल मे बनवासी हो जाने के कारण शान्तनु राजा हुआ ॥१०-११॥ उसके विषय मे पृथिवी पर यह श्लोक गाया जाता है-यह जिस जिसको छू लेते वही वही वृद्ध पुरुष भी युवावस्था को प्राप्त हो जाते थे और अन्य सभी प्राणी उनके स्पर्श को पाकर महान् शान्ति को प्राप्त होते थे, इसीलिए वे 'शान्तनु' नाम से विख्यात हुये थे ॥१२-१३।।

[१०३ चतुर्थ अंश-अ०२०] तस्य च शान्तनो राष्ट्र द्वादशवर्षाणि देवो न ववर्ष ११४। ततश्वाशेपराष्ट्रविनाशमवेक्ष्यासौ राजा ब्राह्मणानपृच्छत् कस्मादस्माकं राष्ट्र देवो न वर्षति को ममापराध इति ।१५ततश्व तमूचुर्दाह्मणाः ।१६। अग्रजस्य ते हीयमवनिस्त्वया सम्भुज्यते अतः परिवेत्तात्वमित्यु क्तस्स राजा पुनस्तानपृच्छत् ।१७किं मयात्र विधेयमिति ।१८) ततस्ते पुनरप्यूचुः ।१६। यावद्दे वापिन पतनादिभिर्दोषरभिभूयते तावदेतत्तस्याहं राज्यम् ।२०। तदलमेतेन तु तस्मै दीयतामित्युक्ते तस्य मन्त्रिप्रवरेणाश्मसारिणा तत्रारण्ये तपस्विनो वेदवादविरो- धवक्तारः प्रयुक्ताः ॥२१॥ तैरस्याप्यतिऋजुमतैर्महीपतिपुत्रस्य बुद्धिवंद- वादविरोधमार्गानुसारिण्यक्रियत ।२२। शान्तनु के शासन काल में एक समय बारह साल पर्यन्त बरसात नहीं हुई ॥१४॥ तब पाने समस्त राज्य को समाप्त होता देखकर नृप शान्तनु ने विप्रो से पूछा, "मेरे देश में वर्षा का प्रभाव क्यों हैं ? इसमे मेरी क्या त्रुट है ? ॥१५॥ ब्राह्मण बोले-- "जिस राज्य को प्राप भोग रहे हैं, वह अापके ज्येभ्राता, या है, इसलिए आप तो केवल सरक्षक मात्र हैं ।" यह मुन कर शान्तनु ने पुनः पूछा - "इस परिस्थिति मे अब मुझे क्या करना अभीष्ट है? ॥१६-१८॥ याह्मणो ने उत्तर दिया-"मापके ज्येष्ठ भ्राता देवापि किसी प्रकार पतित या अनाचारी होकर राज्य से पदच्युत होने योग्य न हो, तब तक इस राज्य के अधिकारी वही हैं ॥१६-२०॥ इसलिये पाप इस राज्य को अपने भाई को ही मौप दें, पापका इसने कोई सम्बन्ध नही। अ.ह्मणों सुनकर महाराज शान्तनु के मन्त्री प्रश्ममारी ने वेदयाद के विरोधी तपस्वियो को धन में भेज दिया ।।२१।। जिन्होंने यन में पहुंचकर महान सरल हृदय राज- कुमार देवापि को बुद्धि को भी वैदवाद के विरुद्ध माकृष्ट किया ॥२२॥ राजा च शान्त नुद्धिजयचनोत्पन्नपरिदेवनशोकस्तान ब्राह्मणान- वृत्वाग्रजस्य प्रदानायारण्यं जगाम २३॥ तदाश्रममुपगतान तमवनतमवनीपतिपुत्रं देवापिमुपतस्थुः ॥२४॥ ते ब्राह्मणा वेदवावानु- बन्धी नि वचांसि राज्यमग्रजेन तमूनुः ॥२५॥ असायपि देवापिदयाद विरोधयुक्तिपितमनेकप्रकारं ऐम वचन ग्रतः कर्तव्यमित्यर्थवन्ति १०४ ] [श्रीविष्णुपुराण तानाह ।२६। ततस्ते ब्राह्मणाश्शान्तनुमूचुः ॥२७॥ आगच्छ हे राजन्नलमयाति निवन्धेन प्रशान्त एवासावनावृष्टिदोपः पतितोऽयमनादि- कालमहितवेदवचनदूपणोचारणात् ।२८। पतिते चाग्रजे नैव ते परिवे- तृत्वं भवतीत्युक्तश्शान्तनुस्स्वपुरमागम्य राज्यमकरोत् ।२६। वेदवादवि- रोधवचननोचारणदूपिते च तस्मिन्देवापी तिष्ठस्यपि ज्येष्ठभ्रातर्यसिल- सस्यनिष्पत्तये ववर्ष भगवान्पर्जन्यः १३० दूसरी पोर ब्राह्मणों के यचन सुनकर दुखित एवं शोकाकुल राजा शान्तनु ब्राह्मणों को मङ्ग लेकर अपने ज्ये? भ्राता को राज्य सौपने धन को गये ॥२३॥ वे सभी सरलमति विनीत व्यवहारी राजकुमार देवापि के पाश्रम पर पहुँचे । जहा ब्राह्मण उन्हें समझाते रहे और "ज्येष्ठ भ्राता को ही राज्य वरना चाहिये।" प्रादि वेदो के अनुमार नीति एवं उपदेशन वनन कहने लगे ॥२४- २५।। लेकिन देवापि ने वेदनीति के विरुद्ध उनमे अनेक प्रकार से दूपित वचन कहे ।।२६।। जिन्हे सुनकर शान्तनु से उन ब्राह्मणो ने कहा-हे नृप ! चलिये, अब अधिक आग्रह करने की प्रावश्यकता नहीं है। आदि काल से माराध्य वेद वाक्यो के विरुद्ध दूषित वचन कहने से देवापि पतित हो गये हैं । अब आप चलें अनावृष्टि का दोष समाप्त होकर प्रापके राज्य में वर्षा प्रारम्भ हो गई है ॥२७॥ चूकि बडा भाई इस प्रकार पतित हो चुके हैं, इस कारण अब पाप सरक्षक या परिवेत्ता मात्र नहीं हैं। फिर शान्तनु अपने राज्य को लौट आये और शासन करने लगे ॥२६॥ वेदवाद के विरोध मे दूपित वचनो के प्रयोग करने के कारण देवापि पतित हो गये और इस प्रकार ज्येष्ठ भ्राता के रहते हुये भी छोटे भाई के शासन मे खाद्यान्न उत्पादन हेतु बादल बरसने लगे ॥३०॥ वाह्लीकात्सोमदत्तः पुत्रोऽभूत् १३१॥ सोमदत्तस्यापि भूरिभूरिश्रवः शल्यसंज्ञास्त्रयः पुत्रा वभूवुः ॥३२॥ शान्तनोरप्यमरनद्यां जाह्नव्यामुदारकीतिरशेषशास्त्रार्थविद्धीष्मः पुत्रोऽभूत् ।३३। सत्यवत्यां च चित्राङ्गदविचित्रवीयौं द्वौ पुत्रावुत्पादयामास शान्तनुः ॥३४॥ चित्रा- गदस्तु वाल एव चित्राङ्गदेनैव गन्धर्वेणाहवे निहतः ॥३॥ विचित्रवो- यॊऽपि काशिराजतनये अम्बिकाम्बालिके उपयेमे ॥३६॥ तदुपभोगाति- [ १०५ . चतुर्थ अंश-अ० २०] खेदाच्च यश्मणा गृहीत. स पञ्चत्वमगमत् ॥३७॥ सत्यवतीनियोगाच्च मत्पुत्र. कृष्णद्वैपायनो मातुर्वचनमनतिक्रमण यमिति कृत्वा विचित्र- वीर्यक्षेत्रेधृतराष्ट्रपाण्डू तत्प्रहितभुजिष्याया विदुर चोत्पादयामास ।३८ बालाक का पुत्र सोमदत्त था और सामदत के भूरि, भूरिथवा एव शल्प तीन पुग हुये ॥३१-३२॥ शान्तनु का एक पुत्र भीष्म, जो कि अत्यन्त कीर्तिशाली एव समस्त शास्त्रों का विद्वान् था और गगाजी से उत्पन्न हुपा था ॥३३॥ शान्तनु के दो अन्य पुत्र चित्रागद एव विचित्रवीर्य सत्यवती से उत्पन्न हुये ॥३४॥ शान्तनु के पत्र चित्रांगद को बाल्यकाल में ही चित्रागद नामक एक गन्धवं ने मार डाला था ॥३॥ विचित्रवीर्य ने काशी नरेश की अम्बिका व पम्बालिका नामक कन्यानो मे विवाह किया ॥३६॥ किन्तु पत्नियों त्यधिक समर्ग मे लग्नशील रहने के कारण विचित्र वीर्य पक्ष्मा से पीडित होकर मकाल ही मृत्यु को प्राप्त हो गया ।।३७।। पाराशर जी बोले- इसके पश्चात् मेरे पुत्र कृष्ण द्वौपायन ने सत्यवती एव अपनी माता वे निर्देशानुसार विचित्र- पीयं की पत्नियोसे धृतराष्ट्र और पाण्डु नामक दो पुत्रो को जन्म दिया एव उनकी दासी से विदुर नामक पुत्र उत्पात किया ॥३॥ धृतराष्ट्रोऽपि गान्वायां दुर्योधनदुश्शासनप्रवान पुत्रशतमुत्पाद- यामास १३९। पाण्डोरप्यरण्ये मृगयायामृपिशापोपहतप्रजाजननसाम- थ्यस्य धर्मवायुशक्र युधिष्ठिरभीमसेनार्जुना कुन्त्या नकुल सहदेवी चाश्विभ्या माद्रघा पञ्चपुनास्समुत्पादिता ।४०। तेपा च द्रौपद्या पञ्चव पुत्रा बभूवु ॥४१॥ युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्य. भोमसेनाच्छ तसेन. श्रुतकीतिरर्जुनाच्छ तानीको नकुलाच्छु तकर्मा सहदेवात् ।४२। अन्ये च पाण्डवानामात्मजास्तद्यथा १४३। यौधेयी युधिष्ठिराद्देवकं पुरमवाप ।४४॥ हिडिम्बा घटोत्कच भीमसेनात्पुत्र लेभे ॥४५॥ काशीच भीमसेनादेव सर्वग सुतमवाप ।४६। सहदेवाच्च विजया सुहोनं पुत्रमवाप ॥४७॥ रेणुमत्या च नकुलोऽपि निरमित्रमजीजनत् । धृतराष्ट द्वारा गान्धारी से दुर्योधन, दु शासन प्रादि सौ पुत्र उत्पन्न हुए ॥३६॥ वन मे शिकार करते हुये एक बार एक ऋपि वे शाप से कारण १०६.] [ श्रीविष्णुपुराण पाण्डु सतानोत्पत्ति के अयोग्य हो गये थे, तब उनकी पत्नी कु-तीसे धर्म, वायु व इन्द्र द्वारा क्रमश. युधिष्ठिर, भीम व अर्जुन नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए एक उनकी दूसरी पत्नी माद्री से दोनो अश्विनी कुमारो द्वारा नकुल व सहदेव नामक दो पुत्र उसन्न हुये और इस तरह पाण्डु के पाच पुत्र उत्पन्न हुये ॥४०॥ द्रोपदी से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव द्वारा पांच पुत्र उत्पन्न हुये ॥४१॥ युधिष्ठिर द्वारा प्रतिविन्ध्य, भीमसेन द्वारा श्रुतसेन, अर्जुन द्वारा श्रुतकोनि, नकुल द्वारा श्रुतानीक एव सहदेव द्वारा श्रुतकर्मा ने जन्म लिया ।।४२।। उपरोत मो के अतिरिक्त भी पाण्डु-पुत्र पांडवो के अन्य अनेक पुत्रों ने जन्म लिया ॥४३॥ युधिष्ठिर द्वारा द्रोपदी के गर्भ से देवक नामक पुत्र, हिडिम्बा से भीमसेन द्वारा घटोत्कच व काशी से सवर्ग नामक पुत्र, रेणुमती से नकुल द्वारा निरमित्र उत्पन्न हुपा ।।८४.४८॥ अर्जुनस्याप्युटूप्या नागकन्यायामिरावानामपुत्रोऽभवत् ।४६। मणिपुरपतिपुत्र्या पुत्रिकाधर्मेण बभ्र वाहन नाम पुत्रमर्जुनोऽजनयत् १५० सुभद्राया चार्भकत्वेऽपि योऽसावतिबलपराक्रमस्समस्तारातिरथ- जेता सोऽभिमन्युरजायत १५१। अभिमन्योरुत्तराया परिक्षीणेषु कुरुष्वश्वत्थामप्रयुक्तब्रह्मास्त्रैण गर्भ एव भस्मीकृतो भगवतस्सव लसुरा- सुरवन्दितचरणयुगलस्यात्मेच्छया कारणमानुपरूपधारिणोऽनुभावा- त्पुनर्जीवितमवाप्य परीक्षिञ्जशे ।५२। योऽय साम्प्रतमेतद्भूमण्डलमख ण्डितायतिधर्मेण पालयतीति ।५३॥ अर्जुन द्वारा उमको उप पत्नी नागकन्या उलूपी से इरावान् उत्पन्न हुमा ॥४६॥ मणिपुरतरण की पुत्री से अर्जुन द्वारा पुत्रिका धर्म के अनुसार बभ्र : वाहन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५०॥ अजुन द्वारा ही सुभद्रा से भिमन्यु का जन्म हुमा कोनि महापराक्रमी और वीर्यवान् पा॥१॥ इसके पश्चत सवय मा के यह्मास्त्र प्रहार से जो परीक्षित गर्भ मे ही भस्मीभूत हो गये रथ पुकुन पे धोरण हो गया तव अपनी इच्छा मे ही मायारूपी मान्य देह पारस करने वाले सम्पूर्ण सुर-भसुरो द्वारा चरण धन्दित भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के प्रभाव से परीक्षित पुन. जीवित हुमा मोर उस काल उसने उत्तरा के गर्भ से चतुर्थ अंश-अ० २१] [१०७ - पभिमन्यु द्वारा जन्म प्राप्त किया, जो कि इस प्रकार मब धर्मानुराग सहित समस्त भूमण्डल पर राज्य कर रहा है, जिससे कि भविष्य में भी उसका वैभव वैसा ही बना रहे ॥५२-५३॥ इक्कीसवाँ अध्याय मतः परं भविष्यानहं भूपालान्कीर्तयिष्यामि ।। योऽयं साम्प्रतमवनीपतिः परीक्षित्तस्यापि जनमेजयश्रुतसेनोग्रसेनभीमसेनाश्च- त्वारः पुत्रा भविष्यन्ति ।२। जनमेजयस्यापि शतानीको भविष्यति १३। योऽसौ याज्ञवल्क्या दमधीत्य कृपादत्राण्यवाप्य विषमविपयविर- क्तचित्तवृत्तिश्च शौनकोपदेशदाात्मज्ञानप्रवीण: पर निर्वाणमवाप्स्यति ।४। शतानीकादश्वमेधदत्तो भविता ।। तस्मादप्यधिसीमकृष्णः ।। अधिसीमकृष्णाग्निचक्नु. ७। यो गङ्गयापहृते हस्तिनापुरे कौशाम्ब्यां निवरस्यति । श्री पराशरजी ने कहा--मय मैं आपसे भविष्य में होने वाले राणामों के विषय मे वर्णन करूंगा ॥१॥ इस काल राज्य करने वाले महाराज परीक्षित के पार पुत्र जनमेजय, श्रुतसेन, उनसेन, भीमसेन होगे ॥२॥ जनमेजय का शतानीक नामक पुत्र हुआ, जिसने याज्ञवल्क मुनि से वेद-शिक्षा प्राप्त कर और कृप से शस्त्रास्त्र विद्या प्राप्त करके महर्षि शौनक द्वारा प्रारम ज्ञान प्राप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगा ॥३.४।। शतानीक का अश्वमेघदत्त नामक पुत्र होगा। मश्व- मेघदात का पुत्र अघिसीम कृष्ण पौर अघिसीमकृष्ण का पुत्र निचक्नु होगा, निचक्नु गंगाजी द्वारा हस्तिनापुर बहा ले जाने पर कौशाम्बी में निपास करेगा ॥६-८॥ तस्याप्युष्णः पुत्रो भविता ।। उष्णाद्विचित्ररथः ॥१०॥ तता शुचिरथः ॥११॥ तस्मावृष्णिमांस्ततस्सुषेणस्तस्यापि सुनीयस्सुनीया.

१०८ [ श्रीविष्णुपुराण पचक्षुस्तस्मादपि सुखावलस्तस्य च पारिप्लवस्ततश्च सुनयस्तस्यापि मेधावी ॥१२२ मेधाविनो रिपुञ्जयस्ततो मृदुस्तस्माच तिग्मस्तस्माद्ब्रह- द्रथो बृहद्रथाद्वसुदानः ११३॥ ततोऽपरश्शतानीक: ॥१४तस्माचोदयन उदयनादहीनरस्ततश्च दण्डपाणिस्ततो निरमित्रः ।१५। तस्मान्छ क्षेमक; ।१६। अत्राय श्लोकः ॥१७॥ ब्रह्मक्षत्रस्य यो योनिशो राजर्पिसत्कृतः । क्षेमकं प्राप्य राजानं संस्थान प्राप्स्यते कलौ ॥१८॥ निचक्नु का पुत्र उष्ण, उष्ण का विवित्ररथ, विचित्ररथ से शुचिरथ, शुचिरथ से वृष्णिमान्, वृष्णिमान से सुषेण, सुषेण से सुनीथ, सुनीथ से नृप, नृप से चक्षु, चक्षु से सुखावल, मुखावल. से पारिप्लव, पारिप्लव से सुनय, सुनय से मेधावी, मेवावी से रिपुजय, रिपुञ्जय से मदु. मृदु से तिग्म तिग्म से बृहद्रथ, बृहद्रथ से वसुदान, वसुदान से द्वितीय शतानीक, शतानीक से उदयन, उदयन से महीनर, अहीनर से दण्डपाणि, दण्डपाणि से निरमित्र एव निरमित्र का पुत्रक्षेमक होगा। इस बारे मे एक प्रसिद्ध श्लोक है-118-१७॥ वह वंश, जो कि ब्राह्मण और क्षत्रियो की उत्पत्ति का कारण तथा विभिन्न राजषियों से जिसकी सभा शोभायमान रही है, कलियुग मे राजा क्षेमक की उत्पत्ति के समय वह वंश नष्ट हो जायगा ॥१॥ वाईसवाँ अध्याय प्रतश्चेक्ष्वाकवो भविष्या. पार्थिवाः कथ्यन्ते ।। वृहदलस्य पुत्रो बृहत्क्षण: ।। तस्मादुरुक्षयस्तस्माच्च वत्सव्यूहस्ततश्च प्रतिव्योमस्तस्मा- दपि दिवाकरः ।३। तस्मात्सहदेवः सहदेवावृहदश्वस्तत्सूनुर्भानुरथ- स्तस्य च प्रतीताश्वस्तस्यापि सुप्रतीकस्ततश्च मरुदेवस्ततः सुनक्षत्र- स्तस्मास्किन्नरः 11 किन्नरादन्तरिक्षस्तस्मात्सुपर्णस्ततश्चामित्रजित चतुथ अंश-अ० २३ ] [ १०६ ।। ततश्च बृहद्राजस्तस्यापि धर्मी धर्मिणः कृतजयः ।६। कृतजयाद्रण- खयः १७। रणञ्जयात्सलयस्तस्माच्छाक्यश्शाक्याच्छुद्धोदनस्तस्माद्राहुल- स्ततः प्रसेनजित् ।। ततश्च क्षुद्रकस्ततश्च कुण्डकस्तस्मादपि सुरथः 18 तत्पुत्रश्च सुमित्रः ।१०। इत्येते चेक्ष्वाकवो बृहब्दलान्वयाः ॥११॥ अत्रानुवशश्लोकः ।१२। इक्ष्वाकूणामय वंशस्सुमित्रान्तो भविष्यति । यतस्त प्राप्य राजानं सस्था प्राप्स्यति वै कलौ।१३। पराशरजी ने कहा--हे भूपते ! मैं अब भविष्य मे आने वाले इक्ष्वाफु वंशज राजामो के विषय में कहता हूँ ॥१॥ वृहद्वल का पुष बृहत्क्षण, वृहत्क्षण का उक्ष्य, उरुक्ष्य का वत्सव्यूह, वत्सव्यूह का प्रतिव्योम, प्रतिव्योम का दिवा- कर, दिवाफर का सहदेव, सहदेव का वृहदश्च, वृहदश्च का भानुरथ, भानुरथ का प्रतीताश्व, प्रतीताश्व का सुप्रतीक सुप्रतीक का मरुदेव, मरुदेव का सुनक्षत्र, सुनक्षत्र का किन्नर, किन्नर का अतरिक्ष, प्रतरिक्ष का सुपर्ण, सुपर्ण का प्रमि- अजित्, अमित्राजित् का वृहदाज. वृहद्राज का धर्मी, धर्मी का कृतजय, कृतजय का रणजय, रणजय का सम् जय, सञ्जय का शाक्य, शाक्य का शुद्धोदन, शुद्धोदन का राहुल, राहुल का प्रसेनजित्, प्रसेनजित् का क्षुद्रक, क्षुद्रक का कुएडक, कुएडा का सुरथ, एव सुरय का सुमित्र नामक पुत्र होगा। इक्ष्वाकु वंश मे यह सभी नर वृहद्वल की सताने होगे ।।२-११॥ इवाकु वंश के लिये एक श्लोक प्रसिद्ध है--"इक्ष्वाकु वंश का राज्य कलियुग मे मुमिन तक रहेगा, सुमिय के जन्म के पक्षात् यह वश समाप्त हो जायगा ॥१२-१३॥ तेईसवाँ अध्याय मागधानां चाहंद्रथानां भाविनामनुकम कथयिप्यामि ॥१॥ अन हि वंशे महावलपराक्रमा जरासन्धप्रधाना बभूवुः ।।

११० ] [ श्रीविष्णुपुराण जरासन्धस्य पुत्रः सहदेवः १३। सहदेवात्सोमापि स्तस्य श्रुतश्रवास्तस्याप्ययुतायुस्ततश्च निरमिनस्तत्तनयस्सुनेत्रस्तस्मादपि बृहत्कर्मा । ततश्च सेनजित्ततश्च श्रुतयञ्जस्ततो विप्रस्तस्य च पुत्रशुचिनामा भविष्यति । तस्यापि क्षेभ्यस्ततश्च सुव्रतस्सुव्रताद्धर्म- स्ततस्सुश्रवाः ।६। ततो दृढसेनः ।७। तस्मात्सुवलः ।। सुबलात्सुनीतो भविता ।। ततस्सत्यजित ११० तस्माद्विश्वजित् ।११॥ तस्यापि रिपुञ्जयः ११२। इत्येते वाहद्रथा भूपतयो वर्षसहस्रमेकं भविष्यन्ति ।१३॥ परासर जी ने कहा-हे भूपते ! अब मैं आपसे मगधवश के प्रवर्तक बृहद्रय की भावी सन्तानो के विषय में कहता हूँ॥१॥ इस वश के महापराक्रमी और तेजस्वी राजानो मे जरासन्य वगैरह राजागण प्रधान थे ॥२॥ जरासन्ध का पुत्र सहदेव, सहदेव का सोमापि, सोमापि का श्रुतश्रवा तश्रवा का अयुतायु, मयुतायु का निरमित्र, निरमिन का सुनेत्र, सुनेत्र का वृहत्कर्मा, वृहत्कर्मा का सेनजिद, सेनजित् का श्रुतजय, अतञ्जय का विष, विष का शुचि नाम का पुत्र होगा ।।४-५॥ फिर शुचि का क्षेम्य, क्षेम्य का सुव्रत, सुव्रत का धर्म, धर्म का सुश्रया, सुश्रवा का रहसेन, दृढसैन का सुबल, सुबल का सुनीत, सुनीत का सत्यजित सत्यजित का विश्वजित् एवं विश्वजित् का पुत्र रिपुञ्जय होगा ॥६-१२॥ यह बृहद्रय वशीय राजा मगध मे एक हजार वर्ष तक राज्य करेंगे ॥१३॥ चौवीसवाँ अध्याय योऽयं रिपुञ्जयो नाम वाहद्रथोऽन्त्यस्तस्यामात्यो सुनिको नाम भविष्यति !११ स चैनं स्वामिन हत्वा स्वपुत्र प्रद्योतनामानमभिपेक्ष्यति ।। तस्यापि वलाकनामा पुत्रो भविता ।३। ततश्व विशाखयूपः ।४।

चतुर्थ अंश-य० २४ ] तत्पुत्रो जनकः 1५ तस्य च नन्दिवर्धनः।। ततो नन्दी) इत्येतेऽष्टनिंशदुत्तरमब्दशतं पञ्च प्रद्योताः पृथिवी भो त ।। ततश्व शिशुनाभः । तत्पुत्रः काकवणे भविता ।१०॥ तस्य च पुत्र.क्षेमधर्मा ।११। तस्यापि क्षतीजाः ॥१२॥ तत्पुत्रो विधिसारः ।१३। ततश्चाजातशत्रुः ॥१४॥ तस्मादर्भकः ।१५। तस्माचोदयनः ॥१६॥ तस्मादपि नन्दिवर्द्धनः ।१७। ततो महानन्दी 1१८। इत्येते शशुनाभा भूपालाली रिण वर्षशतानि द्विपष्टयधिकानि भविष्यन्ति ।१९। श्री पराशरजी ने कहा- बृहद्रथ के वश का अन्तिम राजा रिपुजय होगा, जिसके मन्त्री का नाम सुनिक होगा ॥१॥ वह अपने स्वामी की हत्या करके पाने पुत्र प्रद्योत को राजा बनावेगा ॥२॥ प्रद्योत का पुत्र बलाक और बलाक का पुत्र विशाखयूप होगा ॥३-४) विशाखयूप का पुत्र जनक, जनक का नन्दिवर्टन और उसका पुत्र नन्दो हो ॥५-७॥ प्रद्योत वश के यह पांच राजा एक सौ पडतालीस वर्ष तक पृथिवी का राज भोगेंगे 10 नन्दी का पुन शिशु- नाम, शिशुनाम का काकवरण और उसका पुत्र क्षेमधर्मा होगा ॥६-११॥ क्षेम- धर्मा का पुत्र क्षमा. उसका पुत्र विधिसार, उसका अजातशत्रु और उमका अर्भक होगा ।।१२-१५।। अर्भक पा पुन उदयन, उदयन का नन्दिवद्धन तथा नन्दियद्धन का महानन्दी होगा ॥१६-१८।। यह राब राजा शिगुनाभ वश , के रहे जायेंगे और तीन मी वासठ वर्ष तक पृथिवी पर राज्य कारेंगे ॥१६॥ महानन्दिनस्ततश्शूद्रागर्भोद्भवोऽतिलुब्धोऽतिवलो महापद्मनामा नन्दः परशुराम इवापरोऽखिलक्षत्रान्तकारी भविष्यति ॥२०॥ ततः प्रभृति शूद्रा भूपाला भविष्यन्ति ।२१॥ रा चकच्छयामनुल्लवितशासनो महापद्यः पृथिवी भोक्ष्यते ।२२। तस्याप्यष्टौ सुतास्सुमाल्याद्या भवितारः ।२३। तस्य महापद्यस्यानु पृथिवी भोक्ष्यन्ति ।२। महापद्मपुयाश्चक वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति ।२५। ततश्च नव चेतानन्दानु कौटिल्यो ब्राह्मणस्समुरिष्यति १२६॥ तेपामभावे मौर्याः पृथिवी भोक्ष्यन्ति ।२७॥ कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तमुत्पन्न राज्येऽभिपेक्ष्यति ॥२८॥ तस्यापि पुत्रो विन्दुसारो भविष्यति ॥२६॥ तस्याप्पशोकवन- ११२ ] [ श्रीविष्णुपुराण स्ततस्सुयशास्ततश्च दशरथस्ततश्च संयुतस्ततश्शालिशूकस्तस्मात्सोमशर्मा तस्यापि सोमशर्मरणश्शतधन्वा ।३०। तस्यापि बृहद्रथनामा भविता ।३१। एवमेते मौर्या दश भूपतयो भविष्यन्ति अब्दशतं सप्तत्रिंशदु- त्तरम् ।३२॥ महानन्दी का पुत्र महापद्म शुद्रा के गर्भ से उत्पन्न होकर परशुरामजी के समान सब क्षत्रियों का अन्त करने वाला होगा ॥२०॥ उस समय से उसके जैसे झूद्र राजा पृथिवी पर राज्य करेंगे । वह महापद्म इस सम्पूर्ण पृथिवी को बिना किसी प्रकार की बाधा के एक छत्र भोगेगा ॥२१.२२॥ उसके सुमाली मादि पाठ पुत्र उत्पन्न होगे जो उसकी मृत्यु होने पर शासन करेंगे ॥२३-२४।। महापद्म और उमके पुत्रो का शासन-कान सौ वर्ष होगा। फिर एक कौटिल्य नामक बाह्मण इन नोनों का अन्न कर देगा। उनके पश्चात् मौर्य नामक राजा- गरण राज्य करेंगे ।।२५-२७॥ वही कौटिल्य ब्राह्मण चन्द्रगुत को राज्य पर पभि- पिक्त करेगा ॥२८॥ चन्द्रगुप का पुत्र विन्दुमार होगा। विन्दुपार का अशोक- वर्द्धन और प्रशोकवद्धन का सुयशा, सुयशा का दशरथ, दशरथ का संयुक्त, संयुक्त का शालिक, शालिक का सोमशर्मा और सोमशर्मा का पुत्र शतधन्वा होगा ॥२६-३०॥ शतधन्वा का पुत्र बृहद्रय होगा । इस प्रकार मौर्यवश के यह दन राजा एक सौ तिहतर वर्ष नक पृथिवी पर राज्य करेंगे ॥३१-३२॥ तेषामन्ते पृथिवी दश शुङ्गा भोक्ष्यन्ति ॥३३। पुष्यमित्रस्सेना पतिस्स्वामिनं हत्वा राज्यं करिष्यति तस्यात्मजोऽग्निमित्रः ।३४। तस्मात्सुज्येष्ठस्ततो वसुमित्रस्तस्मादप्युदङ्कस्ततः पुलिन्दकस्ततो घोषवसुस्तस्मादपि वज्रमित्रस्ततो भागवत- ॥३५॥ तस्माद्देवभूतिः ।३६। इत्येते शुङ्गा द्वादशोत्तरं वर्षशत पृथिवी भोक्ष्यन्ति ।३७। तत: कण्वानेपा भूस्थिति ॥३८॥ देवभूति तु शुगराजानं व्यसनिनं तस्यैवामात्यः काण्वो वसुदेवनामा तं निहत्य स्वयमवनी भोक्ष्यति ॥३६॥ तस्य पुत्रो भूमित्रस्तस्यापि नारायणः ।४० नारायणात्मजस्सुशर्मा ४१॥ एते काण्वायनाश्चत्वारः पञ्चचत्वारिंशद्वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति ।४२॥

चतुर्थ अश-अ० २४ ] उनका अन्त होने पर पृथिवी पर दस शुङ्गवशीय राना राज्य करेंगे। पुष्यमित्र नामक सेनापति अपने स्वामी की हत्या करवे राज्य शासन करेगा। उसके पुत्र का नाम अग्निमिन होगा । अग्निमित्र का पुत्र सुज्येष्ठ, सुज्येष्ट का पुत्र घसुमित्र, वसुमित्र का उदक, उदक का पुलिन्दा पुलिन्दकका घोषवसु, घोपवसु फा वमित्र, बमिन का भागवत और भागवत का देवभूति होगा। यह सभी शुङ्ग राजागरण पृथिवी पर एक सौ बारह वर्ष राज्य करेगे ॥३३-३॥ शुङ्ग- वश के पश्चात् कएव नरेशो का राज्य होगा। शु गवश के व्यसनो मे प्रासक्त राजा देवभूति का एक्वशीय वसुदेव नामक मन्त्री, उसकी हत्या करके स्वय राज्य करेगा ॥३८-३६॥ वसुदेव का पुत्र भूमिन, भूमित्र का नारायण और नारायण का पुत्र सुशर्मा होगा । एव वश के यह चारो राजा तालीस वर्ष पृथिवी पर राज्य करेंगे। ४०-४२१॥ सुशर्माण तु काण्व तभृत्यो वलिपुच्छकनामा हत्वान्ध्रजातीयो वसुधा भोक्ष्यति ।४३। ततश्व कृष्णनामा तभ्राता पृथिवोपतिर्भवि. प्यति ॥४४॥ तस्यापि पुन शान्तपरिणस्तस्यापि पूर्णोत्सङ्गस्तत्पुनाश्शा- तकणिस्तस्माच लम्बोदरस्तस्माद पिनकस्ततो मेघस्वातिस्तत पटुमान् ।४५। ततश्चारिष्टकर्मा ततो हालाहल १४६। हालाहलात्पललक- स्तत पुलिन्दसेनस्तत सुन्दरस्ततश्शातकणिस्ततशिवस्वातिस्ततश्च गोमतिपुषस्तत्पुत्रोऽलिमान् ॥४७॥ तस्यापि शान्तयरिणस्तत शिवश्रित- स्ततश्च शिवस्कन्धस्तस्मादपि यज्ञश्रीस्ततो द्वियज्ञस्तस्माचन्द्रश्री. १४८| तस्मात्पुलोमाचि ॥४६॥ एवमेते विशञ्चत्वार्यन्दशतानि पट् पञ्चाराद- धिवानि पृथिवी भोक्ष्यन्ति अान्ध्रभृत्या १५० सप्ताभीरप्रभृतयो दश गर्दभिलाश्च भूभुजो भविष्यन्ति ॥५१॥ ततप्पोडश शका भूपतयो भवितार ।। ततश्चाष्टौ यवनाश्वतुर्दश तुरपारा मुण्डाश्च प्रयोदश एकादश मौना एते वै पृथिवीपतय पृथिवी दशवर्षशतानि नवत्यधि- मानि भोक्ष्यन्ति ॥५३॥ ततश्च एरादश भूपतयोऽन्दशतानि प्रीणि पृथिवी भोक्ष्यन्ति ॥५४॥ पएसया र रामा गुगर्मा तो 31 वलिपुल्या नामर मा.प्रजातीय . ११४ ] [श्रोविष्णुपुराण भृत्य हत्या करके स्वयं पृथिवी का राज्य भोगेगा ॥४३॥ उसके पश्चात् उसका कृष्ण नामक भाई पृथिवी का शासक होगा ॥४४॥ कृष्ण का पुत्र शान्ता गि होगा । उसका पुत्र पूणो.सग, पूर्णोत्सग का पुत्र सातकणि, सातकणि का लम्बो. दर, लम्बोदर का फ्लिक, रिना का मेघ स्वाति मेघस्वाति का पटुमान, पटु- मान् का पुत्र पष्टिकर्मा पोर उसका पुत्र हावाहन होगा ॥४५-४६।। हालाहल का पुत्र पललक, उसका पुलिन्दसेन, उसका पुत्र सुन्दर, सुन्दर का शातकणि, शासकरिण का शिवस्वाति, उसका पुत्र गोमति पत्र पौर गोमति का पुत्र अनि- मान् होगा ।४७अलिमान का पुत्र शान्तकणि, शान्तकणि का शिवथिन, शिव. श्रित का शिवस्कंध, शिवस्कट का यशश्री यज्ञश्री का द्विराज, द्वियज्ञ का पुत्र चन्द्रश्री और चन्द्रश्री का पुत्र पुलोमाचि होगा ॥४८-४६॥ इस प्रकार तीस मान्ध्रभृत्य राजा होगे जो चार सौ छप्पन वर्ष पृथिवी पर राज्य करेंगे।५।। उनके पश्चात् सात प्रामीर तया गर्दभिल भू-भोगी नरेश होगे । तदनन्तर सोलह शक राजा राज्य करेंगे। फिर पाठ यवन, चौदह तुर्क, तेरह मुण्ड और ग्यारह मौन राजा होगे । यह सब एक हजार नब्बे वर्ष पृथिवी का राज्य भोगे ॥५१. ५३।। इनमे से मौन राजाओं का राज्य-काल तीन सौ वर्ष तक रहेगा ॥५४॥ तेषूत्सन्नेषु कैङ्किला यवना भूपतयो भविष्यन्त्यमूर्द्धाभिषिक्ताः १५५॥ तेषामपत्यं विध्यशक्तिस्ततः पुरञ्जयस्तस्माद्रामचन्द्रस्तस्माद्धर्मवर्मा ततो बङ्गस्ततोऽभूनन्दनस्ततस्सुनन्दी तभ्राता नन्दियशाश्शुक्रः प्रवीर एते वर्षशतं पड वर्षाणि भूपतयो भविष्यन्ति १५६। ततस्तत्पुत्रास्त्रयोद- शंतेवालिकाश्च त्रयः ।५७) ततः पुष्पमित्राः पटुमित्रास्त्रयोदशैकलाश्च सप्तान्ध्राः १५८ ततश्च कोशलायां तु नव चव भूपतयो भविष्यन्ति १५६। नैषधास्तु त एव ।६० मगधायां तु विश्वस्फटिकसंज्ञोऽन्यान्वर्णाकरिष्यति १६११ कैवर्तचटुपुलिन्दयाह्मणात्राज्ये स्थापयिष्यति ।६२॥ उत्साद्याखिलक्षत्र- जाति नव नागाः पद्मावत्यां नाम पुर्यामनुगङ्गाप्रयागं गयायाञ्च मागधा गुवात मोक्ष्यन्ति ६४ कोशलान्त्रपुण्डताम्रलिमसमुद्रतटपुरी च देवरक्षितो रक्षिता ।६४१ कलिङ्गमाहिपमहेन्द्रभीमान् गृहा भोक्ष्यन्ति चतुर्थ अंश-अ० २४] [ ११५ १६५॥ नेपवन मिपककाराकोशकाअनपदान्मरिणधान्यकवंशा भोक्ष्यन्ति १६६। राज्यमुपिकजनपदान्कनकायो भोक्ष्यति ।६७ सौराष्ट्रावन्ति- शूद्राभीरानमंदामरुभूविषयांश्च व्रात्य द्विजाभीरशूद्राद्या भोक्ष्यन्ति 1६८। सिन्धुतटदाविकोर्वीचन्द्रभागाकाश्मीरविपयांश्च प्रात्यम्लेच्छशूद्रादयो भोक्ष्यन्ति ।६६ इनफा मन्त होने पर फकिल नामक यवन अभिषेकहीन राना होगे ॥५५।। उनकी सन्तान मे विन्ध्यशक्ति राजा होगा। उसका पुत्र पुरस्नप. पुर- जय का रामचन्द्र, रामचन्द्र का धर्म वर्मा, धर्मवर्षा का धग, नग का नन्द पोर नन्द का सुनन्दी होगा । सुनन्दी के तीन भाई होगे नन्दिरसा, गुरु मौर प्रवीर। इन सब का राज्य-कान एक भी छः वर्ष रहेगा ॥५६॥ तत्पश्चात् इन्ही के वश के तेरह राना मोर होगे फिर तीन याहिक राजा होंगे। तदनन्तर पुष्पमित्र और पटुमिन मादि तेरह राजागण होंगे, फिर सात मान्ध्र राजा होगे ॥५७. ५८॥ फिर मोशन देश में मात राजा होंगे जो निषध देश का भी राज्य करेंगे ॥५९-६०॥ विस्फटिक नामक मगध देश मा राजा मन्य यों का प्रयर्सक होगा ।।११।। यह पावतं, पटु मिन्द मोर प्राह्मणों को राग्य देगा ।। ६२॥ सब धारियो को नष्ट कर पद्मावतीपुरी में नाग पोर गगा के समीपवर्ती प्रदेशप्रपाग मोर गया मे मागध तथा गुप्त राजागण राज्य परेंगे ॥६॥ मोगल, पाम, पुरा, ताम्रलित और गमुद्रकिशारे पर स्पिन पुरी का रक्षा दरक्षित नामक एक रागा होगा ॥६॥रसिंग, माहिप, महे पोर भौमानि देशों माराग्य गृहनामा राजा करेंगे । ६५ नंपर, नपा पोर मामा पानि नामों पा राप मणिमr-के रारा करेगे ॥६६॥ राम पोर मुषिक देगा पर बना नामक रानागाण राम रये ॥७॥ मौराष्ट्र, परति पूद, भाभीर, पौर नर्मश गोरे गोरी भभूमि पर शाय, दिक, पामोर और माद पराम्प होगा ॥६॥ गमः शिनारे 1 दागिरि, पदभामा पर पामीर पानि पर माय, मन और प्रा रामापी सामन होगा | [ श्रीविष्णुपुराण एते च तुल्यकालास्सर्वे पृथिव्यां भूभुजो भविष्यन्ति ७०) अल्पप्रसादा बृहत्कोपास्सर्वकालमनृताधर्मरुचयः स्त्रीवालगोवधकर्तारः पर स्वादानरुचयोऽल्पसारास्तमिस्रप्राया उदितास्तमितप्राया अल्पायुपो महेच्छा घल्पधर्मा लुब्धाश्च भविष्यन्ति ७११ तैश्च विमिश्रा जनपदास्तच्छीलानुवतिनो राजाश्रयशुष्मिणो म्लेच्छाश्चार्याश्च विपर्ययेण वर्तमानाः प्रजा क्षपयिष्यन्ति ७२ ततश्चानुदिनमल्पाल्पह्रासव्यवच्छेदाधर्थियोर्जगतस्सङ्क्षयो भविष्यति ।७३। ततश्चार्थ एवाभिजनहेतुः १७४१ बलमेवाशेषधर्महेतुः [७५। अभिरुचिरेव दाम्पत्यसम्बन्धहेतु: १७६६ स्त्रीत्वमेवोपभोगहेतुः (७७१ अनृतमेव व्यवहारजयहेतुः ७८ उन्नताम्बुतैव पृथिवीहेतु: (७६) ब्रह्मसूत्रमेव विप्रत्वहेतुः १८० रत्नधातुतैव श्लाध्यताहेतुः १८१६ लिङ्गधा- रणमेवाश्रमहेतुः ।।२। अन्याय एव वृत्तिहेतुः १८३३ दौर्बल्यमेवावृत्तिहेतुः 1८४। अभयप्रगल्भोच्चारणमेव पाण्डित्यहेतुः १८॥ अनाट्यतैव साधुत्वहेतुः ।।६। स्नानमेव प्रसाधनहेतुः ।८७) दानमेव धर्महेतु: ।।८। स्वीकरणमेव विवाहहेतुः १८६) सद्वे पधार्येव पात्रम् ।६० दरायतनोद- कमेव तीर्थहेतुः १६१ कपटवेषधारणमेव महत्त्वहेतुः ।।२। इत्येवमनेक- दोषोत्तरे तु भूमराले सर्ववर्णेष्वेव यो यो बलवान्स स भूपतिर्भ- विष्यति १६३ यह सभी राजा एक ही काल मे पृथिवी पर होगे ॥७०॥ यह अल्प प्रसन्नता वाले, अधिक क्रोर वाले, अयगं और प्रससभापण मे रुचि वाले, स्त्री, बालक पोर गोनों का वध करने वाले, पर-पन-हारी, न्यून शक्ति वाले, तमयुक्त, विकसिक होते ही पतन को प्राप्त होने वाले, प्रत्यायु, अल्प पुण्य, बडी अभि- लापा वाले और महान् लोभी होगे ॥७१॥ यह सब देशों को परस्पर में एक कर देने वाले होंगे। इन राजाओं के प्राश्रय में रहने वाले बलवान म्लेच्छ पौर मनायं व्यक्ति, उनके स्वभाव के अनुसार पाचरण करते हुये सम्पूर्ण प्रजा का ही नष्ट कर डालेंगे ।।७।। इससे दिनो दिन धर्म और अर्थ की धीरे-धीरे करके हानि होती जायगी और जब यह क्षीण हो जायेगे तो सम्पूर्ण विश्व ही नष्ट हो चतुथ अंश-अ० २४ ] [११७ प्रायगा ॥७३।। उस समय धन हो कुलीनता का सूचक होगा, बल ही सब धर्मों फा चिह्न होगा, परस्पर की चाहना ही दाम्पत्य-सम्बन्ध को करने वाली होगी, स्त्रीत्व हो भोग साधन होगा ॥७४-७७॥ मूड ही व्वयहार में जीत कराने वाला होगा, जलवायु की श्रेष्ठता ही पृथिवी को श्रेष्ठता का लक्षण होगा, यज्ञोपवीत ही ब्राह्मणत्व का कारण होगा, रत्नादि धारण को श्लाघा का हेतु होगा, बाह- चिह्न ही प्राश्रमों के सूचक होगे, अन्याय ही वृत्ति का साधन होगा, दुर्बलता ही जीविका से वचिन रहेगी, निभंयता और धृष्टता पूर्वक भापण ही पाण्डित्य होगा, निर्धनता ही साधुत्व का कारण समझा जायगा । स्नान साधन का हेतु, दान धर्म का हेतु पोर स्वीकृति ही विवाह का हेतु होगा ॥७८८६ । सजग कर रहना हो सुपात्रता का द्योतक होगा, दूर देश का जल ही तीर्थ-जल होगा, छद्मवेश ही गौरव होगा। इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डल मे नाना प्रगर के दीपों के फैलने से सब वर्गों में जो-जो बनी होगे, वही-वही राजा राज्य को हथिया लेंगे 10-६ एवं चातिलुब्धकराजासहाशेलानामन्तरद्रोणी: प्रजास्संश्वान ष्यन्ति ।१४। माधुशाकमूलफलपनपुष्पाद्याहाराश्न भविष्यन्ति ।।५। तरुवल्कलपर्णचीरप्रावरणाश्चातिवहुप्रजाश्शीतवातातपवर्पसहाश्च भवि- प्यन्ति ।१६। न च कश्चित्त्रयोविंशतिवर्षाणि जीविष्यति अनवरत चात्र कलियुगे क्षयमायात्यसिल एयैप जन: १६७। श्रौते स्मार्तं च धर्म विप्लवमत्यन्तमुपगते क्षीणप्राये च कलावशेषजगत्त्रप्टुश्चराचरगुरोरा- दिमध्यान्तरहितस्य यह्ममयस्यात्मरूपिणो भगवतो वासुदेवस्यांशशम्ब- लग्रामप्रधानग्राह्मणस्य विष्णुयशसो गृहेऽष्टगुणदिसमन्वित कल्किस्पी जगत्ययावतीयं सकलम्लेच्छदस्युदुष्टाचरणचेतसामशेपारणामपरिच्छि- नशक्तिमाहात्म्यः क्षय कारिप्यति म्वधर्मपु चापिलमेव संस्थापयिष्यति 18८। अनन्तरं चारोपफलेरवसाने निशावगाने विबुद्धानामिव तेपामेव जनपदानाममलस्फटिकविशुद्धा मतयो भविष्यन्ति । तेषां । योजभूतानामशेषमनुष्याणा परिणतानामपि ततालकृतापत्यप्रसूतिर्भ- ११८ ] [धीविष्णुपुरण विष्यति ।१००। तानि च तदपत्यानि कृतयुगानुसारीण्येव भवि- प्यन्ति ।१०११ इस प्रकार अत्यन्त लोभी राजापो के कर-भार से दबी हुई प्रजा, उससे पचने के लिए पर्वतो की गुफाओ मे जाकर रहने लगेगो और मधु, शाक, मूल, फल, पत्ते और पुष्पादि का भक्षण करती हुई जीवन का समय व्यतीत करेगी। वृक्षो के पत्तो प्रौर वलल वस्त्रो को पहिने प्रोड़ेगी। उनकी अधिक सन्तानें होगी और सभी को शोत, वायु, धूर, वर्षा आदि के कष्ट सहन करने होगे ।।१४ ६६।। सेईस वर्ष से अधिक प्रायु किसी की भी न होगी । इस प्रकार कनियुग मे सभी मनुष्य क्षीए. ता को प्राप्त होते रहेगे ॥१७॥ जब श्रौत और स्मात धर्म की प्रत्यन्त हानि हो जायगी और कलियुग प्रायः समाप्ति पर होगा तभी शम्बल प्राम के रहने वाले विप्रश्रेष्ठ विष्णुयशा के यहाँ सम्पूर्ण विश्व के कारण,चराचर फे गुरु, प्रादि-मध्य-अन्त से हीन, ब्रह्ममय एव प्रात्मरूप भगवान अपने भन्श से अष्टगुण युक्त कहिक रूप से अवतार धारण करेंगे। वही अपनी असीम शक्ति मौर महिमा से सम्पन्न होकर सब म्लेच्छो, दस्युप्रों, दुष्टहृदयो और दुराचारियो को नष्ट कर सभी प्रजा को अपने-अपने धर्म मे स्थापित करेंगे ॥१८}] फिर सब पलियुग का नितान्त क्षय हो जायगा, तब रात्रि के अवसान होने पर जगने वालो के समान सम प्राणियों की बुद्धि स्फटिक मणि के समान स्वच्छ हो जायगी ।।६६ वे सब बीजभूत मनुष्य अधिक आयु वाले होकर भी सन्तानो. स्पादन में समर्थ होंगे ॥१००। उनकी सन्ताने भी सत्ययुग के समान ही धर्माव- .रण में प्रवृत्त होने वाली होगी ।।१०१॥ यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यो बृहस्पतिः । एकराशौ समेष्यन्ति तदा भवतिवै कृतम् ।१०२। अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताच ये। एते वशेषु भूपालाः कथिता मुनिसत्तम ।१०३। यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नन्दाभिपेचनम् । एतदर्पसहस्र तु ज्ञेय पञ्चशतो. रम् ।१०४।

युग का प्रारम्भ हम था।१०५॥ जय भगवान् विष्णु के पशावतार श्रीकृष्ण चतुथ अंश-अ० २४ ] [ ११६ सप्तर्षीणां तु यो पूर्वी दृश्येतेह्य दितौ दिवि । तयोस्तु मध्ये नक्षत्र दृश्यते यत्सम निशि ॥१०॥ तेन सप्तर्पयो युक्ता स्तिष्ठन्त्यब्दशत नृणाम् । ते तु पारीक्षिते काले मधास्वासन्द्विजोत्तम ।१०६॥ तदा प्रवृत्तश्न कलिदिशाब्दशतात्मकः ।१०७१ यदैव भगवान्विष्णोरशो यातो दिव द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैवानागतः कलिः।१०८॥ यावत्स पादपद्माभ्या पस्पर्शमा वसुन्धराम् । तावत्पृथ्वीपरिष्वङ्ग समर्थो नाभवत्कलि: ।१०६। गते सनातनस्याशे विष्णोस्तत्र भुवो दिवम् । तत्याज सानुजो राज्य धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।११०१ विपरीतानि दृष्ट्वा च निमित्तानि हि पाण्डवः । याते कृष्ण चकाराथ सोऽभिपेक परीक्षितः ॥११॥ प्रयाम्यन्ति तदा चैते पूर्वाषाढा महर्पयः । तदा नन्दात्प्रभृत्येष गतिवृद्धि गमिष्यति ।११२॥ यस्मिन् कृष्णो दिव यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि । प्रतिपन्न कलियुग तस्य सस्या निबोध मे ।११३। इस विषय मे ऐसा कहते हैं कि जब चन्द्र सूर्य और वृहस्पति पुष्यनक्षत्र में स्थित होकर एक साथ ही एक राशि पर पावेंगे तभी सस्ययुग का प्रारम्भ हो जायगा ।।१०॥ हे मुनिवर ! इस प्रकार यह सभी वशो के भूत, भविष्यत्, मौर वर्तमान कालीन सब राजामो का वर्णन मैंने तुम से पर दिया है ॥१०॥ परीक्षित के जन्म-काल से नन्द के अभिषेक पर्यंत का समय डेढ़ हजार वर्ष का समझो 1३१०४।। सापियो मे से जो वो नसा भाका मे पहिले दीखते हैं, उनके HT में रात्रिकाल में जो नक्षत्र समदेवा में स्थित रहते हैं, उनमें से प्रत्येक नक्षत्र पर एक-एक सौ वर्ष त सप्तर्पियो का निवास रहता है । हे द्विजत्रे ! परीक्षित. काल मे सप्तपि मघा नक्षत्र पर पे, उसी समय बारह सौ वर्ष प्रमाण के कलि- अपने धामको चले गये, तभी स पृथिवी पर कलियुग मा गया ।१०६.१०। जब .१२० ] [ श्रीविष्णुपुराण तक वह अपने चरण कमलों के पुण्य स्पर्श से इस पृथिवी को पवित्र किये रहे, तर तक पृथिवी का संग करने में कलियुग समर्थ नहीं हो सका ॥१०६) जब सनातन पुरुष भगवान् विष्णु के प्रशावतार श्रीकृष्ण देवलोक चले गये तब महाराज युधिष्ठिर ने भाइयो सहित अपने राज्य का त्याग कर दिया ॥११॥ भगवान कृष्ण के अन्तर्धान होने पर जब पाएडवों को विरुद्ध लक्षण दिखाई दिये, तब उन्होने परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया ॥१११।। जब पूर्वापाढ़ा नक्षत्र पर सप्तपियों का गमन होगा, तब राजानन्द के शासन-काल में कलियुग की बल-वृद्धि होगी ।।११२॥ जब श्री कृष्ण अपने धाम को चले गये थे, तभी से कलियुग मा गया था, अब उस कलियुग की वर्ष गणना श्रवण करो ।११३।। त्रीणि लक्षाणि वर्षाणां द्विज मानुष्यसंख्यया । पष्टिश्चैव आणि भविष्यत्येष व कलिः ।११४॥ शतानि तानि दिव्यानां सप्त पञ्च च संख्यया। निश्शेषेण गते तस्मिन् भविष्यति पुनः कृतम् ॥११५॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याश्शूद्राश्च द्विजसत्तम । युगे युगे महात्मानः समतीतास्सहस्रशः १११६॥ वहुत्वान्नामधेयानां परिसंख्या कुले कुले । पौनरुक्त्याद्धि साम्याच न मया परिकीर्तिता ।११७/ देवापिः पौरवो राजा मरुश्चेक्ष्वाकुवंशजः । महायोगबलोपेतौ कलापग्रामसंश्रितो ।११८॥ कृते युगे विहागम्य क्षत्रप्रवर्तको हि तौ। भविष्यतो मनोवंशवीजभूती व्यवस्थितौ ॥११॥ एतेन क्रमयोगेन भनुपुनर्वसुन्धरा। कृतप्रेताद्वापराणि युगानि त्रीणि भुज्यते ।१२०॥ कलो ते वीजभूता वै केचित्तिष्ठन्ति वै मुने । यथैव देवापिमरु साम्प्रतं समधिष्ठितो ।१२१॥ मनुष्यों के वर्ष के अनुसार कलियुग की आयु तीन लाख साठ हजार व .की होगी ॥११॥ तदनन्दर बारह सौ दिव्य वर्षों के व्यतीन होने तक सत्ययुः - पतुर्य अंश-अ० २४ ] [ १२१ उपस्पित रहेगा ।।११५॥ हे विप्रष्ठ । प्रत्येक युग मे ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्प, बाद-पारो वर्णो के हजारो सत महात्मा हो गये हैं ॥११६॥ उनके पति- संस्पक होने तथा कम मे समानता होने के कारण, वश-वसन मे कही पुनरोक्ति महो पाय, इस भय उन सब के नाम यहाँ नहीं कहे है ॥११७॥ पुरुषश के राजा देवापि मोर इक्ष्वाकु वंश के राजा मरु--यह दोनो ही महान् योगमल से युक्त हुये, कलापमाम मे निवास करते हैं ॥११८। जब सत्ययुग मारम्भ हो जायेगा, तब यह पुन. मत्यलोक में जन्म लेकर क्षत्रिय वंश के प्रवर्तक होगे। यही भविष्य मे होने वाले मनुवश के बीज स्वरूप हैं ॥११॥ सत्ययुग, पेता पौर द्वापर में भी मनु पुत्र पृथिवी का इसी प्रकार उपभोग करते हैं ॥१२०॥ उन्ही में से कोई-कोई कलियुग में होने वाली मनु-सन्तान के बीज रूप मे देवापि पौर मर के समान ही स्थित रहते हैं ॥१२१॥ एप तद्देशतो वशस्तवोक्तो भूभुजा मया । निखिलो गदितु शक्यो नेप वर्षशतैरपि ।१२२॥ एते चान्ये च भूपाला यैरत्र क्षितिमण्डले। कृत ममत्व मोहान्धनित्य हेयकलेवरे ।१२३१ कथ ममेयमचला मत्पुत्रस्य कथ मही। मद्व शस्येति चिन्तार्ता जग्मुरन्तमिमे नृपाः ।१२४॥ तेभ्य पूर्वतराश्चान्ये तेभ्यस्तेभ्यस्तथा परे । भविष्याश्चव यास्यन्ति तेषामन्ये च येऽप्यनु ।१२५५ विलोक्यात्मजयोद्योग यानाव्यग्रान्नराधिपान् । पुष्पप्रहासश्शरदि हसन्तीव वसुन्धरा १२६॥ मैत्रेय पृथिवीगीताञ्छलोकाश्वान निवोध मे। यानाह धर्मध्वजिने जनकायासितो मुनिः।१२७।। इज प्रकार मैंने तुम से सब राजक्सों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है, इनका पूर्ण वृत्तान्त तो सौ वर्षों मे भी नही पहा पा सकता ।।१२२॥ इस है पलेवर के मोह में मन्धे मोर इस ऐपियों में ममता करने वाले यह तपा मन्य प्रनेक राजा गण हुए हैं ॥१२॥ यह पृषियी मेरी, मेरी पुत्र अपवा बसके १२२] P:[थी विष्णुपुराण अधिकार में स्थायी स्प से किस प्रकार रहेगी ? इस प्रकार की चिन्ता करते. करते ही यह राब राजा मरण को प्राप्त हो गये ॥१२४॥ ऐसी ही चिन्ता मे निमग्न रह कर इन सब राजामो के पूर्व-पुरखे और उनके भी पुरसे इस ससार से कूच कर गये और इसी चिन्ता में मग्न रह कर भविष्य में होने वाले राजा गण भी काल के गाल में समा जागेगे। यह वासुधरा भी अपने पर विजय प्राप्त करने के उद्योग में अथक रूप से लगे हुए राजापो को देख कर जैसे उन पर हंसती है ।।१२६॥ हे मैत्रेयजी ! अब तुम पृथिवी द्वारा कहे हुए कुछ श्लोकों को श्रवण करो। यह श्लोक पूर्वकाल में अमित मुनि ने धर्मध्वम रूप राजा ननक, के प्रति कहे थे.॥१२७॥ कथमेप नरेन्द्राणां मोहो बुद्धिमतामपि । येन फेनसधर्माणोऽप्यतिविश्वस्तचेतमः ॥१२॥ पूर्वमात्मजय कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मन्त्रिणः । ततो भृत्यांश्च पौरांश्च जिगोपन्ते तया रिपून् ।१२६ । क्रमेणानेन जेष्यामो वयं पृथ्वी ससागराम् । इत्यासक्तधियो मृत्युन पश्यन्त्यविदूरगम् ।१३०॥ समुद्रावरणं याति भूमण्डलमथो वशम् । कियदात्मजयस्य॑तन्मुक्तिरात्मजये फलम् ॥१३॥ उत्सृज्य पुर्वजा याता यां नादाय गतः पिता। १, तां मामतीवमूढत्वाज्जेतमिच्छन्ति पार्थिवाः ।१३२१ मत्कृते पितृपुत्राणां भ्रातृणां चापि विग्रहः । जायतेऽत्यन्तमोहेन ममत्वादृप्तचेतसाम् ॥१३३३ पृथ्वी ममेयं सकला ममैपा मदन्वयस्यापि च शाश्वतीयम् । यो यो मृतो ह्यत्र वभूव राजा कुबुद्धिरासीदिति तस्य तस्य ।। पृथिवी का कहना है-ग्रहो, यह राजागण बुद्धिमान् होकर भी कैसे मोहित हो रहे हैं, जिसके कारण यह अपनी क्षणभगुरिता को भूलकर अपने स्थायी होने का विश्वास किये बैठे हैं ॥१२॥ पहिले यह अपने विजय प्राप्त मारते फिर मन्त्रियों को वश मे कर लेते हैं और इसके पश्चात् मृत्यों, पुरः चतुथ-प्रश-अ० २४ ] [ १२३ वासियो और शत्रुनों पर भी विजय प्राप्त करना चाहते हैं ॥१२९। इसी प्रकार इस सम्पूण पृथिवी को हम समुद्र तक अपने वश मे कर लेंगे, ऐसी ही प्रासक्ति म भ्रमित हुए यह गजागण निकट भविष्य मे ही प्राप्त होने वाली मृत्यु को नही देख पाते ॥१३०॥ यदि समुद्र के प्रावरण वाले इस सम्पूण पृथिवी मडल पर विजय प्राप्त भी हो जाय, तो भी मन को जीतने के समान इसका फल नहीं हो सकता, क्योकि मोक्ष की प्राप्ति तो मन के जीतने पर ही सभव है ॥१३॥ इनके पूवक और पिता भी जिमे साथ लिये बिना ही पले गये और जो यहाँ ही स्थिर रूप से रही प्राई, उस मुक्त पृथिवी को महामूर्ख बने हुये राजागण जीत लेना चाहते हैं ।।१३।। प्रत्य त ममत्व वाले पिता पुत्र, भ्राता प्रादि मे भी मोह के वशीभूत होकर मेरे ही कारण विग्रह उपस्थित होता है ॥१३३॥ यहाँ जितने भी राजा हुये हैं, वे सभी इस कुबुद्धि से मोतप्रोत रहे हैं कि यह सम्पूण पृथिवी मेरी है और फिर यह सदेव मेरे वशधरो की रहेगी ॥१३४।। दृष्ट्वा ममत्वाहतचित्तमेक विहाय मा मृत्युवश वजन्तम् । तस्यानु यस्तस्य कथ ममत्व ह्यद्यास्पद मत्प्रभव करोति ।१३५॥ पृथ्वी ममैपाशु परित्यजना वदन्ति ये दूतमुखैम्स्वशयन् । नराधिपास्तेषु ममातिहास पुनश्च मूढेषु दयाम्पुपैति ।१३६। इत्येते धरणीगीताश्श्लोया मैत्रेय यश्श्रुता । ममत्व विलय याति तपत्यर्के यथा हिमम् ॥१३७॥ इत्येप कथित सम्यड भनोवंशो मया तव । यय स्थितिप्रवृत्तस्य विष्णोरशाशका नृपा ॥१३॥ शृणोति य इम भव या मनोवंशमनुक्रमात् । तस्य पापमशेप वै प्रणश्यत्यमलात्मन ॥१३॥ धनधान्यद्धिमतुला प्राप्नोत्यव्याहतेन्द्रिय । श्रुत्ववमसिल वश प्रशस्त शशिसूर्ययो ।१४०। इक्ष्वाकुजह्न मान्धातृसगराविधिताप्रपून् । ययातिनहुपाद्याश्च ज्ञात्वा निष्टामुपागतान् ।१४१॥

१२४ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
महावलान्महावीर्याननन्तधनसञ्चयान् ।
कृतान्कालेन बलिना कथाशेपानराधिपान् ।१४२॥
श्रुत्वा न पुत्रदारादौ गृहक्षेत्रादिके तथा ।
द्रव्यादौ वा कृतप्रज्ञो ममत्वं कुरुते नरः ।१४३॥
इस प्रकार मुझ मे ममता करने वाले एक राजा को मुझे यही छोड कर
मरता हुआ देख कर भी उसाा वशज न जाने क्यो अपने चित्त मे मेरेप्रति इतनी
ममता रखे रहता है ? ॥१३५।। जो भूपात पाने शत्रु को दूत द्वारा यह संदेश
देते हैं कि यह वन्मुधरा मेरी है, तुम इसे छोडकर तुरन्त हट जामो, उन मूर्ती
की उस बात पर मुझे अत्पन्न हैमी तथा दया आने लगती है ॥१३६॥ श्री परा-
शरजी ने कहा-हे मैत्रेपजी ! पृथिवी द्वारा गाये हुये इन श्लोको को सुनने
वाले पुरुप की ममता सूर्य-ताप से पिघल जाने वाले वर्फ के समान नष्ट हो
जायगी ॥१३७॥ इस प्रकार उस मनु-वश का मैंने तुम से वर्णन कर दिया,
जिसमे उत्पन्न हुये राजागरण भगवान् विष्णु के हो अंश थे ॥१३८॥ इस मनु-
वश के क्रम पूर्वक पत्रण करने वाले मनुष्य के सभी पापो का पूर्ण क्षय होता
है ।।१३६॥ इन्द्रियों को वश मे करके जो पुरुप इन सूर्य, चन्द्र वशो का पूर्ण
वृत्तान्त सुरता है, उसे असीमित धन धान्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है
॥१४०।। अत्यन्त वली, महावीर्यवान्, अनन्त धनी और परम निष्टा-सम्पन्न
इक्ष्वाकु, जन्हु, मान्धाता, सगर, मरुत्त, रघुकुन मे उतन्न राजागण, नहुप तथा
ययाति प्रादि के जो चरित्र काल के कारण कया मात्र ही शेष हैं उनको मुनकर
बुद्धिमान पुरुप पुत्र, स्त्री, घर, खेत तथा धन प्रादि मे ममत्व न रखेगा
॥१४१-१४३॥
तप्तं तपो य:पुरुषप्रवीररुब्दाहुभिर्वर्पणाननकान् ।
इट्वासुयज्ञेलिनोऽतिवीर्याः कृता नु कालेन कथावशेपाः ११४४)
पृयुस्समस्तान्विचचार लोका-
नव्याहतो यो विजितारिचक्रः ।
स कालवातामिहतःप्रगष्टः
क्षिप्तं यथा शाल्मलितूलमग्नौ ॥१४॥

[ १२५ । चतुर्थ अंश-ग्र० २४ ] यः कीर्तवीर्योबुभुजे समस्ता- न्द्रौपान्समाक्रम्य हतारिचक्रः । कथाप्रसंगेष्वमिधीयमान- स्स एव सङ्कल्पविकल्पहेतुः ११४६॥ दशानना विक्षितराधवारणामेश्वर्यमुद्भासितदिडमुखानाम् । भस्मापि शिष्ट न कथं क्षरणेन भ्रमङ्गपातेन धिगन्तकस्य ।१४७ कथाशरीरत्वमवाप यकै मान्धातृनामा मुवि चक्रवर्ती । श्रुवापि तत्को हि करोति साधुर्ममत्वमात्मग्यपि मन्दचेताः ।१४८। भगीरथाद्यास्सगरः ककुत्स्थो दशाननो रापवलक्ष्मणौ च । युधिष्ठराद्याश्च बभूवुरेते सत्यं न मिथ्या क नु ते न विद्मः ॥१४॥ ये साम्प्रतं ये च नृपा भविष्याः प्रोक्ता मया विप्रवरोग्रवीर्याः । एते तथान्ये च तथाभिधेयाः सर्वे भविष्यन्ति यथैव पूर्वे ।१५०। एतद्विदित्वा न नरेण कार्य ममत्वमात्मन्यपि पण्डितेन । तिष्ठन्तु तावत्तनयात्मजाद्याःक्षेत्रादेयो ये च शरीरिणोऽन्ये ॥१५॥ ऊर्ध्व वाहु होकर जिन श्रेष्ठ पुरुषों ने बहुत वर्षों तक घोर तप और भनेकों यज्ञ किये थे, उन अत्यन्त बली और वीर्यशाली राजाभों की कथा मात्र ही काल के प्रभाव से शेष बची है ॥१४४।। जो राजा पृथु अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर स्वछच्छन्द मति मे सभी लोको में विचरण करता था, यही अग्नि मे गिर कर भस्म हुई रुई के समान ही विलीन हो गया ॥१४५|| जिस कार्तवीर्म ने अपने सय वैरियो को मारकर सब दीपो को जीता और उनका भोग किया था, वही माज ऐसा प्रतीत होता है कि कभी हुआ था या नहीं ? ॥१४६।। सभी दिशाओं को प्रकाशमान करने वाले रावण, मरुत्त तथा रघुव- शियो का ऐश्वर्ग भी व्यर्थ हो हुआ, क्योकि काल के कटाक्ष मात्र से वह ऐसा मिट गया कि उसकी भस्म भी शेष नही बची ॥१४॥ जो मान्धाता सम्पूर्ण पृथिवी का चक्रवर्ती राजा था, उसकी भी कथा ही रह गई है। इस सब को सुनकर १२४ ] [ श्रीविष्णुपुराण महावलान्महावीर्याननन्तधनसञ्चयान् । कृतान्कालेन वलिना कथाशेपानराधिपान् ॥१४२। श्रुत्वा न पुत्रदारादो गृहक्षेनादिके तथा । द्रव्यादौ वा कृतप्रज्ञो ममत्वं कुरुते नरः ॥१४॥ इस प्रकार मुझ मे ममता करने वाले एक राजा को मुझे यही छोड कर मरता हुआ देख कर भी उस वशज न जाने क्यों अपने चित्त में मेरेप्रति इतनी ममता रखे रहता है ? ॥१३५॥ जो भूपात प्राने शव को दूत द्वारा यह सदेश देते हैं कि यह वन्युधरा मेरी है, तुम इसे छोडकर तुरन्त हट जाओ, उन मूखौं की उस बात पर मुझे अत्पन्न हमी तया दया आने लगती है ॥१३६॥ श्री परा. शरजी ने कहा-हे मंग्रेपजी । पृथिवी द्वारा गाये हुये इन श्लोको को सुनने वाले पुरुप की ममता सूर्य-ताप से पिघल जाने वाले वर्फ के समान नष्ट हो जायगी ॥१३७॥ इस प्रकार उस मनु-वश का मैंने तुम से वर्णन कर दिया, जिसमे उत्पन्न हुये राजागण भगवान् विष्णु के हो अंश थे ॥१३८॥ इस मनु- वश के क्रम पूर्वक श्रवण करने वाले मनुष्य के सभी पापो का पूर्ण क्षय होता है ॥१३६॥ इन्द्रियो को वश मे करके जो पुरुप इन सूर्य, चन्द्र वशो का पूर्ण वृत्तान्त सुनता है, उसे असीमित धन धान्य और ऐश्वर्य को प्राप्ति होती है ॥१४०॥ अत्यन्त बली, महावीर्यवान्, अनन्त धनी और परम निष्टा-सम्पन्न इक्ष्वाकु, जन्हु, मान्धाता, सगर, मरुत्त, रघुकुल मे उत्तन्न राजागण, नहुप तथा ययाति प्रादि के जो चरित्र काल के कारण कया मात्र ही शेप हैं उनको मुनकर बुद्धिमान पुरुप पुत्र, स्त्री, घर, खेत तथा धन आदि मे ममत्व न रखेगा ॥१४१.१४३॥ तप्त तपो य.पुरुषप्रवीरैरुब्दाहुभिर्वर्षणाननकान् । इष्ट्वासुपर्वलिनोऽतिवीर्या. कृता नु कालेन कथावशेपाः ।१४४। पृयुस्समस्तान्विचचार लोवा- नव्याहतो यो विजितारिचक्रः । स कालवाता मिहतः प्रणष्ट. क्षिप्त यथा शाल्मलितूलमग्नौ ।१४श [१२५ चतुर्थ अंश-अ० २४ ] यः कीर्तवीर्योबुभुजे समस्ता- न्द्रौपान्समाक्रम्य हतारिचक्रः । कथाप्रसंगेष्वमिधीयमान- स्स एव सङ्कल्पविकल्पहेतुः ११४६। दशाननाविक्षित राधवाणामैश्वर्यमुद्भासितदिडमुखानाम् । भस्मापि शिष्ट न कथं क्षरणेन भ्रूमङ्गपातेन धिगन्तकस्य ११४७॥ कथाशरीरत्वमवाप यद्व मान्धातृनामा भुवि चक्रवर्ती । श्रुवापि तत्को हि करोति साधुर्ममत्वमात्मग्यपि मन्दचेताः ।१४८॥ भगीरथाद्यास्सगरः ककुत्स्थो दशाननो राघवलक्ष्मणौ च । युधिष्ठराद्याश्च बभूवुरेते सत्यं न मिथ्या क नु ते न विद्यः ।१४६॥ ये साम्प्रतं ये च नृपा भविष्याः प्रोक्ता मया विप्रवरोग्रवीर्याः । एते तथान्ये च तथाभिधेयाः सर्वे भविष्यन्ति यथैव पूर्वे ॥१५०। एतद्विदित्वा न नरेण कार्य ममत्वमात्मन्यपि पण्डितेन । तिष्ठन्तु तावत्तनयात्मजाद्याःक्षेत्रादेयो ये च शरीरिणोऽन्ये ११५॥ ऊर्ध्वबाहु होकर जिन श्रेष्ठ पुरुषों ने बहुत वर्षों तक घोर तप और भनेकों यज्ञ किये थे, उन अत्यन्त बली और वीर्यशाली राजामों की कथा मात्र ही काल के प्रभाव से शेष बची है ॥१४॥ जो राजा पृथु अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर स्वछच्छन्द गति मे सभी लोको मे विचरण करता था, वही अग्नि मे गिर कर भस्म हुई रुई के समान ही विलीन हो गया ॥१४॥ जिस कातवीर्म ने अपने सब रियो को मारकर सब दीपो को जीता और उनका भोग किया था, वही आज ऐसा प्रतीत होता है कि कभी हुआ था या नहीं? ॥१४६॥ सभी दिशाओं को प्रकाशमान करने वाले रावण, मरुत्त तथा रघुवं- शियो का ऐश्वर्ग भी व्यर्थ हो हुना, क्योकि काल के पटाक्ष मात्र से वह ऐसा मिट गया कि उसकी भस्म भी शेप नही बची ॥१४॥ जो मान्धाता सम्पूर्ण पृथिवी का चक्रवर्ती राजा था, उसको भी कया ही रह गई है । इस सब को सुनकर .

१२६ ]
[ श्रीविष्णुपुराण
भी अपने देह के प्रति कौन मन्द बुद्धि वाला ममता करेगा? ॥१४८|| भगीरय
सगर ककुस्थ, रावण, राम, लक्ष्मण, युधिष्ठिर मादि का होना नितान्त सत्य
है, इसमे झूठ किंचित भी नहीं है, परन्तु अब वे सब कहां हैं, इने नी जानते
॥१४॥ हे विप्रश्रेष्ठ ! वर्तमान भयवा मागे होने वाले जिन अत्यन्त वीर्यवान्
राजाप्रो के विषय में मैंने कहा है, तथा अन्य राजागण भी, पहिले कहे हुए
राजाओं के समान कथा मात्र ही रहेगे ॥१५०। इस प्रकार बुद्धिमान मनुष्य को
पुत्र, पुनी, क्षेत्र तथा प्रय प्राणी तो क्या, अपने देह मे भी ममता कभी नहीं
करनी चाहिये ॥१५॥

श्रीविष्णुपुराण पन्चम अंश पहला अध्याय नपारमा कथितस्सर्वो भवता वसविस्तर। चशानुचरित चंच यथावदनुवर्णितम् ॥१॥ अशावतारो ब्रह्मर्षे योऽय यदुकुलोद्भव' । विष्णोस्त विस्तरेणाह श्रोतुमिच्छामि तत्वत ।। चकार यानि कर्माणि भगवान्पुरुषोत्तम । अशाशेनाबतीर्योन्या सम तानि मुने वद १३ मैत्रेय श्रूयतामेतद्यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । विष्णोरशाशसम्मृतिचरित जगतो हितम् ४४ देवकस्य सुता पूर्व वसुदेवो महामुने। उपयेमे महाभागा देवकी देवतोपमाम् ।। कसस्तयोर्वररथ चोदयामास सारथि । वसुदेवस्य देवक्या सयोगे भोजनन्दन । अथान्तरिक्षे घागुच्चै फसमाभाष्य सादरम् । मेघगम्भीरनिर्घोष समाभाष्येदमब्रवीत् १७ थी में प्रेयसी ने महा-हमार ! मापने सभी राजयशों का विस्तार उनके चरित्रों को यथारूप कहा है ॥१॥ है ब्रह्मपि ! भगवान विष्णु का जो अवतार यदुकुल मे हुमा था, उसे ही भव में विस्तार सहित सुनना चाहता हूँ १२८ ] [ श्रीविष्णुपुरण ॥२॥ हे मुने ! भगवान् पुरुषोत्तम ने अपने अंशाशों सहित अवतार धारण करके जो कुछ किया, वही सब भाप मुझे सुनाइये ॥३॥ श्री पराशरजी ने कहा-हे मैत्रेयजी ! भगवान विष्णु के जिस अंशांश रूप के विषय मै तुमने पूछा है, उस संसार के हित मे हुए अवतार का वृतान्त सुनो ॥४॥ पूर्व काल की बात है-- देवक की पत्यन्त भाग्यवती एव देवी स्वरूपिणी पुत्री देवकी का विवाह वसु- देवजी के साथ हुमा था | वसुदेव-देवकी का विवाह होने के पभाव उनके माङ्गलिक रय को भोजनन्दन कंस ने स्वयं चलाया ॥६॥ उसी मवसर पर मेध के समान गम्भीर वाणी मे कस को उच्च स्वर से सबोधन करती हुई देवगिरा में कहा ७॥ यामेतां वहसे मूढ सह भा रथे स्थिताम् । अस्यास्तवाष्टमो गर्भः प्राणानपहरिष्यति ।। इत्याकर्ण्य समुत्पाटय खङ्ग कसो महाबल. । देवकी हन्तुमारब्धो वसुदेवोऽब्रवीदिदम् ।। न हन्यव्या महाभाग देवकी भवतानघ । समर्पयिष्ये सकलाल नस्योदरोद्भवान् ॥१०॥ तथेत्याह ततः कसो वसुदेवं द्विजोत्तम । त घातयामास च तां देवकी सत्यगौरवात् ।११ एतस्मिन्नेव काले तु भूरिभारावपीडिता। जगाम धरणी मेरो समाजं त्रिदिवौकसाम् ॥१२॥ सब्रह्मकान्सुरान्सर्वान्प्रणिपत्याथ मेदिनी। कथयामास तत्सर्वं खेदात्करुणभापिणी ॥१३॥ भरे मूर्ख तू अपने पति के साथ बैठी हुई जिस देवकी को पहुंचाने जा, रहा है. इसी का पाठवां गर्म तेरे प्राण का हरण करने वाला होगा ॥८॥ श्री पराशरजी ने कहा-यह सुनते ही महाबली कंस ने तलवार सखीच ली और जमे ही देवकी को मारने के लिए उद्य त हुआ, वैसे ही वसुदेवजी ने उसे रोकते हुए महा ॥६हे महाभाग ! हे निष्पाप ! इस देवी को मत मारिये, मैं इसके सभी गौ को, उत्पन्न होते ही प्रापको समर्पित कर दूंगा ॥१०॥ पराशरजी ने भ- पञ्चम अंश-अ०१] [ १२६ कहा-है द्विज श्रेष्ठ ! यह सुन कर कस ने सत्य के गौरव से प्रभावित होकर पसुदेवजी की बात मान ली और देवकी को छोड दिया ॥११॥ इसी अवसर बोझ से अत्यन्त पीडित हुई पृथिवी सुमेरु पर्वत स्थित देवताप्रो की सभा मे पहुंची ॥१२॥ वहां जाकर उसने ब्रह्माजी सहित सब देवतामो को प्रणाम किया पौर खेद तथा कपणा भरे स्वर में उसने अपना सब कष्ट उन्हे कह सुनाया ॥१३॥ अग्निस्सुवर्णस्य गुरुगंवा सूर्य परो गुरु । ममाप्यखिललोकाना गुरुनारायणो गुरु ॥१४॥ प्रजापतिपतिवमा पूर्वेपामपि पूर्वज । कलाकाष्ठानिमपात्मा कालश्चाव्यक्तमूत्तिमान् ॥१५॥ तदशभूतस्सर्वेषा समूहो वस्सुरोत्तमा । आदित्या मरुतस्साध्या रुद्रावस्वश्विवह्नय ॥१६॥ पितरो ये च लोकाना स्रष्टारोऽमिपुरोगमाः । एते तत्याप्रमेयस्य विष्णो रूप महात्मन ।१७। यक्षराक्षसदैतेयपिशाचोरगदानया गन्धर्वाप्सरश्चैव रूप विष्णोर्महात्मन ॥१८॥ ग्रहह्मतारकाचित्रगगनाग्निजलानिला । अह च विषयाश्चैव सर्वं विश्णुमय जगत् ।१६। तथाप्यनेकरूपस्य तस्य रूपाण्यहर्निशम् बाध्यबाधकता यान्ति कल्लोला इव सागरे ।२०॥ पृथिवी ने पहा - जसे स्वयं का गुरु पग्नि और रश्मि-समूह का परम गुरु सूर्य है, वैसे ही सम्पूर्ण विश्व के गुरु भगवान् श्री नारायण मेरे गुरु है । वही प्रमापतियो के पति तथा पूर्वजो के पूर्वन ब्रह्मा हैं और वही कला, फाटा पौर निमेष रूप वाला प्रम्पक्त रूप कास है ॥१५॥ हे श्रेष्ठ देवतामो! भाप सब भी उन्हीं के मशरूप हैं । सूर्य मरुद्गण, साम्यगण, रुद्र, वसु, प्रश्विनोदय, पग्नि, पितरगण मौर सोक सृष्टा मनि मादि प्रजापति-यह सय महारमा उन्हीं भगवान् विष्णु से स्वरूप हैं ॥१६-१७॥ यश, राक्षस, देस्य, पिशाच, उग. ।

१३० ] . [ श्रीविष्णुपुराण दानव, गंधर्व और अप्सरा भी उन्ही महात्मा विष्णु के स्वरूप हैं ॥१८॥ ग्रंह, नक्षत्र और तारागण वाला यह अद्भुत आकाश, अग्नि, जल, पवन, मैं तथा सम्पूर्ण विषय युक्त यह विश्व भी विष्णुमय ही है ॥१६॥ फिर भी उन अनेक रूपात्मक भगवान् विष्णु के यह रूप प्रहनिश समुद्र की तरंगो के समान परस्पर टकराते रहते हैं ॥२०॥ तत्साम्प्रतममी दैत्याः कालनेमिपुरोगमाः। मर्त्यलोकं ससाक्रम्य बाधन्तेऽहर्निशं प्रजाः ॥२१॥ कालनेमिहतो योऽसौ विष्णुना प्रभविष्णुना। उग्रसेनसुतः कंसस्सम्भूतस्स महासुरः ।२२। अरिष्टो धेनुकः केशी प्रलम्बो नरकस्तथा । सुन्दोऽसुरस्तथात्युग्रो वाणश्चापि बलेस्सुतः ।२३। तथान्ये च महावीर्या नृपाणां भवनेषु ये। समुत्पन्ना दुरात्मानस्तान संख्यातुमुत्सहे ॥२४॥ अक्षौहिण्योऽत्र बहुला दिव्यमूर्तिधरास्सुराः । महाबलानां दृप्तानां दैत्येन्द्राणां ममोपरि।२५॥ तद्भरिभारपीडार्ता न शक्नोम्यमरेश्वराः । विभत्तमात्मानमहमिति विज्ञापयामि वः ॥२६॥ क्रियतां तन्महाभागा मम भारावतारणम् । यथा रसातलं नाहं गच्छेयमतिविह्वला ।२७। इस समय मत्यलोक पर कालनेमि मादि दैत्यो ने अधिकार कर लिया है भोर वे दिन रात राजा को पोहित करते रहते हैं ॥२१॥ सर्व शक्तियंत भग. पान विष्णु ने जिस कालनेमि पा संहार किया था, यही इस समय ग्रिसेन के पुत्र रूप में कंग नाम से पृथिवी पर उत्तम हुपा है ॥२२॥ परिष्ट, धेनुक, पेशी, प्रलम्य, नरस, सुन्द, घसिपुत्र याणासुर तपा मन्याय महावीर्यशाली दुरारमा रप पृपियो पर राम-गृहों में उत्पन्न हुए हैं, जिनकी गणना करना भी संभव नहीं है १२३-२४॥ हे दिपार देवगण इस समय महापंती भोर महंकारी स्प राजामों को अनेक प्रणोहिणी सेनाएं मुझे दयाय हुपे है ।।२।। हे ममरे- पञ्चम अंश-अ०१] [ १३१ श्वरो ! मैं मापसे निवेदन करती हूँ कि उनके प्रत्यन्त बोझ को न सहने के कारण अब मैं अपने को धारण करने मे भी समर्थ नहीं हो रही है ॥२६। इस- लिये हे महाभाग बालो ! मेरे बोझ को दूर करिये, जिससे मैं अत्यन्त व्याकुलता पूर्वक रसातल मे फंसने से बच सकू ॥२७॥ इत्याकर्ण्य धरावाक्यमशेपैत्रिदशेश्वरैः । भुवो भारावताराथं ब्रह्मा प्राह प्रचोदितः ॥२०॥ यथाह वसुधा सर्व सत्यमेव सत्यमेव दिवौकसः। अह भवो भवन्तश्च सर्वे नारायणात्मका. १२६। विभूतयश्व यास्तस्य तासामेव परस्परम् । प्राधिक्य न्यूनता वाध्यवाधकरवेन वर्तते ॥३०॥ तदागच्छत गच्छाम क्षीराब्धस्तटमुत्तमम् । तयाराध्य हरि तस्मै सवं विज्ञापयाम वै ॥३१॥ सर्वथैव जगत्यर्थे स सर्वात्मा जगन्मयः। सत्त्वाशेनावतोर्योव्यां धर्मस्य कुरुते स्थितिम् ॥३२॥ इत्युक्त्वा प्रययौ तभ सह देवै. पितामहः । समाहितमनाश्चैव तुष्टाव गरुडध्वजम् ॥३३॥ द्वे विद्य त्वमनाम्नाय परा चवापरा तथा। त एव भवतो रूपे मूर्तामूर्तात्मिक प्रभो ॥३४॥ द्वे ब्रह्मणी वरणीयोऽतिस्थूलात्मन्सवं सर्ववित् । शब्दब्रह्म पर चैव ब्रह्म ब्रह्ममयस्य यत् ॥३॥ पृथिवी यो यात सुनकर सब देवनामों की प्रेरणा से उमसे बोझ को दूर करने विषयक वचनो को ब्रह्माजी ने इस प्रकार कहा ॥२८॥ ब्रह्माजी योले-है देवतामो । पृपिणे या पयन सरय है, में, शिवजी, पाप सभी पयार्य में तो नारायण के ही स्वरूप हैं ॥२६॥ उनकी विभूतियों को परस्परिक न्यूनता एवं मधिरता हो याम्प-धापक स्वरूप होती हैं ॥३०॥ दम. सिये पतो, हम सब क्षीर सागर के निारे पलकर भगवान विष्णु पापारा. धन पर और उनको यह सब वृत्तान्त मुना ॥३१॥ #दि ये विश्वरूप सर्या- १३२ ] [ श्रीविष्णुपुराण स्मा विश्व के हितार्य ही अपने सत्वांश से उद्भूत होकर धर्म की सदैव स्थापना करते हैं ॥३२॥ श्री पराशरजी ने कहा-यह कह कर ब्रह्माजी ने सब देवतामो को साथ लियामौर वहां जाकर एकान मन से गाडध्वज भगवान् को प्रसन्न करने लगे ॥३३॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे प्रभो ! पाप वाणी से परे हैं । परा और पपरा नाम की दोनो विद्या प्राप ही हैं, क्योकि वे दोनों मापके ही मूर्त और अमूर्त रूप हैं ॥३४॥ हे अत्यन्त स्थूल एव सूक्ष्म ! हे सर्व ! हे सबके जानने वाले ! शब्द ब्रह्म और परब्रह्म प्रापका ही है ॥३५॥ ऋग्वेदस्त्वं यजुर्वेदस्सामवेदस्त्वथर्वणः । शिक्षाकल्पो निरुक्त च च्छन्दो ज्यौतिषमेव च ॥३६॥ इतिहासपुराणे च तथा व्याकरणं प्रभो। मीमांसा न्यायशास्त्रं च धर्मशास्त्राण्यधोक्षज ।३७। आत्मात्मदेहगुणवद्विचाराचारि यद्वचः । तदप्याद्यपते नान्यदव्यात्मात्मस्वरूपवत् ॥३८॥ त्वमव्यक्तमनिर्देश्यमचिन्त्यानामवर्णवत् । अपाणिपादरूपं च शुद्ध नित्यं परात्परम् ॥३६॥ शृणोष्यकर्णः परिपश्यसि त्वमचक्षुरेको बहुरूपरूपः । अपादहस्तो जवनो ग्रहीता त्वं वेत्सि सर्वं न च सर्ववेद्यः ।४।। अणोरणीयांसमसत्स्वरूपं त्वां पश्यतोऽज्ञाननिवृत्तिरप्रया। धीरस्य धीरस्य विभति नान्यद्वरेण्यरूपात्परतः परात्मन् ॥४१॥ त्वं विश्वनाभिर्भुवनस्य गोप्ता सर्वाणि भूतानि तवान्तराणि । यद्भूतभव्यं यदरणोरणीयः पुमांस्त्वमेकः प्रकृतेः परस्तात् ।४२। पाप ही, ऋक्, यजु, साम और अथवं रूप चारो वेद हैं और आप ही शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द मौर ज्योतिप शास्त्र भी हैं ॥३६॥ आप ही इतिहास पुराण मोर व्याकरण हैं तथा हे अधोक्षज ! मीमाता, न्याय और धर्मशास्म भी भाप ही हैं ॥३७॥ हे माधपते ! जीवारमा, परमात्मा, स्थूल, सूक्ष्म, और उनका कारण अव्यक्त तथा उनके विचार वाला वेदान्त भी मापसे अभिन्न ही है ॥३८॥ भाप ही भव्यक्त, मनिर्देश्य, अचिन्त्य, नाम-वर्ण से हीन, अंग तथा पञ्चम अश-अ० १] [१३३ रूपादि से रहित, शुद्ध सनातन और पर से भी पर हैं ॥३६॥ आप ही बिना श्रोत के सुनने वाले, विना नेत्र देखने वाले, एक होकर भी अनेक दिखाई देने वाले, अप-रहित होकर भी अत्यन्त बैग वाले और भवेद्य होकर भी सब के जानने वाले हैं ।।४२॥ हे परमात्मन् । जिस घोर पुरुष को मति मापके रूप के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं देखती उस पापके अणु से मी सूक्ष्म रूप का दर्शन करने वाले का प्रज्ञान नितान्त रूप से नष्ट हो जाता है ॥४१॥ माप ही विश्व की नाभि और तीनो लोकों के रक्षक हैं, सब प्राणियो की स्थिति भी भाप में ही है तथा विगन और प्रागमी सूक्ष्म से भी सूक्ष्म जो कुछ भी है, वह सब मापकी प्रकृत्यातीत एक मात्र परमपुरुष हैं ॥४२॥ एकचतुर्दा भगवान्हुताशो वक़विभूति जगतो वदासि । स्व विश्वतश्चक्षुरनन्तमूर्ते या पद त्व निदधासि धात. १४३॥ यधाग्निरेको बहुधा समिध्यते विकारभेदरविकाररूप. । तथा भवान्सर्वगतकरूपी रूपाण्यशेपाण्यनुपुष्यतीश १४४] एक त्वमग्रघ परम पद यत्पश्यन्ति त्वा सूरयो ज्ञानदृश्यम् । त्वत्तो नान्यत्किश्चिदस्ति स्वरूप यद्वा भूत यच्च भव्य परात्मन् व्यक्ताव्यक्तस्वरूपस्त्व समष्टिव्यष्टिरूपवान् । सर्वज्ञस्सर्ववित्सर्वशक्तिज्ञानबद्धिमान् ॥४६॥ अन्यूनचाप्यवृद्धिश्च स्वाधीनो नादिमान्वशी। लमतन्द्राभयक्रोधकामादिभिरसयुत १४७) माप ही चार प्रकार के अग्नि रूप से विश्व को तेज रूप विसूनि प्रदान करते हैं । हे पनन्नमूते । मापके चक्षु सब पोर विद्यमान हैं तथा पाप ही लो- प को तीन पग मे नापते हैं ॥४३॥ है ईश्वर । जैसे एक ही अग्नि विकार भेद से अनेक रूप वाला होताहै वैसे एक मात्र माप सवंगत रूप से सभी रूपो की धारण करते हैं । ४ प ही एक मात्र थेष्ट परमपद है माप हो भान-ष्टि थे द्वारा दर्शनीय हैं, इमलिए जानी पुरुष प्रापको ही देखा करते हैं । हे परास्मन। भूत भविष्पत् स्वरूप जो कुछ भी है, मह प्रापसे भिन्न नहीं है ॥४५॥ पाप ही व्यक्त रूप सपा माप ही मन्यक्त रूप है, समष्टि और पटि रूप भी पाप ही हैं,

पञ्चम अंश अ० १ ]
[ १३७
अवसर पर महर्षि नारद ने कंस के पास जाकर कहा कि देवकी के पाठवें गर्भ
के रूप में भगवान् विष्णु अवतीर्य होगे ।। ६६॥ नारद जी की बात सुन कर
कंस अत्यंत क्रोधित हुना और उसने वसुदेव तथा देवको को कारागार में डाल
दिया ।।६७॥
वसुदेवेन कसाय तेनैवोक्त यथा पुरा।
तथैव वसुदेवोऽपि पुत्रपितवान्द्विजः ॥६८
हिरण्यकशिपोः पुत्राप्पड्गी इति विश्रुताः ।
विष्णुप्रयुक्ता तानिद्रा क्रमाद्गर्भानयोजयत् ।।६६
योगनिद्रा महामाया वैष्णवी मोहित यया ।
अविद्यया जगत्सर्व तामाह भगवान्हरिः ॥७०
निद्र गच्छ ममादेशात्पातालतलसश्रयान् ।
एककत्वेन षड्गन्देिवकीजठर नय ७१
हतेपु तेपु कंसेन शेपास्योंऽशस्ततो मम ।
अंशाशेनोदरे तस्यास्सप्तम. सम्भविष्यति ॥७२
गोकुले वसुदेवस्य भार्यान्या रोहिणी स्थिता ।
तस्यास्स सम्भूतिसम देवि नेयस्त्वयोदरम् ॥७३
सप्तमो मोजराजस्य भयाद्रोधोपरोघत ।
देवक्या: पतितो गर्भ इति लोको वदिष्यति ।।७४
गर्भसङ्घर्पणात्सोऽथ लोके सङ्कपणेति वै ।
सज्ञामवाप्स्यते वीरश्श्वेतादिशियरोपमः ॥७५
है प्रिय ! वसुदेव जी ने अपने पूर्व वचनों के अनुसार, अपने प्रत्येक पुत्र
को कंस के लिये अर्पित कर दिया ॥६८) सुनते है कि देवकी के प्रथम छ गर्भ
हिरण्यवशियु के पुत्र थे, विष्णु भगवान् द्वारा प्रेरित योगनिद्रा उन्हें गर्भ में
स्थापित करती रही यो ॥६६॥ जिस मविद्या स्वरूपिणी योगमाया से सम्पूर्ण
विश्व मोहित है, यही भगवान की माया है, उससे भगवान विष्णु ने वहा ||७०॥
श्री भगवान् योले-हे नि ! तू यहाँ से जाकर पाताल में स्थित छ.गों को
एक-एक परके देवकी के गर्भ में स्थापित कर ॥७१॥ अव क्स उन सब का

१३८ ] [ श्रीविष्णुपुराण वध कर डालेगा. तब मेरा अश स्प शेप अपने प्रशांशो के सहित देवकी या सातवां गर्भ होगा 1७२।। वसुदेव जी को एक दूसरी पत्नी रोहिणी गोकुल मे निवास करती है, उस सातवें गर्भ को लेजाकर तू उसी को कोत मे स्थापित फर देना, जिससे कि वह उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ प्रतीत हो ॥७३॥ उस गर्भ के विषय मे सब लोग यही समझेगे कि कारागृह मे पड़ी हुई देवकी का सातवा गर्भ कस के भय से गिर गया ॥७४॥ जिसमे शुभ्र पर्वत शिखर के समान वीर पुरुष का गर्भ से प्राकर्षरण होने के कारण 'सकर्पण' नाम पडेगा ॥७॥ ततोऽह सम्भविष्यामि देवकोजठरे शुभे । गर्भे त्वया यशोदाया गन्तव्यमविलम्बितम् ।।७६ प्रावृट्काले च नर्भास कृष्णाष्टम्यामह निशि । उत्पत्स्यामि नवभ्या तु प्रसूति त्वमवाप्स्यसि ।।७७ यशोदाशयने मा तु देवक्यास्त्वामनिन्दिते। मच्छक्तिप्रेरितमतिर्वसुदेवो नयिष्यति ॥७८ कसश्च त्वामुपादाय देवि शैलशिलातले। प्रक्षेप्स्यत्यन्तरिक्ष च सस्थान त्वमवाप्स्यसि IGE ततस्त्वा शतहक्छक प्रणम्य मम गौरवात् । प्रणिपातानतशिरा भगिनीत्वे ग्रहीष्यति !10 त्व च शुम्भनिशुम्भादीन्हत्वा दैत्यान्सहस्रश । स्थानैरनेक पृयित्रीमशेषा मण्डयिष्यसि ।।८१ त्व भूति सन्नतिः क्षान्ति कान्तिी पृथिवी धृति । लजा पुष्टिरुपा या तु काचिदन्या त्वमेव सा ।।२ हे शुभे । फिर मैं देवकी के उदर मे पाठवां गर्भ होऊँगा उस समय तू भी यशोदा के गर्भ में स्थित हो जाना ॥७६।। वर्षा ऋतु के भादो मास की कृष्णाष्टमी को रात्रिकाल म मैं प्रवतीर्ण होऊँगा और तुझे नवमी के प्राप्त होने पर जन्म लेना है ।।७७॥ उस समय मेरी प्रेरणा से वसुदव जी की मति ऐसी हो जाएगी, जिससे यह मुझे यशोदा के शयनागार में पहुंचा कर तुझे देवकी के पास ले जायगे ॥७॥ हे देवि ! फिर क्स तुझे पत्थर को शिला पर दे मारेगा 4) पञ्चम अश प० २ ] [ १३६ और तू पछाडी जाते ही अन्तरिक्ष में चली जायगी ।।७६। उस समय हजार नेत्र वाला इन्द्र मेरी महिमा से तुझे बहिन मानता हुआ प्रणाम करेगा ।।८०॥ तू भी शुम्भ, निशुम्भादि हजारो दैत्यो का वध करती हुई अपने अनेक स्थान वनाकर पृथिवी को अलकृत करेगी ॥८१॥ तू भूति, सन्नति, क्षान्ति, कान्ति, आकाश और पृथिवी है तथा तू ही धृति, लज्जा एव उपा है अथवा इनके अतिरिक्त भी जो कोई शक्ति है, वह सब कुछ तू ही है ।।२।। ये त्वामार्येति दुर्गेति वेदगर्भाम्बिकेति च । भद्र ति भद्रकालीति क्षेमदा भाग्यदेति च ॥३ प्रातश्चवापराले च स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः । तेपा हि प्रार्थित सर्व मत्प्रसादाद्भविष्यति ।।८४ सुरामासोपहारश्च भक्ष्यभोज्यश्च पूजिता। नृणामशेपकामास्त्व प्रसन्ना सम्प्रदास्यसि ।।८५ ते सर्वे सर्वदा भद्रे मत्प्रसादादसशयम् । असन्दिग्धा भविष्यन्ति गच्छ देवि यथोदितम् ।।८६ प्रात काल और अपराह्न काल मे जो मनुष्य तेरी स्तुति परते हुए विनम्रता से तुझे प्रार्ये । दुर्गे । वेदगर्भ । अम्बिके । भद्रे । भद्रकाली | कल्याण दायिनी, भाग्य प्रदायिनी । प्रादि कह पुकारेंगे, उनको सभी अभिलापाए मेरी वृपा से पूर्ण हो जायेगी ।।३-८४।। भोज्य-मध्य पदार्थों द्वारा पूजन किये जाने पर प्रसन्न हुई तू सब मनुष्यो पी यामनाएं मिद्ध परेगी ॥५५॥ तेरे द्वाग प्रदत्त ये सभी पाम्य-पल मेरी कृपा से अवश्य ही मिड होंगे। इमलिये, हे देवि ! तू रे द्वारा निर्दिष्ट स्थान को गमन कर ॥८६॥ मरा अध्याय यथोक्त सा जगद्धात्री देवदेवेन तथा। पड़ गर्भगविन्यास चमचा-यस्य कपणम् ॥१ १४० । [ 'श्रीविष्णुपुराण सप्तमे रोहिणी गर्ने प्राप्त गर्भ ततो हरिः। लोकत्रयोपकाराय देवक्याः प्रविवेश ह ॥२ योगनिद्रा यशोदायास्तस्मिन्नेव तथा दिने । सम्भूता जठरे तद्वद्यथोक्त परमेष्ठिना ॥३ ततो ग्रहणस्सम्यक्प्रचचार दिवि द्विज । विष्णोरंशे भुवं याते ऋतवश्वावभुश्शुभाः ।।४ न सेहे देवकी द्रष्टुं कश्चिदप्यतितेजसा । जाज्वल्यमानां तां दृष्ट्वा मनांसि क्षोभमाययुः ।।५ अदृष्टाः पुरुपरस्त्रीभिर्देवकी देवतागणाः । विभ्राणां वपुषा विष्णु तुष्टुवुस्तामहनिशम् ॥६ श्री पराशर जी ने कहा-हे मैत्रेयजी ! देवाधि देव भगवान् विष्णु के प्रादेशानुसार जगद्धात्री योगमाया ने देवकी के गर्भ मे छ' गर्भ स्थित किये और सातवें गर्भ को खीच लिया ॥११॥ इस प्रकार जब सातवां गर्भ खिच कर रोहिणी के उदर मे स्थापित हो गया तव भगवान् तीनो लोको को हित-कामना से देवकी के गर्भ मे प्रविष्ट हुए ॥२॥ भगवान् विष्णु के कथनानुसार ही योग माया ने भी उसी दिन यशोदा के गर्भ मे प्रवेश किया ॥३॥ हे द्विज ! जब भगवान् का वह अंश पृथिवी पर अवस्थित हुआ, तभी से प्राकाशस्य ग्रहो की गति नियमित हो गई और ऋतुएं भी मगलमयी होकर सुशोभित होने लगी ॥४॥ उस समय देवको इतनी तेजोमयी हो गई थी, उनकी ओर देख सकना भी कठिन था, उन्हें देख कर मनों मे क्षोभ होता था ॥५॥ उस समय देवगण किसी स्त्री-पुरुष को दिखायी न दे सकें, इस प्रकार अप्रकट रह कर दिन-रात देवकी की स्तुति करने लगे ॥६॥ प्रकृतिस्त्वं परा सूक्ष्मा ब्रह्मग भवः पुग। ततो वाणी जगद्धातुर्वेदगर्भासि शाभने 19 सृज्यस्वरूपगर्भासि सृष्टिभूता सनातने। बीजभूता तु सर्वस्य यज्ञभूताभवस्त्रयो ।

, पञ्चम अश अ०२ ] [ १४१ फन्नगर्भा त्वमेवेज्या वह्निगर्भा तथारणि । अदितिर्देवगर्भा व दैत्यगर्भा तथा दिति । ज्योत्स्ना वासरगर्भा त्व ज्ञानगर्भासि सन्नतिः । नयगर्भा परा नीतिलेना त्व प्रश्रयोदहा ।।१० कामगर्भा तथेच्छा व तुष्टि सन्तोषभियो । मेघा च वोवगर्भासि धैर्यगर्भोद्वहा धृति ॥११ देवगण ने कहा-हे शोभने । पहिले तू ब्रह्म प्रतिबिम्ब को धारण करने वाली मूल प्रकृति थी, विश्वसृष्टा को वेदगर्भा वाणी हुई ॥७) हे सनातने तू ही उत्पन्न होने योग्य पदार्थों को कारण रूपा और सृष्टि रूपा है, तू ही सब की बीजभूता, यज्ञमयी और वेदत्रयी है ।।८।। तू ही फल को उत्पन्न करने वाली यज्ञ क्रिया तथा अग्नि की उत्पादिका अरणि है। तू ही देवमाता अदिति और दैत्य- जननी दिति है ॥६॥ तू ही दिन को प्रकट करने वाली ज्योत्स्ना, ज्ञान को उस्पन करने वाली गुरु-सुथूपा, न्यायगर्भो परमनीति और विनय को उत्पन्न करने वाली लज्जा हैं ॥१०॥ तू ही काम को उत्पन्न करने वाली इच्छा, सन्तोष को उत्पन्न करने तुटि, बोध दायिनी मेधा और धयगर्भा धृति है ॥११॥ ग्रहर्भतारकागर्भा द्यौरस्याखिलहैतुकी। एता विभूतयो देवि तथान्याश्च सहस्रश ॥१२ तथासख्या जगद्धात्रि साम्प्रत जठरे तव । समुद्राद्रिनदीद्वीपपवनपत्तनभूषणा ।।१३ ग्रामखर्वटखेटाढ्या समस्ता पृथिवी शुभे। समस्तवह्नयोऽम्भासि सकलाश्च समीरणा ।।१४ ग्रहह्मतारकाचित्र विमानशतसकुलम् । अवकाशमशेषस्य यद्ददाति नभ स्थलम् ॥१५ भूर्लोकश्च भुवर्लोकस्स्वर्लोकोऽय महर्जनः । तपश्च ब्रह्मलोकश्च ब्रह्माण्डमखिल शुभे ॥१६ तदन्तरे स्थिता देवा देत्यगन्धर्वचारणा । महोरगाम्नथा यक्षा राक्षसा प्रेतगुह्यया ॥१७ + १४२ ] [ श्रीविष्णुपुराण मनुष्याः पशवश्चान्ये ये च जीवा यशस्विनि । तैरन्तःस्थरनन्तोऽसौ सर्वगः सर्वभावनः ॥१८ रूपकर्मस्वरूपाणि न परिच्छेदगोचरे । यस्याखिलप्रमारणानि स विष्णुर्गर्भगस्तव ॥१६ त्वं स्वाहा त्वं स्वधा विद्या सुधा त्वं ज्योतिरम्बरे । त्वं सर्वलोकरक्षार्थमवतीर्णा महीतले ॥२० प्रसीद देवि सर्वस्य जगतश्शं शुभे कुरु । प्रीत्या तं धारयेशानं धृतं येनाखिल जगत् ॥२१ तू ही ग्रहो, नक्षत्रो, मोर तारो को धारण करने वाला प्राकाश है। यह तथा अन्यान्य हजारो विभूतियां तेरे जठर मे स्थित हैं । समुद्र, पर्वत, नदी, द्वीप, वन और नगर, ग्राम, खर्वट, खेटादि से सुशोभित सम्पूर्ण पृथिवी, सभी अग्नियां, जल, सब पवन, ग्रह-नक्षत्र और तागें से चित्रित हुमा, सैकडो विमानो से परिपूर्ण और सब को अवकाश देने वाला प्राकाश, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, मह, जन, तप और ब्रह्मलोक तक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसमे स्थित देवता, दैत्य, गधर्व, चारण, नाग, यक्ष, राक्षस, प्रेत, गुह्यक, मनुष्य, पशु तथा अन्यान्य प्राणियो के कारण रूप जो सर्वत्र गमनशील और सर्व भावन श्री अनन्त भगवान् हैं तथा जिनके रूप, कर्म, स्वभाव और समस्त परिणाम परिच्छेद से परे हैं वही भगवान् विष्णु तेरे गर्भ मे प्रतिष्ठित हैं ॥१२-१६।। स्वाहा, स्वधा, विद्या, सुधा और आकाश मे स्थित ज्योति तू ही है तथा तू सभी लोको की रक्षा के लिये ही पृथिवी पर अवतीर्ण हुई है ॥२०॥ हे देवि ! तू प्रसन्न होकर सम्पूर्ण विश्व का मगल कर । जिस भगवान ने इस सम्पूर्ण विश्व को धारण क्यिा हुआ है, उसे तू भी प्रीति सहित धारण कर ॥२१॥ . तीमरा अध्याय एवं संस्तूयमाता सा देवौवमधारयत । गर्भण पुण्डरीकाक्षं जगतस्त्रारणकारणम् ।।१

पञ्चम अंश अ २ ]
[ १४३
ततोऽखिलजगत्पद्मबोधायाच्युतभानुना।
देवकीपूर्वसन्ध्यायामाविर्भूत महात्मना ।।२
तञ्जन्मदिनमत्यर्थमालाधमलदिड मुखम् ।
वभूव सर्नलोकस्य कौमुदी शशिनो यथा ॥३
मन्तस्सन्तोषमधिक प्रशम चण्डमारुता ।
प्रसाद निम्नगा याता जायमाने जनार्दने ॥४
सिन्धवो निजशब्देन वाद्य चक्रर्मनोहरम् ।
जगुर्गन्धर्नपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणा ।।५
ससृजु पुष्पवर्षारिण देवा भुज्यन्तरिक्षमा ।
जज्वलुश्चाग्नयश्शान्ता जायमाने जनार्दने ॥६
मन्द जगजुर्जलदा पुष्पवृष्टिमुचो द्विज ।
अर्द्धरात्रेऽखिलाधारे जायमाने जनार्दने ।।७
थी पराशर जी ने कहा-हे मैथेयजी । देवतायो द्वारा इस प्रकार स्तुत
हुई देवकी ने जगत् की रक्षा के निमित्त भगवान् को अपन गर्भ मे धारण किया
॥१॥ फिर सम्पूर्ण विश्व रूप कमल के विकासार्थ देवकी रूपिणी सन्ध्या मे
भगवान् अच्युत रूप भास्कर प्रकट हुए ॥२॥ भगवान् का वह जन्म-दिवस
चन्द्रमा की चांदनी के समान सम्पूर्ण विश्य को प्रानन्दित करने वाला हुना तथा
उस समय सम्पूर्ण दिशाएं अत्यत स्वच्छ होगईं ॥३॥ भगवान् का जन्म होने
पर साधुजनो को प्रत्यत प्रसन्नता हुई, प्रचण्ड पवन शान्त हो गया और सभी
दियां निर्मल होगई ॥४॥ समुद्र का शब्द भी मनोहर वाजो का घोप बन गया,
पर्व गाने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगी ॥५॥भगवान् के उत्पन्न होने
पर प्रकाश में गमन करने वाले देवता पुष्प वृष्टि करने लगे और शान्त यज्ञाग्नि
हुन प्रज्वलित हो रटी ॥६॥ उस प्राधी रात के समय प्रकट हुए जनार्दन पर
प्प वृद्धि करते हुए मेघ मन्द घोष दरने लगे ||७||
फुल्लेन्दीवरपनाभ चतुर्वाहुमुदीक्ष्य तम् ।
श्रीवत्सवक्षस जात तुष्टावानपदुन्दुभि ।

१४४ ] श्रीविष्णु पुराण अभिष्ट्रय च तं वाग्भि. प्रसन्नाभिर्महामतिः । विज्ञापयामास तदा कंसाद्भोतो द्विजोत्तम ।। जातोऽसि देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधरम् । दिव्यरूपमिद देव प्रसादेनोपसंहर ॥१० अद्य व देव कंसोऽयं कुरुते मम घातनम् । अवतीर्ण इति ज्ञात्वा त्वदस्मिन्मम मन्दिरे ।।११ योऽनन्तरूपोऽसिलविश्वरूपो । गर्भेऽपि लोकान्वपुपा विति । प्रसीदतामेप स देवदेवो । यो माययाविष्कृतबालरूपः ।।१२ उपसहर सर्वात्मन्न पमेतच्चतुर्भुजम् । जानातु मावतार ते कसोऽय दितिजन्मज ॥१३ स्तुतोऽह यत्त्वया पूर्व पुत्राथिन्या तदद्य ते। सफल देवि सञ्चात जातोऽह यत्तवोदरात् ॥१४ विकसित कमल-दल जैसी कान्नि वाले, चार भुजानो और हृदय में श्री वत्स चिह्न वाले भगवान को उत्पन्न हुआ देखकर वसुदेवजी उनकी स्तुति करने लगे ।।८।। हे द्विज श्रेष्ठ । महामति वसुदेवजी ने प्रसन्न करने वाली गणी से स्तुति करते हुए कस के भय के कारण इस प्रकार कहा ॥६॥ वसुदेवजी बोले-हे देवदेवेश । यद्यपि प्राप उत्पन्न हुए हैं, फिर भी अपने इस शंख-चक्र- गदा युक्त दिव्य स्वरूप को छुपा लीजिये ॥१०॥ हे प्रभो 1 आपके मेरे घर में उत्पन्न होने की सूचना प्राप्त होते ही कंस मेरे विनाश मे तत्पर होगा ॥११॥ देवकीजी ने कहा—जो अखिल विश्वेश्वर अनन्त रूप मेरे गर्भ में स्थित होकर भी सब लोको के धारण करने वाले हैं और जिन्होंने अपनी ही माया से यह बाल रूप धारण किया है। वह देवदेवेश्वर भगवान् हम पर प्रसन्न हो ॥१२॥ हे सर्वात्मन् । अपने इस चतुर्भुज रूप को छुपा लीजिये, जिससे दैत्यवंश कस को मापके इस अवतार का ज्ञान न हो सके ॥१३॥ श्री भगवान् PR पञ्चम अशप्र० ३ ] [ १४५ हे देवि । पूर्व जन्म में मुझ से पुत्र का मनोरथ करने के कारण ही मैं तेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ हूँ ॥१४॥ इत्युक्त्वा भगवास्तूणी बभूव मुनिसत्तम । वसुदेवोऽपि त रानावादाय प्रययौ वहि ।।१५ मोहिताश्चाभवस्तत्र रक्षिग्गो योगनिद्रया। मथुराद्वारपालाश्च बजत्यानकदुन्दुभौ ॥१६ वर्पता जलदाना च तोयमत्युल्बण निशि। सवृत्यानुययो शेष फरणरानकदुन्दुभिम् ॥१७ यमुना चातिगम्भीरा नानावतशताकुलाम् । वसुदेवो वहन्विष्णु जानुमानवहा ययौ ॥१८ कसस्य करदानाय तवाभ्यागतास्तटे । नन्दादीन् गोपवृद्धाश्च यमुनाया ददर्श स ||१६ तस्मिन्काले यशोदापि मोहिता योगनिद्रया। तामेव कन्या मैनेय प्रसूता मोहिते जने ॥२० वसुदेवो हि विन्यस्य बालमादाय दारिकाम् । यशोदा शयनातूर्णमाजगामामितद्य ति ॥२१ ददृशे च प्रबुद्धा सा यशोदा जातमात्मजम् । नीलोत्पलदलश्याम ततोऽत्यर्थं मुद ययौ ।।२२ श्री पराशरजी ने कहा-ह मुनिसत्तम । यह कहकर भगवान् चुप हो गये और उस रात्रिकाल में ही वसुदेवजी उन्हें लेकर बाहर चल दिये ।।१५।। जिस समय वसुदेवजी जारहे थे उस समय कारागार-रक्षक और मधुरापुरी के द्वार-रक्षक योगनिद्रा के वशीभूत होकर चेतना-हीन होगये ।।१६।। भगवान् शेप उस रात्रि काल में वर्षा करते हुए मेघो के जल को रोकने के लिये अपने फरण को उन ऊपर करके पीछे-पीछे गये।।१७॥ भगवान को लेजाते हुए वसुदेवजी न विविध प्रकार की भवगै से परिपूर्ण यमुन जी को जिम समय पार किया, उम समय उनके घुटनो तक ही जल रह गया ॥१८॥ उसी समय कम के लिय कर देने के निमित्त भाये हुए नन्दादि वृद्ध गोपी को भी उहोंने यमुनाजी के विनारे १४६ ] [ श्रीविष्णु पुगण पर देवा ॥१६॥ हे मैत्रेय जी! उस पाल योगनिद्रा के प्रभाव से सभी मनुष्य मोहित होगये थे, जिससे मोहित हुई यशोदा ने भी पन्या उत्पन्न की ॥२०॥ तव अत्यन्त तेजस्वी वसुदेवजी ने अपने बालक को वहां शयन कराकर उस कन्या को उठाया और शयनागार से बाहर निकल पाये ।।२१।। जब यशोदा की नीद खुली तब उसने एक श्याम वर्ण वाले पुत्र को उत्पन्न हुआ देसा, जिससे उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई ॥२२॥ प्रादाय वसुदेवोऽपि दारिका निजमन्दिरे देवकोशयने न्यस्य यथापूर्वमतिष्ठत ॥२३ ततो वालध्वनि थ थु त्वा रक्षिणोस्सहसोस्थिताः। कंसायावेदयामासुर्देवकीप्रसवं द्विज ॥२४ कसस्तूर्णमुपेत्यनां ततो जग्राह वालिकाम् । मुञ्च मुञ्चेति देवक्या सन्नकण्ठया निवारितः ॥२५ चिक्षेप च शिलापृष्ठे सा क्षिप्ता वियति स्थिता । अवाप रूपं सुमहत्सायुधाष्टमहाभुजम् ॥२६ प्रजहास तथैवोच्चः कस च रुपिताप्रवीत् । कि मया क्षितया कंस जातो यस्त्वां वधिष्यति ॥२७ सर्वस्वभूतो देवानामासीन्मृत्यु पुरा च ते। तदेतत्मम्प्रधाशु क्रियता हितमात्मनः ॥२८ इत्युक्त्वा प्रययौ देवी दिव्यस्रग्गन्धभूपणा । पश्यतो भोजराजस्य स्तुता सिद्ध विहायसा ॥२६ इधर कन्या को लेकर आये हुए वसुदेवजी ने उसे देवकी के शयनागार मे शयन करा दिया और फिर पहिले के समान ही स्थित होगये ॥२३॥ फिर वालक रुदन सुनकर कारागार रक्षक सचेत होगये और उन्होने तुरन्स ही देवकी के सन्तान उत्पन्न होते की कस को सूचना दी ॥२४॥ यह सुनते ही कंस ने शीघ्रता पूर्वक वहां जाकर उस कन्या को पकड लिया और देवकी के रोक्ने पर भी उसे शिला पर पछाड दिया। उसके ऐसा करते ही वह कन्या आकाश में जाकर शास्त्र युक्त अष्ट भुज रूप से स्थित होगई ॥२५-२६॥ फिर उमने पञ्चम अंश अ०४ ] [ १४७ भीपण अट्टहास करते हुए क्रोध पूर्वक कम से कहा-अरे वस | मुझे पछाडने से तेरा क्या-क्या बना ? तुझे मारने वाला तो उत्पन्न हो चुका है ॥२७।। तेरे पूर्व जन्म में भी वही देवताओ के सर्वस्व भगवान् विष्णु तेरे लिये मृत्यु रूप थे, यह बात जानकर अब तू अपनी रक्षा का उपाय कर ॥२८।। वह दिव्यमाला और मलयादि से विभूपिता तथा सिद्धो द्वारा स्तुत देवी यह कहकर, कस के देखते-देखते ही आकाश मार्ग में अन्तर्धान होगई ॥२६॥ चौथा अध्याय कसस्तदोद्विग्नमना प्राह सर्वान्महासुरान् । प्रलम्बके शिप्रमुखानाहूयासुरपुङ्गवान् ॥१ हे प्रलम्ब महाबाहो केशिन् धेनुक पूतने । अरिष्टाद्यास्तथैवान्ये श्रू यता वचन मम ॥२ मा हन्तुममरैर्यत्ल कृत किल दुरात्मभि । मद्वीर्यतापितान्वीरो न त्वेता गणयाम्यहम् ॥३ किमिन्द्रोणाल्पवीर्येण किं हरेणकचारिणा । हरिणा वापि कि साध्य छिद्रे प्वसुरघातिना ||४ किमादित्य किं वसुभिरल्पवीय विमग्निभि । किं वान्यरमरै समद्वाहुवलनिर्जितैः ।।५ किं न दृष्टोऽमरपतिमया सयुगमेत्य स । पृष्ठेनैव वहन्बारणानपागच्छन्न वक्षसा ।।६ मद्राष्ट्र वारिता वृष्टियंदा शक्रेण किं तदा। मबाणभिन्न जलदै पो मुक्ता यथेप्सिताः ॥७ विमुामवनीपाला मबाहुवलभीरव । न सर्वे मन्नति याता जरासन्धमृते गुरुम् ।। अमरेपु ममावज्ञा जायते दैत्यपुङ्गवा हास्य मे जायते वीरास्तेपु यत्नपरेप्वपि 1 - १४८ [ श्रीविष्णु पुगण श्री पराशरजी ने कहा-फिर खिन्न चित्त हुए कंस ने प्रलम्ब और केशी आदि अपने सभी प्रमुख असुरो को बुला कर उनसे कहा--॥१॥ हे प्रलम्ब ' हे केशिन् । हे धेनुक । हे पूतने । हे अरिष्ट | तथा अन्यान्य वोरो । मेरी बात सुनो ।।२।। यह चर्चा फैल रही है कि दुष्ट देवताओ ने मेरा सहार करने की कोई योजना बनाई है । परन्तु मैं वीर पुरुप है, इसलिये इन्हे कुछ भी नहीं समझता ॥३॥ अल्प वीर्य इन्द्र, एकाकी विचरण करने वाले रुद्र या छिद्र खोजकर असुरो को मारने वाले विष्णु उनके किस प्रयोजन को सिद्ध कर सकते है । ॥४॥ मेरे भुजबल से पीडित हुए आदित्यो, अल्प वीर्य वसुओ, अग्नियो और सब देवनानी के सम्मिलित प्रयत्न से भी मेरा क्या बिगड सकता है ? 11. क्या तुम सबने यह नहीं देखा कि मुझ से युद्ध करता हुआ इन्द्र रण- भूमि मे पीठ दिखाकर और बारणों के आघात सह कर भाग गया था ।।६।। इन्द्र ने जब मेरे राज्य मे वर्षा करना रोक दिया था, तब क्या मेरे बाणो से बिधे हुए बादलो ने वृष्टि नहीं की थी ? ॥७॥ मेरे बडे जरासन्ध के अतिरिक्त क्या अन्य सभी भूपाल गण मेरे भुजबल से डर कर मेरे सामने मस्तक नहीं झुकाते ? 11८।। हे दैत्य पुगवो । देवताओ के प्रति मेरे हृदय में तिरस्कार भर रहा है और उन्हे मेरी हिंसा का उपाय करते हुए देखकर तो मुझे हँसी पा रही है ।। तयापि खलु दुष्टाना तेषामप्यधिक मया। अपकाराय दैत्येन्द्रा यतनीय दुरात्मनाम् ॥१० तद्य यशस्विन केचित्पृथिव्या ये च याजका । कार्यो देवापकाराय तेपा सर्वात्मना वध ॥११ उत्पन्नश्चापि मे मृत्युभूतपूर्वम्स व किल । इत्येतद्दारिका प्राह देवकीगर्भसम्भवा ॥१२ तस्माद्वालेषु च परो यत्नः कार्यों महीतले । ययोद्रिक्त बल वाले स हन्तव्य प्रयत्लत ॥१३ इत्याजाप्यासुरान्कम प्रविश्या गृह मत । मुमोच वसुदेव च देवरी व निरोधत ॥१४

पञ्चम अंश अ०५ ]
[ १४३
युवयोर्घातिता गर्भा वृयवते मयाधुना ।
कोऽप्यन्य एव नाशाय बालो मम समुद्गतः ॥१५
तदलं परितापेन नूनं तद्भाविनो हि ते ।
अर्भका युवयोर्दोपाच्चायुपो यद्वियोजिता: ॥१६
इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च कसस्तो परिशद्धितः।
अन्तर्गृहं द्विजश्रेष्ठ प्रविवेश ततः स्वकम् ॥१७
फिर भी हे दत्य थेष्ठी | उन दुष्ट दुरात्मा देवगण का अडिट कन्टे के
लिये अब मुझे अधिक प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥१०॥ इसनि विदरजी
भी यशस्वी पुस्प यज्ञ करने वाले हो, उन्हे देवताग्रो के प्रति लिटर
डालना चाहिये ॥११॥ देवको के गर्भ से जो कन्या उत्पन्न हो या
भी कहा था कि मेरी पूर्व जन्म की मृत्यु उत्पन्न हो चुकी है ॥
पृथिवी पर उत्पन्न हुए बालको पर विशेष दृष्टि रखने
जाविध उपवाद
वालक प्रतीत हो, उसका वध कर देना चाहिये ।।१३। कम से भी हम
प्रकार की प्राज्ञा दी और कारागार में जाकर वसुदेव-देवी श्री - कर.
दिया ॥१४॥ उस समय कस ने कहा-प्रापर्व बातमी को प्रम व्ययं
हो मारा, क्योकि मेरा मारने वाला तो कोई अन्न दायक मापन गुणा है
॥१५॥ परन्तु, उन वालवो का ऐसा हो भविष्य था, या मारकर प्रादुखी
न हो। आपया प्रारम्ध दोप भी उन यालगी थी मृग का पागा हमा है
॥१६॥ श्री पराशर जी ने कहाहे द्विजवर ! वगने दी का प्रचार
धर्म बंधाया मोर कारागार से छोड़ कर स्वयं या अपने अन्वह
में पहुंचा ॥१७॥

१४८ ] [ श्रीविष्णु पुगण श्री पराशरणी ने कहा-फिर खिन्न चित्त हुए कंस ने प्रलम्ब और केशी आदि अपने सभी प्रमुख असुरो को बुला कर उनसे कहा-॥१॥ हे प्रलम्ब ' हे केशिन् ! हे धेनुक ! हे पूतने ! हे अरिष्ट ! तथा अन्यान्य वीरो! मेरी बात सुनो ॥२॥ यह चर्चा फैल रही है कि दुष्ट देवताओ ने मेरा महार करने को कोई योजना बनाई है । परन्तु मैं वीर पुरुप हू, इसलिये इन्हे कुछ भी नहीं समझता ॥३॥ अल्प वीर्य इन्द्र, एकाकी विचरण करने वाले रुद्र या छिद्र खोजकर असुगे को मारने वाले विष्णु उनके किस प्रयोजन को सिद्ध कर सकते है ? ॥४॥ मेरे भुजबल से पीड़ित हुए प्रादित्यो, अल्प वीर्य वसुओ, अग्नियो और सब देवताओं के सम्मिलित प्रयत्न से भी मेरा क्या बिगड सक्ता है ? ॥५।। क्या तुम सबने यह नही देखा कि मुझ से युद्ध करता हुमा इन्द्र रण- भूमि मे पीठ दिखाकर और बाणों के प्राधात सह कर भाग गया था॥६॥ इन्द्र ने जब मेरे राज्य मे वर्षा करना रोक दिया था, तब क्या मेरे वाणो से बिधे हुए बादलो ने दृष्टि नहीं की थी। ॥७॥ मेरे बडे जरासन्ध के अतिरिक्त क्या अन्य सभी भूपाल गण मेरे भुजबल से डर कर मेरे सामने मस्तक नहीं झुकाते ? १८॥ हे दैत्य पुङ्गवो । देवताओ के प्रति मेरे हृदय मे तिरस्कार भर रहा है और उन्हे मेरी हिंसा का उपाय करते हुए देखकर तो मुझे हमी आ रही है ॥६॥ तथापि खलु दुष्टानां तेषामप्यधिक मया। अपकाराय दैत्येन्द्रा यतनोयं दुरात्मनाम् ॥१० तद्य यशस्विनः केचित्पृथिव्यां ये च याजकाः । कार्यो देवापकाराय तेषां सर्वात्मना वध. ।।११ उत्पन्नश्चापि मे मृत्युभूतपूर्वम्स वै किल । इत्येतद्दारिका प्राह देवकीगर्भसम्भवा ॥१२ तस्माद्बालेषु च परो यत्नः कार्यो महीतले । यत्रोद्रिक्त बलं वाले स हन्तव्यः प्रयत्नत. ।।१३ इत्याज्ञाप्यासुरान्कंसः प्रविश्याशु गृहं ततः। मुमोच वसुदेवं च देवकी च निरोधतः ॥१४ पञ्चम अंश अ० ५ ] [ १४६ युवयोर्घातिता गर्भा वृथैवते मयाधुना। कोऽप्यन्य एव नाशाय बालो मम समुद्गतः ॥१५ तदलं परितापेन नूनं तद्भाविनो हि ते । अर्भका युवयोर्दोपाच्चायुपो यद्वियोजितः ॥१६ इत्याश्वास्य विमुक्त्वा च कसस्तो परिशङ्कितः। अन्ताह द्विजश्रेष्ठ प्रविवेश ततः स्वकम् ॥१७ फिर भी हे दैत्य श्रेष्ठो | उन दुष्ट दुरात्मा देवगण का अहित करने के लिये अब मुझे अधिक प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥१०॥ इसलिये पृथिवी पर जो भी यशस्वी पुरुष यज्ञ करने वाले हो, उन्हे देवताप्रो के हित के निमित्त मार डालना चाहिये ॥११।। देवकी के गर्भ से जो कन्या उत्पन्न हुई थी उसने यह भी कहा था कि मेरी पूर्व जन्म की मृत्यु उत्पन्न हो चुकी है ।।१२।। इसलिये पृथिवी पर उत्पन्न हुए बालको पर विशेष दृष्टि रखते हुए, जो अधिक बलवान् बालक प्रतीत हो, उसका वध कर देना चाहिये ॥१३॥ कम ने असुरो को इस प्रकार की आज्ञा दी और कारागार मे जाकर वसुदेव-देवकी को बन्धन-मुक्त कर दिया ॥१४॥ उस समय कस ने कहा-अापके बालको को अब तक मैने व्यर्थ ही मारा, क्योकि मेरा मारने वाला तो कोई अन्य बालक उत्पन्न हो चुका है ॥१५।। परन्तु, उन बालको का ऐसा ही भविष्य था, यह मानकर आप दुःखी न हो। आपका प्रारब्ध दोष भी उन वालको की मृत्यु का कारण हुआ है ॥१६॥ श्री पराशर जी ने कहा-हे द्विजवर ! कस ने उन दोनो को इस प्रकार धर्य बंधाया और कारागार से छोड कर स्वय शकाकुल होते हुए अपने अन्तगृह में पहुंचा ॥१७॥ पाँचवाँ अध्याय विमुक्तो वसुदेवोऽपि नन्दस्य शकट गतः । प्रहृष्ट दृष्टवानन्द पुत्रो जातो ममेति वै ॥१

१५० ]
[ श्रीविष्णुपुराण
वसुदेवोऽपि त प्राह दिष्ट्या दिष्टयति सादरम् ।
वाद्ध केऽपि समुत्पन्नस्तन योऽय तवाधुना १२
दत्तो हि वार्षिकस्सर्वो भवद्भिर्नृपते कर ।
यदर्थमागतास्तस्मान्नात्र स्थेय महाधन ॥३
यदर्थमागता कार्य तन्निष्पन्न किमास्यते।
भवद्भिर्गम्यता नन्द तच्छीघ्र निजगोकुलम् ॥४
ममापि वालकस्तत्र रोहिणीप्रभवो हि य. ।
स रक्षणीयो भवता यथाय तनयो निज ॥५
इत्युक्ताः प्रययुर्गोपा नन्दगोपपुरोगमा ।
शकटारोपितैर्भाण्ड कर दत्त्वा महाबला ॥६
वसता गोकुले तेषा पूतना बालघातिनी।
सुप्त कृष्णमुपादाय रात्रौ तस्मै स्तन ददौ ।।७
श्री पराशरजी ने कहा-कारागार से मुक्त होते ही वसुदेवजी ने नन्दजी
के पास जाकर उन्हें पुत्र-जन्म वाले समाचार से प्रसन्न होते हुए देखा ॥१॥
इम पर वसुदेवजी ने उमसे यहा कि आपके वृद्धावस्था मे पुत्र उत्पन्न हुआ, यह
अत्यन्त प्रसन्नता की बात हुई ॥२॥ आप लोग राजा का वार्षिक कर देने के
लिय यहाँ पाये थे, वह दे चुके हैं, इसलिये आप जैसे धनिक को अब यहाँ
अधिक ठहरना उचित नहीं है ॥३॥ जिस लिये पाप यहां आये थे, जब वह
कार्य हो ही चुका तो सब यहाँ क्सिलिए रुके हुए है ? है नन्दजी | अब आप
अपने गाकुल को शीघ्र ही गमन कीजिये ॥४।। वहा पाप रोहिणी से उत्पन्न
हुए मेरे पुत्र को भी अपने इस बालक के समान ही रक्षा करते रहना ॥५॥
पाडो मे भर कर लाये गये वर्तनो मे से कर वा धन चुका वर निदिचत हुए
मन्दादि महाबली गोप बसुदेवजी की बात सुनकर वहाँ से चले गय ॥६॥ उनके
गायुल मे निवास करते हुए भी बालको का घात करने वाली पूनना ने रात्रि के
समय सोते हुए कृष्ण को गोद में उठाया और उन्हें अपना स्तन पान कराने
लसी ॥५॥

पञ्चम प्रश प्र. ५ [
[ १५१
यस्मै यस्मै स्तनं रात्रौ पूतना सम्प्रयच्छति ।
तस्य तस्य क्षणेनाङ्ग बालकस्योपहन्यते ॥८
कृष्णस्तु तत्रतनं गाढं कराभ्यामतिपीडितम् ।
गृहीत्वा प्रारणसहितं पपौ क्रोधसमन्वितः 118
सातिमुक्तमहारावा विच्छिन्नस्नायुवन्धना।
पपात पूतना भूमी म्रियमाणाति भीषणा ॥१०
तन्नादच तिसन्त्रस्ता: प्रवुद्धास्ते ब्रजौकसः ।
दहशुः पूतनोत्सङ्ग कृष्ण तां च निपातिताम् ११
आदाय कृष्णं सन्यस्ता यशोदापि द्विजोत्तम ।
गोपुच्छभ्रामरणेनाथ वालदोपमपाकरोत् ।।१२
गोपुरीथमुपादाय नन्दगोपोऽपि मस्तके ।
कृष्णस्य प्रददौ रक्षा कुवंश्चैतदुदीरयन् ।।१३
वह पूनना रात्रि काल मे जिस बालक के मुन्य मे अपना स्तन देती थी,
वह बालक उसी समय मर जाता था । भगवान् श्रीकृष्ण ने उसके स्तन को
क्रोध पूर्वक अपने हाथो से दबाया और उसके प्राण सहित ही स्तन-पान मे
ततार हुए ॥६॥ इससे पूतना के सभी स्नायु-बन्यन शिथिल होगये और अत्यंत
भयङ्कर रूप वाली होकर घोर शब्द करती हुई धराशायिनी हुई ॥१०॥ उसके
घोर चीत्वार को सुनकर भय के कारण व्याकुल हुए अजवासी उठ पडे और
उन्होंने देखा कि मरी हुई पूतना की गोद मे श्रीकृष्ण स्थित है ॥११।। हे द्विज
श्रेष्ठ ! भय से त्रस्त हुई यशोदा ने तुरन्त ही कृष्ण को गोद में उठाया और उन
पर गो को पूछ से झाड़ा देकर ग्रह-दोष को शान्त किया ॥१२॥ नन्द ने भी
विधि पूर्वक रक्षा-रतोन पढते हुए, बालक के मस्तक पर गोवर लगाया ।।१३।।
रक्षतु त्वामशेपाणा भूतानां प्रभवो हरिः ।
यस्य नाभिसमुद्भ तपङ्कजादभवञ्जगत् ॥१४
येन दष्ट्राग्रविधृता धारयत्यवनिर्जगत् ।
वराहरूपन्देवस्स त्वां रक्षतु केशव. ॥१५

१५२ ] [ श्रीविष्णु पुराण नस्वाड कुरविनिभिन्लवैरिवक्षस्थलो विभु । नृसिंहरूपी सर्वत्र रक्षतु त्वा जनार्दन ॥१६ वामनो रक्षतु सदा भवन्त य क्षरणादभूत् । त्रिविक्रम क्रमाक्रान्तलोक्य स्फुरदायुध ॥१७ शिरस्ते पातु गोविन्द कण्ठ रक्षतु केशवः । गुह्य च च जठर विष्णुजव पादौ जनार्दन मुख बाहू प्रबाहू च मन सर्वेन्द्रियाणि च । रक्षत्वव्याहतैश्वर्यस्तव नारायणोऽव्यय ॥१६ शाङ्गचक्रगदापाणेश्शङ्खनादहता- क्षयम् । गच्छन्तु प्रेतकूष्माण्डराक्षसा ये तवाहिता ॥२० त्वा पातु दिक्षु वैकुण्ठो विदिक्षु मधुसूदन । हृषीकेशोऽम्बरे भूमौ रक्षतु त्वा महीधर ॥२१ एव कृतस्वस्त्ययनों नन्दगोपेन बालक । शायितश्शकटस्याधो वालपर्याविकातले ।।२२ ते च गोपा महद दृष्ट्वा पूतनाया कलेवरम् । मृताया परम त्रास विस्मय च तदा ययु ॥२३ नन्द जी ने कहा-जिनके नाभि-कमल मे यह सम्पूर्ण ससार प्रकट हुप्रा है वे सभी भूतो के कर्ता भगवान् हरि तेरी रक्षा करे ॥१४॥ जिनकी दाढो के अगले भाग पर स्थित हुई पृथ्वी सम्पूर्ण विश्व को धारण करती है, वे वराह रूपी श्री केशव भगवान् तेरी रक्षा करे ।।१२।। जिन्होंने अपने नखान से ही शत्रु का वक्ष स्थल चीर दिया था वे नृसिंह रूप धारी भगवान् जनार्दन तेरी सब ओर से रक्षा करे ॥१६॥ जिन्होने क्षणमात्र मे शस्त्रास्त्र युक्त त्रिविक्रम रूप धारण कर अपने तीन पर्गों में ही तीनो लोको को नाप लिया था, वे श्री व मन भगवान् तेरी सदा रक्षा करे ॥१७॥ तरे शिर को रक्षा गोविन्द करें, कण्ठ की रक्षा घेराव करे, गुह्य और जठर की विष्णु तथा जापो और पांवो की रक्षा जनादन करे ॥१८॥ तरे मुख, बाह, प्रबाहु, मन तथा सब इन्द्रियों को रक्षा प्रखएड ऐश्वयंशाली एव पव्यय भगवान् श्री नारायण करे ॥१६॥ तेरे अनिष्ट पञ्चम अश अ०६] [ १५३ कर्ता प्रेत, बूष्माण्ड, राक्षसादि जो हदें वे सब शाङ्ग चक्रपाणि भगवान् विष्णु के शखनाद से नाश को प्राप्त हो । २० । दिशाओ म भगवान् वैकुण्ठ रक्षा करें, विदिशामो मे मधुसूदन, आकाश मे हृषीकेश और पृथिवी में महीधर श्री शेप भगवान् तेरी रक्षा करें ॥२१॥ श्री पराशरजी ने कहा-नन्दजी ने इस प्रकार बालक का स्वस्तिवाचन किया और फिर उसे एक छकडे के नीचे स्थित खटोले पर शयन करा दिया ।।२२।। मरण को प्राप्त हुई उस पूतना के विशाल शरीर को देख कर उन सब गोपो को अत्यन्त भय और पाश्चर्य हुमा ॥२३॥ अध्याय कदाचिच्छकटस्याधरशयानो मधुसूदनः । चिक्षेप चरणावूध्वं स्तन्यार्थी प्ररुरोद ह ।।१ तस्य पादप्रहारेण शकट परिवर्तितम् । विध्वस्तकुम्भभाण्ड तद्विपरीत पपात वै ॥२ ततो हाहाकृत सर्वो गोपगोपीजनो द्विज । अाजगामाथ ददृशे बालमुत्तानशा यिनम् ॥३ गोपा केनेति केनेद शक्ट परिवर्तितम् । तव वाला प्रोचुलिनानेन पातितम् ॥४ रुदता दृष्टमस्माभि पादविक्षेपपातितम् । शकट परिवृत्त व नंतदन्यस्य चेष्टितम् ॥५ ततः पुनरतीवासन्गोपा विस्मयचेतस । नन्दगोपोऽपि जग्राह बालमत्यन्तविस्मित Ine यशोदा शक्टारुढभग्नभाण्डपालिया। शपट चार्चयामास दधिपुष्पफ्लाभते ७ १५४ ] [ श्रीविष्णु पुराण श्री पराशरजी ने कहा-एक समय छकडे के नीचे शयन करते हुए बालक मधुसूदन ने स्तन-पान की इच्छा से रोते रोते ऊपर की ओर पैर मारा ॥१॥ उनके पैर के लगते ही छकडा उलटा होगया और उसमे रखे हुए घडे आदि फूट गए तथा वह एक ओर को अोधा गिर पडा ॥२॥ हे द्विज । उससे सब ओर हाहाकार मच उठा, सभी गोप-गोपियो ने वहा पाकर बालक को सीधा शयन करते हुए देखा ॥३॥ तब गोपो ने पूछा कि इस छकडे को क्सिने प्रोंधा कर दिया। इस पर वहा पहले से ही खेलते हुये बालको ने उत्तर दिया कि इसी बालक ने लात मार कर गिराया है ॥४॥ हमने स्वय देखा है कि इस ने रोते-रोते ही छकडे मे लात मार दी, जिससे यह पौधा होकर गिर गया, ओर किसी ने भी यह कार्य नहीं किया है ॥५॥ यह सुन कर गोपो को बडा पाश्चर्य हुआ और नन्द ने विस्मय पूर्वक श्रीकृष्ण को उठा लिया ॥६॥ फिर यशोदा ने उस छकडे वा तथा छकडे मे रखे हुए फूटे बर्तनो का दही, पुष्प फल और अक्षत से पूजन किया ।१७॥ गर्गश्च गोकुले तन वसुदेवप्रचोदित । प्रच्छन्न एव गोपाना सस्कारानकरोत् तयो ॥८ ज्येषु च राममित्याह कृष्ण चैव तथावरम् । गर्गो मतिमता श्रेष्ठो नाम कुर्वन्महामति । स्वल्पेनैव तु कालेन रिङ्गिणी तो तदा बजे। धृष्ठजानुकरौ विप्र बभूवतुरुभावपि ।।१० करोपमस्मदिग्धाङ्गो भ्रममाणावितस्तत । न निवारयितु शेके यशोदा तो न रोहिणी ॥११ गोवाटमध्ये क्रीडन्तौ वत्सवाट गतौ पुन । तदहर्जातगोवत्सपुच्छाकर्षणतत्परौ ।।१२ तभी वासुदेवजी द्वारा प्रार्थना करने पर गर्गाचायजी ने गोकुल मे घा पर उन दोनो बालकों का नामकरण सस्कार किया ।।८। उन दोनो का नाम परण करते हुए गचिायी नै बहे बालक का नाम राम और छोटे बालक का वृष्ण रमा ! कुछ दिनों मे ही वे दोनो बालक गोमो के गोप्ठ मे पचम अश अ०६] । १५५ घिसटते हुए घुटनो से चलने लगे ॥१०॥ जब वे गोबर और धूल मे लथपथ होकर इधर-उधर घूमते थे, तब उन्हे यशोदा और रोहिणी भी नही रोक पाती ॥११॥ वे कभी गौग्रो के गोष्ठ मे और कभी बछडो के बीच मे चले जाते तथा नवजात बछडो को पूछ पकड कर खीचने लगते ॥१२॥ यदा यशोदा तौ वालवेकम्थानचरावुभौ । शशाक नो वारयितु क्रीडन्तावतिचञ्चलो ।।१३ दाम्ना मध्ये ततो बद्ध्वा बबन्ध तमुलूखले। कृष्णमक्लिष्टकर्माणमाह चेदममर्पिता ॥१४ यदि शक्नोपि गच्छ त्वमतिचञ्चलचेष्टित । इत्युक्त्वाथ निज कम सा चकार कुटुम्बिनी ॥१५ व्यग्रायामथ तस्या स कर्षमारण उलूखलम् । यमलार्जुनमध्येन जगाम कमलेक्षण ॥१६ कर्पता वृक्षयोमध्ये तिर्यग्यतमुलूखलम् । भग्नावुत्तुङ्गशासाग्रो तेन तो यमलार्जुनी ॥१७ तत पटकटाशब्दसमानतत्पर । अाजगाम व्रजजनो ददर्श च महाद्र मी ।।१८ नवोद्गताल्पदन्ताशुसितहास च वालकम् । तयोर्मध्यगत दाम्ना बद्ध गाढ तथोदरे ॥१९ ततश्च दामोदरता स ययौ दामवन्धनात् ॥२० एक दिन की बात है-जव यशोदाजी उन एक साथ क्रीडा करने वाले बालको को रोकने में असमर्थ रही तो उन्होने निष्पाप कर्म वाले कृष्ण के कटि भाग को रस्सी से जकड कर उलूखल से बांध दिया और क्रोध सहित बोली ॥१३-१४॥ अरे चञ्चल । अब तू इससे टूट सके तो छूट जा, यह कह कर यशोदाजी अपने अन्य कार्य में व्यस्त हो गई ॥१५।। जब वह गृह कार्य मे लग गई, तब पद्मलोचन श्रीकृष्ण उस उलूसल को खीचते हुए यमलार्जून वृक्षो के मध्य मे ले गये ॥१६॥ तथा उन दोनो वृक्षो के मध्य से तिरछे पसे हुए उतू- सल को सोचते हुए उन्होने उच्च शासामो वाले यमलार्जुन वृक्ष को चखाड़ [ श्रीविष्णु पुराण कर गिरा दिया ||१९| तब उनके उखड कर गिरने के शब्द को सुनकर माय हुए ब्रजवासियो ने गिरे हुए उन दोनो विशाल वृक्षो को और उनके मध्य में कटि मे रस्सी से बंधे हुये बालक कृष्ण को अपने छोटे-छोटे दांतो से मृदु हास करते हुए देखा। दाम के उदर मे वैपने के कारण तभी से उस बालक का नाम दामोदर होगया ॥१८ १६.२०॥ गोपवृद्धास्तत सर्वे नन्दगोपपुरोगमा । म यामासुरुद्विग्ना महोत्सातातिभोरव ॥२१ स्थानेनेहनन कार्य व्रजामोऽन्यन्महावनम् । उत्पाता बहवो ह्यत्र दृश्यन्ते नाशहेतवः ॥२२ पूतनाया विनाशश्व शकटस्य विपर्यय । विना वातादिदोपेण द्रमयोः पतन तथा ॥२३ वृन्दावनमित स्थानात्तस्माद्गच्छाम मा चिरम् । यावद्भौममहोत्पातदोषो नाभिभवेद्रजम् ॥२४ इति कृत्वा मतिं सर्वे गमने ते व्रजौकस । मनुस्स्वस्व कुल शीघ्र गम्मता मा विलम्वय ।।२५ तत क्षणेन प्रययु शकटैगोधनस्तथा । यूथशो वत्सपालाश्च कालयन्तो व्रजौकस ॥२६ द्रव्यावयवनि त क्षणमात्रेण तत्तथा । काफमाससमाकीणं अजस्थानमभूद्विज ॥२७ तब नन्दादि सब वृद्ध गरेपो ने उन महान् उत्पातो से डर कर परस्पर में परामर्श दिया ।।२१।। अव इस स्थान से हमें कोई कार्य नहीं है, हम किसी अन्य महावन मे चलें । क्यों कि यहाँ विनाश की कारण रूपा पूतना फा पाना, शरट का प्राधा होना, प्राधी मादि के न होने पर भी वृक्षादि का गिर जाना पादि अनेको उत्पात देखे गये हैं ।।२२-२३॥ इस लिये किसी भूमि सम्बन्धी महा उत्पात से इस ग्रन वे नए हाने से पहिले ही हम यहाँ से वृन्दावन के लिपे प्रस्थान पर दें ॥२४॥ इस प्रकार चलने का विचार स्थिर कर वे सभी प्रज- पासी अपने २ कुटुम्पियो को शीघ्र ही चलने चौर विलम्ब न करने यी बात पञ्चम अंश अ०६ ] { १५७ कहने लगे ॥२५५फिर वे व्रजवासीगण समूहबद्ध होकर क्षणभर मे ही गोरो और छक्डो को साथ लेकर वहाँ से चल पडे ॥२६॥ हे द्विज | उनके जाने पर वहाँ अवशिष्ट पड़ी हुई वस्तुप्रो वाली वह व्रज भूमि क्षणभर मे ही कौए और और मासादि पक्षियो से युक्त होगई ॥२७॥ वृन्दावनं भगवता कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा। शुभेन मनसा ध्यातं गवा सिद्धिमगीप्सता ॥२८ ततस्तत्रातिरूक्षेऽपि धर्मकाले द्विजोत्तम । प्रावृट्काल इवोद्भूत नवशप्प समन्ततः ।।२६ स समायासित्तः सर्वो जो वृन्दावने तत । शकटीवाटपर्यन्तश्चन्द्रार्धाकारस स्थिति ।।३० वत्सपाली च सवृत्तौ रामदामोदरौ ततः । एक्स्थानस्थिती गोष्ठे चेरतुर्वाललीलया ॥३१ बहिपत्रकृतापीडो वन्यपुप्पावतसको । गोपवेगुकृतातोद्यपत्रवाद्यकृतस्वनौ ॥३२ काकपक्षधरी बालौ कुमाराविव पावको । हसन्तौ च रमन्तौ च चेरतु स्म महावतम् ।।३३ क्वचिद्वहन्तावन्योन्य क्रीडमानौ तथा परं । गोपपुस्सम वत्साश्चारयन्तो विचेरतुः ।।३४ कालेन गच्छता तो तु सतवर्षी महावजे । सर्वस्य जगत: पालौ वत्सपालो बभूवनः ।।३५ फिर भगवान् श्रीकृष्ण ने गोप्रो को प्रसन्नता के लिये अपने शुद्ध चित्त से वृन्दावन का ध्यान किया ॥२८॥ हे द्विजोत्तग। उनके ऐसा करने से मत्यन्त हसे गोप्म वाल मे वर्षाकाल के समान ही नवीन घास वहा उत्पन्न होने लगी रह। तब चारो ओर से अद्धं चन्द्रावार मे छक्डो की पक्ति लगाकर बसाया गया वह समस्त ब्रजवासियो से सुशोभित हो गया ॥३०॥ इसके पश्चात् राम और चुप्पण भी बछडो के पालनवर्ता हो कर एक स्थान में स्थित हुए गोगो के गोष्ठ मे बाल क्रीड़ा करने लगे ।।३१॥ गिर पर मोर पंय का मुकुट और [ श्रीविष्णु पुराण कानो मे वन के पुष्पों के कुंडल धारण कर ग्वालोचित वशी आदि की ध्वनि फरते और पत्तो के बाजे बजाते हुए, स्कंध के कुमारो के समान हास-परिहास करते हुए वे दोनो बालक उस महावन मे क्रीडा करने लगे ।।३२-३३॥ वे दोनो कभी तो परस्पर ही एक दूसरे पर चढ जाते और भी अन्य गोप-बालको के साथ खेलते और कभी बछडो को चराते हुए विचरण करते रहते थे ॥३४॥ इस प्रकार उस महावज में निवास करते हुए उन्हें कुछ काल व्यतीत हो गया मोर वे सम्पूर्ण लोको के पालक वत्मपाल रूप में सात वर्ष की आयु के हो गये ॥३॥ प्रावृटकालस्ततोऽतीवमेघौधस्थगिताम्बरः । बभूव वारिपाराभिरक्य कुर्वन्दिशामिव ॥३६ प्ररूढनवशपाढया शक्रगोपाचितामही । तथा मारकतीवासीत्पद्मरागविभूषिता ॥३७ महुरुन्मार्गवाहीनि निम्नगाम्भासि सर्वतः । मनांसि दुविनीताना प्राप्य लक्ष्मी नवामिव ।।३।। नरेजेऽन्तरितश्चन्द्रो निर्मलो मलिनैर्वनैः । सद्वादिवादो मूर्खाणा प्रगल्भाभिरिवोक्तिमि ॥३६ निगुणेनापि चापेन शक्रस्य गगने पदम् । अवाप्यताविवेकस्य नृपस्येव परिग्रहे ॥४० मेघपृष्ठ कलाकाना रराज विमला तति.। दुत्ते वृत्तचेष्टेव कुलीनस्यातिशोभना ॥४१ न बचाधाम्बरे स्थर्य विद्य दत्यातचञ्चला। मंत्रीव प्रवरे पुसि दुर्जनेन प्रयोजिता ॥४२ मार्गा बभूवुरस्पष्टास्तृणशप्पच्यावृता। अर्थान्तरमनुप्राप्ताः प्रजडानामिवोक्तयः ॥४३ फिर मेघों से प्राकाश को ढक्ता हमा और अत्यन्त जलधारो की वर्षा से दिशामो को एक समान करता हुमा वर्षावाल प्रा उपस्थित हुमा ॥३६॥ उस दूब के अधिक बढ़ने मोर वीरवटियो से व्यास होने के कारण यज वसु.

पञ्चम अश अ०६ [ १५६ न्धरा पद्मराग से सुसज्जित तथा मरकतमयी-सी प्रतीत होने लगी ॥३७॥ जैसे नवीन ऐश्वर्य को प्राप्त हुए दुष्ट पुरुष उच्छवल हो जाते हैं, वैसे ही नदियों का जन वृद्धि को प्राप्त होकर सर्वत्र प्रवाहित होने लगा ॥३८॥ जैसे भूखों के भ्रष्ट वचनो के सामने श्रेष्ठ वक्ता की वाणी भी फीकी हो जाती है. वैसे ही मलीन मेधो से स्वच्छ चन्द्रमा की कान्ति भी फीकी पड़ गई ॥३६॥ जैसे अवि- वेकी राजा की सगति को प्राप्त कर गुणहीन मनुष्य भी प्रतिधित हो जाता है, वैसे ही आकाश मे गुणहीन इन्द्र धनुप प्रतिष्ठिन हो गया ।।४०।। जैसे दुरा- चारियो के मध्य स्थित हुअा कुलीन पुरुष शोभा पाता है, वैसे ही अस्वच्छ मेघ मण्डल मे स्थित हुए वगुलो की स्वच्छ पक्ति सुशोभित हुई ॥४१॥ जैसे श्रेष्ठ पुरुप किसी दुर्जन से हुई मित्रता स्थायी नही होती, वैसे ही प्रत्यन्त चञ्चला विद्युत् की स्थिरता स्पष्ट होने लगी ॥४२॥ जैसे महामूखों की उक्तियाँ स्पष्ट नहीं होती, वैसे ही तिनके और दूब से ढक कर मार्ग की स्पष्टता नष्ट हो गई ॥४३॥ उन्मत्तशिखिसारङ्ग तस्मिन्काले महावने । कृष्णरामौ मुदा युक्ती गोपालश्चेरतुस्सह ॥४४ क्वचिद्गोभिस्सम रम्य गेयतानरतावुभौ । चेरतु क्वचिदत्यर्थं शीतवृक्षतलाथितौ ।।४५ क्वचित्कदम्बस्रचित्रो मयूरस्रग्विराजितो। विलिप्तौ क्वचिदासाता विविधगिरिधातुभि ॥४६ पर्णशय्यासु ससुतौ क्वचिनिद्रान्तरपियो । क्वचिद्गर्जति जीमूते हाहाकाररवाकुलौ ॥४७ गायतामन्यगोपाना प्रशसापरमो क्वचित् । मयूरकेकानुगती गोपवेणुप्रवादको ४८ इति नानाविधर्भागेरुतमप्रीतिसयुतौ । बीडन्ती तो वने तस्मिश्चेरतुस्तुष्टमानसी ॥४६ विकाले च सम गोभिर्गोपवृन्दसमन्वितौ । विहृत्याथ यथायोग व्रजमेत्य महाबली ॥५० [ श्रीविधणुपुराण गोपैस्समानरसहितौ क्रीडन्तावमाविव । एवं तावृपतुस्तत्र रामकृष्णौ महाद्य ती ॥५१ ऐसे उस मोरो और चातयो से सुशोभित हुए महावन मै गोप-चालको के साथ राम और कृष्णा घूमने लगे ॥४४॥ वे कभी गोत गाते, कभी ध्वनि निकालते, कभी वृक्ष के नीचे बैठते और कभी विचरण करते थे ॥४५॥ कभी कदम्ब के फूलो के हार धारण कर अद्भुत वेश बनाते और कभी मोरपखो की माला बना कर पहिनते और कभी विभिन्न प्रकार की पर्वतीय धातुओ से अपने देह को सजाते ॥४६॥ कभी नीद लेने की इच्छा से पत्तो पर लेट कर भपकी लेते और कभी मेघो का गर्जन सुन कर कोलाहल करने लगते ॥४७।। कभी अन्य ग्वालों के गाने सुनकर उनकी प्रशसा करते, कभी गोपो के समान वंशी बजाते और कभी मोरो को सी बोली बोलते थे ॥४८॥ इस प्रकार परस्पर में प्रत्यत प्रीति रखते हुए वे विभिन्न प्रकार के खेल खेलते और वन मे घूमते थे ॥४६।। सायकाल होने पर वे अत्यत बलवान् बालक वन मे विहार करके गोप्रो और गोप-वालको के साथ व्रज मे लौट आते ॥५०॥ इस प्रकार अपनी समान प्रायु के ग्वाल-बालो के साथ खेलते हुए वे महान तेज वाले राम और कृष्ण वहाँ निवास करने लगे ॥५१॥ सातवाँ अध्याय एकदा तु विना राम कृष्णो वृन्दावनं ययौं । विचचार वृतो गोपैर्वन्यपुष्पस्रगुज्ज्वलः ॥१ स जगामाथ कालिन्दी लोलकल्लोलशालिनीम् । तीरसंलग्नफेनोघेहंसन्तीमिव सर्वतः ॥२ तस्याञ्चातिमहाभीमं विपाग्निश्रितवारिकम् । इद कालियनागस्य ददर्शातिविभीपरणम् ॥३ विपाग्निना प्रसरता दग्धतौरमहीव्हम् । वाताहताम्बुविक्षेपस्पर्शदग्धविहङ्गमम् ॥४

पञ्चम अंग अ०७ ]
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तमतीव महारौद्र मृत्युवक्नमिवापरम् ।
विलोक्य चिन्तयामास भगवान्मधुसूदन. ॥५
अस्मिन्वमति दुष्टात्मा कालियोऽसौ विपायुध ।
यो मया निजितस्त्यक्त्वा दुष्टो नष्टः पयोनिधिम् ॥६
तेनेय दूपिता सर्वा यमुना सागरङ्गमा ।
न नरंगोधनंश्चापि तृपातरुपभुज्यते ।।७
श्री पराशरजी ने कहा---एक दिन राम को छोड वर वृष्ण अकेले ही
वृन्दावन मे चले गये और वहाँ यन के पुष्पो की मालामो को धारण कर गोपी
के साथ घूमने लगे ॥१॥ इस प्रकार घूमते हुए वे चचल तरगो वाली कालिन्दी
के किनारे जा निक्ले । उस समय तटो पर एकत्रित हुए फेन से ऐसा प्रतीत
होता था जैसे यमुनाजी हम रही हो ॥२१ उसी यमुना में उन्होने विपाग्नि से
उत्तप्त कालियनाग के एक भयकर कुएड को देखा ॥३॥ उसकी विधाग्नि इतनी
तीव्र थी कि उससे तट के वृक्ष जल गये थे तथा वायु के आघ त से उछलती हुई
जल-विन्दुमो के स्पर्श से पक्षी भी गब कभी जल जाते थे ।।४।। जैसे मृत्यु का
दूसरा मुख हो, उस प्रकार का अत्यत भयकर कुण्ड देख कर भगवान् श्रीकृष्ण
विचार करने लगे ॥५॥ इसमे दुरात्मा कालियनाग निवास करता है, इसका वि
भी शस्त्र के समान है। यह दुष्ट पहिले मुझसे हार कर समुद्र से चला आया
है ॥६॥ इसने समुद्र मे जाने वाली पूरी यमुना को ही दूषित कर रखा है। इसी
के कारण यह यमुना जल पिपासु मनुष्यो और गौओ के असोवनीय है ।।७।।
तदस्य नागराजस्य कर्तव्यो निग्रहो मया ।
निस्त्रासास्तु सुख येन चरेयुर्व जवासिनः ||
एतदर्थं तु लोकेऽस्मिन्नवतार कृतो मया ।
यदेपामुत्पथस्थाना कार्याशान्तिदुरात्मनाम् ।।
तदेत नातिदूरस्थ कदम्बमुरुशाखिनम् ।
अधिरुह्य पतिप्यामिहदेऽस्मिन्ननिलाशिन ।।१०
इत्थ विचिन्य वध्वा च गाढ परिकर तत ।
निपपात हदे तन नागराजस्य वेगतः ॥११

१६२ ] [ श्रीविष्णु पुराण तेनातिपतता तत्र शोभितस्य महाह्रदः। प्रत्यर्थ दूरजातास्तु समसिञ्चन्महीरुहान् ॥१२ तेऽहिदुष्टविषज्वालातप्ताम्बुपवनोक्षिताः । जज्वलुः पादपास्सद्यो ज्वालाव्याप्तदिगन्तराः ॥१३ इस लिये इम नागराज का निग्रह करना मेरा वर्तव्य है। ऐसा होने पर ही जवामीगण भय-रहित और सुख से निवास कर सकेंगे ll ऐसे दुरात्मानो का दमन करना आवश्यक है और इसीलिए मैं इम लोक में अवतीर्ण हुआ हूँ ॥६। इस लिये अव इस उच्च शाखा वाले विशाल कदम्ब पर चढ कर मैं उस वायु का भक्षण करने वाले नागराज के धुण्ड में कूद पडूंगा ॥१०॥ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार स्थिर पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी कटि को कमा और सवेग उस कालिय वुड में यूद गये ॥११॥ उनके वूदने के कारण क्षुब्ध हुए उस महान कुड ने दूर पर खडे हुए वृक्षों को भी भिगो दिया ||१२|| नाग के भयानक पि की अग्नि से उप्प हुए उस जल से भंग कर वे वृक्ष दग्ध होने लगे और उनसे निकलती हुई ज्वालाग्रो से सभी दिशाएं भर उठीं ॥१३॥ आस्फोटयामास तदा कृष्णो नागहदे भुजम् । तच्छन्दश्रवणाचाशु नागराजोऽभ्युपागमत् ॥१४ आताम्रनयनः कोपाद्विपज्वालाकुलमुखै.। वृतो महाविपश्चान्यैरुरगर निलाशने ॥१५ नागपत्न्यश्च शतशो हारिहारोपशोभिताः। प्रकम्पिततनुक्षेपचलत्कुण्डलकान्तयः ॥१६ तत प्रवेष्टितस्सस्स कृष्णो भोगबन्धनैः । ददशुस्तेऽपि तं कृष्ण विपज्वालाकुल मुखैः ॥१७ तं तत्र पतितं दृष्ट्वा सर्पभोगनिपीडितम् । गोपा ब्रजमुपागम्य चुक शुः शोकलालसा: ॥१८ एप मोह गतः कृष्णो मरनो वै कालियहदे। भक्ष्यते नागराजेन तमागच्छत पश्यत ॥१६ पञ्चम अश अ०६ ] [ १६३ तच्छ त्वा तत्र ते गोपा वज्रपातोपम वच । गोप्यश्च त्वरिता जग्मुर्यशोदाप्रमुखा ह्रदम् ॥२० उस कालिय कुड मे पहुच कर श्रीकृष्ण ने अपनी भूजारो को ठोक कर शब्द किया, जिसे सुनकर वह नागराज तुरन्त ही उनके सामने आया ।१४। क्रोध के कारण उसके नेत्र ताम्रवर्ण के हो रहे थे और मुख से ज्वाला की लपटे निकल रही थी। उस समय वह अत्यन्त विशले वायुभक्षी अन्य नागो से घिर रहा था ॥१५॥ तथा मनोहर हारी और हिलते हुए कुडनो की काति से सुशोभित हो रही सैकडो नाग पलियां भी उसके साथ थी ।।१६। उन नागो ने कु डलावार हो कर श्रीकृष्ण को अपनी देह मे बाध कर विपाग्नि युक्त मुखो से दशित करना प्रारम्भ किया ।।१७।। इसके अनन्तर जब गोपो ने श्रीकृष्ण को उस नाग कु ड मे गिरे हुए और नागो के फरणो से काटे जाते हुए देखा तो चह शोक से अत्यन्त व्याकुल हो कर रोते हुए ब्रज मे लौट पाये ॥१८॥ उन गोपो ने कहा- अरे, चल कर देखो कालीदह मे गिर कर कृष्ण अचेत पडा है और नागराज उसका भक्षण किये जा रहा है ।।१६। उनके इस अमङ्गल सूचक वचनो को बज्रपात के समान समझ कर सभी गोपगण और यशोदा पादि गोपियाँ उसी समय कालीदह की ओर शीघ्रता से दौड पडी ॥२०॥ हा हा क्वासाविति जनो गोपीनामतिविह्वल । यशोदया सम प्रान्तो द्रुतप्रस्खलित ययौ ।।२१ नन्दगोपश्च गोपाश्च रामश्चाद्भ तविक्रम । त्वरित यमुना जग्मु कृष्णदर्शनलालसा ॥२२ ददृशुश्चापि ये तत्र सर्प राजवशङ्गतम् । निष्प्रयत्नीकृत कृष्ण सर्पभोगविहितम् ॥२३ नन्दगोपोऽपि निश्चेष्टो न्यस्य पुनमुखे दृशम् । यशोदा च महाभागा बभूव मुनिसत्तम ॥२४ गोप्यस्त्वन्या रुदन्त्यश्चददृशुः शोकातरा । प्रानुश्च केशव प्रीत्या भयकातर्यगद्गदम् ॥२५ १६२ ] [ श्रीविष्णु पुराण तेनातिपतता तत्र शोभितस्य महाह्रदः । प्रत्यर्थ दूरजातांस्तु समसिञ्चन्महीरुहान् ।।१२ तेऽहिदुष्टविषज्वालातप्ताम्वुपवनोक्षिताः। जज्वलुः पादपास्सद्यो ज्वालाव्याप्तदिगन्तराः ॥१३ इस लिये इस नागराज का निग्रह करना मेरा कर्तव्य है। ऐसा होने पर ही ब्रजवासीगण भय-रहित और सुख से निवास कर सकेंगे ॥८॥ ऐसे दुरात्मानो का दमन करना आवश्यक है और इसीलिए मैं इस लोक में अवतीर्ण हुअा हूँ ||| इस लिये अव इस उच्च शासावाले विशाल कदम्ब पर चढ कर मैं उस वायु का भक्षण करने वाले नागराज के पुण्ड में कूद पड़ेगा ॥१०॥ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार स्थिर कर भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी कटि को कसा और सवेग उस कालिय वुड मे कूद गये ।।११।। उनके वूदने के कारण क्षुब्ध हुए उस महान् कुंड ने दूर पर खडे हुए वृक्षो को भी भिगो दिया ॥१२॥ नाग के भयानक विष की अग्नि से उप्प हुए उस जल से भंग कर वे वृक्ष दग्ध होने लगे और उनसे निकलती हुई ज्वालामो से सभी दिशाएं भर उठीं ॥१३॥ प्रास्फोटयामास तदा कृष्णो नागह्रदे भुजम् । तच्छन्दश्रवणाच्चाशु नागराजोऽभ्युपागमत् ।।१४ आताम्रनयनः कोपाद्विपज्वालाकुलमुखैः । वृतो महाविषश्चान्यरुरगैरनिलाशने. ॥१५ नागपल्यश्व शतशो हारिहारोपशोभिताः । प्रकम्पिततनुक्षेपचलत्कुण्डलकान्तयः ।।१६ तत. प्रवेष्टितस्सस्स कृष्णो भोगवन्धन. । ददशुस्तेऽपि तं कृष्ण विषज्वालाकुल मुखैः ॥१७ तं तत्र पतितं दृष्ट्वा सर्पभोगनिपीडितम् । गोपा ब्रजमुपागम्य चुक्र शुः शोकलालसाः ॥१८ एप मोह गतः कृष्णो मानो व कालियह्रदे। भक्ष्यते नागराजेन तमागच्छत पश्यत ॥१६ त्वरित यमुना जग्मु कृष्णदर्शनलामा ॥२२ प्राचुन केशव प्रीत्या भयानगगदम् ।। है और नागराज उमका भक्षरण किये जा रहा है ॥१६॥ उगधगम सूचव वचनो पो बज्रपात के समान समझ पर सभी गोषगण पोरगीदा मादिगोपियों उसी समय कालीदह की और गीघ्रता से दौर पटी ॥२०॥ हा हा श्वासाविति जनो गोपीनामतिविहल । यशोदया सम प्रान्तो द्रुतप्रम्पलित ययो ।२१ नन्दगोपोऽपि निश्चेष्टो न्यस्य पुनमुन हाम् । यशोदा च महाभागा वभूद मुनिमुत्तम ॥२४ पञ्चम अंग प्र० ६ ] तच्छ् त्वा तत्र ते गोपा वज्रपातोपमं वच । गोप्यश्च त्वरिता जग्मुर्यशोदाप्रमुखा ह्रदम् ॥२० उस कालिय कुंड में पहुंच कर श्रीकृष्ण ने अपनी भूजाग्रो को ठीक कर शब्द किया, जिसे सुनकर वह नागराज तुरन्त ही उनके सामने पाया ।१४॥ क्रोध के कारण उसके नेत्र ताम्रवर्ण के हो रहे थे और मुख में ग्वाला भी लपटें निकल रही थी। उस समय वह अत्यन्त विशैले वायुभक्षी अन्य नागों में घिर रहा था ॥१॥ तथा मनोहर हारी और हिलते हुए पुस्ती की यानि से सुशोभित हो रही सैकडो नाग पत्तियां भी उसके साथ थी ।।१६। उन नागों ने कुडलाकार हो कर श्रीकृष्ण को अपनी देह मे बाध कर विषागि मृग पृषयों से दंशित करना प्रारम्भ किया ।।१७।। इसके अनन्तर जय गोपों श्रीकृष्णा को उस नाग कुड मे गिरे हुए और नागो के पणो गे पाटे जाने पदेगा मां यह शोक से अत्यन्त व्याकुल हो कर रोते हुए ग्रज मे लौट प्राय METam गोपी ने कहा- अरे, चल कर देखो, कालीदह में गिर पर प्राण प्रपन गया नन्दगोपश्न गोपाश्च रामश्चाद्ध तविक्रम । ददृशुश्चापि ये तत्र राप राजवशङ्गतम् । निष्प्रयत्नीकृत कृष्ण सर्पभोगविवलिम् ॥२३ गोप्यस्त्वन्या रदन्त्यश्चदशः गोवानग ।

१६४ ] [ श्रीविष्णु पुराण 1 उस समय वे सभी गोपियों 'हाय, कृष्ण कहां है ।" वहती हुई व्याकु- लता से रदन करती और गिरती पड़ती हुई वहाँ गई ॥२१॥ सभी गोपो को साथ लिये हुए अद्भत बल वाले बलरामजी भी श्रीक्षण को देसने की इच्छा से तुरन्त ही यमुना के किनारे जा पहुचे ॥२२॥ वहाँ पहुच कर उन्होंने श्रीकृष्ण को नागराज के वश मे पडे हुए तथा उसके लिपटने से निष्प्रयल हुए देखा ॥२३॥ हे मुनिधेष्ठ । उस समय नन्द और यशोदा भी उनके मुख को एक्टक देखते हुए अचेत हो गये ॥२४॥ अन्य गोपियो ने भी श्रीकृष्ण को ऐसी दशा देखी तो शोर से व्याकुल हो पर रदन परने लगी और भय-कम्पित वाणी मे गद्गद कएठ मे प्रीति पूर्वक बोली ॥२५॥ सर्वा यशोदया साद्धं विशामोऽत्र महाह्रदम् । सर्पराजस्य नो गन्तुमस्माभिर्युज्यते व्रजम् ।।२६ दिवस को विना सूर्य विना चन्द्ररेण का निशा । विना वृषेण का गावो विना कृष्णेन को व्रज. ॥२७ बिनाकृता न यास्याम कृष्णेनानेन गोकुलम् । अरम्य नातिसेव्य च वारिहीन यथा सर ॥२८ यत्र नेन्दीवरदलश्यामकान्तिरय हरि । तेनापि मातुर्वासेन रतिरस्तीति विस्मय ॥२६ उत्फुल्लपङ्कजदलस्पष्टकान्तिविलोचनम् । अपश्यन्त्यो हरि दीना कथं गोष्ठे भविष्यथ ॥३० अत्यन्तमधुरालापहृताशेपमनोरथम् । न विना पुण्डरीकाक्ष यास्यामो नन्दगोकुलम् ॥३१ भोगेनावेष्टितस्यापि सर्पराजस्य पश्यत। स्मितशोभि मुख गोप्य कृणस्यास्मद्विलोकने ।।३२ गोपियो ने कहा-अद्र यशोदाजी के साथ हम सभी सपंगज के इम बुड में डूबेंगी, ब्रज मे कदापि नहीं जायेगी ।।२६॥ सूयं ही नहीं तो दिन कैसा? चन्द्रमा नही तो रात ही क्या ? बैल नहीं तो गाय कसो ? इसी प्रकार कृष्ण ही नहीं तो ग्रज कंगा ? ॥२७॥ कृष्ण को साथ लिये पिना हम गोकुल के लिये पञ्चम अंश अ०७ ] [ १६५ कभी नहीं जा सरती, क्यो कि कृष्णहीन गोकुल तो जलहीन सरोवर के समान ही निरर्थक है ॥२८॥ यहाँ नील कमल की-सी कान्ति वाले कृष्ण नहीं, उस मातृगेह से प्रीति होना भी विस्मय की बात होगी ॥२६॥ अरी गोपियो ! विक- सित कमल के समान आभा वाले जिनके नेत्र है, ऐसे श्री हरि के दर्शन बिना दीनता को प्राप्त हुई तुम अपने गोष्ठ मे फंसे रहोगी? ॥३०।। जिन्होने अपने मधुर पालाप से हमारी सब कामनाओं को अपने ही वश मे कर लिया है, उन गुटरीकाक्ष के विना नन्दजी के गोकुल को हम य दापि नहीं जा सकती ॥३१॥ हे गोपियो ! सर्पराज के फरण से ढक कर भी श्रीकृष्ण का मुख हमे देख-देख कर मुसकान युक्त हो गया है ॥३२।। इति गोपीवचः श्रुत्वा रोहिणेयो महाबल. । गोपांश्च त्रासविधुरान्विलोक्य स्तिमितेक्षणान् ॥३३ नन्द च दीनमत्यर्थ न्यस्तदृष्टि सुतानने । मूर्छाकुला यशोदां च कृष्णमाहात्म्यसज्ञया ।।३४ किमिद देवदेवेश भावोऽयं मानुपस्त्वया । व्यज्यतेऽत्यन्तमात्मान किमनन्त न वेत्सि यत् ।।३५ त्वमेव जगतो नाभिरराणामिव संथयः । कर्तापहर्ता पाता च त्रैलोक्य त्वं त्रयीमयः ॥३६ सेन्द्र रुद्राग्निवसुभिरादित्यमरुदश्विभि । चिन्त्यसे त्वमचिन्त्यात्मन् समस्तैश्चैव योगिभिः ।।३७ जगत्यर्थ जगन्नाथ भारावतरणेच्छया । अवतीर्णोऽसि मत्र्येषु तवांशश्वाहमग्रज ॥३८ मनुष्यलीला भगवन् भजता भवता सुराः। विडम्बयन्तस्त्वल्लोलां सर्व एव सहासते ॥३६ श्रीपराशरजी ने यहा-गोपियो का इस प्रकार कथन सुन कर रोहिणी पुत्र बलरामजी ने सन्तप्त नेत्र वाले गोपी, अपने पुत्र को एकटक देखते हुए नन्द और मूर्जा से प्राकुल हुई यशोदा को देखकर श्रीकृष्ण ने सकेत मे कहा ॥३३. ३४॥ हे देवदेवेश ! पाप यह मनुष्य भाव किस लिये प्रकट कर रहे हो ? क्या । श्री विष्णु पुराण अपने को अनन्न नहीं जान पाते ? ॥३॥॥ जैसे चक्र-नाभि ही मरो का आधार हाती है, वैसे ही आप इस संसार के आधार, कर्ता, अपहर्ता और रक्षा करने वाले है। आप ही त्रैलोक्य रूप तया वेदत्रयात्मक हैं ॥३६॥ हे अचिन्त्यात्मन् । इन्द्र, रुद्र, अग्नि, वसु, मादि य, मरुद्गण, अश्विदय तथा सभी योगीजन आपका ही ध्यान किया करते हैं ॥३७॥ हे जगन्नाथ 1 जगत् का कल्याण करने और भू भार हरने की इच्छा स ही पाप मृत्यु लोक मे अवतीर्ण हुए हैं और आपका मैं अग्रज भी प्रापका प्रश रूप ही हूं ॥३८॥ हे भगवन् । जब पाप मनुष्य रूप मे लीला करते हैं, तब यह सभी देवता आपको लोलायो के अनुकरण मे सदा आपके साथ रहते हैं ॥३६॥ अवतार्य भवान्पूर्व गोकुले तु सुराङ्गना । मात्मन पश्चादवतीयोऽसि शाश्वत ॥४० अनावतीर्णयो कृष्ण गोपा एव हि बान्धवा । गोप्यश्च सीदतः कस्मादेतान्वन्धूनुपेक्षसे ॥४१ दशितो मानुपो भावो दर्शित बालचापलम् । तदय दम्यना कृष्ण दुष्टात्मा दशनायुध ॥४२ इति सस्मारित कृष्ण स्मितभिन्नो सम्पुट । प्रास्फोट्य मोचयामास स्वदेह भोगिबन्धनात् ।।४३ आनम्य चापि हस्ताभ्यामुभाच्या मध्यम शिर । प्रारुह्याभुग्नशिरस प्रणनतॊरुविक्रम ॥४४ प्रारणा फ्णेऽभवश्चास्य कृष्णस्याड घ्रिनिकुट्टने । यत्रोन्नतिं च कुरुते ननामास्य ततश्शिर ॥४५ मूर्खामुपाययो भ्रान्त्या नाग कृष्णस्य रेचकं । द डपातनिपातेन ववाम रुधिर बहु ।।४६ त विभुग्नशिरोनीवमास्येभ्यस्त्र तशोणितम् । विलाक्य करुण जग्मुस्तत्पल्यो मधुसूदनम् ॥४७ हे शाश्वत ब्रह्म । मापने क्रीडा करने के लिये पहले देवनारियो को गोकुल में प्रकट किया और फिर स्वय अवतीण हुए हैं ॥४०॥ हे कृष्ण। यहा पश्चिम अश अ०७ ]] [ १६७ पर उत्पन्न हुए हम दोनो के वांधवगरण तो यह गोप गोपियाँ ही हैं, फिर पाप इन दुखियो की उपेक्षा क्यो कर रहे है ? .।४१|| हे कृष्ण। यह मानुप-भाव और बाल-चपलता तो मापने बहुत दिसा दी, अब तो इस दांत रूप शस्त्रधारी दुरात्मा नाग का दमन करिये ॥४२॥ श्री पराशरजी ने कहा-बलरामजी द्वारा इस प्रकार याद दिलाने पर भगवार श्रीकृष्ण ने अपने सम्पुट को खोल कर मधुर मुसकान फैलाते हुए, अकस्मात् उछल कर अपने को सर्प के बन्धन से मुक्त किया ॥४३॥ फिर उन्होो अपने दोनो हाथो से उसके मध्य फण को झुकाया और स्वय उस पर चढ कर नृत्य करने लगे ॥४४॥ श्रीकृष्ण के पदा- घात से उसके प्राण मुख पर प्रागये । वह अपने जिस फण को ऊँचा करता, उसी पर ठोकर मार कर नीचे झुका देते ।।४३।। श्रीकृष्ण की भ्रान्ति, रेचक और द डपात के प्राधान से वह नाग मूछित हो गया और बहुत-सा रक्त वमन करने लगा ॥४६॥ इस पर उसके शिर और ग्रीवाओ को भग्न तथा मुखो से रक्त गिरता देख कर नाग-पत्नियाँ वरुपा पूर्ण वाणी मे श्रीकृष्ण से बोली ॥४७॥ ज्ञातोऽसि देवदेवेश सर्वज्ञस्त्वमनुत्तम पर ज्योतिरचिन्त्य यत्तदश परमेश्वर ॥४८ न समर्था सुरास्स्तोतु यमनन्यभव विभुम् स्वरूपवर्णन तस्य कथ योपिकरिष्यति ||४६ यस्याखिलमहीव्योमजलाग्निपवनात्मकम् । ब्रह्माडमल्पकाल्पाश स्तोष्यामस्त क्थ वयम् ॥५० यतन्तो न विदुनित्य यत्स्वरूप हि योगिन । परमार्थमरणोरल्प स्थूलात्स्थूल नता स्म तम् ॥५१ न यस्य जन्मने धाता यस्य चान्ताय नान्तक । स्थितिकर्ता न चान्योऽस्ति यस्य तस्मै नमस्सदा ।।५२ कोप स्वल्पोऽपि ते नास्ति स्थितिपालनमेव ते। कारण कालियस्यास्य दमने श्रू यता वचः ॥५३ [ श्रीविष्णु स्नियोऽनुकम्प्यासाधूना मूढा दीनाश्च जन्तव । यतस्तनोऽम्य दीनस्य क्षम्यता क्षमता वर ॥५४ समस्तजगदाधारी भवानल्पवल फणी । त्वत्पादपीडितो जह्यान्मुहूर्ताद्ध ने जीवितम् ॥५५ नाग पलिया ने कहा-हे देवदेवेश । अब हम आपको जान गई , भाप सर्वश्रीप्ठ सवज्ञ एव अचिन्त्य परमज्योति के अश रूप परमेश्वर ही है ।।४।। जिन स्वयम्भू भगवान् की स्तुति करने का सामर्थ्य देवताओ में भी नहीं है, उन के रूप का वर्णन हम नारिया किस प्रकार कर सकती है ? ॥४६|| पृथिवी, आवाश, जल, अग्नि और पवन रूप यह ब्रह्माड जिनका अल्पतम अश है, हम उनकी स्तुति किस प्रकार करें॥५०॥ जिनके नित्य स्प को योगीजन पल पूर्वक भी नहीं जान सकते और जो सूक्ष्म से सूक्ष्म तथा स्थूल से स्थूल हैं, उन पर. माथ स्वरूप का हम नमस्कार करते है ॥५१॥ जिन्हें विधाता जन्म नहीं देता और काल जिनका अन्त नहीं कर सकता तथा जिनका स्थिति का भी पोई दूमरा नहीं है, उन प्रभु को हमारा नमस्कार है ॥५२॥ आपने इस कालियनाग का दमन क्रोध से नही, किन्तु ससार की स्थिति और पालन के लिये ही किया है, इसलिये हमारे वचा सुनिये ॥५३॥ हे क्षमाशील श्रेष्ठ । साधुजन को स्त्रियो, मूखों और दोन ज तुओ पर अनाम्पा ही करनी चाहिये, इसलिये आप भी इस दीन के अपराध को क्षमा करिये ॥५४) प्राप सम्पूर्ण विश्व के प्राधार है और यह नाग अल्प बल बाला है । फिर यह आपके चरण प्रहार से पीडित होगया तो प्राधे मुहूतं तक ही जीवित रह सकता है ॥५॥ क्व पन्नमोऽल्पवीर्योऽय क्व भवान्भुवनाश्रय । प्रीति पो समोसष्टगोचरो भवतोऽव्यय ॥५६ तत कुरु जगत्स्वामिन्प्रसादमवसीदत । प्राणास्त्नति नागोऽय भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ॥५७ भुवनेश जगन्नाथ महापुरुप पूर्वज । प्रारणास्त्यजति नागोश्य भिक्षा प्रयच्छ न ।।५८ पश्चम अश अ०-८ ] [ १६६ वेदान्तवेद्य देवेश दुष्टदेत्यनिवर्हण । प्रारणास्त्यजति नागोऽय भर्तृभिक्षा प्रदीयताम् ।।५६ इत्युक्त ताभिराश्वस्य क्लान्तदेहोऽपि पन्नग । प्रसीद देवदेवेति प्राह वाक्य शने शने ॥६० हे अव्यय । प्रीति अपने समान से और वैर अपने से श्रेष्ठ से होती देखते है, तो कहाँ यह अल्पवीर्य वाला नाग और कहां प्राप सब लोको के आश्रय' ? ॥५६।। इसलिये हे जगन्नाथ ! इस दीन पर कृपा करिये । यह नाग अपने प्राणो का त्याग करने वाला है, इसलिये हमे हमारे भर्तार को भिक्षा रूप मे प्रदान करिये ।। ५७।। हे भुवनेश । हे जगन्नाथ । हे महापुरुष । हे पूर्वज । इस नाग के प्राण जाना ही चाहते है, इसलिये आप हमे हमारे पति की भिक्षा दीजिये ॥५८।। हे वेदान्त से जानने योग्य देवेश । हे दुष्टो और दैत्यो के विनाशक । अब यह नाग अपना प्राण त्याग करने वाला है, हमे पति की भिक्षा दीजिये ॥५६॥ श्री पराशर जी ने कहा-नागिनो द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर क्लान्त शरीर वाले नाग को भी कुछ धैर्य हुआ और यह मन्द स्वर मे कहने लगा-हे देव देधेश्वर । प्रसन्न हो जाइये ॥६०॥ तवाष्टगुणमैश्वर्य नाथ स्वाभाविक परम् । निरस्तातिशय यस्य तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम् ॥६१ त्व परस्त्व परस्याद्य पर त्वत्त परात्मक। परस्मात्परमो यस्त्व तस्य स्तोष्यामि किन्न्वहम् ॥६२ यस्माद्ब्रह्मा च रुदश्च चन्द्रन्द्रमरुदश्विन । वसवश्च सहादित्यस्तस्य स्तोप्यामि किन्न्वहम् ॥६३ एकावयवसूक्ष्माशो यस्यंतदखिल जगत् । कल्पनावयवस्याशस्तस्य स्तोप्यामि किन्न्वहम् ॥६४ सदसद् पिणो यस्य ब्रह्माद्यानिदशेश्वरा । परमार्थ न जानन्ति तस्य स्तोप्यामि किन्न्वहम् ॥६५ ब्रह्माद्य रचितो यस्तु गन्धपुप्पानुलेपन । नन्दनादिसमुद्भ तस्सोऽयंते वा कय मया ॥६६ १७० ] [ श्रीविष्णु पुराण ? यस्यावताररूपाणि देवराजस्सदार्चति । न वेत्ति परम रूप सोऽर्च्यते वा कय मया ॥६७ कालिय नाग ने कहा-हे नाथ | आपका अष्ट गुण विशिष्ट परम ऐश्वर्य स्वाभाविक एव समता-रहित है, इसलिये मैं आपकी स्तुति किस प्रकार कर सकता हूँ? ॥६॥ आप पर तथा पर के भी आदि कारण हैं, और हे परात्मक । पर की प्रवृत्ति भी प्रापके द्वारा ही हुई है । इसलिये आप पर से परे की स्तुति में किस प्रकार करूं ? ॥६२॥ जिनसे ब्रह्मा, रुद्र, चन्द्र, इन्द्र, मरुत्, अश्विनी, वसु और प्रादित्यो की उत्पत्ति हुई है, उन आपकी स्तुति में कैसे कर सकता हूं? ॥६३॥ यह विश्व जिनके काल्पनिक अवयव का एक सूक्ष्म अश है, ऐसे आपकी स्तुति कसे कर सकता हूँ? ॥६४।। जिन सत्-असत् रूप के यथार्थ स्वरूप को ब्रह्मा आदि देवेश्वर भी जानने में समर्थ नहीं हैं, उन प्रापकी स्तुति में किस प्रकार कर सकू गा ? ॥६५॥ ब्रह्मा आदि देवता नन्दन कानन के पुष्पो, गन्ध और अनुलेपन आदि के द्वारा जिनका पूजन करते हैं, उन प्रापका पूजन में कैसे कर सकता हू ? ||६६) जिनके अवतार रूपो का पूजन करते हुए देवराज इन्द्र भी वास्तविक रूप को नहीं जान पाते, उन प्रापका पूजन में किस प्रकार कर सकता हूँ ॥६७॥ विपयेभ्यस्समावृत्य सर्वाक्षाणि च योगिन । यमर्चयन्ति ध्यानेन सोऽय॑ते वा कथ मया ॥६८ हृदि सङ्कल्प्य यदू प ध्यानेनार्चन्ति योगिन । भावपुष्पादिना नाथः सोऽय॑ते वा कथ मया ।।६६ सोऽह ते देवदेवेश नार्चनादो स्तुतौ न च । सामर्थ्यवान् कृपामानमनोवृत्ति प्रसीद मे ।।७० सपंजातिरिय क्रूरा यस्या जातोऽस्मि केशव । तत्स्वभावोऽयमनास्ति नापराधो ममाच्युत ॥७१ सृज्यते भवता सर्व तथा सहियते जगद ! जातिरूपस्वभावाश्च सृज्यन्ते सृजता त्वया ॥७२ ?

पञ्चम अंश अ०-८ ]
[ १७१
यथाह भवता सृष्टो जात्या रूपेण चेश्वर ।
स्वभावेन च सयुक्तस्तथेद चेष्टित मया ।।७३
यद्यन्यथा प्रवर्तेय देवदेव ततो मयि ।
न्याय्यो दण्डनिपातो वे तवैव वचन यथा ।।७४
तथाप्यज्ञे जगत्स्वामिन्दण्ड पातितवान्मयि ।
स श्लाघ्योऽय परो दण्डस्त्वत्तो मे नान्यतो वर. ७५
हतवीर्यो हतविपो दमितोऽह त्वयाच्युत ।
जीवित दीयतामेकमाज्ञापय करोमि किम् ॥७६
अपनी इन्द्रियो को सम्पूर्ण विषयो से हटा कर योगीजन जिनका चिंतन
प्रौर पूजन करते हैं, उन आपका पूजन में किस प्रकार कर सकता हूँ ? ॥६॥
चित्त मे जिनके रूप का सङ्कल्प करके योगीजन जिनका ध्यान करते हुए भाव-
मय पुष्पादि से पूजन करते हैं, मैं उनका पूजन किस प्रकार कर सकता हूँ ॥६६॥
हे देव देवेश । मैं आपके पूजन अथवा स्तुति करने में समर्थ नहीं हूं, मैं तो
प्रापकी कृपामार का अभिलापोहू, इसलिये पाप मुझ पर प्रसन्न हो ॥७॥
हे केशव । मैं जिस सपं जाति मे उत्पन्न हुमा हू, वह अत्यन्त दूर होती है, इस.
लिये मेरा जातीय स्वभाव होने के कारण मेरा इरामे कोई अपराध मत मानिये
॥७१। इस सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि और प्रलय करने वाले प्राप ही हैं और आप
ही सृष्टि-रचना के समय सब जातियो के स्प और स्वभाव को भी स्वय
रचते हैं ॥७२॥ हे प्रभो । प्रापने मुझे जिस जाति, रूप और स्वभाव से
युक्त
किया है, उसी के अनुरूप मैरी चेष्टा हुई है ॥७३॥ हे देव देव । पदि मैंने उसके
विपरीत कोई भाचरण किया हा तो मैं अवश्य ही दण्ड + योग्य हो सकता
हूँ ॥७४॥ फिर भी मापने मुझ प्रज्ञानी को जो दण्ड दिया है, वह भी मेरी
भलाई ये लिये ही हो सकता है। परन्तु हे जगदीदयर ! किसी अन्य से प्राप्त
वर भी मेरे लिये ठीक नही होता ।।७।। हे मच्युत । आपने मेरे वीर्य और
विष का भले प्रकार दमन कर दिया है, इसलिये अब तो पाप मुझे प्राण-दान
दीजिये पोर मब मुझे क्या करना है, यह निर्देश परिये ॥७॥

१७२J
[ श्रीविष्णु पुराण
नात्र स्थेय त्वया सर्प कदाचिद्यमुनाजले ।
सपुत्रपरिवारस्त्व समुद्रसलिल बज ७७
मत्पदानि च ते सर्प दृष्ट्वा मूर्द्ध नि सागरे ।
गरुड पन्नगरिपुस्त्वयि न प्रहरिष्यति ।।७८
इत्युक्त्वा सर्पराज त मुमोच भगवान्हरि.।
प्रणम्य सोऽपि कृष्णाय जगाम पयसा निधिम् ॥७६
पश्यता सर्वभूताना सभृत्यसुतवान्धवः।
समस्तभार्यासहित परित्यज्य स्वक हृदम् ॥८०
गते सर्प परिष्वज्य मृत पुनरिवागतम् ।
गोपा मूर्द्ध नि हार्देन सिपिचुनेरजेले १८१
कृष्णमक्लिष्टकर्माणमन्ये विस्मितचेतस ।
तुष्टुवुमुदिता गोपा दृष्ट्वा शिवजला नदीम् ॥२
गीयमान स गोपीभिश्वरितैस्सायुचेष्टितै ।
सस्तूयमानो गोपेश्च कृष्णो व्रजमुपागमत् ।।८३
श्री भगवान् ने कहा--हे नाग ! अव इस यमुना जल मे तेरा निवार
उचित नहीं है । इसलिये, तू अपने पुत्रादि कुटुम्ब के सहित समुद्र के लिए
प्रस्थान कर ॥७७॥ तेरे शिर पर मेरे चरण-चिह्न बन गय हैं, उन्हें देखकर
सों का वैरी गरुड तुझे नहीं सतायेगा ६७८।। श्री पराशरजी ने कहा-सा
राज के प्रति ऐसा कहकर भगवान् ने उसे मुक्त कर दिया और वह भी उहै
प्रणाम करके सब जीवो के देखते ही अपने भृत्य, पुत्र, बाधव और सब
स्त्रियो के सहित उस कुएड का त्याग कर समुद्र में रहने के लिये चल दिया
॥७९-८०॥ सर्प के वहाँ चले जाने पर मर कर जी उठने वाले मनुष्य के
समान श्री कृष्ण को प्राप्त करके गोपो न प्रीति पूर्वक उनका प्रालिंगन किया
पौर अपने प्रासुप्रो स उनके मस्तक को भिगोने लगे ॥१॥ यमुनाजी को
स्वच्छ जल से युक्त देखकर कुछ अन्य गोपगए प्रसन्न चित्त होकर श्रीकृष्ण
को माश्चर्य पूर्वक स्तुति करने लगे ॥२॥ फिर अपन श्रष्ठ चरित्रा के कारण

पञ्चम अश-अ०८ ] [ १७३ गोपिया की गीतमय प्रशसा और गोपो द्वारा स्तुतियो को प्राप्त होते हुए श्रीकृष्ण व्रज मे लौट माये ॥८३ पाठवाँ अध्याय गा पालयन्तौ च पुन सहितौ बलकेशवो । भ्रममारणी वने तस्मित्रम्य तालवन गती ॥१ तत्तु तालवन दिव्य धेनुको नाम दानव । मृगमासकृताहार सदाध्यास्ते खराकृति ॥२ तत्तु तालवन पक्वफलसम्पत्समन्वितम् । दृष्ट्वा स्पृहान्विता गोपा फलादानेऽनु वन्वच ॥३ हे राम हे कृष्ण सदा धेनुकेनेप रक्ष्यते भूप्रदेशो यतस्तस्मात्पक्वानीमानि सन्ति वै ॥४ फलानि पश्य तालाना गन्धामोदितदीशि वै। वयमेतान्यभीप्साम पात्यन्ता यदि रोचते ॥५ श्री पराशरजी ने कहा-एक दिन बलरामजी के सहित भगवान् वेशव गौएँ चराते हुए अत्यन्त रमणीक तालवन म जा पहुंचे ॥१॥ उस दिव्य वन मे गदभाकार धेनुकासुर मृगांसफा माहार परता हुमा निवास करता था।।२।। वह गलपन पने फलो से मम्पन था, जिह तोडने की इच्छ करते हुए गापो ने कहा ।३॥ गोपगण बोले-हे रामहे कृष्ण । इम भू प्रदेश का रक्षक धेनुकासुर है इसीरिये यहाँ परे हुए फलो की भरमार है ॥४॥ यह तालफन मपनी गप है सब दिशामा म भामोद उत्पन्न कर रहे हैं, हम भी इनरे खाने की इच्छा पर रहे हैं, यदि तुम्हारी भी रुचि हो तो इनम बुध फर गिग सो ॥५॥ इति गोपकुमाराणा श्रुत्वा सद्धपरको वच । एतत्वतंव्यमित्युक्त्वा पातयामास तानि वै। कृपणश्च पातयामास भुवि तानि पलानि वै ॥

१७४ ]
। श्रीविष्णु पुराण
फलानां पततां शब्दमाकर्ण्य सुदुरासद ।
आजगाम स दुष्टात्मा कोपाद् देतेयगर्दभ ॥७
पद्भ्यामुभाभ्याम तदा पश्चिमाझ्या वल वली।
जधानोरसि ताम्या च स च तेनाभ्यगृह्यत ।।८
गृहीत्वा भ्रामयामास सोऽम्बरे गतजीवितम् ।
तस्मिन्नेव स चिक्षेप वेगेन तृणराजनि ॥६
तत फलान्यनेकानि तालाग्रानिपतन्खर ।
पृथिव्या पातयामास महावातो घनानिय ॥१०
अन्यानथ सजातीयानागतान्दैत्यगर्दभान् ।
कृष्ण चिक्षेप तालान बलभद्रश्च लीलया ॥११
क्षणेनालङ्कृता पृथ्वी पक्वैस्तालफलस्तदा ।
दैत्यगर्दभदेहैश्च मैत्रेय शुशुभेऽधिकम् ।।१२
ततो गावो निराबाधास्तस्मिस्तालवने द्विज ।
नवशष्प सुख चेरुयंत्र भुक्तमभूत्पुरा ॥१३
श्री पराशरजी ने कहा-बाल-बालों के ऐसे वचन सुनकर बलरामजी
ने भी उनका अनुमोदन किया और कुछ फल गिराये फिर श्रीकृष्ण ने भी कुछ
फल भाड दिये ॥६॥ फलो के गिरने का शब्द सुनकर वह दुद्धपं, दुरात्मा
गर्दभ रूपी असुर क्रोध करता हुआ वहां प्रागया ॥७॥ उस महाबली असुर ने
अपने पीछे के दो पांवो से बलरामजी के हृदय पर आघात किया तब उन्होंने
उमके दोनो पांव पकड लिये ॥८॥ फिर उसे आकाश मे घुमाने लगे और जब
वह निष्प्राण होगया तब उन्होने अत्यन्त वेग पूर्वक उसे ताल वृक्ष पर ही पछाड
दिया | उस गर्दभ के गिरने से ताल वृक्ष के फल इस प्रकार झड गये,जैसे
प्रचण्ड पवन से मेघ झडने लगते है ॥१०॥ उसके अन्य सजातीय बाघव भी
जब क्रोध पूर्वक वहाँ पाये, तब उन्हें भी उठा उठा कर बलराम और कृष्ण ने
ताल वृक्षों पर ही दे मारा ॥११॥ हे मैनेयजी । इस प्रकार एक क्षण में ही
ताल के पके हुए फलो और गधे रूपी असुरो के शरीरो से अलकृत हुई पृथिवी
अत्यन्त शोभा पाने लगी ॥१२॥ हे द्विज ! उस समय से ही उम ताल वन में

पञ्चम ग्रंश-प्र०६ ]
[ १७५
निर्भय हुई गौए सुख पूर्वक चरने लगी, जिसे पहिले कभी चरने का सौभाग्य
नही हुआ था ।।१३।।
जारा
नयाँ अध्याय
तस्मिनासभदैतेये सानुगे विनिपातिते ।
सौम्यं तद्गोपगोपीनां रम्यं तालवनं बभौ ॥१
ततस्तो जातहषों तु वसुदेवसुतावुभौ ।
हत्या धेनुकदैतेयं भाण्डीरवटमागतौ ॥२
वेलमानो प्रगायन्तो विचिन्वन्तौ च पादपान् ।
चारयन्ती च गा दूरे व्याहरन्तौ च च नामभि ॥३
निर्योगपाशस्कन्धौ तो वनमालाविभूपितो।
शुशुभाते महात्मानो वालशृङ्गाविवर्षभौ ।।४
सुवर्णाञ्जनचूर्णाम्या तौ तदा रुपिताम्वरी।
महेन्द्रायुधसयुक्ती श्वेतकृष्णाबिबाम्बुदौ ॥
चेरतुलॊकसिद्धाभिः क्रीडाभिरितरेतरम् ।
समस्तलोकनाथानां नाथभूतौ भुवं गतौ ।।६
मनुष्यधर्माभिरतो मानयन्तो मनुष्यताम् ।
तजातिगुणयुक्ताभि क्रीडाभिश्चेरतुर्वनम् ॥७
ततस्त्वान्दोलिकाभिश्च नियुद्धश्च महाबलौ।
श्री पराशरजी ने कहा-जब यह गर्दभ रूपी असुर अपने अनुचरों सहित
मा गया, तब वह रमणीक तालयन गोपो और गोपियो के लिये सौम्य हो
गया ॥१॥ फिर उस दैत्य को मार कर वे दोनों वसुदेव नन्दन हपित चित्त से
भाण्डीर घट के पास पाये ।रातव गोयो को बांधने को रस्सी को अपने कधे पर
लटकाये और वनमाला धारण किये वे दोनो बालक नाद करते, गाते, वृक्षो पर
चढ़ते-उतरते, गौमो को चराते हुए उनको पुकारते हुए नवीनोत्पन्न सीग वाने
पछडो के समान शोभा पा न्हे थे ॥३-४! उन दोनो के वस्त्र स्वणिम और

[ श्रीविष्णु पुराण श्याम रङ्ग के होने के कारण वे दोनो इन्द्र धनुप पडे हुए श्वेन और श्याम वर्ण के बादलों जैसे प्रतीत होते थे ॥५॥ वे सभी लोकपालो के स्वामी पृथिवी पर प्रकट होकर विभिन लोरिक क्रीडाएं कर रहे थे ॥६॥ मानव धर्म का पालन करते और मानवी-क्रीडाए करते हुए वे वन में विचरण कर रहे थे ।।७।। व्यायाम चतुस्तन क्षेपरणीयस्तथाश्मभिः । तल्लिप्सुरसुरस्तत्र ह्य भयो रममाणयो । आजगाम प्रलम्बाख्यो गोपवेपतिरोहित INE सोऽवगाहत निश्शङ्कस्तेपा मध्यममानुप । मानुप वपुरास्थाय प्रलम्बो दानवोत्तम ॥१० तयोश्छिद्रान्तरप्रैप्सुरविसह्यममन्यत । कृष्ण ततो रोहिणेय हन्तु चक्र मनोरथम् ॥११ हरिणाक्रीडन नाम बालक्रीडनक ततः। प्रकुर्वन्तो हि ते सर्वे द्वौ द्वौ युगपदुत्थितौ ॥१२ श्रीदाम्ना सह गोविन्द प्रलम्बेन तथा बल । गोपालरपरश्चान्ये गोपाला पुप्लुतुस्तत ।।१३ श्रीदामान तत कृष्ण प्रलम्ब रोहिणीसुत । जितवान्कृष्णपक्षीयाँपैरन्ये पराजिता ॥१४ कमी झूले मे झूलते, कभी परस्पर मल्ल युद्ध करते और कभी पत्थर फैक कर विभिन्न प्रकार का अभ्यास करते ॥८॥ ऐसे ही समय मे उन क्रीडा करते हुए दोनो बालको को उठा ले जाने की इच्छा करता हुमा प्रलम्ब नामक एक असुर गोप वेश धारण कर वहाँ पाया 18 दानवो मे श्रेष्ठ प्रलम्बासुर मनुष्य न होते हुए भी मनुष्य देश मे शङ्का रहित भाव से उन बालको मे जा मिला ॥१०॥ वे कब असावधान होते है, इसका अवसर देखते हुए उस असुर ने श्रीकृष्ण को वश मे न पाने वाला समझ कर बलरामजी को ही मारने का विचार स्थिर किया ॥११॥ फिर वे सब ग्वाल-बालको ने हरिणाक्रीडन नामक खेल की इच्छा की और उनमे से दो-दो बालक एक साथ उठ-उठ पर चलने सगे ॥१२॥ उस समय श्रीदामा के साथ कृपण, प्रलम्ब के साथ बलराम पञ्चम प्रश०६ ] [ १७७ तथा अन्याय ग्वालो की दो-दो की जोडी इसी प्रकार हिरन की भांति उछलती हुई चली ॥१३॥ अन्त में कृष्ण से थीदामा, बलराम से प्रलम्ब और कृष्ण-पक्ष के अन्यान्य ग्वालो ने अपन प्रति पक्षियो पर विजय प्राप्त करली ॥१४॥ ते वाहयन्तस्त्वन्योन्य भाण्डीर वटमेत्य वै । पुनर्निववृतुस्सर्वे ये ये तत्र पराजिताः ॥१५ सङ्कर्पण तु स्कन्धेन शीघ्रमुत्क्षिप्य दानव । नभस्स्थल जगामाशु सचन्द्र इव वारिद ॥१६ असहनौहिणेयस्य स भार दानवोत्तम । ववृधे स महाकाय प्रावृपीव बलाहक. ॥१७ सङ्कर्पणस्तु त दृष्ट्वा दग्धशैलोपमाकृतिम् । स्रग्दामलम्बाभरण मुकुटाटोपमस्तकम् ॥१८ रौद्र शकटचक्राक्ष पादन्यासचलरिक्षतिम् । अभीतमनसा तेन रक्षसा रोहिणीसुतः । ह्रियमारणस्तत कृष्णमिद वचनमब्रवीत् ॥१६ कृष्ण कृष्ण हिये ह्येष पर्वतोदग्रमूत्तिना। केनापि पश्य दैत्येन गोपालच्छमरूपिणा ।।२० यदत्र साम्प्रत कार्य मया मधुनिपूदन । तत्कथ्यता प्रयात्येप दुरात्मातित्वरान्वित ॥२१ उस खेल में जिन बालको की हार हुई वे अपने-अपने विजेतानो को कन्धो पर चढा कर भाण्डीर वट तक ले गये और लौट आये ॥१५॥ परन्तु प्रलम्बासुर बलरामजी को अपने कन्धे पर चढा कर जैसे चन्द्रमा युक्त मेघ होता है वैसी ही शोभा को प्राप्त होता हुअा प्रत्यन्त वेग-पूर्वक अाकाश मे उड चला ॥१६॥ विन्तु वह दानवोत्तम प्रलम्ब बलरामजी के भार को न सह सका और वर्षाकाल मे वादल बढ जाता है, वैसे ही वृद्धि को प्राप्त होता हुआ अत्यन्त स्थूल होगया ॥१७॥ उस समय मालादि प्राभूपणो से विभूषित, शिर पर मुकुट धारण किये, रथ चक्र के समान भयानक नेत्र वाले, अपनी चाल से भूमण्डल यो पम्पित करने वाले तथा जले हुए पर्वत जमे भावार वाले उस नि शङ्क १८० ] [ श्रीविष्णु पुराण संस्तूयमानो गोपैस्तु रामा देत्ये निपातिते । प्रलम्बे सह कृष्णेन पुनर्गोकुलमाययौ ॥३८ हे अनन्त मूर्ते ! सम्पूर्ण चराचर जगत् को धारण करने वाली पृथिवी के पाप ही धारण करने वाले हैं। आप ही अजन्मा निमेपादि काल रूप होकर सत्ययुग आदि के भेद से इस विश्व का स्वयं ही पास कर लेते हैं ॥२६॥ जैसे वडवानल का जलवायु के द्वारा हिमालय पर पहुंच कर बर्फ बन जाता है और सूर्य-रश्मियो के सयोग से पिघल कर पुनः जल रूप होता है, वैसे ही यह विश्व आपके द्वारा सहार को प्राप्त होकर आपके ही आश्रय रहता है और जब पाप पुन. सृष्टि करने मे तत्पर होते हैं, तब यह स्थूल विश्व रूप हो जाता है ॥३०-३१।। हे विश्वात्मन् ! पोर और मैं दोनो ही इस विश्व के अकेले कारण हैं और लोकहित के लिये ही हमने पृथक्-पृथक् रूप धारण किया है ॥३२॥ इसलिये पाप अपने यथार्थ रूप को याद करिये और मानव-भाव के प्राश्रय में ही इस देत्य का वध करके जनहित को सिद्ध कीजिये ॥३३॥ श्री पराशरजी ने कहा- महात्मा श्रीकृष्ण ने जब उन्हे इस प्रकार याद दिलाई, तब महाबली बलरामजी ने हँसकर प्रलम्बामुर को पीडित करना आरम्भ किया।॥३४॥ उन्होने क्रोध पूर्वक लोहित वर्ण के नेत्र करके उसके सिर पर मुष्टिका से प्रहार किया, जिससे पाहत होने पर उसके दोनो नेत्र बाहर की ओर निकल पडे ॥३५।। फिर मस्तिष्क के फटने से वह महादत्य रुधिर वमन करता हुआ धरती पर गिर मृत्यु को प्राप्त हुप्रा ।।१६।। अद्भुत कर्म वाले बलरामजी . द्वारा प्रलम्बासुर का वध हुमा देखकर सभी गोप उन्हे साधुवाद देने लगे ॥३७॥ प्रलम्बासुर के मरने पर गोपों द्वारा प्रशंसित होते हुए बलरामजी भगवान् श्रीकृष्ण के साथ गोकुल मे लौट पाये ॥३८॥ सवाँ अध्याय तयोविहरतोरेवं रामकेदावयोवजे। प्रावृह व्यतीता विकमत्मरोजा चाभवच्छरत् ॥१

कुमुदश्शरदम्मासि योग्यतारमण ययुः।
तारकाविमले व्योम्नि रराजावटमाटलः ।
बह्वलम्बममत्वेन हृदयानीव देहिनाम् ।।५.
पञ्चम अंश-अ०५ ]
अवापुस्तापमत्यर्थ गर्यः पल्वलोदके ।
पुत्रक्षेत्रादिसक्तेन ममत्वेन यया गृहीर
मयूरा मौनमातस्थु परित्यक्तमदा बने।
असारता परिज्ञाय समारस्येव योगिनः
उत्सृज्य जलसर्वस्वं विमलास्मितमूर्तयः ।
तत्यजुश्चाम्बरं मेघा गृह विज्ञानिनो यया ॥
शरत्सूर्यांशुतप्तानि ययुश्शोप मरामि च ।
अववोधर्मनासीव समत्वममताननाम् ॥६
चन्द्रश्वरमदेहात्मा योगी साधुको
त्या.

1 १८० ] [ श्रीविष्णु पुराण संस्तूयमानो गोपैस्तु रामा दैत्ये निपातिते । प्रलम्बे सह कृष्णेन पुनर्गोकुलमाययो ॥३८ हे अनन्त मूर्ते । सम्पूर्ण चराचर जगत् को धारण करने वाली पृथिवी के आप ही धारण करने वाले हैं । आप ही अजन्मा निमेपादि काल रूप होकर सत्ययुग आदि के भेद से इस विश्व का स्वय ही ग्रास कर लेते है ॥२६॥ जैसे बडवानल का जलवायु के द्वारा हिमालय पर पहुंच कर बर्फ बन जाता है और सूर्य-रश्मियो के सयोग से पिघल कर पुन जल रूप होता है, वैसे ही यह विश्व आपके द्वारा सहार को प्राप्त होकर आपके ही आश्रय में रहता है और जब आप पुन सृष्टि करने मे तत्पर होते हैं, तब यह स्यूल विश्व रूप हो जाता है ॥३०-३१॥ हे विश्वात्मन् । आप और मैं दोनो ही इस विश्व के अकेले कारण हैं और लोकहित के लिये ही हमने पृथक्-पृथक् रूप धारण किया है ॥३२॥ इसलिये प्राप अपने यथार्थ रूप को याद करिये और मानव-भाव के प्राश्रय में ही इम दैत्य का वध करके जनहित को सिद्ध कीजिये ।।३३।। श्री पराशरजी ने कहा- महात्मा श्रीकृष्ण ने जब उन्हे इस प्रकार याद दिलाई, तब महाबली बलरामजी ने हमकर प्रलम्बासुर को पीडित करना आरम्भ किया ॥३४॥ उन्होने क्रोध पूर्वक लोहित वर्ण के नेत्र करके उसके शिर पर मुष्टिका से प्रहार किया, जिसमे पाहत होने पर उसके दोनो नेत्र बाहर की ओर निकल पडे ॥३५॥ फिर मस्तिष्क के फटने से वह महादैत्य रुधिर वमन करता हुआ धरती पर गिर मृत्यु को प्राप्त हुप्रा ।।१६।। अद्भुत कर्म वाले बलरामजी के द्वारा प्रलम्बासुर का वध हुआ देखकर सभी गोप उन्हे साधुवाद देने लगे ॥३७॥ प्रलम्बासुर के मरने पर गोपों द्वारा प्रशसित होते हुए बलरामजी भगवान् श्रीकृष्ण के साथ गोकुल मे लौट पाये ॥३८॥ दमयाँ अध्याय तयोविहरतोरेव रामकेशवयोनजे । प्रावृड, व्यतीता विकसत्सरोजा चाभवच्छरत् ।।१

पञ्चम अंग-०५ ]
अवापुस्तापमत्यर्थ शफयंः पल्वलोदके।
पुरक्षेत्रादिसवतेन ममत्वेन यथा गृहीर
मयूरा मोनमातस्यु परित्यक्तमदा बने।
प्रसारता परिशाय मंमारस्येव योगिनः ॥३
उत्सृज्य जलसर्वस्वं विमलास्मितमूर्तयः ।
तत्यजुधाम्बरं मेघा गृह विज्ञानिनो यया ॥४
भरत्यूर्यागुतप्तानि ययुरशीप सरामि च ।
बहलम्बममत्वेन हृदयानीय देहिनाम् ।।५
पुमुदशरदम्भांसि योग्यतालक्षारण ययुः ।
प्रयवोधनामीय समस्यममलात्मनाम् ।।६
तारकाविमले व्याम्नि रराजागण्यमानः ।
पन्द्रभारमटेडारमा योगी साधाले यया ।।

१८२ ॥ [ श्रीविष्णु पुराण पूर्व त्यक्तं सरोऽम्भोभिर्हसा योगं पुनर्ययुः । क्लेश कुयोगिनोऽशेपरन्तरायहता इव IIE निभृतोऽभवदत्यर्थ समुद्रः स्तिमितोदकः । क्रमावाप्तमहायोगो निश्चलात्मा यथा यतिः ॥१० सर्वशतिप्रसन्नानि सलिलानि तथाभवन् । ज्ञाते सर्वगते विष्णौ मनासीव सुमेधसाम् ॥११ बभूव निर्मलं व्योम शरदा ध्वस्ततोयदम् । योगाग्निदग्धक्लेशोघ योगिनामिव मानसम् ।।१२ सूर्याशुज नितं ताप निन्ये तारापतिः शमम् । अहंमानोद्भव दु.खं विवेकः सुमहानिव ॥१३ नभसोऽब्द भुवः पङ्घ कालुष्यं चाम्भसश्शरत् । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेम्यः प्रत्याहार इवाहरत् ।।१४ प्राणायाम एवाम्भोभिस्सरसां कृतपूरकः । अभ्यस्यतेऽनुदिवस रेचकाकुम्भकादिमिः ॥१५ जैसे विवेकी पुरुष पुत्र और वैभव मे बढते हुए ममत्व को धीरे-धीरे छोड़ देते हैं, वैसे ही जलाशयो का जल भी अपने किनारो को धीरे-धीरे त्यागने लगा ||11 जैसे विघ्नो से विचलित हुए कुयोगियो को क्लेशो की पुनः प्राप्ति होती है, वैसे ही पूर्व मे त्यागे हुए सरोवर के जल से हस पुनः मिल गये ||६|| जैसे महायोग की उपलब्धि पर यति निश्चलात्मा हो जाता है, वैसे ही जल पी स्थिरता से समुद्र निश्चल हो गया ॥१०॥ जैसे भगवान विष्णु का ज्ञान होने पर शानियों के चित्त स्वच्छ हो जाते हैं, वैसे ही शरद् ऋतु को प्राप्त होकर जलाशयो का जल स्वच्छ हो गया ॥११॥ जैसे योगाग्नि द्वारा नष्ट क्लेश योगियो के चित्त स्वच्छ हो जाते हैं. वैसे ही मेघो के न रहने से प्राकारा स्वच्छ हो गया ॥१२॥ जैसे महकार से उत्पन्न हुए दुःख वो शालि विवेक से हो जाती है, वैसे ही चन्द्रमा से मूर्य रश्मियो से उत्पन्न ताप को शान्ति होगई ॥१३॥ जैसे इन्द्रियो के विषयो को प्रत्याहार दूर कर देता है. वैसे ही माकाश से बादलो को, पृथिवी धूलि को और जल से मल को शरद् काल ने उपस्थित होकर दूर कर दिया पञ्चम प्रश-०१० [ १८३ है ।।१४। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि सरोवरो के जल पूरक करके अव कुम्भक और रेचक किया करते हुए प्राणायाम के अभ्यास में लगे है ॥१५॥ विमलाम्बरनक्षने काले चाभ्यागते बजे। ददर्शेन्द्रमहारम्भायोद्यतास्तान्व्रजौकस ||१६ कृष्णस्तानुत्सुकान्दृष्ट्वा गोपानुत्सवलालसान् । कौतूहलादिद वाक्य प्राह वृद्धान्महामति ।।१७ कोऽय शक्रमखो नाम येन वो हर्ष आगत । प्राह त नन्दगोपश्च पृच्छन्तमतिसादरम् ।।१८ मेघाना पयसा चेशो देवराजश्शतक्रतु । तेन सञ्चोदिता मेघा वपत्त्यम्बुमय रसम् ।।१६ तवृष्टिजनित सस्य वयमन्ये च देहिन । वर्त्तयामोपयुञ्जानास्तर्पयामश्च देवता ॥२० क्षीरवत्य इमा गावो वत्सवत्यश्च तिता । तेन सद्धिस्सिस्यस्तुष्टा पुष्टा भवन्ति वै ।।२१ नासस्या नातृणा भूमिर्न बुभुतादितो जन । दृश्यते यन दृश्यन्ते वृप्टिमन्तो वलाहका ॥२२ भौममेतत्पयो दुग्ध गोभि सूर्यस्य वारिदै । पर्जन्यस्सर्वलोक्स्योद्भवाय भुवि वर्षति ।।२३ तस्मात्प्रावृषि राजानस्सर्वे शक मुदा युता । मगंस्सुरेशमर्चन्ति वयमन्ये च मानवा ॥२४ इस प्रकार प्रजमएडल म जब भाकाश स्वच्छ हा गया पोर पर शाल पा प्रागमन हुमा तव श्रीकृष्ण ने सब ग्रजवासियो को इन्द्रातराय की संपारी में लगे हुए देसा ॥१६॥ उन गोपो को उत्मय को उमग म भर हुए दंग पर श्री पपा ने मपने वृद्धजनो से कौतूहल पूर्वक पूछा ॥१७॥ पाप लोग जिसे परने के लिये इतने उत्माहित हैं, वह इन्द्रया पंगा होगा? मादर सहित एमा प्रश्न किये जाने पर नन्दजी ने उनसे कहा ॥१८॥ नन्द गोप बोले- मेष और जल दोनो थे ही स्वामी इन्द्र है, उन्ही की प्रेरणा में मेप उल रूप रस की दृष्टि १८४ ] श्रीविष्णु पुराण करते है ॥१६॥ हम तथा अन्य प्राणी वर्षा से प्राप्त हुए अन्न का ही व्यवहार करते हैं। उमका स्वयं उपभोग करते और उसी से देवताओं को तृप्त करते हैं ॥२०॥ वृष्टि-जल से वृद्धि को प्राप्त हुए तृण से ही यह गौए तृप्ति और पुष्टि को प्राप्त करती है। उसी से बछडो वाली और दुधारू होती हैं ॥२१॥ जिस भूमि पर वर्पणशील बादल दिखाई देते हैं, वहाँ अन्न या घास की कमी नहीं होतो जिससे वहाँ क्षुधा से किसी को भी पीडित नही होना होता है ॥२२॥ यह इन्द्र ही सूर्य रश्मियो के द्वारा पृथिवी के जल को सीधते और मेघो के द्वारा उसी जल को पुनः पृथिवी पर बरसाते हैं ॥२३॥ इसीलिये सब राजा लोग, हम तथा अन्य सब मनुष्य यज्ञो के द्वारा इन्द्र का ही प्रसन्नता पूर्वक पूजन किया करते है ॥२४॥ नन्दगोपस्य वचनं श्रु त्वेत्थं शक्रपूजने । रोपाय त्रिदशेन्द्रस्य प्राह दामोदरस्तदा ॥२५ न वय कृषिकर्तारो वाणिज्याजीविनो न च । गावोऽस्मद्देवतं तात वय वनचरा यतः ॥२६ आन्वीक्षिकी त्रयो वार्तादण्डनीतिस्तथा परा। विद्याचतुष्टयं चैतद्वार्तामात्र शृणुष्व मे ॥२७ कृषिर्वरिणज्या तद्वच्च तृतीय पशुपालनम् । विद्या ह्य का महाभाग वार्ता बृत्तित्रयाश्रया ॥२८ कर्षकारणां कृषिवृत्तिः पण्यं विपरिणजीविनाम् । अस्माकं गौः परा वृत्तिर्वार्ता भेदैरियं विभि २६ विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा दवत महत् । सैव पूज्यार्चनी सैव तस्योपकारिका ॥३० यो यस्य फलमश्नन्धौ पूजयत्यपर नरः। इह च प्रेत्य चंवासौ न तदाप्नोति शोभनम् ॥३१ कृप्यान्ता प्रथिता सीमा सोमान्तं च पुनर्वनम् । वनान्ता गिरयस्सर्ने ते चास्माकं परा गतिः ॥३२ पञ्चम अंश-अ० १. न द्वारबन्धावरणा न गृहक्षेत्रिणस्तथा। सुखिनस्त्वखिले लोके यथा मै चक्रचारिणः ॥३३ श्री पराशरजी ने कहा-इन्द्र के पूजन विषयक यह विचार सुनकर भगवान् दामोदर ने इन्द्र को रुष्ट करने के विचार से ही नदजी के प्रति कहा ॥२॥ हे तात ! हम न तो कृषि जीवी है, न वाणिज्य जीवी, हम वनचरो के देवता तो यह गोएं ही है ॥२६॥ तक, कर्मकाण्ड, दण्डनीति प्रौर वार्ता- यह चार विद्याएँ कही जाती हैं, इनमे से केवल वार्ता के विषय मे ही आप से पहता हूं, उसे सुनिये ॥२७॥ हे महाभाग ! कृपि, वारि ज्य और पशु पालन रूप तीनो वृत्तियो की पाश्रय भूता वार्ता नाम की विद्या ही है ॥२८॥ वार्ता के इन तीनो भेदो के कारण किसानो की वृत्ति कृषि, व्यापारियो की वृत्ति वाणिज्य और हमारी वृत्ति गोपालन है ॥२६॥ जो व्यक्ति जिस विधा को वृत्ति को करता है, उसकी इष्ट देवता वही विद्या है, उसे अपनी उस परम उपवारिणी विद्या पो ही पूजन करना चाहिये ॥३०॥ एष देवता से फल-लाभ करके दूसरे देवता या पूजन करने वाले मनुष्य के इहलोक पौर परलोक दोनो ही बिगड जाते हैं ॥३१॥ खेतो को समाप्ति पर सीमा माती है और सीमा के पन्त होने पर वन पाता है और जब पन भी समाप्त हो जाता है, तव पवंत पाते हैं, इस. लिये पर्वत ही हमारे लिये तो परमगति स्वरूप हैं ॥३२॥ हम न तो घर की भीत मे रहते हैं, न विवाढ लगाते हैं और न पर या सेत वाले ही हैं, हम तो भ्रमणशील मुनियो थे समान ही अपने जनो के समाज मे सुख से रहते हैं ॥३३॥ श्रूयन्ते गिरयश्चय वनेऽस्मिन्यामरूपिणः । तत्तदू प समास्थाय रमन्ते स्वेपु सानुपु ॥३४ यदा चतैःप्रवाध्यन्ते तेपा ये काननौकस.। तदा सिंहादिस्पस्तान्धातयन्ति महीधरा ३५ । गिरियज्ञस्त्वय तस्माद्गोयज्ञश्च प्रवत्यंताम् ।। विमम्माक महेन्द्र गा गावशं लाश्च देवताः ॥३६ मन्त्रयशपरा विप्राम्मोरयज्ञान यपंकाः । गिरिगोयजशीलाश्च ययमद्रियनाश्रया. ॥३७ १५६ ] [ श्रीविष्णु पुराण तस्माद्गोवर्धनशैलो भवद्भिविविधाहणः । अयंता पूज्यतां मेध्यान्पशून्हत्वा विधानतः ॥३८ सर्वघोपस्य सन्दोहो गृह्यता मा विचार्यताम् । भोज्यन्तां तेन ने विप्रास्तथा ये वाभिवाञ्छकाः ॥३६ • ताचिते कृते होमे भोजितेपु द्विजातिषु । शरत्पुष्पकृतापीडाः परिगच्छन्तु गोगरगा. ४० एतन्मम मतं गोपास्सम्प्रीत्या क्रियते यदि । ततः कृता भवेत्प्रोतिर्गवामद्रेस्तथा मम ।।४१ सुनते हैं कि इस वन के पर्वत इच्छित रूप धारण करके अपने-अपने मस्तक पर विहार करते रहते हैं ॥३४॥ जब कोई वनवास इन पर्वत देवतामों के विहार में किसी प्रकार वाधक होते हैं, तब यह सिंहादि रूप को धारण करके उनकी हत्या कर डालते हैं ॥३॥ इसलिये माज से गिरियज्ञ अथवा गोयज्ञ करने की तैयारी करिये । हमारे देवता तो पर्वत और गौए ही हैं, इन्द्र से हमें क्या लेना है ? ॥३६॥ विप्रगरण मंत्र यज्ञ और कृपकगण सीर यज्ञ करते हैं, इसलिये हम पर्नतों और वनो में निवास करने वालों के लिये तो गिरियश अथवा गोयज्ञ करना ही श्रेयस्कर है ॥३७॥ इसलिये भाप मेध्य बलि देकर विविध पदार्थों के द्वारा विधि पूर्वक गोवर्धन पर्वत का पूजन करिये ॥३८॥ आज ही प्राम प्रज भर का सब दूध इकट्ठा करके उससे ब्राह्मणो और भिखा. रियो को भोजन कराइये, इस विषय मे अधिक विचार की आवश्यकता नहीं है ॥३६॥ गोवर्धन का पूजन, हवन और ब्राह्मण भोजन की समाप्ति पर शरत्का. लीन पुष्षो से सुशोभित मस्तक वालो गौएँ गोवर्धन की प्रदक्षिणा करें।॥४०॥ हे गोपो ! यदि आप मेरे इस मत का अनुसरण करेंगे तो मुझे, गोवर्धन पर्वत को मार गौग्रो को इससे अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होगी ॥४१॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा नन्दाद्यास्तै व्रजौकसः । प्रीत्युत्फुल्लमुखा गोपास्साधु साध्वित्यथा वन् ॥४२ शोभन ते मत वत्स यदेतद्भवतोदितम् । तत्करिष्यामहे सर्व गिरियज्ञः प्रवत्यताम् ॥४३

ञ्चपम अश-अ १० ]
तथा च कृतवन्तस्ते गिरियज्ञ व्रजौकस ।
दधिपायसमासाद्य ददुश्शलवलि तत ।।४४
द्विजाश्च भोजयामासुश्शतशोऽथ सहस्रश ॥४५
पावशैल ततश्चक्रुरचितास्ता प्रदक्षिणम् ।
वृपभाश्वातिनदन्तस्सतोया जलदा इव ॥४६
गिरिमूद्ध नि कृष्णोऽहमिति मूर्तिमान् ।
बुभुजेऽन्न वहुतर गोपवर्याहृत द्विज 11४७
स्वेनैव कृष्णो रूपेण मोपेस्सह गिरेश्शिर ।
अधिरह्मार्चयामास द्वितीयामात्मनस्तनुम् ।।४८
अन्तर्धान गते तस्मिन्गोपा लब्ध्वा ततो वरान् ।
कृत्वा गिरिमख गोष्ठ निजमभ्याययु पुन ॥४६
श्री पराशरजी ने कहा-श्रीकृष्ण ने ऐसे वचन सुनकर नन्दादि गोपी
ने प्रसन्नता से प्रफुल्लिरा हुए मुख से उ हे साधु वाद दिया ॥४२॥ ये कहने लगे-
हे वत्स ! तुम्हारा विचार प्रत्युत्तम है, हम सब उसी के अनुसार करेंगे। अब
हम गिरियज्ञ का प्रवर्तन करेंगे ॥४३॥ फिर उन सब व्रजवासियो ने गिरियज्ञ
प्रारभ किया और पर्वतराज गोवर्धन को दही, खीर मादि पदार्थों से पलि
दी ॥४४॥ सैक्डो हजार ग्राह्मणो को भोजन कराने के पश्चात् पुष्पादि से सजी
हुई गौमो और जलयुक्त मेघा के समान गर्जनशील वैलो ने गिरि गोवर्धन की
परिक्रमा को ।।४५-४६॥ हे द्विज | उस समय गिरिराज के शिखर पर प्रन्य
रूप से मूर्तिमान हुए श्रीकृष्ण ने गोपो द्वारा अपित विविध भोजन सामग्री को
ग्रहण क्यिा ।।४७॥ गोपो के साथ गिरिराज के शिखर पर चढ कर भगवान्
श्रीपप्ण ने अपने ही द्वितीय स्वरूप की पूजा की ॥४८॥ इस प्रकार गिरिया
की समाप्ति पर उनसे अपना इच्छित वर प्राप्त करके सभी गोपगए। उनके मन्त-
र्धान होने के पश्चात् मपने मपने गोप्टो में चले गये ॥४६॥

[ श्रीविष्णु पुराण
ग्यारहवाँ अध्याय
मखे प्रतिहते शक्रो मैत्रेयातिरुपान्वित ।
सवतंक नाम गरण तोयदानामथाववीत् ॥१
भो भो मेघा निशम्यतद्वचन गदतो मम ।
आशानन्तरमेवाशु क्रियतामविचारितम् ।।
नन्दगोपस्सुदुर्बुद्धि!पैरन्यस्सहायवान् ।
कृष्णाश्रयवलाध्मातो मखभङ्गमचीकरत् ॥३
आजीवो या परस्तेषा गावस्तस्य च कारणम् ।
ता गावो वृष्टिवातेन पीड्यन्ता वचनान्मम ॥४
अहमप्यद्रिशृङ्गाभ तुङ्गमारुह्य वारणम् ।
साहाय्य व करिष्यामि वाय्वम्वूत्सर्गयोजितम् ॥५
इत्याज्ञतास्ततस्तेन मुमुचुस्ते बलाहका ।
सातवर्ष महाभीममभावाय गवा द्विज ।।६
तत क्षणेन पृथिवी ककुभोऽम्बग्मेव च ।
एक धारामहासारपूरणेनाभवन्मुने ॥७
विद्युल्लताकशाघातस्तैरिव धनैर्धनम् ।
नादापूरितदिक्चरर्धारासारमपात्यत ।
श्री पराशरजी ने कहा-हे मैनेयजी । अपने यज्ञ के इस प्रकार रुकने
से इन्द्र को प्रत्ययत क्रोध हुअा और सवर्तक नामक अपने मेघो से कहने लगा
॥१॥ हे मेघगगग | मेरा वचन सुन कर तुम मेरी आज्ञा पर बिना किसी प्रकार
का सोच विचार करके तुरत उसका पालन करो ।।२।। दुर्बुद्धि नन्द ने कृष्ण के
प्रवलम्ब से अन्य सब गोपो के सहित मेरे यज्ञ को नष्ट कर दिया है ॥३।। इस.
लिय उनकी परम जीविका और गोपत्व के कारण रूप गोप्रो को वृष्टि और
पवन के द्वारा उत्पीडित करो ॥४॥ मैं भी अपने पूर्णताकार ऐरावत पर चढकर
जल और पवन के प्रयोग के समय तुम्हारा सहायक होउंगा ॥1॥ श्री पराशरजी
ने कहा- हे द्विज' इन्द्र की भाशा प्राप्त करके उन मेघा ने गोप्रो का क्षय करने

प-चम प्रश-अ० ११ ] [ १८६ के लिये वर्षा और वायु का प्रयोग किया ॥६॥ हे मुने । मेघो द्वारा प्रयुक्त महान् जल धारापो से यह पृथिवी, दिशाएँ और आकाश क्षण भर मे ही जल से परिपूर्ण दिखाई देने लगे ॥७॥ उस समय ऐसा प्रतीत होता था जैसे विद्युत् रूपी लना का प्राघात होने के डर से भीत हुए मेघ अपने घोर गर्जन से सब दिशामो को गुजाते हुए घनघोर वृष्टि कर रहे हो ॥८॥ अन्धकारीकृते लोके वर्षद्भिरनिश घन । अधश्चोय च तिर्यक् च जगदाप्यमिवाभवत् || गावस्तु तेन पतता वर्षवातेन वेगिना। धूता : प्राणाञ्जहुस्सन्ननिकसक्थिशिरोधरा ॥१० मोडेन वत्सानाक्रम्य तस्थुरन्या महामुने । गावो विवत्साश्च कृता वारिपूरेण चापरा ॥११ वत्साश्च दीनवदना वातकम्मितकन्धरा । त्राहि त्राहीत्यल्पशब्दा कृष्णमूरिवातुरा ॥१२ ततस्तद्गाकुल सर्व गोगोपीगोपसकुलम् । अतीवात हरिदृष्ट्वा मंत्रयाचिन्तयत्तदा ॥१३ एतत्कृत महेन्द्र ण मखभङ्गविरोधिना । तदेतदखिल गोष्ठ तव्यमधुना मया ॥१४ इमम द्रिमह धैर्यादुत्पाट्योरशिलाधनम् । धारयिष्यामि गोष्ठस्य पृथुच्छयमिवोपरि ॥१५ इस प्रकार रान दिन निरतर जल वृष्टि और विश्व के अधकारमय हो जाने पर ऊपर, नीचे, इधर, उधर सर्वत्र ही यह सब पोय जल रूप ही होगया 1 पोर वर्षा भौर प्रचड यापु के वेगपूर्णर पलने से गोप्रो वे सर्वांग-पटि, जपा, प्रीवा मादि निश्चेष्ट होगये और वे यम्पायमान होती हुई प्राण त्याग परती हुई सी प्रतीत होने लगी ॥१०॥ है महामुा । किमी गी ने तो अपने परडे यो नीचे पररे तक किया और वोई-कोई जल ये वेग के पारण अपने बछडे से ही निह गई ॥११॥ दीन शरीर याने बछडे वायु पे येग मे सम्पाय- मान होते हुए ध्यायुलता पूर्व पाहि पाहि पुरारन पगे ॥१२॥ हे मैत्रेयजी !

१६० ] [ श्रीविष्णु पुराण उस समय गोमो, गोपियो और गोपों के सहित गोकुल को प्रत्यत व्यग्रावस्था में देख कर भगवान् श्री हरि विचार करने लगे ॥१३॥ यज्ञ-भग होने के विरोध में इन्द्र ही यह सब कर्म कर रहा है, इसलिये मुझे भी इस व्रज की रक्षा का उपाय करना चाहिये ॥१४॥ अव में विशाल शिलानी वाले इस महान पर्वत को उखाड कर इससे एक बृहद् छत्र के समान ब्रज को ढक लूंगा ॥१५॥ इति कृत्वा मति कृष्णो गोवर्धनमहीधरम् । उत्पाट्यककरणव धारयामास लीलया ॥१६ गोपाश्चाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधर । विशन्धमत्र त्वरिता कृतं वर्पनिवारणम् ॥१७ सुनिवातेषु देशेषु यथा जोपमिहास्यताम् । प्रविश्यता न भेतव्य गिरिपाताच निर्भय ॥१८ इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्योधनस्सह । शकटारोपितर्भाण्डर्गोप्यश्चासारपीडिता ॥१६ कृष्णोऽपि त दघारव शैलमत्यन्तनिश्चलम् । व्रजैक्रवासिभिहर्ष विस्मिताक्षनिरीक्षित २० गोपगोपीजनैहष्ट प्रीतिविस्तारितेक्षण । सस्तूयमानचरित कृष्णशैलमधारयत् ॥२१ समरान महामेघा वव'नन्दगोकुले। इन्द्र ण चोदिता विप्र गौपाना नाशकारिणा ॥२२ ततो धृते महाशले परिवाते च गोकुले। मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्धनान् ॥२३ व्यने नभसि देवेन्द्र वितथात्मवचस्यथ । निष्क्रम्य गोकुल हृष्ट स्वस्थान पुनरागमः ॥२४ मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम् । स्वस्थाने विस्मितमुखदृष्टस्तैस्तु प्रजोकस ॥२५ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार विचार करके भगवान् श्रीकृष्ण ने मोवर्धन पर्वत को उखाड कर लीला पूर्वक ही अपने एर हाथ पर रख लिया me पत्रम अश-प्र. १२ ] [ १६१ । ॥१६॥ पर्वत को उखाड लेने के पश्चात् उन्होंने सब गोपों से हंसते हुए कहा- पाप सब लोग इस पर्वत के नीचे आ जाइये मैंने वर्षा से बचने के लिये ही यह उपाय किया है ॥१७॥ इस निर्वात स्थान मे निर्भय होकर घुस आनो और सुख पूर्वक बैठो । पर्वत के गिरने की प्राशका न करो ॥१८।। श्रीकृष्ण की यह बात सुन कर जलधार मे प्रस्त हुए गोप-गोपिकाएं अपने वर्तनो को छकडो मे लाद कर और गौमो को भी साथ लेकर पर्वत के नीचे आ गये ॥१६॥ सभी ब्रज- वासी श्रीकृष्ण को हर्ष और पाश्चर्य मिश्रित दृष्टि से एकटक देख रहे थे और वह भी निश्चल भाव से खडे रह कर पर्वत को धारण किये रहे ॥२०॥ पर्वत- धारण करते हुए श्रीकृष्ण प्रीति पूर्वक विस्फारित नेत्रों वाले हपित चित्त गोप- गोपियो से अपने चरित्र का स्तवन सुनते रहे ।।२१॥ हे विप्र ! गोपो के नाश की कामना वाले इन्द्र की प्रेरणा से नन्द के गोकुल में सात रात तक घनघोर वर्षा होती रही ॥२२॥ परंतु श्रीकृष्ण द्वारा गिरिराज के धारण किये जाने से जब उसने अपनी प्रतिज्ञा को भंग होते देखा तब उसने अपने मेघों को निवारण किया ॥२३॥ जब आकाश बादलो से हीन एव स्वच्छ हो गया, तब इन्द्र की प्रतिज्ञा के टूटने पर सभी गोकुल निवासी पर्वत से निकल कर सहपं अपने-अपने स्थान पर आये ॥२४॥ फिर उन ग्रजवासियो के आश्चर्य सहित देखते हुए श्रीकृष्ण ने उस महाचल गोवर्धन को उसके अपने स्थान पर स्थापित कर दिया ॥२५॥ बारहवाँ अध्याय धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले। रोचयामास कृष्णस्य दर्शन पाकशासन ॥१ सोऽधिरुह्य महानागमरावतममित्रजित् । गोवर्धनगिरी कृष्णं ददर्श विदशेश्वरः ।।२ चारयन्त महावीर्य गास्तु गोपवपुर्धरम् । कृत्स्नस्य जगतो गोप वृतं गोपकुमारकः ।।

१६० ] [ श्रीविष्णु पुराण उस समय गौओं, गोपियों और गोपों के सहित गोकुल को प्रत्यंत व्यग्रावस्था में देख कर भगवान् श्री हरि विचार करने लगे ॥१३॥ यज्ञ-मंग होने के विरोध मे इन्द्र ही यह सब कर्म कर रहा है, इसलिये मुझे भी इस व्रज की रक्षा का उपाय करना चाहिपे ॥१४]अव में विशात शिलानों वाले इस महान पर्वत को उखाड़ कर इससे एक बृहद् छन के समान व्रज को ढक लूंगा ॥१५॥ इति कृत्वा मति कृष्णो गोवर्धनमहीधरम् । उत्साट्यककरणव धारयामास लीलया ॥१६ गोपांचाह हसञ्छौरिस्समुत्पाटितभूधरः । विशवमत्र त्वरिताः कृतं वर्षनिवारणम् ॥१७ सुनिवातेषु देशेषु यथा जोपमिहास्यताम् । प्रविश्यतां न भेतव्यं गिरिपाताच निर्भयं. ॥१८ इत्युक्तास्तेन ते गोपा विविशुर्गोधनस्सह । शकटारोपितर्भाण्डेर्गोप्यश्चासारपीडिता: १६ कृष्णोऽपि तं दधारव शलमत्यन्तनिश्चलम् । व्रजैक्रवासिभिहप विस्मिताक्षनिरीक्षितः ।।२० गोपगोपीजनहष्टः प्रीति विस्तारितेक्षणः । संस्तूयमानचरितः कृष्णशैलमधारयत् ॥२१ सप्तरात्र महामेघा वव'नन्दगोकुले। इन्द्रोण चोदिता विप्र गोपानां नाशकारिणा ॥२२ ततो धृते महाशंले परिवाते च गोकुले। मिथ्याप्रतिज्ञो बलभिद्वारयामास तान्धनान् ॥२३ व्यभ्र नभसि देवेन्द्र वितथात्मवचस्यय । निष्क्रम्य गोकुलं हृष्टं स्वस्थानं पुनरागमत् ॥२४ मुमोच कृष्णोऽपि तदा गोवर्धनमहाचलम् । स्वस्थाने विस्मितमुखंडे टस्तस्तु प्रजौकसः ॥२५ नी पराशरजी ने कहा- इस प्रकार विकार करके भगवान श्रीकृष्ण मौवर्धन पर्वत को उखाड़ कर लीला पूर्वक ही अपने एक हाथ पर रख लिया पञ्चम अश-५०१२ ] [ १६१ ॥१६॥ पर्वत को उखाड लेने के पश्चात् उन्होंने सब गोपो से हंसते हुए कहा- आप सब लोग इस पर्वन के नीचे प्रा जाइये मैंने वर्षा से बचने के लिये ही यह उपाय किया है ॥१७॥ इस निर्वात स्थान मे निर्भय होकर घुस पायो और मुख पूर्वक बैठो । पर्वत के गिरने की प्राशका न फरो॥१८॥ श्रीकृष्ण की यह बात सुन कर जलधार मे त्रस्त हुए गोप-गोपिकाए अपने वर्तनो को छकडो मे लाद कर और गोरो को भी साथ लेकर पर्वत के नीचे आ गये ॥१६॥ सभी ब्रज- पासी श्रीकृष्ण को हर्ष और आश्चर्य मिश्रित दृष्टि से एकटफ देख रहे थे और वह भी निश्चल भाव से खडे रह कर पर्वत को धारण किये रहे ।।२०। पर्वत- धारण करते हुए श्रीकृष्ण प्रीति पूर्वक विस्फारित नेत्रो वाले हपित चित्त गोप- गोपियो से अपने चरित्र का स्तवन सुनते रहे ॥२१॥ हे विप्र | गोपो के नादा की कामना वाले इन्द्र की प्रेरणा से नन्द के गोकुल मे सात रात तक घनघोर वर्षा होती रही ।।२२।। परंतु श्रीकृष्ण द्वारा गिरिराज के धारण किये जाने से जब उसने अपनी प्रतिज्ञा को भग होते देखा तब उसने अपने मेघो को निवारण किया ॥२३॥ जव आकाश बादलो से हीन एव स्वच्छ हो गया, तब इन्द्र को प्रतिज्ञा के टूटने पर सभी गोकुल निवासी पर्वत से निकल कर सहर्प अपने-अपने स्थान पर प्राये ॥२४॥ फिर उन व्रजवासियो के आश्चर्य सहित देखते हुए श्रीकृष्ण ने उस महाचल गोवर्धन को उसके अपने स्थान पर स्थापित कर दिया ॥२५॥ बारहवाँ अध्याय धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले। रोचयामास कृष्णस्य दर्शन पाफशासनः ॥१ सोऽधिरुह्य महानागमैरावतममित्रजित् । गोवर्धनगिरी कृष्णं ददर्श निदशेश्वरः ॥२ चारयन्तं महावीर्य गास्तु गोपवपुर्धरम् । कृत्स्नस्य जगतो गोप वृतं गोपकुमारकः ॥३ १६२ 1 [ श्रीविष्णु पुराण . गरुडं च ददर्शोच्चरन्तद्धनगतं द्विज । कृतच्छायं हरेमूनि पक्षाच्या पक्षिपुङ्गवम् ॥४ अवरुह्य स नागेन्द्रादेकान्ते मधुसूदनम् । शकस्सस्मितमाहेद प्रीतिविस्तारितेक्षण ॥५ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार गोवर्धन पर्वत धारण पूर्वक गोकुल की रक्षा करने के कारण श्रीकृ ण के दर्शन की इन्द्र ने इच्छा को ॥१॥ इसलिये शत्रुओ के विजेता इन्द्र अपने ऐरावत पर मारूढ होकर गिरि गोवर्धन पर पाये और वहाँ उन्होने सम्पूर्ण संसार की रक्षा करने वाले श्रीकृष्ण को ग्वाल-बालों के साथ गोपवेश में गोचारण करते हुए देखा ॥२.३॥ उस समय उन्हे पक्षिराज गरुड अपने पखों से उनके ऊपर अदृश्य रूप से छाया करते हुए दिखाई दिये ॥४॥ फिर वे ऐरावत से नीचे उतर कर श्रीकृष्ण की ओर बढ़े और एकान्त में उनको प्रीति पूर्वक देखते हुए कहने लगे ॥३॥ कृष्ण कृष्ण शृणुष्वेद यदर्थमहमागतः । त्वत्समीप महाबाहो नंतचिन्त्य त्वयान्यथा ।।६ भारावतारणार्थाय पृथिव्याः पृथिवीतले। अवतीर्णोऽखिलाधार त्वमेव परमेश्वर ॥७ मखभङ्गविरोधेन मया गोकुलनाशकाः । समादिष्टा महोमेघास्तैश्चेद कदनं कृतम् ।।८ जातास्ताश्चत्वया गावस्समुत्पाट्य महीधरम् । तेनाह तोपितो वीर कर्मणात्यद्भुतेन ते 16 साधितं कृष्ण देवानामह मन्ये प्रयोजनम् । त्वयायमद्रिप्रवरः करेणकेन यद्धृतः ।।१० गोभिश्च चोदितः कृष्ण त्वत्सकाशमिहागतः । त्वया प्राताभिरत्यर्थं युष्मत्सत्कारकारणात् ॥११ सत्यां कृष्णाभिपेक्ष्यामि गर्वा वाक्यप्रचोदितः। उपेन्द्रत्वे गवामिन्द्रो गोविन्दस्त्व भविष्यसि ।।१२ इन्द्र ने कहा है श्रीकृष्ण! हे कृष्ण ! आपके पास मेरै पाने का

पश्चम अंश-प्र० १२ ]]
[ १६३
श्रापन
पारण सुनिये । हे महाबाहो ! मेरे कथन को अन्यथा न माने ॥६॥ हे अखि-
लेश्वर ! पाप पृथिवी वा भार उतारने के लिये इस भूतल पर अवतीर्ण हुए
है ।।७। मेरे यज्ञ पे नष्ट होने के विरोध में ही मैंने महामघो को गोकुल का नष्ट
करने के लिये प्राज्ञा दी थी और इसीलिय उन्होन यह जल रूप सहार उपस्थित
किया था ।।८॥ परन्तु, अापने पर्वत को उखाड कर गोपो को थानी, मापक
इस अद्भुत पराक्रम को देखकर मै अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥६।। हे कृष्ण
अपने एक ही हाथ पर पर्वत को साध लिया था। प्रापके इस कर्म को देखकर
मैं देवताओ के उद्देश्य को सिद्ध हुआ समझता हू ।।१०।। अापके द्वारा रक्षित
हुई गोमो की प्रेरणा से ही आपको विशेप रूप से सम्मानित करने के लिये मैं
यहाँ उपस्थित हुआ हू ।।११।। हे कृष्ण | गौग्रो के वचनो से प्रेरित हुप्रा में
अब आपको उपेन्द्र पद पर अभिपित्त वरूगा । अब से माप गौग्रो के स्वामी
का गोबिन्द' नाम भी विख्यात होगा ।।१२।।
अथोपवाह्यादादाय घण्टामरावताद् गजात् ।
अभिषेक तया चक्र पवित्रजलपूर्णया ॥१३
नियमारणेऽभिषेके तु गाव कृष्णस्य तत्क्षणात् ।
प्रस्रवोद्भूतदुग्धार्दा सद्यश्च वसुन्धराम् ।।१४
अभिषिच्य गवा वाक्यादुपेन्द्र वै जनार्दनम् ।
प्रीत्या सप्रथय वाक्य पुनराह शचीपति ।।१५
गवामेतत्कृत वाक्य तथान्यदपि मे शृणु।
यद्रवीमि महाभाग भारावतरणेच्छया ।।१६
ममाश पुरुषव्याघ्र पृथिव्या पृथिवीधर ।
अवसीर्णोऽर्जुना नाम सरक्ष्यो भवता सदा ॥१७
भारावतरणे साह्य स ते वीर करिष्यति ।
सरक्षणीयो भवता यथात्मा मधुसूदन ।।१८
थो पराशरजी ने कहा-फिर अपने वाहन ऐरावत का घण्टा लेर
इन्द्र ने उसे पवित्र जल से परिपूर्ण किया और उससे श्रीकृष्ण का अभिषेक
विया ॥१३॥ जिस समय श्रीकृष्ण का अभिषेक हो रहा था, उस समय गौओ

१९४ ] [ श्रीविष्णु पुराण ने भी अपने स्तनो से सवित होने वाले दूध से पृथिवी वा सिंचन विया ॥१४॥ इस प्रकार गौग्रो के वचनानुसार इन्द्र ने श्रीकृष्ण को उपेन्द्र पद पर अभिषिक्त कर उनमे प्रीतिपूर्वक पुन निवेदन दिया ॥१५॥ हे महाभाग ' मैंने तो यह गोप्रो के वचनो का पालन किया है । अब भू-भार-हरण के अभिप्राय से मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे भी सुनिये ॥१६॥ हे भूधर ! हे पुरुप व्याघ । अर्जुन नाम से मेरा एक अंश पृथिवी पर अवतरित हुमा है, माप उसके सदा रक्षक रहे ॥१७॥ हे मधुसूदन | भूमि का भार उतारन म वह आपका सहायर होगा, इसलिये जैसे अपने शरीर की रक्षा की जाती है, वैसे ही पाप उसकी रक्षा करे ॥१॥ जानामि भारते वशे जात पार्थ तवाशत । तमह पालयिष्यामि यावत्स्थास्यामि भूतले ॥१६ यावन्महीतले शक स्थास्याम्यहमरिन्दम । न तावदर्जुन कश्चिदेवेन्द्र युधि जेष्यति ।।२० कसो नाम महाबाहुर्दैत्योऽरिष्टस्तथासुर । केशी कुवलयापीडो नरकाद्यास्तथा परे ॥२१ हतेपु तेषु देवेन्द्र भविष्यति महाहवः । तत्र विद्धि सहस्राक्ष भारावतरण कृतम् ॥२२ स त्व गच्छ न सन्ताप पुत्रार्थे कर्तुमर्हसि । नार्जुनस्य रिपु कश्चिन्ममाग्रे प्रभविष्यति ॥२३ अर्जुनार्थे त्वह मर्वान्युधिष्ठिरपुरोगमान् । निवृत्ते भारते युद्ध कुन्त्य दास्याम्यविक्षतान् ॥२४ इत्युक्त सम्परिष्वज्य देवराजो जनार्दनम् । पारुह्य रावत नाग पुनरेव दिव ययौ ॥२५ कृष्णो हि सहितो गोभिर्गोपालश्च पुनव्रजम् । आजगामाथ गोपीना दृष्टिपूतेन वर्त्मना ।।२६ श्री भगवान ने कहा -मुझे यह ज्ञात है कि वृथा पुत्र अर्जुन तुम्हारे प्रश से भरतवश म अवनीण हुप्रा है । जब तक मैं इस भूतल पर रहगा, तब पञ्चम अरा-अ० १३ ] [ १६५ तक उसकी रक्षा करूंगा १६॥ हे देवेन्द्र । मेरे पृथिवी पर रहते हुए उस मर्जुन को कोई भी मनुष्य सग्राम में न हरा सकेगा ॥२०॥ महावाहु कस, अरिष्ट, केशी, कुवलयापीड और नरक आदि असुरो के मारे जाने के पश्चात् इम पृथिवी पर महाभारत नामक युद्ध होगा। हे सहस्राक्ष ! उसी युद्ध के द्वारा भू- भार उतरा हुआ समझो ॥२१-२२॥ तुम अपने पुत्र अर्जुन के विषय में किसी प्रकार की चिन्ता न करते हुए प्रसन्न चित्त से गमन करो, मैं जब तक यहाँ हूँ, तब तक अर्जुन का कोई भी शत्रु सफल नहीं होगा ।।२३।। अर्जुन के निमित्त ही मैं महाभारत युद्ध की समाप्ति पर सब पाण्डवो को सकुशल रूप मे कुन्ती को सौंप दूंगा ॥२४॥ श्री पराशरजी ने कहा-श्रीकृष्ण के द्वारा इस प्रकार कहा जाने पर इन्द्र ने उनका प्रालिंगन किया और ऐरावत पर चढकर अपने लोक को गये ॥२५॥ फिर श्रीकृषण भी ग्वाल बालको और गोप्रो को साथ लिये प्रजाङ्गनामो के देखने से पवित्र हुए मार्ग द्वारा ब्रज मे लोट पाये ॥२६॥ तेरहवाँ अध्याय गते शक तु गोपाला कृष्णमक्लिष्टकारिणम् । ऊचुः प्रोत्या धृत दृष्ट्वा तेन गोवर्धनाचलम् ॥१ वयमस्मान्महाभाग भगवन्महतो भयात् । गावश्च भवता त्राता गिरिधारणकर्मणा ॥२ बालक्रीडेयमतुला गोपालत्व जुगुप्सितम्। दिव्य च भवतः कर्म किमेतत्तात कथ्यताम् ।।३ कालियो दमितस्तोये धेनुको विनियातित । धृता गोवर्धनश्चाय शङ्कितानि मनामि न ॥ सत्य सत्य हरे पादौ शपामोऽमितविक्रम । यथावट्ठीर्यमालोक्य न त्वा मन्यामहे नरम् ॥५ प्रीतिः सम्बावुमारस्य व्रजस्य त्वीय पंग । धर्म चेदमशक्य यत्समस्तै स्थिदशैरपि ॥६ १६६ ] [ श्रीविष्णु पुराण बालत्वं चातिबीयत्व जन्म चास्मास्वशोभनम् । चिन्त्यमानममेवात्मञ्छड्ा कृष्ण प्रयच्छति ।।७ देवो वा दानवो वा त्व यक्षो गन्धर्व एव वा। किमस्माक विचारेण बान्धवोऽसि नमोऽस्तु ते ॥ श्रीपराशरजी ने कहा-जव इन्द्र चले गये, तब निर्दोष कर्म वाले श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण किये जाने के कारण गोपों ने उनसे प्रेम- पूर्वक कहा ।।१।। हे भगवन् । हे महाभाग | अापने गिरिराज धारण का जो कर्म किया, उससे हमारी और गोप्रो की महान भय से रक्षा हुई है ॥२॥ कहाँ यह उपमा रहित वालक्रीडा, कहाँ यह निन्दिन गोपत्व और कहाँ यह दिव्य कर्म ? हे तात । वह क्या लीला है, सो सब हमारे प्रति कहिये ॥३॥ आपने कालियनाग का मर्दन किया, धेनुकासुर का वध किया और फिर इस गिरि गोव- धन को धारण कर लिया--आपके यह अद्भुत कर्म हमारे मन में शङ्का उत्पन्न कर रहे हैं ॥५॥ हे असीमित विक्रम वाले । भगवान हरि के चरणो को शपथ पूर्वक हम आपसे कहते हैं कि आपके ऐसे सामर्थ्य को देखकर आपको मनुष्य नहीं माना जा सकता ॥५॥ स्त्री-बालको के महित सभी व्रजवासी आपको अत्यन्त प्रेम करते हैं । हे केशव । आपके जैसा कर्म तो देवताओ के लिये भी सम्भव नहीं है ॥६॥ आपका यह बालकपन, यह अत्यन्त वीर्यत्व और हम जैसे अशोभन व्यक्तियो मे जन्म,-इन सब बातो पर जब हम विचार करने लगते हैं तव हे अमेयात्मन् । हम शङ्का मे पड जाते हैं ॥७॥ प्राप देवता, दानव, यक्ष अथवा गन्धर्व-काई भी हो, हमे इम पर विचार करने से क्या लाभ है ? हम तो आपको अपना बन्यु ही मानते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है | क्षण भूत्वा त्वसी तूष्णी किञ्चत्प्रणयकोपवान् । इत्येवमुक्तस्तंर्गोपे कृष्णोऽप्याह महामतिः 16 मत्सम्बन्धेन वो गोपा यदि ला न जायते । श्लाघ्यो वाह तत कि वो विचारेण प्रयोजनम् ॥१० यदि वोऽस्ति मयि प्रोति. श्लाघ्योह भवता यदि । तदात्मवन्धुसदृशी बुद्धिवः क्रियता मयि ॥११ पञ्चम अश-अ० १३ ] [ १९७ नाह देवो न गन्धर्वो न यक्षो न च दानव । अह वो वान्धवो जातो नैतच्चिन्त्यमितोऽन्यथा ॥१२ इति श्रुत्वा हरेर्वाक्य बद्धमौनास्ततो वनम् । ययुर्गोपा महाभाग तस्मिन्प्रणयकोपिनि ॥१३ कृष्णस्तु विमल व्योम शरच्चन्द्रस्य चन्द्रिकाम् । तदा कुमुदिनी फुल्लामामोदितदिगन्तराम् ।।१४ वनराजि तथा कूजभृङ्गमालामनोहराम् । विलोक्य सह गोपोभिर्मनश्चक रति प्रति ॥१५ श्री पराशरजी ने कहा-गोपो के ऐसा कहन पर कुछ देर तक चुप रहने के पश्चात् श्रीकृष्ण ने कुछ प्रणयात्मक क्रोध के साथ कहा ।।६।। श्री भग- वान् बोले-हे गोपो । यदि मुझसे सम्बन्ध होने के कारण आपको किसी प्रकार से लजित न होना पडता हो तो मैं आप लोगो की प्रशसा का पान हू, ऐसा सोचने मे ही क्या प्रयोजन है ॥१०॥ यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं और युझे प्रशसा के योग्य समझते है तो आप मुझे अपना वन्धु ही मानते रहे ।।११।। मैं देवता नहीं है, गन्धर्व भी नही हूँ, और न यक्ष अथवा दानव ही हूँ। मैं तो आपका बाघव होकर ही उत्पन्न हुअा हू, इसलिये इस विषय में अधिक विचार मत करो ॥१२॥ श्री पराशरजी ने कहा-भगवान् श्रीहरि की बात सुनकर उन्हे प्रणय-कोप मे भरा देखकर वे सब गोप वन को चले गये ।।१३।। फिर श्रीकृष्ण ने स्वच्छ प्राकाश, शरद् कालीन चन्द्रमा की चन्द्रिका, दिशामो को सुगन्धित करने वाली कुमुदिनी और भौरो की मधुर गुञ्जार वाली निखएटी की मनोहरता को देखा तो गोपियो के साय विहार करने की इच्छा की ॥१४-१५॥ विना रामेण मधुरमतीव वनिताप्रियम् । जगी क्लपद शौरिस्तारमन्द्रकृतकमम् ॥१६ रम्य गीतध्वनि श्रुत्वा सन्त्यज्यावससथास्तदा। आजग्मुस्त्वरिता गोप्यो यतास्ते मधुसूदन ॥१७ शनैश्शनर्गगौ गोपी काचित्तस्य लयानुगम् । दत्तावधाना काचिच्च तमेव मनसास्मरत् ।।१८ १६८ } [ श्रीविष्णु पुराण काचित्कृष्णेति कृष्णेति प्रोच्य लक्षामुपाययो । ययों च काचि प्रेमान्धा तत्पाश्चमविलम्बितम् ॥१६ काचिच्चावसथस्यान्ते स्थित्वा दृष्ट्वा बहिर्गुरुम् । तन्मयत्वेन गोविन्द दध्यौ मोलितलोचना ॥२० तस्चित्तविमललादक्षीणपुण्यचया तथा । तदप्राप्तिमहादुःखविलीनाशेपपातका ॥२१ चिन्तयन्ती जगत्सुति परब्रह्मस्वरूपिणम् । निरुच्छवासतया मुक्तिं गतान्या गोपकन्यका ॥२२ गोपीपरिवृतो रानि शरच्चन्द्रमनोरमाम् । मानयामास गोविन्दो रासारम्भरसोत्सुक. ॥२३ उस समय बलरामजी नही थे । अकेले श्रीकृष्ण ही नारियों को प्रिय लगने वाला मधुर और मृदुल गीत उच्च तथा मन्द स्वर मे गाने लगे ॥१६॥ उनकी उस सुरम्य गीत-लहरी को सुनकर सभी गोपियाँ तुरन्त अपने घरों को त्याग कर भगवान् मधुसूदन के पास जा पहुची ॥१७॥ वहां पहुंच कर उनमे से किमी ने तो उनके स्वर मे स्वर मिलाया और किसी ने मन ही मन उनका स्मरण किया ।।१८। कोई कृष्ण कृष्ण पुकारती हुई लज्जा और संकोच मे भर गई और कोई प्रेमोन्माद मे भर कर उनके पाव में खडी होगई ॥१९॥ जिस किसी गोपी ने बाहर गुरुजनो के होने के कारण घर को नहीं छोडा, वह वही श्री गोविन्द के ध्यान मे तन्मय होगई ॥२०॥ कोई गोपी विश्व कारण एवं ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण का ध्यान करते-करते ही मोक्ष को प्राप्त होगई, क्योकि भगवान के न मिलने के घोर दुख से उसके सब पाप तथा उनके विमल मालाद से उसके सम्पूर्ण पुण्य क्षीण होगये थे ॥२१-२२।। रासरूप रस के प्रारम्भ करने की उत्तराठा वाले श्रीकृष्ण ने गोपियो से प्रावृत होकर शरद के चन्द्रमा में सुशोभित उस रात्रि को सम्मान प्रदान किया ॥२३॥ गोप्य वृन्दश काणचेष्टास्वायत्तमूतयः । अन्यदेशं गते कृपणे वृन्दावनान्तरम् ॥२४ - पञ्चम अश-प्र० १३ ] [ १६६ कृष्णे निवद्धहृदया इदमूवु परस्परम् ॥२५ कृष्णोऽहमेप ललित व्रजाम्यालोक्यता गति । अन्या ब्रवीति कृष्णस्य मम गीतिनिशम्यताम् ।।२६ दुष्टकालिय तिष्टान कृष्णोऽहमिति चापरा। बाहुमास्फोटय कृष्णस्य लीलया सर्वमाददे ॥२७ अन्या ब्रवीति भो गोपा निश्शङ्क स्थीयतामिति । अल वृष्टिभयेनान धृतो गोवर्धनो मया ॥२८ धेनुकोऽय मया क्षिप्तो विचरन्तु यथेच्छया। गावो ब्रवीति चैवान्या कृष्णलीलानुसारिणी ॥२६ एव नानाप्रकारासु कृष्ण चेष्टासु तास्तदा । गोप्यो व्यग्रा सम चेरू रम्य वृन्दावनान्तरम् ।।३० C उस रामय, श्रीकृष्ण जव कही चले गये, तब कृष्ण चेष्टा के वशीभूत हुई गोपियाँ दल बनाकर वृन्दावन मे घूमने लगी ॥२४॥ कृष्ण मे निवद्ध हृदय वाली वे गोपियों परस्पर में इस प्रकार कहने लगी ॥२५॥ एक ने कहा-मैं कृष्ण हूँ, मेरी चाल क्तिनी मुन्दर है, उसे देखो तो सही । इस पर दूसरी ने कहा-कृष्ण तो मैं हूँ, तुम मेरा गीत सुनो ॥२६॥ किसी अन्य गोपी ने ताल ठोक कर कहा-अरे दुष्ट कालियनाग ! मैं कृष्ण हूँ जरा ठहर तो सही-इस प्रकार कह कर यह गोपी श्रीकृष्ण को सब लीलापो को करने लगी ॥२७॥ हे गोपो। मैंने गोवर्द्धन पर्वत उठा लिया है, तुम नि सकोन हो कर इसके नीचे आ बैठो, वृष्टि से भय मत करो ॥२८॥ किसी अन्य गोपी ने कृष्ण लीला का अनुसरण करते हुए कहा-मैंने धेनुकासुर का वध कर दिया, अब गौएँ यहाँ स्वच्छन्द विचरण करें ॥२६। इस प्रकार श्रीकृष्ण की विभिन्न चेष्टाम्रो में मन्मय हुई जोपिया उस अत्यन्त रमणीक वृन्दावन मे साथ-साथ विचरण करने लगी॥३०॥ विलोक्यंका भुव प्राह गोपी गोपवराङ्गना । पुलकाञ्चितमर्वागी विवासिनयनोत्पला ॥३१ २०० } | श्रीविष्णुपुराण ध्वजवज्राइ, शाजाङ्करेसावत्यालि पश्यत । पदान्येतानि कृष्णस्य लोलाललितगामिनः ॥३२ कापि तेन समायाता कृतपुण्या मदालसा । पदानि तस्याश्र्चतानि धनान्यल्पतनूनि च ॥३३ पुष्पापचयमत्रोच्चश्चक दामोदरो ध्रुवम् । येताग्राकान्तमात्राणि पदान्यत्र महात्मन. !॥३४ अनोपविश्य व तेन काचित्पुापरलङ कृता । अन्यजन्मनि सर्वात्मा विष्णुरम्यचितस्तया ॥३५ पुष्पवन्धनसम्मानकृतमानामपास्य ताम् । नन्दगोपसुतो यातो मार्गेणानेन पश्यत ।।३६ अनुयातेनमत्राच्या नितम्वभरमन्थरा। या गन्तव्ये द्रुत याति निम्नपादाग्रस स्थिति. ॥३७ हस्तन्यस्ताग्रहस्तेय तेन याति तथा सखी। अनायत्तपदन्यासा लक्ष्यते पदपद्धतिः ॥३८ विकसित कमल जैसे लोचन वाली एक सुन्दर गोपी ने सर्वाङ्ग पुलकित होकर भूमि की ओर दृष्टिपात करते हुए कहा ॥३१॥ हे सखी। लीलाललित- गामी श्रीकृष्ण के यह ध्वजा, वज, अंकुश, कमल प्रादि रेखामो वाले चरण चिन्हो को तो देखो ॥३३।। उनके साथ कोई मदमाती युवती भो गई है, देखो उस पुण्यवती के यह घने, पतले और छोटे पद चिह्न दिखाई पड़ रहे हैं ॥३३ उन्होने यहां कुछ ऊँचे उठ कर पुष्प इक्छ किये हैं, इसीलिए यहाँ उनके चरणो का अगला भाग ही दिखाई देता है ॥३४॥ यहां किसी सौभाग्यशालिनी को उन्होने अवश्य ही पुष्पो से सजाया जान पडता है कि उसने अपने पूर्वजन्म मे भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया होगा ॥३५॥ अरे, यह देखो। पुष्पो से शृङ्गार किये जाने के सम्मान मद मे भर कर उसने मान किया है, इसीलिए नन्दलाल उसे यही छोड़कर इस मार्ग से गये दिखाई देते हैं ।।३६॥ हे सखियो । यहाँ नितम्बर भार के कारण मन्द गति वाली कोई गोपी तीव्र गति से श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे गई है, इसी कारण उसके पद चिह्नो के अगले भाग कुछ नीचे [ २०१ पञ्चम संश-प्र० १३ ] हो गए है ।।३७।। इस स्थान पर सखी अपना हाथ उनके हाथ में देती हुई गई है, इमोलिए उसके पद चिह्न कुछ परतंय से दिखाई दे रहे है ॥३॥ हस्तसंस्पर्शमात्रेण धूर्तनपा विमानिता। नैराश्यान्मन्दगामिन्या निवृत्त लक्ष्यते पदम् ॥३६ नूनमुक्तात्वरामीति पुनरेप्यामि तेऽन्तिकम् । तेन कृष्णेन येनपा त्वरिता पदपद्धतिः ॥४० प्रविष्टो गहनं कृष्णः पदमत्र न लक्ष्यते । निवर्तध्वं शशाङ्कस्य तद्दीधितिगोचरे ॥४१ निवृत्तास्तास्तदा गोप्यो निराशाः कृष्णदर्शने । यमुनातीरमासाद्य जगुस्तञ्चरित तथा ॥४२ ततो ददृशुरायान्त विकासिमुखप कजम् । गोप्यस्वलोक्यगोप्तार कृष्णमक्लिष्टचेष्टितम् ।।४३ काचिदालोक्य गोविन्दमायान्तमतिहपिता । कृष्ण कृपणेति कृष्णेति प्राह नान्यदुदीरयत् ।।४४ काचिभ्रू भङ्ग र कृत्वा ललाटफलक हरिम् । विलोक्य नेत्रभृङ्गाभ्या पपी तन्मुखपकजम् ।।४५ काचिदालोक्य गोविन्द निमीलित विलोचना । तस्यैव रूप ध्यायन्ती योगारूदेव सा बभौ ॥४६ इन पद चिह्नो से ऐसा लगता है कि वह मन्द गति वाली गोपी निराश हो कर लौट पडी है, क्यो कि उस धूत्तं ने केवल हाथ से स्पर्श करके ही उसका मान भङ्ग कर दिया है ॥३६॥ इस स्थान पर वृष्ण ने उसके पास से शीघ्र ही जाने और पुन: लौट आन को कहा होगा, क्यो कि यहा उसके पद चिह्न द्रतगति से जाने के दिखाई दे रहे है 11४०।। इस स्थान पर उनके चरण चिह्नो के लोप हो जाने से प्रतीत होता है कि यहा से वह गह्न वन में प्रविष्ट होगये हैं। अब हम भी यहा से लौट चले, क्यो कि यहा चन्द्रमा की किरणें भी दिखाई नहीं देनी ॥४१॥ इसके पश्चात् कृष्ण का दर्शन मिलने की प्राशा को त्याग यहा से लौट पड़ी और यमुनाजी के तौर पर प्राकर उनके चरित्रो को

२०२ ]
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गाने मी ॥४२॥ ज म गोपियों में प्रगन्न मुग रमन याम मोपर ग्यार
कार्मा भीमा पो पा घोर पापा देगा ||४गममय उनको
भामा गएर मोर मानी तो पर सामानस मृगण
ही पर गरी, उगरे गुगगे पाई पार नीनियर गरे कोई
गोपी अपने भमगिमा पु ममाट शो मपिग पर भावान् श्रीहरिको
देगती २ अपने नेत्र पी भौरी द्वारा उगरे गुग मररफर पी पीने सगी
॥४॥ोई एर गोपी उन्हें बार अपने नेत्रों को बरी ह उनमें
चिन्नन में योगा-मी प्रनीत होने लगी।
ततः पाश्चित्प्रियाला मासिन मावाशितः ।
निन्येऽनुनयमन्या पपरसन माधव is
साभि. प्रसन्नचिताभिर्गो भिस्सह मादरम् ।
ररास रासगोष्टीभिरशरचरितो हरिः॥४८
रासमण्डलबन्धोऽपि गपणामनुग्मना ।
गोपीजनेन नयाभूदेवस्थानम्थिरात्मना ॥४६
हन्तेन गृह्य चकला गोपीना राममण्डलम् ।
चकार तत्परस्पर्श निमीलिता हरि ॥५०
ततः प्रववृते रासश्चलद्वलयनिस्वन ।
अनुयातशरताव्यगेयगीतिरनुक्रमात् ।।५१
कृष्णाशरच्चन्द्रमस पोमुदी बुमुदाकरम् ।
जगी गोपीजनस्त्वेक कृष्णनाम पुन पुन ॥५२
परिवृत्तिथमेणका चलद्वलयलापिनीम् ।
ददी बाहुलता स्कन्धे गोपी मधुनिघातिनः ॥५३
काचित्प्रविलमदाहु परिरम्य चुचुम्व तम् ।
गापो गीतस्तुतिव्याजानिपुणा मधुसूदनम् ॥५४
तब श्रीकृष्ण ने किसी से प्रिय भलाप, किसी पर भूभगी से दृष्टिपात
मौर विसी के कर ग्रहण पूर्वक उन्हें मनाने का यत्न दिया ।।४। इसके
पश्चात् उस उदारचेता ने उन प्रसन्न चित्त वाली गोपियों के साथ भादर पूर्वक

पञ्चम अंश-प्र०१३] [ २०३ रास-विहार किया ॥४८॥ उस समय कोई भी गोपी कृष्णके स्पर्श से पृथक् नहीं होना चाहती थी, इस लिए एक ही स्थान पर उनके स्थिर रहने से रास-मण्डल न बन पाया ॥४६।। तब भगवान् श्री हरि ने एक-एक गोपी का हाथ अपने हाय मे लेकर रास मण्डल बनाया, उस समय उनके कर सर्श से गोपियो के नेत्र उन्मीलित हो गये ।।५०॥ इसके पश्चात् रासलीला का प्रारम्भ हुमा, जिसमे ककरणो के हिलने से झङ्कार होने लगी और शरद् वर्णन के गीत गाये जाने लगे ॥५१॥ उस समय श्रीकृष्ण ने चन्द्रमा, कौमुदी और कुमुदवन विषयक गीत गाये मोर गोपियां केवल श्रीकृष्ण के नाम का गान करने लगी ॥५२॥ तभी एक गोपी नाचते-नाचते थक गई और उसने चञ्चल कङ्करण की झनकार करती हुई अपनी बाहुलता भगवान् के कण्ठ में डाल दी ।।५३॥ किसी एक चतुर गोपी श्रीकृष्ण गीत की प्रशसा करने के मिस से अपने बाहुप्रो को पसार कर उनसे लिपट गई ॥५४॥ गोपीकपोलसश्लेषमभिगम्य हरेभुजो। पुलकोद्गमसस्याय स्वेगाम्बुघनता गतौ ॥५५ रासगेय जगौ कृष्णो यावत्तारतरध्वनिः। साधु कृष्णेति कृष्णेति तावत्ता द्विगुण जगुः ।।५६ गतेऽनुगमन चक्रवलने सम्मुख ययु । प्रतिलोमानुलोमाभ्या भेजुर्गोपाङ्गना हरिम् ।।५७ स तथा सह गोपीभी ररास मधुसूदन । यथाब्दकोटिप्रतिमः क्षरणस्तेन विनाभवत् ॥५८ ता कार्यमाणा. पतिभिः पितृभिर्धातृभिस्तथा। कृष्ण गोपाङ्गना रात्री रमयन्ति रतिप्रियाः ॥५६ सोऽपि कशोरकवयो मानयन्मघुसूदन । रेमे ताभिरमेयात्मा धपासु क्षपिताहित. ॥६० तद्भर्ट पु तथा तासु सर्वभूतेषु चेश्वरः । मात्मस्वरूपरूपोऽसौ व्यापी वायुरिव स्थित. ॥६१ २०४ ] [ श्रीविष्णुपुराण यथा समस्तभूतेषु नभोऽग्नि पृथिवी जलम् । वायुश्चात्मा तथैवासो व्याप्य सर्वमवस्थितः ॥६२ गोपियों के कपोलो को स्पर्श करती हुई , श्रीकृष्ण की भुजाएं उनमे पुलकावलि रूपी धान्य वो उत्पन्न करने के निमित्त स्वेद रूपी मेघ हो गई ॥५५) भगवान् जितने ऊँचे स्वर मे रास-गीत का गान करते, उससे द्विगुण उच्च स्वर में गोपियां, 'श्रीकृष्ण धन्य है' 'श्रीकृष्ण धन्य हैं'-ऐसी रट लगा रही थी ॥५६॥ जब वह पागे जाते तब गोपियां उनके पीछे २ चलती और जब वे पीछे लौटते तब वे सामने चलती थी। इस प्रकार वे गोपाङ्गनाएँ अनुलोम-प्रतिलोम गति से श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रही थी॥५७। वे भी उनके साथ इस प्रकार रास क्रीडा कर रहे थे, जिसके आनन्द के कारण, उनके विना गोपियो को एक क्षरण करोड वर्ष के समान लगता ॥५८॥ वे रास-रस की रसिका गोपियाँ अपने पति, पिता, माता, भ्राता आदि के द्वारा रोकी जाने पर भी न रुकती और रात्रि में कृष्ण के साथ रास-विहार करती थी ॥५६॥ शत्रुनो के मारने वाले मधुसूदन भी अपनी कैशोरावस्था के मान में रात्रिकाल मे उन गोपियो के साथ विहार करते थे ॥६०) वे ही सर्वव्याप्त श्रीकृष्ण उन गोपियो, उनके पतियों और अन्य सब प्राणियो को प्रात्म रूप से प्रतिष्ठित थे॥६१।। जैसे आकाश, अग्नि, पृथिवी, जल, वायु और आत्मा सभी प्राणियो मे च्याप्त है, वैसे ही वे भगवान् भी सब मे अवस्थित हैं ।।६२१ चौदहवां अध्याय प्रदोपाने कदाचित्तु रसासक्त जनार्दने । प्रासयन्समदो गोष्ठमरिष्टस्समुपागमत् ।।१ सतोयतोयदच्चायस्तीपणशृङ्गोऽकलोचन । खुराग्रपातरत्यर्थं दारयन्धरणोतलम् ॥२ + पञ्चम प्रभ-य०२ ] [ २०५ लेलिहानस्सनिष्पेषं जिह्वयोष्ठौ पुनः पुनः। सरम्भाविद्धलाङ्ग लः कठिनस्कन्धबन्धनः ।।३ उदग्रककुदाभोगप्रमाणो दुरतिक्रमः । विण्मूबलिसपृष्ठाङ्गो गवामुढे गकारक ॥४ प्रलम्बकण्ठोऽतिमुसस्तरुखाताङ्किताननः । पातयन्स गवा गर्भान्दैत्यो वृषभरूपधृक् ॥५ सूदयस्तापसानुग्रो वनानति यस्सदा ॥६ श्री पराशरजी ने कहा-जब एक दिन सायकाल के समय श्रीकृष्ण रास- कीडा मे तन्मय हो रहे थे, तब अरिष्ट नामक एक असुर सब को भय से प्रस्त फरता हुआ गोपाल मे प्रा पहुचा ॥१॥ उसकी सजल मेघ के समान कान्ति, अत्यन्त तीक्ष्ण मोग और सूर्य के समान तेजस्वी नेत्र थे तथा वह अपने खुरो के प्रहार मे पृथिवी को विदीर्ण करता हुअा मा प्रतीत होता था ।।२।। वह दात पीसकर बारम्बार अपनी जिह्वा से प्रोठो को चाटता था, उसने क्रोध के कारण अपनी पूंछ को उठा रखा था, तथा उसके बन्यो के बन्धन दृढ ॥३॥ उसका पकुद और देह अत्यन्त ऊँचा और अपार था, पीछे का अग मूत्र और गोबर में मना हुआ था और सभी गौए उससे भयभीत हो रही थी ।।४। उसका कण्ठ अत्यन्त लम्बा तथा वृक्ष के खोखले के समान गभीर था । वह दैत्य बैल का रूप धारण करके गौमो के गर्भो को पतित करता और तपस्वियो को सताता हुआ सदा ही वन मे घूमता रहता था ।।५-६।। ततस्तमतिघोराक्षमवेक्ष्यातिभयातुरा गोपागोपस्त्रियश्च व कृष्ण कृप्योति चुक शु 1.७ सिंहनाद ततश्चक्र तलशब्द च केशव । तच्छन्दश्रवणाचासौ दामोदरमुपाययौ ।। अनन्यस्तविपाणान कृष्णकुक्षिकृतेक्षण । अभ्यधावत दुष्टात्मा कृपण वृपभदानव. १९ ग्रायान्त दत्यवृपभ दृष्ट्वा कृष्णो महाबलः । न चचाल तदा स्थानादवज्ञास्मितलीलया ॥१० २०६ ] [ श्रीविष्णुपुराण आसन्न चैव जग्राह ग्रहवन्मधुसूदनः । जघान जानुना कुक्षौ विपाणग्रहणाचलम् ॥११ तस्य दर्पबल भड क्वा गृहीतस्य विपारण्योः । अपीडयदरिष्टस्य कण्ठं क्लिन्नमिवाम्बरम् ॥१२ उत्साटय शृङ्गमेकं तु तेनैवाताडयत्ततः । ममार स महादैत्यो मुखाच्छौरिणतमुद्वमन् ॥१३ तुष्ट वुनिहते तस्मिन्दैत्ये गोपा जनार्दनम् । जम्भे हते सहस्राक्षं पुरा देवगणा यथा ।।१४ उस अत्यन्त घोर नेत्री वाले दैत्य को देख कर गोप और गोपियों 'कृष्ण ! कृष्ण' की पुकार मचाने लगी ॥७॥ उनकी पुकार सुन कर भगवान ने सिंहनाद करते हुए करतल ध्वनि की, जिसे सुनते ही वह दैत्य उनके पास पहुचा ।।दा और श्रीकृष्ण की कुक्षि को ताकता हुआ वह दुरात्मा वृपभासुर सींगो को उनकी और करके दौड पडा ! उस वृषभासुर को अपनी ओर तेजी से आता देख कर भी श्रीकृष्ण अविचल भाव से उमका तिरस्कार करते हुए मुसकराते रहे ।।१०। जब वह उनके समीप पाया, तभी उन्होने उसे इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे किसी क्षुद्र जीव को ग्राह पकडता है। फिर सीगो को पाड कर अपने घुटनो से उस दैत्य की कुक्षी मे प्रहार किया ॥११॥ इस प्रकार सीग पकड़ कर उस दैत्य को अपने वश मे करने वाले भगवान् ने उसके कण्ठ को इस प्रकार मरोड दिया, जैसे किसी गीले वस्त्र को निचोड़ते हैं ॥१२॥ फिर उसके एक सीग को उखाड कर उसी के द्वारा उस दैत्य पर प्रहार किया, जिस से वह मुख से रधिर डालता हुमा समाप्त हो गया ॥१३॥ प्राचीन काल में जैसे जम्भ का वध करने पर देवताग्री ने सहस्राक्ष इन्द्र की स्तुति की थी, वैसे ही इस दैत्य वा सहार होने पर गोपगण भगवान् जनार्दन को स्तुति करने . 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पञ्चम अंश-अ० १५ ]
[ २०७
पन्द्रहवां अध्याय
ककुद्मति हतेऽरिष्टे धेनुके विनिपातिते ।
प्रलम्बे निधन नीते धृते गोवर्धनाचले ॥१
दमिते कालिये नागे भग्ने तुङ्गमद्वये ।
हताया पूतनाया च शक्टे परिवर्तिते ॥२
कसाय नारद प्राह यथावृत्तमनुक्रमात् ।
यशोदादेवकी गर्भपरिवृत्त्याद्यशेषत ॥३
श्रुत्वा तत्सकल कसो नारदादेव दर्शनात् ।
वसुदेव प्रति तदा कोप चक्र सुदुर्मत ॥४
सोऽतिकोपादुपालभ्य सर्वयादवससदि ।
जगह यादवाश्चैव कार्य चैतदचिन्तयत् ।।५
यावन्न बलमारूढौ रामकृष्णो सुबालको।
तावदेव मया वध्यावसाध्यौ रूढयौवनी ।।६
श्री पराशरजी ने कहा-अरिष्ट, धेनुव और प्रलम्ब का निधन, गिरि
गोवर्धन का धारण, कालियनाग का मदन, दो विशाल वृक्षो का उत्पाटन,
पूतना का मरण और शक्ट का पतन प्रादि अनेक लीलामो पूर्ण होने पर
नारदजी बस के पास पहुचे और वहाँ यशोदा और देवकी के गर्भ परिवर्तन से
लेकर अब तक का जो कुछ हुमा था यह सब वृत्तान्त उसे माद्योपान्त कह
सुनाया ॥१-३॥ देवता जैसे दिखाई देने वाले नारदजी के मुख से इस प्रकार
सुनकर कस ने वसुदेवजी पर अपना अन्यन्त रोष प्रकट किया ॥४॥ वह
यादवो की निन्दा करके सोचने लगा कि जब तक यह बालक राम और वृषप
अपने बल से परिपूर्ण नहीं होगाते, तभी मक इनका वध कर डालना चाहिये,
अन्यथा युवावस्था को प्राप्त होकर तो यह किसी प्रकार भी न जीते जा
मकेगे ||५-६॥
चाणूरोऽत्र महावीर्यो मुष्टिकश्च महाबल ।
एताम्या मल्लयुद्ध न मारयिष्यामि दुमंती ॥५

२०८ ] [ श्रीविष्णु पुराण धनुर्महमहायोगव्याजेनानीय तो ब्रजात् । तथा तथा यतिष्यामि यास्येते सड क्षय यथा ।।८ श्वफल्कतनय शूरमक र यदुपुङ्गवम् । तयोरानयनार्थाय प्रेपयिष्यामि गोकुलम् ।।६ वृन्दावनचर पोरमादेष्यामि च केशिनम् । तत्रवासावतिबलस्तावुभौ घातयिष्यति ।।१० गज कुवलयापीडो मत्सकाशमिहागतौ। घातयिष्यति वा गोपौ वसुदेवसुतावुभौ ॥११ इत्यालोच्य स दुष्टात्मा कसो रामजनार्दनौ। हन्तु कृतमतिर्वीरावक र वाक्यमब्रवीत् ॥१२ महावीयवान् चारपूर और प्रत्यत बलवान् मुष्टिक जैसे अपने मल्ली के साथ उन दोनो दुर्बुद्धि वालो को भिडा कर उनका वध करा दूंगा ।।७। उन्हें धनुर्यज्ञ के बहाने से यहां बुला कर उन्ह मारने के लिये विविध उपाय करूंगा 11८॥ उन्हे व्रज से बुला लाने के लिये श्वफ्ल्क पुत्र अकर को गोकुल भेजूंगा III इसके साथ ही वृन्दावन म घूमने वान अपने घोर असुर केशी को उन्हे वही मार डालने की आज्ञा दूंगा ॥१०॥ अथवा यदि वे दोनो वसुदेव-पुत्र यहाँ तक आ ही पहुंचे तो मेरा कुवलयापीड हाथी ही उन्ह नष्ट कर डालगा ॥११॥ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार निश्चय कर उस दुष्टात्मा कस ने राम-कृष्ण का वध फरने की इच्छा से अक्रूरजी को बुला कर कहा ॥१२॥ भो भो दानपते वाक्य क्रियता प्रीतये मम । इत स्वयानमारुह्य गभ्यता नन्दगोकुलम् ।।१३ वसुदेवसुतौ तन विष्णोरशसमुद्भवी । नाशाय किल सम्भूतौ मम दुष्टो प्रवर्द्धत ॥१४ धनुमंहो ममाप्यत्र चतुर्दश्या भविष्यति। पानेयो भवता गत्वा मल्लयुद्धाय तत्र तौ ॥१५ चाणूरमुष्टिको मल्लो नियुद्धकुशल मम । ताम्या सहानयोयुद्ध सर्वलोवोऽन पश्यतु ।।१६ पश्चम प्रश-अ० १५ । [ २०६ गज कुवलयापीडो महामारप्रचोदित । स वा हनिष्यते पापी वसुदेवात्मजौ शिम् ।।१७ तो हत्वा वसुदेव च नन्दगोप च दुर्मतिम् । हनिष्ये पितर चैनमुग्रसेन सुदुर्मतिम् ॥१८ ततस्समस्तगोपाना गोधानान्यखितान्यहम् । वित्त चापहरिष्यामि दुष्टाना मद्वधपिणाम् ॥१६ वाम ने यहा-हे दानपते । पाप मेरी प्रसन्नता के लिये यह यायं करिये पि रथ पर ग्रामद होकर गोकुल के लिये प्रस्थान कीजिये ॥१३॥ वहाँ वमुदेवजी द्वारा उत्पा विप्रगु-अग रूप दो दुध वालक मुझे मारने के लिये ही यहां पल रहे है । १४॥ मेरे यहाँ प्रागामी चतुर्दशी के दिन ही धनुर्यज्ञ महोत्सव होने को है, इसलिये आप उन्हे मल्ल युद्ध के लिये यहाँ लिवा लाइये ।।१५।। मेरे पारगूर और मुष्टिर नामय दो मल्ल मह युद्ध में अत्यन्त चतुर हैं, इनका उन दोनो के माथ जो द्वन्द्व युद्ध हो, उसे मभी लोग यहाँ प्रापर देगे ॥१६॥ अथवा महायत की प्रेरणा मे मंग पुवलायपीड हाथी ही उन दोनो पापी यमुदेव पुत्रो को मार डालेगा ।।१७॥ इस प्रकार उन दुरो को मरवा पर इस दुयु दि वासुदेव, नन्द सया पुबुद्धि वाले अपने पिता उग्रमेन गा भी यप पर दूंगा ॥१॥ पिर मेरे यधपी यामना पान इन गर दुए गोपो २ माग गयादि धनी पा भी हरण पर लंगा ॥१६॥ त्वामृते यादवाचते द्विपो दानपतं मम । एतेषा च पधायाह यनिप्येऽनुममात्तत ॥२० तदा निषण्टा सर्व गग्यमेतदयादवम् । प्रमाधिप्ये स्वया तम्मान्मत्प्रीस्य वीर गम्यनाम ॥२१ यथा च माहिम मरिधि पाप्युपताय वै । गोपाम्गमानयन्वागु तथा वाचान्त्वया च ते 12 त्यामतपदाम गे माभागवतो दिन । प्रोनिमानभवरायण शो दायामीनि गावर ॥२३ २१० ] [ श्रीविष्णु पुराण तथेत्युक्त्वा च राजान रथमारुह्य शोभनम् । निश्चक्राम ततः पुर्या मधुराया मधृप्रियः ॥२४ हे दानपते । आपके अतिरिक्त ये सभी यादव मुझसे द्वेष भाव रखते हैं, इसलिये मैं इन सभी को मार डालने का प्रयत्न करूगा ॥२०॥ फिर पाएको माथ लेकर इस यादव-विहीन राज्य का निष्कटक रूप से उपभोग करूगा । अब आप मेरी प्रसन्नता के लिये शीघ्र ही गमन कीजिये ॥२१॥ आप गोकुल मे जाकर उन गोपो से इस प्रकार बाते करे, जिससे वे भैस के घी और दही आदि उपहारो को लेकर शीघ्र ही यहाँ चले भावें ॥२२॥ श्री पराशरजी ने कहा- कस को पाना सुनकर 'कल श्रीकृष्ण के दर्शन करूंगा' ऐसा सोच कर महा भागवत अक्रूरजी प्रसन्न हुए ॥२३॥ पौर राजा कस से 'जो माज्ञा' कह कर श्रेष्ठ रथ पर मारूढ हुए और मथुरा नगरी से बाहर की ओर चल दिये ॥२॥ सोलहवाँ अध्याय केशी चापि बलोदनः कसदूतप्रचोदितः। कृष्णस्य निधनाकाड क्षी वृन्दावनमुपागमत् ।।१ स खुरक्षतभूपृष्ठस्सटाक्षेपधुताम्बुद । द्रुतविक्रान्तचन्द्राकमार्गो गोपानुपाद्रवत् ॥२ तस्य हपितशब्देन गोपाला दैत्यवाजिनः । गोप्यश्च भयसविग्ना गोविन्दं शरणं ययुः ॥३ पाहि त्राहीति गोविन्दः श्रुत्वा तेपा तदो वचः सतोयजलदध्वानगम्भीरमिदमुक्तवान् ।।४ अल त्रासेन गोपाला केशिन किं भयातुरैः । भवद्भिर्गोपजातीय:रवीर्य विलोप्यते ॥५ किमनेनाल्यसारेण हपिताटोपवारिणा। दैतेयवलबाह्य न बल्गता दुष्टवाजिना ॥६ पञ्चम प्रश-अ० १६ ] 7 एह्य हि दुष्ट कृष्णोऽह पूगास्त्विव पिनाकधूक पातयिष्यामि दशनान्वदनादखिलास्तव ७ श्री पराशरजी ने कहा-इधर कस के दून ने महाबली कशा का कृष्ण पी हत्या करने के लिये भेजा, जो इस कार्य को सम्पन्न करने के लिये वृन्दावन में जा पहुंचा ॥१॥ यह अपने खुगे के द्वारा भूतल को कुरेदता, कठ के द्वारा सब को छिन्न-भिन्न करता पौर प्रत्यत वेग से सूर्य चन्द्रमा के मार्ग को लांधता हुमा गोपो की पौर दौड पडा ॥२।। उस घोडे के रूप वाले दैत्य की हिनहिनाहट को सुनकर डरे हा सब गोप-गोपियां भगवान की शरण मे गये ॥३॥ उनके 'रक्षा परो, रक्षा करो' पुकारने पर जलयुक्त बादल के समान गर्जन युक्त पाणी में श्रीकृष्ण ने कहा ।।४॥ हे गोपगण ! इस केशी में प्राप भतभीत न हो, मापने गोपजाति ये होकर भी इस प्रकार डर कर प्रपन वीरोचित पुरुषार्थ को यो त्याग दिया है ? ॥५॥ यह अल्प बन वाला हिनहिनाहट से प्रातषित करने और नाचने वाला तथा दैत्यो के लिये बल पूवव चढने के लिये वाहन म्प यह प्रश्न प्रापका क्या अनिष्ट कर सकता है 210) फिर उहाने केभी को लल- बारा-परे दुष्ट तू इधर मा। जैस धनुरी वीरभद्र पूर्ण के दांत तोड दिये थे वैमे हो मैं कृष्ण तरे मभी दात उपाइ पेंगा ।।७।। इत्युपत्वास्फोट्य गोविन्द वैशिनस्सन्मुख ययो । विवृतास्यश्च सोऽप्येन देतेयाश्व उपाद्रवत् ।। बाहुमाभोगिन वृत्वा मुसे तम्य जनार्दन । प्रवेशयामास तदा ये शिना दुप्टवाजिन ॥ पेशिनो वदने तेन विशता वृप्णवाहुना। पातिता दाना पेतु मिताभावयवा इव ।।१० पृष्णस्य वधे बाह पेशिदेहगतो द्विज । विनाशाय यषा व्याधिगसम्भूतैररेक्षित ॥११ विपाटितो बहुल मपेन रुधिर वमन्। सोक्षिणी विवृते पा मिनिटे मुक्तरन्यने ।।१२ २१० ] [ श्रीविष्णु पुराण जघान धरणी पादश्शकृन्मून समुत्सृजन् । म्वेदा गात्रश्यान्तश्च निर्यत्नम्मोऽभवत्तदा ॥१३ व्यादितास्यमहारन्ध्रम्मोऽमुर कृपणवाहना । निपातितो द्विधा भूमौ वैद्य तेन यथा द्रम १४ द्विपादे पृष्ठपुच्छार्दै थवर्णकाक्षिनासिके। केशिनस्ते विधाभूते शकले द्वे विरेजतु ॥१५ यह कह कर श्रीकृष्ण ने उछत कर येदी का सामना किया और प्रश्व रूप वाला वह दैत्य भी मुख खोल कर उन पर झपटा ।।८।। तब श्रीकृष्ण न अपनी भुजा फैला कर दुष्ट के मुख मे घुसा दी Ill जैसे ही उसके मुख उनकी भुजा प्रविष्ट हुई, वैसे ही उमसे टकराकर उम दैत्य के सव दांत श्वेत मेघ सएडो के समान टूट कर पृथिवी पर प्रा गिरे ॥१०॥ है द्विज | जैसे उत्पन्न होते ही रोग की चिकित्सा न होने पर उसकी वृद्धि होती रहती है, वैसे ही केशी के मुख मे घुसी हुई भगवार की भुजा वृद्धि को प्राप्त होन लगी ॥११॥ अन्त मे उमका मुख फ्ट गया और वह फेनयुक्त रक्त उलटने लगा। तभी स्नायु बंधनो के शिथिल होने से उसके नेत्रा की ज्योति भी नष्ट होगई ॥१२।। तब वह मल-मूत्र को त्यागता हुपा अपने पाँवाको पटकने लगा,उसका देह स्वेद से शीतल हो गया और उसे मूर्छा प्रा गई ॥१३ । इस प्रकार श्रीकृष्ण की भुजा से फैलाये गये मुख के विशाल रन्ध्र के फटने में वज्रपात से पनित हुए वृक्ष के ममान दो टूम होकर वह असुर धरती पर लेट गया ॥१४॥ केशी के देह के दोनो टुकडे दो पाव, एक कान, एक नेत्र, प्राधी पोठ, प्राधी पूंछ और एक नासिका छिद्र क साथ शोभा पाने लगे ॥१५॥ हत्वा तु केशिन कृष्णो गोपालमुदितवृत । अनायस्ततनुस्स्टस्थो हसस्तव तस्थिवान् ।।१६ ततो गोप्यश्च निहते केशिनि स्वति विस्मिता । तुष्टुवु पुण्डरीकाक्षमनुरागमनोरमम् ॥१७ अथाहान्तहितो विप्र नारदो जलदे स्थित । केशिन निहत दृष्ट्वा हपनिर्भरमानस ||१८ पचम प्रश-अ० १६ ] साधु साधु जगन्नाथ लीलयैव यदच्युत । निहतोऽयत्वया केशी क्लेशदस्त्रिदिवौकसाम् ॥१६ युद्धोत्सुकोऽहमस्मयं नरवाजिमहाहवम् । अभूतपूर्व मित्यत्र द्रष्टु स्वर्गादिहागत ॥२० कर्माण्यनावतारे च ते कृतानि मधुसूदन । यानि विस्मित चेतस्तोपमेतेन मे गतम् ।।२१ इस प्रकार केशी-वध से प्रसन्न हुए ग्वाल से घिरे हुए श्रीकृष्ण बिना क्सिी प्रकार की थकान के स्वस्थ मन से खडे हुए हेंमते रहे ।।१६।। उस समय केशो के मारे जाने से आश्चर्य को प्राप्त हुए गोप-गोपियो ने उन कमल नयन एव मनोरम भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति की ॥१७॥ उस राक्षस यो मरा हुआ देख कर बादलों की प्राड में छिप कर खडे हुए नारदजी ने अत्यंत हर्प पूर्वक उनसे कहा ॥१८॥ हे जगन्नाथ ! हे अच्युत ग्राप धन्य है। आपने देवतायो को सतप्त करने वाले इस पेशी को सेल-खेल में ही मार डाला ॥१६॥ मैने मनुष्य और घोडे का युद्ध पहिले कभी नहीं देखा था, उसी को देखन के लिय यहाँ उपस्थित हुमा हूँ ॥२०॥ हे मधुसूदन । अापके द्वारा इस अवतार में किये जाने वाले कर्मों को दखकर मेरा मन अत्यत प्राश्चय चनित और प्रसन्न हो रहा है ॥२१॥ तुरङ्गस्यास्य शक्रोऽपि वृष्ण देवाश्च विम्यति । धुतकेसरजालस्य हपतोऽभावलोकिन ॥२२ यस्मात्त्वयंप दुष्टात्मा हत केशी जनार्दन । तस्मात्पेशवनाम्ना व लोके स्यातो भविष्यसि ।।२३ स्वम्त्यस्तु ते गमिप्यामि कसयुद्ध ऽधुना पुन । परश्वाऽह समेप्यामि त्वया केशिनिपूदन ॥२४ उग्रसेनसुते कसे सानुगे विनपातिते । भारावतारकर्ता त्व पृथिव्या पृथिवीधर ।।२५ तयातेकप्रकाराणि युद्धानि पृथिवीक्षिताम् । द्रष्टव्यानि मया युद्ध त्वत्प्रणीतानि जनार्दन ॥२६ | ifstream मोरामात मोमि। सन निगम गिरावमापार नारदमा मह गागाभाजि वियना गानुम गांगी भाननम् ॥२८ ! मी को मनापानी पर देखने माग गरltne मापा ॥२२॥ साल! पाने gfarm inst चौपा ॥२॥ मार्गाप्रमो! aur पपराग गायोग होगा. पुन: for ईमा २ भूपा! मान-पुष ५ को उमर पनुपानियो नि मार पर भू-पार का हर भाग ॥२॥ उग गम में भी पानं गानों गा पाप पिनानी मुमतयों को देगा ॥२॥e ! पर जा पाने पापों का पाल महर पूर्ण पापंगापन free है। पाप गावा. पापरायण हो ||२| पिर मारी मे जाने पर गोगाद्वारा मम्मानित पार गोपियोर मनी मिएर मात्र पान पलं योग्य श्रीकृष्ण गोषो के गलि गीन में प्रविष्ट प ॥२८॥ मत्रहवां अध्याय मकरोऽपि विनियम्य स्यन्दनेमागुगामिना । गृष्णसदर्शनासाक्षी प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥१ चिन्तयामास पामारो नास्ति धन्यतरो मया । योऽहमनावतीणस्य मुस द्रष्यामि चमिण. ॥२ प्रद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाताभवग्निशा। यदुन्निद्राभपयाक्ष विष्णोक्ष्याम्यह मुखम् ॥३ पाप हरति यत्पुसा स्मृत सङ्कल्पनामयम् । तत्पुण्डरीपनयन विष्णोद्रक्ष्याम्यह मुखम् ।।४ पञ्चम प्रश-प्र०१७ ] [ २१५ विनिर्जग्मुर्यतो वेदा वेदाङ्गात्यखिलानि च । द्रक्ष्यामि तत्पर धाम धाम्नां भगवतो मुखम् ।।५ यज्ञेषु यज्ञपुरुप. पुरुष पुरुषोत्तमः । इज्यते योऽखिलाधारस्त द्रक्ष्यामि जगत्पतिम् ॥६ इष्ट्वा यमिन्द्रो यज्ञाना शतेनामरराजताम् । अवाप तमनन्तादिमह द्रक्ष्यामि केशवम् ॥७ श्री परागरजी ने कहा-इधर मथुरा पुरो से बाहर निकलते हुए प्रकरजी अपने शीघ्रगामी रथ के द्वारा श्रीकृष्ण को देखने की इच्छा से नन्दजी के गोकुल को चले ॥११॥ उस समय अरजी विचार करने लगे कि आज में चक्रधारी भगवान् विष्णु के अंश रूप परमेश्वर का अपने नेत्रो से दर्शन करूंगा, इसलिये मेरे समान भाग्यशाली कोई नहीं है ॥२॥ आज मेरा जन्म सफल हो गया है, यह रात्रि अवश्य ही श्रेष्ठ प्रात काल वाली है, जिसके कारण मैं उन विकसित पन के से नयन भगवान् ये मुख को देसुंगा ॥३॥ भगवान के जिस सकल्पात्मक मुख कमल के स्मरण मात्र से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते है, उसी मा में प्राज दर्शन करूंगा ॥४॥ सभी तेजस्वियों के परम प्राथय रूप जिम मुखारविन्द से वेद-वेदाङ्ग उत्पन्न हुए हैं प्राज मैं उमी मुख का देसुंगा ॥५॥ मभी पुरप जिन यज्ञ पुरुष को यज्ञानुष्ठानो मे यजन किया करते है, उन्ही विश्वा- श्रय विश्वेश्वर या प्राज मैं दशन कम्गा ॥६।। जिनका सौ बार पजन करके ही इन्द्र को देवराज-पद की प्राप्ति हुई है, उन्ही अनादि पुरुष अनन्त भगवान का मैं दर्शन करूंगा ॥७॥ न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विवस्वादित्यमरुद्गणा । यस्य स्वरूप जानन्ति प्रत्यक्ष याति मे हरि.15 सर्वात्मा सर्ववित्सर्वस्सर्वभूतेप्ववस्थित.। यो ह्यचिन्त्योऽव्ययो व्यापी स वक्ष्यति मया सह ।। मत्स्यकूर्मवराहाश्वसिंहरूपादिभिः स्थितिन् । चकार जगतो योजःसोऽद्य मा प्रलपिप्यति ॥१० [ श्रीविष्णु पुराण साम्प्रत च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम् । कर्तुं मनुष्यता प्राप्तस्स्वेच्छादेहधृगव्यय ॥११ योऽनन्तः पृथिवी धत्ते शेखरस्थितिसस्थिताम् । सोऽवतीर्णो जगत्यर्थे मामक रेति वक्ष्यति ॥१२ पितृपुत्रसुहृद्भ्रातृमातृवन्धुमयी मिमाम् । यन्माया नालमुत्ततुं जगत्तस्मै नमो नमः ॥१३ तरत्यविद्या वितता हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगमायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नम ॥१४ ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु, आदित्य और मरुद्गण भी जिनके स्वरूप को नही जानत, वे ही श्रीहरि मेरे नयनो के समक्ष प्रत्यक्ष होंगे ॥८॥ जो सर्वव्यापक भगवान् सर्वात्मा, सर्वज्ञ, सर्वरूप, सर्वभूतो मे अवस्थित, अचिन्त्य और अव्यय स्वरूप है, वे अाज साक्षात् रूप म मुझसे सम्भापण करेंगे | जिन अजन्मा प्रभु ने मत्स्य, कूर्म, वराह, हयग्रीव, नृसिंह अादि रूपो मे ससार की रक्षा की, आज वे ही भगवान् मरे साथ बाते करेंगे ॥१०॥ उन अव्ययाला जगत्स्वामी ने अपन इच्छिन काय की पूर्ति के लिये ही मनुष्य रूप में अवतार लिया है ।।११।। अपन शिर पर पृथिवी को धारण करने वाले अनन्त भगवान् ने जगत्-रल्याण के लिये पृथिवी पर जन्म धारण किया है, वे ही आज मुझे अक्रूर कह कर वार्तालाप करेगे ॥१२॥ पिता, पुत्र, सुहृद, भ्राता, माता और बन्धु रूप वाली माया के जो म्दामी हैं, उनका नमस्कार, नमस्कार है ॥१३॥ जिनमे चित्तवृत्ति लगा देने में इस योगमाया रूपी घोर अविद्या को लाघा जा सकता है, उन विद्या म्प प्रभु को नमस्कार है ॥१४॥ यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च सात्वतं । वेदान्तवेदिभिर्विष्णु प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम् ।।१५ यथा यम जगद्धाम्नि धातर्यतत्प्रतिष्ठितम् । सदसत्तेन सत्येन मय्यसौ यातु सौम्यताम् ॥१६ स्मृते सकलकल्याणभाजन यत्र जायते । पुरुपस्तमज नित्य प्रजामि शरण हरिम् ॥१७

पञ्चम प्रश-प्र०१७ ]
। २१७
इत्थ सञ्चिन्तयन्विष्णु भक्तिनम्रात्ममानस.।
अक्रो गोकुलं प्राप्त किञ्चित्सूर्ये विराजति ॥१७
स ददर्श तदा कृष्णमादावादोहने गवाम् ।
वत्समध्यगत फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम् ।।१६
प्रफुल्लपापयाक्ष श्रीवत्सावितवक्षसम् ।
प्रलम्वबाहुमायामतुङ्गोर.स्थलमुन्नसम् ।।२०
सविलासस्मिताधारं विभ्राण मुखपङ्कजम् ।
तुङ्गरक्तनख पझ्या घरण्या सुप्रतिष्ठितम् ॥२१
याज्ञिक जिन्हे यज्ञ पुरुष, सात्वत जिन्हें वासुदेव और वेदान्त के जानने
वाले जिन्हें विष्णु पहकर पुकारते है, उनको मेरा नमस्कार है ।।१५। जिस
सस्य के बल से यह सत्-प्रमत् रूप विश्व उसी विश्वाधार मे अवस्थित है, उसी
फे द्वारा वे मेरे प्रति सौम्य हो ॥१६॥ जिनका स्मरण करने से ही मनुष्य
कल्याण भाजन हो ज ता है, उन्ही अजन्मा भगवान् हरि की शरण मे, मैं जाता
हूं ॥१७॥ श्री पराशर जी ने कहा-भक्ति से विनम्रता को प्राप्त हुए अक्रूरजी
इस प्रकार भगवान् विष्णु का हृदय मे चिन्तन करते-करते, सूर्य के प्रस्त होने
से कुछ पहिले ही गोकुल में जा पहुचे ।।१८।। वहाँ पहुचने पर उन्हें विकसित
नीलोत्पल जैसी कान्ति वाले श्रीकृष्ण गौआ क दोहन-स्यान मे बछडो के मध्य
स्थित दिखाई दिये ॥१६॥ उनके बिवसित कमल जैसे नेत्र थे। लम्बी भुजाए,
श्रीवत्साक्ति हृदय, विशाल प्रौर उन्नत वक्ष स्थल तया ऊँधी नामिका थी
।।२०।। जो सविलास मुसकान युक्त मनोहर मुखपज मे सुशोभित हो रहे थे
राथा जो लास वणं के नसो वाले ऊंचे चरणो स पृथिवी पर प्रतिष्ठित थे ।।२।।
विभ्राण वाससी पीते वन्यपुष्पविभूपितम् ।
सेन्दुनीलाचलाभ त सिताम्भोजावतसकम् ॥२२
हसकुन्दन्दुधवल नीलाम्यरधर द्विज ।
तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम् ।२३
प्राशुमुत्तुङ्गवास विकासिमुपपङ्कजम् ।
मेघमालापरिवृतं कलासादिमिवापरम् ॥३४

२१८ ] [ श्रीविष्णु पुराण तो दृष्ट्वा विकसद्वक्त्रमरोजः स महामतिः । पुलकाशितसर्याङ्गस्तदा रोऽभवन्मुने ।।२५ तदेतत्परम धाम तदेतत्परमं पदम् । भगवद्वासुदेवासो द्विधा योऽयं व्यवस्थितः ॥२६ साफल्यमक्षणोयुगमेतदव दृप्टे जगदातरि यातमुच्चैः । अप्यगमेतद्भगवत्प्रसादा त्तदङ्गसङ्ग फलवन्मम स्यात् ।।२७ जो पीताम्बर भोर वन के पुष्पो से सुशोभित ये तथा जिनका श्याम शारीर श्वेत कमल के मलझारो से सुसज्जित हुमा नीलाचल जैसा प्रतीत हो रहा था ॥२२॥ हे द्विज ! उन्ही के पीछे हम, युन्द अथवा चन्द्रमा जमे गौर वर्ण वाले तथा नीलाम्बर धारण किये हुए बलरामजी दिमाई दिये ॥२३।। जो विशाल वाहुएँ, उन्नत कन्धे और विरसिन मुग कमल से मुशोभित हुए मेघमाला से घिरे हुए द्वितीय क्लाग पर्वत जैसे प्रतीत होते थे ॥२४॥ हे मुने ! महामनि प्रकरजी ने उन बालको को जैसे हो देखा, वैसे ही उनका मुसारविन्द खिल उठा और उनका सम्पूर्ण देह पुलक्ति होने लगा ॥२॥ उन्होंने सोचा कि इन दो स्वरूपों में प्रकट हुमा भगवान् वासुदेव का प्ररा ही परमधाम सथा परम पद है ॥२६॥ संसार को उत्पन्न करने वाले इन वालको के दर्शन से माज मेरे दोनो नेत्र सफल होगये, परन्तु क्या मैं इनके अङ्ग-अङ्ग के लाभ से भी धन्य हो • सकूगा? ॥२७॥ अप्येप पृष्ठे मम हस्तपद्म करिष्यति श्रीमदनन्तमूर्तिः । यस्याङ्गुलिस्पर्शहताखिलाघे रवाप्यते सिद्धिरपास्तदोपा ॥२८ येनाग्निविद्य द्रविरश्मिमाला करालमत्युग्रमपेतचक्रम् । चक्रघ्नता देत्यपतेर्हतानि दैत्याङ्गनानां नयनाञ्जनानि ॥२६ यत्राम्बु विन्यस्य बलिमनोज्ञा नवाप भोगान्वसुधातलस्थः। तथामरत्व त्रिदशाधिपत्व मन्वन्तरं पूर्णमपेतशत्रुम् ॥३० अप्येप मां कंसपरिग्रहेण दोपास्पदीभूतमदोपदुष्टम् । कविमानोपहत धिगस्तु तसन्म यत्साधुबहिष्कृतस्य ॥३१ पञ्चम प्रश-अ० १८ ] [ २१६ ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशेरपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य । कि वा जगत्यत्र समस्तपु सा मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य ३२ तस्मादहं भक्तिविनम्रचेता व्रजामि सर्वेश्वरमीश्वराणाम् । अंशावतारं पुरुषोत्तमस्य ह्यनादिमध्यान्तमजस्य विष्णो. ॥३३ जिनकी अँगुली का स्पर्श होने से ही सब पापो से शून्य हुए मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाते है, क्या वे अनन्त मूर्ति अपने कर कमल को मेरी पीठ पर फेरेंगे ? ॥२८॥ जिन्होने अपने अग्नि, विद्युत् और प्रादित्य की रश्मि माला के समान उग्र चक्र के प्रहार से दैत्यराज की सेना का सहार कर देत्याङ्गनामो के नयनाजन को बहा दिया था ॥२६॥ जिन्हे एक जल-विन्दु देकर ही राजा बलि ने इस भूतल पर मनोज्ञ भोगो को प्राप्त कर एक मन्वन्तर पर्यन्त शत्रु. विहीन अमर इद्र पद का उपभोग किया था ॥३०।। क्या वे भगवान् मुझ दोप- रहित को कस के साथ रहने के कारण दोषी मानकर मेरा तिरस्कार करेंगे? यदि एसा हो तो साधु-जन द्वारा वहिप्कृत होने वाले मेरे जन्म को धिक्कार है ॥३१॥ जगत् मे ऐसा कौन-मा विषय है जिम वे न जानते हो क्योकि ये तो ज्ञानरूप, निर्दोप, सत्वराशि, नित्यप्रकाश और सब जीवो के हृदयों में स्थित रहते है ।।३२।। इसलिये मैं भक्ति-भाव पूवक उन ईश्वरो के भी ईश्वर, अनादि, अमध्य और अनन्त पुरुषोत्तग के अशावतार की शरण को प्रास होता हूँ ॥३३॥ अठारवाँ अध्याय चिन्तयन्निति गोविन्दमुपगम्य स यादव । अक गेऽस्मीति चरणौ ननाम शिरसा हरः ॥१ सोऽप्येन ध्वजवज्राजकृत चिह्नन पाणिना। सस्पृश्याकृष्य च प्रीत्या सुगाढ़ परिपम्बजे ॥२ कृतसुवन्दनी तेन यथावद्वलक्गवी। तत. प्रविष्टौ सहृष्टी तमादायात्ममन्दिरम् ॥३

२२०
1
[ श्रीविष्णु पुराण
सह ताभ्यां तदाक र. कृतसवन्दनादिकः ।
भुक्तभोज्यो यथान्यायमाचचक्षे ततस्तयोः॥४
यथा निर्भत्सितस्तेन कसेनानकदुन्दुभिः ।
यथा च देवकी देवी दानवेन दुरात्मना ॥५
उग्रसेने यथा कसस्स दुरात्मा च वर्तते ।
यं चैवार्थ समुद्दिश्य कसेन तु विसर्जितः ॥६
श्री पराशरजी ने कहा-~-यादव प्रक्रूरजी इस प्रकार स्थिर कर भगवान
श्री गोविन्द के पास गये और उनके चरणो मे मस्तक झुका कर प्रणाम करते
हुए बोले कि "मैं अक्रूर हूँ ॥१॥ तव श्रीकृष्ण ने भी उन्हे अपने ध्वजा, वज,
पद्म, चिह्न वाले हाथो से स्पर्श किया और प्रेम सहित अपनी ओर खीचकर दृढ़
आलिंगन किया ॥२॥ फिर अक्रूर द्वारा वन्दित हुए बलराम और कृष्ण अत्यन्त
प्रानन्द पूर्वक उनके साथ अपने घर आये ||३|| तब अक्रूर का वहाँ सत्कार
हुमा और उन्हें भोजनादि कराया गया। तदनन्तर अकूर ने उन्हे कस का वसु-
देव-देवकी को फटकारने अपने पिता उग्रसेनजी को सताने तथा अगर को
वृन्दावन भेजने प्रादि का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया ॥४-६॥
तत्सर्वं दिस्तराच्छु त्वा भगवान्देवकीसुतः ।
उवाचाखिलमप्येतज्ज्ञातं दानपते मया ॥७
करिष्ये तन्महाभाग यदत्रीपयिक मतम् ।
विचिन्त्य नान्यथैतत्ते विद्धि कस हत मया ॥
अह रामश्च मथुरा श्वो यास्यावस्सह त्वया ।
गोपवृद्धाश्च यास्यन्ति ह्यादायोपायन बहु ।।
निशेय नीयतां वीर न चिन्ता कर्तुमर्हसि ।
त्रिरात्राभ्यन्तरे कसं निहनिष्यामि सानुगम् ॥१०
समादिश्य ततो गोपानक रोऽपि च केशव. ।
सुध्वाप बलभद्रश्च नन्दगोपगृहे ततः ॥११
तत. प्रभाते विमले कृष्णरामो महायुती।
अकरेण समं गन्तुमुद्यतो मथुरा पुरीम् ॥१२

पञ्चम अंश-०१८ ] [ २२१ प्रब जो । दृष्ट्वा गोपीजनम्मान. श्लथवलयबाहुक । नि.शश्वासातिदु खात्तं प्राह चेद परस्परम् ।।१३ उस मम्पूण वृत्ताल को सुनकर देववी पुत्र श्रीकृष्ण ने अक्रूर से कहा- हे दानपते । मुझे यह सब बाते ज्ञात हो चुकी है ॥७॥ हे महाभाग मैं ठीक ममभूगा, वह करूगा । तुम कस को मेरे द्वारा मारा गया ही समझो, इममे कुछ अन्यथा नही है 1८1। मैं और बलरामजी तुम्हारे साथ कल ही मथुरा चलेंगे तथा अन्य वृद्ध गोपगण भी बहुत सा उपहार लेकर वहाँ जायगे ॥६॥ हे वीर | आप चिन्ता को छोड कर सुख से रात्रि विथाम करिये । मैं बस को उसके अनुगामियो के महित तीन गत म ही नष्ट कर दूंगा ॥१०॥ श्री परा. शर जी ने कहा--प्रबर, केशव और बलरामजी ने मभी गोमो को कस का प्रादेश सुनाया और नन्द भवन मे जाकर शयन करन लगे ॥११।। फिर प्रात . फाल होन पर महातेजस्वी बलराम और कृष्ण प्रकरजी के साथ मयुरा जाने को उद्यत हुए तब ढील हुए कवण वाली गोपियां अश्रुपूर्ग नेत्रो से दु खात होती हुई दीघ श्वास छोडा लगी और परस्पर म बोली ॥१२-१३।। मथुरा प्राप्य गोविन्द कथ गोकुलमेष्यति । नगरस्त्रीकलालापमधु श्रात्रेण पाम्यति ॥१४ विलासवाक्यपानेषु नागरीणा कृतास्पदम् । चित्तमस्य क्थ भूया ग्राम्यगोपीपु यास्यति ।।१५ सार समस्तगोष्ठस्य विधिना हरता हरिम् । प्रहृत गोपयोपित्सु निर्धणेन दुरात्मना ।।१६ भावगर्भस्मित वाक्य विलासललिता गति । नागरीणामतीवंतत्कटाक्षेक्षितमेव च ॥१७ ग्राम्यो हरिग्य तासा विलासनिगड युत । भवतीना पुन पावं क्या युक्त्या समेष्यति ।।१८ एपेर रथमारुह्य मथुरा याति केशव । करेणाक रफेरणान निर्घग्गन प्रतारित ॥१६

२२२ ]
श्रीविष्णु पुराण
किं वेत्ति नृशंसोऽयमनुरागपर जनम् ।
येनैवमक्ष्णोराह्लाद नयत्यन्यत्र नो हरिम् ।।२०
एप रामेण सहितः प्रयात्यत्यन्तनिधुरण ।
रथमारुह्य गोविन्दस्त्वयंतामस्य वारणे ॥२१
जब गोविन्द मथुरा पहुंच जायगे तब गोकुल मे क्यो लौटेगे ? क्योकि
वहाँ इनके कानो को नगर की स्त्रियो का मधुरालाप रूपी रस उपलब्ध होगा
१४॥ नगर की स्त्रियो के विलास-वाक्यो मे रम जाने पर गंवारियों की ओर
इनका मन क्यो रहेगा ? ॥१५॥ दुरात्मा विधाता भी कमा निर्दयी है, जिसने
सम्पूर्ण अज के सारभूत भगवान् श्रीहरि को छीन कर हम गोपाङ्गनामो पर
हार किया है ।।१६।। नगर को नारियो मे स्वभाव से ही भावमयी और मुम-
कानमयी वाणी, विलास-लालित्य तथा कटाक्षमयी चितवन की अधिकता होती
है । उनके विलास-बन्धन को प्राप्त होकर यह ग्रामीण कृष्ण फिर किस प्रकार
तुम्हारे पास आ सकेंगे? ॥१७-१८।। देखो, यह क र अक र कैसा निर्दयी है,
जिसके बहकावे में आकर यह केशव उसके रथ पर चढ कर मथुरा जा रहे हैं ?
।।१६।। क्या यह नृशस प्रक र अनुरागियो के हृदयगत भावो से अनजान है जो
हमारे नेनो को सुख देने वाले हरि को यहां से अन्यत्र ले जारहा है
परी देखो, यह गोविन्द भी कैमे निष्ठुर होगये हैं जो बलरामजी के साथ रथा-
रूढ होकर जा रहे हैं । इन्हें रोकने मे शीघ्रता करनी चाहिये ॥२१॥
गुरूणामग्रतो वक्तु किं ब्रवीपि न न क्षमम् ।
गुरवः किं करिष्यन्ति दग्धानां विरहाग्निना ॥२२
नन्दगोपमुखा गोपा गन्तुमेते समुद्यताः ।
नोद्यम कुरुते कश्चिद्गोविन्दविनिवर्तने ।।२३
सुप्रभाताद्य रजनी मयुरावासियोपिताम् ।
पास्यन्त्यच्युतवक्त्राब्ज यासा नेपादिपक्तयः ॥२४
धन्यास्ते पथि ये कृष्णमितो यान्त्यनिवारिता. ।
उहिष्यन्ति पश्यन्तस्वदेह पुलकाञ्चितम् ।।२५
?
॥२०॥

पञ्चम पश-०१८ ] [ २२३ मथुरानगरीपौरनयनानां महोत्सवः । गोविन्दावयष्टैरतीवाद्य भयिष्यति ॥२६ को नु स्वप्नमभाग्याभिष्टस्ताभिरधोक्षजम् । विस्तारिकान्तिनयना या द्रक्ष्यन्त्यनिवारिता ॥२७ अहो गोपीजनस्यास्य दर्शयित्वा महानिधिम् । उत्कृत्तात्यद्य नेत्राणि विधिनाकरुणात्मना ॥२८ प्ररी, तू यह क्या कहती है कि अपने बडो के सामने इस प्रकार रहने मे हम ममथं नहीं हैं ? हम तो विरहाग्नि मे दग्ध हो चुकी है, वडे अव हमारा क्या करेंगे ? ॥२२॥ देयो, यह नन्दादि गोप भी उनके साथ जाने को उद्यत है। इनमे से भी कोई गोविन्द वो वहाँ जाने से नहीं रोकता ॥२३॥ मथुरा की स्त्रियो के लिये प्राज की रात सुम्पद प्रभात वाली हुई है, क्योकि आज उनके नेम रूपी भ्रमर भगवान् अच्युत के मुख-मकरन्द का पान करेगे ॥२३॥ श्रीकृष्णा पा अनुगमन करन वाले ही धन्य है, क्योकि वे उनका दर्शन-लाभ करते हुए ही अपने पुलकित देह को चलाते है ॥२॥ श्री गोविन्द क प्रगो को देखकर मथुरा निवामियो के नेत्र महोत्सव मनायेगे ॥२६।। ग्राज मथुग की कान्तिमय विशाल नेत्रो वाली मौभारशालिनी मारियो न एमा कौन-मा शुभ स्वप्न देखा है, जिसके फलस्वरूप वे स्वच्छन्दता पूर्वक श्री अधोक्षज का दर्शन करेंगी ॥२७।। अरे, ये विघाता क्तिमा निष्ठुर है, जिमने महानिवि दिखाकर ही हम गोपियो के नेत्र खीच लिय है ॥२८॥ अनुरागरण शैथिल्यमस्मासु जिते हरौ। शैथिल्यमुपयान्त्याशु करेपु बलयान्यपि ॥२६ अक र क्रू रहृदयश्शीघ्र प्रेरयते हयान् । एवमार्तासु सुकृपा कस्यान्यथा न जायते ॥३० एप कृष्णरथस्याच्चैश्चक्ररेणुनिरीक्ष्यताम् । दूरीभूतो हरियन सोऽपि रेणुन लक्ष्यते ॥३१ इत्येवमतिहाद्देन गोपीजननिरीक्षित.। तत्याज ब्रजभूभाग सह गमेण केदाव ॥३२ २२४ ] । श्रीविष्णुपुराण गच्छन्तो जवनाश्वेन रथेन यमुनातटम् । प्राप्ता मध्याह्नसमये रामा रजनार्दना. ॥३२ अथाह कृष्णम रो भनद्भयां तावदास्यताम् । यावत्करोमि कालिन्द्या आह्निकाहणमम्भमि ॥३४ देखो, भगवान हरि का अनुराग भी हमारे प्रति शिथिल होगया है, इसी से तो हमारे हाथो के कगन ढीले होगये हैं ।।२६।। देखो, यह प्रक र कसा क्रूर हृदय है जो अश्वो को शीघ्रता से हांक रहा है, अन्यथा हमारे जैसी प्रात हुई नारियो पर कौन कृपा न करेगा ? ॥३०॥ देखो, अब कृष्ण के रथ की उडती हुई यह धूलि ही दिखाई दे रही है, परन्तु अब तो वे इतने दूर जा पहुंचे कि उस धूलि का दिखाई देना भी रुक गया ॥३१॥ श्री पराशरजी ने कहा-इस प्रकार गोपियो द्वारा अनुराग-पूर्वक देखते-देखते ही श्रीकृष्ण-बलराम ब्रजभूमि को छोड कर आगे बढ गये ॥३२॥ फिर वे तीनो--बलराम, कृष्ण और अक्रूर शीघ्रगति वाले प्रश्वी से संयुक्त रथ मे चलते हुए मध्याह्न वाल मे यमुना के निकट पहुंच गये ॥३३॥ वहाँ जाकर अकूर ने श्रीकृष्ण से कहा-'मैं मुना जी में जाकर मध्याह्न काल की उपासना करगा। मेरे वहां से लौटने तक प्राप यही रहें ॥३४॥ तथेत्युक्तस्ततस्स्नातस्स्वाचान्तस्स महामतिः । दध्यो ब्रह्म पर विप्र प्रविष्टो यमुनाजले ॥३५ फणासहस्रमालाढय बलभद्र ददर्श स.। कुन्दमालाङ्गमुन्निद्रपद्मपत्रायतेक्षणम् ॥३६ वृतं वासुकिरम्भाद्य महद्भिः पवनाशिभिः । सस्तूयमानमुद्गन्धिवनमालाविभूषितम् ॥३७ दधानमसिते वस्त्रे चारुपद्मावतंसकम् । चारकुण्डलिनं भान्तमन्तर्जलतले स्थितम् ॥३८ तस्योत्सने घनश्याममाताम्रायतलोचनम् । चतुर्बाहुमुदाराङ्ग चक्राद्यायुधभूपणम् ॥३६ पञ्चम अश-अ० १८ ] [ २२५ पीते वसान वसने चित्रमाल्योपशोभितम् । शक्रचापतडिन्मालाविचित्रमिव तोयदम् ।।४० श्रीवत्मवक्षस चारु स्फुरन्मकरकुण्डलम् । ददर्श कृष्णमक्लिष्ट पुण्डरीकावतसकम् ॥४१ सनन्दनाद्य मुनिभिस्सिद्धयोगैरकल्मपं । सञ्चिन्त्यमान तत्रस्थैर्नासानन्यस्तलोचनः ।।४२ श्री पराशर जी ने कहा-हे विप्र । भगवान् द्वारा सहमति प्रकट करने पर महामति अक रजी ने यमुना-जल मे प्रवेश किया और प्राचमन आदि के पश्चात् परब्रह्म का चिन्तन करने लगे ॥३५॥ उस समय उन्हे बलरामजी हजार फलो से युक्त दिखाई देने लगे। उनका देह कुन्दपुष्पो की माला के समान तथा नेत्र खिले हुए पद्म पत्र के ममान प्रतीन हुअा ॥३६॥ तथा धे वासुकि और रम्भ प्रादि महासर्पो से घिर र स्तुत हो रहे है । उनके देह पर सुगन्धित वन- मालाए शोभा पा रही है ॥३७॥ उन श्याम वस्त्रधारी ने कमल पुप्पो के सुन्दर प्राभूषण धारण किये हुए हैं और वे कुण्डली लगा कर जल मे अवस्थित है ॥३८।। फिर उनकी गोद मे स्थित मन विभूपित आनन्द-पद श्रीकृष्णचन्द्र को उन्होंने देखा, जो बादल क समान श्याम देह, विचित् लाल एव विशाल लोचन, मनोहर अङ्ग और उपागो तथा शख-चक्रादि प्रायुधो से शोभित चार भुजा, बनमाला और पोताम्बर से सुमज्जित तथा इन्द्रधनुष और विद्यु-माला युक्त मेघ जैसे प्रतीत हो रह थे । उनके वक्ष स्थल मे श्री वत्म का चिह्न और कानो मे मकराकार कुण्डल सुशोभित थे ।।३६-४०-४१॥ तथा सनन्दनादि मुनि, दोप- रहित सिद्ध और योगी उसी जल में स्थित रहार नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए श्रीकृष्ण का ही व्यान कर रहे है ।।४२।। बलकृष्णौ तथाक र प्रत्यभिज्ञाय विस्मित । अचिन्तयद्रथाच्छीघ्र कथमनागताविति ।।४३ विवक्षो स्तम्भयामास वाच तस्य जनार्दनः । ततो निष्क्रम्य सलिलाद्रथमम्यागत पुनः॥४४ ।

२२६ ॥ [ श्रीविष्णु पुराण ददर्श तत्र चैवोभौ रथस्योपरि निष्ठितो। रामकृष्णौ यथापूर्व मनुष्यवपुपान्वितौ ।।४५ निमग्नश्च पुनस्तोये ददर्श च तथैव तौ। सस्तूयमानी गन्धर्व, निसिद्धमहोरगै ॥४६ ततो विज्ञातसद्भावस्स तु दानपतिस्तदा । तुष्टाव सर्वविज्ञानमयमच्युतमीश्वरम् ।।४७ इस प्रकार बलगम कृष्ण को वहाँ देखकर अफ जी को बड़ा प्राश्चर्य हुना और वे मोचने लगे कि यह दोनो रथ से उतर कर इतनी जल्दी यहाँ कैमे प्रागये ? ॥४३।। जब उन्होने कुछ कहने की इच्छा की तो उनकी वाणी ही रुक गई । तब उन्होन रथ के पास आकर बलराम-कृष्णा दोनो को ही पहिले के समान रथ पर बैठे देखा ॥४४-४५॥ इस पर अकूरजी पुन यमुनाजी के जल मे घुपे तो उन्हें गन्धर्वो, मिद्धो, मुनियो और नागो ने स्तुन होते हुए वे दोनो बालक उमी प्रकार दिखाई दिये ॥४६।। तब तो अकरजी उस यथार्थ रहस्य मा समझ गये और मर्वविज्ञानात्मक अच्युत परमेश्वर श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे ॥४७॥ सन्मात्ररूपिरोऽचिन्त्यमहिम्ने परमात्मने । व्यापिने नकरूपैकस्वस्पाय नमो नम ॥४८ नमो विज्ञानपाराय पराय प्रकृते प्रभो ।।४६ भूतात्मा चेन्द्रियात्मा च प्रधानात्मा तथा भवान् । प्रात्मा च परमात्मा च त्वमेक पञ्चधा स्थितः ।।५० प्रसीद सर्व मर्वात्मन् क्षगक्षरमयेश्वर । ब्रह्मविष्णुशिवास्याभि कल्पनाभिरदीरित ॥५१ अनाम्येयम्बम्पात्मन्ननाव्येयप्रयोजन । प्रनाम्येयाभिधान त्वा नतोऽस्मि परमेश्वर ॥५२ परजी न कहा--मन्माष म्प, अचिन्त्य महिम, व्यापर, तथा अनेक वाले उन परमारम देव ब) नमस्कार है॥४८॥ हे प्रभो । आप मचिन्त्य एवं गांप हषि वन ग्रह्म को नमस्कार है। माप विज्ञान और पञ्चम अंश-अ०१८ ] [ २२७ प्रकृति से परे को नमस्कार है ॥४६॥ आप एक ही भूतात्मा, इन्द्रियात्मा, प्रधा- नात्मा, जीवात्मा और परमात्मा-इन पांचौ रूपो में स्थित है ॥५०॥ हे सर्व ! से सर्वात्मन् ! हे क्षर-अक्षरमय परमेश्वर ! आप एक ही ब्रह्मा, विष्णु, महादेव रूप से कल्पित किये जाते है । हे प्रभो ! आप प्रसन्न हो ॥५१।। हे परमेश्वर ! अापके नाम, रूप, प्रयोजन-सभी अक्थनीय है । अापको मेरा नमस्कार है ॥५२॥ न यत्र नाथ विद्यन्ते नामजात्यादिकल्पनाः । तद्ब्रह्म परम नित्यमविकारि भवानज. ॥५३ न कल्पनामृतेऽम्यि सर्वस्याधिगमो यतः । ततः कृष्णाच्युतानन्तविष्णुसज्ञाभिरीड्यते ॥५४ सर्वार्थास्त्वमज विकल्पनाभिरेते, देवाय भवति हि यैरनन्तविश्वम् । विश्वात्मा त्वमिति विकारहीनमेत- त्सवम्मिन्न हि भवतोऽसि किञ्चिदन्यत् ।।५५ व ब्रह्मा पशुपतिरर्यमा विधाता। धाता व त्रिदशपतिस्समीरणोऽग्नि. । तोयेशो धनपतिरन्तकस्त्वमेको, भिन्नार्जगदभिपासि शक्तिभेद ५६ विश्व भवान्सृजति सूर्यगभस्तिरूपो, विश्वेश ते गुणमयोऽयमत प्रपञ्च । रूप पर सदिति वाचकमक्षर य. ज्ज्ञानात्मने सदसते प्रगतोऽस्मि तस्मै ११५७ ॐ नमो वासुदेवाय नमस्सकर्षणाय च । प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ।।५८ हे नाथ ! माप नाम-जाति आदि कल्पनाओ से परे, नित्य, निविवार ए प्रजन्मा परब्रह्म हैं ॥५३॥ कल्पना के बिना किसी वस्तु का ज्ञान सम्भव न होने से ही कृष्ण, अच्युत, अनन्त और विष्णु आदि नामो मे मापकी पाराधना २२८ ] [ श्रीविष्णु पुराण की जाती है ॥५४॥ हे अज ! जिन देवादि कल्पना वाले पदार्थों से यह अनन्त संसार उत्पन्न हुआ है, वह सब पाप ही है । आप ही विकारहीन आत्म वस्तु होने में विश्वात्मा है । इन सब मे आपसे भिन्न कोई भी पदार्थ नहीं है ॥५५॥ अाप ही ब्रह्मा, पशुपति, अर्थमा, विधाता, धाता, इन्द्र, समीर, अग्नि, वरुण, कुवेर और यम के रूप में विभिन्न कार्य-भेद के द्वारा इस सम्पूर्ण विश्व की रक्षा करते है ॥५६॥ हे विश्वेश्वर ! माप ही सूर्य-रश्मियो के रूप मे होकर जगत् की सृष्टि करते है। इस प्रकार यह गुणमय सम्पूर्ण प्रपंच आपका ही स्वरूप है । जिसका वाचक सत् है, वह प्रणव प्रापका ही रूप है, इसलिये उस ज्ञानात्मक सत्स्वरूप को मैं प्रणाम करता हूँ ॥५७॥ वासुदेव, संर्पण,प्रद्युम्न मोर अनिरुद्ध स्वरूपो को मेरा बारम्बार नमस्कार है ।।५८|| उन्नीसवाँ अध्याय एवमन्तर्जले विष्णुमभिष्ट्रय स यादवः । अर्चयामास सर्वेश धूपपुष्पर्मनोमयः ॥१ परित्यक्तान्यविषयो मनस्तत्र निवेश्य सः । ब्रह्मभूते चिर स्थित्वा विरराम समाधितः ॥२ कृतकृत्यमिवात्मान मन्यमानो महामतिः । आजगाम रथ भूयो निर्गम्य यमुनाम्भसः ॥३ ददर्श रामकृष्णौ च यथापूर्वमवस्थितौ । स्मिताक्षस्तदाक रस्तं च कृष्णोऽभ्यभाषत ।।४ नून ते दृष्टमाश्चर्यमा र यमुनाजले । विस्मयोत्फुल्लनयनो भवान्सलक्ष्यते यतः ।।५ अन्तर्जले यदाश्चर्य दृष्ट तत्र मयाच्युत । तदनापि हि पश्यामि मूर्तिमत्पुरतः स्थितम् ॥६ जगदेतन्महाश्चर्यरूप यम्य महात्मन. । तेनाश्चर्यपरेणाहं भवता कृष्ण सङ्गत ॥७ पञ्चम प्रश-अ० १६ ] [ २२६ तत्किमेतेन मथुरा यास्यामो मधुसूदन । विभेमि कसाद्धिग्जन्म परपिण्डोपजीविनाम् ।।८ श्री पराशरजी ने कहा - यदुवशी प्रक्र रजी ने जल के भीतर भगवान् विष्णु की इस प्रकार स्तुति की और मनोभाव स ही धूप, दीपक, पुष्पादि से उनका पूजन किया ॥१॥ अन्य विषयो से चित्त को हटा कर उन्ही म तन्मय करते हुए अक रजी ने चिरकाल तक ध्यानावस्थित रहकर समाधि तोड दी ॥२॥ फिर अपने को धन्य मानते हुए यमुना-जल से निकल कर रथ के पास पहुचे ॥३॥ वहाँ उन्होने बलराम-कृष्ण को विस्मित नेत्रो से पहिले के समान ही रथ मे बैठे हुए देखा । तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा ॥४॥ श्रीकृष्ण बाले–हे अक्रूर । आपने यमुनाजी के जल मे अवश्य ही कोई विस्मय करने वाली वस्तु देखी है, यह बात अापके चकित नेमो स प्रतीत हो रही है ॥५॥ प्रकर ने कहा है अच्युत । यमुनागी के जल में जा आश्चर्य मुझे दिखाई दिया था, उसे मैं इस समय भी अपने समक्ष देखता हू ।।६।। हे वृपण । जिसका स्वरूप यह पाश्चयमय विश्व है, उन्ही पाप परम भाथय रूप के साथ मेरा सग हुअा है ।।७।। हे मधु- सूदन । अब उस आश्चर्य के विषय म क्या कहू ' अब हम शीघ्र ही मथुरा पहुचना है, क्योकि कस स मैं अत्यन्त भयभीत ह । पराय अन्न के प्राधार पर जीवित रहने वालो का जीवन भी व्यथ है ॥८॥ इत्युक्त्वा चोदयामास स हयान् वातरहस । सम्प्राप्तश्चापि सायाह्न साङ्करा मथुरा पुराम् 16 विलाक्य मथुरा कृष्ण राम चाह स यादव । पझ्या यात महावीरो रथेनको विशाम्यहम् ॥१० गतव्य वसुदेवस्य नो भवद्भ्या तथा गृहम् । युवयोहिं कृते वृद्धस्स कसेन निरस्यते ॥११ इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सोऽक्रूरा मथुरा पुरीम् । प्रविष्टौ रामकृष्ण च राजमार्गमुपागतो ॥१२ नीभिनंश्च सानन्द लोचनरभिवीक्षितो। जग्मतुर्लीलया वीरो मत्ती बालगजाविव ॥१३ -- २३० [ श्रीविष्णु पुराण यह कहकर अक रजी ने वायुवेग वाले अपने अश्वो को चलाया और सायकाल होने पर मथुरा पुरी में जा पहुचे ॥६॥ उस मथुरा नगरी को देखकर बलराम-कृ ण से अकर ने कहा-हे महावीरो । यहाँ से मैं अकेला ही रथ पर जाऊँगा, आप पैदल ही वहा आजाइये ।।१०।। मथुरा में जाकर आप वसुदेवजी के घर मे मत जाना, क्योकि कस उन वृद्ध वसुदेवजी का पापके कारण ही तिरस्कार किया करता है ॥११॥ श्री पराशरजी ने कहा-~-यह कहकर अक्रूरजी मधुरापुरी मे प्रविष्ट होगये फिर बलराम और कृष्ण भी राज मार्ग के द्वारा पुरी मे पागये ।।१२।। मदमत्त तरुण हाथियो की-सी चाल चलते हुए उन दोनो वीरो को मथुरा के नर-नारी परम आनन्द पूर्वक देख रहे थे ।।१३।। भ्रममारणौ ततो दृष्ट्वा रजक रङ्गकारकम् । अयोचता सुरूपाणि वासासि रुचिराणि ती ॥१४ कसस्य रजक सोऽथ प्रसादास्ढविस्मय.। बहून्याक्षेपवाक्यानि प्राहोच्चै रामकेशवा ॥१५ ततस्तलप्रहारेण कृष्णस्तस्य दुरात्मन । पातयामास रोपेण रजकस्य शिरो भुवि ॥१६ हत्वादाय च वस्त्राणि पीतनीलाम्बरी तत्त । कृष्णरामौ मुदा युक्तौ मालाकारगृह गतो १७ विकासिनेत्रयुगला मालाकारोऽतिविस्मत । एतौ वस्य सुतौ यातो मत्रेयाचिन्तयत्तदा ॥१८ पीतनीलाम्बरधरौ तौ दृष्ट्वातिमनोहरौ। स तयामास तदा भुव देवावुपागतो ॥१६ विवासिमुखपद्माभ्या ताभ्या पुष्पाणि याचित । भुव विष्टभ्य हस्ताभ्या परस्पर्श शिरसा यहीम् ॥२० प्रसादपरमी नायौ मम गेहमुपागतो। धन्योऽहमर्चयिष्यामीत्याह तो माल्यजीवन ॥२१ माग में उन्हें एक पडे रंगने वाला रजर दिखाई दिया, जिमसे उन्होंने सुन्दर वरसो को याचना की ॥१४॥ वह जर बस का कृपापात्र होने से प्रत्यत

पञ्चम अंश-न० १०
[ २३१
अहवारी होगया था, इसलिये राम-कृष्ण द्वारा वस्त्र की याचना करने पर उसने
विस्मय पूर्वक अनेक आक्षेप युक्त वचन कहे ॥१५॥ इस पर श्रीकृष्ण ने रुष्ट
होकर अपनी हथेली के प्रहार से उस दुष्ट के मम्तक को पृथिवी पर गिरा दिया
।।१६।। इस प्रकार उसका वध करके उन्होने उसके सब वस्त्रो को ले लिया और
उन नीले-पीले वस्त्रो को पहिन कर हर्पित होते हुए एक माली के घर आये
॥१७॥ हे मैत्रेयजी ! उस माली ने जैसे ही उन्हें देखा वैसे ही उसके नेत्र हर्ष
से विकसित होगये और वह विस्मय पूर्वक सोचने लगा कि यह किसके पुत्र,
कहाँ से चले पा रहे हैं ? ॥१५) उन पीले-नीले वस्त्रो को धारण करने वाले
मनोहर वालको को देखकर उसने दो देवताओ को पृथिवी पर आया हुआ समझा
।।१६। फिर उन सिले हुए मुखारविन्द वालो ने उससे पुष्पो को याचना की तर
उसने अपने हाथो को टेक कर अपने शिर से भूमि को स्पर्श करते हुए कहा-
हे नाथ ! आपने मेरे घर आकर बडी कृपा की है । मैं आज आपका पूजन करके
धन्य हो जाऊंगा ॥२०-२१।।
तत. प्रहृष्टवदनस्तयो. पुष्पाणि कामत.।
चारूप्येतान्यथैतानि प्रपदौ स प्रलोभयन् ।।२२
पुनः पुन प्रणम्याभी मालाकारो नरोत्तमौ ।
ददो पुष्पाणि चारूणि गन्धवन्त्यमलानि च ॥२३
मालाकाराय कृष्णोऽपि प्रसन्न प्रददौ वरान् ।
श्रीस्त्वा मत्सश्रया भद्र न कदाचित्यजिष्यति ॥२४
बलहानिर्न ते सौम्य धनहानिरथापि वा।
यावद्दिनानि तावच न नशिष्यति सन्ततिः ॥२५
भुक्त्वा च विपुलान्भोगास्त्वमन्ते मत्प्रसादतः ।
ममानुस्मरण प्राप्य दिव्य लोकमवाप्स्यसि ॥२६
धर्म मनश्न ते भद्र सर्वकाल भविष्यति ।
युष्मत्सन्ततिजाताना दीर्घमायुभविष्यति ॥२७
नोपसदिक दोपं युष्मत्सन्ततिसम्भवः ।
अवाप्स्यति महाभाग यावत्सूर्यो भविष्यति ॥२८

२३२ ) 1 श्रीविष्णु पुराण इत्युक्त्वा तद्गृहात्कृष्णो बलदेवसहायवान् । निर्जगाम मुनिश्रेष्ठ मालाकारेण पूजितः ॥२६ फिर उस माली ने 'यह बहुत सुन्दर पुष्प हैं, यह अत्यन्त सुन्दर हैं इस प्रकार प्रसन्न मुख से उन्हें प्राकर्षित कर-करके पुष्प प्रदान किये ॥२२।। उसने उन दोनो को बारम्बार प्रणाम करते हुए अत्यन्त सुन्दर, सुगन्धित और मनोहर पुष्प दिये ।।२३।। तब श्रीकृष्ण भी उस माली पर प्रसन्न होगये और उन्होंने उसे वर दिया कि मेरी आश्रिता लक्ष्मी कभी तेरा त्याग न करेगी ॥२४॥ हे सोम्य ! तेरा बल और धन कभी क्षीण नही होगा और जब तक दिनो का अस्तित्व रहेगा, तब तक तेरा वंश समाप्त न होगा ॥२५॥ तू भी अपने जीवन पर्यन्त विविध प्रकार के मुख-भोग करता हुआ, अन्त मे मेरी कृपा से मेरा स्मरण करेगा, जिससे तुझे दिव्यलोक की प्राप्ति होगी ॥२६॥ है भद्र ! तेरा वित्त सदा धर्म में लगा रहेगा और तेरे वशज दीर्घ आयु वाले होगे ॥२७॥ हे महाभाग ! संसार में सूर्य की स्थिति तक तेरे किसी भी वशन को उपसर्ग दोष की प्राति नही होगी ॥२८॥ थी पर शरजी ने कहा--से मुनिवर । यह कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अपने भ्राता बलरामजी सहित उस माली द्वारा पूजित होकर वहाँ से चल दिये ॥२६॥ बीसवाँ अध्याय राजमार्ग तत. कृष्णस्सानुलेपनभाजनाम् । ददर्श कुब्जामायान्ती नवयौवनगोचराम् ।।१ तामाह ललित कृष्ण. कस्येदमनुलेपनम् । भवत्या नीयते सत्यं वदेन्दीवरलोचने ॥२ सकामेनेव सा प्रोक्ता सानुरागा हरि प्रति । प्राह सा ललितं कुब्जा तदर्शनबलात्कृता ॥३ कान्त कस्माग्न जानासि कसेन विनियोजिताम् । मकवक ति विख्यातामनुलेपनकर्माण ॥४ पञ्चम अश-प्र० २० ] [ २३३ नान्यपिष्ट हि कसस्य प्रीतये ह्यनुलेपनम् । भवाम्यहमतीवास्य प्रसादधनभाजनम् ।।५ सुगन्धमेतद्राजाहं रुचिर रुचिरानने । आवयोर्गानसदृश दीयताममुलेपनम् ॥६ श्री पराशरजी ने कहा-इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण ने कुब्जा नाम की एक नवयौवना नारी को अनुलेपन का पात्र ग्रहण किये हुए राजमार्ग पर पाते हुए देखा ॥१॥ तब उन्होंने उससे लालित्यपूर्ण वचनो मे कहा-हे पद्य- लोचने । सत्य बता कि तू इम अनुलेपन को सि पुरुष के लिये ले जारही है ? ॥२॥ भगवान् द्वारा कामुक के समान ऐसा पूछा जाने पर अनुरागवती कुरजा उनको देखकर प्रासक्त चित होगई और विलास पूर्वक कहने लगी ॥३॥ है कान्त । क्या तुम मुझे नहीं जानते । राजा कस द्वारा में अनुलेपन-कार्य में नियुक्त हु और मेरा नाम 'भनेकवक्रा' प्रसिद्ध है ॥४॥ राजा को मेरे द्वारा बनाया हुआ अनुलेपन ही अच्छा लगता है, इमोलिय में उनकी महती कृपापात्री हूं ॥५॥ श्रीकृष्ण ने कहा-हे सुन्दर मुग्यवाली । यह सुन्दर सुगन्ध वाला उब- टन तो राजा के याग्य ही है । यदि तुम्हार पाम कोई अनुलेपन हमारे देह के याय हो तो हम देदो ॥६॥ श्रु त्वैतदाह सा कुब्जा गृह्यतामिति सादरम् । अनुलेपन च प्रददौ गाययाग्यमयोभया ।। भक्तिच्छेदानुलिप्ताङ्गो ततस्तो पुरपपंभो। सेन्द्रचापौ व्यराजेता मितवृष्णाविवाम्बुदौ । ततस्ता चिवुके शोरिरुल्लापन विधानवित् । उत्पाटय तोलयामास द्वघड गुलेनाग्रपाणिना IME चकप पद्भया च तदा ऋजुत्व केशवोऽनयत् । ततस्सा ऋतुजा प्राता या पितामभवद्वरा ॥१० विलासललित प्राह प्रमग भगलसम् । वम्ने प्रगृह्य गाविन्द मम गेह यदि वे ॥११ २३४ ] [ श्रीविष्णु पुराण एवमुक्तस्तया शौरी रामस्यालोक्य चाननम् । प्रहस्य कुब्जां तामाह नैकयक्रामनिन्दिताम् ॥१२ आयास्य भवतीगेहमिति ता प्रहसन्हरिः । विससर्ज जहासोच्च रामस्यालोक्य चाननम् ॥१३ श्री पराशरजी ने कहा-ऐसा सुन कर बुजा ने उनके शरीर पर लगाने योग्य अनुलेपनादि उन्हे प्रदान किये ॥७॥ तब वे दोनों पुरुष थे४ अनु. लेपन-युक्त होकर इन्द्रधनुषमप श्याम और श्वेत बादलो के समान शोभा पाने लगे। फिर उल्लापन-विधान के ज्ञाता श्रीकृष्ण ने उसकी चिबुक को अपनी दो अंगुलियो मे उचका कर झटका दिया और अपने चरणो से उसके पांव दबा लिये । इस प्रकार उन्होने उसकी देह सीधी कर दी। इस प्रकार सीधी होकर कुब्जा सब स्त्रियो से सुन्दर प्रतीत होने लगी ॥६.१०) तब उसने भग- वान् का वस्त्र पक्ड लिया और प्रेम गर्व से अलसाई हुई ललित वाणी मे कहने लगी कि 'मेरे घर पर पधारिये' ॥११॥ पहिले जिसके अनेक प्रङ्ग युवडे ये और जो अब सीधे अग होने से सुन्दरी होगई थी, बस कुब्जा की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने बलरामजी मुख की ओर देखते हुए हैंस कर कहा-'मैं तुम्हारे पर आऊंगा' । ऐसा कह कर उन्होंने बुब्जा को हंसते हुए विदा किया और बलरामजी के मुख की ओर देख कर उच्च हास करने लगे ॥१२-४३॥ भक्तिभेदानुलिप्ताङ्गो नीलपीताम्बरी तु तो। धनुश्शाला ततो यातो चित्रमाल्योपशोभिती ।।१४ प्रायागं तद्धनरत्न ताम्या पृष्टस्तु रक्षिभिः । आख्याते सहसा कृष्णो गृहीत्वापूरयद्धनुः ।।१५ ततः पूरयता तेन भज्यमान वलानुः । चकार सुमहच्छन्द मथुरा येन पूरिता ॥१६ अनुयुक्तो ततस्तौ तु भग्ने धनुपि रक्षिमिः । रक्षिसंन्य निहत्योभौ निष्क्रान्तो कामुकालयात् ।।१७ अक्रूरागमवृत्तान्तमुपलभ्य महतनुः । भग्न श्रुत्वा च कंसोऽपि प्राह चारणरमुष्टिको ।।१८ पञ्चम अंश प्र०-२० ] [ २६५ गोपालदारको प्राती भवद्भया तु ममाग्रत । मल्लयुद्ध न हन्तव्यो मम प्रारणहगै हि तौ ॥१६ नियुद्ध तद्विनाशेन भवद्भया तोपितो ह्यहम् । दास्याम्यभिमतान्कामान्नान्यथतो महावली ।।२० न्यायतोऽन्यायतो वापि भवद्भ्या तौ ममाहितौ । हन्तव्यौ तद्वधाद्राज्य सामान्य वा भविष्यति ।।२१ फिर अनुलेपन और नित्र विचित्र मालानो से विभूषित तथा क्रमश नीलाम्बर और पीताम्बर धारण किये हुए बलराम और कृष्ण धनुर्यज्ञ के स्थान पर पहुंचे ॥१४॥ वहाँ जाकर उन्होंने यज्ञीय धनुप के विषय मे यज्ञ रक्षको से पूछा और जय उन्होने बतलादिया तव श्रीकृष्ण ने उस धनुप को सहसा उठा लिया और उस पर प्रत्य चा चटाने लगे ॥१५॥ जब वह बल पूर्वक प्रत्या चढा रहे थे, तभी वह धनुष अत्यन्त घोर शब्द परता हुआ टूट गया, जिससे सपूर्ण मथुरापुरी गूज गई ।।१६।। उस धनुप के टूटने पर उसके रक्षक उन्हे मारने को दौडे सब उन रक्षका की सेना को नष्ट करक उस यज्ञशाला से दोनों निकल आये ।।१७।। इसके उपगन्त जब कस का अनर के व्रज से लोट पाने तथा उस महान् धनुप के भी टूटने का समाचार मिला तब उसन चाणूर मुष्टिक पो बुलाकर कहा ॥१८॥ वस ने कहा-वे दोना गोप-बालक यहां प्रागये और मेरे प्राणो का हरण करन के प्रयत्न मे हैं, इसलिये तुम उन्हे मल्लयुद्ध करके मार दो । यदि तुम उन्ह मार कर मुझे प्रसन्न करोग ता मैं भी तुम्हारे मनोरय पूर्ण कर दूंगा। मेरी इस बात को अचथा मत जानो ॥१६-२०॥ न्याय से अन्याय स, जिस प्रकार भी हो, मेर इन महावलो गनुओ का वध कर डालो जब ये मारे जायेंगे तब यर सम्पूर्ण राज्य मेरा और तुम्हारा बरावर हो ज यगा ॥२१॥ इत्यादिश्म स तो मानो ततश्चाहूय हस्तिपम् । प्रोवाचोच्च स्त्वया मल्लममाजद्वारि कुकर ॥२२ स्थाप्य वुवलयापीडस्तेन तौ गोपदारयो। धाननीयो नियुद्धाय र गद्वारमुपागतो ॥२३ २३६ ] { श्रीविष्णु पुराण तमप्याज्ञाप्य दृष्ट्वा च सर्वान्मञ्चानुपाकृतान् । आसन्नमरण. कसः सूर्योदयमुदक्षत ।।२४ ततः समस्तमञ्चषु नागरस्स तदा जन. । राजमञ्च पु चारूढास्सह भृत्य राधिपाः ॥२५ मल्लप्राश्निकवगंश्च रङ्गमध्यसमीपग.। कृतः कसेन कंसोऽपि तुङ्गमञ्च व्यवस्थितः ॥२६ अन्तः पुराणां मञ्चाश्च तथान्ये परिकल्पिता: । अन्ये च बारमुख्यानामन्ये नागरयोपिताम् ॥२७ नन्दगोपादयो गोपा मञ्च वन्यप्ववस्थिताः । यक रवसुदेवी च मञ्चप्रान्ते व्यवस्थितौ २८ नागरीयोपिता मध्ये देवकीपुत्रगधिनो। अन्तकालेऽपि पुत्रस्य द्रक्ष्यामीति मुखं स्थिता ॥६६ कस ने अपने मल्लो को इस प्रकार वह कर अपने महावत को माना दी कि रगभूमि के द्वार पर कुवलयापीड को खडा कर दो और जैसे ही वे गोप पुष वहां पावें, वैसे ही उस हाथी के द्वारा मरवा दो ।।२२-२३॥ महावत को इस प्रकार की प्राज्ञा देकर और सब मचो को पया स्थान रसे देख कर मासन मृत्यु कम सूर्य के उदित होने की बाट देखने लगा ।।२४।६ जब प्रातःकाल हुमा वय राजमचो पर अपने अनुचरो सहित राजागण तया सामान्य मचो पर सभी नागरिक बैठ गये ॥२॥ फिर रंगभूमि के बीच में युद्ध-निर्णायको को स्थित फर एक उच्च सिंहासन पर कग स्वय बैठ गया ॥२६॥ वहाँ भन्तःपुर की महिलाप्री, प्रमुख परागनानी पोर नगर को प्रतिष्ठित नारियो के लिये पृथक् २ मची पो रचना की गई थी ॥२७॥ कुछ अन्य मचो पर नन्दादि गोपी को स्थान दिया गया, जिनके समीपस्य मंचो पर अफ रजी पौर यसुदेवजी बैटे थे। ॥२८॥ नगर की महिलाओं के मध्य में ही बैठी हुई देवपीजी सोच रही पी कि पात समय में अपने पुत्र का मुरा तो देख लूगी ॥२६॥ वाद्यमानेषु तूर्यपु धारणरे चापि यल्गति । हाहामारपरं लोके याम्फोटयति मुष्टिके ॥३०

पश्चम अश भ०-२० ]
[ २३७
इपद्धसन्तो वीरो बलभद्रजनार्दनी ।
गोपवेपधरौ वालो रङ्गद्वारमुपागतौ ॥३१
तत: कुवलयापीडो महामात्रप्रचोदितः ।
अभ्यधावत वेगेन हन्तु गोपकुमारको ॥३२
हाहाकारो महाअज्ञे रंगमन्ये द्विजोत्तम ।
बलदेवोऽनुजं दृष्ट्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥३३
हन्तव्यो हि महाभागनागोऽयं शत्रुचोदितः ॥३४
फिर तुहरी बज उठी, चाणूर अत्यन्त उछलने और मुष्टिक ताल ठोकने
लगा। इसमे लोगो मे हाहाकार मचने लगा। उसी समय बलराम और कृष्ण
भी कुछ हंसते हुए गोपवेश मे गभूमि के द्वार पर प्रा पहुचे ॥३०-३१।। उन
के पाते ही महावत ने कुवलयापीड को प्रेरित किया, तब वह उनका वध
करने के लिये वेग पूर्व उनके ऊपर झपटा ॥३०॥ हे द्विजोत्तम ! उस समय
गंगभूमि मे घोर हाहाकार होने लगा, तब वलरामजी ने श्रीकृष्ण की पोर
दृष्टि कारके उनसे कहा-हे महाभाग । इस शत्रु द्वारा प्रेरित हाथी का वध
कर देना ही उचित है ।।३३-३४॥
इत्युक्तस्सोऽग्रजेनाथ बलदेवेन व द्विज ।
सिंहनाद ततश्चक माधवः परवीरा ॥३५
करेण करमाकृष्य तस्य केशिनिपूदन ।
भ्रामयामास त शोपिरंरावतसम वले ॥३६
ईशोऽपि सर्वजगता बाललीलानुमाग्त ।
कोडित्वा मुचिर कृष्ण कग्दिन्तपदान्नरे ॥३७
उत्पाटय वामदन्त तु दक्षिणेनैव पारिगना ।
ताडयामास यन्तार तम्यामीच्छतधा गिर.॥३८
दक्षिरण दन्तमुत्पाटप यनभद्रोऽपि तत्क्षणान् ।
मगेपस्तेन पाच त्यान् गजपालानपोययत् ॥३६
ततम्वन्नुन्य वेगेन गैहिणेयो महावनः ।
जपान वामपादेन मम्त के हस्तिन ग्पा॥४०

[ श्रीविष्णु पुराण
स पपात हतस्तेन बलभद्रण लीलया।
सहस्राक्षेण वज्रेण ताडित पर्वतो यथा ।।४१
है विप्र । बडे भाई बलरामजी के वचन सुन कर शत्रु सहारक भगवान्
श्रीकृष्ण ने घोर सिंहनाद क्यिा ॥३५॥ और उन वेशी-हन्ता से ऐरावत के
समान महाबली कुवलयापीड की सूड को अपन हाथ में लेकर जोर मे घुमाया
।।३६।। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण विश्ध के ईश्वर है, फिर भी उन्होन
बाललीला का अनुसरण करके बहुत देर तक खेल करते हुए अपने दाये हाथ
से हाथी का बांया दाँत उखाड लिया और उसके द्वारा महावत पर भाघात
किया, जिसस महावत का शिर फट कर सैकडो खण्डो मे विभक्त हो गया
॥३७-३८।। उसी समय बलरामजी ने हाथी का दाया दात उखाड़ कर उसके
निकटवर्ती महावतो का क्रोध पूर्वक वध कर डाला ॥३६॥ फिर उन महावली
रोहिग्गी पुत्र ने अत्यन्त वेग पूर्वक उछल कर कुवलयापीड के मस्तक पर अपने
बाए पद से प्रहार किया ॥४०॥ इस प्रकार बलरामजी के द्वारा वह हाथी
लीला पूर्वक ही अपनी जीवन लीला समाप्त करके जैस इन्द्र वच्च के प्रहार से
पर्वत गिर जाते हैं, वैस ही पृथिवी पर गिर पडा ।।४।।
हत्वा कुवलयापीड हस्त्यारोहप्रचोदितम् ।
मदासृगनुलिप्तागो हस्तिदन्तवरायुधौ ॥४२
मृगमध्ये यथा सिंही गर्वलीलावलोकिनी।
प्रविष्टी सुमहार ग बलभद्रजनादं नौ ॥४३
हाहाकारो महाअज्ञे महार गे नन्तरम् ।
कृष्णोऽय वलभद्राध्यमिति लोकस्य विस्मय ॥४४
सोध्य येन हता घोरा पूतना वालधातिनी ।
क्षिप्त तु शस्ट येन भग्नौ तु यमलार्जुनौ ॥४५
सोऽय य यालिय नाग ममारुह्य बालक ।
धृतो गोवर्धनो येन मप्तरात्र महागिरि १४६
अरिष्टो पेनुमा केशी लीनयंध महारमना।
निता येन दुवृत्तिा दृश्यतामेप सोऽच्युत ॥४७

पञ्चम अंश-अ० २०] [ २३६ अय चाम्य महाबाहुबलभद्रोऽग्रतोऽग्रज । प्रयाति लीलया योपिन्मनोनयननन्दन ॥४८ अय स कथ्यते प्राज्ञ पुराणार्थविशारदै. । गोपालो यादव वश मग्नमभ्युद्धरिष्यति ।।४६ प्रय हिमवलोषम्य विष्णोरखिलजन्मन । अवतीर्णो महीमशो नून भारहरो भुव. ॥५० इस प्रकार महावत के द्वारा प्रेरित किये गये कुवलयापीड का वध करने से उसके मद और रुधिर मे सने हुए बलराम कृष्ण उनके दातो को पक्डे हुए गवं एष लीलामयी चितवन से देखते हुए मृगो के मध्य मे सिंह के निर्भयता पूर्वक चले पाने के समान ही उम महान् रङ्गभूमि मे आ पहुचे ॥४२-४३।। उम समय यहा अन्यन्न हाहाकार मचा हुमा या और उगवे पाते ही सब में कृष्ण है, यह बलगम है, इस प्रकार विस्मय पूर्वक कहन लगे ।।४४॥ यह वहीं है जिसने बानको का घात करने वाली भयकरी पूतना का वध किया, छकडे को उलट दिया यमलार्जुन वृक्षो को उखाड दिया, कालिय नाग का दमन किया और सात रात्रि पर्यंत महान् पर्वत गोवर्धन को धारण किया था ॥४५-४६।। यह वही अच्युन हैं, जिन्होने अरिष्ट, धेनुक और केशी आदि को खेल-खेल में ही गार डाला था ॥४७।। इनके प्रागे इनके ज्येष्ठ भ्राता बलरामजी है, जो लीला पूर्वक चलने वाले तथा नेत्रो को अत्यन्त सुख देने वाले है ।।४८।। पुरा- रणार्थ के ज्ञाता विज्ञजनो का क्थन है कि यही गोपाल यादवो का उद्धार करेंगे ॥४६॥ यह सर्वलावात्मक एव राव कारण भगवान् विष्णु के ही अशभूत हैं भौर यह भू-भार-हरण के नियही पृथिवी पर अवतीर्ण हुए हैं ॥५०॥ इत्येव वणिते पौरै रामे कृष्णे च तत्क्षणात् । उरस्तनाप देवक्याः स्नेहस्र तपयोधरम् ॥५१ महोत्सवमिवासाद्य पुत्राननवितोक्नात् । युवेव वसुदेवोऽभूद्विहायाभ्यागता जराम् ॥५२ विस्तारिताक्षियुगलो राजान्त पुरयोपिताम् । मागरम्त्रीसमूहश्च द्रष्टु न विरगम तम् ॥५३ २४० ] [ श्रीविष्णु पुराण सख्य पश्यत कृष्णस्य मुखमत्यरुणेक्षणम् । गजयुद्धकृतायासस्वेदाम्बुकणिवाचितम् ।।५४ विकासिशरदम्भोजमवश्यायजलोक्षितम् । परिभूय स्थित जन्म सफल क्रियता दृश ॥५५ जिस समय पुर वासीगण बलराम और कृष्ण के विषय में इस प्रकार कह रहे थे, उस समय स्नेहवश देवकी के स्तना से दूध टपकने लगा और उम का हृदय अत्यन्त सनम हो उठा ॥५१॥ पुत्रो के मुख देखने के कारण उल्लसित मन वाले वसुदेवजी जैसे प्राप्त हुई वृद्धावस्था को त्याग पर पुन नवयौवन को प्राप्त हो गय हा ॥५२॥ राजा कम के अन्त पुर की महिलाएं और नगर म निवास करने वाली स्त्रिया--सभी उन्हे टक्टको लगावर देखने लगी ॥५२॥ उन्होने कहा-हे सखियो कृष्ण का अरण नेत्रो पाला श्रेष्ठ मुख तो देखो जो हाथो से युद्ध करने के श्रम के कारण म्वेद युक्त हो कर हिम-कणों पे द्वारा सोचे गये शरत्कालीन विकसित मन को भी फीवा कर रहा है। इनक दर्शन से अपने नेत्रों को सफल बना लो ॥५४-५५॥ श्रीवत्साङ्क महद्धाम बालस्यतद्विलोक्यताम् विपक्षक्षपण वक्षो भुजयुग्म च भामिनि ॥५६ वि न पश्यसि दुग्धेन्दुमृणालधवलाकृतिम् । बलभद्रमिम नीलपरिधानमुपागतम् ।।५५ वल्गता मुष्टियेनंर चारणरेण तथा ससि। मोडतो बलभद्रम्य हरेहाम्य विलोक्यनाम् ॥५८ सध्य पश्यत चाणूर नियुदार्थमय हरि । समुपैति न सन्त्यत्र कि वृद्धा मुक्तपरिण ||५६ क्व यौवनोन्मुमोभूतगुकुमारतनुहरि । स्य वचपठिनाभोगारीरोज्य महासुर ॥६. इमो सुलितरझं वर्तते नवयौवनो। देतेयमल्लाचापप्रमुपाल्पनिदारणा ॥६१ ।

पञ्चम मश-१० २० ]
[ २४१
नियुद्धप्राश्निकाना तु महानेप व्यतिक्रमः ।
यद्वालवलिनोयुद्ध मध्यस्थस्समुपेक्ष्यते ।।६२
हे भामिनि । इस बालक के श्री वत्माक्ति हृदय और शत्रुयो को हरा
देने वाली दोनो भुजाओ पो तो देखो ॥५६॥ इस पर किसी अन्य ने कहा-
क्या तुम्हे कमलनाभ, दूध अथवा चद्रमा के समान शुभ्रवर्ण वाने नीलाम्बरधारी
बलराम दिखाई नहीं दे रहे है ? ||५७।। अरी सखियो । देखो यह कृष्ण चारपूर
के साथ युद्ध करने के लिये बढ़ रहे है। क्या कोई भी वृद्ध पुरुप इन्हे रोकने के
लिये उद्यत नहीं होता ? ॥५७-५८।। कहाँ तो युवावस्था मे पैर रखने वाले यह
सुकुमार देह वाले हरि और कहाँ यह वज्र के समान कठोर देह वाला यह घोर
असुर ? ।।६०।। यह दोनो नवयौवन सम्पन्न एव अत्यत कोमल शरीर वाले हैं
तथा ये चाणूर प्रादि मल्ल-दैत्य अत्यन विकराल है ॥६१।। मल्ल-युद्ध के
निर्णायको का यह अन्याय पूर्ण कार्य ही है कि जो मध्यस्थ होकर भी इस
विपय में उपेक्षा करते है ।।६२।।
इत्य पुरस्त्रीलोकस्य वदतश्चालयन्भुवम् ।
ववल्ग वद्धकक्ष्योऽन्तर्जनस्य भगवान्हरि ॥६३
बलभद्रोऽपि चास्फोग्य ववल्ग ललित तथा ।
पदे पदे तथा भूमिर्यन्न शीर्णा तदद्भुतम् ।।६४
चाणूरेण तत कृष्णो युयुधेऽमितविक्रम ।
नियुद्धकुशलो दैन्या बलभद्रेण मुष्टिक ||६५
सन्निपातावधूतस्तु चाणूरेण सम हरि ।
प्रक्षेपणमुष्टिभिश्च कीलवज्रनिपातने ॥६६
पादोद्धृते. प्रमृष्टश्च तयोयुद्धमभून्महत् ॥६७
प्रशस्नमतिघोर तनयोयुद्ध सुदारुणम् ।
वलपारण विनिष्पाद्य समाजोत्सवमनिधी ॥६८
यावद्यावच्च चाणूरो युयुधे हरिणा मह ।
प्राणहानिमवापानचा तावत्तावल्लवाल्लवम् ॥६६

२४२ ] [ श्रीविष्णु पुराण कृष्णोऽपि युयुधे तेन लीलयंव जगन्मय । खेदाचालयता कोपानिजशेसरकेसरम् ।।७० श्री पराशरजो न वहानगर की महिलाएं इस प्रकार वार्तालाप पर हो रही थी तभी भगवान् श्रीहरि ने अपनी कटि को रस लिया तथा पृथियो को अम्पायमान करत हुए, सभी दशक की उपस्थिति में, रगभूमि में छलांग मारी ॥६३॥ अपने मुज दण्डो वो ठोरते हुए बलरामजी भी उत्तेजना पूर्वक उछलने लगे । उस समय उनके पदापात से पृथिवी विदीर्ण नहीं हुई-यही विस्मय वी बात है ॥६४॥ फिर द्वन्द्व युद्ध का प्रारभ हुआ, जिसमे चाणूर से कृष्ण और मुटिक से बलरामजी भिड गय ॥६५॥ कृष्ण और चार भिड कर, नीचे गिरा कर, मुष्टिका और कोहनी से प्रहार कर, पदापात कर तथा परस्सर में अङ्ग से प्रग रगद कर युद्ध करने लगे । उस समय का वह युद्ध भयवर हो उठा ॥६६-६७। इस प्रकार समाजोत्मव की सन्निधि मे केवल बल मोर प्राण से ही सम्पन्न होने वाला विना अस्त्र के ही अत्यन्त भयकर युद्ध होरहा था ।६८ चार र जैसे जैसे वृपण से प्रत्यन्त घोर भिडन्त करने लगा, वैसे ही वैसे उमकी प्राग क्ति वा ह्रास होने लगा था ॥६६॥ उस समय जग मय भगवान श्रीकृष्ण भी परिश्रम और क्रोध के कारण अपने पुष्पमय मुकुट की वेशर वो कम्पिन मरने वाले चारशूर से लीला पूर्वक ही युद्ध कर रहे थे ॥७॥ बलक्षय विवृद्धि च दृष्ट्या चाणूरकृष्णयो । वारयामास तूर्याणि कस कोपपरायण ॥७१ मृदङ्गादिपु तूर्येषु प्रतिषिद्ध षु तत्क्षणात् । खे सङ्गतान्यवाद्यन्त देवतूर्याण्यनेकश ७२ जय गोविन्द चाणूर जहि केशव दानवम् । अन्तर्भानगता दवास्तमूचुरतिहर्षिता ॥७३ चाणूरेण चिर बाल क्रीडित्या मधुसूदन । उत्थाप्य भ्रामयामाम तद्वधाय कृताधम ॥७४ भ्रामयित्वा शतगुण दैन्यमल्लममित्रजित् । भूमावास्फाटयामाम गगने गत जीवितम् ॥७५ पञ्चम प्रश-ग्र० २० ] [ २४३ भूमावास्फोटिनस्तेन चाएर शतधाभवत् । रक्तस्रावमहापड्का चकार च तदा भुवम् ॥७६ वलदेवोऽपि तसाल मुश्केिन महावल । युयुधे दैत्यमल्लेन चाणूरेण यथा हरि ७७ सोऽप्येन मुष्टिना मूनि वक्षस्याहत्य जानुना। पातयित्वा धरापृष्ठे निष्पिपेप गतायुपम् ।।७८ उम समय चाणूर का बल घटता और श्रीकृष्ण का बल बढना हुना देख कर कस झल्ला उठा और उसन बजते हुए सभी वाजे बद करा दिये ॥७१।। परतु, रगभूमि मे बजते हुए तुरही प्रादि बाजो के बद होते ही प्राकाश मे अनको बाजे एक माथ ही बज उठे ॥७२।। तभी देवतामा ने अप्रकट रूप से नहा-गोविन्द की जय । हे केशव । इस दानव चाणूर का वध कीजिये ॥७३॥ फिर उस चाणूर के साथ श्रीकृष्ण ने बहुत देर तक मल्लकोडा की और उमे मारने की इच्छा से उठा कर घुमाया ॥७४।। शत्रुआ के जोतन वाले श्रीकृष्ण न उस दैत्य को संक्डो बार आवाश म फिराया और फिर पृथिवी पर डाल दिया ।।७५॥ इस प्रकार गिराय जात ही उसके देह के मैकडो टूक हा गये और रक्त प्रवाहित हाने से पृथिवी पर कीचड हा गई ॥७६॥ जिस प्रकार श्रीकृष्ण न चाणूर क माथ युद्ध किया था, उसी प्रकार महाबली वलरामजी भी मुष्टिक नामम मल्ल स भिड रह थे ।।७।। मुटिक क मस्तक पर वलरामजी ने मुश्किा- पात किया नोर वक्ष स्थल पर अपने जानु स टक्कर मारी। फिर उस नि शेप प्रायु वाले दैत्य का पृथिवी पर पटक कर बुरी तरह मर्दिन किया ॥७८|| कृष्णस्तोशलक भूयो मल्लगज महाबलम् । वाममुष्टिप्रहारेण पातयामास भूतले ७६ चाणरे निहते मरले मुष्टिव मिनिपातिते । नीते क्षय तोशलके सर्वे मना प्रदुद्र वु ८० वल्गतुस्ततो रङ्ग कृष्णमर्पणावुभौ । समानवयसो गोपान्वलादाज्य हर्पितो।८१

२४४ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
कसोऽपि कोपरक्ताक्ष. प्राहोच्चायतान्नरान् ।
गोपावेतो समाजौधानिक्राम्येता वलादित ॥६२
नन्दोऽपि गृह्यता पापो निगलरायसरिह ।
अवृद्धाहेण दण्डेन वसुदेवोऽपि वध्यताम् ॥८३
गल्गन्ति गोपा कृष्णेन ये चेमे सहिताः पुर ।
गावो निगृह्यतामेपा यच्चास्ति वसु किञ्चन ।।८४
इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने बहाबली तोशल पर बाए हाथ की मुट्ठी से
प्रहार किया और अन्त मे धराशायी कर दिया ॥७९॥ चारपूर, मुष्टिक और
तोशल जैसे महामल्लो के मरते ही सब मल्ल रग भूमि से भाग गये।८०॥ उस
समय कृष्ण और बलराम दोनो ही अपन समान आयु वाले गोपो से आलिंगन
करते हुए हर्ष से उछलने लगे ॥८१|| इस पर कस के नेत्र क्रोध से लाल हो गये
और उसने उपस्थित पुरुपो मे कहा--प्ररे, कोई इन दोनो ग्वालो का इस समाज
से निकाल बाहर करो ॥२॥ पापात्मा नन्द को लोहे की जजीरो मे क्स लो
और वसुदेव को भी अवृद्धो जंगी कठोर यातना देकर मार डालो ॥८३।। कृप्रा
के माथ यह जितने भी ग्वाले उछल कूद कर रहे हैं, इन सब पा सहार कर
इनके गवादि धन को छीन लो।।८४॥
एवमाज्ञापयन्त तु प्रहस्य मधुसूदनः।
उत्प्लुत्यारुह्य त मञ्च कस जग्राह वेगत १५
केशेवावृष्य विगलकिरीटमवनीतले ।
स कस पातयामास तस्योपरि पपात च ॥८६
अशेषजगदाधारगुरुणा पततोपरि।
कृष्णेन त्याजित. प्राणानुग्रसेनात्मजो नृप ।।६७
मृतम्य पेगेषु तदा गृहीत्या मधुसूदन ।
चक्र्य देह क्सस्य रगमध्ये महावल ॥
गौरवणानिमहना परिसा तेन वृप्यता।
कृता क्मस्य देहेन वेगेनेव महाम्भसः ।।८९

दुवृत्तनिधनार्थाय तेन नः पावित कुलम् ॥६५ चपम अश-अ २० ] [ २४५ कसे गृहीते कृष्णेन तद्माताऽभ्यागतो रुपा। सुमालो बलभद्रेण लीलयव निपातितः ।।६० ततो हाहाकृत सर्वमासीत्तद्गमण्डलम् । अवज्ञया हत दृष्ट्वा कृष्णेन मथुरेश्वरम् ।।६१ राजा कस इस प्रकार की प्राज्ञा दे ही रहा था, तभी श्रीकृष्ण हँसते- हँसते उसके सिंहासन पर उछल कर चढ गये और तुरत ही उसे पकड लिया ॥५॥ फिर उसके केश पकड कर खीचते हुए पृथिवी पर दे मारा और फिर स्वय भी उसके ऊपर कूद पडे । इस अवस्था में उसके सिर का मुकट उतर कर पृथक् जा गिरा ॥८६॥ जगदाधार कृष्ण के ऊपर गिरते ही उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपने प्राणो का त्याग कर दिया ॥८७॥ फिर उन महावली कृष्ण ने मरे हुए कस के वालो को पकड कर उसके शरीर को पृथिवी पर घसीटा ॥८॥ कंस का शरीर इतना भारी था कि उसके घसीटे जाने से जल-वेग से पड़ी हुई दरार फे समान पृथिवी फट गई ॥८६॥ जब श्रीकृष्ण ने कस के केश पकडे थे, तभी उसके भाई सुमाली ने उन पर क्रोध पूर्वक अाक्रमण किया, परंतु बलरामजी ने उसका लीला पूर्वक ही वध कर डाला IIR०॥ इस प्रकार मथुरेश कस को कृष्ण द्वारा मारा जाता हुआ देख कर सभी उपस्थित जन समाज हाहाकार कर उठा ॥६॥ कृष्णोऽपि वसुदेवस्य पादौ जग्राह सत्वरः । देवक्याश्च महावाहुर्यलदेवसहायवान् ।।१२ उत्थाप्य वसुदेवस्त देवकी च जनार्दनम् । स्मृतजन्मोक्तवचनो तावेव प्रगतो स्थिती॥६३ प्रसीद सीदता दत्तो देवाना यो वरःप्रभो। तथावयोः प्रसादेन कृतोद्धारस्स केशव ॥१४ आराधितो यद्भगवानवतीर्णो गृहे मम। स्वमन्त. सर्वभूताना सर्वभूतमयः स्थितः । प्रवर्तते समस्तात्मस्त्वत्तो भूतभविष्यती ॥६६ - २४५ । [ श्रीविष्णु पुराण यस्त्वमिज्येसेऽचिन्त्य सर्वदेवमयाच्युत । त्वमेव यज्ञो यष्टा च यज्वना परमेश्वर ॥७ समुद्भवस्समस्तस्य जगतम्त्व जनार्दन ॥१८ सापह्नव मम मनो यदेतत्त्वयि जायते । देवक्याश्चात्मजप्रीत्या तदत्यन्तविडम्बना IEE स्व कर्ता सर्वभूतानामनादिनिधनो भवान् । त्वा मनुष्यस्य कस्यैपा जिह्वा पुनेति वक्ष्यति ॥१०० तभी महाबाहु श्रीकृष्ण ने बलरामजी के सहित जाकर वसुदेव और देवकी के चरण पडे ॥३२॥ उस समय उद्धव काल में कहे हुए भगवान् के वचनो को करके वसुदेव देवकी न श्रीकृष्ण को पृथिवी से उठाया और स्वय उनके समक्ष विनीत भाव से खडे होगय ॥६३॥ श्री वसुदेवजी ने कहा- हे प्रभो । हे केशव । हम पर प्रसन्न हूनिये । आपने देवताओं को जो वर प्रदान किया था उसे हम पर भी कृपा करते हुए पूर्ण कर दिया ॥६॥ हे भगवन् । मेर द्वारा पाराधन करने पर अापने दुष्टो के सहारार्थ मेरे यहाँ जन्म लेकर हमारे कुल का ही पवित्र कर दिया है ॥६५॥ पाप सर्वभूतात्मक तथा सभी भूतो म अवस्थित हैं । हे सर्वात्मन् । भूत, भविष्यत् की प्रवृत्ति भी आपसे ही है ॥६६॥ हे अचिन्त्य ! हे अच्युत । हे सर्व दवात्मक देव ! सभी यज्ञो के द्वारा आपका ही यजन होता है तथा आप ही याज्ञिको से याजक और यज्ञरूप हैं ।९७1 है जनादन | आप तो इस सम्पूर्ण विश्व व उत्पत्तिकर्ता हैं, अपके प्रति आत्मज भाव होने से ही मेरा और देवको का चित्र भ्रात होगया है, यह कैसी विडम्बना है ।।६८-६६॥ पाप ही सब भूतो के कर्ता, अनादि तथा अन्त-रहित है, फिर ऐमा कौन-सा मनुष्य होगा, जिसकी जिह्वा आपको पुन कहेगी ॥१०॥ जगदेतज्जगनाथ सम्भूतमखिल यत । क्या युक्त्या विना माया सोऽस्मत्त सम्भविष्यति ॥१०१ यस्मिन्प्रतिटित सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम् । सकोटोत्सनरायनो मानुपो जायते क्थम् ।।१०२ पञ्चम अश-प्र० २० ] । २४७ स त्व प्रसीद परमेश्वर पाहि विश्व- मशावतारकरणर्न ममासि पुत्र.। आब्रह्मपादपमिद जगदेतदीश त्वत्ता विमोहयमि कि पुरुषोत्तमास्मान् ॥१०३ मायाविमोहितदृशा तनयो ममेति कसाद्भय कृतमपास्तभयातितीव्रम् । नीतोऽसि गोकुलमरातिभयाकुलेन । वृद्धि गतोऽसि मम नास्ति ममत्वमीश ॥१०४ कर्माणि रुद्रमरुदश्विशतक्रतूना । साध्यानि यस्य न भवन्ति निरीक्षितानि । त्व विष्णुरीश जगतामुपकारहेतोः । प्राप्तोऽसि न परिगतो विगतो हि मोह ।।१०५ हे जगदीश्वर । जिनसे इस सम्पूर्ण ससार का प्राकट्य हुअा है, वह माया शक्ति के अतिरिक्त अन्य किस प्रकार से हमारे द्वारा उत्पन्न हो सकते हैं ? ॥१०१।। जिसमे सम्पूर्ण चराचर विश्व स्थित है, वह ईश्वर कोस और गोद मे सोन वाला मानव विस प्रवार से हो सकता है ? ॥१०२॥ हे प्रभो। हम पर प्रसन्न होकर अपने अशावतार के द्वारा मसार वी रक्षा परिये । हे परमेश्वर । मै जानता हूं कि आप मेरे पुत्र नहीं है, क्योकि ब्रह्मादि से युक्त यह सम्पूर्ण विश्व प्राप ही की रचना है । फिर, आप हमे मोह म क्यो डाल रहे हैं? ॥१०॥ हे भयातीत । मायावश प्रापको पुत्र समझते हुए ही में कम से प्रत्यत भयभीत रहा था, और उसी शत्रु के कारण प्रापपो गोवुल पहुचा पाया था। फिर माप वही रहते हुए इस वय-वृद्धि को प्राप्त हुए हैं, इमलिये भी आपके प्रति मेरा ममत्व नही रहा है ।।१०।। जो फर्म रुद्र, मन्द्रण मौर इन्द्र द्वारा भी क्येि जाने सभव नहीं हैं, वे प्रापर्व द्वारा होते हुए मैंने देखे हैं । इससे मेरा मोह नष्ट हो गया है। भाप ही ईश्वर एव भगवान् विष्णु हैं तथा लोक-कल्याण के लिये ही माप प्रवनीग हुए है।॥१०॥ - ।

२४८ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
इक्कीसवाँ अध्याय
तो समुत्पन्न विज्ञानी भगवत्कर्मदर्शनात् ।
देवकीवसुदेवा तु दृष्ट्वा माया पुनहरिः ।
मोहाय यदुचक्रस्य विततान स वैष्णवीम् ॥१
उवाच चाम्ब हे तात चिरादुत्कण्ठितेन मे ।
भवन्तो कंसभीतेन दृष्टौ सङ्कर्षणेन च ॥२
कुर्वतां याति यः कालो मातापित्रोरपूजनम् ।
तल्खण्डमायुपो व्यर्थमसाधूना हि जायते ॥३
गुरुदेवद्विजातीना मातापित्रोच पूजनम् ।
कुर्वतां सफलः कालो देहिना तात जायते ।।४
तत्क्षन्तव्यमिद सर्वमतिकमकृत पितः।
कंसवोर्यप्रतापाभ्यामावयो. परवश्ययो. ॥५
इत्युक्त्वाथ प्रणम्योभो यदुवृद्धाननुक्रमात् ।
यथावदभिपूज्याथ चक्रतु. पोरमाननम् ॥६
कसपल्यस्तत. कस परिवार्य हतं भुवि ।
विलेपुर्मातरश्वास्य दुःखशोकपरिप्लुताः ७
बहुप्रकारमत्यर्थ पश्चात्तापातुरो हरिः ।
तास्ममाश्वासयामास स्वयमस्राविलेक्षणः ।।
श्री पराशरजी ने कहा-जब भगवान् ने यह देखा कि उनके ईश्वरीय
कमो को देखकर वसुदेव-देवको यो विज्ञान उत्पन्न हो गया है, तब उन्होंने
यादो को मोह मे डालने के लिये अपनी मापा को विस्तृत किया ॥१॥ उन्होंने
महा-है मम्ब ! हे तात ! मोर बलरामजी दोनो ही कस के भय से बहुत
समय से छिपकर रहते हुए भी प्रापके दर्शनो के लिये लालायित थे, जिसकी
प्राज हमे प्राति हुई है ॥२॥ माता-पिता को सदा किये बिना व्यतीत हुआ भायु.
भार प्रसाधुत्व को प्राप्त कराता हुमा व्यर्थ ही चला जाता है ।।३॥ है तात !
पारीर धारियों के जीवन की सफलता ती मुरु, देवता, ब्राह्मण और माता-पिता

२५० ] [ श्रीविष्णु पुराण उस नि शक चित्त से कहिये ||११|| ययाति के शापयश यद्यपि हमारे वा को राज्य करने का अधिकार नहीं है, फिर भी पाप मुझ मवक के सामने अन्य राजाओं को क्या, देवताओं को भी प्राज्ञा देन म समर्थ है ॥१२। श्री पराशरजी ने कहा- मनुष्य रूप धारी भगवान ने उग्रसेन से इस प्रकार कह कर वायु का स्मरण किया और उसके उपस्थित होते ही उससे कहने लगे ॥१३॥ हे वायो । तुम इन्द्र के पास जाकर उससे कहो कि महाराज उग्रसेन के लिये अपनी सुधर्मा नाम की सभा प्रदान करदो ॥१४॥ श्रीकृष्ण का कहना है कि यह सुधर्मा नाम सभा राजा के लिये ही शोभनीय है, इसलिये इसम यदुवश का प्रतिष्ठित होना उचित है ॥१५॥ इत्युक्त पवनो गत्वा सर्वमाह शचीपतिम् । ददौ सोऽपि सुधर्माख्या सभा वायोः पुरन्दर ॥१६ वायुना चाहता दिव्या सभा ते यदुपुङ्गवा । बुभुजस्सर्वरत्नाढ्या गोविन्दभुजसथया ॥१७ विदिताखिलविज्ञानौ सर्वज्ञानमयावपि । शिष्याचार्यक्रम वीगै ख्यापयन्ती यदूत्तमौ ॥१८ ततस्सान्दीपनि काश्यमवन्तिपुरवासिनम् । विद्यार्थ जग्मतुर्बालो कृतोपनयनकमौ ॥१६ भेदाभ्यासकृतप्रीती सङ्कर्षणजनार्दनौ । तस्य शिष्यन्वमभ्येत्य गुरुवृत्तिपरौ हि तो ॥२० दर्शयाञ्चतुर्वीरावाचारमखिले जने । सरहस्य धनुर्वेद ससड्ग्रहमधीयताम् ॥२१ अहोरात्रचतुप्पष्टया तदद्भुतमभूद्विज । सान्दीपनिरसम्भाव्य तयो कर्मातिमानुपम् ॥२२ विचिन्त्य तो तदा मैने प्राप्तौ चन्द्रदिवाकरो। साङ्गाश्च चतुरो वेदान्सर्वशास्त्राणि चैव हि ॥२३ अस्वग्रामसशेष प्रोक्तमानमवाप्य तो। चतुनियता या ते दातव्या गुरुदक्षिणा ।।२४ पञ्चम यश-अ० २१ । [ २५१ ? श्रीपराशरजी ने कहा-श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर वायु ने इन्द्र के पास जाकर सब बात कही जिस पर उसन वह सभा वायु को दे दी ॥१६॥ तब उम सर्वरत्नमयी दिव्य सभा का उपभोग श्रीकृष्ण के भुज बल के आश्रित हुए यादव करने लगे ॥१७॥ फिर सभी विज्ञानो के ज्ञाता श्रीकृष्ण और बल- राम गुरु शिष्य का सम्बन्ध प्रवट करने के लिये उपनयन सस्कार के पश्चात् विद्या पढने के लिये काशी में उत्पन्न श्री सन्दीपन मुनि के यहाँ अवन्तिकापुर गय ।।१८ १९।। वहाँ कृष्ण और बलराम सान्दीपन के शिष्य होकर वेदाभ्यास करते हुए गुरु की सेवा-सुश्रुषादि लोक-शिष्टाचार पूर्वक रहने लगे। उन्होंने केवल चौमठ दिन म हो रहस्य और सग्रह क सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद की शिक्षा पूण करलो । सान्दीपन न उनके असम्भव एव अमानवीय कर्मों को देखा तो सूय-चन्द्रमा को ही अपने घर पाया हुआ समझा । उन्होंने सर्वांग सहित चारो वेद, सभी शास्त्र तथा अस्त्र विद्या को एक बार सुनकर सीख लिया और फिर गुरुजी से पूछा-पापको गुरुदक्षिणा मे क्या दिया जाय ॥२०-२४॥ सोऽप्यतीन्द्रियमालोक्य तयो कर्म महामति । अयाचत मृत पुत्र प्रभासे लवणाणवे ॥२५ गृहीतास्नौ ततस्तौ तु मार्ग्रहस्तो महोदधि । उवाच न मया पुत्रो हृतस्सान्दीपनेरिति ।।२६ दैत्य पञ्चजनो नाम शङ्खरूपस्स बालकम् । जग्राह योऽस्ति सलिले ममैवासुरसूदन ।।२७ इत्युक्ताऽन्तर्जल गत्वा हत्वा पञ्चजन च तम् । कृष्णो जग्राह तस्यास्थिप्रभव शङ्खमुत्तमम् ॥२८ यस्य नादेन दैत्याना वलहानिरजायत । देवाना ववृधे तेजो यात्यधर्मश्च सक्षयम् ॥२६ त पाञ्चजन्यमापूर्य गत्वा यमपुर हरि । वलदेवश्च बलवाञ्जित्वा वैवस्वत यमम् ॥३० त वाल यातनासस्थ यथापूर्वशरीरिणम् । पित्रे प्रदत्तवान्कृष्णो बलन बलिना वर ॥३१ २५२ ] [ श्रीविष्णु पुराण मथुरा च पुन प्राप्मावुग्रमेनेन पालिताम् । प्रहृष्टपुरुषस्त्रोकामुभौ रामजनार्दनी ॥३२ महामनि मान्दीपन ने उनको अद्भुत कर्मा देवकर प्रभास क्षेत्र स्थित नमय के समुद्र में डूबकर मृत्यु को प्राप्त हुए पुत्र की उनसे याचना की ॥२५॥ नदनन्तर वे शस्त्र लेकर समुद्र के निकट गये तब समुद्र स्वय ही अध्यं लेकर उनसे सामने पाया और कहने लगा कि हे प्रभो । सान्दीपन के पुत्र का हरण मैंने नहीं किया है ॥२६॥ हे अमुर सूदन ! मेरे जल मे पचजन नामक एक दैत्य शख रूप से निवास करता है, उसने ही उस बालक का हरण किया है ॥२७॥ श्री पराशरजी ने कहा-समुद्र की बात सुनकर श्रीकृष्ण उसके जल मे गये और वहां उन्होने परजन को मार कर उसकी अस्थियो से उत्पन्न शख को ग्रहण कर लिया ॥२८॥ उस शख के शब्द से दैत्यो का बल क्षीण होता, देवताप्रो के तेज की वृद्धि होती और अधर्म नष्ट हो जाता है ॥२६॥ उसी पांच- जन्य शख का घोष करते हुए कृष्ण-बलराम यमपुरी पहुंचे और वहाँ सूर्य पुत्र यम को पराजित कर नरक की यन्त्रणा भोगते हुए उस बालक को पूर्ववत् देह में स्थापित कर उसके पिता के पास लाकर सौर दिया ॥३०-३१।। फिर जिस मथुरापुरी मे सब स्त्री-पुरुष अानन्द मना रहे थे, उस उप्रसेन द्वारा पानित पुरी मे कृष्ण-बलराम लौट आये ॥३२।। बाईसवाँ अध्याय जरासन्धसुते क्स उपयेमे महावल । अस्ति प्राप्ति च मैत्रेय तयोर्भर्तृहण हरिम् ॥१ महावलपरीवारो मगधाधिपतिर्वली। हन्तुमभ्याययो कोपाञ्जरासन्धस्सयादवम् ॥२ उपत्म मथुरा सोय झरोध मगधेश्वरः। अक्षौहिणी भिस्सन्यस्य प्रयोविंशतिभिवृत ॥३ [ २५३ पञ्चम प्रश-प्र० २२ ] निष्क्रम्याल्पपरीवाराचुभी रामजनार्दनौ । युपुधाते सम तम्य वलिनो बलिमंनिकै. ॥४ ततो रामश्च कृष्णश्च मति चक्रतुरञ्जमा । प्रायुधाना पुराणानामादाने मुनिसत्तम ॥५ अनन्तर हरेश्शाङ्ग तूणी चाक्षयमायको । श्राकाशादागतौ विप्र तथा कौमोदकी गदा ।।६ हल च बलभद्रस्य गगनादागत महत् । मनसोभिमत विप्र सुनन्द मुसल तथा ७ श्री पराशरजी ने कहा-ह मैत्रेयजी | महावली कस का विवाह जरा- सन्ध की पुत्री अस्ति और प्राप्ति से हुमा, वह बलवान् मगधराज जरासन्ध ने अपने जामाता के पधिर श्रीहरि को सम्पूर्ण यादवो के सहित नष्ट करने के लिये बहुत बड़ी सेना लेकर मथुरापुरी पर आक्रमण किया ।।१-२।। उस समय मगध- राज की तेईम अक्षौहिणी सेना मथुरापुरी घिरी हुई थी।३।। तब बलराम और कृष्ण थोडी-सी सेना साथ लेकर पुरी से बाहर आये और जरासन्ध के बलवान सैनिको से भिड गये ।।४।। हे मुनिवर । उस युद्ध मे बलराम-कृष्ण ने अपने प्राचीन शस्त्रो को ग्रहण करने की इच्छा वी ।।५।। श्रीकृष्ण द्वारा स्मरण करते ही उनका शाह धनुष, अक्षय बाणो स परिपूर्ण दो तरकश और कोमोद नामक गदा-यह मब आकाश से उनकी सेवा में आगये ॥६॥ हे विप्र । चल- रामजी के लिये भी उनमा इच्छिन हल तया सुनन्द नामक मूसल प्राकारा से उनके पास मागये ।।७।। ततो युद्ध पगजित्य ससैन्य मगधाधिपम् । पुरी विविशतुर्वीरावुभौ रामजनार्दनौ ।। जिते तस्मिन्मुदुत्ते जरासन्धे महामुने । जीवमाने गते कृष्णस्तेनामन्यत नाजितम् ।। पुनरप्याजनामाथ जरासन्ध बलाविन्त । जितश्च रामकृष्णाभ्यामपक्रान्तो द्विजोत्तम ॥१० २५४ ] [ श्रीविष्णुपुराण दश चाष्टौ च सङ्ग्रामानेवमत्यन्तदुर्मदः । यदुभिर्मागधो राजा चक्रे कृष्णपुरोगमैः ।।११ सर्वेष्वेतेपु युद्ध पु यादवस पराजितः । अपक्रान्तो जरासन्धस्स्वल्पसैन्यैर्वलाधिकः ॥१२ न तब्द्दलं यादवानां विदितं यदनेकशः। तत्तु सन्निधिमाहात्म्यं विष्णोरंशस्य चनिरणः ॥१३ मनुष्यधर्मशीलस्य लीला सा जगतीपतेः । अस्नाण्यनेकरूपाणि यदरातिषु मुञ्चति ॥१४ इसके पश्चात् बलराम और कृष्ण ने जरासन्ध को सेना के महित परा- जित कर दिया और फिर मथुरा नगरी को लौट आये ॥८॥ हे महामुने । उस दुत जरासन्ध को हग कर भी उसके जीवित बच निकलने के कारण श्रीकृष्ण ने अपने को विजेता नहीं माना 10 हे द्विजोत्तम ! जरासन्ध ने उतनी ही सेना लेकर पुनः मथुरा पर पाक्रमण किया, परन्तु बलराम-कृष्ण से हार कर भाग गया ॥१०।। इस प्रकार उस अत्यन्त दुर्मद जरासन्ध ने यादवो के साथ अठारह बार सग्राग किया ॥११॥ इन सभी सग्रामो मे वह बहुत अधिक सेना के साथ आकर भी अल्प सेना वाले यादवों मे पराजित होकर चला गया ॥१२॥ यादवो की अल्प सेना भी उमसे न हार सकी, यह सब भगवान विष्णु के अश रूप श्रीकृष्ण की सग्निधि को ही महिमा थी ॥१३॥ उन मनुष्य धर्म का अनुकरण करने वाले जगत्पत्ति को यह लीला है जो वे अपने शत्रुप्रो पर विविध प्रकार के शस्त्रास्त्रो का प्रयोग करते हैं ॥१४॥ मनसैव जगत्सृटि संहारं च करोति यः । तम्यारिपक्षक्षपणे कियानुद्यमविस्तरः ११५ तथापि यो मनुष्याणां धर्मस्तमनुवर्तते । कुर्यन्वलवता सन्धि हीनयुद्ध करोत्यसौ ॥१६ साम चोपदानं च तथा भेदं च दर्शयन् । करोति दण्डपानं च क्वचिदेव पलायनम् ॥१७ पश्चम प्रग-प्र०२ ] [ २५५ मनुष्यदेहिना चेष्टामित्येवमनुवर्तते । लीला जगत्पतेस्तस्यच्छन्दतः परिवर्तते ॥१८ जिनके सङ्कल्प मात्र में विश्व की उत्पत्ति और संहार करते हैं, उन्हें अपने शत्रुप्रो को नष्ट करने के लिये कितना प्रयत्न करना होता है ? ॥१५॥ फिर भी वे बलवान पुरुषो से सन्धि और निर्बलो से विग्रह परके मनुष्य धर्म के अनुकरण मे लगे हैं ॥१६॥ वे कही साम-नीति, कही दान-नीति, कही दण्ड नीति और कही भेद-नीति से कार्य लेते है और आवश्यकता पड़ने पर कही युद्ध मे से भाग भी आते है ।।१७।। इस मनुष्य शरीरियो को चेष्टानो का अनुसरण करते हुए वे स्वेच्छा पूर्वक लीलाएँ करते रहते है ॥१८॥ तेईमवां अध्याय गार्य गोष्ठया द्विज श्यालप्पण्ढ इत्युक्तवान्दिन । यदूना सनिधौ सर्वे जहसुर्यादवास्तदा ॥१ ततः कोपरीतात्मा दक्षिणापथमेत्य सः । सुतमिच्छन्तपस्तेपे यदुचक्रभयावहम् ।।२ आराधयन्महादेव लोहचूर्णमभक्षयत् । ददौ वर च तुटोऽम्म वर्षे तु द्वादशे हरः ॥३ सन्तोषयामास च तं यवनेशो ह्यनात्मजः । तद्योपित्मङ्गमाच्चास्य पुत्रोऽभूदलिसन्निभः ॥४ त कालयवन नाम राज्ये स्वे यवनेश्वर । अभिषिच्य वन वज्राग्रकठिनोरसम् ॥५ स तु वीर्यमदोन्मत्त पृथिव्या वलिनो नृपान् । अपृच्छन्नारदस्तम्मै कथयामास यादवान् ।।६ म्लेच्छ कोटिसहस्राणा सहस्रं सोऽभिसवृत्त । गजाश्वरथसम्पन्नश्च कार परमोद्यमम् ।।

२५६ ] [ श्रीविष्णु पुराण - श्री पराशरजी बोले-हे द्विज ! एक यादवो के समाज में महपि गार्य से उनके साले ने पगढ (सत्वहीन) कह दिया, उस समय सभी यादव हँसने लगे ॥१॥ इससे महर्षि गायं प्रत्यन्त क्रोधित हुए और उन्होंने दक्षिण-समुद्र के किनारे पर जाकर यादवो के लिये भयावह हो सके, ऐसे पुत्र की कामना से तप किया ॥२॥ उन्होंने केवल लौह चूर्ण भक्षण करते हुए भगवान् शङ्कर की अाराधना की, तब बारहवे वर्ष में शिवजी प्रसन्न हुए और उन्होंने महर्षि गार्ग्य को इच्छित वर दिया ॥३॥ एक यवनराज पुन हीन था, उसने महर्षि गार्य की सेवा-सुधृपा करके उन्हें प्रसन्न किया तब उसकी स्त्री की सगति से एक भवर के समान काले रङ्ग का बालक उत्पन्न हुआ || उस कालयवन नामक बालक का वक्ष स्थल अत्यन्त हट था । यवनगज ने उसका राज्य पर अभिषेक किया और स्वय वन को चला गया ॥५॥ फिर बल विक्रम के मद में उन्मत्त हुए कालयवन ने नारदजी से प्रश्न किया कि पृथिवी पर कौन-कौन से राजा अधिक बलवान हैं, तब नारदजी ने यादवो को ही अधिक बलशाली बतलाया ॥६॥ यह सुनकर कालयवन असख्य हाथी, घोडे, रथ और म्लेच्छ सेना आदि को मथुरा पर चढाई करने के लिये तैयार करने लगा ॥७ प्रययौ सोऽव्यवच्छिन्नं छिन्नयानो दिने दिने । यादवान्प्रति सामों मैत्रेय मथुरा पुरीम् । कृष्णोऽपि चिन्तयामास क्षपित यादवं बलम् । यवनेन रणे गम्य मागधस्य भविष्यति ॥E मागधस्य बलं क्षीण स कालयवनो बली। हन्ततदेवमायातं यदूनां व्यसनं द्विधा ।।१० तस्माद् दुर्ग करिष्यामि यदूनागरिदुर्जयम् । स्त्रियोऽपि यत्र युध्येयुः किं पुनर्वृष्णिपुङ्गवाः ॥११ मयि मते प्रमत्ते वा सुप्ने प्रवसितेऽपि वा। यादवाभिभवं दुष्टा मा कुर्वन्त्वरयोऽधिकाः ।।१२ इति सश्चिन्त्य गोविन्दो योजनानां महोदधिम् । ययाचे द्वादश पुरी द्वारका तत्र निर्ममे ।।१३ २५८ ] [ श्रीविष्णु राण दृष्टमायश्च तेनामी जग्जाल ययनोऽग्निना । तकोधजेन मंत्रेय भस्मीभूतश्च तत्क्षणाद ।।२१ जव कालयवन मधुग के निकट पहुवा तभी श्रीकृष्ण ने सब मथुरा- वामियो को द्वारया में जा पहुचाया और स्वयं मथुरा में लौट पाये ॥१५॥ कालययन यो सेना के द्वारा मथुरा के पेर लिये जाने पर जव श्रीकृष्ण नि.मम्म ही मधुरा नगरी में बाहर निकले तभी फालयवन ने उन्हें देख लिया ॥१६॥ जो महायोगियो के भी चिन्तन मे नही पाते, उन्ही भगवान कृष्ण को वाहुमाग से पाता देखार कालयवन उनके पीछे दौड पडा ॥१७॥ कालयवन को पीछे पाने देवकर भागते हुए श्रीकृष्ण उम गुफा में प्रविष्ट हुए, जिसमे महावली राजा मुचुकुन्द गयन कर रहा था ।।१८।। उस बुद्धिहीन कालयवन ने गुफा में जाकर मुचुकुन्द कृष्ण गमझा और उसके शयन वरते हुए मे ही पद-प्रहार किया ।।१६। उसक पदाधान से मुचुकुन्द की नीद खुल गई और उमन उठकर अपन सामने वालयवन यो पडा हुप्रा देया ।।२०॥ हे मैत्रेय जी । मुचुकुन्द ने जैसे ही उस यवन को देखा, वैसे ही वह उसकी क्रोधाग्नि मे दग्ध होगया ॥२१॥ म हि देवासुरे युद्ध गतो हत्वा महासुरान् । निद्रार्तस्सुमहाकाल निद्रा व वर सुरान् ॥२२ प्रोक्तश्च देवैम्ससुप्त यस्त्वामुस्थापयिष्यति । देहलेनाग्निना सद्यम्स तु भस्मीभविष्यति ॥२३ एव दग्ध्वा स त पाप दृष्ट्वा च मधुसूदनम् । कम्त्वमित्याह सोऽप्याह जातोऽह शिन कुले ॥२४ वसुदेवस्य तनयो यदोवंशसमुद्भव । मुचुकुन्दोऽपि तत्रासौ वृद्धगार्यवचोऽस्मरत् ॥२५ सम्मृत्य प्रणिपत्यन मर्व सर्वेश्वर हरिम् । प्राह ज्ञातो भवान्विष्णोरशस्त्व परमेश्वरः ॥२६ पुग गार्येरण कथितमष्टाविंशतिमे युगे। द्वापरान्ते हरेजन्म यवशे भविष्यति । २७ ।

1 श्रीविष्णु पुगण
बुद्धिरव्याकृतप्राणा: प्राणेशस्त्व तथा पुमान् ।
पुस. परतर यच्च व्याप्यजन्मविकारवत् ॥३३
शब्दादिहीनमजरममेय क्षयवजितम् ।
अवृद्धिनाश तदब्रह्म त्वमाद्यन्तविवर्जितम् ।।३४
स्वत्तोऽमरास्मपितरो यक्षगन्धर्वन्निरा ।
सिद्धाश्वाप्सरसस्त्वत्तो मनुष्याः पराव. खगाः ॥३५
सरीसृपा मृगास्सर्वे त्वत्तस्सर्वे महील्हा ।
यच्च भूत भविष्य च किञ्चिदत्र चराचरम् ॥३६
हे देव । जब देवासुर सग्राम हुअा था, तब महाबली दैत्य भी मेरे तेज
को सहन करने में समर्थ नही थे, वही मैं आपके तेज को सहन नहीं कर रहा
हूँ ॥३०॥ विश्व मे पतितो के आप ही परम आश्रय और शरणागतो के सइट
को दूर करने वाले हैं। इसलिये प्राप प्रसन्न होकर मेरे सङ्कट को नष्ट करिये
॥३१॥ हे प्रभो । आप ही समुद्र, नदी, वन, पृथिवी, आकाश, वायु, जल और
अग्नि है तथा मन भी पाप ही हैं ।।३२।। आप ही बुद्धि, प्राण, तथा प्राणो के
अधिष्ठाता पुरुप हैं । आप ही पुरुष से परे व्यापक अजन्मा और निर्विकार प्रभु
है ॥३३॥ आप ही शब्दादि से परे, जरा-रहित, अमेय, अक्षय, अविनाशी, वृद्धि-
रहित तथा आदि-अन्त से परे हैं ॥३४॥ देवता, पितर, यक्ष, गन्धर्व, विनर,
मिद्ध और अप्सरानो की उत्पत्ति प्राप से ही हुई है । मनुष्य, पशु, पक्षी, सरी.
मृप, मृग, वृक्ष तथा भूत, भविष्यत्मय चराचर विश्व-सब कुछ माप ही
हैं ।।९५३६॥
मूर्तामूर्त तथा चापि स्थूलं मुश्मतरं तथा।
तत्सर्व त्वं जगत्यर्ता नास्ति किञ्चित्त्वया विना ॥३७
मया ममारचक्रेऽस्मिन्भ्रमता भगवान् सदा।
तापत्रयाभिभूतेन न प्राप्ता निर्वृतिः क्वचित् ॥३८
दुपान्येव मुनानीति मृगतृष्णा जलाशया ।
मया नाथ गृहीनाति नाति advaar

पञ्चम अश-अ० २३ ]
[ २६१
राज्यमुर्वी बल कोशो मित्रपक्षस्तथात्मजा.।
भार्या भृत्यजनो ये च शब्दाद्या विषयाः प्रभो ॥४०
सुखबुद्धया मया सर्व गृहीतमिदमव्ययम् ।
परिणामे तदेवेश तापात्मकमभून्मम ॥४१
हे प्रभो ! आप ही मूर्त, अमूर्त, स्थूल, सूक्ष्म तथा और भी जो कुछ
है वह सव है, आपसे पृथक् कुछ भी नहीं है ।।३७।। हे भगवन् ! तीनो तापो
से अभिभूत हुप्रा मे सदा ही इस ससार'चक्र मे घूमता रहा हूँ, मुझे कभी भी
शान्ति नहीं मिली ।।३।। हे नाथ ! जल की अाशा वाली मृगतृष्णा के समान
ही मैंने दुखो को सुख माना था, परन्तु उन सब से मुझे सन्ताप ही हुआ है ।
॥३६।। हे प्रभो ! राज्य, पृथिवी, सेना, कोप, मित्र, पूत्र, स्त्री, भृत्य और
शब्दादि विषयों को अविनाशी और सुख मान पर ग्रहण किया था, परन्तु अन्त
मे वे सभी वस्तुएं दु ख रूप सिद्ध हुई ।।४०.४१।।
देवलोकगति प्रातो नाथ देवगणोऽपि हि ।
मत्तस्साहाय्यकामोऽभूच्छाश्वती कुत्र निवृतिः ।४२
त्वामनाराध्य जगता सर्वेषा प्रभवास्पदम् ।
शाश्वती प्राप्यते केन परमेश्वर नितिः ।।४३
स्वन्मायामूढमनसो जन्ममृत्युजरादिकान् ।
ग्रयाप्य तापात्पश्यन्ति प्रेतराजमनन्तरम् ।।४४
ततो निजक्रियासूति नरकेप्वतिदारुणम् ।
प्राप्नुवन्ति नरा: दुसमस्वरूपविदस्तव ॥४५
प्रहमत्यन्तविपयो मोहितस्तव मायया ।
ममत्वगवंगर्तान्तर्भमामि परमेश्वर ॥४६
सोऽह त्या शरणमपारमप्रमेय सम्प्राप्त परमपद यतो न किञ्चित् ।
ससारभ्रमपरितापतप्तचेता निर्वाणे परिणतधाम्नि सामिलापः
हे प्रभो । अव देवलोक वासी देवताओं को भी मेरो सहायता सेनी
परी तो उनके उस लौर में भी नित्य शान्ति पहाँ होगी? ॥४२॥ हे नाय !
पाप सब समार में उभय म्यान यी माराधना के बिना सारयत शान्ति दिमे

२६२ ] [ श्रीविष्णु पुराण मिल सकनी है ॥४३॥ हे प्रभो प्रापको माया भ्रमे हुए मनुष्य जन्म, जरा और मृत्यु प्रादि दुग्यो यो भोग करते हुए अन्त मे यमराज को देखते हैं, ॥४४॥ जो आपके रूप को नहीं जानते, वे नरखो को प्राप्त होकर अपने फल म्प क्लेशो को भोगते है ॥४५॥ हे परमेश्वर । मैं विषयों के प्रति दौडता हुमा मापकी माया से भ्रम कर ममता और अभिमान गर्न मे भटक्ता रहा हू ।।४६।। परन्तु माज में उस पार रहित और मप्रमेय परम पद रूप परमात्मा की शरण में पाया हूं, जिससे भिन्न कोई भी नहीं है । हे नाथ | संसार मे चक्कर काटन से खिन्न हुमा मैं पाप निरतिशय, प्रकाशमान एव मोक्ष स्वरूप ग्रह्म की ही कामना करता हूं ॥४७॥ चौथीमवॉ अध्याय ३त्थ स्तुतस्तदा तेन मुचुकुन्देन धीमता । प्राहेश सर्वभूतानामनादिनिधनो हरि ॥१ यथाभिवाञ्छितान्दिव्यान्गच्छ लोकान्नराधिप । अव्याहतपरैश्वर्यो मत्प्रसादोपवृ हित ॥२ भुक्त्वा दिव्यान्महाभोगान्भप्यिसि महाकुले । जातिस्मरो मत्प्रसादात्तता मोक्षमवाप्स्यसि ॥३ इत्युक्त प्रणिपत्येश जगतामच्युत नृप । गुहामुखाद्वि निष्क्रान्तस्स ददर्शाल्पकानरान् ॥४ तत कलियुग मत्वा प्राप्त तप्तु नृपस्तप । नरनारायणस्थान प्रययौ गन्धमादनम् ।।५ कृष्णोऽपि घातयित्वारिमुपायेन हि तद्वलम् । जग्राह मथुरामेत्य हस्त्यश्वस्यन्दनोज्ज्वलम् ॥६ आनीय चोग्रसेनाय द्वारवत्या न्यवेदयत् । पराभिभवनिश्शद्ध बभूव च यदो कुलम् ।।७ पञ्चम प्रश-प्र०२० ] [ २६३ हे राजन् जी ने कहा- श्री पराशरजी ने कहा-महामति मुन्कुन्द द्वारा स्तुन हो कर सब- भूतेश्वर अनादि एव अनन्न भगवान् श्रीकृष्ण न रहा ॥१॥ श्री भगवान् बोले- आप अपने इच्छिन दिव्य लोको को गमन कीजिये, आपको मेरी कृपा से परम ऐश्वयं की प्राप्ति होगी ॥२॥ वहा आपको अत्यन्त दिव्य भोगो यी प्राप्ति होगी, फिर एक महान पुल आपका जन्म होगा, जिसमें पूर्व जन्म वृत्तान्त याद रहेगा और मेरे अनुग्रह से मोक्ष की प्राप्ति होगी ।।२।। श्रीपराशर भगवान् द्वारा इस प्रकार कहे जान पर राजा ने विश्वेश्वर श्री कृष्ण को प्रणाम किया पौर गिरि कन्दरा से बाहर प्रारर लोगो के प्रसार बहुत छोटे हुए देखे ।।४॥ उस समय कलियुग को पाया जानवर तप करने की अन्धा से राजा मुकुन्द नर-नरामण वे परम स्थान रूप ग धमादन पर्वत पर चले गये ।।५।। इस यत्न से मात्र को समाप्त पर श्रीयाण मधुग वो लोट पाये मौर बालयन यी रथ, हाथी, घोडे मादि से मुसज्जित सम्पूर्ण सेना को अपने घरा मे परके द्वारका जावर उग्रगन का सौंप दी। उस समय से यादव शनुमो पी मोर से भय रहित हो गय ।।६-७।। बलदेवोऽपि में श्रेय प्रशान्ताखिल विग्रह । शातिदर्शनमोत्कण्ठ प्रययो नन्दगोयुलम् ।।८ ततो गोपाश्च गोपीश्च यथापूर्वममित्रजित् । तथैवाभ्ययत्प्रेम्णा यहुमानपुरस्मरम् IME सश्चित्मम्परिध्वक्त याश्रित परिपम्बजे । हास्य चर्म सम पं निगोपगोपीजनंग्नथा ॥१० प्रियाण्यनेरान्यवदन गोपाम्तर हलायुधम् । गाप्यच प्रेमपिता प्रोगुम्सेप्यंमथापग ॥११ गोप्य पप्रच्छुरपग नागरोजनवल्लभ । पजिदाम्ते गुग पृणधलप्रेमलयारमर ॥१२ अम्मष्टामपहनन यचित्युग्यौपिताम् । सौभायमानमपिर परोति क्षणमाद ॥१३ २६४ ] [ श्रीविष्णुपुराण कञ्चित्स्मरति नः कृष्णो गीतानुगमनं कलम् । अप्यसौ मातर द्रष्टु सकृदप्यागमिष्यति ॥१४ हे मंडेयजी ! जब यह मम्पूर्ण विग्रह शान्त हो गया तब बलरामजी अपने बन्धुओ से मिलने के लिये नन्द जी के गोकुल को पधारे 11 बहा जाकर उन्होने गोपी और गोपियो को पूर्ववत् अत्यन्त प्रादर और प्रेम पूर्वक अभिवादन किया ॥६॥ किसी को उन्होंने हृदय से लगाया और कोई उनसे कन्धे से कन्धा भिडा कर मिला तथा किसी गोपी और गोप के साथ उनका हास परिहास हुआ ॥१०॥ गोपो ने उनसे अनेक प्रकार से प्रिय सम्भापण किया तथा विसी गोपी ने प्रेम युक्त उपालम्भ दिया और किसी ने प्रणय कोप प्रद- शिन किया ॥११॥ किन्ही गोपियों ने उनसे प्रश्न किया कि अल्लम मोर चञ्चल चित्त वाले तथा नगर की स्त्रियों के प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण कुशल से तो हैं ॥१२॥ उन क्षणिक स्नेह वाले कृष्ण ने क्या हमारे प्रेम का उपहास भोर नगर की स्त्रियो के सौगाग्य और सम्मान की वृद्धि नहीं की है ? ॥१३॥ क्या वे कभी हमारे गीतमय मनोहर स्वर की भी याद करते हैं ? और क्या में एक वार अपनी माता वो देखने के लिये भी यहाँ नही पावेंगे? ॥१४॥ अथवा फितदालापैः क्रियन्तामपराः कथा.। यस्यास्माभिविना तेन विनास्माक भविष्यति ॥१५ पिता माता यथा भ्राताभर्ता वन्धुजनश्च विम् । सन्त्यक्तस्तस्कृतेऽम्माभिरकृतनध्वजो हि सः ।।१६ तथापि कच्चिदालारमिहागमनसंश्रयम् । करोति कृष्णो वक्तव्यं भवता राम नानृतम् ।।१७ दामोदरोऽमी गोविन्दः पुरस्त्रीसक्तमानस. । अपेतमीतिरस्मामु दुर्दशः प्रतिभाति नः ॥१८ मामाचता गृपति पुनर्दामोदरति च । जहमुगपरे गोप्यो हरिणा हतचेतमः ११६ सन्देशम्साममधुरःप्रेमगर्भरगवितः । रामेणाशामिना गोप्य. गृष्णस्यानिगाहग. ॥२० ..

[ श्रीविष्णु पुराण इत्युक्ता वारुणी तेन सन्निधानमथाकरोत् । वृन्दावनसमुत्पन्नकदम्बतरुकोटरे ॥४ विचरन् बलदेवोऽपि मदिरागन्धमुत्तमम् । आवाय मदिरातर्पमवापाथ वराननः ।।५ तत कदम्बात्सहसा मद्यधारा स लागलो। पतन्ती वीक्ष्य मैत्रय प्रययौ परमा मुदम् ॥६ पपौ च गोपगोपीभिस्समुपेतो मुदान्वित । प्रगोयमानो ललित गीतवाद्यविशारदै ॥ श्री पराशरजी ने कहा-अपने महान कार्यों के द्वारा पृथिवी को चलाय. मान करने वाले तथा धरणी के धारण करने वाल माया स मनुष्य बने शेपावतार बलरामजी को गोपो के साथ ब्रजभूमि में क्रीडा करते देख कर वरुण ने उनके भोग के निमित्त वारुणी को आज्ञा दी ?-हे मदिर। जिन महाबली अनन्त भगवान् को तुम सदा ही प्रिय लगती हो,उनके उपभोग और प्रसन्नता के निमित्त तुम शीघ्र ही उनक पास पहुंचो ॥१-३।। वरण की प्राज्ञा पावर वह वारुणी वृदावन में उत्पन्न हुए कदम्ब तरु के कोटर मे जाकर स्थित हुई ॥४॥ जव मनोहर मुख वाले बलरामजी वन मे घूम रहे थे, नव मदिरा की गध पाकर उन्होन उसके पान करने की इच्छा को ॥५॥ हे मैनेयजी । उसो कदम्ब के वृक्ष से धार रूप मे मदिरा गिरने लगी, जिसे देखने पर बलरामजी को अत्यत प्रसन्नता हुई ॥६॥ फिर गायन-वादन चतुर गाप-पोपियो क मधुरालाप पूर्वक उनने साथ मिल कर बलरामजी ने हर्ष सहित मदिरा का पान किया ॥७॥ स मत्तोऽन्यन्तधर्माम्भ कणिकामौक्तिकोज्ज्वल । आगच्छ यमुने स्नातुमिच्छामोत्याह विह्वन ॥८ तस्य वाच नदी सा तु मत्तोतामवमत्य वै । नाजगाम तत कुलो हल जग्राह लागली HE गृहीत्वा ता हलान्तेन चकपं मदविह्वल । पापे नायासि नायासि गम्यतामिच्छयान्यत ॥१०

1
पश्चम अश-अ० २५ ]
[ २६७
साकृष्टा सहसा तेन मार्ग सन्त्यज्य निम्नगा।
यत्रास्ते बलभद्रोऽसौ प्लावयामास तद्वनम् ।।११
शरीरिणी तदाभ्येत्य वासविह्वललोचना ।
प्रसीदेत्यत्रवीद्राम मुञ्च मा मुसलायुध ।।१२
ततस्तस्या सुवचनमाकर्ण्य स हलायुध ।
सोऽब्रवीदवजानासि मम शीर्यवले नदि ।
सोऽह त्वा हलपातेन नयिष्यामि सहस्रधा ॥१३
फिर धूप के अधिक ताप से स्वेद विन्दु रूपी मोतियो से सुशोभित हुए
मदोन्मत्त वलरामजी ने विह्वलता पूर्वक कहा हे यमुने । यहाँ पा, मेरी इच्छा
स्नान करने की है।॥८॥ उनके उस कथन को यमुना ने मदिरा से उन्मत्त हुए
मनुष्य का प्रलाप मात्र समभा और उस पर कुछ भी ध्यान न देती हुई वह वहाँ
नहीं पहुंची । इस पर क्रोधित होकर उन्होने अपना हल ग्रहण किया ।।६। उन
मदविह्वल बलराम ने हल को नार से यमुना को पकड कर अपनी ओर खीचते
हुए कहा-परी पापे | तू नहीं पाई ? अच्छा त अपनी इच्छा से कही जाकर
तो दिखा ॥१०॥ इस प्रकार बलरामजी क द्वारा सिंची हुई यमुना अपने मार्ग
को छोड पर, जहाँ बलराम खडे थे वहाँ आ गई और उम स्थान को जल से
भर दिया ।।११।। फिर वह भय से अथु-युक्त नेत्र वाली यमुना देह धारण कर
बलरामजी के समक्ष उपस्थित हुई और उसने उनसे कहा-हे हलधर | प्राप
प्रसन्न होकर मुझे मुक्त कर दीजिय ।।१२।। उसकी बात सुनकर बलरामजी
बोले-हे नदी । क्या तू मेरे शौर्य और बल का तिरस्कार करती है । देस, इस
हल व द्वारा ही मैं तरी हजाग धाराए' बना दूंगा ॥१३||
इत्युक्तयातिसन्त्रासात्तया नद्या प्रसादित ।
भूभागे प्लाविते तम्मिन्मुमोच यमुना बल ||१४
ततस्स्नातस्य वै कान्तिरजायत महात्मन ।
अवतसोत्पत चारु गृहीत्वैक च कुण्डलम् ।।१५
वरुणप्रहिता चास्म मालामम्लानपङ्कजाम् ।
समुद्राभे तथा वस्त्रे नीले तक्ष्मीरयच्छत ॥१६

२६८ ] [ श्रीविष्णु पुराण कृतावतंसस्स तदा चारुकुण्डलभूपितः। नीलाम्बरधरस्त्रग्वी शुशुभे कान्तिसयुतः ।।१७ इत्थं विभूपितो रेमे तत्र रामस्तथा बजे। मासद्वयेन यातश्च स पुनरिकां पुरीम् ॥१८ रेवती नाम तनयां रैवतस्य महीपते । उपयेमे बलत्तस्यां जज्ञाते निशठोल्मुकौ ॥१६ श्री पराशरजी ने कहा--बलरामजी के ऐसा कहने पर भय से कांपनी हुई यमुना उस भू-खण्ड पर प्रवाहित होने लगी, तब प्रसन्न होकर उन्होने यमुना को मुक्त कर दिया ॥१४॥ उसमे स्नान कर लेने पर महात्मा बलरामजी अत्यंत सुशोभित हुए। तब लक्ष्मीजी ने प्रकट होकर उन्हे एक सुन्दः कुण्डल, वरुण द्वारा भेजी गई सदा प्रफुल्लित रहने वाली पद्ममाला और ममुद्र जैसी कान्ति वाले दो नीलाम्बर प्रदान किये ॥१५-१६।। उन सब को धारण करके बलरामजी अत्यत काति वाले और शोभा सम्पन्न हो गये ।।१७। इस प्रकार प्रलकृत हुए बलरामजी ने ब्रज मे लीलाएँ करते हुए दो मास पर्यंत निवास किया और फिर द्वारकापुरी मे लौट आये ॥१८॥ जहां उन्होंने राजा रैवत की पुत्री रेवती का पाणिग्रहण किया और उससे निशठ तथा उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥१६॥ छब्बीसवाँ अध्याय भीष्मकः कुण्डिने राजा विदर्भविपयेऽभवत् । रुक्मी तस्याभवत्पुयो रुक्मिणी च वरानना ॥१ रुक्मिणी चकमे कृष्णस्सा च तं चारुहासिनी। न ददो याचते चना रुक्मी पेण चक्रिणे ।।२ ददौ च शिशुपालाय जरासन्धप्रचोदितः । भोरको रुस्मिरमा सर्ट सरिमा पुरविक्रम ॥३

पञ्चम प्रश-अ० २६ ]
[ २६६
विवाहार्थ तत सर्वे जरासन्धमुखा नृपाः ।
भीष्मकस्य पुरं जम्मुश्शिशुपाल प्रिय पिण. ॥४
कृपणोऽपि बलभद्राद्य यंदुभिः परिवारित. ।
प्रययौ कुण्डिन द्रष्टु विवाह चयभूभृतः ॥५
श्री पराशरजी ने कहा-विदर्भदेश में बुण्डिनपुर नामक एक नगर था,
जिसका शामन राजा भीमा करते थे उनके पुत्र का नाम रुक्मी और पुत्री का
नाम रुक्मिणी था ॥१॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणी को चाहते थे और रस्मिणी भी
उन्ही की कामना करती थी, परतु भगवान् द्वारा याचना किये जाने पर भी
उनके द्वपी स्क्मी ने रुक्मिणी उन्हे नही दी ।।२।। जरासन्ध की प्रेरणा से राजा
भीष्मक ने रुक्मी + प्रस्ताव से सहमत होकर शिशुपाल के लिये अपनी कन्या
देना स्वीकार किया ॥३॥ तब शिशुपाल के हित-चिन्तक जगसधादि सब राजा
बरात लेकर महागज भीमर के नगर में पहुंचे ।।४।। यादवो और बलरामजी
को माय लेकर श्रीकृष्ण भी चेदिगज मिशुपाल का विबाह देखने के निमित
कुण्डिनपुर मे आ गये ।।५।।
श्वोभाविनी विवाहे तु ता कन्या हृतवान्हरि ।
विपक्षमारमासज्य रामादिप्वय बन्धुषु ॥६
ततश्च पौण्ड्रकम्श्रीमान्दन्तवको विदूग्थः ।
शिशुपालजरासन्धशाल्वाद्याश्च महीभृत ७
कुपितास्ते हरि हन्तु चक्रुरुद्योगमुत्तमम् ।
निजिताश्च ममागम्य रामाद्य यदुपुङ्गवं ॥८
कुण्डिन न प्रवेश्यामि ह्यहत्वा युधि केशवम् ।
कृत्वा प्रतिज्ञा रुक्मी च हन्तु कृष्णमनुद्र तः ।।
हत्वा चल मनागाश्व पत्तिस्यन्दनमकुलम् ।
निजित पातितश्चोया लीलयंव म चक्रिरणा ॥१.
निजित्य रक्मिरण सम्पगुपयेमे च क्मिणीम् ।
राक्षसेन दिवाग नम्प्राता मधुसूदन ॥११

२७० 1 [ श्रीविप्रणु पुगण तस्या जने च प्रद्युम्नो मदनामस्सवीर्यवान् । जहार शम्बरो य वै यो जघान च शम्बरम् ॥१२ फिर, जब विवाह होने में एक दिन शेप था तब श्रीकृष्ण ने रविमणी का हरण करके विपक्षियो से भिडने का भार बलरामजी प्रादि यादवो को दिया ॥६॥। उस समय पौएडा, दन्तवक्र, विदूरथ शिशुपाल, जरासघ तथा शाल्लादि नरेशो ने श्रीकृष्ण का वध करने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु बलरामजी आदि वीरश्रेष्ठो से युद्ध में हार गये ।।७-८॥ त्व रुक्मी ने कृष्ण को मार विना, कुण्डिनपुर मे प्रवेश न करने की प्रतिज्ञा की और वेग पूर्वक श्रीकृष्ण का पीछा किया | परन्तु श्रीकृष्ण ने उसकी रथ, पश्व, गज और पैदलो से सम्पन्न सेना को पराजित कर रुक्मी को पृथिवी पर गिरा दिया ॥१०॥ इस प्रकार रुक्मी को हराकर राक्षस विवाह की पद्धति से प्राप्त हुई रुक्मिणी के साथ श्रीकृष्ण ने विधिवत् विवाह किया ॥११॥ उस रक्मिणी से उन्होंने कामदेव के अश स्प अत्यत वीर्यशाली प्रद्यम्न को उत्पन किया, जिसका गम्बरासुर ने हरण कर लिया था और जिसके द्वारा उम शम्बगसुर की मृत्यु हुई थी ॥१२॥ मत्ताईसवाँ अध्याय शम्बरेण हतो वीर प्रद्युम्न स कथ मुने । शम्बर स महावीर्य प्रद्युम्नेन क्थ हत ॥१ यस्तेनापहृत पूर्व स कथ विजघान तम् । एतद्विस्तरत श्रोतुमिच्छामि सकल गुरो॥२ पप्ठेऽह्नि जातमान तु प्रद्युम्न सूतिकागृहात् । ममप हन्तेति मुने हृतवान्कालशम्बरः ॥३ हृत्वा चिक्षेप चैवैन ग्राहाने लवणार्णवे। करलोलजनितावर्ते सुघोरे मकरालये ॥४ पातित तत्र चवैयो मत्स्यो जग्राह बालकम् । न ममार च तस्यापि जठराग्निप्रदीपित ॥५

पञ्चम अग-अ० २७ ]
[ २७१
श्री मैनेयजी ने कहा-हे सुने । शम्बरासुर ने महावीर्य प्रद्युम्न को कैसे
हर लिया और फिर प्रद्युम्न ने उसका वध किस प्रकार किया ? ॥१॥ जिसका
उसने हरण किया उसी न उसको कैसे मार डाला? हे गुरो । इस वृतान्त को
विस्तृत रूप से सुनने को मेरी इच्छा है ॥२॥ श्री पराशरजी ने कहा-हे मुने ।
काल के समान विकराल शम्बर ने प्रद्युम्न को अपना काल समझ कर जन्म के
छटवें दिन ही प्रमूति गृह मे चुरा लिया था ।। || उसे चुरा लेने के वाद शम्बर
ने खारे समुद्र म डाल दिया, जा कल्लोल जनित पावतों से परिपूर्ण तथा बडे
मत्स्यो का सदन है ॥४॥ समुद्र मे डाले गये उम वालक को एक मत्स्य निगल
गया, परतु उसको जठराग्नि में पड़कर भी उसकी मृत्यु नहीं हुई ।।५।।
मत्स्यवन्धश्च मत्स्योऽसौ मत्स्यरन्यस्सह द्विज ।
घातितोऽमुरवर्याय सम्वराय निवेदित ॥६
तस्य मायावती नाम पत्नी सर्वगृहेश्वरी।
कारयामास सुदानामाधिपत्यमनिन्दिता ७
दारिते मत्स्यजठरे मा ददर्शातियोभनम् ।
कुमार मन्मथतगरोदंग्धम्य प्रथमाकुरम् ।।
कोऽय क्थमय मत्स्यजठरे प्रविवेगित ।
इत्येव कौतुकाविष्टा तन्वी प्राहाथ नारद I16
प्रय समनजगन स्थितिसहारकारिण ।
शम्बरेण हृतो विप्णोस्तनय सूतिकागृहात् ॥१०
क्षिप्तम्समुद्र मत्स्येन निगीणस्ते गृह गत ।
नररत्नमिद सुम्र वियब्धा परिपालय ॥११
नारदेनवमुक्ता सा पालयामास त गिगुम् ।
बात्यादेवातिरागेण म्पातिमयमोहिता ॥१२
स यदा यौवनाभागभूपिनाऽभून्महामते ।
साभिलारा नदा मापि बभूव गजगामिनी ॥१३
मायावती ददौ तस्मै मायाम्मा महामुने ।
प्रच म्नायानुरागान्या तन्यस्तहृदयेशग्गा ॥१४

२७२ ] श्रीविष्णु पुराण उस मम्य को अन्य मछलियो के सहित मछुओं ने जाल में फंसाया और सम्बरासुर की भेंट कर दिया ॥६॥ उमको मायावती नाम की पत्नी उमके घर को स्वामिनी थी और वही श्रेष्ठ लक्षण वाली सब रमोइयों की देख भाल करती थी ।।७।। उस मत्म्य के उदर को चीरते नमय एक सुन्दर बालक दिखाई पडा, जो जले हुए वाम रूपी वृक्ष का प्राथमिर अकुर था || मायावती विस्मय पूर्वक यह सोचने लगी कि 'यह बालक कौन है तथा मत्स्य के उदर मे केस पडा' । उसके इस विस्मय का निवारण देवर्षि नारद ने इस प्रकार दिया l से सुभ्र । यह बालक सम्पूर्ण विश्व की स्थिति और महार करने वाले भगवान् विष्णु का पुत्र है । शम्बरासुर ने सूतिकागृह में ही इसका अपहरण करके समुद्र में डाल दिया। वहां जो म स्य इसे निगल गया था, उसके यहां लाये जाने पर यह भी यहाँ पा गया है। अब तू आश्वस्त होकर इसका परिपालन पर ॥१०. ११॥ श्री पराशरजी ने कहा-नारदजी की बात सुनकर मायावती उस अत्यन सुन्दर बालक पर मोहित होती हुई उमका अत्यन्त स्नेह से परिपालन मे तत्पर हुई ॥१२॥ जब वह बालक नव यौवन क सम्पर्क में आया तभी से गज गामिनी मायावती उसमे अनुरागमयी हो गई ॥१३॥ हे महामुने । जिस मायावती ने अनुराग में अन्धी होकर अपने हृदय तथा नेवो का उममे तन्मय कर दिया था, उसने उसे सब प्रकार की माया सिखा डाली ॥१४॥ प्रसञ्जन्ती तु ता प्राह स काणि कमलेक्षणाम् । मातृत्वमपहायाद्य किमेव वर्तसेऽन्यथा ॥१५ सा तस्मै कथयामास न पुनस्त्व ममेति वै। तनय त्वामय विष्णोह तवान्कालशम्बर ॥१६ क्षिप्तः समुद्र मत्स्यस्य सम्प्राप्तो जठराग्मया । सा हि रोदिति ते माता कान्ताधाप्यतिवत्सला ॥१७ इत्युक्तश्शम्बर युद्ध प्रद्युम्न स समाह्वयत् । क्रोधाकुलीकृतमना युयुधे च महावल ॥१८ हत्वा संन्यमशेष तु तस्य दैत्यस्य यादव । सप्त माया न्यतिकम्य मायो प्रयुयुजेऽष्टमीम् ।।१६ प-चम अंग-म० २७ ] [ २७३ तया जघान त दैत्य मायया कालगम्बरम् । उत्पत्य च तया सार्द्ध माजगाम पितु पुरम् ।।२० इस प्रकार उस पद्माक्षी को अपने ऊपर मासक्त हुई देखकर प्रनम्न ने यहा-तुम मातृत्व के भाव को छोड कर अन्य भाव क्यो दिखा रही हो? ॥१।। इस पर मायावती बोलो-तुम मेरे पुत्र नहीं, भगवान् विष्णु ये पुन हो । शम्बरासुर न तुम्हे चुरा कर जिम ममुद्र में डाल दिया था, उम ममुद्र में प्राप्त मत्स्य के पेट में तुम मुझे मिले हो। पुत्र स्नेह से मतत हुई तुम्हारी माता अब भी विलाप करत होगी ।।१६-१७॥ श्री पराशरजी ने कहा-मायावती की बात सुनकर महावलो प्रयम्न ने क्रोधाकुल होकर शम्बरासुर को ललकारा और उसमे भिड गये ॥१८|| फिर उम दैत्य को सब सेना का महार पर और उसकी मात मायानो को अपने वश में कर पाठवी माया वा स्वय प्रयोग किया ॥१६॥ उसी माया के द्वारा उन्होने शम्बरासुर का वध कर दिया और मायावती को साथ लेकर गगन मार्ग से अपने पिता की द्वारकापुरी में प्रा पहुंचे ॥२०॥ अन्त पुरे निपातित मायावत्या समन्वितम् । त दृष्ट्वा कृष्णसङ्कल्पा बभूवु कृष्णयोपित ॥२१ रुक्मिणी सामवत्प्रेणा साम्रदृष्टिरनिन्दिता। धन्याया खल्वय पुत्रो वर्तते नवयौवने ॥२२ अस्मिन्वयसि पुत्रो मे प्रद्युम्नो यदि जीवति । सभाग्या जननी वत्स सा त्वया वा विभूपिता ॥२३ अथवा यादृश स्नेहो मम यादृग्वपुस्तव । हरेरपत्य सुव्यक्त भवान्वत्स भविष्यति ॥२४ मायावती के साथ अन्न पुर में जाने पर श्रीकृष्ण की रानियो ने उन्हें कृष्ण ही समझा ॥२१॥ परन्तु उसे देखकर रुक्मिणीजी के नेत्रो म आमू प्रागये और वे कहने लगी कि यह नवयौवन का प्राप्त हुआ किमी वडभागिनी का ही पुत्र होगा ॥२२।। यदि मेग पुत्र प्रद्युम्न कही जीविन हो तो उसकी अवस्था भी इतनी ही होगी । हे वत्म ' तेरे स कौन-मोभाग्यवती माता अलकृत हुई है ? ॥२३॥ अथवा जमे तेरा रूप है और मेरा चित्त तेरी अोर स्नेह से प्राक- 7 २७४ - [ श्रीविष्णु पुगग पित हुआ है, उससे यही लगता है कि तू भगवान् का ही पुन है ॥२४॥ एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तस्सह कृप्रणेन नारद । अन्त पुरचरा देवी रुक्मिणी प्राह हर्पयन् ॥२५ एप ते तनय सूभ्र, हत्वा शम्बरमागत । हतो येनाभवद् बालो भवत्यास्सूतिकागृहात्।।२६ इय मायावती भार्या तनयस्यास्य ते सती। गम्बरम्य न भायेंय थ यतामन कारणम् ।।२७ मन्मथे तु गते नाग तदुद्भवपरायणा । शम्बर मोहयामास मायारूपेण रूपिणी ॥२८ विहाराद्य पभोगेपु मायामय शुभम् । दर्शयामास दैत्यम्य यस्येय मदिरेक्षणा ॥२६ कामोऽवतीर्ण पुरस्ते तम्येय दयिता रति । विशङ्का नान कर्तव्या स्नुषेय तव शोभने ॥३० तनो हर्पसमाविष्टौ रुक्मिरणीकेशवी तदा । नगरी च नमस्ता सा माधुसावित्यभाषत ।।३१ चिर नष्टन पुत्रेण मङ्गना प्रेक्ष्य रुक्मिणीम् । अवाप विस्मय सर्वो द्वाग्वत्या तदा जन ॥३२ श्री पराशरजी ने कहा-उसी समय श्रीकृष्ण के साथ नारदजी भी वहाँ आ पहुंचे। उन्होने रक्मिणीजी को अत्यन्त आनन्दिन करते हुए कहा- हे श्रेष्ठ भ्रू वालो | यह तेरा ही पुत्र है, जो शम्बरासुर का वध करके यहाँ पाया है । इमो को उमने मूतिकागृह स चुरा लिया था ॥२६॥ यह मायावती शम्बगसुर की स्त्री नहीं है, तेरे इमी पुत्र की पत्नी है, अब मुझमे इसका कारण सुन ॥२७॥ जव पूर्वकाल म कामदेव भस्म हो गया था तब उसके पुनर्जन्म की प्रतीक्षा करती हुई इम मायावती न अपने माया युक्त-रूप म शम्बरासुर को मोहित कर लिया था ॥२८॥ यह मत्त नया वानी मायावती उम देस्य का विहारादि करन ममय अपने प्रत्यन्त सुन्दर मायामय रूपो का दर्शन कराती रहती थी ॥२६॥ वह कामदा ही तेरे यहाँ पुत्र रूप से उत्पन्न हुमा है और यह - पञ्चम अश-०२८ ] [ २७५ उसकी पत्नी रति है । हे शोभने । इसके अपनी पुत्रवधू होने में कोई सन्देह मत कर ॥३०॥ इस बात से रुक्मिणी और कृष्ण अत्यन्त आनन्दित हुए और द्वारका में निवास करने वाले सभी मनुष्यो को हपं हुअा ।।३१।। बहुत समय से नष्ट हुए पुत्र के साथ रुक्मिणी का पुनर्मिलन देखकर द्वारखा वासियों को अयन्त विस्मय हुमा ॥३२॥ अट्ठाडेमयां अध्याय चारुदेष्ण च चारुदेह च वीर्यवान् । सुपेण चारुगुप्त भद्रचारु तथा परम् ।।१ चारुविन्द सुचारु च चारु न बलिना वरम् । रुक्मिण्यजनयत्पुनान्कन्या चारुमती तथा ॥२ अन्याश्च भार्या कृष्णस्य बभूवुः सप्त शोभना । वालिन्दी मिनविन्दा च सत्या नागाजिती तथा ॥३ देवी जाम्बवती चापि रोहिणी कामरूपिणी। मद्रराजसुता चान्या सुगीला शीलमण्डता ॥४ मायाजिती मत्यभामा लक्ष्मणा चारुहामिनी। पोडशासन् सहस्राणि म्नीगामन्यानि चमिण ॥५ श्री पराशरजी न कहा-क्मिणोजी व चारदेवग, सुदेगा, चारदेह, मुषेण, चारगुप्त भद्रचार, नारविन्द, सुचार भोर चार नामक महावली पुत्र तथा चारमती नाम की एक पुत्री हुई ।।१२।। क्मिणी व अतिरिन श्रीकृष्ण की जो सात रानियां थी उनो नाम कानिन्दी, मित्रविन्दा, मत्या, पामरूपगी जाम्बवती, रोहिणी, मदरातमुरा भद्रा मत्राजितमुता, मत्यभामा और सुन्दर हामवाली लक्ष्मणा मत्यन मुन्दर थी। इससे अनिरिक्त श्रीकृष्ण के गोत्रह हमार रानियां पोर थी॥३.४.५॥ प्रद्य म्नोऽपि महावीर्यो गरिमगम्तनया शुभाम् । म्ययवरे ता जग्राह मा च त तनय हरे ।

२७६ ] | श्रीविष्णुपुराण तस्यामम्याभवत्पुत्रो महावलपराक्रम. । अनिरुद्धो रणे रुद्धवीर्योदधिररिन्दम ॥७ तस्यापि रुक्मरण पौत्री वरयामास केशव । दौहित्राय ददौ रुक्मी ता स्पर्द्ध नपि चक्रिणा ॥ तस्या विवाहे रामाद्या यादवा हरिणा सह । रुक्मिणो नगर जग्मुर्नाम्ना भोजकट द्विज 16 विवाहे तर निवृत्त प्राधे म्नेस्तु महात्मन । कलिङ्गराजप्रमुखा रुक्मिरण वाक्यमन्त्र वन् ॥१० अनक्षज्ञो हली ते तथास्य व्यसन महत् । न जयामो बल स्माद् छू तेनैन महाबलम् ॥११ महाबली प्रद्युम्न न रुक्मी की कन्या की कामना की और उस कन्या ने भी प्रद्युम्न का स्वपवर म वरण किया १६ प्रद्युम्न न उस रवमीसुता से अनि- रुद्ध नामक एक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ, जो युद्ध म कभी न रुकने वाला और मनुप्रो व मर्दन म बल का ममुद्र ही था ॥७॥ श्रीकृष्ण ने रुक्मी की पौत्री के साथ उसका विवाह किया। श्रीकृष्ण स द्वप होते हुए भी रुक्मी ने अपने दौहित्र को अपनी पुगी दने का निश्चय कर लिया ॥८॥ श्रीकृष्ण क साथ बलरामजी तथा अन्य यादवगण भी उम विवाहोत्सव म सम्मिलित होने के लिय राजा रुक्मी के भोजकट नामक नगर म जा पहुचे ॥६॥ प्रद्युम्न पुष अनिरुद्ध का विवाह-सम्कार पूण हा चुकने पर कलिंगराज आदि प्रमुख नरेशो ने रुक्मी से कहा-यह बरामजी द्यूत क्रीडा म चतुर न होते हुए भी, उसके बडे इच्छुक रहते हैं । इसलिये हम उह द्यूत म ही क्यो न पराजित कर दे ॥११॥ तथेति तानाह नृपान्रुक्मी वलमदान्वित । सभाया सह रामण चक चूत च वै तदा ॥१२ सहस्रमेक निष्कारणा रुक्मिणा विजितो वल । द्वितीयेऽपि पणे चान्यत्सहस्र रुक्मिरणा जित ॥१३ तता दशसहस्राणि निवारणा पर्णमाददै । बलभद्रोऽजयत्तानि स्वमी चूतविदा वर !॥१४ [ २७७ पञ्चम अश-अ० १८ ] ततो जहास स्वनवत्व लिङ्गाधिपतिद्विज । दन्तान्विदर्शयन्मूढो रुक्मी चाह मदोद्धत ।।१५ अविद्योऽय मया छू ते बलभद्र पराजित । मुधवाक्षावलेपान्धो योऽवमेनेऽक्षकोविदान् ॥१६ श्री पराशरजी ने कहा-तब बल-मद से उत्मत्त हुमा रुक्मी उन राजापो से 'बहुत अच्छा' कहार सभा मे गया और बलरामजी के साथ द्यूत- फ्रीडा करने लगा ।।१२॥ प्रथम दांव म उसने एक हजार निक जीते तथा द्वितीय दांव में भी एक हजार निष्प पुन जीत लिय ।।१३।। फिर वलरामजी ने दस सहस्र निष्क का दांव लगाया, उममे भी वे रुक्मी से हार गय ॥१४॥ इस पर कलिंगराज उनको हँसी उडाता हुमा जार-जार मे हंसने लगा । उसी समय रक्मी ने कहा-यूतक्रीडा न जानने वाल वलरामजी मुझने हार गये है, यह पासे के घमण्ड मे व्यर्थ ही पामे मे चुरान व्यक्तियो का तिरस्कार परते थे ॥१६॥ दृष्ट्वा वलिङ्गराज त प्रकाशदशनाननम् । रुक्मिण चापि दुर्वाक्य कोप च हलायुध ॥१७ ततः कापपरीतात्मा नियकाटि समाददे। ग्लह जग्राह रवमी च तदर्थेऽक्षानपातयत् ॥१८ अजयदलदेवस्त प्राहोच्चविजित मया । मयेति रक्मी प्राहोचरलीयोक्तरल वल ॥१६ त्वयोक्तोऽय ग्लहस्गत्य न मयपोऽनुमोदित । एव त्वया चेद्विजित विजित न मया क्थम् ॥२० प्रथान्तरिक्षे वागुच्च प्राह गम्भीरनादिनी। बलदेवस्य त कोप बद्धं यन्ती महारमन ॥२१ जित बलेन धर्मग रुक्मिणा भापित मृपा । अनुक्त्वापि वचः विधिकृत भवति यमणा ॥२२ इग प्रसार कलिंगगज को हेमो उडान पोर ग्यमी को दुर्वचन कहते देशपर बनगमजी यो प्ररएन प्रोध हा 11111उहोंने शोध पूब एक २७८ ] [ श्रीविष्णु पुराण कराड निष्क दांव पर लगाये और उम जीतने के लिये रुक्मी ने भी पासे डाले ॥१८॥ उस दांव को बलरामजी जीत गय और उच्च स्वर से बोल कि इसे मैंन जीता है। इस पर ममी ने भी जोर से कहा कि बलरामजी मिथ्या वचन कहने मे क्या लाभ है ? यह दांव मैने ही जीता है ॥१९॥ मापने इस दौर के विषय म जो कहा था, उसका मैंने अनुमोदन कदापि नहीं किया । इस प्रकार यदि प्राप इस अपन द्वारा जीता हमा कहते है तो मैंने ही इस किस प्रकार नहीं जीता है । ॥२०॥ श्री पराशरजी न कहा-इमक पश्चात् बलरामजी की क्रोध वृद्धि करती हुई अाकाश वाणी न गम्भीर स्वर म कहा-इम दांव की जीत बलरामजी की ही हुई है, रुक्मी का क्थन यथार्थ नहीं है, क्योकि वचन अभाव में भी कार्य क द्वारा अनुमोदन हुआ ही माना जायगा ॥२१-२२।। ततो वल समुत्थाय कोपसरक्तलोचन । जधानाष्टापदेनैव रुक्मिरण स महावल ॥२३ कलिङ्गराज चादाय विस्फुरन्त बलाद्वल । वभञ्ज दन्तान्कुपितो ये प्रकाश जहास स ॥२४ आकृष्य च महास्तम्भ जातरूपमय वल । जधान तान्येतत्पक्षे भूभृत कुपितो भृशम् ।।२५ ततो हाहाकृत सर्व पलायनपर द्विज । तद्राजमण्डल भीत बभूव कुपिते बले ।।२६ वलेन निहत दृष्ट्वा रुक्मिण मधुसूदन । नोवाच किञ्चिन्मत्रेय रुक्मिणीवलयोर्भयात् ।।२७ ततोऽनिरुद्वमादाय तदार द्विजोत्तम । द्वारकामाजगामाथ यदुचक च केशव ॥२८ तब क्रोध स लाल नत्र वाल बलरामजी न जुमा खेलन के पासो से ही रुक्मी का वध कर दिया ॥२३॥ फिर दांता का दिखाकर बलरामजी की हसी उडान वाले कलिंगराज को पकड कर उन्होन उसक दांत तोड डाले ॥२४॥ इनके अतिरिक्त उत्तरे पक्ष के जो भी राजा थे, वे सब एक सोने के स्तन को उसाद कर, उसस मार दिय ।।२।। हज | बलरामजी को क्रोधित हुए पञ्चम अा-प्र० २६ } [ ૨૭e दयवर उम समय हा-हाकार मच गया और सभी रोजागरण डर १ मार वहाँ से भाग गये ।।२६॥ है मैत्रेयजी ! मी का वध हुमा दबार श्रीकृष्ण न बलरामजी और रुक्मिणीजी दानो क ही डर के कारण मौन धारण कर लिया ॥२७॥ फिर ह द्विजोत्तम । फिर श्रीकृष्ण पत्नी युक्त अनिन्द्ध या माय लपर सम्पूर्ण यादवार सहित द्वारका मे लौट आय ॥२८॥ उसन्नॉ अध्याय द्वारवत्या स्थिते कृष्णे शक्रस्त्रिभुवनेश्वर माजगामाथ मैच मतं रावतपृष्ठग ॥१ श्य द्वारका सोऽथ समेत्य हरिणा तन । कथयामास दैत्यस्य नरवस्य विचेष्टितम् ॥२ त्वया नायेन देवाना मनुष्यवऽपि तिष्ठना। प्रशम सर्वदु यानि नीतानि मधुसूदन ॥३ तपस्यियमनार्थाय सारितो धनुषस्तथा । प्रत्तो यस्तथा देशी त सर्वे निहतान्त्वया ॥४ पग पुवनयापीड. पूतना बालघातिनी । नाम नीनाम्त्वया सर्ने यऽन्ये जगदुपद्ररा ॥५ सुष्मदादण्डसम्भूतिपरित्रात जगत्यय । यचयनागमम्प्राप्त्या तृषि यान्ति रिसोयरा ॥ माह गाम्मामायामा यनिमित्त जनादन । तर त्या तत्प्रतीचारप्रयन्न महाम।।

२८० ] श्रीविष्णु पुराए है ॥३॥ अरिष्ट, धेनुक, देशी ग्रादि जो दैत्य सदा तपस्वियो को सताया करते थे, उन सबका अापने वध कर दिया ॥४॥ कस, कुवलयापीड और बालघातिनी पूतना अथवा अन्य सभी उपद्रवियो को आपने मार दाला ॥५॥ प्रापके भुज- दण्ड के प्राश्रय में तीनो लोकों के सुरक्षित होने के कारण यज्ञ भागो को प्राप्त करते हुए सब देवताप्रो को अब तृप्ति-लाभ हो रहा है ॥६॥ हे जनार्दन । प्रव मैं जिस कारण से यहां आया हूँ, उसे श्रवण कर उसके निवारण का उपाय करिये ॥७॥ करोति सर्वभूतानामुपघातमरिन्दम ।। देवसिद्धासुरादीना नृपाणा च जनार्दन हृत्वा तु सोऽसुर कन्या ररुधे निजमन्दिरे 1E छन यत्सलिलनावि तहार प्रचेतस । मन्दरस्य तथा शृङ्ग हृतवान्मणिपर्वतम् ।।१० अमृतस्राविणी दिध्ये मन्मातु कृष्ण कुण्डले । जहार सोऽमुरोऽदित्या वाञ्छत्यरावत गजम् ॥११ दुर्भातमेतद्गोविन्द मया तस्य निवेदितम् । यदन प्रतिकर्तव्य तत्स्वय परिमृश्यताम् ।।१२ इति थु त्वा स्मित कृत्वा भगवान्देवकीसुत । गृहीत्वा वासव हस्ते समुत्तस्थौ वगसनाद ।।१३ सञ्चिन्त्यागतमारुह्य गरुड गगनेचरम् । सत्यभामा समारोप्य ययौ प्राग्ज्योतिप पुरम् ॥१४ हे शत्रुनो के नाशक । पृथिवी-पुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिपुर का अधीश्वर है । वह सभी प्राणियो को नष्ट करने में लगा हुआ है ।।८॥ ह जनार्दन । उसने देवता, सिद्ध, असुर और राजा आदि की पुत्रियो का बलपूर्वक अपहरण किया और उन्हें अपने मन्त पुर में रख लिया है ।।९।। उसने वरण का जन-वर्ष छन तथा मन्दराचल का मणि पवंत नायक शृङ्ग भी छीन लिया है ॥१०॥ हे कृष्ण ! उसने मेरी माता अदिति के कुण्डल भी बलपूर्वक ले लिये हैं और अब इस ऐरावत को भी छीन लेने की इच्छा करता है ॥११॥ हे गोविन्द । उसकी पञ्चम अश अ०-२० ] [ २८१ सभी दुर्नीतियो का मैंने आपसे वणन कर दिया है, अब उसके प्रतिकार का उपाय प्राप स्वय ही सोच ले ॥१२॥ इन्द्र की बात सुनकर भगवान् कुछ मुस- कराये और इन्द्र का हाथ पकडते हुए प्रासन से उठ खडे हुए ॥१३॥ फिर उन्होंने गरुड का स्मरण किया और उसके उपस्थित होते ही सत्यभामा सहित उस पर प्रारूढ होकर प्राग्ज्योतिपपुर के लिये चल दिये ॥१४॥ आरुह्य रावत नाग शक्रोऽपि निदिव ययौ । ततो जगाम कृष्णश्च पश्यता द्वारकौकसाम् ॥१५ प्राग्ज्योतिपपुरस्यापि समन्ताच्छतयोजनम् । आचिता मौरव पाशै क्षुरान्तभूद्विजोत्तम ॥१६ ताश्चिच्छेद हरि पाशान्क्षिप्त्वा चक्र सुदर्शनम् । ततो मुरस्समुत्तस्थौ त जघान च केशव ॥१७ मुरस्य तनयान्सप्त सहस्रास्तास्ततो हरि । चनधाराग्नि निर्दग्धाश्चकार शलभानिव ॥१८ हत्वा मुर हयग्रीव तथा पञ्चजन द्विज । प्राग्ज्योतिपपुर धीमास्त्वरावान्समुपाद्रवत् ।।१६ नरकेरणास्य तनाभून्महासन्येन सयुगम् । कृष्णस्य यत्र गोविन्दो जने दैत्यान्सहस्रश ॥२० क्षिप्त्वा चक्र द्विधा चक्र चक्री दैतेयचनहा ।।२१- हते तु नरके भूमिगृहीत्वादितिकुण्डले । उपतस्थे जगन्नाथ वाक्य चेदमथाब्रवीत् ।।२२ सब द्वारकावासियो के देखते-देखते इघर श्रीकृष्ण चल दिये, उधर इन्द्र भी अपने ऐरावत पर चढकर स्वर्गलोक यो चले गये ॥१५॥ हे द्विजथेष्ठ । प्राग्ज्योतिपपुर के चारों मोर सौ पोजन तक की भूमि मुरदैत्य निर्मित छुरा को धार के समान अत्यन्त तीक्ष्ण पाशो के द्वारा घिरी हुई थी ॥१६॥ उन पाशो को श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र के द्वारा काट डाला तो मुरदैत्य उनसे लडने के लिये सामने माया तभी उहोंने उसका वध कर डाला ॥१७॥ फिर उन्होंने पुर के सात सहस्र पुयो को अपने चक्र की धार रूप जाला मे पतग के समान २८२ ] [ श्रीविष्णु पुगण । जला दिया ॥१८॥ इस प्राार महामेयायो यो मुर, हयग्रीव मौर पन्चजन मादि दैत्यों का सहार कर प्रायोतिपुर में प्रविष्ट हुए ॥१६॥ यही उन्होने अत्यन्त विशाल सेना पाले नरयागुर से युद्ध पिया, जिसमें उसके हजारो दैत्य मारे गये पे ॥२०॥ दस्पदल-दलन, चक्रधारी भगवान श्रीहरि ने शस्त्रास्त्री को वर्षा करते हुए पृथियोमुर नरकासुर के अपने मुदर्शन चक्र से दो सएड पर डाले ॥२१॥ उसके मरते ही पदिति के कुएडलो को हाथ में लिप हुए पृथिवी मूर्ति मान रूप से उपस्थित हुई पौर श्रीप्ण के प्रति बोली ॥२२॥ यदाहमुघृता नाय त्वया सूकरमूर्तिना। 'स्वस्पर्शसम्भवः पुरस्तदायं मय्यजायत ॥२३ सोऽयं त्वयंव दतो मे त्वयैव विनिपातितः। गृहाप कुण्डले चेमे पालयास्य च सन्ततिम् ।।२४ भारावतरणार्थाय ममंव भगवानिमम् । प्रशेन लोकमायातः प्रसादसुसुखः प्रभो ।।२५ त्व कर्ता च विकर्ता च संहर्ता प्रभवोऽप्ययः । जगता व जगद् प स्तूयतेऽच्युत किं तप ॥२६ व्याप्तियाप्य क्रिया का कार्य च भगवन्यथा। सर्वभूतात्मभूतस्य स्तूयते.तव किं तथा ॥२७ परमात्मा च भूतात्मा त्वमात्मा चाव्ययो भवान् । यथा तथा स्तुति थ किमर्थं ते प्रवर्तते ॥२८ प्रसीद सर्वभूतात्मन्नरकेण तु यत्कृतम् । तत्क्षम्यतामदोपाय त्वत्सुतस्त्वनिपातित. ॥२६ पृथिवी ने कहा-हे नाथ ! जब वराह रूप मे अवतीर्ण हो कर मापने मुझे निकाला था. तब मापके ही स्पर्श मेरे इस पुत्र को उत्पत्ति हुई थी ॥२३ इस प्रकार आपके द्वारा दिये हुए पुत्र को आपने स्वयं ही मार दिया, अब आप इन कुण्डलो को ग्रहण करिये तथा इसकी सन्तति की रक्षा करिये ॥२४॥ है प्रभो! आपने मुझे प्रसन्न हो कर मेरा बोझ उतारने के लिये अपने प्रश से भवतार ग्रहण किया है [२शा हे अच्युत! आप ही इस विश्व के कर्ता, PZA पञ्चम प्रश-म०१८ ] [२८३ स्थितिकर्ता तथा हर्ता हैं, आप जगद्रूप ही इसको उत्पत्ति लय के स्थल हैं, फिर मैं आपके किस वृत्तान्त को लेकर स्तुति करूं ॥२६॥ हे प्रभो । पाप ही व्याप्ति व्याप्त, क्रिया, कर्ता, कार्यरूप एवं सब के आत्म स्वरूप हैं तब किस वस्तु के द्वारा आपकी स्तुति की जाय ॥२७॥ पाप ही परमात्मा, भूतात्मा तथा प्रवि नाशी जीवात्मा है, तब किरा वस्तु के लिये प्रापकी स्तुति की जा सकती है ? ॥२८॥ हे सर्व भूतात्मन् । पाप प्रसन्न होकर नरकासुर के सब अपराधो को क्षमा कर दीजिये, आपने अपने इस पुत्र का वध उसे दोपो से मुक्त करने के लिये ही किया है ॥२६॥ तथेति चोक्त्वा धरणी भगवान्भूतभावन । रत्नानि नरकावासाञ्जग्राह मुनिसत्तम ।।३० यापुरे स कन्याना शोडपातुल विक्रम । शताधिकानि ददृशे सहस्राणि महामुने ।।३१ चतुर्दष्ट्रान्गजाश्चार्यान् पट्सहस्राश्च दृष्टवान् । काम्बोजाना तथाश्वाना नियुतान्येकविंशतिम् ।।३२ ता कन्यास्तास्तथा नागास्तानश्वान द्वारका पुरीम् । प्रापयामास गोविन्दस्सद्यो नरककिकरैः ॥३३ ददृशे वारुण छत्र तथैव मणिपर्वतम् । आरोपयामास हरिर्गरुडे पतगेश्वरे ।।३४ आरुह्य च स्वय कृष्णस्सत्यभामासहायवान् । अदित्या कुण्डले दातु जगाम विदशालयम् ।।३५ श्री पराशरजी ने कहा-हे मुनिसत्तम । इस प्रकार भूत भावन भगवान् श्रीकृष्ण ने 'ऐसा ही हो' कह कर नरकासुर के घर से अनेक प्रकार के रत्न ग्रहण किये ॥३०॥ हे महामुने । अत्यन्त बली भगवान ने नरकासुर की कन्याओ के मन्त पुर मे जाकर सोलह हजार कन्यानो को देखा ॥३१।। वही चार दान वाले 2 हजार हाथी और इक्कीस लाख कम्बोजो जाति के घोडे देखे ॥३२॥ उन सब कन्याओ, हाथियो और घोडो को उन्होंने नरकासुर के भृत्यो के द्वारा द्वारवापुरी पहुंचवा दिया ॥३३॥ फिर उन्होंने वरुण के छत्र और मणि पर्वत २०४] । श्रीविषणु पुगण पो योग पर उठा मिा मोर पशिगत गटी पीट पर दो मादा ॥२४॥ सपा सायमामा हित स्वयं भी पार पर पास्त हो पर प्रसिनि यो उसने मुएटन देने में सिंगे गंभीर मो गये ॥३॥ तीनां अध्याय गरडो यारण पर तय मणिपर्वतम् । समायं पहुपोये ग लीलयंव यहन्ययो॥१ ततरगतमुपाध्मामीत्स्यगंद्वारगतो हरि। उपतस्थुम्तपा देवास्साघ्यहस्ता जनार्दनम् ॥र स देवरचितः गणो देवमातुनिवेशनम् । सितानशिसरापार प्रविश्य ददशेऽदितिम् ॥३ स ता प्रणम्य पाकरण सह ते कुण्डलोत्तमे। ददौ नरवनाश च शशसास्य जनार्दनः ।।४ तत प्रीता जगन्माता पातार जगता हरिम् । तुष्टावादितिरव्यग्रा मृत्वा तत्प्रवरण मन ॥५ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयकर । सनातनात्मन् सर्वात्मन् भूतात्मन् भूतभावन ॥६ प्रणेतर्मनसो बुद्ध रिन्द्रियाणा गुणात्मक । त्रिगुणातीत निर्द्वन्द्व शुद्धसत्व हुदि स्थित ॥७ श्री परागारजी ने पहा-चरण के छर, मरिश पर्वत सत्यभामा मोर श्रीरण वो लोला पूर्वक धारण किये हुए ही पक्षिराज गरट स्वर्ग के लिये चले ॥१॥ स्वर्ग द्वार के पाते ही श्रीकृष्ण ने अपना शस बनाया, जिसकी ध्वनि सुनते ही देवगण मध्यं सहित उनके समक्ष उपस्थित हुए सा देवतामो द्वारा पूजन को प्राप्त हुए श्रीकृष्ण ने देवमाता अदिति के शुभ्र मेघ शिखर जैसे भवन मे पहुच कर उन्हें देखा ||३|| फिर इन्द्र के सहित श्रीकृष्ण ने उन्हे प्रणाम किया और नरकासुर के मारने का पूर्ण वृत्तान्त सुनाकर उन्हे उनके दुरडल पञ्चम अंश--प्र० ३. ] [ २८५ अस्ति विये ॥४॥ फिर जगन्माता अदिति ते अत्यन्त आनन्दित हो कर विश्व स्रष्टा भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की ॥५॥ अदिति ने कहा-हे पुण्डरीकाक्ष ! हे भक्त भयहारी सनातन स्वरूप ! हे भूतात्मन् । हे भूतभावन आपको नमस्कार है ॥६॥ हे मन, बुद्धि और इन्द्रियो के रचने वाले गुण रूप एवं गुरगातीत ! हे द्वन्द्व-रहित, शुद्ध सत्व एव अन्तर्यामिन् | आपको प्रणाम है ॥७॥ सितदीर्घादिनिश्शेषवल्पनापरिवजित । जन्मादिभिरसंस्पृष्ट स्वप्नादिपरिवजित ।।८ सन्ध्या रात्रिरहो भूतिर्गगन वायुरम्बु च । हुताशनो मनो बुद्धिर्भूतादिस्त्वं तथाच्युत ।। सर्गस्थितिविनाशानां कर्ता क्र्तृपतिर्भवान् । ब्रह्मविष्णुशिवाख्याभिरात्ममूर्तिभिरीश्वर ॥१० देवा दैत्यास्तथा यक्षा राक्षसास्सिद्धपन्नगाः । कूष्माण्डाश्च पिशाचाश्च गन्धर्वा मनुजास्तथा ॥१ पशवश्च मृगाश्चैव पतङ्गाश्च सरीसृपा. । वृक्षगुल्मलता बह्वयः समस्तास्तृगजातयः ।।१२ स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्मास्सूक्ष्मात्सूक्ष्मतराश्च ये । देहभेदा भवान् सर्वे ये केचित्पुर्गलाश्रयाः ॥१३ माया तवेयमज्ञातपरमार्थातिमोहिनी । अनात्मन्यात्मविज्ञान यया मूढो निरुद्धधते ॥१४ हे नाथ ! आप श्वेतादि गर्ग, दीर्घादि मान तथा जन्मादि विकागे से दूर हैं । स्वप्नादि तीन अवस्थाएँ भी पाप मे नहीं हैं, ऐसे प्रापको नमस्कार है ||८॥ हे अच्युत | सायं, रात्रि, दिवस, पृथिवी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, मन, बुद्धि और अहकार-सब कुछ प्राप ही तो हैं हे ईश्वर ! पाप, ब्रह्मा, विष्णु और शंकर नामक पने तीन रूप से ससार को सृष्टि, स्थिति, और संहार करते हैं । पाप ही कर्तामो के कर्ता हैं ॥१०॥ देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, नाग, यूप्माण्ड, पिशाच गन्धर्व, मनुष्य, पशु, मृग, पतंग, सरीसृप वृक्ष, गुल्म, लता, सम्पूर्ण प्रकार के तृण और स्थूल, मध्यम,सूक्ष्म तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म जितने भी देह के भेद परमाणु के प्राश्रय मे हैं, वे सभी पाप है ॥११ ।

२८६ ] [ श्रीविष्णु पुराए -१३।। आपकी ही माया परमार्यतत्व से अनभिज्ञ पुरुषों को मोहित करती है, जिसके कारण अज्ञानी मनुष्य अनात्म को प्रात्म समझ कर बन्धन मे पड़ते हैं ॥१४॥ अस्वे स्वमिति भावोऽत्र यत्पुसामुपजायते । अहं ममेति भावो यत्प्रायेणेवाभिजायते । संसारमातुर्मायायास्तवतन्नाथ चेष्टितम् ॥१५ यः स्वधर्मपरंथि नरंराराधितो भवान् । ते तरन्त्यखिलामेतां मायामात्मविमुक्तये ॥१६ ब्रह्माद्यास्सकला देवा मनुष्याः पशवस्तथा। विष्णुमायामहावर्तमोहान्घतमसावृताः ॥१७ आराध्य त्वामभीप्सन्ते कामानात्मभवक्षयम् । यदेते पुरुपा माया संवेयं भगवंस्तव ।।१८ मया त्व पुत्रकामिन्या वरिपक्षजयाय च । आराधितो न मोक्षाय मायाविलसितं हि तत् ।।१४ कौपीनाच्छादनमाया वाञ्छा कल्पद्रुमादपि । जायते यदपुण्यानां सोऽपराध, स्वदोषजः ॥२० तत्प्रसीदाखिलजगन्मायामोहकराव्यय । अज्ञान ज्ञानसद्भावभूतं भूतेश नाशय ।।२१ हे प्रभो ! मनात्मा मे प्रात्मा और ममता के भाव की जो उत्पत्ति हो नाती है, वह सब आपकी माया का ही प्रभाव है ॥१५॥ हे नाय ! जो मनुष्य अपने धर्म का प्राचरण करते हुए आपकी उपासना में रत रहते हैं, वे अपनी मुक्ति के लिये सब माया को लांघ जाते है ॥१६॥ ब्रह्मादि सब देवता, मनुष्य तथा पशु आदि सब विष्णु माया रूपी महान गढ़े में पड़कर मोह रूपी अन्धकार से ढक जाते हैं 100 हे प्रभो! पाप भव-बन्धन के काटने वाले की आराधना करके भी जो पुरुष विभिन्न प्रकार के भोग ही मांगते हैं, वह सब पापको माया का ही प्रभाव है रा मैंने भी शत्रुभो को हराने के लिये पुगो को विजय- कामना करते हुए ही आपका पारावा किया था, मोक्ष के लिये नहीं किया पञ्चम अंश-म ३० ] २८७ यह भी प्रापकी गाया का ही प्रभाव था ॥१६॥ कल्पवृक्ष से भी जो पुण्य-विहीन पुरुष वस्त्रादि को ही याचना करते हैं तो उनका यह दोप कर्म से ही उत्तम हुआ है ।।२०।। हे सम्पूर्ण विश्व में माया-मोह के उत्पन्न करने वाले प्रभो ! प्राप प्रसन्न हूजिये । हे भूतेश्वर ! मेरे ज्ञान के अभिमान से उत्पन्न हुए प्रशान पो माप नष्ट कर डालिये ॥२॥ नमस्ते चक्रहस्ताय शाङ्गहस्ताय ते नमः । गदाहस्ताय ते विष्णो शह्वहस्ताय ते नमः ॥२२ एतत्पश्यामि ते रूप स्थूलचिह्नोपलक्षितम् । न जानामि पर यत्ते प्रसीद परमेश्वर ॥२३ अदित्यवं स्तुतो विष्णुः प्रहस्याह सुरारणिम् । माता देवि त्वमस्माक प्रसीद वरदा भव ।।२४ एवमस्तु यथेच्छा ते त्वमशेपंससुरासुरे । अजेयः पुरुषव्याघ्र मर्त्यलोके भविष्यसि ॥२५ तत कृष्णस्य पत्नी च शक्रपत्न्या सहादितिम् । सत्यभामा प्रणम्याह प्रसीदेति पुन: पुन. ॥२६ मत्प्रसादान्न ते सुभ्र जरा वरूप्यमेव वा । भविष्यत्यनवद्याङ्गि सुस्थिर नवयौवनम् ॥२७ अदित्या तु कृतानुज्ञो देवराजो जनार्दनम् । यथावत्पूजयामास बहुमानपुरस्सरम् ॥२८ हे चक्रपाणे । हे शाङ्ग धनुपधारी आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे गदा और शख धारण करने वाले विष्णो ' प्रापको बारम्बार नमस्कार हैं ॥२२॥ मैं आपके स्थूल चिह्नो के आरोप वाले इसी रूप को देख रही हूँ, आपके उस यथार्थ पर स्वरूप को तो मैं जानती ही नहीं । हे परमेश्वर ! पाप मुझ पर प्रसन्न हो ।।२३।। श्री पराशरजी ने कहा-अदिति को इस प्रकार की स्तुति को सुनकर भगवान् विष्णु ने हंसते हुए देवजननी से कहा- हे देवि ! आप तो हमारी माता है, आप प्रसन्न होकर हमारे लिये वर देने वाली बनो ॥२४॥ अदिति ने पहा-हे पुरुष व्याघ्र ! ऐसा ही हो, तुम इच्छानुसार-फन प्राप्त २८८ ] [ श्रीविष्णु पुराण करो। मत्यंलोक में तुम सब देवताओं और दैत्यों से अजेय रहोगे ॥२५॥ श्री पराशरजी ने कहा-फिर इन्द्र की भार्या शची के सहित कृष्ण पत्नी सत्यभामा ने अदिति को बारम्बार प्रणाम किया और उनसे निवेदन किया कि आप हम पर प्रसन्न हों ।।२६।। हे सुभ्र ! मेरी कृपा से वृद्धावस्था या विरूपता तेरे निकट न आयेगी और तू सदा ही अनिन्दित अङ्ग वाली और स्थिर नवयौवन से सम्पन्न रहेगी ।।२७॥ श्री पराशरजी ने कहा-इसके पश्चात् अदिति की आज्ञा से देवराज इन्द्र ने श्रीकृष्ण का अत्यन्त मान के सहित पूजन किया ॥२८॥ शची च सत्यभामायै पारिजातस्य पुष्पकम् । न ददौ मानुपी मत्वा स्वयं पुष्पैरलङ्कृता ॥२६ ततो ददर्श कृष्णोऽपि सत्यभामासहायवान् । देवोद्यानानि हृद्यानि नन्दनादीनि सत्तम ॥३० ददर्श च सुगन्धाढ्य मञ्जरीपुञ्जधारिणम् । नित्याह्लादकर ताम्रवालपल्लवशोभितम् ।।३१ मथ्यमानेऽमृते जातं जातरूपोपमत्वचम् । पारिजातं जगन्नाथ: केशवः केशिसूदनः॥३२ तुतोप परमप्रीत्या तरुराजमनुत्तमम् । तं दृष्ट्वा प्राह गोविन्दं सत्यभामा द्विजोत्तम। कस्मान द्वारकामेष नीयते कृष्ण पादपः॥३२ यदि चेत्त्वद्वचः सत्यं त्वमत्यर्थं प्रियेति मे। मद्गेहनिप्कुटाय तदयं नीयतां तरुः ॥३४ न मे जाम्बवती तागभीष्टा न च रुक्मिणी । सत्ये यथा त्वमित्युक्त त्वया कृष्णासकृत्प्रियम् ॥३५ उस समय कल्पवृक्ष के पुष्पों से सुशोभिता इन्द्राणी ने सत्यभामा के मानुपी होने के कारण पारिजात-पुप नही दिये ॥२६॥ फिर सत्यभामा के सहित श्रीहष्ण ने देवताग्रो के नन्दन कानन आदि गुरम्य उपवनो को जाकर देखा ॥३०॥ केशी के मारने वाले भगवान श्रीपण ने यही पर मुगन्धित मंजरी पुस्ज से लदे हुए, नित्यानन्द करने वाले, तासर के बाल पोर पत्रों से सुशो• पञ्चम प्रश-प्र० ३०] [ २८६ - भित, स्वनिगम छाल से युक्त उस अमृत मंथन से उत्पन हुए पारिजात वृक्ष को देसा ॥३१-३२॥ हे द्विजोत्तम । उस सर्वश्रेष्ठ तरराज के दर्शन कर उसके प्रति अत्यन्त प्रीति करती हुई सत्यभामाजी अत्यन्त प्रसन्नता को प्राप्त हुई और भग- चान से कहने लगी हे प्रभो। इस तरराज को द्वारका क्यो नहीं ले चलते ? ॥३३॥ यदि आप अपने वचनानुमार मुझे अपनी अनन्यतम प्रियतमा मानते हैं तो इस वृक्षराज वो मेरे भवन के उद्यान में लगाने के लिये ले चलिये ॥३४॥ हे कृष्ण । हे नाय ! प्राप अनेक बार कह चुके हैं कि है सत्ये । मुझे तेरे ममान जाम्बती या रुक्मिणी पोई भी प्यारी नहीं है ॥३५॥ सत्य तद्यदि गोविन्द नोपचारकृत मम । तदस्तु पारिजातोऽय मम गेहविभूपणम् ॥३६ विभ्रती पारिजातस्य के शपक्षेण मञ्जरीम् । सपत्नीनामह मध्ये शोभेयमिति कामये ॥३७ इत्युक्तम्स प्रहस्यना पारिजात गरुत्मति । आरोपयामास हरिस्तमूचुर्वनरक्षिण |॥३८ भो शची देवराजस्य महिपी तत्परिग्रहम् । पारिजात न गोविन्द हर्तुमर्हसि पादपम् ॥३६ उत्पन्नो देवराजाय दत्तस्सोऽपि ददो पुन । महिष्य सुमहाभाग देव्यै शच्यं कुतूहालात् ।।४० शची विभूपणार्थाय देवरमृतमन्यने । उत्पादितोऽय न क्षेमी गृहीत्वन गमिष्यसि ।।४१ देवराजो मुसप्रेक्षी यस्यास्तस्या परिंग्रहम् । मौढचात्प्रार्थयसे क्षेमी गृहीत्वेन हि को व्रजेत् ।।४२ हे गोविन्द 1 यह आपका वह ववन सत्य पौर मेरे प्रति वहाना मान नहीं है, तो इस पारिजात को मेरे घर की शोभा बनाइये ॥३६॥ मैं चाहती हूँ कि अपने केशो मे इन पारिजात पुष्पो को गूथ कर अपनी अन्य सौतो मे अधिक शोभा सम्पन्न बन जाऊं ॥३७ श्री पराशरजी ने कहा-सत्यभामा के वचन सुनकर भगवान् श्रीहरि हँस पडे और उन्होंने उस पारिजात वृक्ष को उठाकर 1 २६० ] [ श्रीविष्णु पुराण गरुड की पीठ पर रख लिया। इस पर नन्दन कानन के रक्षको ने उनसे कहा- १३॥ हे गोविन्द ! यह पारिजात इन्द्राणोचो को निजी सम्पत्ति है, प्राय इसे न लीजिये ॥३९॥ जब यह क्षीर-नागर से उत्पन हुमा था, तब इसे देव- राज ने प्राप्त करके अपनी पत्नी को प्रदान कर दिया था ॥४०॥ शची को अलकृत करने के लिये अमृत मयन के ममय इसे देवतानो ने उत्पन्न किया था, इसलिये आप इसको कुशल पूर्वक नहीं ले जा सकते ॥४१॥ देवराज भी जिस शचि का मुख निहारते रहते हैं यह पारिजात उसी की सम्पत्ति है, जिसे ग्रहण परने का आपका विचार मूर्खता का ही है, भला इसका हरण करके कौन बचकर निकल सकता है ॥४२॥ अवश्यमस्य देवेन्द्रा निष्कृति कृष्ण यास्यति । वज्रोद्यतकर शम्मनुयास्यन्ति चामरा ॥४३ तदल सकलैवविग्रहेण तवाच्युत । विपाकरटु यत्कर्म तन्न शसन्ति पण्डिता ॥४४ इत्युक्त तैरुवाचतान् सत्यभामातिकोपिनी । का शची पारिजातस्य को वा शकस्सुराधिप ।।४५ सामान्यस्सर्वलोकस्य यद्य पोऽमृतमन्थने । समुत्पन्नस्तरुः कस्मादेको गृह्णाति वासव ॥४६ यथा सुरा यथैवेन्दुर्यथा श्रीर्वमरक्षिण । सामान्यस्सर्वलोकस्य पारिजातस्तथा द्रुम ॥४७ भर्तृ बाहुमहाग पद्धय नमथो शची। तत्थ्यतामल क्षान्त्या सत्या हारयति द्रु मम् ॥४८ क्थ्यता च द्रुत गत्वा पोलौम्या वचन मम । सत्यभामा वदत्येतदिति गर्वोद्धताक्षरम् ॥४६ यदि त्व दयिता भतुर्यदि वश्य पतिस्तव । मद्भर्तु हरतो वृक्ष तत्कारय निवारणम् ॥५० जानामि ते पति शक्र जानामि निदशेश्वरम् । पारिजात तथाप्येन मानुषी हारयामि ते ॥५१ पश्चम अक-०३० । [ २६१ हे कृष्ण ! इसकी रक्षा के लिये देवराज वन ग्रहण करके अवश्य पायेंगे तथा अन्य सभी देवगण उनकी सहायता करेगे ॥४३॥ इसलिये, हे अच्युत ! सब देवताग्रो से शत्रुता करना उचित नहीं है, क्योकि पण्डितजन कटु परिणाम वाले कार्य का निषेध करते हैं ॥४४।। श्री पराशरजी ने कहा-उनके इस प्रकार कहने पर सत्यभामा कोधित होगई और कहने लगी-इस पारिजात के सुरपति इन्द्र और राची ही कौन हैं ? ।।४५।। यदि अमृत मयन के समय इसकी उत्पत्ति हुई है तो इस पर सब लोको का समान रूप से अधिकार है तब अकेले इन्द्र ही इसे कैसे ग्रहण कर सकते है ? ॥४६॥ हे वन रक्षको ! जैसे मदिरा, चन्द्रमा और लक्ष्मी का सभी समान रूप से उपभोग करते है, वैसे ही यह पारिजात भी सभी के लिये उपभोग्य है ॥४७॥ यदि अपने पति के भुजबल के घोर गर्व मे भर कर शची ने इस पर एकाधिकार कर लिया है, तो उसे घताना कि तुम क्षमा के योग्य नहीं हो, इसलिये सत्यभामा उस वृक्ष को ले गई है ॥४८॥ तुम शीघ्रता पूर्वक शची के पास जाकर यह कह दो कि सत्यभामा ने अत्यन्त गर्व पूर्वक कहा है कि यदि तुम्हारे पति तुम्हे अत्यन्त प्रेम करते हैं और तुम्हारे वश में है तो मेरे पति को पारिजात ले जाने से रोके ।।४६-५०।। मैं तुम्हारे पति को जानती हूं कि वे देवताग्रो के अधीश्वर हैं, फिर भी मैं मानुपी होकर तुम्हारे पारिजात को लिये जाती हूं ॥५१॥ इत्युक्ता रक्षिरणो गत्वा शच्याः प्रोचुर्यथोदितम् । श्रुत्वा चोत्साहयामास शची शकसुराधिपम् ॥५२ ततस्समस्तदेवाना सैन्यः परिवृतो हरिम् । प्रययो पारिजातार्थ मिन्द्रो योधुद्विजोत्तम ।।५३ ततः परिघनिस्त्रिशगदाशूलवरायुधाः । बभूवुस्विदशास्सज्जा: शके वनकरे स्थिते ।।५४ ततो निरीक्ष्य गोविन्दो नागराजोपरि स्थितम् । शक्र देवपरीवारं युद्धाय समुपस्थितम् ।।५५ चकार शब निर्घोप दिशश्शब्देन पूरयन् । मुमोच शरसङ्घातान्सहस्रायुतशश्शितान् ।।५६

२६२ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
ततो दिशो नभश्च व दृष्ट्वा शरशतै श्वितम् ।
मुमुचुस्त्रिदशास्सर्वे शस्त्रशस्नाण्यनेकशः ॥५७
श्री पराशरजी ने कहा-~-सत्यभामा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर
मालियो ने सब वृत्तान्त शची के पास जाकर मव वृत्तान्त यथावत् सुना दिया,
जिसे सुनते ही शची ने सुरपति को वृक्ष की रक्षा के लिये उत्साहित किया
॥५२॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! फिर सब देवताप्रो की सेना को माथ लेकर सुरराज इन्द्र
पारिजात को रोकने के लिये श्रीकृष्ण युद्ध करने के लिये गये ॥५३॥ जैसे
ही इन्द्र ने वन ग्रहण किया, वैसे ही सब देवता परिष, निस्त्रिंश, गदा और
शूलादि श्रेष्ठ आयुधो मे सज कर तैयार होगये ॥६४ । फिर देवसेना सहित इन्द्र
को युद्ध के लिये आया हुआ देखकर गरुडगामी गोविन्द ने अपनी शख-ध्वनि से
सब दिशामो को प्रतिध्वनित करके हजारो-लाखो तीक्ष्ण बाणो को वर्षा की
॥५५-५६।। इस प्रकार सब दिशामो पोर प्रकाश को बाणो से पाच्छादित
देवकर देवताओं ने भी भनेको शस्त्रास्त्रो का प्रयोग किया ॥५७।।
एकेकमस्त्र शस्त्रं च देवमुक्त सहस्रशः ।
चिच्छेद लीलयैवेशो जगता मधुसूदन. १५८
पाश सलिलराजस्य समाकृष्योरगाशन. ।
चकार खण्डशश्वञ्च्वा वालपन्नगदेहवत् ॥५६
यमेन प्रहित दण्ड गदाविक्षेपखण्डितम् ।
पृथिव्यां पातयामास भगवान् देवकीसुतः ।।६०
शिविका च धनेशस्य चक्रेण तिलशो विभुः ।
चकार शोरिरकं च दृष्टिदृप्टहतोजसाम् ।।६१
नीतोऽग्निश्शीतता बागीविता वसवो दिशः ।
चक्रविच्छिन्नमूलाग्रा रुद्रा भुवि निपातिताः ॥६२
साध्या विश्वेऽथ मरुतो गन्धवश्चिव सायकः ।
शाङ्गिणा प्रेरितरस्ता व्योम्नि शाल्मलिनुलवत् ।।६३
गरत्मानपि तुण्डेन पक्षाम्या च नखाइकुरैः ।
भक्षयस्ताडयन् देवान् दारयंश्च चचार वै ॥६४

पश्चम अश-प्र०३० ] { २६३ जगदीश्वर श्रीकृष्ण ने लीला पूर्वक ही देवताप्रो के प्रत्येक शस्त्रास्त्र के हजारो खण्ड कर डाले ।।५८॥ सर्पो का आहार करने वाले गरुड ने जलराज वरुण के पाश को सर्प के बालक के समान अपनी चोच से चवाकर अनेक टुकडो में विभक्त कर दिया ||५६|| भगवान् श्रीकृष्ण ने यम द्वारा प्रेरित दण्ड को अपनी गदा से टुक-ट्रक कर पृथिवी पर गिरा दिया ॥६०॥ कुवेर के विमान का चूर्ण कर दिया और अपनी तेजोमयी दृष्टि से देखकर ही तेज-हीन कर दिया ॥६१॥ बाण-वर्षा द्वारा अग्नि को शीतल कर वसुओ को सव दिशाम्रो मे भगा दिया और निशूलो की नोक को अपने चक्र से काट डाला और द्रो को भूमि पर गिरा दिया ॥६२।। उनके द्वारा प्रेरित किये गये बाणो रो साध्यगण, विश्वेदेवा, मरुद्गण और सभी गन्धर्व सेमल की रई के समान उडते हुए, व्योम में ही विलीन होगये ॥६३॥ उम समय गरुड भी अपनी चोच, पस और पंजो के द्वारा देवतापो का भक्षण करते, विदीर्ण परते और मारते हुए विचर रहे थे ॥६४॥ ततश्शरसहस्रण देवेन्द्रमधुसूदनौ । परस्पर ववति धाराभिरिव तोयदी ॥६५ ऐरावतेन गरुडो युयुधे तत्र सडकुले । देवस्समस्तंयुयुधे शक्रेण च जनार्दन ॥६६ भिन्नेप्वशेषवाणेपु शस्त्रेप्वस्त्रेषु च त्वरन् । जग्राह वासको वच कृष्णश्चक सुदर्शनम् ॥६७ ततो हाहाकृत सर्व लोक्य द्विजसनम । वनचक्करी दृष्ट्वा देवराजजनार्दनौ ॥६८ क्षिप्त वचमयेन्द्रेण जग्राह भगवान्हरिः। न मुमोच तदा चक्र शक तिप्ठेति चायवीत् ॥६६ फिर से दो बादलो से जल की वर्षा हो रही हो, वैसे ही श्रीकृष्णा पौर इन्द्र परम्पर बाण-वर्षा कर रहे थे।॥६५॥ उग गमय गाड-ऐरावत भित हो रही पी सया श्रीकृष्ण देवताओ पोर इन्द्र से भिट रहे थे ।।६।। सभी पाणी के समाप्त होने और रास्त्रास्त्री के पिन-भिन्न होजाने पर इतने २६४ [ श्रीविष्णु पुराण वज और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र ग्रहण किया ।।६७॥ हे द्विजसत्तम । उस समय इद्र को वज और कृष्ण को सुदर्शन चक्र लेकर युद्ध करते देख कर तीनो लोको मे हाहाकार मच गया ॥६८॥ श्रीकृष्ण ने इन्द्र द्वारा प्रेरित वन को पकड लिया और अपने चक्र को हाथ मे ग्रहण किये हुए ही इन्द्र से ललकार कर कहा-'ठहर तो सही ॥६॥ प्रष्टवज देवेन्द्र गरुडक्षतवाहनम् । सत्यभामाब्रवीद्वीर पलायनपरायणम् 11७० लोक्येश न ते युक्त शचीभतुं पलायनम् । पारिजातस्रगाभागा त्वामुपस्थास्यते शची ॥७१ कीदृश देवराज्य ते पारिजातस्रगुज्ज्वलाम् । अपश्यतो यथापूर्व प्रणयाम्यागता शचीम् ।।७२ अल शक्र प्रयासेन न व्रीडा गन्तुमर्हसि । नीयता पारिजातोऽय देवास्सन्तु गतव्यथा ॥७३ पतिगविलेपेन बहुमानपुरस्सग्म् । न ददर्श गृह यातामुपचारेण मा शची ॥७४ स्त्रीत्वादगुरुचित्ताह स्वभश्लाघनापरा । तत कृतवती शक भवता सह विग्रहम् ।।७५ तदल पारिजातेन परस्वेन हृतेन मे। रूपेण गविता सा तु भर्ना का स्त्री न गविता ॥७६ इस प्रकार वन छिन जाने और ऐरावत का गरड के प्रहारो से बुरी तरह पाहत होन के कारण इन्द्र भागने लगा, तब सत्यभामा ने उससे कहा- हे प्रैलोक्येश ' तुम दाचीपरि को इस प्रकार युद्ध से नही भागना चाहिये। क्योधि पारिजात वै पुप्पो से अलकृत हुई शची प्रव शीघ्र ही तुम्हारे पास उपस्थित होगी ॥७०-७१।। हे इन्द्र | जब पारिजात पुप्पो से शून्य शची तुम्हारे पास प्रेमवश उपस्थित होगी, तब उसे उस प्रकार देख पर तुम्हें क्या प्रानन्द मिलेगा? ॥७२॥ हे इन्द्र । अव अपिर प्रयास मत परो, निसयोच इम पारिजात को लेजामो, क्योकि इसे पाने पर ही देवतानो की व्यथा दूर होगी पञ्चम प्रश-ग्र० ३० ] [ २६५ ॥७३॥ अपने पति के भुजबल से गर्विता हुई शची ने मुझे अपने घर पर आई हुई देख कर भी मेरा कुछ विशेष सम्मान नहीं दिया था ॥७४।। मैं भी स्त्री होने के कारण अधिक गभीर चित्त वाली नहीं हूं, इसलिये अपने पति वा गौरव दिखाने के लिये ही मैंने यह युद्ध कराया था ॥७५।। मुझे इस पारिजात रूप पराई पम्पत्ति को ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है । जैसे शची को अपने रूप और पति का गर्व है, वैसे ही अन्य स्त्री भी क्यो न होगा? ॥७६।। इत्युक्तो वै निववृते देवगजस्तया द्विज । प्राह चैनामल चण्डि सख्यु खेदोक्तिविस्तरै । ७७ न चापि सर्गसहारस्थितिकर्ताखिलस्य य । जितस्य तेन मे ब्रीडा जायते विश्वरूपिणा ॥७८ यस्माञ्जगत्सकलमेतदनादिमध्या- द्यस्मिन्यतश्च न भविष्यति सर्वभूतात् । तेनेद्भवप्रलयपालनकारणेन व्रीडा कथ भवति देवि निराकृतस्य ॥७६ सकलभुवनसूतिमूतिरल्पाल्पसूक्ष्मा विदतसकलवेदीयते यस्य नान्य । तमजमकृतमीश शाश्वत स्वेच्छयन जगदुपकृतिमयं को विजेतु समर्थ ॥८० श्री पराशरजी ने कहा-हे द्विज । इस प्रकार कहे जाने पर देवराज इन्द्र लोट पाये मोर कहने लगे-मैं तो तुम्हारा मुहृद ही हूँ, मेरे प्रति इस प्रकार की सेदोक्तियो के विस्तार से क्या लाभ है ? ॥७७॥ सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति, स्थिति मौर सहारषर्ता तथा विश्वरूप परमात्मा से हारे जाने में सकोच या कोई कारण नरी है ॥७॥ हे देवि ! जिन मादि-मध्य से रहित भगवान् से यह विश्व उत्पन्न होकर उन्ही के द्वारा स्थित होता और अन्त में विलीन होजाता है, ऐसे उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के धारण रूप ईश्वर से पराजित होने में सोच कसा ॥७९॥ जिनको सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करने वासी मत्प से भी अल और मूक्ष्म मूर्ति को रस वेदो में जाता भी नहीं जान

२६६ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
सयते तथा जिन्होंने स्वेच्छा पूर्वक सोपा पल्याण में लिये मयंलोर में अवतार
लिया है, उन जन्म-रहित, पग रहिन मोर निराप स्वम्प परमेश्वर को पराजित
पाने का सामयं विराम होगा? 1000
इकतीसवाँ अध्याय
सस्तुतो भगवानित्यं देवराजेन केशव. ।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवागेन्द्र द्विजोत्तम ॥१
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मयां जगत्पते ।
क्षन्तव्यं भवतवेदमपराध त मम ॥२
पारिजाततरचायं नीयतामुचितास्पदम् ।
गृहीतोऽय मया शक सत्यावचनकारणात् ॥३
वन चेद गृहाण त्व यदन प्रहितं त्वया ।
तवैवैतत्प्रहरणं शक वैरिविदारणम् ॥४
विमोहयसि मामीश मोऽहमिति किं वदन् ।
जानीमस्त्वां भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम् ।।५
योऽसि सोऽसि जगत्लारणप्रवृत्तौ नाथ संस्थित्तः ।
जगतश्शल्यनिष्कर्ष करोप्यसुरसूदन ॥६
नीयतां पारिजातोऽय कृष्ण द्वारवती पुरीम् ।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्त नाय सस्थास्यते भुवि ॥७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज ।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वतद्व्यतिक्रमम् ।।८
श्री पराशरजी ने कहा- हे द्विजोत्तम ! इन्द्र के द्वारा इस प्रकार स्तु
किये जाने पर भगवान कृष्ण ने गभीरता पूर्वक कहा ॥१॥ श्रीकृष्ण बोले-
हे जगत्पते ! प्राप देवाधिपति इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मानव, इसलिये हम
प्रापका जो अपराध बन पडा है, उसे क्षमा कीजिये ॥॥ माप इस पारिजार

पञ्चम अंश ०-३१ ] [ २९७ को इसके अपने स्थान पर ही रखिये क्योकि केवल सत्यभामा का वचन रखने फे लिये ही मैंने इसे ग्रहण किया था ॥३॥ आप अपने फैके हुए वज को भी ले जाइये, क्योकि हे इन्द्र ! शनुप्रो को विदीर्ण करने वाला यह वन मापका ही है ॥४॥ इन्द्र ने कहा-हे प्रभो ! आप अपने को मनुष्य कह कर मुझे मोह में क्यो डालते है ? मैं तो आपके इसी रूप को जानता हू, उस सूक्ष्म रूप का ज्ञान मुझे नही है ॥५॥ हे प्रभो ! माप जो हैं, क्योकि आप जगत् की रक्षा में लगे हुए हैं तथा उसे कटक-विहीन कर रहे हैं ॥६॥ हे कृष्ण ! इस पारिजात को आप द्वारावती को लेजाइये, जब आप पृथिवी का त्याग करेगे तब यह वहाँ नहीं रहेगा ॥७॥ हे देव देव ! हे जगन्नाथ ! हे कृष्ण ! हे विष्णो ! हे महा- भुज । हे शख-चक्र गदापारणे ! मेरे अपराध को क्षमा करिये ॥८॥ तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुव हरि.। प्रसक्त सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमान. सुरपिभि. ॥६ ततशत मुपाध्माय द्वारकोपरि सस्थित । हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिना द्विज ॥१० अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान् । निष्कुटे स्थापयामास पारिजात महातरुम् ।।११ यमभ्येत्य जनस्सर्वो जाति स्मरति पौविकीम् । वास्यते यस्य पुष्पोत्यगन्धेनोर्ण त्रियोजनम् ।।१२ ततस्ते यादवास्सर्वे देहवन्धानमानुपान् । ददृशुः पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम् ॥१३ श्री पराशरजी ने कहा-फिर श्रीहरि ने 'तुम चाहते हो वही हो' कहा पौर सिद, गन्धर्व और देवपियो से प्रशसित हो पृथ्वी पर आगये ।।६॥ हे द्विज ! द्वारकापुरी के ऊपर पहुंचते ही उन्होने ख-ध्वनि करके द्वारदावासियों को हपित लिया ॥१०॥ फिर सत्यभामा के भवन के पारा आर उसके सहित गरुड से उतरे और पारिजात को वही रसवा दिया ॥११॥ जिनका निकटता प्राप्त होने पर पूर्व जन्म या वृत्तान्त स्मरण होता है तथा जिसके पुषो की सुगम तीन योजन तक पृथ्वी को मुरभित रसती है ॥१२॥ जब पादयों ने उस

२६६ ॥
[ श्रीविष्णु पुराण
सफ्ते सगा मितीने स्वेच्या पूर्वक सोप सल्याण के लिये मसौर में अवतार
लिया है, उन जन्म-रहिल, पगं-रहित मौर नित्य स्वाप परमेस्वर मा पराजित
फको या सामामि होगा? col
इकनीसवाँ अध्याय
सस्तुतो भगवानित्यं देवराजेन फेगवः ।
प्रहस्य भावगम्भीरमुयाचेन्द्र द्विजोत्तम ॥१
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मा जगत्पते ।
क्षन्तव्यं भवतवेदमपराध कृतं मम ॥२
पारिजाततरमापं नीयतामुचितास्पदम् ।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात् ॥३
वज चेदं गृहाण त्व यदन प्रहितं त्वया ।
तवैवैतत्पहरणं शक वैरिविदारणम् ॥४
विमोहयसि मामीश मोऽहमिति किं वदन् ।
जानीमस्त्वां भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम् ॥५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्ती नाथ संस्थितः ।
जगतश्शल्यनिष्कर्ष करोप्यसुरसूदन ॥६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवती पुरीम् ।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्त नाय संस्थास्यते भुवि ॥७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज ।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वतद्व्यतिक्रमम् 11८
श्री पराशरजी ने कहा-हे द्विजोत्तम ! इन्द्र के द्वारा इस प्रकार स्तुति
किये जाने पर भगवान् कृष्ण ने गभीरता पूर्वक कहा ॥१॥ श्रीकृष्ण बोले-
हे जगत्पते ! आप देवाधिपति इन्द्र है और हम मरणधर्मा मानव, इसलिये हमसे
पापका जो अपराध बन पडा है, उसे क्षमा कीजिये ॥२॥ भाप इस पारिजात

पञ्चम अंश प्र०-३१ ] । २९७ को इसके अपने स्थान पर ही रखिये क्योकि केवल सत्यभामा का वचन रखने के लिये ही मैंने इसे ग्रहण लिया था ॥३॥ प्राप अपने फेके हुए वष को भी ले जाइये, क्योकि हे इन्द्र ! शत्रुमो को विदीर्ण करने वाला यह वज आपका ही है ॥४॥ इन्द्र ने कहा-हे प्रभो ! अाप अपने को मनुष्य कह कर मुझे मोह मे क्यो डालते हैं ? मैं तो आपके इसी रूप को जानता हू, उस सूक्ष्म रूप का ज्ञान मुझे नहीं है ॥५॥ हे प्रभो ! माप जो हैं, क्योकि पाप जगत् की रक्षा में लगे हुए हैं तथा उसे कटक-विहीन कर रहे है ॥६॥ हे कृष्ण ! इस पारिजात को आप द्वारावती को लेनाइये, जब पाप पृथिवी का त्याग करेंगे तब यह वहाँ नहीं रहेगा ॥७॥ हे देव देव ! हे जगन्नाथ ! हे कृपण हे विष्णो ! हे महा- भुज ! हे शंख-चक्र-गदापाणे ! मेरे अपराध को क्षमा करिये ॥६॥ तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुव हरिः । प्रसक्त. सिद्धगन्धर्वैः स्तूयमानः सुरपिभि. 16 ततश्शङ्खमुपाध्माय द्वारकोपरि सस्थितः । हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिना द्विज ॥१० अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान् । निष्कुटे स्थापयामास पारिजात महातरुम् ॥११ यमभ्येत्य जनस्सर्वो जाति स्मरति पौविकीम् । वास्यते यस्य पुष्पोत्यगन्धेनोर्ग त्रियोजनम् ।।१२ ततस्ते यादवास्सर्वे देहबन्धानमानुपान् । ददृशु. पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम् ।।१३ श्री पराशरजी ने कहा-फिर श्रीहरि ने 'तुम चाहते हो वही हो' कहा और सिद्ध, गन्धर्व और देवर्पियो से प्रशंसित हो पृथ्वी पर आगये ॥६॥ हे द्विज ! द्वारकापुरी के ऊपर पहुंचते ही उन्होने शख-ध्वनि करके द्वारयावासियो को हपित किया ॥१०॥ फिर सत्यभामा भवन के पास आकर उसके सहित गरुड से उतरे और पारिजात को वही रखवा दिया ॥११॥ जिसकी निकटता प्राप्त होने पर पूर्वजन्म का वृत्तान्त स्मरण होता है तथा जिसके पुप्पो की सुगन्ध तीन योजन तक पृथ्वी को सुरभित रसती है ॥१२॥ जव यादयो ने उसकी

२६६ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
सफ्ते तथा जिन्होंने स्वेच्छा पूर्वक लोक कल्याण के लिये मत्यलोक मे अवतार
लिया है, उन जन्म-रहित, यम-रहित और नित्य स्वरूप परमेश्वर को पराजित
करने का सामर्थ्य विसमे होगा? 10॥
इकतीसवाँ अध्याय
सस्तुतो भगयानित्यं देवराजेन केशवः ।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचेन्द्र द्विजोत्तम ॥१
देवराजो भवानिन्द्रो वयं मा जगत्पते ।
क्षन्तव्यं भवतवेदमपराध कृत मम र
पारिजाततरुश्वायं नीयतामुचितास्पदम् ।
गृहीतोऽयं मया शक्र सत्यावचनकारणात् ॥३
वज चेदं गृहाण त्व यदन प्रहितं त्वया ।
तवैवैतत्प्रहरणं शक्र वैरिविदारणम् ॥४
विमोहयसि मामीश मोऽहमिति किं वदन् ।
जानीमस्त्वां भगवतो न तु सूक्ष्मविदो वयम् ॥५
योऽसि सोऽसि जगत्त्राणप्रवृत्तौ नाथ सस्थितः ।
जगतश्शल्यनिष्कर्ष करोष्यसुरमूदन ।।६
नीयतां पारिजातोऽयं कृष्ण द्वारवती पुरीम् ।
मर्त्यलोके त्वया त्यक्त नाय संस्थास्यते भुवि ॥७
देवदेव जगन्नाथ कृष्ण विष्णो महाभुज ।
शङ्खचक्रगदापाणे क्षमस्वैतद्व्यतिक्रमम् ।।८
श्री पराशरजी ने कहा है द्विजोत्तम ! इन्द्र के द्वारा इस प्रकार स्तुति
किये जाने पर भगवान कृष्ण ने गभीरता पूर्वक कहा ॥१॥ श्रीकृष्ण बोले-
हे जग पते ! पाप देवाधिपति इन्द्र हैं और हम मरणधर्मा मानव, इसलिये हमसे
आपका जो अपराध बन पड़ा है, उसे क्षमा कीजिये ॥२॥ आप इस पारिजात

पञ्चम प्रशम०-३१ ] [ २६७ . । 1 1 को इसके अपने स्थान पर ही रखिये क्योकि केवल सत्यभामा का वचन रखने घे लिये ही मैंने इसे ग्रहण निया था ॥३|| प्राप अपने फैके हुए वच को भी ले जाइये, क्योकि हे इन्द्र ! शत्रुओ को विदीर्ण करने वाला यह वज आपका ही है ॥४॥ इन्द्र ने कहा-हे प्रभो । पाप अपने को मनुष्य कह कर मुझे मोह ग क्यो डालते हैं ? मैं तो आपके इसी रूप को जानता हूँ, उरा सूक्ष्म रूप का ज्ञान मुझे नहीं है ॥५॥ हे प्रभो। आप जो है, क्योकि आप जगत् की रक्षा में लगे हुए है तथा उसे कटक-विहीन कर रहे हैं ॥६॥ हे कृष्ण । इस पारिजात को आप द्वारावती को लेजाइये, जब पाप पृथिवी का त्याग करेगे तब यह वहाँ नहीं रहेगा ॥७॥ हे देव देव 1 है जगन्नाय | हे कृष्ण । हे विष्णो | हे महा- भुज । हे शख-चक्र-गदापाणे | मेरे अपराध को क्षमा करिय ॥८॥ तथेत्युक्त्वा च देवेन्द्रमाजगाम भुव हरि । प्रसक्त सिद्धगन्धर्व स्तूयमान सुरपिभि IRE ततश्शङ्ख मुपाध्माय द्वारकोपरि सस्थित । हर्षमुत्पादयामास द्वारकावासिना द्विज ॥१० अवतीर्याथ गरुडात्सत्यभामासहायवान् । निष्कुटे स्थापयामास पारिजात महातरुम् ॥११ यमभ्येत्य जनस्सर्वो जाति स्मरति पौविकीम् । वास्यते यस्य पुष्पोत्यगन्धेनोर्ग त्रियोजनम् ।।१२ ततस्ते यादवास्सर्वे देहबन्धानमानुपान् । ददृशु पादपे तस्मिन् कुर्वन्तो मुखदर्शनम् ॥१३ श्री पराशरजी ने कहा---फिर श्रीहरि ने 'तुम चाहते हो वही हो' कहा और सिद्ध, गन्धर्व और देवपियो से प्रशसित हो पृथ्वी पर आगये ।।६॥ हे द्विज । द्वारकापुरी के ऊपर पहुंचते ही उन्होने शख-ध्वनि करके द्वारवावासियो को हर्पित किया ॥१०॥ फिर सत्यभामा के भवन के पास आकर उसके सहित गरुड से उत्तरे और पारिजात को वही रखवा दिया ॥१॥ जिसकी निकटता प्राप्त होने पर पूर्व जन्म का वृत्तान्त स्मरण होता है तथा जिसके पुप्पो की सुगन्ध तीन योजन तक पृथ्वी को सुरभित रसती है ॥१२॥ जब यादवो न उसकी

३००
[ श्रीविष्णु पुराण
को पोत्री और वाणासुर की पुत्री उपा से हमा १७॥ उम विवाह के भवसर
पर श्रीकृष्ण मौर शकर में घोर संग्राम हुप्रा था तथा वाणासुर की हजार
भुजायें काट डाली गई थी।
कथं युद्धमभूग्रह्मन्नुपाय हरकृष्णयोः ।
कथं क्षय च वारणस्य वाहूना कृतवान्हरिः ॥६
एतत्सर्व महाभाग ममास्यातुं त्वमर्हसि ।
महत्कौतूहलं जातं कथां श्रोतुमिमा हरेः ।।१०
उपा वारणसुता विप्र पार्वती सह शम्भुना।
क्रीडन्तीमुपलक्ष्योच्चः स्पृहां चक्रे तदाश्रयाम् ।।११
ततस्सकलचित्तज्ञा गौरी तामाह भामिनीम् ।
अलमत्यर्थतापेन भी त्वमपि रंस्यसे ।।१२
इत्युक्ता सा तया चक्र कदेति मतिमात्मनः ।
को वा भर्ता ममेत्याह पुनस्तामाह पार्वती ॥१३
वैशाखशुक्लद्वादश्या स्वप्ने योऽभिभवं तव ।
करिष्यति स ते भर्ता राजपुत्रि भविष्यति ।।१४
श्री मैत्रेयजी ने कहा-हे ब्रह्मन् ! उपा के लिये कृष्ण-शंकर मे संग्राम
क्यो हुआ था और श्रीकृष्ण ने वाणासुर की भुजाये क्यो काट डाली थी ॥६॥
हे महाभाग मैं उस वथा को सुनने के लिये अत्यन्त उत्सुक हूँ, भत. माप मुझसे
उसका पूर्ण वर्णन वरिये ॥१०॥ श्री पराशरजी ने कहा है विप्र ! एक बार
की बात है कि शकर-पार्वती को क्रीडा-रत देख कर बाणासुर-सुता उपा ने
भी अपने पति के साथ क्रीडा करने की इच्छा को ॥११॥ तब सबके चित्त को
जानने वाली पावतीजी ने उससे कहा कि-तू सताप न कर, समय पाने पर
तू भी अपने पति का सग प्राप्त करेगो ॥१२॥ उनके ऐसा कहने पर उपा ने
यह सोच कर कि वह समय कब आयेगा, और मेरा पति कौन होगा ? इस
विषय मे पार्वतीजी से पूछा तो उन्होने उससे फिर कहा ॥१३|| पार्वतीजी बोली-
हे राजकुमारी ! वंशाख शुक्ला द्वादशी की रात्रि में जिस पुरप के साथ सगति
करने का तू स्वप्न देखेगी, वही पुरुष तेरा पति होगा ॥१४॥

पश्चम प्रश-अ० ३२ ] [ ३०१ तस्या तिथावुपास्वप्ने यथा देव्या समीरितम् । तथैवाभिभव चक्र कश्चिद्राग च तत्र सा ॥१५ तत प्रबुद्धा पुरुपमपश्यन्ती समुत्सुका । क्व गतोऽसीति निर्लजा मैत्रेयोक्तवती सग्वीम् ।।१६ बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता। तस्याः सख्यभवत्मा च प्राह कोऽय त्वयोच्यते ॥१७ यदा लक्षाकुला नास्य कथयामास सा सखी । तदा विश्वासमानीय सर्वमेवाभ्यवादयत् ॥१८ विदितार्था तु तामाह पुनश्चोषा यथोदितम् । देव्या तथैव तत्प्राप्तौ यो ह्यपाय कुरुष्व तम् ॥१६ दुर्विज्ञयमिद वक्तु प्राप्तु वापि न शक्यते । तथापि किञ्चित्कर्तव्यमुपकार प्रिये तव ।।२० सप्ताष्टदिनपर्यन्त तावत्काल प्रतीक्ष्यताम् । इत्युक्त्वाभ्यन्तर गत्वा उपाय तमथाकरोत् ॥२१ श्री पराशरजीन महा-फिर उसी तिथि मे उपा वी स्वप्नावस्था में जिम पुरुष ने पार्वतीजी के वचनानुसार उमसे मगति की थी, उसी से उपा का अनुराग होगया था ।।१५।। हे मैनेयजी | जब उसका स्वप्न भग हुभा तब उसने उम पुरुप को न दखकर उस प्रास वरन की कामना करके उसने अपनी ससी के सामने ही लज्जा त्याग कर कहा कि तुम कहाँ चले गये ? ॥१६॥ बाणासुर के मन्त्री कुम्भाएड को पुत्री चित्रलेखा उपा की मखी थी, उसन पूछा कि 'तुम यह किम लिय कह रही हो ? ॥१७॥ परन्तु उपा ने उसे कुछ भी न बतापा तो चित्रलेगा ने उसे विश्वाम देकर उपा से मव वृत्तान्त पूछ लिया ॥१८॥ चित्रलपा का जब यह बात विदित होगई, तब उपा ने उमे पार्वतीजी के वचन भी सुना दिये और फिर उमन चित्रलेखा मे उस पुरुष की प्राप्ति का उपाय करने वो वहा ॥१६॥ विश्लेषा बोली- प्रिय ममी ! तुम्हारे देखे हुए पुरुष को जब तार जान न लिया जाय तब तर उसका प्रास होना बेमे मम्भव हैफिर भी मैं तुम्हाग युद्ध राय बनाने का यल र गो ॥२०॥ तुम सात-माठ दिन ३०२ ] [ श्रीविष्णुपुराण तक प्रतीक्षा करो। यह कहकर उस पुरुष की सोज करने का उपाय करने के लिये वह अपने घर चली गई ॥२१॥ ततः पटें सुरान्दैत्यान्गन्धर्वाश्च प्रधानतः । मनुष्याश्च विलिस्यास्यै चित्रलेखा व्यदर्शयत् ।।२२ अपास्य सा तु गन्धर्वास्तथोरगसुरासुरान् । मनुष्येषु ददौ दृष्टि तेष्वप्यन्धकदृष्णिपु ॥२३ कृष्णरामौ विलोक्यासीत्सुभ्र लंञ्जाजडेव सा। प्रद्य म्नदर्शने ब्रीडादृष्टि निन्येऽन्यतो द्विज ॥२४ हाटमा तत कान्ते प्रद्य म्नतनये द्विज । दृष्ट्वात्यर्थविलासिन्या लञ्जा क्वापि निराकृता ॥२५ सोऽय सोऽयमितीत्युक्त तया सा योगगामिनी। चित्रलेखाब्रवीदेनामुपा बाणसुता तदा ।।२६ श्री पराशरजी ने कहा-फिर चित्रलेखा में प्रमुख-प्रमुख देवतायो, दैत्यों, गन्धर्वो और मनुष्यो के चित्र बनाकर उपा को दिखाये ।।२२।। उम समय उपा ने गन्धर्व, नाग, देवता, दैत्य प्रादि पर ध्यान नहीं दिया और अधक तथा वृष्णिवशी मनुष्यो को ही देखने लगी ॥२३॥ है द्विज । बलराम और कृष्ण के चित्रो को देखकर वह लज्जा से जड के समान होगई और प्रद्युम्न को देख- कर तो उसे बहुत ही लज्जा पाई ॥२४॥ फिर प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध को देखते ही, उसको लज्जा नष्ट होगई ॥२५॥ और यही है, यही है, कह उठो । उसके ऐसे वचन सुनकर चित्रलेखा ने उपा से कहा ॥२६॥ अय कृष्णस्य पौत्रस्ते भर्ता देव्या प्रसादित । अनिरुद्ध इति ख्यात प्रख्यात. प्रियदर्शन ॥२७ प्राप्नोपि यदि भारमिमं प्राप्त त्वयाखिलम् । दुष्प्रवेशा पुरी पूर्व द्वारका कृष्णपालिता ॥२८ तथापि यत्नाद्भरिमानयिष्यामि ते सखि । रहस्यमेतद्वक्तव्य न कस्यचिदपि त्वया ॥२६

पञ्चम अंश-अ० ३२ ]
अचिरादागमिष्यामि सहस्व विरहं मम ।
ययो द्वारवती चोषां समाश्वास्य ततः सखीम् ॥३०
चित्रलेखा ने कहा-भगवती पार्वती ने प्रसन्न होकर कृष्ण के पौत्र इस
अनिरुद्ध को ही तेरा पति बनाया है । यह अपनी सुन्दरता के लिये विरयात हो
रहा है ॥२७॥ इसे पति रूप मे पाने पर तो तुझे सवंम्व ही मिल जायगा,परन्तु
श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित द्वारका मे प्रथम तो घुसना ही दुष्कर है ।।२८।। फिर भी
हे सखि ! मैं तेरे पति को लाने का उपाय करूगी, परन्तु तू इस गुप्त बात को
क्सिी पर प्रकट न करना ॥२६॥ अब मैं जाती हू और शीघ्र ही लौटूंगी। इस
प्रकार उपा को आश्वासन देती हुई चित्रलेखा द्वारकापुरी के लिये चल दी।३०।
तेतीसवाँ अध्याय
चाणोऽपि प्ररिणपत्याने मैयाह त्रिलोचनम् ।
देव बाहुसहस्रण निविण्णोऽस्म्याहवं विना ॥१
कचिन्ममपा वाहूना साफल्यजनको रणः ।
भविष्यति विना युद्ध भाराय मम किं भुज ॥२
मयूरध्यजभङ्गरते यदा वाण भविष्यति ।
पिशिताशिजनानन्द प्राप्स्यसे त्व तदारणम् ॥३
तत प्रणम्य वरद शम्भुमभ्यागतो गृहम् ।
सभग्न ध्वजमालोक्य हृप्टो हर्प पुनर्ययौ ॥४
एतस्मिन्नेव काले तु योगविद्यावलेन तम् ।
अनिरुद्धमयानिन्ये चित्रलेखा पराप्सरा ॥५
पन्यान्त पुरमभ्येत्य रममाण महोपया।
विज्ञाय रक्षिणो गत्वा शरासुदैत्यभूपतेः ।।
व्यादिष्ट वि वराणा तु सैन्य तेन महात्मना ।
जघान परिघ घोरमादाय परवीरहा ।।७

IY ] [ fuTIN श्री रात्री १ मा म in गुर में trim girnा frien! मा, RAI भुवापों meभे. पहा है मामील मुलामों को मार गाना गारंगा ? मुरामा गए मार स्वत:inli,feोही है| भाir मे-माग ! HTTATESTी भी सोपोर familोगासने पामे गंदारीनी भी पारी में परा-8 यानापुर में पर मोमतामा और पर्म पर मोर पारि चुप गरम होने पर 3 m टूट गई, सिंग देगा अगं आपना मोनमा पर पिता नारा नगर मापन योग प्रभागे पनिारको यो में मात्र प्रापुर के भोपारा गरे गाव गाता गामा, सर उनहोने पागुर के पाग गारगर पृतान्न नि nि पर गुना यामागुर में अपने मेयो गोपनिगरो पाउने सो मा गोको नष्ट करने या पनि में उग गापूर्ण रीना को मोहन पर में दिन-भिन्न पर दिया ॥३॥ हतेषु तेषु वाग्गोऽपि रयस्यस्तपोचत । युध्यमानी यथाशक्ति पदुवीरेगा निजितः ।। मायया युयुधे सेन म सदा मन्त्रिचोदितः। ततस्तं पानगान्प्रेग बाम यदुनन्दनम् 16 द्वारयरयां पद यातीभावनिरुद्ध ति जल्पताम् । पदूनामाचशे त वन वारणेन नारदः ॥१. त गोरिगतपुर नीत श्रुत्या विद्याविदग्धया। योपिता प्रत्ययं जग्मुर्यादवा नामरैरिति ।।११ ततो गरडमारुह्य स्मृतमामागत हरिः। बलप्रय म्नसहितो बाणस्य प्रययौ पुरम् ॥१२ पुरप्रवेशे प्रमथैयु दमासोन्महात्मनः । ययो वाणपुगभ्याश नीत्वा तान्सशय हरिः ॥१३

प-चम अंश-प्र० ३३ ]
[ ३०५
जब बाणासुर के मेवव मारे गये तब बाणासुर अनिरुद्ध का वध करने
के विचार से रथारूढ होकर अनिरुद्ध से युद्ध मे प्रवृत्त हुआ, परन्तु अपने जी-
जान लगार भी वह अनिरुद्ध से हार गया ॥१॥ तब उसने मन्त्रियो के परामर्श
से माया फैला कर अनिरद्ध को नाग-पाश में जकड लिया है। इधर द्वारका
में अनिरुद्ध के सहमा अदृश्य हो जाने पर विविध प्रकार की बाते चल रही
थी, तभी देवपि नारद ने अनिरुद्ध के नागपाश मे बांध जाने का समाचार दिया
॥१०॥ योग-विद्या मे कुशल चित्रलेखा द्वारा अनिरुद्ध को शोणितपुर लेजाया
गया यह सुनकर यादवो न ममभ लिया कि अनिरुद्ध का देवताओ ने अपहरण
नही किया है ॥११॥ फिर स्मरण करने पर तत्काल उपस्थित हुए गरुड पर चढ
कर बलराम और प्रद्युम्न के महिन श्रीकृष्ण वारणापुर के नगर को गये ।।१२।।
वहाँ पहुंचते ही उन तीनो को शिव-पार्षद प्रमथगणो से मग्राम करना पड़ा।
उनसे मार कर वे याणासुर के निकट जा पहुचे ।।१३।।
ततस्त्रिपादस्त्रिशिग ज्वरो माहेश्वरी महान् ।
वाणरक्षार्थमभ्येत्य युयुधे शाङ्ग धन्वना ।।१४
तद्भम्मस्पर्शमम्भूतताप कृष्णाङ्गमङ्गमात् ।
प्रवाप बलदेवोऽपि श्रममामीलितेक्षण. 11१५
ततस्म युद्धयमानस्तु सह देवैन शाङ्गिणा।
यंप्णवेन ज्वरेणागु कृष्णदहानिराकृत. ॥१६
नारायणभुजाघातपरिपीडनविह्वलम् ।
त वीपक्षम्यतामस्येत्याह देव पितामह ॥१७
ततश्च क्षान्तमेवेति प्रोच्य त वैष्णव ज्वरम् ।
प्रात्मन्येय लय निन्ये भगवान्मधुसूदन ।।१०
मम त्वया सम युद्धये स्मरिप्यन्ति मानवा ।
विन्दरास्ते भविष्यन्तीत्युवरवा चनं ययौ ज्वर ॥१६
ततोऽग्नीन्भगवान्पश्च नित्या नीत्या तथा क्षयम् ।
दानवाना बल प्रयागंयामाग लीलया ॥२०

३०६ ] [ श्रीविष्णु पुराण माघात उसके पश्चात् वारणासुर की रक्षा मे जो तीन शिर और तीन पांव वाला माहेश्वर ज्वर नियुक्त था, उसने अग्रसर होकर श्रीकृष्ण के साथ युद्ध किया ॥१३॥ उस ज्वर द्वारा प्रेरित भस्म के स्पर्श से श्रीकृष्ण भी सना हो उठे और कृष्ण के अगों के स्पर्श से बलरामजी ने भी शिथिलता को प्राप्त होकर अपने नेत्र बन्द कर लिये ॥१५॥ इस प्रकार जब वह माहेश्वर ज्वर श्रीकृष्ण के देह मे व्याप्त होकर युद्ध कर रहा था, तब वैष्णव ज्वर ने आक्रमण करके उसे उनके शरीर से दूर कर दिया ।।१६।। उस समय भगवान की भुजाओ के सहन न करने से सतत हुए उस माहेश्वर ग्बर को विह्वल देखकर ब्रह्माजी ने उसे क्षमा करने के लिये श्रीकृष्ण से कहा ॥१७॥ तव श्रीकृष्ण ने उसे क्षमा करके वैष्णव ज्वर को अपने देह में ही विलीन कर लिया ॥१८॥ तब माहेश्वर ज्वर ने कहा-आपके और मेरे मध्य मे हुए इस युद्ध का जो स्मरण करेंगे, उन्हे ज्वर व्याप्त नहीं होगा। यह कहकर वह ज्वर चला गया ॥१६॥ फिर श्रीकृष्ण ने पचाग्निपों को वशीभूत कर उन्हे नष्ट कर डाला और लीला पूर्वक ही दानवो को मारने लगे ॥२०॥ ततस्समस्तसैन्येन दैतेयानां वलेस्सुतः । युयुधे शङ्करश्चैव कार्तिकेयश्च शौरिणा ॥२१ हरिशङ्करयोयुधमतीवासीत्सुदारुणम् । चुक्षुभुस्सकला लोकाः शस्त्रास्त्राशुप्रतापिताः ।।२२ प्रलयोऽयमशेषस्य जगतो नूनमागतः । मेनिरे त्रिदशास्तत्र वर्तमाने महारणे ॥२३ जुम्भकास्त्रेण गोविन्दो जम्भयामास शइरम् । ततः प्रणेशुदैतेयाः प्रमथाश्च समन्ततः ॥२४ जम्भाभिभूतस्तु हरो रथोपस्थ उपादिशत् । न दाशाक ततो योधु कृष्णेनाविलय मणा ॥२५ गरडक्षतवाहन प्रयम्नास्त्रेण पीडितः । कृष्णहुशारनि तशक्तिचापययो गृहः ॥२६

इस प्रकार शिरमी में भीगने, दम-मेना के न होने म्यामि कानि.
पश्चम अंश-अ० ३३ ]
[ ३०७
तदन्तर बलिपुत्र बाणासुर, भगवान् शङ्कर और स्वामी कातिकेयजी
सम्पूर्ण दैत्य सेना के सहित आगे पढ कर श्रीकृष्ण के साथ युद्ध मे तत्पर हुए
॥२१॥ भगवान् श्रीहरि और शङ्करजी मे परस्पर पत्यन्त घोर सग्राम हुआ,
जिसमे प्रयुक्त शस्त्रास्त्रों के तेज जाल से सम्पूर्ण लोफ क्षुब्ध एव संतस होगये
।।२२।। इस भयङ्कर युद्ध के होने से देवगण समझने लगे कि सम्पूर्ण विश्न का
प्रलयकाल प्रागया जान पडता है ॥२३॥ गोविन्द द्वारा प्रेरित जृम्भकास्त्र से
शङ्करजी झाकी और जमुहाई लने लगे, उनकी ऐसी दशा देखकर दैत्यो और
प्रमयो मे भगदड मच गई ॥२४॥ भगवान् शङ्कर निद्रा से अभिभूत होकर रथ
के पिछले भाग मे बैठ कर महान् वर्मा कृष्ण से युद्ध करने में विफल रहे ॥२५।।
फिर स्वामि कार्तिकेय भी अपने वाहन के द्वारा गरुड द्वारा मारे जाने से और
श्रीकृ ण की हुकार तथा प्रद्युम्न के शस्त्रो से आहत होकर युद्ध भूमि से भाग
निकले ॥२६॥
ज़म्भते शङ्करे नप्टे दंत्यसैन्ये गुहे जिते ।
नीते प्रमथसंन्ये च सक्षय शाङ्ग धन्वना ॥२७
नन्दिना सगृहीताश्वमधिरूढो महारथम् ।
वास्तत्राययौ योद्धु कृष्णकाणिवलरसह ।।२८
बलभद्रो महावीर्यों वारणसैन्यमनेकधा ।
विव्याध वाण प्रभ्रश्य धर्मतश्च पलायत ॥२६
आकृष्य लागलाण मुसलेनाशु ताडितम् ।
बल वलेन ददृशे वाणो वाणश्च चक्रिरणा ॥३०
ततः कृष्णेन वारणस्य युद्धमासीत्सुदारुणम्।
समस्यतोरिपून्दीप्तान्कायवाणविभेदिनः ॥३१
कृपयश्चिच्छेद वारणस्तान्वारणेन प्रहिताञ्छितान् ।
विव्याध केशव वारणो वागं विव्याध चक्रपृक् ।।३२
मुमुचाते तयास्थाणि बाणकृष्णो जिगोपया।
परस्पर क्षतिकरो ताथवादनिश द्विज ॥३॥

। श्रीविष्णु पुगगा - वेय के पलायन करने और शिवगणो के क्षीण होने पर नन्दीश्वर द्वारा हाँके जाते हुए महाग्य पर प्रारूढ हुअा बाणासुर कृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न से युद्ध करने में लिये मामने पाया ।।२७-२८|| तब महावलो रामजी ने वाण-वर्पा के द्वारा दैत्य-सेना को छिन्न-भिन्न किया, तब वह कायरता पूर्वर वहां से भाग चनी ।।२६।। उस समय बाणासुर ने देखा कि उमणी सेना को बलराम जी स्पूर्ति पूर्वक हल मे मीचते और मूसल से मारते है तथा कृष्ण उमे बाहो मे बीधे डालते है ॥३०॥ तब उसने श्रीकृष्ण के साथ महा मप्र म मचाया। दोनो ही कवच भेदी वाणो का प्रयोग करने लगे शाफिर जब श्रीकृष्ण ने वारणा. सुर द्वारा प्रयुक्त बाणो को काट डाला, तब वाग्गासुर ने उन्हे और उन्होने बाणासुर को बाणी से वीरना प्रारम्भ किया ॥३२॥ हे द्विज | उम समय वारणासुर और कृष्ण दोनो ही परस्पर मे प्रहार करते हुए विजय की कामना स फुर्ती से प्रायुधो का प्रादान-प्रदान करने लगे ॥३३॥ भिद्यमानेष्वशेपेपुशरेष्वस्त्रेषु सीदति । प्राचुर्येण ततो बाण हन्तु चक्र हरिमनः ।।३४ ततोऽर्कशतसङ्घाततेजसा सदृशद्यति । जग्राह दैत्यचकारिहरिश्चक सुदर्शनम् ॥३५ मुञ्चतो वाणनाशाय ततश्चक मधुद्विप । नग्ना देतेय विद्याभूत्कोटरी पुरतो हरे ॥३६ तामग्रतो हरिदृष्ट्वा मीलिताक्षस्सुदर्शनम् । मुमोच बाणमुद्दिश्यच्छेत्तु बाहुवन रिपो ॥३७ क्रमेण तत्तु वाहूना बाणस्याच्युतचोदितम् । छेद चक्र'मुरापास्तशम्बोधक्षपणाहतम् ।।३८ छिन्ने बाहुवने तत्तु करस्थ मधुसूदन । मुमुक्षुणिनाशाय विज्ञात स्त्रिपुरद्विपा ॥३६ ममुपेत्याह गोविन्द सामपूर्वमुमापति । विलोक्य वाण दोर्दण्डच्छेदासृक्नाववर्षिणम् ॥४० मन्त म अब सभी बाग टूट गये और सभी शस्त्रास्त्र ध्यर्थ होगमे, सब पञ्चम प्रश-अ० ३३ ] [ ३०६ भगवान् श्रीहरि ने वाणासुर को नष्ट करने का निश्चय किया ॥३४॥ फिर दैत्यो के महान् शत्रु भगवान हरि ने संक्डो सूर्यों जैसे तेज वाले सुदर्शन चक्र को हाथ मे ग्रहण किया ॥३५॥ जब वह उसे मारने के लिये अपने चक्र को छोडने मे तत्पर हो रहे थे, तभी दैत्यो की विद्या कोटरी नग्नावस्था में श्रीकृष्ण सामने आई ॥३६।। उसे देखकर भगवान् ने अपने नेन बन्द कर लिये और बाणासुर की भुजानो रूबी वन को काटने के लिये, उसे लक्ष्य करके चक्र प्रेरित किया ॥३७॥ तब उस चक्र ने दैत्यो द्वारा प्रेरित अस्त्रो को काट कर वारणसुर की भुजामो को भी काट कर गिरा दिया ॥३८॥ तब भगवान् शङ्कर ने यह समझ कर कि अब श्रीकृष्ण इम वाणासुर का वध करने के लिये पुन अपन चक्र को प्रेरित करन मे तत्पर हैं ॥३९॥ तब बाणासुर के क्टे हुए भुजदएडो स रुधिर-धार प्रवाहित होती देखकर उन पार्वतीनाथ त्रिपुरारि शङ्कर ने भगवान् गोविन्द के पास आकर कहा ॥४०॥ कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्या पुरुपोत्तमम् । परेश परमात्मानमनादिनिधन हरिम् ॥४१ देवतिर्यड्मनुष्येपु शरीरग्रहणात्मिका। लीलेय सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥४२ तत्प्रसीदाभय दत्त बारणस्याम्य मया प्रभो । तत्त्वया नानृत कार्य यन्मया व्याहृत वच ॥४३ अस्मत्सश्रयहप्तोऽय नापराधी तवाव्यय । मया दत्तवरो दैत्यस्ततस्त्वा क्षमयाम्यहम् ।।४४ इत्युक्त प्राह गाविन्द शूलपारिणमुमापतिम् । प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामर्पोऽसुर प्रति ।।४५ भगवान् शङ्कर बोले-हे कृष्ण । हे कृष्ण । हे जगन्नाथ । मुझे ज्ञात है कि प्राप परम पुरप, परमात्मा पौर मादि-अन्त-विहीन धीहरि हैं ।।४।। प्राप देव तिर्यक् और मनुष्यादि योनियो में उत्पन्न होते हैं, यह मय प्राप स्वं. भूतात्मक प्रभु की लीला ही है ।.४२॥ हे प्रभो ! पाप प्रसन्न हो । मैंने इस बाणासुर को जो अभयदान दिया है, मेरे उग वचन को प्राप भग न कीजिये - 1 श्रीविष्णु पुराण पंप के पलायन करने मोर शिवगणों क्षीण होने पर नन्दीश्वा द्वारा हो जाने हुए महाग्य पर मास्तु हमा मागणागुर कृपण, बलगम गौर प्रद्युम्न मे युद्ध करने के लिये मामने पाया ॥२७.२८॥ तब महायनो रामजी ने मारण-वर्षा के द्वारा देश्य-मेना को छिन्न-भिन्न रिया, तब वह कायरता पूर्वर यहाँ में भाग पली ॥२६॥ उम ममय भागामुर ने देखा कि उमत्री मेना को बलगम जी पूर्ति पूर्वव हन से वीचते और मूसल में मारते है तथा कृष्ण उमे बायो में चीये डालते हैं। 2011 तम उमने श्रीकृष्ण साय महा मन म मनाया । दोनो ही ववन भेदी यागो का प्रयोग करने लगे ॥१॥ फिर जन धीरप्पा ने बागा- मुर द्वारा प्रयुक्त यागो को काट डाला, तव बाणासुर ने उन्हें और उन्होने बागामुर वो वाग्गो से बीपना प्रारम्भ किया ॥३२॥ हे द्विज | उम समय पाणासुर और कृष्ण दोनो ही परस्पर में प्रहार करते विजयीकामना म फुर्ती म भायुधो का पादान-प्रदान पग्ने लगे ॥३३॥ भिद्यमानेश्वगेपेपुशरेप्वम्प्रेषु सीदति । प्रायेण ततो बाण हन्तु चक्र हरिमनः ॥३४ ततोऽशतसङ्घाततेजसा साद्य ति । जग्राह देत्यचकारिहरिश्चक मुदर्शनम् ॥३५ मुञ्चतो वाणनाशाय ततश्च मधुद्धिप । नग्ना दैतेय विद्याभूत्कोटरी पुरतो हरे ।।३६ तामग्रतो हरिदृष्ट्वा मीलिताक्षम्सुदर्शनम् । मुमोच वाणमुद्दिश्यच्छेत्तु वाहुवन रिपो. ॥३७ क्रमेण तत्तु वाहूना बारणस्याच्युतचोदितम् । वेद चक्रे ऽयुरापास्तशस्त्रोधक्षपणाहतम् ॥३८ छिन्ने बाहुबने ततु करस्थ मधुसूदन । मुमुक्षुर्वाणनाशाय विज्ञात स्त्रिपुरद्विपा ॥३६ ममुपेत्याह गोविन्द सामपूर्वमुमापति । विलोक्य वाण दोर्दण्डच्छेदारानाववर्षिणम् ॥४० पन्त में जब मभी बाग टूट गये और मभी शस्त्रास्त्र ध्यर्थ होगये, सई पञ्चम अंग-अ० ३३ ] भगवान् श्रीहरि ने वाणासुर को नष्ट करने का निश्चय किया ॥३४॥ फिर दैत्यो के महान् शत्रु भगवान् हरि ने सैकडो सूर्यों जैस तेज वाले सुदर्शन चक्र को हाथ मे ग्रहण किया ॥३५॥ जब वह उसे मारने के लिये अपने चक्र को छोड़ने में तत्पर हो रहे थे, तभी दैत्यो की विद्या कोटरी नग्नावस्था में श्रीकृष्ण के सामने पाई ॥३६॥ उसे देखकर भगवान् ने अपने नेन बन्द कर लिये और बाणासुर की भुजाओं रूपी वन को काटने के लिये, उसे लक्ष्य करके चक्र प्रेरित किया ॥३७।। तब उस चक्र ने दैत्यो द्वारा प्रेरित अस्त्री को काट कर वारणसुर की भुजानो को भी काट कर गिरा दिया ॥३८॥ तब भगवान् शङ्कर ने यह समझ कर कि अब श्रीकृष्ण इस बाणासुर का वध करने के लिये पुन प्रान चक्र को प्रेरित करने में तत्पर हैं ॥३६॥ तव बाणासुर के कटे हुए भुजदएडो स रुधिर-धार प्रवाहित होती देखकर उन पार्वतीनाथ त्रिपुरारि शइर ने भगवान् गोविन्द के पास माकर कहा ॥४०॥ कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ जाने त्वा पुरुषोत्तमम् । परेश परमात्मानमनादिनिधन हरिम् ॥४१ देवतियंड्मनुप्येषु शरीरग्रहणात्मिका । लीलेय सर्वभूतस्य तव चेष्टोपलक्षणा ॥४२ तत्प्रसीदाभय दत्त बारणस्यान्य मया प्रभो। तत्त्वया नानृत कार्य यन्मया व्याहृत वच ।।४३ अस्मत्सय हप्तोऽय नापराधी तवाव्यय । मया दत्तवरो दैत्यस्ततस्त्वा क्षमयाम्यहम् ॥४४ इत्युक्त प्राह गोविन्द मूलपारिगमुमापतिम् । प्रसन्नवदनो भूत्वा गतामोऽमुर प्रति ।।४५ भगवान् गहर होते हे पृषण । हे कृष्ण । हे जगन्नाय । मुझे ज्ञात है कि पाप परम पुग्प, परमात्मा और प्रादि-मन्न-विहीन श्रीहरि है ॥४१॥ पाप देव नियं पोर मनुष्यादि योनियों में जाम होने हैं, यह मर मार र. भूतारमप प्रभु की लीला ही है ।:४२॥ हे प्रभो ! मार प्रसन्न हो । मैंने इम धारणामुर को जो अभयदान दिया है, मेरे उस वचन को पार भग न कीजिये -- [ श्रीविष्णु पुगए ॥४३॥ हे अव्यय । इसने मेरे प्राश्रय के कारण इतना गर्वीला होने से ही प्रापया पपराध किया है, इसलिये यह प्रापया अपराधी नहीं है। इसे मैंने जो वर प्रदान किया था, उसकी रक्षा के लिये ही मैं इसे क्षमा करने के लिये पापगे भाग्रह करता हूं ११४४५ श्री परागरजी ने कहा-भगवान शहर के वचन सुन पर श्रीकृष्ण ने वारणासुर के प्रति उत्पन्न हुए अपने क्रोध को त्याग दिया और प्रसन्न मुख होरर उनसे वोले ॥४॥ युष्मद्दत्तवरो वाणो जीवतामेष शङ्कर । त्वद्वाक्यगीरवादेतन्मया चक्र निवतितम् ।।४६ त्वया यदभय दत्तं तद्दत्तमखिल मया । मत्तोऽविभिन्नमात्मान द्रष्टुमर्हसि शङ्कर ॥४७ योऽह स त्व जगच्चेदं सदेवासुरमानुपम् । मत्तो नान्यदशेष यत्तत्त्व ज्ञातुमिहार्हसि ॥४८ अविद्यामोहितात्मान पुरुषा भिन्नदर्शिनः । वदन्ति भेद पश्यन्ति चावयोरन्तर हर ।।४६ प्रसन्नोऽह गमिष्यामि त्व गन्छ वृपभध्वज ॥५० श्री भगवान् ने कहा-हे शङ्कर | आपके वरदान के कारण यह बाणा- सुर जीवित रहे । आपका वचन भग न हो, इसलिये मैं अपने चक्र को रोकता हूँ ॥४६॥ हे शिव । प्रापने जो वर दिया है, उसे मेरे द्वारा ही दिया हुआ समझे, आप मुझे सदैव अपने से अभिन ही देखें ॥४७॥ जो मैं हूँ, वहीं ग्राप हैं । सम्पूर्ण विश्व-देवता, दैत्य, मनुष्यादि कोई भी तो मुझसे भिन्न नहीं है ॥४८॥ हे शङ्कर । अविद्या से भ्रमित चित्त वाले मनुष्य ही हम दोनो मे भेद कथन करते अथवा देखते है । हे वृषभध्वज | आप गमन कीजिये, मैं भी अव जा रहा हूँ ॥४६-५०॥ इत्युक्त्वा प्रययौ कृष्ण प्राद्य मिनर्यत्र तिष्ठति । तद्वन्धफणिनो नेशुगरुडानिलपोथिता. ॥५१ ततोऽनिरुद्धमारोप्य सपत्नीक गरुत्मति । आजग्मुरिका रामकाष्णिदामोदरा: पुरीम् ॥५२ 1

पञ्चम प्रश-०२६ ]
पुत्रपौत्रः परिवृतस्तत्र रेमे जनार्दनः ।
देवीभिस्सतत विष भूभारतरणेच्छया ॥५३
श्री पराशरजी ने कहा-ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण अनिरुद्ध के
पास पहुचे । उनके वहाँ जाते ही अनिरुद्ध के लिये पाश स्प हुए सभी नाग
गरुड के चलने से उत्पन्न हुए पवन के वेग से नाश पो प्राप्त हुए ॥५१॥ फिर
अनिरुद्ध को उसकी पत्नी उपा के सहित गरुड पर चढकर बलराम और प्रद्युम्न
सहित थोकृष्ण द्वारकापुरी में प्रागये ॥५२॥ हे द्विज I यहां पृथिवी का भार
उतारने की इच्छा से अपने पुत्र पौत्रादि के सहित निवास करते हुए भगवान्
अपनी रानियो के साथ क्रीडा करने लगे ॥५३।।
चौतीसवाँ अध्याय
चक्रे कर्म महच्छौरिविभ्राणो मानुपी तनुम् ।
जिगाय शक्र शर्व च सर्वान्देवाश्च लीलया ॥१
यच्चान्यदकरोत्कर्म दिव्यचेष्टा विघातकृत् ।
तत्वथ्यता महाभाग पर कौतूहल हि मे ॥२
गदतो मम विप्र ध यतामिदमादरात् ।
नरावतारे कृष्णेन दग्धा वाराणसी यथा ॥३
पौण्ड्रको वासुदेवस्तु वासुदेवोऽभवद्भुवि ।
अवतीर्णस्त्वमित्युक्तो जनरज्ञानमोहितः ।।४
स मेने वासुदेवोऽहमवतीणों महीतले ।
नष्टस्मृतिस्ततस्सर्व विष्णुचिह्नमचीकरत ॥५
दूत च प्रेपयामास कृष्णाय सुमहात्मने ।
स्यक्त्वा चक्रादिक चिन्ह मदीय नाम चात्मनः ॥६
वासुदेवात्मक मूढ त्यक्त्या सर्वमशेषतः ।
प्रात्मनो जीवितार्थाय ततो मे प्रति व्रज ॥७

पञ्चम प्रश-अ० ३४ ] [ ३१३ ततस्तु केशवोद्योगं श्रुत्वा काशिपतिस्तदा। सर्वसैन्यपरीवार: पाणिग्राह उपाययौ ॥१४ दूत ने उसके संदेश को यथावत् श्रीकृष्ण को जा सुनाया, तब उन्होने हंसते हुए कहा-हे दूत पौड़क को कहना कि मैं अपने चक्र रूप चिह्न को तेरे लिये अवश्य छोडूंगा । मैंने तेरे सदेश का यथार्थ भाव ग्रहण कर लिया, अब तू जैसा चाहे वैसा कर ।।८-६।। मैं अपने चिह्न और वेश के सहित तेरे यहाँ पाकर इन्हें तेरे ऊपर ही छोड दूंगा ॥१०॥ और मैं तेरी प्राज्ञा का पालन करने के लिये कल ही तेरी शरण मे उपस्थित होऊ ॥११॥ मैं तेरी शरण में पहुंच कर तुझे भय-रहित करने का पूर्ण उपाय करूंगा ।।१२॥ श्री पराशरजी ने कहा- श्रीकृष्ण जी की बात सुनकर दूत चला गया तब भगवान ने गरुड का स्मरण किया, जिससे वह तत्काल मा गये। भगवान् उस पर चढ कर पौएड्रक की राजधानी की मोर चल दिये ॥१३॥ भगवान् के यहां आने का समाचार प्राप्त कर काशी नरेश भी पौंड्रक की सहायता के लिये अपनी सेना के सहित पा गया ॥१४॥ ततो बलेन महता काशिराजवलेन च । पौण्ड्रको वासुदेवोऽसौकेशवाभिमुखौ ययौ ॥१५ त ददर्श हरिदूंरादुदारस्यन्दने स्थितम् । चक्रहस्तं गदाशाङ्गबाहुँ पारिणगताम्बुजम् ॥१६ स्रग्धरं पीतवसनं सुपर्णरचितध्वजम् । वक्ष स्थले त चास्य श्रीवत्स दो हरि. ॥१७ किरीटकुण्डलधरं नानारत्नोपशोभितम् । त दृष्ट्वा भावगम्भीर जहास गरडध्वजः ॥१८ युयुधे च बलेनास्य हस्त्यश्वयलिना द्विज । निस्पिशासिगदागूलपाक्तिकामुपशालिना ॥१६ धरणेन शाङ्गनिमुक्तारैररिविदारणः। गदाचक्रनिपातंश्च सूदयामास तयलम् ।।२० 1 श्रीविष्णु पुराण ३१४ ] काशिराजवल चैव क्षय नीत्वा जनार्दन । उवाच पौण्ड्रक मूढमात्मचिह्नोपलक्षितम् ।।२।। इसके पश्चात् काशी नरेश की सेना के साथ ही अपनी महान् सेना को लेकर पौण्ड्रक भगवान् वासुदेव के सामने पाया ॥१५॥ भगवान् ने उसे हाथ मे चक्र, गदा, शाङ्ग धनुप और पद्म धारण किये एक श्रेष्ठ रथ पर सवार हुए देखा ॥१६॥ उसके कराठ में वैजयन्ती माला, देह मे पीताम्बर, वक्ष स्थल मे श्रीवरस का चिह्न और गरुड से चित्रित ध्वजा पी॥१७॥ उसे विभिन्न प्रकार के रत्नादि से युक्त किरीट-कुण्डल धारण किये हुए देख कर गरुडध्वज भगवान् वासुदेव गम्भीरता पूर्वक हँस पडे ॥१८॥ हे द्विज । फिर उसकी अश्व-गजादि से सम्पन्न एव निस्त्रिश, खड्ग, गदा, शूल, शक्ति धनुप प्रादि मायुधो से सज्जित सेना के साथ युद्ध करने मे तत्पर हुए ।।१६।। भगवान् ने शत्रुओ को विदीर्ण करन वाले अपने तीक्ष्ण बाणो को शाङ्ग धनुप से छोड कर तथा गदा और चक्र से शत्र ओ पर प्रहार करके क्षण भर मे ही उन्हे नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥२०॥ इसी प्रकार काशीराज की भी सेना मार दी और अपने सामने सभी चिह्न धारण किये हुए पौण्ड्रक को देख कर उससे वहा ॥२१॥ पौण्डकोक्त त्वया यत्तु दूतवक्त्रेण मा प्रति । समुत्सृजेति चिह्नानि तत्ते सम्पदयाम्यहम् ।।२२ चक्रमेतत्समुत्सृष्ट गदेय ते विसर्जिता। गरुत्मानेप चोत्सृष्टस्समारोहतु ते ध्वजम् ॥२३ इत्युच्चार्य विमुक्त न चकणासो विदारित । पातितो गदया भग्नो ध्वजश्नास्य गरुत्मता ।।२४ ततो हाहाकृते लोके काशिपुर्यधिपो बली। युयुधे वासुदेवेन मित्रस्यापचितौ स्थितः ।।२५ ततश्शाङ्ग धनुर्मुक्त रिछत्त्वा तस्य शिरश्शर । काशिपुर्या स चिक्षेप कुर्वल्लोकस्य विस्मयम् ।।२६ हत्वा त पौण्ड्रक शरि काशिराज च सानुगम्। पुनरवती प्राप्तो रेमे स्वर्गगतो यथा ।।२७ पचम पदा-म० ३४ । थी भगयान् ने कहा है पांडव ! तूने मुझे मन्देश भेजा पारि मेरे पिहनी पो छोड दे, इम लिये उम मामा पा पासन तेरे ही मामन करता हूँ ॥२२॥ देग, गरे कार यह चक्र छोट दिया, यह गदा भी छोड़ दी और पव गरट की भी दौर रहा है, जो तेरी प्वजा पर बढ जाय ॥२॥ थी परापारजी ने पहा-यह यह पर घोडे गये पर ने पोदय को ग्दिी रस्सिा भोर गदा ने उसे धराशायी पिया तथा गफ्ट ने उगतीपा राट राती ॥२४॥ म पर मर गंगा में हा-हामार मप गया । गह देगापित्र के प्रतिशोधायं मागिराज ने श्रीकृष्ण गे पुट पिया ।।२५।। तब भगवार ने एर पास से ही उगमा मागर पाट पर नामापुरी में फोदिया, मगे गभी प्रादपर्व परने मो ॥२६॥ग प्रभार पोट्रा प्रोर पामीरानगवण सेना सहित संहार पग्ने पार भगवार श्रीया तारपा में पापर स्यगं में गमान गे भोगने सnt [ श्रीविष्णु पुराण है, तो अपने पुरोहित की सहायता से उसने भगवान् शङ्कर को प्रसन्न किया ॥२६॥ उस अविमुक्त महाक्षेत्र मे प्रसन्न हुए भगवान् शङ्कर ने प्रकट हो कर उस राज्पुत्र से कहा-'वर मांग ॥३०॥ इम पर उसने कहा- हे महेश्वर । हे भगवन् । पाप ऐसी कृपा करें मेरे पिता को मारने वाले कृष्ण के विनाशार्य कृत्या उत्पन्न हो जाय ॥३१॥ श्री पराशरजी ने कहा-भगवान् शङ्कर बोले कि "ऐसा ही होगा' । उनके ऐसा कहने पर दक्षिणाग्नि का चयन करने पर उससे उसी अग्नि को नष्ट करने वाली कृन्या उत्पन्न हो गई ॥३२।। उसका ज्वाला मालामो से परिपूण विकराल मुख और अग्नि शिखा के समान प्रज्वलित केश थे। ऐसी वह कृत्या कृष्ण | कृष्ण | पुकारती हुई क्रोध पूर्वक द्वारका पुरी मे जा पहुंची ॥३३॥ तामवेक्ष्य जनस्त्रासाद्विचलल्लोचनो मुने। ययौ शरण्य जगता शरण मधुसूदनम् ॥३४ काशिराजसुतेनेयमाराध्य वृषभध्वजम् । उत्पादिता महाकृत्येत्यवगम्याथ चक्रिरणा ॥३५ जहि कृत्यामिमामुग्रा वह्निज्वालाजटालकाम् । चक्रमुत्सृष्टमक्षेषु क्रीडासक्तन लीलया ॥३६ तदग्निमालाजटिलज्वालोद्गारातिभीषणाम् । कृत्यामनुजगामाशु विष्णुचक्र सुदर्शनम् ॥३७ चक्रप्रतापनिर्दग्धा कृत्या माहेश्वरी तदा । ननाश वेगिनी वेगात्तदप्यनुजगाम ताम् ॥३८ कृत्या वाराणसीमेव प्रविवेश त्वरान्विता । विष्णुचकप्रतिहतप्रभावा मुनिसत्तम ।।३६ तत काशीबल भूरिप्रमाना तथा बलम् । समस्तशस्त्रास्त्रयुत चकस्याभिमुस यो ॥४० हे मुने ! उसे देख कर सभी द्वारका निवासी भय से व्याकुल हो उठे पौर तत्वाल हो भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जा पहुंचे ॥३४॥ तब जुमा खेलने म लगे हुए भगवान् ने उस वृत्या को पासिराज के पुत्र द्वारा प्रसन्न हुए पञ्चम अश-प्र० ३४ ] सङ्घर के प्रसाद से वहाँ पाई हुई जान कर अपने चक्र को प्रादेश दे दिया कि इम ज्यालामयो भयङ्करी कृत्या को नष्ट कर दे ।।३५-३६।। पाशा पाते ही उस छूटे हुए सुदर्शन चक्र ने अग्निमाल गण्डित गटामो और अग्निमुख के कारण भयानक मुख वाली उस कृत्या का पीछा किया ॥३७॥ तब उस चक्र के तेज से जानती हुई कृत्या छिन्न-भिन्न होती हुई द्रुतवेग से भागी और चक्र ने भी उस पा उसी वेग से पीछा किया ॥३८॥ हे मुनिसत्तम ! चक्र के तेज से प्रभावहीन हुई वह कृत्या उल्टी लौट कर काशी में हो जा पहुची ॥३६।। उस समय शिव जी के प्रमथगण और काशिराज की सम्पूर्ण सेना शम्मास्त्रो से सब पर उस पक्र के सामने पा गये ॥४०॥ शस्त्रास्त्रमोक्षचतुर दग्ध्वा तद्बलमोजसा। कृत्यागर्भामशेपा ता तदा वाराणसी पुरीम् ।।४१ सभूभृभृत्यपौरा तु साश्वमातङ्गमानवाम् । प्रोपगोष्ठकोशा ता दुनिरीक्ष्या सुरैरपि ।।४२ ज्वालापरिष्कृतागेपगृहप्राकार चत्वराम् । ददाह तद्धरेश्चक सकलामेव ता पुरीम् ।।४३ अक्षीणामपंमत्युग्रसाध्यसाधनसस्पृहम् । तचक्र प्रस्फुरद्दीप्ति विष्णोरभ्याययो करम् ।।४४ उस समय उस चमा ने अपने तेज से सब प्रकार के मायुधो के प्रेरण में अध्यस्त उस सम्पूर्ण सेना को भस्म कर उस कृत्या वे सहित सम्पूर्ण काशी पुगे पो दग्ध करना प्रारम्भ किया ॥४१॥ जो वाराणसी राजा, प्रजा, सेवा, हाथी, घोटे और मनुष्यादि से परिपूर्ण, सभी गोठो भोर पोशो से सम्मान तथा देयतामो के लिये दुर्लभ दर्शन थी, उसे उस विष्णु पका ने पर, कोट, चयूतरे मादि ये हित भस्म पर दिया ।।४२-४३।। पन्त में यह प्रशान्त तपा उपवर्मा अत्यन्त सेजोमय पर वहाँ से लौटय र पुन भगयार के हाप में जा पहुवा ॥४४

३१८ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
पंतीसवाँ अध्याय
भूय एवाहमिच्छामि बलभद्रस्य धीमत. ।
श्रोतु पराक्रम ब्रह्मन तन्ममाख्यातुमर्हसि ।।१
यमुनाकर्षणादीनि श्रुतानि भगवन्मया ।
तत्कथ्यतां महाभाग यदन्यत्कृतवान्बलः॥२
मैत्रेय श्रूयता कर्म यद्रामेणाभवत्कृतम् ।
अनन्तेनाप्रमेयेन शेषेण धरणीधृता ॥३
सुयोधनस्य तनयां स्वयवरकृतक्षणाम् ।
बलादादत्तवान्वीरस्साम्बो जाम्बवतीसुतः ॥र
ततः कुद्धा महावीर्या कर्णदुर्योधनादयः।
भीष्मद्रोणादयश्चनं ववन्धयुधि निर्जितम् ।।५
तच्छु त्वा यादवास्सर्वे क्रोधं दुर्योधनादिषु ।
मंत्रेय चक्र : कृष्णश्च तानिहन्तुं महोद्यमम् ॥६
तानिवार्य बल: प्राह मदलोलकलाक्षरम् ।
मोक्ष्यन्ति ते मवचनाद्यास्याम्येको हि कौरवाना
श्री मैत्रेयजी ने कहा-हे ब्रह्मन् ! अब में बलरामजी के पराक्रम का
वृत्तान्त सुनने का उत्सुक हूँ, उसे कहिये ॥१॥ यमुना को सोचने आदि पराक्रम
तो सुन पुका, अब उनके अन्य कार्यों को बतलाइये ॥२॥ श्री पराशरजी ने
कहा-है मैयजी ! गोपावतार श्री बलरामजी द्वारा किये गये कर्मों को मुझसे
सुनो ॥३॥ एक बार जाम्बवती-पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री के स्वयंवर से
उसे बल पूर्वक हर लिया था | तब महाबली कर्ण, दुर्योधन, भीष्म, द्रोण
प्रादि नै क्रोधित होकर उसे बांध कर अपने वश में कर लिया ॥१॥ यह समा-
चार मिलने पर प्रीकृष्णादि यदुवंशियो ने अत्यन्त क्रोधित होकर उनको मारने
के लिये भागे तैयारी को 11६1) वलरामजी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि मेरे

[ ३१६ पञ्चम अश-प्र० ३५ ] करने मान से कौरवगण साम्ब को मुक्त कर देंगे, इसलिये मे अकेला ही वहाँ जाता हूँ ॥७॥ बलदेवस्ततो गत्वा नगर नागसायम् । बायोपवनमध्येऽभून्न विवश च तत्पुरम् ।। बलमागतमाज्ञाय भूपा दुर्योधनादय । गामय॑मुदक चैव रामाय प्रत्यवेदयन् ॥ गृहीत्वा विधिवत्सर्व ततस्तानाह कौरवान् । प्राज्ञापयत्युग्रसेनस्साम्बमाशु विमुञ्चत ॥१० ततस्तद्वचन श्रुत्वा भीष्मद्रोणादयो नृपा । फर्णदुर्योधनाद्यान्न चुक्षुभुदिजसत्तम ।।११ ऊवुश्च कुपितास्मर्वे बालिकाद्याश्च कौरवा । अराज्याहं यदोवंशमवेक्ष्य मुसलायुधम् ।।१२ भो भो किमेतद्भवता वलभद्रेरित वचः। आज्ञा कुरुकुलोत्थाना यादव क प्रदास्यति ॥१३ उग्रसेनोऽपि यद्याज्ञा कौरवाणा प्रदास्यति । तदल पाण्डुश्छिन।पयोग्यविडम्वनै ।।१४ श्री पगशर जी ने कहा-इसके पश्चात् बलरामजी हस्तिनापुर पहुच फर नगर से बाहर एक उद्यान मे ठहर गये ।।८॥ बलरामजी के वहा पाने का समाचार दुर्योधनादि ने गौ, अध्यं और पाद्यादि के निवेदन पूर्वक उनका सत्कार किया है। उसे स्वीकार करके बलरामजी ने उनसे कहा-राजा उग्रसेन की प्राज्ञा है कि आप साम्ब को मुक्त करदें ॥१०॥ हे द्विजसत्तम । यह सुनकर भीष्म, प्रोण, कर्ण और दुर्योधनादि अत्यन्त सुब्ध हुए ॥११॥ और यदुवंश को राज्य के अयोग्य समझ कर क्रोध पूर्वक बलरामजी से बोले रामजी । आप क्या कहते हैं ? कौन सा यदुवशी वीर किसी कौरव वीर को भाजा देने में समर्थ है ? ॥१३॥ यदि उग्रसेन जैसे भी कोरवा को प्राज्ञा दे सकते हैं तो कौरव को इस श्वेत राजछत्र के धारण को क्या आवश्यकता है ? ॥१४॥ २॥ हे बल- ?

| श्रीविष्णगण
तद्गच्छ बल मा या त्वं साम्बमन्यायचेष्टितम् ।
विमोध्यामो न भवतश्चोग्रसेनस्य शासनात् ।।१५
प्रणतिर्या कृतास्माकं मान्यानां कुकुरान्यकः ।
ननाम सा कृता केयमाज्ञा स्वामिनि मृत्यतः ॥१६
गर्वमारोपिता यूयं समानासनभोजनः ।
को दोपो भवतां नीतियत्प्रीत्या नावलोकिता॥१७
अस्माभिरों भवतो योध्यं बल निवेदितः।
प्रेम्णतन्नतदस्माकं कुलाय मत्कुलोचितम् ॥१८
इत्युक्त्वा कुरवः साम्ब मुन्धामो न हरेस्सुतम् ।
कृतकनिश्चयास्तूर्ण विवर्गजसाह्वयम् ॥१८
मत्तः कोपेन चापूर्णस्ततोऽधिक्षेपजन्मना ।
उत्याय पाया वसुघां जधान स हलायुधः ।२०
ततो विदारिता पृथ्वी पाणिघातान्महात्मनः ।
प्रास्फोटयामास तदादिशशब्देन पूरयन् ।।२१
इसलिये हे वलरामजी ! तुम जामो या रहो, परन्तु हम तुम्हारी अथवा
उग्रसेन की प्राज्ञा पर साम्ब को मुक्त नहीं करेंगे ।।१४। पहिले सभी यदुवंशी
हमे प्रणाम करते थे, परन्तु अब ये वैसा न करके सेवक होते हुए भी स्वामी
को कैसे भाज्ञा दे रहे हैं ? ॥१६।। तुम्हारे साथ समान व्यवहार करके हमने ही
तुम्हें चढा दिया है, इसमें तुम्हारा भी कुछ दोष नहीं है, हमने ही प्रेम के क्शी-
भूत होकर नीति पर ध्यान नहीं दिया था ॥१७॥ हे बलराम ! तुम्हे यह
अादि भी हमने प्रेमवा ही दिया है, यथार्य रूप में तो हमारे द्वारा तुम्हारा
सम्मान किया जाना अनुचित ही है ॥१८॥ श्री परागरजी ने कहा-कृष्ण-पुत्र
साम्ब को बन्धन मुक्त न करने का निश्चय प्रकट करके सब कोरवगण उसी
समय नगर में चले गये ॥१६॥ इस प्रकार तिरस्कृत हुए बलरामजी ने रोप
पूर्वक पृथिवी में पह-प्रहार किया ॥२०॥ इस पृथिवी फुट गई और बलरामजी
अपने शब्द से सब दिशानो को गुञ्जार कम्पित करने लगे ॥२१॥

पञ्चम अश-प्र० ३५
[ ३२१
उवाच चातिताम्राक्षो भृकुटीकुटिलानन ।
अहो मदावलेपोऽयमसाराणा दुरात्मनाम् ।।२२
कौरवाणा महीपत्वमस्माक किल कालजम् ।
उनसेनस्य ये नाज्ञा मन्यन्तेऽद्यापि लवनम् ॥२३
उग्रसेन समध्यास्ते सुधर्मा न शचीपतिः ।
धिमानुपशतोच्छिष्टे तुष्टिरेपा नृपासने ।।२४
पारिजाततरो पुष्पमञ्जरीवनिताजन ।
विभर्ति यस्य भृत्याना सोऽप्येषा न महीपति ।।२५
समस्तभूभृता नाथ उग्रसेनस्स तिष्ठतु ।
प्रद्य निष्कौरवीमुर्वी कृत्वा यास्यामि तत्पुरोम् ॥२६
कर्ण दुर्योधन द्रोणमद्य भीष्म सबाह्निकम् ।
दुरशासनादीन्भूरि च भूरिश्रवसमेव च ।।२७
सोमदत्त शल चैव भीमार्जुनयुधिडिरान् ।
यमौ च कोरवाश्वान्यान्हत्वा साश्वरथद्विपान् ।।२८
वीरमादाय त साम्ब सपत्नीक तत पुरीम् ।
द्वारकामुग्रसेनादीगत्वा द्रक्ष्यामि वान्धवान् ।।२६
अथ वा कौरवावास समस्तै कुरुभिस्सह ।
भागीरथ्या क्षिपाम्याशु नगर नागसाह्वयम् ॥३०
बलरामजी की भ्रकुटी टेढी और पांसे लाल हो गई, उन्होंने कहा-
यह दुरात्मा कौरव राजमद मे कैसे उन्मत्त होगये हैं ? वह समझते हैं कि हमारा
भूपालत्व स्वय ही सिद्ध है, इसीलिये महाराज उनसेन की प्राजा का तिरस्कार
कर रहे हैं ॥२२-२३॥ प्राज महाराज उग्रसेन उस सुपर्मा सभा मे बैठते हैं,
जिसमे इन्द्र भी नहीं बैठ सकते । इन उच्छिष्ट सिंहासन पर बैठने वाले कौरवो
को धिक्कार है ।।२४।। जिनके भृत्यो की पत्नियां पारिजात पुप्पो से शृङ्गार
घरती है, वह महाराज उग्रसेन इनके लिये प्रादरणीय नही है ? ।।२५।। वही
उग्रसेन सव राजामो के सिरताज बन कर रहेगे। आज मैं अकेला ही इम
पृथिवी वो कौरवों से शून्य करवे उनको द्वारकापुरी को लोटूगा ।।२६।। वर्ण,
?

१२२ ] [ श्रीविष्णु पुगण मे दुर्योधन, द्रोण, भीष्म, बाहिक, दु गामन, भूपि, भूरिश्रया, सोमदत्त, शल, भीम, अर्जुन, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवादि जितने भी कौरव हैं उन सबका सेना-महित वध करके और पत्नी सहित साम्ब को लेकर ही मैं द्वारका को लौटूगा ॥२७- २८ २६ । अथवा सय कोरयो सहित उनके हस्तिनापुर को ही मैं प्राज गङ्गा डुबाये दे रहा हूँ॥३०॥ इत्युक्त्वा पदरताक्ष कर्षणाधोमुख लम् । प्राकारवप्रदुर्गस्य चर्प मुसलायुध १३१ प्राणित तत्सहसा ततो वै हास्तिन पुरम् । दृष्ट्वा समुन्धहृदयाश्चुक्षुभ सर्वकौरवा ॥३२ राम राम महाबाहो क्षम्यता क्षम्यता त्वया । उपसहियता कोप प्रसीद मुसलायुध ॥३३ एप साम्बस्सपलीकस्तव निर्यातितो बल । अविज्ञातप्रभावारणा क्षम्यतामपराधिनाम् ॥३४ ततो निर्यातयामासुस्साम्व पत्नीसमन्वितम् । निष्कम्य स्वपुरात्तर्ण कौरवा मुनिपुङ्गव ॥३५ भीष्मद्रोणपादीना प्रणम्य वदता प्रियम् । क्षान्तमेव मयेत्याह वलो बलवता वर ॥३६ प्रयाप्याणिताकार लक्ष्यते तत्पुर द्विज । एप प्रभावो रामस्य बलशौर्योपलक्षण ॥३७ ततस्तु कौरवास्साम्ब सम्पूज्य हलिना मह । प्रेपयामासुरुद्वाहयनमासमन्वितम् ॥३८ थी पराशरमी ने कहा- यह कहकर बनरामजी ने हस्तिनापुर के पाई और दुर्ग के सहित पावार मूर मे हल वो नोक को लगाकर उसे खीया ॥३१॥ उससे सम्पूर्ण नगर कापने लगा यह देखकर समस्त रोरख भयभीत होगप ॥३२॥ उन्होंने यहा~हे बलराम हे महावाहो। हम शमा परो । पाने क्रोध को शान्त करके प्रस: होपो ॥३३|| हम इस साम्य को इमी भार्या में सहित आपको सौपते हैं। मापया प्रभाव न जाने से यारण हमम जो मपराय पञ्चम अश-अ० ३५ ] [ ३२३ बना है, उसे क्षमा करिये ॥३४॥ श्री पराशरजी बोले-हे मुनिवर 1 कौरवो ने साम्ब को पत्नी सहित बलरामजी के पास लाकर सौप दिया नब भीष्म द्रोण, कृप आदि से बलरामजी ने कहा कि अच्छा, क्षमा करता है ॥३५-३६।। हे द्विज | हस्तिनापुर अब भी कुछ झुका हुआ-सा दिखाई देता है, यह बलरामजी की वीरता का प्रभाव समझो ॥३७॥ फिर पौरवो ने बलरामजी सहित साम्ब का पूजन कर बहुत सी दात और भार्या के सहिन द्वारका के लिये विदा 1 किया ॥३८॥ छत्तीसवां अध्याय मैनेयतद्बल तस्य बलस्य बलशालिन । कृत यदन्यत्तेनाभूत्तदपि श्रूयता त्वया ॥१ नरकस्यासुरेन्द्रस्य देवपक्षविरोधिन । सखाभवन्महावीर्यो द्विविदो वानरर्षभ ॥२ वैरानुबन्ध बलवान्स चकार सुरान्प्रति । नरक हतवान्कृष्णो देवराजेन चोदित ॥३ फरिप्ये सर्वदेवाना तस्मादेतत्प्रतिक्रियाम् । यज्ञविध्वसन कुर्वन् मर्त्यलोकक्षय तथा ॥४ ततो विध्वसयामास यज्ञानज्ञानमोहित । विभेद साधुमर्यादा क्षय चक्रे च देहिनाम् ॥५ ददाह सवनान्देशा-पुग्णामान्तराणि च । क्वचिच्च पर्वताक्षेपामादीन्समचूर्णयत् ।।६ शैलानुत्पाट्य तोयेषु मुमोचाम्यूनिधौ तथा । पुनश्वार्णवमन्यस्य क्षोभयामास सागरम् ।।७ श्री पराशरजी ने कहा है मैनेयजी । बरामजी का ऐसा ही प्रभाव था, मव उनके अन्य यौ यो सुनो ॥१॥ देवतामो ये द्रोही नसामुर का मित्र ३२४ ] । श्रीविष्णु पुराण द्विविद नामा एक अत्यन्त धनी बन्दर था ॥२॥ इद्र की प्रेरणा से श्रीकृष्ण न नरवार को मारा था, इसीलिये द्विविद ने देवताना से साना ठान ली ॥३॥ मैं मत्यंनो यो क्षौण यर यादि यो बन्द कर दूंगा, इमरी देवनामो मे बदला ले लिया जयगा ॥४॥ ऐसा निश्चय पर वह यज्ञो को विषस करन, साघुप्रो की मर्यादा को नष्ट करन और पारीर धारियों को मारन लगा ॥शा वह वन, देश, पुर और ग्रामादि को भस्म करना या उन पर पर्वतादि को गिरा देता है ।।६।। वी ममुद्र में पर्वत-शिला पंक्ता तो वभी समुद्र में घुमकर उसमे क्षोभ उत्पन्न करता है ॥७॥ तेन विक्षोभितश्चाधिरढेलो हिज जायते । प्लारयस्तीरजान्ग्राभान्पुरादीनतिवेगवान् ।। कामरूपी महारूप कृत्वा सस्यान्यशेषत । लुठन्ध्रमणसम्मदस्मञ्चूर्णयति वानरः ॥ तेन विप्र कृत सर्व जगदेतदुरात्मना । निस्म्वाध्यायवपट्कार मंत्रेयासीत्सुदु खितम् ॥१० एकदा रेवतोद्याने पपो पान हलायुध । रेवती च महाभागा तथैवान्या वरस्त्रिय ॥११ उद्गीयमानो विलसल्ललनामोलिमध्यग । रेमे यदुकुलश्रेष्ठ कुबेर इव मन्दरे ।।१२ ततस्स वानरोऽन्येत्य गृहोत्वा सीरिणो हलम् । मुसल च चकारास्य सम्मुख च विडम्बनम् ।।१३ तथैव योषिता तासा जहासाभिमुख कपि । पानपूर्णाश्च करकाश्चिक्षेपाहत्य वै तदा ।।१४ तब वह क्षुभित हुना समुद्र अपने सटवर्ती ग्राम प्रादि को दुबा देता 141) जब वह कामरूपी बन्दर विशाल रूप धारण कर खेतो पर लेट जाता तब सभी धान्यो को कुचल कर नष्ट कर देता है।।६॥ उस पापी ने सम्पूर्ण विश्व को यज्ञ और स्वाध्याय से विमुग कर दिया इससे दुखो की अत्यन्त वृद्धि हुई 1१०॥ एक दिन बलरामजी रैवतोद्यान में रेवती और अन्य सुदरिया के साथ पचम प्रश-प्र० ३६ ) [ ३२५ बैठे हुए मा पो रहे थे ॥११॥ मन्दराचल पर वुवेर के क्रीडा करने के समान ही स्त्रियो द्वारा गायन-वादन चलने पर उतो मध्य मे सुशोभित थे ॥१२॥ उसी समय यहाँ यह हिदि नाम का बन्दर प्रागया और बलरामजी ये हल-मूसल उठा कर उनकी नकल बनाने लगा ॥१॥ फिर उसने मदिरा के घडे को फोड पंगा और प्रियो यी पोर घर-पूर कर हमने लगा ॥१४॥ तत. कोपपरीतात्मा भसंयामास त हली। तथापि तमवज्ञाय चर किलकिलध्य निम् ॥१५ तत. स्मयित्वा स वनो जग्राह मुमलं रपा । मोऽपि शलशिला भीमा जग्राह प्लवगोत्तमः ॥१६ निक्षेप स च ता क्षिमा मुसलेन सहस्रधा । विभेद यादवथ एम्सा पपात महीतले ।।१७ प्रय तन्मुमल चामो समुल्लवप प्लवङ्गम । वेगेनागस्य रोपेश करेगारम्यताडयत् ॥१८ ततो धसेन योपैन मुष्टिना मूनि ताहित.। पपान पिरोदगारी विविद क्षीणजीवित ॥१६ पाता तरीरंग गिरामनीयंत ।

३२६ ]. [ श्रीविष्णु पुराण रामजी पर फेंकी तो उन्होंने अपने मूसल से उसके हजारो सएड करके पृथिवी पर गिरा दी ।।१७। तब बन्दर ने बलरामजी के मूसल की मार से बचकर उनकी छाती मे बडे वेग से मुष्टिका का प्रहार किया ॥१८॥ तब उन्होंने क्रोध पूर्वक उस वन्दर के सिर मे धूसा मार कर पृथिवी पर गिरा दिया और वह रक्त वमन करता हुआ समाप्त होगया ॥१६॥ उस बन्दर के गिरने से, जैसे इन्द्र के वच से पर्वत विदीर्ण होते हैं, वैसे ही पर्वत-शिखर के सैकड़ों खएड होगये ॥२०॥ उस समय देवताग्रो बलरामजी पर पुष्प वृष्टि करते हुए उनकी स्तुति की ।।२१।। उन्होने कहा कि जगत् को घोर त्रास देने वाला यह दुष्ट बन्दर माज अापके द्वारा नष्ट होगया, यह कितने सौभाग्य की बात हुई है, यह कहते हुए सभी देवगण प्रसन्न होते हुए स्वर्गलोक को गये ॥२२-२३॥ श्री पराशरजी कहा-शेपावतार श्री बलरामजी के ऐसे असख्य कर्म हैं, जिनकी गणना सम्भव नहीं है ॥२४॥ सैंतीसवाँ अध्याय एवं दैत्यवधं कृष्णो बलदेवसहायवान् । चक्र दुष्टक्षितोशानां तथैव जगतः कृते ॥१ क्षितेश्च भारं भगवान्फाल्गुनेन समन्वितः । अवतारयामास विभुस्समस्ताक्षौहिणीवधात् ।।२ कृत्वा भारावतरणं भुवो हत्वाखिलान्नृपान् । शापव्याजेन विप्रारणामुपसंहृतवान्कुलम् ॥३ उत्सृज्य द्वारकां कृष्णस्त्यक्त्वा मानुष्यमात्मनः । साशो विष्णुमय स्थान प्रविवेश मुने निजम् ॥४ स विप्रशापव्याजेन संजह स्वकुलं कथम् । कथं च मानुष देहमुत्ससर्ज जनार्दनः ॥५ विश्वामित्रस्तथा कण्वो नारदश्च महामुनिः। पिण्डारके महातीर्थे दृष्ट्वा यदुकुमारकः ।।६ स पश्रम मश-०३७ ] [ २२७ ततस्ते यौवनोन्मत्ता भाविकार्यप्रचोदिता । साम्य जाम्बवतीपूत्र भूपयित्वा स्त्रिय यथा ॥७ प्रथितास्तान्मुनीनूचु प्ररिगपातपुरम्सरम् । इय स्त्री पुत्रकामा वै व्रत कि जनपिप्यति ॥ श्री पराशरजी ने पहा-इरा प्रभार लोकहितपी बलरामजी के सहित भगवान् श्रीकृष्ण ने दैत्यो और राजामों का सहार पिया ॥१॥ फिर पर्जुन में साथ मिलर उन्होंन पठारह प्रक्षौहिणी सेना को नष्ट पर भू-भार उतार दिया ॥२॥ इस प्रकार सब राजाओ का मसन्य राहार कर उन्होंी ग्राह्मणो में पाप ये यहाने से अपने पुल का भी उपमहार दिया ॥३॥ हे मुने । अन्न मे उन्होंने दारयापुरी और अपने मानव देह के परित्याग पूर्व अपने प्रा सहित स्यधाम में प्रवेश रिया ॥४॥ श्री मैत्रेयजी न रहा है ग्रह्मन् । भोरप्य ने अपने पुल पा उपगहार किस प्रकार दिया और मंग अपने मानव शरीर का रयाग दिया । ॥५॥ श्री पराशरजी ने कहा-एर बार यादयो के वानको गे पिएटारर क्षेत्र में विवामित्र, वएव पोर नारदादि महपियो को देगा ॥६॥ पर उन्होंने जाम्ययती ये पुत्र साम्य को नोन्येग में मजापर उन मुनियों से प्रगाम पूर पूछा कि 'इस पुत्र की इच्छा है तो यताइये इगरे क्या उत्पन्न होगा 100 दिप्यमानीपपन्नास्ते विप्रलव्याः पुमारय । मुनय युपिता प्रानुमुंगल जनयिष्यनि । सर्वमास्वमहारपारण भुवनोनरम् । पेनागितामोल्गादी यादवाना भविष्यति ।।१० परयुगापुमागम्नु पाचचभुर्यथातयम् । उमगेनाय मुगल जग माग्यग्य गोदरात ॥११ जोरराशिम तमोम्पो १२ गुमास्ताप मोर गणितम्य तु यावं.। गष्ट पूगिर सनो मतोमराशि २२० ] { धीविषणु पुराण तदप्यम्वुनिधौ क्षित मत्स्यो जग्राह जालिभिः । धातितस्योदरात्तस्य लुब्धो जग्राह ताराः ॥१४ विज्ञातपरमार्थोऽपि भगवान्मधुसूदनः । नच्छत्तदन्यथा क्तु विधिना यत्समीहितम् ।।१५ श्री पराशरजी ने कहा-यादव-बालको की हंसी को ताड फर उन महपियो ने क्रोधपूर्वक कहा-इसके यूसल उत्पन्न होगा जो सब ओर से यादवो के नाश का कारण हो जायगा ।।९-१०।। मुनियो के ऐसा कहने पर उन बालको ने राजा उग्रसेन को जाकर सब वृत्तान्त यथावद सुनाया ॥११॥ उग्रसेन ने उस मूसल का चूर्ण कराकर समुद्र में फिकवा दिया, जिससे बहुत से सरकंडे उत्पन्न होगये ॥१२॥ उस मूसल का भाले की नोक जैसा एक भाग चूर्ण करने से रह गा, उसे भी समुद्र में डलवा दिश था, उस भार को एक मछली ने निगल लिया। मछेरो द्वारा पकड़ी गई उस मछलो के चीरने पर निकला हुआ मूसन का वह टुकड़ा बरा नामक व्याध ने उठा लिया ॥१३-१४।। श्रीकृष्ण इन सब वातो को जानते थे, परन्तु उन्होंने विधाता के विधान मे हस्तक्षेप करना उचित नही समझा ॥१५॥ देवश्च प्रहितो वायु: प्रणिपत्याह केशवम् । रहस्येवमह दूतः प्रहितो भगवन्सुरै ॥१६ वस्वश्विमरुदादित्यरुद्रसाच्यादिभिस्सह । विज्ञापयति शास्त्वां तदिद ध यतां विभो ।।१७ भारावतरणार्थाय वर्षाणामधिक शतम् । भगवानवतीर्णोऽन विदशैस्सह चोदित ॥१८ दुवृत्ता निहता दंत्या भुवो भारोऽवतारित । त्वया सनाथास्निदशा भवन्तु त्रिदिवे सदा ॥१६ तदतीतं जगन्नाथ वाणामधिक शतम् । इदानी गम्यता स्वगों भवता यदि रोचते ॥२० देवविज्ञाप्यते देव तथात्रय रतिस्तव । तत्स्थीयता यथाकालमाख्येयमनुजीविभि ।।२१ नहीं घट सकता, इसलिये सात रात के भीतर ही मैं तुम्हारे हे अनुसार करूगा ।।२३।। इस द्वारकापुरी की भूमि मैंने समुद्र से मांगी थी, इसलिये इसे पञ्चम अश-प्र० ३७ ] [ ३२६ इसी अवसर पर देवतानो द्वारा भेजे गये वायु ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करके कहा-हे प्रभो ! मुझे दूत-रूप से देवतानो ने आपके पास भेजा है ॥१६॥ हे विभो । वसुगण, अश्विनी द्वय, रुद्र, प्रादित्य, मरुत् और साध्यादि देवतानो की सहमति से इन्द्र के भेजे सन्देश को सुनिये ॥१७॥ देवतानो की प्रार्थना पर उनके साथ ही पृथिवी पर भू-भार हरणार्थ उद्भूत हुए सौ वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुके हैं ॥१८॥ आपने दैत्यो को मार कर पृथिवी का भार उतार दिया, इसलिये अब सब देवता आपके सहित स्वर्गलोक मे ही सनाथ करे ॥१६॥ हे जगदीश्वर | पृथिवी पर आये हुए आपको सौ वर्ष से अधिक होगये, अब यदि इच्छा हो तो आप स्वर्गलोक को पधारें ॥२०॥ हे देव । उन्होने यह भी कहा है कि आप वही रहना चाहे तो रहें, सेवको का कर्तव्य तो निवेदन करने का ही है ॥२१॥ यत्वमात्थाखिल दूत वेम्येतदहमप्युत । प्रारब्ध एव हि मया यादवाना परिक्षय ॥२२ भुवो नाद्यापि भारोऽय यादवैरनिहित । अवतार्य करोम्येतत्सप्तरात्रेण सत्वर ॥२३ यथा गृहीतामम्भोधेर्दत्त्वाह द्वारकाभुवम् । यादवानुपसहृत्य यास्यामि त्रिदशालयम् ॥२४ मनुष्यदेहमुत्सृज्य सङ्घर्पणसहायवान् । प्राप्त एवास्मि मन्तव्यो देवेन्द्रण तथामरै ॥२५ जरासन्धादयो येऽन्ये निहता भारहेतव । क्षितेस्तेभ्य कुमारोऽपि यदूना नापचीयते ॥२६ तदेत सुमहाभारमवतार्य क्षितेरहम् । यास्याम्यमरलोकस्य पालनाय ब्रवीहि तान् ॥२७ ने कहा-हे दूत । तुम्हारी बात ठीक है, मैंने यादवो के नाश का उपाय कर दिया है ॥२२॥ इन यादवो के रहते हुए पृथिवी याबोर श्री भगवान् [ श्रीविष्णु पुराण उसको लौटाकर और यादवों को नष्ट कर स्वर्ग को प्रस्थान करूंगा ॥२४॥ प्रव सब देवतानो और इन्द्र को यह बता देना कि बलरामजी के सहित मुझे स्वर्ग में पहुंचा हुआ ही समझो ।।२५।। पृथिवी के बोझ स्वरूप जरासन्ध प्रादि जो राजा नष्ट हुए हैं, यह यदुवंशी भी उनसे किसी प्रकार न्यून नही है ॥२६॥ इस. लिये देवताओ से कहना कि पृथिवी का बोझ उतार कर ही शीघ्र ही स्वर्गलोक मे प्राकर उसका पालन करूगा ।।२७॥ इत्युक्तो वासुदेवेन देवदूतः प्रणम्य तम् । मैत्रेय दिव्यया गत्या देवराजान्तिकं ययौ ॥२८ भगवानप्यथोत्पातान्दिव्यभीमान्तरिक्षजान् । ददर्श द्वारकापुर्या विनाशाय दिवानिशम् ॥२६ तान्दृष्ट्वा यादवानाह पश्यध्वमतिदारुणान् । महोत्पाताञ्छमार्यपा प्रभास याम मा चिरम् ॥३० एवमुक्त तु कृष्णेन यादवप्रवरस्ततः । महाभागवतः प्राह परिणपत्योद्धवो हरिम् ॥३१ भगवन्यन्मया कार्य तदाज्ञापय साम्प्रतम् । मन्ये कुलमिदं सर्व भगवान्सहरिष्यति ॥३२ नाशायास्य निमित्तानि कुलस्याच्युत लक्षये ॥३३ श्री पराशरजी ने कहा-हे मैत्रेयजी ! श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर वायु उन्हें प्रणाम करके चल दिये और तुरन्त ही इन्द्र के पास पहुंचे ।।२।। इधर द्वारकापुरी में नाम सूचक दिव्य, पार्थिव और अन्तरिक्ष सम्बन्धी धोर उत्पात होते दिखाई पडे ॥२६॥ तव भगवान ने यादवो से कहा कि यह पोर उपद्रव हो रहे हैं, प्रभास क्षेत्र मे चलकर इनकी शान्ति का उपाय करें ॥३०॥ श्री पराशरजी ने कहा-भगवान् की बात सुनकर उद्धवजी ने उन्हें प्रणाम करके कहा-हे प्रभो ! अब आपकी इच्छा से इस कुल का नारा होता दिखाई देता है, सब भोर ऐसे ही अपराकुन हो रहे हैं, इसलिये मुझे जो वरना हो, वह भाज्ञा मोजिए॥३२-३३॥

पञ्चम प्रश-प्र० ३७ ] [ ३३१ गच्छ त्वं दिव्यया गत्या मत्प्रसादसमुत्यया । यद्वदर्याश्रमं पुण्य गन्धमादनपर्वते। नरनारायणस्थाने तत्पवित्रं महीतले ॥३४ मन्मना मत्प्रमादेन तत्र सिद्धिमवाप्स्यसि । अहं स्वर्ग गमिष्यामि ह्य पसंहृत्य वै कुलम् ॥३५ द्वारकां च मया त्यक्ता समुद्रः प्लावयिष्यति । मद्व श्म चैकं मुक्त्वा तु भयान्मत्तो जलाशये । तत्र सन्निहितश्वाह भक्तानां हितकाम्यया ॥३६ इत्युक्तः प्रणिपत्यनं जगामाशु तपोवनम् । नरनारायणस्थान केशवेनानुमोदितः ॥३७ ततस्ते यादवास्सर्वे रथानारुह्य शीघ्रगान् । प्रभास प्रययुस्साद्ध कृष्णरामादिभिद्विज ॥३८ प्रभासं समनुप्राप्ताः कुकुरान्धकवृष्णयः । चक स्तत्र महापानं वासुदेवेन चोदिताः ।।३६ पिवतां तत्र चेतेपा सङ्घर्पण परस्परम् । अतिवादेन्धनो जज्ञे कलहाग्निः क्षयावहः ।।४० श्री भगवान् ने कहा-हे उद्धव ! अब तुम मेरी कृपा से प्राप्त हुई दिव्य गति से गन्धमादन पर्वत के बदरिकाश्रम मे जानो, वह सबसे पवित्र क्षेत्र है ॥३४॥ वहाँ मुझमे अनन्य चित्त रखने से तुम्हे सिद्धि प्राप्त होगी। अब मुझे भी यदुकुल के नष्ट होने पर स्वर्गलोक को प्रस्थान करना है ॥३५॥ मेरे यहाँ से जाते ही समुद्र द्वारका को अपने जल मे विलीन कर लेगा, परन्तु केवल भवन ही शेष रह जायगा, जिसमे भक्तो के हितार्थ मे सदा निवास करता हूँ ॥३६॥ श्री पराशरजी ने कहा-भगवान् को प्राज्ञा सुनकर उद्धवजी ने उन्हें प्रणाम किया और तुरन्त ही बदरिकाश्रम चले गये ॥३७॥ फिर कृष्ण बल- रामादि सब यादव रथो पर चढ कर प्रभास क्षेत्र गये ॥३७॥ वहां पहुच कार श्रीकृष्ण की प्रेरणा से सभी यादवो ने महापान किया रिहा पान करते समय उनमे कुछ विवाद हो गया, जिससे कलहाग्नि धधकने लगी ।।४।।

[ श्रीविष्णु पुराण
स्व स्व वै भुञ्जता तेषा कलहः
किनिमित्तक.।
सङ्घर्पो वा द्विजथेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ।।४१
मृष्ट मदीयमन ते न मृप्टमिति जल्पताम् ।
मृप्टामृप्टकथा जज्ञे सङ्घपंकलही तत. ॥४२
ततश्चान्योन्यमभ्येत्य क्रोधसरक्तलोचनाः ।
जघ्नुः परस्परं ते तु शस्त्रैर्देववलात्कृताः ॥४३
क्षीणशस्त्राश्च जगृहु प्रत्यासन्नामथैरकाम् ।।४४
एरका तु गृहीता वै वनभूतेव लक्ष्यते ।
तया परस्पर जघ्नुस्सप्रहारे सुदारुणे ।।४५
प्रद्युम्नसाम्वप्रमुखाः कृतवर्माथ सात्यकिः ।
अनिरुद्धादयश्चान्ये पृथुविपृथुरेव च ॥४६
चारुवर्मा चास्कश्च तथाक रादयो द्विज ।
एरकारूपिभिर्वचस्ते निजघ्नु परस्पस्म् ।।४७
निवारयामास हरिर्यादवास्ते च केशवम् ।
सहाय मेनिरेऽरीणा प्राप्त जघ्नु परस्परम् ॥४८
श्री मैनेयजी ने कहा-हे द्विजवर ! भोजन करते हुए उन यदुवंशियो
में कलह क्यो हुआ ? यह बतलाइये ॥४१॥ श्री पराशरजी ने कहा-मेरा
पदार्थ शुद्ध है, तेरा भोजन ठीक नहीं, इसी प्रकार विवाद करते हुए उन यादवो
मे सघर्ष होने लगा ।।४२।। तब वे देवी प्रेरणा से परस्पर मे शस्त्र प्रहार करने
लगे और जब शस्त्र भी समाप्त हो गये तो उन्होने निकटवर्ती क्षेत्र से सरकण्डे
ग्रहण किये ॥४३-४४॥ दे सरकडे वच्च जैसे लग रहे थे, उन्ही के द्वारा वे
परम्पर मे आधात-प्रत्याघात करने लगे ॥४५।। प्रद्युम्न तथा साम्बादि कृष्णसुत
कृतवर्मा, सात्यकि, अनिरुद्ध, पृथु, विपृथु, चारुवर्मा, चारुक और मक र आदि
यादव उन्ही सरक्डो का परस्पर प्रहार कर रहे थे ॥४६-४७।। जब श्रीकृष्ण ने
उ हे निवृत्त करना चाहा तो वे उन्हे प्रतिपक्षी का सहायक समझ कर परस्पर
प्रहार करने से न रुके ॥४८॥

पञ्चम प्रश-प्र० ३७ ]
[ ३३३
कृष्णोऽपि कुपितस्तेषामेरकामुष्टिमाददे ।
वधाय सोऽपि मुसल मुष्टिलौहमभूतदा ।।४६
जघान तेन निश्शेपान्यादवानाततायिनः ।
जानुस्ते सहसाभेत्य तथान्येऽपि परम्परम् ।।५०
ततश्चार्णवमध्येन जैमोऽसौ चक्रिणो रथः ।
पश्यतो दारुस्स्याथ प्रायादश्वैधृतो द्विज ॥५१
चक्र गदा तथा शाङ्ग तूणी शवोऽसिरेव च ।
प्रदक्षिण हरिं कृत्वा जग्मुदरादित्यवर्मना ॥५२
क्षणेन नाभवत्कश्चिद्यादवानामघातित ।
ऋते कृष्ण महात्मान दारुक च महामुने ।।५३
चड कम्यमाणो तो राम वृक्षमूले कृतासनम् ।
ददृशाते मुखाच्चास्य निष्कामन्तं महोरगम् ।।५४
निष्कम्य स मुखात्तस्य महाभोगो भुजङ्गम ।
प्रययावर्णव सिद्ध पूज्यमानस्तथोरग ।।५५
ततोऽयं मादाय तदा जलधिस्सम्मुख ययौ ।
प्रविवेश ततस्तोय पूजित पन्नगोत्तम ॥५६
इस पर क.द हुए श्रीकृष्ण ने भी एक मुट्ठी भर कर सरकडे उठाये,
जो कि लोह के मूसल जैसे प्रतीत होने लगे ॥४६॥ उन सरकडो से वे सब
अाक्रमणकारी यादवो को मारने लगे और यादव-गण परस्पर भी मारने-मरने
लगे ।।५०।। फिर दारुक के देखते-देखते ही श्रीकृष्ण का जैत्र नामक रथ अश्वो
के द्वारा विचता हुअा समुद्र के मध्य मार्ग से चला गया ॥५१॥ तथा शव,
चक्र, गदा, धनुष, तरकस प्रसि प्रादि सब प्राधुध श्रीकृष्ण की परिक्रमा करके
सूर्य-पथ से चले गये ॥५२।। हे महामुने । क्षण भर मे ही श्रीकृष्ण और दारुक
के अतिरिक्त और कोई भी यादय शेप न रहा ।।५३॥ उन दोनो ने बलरामजी
वो एक वृक्ष के नीचे बैठे और उनके मुख से एक विशाल सर्प को निकलते देखा

[ श्रीविष्णु पुराण
गया ॥५५।। तभी समुद्र अध्यं लेकर ऊपस्थित हुआ और वह नागो द्वारा पूजित
सपं समुद्र में प्रविष्ट हो गया ||५||
दृष्ट्वा वलस्य निर्याणं दारक प्राह केशवः ।
इद सर्व समाचक्ष्व वसुदेवोग्रसेनयोः १५७
निर्यारणं बलभद्रस्य यादवानां तथा क्षयम् ।
योगे स्थित्वाहमप्येतत्परित्यक्ष्ये कलेवरम् ॥५८
वाच्यश्च द्वारकावासी जनस्सर्वस्तथाहुकः ।
यथेमां नगरी सर्वा समुद्रः प्लावयिष्यति ।।५६
तस्माद्भवद्भिस्सर्वस्तु प्रतीक्ष्यो ह्यजुनागम. ।
न स्थेयं द्वारकामध्ये निष्कान्ते तत्र पाण्डवे ॥६०
तेनैव सह गन्तव्यं यत्र याति स कौरवः ॥६१
गत्वा च हि कौन्तेयमर्जुनं वचनान्मम ।
पालनीयस्त्वया शक्त्या जनोऽयं मत्परिग्रहः ॥६२
त्वमर्जुनेन सहितो द्वारवत्यां तथा जनम् ।
गृहीत्वा याहि वज्रश्च यदुराजो भविष्यति ॥६३
इस प्रकार बलरामजी का महाप्रयाग देखकर दारुक से श्रीकृष्ण ने
कहा- तुम यह सम्पूर्ण वृत्तान्त उग्रसेन जी और वसुदेवजी को जाकर सुनादी
।।५७॥ बलरामजी का जाना और यादवो का नष्ट होना बता कर यह भी कहना
कि मैं भी योगस्थ होकर देह त्याग करूगा ॥५८ा सब द्वारकावासियो और
उग्रसेनजी से कहना कि समुद्र इस सम्पूर्ण नगर को अपने में लीन कर लेगा
॥५९। इसलिये जब तक अर्जुन वहाँ न पहुंचे तभी तक द्वारका मे रहे और
जहाँ अर्जुन जाय वही सब चले जाय ॥६०-६१॥ तुम अर्जुन से भी मेरा यह
सदेश कहना कि अपने सामर्थ्य के अनुसार ही मेरे परिवारीजनों की रक्षा
करना ॥६२॥ तुम सब द्वारकावासियों के सहित अर्जुन के साथ चले जाना।
फिर यदुवश का राजा वच होगा ॥६३}}
इत्युक्तो दारुकः कृष्णं प्रणिपत्य पुनः पुनः ।
प्रदक्षिणं च बहुशः कृत्वा प्रायाद्यथोदितम् ॥६४

पञ्चम अश अ०-३७ ] स च गत्वा तदा वष्ट द्वारकायां तथार्जुनम् । आनिनाय महावुद्धिर्वज चक्र तथा नृपम् ।।६५ भगवानपि गोविन्दो वासुदेवात्मकं परम् । ब्रह्मात्मनि समारोप्य सर्वभूतेष्वधारयत् ॥६६ निष्प्रपञ्चे महाभाग संयोज्यात्मानमात्मनि । तुर्यावस्थ सलोलं च शेते स्म पुरुपोत्तमः ॥६७ सम्मानयन्द्विजवचो दुर्वासा यदुवाच ह । योगयुक्तोऽभवत्पादं कृत्वा जानुनि सत्तम ।।६८ आययौ च जरानाम तदा तत्र स लुब्धकः । मुसलावशेपलोहैकसायकन्यस्ततोमरः ॥६६ स तत्पादं मृगाकारमवेक्ष्यारादवस्थितः। तले विव्याध तेनैव तोमरेण द्विजोत्तम ॥७० श्री परासरजी ने कहा-~भगवान् के वचन सुनकर दारुक ने उन्हें पारम्बार प्रणाम करके अनेक परिक्रमाएं की पोर उनकी प्राजानुसार वहां से चला गया ॥६४॥ उसने द्वारका मे पहुच कर सब वृत्तान्त सुनाया और अर्जुन को वहाँ लाफर बच को राज्यपद मे अभिषिक्त दिया ॥६५॥ इधर श्रीकृष्णा भपने प्रात्मा में परब्रह्म को पारोपित कर उनमे चित्त लगाते हुए अपने तुरीय- पर में अवस्थित होगये ॥६६-६७।। हे मुनिवर । दुर्वामाजी के वचनानुसार उन्होंने अपनी जांघो पर चरण रख कर योग युक्त समाधि लगाई ॥६८॥ तभी मूसल के पशिष्ट भाग को अपने वाण पर नोक रूप से लगाये हुए जरा नामक यह व्याघ वहाँ आया और भगवान् के चरण यो मृगाकार देस कर उसले दूरसे उन पर बाण छोड दिया ॥६९-७०॥ सतश्च ददृशे तत्र चतुर्वाधरं नरम् । प्रणिपत्याह चैवैन प्रमोदेति पुनः पुनः ७१ अजानता तमिद मपा हरिणाङ्कया। क्षम्यता मम पापेन दग्ध मा पातुमर्हसि ॥७२

३३६ ]
श्रीविष्णु पुराण
ततस्त भगवानाह न तेऽस्तु भयमण्वपि ।
गच्छ त्वं मत्प्रसादेन लुब्ध स्वर्ग सुरास्पदम् ॥७३
विमानमागत सद्यस्तद्वाक्यसमनन्तरम् ।
आरुह्य प्रययौ स्वर्ग लुब्धकस्तत्प्रसादतः ।।७४
मते तस्मिन्स भगवान्सयोज्यात्मानमात्मनि ।
ब्रह्मभूतेऽव्ययेऽचिन्त्ये वासुदेवमयेऽमले ।।७५
अजन्मन्यमरे विष्णावप्रमेयेऽखिलात्मनि ।
तत्याज मानुष देहमतीत्य विविधा गतिम् ॥७६
फिर उस व्याघ ने श्रीकृष्ण के पास पहुंच कर जैसे ही एक चतुर्भुजी
श्रेष्ठ पुरुष को देखा तो उनके चरणो मे गिरपडा और बारम्बार 'प्रसन्न होइये,
प्रसन्न होइये कहता हुप्रा बोला-मैंने मृग समझ कर ही यह अपराध कर
डाला है, आप क्षमा करके मुझ पाप से भस्म होते हुए पापी की रक्षा करिये
॥७१-७२॥ श्री परागरजी ने कहा-तू भय मत कर, तू अभी मेरी कृपा से
स्वर्गलोक को प्राप्त होगा ॥७३॥ उनके ऐसा कहते हो वहाँ एक विमान प्रागया,
जिस पर चढ वह व्याध स्वर्ग लोक को गया ॥७४॥ उसके जाने के पश्चात्
श्रीकृष्ण ने भी अपने प्रात्मा को अव्यय, अचिन्त्य, वासुदेवस्वरूप, निर्मल, अज,
अमर, अप्रमेय, सक्लास्मा तथा ब्रह्मरूप भगवान् विष्णु मे लीन कर इस मानव
देह वा त्याग कर दिया ॥७५-७६।।
अड़तीसवाँ अध्याय
अर्जुनोऽपि तदान्विष्य रामकृष्णकलेवरे।
संस्कारं लम्भयामाम तथान्येपामनुक्रमात् ॥१
अष्टौ महिप्यः कथिता रुक्मिणीप्रमुखास्तु याः ।
उपगुह्य हरेह विविशुस्ता हुताशनम् ॥२
रेवती चापि रामस्य देहमाश्लिष्य सत्तमा ।
विवेश ज्वलित वह्नि तत्सङ्गालादगीतलम् ॥३

पञ्चम प्रश-अ०३८ ] { ३३७ उग्रसेनस्तु तच्छत्वा तथैवानक्दुन्दुभि । देवकी रोहिणी चैव विविशुर्जातवेदसम् ।।४ ततोऽर्जुन प्रेतकार्यं कृत्वा तेषा यथाविधि । निश्चक्राम जन सर्व गृहीत्वा वज्रमेव च ॥५ द्वारवत्या विनिष्क्रान्ता कृष्णपन्य सहस्रश । वज्र जन च कौन्तेय पालयञ्छनकैययौ ॥६ सभा सुधर्मा कृष्णेन मर्त्यलोके समुज्झिते । स्वर्ग जगाम मैनेय पारिजातश्च पादप ७ यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिव सन्त्यज्य मेदिनीम् । तस्मिन्नेवावतीर्णोध्य कालकायो बली कलि.॥८ श्री पराशरजी ने यहा-अर्जुन ने बलराम, कृपण तथा अन्यान्य प्रमुख- प्रमुख यादवो के मृत शरीरो को दुटवा कर उनका मस्तार किया ॥१॥ श्रीकृष्ण की रक्मिणी प्रादि पाठ पटरानियो ने उनके देह का प्रालिंगन कर अग्नि-प्रवेश किया ॥२॥ रेवतीजी भी बलरामजी के देह बा मालिंगन पर उनकी चिता म प्रविष्ट होगई ॥३।। इस प्रनिष्ट समाचार वो मुनकर उप्रमेन, वमुदेव, देवकी और रोहिणी ने भी पग्नि प्रवश द्वारा अपन को नष्ट कर लिया ॥४॥ पिर अजुन ने उन सबवा भौघदहिव गम्कार किया मोर वन तथा प्राय युटुम्बिया पे सहित द्वारका से पिल प्राय ॥५श्रीकृष्ण की हजारा प िनयो मोर बच्चादि भन्यान्य बन्धुआ पो रक्षा करत हुए अर्जुन धीरे-धीरे चला लग ॥६॥ ह मैत्रेयजी ' पोषण य पृथिवी लार या छोडते ही मुधर्मा सभा और पारिजात तर भी स्वर्ग लोर का पर गय ॥७॥ जिम दित भगवान् न पृथिवी मो मोडा, उसी दिन रा महापती गलियुग पृथिवी पर उतर आया ITE प्लावयामाम ता मून्या द्वारया न मोरधि । वासुदेवगृह त्येा न प्लाययति मागर ME गातिमा-तुम न ब्रह्म म्तदद्यापि महोदधि । नित्य मन्निहितम्नत्र भगवानेगा यत ।।१० ३३८ । [ श्रीविष्णु पुराण तदतीव महापुण्य सर्वपातकनाशनम् । विष्णुश्रियान्वित स्थान दृष्ट्वा पापाद्विमुच्यते ॥११ पार्थ पञ्चनदे देशे बहुधान्यधनान्विते । चकार वास सर्वस्य जनस्य मुनिसत्तम ।।१२ ततो लोमस्समभवत्पार्थेनैकेन धन्विना । दृष्ट्वा स्त्रियो नीयमाना दस्यूना निहतेश्वरा ॥१३ ततस्ते पापकर्माणो लोभोपहृतचेतस । भाभीरा मन्त्रयामासुस्समेत्यात्यन्तदुर्मदा ॥१४ अयमेकोऽर्जुनो धन्वी स्त्रीजन निहतेश्वरम् । नयत्यस्माततिक्रम्य धिगेतद्भवता बलम् ॥१५ इस प्रकार जनशून्य हुई उस द्वारका को समुद्र ने बुवा दिया, केवल श्रीकृष्ण का भवन ही शेष रह गया ! उसम श्रीकृष्ण के सदा निवास करने से समुद्र पाज भी उस भवन को नहीं डुबा सकता ॥१०॥ वह ऐश्वर्य सम्पन्न स्थान अत्यन्त पवित्र और दर्शन मात्र से सब पापो को नष्ट करने वाला है ॥११॥ हे मुनिवर | उन सब द्वारकावासियो को अर्जुन ने धन धान्य युक्त पचनद प्रदेश मे बसा दिया ॥१२॥ उस समय अनाथ अबलानो के साथ अर्जुन को अकेले देख कर दस्युमो को लोभ हो पाया और उन पापी आमीर दस्युमो ने परस्पर मे मन्त्रणा की ।।१३-१४॥ देखो यह अर्जुन अकेला ही हमारा तिरस्कार कर इन स्त्रियो को लिये जा रहा है, इससे हमारे बल को धिक्कार है ॥१५॥ हत्वा गर्वसमारूढो भीष्मद्रोगजयद्रथान् । कर दोश्च न जानाति बल ग्रामनिवासिनाम् ॥१६ यष्टिहस्तानवेक्ष्यास्मान्धनुष्पाणिस्स दुर्मति । सनिवावजानाति कि वो वाहुभिरुन्नत ॥१७ ततो यष्टिप्रहरणा दस्यवो लोप्टचारिणः । सहस्रशोऽभ्यधावन्त त जन निहत्तेश्वरम् ॥१८ ततो निर्भय॑ कौन्तेय प्राहाभोरान्हसन्निव । निवर्तध्वमधर्मज्ञा यदि न स्थ मुमूर्षव ॥१६ पञ्चम अंश-अ० ३८ ] [ ३३६ अवज्ञाय वचस्तस्य जगृहस्ते तदा धनम् । स्त्रीधन चैव मैत्रेय विष्वक्सेनपरिग्रहम् ।।२० ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजर युधि । आगेपपितुमारेभे न शशाक च वीर्यवान् ।।२१ चकार सज्य कृच्छाच्च तच्चाभूच्छिथिल पुन । न सस्मार ततोऽस्त्राणि चिन्तयन्नपि पाण्डव. ॥२२ भीष्म, द्रोण, जयद्रथ और कर्ण आदि का वध करके ही यह इतना गर्वीला होगया है कि हम ग्रामीणो को कुछ नही समझता ॥१६॥ हमारे हाथो मे लाठी होने पर यह हमे धनुष दिखा रहा है, तो हमारी विशाल भुजानो से क्या प्रयोजन है ? ॥१७॥ ऐसा विचार करके उन हजारो लुटेरो ने उन अनाथ द्वारकावासियो पर लाठियो और पत्थरो से आक्रमण कर दिया ॥१८॥ तब अर्जुन ने ललकार कर उनसे कहा-अरे पापियो । अगर जीवित रहना चाहते हो तो यहाँ से तुरन्त लौट जायो ।।१६ । परन्तु हे मैत्रेयजी | दस्युमो ने उनकी बात पर ध्यान न देकर श्रीकृष्ण की स्त्रियो और सम्पूर्ण धन को उन्होने जीत लिया ॥२०॥ तब अर्जुन अपने गाण्डीव धनुप को चढाना चाह कर भी न चढा सके ॥२१॥ जैसे तमे करके प्रत्यचा चढा ली तो उनके अङ्ग शिथिल होगये और उन्ह अपने अस्त्रो की याद ही न आई ॥२२॥ शरान्मुमोच चैतेपु पार्थो वैरियमपित । त्वरभेद ते पर चक्रुरस्ता गाण्डीवधन्विना ।।२३ वह्निना येऽक्षया दत्तारशरास्तेपि क्षय ययु । युद्धयतस्सह गोपालरर्जुनस्य भवक्षये ॥२४ अचिन्तयच्च कौन्तेय कृष्णस्यैव हि तद्बलम् । यन्मया शरसङ्घातस्सकला भूभृतो हता ॥२५ मिषत पाण्डुपुत्रस्य ततस्ता प्रमदोत्तमा । भाभीरैरपकृष्यन्त काम चान्या प्रदुद्दु ॥२६ ततश्शरेपु क्षीणेपु धनुष्कोट्या धनञ्जय । जघान दस्यू स्ते चास्य प्रहाराञ्जहसुमुने ।।२७ [ श्रीविष्णु पुराण प्रेक्षतस्तस्य पार्थस्य वृष्ण्यन्धकवर स्त्रियः । जग्मुरादाय ते म्लेच्छाः समस्ता मुनिसत्तम १२८ ततस्सुदुःखितो जिष्णुः कष्ट कष्टमिति ध्रुवन् । अहो भगवतानेन वञ्चितोऽस्मि रुरोद ह ॥२६ फिर उन्होने उन शत्रुप्रो पर रोप पूर्वक बाण-वर्षा की परन्तु वे बाण उन लुटेगे की त्वचा को ही बीध सके ।।२३॥ अर्जुन के उद्भव के क्षीण होने के कारण अग्नि-प्रदत्त बारण भी इस युद्ध मे नष्ट होगये ॥२४॥ तब अर्जुन विचार करने लगा कि अब तक मैंने अनेक राजाओ को परास्त किया था, वह सब श्रीकरण का ही प्रभाव था ॥२॥ अर्जुन के देखते-देखते ही उन अहीरो ने एक-एक स्त्री को घसीट घसीट कर हरण कर लिया और कोई-कोई अपनी इन्छा से हो इधर-उधर भाग निकली ॥२६॥ बालो के न रहने पर अर्जुन ने धनुप की नोक से उन्हे मारना प्रारम्भ किया, परन्तु उन लुटेरों ने उनकी और भी हंसी उडाई ॥२७॥ है मुनिवर ! उन वृष्णि और अन्धक वश की सब स्त्रियो को वे लुटेरे अर्जुन के मामने ही उठा ले गये ॥२६॥ तद्धनुस्तानि शस्त्राणि स रथस्ते च वाजिनः । सर्वमेकपदे नष्ट दानमश्रोत्रिये यथा ॥३० अहोऽतिवलवयं विना तेन महात्मना । यदसामर्थ्ययुक्तऽपि नीचवर्गे जयप्रदम् ।।३१ तौ बाहू स च मे मुष्टि. स्थान तत्सोऽस्मि चार्जुनः । पुण्येनेव विना लेन गतं सर्वमसारताम् ॥३२ ममार्जुनत्वं भीमस्य भीमत्वं तत्कृते ध्वम् । विना तेन यदाभीरंजितोह रथिनां वरः ॥३३ इत्य वदन्ययो जिष्णुरिन्द्रप्रस्थं पुरोत्तमम् । चकार तत्र राजान वज्र यादवनन्दनम् ।।३४ स ददर्श ततो व्यास फाल्गुनः काननाधयम् ।। तमुपेत्य महामार्ग विनयेनाम्यवादयत् ।।३५ पञ्चम अश-प्र०३८ । [ ३४१ यह देख कर अर्जुन अपमान दुसित होकर रोने लगे कि भगवान् ने ही मुझे ठग लिया। यह वही धनुप, वे शास्त्र, वही रथ तथा वही घोडे हैं, परन्तु व्यर्थ दान के समान यह सब निष्फल होगये हैं ॥३०॥ देव की प्रबलता देखो कि उसने इन असमर्थ और नीच अहीरो को जिता दिया । उसी मुष्टिका और उसी भुजा वाला मैं अर्जुन प्राज श्रीकृष्ण के अभाव मे सार-हीन होगया हूँ ॥३१-३२।। मेरा अर्जुनत्व उन्ही के प्रभाव से था, अहो मुझ महारथी-श्रेष्ठ को प्राज तुच्छ अहीरो ने पराजित कर दिया ॥३३॥ श्री पराशरजी ने कहा- इस प्रकार चिन्ता करते हुए अर्जुन ने इन्द्रप्रस्थ मे पाकर वण का राज्याभिषेक किया ॥३४॥ फिर उन्होने वन मे जाकर महपि व्यासजी से भेंट की और विनीत भाव से उनके चरणो मे प्रणाम किया ॥३॥ त वन्दमान चरणाववलोक्य मुनिश्चिरम् । उवाच वाक्य विच्छायः कथमद्य त्वमीदृश ॥३६ अवीरजोऽनुगमन ब्रह्महत्या कृताथ वा। दृढाशाभगदुखीव भ्रष्टच्छायोऽसि साम्प्रतम् ॥३७ सान्तानिकादयो वा ते याचमाना निराकृताः। अगम्यस्त्रीरतिर्वा त्व येनासि विगतप्रभ ॥३८ भुक्तऽप्रदाय विप्रेभ्यो मिष्टमेकोऽथ वा भवान् । कि वा कृपणवित्तानि हतानि भवतार्जुन ।।३६ कञ्चिन्नु शूर्पवातस्य गोचरत्व गतोऽर्जुन । दुष्टचक्षुर्हतो वाऽसि निश्श्रीक कथमन्यथा ॥४० स्पृष्टो नखाम्भसा वाथ घटवायुक्षितोऽपि वा। केन त्व वासि विच्छायो न्यूनैर्वा युधि निजित ॥४१ अर्जुन को चरणो मे झुके हुए देख कर महर्षि ने उनसे पूछा कि प्राज सुम ऐसे निस्तेज क्यो होरहे हो ? क्या तुम भेडो की धूलि के पीछे चले हो, या तुम्हारी प्राशा टूट गई है अथवा गुमने ब्रह्महत्या की है, जिससे ऐसे दुखी होरहे हो ॥३६-३७|| क्या तुमने किसी सन्तान-कामना याले को विवाह-याचना पर ध्यान नहीं दिया है अगम्या से समागम किया है या क्सिी कृपण का धन ! ७ [ श्रीविष्णु पुराण छीन लिया है अथवा ब्राह्मणो को दिये बिना अकेले ही पक्वान्न भोजन कर लिया है ? ॥३८-३६॥ अथवा तुमने सूप की वायु का सेवन किया है या तुम्हारे नेत्र विकृत होगये हैं अथवा किसी ने तुम पर प्रहार किया है, जिससे इस प्रकार श्रीहीन होरहे हो ॥४०॥ कही तुमने नख का जल तो नही छू लिया,या तुम्हारे ऊपर पड़े से जल के छलकने पर छोट तो नही पड गये अथवा तुम अपने से निबल पुरुष से तो नहीं हार गये ? ॥४१॥ तत पार्थो विनि श्वस्य श्रूयता भगवनिति । उक्त्वा यथावदाचष्टे व्यासायात्मपराभवम् ।।४२ यद्बल यच्च मतजो यद्वीयं य पराक्रम । या श्रीश्छाया च न सोऽस्मान्परित्यज्य हरिगत. ॥४३ ईश्वरेणापि महता स्मितपूर्वाभिमापिणा। हीना वय मुने तेन जातास्तृणमया इव 11४४ अस्त्रारणा सायकाना च गाण्डीवस्य तथा मम । सारता याभवन्मूर्तिस्स गत पुरुषोत्तम. ॥४५ यास्यावलोकनादस्मान्छीर्जय सम्पदुन्नति । न तत्याज स गोविन्दस्त्यक्त्वास्मान्भगवान्गत ||४६ भीष्मद्रोणाङ्गराजाद्यास्तथा दुर्योधनादय । यत्प्रभावेण निर्दग्धास्म कृष्णस्त्यक्तवान्भुवम् ॥४७ नियौवना गतधीका नष्टच्छायेव मेदिनी। विभाति तात नकोऽह विरहे तस्य चक्रिण ॥४८ श्री पराशरजी ने कहा-इस पर अर्जुन ने दोघ श्वास लेते हुए कहा- अपने परास्त होने का सब वृत्तान्त यथावत् सुना दिया ॥४२मजुन बोले- हमारे एकमात्र बल, तेज, वीय पराक्रम, श्री पौर कान्ति स्वरूप श्रीकृष्ण हम छाड कर प्रस्थान कर गये ॥४३॥ जो समर्थ होकर भी हमसे हरा हमपर बत. राते थे, उन हरि के बिना हम तिनरे से निर्मित हुए पुतने के समान निर्जीव होगये हैं ux मेरे दिव्यरको दिन वा गडीव साप श्रीहरि हम त्याग पर चले गये ॥४५॥ जिनकी कृपा से जय, ऐश्वर्य प्रौर उन्नति सदा पञ्चम मंश-प०३८ ] [ ३४३ हमारे साथ रही, वे गोविन्द हमें छोड़ गये ।।४६|| जिनके प्रभाव रूप अग्नि में भीष्म, द्रोण, पर्ण और दुर्योधनादि वीर भस्म होगये,उन श्रीहरि ने इस पृथियो वो छोड़ दिया ॥४७॥ उन श्रीकृष्ण के विरह में यह सम्पूर्ण पृथिवी ही विगत यौवना और कान्तिहीना लग रही है ।।४।। यस्य प्रभावाद्धीप्माद्य मय्यग्नी शलभायितम् । विना तेनाद्य कृष्णेन गोपालरस्मि निजितः ।।४६ गाण्डीवस्त्रिषु लोकेषु ख्याति यदनुभावतः । गतस्तेन विनाभीरलगुडस्स तिरस्कृतः ।।५० स्त्रीसहस्राण्यनेकानि मन्नाथानि महामुने । यततो मम नीतानि दस्युभिर्लगुडायुधः ॥५१ प्रानीयमानमाभीर: कृष्ण कृष्णावरोधनम् । हृत यष्टिप्रहरणं परिभूय बल मम ॥५२ निश्चीकता न मे चित्रं यञ्जीवामि तदद्भुतम् । नीचावमानपाड्नी निर्लञ्जोऽस्मि पितामह ।।५३ जिनके प्रभाव मे मुझ अग्नि रूप मे पडकर भीष्मारि महारथी पतंग के समान भस्म होगये थे, प्राज उन्ही के न होने पर गोपो ने मुझे जीत लिया ॥४६॥ जिनके प्रभाव से यह गाण्डीव तीनो लोको मे विख्यात था, आज उन्ही के प्रभाव यह अहीरो की लाठियो से व्यर्थ होगया ॥५०॥ हे महामुने ! श्रीकृष्ण की हजारो पत्नियां मेरे संरक्षण मे आ रही थी, उन्हें लुटेरो अपना लाठियो के बल पर ही लूट कर ले गये ॥५१॥ लाठियो से सज्जित अहीरो ने मेरे बल को तिरस्कृत कर मेरे साथ के सम्पूर्ण कृष्ण-परिवार का हरण कर लिया ॥५२॥ ऐसी अवस्था मे श्रीहीन होने का तो कोई पाश्चर्य नहीं है, परन्तु नीच पुरुषो द्वारा अपमानित होकर भी मैं अभी तक जीवित हू, यही आश्चर्य है ॥५३॥ अल ते बीडया पार्थ न त्वं शोचितुमर्हसि । अवेहि सर्वभूतेषु कालस्य गतिरीहशी ॥५४ मै [ श्रीविष्णु पुराण ३४४ ] कालो भवाय भूतानामभवाय च पाण्डव । कालमूलमिद ज्ञात्वा भव स्थैर्यपरोऽर्जुन ॥५५ नद्य समुद्रा गिरयस्सकला च वसुन्धरा । देवा मनुष्या पशवस्तरवश्च सरीसृपा ॥५६ सृष्टा कालेन कालेन पुनर्यास्यन्ति सक्षयम् । कालात्मकमिद सर्व ज्ञात्वा शममवाप्नुहि ।।५७ कालस्वरूपी भगवान्कृष्ण कमललोचन । यच्चात्थ कृष्णमाहात्म्य तत्तथैव धनजय ॥५८ भारावतारकार्यार्थमवतीर्णस्य मेदिनीम् । भाराका ता धरा याता देवाना समिति पुरा ॥५६ तदर्थमवतीरर्गोऽसौ कालरूपी जनार्दन । तच निष्पादित कार्यमशेषा भूभुजो हता ॥६० श्री व्यासजी ने कहा-हे पार्थ । लज्जा और शोक से कोई लाभ नही है, क्योकि सब भूतो मकान को गति ऐमी ही है ॥५४॥ प्राणियो की उन्नति या अवनतिकाल से ही होती है और जय-पराजय भी उसी के अधीन हैं ।।५।। नदी, समुद्र, पर्वत, पृथिवी, देवता, मनुष्य, पशु, वृक्ष तथा सर्पादि जन्तु सब काल से ही रचे जाते और उसी से क्षीण होते है । यह सब प्रपञ्च कालात्मक है-यह समझ कर शान्ति धारण करो ॥५६-५७॥ श्रीकृष्ण की जी महिमा तुमने कही है, वह उन भगवान के साक्षात् कालरूप होने के कारण सत्य हो है ॥५८॥ वे भू-भार-हरण करने के लिये ही अवतीर्ण हुए थे, क्याकि भार से आक्रान्त हुई पृथिवी एक्वार देवतामो की सभा मे गई थी ॥५६॥ उसी वे निमित्त पृथिवी पर प्राकार उन्होंने सब राजामो को मार दिया, इस प्रकार उनका उद्देश्य पूर्ण होगया ॥६०॥ वृष्ण्यन्धक्कुल सर्व तथा पार्थोपसहृतम् । न किञ्चिदन्यत्वतव्य तस्य भूमितले प्रभो ॥६१ अतो गतस्स भगवान्कृतकृत्यो यथेच्छया ।

पञ्चम मंश-०३८ ] [ ३४५ सृष्टि सगै करोत्येष देवदेयः स्थितो स्थितिम् । अन्तेऽन्ताय समर्थोऽयं साम्प्रतं वै यया गतः ॥६२ तस्मात्पाथं न सन्तापस्त्वया पाय: पराभवे । भवन्ति भावाः कालेषु पुरपारणां यतः स्तुतिः ॥६३ त्वयं केन हता भीष्मद्रोणकर्णादयो रणे । तेपामर्जुन पालोत्यः किं न्यूनाभिभवो न सः॥६४ विप्पोस्तस्प प्रभावेण यथा तेपां पराभवः । कृतस्तव भवतो दस्युम्यस्स पराभवः ॥६५ स देवेगारीराणि ममाविश्य जगस्थितिम् । फरोति सर्वभूतानां नाशमन्ते जगत्पतिः ।।६६ हे पापं ! पृपिश पौर पन्यादि गर यादयो से नष्ट हो जाने पर तो पियों पर उनका कोई रह ही नहीं गया पा III मीलिये ये स्वैग्यापूर्वक पर से पले गये । ही गृटि रपने तया जगरा पालन पोर विकास पले ॥१२गोलिये अपनी परामय पर दुगी नहीं होना चाहिये, गरि पदम काम में पुगे प्रगमनीयम यन पा॥हे पनाम मरेगे में ही भीत, होग, गंजेगे महागीरों को मार पापा, र ग उमा पानामारणी पर गये गामने पगशिलानी पा? ॥१४॥ जमे भगवान वितुरे प्रभाष ने उगरा सिर पिया पानपात्र तुम तिर होना ही मान गयो तिहार गंगाराम और कार में गहरा [ श्रीविष्णु पुराण । गृहीता दस्युभिर्याश्च भवाञ्छोचति तास्त्रिय । एतस्याह यथावृत्त कथयामि तवार्जुन ॥७० हे कुतीपुत्र । तेरे भाग्योदय के समय श्रीकृष्ण की तुझ पर कृपा और अब तेरे विपक्षियो पर उनकी कृपा हुई हैं ॥१७॥ यह कौन मानता या कि तू भीष्म सहित सब पौरवो का सहार कर डालेगा और अब इसे भी कौन मान सकता है कि तू अहीरो से पराजित हो जायगा ॥६॥ हे पार्थ । यह सब उन्ही की लीला है कि तुझ अकेले ने कौरवो का सहार कर दिया और अव तू ही अहीरो से हार गया ॥६६॥ हे अर्जुन । उन लुटेरो द्वारा हरण की गई जिन स्त्रियो के लिये तुझे शोक हो रहा है, उसका रहस्य मैं तुझसे कहता हूँ॥७॥ अष्टावक्र पुरा विप्रो जलवासरतोऽभवत् । बहून्वपगरणान्पार्थ गृणन्द्रह्म सनातनम् ।।७१ जितेष्वसुरसङ्घषु मेरुपृष्ठे महोत्सव । बभूव तन गच्छन्त्यो ददृशुस्त सुरस्त्रिय ७२ रम्भातिलोत्तमाद्यास्तु शतशोऽथ सहस्रश । तुष्टुवुस्त महात्मान प्रशशसुश्च पाण्डव ।।७३ अाकण्ठमग्न सलिले जटाभारवह मुनिम् । विनयावनताश्चैन प्ररणेमु स्तोत्रतत्परा ॥७४ यथा यथा प्रसन्नोऽसौ तुष्टुवुस्त तथा तथा । सर्वास्ता कौरवश्रेष्ठ त वरिष्ठ द्विजन्मनाम् ।।७५ प्रसन्नोऽह महाभागा भवतीना यदिध्यते । मत्तस्तव्रियता सर्व प्रदास्याम्यतिदुलभम् ॥७६ रम्भातिलातमाद्यास्त वैदिक्योऽप्सरसोऽत्र वन् । प्रसन्ने त्वय्यपर्याप्त विमस्मावमिति द्विजा ॥७७ इतरास्त्वन्न वन्विप्र प्रसन्नो भगवान्यदि । तदिच्छाम पति प्राप्तु विप्रेन्द्र पुरुषोत्तमम् ।।७८ पूर्व दाल को पाउ है-माहाण श्रेष्ठ अष्टावक्रजी भगवान् का चिन्तन पञ्चम मश-प्र० ३८] [ ३४७ करते हुए अनेक वर्षों तक जल मे स्थित रहे ॥७१। तभी दैत्यो को जीतकर देवतानो ने सुमेरु पर्वत पर एक महोत्सव किया, जिसके लिये जाती हुई रम्भा, तिलोत्तमा प्रादि हजारो देव-नारियो ने अष्टावक्रजी को देख कर उनकी स्तुति की ।।७२-७३।। उन कठ तक जल म स्थित हुए मुनिवर की देव-नारियाँ प्रत्य- न्त विनय पूर्वक स्तुति और प्रणाम करने लगी ॥७४। जिस स्तुति से दे ब्राह्मण श्रेष्ठ प्रसन्न हो सकें, वैसी स्तुति उहोने की ।।७।। इस पर अष्टावक्रजी ने कहा- हे महाभागामो | मैं तुमसे प्रसन्न हूं, अपनी इच्छा के अनुसार मुझसे वर मांग लो, दुलभ वर भी दे डागा ॥७६॥ तब उन रम्भा-तिलोत्तमा आदि अप्सरामो ने कहा-हे ब्रह्मन् | आपके प्रसन्न होने से ही हम क्या नहीं मिल गया है । ७७।। परन्तु अन्य अप्सराओ ने कहा कि यदि आप प्रसन्न हैं तो हम भगवान् विष्णु की पति रूप में कामना करती हैं ॥७॥ एव भयिष्यतीत्युक्त्वा ह्य त्ततार जलान्मुनि । तमुत्तीर्णं च ददृशुविरुप वक्र मष्टया ।।७६ त दृष्ट्वा गृहमानाना यासा हास स्फुटोऽभवत् । ताश्शशाप मुनि कोपमवाप्य कुरुनन्दन 110 यस्माद्विकृतरूप मा मत्वा हासावमानना। भवतीभि कृता तस्मादत शाप ददामि व ॥८१ मत्प्रसादेन भर्तार लब्ध्वा तु पुरुपोत्तमम् । मच्छापोपहतास्सर्वा दस्युहस्त गमिष्यथ ।।२ इत्युदीरितमावण्य मुनिस्ताभि प्रसादित । पुनस्सुरेन्द्रलोक वै प्राह भूयो गमिप्यथ ।।८३ एव तस्य मुनश्शापादष्टावक्रस्य चक्रिणम् । भरि प्राप्य ता याता दस्युहम्त सुरागना ॥८४ तत्त्वया नात्र कर्तव्यश्शोकान्पोऽपि हि पाण्डव । तेनवापिलनाथेन सवं तदुपसहतम् ।।८५ भवता चोपमहार प्रासनस्तेन पाण्डव ! वल तेजस्तया वीर्य माहात्म्य चोपसहतम् ।।६ ३४० [ श्रीविष्णु पुराण धीम्यामजी ने महा-मायाजी 'ऐगा ही होगा' कहते हुए जल से बाहर निपले, उग रामय पराभो ने उनके पाठ स्थानो में टेढ़े दारीर को देखा तो मुस से हसी टूट पड़ी पोर दिपाने पर भी छिप न सको, इससे महर्षि ने एट होमर उन्हें शाप दे दिया मि तुमने मेरे कुबड की हसी उडाई है, इस- लिये सुम भगवान विष्णु को पति रूप में पाकर भी लुटेरो द्वारा अपहृत होरोगी ॥७६.८२साधी व्यागजी बोले-इंग पर उन मप्सराओ ने मायक्रजी को पुन' प्रसन्न विया, तय मुनियर ने उनसे कहा--कि 'उसके बाद तुम्हे स्वर्ग की प्राप्ति होगी' ॥३॥ इस प्रकार मष्टावक्रजी की कृपा से उन्हे रति रूप भगवद्-प्राप्ति पोर पाप से लुटेरो द्वारा मपहरण रूप फल मिला है पाएडव | उन मसिलेश्वर ने स्वम ही सब यादव-वश को नष्ट किया है तो तुझे शोक करना उचित नहीं है ।।५फिर तुम्हारा भी अन्त काल समीप है इसलिये भगवान तुम्हारे बल, वीर्य, तेज और माहात्म्य को क्षीए कर दिया है ।।८।। जातस्य नियतो मृत्यु पतन च तथोन्नते । विप्रयोगावसानस्तु सयोग सञ्चये क्षय १८७ विज्ञाय न बुधाशोक न हर्पमुपयान्ति ये। तेषामेवेतरे चेष्टा शिक्षन्तस्सन्ति ताशा ।।८८ तस्मात्वया नरष्ठ ज्ञात्वैतभ्रातृभिस्सह । परित्यज्याखिल तन्त्र गन्तव्य तपसे वनम् II८६ तद् गच्छ धर्मराजाय निवेद्य तद्वचो मम। परश्वो भ्रातृभिस्साद्ध यथा यासि तथा कुरु ॥६० इत्युक्तोऽभ्येत्य पार्थाभ्या यमाभ्या च सहाजु नः । दृष्ट चैवानुभूत च सर्वमाख्यातवास्तथा ॥६१ व्यासवाक्य च ते सर्वे श्रुत्वार्जुनमुखेरितम् । राज्ये परीक्षित कृत्वा ययु पाण्डुसुता वनम् ॥१२ इत्येतत्तव मैत्रेय विस्तरेण मयोदितम् । जातस्य यद्यदोवंशे वासुदेवस्य चेष्टितम् ॥६३ पष्ठ अंश-ग्र० ३८ ] [ ३४६ यश्चतच्चरितं यस्य कृष्णस्य शृणुयात्सदा । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।। हे पार्थ ! जो जन्मा है, वह अवश्य मरेगा, उन्नति का पतन भी निश्चित है, सयोग से वियोग और संचय से ही व्यय होता है । ऐसा समझ कर हर्षशोक न करके बुद्धिमान् पुरुप दूसरो के लिये भी अनुकरणीय बन जाते हैं ॥९७.८८! तुम भी भव राज-पाट को त्याग कर अपने भाइयों के सहित वन में जामो NEE) अब यहाँ से जाकर युधिधिर को सब वृत्तान्त कहकर वन-गमन कर सको वैसी चेष्टा करो ॥६०॥ मुनिवर व्यास के ऐसा कहने पर अर्जुन ने सब भाइयों के पास पाकर सब वृत्तान्त यथावत् सुनाया, जिससे सब पाण्डु पुत्र परीक्षित को राज्यपद पर अभिषिक्त कर स्वय वन को चल दिये ॥११-२॥ हे मैत्रेय जी! भगवान ने यदुवश मे अवतीर्ण होकर जो-जो चरित्र किये वह सब मैंने तुम्हें सुना दिये । जो पुरुष इन चरित्रो का सुनता है, यह सभी पापो से मुक्त होकर अन्त मे विष्णुलोक को प्राप्त होता है ।।६३-६४॥ ॥ पंचम अंश समाह। षष्ठ अंश व्याख्याता भवता सर्गवंशमन्वन्तर स्थितिः। वंशानुचरित चैव विस्तरेण महामुने ॥१ श्रोतुमिच्छाम्यह त्वत्तो यथावदुपसंहृतिम् । महाप्रलयसंज्ञां च कल्पान्ते च महामुने॥२ मैत्रेय थ यतां मत्तो यथावदुपसहृतिः । कल्पान्ते प्राकृते चैव प्रलये जायते यथा ॥३ अहोरात्रं पितृणां तु मासोऽब्दस्त्रिदिवौकसाम् । चतुर्युगसहस्र तु ब्रह्मणो वै द्विजोत्तम ॥४ कृतं प्रेता द्वापर न कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यपंसहसंस्तु तद्द्वादशभिरुच्यते ॥५ चतुर्युगाण्यशेपाणि सहशानि स्वरूपत्तः । श्राद्य कृतयुगं मुक्त्वा मैत्रेयान्त्यं तथा कलिम् ॥६ प्राधे कृतयुगे सर्गो ब्रह्मणा क्रियते यथा । क्रियते चोपसंहारस्तथान्ते च कलौ युगे॥७ | धीरिया पुराण श्रीमद में ~i, arjो ! प्रान हि रमना, मन्वना पौर Ant viraiमहिमपान में हो या मामा पापात्र गुना HREE श्री परारजी ने पहा मन! HEREIT महार होगा है, उसे प्रया मोरे एग माग मा एक दिन-रासएr वर्ष पादेयापी निरामया दो बार मुमुगियों का प्रा.पा एम दिन राग in tin सत्ययुग, am पर और मतियुग-यह पारंगी है. इगमा मान बारह मार दिया। प्रपम दे गस्पयुग मोर मन पतियुग प्रतिगि शेष सय पारी युग मानानुगार एप गमान है ॥६॥रो प्रारम्भिर युग में प्रासानी गरि रचले है. यंगे मन्तिम युग में उगा राहार पर देते हैं ॥७॥ पलेस्स्वरूप भगवन्यिस्तगत महंगि। मंचतुष्पाद्भगवान्यस्मिविप्लव मृच्छति ॥ मलेःस्वरुप ममेय यद्भवायोतुमिच्छति । तग्निवोध समासेन वर्तते यन्महामुने । याश्रिमाचारवती प्रवृत्तिनं कली नृणाम् । न सामऋग्यजुर्धर्म विनिप्पादन हैतुकी ॥१० विवाहो न कलो धा न शिष्यगुरसंस्थितिः । न दाम्पत्यक्रमो नव वह्निदेवात्मकः क्रमः ॥११ या कुत्र कुले जातो बली सर्वेश्वरः कलौ। सर्वेभ्य एव वणेभ्यो योग्यः कन्यावरोधने ॥१२ येन केन न योगेन द्विजातिःक्षित. कली। यव सैव च मय प्रायश्चित कली क्रिया ॥१३ सर्वमेव कलौशाम्त यस्य यद्वचनं द्विज । देवता च कलौ सर्वा सर्वस्सर्वस्य चाथमः ॥१४ उपवासस्तथायासो वित्तोत्सर्गस्तपः कलौ। धर्मों ययाभिरुचिरेरनुष्ठानेरनुष्ठितः ॥१५ श्री मैत्रेयजी ने रहा है भगवन् ! उस कलियुग के स्वरूप को विस्तार पूर्वर कहिये, जिसमे भगवद्धर्म लुप्त हो जाता है || श्री पराशरजी ने कहा- है मैत्रेयजी ! पाप कलियुग का रूप सुनने के इच्छक हैं इसलिये उसे यथावत् सक्षेप मे श्रवण करिये । कलियुग में मनुष्यो की प्रवृत्ति वर्णाश्रम धर्म और पष्ठ अंश-प्र०१ ] [ ३५१ घेदत्रयी युक्त नहीं होती ॥१०॥ उस समय धर्म पूर्वक विवाह, गुरु-शिष्य-संबंध, दाम्पत्य जीवन का क्रम और यज्ञानुष्ठान मादि का भी लोप हो जाता है ।।११।। पलवान् ही सब का स्वामी और सभी वर्गों से कन्या-ग्रहण करने में समर्थ होता है ।।१२।। उस समय निकृष्ट उपाय 'दीक्षित' होने में और सरल दिया ही प्रायश्चित मानने में स्वीकार होगी ।।१३। जिसके मुख से जो निकल जाय वही शास्त्र तथा भूतादि देवता और सभी के लिये सब प्राधम खुले होंगे ||१४॥ उपवास, तीर्थयात्रा, धन-दान और स्वेच्छा पूर्षक अनुष्ठान ही श्रेष्ठ धर्म माने जायेंगे ॥१५॥ वित्तेन भविता पुसां स्वल्पेनादधमद कलौ । स्त्रोणां रुपमदचं वं केशैरेव भविष्यति ॥१६ सुवर्णमणिरत्नादी वस्त्रे चोपक्षयं गते । कलौ स्त्रियो भविष्यन्ति तदा केशरलङ्कृताः ।।१७ परित्यक्ष्यन्ति भरि वित्तहीनं तथा स्त्रियः । भर्ता भविष्यति कलो वित्तवानेव योपिताम् ॥१८ यो वै ददाति बहुल स्व स स्वामी मदा नृणाम् । स्वामित्वहेतुस्सम्बन्धो न चाभिजनता तथा ॥१६ गृहान्ता द्रव्यसवाता द्रव्यान्ता च तथा मति । अर्थाश्चात्मोपभोग्यान्ता भविष्यन्ति कलौ युगे ॥२० स्त्रिय. कलौ भविष्यन्ति स्वरिण्यो ललितस्पृहा. । अन्ययावाप्त वित्तेपु पुरुषःः स्पृहया नवः ।।२१ प्रथितापि सुहृदा स्वाहानि न मानवा । पणार्धा(मानेऽपि फरिप्यन्ति फलो द्विज ।।२२ समानपौरपं चेतो भावि विप्रेषु वै कलौ । क्षीरप्रदानमम्बन्धि भावि गोषु च गौरवम् ॥२३ पोडे धन मे ही धनपान होने का मभिमान पोर वालों से हो नारी- शोन्द्र का गर्व होगा ! स्व. मशि और रातादि के सभाप में देश-लापही विपो या पलंगर होगा ॥१६-१७॥ बिया पन-हीन पति का त्याग करेंगी ३५२ ] [ श्रीविष्णु पुराए - भोर धनवान् को ही अपना पति मानेगी ॥१८॥ अधिक धन देने वाला है स्वामी होगा, उस समय सम्बन्ध या कुलीनता से स्वामित्व को नहीं मान जायगा ।।१९।। सम्पूर्ण द्रव्य गृह-निर्माण में ही व्यय होता रहेगा धन सचर वाली बुद्धि होगी और सब धन अपने ही उपयोग में लाया जायगा ।।२०।। कति युग मे स्त्रियां स्वेच्छाचार पूर्वक सुन्दर पुरुष को चाहेगी, तथा पुरुपगण अन्यार पूर्वक धन ग्रहण करने की इच्छा करेंगे ॥२१॥ स्वजनो को प्रार्थना पर भी कोई एक माघ दमडी की हानि भी स्वीकार न करेगा ॥२२॥ शूद्र ब्राह्मणो से समा नता करेंगे भौर दूध देने के कारण ही गौएँ सम्मानित होगी ॥२३॥ अनावृष्टिभयप्राया प्रजा क्षुद्भयकातरा । भविष्यन्ति तदा सर्वे गगनासक्तदृष्टय ।।२४ कन्दमूलफलाहारास्तापसा इव मानवा । आत्मान घातयिष्यन्ति ह्यनावृष्टया दिदु खिता ॥२५ दुर्भिक्षमेव सतत तथा क्लेशमनोश्वरा । प्राप्स्यन्ति व्याहतसुखप्रमोदा मानवा कलौ ॥२६ अस्नानभोजिनो नाग्निदेवतातिथिपूजनम् । करिष्यन्ति कलौ प्राप्त न च पिण्डोदकक्यिाम् ॥२७ लोलुपा ह्रस्वदेहाश्च बह्वनादनतत्परा । बहुप्रजाल्पभाग्याश्च भविष्यन्ति कलौ स्त्रिय ॥२८ उभाभ्यामपि पाणिभ्या शिर कण्डूयन स्त्रिय । कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञा भेल्स्यन्त्यनादरा ॥२६ स्वपोषणपरा क्षुद्रा देहसस्कारजिता । परुषानृतभापिण्यो भविष्यन्ति कलौ स्त्रिय ॥३० दु शीला दुष्टशीलेषु कुर्वन्त्यस्सतत स्पृहाम् । असद्वृत्ता भविष्यन्ति पुरुषेषु कुलाङ्गना ॥३१ भूख से व्याकुल हुई प्रजा अनावृष्टि के भय से आकाश को ताकती रहेगी ॥२४॥ मनुष्यो को केवल कन्द, मूल, फल के सहारे रहना होगा और बहुत से अनावृष्टि से दुखित हो कर प्रात्मघात कर लेंगे ॥२५।। कलियुग में शष्ठ प्रश-अ०१ ] [ ३५३ मनुष्य इतने असमर्थ होगे कि सुख के क्षीण होने पर उन्हे दुर्भिक्ष और क्लेश की ही प्राप्ति होती रहेगी ॥२६॥ विना स्नान किये ही भोजन तथा अग्नि, देवता और अतिथि के पूजन का अभाव और पिण्डदान न करने की वृत्ति हो जायगी ॥२७॥ स्त्रियाँ विषयासक्त प्रति भोजन करने वाली, अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाली प्रभागो और छोटे देह में होगी ॥२८॥ वे अपने दोनो हाथो से सिर खुजाती हुई अपने बडो तथा पतिया के आदेश को न मानेंगी ॥२६॥ वे क्षुद्र चित्तवाली, अपनी ही उदर पूर्ति में लगी हुई, आचार-विचार मे हीन तथा कठोर और मिथ्या बचन कहने वाली होगी ॥३०॥ दुश्चरित्र पुरुपो का सङ्ग चाहने वाली, दुराचारिणी और पुरुपो से धूर्ततापूर्ण व्यवहार करने वाली होगी ॥३१॥ वेदादान करिष्यन्ति वटवश्वाकृतव्रता । गृहस्थाश्च न होण्यन्ति न दाम्यन्त्युचितान्यपि ॥३२ वानप्रस्था भविष्यन्ति ग्राम्याहारपरिग्रहा । भिक्षवश्चापि मिनादिस्नेहसम्वन्धयन्त्रणा ॥३३ अरक्षितारो हरिश्शुल्कव्याजेन पार्थिवा । हारिणो जनविताना सम्प्राप्ते तु क्लो युगे ॥३४ यो योऽश्वरथनागाढयस्स स राजा भविष्यति । यश्च यश्चावलस्सर्वस्स स भृत्य कलौ युगे ॥३५ वैश्या कृषिवाणिज्यादि सन्त्यज्य निजकर्म यत् । शुद्रवृत्त्या प्रवस्य॑न्ति पाएवर्मोपजीविन ॥३६ भैक्षवतपरा शूद्रा प्रव्रज्यालिनिनोऽधमा । पापडसश्रया वृत्तिमाथयिष्यन्ति सत्वता ॥३७ दुभिक्षरपीडाभिरतीवोपद्रु ता जना । गोधूमानयवान्नाढयान्देशान्यास्यन्ति दुखिता।३८ ब्रह्मचारी प्रतादि न करते हुए ही वेद पड़े ग मौर गृहस्य सत्पात्र को दान न देने वाले मोर हवन न करने वाले होंगे ॥३२॥ वान प्रस्थ नगर का भोजन पसन्द करेंगे और सन्यामी अपने स्नहोजनों के प्रेम म से रहेगे ||३|| [ घोवितरणपुराण पनिगम में राजागरण पर सो मे यही प्रभा गो सूटेंगे और उसकी रक्षा भी गरी करेगे ॥३४॥ बहन से रस, शायो, मो? यासा हो राजा हो जायगा तया पगा पुरुषष्ठ हो पर भी सेयर ही बनेगा ॥३५॥ वैश्य भी मृपि-वाणिज्य मोर पर शिल्पारी करेंगे या पूर वृत्ति से निर्वाह करेंगे ॥३६॥ प्रथम सोग संन्यासी देश में भिक्षावृत्ति परंग तथा सम्मानित हो पर पासएड की वृद्धि परेंगे ॥३७॥ प्रजाजन र पौर दुनिया के कारण अत्यन्त दुखित होरर गेहूं पोर जोपी मधिवता या देशो मे पले जायगे ॥३॥ वेद मार्गप्रलीने च पापण्डाढय ततो जने । अधर्मवृद्धया लोकानामल्पमायुर्भविष्यति ॥३६ प्रशास्त्रविहित घोर तप्यमानेषु वै तप । नरेपु नृपदोपेण वाल्ये मृत्युभविष्यति ॥४० भविता योपिता सूति पञ्चपट्सप्तवार्षिकी। नवाष्टदशवाणा मनुष्यारणा तथा क्लो ।।४१ पलितोद्भवश्वभविता तथा द्वादशवार्षिक । नातिजीवति वै कश्चित्कलो वरिण विंशति ॥४२ अल्पप्रज्ञा वृथालिङ्गा दुष्टान्त करणा कलौ । यतस्ततो विनड क्ष्यन्ति कालेनाल्पेन मानवा ॥४३ यदा तदा हि मंत्रेय हानिधर्मस्य लक्ष्यते । तदा तदा कलेवृद्धिरनुमेया विचक्षण ॥४४ यदा यदा हि पापण्डवृद्धिमत्रेय लक्ष्यते । तदा तदा कलेवृद्धिरनुमेया महात्मभि ।।४५ यदा यदा सता हानिर्वेदमार्गानुसारिणाम् । तदा तदा कले धिरनुमेया विचक्षणे ॥४६ कलिकाल में वेद-धर्म के लुप्त होने, पाखड के बढाने और अधर्म की प्रचुरता होने से प्रजा घल्प आयु वाली होगी ॥३६।। शास्त्र विरुद्ध तपस्या से और राजा के विपरीत मार्गगामी होने से बाल्यावस्था मे ही मृत्यु होने लगेगी 1॥४०॥ पांच, या सात वर्ष की स्त्री और पाठ, नौ या दस वष के पुरुष की षष्ठ अंश-१०१ [ ३५५ . सन्तान उत्पन्न करने लगगे ॥४१॥ बारह वर्ष की आयु में ही केश पकने लगेंगे और बीस वर्ष से अधिक किसी की भी आयु नही होगी ।।४२॥ लोगो की बुद्धि मन्द होगी, दुष्ट चित्त वाले हो कर व्यर्थ के चिह्न धारण करेंगे और इसीलिये अल्पायु में ही मर जायगे ॥४३॥ हे मैत्रेयजी ! जैसे-जैसे धर्म की हानि होती हुई दिखाई दे, वैसे-वैसे ही कलियुग को बढता हुआ समझे ॥४४|| जव पाखड की वृद्धि दिखाई दे, तभी समझले कि कलियुग का बल बढ रहा है ॥४५।। जब वैदिक मार्ग पर चलने वालो की कमी जान पड़े, तभी बुद्धिमान् पुरुप कलियुग को उत्कर्ष पर जान लेवें ॥४६।। प्रारम्भाश्चावसीदन्ति यदा धर्मभृतां नृणाम् । तदानुमेय प्राधान्यं कलेमें रेय पण्डितः ।।४७ यदा यदा न यज्ञानामीश्वरः पुरुषोत्तमः । इज्यते पुरुपर्यजस्तदा ज्ञेयं कलेवलम् ।।४८ न प्रीतिर्वेदवादेषु पापण्डेपु यदा रतिः 'विस्तथा प्राज्ञ रनुमेया विचक्षण ॥४६ कलौ जगत्पति विष्णु सर्वस्रष्टारमीश्वरम् । नायिष्यन्ति मैत्रेय पापण्डोपहता जनाः ।।५० कि देव किं द्विजर्वेदै. कि शोचेनाम्वुजन्मना । इत्येव विन वक्ष्यन्ति पापण्डोपहता जनाः ॥५१ स्वल्पाम्बुवृष्टि पर्जन्यः सत्यं स्वल्पफल तथा । फलं तथाल्पसारं च विप्र प्राप्ते कलौ युगे ॥५२ शागीप्रायाणि वस्त्राणि शमीप्राया महीरुहाः। शूद्रप्रायास्तथा वर्णा भविष्यन्ति कलौ युगे ।।३ अणुमायाणि धान्यानि अजाप्रायं तथा पयः । भविष्यति कलो प्राप्ते द्यौसीरं चानुलेपनम् ।।५४ हे मैत्रेयजी ! जब धर्मात्मा पुरुपो द्वारा प्रारम्भ किये हुए कार्य विफल हो जाय, तर कलियुग का माविप समझे ।[४७॥ जब यनों के द्वारा यज्ञेश्वर भगवान के यजन से लोग विमुग हो जाय तय कलियुग की प्रबलता माने ॥४८॥ कले [ श्रीविष्णु पुराण अब घेदवाद में प्रचि पोर पाखण्ड में तन्मयता हो तब ही कलियुग की वृद्धि जाने ॥४६॥ कलियुग में पाएपड के वशीभूत होकर मनुष्य जगदीश्वर भगवान् विष्णु की पूजा नही करेंगे ॥५०॥ उस समय पाखण्डीजन कहे गे कि देवता, विप्र, वेद तथा जल से होने वाले कर्मों से पया लाभ है ? ॥५१॥ कलियुग में वर्षा थोडी होगी, खेती थोडा प्रश्न उत्पन्न करेगी और फलादि में न्यून गुण होगा ॥५२॥ सन के बने हुए वस्त्र पहिन जापगे, शमी वृक्षो की अधिकता होगी और सब वर्णो का याचरण शूद्र के समान होगा ॥५३॥ कलियुग मे धान्य बहुत छोटे होंगे, बकरियो का दूध ही उपलब्ध होगा और खस ही अनुलेपन होगा ।।५४॥ श्वधू श्वशुरभूयिष्टा गुरवश्च नृणा कलौ। श्यालाद्या हारिभार्याश्च सुहृदो मुनिसत्तम ॥५५ कस्य माता पिता कस्य यथा कर्मानुग पुमान् । इति चोदाहरिष्यन्ति श्वशुरानुगता नरा.॥५६ वाड मन कायजर्दोषैरभिभूता पुनः पुन । नरा पापान्यनुदिन करिष्यन्त्यल्पमेधस ॥५७ निस्सत्त्वानामशौचाना निहीकारणा तथा नृणाम् । यद्यदु खाय तत्सर्वं कलिकाले भविष्यति ॥५८ निस्स्वाध्यायवपटकारे स्वधास्वाहाविवजिते । तदा प्रविरलो धर्म क्वचिल्लोके निवत्स्यति ॥५६ तत्राल्पेनैव यत्नेन पुण्यस्कन्धमनुत्तमम् । करोति य कृतयुगे क्रियते तपसा हि स ६० कलियुग मे सास-ससुर गुरुजन तथा पत्नी और साले ही सुहृद्जन होगे ॥५५॥ मास-ससुर के वश मे पडे हुए लोग माता-पिता को कुछ नहीं मानेंगे ॥५६॥ मनुष्यो की बुद्धि अल्प होगी और वे मन, वाणी और कर्म के द्वारा बारम्बार पाप कर्म करेंगे ॥५॥ अशक्त, अपवित्र और लज्जाहीनो को को दुख मिल सकते हैं, उन सभी दुखा की कलियुग में प्राति होगी ॥५॥ ससार स्वाध्याय, वपट्कार, स्वधा और स्वाहा से हीन हो जायगा और कही.

पष्ठ अश-१ ]
[ ३५७
कही ही पूछ धर्म रह सकेगा ।।५६।। परन्तु कलियुग मे स्वल्प प्रयत्न मे ही जिस
महान पुण्य राशि को प्राप्ति हो सकती है, उसे सत्ययुग मे घोर तप करके ही
पाया जा सकता है ।।६०॥
दूसरा अध्याय
व्यासश्वाह महाबुद्धिर्यदव हि वस्तुनि ।
तच्छू यता महाभाग गदतो मम तत्त्वतः ।।१
कस्मिन्कालेऽल्पको धर्मो ददाति सुमहत्फलम् ।
मुनीनां पुण्यवादोऽभूत्कश्चासौ क्रियते सुखम् ।।२
सन्देहनिर्णयार्थाय वेदव्यास महामुनिम् ।
ययुस्ते सशयं प्रष्टु मैत्रेय मुनिपुङ्गवाः ।।३
ददृशुस्ते मुनि तत्र जाह्नवीसलिले द्विज ।
वेदव्यास महाभागमर्द्ध स्नात सुत मम ॥४
स्नानावसान ते तस्य प्रतीक्षन्तो महर्पयः ।
तस्थुस्तीरे महानद्यास्तरुपण्डमुपाश्रिता. ॥५
मग्नोऽथ जाह्नवीतोयादुत्यायाह सुतो मम ।
शूद्रस्साधु कलिस्साघुरित्येव शृण्वता वच. ॥६
तेपा मुनीना भूयश्च ममञ्ज स नदीजले ।
साधु साध्विति चोत्थाय शूद्र धन्योऽसि चाब्रवीत् ।।७
श्री पराशरजी ने कहा--हे महाभाग ! इस विषय में व्यासजी ने जो
कहा है, वही ज्यो का त्यो सुनाता हूँ ॥१॥ एकबार मुनियों मे परस्पर पुराप
विषयक वार्तालाप हुआ कि किस समय का अल्प पुण्य भी महान् फल वाला
होता है तथा उसके अनुष्ठाता कौन हो सकते हैं ? || फिर इस संदेह के
समाधान हेतु वे सब महामुनि व्यासजो के पास पहुंचे ।।३।। हे मैत्रेयजी ! वहाँ
जाकर उन्होंने मेरे पुत्र व्यासजी को गङ्गाजी मे अद्धं स्नान करते हुए पाया
॥४॥ तब ये सब गगातट स्थित वृक्षो के नीचे बैठकर उनके स्नान करने की

३५८
[ श्रीविष्णुपुराण
प्रतीक्षा करने लगे ॥शा उस समय गगाजी में गोता लगाकर व्यासजी ने ऊपर
उठते हुए वहा 'कलियुग श्रेष्ठ, शूद्र श्रेष्ठ' उनके वचन सबने सुने । उन्होंने पुन
गोता लगाया और उठार कहा-हे शूद्र । तुम ही श्रेष्ठ और तुम ही धन्य
हो ॥६-७॥
निमग्नश्च समुत्थाय पुन. प्राह महामुनि ।
योपित साधु धन्यास्तास्ताम्यो धन्यतरोऽस्ति कः ॥
ततः स्नात्वा यथान्यायमायान्त च कृतक्रियम् ।
उपतस्थुमहाभाग मुनयस्ते सूत मम 15
कृतसवन्दनाश्चाह, कृतासनपरिग्रहान् ।
किमर्थमागता यूयमिति सत्यवतीसुत ।।१०
तमू सशय प्रष्टु भवन्त वयमागता ।
अल तेनास्तु तावन्न कथ्यतामपर त्वया ॥११
कलिस्साध्विति यत्प्रोक्त शूद्र साध्विति योपित ।
यदाह भगवान् साधु धन्याश्चेति पुन पुनः ॥१२
तत्सर्व श्रोतुमिच्छामो न चेद् गुह्य महामुने ।
तत्कथ्यता ततो हृत्स्थ पृच्छामस्त्वा प्रयोजनम् ॥१३
इत्युक्तो मुनिभियास प्रहस्येदमथाब्रवीत् ।
श्रूयता भो मुनिश्रेष्ठा यदुक्त साधु साध्विति ॥१४
इसके पश्चात् उन्होंने फिर गोता लगाया और उठते हुए कहा-स्त्रियां
धन्य है, वे हो साधु हैं, उनसे बढ़कर कृतकृत्य और कौन हो सकता है ? ॥८]
फिर जब व्यासजी स्नान तथा नित्य-कर्मादि से निवृत्त हुए तब वे मुनिजन उनके
पास गये | वहां अभिवादन आदि करके जब वे बैठ गये तब व्यासजी ने
उनसे उनके प्रागमन का कारण पूछा ॥१८॥ तब मुनियो ने कहा-वैसे तो
हम एक शड्डा के समाधानार्थ यहाँ प्राये थे, परन्तु इस समय तो आप एक और
चात बताने की कृपा करे ।।११।। आपन स्नान करते समय कलियुग श्रेष्ठ, शूद्र
श्रेष्ठ, स्त्रियां धन्य, वे ही साधु हैं आदि वाक्य कहे उनका तात्पर्य क्या है, यही
हम सुनने को उत्सुक हैं । यदि यह विषय गोपनीय न हो तो बताने की कृपा
?

पाठ अश-प्र०२ ] [ ३५६ करे ।।१२-१३।। श्री पराशरजी ने कहा-मुनियो के प्रश्न पर व्यासजी हँस पडे और बोले कि मेरे वचनो का प्रयोजन सुनो ॥१४॥ यत्कृते दशभिर्वणस्येताया हायनेन तत् । द्वापरे तच्च मासेन ह्यहोराण तत्कलो ॥१५ तपसो ब्रह्मचर्यस्य जपादेश्व फल द्विजाः । प्राप्नोति पुरुपस्तेन कलिस्साध्विति भापितम् ॥१६ ध्यायन्कृते यजन्यज्ञ स्वेताया द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलो सकीयं केशवम् ॥१७ धर्मोत्कर्पमतीवात्र प्राप्नोति पुरुप: कलौ। अल्पायासेन धर्मशास्तेन तुष्टोऽस्म्यह कलेः॥१८ व्रतचर्यापराह्या वेदा पूर्व द्विजातिभि । ततस्स्वधर्मसम्प्राप्तेष्टव्य विधिवद्धन. ॥१६ वृथा कथा वृथा भोज्य वृथेज्या च द्विजन्मनाम् । पतनाय ततो भाव्य तैस्तु समिभिस्सदा ॥२० असम्यकरणे दोपस्तेपा सर्वेपु वस्तुपु । भोज्यपेयादिक चंपा नेच्छाप्राप्तिकर द्विजा २१ पारतन्त्र्य समस्तेपु तेपा कार्येषु वं यतः । जयन्ति ते निजाल्लोकान्क्लेशेन महता द्विजा ॥२२ श्री व्यासजी बोले हे द्विजगगा । सरयगुग मे दस वर्ष तर तप, ब्रह्म- पर्य-पालन पोर जपादि परन से जिस पल की प्राप्ति होती है, उसे प्रेता मे एक वर्ष में, द्वापर में एक महीने मे तथा पलियुग मे तो एक महोरात्रि में ही प्राप्त रिया जा सकता है ॥१५-१६।। सत्ययुग में ध्यान से जो पल होता है, यह प्रेता में या से, द्वापर में देव-पूजा से तया यालियुग में पेवल श्रीकृष्ण नाम सकीर्तन से होता है ॥१७॥ हे पर्ममो ! कलियुग में योडा-गा परिश्रम करने पर ही महान धर्म की प्राप्ति होती है, इसीलिये मैं यलियुग से बहुत प्रसन्न हूँ १० दिजातियो को ग्रहाचर्य ग्रत के पालन पूर्वक वेदाध्ययन और धर्म से उपाजित धन के द्वारा विधिपूर्वद यो रे अनुदान करले होते हैं ॥१६॥ फिर

३६० ]
[ श्रीविष्णु पुराण
भी व्यर्थ वार्तालाप व्यथं भोजन या निष्फल यज्ञ उनका पतन करने वाले होते
हैं, इसीलिये उन्हें सयम रखना मावश्यक होता है ॥२०॥ सभी कार्यों को विप.
रीतता से उन्हे दोप को प्राप्ति होती है, इस भय से वे भोजन तथा पानादि भी
अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकते ॥२१॥ वे सभी कार्यों
परतन्त्रता पूर्वक
निष्ठावान् रहकर अत्यन्त कोश से पुण्यलोको को प्राप्त होते हैं ।।२२।।
द्विजशुश्रू यवैप पाकयज्ञाधिकारवान् ।
निजाञ्जयति वै लोकाञ्छूद्रो धन्यतरस्तत ॥२३
भक्ष्याभक्ष्येपु नास्यास्ति पेयापेयेपु वै यत ।
नियमो मुनिशार्दूलास्तेनासो साध्वितीरित ॥२४
स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर्लब्ध धन सदा ।
प्रतिपादनीय पानेषु यष्टव्य च यथाविधि ॥२५
तस्यार्जने महाक्लेश पालने च द्विजोत्तमा ।
तथासद्विनियोगेन विज्ञात गह्न नृणाम् ॥२६
एवमन्यस्तथा क्लेश पुरुपा द्विजसत्तमा ।
निजाञ्जयन्ति वै लोकान्प्राजापत्यादिकान्क्रमात् ।।२७
योपिच्छुश्रू पणाद्भर्तु कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्य यतो द्विजा ॥२८
नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा ।
तृतीय व्याहृत तेन मया साध्विति योषित ॥२६
एतद्व कथित विप्रा यग्निमित्तमिहागता ।
तत्पृच्छत यथाकाम सर्व वक्ष्यामि व स्फुटम् ॥३०
ऋषयस्ते तत प्रोचुर्यत्प्रष्टव्य महामुने ।
अस्मिन्नेव च तत् प्रश्ने यथावत्कथित त्वया ॥३१
केवल पाक-यज्ञ का अधिकारी शूद्र द्विजो की सेवा से ही मोक्ष प्राप्त
करने में समर्थ है, इसलिये वह भधिक धन्य है ॥२३॥ हे मुनिवरो । द्ध के
लिये भक्ष्याभक्ष्य का भी कोई बन्धन नहीं होने से मैं उन्हें श्रेष्ठ कहता हूँ ॥२४॥

पष्ठ ग्रंश-अ०२ ] मनुष्यो को धर्म से प्राप्त धन से सुपान को दान और विधिवत् यज्ञ करना उचित है ॥२।। इस धन के उपार्जन में और रक्षण मे अत्यन्त प्रष्ट होता है और फिर उसे उचित मार्ग से व्यय न करने पर तो बहुत ही दुस भोगना होता है ॥२६।। इस प्रकार के कष्ट साध्य उपायो के द्वारा ही मनुष्यो को प्राजापत्य प्रादि लोको की प्राप्ति होती है ।।२७।। परन्तु, स्त्रियो को तो केवल पति-सेवा करने से ही पति के समान लोको की प्राप्ति हो जाती है, इसलिये मैंने स्त्रियो को साधु कहा है ॥२८-२६॥ हे विप्रो | यह तो मैंने मापको बता ही दिया, अव आप अपने पाने का प्रयोजन काहये, जिसे मैं स्पष्टता से समझा सकू ॥३०॥ इस पर ऋपि बोले कि हमारे प्रश्न का उत्तर इसी मे मिल गया है ।।३१।। तत प्रहस्य तानाह कृष्णद्वैपायनो मुनि । विस्मयोत्फुल्लनयनास्तापसास्तानुपागतान् ॥३२ ययंपा भवता प्रश्नो ज्ञातो दिव्येन चक्षुपा। ततो हि व. प्रसङ्गन साधु साध्विति भापितम् ॥३३ स्वल्पेन हि प्रयत्नेन धर्म स्सिद्धयति वै कलौ। नरैरात्मगुग्गाम्भोभि क्षालितासिलकिल्बिर्षे ॥३४ शूद्रश्च द्विजशुश्रू पातत्परैद्विजसत्तमा । तथा स्रोभिरनायासात्पतिशुश्रू पयव हि ॥३५ ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतर मतम् । धर्मसम्पादने क्लेशो द्विजतीना कृतादिषु ॥३६ भवद्भियदभिप्रेत तदेतत्कथित मया । अपृष्टेनापि धर्मज्ञा किमन्यत्क्रियता द्विजा ॥३७ श्री पराशरजी ने कहा-यह सुनकर श्री व्यामजी ने उन तपस्वियो से हंसते हुए कहा ॥३२॥ मैंने अापके प्रश्न को दिव्य दृष्टि से जानकर ही प्रसगवश 'साधु' कहा था ॥३३॥ जिन्होंने गुण रप जल से अपने सब दोपो को धो दिया है, उन्हे कलियुग में स्वल्प उद्यम से ही धर्म की प्राप्ति हो जाती है ॥३४॥ शूद्र द्विजसेवा से पौर स्त्रियां पनि-सेवा से ही धर्म की प्राप्ति कर लेती हैं ॥३॥ इसीलिये यह तीनो पन्य से भी धन्य हैं, कलियुग के अतिरिक्त अन्य युगो में भी [ श्रीविष्णु पुराण द्विजातियो को ही धर्म की सिद्धि के लिये घोर कष्ट सहन करने होते हैं ॥३६।। इस प्रकार प्रापको शङ्का का समाधान हो चुा अब और मुझे क्या करना चाहिये ? ॥३७॥ ततस्सम्पूज्य ते व्यास प्रशशसु. पुन पुन. ! यथागत द्विजा जग्मुर्यासोक्तिकृतनिश्चया. ॥३८ भवतोऽपि महाभाग रहस्य कथित मया ॥३६ अत्यन्तदुष्टस्य कलेरयमेको महान्गुण.। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तवन्ध पर यजेत् ।।४० यच्चाह भवता पृष्टो जगतामुपसहृतिम् । प्राकृतामन्तराला च तामप्येप वदामि ते ॥४१ श्री पराशरजी ने कहा-फिर वे ऋषिगण व्यासजी का पूजन और बारम्बार स्तवन करते हुए अपने स्थान को गये ।।३८॥ है मैत्रेयजी । प्रापको भी मैं यह रहस्य सुना चुका ॥३६॥ इस कलियुग में केवल कृष्ण-नाम सकीर्तन से परमपद की प्राति होती है ।।४011 मब मैं उस प्रश्न को भी कहता हूं जो मापने ससार के उपसहार के विषय मे पूछा था ।।४।। तीसरा अध्याय सर्वेषामेव भूताना विविध प्रतिसश्वर । नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको लय.॥१ ब्राह्मो नैमित्तकस्तेपा कल्पान्ते प्रतिसञ्चरः । प्रात्यन्तिवस्तु मोक्षाख्य. प्राकृतो द्विपराद्धकः।२ पना सरया भगवन्ममाचक्ष्व यया तु सः। द्विगुणीतया ज्ञेय. प्राकृत प्रतिसश्वरः ॥३ स्थानात्स्थान दशगुणमेस्माद् गण्यते द्विज । ततोऽष्टादशमे भागे पराद्ध मभिधीयते ।

पठ प्रग-अ०३ ]
पराई द्विगुरणं यत्तु प्राकृतस्म लयो द्विज ।
तदाव्यक्तेऽसिलं व्यक्त स्वहेतौ लयमेति वै ॥५
निमेपो मानुपो योऽमो माया मायाप्रमारणतः ।
तः पञ्चदशभिः काठा शिकाष्ठा कला स्मृता ॥६
नाडिका तु प्रमाणेन सा कला दश पञ्च च ।
उन्मानेनाम्भसस्सा तु पलान्यद योदय ७
मागधेन तु मानेन जलप्रस्थस्तु रा स्मृतः ।
हेममापः कृतच्छिद्रश्चतुभिश्चतुरडगुलः ।।

३६४ ] [ श्रीविष्णु पुराण तैस्तु द्वादशसाहस्र चतुर्युगमुदाहृतम् । चतुर्युगसहस्र तु क्थ्यते ब्रह्मणो दिनम् ॥११ स कल्पस्तत्र मनवश्चतुर्दश महामुने । तदन्ते चैव मैत्रेय ब्राह्मो नैमित्तिको लय ॥१२ तस्य स्वरूपमत्युग्र मंनय गदतो मम। शृणुष्व प्राकृत भूयस्तव वक्ष्याम्यह लयम् ।।१३ ऐसी दो ताडिकामो का एक मुहूर्त, तीस मुदत्त का एक अहोराय और तीस अहोरात्र का एक मास होता है ॥६॥ बारह मास का वप होता है, यही देवताग्रो का एक अहोरात्र है । ऐसे तीन सौ आठ वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है ॥१०॥ वारह हजार दिव्य वर्षों की एक चतुर्युगो और एक हजार चतु- युगियो का ब्रह्मा का एक दिन होता है ॥११॥ महामुने । यही कल्प है, इसमे चौदह मनु होते हैं। इस कल्प के मन्त म ही ब्रह्माजी का नैमित्तिक प्रलय होता है ।।१२।। अब मैं बस नैमित्तिक प्रलय के भयङ्कर रूप को कहता हूँ फिर प्राकृत प्रलय को कहूंगा ॥१३॥ चतुर्युगसहस्रान्ते क्षीणप्राये महीतले । अनावृष्टिरतीवोग्रा जायते शतवार्षिकी ।।१४ ततो यान्यल्पसाराणि तानि सत्त्वान्यशेपत । क्षय यान्ति मुनिश्रेष्ठ पार्थिवान्यनुपीडनात् ॥१५ तत स भगवान्विष्णू रुद्ररूपधरोऽव्यय । क्षयाय यतते वर्तुमात्मस्थास्सकला प्रजा ॥१६ ततस्स भगवान्विष्णुर्भानोस्सप्तसु रश्मिपु । स्थित पिबत्यशेपाणि जलानि मुनिसत्तम ।।१७ पीत्वाम्भासि समस्तानि प्रारिणभूमिगतान्यपि । शोप नयति मैग्य समस्त पृथिवीतलम् ॥१८ समुद्रान्सरित शैलनदीप्रस्रवणानि च। पातालेषु च यत्तीय तत्सर्वे नयति क्षयम् ॥१६ पष्ठ प्रश-०३ ] ततस्तस्यानुभावेन तोयाहारोपवृहिता । त एव रश्मयस्मत जायन्ते सप्त भास्करा ॥२० अधश्चोध्वं च ते दीप्तास्ततस्सप्त दिवाकरा । दहन्त्यशेष लोक्य सपातालतल द्विज ॥२१ एक हजार चतुयुंगियो के व्यतीत होने पर जब पृथिवी क्षीण प्राय होती है, तब सौ वर्ष तर वर्षा नही होनी ।।१४। उस समय अल्प शक्ति वाले पार्थिव प्राणी अनावृष्टि से सतप्त होकर नाश को प्राप्त होते है ॥१५॥ फिर रुद्र रूपी भगवान् विष्णु जगत् के सहारार्थ सब प्रजा वो अपने मे लोन करने के लिये प्रयत्नवान होते हैं ॥१६॥ हे मुनि श्रेष्ठ | उस समय सूर्य को सप्तरश्मियो मे स्थित हुए भगवान् विष्णु मम्पूर्ण जल का शोपण कर लेते हैं ।।१७। इस प्रकार बे जल का शोषण कर समस्त पृथिवी को सुखा देते है ।।१८। समुद्र, नदी, पर्वतीय स्रोत और पातालादि में सर्वम जल सूख जाता है ||१६|| तब प्रभु-प्रताप से वे सप्त-रश्मियां जल-पान से पुष्ट होकर सार सूर्य हो जाते हैं ।।२०।। उस समय वे सातो सूर्य सभी दिशामो म प्रकाशित होकर पाताल तक सम्पूर्ण मिलोसी को भस्म पर देते है ॥२१॥ दह्यमान तैर्दीप्तस्त्रलोक्य द्विज भास्करै । साद्रिनद्यर्णवाभोग निस्नेह्मभिजायते ॥२२ ततो निर्दग्धवृक्षाम्बु लोक्यमखिल द्विज । भवत्येषा च वसुधा कूर्मपृडोपमाकृति ॥२३ तत कालाग्निरुद्रोऽसौ भूत्वा सर्वहरो हरि । शेपाहिश्वाससम्भूत पातालानि दहत्यध ॥२४ पातालानि ममस्तानि स दग्ध्या ज्वलनो महान् । भूमिमभ्येत्य मकल वस्ति वसुधातलम् ।।२५ भुवर्लोक ततस्मय स्वर्लोप च सुदारण । ज्वालामालामहावर्तस्तत्रय परिवर्तते ।।६ अम्बरीपमिवाभाति प्रैलोक्यममिल तदा। मानावतंपरीवारमुपक्षीरगनराचरम् ॥२७

३६६ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
ततस्तापपरीतास्तु लोकद्वयनिवासिनः ।
कृताधिकारा गन्छन्ति महर्लोक महामुने ।।२८
तस्मादपि महातापतप्ता लोकात्ततः परम् ।
गच्छन्ति जनलोकं ते दशावृत्या परैपिणः ।।२६
हे द्विज ! उन सूर्यो से नदी, पर्वत, समुद्रादि से युक्त सम्पूर्ण त्रिलोकी
रस-हीन हो जाती है ॥२२॥ वृक्षो और जलादि के न रहने से यह पृथिवी
कछुए की पीठ जैसी बटोर हो जाती है ॥२३।। फिर कालाग्नि रुद्र रूप से
प्रकट हुए भगवान् नीचे से पातालो को भस्मी भूत करने लगते है ॥२४॥ सब
पातालो को जलावर वह अग्नि पृथिवी पर पहुंच कर उसे भी भस्म कर डालता
है ।।२५। फिर वह भुवर्लोक और स्वर्गलोक को भस्म करके वहीं घूमता रहता
है ॥२६॥ इस प्रकार अग्नि के धेरे में घिर कर सम्पूर्ण चराचर के नष्ट होने
पर यह मिलोसरी तपे हुए कढाव जैसी हो जाती है ।।२७।। फिर परलोक को
कामना वाले अधिकारीगण भुवोंक और स्वर्गलोक मे स्थित हुए उस अग्नि से
संतप्त होकर महर्लोक मे जाते हैं परन्तु वहाँ भी वैसा ही ताप होने के कारण
जनलोक मे चले जाते हैं ॥२८-२६॥
ततो दग्ध्वा जगत्सवं रुद्ररूपी जनार्दनः ।
मुखानि.श्वासजान्मेघान्कगेति मुनिसत्तम ।।३०
ततो गजकुलप्रख्यास्तडित्वन्तःऽतिनादिनः।
उत्तिष्टन्ति तथा व्योम्नि घोरास्सवर्तका घनाः ॥३१
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसनिभाः।
धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥३२
केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारस निभास्तथा ।
केचिद्वैडूर्यसङ्काशा इन्द्रनीलनिभा. क्वचित् ॥३३
शवकुन्दनिभाश्चान्ये जात्येञ्जननिभा. परे।
इन्द्रगोपनिभाः केचित्ततारिशसिनिभास्तथा ॥३४
मनश्शिलाभाः केचिद्व हरिताल निभाः परे ।
चापपननिभाः केचिदुत्तिष्ठन्ते महाघनाः ।।३४

[ श्रीविष्णु पुराण जब सम्पूर्ण विश्व अन्धकारमय हो जाता है, तब समस्त स्थावर-जगम प्राणियो के नष्ट होने पर वे महामेघ सौ वर्ष से अधिक समय तक वृष्टि करते रहते है ॥४०॥ हे मुनिवर । भगवान् वासुदेव की महिमा से करप के अन्त मे इसी प्रकार होता है ॥४१॥ चौथा अध्याय सप्तर्षिस्थानमाक्रम्य स्थितेऽम्भसि महामुने । एकार्णव भवत्येतत्तलोक्यमखिल तत ॥१ मुखनि श्वासजो विष्णोर्वायुस्ताञ्जलदास्तत । नाशयन्वाति मैत्रेय वरिणामपर शतम् ॥२ सर्वभूतमयोऽचिन्त्यो भगवान्भूतभावन । अनादिरादिविश्वस्य पीत्वा वायुमशेपत ॥३ एकागवे ततस्तस्मिञ्च्छेपशय्यागत प्रभु । ब्रह्मरूपधरश्शेते भगवानादिकृद्धरि ॥४ जनलोकगतस्सिद्धस्सनकाय रभिष्टुत । ब्रह्मलोक्गतश्चैव चिन्त्यमानो मुमुक्षुभि ॥५ आत्ममायामयी दिव्या योगनिद्रा समास्थितः। प्रात्मान वासुदेवास्य चिन्तयन्मधुसूदन. ॥६ एप नैमित्तको नाम मैनेय प्रतिसञ्चरः। निमित तत्र यच्छेते ब्रह्मरूपधरो हरि ७ यदा जागति सर्वात्मा स तदा चेष्टते जगत् । निमीलत्येतदखिल मायाशय्या गतेऽच्युते ॥८ श्री पराशरजी ने कहा-हे महामुने । सप्तर्पियो ने स्थान या भी अनि. प्रमण परने वाले जल के वारण सम्पूर्ण त्रिलोकी महासागर जैसी प्रतीत होती है ॥१॥ हे मंयजी। फिर भगवान् विष्णु के मुख से प्रकट हुप्रा वायु डा मेघा को नष्ट करवे मौ वर्ष तक पता है ॥२॥ फिर जन- लोय वामी सनकादि

पष्ठ अंश-०४]
[ ३६६
सिद्धो से स्तुत और ब्रह्म नोक-प्राप्त मुमुक्षुप्रो द्वारा ध्यान किये जाते हुए भूत
भावन भगवान् श्रीहरि उस सम्पूर्ण वायु का पान करके वासुदेवात्मक अपने
रूप का चिन्तन करते हुए योग निद्रा का अवलम्बन कर महा समुद्र स्थित
शेप-शया पर शयन करते हैं ॥३.६।। हे मैत्रेयजी ! इसमे ब्रह्मा रूपधारी भगवान्
विष्णु का शयन करना ही निमित्त होने से इसे नैमित्तिक प्रलय कहा गया है
(1७|| भगवान् के जागते रहने पर समार की चेष्टाएँ चलती रहती है और उनके
शयन करने पर ससार भी उनमे लीन हो जाता है ।।८।।
पद्मयोनेदिन यत्तु चतुर्युगसहस्रवत् ।
एकागवीकृते लोके तावती रात्रिरिष्यते ।।
तत प्रबुद्धो राश्यन्ते पुनस्सृष्टि करोत्यज ।
ब्रह्मस्वरूपधृग्विष्णुर्यथा ते कथित पुरा ॥१०
इत्येप कल्पसहारोऽवान्तरप्रलयो द्विज ।
नैमित्तिकस्ते कथित प्राकृत शृण्वत परम् ।।११
अनावृष्ट्या दिसम्पत्कृिते सक्षालने मुने ।
समस्तेष्वेव लोकेषु पातालेष्वखिलेषु च ॥१२
महदादेविकारस्य विशेपान्तस्य सक्षये।
कृष्णेच्छाकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते प्रतिसञ्चरे ।।१३
पापो ग्रसन्ति वै पूर्व भूमेगन्धात्मक गुणम् ।
प्रात्तगन्धा ततो भूमि प्रलयत्वाय कल्पते ।।१४
प्रणष्टे गन्धतन्मात्रे भवत्युर्वी जलात्मिका ।
प्रापस्तदा प्रवृद्धास्तु वेगवत्यो महास्वना ॥१५
सर्वमापूर यन्तीदं तिष्ठन्ति विचरन्ति च ।
सलिलेनोमिमालेन लोका व्याप्ता. ममन्तत ॥१६
ब्रह्मा जी का दिन जिस प्रकार एक हमार चतुर्युगी का है, वैसे ही
जगन् के एकार्णव रूप होने से उतने ही काल को उनकी रात्रि होती है ।
रात्रि का अन्त होने पर जय मगफार जागते हैं तब ब्रह्मा रूप होकर पूर'
हुए प्रकार से मृष्टि-रचना करते हैं ॥१०॥ हे द्विज ! इस प्रकार नाम

३७० ] [ श्रीविष्णु पुराण अवान्तर प्रलय के विषय मे करा गया, पय प्रायन प्रलय वा वर्गन सुनो ॥११॥ अनावृष्टि प्रादि रो सम्पूर्ण सोको मौर पातालो रे नष्ट होने पर महत्तत्त्व से विशेष ता सब विकार क्षीण हो जाते हैं और पहिले पृथिवी पो गुरा गध को जल अपने में लीन पर लेता है। इस प्रकार गध-हीन होने से पृथिवी का प्रलय होता है ।।१२-१४॥ गय-तन्मात्रा या नाश होने पर पृथिवी जलमयी हो जाती है और घोर शब्द से युक्त जल कभी स्थिर और कभी बहता हुआ रह पर सपूर्ण विश्व को व्याप्त पर लेना है ।।१५-१६॥ अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिपा पीयते तु सः । नश्यन्त्यापस्ततम्ताश्च रमतन्मानसक्षयात् ।।१७ ततश्चापो हृतरसा ज्योतिप प्राप्नुवन्ति वै । अग्न्यवस्थे तु सलिले तेजसा सवतो वृते ॥१८ स चाग्नि सर्वतो व्याप्य चादत्ते तज्जल तथा । सर्वमापूर्यते चिभिस्तदा जगदिद शनं ॥१६ गचिभिस्स वृते तस्मिस्तियंगूलमधस्तदा । ज्योतिपोऽपि पर रूप वायुरति प्रभाकरम् ॥२० प्रलीने च ततस्तस्मिन्वायुभूतेऽखिलात्मनि । प्रणप्टे रूपतन्मात्रे हतरूपो विभावसु ॥२१ प्रशाम्यति तदा ज्योतिर्वायुर्दोधूयते महान् । निरालोके तथा लोके वाय्ववस्थे च तेजसि ।।२२ ततस्तु मूलमासाद्य वास्मभवमात्मन । कर्ण चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश ॥२३ इसके पश्चात् जल के गुण रस को अग्नि अपने मे लीन कर लेता है और रस तन्मात्रा के प्रभाव में जल नष्ट हो जाता है ॥१७॥ इस प्रकार अग्नि रूप हुआ जल अग्नि के साथ सयुक्त होकर शेष जल का शोषण कर लेता है और तब सम्पूर्ण विश्व ही अग्निमय हो जाता है ।।१८.१६॥ जब सम्पूर्ण विश्व सब प्रोर से अग्निमय होता है, तब उस अग्नि के गुण प्रकाश ( रुप ) को वायु अपने मे लीन कर लेता है ॥२०॥ उस समय रूप-तन्माना के न रहने पर अग्नि पष्ट प्रश-५०४ ] [ ३७१ वा कोई स्वरूप ही नहीं रहता ॥२१॥ तव उस अग्नि के लिोन होने पर अत्यत घोर वायु चलता है ।।२२।। तब अपने उद्गम स्थल प्राकाश के प्राश्रम मे रह कर वह वायु सभी दिशाओं में प्रत्यत वेग पूर्वक चलता है ॥२३॥ वायोरपि गुणं स्पर्शमाकागो ग्रसते तत । प्रगाभ्यति ततो वायुः खं तु तिष्ठत्यनावृतम् ॥२४ अरूपरसमस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् । सर्वमापूग्यचं व सुमहत्तत्प्रकाशते ॥२५ परिमण्डल च सुपिरमाकाशं शब्दलक्षणम् । शब्दमात्र तदाकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२६ ततश्शब्दगुण तस्य भूतादिम्र सते पुन । भूनेन्द्रियेषु युगपद्भ तादौ सस्थितेषु वै ॥२७ अभिमानात्मको ह्यप भूतादिस्तामसम्मृत । भूतादि ग्रसते चापि महान्दै बुद्धिलक्षण ।।२८ तदनन्तर वायु का गुण स्पर्ग भी ग्रामाश मे लोन हो जाता है और वायु के अभाव में पाकाश का कोई आवरण नही रहता ।।२४॥ उस समय रूप, रस, गधं और प्राकार से हीन हुआ प्राकाश हो सब को व्याप्त करता हुमा प्रकाशित होता है ॥२५॥ उस समय यब पोर से गोल, छिद्र स्प, शब्द लक्ष आकाश ही सबको अच्छादित किये रहता है ।।२६॥ फिर भूनादि उस आकाश के गुण शब्द का ग्रास कर लेता है । इमी भूतादि मे पचभूत और इन्द्रियो के भी लीन हो जाने पर यह ग्रहकारात्मक तामस कहा जाता है । फिर बुद्धि रूप महत्तत्त्व इस भूतादि का ग्रास कर लेता है ।।२७-२८।। उर्वी महाश्च जगत प्रान्तेन्तर्वाह्यतस्तथा ॥२६ एव सप्त महाबुद्ध क्रमात्प्रकृतयस्म्स्मृत.। प्रत्याहारे तु तास्सर्वाः प्रविशन्ति परस्परम् ॥३० येनेदमातृत सर्वमण्डलमप्सु प्रलीयते । मप्तद्वीपसमुद्रान्त सप्तलोक सपर्वतम् ॥३१ ३७२ ] [ श्रीविष्णु पुराण उदकावरणं यत्तु ज्योतिपा पीयते तु तद् । ज्योतिर्वायो लय याति यात्याकागे समीरण.॥३२ आकाशं चैव भूतातिर्गसते त तथा महान् । महान्तमेभिस्सहित प्रकृतिम्र सते द्विज ॥३३ गुणसाम्यमनुद्रिक्तमन्यून च महामुने । प्रोच्यते प्रकृतिहेतु प्रधान कारण परम् ।।३४ इत्येपा प्रकृतिस्सर्वा व्यक्ताध्यक्तस्वरूपिणी । व्यक्तस्वरूपमव्यक्त तस्मान्मैत्रेय लीयते ॥३५ पृथिवी और महत्तत्त्व ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत जगत् और बाह्य जगत् दोनो की सीमाएं हैं ॥२६॥ इसी प्रकार जो सात आवरण कहे हैं, वे सभी प्रलयकाल मे अपने कारण मे लीन हो जाते हैं ॥३०॥ सप्त द्वीप, सप्त समुद्र, सप्त लोक और सम पर्वत श्रेणियो के साहित यह सम्पूर्ण भूपएण्डल रेल मे विलीन हो जाता है ॥३१।। फिर जल के प्रावरण का पान करने वाला अग्नि वायु मे और वायु प्राकाश मे लीन हो जाता है ।।३२॥ वह अाकाश भूनादि मे और भूतादि महत्तत्त्व मे तथा महत्तत्त्व मूल प्रकृति मे लीन होता है ॥३३॥ हे महामुने ! सत्वादि गुणों को साम्यावस्था ही प्रकृति है. इसी को प्रधान कहते हैं। इसी प्रधान से सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है ॥३४॥ प्रकृति के व्यक्त ग्रौर मश्यक्त रूप से सर्वमयी होने के कारण व्यक्त रूप अव्यक्त में विलीन हो जाता है ॥३॥ एकश्शुद्धोऽक्षरो नित्यस्सर्वव्यापी तथा पुमान् । सोऽयशस्सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मन. ॥३६ न सन्ति यत्र सर्वेशे नामजात्यादिकल्पनाः । सत्तामात्रात्मके ज्ञेये ज्ञानात्मन्यात्मनः परे ॥३७ तद्ब्रह्म परमं धाम परमात्मा स चेश्वर. 1 स विष्णुस्सर्वमेवेद यतो नावर्तते यति. ॥३८ प्रकृतिर्या मयारयाता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी।. पुरुपश्चाप्युभावतो तीयेते परमात्मनि ॥३६

पष्ट अश-प्र० ४ ]
[ ३७३
परमात्मा च सर्वेपामाधारः परमेश्वरः।
विष्णुनामा स वेदेपु वेदान्तेषु च गीयते ॥४०
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्म वैदिकम् ।
ताभ्यामुभाम्या पुरुषस्सर्वमूर्तिस्स इज्यते ॥४१.
ऋग्यजुस्सामभिर्गिः प्रवृत्तैरिज्यते ह्यसौ।
यज्ञेश्वरो यज्ञपुमान्पुरुपैः पुरुषोत्तमः ।।४२ .
ज्ञानात्मा ज्ञानयोगेन ज्ञानमूर्तिः स चेज्यते ।
निवृत्ते योगिरिर्मार्ग विष्णुमुक्तिफलप्रदः ॥४३
हे मैत्रेयनी ! इसरो भिन्न एक शुद्ध, अक्षर, नित्य और सर्वव्यापी पुरुष
भी परमात्मा का ही अंश है ॥३६॥ जिस ज्ञानारमा एव ज्ञातव्य मे नाम-जाति
की कल्पना नहीं है, वहीं सर्वेश्वर परमधाम परब्रह्म परमात्मा है। वही विश्व
रूप ईश्वर है । उसे प्राप्त होकर योगी पुरुष पुन. ससार मे नही पाते ॥३७-३८।।
मेरे द्वारा कही हुई व्यक्त और अव्यक्त प्रकृति तया पुरुष भी उसी परमात्मा मे
लीन होते है ।।३६।। उसी सर्वाधार, परमेश्वर को वेद-वेदान्तो में 'विष्णु' नाम
से कहा है ॥४०॥ कम और सौरय रूप दोनो प्रकार के वैदिक कर्मो से उसी
परमेश्वर का यजन होता है ॥४१॥ ऋक्, यजुः और साम द्वारा कहे गये प्रवृत्ति
मार्ग से भी उन्ही यज्ञेश्वर भगवान् का पूजन होता है ॥४२॥ तथा निवृत्ति मार्ग
का अवलम्बन करने वाले योगी भी उन्ही भगवान् विष्णु का ज्ञान योग से यजन
करते हैं ॥४३॥
ह्वस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु किञ्चिद्वस्त्वभिधीयते ।
यच्च वाचामविषय तत्सर्व विष्णुरव्ययः ।।४४
व्यक्तस्स एव चाव्यक्तस्स एव पुरुपोऽव्ययः ।
परमात्मा च विश्वात्मा विश्वरूपधरो हरिः ॥४५
व्यक्ताव्यतात्मिका तस्मिन्प्रकृतिस्सम्प्रलीयते ।
पुरुपश्चापि मैत्रेय व्यापिन्यन्याहतात्मनि ॥४६
द्विपरार्धात्मकः कालः कथितो यो मया तव ।
तदहस्तस्य मंत्रेय विष्णोरीशस्य कथ्यते ॥४॥

२७४ ] [ श्रीविष्णु पुराण व्यक्त च प्रकृती लीने प्रकृत्यां पुरुषे तथा। तत्र स्थिते निशा चास्य तत्प्रमाणा महामुने ।।४८ नैवाहस्तस्य न निशा नित्यस्य परमात्मनः । उपचारस्तथाप्येप तस्येशस्य द्विजोच्यते ॥४६ इत्येष तक मैत्रेय कथितः प्राकृतो लय । आत्यन्तिर मयो ब्रह्मन्निबोध प्रतिसञ्चरम् ॥५० तोनो प्रकार के स्वरो से जो कहा जाता है और जो वाणी से परे हैं, वह सब भव्ययात्मा विष्णु ही है ॥४४॥ यह विश्व रूप परमात्मा अध्यक्त और अविनाशी हैं ॥४५॥ उन्ही सर्वव्याप्त एव अविकृत रूप परमात्मा से व्यक्त और भव्यक्त रूप वाली प्रकृति और पुरुष लीन हो जाते हैं ॥४६॥ हे मैत्रेयजी ! मैंने जो द्विपरार्द्ध काल तुम्हे बताया है, वह विष्णु भगवान् का एक दिन समझो ।।४७।। जब व्यक्त जगत् प्रकृति में और प्रकृति पुरुष मे लीन हो जाती है, तब इतने समय की विष्णु की रात्रि होती है ॥४८॥ यथार्थ मे तो उस परमात्मा वा न कोई दिन है, न रानि है, उपचार से ही इस प्रकार कहा गया है ॥४६॥ हे मंडेयजी ! इस प्रकार प्राकृत प्रलय का यह वर्णन किया गया है, अव प्रात्य- तिक प्रलय के विषय मे सुनो ॥५०॥ पांचवां अध्याय आध्यात्मिकादि मेरेय ज्ञात्वा तापत्रय बुधः । उत्पन्नशानवैराग्यः प्राप्नोत्यास्यन्तिक लयम् ॥१ माध्यात्मिकोऽपि द्विविधशारीरी मानसस्तथा । शारीरो बहुभि द भिद्यते भू यता च सः ॥२ शिरोरोगप्रतिश्यायज्वरशूलभगन्दरः । गुल्मार्शः श्वययुश्वासच्छादिभिरनेकधा ॥३

पष्ठ प्रश-प्र०५ ]
[ ३७५
तथाक्षिरोगातीसारकुशङ्गामयसज्ञितं ।
भिद्यते देहजस्तापो मानस श्रोतुमर्हसि ॥४
कामक्रोधभय पलोभमोहविपादज ।
शोकासूयावमानेामात्मर्यादिमयस्तथा ॥५
मानसोऽपि द्विजश्रेष्ठ तापो भवति नवधा ।
इत्येवमादिभि दस्तापो ह्याध्यात्मिय स्मृतः॥६
मृगपक्षिमनुष्याद्य पिशाचोरगराक्षस ।
सरीसृपाद्यश्च नृणा जायते चाधिभौतिक ॥७
शीतवातोष्णवर्षाम्बुवैद्य तादिममुद्भव ।
ततो द्विजवर श्रेष्ठ कथ्यते चाधिदैविकः ।।
श्री पराशरजी ने कहा- मैत्रयजी माध्यात्मिक प्रादि तोगो तापा
का ज्ञान प्राप्त करो और वैराग्य के उत्पन्न होने पर प्रात्यन्तिक प्रलय को प्रालि
होती है ।।१।। प्राध्यात्मिक ताप ये शारीरिक और मानसिक दो भेद हैं, उनम
शारीरिव के भी अनक भेद हैं, उन्ह सुनो ॥२॥ शिरोरोग, प्रतिश्याय, ज्वर,
सून, भगन्दर, गुल्म, प्रशं, साय, श्वास, धदि नत्र रोग, अतिसार, पुष्ठ प्रादि
के भेद से शारीरिक ताप अनक प्रकार का है । अव मासिक ताप सुनो ।।३-४।।
काम, मोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह, विपाद, शार प्रमूया, अपमान, ईर्या,
मात्सर्य प्रादि ये भेद से मानसिक ताप भी बहुत प्रकार का है। ऐस हो अनय
भेद वान ताप को प्राध्यात्मिक पहा है ॥५-६॥ मृग, पक्षी, मनुष्य, पिशाच,
सर्प, सक्षम, सरीगृप आदि स प्रास होने वाल दुरा को आधिभौतिक पहत हैं
॥७॥ शीत, वात, उपण, वर्षा, जल, विद्युत् मादि से मिलन वाला दुग्य
प्राधिदैविय है 10
गभंजन्मजराज्ञानमृत्युनारय ज तथा ।
दुस सहस्रशो भदैभियत मुनिसत्तम IIE
सुकुमारतनुर्ग में जन्तुहमलावृते ।
उल्लमवेष्टितो मुग्नपृष्ठग्रीवास्थिमहति ॥१०
.

1 श्रीविष्णु पुगए पत्यम्नाटुनोपोगानयमातृभोजनः । प्रत्यन्ततापग्रम पद्धंगानातिवेदनः ।।११ प्रमारणासनादी नामाना प्रभुगरमनः । मात्रमहापगापी मयंत्र पीडितः ॥१२ निरुच्याम मचंतन्यम्म्मरसन्मशतान्यथ । मान्ते गर्भ:तिदु.गेग निजम मं नियन्धन. ॥१३ जायमानः पुगेषागृमूवमुमाविलानन. । प्राजापत्येन वातेन पोरयमानास्थिवन्धनः ॥१४ अधोमुमो वै नियते प्रवलम्मूतिमागतः । ग्लेशानिमान्तिमाप्नोति जठरान्मातुरानुरः॥१५ है मुनिवर । इन दुःमो में अतिरित गर्भ, जन्म, जरा, अज्ञान, मृत्यु तथा नरस में उत्पन्न दुग भी सहयों प्रकार के है । गर्भ की भिन्ली से लिम गुयुमार पाना जीव मन-मून कप घोर कीचड़ में पड़ा हुमा माता के डुये, परपरे, सारे मोर गमं पदायों के सेवन से प्रौर पीठ तथा ग्रीवा का हाडियो के पुण्डलागार मुडी रहने मु अत्यन्त पीडा यो प्राह हो कर और चेतना मय होते हुए भी श्वास लेने में असमर्थ रह पर अपने पूर्व जन्मो का स्मरण परता हुमा गर्भ-यास के दुखो को भोगता है ॥१०.१३॥ जन्म के समय भी उसषा मुम मल, मूत्र, रक्त, वीर्य मादि मे सना रहता तथा सम्पूर्ण अस्थिवधन प्राजापत्य वायु से सन्तप्त होते हैं ।।१४।। सूतिकावात उसके मुख को नीचे कर देता है पी. जीव अत्यन्त क्लेश पूर्वक माता के गर्भ मे निकलने में समर्थ होता है ॥१५॥ मूळमवाप्य महती सस्पृष्टो बाहवायुना । विज्ञानभंगवाप्नोति जातश्च मुनिसत्तम ।।१६ कण्टकरिव तुम्नाङ्गः करिव दारित.। पूतिधरणाग्निपतितो धरण्या कृमिको यथा ॥१७ कण्डूमनेऽपि चाशक्तः परिवर्तेऽप्यनीश्वरः। स्नानपानादिकाहारमप्याप्नोति परेच्छया ।।१८ पष्ठ अश अ०-५ ] [ ३७७ अशुचिप्रस्तरे सुप्त कीटदशादिभिस्तथा । भक्ष्यमारणोऽपि नवंपा समयों विनिवारणे ॥१६ जन्मदु खान्यनेकानि जन्मनोऽनन्तराणि च । बालभावे यदाप्नोति ह्याधिभौतादिकानि च ।।२० अज्ञानतमसाच्छन्नो मूढान्त करणो नर । न जानाति कुत कोऽह क्वाह गन्ताकिमात्मकः ॥२१ कैन बन्धेन बद्धोऽह कारण किमकारणम् । कि कार्य किमकार्य वा किं वाच्य किं च नोच्यते ॥२२ को धर्म याश्च वाधर्म. कस्मिन्वर्तेऽथ या कथम् । किकर्तव्यमकर्तव्य किं वा किं गुणदोपवत् ।।२३ एव पशुसमै ढेरज्ञानप्रभव महत् । अवाप्यते नरैर्दु ख शिश्नोदरपरायणं ।।२४ हे मुनिश्रेष्ठ । उत्पन्न होने पर बाहरी वायु पे स्पर्श से अत्यन्त मूर्धा पो प्राप्त होता है ।।१६। उस समय जीव दुगंधित प्ररण से गिरे या आरे से थोडे के समान ही गर्भाशय से पृथिवी पर गिरता है ।।१७।। वह स्वय बुछ भी कर सकने में असमर्थ रहता तया स्नान और दुग्धाहार के लिये भी पराधीन रहता है ॥१८॥ अपवित्र विछौने पर पड़े रहने पर मच्छर मादि से काटते हैं, उन्हे भी वह नहीं हटा सवता ॥१६॥ इस प्रकार उत्पत्ति के समय पौर बाद में जीव माधिभौतिय दुसी को भोगता है ॥२०॥ पशान पे पन्धेरे में पडा हुमा जीव यह भी भूल जाता है fr में यहाँ से पाया? यहाँ जाऊँगा? मैं योन हूँ?, मेरा रूप धया है ? ॥२१॥ में कौन से यन्धन से पिग पारण चंपा है? मैं क्या पर', क्या न करू? क्या रहै, क्या न रहूँ ? ॥२मा पर्म पया है, अपमं क्या है ? मिग मयस्था में पैसे रहे? पसंम्प या पर्सम्म मया है ? तपा गुण या दोष क्या है ? ॥२॥ इग प्ररार विदेर रहिल पशु में गमान यह जीय अशान से उ पनि दुगो को भोगते हैं ॥२४॥ मशान तामसो भावः पार्यारम्भप्रवृत्तयः । प्रमानिना प्रस्तोगमंलोपास्ततो द्विज ॥२५ ३७८ - - [! श्रीविष्णु पुराण नृरक कर्मणा लोपात्फलमाहुर्मनीर्पिण ।' वस्मादज्ञानिना दु खमिह चामुन'चोत्तमम् ॥१६ जराजर्जरदेहश्च शिथिलावयव पुमान् । विगलच्छीर्णदशनो वलिस्नायुशिरावृत २७ दूरप्रयाष्टनयनो व्योमान्तर्गततारक। तासादिवरनिर्यातलोमपुञ्जश्चलद्वपु ६ प्रकटीभूतसर्वास्थितपृष्ठास्थिसहति । उत्सन्नजठराग्निवादल्पहारोऽल्पचेष्टित IE हे द्विज । प्रज्ञान के ताममिक हाने से अज्ञानी पुरुषा की प्रवृत्ति तामfrक को म होती है इसके कारण वैदिक कम लुप्त हो जाते हैं ॥२५॥ कम लोप का फल मनीपियो ने नरक कहा है, इस लिये प्रज्ञानियों को इहलोक-पर- लोक दोनो में ही दुखो को भोगना होता है ॥२६॥ जब वुढापा पाता है तब अङ्ग शिथिल होते दाँत उखड जाते पोर देह पर भुरियां तथा नस-नाडियो उभट आती है ॥२७॥ नेत्र दूर तक नहीं देख पाते और उनम गढ़े पड जाते हैं, नासिका-छिद्रो से रोम बाहर निकलते और देह काँपता रहता है ॥२५॥ रीढ़ हड्डी झुक जाती और सभी अस्थियां दिखाई देने लगती हैं जठर्राग्नि मग्द हो कर पाचन शक्ति और पुरपाथ में न्यूनता पा जाती है ।।२सा कृच्छाच्चड्क्रमणोत्थानशयनासनचेष्टित। मन्दीभवृच्छ्रोत्रनेत्रस्त्रवल्लालाविलानन १३० अनायत्तस्समस्तंश्च करणेमरणोन्मुख । तक्षणेऽप्यनुभूतानामस्मर्ताखिलवस्तुनाम् ॥३१ सकृदुच्चारित वाक्ये समुद्भूतमहाश्रम । श्वासकाशसमुद्भूतमहायासप्रजागर ३२ अन्येतोत्याप्यतेऽन्येन तथा सवेश्यते जरी। भृत्यात्मपुत्रदारा गामवमानास्पदीकृत ॥३३ प्रक्षोरणासिनशौचश्च विहाराहारसस्पृह । हास्य परिजनस्यापि निविण्णाशेपवान्धव ।।१४ पष्ठ प्रश-प्र०५ ] [ ३७६ अनुभूतिमिवान्यस्मिात्मन्यात्मष्टिचेष्टितम् । सस्मरन्यौवने दीर्घ नि श्वसत्यभितापित ॥३५ एवमादीनि दु खानि जरायामनुभूय वै । भरणे यानि दुखानि प्राप्नोति शृणु तान्यपि ॥३६ चलने,-फिरने, उठने-बैठने प्रादि में भी कठिनाई होती है, कान और नेत्र अशक्त हो जाते है, और लार निकलने से मुख भी मलीन हो जाता है ॥३०॥ इन्द्रियां अपने अधीन नही रहती और मरणासन्न अवरया की प्राप्ति हाती है तथा अपने देसे-सुने पदार्थों की भी याद नहीं रहती ।।११।। एव' याक्य वहीं में भी कष्ट होता तथा श्वास काम के प्रकोप से जागता रहता है ॥३२॥ दूसरो के द्वारा उठाया-बैठाया जाता है, स्वय कुछ वरं नहीं सकता, इसीलिय अपने भृत्य, पुत्र, स्त्री आदि स भी तिरस्कृत होता रहता है ।।३३।। उसका पवित्राचरण नष्ट होता और भोग भोजन की इच्छा पढ जाती है, उसके बधुजन उससे उदामीनता का व्यवहार करते और परिजन हंसी उडाते हैं ॥३४॥ उसे अपनी यौवनावस्था की चेष्टाए किमी अन्य जन्म में की हुई सी याद पाती हैं और वह दु ख के कारण दोघ श्वास लेता रहता है ।।३।। इस प्रकार बुढापे के वष्ट भोगते हुए मरणकाल में उसकी जो अवस्था होती है उसे भी सुनो ।।३६ श्लथनीवाधिहस्तोऽथ व्याप्तो वेपथुना भृशम् । मुहुग्लानिपरवशो मुहनिलवान्वित ।।३७ हिरण्यधान्यतनयभार्याभृत्यगृहादिपु । एते पथ भविप्यन्तीत्यतीव ममताकुल ॥३८ मर्मभिद्धिमहारोग काचैरिव दारण । शररिवान्तकम्योग्रेश्विद्यमानासुबन्धन ॥३६ परिवर्तितनाराक्षो हस्तपाद मुहु क्षिपन् । सगुप्यमारणताल्वोष्ठपुटो घुरघुरायते ॥४० : निरखकण्ठो दोपोघरुदानश्वासपीडित । तापेन महता व्याप्तस्तृषा चातस्तथा शुधा ।।१ .

३८२ ] [ श्रीविष्णु पुराण धनोपाजन तथा पन की रक्षा और उसपे व्यय में भयवा इष्टमित्रो यो विपत्ति ये कारण भी जीव को अनेक दुय भोगने होते हैं ॥५४॥ यद्यत्प्रीतिपर पुसा वस्तु मैत्रेय जायते। तदेव दु सवृक्षस्य वीजत्वमुपगच्छति ॥५५ वलपुत्रमित्रार्थगृहक्षेत्रधनादिक । क्रियते न तथा भूरि सुस पुसा यथाऽमुसम् ॥५६ इति ससारदु सातापतापितचेतसाम् । विमुक्तिपादपच्छायामृते पुत्र सुस नृणाम् ॥५७ तदस्य विविधस्यापि दु सजातस्य वै मम । गर्भजन्मजराद्य पु स्थानेषु प्रभविष्यत ॥५८ निरस्तातिशयालादसुखभावैकलक्षणा । भेपज भगवत्प्राप्तिरेकान्तात्यन्तिकी मता ॥५६ तस्मात्तत्प्राप्तये यत्न कर्तव्य पण्डितैनर । तत्प्राप्तिहेतुआन च कर्म चोक्ते महामुने ॥६० नागमोत्थ विवेकाच द्विधा ज्ञान तदुच्यते । शब्दब्रह्मणागममय पर ब्रह्म विवेकजम् ॥६१ अन्ध तम इवाज्ञान दीपवच्चेन्द्रियोद्भवम् । यथा सूर्यस्तथा ज्ञान यद्विप्रर्षे विवेकजम् ॥६२ हे मैत्रेयजी | मनुष्यो की प्रिय वस्तुएं उनके लिये दुख रूपी वृक्ष का बीज बन जाती हैं ॥५५।। स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, घर, खेत नथा धाग्यादि से जितने दुख की प्राप्ति होती है, उतना सुख नहीं मिलता ॥५६॥ इस प्रकार दुख रूपी सूर्य के ताप से सतप्त हुए पुरपो को मोक्षरूपी वृक्ष की छाया के अतिरिक्त अन्य किस स्थान पर सुख की प्राप्ति होगी ॥५७।। इसलिये गर्म, जन्म और बुढापा प्रादि रोग-समूहो की एकमात्र औषधि भगवान की प्राप्ति ही है, जिसका लक्षण प्रानन्द रूप सुख का प्राप्त होना ही है ॥५८-५९। इसलिये भगवत्प्राप्ति का प्रयत्न ही ज्ञानियों का कर्तव्य है, और उसके ज्ञान और कर्म ये दो ही मार्ग हैं ॥६६॥ ज्ञान भी दो प्रकार का है-शास्त्र जन्य और विवेकजन्य । ससार के ब्रह्म है । वही मुमुक्षुओ द्वारा चिन्तनीय भगवान् विष्णु का अत्यन्त सूक्ष्म परम- पष्ट अंश-प्र०५ ] [ १८६ शब्द ब्रह्म विषयक ज्ञान शास्त्र से उत्पन्न होना है और पाया विरहान की उत्पत्ति विवेक से होती है ॥६१।। हे ब्रह्मा ! प्रशान घोर पापकार जमा है, उसे दूर करने के लिये इन्द्रिय से उत्पन्न शान दीपा फे समान पोर विक से उत्पन्न ज्ञान सूर्य ये रामान है ॥६२।। मनुरप्याह वेदार्थ स्मृत्वा यन्मुनिसत्तम । तदेतच्छु यतामा सम्बन्धे गदतो मम ।।६३ द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्द ब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः पर ब्रह्माधिगच्छति ।।६४ द्वे व विद्य वेदितव्ये इति चायणी ध्रुतिः । परया त्वक्षरप्राप्तिऋग्वेदादिमयापरा ॥६५ यत्तदव्यत्तमजरमचिन्त्यमजमव्ययम् । अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादाद्यसंयुतम् ॥६६ विभु सवंगत नित्यं भूतयोनिरकारणम् । व्याप्यव्याप्त यतः सर्व यह पश्यन्ति सूरयः ।।६७ तद्ब्रह्म तत्पर धाम तद्धय यं मोक्षकाक्षिभिः । श्र तिवाक्योदितं सूक्ष्म तद्विष्णोःपरमं पदम् ॥६८ तदेव भगवद्वाच्यं स्वरूप परमात्मनः । वाचको भगवच्छब्दस्तस्यायस्याक्षयात्मनः ।।६६ हे मुनिवर ! वेदार्थ के स्मरण पूर्वक मनुजी ने जो मुध मा म कहता हू,सुनो ॥६३||ब्रह्म के दो भेद हैं-ौर परब्रह्म जो शब्द प्रहागे नि मामा है उसे परब्रह्म की प्राप्ति होजाती है ॥६४॥ अथर्व श्रुति है कि पा और सपा भेद से विद्या दो प्रकार की है । परा से अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति सवनमा अपरा ऋगादि वेदात्मिका है ॥६५॥! अव्यक्त,अजर, अचिन्त्य,गज,अध्या, निर्देश, अरूप, हाथ-पांव ने शून्य, विभु, सर्वगत, नित्य, भूतयोनि, कारण-रहित, जिससे व्याप्य, व्यापक प्रकट हुआ और जिसे ज्ञानीजन ही देख पाते हैं, यही परमपा ३८४ ] [ श्रीविष्णु पुराण पद है । परमात्मा का वही स्प 'भगवत्' कहा जाता है तथा 'भगवत्' शब्द उसी मादि एव अक्षय रूप के लिये प्रयुक्त होता है ॥६६॥ एव निगदितार्थस्य तत्तत्व तस्य तत्त्वतः । ज्ञायते येन तज्ज्ञानं परमन्यत्रयीमयम् ।।७० अशब्दगोचरस्यापि तस्य वै ब्रह्मरणो द्विज । पूजाया भगच्छब्दः क्रियते ह्य पचारत.७१ शुद्ध महाविभूत्याख्ये परे ब्रह्मरिण शब्द्यते । मैत्रेय भगवच्छन्दस्सर्वकारणकारणे ॥७२ सम्भतेति तथा भर्ता भकारोऽर्थद्वयान्वित । नेता गमयिता स्रष्टा गकारार्थस्तथा मुने १७३ ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसश्श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्च व षण्णा भग इतीरणा ॥७४ वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि । स च भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः |७५ एवमेप महाञ्छब्दो मैत्रेय मगवानिति । परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः ॥७६ जिसका ऐसा रूप कहा है उस ब्रह्म तत्व का जिससे यथार्थ ज्ञान होता है, वही परमज्ञान है और प्रयीमय ज्ञान इससे भिन्न है ॥७०॥ हे द्विज ! ब्रह्म के शब्द का विपय न होने पर भी 'भगवत्' शब्द उपासना के लिये उपचार से ही कहा जाता है ।।७१।। हे मैत्रेयजो ! सब कारणो के कारण, महाविभूति रूप परब्रह्म को ही 'भगवत्' कहा है ॥७२॥ इस शब्द मे भकार के दो अर्थ लिये गये हैं-भरण करने वाला तथा सबका आधार और गकार के अर्थ कर्म- फल की प्राप्ति कराने वाला, लय करने और रचने वाला है ॥७३॥ ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य इन छ को भग कहते है ।७४॥ उस सर्व- भूतात्मा मे सब भूतो का निवास है तथा वह स्वयं भी सव भूतो मे स्थित है, इसलिये वह अव्यय ही वकार है ।।७५॥ हे मैनेयजी ! इस प्रकार यह भगवान् शब्द परब्रह्म रूप वासुदेव का ही वाचक है ॥७६

पठ अश-प्र० ५ ]
[ ३८५
तन पूज्यपदार्थोक्तिपरिभाषासमन्वित ।
उत्पत्ति प्रलय चैव भूतानामागति गतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्या च स वाच्यो भगवानिति ||७८
ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजास्यशेषतः ।
भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेय गुणादिभि ॥७६
सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि ।
भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्तत स्मृत ॥८०
खाण्डिक्यजनकायाह पृष्ट के शिध्वज पुरा।
नामव्याख्यामनन्तस्य वासुदेवस्य तत्त्वत ।।८१
भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसत्यन च तानि यत् ।
धाता विधाता जगता वासुदेवस्तत. प्रभु ।।८२
स सर्वभूतप्रकृति विकारान् गुणादिदोपाश्च मुने व्यतीत ।
अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनास्तृत यद्भुवनान्तराले ॥६३
समस्तकल्याणगुणात्मकोऽमो स्वशक्तिलेशावृतभूतवर्ग ।
इच्छागृहीताभिमतोरुदेह स्ससाधिताशेपजगद्धितो य ।।८४
तेजोवलैश्वर्यमहावबोध सुवीर्यशक्त्यादिगुणेकराशि ।
पर पराणा सकला न यत्र वलेशादयस्सन्ति परावरेशे ॥८५
स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपो व्यक्तस्वरूपोऽप्रकटस्वरूप ।
सर्वेश्वरस्सर्वदृक् सर्वविच्च समस्तशक्ति परमेश्वराख्य ।।८६
सज्ञायते येन तदस्तदोप शुद्ध पर निर्मलमेकरूपम् ।
सदृश्यते वाप्यवगम्यते वा तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ।।८७
पूजनीय सूचक इस भगवान् शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से परमात्मा के
लिये ही है, अन्यो के प्रति गौण रूप से होता है ॥७७) क्योकि भगवान् वही
कहा जा सकता है जो सब जीवो के उत्पत्ति, विनाश, मावागमन और बिद्या-
अविद्या का ज्ञाता हो ॥७॥ त्यागने योग्य गुणादि को छोडकर ज्ञान, शक्ति
बल,ऐश्वर्य,वीर्य तथा तेज आदि गुण ही 'भगवत् कहे जा मकते हैं ॥७६। उन्ही
परमात्मा मे सब भूतो का निवास है तथा वे भी प्रात्मा रूप से सब म रहते हैं

- [ श्रीविष्णु पुराण इसलिये उन्हें 'वासुदेव' कहा जाता है ॥८०॥ प्राचीनकाल मे खाण्डिक्य जनक के प्रश्न पर केशिध्वज ने 'वासुदेव' नाम की इस प्रकार व्यास्या की थी ॥१॥ सब भूतो मे व्याप्त और सब भूनो के निवास म्यान तथा ससार के रचयिता और रक्षक होने से वे 'वासुदेव' कहे जाते हैं ॥२॥ वे सर्वभूतो को प्रकृति प्रकृति के विकार, गुण और उनके दोषो से दिलक्षण तथा सब आवरणो से प्रतीत सर्वात्मा हैं । पृथिवी-प्राकाश के मध्य मे जो कुछ स्थित है, वह सब उन्हीं के द्वारा व्याप्त है ॥५३॥ वे सभी कल्याण-गुणात्मक है, उन्होने अपनी माया से ही सबको व्यास किया हुना है और वे अपने इच्छित स्वरूपो के धारण पूर्वक विश्व का कल्याण करते हैं ।।८४॥ तेज, बल, ऐश्वर्य, बोध, वीर्य और शक्ति प्रादि गुणों के समूह तथा प्रकृति प्रादि से भिन्न और सम्पूर्ण क्लेशो से नितान्त परे हैं ॥५५॥ वे ही समष्टि और व्यष्टि हैं, वे ही व्यक्त और अव्यक्त हैं, वे ही सर्वसाक्षी, सर्वज्ञाता और सबके स्वामी हैं तथा वे ही सर्वशक्ति सम्पन्न परमेश्वर सज्ञक हैं ॥८६॥ वे दोप-रहित, मल-रहित, विशुद्ध और एक रूप परमात्मा जिसके द्वारा देखे या जाने जाते हैं, वही ज्ञान है और इसके विपरीत को प्रज्ञान ममझो ॥७॥ छटवां अध्याय स्वाध्यायसयमाभ्या स दृश्यते पुरुपोत्तम । तत्प्राप्तिकारणं ब्रह्म तदेतदिति पठ्यते ॥१ स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमावसेत् । स्वाध्याययोगसम्पत्त्या परमात्मा प्रकाशते ।।२ तदीक्षणाय स्वाध्यायश्चक्षुर्योगस्तथा परम् । न मांसचक्षुपा द्रष्टुं ब्रह्मभूतस्स शक्यते ॥३ भगवस्तमहं योगं ज्ञातुमिच्छामि तं वद । जाते यत्राखिलाधारं पश्येय परमेश्वरम् ॥४ पष्ठ मश-१० ६ ] [ ३८७ यथा केशिध्वजः प्राह खाण्डिक्याय महात्मने। जनकाय पुरा योग तमह कथयामि ते ॥५ खाण्डिक्य कोऽभवद् ब्रह्मन्वो वा केशिध्वज कृती। कथ तयोश्च सवादो योगसम्बन्धवानभूत्॥६ श्री पराशरजी ने कहा-स्वाध्याय और सयम के द्वारा ही उन पुरुषो- त्तम के दर्शन होते हैं तथा ब्रह्म की प्राप्ति के कारण होने से इन्ह भी ब्रह्म ही कहा है ॥१॥ स्वाध्याय से योग का प्राश्रय प्राप्त करे और योग से स्वाध्याय का का प्राश्रय ले । इस प्रकार स्वाध्याय और योग रूप सम्पत्ति ही परमात्मा को प्रकाशित करने वाली है ॥२॥ उस ब्रह्मरूप ब्रह्म को चर्म-नेत्री से नहीं, स्वा ध्याय और योग रूपी नेत्रो से ही देखा जा सकता है ।।३।। श्री मैनेयजी ने कहा-है भगवन् । जिसे जानने पर परमेश्वर को देखा जा सकता है, उस योग को जानने का मैं इन्द्रुक हूँ, उसे पाप मेरे प्रति यहिये ॥४॥ श्री पराशरजी ने कहा--पूर्वकाल मे साण्डिक्य जनर से वैशिध्वज न इम योग का जो वर्णन किया था, वह तुम से वहता है ॥५॥ श्री भैरेयजी ने कहा- यह बारिडक्य और केशिध्वज पौन थे मौर उनका योग विषय मम्वाद विसलिये हुमा था? ॥६॥ धर्मध्वजो वै जनकस्तस्य पुनोऽमितध्वज । कृतध्वजश्च नाम्नासीत्सदाच्यात्मरतिनृप.13 कृतध्वजस्य पुरोऽभूत् स्यात शिध्वजो नृप । पुरोऽमितध्वजस्यापि साण्डिक्यजनकोऽभवत् ॥८ कर्ममार्गेण खाण्डिक्य पृथिव्यामभवत्ती। केशिध्वजोऽप्यतीवामीदात्मविद्याविशारद ॥६ तायुभावपि चैवास्ता विजिगीपू परम्परम् । पेशिध्वजेन साण्डिक्यम्स्वराज्यादवरोपित ॥१० पुरोधसा मन्त्रिभिन्न नमवतोपसाधनः । राज्यामिगहतम्गोश्य दुर्गारप्पचगेऽभवन् ।।११ । ३८८ [ श्रीविष्णु पुराण इयाज सोऽपि सुबहून्यज्ञाज्ञानव्यपाश्रय । ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय ततु मृत्यमविद्यया ॥१२ श्री पराशरजी ने कहा-पूर्वकाल म धर्मध्वज जनक नामक एक राजा होगये हैं। उनके दो पुत्र अमितध्वज और वृतध्वज नाम से हुए। इनमे से कृत ध्वज अध्यात्म मे ही लगा रहता था ॥७॥ कृतध्वज का पुत्र केशिध्वज पोर अमितध्वज का पुत्र सारिडक्य जनक हुआ ||८|| खाण्डिक्य कर्म-मार्ग मे और केशिध्वज अध्यात्म शास्त्र में निपुण था । वे दोनो परस्पर म एक दूसरे को हराने का यत्न करते रहते थे और अन्त मे केशिध्वज ने खाएिडक्य को राज्य से हटा दिया ॥१०॥ राज्य से भ्रष्ट हुया खारिडक्य पुरोहित और मन्त्रियो तथा अल्प सामान सहित वन म चला गया ॥११।। ज्ञानी होते हुए भी केशिध्वज ने कम द्वारा मृत्यु को जीतने के लिये अनेको यज्ञ किये ॥१२॥ एकदा वर्तमानस्य यागे योगविदा बर । धर्मधेनु जघानोग्रश्शार्दूलो विजने वने ॥१३ ततो राजा हता श्रुत्वा धेनु व्याघ्रण चत्विज । प्रायश्चित्त स पप्रच्छ किमोति विधीयताम् ॥१४ तेऽप्यूचुर्न वय विद्म कशेरु पृच्छयतामिति । कशेरुरपि तेनोक्तस्तथैव प्राह भार्गवम् ॥१५ शुनक पृच्छ राजेन्द्र माह वेधिस वेत्स्यति। स गत्वा तमपृन्छच्च सोऽप्याह शृणु यन्मुने ॥१६ न कशेरुन चवाह न चान्य साम्प्रत भुवि । वेत्त्येक एव त्वच्छत्रु खाण्डिक्यो यो जितस्त्वया ॥१७ स चाह त व्रजाम्येप प्रष्टुमात्मरिपु मुने। प्राप्त एव महायज्ञो यदि मा स हनिष्यति ॥१८ प्रायश्चित्तमशेण चेत्पृष्टो वदिष्यति । ततश्चाविक्लो यागो मुनिश्रेष्ठ भविष्यति ॥१६ एक दिन जब राजा के शिध्वज यज्ञानुपान में लगे पे तब उसकी धर्म- गौ को जनहीन वन में एक भयानक व्यान ने मार डाला ॥१३॥ जब राजा न

पष्ठ प्रश-१०६ ।
३८६
गो का इस प्रकार मारे जाना सुना तो उसने ऋत्विजो से उसका प्रायश्चित्त
पूछा ॥१४॥ ऋविजो ने कहा- इस विषय म मैं नहीं जानता, कशेरु में
पूछिये । कशेरु से पूछने पर उन्होंने भी यही कहा कि मैं तो नहीं जानता, परतु
सुनक अवश्य जानते होगे । तब राजा ने शुनक से पूछा और उन्हाने उसका
उत्तर इस प्रकार दिया इस बात का कशेरु, मैं अथवा अय कोई भी नहीं
जानता, केवल आपके द्वारा परास्त साएिडक्य ही जानता है ॥१५-१६-१७।।
यह सुनार राजा ने कहा-हे मुने | तो मैं अपने शत्रु वारिडक्य के पास जाकर
ही पूछता हूँ । यदि उसने मरा वध पर दिया तो भी महायज्ञ का फन ता प्राप्त
हो ही जायगा और वही प्रायश्चित बता दिया, ता यज्ञ को निर्विघ्न समाप्ति
निश्चित है ।।१८ १६॥
इत्युक्त्वा रथमारा कृष्णाजिनधरा नृप ।
वन जगाम यत्रास्ते स साण्डिक्यो महामतिः ।।२०
तमापतन्तमालोक्य खागिडक्यो रिपुमात्मन ।
प्रोवाच जोधताम्रक्षस्ममारोपितकामुक ॥२१
कृष्णाजिन त्व परचमावस्यास्मान्हनिग्यसि ।
कृष्णाजिनधरे यत्ति न मयि प्रहरिष्यति ।।२२
मृगारणा वद पृष्ठेपु मूढ वृष्णाजिन न विम् ।
येपा गया त्वया चोग्रा प्रहिताविशतसायरा ॥२३
स त्वामह हनिष्यामि न मे जीवन्धिमोक्ष्यमे ।
प्रातताय्यमि दुर्बुद्ध मम राज्यहरो रिपु ।।२४
साण्डिक्य सशय प्रप्टु भवनमहमागत ।
न त्वा हातु विचार्यतत्कार वारण विमुश्च वा ॥२५

३६० ]
[ श्रीविष्णु पुराण
तूने उन कृष्ण मृगो पर कभी वाण नही बरसाये हैं ? ॥२३॥ इसलिये, मैं
अवश्य ही तेरा वध कर दूंगा, तू मेरे राज्य का अपहरण करने वाला शत्रु है
॥२४।। केशिध्वज ने कहा- हे खारिडक्य । मैं आपका वध करने के लिये नहीं,
केवल एक सन्देह का समाधान करने के लिये आया है। यह जानकर आप
क्रोध का त्याग करें अथवा मुझ पर बाण छोड दे ॥२५।।
ततस्त मन्त्रिभिस्साई मेकान्ते सपुरोहितः।
मन्त्रयामास खाण्डिक्यस्सर्वेरेव महामतिः ॥२६
तमूचुर्मन्निणो बध्यो रिपुरेप वशं गतः ।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा तव वश्या भविष्यति ॥२७
खाण्डिक्यश्चाह तान्सर्वानेवमेतन्न सशय.।
हतेऽस्मिन्पृथिवी सर्वा मम वश्या भविष्यति ॥२८
परलोकजयस्तस्य पृथिवी सकला मम ।
न हन्मि चेल्लोकजयो मम तस्य वसुन्धरा ॥२६
नाह मन्ये लोकजयादधिका स्याद्वसुन्धरा ।
परलोकजयोऽनन्तस्स्वल्पकालो महीजयः ॥३०
तस्मान्नून हनिष्यामि यत्पृच्छति वदामि तत् ॥३१
ततस्तमभ्युपेत्याह खाण्डिक्यजनको रिपुम् ।
प्रष्टव्य यत्त्वया सर्व तत्पृच्छस्व वदाम्यहम् ॥३२
श्री पराशरजी ने कहा-ऐसा सुन वर साण्डिक्य ने अपने पुरोहितो
और मन्त्रियो से परामर्श किया ॥२६॥ तब मन्त्रियो ने कहा-इस समय शत्रु
आपको पाड मे है, इसे मार डालना हो उचित है ।ऐसा करने से इस सम्पूर्ण
पृथिवी पर आपका अधिकार हो जायगा ॥२७॥ खाण्डिक्य बोले--प्राप सब का
वयन यथार्थ है, परन्तु इसे मार देने पर यह पारलौविक विजय प्राप्त कर लेगा
और मुझे पृथिवी ही मिलेगी। यदि इसका वध नहीं करेगा तो इसे पृथिवी
और मुझे पारलौतिक सिद्धि प्राप्त होगी ॥२८-२६॥ परलोक से बढ़ कर पृथिवी
नहीं है, क्यो कि पारलौविक विजय चिरकालिक और पृथियो मल्प पालिक
होती है। इसीलिये मैं इसका वध न पर इसरे प्रश्न या समाधान पगा

पष्ठ प्रश-प्र०७ -- बाढमित्येव तेनोक्तः खाण्डिक्यस्तमथाब्रवीत् । भधानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षण ॥४६ यदि चेद्दीयते मह्य भवता गुरुनिष्क्रय । तत्वलेशप्रशमायाल यत्कम तदुदोरय ।।५० तब खाण्डिक्य ने हँसते हुए कहा-राज्य तो कुछ दिन टिकने वाला है, मेरे जैसे व्यक्ति को क्या मांगना चाहिय ? ॥४६॥ यह सत्य है कि स्वार्थ सिद्धि के लिये आपका परामश उचित हो सकता है परन्तु परमार्थ का आपको ज्ञान नहीं ॥४७॥ श्री पराशरजी ने वहा-फिर खाण्डिक्य ने व शिध्वज के पास पा कर कहा- क्या तुम मुझे अवश्य गुरु दक्षिणा देना चाहत हो ? केशिध्वज बोले- --अवश्य । तव खाण्डिक्य ने कहा- आप आध्यात्मरूपिणी परमार्थ विद्या मे पारङ्गत है, इसलिये गुरुदक्षिणा स्वरूप मुझे यह वताइये, जिससे सभी क्लयो का शमन हो सके ।॥५०॥ मातवा अध्याय न प्रार्थित त्वया कस्मादस्मद्राज्यमकप्टकम् । राज्यलाभाद्विना नान्यत्क्षनियाणामतिप्रियम् ॥१ केशिध्वज निवोध त्व मया न प्रार्थित यत । राज्यमेतदशेष ते तत्र गृध्नन्त्यपण्डिता ॥२ क्षत्रियाणामय धर्मों यत्प्रजापरिपालनम् । वधश्च धर्मयुद्धन स्वराज्यपरिपन्धिनाम् ॥३ तनाशक्तस्य मे दोपो नेवास्त्यपहृते त्वया। वन्धायैव भवत्येपा ह्यविद्याप्यक्रमोज्झिता ॥४ जन्मोपभोगलिप्साय मिय राज्यस्पृहा मम । यन्येपा दोपजा सैव धर्म व नानुरुध्यते ॥५ न याचा क्षयवन्धूना धर्मार्थतत्सता मतम् । प्रतो न याचित राज्यमविद्यान्तर्गत तव ॥६ ३९४ ] [ श्रीविष्णु पुराण राज्ये गृघ्नन्त्यविद्वांसो ममत्वाहृतचेतसः । अह मानमहापानमदमत्ता न मादृशाः ॥७ केशिध्वज ने कहा-निय तो राज्य से अधिक प्रिय और किसी भी वन्तु को नहीं मानते, फिर आपके निकटक राज्य न मागने का क्या कारण हैं ? ॥१॥ खाण्डिक्य ने कहा है के शिध्वज । राज्यादि की कामना तो मूर्ख किया करते हैं, इसी लिये मैंने राज्य नही मागा है ॥२॥ क्षत्रियों का धर्म प्रजा. पालन तथा अपने विरोधियो का धर्म पूर्वक दमन करना है |१३|| अशक्त होने के कारण तुमने मेरे राज्य वा अपहरण कर लिया तो वैसा न करने में मुझे कोई दोष नहीं है । यद्यपि यह अविद्या ही है, फिर भी इसका अनियमित रूप त्याग करना भी बन्धन का कारण हो जाता है ॥४॥ राज्य की प्राकाक्षा तो जन्मान्तर का सुख भोगने को निमित्त है और मन्त्री आदि में भी उसकी उत्पत्ति रागादि के कारण होती है ॥५॥ सज्जनो का मत है कि याचना करना श्रेष्ठ मनियो का धर्म नहीं है, इसीलिये मैंने अविधा वाले राज्य की यानना नहीं की है ।।६) अहकार रूपी मद से उन्मत्त और ममतामय चित्त वाले मूर्ख पुरुष ही राज्य की इच्छा करते है, मेरे जैसो को उसकी कोई कामना नहीं ॥७॥ प्रहृष्टस्साध्विति प्राह तत केशिध्वजो नृप. । खाण्डिक्यजनक प्रीत्या श्रू यता वचनं मम ।। अह मविद्या मृत्यु च ततुकाम करोमि । राज्यं यागांश्च विविधान्भोगः पुण्यक्षयं यथा ।।। तदिद ते मनो दिष्ट्या विवेकश्वर्यता गतम् । तच्छ यतामविद्यायास्स्वरूप कुलनन्दन ।।१० अनात्मन्यात्मवुद्धिर्या चास्वे स्वमिति या मतिः । संसारतरसम्भूतिवीजमेतद् द्विधा स्थितम् ॥११ पञ्चभूतात्मके देहे देही मोहतमोवृतः । अह मर्मतदित्युच्च : कुरुते कुमतिम तिम् ॥१२ आकाशवाय्वग्निजलपृथिवीभ्यः पृथक् स्थिते । पात्मन्यात्ममय भाव कः करोति कलेवरे ॥१३

पप्ठ अदा-०७
। ३६५
कलेवरोपभोग्य हि गृहक्षेत्रादिक च कः ।
प्रदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते ।।१४
श्री पराशरजी ने कहा-~-इस पर राजा केशिध्वज ने उन्हे साधुवाद
देकर प्रेम सहित यह कहा ।।८।। मैं अविद्या के द्वारा मृत्यु को जीतना चाह कर
राज्य और यज्ञो के अनुष्ठान मे लगा हूँ, जिससे विविध प्रकार के भोगो से मेरे
पुण्य क्षीण हो सकें ।।६। यह प्रसन्नता की बात है कि तुम्हारी बुद्धि निवेक से
सम्पन्न हुई है. इसलिये अब तुम अविद्या के रूप का श्रवण करो ॥१०॥ अनात्मा
को प्रात्मा और अपना नहीं है, उसे अपना मानना-इस प्रकार अविद्या के दो
भेद हैं ।।११। यह बुद्धिहीन प्राणो मोहान्धकार मे पड कर पञ्चभूतात्मक इस
शरीर 'मैं' या मेरा' का भाव रखता है ॥१२॥ परन्तु प्राकाश, वायु, अग्नि,
जल और पृथिवी ग्रादि से प्रात्मा के नितान्त पृथक् होने के कारण कौन विवेकी
पुरुप शरीर को प्रा मा मानेगा ? ॥१३॥ और जव शरीर से प्रात्मा भिन्न है
तो शरीर के उपभोग को घर प्रादि वस्तुओ को कोन ज्ञानी पुरुष अपना कह
सकता है ।।१४॥
इत्य च पुत्रपौत्रेषु तद्द होत्पादितेपु क ।
करोति पण्डितस्स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे ॥१५
सर्व देहोपभोगाय कुरुते कर्म मानव ।
देहश्चान्यो यदा पुसस्तदा बधाय तत्परम् ।।१६
मृन्मय हि यथा गेह लिप्यते वै मृदम्भमा ।
पार्थिवोऽय तथा देहो मृदम्बालेपनस्थित ॥१७
पञ्चभूतात्मक ग. पञ्चभूतात्मक वपु ।
प्राप्यायते यदि तत पु सो भोगोऽय किनः ॥१८
भने जन्मगायो मसारपस्वी नजन् ।
मोहम्म प्रायतोमो वागनारेगुगुण्ठितः ।।१६
प्रक्षाल्यते यदा सोम्य रेणुनानाणारारिणा ।
तदा ससारपान्यरच याति मोहनमस्तमम् ॥२०

[ श्रीविष्णु पुराण
मोहश्रमे शम याते स्वस्थान्त करणः पुमान् ।
अनन्यातिशयावाध पर निर्वाणमृच्छति ॥२१
इस प्रकार देह के आत्मा न होने मे उत्पन्न हुए पुत्र पौन आदि को भी
कौन अपना मानेगा ? ॥१२॥ इस देह के उपभोगार्थ सब कर्म किये जाते हैं,
परन्तु देह के अपने से अलग होन के कारण वे सभी कर्म बन्धनकारी ही होजाते
है ।।१६।। जैसे घर को मिट्टी और जल से लीपा जाता है, वैसे ही यह शरीर
मिट्टी और जल के द्वारा ही स्थिर रहता है ।।१७॥ यदि पञ्चभूतात्मक इस देह
का पोपण पाञ्चभौतिक पदार्थों से ही होता है तो पुरुष इससे क्या भोग कर
सका? ॥१८॥ यह प्राणी हजारो जन्म तक सांसारिक भोगो मे रहने के कारण
उन्ही भोगो की वासना रूपी धूलि से पट कर मोह रूपो थम को पाता है ||१६
जब वह धूलि ज्ञान रूपी उष्ण जल से धुल जाती है तभी इस विश्वपथ के
पथिक का मोह-श्रम मिट पाता है ॥२०॥ तव वह स्वस्थ-चित्त हुमा पुरुष
निरतिशय और अबाध परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है ।।२१।।
निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमल।
दुखाज्ञानमया धर्मा. प्रकृतेस्ते तु नात्मन ॥२२
जलस्य नाग्निससर्ग. स्थालीसगात्तथापि हि ।
शब्दोद्रे कादिकान्धर्मास्तत्करोति यथा नृप ।।२३
तथात्मा प्रकृतेस्सङ्गादहम्मानादिदूपित, ।
भजते प्राकृतान्धर्मानप्यस्तेभ्यो हि सोऽव्यय. ॥२४
तदेतत्कथित बीजमविद्याया मया तव ।
क्लेशाना च क्षयकर योगादन्यन्न विद्यते ॥२५
त तु ब्रूहि महाभाग योग योगविदुत्तम ।
विज्ञातयोगशास्त्रार्थ स्त्वमम्या निमिसन्तती ॥२६
योगस्वरूप खाण्डिक्य श्रूयता गदतो मम ।
यय स्थितो न च्यवते प्राप्य ब्रह्म लय मुनि ।।२७
यह मल-रहित और ज्ञानमय प्रात्मा निर्वाण रूप है और दुसादि
मज्ञानमय धर्म मात्मा के नहीं, प्रकृति के हैं ॥२२॥ जसे स्पाली मे भरे हुए जल

पष्ठ अश-०७
[ ३६७
का सयोग अग्नि से न होने पर भी स्थाली के ससर्ग से ही वह जल खोलने
लगता है, वैसे ही प्रकृति के ससर्ग से अहकार आदि से दूपित हुमा मात्मा
प्रकृति के धर्मों को अपना लेता है । नहीं तो अव्यय स्वरूप प्रात्मा उन धर्मों से
नितान्त पृथक् है ।।२३-२४॥ इस प्रकार यह अविद्या का वीज मैंने कहा है ।
इस अविद्या-जन्य क्लेशा का दूर करने का उपाय योग ही है ।।२।। खाण्डिक्य
ने कहा-ह केशिध्वज 1 तुम योग के जानन वालो म श्रेष्ठ तथा योगशास्त्र के
मर्मज्ञ हो, इसलिये उस योग कर स्वरूप भी कहा ।।२६॥ देशिध्वज ने कहा-
अब तुम मुझसे उस योग को सुनो जिसम अवस्थित मुनिजन ब्रह्म स्वरूप होकर
फिर उसस पतित नहीं होते ॥२७।।
मन एव मनुष्यारणा कारण वन्धमोक्षयो ।
वन्वाय विपयासङ्गि मुक्त्यै निर्विषय मन ॥२८
विषयेभ्यस्समाहृत्य विज्ञानात्मा मनो मुनि ।
चिन्तयेन्मुक्तये तेन ब्रह्मभूत परेश्वरम् ॥२६
अात्मभाव नयत्येन तद्ब्रह्म ध्यायिन मुनिम् ।
विकार्यमात्मनदशक्त्या लोहमाक्पको यथा ॥३०
ग्रात्मप्रयलसापेक्षा विशिष्टा या मनोगति ।
तस्या ब्रह्मरिण सयोगा याग इत्यभिधीयते ॥३१
एवमत्यन्तवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षण ।
यस्य योग स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ।।३२
योगयुक् प्रथम योगी युञ्जाना ह्यभिधीयते ।
विनिप्पन्नसमाधिस्तु पर ब्रह्मोपलब्धिमान् ॥३३
मनुष्या क वध-माक्ष का कारण मा हो है । पिपाम पामत हार
यह बन्धन करन वाला ता विपया का त्यागन से माक्ष प्राप्त करान वाला हाता
है ॥२८॥ इलिय विमान-समन मुनिजना का प्रश्न मनात विपया त निवृत्त
पर, मोक्ष की प्राप्ति निर परमात्मा का ही पिउन रना चाहिय ॥२६॥
जग पुम्बर मानी शान्ति र साह यो पपनी पार गीप रता है, वंस हो रह-
चिनन यार मुनि का परमात्मा स्वभाव में ही प्रान म मिना रना है ॥३०॥

३६८ ] [ श्रीविष्णु पुराण पात्मज्ञान के यल रूप यम, नियमादि की अपेक्षा वाली विशिष्ट मनोगति का ब्रह्म से संयोग होना ही 'योग' कहा गया है ॥३१॥ जो इस प्रकार के विशिष्ट धर्म वाले योग में रत रहता है, वह मुमुक्षु योगी कहलाता है ॥३२॥ प्रथम योगाभ्यास करने वाला 'योग युक्त योगो' कहा जाता है और जब वह परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, तब उसे 'विनिष्पन्न समाधि' कहते है ॥३३॥ यद्यन्तरायदोपेण दूष्यते चास्य मानसम् । जन्मान्तररभ्यसतो मुक्तिः पूर्वस्य जायते ।।३४ विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्ति तव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥३५ ब्रह्मचर्यमाहिसा च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योग्यता स्वमनो नयन् ॥३६ स्वाध्यायशौचसन्तोपतपासि नियतात्मवान् । कुर्वीत ब्रह्मरिण तथा परस्मिन्प्रवरण मनः ॥३७ एते यमास्सनियमाः पञ्च पञ्च च कीर्तिताः । विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामारणां विमुक्तिदाः॥३८ एक भद्रासनादीना समास्थाय गुणयुतः। यमास्यनियमास्यश्च युञ्जीत नियतो यतिः ॥३६ प्राणाख्यमनिल वश्यमभ्यासात्कुरुते तु यत् । प्राणायामस्स विज्ञेयस्सवीजोऽवीज एव च ॥४. यदि उस योगी का चित किसी विघ्न के कारण दुपित हो जाता है तो दूसरे जन्म मे अभ्यास करने पर उसकी मुक्ति हो जाती है ॥३४॥ विनिष्पन्न समाधि योगी के कर्म योगाग्नि से भस्म हो जाते है और इसीलिये उस स्वल्प काल मे ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ||३५|| योगी को ब्रह्म-चिन्तन के योग्य होने के लिये ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह आदि का पालन करना उचित है ॥३६॥ स्वाध्याय, शौच, सन्तोप और तप के माचरण पूर्वक अपने मन को परब्रह्म में लगादे ॥३७॥ यम और नियम दोनो पांच-पांच हैं, foसी कामनाचश इनका पालन करने से पृथक्-पृथक् फल की प्राप्ति होती है, पष्ठ प्रश-ग्र०७ ] परन्तु निष्काम पालन से मोक्ष मिल जाता है ॥३८॥ इसलिये यति को भद्रासन आदि मे से किसी एक आसन के अवलम्बन मे यम, नियम आदि के सेवन पूर्वक योगाभ्यास करना चाहिये ।।३६।। अभ्यास द्वारा प्राण वायु का वश मे किया जाना प्राणायाम है । उसके सवीज और निर्योज- यह दो प्रकार हैं ।।४।। परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यथानिलो। कुरुतस्सद्विधानेन तृतीयस्सयमात्तयोः ॥४१ तस्य चालम्वनवतः स्थूलरूप द्विजोत्तम । आलम्बनमनन्तस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ।।४२ शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् । कुर्याञ्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ।।४३ वश्यता परमा तेन जायतेऽतिचलात्मनाम् । इन्द्रियाणामवश्यस्तैन योगी योगसाधकः ।।४४ प्राणायामेन पवने प्रत्याहारेण चेन्द्रिये । वशीकृते ततः कुर्यास्थित चेतश्शुभाश्रये ।।४५ प्राण और अपान के द्वारा तिरोध करने से दो प्राणायाम होते है तथा इन दोनो को एक ही समय रोकने से तीसरा कुम्भक प्राणायाम होता है ।।४।। सबीज प्राणायाम के अभ्यासी का पालम्पन अनन्त भगवान् का स्थूल रूप होता है ।।४२।। फिर वह प्रत्याहार के अभ्यास पूर्वक अपनी विषयासक्त इन्द्रियो को संयमित करके अपने चित्त के अनुसार चलने वाली बना लेता है ॥४३॥ इससे चचल इंद्रियां उसके वश में हो जाती हैं, जिनको वशीभूत किये विना योग- साधन सम्भव नही होता ॥४४॥ इस प्रकार प्राणायाम से वायु को और प्रत्या- हार से इद्रियो को वश में करके चित्त को शुभाश्रय में स्थित करना चाहिये ।४५॥ कथ्यता मे महाभाग चेतसो यश्शुभाश्रयः । यदाधारमशेप तद्धन्ति दोषमलोद्भवम् ॥४६ ग्राश्रयश्चेतसो ब्रह्म द्विधा तच्च स्वभावतः। भूप मूर्तममूर्त च पर चापरमेव च ।।४७ "

४०० ]
[ श्रीविष्णु पुराण
त्रिविधा भावना भूप विश्वमेतन्निवोधताम् ।
ब्रह्माख्या कर्मसज्ञा च तथा चवोभयात्मिका ।।४८
कर्मभावात्मिका ह्य का ब्रह्मभावात्मिका परा ।
उभयात्मिका तथवान्या निविधा भावभावना ॥४६
सनन्दनादयो ये तु ब्रह्मभावनया युताः ।
कर्मभावनया चान्ये देवाद्याः स्थावराश्वराः १५०
हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा ।
वोधाधिकारयुक्तेषु विद्यते भावभावना ॥५१
अक्षीणेषु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु ।
विश्वमेतत्पर चान्यदभिन्नदृशा नृणाम् ॥५२
प्रत्यस्तमितभेद यत्सत्तामात्रमगोचरम् ।
वचसामात्मसवेद्य तज्ज्ञान ब्रह्मसज्ञितम् ॥५३
तच विषयोः पर रूपमरूपाख्यमनुत्तमम् ।
विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षण परमात्मनः ।।५४
खरिडक्य ने कहा-हे महाभागो! जिसके पाश्रय में चित्त के सब
दोप नाश को प्राप्त होते है, वह चित्त का शुभाश्रय कौन-सा है ? ॥४६।। केशि-
ध्वज ने कहा--चित्त का प्राश्रय ब्रह्म है, जो मूर्त-अमूर्त अथवा पर-अपर रूप
से दो प्रकार का है ।।४७।। हे राजन् ! इस विश्व मे कर्म, ब्रह्म और उभया-
मिका नाम की तीन प्रकार की भावनाएँ कही है ||४८॥ इनमे कर्मभावना
पहिली, ब्रह्मभावना दूसरी और उभयात्मिका तीसरी है ।।४६॥ सनन्दन मादि
मुनिगण ब्रह्म भावना वाले तथा देवताग्रो से स्थावर जगम तक जितने भी जीव
हैं, वे मब कर्म भावना वाले हैं ।।५०॥ तथा वोध और अधिकार वाली ब्रह्म
और कर्म दोनो से युक्त उभयात्मिका भावना समझो ॥५१॥ जब तक विशेष
ज्ञान के कारण रूप कर्मों का क्षय नही होता, तभी तक अहङ्कारादि के कारण
निनकी भेद दृष्टि हो रही है, उन्हे ब्रह्म और जगत् भिन्न प्रतीत होते हैं ।।५।।
जिसमे सब भेद नष्ट होते, जो सत्तामात्र वाणी का विषय नही है तथा जो
अनुभव से जानने योग्य है, वही ब्रह्मज्ञान है ॥५३।। वहीं विप्णु प्ररूप कहा जाने

प? मग-4..] [ १०१ पाना परम स्वरूप है, जो उनके विशप मे नितान्त बिनधाय है ॥१४॥ न तद्योगयुजा गम्यं नृप चिन्तयितु यतः । ततः स्थल हरे रूपं चिन्तयेद्विश्वगोचरम् ।।५५ हिरण्यगर्भो भगवान्यासुदेवः प्रजापतिः । मरुतो वमवो मुद्रा भास्वारास्तारका ग्रहाः ॥५६ गन्धर्वयक्षदत्याद्यास्सकला देवयानय । मनुप्या. पावालास्ममुद्रास्मरितो द्रुमाः ।।५७ भूग भूतान्योपाणि भूताना ये च हेतवः । प्रधानादिवियोपान्त चेतनाचेतनात्मकम् ।।५८ एकपादं द्विपाद च बहुपादमपादकम् । मूर्तमेतद्धरे रूप भावनायितयात्मकम् ॥५६ एतत्मवंमिद विश्व जगदेतच्चराचरम् । परब्रह्मस्वरूपस्य वियोश्शक्तिसमन्वितम् ॥६० हे ना ! योगाभ्यागी प्रारम्भ में उनके उस परम रूप का चिन्तन करने में असमर्थ होते हैं, इसलिये उन्हें उनके विश्वमय म्यूल रूप का ही ध्यान करना चाहिये ॥५५॥ हिरण्यगर्भ, वासुदेव, प्रजापति, मरुद्गण वमुगण, रुद्र, आदित्य, तारागण, ग्रहगण, गरवं, यक्ष, दैत्य देवता, मनुष्य, पशु पर्वत, ममुद्र, नदी, वृक्ष, सम्पूर्ण भूत तथा प्रधान मे विशेष पर्यन्त उनके कारण तथा चेतन,अचेतन, एकपाद, दो पाद अथवा अनेक पाद या विना पाद के प्राणी--यह सभी भगवान् के तीन भावना वाले मूर्त स्वरूप हैं ॥५६-५७-५८-५६॥ यह सम्पूर्ण विश्व ही उन परब्रह्म रूप भगवान् विष्णु की शक्ति से सम्पन्न उन्हीं का 'विश्व' नामक स्वरूप है ॥६॥ विष्णुशक्ति परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा । अविद्या कर्मसज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥६१ यया क्षेत्रज्ञशक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा। ससारतापानखिलानवाप्नोत्यतिसन्ततान् ॥६२ ,

४०२
[ श्रीविष्णु पुराण
तया तिरोहितत्वाच शक्ति क्षेत्रसज्ञिता ।
सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते ॥६३
अप्रागवत्सु स्वल्पा सा स्थावरेपु ततोऽधिका ।
सरीसृपेपु तेभ्योऽपि ह्यतिशक्त्या पतनिपु ।।६४
पतत्तिभ्यो मृगास्तेभ्यस्तच्छक्त्या पशवोऽधिका ।
पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पु स प्रभाविता ॥६५
तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥६६
शक्रस्ससस्तदेवेभ्यस्ततश्चाति प्रजापति ।
हिरण्यगर्भोऽपि तत पुस शक्त्युपलक्षित ॥६७
एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव ।
यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ।।६८
विष्णु नामक शक्ति परा और क्षेत्रज्ञ नामक शक्ति अपरा है तथा कर्म
सशक तृतीय शक्ति अविद्या कही जाती है ॥१॥ हे नृप । इसी अविद्या से
आवृत्त हुई क्षेत्रज्ञ शक्ति सब प्रकार के सासारिक कष्टो को भोगती है ।।६२॥
अविद्या से तिरोहित हुई क्षेत्रज्ञ शक्ति सब जीवो मे तारतम्य से दिखाई पड़ती
है ।।६३॥ जड पदार्थों में यह स्वल्प प्रमाण मे, उनसे अधिक स्थावरो मे और
उनसे अधिक सरीसृपादि मे तथा उनसे भी अधिक पक्षियो मे है ॥६४॥ पक्षियो
से अधिक मृगो मे, उनसे अधिक पशुप्रो मे तथा पशुयो से अधिक शक्ति मनुष्यो
मे है ॥६५॥ मनुष्यो से अधिक नाग, गन्धर्व, यक्षादि सब देवताओ मे, उनसे
अधिक इन्द्र मे, इन्द्र से अधिक प्रजापति मे, उनसे अधिक हिरण्यगर्भ मे दिखाई
देती है ॥६६-६७॥ यह सभी रूप उस परमेश्वर के ही देह हैं, क्याकि आकाश
के समान ही उनकी शक्ति से यह सभी व्याप्त हो रहे हैं ॥६८||
द्वितीय विष्णुसज्ञस्य योगिध्येय महामते ।
अमूर्त ब्रह्मणो रूप यत्सदित्युच्यते बुध. ।।६९
समस्ता शक्तयश्चैता नृप यन प्रतिडिता ।
तद्विश्वरूपवरूप्य रूपमन्यद्धरेमहत् ।।७०

पष्ठ प्रश-प्र. ३ ]
[ ४०३
समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर ।
देवतिर्यड्मनुष्यादिचेष्टावन्ति स्वतीलया ॥७१
जगतामुपकाराय न सा वर्मनिमित्तजा।
चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यव्याहतात्मिका ।।७२
तद्रूप विश्वरूपस्य तस्य योगयुजा नृप ।
चिन्त्यमात्मविशुद्धयर्थ सर्व किल्विषनाशनम् ।।७३
यथाग्निरुद्धतखि कक्ष दहति सानिल ।
तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिना सर्व किल्विपम् ॥७४
तस्मात्समस्तशक्तीनामाधारे तत्र चेतस. ।
कुर्वीत सस्थिति सा तु विज्ञेया शुद्धधारणा ७५
हे महामते । ब्रह्म का द्वितीय अमूर्त रूप 'विष्णु'सक्षक है,जिसे जानीजन
'सत्' कहते और मुनिजन जिसका ध्यान करते है ॥६६॥ जिसमे यह सभी
शक्तियां स्थित है वही विश्व रूप से विलक्षण भगवान् का दूसरा रूप है ।।७।।
अपनी लीला त देव, तियक तथा मनुष्यादि की चेष्टागी वाला सर्व शक्तिमय
स्वरूप भी भगवान् का वही रूप धारण करता है ॥७१।। इन रूपो मे उनकी
व्यापक और अव्याहत चेष्टा जगत् के उपकारार्थ है कम से उत्पन्न नहीं होती
१७२॥ हे नृप । योगाभ्यास करने वाले को प्रात्म शुद्धि के लिये उसी सर्व पाप
हर स्वरूप का ध्यान करना चाहिये ।।७३।। जैसे वायु से मिलकर अग्नि अपनी
ऊँची ज्वालाग्रो से तिनको को भस्म कर देता है, वैसे ही चित्त मे स्थित हुए
भगवान विष्णु योगियो के सभी पापो को भस्म कर देते हैं ॥७४|| इसलिय
सर्वशक्तियो के प्राधार भगवान विष्णु मे चित्त का लगाना ही शुद्ध धारणा है ७५
शुभाश्रय स चित्तस्य सर्वगस्याचलात्मन ।
निभावभावनातीतो मुक्तये योगिनो नृप ।।७६
अन्ये तु पुरुपव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रया ।
अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्या कर्मयोनय ७७
मूर्त भगवतो रूप सर्वापाश्रयनि स्पृहम् ।
एपा वै धारणा प्रोक्ता यच्चित्त तत्र धार्यते ॥७८

४०४ ]
[ श्रीविष्णु पुराण
यच्च मूर्त हरे रूपं यादृविचन्त्य नराधिप ।
तच्छ्र यतामनाधारा धारणा नोपपद्यते ॥७६
प्रसनवदनं चारुपद्मपत्रोपमेक्षणम् ।
सुकपोलं सुविस्तीर्णललाटफलकोज्ज्वलम् ।1८०
समकणन्तिविन्यस्तनारकुण्डलभूपणम् ।
कम्वुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्साङ्कितवक्षसम् १८१
वलिबिङ्गिना मग्ननाभिना ह्य दरेण च ।
प्रलम्बाष्टभुज विष्णुमयवापि चतुर्भुजम् ॥८२
समस्थितोरुजङ्घच सुस्थिताध्रिवराम्बुजम् ।
चिन्तयेद् ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम् ॥८३
हे राजन् । तीनो भावनामो से परे भगवान् विष्णु ही योगियो को मोक्ष
प्राप्त कराने के लिये उनके चचल और स्थिर चित्त के शुभाश्रय हैं ॥७६।। इसके
अतिरिक्त मन को आश्रय देने वाले देवादि कर्म योनियो को पशुद्धाश्रय समझो
१७७)। भगवान के इस मूर्त रूप से चित्त अन्य आश्रयो से हट जाता है, इस
प्रकार चित्त के उन्ही मे स्थिर होने को 'धारणा' कहते हैं ॥७॥ हे राजन् !
बिना किसी आधार के पारणा नही होती, इसलिये प्रभु का जो मूर्त रूप है,
उसे सुनो ॥७९॥ जो भगवान् प्रसन्न मुख और सुन्दर पद्मदल जैसे लोचन वाले,
श्रेष्ठ कपोल, विशाल ललाट, कानो मे कुण्डल धारण किये हुए, शख जैसी ग्रीवा
वाले, विस्तृत एव श्रीवत्सचिह्न युक्त वक्षःस्थल वाले, तरंगाकार शिवली और
गभीर नाभि वाले उदर से शोभित, पाठ लम्बी-लम्बी भुजानो वाले, जिनके
जंघा और ऊरु समान रूप से स्थित हैं, सुघड़ और मनोहर चरण कमलो से
बैठे हुए उन श्री विष्णु का ध्यान करना चाहिये ॥६० से ८३॥
किरीटहारकेयूरकटकादिविभूपितम् ॥८४
शाङ्ग शङ्खगदाखड़ गचक्राक्षवलयान्वितम् ।
वरदाभयहस्त च मुद्रिकारत्न भूपितम् ॥५
चिन्तयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम् ।
तावद्यायदृढीभूता तय नृप धारणा ॥८६

पष्ठ प्रश-अ०७ ] [ ४०५ व्रजतस्तितोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत ता तदा ॥८७ ततः शङ्खगदाचक्रशादिरहितं बुधः। चिन्तयेद्भगवद्प प्रशान्त साक्षसूत्रकम् ।।८८ सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः । किरीटकेयूरमुखैर्भू पण रहितं स्मरेत् ॥८६ तदेकावयवं देव चेतसा हि पुनर्बुधः । कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत् ।।६० हे राजन् ! किरीट, हार, केयूर, कटक आदि धारण किये शाङ्ग धनु, शङ्ख, चक्र, गदा, खङ्ग और अक्ष-अवलि युक्त वरद और अभय मुद्रा वाले कर- कमय, जिनमे रत्नमयी मुद्रिका सुशोभित हैं, ऐसे भगवान् के दिव्य रूप का एकाग्र मन से धारण करके दृढ न होने तक चिंतन करते रहना चाहियो।८४-८५. ८६।। जब चलते, उठते, बैठते या अन्य कोई कार्य करने मे भी वह रूप अपने चित्त से विस्मृत न हो, तव सिद्धि की प्राप्ति हुई समझे ॥८७॥ जब धारणा मे इतनी दृढता पाजाय, तव शख, चक्र, गदा और शाङ्ग धनुप ग्रादि के विना जो उनका अक्षमाला और यज्ञोपवीत धारण किये हुए शान्त स्वरूप है, उसका ध्यान करना चाहिये ।।८।। जब यह धारणा भी दृढ हो जाय तव किरीट- केयूगदि प्राभूषणो से रहित उनके स्वरूप का चिन्तन करे ॥८६।। फिर एक अवयव विशिष्ट भगवान् का ध्यान करे और जब यह भी सिद्ध होजाय तव अवयव रहित रूप का चिन्तन करना चाहिये ||६|| तद्र पप्रत्यया चैका सन्ततिश्चान्यनिःस्पृहा । तद्धयान प्रथम रङ्ग पड भिनिष्पाद्यते नृप ॥६१ तस्यैव कल्पनाहीन स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यसमाधि. सोऽभिधीयते ॥१२ विज्ञान प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव । प्रापणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेपभावन: १६३ ૪૦૬ [ श्रीविष्णु पुराण क्षेत्रज्ञ. करणी ज्ञानं करणं तस्य तेन तत् । निष्पाद्य मुक्तिकार्य वै कृतकृत्यो निवर्तते ।।६४ तद्भावभावमापनस्ततोऽसो परमात्मना। भवत्यभेदी भेदस्य तस्याज्ञानकृतो भवेत् ॥६५ विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥६६ इत्युक्तस्ते मया योगः साण्डिक्य परिपृच्छतः । सक्षेपविस्त राभ्या तु किमन्यत्कियता तव ॥६७ हे नृप ! जिसमे प्रभु रूप को प्रतीति हो, वह निस्पृह एवं अनवरत धारा ही ध्यान है, यह अपने से पहले छः अंगो द्वारा निष्पन्न होता है ॥६॥ ध्यान द्वारा सिद्धि के योग्य उस ध्येय का जो स्वरूप मन के द्वारा ग्रहण होता है, वही समाधि कही जाती है ।।६२ विज्ञान ही प्राप्त होने योग्य परब्रह्म तक पहुंचाने वाला तथा सब भावनामो से हीन प्रात्मा ही वहाँ तक पहुचने वाला है ।।६३॥ मोक्ष-लाभ मे क्षेनन कर्ता और ज्ञान करण है, मोक्ष रूपी कार्य को सिद्ध करने से धन्य हुअा वह विज्ञान निवृत्ति को प्राप्त होता है ।।६४॥ उस समय भगवान के भाव से परिपूर्ण हुमा विज्ञान परमात्मा से अभिन्न होता है, इसको भिन्न माना जाने का कारण अज्ञान ही है ॥६५॥ भेदोत्पादक अज्ञान के नष्ट होजाने पर ब्रह्म और आत्मा मे न होने वाले भेद को कौन कर सकता है ? ॥६६|| हे खारिडक्य ! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने सक्षिप्त रूप से और विस्तार पूर्वक भी योग का वर्णन कर दिया है, अब तुम्हारा और क्या कार्य मुझे करना है ? ॥६॥ कथिते योगसद्भावे सर्वमेव कृत मम । तवोपदेशेनाशेपो नष्टश्चित्तमलो यतः ।।६८ ममेति यन्मया चोक्तमसदेतन्न चान्यथा । नरेन्द्र गदिशक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः ॥६६ ग्रह ममेत्यविद्य य व्यवहारस्तथानयोः । परमार्थस्त्वसलापो गोचरे वचसा न यः ।।१०० पष्ठ अश-प०६ ] [ ४०७ तद्गच्छ श्रेयसे सर्व ममैतद्भवता कृतम् । यद्विमुक्तिप्रदो योगः प्रोक्त केशिध्वजाव्यय. ॥१०१ खाण्डिक्य ने कहा-इस योग का वर्णन करके तुमने मेरे सभी कार्यों को सिद्ध कर दिया । अब तुम्हारे उपदेश से मेरे चित्त का सव मैल दूर होगया है ।।६८! मैंन जो 'मेरा' कहा, वह भी मिथ्या ही है, क्योकि जानने योग्य पदार्थ ज्ञाता ऐसा कदापि नहीं कह सकते ॥६६॥ मैं, मेरा की भावना और इनका व्यवहार भी अविद्या है और पदार्थ वारणी का विषय न होने से कहा या सुना नहीं जा सकता ॥१००।। हे वशिध्वज ! आपने मोक्षदायक योग को कहकर मेरी मुक्ति के निमित्त सव कुछ कर दिया, अब माप सुख से जाइये ॥१०१॥ यथाहं पूजया तेन साण्डिक्येन स पूजित. । अाजगाम पुर ब्रह्म स्ततः केशिध्वजो नृप ।।१०२ खाण्डिक्योऽपि सुत कृत्वा राजान योगसिद्धये । वन जगाम गोविन्दे विनिवेशितमानसः ॥१०३ तनकान्तमतिर्भूत्वा यमादिगुणसयुत । विष्ण्याख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिलयम् ॥१०४ केशिध्वजो विमुक्त्यर्थ स्वकर्मक्षपणोन्मुस.। भुजे विपयान्कर्म चक्रे चानभिसहितम् ॥१०५ सक्ल्याणोपभोगश्च क्षीणपापोऽमलस्तथा। अवाप सिद्धिमत्यन्ता तापक्षयफला द्विज ॥१०६ श्री परागरजी ने रहा-हे नहान् ! इगके पश्चात् सारिडाय द्वारा पूजित हुमा राजा वेशियन अपन नगर पो गय पोर अपने पुत्र यो स्वामित्व सौंपकर भगवान् म चित्त लगा कर निर्जन यन म योग-मिद्धि करने लगे ॥१०२ १०३॥ यम-नियमादि से युक्त हुए राजा गादिडक्य एका चित्त म चिन्तन करते हुए निमंन प्रम में लय को प्राप्त हुए ॥१०४॥ उधर राजा शिवज अपने मोरोक्ष रते हुए सर विषयों को भोगा रहे पोर पनेरी निवाम व परो रहे ॥१०॥ हे नि ! मनेसो पस्याणकारी भोगा यो भोगते हुए उन्ह ४०८ ] [ श्रीविष्णु पुराण T भोर मल के क्षीण होने पर तापमय को मिटाने वाली आत्यन्तिक मिडि प्राप्त होगई है ॥१०६॥ पाठवां अध्याय इत्येप कथितः सम्यक् तृतीयः प्रतिसञ्चरः । प्रात्यन्तिको विमुक्तिर्या लयो ब्रह्मरिण शाश्वते ॥१ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वशमन्वन्तराणि च । वंशानुचरित चैव भवतो गदित मया ॥२ पुराण वैष्णव चतत्सर्वकिल्बिपनाशनम् । विशिष्ट सर्वशास्त्रेभ्य पुरुषार्थीपपादकम् ।।३ तुभ्य यथावन्मय प्रोक्त शुध पवेऽव्ययम् । यदन्यदपि वक्तव्य तत्पृच्छाद्य वदामि ते ॥४ भगवन्कथित सर्व यत्पृष्टोऽसि मया मुने । श्रुतचैतन्मया भक्त्या नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे ॥५ विच्छिन्ना सर्वसन्देहा नर्मल्य मनसः कृतम् । स्वत्प्रसादान्मया ज्ञाता उत्पत्तिस्थितिसक्षया ॥६ ज्ञातश्च विधो राशि शक्तिश्च त्रिविधा गुरो। विज्ञाता सा च कात्स्न्येन विविधा भावभावना ॥७ श्री पराशरजी ने वाहा-हे मैनेयजी । इस प्रकार तीसरे प्रात्यन्तिक प्रलय का वर्णन भी मैंने तुमसे कर दिया, जिसे तुम ब्रह्म मे लीन होने रूपी ब्रह्म ही समझो ||१|| मैंने सृष्टि, प्रलय, वश, मन्वन्तर और वशो के चरित्र भी कह दिये ॥२॥ तुम्हे श्रवणेच्छुक देखकर इस सर्वश्रेष्ठ, सर्व पापाहारी तथा पुरु- पार्थ के प्रतिपादक विष्णु पुराण को मैंने सुना दिया। अब यदि कुछ और पूछना चाहो तो उसे भी पूछ लो ।।३-४॥ श्री मैनेयजी ने कहा-हे भगवन !

पष्ठ प्रश-प्र०८ [ ४०६ नापने मेरा पूछा हुआ सभी कुछ कह दिया और मैंने भी उसे भक्तिपूर्वक सुना है, अब मुझे कुछ नही पूछना है ॥५॥। आपकी कृपा से मेरी शङ्कामो का समा- धान होगया तथा चित्त निर्मल हुप्रा और सृष्टि, स्थिति और प्रलय का ज्ञान भी मुझे होगया ॥६॥ हे गुरो | चार प्रकार की राशि, तीन प्रकार को शक्ति और तीन प्रकार की ही भाव-भावनायो का मुझे ज्ञान होगया ॥७॥ त्वत्प्रसादान्मया ज्ञात ज्ञेयमन्यैरल द्विज । यदेतदखिल विष्णोर्जगन्न व्यतिरिच्यते ।। कुतार्थोऽहमसन्देहस्त्वत्प्रसादान्महामुने । वर्णधर्मादयो धर्मा विदिता यदशेपत IME प्रवृत्त च निवृत्त च ज्ञात कर्म मयाखिलम् । प्रसीद विप्रप्रवर नान्यत्प्रष्टव्यमस्ति मे ।।१० यदस्य कथनायासैोजितोऽसि मया गुरो। तत्क्षम्यता विशेपोऽस्ति न सता पुनशिष्ययो ॥११ एतत्त यन्मयाख्यात पुराण वेदसम्मतम् । श्रु तेऽस्मिन्सर्वदोपोत्थ पापराशि प्रणश्यति ।।१२ सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वशमन्वतराणि च । वशानुचरित कृत्स्न मया तव कीर्तितम् ॥१३ अत्र देवास्तथा दैत्या गन्धर्वोरगराक्षसा । यक्षविद्याधरास्सिद्धा कथ्यन्ते ऽप्सरसस्तथा ।।१४ हे द्विज ! प्रापकी कृपा से मैं इस जानने योग्य वात को भले प्रकार जान गया कि यह ससार विष्णु से भिन्न नहीं है, इसलिय अन्य बाता क जानन से क्या प्रयोजन है ? ॥८॥ आपको कृपा से मैं कृतार्थ होगया हू, क्योकि मैं वर्ण-धर्मादि सब धर्मो तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप सब कर्मों को जान गया । हे ब्रह्मन् । प्राप प्रसन्न हो, अब कुछ भी पूछना शेप नही है ।।६-१०॥ ह गुरो । मैंने इस सम्पूर्ण पुराण के कहने का जो यष्ट प्रापको दिया है, उसके लिय मुझे क्षमा कीजिय । सन्तजन तो पुत्र प्रौर सिष्य म कोई भेद नही मानते ॥११॥ श्री पराशरजी ने कहा-मैंने तुम्हे जो यह वद सम्मत पुराण सुनाया है, उसके

[ श्रीविष्णु पुराण
सुनने से ही सब दोपो से उत्पन्न हुए पाप नष्ट हो जाते हैं ॥१२॥ इसमे सृष्टि-
रचना, प्रलय, वश, मन्वन्तर और वशो के चरित्र-इन सवका वणन तुमसे
किया है ।।१३।। इसमे देवता, दैत्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध
पौर अप्सरानो का वर्णन हुया है ।।१४॥
मुनयो भावितात्मान कथ्यन्ते. तपसान्विता ।
चातुर्वर्ण्य तथा पु सा विशिष्टचरितानि च ॥१५
पुण्या प्रदेशा मेदिन्या पुण्या नद्योऽथ सागरा ।
पर्वताश्च महापुण्याश्चरितानि च धीमताम् ।।१६
वर्णधर्मादयो धर्मा वेदशास्त्राणि कृत्स्नश ।
येगा सस्मरणात्सद्य सर्वपापै प्रमुच्यते ॥१७
उत्पत्तिस्थितिनाशाना हेतुर्यो जगतोऽव्यय ।
स सर्वभूतस्सर्वात्मा कथ्यते भगदान्हरि ॥१८
अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकै ।
पुमान्विमुच्यते सद्य सिंहवस्तै करिव ॥१६
यन्नामकीर्तन भक्त्या विलायनमनुत्तमम् ।
मैत्रेयाशेपपापाना धातूनामिव पावक ॥२०
कलिकल्मषमत्युग्र नरकार्तिप्रद नृणाम् ।
प्रयाति निलय सद्य सकृद्यन च सस्मृते ॥२१
तपोनिष्ठ मुनिजन, चार वर्णों का विभाग, महापुरुषो के चरित्र, पृथिवी
के पवित्र क्षेग, नदी, ममुद्र, पर्वत, बुद्धिमानो के चरित्र, वर्ण धर्मादि धर्म और
वेद शास्त्रो का भी इसम भले प्रकार से वर्णन हुप्रा है, जिनके स्मरण करने से
ही मनुष्य सब पापो छूट जाता है ।।१५-१६-१७।। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति
और प्रलय के एकमात्र कारण रूप भगवान् विष्णु का भी इसम कीर्तन हुमा
है ॥१८॥ यदि विवश होकर भी उन भगवान का कीर्तन करे तो सिंह से भय-
भीत हुए भेडिये के समान मुक्त हो जाता है ||१९| हे मैत्रेयजी । भक्तिभार
पर्वक जिनका हमा नाम-कीर्तन सभी पापो का सर्वश्रेठ विलयन है ॥२०॥

पष्ठ अश अ०-८ ] [ ४११ जिनका एक्वार भी स्मरण करने से नरक की यातनाएँ प्राप्त कराने वाला कलि-कल्मप उसी समय क्षीण हो जाता है ॥२१॥ हिरण्यगर्भदेवेन्द्ररुद्रादित्याश्विवायुभिः । पावकर्वसुभि. साध्यविश्वेदेवादिभि सुरैः ।।२२ यक्षरक्षोरग. सिद्धं दैत्यगन्धर्वदानवै.। अप्सरोभिस्तथा तारानक्ष. सकलैन है ॥२३ सप्तपिभिस्तथा धिपण्यधिष्ण्याधिपतिभिस्तथा । ब्राह्मणाय मनुष्यश्च तथैव पशुभिमृगैः ।।२४ सरीसृपविहङ्गश्च पलाशाद्य महीरुहैः । वनाग्निसागरसरित्पाताले सधरादिभि ।।२५ शब्दादिभिश्च सहित ब्रह्माण्डमखिल द्विज । मेरोरिवाणुर्यस्यैतद्यन्मय च द्विजोत्तम ॥२६ स सर्व सववित्सर्वस्वरूपो रूपवजितः । भगवान्कोतितो विष्णुरन पापप्रणाशन ॥२७ यदश्वमेधावभृये स्नात प्राप्नोति व फलम् । मानवस्तदवाप्नाति श्रु त्वतन्मुनिसत्तम ॥२८ प्रयागे पुष्करे चंव कुरुक्षेत्र तथाणवे । कृतोपवास प्राप्नोति तदस्य श्रवणान्नरः ॥२६ हे द्विजश्रेष्ठ । हिर यगर्भ, देवन्द्र, रुद्र, मादित्य, अश्विद्वय, वायु, अग्नि, वसु, साध्य, विश्वेदेवा, यक्ष, राक्षस, उरग, सिद्ध, दैत्य, गन्यवं, दानव,प्रप्सरा, तारे, नक्षत्र, ग्रह, सप्तपि, लोक, लोकपाल, मनुष्य, पशु, मृग, सरीमृप, विहग, वृक्ष, वन, अग्नि, समुद्र, नदी, पाताल और पृथिवी आदि और शब्दादि विषयों क सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मिन प्रभु के सामने प्रत्यन्त तुच्छ है और जो उसके उपादान-बारण भी है, उम सर्वरूप, सर्वज्ञ, रूपहीन तथा पापो के नाश करने व ल भगवान् विष्णु का चरित्र इनमे कहा गया है ॥२२ से २७॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! अश्वमेघ यज्ञ में अवभृय स्नान का जो फा है, वही इन पुराण के सुनने से प्राप्त हो जाता है ॥२८॥ प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र प्रयवा समुद्र के किनारे रहकर ४१२ । [ श्रीविष्णु पुराण उपवास करने से जिस फल की प्राति होती है, वह इस पुराण के श्रवण से ही प्राप्त होजाता है ॥२६॥ यदग्निहोने सुहुते वरणाप्नोति मानवः । महापुण्यफल विप्र तदस्य श्रवणात्सकृत् ॥३० यज्ज्येष्ठशुक्लद्वादश्यां स्नात्वा वै यमुनाजले । मथुरायां हरिं दृष्ट्वा प्राप्नोति: पुरुषः फलम् ॥३१ तदाप्नोत्यखिल सम्यगध्यायं यः शृणोति थे। पुराणस्यास्य विप्र केशवापितमानसः ॥३२ यमुनासलिलस्नातः पुरुपो भुनिसत्तम । ज्येष्ठामूले सिते पक्षे द्वादश्या समुपोपितः ॥३३ समस्याच्युतं सम्यङ मथुराया समाहितः । अश्वमेधस्य यज्ञस्य प्राप्नोत्यविकल फलम् ॥३४ पालोक्यद्धिमथान्येपामुन्नीताना स्ववशजः । एतकिलोचुरन्येपा पितरः सपितामहाः ॥३५ नियमानुसार एक वर्ष तक अग्निहोत्र करने से जिस महापुण्य फल की प्राप्ति होती है, यह फल इसके एकवार श्रवण से ही मिल जाता है ॥३०॥ ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी को मथुरा में यमुना स्नान करके श्रीकृष्ण का दर्शन करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान् श्रीकृष्ण मे तन्मय चित्त होकर इस पुराण के एक अध्याय के श्रवण से ही प्राप्त हो जाता है ॥३१.३२॥ हे मुनिवर ! ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन मथुरापुरी म उपवास पूर्वक यमुना स्नान करके श्री प्रच्युत भगवान् मे चित्त लगा कर उनका पूजन करने से अश्व- मेध यज्ञ जैसा ही फल प्राप्त होता है ॥३३-३४|| अपने वशनो द्वारा श्रेष्ठता को प्राप्त हुए पितरो ने अन्य पितगे को समृद्धि-लाभ करते हुए देखकर इस प्रकार कहा था ॥३५॥ कच्चिदस्मत्कुले जातः कालिन्दीस लिलाप्लुतः । अर्चयिष्यति गोविन्द मथुरायामुपोपित. ॥३६ पष्ठ अश-म०८ - ज्येष्ठामूले सिते पक्षे येनैवं वयमप्युत । परामृद्धिमवाप्स्यामस्तारिताः स्वकुलोद्भवैः ।।३७ ज्येष्ठामूले सिते पक्षे समभ्यर्च्य जनार्दनम् । धन्याना कुलजः पिण्डान्यमुनाया प्रदास्यति ।।३८ तस्मिन्काले समभ्यर्च्य तत्र कृष्ण समाहितः । दत्त्वा पिण्ड पितृभ्यश्च यमुनासलिलाप्लुत. ॥३६ यदाप्नोति नर पुण्य तारयन्स्वपितामहान् । श्रु त्वाध्याय तदाप्नोति पुराणस्यास्य भक्तित ।।४० एतत्ससारभीरूणा परित्राणमनुत्तमम् । श्राव्याणा परम श्राव्य पवित्राणामनुत्तमम् ॥४१ दु स्वप्ननाशन नृणा सर्वदुष्टनिवहणम् । मङ्गल मङ्गलाना च पुत्रसम्पत्प्रदायकम् ।।४२ हमारे कुल मे उत्पन्न कोई पुरुष क्या ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन उप- वास करके परम पवित्र मथुरा नगरी मे यमुना-स्नान करके गोविन्द का पूजन करेगा? जिससे हमभी अपने वशजो द्वारा उद्धार किये जाकर परम ऐश्वर्य को प्राप्त करेगे । क्योकि किन्ही भाग्यवान् व्यक्तियो के पशज ही जेष्ठ मास के शुक्ल पक्ष म यमुना मे पितृो को पिण्डदान का पुण्य करते हैं ॥३६-३८।। जल में इस प्रकार स्नान करके पितरो को पिण्डदान करके उनको तारने वाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, वही पुण्य इस विष्णु पुराण का एक अध्याय भक्तिपूर्वक सुनने से प्राप्त होता है ॥३६-४० । यह पुराण ससार सागर स भयभीत जनो का बहुत बड़ा रक्षक, श्रवण योग्य तथा पवित्रो में भी बहुत पविनई ॥४१॥ बुरे स्वभावो का नाशक सपूर्ण दोपो को दूर करने वाला, मागलिक वस्तुप्रो मे परम मागलिक मोर सतान तथा सम्पत्ति का देने वाला है ॥४२॥ इदमार्ष पुरा प्राह भवे कमलोद्भवः । ऋभुः प्रियव्रतायाह स च भागुरयेऽब्रवीत् ।।४३ ४१४ ] । श्री विष्णु पुराण भागुरिः स्तम्भमित्राय दधीचाय स चोक्तवान् । सारस्वताय तेनोक्त भृगुस्सारस्वतेन च ॥४४ भृगुरणा पुरुकुत्साय नर्मदाय स चोक्तवान् । नर्मदा धृतराष्ट्राय नागायापूरणाय च ॥४५ ताभ्यां च नागराजाय प्रोक्त वासुकये द्विज । वासुकिः प्राह वत्साय वत्सश्चाश्वतराय वे ॥४६ कम्बलाय च तेनोक्तमेलापुत्राय तेन वै। पाताल समनुप्राप्तस्ततो वेदशिरा मुनिः ।।४७ प्राप्तवानेतदखिलं स च प्रमतये ददो। दश प्रमत्तिना चैतक्षातुकराय धीमते ॥४८ इस पाप-पुराण के प्रथम वक्ता ब्रह्माजी थे जिनसे ऋभु ने इसे श्रवण किया । ऋभु से प्रियव्रत और प्रियव्रत से भागुरि ने सुना । भागुरि ने स्तम्भ- मिन को, स्तम्भमित्र ने दधीचि को, दधीचि ने सारस्वत को, मारस्वत ने भृगु को सुनाया ।।४३-४४। इसके पश्रात् इसे भृगु से पुरुकुत्स ने, पुरुकुत्स से नमंदा ने, नर्मदा से धृतराष्ट्र और पूरण नाग ने सुना ॥४५॥ इन दोनो ने यह पुराण नागराज वासुकि को सुनाया। वासुकि ने वत्स को, वत्स ने अश्वतर को, अश्वतर ने कम्बल को, कम्बल ने इला पुत्र को सुनाया । उसो अवसर पर वेदशिरा मुनि पाताल लोक में आये हुए थे, उन्होंने इस पुराण को नागो से प्राप्त करके प्रमति को सुनाया और उससे परम विद्वान जातुकर्ण ने इसे प्राप्त किया ।।४६-४६॥ जातुकर्णन चवोक्तमन्येषां पुण्यकर्मणाम् । पुलस्त्यवरदानेन ममाप्येतत्स्मृतिं गतम् ॥४६ मयापि तुभ्यं मंत्रेय यथावत्कथितं त्विदम् । स्वमप्येतच्छिनीकाय कलेरन्ते वदिष्यसि ।।५० इत्येतत्परम गुह्य कलिफल्मपनाशनम् । य. पोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥५१ - पष्ठ प्रश-प्र०८ । ४१५ समस्ततीर्थस्नानानि समस्तामरसंस्तुतिः । कृता तेन भवेदेतद्यः शृणोति दिने दिने ।।५२ कपिलादानजनित पुण्यमत्यन्तदुर्लभम् । श्रु त्वैतस्य दशाध्यायानवाप्नोति न संशय. ॥५३ यस्त्वेतत्सकल शृणोति पुरुष. कृत्वा मनस्यच्युत । सर्व सर्वमय समस्तजगता माधारमात्माश्रयम् । ज्ञानज्ञ यमनादिमन्तरहितं समिराणां हितं । स प्राप्नोति न सशयोऽस्त्यविकलं यद्वाजिमेधे फलम् ।।५४ यत्रादौ भगवांश्चराचरगुरुर्मध्ये तथान्ते च सः । ब्रह्मज्ञानमयोऽच्युतोऽखिलजगन्मध्यान्तसर्गप्रभुः । पुरुपः पवित्रममल शृण्वन्पठन्वाचयन् । प्राप्नोत्यस्ति न तत्फल त्रिभुवनेष्वेकान्तसिद्धिहरिः ॥५५ तत्पश्चात् जातुकणं ने इसे महात्माओ को सुनाया और उनमे से पुलस्त्य जी के वरदान से मुझे भी यह ज्ञात हो गया। वही मैंने तुमको यथावत सुना दिया और तुम कलियुग के अन्त मे इसे शिनीक को सुनामोगे ।।४६-५०।। जो व्यक्ति इस परम गुह्य और कलिग के दोपो को नाश करने वाले पुराण को भक्ति के साथ श्रवण करता है वह सब पापो से छुटकारा पा जाता है । मोर जो कोई इसको प्रति दिन सुनता रहता है तो मानो तमाम तीर्थों के स्नान तथा सभी देवो की स्तुति का पुण्य-फल प्राप्त कर लिया ॥५१-५२।। जो कोई इस पुराण के दस प्रध्यायो को श्रवण कर लेता है उसे कपिला गो के दान का मत्यन्त दुर्लभ पुण्य प्राप्त होता है । जो मनुष्य जगदाधार, मात्मा के प्राश्रय सर्व स्वरूप, सर्वमय, मान मोर शेप रूप, मादि मन्त रहित मार सय देवतामो के हितपी विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए इस सम्पूर्ण पुराण का श्रवण करता है उसे निस्सन्देह मश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है ॥५३-५४।। इस पुराण के पादि, पन्त, मध्य में सर्वत्र विश्व को मृष्टि, स्थिति तया लय में समर्प ग्रहमानमय घराचर गुरु भगवान् पच्युत का कीर्तन किया गया है । इस लिए इस सबंधेठ पोर निमंत पुराण को मुनने, पाने मोर धारण करने [ श्री विष्णु पुराण से जो फल प्राप्त होता है वह तीनो लोक मे अन्य किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता, क्योकि मुक्तिदाता भगवान विष्णु की ही इसके द्वारा प्राप्ति होती है ॥५५॥ यस्मिन्यस्तमतिनं याति नरक स्वर्गोऽपि यचिन्तने । विघ्नो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोऽपि लोकोऽल्पकः । मुक्ति चेतसि यः स्थितोऽमलधिया पुसा ददात्यव्यय. । कि चित्रं यदघ प्रयाति विलय तत्राच्युरे कीर्तिते ॥५६ यज्ञ यज्ञविदो यजन्ति सततं यज्ञेश्वर कमियो। य वै ब्रह्ममय परावरमय ध्यायन्ति च ज्ञानिनः । य सञ्चिन्त्य न जायते न म्रियते नो वर्चते होयते। नवामन च सद्भवत्यति ततः किं वा हरे' श्रू यताम् ॥५७ कव्य य. पितृरूपधृग्विधिहुत हव्य च भुङ्क्त विभु देवत्वे भगवाननादिनिधन. स्वाहास्वधासज्ञिते । यस्मिन्ब्रह्मगि सर्वशक्तिनिलये मानानि नो मानिनां निष्ठाय प्रभवन्ति हन्ति कलुषं श्रोत्र स यातो हरिः ॥५८ जिन विष्णु भगवान् मे चित्त लगाने से नर्क का भय दूर हो जाता है, जिनके स्मरण में स्वर्ग भी निस्सार है, ब्रह्म लोक भी तुच्छ प्रतीत होता है, और जो शुद्ध चित्त वाले सज्जनो के हृदय में स्थित होकर उन्हे मोक्ष देते हैं, उन्ही भगवान् अच्युत का कीर्तन करने यदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं तो इसमे पाश्चर्य क्या है ॥५६॥ कर्मनिष्ठ यज्ञवेत्ता जिन भगवान् का यजेश्वर रूप से भजन करते हैं, ज्ञानी जन जिनका ब्रह्म रूप से ध्यान करते हैं, जिनका स्मरण करने से न पुरुष जन्म लेता है, न मरता है, न क्षीण होता है, एवं जो न सत है न असत्, उन श्रीहरि के अतिरिक्त सुनने का विषय और क्या हो सकता है ? ॥५७॥ जो अनादिनिधन प्रभु पितृरूप से स्वधासजक कव्य को और देव रूप से अग्नि में हवन किये गये हत्य को ग्रहण करते हैं, तथा जिन समस्त शक्तियो के आश्रयभूत भगवान के विषय में प्रमाण कुशल विद्वान भी प्रमाण पठ अंश-५०० [ ४१७ नहीं दे सकत ये श्रीहरि श्रवण पथ म बाते हो समस्त पापो को नष्ट कर देत हैं ॥५॥ नान्तोऽस्ति यस्य न च यस्य समुद्भयोऽस्ति वृद्धिनं यस्य परिणामविवजितस्य । नापक्षय च समुपेत्य विकारि वस्तु यस्त नतोऽस्मि पुरुषोत्तममोशमीड्यम् ॥५९ तस्यैव योऽनु गुणभुग्बहुधक एव शुद्धोऽप्यशुद्ध इव भाति हि मूर्तिभेदै.। शानान्वित सकलसत्त्वविभूतिकर्ता तस्मै नमास्तु पुरुपाय सदाव्ययाय ॥६० जानप्रवृत्तिनियमेश्यमयाय पुसो भोगप्रदानपटवे ग्रिगुणात्मकाय । प्रव्याकृताय भवभावनकारणाय वन्दे स्वरूपभवनाय सदाजराय ॥६१ ध्यामानिलाग्निजलभूरचनामयाय दादादिभोग्यविपर्यापनयक्षमाय । पुस समस्तकरणरुपकारकाय ध्यक्ताय सूक्ष्मवृहदारमवते नतोऽस्मि ॥६२ इति विविधमजस्य यस्य रूप । प्रतिपरात्ममय मनातनस्य। प्रदिशतु भगवानपपु सा। हरिरपजन्मजरादिषा समिनिम् ॥६३ । श्री विष्णु पुराण समस्त वैभवो का कर्ता है उस अव्यय परमपुरुष को नमस्कार है ॥६०।। जो ज्ञान-प्रवृत्ति और नियमन का सम्मिलित रूप है, जो मनुष्यो को समस्त भोग प्रदान करता है, तीनों गुणो से युक्त और भव्याकृत है, जो संसार की उत्पत्ति का कारण है, उस स्वत सिद्ध और अजर भगवान् को नमस्कार करता हूँ ॥६१॥ जो भगवान् आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी रूप है, शब्दादि भोग्य विषयो को प्राप्त कराने वाला है और मनुष्यों का उनकी इन्द्रियो द्वारा उपकार करने वाला है उस सूक्ष्म और विराट स्वरूप को नमस्कार है ॥६२।। इस प्रकार जिन नित्य तथा सनातन परमात्मा के प्रकृति-पुरुष भेद से अनेक रूप हैं वे भगवान् हरि मनुष्य मात्र को जन्म और जरा से विहीन मुक्ति प्रदान करे ॥१३॥ ॥ विष्णु महापुराण समाप्त ।।

विष्णुपुराण का निष्पक्ष नैतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक अध्ययन विष्णुपुराण विविध विषयो वा भण्डार है, ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी उपयोगी तथ्यो का इसमे चयन किया गया है। पुराणकार न परिस्थितियो का केवल एक पहलू ही प्रस्तुत नहीं किया है, अच्छे पोर पुरे दोनो पहनुमो पर विचार किया है। विष्णु पुराण कालीन भारत को सामाजिक दुर्दशा का भी विस्तृत वर्णन किया गया है और उसका गुग्दर, व्यावहारिक ममाधान लिया गया है, पतन के लक्षणों के चित्रण के साथ उत्थान के मूत्र दिए है। भारत फे गौरवमय इतिहास के क्सको का भी पुले रूप में यरगन है और भारत के मस्तक को ऊंचा उठाने वाली विभूतियो ना भी उस्लेग है। मानव मन की पमजोरियो का दिग्दर्शन कराते हुए उनका इस भी इदन सा प्रयत्न लिया गया है। दोपा, दुगुणो मोर कुरीतियो के दुष्परिणामों की पार विसर प्रारम ग्यान दिलाया गया है और मदगुणा के विकास पर बल दिया गया है। माना जीवन के उत्पान के सिमान्तो रा वर्णन है ही। उन्हें प्रिया यानी साधनापा को भी दिया गया है। रयापी रु माम्पम ने जीवन मोनोरना सिसाईगई है। पन्ध पोर पुरे दानों प्रसार के निरोधी स्वभाव के प्रभावशाली यत्तिस्या को उभारा गया है, उनर पर परिणामा गहो पाट कनिगंग कर सस्त है कि उस रिस मार्ग पर पसना पुरक रहेगा। पुरागार न मायाधिक एyा भी शान का प्रपल घिरा है।गि नरह से पर पुगणो म पुराण से सम्माता राना गरम बा पौर नारा गया है और दूसरों को दीनना उनको उगना कर इए गिया गा हैमाणुि पुराणम नहीं है। गम को समास माय जति ग्यार किया गया है। गार यह है ! मानस जीवन : मामाधिसमोर ४२० । । श्री विष्णुगण माध्यामि उत्पन के लिये जिन ती पौर विचारों की प्रावश्यकता रहती है । वह सभी इसमें प्रस्तुत हैं । हम प्रब विष्णुपुराण का निप्पक्ष अध्ययन करेंगे। सामाजिक दुर्दशा- पुराणों की परम्परागत शैली में विष्णु पुराण में भी पांचो लक्षण-सर्ग, प्रतिराग, वरा, मन्यन्तर, वशानुचरित्र उपलब्ध होते हैं। विष्णुपुराण का निर्माण लोय हित को दृष्टि से किया गया है। राष्ट्र का हित इसी में होता है कि जनता के समक्ष देश में फैल रहे सामाजिक रोगो, उत्पातो मोर कुरीतियो को रखा नाए भोर स्पट रूप से बताया जाए कि किस प्रकार राष्ट्र पतन की पोर जा रहा है । लेखक लोकनायको का याह्वान करता है कि वह उठे और अपने तप त्याग द्वारा देश या उत्थान करें। विष्णु पुराण के लेखक ने ऐतिहासिक वर्णनो के साथ (कही २ प्रतीक रूप मे पोर कही २ अतिशयोक्ति शैली मे) उस समय की सामाजिक दुर्दशा का स्पष्ट उल्लेख लिया है । इससे विदित होगा कि पतन की राहे केवल क्लयुग में ही नहीं बनी हैं हर युग मे समाज का एक वर्ग दूषित रहा है जिसे सन्मार्ग पर लाने की आवश्यकता रही है। विष्णुकालीन भारत का चित्र पुराणकार ने वडो ही सरलता से खींचा है । विष्णु पुराण से ही कुछ उदाहरण देकर हम इसे स्पष्ट करेंगे। राजाओं का अन्याय और अत्याचार- राजा वेन के रान्यकाल का वर्णन करते हुग ( १।१२।१३।२४ ) मे कहा गया है जब वह वेन राजपद पर अभिपिन्न हुआ था तभी उसने विश्व भर मे यह घोषित कर दिया था कि मैं भगवान हू, यज्ञ पुरुष और यज्ञ का भोक्ता एव म्वामी मैं ही हूं। इसलिये अब कभी कोई भी मनुष्य दान और यज्ञादि न करे । हे मैनेयजी | उस समय वे महर्षिगण उस राजा वेन के समक्ष उप. स्थित हुए और उन्होने उसकी प्रशता करके स्वान्त्वनामयी मीठी वाणी से कहा "हम तुम्हारे राज्य, प्रजा तया शरीर के हितार्थ जो कहते हैं,उसे श्रवण करो।

विष्णु पुराए-एक अध्ययन ] [ ४२१ तुम्हारा कल्याण हो, हम यज्ञेश्वर देवदेव भगवान् विष्णु का पूजन करेंगे, उसके फल के छठे अश का भाग तुम्हे भी प्राप्त होगा। यज्ञो के द्वारा भगवान् यज्ञ पुरुप सन्तुष्ट होकर हमारे साथ ही तुम्हारी भो अभिलाषाएं पूरी करेंगे । जिन राजाम्रो के राज्यकाल में यज्ञेश्वर भगवान् का यज्ञानुष्ठानो द्वारा पूजन होता है, उनकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं ।" यह सुनकर वेन ने कहा-"मुझसे अधिक ऐसा कौन है जो मेरे द्वारा भी पूजा के योग्य हो। तुम जिसे यरेश्वर एव भगवान् कहते हो, वह कौन है ? ब्रह्मा, विष्णु, शम्भु इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मग्नि वरुण, धाता, पूषा, पृथिवी भौर चन्द्रमा प्रथवा अन्य जो भी देवता शाप या वर देने में समर्थ हैं, उन सभी का निवास राजा में होने से राजा हो सर्वदेवमय होता है.। है द्विजगण । यह जानकर मेरे प्रादेश का पालन करो, किसी को भी दान यज्ञ, हवनादि नही करना चाहिये । हे ब्राह्मणो ! जैसे स्त्री का परम धर्म पतिसेवा है, वैसे हो आपका परमधर्म मेरी प्राज्ञा का पालन है।" इससे उस समयमे राजाप्रो को नादिरशाही का परिचय मिलता है । वह राज्य सत्ता का दुरुपयोग किसी भी तरह कर सकते थे । जनता को कोई आवाज न थी । राजा जनता को इतना दबाकर रखते थे कि भले ही उन पर हजारो जुल्म ढाये जाएं,वह चू भी नही कर सकती थी,जनता की कोई विचार- धारा मोर बल नहीं था, यह राजा के नेतृत्व को ही सौभाग्य मानती थी। इसीलिए उस समय के गजामो मे यह साहस उत्पन्न हो जाता था कि वह अपने को भगवान् घोषित कर देते थे मौर जनता से भगवान् की तरह पूजा और सम्मान के प्राकाक्षी रहते थे। जिस देश की जनता को मारमा मर चुकी हो, वह अपने नेता का अन्धानुकरण करती है भले ही उनके प्रात्म विवेक का गला घुट रहा हो । जो जनता राजा के इशारो पर नाचती है, उसका उल्यान कैसे हो सकता है ? यह प्राकृतिक नियम है कि कमजोर को हर कोई दबाता है। इसलिए निर्वलता को पाप माना गया है । वेन के समय में जनता निर्वल थी। उनकी निर्वलता ने ही वेन को मन्याय मोर अत्याचार करने के लिये उत्साहित किया । यदि उस समय के लोग कुछ भी विरोध करते तो जमके प्रत्याचार इस सीमा तक न बढ़ पाते । - .

४२२ ] [ श्री विष्णु पुराण इसी अध्याय मे लूट पाट का वर्णन करते हुए कहा गया है "फिर महपियों ने सर्वत्र बड़ी धूल उड़ती हुई देखकर अपने पास खडे लागो से पूछा कि यह क्या है ? तब उन्होने उत्तर दिया कि इस समय राष्ट्र राजा रहित हो गया है इसलिए दीन दुखी मनुष्यो ने धनवानो को लूटना प्रारम्भ कर दिया है। हे मुनिवरो | उन अत्यन्त वेगवान लुटेरो के उत्पात से ही यह धूल उड़ रही है।" (१११३१३०-३२) प्रन्याय स्वयं मे एक निर्बलता है, उसकी भी एक सीमा होती है । वह स्थिर नही रह सकता । अन्यायी अपने अन्याय से ही अपने मस्तित्व को नष्ट करता है । वेन को भी यही दुदशा हुई । जब राष्ट्र मे भुखमरी फैलती है और शासन कुछ भी सहायक सिद्ध नहीं होता ता भूखी जनता लावार होकर जमा- खोरो को दूढती है । परिस्थितियां उन्हें वाध्य करती हैं कि वह क्षुधा तृप्ति के लिये धनवानो को लूटने का साहस करे, यही उस समय होने लगा था। राजाओ की तानाशाही का बड़ा ही मार्मिक उल्लेख पुराणकार ने किया है । एसा लगता कि राज्य शासन के सचालन के लिये उन्होने मानवता के सिद्धान्तो को तिलाजलि देदो थी। हिरण्यकशिप काल मे वेन के कुशासन के सभी लक्षण तो देखने को मिलते ही हैं, इसके अतिरिक्त ऐसे हृदय विदारक दृश्य दिखाई देते हैं जो पशुता, क्षुद्रता और विवेकहीनता की सीमानो का उल्लघन कर गये हैं । जनता पर तो इतिहास में सैकडों राजाओं ने अन्याय किया है परन्तु यह केवल एक ही उदाहरण है यदि उसकी अपनी सतान विवेक सगत बात करती है तो उसको मृत्यु तुल्य दण्ड दिये जाएँ। वह किसी का भी विरोध सहन नहीं करते थे चाहे वह विरोध करने वाला उनका अपना ही पुत्र न हो । हल्का-सा विरोध उनके क्रोध के सतुलन को मव्यवस्थित कर देता है और वह बड़े से बडा दण्ड देने के लिये तैयार हो जाते हैं। (१११६:१-१०)के अनुसार जब प्रह्लाद ने भगवान् विष्णु को अपना इष्ट बताया तो उसे अग्नि में भस्म करने का प्रयत्न किया गया, शस्त्रात्रो से भाघात पहुं- चाये गये, बांध कर समुद्र के जल में डाला गया, पत्थरो की बौछार से उसका विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] । ४२३ शरीरात करने का प्रयास किया गया। पर्वतो मे गिराया गया, सर्पो से उसवाया गया, दिग्गजो के दांतो से इंधवाया गया, दैत्य गुरुप्रो ने उस पर कृत्या चलाई शम्बासुर ने अपनी मायामो वो प्रयुक्त किया, रसोइयो ने विप दिया।" इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जो अपने पुत्र पर इतने अत्याचार कर सकता है, वह जनता को कितने कष्ट पहुंचाता होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । उसके राज्य में कोई भी व्यक्ति अपने जान व माल को सुरक्षित नहीं समझता होगा क्योकि क्या पता ऐसे कुशासक के कुविचारों का वेग किधर को प्रवाहित होने लगे और उधर ही उत्पातो के समूह लग जाएँ । जब उनको मात्र प्राज्ञा ही नियम है तो क्षणभर मे हजारो सर धड़ से अलग किए जा सकते हैं। ऐसे अत्याचारी राजा की प्रजा कभी भी अपने को सुरक्षित नहीं मान सकती है। वह समझते होगे, कभी भी बिना कारण दण्ड मिल सकता है । ऐसा कुशारान तो विश्व के इतिहास मे कभी नही देखा गया। ब्राह्मण राष्ट्र निर्माता होते हैं। वह सामाजिक रोगो की चिकित्सा करके राष्ट्र को स्वस्थ शासन देते हैं, परन्तु उस समय के ब्राह्मण भी प्रन्याय का पक्षपात करते देखे जाते है । प्राह्मण को प्राचीन काल मे निष्पक्ष और साहसी नता माना जाता था क्षत्रिय राजा ब्राह्मणो के परामश से शासन का सचालन किया करते थे, उन्हे ब्राह्मणो की अवज्ञा करने का साहस नही होता था। परन्तु इस समय के ब्राह्मणो का साहस भी विलुप्त होगया था। वह अपने राजा को विवेक की शिक्षा नहीं दे पाए, उसके अत्याचारो के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कह सके । पाश्चर्य तो यह है कि देवताओं ने अपना देवत्व छोड कर दैत्यपन स्वीकार कर लिया, प्रासुरी कार्यों का अनुमोदन ही नहीं किया वरन् उसमे भाग लेकर ब्राह्मणत्व पर कलक का टीका लगा लिया। विष्णु पुराण (१।१७।५१-५२) मे वह राजा से कहते हैं कि 'यदि प्रह्लाद हमारे कहने के भी विपक्षी के पक्ष का त्याग न करेगा, तो हम इसे नष्ट करने के लिए किमी प्रकार भी व्यर्थ न होने वाली कृत्या का प्रयोग करेंगे।"

४२४ ॥ [ श्री विष्णु पुराण कस के अत्याचारो का भी विस्तृत वर्णन इस पुराण मे है । अपने पिता को कैद मे डाल कर स्वय राज्यसत्ता हथियाने का विश्व के इतिहास में औरगजेव का उदाहरण मिलता है। इस कुप्रवृत्ति का प्रारम्भ शायद कस से हो होता है। भारतीय संस्कृति का अनुयायी होकर जब वह अपने जन्मदाता को नेल को काल कोठरी मे सडने के लिए बाध्य कर सकता है तो जनता को निर्भय रूप से दवाने में उसे क्यों दर्द होगा ? स्वाभाविक है कि पापी का मन माशंकामो से मोत प्रोत रहता है, वह हर क्षण किसी भी दुर्घटना के लिए भय- भीत रहता है। भले ही वह ईश्वरीय सत्ता को न स्वीकार करता हो परन्तु उसके कुकृत्य भय के जन्मदाता बनते हैं मोर बुरे भविष्य के सूचक होते है । कस को भी निरन्तर यही माशका रहती थी कि उसे कोई प्रशात शक्ति अवश्य नष्ट कर देगी। पाकाश वाणी के माध्यम से बताया गया है कि देवकी के उदर से जन्मा बालक तो उसका काल सिद्धि होगा। वह अपनी सुरक्षा के लिए निर्मम हत्याओं पर उतारू होगया। अनेकों शिशुमों का अन्त करने पर भी उसकी प्यास न बुझी । माता-पिता और पत्नी के बाद बहिन का सम्बन्ध प्रिय होता है । भाई बहिन की सुरक्षा का सकल्प रक्षाबन्धन पर करता है । उसके बच्चो को अपने बच्चो के तुल्य मानता हूं। जो व्यक्ति अपनी वहिन के बच्चो को मौत के घाट उतार सकता है, वह अपने प्रनाजनो का क्या मूल्याकन कर सकता है ? ऐसा निर्दयी राजा तो मच्छरो और मक्खियो की तरह लोगो को मरवाता होगा। ऐसे शामक के राज्यकाल में प्रजा सदैव अपने सर को तलवार नीचे ही रखा समझती है । कस के अत्याचारों का वर्णन पचम प्रश के कई अध्यायो मे है । (५ । ३ । २३.२५) मे है कि जब वसुदेव कृष्ण को नन्द के यहाँ छोड आये और उनके स्थान पर एक कन्या ले पाए तो कस ने उसे मार दिया । "इधर कन्या को लेकर पाये हुए वसुदेवजी ने उसे देवकी के शयनागार मे शयन करा दिया और फिर पहिले के समान ही स्थित हो गये मोर उन्होने तुरन्त ही देवकी के सन्तान उत्पन्न होने को सूचना दी। यह सुनते ही कम ने शीघ्रता विष्णु पुराण-एक अध्ययन । पूर्वक वहाँ जाकर उस कन्या को पकड़ लिया और देवकी के रोकने पर भी उसे शिला पर पछाड दिया।" इसके बाद उसने यह राजाज्ञा प्रसारित की पृथिवी पर जो भी यशस्वी पुरुप यज्ञ करने वाले हो, उन्हे देवताओं के अहित के निमित्त मार डालना चाहिये । देवकी के गर्भ से जो कन्या उत्पन्न हुई थी उसने यह भी कहा था कि तेरी मृत्यु कही अन्यत्र उत्पन्न हो चुकी है । इसलिये पृथिवी पर उत्पन्न हुए बालकों पर विशेप दृष्टि रखते हुए, जो अधिक बलवान बालक प्रतीत हो, उनका वध कर देना चाहिये । (५।४।११-१३) कंस ने नवजात शिशुओ के वध के लिये ऐसी स्त्रियो की नियुक्ति की थी जो अपने स्तनो पर विप लगा लेती थी और स्तनपान करते ही बालक मर जाता था। कृष्ण के वध के लिये पूतना ने प्रयल किया। (५।१७। कृष्ण को गोद में उठाया और उन्हे अपना स्तन-पान कराने लगी। ऐसा लगता है कि कस ने शिशु बध का राष्ट्र व्यापी अभियान चलाया था और उसकी सफलता के लिये हर सम्भव उपाय अपनाये गये थे। शिशु बध को व्यापक योजना का सचालन केवल कस ने ही किया था। इस स्थिति मे माता-पिता अपने बच्चो को घर की कैद मे ही बन्द रखते होगे । घर की चारदीवारी उनके लिये जेल के समान ही बन जाती होगी क्योकि राज्यकर्मचारियो को पता चलने पर किसी भी क्षण उन पर मुसीवत पा सकती थी। कंस अपने इस हत्याकाण्ड के लिए जगद्विख्यात होगये; क्योकि शिशुप्रो की निर्मम हत्याप्रो का श्रेय केवल उसे ही प्राप्त हुआ है । ऐसे जालिम शासको का आज नाम निशान भी नही है। इस दृष्टि से तो प्राज का बुरा शासन भी उस समय के शासन से सैकड़ो गुना मधिक स्वच्छ, स्वस्थ व श्रेष्ठ है। हत्याएँ- छोटी छोटी बातो पर हत्याएँ अब भी होती हैं और पहले भी होती थी। हत्या से मानव मन को करता का परिचय मिलता है। यह मूल्यवान मानव शरीर जो प्रात्म-विकास के लिये प्राप्त हुमा है, उसे क्षण भर मे नष्ट कर देना - [ श्री विष्णुपुराण महान पाप है । विष्णुपुराण के चतुर्थ अश के १३ वें अध्याय मे स्यमन्तक मणि पर अनेको हत्याएँ होने का वर्णन है । सत्राजित के पास मणि थी, शतधन्या ने मोते हुए उसकी हत्या कर दी । (४११३६७१) पिता की हत्या से अत्यन्त रोप मे भरकर सत्यभामा ने कृष्ण को शतधन्वा का वध करने के लिये प्रेरित किया । कृष्ण ने बलराम से कहा "पब माप यहाँ से उठकर रथ पर वैठिए और शतधन्वा का वध करने के प्रयत्न मे लग जाइये।" (४।१।३।८०)। माताप्रो द्वारा पुत्रो की हत्या करने का भी मनोखा उदाहरण है। "भरत की तीन पत्नियां थी। उन्होने नौ पुत्र उत्पन्न किये। भरत ने जब उन्हे अपने अनुरूप न बताया तो उनकी माताम्रो ने अपने परित्याग किये जाने की आशका से, उन पुत्री की हत्या कर दी।' (४।१२।१४-१५) पिता जैसे योग्य पुत्र उत्पन्न न हो, तो कोई उन्हे मार नहीं देता। माता का कोमल हृदय तो कभी सहन नहीं कर सकता । यह निर्दयता की सीमाओ का उल्लघन है। नरमांस का भत्ता- पशुप्रो का मास खाकर लोग अपनी पशुता का परिचय देते तो हैं । दानवता की चरम सीमा तक पहुचने वाले गो कृत्य उस समय होते थे--वह दुष्कृत्य है नरमास का भत्ता । यह एक कथात्मक उदाहरण से स्पष्ट है । सौदाम ने एक यज्ञ का अनुष्ठान किया। जब यज्ञ के समाप्त होने पर प्राचार्य वसिष्ठ जी वहाँ से चले गये तब एक राक्षस वसिष्ठ जो का रूप धारण कर वहाँ आकर कहने लगा--यज्ञ की समाप्ति पर मुझे मनुष्य-मांस युक्त भोजन कराया जाना चाहिये, इसलिए तुम वैसा भोजन बनवामो, मैं क्षण भर में लौट कर माता हूँ। यह कहता हुआ वह वहाँ से चला गया। फिर वह रसोइये का रूप धारण कर राजाज्ञा से मनुष्य मारामम भोजन बना कर राजा के समक्ष लाया। राजा ने उसे स्वर्णपात्र में रखा और वसिष्ठजी के आने पर उसने उन्हे वह नरमास निवेदन किया । तब वसिष्ठ जी ने मन में विचार किया, यह राजा कितना कुटिल है जो जानते हुए भी मुझे यह मांस दे रहा है । फिर यह जानने के लिये कि यह फिस जोर का मांस है. उन्होने समाधि का प्राश्रय लिग मौर विष्णुपुराण-एक अध्ययन ] [ ४२७ ध्यानावस्था में उन्होने जान लिया कि मनुष्य का मांस है । तव तो वसिष्ठजी अत्यन्त क्रोधित और क्षुब्ध मन हुए और उन्होने तत्काल ही राजा को शाप दे डाला कि तूने इस अत्यन्त प्रभक्ष्य नर मांस को मेरे जैसे तपस्वी को जान- वूझ कर पाहार हेतु दिया है, इसलिये तेरी लोलुपता नरमास मे ही होगी। (४ । ४ । ४५५३ ) नरभक्षी राक्षसो के उदाहरण भी उपलब्ध होते हैं। विष्णु पुराण (४।४५६-६३) के अनुसार "एक दिन उस राक्षसत्व प्राप्त राजा ने एक मुनि को ऋतुकाल मे अपनी पत्नी से रमण करते हुए देखा । उस प्रत्यन्त भीपण राक्षस रूप वाले राजा को देखकर भय से भागते हुये उन दम्पति मे से उसने मुनि को पकड़ लिया। उस समय मुनि पत्नी ने उससे अनेक प्रकार मनुनय विनय करते हुये कहा-हे राजन् ! प्रसन्न होइये । माप राक्षस नही, इक्ष्वाकु- वश के तिलक रूप महाराज मित्रसह हैं । पाप सयोग सुख के ज्ञाता हैं, मुझ अतृप्ता के पति की हत्या करना आपके लिये उचित नहीं है। इस प्रकार उस ब्राह्मणी द्वारा अनेक प्रकार से विलाप किये जाने पर भी जैसे व्याघ्र प्रपने इच्छित पशु को जगल मे पकड कर भक्षरण कर लेता है, वैसे ही उस ब्राह्मण को पकड कर उसने खा लिया।" माँस, मदिरा का सेवन और जुए की कुप्रवृति- राजवशो में मास का सेवन होता या । पुराणकार ने लिखा है । "राजा इक्ष्वाकु ने प्रष्टका श्राद का आरम्भ पिया मोर अपने पुत्र विकुक्षि को श्राउ योग्य भन्न लाने की माज्ञा दो। उसने उनकी माज्ञा मानकर धनुषवारण को ग्रहण किया मोर वन मे आकर मृगो को मारने लगा। उस समय अत्यन्त क्षुधातं होने के कारण विकुदिक्ष ने उनमे से एक सरगोश भदाण कर लिया और शेप मास पिता के समक्ष लाकर रसा।" (४१२।१५-१६) मदिरापान के भी मनेको उदाहरण पुराण में दिये गये हैं जिनसे विदित है कि उस समय मदिरा का प्रचलन या मोर उसे राजवश मे बुरा नहीं माना जाता था।

४२८ ] [ श्री विष्णुपुराण शतधन्वा से प्राप्त एक म्यमन्तक मणि मन रजी के पास थी, उस पर काफी विवाद हुआ, उसे सभी हथियाना चाहते थे, बलगमजी की दृष्टि उस पर थी परन्तु उसे सुरक्षित रखने के लिये पवित्रता का जीवन व्यतीत करना प्राव. श्यक था । इसलिए विवाद का निराकरण करते हुए कृष्ण ने कहा "यदि आर्य बलरामजी इसे अपने पास रखते हैं तो उन्हें अपने मदिरा पान आदि सभी भोगो को छोडना पडेगा।" (४।१३।१५७) । "जब मनोहर मुख वाले वलरामजी वन मे घूम रहे थे, तब मदिरा की गन्ध पाकर उन्होने उसके पान करने को इच्छा की।" (५।२।५) "एक दिन बलरामजी ग्वतोद्यान मे रेवती भौर अन्य सुन्दरियो के साथ बैठे हुए मद्य पी रहे थे।" (५॥३६॥११) 'फिर कृष्ण बलरामादि सब यादव रथो पर चढकर "प्रभास क्षेत्र गये। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण की प्रेरणा से सभी यादवो ने महापान किया।" (५॥३७॥३८-३६)। यथा राजा, तथा प्रजा । जब राजा मदिरा का सेवन करते थे तो प्रजा भी अवश्य करती होगी। कृष्ण और बलराम को जुमा खेलने वाला भी बताया गया है । यथा "प्रद्युम्न-पुन अनिरुद्ध का विवाह संस्कार पूर्ण हो चुकने पर कलिंगराज आदि प्रमुख नरेशो ने रुक्मी से कहा--यह वलराम जी द्यूतक्रीडा मे चतुर न होते हुए भी उसके बडे इच्छुक रहते हैं ।" (४१८।१०-११) 'तब बल-मद से उन्मत्त हुपा रुक्मी उन राजामो से बहुत अच्छा' कहकर सभा मे गया और बलरामजी के साथ द्युतक्रीडा करने लगा।" (११११५) (५॥३४-३५) में श्रीकृष्ण को जुआ खेलते हुए दिखाया गया है। अवैध सन्तान- काम के वशीभूत होकर प्रबंध सतानो को उत्पन्न करने को भी घटनामो पा पता चलता है । "जब उर्वशी ने पुरुरवा को देखा तो उसके सुन्दर रूप को देखकर वह आर्पित हुई । अन्य अप्सरापो ने भी उसके साथ विहार करने को इच्छा प्रकट फो । एक की समाप्ति पर बव राजा पुरुरवा पुनः यहाँ - विष्णुपुराण-एक अध्ययन ] [ ४२६ पहुंचे तो उर्वशी ने उन्हे 'पायु' नामक एक शिशु प्रदान किया। फिर उसने उनके साथ एक रानि रहकर पांच पुत्रों की उत्पत्ति के लिए गर्भ धारण किया।" (४।६।६८-७४) । ब्रह्मा के पोन और अनि के पुन चन्द्रमा ने देवगुरु वृहस्पनि को पली तारा का अपहरण किया और अनुचित रूप से व्यभिचार किया। इस पर घोर युद्ध हुपा और तारा वृहस्पति को मिल गई । तारा को गर्भ रह गया था। इस पर वृहस्पति ने तारा से कहा कि मेरे क्षेत्र मे दूसरे के पुन को धारण करना अनु- चित है । इस प्रकार की घृष्टता ठीक नहीं है । इसे निकाल कर फेंक दो । तारा ने उस गम को सीको को झाडो में फेंक दिया। तारा ने स्वीकार किया कि यह गर्भ चन्द्रमा से है।" (४।६।२-२२) । अवैध संतान की उत्पत्ति चरिनहीनता का लक्षण है। कामासक्ति और भोगलिप्सा- कामासक्ति पोर भोग की कुछ विचित्र घटनाएं विष्णु पुराण मे दी गई हैं । 'एक वार सत्यधुति ( अहिल्या के परपोष ) ने अप्सग श्रेष्ठ उर्वशी को देखा तो उसके प्रति कामासक्त होने से उनका वीर्य स्खलित होगया मोर सरपएडे पर जा गिरा।' (४।१०।६५) । विश्वामित्र पी तरह एडु नामक पि का एक प्रमरा के जाल में फैमवर लम्बे समय तक भोगासक्त होने का वर्णन है। विवरण इस प्रकार हैं। (१।१५।११-२१) "प्राचीन काल मे वेदन पियो मे श्रेष्ठ परडु नामक एक मृपि हुए, जिन्होन गोमती के सुरम्य तट पर घोर तपस्या को । तब इन्द्र ने उनमा तप भग करने के लिये प्रम्लोचा नाम की एक प्रत्पन्न गरी प्रप्सरा नियुक्त की, जिसन उन महर्षि का चित्त चनल कर दिया । उमा मोह जाल में पड कर वे महर्षि सौ वर्ष में भी अधिक काल तक मदरावल में भागामक्त पड़े रह । इसके पश्चात् एक दिन उस प्रमरा न उन महपि मे कहा है ब्रह्मन ! प्रव में स्वर्ग लोक को प्रम्यान यरूगी, बाप प्राप्त होरर मुझे जाने की पनुमनि दीधिये । उमयो बास मुगार उगम प्रामसियान एपि न रहा कि ४३० ] { थी विष्णुपुराण अभी कुछ दिन और व्हो । उनके अनुरोध पर वह अप्परा सौ वर्ष तक और उनके साथ रहती हुई विविध भोगो को भोगती रही। तब उसने पुनः उनसे कहा कि अब मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दीजिये । इस पर ऋपि ने उससे कहा कि अभी कुछ दिन और ठहगे । इस प्रकार फिर सो वपं व्यतीत हो गये । तब उसने मुसका कर मुनि से कहा--"भगवन् ! अब मैं स्वर्गलोक को जाती हूँ।" यह सुन कर मुनि ने उसे अपने हृदय मे लगा लिया और बोले कि वहाँ तो तुम्हें बहुत समय लगेगा, इसलिये अभी क्षण भर तो स्को। तब वह श्रेष्ठ कटि बाली पसरा उन ऋषि के साथ दो मौ वर्ष से कुछ कम समय तक मौर क्रीड़ा करती रही। वह अप्सग जब-जब ऋपि ते स्वर्ग लोक को जाने की बात कहती, ढव-तब कण्ड ऋपि उससे ठहरने का आग्रह करते । जब काम तपस्वी पियो को भी पतित करने में समर्थ है तो साधारण व्यक्तियों को क्या विमात है । अतः इसे काम के प्रति सावधान रहने के लिये चेतावनी समझना चाहिये । भोगों में लिप्त होने का राजा ययाति का उदाहरण अपने द ग का एक ही है। वृद्धावस्था प्राप्त होने पर भी उसने एक हजार वर्ष तक भोग करने की इच्छा व्यक्त की । दो पुनो न तो उसे अपना योवन देने से इन्कार कर दिया परन्तु पुरु ने ययाति को वृद्धावस्था लेकर अपनी युवावस्था दे दी यौवन प्राप्त कर के ययाति ने एक हजार वर्ष तक विश्वाची और देवयानी. अपनी पत्नियो के साथ अनेक प्रकार के सुग्बो का उपभोग विया । (४।१०- १।२२) लम्बे समय तक भोगो में लिप्त होना एक दोप है और पुत्र का यौवन छीन कर वासना की तृप्ति करना दूसरा दोष है। पुत्र की खुशियो यो छीनने वाले पिता इस घोर कलियुग में भी नही मिलते है । चन्द्रमा ने देवगुरु पत्नी ताग मे व्यभिचार किया । गुरु पत्नी शिष्य के लिये पूज्य होती है। उस पर भासक्त होना घोर पतित प्रवस्या का विष्णुपुगण-एक अध्ययन । ४३१ परिचायक है। इन्द्र ने छल से अहिल्या को दूपित किया। कामासक्त पुरुष किसी भी अनुचित उपाय को अपनान मे सकोच नहीं करता । अश्लीलता का प्रदर्शन- कृष्ण की रास लीला में कुछ अश्लीलता को भी गन्ध पाती है। "एक चतुर गोपी श्रीकृष्ण के गीत की प्रशंसा करते हुये अपने वाहुरो को पसार कर उन से लिपट गई ।" "गोपियो के कपोलो को स्पर्श करती हुई श्री कृष्ण की भुजाए उनमे पुलकावलि रूपी धान्य को उत्पन्न करने के निमित्त स्वेद रूपी मेघ हो गई ।" ( ५११३१५५) । "वे रास रम की रसिका गोपियां अपने पति, पिता, माता, भ्राता आदि के द्वारा रोकी जाने पर भी न रुकती और रात्रि मे कृष्ण के साथ रास विहार करती थी।" (५॥१३॥५६ ) "शत्रुप्रो के मारने वाले मधुसूदन भी प्रपनी केशोरावस्था के भाव मे राषिकाल मे उन गोपियो के साथ विहार करते थे।" ( ११३।५० ) । बहुपत्नी-प्रथा- माज तो किसी की एक से अधिक पत्नी नही होती है। यदि कोई विरला उदाहरण मिल भी जाए तो उसे असम्मान की नदि से देखा जाता है और समाज भी उम हेय दृष्टि से देखता है । परन्तु विष्णुपुराण कालीन भारत ऐमा नहीं था। राजा प्राय विलासी और कामी होते थे, एक पत्नी से उनकी वासना की भूग्न नहीं मिटती थी इसलिए वह प्रनको विवाह करते थे। इस पर उस समय कोई रोक नही थी और न वहु-विवाह ही दुरी दृष्टि से देखा जाना था । उदाहरण के लिए "ब्रह्मा जी ने अपनी दस कन्याएं धर्म के प्रोर तेरह कश्यप के साथ व्याह दी। फिर काल-परिवर्तन म नियुक्त हुई अश्विनी अादि २७ कन्याए चन्द्रमा को दी।" ( १।१५-७७१७) (४१६६ ) में चन्द्रमा को ब्रह्मा का पोय कहा गया है परन्तु यहां उन्हें दामाद बना दिया गया है । "दक्ष प्रजापति ने साठ कन्याए उत्पन्न की, उनमे मे दम धर्म को, १३ कश्यर की, २७ चन्द्रमा को मोर चार परिष्टनमि को ब्याह दी।" (१११५-१०१।४७)। - ४३२] । श्री विष्णुपुराण महर्षि सौभरि ने राजा मान्धाता की पचास न्यानो से विवाह किया ( अंश ४, अध्याय २) "राजा राशिविन्दु के एक लाख स्त्रियाँ थी जिन के दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए" (४११२-४१५) । सात बहिनो का विवाह वसुदेव जी के साथ हुआ था। (४।१४।१४ ) अानन्द दु दुभि नाम वाले वसुदेव जी को पोरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा, देवकी, नाम की अनेक पलियां थी। ( ४११५११८ ) इस मृत्युलोक मे प्रकट हुए भगवान् वासुदेव की सोलह हजार एक सो एक रानियाँ हुई । उन सब रानियो के उदर से भगवान् के एक लाख अस्सी हजार पुत्र उत्पन्न हुए। ( ४११५-३४॥३५ )। 'भरत की तीन पलियाँ थी। उन्होने ६ पुत्र उत्पन्न किये।" (४।१४।१४ ) 'कालिय की सैकडो नाग पत्नियां थी।" ( ५६१६) ( स्मरण रहे कालिय नाग जाति के नेता थे)। "रुक्मिणी के अतिरिक्त श्री कृष्ण की सात रानिया थी। इन के प्रतिरिक्त कृष्ण को १६००० रानिया और थी।" (५।२५-३१५) सम्भव है उम समय स्त्रियो की अपेक्षा पुरुषो को सस्या न्यून हो और एक से अधिक स्त्रियां रखने की स्वतन्त्रता हो। बहु संतान प्रवृति- आज देश की प्रावादी दिन प्रति दिन बढती जा रही है। प्राबादी का तीव्र गति से बढना राष्ट्र दी सब से गम्भीर समस्या होगई है। प्रावादी से सम्बन्धित खाद्य सकट ने अनको क्षेत्रो में अकाल की सी स्थिति उत्पन्न कर दी है। विदेशो से काफी तादाद मे साद्य सामग्री मगवान पर भी पूर्ति नहीं हो पा रही है। इमलिये अाज अधिक सतान अभिशाप सिद्ध हो रही है क्योकि इम महगाई के युग मे अधिक बच्चो का ठीक तरह से पालन पोपण सम्भव नहीं है।

विष्णु पुराण --एक अध्ययन ] [ ४३३ प्राचीनकाल मे स्थिति इसके विपरीत थी। आवादी कम थी। कृषि प्रधान देश होने के कारण खाद्य सामग्री आवश्यकता से अधिक उत्पन्न होती थी, इसलिये लोग अधिक संतान उत्पन्न करने के आकाक्षी रहते है। यह विष्णु पुराण के कुछ उदाहरणो स स्पष्ट हो जाएगा "दक्ष प्रजापति के प्रसूति से २४ कन्याएं उत्पन्न हुई।" (81७२२) । "सुना जाता है कि फिर दक्ष प्रजापति ने साठ कन्याएं उत्पन्न की।" ( १११५५१०३ ) । “वैश्वानर के वे दोनो कन्याए मरीचि पुत्र कश्यप जी की पलियाँ हुई जिनके साठ हजार पुत्र हुए।" ( १।२१।८)। रेवत का पुत्र रैवत ककुयी हुप्रा जो प्रत्यन्त धार्मिक और अपने सौ भाइयो मे ज्येष्ठ था।" (४।११६५)। "शतविन्दु की पुत्री बिन्दुमती से उस मान्धाता ने विवाह किया जिससे पुरुकुत्म, अम्बरीप और मुचुकुन्द नामक तीन पुन और पचास कन्याएं उत्पन्न हुई ।" ( ४।२१६६ ) । "कालान्तर मे उन राजकुमारियो के द्वारा सौभरि मुनि ने डेढ़ सौ पुत्र उत्पन्न किए।" ( ४१२।११२ )। भगवान प्रौर्व ने सगर पलियो को वरदान देते हुए रहा ।" तुम मे से एक से वश वृद्धि करने वाला एक पुन उत्पन्न होगा और दूपरी से साठ हजार पुत्री की उत्पत्ति होगी।" ( ४।४।३ )। "रजि के अत्यन्त बली और पराक्रमी पांच सौ पुत्र उत्पन्न हुए।" ( ४।६।१ )। "राजा शशिबिन्दु के एक लाख स्त्रियां थी जिनसे दस लाख पुन उत्पन्न हुए थे।" ( ४११२।४।५)। "भगवान् वसुदेव की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ हुई जिनके उदर में भगवान ने एक लाख अस्सी हजार पुन उत्पन्न किय थे।" ( ४॥१५-३४१३५ ) । "महपि च्यवन के वराज सोमक के सौ पुन उत्पन्न हुए।" ( ४११६७२)। धृतराष्ट्र द्वारा गान्धारी से दुर्योधन, दुशासन प्रादि सौ पुन उत्पन्न हुए।' श्रा कृष्ण ने मुर के सात सहस्र पुषो का अपने चक्र की धार रूप ज्वाला मे पतग के समान जला दिया।" (२१८- "प्रत्यन वली भगवान ने नरकासुर के मन्त पुर में जाकर सोलह हजार कन्याप्रो को देखा।" (०१८।३११)। "इसी प्रकार भगवान को ४३४ ) [ श्री विष्णु पुराण अन्य पलियो से भो अठाईस हजार आठ सौ पुत्रो का जन्म हुमा।" ( ५३८।५)। संख्या के सम्बन्ध मे अतिशयोक्तियां इसमे अवश्य हैं परन्तु अधिक सतान उत्पन्न करने की प्रवृत्ति का इससे पता चलता ही है। अधिक सतान भी उस समय गौरव का कारण मानी जाती होगी। विवाह सम्बन्धी अनियमितताएँ- विवाह सम्बन्ध रो विकृतियां आज मे पनपी हो, ऐसी बात नहीं है। पहले भी यह विद्यमान थी। युग को परिस्थितियों के अनुसार उनका रूप भले ही कुछ बदल गया हो । आज पश्लील फिल्मो को देख कर युवक युवतियाँ वासना की भूख से प्रेरित होकर प्रेम का नाटक करते हैं और अपने जीवन को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं । इस उत्तेजना में वह अपने धर्म सस्कृति और मान्यतामो को भी तिलाजलि देते हैं। अनेको हिन्दू युवक और युवतियो ने इस अन्धे प्रेम के वशीभूत होकर अपनी संस्कृति को छोड़ने का निश्चय किया। प्राचीनकाल मे भी इस प्रकार के विवाह होते थे । राजा पुरुरवा-स्वर्ग की प्रधान अप्सरा उर्वशी पर आसक्त हो गये और उससे विवाह का, प्रस्ताव किया। (४१६-३६।४०)। उर्वशी ने अपनी कुछ शर्त रखी जो राजा ने स्वीकार कर ली और विवाह हो गया। उपा और अनिरुद्ध का उदाहरण भी इसका साक्षी है। उपा स्वप्न मे एक युवक को देख कर उसे अपना जीवन साथी बनाने को उद्यत हो गई। इसके लिये उसने काफी प्रयत्न किया। देश-विदेश मे अपने दूतो को भेजा होगा । जब युवक का पता चल गया तो उसे वहाँ मगवाया गया और विवाह हो गया। यह गन्धर्व विवाह का अनोखा उदाहरण है । अनमेल विवाह को भी ऐसी घटना दी गई है जिसकी पुनरावृति प्राज जैसे घोर कलयुग मे भी सम्भव नही है । राजा ज्यामघ की रानी दौम्या से कोई सन्तान नही थी परन्तु वह उसके भय से दूसरा विवाह नहीं कर सकता था । एक बार युद्ध मे उसे एक सुन्दर राजकुमारी मिल गई । वह उस पर प्रासक्त - विष्णु पुराण--एक अध्ययन । होगया और उससे विवाह की योजना बनाई ताकि उसको कोई सन्तान हो जाये। इसी दृष्टि से राजा ने राजकुमारी को अपने रथ पर विठा लिया पोर मोचा कि शैव्या की अनुमति से इसमे विवाह कर लूगा । जब राजधानी पहुंचा तो शैव्या ने राजकुमारी के सम्बन्ध में पूछा तो राजा ने भय से कहा कि यह मेरी पुत्रवधू है । इस पर शव्या ने कहा कि मेरा तो कोई पुत्र नहीं है फिर आपकी पुत्रवधू कैसे हुई । राजा न डरते हुये कहा "मैं ने तुम्हारे होने वाले पुत्र के लिये अभी से यह पत्नी निश्चित कर दी है। रानी इस पर सहमत होगई । कुछ समय व्यतीत होने पर शया के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हमा उसी से उस राजकन्या विवाह हुआ। ( ४।१२--२३॥३७ ) । लडका अभी इस समार मे पाया नही और युवती कन्या से उसका विवाह निश्चित हो गया। नियमानुमार तो लड़के की प्रायु लड़की से ६-७ वर्ष अधिक होनी चाहिय । उस युवती की प्रायु यदि कम से कम १५ वर्ष मानी जाये तो भी वह पति से १६ वर्ष बडी हो गई क्योकि उसके पाने के पाद शैव्या ने गर्भ धारण किया था । वृद्धो के साथ तो छोटी प्रायु की कन्यामो के विवाह होते देखे गये हैं परन्तु वडी प्रायु की लडकियो के माथ छोटी मायु के लडको के वियाह कम ही सुनने में माते है । यह घटना सामाजिक पतन की ही सूचक है। हिन्दू सस्कृति में सपिण्ड विवाहो मा निषेध है परन्तु कृष्ण की माता से वह सम्पन्न हुए है। कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न ने कामो को कन्या की कामना को और उस कन्या ने भी प्रद्युम्न का स्वयंवर मे वरण किया । ( १८६) रुपमो -कृष्ण-पत्नी रुक्मिणी का भाई था। इसका प्रयं हुमा प्रयम्न ने अपने मामा को कन्या से विवाह किया जो प्राज यही भी सम्भव नहीं है। प्रद्युम्न ने उस रुक्मी सुता से पनिरुड नामर पुत्र उत्पन्न दिया। श्री कृष्ण ने रुक्मी की पौत्री के साथ उसका विवाह किया । श्रीकृष्ण से द्वेष होते हुये भी रुक्मी ने अपने दोहित को अपनी पोती देने का निश्चय कर लिया। हिन्दुसम्हति में यह विवाह वैध नहीं है परन्तु हुए हैं और वह भी श्रीकृष्ण के सरक्षण में ।

- [ श्री विष्णु पुराण ऊँच नीच भेद-भाव- ऊँच-नीच के भेदभाव मानव के अपने ही बनाये हुये हैं। भगवान ने सव को समान अधिकार देकर पृथ्वी पर अवतरित किया है। ईश्वर द्वारा वनाई हुई जितनी वस्तुए हैं, सभी प्राणी उनका समान रूप से उपभाग करते हैं । सूर्य की किरणें, वायु, जल आदि किसी जाति या प्राणी विशेष के साथ किसी बात का भी पक्षपात नहीं करते। प्राकृतिक वस्तुओं का समवितरण प्रेरित करता है कि हमे हर प्राणी के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये । जातियो और वर्गों के भेदभाव आपसी सघर्षों की उत्पति के ही कारण बनते हैं । हिन्दू सस्कृति मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र-चार वर्ण कार्य की सुविधा की दृष्टि से बनाये गये हैं । बडे-छोटे की दृष्टि से नहीं । शास्त्र भी इसका अनुमोदन करते हैं। महाभारतकार का कहना है कि पहले यहाँ केवल एक ब्राह्मण वर्ण हो था। शान्ति पर्व अ० १८८ के श्लोक १० मे भृगु ने कहा है 'वों की कोई विशेषता नही। इस समस्त ससार का ब्रह्मा जी ने ब्राह्मणमय ही बनाया है पश्चात् कर्मों के अनुसार वर्ण बने।" भागवतकार का भी यही कथन है । "सर्व प्रथम एक ही सर्ववाङ्गमय प्रणव, एक ही अद्वत नारायण, एक ही अग्नि और एक ही वर्ण था।” (६.१४ ) भगवान ने गीता ( ४११३ ) मे भी कहा है कि मैंने गुण कर्म के विभाग के अनुसार ही चार वर्ण उत्पन्न किये हैं । हर वर्ण को अपने धर्म और कर्तव्य का पालन निष्ठापूर्वक करना चाहिये । यही भगवान् ने आदेश किया । जिन जातियो ने समानता के सिद्धान्त को व्यवहारिक रूप दिया, वह तीव्र गति से बढ़ती गई और अब भी बढ रही हैं। परन्तु जहाँ ऊँच-नीच के रोग ने जन्म लिया, उसका ह्रास होता चला गया। दुर्भाग्य से हिन्दू जाति का एक यह विशेप अवगुण रहा है । कुछ कुण्ठित बुद्धि के शास्त्रकारो ने भी इसका समर्थन किया और उसके आधार पर यह रोग व्यापक रूप से फैला । शूद्रो को छोटा व घृणित ममझ कर उनकी घोर उपेक्षा की गई, उनसे अधिकार छीन लिये गए, समाज मे उनको अपने साथ बैठने तक नही दिया गया, जहाँ तक हो सका, उन्हे दबाया गया। अन्य सम्प्रदायो ने इस कमजोरी का लाभ विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४३७ . उठाया। उन्हे गले लगाया गया और सभी प्रकार की सुविधायें दी गई। भारत मे सर्व प्रथम १७०० मुसलमान प्राये परन्तु आज उनकी सस्या करोडो मे है। उपेक्षित जातियों का धर्म परिवर्तन तीव्र गति से हो रहा है । सारे दक्षिण पूर्व एशिया में हिन्दुओ का राज्य था, परन्तु कुण्ठित विचारधारा से धीरे-धीरे सभी राज्य समाप्त हो गये, आज उनके अवशेषो को देख कर ही सन्तुष्ट होना पड़ता है। वर्णो मे भेद होने के कारण खानपान में भी भेद हो गया। अपने को ऊँचा समझने वाला वणं दूसरे के हाथ का बनाया भोजन नहीं करता। दूसरे वर्णों का क्या एक वर्ग में ही विभिन्न प्रकार के भेदो ने जन्म लिया और खानपान के नियम बन गये। इन विषयो का उल्लेख होने पर विवाद उठ खडे होते हैं । विष्णु पुराण ( ५५३७।४१।४५) के अनुसार यादवो मे भी यह मतभेद थे और उनका नाश इसी कारण से हुआ। पुराणकार ने कहा है- 'मेरा पदार्थ शुद्ध है, तेरा भोजन ठीक नहीं। इसी प्रकार विवाद करते हुए उन यादवो मे सघर्ष होने लगा । तब वह देवी प्रेरणा से परस्पर शस्त्र प्रहार करने लगे और जव शम्य भी समाप्त हो गये, तो उन्होने निकटवर्ती क्षेत्र से सरकरडे ग्रहण किये । वह सरकडे बच जैसे लग रहे थे, उन्ही के द्वारा वे परस्पर मे ग्राघात-प्रत्याधात करने लगे।" यह कुप्रवृत्ति माज भी विद्यमान है, हिन्दू संस्कृति के उत्थान के लिये इसका जड से उन्मूलन होना पावश्यक है। पड़ों का अनादर- यदुवंश के नाश का कारण बडो के प्रति प्रशिष्टता का प्रर्दशन यताया गया है । वर्णन इस प्रकार है- "एक बार यादवो के बालको ने गिडारक क्षेत्र में विश्वामित्र, करव भौर नारदादि महपियो को देखा । तब उन्होंने जाम्भयती के पुत्र साम्ब दोनों वेश मे सजा कर उन मुनियो से प्रणाम करके पूछा कि-'इसे पुत्र को इन्छा जो बताइये इसके क्या उमन होगा ? 4 ४३८ ] [ श्री विष्णु पुराण यादव बालको की हंसी को ताड कर उन महर्षियो ने क्रोध पूर्वक कहा-इसके ममल उत्पन्न होगा जो सब ओर से यादवो के नाश का कारण हो जायगा । मुनियो के ऐसा कहने पर उन बालको ने राजा उग्रमेन को जाकर सब वृतान्त यथावत् सुनाया । उग्रसेन ने उस मूसल का चूर्ण कग कर समुद्र मे फिकवा दिया, जिससे वहुत से सरकडे उत्पन्न हो गये। उस मूसल का भाले की नोक जैसा एक भाग चूर्ण करने से रह गया, उसे भी समुद्र में सलवा दिया था, उस भाग को एक मछली ने निगल लिया। मछेरो द्वारा पकडी गई उस मछली के चीरने पर निकला हुआ मूसल का वह टुकडा जरा नामक व्याध ने उठा लिया। (५॥३७।६।१४ ) यही श्री कृष्ण के पञ्चभौतिक शरीर को नष्ट करने का कारण बना। जब यादव पापस मे लडने-झगडने लगे तो इन्ही सरकंडो से एक दूसरे को मारा और यदुवश का नाश हुप्रा। इस उदाहरण से यह शिक्षा देने का प्रयत्न किया गया है कि जब समाज इतना पतित हो जाता है कि वह सामान्य शिष्टाचारो का भी पालन नहीं कर सकता, तो इसे उसके भावो नाश का ही लक्षए समझना चाहिए । साम्ब के पेट से ऋषियो के शाप से मूसल निकला या नहीं, इस विवाद में पड़ने से कोई लाभ नही । हमे तो यह देखना है कि जिन बच्चो को इतनी भी नैतिक शिक्षा न दी जाती हो कि उन्हे अपने बडो के साथ किस नम्रता पोर सम्मान का व्यवहार करना चाहिए, वह प्रपना भौतिक विकास कुछ भी करलें मात्मिक प्रगति की पोर वह एक पग भी नहीं बढ सकते। पुराणकार की दृष्टि से जब समाज मे मशिष्ट विचारधारा का व्यापक प्रसार हो जाता है, तो उस समाज को नष्ट हुमा ही समझना चाहिए। यपहरण- बलपूर्वक मपहरण प्रन्याययुक्त कार्य है, पाज भी हम नित्य गमार पत्रो में इसे पढ़ने रहते हैं । परन्तु प्राचीन काल में भी ऐसी घटनायें होती पो। यह राज्य शासन की प्रम्यवस्था को मूनक हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है।

विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४३९ "उर्वशी और पुरुरवा के मध्य हुई प्रतिज्ञा को जानने वाले विश्ववसु एक रानि मे गन्धर्वो के साथ पुरुरवा के शयनागार मे चाकर उसके एक मेष का अपहरण कर लिया । तब उर्वशी ने कहा कि मुझ अनाथ के पुन का भप- हरण करके कौन लिये जा रहा है ?" (४॥६५॥५३ ) । "जब विवाह होने मे एक दिन शेष था तब श्री कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया।" (५।२७१६ ) । "अर्जुन के देखते-देखते ही उन प्रहीरो ने एक एक स्त्री को घसीट-घसीट कर हरण कर लिया।" (५।३८।२६ ) । "एक बार जाम्बवती पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री को स्वयवर से बलपूर्वक हर लिया था ।" ( ५॥३५॥४) लोभ के दुष्परिणाम- लोभ के दुष्परिणामो पर प्रकाश डालने वाली घटनायो का भी यदा- कदा वर्णन है। राजा सत्राजित के पाम एक स्यमन्तक मणि थो। प्रकर कृतवर्मा और शतधन्वा ने पड्यन्त्र रचा और मणि को प्राप्त करने के लिये शतधन्वा ने सोते हुए समित को हत्या कर दी ( ४११३७१ ) । सनजित सत्यभामा का पिता था। उसने श्री कृष्ण को प्रेरित किया कि वह उसके पिता की हत्या का बदला लें । शतधन्वा श्रीकृष्ण के भय से घर से भाग निकला। कृष्ण बलदेव ने उसका पीछा किया । कृष्ण ने चक्र से दातयन्वा का मस्तक काट दिया । एक मणि के लिये दो हत्यायें हुई । इन हत्यामो के पीछे मणि को प्राप्त करने का लोभ ही था। सक्षिप्त में यह विष्णु कालोन भारत को सामाजिक दुदंगा का पुराण के हो काण्डो में चित्राकन किया गया है । इस से उस समय की सामाजिक स्थिति का पनुमान लगाया जा सकता है।

४१० ] [ विष्णु पुराण-एकअध्ययन सुधार और आसुरी शक्तियों का विनाश पिछले अध्याय में विष्णु पुराण मे भारत को सामाजिक दुर्दशा का सुन्दर चित्रण किया गया है। इस दुर्दशा को ऐसे ही बने रहने दिया गया है, ऐसी बात भी नहीं है । अनेको प्रकार के सुधार किये गये, प्रासुरी शक्तियो के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया गया और देवत्व पृष्ट किया गण, निरकुश राजा- श्रो का विरोध किया गया, उनके शासन को बदला गया और राष्ट्र में हर प्रकार की शान्ति बनाए रखने का प्रयत्न किया गया। जहाँ पतन के लक्षण मिलते हैं । वहाँ उत्थान की व्यावहारिक रूप रेखा भी देखने की उपलब्ध होती है । कुछ उदाहरण प्रस्तुत है ऐसा लगता है कि कृपि का विकास राजा पृथु के काल मे ही हुमा और नगरो की वसाने की व्यवस्था का समय भी वही है । विष्णु के पुराण (९।१३। ८३ ८८) मे कहा है " राजा पृथु ने अपने धनुप की कोटि से हजारो पर्वतो को उखाड-उखाड कर एक ही स्थान पर एकत्र कर दिया। इस से पहले पृथ्वी समतल नती थी तथा पुर, ग्राम आदि का विभाग भी नहीं हुआ था । उस समय अन्न, कृषि, व्यापार आदि का कोई क्रम नही था। इसका प्रारम्भ पृथु के शासन काल मे हो हुा । जहाँ-जहाँ पृथ्वी समतल हुई, वही-वही प्रजा जा घसी। उस समय तक केवल फल मूलादि का पाहार किया जाता था। उस समय राजा पृथु ने स्वायभुव मनु को बछडा बनाया और अपने हाथ से पृथ्वी रूपिणी गो से सब शस्यो का दोहन किया । उमी प्रन के प्राधार पर अब प्रजा जीवन यापन करती है । इससे पूर्व पृथ्वी और पृथु का सवाद है । पृथु जनता के हित के लिये पृथ्वी का बध करना चाहते है। पृथ्वी भयभीत होकर कहती है मैंने जिन औषधियो को अपने मे लीन कर लिया है, यदि आप चाहे तो मैं उन्हे दूध रूप मे दे सकती हूँ। (६३।६७) । इससे भूमि सुधार की वृहद् सफल योजनामो का परिचय मिलता है। जब राजा वेन के समय में शासन मे घोर अव्यवस्था फैली और दीन दु सो मनुप्या ने धनवानो को लूटना प्रारम्भ कर दिया (१।१३।३१) तो मह- " पुराणकार प्रेरित करते हैं कि जब-जब धर्म को हानि हो. मधमं या विष्णुपुराण-एक अध्ययन ] [ ४४१ पियो ने परामर्श किया और वेन को दांये हाथ को मथकर पृथु को उत्पन्न किया (१।१३।३१) । जव ब्राह्मणो ने देखा कि वेन जुल्म ढा रहा है तो वेन के स्थान पर योग्य शासक को नियुक्त किया गया । पृथु की सुव्यवस्था का प्रतीकात्मक रूप मे वर्णन करते हुये कहा गया है " उनक समुद्र मे जल स्थिर होकर रहता था, और पर्वत भी उन्हे मार्ग दे देते थे। इसमे उनकी ध्वजा का कभी पतन नहीं हुग्रा । पृथ्वी विना जोते बोऐ ही धान्य उत्पन्न करती और पकाती थी, चिन्तन मात्र से अन्न पक जाता था । गाऐं कामधेनु के समान सर्व कामप्रद थी तथा पुष्प-पुष्प मे मधु भरा रहता था (१।१३।८-५०) । कृष्ण ने राष्ट्र में प्रशान्ति उत्पन्न करने वाली आसुरी शक्तियों का दमन किया। कालिय नाग से उन्होने युद्ध किया और उसे परास्त कर यमुना क्षेत्र से हटने के लिए बाध्य किया। नाग उस समय एक जाति थी और कालिय उस जाति का नेता था। वह जाति लूट मार कर जनता को परेशान करती थी। कृष्ण ने उन लोगो को अन्यत्र बसने के लिए बाध्य किया (पचम अग-अ. ८) । कृष्ण बलराम ने धे नुकासुर का बर पिया ( ५८६) । बलराम जी प्रलम्बासुर को यमपुर पहुंचाया ( ५६६१३६ ) । कृप्ग ने बेशी दैत्य को समाप्त किया (५॥१६॥६-१०) । चाण्डूर मुष्टिक का अन्त किया (२०७१) । कुवलिया पीड को परास्त किया (२२०३३६) । फिर कस को पछाड कर उम के भी प्राण निकाल लिए (२०१७)। कृष्ण और बलराम ने जरासघ की सेना को पराजित किया (५।२२।८) और बंद से हजारो कन्यानो को टुडाया। जब हिरण्यकशिपु के मस्तिष्क मे विकृति आई और वह भपन को ईश्वर मानने लगा तो भगवान ने नृसिंह अवतार लेकर उसका वध किया (१॥ २०।३२) । कोई-नर-सिंह--मानयो मनिह ही ऐमें बुमागियो का मन्त कर सकता है। पोलबाला हो, घोर सामाजिक मध्यस्था फैन रही हो तो महान यात्माएँ पर. तरित होकर सुधार करती हैं। ने ४४२ । [ विष्णु पुराण भारतीय संस्कृति की गौरव गरिमा भारतीय सस्कृति प्रादश संस्कृति है। सारे विश्व की सभ्यता और शिष्टाचार की शिक्षा और प्रेरणा देने का श्रेय इसे ही प्राप्त है। इसकी उत्कृ- टता और यादशवादिता के कुछ उदाहरण विष्णु पुराण से चुनकर नीचे दे :-- राष्ट्रीय नेता-ब्राह्मण की कतव्य-निष्ठा- प्राचीन वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण देश का नेता, कर्णधार और उन्नायक होता था, क्षत्रिय शामक इनके निर्देशन मे ही शासन चलाते थे। वह तपस्वी त्यागी व निःस्वार्थी होते थे । राष्ट्र के रोगों का निरीक्षण करके उनका उपचार करना ही उनका कार्य होता था। वह ज्ञान के धनी देश के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाए रखते थे, अपने यजमान का चरित्र निर्दोष रखना तो वह अपना प्रावश्यक तंव्य मानते थे। जब-जब भी देश पर सङ्कट पाया, उन्होंने उसे दूर करने के लिये प्रयत्न किये। विष्णु-पुराण के अनुसार ये एका निरकुरा, अहवारी, नास्तिक राजा हुप्रा था। हिरण्यकश्यप को की तरह भगवान की अपेक्षा पाने सम्मान पर अधिक वन दता था। उसकी पोपरा थी-'मेरे भादेश का पूर्ण रूप से पालन करो, किमो को भी दान. यज्ञ, हवनादि नही करना चाहिये । हे ब्राह्मणो! बसेसी का परम धर्म पति सेवा है, वैसे ही प्रापका परम धर्म मेरी पाज्ञा का पालन है" (१।१३।२३-२४)। ब्राह्मणो ने उसे बहुत समभाया परन्तु वह न माना और उगती नियमिततायें बदनी हो गई, तब उन्होंने उस मार डालने का निश्चय किया। पंसा लिया है कि "पहिले से हो मृन हा चरा राजा । मापून कुशो के पापात स यध पर स्यिा" (१।१३।२४) । 'वेन मी मृतु मे याद याह्मणो ने बेन दीप हाप को मपा, जिनम वेन पुत्र गृप को उत्तिई ( १३१३३८-३६) नि.ह विधि पूर्वक राजा. शिकार देकर प्रनिपिस दिया गया (१६१३.१०)। उस पिता नगि प्रया को प्रारमा पा, उमो प्रनाको उमन प्रगतया (१३.)

विष्णु पुगण-एक अध्ययन ) [ ४४३ में के उन्नत राज्य के सम्बन्ध में वर्णन है कि "उनके समुद्र में चलने पर जल स्थिर हो जाता और पर्वत भी उन्हे मार्ग दे देते थे, इसस उनकी ध्वजा का कभी पतन नही हुआ। पृथ्वी जोते-बोये बिना ही अन्न उत्पन्न करती और पकाती थी, चिन्तन मात्र से ही प्रश्न पक जाता था, गौएँ कामधेनु के समान सर्व काम- प्रद थी तथा पुटके-पुटके में मधु भरा रहता था" (१।१३।४६-५०) । राज्य मे सुशासन, सुधार और सुव्यवस्था स्थापित होने का श्रेय उन ब्राह्मणो को है जिन्होंने शासन मे से मव्यवस्था उत्पन्न करने वाले तत्वों को निकाल फेका और ऐसे हायो मे सत्ता सौपी जो प्रजा के हितो का सच्चे अर्थों स रक्षरण करने वाले थे । इसमे राज्य में सुधार हुए और प्रजा प्रसन्न हुई और उसे एक पादर्श राज्य की संज्ञा दी गई। अाज ऐसे ब्राह्मणो का प्रभाव है । जब-जब देश ब्राह्मण हीन हो जाता है, तभी उस पर सङ्कट पाता है, तभी सुशासन कुशासन में परिवर्तित हो जाता है। माग यह परम्परा प्राय: नट सी हो गई है। मामन मे स्वार्थपरता का बोलबाला होने के कारण वह प्रजा के हित की नही मोच मकता । ऐस ब्राह्मण भी नहीं हैं, जो वेन को हटाकर पृथ मे शासको का नियुक्त करें। जब तक इस देश का न ह्मण पुन नही जागेगा, उसका उत्थान अशक्य ही है। धार्मिक उदारता- वैष्णव धम एक उदार धर्म है । इसमे ऊंच-नीच के कोई भेद नहीं हैं। इसमे किमी वर्ग को नीचा समझ कर उसकी उपेक्षा नहीं की जाती वरन् सवको गले से लगाया जाता है। मबको वैष्णव भक्ति का समान अधिकार है । भक्ति के क्षेत्र मे अधिकारो की कोई दीवार खडी नही की गई है । यही इसकी महान् विशेषता है । विष्णु पुराण इसका साक्षी है । जम्मू द्वीप के वणों और जातियो का वर्णन करते हुए कहा गया है कि 'उस द्वीप म प्रायंक, कुरर, विदिश्य और भाषी सनक जातियाँ हैं, वही क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पौर शूद्र है । वहाँ ययक मादि बारिश हो सर्वेर श्रीहरि का सोम रूप से यजन करती हैं।" (२११७, १६) ४४४ ] [ श्री विष्णु पुराण . शाल्मल द्वीप में फपिन, भरुण, पीत प्रौर कृष्ण यह जातियां रहती हैं जो क्रमशः ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। यह यज्ञ करने वाले व्यक्ति सर्वात्मा, अव्यय और यज्ञाश्रय वायु रूप विष्णु का श्रेष्ठ यज्ञों से यजन पूजन करते हैं ।" (२१४६३०-३२) "मपने अपने कर्मों में लगी हुई चार जातियाँ दम्भी, शुष्मी, स्नेह भोर मन्देह संज्ञक हैं जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। अपने प्रारब्ध को क्षोरा करने के निमित्त शास्त्र सम्मत कर्म करते हुए ब्रह्म रूप जनार्दन की सपासना से अपने प्रारब्ध फल के दाता उस अत्यन्त उग्र अहवार को क्षीण करते हैं।" (२।४।३८, ४०) । "पुष्कर, पुष्कल, धन्य पौर तिष्य संज्ञक वर्ण ही क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। वे वहां रुद्र रूपी भगवान विष्णु का यज्ञादि से पूजन करते हैं ।" (२।४।५५, ५६) । "वहाँ नग, मागध, मानस और मदग नामक चार वर्ण क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, मेश्य और शूद्र हैं। उस शाक द्वीप में शास्त्र सम्मत कम करने वाले उन चतुर्वणं द्वारा सूर्य रूपी भगवान् विष्णु को माराधना को जाती है ।" (२।४१७०, ७१)। इस धार्मिक उदारता के कारण वैष्णव धर्म का देश-विदेश में विस्तार हुमा। सभी वर्ण समान रूप से यज्ञो में सम्मिलित होते थे परन्तु खेद है कि माज उन अधिकारो को सीमित कर दिया गया है और एक विशेष वर्ग को ही यज्ञ करने का अधिकार दिया गया है । यह बेष्णव धर्म के मूलभूत सिद्धानो का हनन है । यदि यही स्थिति बनी रही तो यह धर्म भी सकुचित होता चला जायगा । श्रद्धा-कृतज्ञता-विश्व बन्धुत्व को उच्चतम भावना- श्रद्धा भारतीय संस्कृति का प्रारण है। इसे निकाल देने पर वह प्राण- हीन सी ही हो जायेगी। भगवत्प्राप्ति की सीढियां चढने के लिये भी यह प्राव. श्यक है। इसीलिये इसे जाग्रत रखने और बढ़ाने के लिये अनेको विधि-विधान विष्णु पुगण-एक अध्ययन ] [ ४४५ और उपाय बताये गये है ताकि इसके सहारे साधक निरन्तर मागे बढ़ता चला जाये । विष्णु पुराण (३।११।२६, ३६) मे कहा है "स्नान के पश्चात् शुद्ध वस्त्र धारण कर देवता, ऋषि मोर पितरो का उन उनके तीथों से तर्पण करे। देवतानो और ऋषियो के तर्पण में तीन-तीन बार और प्रजापति के लिये एक ही बार पृथ्वी मे जल छोडे । पितरो मोर पितामहो की तृप्ति के लिये भी तीन बार ही जल छोडना चाहिये, इसी प्रकार प्रपितामह) की तृप्ति करे, मातामह और उनके पिता और पितामह को यत्नपूर्वक तीर्थ जस से प्रसन्न करे । माता को, प्रमाता को, उसकी माता को, गुरु पली को, गुरु को, मामा को, प्रिय मित्र को अथवा राजा को मेरा दिया हुअा यह जल प्राप्त हो। इस प्रकार कहता हुषा, मब भूतो के लिये देवादि का तर्पण करके अपने इच्छित सम्बन्धी को जल दे। देवना, असुर, यक्ष, नाग, गर्ग, राक्षस, पिशाच, गुह्य क, सिद्ध, पूष्माड, पशु पक्षी, जलचर, भूमियर, वायु का प्राहार करने वाले सय जीव मेरे द्वारा दिय गये इस जल से तृप्त हो-ऐसा देवादि के तपंण मे कहे । सम्पूर्ण भरकों में स्थित हुए जो-जो जीव विभिन्न प्रकार की य प्रणाएं प्राप्त कर रहे हैं, उनको तृति के लिये जल देता हूँ। जो मेरे बन्धु हैं अथवा प्रबन्धु हैं या पहिले किमी जन्म में बन्धु थे या जो मुझसे जल-प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, वे सभी मेरे द्वारा दिये गये इस जल से तृप्त हो-शुर-पिपासा से व्याकुल कोई भी प्राणी जहाँ कही भी हो वे सब मेर द्वारा दिय गये इस तिल-जल स तृत हो जाय।" बड़ा का सम्मान करना हिन्दू सस्कृति को एक महान् विशेषता है। यह सामान्य शिष्टाचार में सम्मिलित है। माता-पिता, गुरु ५ वृद्धजनो पी माता पालन यहां साधारण नियम था, जिसका हर कोई पालन करता था। इस नियम में इतनी ता पा गई थी कि वृद्धजनो र) मृत्यु हो जाने पर भी उनके प्रति सम्मान बना रहा था। उस सम्मान के प्रतीक रूप में उन्हें जल से तरंण मादि दिया जान लगा। दिन पूर्वजा के कारण प्राज हमारा इतना उत्पान हो पाया है, उनसे उस दुपा के प्रति प्रतमता प्रकट करना हमारा पतंव्य हो जाता है। नाता प्रदर्शन के लिये ही यह विधान बनाए गय हैं।

{ थी विष्णु पुराण कृतज्ञता का गुण मानवता का लक्षण है। जो इससे हीन है उसमे मानवता का प्रभाव समझना चाहिये । यह कृतज्ञवा, श्रद्धा और सहयोग की भावना केवल अपने सम्बन्धियो तक ही सीमित नही है। इसमें सभी प्राणियो को श्रद्धांजलि अरित की गई है। विश्व के सभी प्रभावग्रस्तो और दु.खियो के प्रति सद्भावना व्यक्त की गई है, शत्रुनो के प्रति भी सहानुभूति प्रकट की गई है। इससे विश्व बन्धुत्व की भावना जागत होती है और हम समस्त विश्व के प्राणियो को अपना सम्बन्धी मानने लगते हैं । माता-पिता, बहन, भाई, पुत्र, पुत्री भादि के सीमित पारिवारिक सम्बन्धो से ऊँचा उठकर हम अपने दृष्टिकोण को विस्तृत करने की प्रेरणा मिलती है और हम सारे संसार को अपना परिवार मानन की और प्रेरित होते है । यह भावना जब परिपक्व हो जाती है, उप उन्नत अवस्था को ही प्रात्म विस्तार, प्रारम वल्याण, आत्मोन्नति ग्रादि कहा जाता है। राम राज्य-आदर्श शासन- शाक द्वीप में रामराज्य की सी स्थिति का वर्णन है। "उन सातो वों मे कही भी धर्म का क्षय, पारस्परिक कलह अथवा मर्यादा का नाश कभी नहीं होता।" (२१४,६८, ६६)। "वहां के निवासो रोग, शोक, राग-द्वपादि से परे रहकर दस हजार वर्ष तक जीवन धारण करते हैं। उनमे ऊँच-नीच, मरने. मारने आदि जैस भाव नहीं हैं और ईप्या, अनुषा, भय, द्वीप तपा सोभादि का भी प्रभाव है" (२४७६, ८०) । इससे स्पष्ट है कि शाकद्वीप में धर्म सस्कृति और मास्तिकता का व्यापक विस्तार था और प्रमा बुद्धिमान व विवेकी थी। उनके विचार शुद्ध व पवित्र थे तभी वह लम्बी आयु और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करते थे। विचारो में स्थिरता, दृढता और स्वभाव मे शान्ति होन के कारण ही छोटी छोटी बातो पर कलह क्लेश और सघर्षों से बचा जा सकता है। यह मादस साक द्वीप म था। इसे राम राज्य मे सम्बोधित किया जा सकता है। प्राज यह स्थिति साप्न जैसी ही है। 1 विष्णुपुराण--एक अध्ययन [ ४७ विष्णु पुराण में जहाँ कस, हिरण्यकशिपु आदि जैसे अन्यायो राजापो के कुशासन का वर्णन है जिससे प्रजा त्राहि पाहि कर उठी थी, वहां न्याय- मूर्ति, कर्तव्य परायण और अपने को प्रजा का सेवक मानने वाले प्रादर्श राजाओं के सुशासन का भी उल्लेख है जो अपने अहं की पुष्टि के लिये जनता पर अनुचित प्रादेश लादना मात्मा का हनन मानते थे। प्रादर्श शासक जनता के जानमाल की सामूहिक आपत्तियो से सुरक्षा अपना नैतिक कर्तव्य मानता है। प्रजा-राजा का अनुकरण करती है। इसलिये राजा की नैतिक व धार्मिक प्रवृत्तियां भी ऐसो उच होनी चाहिए जिससे जनता प्रेरणा प्राप्त करे और अपना उद्देश्य निर्धारित करते हुए उसे मापदण्ड मानें । वेन पुत्र पृथु की प्रजा इतनी सुखी और समृद्ध थी कि उसके राज्यकाल के सम्बन्ध में कहा गया है-'पृथ्वी जोते-वोए बिना ही धान्य उत्पन्न करती और पकातो थो" (१।१३।५०) । अतिशयोक्ति की शैली में यहां तक कहा गया है कि-चिन्तन मात्र मे ही अग्न पक जाता था, गायें कामधेनु के समान सर्व कामप्रद श्री तथा पुटके-पुटके में मधु भरा रहता था।" प्रजा की अनुकूलता का वर्णन करते हुए कहा गया है--"उनके समुद्र मे चलने पर जल स्थिर हो जाता और पर्वत भी उन्हे मार्ग दे देते थे, इससे उनकी ध्वजा का कभी पतन नही हुमा " ( ११३।४६ ) । इसमे जड पदार्थों को राजा की प्राज्ञा का पालन करते बताया गया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रजा उनसे कितनी प्रसन्न होगी। राजा कार्तवीर्य के राज्यशासन की प्रशसा करते हुए कहा गया है कि-"उसने बल, पराक्रम, प्रारोग्य सुरक्षा, पोर व्यवस्थापूर्वक पिच्चासी हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर राज्य किया था ।" (४।१२।१८ ) राजा को प्रादर्श शासक बनने के लिये सद्गुणी होना चाहिए । कार्तवीर्य के सम्बन्ध मे लिखा है कि-"यज्ञ, दान, विनम्रता और िद्या में कोई भी राजा कार्तवीर्य के समान नहीं हो सकता। उसके राज्यकाल में कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं हुआ।" ( ४।१२।१७ ) यज्ञ और दान से अभिप्राय लेने का ही नहीं देने का भी है अथवा नि स्वार्थता की प्रवृत्ति की अोर सबैत है । राजा को पाराम नही ४४८ ] [ श्री विष्णुपुराण घोर परिश्रम करना चाहिर, प्रालस्य नही, क्रियाशीलता उसका आदर्श होना चाहिए, उसे सदैव चारो ओर से सजग रहना चाहिए। वह अपने को बडा नही जनता का सेवक समझे, अहकार से फूलने का रोग उसे न लगने पाये । वह विनम्रता की मूर्ति होना चाहिए, वह केवल धन सम्पत्ति का ही नहीं गुणो का भी भण्डार होना चाहिए। ऐसे शासन मे सुव्यवस्था स्थिर रहती है । वर्तमान शासको को भी इन से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। गुरुजनों के प्रति शिष्टाचार का पालन-आदर्श विद्यार्थी जीवन-- आजकल विद्यार्थी वर्ग से सभी विचारशील चिन्तित हैं । आज्ञा नहीं अवज्ञा ही उनकी एक मात्र विशेषता हो गई है । गुरुजनो का सम्मान तो स्वप्नवत हो गया है। उन्हे अपमानित करने मे भी तनिक लज्जा नहीं पाती । कभी-कभी तो मार-पीट तक की नौबत आ जाती है। विद्यार्थी अपने निर्मा. ताओ को गुरुजन नही केवल वेतन भोगी अध्यापक मानते है जिन्हे अपने अनुकूल मोडना वह अपना अधिकार समझते हैं। यह उच्छङ्घनताएँ स्वून कालेज तक ही सीमित नहीं रहती, शासन के विरुद्ध भी कडी से बडी कायवाही करने में सकोच नहीं करते। उनके लिये तोड फोड, मार पीट साधारण सी वात हो गई है। शिष्टाचार के नाते गुरुजनो का सम्मान आवश्यक नहीं मानते । प्ररुरिण, उद्दालक, एकलव्य आदि के देश में इतना अन्तर दुख का विषय है। प्राचीन काल का विद्यार्थी प्राज्ञ पालक, सेवाभावी, अनुशासित और आवश्यक शिष्टाचार का पालन करने वाला होता था । विष्णु पुराण ( ३।६।१।७) के अनुमार-'बालक को उपनपन सस्कार के पश्चात् वेदा- ध्ययन परायण होकर और ब्रह्मचर्य पालन पूर्वक गुरु गृह में निवास करना चाहिए। वही रह कर शौच और प्राचार-व्रत का पालन तथा गुरु-सेवा करे एष व्रतादि के पालन पूर्वक स्थिर चित्त से वेदाध्ययन करे । दोनो सध्यामो मे एकाग्र मन से सूर्य और अग्नि की उसना परे तथा गुरुदेव का अभिवादन परे । जव गुरूगी खडे हो, तव बडा हो जाय, जव चले सब पीछे पीछे चले और जब वे तब नीचे बैठ जाय । इस प्रकार करते हुए कभी भी गुरू के विरुद्ध कोई माचरण नहीं करना चाहिए । गुरू जी रहे सभी उनके सामने बैठ विष्णुपुराण-एक अध्ययन । [ ४४६ कर वेद का अध्ययन करे और जब उनकी प्राज्ञा हो तब भिक्षा से प्राप्त अन्न का भोजन करे। जब प्राचार्य जल मे स्नान करलें तब स्नान करे भोर नित्य उनके लिये समिधा, जल, कुश, पुष्पादि लाकर एक न करें। इस प्रकार अपने वेदाध्ययन को पूर्ण करके मतिमान शिष्य गुरूजी को प्राज्ञा प्राप्त करके उन्हे गुरु-दक्षिणा दे और फिर गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट हो । प्राचीन काल के विद्यार्थी जीवन की यही व्यवहारिक रूप रेखा थी जिसे पाज भी आदर्श माना जाता है। यदि आज का विद्यार्थी वर्ग इस शिष्टाचार का पालन करने लगे तो विद्यार्थी समाज से सम्बन्धित उलझी गुत्थियां सहज मे ही सुलझ जायें। यह भारतीय सामाजिक सुव्यवस्था का ही चमत्कार था कि विद्यार्थी अपने प्राचाय के दृढ अनुशासन में रहते थे। आज विदेशी शिक्षा प्रणाली के कारण वह अनुशासन भङ्ग हो गया। प्राचीनता को अपनाये बिना समस्या का समाधान असम्भव है। अतिथि सत्कार-प्रेम विकास की साधना- प्राचीन काल में अतिथि सत्कार को गृहस्थ का एक मावश्यक गुण माना जाता था । प्रतिथि की उपेक्षा करने वाले या उसका स्वागत न करने वाले को हीन दृष्टि से देखा जाता था । उत्तम गृहस्य अतिथि को खिला कर हो स्वय भोजन करते थे। भोजन का समय होने पर वह अपने द्वार पर जाकर प्रतिथि की प्रतीक्षा करते थे। विष्णु पुराण ( २०१५।८।१०) में निदाघ का वर्णन है कि वह वलिवैश्वदेव के पश्चात् अपने द्वार पर प्रति- थियो की प्रतीक्षा मे खडा था तभी महपि ऋभु उसे दिखाई दिये और वह उन्हे अध्यं देकर अपने घर में ले गया।" प्रतिषि का सत्कार न करने वाले को भत्र्सना की गई हैं। "जिसके घर पर माया हुमा प्रतिपि निराश होकर लोटना है, वह अपने सय पाप कर्म उस गृहस्थ को देकर उसके सभी पुण्यफमों को साथ ले जाता है। प्रतिथि का प्रमान उसके प्रति गवं भौर दम्भ या व्यवहार, उसे कोई वस्तु देकर उसका पञ्चाताप, कटु भाषण अथवा उस पर प्रहार करना नितान्त अनुचित है। ( ३११५४१६) ४५० ] [ श्री विष्णुपुराण विष्णु पुराण ( ३।११।६६१५१ ) मे भी कड़े शब्दो का प्रयोग किया गया गया है-"जिसके घर से अतिथि विमुख लोटता है, उसे वह अपने समस्त पाप देकर उसके सभी शुभ कर्मों को साथ ले जाता है । धाता, प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, वसुगरण और अर्यमा-यह सभी देवता अतिथि के शरीर मे बैठ कर उसके साथ भोजन करते है। इसलिये प्रतिथि सत्कार के लिये गृहस्थ पुरुष को यत्नशील रहना चाहिए। जो मनुष्य अतिथि को भोजन कराये बिना स्वय ही भोजन कर लेता है, वह तो केवल पाप का ही भक्षरण करता है।" कैसे प्रतिधि का स्वागत करना चाहिए, इसका विश्लेषण करते हुए कहा गया है । “यदि अतिथि मिल जाय तो उसे स्वागत पूर्वक प्रासन दे और परण धोकर सत्कार करे और श्रद्धा पूर्वक उसे भोजन कराता हुआ मधुर । वाणी से बातचीत करता हुया उसके गमन काल मे पीछे-पीछे जाकर उसे प्रसन्न करना चाहिए। जिस व्यक्ति के नाम और निवास स्थान प्रादि का पता न हो, उसी अतिथि का सत्कार करे। अपने ही ग्राम में निवास करने वाला पुरुष आतिथ्य का पात्र नहीं होता। जिसके पास कोई सामान न हो, जिससे कोई सम्बन्ध न हो, जिमके वशादि का ज्ञान न हो और जो भोजन करने के लिये इच्छुक हो, ऐसे प्रतिथि का सत्कार न करना या भोजन न कराना अधोगति को प्राप्त कराने वाला है । प्रागत अतिथि का अध्ययन गोत्र, पाचरण, कुल प्रादि कुछ न पूछे मोर हिरण्यगर्भ बुद्धि से उसका पूजन करें।" ( ३।१११५७४६१) अतिथि सत्कार मानव मात्र के प्रति प्रेम के विकास को साधना है जो प्रात्मोत्थान मे सहायक सिद्ध होती है । तप द्वारा ही कठिनाइयों का अन्त सम्भव है- ध्रव का जीवन जीने की कला का मार्गदर्शक है । ध्रुव से पितृ स्नेह का अधिकार छीना जाता है । वह उद्विग्न हो उठते हैं। वह उसे अपने वल पर प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, घोर ता करते हैं। इसी तप को सृरि रचना का मूल बताया गया है। भगवान् मनु का कहना है कि-"समस्त लोकों में जो तपस्या भी थे दृष्टिगोचर हो रहा है, उसके मूल, मध्य प्रौर पन्त कुछ विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४५१ - विद्यमान है । त्रिकालदर्शी अपियो ने यह शक्ति तप के बल पर ही प्राप्त की है। दुस्तर, दुष्प्राण, दुगम और दुष्कर सभी कार्यों का प्रतिकार तप ही है। म्बग का साधन तप ही है । तप के फलस्वरूप हो पवित्र हृदय वाले ऋपियो के मत करण मे बडे जान का अवतरण हुआ है भौतिक जीवन मे ध्रुव को कठिनाइयाँ आई । उसने डटकर मुकाविला किया वह उनसे डरा नहीं, धव. राया नहीं, खोया नहीं, निराश नहीं हुमा । उसने उसके समाधान का उपाय सोचा। हमारा जीवन भी कठिनाइयो से श्रोत प्रोत है । यदि हम उनसे डर गये तो जीवन काटना भी असम्भव हो जायगा । दु खो वो धैय पूर्वक सहन करना चाहिए। राम जैसे अवतारी पुरुषो को और कृष्ण के सखा पाण्डवो को जब घोर सकटो का सामना करना पडा है तो साधारण जीव उनसे कैसे बच सकते हैं ? दु ख तो सधप की प्रेरणा देने प्राते हैं । यदि व्यक्ति को सघप करने का अवसर न मिन तो इस ओर मन से निकम्मा हो जाता है । सघष व्यक्ति को क्रियाशील पौर शक्तिशाली बनाने ग्राता है। उसमे कितनी प्रसन्न होगी। ध्रुव ये तप को विफल करने को अनेको प्रयल किये गये। माया रूपी सुनीति ने विलाप किये ( १ १२।१४।१५) । भयकर राक्षसी ने डराया धमकाया (११२१२,१८ । परन्तु ध्रव अपने नित्य पर अटल रहे। हमारा भी यही जीवन प्रादश होना चाहिए तनी प्रगति पथ पर मारूढ हो सकेंगे। कठिनाइयो का मन्त तप द्वारा ही सम्भव है। देवता से माननी की श्रेष्ठता का प्रतिपादन- विष्णु पुराण ५।३०।४३-५१ के अनुसार वृष्ण पली सत्यभामा को जब इद्राणी का पारिजात वृक्ष पम द प्राया जिसके सुगधित पुष्पो से वह अपने केशो को सजाती थी तो उमने को इसे द्वारका से जान पे लिये प्रेरित किया। वह जानती थी कि इसस इद्रय ममम देवतामो के साथ सथप आवश्यम्भावी है। परन्तु वह इसन भनी ही होगी शचो को सन्देश भेजते हुए गयपूवक नुनौता देती है कि यदि तुम्हारे पति तुम्ह प्रत्य त प्रेम करते हैं और तुम्हारे वाम हैं तो मेरे पति को पारिजात त जान म रोको। मैं तुम्हार पति को जानती हूं कि वे देवतामा पभवीश्वर हैं, फिर भी म ४५२ ] [ श्री विष्णु पुराण मानुपी होकर तुम्हारे पारिजात को लिये जाती हूं।" ( ५३३०१५९५१) । इस पर कृष्ण और इन्द्र सहित देवतामो में संघर्ष हुमा जिसमें देव- तामों को पराजित होना पड़ा। इस कथा से यह ध्वनि निकलती है कि मानव देवतामों से श्रेष्ठ हैं। देवता भोग करते हैं, मानव भोग और कर्म दोनो करता है। मानव अपने बल, पोरुप और पराक्रम से उच्चतम स्थिति तक पहुं- चने में समर्थ है। इसमें मानव का गौरव झलकता है। स्वर्ग से भी आगे बढ़ने की आशा- सारा विष्णुपुराण पाप और पुण्य के संघर्ष से भरा हुआ है । इसमें पापी व्यक्तियो का भी वर्णन है जो अहवार के वशीभूत होकर अपने मह का प्रद- र्शन करने के लिये दूसरो का दमन करते हैं परन्तु मन्त मे उन्हे अपने दुष्कर्मों पर पछताना पड़ता है । इसमे ऐसी भी पुण्य प्रात्मानो की कथानो का उल्लेख है जो स कर्मों को ही अपने जीवन का मालम्बन बनाती रही है और समस्त प्राणियों में अपने इष्टदेव के दर्शन करती रही हैं । विष्णु पुराण ( ३१७:४४ ) ने इसी पाप को नरक और पुण्य को स्वर्ग की सज्ञा दी है। तभी पापात्माओ के चरित्रो का वर्णन करके वैसे कर्मों से बचने की प्रेरणा दी है। साथ ही साथ पुण्य के सचय की शिक्षा भी दी गई है ताकि साधक ऊपर उठ सके क्योकि ऊपर उठना ही स्वर्ग है । भागवत के अनुसार सात्विक गुणों का विकास ही मनुष्य के लिये स्वर्ग है। पुराणकार अपने साधक को स्वर्ग तक ही सीमित नहीं रखना चाहते । स्पष्ट रूम मे कहते हैं कि केवल नरक मे ही दु.ख नही है, सार्ग मे भी है,क्योकि वहां से नीचे गिरने की प्राशङ्का से जीव को सदा अशान्ति ही रहती है ( ५।५।५०)। स्वर्ग के सुख भोग कर पुनः पृथ्वी पर आना पडता है । मतः यह मन्तिम लक्ष्य नहीं है। इससे आगे बढ़ना होगा। इस प्रगति पर सन्तोप नहीं करना चाहिए। स्वर्ग से भी प्रागे के लोको की प्राप्ति मे प्रयत्नशील रहना चाहिए। भविष्य वाणी-एक वैज्ञानिक प्रक्रिया- भारतवर्ष तपस्वी मोर वैज्ञानिक ऋपियो की भूमि रहा है। ऋषि श्री विष्णुपुराण-एक अध्ययन ] [ ४५३ निकालज्ञ होते थे, वह भूत, भविष्य का ज्ञान रखते थे । वह जो भविष्य वारिणयां करते थे, वह प्रायः सत्य निकलती थीं। विष्णु पुराण मे भी कुछ भविष्य वाणियो का वर्णन है । (४॥२१॥३, ८) के अनुसार “इस काल मे राज्य करने वाले महाराज परीक्षित के चार पुत्र जनमेजय, श्रुइसेन, उग्रसेन, भीम- सेन होगे। जनमेजय का शतानीक नामक पुत्र होगा, जो याज्ञवल्क्य मुनि से वेद-शिक्षा प्राप्त कर और कृप से शस्त्रास्त्र विद्या प्राप्त करके महर्षि शौनक द्वारा प्रात्म-ज्ञान प्राप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगा। शतानीक का अश्वमेघदत्त नामक पुत्र होगा। अश्वमेघदत्त का पुन अधिसीम कृष्ण पौर अधिसीम कृष्ण का पुन निचक्नु होगा। निचक्नु गगाजी द्वारा हस्तिनापुर यहा ले जाने पर कौशाम्बी में निवास करेगा।" चौथे अश के २४ वें अध्याय के श्लोक ७०-६३ मे भी कुछ भविष्य की बातें कही गई हैं-यह सभी राजा एक ही काल मे पृथ्वी पर होगे, यह अल्प प्रसन्नता वाले, अधिक क्रोध वाले, प्रधर्म और प्रसत्य भापण में रुचि वाले स्त्री, बालक और गोमो का वध करने वाले, पर-धन-हारी, न्यून शक्ति वाले, तमयुक्त, विकसित होते ही पतन को प्राप्त होने वाले, अल्पायु, अल्प पुन्य, बडी मभिलापा वाले और महान् लोभी होगे। यह सब देशो को परस्पर में एक कर देने वाले होगे । इन राजानो के माधय में रहने वाले बलवान् म्लेच्छ मौर अनार्य व्यक्ति, उनके स्वभाव के अनुसार माचरण करते हुए सम्पूर्ण प्रजा को ही नष्ट कर डालेंगे। इससे दिनो-दिन धर्म मौर अर्थ को धीरे धीरे करके हानि होती जायगी और जब यह क्षीण हो जायेंगे तो सम्पूर्ण विश्व ही नष्ट हो जायगा। उस समय धन ही कुलीनता का सूचक होगा, बल ही सव धर्मों का चिह्न होगा, परस्पर की चाहना हो दाम्पत्य सम्बन्य को करने वाली होगी, स्त्रीत्व ही भोग का साधन होगा । भूउ ही व्यवहार म जीत कराने वाला होगा, जलवायु की श्रेष्ठता ही पृथ्वी की श्रेष्ठता का लक्षण होगा, यज्ञोपवीत ही गा. रणत्व का कारण होगा, रत्नादि धारण ही लापा का हेतु होगा, याह्य चिह्न ही पाश्रमो के सूचक होगे, मन्याय हो ति का सापन होगा, निर्भयता और पुष्टतापूर्वक भाषण ही पारिस्य दोगा, निर्धनता ही गाय या तारण सममा ४५४ ] [ विष्णु पुराण जायगा । स्नान तापन का हेतु, दान धर्म का हेतु और स्वीकृति ही विवाह का हेतु होगा। सज धज कर रहना ही सुपात्रता का घोतक होगा, दूर देश का जल हो तीर्थ जल होगा, छद्मवेश ही गौरव होगा। इस प्रकार सम्पूर्ण भूमडल में नाना प्रकार के दोपो के फैलने से सब वर्गों मे जो-जो बली होगे वही वही राजा राज्य को हथिया लेंगे।" भविष्य की बातें जानने में भारत इतना दक्ष था कि अलग से एक भविष्य पुराण का ही निर्माण हो गया । भविष्य कथन एक विश्वसनीय सिद्धात है, यह एक विज्ञान है, साधना है। महर्षि पतञ्जलि ने योग दर्शन मे इमका समर्थन किया है और साधना का सकेत किया है। उन्होने लिखा है "तीनो परिणामो ( धर्म, लक्षण, प्रवस्था ) मे सयम करने से अतीत और अनागत ( भूत, भविष्यत् ) का ज्ञान होता है (३।१६) । ससार के समस्त पदार्थ इन तीन परिणामों के अन्तर्गत आ जाते है। इसमे सयम करने से तमोगुण और रजोगुण का निवारण होता है और सतोगुण का विकास होता है। इसी से भूत और भविष्यत् का ज्ञान होता है। यह भारत की एक गौरवमय उपलब्धि है जिस पर हमे गर्व है । दोषों, दुर्गुणों और कुरीतियों से चेतावनी दुर्गुण मानव के महान शत्रु हैं । वह शक्तियो का ह्रास करते हैं । शक्ति के विकास से ही सुख शान्ति को प्राप्ति सम्भव है। इसलिए इसको नष्ट करने वाले शत्र प्रो से सावधान किया गया है- बड़ों के अनादर के दुष्परिणाम- शिष्टाचार भारतीय संस्कृति की नीव है । जो इसका ग्राचरण नही करता, वह उद्दण्ड और अशिष्ट माना जाता है । प्राचारो म माता, पिता, गुरु और वृद्धजनो के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना सर्वोपरि है । सम्मान न करके जो भूपि, ब्राह्मणो और अपने से बडो की हंसी, मजाक और अनादर करते हैं, उनके घोर दुष्परिणाम विष्णुपुराण में वर्णित किए गये हैं ।

विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] पंचम अश के दसवें अध्याय में वर्णित कथा के अनुसार यादव बालको ने ऋपियो के साथ मनोरजन का प्रोग्राम बनाया । उन्होने जाम्बवती पुत्र साम्य को स्त्री वेप मे सजा कर ऋपियो से कहा "इसे पुत्र की इच्छा है तो वताइये, इसके क्या उत्पन्न होगा ?" (६-८) भूपि यादव वालको की चाल को ताड़ गये और क्रोधपूर्वक कहा-"इसके मूसल उत्पन्न होगा जो सब भोर से यादको के नाश का कारण हो जायगा।" (E-१०) मोर अन्त में यही हुया। एक बार अप्सरानो ने अष्टावक्र के माठ स्थानो से टेढ़े पारीर को देसा तो स्वभावतः हँसी छूट पडी और छिपाने पर भी न छिप सकी। महर्षि ने उन्हे साप दिया कि तुमने मेरे कुबड की हंसी उडाई है, इसलिये तुम भगवान् विष्णु को पति रूप मे पाकर भी लुटेरो द्वारा अपहत होगी।"(६।३८७६.८२) इन कथापो से वडो के धनादर करने से सावधान करते हुए सम्मान की प्रेरणा दी गई है। अविवेक-अज्ञानता का लक्षण है। विवेक कहते हैं-सत्य अगत्य के निर्णय करने को भक्ति गी। वो व्यक्ति इस शक्ति से च्युत है,वह मन्धकार मे भटरता रहता है और गौरवमयी मानव योनि पाकर के भी पमानयो के गे काम करता है। मानवता की सिद्धि के लिये विवेक का जागरण भावश्यक है । विष्णुपुराण मे मविवेक को नष्ट करने के लिये पनेको स्थलो पर महत्वपूर्ण मामग्री प्रस्तुत की है। एक स्थान पर कडे दादो में कहा है "मजान के पन्धेरे में पड़ा हुमा जीप यह भी भूल जाता है कि मैं कहाँ से माया ? कहाँ जाऊंगा? मैं कौन है ? मेरा रूप क्या है ? में कौन से बन्धन में सि पाररा बंधा हूँ? मैं का करू, या न? या पई, पान गई ? पमं सा है परमं करा' रिम माया में से रहूँ ? कर्तव्य या मातम्म नया है ? ग प्राार पिक हित पशु के ममान वह बोर मजान से उतान गो गो भोगो है।" (६१५२१-२४) सहवार एक महारोग मासिक पतन में ही पन्य मागुनों रा हाय रहता है, वहीं सहया [ श्री वि गुपुराण को भी एक ऊँचा स्थान प्राप्त है। भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्री में कोई विरला ही ऐसा व्यक्ति बचा होगा, जो इसके कुप्रभावो से पीडित न हुआ हो । इसके प्रहार व्यापक रूप से काम करते हैं । इसीलिये तो गीताकार (१८।१६) कहा कि "जो सस्कृत बुद्धि न होने के कारण यह समझे कि मैं ही अकेला कर्ता हूँ, समझना चाहिए कि वह दुर्मति कुछ नहीं जानता।" अहङ्कार प्रदर्शन के लिये पुराण मे अनेको कथापो का चयन किया गया है जिनमे वेन और हिरण्यकशिपु के चरित्र प्रमुख हैं । वेन ने तो कहा था। "मुझने अधिक ऐसा कौन है जो मेरे द्वारा भी पूजा के योग्य हो। तुम जिसे यज्ञेश्वर एव भगवान कहते हो, वह कौन है ?" (१।१३।२०) उसने प्रजा को अपनी पूजा करने का आदेश दिया था। हिरण्यकशिपु,प्रह्लाद से विष्णु की अपेक्षा अपना सम्मान चाहते थे । प्रह्लाद ने इसका विरोध किया तो हिरण्यकशिपु का मह- वार भडका, इसी अग्नि मे उसने प्रह्लाद को जलाना चाहा, परन्तु अहङ्कारी व्यक्ति तो स्वय उससे जलता है, वह क्या दूसरे को जलायेगा? अहसार की उत्पत्ति का अर्थ है शक्ति की ह्रास का प्रारम्भ । इसीलिये महङ्कारी का सर सदैव नीचा होने वाली कहावत कही जाती है। पुराणकार इसे भी व्यवहारिक रूप में बताते हैं । विश्व विख्यात हजारो महान योद्धाओ पर विजय प्राप्त करने वाले अर्जुन अनाथ वालाप्रो को ले जाते हुए प्रपार दस्युओ से उनकी रक्षा करने से अपने में असमर्थ पाते हैं और लूट लिये जाते हैं (५।३।१२-१५) । केवल भौतिकवादी राजा लोग इस रोग के रोगी रहे हो, ऐसा नहीं है । तपस्वी ऋपि भी इससे हार मान चुके हैं । इन्द्र ऐरावत पर चढ़े जा रहे थे। दुर्वामा ने एक पुण्यमाला इन्द्र को दी । इन्द्र ने हाथी के मस्तक पर डाल दी। हाथी ने उसे पृथ्वी पर फेंक दिया । महर्षि का महद्वार इससे उत्तेजित होगया। उनके क्रोध की ज्वाला भडक उठी और उन्होंने इन्द्र को शाप दिया कि "तेरा यह त्रिभुवन भी अब शीघ्र हो हीनता को प्राप्त होगा।' (१९१६) इस छोटी सी गलती के लिये इतना बड़ा दण्ड अनुचित ही है । वह क्या न देते, महद्वार ने जो उनके मस्तिष्क पर नियन्त्रण कर लिया था। पुराणकार ने इस महारोग से सावधान रहने की प्रेरणा दी है।

[ ४५७ विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] क्रोध से शक्ति नाश- कोध ऐमी अग्नि है जिसमें हमारा शरीर, मन और बुद्धि सब जलते रहते हैं। शास्त्रो ने इसे नरक का द्वार, पाप का मूल और महा रात्र कहा है क्योंकि यह यात्मिक बल को नष्ट करता है। गाधी जी ने कहा कि "कोच के लक्षण शराव और अफीम दोनो से मिलते है।" गीता (१९६३) में कहा कि "क्रोध से अविवेक होता है, परिवेक से स्मृतिभ्रंस, स्मृतिभ्रंश स बुद्धि नारा पौर बुद्धि नाश से सर्वनाश हो जाता है।" इस क्रोध से पुराणकार ने बार-बार विभिन्न कयाम्रो द्वारा सावधान किया है । एकवार वसिष्ठ ने जब देसा कि राजा निमि ने उसके स्थान पर गौतम होता नियुक्त कर लिया है तो शाप दे डाला कि तुम देह रहित हो जानो । (४१५७.८) जब राजा सोकर उठे तो उन्हें भी कोष माया । उन्होंने गुरु को शाप दिया कि वह भी देह रहित हो जाएं (६-१०)। इन्द्र न जर महर्षि दुर्वामा द्वारा पुण्यमाला का अनादर किया तो प्रोप- पूर्वक शाप दिया कि तुम श्रीहीन हो जाप्रो (१९१६) । महर्षि पाराशर ने एक बार कोध म माफर राक्षमो के बिनागा या पिया जिग में प्रतिदिन सेकडो हजागे राक्षम भस्म होन लगे (१११:१३-१)। तव पगिट ने उन्हें रोगा कि "इस पा करी । मूर्य गतिही प्रोर किया करते है, मानोजन ऐमा नहीं करते हैं । (१।१।१७) मान के भण्डार ऋषिगण गं पोर मांस मे वापा स्थान को का परित्याग पर दो है । यि नुम को जीभूत मा हो।" (१५-१६) ४५८ ] [ थी विष्णुपुराण . निर्मल और असदिग्ध रहेगी।" (२५-२७) जिस शान्त मन मे क्रोध की ज्वाला नहीं भटकती, उसी मन में ऐसे परिणामो की सम्भावना हो सकती है। मोह से बन्धनों की दृढ़ता- प्रेम अमृत है । इसे प्राणीमात्र पर छिड़कना चाहिये । यह मानव का परम धर्म है । इससे वचित व्यक्ति जड़ गिना जाता है। परन्तु प्रेमी के प्रति लगाव और लिप्तता हानिकारक है। यह लगाव ही कुमति है जो बन्धन और दुख का कारण है । इससे निवृत्ति की माधना बड़ी तत्परतापूर्वक करनी चाहिये क्योकि विष्णुपुराणकार ने ऋषि और तपस्वियो को भी इसमे फंसते हुए बताया है। भरत तपस्वी और ज्ञानी थे परन्तु एक हरिणी से उनका मोह होगया । भयभीता हरिणी का गर्भ नदी मे गिरा और उन्होने पकड़ कर उसका पालन किया। इससे तो उनके प्राणीमात्र के ऊपर अपार प्रेम की झलक मिलती है (२।१३।१६) । परन्तु मरते हुए भी उसका स्मरण करते रहना उनके लिये हानिकारक होगया और उन्हे हरिणी की योनि मे नाना पड़ा। महर्षि सौभरि प्रत्यन्त तपस्वी थे । एक वार उन्हे विवाह की सुझी । एक नही राजा मानधाता की ५० कन्यानो से विवाह कर लिया और १५० पुत्र उत्पन्न किए । वह मोचने लगे "क्या यह मेरे पुन मधुर बोली वोलेगे ? अपने पैरो से चलेगे ? युवावस्था को प्राप्त होगे ? क्या मैं इन सबको पत्नी सहित देख सकूगा ? फिर इनके भो पुत्र होगे, तब क्या मैं अपने को पुत्र-पौत्रो से सम्पन्न देख पाऊंगा?" (४१२६११४) । इस तरह हमारे मोह की कोई सीमा नही है। जिनसे मोह करते हैं, उन्हे एक दिन नष्ट होना है फिर इन अनावश्यक लगावो से क्या लाभ है ? इससे निवृत्त होना ही ज्ञान और विवेक का लक्षण है। धन का अपव्यय- धन मानव के ज्ञान-प्रज्ञान को महान कसौटी है। शरीर मात्मिक [ ४५६ विष्णु पुगए-एक अध्ययन ] उत्थान की साधना के लिए मिला है । अत. उसे भगवान का मन्दिर समझ कर स्वस्थ व हृष्ट पुष्ट रखना कर्तव्य है परन्तु हर समय उमी के लालन-पालन मे लगे रहना अज्ञानता है। इसीलिये ईसा को कहना पडा कि सुई की नोक मे से एक ऊंट को निकलना सम्भव है परन्तु एक धनवान का स्वर्ग में जाना सभव नहीं है, क्योकि वह धन की तृप्णा से हर समय अस्त रहता है और उसे प्राप्त करने के लिए अनुचित उपाय अपनाता है। विष्णुपुराण ने प्रेरणा दी है कि धन का उपार्जन किया जाये अवश्य परन्तु उसका प्राधार धर्म हाना चाहिये (६।२०२४) विना धर्म के प्राप्त धन नरक का द्वार सिद्ध होता है । ईमानदारी से कमाया धन ही स्वर्गीय सुख और शान्ति का प्रदाता है। पुगणकार ने वास्तविकता का वर्णन करते हुए लिखा है । 'धन के उपार्जन और रक्षण में अत्यन्त कष्ट होता है और फिर उसे अनुचित मार्ग से व्यय करने पर भी बहुत ही दुख भोगना पडता है।" (२६) उपार्जन और सरक्षण दोनो म सावधानी बरतनी पडती है । प्राकृतिक नियम है कि जो व्यक्ति जिस वस्तु का सदुपयोग करता है, वह उसे अधिक मात्रा में उपलब्ध होती है क्योकि वह उसके लिय अपने को अधिकारी सिद्ध करता है । इसके विपरीत दुरुपयोग करने वाले से छीन ली जाती है । इसलिये चेतावनी दी गई है कि धन के व्यय मे ध्यान रखना चाहिये। लोग अनुचित उपायो से कमाये धन को यश और कोनि के लिये दानमे देते रहते हैं । विष्णुपुराण ने इसका भी विरोध किया है और कहा है कि जो धन धर्म से कमाया गया हो, उसे ही दान और यज्ञो मे देना उचित है (६।२।२४)। वन्धन का कारण तृपया- - धन, वैभव और अन्य भौतिक ऐश्वर्यों की तपस्या जीव को बन्धन में डालकर आवागमन के चक्र में घुमाती रहती है । इसका वर्शन राजा ययाति के अनुभव के माध्यम से दिया गया है। उसने अपने पुत्र प्रासू का यौवन लेकर । [ श्री विष्णुपुराण हजार पर्प तक भोगो को भोगा । इतने लम्बे सम्पर्क तथा अनुभव के बाद अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा-~~ "भोगो के भोगते रहने से उनकी तृष्णा कभी शान्त नहीं होती किन्तु भाज्याहुति से प्रवृद्ध होने वाले अग्नि के समान निरन्तर बढ़ती जाती है । भू- मण्डल पर जितने भी धान्य, जौ, स्वरणं, पशु, और स्त्रियाँ हैं वे सब एक मनुष्य के लिये भी तृप्त नही कर सकते, इसलिये इस तृष्णा का सर्वथा त्याग करना चाहिए । जो तृष्णा खोटी बुद्धि वालों द्वारा अत्यन्त कठिनाईपूर्वक त्यागी जा सकती है और जो वृद्धावस्था में भी शिथिलता को प्राप्त नहीं होती, उसी तृष्णा को त्याग कर निमान पुरुष पूर्ण रूप से सुखी हो जाता है। जीर्णावस्था प्राप्त होने पर वाल और दांत तो जीर्ण हो जाते हैं, परन्तु उनके जीर्ण होने पर भी धन और जीवन की आशा जीर्ण नहीं हो पाती। इन विषयो मे प्रासक्त रहते हुए मेरे एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये, फिर भी उनके प्रति नित्य ही इच्छा रहती है । इसलिये, अब मैं इनको त्याग कर अपने चित्त को ब्रह्म में लगाऊँगा, निद्धन्द्व तथा निर्मम होकर मृगो के साथ विचरण करूंगा।" (४।१०।२२,२४,२६-२६) । ययाति के अनुभव से लाभ उठा कर हमें भी अपने जीवन मे मोड लाना चाहिए। पापों का परिणाम नरक- शास्त्रो मे भनेको प्रकार के नरको वर्णन है। विष्णुपुराण में भी यह नाम पाये है। "तामिस्र, अन्धतामिल, महारोरव, रौरव, प्रसिपनयन, घोर, काल सूत्र, अवीचिक, यह सब नरक लोक हैं। वेदो की निंदा करने वाले, यज्ञो म वाधा डालने वाले और अपने धर्म को त्याग का प्राचरण करने कालो का यही स्थान कहा गया है।" ( ११६-४०१४३) नारकीय पारलाओं का वर्णन गरुड पुराण आदि मे है । विष्णु पुराण में भी उनका सक्षिप्त वर्णन विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] "पहले तो यमदूत उसे अपने पाश में बांध लेते पोर फिर इन पर दण्ड प्रहार करते हैं। तब अत्यन्त दुर्गम मार्गों को पार करने पर यमराज का दर्शन हो पाता है। फिर तपे हुय बालू पग्नियन्य, शस्त्रादि से भीषण एव असह्य नरव-यातनाएं भोगनी होती हैं । नरकवासी को गाइन मूली पर चढ़ाने सिंह के मुख में डालन गिद्धो द्वारा नुचवाने, हाथियो से कुचलवाने, तेल म पकाने, दलदल म फैमाने ऊपर से नीचे गिराने तया क्षेपणया से दूर फिकवाने रूप जिन-जिन कष्टो की प्राप्ति होती है, उनकी गणना मसम्भव है। । ६५- ४४१४६)।" इन यातनामो से जो बचना चाह, उसे उन कर्मों स दूर रहना चाहिये जिनका परिणाम नरका म प्राप्त होता है । "नरक प्राप्ति के वारणा पर चर्चा करते हुए कहा गया है। के तामसिक होन से प्रशानी पुरुषा को प्रवृत्ति तामसिक फर्मो म होती है, इसके कारण वैदिक कर्म लुप्त हो जाते हैं। वर्म नोप का फल मनीषिया ने नरक कहा है। (६॥५-२०२६) एक कारण प्रौर बनाग है। "जो शक्ति अपन पापा या प्रायतित नही परत, उन्ह नरक को ही प्राप्ति होती है।" ( २१५॥३४ ) प्रात्मनिरीक्षण करने वाला व्यक्ति ही दुप्पमों को छोड़ कर सद्कर्मों की पार प्रवृत्त हाना है। तभी उनकी निति नरम म हो सकती है। पुगणकार चाहत हैं कि हम पूर्व पापा का प्रात्रि पर स्वग से पथ पर बगान मारूद हो। पशुबलि हिन्दु धर्म पर महान कलंक ४६२ ॥ [ श्री विष्णु पुराण जाता है । यज्ञ पवित्रतम कार्य है। इससे सारे विश्व के प्राणियों का कल्याए होता है । इसके साथ पशुबलि जैसे जघन्य पार्य यो मिलाना पशुता से भी गिरने के समान है । विष्णु पुराण ने इस बात का विरोध करते हुये कहा है "यदि यज्ञ मे बलि होने वाले पशु को स्वर्ग मिलता है तो यजमान अपने पिता का बलिदान कर के हो उसे स्वर्ग क्यो नहीं प्राप्त करा देता।" ? ३३१८१२७ ) इस बुद्धिवादी युग मे भो बलि का प्रचलन है। यह हिन्दू धर्म पर कलक है। - आचार दर्शन सभ्य और असभ्य की पहचान को यदि कोई कसौटी है तो वह माचार ही हैं । यही पतन और उत्थान को सीमा रेसाएं खो वने वाले हैं। माचारहीन मनुष्य पशु तुल्य ही माना जाता है। प्राचार की शिक्षा ग्रहण व्यक्ति ही सभ्य कहा जाता है। भारतीय माचार दर्शन शारीरिक, मानमिक व बौद्धिक स्वास्थ्य के लिये हितकर है नागरिकता की उत्तम शिक्षामो से भी यह मोत-प्रोत है । प्रात व साय के अलग-मलग प्राचार हैं । लोकाचार के सामान्य नियमो की भी प्रेरणा दी गई है। सदाचार तो भारतीय संस्कृति को प्रापार शिला ही है। विष्णु पुराण के माधार पर यहां उनका दिर,शंन कराया जा रहा है। सदाचार- सदाचार की प्रेरणा भारतीय संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता है । विष्णु पुराण भी उससे अछूता नहीं है । सदाचार की परिभापा का वर्णन करते हुए कहा गया है ' सत्म र्गी का अर्थ साधु होता है और द प रहित को भी साधु कहते । उस साधु पुरुष का प्राचरण हो सदाचार कहा गया है ( ३॥११॥३)। विष्णु भत्ति की श्रेष्ठता का प्राधार सदाचार ही है । (३।७।२२) मे कहा है "जो निर्जन स्यान मे पराए स्वर्ण को पड़ा देखकर उसे तिनके के समान मानता है, उसे भगवान् का भक्त समझो।" भगवान् के निवास को - - विष्णुपुराग-एका मध्ययन ] फसोटी वह पुरुप है जो 'स्वच्छ चित्त, मत्सरताहीन, प्रशान्त, पुनीत चरित्र, सब प्राणियो का प्रेमी, सहृदय तथा हिन की बात कहने वाला, निरभिमान तथा माया से अलग रहता है" ( ३६७।२४)। पर नारी में पासक्ति रखने वाले को इहलोक व परलोक दोनों के बिग- ड़ने का भय दिखाया गया है ( १।१२।१२४ ) क्योकि इस लोक में प्रायु का ह्रास मौर परलोक में नरक की प्राति होती है। इसलिये पुराणकार ने प्रेरित किया है कि "पर नारी से तो वाणी या मन से भी सङ्ग न करे" (३।११।१२३) केवल मपनी ही स्त्री से ऋतुकाल में सङ्ग करे (१२५) । कुछ व्यावहारिक उपयोग के माचारो की भी शिक्षा दी गई है । जैसे "स्दल रूप में भी अप्रिय भापण न करे। मिथ्या वचन प्रिय हो तो भी न बोले पोर परदोपों को किसी से न कहे ।" ( ३।१२।४ ) "किसी के साथ बैर मादि रखने मे रुचि न रखे" (५) । "लोक निन्दित, पतित, उन्मत्त, बहुतो के वैरी, मिथ्याभापी, अत्यन्त ध्यय करने वाले, परनिन्दा मे रुचि रखने वाले मोर दुष्टो के साथ कभी मित्रता न करे ।" ( ३।१६।७ )। जो कुटिल पुरुषो से भी प्रिय भापण करता है,मोक्ष सदा उसरे हाथ में स्थित रहता है" ३।१३।४२ "ज्ञानी पुरुषो का कर्तव्य है कि वह उसी प्रकार का सत्य बोलें जिससे दूसरो को सुख मिले । यदि किसी सत्य वाग्य से दूसरो का अहित होता हो तो मौन रहना ही उचित है " ( ३११३१४३ ) । यह सद-माचार साधक को दिन-दिन ऊँचा उठाते हैं। मानवता के लिये इनका प्राचरण आवश्यक है । प्रातःकाल के प्राचार- भारतीय सस्कृति एक प्रादर्श सम्कृति है । मानवता का विकास इसका प्रमुख उद्देश्य है । आत्म विकास मानव वा अन्तिम लक्ष्य है । प्रारम्भिक पाठ तो शिष्ट आचार हैं जिनके प्राचारण से हम समाज मे उत्तम नागरिक के रूप में रह सकें। यदि नागरिक्ता के माधारण नियमो का पालन सम्भव न हो तो प्रात्म-विकास की भी सम्भावना नही हो सकती। भारतीय ऋपियो ने प्रात - - ४६४ ] [ श्री विष्णु पुराण काल उठने से लेकर रात्रि काल तक ऐसे नियमो का चयन किया जो व्यक्तिगत और सामाजिक-दोनों दृष्टियो से लाभदायक हैं । वह केवल नियम ही नहीं हैं । यदि उन पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया जाय तो उनके गहन रहस्यों का पता चलेगा। यह निश्चय है कि बिना उपयोगिता के किसी भी नियम को इन प्राचारो मे स्थान नहीं दिया गया है । विष्णु पुराण ( ३११११८-२१ ) मे मल मूत्र सबधी स्वास्थ्योपयोगी नियमो का दिग्दर्शन कराया गया है "ब्रह्म मुहूर्त म उठने के पश्चात् ग्राम के नत्य कोण वाली दिशा में जितनी दूर छोडा हा वाण जा सकता है, उतनी दूर से भी भागे बढ कर मल-मून का त्याग करें और अपने घर के आंगन मे पाप धोने का जल प्रथवा जूठा जल न डालें । अपनी छाया पर या वृक्ष की छाया पर अथवा गो, सूर्य, अग्नि, वायु, गुरु मौर द्विजाति ‘ाले किसी पुरुष के सामने जाकर कभी मलमूत्र न करें। इसी प्रकार जोते हुए खेत, अनाज युक्त भूमि, गोमो के गोष्ठ, जन-सभा, मार्ग के मध्य, नदी, प्रादि तीर्य, जल या जलाशय के किनारे और श्मशानादि मे कभी मल मूत्र विसर्जन न करें। सम्भव हो तो दिन में उत्तर की पोर मुख करके और रात मे दक्षिण की ओर मुख करके मूनोत्सर्ग करें। मल त्याग के समय पृथिवी को तिनको से ढक ले और सिर पर वस्न लपेट ले और उस स्थान पर मधिक समय तक न रहे तथा मुख से भी कुछ न बोले।" "बीवी को मिट्टी, चूहो द्वारा बिल से निकाली हुई, जल के भीतर की, घर लीपने को, चीटी प्रादि जीवो द्वारा निकाली हुई, हेल द्वारा उसाडी हुई तथा शौच कम से बची हुई मिट्टी को शौच कम म काम न लें। हे राजन ! उपस्थ मे एक बार, गुदा मे तीन बार, बोये हाथ मे दस बार और दोनो हाथो मे सात बार मिट्टी लगाने से शुद्धि होती है। फिर निगंध, फेनहीन जल से प्राचमन करे और यत्न पूर्वक अधिक Pिट्टी ग्रहण करे। उसमे करें। पीय धोने के उपरात तीन बार युल्ला और फिर दो वार मुख का धोवे । फिर जल ग्रहण करके उससे इन्द्रियम्ध्र, मुर्दा, बाह, नाभि प्रौर हृदय को सर्व करे। फिर भी प्रकार स्नान करके वानों को प्रभाले और आवश्यकता- पांवो को शुद्ध विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४६५ नुसार दर्पण, अजन दूर्वा आदि मागलिक द्रव्यो का विधिपूर्वक प्रयोग करें। मल मूत्रोत्सर्ग के वाद स्नान करना चाहिए ( ३।११।२४-२५)। स्नान के पश्चात् शुद्ध वस्त्र धारण कर देवता ऋषि और पितरो का तपर्ण फरने का प्रादेश है ( २६ ) । श्लोक २४-३६ म तपंण के विस्तृत नियम दिये गये है। तपंण को केवल अपने सम्बन्धियो तक ही सीमित नहीं रखा गया वरन् प्राणी मात्र को, चाहे वह मनुष्य, पक्षी, पशु जलचर, थलचर या अपना विरोधी ही क्यो न हो, उसे जलाजलि देने का नियम है ( ३५-३६) क्योकि मूल रूप मे सभी प्राणी एक हैं । जो इस एकता को अनुभव करता है, उसी का पात्मविकास हुमा समझना चाहिए । तर्पण के बाद प्राचमन, सूर्य भगवान् को अर्घ्यदान, गृहदेवता और इष्ट देवता की पूजा मोर अग्निहोत्र का विधान है ( ३।११।३न-४२)। फिर पृथ्वी पर बलि भाग रखने मौर अतिथि की प्रतीक्षा करने का मादेश है जो कुछ भी हम खाते हैं, उससे हमारे मन और बुद्धि का निर्माण होता है, मुख दु ख के कर्मों का यही माश्रय है, इसलिये भोजन सम्बन्धी नियमो को बहुत ही पैनी दृष्टि से बनाया गया है । शारीरिक स्वास्थ्य को दृष्टि से तो वह लाभदायक हैं ही, मानसिक व बौद्धिक पविनता के लिये भी वह आवश्यक हैं। भावना योग का भी इसमे समावेश है । प्राधुनिक भौतिक विज्ञान के यह अनुकूल हैं | मनोविज्ञान ने इन्हें उपयोगी पाया है । विष्णु पुराण ( ३।११।६१-६६ ) में भोजन सम्बन्धी नियम इस प्रकार वणित हैं जो मनुष्य स्नान के बिना ही भोजन कर लेता है, उसे मल भक्षण करने वाला समझो । जप किये बिना भोजन कर लेना रुधिर पौर मूत्र पान करना है। असस्कृत भन्न का भोजन करन वाला कीडो का और बिना दान दिये खा लेने वाला विष का भोजन करता है । इसलिय गृहस्थ जिस प्रकार भोजन करे उस विधि को श्रवण करो। स्नान के अनन्तर देवतामो मृपियो और पितरो का तपर्ण कर हाय में श्रेष्ठ रत्न धारण पूर्वक पवित्रता से भोजन करे । जप मोर प्रग्निहोत्र के बाद शुद्ध वस्त्र पहिरे तथा प्रतिथि, ब्राह्मण, गुरुजन मौर [ श्री विष्णु पुराण अपने प्राधितों के भोजन करने के पश्चात् श्रेष्ठ पुष्पमालादि धारण पोर हाथ पांव प्रक्षालन प्रादि से शुद्ध होकर भोजन करे और भोजन करते समय इधर-उधर दृष्टिपात न करे।" "अन्यमनस्क भाव को त्याग कर पूर्वाभिमुस या उत्तराभिमुख बैठकर पथ्य अन्न को मन्त्रपूत जल के छोटे देकर उसका माहार करे । किसी दुराचारी पुरुष से प्राप्त, घृणोत्पादक या बलि वैश्वदेव आदि संस्कारो से रहित अन्न को त्याग दे तथा अपने भोजन योग्य प्रष्ट मे से कुछ मश अपने शिष्य प्रयवा अन्य क्षुधार्त व्यक्तियों को देकर शुद्ध पात्र मे अन्न रख कर उसका भक्षण करें। किसी वेन आदि के आसन पर स्थित पात्र में, अयोग्य या संकुचित स्थान में अथवा असमय मे भोजन न करे । प्रथम अग्नि को अन्न का मग्रभाग देकर हो भोजन करें। न्त्रपूत, प्रशस्त तथा ताजा प्रश्न का भोजन करे । परन्तु, मूल और सूखी शाखाप्रो के और चटनी में गुड़ के पदार्थो के प्रति यह नियम लागू नहीं हैं । सारहीन पदार्थों का भोजन न करना ही इस कथन का उद्देश्य है । मधु, जल, घृत, दही, सत्तू मादि के अतिरिक्त अन्य किसी पदार्थ को पूग ही भक्षण न करे।" "एकाग्र मन से भोजन करना चाहिये । पहिले मीठे, फिर नमकीन, फिर खट्टे और अन्त मे कडुवे तीक्ष्ण पदार्थों का भोजन करे। जो मनुष्य प्रथम द्रव पदार्थ, मध्य मे.कठिन पदार्थ और मन्त मे पुन: द्रव पदार्थ भक्षण करता है, उसके बल और प्रारोग्य का कभी क्षय नहीं होता। इस प्रकार अनिपिद्ध पदार्थों का वाणी के संयमपूर्वक भोजन करे। भन्न का कभी तिर- स्कार न करे । पहिले पांच ग्रास मौन रह कर खाय, वह पांच प्रारणो की तृप्ति करने वाले हैं। भोजन के पश्चात् भले प्रकार प्राचमन करे मोर पूर्व या उत्तर की मोर मुख करके हाथो को उनके मूल-देश तक धोकर पुनः विधिवत पाच- मन करे। फिर स्वस्थ और शान्त मन से प्रासन पर स्थित हो और अपने इष्ट देवतामों का ध्यान करे। "प्राणवायु से प्रदीप्त हुमा जठराग्नि प्राकारा से माकासमय अन्न का परिपाक करता हुया मेरी देहगत पार्थिव धातुमों का पोषण करें, जिससे मैं सुखी रहूं, यह भग्न मेरे देह मे स्थित पृथ्वी, जल, अग्नि विष्णु पुराण-एक मध्ययन ] मोर यायु के बल की वृद्धि को तया इन्हीं चारो तत्वो केस मेहमा यह पन्न मुझे मुखदायक हो।" "यह मान प्रापान, समान, उदान मोर ध्यान को पुट सरे, बिरारी मुझे पापा रहित सुरा मिल सके। मेर भोउन तिर गर प्रम को प्रगति नामक पनि मोर यदयानन पकार, उसके परिणाम में उमस्यबाने यारा मुपदें मोर उगसे मेरे देह को मारोप नाता। देश सपा मारिक मनिटाता यस भगवान श्री हरि ही प्रधान है. हम मरप प्रभाप में मेरे भावन का सर पर पककर मुर पगेम्प-नाम करावं । भोजना करने गा, पार तथा उसका परिपाक-यह गय प्णुि ही है। मां गम भाप मेरे भोर को हुए इस पर का परिपार हो-दस प्रहार पर मान पट पर हाप फेरे पोर यानपूरक पपिक धम उत्तर न करो बारे मा को परमा।" इन नियमो को पाप मिरा तिा गमाई. या २६ र शानिक नियम बनके माप मनाrantमापा गया। गायन पनामा गरि।ग पर काश या ममा (११) मा Rifamil माशिसभयानमा है। १.२)। मोर fly भावार मायंकाल के यानार- सानिम MER: Teen e.naristm, feteatml गंम 4lanktt ) in 4 traiगर और भिम को at farm itute fE HERE 'Trimur-n.twituमद ५m witterfa र httrkite को film - [ श्री विष्णु पुराण किया गया है । सुश्रुत सहिता-सूत्रस्थान १६६ ने इस तथ्य का समर्थन किया है। इसका वैज्ञानिक कारण बताते हुए एक विद्वान ने लिखा है-"समस्त ब्रह्माण्ड की गति ध्रुव की अोर होती है और ध्रुव की स्थिति उत्तर दिशा मे होती है । इस कारण ब्रह्माण्ड के अन्र्तगत पृथ्वी के भीतर की विद्युनधारा भी दक्षिण दिशा से उत्तराभिमुख प्रवाहित होती है । यदि हम उत्तराभिमुख सिर करके सोवें तो वह पार्थिव-विद्य त हमारे पैरो से होकर सिर की ओर प्रवाहित होगी, जिससे सिर मे कई रोग हो जायेगे और स्नायुपु ज मे अस्वाभाविक उत्तेजना की वृद्धि होने से प्रवृत्ति अस्वस्थ रहा करेगी।" समागम सम्बन्धी वैज्ञानिक निषेधात्मक नियमो का उल्लेख करते हुए पुराणकार ने ( ३।११।११२-१८) लिखा है-"ऋतुकाल को प्राप्त हुई अपनी हो भार्या से समागम करे। पुल्लिग नक्षत्र मे, युग्म रानियो मे बहुत रात गये तथा श्रेष्ठ रामय देखकर ही नारी से सगति करे। अप्रसन्न मन वाली, रोगिणी, रजस्वला, अभिलापा-हीन, क्रोधमयो, दुखिनी या गर्भवती के साथ संगति न करे । जो सरल स्वभाव की न हो, अभिलापा हीन या दूसरे पुरुष की कामना वाली हो, भूख से व्याकुल या अधिक भोजन किये हुए हो ऐसी पत्नी, स्त्री गमन योग्य नहीं हैं । यदि अपने मे भी इन दोपो की स्थिति हो तो उस दशा में भी सगति नही करनी चाहिए । स्नान करके पुष्प-माला तथा मध लेपनादि से युक्त होकर काम और अनुराग के सहित स्त्री के पास जाय भोर प्रतिभोजन करके अथवा भूखा रहने की अवस्था में सगति न करे । चौदस, अष्टमी, अमावस, पूर्णिमा तथा सूर्य की सक्रान्ति-यह सब पर्व-दिवस हैं । इनमे नेल मर्दन, नारी-सयोग मृत्यु के मनन्तर मल-मूत्र युक्त नरक की प्राप्ति कराने वाला है। विद्वान पुरुषो को इन सभी एवं-दिनो मे सयम पूर्वक सत्-शास्त्रो का अध्ययन, देववन्दन, जप और ध्यानादि कार्य करने चाहिए।" यह स्वास्थ्य रक्षा के लिये प्रत्यन्त उपयोगी सूत्र है। लोकाचार- विष्णु पुराण केवल प्णय सम्प्रदाय वा प्राचीन ग्रन्य ही नहीं है, विष्णुपुराण-एक अध्ययन ] [४६६ . इसमे भनेको लोकोपयोगी तथ्यो का सकलन है जो लोकाचार की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। स्वास्थ्य, शिष्टाचार और सामान्य ज्ञान व उपयोगिता पर यह प्राधारित है। ( ३.१२।६.-२१ ) मे इस प्रकार दिए गए है:- जल प्रवाह के वेग के सामने से कभी स्नान न करें, जलते हुए घर मे कभी न घुसे तथा वृक्ष के शिखर पर भी न चढ़े। दांतो का मापस में पर्पण न करे, नासिका को न कुरेदे। वन्द मुह मे जमुहाई लेना, खोसना या श्वास छोडना वजित है । जोर से न हंसें, अधोवायु का शब्द सहित त्याग न करे, नखो को न चवावे, तिनका न तोड़े तथा भूमि पर न लिखे। मूछ-दाढी के बालो को भी न चवावे, दो देलो को परस्पर में न पिसे तथा निन्दित भोर मयुद्ध नक्षत्रों का दर्शन न करे। नग्नावस्था वाली परनारी को न देखे, उदय या अस्त होते हुए सूर्य के दर्शन न करें। शव या गव की गन्ध से पूणा न करे, क्योकि शव गन्ध चन्द्रमा का मंच है । चौराहा, चस्यवृक्ष, स्मशान, उप- वन तया दुष्टा स्नो को निकटता-~-इन सबको राधिकाल मे त्याग दे। अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण पोर ज्योतियो को छाया को कभी भी न सापे तपा सूने जङ्गल या सूने घर मे भी अकेला न रहे । केश, पस्यि, कटिं, मन वातु बलि, भस्म, तुप पोर स्नान मे गोलो हुई भूमि को दूर से हो स्याग दे। मनावं पुरुष का सा पोर कुटिल मनुष्य मासक्ति न करे, सर्प के समीर न जाय पौर नीद घुलने पर देर तक न लेटे। जागने, मोने, स्नान करने, बैठने, सम्पा पर लेटने और व्यायाम करने में प्रषिक देर न लगाये। दापोरसोंग वाले पशुपों को, मोस को, सामने को वायु को पोर पूप को सपा छोड़ दे। मजा होकर स्नान, सयन और पाचमन न करे मोर पालो को सोलकर पाचमन या देवयूमन ही फरे। हवन, देव-पूजन, प्रारमन, पुण्याहवाचन पोर उप में एक वस्त्र धारण पूर्वफ हो प्रवृत्त न हो। समय हृदय पुष्पों रानी साय न करे । सदाचारी पुरुषो का सक्ष साप करे, पोंकि ऐगे मनुष्यों के साथ तो मा सात रहना भी प्रशंसनीय है।" गुरुजनों के सामने रन पगारे मोर उमापन पर सपा है (३।१२।२०) । गुरु बाह्मए- पोर माअ-पिता की पूजा में मगेर.

४७० ] [ श्री विष्णुपुराण धारियो के जीवन की सफलता मानी गई है (०२११४) । चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियो के समक्ष थूकने पोर मल मूत्र विसर्जन करने का निषेध है (३।१२।२७)। भोजन, हवन, देव-पूजन के समय थूके व छीके नही ( २६ )। पूज्य पुरुपो का अभिवादन किए विना घर से बाहर न जाए (३१) । यह लोकाचार की उपयोगी बातें हैं जो प्रत्येक उत्तम नागरिक को जाननी आवश्यक है। अध्यात्म का आरम्भ प्राचार से होता है । जो प्राचार मे दक्ष नहीं है, उसके प्रात्म-साधना मे सफलता प्राप्त करने मे सन्देह ही है । जीवन निर्माण के अमूल्य सूत्र विष्णुपुराण जीवन निर्माण का साधना विधान प्रस्तुत करता है, जिन पर चलकर मानव का पूर्ण उत्थान सम्भव है। यह सिद्धान्त अनुभव गम्य और वेद शास्त्र अनुमोदित हैं। उनका सक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-- मोक्ष प्राप्ति का साधन-निष्काम कर्मयोग- शास्त्रकारो की घोषणा है कि मन को निष्काम कर रोने से मोक्ष की प्राप्ति होती है (मनु ६।३४, अमृत विन्दु २) । "जिसका मन एक बार शुद्ध और निष्काम हो जाता है, उस स्थितप्रज्ञ पुरुप से फिर कभी पाप होना संभव नही अर्थात् सब कुछ करके भी वह पाप पुण्य से मलिप्त रहता है" (बौद्ध ग्रथ) गीताकार (२०५१) ने भी कहा है "समत्व बुद्धि से जो ज्ञानी पुरुष कर्म- फल का त्याग करते हैं, वे जन्म के बन्ध से मुक्त होकर परमेश्वर के दुख विरहित पद को जा पहुंचते हैं ।" इसीलिए भगवान ने स्वय कहा कि "मुझे कर्म का लेप अर्थात् वाधा नहीं होगी क्योति कर्म के फल म मेरी इच्छा नही है । जो मुझे इस प्रकार जानता है, उसे कर्म की बाधा नहीं होती।" प्रह्लाद को जब भगवान के दर्शन हुए और भगवान ने वर मांगने को कहा तो इजी पवित्र भावना से प्रेरित होकर उसने कहा "हजारो योगियों में से विष्णु पुराण--एक अध्ययन ] । ४७१ . मैं जिस-जिस योनि को प्राप्त होऊ, उस उसमे ही मेरी भक्ति आप मे सदैव अक्षुण्णय रूप से बनी रहे। जैसे पविवेकी जन विषयो अविचल प्रीति रखते हैं, वैसे ही पाप मेरे हृदय से कभी भी प्रथक न हों।" (१।२०:१८,१९) ऐसी निष्काम बुद्धि से जो भी भगवान की भक्ति करता है । वह चिंता- मुक्त जीवन व्यतीत करता हुआ अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है । ईश्वर प्राप्ति का साधन ज्ञान साधना-- ज्ञान की परिभाषा करते हुए विष्णुपुराण (६।५।८६-८७) मे कहा गया है । "वे ही समष्टि और व्यष्टि रूप हैं, वे ही व्यक्त और अव्यक्त हैं, वे ही सर्वसाक्षी, सर्वज्ञाता और सबके स्वामी हैं और वे ही सर्वशक्ति सम्पन्न पर- मेश्वर सज्ञक हैं। वे दोष रहित, मन रहित, विशुद्ध और एक रूप परमात्मा जिसके द्वारा देखे या जाने जाते हैं, वही ज्ञान है और इसके विपरीत प्रज्ञान है।" साधना में ज्ञान को उच्चतम स्थान प्राप्त है तभी गीता ४.३८ में कहा गया है । "इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र सचमुच और कुछ भी नहीं है।" "पापी से पापी हो, तब भी वह इस ज्ञान नौका से तर जाती है (गीता ४१३६) यह ज्ञान रूपी अग्नि शुभ-अशुभ वन्धनो को जला डालती है (गीता ४:३७) । ज्ञान से मोह का नारा होता है और साधन समस्त प्राणियो को अपने में भगवान् दीसने लगता है (गीता ४।३५) । ज्ञान से ही परमेश्वर की प्राप्ति कही गई है ( महा भारत का० ३८०1३ ) । ज्ञानी को कर्म दूपित नहीं कर सकते (छादोग्य ४।१४।३)। इसी प्राधार पर विष्णुपुराण (२।६।४८) में नान को परब्रह्म कहा गया है। इसी के माध्यम से वह ईश्वर से मिल सकता है। ग्रात्म-विकास की कसौटी साम्यभाव- यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि हर प्राणो में प्रात्मा का निवाम है । यह मारमा एकरस अविनाशी, अवघ्य है । गलना, सडना अथवा नष्ट होना उसको प्रकृति में नही है। नाश तो पंचभौतिक शरीर का होता है । अतः ज्ञानी पुरुषो का कहना है कि वाह प्राकृति से भले ही जीवधारियो में अन्तर ४७२ ] [ श्री विष्णुपुराण प्रतीत होता हो, वस्तुतः उनका कोई अन्तर नहीं है। सर्वत्र एक प्रात्मतत्व ही बिखरा हुअा है। ऐसा जानना और अनुभव करना ही ज्ञान है । जो व्यक्ति अपने को किन्ही भौतिक विशेषतानो के कारण दूसरो से बड़ा समझता है, वह इसकी अज्ञानता है । इस अज्ञानता से शक्ति क्षीण होती है क्योकि वह अपने को एक साधारण प्राणी मानने लगता है और ज्ञान से शक्ति का विकास होता है, क्योकि वह अपने को महान आत्मा अनुभव करता है । प्रह्लाद की सफलता का रहस्य समान भाव मे ही था। वह किसी को अपना शत्र व वैरी नहीं समझना था। तभी किसी भी प्रापत्ति का उस पर प्रभाव न पडा । उसने स्वय दैत्य पुत्रों को शिक्षा देते हुए कहा था। "तुम सबके प्रति समान दृष्टि रखो क्योकि सर्व समानता ही भगवान् अच्युत को परम आराधना है।" (१।१७।६० )। साधना की उच्चतम स्थिति तक पहुँचने का सरल मार्ग--भक्ति- भक्ति का अर्थ है प्रेम । नारद भक्ति सूत्र में कहा है कि परमात्मा में परम प्रेम हो भक्ति का स्वरूप है । शाण्डिल्य भक्ति सूत्र के अनुसार ईश्वर मे परम अनुराग का नाम ही भक्ति है । गर्ग मुनि का मत है कि भगवान की कथा अर्थात् नाम, रूप, गुण और लीला के कीर्तन में अनुराग का नाम ही भक्ति है । भागवत मे लिखा है "भगवान् को महिमा और गुणगान श्रवण करते ही समुद्र की ओर प्रस्थान करती हुई गंगाजी की अविच्छिन्न धारा की तरह चित्त की जब निष्काम अविच्छिन्न गति हो जाती है, उसी को भक्तियोग कहते हैं।" वास्तव में अव्यक्त ईश्वर को व्यक्त द्वारा अनुभव करने की साधन प्रणाली को ही भक्ति मार्ग कहा गया है । विष्णुपुराण में भक्त प्रह्लाद प्रार्थना करते है "जिस तरह विषय भोगों मे लिप्त लोगो में विषयो के प्रति एक-चित्त प्रीति होती है, उसी तरह भगवान् के प्रति अटूट और मविच्छिन्न प्रेम ही भक्ति का लक्षण है।" इमी भक्ति भावना को विकसित करने के लिये विष्णुपुराण (१॥१७ ८६८६) में कहा गया है "जो शान्ति, अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, मेप. वरुण, विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [४७३ सिद्ध, राक्षस, यक्ष, देत्येन्द्र, किन्नर, मनुष्यो और पशुप्रो के अपने मन से उत्पन्न दोपो से, ज्वर, नेत्ररोग, मतिसार, प्लीहा और गुल्मादि रोगो से; तथा द्रुप, ईर्ष्या, मत्सर, राग, लोभ और किसी भी अन्य भाव से नष्ट नहीं हो सकती, वह अत्यन्त निर्मल परम शान्ति भगवान् केशव मे मन लगाने से ही प्राप्त हो सकती है।" भगवान् ने गीता में भक्तो को स्वयं प्राश्वासन देते हुए कहा है- "वह भक्ति से मेरा तात्विक ज्ञान पायेगा और तात्विक ज्ञान प्राप्त हो जाने पर वह मुझमे प्रवेश पा जायेगा (१८१५५) । इससे स्पष्ट है कि भक्ति से साधना की उच्चतम स्थिति तक पहुंचना सम्भव है। शक्ति-संचय का साधन-सदगुण- सद्गुण मानव की सच्ची सम्पत्ति है । धन वैभव हो पूरा छाया की तरह क्षीण हो जाता है परन्तु सद्गुण सदैव साथ रहते हैं पोर मानव को प्रपन परम लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध होते है। दुर्गुण इस प्रगति में बाधा उपस्थित करते है, इसलिये वह मानव के सबसे बडे सत्र माने गये हैं । इसलिए विष्णुपुगए ने सद्गुणो के विकाम पर बल दिया है । गुणो के प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा गया है "जय गुण नही तो पुरण मे यल, शौर्यादि भी नहीं रहता और जिममे वन शोर्यादि नही, उसे वही भी प्रादर प्राम नहीं होता।" (१९३१) इमा प्रभिप्राय यह है कि दुगुणा शारीरिक, मानमिक और वोटिक सभी सकियो पर कुठाराघात करते पोर उन्हें नष्ट करते रहते हैं। दुर्गुणी सपिाहीन होता है पोर महगुगी मस्ति- पानी, पुराणगार की प्रेरणा है कि जिसे शक्ति संचय के पथ पर चलना हो, यह मद्गुणो को अपनाये । इसीलिए कहा गया है कि "मदगुणों में ही मनुष्य प्रशभित हो है " (१॥१३॥५७) aft काही संबंधा पूजा और सम्मान होता है और शक्तिहीन रा सिर । गुणों के पापार पर ही मनुष्य के जीवन का निमांग होता है क्योंकि "गुणों को प्रेरणा से प्राणियों की प्राप्ति गी है।" (1) ही गुग्गु ४७४ ] [ श्री विष्णुपुराण उसे चोर, डाकू या महात्मा बनाते हैं, यही महान पुरुष या दर-दर का भिखारी बनाते हैं, यही क्षुद्र या उच्च बनाते हैं, यही कलक्ति करते हैं और यही प्रशसित । अतः दुर्गुणो से सावधान रहकर सद्गुणो के विकास मे लग जाना चाहिए । कयानो के माध्यम से भी सद्गुणो की प्रशंसा की गई है। अफरजो को सद्गुणी घोषित करते हुए कहा गया है कि जब उन्होने नगर का त्याग किया तो यहाँ दुर्भिक्ष प्रौर महामारी प्रादि उपद्रव होने लगे(८।१३।१२७-१२८) जव उन्हे वापिस लाया गया तो सभी उपद्रवो की शान्ति होगई (१३०)। पोएड्रकवश मे वासुदेव नामक एक राजा हुआ था, जिसे अज्ञान से भ्रमे हुए मनुष्य वासुदेव रूप से प्रवत्तीर्ण हुमा कह कर उसकी स्तुति करते थे। इससे वह भो यह मान वैठा कि मैंने ही वासुदेव रूप से भूतल पर अवतार लिया है। इस प्रकार अपन को भूल जाने के कारण उसने भगवान् विष्णु के सभी चिह्नो को धारण कर लिया। फिर उसने भगवान श्रीकृष्ण के पास दूत के द्वारा यह सदेशा भेजा कि मरे मूढ ! तू वासुदेव नाम और चक्रादि सब चिह्नी को अभी त्याग कर दे और यदि अपना जीवन चाहता है तो मेरी शरण मे उपस्थित हो (५१३४१४-७) । भगवान कृष्ण ने स्वय उपस्थित होकर उसका गर्व मर्दन किया । पौराक ने विष्णु के बाह्य चिह्न धारण करके ही विष्णु का अवतार बनना चाहा । वेपभूपा को धारण करने से काई वैसा नही बन जाता, यह निर्माण गुणो के आधार पर ही होता है । यह गुण ही क्षुद्र से महान बनाते हैं । बाह्य आकार आकर्षक हो या न हो, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। इसलिए पुराण- कार ने नाशवान शरीर की सजावट की ओर ध्यान न देकर सद्गुणो के विकास पर बल दिया है। धर्म पालन का अभिप्राय विवेकयुक्त व्यवहार- धर्म का अर्थ केवल पूजा, पाठ और मन्दिर में जाकर भगवान की साकार मूर्ति के समक्ष सर झुकाना ही नहीं है। धर्म के बडे व्यापक अर्थ हैं। - विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४७५ प्रायः इसके प्रति गलत धारणा बनाई जाती है। हमारे शास्त्रकारो ने इसका सुन्दर स्पष्टीकरण किया है। "जो व्यवहार अपने विरुद्ध हो, उसको दूसरे के साथ मत करो । यही धर्म का तत्व है" (विष्णुधर्मोत्तर ३२५५५४४) "जिस व्यवहार से इस लोक मे आनन्द भोगते हुए परलोक मे कल्याण प्राप्त हो, वही धर्म है" (वैशेपिक) । 'न्याययुक्त कार्य धर्म और अन्याययुक्त कार्य अधर्म है, यही श्रेष्ठ पुरुषो का मत है" (महाभारत, वनपर्व २०७।६७)। "सत्य बोले और प्रिय बोले, अप्रिय सत्य न कहे, मिथ्या प्रिय न कहे, यह सनातन धर्म है"(मनु०४।१३८) । यही पाण्डित्य है, यही चतुरता है, परम धर्म है कि प्राय से अधिक खर्च न हो" (पद्म पु० सृष्टि सण्ड अ० ५०) । धर्म के तीन स्कन्ध हैं—यन, अध्ययन और दान" (छान्दोग्य) समग्र मानव जाति का-प्राणीमात्र का-जिससे हित होता हो, वही धर्म है" (तिलक) । "दया धर्म का मूल है" (तुलसी)। "सत्य बोलना, सब प्राणियो को एक जैसा समभना, इन्द्रियो को वश में रम्बना, ई िद्वेप से बचना, क्षमा, शील, लज्जा, दूसरो को कष्ट न देना, दुष्कर्मों अलग रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस, विद्या, यह १३ धर्म के लक्षण है । इनका पालन सवसे उत्तम धर्म है" (भीम)। इसी धर्म को विष्णुपुराण में अपनी स्वाभाविक शैली में अभिव्यक्त किया है । १७।२३ मे कहा है "श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुटि, मेघा, पुष्टि, क्रिया, बुद्धि, लज्वा, शान्ति, सिद्धि, कीति और वपु ये तेरह कन्याएं भार्या रूप में धर्म ने ग्रहण की।' अर्थात् यह गुण धर्म के जीवन साथी रहते हैं। प्रागे २६३१ श्लोको मे कहा गया है "इभी प्रकार मेधा ने श्रुत, क्रिया ने दण्ड, न और विनय, वुद्धि ने बोध, लज्जा न विनय, वपु ने व्यवसाय, शान्ति ने क्षेम, सिद्धि ने सुम और कीति ने यश को उत्पन्न किया । धर्म के यही सब पुत्र हैं । धर्म पुत्र काम ने रति से हर्ष को प्रकट किया। धर्म के जो पुत्र घोषित दिये गये हैं, यह धर्म पालन के सहज परिणाम हैं। यह धर्म की सुन्दर व्याख्या है।

४७६ ] । विष्णु पुराण धर्म की पोर प्रवृत्त करने के लिए कथा का भी सहारा लिया गया है। एक बार दैत्य "धर्म के पालक, वेदमार्ग पर चलने वाले तथा तपोनिष्ठ होगये" (३।१८।३६) । देवता घबराये । विष्णु के पास गये । विष्णु ने अपनी देह से माया-मोह को उत्पन्न किया जो दैत्यो के पास गया। उसने प्रनेको युक्तियो से दत्यो को वैदिक मार्ग से हटा दिया, धर्म से विमुख कर दिया (३।१८९७-११) तव देवता दैत्यो पर विजय प्राप्त करने में सफल होगये। इससे स्पष्ट है कि धर्म पालन में शक्ति, सिद्धि और सफलता है और अधर्म मे विफलता है। इस प्रकार से पुराण ने धर्म पालन की प्रेरणा दी है । ईश्वरीय शक्ति के सहवास से निर्भयता प्राप्ति- प्रह्लाद का चरित्र निर्भयता का प्रतीक है। विष्णु के प्रति उसको एक निश्चित धारणा बन चुकी थी जिसे उसके पिता नहीं चाहते थे परन्तु प्रह्लाद ने उसे अपने मन से हराने से मना कर दिया । हिरण्यकशिपु ने इसे अपनी अवज्ञा समझा पोर पुत्र को डांटा, फटकारा और घोर दएड का भय दिया परन्तु जिसको विश्व की महानतम् शक्ति का सहारा प्राप्त हो, वह सासारिक शक्तियो से क्यो भयभीत हो ? कथा के अनुसार पिता ने पुन को वह मृत्यु तुत्य दण्ड दिए जो एक सहृदयं पिता अपने पुत्र के लिए कभी कल्पना भी नही कर सकता। सर्पो से उसवाया गया (१।१६१३७) जिनका उसके भारीर पर कोई प्रभाव नहीं पडा । सों ने कहा इसके काटने से हमारी दाढ़े विदीर्ण हो गई, मणियो मे दरारें पड गई, फणो मे दर्द होने लगा (१।१७ १४०) । पर्वत की शिखर के समान विशाल देह वाले दिग्गजो ने उस बालक को पृथ्वी पर डालकर अपने दांतो से रौंदने की चेष्टा को (११७४४२) । मग्नि ने उमे भस्म करने की चेष्टा की (१।१७।४६) परन्तु प्रह्लाद न पहा 'मुझे सभी दिशाऐ ऐसी गोतल लग रही है जैसे मेरे चागे मोर कमल के पुष्प बिछ रहे हो (१.१७१४७) । रसोईयो ने उसे हलाहल विष दिया (१।१८।४) वह भगवन्नाम के प्रभाव से तेजहीन हो गया। उसे वह बिना ४७५ ] [ श्री विष्णुपुराण माधुनिक मनोज्ञ निको का कहना है कि जो कार्य से हम करते हैं, उनका सूक्ष्म चित्रण हमारे अन्तमन मे हो जाता है । इस वित्रण को प्राध्या- त्मिक भाषा मे रेखाएँ कहा जाता है । इस सिद्धान्त के प्रबल समर्थक हैं विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डा० फाइड । अन्तमन पर हुए चित्रण को ही भाग्य रेखाएँ कहा जाता है। वैज्ञानिको ने इन रेखाओं का मनन अध्ययन किया है । डा० ईवन्स इसमें अग्रणी रहे हैं। उन्होने अपने अनुसंधान के फल- स्वरूप यह निष्कर्ष निकाला कि जब मस्तिष्क के भूरे चर्बीदार पदार्थ को सूक्ष्म दर्शक यन्त्रो से देखा गया तो उसके एक-एक परमाणु पर असख्य रेखाएं अति हुई मिली । यह रेखाएं क्रियाशील प्राणियो मे अधिक बोर क्रिया शून्य प्राणियो मे कम देखी गई । विशेषज्ञो का कहना है कि यही रेखाएं उपयुक्त समय पर कर्मों का साकार रूप धारण करती रहती हैं । इसे ही कर्मफल कहते हैं । कर्मो का सूक्ष्म रेखाकन स्वचालित यन्त्र द्वारा ही अपने पाप होता रहता है । इस प्रतिक्रिया को समझने के लिए चित्रगुप्त रूपी देवता का नाम रखा गया है कि वह प्राणियो के सभी कर्मों को निरन्तर अपनी वही में लिखता रहता है और मृत्यु के पश्च त् जब प्राणी को यमराज के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो चित्रगुप्त ही उसके भले-बुरे कार्यो का लेखा-जोखा बताते हैं, उमी के अनुसार उसे फल मिलता है। यह चिनगुप्त वास्तव में हमारा अन्तमन गुप्त मन ही है जो निरन्तर हमारे कार्यों के चित्र लेता रहा है और उन्हे सुरक्षित रखता है। उपयुक्त समय आने पर उन्हें प्रकट कर देता है। विष्णु पुराण में कर्म सिद्धान्त को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। (१।१।१७) में कहा है "कोई किसी का वय नहीं करता है क्योकि सब अपने अपने कृतकों का फल भोग किया करते है।" कम की ममिट रेसायो का वर्णन करते हुए कहा गया है (१।१।१७) "पूर्व जन्म के कर्म का फल कोई नही मिटा सकता और जो तूने नहीं लिया, उसे कोई दे ना सकता।"

विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४७६ बडे विश्वास के साथ कहा गया है (१।१९।५-६) "जो मनुष्य दूसरो का बुरा नही करना चाहता, उसका अकारण ही कभी अनिष्ट नहीं होता। जो मनुष्य मन, वचन,कर्म से किसी को कष्ट देता है, उसे उस परपीडा रूप कर्म के द्वारा उत्पन्न हुमा अत्यन्त प्रशुभफल प्राप्त होता है।" कर्म सिद्धान्त पर विश्वास करने वाले जब श्रेष्ठ कर्म करते हैं तो वह अपने निश्चित उज्वल भविष्य की प्राशा रखते हैं। इसीलिए कहा गया गया है "श्रेष्ठ चित्त वाला होने से मुझे देविक, मानसिक अथवा भौतिक दु.ख कसे मिल सकता?" (१११९८) । यह सिद्धान्त निश्चित भविष्य की आशा का प्रेरक है। सफलता की कुञ्जी-पुरुषार्थ वैसे तो उत्थान के लिये पुराणकार ने भनेको मार्ग और साधनामो का मार्ग-दर्शन किया है परन्तु ध्र व चरित्र के माध्यम से जो पुरुषार्थ का वर्णन किया गया है, वह सब से श्रेष्ठ माना जायेगा क्योंकि वही सब साधनामो के मूल में है। इसी के बल पर सभी साधनाये सफन होती हैं । ध्रव को अपने अधिकारो से वचित होना पडा। वह घवराय नहीं । अपने अधिकार के लिये पात्रता प्राप्त करने का प्रयत्न किया। यह पानता प्राप्त करने के लिये उसने पुरुषार्थ का सहारा लिया । उम ने स्वयं कहा "किसी दूसरे के द्वारा दिये हुये पद की अभिलाषा नहीं करता, हो उस पद को पाना चाहता हूँ जिसे पिता जी भी नहीं प्राप्त कर सके हैं।" उन्नति की कोई सीमा नही है । इस से असीम उन्नति की आशा की जाती है। जिस तरह भ व ने पुरुषाथ से ममर पद पाया, उस तरह पुराण- कार विश्वास दिलाते हैं, कि हर कोई ऐसा कर सकता है। संघर्प का उद्देश्य अधिकार नहीं कर्तव्य हो हर युग मे हर तरह के व्यक्ति हुए हैं। कोई न्याय या अन्यायपूर्वक, स्वार्थ या लोभवश सघर्ष करके अपने अधिकार प्राप्त करते हैं और किन्ही मैं तो अपने पुरुषार्थ से - ४८० श्री विष्णु पुराण ने न्याय और वर्तव्य के लिये अपने जीवन खपा दिये, कोई अपने क्षेत्र विस्तार में लगा रहा है, कोई उनकी सुव्यवस्था मे । कस, रावण और हिरण्य- कशिपु जैसे राजा अन्याय के लिये प्रसिद्ध है और राम, कृष्ण जैसे राजा अपने न्याय के लिये । जब राम ने रावण पर विजय प्राप्त करलो तो वह सुविधापूर्वक लका के शासक बन सकते थे परन्तु उन्होंने इसे अपना अधिकार नहीं समझा, उन्होने प्रसन्नतापूर्वक इसे विभीषण को दे दिया। यही उचित पा । यही आदर्श विष्णु पुराण (पञ्चम मश के २१ वें अध्याय में कृष्ण द्वारा उपस्थित किया गया है । कस के उत्पात बहुत बढ रहे थे, वह दमन की नीति का अनुयायी था। प्रजा अत्यन्त दु.खी थी, जिसने शासन के विरुद्ध सर उठाया, उसे दबा दिया गया। कृष्ण ने भी विरोध किया। कस ने कृष्ण को मारने के भनेको प्रयत्न किये परन्तु वह सफल नही हुमा । कृष्ण की योजना सफल हुई, क्योकि कस की दमन नीति से उसके सहायक भी उसके विरोधी हो गये थे और गुप्त रूप से कृष्ण का साथ दे रहे थे। कृष्ण ने कस को मार कर सत्ता हथियाने का प्रयत्न नहीं किया । कंस अन्याय की प्रतिमा थे। उसे नष्ट करना ही उनका उद्देश्य था। वह चाहते तो स्वय शासन को बागडोर सम्भाल सकते थे परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। कस के पिता उग्रसेन को उन्होने शासक नियुक्त किया। उन्होने अधिकार के लिये नही कर्तव्य के लिए संघर्ष किया भोर तव्य की पूर्ति होने पर स्वय अलग हो गये । यही मादर्श है जिस के पालन की माज मावश्यकता है। अनधिकार चेष्टाओ से दूर रहने के कुछ और उदाहरण भी विष्णु- पुराण मे दिये गए हैं। एक बार कृष्ण और सत्यभामा इन्द्रपुरी गये । सत्य- भामा को शची के पारिजात वृक्ष के पुष्प पसन्द आये और कृष्ण को पारिजात ले जाने के लिये प्रेरित किया । जब वह वृक्ष को ले जाने लगे तो द्वारपालो ने रोका, इन्द्र व अन्य देवता भी वहां प्रागये और उस वृक्ष पर पोर सग्राम हुमा । अन्त मे इन्द्र की पराजय हुई और इन्द्र कृष्ण को पारिजात ले जाने से रोक न सके । सत्यभामा ने कहा "मुझे इस पारिजात रूप पराई सम्पत्ति - विष्णु पुराण-एक अध्ययन । [ ४८१ को ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है। (५।३०७६ ) मैं ने तो शची का गर्व मर्दन करने के लिये यह युद्ध कराया था।" राजा शान्तनु का उदाहरण प्रेरणाप्रद है। विष्णु पुराण (४।१०- १४१२१ ) मे इस प्रकार कया वणित की गई है। शान्तनु के शासन काल मे एक समय बारह साल पर्यन्त वरसात नही हुई। तब प्राने समस्त राज्य को समाप्त होता देख कर नृप शान्तनु ने विप्रो से पूछा "मेरे देश मे वर्षा का प्रभाव क्यो है ? इसमे मेरी क्या त्रुटि है । ब्राह्मण बोले-"जिस राज्य को पाप भोग रहे हैं, वह अापके ज्येष्ठ भ्राता का है, इसलिये पाप तो केवल सरक्षक मात्र हैं ।" यह सुन कर शान्तनु ने पुनः पूछा- "इस परिस्थिति में अब मुझे क्या करना अभीष्ट है ?" ब्राह्मणो ने उत्तर दिया-"प्रापके ज्येष्ठ भ्राता देवापि किसी प्रकार पतित या अनाचारी होकर राज्य मे पदच्युत होने योग्य न हो, तब तक इस राज्य के अधिकारी वही हैं। इसलिये माप इस राज्य को अपने भाई को ही सोप दें, मापका इससे कोई सम्बन्ध नहीं।" पान्तनु ने अपने अनधिकार को स्वीकार किया । पुराणकार के अनुसार ब्राह्मणो के वचन सुन कर दुखित एघ पोकाकुल राजा शान्तनु ब्राह्मणो को सग लेकर ज्येष्ठ भ्राता को राज्य सोपने वन को गये। वे सभी सरलमति विनीत व्यवहारी राजकुमार देवानि के माश्रम पर पहुचे । जहाँ ब्राह्मण उन्हे समझाते रहे मोर "ज्येष्ठ भ्राता को ही राज्य करना चाहिये।" प्रादि वेदो के अनुसार नीति एव उपदेशवणं वचन कहने लगे। लेकिन देवापि ने वेद नीति के विरुद्ध उनसे अनेक प्रगर से दूषित वचन रहे । जिन्हें मुनकर गान्तनु से उन ब्राह्मणो ने कहा-हे नृप ! चलिये, भव पपिक पाग्रह करने आवश्यकता नहीं है । मादि काल से माराध्य वेद वायरी के विरुड दूषित वचन कहने से देवापि पतित हो गये हैं। अब पाप चलें अनावृष्टि का दोप समाप्त होकर पाएके राज्य मे वर्षा प्राम्म हो गई है। नकि वा भाई इस प्रकार पतित हो चुरा है, म पारण पर पाप मरता या परिवेता मात्र नहीं हैं। फिर गान्तनु अपने राज्य को लौट पाप मोर वामन करने लगे।" ( ४१२०-२३०२४) । ।

४५२ ॥ [ श्री विष्णु पुराण शान्तनु को जब यह पता चला कि राज्य पर उसका अधिकार नहीं है तो वह उसे छोड़ने के लिये तैयार हो गये । अनाधिकार पूर्वक राज्य करने से वर्षा का अभाव हो गया था परन्तु जब बडे भाई को ब्राह्मणो ने अयोग्य पाया और शान्तनु को राज्याधिकार मिल गया तो वर्षा प्रारम्भ होगई । अनधिकार चेष्टा से देवी प्रकोप होता है और अधिकार पूर्वक कार्य करने पर देवी सहायता मिलती है। कथा का अभिप्राय यह है कि हमे अविवेक के वश मे हो कर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिये । इस सीमा रेखा के प्रति सदैव सतर्क रहना चाहिए क्योकि अनधिकार की सीमा में प्रवेश करके कलह, क्लेश, सघपं. कठिनाई और घोर विरोधो का सामना करना पडेगा जिससे मन हर समय प्रशान्त रहेगा और यह भी सम्भव नहीं कि वह अन- धिकार का प्रयत्न सफल हो जाये। श्रात्म निरीक्षण मानव अपूर्ण है । यह अपनी थपूर्णता को दूर करने के लिए पूर्ण की भोर प्रवृत्त होता है । ईश्वर पूर्ण है, दोष रहित है। उससे अनुकूलता प्राप्त करने के लिए अपने दोषो का परिमार्जन करना पडेगा। विवेक की जाग्रति विना यह सम्भव न होगा । कौन-सा कार्य करने योग्य है और कौन-सा न करने योग्य, ग्रहण और त्याग योग्य कर्मों का निरीक्षण करना होगा। उचित और अनुचित को परखना होगा और उचित को स्वीकार करना होगा। अपने गरेवान में झाक कर देखना होगा कि मुझ मे कौन-कौन से दोप हैं जिन्हें दूर करना आवश्यक है, जिन से प्रात्म विकास में बाधा उपस्थित हो रही है । चार पुरुषार्थों पर विचार करना चाहिए । अन्तिम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति के लिए धर्म, अर्थ और काम को सन्तुलित रखना मावश्यक है ताकि सुविधापूर्वक आगे वढा जा सके। विष्णु पुराण ( ३१११---५७) में इन तीनो पुरुपार्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देते हुए कहा गया है "गतिमान पुरुष को स्वस्थ चित्त से ब्रह्म मुहत्तं मे उठ कर अपने धर्म तथा धर्म कार्य में बाधक विषयों पर विचार करना चाहिये और उस कार्य का विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४८३ भी विचार करे जिससे धर्म और अर्थ की हानि न हो। इस प्रकार दृष्टादृष्ट अनिष्ट की शान्ति के लिये धर्म, अर्थ और काम इन तीनो के प्रति समभावी हो। धर्म के विरुद्ध जो अर्थ और काम हैं, उनका त्याग करे और ऐसे धर्म को छोड़ दे जो आगे चल कर दुःखमय हो जाय अथवा समाज के विरुद्ध हो।" इस प्रकार का प्रात्मनिरीक्षण ही एक ऐसा उपाय है जिसमे दोपो को अनुभव करके उनका परिमार्जन किया जा सकता है। सुखी दाम्पत्य जीवन का आधार-प्रेममय व्यवहार- महपि सौभरि ने राजा मान्धाता की ५० कन्याओ के साथ विवाह किया । यह विस्तृत चरित्र चतुर्थ अश के दूसरे अध्याय मे वर्णित है । एक बार मान्याता यह जानने के लिये महपि के माधम मे मए फि उनकी कन्याएं किस परिस्थिति में रह रही हैं। राजा सभी कन्यानो से मिले । सभी हर प्रकार से सुखी थी, किसी तरह का उन्हे प्रभाव न था परन्नु हर कन्या ने अपने इस दुख का वर्णन किया कि "हमारे पति यह महर्षि मेरे भवन से कभी निकलते ही नही, मुझ पर ही अत्यधिक स्नेह रहने के कारण यह हर समय मेरे ही पास रहते हैं, मेरी भन्य वहिनो के पास कभी नहीं जाते" (४१२६१०६-५) । सभी पत्नियों यह अनुभव करती हैं कि उनके पति उनसे सर्वाधिक प्रेम करते हैं। यही दाम्पत्य जीवन को सफलता का चिह्न है। महपि भले ही योग वल से सभी पलियो के साथ एक ही समय में रह पाते हों परन्तु वास्तविकता यह है कि वह अपनी पत्नियो को सन्तुष्ट करने में सफल रहे । गृहस्थ जीवन उसी फा सफल माना जाना चाहिये जिम की पली यह अनुभव फरे कि यहाँ तक उसकी जानकारी है, अन्य पतियो की अपेक्षा उसके पति उससे अधिक प्रेम फरते हैं । यह सन्तोप ही गृहस्य जीवन के सुखी होने की नीव है । यही उत्तम कसौटी है। गृहस्थ योग है- गृहस्थ को बन्धन नहीं, योग को समा दी गई। मानियो के लिये तो यह बन्धन ही है क्योकि इसमे संदो तरह के झंभट पग-पग पर उपस्थित ४८४ ] [ श्री विष्णु पुगण होते रहते हैं, परन्तु विवेको पुरुष इस संघर्षमय जीवन को ही अपने उत्थान. का माध्यम मानते हैं। इसमें जो दुःख पाते वह विकास के भविष्य को प्राशा लेकर आते हैं। गृहस्य मे क्रियाशीलता, चेतना और जागरूकता बनी रहती है, जो पात्मिक साधना के लिए अत्यन्त आवश्यक है। गृहस्थ किसी पर निर्भर नहीं रहता, अन्य आश्रमों का यह पाश्रय स्थल है, यह किसी को सहायता नहीं चाहता, यह मोरों की सहायता करता है। इसलिए इस माधम मे आत्मविकास की काफी सम्भावना निहित है । तभी विष्णुपुराण (३३शक्ष ११) में गृहस्थ के कर्तव्यो का वर्णन करते हुए इसे सर्वश्रेष्ठ माश्रम कहा गया है" पितरों की पिण्डदानादि से, देवतामों की यज्ञादि के भनुष्ठान से, पतिथियो को अन्न-दान से, ऋषियो को स्वाध्याय से, प्रजापति की पुत्रोत्पादन से, भूतो को बलि से और सम्पूर्ण विश्व की वात्सल्य भाव से सन्तुष्टि करे। अपने इन कर्मों के द्वारा वह पुरुष श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लोक को प्राप्त कर लेता है। भिक्षावृत्ति पर निर्भर रहने वाले परिवाजको मोर ब्रह्मचारियो प्रादि का प्राश्य भी यह गृहस्थाश्रम ही है, इसीलिये इसे सर्वश्रेष्ठ कहा गया है ।" गृहस्थ को प्रेरणा देते हुए कहा गया है (३.१२.१-७) कि "वह प्रति- दिन देवता, गौ, ब्राह्मण, मिद्धगण, गुरुजन और पाचार्य का पूजन करे तथा दोनों समय सन्ध्योपासन और मग्निहोम करे। सयम पूर्वक रहे । foसी के किचित मात्र धन का भी अपहरण न करे, अप्रिय भाषण न करे, परनारी में प्रीति न करे, दुष्टो के साथ कभी मित्रता न करें"। माज इन पादर्शों और कर्तव्यो पर ध्यान नहीं दिया जाता, इसलिए इस परम पवित्र गृहस्य माधम का बोझ अनुभव किया जाता है। गुरुजनों का सम्मान-एक सामान्य शिष्टाचार- 'अद्वयतारक' उपनिषद् के भनुसार गुरु ही परब्रह्म है, गुरु ही परम गति है. गुरु ही परम विद्या है, गुरु ही परापण योग्य है, गुरु हो पराकाष्ठा है, गुरु ही परम धन है । वह उपदेष्टा होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है । यही भारतीय संस्कृति की धारणा है। प्राचीनकाल में गुरु निःस्वार्थी, निर्लोभी, विष्णुपुराण-एक अध्ययन । [ ४८५ तपस्वी होते थे मोर निरन्तर अपने शिष्यो के उत्थान के लिए प्रयलशील रहत थे, तभी तो महर्षि ऋभु मपने पुराने शिष्य निदाय के निवास स्थान पर मदत और पात्मबुद्धि को शिक्षा देने जाते हैं (विष्य पुराण २।१६।१८ ) पौर निदाघ उनकी सेवा करते हैं, पाजा का पालन करते हैं मोर गुरु क मादश को अनुसार साधना मे लग जाते हैं। प्राचीन व्यवस्था म गुरु को काफी सम्मान दिया जाता था। बालक को गुरु गृह में रहकर गुरु सेवा का आदेश दिया गया है (३।६।१.२)। गुरु के प्रति शिष्टाचार का पालन करते हुए (३।६।२.६) में कहा गया है. गुरुश्य का अभिवादन करे। जब गुरुजी सढे हो, तव सडा हो जाय, जन चले तब पीछे- पोछे चले मोर जर बैठे तब नीचे वैरा जाय । इस प्रकार करते हुए कभी भी गुरु के विरुद्ध कोई माचरण नहीं करना चाहिये। गुरुजी यह तभी उनक सामने बैठकर वेद का अध्ययन करे मोर जव उनकी पाना हो तब भिक्षा प्राप्त मन का भोजन करे। जव प्राचार्य जस में स्नान र लें तव स्नान करे पौर नित्य प्रति उनके लिये समिधा, जल, दुश, पुप्पादि लाकर एकत्र करे। इस प्रकार अपने वेदाध्ययन को पूर्ण करपे मतिमान शिष्य गुरुत्री की माला प्राप्त करके उन्ह गुरु दक्षिणा दे मोर फिर गृहस्पायन में प्रविष्ट हा।" गुरुजनो की भाशा र पालन स सिदियों को प्राप्ति का यरान मनाम पाया है। गुरु अन्धकार व अधिवेक को ना परत ई मत प्टिापू ना सम्मान करना चाहिए। पित सेवा-युग का परम धर्म- ४६६ ] [ धी विष्णु पुराण पूर्वक वर्तता है, वह जीता हुमा भी मृतक के समान है और मरने पर नरक को जाता है" अध्यात्म रामायण (९३१)। पिता की प्रसन्नता के लिए भीष्म प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है । श्रवणकुमार की सेवा को कौन भुला सकता है ? इसीलिए पिता की प्राज्ञा का पालन करने के लिए विष्णु पुराण ने भी कहा है, "पिता सर्वत्र प्रशसनीय है, वही गुरुप्रो के परम गुरु हैं, इसीलिए उन्हीं की स्तुति करनी चाहिये" (१३१८.१३)। पुराणकार ने भगवान कृष्ण के मुख से कहल- पाया है "माता-पिता की सेवा किए बिना व्यतीत हुमा प्रायु भाग असाधुत्व को प्राप्त कराता हुआ व्यर्थ हो चला जाता है" (श२११३) । राजा ययाति शुक्राचार्य के शाप से असमय में ही वृद्ध हो गये । फिर यह छूट मिली कि वह अपने किसी पुत्र का योवन लेकर अपनी वृद्धावस्था उसे दे सकते हैं और यौवन के भोगो को भोग सकते है। ययाति पुत्र पुरु ने अपना यौवन रिता को पपित करते हुए कहा, "यह तो पापका मुझ पर परम अनु ग्रह है। इस प्रकार कहकर पुरु ने उनकी वृद्धावस्था लेकर अपनी युवावस्था उन्हे दे दो" (४।१०।१६-१७) । पितृ सेवा का यह भी एक अनोखा उदाहरण है-अपना यौवन पिता को अपित करना । यही मीख पुराणकार देना चाहते हैं कि पिता की सेवा हमारा परम धर्म होना चाहिए । समय का सदुपयोग- समय को एक मूल्यवान् सम्पत्ति माना जाता है। जो इसका सदुपयोग करता है, सफलता उसके पैर चूमती है, दुरुपयोग करने वाले को रोते-झीकते और भाग्य को कोसते ही देखा गया है। क्षीण परिस्थितियो मे पले व्यक्तियों ने उसकी सिद्धि से महान सफलताएं प्राप्त की हैं और उत्तम अवसर प्राप्त व्यक्तियो का जीवन उसके मभिशाप से नष्ट हो गया। माता-पिता अपने बच्चो को वही शिक्षा देते हैं जो माया रूपी सुनीति ने ध्रुव को अपने साधना-पथ से विचलित होने के लिए दी थी कि "क्योकि अभी तो तेरी मायु खेलने-कूदने की ही है, फिर मध्ययन करने योग्य होगी, उसके बाद भोगों को भोगने का समय होगा भोर मन्त मे तप करने की अवस्था विष्णु पुराए-एक अध्ययन ] [ ४८७ प्रप्त होगी। हे पुन ! तुझ सुकुमार को जो बाल्य वस्था है, उस खेलने की अवस्था मे तू तपस्या का अभिलापो हुप्रा है, अरे, तू क्यो इससे अपना सर्वनाश करने को तत्पर है ? मुझे प्रसन्न करना ही तेरा परम धर्म है, इसलिये तू अपनी आयु के अनुकूल ही कों को कर, मोह का अनुवतन कर मौर इस तपस्या रूपी अधर्म से अव विमुख होजा" (१।१२।१८-२०) । तभी तो पुराणकार ने प्रेरणा दी है, "मूर्ख मनुष्य बाल्यावस्था मे खेलते-कूदते, यौवनावस्था में विषयो में फैमे रहते और वृद्धावस्था मे असमयं हो जाते हैं। इसलिए विवेकी मनुष्य को वाल, युवा या वृद्धावस्था का विचार न करके, वाल्यावस्था से ही अपने कल्याण में लग जाना चाहिये" (१९१७ ७५१७६) । बाल्यावस्था मोर यौवन में इन्द्रियाँ ससक्त होती हैं। वह कठोर से कठोर साधना करने में समर्थ होती हैं । वृद्ध होने पर तो वह शिथिल हो जाती हैं, फिर उनसे कुछ भी नहीं बन पाता । इसलिए यह अवस्था पहुंचने से पूर्व ही समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी गई है। राजा सवाग ने भी पायु से पूर्व एक मुहू के समय का पच्छा उप. योग किया। उसने देवासुर संग्राम मे देवताओं की सहायता की थी। इसलिए देवतामो ने उससे वर मांगने को कहा (४।४७५-७६ ।। उम ममय उसको एक मुहर्त को प्रायु रह गई थी । राधा एक मराध गति पारे यान पठार मृत्यु लोक में पहुंचा मोर बोला, "यदि मैंने कभी अपने धर्म से नही छोडा, यदि सब देवता, मनुष्य, पशु पक्षी प्रोर वृक्षादि मे भगवान के पारित कुछ मौर नही देखा तो मुझे निर्वाध रूप से भगवान श्री विष्ण की प्राप्ति हो" (४१४१८०)। यह कहकर राट्वांग अपना चित्त परमात्मा में नगार तीनो गये। तभी पिमा करते हैं कि 'सट्याग चंगा कोई भी गराधी पर नहीं होना है जिसने केवल एक मुहूनं जीरन के मेष रहते हुए सगं से पृमी पर मार अपनी बुद्धि से सोनो मोरो को पार किया पोर भगवान को प्रार लिया" (VII-१-८२) पगार को प्रेरणा है। हमें एक सा भी नए बिना पाने ४८८ [ श्री विष्णुपुराण लक्ष्य की मोर निर्बाध गति से चलते जाना चाहिए और समय जैसी मूल्यवाद सम्पत्ति को नष्ट न करके उसका सदुपयोग करना चाहिये । साधना का भूपण--क्षमा- विष्णु पुराण ( १११०२०) मे क्षमा को साधुना का भूपए कहा गया है। यह निर्वलता का चिन्ह नही, शक्ति का द्योतक है। अपराधी को दण्ड देना तो साधरण नियम है। आधुनिक मनोविज्ञान ने भी लम्बे समय के अनु- भव के बाद निश्चित किया है कि अपराध वृत्ति को दण्ड के भय से सुधारा जाना सभव नहीं है, उसके लिये अन्य उपाय अपनाने चाहिए। अपराधी को दण्ड दिला कर मन को कुछ सतोष अवश्य हो जाता है परन्तु उससे किसी का भी भला नहीं होता। अपराधी को अपराध वृत्ति उत्तेजित होती है और दण्ड दिलाने वाले के मन मे शत्रुता के भाव दृढ होते हैं । पुराणकार प्रह्लाद की कथा के माध्यम से अपनी नीति का स्पष्टीकरण करते हैं। प्रह्लाद के पिता ने उसे अनेको प्रकार के मृ यु दण्ड दिये जिनसे वह बच निकपा । विष्णु भगवान के जब उसे दर्शन हुए और उन्होने वर मांगने के लिये कहा तो प्रल द ने साधुना का परिचय देते हुए कहा-"मेरे देह पर शस्त्राघात करने, मग्नि मे जलाने, सपो से कटवाने, भोजन मे दिय देने, पाशबद्ध कर समुद्र में डालने, शिलामो से दबाने तथा अन्यान्य दुर्व्यवहार मेरे साप करने के कारण जो पाप मेरे पिता को लगे हैं, उन पापो से वह शीघ्र छूट जायें" ( १।२०।२२-२४ )। यह है सच्ची क्षमा । पिता ने पुत्र को अपना विरोधी समझकर उसे यमपुर पहुंचाने के सभी सम्भव प्रयल किये तो पुत्र भी वैसा कोई वर मांग सकता था जिसरो अपना बदला लिया जा सके परन्तु उसने मज्ञानी जान कर क्षमा कर दिया । यह महानता का लक्षण है। स्पष्टवादिता--साहसी जीवन का परिचायक गुण-- मन मोर व्यवहार मे मन्तर होना एक अवगुण है । ऐसे व्यक्ति पर कोई भी विश्वास नहीं करता। इससे पन्ततः हानि ही होती है। जो मन में है, वह क्रिया मे होना एक विशेषता है, ऐसा व्यक्ति दुमरो का विश्वासपात्र विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४८६ बनता है और उसे हर तरह का सहयोग मिलता है। विष्णु पुराण ऐसी स्पष्ट- वादिता का समर्थक है। एक बार देवतामों और दैत्यो मे युद्ध होने को था। दोनों ब्रह्मा के पास अपना भविष्य पूछने गये । ब्रह्मा ने उन्हें कहा कि जिस पक्ष के साथ राजा रजि शस्त्र धारणपूर्वक युद्ध करेगा, वही पक्ष जीतेगा ( ४१६।४-५)। दैत्य उसके पास गये। रजि ने यह शतं रसो कि यदि विजयी होने पर मैं दैत्यो का इन्द्र वन सकू तो मैं तुम्हारी पोर से युद्ध करने को तैयार हूँ। इस पर दैत्यो ने स्पष्ट रूप से कहा जो कह देते हैं, उससे विपरीत पाचरण कभी नही करते । हमारे इन्द्र प्रह्लाद हैं पोर उन्ही के लिये हम इस संग्राम में तत्पर हुए हैं " ( ४६८ ) । दैत्य हार गये परन्तु उन्होने कपट नहीं किया, स्पष्ट रूप से रजि को वास्तविकता से परिचय कराया। प्रभावशाली व्यक्तियों का चित्रण विष्णु पुराण में प्रभावशाली व्यक्तियो को उभारने का प्रयल किया गया है । शिक्षामो मोर प्रेरणामो का व्यक्ति के मस्तिष्क पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि गण्यमान्य व्यक्तियो की सघी घटनामो से । इसीलिये पुराणकारी ने जीवन उत्थान के सूत्रो की कयामो के माध्यम से पा को शैली प्रपनाई । मपने उद्देश्य को पूर्ति के लिये उन्हें दो प्रकार के व्यक्तियों में लाना पड़ा-एक पच्छे पौर दूसरे बुरे । मच्छ के गुणो को ग्रहण किया जा सके मोर बुरे को बुराइयों के प्रति सजग रहा जाय। पहली श्रेणी मे बनेको महान मोर मादशं मारमाों को लिया गया है। जनक (४१५।१२) नाद कर्मयोगी के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं। राजा होकर भी यह सभी भोगों में लिप्त रहते हैं । क्षत्रिय होकर ब्राह्मणी पोर सन्यासियो तक को शिक्षा देते हैं। हर व्यक्ति पुरुषार्थ के बल पर महान्तम पद प्राप्त कर सकता है। ध्रुव ने बाल्यकाल मे भगवस्त्राप्ति को साधना पारम्भ की। यह पात्र. कल के भौतिकवादियों को चेतावनी है, जो अपने बमों को स्पून को पुस्तको ४६० ] [ विष्णु पुराण के अतिरिक्त और कुछ पढने की प्राज्ञा और प्रेरणा नहीं देते । ध्र व को अपने अधिकारो से वचित किया गया । वह किसी के पास रोया नहीं,गिडगिड़ाया नहीं। पुरुषार्थ के बल पर उसने अपना अधिकार प्राप्त किया। विश्व की हर शक्ति पुरुषार्थ के सामने घुटने टेक देती है। जो व्यक्ति परिस्थितियो का रोना रोकर भाग्य और ईश्वर को कोसा करते हैं, उन्हे ध्रव के चरित्र से शिक्षा लेनी चाहिए कि वह अपनी बुरी से बुरी परिस्थितियो को पुरुषार्थ से सुधार सकते हैं। प्रह्लाद निर्भयता के प्रतीक हैं। जो साधक शरीर-भाव से ऊंचा उठ कर प्रात्म-भाव में स्थित हो जाता है, उसे ससार को महानतम शक्तियो से भी भय नहीं लगता,क्योकि वह समझता है कि उसका यह पचतत्वो का शरीर तो माज नही कल नष्ट हो ही जायगा। इसके नष्ट होने पर भी मेरा नाश सम्भव नही है, मैं तो अविनाशी तत्व हूँ। यह छोप जिसके मन पर स्थायी रूप से पड जाती है, वह विष, मग्नि से क्यो मरेगा ? पर्वतो से गिरने और समुद्र मे डूबने से उसका क्या होगा? वह तो सदैव एक जैसी स्थिति में रहेगा। जीयन की सफलता इसी मे है न कि भौतिक ऐश्वर्यों के सचय मे। “सगर का जाम सपोवन मे हुआ था। उनका राज्य छिन गया था। जब वह बड़ा हुमा तो अपने सभी शत्रुमों को परास्त करके सात द्वीपो वाली सम्पूर्ण पृथ्वी पर राज्य किया " ( ४१४१४६ )। अपने छीने हुए अधिकारों को पराक्रम से वापिस लिया जा सकता है। भागोरप भी पुरुषार्थ के प्रतीक ही है वो गगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल हुए और पृथ्वो को स्वर्ग बना दिया । स्वर्ग से अवतरित होने की कथा को बुद्धि न भी मानें तो यह तो स्वीकार करना ही होगा कि उसने बांध बनवाकर गगाजल को एक निश्चित दिशा में प्रवाहित करने की योजना बनाई और सफल हुए। कृष्ण बलराम ने तो मिलकर कम, जरासुध जैसी मजेय शक्तियो को पराजित किया मोर धेनुमासुर, प्रलम्बासुर जैसे अनिष्टकारी तत्वो का विश्वम विष्णुपुराण-एक प्रध्ययन ] [ ४६१ किया। यह उच्चकोटि की परमार्ग साधना है। इसे अपनी सामथ्र्य के अनुसार हर कोई अपना सकता है । वसुदेव देवकी अपने धुन के पक्के थे। वह जानते थे कि उनके हर शिशु का वध कर दिया जायगा। साधारण बुद्धि तो यह निर्णय करती कि अपने बचो को प्रांखो के सामने मरते देखने को प्रपेक्षा यही उचित था कि उन्हे उत्पन्न ही न किया जाय परन्तु उनका निश्चय था कि उनकी सतान कस का अन्त करेगी। वह पपने हृदय को कटना देखते रहे परन्तु दृढ निश्चय और सकल्प एक दिन सफल होता ही है। वह कृष्ण को बनाने में सफल हुए जिसने कस को यमपुरी पहुंचाकर देश मे शान्ति पोर व्यवस्था की स्थापना की । नन्द का बलिदान भी कम महत्व का नहीं है । उसने दूसरे के शिशु को बचाने के लिये अपनी कन्या को वलिवेदी पर चढा दिया । उस त्याग का ही यह फल हुमा कि कस जैसी महान शक्ति को तोड-फोउ दिया गया । त्याग से बडे-बडे कार्य होते देखे गये हैं। विरोधी व्यक्तित्व भी कम प्रभावशाली नहीं हैं । रावण (४१५) ने लका को स्वर्णमय बना दिया था। वह महान् पडित पौर भौतिक विज्ञानी था, वह स्वगं तक सोढी बनाने के प्रयत्न में था परन्तु सीताजी पासक्त होने से वह कलावित हो गया। विद्वान और ऐश्वर्यशाली होना ही पर्याप्त नहीं है, चरित्रवान् होना महानता की प्रथम कसोटो है। वह सब तरह से प्रभावशाली या परन्तु एक प्रवगुण, दुश्चरित्र ने धुन का काम किंग। कस का विस्तृत चरित्र विष्णु पुराण में उपलब्ध है ( पचम प्रश, प्रध्याय १६-२१) । उसको निर्दयता का विशिष्ट उदाहरण है। जनता पर भन्याय और जुल्म दाना तो प्राचीन राजामों के लिये एक साधारण बात रही है पर•तु अपनी बहिन की सतानो का बप कही नहीं सुना गया। जो कहीं न मुना गया, न देखा गया, वह कस ने किया । जो राजा प्रपने सगे सम्बन्धियों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार र सस्ता है, उससे रल्पना की जा सकती है कि जनता के लिये वह पिटना जातिम होगा। कर के चरित्र के साष्ट है कि न्याय प्रति ४६२ ] [ श्री विष्णु पुराण और निर्दयता से शक्ति का ह्रास होता है । इतने शक्तिशाली सम्राट् को एक बालक कृष्ण न परास्त कर दिया । न्यार का पक्ष लेने वाली छोटो शक्तियां भन्यामो की शक्तियों पर सहज ही विजय प्राप्त कर सकती हैं। जरासध' के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है । यह कस का समुर था। जब कृष्ण ने कस का वध किया तो वह मसख्य सेना लेकर मथुरा पर चढाई करने आ गया। यादवो की थोडी-सी सेना ने उसकी विशाल सेना को एक नही मठारह यार परास्त किया। अन्याय और अत्याचार उसका भी एक अवगुण था । उसने दूसरे राजामो की हजारो कन्यायें मपने यहाँ कंद कर ली थी। अन्याय शक्ति को विध्वस करने वाला है। वेन ने राजपद पर अभिषिक्त होते ही यह घोषित कर दिया था कि- "मैं भगरान हूँ, यश पुरुष और यज्ञ का भोक्ता भौर स्वामी मैं ही हूँ। इसलिये पब कोई पुरुप दान और यज्ञादि न करे " (१) १३ (१३-१४)। राज्य के लिये इस अहितकर मनोभावना को देखकर महपियो ने पहिले से ही मृत उस राजा का मन्त्रपूत कुशो के प्राघात से धध कर दिया ( १११३१२६) । महकार शक्तिशाली को भी शक्तिशून्य कर देता है । ऋषियों ने उसके दाये हाथ को मला मोर पृथु की उत्पत्ति की, उसे ही राज्य शासन सौंपा । महडार का सदैव सर नीचा होता है। हिरण्यकशिपु को घोषणा भी वेन से मिलती-जुलती है। उसने भी प्रलाद से कहा था, "मेरे अतिरिक्त मौर कौन परमेश्वर हो सकता है ?" (१।१०।२३)। राज्य और शक्ति के प्रहार ने उसे मन्या कर दिया था। वह अपने को विश्व की समस्त शक्तियों का सिरमौर मानता था। उसका बध स्वय भगवान् ने नृसिंह अवतार लेकर किया। यह निश्चित है कि विश्व के सभी ऐश्वर्य मोर भौतिक शक्तियां प्राप्त होने पर भी जिसके मन मे प्रहार घुसा हुमा है, उसका मन्त बुरा ही होता है, उसे दुदिन देखने ही पड़ते हैं। कृष्ण के नेतृत्व में यादवो ने प्रशयनीय विकास किया परन्तु जब विलासिता और मद्यपान आदि की कुप्रवृत्तियां उनमे पनपने लगीं पोर च नीच के भेद-भावो न जन्म लिया (५५३७४२) । तब उनमे मापसी सपर्प होने विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] । ४६३ लगे पौर कृष्णा स्वप उन्हे ध्वस्त करने की सोचने लगे। इन कुरीतियो और कुप्रवृत्तियो ने मनोमालिन्य का रूप लिया, फिर सघर्ष, युद्ध और समाप्ति । भवगुण व्यक्ति के ऊँचे व्यक्तित्व को भी नष्ट कर देते हैं । वैदिक युग मे इन्द्र का एक सर्वोच, सम्मानित पद था। इन्द्र से सम्ब- न्धित लगभग साढ़े तीन हजार मन्त्र वेदो में प्राते हैं। इतने मन्त्र मौर किसी देवता को समर्पित नहीं हुए हैं। परन्तु विष्णु पुगए। मे उसे सत्ता लोलुप, द्वेपी कामी और ईर्ष्यालु दिवाया गया है । (१.२२१३२.३८) के अनुसार कश्यप पत्ती दिति के गर्भ के इन्द्र ने सात खरड कर दिये। पवम प्रश के दपर्वे अध्याय मे कृष्णा ने इन्द्र यज्ञ की उपेक्षा की भोर गोवर्धन की पूजा की, (५।१०।४४)। पवम अश के तीसरे प्रध्याय में कृष्ण ने इन्द्र को पारिजात वृक्ष ले जाने पर नीचा दिखाया । नरकासुर वध के लिये इन्द्र कृष्ण से प्रार्थना करते हैं (५।२न।१०-१२) । इन्द्र को तपस्वियो का तप भ्रष्ट करते हुए दिखाया गया है और वह भी सुन्दर स्त्रियाँ भेजकर उन्हे काम-बाल में फंसा कर (१४१५२१११३) । कण्व ऋषि का तप एक अप्सरा के सहयोग से भ्रष्ट किया गया । महानतम व्यक्तित्वो के भी गिरने की सम्भावना रहती है। प्रतः सदैव जागरूक रहना ही बुद्धिमानी है। प्रात्म निरीक्षण द्वारा अपने दोपों पर कडी दृष्टि रखनी चाहिए और उन्हे पनपने के अवसर न देने चाहिये क्योंकि जीवन के अन्तिम क्षणो मे भी पतन की अवस्था मा सकती है। कस अन्याय का प्रतीक था। यह नष्ट हुमा । अन्याय को जो भी सहयोग देगा वह नष्ट होगा, यह निश्चित है । पूतना ने कस की प्राज्ञा से कृष्ण का बध करना चाहा परन्तु उसका वही पनि हुमा जो अन्याय के पक्षपातियो का होता है। महिल्या गौतम ऋपि की पत्नी थी, इन्द्र ने गौतम का वेप बदल कर अहिल्या से सम्भोग किया। वह शापवश पत्यर को हो गई। उसने अपना दोष स्वीकार किया, अपनी गलती पर वह पछताई । गौतम ने उसे स्वीकार कर लिया । मौर धारण करने वाली पहिल्या ने राम के समक्ष अपना दोष [ विष्णु पुराण माना होगा। इसीलिए कहा गया कि वह उनके दर्शन करने से पाप मुक्त हो गई (४१४१६१)। इसी तरह चन्द्रमा ने बृहस्पति की पत्नी तारा से सम्भोग किया, उसके गर्भ रह गया । इस पर दानयो और दैत्यो में युद्ध हुआ। ब्रह्माजी बीच मे पडे और तारा को बृहस्पति को दिलवा दिया। वृहस्पति ने उम गभ को निकाल फैकने के लिए कहा। मादेश का पालन किया गया। तेजस्वी व लक उत्पन्न हुमा। जब यह पूछा गया कि यह किसका बालक है तो तारा ने इसे चन्द्रमा का स्वीकार किया (४१६३२) । दोप बहुत बड़ा है पर तु स्वीकार किया गया वृहस्पति ने उसे अपनाया । इन दो उदाहरणो से दोपी स्त्रियों के प्रति प्रपन ई जाने वाली नीति स्पष्ट हो जाती है । दोप सवसे होते हैं और जब वह दोप को स्वीकार कर लेते हैं तो दोप को समाप्त हुआ माना जाता है। इन दो प्रकार के विरोधी व्यक्तित्वों से अपने जीरन का मार्ग चुनने मे सहायता मिलती है। साम्प्रादयिक एकता-अनेकता का प्रतिपादन विष्णु-पुगण विष्ण-प्रधान पुराण है । यह स्वाभाविक ही है कि इसमे अन्य देवतामो की अपेक्षा विष्णु को महान् सिद्ध किया जाए, जिस से शिव सम्बन्धी पुराणो मे शिव को प्रधान और अन्यो को गौण माना गया है । वैष्णव धर्म उदार धर्म है। इसमे ऊँच-नीच का कोई भेद भाव नहीं है, जो भी इधर झुका उसे गले लगाया गया, चाहे वह कोई भी हो, यह भागवत और विष्ण पुराण आदि विष्णू-प्रधान-पुराणो से स्पष्ट है । फिर भी पुराणकार को श्रद्धा अपने इष्टदेव की पोर विशेष होती है और वह त्रिदेव को एक मानते हुये भी अनेक स्थानो पर दोनो मे विवाद करा कर उस पुराण से सम्बन्धित देव को प्रधान और दुसरो को गौण बना ही देता है। उदाहरण के लिए कृष्ण और शकर युद्ध का वर्णन है जिसमें शङ्कर, कृष्ण से पराजित होते हुए दिखाए गये हैं। (११३३-२११२६ ) तरह विष्णुपुराण-एक अध्यपन ] [ ४६५ एक और स्थान पर शङ्कर को कृष्ण से नीचा दिखाया गया है। पचम अंश के ३४ अध्याय मे वर्णन है कि पोएड्रक के वसुदेव राजा ने विष्णु का वेश बना कर सारे चिन्ह धारण पिये और कृष्ण को चुनौती दी। कृष्ण ने उसे स्वीकार किया । वसुदेव पराजित हुए । कृष्ण ने उसके सहायक काशी नरेश का भी सर काट दिया। काशी नरेश के पुत्र ने शङ्कर को प्रसन्न करके कृत्या उत्पन्न को जो अपनी किराल जालानो के साथ द्वारका मे माई । कृष्ण ने चक्र छोडा तो वह भागी। शहर की प्रदान की हुई कृत्या. कृष्ण के चक्र के सामने न रुक सकी ( ५॥३४-२८।४३ )। ग्र ह्या वो भी गौण मानने के कई उदाहरण इस पुराण में हैं। जव देवासुर संग्राम मे देवता पराजित हुए तो ब्रह्मा ने उनकी समस्या का स्वय समाधान न करक भगवान विष्णु की शरण में जाने के लिये प्रेरित किया। ( १।६-३४) ब्रह्मा देवताओ का लेकर भगवान विष्प के पास पहुंचे। ब्रह्मा से विष्णु की ऐसी प्रार्थना कराई गई है जैसे मातं स्वर से कोई भक्त अपने इष्टदेव के प्रति करता है ( १६-४०१५० ) । इसरा उद्देश्य ब्रह्मा की होनता मोर विष्णु की महानता का प्रतिपादन करना है। इसी तरह से ध्रुव प्राम्यान ( १।१२।१६ ) मे ध्र व भगवान विष्ण, को स्तुति करते हुए कहत हैं-' हे देव । ब्रह्मा मादि वेदो क माना भी जिनको गनि का ज्ञान नहीं रखते, उनका सवन में प्रवोय वालक कैन कर सकता हूं।" उपरोक्त उदाहरणो से स्पष्ट है कि विष्णु को शिव मौर ब्रह्मा से यडा सिद्ध किया गया है । वमे पुराणकार ने तीनों को एक सशक्ति, एक शक्ति के विभिन्न रूप भी माना है पोर तीनो के साम्प रो स्थापना को है, जिसमे उनको निष्पक्षता पोर उदारता का परिचय मिलता है। विष्णु पुराण ( ११३-६१६६ ) में कहा है। "एक मात्र भगवान् जनार्दन ही नृष्टि, स्पिति और प्रलय में ब्रह्मा, पि, पोर शिव के नामो को ग्रहण करते हैं ।" १।४।१६ में पृथ्वी ने भगवान की स्तुति करते हुए कहा है।

[ श्री विष्णुपुराण "हे प्रभो । मृष्टि प्रादि के लिए मार ही ब्रह्मा विश. रुद्र, का स्वरूप धारण करते हो, तुम ही सर्व भूतों के कर्ता हो, तुम ही रचने वाले और तुम ही विनाश करने वाले हो।" ( १।६।२३ ) मे विष्णु और शिव की एकता स्थापित करते हुए कहा गया है ' यदि विष्णु शिव हैं ता लक्ष्क्षी पावती हैं।" 'ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप मे जिन मभूनपूर्व देव की शक्तियां हैं, वही भगवान श्री हरि का परम पर है।" (११६४५६), "देवताओ ने कहा- हे नाथ । आपको नमस्कार है । माप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अग्नि, पवन, वरुण, सूर्य, यमगन होते हुए भी निर्विशेष हैं।" ( 118-६८१६४) । प्रलाद मे भावान की नुति करते हुए कहा "ब्रह्मा रूप से विश्व के मुटा, विग रूप से पालक पोर रुद्र रूप से सहारक त्रिमूमिधारी भगवान को नमस्कार है।" ( १.१९६६ ) । विष्णु की तीनो शक्तियो का समन्वय रूप घोषित करते हुये कहा गया है । "जिस जीव द्वारा जो कुछ भी उत्पत्ति होती है, उस सब में भगवान विष्णु का हेतु ही एकमात्र कारण है । इसी प्रकार स्थावर जगम प्राणियो में से यदि कोई किसी का मन्त करता है, तो वह अन्त करने वाला भी भगवान का पन्त करने वाला रोद्र रूप होता है । इस प्रकार से वह भगवान ही समस्त विश्व के सृजन, पालन मोर सहारकर्ता हैं, तथा वह स्वयं ही जगबू प हैं।" (१२२२-३८१४०)। "ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीनो ब्रह्म की प्रधान शक्तियां हैं।" ( १।२२।५८)। भगवान के विभिन्न रूपो का वर्णन करते हुए कहा गया है-"मापका जो स्वरूप कल्प के अन्त म सभी भूतो का मनिवार्य रूप से भक्षण कर लेता है, उस काल रूप को नमस्कार है । प्रलयकाल देवादि सब प्राणियो को सामान्य रूप से भक्षण करके नृत्य करने वाले प्रापके रुद्र रूप को नमस्कार है।" ( ३१७-२५२६)।

४१८ ] [ श्री विष्णुपुराण रचना का विस्तृत वर्णन है । वैसे तो सारा विष्णु पुराण ही ईश्वर की सत्ता और महत्ता की पुष्टि करता है परन्तु सैद्धान्तिक पक्ष का प्रतिपादन श।१०,१५,२१, १३१२१५७,६७,७४, १४१४४२६, १११७.१५,२४, ६।४।३७. ३८, मे विशेष रूप से किया गया है । १६१३ मे मन की शुद्धि को परमात्म प्राति का साधन बताया गया है । भगवान् उसी पर प्रसन्न होते हैं जो किमी की निन्दा और मिथ्या भाषण नहीं करता और खेदजनक वचन नहीं कहता (३।८।१३) । ईर्ष्यालु, निन्दक, सन्तो का तिरस्कार करने वाला और दान न देने वाला भगवान को प्राप्त नही कर सकता (२१७।२६) १।२।१६, ५०-५३, और ६१४१३४ मे प्रकृति का चित्राकन किया गया है । ११२।२५, ११७।४२,४३, ३।३।१, ६।४।१५-१६, ५॥११ मे विभिन्न प्रकार के प्रलयो का वर्णन है । इससे यह प्रतिपादित किया गया है कि प्रलय हो स्वभाविक रूप से आती है और पाती रहेगी । उत्तम साधक को सदैव अपने सामने प्रलय के दशन करते रहने चाहिए और निर्भय रूप से विचरना चाहिए । जो प्रलय से निर्भय हो गया, वह ससार की किसी भी विपत्ति नही घबडा सकता। तृतीय अश के १८ वें अध्याय में एक कथा द्वारा भारतीय मनोविज्ञान को सुन्दर रूप से उभारा गया है जिससे निराश से निराश व्यक्तियों में भी पाशा को उमगें उछलने लगती हैं । २।१२।६६ में वेदान्त विज्ञान का सार दिया गया है। १११२१७, ११११।१७-१८, १६५८ मे कर्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है और यह साहस पूर्वक कहा गया है कि जो मनुष्य दूसरो का युग नहीं करना चाहता, उसको अकारण भी कभी कष्ट नही होता। इसी सिद्धान्त से व्यक्ति भविष्य निर्माण की प्रेरणा प्राप्त करता है । वह केवल अपने कर्मों को सुधार कर किसी से भयभीत नहीं होता। वह अपने भाग्य को स्वय बनाता है।

विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] राजा खाण्डिक्य के सामने जब राज्य और परलोक दोनो मे से चुनने का अवसर प्राता है तो वह राज्य की उपेक्षा करके परलोक को ही पसन्द फरते हैं । इस कथा मे पृथ्वी के भौतिक सुखो और ऐश्वर्यों की अपेक्षा पर- लोक को अधिक महत्व दिया 1 (६।६।२६-३१)। ४१२४११४७ मे काल की शक्ति का उल्लेख है। भस्वर, महत और रघुवशियो का ऐश्वर्य भी व्यथ ही हुमा क्योकि काल के कटाक्ष मात्र से वह ऐसा मिट गया कि उसकी भस्म भी शेप न रही । किसी की यहाँ स्थायी रूप से रक्षा सम्भव नहीं है। कर्मों के अनुसार भोग भोग कर सभी को समयानुसार जाना है । तो फिर जव काल की तलवार घूमती है तो रोना, पीटना और दुखी होना कैसा? यह अज्ञानता और निश्चित तथ्यो पर प्रविश्वास का व्यक्त करना है । ज्ञानी वही है जो प्रसन्नतापूर्वक काल का गति को देखता है। ६७।२८ मे मन को बन्धन और मोक्ष का कारण बताया गया है और प्रेरणा दी गई है कि मन को विषयो से हटाकर मोक्ष मार्ग की ओर लगाना चाहिए । इस साधना मे दक्ष व्यक्ति ही जीवन की सफलता प्राप्त करता है। श६।३-८ मे ब्रह्मा से चारो घणों की उत्पति का वर्णन है। ३।। २०-३३ मे चारो वर्णों के धर्मों का विवेचन है। १।४।२२ मे विष्णु को यज्ञ रूप कहा गया है । यज्ञ के उद्देश्य का सटीकरण करते हुए कहा गया है "देव गण यन से सन्तुष्ट होकर समस्त प्रजा का कल्य रण करते हैं। इससे यज्ञ कल्याण का मूल है (११६७-८) । यज्ञ से मनुष्य स्वगं प्रपवर्ग प्राप्त करते हैं और मभिलाषित स्थित को पा सकते हैं (१६१०) । यज्ञ प्रत्येक व्यक्ति द्वारा पित्य frया जाने योग्य अनुष्ठान है । मनुष्यो का उपकार करने वाला है पौर नित्य होने वाले पर सूना पापो को दूर करने वाला है ' (१६२८) यह सम्पूर्ण विश्व हवि से हो उसन हुपा है "(१।१३१२५) ।" प्राचीन बहि ने 2 द्वारा पनो प्रया ४६८ ] [ श्री विष्णुपुराण रचना का विस्तृत वर्णन है । वैसे तो सारा विष्णु पुराण ही ईश्वर की सत्ता और महत्ता की पुष्टि करता है परन्तु सैद्धान्तिक पक्ष का प्रतिपादन ११२।१०,१५,२१, ११२१५७,६७,७४, १११४१२६, १।१७।१५,२४, ६।४।३७. ३८, मे विशेष रूप से किया गया है। ११६६१३ में मन की शुद्धि को परमात्म प्राप्ति का साधन बताया गया है । भगवान् उसी पर प्रसन्न होते हैं जो किमी की निन्दा और मिथ्या भाषण नहीं करता और खेदजनक वचन नहीं कहता (३।८।१३) । ईर्ष्यालु, निन्दक, सन्तो का तिरस्कार करने वाला और दान न देने वाला भगवान को प्राप्त मही कर सकता (२७२६) १.२।१६, ५०-५३, पौर ६।४।३४ प्रकृति का चित्राकन किया गया है । १।२।२५, ११७१४२,४३, ३।३।१, ६।४।१५-१६, ५२१ मे विभिन्न प्रकार के प्रलयो का वर्णन है । इससे यह प्रतिपादित किया गया है कि प्रलय हो स्वभाविक रूप से प्राती है और पाती रहेगो । उत्तम साधक को सदैव अपने सामने प्रलय के दशन करते रहने चाहिए और निर्भय रूप से विचरना चाहिए । जो प्रलय से निर्भय हो गया, वह ससार की किसी भी विपत्ति से नहीं घबडा सकता। तृतीय अश के १८ वे अध्याय मे एक कथा द्वारा भारतीय मनोविज्ञान को सुन्दर रूप से उभारा गया है जिससे निराश से निराश व्यक्तियों में भी आशा की उमगे उछलने लगती हैं । २११२१६६ मे वेदान्त विज्ञान का सार दिया गया है। १।१।१७, १११११७-१८, १११६५८ मे कर्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है और यह साहस पूर्वक कहा गया है कि जो मनुष्य दूमरो का बुरा नहीं करना चाहता, उसको अकारण भी कभी कष्ट नहीं होता । इसी सिद्धान्त से व्यक्ति भविष्य निर्माण की प्रेरणा प्राप्त करता है। वह केवल अपने कर्मों को सुधार कर किसी से भयभीत नहीं होता। वह अपने भाग्य को स्वय बनाता है।

मनुष्ठान है। मनुष्यो का उपकार करने वाला है और नित्य होने वाले र सकते हैं (१६१०)। यज्ञ प्रत्येक व्यक्ति द्वारा नित्य किया जाने योग्य विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] [ ४६६ राजा खाण्डिक्य के सामने जब राज्य और परलोक दोनो मे से चुनने का अवसर प्राता है तो वह राज्य की उपेक्षा करके परलोक को ही पसन्द करते हैं । इस कथा मे पृथ्वी के भौतिक सुखो मोर ऐश्वर्यों की अपेक्षा पर- लोक को अधिक महत्व दिया है । (६।६।२६.३१) । ४।२४।१४७ मे काल की शक्ति का उल्लेख है। भस्वर, महत और रघुवशियों का ऐश्वयं भी व्यर्थ ही हुमा क्योकि काल के कटाक्ष मात्र से वह ऐसा मिट गया कि उसकी भस्म भी शेष न रही । किसी को यहाँ स्थायी रूप से रक्षा सम्भव नही है । कर्मों के अनुसार भोग भोग कर सभी को समयानुसार जाना है । तो फिर जब काल की तलवार घूमती है तो रोना, पीटना और दुखी होना कसा? यह मज्ञानता और निश्चित तथ्यो पर प्रविश्वास का व्यक्त करना है । ज्ञानी वही है जो प्रसन्नतापूर्वक काल की गति को देखता है। ६७।२८ मे मन को बन्धन और मोक्ष का कारण बताया गया है और प्रेरणा दी गई है कि मन को विपयो से हटाकर मोक्ष मार्ग की ओर लगाना चाहिए । इस साधना मे दक्ष व्यक्ति ही जीवन की सफलता प्राप्त करता है। १६।३-८ मे ब्रह्मा से चारो पर्णो की उत्पति का वर्णन है । ३।। २०-३३ मे चारो वर्णों के धर्मों का विवेचन है। १।४।२२ मे विष्णु को यज्ञ रूप कहा गया है । यज्ञ के उद्देश्य का सीकरण करते हुए कहा गया है "देव गण यज्ञ से सन्तुष्ट होकर समस्त प्रजा का कल्य ण करते हैं । इससे यज्ञ कल्याण का मूल है '(१९६७-८) । पौर मभिलापित स्थित को पा यश से मनुष्य स्वर्ग मपवगं प्राप्त करते सूना पापी को करने वाला है ' (१६२८) यह सम्पूर्ण उन हुमा है “(१।१३।२५) ।" प्राचीन वहि ने .. सोग ५०० ] [ विष्णु पुराण को अत्यन्त वृद्धि को "(१३१४॥३)।" राजामो ने यझेश्वर भगवान का महा- यज्ञों द्वारा यजन करके इहलोक और परलोक दोनों को सिद्ध कर लिया (राह|१२०) । इस तरह यज्ञ जैसी महान साधना यो मोर प्रेरित किया गया है। गाय के प्रति भगवान कृष्ण का विशेप प्राकर्षण दिसाया गया है। (५।६।१८।१२)। इन्द्र यज्ञ की उपेक्षा करके गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ की गई है (५।१०।४४) । इस का विद्वान यह अर्थ लगाते हैं कि यह गोवर को घन मानने की ओर सकेत है। पुराणो में प्रतीकात्मक शैलो का खुलेरूप मे प्रयोग किया जाता है । भगवान विष्णु का स्वरूप स्वयं इनसे गुथा हुमा है। उनकी चार भुजाएँ चार दिशामो, यज्ञ कुण्ड, चार देवता, पारो वेद, विकास की चार भवस्थानों, चार आधारभूत मानसिक, प्रक्रियामो, चार प्राश्रमो, चार वरगो, चारों भोर से सुरक्षा, चार दैवी गुणो, जीवन के चतुर्मुखी उद्देश्य भौर अन्तःकरण की वृत्तियो को परिष्कृत करने की पोर सकेत है। उनकी पाठ भुजाएं स्वास्थ्य, विद्या, धन, व्यवसाय, संगठन, यश शौर्य और सत्य के विकास की ओर इ गित करती हैं। जीवन को परिष्कृत करने वाले सस्कारों का भी विष्णुपुराण में वर्णन है । (३११३५१) ने जन्म के समय का विधान दिया गया है और जातकर्म सस्कार करने को कहा गया है । (३।१०।८-१०) मे नामकरण का विधान और नाम- करण के सम्बन्ध में उपयोगी मनोवैज्ञानिक जानकारी दी गई है कि नाम किस प्रकार के होने चाहिए । उपनयन व विद्याध्ययन की भी प्रेरणा दी गई है। (३।१०।१२) फिर गृहस्थ मे प्रवेश की प्राज्ञा दी गई है (१३)। विवाह और कन्या के चुनाव के सम्बन्ध मे निर्देश दिये गए हैं (१७-२१)। सन्यास की भी चर्चा है (१४)। ३।१३।८-१३ मे दाहसस्कार का विधान दिया गया है। इस तरह से अत्यन्त उपयोगी विषयो का चयन इस पुराण में किया गया है।

विष्णु पुराण-एक अध्ययन ] विष्णुपुराण उच्चकोटि का सुधारात्मक व प्रेरणात्मक ग्रंथ है अाजकल भी कोई सुधारात्मक ग्रन्थ लिखा जाए तो सर्व प्रथम वर्त. मान पतित समाज और कुशासन का निरीक्षण होगा और तत्पश्चात् सुधार के लिए सुझाव दिए जायेंगे । राष्ट्र विकास के चहुंमुखी सुझाव ही उपयोगी माने जायेंगे बजाए एकागो विकास के । विष्णु पुराण ने सर्वांगीण उन्नति के लिए ही भूमिका तैयार की है। उन्होने स्वभाविक रूप से पहले सामाजिक दुर्दशा, राजनीतिक परिस्थितियां, मोर नीतियो को प्रस्तुत दिया है । वह भली प्रकार जानते थे कि भारतीय संस्कृति का गौरव महान है परन्तु फिर भी साहस के साथ ऐसे-ऐसे उदाहरणो का उल्लेख किया है जिनको सरे विश्व में पुनरावृत्ति सम्भव नही हो सकी। ऐसे हृदय विदारक दृश्य उपस्थित किए हैं कि पाठक को अन्याय के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है । उस समय की राजनीतिक व्यवस्था अहवारी, निरकुश, मन्यायी राजाभी के कारण हुई जो स्वय को ही भगवान् समभते थे। वेन भोर हिरण्यरशिपु के नाम इस कोटि मे माते हैं । कस ने सत्ता की स्थिरता के लिए फरता का सहारा लिया । हिरण्यकशिपु ने विरोध को देवाने लिये शक्ति का दुरुपयोग किया । छोटी-छोटी बातो पर हत्यायें की जाती थी। मांस मदिरा का सेवन पौर जुए को कुत्रवृत्ति का प्रचलन था। नरमास भक्षी ये भी उदाहरण दिए गए हैं। बलराम तक मदिरा पा सेवन करते थे। व्यभिचार के परिणाम स्वरूप प्रबंध सन्तान भी होती थी। एडु जैसे ऋषि भी कामासक्त होते दिखाए गए हैं। वृष्ण पर भरलीलता पा मारोप सगाया गया है। राजा एक से पधिक परनी रसते थे । जनता में भी यह प्रवृत्ति हो गयी। मधिक पत्नियो से मधिर संतान होना स्वाभाविक है। परि सन्तान के जवित पालन पोषण में प्राचन पड़ती है । मनेगी प्रसार को उनभने उलप्त हो जाती है। माधवं विधाही का भी प्रपनन पा। स्वप्न में गे मुह से [ श्री विष्णु पुराण साथ भी विवाह होने की विलक्षण घटनायें है अनमेल विवाहो की भी सूचना मिलती है । सपिण्ड विवाह भी खुले रूप में होते थे। ऊंच-नीच का भेदभाव भी माना जाता था, व्यवहारिक शिष्टता का अभाव था, बहो का उपहास किया जाता था। कन्यामो के अपहरण की भी क्थायें दी गई हैं । जनता का नैतिक चरित्र गिरा दुना था और शासन मे अन्याय प्रत्यापार का बोल.' वाला था। मावश्यकता पाविष्कार की जननी है । जब अन्याय अपनी सीमानो का उल्लघन करने लगता है तो न्याय को स्थापना के लिए महान आत्माएँ अवतरित होती हैं, प्रकृति इस सतुलन को बनाये रखना चाहती है । जब राजा वेन से जनता परेशान थी तो राष्ट्रीय नेतामो ने मिलकर वेन को हटा दिया । पृथु ने कृषि, शासन और अन्य मावश्यक सुधार किए। जब हिरण्यकशिपु के जुल्म बढ़े तो नृसिंह द्वारा उसका वध हुआ। कस का कृष्ण द्वारा वध कराया गया। अन्याय शक्ति का घुन है । भन्यायो का भवन रेत की दीवार पर खडा बताया जाता है । यह विष्णुपुराण से भी स्पष्ट है कि क्योकि शक्तिशाली सम्राटो का विरोध छोटी शक्तियो ने किया और उन्हे सफलता मिली। पुराणकार केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता को ही पर्याप्त नहीं मानते हैं । वह सुख-शान्ति का जीवन व्यतीत करने के लिए नैतिक व माध्यात्मिक विकास भी भावश्यक समझते हैं। इसलिये सावधानी पौर सुरक्षा की भी सामग्री प्रस्तुत की गई है । उनका विचार है कि सद्गुणो के विकास के लिए अवगुणों पर पहले ध्यान देना होगा। प्रत वह काम, क्रोध, लोभ, महद्वार, तृष्णा मोह, धन के अपव्यय, अविवेक, अशिष्टता, भोग-विलास, व्यभिचार, पशुबलि ध वैवाहिक कुरीतियो की ओर ध्यान माकर्षित कराते हैं और चेतावनी देते है कि यदि उनसे बचा न गया तो व्यक्तिगत व सामाजिक उत्थान प्रशक्त हो जायेगा। पुराणकार ने क्रमिक विकास का नियम अपनाया है। उन्होने माचार की पूरी योजना प्रस्तुत की है । वह प्रात्मसाधना से पूर्व नागरिकता की परीक्ष वपणु पुराण-एक अध्ययन ] । ५०३ उत्तीणं होना मावश्यक मानते हैं । इसलिये प्रात: व साय के अलग-अलग अपनान योग्य प्राचार दिये हैं, लोकाचार व सदाचार की उपयोगी शिक्षाएं से हैं। जीवन निर्माण के लगभग सभी मूत्रों का सकलन कर लिया गया है । रहस्य में प्रवेश करके दाम्पत्य जीवन को सुपी बनाने के लिए मूत्र दिये गए हैं, गृहस्य को योग मानकर उनको साधना को प्रेरणा दी गई है, माता-पिता की सेवा, प्रतिथि पूजन, गुरुजनो का सम्मान, शिष्टाचार व सदगुणों के विकारा पर बल दिया गया है । पुरुषायं, स्तंभ्यनिष्ठा से उत्थान को सम्भावनाएं प्रद- शित की गई है । समय के मदुपयोग, सहनशीलता, धमाचौमना निर्भयता, उद्योग मोर क्रियाशीलता के सिमान्ती का प्रतिपादन किया गया है। पमं की वास्तविरता पर प्रराश डाला गया है और भक्ति ज्ञान, पैराण, निष्काम फर्मयोग और साम्पयोग द्वारा ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिसामा गम है । सरंप पारम-निरीक्षण द्वारा विवेक की स्पिरता, दोपो, दुग़लो पर पंनी रधि रयन पो रहा है। बन्धन पोर मोक्ष के शरणों पर भी विचार किया है और मौत लिए मन यो मुरिको पावश्यक माना गया है। पृषो मस्त ऐभाको मक्षा परलोक मुधार को माना गा है। , उपोग, IT, शापं पोर पतंम्प निशा म उन्नति के उम्साम पर पर पवन रामाधामन या मा है। यह मिसाए कियारमक पगमारमाRitual :रा पतिको गरिन सिप प्रभार पाहै।

५०४ ] [ श्री वि गुपुराण उपयोगी भोजनादि के नियम से लेकर अद्वैत तक की साधनायो का वर्णन है । पार-बार दोपों के परिमार्जन की चेतावनी और नैतिक विकास पर बल दिया गया है । पुराण का पाठ करते हुए पाठक के अपने दोप प्रोर दुर्गण उभर कर सामने प्रा जाते हैं और कथामो के माध्यम यह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है कि इनके यह दुष्परिणाम होगे । इमरो भय को उत्पत्ति मौर विवेक की जाग्रति होती है। इस मिश्रित प्रतिक्रिया से वह सुधार के पावश्यक पग उठाता है, अपनी आत्मा स्वय उसे बार-बार धिक्कारती है और उसे अपने दुष्कर्मों पर ग्लानि होती है। आत्मग्लानि से घुटन उत्पन्न होती है । यह घुटन ही सुधार का मार्ग प्रशस्त करती है। उपरोक्त तथ्यो से विदित होगा कि विष्णुपुराण का लेखन एक विशेष उद्देश्य से किया गया है और वह है राष्ट्र का नैतिक व प्राध्यात्मिक सुधार । इसलिये इसे यदि उच्चकोटि का सुधारात्मक व प्रेरणात्मक ग्रथ कहा जाये तो अतिशयोक्ति न होगी। on

Vishnu Puran (khand-ii)

Author
Sharma,pt.shriram
Title
Vishnu Puran (khand-ii)
File name
Vishnu Puran (khand-ii)
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2012/08
Publisher
Barely.,uttar Pradesh.,sanskriti Sansthan Vednagar
Language
Sanskrit
Pages
495
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313006
Barcode
99999990321737.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
LCS1WcgdHlI
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