Bhartiya Jnanpith Delhi
Sri Anekant Vyavastha Prakaranam
Front matter
No text on this page.
Cornxxco Xcxcxc S काशकसभाग्रन्थांक: ४ाई ॥ ॐ श्री अर्ह नमः॥ सर्वतंत्रस्वतंत्र-शासनसम्राट्-सूरिचक्रचक्रवर्ति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रभावशालि-तीर्थराजश्रीकदम्बगिरि- प्रभृतिप्रभूततीर्थोद्धारक-शासनप्रभावक-भट्टारकाचार्यमहाराधिराजश्रीविजयनेमिसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमो नमः सं.१० . ११३६ ॥ श्रीअनेकान्तव्यवस्थाप्रकरणम् ॥ OOOOOOOG000000 न्यायविशारद-न्यायाचार्य-निजप्रतिभाप्राग्भारोबोधितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवत्-कूर्चालसरस्वती-पूर्वधरनिकटकालवर्ति- चतुश्चत्वारिंशदुत्तरचतुर्दशशतग्रन्थप्रासादसूत्रधारभगवत्-श्रीहरिभद्रसूरिपुङ्गवलघुवान्धवप्रभृतिविशदविरुदावली- विभूषित-महामहोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीतं श्रीजैनतत्यपराभिधानम् ।। तश्चेदं राजनगर( अहम्मदावाद )स्थ श्रीजैनग्रन्थप्रकाशकसमायाः कार्यवाहकश्रेष्ठि-ईश्वरदासमूलचन्द्रेण भावनगरस्थे प्रसिद्ध महोदयमुद्रणालये तदधिपतिश्रेष्ठि-गुलाबचंद्र लल्लुभाइद्वारा मुद्रयित्वा प्रकाशितम् ।। वीर निर्वाण सं० २४६९ ] - वैशाख शुक्ल ३ अक्षय्यतृतीया [ विक्रम सं० १९९९ CA मूल्यम् रूप्यकचतुष्टयम्
प्रकाशित
ग्रंथा:।।
...
"
...
...
...४-०
...
...
...
...
...
॥श्री जैनग्रन्थप्रकाशकसमाप्रकाशितग्रन्थाः ॥
१ हारिभद्राष्टकवृत्ति ३३१ संवाद जैनन्याय मुक्तावली समु० मेगा १-४ २८ पारमर्षस्वाध्यायग्रन्थसं.(पत्राकारे)०-८
पाठयुक्तवृत्ति ड्रोइंगपेपर...२-८ १० नवतत्त्व विस्तरार्थ
२९ सम्मतितर्कप्रकरणसटीक प्र०मा०५-०
ग्लेझपेपर...२-० ११ दंडक विस्तरार्थ
३० योगदृष्यादिनवग्रन्थपद्यानुक्रम ....-६
२ संबोध प्रकरण
१२ हैमधातुमाला
३१-३२-३३-३४ भाषारहस्य प्रकरण सटीक,
३ हरिभद्रसूरिप्रन्थसंग्रह...
१३ जैनतत्त्वपरीक्षा
योगर्विशिका व्याख्या,तत्वविवेकविवर-
४ हारिभद्राष्टक प्रकरण (मूल)...०-४ १४ स्तोत्रभानु
...०-२ जसमेतकूपरष्टान्तविशदीकरणप्रकरण,
५ स्याद्वादरहस्य पत्र सटीक ....०-१२/ २४-२५ योगदृष्टियोगबिन्दु सटीक २-८ निशाभक्के स्वरूपतो दूषितत्त्ववि.प्र.२-०
६ न्यायालोक सटीक...
२६ १२५-२५०-३५०ना स्तवनो,योगदृष्टि ३५ ज्ञानार्णवप्रकरण मूल
७ अष्टसहनी तात्पर्यविवरण ...१०-० सज्झाय,द्रव्यगुणपर्यायरास-संय ३६थी४६ श्रीयशोविजयवाचकग्रन्यसंग्रह
८समुद्धाततस्व...
मश्रेणिविचार-सज्झायादिसंग्रह ०-८ पातंजलयोगदर्शनविवरणादि११ग्रंथो२-०
९ जैनन्यायमुक्तावली सटीक ...१-० २७ पारमर्षस्वाध्याय ग्रन्थसंग्रह(बुक)०-६ ४७ सविवरणधर्मपरीक्षा टिप्पणयुता ४-०
॥ मुद्रयमाणा मुद्रयिष्यमाणाश्च शासनप्रभावका ग्रन्थाः॥
१ ज्ञानार्णवः सटीका, ज्ञाननिन्दुश्च २ वादमाला ३ उत्पादादिसिद्धिप्रकरणवृत्तिः ४ सम्मतितर्कसटीक द्वितीय भागः
५ प्रतिमाशतकबृहट्टीकाप्रभृतयः प्राप्तिस्थानं-शेठ ईश्वरदास मूलचंद, कीका भनी पोल-अमदावाद.
॥१॥
॥ औँ हाँ श्री अहैं सकललब्धिनिधानाय श्रीगौतमस्वामिने नमो नमः ॥ ॥ श्रीअनेकान्तव्यवस्थाप्रकरणे प्रकाशकीयं निवेदनम् ॥ ए तो सुनिश्चित छे के आ पवित्र भारतवर्षमा आर्यावर्तना विद्वद्वन्दविभूषित भूभागमा हाल पण अनेकविध साहित्यग्रन्थो उप- लभ्यमान छे, परन्तु ते सर्वमां शिरोमणिभावने पामेलं, बुद्धितत्त्वने खीलवनार, प्रज्ञाना नवनवोन्मेषने वधारनार, वस्तुना यथार्थ भावने- उपनिषद्विचारने-ऐदम्पर्यसारभूततत्त्वने-रहस्यस्वरूपने समजावनार, चौद अथवा अढार विद्यास्थानोमां 'आन्वीक्षिकी विद्या' ए नामथी अग्रणी स्थाने शोभनार, अतीन्द्रिय पदार्थोना अस्तित्वने प्रकाशमां लावनार, निष्पक्ष बुद्धिमानोने सत्य वस्तुग्रहणमा परम साधन नो कोई पण साहित्य होय तो ते तर्कशास्त्र ज छे, जेनुं बीजं नाम युक्तिवादशास्त्र पण कही शकाय. आ युक्तिवादमां हेत्वाभास-जाति- निग्रहस्थान विगेरे पैकी कोई पण बाधक दोष लागु न पडतो होय ते खास तपासवानुं रहे छे. तर्कशास्त्रोमां नैयायिक-वैशेषिक- सांख्य-वेदान्त-मीमांसक-बौद्धादिना अनेक दर्शनकारोए नानास्वरूपे अन्थो गुंथ्या छे. परन्तु ते सर्व वस्तुना यथार्थ तत्त्वने बाध करनार एकान्त पक्षना ग्राहक होई परस्पर ध्वंसक कंटको ज न होय तेम एक बीजामां कोईमां कोई अने कोईमां कोइ एम जुदा जुदा बाधक दोषोनो सद्भाव अवश्य रह्यो छे, ते ज कारण माटे छेवटे “ तर्काप्रतिष्ठानात् " " पुराणं मानवो धर्मः" इत्यादि वाक्यो लखवा पन्या छे. पक्षपातरूपे नहि परन्तु श्री हरिभद्रवरिपुङ्गव-आदि महापुरुषोनी जेम युक्तिसिद्ध परीक्षित सत्य स्वरूपनो प्राथ- बुद्धिथी विचार करवामां आवे तो पदार्थमा रहेला परस्पर विरुद्ध धर्मोनो अपेक्षामेदे समन्वय करावनार सर्वनयसमूहमय त्रिकाला- बाध्य जैन तर्कग्रन्थो ज छे तेम कहे ते अतिशयोक्ति भर्यु नथी तेम सौजन्यवंत दरेक सहृदय पुरुषने जणाया विना रहेशे नहि.
भी
बनेकान्त-
प्रकाशकीय
निवेदनम्॥
प्रकरणे
॥ २॥
ते जैन तर्कप्रन्थो पैकी आ एक 'अनेकान्तव्यवस्था' ग्रन्थ पण छे जेने पूज्य महर्षि ग्रन्थकार पोतेज 'जैन तर्कप्रन्थ ' ए उपनामथी
ओळखावे छे. अलभ्य नहि तो पण दुर्लभ्य तो खरो ज, तेवो आ ग्रन्थ सप्तनय-सप्तभङ्गी विगेरे जैनशासनना उपनिषद्-टोच भूत
द्रव्यानुयोगना सूक्ष्म विचारोने विस्तारथी स्पष्टीकरण करवापूर्वक जिज्ञासु भव्यजीवोना निर्मल बुद्धि आदर्शमां प्रतिबिम्बित करवा परम
तेजःपुञ्जरूप छे. ए तो सुविदित छे के आ महान् प्रभावक अन्थनी रचना करनार विश्ववंद्य, विश्वविख्यात, सर्वानुयोगव्यापि-सर्व-
दर्शनानुवेधि, कुशाग्र प्रज्ञा पीयूषपाथोधि, निजप्रतिभाप्राग्भारथी अतीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवंतोनुं स्मरण करावनार, दाढी-मुछ धारण
करती साक्षात्सरस्वती, कूर्चालवेलनी जेम जटिलरूपे ओतप्रोत थयेल सरस्वतीस्वरूप 'कूर्चालसरस्वती' बिरूदविभूषित, पूर्वधरभगवंतोनी
विद्यमानताना निकटकालवर्ति विच्छिद्यमान पूर्वमहार्णवना निस्यन्दरूप १४४४ ग्रन्थप्रणेता सुगृहीतनामधेय भगवंत 'श्रीहरिभद्रसरि-
पुङ्गवना लघुबन्धु' तरीके प्रख्याति पामेला, भारतभूमिभास्कर, सरस्वतीना घररूप काशीमां वादिपरिषद्ने जीतवाथी पंडितमंडळीए
समर्पित न्यायविशारद-पदविभूषित अने त्यार पछी सो ग्रन्थो बनाववाथी न्यायाचार्य पदने धरनार, श्री भगवतीपंचमांगप्रभृति-
योगोद्वहनथी प्राप्त थयेल गणिपद-पण्डितपदना क्रमथी महामहोपाध्याय नामान्तरे वाचक पदथी सुशोभित श्रीमान् यशो-
विजयजी गणिमहाराज छे. आ समर्थ मन्थनी रचना करी तेमणे समग्र विश्व उपर अविस्मरणीय असीम उपकार कर्यो छे. जो के
उपाध्यायजी भगवान् पोते पोतानी कृतिनो कोई कोई स्थळे ग्रन्थना आदिभागमां अने बहुलताए अन्तिम भागमां स्वगुरुपरम्परानो
परिचय आपी साक्षात्कार करावे छे, छतां जेम बहुलताए ग्रन्थावसानमां 'विरह ' ए पद श्रीहरिभद्रसरिभगवंतकृतग्रन्थोनुं सूचक
छे तेम बहुलताए श्री उपाध्यायजी भगवंतना अन्थोना प्रारंभमां सरस्वतीनुं बीजक 'ऍकार' पद सूचकचिहरूपे होय छे. कवित्व
॥ २॥
अने वित्त्वनी अभिलाषा पूरवामां कल्पवृक्षतुल्य सरस्वती, बीजक ऍकारपद छे के जेनो अखंड प्रेमपूर्वक श्रेष्ठ जाप पोते गंगातटे को हतो, तेम तेओश्रीना वचनो ज साक्षी पूरे छे. जुओ तेमना रचेला न्यायखंडनखंडखाद्य अपरनाम महावीरस्तवप्रकरणनो आद्य श्लोक- "ऍकारजापवरमाप्य कवित्ववित्व-वाञ्छासुरद्वमुपगङ्गमभरङ्गम् ।। सूक्तैर्विकासिकुसुमैस्तव वीरशम्मो-रम्भोजयोश्चरणयोर्वित- नोमि पूजाम् ॥१॥" कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरप्रणीत परिशिष्टपर्ववर्णित श्री जंबूचरित्रनो गूर्जर भाषामां जाणे पद्यात्मक छायानुवाद ज न होय तेम रचेला जंबूस्वामिरासनी मंगळ गाथाओमां पण ते ज भाव जणाव्यो छे. “ शारदमात दया करी, आपो वचन तरंग ॥ तुं तुठी मुझ उपरे, जाप करत उपगंग ।। १॥ तर्क काव्यनो तें तदा, दीधो वर अभिराम ॥ भाषा पण करी कल्पतरु, शाखा सम परिणाम ॥२॥" ते जापना अविस्मरणार्थे ज जाणे होय नहि तेम सूचकचिह ऍकारपद तेमणे पोताना अनेक ग्रन्थनी शरूआतमां मूक्युं छे. आ ग्रन्थमां पण ते ऎकारपद शरूआतमां देखाय छे. आ ग्रन्थना प्रतिपृष्ठे विषयसूचिका करेली होवाथी अलग पृष्ठक्रमे विस्तृत विषयानुक्रमणिका बताववा आवश्यकता नथी छतां संक्षेपे अन्थान्तर्गत विषयदर्शन बताव्यु छे. वस्तुतत्त्वनुं यथार्थ निष्टंकन अनेकान्तवाद मान्या सिवाय थई शकतुं नथी, जेम हरणीयाओने व्याप्रमुख सुंघर्बु अशक्य छे तेम नयलेशरूप परदर्शनना अनुयायीओने अनन्त- नयपूर्ण अतिगंमीर अनेकान्तवादगर्भित श्रीजैनदर्शननो स्वल्प गंध लेवो पण शक्य नथी. शुं सूर्यप्रभा उपर खजुआ विगेरे प्रकाशकोनो च्हाय तेटलो प्रभासमूह मेगो थाय तो पण धसारो करी शके खरो ?, जो के प्रतिपृष्ठे बनता सुधी ते ते पृष्ठमां आवतो विषय तेना उपान्त्य भागमां आपवा बनतो प्रयत्न कर्यो छे जेथी वांचनारने सुगम पडे छतां संक्षिप्त विषयविभाग नीचे प्रमाणे छे. आ अनेकान्तव्यवस्था ग्रन्थमा प्रथम अनेकान्तनुं व्यापक लक्षण बांधी, लक्षणान्तर्गत पदोनो विचार संक्षेपमा करी, तदन्तर्गत
भी
बनेकान्त-
प्रकाशकीय
निवेदनम्॥
प्रकरणे
आवती तत्त्वसंख्या संबंधी निष्कर्ष को छे. प्रसंगसंगतिथी नयो- अवतरण-उपक्रम लावी १८ मा पत्र सुधी नैगमनयनो विस्तारथी
विचार कर्यो छे. तदन्तर्गत नैगमनयना एकान्तावलम्बि वैशेषिकदर्शन जेनुं बीजु काणाद याने औलक्यदर्शन छे अने उपलक्षणथी घणा
विचारमां तेने अनुसरतुं न्यायदर्शन जेना बीजा नाम गौतमीय अगर योगदर्शन छे, तेनी प्रक्रिया देखाडवापूर्वक समीक्षा करी छे.
त्यारबाद २७ मा पत्र सुधी संग्रहनय विचार विस्तारथी बतावी तदन्तर्गत एकान्तसंग्रहनयावलम्बि वेदान्तदर्शननी प्रक्रिया बताववा साथे
समीक्षा करी छे. ते पछीना ४० मा पत्र सुधी व्यवहारनयनो विस्तारथी स्पष्ट विचार देखाडी तदेकान्तग्राहि-सांख्यदर्शननी समीक्षा
करी छे. अहीं विशेषता ए छे के बीजा ग्रन्थमा क्वचिदंशे एकान्तसंग्रहावलम्बि होवाथी सांख्यदर्शन संग्रहनयथी उत्पन्न थयेल बताव्यु
छे, जेथी ग्रन्थकार महर्षि पोते ज "बौद्धानामृजुसूत्रतो मतमभूद्वेदान्तिनां संग्रहात , सांख्यानां तत एव नैगमनयायोगश्च वैशे-
पिका । शब्दब्रह्मविदोऽपि शब्दनयतः सर्वैर्नयैर्गुम्फिता, जैनी दृष्टिरितीह सारतरता प्रत्यक्षमुवीक्ष्यते ॥१॥" (अध्यात्मसार)
"अद्वैतवादिना निखिलानि दर्शनानि सांख्यदर्शनं च तदाभासतया ज्ञेयानि" (सप्तभङ्गीनयप्रदीप) ए प्रमाणे लखे छे; ज्यारे आ
ग्रन्थ तेमज अन्य ग्रन्थोमां व्यवहारनयमांथी पण सांख्यदर्शनोत्पत्ति बतावी छे, तेनी युक्ति तथा संवाद पाठ पण ग्रन्थकार पोते ज बतावे छे.
द्रव्यार्थिकनयना शुद्ध-अशुद्ध बे विभागो पैकी शुद्धद्रव्यार्थिक संग्रहनय छे, तेना एकान्तावलम्बनथी वेदान्तदर्शननी प्रवृत्ति जणावी छे.
" जातं द्रव्यार्थिकाच्छुद्धा-दर्शनं ब्रह्मवादिनाम् । तत्रैके शब्दसन्मानं, चित्सन्मानं परे जगुः ॥१॥"
अशुद्ध द्रव्यार्थिक व्यवहारनय छे अने तेनुं एकान्तावलम्बि सांख्यदर्शन छे तेम जणावे छे.
अशुद्धाश्यवहाराख्यात्, ततोऽभूत्सांख्यदर्शनम् । चेतनाचेतनद्रव्या-नन्तपर्यायदर्शकम् ॥ २॥
॥३॥
- आ ज विचारने युक्तिपुरःसर स्पष्ट शब्दोमां जणावे छे के- " सांख्यशास्त्रं च नानात्म-व्यवस्थाव्यवहारकृत् । इत्येतावत्पुरस्कृत्य, विवेकः सम्मतावयम् ॥ ३॥" आ बाबतमां वादिगजकेसरि तार्किककदम्बकोटीर-श्रीसिद्धसेन दिवाकरजी महाराज पोते रचेला दर्शनप्रभावक शास्त्र सम्मति महातर्क ग्रन्थमां दर्शावे छे के "जं काविलं दरिसणं, एयं दवढियस्स वचत्वं ॥" विवरणकार स्पष्ट करे छे के "द्रव्यार्थिकपदमत्र व्यवहारलक्षणाशुद्धद्रव्यार्थिकपरं द्रष्टव्यं शुद्धद्रव्यार्थिकप्रकृतेः संग्रहनयरूपाया वेदान्तदर्शनोत्पत्तिमूलताया उक्तत्वात् " आ रीते व्यवहारनयनुं विस्तारस्वरूप कह्या पछी ५५ मा पत्र सुधी ऋजुसूत्रनयनो विस्तारथी विचार कर्यो छे. ऋजुसूत्रनयना एकान्तावलम्बि बौद्धदर्शननी समीक्षा करी छे. पर्यायार्थिक नयरूप वृक्षना मूलस्थानीय ऋजुसूत्रनयने गणी ते वृक्षमांथी नीकळती शाखा प्रशाखा- स्थाने शब्दनय, समभिरूढनय अने एवंभूतनयो छे तेम सम्मतिमहातग्रन्थना पाठथी सिद्ध थता शब्दादि नयोनुं मूळ भेदपणुं ऊडी जाय अने तेम मानता ' सत्त मूलणया पण्णत्ता' ए सूत्रविरोधापत्ति आवी पडे छे. ते शंका- अबाधित युक्तिपुरःसर घणी ज स्पष्टताथी निरसन कर्यु छे, तदन्तर्गत दिगम्बरामिमत मूळ नयोनी नव संख्यामा युक्ति तथा सिद्धान्तबाधितपणुं विगेरे दोषो बतावी पूज्य ग्रन्थकार उपाध्यायजी महाराज विशेष जिज्ञासुओने पोते रचेला "आपभ्रांशिकप्रबन्ध" नामना ग्रन्थनी भलामण करे छे ते प्रबन्ध ग्रन्थ " दिपटकपटकुठार " नामनो दिगंबरोना सूत्रविरुद्ध विसंवादि चोर्याशी बोलोना खण्डननो जे अन्थ बनान्यो छे ते ज होवा संभव छे; कारण दिक्पटकपटनाटकमपास्तमापभ्रांशिकप्रबन्धेऽस्मामिः" ए वाक्यथी ते ग्रन्थनो विषय बताव्यो छे ते तेमां पूरेपूरो मळतो आवे छे तेमज भाषा पण अपभ्रंशने लगती ज छे. मात्र तेमां ' आपनांशिक प्रबन्ध ' एवं नाम न जणायाथी अमोए
प्रकाशकीयं
निवेदनम्॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणे
संभव शब्द वापर्यो छे. कोई महाशय पासे उपाध्यायजीकृत आपत्रांशिक प्रबन्ध अलग ग्रन्थ होय अगर जाणमां होय तो जणाववा
अनुग्रह करशे. अमो तेओनो आभार मानीशुं. प्रस्तुत विचार माटे ते दिपटकपटकुठार ग्रन्थमां जणावे छे के " तत्त्वार्थसूत्रमा
( दिगम्बरो पण जेने केटलाक सूत्रोना फेरफार साथे मान्य गणे छे) पण सात नयो कह्या छतां दिगंबर देवसेनीय नयचक्रमां द्रव्यार्थिक
विगेरे नव नयो कई रीते इष्ट गण्या ते समजातुं नथी, जो के तत्त्वसंख्यामां आपेक्षिक सात-नव संख्यामेदो छे, परन्तु नय मेदो माटे
सात-नव भिन्न संख्या कहेवामां तेवं कोई कारण नथी, कदाच हवादथी द्रव्यार्थ अने पर्यायार्थ नय ए बे मेदो अलग पाडी नव संख्या
मानवी ज होय तो अर्पित-अनर्पित ए बे मेदो पण अलग करी शकाय छे अने ते रीते अगियार भेदो न मानवामां विनिगमक शुं छे ?
कदाच कहेशो के अर्पित-अनर्पित ए मेदो संग्रहव्यवहारमा अन्तर्गत करी शकाय छे माटे अलग मानवामां कोई कारण नथी तो
नैगमादि त्रण अथवा चारमां द्रव्यार्थनो अने बाकीनामां पर्यायार्थनो पण अन्तर्भाव थइ शके छे अने पूर्वपुरुषोए ते करेलो पण छे
छतां अलग गणवा तेमां हठवाद सिवाय बीजुं शुं कारण होई शके ?, तेमज नयना अंशरूपे उपनयो पण भिन्न होई शकता नथी.
जो तेम मानवामां आवे तो प्रमाणना अंशरूप उपप्रमाण पण मानवा जोइये" इत्यादि अनेक विचारो छे. ते पाठ नीचे प्रमाणे छे-
" नव ही नय नयचक्रमें, द्रव्यारथ मुख इट्ट । तच्चारथमा सात है, देवसेन कहां दिट्ठ ॥ १॥ तत्व सात नव ज्युं कहे,
त्यों नहि नयकी बात । एएं विभक्त विभाग है, सो तो कारन जात ॥ २॥ जो हठते नव नय कहो, गहत द्रव्य परजाय ।
अप्पियणप्पियमेदतें, एकादश हुइ जाय ॥३॥ जो संग्रह व्यवहार में, अप्पियणप्पिय इट्ट । आदि अंत नयथोकमें,
पञ्जवदा निविट्ठ ॥ ४॥ उपनय नयको अंश है, कहे विभिन्न कुवंश । उपप्रमाण माने नहीं, क्यों प्रमाणको अंश ॥५॥
" /44.man 170HITrenTherawनारRPATR" इत्यादि पद्यो आपेला छे. आ विचारोनी अनन्तर सौत्रान्तिक-वैभाषिक-योगाचार अने माध्यमिक ए चारेय एकान्तरूपे सूक्ष्म- सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतमादि विचारमा उतरेला बौद्धोना मेदोनु टुंकाणमां मन्तव्य बतावी बौद्धमतना मूल कारणरूपे ऋजुसूत्र नय होवा छतां ते ते मेदनी कया कया नयथी उत्पत्ति थई छे तेनो पण विचार करवा साथे तेओना पूर्वपक्ष समाधानादिनो संक्षेप विचार करी विस्तार विचार माटे श्रीसम्मतितर्क तथा शास्त्रवार्तासमुच्चयवृत्ति स्याद्वादकल्पलतानी भलामण आपी छे. ते पछीना ६५ मा पत्र सुधी शब्दादि त्रण नयोनुं विस्तारथी स्वरूप अने अवान्तर सप्तभंगी अर्थनय-शब्दनयाश्रित स्वरूप विगेरे अनेक विचारो दर्शाव्या छे. त्यार बाद ७४ मा पत्र सुधीमां सप्तभंगीना दरेक भंगोनुं विस्तारस्वरूप, नयोमां सप्तभंगीनो समवतार, तृतीय मंगनो लंबाण विचार, ते माटे १६ विकल्पो, पूज्य पूर्वधर श्रीमल्लवादि मगवंत निगेरे महापुरुषोए बतावेल सप्तभंगीना दरेक मंगोना प्रतिभंगो गणतां प्रथम भंगना ३, द्वितीय भंगना ३, तृतीय भंगना १०, चतुर्थ भंगना १०, पंचम भंगना १३०, षष्ठ भंगना १३० अने सप्तम भंगना १३० कुल संकलनाए मध्यम विचारथी ४१६ भंगो, वली तेना पण अवान्तर भंगोनी उत्तरोत्तर विचारणाए १४३६ संख्या अने सांयोगिक भंगादिनी गणतरीए कोटिशः संख्या थाय छे विगेरे दिग्दर्शन करावी ते भंगसंख्या जाणवानी जिज्ञासा उपजाववा साथे तेना विस्तार अवबोधने अंगे ते ते अन्थोनी भलामण आपी छे, आठमा विगेरे भंगो केम न थई शके ! ते संबंधमां पर- वादिकृत शंकानुं युक्तिपुरःसर समाधान विगेरे अनेक विचारो बताव्या पछी ग्रन्थनी पूर्णता सुधीमां अनेकान्तात्मक वस्तु एज नय तथा प्रमाणनो विषय थई शके छे, व्यानपर्याय अने अर्थपर्यायर्नु स्वरूप, द्रव्य गुणना भेदाभेद स्वरूपनुं व्यवस्थापन, त्रीजो गुणार्थिक- नय सिद्ध थई शकतो नथी तेनुं घणी ज दलीलो साथे पारमर्ष पाठोना समन्वयपूर्वक खंडन कर्यु छे. दिगंबरप्रक्रियानुसार सामान्य- प्रकाशकीय निवेदनम्॥ भी बनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणे विशेष गुणसंख्या, सामान्य-विशेष स्वभावो, अनेकान्तवादमां ज तेनुं यथार्थ घटवू, द्रव्यार्थिकना १० मेदो, पर्यायार्थिकना ६ मेदो, नयोपनय मेद विचारो, नैगमना ३, संग्रहना २, व्यवहारना २, ऋजुसूत्रना २, शब्द-समभिरूढ-एवंभूत ए त्रणेना प्रत्येकना एक एक एम सर्व संकलनाए सर्व मळी २८, मेदो, उपनयमां सद्भूत-असद्भूतव्यवहारना शुद्धाशुद्धादि-उपचरितानुपचरितादि मेदोनुं वर्णन, नयोपनयनी स्वभावोमा योजना विगेरे दिगंबरप्रक्रिया, विस्तारस्वरूप बतावी दिशासूचनरूपे क्रमशः युक्ति पूर्वक खंडन कयु छे. दिगंबर अमृतचन्द्रमरिकृत प्रवचनसारवृत्तिमां आपेल पर्यायविचारोनी खंडनदिशा विगेरे प्रदर्शन करी, द्रव्यपर्यायोना एका- न्तमेदवादि मतनुं पूर्वपक्ष निरूपणपूर्वक युक्तिपुरःसरखंडन, तेवी ज रीते एकान्त अमेदवादि मतनुं पण खंडन, एकान्त द्रव्यवादि- मतनुं खंडन, अनेकान्तमा अनेकान्त स्वीकारतां घटाभावनो अभाव जेम घटस्वरूप छे तेम एकान्तपक्षापत्तिदोषनो तथा प्रमेयत्व विगेरे दृष्टान्तोथी अनवस्था विगेरे दोषोनो उद्धार तथा अनेकान्तनुं विश्वव्यापकत्व, सर्वदर्शनसम्मतत्व समर्थन घणा ज विस्तारथी करी अनेकान्तमाहात्म्य निरूपण करी अन्तिमोपदेश आप्यो छे. छेवटना ग्रन्थसमाप्ति प्रशस्ति पद्योमा सर्व दर्शनोए अनेकान्त स्वीकार्यों छे ते स्पष्ट करी आप्युं छे. आ ग्रन्थकारनी ग्रन्थप्रथनशैलीमां अद्भुतता ए छे के दरेक दार्शनिक विचारो प्रायः ते ते दर्शननी प्रक्रिया स्पष्टतया विस्तारथी बताववापूर्वक ज तेनी समीक्षा (निरसन) करे छे. तेमज दरेक विचारो अबाधित युक्तिपुरःसर होवा छतां तेने संगत संवाद-साक्षिपाठो आप्या विना रहेता नथी. एक धर्मपरीक्षा वृत्ति जेवा ग्रन्थमां पण लगभग ५५० साढी पांचसो उपरान्त संवादपाठो मुक्या छे तेवीज रीते आ ग्रन्थमां पण पोणोसो उपरांत महाभाष्यना, ६० लगभग सम्मति महातर्क ग्रन्थना अने बीजा मळी लगभग २५० अढीसो संवादपाठो मूकेला छे जेनी सूचिका पण आ साथे छे ते जोवा सुज्ञवाचकवर्गने प्रार्थना छे. वळी विशेष , उपाध्यायजी भगवंतनी ग्रन्थसन्दर्भ शैलिमां विशिष्टता ए छे के-बहुलताए प्राचीन पूज्यतम पुरुषोना वचन तथा अर्थानुसरणने अवलंबीने ज ते प्रवर्ते छे तेमां रहेली अपूर्वता पूज्यपुरुषोना वचनोनो समन्वय आदि नवीनता विगेरे विकसित बुद्धि प्रतिभाशालिओने- ज ते तरी आवे छे, वळी तेवा प्रतिभाशालि पुरुषोना तीव्र क्षयोपशमानुसारे गुंथाएल ग्रन्थमालामां शब्द तथा अर्थानुसरण जेवू कुदरते नैसर्गिक-साहजिक पण आवी शके छे तेथी ते पूज्यभगवंतनी अमाप प्रज्ञानुं माप करवा मथq-तेनी परीक्षामा ऊतर ते आपणा जेवा पामरोनी बुद्धिनी कीमत अंकाववा जेवू अने “प्रांशुलभ्ये फले मोहा-दुद्वाहुरिव वामनः" जेवी स्थिति सूचवनारुं छे. आ श्री अनेकान्त व्यवस्था प्रकरण तेमज अमारा तरफथी बहार पडेला प्रायः घणा ग्रन्थोना संशोधनकार्यमां प्राच्य तथा नव्य- न्यायनिष्णात, जगत्कर्तृत्ववादनिरासात्मक ' जगत्कर्तृत्वमीमांसा ' ' अयोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकाविवृति' तथा 'धर्मपरीक्षा वृत्तिटिप्पण' आदि अन्थोना प्रणेता मुनिराजश्री शिवानन्दविजयजी महाराजश्रीए सहाय करी छे. जेमना ग्रन्थो पैकी नव्यन्यायशैलीए सिद्धान्तना संवाद पाठोयुक्त विद्वत्तापूर्ण धर्मपरीक्षा वृत्तिटिप्पण के जेनो अमुक भाग हालमा ज अमारा तरफथी बहार पडेल सटीक धर्मपरीक्षा अन्य साथे प्रकाशित थयो छे. संपूर्ण टिप्पण प्रकाशित करवा इच्छा छतां प्रेसनी अगवडता विगेरे कारणोए शेष भाग बहार पाडी शक्या नथी. आशा छ के-ते बाकीनो भाग पण बहार पाडवा भाग्यशालि बनीशू: आ ग्रन्थ प्रकाशमां मूकतां अमोने घणो ज आनन्द थाय छे के जेनी हस्तलिखित अलभ्य प्रायः प्रतिओने लईने अनेक भव्यात्माओ जिज्ञासुओ छतां लाभ मेळवी शकता नहोता ते आ प्रकाशनथी लाभ लई तत्त्वज्ञान उपार्जी अनुक्रमे सिद्धिसुखना सत्पात्र बनशे. शुभं भूयात् श्रीश्रमणसंघस्य श्री जैनग्रन्थप्रकाशक सभा-अमदावाद.
किश्चिद् वक्तव्य॥ भी अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम्। ॥ श्रीगौतमस्वामिने नमः॥ ॥श्रीअनेकान्तव्यवस्थाने अंगे किंचिद् वक्तव्य ॥ शास्त्रोमां कोई पण शास्त्र विशिष्ट ने कठीन होय तो ते तर्कशास्त्र छे. तर्कविद्या तीक्ष्णबुद्धिथी ग्रहण थाय छे. ते समजवा माटे एकाग्रता अने स्थिरतानी आवश्यकता रहे छे. तर्कविषयक लखाणमां बे पद्धति जोवामां आवे छे. एक विकल्पपरम्परानी गुंथणीथी जटिल अने बीजी अवच्छेदकावच्छिन्ननी अविच्छिन्नधाराथी गहन, आ बन्ने पद्धतिओ अनुक्रमे प्राचीन पद्धति अने नवीन पद्धति एवा अभिधानथी ओळखाय छे. दरेक दर्शनने न्याय-तर्क-युक्तिनी आवश्यकता रहे छे. जनताने स्वाभिमत सिद्धान्त समजाववा माटे दलील जरूरी छे. दर्शना- न्तरना विद्वानो साथे चर्चा आदि प्रसंगे ते ते समये प्रचलित न्याय पद्धति तथा विवेचन शैली जाणवी जोईए. नहिं तो स्वदर्शन- दर्शनान्तर समक्ष निर्बळ अने फीक्कुं भासे छे. पंदरमी शताब्दी सुधी तर्कवादमां प्राचीन पद्धतिनी प्रबलता हती. लखवामां ने वादमां विकल्पजाळनुं जोर विशेष जणातुं. आईतदर्शने ते पद्धतिमां मजबूत टक्कर झीली हती ने स्वसिद्धान्तो चोमेर फेलावी बीलकूल झांखा पडवा दीधा न हता. सोळमी शताब्दीथी नवीन पद्धतिनो प्रचार वधवा लाग्यो. न्यायदर्शनना विशिष्टप्रन्थ चिन्तामणिना कर्ता गंगेशोपाध्याये नवीन पद्धतिनो प्रारंभ कर्यो. पक्षधरमिश्र-दीधितिकार रघुनाथशिरोमणि आदिए ते पद्धति विशेष प्रकाशमां मूकी, जगदीशभट्टाचार्य अने गदाधरभट्टाचार्यना समयमां ते पद्धतिनुं प्रमुत्व खूब जामी गडे हतुं ते समये आहेत दर्शनमा ते पद्धतिना परिचयनी जरूर हती. तेनो सारी रीते परिचय करी. विशद रीतिए लखवानो ने विवेचनमा मूकवानो यश न्यायविशारद न्यायाचार्य उपाध्यायजी महाराजश्री यशोविजयजी महाराजने मळे छे. न्याय विचारोर्नु पूर्ण अध्ययन करी न्यायनी बन्ने शैलीथी जैन दर्शनना सिद्धान्तो स्पष्टपणे निरूपवामा उपाध्यायजी महाराजे नवीन न्यायपद्धतिने आत्मसात् न करी होत तो जैनदर्शन बौद्धदर्शननी जेम पछात रही गयुं होत. आज आ पद्धतिमां पण जैनदर्शननी जे उन्नति देखाय छे ते न देखात. अनेकान्तव्यवस्था प्रकरण अथवा जैनतर्क ए एमनो प्राचीन अने नवीन पद्धतिना मिश्रणथी लनायेल न्यायनो ग्रन्थ छे. " जेम हरणीयुं वाघना मुखने सुंघवा पण समर्थ न थाय तेम अनन्तनयथी भरपूर अतिगंमीर जिनमत नयना अंशने जाणनारवडे सुंघवाने पण शक्य नथी. प्रमाण अने नयथी सिद्ध एवा जिनमतने दूषित करवा प्रयत्न करवो ए पोतानी बुद्धिमुंज विडम्बन छे," ए प्रमाणे ग्रन्थना प्रारंभमां लखी स्याद्वाद प्रत्ये पोतानो अद्वितीय विश्वास ग्रन्थकार प्रकट करे छे. दरेक दर्शनो अनेका- न्तवादमांथी छूटा पड्या छे ने एक अथवा बीजी रीतिए दरेक दर्शनोने अनेकान्तवाद अंगीकार करवो पडे छे ते विषय प्रधानतया सात नयनुं स्वरूप बतावता सचोटपणे उपाध्यायजी महाराजे प्रस्तुत ग्रन्थमा प्ररूप्यो छे. ते सम्बन्धि उपसंहारना सूक्तो नीचे प्रमाणे छे. " दर्शितेयं यथाशास्त्रं, नैगमस्य नयस्य दिक । कणादृष्टिहेतुः श्री-यशोविजयवाचकैः ॥१॥ दर्शितेयं यथाशास्त्रं, सनहस्य नयस्य दिग् । वेदान्तराद्धान्तहेतु-र्यशोविजयवाचकैः ॥२॥ दर्शितेयं यथाशास्त्रं, व्यवहारनयस्य दिम्। सांख्यसिद्धा- न्तहेतुः श्री-यशोविजयवाचकैः ॥२॥ दर्शितेयं यथाशास्त्र-मृजुसूत्रनयस्य दिग्। बौद्धसिद्धान्तहेतुः श्री-यशोविजयवाचकै॥४॥ आ ग्रन्थमा दरेक पृष्ठ पर आपेल विषयसूचनथी ग्रन्थ वांचवाने अने विषयशोधन करवाने विशेष अनुकूळता छे. जेम भाष्यकार-जिनभद्रगणि क्षमाक्षमण, संग्रहकार वाचकावर उमास्वातिजी महाराज, महातार्किक श्री सिद्धसेनदिवाकर,
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
किशिद
वक्तव्य।
चौदसो चुम्मालीस ग्रन्थसूत्रण सूत्रधार श्री हरिभद्रपारिजी महाराज आदिनी उपर उपाध्यायजी महाराजने प्रेमभक्ति हती तेम कलिका-
लसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसरिजी महाराज प्रत्ये पण सम्पूर्ण बहुमान अने भक्ति हता ए आ ग्रन्थमा आवता स्थळे स्थळे " तदुक्तं प्रभुश्री
हेमचन्द्रसरिभिः" वगेरे वचनोथी पूरवार थाय छे.
आ ग्रन्थ उपाध्यायजी महाराजनुं इतर दर्शनोमां पण केटलं ऊ९ अवगाहन हतुं ते सिद्ध करतां ते ते दर्शनोना मौलिक
श्रुति-स्मृति वगेरे ग्रन्थोथी लईने विवेचन पर्यन्तना सर्व ग्रन्थो तेओश्रीए अवलोक्यां हतां ने तेना विषय तेओश्रीने सारी रीते
उपस्थित हता ए समजावे छे.
आ ग्रन्थ वांचवाने अने समजवा माटे ते ते दर्शनोनो अने जैनदर्शननो सारो परिचय करवो आवश्यक छे.
उपाध्यायजी महाराजे सेंकडो ग्रन्थो गुंथ्या छे तेमांना केटलाएक ग्रन्थोना नाममात्रथी ज आपणे संतोष अनुभववानो छे.
'अष्टसहस्री' ग्रन्थनी एकज प्रति डॅकन कोलेजना पुस्तकसंग्रहमा छे तेम पूज्यपाद परमोपकारि प्रातःस्मरणीय सूरिचक्रचक्रवर्ति शासन-
सम्राट् सर्वतंत्रस्वतंत्र अमारा परमगुरु गुरुमहाराज श्रीविजयनेमिसूरीश्वरजी महाराजश्रीना लक्ष्यमा आवता तेनी नकल करावी लेवा
उपदेश आप्यो यावत् ते 'श्रीजैनग्रन्थप्रकाशक सभा' तरफथी प्रसिद्ध थतां आजे ते ग्रन्थनुं दर्शन करवा आपणे भाग्यशाली थया
छीए, ते प्रमाणे आ ग्रन्थनी पण एक बे प्रतिओज हस्तलिखित प्राप्त थती हती. आजे सद्भाग्ये तेनुं पण 'श्री जैनग्रन्थ प्रकाशक सभा'
तरफथी प्रकाशन थयु एटले हवेथी आ ग्रन्थना नामथी ज नहिं पण साक्षात् ग्रन्थना दर्शन करी आनन्दमां अमिवृद्धि करीए एज-
लि० मुनि धुरन्धरविजय
॥ ७॥
॥ ॐ अह नमः ॥ ॥ अनेकान्तव्यवस्थापन्थान्तर्गतसाक्ष्यपाठानुक्रमणिका ॥ पत्र पृ. पं. १ प्रन्थनाम विशेषा० भाष्य आवश्यकनियुक्ति विशेषा० भाष्य २ - " ८ गाथाऽऽद्यपाद: जीवाजीवाश्रवबन्ध- इत्येष सप्तविधोऽर्थ- प्रमाणप्रमेय इत्यादि ते ति परावेक्खा दोहि विणएहिणीयं सबैतन्यमात्मनि वस्तुपर्यायवद् द्रव्यम् क्षणमेकं सुखी जीवो गुणपडिवनो भादावन्ते च यन्नास्ति इच्छह जं दखनओ पज्जाओ चिय वत्थु पजायनयमयमिणं प्रन्थनाम पत्र पृ. पं. गाथाऽऽयपादः तत्त्वार्थसूत्र अ०१सू.४ १ ८ जह रुवाइविसिट्टो तत्त्वार्थभाग्य १ १११ | उप्पजति वियंति य गौतमसूत्र २ ११३ | उप्पायविगमपरिणा- भाषारहस्य ३ १ ६ ते जप्पभवा जं वा महाभाष्य, सम्मति ११३ | आहावक्खाणमिदं आकर(प्रमाणनय- उप्पायाइसहावा तत्त्वालोकालंकार- २ ९ जीवस्स य सामाइयं परिच्छेद७सू०८,९,१०) ४ जह पजायनउ चिय आवश्यकनियुकि इच्छह सो तेणोभय- अध्यात्मोपनिषद् एगत्ते नणु दचं विशेषा० भाष्य० जह भिन्नोमयगाही तम्हा किं सामइयं ११२ इहरा जीवाणपन्न " " " " २ " ६ " प्रन्यनाम पत्र पृ. पं. बनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणे॥ साक्ष्य- पाठानु- क्रमणिका। १८ २ ३ आगम विशे० भाष्य " " वाक्यपदीय " " १ श्रुति १ १ पत्र पृ. पं. गाथाऽऽधपादः अनन्तधर्मात्मकमेव तस्व- संगृहीतपिण्डार्थ २ १२ | कुंभो भावाणनो ७ २ १२ | चूओ वणस्साइ चिय अस्त्यर्थः सर्वशब्दानां ८ २ ४ घटादीनां न चाकारान् ८ २ ५ वेदात्मशक्ति स्वगुणैः अजामेकां लोहित- ३ या सर्वक्षः स सर्ववित् १ २ ६ इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप- एष सर्वेश्वरः १ २ शिवमद्वैतं चातुर्थ १ विक्षेपशक्तिलिङ्गादि- २ पतस्मादात्मन आकाश: २१३ प्रविभक्तभुक् १० २१३ जागरितस्थानो सामानाधिकरण्यं च गाथाऽऽयपाद: प्रन्यनाम सो चेव पज्जवट्ठिय- विशेषा० भाष्य नणु भणियं पजाय- उपायभङ्गुराणं तब्मेयकप्पणाओ उप्पायभंगुरा जं, बीयस्स दव्वमेतं आविभावतिरोभाव- जं जं जे जे भावे जं जाहे जं भावं न सुवनादचं कुंडल- जइ वा दव्वादने. जइ पजवोवयारो ध्यपरिणाममित्तं व्वट्टियनयपयडी सम्मति पुरुष एवेदं सर्वम श्रुति (वेद) ऊर्ध्वमूलमघाशाखम् गीता स्वतोऽनुवृत्तिव्यतिवृत्ति- अन्ययोग द्वात्रिं. " " " " " " " २ २० २१ २१ वसिष्ठवाक्य छान्दोग्योपनिषद् " विशे० भाष्य " " १ " फलव्याप्यत्वमेवास्य न यावत्सममभ्यस्तो प्रतिपाद्यस्याद्वितीय अद्वितीयवस्तुन अद्वितीयवस्तुनो आचार्यवान् पुरुषो येनाश्रुतं श्रुतं यथा सौम्यैकेन दृशिस्वरूपं गगनोपमं यमनियमासनप्राणा लये संबोधयेधित्तं सचक्षुरचक्षुरिव बुद्धावंतसतस्वस्य उत्पन्नात्मायबोधस्य न तस्य प्राणां उत्क्राम० अव्यावृत्ताननुगतं न निरोधो न चोत्पत्ति तस्याभिध्यानाद्योजनात् २२ माया सती चेद्यतत्त्व- अन्ययोग द्वात्रिंशिका २६ १ २२ २ सच्चिदानन्दरूपं श्रुति २६ १२२ २३ १ ३ जे पगं जाणा आचारांग २६ २ २३ १ ५ सवियष्पणिवियप्पं सम्मति २६ २३ वधा विणिच्छियस्थ २७ २३ यथा कटकशब्दार्थः २३ १ ८ पजवणयवुक्कंतं सम्मति २८ २३ ११० दब्बटियोत्ति तम्हा २८ २ २३ ११४ | दवट्टियवत्तवं २८ २३ २ उप्पजति वयंति य २३ २ १३ दव्वं पजवविजुयं २९ २४ एए पुण संगहओ २९ २४ १ ण य तइओ अत्थि णओ २४ जह एए तह अण्णे २९ २४ ११० सम्षणयसमूहम्मि वि सम्मति २ तम्हा सब्वे विजया १ २४ २ १२ | जहऽणेगलक्खणगुणा २ तह णिययवायसुविणि- ૨૧ " पातंजलयोगदर्शन " श्रुति " " १ श्रुति वार्तिक श्रुति " ३ २९ "
अनेकान्त.
व्यवस्था
प्रकरणे॥
Www
س س س س س س
११२
२
"
साक्ष्य-
पाठानु-
क्रमणिका।
३८
३९
"
"
॥९॥
१
३
४०
४०
"
जह पुण तेचेव मणी
तह सव्वे णयवाया
लोइयपरिच्छियसुहो
इहरा समूहसिद्धो
णिययवयणिज्जसथा
सदेव सत्स्यात्सदिति अन्ययोग द्वात्रिंशिका
जं काविलं दरिसणं
सम्मति
प्रकृतेर्महाँस्ततोऽहकारः सांख्यकारिका
पञ्चविंशतितस्वको
त्रिगुणमविवेकिविषयः
हेतुमदनित्यमव्यापि
असदकरणादुपादान-
कार्यस्यैव न योगाथ
भेदानां परिणामात् सांख्यकारिका
मूलप्रकृतिरविकृति-
यदेव दधि तत्क्षीरं
न सदकरणादुपादान सांस्यकारिका
अवधीनामनिप्पत्ते-
૨
१ / लिलिङ्गिधियोरेवं
३० १ ५ चैतन्यं पुरुषस्य
पुरुषस्य दर्शनार्थ
सांख्यकारिका
३० २ तस्यैव व्यभिचारादौ
२ १३ | वत्सविवृद्धिनिमित्तं
३१ १ ७ | उज्जुं ऋजुं सुयं नाणं विशेषा० भाष्य
३ तम्हा णिययं संपई
३१ २ पलालं न दहत्यग्नि-
३१
कचित्तदपरिक्षानं
३२
तत्रापूर्वार्थविज्ञानं
૨૨
न हि स्मरणतो यत् प्राक् श्लोक ३
३२ २ इदानीम्तनमस्तित्वं
३३ १ ९ भावान्तरविनिर्मुक्तो
३३ ११३ कः शोभेत वदन्नेवं श्लोक ३
१ अनष्टाज्जायते कार्य
१ यदि तुलान्तकयो
१
८ भाषे हो विकल्पः स्यात्
३६ ११३ | रष्टस्तावदयं घटोऽत्र निपतन
४०
४०
४०
२
४३
॥९॥
४९ KW १ " CM " " " . " ५९ २ २ २१२ २१२ ८ स्वभावोऽपि स तस्येत्यं जातस्य च स्वभायस्य सौगताः अदृष्टेऽर्थे विकल्पनमात्रम् सौगताचार्यः प्राद्यप्राहकसंवित्ति- मूलनिमाणं पजव सम्मति सत्त मूलणया पन्नत्ता- सवणं सपा स तेणं विशेषा० भाष्य इच्छह विसेसियतरं आवश्यकनियुक्ति तं चिय रिउसुत्तमयं विशेषा० भाष्य नामादओ न कुंभा जर विगयांणुप्पना अहवा पच्चुप्पन्नो सम्भावासम्भावो एवं सत्तषियप्पो सम्मति पत्थुविसेसओ वा. विशेषा० भाष्य घणिमेयामो मेमो तो भावो चिय वत्थु विरोधिलिङ्गसङ्ख्यादि- जं जं सण्णं भासह विशेषा भाष्य २११ वत्थुओ संकमणं आवश्यकनियुक्ति १ ८दछ पज्जाओ वा विशेषा० भाष्य १ णहि सइंतरवच ९ घडकुडसइत्थाणं धणिमेआओ मेओ २ आगासे वखइत्ति य ૨ ५ वत्थु बसइ सहावे २ ५ णेगमववहाराणं २ ११ माणं प्रमाणमिटुं ३ | णहि पत्थाइ पमाणं ७ | पत्थादओ वि तकारणं ति ८तकारणं ति या जा २ ८ देसी चेव य देसो १ १ पत्तो चेव समाणा घडकारविवक्खाए ११० कुंभंमि वत्थुपजाय २१. मृदादिभावैः परिणामवद्भि- " १ ६० ६० ६० " " " " " " " " " " " " "
आगम
सम्मति
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणे॥
साक्ष्य-
पाठानु-
कमणिका।
"
२
"
॥१०॥
सम्मति
७२
७४ ११४
२
एवं जह सइत्थो
बंजणअत्थतदुभयं
आवश्यक नियुक्ति
बंजणमत्थेणत्थं विशेषा० भाष्य
सहवसादभिधेयं
सहपरिणामओ जद
जह पत्थुसंकमो वा
एवं जीवं जीवो
पञ्चेन्द्रियाणि त्रिविधं
आचा०टी०
तिकाले चदुपाणा
द्रव्यसंग्रह
एएहि दिट्टिवाये
विशेषा० भाष्य
मग्गण गुणठाणेहिं य द्रव्यसंग्रह
जह देसिञ्चिय देसो विशेषाभाष्य०
अह भित्रो तस्स तओ
नो सहो वि समत्तं
नीलुप्पलाइसहा
तो वत्थुसकराई
जे वयणिज्जवियप्पा
विभजवायं च विया सम्मति
६२ १ १३ | पुरिसजायं तु पहुध
६२ २
२ ४ अस्थतरभूएहि य
६२ २ ५ अह देसो सम्भावे
६२ २ ११ | सम्भावे आइट्टो
६३ १ ४ आइटो सम्भावे
१ ६ सम्भावासम्भावे
६३ १११ एवं सत्तवियप्पो
१ १२ | परपजवेहि विसरिस
पच्चुप्पण्णंमि वि प-
१ ६ द्रव्यकषाययोगा
कोवं उप्पायन्तो
११४ रुवरसगन्धफासा
६४ २ ५ दूरे ता अण्णतं
२१२ दो उ णया भगवया
जं च पुण अरहया
परिगमण पजाओ
६५ २ जंपति अस्थि समये
६५ २ १२ | गुणसइमंतरेणावि
७४
प्रशमरति श्लोक ६
सम्मति
२
"
२
७५ २१२
२
१
१
"
॥१०॥
तत्त्वार्थ अ०५सू. ३७ उत्तराध्ययन अनुयोगद्वार आगम ८ ८३ २१० ८४ १ ८४ ६ जह दससु वसगुणंमि गुणपर्यायवहव्यं गुणाणमासओ दच्छ दवणामे गुणणामे नाणदेसणट्टयाए अण्णोण्णं पविसंता अणंतेहि वण्णपज्ज- अणुदुअणुपहि एगत्तं च पुहुत्तं च गुणपर्यायवद् द्रव्यं पिउपुत्तणत्तुभाणि. जह संबंधविसिटुं होजाहि दुगुणमहुरं भण्णा संबंधवसा जुजा संबंधवसा भण्ण विसमपरिणय दधस्स ठिई जम्म दबत्थंतरभूया भगवती सम्मति उत्तराध्ययन तत्वार्थ अ०५ सू. ३७ सम्मति ७६ २ १ सीसमईषिप्फारण ७६ २ ण वि मत्थि अण्णवाओ ७६ ७ भयणा विहु भइयचा २ रयणप्पभा सिय २ १० मूलक्षयकरीं प्राहु- तार्किक ७७ २ ६णियमेण सहतो सम्मति ८] अणभिग्गहियकुदिट्ठी उत्तराध्ययने ८१ २ ११ एगविह दुविह नधतत्व ८१ २ १२ गइपरिणयं गई चेव सम्मति ८२ १ ७ गुणणिवत्तियसन्ना ८२ १ ९| कुंभो ण जीवदवियं चरणकरणप्पहाणा ८२ वयसमणधम्म प्रवचनसारोद्धार ८२ २१० पिंडविसोही समिई ८२ २१२ | मण्णई तमेव सर्च भगवती १ २|तं सव्वणयविसुद्धं आवश्यकनियुक्ति ८३ ११०|गुरुपारतंतनाण पंचाशक ८३ २ १| गीयत्थो य विहारो २ ८६ " " " " "
शुद्धि-
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणे॥
पत्रकम् ॥
१
१
१
४
M
॥११॥
४
वस्य,
ते तद्वा
॥ शुद्धिपत्रकम् ॥
अशुद्ध शुद्ध पत्रं पृष्ठं पंक्तिः अशुद्ध शुद्ध पत्रं पृष्ठं पंक्तिः अशुद्ध
पत्रं पृष्ठं पंकि:
नारू
नादिरू
क्षया
दृष्टाक्षयाद
२
मेऽय मेप्यय
शाद
शा, म
१ ३
२
न चामे
न च मे
१२
च्छद
च्छब्द
न्, पू
वस्य न ६८
१२
त्यख्या त्ख्या
वृत्तः
वृत्तः
सैता
ति, ये ति ये
१३
रंक
क्षिता प
क्षिताप
१
गित्व गिकत्व
२
कान्य
कस्य चान्य
तोऽत्रद्र तोद्र
२
प्रयो
प्रतियो
१३ स्यात्
त्वात्
बाघोदेशेऽ बोधोदशे
१
ष्टभा
ष्टमभा
२० २ ६ कत्वेन्द्र
कत्वद्व
२ १२ व,
नेति
२
२७ १ ६
नुमव
नुभव
१ ११
२
सङ्का
६ मित्तिक मित्तक
१
निष्टा निष्ठा
२
ननु
भेदाद
भेदाद्य ८३ २ ६
केः, न चा
१४
क्रियाक्ष
तदेत
तदत
शोधितेऽप्यस्मिन् प्रायःसमाकृति पषम व ध इत्याद्यक्षरस्वत्यासादिका या काचिच्छेदशुद्धिः स्यात्स्वयं सा संशोध्याऽनाभोगादिगोचरा च क्षमाऽभ्यर्थ्यते ।
७
७.
२
२
७
व नेति
७४
१
१
४
८
क्रिया क्ष
८४
१
२
॥११॥
॥ अहूँ नमः ॥ । निजप्रज्ञावदातसंस्मारितातीतपूर्वधुतकेबलिभगवद् न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्यायभीमद्-यशोविजयवाचकविरचितम् ॥ ॥जैनतत्यपराभिधानं श्री अनेकान्तव्यवस्थाप्रकरणम् ॥ ऐन्द्रस्तोमनतं नत्वा, वीतरागं स्वयम्भुवम् ॥ अनेकान्तव्यवस्थायां, श्रमः कश्चिद्वितन्यते ॥१॥ जिनमतमलिगम्भीरं, नयलषविद्धिः परैरनन्तनयम्॥ आघ्रातुमपि न शक्यं, हरिणेन व्याघ्रवदनमिव ॥२॥ वस्तुधर्मो बनेकान्तः, प्रमाणनयसाधितः ॥ अज्ञात्वा दूषणं तस्य, निजबुद्धेविडम्बनम् ॥ ३॥ अषकोऽयमनेकान्तः?,उच्यते-तत्वेषु भाषामावादिशषलैकरूपत्वम् । कानि तवानीति चेत् तत्रेदं तत्वार्थमहाशास्त्र सूत्र(अ०१-४)"जीवाजीवाश्रवपन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्वम्"जीवा औपशमिकादिमावान्विताः॥अजीवाधर्मादयश्चत्वा- रोऽस्तिका आश्रूयते-गृह्यते यः कर्मते आप्रबार, शुभाशुभकर्मादानहेतव इत्यर्थः ॥बन्धो नामावाचकर्मण वात्मना सह प्रकृत्यादिविशेषतः संयोगः ॥ आश्रवनिरोधहेतुः संवरः ॥ विपाकात् तपसो वा कर्मणां मटी निर्जरा ॥ सर्वोपामिबि- सुस्वामलामो मोक्षः।। "इत्येष सप्तविधोऽर्थस्तत्वम् । एते पा सप्तपदास्तस्त्रानि" इति भाष्यकारः।। (अ०१०४) सव- मित्वस्याऽयुत्पचिपक्षे परमार्थ इत्यर्थः, व्युत्पचिपक्षे तु जीवादीनां या स्वसत्ता सा तत्वपदेनोच्यते । तस्याब प्रतिवस्तु यो मेदस्तमनादृत्यैकवचनम्, नैयापिकादिवत्तस्था अतिरिक्तत्त्वानम्नुपयमेन वस्तुधर्मतया प्रतिवस्तु मेदयमित्यप माघे भी बहुवचनमपीति टीकाकृतः । वस्तुतः सकलज्ञानसाध्यैकप्रयोजनकत्वलक्षणमेकत्वं, लक्षणमेदज्ञानजनितपरस्परमेदज्ञानविष- यस्वरूपं बहुत्वं चादायैकवचनबहुवचने सूत्रभाष्ययोर्बोध्ये ॥ स्वाभाविकैकत्वबहुत्वयोर्नयमेदाश्रयणेन प्रकृतसमाधाने चोपयोगवन्तो जीवः उपयोगवन्तो जीवा इति प्रयोगयोरपि साधुत्वापसे, उपदर्शितनीत्या तु बहुत्वावच्छेदेनैवैकत्वस्य क्लप्तत्वात् करितुरगरथाः सेनेत्यादाविव बहुवचनावरुद्ध एकवचनावरुद्धस्योद्देश्यविधेयभावेनान्वयो नानुपपन्न इति दिक् ।। ननु कथं सप्तैव तत्वानि, पुण्यपापयोरप्यधिकयोः सत्वादिति चेत्, न, बन्ध एव तयोरन्तर्भावमभिप्रेत्य भेदेनानमिधानात् । हन्त तर्हि जीवाऽजीवास्तवमेतावदेव वाच्यं स्याद् , आश्रवादीनामपि पञ्चानां जीवाऽजीवयोरभिन्नत्वात् । तथाहि ।। आश्रवो मिथ्यादर्शनारूपः परिणामो जीवस्य, स च क आत्मानं पुद्गलांश्च विहाय । बन्धश्चात्मप्रदेशसंश्लिष्टकर्मपुद्गलात्मकः । संबरोऽ- प्यात्मन एवाश्रवनिरोधलक्षणो देशसर्व निवृत्तिपरिणामः । निर्जरा तु पार्थक्यापनजीवपुद्गलदशैव । मोक्षोऽपि समस्तकर्मरहित आत्मैवेति ?, सत्यम् , इदमित्थमेव, किन्विदं शास्त्रं मुमुक्षुशिष्यप्रवृत्तये। सा च मुक्ति-संसारयोः कारणयोर्भेदेनाभिधानं विना न स्यादिति । आश्रवो वन्धश्चेति द्वयं मुख्यं संसारकारणम् । संवरो निर्जरा चेति द्वयं मुख्यं मोक्षकारणमुपातम् । यत्तु मुख्यं प्रयोजनं मोक्षो यदर्था सर्वा प्रवृत्तिः, स कथं न प्रदर्यतेति युक्तं पशानामप्युपादानम् । अथ हेयोपादेययोरेककारणाभिधा- नेनैव चरितार्थत्वे किं द्वयाभिधानेनेति चेत्, न, एककारणे ज्ञात कारणान्तरजिज्ञासाया औत्सर्गिकत्वात् , कारणद्वयज्ञाने च मध्यमजिज्ञासापरिपूर्तेः, तथापि मोक्षस्योपादेयतयेव हेयतया संसारस्यापि पृथगमिधान कार्य स्यादिति चेत्, न, अनागत- जन्मावभावरूपसंसारहानेः स्वातन्त्र्येणासाध्यतया तद्धेतूच्छेदे पुरुषव्यापाराभ्युपगमेन तद्धेस्वोरेवामिधानात् , संसारहानेर्मो- रूपं, तर तत्वानीति- भाष्योकै- कवचनब- हुवचनसा- धुत्वव्यव- स्थापनं न्यू नाधिकत- वसंख्या- परामर्शबा क्षस्वरूप एवानुप्रवेशान्मोक्षोपस्थितौ संसारस्य प्रतिपक्षत्वेनावश्योपस्थितिकतया पृथगभिधानस्यानतिप्रयोजनत्वाचेति सम्म- वायपरिष्कारः। वस्तुतः संवरनिर्जरयोर्मोक्षे दण्डचक्रादिन्यायेन हेतुता, न तु तृणारणिमणिन्यायेनेति बोधयितुं द्वयामिषा- नम् । बन्धपदेन संसारस्याश्रवस्य च तत्कारणतयाभिधानमित्ययं संसारनिवृत्तिमोक्षप्रवृत्तिप्रगुणः प्रघडक इत्यपि युक्तं पश्या- मः । न चैवं सम्प्रदायातिक्रमः, अनेकनयसमूहात्मकत्वाद् भगवत्प्रवचनस्येति सूक्ष्ममीक्षणीयम् ।। अत्र वैशेषिका:-" सर्वत्र विभागवाक्ये न्यूनाधिकसङ्ख्याव्यवच्छेदफलकत्वं सर्वसिद्ध, तत्रोद्देश्यविधेयभावस्थले विधेयतावच्छेदकरूपेण विधेयतासमव्यातरूपेण वा विधेयस्य व्यापकत्वलामो व्युत्पत्तिमर्यादयाऽवश्यं स्वीकर्तव्यः, अन्यथा वहिमान् धूमवानित्यादौ द्रव्यत्वादिना धूमवदादिव्यापकत्वलामप्रसङ्गाद, तदिह जीवाजीवेत्यादिवाक्ये चरमपदे तावदन्यत- भत्वेन निरूढलक्षणास्वीकाराद् विधेयतावच्छेदकेनान्यथा च विधेयतासमव्याप्तेन जीवाजीवाचन्यतमत्वेन पदार्थव्यापकत्व- लाभादाधिक्यं व्यवच्छिद्यताम् । यत्तु “विभाजकोपाधीनां मिथः सार्यरूपं न्यूनत्वमप्येतद्वाक्येनान्यतमत्ववलादेव व्यवच्छे- धम् । न्यूनत्वे पृथिवीघटान्यतमत्ववत् तस्याऽसम्भवात्, घटमेदवृत्तित्वायंशवैयर्यन पृथिवीमेदवचिद्वित्वादेः प्रतियोगिता- ऽनवच्छेदकत्वेन तदवछिनाऽभावाभावात् । तश्चात्रासम्भवीत्ययुक्तोऽयं विभाग" इत्याहुः । तत्र । भूतमान्यतमत्ववजीवा- जीवाश्रवाधन्यतमत्वस्य जीवत्वाऽजीवत्वाश्रवत्वादिसाङ्कर्येऽपि सम्मवाजीवत्वाजीवत्वायसार्यस्य च जातिसार्यादिवाधका- न्तरादेव सिद्धेः। इत्थमेव " प्रमाणप्रमेयेत्यादि" गौतमीयविभागसूत्रमप्युपपद्यते ।। अथैवं न्यूनत्वव्यवच्छेदामिप्राया- भावादीशविभागकरणेऽपि वस्तुतः पदार्थद्वित्वसिद्धौ मेदद्वयाभावमात्रस्य व्यापकतावच्छेदकत्वसम्भवादुक्तान्यतमत्वाव- विभागसं- ख्याया सार्थक्ये - शेषिक-ने- यायिकसं- वाद:।.प. रिष्कारनिः ष्कर्षश्च ॥
श्री व्यवस्था- ॥२॥ किमयापकतावलादेव न्यूनत्वव्यवच्छेदो पलादापतेत् । तया च महदासमञ्जस्पमिति वेद, म, तवं परमार्थ इति पिकलात् तत्वपदस्य समाप्रापयुक्तज्ञानविषये स्डस्यात् तस्य च सप्तभ्यो न्यूनस्वाऽमावादुफ्तविमाजकोपाध्यवछिनमेवामापसर ख्याज्याप्यसरख्यायां व्यापकताऽवच्छेदकताऽवच्छेदकस्वपर्याप्स्यमावलक्षणन्यूमस्वव्यवच्छेदस्यावाषितस्वादिति दिए । अत्र चादग्धवहनन्पायेन यावदप्रासं तावविधेयम् । अत एव "लोहितोष्णीषा ऋत्रिजःप्रचरन्ती"स्पत्र ऋत्विचरणस्य प्रत्यक्षसियालीहितोष्णीपत्वमा विधेयम् "दध्ना जुहोती"त्यत्र दना प्रत्यक्षसिद्धत्वात् शरणस्वमात्रं विषेयमिति मीमां- सानिष्णाताः सनिरन्ते । अतो यस्य तवाधिगमस्तं प्रति जीवावस्यसमस्त विधेवत्वं, पस्य च जीवावग्यतमाधिममस्तं प्रति तपस्थ, यस्य चोमयानधिगमस्तं प्रत्युभयस्य विधेयत्वमित्यतिदेशेनाकरेव्यवस्थितम् ॥ विशेषविधिनिषेधषो पनिषे- पविण्यम्बनुशाफलकत्वात् , सामान्यतोऽवगतानां विशेषतोऽमिषाने न्यूनाधिकसलवाव्यवच्छेदकत्वं व्युत्पतिसिमित्यपरे॥ "सर्वत्र श्रुतादम्याहतादेवकारादेव न्यूनाधिकसङ्ख्याध्यपच्छेद" इत्यपि केचित् ॥ तदेवं जीवाजीवादीनि सव वलानीति व्यवस्थितम् । यदि चाऽभ्युदयहेतुतया पुण्यस्य तत्प्रतिपक्षतया पापस्यापि च पृथग निरूपणमावश्यक, तदाऽभ्युदयनिःश्रेयस. हेतुप्रात्यनुकूलज्ञानविषयतया जीवाजीवादयो नवैव पदार्था निरूपणीया इति परममिसिद्धान्तसरणिः ।। अब किमेतेषु भावाभावादिशबलैकरूपत्वं?, उच्यते-विषयतया मावामाषाघाकारबुद्धिजनकपरिणामयतादात्म्यापमजा- स्वन्तरैकवामित्वं, अस्ति ोकस्य जीवाजीवादेः स्वपरद्रव्यादिनिषन्धनो मावाभावादिरूपो द्विविधा परिणामो, पलात् तत्रास्ति. नास्तीतिप्रत्ययविध्यापआयते । एकपरिणामस्याप्युमयाकारप्रतीतिजनकैकशक्तिमत्वात् प्रत्ययविध्यापपरस्वत इति चेत्, म्पयरित्ना- करादिन- न्थसंवादे- ननानाम- सविचारण चसख्या- सार्थक्प- विचारः॥ 1211 क याप्पविनिगमेनीमयपरिणामवत्यसिद्धेः ॥ सदंशः परानपेक्षप्रतीतिविषयत्वात् तासिका, असशस्तु विषपान के त्यस्ति विनिममकमिति चेत्, न, परापेक्षप्रतीतिविषयत्वस्याऽताविकत्वाव्याप्यत्वात् , संयोपविभागहस्थत्वदीर्षवादी व्यनि- पारात् । प्रतियोगिविशिष्टसंयोगादिष्यवहार एव परापेक्षा, न तु तद्ज्ञानमात्र इति चेद, तदिदममावेऽपि तुल्यम् ।। वस्तुतः केषिमावाः प्रतिनियतव्याकव्यङ्गया, केचिन, इत्यत्र स्वभावविशेष एवं शरणम् । करिशरावगन्धादौ तथास्वभावदर्थ- नाद, तस्सदशासदंशयोरपि नैकस्य तुच्छत्वमपरस्यातुच्छत्वं, तदिदममिप्रेत्योक्तं प्रतीत्यसत्याधिकारे भाषारहस्येऽस्माभिः "ते हुंति परावेक्खा, वंजयमुहदसिणोति ण य तुच्छा ॥ दिडमिणं वेचिसं, सरावकप्पूरगंधाणं ॥ ३० ॥"[ते भवन्ति परापेक्षा व्यञ्जकमुखदर्शिन इति न प तुच्छाः। दृष्टमिदं वैचित्र्यं शरावकर्पूरगन्धयोः ॥]ति॥ शुद्धं भूतलमेव घटाभावण्यवहार. विषय इति नामावांशोऽधिक इति मीमांसका, तभ, शुद्धत्वस्याभाववस्वातिरिक्तस्यानिर्वचनेन कथश्चिदमावपरिणामाषि- क्यस्यावश्यकत्वात् , यादृशे भूतले परस्य घटाभावववं ताशत्वमेव मम शुद्धत्वमिति चेत्, न, अतिरिक्ताभाववादिभि- नयोपिकाविभिभूतलत्वावच्छिम एव घटामाववत्तास्वीकारेऽपि कालविशेषविशिष्टत्वस्य सम्पन्धतयाऽतिप्रसङ्गनिराकरणाद, अस्माकं तु कालविशेषविशिष्टत्वेन सूत्रनयादेशात् पूर्वावस्थातः कथञ्चिद्मिनस्य भूतलस्य घटाभावाऽऽधारस्थाऽम्पमये- नाजुपपस्यमावात् , परस्य चैवमम्युपगमेऽ नेकान्तप्रवेशापतिः । किश्च भावादेरनतिरेके दुरितध्वंसादेः परमेश्वरनमस्कारादि- कार्यता म स्यात्, आत्मनि दुरितध्वंसस्यात्मस्वरूपत्वात् , तस्य च नित्यत्वेनाजन्यत्वात् , निस्यत्वेऽपि कश्चिदनित्यत्वा- म्युपगमेऽस्मत्पक्षप्रवेश इति यस्किश्चिदेतदिति दिग् ।। अभावामाववतोरेकान्तमेदोऽपि नैयायिकायभिमतो न न्याय्या, मी, सद- शाऽसदंच- योस्तिव- स्वेभावार- हस्योहार ष्टान्तप्रद- निं,मीमां- सकपक्ष- निरासम॥
भी व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ एकान्तमेदे सम्बन्धानुपपत्तेः, विशेषणताया एकस्वरूपत्वेऽतिप्रसङ्गादुमयस्वरूपत्वे तादात्म्यपर्यवसानात् । एकदेशिनां तदति- रेकाभ्युपगमस्याप्यन्याय्यत्वात् , तत्रापि सम्बन्धान्तरान्वेषणायामनवस्थानात् , स्वरूपतस्तस्याः सम्बन्धत्वाभ्युपगमे चामावा- भाववत्स्वरूपयोरेव तादात्म्येन सम्बन्धत्वकल्पनौचित्यादिति दिग् ॥ भावांशोऽपि न स्वलक्षणातिरिक्तः सकलव्यक्तिवृत्ति- तिर्यक्सामान्यात्मा प्रामाणिकः, देशेन तस्यैकव्यक्तिवृत्तित्वे सावयवत्वप्रसङ्गात् , कात्स्न्येन च तथात्वे इतरव्यक्तीनां निःसामान्यत्वप्रसङ्गादिति बौद्धः, तब, नैयायिकादिवत् सर्वथाऽतिरिक्तसामान्याभ्युपगम एव तदोषावकाशात् , कथ- चियावृत्तानामपि व्यक्तीनां कथञ्चिदनुगतत्वेन सामान्यभावाम्युपगमे च तद्दोषासंस्पर्शात् । तत्तदन्पक्षणवृत्तित्वयोर्विरोधा- दुर्चतासामान्यात्मा मावो नास्तीति स एव, तदप्यसत् , स एवायमिति प्रत्यभिज्ञयैवोर्खतासामान्यसिद्धेः, तत्वदन्यक्षणवृत्ति- त्वयोचित्रज्ञाने नीलाकारपीताकारयोरिवाऽविरोधात् ॥ ज्ञानविषययोरतिरिक्तसम्बन्धानुपपत्ते नाकार एव भावो न तु बाय इति तदेकदेशीयः, तदप्यसत् , बाघार्थाभावे नियतव्यवहारादिविलोपप्रसङ्गाद्, वासनाविशेषेण तव्यवस्थोपपादनेऽपि तत्प्र. बोधार्थ बापाभ्युपगमावश्यकत्वादिति दिग् ।। तदेवं व्यवस्थितं जीवाजीवादीनां विचित्रभावाभावादिशवलैक- रूपत्वम् ।। अथैवं सर्वस्याऽनेकान्तत्वेन सर्वरूपत्वे कथं प्रतिनियतधर्मग्रह इति चेत् ?, मतिज्ञानोपयोगे तत्तत्सामग्रीसव्यपेक्ष- क्षयोपशमविशेषात् , श्रुतज्ञानोपयोगे च नयविशेषादिति गृहाण ॥ अत एवैकस्मिकत्वोदोघेऽयं गुरुरिति, अनेकत्वोरोघे चैते गुरव इति पोषः सङ्गच्छते । क्रमेणोमयोदोघेऽयं गुरव इति प्रयोगस्त्वेकत्वावरुद्ध बहुत्वान्वयस्य निराकाहत्वादेव निरसनीयः, यत्र वनपविधेयभावतात्पर्येण तथाऽन्वये न निराकासत्वं,तत्र भवत्येव नैममनयाभिप्रायात् तथाप्रयोगो,यथा “सभूमृदष्टावपि अनेकान्त- लक्षणपरा- मर्शमिरे- ण नैयायि- कयौदादि विचार- निरसनम्॥
नयविचा- रोपक्रमः। नैगमनक- लोकपाला" इत्यादि लौकिके, यथा च "एकग्रहणगृहीता असङ्ख्येयाः प्रदेशा जीव" इत्यादि लोकोत्तर इति सर्तव्यम् ।। अथ के ते नया यैः प्रतिनियतधर्मग्रह इति ?, उच्यते, "नैगमसङ्ग्रहव्यवहारर्जुश्त्रशब्दसममिरूदैवम्भूता नयाः ॥ तत्र नैकै प्रभूतैर्मानैर्महासामान्यावान्तरसामान्यविशेषज्ञानलक्षणैर्मिनोति मिमीते वा निरुक्तविधिना वर्णविपर्ययागमः। यद्वा गम्यतेऽनेनेति गमः-पन्थाः, नैके गमा:-पन्थानो यस्य स नैकगमः, निरुक्तविधिना ककारलोपान्नैगमः। अथवा लोकार्थनिबोधा निगमा, तेषु भवः कुशलो वा नैगमः। अयं च महासामान्यादिषु त्रिषु क्रमेण सर्वाविशुद्धो विशुद्धाविशुद्धो विशुद्धश्च ज्ञातव्यः । एवं प्रस्थकायुदाहरणेष्वपि सिद्धान्तसिद्धेषु भावनीयम् । एवं घटादिष्वपि कार्यकारणयोरवयवावयविनोरन्यप्रकारेण चोपचा- रानुपचाराम्यामविशुद्ध-मध्यम-विशुद्धभेदा भावनीयाः । एतद्व्युत्पत्त्यर्थमेव प्रस्थकादिदृष्टान्तोपदेशादस्मिन् नये विशेषे- भ्योऽन्यदेव सामान्यम् , अनुवृत्तिबुद्धिहेतुत्वात् , सामान्याच्चान्य एव विशेषाः, व्यावृत्तिबुद्धिहेतुत्वात् , एवमाश्रयादपि भिन्न- अन्यथा व्यक्तिवत् साधारण्यानुपपत्तेः, एवं तुल्याकृतिगुणक्रियैकप्रदेशनिर्गतागतपरमाणुषु योगिनां परस्पर- भेदबुद्धिहेतुरन्त्यविशेषोऽपि परमाणुभ्यो भिन्न एव, स्वस्मिभितरभेदबुद्धेः स्वातिरिक्तविशेषहेतुकत्वनियमाद् गोत्वादिसामान्य- विशेषस्थले तथादर्शनादित्यवधेयम् ।। नन्वेवं द्रव्यार्थविषयं सामान्यं पर्यायार्थविषयं विशेष चेच्छबैगमः साधुवदुभयनयावल- म्बित्वेन सम्यग्दृष्टिः स्यादिति चेत् १, न, परस्परं वस्तुतश्च मिन्नसामान्यविशेषोमयाम्युपगन्तृत्वेनास्य कणादवन्मिथ्यादृष्टि- त्वात् । तदुक्तं (विशे०)महाभाष्ये संमती (३-४९) च-"दोहि विणएहिणीय, सत्थमुलूएण तहवि मिच्छत्तं ॥ सविसयपहाण-तणेण अण्णोण्णणिरवेक्खा ॥२१९५॥" अस्याः-द्वाभ्यामपि द्रव्यास्तिकनय-पर्यायास्तिक- स्यार्थाः मेदाब, सा- मान्यवि- शेषाम्युप- गन्तृत्वेऽपि युत्याग्रन्थ- संवादत कणगुध पादयोर्मि- मेव सामान्यम्, समर्थनम् ।।
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ॥
या
॥४॥
नयाम्या, मीत-समर्पित,शास्त्रमुलूकेन-वैशेषिकदर्शनाधप्रवर्तकेन, तथापि तन्मिथ्यात्वमेव, यदू यस्मात् ,ताविति शेषः।
तौ पैशेषिकदर्शनप्रवर्तको द्रध्यार्थिकपर्यायार्थिको नयौ, स्वविषयप्रधानत्वेन सावधारणस्वविषयावगाहित्वेन, अन्योन्य-
मिरपेक्षौ इतरांशापलापिनी, जैनाभिमतौ तु तौ स्याच्छलामिछतत्वेन परस्परसापेक्षत्वाम मिथ्यारूपाविति भावः ।।
ननु यदि द्रव्यपर्यायोभयविषयावगाही नैगमस्तदाबास्त्रयो द्रव्यार्थिकाः, अन्त्याचस्वारः पर्यायार्थिका इति सिद्धसेना-
चार्याणाम् , आद्याश्चत्वारो द्रव्यार्थिका अन्त्याखया पर्यायार्थिका इति जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादानां च विभागवचनं
व्याहन्येत, नैगमस्योमयान्तःपातित्वेन पर्यायार्थिकाधिक्यात् , न चोमयविषयकत्वेऽपि द्रव्यांशे प्राधान्येनास्य द्रव्यार्थिफस्वमे-
पेति वाच्यम् । पर्यायांशेऽपि कचिदस्य प्राधान्यदर्शनात् , त्रिविधो अयमाकरादाबुदाहियते, धर्मयोधर्मिणोर्मधर्मिणोध
प्रधानोपसर्जनभावेन विवक्षणात्, तत्र "सञ्चैतन्यमात्मनी"स्यायो मेदः, अत्र चैतन्याख्यस्य धर्मस्य विशेष्यत्वेन प्राधान्यात् ,
सचाख्यधर्मस्य तु विशेषणत्वेनोपसर्जनभावात् १ ॥ “वस्तुपर्यायवद्रव्य"मिति द्वितीयो मेदः, वस्त्वाख्यधर्मिणो विशेष्यत्वेन
प्राधान्यात्, पर्यायवाव्यस्य तु विशेषणत्वेनोपसर्जनभावात् २ ॥ "क्षणमेकं सुखी विषयाऽऽसस्तो जीवा" इति तृतीयो मेदा,
अत्र विषयासक्तजीवाख्यधर्मिणो विशेष्यत्वेन मुख्यत्वात् , सुखलक्षणधर्मस्य तु विशेषणत्वेनोपसर्जनत्वात् ३॥ इत्वं चात्र धर्म-
प्राधान्ये पर्यायप्राधान्यात् पर्यायार्थिकत्वमपि दुर्निवारमिति घेत?, सत्यम् , द्रव्यपर्यायोभयग्राहित्वेऽपि नैगमस्याधिकृतवस्तुनि
द्रव्यपर्यायान्यवरात्मकत्वजिज्ञासायां द्रव्यांशाप्रतिक्षेपेणैव द्रव्यार्थिकत्वनिरिणाद, अन्यथा सामान्यरूपस्थास्य सनहे विशेष.
रूपसप व्यवहारेऽन्तविपक्षे व्यवहारस्यापि द्रव्यार्थिकसायाधिस्वस्वापत्ते, निर्माते च स्वस्वान्यविषयातिपेणैव द्रव्यपर्या
त्यारेकाया
आकरा-
दाइतनैय-
ममेदत्रैवि-
ध्यप्रदर्षने-
न निर-
॥४॥
यत्राहिणोई पार्मिकस्व-पर्यायार्थिकस्वे नियुक्तिभाष्यावौ। तदाह सामायिकमाश्रित्य एतचिन्तायां भगवान् भद्रबाह- (आव०नि०) "जीवी गुणपडिवनी, यस्स दबट्टियस्स सामइयं । सो घेव पञ्जवडिय-नयस्त जीवस्स एस गुणो ॥२६४३॥" अस्था:-द्रव्यमेवार्थो यस्य न तु पर्यायाःस द्रव्यार्थिकस्तस्य नयस्य मतेन, जीव आत्मा,गुणप्रतिपन्नः सामायिकम्, न तु समतागुणरूपः पर्यायः । अस्य मते गुणाः खल्वौपचारिकत्वात् "आदाषन्ते च यमास्ति, वर्तमानेऽपि तत् तथा" इत्पा- दिन्यायाद् द्रव्यव्यतिरेकेण तेषामनुपलम्माचासन्त एव । कथं तहिं घटादिद्रव्ये रूपादिगुणप्रतीतिरिति चेद् !, प्रान्तव, चित्रे निम्मीमतप्रतीतिवदिति दिग्॥स एवं सामापिकादिर्गुणः, पर्याय एवाथों यस्य न तु द्रव्यं स पर्यापार्थिकमयस्तस्य मते परमार्थतोऽस्ति,न तुजीवद्रव्यं, यस्माजीवस्यैष गुणो जीवगुण इति षष्ठीतत्पुरुषसमासोऽयं, स चोचरपप्रधाना, यथा तैलस्य पारा तैलधारेति । न चात्र धारातिरिक्तं किमपि तैलमस्ति, एवं ज्ञानादिगुणातिरिक्त जीवद्रव्यमपि नास्तीति पर्यायार्षिका- मिप्रायः ।। अत्र भाष्यम् ॥ इच्छा जे दवनओ, दक्षं तचमुक्यारजी य गुणे ॥ सामइयगुणविसिहो, तो जीवो तस्स सामह ॥२६४४॥ पजामोषिय वत्पु, तचं दधं च तदुक्याराओ ।। पजवणयस्स अम्हा, सामइयं तेण पणाओ ॥२६४५॥" प्रायः स्पटेशनवर तदुपचारादिति तेषु पूर्वापरीभूतपर्यायेचूपचरणमुपचारः सांपती कल्पना,ततो व्यनहियते, न तु परमार्यतो द्रव्य- मस्तीत्यर्थः । एतदेव पर्यायार्थिकमतं युक्त्या समर्थयति भाष्यकृत्-"पजावनपमयमिणं, पहायस्यंतरं को वर्ष । उव- समयवहारा-माषाओ खरविसाण व ॥ २६४६ ॥ जह रूपाइविसिडो, न घडो सबप्पमाणविरहाओ। वह नाणाइविसिडो, को जीवो णामऽणक्खेओ ? ॥२६४ा" नास्ति परपरिकल्पितं द्रव्यं पर्यायेभ्योऽर्थान्तरत्वात् खरविषाणवत् । यहा नास्ति पर- महिश्य म- गवताभद्र- बाहुखामि- ना प्रदर्शि- तस्यव्य- पर्यायाधि- | कनयपी- विचार, विषयं भा- ब्यविवरण वितम् ॥
भी बनेकान्त- व्यवस्था प्रकरणम् ॥ सामायि- कोदेशेन नयविचार- स्य निर्य- परिकल्पितं द्रव्यं पर्यायेभ्यो मेदेनानुपलभ्यमानत्वाद् व्यवहारेऽप्रयुज्यमानत्वा वा खरविषाणवदिति प्रयोगः॥ यथा वारूप- रस-गन्ध-स्पर्शेभ्यो विशिष्टो मियो घटो नास्ति, प्रमाणैर्ग्रहणाभावात् खरविषाणवत् , तथाऽनाख्येयः पर्यायविरहेण सर्वो- पाख्यारहितो, ज्ञानादिभ्यो विशिष्टो-व्यतिरिक्तः को नाम जीवो, नास्ति कश्चनाप्यसाविति भावः। उक्तप्रयोगेषु धर्मिदृष्टा- न्ताधसिद्धिर्नाशकनीया, विकल्पसिद्धानां तेषां साम्प्रदायिकैरभ्युपगमात् । स च विकल्पोऽखण्डालीकव्यवहारनिर्वाहकास- त्यख्यातिरूपा, खण्डशः प्रसिद्धपदार्थयोरलीकसम्बन्धव्यवहारनियामकाहार्यशाब्दभ्रमलक्षणान्यथाख्यातिरूपो वेत्यन्यदेतत् ।। द्वितीयपक्षेऽन्यत्र सत एवान्यत्रारोप इति द्रव्यस्य सवप्रसक्तिरिति चेत्, न, सभागक्षणसन्ततिरूपद्रव्यपदार्थे पर्यायात् पृथक्त्व- अमोत्तर-पर्याये तत्सम्बन्धोपचारेणापि तत्सन्चासिद्धेरिति दिग्॥ एतदेव पर्यायाथिकमतं (आवश्यक) नियुक्तिकृदपि समर्थ- यत्राह-"उप्पअंति वियंति य, परिणमंति य गुणा ण दवाई। दरप्पभवा य गुणा, ण गुणप्पमवाई दवाई ॥२६४८॥ अस्या- र्थ:-उत्पद्यन्ते व्ययन्ते उत्पादव्ययावच्छिन्नखभावेन च परिणमन्ते, द्वितीयचकारस्यैवकारार्थस्य गुणा इत्यनन्तरं सम्ब- न्धाद् गुणा एव पर्याया एव, न तु द्रव्याणि अतस्त एव सन्ति, पत्रनीलरक्ततादिवत् , न तु द्रव्याणि, उत्पादव्ययपरिणाम- रहितत्वाद् बन्ध्यासुतादिवदित्यर्थः । किञ्च द्रव्यात् प्रभवो येषां ते द्रव्यप्रभवा गुणा नेत्यत्र विश्रामः, ततो द्रव्यमभवा इत्यनन्तरं चकारस्याप्यर्थस्य व्यवहितसम्बन्धानकारस्य चाऽऽवृत्तिकरणात् नापि गुणप्रभवाणि द्रव्याणि भवन्तीत्यर्थसिद्धेर्न कार- गत्वं नापि कार्यत्वं द्रव्याणामित्यसन्त्येव तानीत्युत्तरदलार्थः। अथवा द्रव्यप्रभवाश्च गुणा न भवन्ति, गुणप्रभवाणि तु द्रव्याणि मवन्ति, पूर्वापरीभावेन प्रतीत्य समुत्पादसमुत्पन्ने गुणसमुदाये द्रव्योपचारप्रवृत्तेः, तस्मात् सांवृतकार्यरूपापेक्षयाऽसांवृतकारण- क्तिमाय- संवादेन विशेषतो निरूपणम्॥
- रूपस्यैवाम्यहितत्वाद् गुण एव सामायिकमिति नियुक्तिगाथार्थः ॥ एतदेव भाष्यकृवाह-(विशेषावश्यकमाष्य) " उप्पायविगत(म)परिणा-मओ गुणा पत्तनीलयाइव ॥ संति न उ दवमिट्ट, तबिरहाओ खपुष्पं व ॥२६४९॥ ते जप्पमवा जं वा, तप्पभवं होज होज तो दवं ॥ णय तं ते चेय जओ, परोप्परप्पञ्चयप्पमवा ॥ २६५० ॥" एकदेशिमतमुत्थापयति- "आहाऽवक्खाणमिदं,इच्छह दवमिह पञ्जवणओवि ।। किंतचंतविमिने, मनइ सो दवपजाए ॥२६५१॥ उप्पायाइसहावा, पजाया जं च सासयं दवं ॥ ते तप्पभवा ण तयं, तप्पभवं तेण ते मिन्ना ॥ २६५२ ।। जीवस्स य सामइ, पजाओ तेण तं तओ मित्रं ॥ इच्छइ पजायणओ, वक्खाणमिणं जहत्थंति ॥२६५३॥" आह कश्चिद् व्याख्यात्रामास:-ननु पर्यायार्थिकनयमते यदिदं सर्वथा द्रव्याभावव्याख्यानं भवद्भिः कृतं तदयुक्तमेव, यत इह पर्यायनयोऽपि द्रव्यमिच्छत्येव, किन्तु परस्परम- त्यन्तमिन्नावेव द्रव्यपर्यायावसौ मन्यते, न पुनः कथञ्चिदेव, इत्येतावता सिद्धान्तादस्य भेद इति ॥ कुतः पुनरस्य द्रव्यपर्याययोरत्यन्तं भेद इति, आह, यद् यस्मादुत्पादव्ययपरिणामस्वभावाः पर्यायाः, शाश्वतं नित्यं, पुनद्रव्यं, किन ते गुणास्तत्मभवा द्रव्यलब्धात्मळाभाः, न पुनस्तद्रव्यं तत्पभवं गुणेभ्यो लब्धात्मस्वरूपं, तेन ते द्रव्यपर्याया मिन्नाः॥ यस्माच जीवस्य शाश्वतस्य, तळ्यतिरिक्तं सामायिकं पर्यायः,तेन तत् सामायिक, ततो जीवाद्, भिन्नमत्यन्तव्यतिरिक्तं, इच्छति पर्यायनयः, अतो मदीयं व्याख्यानमिदं यथार्थ घटमानकं, पर्यायार्थिकामिमतद्रव्यपर्यायात्यन्तमेदव्याप्यवैषH- ज्ञानपरतया "उप्पजति वियंति ये"त्यादिनियुक्तिगाथाया न्याय्यत्वादिति निर्गलितार्थः॥ एतन्मतमपाकुर्वन् स्वव्याख्यान समर्थयन्नाह-"जह पजायनउ चिय, सम्ममइ दोवि दवपजाए ॥ दबडिओ किमहुं, जह व मई दोवि जममिन्ने ॥२६५४॥ वरणद्वारा द्रव्यपर्या- | ययोर्मेद निरूपणं त- द्विषये वि- प्रदर्शनश्च।
मायसंवा देन विशे- श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ पतो द्रव्या पर्यायामेद- वादिमत- निरसनं - ॥६॥ द्विषये ए. र सो तेजोमय-समयग्गा वि सह पिहम्भूज॥ मिच्छचमिहगता देगवणचगाहाजो ॥२१५५॥ एगचे मषु दक्ष, गुणोपि पजापरपणमिमियं ॥ तम्हा तं दई वा, गुणो व दवडिअग्गाहो ॥२६५६।। जइ मिनोमयगाही, पजायमजी तदेगपक्वमि॥ अविका वेष तप, किमको दबडियनएण ॥२६५७॥ तम्हा किं सामह, हजाद गुणोचि चिंतेयं ॥ दष्ट्रियस्स दा, गुणो य ते पजवणयस्स ॥२६५८॥ इहरा जीवाण, दमयस्सेयरस्स मिति ॥ उभयनजोमयगाहे, पटेडणेकेकगामि ॥२५५९॥" व्याख्या-यदि मोः, पर्यायमय एष द्रव्यपर्यायौ द्वावपि सम्मन्यते-अम्युपगच्छति, तर्हि द्रव्यार्थिकाकिमर्थ 'द्रव्यपरिकल्पना त्वयेष्यत इति शेषः । पर्यायनयाभ्युपगमेनापि द्रव्यस्य सिद्धत्वादिति भावः ॥ यदि वैवम्भूता मतिः स्यात् परस्य, द्वावपि द्रव्यपर्यायौ, यद् यस्माद् अभिन्नौ परस्परात्म(रमे)कत्वमापनौ ॥ इच्छति स द्रव्यार्थिकनय इति सम्बन्धः । तेन कारणेनेदमुभयं द्रव्यपर्यायार्थिकनयवयं, उभयग्राहेऽपि सति प्रत्येकामयाम्युपगमेऽपि सति, पृथग्भूतं मिन, एकेनोभयोरत्यन्तममेदाम्युपगमादन्येन चाऽत्यन्तमेदाभ्युपगमादित्यर्थः । तथा प्रत्येकमुभयग्रहेऽप्युभयं मिथ्यात्वमेकाम्तादेकान्तेन प्रत्येकमेकत्वान्यत्वग्रहात् ॥ तत्रोच्यते-ननु द्रव्यपर्याययोरेकत्वे त्वदमिप्रायतो द्रव्या- थिकेनेष्यमाणे द्रव्यं गुण इति ध्वनियमिदमेकार्थवाचकत्वादिन्द्रपुरन्दरादिध्वनिवत् पर्यायवचनमात्रमेव स्यात्, तस्मात् सामायिक, द्रव्यं वा गुणो वेति द्रव्यार्थिकनयग्रहः स्यात् , न पुनस्तद्रव्यमेवेति तद्ब्रहो भवेद, न चैव- मिष्यते, द्रव्यार्षिकमयमतेन द्रव्यरूपस्यैव तस्य प्रसिद्धरिति ॥ तथा, यदि भिशोभयग्राही पर्यायनयस्त्वयेज्यते, तदैक- पसे एकद्रव्यांपग्रहवेलायाम् , अविरुद्धमेव तत् सामायिक, द्रव्यत्वेनेति शेषः । अतः किद्रव्यापिकनषेनोपम्पस्तेन ।। तिविस्तर प्रदर्शनशा तदर्थस्थान्यत एव सिद्धेः, अनन्यलभ्यस्यैव विषयस्य नयान्तरकल्पकत्वात् ।। तस्मात् किं द्रव्यं गुणो वा सामायिक- मितीयं चिन्ता प्रस्तुता, अस्यां चिन्तायामुच्यते-द्रव्याथिकनयस्याभिप्रायेण द्रव्य, पर्यायाथिकनयस्य मतेन गुणय, तत् सामायिकमित्येव व्याख्यानं श्रेयः ॥ इतरथाऽन्यथा पुनद्रव्यार्थिकस्य जीवादनन्यत् सामाणिक, इतरस्य तु पर्यायाधि- कस्य, जीवाद मि तद्, इत्येवं व्याख्यायमानं प्रागुक्तयुक्त्या, न घटेतेति शेषः॥कथं पुनर्घटेत इत्याह-उभयनयस्योमयो- नययोर्मिलितयोरुभयग्राहे प्रत्येकोपनीतैकैकविषयसमावेशेनाभ्युपगम्यमाने सर्व घटेत, न त्वेकैकग्राहे, एकैकस्योभयविषयक- स्वाम्युपगमे, एवं हि मिलनस्याधिकविषयानुपनायकत्वेनानतिप्रयोजनत्वादित्यर्थः ॥ स्यादेतत् , प्रत्येकमेकैकविषयत्वेऽप्यु- मयोमिलनस्य स्यात्कारलाञ्छनेन सम्यक्त्वापादनमेव प्रयोजनं तत्प्रत्येकमुमयविषयकत्वाभ्युपगमेऽपि निष्प्रत्यूहं तव मते स्याद्गुणविशिष्टजीव एव सामायिकम्, स्थाजीवगुण एव सामायिकमिति मिलितामिलापवन्मम मते स्याजीवाभिमगुण एव सामायिकं स्याजीवभिन्नगुण एव सामायिकमिति मिलिताभिलापस्यापि सम्भवात् , न चैवं भङ्गादयेऽपि द्रव्यप्राधान्याऽलामा, स्याशीवामिभगुण एवेत्यादेः स्याद्गुणामिनजीव एवेत्यादेरपि समानसंविसंवेद्यतया लाभाभ्युपगमात् ॥ किं च मम मते 'जीवो गुणप्रतिपम इति नियुक्तिप्रतीके गुणामिन इत्यर्थे साम्मुख्यम् , तव मते तु गुणानामौत्प्रेक्षिकत्वेन शुक्तौ रजतारोप- स्थले शुक्तौ रजतस्येव जीवे गुणानां वैज्ञानिकसम्बन्धस्यैवाभ्युपगमेन गुणनिरूपितवैज्ञानिकसम्बन्धवानित्यर्थों वाच्य इत्य- साम्मुख्यम् । ननु मम मते द्रव्यास्तिकपक्षे द्रव्यगुणपदयोरामेदेन पर्यायत्वापच्या द्रव्यं गुणो वेत्येकतरनिर्धारणानुपपत्तिा, सव मते द्रव्यार्थिकपक्षे गुणस्येव मम मते द्रव्याथिकपक्षे द्रव्यगुणयोरमेदस्य वास्तवत्वेऽपि गुणे द्रव्यमेदस्योत्प्रेक्षिकस्याङ्गी. द्रव्यपर्या- यामेदवा- दिमतनिर- सनं तद्विषये युक्तिविस्त- रप्रदर्शन- ॥
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ॥
कारेण तमादाय द्रव्यगुणपदयोः पर्यायत्वापरयुद्धारादिति चेत्, मैवम् , सामायिके द्रव्यगुणत्वान्यतरव्याप्यशुद्धधर्मप्रकारक-
जिज्ञासायां तादृशविशिष्टधर्मप्रकारकबोधजनकनयशब्दप्रयोगस्यासङ्गतत्वापत्ते१रुद्धरत्वात् , न हि कोऽयमिति षटजिज्ञासायां
चैत्रावलोकितमैत्रनिर्मितघटोऽयमित्यनुन्मत्तः प्रयुते ॥ अथ सामायिकपदात् सामायिकोपस्थितौ तत्र द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिक-
नयान्यतरप्रकारप्रकारकज्ञानस्येष्टसाधनत्वज्ञानात् , तथैव जिज्ञासया तथैव प्रश्नात् , तथैव प्रतिवचनरूपनयशब्दप्रयोगो नानु-
पपम इति चेत्, न, वक्त्रभिप्रायरूपनयपक्षेऽन्योन्याश्रयात् । एवं सति सामायिके द्रव्यपर्यायात्मकत्वस्याद्वादात् तत्कुक्षिप्र-
विष्टतभेदाभेदस्याद्वादस्यानतिरिक्तत्वप्रसङ्गाच्च । न चेष्टापत्तिः, तत्र द्रव्यपर्यायात्मकत्वस्याद्वादसिद्धावपि तद्भेदाभेदस्याद्वा-
दोत्थापनमूलाकासाव्युपरमाऽभावादिति दिग् ।। अथ यदुक्तं-"सोचेव पजवट्टिय-नयस्स जीवस्स एस गुणो त्ति"। एतदवष्टभ्य
परःप्राह-"नणु भणियं पजाय-ट्टियस्स जीवस्स एस हि गुणोत्ति॥ छट्ठीए तओदवं, सो तं च गुणोतओ मिनो ॥२६६०॥"
व्या ननु सो चेवेत्यादिनियुक्तिगाथोत्तरार्धे भणितं पर्यायार्थिकनयमतेन जीवस्यैष सामायिकलक्षणो, गुण इति।
हि-यस्मात्, षष्ट्या षष्ठीनिर्देशादवसीयते, ततः स जीवो, द्रव्यं तच सामायिक, गुणः स च सामायिकगुणः, ततो,
जीवद्रव्याद्, भिन्न इति पर्यायनयमते भिन्नद्रव्यपर्यायोभयसद्भावस्य श्रौतत्वान्मदीयमेव व्याख्यानं श्रेय इति परस्याकूतम् ।।
अत्रोत्तरमाह-" उप्पायमंगुराण, पइक्खणं जो गुणाण संताणो ॥ दद्योवयारमेत्तं, जइ कीरइ तम्मि तमाम॥ २६६१॥ तन्मे-
यकप्पणाओ, तं तस्स गुणोत्ति होउ सामइयं ।। पत्तस्स नीलया जह, तस्संताणोदियरथमिया ॥२६६२॥" व्या० ननु पर्यायाथिकमते
वालवं द्रव्यं त्वयेष्यते कल्पितं वा, यद्यायः पक्षः, स न युक्तो ' जइ पञ्जायनओचिये (गाथा २६५४ ) त्यादिनोस्तोत्तर-
द्रव्यपर्या-
यामेदवा-
दिमतनिर-
सनं तद्विष-
ये युक्तिवि-
स्तरप्रदर्श-
नश्च॥
॥७॥
त्वात् । अथ द्वितीया, तत्रोच्यते-उत्पावभङ्गुराणां प्रतिक्षणमुत्पादव्ययगुणयोगिनां, गुणानां यः सन्तानः समागसन्त- तावनवरतप्रवृत्तिस्तस्मिन् यदि समान खभिधानहेतुत्वेन निवन्धनेन द्रव्योपचारमानं क्रियते षष्ठीवादिना भवता, तदा तन्नाम नामेत्यम्युपगमे मन्यामहे तदित्यर्थः, न हि कल्पितद्रव्यसद्भावो वास्तवं द्रव्याभाव विरुणद्धि, ततश्च तद्भेदकल्प- नात् तेन कल्पितद्रव्येण सह भेदकल्पनात्, तत् सामायिकं, तस्य कल्पितजीवद्रव्यस्य गुणो भवतु, को निवारयिता ?, यथा पत्रस्य गुणसमुदायव्यतिरिक्तस्य कल्पितस्य, तत्सन्ताने तस्मिन्नेव उदितोत्पना, अस्तमिता च विनष्टा, नीलता गुणो व्यवहियते, तथा प्रकृतकल्पनायामपि व्यवहर्तृणां न बाधकम् । आशूत्पत्तिदोषेण क्षणिकगुणसन्ताने भेदाऽग्रहादमेदेना- ऽध्यवसिते तत्र द्रव्यप्रवृत्तरित्यर्थः। न च वक्तव्यं 'देवदत्तस्य गाव:' इत्यादौ वास्तव एव सम्बन्धिद्वये षष्ठीदर्शनामोक्तोपपत्ति- रिति, 'राहो शिरः, शिलापुत्रकस्य शरीरम्' इत्यादिमिर्व्यभिचारात् ॥ ननु गुणसन्तानयोर्घटतत्स्वरूपवद् मेदकल्पनैव न सम्म- वति, तभिवन्धनधर्माभावाद , षष्ठी चामेंदाथिकैव, घटस्य खरूपमित्यत्रेव । न चैवं घटस स्वरूपमितिवद् घटस्य घट इति प्रयोगापत्तिः, 'अप्रयोगादेवाप्रयोग' इतिन्यायेन तदनापत्तेः । समानविशेष्यत्वप्रत्यासत्या घटादिनिरूपितषश्यमेदप्रकारक- शान्दोघे स्वरूपादिपदजन्यपदार्थोपस्थितेहेतुत्वान्न तदापत्तिरिति न्यायमार्गः। तथा च कथं कल्पितस्यापि गुणव्यतिरेकिणो द्रव्यस्य सद्भाव इत्याशवायां मेदकल्पनानिषन्धनं धर्मभेदमुपदिदर्शयिषुराह- "उप्पायमजुरा जं, गुणा य न य सो तिते य तप्पभवा । न यसो तप्पभवोत्ति य, जुञ्जइ तं तदुक्याराओ ।।२६६३॥" व्या० यत्-यस्माद्, उत्पादभरा गुणाः, न चासो सन्तान उत्पादभरगुरः, तस्य प्रवाहनित्यतया स्थितत्वादित्येको गुणसन्तानयोधर्ममेदः, तथा, ते सामायिकादयो नीलता- पर्यापार्थि- नये द्रव्यस कल्पितस्य कल्पितो गुणमेदा तत्र भाष्य- सम्मतिः॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ॥
दयो वा गुणाः, तत्रैव सन्ताने प्रभवः उत्पत्तिर्येषां ते तथा, न पुनरसो सन्ताना, तत्प्रभवो गुणेभ्यो लब्धात्मलामा,
तस्य गुणसादृश्यनिबन्धनत्वात् , तथा च कारणमेव सन्तानः, न कार्य, कार्यमेव च गुणाः, न कारणमित्येष द्वितीयो गुण-
सन्तानयोधर्ममेदा, इति युज्यते तज्जीवद्रव्यं, तदुपचारात्तत्र गुणसन्ताने गुणेभ्यो मेदकल्पनात् ।। तदेवं पर्यायाथिकन-
यमतं युक्तितः समर्थितम् ।। अथ द्रव्यार्थिकनयाभिप्राय दिदर्शयिषुराह-"पीयस्स दवमेतं, णस्थि तदत्यंतरं गुणो णाम ।।
सामनावत्थाणा-ऽभावाओ खरविसाणं व ॥२६६५॥ आविब्भावतिरोमा-वमेत्तपरिणामिदवमेवेयम् ॥ णिचं बहुरूवं चिय, ण-
डोब संतरावण्णो॥२६६६॥" व्या० द्वितीयस्य द्रव्याथिकनयस्य सर्व सुवर्णरजतादिकं द्रव्यमानमेवास्ति, गुणस्तु रक्तत्व-
घेतत्वादिकस्तान्तरभूतो नास्ति, तस्य सामान्यरूपतयाऽवस्थानाभावात् स्वरविषाणवत्, तथाहि आविर्भावः
कुण्डलादिरूपेणामिव्यक्तिः, तिरोभावश्च मुद्रिकादिरूपेणानमिव्यक्तिः, तावेव तन्मात्रं, तेन परिणन्तुं-प्रवर्तितुं शीलं यस्य
तत् तथा । द्रव्यमेवेदं सुवर्णादिकमस्ति, न तु तदतिरिक्ता गुणाः । किम्भूतं द्रव्यम् , नित्यम्-अविचलितखभावं, बहु-
रूपं च करणा-द-कुण्डल-मुद्रिकादिबहुपरिणाम, राम-रावण-भीमा-ऽर्जुनादिसम्बन्धीनि वेषान्तराण्यापनो नट इव ।।
द्रव्याधिकस्य समर्थनार्थ नियुक्तिकुदप्याह-"जं जं जे जे भावे, परिणमइ पओगवीससादई । तं तह जाणाइ जिणो, अपजवे
जाणणा पत्थि ॥२६६७॥" व्या० पओगवीससत्ति लुप्तविभक्तिको निर्देशः, प्रयोगः 'चेतनावतो व्यापारा', विस्रसा
'खमावः', ताम्यां यान् यान् भावान् कृष्णत्व-रक्तत्व-पीतत्व-शुक्लत्वादीन् , यदू यद् द्रव्यं घटा-प्रधनुरादि, परिण-
मति-आत्मसात् कुरुते । प्रयोगविस्रसाद्रव्यमित्येकसमासस्वीकारे प्रयोगविस्रसानिष्पभद्रव्यमित्यर्थे द्रव्यपदस
पर्यायार्षि-
कनयसम-
र्थनोपसंहा-
,मा-
ज्यसंवादेन
द्रव्यार्थिक-
नयाभिमा-
योपर्णनए।
॥८॥
तु
॥८॥
द्रव्यार्थि- याद्रम्पले विनता तिरिकार पर्यायाणा- व्यक्तिवचनत्वेन तदुभयनिष्पममिश्रद्रव्यस्यैव सङ्ग्रहः स्यात् , न प्रायोगिकवैससिका (कयो)जातिवचनत्वे च जातेरनिष्पन- त्वेन बाप इत्यालोच्य प्रयोगविस्रसाभ्यामिति व्याख्यातम् । तथा च यान् यान् भावानिति कर्मचीप्सामहिम्नाधामदक्षिणह- स्ताम्यां यं यं गृहातीत्यत्रेव प्रत्येककरणान्वयतात्पर्याभानुपपत्तिरिति ध्येयम् । तं तहत्ति वीप्साप्रधानत्वानिर्देशस्य तत्तत्तथा- तथा तेन तेन रूपेण परिणमद्रव्यमेव, जानाति जिनः केवली, न पुनस्तदतिरिक्तान् पर्यायानिति भावः, तेषामुत्प्रेक्षामा- श्रेणैव सत्वात् । न धुत्फणविफणकुण्डलिताद्यवस्थासु सर्पादिद्रव्यस्य स्वरूपव्यतिरिक्तः कोऽपि पर्यायः, सर्वावस्थाऽविचलित- स्वरूपस्य सर्पादिद्रव्यस्यैव संलक्षणात् । यदि पर्याया न विद्यन्ते तदा कथमुच्यते यान् यान् भावान् परिणमत इत्यत आह- अपर्याये-पर्यायरहित वस्तुनि, 'जाणण 'त्ति केवल्यादीनां परिज्ञा, नास्ति, ज्ञानविषयतयोत्प्रेक्षामात्रेणैव तत्पर्याया: सन्ति, न तु द्रव्यव्यतिरेकिणः, अतो द्रव्यान्यसवाभावादसन्त एव पर्यायाः, द्रव्यमेव च परमार्थसदित्यर्थः ॥ ननु द्रव्यान्यसवाभावाद् यदि पर्यायाणामसचं तदा द्रव्यस्याप्यसत्वं स्यात् , न हि द्रव्येऽपि द्रव्यान्यसत्ता द्रव्यार्थि- केनाभ्युपगम्यते, किन्तु द्रव्यात्मिकैव, कालवृत्यत्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूपमसत्त्वं तु परिभाष्यमाणमपि न मौलं सत्र विरुणद्धीति चेत्, न । अविचलितकस्वभावत्वेन सत्सदिति व्यवहारविषयतया द्रव्यमेव हि मौलं सवं, तदभावाच पर्या- याणामसत्त्वमित्यर्थात् , तर्धसत्यपर्यायांशे तदवगाहिकेवलज्ञानस्य भ्रान्तत्वं स्यादिति चेत्, न, तदुपहितद्रव्यस्यैव तेन ग्रहणाम्युपगमेन तदंशेऽनान्तत्वात् । न चोपहितानुपहितमेदेऽपि द्रव्यमेदापत्तिः, घटपटाकाशामेदवत् तदभावात् , न चासतोऽनुपधायकत्वं, प्रतिसूर्यस्य जलोपधायकत्ववदविरोधात् , केवलिना केवलज्ञानोपयोगे प्राधान्येनाविषयीक्रियमाण- निरुक्तं
केवलज्ञान-
स्यैव पदा-
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥९॥
स्वमेव वा द्रव्यार्थिकमते पर्यायाणामसत्वम् , न चेदं परिभाषामात्र, निश्चयतः केवलज्ञानस्यैव पदार्थसत्तायां प्रमा-
णत्वात् । छानस्थिकज्ञानानां संवादादिना व्यवहारत एव प्रामाण्याभिमानादिति दिग् ॥ उक्तमेव प्रकृतगाथार्थ
भाष्यकृद् विवृणोति-" जं जाहे जं भावं, परिणमइ तयं तया तओणन्नं ॥ परिणइमेतविसिट्ठ, दवं चिय जाणइ जिणिदो
॥ २६६८॥" च्या० इह यदु घटेन्द्रधनुरादिद्रव्यं, यदा-यस्मिन् काले, यं रक्त-श्वेतादिकं, भावं परिणमति तत् तदा
ततः पर्यायादनन्यद्रव्यमेव, परिणतिमात्रविशिष्टं वस्तुतोऽविचलितस्वभावं जानाति ॥ कुण्डलादिकमिव संस्था-
नविशेषविशिष्टं सुवर्ण कुण्डलादिपर्यायासवे कथं तद्व्यपदेश इति जिज्ञासायामाह-"न सुवमादन्नं कुं-डलाइ तं चेव
तं तमागारं ॥ पत्तं तववएस, लहइ सरूवादभिन्नपि ॥ २६६९ ॥" व्या० न सुवर्णादन्यत् कुण्डलादिकमभ्युपगच्छामः,
किन्तु तदेव सुवर्णमेव, तं तं कुण्डलादिरूपं, आकारं प्राप्तं तव्यपदेशं कुण्डलादिव्यपदेशं लभते, स्वरू-
पात्पूर्वावस्थामाविन उत्तरावस्थायां, अभिन्नमपि तत्तद्विशिष्टाकारनिबन्धनत्वाम निर्निबन्धनस्तद्व्यपदेशः, न च
विशिष्टमेदः शुद्धामेदप्रतिबन्धीति भावः ॥ एवमपि यदि गुणानामन्यत्वमिष्यते तत्राह-"जइ वा दवादन्ने, गुणादओ नूण
सप्पएसत्तं ॥ होज व रूवाईणं, विभिनदेसोवलमोवि ॥२६७० ॥"व्या० यदि पुनद्रव्याद्रूपादयो गुणा आदिशब्दानवपुरा-
णादयश्च पर्याया:, अन्ये व्यतिरेकिण इष्यन्ते, तदा नूनं निश्चितं गुणादीनां स्वप्रदेशत्वमापद्यते, द्रव्यप्रदेशा हि गुणादय
इष्यन्ते, द्रव्यमेदाम्युपगमे च तेषामनन्यशरणानां स्वप्रदेशत्वमेव स्यात्, न चैतदृष्टमिष्टं वा, गुणादीनां सदैव पारतन्त्र्येण
परप्रदेशत्वस्यैव न्याय्यत्वात् । किं चैवं रूपादीनां विभिन्नदेशोपलम्भोऽपि स्यात्, 'यद् यतो मिन्नं तत्ततो मिन्नदेश
र्थसत्तायां-
प्रामाण्यम-
न्यस्यव्य-
वहारतएव
प्रामाण्यं प-
रिणतिमा
विशिष्टद्रः
व्यस्यैव के
वलज्ञानवि-
षयत्व
॥९॥
? उपलभ्यत' इतिव्याप्तेः, उपष्टम्भकभागेन व्यभिचार इति चेत्, न, परिणामाभेदवादे तस्यापीतरभागामिन्नत्वादिति भावः॥ अथोपचारतो यदि पर्याया अप्यभ्युपगम्यन्ते तदा सिद्धसाध्यतेति दर्शयन्नाह-" जइ पञवोवयारो, लय-प्पयासपरिणा- ममित्तस्स ॥ कीरइ तमाम ण सो, दहादत्यंतरभूओ ।।२६७१॥" व्या० लयस्तिरोभावो दर्शनायोग्य रूपमिति यावत् , प्रकाश आविर्भावो दर्शनयोग्यं रूपमिति यावत् , ताभ्यां यः परिणामः स एव तन्मात्र, तत्र यदि तत्तद्विशेष ख्यभिधाननिमित्त- त्वेन पर्यायोपचारः क्रियते तन्नाम मन्यामहे तदित्यर्थः, केवलं नासो पर्यायो वास्तवः कोऽपि द्रव्यावर्थान्तरभूत इत्येतदेव भुजमुत्क्षिप्य ब्रूमः ॥ ननु यदि न वास्तवः पर्यायः किन्तु कल्पितस्तदा खरशृङ्गस्याप्यसौ कुतो न भवति ? कल्प- नामात्रस्य तत्रापि मुकरत्वादित्यत आह-"दवपरिणाममित्तं, पजाओ सो य ण खरसिंगस्स ॥ तदपजवं ण णजइ, जनाणं णेय- विसयंति ॥२६७२॥"व्या० कालविशेषादिविशिष्टो द्रव्यपरिणाम एव द्रव्यपरिणाममात्रं पर्यायो नान्यः । स च न द्रव्याद् भिना, तथाऽनुपलम्भात्, नाप्यसौ खरशृङ्गस्य, द्रव्यपरिणामत्वात्पर्यायस्य, खरविषाणस्य चाद्रव्यत्वात् , अत एव तत्खर- गृहं, अपर्यवमित्यद्रव्यं सन ज्ञायते केवलिना। यतो ज्ञानं ज्ञेयविषयं, ज्ञेयं च न खरशृङ्गम् , अपर्यवत्वेनाद्रव्यत्वात् , अत एवोक्तं नियुक्तिकृता ' अपजवे जाणणा णत्थि' ति । ज्ञेयत्वाभावव्याप्याद्रव्यत्वव्याप्यधर्मप्रदर्शनपरमेतत्, पर्यायनये उत्पादव्ययभागित्वमेव सवं, द्रव्यनयेऽविचलितैकस्वभावत्वं, सिद्धान्ते तु त्रैलक्षण्यमिति सिद्धान्तमाश्रित्य ततोऽपर्याये परि- मयात्मकं वस्तु, केवलिना तथाऽवगतत्वादिति हरिभद्राचार्या निगमयामासुः । तदेवं द्रव्यार्थिकः पर्याय प्रतिक्षिपति पर्यायार्थिकस्तु द्रव्यमिति द्रव्यांशाप्रतिक्षेपामैगमो द्रव्यार्थिक इति व्यवस्थितम् ।। न च तथा तजातीयेन पर्या- द्रव्यनये पर्यायस्यौ पचारिकत्वे भाग्यसंवा- दः अपर्य- वसासतः खरविषा- णय केवल ज्ञानाविष- यत्वञ्च॥ सानास्ति नैगमस्य द्रव्यार्थि- कत्वमेव, व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ ॥१०॥ पाप्रतिक्षेपात्पर्यायार्थिकत्वमपि स्यादिति वाच्यम् , 'यजात्यवच्छेदेन द्रव्याप्रतिक्षेपित्वं तआतीयस्य तन्मयत्वम्' इत्येवं परिभाष- णात् ॥ वस्तुतः क्षणिकत्वादिविशेषणशुद्धपर्याय नैगमो नाभ्युपगच्छत्येव । किश्चित्कालस्थाय्यशुद्धतदम्युपगमस्तु सचामहा- सामान्यरूपद्रव्यांशस्य घटादिसत्तारूपविशेषप्रस्तारमूलतयाऽशुद्धद्रव्याभ्युपगम एव पर्यवस्यतीति न पर्यायार्थत्वं तस्य, अत एव सामान्यविशेषविषयमेदेन सहव्यवहारयोरेवान्तर्भावेन शुद्धाशुद्धद्रव्यास्तिकोऽयमिष्यत इति ।। "दबडियनयपयडी, सुद्धा संगहपरूवणाविसओ ॥ पडिरूवे पुण वयण-स्थणिच्छओ तस्स ववहारो॥४॥"(कांड)त्ति सम्मतिगाथायां पृथग् नोदाहृतः । अस्या अर्थः " द्रव्यास्तिकनयस्य प्रकृतिः स्वभावः, शुद्धा विशेषासंस्पर्शवती, संग्रहस्यामेदग्राहिनयस्य, या प्ररू- पणा प्ररूप्यतेऽनयेति कृत्वाऽभिधायकपदसंहतिस्तस्या विषयः, उपचारात्तदेकविषयेत्यर्थः । प्रतिरूपं प्रतिविम्ब घटादिनाs- शुद्धद्रव्येण सङ्कीर्णा सत्तेतियावत् । तत्र, पुनस्तस्य द्रव्यास्तिकस्य, यो वचनार्थनिश्चयो निवृत्तिप्रवृत्युपेक्षालक्षणव्यवहारस. म्पादकशब्दार्थनिर्णयः, स व्यवहारः, प्रतिरूपं सङ्कीर्णा सत्ता, पुनःशब्देन प्रकृतिः स्मार्यते, वचनं व्यवहारसम्पादक: शब्दः, घट इति विभक्तरूपतयाऽस्तीत्यविभक्तात्मतया प्रतीयमानस्तदर्थः, तस्य निर्गतः पृथग्भूतः, चयः परिच्छेदः, तथा च तस्य द्रव्यार्थिकस्य सङ्कीर्णसत्ताप्रकृतिर्वचनार्थनिश्चयो व्यवहार " इति टीकानुगतार्थः ।। अत्र नैगमो न पृथग् जगृहे सग्रह- व्यवहारविषयातिरिक्ततद्विषयासिद्धेरिति । येषां तु मते पृथक् नैगमनयो विद्यते ते प्रतिपत्तृमेदानानातदभिप्राय वर्णयन्ति । यतः केषिवाहुः "पुरुष एवेदं सर्व " इत्यादि । यदाश्रित्योक्तं--"ऊर्ध्वमूलमघाशाख-मश्चत्यं प्राहुरव्ययम् ॥ छन्दांसि यस्य पर्णानि, यस्तं वेद स वेदवित् ॥" (गीता अ० १५) पुरुषोऽप्येकत्वनानात्वमेदात्कैश्चिदम्युपगतो वेषा। नानात्वेऽपि हारयोरेवा- स्यान्ता वादनुक्तिः सम्मती,त- वाल्याने चतस्यपा- र्थक्ये ना- नाभिप्रायो- पदर्शनशा नेगमीया नानामिप्रा- या:सम्म- |त्युक्ताद- चिंता, तस्य कर्तृत्वाकर्तृत्वमेदः परैराश्रितः, कर्तृत्वेऽपि सर्वगतेतरमेदः । असर्वगतत्वेऽपि शरीरव्याप्स्यव्याप्तिम्यां मेदः । व्यापित्वेऽपि मूर्तेतरविकल्पाद् मेद एव ॥ अपरैस्तु प्रधानकारणकं जगदम्युपगतम्, तत्रापि कैश्चित्सेश्वरनिरीश्वरमेदो. ऽभ्युपगतः, अन्यैस्तु परमाणुप्रभवमभ्युपगतं जगत् । तत्रापि सेश्वरनिरीश्वरमेदाद् मेदोऽभ्युपगत एव । सेश्वरपक्षेऽपि स्वकृतकर्मसापेक्षत्वानपेक्षत्वाभ्यां तदवस्थ एव भेदाभ्युपगमः ॥ कैश्चित्स्वभावकालयदृच्छादिवादाः समाश्रिताः, तेष्वपि सापेक्षत्वानपेक्षत्वाभ्युपगमाद् भेदव्यवस्थाऽभ्युपगतैव ॥ तथा कारणं नित्यं कार्यमनित्यमित्यपि द्वैतं कैचिवम्युपगतम् । तत्रापि कार्य स्वरूपं नियमेन त्यजति न वा इत्ययमपि मेदाम्युपगमः। एवं मूतैरेव मूर्तमारम्यते, अमूरमूर्त, मूर- मूर्तम् , अमूर्तेर्मूर्त इत्याबनेकधा निगमार्थः संमतिवृत्ती व्यवस्थितः॥ एतनयमालम्ब्य वैशेषिकदर्शनं प्रवृत्तं, तन्मते द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाख्याः षडेव पदार्थाः तत्र द्रव्याणि पृथिव्यादीनि नवैव, गुणा रूपादयश्चतु- विशतिरेव, कर्मोत्क्षेपणादि पञ्चविषमेव, सामान्यं परम् , अपरम् , परापरं चेति त्रिविषं, विशेषो नित्यद्रव्यवृत्तयोऽनन्ता एव, समवायस्त्वेक एवेत्यादि निरपेक्षतया सामान्यविशेषाभ्यां बहुधा अपश्चितं, तचायुक्तम् । नव द्रव्याणि चतुर्विश- तिर्गुणा इत्यादि-स्ववचनानुरोधेनैव संख्याया अतिरिक्तत्वात् , न च द्रव्य-गुणादिषु संख्याप्रतीतौ सम्बन्धांशेऽपि वैल. क्षण्यमनुभूयते, येन द्रव्ये समवायेन तत्प्रतीतिर्गुणादौ तु संयुक्त [ स्वाश्रय ] समवायादिनेति वक्तुं शक्यते । किन शक्तिरप्यतिरिच्यते मण्यादिसमवहितेन वहिना दाहवारणाय मण्यादिसमवधानेन कुण्ठनीयाया नाश्याया वा दाहानु- कूलाया वहिनिष्ठायाः शक्तेः स्वीकार्यत्वात् । न चोचेजकामावविशिष्टमण्याघमावस्यैव दाहहेतुत्वेन तत्र दाहवारणा- लकं वैशे- विकदर्शन पदर्य ण्डितम्॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम्॥
वैशेषिकम-
तखण्डनम,
तत्रातिरि-
क्तशक्तिप-
दार्थव्यव-
स्थापनश्च।।
न्छक्तिकल्पनावैयर्थ्य । न चैवं गौरव, तत्रापि तदभावस्य शक्त्यादिहेतुत्वस्वीकाराद्, वस्तुतो रूपादिध्वंसात्मकदाहे
तद्धेतुत्वे गौरवान्मण्यादियुक्ते तृणादौ वहयाद्युत्पत्तेर्वारणीयाच विजातीयवहावेवोत्तेजकाभावविशिष्टमण्याघमावो हेतुः
स्वजन्यवहेरेव स्वस्मिन् दाहजनकत्वान्मण्यादियुक्ते न दाह इति वाच्यम्, अपरिदृश्यमानानुभूतरूपविलक्षणवस्तज-
नकाऽदृष्टविशेषादेच कल्पनायां गौरवाहाहजनकशक्तिकल्पनाया एव न्याय्यत्वात् मण्यादिसमवधानापगमानन्तरं शक्त्युत्प-
तिस्त्वप्रतिबद्धस्वकारणादेवेत्याकरे व्यवस्थितम् ॥ अप्रतिबद्धत्वं च मण्यादिसमवधानापगमकालविशेषविशिष्टत्वं काल-
विशेषस्य सम्बन्धघटकत्वं च यथा त्वयाऽभावीयविशेषणताविशेषादौ वाच्यं, तथाऽस्माभिः कारणपरिणामविशेष इति
युक्तमुत्पश्यामः ॥ किञ्च तृणादिजन्यवह्नौ वैजात्यस्यानानुभविकत्वातजन्यतावच्छेदकवैजात्यत्रयादिकल्पनातस्तृणादौ जन-
कतावच्छेदकैकशक्तिकल्पनैव लघीयसी । तृणनिर्मथनादितो वड्यनुत्पादस्तु तृणफूत्कारादिसमवधानस्याप्येकशक्तिमत्त्वेन
हेतुत्वात् , किश्च ब्रीद्यादिजनननियामकोऽपि शक्तिविशेषोऽवश्यं कल्पनीयः। अन्यथा ब्रीहिवापे बीयादीनामापरमाण्वन्त-
मङ्ग बीद्यारम्भकपरमाणुभिर्वीहय एव जन्यन्त इति नियमो न स्यात्, तैरपि कदाचिद्यवारम्भात् । न च पाकजविलक्षणरूपर-
सादिविशिष्टपरमाणूनां यवाद्यारम्भकत्वानोक्तनियमानुपपत्तिा, यत्र पाकजा न विशेषास्तत्र जलादौ क्वचिदुद्भूतं रूपादिक
कचिनेत्यत्र नियामकाभावात्तदनुकूलशक्तरवश्यं स्वीकार्यत्वात् , न च तव शक्तिविशेषप्रयोजनकाददृष्टविशेषादेवोद्भूतरूपा-
दिसम्भवः । परिणामवादे तथा तथा परिणतस्वकारणादेव शक्त्युत्पत्तरभ्युपगमात्तत्रादृष्टविशेषहेतुत्वाकल्पनात् । न चादृष्टे
पापपुण्यरूपे साइदिनुगतविशेषसम्भवः । न चावयवोद्भूतरूपादिकमेवावयव्युभूतरूपादिजनकमिति नोक्तनियमानुपपत्तिा,
॥११॥
वैशेषिकम- तखण्डन- प्रसङ्गेड- तिरिक्तवै- शिष्यस्था- पनेन सम- योग्यायोग्यजलारम्भकपरमाणुभेदाभ्युपगमे गौरवाद्वाय्वाधाकृष्टसुरभिमागाधारब्धतायाश्चम्पकादावनुपपत्तेश्च । न चेष्टा- पत्तिः। एवं सति गृह्यमाणकर्पूरादिभागानां कर्पराद्यनारम्भकाणामपगमाभ्युपगमे कर्पूरादेर्वाग्वादिनाऽप्रक्षयप्रसङ्गादिति दिग् ॥ वैशिष्ट्यमप्यतिरिच्यते, जलादौ वहथायभावप्रमायाः सम्बन्धनियतत्वादभावस्य संयोगादिवाधादतिरिक्तसम्बन्ध- सिद्धेः । न च स्वरूपसम्बन्धेनैव तत्प्रमासम्भवाम वैशिष्ट्यसिद्धिरतिरिक्तवैशिष्ट्यप्रमायामपि तथैव वाच्यत्वादिति वाच्यम् । समवायोच्छेदप्रसङ्गात् । न च गुणगुण्यादिस्वरूपद्धये सम्बन्धत्वमतिरिक्तसमवाये वेत्यत्र विनिगमकाभावेनापि तसिद्धिः, न चैवं प्रकृते, अमावस्यानुगतत्वेन तस्यैव सम्बन्धत्वादिति वाच्यम् , एवमपि जातिव्यक्तिस्थले समवायोच्छेदप्रसङ्गात् । न च समवायेन जन्यभावत्वसंयोगत्वाद्यवच्छिन्ने द्रव्यत्वादिना हेतुत्वात् समवायसिद्धिः, न च स्वरूपेण तत्सम्भवः, स्वरूपा- णामानन्त्येन गौरवात्कालिकादिस्वरूपेण स्पन्दादेरपि जन्यभाववचाचेति वाच्यम् । तथापि कालिकविशेषणतादिभिन्नपदा- र्थमात्राधारतानियामकसम्बन्धस्यैव सिद्धौ तस्यैव वैशिष्ट्याभिधानत्वात्तेन जन्यमावादेः कार्यत्वोक्तौ दोषाभावात् । न च प्रति- योगितया घटादिसमवेतनाशे स्वप्रतियोगिसमवेतत्वेन घटादिनाशस्य हेतुत्वात् समवायसिद्धिः, स्वप्रतियोगिचित्वेन हेतुत्वे घटादिवृत्तिध्वंसध्वंसापत्तेरिति वाच्यम् । तचापि जात्यादौ तदापत्तेर्महाप्रलयावृत्तित्वेन सत्वेन वा प्रतियोगिनो हेतु- त्वध्रौव्ये ममापि ध्वंसे तदनापत्तेः । न च स्वप्रतियोगिसमवायिकारणत्वेन कालावच्छिन्नस्वप्रतियोगिसमवेतत्वेन वा नाशक- त्वस्वीकारान्मम न जात्यादौ तदापत्तिरिति वाच्यम् । सम्बन्धमध्ये समवायिकारणत्वकालावच्छिनत्वप्रवेशापेक्षया लाघवा- त्सवनिवेशस्यैवौचित्येन मत्पक्ष एव दोषाभावात् । न च घटादिसमवेतनाशमाने न घटादिनाशो हेतुः, घटादिकालीनतवृत्ति- वायखण्ड- नं विस्त-
भी
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
क्रियासंयोगविभागवेगद्वित्वादिनाशे व्यभिचारात् , किन्तु प्रतियोगितया स्वप्रतियोगिसमवेतत्वस्वाधिकरणत्वोमयसम्बन्धेन
नाशवनाशत्वावच्छिन्न एव स्वप्रतियोगिसमवेतत्वेन नाशत्वावच्छिन्नस्य हेतुत्वान्न जात्यादे शापतिः, परस्य तु ध्वंसध्वं-
सापत्तिर्दुरेति वाच्यम् । स्वाधिकरणत्वस्थाने कालिकसम्बन्धेन स्ववृत्तित्वस्य सम्बन्धमध्यनिवेशे दोषाभावात्प्रतियोगिनो
विशिभ्य हेतुत्वेन ध्वंसध्वंसानापत्तेश्च । किञ्च रूपाभावान्यमहवृत्तिचाक्षुषे चक्षुःसंयुक्तमहदुद्भूतरूपवद्वैशिष्ट्यस्य हेतुत्वात्त-
सिद्धिः। न चैवमपि महत्त्वामावरूपामावयोश्चाक्षुषे कार्यकारणभावद्वयान्तरावश्यकत्वे रूपाभावान्यद्रव्यवृत्त्यमावचाक्षुषे
चक्षुःसंयुक्तोद्भूतरूपवद्विशेषणता महत्वाभावान्यद्रव्यवृत्यभावचाक्षुषे चक्षुःसंयुक्तमहत्त्ववद्विशेषणता, महत्समवेतचाक्षुषे चक्षु:-
संयुक्तमहदुद्भूतरूपवत्समवायो हेतुरिति कल्पनाया एव युक्तत्वमिति वाच्यम् । कार्यतावच्छेदके चरमामावत्वाप्रवेशे
द्वितीये च द्रव्यभेदप्रवेशे प्रथमद्वितीयाभ्यामेव निर्वाहेन तृतीयकार्यकारणमावाकल्पनेन वैशिष्ट्यवादिनो लाघवात् । न चैवं
तव पार्थिवाणुघ्राणमात्रेन्द्रियसभिकर्षे पृथिवीत्वादिप्रत्यक्षतापत्तिः, तवापि तन्मात्रसभिकर्षाजलत्वाभावादिप्रत्यक्षतापत्तेः । एत-
दिया च त्वया रूपाभावप्रत्यक्षे चक्षुःसंयुक्तमहत्त्ववद्विशेषणता, महत्त्वाभावचाक्षुषे चक्षुःसंयुक्तोद्भूतरूपवद्विशेषणता, रूपमह-
स्ववद्वृत्ते रूपाभावमहत्त्वाभावमिवस्याऽभावस्य चाक्षुषे चक्षुःसंयुक्तमहदुद्भूतरूपवद्विशेषणता हेतुरित्यभावप्रत्यक्ष एव त्रयं
वाच्यम् । मावप्रत्यक्षे चान्यत् । तथा च तृतीये कार्यतावच्छेदकेऽभावत्वाप्रवेशे भावप्रत्यक्षेऽपि वैशिष्ट्यवादिनो निर्वाहः ।
एवंच चक्षुःसंयुक्तसमवायादेरप्यस्वीकाराल्लाघवमिति चक्षुरप्राप्यकारित्वे द्रव्यचाक्षुषेऽपि चक्षुराभिमुख्यमेव नियामकमिति
गुणादिचाक्षुषेऽपि तदेव नियामक युक्तमिति सत्रिकर्षमात्रान्यथासिद्धिकारकं तदप्यतिरिच्यत इति मदेकपरिशीलितो
अतिरिक्त-
वैशिष्य-
वादे वैशे-
पिकोक्तदो-
पोद्वारला-
पवाघुपद-
र्शन ॥
॥१२॥
॥१२॥
सारश्वर रणत्वयोर- तिरिक्तप- दार्थतया व्यवस्थाप. नम्, लतादिविदितः पन्थाः ॥ द्रव्यजात्यन्यचाक्षुषे महदुभूतरूपवदिनसमवेतत्वेन प्रतिबन्धकत्वात्समवायसिद्धिरित्यन्ये । जाल. न्मत्वस्थाने नित्वान्यत्वनिवेशाचेदं युक्तमित्यपरे । द्रव्यजात्यन्यत्वस्थाने द्रव्यान्यसवनिवेशेऽपि न क्षतिरित्यपि बोध्यम् ।। सादृश्यमप्यतिरिच्यते तद्धिमत्वे सति तत्तिधर्मत्वेन तयुद्धेरनुपपत्तेरुत्कर्षापकर्षादिवत्तस्य वैलक्षष्येनैवानुभवात् ।। कारणत्वमप्यतिरिच्यते अनन्यथासिद्धत्वे सति नियतपूर्ववर्तितायाअतत्वात् । तथाहि, अनन्यथासिद्धत्वमन्यथासिद्धमिमत्वम्।। अन्ययासिद्धं पाविधम् । तत्र 'येन सहैव यस्य यं प्रति पूर्ववृत्तित्वं गृसते तदाब, यथा दण्डादिना सहैव दण्डरूपा- देषटादिकं प्रति पूर्ववर्तित्वग्रहाद्दण्डरूपादिकं, दण्डादिनात्र साहित्यं पूर्ववर्तित्वग्रहे विशेष्यतावच्छेदकत्वं, रूपादावेष पूर्ववर्तित्वग्रहाद्विशेष्यत्वमित्यन्ये । अत्र येन पृथगन्वयव्यतिरेकवता यस्य तद्रहितस्येति वाच्यम् । तेन दण्डत्वादिना दण्डा- देर्नान्यथासिद्धिा, न वा दण्डसंयोगादेर्दण्डादिना, सत्यपि दण्डादौ विना तत्संयोगादिकं कार्यव्यतिरेकात्तस्य पृथगन्वया- दिमत्त्वात् ।। न चैवं दण्डादेरपि पृथगन्वयादिमवादेव न दण्डत्वादिनाऽन्यथासिद्धिरिति, येन पृथगन्वयादिमतेति व्यर्थम् ।। स्वाभयसंयोगेन सति दण्डत्वादी दण्डादिव्यतिरेकासिद्धेर्दण्डादेरतथास्वात् ॥ न चैवं सति दण्डसंयोगादौ दण्डादिष्यति- रेका घटादिव्यतिरेकासिद्धेर्दण्डादेः पृथगन्वयायभावात् येन पृथगन्वयादिमतेत्यत एव दण्डसंयोगादेरनन्यथासिद्धौ नद्र- हितस्येति व्यर्थमिति वाच्यम् । चक्षुकपालादिना तत्संयोगान्यथासिद्धिवारणार्थ तदुपादानाद, तत्संयोगे सत्यपि चक्षु:- कपालादिनाशकाले तत्यतिरेके कार्यव्यतिरेकाचक्षुःकपालादेः पृथगन्धयादिमच्चात् ।। नन्वेवमपि दण्डादेर्दण्डत्वादित इव दण्डरूपादेरपि पृथगन्वयायभावात् कथं तेन तबूपान्यथासिद्धिरिति चेत्, न, पृथगित्यादेस्तदन्वयव्यतिरेकानियवान्वयव्य- यामिमत- ण्डनेऽन्य- वासिदिनि रूपणा
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
न्यायामि-
मतकारण-
त्वखण्डने-
अन्यथासि-
द्विनिरू-
॥१३॥
पणम् ॥
तिरेकशालित्वं नार्थः, किन्तु तदन्वयाधघटितान्वयादिमच, इत्थं च दण्डदण्डत्वयोर्न मिथस्तथात्वं दण्डत्वतत्समवायदण्ड-
संयोगादीनामुभयशरीरघटकत्वात् , दण्डादेस्तु तद्रूपादेस्तथात्वं, दण्डायन्वयस्य तद्रूपाद्यन्वयघटकतत्समवायाघटितत्वात् ,
न तु दण्डरूपादेर्दण्डादितः, तद्रूपाद्यन्वयस्य तदन्वयघटितत्वात , चक्षुःकपालादेरन्वयः कालिकतादात्म्यादितस्तत्संयोगस्य तु
समवायत इति मिथस्तत्वमेवेत्यदोषात् । न चैवं विनापि दण्डादिज्ञान रूपत्वादिना दण्डरूपादौ घटादिपूर्ववर्तित्वग्रहसम्मवा-
दूपत्वादिना तद्धेतुत्वापत्तिः । प्रत्यक्षेण ग्रहे नियमोक्तौ च न्यणुकादिकं प्रति परमाग्वादिना तद्रूपादेरन्यथासिख्यनापत्तिः, निय-
माविवक्षायां तु वैपरीत्यमपि स्यादिति वाच्यम् ॥ पूर्ववर्तित्वमित्यस्यान्वयव्यतिरेकित्वमित्यर्थात् , न च तदतिप्रसक्तेन रूपत्वा-
दिना सुग्रहमिति ॥१॥'अन्यं प्रति पूर्ववर्तित्वे ज्ञात एव यं प्रति यस्य पूर्ववर्तित्वं गृह्यते तद्वितीयम्,' यथाकाशस्य शब्द प्रति पूर्व-
वर्तित्वे ज्ञात एव ज्ञानघटादिकं प्रति तद्ग्रहादाकाशो ज्ञानघटादौ । न च शब्दाश्रयत्वेनान्यथासिद्धत्वमायेनैवेति किमनेनेति
वाच्यम् , अष्टद्रव्यान्यत्वादिना तथात्वायैतदुक्तेः, शब्दस्य घटादिकं प्रति पृथगन्वयव्यतिरेकरहिततया तेन प्राक्तनान्यथासि-
द्धेर्दुर्वचत्वाच ॥ ननु शब्दो द्रव्याश्रितो गुणत्वादित्याद्यनुमानाच्छन्दाश्रयत्वादिनोपस्थिते आकाशे विनापि शब्दपूर्ववृत्तित्वग्रह
ज्ञानघटादिपूर्ववर्तित्वग्रहसम्भव इति चेत्, न, शब्दो द्रव्यहेतुको जन्यगुणत्वादित्याद्यनुमानादेव कार्यकारणभावलक्षणानुकू-
लतर्कप्रयुक्तातत्सिद्धेः । न चैवं संयोगविभागादावप्याकाशस्याहेतुत्वापत्तिः, द्रव्यत्वेन तद्धेतुत्वसम्भवात् ।। अत एवाधारत्वेन
कालदिशोः कार्यसामान्यहेतुत्वं निष्प्रत्यूहम् । विनापि कालिकपरत्वादिपूर्ववर्तित्वग्रहमाधारत्वेन पूर्ववर्तित्वग्रहसम्मवात् ॥ न
चैवं विभुत्वेनाकाशस्यापि कार्यसामान्यहेतुत्वं स्यात्, आत्मत्वव्यापकविमुत्वेनान्यथासिद्धेः। न च स्वर्गादिपूर्ववर्तित्वेन
॥ १३ ॥
गृहीत एव यागादावपूर्वपूर्ववर्तित्वग्रहाद् यागादिकमपूर्वादावन्यथासिद्धम् , अन्य प्रति पूर्ववर्तित्वानुपपादकं यस्य पूर्ववर्ति- त्वं गृह्यत इत्यर्थात् , वस्तुतोऽन्य प्रति पूर्ववर्तित्वग्रहनियतो यं प्रति यद्धर्मावच्छिन्नस्य पूर्ववर्तित्वग्रहस्तं प्रति तद्धर्मावच्छि- भमन्यथासिद्धमित्यर्थात् , यागादेः सुखहेतुतया विहितत्वेनापूर्व प्रत्यन्यथासिद्धत्वेऽपि यागत्वादिना हेतुत्वं निष्प्रत्यूहम् , आ- काशस्यापि ज्ञानघटादौ शब्दजनकत्वेनैवैतदन्यथासिद्धत्वं, शब्दाश्रयत्वेन त्वन्यत्र क्लुप्तेत्यादिनैव, न चैवं मननव्यापार- कश्रवणत्वमिजनकत्वादिना जनकत्वानुपपत्तिः, अन्यं प्रति पूर्ववतित्व एवेत्यत्र फलाननुगुणमन्यं प्रतीति वाच्यत्वात् । दीधितिकृतस्तु फलाननुगुणमन्यं प्रतीति न वाच्यम् । अत एव परामर्शजनकत्वेन तव्याप्तिज्ञानानां न कारणत्वमेतद- न्यथासिद्धः। न चैवं भ्रमिजनकत्वलक्षणदृढत्वेन दण्डे घटहेतुत्वं न स्यात् , इष्टत्वात् , दण्डत्वेनैव तच्चात् , कचिद्घटानुत्पादस्य अमिरूपद्वाराऽभावेन सम्भवात् , क्षुद्रचक्रप्रमिसमर्थान्महाचक्रसहिताद् दण्डादटानुत्पत्तौ तथैव वाच्यत्वादित्याहुः ॥२॥ 'अन्यत्र क्लुप्तनियतपूर्ववर्तिन एव कार्यसम्भवे तत्सहभूतं तृतीयम् , यथा गन्धं प्रत्यन्यत्रक्लप्तपूर्ववर्तिताकगन्धप्रागभावेन तत्सहभू- तरूपप्रागभावादि पाकजगन्धं प्रत्यन्यथासिद्धं, यथा वा घटान्तरं प्रति क्लप्तपूर्ववर्तिताकदण्डादिजातीयेन तत्सहभूतं तद्रा- समादिकं तद्घटादौ, दण्डादिना चक्रादेमिथोऽन्यथासिद्धिवारणायोक्तं कार्यसम्भव इति ॥ न च पञ्चम्यर्थहेतुत्वप्रवेशे आत्मा- श्रयः, पृथगन्वयव्यतिरेकराहित्ये सत्यन्यत्रक्लप्तनियतपूर्ववर्तिताकसहभूतमित्यर्थस्य वाच्यत्वात् , हन्तैवं रूपप्रागमावेनैव गन्धप्रागभावः किं नान्यथासिद्धः पृथगन्वयव्यतिरेकसाहित्यराहित्ययोरुभयत्र तौल्यात् । मैवम् । अन्यत्रक्लप्तेत्यस्याव- श्यक्लप्तेत्यर्थकरणात् , अवश्यक्लप्तथ गन्धप्रागभाव एव, गन्धरूपप्रतियोग्युपस्थितौ शीघ्रोपस्थितिलाघवात् , इत एव मह- न्यायामि- मतकारण- त्वखण्डने- ऽन्यथासि- द्विनिरूप- णम्, तत्र दीधितिक- न्मतमुपद र्शितम् ।।
भी बनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ अन्यथासि- दिनिरूपणे मणिकत्सं.. वादोपदर्थ- नम्, मत- मेदोपदर्थ- ना॥ ॥१४॥ वस्पान्यत्रक्लप्तत्वामावेऽप्यनेकद्रव्यवस्वं द्रव्यचाक्षुषादौ तेनान्यथासिद्धं, महत्वस्य शरीरलाघवेनावश्यकत्वात् , अत एव च व्यापकधर्मावच्छिमस्य व्याप्यधर्मावच्छिनान्यथासिद्धिः, कारणाल्पत्वलाघवात् । न चैवं सम्बन्धलापवाहण्डादिनाऽऽय- श्यकेन दण्डरूपादेरित एवान्यथासिद्धौ प्रथमवैयर्थ्य, तल्लाघवकृतावश्यकत्वस्यात्राप्रवेशात् ।।३।। 'यमादायैव यस्यान्वयव्यतिरे- को गृोते तेन तदन्यथासिमिति चतुर्थम् , यथा षटम्प्रति दण्डेन दण्डत्वम् , आधेऽवच्छेदकेनावच्छेद्यस्यात्र चावच्छेचेनावच्छे- दकस्यान्यथासिद्धिरिति भेदः।।। 'स्वजन्यस्य यं प्रति पूर्ववर्तित्वे ज्ञाते स्वस्य तत्वं ज्ञायते तं प्रति स्वमन्यथासिद्धमिति पञ्चमं ।। यथा घटं प्रति कुलालेन तत्पिता, घटं प्रत्यस्य साक्षादहेतुत्वेन कुलाले घटजनकत्वं ज्ञात्वैव तद्वारा तस्य पूर्वभावग्रहात् ॥ तदुक्तं मणिकृता--" यत्र जन्यस्य पूर्वभावं ज्ञात्वा जनकस्य तद्भहस्तत्र जन्येन जनकमन्यथासिद्ध, यत्र तु जनकस्य पूर्व- मावं ज्ञात्वा जन्यस्य तद्ग्रहस्ता तद्वारा जनकत्वं यागस्येवापूर्वद्वारेति"॥न चायमान सरगृसते, अमिजनकत्वादिना हेतुत्वरक्षायै तत्र यस्येति यत्पदार्थे येनेति यत्पदार्थनियतपूर्ववर्तिमिमस्येति विशेषणध्रौव्यात् । नापि द्वितीयेन, तत्र फलाननु- गुणं प्रतीति वाच्यत्वादिति दिग॥५॥ तृतीयचतुर्योरमेदात्पश्चम्याश्च द्वितीयस्यामन्तर्भावात्रिबैवान्यथासिद्धिरिति केचित् । परे त्वेकैवान्यथासिद्धिरवश्यक्लप्तेत्याचा, नानाविधलाघवकतावश्यकत्वप्रपश्चार्थमन्यामिधानमित्याहुः ॥ अथ कपालादे- व्यत्वादिनाऽन्यथासिद्धत्वाकपालत्वादिनापि हेतुत्वं न स्यादिति चेत्, न । अन्यथासिखनिरूपकनियतपूर्ववर्तितावच्छेदक- रूपवस्वं तत्पमित्यदोषात् । धूमायनुपधायकवयादिसाधारण्यायावच्छेदकरूपनिवेशः ॥ धूमादौ रासमादे मध्वंसादेव हेतु- त्ववारणाय नियतपूर्ववर्तीति नियमतोऽन्यवहितपूर्वकालवीत्यर्थः । न च धूमाव्यवहितपूर्वकाले कचिद्रासमादेरपि सत्वादे- अन्यथा सिदिनि- रूपर्ण, तत्र विशिष्य- तद्रासमाचल्यावर्तक, तद्रासमत्वादिना रासमादिव्यावर्तकत्वेनास्य सफलत्वात्, रासमत्वादिना त्वन्यथासिद्धेरेवाहेतुत्वात् ॥ न च तद्रासनस्वादिनापि तत एवाहेतुत्वं, तद्भूमादिकं प्रति तद्विरुद्धदिकालतद्रासमादेस्तत्कारणासहभूतत्वेन यथोक्तान्यथा- सिरसभावात् , विशेष्यमागसाफल्याय नियतपूर्ववर्तितावच्छेदकेन येन कारणत्वाव्यवहारस्तदूपेणैवान्यथासिद्धेर्वाच्यत्वाच यद्वा दैशिकन्यापकतावच्छेदकत्वमपि नियतपूर्ववर्तितावच्छेदकविशेषणं, इत्थं च दैशिकव्यापकताशालितत्तद्भूमादेमिथो हेतुत्व- वारणाय कालिकव्यापकत्वनिवेशः ।। अत एव दैशिककालिकव्यापकताद्वयगर्भमेकमेव कारणत्वमिति वदन्ति । वस्तुतो धूम- वाद्याश्रया यावन्तः प्रत्येकं तत्तदव्यवहितपूर्वकालावच्छेदेन तत्तदधिकरणे विशेषणतया वर्तमानस्यामावस्य कारणतावच्छे- दकतत्सम्बन्धावच्छिनप्रतियोगितानवच्छेदकरूपवत्वं तत्, तत्तद्रव्ये तत्तञ्चरमसंयोगस्य चाक्षुषादौ चक्षुरादेव कालिकेनैव हेतुत्वेऽपि तत्तकार्याधिकरणे स्थूलकाले तत्तत्काव्यिवहितप्राकालावच्छेदेन वर्तमानत्वमभावस्य सुलभ, तेन तत्कार्याधिक- रणक्षणे तदसवेऽपि न क्षतिः ॥ न च तत्तमायधिकरणावच्छेदेन तत्चदव्यवहितपूर्वकाले विशेषणतयेत्यादिकमप्यस्त्विति व्यापकताद्वयगर्भत्वमत्राप्यावश्यक, तयोरैक्यात् कार्यतावच्छेदकसम्बन्धेन कार्यस्य व्यापकतायाः कारणताघटकत्वौचित्याच॥ न चास्तु धूमादेः कार्यमात्रस्य कालिकेनापि कार्यत्वं विनिगमनाभावात् , यदधिकरणावच्छेदेन काले कारणं तदधिकरणे कार्य- मित्यतोऽपि देशनियमसम्भवादिति वाच्यम्। तादात्म्येन तन्तुसम्बन्धितन्त्ववच्छेदेन काले तन्त्वभावात्तन्तौ पटानुत्पचिप्रसङ्गाद। अत्र धूमत्वावच्छिनाध्यवहितपूर्वत्वमसिद्धम् । नहि धूमप्रागभावाधिकरणत्वे सति धूमप्रागभावाधिकरणसमयप्रागभावानधिकरण- समयत्वलक्षणं' धूमत्वावच्छिनाम्यवहितपूर्वत्वं सम्भाव्येतापि, सर्वस्यैव समयस्य यस्किश्चिमप्रागमावाधिकरणसमयप्रागमावा- लक्षणप्रद- र्शनम् ।।
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
धिकरणतया तदन्यत्वाभावात् , तद्धर्माश्रययत्किश्चिदव्यवहितपूवत्वगर्भनियमोऽपि नोपादेयः, द्रव्यत्वजन्यद्रव्यत्वाधवच्छिन
प्रत्यपि कपालादिना हेतुतापत्तैरिति धूमत्वाद्याश्रया यावन्तः प्रत्येकं तत्तदव्यवहितपूर्वकालावच्छेदेनेत्युक्तम् । अत एव कार्य-
मात्रवृत्तिधर्मस्यैव कार्यतावच्छेदकत्वमिति प्राचीनगाथापि सङ्गच्छते । अथात्र शिखराघवच्छेदेन वहथभावसरवादव्याप्तिः ।
प्रतियोगिव्यधिकरणत्वनिवेशे तु धूमध्वंसातिव्याप्तिरिति चेत्, न, देशानवच्छिन्नविशेषणतया वर्तमानत्वस्य वाच्यत्वात् । न च
वायभावः पर्वतादौ देशानवच्छिनविशेषणतया वर्तते । वृश्यनियामकसम्बन्धस्य प्रतियोगितानवच्छेदकत्वे तु तत्तत्कार्याव्यव-
हितपूर्वकालावच्छिन्नतत्चत्कारणतावच्छेदकसम्बन्धेन प्रतियोगिव्यधिकरणत्वं निवेश्यम् । अतो न यागादेः स्वजन्यापूर्वसम्ब-
न्धेन हेतुत्वं दुर्घट, न वा धूमध्वंसेऽतिव्याप्तिः, न वा प्रागुक्तरीत्यापि धूमसंयोगाभावेऽतिव्याप्त्यनिवृत्तिः, धूमावयवसंयो-
गाभावे त्वाधान्यथासिद्धेरिव नातिव्याप्तिरिति बोध्यम् । इत्थं च कालिकेन यत्र कारणत्वं तत्र तत्तत्कार्याव्यवहितप्राका-
लत्वव्यापकतावच्छेदकरूपवश्वमेव तत् । यदि च द्विकपालघटादौ तत्संयोगस्व विनिगमनाविरहात्कालिकेन दैशिकेन च
कारणत्वं तदा तत्रैकैकव्यापकतागर्ममेकैकमेव कारणत्वं तत्रैव व्यापकताद्वयगर्भमेकं कारणत्वम् ॥ धूमत्वाद्याश्रया
यावन्तः प्रत्येकं तत्तदव्यवहितपूर्वकालावच्छेदेन तत्तदधिकरणे तत्तत्सम्बन्धेन सम्बन्धिवृत्तिरूपवचमेव वा तत्, याव-
साधनाश्रयाश्रितत्वस्य व्यापकतारूपत्वात् । कालिकेन कारणमपि प्राक्कालावच्छेदेन कार्याधिकरणस्थूलकालसम्बन्धि,
यागादिकं च स्वजन्यापूर्वसम्बन्धेन तथा । तादृशसम्बन्धिवृत्तिधर्मस्वव्यापारान्यतरवत्वं वाच्यमित्यन्ये । न चाव्यवहि-
तत्वांशत्यागेन तत्त्पूर्वसमयावच्छेदेनेत्येतावदेवोच्यताम् , अव्यवहितपूर्वसमयावच्छेदेन कार्यवति यदभावो ज्ञायते तत्र
अन्यथा
सिद्धिनि-
रूपणं, तत्र
विशिष्य-
कारणत्व-
लक्षणप्रद-
र्शनम् ।।
॥
॥ १५ ॥
कारणताबुब्सनुदयेन तभिवेशात् । अथेदृशकारणत्वग्रहेऽस्तु व्यतिरेकव्यभिचारज्ञानं विरोधि, अन्वयव्यभिचारज्ञानं तु कुत इति चेत् , अवश्यकल्प्येत्यायन्यथासिद्धिज्ञानप्रयोजकत्वात् । समूहान्वयव्यतिरेकाभ्यां समूहे कारणत्वग्रहे तदितरगृहीतत- कार्यकारणताकसमूहसवे तव्यतिरेकेऽवश्यं कार्यव्यतिरेकस्तावत्समूहसच्चे तत्सत्त्वे चावश्यं तत्कार्यसत्चमित्यन्वयव्यतिरेक- योग्रहो विशिष्य तत्कारणत्वग्राहकः, तयोऽहे चान्वयव्यतिरेकव्यभिचारज्ञानं विरोधीत्यप्याहुः ॥ अत्र येन सहेत्यादिक- मयुक्तं, येन पृथगन्वयादिमता यस्य तद्रहितस्येत्युक्तौ नियमादिप्रवेशवैकल्यात् , पृथगन्वयादिमतेत्यादेरनुगतानतिप्रस- क्तस्य दुर्वचत्वाच ॥ अन्यं प्रतीत्यादिकमप्ययुक्तम् , ईश्वरज्ञानादेः क्षित्यादिपूर्ववर्तित्वेन गृहीतस्यैव घटादिपूर्ववर्तित्व- ग्रहाद् घटादावन्यथासियापत्तेः । क्षित्यादिपूर्ववर्तित्वग्रहादेव कार्यमाने तद्धेतुत्वसिद्धिरिति चेत्, तथापि शब्दसाक्षात्कारे गगनस्यान्यथासिद्ध्यापत्तिः ॥ इन्द्रियत्वेन तत्र हेतुत्वग्रहाददोष इति चेत्, न, तथापि श्रावणत्वावच्छिन्ने श्रोत्रत्वेनाहेतुत्व- प्रसङ्गात् । अवश्यकल्प्येत्यादिकमप्यावश्यकत्वस्य दुर्वचत्वान युक्तम् । न चान्यथासिद्ध्यनिरूपकनियतपूर्ववर्तिताक- रूपवत्वं हेतुत्वं, तत्रान्यथासिद्ध्यनिरूपकत्वं च येन नियतपूर्ववर्तितावच्छेदकेन कारणत्वं न व्यवयिते तत्तद्भेदसमूहस्तावद- न्यतमत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक एक एव मेदो वा कारणतायां निविशत इति नाननुगमदोपो न वान्यथासिद्धिनिरूपकेण कारण- त्वभ्रमानुपपत्तिरिति वाच्यम् ।। उक्तमेदसमूहे प्रतियोगिकोटावुदासीनप्रवेशाप्रवेशाम्यां विनिगमनाविरहात्, प्रतियोग्यवि- शेषिताऽखण्डमेदाभ्युपगमे च सर्वत्राखण्डामाववत एवाऽखण्डामावस्यैव वा हेतुत्वं स्यादिति बहु विप्लवेत । किश्चैवं विशे- ध्यभागोऽपि वैयर्थ्यमाप्नुयादकारणभेदस्यैवाखण्डस्य कारणतालक्षणत्वसम्भवात् । तस्मादिष्टसाधनत्वादिज्ञानकारणतावच्छेदक- अन्वयव्य- तिरेकच्या मिचारणा- नयोः कार- णत्वग्रहवि- रोषित्वो- पपादनम्, परदर्शिता- न्यथासि- द्धिलक्षण- कारणत्व- लक्षणान्तर खण्डनश्च।
No text on this page.
No text on this page.
fke -51for TTSTEPS Il PTER 11 OS II -THIKE -p>ТБТІВ APTISTE -SITFIBIE TEIPZEF SPIST -FIETS -HE, PF -HIRAT -657 ift Spo Il PF FF Fizikisr F5 F6330E 5 F «FIFFIEZOE PIIPIS0E F631HUJFIE I FFFF HISNIFF PIPAJFOE SUE DITE TEJPAJBIFEIPF F 655FFH16 51F75FBIHIFIFFOF PIFFF71HGIBIJE ÉP3FTUE JPIHIFIE JPTHIPIPIPE :JFTPF5B FREREJER SE HE FIFE E FIGE SF PIPIPIEFIKAFFIP ŠÉSBI I 56 FAIT F5F HIPPOFIR FIUFFPPÉİF571PIFF 53F1F&FP F&FIGIF3561AF HE FIFE 14153 | 51FJÁÍFGIF359 -EFSEKEE IPJAIBIFIF155561FGFIFIGIF359 FIFTIFÁIZ PIRERFJAR :FBI biz 565 F IF1565 PITNE5 -PSIHIFIFIFPIPE :SI5FBFIÉIGIF35 F FI:PPETIR ÁBEKFI F FREIESIFIPE TFK 515323 -FI FifshirSISTFfy | FIRARSETE PFSE , 51F56FFIÁFIFFYGIÉ PPFIF Hiş pfs FIFIIPET65 615P5F5371B1AFFIAFY PIFP5FF315155 FY PIFFF5F5 5 THJIBISIP THJIBIBIJZE Ffsinfpi53 i FTFSHIFF$ITELBİSSEIRI | FHF1PFAFP 'HibsFSR :$1F55P FIFIFFFS115F6FE#:BF FY HE 5155 KÉPPTE JEFFIFFE HIE SSIISOE (SIFF FF FF IFRSIFIE 517F MÉATIF DIPARSISIE ÉBAI -PF ÉFP-F7F35 F5 | :pfs F HIÁJFBiGffAPET F F$FFİFİFFIBIGAIERSFF SPIAGIBTEFFIÚIE -EESTITAR 11:Pf815 HISIEFFIFÉIJFSF FF FRIESFRÆFFFAFIEFA F5 FF HE FIF56 TPAJIFIE pfriferģIFIKISPFGFIFIBFIATI JlFFET ÉP3FFB11sos filhir :$JFIF1905 fpsføp: -fiBiR FFF $3FIFTFIFIFF FF | FIRFRFFIABİſFRIRFFFFFIFIFIF15FFEIFIBSE+EPIFFE ESPASIF Il es II TOWAR -TFF TF2 -FTTIFTH -F7PF3 PFT -1H17 -TEPÉT -TTFFFPA -JFIF ESFIFJFIFTETISTETET I FF BABESTELPHIRFTFFSB F355 51x ge ÉSFIFJEFFIETSP Â HIFK ÉSTE F I STIFF I fpfÁPFEPÁ | FIJUPÉESTERFREEP FISÉJFIFFET ! :FPFIF36f Bir :$IFTUNIFIE IFIÁPPÉ FIP ppi,:FPIFOJFIRESTSITSA i 153 SF fhfiszbby IFISE JP fáfbIFFIE JE IPAPPA TFTPZFIEFHFPIFFE FIFIE SIIFFÉ15PSB IPFFIFFIE PIJF JPAFFTFIEPPEI FED FE | 51F5B1E1512759 -fiis f5151P PIPFFIE HISFGB Ffilisis FF5F FÉIFAF SIP | FIFSGKISI15P7FF1F4151635B JETAPPÉT -JHIFPFÆRIIET 135 F SIFFIHFFSHIJF ÁHEFIEHISF MET ŠIE ŞIP KÉT I KEPIEPJÁBBITSF JFHIT -T585 FPIBIJZF9375 FF F5 FFF FÉFFIHEIGJE | FIFEFTA TIFF HE PIFS1151831P3SIPJEFFpost -FJ (1 51F3FIAFIKFFSPPFIAPÉI PII F FIE TRE ÁFIFAFFIBIBIGIF :FIFFT PFAPB55 56 HISTHIET -FIFBUEFI BifssFFEFSF F IPFIFFIH EFE 15TH JP5175 =BIFFIFFSE JEP JEP PB P126# -FILEF= FPHEFFIEF :P3F5F5IFESTISF SF ÉPPEIFFHIF TEPEE FpahtspysF39F #FİPB55 Jep=2f67-FF5 FffH1P65F - Fyrskur BFB:B15 II HIE FESTEBİPPP5955F2IFIKKEIPS - Fpopifop:53 1F13P FØP :55 || FIE "1851l :FIFGFPIFPRIE-HIFE A PIPSIPER Biz !l FŞIPPBAFFA GBFIFIPJJF5Pisi1957 ifio šyno e Sils JP54FPPEIRJFF Biztsérfparfye 11 :FPPE2f56- PleFiEFifiFÁ FsisÁFIEFFPIFER F 1853) :FIUIFFIPERI FY 55 HIÁTESIPHIR EIFFÁRIA F53F FF -BT5FZ -FFIp Tespf65 II EF
ਵਣ
•en
( Fu
FIਰਨ
-ਇਸ
-p
-jvp
ਸੀ।
•ਨੂੰ
ਲਸੀ
epic
॥ :7FE
॥ S; if
! BEਡੀ ਸੀ ਨੂ
IFIE :FIR | #yogਸਲਵੀ
॥ $ :rsery-fk :ਸੁਨੰਤੀ ॥ ਝੜੀ 5 pf Iky jfx
pਝਲ ਝੂਝ ]; ਸੀਸੀ ਸ਼IFIE
#B। ਝਲ ਰਿਹELF BEIBਝਲ**
-gਲ # Fixਸੀ।try Bਈ :y FERTIFIE :ਸਥਿye-kup 1:5; ' #spਝE Ts
•s :PIFFIpRIBETE :ਸਲਿਲ Er AssBERTISPEgਸੀ ਬਈ :ppsTEਟੜਿ
HIPTOPEXIA FOSFIFA FIPÉBIBEBERRIFE,FFFFFRAIFF5 F3F VISELEPIFFIFFIFIFFPIJP KK
#1736 pBBHIFER FY TEPI Pippar GIFFIPETRE ADIF AVAIFFFF} Fts FIDIK 865817
-:HTE PRATIFspørsF HATF BIRK153#FF11A FEIPPI JF FFP31P5505 FIFTH=55 5155PPPIIFP55
-RTUPÉIJE ÉPIFIT BIFRS15P5F / FP 5575$FATEF153#f147757FZIGETF FuchspfchIHI FIDA
-PIF file fb F FGTUIFIE FESË"-KETJFIFAST I HIZ ETJET FY PSPFÍSIRIA F 65F5F56 , spas
-IFE | ਨ ਸੀਝਲ ਵੀ ਝਇF ॥ ;; ॥ FB Fri]FIF 3 ਸੀ ਇ5 Full bxਟਡ
fragr *siip5fbFF E' Th FPK FIPPER FP FP 5€ 11.885 11 TZAIBIZAPF F Boss FT Á les
RB ##po #y TIP FF IFppy F sfy : BIIFLers :IFIFE | :ppਕੇ ਸੀਝ
-ਜਿਸ਼ :p -( ਤਿPpIE ) : #keshg। IPpwDigipp*IFE#TFATT
॥3॥
-PFIRE fo -DX9755 -L35156 jUPZÉS -TFIT 5 -IEIPZ -To F OFFS) 361 I TETUP BIB(P)51F5R . FIJIFF F JFÍSI53 11 95% 1! ESIFISEUR BA:SOTEIHFSÉPE 11 PTE P3155R HIRI-IFISE BŞTPHIRDÉSHAFSFIGF1 FIFPFHp i niz " 11558 11:51fhigh-FEIKHIKIFHF 11 :FFIF -AJFÆFS 5 ÉTER I HFF2fFHEFGFPSİ1FIEE HIF FÍSE DEIFFIŞQA B 155 DFBR1e555156 FEB) KES1973 "isTaTTOFF FF11F5156 " FIFFEF EPFFFF51FTFBIÉFIE FITURI DIFFfit TOSTRIFEFF FFHIE FEIGE EGEFHKJFF EASE I5 I FPIFF: Hiflæfraffirip pagtip SIERFZ JPGFITPfe59917iz 1:hk $153 "FIFFIETE :TEPPIPFBFIFTERIFIATEFFE DIFIFFIPFIF FESTEK fpefula TIF PUFAS ŠFPSFFFSETUUSIFIK=FFFFFFFFFIEBE ÉSTE BEIPZK JFIBREFIGH -1F5TUGIF5F5 :gifs BEJE :fikhia " FILE EFF :P HIFFIFFIFIETSFB FPESIppo F his -RF BOYF FI BE:BEF516570ESGFEPIFA :TEFFFFFFIFIF3F31&=IFF$1251F3IERSFIE BIETETI#5 -FrPPO F13FFE HISTGF IF IPTIGE HIE INE Tufirfløp SFF F TFF i fryP3A]FIEFPGEP -PlippinP FE 1:AKSIGE " Frš pag! :IFF f : 15$ppak3FÉTUBIRAP 55 PIJISFIELIES FPESIFEJEEPSAPSKÉ i PE5 JFIBRFFEESE IPABTPTSFhigpa iz ! :$pp:159 Phøjpa 563 ETGIF71F5PFIFSITIEFPPIPFE PFEIR FIŞIFIERBIFIPB11Pf8P751F3FFIAFIFTEIXY FP-83 ER -gifsaff i fp=FF HAFIppgiftFBFF (RiksTEFPIFFETFPFS Fifth F$IFIERSFIE PFA
As
-51 Fiore
-TTSTEPS
-$55156
-IE FB
-ZTPITTEL
-FITE
-PASBITUG
- PERIT
11 FTUR
Il 9811
1757
-EPTISTE FOISEFIFGFIEEFF PIZTPEIRIENIA iPHY :FFZJE FITFGEFEIGE Ffliseréliep
-z21FFFFFFTRIÁTRAFFSETTELFIFGF3FF AKHE "FEBÉES PY'S EFFIZJE FALSIFIE PHIRTS
- நுாந்தர" சரி FMPTMAHIFTHEEF HAIPSEFIETIFFFFFIFTHAIPEIVIE
-157] FİFFF54:51933 FISK ÉN AF FFRIBIFIPAPSKÉHSPESIFTERFSFÉ ŠT ifth ffzzi fik blz "55
-JUGFIFA İZAHITE FRAFFIEPÉTUGFJFFFIEFFNE fp=ff HÁTEIG ÁFRIÉ PRIE PIPF1F13F TFS
-1FF-PIPFFIEPIFFFFP FSHEPIFFEPÍHFIETSF0FF5SIHFTFEFFEfp9ff piipppshire
-fFzb.: :FF31PFEF2ZIPFE I Hihisisap ÅFYR I FESTE FIG=175FFIBPIBIEBBIFTSF2ffrivist
-Fşiipp FEJHEIS IET SJEFTTI HEFÁTEPESI I PFSPF FFIEF IPTAFIFFIEIS Efath $1F7F1bcrat
-FÉIEPŁA "—IFEK | FFSFJEFFIK FÉ HIFFIPGEPRSJETITI AF51AETA PIPFTERFY HIPSTPE
IPFIERBIIPIES GHIA FFFIBREF ÉFÉRIPFIESFFIERITE II Fiat " !! FEESTIF 551801KR-sis
-FFUSFIBR:f5556 PFIZIPPF JF5FIBRIFTEFF ŠPIA IPARIEREF HIR 1575 175 TB HIFK ŠIFIPE
:CIFIK FF3151F759'. Fpsp5fe ferig :P 5!PTFFATE :FGiffgif,EIZEIFTE ŠIAIP5BÉABIPFIEZA
-JFIFOTOBRETUTTGIF PiSjFFFFF) FISIKIR:F5 BSTITF35$IFIÉ SPFBİTFEJF EHY I AKHIP57" :1975
-P516 FilhkEz jóiftris :pffy fsp=fF FIIFETEPPOIKIA55 F115F EP FÉIBY F-PSPIESIE
-SRSITE
II PFIS
118 11
-ਇਸ-ਓ -TGP E$11315 -TR:FFET TETEPAT -T752BET -P27756 -#191135 R$1128 ŠEPETE ŠEPPNI FPBIE TEPPEHJE JEPETE Wifers FIFPFITFRE ÚTGEF},f= I happypg Frg :p*f3p3 fpifcIFFFIE İFESTEJFIPSIHY FITIRIZZINFEKKIR METÁIE I HF JEET F fy IF155751FJI FIFFI FffFFI I FF IF IFFS1PSFÉIPEA 1 :BIETE:551FPEFISIE f# THE BFG FIEBIE IE FFSÍLABIEFF1F5153#F5JFIFF JPP I FÉpg Phó (pebixFFIBOS FBF HFFF i fr=953 F FEB 13Fipa fiiTFIFA FÉRJFF11F5GFTFIEA DE I BIFF TEEPAFIFE -P5Upywrg :p*fp3 forfeifs IFÍSITETFIPSIAP | BIJBIPFIPSIPTOPFIF ØERNE I ETAPAFFA RF EPSIMME 53 11 6515P5g piftiá fi cirFHTSIFIFIF FY :IFJPFIFFISAIPITIR OEPJE 1 655 PaBF FIEBRIEFTE TOPFIEHETETF EYPFBJFTERFEJ F163FFIERI PFF I FFIE TEEPETIR ÁSIAPA -TE4559 || :TIPÉ DIF65BTLE IPFAFFE PABIA FIPSÉGICA PAUR :PAT FTESKITETEZ FAFA JPGPPFIBIEFE 1:31FF IBFPTGIDSEFFF JPAFPFIBIExfifteFEEPIIFE frufteps SG ÚT -FIE HIEHETETEBE I fpFF HIE MIR :HTETOZÁİ TF3IFE ÉSBÉ KÁVERF5 :55 11 fp=p5figpz IUFHEBHE PFIFFIERIF İFELEIFAFIERI JÍTEF3F FIFFSB IPSCIEPRAEFT:SPF POSE F1FABPEPAREIER -FÁPfiUF:55JFFER 5P8 FEB 0556 FSPF35569 11 fp:ge)FILIPGEPR59FY 52f5765 5155 -TEPFIFFIERIF ÖFTEFFIIPFFIERI Šfrps F$15311F3F35 PSBiGittesy:gip5 ifipfe Il PTOP GIF 576 -6 ਸੰਨਿ -PSFERIE -RTOFFE ਲਈ fis B ਜਣ -ਡ 1 FIVE 3• ॥ gial-££. 3111 ity- "Ff FEHFPTÁR :HFFEFIPPFE :FlFiglfe TEISBIBEBATES I Fip PGIFTSyz :F165 -ETFIFTHÁIRFFAFPTSIDE FFFIFF:FFFFFBEASEFIRBERPA1gips PIIEE 1: FR hiz -ਸਲ pc pਝੀ frygIgIF; lya | Ang F #pyਲਤ :ਜਿਨFਝ ਸੰy | ::#FF -POTEFTÓFFFF JFIT IF YOHF 115F ipf PakÊ PA FJF ASR FIPIFEP FIFPIPIR EFTK ots ghs ਟ95 65Ip iFI ,ETHEIF EIFਆgਲgps :fgx5y ,FFF IT F FIF sfrysWਟਤਿ ਨਿਰਫIFFE | Texpeop5FF FbIaFIਲਝSTipgਈ£ jyxigne; -SF :pitetsp :p:69:TETEPPJSPF Fare jpareig :Ffpstepsol. FE ÚPalfpipets fire tips so -pਇਢਾਇpਓਜvsFEIF jF►ggargipartist | :ਸੀਜF Iਲ FB Frਿ iFII; -F5775359 | HIFF pig|pa IEFDEFESESİFF TEFFETSRFFFIPAFPÉBIE**1#fiftesy BIHF PIJEE IA JFypfsy Pਤe | frF fiਸੀ; FIs; FIEFTHE Bਸੀ ਨੂIFAKIFAIFE #BF bਝੀ Foyz popfiphitFBFPEZ KÉSSÉ BSPFgpap 1 fpeSippBITIÆIFFAPITfET:EEFPF; -rBig FIFA F। ਓਨsieTE EFIFFIxGxwxxyx IPਉਹp3 : EIFA FFI:#APTERAਲਿਜFFIBExP55ੜਨ ਵpeek Fਓ ees : JEGJIFFINIZIWEFA FRÁPRAR:FEFFIFFIFFITFFFFRFISIFFRIFT FkEppifsiri ਸੀ। PP 5555156 -G915 h -PTPTF -JEPZTPTS -PED R15PĚr -F75FBFTE -TEHASE FJZIPF -FEPETGO -REFF 11 propa 11: S11153 "EIR:RIF FIEBATTE" || !AFFEFFPFINE, KİFFIBIZIPKÉPERHIAR TUFF FAM55 AIRBAFFAEPEIGF EFEIFTEIFF86F5FFFFFF KIESFIBÉBFilipipzaligpasiyat :fEPIKE BIETFIKPRTUGTFFBF97 iPy 11 :ipfEPRIEF :F*ft forfelep #7 || :FFFFFF FFTETETETFIFT FIR EFTFIPTEIGF5551FZJE JEFFER ŠIET PIPJFIFFI551FZJFF II HFF GESPR FIER FFF -SIFIFTHAIRPEIGF1551F3FEETFIFGFIFIFF7551FPJAP55F 65PJEŠSIFIKẾ SSİPEKY :P :PEIGF AF (SIEPIEF I :pagz PififsifzwijfTEGLT :FFFFÍFIF ÁFITFR FY 1 :pfipAPR 11 FFPÉF -FEBBIFF5F1Tff S1195 1PF5FIFHJF PIEPR :SIFIEZTFHFFIFTBFF5FBFF5FIPETI PIPEBFFIETI FINATFPFIFIES AF HIEFHTTEPHp from F FISOJEFFKIEFFFFFFFFIFE-FIFIPSE -TEPF FHHHFIFFE Fநர BE HIP HTTEPIPEDIT THEIFFES FIFTHEEP -PEIHFFIF155F# SITIEF ŠTAFFSIPFIEFFIEFHY HIFK FIRFEKÉBBIPFIEIHFSTPLIF35ffakiyəfiPESTHE -531PHSİPFSIFIEE 1:55 fspilte pifIPI$PF5 İFFIŞIFPIPſip.JPIJE I BIFF ÉPIPFBkpftpfhs -STIFIEKE FIFTIPFIFFP56 FFFIFFIE FIF654$: PIBH FIPFPAPÉSBIPESHF55ÉSEIFIBIIESEBES -15HPHY F1F5BJPFIFSPi5 PFFFFFUR F FJFFPESAFÉKSİPAFSKÉ SPETSIIFIEKEIHHİPžbsajpa I HIPPIE &17093ITBFBSFT5 İFIFHPF5 FE 11 6155117355PÉF5 F FIP-erfthSFITF3R5ÑPEIFIB fik -577#fre TPFPO U FOR ISH -795557561 -PF75 -JFhifts -STIFTPF -PETGO -TUPIE -IPIETA -FABIJE -PSIPO -PB IPTOP I HIÉFJEWEEPRÉSEPEGF51ff5R :FIFPIRITUPERFLETEP 10FABIIFFE :fFSP AF İSEBSEIS -IFIFIE F5 | HIE"11311 PIEFIERBISP :F565FT5335 || 15 POÉBITUPERIF SUFRIGFIE ÁFER 135=EBIFFIFSIFIÉGIFFÉ133EEFFIFF $F$FIÉIGIFF $FIF FIE FFF$ B2f65-JFF FF147B5F7F70XBT -F556 STEIFIŞIIF(JP195P55FFIFP5KẾSEIRSIFfEP fkiFFIEP5115 11 :BF#FBPIH SUPT FRBFF -PŠIF5F5F$FIÉTÉGIFTEDEF ÉFIF FK IPF HFFIHPIÉGİMPB1 :B5F=FØP5J5 FAFFÉ PISPSSEFFIF -FPIPIEPĖS PFFFFÉESIFSIFfbpjsJ5P55 GBIF PIIFI$5JF5FBFFOSFESJF FIF$F$9TEIBIGIF55815 BefrisshfryzęFISEEF F5 TEPS HIESFIFTSHF35 11:Fagg JF5FBFipaskr=f5F FIPSÉGKIÁSIFB -JFJESTEP FIB1 353115pě75 PIKIP55FIFTSSP:35 FF FFFFFFFFluffP5f1PF58151F151155_1FEJFT -piggfa fkIFSEFIE FEESUATIF Ffipz :FIFTSGP35 ZF 556556EGFITFf1b5f1PF5YGIBIBIENTEP - TUPEF=6725xßkipaS15PEE IF$P&P=151E1FFifPozpy FF I FERA E IBIFFIF FX PBTE HAIG -ISPĖSPSFÉGÉIRISIFESTIPÍT3P55 FPIFIFPPFⓇIFFIF JE PIPFS5 F5F5F51BF1F1551FFIE PIERT FBTSÉPARHIEPIR JE FIFFÉTÉIÊÍ PILIEBETAPIFERITPÉÊU JF5FBFIpafsfrfFIÉSEI ŞIFESTSPIE -PEIFIEPRIEBTESPÍBIRTS 65 ABF F FÉF3E PIP PIET F F FFPEFZZIJUESS $15 : ÉPPEIFFIFFIE KIPTIF FFÚTPFIF PFFFFFBTEPIETEP FPIZARFE FITÆGISHES7135 pop5f1P FIETFEJPFJE IFFP IISSII -1555-156 -PF75 - Forg וולפסון- -PITIFPA STEPF -f#FISK -PFIFA1 PERIFE ŚPIE FER FRILIEPgfs Ffojb5fPRJE$PIET F F | 51F3EFEK IFIBGpstifipfipTIFFISIKA -1555 FJÖFFIEPIFA F5 I PPFJE BIJEGFF To The HiFFEA JE ŠT5P55 1615P55 FfePFİPLIFF IF SPĖS -BISPHESIFSP7555F TFS für 55 FÉSTJEPK fixpër5 FER PIFIpinbpthr36 JemSg fórhr ESÊ FFÉFFIF FIPETFATTOETSE 55 BIFFTE FPIT8Fskfiffig fiutE PIJE I HIFIFIxopfhr -SF1FFF 543#f=5ÉSEIBIFIEFFPIFFETFP FPIZÉKIFFIERIPFITẾi TFTESSIBIPK156 FFP5HPFF]55 -5fp DIEGBÍTJFIFFT JF SP55 $P55 F F | 51515FÀPIETEFI BIFIPINGPFppf755 A forpasip -FPIFF F$P F9 | PPGJE HIE FI FITNFTITF TUE5511FR :FE GRESS JF espė5 BI$P55 ÁRIASIEİFT F$FÁ SZTES IEBIPFE | FIFIER PIEPraise : Fg TipSAIFRE 56 T05515P FIESTFR FIMAGE#145; -FUIFTPhp DSİSTETÉGIF35&IFFEISJIBTJÉN FEIPFEIFFIF FPSGF$FÉRFIASIF7161735 JF 1955 hiz FEIPFLIPFIE FITGPFAFÉSÇIFTEŞTEPIFEftp jf 55 j'FIF BIFF75 185 HIPS ÉIFTİFFFSET -Bift BEFIFHOSPF5 ÉJ | prperpf|pps ÉIFESFI FIIFEFTİP BİFFETFPIFFTP STBFEFF) -EFFT IFTFIJIF1F0Fp5fE7IBE BEIFFIPZPFFFFFFFHFPFEFEFFI ȘffiÆKIFTEF1FHif?13k ğzh -5551071F5P 155, FBIF FFFIEHJ5 PENIPÉI BRIP SIĘPFKrir íte IFIAFTEIHIRSFI IF (Fifoni 1GBITE BIFFIEFFI 15FFF1F130$S215/655371F55BIJE PISF1IFF$35 FFHTE FJELJÚFIFOBİSFZISSP $15 שיגעט- -SITETET -FAZERIE Il PFGSP לפי As -ਜਸਵੰਲ -ITドラフトいさ Il PTAR 11 ss 1 -ES5156 funk ť "Ipapir • FF55) - 'IFIR -HAT -PIPER AFTES •TRPET SIETE :) II ETUST -FJFFIFFIBRIPFHITISREIFCIFRİF53FIERPASSERIEFIKF55 TE REFMIPAP=5€ ÁFIBIBIR36 1 FF -WEJP FilipR FFF5FJPFg FIFpihirag TFTTOB31F35fi1FFFsOFIBEBNPTÉS F1Ff 1953 - Toflrfx1951FFE 1 :FfskiftF155 " FEF F FFFF ef PagSEIFFE - Big FY HIFE FTE -PFRUIPOGIE PIEIFFIEPUBK II PAFFIBIFFITE FF1F755p9poh -FHFEK | HIPPHIRE5P7|p5 FIEFFIKSITFIFTFIETSPSESITSBI F Bizle ll foPPE FIFTE-JFFIFER ÅF "Biz " 11 S II THESI FHIASOFTFRPPS HIPPIE PIES115B ŠF FBIFIFFIHTEI :FFFAFIES FJÓXfXPÉISISPHIE$ FEJTXTFSFİYFTHY PÊ silpflFHITSB IFFRET ÉPF#ff TF5 FEfspet $S155 085:25 -F4F77F11 F1-Fløjf ÁFER I HIFIFFIEZER 5 F HEKTÁKÉPZES FÉIRIPFIF İFITESIFE 67555221F# FFX3FIF FFIBO Biz " 11 8 11 61pasi zbPJE FF155TKÉ Pizffy II PERPFYSAFIE 155 - FEIFFEFZ HESTAF755775FJFFIA HIFH FIFSAT FA :FFY=FFIFFITHIEF FIFPGEFIFF15 HIPEP FSSBBFIFFIFÉIRIHØGIFTE BEDBFFP5g3h FÅE FAIFFIFIETNSFIE IPFEFF: 5-14IFIF$FİPEKTIFS 118 :ERÁÁFA fsxfPRIEFAHİPSMEK :FTE F5":IEKEIFIFFIEHABIPESHE'S IPFIFT I 1956 11:11P3S1P FBIÉN 3&pf1P3BITEF İTHAF JFIGSHAFPE I SPFBFÁI SPEEPFJBFBiHPBI TOFFIBIE TAJ -TEKET INFIEFF :B1EF F FPBITLESK ISITEK :FFA FRÍTÁI XATTRIFSTEsituafhfs win HISEN
-ਨਿਸyਓ।
-ITFK ť
தி
קולולו
- IF
-PF5
•
-py
-ਲੀਨ
ਸੀ
FIF JUPK II FITFIREPRIPAF1P3SÁFERTEK-APFEX:JFGESITE FTFE || 315K FIBBI PEFIFs
ਨਿਟਲਟਵੰਟgਸਿPਣ ਦੇ 5 ਸੀ।ਲੀ। LyriyxID AFFERIFIFFEਝਲੀ
-PIPHIR - FOGFR GP ffiu-Jpp forzapfErPfFsIPPPP55FISH FIPSIPÁIRTER'I BIPapp
F6FP far ZIPfeIvyz ॥3॥'FFIf F p55561pIkrਨਿਝੀਲxy FB3pybir
-13551TTER FIBIPHIRPEFR 11 S 11 PEFIPHIR :FEFF HASAFF7F55EPIEBIE FRA IPF :AITTFESTPHIR
FIELPAETTER 5 ਲਨਾ ॥ ੬ ॥"pyref==IFIE App ** Fin pr baggers
-P5753 F FF(***)BFF FFIP FI FSFI6 975 5 frogshkýFIE" FA TETS SEPER JUIFFE FA IF PFF18E35
DKTFF, F15JEV :FIFİSREFIER FIFIPÁIRTUFER 11811 APK EFTER :Bi1R56 FIFIEHIEPISE biz "655
-5FIE PIEPK F6 FBIHKIBIPÁIRTEER II XII PEPERHFPfb1973 " FATEFI ŠTERPEF ŠAFFF ske
ਲਓg FIF fxf sIFIਤ ਸੀ ਜy ਸ ਸpg ਜਲਿ pp FE-TIBy :ਸੀਨ
-156 453FfKBIPIHK HÉFF || 311 fok :FFIE 65FIFTOHIFIFIE PFJIFÁRBIAHFPIK FIPE "F5
-ਸਤਵੀ ਉIFRpp5rbiF5pitifszynsk,$rbic ॥ FEF6FFkBgle+
-# #pb #p: fbਟpfAppਭgFEBI k] । ਫਲਸੀ ਵਿਚਲ :pਝੀਸ ॥ EF
-fg-kehrg 1 :Pg*IFIFE=Fpਟ5£ FFIvy ਟfix$Issy II
ft Fচারু TIFFPS Il PTFR I ESB -76555156 -PASTE -BIFE jupas REPIFT -SBIAN की PI -HP653 РЕЗБЕ -PAF II ETU Il blz ' 11311 :SFPF1 GBP ŞIF F65 IES STÉFS ÈP&11 PEFFFFF; BFBFB „JF ÅPENTE PIET -TGIFTSE 155 , ŠTEFFIFF1F FF FTGHHITÉE TFIFFIFIFIFISK FIGJEPf5B2FEPIPHPSEFÍSIFIEKIE 5757 -EE PF1655FFFFFFIFHEPJEK12&IFFFFFFF FIBÍİTEIGIFJF5FFPJHÁÍSFFIFFIFIAGE FIEFFITESANIE ITREFIFFET ATEIFFTE 1 Éppfskiff5 TOFTAFIFFIFIEPIFFA pizfra flfPFE FPFE :Ff1ffs -PFfTE Allo $11 8:JPP IPFIPIFF5663113EPŠIFF' "'112511-(.FS.BIP) :FBIFFEIPZITUZIBITZISRAIB -ITUIR :FFPFFTEFFf 11 EFIFFIP=151x511F7EEP "lI SĘ Il SitoPAT FITFIBIÓRIEBJP3JFF:PAPIA - FÉH || BITUGIE JUFBP-15PHFFSBE 11 :FFIFIR FBFF Toffpf1FF İPPFTE II 8:JETE --P56-F5FP FPSFIÁT PIE FD PSFKit 576IFF II FFP3 (IFREEFFIpoh 1861 -EFF FFF77F56 || TRÉEFFI FÁF*5FFF57FE0FFF15575 551FK 153 1FIFJEITOSESIF7155-P1PF 11 :FTP# FF#7F553FZUFJFIFIFfsat IPFEIFSITIG FEFFI PIZETFIPSHIPS :PEST F45FFF FxFpfsbih FFI ÁHipg5753bhp || :FIFFIAT ŠIF71F5FIFP5FHE IF F11859FAEF31EF5 Il sfr=YHİBIAAPSE FIAT 135 FGHIFZISP ÉTAFSKÉ 30958 11 9 | FRUIF E BIBPIPE HIFFIERI BIPFE || :F56AT PERTI BIGBEE f * FREK IF hiz "I 15F7 TAPE FB FBFIFÁI fps PP | Big II " BFT PERRE:61 65 İSASIETTE IIES II -15.56 -Ffe fupz TESTFITER -PEP :55 -P51mg កត្ត לייק• -B55+7GEAŞIFIKKJE DIFFIPÉPÉIFEAFFEFTIFF JFIFFPJEKJEFA EFIEBSKZUFIPFFFF7548 -IFFEIFEFFIEIEIPPiipfitgipfoFPFIFFIFFITEATE FÉEJEBIpfgfPATEFIA FA#Fibsga fer -FF FFGIEFHHPEP E PIFFEP F115FBOJIESFIIFIE F P12FEE FITAPRİ FFFFFF&F FfOF:55 -TZFIFIZIEIFIFIFFÉ ÉPFIFIE PIE 1 &p=857 g=FFE TIPS BEşi:fik S11E " POFFITUFF FFIEFIE JUFFISBF FFFFFFFÉIFE "-ÁFET | IF isisfsfóFEIHT SIFKFIFEIFFIFIFFIFFGFBEERIFÉSIE TIF :P51F5FYÍFSTEPIFFIF FIBIFFIFFfrika bila " /1915 forskfigefsfi F ifşFFF İFE 11 Sip -JEBIE 5 F FFP55FF TEPEE 11:Ipe fişiFi ÉTE PFFIFFIN51FP38 "- FKFER 1 65SFEFFIESZIKITU -FIFFIFIKIMFF:F55FFEFFIGFFÖJJFSINSFF:FFIE PEIFIFIFIFFS ŠE TEJF Biz " 115 11 :ppt -TIF 17.FSSJEFSFIR ŽP5IFIFFI PIPIDIFFIPIFFFizff förr TÚŽBEJP55FIESE FIFF$5355 :FFFF 11 hingga biz "PERFI BAFPF 55PF5FFE FÉP55F1355 IPIR P36 5 68HiFikk ŠUPKBRIFBIRSTE -FÉ BFTIRIHRBIE FPPEIFY JPJEFFpzpfipar fotoPEF1F$175K 8:55 | PSF Biobassin -ESFF FFP55 PIET F675g fleiros figfisik BEBISPESE PIFFIBIRSIE SIFFIBIHR hiz Ffe 35 -HIRSEJF (BF55E PIZKIF$FFÉE EFg B55110º5 PizbiFjTÍSFY 51F5PFFFHFF F PELISP -FIFIPSIFIFFTSHIRBIEFH 51F5FEPRHUF PIFIFIFIBIKIRJÉFSF HIFF772655BSS :JFIWEGFIFIFI -IFE U ETT he -5ÆFTE -TP FPS Il PTUAR 11 851 EST=136 -RF FUFF BIR $157 -JFJETH -BÉTFIF -> JFISIE FIFSH - F F -FIP PFTO "APIE • FUTE -JUST PI -151F7553PESE AWO | BIHIBIPFÁ FERTIESPAfisfir-refliko pizfirepforgffres fabf 1* 555#8 F FFFF15 $53FFIZIEEJEJEJESÉGF PIZSIEBIEJF5; Fffe BSISIEKAIBIHISHİFFPIPT5 | ppagx SFIPPI577 NF F FFFIEFB5F FF FF FFFTEIF $17567613 Ffe BSSÉ TEPKIFTEE F MMFARFIEE | HIEFMIFFFFFFFFFFUSE FEEFEFIFTSFIFIETETFIFTY 13 F15G=YTEREBRÍESHÉB1BXBT 581765>iffiggiş İFR :PIŞIFFEF633 Efte 155 TFF hirspuset F PSFIBRISJÉJAFEEZE BBIIPFIP PAFFFFFFFFFFFFFFTIFFIp3 EFE ! :P -REPIAS SIE JE FAI FAZIE FIFAPFAFF HE FIFP=FFEPR 556FBFER BEZIP FIE his fin . FIFF kaffebby Petak 11 Frog HØR GIF, ÁTEFFETPOESIE AFER I Arsistefione FIFBK F FJ F1F559FIFIEPR FY FIFBK HPF 156 PAESETEFIFJETF F ESTE 11 siz " 11 9 11 Flugh -EFEFFA EFT I STEBRIEFFIBITI HINTETSPESZTÉBFETSZ FZ TÉTEEPIFF95+1F5FFFFFFTAIR PF16F653 EKIPFIIPFEft EB1:557 636#8 BITEK FIFFEF1F57F Tespi FUSEE IFÍFIESPHSEE TIVER 65 F f4f #3 F SPE5PfeKHIF FIEP PE || Ý ĐèSing 18 SẼ ĐIỂist FIF78BIP94656156 ly -1F673P6P EHHIKE I fkntz " 11811 THBTEJP IPF33 585 EBBE F || :FBIH F F ETF k-info -HTERTARJETRTEPFAPAŠTÁT PIGMESPY9ZE5FFIEFHPF&PJFF FPSFISTI56 1951F1IFIERIA 所 11.89 U -VFERT fupzhi -576176 -- FE -RPFIFIE “廉所 VBIH FFPOIHIR JU F $1FjF5f7PJE :553 Off RBGIBIE F6 € HIFIPSPÉE&PTE FS635 HIST1FFFFFFHP31FSR PIEFIBIIPE -JFF PIBPPT TUBE BIPF5PPÉGIFTTF1F$FIPERIAI FI I FTIPEIPSPÉESPÍFÁSESEIKTOFFP16 -156568:53F+3 : Tóbk 655131HÁTE PIIFIF35 FF HÁLFPPFISK FFF3318156 | PSÉE GIFf1F3F# -pfiUPzFIFFIEFF BIE FIFA PEF 658+fXpBÁ SHIFIFÀ I PIEVIFF Fiz ? Bap* # FF F 65515 -FBFHIFIEFFFPFBÁT Pizf=677315k (AFF5 PE I PIPFEIEftp 5 F :P ŠPIFIBTE İFITIESKIFI8565 -F7 HIPKIP5f5PATPOTETE BIE F 65FBFÉIFIEFFIFBFIFIEZPIE FOTBIR,F, JF HIPOJPTR JÓKK FÁTF3 1551F5 F551ER PAPPÉGBIIFIFÉ FIELTPFIFTFF ( Hills 495 ) FFPSFÉRFIABFIIPFIFFÉIERPPER -FA134155156 BIAFITE 5 F PizfFFIIFOIFIR FESTISFIEFF3 FIFAK IPAPPRIBBET İFTSTES FIR -Pffe PBAFPFIFFF HITETE il prof HiStips ULCFFA FIFA FIFIBFBFB :fukolyPS JPEFPIEKIEZHİEFEIFIESE SIEPIIPFFIEBSS15B FY HE FESTFIBB F İSOTETR :FFFF FY FIT -FÉIFIEIFÉFFIEBIŠSINF 7716 Ff bikihBFÉÍFIETF F$IPOJFIRZIPARITIFIKÁ PizFTPEFJBOJATR -FIPIFFIFFT I F 56 HA1F5FBFFÍFIEIFE3FIECZI5F5FPFIFIZR | RARHIFIFPB GF HJÁIFE # -IPFIFISPAÑFIFTH :FAIPAJIFFI PUFAI FİPUBBIO&BIF BINFINÉ TÉKFIFFSEPFIFTFF HIFSTOJE -FAIRPEREPAIRFISIJE BIZGUIPIR :AF 143THF431PHÉJÁTF5F55156 I FIRARFIERIFIESIFIER 11 PF
-5512F
-TIETFPE
Il PTPR
ا ور ال
-PERE
fupza
-P57156
f90535
-FIFTISK
-FIEIFE
- BEAT
-TRIPTE
-PFTE
F FF
Il FFFF
-SHIF sePs6PFIERREIFIEISFIERT EIFIỆP #36 °Fế 68 6Vgfsz6IPalit IPIE5%8BERIFIEIF
#ARFIERIFIEIFY FIFIAFÍPEPIPÁIRET GITE , &FEPTIFF 58 PFEFA SEFIAFTEDE PAPHORST
•IFRIHFSP FP FE :PTERIPIGIFÉ FÉFÉIEFSAPFIEHİTE I FTEFFIFIATEFETIMIFFI F front
F$PASSPFIFESA F=FFIVÉTE :IPIERSITIF BIBESEFFE IFFIERI PE FÉERIFIPSHIE "FR36 SPF
-JUGEBIIFIFIE #55HjPgFEFFPFIEHÉ PEF FF FIBIFFIFFIMFTKFS5IFFIER TOTAFF#g
-FT15 F DER SUBFH, FERÐINTE PPGIF PAPEÉFIEIFFHAPPIJPFIFBB TEPI PIERSITA
- FRIFIEZIE FÉSBFigTzI5FFPIFIEKTEFTFIEF FÉFIEMIFFIFIZA KIÉPEkg#$APFIETS :APPEPSISE
-FÉFFIFF FFRIN BE FIFPIAFÉ FIKPFIFFFFFIFFIEIFIPIFJEFF | FIZJÉIEFTFAHRFER
-1936 jpe BF GEFIP FB16 B15 56 FifsPATHIA #5FBFFİFTEFIEIE 1931F5THIEPIEPTEFIFTER
- FJEIFBihfhrste Hifi F JE ŠF EIPHER GEFIÉKPR JF SF ! APDFFU FÉIE VAFEA 765
Ep#FFPIFIP FIKFPIRIFIEZ FİPSIFIEIFIETSEHIRÁLÉPPEJFIFFF JP515A PIFIE İ5 JPSTESTE
ÉT F F HIHIHIPFIFF 65P FÉIFIFFIFJF IFEPIPAFFF15 51F3F1F F65BITFIRE S Pfarissa
- Fjp3 51515FİP FASFIBBIEBIEFF$155FBFObtrflpgpag|ff FIFTIÂ 51FBIFIPIFF FP JFIAPFPFT
-STEFFFFIFPIZI#ff57557377 ESFIT AFF FF1155P8FF376PFUFPJF F FlipFITHIFTE
Il 11
+ #fਸੀ 5 - ਸੰਤ ਸੀ 275 ਲਿ ਝਾ -TFHEIR +1 ਨੂੰ -56 1 EFਡਾ İSFPFIFTFREEB# PEFPFÁBIFIEFF1AF3PBF1# $aTcf 15 JAHRSG-TF-713kpa FIPSI -:KਉਸkEE FFgਲੀਸ । ! If F ਨੇ ਸੀਸੀ:5poeIP 5 65Fਟghਲ , ਸਿਲਕੁਲ pipfP56F IPFE F JATF7515 F 1ERIESF FB1F || !EPR :FE 155 f#fz-SIBEBPE EFF jpj -pF EPF5CIFIFEIFIABB TE F6FFE#BTF55#pxfbf x7FIE F sਰ ਸੀ '; ॥ -FUSF BIPESHIFIESPŠIESF HIFFISHIF FTIPEST674$iFift for PEFIFTEFFIEPIFFEFIFTIRFÐISFERI -JFAPPÉBE APPRIPISFPFIETSSREFSÍPEFIAFFIPAGSAFIE FIE H55695:ffERSFIE FJÖFTET -IBIGIETSIFTZTEFSIFF#BIJESAFhirafforshi PF15F 713515P FY 557 tufF5APPIJPFITPE : Épper -15556 FPPETEBAB FfsPf1FFF51775P5lFTSGRIFOST F 56 FINEFESIPIRÁTYFIRJE PIE -IENTO FFBUPPFITSPFÜLFÁIRhifyfioaftPÉU FY FTPE$145#FFF:FFFP5FFIFFA PBB1FP FS115567 - pਲ ਓ555 FEPTEFFLE F fiffਜੀ :FIF5ਨਵy flygIFIFਟfish;fFEx|5 Fif 1 FIFFIFebe Fifykiypਨਸੰsy psy xIFFਝੀਸੀrpਨੂੰyiਸ਼ ਨੂੰpBEDIgsIਲੀ -FISFI BÁSE IPK Bla 5k FISFIA FETEI PASIFIE F 573) VÉs ipsfarbEPIS5# B E ਈਸxਸਨs | IPIppakkbpgpFFFFFFFFF ਉਸ ਵbf #fbps fਲਵਲਿਨ, JIFIEbpIFIDEFIf Fipploy spIP7 # # $5 frFire bf fiੜੀ Fak ਤੁਸੀ -PFIRA -€ fupart -5415515 -A-PF75 -PF1F61 RZE BIT fe -572fire TIFY Il PTFPR 11 3 6 11 -TE TÚTS biz 5877 PHIHETFFFF&FIP " FIETF irg € " H 1553 | HIFIÉIpati Psirag P11615 FEBTPSBITEFÁ 973ffrgshólhlFSETÉGIE75 EFIF HE F$F$ zfs Pisp ll PPFUJIFI 1793F75 -Pshp&p=5FBFFEfSP pizffifHiftsfFF5 F5F5519756563Bkiss Tuess f5f7f75F6E ÉPPEIFTE 53 Pis PopiÁI HI APRE IMPEDIESEF BKS05IFTSFI8 FFÉISPEPSP35STRIBF5F5R PFIT -JBTS FFFFFEBIH 7sfiskfisg1h1565 , HIFIFTERE FTPESITSE EFIF HIE F$F$ szfas Il F&H -FEIMSGFİZUFJFBIFIEKIEHPFIFF PIFIŞIFTEFFIPAFFI IPFE AJF fettet tz& FFER F FIFIE -FFF}PPFHIFÁIRFFz123555 315 HF Hiby HPREJ 1ms5 FEİZESPOJKFIGFBifr 11 :FPT3T FY FİFA 173P#F]F5093757 FPFEIRA fbpFfbFFIÚPFPF F fhfEEBJA pizfFÁIRSOS 125 - STÚJFTR RIFI&IFS HAFEEZYFP FIESE AFFEIZEITFF :Hilbe FB Fr! Aprife IESE E TAFTSF SFERAIFFS15 !! PAPÉ FFfustaf H7F FFFFFFF fleBERPFE fustes F5 FGA F Tu pyppga-Tu JF FfppfES 11 PEBIE FITF TF isfig P3PFBitopp-ITERRA JUPIFTUIFREE PSP9983F F5 PFIEfRFJFJSUEFR FE5F9FFEEPPElsife IFIEUEEtus-II H13 5FFFVFPKÁ fsť FPSIPHIR 56 PZPÉFIF 1853 SPIFFS fFH3F FFFPSPF150571305375 PffffrizzF16 FerF VIITET JE JPAFFP3f6 TPAPIFAFFE THREE FT | ppfiugiffi WHATE :IPITUTSTS II PF3055 Il 35 II
-FFERA
fupa
#5575
F30635
- TEE
אטוומן:
É F705
-STEAK
-EF5 F
•IFhift
-5r:PIPE
İFTPFIE
-PE
Il BT
FEZATIB F27F5 FERB İFISP P1zfo=fFÍP315 BRZUFTFFUTBFF3F3F5 F F 51F38F5FE prisis
-F1F75 555 F 513 57R5G6FFEFFIFFEISUFFISI5R FKIF=fJF FTBUTEFÍPP515 :FPPEIPP516
-ISPĖP315175-18CIBÁmfipsilsissTPIE FÉISP55P3A5FJPESIbhITUPSIIFIESF İSFIFFIMAET
FøE škg pgg (HIFFIFFİPPFF5F5PF5JFfE FFB57 :fisiştpis štis TOEP5153515f isle
F S TFFSE Alpags FITSPIFFFF&($17935F JFJJF JOTEPHTHIPIT AIFFIFFIFÉG FÍSTIS
JÚIJPFISFIÁJA FIFFIFFÉ || FITEARETHİSSHHIKFSIPHIRASSE, "F ŠPIF ŠP 125336 fluss
JOTSPÁ FifiF7'FTÆFIFJE ÉÍFUIFFE F5 I TÚIEPGIFESTFJÁIJF JÚTEPSIFIFFIFITA
-IPFE EBIBI.FSIF63355 'ufffiffif]E FIFE 1Figidp 1FFY' FHIFI FiskisfihHS HIFIFİSTS
bfppfEBTE 5 GEP FGZIGülFfizfis effektiefs ter fører :F PTS " 11 ÉPÍFSSPÉFIREFIFÍFE
-IPFIF Aifsip37"PEPF FFFBÍJE ,:10]FE ,:FAFHS :JFTFESIE' I:FIFYISSUEPER İFT'SIKFEP PP
-97 FITFIBRSIF14554 A1FFF5€ IPFÍSIP55 HISTIŞIFEFDE FFPIFFEHİRETE GJIFIERSIFETS
PIE IFFİATA HIKIBOFIR 5 BJEF JFIFFIFÁIFPÉFIẾI FY JE !! Parhiepa FFPJFIFF Bitipa
İFLFSTPHRÍPSFFffer :FFF FF:16 EfIPSPFBIISIF PETE SHIFPÉFSPIEBIÊ F FIFFRIR
-IBPOBEDIÉFIF505 fff-ps $55PSFFFFFR JPFPPETEFSITERBIÉF17317 İFFSIFF653 ' ghle FOIE •
fike -FrTFORE TTSPUS II PTIER Il es II *FF是 foPZA -P571 f31936 IF155756 -P361 R16 PPPJAT PRUE FITUF -TUPA II ET IR 2 -EHUR FH HIẾPFIFFSF35 FB1-BJPESBT8F FIFZFIPTESH TGIFH15715F5AFFI3RIF OG FIKFIETE BIFB1FFFFP1 F FESP 1PHEFIFIÉ FIFSIPÄIRETEK FFFFFFPPARIRSFIPZP F İFIPFIFS=15€ 51F3 -PFEFFIFIFISE IFBEPEJHFUFSBFER ÉSREFPEÉTHP51ABÉBIRÉPP EIF1551$$ jFfRBF | PPFIE -STATÉ ZBIGNIF:55JFÉTABFIF:AgBiFIE 'Ff15 Fey FPSIKIĜITUSIF FÉFFEISE Šf5' 51P3Fifts "JERI, HITER PFPFJÁ FFFIPFAEFIXIFFF BEPETEPPE IFIĘTO FØPET F5 F5, FKIF HÁTFIPE TPAPSTP -fiffsgp FTSPESIFIFFİPZfURFEFFIF FERIPSIÉRT FE34FFFÍSPHIR 5171FB1RFTESDE EFF -PEREIKFHR HIHI HifiStunt FffJFIFJİF SIFISEERFIFFIPIFIFITIFFÉE :FESIPI ' 5ÉP=JFÁJE li:fugt :GFÁFIRER || [pags FP7FFIGIP55F5F5FPSIHÉ JEBITDA 1 8 1536 11 S 11 FIFPFBiftet-$T(1515)1855-15€ 11 JEST PIFF PER FITGIET Bhišis FIFFPO JF BiffpPSTFIE APIE FPÜFÍAPÉRI:FIFFTS IF Hif55xFpa :I15FPS 10G3F35 BIFFI EPozko :F13FPS | FFF "Fill JBSBA VIEFF İSTEMI FF.—:JPFIFFPF15 TSJFFIFPEPE -PAT FIBERISITSPSF FF Fizz Fisie E5-AIPFIFÊT PAS DE PFAFSTAPPIEFFP: FEFF FFUPER GIRARHIFTSTETETTE PFEIRFIEF ÉIFETEPEF EF I FEST1FIFTEPEPPSIPTE SHIRKIPÍBIF FIRE; -P1F15 F65716 FIFF ŠIBFFFFFTSPETÍPÁRFIPIFFIEBATTIVHIR F FFPUJE JF57F75PEIPITE 56 Il es II -F313FPO FTTEFPG fopas PISSIEJE -FTPFERD EFFIFIE PIDO -POTPIP $3AZINE F5 :TSR ਸੀਤਲ 11:51FT -TJFP1515RESPITETUZEIGE I F OF HINEBIJFSFK7EPEIPTAJE F 67755 HIFIFTIEPID FAIR -Pf$ 796 P1z rfifyprisas F65F31FÁIRGIZFPJ PIPPIE Ffles PIPAPIR EFETSFISIKPFÁTSB 1975 KIF F Iziskpg :f1go5F5F TFF IFFIIFFRIR FPoyr Ffy | OSRİF33F 166 F6FK IPAFIEFSE -PSG HTFSFF-HISIFSF FF F M FE | P531P55 II His "1911 EFZIFB15EGTE-FFFSF FF F || BIF "ETSEFFJEPFSFIPSIFIEE : BRUIFFÉIPPFEFISIFRIF5F5FIF FIFFAFF FFEIF F1 :15€ HIF 31558 FISKI BIG TABIIPF tisk TFBFBIE PIEBHFfJF :BOSPEIF JFIFFFAFFkkipaFFIP FESJAJFIFFS -TFIH EF 1 :fp75 568 MIFIFIPSIFA HIEK TFFixFp3 F5 :PBÊ F1F55 İSSIFIE FEIERÁ FE -5*35PAPIPPFIBFS FÁBIR IPHFPIPAFE PIPPSIPTE JFIFFPT THąg PÉRI F1575 PTPÉRIE: -FSKİŞFJF II (ÉTOFF) BFF BIFB1B5 95F BREPTUFRP »-ABRIA ÁFEK | 5165FPFIFCPEF php5 EP TONS5713fpofbFPSFIE FF5fpak fahP FSA F FE Fİ"113-811 fiupsPpBİAGGİPE Soffer PFFP JEFTA FIBER :Tofspisakykie fez :FERIFFFPSX İP :56 FFIP FIE FJEFIEREA IP5 F5 -65H1IFIFJFIF İFFFFIFFIFIEP FARETIP FAT=RSTE TÉGÉT A FfavjEP 5JF iftFF SHE ĐỀg IEpfse ps365gs IEEE5 2693 EGESTIP IFPSIEEEEEEEEE89 288 IFP || sởzfGP -FF PFFP][pag FMFIKIPÉBI 1972f5PAEEFFIP JFIFTFFÉSÉFJEPÉRIEBSIPÉBIHIS&P BSIFJFF fies -Taft -TTSFO 11 PTFR Il SS 11 FTTP fópzés KRE pppos - ffp -poys - FEBITEFF -HFIT -R :JTF15 -HIRE VI EFIEET -Bjpppag FY FR 11 :fezfbfist hla BBER :pfppfE53F153PEH FEKIPSFFİFRPSFIP AF 1 st -BERTERÉJESSIEFERPF JFIFPOFIFFIPIFPFfilppfHEFT IF JFKPPFIFS15 jFFIAPPFI -FEIFEP FTD || PSŽIEBERFIÚ fer patro 1345 febbs' —ÁFER | FÉTISÉRETESTEFTPAPPERLIFT PFPPIPPIE 1777545 ISF F (17)115 1FEITFIFTÆFIBRFÉEpfEFF 412-811 FÉ E ZITPA ET AITO ŠOJFIRF5 56 58316 Tfb51PF FEJFHRBT/65FF EEEFTS À F56 Hz 555 21F1456 PFF13FPS FRÁBOJFIRIPEPSIFA BIZ FRÁFIFİESFIFBÁPOJFIRSF FZ PESIFEISBOAJRFIE HIZ EPRISPEI -FFFFIES - IFIFIFAFFAH IP5 Piaf F GIFIFTPFSFETFIFSE FEE5FFFFIFHEEFER FESSIBIRPFFHF51fre "1108-811 ppppgibs Ffy5-FFE5FFEP 35 11 (FFPUFFP) PIEP TE TFPIÚ E5 JFIF FE HIP(F)F HIEPTE-ŠFEPIFFFFFBỂ 115 FPÉFKÁJFHFFZJHEFKAIPOJARIPFHÉIEBIEJIP -IFE GIVIBFTTHITHEPIEREA $6554198-811 ŠTOFTATOPPUR TPB BA APRUBS || EIPIOFEP TOEPTU 56 HIŞIFIKITIF155 POÉSIFFIFF5FFF1A55P5FFIFF5FBIÉÂIFFIFTIAPSIPERTESTATA 5195 $JFSÁT BIZ -TETEGFFR bisikforpose of PFAFF FFFSR 5 F JAPaz H 15$BF :1RFBIKAISIP58 FF$134 -5P Siv Ffliprokliz.biz PFF :PfHE SIF F faşipski i hPFSF BUPIPPillfox frust -IPFOF ITVÄTTREPJÁ IEIFR FR 195 : fuff J F (155KFP75 FFIPFIFFOK TPERIPAT-I9515P5 11 S 11 -FITHEPE fopan - EBER IFIPFGP FIPSA -TFIS 6391 PPPF:5 63429 -Hipih F Il :STFH 1 -55 PERIFEP 5°—fisi fiz FUIFIR İFTPFSFETFIFFE TEIAFTIFIFISEBI IFIBIFOKIFIEPTERE Il Baby JEFSAFATP TEFTİ top my 11%8-31109 MFF phiş Şts Ini BIPPE | PESITO IFEPT IFEFI IHIN SI TE il jugar BÁ TU FATE TE TU ,Fietu pale fe tu 11 € 3 LIEPGF Fifs BFP ENGF1 1315 GIF 17FTF JOFTOP tuppsp Eşiš 11 ÉS IFTO JE Jung FP we zh yy II 8811 (ADDE IPIERRE 1133 11 HIR TAI IPFP JUTE (E Tu)jvPFSP 11 TEFTDUPPIFPFE Fietu satru i přIFEFTUBE 11 us -E735 65915iPsh FPE FFIPÉDIFTREPESİFFF1F7FF1F755HİR FJÖLSPFT JPSÁT TŞIFØF PICÉA ÉGF 1 fap 147-FFIFI F1FF78F5#p575 BIFBB FÉKÁraffe F, FF HISIFJ F #PIF Pizbis 1955*Pas "1198-811 JFI#HFA+ Bliz jug Ppillujo por 11 (IFF) TFF&IPFIFPA Apteekt JETU -PET PPFFPIFIE 11:fepf- uglæp35FR :TF13F JFIF 1655 :IFTH HIS FIK FFPERAKSBIFTET -Ffrics , 1555575 SF FifiFRAPSHIFIPFIFFIPSÁT BIR HIZ TEIFFFF3FPIF JFIFA154 -FEIRPPIFFİhstppspiffsr 11 :FFERETA FE II of HISFERIJA IEPAI IPF PIE5 Ffolgsfiriz -1P3PIPPÉBÉBFÍIF I :Pfklx F 65055 B1$853A foB BİZ 55555 1F$PFHFHPF57FF F5 -FTP5TFIETFIFAD FI:PY FIGIPTAFEN ABTE EFFP+ FB Ff ! HiFFA :FIJEN İFTETE iFfEE :fuffpplif173 TRIÁrsfoster:P17EF FY PIAFPFIFPFİPalakp5f1P65 PIE FEIF fvisen İP695 FFP3 FILE fupasit PEPF -PE UT - FIFÉFF SEPSE -TREITE ÉSFRP -1577 KB -T9315F U 655 Il :JTP53 BIFIR :FPZfSiFPF;FPIPEFISIERIPFIFFSTOFF5F5FJFFFBUPÍPPFBTIPIT S 51: THIR fs -FFF5F13FFFFFSPSPBFIE STIERFISSTEF5E 65FTTISBF BFPIFFETFEJÉT EF-FIFİFAIFA SÉR -Tafs -7,51TfBIFFEFIETIERFREITTIPF:FFFFFAIRE PAFOJFFAFIR HIEMARŠEFIFIZFFLFF5475 -TW -FFIEISIPFIFPJESTSEFTELSTF FIFFFFPJPGPFF FIFFIPPEKÁJFEKBE PIEBIFIPFIFF PTFFIFP65 Il PTUR -z&PIPFIFFIPS | PPF HIHFIPPFIFFP3JFASIPERPFFIERIFFIFIIPFIFFIERIPFIFFFFÁIR PIFFIPS BII Y5 II -IPIEFPFIFFE FIFTPFEFFIIFITFÉFFIECIPFIFTEF FOSFISgFFIEŠIPFIFFOBIEFFEŚ1588p5fbr pt -PF1F57 IFP5F ÉG | FIRFREIFIŞIFPEiffuresTIPPESILEIRFIRE F1F3FFETFIFPJP JPFPPEIPP: FIOETAFETTJÓZEF "-55 S I JPÉPEIFŠIF-EFĘTFFFF1FIAFFIPPSFÉFÉRFIARPE F#5193 Fif$1555$HIFPÉÍ TJERFFITT "186-311 FigP(5BIFA FIŠE TO RUFFSIFITOFT || FEHÉI NA ŽIphigh TFF FF5 F te$ppafsFIF55 iffstrg :FDE TEFIFFÉ jpf ing kpgifGfF ÁTTES HIFLIP TO JPTO I BA SADRŽATE || JEFÉIDIEFPOLUPFE FÜIPF=i-TIFIEPIFPPIO F5 "|| Olte -PE TARAFF 763556=HİPPPÉTFF IF GIFFÉFFİPFPFIFINDETRÁTIFIPIFIDIER 115 " 11€5-811 - SIFSIFIFFEPAT (IHF) IF FF FJFFIIR FITF P126# jpajprimer :photos PREIRER PIš px Šfsy FFF TECFIESTFIRIFEPThxpfsfose PIE TAFEFFERHÉ PIKE JFKTA Il Pite ESF I OS 11 -FFIZFPE fupas -FHPF -F3F0FT - FIFA -:EF185 PIRFIE F5 F5FR -TEJAT fF1753 -195 II EFFR -PSIP hit rgpoot FISIFITOPI II IFFÉIPTAFRÉTTIJE NA FF & rog se Il FOFFRE IEF -spf-port FASFIF57 TFFAIR TESTPRIPPFESTUTET FTA FT FIFT TVF "185-811 FEITOR PFPEÉTTEFFEf a ffor 1F1655 F IFBFFIESEF1F561555 IPFEFIE1F5; FFPS F FIIFIFFIT -feir PIEBBPE :TPSERITREISIFIPFIFIFTEFFIFOFIBIHIFIEISIIF PFIFFEISF1755 JE JFIF;DF1S15 TWF "'\\96-811 FETTUFASEU u fi3s PUFFIE || IBFFFETFİFAPIIF JFIFFT BF FF" || FIF5FB -PEPEFF BFEFIFI F5 F5 PIESE FP Eife PFFFFFFFÍSIPFEIF JFIFPF ÉN RIFIEKEE JEESPERT FF45 jpajpskimer Flestrih 185 Ipf f5F :FFITFISIF -JER TE pirfosPTFFFFFFFZIFÍFIEPFF15 İFIFIEFFBRIEFFIFPFEFFEIFINGFIIFSPEEPFÉFEEZER TETSPATEFA5JFSHFSJIFRFFSF 5155P5JFFEPFFE PIP FÉMIER PIJPFF5JPEGISTRIJF5B31F5TLETO PF bijikus 151P155193sFIF3J FFIFJEFTEP?PIFF&FAJTERPAFFIEFFIFPFIFFEFFIF3F para-FFF || HIFFIPPEK SÍDIFPKÁ FEIFEISEFÜPHIREISIIE BIZEFİFŞeir3 fifupfcf3FIFY -PFA "1135-811 fe ftofgreff Toh FINEFFIUUETOOP F 11 B frePFIFFIPPFPEFIÚt fshpeGİP EIFFIFPERFA51x61#FFFFPKÁT PIPEFPhiRFE :FF İFMOIREFFF&Ffifipaşa İmirft hiz F-19şfisF1637 føpÉPFIFFISSÉIBER :FPHIEPIFR JOFTEFF:FEE : FIŠERPOJATE PIPAPAR fe -557FFF ITF13 Il PTUAR II E II -FFIFFPO fopz EPF -F7FPT R GIFT F#65 -IRFUIFT -FRP -IF 15 - 5FFIFE Il FFG :HTEFFP5FTF F ! :5&ISPE RAPE 1 :P HOE GRIPIE JP5 APIE PF ETIAM SEBI FfOF FF | FPEJF FAPIPÉTUFEIFEJFIFFK İFITF STEIFUIR BIPIEFFITIERSKIGPAPÁ F1557 F GIFFFLIR -1555 | ÉPPEIFIFF551191 195 GTIFTTFES , HIFIŞIpfiugisTiFFF5FJPİSTFIFFİPPFF5IFÉIFEFTER FATÝP BIF ÉTAITERI GFFHPFIFFphIFFE pa FFIFFIPF PFT HIÉSES VIESITF56JFSJÓFIFSI GIF FFFFTES F5 55F1,FPTFIP TOPSBIE JULIE IF F FERIEPILIR TOSIF GIF GFFI:PFEFIBJis biky -JFSFPIRATEFIFIE HIE li fPFZF6 FfriFTZE AFIF JFIF IF F IPFTFpifcft six fuspss FfRPIE F1 5-F BÚT FÅ Fill frisk ŠTE PE BIEFFIEP TERIJHF 153'FIFE FP55FAF?JE F7F5155 FF3155 FBUS IF FERIT FF5F131 false frpg FIFÆRHFTIJF",106-311 F&F FUFPTÚ : P31F55 1FEB1Epoffits BIFIPS:FED pizkerffiuppFyIFIP FÉBE TIFF , Bigas -FSFÉTIPIPOTJIE FIFÓTF5F, ÁSIT:*7 FFPA HEFF Sufis E FSF F FSPIJF FAF IPFIF$1 -FHN F fripeririFFFF FIRERPSFIJIFFP3 AAPP FE5511935 FÉFET F SIEBIFFE HIFFR II : FIFS BIAISFIRAPFÉFASIPERPFHFIETFIPIFIFFIEBIFFEFIFFPOFBINIE PIEÉFRIKESTEFFRE JE PSIK FÉE EPET PERFEst to tug 6 || IPFIFP IPDUB IFFET PEPPJÚ "-FIFÁKY FIFA :PFAF :IPF FP Ár:1p3FIEPIR :1758 bøp çift FFFFFF" 1136-311 II og II -ЗЕрә Uyesh -PFTUTER - EFFE FESTP -PE FB !!:STFHS -HF5 F1F36 51F5PFEF BP15176353 PPIPPÉIJP , :Ipfiripsø Ett fiftsig Frpstopher -1554738,:FF6651fibime PPST FIFTSITFIBFIPFFOTE:FE FIPF FFIFFIP55 frhlfpapJFFPP -FFRE İSPÉPF 1538 185 5lspo F65551PF IPKEBIA JPIEFFIPER 5 PIE AFFT E JEEftsz HIFFIPPETPIFRAESEPIFFP3TEGETA SF F5 SefikP3 DJFFAIFFPIFFERITIERPRIP75 1:05 -DA FEFFPPAP3556fp5f|p51F36STFRIF3F3FẾFIF FIFPA FJ FIAFP3JFPEIPSIBFESSİPE PPE 56 KpopishR35 ,JFF fupi hiRIJAZ IFFITESE55JUJER ŠIETF5F151635RÁJIPETIBIETERPF PFPPIS -RPFhilst affy FriFÉ HIS1931F57 FSF (:fiørff):JIHIEF F 115 HIFIEFFPOPIER HIE IPFE (65pfESiEJERI PIISA EF 11 ? TufHFÉIBFF ll "ISF11 BJJFF5 ephilha FEP-MERPF 5 TIL FISTET !!! JOSE JER İPEP løpte :ÉPPEK FÉIPIEFFIPPE 858 5f hisInfifPF GASHIRITZ3 :FPPETPIPFIFFP3 F fisráleşi FfesteggPHÁIRTEITAFA F IESBIFRS131F* FIPFFSPRIPSIFIÉ FÚTBEFFEIN - Ih fpoFIT$1573 'EFF'JEPE I FIPIFIFIPIFJFF stuk S11F73 piškl# F HÁJEZEREP55 FP PILIH EFFTEPFGZIBJKPBTESTUFKP :SIJEK FfPPEPKÁI II H115 :1733 FixP3 HER PESHIFK FT/FÉlikIPFF FF SPF57F5 F HIPPIFF :P5313743 jeffs HiFF forf 155PFF fsível 56 F PrFre Fisip; F PIA BOjFirFrits FIFJIFFHpflazföylfxpIF147 E fAK BÊ T .1
•
Firs
-ਸਲ
R
# #
-55
-f5e8
-ਲਿਬਾਨ
॥ ;
॥ ; ॥
Ik TਬੂਤIETLEFT F 677: IF DIFFEFIEID Ihnx3px|sjp
Peppais #FIPÁIRPEFFHFIFAF5561AFTEFTFF il TSV HISIFIFIPTS TÉRFEJPÁBÉBX8F13P
-šrpਰgਲBFwo exts if "F; ਲਈ 6 ,ਸਲੀਨ ਲf E' ਗਿr | FBF
-ਰਵੀ 65F FIE5F FImgਸੀਨfxf jIFE :frépos spogਝ ਸਾਲ
JUNGTEFFIPTIF İBRAFFIFFF FF FBER :15FBIF F$IETER FIFİRHÉIGPGIFFEPIRBIFNISIA "
ਸ+spef t]]ਝ ਸੈਸ਼ਨ ਜF EPI: %E :ਝE (fispਨ sy :BE
IFU EP 8 GIFs 18+ FUg9930FIP5IVINIFFIF EP TUNIT ifẸ GIRUSSIUIRIBEFFFFFfe FE
-5+ਭੁ ''.ਸੀਡਿਓgpਆ :PITE :fiਸ਼ :gਸ਼ਤ 4:115 , #Eye :pxfIF5pxy F FR F
:p : poeIEਣF fixib 11: EXTFB7-ਝਟ
ਸਿਓਲ -(
1FbiF) Fresh
BETTFE 3F7F51%FFE JESHPIAFP3F1153 SP :SB KITE ŠIPKE FIATF F FEE iii #py
ਸੰpxI hIr :98 :DiਸਿਡFFf fireਿਚfਝ7 vw BFF FIBT; F;
FIFFIEP BIF 'pagFIBR EF :Psiskt ripp fsi jÆFFIZIE 155 HRBTEFFIP; Bts that
FP JEFFSHIEFIEP *-FFFER I IBPp9FIFTHFifrie 5 F : Frig IPFA FÁTFIFFIETF FJ1F757
-xITyJ FIFIFE5FIBE F ਸੰਝ 13॥ :rgਲ EIF Ep sIF ਭਿਣੀ be by (5)p
॥ ॥
-F71 FPS брәбір -15FFR51 - FISSP -Pfror F5 HOE II PPSTIP -ERT FIER IBP-N125 FY FIFSIFIBR TFSI POTÉ 5:15FEBTE FI JEPPE FÁFA friss -PFAFFSITUSF :$15PFEF1F5-5S1Tun PSJTUR PA5Fpz #1315FPMKPF15E 1785 *#7770 -FAT APFE F Hiz 'Pappa ŞIŞIF F ŠE ITT ToxiFFF FEO ERISEBI PJÚla Ff:TYPJENUTNUGTE EFT 51F3FTF FFPTff føpet SPFP FP#115 SETEFFFÉIFE imag h $FP7 pp 6F35 Foly F FT BF -1F779 ŠE ŠTER :5F F JBFAR 5153461f5:FFE FÉDÉE Fffispop HIFIPUTIE POPERIFIUpagbus TFSIIPULÆTP75 HiftspfF HIHETA F ÚTFIP55 , Pips Nikif55 BIZTES BIEZPIE BIPFE F 85 öppz 11 BEAR GAFFESTFIE : PPflasterPTER"-(TFFFFFİF)FFFY 1 65BFR :15FEBTE FY IPEA -GE.FPJHFP3 SITE DE :15FBIF FT JFR6 Sty Tepe "'I ATE 11 9811 FIFP F 15fps16 SIER JP5 110811 " Pokpofaftphì $FP3 ÅSHIP ÉPFIA 11 FRÁ SKF#FPPD PPAPASADF" ŠTUEPRISUB -PF62F JFFDESIFIER FRIFRSIDE Ff883 FPTUJ127F5—PP FE 18 Effie VFPR A TIepe frogster 1185 Pf1k3Ffp F BIHIFFRIFIKASBIZTF7F5$ fsp5e Arsfizfor BBTHE BFPS &Frisp sálfizing $1FFIPËS FJEP Plipa kippa B ftpijp ts fiz AFFEPIPFESTA -5623 BBVAFIF F$FSTEDE GITfXIFRE FÉERI 275 ŠEPSAFĖ ATER šppa BETTIERE 51656KVIJA 536 fuparki FP FPC F FRIEE , STEFTIFFFFHHA FÉFFB55 (DVFSIF , FFXAPE
•F3T3E23
p
-চা
-TF1
( FUR
he gਹਿਸ5 ਸੀ। ਨਾਲਣ ,ਝੀ 6pਨ F ਝੋਲੀ IFg
fiਸੀ। -ਲBeyoਟF fਲਿ ਸੀਸਾ ਿਲ ਸੀਲ perਓਨ F FIBE TE ,ਚਿ ਸੀਲਿ ਝpਝste]=5
-Fਝਲੀrip y fਲEਜੰਗਲਨ
be proxFਓਨ F #pਫ ਝਲੀ ਸੀਡੀਪExpਡ ਸੰp
For rifogperiffBFPolisaTE FB PAFB F51635FERPFYÉFIESTAS PAÍSP353 BFP SPF15 FIFTE
-ਇਸ਼ੀਲ -ਲIFFTIIE DpaFF BE5FFITI EH By B5 DE F , #Fਇ ਸੰb ky IF
-ਸੰfਸ਼puਡਿਸIp is : pਇਸੀ॥ਇਸ ਸffigਈAgਸੀਟਉਹgIBABIEF । Fiਸੀਸ čk
py
-kਡ ਸੀਨ ਸੰਝ ;f 5 FBਇਸ :ਈeck#IPE5F7sopEFE5FFH ਟਓਮਾਨ
॥
PIHFE || HIFIFIFFEKAIVERF-ISIPZITUAR "ZAPFIXPF#F55 SÉE II DIFF BIEHIR Álfbsp
-IEF :ਸੀ#FF 56 ਈਸਲੀਸਸ ਸ ਸfਨੀਲgy ( 1 ? 5 #FIKI DIpps
F ਸੰਝ ਵff yFB p ਪਾਸ਼ppਣ sh Bਈ IFE #ਲਓਸੀਸੀ ਸਿਰਨੀ
-SITE FFWGPOVITE HFF F PERFISIPPAPAHIR İMPIE 15FFF Blæ fóliEF 195 ? :B1F31333
ÉF FRARDER PEIFIER F35 F FFFFFÍSIGFÁILE ESIENESIT , första FF>$ipfpfiffe
#ghref= £5 FB fBPk pwsy ipE | 6y Abbb FIED AF
॥ ॥ -FB : APİ ISIP55 BIFF fots ÉS F FLIPTEA FAPPE 5 BIRSE 1 :5P8 RAR FAETUI FT :RBR
Fb #ਤ
॥ 5 ॥
-FE313EPO -FIT FP3 fupzs -TPFTRIT -Fisse -PETAR ll PAROC PizbripB1# 56:15pHIR :FEFE EŠTE FEFFABIR IFTIUGIH50$Ips 1 & fpar HIHIFTER 176 F -65 BS GF HIFFRIBE F FSETT AF FSV FFESTPPFIZIPIESKID SIFF FFP LE FAKIR SIE FPPIPFE EITHEE IF :FH PIFE TAFTE :55 56$15€ HINDIH1635 :p*f*FARBFE HISIA -RT3F3F topshfRPIE PISATOR F F BRIFFTEŞIF5PTHIPPIESEPIPÉVETE FIF FAF PPRIPFEIF FosfPFIFF7 :89 F | 51FRFIIPFF1F5PJIPJÁT IFIMEPIRIDER 175 IRPFTE BIZ SPRIBAP to f15f4P5P73P PERIFF5PPFP F$P: 5 #1 HÁLFPHİR İHP;A FÁBIE JE f15 HP IBFGHÍPISPJA -EFIFFFAFPFEFFITIEF FTPESTF5FIFØJF5F716 FFPTÁPFESFF5F FIPF5 J1F55WIFTS5 -TTPSFPFTS BIBETE Ffy | PIFEPZ PFÁJÁRBIIPFIFFHIHIRGHIE HJÁJÁFEST ARHIFS GIFT ÚTSP - ESIET BIZTETETUGIE : 55 | 56F juFIFFE 4] FITTE F FÉSBIE ' 1 Alpoipons freHF 8 HIS SIENTFE & Hifiipatif TE BENS SIEVIETB$IF9HFd$bFffer i PPFFÍSPFHÁPEP BİZ " 11 8 11 6295 Biz PÉPÉTITIS B FBFEJFTAIFSÞIFFIFFFFFSJIENE JUgla FF5FF BPFE TPB I GEF LUFT* °F 55653 1FBESISH F$IFIER 57351 175 F15 i FHÉIFF | 55 BTE :BPIKIR ŠAI PIPIABÉITEA5-IMBRIFTUJIO || BFER :566&PFPS GPIPÍTP IFISEE "-5€ Apost -FTFF EP TÚIP FAGSTE BOTFIREF EP :J133ZTFÍFIE TEY ÁPE DE İFT$13F FIDEE fe Typis -F710FPS fupDAT -TPFFKI -FIEST -PIETER 11 Palok 11 FTUSTPR Il &ę 11 -195196AF JFIFFE 18511 S FIFR FÍF SIF FFI$IFFIFP45pf65bftit jayfiftulF16566 hift15 -IFF JAFÁPIEF (FIFITTESF FF FFESTEJFFFFF FF45PEF SI SFOPHET JIFÉRIFERIJEME -JAR F11P5 ifagpipipHIP=SPF5JFR Friapoffpa ŠF GESPEKIE:JIITAT:JF JESTETIT #13 RSSIE BETÉTE FES inst+555FPTTEPIA F31FFFFF F Hiklis VF FFFFF5 :PAIRBFIRFFFF155 -PIHŞIER FPB jFfsi F F İpy Fr=fFSTEITA BAF BIF :FP5 MiesfihafFFÉRFIFSIEJIFIP5 :5ÝTESIFIER IPFÉRBI FF FF FISE JFÉRITÉFIF FFUUUJFF İFTET BIFFE HIE Apiapriisirs fAFTE F5 ABER ÉFFFF FF FF FF 11 S :DIFFIER FIBETFBÆRFA5 FIPF556 5655FÄSTE -TER :GARE BIFIER F$6 , jagSPFFITE PULIFIKIA ŠIPBER 11FFIP:15FP3 (FF JOZEFSP :PIFH5 Jpp HTTLE 5 : BFFBIFUPIF F F BIF :JF JF :E0SIF--IPF5 ::SF THELBSTOJIFBIF $15565 11 & SIHE HAPPIE JUJTE ŠIER ÉPPFAPPHEFFI Pipilsins Spiel :Eopaig a lepETJIE JEPP#F# Tsp TE BIFIKTF55. JKP Fink EP SPAR SPF BIFIFIPRSITIFF135 , :TFT for FIF FARRÉ 15 11 8 -FTFIEFFITHS TPT FFSBIZTOJFFIE I HÌE FIBR :Fix ITF HFZJE FIZIIF PIPFIFF5 -1956 HIZ VÁPFESZTEFFE Biz 'P6P3PFÁJHFPI ŠTO $JFP6R3F5 BIPFzfrire F Faffi Afspsrifsp5 -POF THE F#fopas BFPFÁTSFJETUSTAFEIFFE Filharts JJEFIARDIMIFFA FP ŠIBR 52# 11 EE II -Б ТББра fupp -THFFR75 -FESPE JETTER -Pen -TEFFPT -TER-N185 | 51F73AGIFT 1P3A1 jafÆ ! :FER PFEFPFEIF :PF313Fpa foPapersforteps TPSÝTE IPFTF FY TFTFFIFIER :IPÉFIBIE :FFFF SIF FF SF;F hlz FBFR :19F8B1FS195F F$16 FTF5TOEGFRISTLIEBTE ÁFP PSPPI AF POGIE ÜTF 1775 ifilhipazfhp yy F IBFYFIER :16 FR F FFT EFFETP 11 BE OPHEFIHIER :JFIFF-FFITHFREE _ArzfFfOFbEefsr F HITSAR FÉFF5F5JFSTOFTEF5P|F31#ffippyPFP İPĚE SIE FEIFFitF35 Fiz "11811 : Pag : -FHIER PIIPFPJT 1PESTE EINE ERFAFFIHEREFPJPZJFIF15551PapfubipFFIFTUITEÚJF51F7PGIFE II F Hifz ifisse jfis55 Big FEE " I FISUFBEREIFISPIÆ FPFHPF6 FFPRE$Praha BightsklukAHE PAFFORFEÁBB1F7F5$ i Hiz 11 & 11 TEAUIFFITT FPipa SF1JFP3761536 -53EEFFS FIRERÉ=FFIFFPOFF FHFg sftpet 1675 ŠIFFFAF fipoffe FP ŞI E SIFEIPIARUJE - SHPIPESIF PITE, FTFFPASSPẾJPFIP P12fefe :FP1F3FAIKA PIATIFETISFEIPFP F DIFIFIPSE JER 1 :AFEFIFFIŞIFFÉIRÍAptipsprisp FIF561 EF 1:AIPIREETFIPYIŞzp fp*SIFIBR PIŞIFJFIF tufas 13F FIBR 5561 5637 PEFISFPF fpirppf2fFIFTUZIFÉIF JPFP5TFIFFFFPIFIIPFIS E HTF3P FIV1P55 DIFFI$FF FPesippBIANTUFTFF113gp ŠIBP Hiftopasiragog :PE HIETPEHMBP -IFINÁP GIPTE HIFFIFFIGF1F3FFY BIFFERFTIki pizsprzfcipulip F F IPFEIFE$ppablik II FFP ह -FITTE -TESTEPO Il PTPR -FF13FP3 fupa -TAFTRID -Flesha TPIPAR -5PSAT PTEFFPO -F735 -ТојРБА -JPZTSIEF Il PTUSTE If 8 & II PIEPTEFFPIFE FIPETHIBFF2I55,WP Hilfgrep F5 FİSHIFPE Hifgrynhyarpab fase 135:EN F BúiAEht he was fopf ŠPAXOF XF5JFIKETEP 155 :Psphinkgor BE :EARBOSPFS5FB1F3FE F ETF FFBFF FTsSEY FE FUFFIFF ffure : FIFTEF=IFEJA F PIE 1 56361 :fipf1PFIBA GÁT F THE FIRFREIPITEITEP FFIFFEISPEL JEF57F# PILE I FIFFTFIESFÉRU,FE$F$F15 AF FÁA fruke PHÍTEPS | 51F3F5FÁIŞIP5(57=IFIFFF 176 PAFE $5JBP-TF635 F5 ÁSTÆ HIR1F5631pa2f-53F PIFJFFFFFBFFFFÉRETE ÉSTEFSIFIFF* 5 F APAT PExzffitufio :P$TFIFZTR355 55 Friepote JPP :P355 PExZffipzfute TEB KFIFPPIE FIPEPER :59 55$FF 518 :FTABEIPZ 166 FIFBFEZSE Jpp fff # Aktips for FIFBFAHİP HIP5 | 5IFFTHIFFÉIFIFHÁI Tere ft x 5pk) F 165 PPF ÞIE PIGFHB (BIFIKPERFÍFÉIE PIZÉTFBFETOM F Fiśkipa :5P TFITÍİP :SI56 FFP HPIFFIFFITIFRIŞIP53155P5 fript = || FTF fhrosip isip biky BFF35 -PE#zfflip 175 JPFIETFÉIŞIPSafpherE67F55 | 519 FIDIP PAPÉIFFET , BIFARHIE BIFF HISIERPE$JF5FBKÁ 135766F3PFIETSF PISTEIFFISIP5E Pab piztap F 57%9F5FÉ PIESIF .fBITI -1656PFF155, 5161PIBÉIPIPIPPF17355715ETA PINS5 FTUPEFIBIFFRIBIK PINK F 56 513 #FRÁI -IFF 5 :APITJEDNJIA :PTOP İPTIETF FIŞIP5135=1FFFFHP F F F GJEJFSTETE FTUPEF Il 8 € 11 -FTIPO fopas -JEFFROT -FRESSE -FUPA TOP3 бPTETE -BAfist JFB1857 -70775 -FİFEIFIFF7EBSF fhital İEIBIFF XF FF IFF IBFFP3F5 FÉV ESETEJEJPIEEIFIFFFFFF5 -SPE TEB ArhipIPS FAEPSTEPPJA FE HIE 5fing F F JFIF Affos Fiab fÁP Bait Pálf :FP slz 5475=1"FFEE | FÁPPÉFIZFP53#fieşi5 HSIFISA HIJFFFjFfioez hirmsGp :http for tupas Fof FISIEPASİTE #5#fffPHÉTFFIFÉIFIKBF11F3BFBiHPaşıP3EFBEIFFFF195 - FFFEPKE FIAT FITIPFIFF PFFÉ HÄNET fEFEIRITÁ P7F1557552fIRJE F p* FEIPF İFPOİR PİŞEFPIJPF fiz Affle Fp FA STIP55FNPEFFFFFFFFFRFIEME HÉPF F 85F1FF* STIE6 ISSH PIZ$1F$175756 BIJBFTATUPZSIIFIBIIPFFSHZSIFSTFEEF II FIZEPSUJIFSIEF HTTPFTE 576F15 11 HIFIFIFFIFÉM HIVERF-ISIPZIPFSA F DIEFFERİŞBİPFC PIPIESITFB18 :5$ fss FSA FB :Pablo (65675 Ff81fp5 HIABI#15 F F FF DIE "11811 př18 FIFIKTUJTE -Pa IPFAM IPF 15FFIFFIP3 54 Tuba FAFFA TESTETPRÍFA MITIF Afs35 Estry H slp "ITUTE :58 :56 FFPxPsbener bIFE PÁPSTFILE FIFTPEA SF 5175 ikter ApoÉIFAPIPIE -177F JE F$TE SKRBIER JEP İSRF17635 F5 fóla 15731FAP-erfor fpfifTE FIFFT -ER 164516156 FFPRARBÖTEPERIFPJP5 HMp3fsigtis FFPJP IFFIER F T IFIBIE PSMEPIB 1713FFIPIFCHIPTHFPoipzfha mf255681F7FARF5PFE İPĚA $pe PIPIPEHIPIP5 1 所
f
ਜਾਓ
21
( fw
Fbਠ
ਸੰp
"EFE
-pps
-ਈਸਵੀ
-Es
“Tsp
-BWE
-$55
-p;
l F
-IFIR FPEMUPasi15kFSKIFTES FIBERETAPSIPETAK F JOPEAN TÍSS16FPPE HTFA+
#pakiਟjE she IFFEਜੀrfਟfirਣਿਲਾਸ 5 f#ਸੀ pਲ ਸੰof
-PTEH}IPFTSGS11EFPOFTE
II S FÍJEF FIPFFFF 57f5på 15 :ASIFB1F5E 5 EFETUR FIFJFTPFIHFHUFITKKFE EFIFIR PIPI
11 $ FERIPATSIPGRIFIER FEETFOFP8|156 FIFT ÉPPEPIFTERFISIPZIFIFFFP215 SIFÝLEZA 1P6
-PÁ FY FIF1FF71517365 :P F$IFFE1F731F FIPF ÉPPEPISK657 F&BIFF$1p3s$ifs F FIBPÁ
-FFFFF HIHIHFA E HIPE FUNGIFÁJÉPIFIFIPIFF SHIF Bje FBE SIEBIEF# F5 FPEE15
IFE ,Fਜਲੀਲੀਓਜਝੀ ਨੂੰr ,FgIgIFIFTyਤ ਈpyF75 TEFE#
1px; FTE ਈਟਨਿ ॥ ੪ fy) Fਇp3gp jby r pੜbਸੀ ,ਓਹਾਡ5 ਰਸੀ
JERER PIEEP :PYPFIRER HÁTIPTEFFITUFTF VFF F FIBISSÉ FI NOBFE F SIEBIH F$IEJE
Apps PTEÅ FIF5P58 fpe fra BIIBSFİ VE ŠIPBER GEPF165 ÁBIA FABA F PIE 1 :Pof EFB
-FSFÉREAPPÉPTES FERA JF5FE SIEBIFARË F BiffrfFPDPKÁ JE IPHP?TBEF HIEBEA 15
-p5ਸੀ ਇF pleਤਿ 65pfifth ਈਓ-ਸ਼:FFਝੀ : FIFyvyxITyFBIE Fਓ57# ਓਨਤ
:1976 HIFFFFFFPIA PIJETEKA HUSÉR55LFFZJE FTIPE*1F3F3FITFPIPPFEÉPZP P1265
॥ ; ॥
F313 -FIFPG fਸੀ -TPSFR55 -Fissen -FUTTER POFF FPTSFF - FRIST $TFF15 I FF505 :FKét fofpoffrir flesPrif ffspDTEREBIE AHFIZIEHİRBT656 TPFSE 51F5PFIFISK -IPITTB PTKEHIFFF} F F BbPFIFTEREBIE &pskpakhrif-PFIETFAKİPrifs*fB11KP ÉFE HTIIEEIPPÉTEREBIE FÉFF FIR OffPafle IFITSGFTEPIFFIFFFTSPEHITFITUESTFIEPPÉIA FÉ F FIREBIE TEHEEPJEFFIFFE TUJTEIR FIBIE FRIEF HIFPOFTE' FAY : 5$ SIFBIFH F - NF FSGEFIFTEFESTEGET FSIPERFEJF F5 KIIFFPOFK JE ŠEFPIE 65F51F F ASIGF F İFASTE05 - BigF, FBIẾT VIHEHEHIPSETgsp5E45PgJSF PIE FFSIFIFFF FFEE GET ISPF Espersp -FEP3 Ff6p5f6jpozširfWFIBF FF 1 FIŞIEHIR F EFFE FIEBRETGPEISP ÉFEFIR PITSIPÉBIT -Pay big #PFFF HIS FEPI PIHIESITTER:BF F F ÉTHIE Ñ 655kpalje: PfS ÚTFIETSP55 -FSIF JFfEPSE Fp paxFF #SİG5 FIHFEP: $15 16 56 HIFPOFFfPFIPGRIGIE | 55$ F FF FFPAFPF1FF7F5B F#51F7556f5firefox F F 185 51F7ft fp5456 fsinfo:HF5F1F$ :15PÁ HUR ihmzx :FIFTEET PE 1l prffah FFF3B Hiz HPFÉ FY FIBIB3 HIÁJFIFTSB -FÉTAPÁJÁİR Hifhkiin :FIFF :HABIFITEHTABIFU FFPEIPTFBFFIFIFFEIFT FP55 F frakts -PÁ F 67F || :PAFT F 6315781-ÉPJÁRFSFE—EFFEK 11 FFPFIFFREDIE # F$1F5YÉREIE -IE$Pps Hillnite fiziP5E35 pilis fPÁJPJFBFF FFF Biz " II & II EF (FBIFIA :FFF JF16#
हारन
श्री
अनेकान्त
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥३६॥
सम्भवेप्यनारोपितं सर्वोपाधिनिरपेक्षं प्रतिनियतकार्यजनकं यद्वस्तुस्वरूपं यदनन्तरं पूर्वमदृष्टं वस्त्वन्तरं प्रादुर्भवदृश्यते तत्प्र-
तिषेधस्य कर्तुमशक्यत्वात् । न च शब्दविकल्पानां यत्र व्यावृत्तिस्तत्र वस्तुस्वभावोऽपि व्यावर्तते, यतो व्यापकस्वभावः
कारणं वा व्यावर्तमानं स्वव्याप्यं स्वकार्य वाऽऽदाय व्यावर्तते इति युक्तं, तयोस्ताभ्यां प्रतिबन्धात् , न च पयसो दध्मि
शक्तिरित्यादिव्यपदेशो विकल्पो वा भावानां व्यापकस्वभावः कारणं वा येनासौ निवर्तमानो वस्तुस्वभावं निवर्तयेत् ,
व्यपदेशविकल्पा हि न वस्तुस्वभावायत्ताः, किन्तु यदृच्छाजन्मानः, एकत्रैव शब्दादौ नित्यानित्यादिरूपेण वादिनां नाना-
विकल्पप्रवृत्तेः । एवमपि यद्यवधिनिरूपितत्वं शक्तौ तदभेदपर्यवसितमिति तत्कुक्षिप्रविष्टत्वमवधीनां स्वीक्रियते, तदा घटा-
भावः पटाभाव इत्यादिव्यवहारानुरोधेन घटादीनामभावकुक्षिप्रविष्टत्वादभावे घटादिसवमपि प्रसज्येत, चैतन्यं जडभिन्न-
मित्यायनुरोधाचैतन्येपि च जडसत्त्वमासज्येत, तथा च महदासमञ्जस्यमितिदिग् ॥ किश्च सत्कार्यवादे बन्धमोक्षामावोऽपि
सांख्यानामासज्यते, प्रधानपुरुपयोः कैवल्योपलम्भलक्षणतत्वज्ञानोत्पत्ती ह्यपवर्गस्तैरिष्यते, तत्वज्ञानं च सर्वदा व्यवस्थि-
तमेवेति सर्व एव देहिनोऽपावृताः स्युः, मिथ्याज्ञानवशाच्च तेर्बन्ध इष्यते, तस्य च सर्वदा व्यवस्थितत्वात्सर्वेषां बद्धत्वमिति
कुतो मोक्षः । नित्यमुक्त एवात्मा कण्ठगतचामीकरन्यायेनाप्राप्तिभ्रमादेव तदर्थ प्रवृत्तिरित्यपि दुर्वचनं, प्राप्तेः सत्त्वेऽप्रा.
प्तिभ्रमायोगात् , असत्वे चानुत्पत्तः । यदपि भेदानामन्वयदर्शनात्प्रधानास्तित्वमुक्तं, तत्रापि हेतोरसिद्धत्वं पर्यायास्तिक-
नयानुसारिण उद्भावयन्ति, तथा हि, नहि शब्दादिलक्षणं व्यक्तं सुखाद्यन्वितं सिद्ध, सुखादीनां ज्ञानरूपत्वात् , शब्दादीनां
च तद्रूपविकलत्वात् , न च सुखादीनां ज्ञानरूपत्वमसिद्धं, स्वसंवेदनरूपतया स्पष्टमनुभूयमानत्वात्तचसिद्धेः, तथाहि, स्पष्टेयं
व्यवहारन-
यनिरूपणे
तत्प्रभवसा.
वयदर्शन-
प्रक्रियामि-
थ्यात्वव्य-
वस्थापने
तदमिमत-
सत्कार्य-
वादरखण्ड-
नम् ॥
॥३६॥
सुखादीनां प्रीतिपरितापादिरूपेण शब्दादिविषयसन्निधाने प्रकाशान्तरनिरपेक्षा प्रकाशात्मिका स्वसंवित्तिः, यच्च प्रकाशा- न्तरनिरपेक्षं सातादिरूपतया स्वयं सिद्धिमवतरति तद् ज्ञानं, संवेदनं, चैतन्यं, सुखमित्यादिभिः पर्यायशब्दैरभिधीयते, न च सुखादीनामन्येन संवेदनेन वेदनादनुभूयमानता, तत्संवेदनस्यासातादिरूपताप्रसक्तेः, नहि योगजप्रत्यासत्याऽनुमा- नादिना वा परकीयसुखादिसंवेदने सातादिरूपता दृष्टा । भोगायलौकिकमानससाक्षात्कारेणानुभवादनुभूयमानता सुखादेः, न तु स्वयंवेदनादनुभूतिरूपतेत्यपि वात, चन्दनादिस्पर्शनसामग्रीकाले सुखादिमानसानुपपत्तेर्मानससामग्याः सर्वतो दुर्बलत्वात् , तत्र भोगान्यत्वनिवेशे गौरवात् , भोगत्वावच्छिन्नं प्रति वैजान्येन सुखदुःखयोरेव हेतुत्वे भोगाख्यमानसे चन्द- नादिभानानुपपत्तेः चन्दनादिभान एव विलक्षणे भोगत्वकल्पनौचित्यात् , इदं चन्दनमिति बहिर्मुखाकारेण चन्दनादिभा- नेऽपि चन्दनीयं सुखमिदं जातमित्यन्तर्मुखाकारेण सुखस्यापि तत्क्षणमेवानुभवात् , अतिरिक्तत-ज्ञानतत्सामच्यादिकल्पने गौरवात् । एतेन ' मानसत्वावच्छिन्नं प्रति मानसान्यज्ञानसामग्र्याः प्रतिबन्धकतायां वैजात्येन सुखदुःखयोरुत्तेजकत्वमेवा- स्तु' इत्यपि निरस्तम् । तदुत्तेजकत्वकल्पनायामपि गौरवात् , वैजात्येन सुखदुःखयोर्वा तत्रोत्तेजकत्वं मनःसंयोगविशेषा- देवेति विनिगमनाविरहाचेति नव्यबौद्धसिद्धान्तस्यैवोद्धतत्वात् । किश्च शब्दादीनां सुखादिरूपत्वे भावनावशेन मद्याङ्गना- दिषु कामुकादीनां, करभादीनां च कण्टकादिषु प्रतिनियताः प्रीत्यादयो न प्रादुर्भवेयुः, किन्तु प्रत्येकं चित्रा संवित्प्रसज्येत । अथ यद्यपि त्रयात्मकं वस्तु तथाप्यदृष्टादिसहकारिवशात् किञ्चिदेव कस्यचिद्रूपमाभाति न सर्व सर्वस्येति चेत्, न, तदाका- रशून्यत्वादवस्त्वालम्बनप्रतीतिप्रसक्तेः, तथाहि, त्र्याकारं तद्वस्त्वेकाकारं च संविदा संवेद्यत इति । न च यथा प्रत्यक्षेण व्यवहारन- य प्रभवसा वयदर्शन- प्रक्रियानि- रासप्रसङ्गे सुखादीनां- ज्ञानरूपत्व- प्रतिपादनं. शब्दादीनां सवादित्र- यात्मकत्व- खण्डनंच॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम्
व्यवहारन-
यनिरूपणे
तत्प्रभाव-
साङ्ख्यदर्श-
नप्रक्रिया-
॥३७॥
मिथ्यात्व-
गृहीतेऽपि सर्वात्मना वस्तुन्यभ्यासादिवशात्क्वचिदेव क्षणिकत्वादौ निश्चयोत्पत्तिर्न सर्वत्र, तद्वददृष्टादिबलादेकाकारा संविदु-
देष्यतीत्यभिधातुं क्षम, क्षणिकादिविकल्पस्यापि परमार्थतो वस्तुविषयत्वानभ्युपगमात् , वस्तुनो विकल्पागोचरत्वात्पर-
म्परया वस्तुप्रतिबन्धात्तथाविधतत्प्राप्तिहेतुतया तु तस्य प्रामाण्यमिष्टम् , उक्तं च-“लिङ्गलिङ्गिधियोरेवं, पारम्पर्यण
वस्तुनि ॥ प्रतिबन्धात्तदाभास-शून्ययोरप्यबन्धनम् ॥१॥” इति ।। परैस्तु परमार्थत एव वस्तुविषयत्वमिष्टं प्रीत्यादिप्रतिपत्ती-
नां, अन्यथा सुखाद्यात्मनां शब्दादीनामनुभवात् सुखाद्यनुभवख्यातिरित्येतदभिधानमसङ्गतं स्यात् , सुखादिसंविदां च सवि-
कल्पकत्वान्न किञ्चिदनिश्चितं रूपमस्तीति सर्वात्मनाऽनुभवख्यातिप्रसक्तिः । यदि च त्रिगुणात्मकत्वं शब्दादीनां ततः
प्रीत्यादिप्रतिपत्तिप्रतिनियमाय पुरुषविशेषेऽदृष्टविशेषस्य तन्नियामकत्वं दुःखादिधीप्रतिबन्धकत्वं च कल्पनीयम् , तदा
दशाविशेपे प्रीतिधीस्थले परितापधीन स्यात्प्राक्तनाक्षयाऽपूर्वादृष्टोत्पत्तिमामय्यभावाद्दशाविशेषस्यैवोत्तेजकत्वे तु तस्यैव
सर्वत्र हेतुत्वसम्भवात्कालैककारणपरिशेषापत्तिरदृष्टे पुण्यपापरूपे साङ्कर्याजातिरूपविशेषासम्भवश्चेति यत्किश्चिदेतत् ।।
यदपि प्रसादतापदैन्यायुपलम्भात्सुखाद्यन्वितत्वं सिद्धं शब्दादीनामित्यभिहितं, तदप्यनेकान्तिकं, तथाहि, योगिनां प्रकृतिव्य-
तिरिक्तं पुरुषं भावयतां तमालम्ब्य प्रकर्षप्राप्तयोगानां प्रसादः प्रादुर्भवति प्रीतिश्च, अप्राप्तयोगानां तु द्रुततरमपश्यतामुद्वेग
आविर्भवति, जडमतीनां च प्रकृत्यावरणं, न च परैः पुरुपस्त्रिगुणात्मकोऽभीष्ट इति । न च सङ्कल्पात्प्रीत्यादीनि प्रादुर्भ-
वन्ति न पुरुषादिति वाच्यम् । शब्दादिष्वप्यस्य ममानत्वात् , तस्मात् समन्वयादित्यसिद्धो हेतुरनकान्तिकश्च, प्रधानान्व-
यस्य क्वचिदप्यसिद्धेर्यदात्मकं कारणं तदात्मकं कार्यमित्यम्यापि दुर्वचन्वान् , व्यक्ताव्यक्तयोः स्वयमेव भेदप्रतिपादनात् ,
व्यवस्थाप-
ने शब्दा-
दीनां त्रिगु-
णात्मकत्व-
स्य खण्ड-
नम् ॥
॥ ३७॥
विरुद्धश्च, अनित्यानेकरूपेण कार्येण तादृशस्यैव प्रधानस्य सिद्धेः । अनेनैव न्यायेनान्येऽपि हेतवो निरसनीयाः । न हि प्रधानाख्यस्य हेतोरभावेन परिमाणादीनां विरोधः सिद्धः, तथाहि, यदि तावत्कारणमात्रस्यास्तित्वं साध्यते, तदा सिद्ध- साध्यता, न ह्यस्माकं कारणमन्तरेण कार्यस्योत्पादोऽभीष्टो, न च कारणमात्रस्य प्रधानमिति नामकरणे किश्चिदस्माकं हीयते ॥ अथ प्रेक्षावत्कारणमस्ति यद् व्यक्तं नियतपरिमाणमुत्पादयति शक्तितश्च प्रवर्तत इति, तदयुक्तं, अनैकान्तिकत्वात्, प्रेक्षावकारणं विनापि स्वहेतुसामर्थ्यात्प्रतिनियतपरिमाणादियुक्तस्योत्पत्त्याविरोधात् । न च प्रधानं प्रेक्षावत्कारणं युक्तम् , अचेतनत्वात्तस्य, शक्तितः प्रवृत्तेरित्यनेन च किमप्यतिरिक्तशक्तिमत्कारणं साध्यते,आहोस्विद् व्यतिरिक्तानेकशक्तिसम्बन्धित- देकत्वादिधर्मकलापाध्यासित, नाद्यः, सिद्धसाधनात्कारणमात्रस्य ततः सिद्ध्यभ्युपगमात् ॥ द्वितीये हेतोरनैकान्तिकता, तथाभूतेन कचिदप्यन्यथासिद्धेः, न च विभिन्नशक्तियोगात्कस्यचित् कचित्प्रवृत्तिर्दृष्टा, स्वात्मभूतत्वाच्छक्तीनाम् ॥ कारण- कार्यविभागोऽप्यभेदैकान्तेऽयुक्त एव । पर्यायनये निरन्वयविनाशाच सर्वभावानां कचिदपि लयासिद्धरविभागाद्वैश्वरूप्य- स्येत्ययमपि हेतुरसिद्धः, लयो हि भवन् पूर्वस्वभावापगमे वा भवेदनपगमे वा, आये निरन्वयनाशो, द्वितीये लयानुपपत्तिः, अविकलस्वरूपस्य लयोपगमेऽतिप्रसङ्गादिति दिग् ॥ यदपि "प्रधानविकारबुद्धिव्यतिरिक्तं चैतन्यमात्मनो रूपं ते कल्पयन्ति, "चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपम् इत्यागमात्, पुरुषश्च शुभाशुभकर्मफलस्य प्रधानोपनीतस्य भोक्ता, न तु कर्ता, सक- लजगत्परिणतिरूपायाः प्रकृतेरेव कर्तृत्वोपगमादिति वदन्ति, प्रमाणयन्ति चात्र यत् सङ्घातरूपं वस्तु तत्परार्थ, ' यथा शयनासनाभ्यङ्गादि, सङ्घातरूपाश्च चक्षुरादय इति स्वभावहेतुः, यश्चासौ परः स आत्मेति सामर्थ्यात्सिद्धमिति," अत्र व्यवहारन- यनिरूपणे तत्प्रभवसा- वयदर्शन- प्रक्रियामि- थ्यात्वव्य- वस्थापने साङ्क्षचाभि- मतात्मस्व- रूपापाक- रणम् ॥
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ ॥ ३८॥ 'चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपम्' इत्यादिवदता चैतन्यं नित्यैकरूपं प्रतिज्ञातं, तच्चाध्यक्षविरुद्धं, रूपादिसंविदः स्फुटं संविच्या भिन्न- स्वरूपावगमात् , एकरूपत्वे चात्मनोऽनेकविधार्थस्य भोक्तृत्वाभ्युपगमो विरुध्येत, अभोक्त्रवस्थाव्यतिरिक्तत्वाद्भोक्त्र- वस्थायाः, न च दिदृक्षायोगादविरोधो, दिदृक्षाशुश्रूषादीनामुत्पादे आत्मनोऽप्युत्पादप्रसङ्गात् ,तदव्यतिरेकात्तासां, व्यतिरेके च तस्य ता इति सम्बन्धानुपपत्तेः, उपकारस्य तन्निबन्धनस्याभावात् , भावे वा तत्रापि भेदाभेदविकल्पकृतदोषानुद्धारात् । किञ्च कर्तृत्वभोक्तृत्वयोः सामानाधिकरण्यनियमात्कर्तृत्वाभावे भोक्तृत्वमपि तस्य न युक्तं, न ह्यकृतस्य कर्मणः फलं कश्चिदुपभुङ्क्ते, अकृताभ्यागमप्रसङ्गात् , न च पुरुषम्य कर्माकर्तृत्वेऽपि प्रकृतिरस्याभिलपितमर्थमुपनयतीत्यसौ भोक्ता भवति, यतो नासावप्यचेतना सती शुभाशुभकर्मणां कीं युक्ता, येन कर्मफलं पुरुषस्य सम्पादयेत् । अथ यथा पङ्ग्य- न्धयोः परस्परसम्बन्धात्प्रवृत्तिस्तथा महदादिलिङ्गं चेतनपुरुषसम्बन्धाचेतनावदिव धर्मादिकार्येष्वध्यवसायं करोतीत्यदोष एवायम् , उक्तं च (सांख्यकारिका) " पुरुषस्य दर्शनार्थ, कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ॥ पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि, संयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥२१॥" इति चेत् , न, सर्गस्योभयजत्वे संयोगादिवद् द्विष्ठत्वेन नैमित्तिकद्रवत्वादिस्थानीयत्वेऽपितं प्रति निमित्तत्वेनात्म- नोऽप्रकृतिविकृतित्वभङ्गापत्तेः। किश्च यदि प्रकृतिरकृतम्यापि कर्मणोऽताविकमयोगेनापि फलमभिलपितमुपनयति, तदा सर्वदा सर्वस्य पुंसोऽभिलपितार्थसिद्धिः किमिति न स्यात् ? । न च तत्कारणस्य धर्मस्याभावान सा स्यादिति वाच्यम् , धर्मधर्मस्यापि प्रकृतिकार्यतया तदुत्पादनद्वारोक्तप्रसङ्गानुद्धारात् ॥ किश्च यद्यमिलपितं फलं प्रकृतिरुपनयति तदा नानिष्टं प्रयच्छेत्, न हि कश्चिदनिष्टमभिलषति । किञ्च उपनयतु नाम प्रकृतिः फलं, तथापि भोक्तृत्वं पुंसोऽयुक्तम् , अविका- व्यवहारन- यनिरूपणे तत्प्रभवसा- यदर्शन- प्रक्रियामि- थ्यात्वव्य- वस्थापने साङ्ख्यामि- मतात्मस्व- रूपापाकर- णम् ॥ ।। ३८ ॥
रित्वात् , न हि सुखदुःखादिबलादपरितापादिरूपविकारमनुपनीयमानस्य भोक्तृत्वमाकाशवत्सङ्गतम् ॥ अथ न विकारा- पत्त्यात्मनो भोक्तृत्वमिष्टं, किं तर्हि बुद्ध्यध्यवसितस्यार्थस्य प्रतिबिम्बोदयन्यायेन सञ्चेतनात् , तथाहि, बुद्धिदर्पणसक्रान्त- मर्थप्रतिबिम्भकं द्वितीयदर्पणकल्पे पुंस्यध्यारोहति, तदेव भोक्तृत्वमस्य, न तु विकारापत्तिः, न च पुरुषे प्रतिबिम्बमात्र- सान्तावपि स्वरूपं प्रच्युतिमेति, दर्पणवदविचलितस्वरूपत्वादिति चेत् , ननु प्रतिबिम्बलङ्कमासम्भवात्तदधिष्ठानत्वमेव सः, तथा च भोक्तृत्वव्यवहारानुरोधात्यातिभासिकभोक्तृत्ववकर्तृत्वव्यवहारानुरोधात्प्रातिभासिकं कर्तृत्वमप्यात्मनि किं न स्वीक्रियते । किञ्चैवमात्मनि भ्रान्तभोक्तृत्वादिकल्पनापेक्षयाऽभ्रान्ततत्कल्पनायामेव लाघवाद्यौचित्यं किं न बुध्यसे ?, पङ्ग्बन्धदृष्टान्तोऽप्यत्र तदा शोभेत, यदि वैपम्यं न स्यात् , अस्ति च तत् , तथाहि, अन्धो यद्यपि मार्ग नोपलभते तथापि पङ्गोविवक्षामसौ वेत्ति चेतनावत्वात् , न चैवं प्रधानं पुरुषविवक्षामधिगच्छतीत्यभ्युपगम्यते, तथा सति भोक्तृत्वमपि तस्य प्रसज्येत, करणज्ञस्य भोक्तृत्वाविरोधात् , न च बुद्धिव्यतिरिक्तं चैतन्यं प्रमागसिद्धमिति कः परश्चिद्रूप आत्मा । यदपि चिपाद् बुद्धर्भेदप्रसाधनाय परैरनुमानमुपन्यस्यते, यद् यदुत्पत्तिमत्वनाशित्वादिधर्मयोगि तत्तदचेतनं, यथा रसादयः, तथा च बुद्धिरिति स्वभावहेतुरिति, तत्रापि वक्तव्यं, किमिदं स्वतन्त्रसाधनमाहोस्वित्प्रसङ्गसाधनम् , आयेऽन्यतरासिद्धो हेतुः, यथाविधमुत्पत्तिमञ्चमपूर्वोत्पादलक्षणं, नाशित्वं च निरन्वयविनाशात्मकं प्रसिद्ध बौद्धस्य, न तथाविधं साङ्ख्यस्थ, तयोराविर्भावतिरोभावरूपत्वेन तेनाङ्गीकारात् , यथा च साङ्घयस्य तौ प्रसिद्धौ, न तथा बौद्धस्येति, न च शब्दमात्रसि- द्धावनुगतहेतुसिद्धिः, तदिदमुक्तं-" तस्यैव व्यभिचारादौ, शब्देऽप्यव्यभिचारिणि ॥ दोपवत्साधनं ज्ञेयं, वस्तुनो वस्तु- व्यवहारन- यनिरूपणे तत्प्रभबसा- यदर्शन- प्रक्रियामि- थ्यात्वव्य- वस्थापने तदभिमता- त्मिस्वरूपा- पाकरणम्॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
सिद्धितः ॥ १॥” इति ॥ द्वितीये साध्यविपर्यये बाधकप्रमाणादर्शनादनैकान्तिकता, न ह्या प्रतिबन्धोऽस्ति चेतनस्यो-
त्पादनाशाभ्यां न भवितव्यमिति । यदपि कल्पितं वत्मविवृद्धिनिमित्तं, क्षीरम्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य ।। पुरुषविमोक्षनि-
मित्तं, तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ।। ५७ ॥” इति तदपि न सम्यग, यतः क्षीरमपि न स्वातन्त्र्येण वत्मविवृद्धिं चेतस्याधाय
प्रवर्तते, किं तर्हि काचित्केभ्यः स्वहेतुभ्यः प्रतिनियतेभ्यः समुत्पत्तिमासादयति, तच्च लब्धात्मलामं वत्सविवृद्धिनिमित्त.
तामुपयातीत्यचेतनमपि प्रवर्तत इति व्यपदिश्यते, न चैवं प्रधानस्य कादाचित्का प्रवृत्तियुक्ता, नित्यत्वात् , कादाचि-
कसहकारिसमवधानस्याप्यनागन्तुकम्वशक्तिनिमित्तत्वादेकमुक्ती सर्वमुक्तिप्रसङ्गात् , अन्यथैतद्वैषम्यनिर्वाहकप्रतिनियता-
त्मव्यापाराभ्युपगमप्रसङ्गात् , तत्तत्काले तत्तत्पुरुषस्य मोक्षसम्पादकतत्तत्सहकारिचक्रसमवधायकानन्तशक्तिमत्प्रधानाभ्युप-
गमे च तत्तत्क्षणोत्तरकायें तत्तत्क्षणस्यैव हेतुत्वावश्यकत्वात्कालेककारणपरिशेषादेव, किमन्तर्गडुना प्रधानेनेति द्वात्रिं.
शिकाप्रकरणादाभिहितमस्माभिः ॥ यदपि परार्थाश्चक्षुरादय इत्युक्तं, तत्राप्याधेयातिशयो वा परः साध्यत्वेना-
भिप्रेतः१, यद्वाऽविकार्यनाधेयातिशयश्चर, आहोस्वित्सामान्येन चक्षुरादीनां पारार्यमानं साध्यत्वेनाभिप्रेतम्३ इति विकल्पत्र-
यम् , नाद्यः, सिद्धसाधनात् , अस्माभिरपि चक्षुरादीनां विज्ञानोपकारित्वेनाभ्युपगमात् ।। न द्वितीयः, विरुद्धत्वात् , साध्यविप-
र्ययेण दृष्टान्तहेत्वोाप्तत्वेन प्रतीतेः ॥ अविकारिण्युपकारस्याशक्यक्रियत्वेन पाराायोगाच्च न तृतीयो, यथाकथञ्चित्पारा-
स्य सर्वैरभ्युपगमात् । न च चित्तमपि साध्यमित्वेनोपात्तमिति तदपरस्य परस्य माध्ये प्रवेशान सिद्धसाधनम् , अपरस्या-
विकारिण उपकार्यत्वासम्भवात् , चक्षुरूपालोकमनस्काराणामपरचक्षुरादिकदम्बकोपकारित्वस्यैव न्याय्यत्वाद्विज्ञातस्य चानेक-
व्यवहारन-
यनिरूपणे
तत्प्रभवसा-
वयदर्शन-
प्रक्रियामि-
थ्यात्वव्य-
वस्थापने
पुरुषार्थप्र-
वृत्तेः खण्ड-
IA
नम् ॥
॥ ३९॥
व्यवहारन- यनिरूपण समाप्तिः, ऋजुसूत्रन- यनिरूपणं, कारणकृतोपकाराध्यासितस्य संहतत्वं कल्पितमविरुद्धमेवेति न किञ्चिद्विचार्यमाणं साङ्ख्यदर्शने चारिमाणमञ्चतीति दिग् ।। दर्शितेयं यथाशास्त्रं, व्यवहारनयस्य दिग् ॥ साङ्खयसिद्धान्तहेतुः श्री-यशोविजयवाचकैः ॥१॥ ऋजु अवकं श्रुतं ज्ञानमस्य ऋजुश्रुतः । यद्वा ऋज्ववक्रं वस्तु सूत्रयतीति ऋजुसूत्रः। यद्भाष्यकृत्-"उज्जु ऋजुं सुयं ना-णमुज्जुसुयमस्स सोयमुज्जुसुओ। सुत्तयइ वा जमुज्जु, वत्थु तेणुज्जुसुत्तोत्ति ॥२२२२।" व्या० ऋजुत्वं चैतदभ्युपगत- वस्तुनोऽवर्तमानपरकीयनिषेधेन प्रत्युत्पन्नत्वं, अतीतमनागतं परकीयं च वस्त्वेतन्मते वक्रं, प्रयोजनाकर्तृत्वेन परधनवत्त- स्यासचात् , स्वार्थक्रियाकारित्वस्यैव स्वमत्तालक्षणत्वात् , अत एव व्यवहारनयवादिनं प्रत्ययमेवं पर्यनुयुक्ते, यदि व्यवहारानुपयोगादनुपलम्भाच्च सङ्ग्रहनयसम्मतं सामान्यं त्वं नाभ्युपगच्छसि तदा तत एव हेतुद्वयाद् गतमेष्यत्परकीयं च वस्तु माम्युपगमः, नहि तैः कश्चिद्व्यवहारः क्रियते, उपलब्धिविषयीभूयते वा, वासनाविशेषजनितो व्यवहारस्तु सामान्येऽप्यतिप्रमज्यत इति, तस्माद् यत्स्वकीयं साम्प्रतकालीनं च तद्वस्तु, लिङ्गसङ्ख्यादिभेदेऽपि तटस्तटीतटमित्यादौ, गुरुर्गुरवः, आपो जलं, दाराः कलत्रमित्यादौ च विपरिणतनानापर्यायशब्दवाच्यं निक्षेपचतुष्टयाक्रान्तमप्येकमेव स्वीकुरुते अजुसूत्रनयः, न तु शब्दनयवद्भावरूपैकनिक्षेपाक्रान्तलिङ्गसङ्ख्याभिन्नपर्यायशब्दावाच्यं च । तदाह भाष्यकृत्-" तम्हा णिययं संपइ-कालीणं लिङ्गवयणभिन्नपि ॥ नामादिभेयविहियं, पडिवजइ वत्थुमुज्जुसुओत्ति ।।२२२६।। व्या० अस्मानयात्पर- पर्यायासंस्पर्शिन्येकपर्याये वचनं विच्छिन्दवौद्धदर्शनं प्रवृत्तम् , तथा च तदनुसारिणः पठन्ति "पलालं न दहत्यग्नि-दह्यते न गिरिः कचित् ॥ नासंयतः प्रत्रजति. भव्यजीवो न सिद्ध्यति ॥१॥ "पलालपर्यायस्यामियामोगा तत्प्रभव- बौद्धमतोप- दर्शनम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥४०॥
स्वात् , यः पलालो नासौ दह्यते, यश्च भस्मभावमनुभवति नासौ पलालपर्यायमनुभवति, एवमग्रेऽपि द्रष्टव्यम् । न चैवं
व्यवहारबाधः, सर्वत्र नये कचिदंशे तद्भाधात् । ननु क्षणक्षयसिद्धावेवं युक्तं, तत्रैव च प्रमाणं न पश्यामः, तथाहि-न
तावदध्यक्षं क्षणक्षयितामवगच्छत् प्रतीयते, परैरभ्युपगम्यते वा, यतः परैरन्त्यक्षणदर्शिनामेव प्रत्यक्षतः क्षणिकताया निश्च-
यतः प्रकल्प्यते भ्रान्तिकरणसद्भावान प्राक, उक्तं च कचित्तदपरिज्ञानं, सदृशापरसम्भवात् ॥ भ्रान्तेरपश्यतो भेदं,
मायागोलकभेदवत् ॥ १ ॥” इति । नाप्यनुमानात्तन्निश्चयः, क्षणिकत्वाभ्युपगमे तदङ्गपक्षधर्मत्वादेरेव निश्चेतुमशक्य-
त्वात् , सर्वोपसंहारेण व्याप्तिग्रहोपायाभावाच, विकल्पस्याप्रमाणत्वेन तदग्राहकत्वात् , निर्विकल्पेन च तत्संस्पर्शस्यापि
कर्तुमशक्यत्वात् , न चान्यद् बौद्धानां प्रमाणमस्ति, प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्षाच भावानां स्थैर्यप्रतिपत्तिः क्षणिकत्ववाधिका, न
च प्रत्यभिज्ञानमप्रमाणं, "तत्रापूर्वार्थविज्ञानं, निश्चितं बाधवर्जितम् ॥ अदुष्टकारणारब्धं, प्रमाणं लोकसम्मतम् ॥१॥" इति
प्रमाणलक्षणयोगात् , न च स्मृतिपूर्वकत्वात्स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानुसन्धानस्य प्रत्यक्षत्वमयुक्तमिति वाच्यम् , सत्सम्प्रयो-
गजत्वेन स्मरणपश्चाद्भाविनोऽप्यक्षजप्रत्ययस्य लोकप्रत्यक्षत्वेन प्रसिद्धत्वात् , उक्तं च ॥ "न हि स्मरणतो यत्प्राक, तत्प्रत्य.
क्षमितीदृशम् ॥ वचनं राजकीयं वा, लौकिकं वापि विद्यते ॥१॥ न चापि स्मरणात्पश्चा-दिन्द्रियस्य प्रवर्तनम् ।। वार्यते केन-
चिन्नापि, तत्तदानी प्रदुष्यति ॥ २॥ तेनेन्द्रियार्थसम्बन्धात्, प्रागूचं वापि यत्स्मृतेः । विज्ञानं जायते, सर्व प्रत्यक्षमिति
गम्यताम् ।। ३॥" इति ।। अनेकदेशकालावस्थासमन्वितं सामान्य द्रव्यादिकं च वस्त्वस्याः प्रमेयमित्यपूर्वप्रमेयस्वभावः ।।
उक्तं च " इदानीन्तनमस्तित्वं, न हि पूर्वधिया गतम्॥” इति । न च पूर्वापरकालसम्बन्धिद्रव्यस्यैकत्वात्कालस्य चातीन्द्रि-
ऋजुसूत्रन.
यनिरूपणे
तत्प्रभव-
बौद्धमतोप-
दर्शने स्थै-
र्यवादिनः-
प्रश्नः, तत्र
प्रत्यभिज्ञा-
प्रामाण्य-
व्यवस्था-
पनम् ।।
॥४०॥
यत्वान्न प्रमेयातिरेक इति वाच्यम् । तथापि प्रत्यभिज्ञातार्थे सन्देहाभावेन तत्प्रामाण्यसिद्धेः, विषयातिरेकस्येव सन्देहापाकरण- स्याऽपि प्रामाण्यनिवन्धत्वात् , न च सविकल्पमेव प्रत्यभिज्ञानं, अविकल्पस्यापि तस्य दर्शनात् प्रथमप्रत्ययाभिन्नविषयाकाराऽनु- व्यपार्थग्राह्यविकल्पस्यैकत्वप्रत्यभिज्ञानत्वात् , यथा ह्यर्थमंसर्गानुसारिणोऽनुभवादुपजातानीलविकल्पानीलानुभवः सौगतैर्व्य- वस्थाप्यते तथा पूर्वदृष्टं पश्यामीत्युल्लेखवतोऽनुसन्धानविकल्पादत्रुट्यदूपशब्दाद्यनुभवः किं न व्यवस्थाप्येत, अक्षव्यापारानन्तर- त्वस्योभयत्राविशेषात्पूर्वदृष्टताज्ञानस्य पूर्वदर्शनं विनाऽसम्भवात्तद्विना पौर्वापर्येऽक्षजप्रत्ययप्रवृत्तेरभावान्न प्रत्यभिज्ञाप्रामाण्य- मिति चेत् , न, पूर्वदृष्टमित्युल्लेखमन्तरेणापि पौर्वापर्ये दृगवतारात् , अन्यथाऽत्रुट्यद्रूपनिश्चयानुपपत्तेः, ततो निर्विकल्पकस्य सवि- कल्पकस्य वा स्थैर्यग्राहिणः प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणाबाधितत्वात् क्षणक्षयस्य नाभ्युपगमार्हत्वम् ।। किञ्च विनाशस्य सहेतुकत्वा- तद्धत्वभावादेव क्षयिणामपि भावानां कियत्कालं स्थैर्यमनाबाधम् । न च विनाशस्य सहेतुकत्वमसिद्धं, दण्डेन घटो भग्नः, अग्निना काष्ठं दग्धमित्याद्यनुभवस्य सार्वजनीनत्वात् । न चावस्तुत्वाद्विनाशस्य न कार्यत्वं, यथा हि नोपलम्भव्यावृत्तिरेवानु- पलम्भः परेषां, किं तु विवक्षितोपलम्भादन्यः पर्युदासवृत्त्योपलम्भ एव, तथा नाशोऽपि भावान्तरविनिर्मुक्तो भाव एवेति तम्य कार्यत्वाविरोधात् । उक्तं च--" भावान्तरविनिर्मुक्तो, भावोऽत्रानुपलम्भवत् ॥ अभावः सम्मतस्तस्य, हेतोः किं न समुद्भवः १ ॥ १ ॥” इति । अत्रोच्यते--यदुक्तं क्षणक्षयसिद्धौ नाध्यक्षं प्रवर्तत इति, तदयुक्तम्, पूर्वापरक्षणसम- न्वयम्याध्यक्षाविषयत्वे मध्यमक्षणसचमेव गृह्णता प्रत्यक्षेण कालान्तरस्थितिविपर्यासलक्षणभेदपरिच्छेदात् । न च काला- न्तरसमन्वयमधिगन्तुमक्षममध्यक्षं न तदुद्भासयतीति सन्देह एव तत्र युक्तो नासवमिति वाच्यम् । कालान्तरस्थायि- ऋजुमूत्रन- यनिरूपणे तत्प्रभव- बौद्धमतो- पदर्शने त- त्खण्डना. त्मकपरप्र- नस्य प्रति- विधानम् ।।
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तत्प्रभवबौ-
द्धमतोपद-
र्शने क्षणक्ष-
॥४१॥
त्वस्य कदाचिदप्यनवगतौ सन्देहाभावात् , सदृशापरापरक्षणोत्पत्तिदोषादन्त्यक्षणादर्शिनां क्षणिकत्वनिश्चयो विकल्पात्मको
नेष्यते, निर्विकल्पकं तु क्षणिकतायां सदैव प्रमाणभावमाविभर्ति, क्षणिकत्वप्रकारकाध्यवसायजनकतया समनन्तरप्रत्यय-
स्येव तत्प्रयोजकतया पूर्वपूर्वतरक्षणज्ञानानामपि प्रामाण्याव्याघातात् , स्वविषयविषयकत्वस्योभयत्राविशेषात् , व्यवहार-
साधनाय विप्रतिपत्तिनिरासाय च तत्रानुमानमाद्रियत एव । क्षणिकत्वपक्षेऽप्यनुमानसामग्रीसम्पत्तौ पक्षधर्मवादिना निश्चि-
तस्य हेतोः स्वसाध्यप्रतिविम्बजननक्षमत्वात्सविकल्पकत्वेऽपि तस्य परम्परया वस्तुप्रतिबन्धेन प्रामाण्यात् । अनुमानं च
क्षणिकतायां 'यत्सत्तक्षणिकमेव 'सन्ति च द्वादशायतनानीति' । ननु क्षणिकत्वस्य प्रत्यक्षेणानिश्चयात्कथं हेतुसाध्ययोस्ता-
दात्म्याविनाभावग्रहः, न च कृतका विनाशं प्रत्यनपेक्षत्वात्तद्भावनियता यतो भावा इत्यनुमानसिद्धं तत्तादात्म्यम् , निहें-
तुकत्वेऽपि नाशस्य यदैव घटादयो नाशमनुभवन्तः प्रतीयन्ते तदैव तेषामसौ निर्हेतुकः स्यानान्यदेति कथं क्षणविशरारुता
कृतकत्वेऽपि भावानाम्, एकक्षणस्थायित्वस्वभावेनोत्पत्तेर्भावानां प्रागपि विनाशसङ्गतिरिति चेत्, न, अनेकक्षणस्थायित्व-
स्वभावेन स्वहेतुभ्य उत्पत्तरप्युक्तौ बाधकाभावात् , न च यदि कचित्कदाचिद्विनाशो भवेत्तदा तत्कालद्रव्यापेक्षत्वादन्या.
नपेक्षत्वहानिः, विनाशहेत्वनपेक्षत्वेनान्यानपेक्षताया अहानेः, अन्यथा द्वितीयेऽपि क्षणे विनाशो न स्यात्तत्कालाद्यपेक्षत्वात्,
न च क्रमयोगपद्याभ्यां सामर्थ्यलक्षणं सत्त्वं व्याप्तं क्रमाक्रमनिवृत्तौ च नित्यात्सचं निवर्तमानं क्षणिकेष्वेवावतिष्ठत
इत्यपि वक्तुं युक्तम् , क्षणिकत्वे क्रमाक्रमप्रतिपत्तेरेवासम्भवात् , पूर्वोत्तरकालभाव्यन्यतरप्रतिपत्तृभ्यां तदितरासंस्पर्शात् ,
यो हि पूर्ववस्तुप्रतीत्यनन्तरमपरस्य ग्राहकः स क्रमग्राही भवेत् , तथा चाक्षणिकत्वं बलादापतति, बौद्धस्य च काल एव ना-
यमसहमा-
नस्स पर-
स्य प्रश्नः॥
॥४१॥
ऋजुत्रन- यनिरूपणे तत्प्रमववी- द्धमतोपद- र्शने परप्र- नप्रतिवि- धानेन क्ष- स्तीति कथं तस्य क्रमग्रहः, भिन्नकालवस्तुग्रहाभावे चानेकवस्तुरूप एव क्रमः, स च नित्यस्यापि क्रमिककार्यकर्तृत्वे न विरुध्यते, कालाभावेन तत्सङ्करदोषाभावात्, अत्र केचित्प्रतिविदधति, प्रत्यक्षसिद्ध एव क्रमयोगपद्ये, तथाहि, सहभावो भावानां योगपद्यं, क्रमस्तु पूर्वापरभावः, स च क्रमिणामभिन्न एकप्रतिभासश्च तत्प्रतिभासः।। अथैकप्रतिभासानन्तरमप- रस्य प्रतिभासः क्रमप्रतिभासो न त्वेकस्यैवातिप्रसङ्गात्, एवमेतत् , किन्तु यदैकप्रतिभासो जातोऽपरश्च जायते तदा प्राक्तने योगपद्यप्रतिमासप्रसक्तिरानन्तर्याभावात् , तस्मात् ऋमिणोः पूर्वापरज्ञानाभ्यां ग्रहणे तदभिन्नः क्रमोऽपि गृहीत एव, केवलं पूर्वानुभूतपदार्थाहितसंस्कारप्रबोधादिदमस्मादनन्तरमुत्पन्नमित्यादिविकल्पप्रादुर्भावे क्रमो गृहीत इति व्यवस्थाप्यते, क्रमि- णोहेऽपि कथश्चिदानुपूर्व्या विकल्पानुपपत्तौ क्रमग्रहव्यवस्थापनायोगात् , अत एव क्रमिणामेकग्रहेऽपि न क्रमग्रहो व्यव- स्थाप्यते, अपि च कथं कालाभ्युपगमवादिनोऽपि क्रमग्रहः, सर्वकार्याणामेककालत्वात् , न च भिन्न भिन्नकालोपाधिक्र. मात्कार्यक्रमो युक्तः, कालस्याभिन्नत्वेनाभ्युपगमात्तद्योगात्तदुपाधीनां क्रमानुपपत्तेः, कालोपाध्यन्तरक्रमापेक्षतत्क्रमाम्यु- पगमे चानवस्थानात् , स्वरूपेण तत्क्रमाभ्युपगमे च बहूनामसहायानां कार्याणामेव स्वरूपतः क्रमः किं न भवेत् ? अस्माकं तु लोकसिद्धकालतत्क्रमाभ्युपगमान दोपः, तस्माद् घटादिः पदार्थोऽर्थक्रियाकारी क्रमाक्रमाभ्यां प्रत्यक्षसिद्धः, तस्यैककार्यकरणं प्रति यत्सामर्थ्य तत्तदैव, न पूर्व न पश्चात् , तत्कार्याभावात् , सामर्थ्य तु ततोऽव्यतिरिक्तमेव, उत्तर- कार्योत्पत्तावप्येवं द्रष्टव्यमिति सामर्थ्य भेदेन पदार्थभेदात्कथं न क्षणिकत्वं, यथा च दृष्टेषु घटादिषु क्षणिकत्वव्याप्तमर्थ- क्रियाकारित्वरूपं सत्त्वं सिद्धं, तथाऽदृष्टेष्वपि सिद्ध्यत्यविशेषादिति सर्वोपसंहारेण व्याप्तिमत्रगत्य यत्र यत्र सत्त्वं निश्ची- णिकत्वानु- मानहढी- करणम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
ऋजुसूत्रन-
य प्रभवबौ-
द्धमतोपद.
र्शने परप्र-
नस्य प्रति-
॥४२॥
विधाने म-
यते तत्र तत्र क्षणिकत्वानुमान प्रवर्तयन्ति विद्वांसः, हेतुमाध्ययोस्तादात्म्यप्रतिबन्धनिश्चयादिति स्थितम् ॥ न च सत्वे सत्य-
प्यक्षणिकत्वस्यैव साम्राज्यात् (ज्यम् ) ॥ अथ प्रथमक्षणे जन्मैव न स्थितिः, द्वितीये स्थितिरेव न जन्म, एवमपि क्षणिकत्वं
प्रसक्तं जन्मजन्मिनोः स्थितिस्थितिमतोश्वाभेदादिति । परे तु सचलक्षणस्य हेतोस्तादात्म्यरूपः प्रतिबन्धो विपर्यये वाध-
कप्रमाणनिवन्धन इत्येवं वर्णयन्ति । यत्र क्रमयोगपद्यायोगो न तत्रार्थक्रियासामर्थ्यलक्षणं सत्त्वमित्यक्षणिकाद्व्यावर्तमानस्य
क्षणिकत्वस्य क्षणिकेष्वेवावस्थानात् । अथ कथमर्थक्रियासामर्थ्यनिवृत्तिः क्रमयोगपद्यनिवृत्तिनिमित्तेति चेत् , तयोस्तद्व्यापक-
स्वात् । अथात्राऽपि यदि व्याप्यव्यापकभावो बाधकान्तरनिबन्धनस्तदा तत्रापि बाधकान्तरान्वेषणायामनवस्थेति चेत्, न,
क्रमयोगपद्याभ्यां सामर्थ्यस्य व्याप्तेः प्रकारान्तरासम्भवतो निश्चयेनानवस्थाभावात् , प्रकारान्तरापम्भवश्च प्रत्यक्षेणैव
निश्चीयते, क्रमेण योगपद्येन वा घटादीनां स्वकार्यमुत्पादयतामध्यक्षेणावलम्बने इतररूपविवेकमानात्तदनन्तरं क्रमभावि
तत्कार्य नाक्रम इति विकल्पद्वयप्रवृत्तः, नीलाद्यनुभवोत्तरमनीलादिव्यवच्छेदविकल्पोदयात्तस्याऽनीलादिव्यवच्छेदावगाहित्व-
वत् क्रमप्रतीतावक्रमव्यवच्छेदविकल्पोदयात्तस्याक्रमव्यवच्छेदावगाहित्वस्य न्यायप्राप्तत्वात् ॥ अथ कथं क्रमयोगपद्यायो.
गोऽक्षणिकेषु भावेषु, उच्यते, न तावदक्षणिकाः क्रमेणार्थक्रियाकारिणः, कारकस्वभावस्य प्रागेव सन्निधानात्प्रथमक्षण एव
द्वितीयादिक्षणभाविसकलकार्यकरणप्रसक्तेः ॥ न च सहकारिक्रमात्कार्यक्रम इति वक्तव्यं, यतः सहकारिणः किं विशेषाऽऽ-
धायकत्वेन तथा व्यपदिश्यन्ते, आहोस्विदेकार्थप्रतिनियताश्चक्षुरादय इवाक्षेपकारिणः स्वविज्ञानेन ? । नायः, तजनितविशेष-
स्यार्थान्तरत्वात्तेनाकारकस्वभावाप्रच्यावनात् , नापि द्वितीयः, नित्यानामेककार्यप्रतिनियमलक्षणसहकारित्वसम्भवेपि प्राक्प-
तान्तरोपद-
शनं, स्थिरे
क्रमयोगप-
द्यायोगव्य-
वस्थाप-
नम् ॥
॥४२॥
ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतोपद- शेनेऽ-क्ष- श्रात्पृथग्भावसम्भवात् सहैत्र कुर्वन्तीति सहकारित्वनियमस्यानुक्तिसम्भवात् , साहित्येऽपि प्राक्तनाकारकस्वभावानिवृत्तेः, प्रागेव कारकस्वभावत्वे च न कदाचित्तक्रियाविरतिरिति कुत एकार्थक्रियाप्रतिनियमस्वरूपमक्षणिकानां सहकारित्वम् ? ॥ कार्यस्य सामग्रीजन्यतया तस्याश्चापरापरप्रत्यययोगरूपतया प्रत्येकं तक्रियास्वभावत्वेऽप्यनुत्पत्तिरिति चेत्, व्याहतमेतत् , समुदितस्य कार्यजननस्वभावत्वे केवलस्य तजनननस्वभावत्वासिद्धेः ॥ किश्च प्रत्येकातिरिक्तसमुदाये प्रमाणाभावात् प्रत्येकमनुत्पादकत्वे समुदायस्याप्यनुत्पादकत्वम् ।। अथ प्रत्येकं कारणानां स्वरूपयोग्यतैत्र, फलोपहितकारणतायां त्वेकै- कस्य कारणस्येतरकारणसाहित्यमप्यवच्छेदकमिति न दोष इति चेत् , इतरकारणसाहित्यमपि यद्येकैककारणस्य कार्योपधान- स्वभावानुप्रविष्टं, तदानुपनमन्त्यपि तानि गलेपादिकया गृहीत्वा प्रतिक्षणं कायं कुर्यात् ।। अथ कारणे हेत्वन्तरोपनिपा- तेन कार्यजननखभाव उत्पद्यत इति केवलस्य न जनकत्वं, न च सहकारिसहितासहितावस्थयोरस्य स्वभावभेदः, प्रत्ययान्त- रापेक्षस्वकार्यजननस्वभावतायाः सर्वदा भावादिति चेत्, न, प्रत्ययान्तरसत्वेऽपि ह्यस्य स्वरूपेणैव कार्यकारिता, तच्च प्राग- प्यस्ति, प्रत्ययान्तरापेक्षायाश्च ततो लभ्यस्यात्मातिशयस्याभावादसम्भव इति केवल एव कार्य किं न कुर्यात् , अकुर्वच केवलः सहितावस्थायां च कुर्वन् कथं न भिन्नस्वभावो भवेत् , तन्नाऽक्षणिकस्य क्रमेणार्थक्रिया सम्भवतीति न क्रमयोगः । योगपद्यमपि तस्यासङ्गतं, द्वितीयादिक्षणेषु तावत एव कार्यकलापस्योदयप्रसङ्गाद्धेतोस्तजननस्वभावस्याप्रच्युतेः, सन्निहि- तसकलकारणानां चानुदयोऽयुक्तः, प्रथमक्षणेऽपि तद्भावापत्तेरिति क्रमयोगपद्यायोगादक्षणिकानामर्थक्रियासामर्थ्य विरहल. क्षणमसत्त्वमायातमिति सवलक्षणः स्वभावहेतुः क्षणिकतायां बाधकप्रमाणबलान्निश्चिततादात्म्यः कथं न गमकः । अथाक्ष- णिकस्यार्थ- क्रियाकारि- त्वखण्ड- नम् ॥
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ ॥४३॥ णिकानामिव क्षणक्षयिणामप्यर्थक्रियासामर्थ्य लक्षणं सचमनुपपन्नमेव, क्रमायोगस्य तत्राऽपि नदवस्थत्वात् , यौगपद्यस्य च प्रत्यक्षेणैव बाधात् , न च विशिष्टहेतुक्रमादेव कार्यक्रमस्तेष्वेकत्वाभिमानश्च सादृश्यादिति वाच्यम् , प्रतिक्षणोदयं बि. भ्राणेषु हेतुषु परस्परतो विशेषाधानस्यैव दुर्वचत्वात् , प्रत्ययजनितविशेषस्य स्त्रोत्पत्तेः प्राक् पश्चाद्वाऽसम्भवात् , प्राक्तेषामे- वासत्वात् , पश्चादप्युपहितानुपहितक्षणाविवेकेन तत्स्वरूपस्य तस्याकार्यत्वात् , अतिरिक्तस्य च सम्बन्धाभावादिति न सहकारिभिरुपकारः, ततो निर्विशेषाणां क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाकारित्वलक्षणं न सत्त्वम् ।। तदुक्तम्- का शोमेत- वदन्नेवं, यदि न स्यादहीकता ॥ अज्ञता वा यतः सर्व, क्षणिकेष्वपि तत्समम् ॥ १॥ विशेषहेतवस्तेषां, प्रत्यया न कथ- चन ॥ नित्यानामिव युज्यन्ते, क्षणानामविवेकतः ॥ २ ॥ क्रमेण युगपञ्चैव, यतस्तेऽर्थक्रियाकृतः ॥ न भवन्ति ततस्तेषां, व्यर्थः क्षणिकताश्रमः ॥ ३॥" इति, तदयं सत्ताहेतुरमाधारणानैकान्तिक इति चेत् , असदेतत्, सहकारिजनितस्य कार• णगतविशेषस्यासम्भवेन निर्विशेषत्वेऽपि ' मामय्याः कार्यजनकत्वमिति' प्रवादात् समग्राणां प्रत्येकमितरेतरसहकारिणां स्वस्वविशिष्टक्षणान्तरारम्भकत्वात्तदनन्तरमपि तथैव तदारम्भसम्भवात्सविशेषत्वाभ्युपगमे बाधकाभावात् । असमर्थात् समर्थ- क्षणोत्पत्ती सहकारिसमवधानप्रयोज्यो विशेषो न स्यात्तथा च प्रागपि स्यादिति चेत् , न, असमर्थक्षणे समर्थक्षणकुर्वद्रूपत्वा- ख्यो यो विशेषस्तत्र सहकारिसमवधाननियतताया एव तत्प्रयोज्याया अभ्युपगमे दोषाभावात् । युक्तं चैतत् , कारणस्यैव कार्योत्पत्तिव्याप्यत्वे लाघवात् , त्वया तु स्वेतरकारणविशिष्टकारणत्वेन कार्योत्पत्तिव्याप्यत्वं स्त्रीकर्तव्यमिति गौरवम् । तस्मा- तक्षणिकानामेवार्थक्रियासामर्थ्यलक्षणं सत्वं सम्भवतीति नासाधारणानैकान्तिकता। अथ क्षणिकक्षित्यायनेककारणजनितं कार्यमेक ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतोप- दर्शने क्षणि- कस्यार्थक्रि- याकारित्वे पराक्षेपस्य प्रतिविधा- नम् ॥ ।। ४३॥
न स्यात्, अनेककारणजनितस्यैकत्वासिद्धेरिति चेत् , एकमेकं करोतीति कुतोऽवगतं, तद्भावे तद्भावादिति चेत् , समानमेत- दनेकत्र, तथा ह्येकमकुरादिकार्यमङ्गीकृत्य विशिष्टक्षणान्तरोत्पादनलक्षणेनातिशयाधानेन क्षित्यादीनां प्रवृत्तिः, तत्र स्वहेतुप- रिणामोपात्तधर्माणस्तदवस्थां प्राप्तास्तस्यैवैकस्य जनने समर्था नान्यस्येति नापरं तजनयन्ति, न वा नकोद्भूतं तदनेकमास- ज्यते, यतो न कारणमेव कार्य भवतीत्येतदस्माभिरभ्युपेयते, येनानेकपरिणतेरनेकरूपत्वात्कार्यस्याप्यनेकत्वं प्राप्यते, किन्तु केषुचित् सत्स्वपूर्वमेव किश्चित्प्रादुर्भवति, तद्भाव एव भावात्तत्कार्यमुच्यते इति नानेकताप्रसङ्गः। यदि तु तेषु सर्वेषु अभिन्नं रूपं किश्चिजनकं स्यात्तदा तदेकतरस्थितावपि कार्यजननं स्यात् , न स्याद्वाऽन्यसन्निधावपि । सामग्रीमाश्रित्य कारणभेदात्का- र्यभेदः स्यादिति चेत् , अयमस्माकमप्यभ्युपगम एव । स्थिरपक्षेऽपि हि सामग्रीत्वमेकं दुर्वचं, इतरकारणविशिष्टापरकारण- स्य सामग्रीत्वेऽननुगमाद्वैशिष्ट्यस्यापि तत्सम्बन्धरूपस्याननुगतत्वादिति कल्पितैकत्वानामेव सकलकारणानां सामग्रीत्वं वाच्यं, तद्वदस्थिरपक्षेऽप्येकक्षणोत्पन्नानां कुर्वद्रूपत्वजात्यैकीकृत्य कल्पितानां कारणानां यदि सामग्रीत्वं कल्प्यते तदा को वा साम- ग्रीभेद इति । एतेन 'क्षणिकानामेव हेतुत्वे तत्क्षणोत्पन्नानामुदासीनानामपि हेतुत्वं स्याद्' इति निरस्तम् , अन्वयव्यतिरेकाम्यां सादृश्यानुसारेणैव कार्यकारणभावव्यवहारातन्निश्चयानुसारेणैव तच्छक्त्यनुभवकल्पनात् प्रतिनियतहेतुहेतुमद्भावस्यैव प्रामाणि- कत्वात् । अथासतोऽजनकत्वान क्षणविशरारोः कार्यप्रसव इति चेत् , न, अनभ्युपगमात्कार्यकाले सवस्य कारणतायामप्रयोज- कुर्वद्रूपत्वस्यैव तथात्वात् , तथाप्यविनष्टाद् द्वितीयक्षणव्यापारसमावेशवर्तिनः कार्यप्रसवाभ्युपगमे क्षणभङ्गभङ्गप्रसङ्ग इति चेत्, न, द्वितीयक्षणप्रतीक्षाव्यतिरेकेणापि स्वमहिम्ना कार्यकरणप्रवृत्यभ्युपगमात्, अन्यथा द्वितीयक्षणभाविव्यापारज- ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौग- तमतोपद- र्शने क्षणि- कस्यार्थ- क्रियाकारि- त्वे पराक्षे- . पस्य प्रति- विधानम् ॥ कत्वात्,
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥४४ ॥
ननेऽप्यपरव्यापारसमावेशव्यतिरेकेणाप्रवृत्तः, तत्रापि चापरव्यापारसमावेशकल्पनायामनवस्थानात् , अपरव्यापारनिरपेक्षाणा-
मेवैकव्यापारनिवर्तकत्वाभ्युपगमे किमपराद्धं कार्येण, येनाद्यव्यापार विनैव न तजन्यत इति, न च व्यापारमन्तरेणार्थक्रिया नोपप-
त्तिमती, व्यापारेणैव व्यभिचारादिति भावनीयम् ॥ अथानष्टात्कारणादुपजायमाने कार्य कार्यकारणयोः सहभावप्रसक्तिः, नष्टाच
कारणात्कार्योत्पत्यभ्युपगमे तृतीयक्षणे तत्प्रसङ्गः, तथा हि प्रथमे क्षणे कारणसत्ता, द्वितीये तद्विनाशः, तृतीये च कार्योत्पत्तिरि-
ति चेत् , न, यथैव कारणविनाशस्तत्सत्तापूर्वको न नष्टाद्भवति तथा तत्समानकालं कार्यमप्यनष्टात्कारणाविष्यतीति दोषाभा-
वात् । एवं विनाशोऽपि हेतुमान् स्यादिति चेत् , न, नीरूपत्वेन तत्र हेतुव्यापाराभावात्तदुपन्यासस्यात्र व्यवधायककालासम्भव-
प्रदर्शनार्थत्वात् , ततो द्वितीयक्षणे कारणं नष्टं कार्य चोपजायत इति कुतस्तयोः सहभावप्रसक्तिः । तदुक्तम्-"अनष्टाजा-
यते कार्य, हेतुश्चान्योऽपि तत्क्षणम् ॥ क्षणिकत्वात्स्वभावेन, तेन नास्ति सहस्थितिः ॥१॥" इति ॥ अत्र चाविद्धकर्णोद्यो-
तकरादिभिर्यदुक्त “ यदि तुलान्तकयोमनोनमनवत्कार्योत्पत्तिकाल एव कारणविनाशस्तदा कार्यकारणभावो न भवेत् ,
यतः कारणस्य विनाशः कारणोत्पाद एव 'उत्पाद एव विनाश' इति वचनात्, एवं च कारणेन सह कार्यमुत्पममिति प्रासं,
यदि च स एव नाशः प्रथमेऽपि क्षणे न सत्ता भावस्य स्यात् , तदैव विनाशात् , भावस्यैव विनाशत्वे सर्वदाभावस्य सत्वम-
सचं वा स्यात् , अन्यथा क्षणोत्तरं तन्नाशाभ्युपमस्याप्रामाणिकत्वप्राप्तेः । अथ कारणोत्पादात्कारणविनाशो मिन्नस्तदा
कृतकत्वस्वभावत्वमनित्यत्वस्य न भवेत् , उत्पादनाशयोस्तादात्म्यप्रतिबन्ध एव तस्य वक्तुं शक्यत्वात् , व्यतिरिक्ते च
नाशे समुत्पन्ने न भावस्य निवृत्तिरिति कथं क्षणिकत्वमिति" तन्निरस्तम् । यतो द्विविधो विनाशः सांव्यवहार्यस्तावि-
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौग-
तमतोपद-
र्शने क्षणि-
कस्यार्थक्रि-
यकारित्वे
अविद्धक-
द्याक्षेपस्य
प्रतिविधा-
नम् ॥
॥४४॥
ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतोप- दर्शने क्ष. । कश्च, आयो भावनिवृत्तिरूप एव, द्वितीयश्च भावः, तत्र कारणनिवृत्तिरूपोऽभावो लोकप्रतीत एव नायं भावस्वभाव इष्यते, नापि कारणोत्पादादभिन्नो भिन्नो वा, नीरूपत्वात् , भेदाभेदप्रतिषेध एव केवलमस्य क्रियते, तदुक्तम्- भावे ह्येव वि- कल्पः स्या-द्विधेर्वस्त्वनुरोधतः॥” इति । तेन 'व्यतिरिक्त नाशे जाते क्षणरूपस्य भावस्यानिवृत्तिः, इत्यपास्तं, यतश्च द्वितीय- क्षणोत्पत्तिकाल एव प्रथमक्षणनिवृत्तिस्तेनैकक्षणस्थायी भावो विनाशशब्देनोच्यते, अयं च भावरूपत्वात्तात्त्विका साधन- स्वभाव एव विनाशः कार्योत्पत्तिकाले च निवर्तत इति कार्यभिन्नकालभावी । न च सर्वकालमस्य सद्भावः, मावस्या- सत्त्वात् । यद्वा 'विनाशोऽस्य स विनाशी' इति व्युत्पत्तेरविनाशिव्यावृत्तो भाव एव नाश उच्यत इति । यदपि च प्रत्यभिज्ञायाः क्षणिकत्वानुमानबाधकत्वमुक्तं, तदप्यसत्, अनिश्चितप्रामाण्याया अस्या बाधकत्वानुपपत्तेः, न च क्षणिकत्वानुमानप्रा- माण्येऽस्या अप्रामाण्यनिश्चयोऽस्या अप्रामाण्ये च क्षणिकत्वानुमानप्रामाण्यमित्यन्योन्याश्रयदोषोपनिपातः, यतो न क्षणि- कत्वानुमानप्रामाण्यं प्रत्यभिज्ञाऽप्रामाण्याधीनं, अपि तु विपर्ययबाधकप्रमाणाऽऽहितस्वसाध्यप्रतिबन्धनिश्चयाधीनमिति । किश्चायमित्युल्लेखवद्वर्तमानकालकार्यजनकं स्वभावं वस्तुनः परामृशति, स एवेत्युल्लेखवच्च प्राक्तनं तदजनकं स्वभावमिति विरुद्धोभयस्वभावावगाहित्वात्कथं प्रत्यभिज्ञानं प्रमाणम् , अपि च क्षणविशरारुषु भावेषु सदृशापरापरोत्पत्त्यादिविप्रलम्भ- हेतोरुपजायमानं तदुष्टकारणारब्धत्वादेवाप्रमाणम् । अपि च लूनपुनरुदितकेशादिष्वेकत्वाभावेऽप्यस्य प्रवर्तमानस्य दर्शना. स्कुतः स्वविषयव्यवस्थापकत्वम् । किश्च सत्सम्प्रयोगजत्वमपि प्रत्यभिज्ञानस्यासिद्धं, बहिरवस्थिततदेतत्कालसंस्पश्ये- कार्थेन्द्रियसम्प्रयोगासिद्धेः । यदप्येतत् प्रत्यभिज्ञानं देशादिभिनसामान्यालम्बनमित्युक्तं, तदप्यसङ्गतम् , सामान्यादेरपि णिकत्ववा- धकतया परोक्तस्य प्रत्यभिज्ञा- नप्रमाण- स्य खण्ड- नम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ-
गतमतोप-
दर्शने क्ष-
॥४५॥
मिन्नस्य तद्विषयस्याभावात् । भावेऽपि भूयः प्रमाणगोचरीकृते तत्र प्रवर्तमानस्य प्रत्यभिज्ञानस्यानधिगतार्थाधिगन्तृत्वा-
योगात् । भिन्नाभिन्नालम्बनत्वेऽपि च प्रत्यभिज्ञानस्य न प्रामाण्यं, अपूर्वप्रमेयाभावात् , न हि देशादयस्तत्र प्रत्यभिज्ञा-
यन्ते, प्रागदर्शनात्तेषां, पूर्वोपलब्धे तु सामान्यादौ न प्रमेयाधिक्यम् । न च पूर्वप्रसिद्ध मेवाग्न्यादिसामान्यं देशादिविशिष्ट-
तयाधिगच्छतोऽनुमानस्य यथा न प्रामाण्यव्याहतिस्तथा प्रागुपलब्धमेव सामान्यादि देशादिविशिष्टतया प्रतिपद्यमान-
स्यापूर्वप्रमेयसङ्गतेन प्रामाण्यक्षतिरिति वक्तव्यम् , द्वितीयप्रत्यक्षत एव तत्सिद्वेः प्रत्यभिज्ञानस्यापूर्वप्रमेयायोगात् , न हि
सोऽयमित्युल्लेखद्वयाक्रान्तं प्रत्यभिज्ञानविषयद्वयं प्रत्यक्षद्वयगोचरादतिरिक्तमिति । न च यथा वस्तुस्वरूपग्राहिणाऽध्यक्षेण
तदव्यतिरिक्ते क्षणक्षयेऽधिगतेऽपि तन्निश्चिन्वानाऽनुमितिः समारोपव्यवच्छेदकतयैव प्रमाणं, तथा प्रत्यभिज्ञा दर्शनद्वयगृ.
हीतेऽप्यर्थे समारोपव्यवच्छेदकत्वादेव प्रमाणमिति वाच्यम् , दर्शनद्वयेनैव समारोपव्यवच्छेदसिद्धेः समारोपव्यवच्छेदवि-
पया चेयं कुतः प्रत्यक्षता स्वातन्त्र्येण प्रमाणतां वाऽऽस्कन्देत् । यदपि 'प्रमे यातिरेकाभावेऽपि सन्देहापाकरणात्प्रमाणं
प्रत्यभिज्ञा' इत्यभ्यधायि, तदप्यापातरमणीयं, स्मृतेरपि किमिदं मया दृष्टमुत नेति संशयव्यवच्छेदेन दृष्टमेवेत्युपजायमानायाः
प्रमाणताप्रसक्तेः ॥ अपि चालोचनाज्ञानानन्तरं मविकल्पकप्रत्यक्षाभ्युपगमारकालान्तरादिभावोऽपि तत एव निश्चित इति
कुतः सन्देहो यदपाकरणाय प्रत्यभिज्ञादरो युज्यते, न हि निश्चितमनिश्चितं नाम, तस्मात्प्रमेयाधिक्यमेव प्रामाण्यनिवन्धनं,
न तु संशयापाकरणमपि तथावक्तुं युक्तम् ॥ यत्तु-"इदानीन्तनमस्तित्वं, न हि पूर्वधिया गतम् ॥” इत्युक्तं, तद् युक्तमेव,
इदानीन्तनास्तित्वस्य प्राकालीनास्तित्वतो भेदात् , अन्यथा प्राक्तनविकल्पबुद्ध्या वस्त्वव्यतिरेकीदानीन्तनास्तित्वस्य कथम-
णिकत्व-
बाधकतया
परोक्तस्य
प्रत्यभिज्ञा-
नप्रमाण-
स्य खण्ड-
नम् ॥
॥४५॥
ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतो- पदर्शने क्ष- णिकत्वबा- ग्रहणम् । यैस्तु निर्विकल्पकं प्रत्यभिज्ञाज्ञानं प्रमाणतयाभ्युपगतं, तेषां तदुत्तरकालभात्रिसविकल्पकादयो घटादिविषयाः प्रमेयातिरेकामावात्कथं प्रमाणतामनुवीरन्, न हि निर्विकल्पकसविकल्पकयोरन्तराले सन्देहसम्भवोऽपि येन तदपा- करणेनापि प्रामाण्यं व्यवतिष्ठेत । किश्च पूर्वापरसंवेदनाधिगतभावैकत्वग्राहकं प्रत्यभिज्ञानं कथमध्यक्षस्वरूपं, प्रथमसंवि- दोऽसत्यास्तत्र ग्रहणासम्भवात् , अन्यथा भाविसमयादिग्रहणस्यापि प्रसङ्गात् , भाविकालाद्यग्रहेऽपि तत्सम्बन्धिरूपग्रहा- भ्युपगमे आद्यमृद्दर्शनवेलायामेव त्रैकाल्यस्पर्शिस्थासकुशूलादिसकलव्यक्तिग्रहणप्रसङ्गात् । यदेवोत्तरकालं परामृश्यते तदेव भाविज्ञानविषयीभावस्तु प्रागवगम्यत इति नियमकल्पनान्न दोष इति चेत्, न, तत्वं यदि दृश्यमानस्य पूर्वदेशादिपरि- गतत्वं तदा पूर्वदेशाद्यसन्निधाने तत्प्रतिमामासम्भवात् , प्रातिभासिकसन्निधानाभ्युपगमेऽपि तद्वर्तमानतापत्तेः, नहि तदर्शनप्रतिभासमन्तरेणान्या वर्तमानता नीलादीनामपि, तथापि पूर्वरूपत्वाप्रच्यवे वर्तमानव्यवहारोच्छेदप्रसक्तेः ॥ यदि च दृष्टतैव दृश्यमानस्य तत्वं, तदापि तस्याः माम्प्रतिकदर्शने प्रतिभानाभ्युपगमे वर्तमानतापत्तेः पूर्वापरदृगवगतैकत्व- क्षतेः । पूर्वदृशि तहानाभ्युपगमे च तस्याः प्रच्युतौ तद्ग्राह्यताया अपि प्रच्युतत्वात् ।। न च पूर्वदृष्टताऽप्रतिपत्तावपि पूर्वदृष्ट- रूपप्रतीतेन दोषो, विशेषणाप्रतीतौ विशिष्टाप्रतीनेः, न हि नीलताऽप्रतिपत्तौ नीलोऽर्थोऽधिगतो भवति, यदि च प्राग्दर्शनगोच- रोऽर्थो वर्तमानदृशि तत्स्वाभाव्यादेव प्रतिभाति, तदा पूर्वदृग्गोचरसकलपदार्थप्रतिभासनप्रसङ्गः । अथाभेदस्य नियामकत्वम् , न, नीलादेभिन्नस्यापि वर्तमानदर्शने प्रतिभासनात् , पूर्वदृष्टस्य वर्तमानदृशि सन्निधानेन प्रतिभासनान्नाऽतिप्रसङ्ग इति चेत्, न, अप्रतिभासेन सन्निधौ सर्वत्रातिप्रसङ्गात् , प्रतिभासेन च सन्निधावितरेतराश्रयात् । एतेन 'पूर्वदृष्टस्याप्रच्युतेर्वर्तमानदृशि भा- धकतया परोक्तस्य प्रत्यभिज्ञा- नप्रमाण- स्य खण्ड- नम् ॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ।।
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ.
गतमतोप-
दर्शने क्ष-
॥४६॥
नम्' इत्यपास्तं, तदप्रच्युतौ प्रमाणाभावात् , तदवगाहिदर्शनस्यैव तत्र प्रमाणत्वेऽन्योन्याश्रयात् , पूर्वदृष्टस्याप्रच्युतौ प्रवर्तमानं
दर्शनं प्रमाण सिद्धथति, तत्प्रामाण्यसिद्धौ च पूर्वदृष्टस्याप्रच्युतिरिति । न च परिस्फुटप्रतिभासबलादेवेयं वर्तमानदृक्प्रमाणं, का-
मशोकायुपप्लुतविशददृशोऽपि प्रमाणताप्रसक्तेः। न च विसंवादात्साऽप्रमाणमियं तु विपर्ययात्प्रमाणं, यतः संवाददृशोऽपि पूर्व-
दृष्टार्थवाहित्वेन प्रामाण्यं वाच्यं न संवादान्तरेण, अनिष्ठापातात् , पूर्वदृष्टार्थग्राहित्वं च दुर्निरूपं, पूर्वोत्तरज्ञानयोरेकरूपपरिच्छेदे
एकतरपरिशेषात् , ज्ञानद्वयावभासिरूपस्य चोभयाप्रतिभासेऽप्रतिभासात् , अन्यथा सकलातीतज्ञानावभासिरूपप्रतिभासप्रस-
क्तेः ।। किञ्च यः स इत्याकारयोरन्योन्यानुप्रवेशेन भाने परोक्षापरोक्षरूपमेकं ज्ञानं स्यात् , अन्योन्याननुप्रवेशेन च भाने प्रति
भासद्वयं परस्परविविक्तमायातमिति प्रतिभासस्याऽपि भेद एव ध्रुवः । न चात्रुट्यदूपतया प्रतिभासात्प्रतिभासस्यैकत्वमेव, यतो
विद्युदादिष्वपि पूर्वरूपाप्रतिभासनं यदि त्रुट्यद्रूपत्वमङ्गीक्रियते, तर्हि पूर्वदृष्टाप्रतिभासनं वर्तमानदृशः स्तम्भादावस्तीति कथं न
व्यद्रूप एवायं प्रतिभासः स्तम्भादिभेदं विधातुं प्रगल्भताम् । अथ ग्राह्यस्याविरतमुपलब्धिरत्रुट्यद्रूपता, विद्युदादौ त्ववभासस्य
विरतिरित्यत्रुट्यद्रूपता न युक्तेति चेत् , न, अविरतोपलब्धिरपि किं तस्याहोस्विदन्यस्येति वक्तव्यम् , यद्यन्यस्य कथमे-
कत्वम् , अथ तस्यैव, सा न सिद्धा, न हि पूर्वदृष्टस्य पुनरुपलब्धिरित्यद्याऽपि सिद्धम् । यदपि पूर्वदृष्टं पश्यामीति व्यवसाय-
बलानिर्विकल्पकं दर्शनं पूर्वापरकत्वग्राहीत्यभ्युपगम्यते, तदप्ययुक्त, व्यवसायमात्रानुसारेण ग्राहकदर्शनाव्यवस्थापनात् , प्रति-
भासानुसारेणैव व्यवसायव्यवस्थापनात् , अन्यथाऽश्वविकल्पनसमये गोदर्शनाभ्युपगमानुपपत्तेः । प्रतिभासश्च निरस्तपू.
परभावो वर्तमानाऽऽरूढ एव परिस्फुटः । न च पूर्वापरदर्शनप्रतिभासिस्वरूपद्वयव्यतिरिक्तं नीलादि यदुभयत्रैकं भासेतेत्य-
णिकत्वबा
कतया परो-
क्तस्य प्रत्य-
भिज्ञानप्र-
माणस्य
खण्डनम् ॥
॥४६॥
ऋजुत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतो- पदर्शने क्ष- प्रतिभासमाने नित्यत्वसाधने न कापि क्षतिः, प्रतिमासस्यैवानित्यत्वसाधनान्नाध्यवसायवशादध्यक्षग्रहणव्यवस्थेत्येके । अपरे तु मन्यन्ते यद्यपि नीलाध्यवसायान्नीलदर्शनस्य तद्वाहकत्वं व्यवस्थाप्यते तथापि लूनपुनर्जातकेशादिषु पूर्वदृष्टं पश्यामीत्यध्यवसायाद् व्यभिचारेण न तस्य तद्रूपार्थग्राह्यनुभवव्यवस्थापकत्वम्, न च विच्छेदाभिज्ञैस्तत्र मेदग्रहणान्मा- भूदभेदग्राहितानुभवस्य, अत्र तु नैवमिति वैषम्यमिति वाच्यम्, अवगतविच्छेदानामपि प्रमातृणां समानवर्णसंस्थानप्रमा- णेषु केशादिषु तदन्येषामिव प्रत्यक्षेण भेदनिश्चयाभावात् , आनुमानिकभेदनिश्चयस्य चात्राऽपि साम्यात् । न च विकल्प- वशादनुभवस्य विषयव्यवस्था सङ्गच्छते, अन्यथापि विकल्पसम्भवात् शङ्काऽनिवृत्तेः । न च बाधकप्रामाणभावाच्छङ्काभावः, बाधकप्रमाणस्य विपर्ययोपस्थापन एव सामर्थ्यात् , शङ्कायाः कोटिद्वयोपस्थितिविशेषादर्शनमूलत्वात् , तन्नैकत्वाध्यवसायि- विकल्पबलान्निर्विकल्पप्रत्यभिज्ञाकल्पनं युक्तिमत् ।। यदपि कैश्चिदुच्यते निर्विकल्पकं ज्ञानमेकत्वग्राहि, तदनन्तरमावि- सविकल्पकं च प्रमाणमिति, तदपि प्रतिविहितमेव, निर्विकल्पकेनैकत्वापरिच्छेदात् , स्वरूपप्रतिभासस्य निर्विकल्पकलक्षण- त्वात् , स्वरूपस्य च सनिहितस्यैव भानात् , असन्निहिते च स्मृतेरेव प्रवृत्तेः, विस्मृतस्य प्राग्दृष्टस्याप्यप्रत्यभिज्ञानात् , स्मृतिविकलेन्द्रियजप्रतिमासस्य च निर्विकल्पकत्वात् । सविकल्पकप्रत्यभिज्ञानमपि भ्रान्तमेव, असद्भूततत्ताविषयत्वात् , तस्याः सद्भूतत्वे प्रथमदर्शनेऽपि भानप्रसङ्गात् । न च स्मृतिसहिताया दृशस्तत्वे व्यापारादयमदोषः, अविषये स्मृति- साहित्यस्याप्यप्रयोजकत्वात् , अन्यथोत्पलचाक्षुषं गन्धस्मृतिसहायं गन्धमपि गृह्णीयात् । यद्येवं कथमक्षव्यापारानन्तरं प्रत्यभिज्ञोदय इति चेत्, पुरो व्यवस्थितदर्शने पूर्वदृष्टे स्मृतेरुदयात् , दूरव्यवस्थितचन्दनाद्यर्थदर्शनाद् गन्धस्मृतेः सुरभि णिकत्ववा- धकतया प- रोक्तस्य प्र- त्यभिज्ञान- प्रमाणस्य खण्डनम् ॥
.
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
अय-
॥४७॥
चन्दनमिति प्रतिपत्तिवत् । लोचनाविषयत्वाद्गन्धस्य तद्विशिष्टचन्दनप्रतिपत्तिस्तद्गतरूपदर्शनाल्लिङ्गप्रभवेति चेत् , प्रकृते-
ऽपि वर्तमानदर्शनात्पूर्वकालाद्यनुस्मरणात्तद्विशिष्टपुरोव्यवस्थितार्थप्रतिपत्तिरानुमानिकीति तुल्यम् । किश्च सोऽयमिति
पूर्वदृष्टार्थस्मृतिवर्तमानदृशोर्मेंदाग्रहादेव व्यवहारोऽन्यथा परोक्षापरोक्षाकारौकज्ञानविरोधात् , ' म इत्युल्लेखे' स्मृतेरेव
मित्युल्लेखे' च दर्शनस्यैव हेतुत्वात् । न च तत्तैवेदन्ता, संस्कारजन्यतज्ज्ञाने च स इत्यभिलापः, प्रात्यक्षिकतज्ज्ञाने
चायमित्युभयहेतुसमाजात्सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञाकारोपपत्तिरिति भवानन्दादिकृतसमाधानमपि
युक्तम्,
सोऽयमित्या-
कारयोः परस्परानुप्रवेशप्रसङ्गात् , तथा च कदाचित्म इत्येवोल्लिख्येत, कदाचिच्चायमित्येव, न तु सोऽयमिति नियतोल्लेखः
स्यात् । प्रत्यभिज्ञाया उभयाकारावगाहित्यनियमादुभयोल्लेखनियम इति चेत् , तर्हि विषयविशेषं विना धीव्यवहारविशे-
षाभ्युपगमे साकारज्ञानवादप्रसङ्ग इति यत्किश्चिदेतत् । एतेन 'म एवायमिति व्यवहारैकत्वादेकत्वम्' इत्यपास्तं, यतो व्यव-
हारो ज्ञानं, अभिधानं, प्रवृत्तिा, यदि ज्ञानं, तर्हि तन्निर्विकल्पकं, स्मृतिः, कल्पना वा, यदि निर्विकल्पक, तत्पूर्वापरका-
लभाविभिन्नमेवैककालमपि पूर्वापरार्थप्रतिभासभेदाद्भिन्नम् , अथ स्मृतिः, साऽपि दर्शनाद्भिन्ना कथं तदेकत्वं साधयेत् ? ।
न चोभयदर्शनविषयविषयकत्वात्तदर्थैकत्वमेव स्मृत्या माध्यत इत्यभिप्रेतं, मिथोऽननुप्रविष्टाकारभेदावगाहिन्यास्तस्या-
स्तदसाधकत्वात् । न च कल्पनाप्येकास्ति, स इत्ययमिति च कल्पनाभेदाद् । अभिधानमपि स इत्ययमिति च भिन्न भिन्नार्थ
च प्रतिभाति, एकार्थत्वे पर्यायताप्रसक्तेः । तत्तेदन्ताख्याखण्डोपाधिरूपशक्यतावच्छेदकभेदाव्यघटपदयोरिव न पर्या-
यत्वमिति चेत्, न, अन्यूनानतिरिक्ततयैकार्थवृत्तित्वेन पर्यायत्वाप्रच्यवात् , अन्यथा कम्बूग्रीवादिमद्-घटपदयोरपि
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ-
गतमतोप-
दर्शने क्षणि-
त्वबाधकत-
या परोक्त-
स्य प्रत्य-
भिज्ञानप्र-
माणस्य ख-
ण्डनम् ॥
॥४७॥
पर्यायत्वानापत्तेः ॥ प्रवृत्तिस्तु क्रियारूपत्वात्पूर्वापरभाविनी भिन्नैवेति कुतो व्यवहारकत्वादप्येकत्वम् ।। तेन निर्विकल्प- कस्य सविकल्पकस्य वा प्रत्यभिज्ञानस्य प्रामाण्यासिद्धेर्न प्रत्यक्षविरोधमनुभवन्ति क्षणिकवादिनः । यच्च विनाशस्य सहे- तुकत्वात्तद्धत्वभावादेव कियत्कालं स्थैर्यमित्युक्तं, तदप्यमत् , विनाशस्य सहेतुकताया एवासिद्धेः, तथा हि इन्धनादीना- मग्निसंयोगावस्थायां त्रितयमुपलभ्यते तदेवेन्धनादि, कश्चिद्विकारोऽङ्गारादिः, तुच्छरूपश्चाभावः कल्पनाज्ञानप्रतिभासी, तत्राग्न्यादीनां व व्यापार इति वक्तव्यं, न तावदिन्धनादिजन्मनि, स्वहेतुत एव तेषामुत्पत्तेः, नाप्यङ्गारादौ, विवादा- भावात् , किन्त्वग्न्यादिभ्योऽङ्गाराद्युत्पत्ताविन्धनादेरनिवृत्तत्वात्तथैवोपलब्ध्यादिप्रसङ्गः, न चाङ्गारादिभ्यः काष्ठादे शा- बायं दोषः, ततो वस्तुरूपापरध्वंसोपगमेऽपि काष्टादेस्तदवस्थत्वात् ॥ काष्ठनाशोपलब्धेः काष्ठोपलब्धिप्रतिबन्धकत्वात्तदनुप- लब्धिरिति चेत्, न, अतिरिक्तकाष्ठनाशस्यैवानुपलब्धेः, तदिदमुच्यते-' दृष्टस्तावदयं घटोत्र निपतन् दृष्टस्तथा मुद्गरो, दृष्टा कर्परसंहतिः परमतोऽभावो न दृष्टोऽपरः ॥ तेनाऽभाव इति श्रुतिः क निहिता किं वाऽत्र तत्कारण, स्वाधीना कलशस्य केवलमियं दृष्टा कपालावली ॥१॥' इति ॥ अथ काष्ठादेरङ्गारादिकमेव ध्वंसो नापर इति ततो नोपलब्ध्यादि- प्रसङ्ग इति चेत् , काष्ठादेरङ्गारादिकमेव धंसो नापर इत्यत्र किं निबन्धनं, तस्मिन्सति तनिवृत्तिरिति चेत् , न, तुच्छस्त्र- भावनिवृत्त्यनङ्गीकरणेऽङ्गारादिभावेऽङ्गारादिभावात्काष्ठादेरङ्गारादिकमेव ध्वंस इति वाक्यार्थः स्यात् , स च स्वात्मनि क्रियाविरोधादसङ्गतः । अव्यक्तस्वात्मरूपविकारान्तरं चंप इत्यप्यनुद्वोष्य, बुद्ध्यादीनामात्मरूपविकारापत्तौ प्रमाणाभा- प्रदीपादेशचाव्यक्तरूपस्य विकारस्य कार्यविशेषादर्शनेनासिद्धेः । तत्र भावान्तरं प्रध्वंसाभावः, भावान्तरस्य च प्रध्वं- ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतोपद- र्शने विना- शसहेतुक- त्वतःपरस्य स्थैर्यसाध- नस्य खण्ड- नम् ॥ वात्,
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ-
गतमतोप-
दर्शने परा-
भिमतना-
॥४८॥
सत्वे तद्विनाशाद् घटाद्युन्मजनप्रसङ्गः, घटप्रागभावतत्प्रध्वंसानाधारकालस्य घटाधारत्वव्याप्यत्वात् , न च कपालादे-
र्भावरूपतैव ध्वस्ता नाभावात्मकतेति नायं दोषः, धर्मिप्रच्यवे धर्मप्रच्यवान्निराश्रयधर्मावस्थानायोगात् । कपालादिकार्य-
परम्परायामेव घटध्वंसत्वस्वीकारान्न दोष इति चेत्, न, एवं सति घटध्वंसत्वस्य व्यासज्ज्यवृत्तित्वे यावदाश्रयमानं
विनाऽभानप्रसङ्गात् , प्रत्येकं वृत्तित्वे च नानात्वेनाननुगमप्रसङ्गात् , तन्नानात्वस्य प्रतीतिनाधितत्वाच्च । एतेन 'कपालादि-
रूपस्य घटध्वंसस्याप्यऽस्तु बंसः, न चैवं घटोन्मजनप्रसङ्गः, घटध्वंसध्वंसादिपरम्परानाधारकालत्वस्य घटाधारत्वव्याप्य-
त्वाद्' इत्यप्यपास्तं, गौरवात् , घटध्वंसो ध्वस्त इत्यादिप्रतीत्यभावाच, तन्न कपालादिरूपं भावान्तरं घटादेवंसः, नवा तत्र
कारकव्यापारसम्भवः, क्रियाप्रतिषेधमात्रप्राप्तेः, अकारकम्य च हेतुमचाभ्युपगमो विरोधाघातत्वादेव न श्रद्धेयः, हेतुमत्त्वे
वाऽभावस्य कार्यत्वादभावरूपताप्रच्युतिः, 'भवनधर्मा हि भावः' अङ्कुरादेरपि भावशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं नापरमुपलभ्यते,
तच्चेदभावेऽस्ति कथं न भाव इति ? । अर्थक्रियासामध्यं भावशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं तचाभावे नास्तीति चेत् , न, सर्वसामर्थ्य-
विकलस्य प्रतीतिविषयत्वायोगात् , प्रतीतिजनकत्वे सर्वसामर्थ्यायोगासिद्धेः । अथ यथा घटपटादीनां भेदः प्रतिनियतज्ञा.
नविषयतया, तथा भावाभावयोः कार्यत्वाविशेषेऽपि सदसत्प्रतीतिविषयतया भेदः सेत्स्यतीति चेत्, न, असत्प्रत्ययवि.
षयतया शशशृङ्गादिवत्कार्यताया अप्यस्य दूरोत्सारणात् । अथ स्वहेतुभावे भावादस्य कार्यता, कथं न सत्प्रत्ययविषयता,
यो हि भवतीति प्रतीयते स सन्नित्यपि प्रतीयते, न ह्यस्ति-भवति-सद्भाव इत्यादिशब्दानां कश्चिदर्थभेदो विद्वद्भिरिष्यते ।
अभावात्मकतयैवासौ भवतीत्यदोष इति चेत् , न, व्याहतत्वात् , न भवतीति ह्यभाव उच्यते स कथं भवतीति ? । स्वग्रा-
शस्य खण्डं-
नम् ॥
॥४८॥
ऋजुसूखन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतोपद- र्शने परा- भिमतना. शस्य ख- हिणि ज्ञाने प्रतिनियतेन रूपेणाप्रतिभासनादभाव इत्येतदपि न वक्तव्यम्, अत्यन्तपरोक्षचक्षुरादीनामप्यभावत्वापत्तेः । किञ्च यद्यमावरूपो विनाशो हेतुमास्तदा हेतुमेदात्तद्रेदप्रसङ्गो, न चायमनुभूयतेऽग्न्यभिधातादिहेतुमेदेऽपि घटनाशमेदा- ननुभवात् , तस्मादहेतुरेवायं निःस्वभावस्तुच्छोऽभ्युपगन्तव्यः, अनिसंयोगादयस्तु काष्ठादिष्वङ्गारादिकमेव जनयन्ति काष्ठादयश्च स्वरसत एव निरुध्यन्त इत्यनवद्यम्, लोकश्चाकिश्चिदूपतामेव नाशस्य प्रतिपद्यते, तत्त्वमपि चाऽसतोऽकिश्चिद्रूप- तैव, यतोऽवैपरीत्यं तत्त्वमुच्यते, न चैतद्विपरीतं यदकिञ्चिद्रूपो ध्वंस इति । किश्च स्वभावतो भावानां नश्वरत्वेऽपरव्यापार- वैफल्यात् , अनश्वरत्वे च सत्स्वभावस्यान्यथाकर्तुमशक्यत्वाव्यर्थो नाशहेतुः। अथ स्वहेतुभिर्नियतकालस्वभावः पदार्थों जनित इति नोत्पादानन्तरमेव विनंष्टुमुत्सहत इति चेत्, तर्हि तस्मिन्नेव स्वभावे व्यवस्थितः कथमन्तेऽपि विनश्येत् , तथा चान्तेऽन्ते तावत्तावत्कालस्थायिस्वभावानपगमे सदा स्थास्नुरेव स्यात् । तत्स्वभावापरावृत्तावकिश्चित्करैर्मुद्गरादिभिस्त- न्नाशायोगात् ॥ न च भवतामप्यकिश्चित्करमपि मुद्रादिकमपेक्ष्य कथं प्रवाहो निवर्तत इति वाच्यम् , यतो न विशरारुक्षण- व्यावृत्तोऽपरः प्रवाहो विद्यते, यो निवर्तमानोऽकिश्चित्करं मुद्गरादिकमपेक्षत इति प्रतिजानीमहे, किन्तु परस्परविविक्ताः पूर्वापरक्षणा एव प्रवाहः, ते च स्वरसत एव निरुध्यन्त इति न क्वचिदकिञ्चित्करापेक्षा निवृत्तिः, केवलं मुद्गरादिना रहिता सामग्र्यविभक्तं कार्य सम्पादयति, तत्सन्निधाने तु विभक्त कार्यान्तरं जनयतीति विशेषो, नतु मुद्गरादयः कारणसामर्थ्य खण्डयन्तीति, अतो यदुक्तं-"स्वभावोऽपि स तस्येत्थं, येनापेक्ष्य निवर्तते ॥ विरोधिनं यथान्येषां, प्रवाहो मुद्गरादिकम् ॥१॥ इति," तदपि प्रतिक्षिप्तं द्रष्टव्यम् ॥ अथायं विकल्पः सर्वगतत्वादसारः, तथा झुत्पादेऽप्येवं शक्यत एव वक्तुं स्वभा- ण्डनम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
वतो झुत्पत्तिस्वभावस्य न किञ्चिदुत्पत्तिहेतुभिः, तत्स्वभावतयैव समुत्पादात्, अनुत्पत्तिस्वभावस्य तु व्यर्था उत्पत्ति-
हेतवः, तद्भावान्यथात्वस्य कर्तुमशक्यत्वात् , मैवं, यतो यद्यभूत्वा भवनलक्षणोत्पत्तिस्वभावहेतोरकिञ्चित्करत्वं, तदा इष्टाप-
तिरेव । अथोत्पत्तौ स्वभाव आभिमुख्यलक्षणो यस्य मन्निहितकारणकलापानन्तरभाविनस्तस्य व्यर्थत्वमभिधातुमभिप्रेतं,
तदसन्निहिततथाभूतकारणवशात्तथा व्यपदेशहेतोर्व्यर्थता युक्ताऽनुत्पत्तिस्वभावहेतुवैफल्यं चाभीष्टमेव, न ह्युत्पत्तिहेतवोऽ-
भावान् भावीकुर्वन्ति । नन्वेवं कथमुत्पद्यतेऽसदितीष्यते, कारणानन्तरं यः सद्भावः स प्रागसन्नित्ययमत्रार्थो, न पुनरभावो
भावत्वमापद्यत इति, हन्त यद्येवं तर्हि तु को मावस्य विनाश उत्पादोऽपि तथैवास्तु भावधर्मत्वाविशेषात् , नैवं, यतो न नाम
विनाशोऽन्य एव कश्चिदुदयापवर्गिणो भावात् , भावश्च स्वहेतोरेव तथाभूत उत्पन्नो न कश्चिद्धर्मोस्यानिमित्तः, केवलं तमस्य
स्वभावं पश्यन्नपि मन्दबुद्धिर्न विवेचयति, दर्शनपाटवाभावात् , यदा तु विसदृशः कपालादिक्षणः प्रत्ययान्तरोपनिपातादुत्पद्यते,
तदा भ्रान्तिकारणविगमात्प्रत्यक्षनिबन्धनः क्षणक्षयनिश्चय उत्पद्यते, अनुमानतस्तु विदुषः प्रागपि भवत्येव, यथा विषयरूपदर्श-
नेऽप्यतत्कारिपदार्थसाधर्म्यविप्रलब्धौ न कारणशक्ति निश्चिनोति प्राक, पश्चाच्च विकारदर्शनात्तन्निश्चयो, न च शक्तिशक्तिम-
तोर्भेद इति, उक्तं च सौगतः "जातस्य च स्वभावस्य विनश्वरत्वेऽन्यानपेक्षणमात्रेण निर्हेतुको नाश उच्यते" इति ।। स्थितमेतत्
प्रत्यक्षतोऽनुमानतश्च सर्वभावानां क्षणिकत्वमिति । एतच्च द्रव्यार्थिकनिःक्षेपविचारे सम्मतावेव यथा दूषितं तथैव किञ्चित्सं.
क्षिप्य विविच्य लिख्यते, तत्र क्षणक्षयित्वे यदध्यक्षं प्रमाणमुक्तं, तदसत्, स्थिरस्थूररूपाणामेव घटादीनां प्रतिभासात्, न
चान्यादृग्भूतार्थप्रतिभासोऽन्यादृग्भूतार्थव्यवस्थापकोऽतिप्रसङ्गात् ।। न च सदृशापरापरोत्पत्तिदोषादत्र यथानुभवं न विकल्पो-
ऋजुमूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ.
गतमतोप-
दर्शनस्य
समाप्तिः तु-
त्खण्डनार-
म्भश्च ॥
॥४९॥
॥४९॥
त्पत्तिः, नीलादिष्वप्येवमनाश्वासप्रसङ्गात् , यथाहि परमार्थतोऽसदृशा अपि सदृशविकल्पोत्पादकदर्शनहेतवो भावाः सदृशव्य- वहारमाजस्तथा स्वयमनीलादिस्वभावा अपि नीलादिविकल्पोत्पादकदर्शननिमित्ततया नीलादिव्यवहारभावत्वं प्रपत्स्यन्त इति शङ्कापिशाचीप्रचारस्य दुर्निवारत्वात् । निश्चयानुरूपेणैव च प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यम् , अन्यथा दानहिंसाविरतिचेतसामपि स्वर्गप्रापण- शक्तेरध्यक्षत एवावगते तत्र विप्रतिपत्तिरिति तद्व्युदासार्थमनुमानप्रवर्तनं शास्त्रविरचनं वा सौगतानां वैयर्थ्यमनुभवेत् । निश्चयश्च संहृतसकलविकल्पावस्थायामश्वविकल्पनसमय एव च प्रणिधानानन्तरं पुरोग्यवस्थितस्य गवादेः स्थिरस्थूररूप- स्यैवेति कथं क्षणिकत्वेऽध्यक्षं प्रमाणम् । नाप्यनुमानात्तनिश्चयः, नत्राध्यक्षाऽप्रवृत्तावनुमानस्याप्यनवतारात्, तथाह्यध्यक्षाधि- गतमविनामावमाश्रित्य पक्षधर्मतावगमबलादनुमानमुदयमासादयतीति, अध्यक्षानवगते तु विषये स्वर्गादाविवाध्यवसायफल- स्यानुमानस्य प्रवृत्तिरेव सौगतैरभ्युपगता, तथा च तदाचार्यः। “अदृष्टेऽर्थे विकल्पनमात्रम्" इति, किश्च स्थायितावगाहिप- त्यभिज्ञाबाधितत्वादेव क्षणिकत्वे नानुमानं प्रमाणं साधीयः । न च लूनपुनर्जातकेशादिष्वेकत्वप्रत्यभिज्ञोदयान्नासावेकत्वे प्रमा- णम् , एवं सति कामलोपहतदृशां धवलिमानमाविभ्राणेषु पीतदर्शनमुदेतीति वास्तवपीतेष्वपि तन्न प्रमाणतामासादयेत् , दोष- गुणप्रभवत्वविशेषस्तूभयोः समानः । लूनपुनर्जातनखकेशादिषु भेदाभेदाध्यवसायादुभयतैवास्तु, स्तम्मादिषु तु विशददर्श- नावमासिषु क्षणक्षयविकला स्थायिता प्रतिभातीति तेषां स्थिररूपतैवास्त्वित्यन्ये । न च परिच्छिद्यमानस्य वस्तुनः पूर्व- कालतापि प्रत्यभिज्ञया निश्चयेत्यवस्तुधर्मग्राहकत्वात्तदप्रामाण्यं, पूर्वकालीनस्य पूर्वकालीनत्वेन ग्रहेऽवस्तुधर्मग्राहकत्वाभावात् । न च सनिहितविषयबलादुत्पत्याऽविचारकेणाध्यक्षेण पूर्वकालसम्बन्धित्वं परामर्दुमशक्यम् , असनिहितस्याप्यतीतकालत्वस्य ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतख- ण्डने क्षणि- |कत्वानुमा- नबाधक- प्रत्यभिज्ञा-- प्रामाण्य- स्थापनम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था.
प्रकरणम् ॥
॥ ५० ॥
सनिहितविषयप्रत्यासत्तिमहिम्नाऽध्यक्षेण निश्चयाविरोधात् , यथान्त्यसङ्ग्येयग्रहणकाले शतमिति प्रतीतिः क्रमगृहीतानपि
संख्येयामिश्चिन्वाना न विरुध्यते । न चैषाऽनिन्द्रियजा, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधानात् । नाप्यनर्थजा, सन्निहिता-
न्त्यसख्येयजन्यत्वात् । न चैकावभासिनी, एकप्रतिपत्तिसमये शतमित्यप्रतीतेः, अन्यथा प्रथमव्यक्तिप्रतिभाससमय एव
तत्प्रसङ्गात् । न वाप्रमाणं, बाधकाभावात् , घटाद्यध्यक्षेण तुल्यत्वादिति । न चात्र सङ्ख्येयानां विद्यमानता प्रत्यभि-
ज्ञायां पूर्वकालतायास्त्वविद्यमानतेत्यस्ति विशेषः । पूर्वावगतयत्किश्चित्सङ्ख्येयविगमेऽपि शतप्रतीतेः। न च वर्तमानकालाव-
च्छिन्नस्यावर्तमानकालावच्छिन्नेन सह समावेशानुपपत्तेस्तत्तेदन्ताविशिष्टैकत्वग्राहिणः प्रत्यभिज्ञानस्याप्रामाण्यमिति वा-
च्यम्, छत्रकुण्डलाधवच्छिन्नस्य देवदत्तादेवि परस्परविरुद्धकालावच्छिन्नस्याप्येकत्वाविरोधेन तदप्रामाण्यासिद्धेः। न च
देवदत्तादेः सहमाव्यनेकविशेषणावच्छिन्नत्वादेकत्वमविरुद्धं, तदभावनियतभावलक्षणस्य विरोधस्य सहसम्भविनामभावात् ,
प्रकृते तु प्रागुक्तविरोधशालिविशेषणद्वयविशिष्टस्य नैकत्वं न्याय्यमिति वाच्यम् , एकप्रतिभासवलादेवैकत्वसिद्धेः, अन्यथा
नीलसंवेदनस्यापि स्थूलाकारावभासिनो विरुद्धदिक्सम्बन्धात्प्रतिपरमाणु मेदप्रसक्तेः तदवयवानामपि दिक्षद्कयोगानेदा-
पत्तितोऽनवस्थाप्रसक्तेः प्रतिभासविरतिलक्षणा शून्यता स्यादिति सर्वव्यवहारविलोपः । अथवा तदेवेदमिति ज्ञानस्यानि-
न्द्रियजस्यालिङ्गजस्यापि वाधरहितत्वेन प्रामाण्यमवश्यमभ्युपगन्तव्यम्, अन्यथैवंजातीयस्य कस्यापि प्रामाण्यानम्युप-
गमेऽक्षजस्य सन्निहितार्थमात्रग्राहित्वेन लिङ्गजस्य चानवस्थाप्रसक्तितः सकलपदार्थाक्षेपेण प्रतिबन्धग्राहकत्वायोगादनुमा-
नप्रवृत्तेरभाव इति कुतस्तदेकप्रमाणकक्षणिकत्वादिधर्मसिद्धिः सौगतानाम् , न हि ते नैयायिकादय इव सामान्यप्रत्यासत्ति
ऋजुसूत्रन
यनिरूपणे
तदुत्थसौ.
गतमतख-
ण्डने क्षणि-
कत्वानुमा-
नबाधकप्र-
त्यभिज्ञा-
प्रामाण्य-
स्थापनम्॥
॥ ५० ॥
ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतख- ण्डने प्रस- सर्वाक्षेपेण प्रतिवन्धग्राहिकामभ्युपगच्छन्ति । यैरपि सामान्यप्रत्यासत्तिरभ्युपेया, तेषामपि ज्ञातस्य सामान्यस्य सामान्य- ज्ञानस्य वा प्रत्यासत्तित्वे वह्नित्वसामान्यप्रत्यासत्या कथञ्चिद् यावद्वह्निभानसम्भवेपि वहिमत्वादेर्वहिसंयोगादिरूपस्य सा- मान्यत्वाभावेन तत्प्रत्यासत्या यावद्वह्निमदादिमानानुपपत्तिः । न च तत्रापि स्वाश्रयादिसम्बन्धेन ववित्वादिकमेव प्रत्या- सत्तिः, न चैवं समवायेन वह्नित्वप्रकारकज्ञानादपि वह्निमतां प्रत्यक्षापत्तिः, परम्परासम्बन्धेन वह्नित्वप्रकारकज्ञानस्यैव तद्धेतु- त्वात् , न चैवं वह्निमदितिज्ञानानन्तरं तन्न स्यात् , प्रकारीभूतस्य वह्नः संसर्गतयापि भाने बाधकामावात् , अत एव 'विशे- षणविधया जनकज्ञाने प्रकारीभूतस्यैव संसर्गत्वे जन्यज्ञानेऽपि तथात्वमितरथा तूभयत्रैव प्रकारतानाक्रान्तमेव संसर्गत्वमिति, सर्वत्र वह्नित्वेनैव वहिमतां भानं स्यादिति ' कुचोद्यमपास्तमिति वाच्यं, तथाप्यभाववदादिप्रत्यक्षस्थले सामान्यप्रत्यासत्ति- ताया वक्तुमशक्यत्वात् , तत्राप्यभावत्वादेरखण्डोपाधेः सामान्यत्वस्वीकारे च तेनैव जात्युच्छेदाद्दत्तस्तस्यै जलाञ्जलिः । किञ्च परम्परासम्बन्धेन वह्नित्वादिप्रकारकज्ञानं विनापि साक्षात्सम्बन्धेन वह्निमत्त्वादिप्रकारकज्ञानादपि यावद्वह्निमदादिप्रत्य- क्षानुभवस्य सार्वजनीनत्वाद्वह्निमत्त्वादेरपि सामान्यत्वं ध्रुवम् , साक्षात्सम्बन्धेन वहिमच्चप्रकारके परम्परासम्बन्धेन वह्नित्व- प्रकारकत्वमावश्यकमिति चेत् , तर्हि जातिप्रकारके जातित्वप्रकारकत्वमावश्यकमिति जातिमदादिप्रत्यक्षे जातित्वादेः प्रत्या- सत्तित्वं स्यात् , तच्चायुक्तमिति, वहिमत्त्वादेर्जातिमत्वादेश्व सामान्यत्वे ध्रुवे च वहिमदादेरेव जातिमदादेरेव च सामान्यत्वक- ल्पने लाघवं, सखण्डाखण्डसम्भिन्नेकस्वभावस्य वस्तुनः प्रामाणिकत्वात् , तथा च धूमादेधूमसामान्यत्वेन ज्ञाने यावद्धमज्ञा- नमनक्षजमलिङ्गजं सर्वोपसंहारेण प्रतिबन्धग्राहकमूहप्रमाणाख्यमवश्यमभ्युपेयमिति किमप्रकृतेन ॥ विवेचितमिदमन्यत्र। गाव्याप्ति- ग्राहकत. या न्या- याभिमता- या: सामा- न्यप्रत्यास- त्तेः खण्डन मूहप्रमाण स्य तवश्वा .
श्री बनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ ॥५१॥ यच्च 'नित्यात्क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियासामर्थ्यलक्षणा सत्ता निवर्तमाना क्षणिकेष्वेवावतिष्ठत' इत्यायुक्तं, तदसत् , क्रमेण कार्यजननेऽपि जनकत्वाजनकत्वस्वभावभेदस्य वस्तुभेदासाधकत्वेन तन्नित्यत्वाग्रच्यवात् , यतः क्रमोपेतार्योपलम्माद्धेतो- र्जनकाजनकस्वभावभेदं कल्पनाऽध्यवस्यति, न च तत्प्रदर्शितस्वभावभेदाद्भावा भिद्यन्ते, अन्यथा कल्पना भावानामेकत्व- मप्यध्यवस्यतीति नित्यतापि तेषां भवेत् , यदि चोदितानुदितप्रयोजनापेक्षः कल्पनारोपितोऽपि जनकाजनकस्वभावभेदो भावानामभ्युपगन्तव्यस्तदा स्वपरोत्पाद्यकार्यापेक्षया क्षणेऽपि कल्पनारोपितो जनकाजनकस्वभावभेदः स्यादमेदप्रतिभासेन कल्पनाबाधस्तूभयत्र तुल्यः, नानाकार्यजनकैकस्वभावस्यानुभवसिद्धस्य वस्तुनः प्रत्याख्यातुमशक्यत्वात् ।। किञ्च यदि नाम क्रमयोगपद्याभ्यां नित्यादर्थक्रिया व्यावृत्ता तथापि न ततः क्षणक्षयसिद्धिः, अक्षणिकेभ्य इब क्षणिकेभ्यो- ऽप्यस्या व्यावृत्तत्वात् , यतः क्षणिका अपि कार्य केवला एकमुत्पादयन्ति उताऽनेकं, समुदिता अपि तदेकमने वा, न तावदेकमुत्पादयन्ति, अदर्शनात् , अनभ्युपगमाच्च, एकस्मादेवाग्नेरिन्धनविकारधूमभस्माद्यनेककार्यदर्शनात्, “न वै किश्चि- देकं जनकम्" इत्यभ्युपगमाच्च, नाप्येकमनेकोत्पादकं, सामग्र्या एव जनकत्वाभ्युपगमात् , अनेकस्मात्कार्योत्पत्त्युपलब्धेश्व, नाप्यनेकमेकोत्पादकम् , अनेकस्मादुपजायमानस्य कार्यस्य नानात्वस्य न्यायप्राप्तत्वात् , इष्यते च सौत्रान्तिकवैभाषि- काभ्यां सश्चितेभ्यः परमाणुभ्यः सश्चितानामेव तेषामुत्पत्तिः, मश्चितपरमाणुव्यतिरेकेण भिन्नस्य वस्तुनोऽनभ्युपगमात् , संवृत्यैकस्य घटादेश्चाजन्यत्वात् , ज्ञानमपि विषयालोकमनस्कारादिसामग्रीप्रभवं नैकं युक्तं, नापि तदेकरूपमभ्युपगम्यते, अन्तरहकारास्पदसुखादिरूपस्य बहिश्च तद्विपरीतस्य ग्राह्यग्राहकाकारोभयरूपस्य तस्य संवेदनात् । अथायमनयोर्भेदाव- जुमूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थमौ- गतमतख- ण्डने अर्थ- क्रियासाम- य॑स्य नि- त्याव्या- च्या क्षणि- केऽवस्था- स्यनखण्ड- नम् ॥
भासो मिन्नयोरिव, न पुनभिन्नयोरेत्र, तदुक्तम् “ ग्राह्यग्राहकसंवित्ति-भेदवानिव लक्ष्यत" इति ।। नैतदेवं, बाह्यार्थवाद- त्यागप्रसक्तेः । न च ग्राह्यग्राहकाकारयोः सांवृतत्वं, ग्राहकाकारस्य बोधरूपतया समनन्तरप्रत्ययजनितत्वेन ग्राह्याका- रस्य च विषयापितत्वेन कारणान्वयव्यतिरेकानुविधायितयाऽमांवृतत्वात् । न च निराकारमभिन्नस्वभावमेकसामग्रीजन्यं ज्ञानं सम्भवति, परमते निराकारस्य विषयाग्राहित्वात् , तस्मान्नैकमनेकजन्यमिति स्थितम् ॥ नापि पूर्वसामग्रीत उत्तरा सामग्री प्रभवतीति बौद्धसिद्धान्तमनुरुध्याऽनेकमनेकमुत्पादयतीति वक्तुं युक्तं, रूपज्ञानादीनां ज्ञानरूपादिजन्यत्वेन ज्ञान- रूपादित्वापत्तेः। न चावान्तरकारणविशेषात्कार्यविशेषः, तथाहि चक्षुरूपालोकमनस्कारादिषु विज्ञानादिकार्योत्पादकेषु मनस्कारो विज्ञानमुपादानत्वेन जनयति, शेषकार्याणि सहकारित्वेन, एवं रूपादिकमपि रूपादिकमुपादानत्वेन, शेषाणि सहकारित्वेनेत्यवान्तरसामग्रीभेदेन तजन्मनां स्वभावभेद इति वाच्यं, मनस्कारादीनां ज्ञानादौ येन रूपेण जनकत्वं तेनैव चक्षुरादिजनकत्वे चक्षुरादीनां ज्ञानादित्वापत्तेः, कार्य सकलस्त्रगतविशेषाधायकत्वस्योपादानलक्षणत्वात् , रूपान्तरेण च मनस्कारादीनां चक्षुरादिजनकत्वे कथं न स्वभावभेदः ॥ उपादानसहकारिशक्तिभेदेऽपि स्वसंविद्येकत्वेनावभासनान्मन- स्कारस्यैकत्वमिति चेत् , नन्वेवमक्षणिकस्यापि तदतत्कालभाविकार्यजनकत्वस्वभावभेदेपि प्रत्यक्षेणैकत्वेन प्रतिभासनात्कथं नैकत्वम् । उपादानत्वसहकारित्वे जनकत्वविशेषरूपे कार्यभेदेन जनकत्वाजनकत्वरूपे वा न विरुद्ध इति चेत् , तदतत्कार्य- जनकत्वेऽपि तथा न विरोत्स्येते इति तुल्यम् । अन्त्यावस्थायां सर्वेषां प्रत्येकमभिमतकार्यजनकत्वमन्यसनिधिस्तु स्वहे- तुप्रत्ययसामोपनीतावर्जनीयसन्निधि!पालम्भमर्हतीत्येकैकस्यैत्रोत्पादकत्वं युक्तमित्यपि नापेशलं वचः, अन्वयिद्रव्या- ऋजुसूत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतख- ण्डने तन्म- ते क्षणिक- स्यैकस्या- नेकस्य चै- कानेकका- र्यजनक- त्वासम्भव- प्रदर्शनम् ।।
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
ऋजुसूत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ.
गतमतख-
ण्डने तद.
॥५२॥
भावे मनस्कारस्यैवान्त्यक्षणस्थस्य चक्षुर्विज्ञानं प्रत्युपादानत्वं न रूपादेरित्यत्र विनिगमकाभावात् , व्यावहारिकान्वय-
व्यतिरेकदर्शनस्य मनस्कारादाविव रूपादावपि तुल्यत्वात् । एतेन 'कुर्वद्रूपत्वेनैव हेतुत्वं कारणत्वेनैव च कार्योत्पत्ति-
च्याप्यत्वम् ' इत्यपास्तं, कुर्वद्रूपत्वस्य जातिरूपस्यानभ्युपगमात् , अतव्यावृत्तिरूपस्य चेकैकक्षणग्रहणविनिर्मोकाभ्यां विनि-
गमनाविरहात्, कुर्वद्रूपत्वस्य कार्यैकगम्यतया कार्योत्पत्तेः प्रागिष्टसाधनताज्ञानाधीनप्रवृत्त्यनुपपत्तेः, जातिप्रतिनियतकार्य-
कारणभावाभावेऽवह्वेरपि धूमसम्भावनया प्रसिद्धानुमानस्याप्युच्छेदापत्तेः, तस्मात्क्षणिकेभ्योऽप्यर्थक्रियासामर्थ्यलक्षणं सत्त्वं
निवर्तमानं श्रावणत्ववदसाधारणानैकान्तिकतामास्कन्ददसाधकम् । किश्चार्थक्रियालक्षणं यत्सत्वं हेतुरुच्यते, तत्र किमर्थ-
क्रियातः सत्वं भावानामुत सवादर्थक्रिया, आधे प्रागसच्चप्रसङ्गः, अन्त्ये च स्वरूपसवमायातम् । किश्चार्थक्रियाया भावानां
सम्वनियामकत्वे तस्या अपि सत्चनियामिकयाऽपरार्थक्रियया भवितव्यं, तस्या अप्यपरयेत्यनवस्थानात् स्वरूपसत्वमेव
भावानामवश्यमभ्युपेयं, तच्च न क्षणिकत्वव्याप्यमिति नानुमानात् क्षणिकत्वसिद्धिः । यदपि 'निर्हेतुको ध्वंसः पदार्थोदया-
नन्तरभावीति तेषां क्षणिकत्वमुच्यते, तदप्यसत् , निर्हेतुकस्याऽपि ध्वंसस्य मुद्गरादिव्यापारानन्तरमुपलब्धेस्तदैव तत्सद्भा-
वाभ्युपगमस्य युक्तत्वात् । न च मुद्गरादिव्यापारानन्तरमस्य दर्शनात् प्रागपि सद्भावकल्पनं, प्रागदर्शनादग्रेऽप्यभावस्य
सुवचत्वात् । कारणान्तरमनपेक्षमाणो ध्वंसो भावसत्तामात्रानुबन्धीति प्रतिक्षणध्वंससिद्धिरिति चेत् , न, सत्तायां क्षणिक-
त्वासिद्धौ क्षणिकसत्तानुबन्धित्वस्य नाशे वक्तुमशक्यत्वात् , अनेकक्षणस्थितिकसत्तानुबन्धित्वोक्तौ चानेकक्षणस्थितिक-
सत्तानुभवानन्तरमेव भावेन नंष्टव्यमिति || किश्च निर्हेतुकत्वे ध्वंसस्य प्रथमक्षण एव तद्भावप्रसक्तिः स्यानोदयानन्तरं, न हि
भिमतकुर्व-
द्रूपत्वार्थ-
क्रियासाम-
र्थ्यलक्षण-
सत्वादेःख-
ण्डनम् ।।
॥ ५२॥
निर्हेतुकस्य काचित्कत्वं कादाचित्कत्वं वा युक्तं, व्याघातात् । न च भावहेतुरेव तत्प्रच्युतिहेतुरतिरिक्तहेत्वभावाच्च निर्हेतुकत्वं पदार्थाभावे च कुतस्तत्प्रच्युतिरिति प्रथमक्षण एव न ध्वंस इति वाच्यं, भावप्रभववेलायां तत्प्रच्युतेरनुत्पत्तौ मावहेतुरेव तद्धेतुरित्यस्य वक्तुमशक्यत्वात् , भावोत्पादनद्वारा भावहेतुस्तद्धेतुर्भावोऽपि वा तद्धेतुः प्रतियोगितद्धेवितरहेत्वनपेक्षत्वमेव निर्हेतुकत्वमिति तु यादृच्छिकपरिभाषामात्र, मुद्रादिव्यापारानन्तरमेव तत्र तद्धेतुकत्वस्य प्रमाणतो व्यवस्थितेः, अन्य त्रापि कार्यकारणभावेऽन्वयव्यतिरेकयोरेव नियामकत्वात् । किञ्च परैरपि मुद्रादीनां विरोधित्वं व्यवस्थापयद्भिः 'गले- पादुका' न्यायेन नाशकारणत्वमवश्यमभ्युपेयं, तथाहि न ते कणभुगादय इव कार्यकारणभावात् पृथग्विरोधाख्यं सम्बन्धम- म्युपेय(पयन्ति),किन्तु घटक्षणो मुद्गरादिकं विनाशकारणत्वेन प्रसिद्धमपेक्ष्य समानक्षणान्तरोत्पादनेऽसमर्थ क्षणान्तरमुत्पादयति, तदपि तदपेक्षमपरमसमर्थक्षणान्तरं तदप्युत्तरं तदपेक्षमसमर्थतमं यावद्धटसन्ततेनिवृत्तिः, एवमन्यत्रापि विरोधित्वं प्रतिपाद- यन्ति, तथा चासमर्थक्षणान्तरजनकस्य क्षणस्य मुद्रादेः कश्चित्सामर्थ्य विघातोम्युपगन्तव्य एव, अन्यथा समर्थक्षणान्तर- जननस्वभावात्ततो मुद्गरादिसभिधानेऽप्यसमर्थक्षणानारम्भप्रसङ्गात् ॥ न च स्वहेतुतोऽसमर्थजननस्वभावस्य तस्योत्पत्ते यं दोषः, प्रथमक्षण एव सन्तत्युच्छेदप्रसक्तेः ।। मुद्गरादिसनिधानसहभाविनः स्वहेतुत एवासमर्थक्षण उत्पद्यत इति चेत्, न, मुद्गरादिना प्राक्तनशक्त्यनाशने तत्सन्निधिवैयर्थ्यात् ॥ न चाकिश्चित्करस्यापि मुद्गरादेः स्वहेतुसन्निधिबलायातत्वात्तत्स- मवहितत्वस्य घटक्षणेऽसमर्थक्षणान्तरजननकाले नोपालम्भविषयतेति वाच्यं, एवं सत्युदासीनसमवधानस्याप्रयोजकत्वेन केवलस्यैव घटक्षणस्य विलक्षणक्षणान्तरोत्पादकत्वप्रसङ्गात् । किवं विलक्षणसन्तत्युत्पादे प्राक्तनसन्तानोच्छेदे वा मुद्गरा- ऋजुत्रन- यनिरूपणे तदुत्थसौ. गतमतख- ण्डने विना- शनिर्हेतुक- त्वतः क्षणि- कत्वव्यव- स्थापनस्य खण्डनम् ।।
श्री
अनेकान्त-
A
ऋजुत्रन-
यनिरूपणे
तदुत्थसौ-
गतमतख-
प्रकरणम् ॥
ण्डने उत्प.
॥५३॥
त्तिप्रतिव-
देरन्वयस्य व्यतिरेकान्यथासिद्धेस्तद्व्यापारानन्तरमपि घटादेरनुपलब्धिर्न भवेत् । तदा तस्य न स्वरूपप्रच्युतिरुत्पद्यते किन्तु
तस्यैकक्षणावस्थायित्वेन तदाऽभवनमिति नोपालम्भ इति चेत्, न, यतः स्वरूपादप्रच्युतस्य नाभवनं नाम किश्चित् ,
अन्यथा तस्य सत्चान्तरमभ्युपगतं स्यात् । अथ स एव न भवति नतु तस्यापरमत्त्वं, ननु तदेवेदं पुनारूपाभवनमभिधी-
यते, तत्र च तदेवोत्तरं, तस्माद्विनाशहेतुव्यापारानन्तरं पदार्थस्यासद्व्यवहारं विदधता तव्यतिरिक्तानन्तरग्रहणमभ्युपग-
न्तव्यं, न तु तदग्रहणमात्रं, अन्यथा तस्याभावानिश्चयात्कल्पादिव्यवहितस्यापि सद्व्यवहारनिषेध एव स्यानासद्व्यवहार
प्रवृत्तिः । न चार्थान्तरनाशानभ्युपगमे शत्रुमित्रक्षयजन्यसुखदुःखाद्यनुभवोऽपि सङ्गच्छते, न चाभावस्य भवितृत्वे भावरूपता,
भवितृत्वाविशेषेऽपि घटपटयोरिव विलक्षणप्रत्ययविषयत्वेन भावाभावयोर्भेदसिद्धेः । अथ कपालोत्पत्तिकाले घटविनाशान-
भ्युपगमे स्वभावत एवाविनश्वरम्य घटस्य परतोऽपि नाशासम्भवात् कपालोत्पत्तिप्राक्क्षणपर्यन्तस्थायित्वस्वभावकल्पने तस्य
नाशकसनिधावप्यनुवृत्तेः कौटस्थ्यप्रसङ्गात्तद्धाधे क्षणिकत्वमेव युक्तमिति चेत्, न, एकक्षणस्थायित्वस्वभावस्येवानेक-
क्षणस्थायित्वस्वभावस्यापि विवक्षितकालान्तरमनुवृत्त्यभ्युपगमे बाधकामावात् , अन्यथैकैकक्षणस्थायित्वस्वभावानुवृत्यापि
परस्य कल्पान्तरस्थायितापत्तेर्वज्रलेपत्वात् । विनाशहेतुपक्षनिक्षिप्तश्व विकल्पो भावोत्पत्तावपि समानः, तथाहि उत्पत्तिहेतुः
स्वभावत एवोत्पित्सुं भावमुत्पादयति, उतानुत्पित्सुं, प्रथमे विफलता तद्धतोः, द्वितीये तु वियत्कुसुमादेरप्युत्पादनप्रसङ्गः ।
स्वहेतुसनिधेरेवोत्पित्सोरुत्पादनाभ्युपगमे विनाशहेतुसन्निधाने विनश्वरस्वभावं तद्धेतुर्विनाशयतीत्यपि तुल्यन्यायात्कि ना-
भ्युपगम्यते, स्वयमेव विनश्वरस्य विनाशहेतुकृतोपकाराभावेन तजन्यनाशव्यपदेशाभावो हि स्वयमेवोत्पित्सोरुत्पत्तिहेतु-
न्दथा वि-
नाशस्य स-
हेतुकत्व-
व्यवस्था-
पनम् ॥
॥५३॥
ऋजुत्रन. यनिरूपणे तदुत्थसौ- गतमतख- ण्डनसमा- प्तिः, ऋजु- कृतोपकाराभावेन तजन्योत्पत्तिव्यदेशाभावतुल्ययोगक्षेमः । स्वकारणादुत्पत्तिरात्मलाभो यस्य स स्वोत्पत्तिधर्मा तं यदि स्वहेतुर्नोत्पादयेत्तदा विरुद्धमभिधानं स्यादित्यपि विनाशकारणाद्विनाश आत्मप्रच्युतिलक्षणो धर्मो यस्य तं यदि विनाश हेतुर्न विनाशयेत्तदा विरुद्धमभिधानमित्यनेन समानम् , येषां च न घटनिवृत्तिः कपालस्वरूपादन्या, तेषां कथं न कपाल- हेतुर्घटध्वंसहेतुर्भवेत् । अथ कथं कपाललक्षणस्य वस्त्वन्तरस्य प्रादुर्भावे घटो विनष्ट इति व्यपदिश्यते, मुद्गरादिहेतुसन्नि- धिमहिम्ना घटस्यैव कपालभावात् । कथं घटो विनष्टः स एवान्यथा भवतीति चेत्, नन्वसत् कथं भवतीति समानम् अथ प्राग्घटादिकमसत्सद्भवत्युत्पत्तिसमय इत्यविरुद्धं, ननु प्राग्घटः सन् विनाशहेतुसन्निधौ कपालीभवतीत्यविरुद्धमेव । कथं तस्यैव तदन्यत्वमिति चेत् , यथा संवेदनस्य नीलाद्याकारभेदः तथा स्वरूपेणानेकमनेकं भवन्न विरोत्स्यते । इत्थं च निवृत्तिः कारणस्य कार्यात्मना परिणतिरेवाभिधीयते, तथा च घटप्रच्युतेः कपालस्वरूपत्वे कुतः क्षणिकत्वमिति संक्षेपः ॥ अयं चर्जुसूत्रनयः पर्यायनयतरोर्मूलं, शब्दादीनामेतच्छाखारूपत्वात् , तदुक्तं सम्मतौ-"मूलनिमाणं पजवण- यस्स उज्जुसुअवयणविच्छेदो ॥ तम्स उ सद्दाईया, साहपसाहा सुहुमभेया ॥१-५॥" अस्यार्थः-मूलनिर्माणं मूलाधारः, पर्यायनयस्य ऋजुसूत्रवचनविच्छेदो लक्षणया प्रतिक्षणविवेचनेन विच्छिद्यमानवचनफलीभूतऋजुसूत्राख्यो नयबोधः, तस्य ऋजुसूत्रतरोः, तुरवधारणार्थः, तेन तस्यैव न द्रव्यार्थिकस्य, शब्दादयः शब्दप्राधान्येनार्थोपसर्जनत्वेन प्रतीतिजनकाः शब्दसममिरूदैवम्भूताख्यास्त्रयो नयाः, शाखाप्रशाग्वा इव स्थूलसूक्ष्मतरदर्शित्वात् सूक्ष्मो भेदो येषां ते तथा, यथा हि तरोः अनिताaananनिमारता: गत जसत्रतगे: सूत्रस्य प- र्यायनयत- रुमूलत्वं। शब्दादि- नयानां त- च्छाखाप्र- शाखारूप- शिलमममश्मतरतावाप्रकारवा.
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ ॥५४॥ प्रतिशाखारूपा अशुद्धशुद्धशुद्धतराः शब्दसमभिरूढेवम्भूताख्यास्त्रयो नया द्रष्टव्याः॥ तथा हि अजुसूत्राभ्युपगतं क्षणमात्राव- स्थितिवस्तु लिङ्गादिमेदाद्भिनं शब्दो वृक्षाच्छाखामिव मूक्ष्ममभिमन्यते, समभिरूढः शब्दाभिमतं वस्तु सज्ञामेदादपि भिधमानं शाखातः प्रशाखामिव मूक्ष्मतरमध्यवस्यति, तदेव समभिरूढाभिमतं वस्तु एवम्भूतः क्रियामेदाद्भिनं प्रशाखातः प्रतिशाखामिव सूक्ष्मतममधिगच्छतीति ।। एतच्च ऋजुसूत्रपदव्युत्पत्तिनिमित्तं प्रत्युत्पन्नग्राहित्वं पर्यायनयत्वमात्रपर्यवसनम- भिप्रेत्य द्रष्टव्यम् ॥ यद्वा विशेषणभेदाप्रयुक्तऋजुस्त्रविषयप्रतियोगिकमैदानाधारप्रतीतिविषयकत्वमिह शब्दादीनाम- जुसूत्रभेदत्वं परिभाष्यते, न ह्येवं व्यवहारस्य सङ्ग्रहमेदत्वं प्रसज्यते, विशेषणभेदाप्रयुक्तसामान्यलक्षणसङ्ग्रहविषयप्रतियो- गिक भेदाधारविशेषविषयत्वात्तस्य । शब्दभिन्नत्वे सति प्रत्युत्पन्नग्राहित्वं लक्षणमभिप्रेत्य तु न शब्दादीनामृजुस्त्रमे- दत्वं, अन्यथा नयविभाजकोपाधिव्याप्यविभाजकोपाधिमत्वेन नयप्रभेदत्वापत्तेः-" सत्त मूलणया पण्णत्ता" इति सूत्र- व्याकोपप्रसङ्गात् , न चान्यथाऽपि नयविभाजकोपाधिरूपद्रव्यार्थिकत्वपर्यायार्थिकत्वव्याप्यसब्रहत्वऋजुसूत्रत्वादिकमादाय सन्नहर्जुसूत्रादीनां नयप्रमेदत्वं दुनिवारं, द्रव्यार्थिकत्वपर्यायार्थिकत्वयोः प्रकृतविभागप्रयोजकविभाजकोपाधित्वाभावेन तद- दोषादिति स्मर्तव्यं, अत एव नव नया द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिको नैगमः सत्रहो व्यवहार ऋजुसूत्रः शब्दः समभिरूद एवम्भूतश्चेत्येकविभागकरणलम्पटदिक्पटकपटमपास्तमापभ्रांशिकप्रबन्धेऽस्माभिः। एवं हि द्रव्यार्थिकत्वपर्यायार्थिक- त्वाभ्यां सामान्यतो नयविभागं कृत्वा सङ्ग्रहर्जुसूत्रादीनां द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकभेदानामेवानुपदमुपदर्शनेन विभक्तविभागः कृतः स्यात् , नत्वेकविभागः, समहर्जुसूत्राधन्तर्भावशीलयोर्द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकयोः पृथग्विभागस्य कर्तुमशक्यत्वात् , ऋजुसूत्रत. रोःशाखा- प्रशाखाप्र- तिशाखारू- पा:शब्दस- मभिरुव- म्भूताःनय- स्यनवधा- विभजनं. दिक्पटस्य खण्डितम्।।
अन्यथाऽपिंतानर्पितमेदद्वयाधिक्येनैकादशधापि किं न नयविभागो देवानांप्रियस्याभिमतः स्यात् १, न च पश्च नया इत्येक आदेशः सप्तेत्यन्य इतिवत्सप्त नया इत्येकः आदेशो नवेत्यन्य इत्यस्मदभिप्रेतमिति साम्प्रतं, मिन्नविषयाणां शब्दादीनां त्रयाणां शब्दत्वेनैक्यं स्वातन्त्र्यं चाभिप्रेत्य पञ्चसप्तादेशमेदद्वयसम्भवेऽपि प्रकृते विषयभेदाभावेन तदसम्भवात् , न च सप्तधा नवधा च तत्वविभागवन्नयविभागोऽपि तथा नानुपपन्न इति वक्तुं युक्तं, तत्र केवलनिःश्रेयसोपयोग्यभ्युदयसंवलि. ततदुपयोगिबोधलक्षणप्रयोजनभेदेन विभागद्वैविध्यसम्भवेऽपि प्रकृते प्रयोजनभेदाभावेनानुयोगद्वारस्थानाङ्गतत्त्वार्थमहा- शास्त्राद्यभिहितं सप्तधानयविभागमुल्लध्य नवधा तत्करणस्य सूत्राशातनाकलङ्कितत्वादिति दिग् ।। अयं च सर्वोऽपि ऋजु- सूत्रवचनविस्तारो बाह्याभ्युपगमपरो द्रष्टव्यः। यद्वा ऋजु बाह्यापेक्षया ग्राहकसंवित्तिभेदविकलमविभागं बुद्धिस्वरूपमकु- टिलं, सूत्रयतीति ऋजुसूत्रः शुद्धपयार्यास्तिको, यद्वा सर्वधर्मविरहशून्यतेत्यभ्युपगमपरः शुद्धतरपर्यायास्तिकावलम्बी ऋजु- सूत्रो व्यवस्थितः, अथवा सौत्रान्तिकवैभाषिको बाह्यार्थमाश्रितौ यथाक्रममृजुसूत्रशब्दो, वैभाषिकेण नित्यानित्य- शब्दवाच्यस्य पुद्गलस्याभ्युपगमाच्छब्दनये तस्यानुप्रवेशः ।। बाह्यार्थप्रतिक्षेपेण विज्ञानमात्राभ्युपगमपरः समभिरूढो योगा- चारः । एकानेकधर्मविकलतया विज्ञानमात्रस्याप्यभाव इत्येवमभ्युपगमपर एवम्भूतो माध्यमिक इति सम्मतिवृत्ती व्यवस्थितम् , तत्पूर्वपक्षसमाधानादिकमपि तत एवावसेयं, विस्तरभयान्नेह विलिख्यते, नवीनतर्कस्पृहयालुभिश्चा- त्रार्थे मत्कृतस्याद्वादकल्पलता परिशीलनीया ॥ ऋजुसूत्रनयविचारः सम्पूर्णः ।। "दर्शितेयं यथाशास्त्र-मृजुसूत्रनयस्य दिक् ॥ बौद्धसिद्धान्तहेतुः श्री-यशोविजयवाचकैः ॥१॥ ऋजुसूत्रन- यप्रसङ्गे दिगम्बरक- तनयविभा- गनिरसनं, सम्मतिसं- वादेन सौ- त्रान्तिका- दीनां नय- समवतार ऋजुसूत्रो- पसंहारश्च ।।
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
'शप आक्रोशे' शपनमाह्वानमिति शब्दः, शपत्याह्वयतीति वा शब्दः, शप्यते वाऽऽहूयते वस्त्वनेनेति शब्दः। तस्य
शन्दस्य यो वाच्योऽर्थस्तत्प्रधानत्वान्नयोऽपि शब्दः, उपचारात् , यथा कृतकत्वादित्यादिकः पञ्चम्यन्तशब्दोऽपि हेतुः। अर्थरूपं
हि कृतकत्वमनित्यत्वगमकत्वान्मुख्यतया हेतुरुच्यते, उपचारात्तु तद्वाचकः शब्दः, तद्वदिहापि द्रष्टव्यं । उक्तं च महाभाष्य
कृता । “सवणं सपइ स तेणं, व सप्पए वत्थु जं तओ सद्दो॥ तस्मत्थपरिग्गहओ, नओ वि सदोत्ति हेउ छ ॥२२२७॥" शब्दवाच्या-
र्थपरिग्रहप्राधान्यं ॥ “इच्छइ विसेसियतरं, पच्चुप्पन्नो नओ महो"॥२१८४॥त्ति नियुक्तिदलं, तत्र भाष्यं-"तं चिय रिउ.
सुत्तमयं, पच्चुप्पन्न विसेसिययरं सो ॥ इच्छइ भावघडं चिय, जं न उ नामादिए तिनि ॥ २२२८ ॥" तदेव ऋजुसूत्र-
नयमतं ऋजुसूत्रनयाभ्युपगतं प्रत्युत्पन्नं वर्तमान वस्त्विच्छत्यसो शब्दनयः, कीदृशं विशेषिततरं, कुत इदं ज्ञायते,
यद् यस्मात् पृथुबुध्नोदराद्याकारकलितं मृन्मयं जलाहरणादिक्रियाक्षमं प्रसिद्धघटरूपं भावघटमेवेच्छत्यसौ, न तु शेषा-
नामस्थापनाद्रव्यरूपांस्त्रीन् घटानिति, शब्दार्थप्रधानो ह्येष नयः, शब्दार्थश्च प्रकृते 'घट चेष्टायाम्' इति धात्वर्थलक्षणो भाव-
घट एव युज्यते, न नामादिष्विति निक्षेपचतुष्टयाभ्युपगमपरादृजुसूत्राद्विशेषिततरं वस्त्विच्छत्यसौ, एकस्यैव भावघटस्यानेनो-
पगमात् ।। नामादिघटनिराकरणे प्रमाणमाह-" नामादओ न कुम्भा, तकजाकरणओ पडाइ छ । पञ्चक्खविरोहाओ,
तल्लिंगाभावओ वा वि ।। २२२९ ॥” नामस्थापनाद्रव्यरूपाः कुम्भा न भवन्ति, जलाहरणादितत्कार्याऽकरणात् , पटा-
दिवत् , तथा प्रत्यक्षविरोधात् घटलिङ्गादर्शनाच, अघटरूपास्ते प्रत्यक्षेणैव दृश्यन्त इति प्रत्यक्षविरोधः, जलाहर-
णादिघटलिङ्गं च तेषु न दृश्यते ततोऽनुमानविरोधोऽपीति कथं ते नामादिघटा घटव्यपदेशभाजो भवेयुः १ । घटपदानामादि-
शब्दनयो-
पक्रमः,नि-
क्षेपाभ्युप
गममेदेन
ऋजुसूत्राद-
स्य महा-
भाष्यसंवा-
दतो भेद-
प्रदर्शनच॥
॥ ५५॥
शब्दनयस्य ऋजुत्रा- द्विशिष्ट- त्वे प्रथम- प्रकारोपसं- हारः, द्वि- घटोपस्थितेरस्खलिताया दर्शनात्तत्र तत्पदशक्तेरव्याहतत्वात् स्वारसिकघटपदप्रयोगलक्षणो व्यपदेशस्तेषु न विरुध्यत इति चेत्, न, अन्तरङ्गप्रत्यासच्या धटभाव एव घटपदशक्तेरभ्युपगमात् , नामादिषु तत्पदप्रयोगस्यास्वारसिकत्वादिति दिग् ।। ऋजुसूत्रशिक्षणार्थमाह-"जइ विगयाणुप्पन्ना, पओअणाभावओ न ते कुम्भा ॥ नामादओ किमिट्ठा, पओअणाभावओ कुम्भा ।। २२३० ।।" यदि विगता अनुत्पन्नाश्च तव हे अजुसूत्र ! कुम्भा नेष्टाः, प्रयोजनाभावात् , तर्हि नामादयोऽपि कुम्भाः किमिष्टाः, प्रयोजनामावस्य समानत्वात् , न खलु तैरपि कुम्भप्रयोजनं किमपि विधीयते, वासनाविशेषोत्थापित- प्रतीत्यादिप्रयोजनं तु शशविषाणादेरिव न सत्त्वसाधकमिति भावः । तदेवमृजुसूत्राच्छन्दनयस्य विशेषिततरत्वमुक्तम् ॥ अथ प्रकारान्तरेण तदाह-"अहवा पच्चुप्पन्नो, रिउसुत्तस्साविसेमिओ चेव ।। कुम्भो विसेसिययरो, सम्भावाईहिं सदस्स ॥ २२३१ ॥ सम्भावासब्भावो-भयप्पिओ स-परपज्जओ-भयओ॥ कुम्भा-ऽकुम्भा-ऽवत्त-बोभयरूवाइमेओसो ॥२२३२॥" अथवा प्रत्युत्पन्न ऋजुसूत्रस्याविशेषित एव सामान्येन कुम्भोऽभिप्रेतः, शब्दनयस्य तु स एव सद्भावादिभिर्विशे- षिततरोऽभिमत इत्येवमनयोर्भेदः, तथाहि, स्वपर्यायैः परपर्यायैरुमयपर्यायैर्वाऽर्पितो विशेषितः, कुम्भाकुम्भाऽवक्तव्योभ- यरूपादिभेदो भवति-सप्तभङ्गी प्रतिपद्यत इत्यर्थः, तद्यथा---ऊर्ध्वग्रीवाकपालकुक्षिबुध्नादिभिः स्वपर्यायैः सद्भावेनार्पितो वि- शेषितः कुम्भः कुम्भो भण्यते, 'सन् घट' इति प्रथमभङ्गो भवतीत्यर्थः ॥१॥ तथा पटादिगतैस्त्वक्त्राणादिभिः परपर्यायै- रसद्भावेनार्पितो विशेषितोऽकुम्भो भवति, सर्वस्यापि घटस्य परपर्यायैरसत्वविवक्षायाम् , 'असन् घट' इति द्वितीयो भङ्गो- भवतीत्यर्थः ॥२॥ तथा सर्वोऽपि घटः स्वपरोभयपर्यायैः सद्भावासद्भावाभ्यामर्पितः 'अवक्तव्यो' भवति, स्वपरपर्यायस- तीयप्रकारे च सप्तभ- छग्युपदर्श- नम् ॥
श्री
अनेकान्त-
च्यवस्था-
प्रकरणम् ।।
चासत्वाभ्यामेकेन केनाप्यसाङ्केतिकेन शब्देन सर्वस्यापि तस्य युगपद्वक्तुमशक्यत्वात् इति तृतीयो भङ्गः ॥ ३॥ एते
त्रयः सकलादेशाः । अथ चत्वारो विकलादेशाः प्रोच्यन्ते, तत्रैकस्मिन् देशे स्वपर्यायसवेनान्यत्र तु देशे परपर्या-
याऽसम्वेन विवक्षितो घटः 'संश्चासंश्च' भवति, घटोऽघटश्च भवतीत्यर्थः इति चतुर्थो भङ्गः॥४॥ तथैकस्मिन् देशे स्वपर्यायैः
सद्भावेनार्पितोऽन्यत्र तु देशे स्वपरोभयपर्यायैः सद्भावासद्भावाभ्यां युगपदसाङ्केतिकेनैकेन शब्देन वक्तुमिष्टः कुम्भः 'संश्चा-
वक्तव्यश्च' भवति, घटोऽवक्तव्यश्च भवतीत्यर्थः, देशे तस्य घटत्वाद्देशे चाऽवक्तव्यत्वात् इति पञ्चमो भङ्गः॥५॥ तथैकदेशे
परपर्यायैरसद्भावेनार्पितोऽन्यस्मिस्तु देशे स्वपरपर्यायैः सद्भावासद्भावाभ्यां युगपदसाङ्केतिकेनकेन शब्देन वक्तुमिष्टः कुम्भः
'असंश्चाऽवक्तव्यश्च' भवति, अघटोऽवक्तव्यश्च भवतीत्यर्थः, देशे तस्याघटत्वाद्देशे चावक्तव्यत्यात् इति षष्ठो भङ्गः॥६॥
तथैकस्मिन् देशे स्वपर्यायैः सद्भावेनान्यस्मिंस्तु परपर्यायैरसद्भावेनान्यस्मिंस्तु स्वपरोभयपर्यायैः सद्भावासद्भावाभ्यां युगपदेके.
नाऽसाङ्केतिकेन शब्देन वक्तुमिष्टः कुम्भः संश्चासंश्चावक्तव्यश्च' भवति,घटोऽघटोऽवक्तव्यश्च भवतीत्यर्थः इति सप्तमोभ-
ङ्गः॥७ इह च कुम्भाकुम्भेत्यादिना गाथार्धेन षड् भङ्गाः साक्षादुपात्ताः, सप्तमस्त्वादिशब्दात् , तद्यथा--कुम्भः१, अकु-
म्भा२, अवक्तव्यः३, उभयत्ति संश्वासंश्चेत्युभयं४, सन्नवक्तव्य इत्युभयं५, तथाऽसन्नवक्तव्य इत्युभयं६, आदिशब्दसङ्ग्र-
हीतस्तु सप्तमः सन्नऽसन्नवक्तव्य इति ७॥ अत्रोभयपदस्य समभिव्याहृतपदार्थैकत्वेद्वयप्रकारकवुद्धिविषये शक्तावपि समभि-
व्याहारत्रैविध्यात्रिरावृत्त्या त्रिविधोभयबोध इति न्यायमार्गः॥ तदेवं स्याद्वाददृष्टं सप्तमेदं घटादिकमर्थ यथाविवक्षमेकेन
केनापि भङ्गकेन विशेषिततरमसौ शब्दनयः प्रतिपद्यते, पर्यायनयत्वादृजुसूत्राद्विशैषिततरवस्तुग्राहित्वाच्च । स्यावादिनस्तु
शब्दनयस्व
ऋजुसूत्रा-
द्विशिष्टत्वं
द्वितीयप्र-
कारद्वारा-
सप्तमङ्ग्यु-
पदर्शनश्च।।
॥५६॥
॥५६॥
शब्दनयप्र- सङ्गेन सप्त- भङ्गथा अर्थ शन्दनया- श्रितत्वं वि- कल्प्य तत्त- वनिरूप- सम्पूर्णसप्तभङ्ग्यात्मकमपि प्रतिपद्यन्त इति विशेषावश्यकवृत्तावुक्तम्॥ तत्रेदं विचार्यते, ननु किमियं सप्तभङ्गी-अर्थनया- श्रिता उत शन्दनयाश्रिता, आधे तदेकतरभङ्गविशेषणेन कथमृजुसूत्राच्छब्दस्य विशेषिततरत्वं, अर्थनयाश्रितभङ्गस्य शब्द- नयाविशेषत्वात् , उभयेषां विषयविभागस्य दूरान्तरत्वात् , तथाहि, एतदर्थनयमतं, यद्यपि शब्दार्थों सामान्येन स्तः, त थाऽपि तदाकारानुविधायिनी तदध्यवसायेन तत्राविसंवादान्संवित्प्रमाणत्वेन गीयते, प्रमाणे स्वाकारार्पकचार्थ एव, सा- क्षात्परम्परया वा नियतान्वयव्यतिरेकशालित्वात् , न तु शब्दोऽतथात्वादिति तस्य न प्रमेयत्वं, न चाध्यक्षसंविदि कदापि शब्दसंसृष्टोऽर्थः प्रतिभासते, तथाऽननुभवात् , यदि च वस्तुसन्निधावपि तन्नामानुस्मृति विनार्थस्यानुपलब्धिरिष्यते, तदार्थसन्निधेरभिधानस्य स्मृतावेवोपक्षीणशक्तिकत्वात्कदापीन्द्रियबुद्धिजनकत्वं न स्यात् , यदि च स्वाभिधानविशेषणा- पेक्षमेव चक्षुरादिप्रतिपत्तिः स्वार्थमवगमयतीति परस्य निर्बन्धः, तदाऽस्तङ्गतेयमिन्द्रियप्रभवार्थाधिगतिः, तन्नामस्मृत्यादेरस- म्भवात् , तथाहि, यत्रार्थे प्राक्शब्दप्रतिपत्तिरभूत्पुनस्तदर्थवीक्षणे तत्सङ्केतितशब्दस्मृतिर्भवेदिति वक्तुं युक्तं, अन्यथातिप्रसङ्गात्, न चानभिलापार्थाप्रतिपत्तौ पूर्वप्रतिपन्नमभिलापमपि स्मरेत् , अर्थदर्शनरूपसंस्कारोबोधकाभावात् , असरंश्च शब्दविशेषं न वा- च्यवाचकभावसम्बन्धेनार्थे योजयेत् ,अयोजयंश्च न तेन विशिष्टमर्थमवगच्छेदित्यायातमान्ध्यमशेषस्य जगतः,तस्मात्स्वाभिधान स्मृतिनिरपेक्षस्यार्थस्य स्वत एव चक्षुरादिप्रत्ययं प्रत्युपयोगित्वमेष्टव्यमित्यर्थ एव तत्त्वमिति । शब्दनयास्तु सङ्गिरन्ते कारण- स्यापि विषयस्यावगाहनेनोपलम्भमाना प्रतिपत्तिर्न तावत्प्रमाणं यावदध्यवसायो न भवेत् , स चाध्यवसायो विकल्पात्मा तद- भिधानस्मृति विना नोत्पद्यत इति सर्वव्यवहारेषु शब्दसम्बन्धः प्रधाननिबन्धनं, प्रत्यक्षस्यापि तजन्माध्यवसायविकल्पविक- णम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
शब्दनयप्र-
सङ्ग सप्तम-
गया अर्थ-
॥ ५७॥
लस्य बहिरन्तर्वा प्रतिक्षणपरिणामप्रतिपत्तावित्र प्रमाणतानुपपत्तेः, अविसंवादलक्षणत्वान्प्रमाणानां, प्रतिक्षणपरिणामांशेऽप्य-
ध्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमे च प्रमाणान्तरदर्शने यत्नान्तरकरणं ग्रान्थिकानामपार्थकं स्यात् , ततः प्रमाणव्यवस्थानिबन्धनं
तनामस्मृतिव्यवसाययोजनमर्थप्राधान्यमपहस्तयतीति शब्द एव सर्वत्र प्रमाणादिव्यवहारे प्रधान कारणमिति ॥ द्वितीयविकल्पे
च ऋजुसूत्राभिमतार्थपर्यायाविषयत्वेनाशुद्धव्यञ्जनपर्यायग्राहिणः कुतः शब्दस्य तस्माद्विशेषिततरार्थत्वं, न हि तदविषय-
विषयकत्वं विशेषिततरशब्दार्थः, किन्तु शुद्धतरतद्विषयविषयकत्वमिति ।। न च ऋजुसूत्राभिमनं सचमुपमृद्यासचाख्यद्विती-
यभार्थोपग्रहाच्छब्दस्यर्जुसूत्राद्विशेषिततरत्वं वक्तुं युक्तम् , इत्थं ऋजुमूत्राभिमतं सचमुपमृद्यासत्रग्रहणव्यापृतस्य व्यव-
हारस्थापि ततो विशेषिततरार्थत्वापत्तेविशेषकभङ्गानिर्धारकवचनानुपपत्तेश्चेति चेत् , अत्रेदनाभाति यद्यपि सम्मती--
" एवं सत्तविअप्पो, वयणपहो होइ अत्थपजाए ॥ वंजणपजाओ पुण, सवियप्पो णिबियप्पो य ॥१-४१॥"त्ति गाथयाऽर्थ-
पर्यायाश्रिता सप्तभङ्गी सहव्यवहारर्जुसूत्रेय॑ञ्जनपर्यायाश्रिता च शब्दसमभिरूंढवम्भूतैः सूचिता, तथाप्येतत्प्रकारद्वयाभिधान-
मर्थव्यञ्जनसाधारणपर्यायसामान्याश्रितमप्तभड्न्या अप्युपलक्षणं, सा च स्वपरपर्यायाणां क्रमयुगपद्विवक्षावशान्नयद्वयेनाऽ-
शुद्धशुद्धशुद्धतरपर्यायविवक्षया च नयत्रयेणापि सम्भवतीति ऋजुसूत्रशब्दप्रयुक्तसप्तमङ्गया द्वितीयादिना व्यवहारर्जुसूत्रश-
ब्दप्रयुक्तायां च तस्यां तृतीयादिना भङ्गेनर्जुमूत्राच्छब्दस्य विशेषिततरार्थत्वं युक्तं, न चैवं ऋजुसूत्रकृतसत्तापेक्षयाऽसत्ता-
ग्राहिणो व्यवहारस्यापि ततो विशेषिततरार्थत्वप्रसङ्गदूषणानुद्धाः, सम्प्रदायाविरुद्धभङ्गविषयीभूतेनार्थेन विशेषिततरत्वस्याभि-
धित्सितत्वात् , सम्प्रदायश्चोत्तरोत्तरभङ्गप्रवृत्तावुत्तरोत्तरनयावलम्बनेनैव दृष्टो नान्यथेति न कश्चिदोष इति विभावनीयं सुधीभिः॥
शब्दनया-
श्रितत्वनि-
टकनं, श-
ब्दनयस्य-
दर्शितप्रका-
रे विशेषित
तरत्वोषसं-
हारश्च ॥
॥ ५७॥
शब्दनय- स्य पुनः प्रकारान्तरे- ण ऋजुसू. त्राद्विशिष्ट- त्वं व्यव- स्थाप्य स- मभिरूढण अथवा लिङ्गवचने समाश्रित्य विशेषिततरं वस्त्विच्छति शब्दनय इति दर्शयन्नाह भाष्यकृत्--" वत्थुमविसेसओवा, जं भिन्नाभिन्नलिङ्गवयणंपि ॥ इच्छइ रिउसुत्तनओ,विसेसियतरं तयं ( नयो ) सद्दो ॥२२३३॥" व्याख्या--वा इत्यथवा, भिन्नाभिन्नलिङ्गवचनमप्यविशेषतो यद्वस्त्विच्छति ऋजुसूत्रनयस्तद्वि शेषिततरमिच्छति शब्दनयः ॥ कुत इत्याह--" धणिभेयाओ भेओ, स्थी-पुंलिङ्गाभिहाणवच्चाणं ।। पडकुंभाणं व जओ, तेणाभिन्नत्थमिटुं तं ॥२२३४॥" यतो यस्मात्कारणात् स्त्रीपुंनपुंसकलिङ्गाभिधानवाच्यानामर्थानां तटादीनां भेद एव, न पुनरेकत्वं, तटीत्यभिधानस्य भिन्नोऽर्थो वाच्यः, तट इत्यभिधानस्य त्वन्यः, तटमित्यभिधानस्य चापरः, कुतः १, ध्वनिभेदात्, तथा, गुरुर्गुरव इत्यावे. कवचनबहुवचनादिवाच्यानामर्थानां ध्वनिभेदादेव भेदः । केषामिव ? इत्याह पटकुम्भादिध्वनिभेदात्पटकुम्भाद्यर्थानामिव । तेन तस्मात्कारणात्, तल्लिङ्गं वचनं वाऽभिन्नार्थमेवेष्टं यादृशो धनिस्तादृश एवार्थो द्रष्टव्य(ऽस्येष्ट) इत्यर्थः। अन्यलिङ्ग- वृत्तेस्तु शब्दस्य नान्यलिङ्गवाच्यमिच्छत्यसौ, नाप्यन्यवचनवृत्तेः शब्दस्यान्यवचनवाच्यं वस्त्वभिधेयमिच्छत्येप इति भावः ।। उक्तमेवार्थमुपसंहृत्य दर्शयति--" तो भावो च्चिय वत्थु, विसेसियमभिन्नलिं-गवयणं व ।। बहुपजायं पि मयं, सद्दत्थवसेण सद्दस्स ॥ २२३५ ॥ ततस्तस्मात्कारणान्नामादिनिक्षेपेषु भाव एव वस्त्वित्यसाविच्छति, तदपि प्रागुक्तरीत्या सद्भा. वादिभिर्विशेषितं अभिन्नलिङ्गवचनं चाभ्युपैति, स्ववाचकध्वनिनाऽ(नीनाम)भिन्ने लिङ्गवचने यस्य समानाधिकरण- ध्वनेरीधचा वाच्यवाचकभावसम्बन्धेन तन्निरूपिततादात्म्येन वा तद्वदित्यर्थः । समभिरूढेन सहास्य मतभेदं दर्शयति- बहर्यायमपि इन्द्रः शक्रः पुरन्दर इत्यादिनानापर्यायवाच्यमप्येकमिन्द्रादिकं वस्तु शब्दस्येन्द्रादेरिन्दनादिको योऽर्थ- ? सह भेदो- पक्रमच॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥ ५८ ॥
स्तद्वशेन शब्दनयस्य मतमभिप्रेतं, इन्दनशकनपूर्दारणादीनामनामेकस्मिन्निन्द्रादिके वस्तुनि समावेशसम्भवात् ,
समभिरूढस्तु नैवं मन्यत इति स्फुटीभविष्यतीत्ययमनयोभैदः । अत्राभिन्नलिङ्गवचनमिति यदुक्तं तदभिन्नकारकाद्युपल-
क्षणं, कारकादिभेदेनाप्यनेकार्थभेदाभ्युपगमात् , तथाहि-यथा ऋजुसूत्रनयमत एवं 'अग्निष्टोमयाजी पुत्रोस्य जनिता' इत्य-
युक्तम् , अतीतानागतयोः सम्बन्धाभावात् , तथा शब्दनयमतेऽन्यकारकयुक्तं यत्तदेवापरकारकसम्बन्धं नानुभवतीत्यधि-
करणं चेद् , ग्रामोऽधिकरणाभिधानविभक्तिवाच्य एव न कर्माभिधानविभक्त्यभिधेय इति 'ग्राममधिशेते' इति प्रयोगोऽनुप-
पन्नः, तथा पुरुषभेदेऽपि नैकं वस्त्विति 'एहि मन्ये रथेन यास्यसि न हि यास्यसि यातस्ते पिता' इति च प्रयोगो न युक्तः,
अपि तु 'एहि मन्यसे यथाहं रथेन यास्यामि' इत्येवं परभावेनैतन्निर्देष्टव्यं । एवमुपग्रहणभेदेऽपि विरमतीन्यादिर्न युक्तः, आत्मा-
र्थतया हि विरमत इत्यस्यैव प्रयोगस्य सङ्गतेः, न चैवं लोकशास्त्रविलोपः, सर्वत्रैव नयमते तद्विलोपस्य समानत्वादिति
सम्मतिवृत्तौ व्यवस्थितम् । वस्तुतो 'ग्राममधिशेते' इत्यादी ग्रामोत्तरद्वितीयादिपदादधिकरणत्वादिप्रकारकप्रतीत्यर्थमधि-
करणत्वादिविशिष्टे लक्षणैव स्वीकार्या, तन्निरूढत्वज्ञापनार्थमेव विशेषानुशासनमिति न कोऽपि दोषः। एतेन " विरोधि-
लिङ्गसंख्यादि-भेदाद्भिन्नस्वभावताम् ॥ तस्यैव मन्यमानोऽयं, शब्दः प्रत्यवतिष्ठते ॥ १ ॥" इत्यत्र लिङ्गसंख्यादिशब्दार्थो
व्याख्यातः ॥ इति शब्दनयः ॥ एकामेव संज्ञां समभिरोहतीति समभिरूढः, आह च भाष्यकृत्-
जं जं सणं भासइ, तं तं चिय समभिरोहए जम्हा ॥ सण्णंतरत्थविमुहो, तओ णओ समभिरूढत्ति ॥ २२३६ ।।
यां यां संज्ञां घट इत्यादिरूपां भाषते तां तामेव यस्मात्संज्ञान्तरार्थविमुखः कुटकुम्भादिशब्दवाच्यार्थनिरपेक्षः
शब्दनय.
स्य समभि-
रूढनयाद्रे-
दनिरूपण-
म्, कार-
कादिमेदा-
दपिभेदो-
पदर्शनं स-
भिरूढनयो-
पक्रमथ ॥
॥ ५८ ॥
समभिरोहति तत्तद्वाच्यार्थविषयत्वेन प्रमाणीकरोति, ततस्तस्मान्नानार्थसमभिरोहणात्समभिरूढो नयः, यो घटशब्द- वाच्योऽर्थस्तं कुटकुम्भादिपर्यायशब्दवाच्यं नेच्छत्यसावित्यर्थः ॥ “वन्यूओ सङ्कमणं होइ, अवत्थू नए सममिरूढे।।२१८५॥” इति नियुक्तिदलं, एतद्व्यात्रिख्यासुराह भाष्यकृत्-“दवं पजाओ वा, वत्थु वयणंतराभिधेयं जं ॥ न तदनवत्थुभावं, सङ्क- मए सङ्करो मा भू ॥२२३७॥ ण हि सदंतरवच्चं, वत्धुं सतरत्थतामेइ ॥ संसय-विवज-एगत्त, सङ्कराइप्पसङ्गाओ ॥२२३८॥" द्रव्यं कुटादि, पर्यायस्तु तद्गतो वर्णादिस्तल्लक्षणं यत्कुटादिवचनान्तराभिधेयं वस्तु न तदन्यवस्तुभावं घटशब्दाभिधेयं वस्तुभावं सङ्कामति, कुत इत्याह, वस्तुनो वस्त्वन्तरसङ्कामे माभूत्सङ्करादिदोष इति ॥ एतदेव भावयति, न हि शब्दान्तरवाच्यं वस्तु शब्दान्तरवाच्यार्थतामेति, संशयविपर्ययैकत्वसङ्करातिप्रसङ्गेभ्यः । तथाहि ॥ घटादौ पटाद्यर्थसङ्क्रमे किमयं घटः पटादिति संशयः स्याद् , विपर्ययो वा घटादावपि पटादिनिश्चयात् , पटादौ वा घटायध्यवसा- कत्वं वा घटपटाद्यर्थानां प्राप्नुयात् , सङ्करः सङ्कीर्णरूपता वा मेचकमणिवत् , अतिप्रसङ्गो वा पटाद्यर्थिनो घटादौ प्रवृ- त्तिलक्षणः स्यात् ।। एवं 'घट चेष्टायां' घटनाद् घटः, 'कुट कौटिल्ये' कुटनात्कुटः, तथा 'उभ-उम्भ पूरणे' कुम्भनात् कुस्थितिपूरणात् कुम्भ इति, भिन्नाः सर्वेऽपि घटकुटादिपदार्थाः । ततश्च घटाद्यर्थे कुटादिशब्दप्रयोगे वस्तुनो वस्त्वन्तरसङ्क्रा- न्तौ संशयादिदोषोपनिपात इति ॥ घटकुटादिपदार्थानामभेदे बाधकप्रमाणमुक्त्वा भेदसाधकप्रमाणमाह- घडकुडसइत्थाण, जुत्तो मेओऽमिहाणमेआओ ॥ घडपडसद्दत्थाण व, तओ न पजायवयणं ति ॥ २२३९ ।। " नागानामर्थानां भेट एव परस्परं युक्त इति प्रतिज्ञा, अभिधानमेवाद्वाचकध्वनिमे- पर्याय मेदे नाप्यर्थमि- नताभिप्रा- यस्यसम- भिरूढनय- स्यपर्याय- मेदादर्थमे. दाभेदोप- पादनम् ॥ .
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
?
॥५९ ॥
दादिति हेतुः, घटपटस्तम्भादिशब्दवाच्यानामिवार्थानामिति दृष्टान्तः, इन्थं चैतदभिप्रायेण घटादिपदस्य कुटकुम्भ-
कलशादिकं पर्यायवचनं नास्त्येवेकानेकशब्दप्रवृत्यनभ्युपगमादिति भावः ॥ शब्दनयशिक्षणार्थमाह--" धणिभेयाओ
मेओ-ऽणुमओ जइ लिङ्गवयणभिन्नाणं ॥ घडपडवच्चाणं पिव, घडकुडवच्चाण किमणिट्ठो ॥२२४०॥" हन्त ? यदि लिङ्गव-
चनभिन्नानां घटपटस्तम्भादिवाच्यानामिवार्थानां ध्वनि भेदाभेदस्तवानुमतः, तर्हि घटकुटकुम्भकलशादि-
शब्दवाच्यानामर्थानां किमिति भेदो नेष्टः, ध्वनिभेदस्यात्रापि समानत्वात् । किश्च विभिन्नलिङ्गवचनादिशब्दवाच्यत्व-
मर्थभेदे न प्रयोजक, गौरवात् , किन्तु विभिन्नशब्दवाच्यत्वं, लाघवात् । न च नानार्थकैकशब्दवाच्यानामप्यर्थानां यथा
नाभेदस्तथा भिन्नशब्दवाच्यानामपि न भेदो भविष्यतीत्याशङ्कनीयं, यतो विभिन्न शब्दवाच्यत्वस्यार्थभेदप्रयोजकत्वं न
तव्यापकत्वं, येन नानार्थस्थले 'व्यापकाभावाद् व्याप्याभाव' आपादयितुं शक्येत, किन्तु तव्याप्यत्वं, न च 'व्याप्या.
भावाद् व्यापकाभाव' आपादयितुं शक्यते, तप्तायोगोलके व्यभिचारात् , तम्मान्नानार्थस्थले शब्दभेदाढ़ेदाभावेऽपि लक्षण-
स्वरूपादिभेदाभेदोऽव्याहतः, न ह्यर्थभेदे एकमेव प्रतिनियतं प्रयोजकं, भिन्नशब्दवाच्यतया तु भिन्नकालवृत्तितयेवार्थमेदो
भुव इति बलादस्मत्पथवर्तित्वं भवतोप्यापतितम् ॥ वसतिप्रस्थकादिविचारेऽप्यस्य पूर्वनयेभ्यो भेद इति दर्शयन्नाह-
"आगासे वसइत्ति य, भणिए भणइ किह अन्नमन्नम्मि ॥ मोत्णायसहावं, वसेज वत्थु विहम्मम्मि ॥२२४१॥ वत्थु वसइ
सहावे, सत्ताओ चेयणा व जीवमि । न विलक्खणतणाओ, भिन्ने छायानवे चेव ।। २२४२ ॥ "कासौ साध्वादिर्वसतीति
पृष्ट लोकग्रामनगरवसत्यादौ वसतीति नैगमादिनयवादिनो वदन्ति । ऋजुसूत्रनयवादी तु वदति यत्रावगाढस्तत्रा-
समभिरूट-
नयस्य श-
ब्दनयाद्वि-
शिष्टत्वप्र-
दर्शन, वस-
त्यादिदृष्टा-
न्ततोऽपि
पूर्वनयेभ्यो
मेदोपदर्श-
नश्च ॥
॥ ५९॥
समभिरूद- नयविचारे वसत्यादि- दृष्टान्तनि- कर्षः॥ काशखण्डे वसति, ततश्च ऋजुसूत्रेणेवं भणिते भणति समभिरूढो नन्वात्मस्वभावं मुक्त्वा कथमन्यद्वस्त्वन्य. स्मिन् विधर्मके आत्मविलक्षणे वसेत् , न कथञ्चित् , सम्बन्धाभावादसम्बद्धस्य चाधारत्वानुपपत्तेरित्यर्थः ॥ तर्हि क वसतीत्याह--सर्वमेव वस्त्वात्मस्वभावे वमति, सत्त्वात् , जीवे चेतनावद् । भिन्ने त्वात्मविलक्षणस्वरूपे वस्तुनि न वसति यथा छायाऽऽतपे । यद्यप्येष त्रयाणामपि शब्दनयानामविशेषेणाभिप्रायः सूत्रे व्यावर्णितस्तथा च सगृह्याऽभ्य- धीष्महि-" णेगमववहाराणां, वसही लोयाइणिलयकोणता ॥ संथारगावगाहग-णहप्पएमायगा तिण्हं ॥१॥" तिण्हति क्रमेण सनहर्जुसूत्रशब्दाख्यानां त्रयाणां नयानामित्यर्थः । तथापि शब्दसमभिरूद्वैवम्भूतेषु ज्ञानात्मप्रदेशतदाकारज्ञाननिरा- कारज्ञानसामान्यभेदादात्मस्वभावभेदेन यदि विशेप उच्यते तदेवतद्विपये मिथो विशेपो घटेतेति सूक्ष्ममीक्षणीयम् । अभेदे कथमाधाराधेयभावः, भेद एव कुण्डबदरादीनां तदर्शनादिति तु न शङ्कनीयं, अभेदेऽपि घटाभावे घटो नास्तीत्याद्याधाराधे- यभावोल्लेखिप्रतीतिदर्शनात , भेदे तत्प्रयोगस्तूपचारात्समर्थनीय इति दिक् ।। प्रस्थकविचारमधिकृत्याह--"माणं पमाण- मिट्ट, नाणसहावो स जीवओऽणन्नो ॥ किह पत्थयाइभावं, वएज मुत्ताइरूवं सो ॥ २२४३ ।। ण हि पत्थाइपमाणं, घडो- बभुविचेयणाइविरहाओ ।। केवलमिव तण्णाणं, पमाणमिटुं परिच्छेओ ॥ २२४४॥ इह यन्मानं तत्प्रमाणमेवेष्टं, प्रमी. यते परिच्छिद्यते वस्त्वनेनेति कृत्वा, प्रमाणं च परिच्छेदात्मकं जीवस्वभाव एव, स च जीवादनन्य इति कथं मूििद- स्वभावमादिशब्दादचेतनस्वभावं प्रस्थकादिस्वभावं ब्रजेदसौ, येन नैगमादयः काष्ठमयं प्रस्थकादिकं मानमिच्छन्तः शोभेरन्निति ॥ तर्हि शब्दनयानां किं प्रमाणं प्रस्थकादि किंवा न प्रमाणमित्याह-न हि नैव काष्ठघटितं प्रस्थकादि प्र. "
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
माणं, चेतनादिरहितत्वात् , घटपटलोष्ठादिवत्, किन्तु तस्य प्रस्थकस्य ज्ञानं तदुपयोगस्तत्परिच्छेदः प्रमाणं ज्ञान-
मिष्टं, तेनैव तत्त्वतः प्रमीयमाणत्वात् । परिच्छेया इति पाठान्तरं वा तेनैव परिच्छेदात् , केवलज्ञानवत्, तस्मात्प्रस्थक-
ज्ञानमेव प्रस्थक इति स्थितम् । अत्र परमतमाशक्य परिहरन्नाह-"पत्थादओवि तकारणंति, माणं मई न तं तेसु ॥ जम-
संतेसु वि बुद्धी, कासइ संतेसु वि न बुद्धी ।।२२४५॥ तक्कारणं ति वा जइ, पमाणमिटुं तओ पमेयं वि ॥ सवं पमाणमेवं, किम-
प्पमाणं पमाणं वा ।। २२४६ ॥" प्रस्थादयोपि मानमिति प्रतिज्ञा, तत्कारणत्वात् प्रस्थकज्ञानकारणत्वात् , यथा
नड्वलोदकं पादरोग इत्यादि, इत्येवम्भूता परस्य मतिः स्यात् , तदेतन्न, यतस्तेषु प्रस्थकादिष्वसत्स्वपि कस्यापि
धान्यराश्यवलोकनमात्रेणापि कलनशक्तिसम्पन्नस्याऽतिशयज्ञानिनो वा प्रस्थकपरिच्छेदबुद्धिरुपजायते, कस्यापि पुनर्ना-
लिकेरद्वीपाद्यायातस्य सत्स्वपि तेषु प्रस्थकपरिच्छेदबुद्धिर्न सम्पद्यते इत्यनेकान्तिका एव काष्ठमयप्रस्थकादयः प्रस्थक-
ज्ञानजनने, इति कथं तत्कारणत्वात्ते प्रस्थकादिमानरूपा भवेयुः १ । यदि वा प्रस्थकज्ञानकारणतामात्रेणापि काष्ठमयप्रस्थ.
कादयः प्रमाणज्ञानकारणत्वात् प्रमाणमिष्टास्तदा दधिभक्षणादीनामपि परम्परया तत्कारणानां प्रमाणत्वं स्यादिति प्रमेयप्रमा-
णसाकर्याद्विशीर्णा प्रमाणाप्रमाणव्यवस्था । एतेन 'प्रस्थकत्वप्रकारकालौकिकधान्यचाक्षुपे स्वावच्छिन्नचक्षुःसंयोगसम्ब-
न्धेन प्रस्थकस्य हेतुत्वमिति' नव्यतोऽप्यपास्तः, अनेनाऽपि प्रकारेण प्रस्थकस्य प्रमाणत्वे प्रमाणप्रमेयसाङ्कर्यदोषानुद्धा-
रात् , ज्ञाने प्रस्थकत्वप्रकारकत्वस्य प्रस्थकाकारत्वपर्यवसन्नत्वेन तद्भिन्नप्रस्थके प्रमाणाभावश्च, प्रस्थकज्ञानात्पूर्व हि न
प्रस्थकसिद्धिः, तज्ञानकाले च तदेव प्रस्थकाकारत्वेनानुभूयत इति किमपरमप्रामाणिकं बाह्यं प्रस्थकादीति । यद्यप्यत्रापि
शब्दादीनां
त्रयाणां न.
यानां मते-
न प्रस्थक.
तत्त्वोपवर्ण-
नं तत्र च-
पराशकाप-
रिहारश्च ।।
॥६०॥
॥ ६०॥
शब्दादिन- यत्रिकमते प्रस्थकज्ञान- स्य प्रस्थक- प्रमाणतां निर्णीय श- प्रस्थकज्ञानमेव प्रस्थकप्रमाणमिति त्रयाणामपि शब्दनयानामविशिष्टमेव मतं गीयते, तथापि बाह्यप्रस्थकार्पितस्वाभाविक- सत्यप्रस्थकाकारोपप्लवोपस्थापितामत्यप्रस्थकाकारग्राह्यग्राहकताविनिर्मुक्तमध्यमसंवित्स्वरूपज्ञानभेदेनैषां विषयभेदः सूक्ष्म- मीक्षणीयः । तथा पश्चानां धर्माधर्माकाशजीवपुद्गलास्तिकायानां देशप्रदेशकल्पनायामप्यस्य नयस्य मते षष्ठीसमासादि नेष्टं, किं तर्हि देशी चासो देशश्चत्यादिकर्मधारय एवेति सयुक्तिकमाह --" देसी चेव य देसो, णो वत्थु वा न वत्थुणो भिन्नो || भिन्नो व न तस्स तओ, तस्स व जइ तो न मो भिन्नो ॥ २२४७ ।। एत्तो चेव समाणा-हिगरणया जुज्जए पयाणं पि ॥ नीलुप्पलाइयाणं, न रायपुरिमाइसंमग्गो ॥२२४८॥" व्याख्या-धर्मास्तिकायादिको देश्येव हि देशो न पुनस्तस्माद् घटादिवाघरट्टोऽत्यन्तभिन्न स्वतन्त्रं वस्तु देशः। अथ न स्वतन्त्रं वस्तु देशः, किन्तु तत्सम्बन्धित्वादस्वतन्त्रोऽपि देशिनो भिन्नो देश इति चेत् , तत्राह-न च (वा) देशिलक्षणाद्वस्तुनो भिन्नोऽसौ देशः, अथ भिन्नस्तस्मादिष्यतेऽसौ, तर्हि,अन्यस्या- ऽन्येन विन्ध्येन हिमवदादेरिव सम्बन्धायोगान्न तस्य देशिनस्तकोऽसौ देशः, यदि पुनस्तस्य देशिनः सम्बन्धी देशोs- भ्युपगम्यते तर्हि घटादेः स्वस्वरूपबन्न स देशस्तस्मादेशिनो भिन्नः, किन्तु तदात्मक एवेति ॥ अत एव विशेषणविशेष्य- भूतानां सर्वेषामपि पदानां समानाधिकरणता कर्मधारय एव समासो युज्यत इत्यर्थः, यथा नीलोत्पलादीनां, उपलक्षणं चेदं धवखदिरपलाशा इत्यादिर्द्वन्द्वोप्येतन्मतेनानुपपन्ना, ' परस्परानन्वितनानापदार्थकसमासत्वस्यैव ' द्वन्द्वलक्षणत्वात्, अभे- देनान्वयस्य भेदेनान्वयस्य च तुल्ययोगक्षेमत्वात , न तु राज्ञः पुरुषो राजपुरुप इति षष्ठ्यादिसमासः एतन्मते युज्यते, यतो Fr-mai गंगा: सम्बन्धो न घटते. तथाहि, सम्बद्धवस्तुद्वयात्सम्बन्धो भिन्नोऽभिन्नो वा, यदि भिन्नः, तर्हि ब्दनयस्य- मतेन धर्मा- स्तिकाया- दिभिर्देशप्र- देशयोः स- मासनिर्ण- यश्च ॥
शब्दादिन-
यमन द्व-
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ॥
न्दु-कर्म-
धारयसमा-
॥ ६१॥
योरेत्र मु.
ख्यत्वं प्र-
रूपितं का.
सम्बद्धवस्तुद्वयाद्भिन्नं तृतीयमेव वस्तु तत्स्यात् , न तु सम्बन्ध इति कथं नवशात्पष्ट्यादिविभक्तिः, न हि विन्ध्यहिमवदा-
दिभ्यो भिन्नो घटादिस्तत्सम्बन्धो भण्यते, नापि तद्वशानेषां पष्ठयादिविभक्तिः प्रवर्नने, अथ सम्बद्धवस्तुद्वयादभिन्नः सम्ब
न्धः, नर्हि नामौ पष्ठयादिप्रयोगहेतुः, सम्बद्रवस्तुद्वयादव्यतिरिक्तत्वात् , नम्वरूपवन । ननु तत्स्वरूपमिन्यत्रै (त्र)वाभेदे षष्ठी-
प्रयोग इति विपरीताभिधानमिदमिति चेत् , नात्र तत्पुरुषः, कर्मधारयस्यैवाश्रयणात् । तस्य स्वरूपमिति पष्ठीप्रयोगोऽप्यविभा-
गेन दृश्यत इति चेत्, न, समभिरूढनयमतावलम्बिभिरस्य प्रयोगम्य विगीतन्वात् , भेदोपचारेण वाऽत्र षष्ठीसमर्थनात् । अत
एवात्र-भेदे कथं पष्ठीति बाधमपि प्रदर्शयन्ति मूक्ष्मेक्षिणः, इत्थं च द्वन्द्वकर्मधारयातिरिक्तममाससमर्थनमेतन्मन उप-
चारेणैवेति बोध्यम् ।। अपर मपि समभिरूढनयाभिप्रायभेदं दर्शयन्नाह --- "घडकारविवक्वाए. कत्तुरणथंनरं जओ किरिया ॥
न तदत्थंतरभूए, ममवाओ तो मओ नीसे ।।२२४९।। कुम्भमि बन्युपजाय-सङ्कराइपमङ्गदोमाओ॥ जो जेण जंच(ब) कुरुए,
तेण विभिन्नं नयं सवं ॥२२९०॥" घटं करोतीति घटकार इत्यस्यां विवक्षायां प्ररूपगायां, यनो यस्मात्तस्य घटकर्तु
रनन्तरमव्यतिरिक्ता घटकरण क्रिया, कर्तर्येव घटकारे तस्याः ममवायात् , नोत्ति नस्मान्न तदर्थान्तरभूते कर्तृव्य-
तिरिक्ते, कुम्भ घटे, तस्याः समवायः संश्लेयो, मतः, कुनः?, वस्तुपर्यायमङ्करादिदोषप्रसङ्गात् , कर्तृगतक्रियायाः कर्म-
ण्यपि समवायाभ्युपगमे वस्तुपर्यायाणां विभिन्नवस्तुधर्माणां परस्परं मङ्करः मङ्कीर्णत्वमेकत्वं वा स्यादिनि । ततश्च यः
कुम्भकारादिः, येन क्रियाविशेषण, यत्कुम्भादिकं, कुरुते, तेन क्रियाविशेषेण, तक्रियारूपतयेत्यर्थः, सर्व तत् कटकर्माद्य-
भिन्नं स्यात् , तस्मान्कर्तगतक्रियाया न कर्मणि मक्रमः, किन्तु कुर्वन् कारकः, कुम्भनादिभ्य एव कुम्भादय इति मन्यते
रकरूपेण
समभिरूट-
स्य भेदश्च ॥
॥ ६१॥
ममभिरूढः ।। अयमस्मिन्विषयेऽन्यकारकसम्बद्वेऽन्यकारकानन्वयित्वाभ्युगमपरं शब्दं प्रति प्रत्यवतिष्ठते, नन्वेवमन्यपदार्थे- ऽन्यपदार्थानन्वयित्वमेव लाघवादभ्युपगम्यतामिति, नन्वेवं कुलाले घटकार इति प्रयोगोऽनुपपन्नः स्यादिति चेत् , बा- ह्यघटाभिप्रायेणानुपपन्नः स्यादेव, भावघटाभिप्रायेण तु न स्यात् , घटपरिणामित्वान्मृदादिद्रव्यमेव हि घटकारशब्दार्थः, घटाकाराध्यवसायादिपरिणामित्वात् , कुलालादिस्तु तत्कार एवाभिमानिकसम्बन्धेन केवलं बाह्यघटादिकारित्वं कुलालादा- वभ्युपयन्ति व्यवहारमूढाः । नदिदमभिप्रेत्यावोचाम-“ मृदादिभात्रैः परिणामवद्भिः, कुम्भादिभावाञ्जनितानवेत्य ।। तेषामगृहन्परिणामिभावं, बाह्यं करोमीत्यभिमन्यते कः ॥ १ ॥" अत एवैतन्नये परगतस्य दानहरणादेर्नास्त्येव सद्भावः, स्वगतं तत्फलं तु स्वगतदानहरणाद्यध्यवमायविशेषादेवेति विवेचितमन्यत्र ।। अयं पुनरिह शब्दसमभिरूढयोरवान्तरविशेषोऽ- नुसन्धेयः, यदायेन बाह्यवस्तुसन्निधापितस्तदाकाराध्यवमायः फलक्षमोऽभ्युपेयः, द्वितीयेन तु वासनाविशेषमात्रोत्था. पित इति । इत्थमेव नैगमनये जीवाजीवयोहिंसा, मत्रहव्यवहारयोः षटम्वेव कायेषु, ऋजुसूत्रे प्रतिजीवं भिन्नभिन्ना सा, शब्दनये तु स्त्रपरिणामविशेषरूपैव सेत्यादि नयविचारे शब्दममभिरूढयोर्भावहिंसाद्याश्रित्य विषयभेदः सङ्गच्छते, एवम्भू- तस्तु क्रियाकालान्यकालस्पार्शपदार्थप्रतिक्षेपादेव विशिष्यत इति न तत्र युक्त्यन्तरं मृग्यं, युक्त्यन्तरान्वेषणे वा तस्य माध्यमिकमतपर्यवमानमपि न दुर्लभमिति सक्षेपः ॥ ‘पदार्थव्युत्पत्तिनिमित्तक्रियाकालव्यापकपदार्थसत्ताभ्युपगमपर एव- म्भूतः' । आह च भाष्यकार:-" एवं जह सद्दत्थो, सन्तो भूओ तह तयन्नहाऽभूओ । तेणेवम्भूयणओ सद्दत्थपरो विसे- .........." mi nा 'घट चेपायाम' इत्यादिरूपेण शब्दार्थो व्यवस्थितः, तहत्ति तथैव यो वर्तते घटादिकोऽर्थः शब्दनया- स्कारकस्त्र- रूपतःसम- भिरूढस्य भेदमुपद- श्य प्रकारा- न्तरेण मेद: प्रत्येकन- याभिप्राय- तो हिंसा स्वरूपं चेति दर्शितम् ॥
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ एवम्भूतन- यस्वरूपं, नियुक्ति- भाष्यसंवा- ॥६२ ॥ स एव सन् भूतो विद्यमानः, अथ यस्तु, अन्यथा शब्दार्थोल्लानेन वर्तते स तत्वतो घटाद्यर्थोऽपि न भवति, किन्तु, अभूतो- ऽविद्यमानः । येनैवं मन्यते, तेन कारणेन, शब्दनयसमभिरूढनयाभ्यां सकाशाई, एवम्भूतनयो विशेषेण शब्दार्थतत्परः। अयं हि योषिन्मस्तकारूढं जलाहरणादिक्रियानिमित्तं घटमानमेव घटं मन्यते, न तु स्वगृहकोणादिव्यवस्थितं, अचेष्टनाद्, इ. त्येवं विशेषतः शन्दार्थतत्परोऽयमिति भावः ।। "वंजणअत्थतदुभय, एवंभूओ विसेसेइ।।२१८५॥"त्ति नियुक्तिदलं तद् ब्याचष्टे भाष्यकृत्-"वंजणमत्थेणत्थं, च वंजणेणोभयं विसेसेइ ।। जह घडसई चेट्ठा-वया तहा तं पि तेणेव ॥२२५२॥" व्यज्यतेऽर्थोऽ. नेनेति व्यञ्जनं वाचकः शब्दो घटादिस्तं चेष्टावतैतद्वाच्येनार्थेन विशिनष्टि, स एव घटशब्दो यश्चेष्टावन्तमर्थ प्रतिपादयति, नान्यः, इत्येवं शब्दमर्थेन नैयत्ये व्यवस्थापयतीत्यर्थः, तथा, अर्थमप्युक्तलक्षणं अभिहितरूपेण व्यञ्जनेन विशेषयति, चेष्टापि सैव या घटशब्दवाच्यत्वेन प्रसिद्धा योपिन्मस्तकारूढस्य घटस्य जलाहरणादिक्रियारूपा, न तु स्थानभरणक्रियात्मिकेत्ये- वमर्थ शन्देन नैयत्ये स्थापयतीत्यर्थः, इत्येवमुभयं विशेषयति, एतदेवाह —'जह घडसई' इत्यादि । इदमत्र हृदयं-यदा योषिन्मस्तकारूढश्चेष्टावानर्थो घटशब्देनोच्यते तदा स घटलक्षणोऽर्थः, म च तद्वाचको घटशब्दः, अन्यदा तु वस्त्वन्तरस्येव तच्चेष्टाभावादऽघटत्वं घटध्वनेश्चावाचकत्वमिति । एतदेव प्रमाणत: समर्थयन्नाह-" सद्दवमादभिधेयं, तप्पच्चयओ पईव-कुंभो छ । संसयविवजएग-त्तसङ्कराइप्पसङ्गाओ ॥ २२५३ ॥" यथाभिधायकः शब्दस्तथाभिधेयं प्रतिपत्तव्यमिति प्रतिज्ञा, तत्प्रत्ययत एव ततः प्रत्ययमम्भूनेरिति हेतुः, प्रदीपवत् कुम्भवद्वेति दृष्टान्तः, विपर्यये बाधकमाह- संशयेत्यादि, इदमुक्तं भवति, प्रदीपशब्देन प्रकाशवानेवार्थोऽभिधीयते, अन्यथा संशयादयः प्रसज्येरन , तथाहि, यदि मभिरूढन- याभ्याम- स्य मेदः, शब्दार्थनै- यत्यनिर्ण- यश्चेति प्रद- शिंतम् ।। ।।६२॥ .
दीपनक्रियाविकलोऽपि दीपस्तर्हि दीपशम्देन प्रकाशवानर्थोऽभिहितः किं वाऽप्रकाशकोप्यन्धोपलादिरिति संशयः, अन्धोप- लादिरेवानेनाभिहितो नदीप इति विपर्ययः, तथा, दीप इत्युक्तेऽप्यन्धोपलादेरन्धोपलादावप्युक्ते दीपस्यच प्रत्ययात्पदार्थाना- मेकत्वं सायं वास्यादेवमतिप्रसङ्गोऽपीति "शब्दत्रशादेवाभिधेयमभिधेयवशाच शब्द" इति प्रतिपत्तव्यम्।। समभिरूढ- नयं शिक्षयन्नाऽऽह-"मद्दपरिणामओ जइ, घडकुडसद्दन्थमेयपडिवत्ती । तो णिचेट्ठो वि कहं, घडसद्दत्थो घडोऽभिमओ ॥ २२५४ ॥" यदि शब्दपरिणामतः शब्दभेदात् घटकुटकुम्भादिपर्यायशब्दानामर्थभेदप्रतिपत्तिः ततस्तर्हि, निश्चष्टोऽपि घटशब्दाभिधेयोऽर्थः कथं, घटोऽभिमतः, 'घटनाद् घट' इति शब्दार्थाभावादिति ॥ किश्च " जइ वत्थु- सङ्कमो वा-ऽनिट्ठो चेट्ठावओ य सङ्कती ॥ तो न हि निचिट्ठतया, जुत्ता हाणीव समयस्स ।। २२५५ ॥" वाऽथवा युक्त्य- न्तरमुच्यते हन्त ! यदि 'वत्थूओसङ्कमणं होह अवत्थू' इत्यादिवचनात्तव वस्तुमङ्गमोऽनिष्टोऽनभिमतस्तहि चेष्टावतोऽपि भावघटस्य निश्चेष्टतयेति, कोऽर्थः, चेष्टाविकले द्रव्यघटे घटशब्दप्रवृत्तितः सङ्क्रमणं सङ्क्रान्तिन हि नैव युक्ता, अथ चेष्टावतोऽपि निश्चेष्टेऽर्थे सङ्कान्तिरिष्यते, तर्हि समयहानिर्भवतो ' वत्थूओ सङ्कमणं' इत्यादिस्वप्रतिज्ञाक्षतिरित्यर्थः । अपरमप्यस्य मत- भेदं दर्शयन्नाह- "एवं जीवं जीवो, संमारी पाणधारणाणुभवो। सिद्धो पुण अजीवो, जीवणपरिणामरहिओ ति ।।२२५६॥" जीवति " पश्चेन्द्रियाणि त्रिविधं बलं च, उच्छ्वासनिःश्वासमथान्यदायुः॥ प्राणा दशैते भगवद्भिरुक्ता-स्तेषां वियोगीकरणं च हिंमा ।। १ ॥" इत्यादिवचनप्रसिद्धान् दशविधप्राणान्धरतीति शब्दार्थवशाजीवन्नेव दशविधप्राणधारणं कुर्वन्नेवास्य नय. म्य प्रतेन जीव उच्यते. स च नारकादिः संसार्येव भवति, सिद्धस्त्वेतनयमतेन जीवोऽसुमान प्राणीत्यादिशब्दैनं व्यपदेश्यः, एवम्भूतन- याभिप्राये- ण शब्दार्थ- यो यन्या- नभ्युपगमे दोषप्रदर्शन समभिरूढ- स्योपाल- म्भः प्रका- रान्तरेण भेदप्ररूप- पश्च॥
भी
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
11६३॥
जीवनादिपरिणामरहित इति कृत्वा शब्दार्थाभावात् , किं तर्हि 'मत्तायोगात्मत्वः' 'अनति तांस्तान् ज्ञानदर्शनमुखादिपर्या-
यान् गच्छतीत्यात्मा' इत्यादिभिरेव शब्दैव्यंपदेश्य इति ॥ इन्थं च यदुच्यते बोटिकवृद्धन (द्रव्यसन हे) “ तिकाले च
दुपाणा, इंदियबलमाउ प्राणपाणो य ॥ ववहारा मो जीवो, णिच्छयदो दुचेदणा जस्य ॥१॥" ति, तन्निजकपोलनल्पशयालु-
विरुद्धकल्पनया शिष्यव्यामोहनमात्रम् , अशुद्धनयविवेचनं शुद्धनयम्याप्यय॑माणम्य प्रसिद्धार्थपुरस्कारेणोल्लेखस्यैव माम्प्र-
दायिकत्वात् , एवम्भूननयमते 'जीव प्राणधारणे' इति धात्वर्थायोगेन शुद्धचेतनाद्वयवतोपि सिद्धस्य जीवपदार्थतया वक्तुमश-
क्यत्वात् , धात्वर्थ एव भावनिःक्षेपोपग्रहे च योषिन्मस्तकारूढो जलाहरणादिक्रियां कुर्वन्नपि घटो घटपदार्थो न स्यात् ,
किन्तु भावघटनयानुपयोग इत्येवम्भूतस्य प्रमिद्धोदाहरणमपि विलूनशीणं म्यात् । अथ शब्दार्थाभयविशेपणप्रधानन्यादेवम्भू-
तस्य व्यावहारिकशब्दार्थोपग्रहेणव प्रसिद्धोदाहरणव्याघातो नैश्चयिकतदुपग्रहे च तद्व्याघातो न दोषाय नयान्तगर्थव्या.
घातपुरःसरमेव नयान्तरप्रवृत्तरिति निश्चयोपजीविनिश्चयेन मिद्वम्यैव जीवन्वं न संयारिण इन्यस्मन्मतमदुष्टमिति चेत्, न,
तथापि व्यवहारोपजीविनिश्चयेन शब्दार्थोपदर्शनं बिना निश्चयोपजीविनिश्चयेन शब्दार्थोपदर्शनम्य क्रमभङ्गदोषावहत्वात् ।
अथ 'विचित्रा सुत्राणां कृतिराचार्यस्य' इति निश्चयोपजीविनिश्चयप्रदर्शनेच्छयैवास्मद्ग्रन्धकारप्रवृत्तेरयमदोष इति चेत् ,
न, ग्रन्थकर्तुरिच्छावैचित्र्यस्यापि सम्प्रदायानतिवर्तित्वात् . सम्प्रदायश्चादी व्यवहारस्यैव तदनन्तरं नयपरिकर्मितमतेः कस्यचि.
बुद्धिविस्फारणार्थ व्यवहारोपजीविनिश्चयस्य तदनन्नम्मेव च भृशनरं नयविस्तरावगाहनावदातमतिं शिष्यं प्रति निश्चयो-
पजीविनिश्चयस्य प्रदर्शनं प्रसिद्धम्, इति किमादावेव देवानांप्रियस्य 'सूचीमुखे मुमलप्रवेशनकल्पेन' निश्चयोपजीविनिश्चयप्रदर्शन-
एवम्भूतन-
यमलेन जी-
वित्वनिरूप-
णं, दिगम्ब-
रकल्पिता-
भिप्रायनिर-
सनं, व्यव-
हारनिश्चय-
योरादितः
शिष्येभ्यो
देशना
प्रकारश्च ॥
॥ ६३ ॥
प्राच्यदशा- यामाद्यन- यत्रिकपरू- पणाया एव सिद्धा- व्यापारेण, सिद्धान्ते ह्यादिदेशना व्यवहाराश्रितैव प्रत्यपादि, तस्या एव कर्म-कर्मफल--कर्तृ-भोक्त्रादिव्यवस्थोपपादकत्वेन सम्यग्दर्शनमूलत्वात् , न तु निश्चयदेशना, तम्या एतद्वैपरीन्येन मुग्धजनहृदये नास्तिक्यवामनाधानद्वारा मिथ्यादर्शनमूल- त्वात् , प्रतिपादितं चैतद्व्यवहार भाष्ये, ममर्थितं च गुरुतत्त्वविनिश्चयं स्वोपज्ञं विवृण्वद्भिरस्माभिः, अत एव सिद्धान्ते लोकोपकाराय क्वचिन कचिदाद्यनयत्रयदेशनवोपनिबट्टा, न तूनरनय चतुष्टयप्ररूपणा, नस्या अपरिणत्यतिपरिणत्या- धायकतया प्राच्यदशायामहितत्वात् , अङ्गोपाङ्गादिपारदृश्वनां परिणजिनप्रवचनोपनिषदां दृष्टिवादाध्ययने तु सर्वनयानु- योगो विहित एव, तान्प्रनि नस्य हितकारणत्वात् , नदाह श्रुतकेवलो-."एएहिं दिहिवाए, परूवणा सुत्तअथकहणा य ।। इह पुण अणभुवगमो, अहिगारो तीहि ओषणं ॥२२७५।।" नि ।। अथ 'कालत्रये प्राणचतुष्टयधारी यः म व्यवहारतो जीव' इति व्युत्पाद्य 'यस्य द्वे चेनने स निश्चयनो जीव' इति वाग्भया कर्मोपाधिनिरपेक्षशुद्धद्रव्यार्थिकलक्षणनिश्चयेन सिद्धसंसारि- णामविशेपेण जीवत्यव्युत्पादने न क्रमभङ्गादिदोषलेशोऽपीति चेत्, न, नेन सर्वेषां मामान्यतो जीवन्वे सिद्धे यस्येति विशे- पोपग्रहानुपपत्तेः, न हि शुद्धनयमते एकः शुद्ध एकश्चाशुद्धोऽम्ति, अत एव मग्गणगुणठाणेहि य, चउदसहिं हवंति तह असुद्धणया ॥ विष्णेया संसारी, मव्वे सुद्धा हु सुद्धणया ॥ १३ ॥" ( द्रव्यसवहे ) इति परेणैवाग्रे प्रतिपादितम् , अस्म- मावनिका अपि च सामायिकनयविचारे स्वजात्या शुद्धस्य सर्वस्यैवात्मनः सामाविकरूपता मन्त्रहनयापेक्षया प्रतिपा- दयन्तीत्यन्यत्र विस्तरः । यदपि देशदेशिनोरेकत्वं समर्थयता देशी चासौ देशश्चेत्यायुक्तं समभिरूढेन, तदपि समभिरूढ- नयमते न युक्तमिति दर्शयन्नाह-" जइ देसि चिय देसो, पत्ता पजायवयणपडिवत्ती ॥ पुणरुत्तमाणस्थय, वत्युसङ्कमो वा ण न्तोक्तत्वं सर्बनयानु- योगस्य च विशिष्ट- जीव एवा- धिकारी- त्यादिनिरू- पणम् ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
समभिरूढ-
नयमतेन
कर्मधारय-
समासस्य
देशिदेशा-
दिष्वनुपप-
॥ ६४॥
चेहूँ ते ॥ २२५७ ॥ यदि देश्येव देशः, देशो वा देशी तदानयोवृक्षः पादप इत्यादीनामिव पर्यायवचनतैव
प्राप्ता, ततश्च यथा वृक्षः पादप इत्येकार्थशब्दप्रयोगे पौनम्वत्यं तथा देशिदेशशब्दप्रयोगेऽपि स्यात , तथा एकेनापि
द्वितीयशब्दार्थस्य प्रतिपादितत्वाद् द्वितीयशब्दप्रयोगस्यानर्थक्यं च स्यात् , तथा, देशस्य देशिनि, देशिनश्च देशे तिरोधा-
नाद्वस्तुसङ्क्रमोऽपि भवेत् , न चेदं तवेष्टं, तस्मान देशदेशिनोरेकत्वमिति । भेदपक्षम्तु तयोस्त्वयापि निराकृत एव ।। अथा-
भेदपक्षोक्तदूषणभिया पुनस्तमङ्गीकरिष्यमि, तत्राह अह भिनो तस्स तओ, ण होइ ण य वत्थुसङ्कमभयाओ ॥ देसी
चेव य देसो, न वा पएमी पएसोत्ति ॥ २२५८ ॥ " अथ भिन्नो देशिनो देशः, नहिं प्राक् त्वदुक्तयुक्तरेव, तस्य देशि-
नस्तकोऽसौ देशो न भवतीति स्मयतामिदं, न च वस्तुसङ्कमादिदोषभयाद्देश्येव देशोऽभ्युपगन्तव्य इत्यनन्तर-
मेवोक्तम् , एवं प्रदेशी प्रदेश इत्यपि नैष्टव्यं, ममानदोषत्वात् , तम्मान देशिमात्रं देशमात्रं वा, किन्त्वखण्डं वस्त्वभ्युप-
गन्तव्यं, न तु देशप्रदेशकल्पना कार्या, तयोर्मेंदऽभेदे च यथोक्तदोपसम्भवात् , अत एतन्मने कर्मधारयोऽपि पदानां न
भवति, सर्वस्यापि वस्तुनः प्रत्येकमखण्डरूपत्वात् ॥ अथ देशप्रतिपादनार्थ नोदेशीति प्रयोगः क्रियते एकदेशवचनश्च
नोशब्दो देशिन एकदेशभूत एव देशो न पुनस्तद्व्यतिरिक्त इत्यर्थप्रतिपादक इति चेत , तदप्ययुक्तमित्याह-" नो-
सद्दो वि समत्तं, देसं व भणिज जइ ममत्तं तो ॥ तम्म पओगोऽणत्थो, अह देमो तो ण मो वत्) ।।२२५९।। " नो देशीति
प्रयोगे योऽयं नोशन्दः स किं समस्तं देशिलक्षणं वस्तु वदेत्, अथवा तद्देशमेव ब्रूयात् , यद्याद्यः पक्षः, तदा नोशब्दस्य
प्रयोगोऽनर्थकः, केवलाद्देशिशब्दादेव समस्तवस्तुप्रतीतेः, अथ देशो नोशब्देनोच्यते, ततो नासौ वस्तु, देशिनो मेदा-
त्वं प्रद
र्य तन्नि-
ष्कर्षः ॥
॥६४॥
मेदाभ्यामनुपपत्तेरुक्तत्वात् । नीलोत्पलादिसमासश्च द्वयोः पदयोरेकाधिकरणतायां भवति, द्वयोश्चकमधिकरणं नास्ति, अन- न्तरमेव निषिद्धत्वादिति कर्मधारयममामोऽपि न युक्त इति दर्शयबाह--"नीलुप्पलाइसहा-ऽहिगरणमेगं च जं मयं तत्थ ।। नणु पुणरुत्ताऽणत्थय-समयविधाया पुहुत्तं वा ।। २२६० ॥" नीलोत्पलादिशब्दानां यदेकमधिकरणमतिक्रान्तनयस्य सम्मतं तत्र ननु पौनरुक्त्यानर्थक्यसमयविघातलक्षणा दोषा उक्ता एवेति न कर्मधारयः, अथ पौनरुक्त्यादिदोषा नेष्यन्ते, तर्हि नीलोत्पलादिशब्दाभिधेयस्यार्थस्य पृथक्त्वं भेदः प्राप्नोतीत्यतोऽपि तुल्याधिकरणताऽभावान कर्मधारयः ।। तस्मात् किं स्थितमित्याह ॥ " तो वत्थुसङ्कराइ-प्पसङ्गओ सबमेव पडिपुग्नं ।। वत्थु सेसमवत्थु, विलक्षणं खरविसाणं व ॥ २२६१ ॥" तस्माद्वस्तुसाङ्कर्यादिदोषप्रसङ्गतः, सर्व धर्मास्तिकायादिकं, सम्पूर्ण देशदेशिकल्पनारहितमखण्डं वस्तु, एतस्मात्तु विलक्षणं देशदेशिकल्पनान्वितमवस्तु, युक्तिविकलत्वात् , खरविषाणवदिति ॥ नन्वेवं नीलघट इत्यादिस- मासानीलो पट इत्यादिवाक्याच शाब्दबोधो न स्यादिति चेत्, गृहीतैवम्भूतनयव्युत्पत्तीनां न स्यादेव, अन्येषां तु भवभयं भ्रमरूपता नातिक्रामतीति गृहाण । समभिरूढेन ह्येकपदार्थे भेदसम्बन्धेनेतरपदार्थान्वयाभावव्याप्यत्वं स्वीक्रियते, मया तु सम्बन्धमात्रेणेतरपदार्थान्वयाभावव्याप्यत्वमिति लाघवं, तस्मान्नीलघट इत्यादौ 'नीलीभवनान्नीलो ''घटनाद्धट' इत्या- दिक्रियाद्वयाऽसमावेशादनन्वय एव, गुणादिवाचिन: शब्दास्त्वतन्नये न सन्त्येव, सर्वेषामेव व्युत्पत्यर्थपर्यालोचनायां क्रिया- शब्दत्वात् , क्रियाशब्दयोरपि च भिन्नयोः परस्परमनन्वय एव, नीलघटादिविशृङ्खलपदोपस्थित्यनन्तरं तत्संसर्गबोधश्च मान- गोपेशामानं. तयैव च सर्वो व्यवहारः, यदि च नीलो घट इत्यादेरखण्डनीलघटादिवाक्यार्थबोध: शाब्द एवानुभवसिद्ध- 5 समभिरूट- नयामिप्रा- येण नीलो- त्पलादाव- पिकर्मधार- ये दोषस- वाताएव- म्भूतनय- मतेन शा- ब्दबोधप्र- कारश्च ।।
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥६५॥
स्तदा वाक्यार्थस्याखण्डत्वादखण्डवस्तुबोधाय वाक्ये लक्षणैव स्वीकर्तव्या, यथा वेदान्तिनां ' सोऽयं देवदत्त ' इत्यादी
तत्वमसि' इत्यादौ च, सा च न शक्यसम्बन्धरूपा पदद्वयात्मकबाक्यशक्ययोः सम्बन्धानभ्युपगमात् , किन्तु तात्पर्या-
नुपपत्तिसध्रीचीनाखण्डवस्तुविषयकशाब्दबोधजनकशक्तिविशेषस्वभावा, वाक्यस्फोटाभ्युपगमे तु नत एवाभिव्यक्तान-
ण्डादखण्डवस्तुबोधो नानुपपन्न इति रहस्यम् ॥ अनेकान्ततत्त्वव्यवस्थायां सप्तनयविचारः सम्पूर्णः ॥
समर्थिता इति श्रीम-यशोविजयवाचकैः ।। श्रीमिद्वान्नानुसारेण, नयाः शब्दादयस्त्रयः ॥१॥
एते च नयाः प्रत्यक्षादिम्थलेऽऽजहवृत्यकोपयोगरूपतया मापेक्षाः प्रमाणतामास्कन्दन्ति, शब्दस्थले च साकाङ्क्षख-
ण्डवाक्यजसप्तभङ्ग्यात्मकमहावाक्यरूपाः प्रमाणं, न निरपेक्षाः, तदुक्तं मम्मतौ ॥ जे वयणिजवियप्पा, संजुजं-
तेसु होति एएसु ॥ सा मसमयपण्णवणा, तिन्थयराऽऽमायणा अण्णा ।। १-५३ ॥ ये वचनीयस्याभिधेयस्य, विकल्पास्त-
प्रतिपादका अभिधानभेदाः, संयुज्यमानयोरन्योन्यमम्बद्धयोर्भवन्नि, अनयोर्द्रव्यास्तिकपर्यायास्तिकनयवाक्ययोः, ते च
'कथचिनित्य आत्मा
'कथञ्चिदनित्य ' इत्येवमादयः । सैषा, स्वममयस्य तत्त्वार्थस्य, प्रज्ञापना निदर्शना, अन्या
निरपेक्षनयप्ररूपणा तीर्थकरस्याशातना अधिक्षेपः, तत्प्ररूपणोत्तीर्णन्वान् , ' उत्सर्गतः स्याद्वाददेशनाया एव
तीर्थकरेण विहितत्वाद' 'विभञ्जवायं च वियागरिजा' इत्याद्यागमवचनोपलम्भात् । पुरुषविशेषमपेक्ष्यापवादत-
स्त्वेकनयदेशनायामपि न दोपः, तदाह मम्मती-पुरिमजायं तु पडु-च्च जाणओ पनवेज अनयरं ।। परिकम्मणाणिमित्तं,
ठाएहि सो विसेसं पि ॥ १-५४॥ पुरुषजानं प्रतिपन्नद्रव्यपर्यायान्यतरम्वरूपं श्रोतारं, प्रतीत्य आश्रित्य, ज्ञकः स्याद्वा-
नयविचारं
समय स-
वेषां सापेक्ष
त्वे प्रमाण-
त्वमिति
स्याद्वाद-
देशनाया
एवोत्स-
गत्वं तीर्थ-
करोपदेश-
श्वेत्यादि-
निरूपणम्॥
॥६५॥
. दविद्, प्रज्ञापयेदन्यनरदज्ञातं, परिकर्मनिमित्तं, अज्ञातांशसंम्कारपाटवार्थ, ततः परिकर्मितमतये स्थापयिष्यत्यसो स्थाद्वादविशेषमपि परम्पराऽविनिर्मागरूपं, ततश्वेयमेकन यदेशनापि भावतः स्याद्वाददेशनैवेति फलितम् ।। अतः स्याद्वा- ददेशनाया एव परिणनजिनप्रवचनानामभ्यहिनवानद्वाक्यं यतमङ्ग्यात्मकमुपदश्यते--स्यादस्त्येव घटः १, स्याना- स्त्येव २, स्यादवक्तव्य एव ३, स्यादन्येव स्यानाम्न्येव ४, स्यादन्येव म्यादवक्तव्य एव ५, स्यानास्त्येव स्यादवक्त. व्य एव ६, स्यादस्त्येव म्यान्नास्त्येव म्यादवक्तव्य एव ७ चेनि । नत्रामचोपर जनसचविवक्षायां प्रथमो भङ्गः १, सन्योपसर्जनामवविवक्षायां द्वितीयः २, युगपदुभविवक्षायां तृतीयः ३। द्वयोधर्मयोः प्राधान्येन गुणभावेन वा प्रतिपादने कस्यापि वचमः सामर्थ्याभावान् , तथाहिं, न तावन्समामवचनं नन्प्रतिपादकं, समासपके बहुव्रीहेरन्यपदार्थप्रधानत्वात् , प्रकृने चोभयप्राधान्यविवक्षणात् , अव्ययीभावस्य चात्रार्थऽप्रवृत्तेः, द्वन्द्वस्य चोभयपदप्राधान्येऽपि द्रव्यवृत्तेः प्रकृतार्था- प्रनिपादकत्वाद् , गुणवृत्तेरपि द्रव्याश्रितगुणप्रतिपादकत्वात् , द्रव्यमन्तरेण गुणानां तिष्ठतीत्यादिक्रियाधारत्वासम्भवात् , तस्या द्रव्याश्रितत्वाद् , एवञ्च प्रधानभूतयोर्गुणयोरप्रतिपत्तेः, तत्पुरुषस्थाप्युत्तरपदार्थप्रधानत्वाद् , द्विगोः संख्यावा- चिपूर्वपदत्वात्, कर्मधारयस्यापि गुणाधारद्रव्यविषयत्वात् , न च समासान्तरसद्भावो, येन युगपद् गुणद्वयं प्रधानभावेन समासपदवाच्यं स्यात् , अथ द्रव्यान्वयव्यवधानेन क्रियान्वयित्वरूपप्राधान्यं प्रथमद्वितीयभङ्गयोरतिप्रसक्तं, उत्कटतात्पर्य- विषयत्वरूपप्राधान्यग्रहणे च प्रकृते द्वन्द्वकर्मधारययोरपि प्राधान्येन गुणद्वयवाचकतायां न क्षतिरिति चेत् , न, द्वन्द्वे द्विव- चनाद्धेदोपस्थिती निरवयवप्रतीतिव्याघातः, कर्मधारये च विशेष्यतयाऽभ्यर्हितत्वेन द्रव्य एवोत्कटतात्पर्यमित्याशयाद् । जिनवच- नावदात- मनसां स्या द्वाददेशन- व प्रशस्येति तद्वाक्यस्य सप्तभङ्गी- स्वरूपत्वं, सप्तभङ्गथा- श्च विवरणं तत्र तृतीय- भने शङ्का- समाधाने॥
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ सप्तभङ्गयां तृतीयभङ्ग- विचारः, द्वितीयभ. ॥६६॥ . अत एव न वाक्यमपि तथाभूतगुणद्वयप्रतिपादकं सम्भवति, तस्य वृत्यसम्भिन्नाऽर्थत्वात् , न च केवलं पदं वाक्यं वा लोकप्रसिद्धं, तस्यापि परस्परापेक्षद्रव्यादिविषयतया तथाभूतार्थप्रतिपादकत्वायोगात् , न च तो सदिति शशानचयो- रिव साङ्केतिकपदवाच्यत्वं, विकल्पप्रभवशब्दवाच्यत्वप्रसक्तेः, विकल्पानां च युगपदप्रवृत्त कदा तयोस्तद्वाच्यतासम्भवः, न च समूहालम्बनविकल्पमादाय नायं दोषः, तादृशविकल्पप्रभवपदानां बुद्धिविशेषविषयतावच्छेदकत्वोपलक्षितनानाशक्य- तावच्छेदकत्वेन परमार्थतो नानार्थस्थानीयत्वात् , तेभ्यः प्रकरणादिनियन्त्रितप्रतिनियतैकार्थबोधस्यैवैकदा सम्भवात् । न च येषां वैकल्पिकपदानां मिलितोभयबोधकम्वाभाव्यं तान्यादाय नाऽवाच्यत्वमिति वाच्यम्, सदसदुभयसाङ्केतिकपदस्य पुष्प- दन्तादिवद्वित्वविश्रान्तत्वेनैकत्वावच्छिन्ने द्वित्वावच्छिन्नान्वयम्य निराकाङ्क्षत्वादेवावाच्यत्वमिद्धेः, अत एव वस्त्वादिपदानि जैनैः सदसदुभयात्मकैकजान्यन्तरे सङ्केत्यन्ते, ननु मदमतोरिन्यवधेयम् , वस्तुन एकपदजनितप्रातिस्विकधर्मद्वयावच्छिन्न- विशेष्यताकशाब्दबोधाविषयत्वेनावक्तव्यन्वं प्रकृतेऽव्याहतं, अत एव कर्मधारयाख्यं मामासिकमेकपदमादायापि न दोप- स्तजन्यबोधे उभयनिरूपितकविशेष्यताभ्युपगमेन यथोक्तावाच्यत्वाक्षतेरिति दिक् ॥ ननु च घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्ते विधि- रूपेऽसम्बद्ध एव तत्र पटाद्यर्थान्तरप्रतिषेध इति चेत् , न, पटादेस्तत्राभावाभावे घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य घटत्वस्यैवासिद्धेः, शब्दानां चार्थज्ञापकत्वं न कारकत्वमिति तथाभूनार्थप्रकाशनं तथाभूतेनैव शब्देन विधेयमिति नासम्बद्धस्तत्र पटाद्यर्थप्र. तिषेधः, तथापि 'स्वद्रव्यादिना मन्नेव' इत्यत एव समानसंविन्संवेद्यतया परद्रव्यादिनाऽसत्वलाभसम्भवात्तबोधनाय द्विती- यभङ्गप्रयोगोऽनर्थक इति चेत् , न, समानसंविसंवेद्यताया मानमवोध एव तन्त्रत्वात् , ' शाब्दी ह्याकाक्षा शब्देनैव पूर्यते' प्रथमभङ्गे- | समवतारा- रेकापरिहा- इति न्यायात्परद्रव्यादिनाऽमत्त्वं शब्देन बोधयितुं द्वितीयभङ्गोपन्याससार्थक्यात् ॥ अथवा सर्व सर्वात्मकमिति सां. ख्यमतव्यवच्छेदार्थमर्थान्तरप्रतिषेधो विधीयते, तत्र तस्य प्रतीत्यभावात् १॥ यद्वा नामस्थापनाद्रव्यभावभिन्नेषु विधि- त्सिताविधित्सितप्रकारेण प्रथमद्वितीयौ भङ्गो, तत्प्रकाराभ्यां युगपदवाच्यः, तथाभिधेयपरिणामरहितत्वात्तस्य, यतो यद्य- ऽविधित्सितरूपेणापि घटः स्यात् प्रतिनियतनामादिभेदव्यवहाराभावप्रसक्तिः, तथा च विधित्मितस्यापि नात्मलाभ इति सर्वाभाव एव भवेत् , तथा यदि विधित्सितप्रकारेणाप्यघटः स्यात् तदा तनिबन्धनव्यवहारोच्छेदप्रसक्तिरेव, एकपक्षाभ्यु. पगमेऽपि तदितराभावे तस्याप्यभाव इत्यवाच्यः । रूपान्तरेण विधित्सा रूपान्तरावच्छिन्नमत्तां न विरुणद्धि रूपवत्वेन घट- विधिमायामपि रसवत्त्वेन तत्सत्ताया अनपायादिति चेत्, न, गुणात्मकसत्ताया गुणरूपत्वेऽपि व्यावहारिक्यास्तस्यास्तद- भिधेयपरिणामपर्यवसितत्वेन विधिन्सानुमारिन्वात् , एवमग्रेऽप्याक्षेपपरिहारौ द्रष्टव्यौ २ ।। अथवा स्वीकृतप्रतिनियतप्रकारे तत्रैव नामादिके यः संस्थानादिस्तत्स्वरूपेण घटः, इतरेण चाघट इति प्रथमद्वितीयौ । ताभ्यां युगपदभिधातुमशक्तेरवाच्या, विवक्षितसंस्थानादिनेत्र यदीतरेणापि घटः स्यात्तदैकस्य सर्वघटात्मकत्वप्रमक्तिः, अथ विवक्षितेनाप्यघटः, पटादाविव घटा- र्थिनस्तत्राप्यप्रवृत्तिप्रसक्तिः, एकान्ताभ्युपगमेऽपि तथाभूतस्य प्रमाणाविषयत्वतोऽसवादवाच्यः ३॥ यदि वा स्वीकृतप्रति- नियनसंस्थानादौ मध्यावस्था निजं रूपं, कुशलकपालादिलक्षणे पूर्वोत्तरावस्थे अर्थान्तररूपं, ताभ्यां सदसत्त्वात् प्रथमद्वि- तीयौ, युगपत्ताभ्यामभिधातुमसामर्थ्यादवाच्यलक्षणस्तृतीयो भङ्गः, तथाहि, मध्यावस्थावदितरावस्थाभ्यामपि यदि घटः स्यात्तदा तस्यानाधनन्तत्वप्रसक्तिः, अथ मध्यावस्थारूपेणाप्यघटः सर्वदा घटाभावप्रसक्तिः, एकान्तरूपत्वेप्ययमेव प्रसङ्ग इत्य- सप्तभङ्गया तृतीयमा स्य षोडश- मिर्विकल्पै- स्तत्वनिष्ट- ङ्कनं तत्र नानास्वरू- पैराद्यचतु- विकल्पोप- पादनम् ॥ १.
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
H६७॥
सत्वादेवावाच्यः ४ ॥ अथवा तस्मिन्नेव मध्यावस्थास्वरूपे वर्तमानाऽवर्तमानक्षणरूपतया सदमचान् प्रथमद्वितीयमङ्गो,
ताभ्यां युगपदभिधातुमशक्तेरवान्यलक्षणस्तृतीयः, तथा हि यदि वर्तमानक्षणवत् पूर्वोत्तरक्षणयोरपि घटः स्यात्तर्हि वर्तमान
क्षणमात्रमेवासौ स्यात् , पूर्वोत्तरयोर्वर्तमानताप्राप्नेः, न च वर्तमानक्षणमात्रमपि, पूर्वोत्तरापेक्षस्य तदभावेऽभावात् , अथा-
तीतानागतक्षणवद्वर्तमानक्षणरूपतयाप्यघटः एवं सति सर्वदा तस्याभावप्रसक्तिः, एकान्तपक्षेऽप्ययमेव दोष इत्यभावादेवा-
वाच्यः ५ ॥ यद्वा क्षणपरिणतिरूपे घटे लोचनज प्रतिपनिविषयत्वाविषयत्वाभ्यां सदसत्चात् प्रथमद्वितीयौ भङ्गो, ता.
भ्यां युगपदादिष्टोऽवाच्यः, तथाहि, लोचनजन्यप्रतिपनिविषयत्वेनेव यदीन्द्रियान्तरजप्रतिपनिविषयत्वेनापि घटस्स्यात्तर्हि,
इन्द्रियान्तरकल्पनावैयर्थ्यप्रमक्तिः, इन्द्रियमङ्करप्रमक्तिश्च । अथेन्द्रियान्तरजप्रतिपत्निविषयत्वेनेव चक्षुर्जप्रतिपत्तिविषयत्वे-
नापि न घटस्तर्हि तस्याऽरूपत्वप्रसक्तिः, एकान्तवादेऽपि नदिनराभावे तस्याप्यभावादवाच्य एव ६ ॥ अथवा लोचनजन-
तिपत्तिविषये तस्मिन्नेव घटशब्दवाच्यता निजं रूपं, कुटशब्दाभिधेयन्वमर्थान्तरभूतं रूपं, ताभ्यां सदसवात्प्रथमद्वितीयौ,
युगपत्ताभ्यामभिधातुमिष्टोऽवाच्यः, यदि घटशब्दवाच्यत्वेनेव कुटशब्दवाच्यत्वेनापि घटस्तहिं त्रिजगत एकशब्दवाच्यता-
प्रसक्तिः, घटस्य वाऽशेषपटादिशब्दवाच्यत्वप्रमक्तिरिति घटशब्दवाच्यत्वप्रतिपत्तौ ममस्तनद्वाचकशब्दप्रतिपत्तिप्रसङ्गश्च,
अर्थे वाच्यतायाः शब्दे वाचकतायाश्च ममानमंविन्संवेद्यत्वात् , तथा घटशब्देनापि यद्यवाच्यः स्याहि घटशब्दोच्चारणवै-
यर्थ्यप्रसक्तिः, एकान्ताभ्युपगमेऽपि घटस्यैवामन्चात्मङ्केतद्वारेणापि न तद्वाचकः कश्चिच्छब्द इत्यवाच्य एव ७ ॥ अथवा
घटशब्दाभिधेये तत्रैव घटे हेयोपादेयान्तरङ्गबहिरङ्गोपयोगानुपयोगरूपतया सदसवात्प्रथमद्वितीयौ, ताभ्यां युगपदादिष्टोऽ-
सप्तमङ्गयां
तृतीयभा-
तत्त्वनिर्ण-
याय कृतेषु-
षोडशवि-
कल्पेषु प-
श्वमषष्ठ-
सप्तमवि-
कल्पोप-
पादनम् ।।
.
॥६७॥
वाच्या, यदि हि हेयबहिरङ्गानर्थक्रियाकार्यऽमनिहितरूपेणाप्यर्थक्रिया क्षमादिरूपेणेव घटः स्यात्तर्हि पटादीनामपि घटत्वप्रस- क्तिः, तद्वद् यापादेयादिरूपेणाप्यघटः म्यात्तदाऽन्तरङ्गम्य वक्तृ श्रोतगनहेतुफलभूनघटाकारावबोधकविकल्पोपयोगस्याप्यभावे घटस्याप्यभावप्रसङ्ग इत्यवान्यः, एकान्ताभ्युपगमेऽयमेव प्रसङ्ग इत्यवाच्यः ८ ॥ अथवा तत्रैवोपयोगेऽभिमतार्थावबोधक- स्वानभिमतार्थानवबोधकत्वतः मदमत्त्वात्प्रथमद्विनीयो, नाभ्यां युगपदादिष्टोऽवाच्यो, विवक्षितार्थप्रतिपादकत्वेनेवेतरेणापि यदि घटः स्यात्तर्हि प्रतिनियतोपयोगाभावः, नथाऽभ्युपगमे विविक्तरूपोपयोगप्रतिपत्तिर्न भवेत् , तदुपयोगरूपेणापि यद्यघटो भवेत्तदा सर्वाभावोऽविशेषग्रसङ्गो वा, न चैवं, तथाऽप्रतीनेः, एकान्तपक्षेऽप्ययमेव प्रसङ्ग इत्यवाच्यः ९।। अथवा सत्वमर्था- न्तरभूतं साधारणत्वात्, निजं घटन्वममाधारणत्वान् , ताभ्यां प्रथमद्वितीयौ, अभेदेन ताभ्यां निर्दिष्टो घटोऽवक्तव्यो भवति, तथा हि, यदि मत्वमनूद्य घटन्वं विधीयते तदा मच्चस्य घटन्वेन व्याप्तेर्घटस्य सर्वगतत्वप्रसङ्गः, तथाऽभ्युपगमे प्रतिभासबाधा व्यवहारविलोपश्च, तथाऽसत्त्वमप्यनूय यदि घटत्वं विधीयते तदा प्रागभावादिचतुष्कस्य घटत्वेन व्याप्तेर्घटत्वप्रसङ्गः । अथ घटत्वमनूय सदसत्वे विधीयते तदा घटत्वं यत्तदेव सदसच्चे इति घटमात्रं ते प्रसज्ये यातां, तथा च पटादीनां प्रागभावादीनां चाभा- वप्रसक्तिरिति प्राक्तनन्यायेन विशेषणविशेष्यलोपात् मन् घट इत्येवमप्यवक्तव्योऽसन्घट इत्येवमप्यवक्तव्यो न चैतत्ततोऽवा- च्यः, अनेकान्तपक्षे तु कश्चिदवाच्यो, न तु सर्वथा,अभेदवादकततद्दोषस्य भेदवादेन परिहारादिति न कश्चिद्दोषः, न चाभेदैकान्ते- ऽपि घटत्वमन्य सवामन्चयोः समवायविशेषणताभ्यां विधानानायं दोष इति वाच्यं, अतिरिक्तसमवायविशेषणतयोर्मानाभा- वेन भेदैकान्तस्यैवाऽवाच्यत्वादिति दिग् १०॥ यद्वा व्यञ्जनपर्यायोऽर्थान्तरभूतस्तदतद्विषयत्वात् तस्य, घटार्थपर्यायस्त्वन्यत्रा- सप्तमङ्गया तृतीयभङ्ग- तत्त्वनिर्ण- याय कृतेषु- षोडशवि- कल्पेष्वष्ट- मनवमद- शमविक- ल्पोपपा- दनम् ॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था
प्रकरणम् ॥
वृत्तेनिजा, ताभ्यां प्रथमद्वितीयौ, अभेदेन ताभ्यां निर्देशेऽवक्तव्यो, यतोऽत्रापि यदि व्यञ्जनमनूद्य घटार्थपर्यायविधिस्तदात.
स्याशेषघटात्मकताप्रसक्तिरिति मेदनिबन्धनतद्व्यवहारविलोपः, अथार्थपर्यायमनूद्य व्यञ्जनपर्यायविधिस्तदा प्रसिद्धविशेषानु-
वादेन घटत्वसामान्यविधानात्तस्याकार्यत्वम् , एवं च घटस्याभावादवाच्यः, अनेकान्तपक्षे तु युगपदभिधातुमशक्यत्वात्कथञ्चिद-
वाच्यः११॥ यद्वा सत्वमर्थान्तरभूतं, तस्य विशेषवदेकत्वादनन्वयिरूपता, अत एव न तद्वाच्यमन्त्यविशेषवत् ,अन्त्यविशेषस्तु नि-
जा,सोप्यवाच्योऽनन्वयात् ,प्रत्येकावक्तव्याभ्यां ताभ्यामादिष्टो घटोऽवक्तव्या, अनेकान्तपक्षे तु कथञ्चिदवक्तव्या१२॥ अथवा
सन्दुतरूपाः सन्चादयो घटः सन्द्रुतं रूपं प्रतिनियतार्थक्रियाकारितावच्छेदिका ऐक्यपरिणतिरित्यत्र दर्शनेऽर्थान्तरभूताः सत्वादयो,
निजं सन्दुतरूपं, ताभ्यामादिष्टो घटोऽवक्तव्यः, यतः सन्द्रुतरूपस्य सत्वरजस्तमस्सु सत्त्वे सच्चरजस्तमसामभावप्रसक्तिस्तेषां
परस्परवैलक्षण्येनैव सच्चादित्वात् ,सन्द्रुतरूपत्वे च वैलक्षण्याभावादभाव इति विशेष्याभावादवाच्यः, असत्वे त्वसत्कार्योत्पादप्रस-
ङ्गा, न चैवमभ्युपगम्यते, अभ्युपगमेऽपि विशेषणाभावादवाच्यः, तत्काले सन्द्रुतरूपत्वान्न विशेषणाभाव इति चेत् , कालमेदेनापि
सदसद्रूपसमावेशेऽनेकान्तप्रवेशात् । प्राक् शक्त्यैव सन्द्रुतरूपमस्ति न च तथा तत्सवादिवैलक्षण्यव्याहन्तु, व्यक्त्या तुघटसामग्री
त एव तत्स्यादिति न दोष इति चेत् , न, व्यक्तेरपि सदमद्विकल्पग्रासात् । अथ नैयायिकादीनां यथा घटसच्चे भूतले सतोऽपि
घटाभावस्य, न सम्बन्धः, किन्तु तदपसारणदशायामेव तत्कालावच्छिन्नस्वरूपात्मा सः, तथा ममापि सन्दुतरूपस्य प्राक्सत्वेऽपि
तत्कालावच्छिन्नस्वरूपात्मा न सम्बन्धो, घटसामग्रीसम्पत्तौ च सम्बन्धलाभाद् व्यवहारसिद्धिरिति चेत् , न, उभयोरपि वादिनोर्य-
थोक्तसम्बन्धस्याऽनेकान्तं विनाऽवाच्यत्वादिति दिक १३॥ अथवा रूपादयो यर्थान्तरभूता असंहृतरूपत्वं सामूहिकप्रत्ययग्राचं
|सप्तभङ्गयां
तृतीयभङ्ग
तत्वनिर्ण-
याय कृतेषु-
षोडशवि-
कल्पेष्वेका-
दशद्वादश.
त्रयोदशः
विकल्पोप-
पादनम् ॥
॥६८॥
निजं, ताभ्यामादिष्टोऽवक्तव्यो, यथा ह्यरूपादिव्यावृत्तरूपादयस्ते, एवश्व रूपादीनां घटताऽवाच्याऽरूपत्वादित्वात् घटस्य, न हि परस्परविलक्षणबुद्धिग्राह्या रूपादय एकानेकात्मकप्रत्ययग्राह्याऽरूपादिरूपघटतां प्रतिपद्यन्ते, विशेष्यलोपादवाच्यः, अथाप्य- रूपा रूपादयः, नन्वेवमपि रूपादय एव न भवन्तीति तेषामभावे केऽसंहृतरूपतया विशेष्याः येनासंहृतरूपा रूपादयो घटो मवेदित्येवमप्यवाच्यः, अनेकान्तवादे च कथश्चिदवाच्यः १४ ॥ यदि वा रूपादयोऽर्थान्तरभूताः, मतुबर्थो निजः, ताभ्यामादिष्टो घटोऽवक्तव्यः, रूपाद्यात्मकैकाकारावभासप्रत्ययविषयव्यतिरेकेणापररूपसम्बन्धानवगतेर्विशेष्याभावाद्रूपा. दिमान् घट इत्यवाच्यः, न चैकाकारप्रतिभासग्राह्यव्यतिरेकेणापररूपादिप्रतिभास इति विशेषणाभावादप्यवाच्यः, अनेकान्ते तु कश्चिदवाच्यः १५ ॥ अथवा बाह्योऽर्थान्तरभूतः, उपयोगस्त निजः, ताभ्यामादिष्टोऽवक्तव्यः, तथाहि, य उपयोग स घट इति यद्युच्येत तर्दुपयोगमात्रकमेव घट इति सर्वोपयोगस्य घटत्वप्रसक्तिरिति प्रतिनियतस्वरूपाभावादवाच्यः, अथ यो घटः स उपयोग इत्युच्येत तथाप्युपयोगस्यार्थत्वप्रसक्तिरित्युपयोगाभावे घटस्याप्यभावः ततश्च कथं नाऽवाच्यः १६ ॥ तदिदमभिप्रेत्योक्तं सम्मतौ-"अत्यंतरभूएहि य, णियएहि य दोहि समयमाईहिं ।। वयणविसेसाईअं, दवमबत्तवयं पडइ ॥१-३६॥" अस्यार्थ:-अर्थान्तरभूतैर्निजकैश्च पर्यायैः क्रमेण स्यात् सन् स्यादसन्निति द्वौ भङ्गो भवत इति शेषः । द्वाभ्यां चादिभ्यां प्रागुक्ताभ्यां प्रकाराभ्यां, समकं युगपद्विवक्षितमिति शेषः, द्रव्यं वचनविशेषातीतं सत्तथाविधवचनवाच्यता- ऽनापन्नं सद् , अवक्तव्यकं पतति तृतीयभङ्गविषयतामास्कन्दतीति । अत्र च निजार्थान्तरपर्यायैरनेकान्तोपजीविनैगमव्य- वहारविशुद्धतारतम्योपदर्शकवसतिदृष्टान्तनीत्या यथाक्रमसङ्कुचद्भिः क्रमेण युगपच्चादिष्टैरुपदर्शितेषु षोडशस्त्रवक्तव्यवि- सप्तमङ्गयां तृतीयभङ्ग- तत्वनिर्ण- याय कृतेषु- षोडशवि- कल्पेषु च तुर्दशपश्च- दशषोडश- विकल्पोप- पादनं तत्र- च सम्मति- महाशाख संवादः॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
किरणम् ॥
॥६९॥
कल्पेषु मध्ये एकादशसु त्रयोऽपि भङ्गाः सम्भवन्ति, द्वादशादिषु पञ्चमु च स्वतन्त्रैकान्ते नयार्पितैस्तैः प्रत्येक समुदाये च सर्व-
थाऽवक्तव्यत्वभङ्ग एवोत्तिष्ठते, म च बाधितः सन् कथश्चिदवक्तव्यत्वे पर्यवस्यति, तस्य कथञ्चिचं च भङ्गद्वयाधीनं, इत्थं
च त्रयाणां भङ्गानां क्रमाभिधानमेव सम्प्रदायमिद्धमिति ॥ व्युत्पत्तिमहिम्ना ततोऽपि स्याद्वादविदुपो भङ्गत्रयमम्भव
इति विवेकः, इत्थं च यत्पशुपालेनोक्तं- "सर्वत्रानेकान्ताभ्युपगमे 'मर्वमस्ति म्वरूपेण, पररूपेण नास्ति च ।' इति वचन-
मेवानुपपन्नं, स्वपररूपयोरप्यनिर्धारणादिति," तदपास्तं द्रष्टव्यं, पूर्व नगविशेपेण स्वपररूपयोः मङ्कोचविकासावुपजीव्य तदनु-
सारेणैव सप्तभङ्गीप्रवृत्तेः, अवच्छिन्नमप्रतिपक्षधर्मद्वयाभिधानस्थले एकान्ततोऽवच्छेदकनिर्णयम्य तबाप्यभावात् , इदानीं गोष्ठे
गौन तु वाजिशालायामित्यादौ शुद्धगोष्ठादेरप्यवच्छेदकत्वस्य निर्णतुमशक्यत्वात् , इह कोणे गोष्ठे गौ परकोणे इति
प्रतिसन्धाने एतत्कोणावच्छिन्नगोष्ठस्यैतत्कोणस्य वा तथात्वसम्भवादवच्छेदकावच्छेदकस्याऽवच्छेदकसकोचस्य वाऽपरि-
स्फूर्ती शुद्धावच्छेदकपुरस्कारेण तत्परिम्फूतौ तु मावच्छिन्नप्रकृतावच्छेदकपुरस्कारेणेव प्रतिनियतदेशदेशावच्छेदेन वा निर्ण-
यस्त्वाश्योः समानः, देशदेशस्य नावच्छेदकत्वमिति तु नीलपीतकपालिकास्थकपालसमवेतघटनीलप्रत्यक्षान्यथानुपपत्त्या
परेण वक्तुमशक्यं, तत्र नीलकपालिकावच्छिन्नचक्षुःसंयुक्तममवायसम्बन्धावच्छिन्नाधारतयैव घटे नीलप्रत्यक्षोपपादनात्,
इयांस्तु विशेषः, यत्परेषां देशदेशस्यावच्छेदकत्वं स्वाभाविकमम्बन्धविशेषेण, अस्माकं तु वैज्ञानिकसम्बन्धविशेषेण, तत्र
परेषां परम्परासम्बन्धेन गोष्ठकोणस्य माक्षात्मम्बन्धन च कोणावच्छिन्नगोष्ठस्य गवावच्छेदकत्वमिति कोणे गौर्न तु गोष्ठे
इति सूक्ष्मेक्षिकानुपपत्तिः, अस्माकं तु मध्यमनैगमभेदकृतनैज्ञानिकसम्बन्धेन गोष्ठकोण एव तथात्वं न तु गोष्ठ इति तदुप-
नयभेदद-
र्शक वयति-
दृष्टान्तव-
द्यथाक्रम-
सङ्कुचत्सु
विकल्पेषु
भङ्गावतार
अनेकान्ते.
दोपप्रदर्श-
कपशुपा-
लीयमत-
निरसनश्च।
॥ ६९॥
सप्तसु भने- पत्तिः, न च कोणे गौर्न तु गोष्ट इति सूक्ष्मेक्षिका न भवत्येव, किन्तु न तु सम्पूर्णगोष्ठ इत्येव, सा च यावत्कोणेषु गवाव- च्छेदकतावच्छेदकत्वपर्याप्त्यभावमवगाहत इति परेषामपि नानुपपत्तिरिति वाच्यम् , एवं सति सम्पूर्णकोणेऽपि तदभावा- कोणे गोष्ठे गौरित्यस्याप्यनुपपने यविशेपकृतसम्बन्धं विना न विचित्रप्रतीत्युपपत्तिरित्यधिकं नयरहस्यादौ ॥ एते च त्रयो भङ्गा गुणप्रधानभावेन सकलधर्मान्मकैकवस्तुप्रतिपादकाः सन्तः सकलादेशाः स्यात्कारपदलाञ्छिते तद्वा- क्याद्विवक्षाकृतप्रधानभावमदायेकधर्मात्मकस्यापेक्षिता पराशेपधर्मक्रोडीकृतम्य वाक्यार्थस्य प्रतीतेः। विवक्षाविरचितद्वित्रिधर्मा- नुरक्तस्य स्यात्कारपदसंसूचितमकलधर्मम्वभावस्य धर्मिणो वाक्यार्थस्य प्रतिपादका वक्ष्यमाणास्तु चत्वारो विकलादेशा इति केचित्सङ्गिरन्ते ।। ने चेमे स्यादस्तिनास्ति च घट इति प्रथमो विकलादेशः १ । स्यादस्त्यवक्तव्यश्च घट इति द्वितीयः २ । स्यानास्ति चावक्तव्यश्च घट इति तृतीयः ३ ! स्यादस्ति च नास्ति चावकाव्यश्च घट इति चतुर्थः ४ ॥ तत्र वस्तुनो देशो यदेकः सत्त्वेऽपरश्वासत्त्वे आदिश्यते तदा प्रथमो विकलादेशः ॥ आह च --- "अह देसो सम्भावे, देसोऽसब्भावपजवे णि- यओ ॥ तं दवियमथि णत्थि य, आएसविसेसियं जम्हा ।। १-३७ ।।" अस्यार्थः-यदा देशो वस्तुनोऽवयवः, सद्भावेऽ. स्तित्वे, नियतः सन्नेवायमित्येवं निश्चितः, अपरश्च देशोऽसद्भावपर्याये नास्तित्व एव नियतोऽसन्नेवायमित्यवगतः, अवयवेभ्योऽत्रयविनः कथञ्चिदभेदादवयवधर्मंस्तस्यापि तथा व्यपदेशो, यथा ' कुण्ठो देवदत्त इति ' ततोऽवयवसवासचा. भ्यामवयव्यपि सदसन् सम्भवति, ततस्तद्रव्यमस्ति च नास्ति चेति भवति, आदेशेन उभयप्रधानावयवभागेन विशे- षितं यस्मात्॥ तथाहि, यदवयवेन विशिष्टधर्मेण आदिश्यते तदस्ति च नास्ति च भवति, तथा स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैविभक्तो वभिप्रा- यान्तरेण त्रयाणां स- कलादेशत्वं चतुर्णा वि- कलादेश- त्वं च प्रद- र्शितं तत्र .. प्रथमविक- लादेशस- मर्थनश्च ॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
विकलादे.
शत्वेनामि-
प्रेतेषु भङ्गे.
षु द्वितीय-
॥ ७० ॥
.
घटोऽस्ति परद्रव्यादिरूपेण च स एव नास्तीति । आद्ययोरपि भङ्गयोः स्वद्रव्यपरद्रव्याभ्यां विभज्यत एव घट इति
तत्समुदायात्कोऽस्य विशेष इति चेत् , न, तत्रास्तित्वनास्तित्वावच्छेदकद्वारा विभागेऽप्यवयवद्वारा विभागाभावात् , अत्र
तु तद्वारा विभागेन विशेषात् । तद्वारा विभागकरण एव किं बीजमिति चेत् १, सावयवनिरवयवात्मकवस्तुनस्तथाप्रति-
पत्तिजनकसावयवनिरवयवत्वशबलैकस्वरूपवाक्यत्वेन प्रामाण्यरक्षार्थमिति दिक ४ ॥ एकस्य देशस्य सत्वेनाऽपरस्य च
युगपदुभयथादेशे द्वितीयो विकलादेशः। आह च-"सम्भावे आइट्ठो, देसो देमो य उभयहा जस्स ॥ तं अस्थि अब
तवं, च होइ दवियं विअप्पवसा ॥१-३८॥" अस्यार्थ:-सद्भावेऽस्तित्वे, यस्य घटादेर्धर्मिणः, देशो धर्मः, आदिष्टोऽ-
वक्तव्यानुविद्धः, स्वभावे, अन्यथा तदसञ्चात्, न ह्यपरधर्माऽप्रविभक्ततामन्तरेण विवक्षितधर्मास्तित्वमस्य सम्भवति,
खरविषाणादेरिव, तस्यैवापरो देश उभयथास्तित्वनास्तित्वप्रकाराभ्यामेकदैव विवक्षितोऽस्तित्वानुविद्ध एवावक्तव्यस्त्र-
भावे, अन्यथा तदसवप्रसक्तेः, न ह्यस्तित्वाभावे उभयाविभक्तता शशशृङ्गादेरिव तस्य सम्भविनी, प्रथमतृतीयकेवलभङ्ग-
व्युदासस्तथाविवक्षावशादत्र कृतोत्र द्रष्टव्यः, तत्र प्रथमतृतीययोर्भङ्गयोः परस्पराविशेषणीभूतयोः प्रतिपाद्येनाधिगन्तुमि-
ष्टत्वात्,
प्रतिपादकेनापि तथैव विवक्षितत्वाद् , अत्र तु तद्विपर्ययादनन्तधर्मात्मकस्य धर्मिणः प्रतिपाद्यानुरोधेन तथाभूत
धर्माक्रान्तत्वेन वक्तुमिष्टत्वात्तव्यमस्ति चावक्तव्यं च भवति, तद्धर्मविकल्पवशाद्धर्मयोस्तथापरिणतयोस्तथा
व्यपदेशे धर्म्यपि तद्वारेण तथैव हि व्यपदिश्यते, अत्रेदमवधेयं परस्परविशेषणीभूतयोरस्तित्वावक्तव्यत्वयोरत्र न विवक्षा,
चैत्रो रक्तदण्डवानितिवत् स्यादस्त्यवक्तव्यश्च घट इत्यतोऽस्तित्वविशिष्टाऽवक्तव्यत्ववान् घट इत्यबोधात् , किन्तु चकार-
विकलादे.
शोपपादनं
तत्र च स-
म्मतिमहा-
शास्त्र सं-
वादः॥
॥ ७॥
बलाद् 'एकत्र द्वयम्' इति न्यायेन विदेशे दण्डी कुण्डली चेत्यत्र चैत्रे दण्डकुण्डलयोरिव प्रकृते घटेऽस्तित्वाऽवक्तव्यत्वयोः परस्पराऽविशेषणीभूतयोरेव भानात् । एकत्र द्वयमाने द्वयोः सामानाधिकरण्येन वैशिष्ट्यमप्यौत्सर्गिकं भासत इति चेत् , तर्हि सम्भूयभङ्गद्वयजनितबोधेऽपि तद्भानमावश्यकमिति कस्ततो विशेषः । वस्तुतो मिलिताभ्यां प्रथमतृतीयाभ्यामस्तित्वविशिष्टे घटेऽवक्तव्यवैशिष्ट्यज्ञानं सुकरं, द्वितीयमिलनस्यापि 'अधिकं प्रविष्टं(टे) न तु तद्धानिः' इति न्यायेनादुष्टत्वात् , प्रकृते तु 'एकत्र द्वयम्' इति न्यायेनापि न बाधो देशेऽसत्त्वस्य देशेऽवक्तव्यत्वस्य च विवक्षणादिति विपरीतो विशेषः, परस्परविशेषणीभूतयोरेक- वाक्येन बोध्यत्वप्रकारकतात्पर्यविषयतया तु विशेषो न भङ्गान्तरनिमित्तं फलाविशेषात् , अन्यथा विशेषणविशेष्यभाव कामचारस्यापि तथात्वप्रसङ्गात् , तथापि देशविशेषितपरस्परविशेषणविशेष्यभावेनात्र विशेषो द्रष्टव्यः, प्रकृतेऽस्त्यवक्तव्य. पदयोर्देशास्तित्वविशिष्टदेशावक्तव्यत्वविशिष्टयोरेव तात्पर्यानुपपच्या लक्षणास्त्रीकारात्, तयोश्च तादात्म्येन वैशिष्ट्यबा. धस्यैतद्भङ्गफलत्वात् , अयमेव परस्परानुवेधार्थोऽपि द्रष्टव्यः, चतुर्थभङ्गेऽप्युभयप्रधानावयवभागेनैव विशेषोपदेशादत्राग्रेऽपि तस्यैव विशेषस्याऽविशिष्टत्वादिति दिग् ५ । देशेऽसवस्य देशे च युगपदुभयोर्विवक्षणे षष्ठः, आह च-"आइट्ठोऽसब्भावे, देसी देसो य उभयहा जस्स ।। तं णत्थि अवत्तवं, च होइ दवियं वियप्पबसा ॥१-३९॥" अस्याः-यस्य वस्तुनो, देशो- ऽसत्त्वे आदिष्टोऽसन्नेवायमित्यवक्तव्यानुविद्धो विवक्षितोऽपरश्चासदनुविद्धः, उभयथा सदसत्वाभ्यामादिष्टस्तदा त- द्रव्यं नास्ति चावक्तव्यं च भवति विकल्पवशात्, तव्यपदेश्यावयवाभेदोपचारात् द्रव्यस्यापि तद्व्यपदेशासा- दनात् , देशानुपरक्तद्वितीयतृतीयभङ्गव्युदासेनायं षष्ठो भङ्गः प्रवर्तते ६ । देशेऽस्तित्वस्य देशे नास्तित्वस्य देशे च युग- अवशिष्टवि- कलादेश- भङ्गसमर्थ- नं तत्रास्त्य- वक्तव्यप- दयोर्लक्षण- या देशवि- शिष्टत्वार्थे तात्पर्योप- पादनम् ॥
भी बनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ महावा- क्यादेव सु- नयत्वं प्र- माण-सुन- य-दुनय- ॥ ७१॥ स्वरूपं स- पदुभयोर्विवक्षायां सप्तमः।। आह च-"सम्भावामभावे, देसो देसो य उभयहा जस्स ॥ तं अस्थि णत्थि अवत्त-वयं च द- वियं विअप्पवसा ।।१-४०॥" अस्यार्थः, यस्य देशिनो, देशोऽवयवो, देशो धर्मो वा, सद्भावे सच्चे नियतोऽपरस्त्वसद्भावेऽ- सत्त्वे, तृतीयस्तूभयथेत्येवं देशानां सदसदवक्तव्यव्यपदेशानदपि द्रव्यमस्ति च नास्ति चावक्तव्यं च भवति विक- ल्पवशात् , तथाभूतविशेषणाध्यासितस्य द्रव्यस्यानेन प्रतिपादनादपरभङ्गव्युदामः । एते च परस्पररूपापेक्षया सप्तभ- ङ्गयात्मकाः प्रत्येकं स्वार्थ प्रतिपादयन्ति नान्यथेति प्रत्येकं तत्समुदायो वा सप्तभङ्गात्मकः प्रतिपाद्यमपि तथाभृतं दर्शय- तीति सम्प्रदायविदो वदन्ति ॥ तत्र जिज्ञासितसप्तधर्मात्मकताप्रतिपादकत्वपर्याप्त्यधिकरणमहावाक्यत्वरूपसप्तभङ्गीत्वं समुदाय एव निरुक्तप्रतिपादकत्वाधिकरणवाक्यत्वरूपं च तत्प्रत्येकमपीति विवेकः, अत एव स्यात्पदलाञ्छनविवक्षितधर्मा- वधारकत्वेन स्वार्थमात्रप्रतिपादनप्रवणत्वेन च द्विधा मुनयत्वमुदाहरन्ति, आद्यं सप्तभङ्गयात्मकमहावाक्यैकवाक्यतापनवाक्ये, अन्त्यं चोदासीने धर्मान्तरोपादानप्रतिषेधाकारिणि, इत्थं च स्यादम्तीत्यादि प्रमाणम् , अस्त्येवेत्यादि दुर्नया, अस्तीत्यादिकः सुनयः, न तु स व्यवहाराङ्गं, स्यादस्त्येवेन्यादिम्तु सुनय एव व्यवहारकारणं, स्वपरानुवृत्तव्यावृत्तवस्तुविषयप्रवर्तकवाक्यस्य व्यवहारकारणत्वादिति ग्रन्थकृतो विवेचयन्ति ॥ अत्र सप्तभङ्गयामाद्यभङ्गकस्विधा, द्वितीयोऽपि त्रिधा, तृतीयो दशधा, चतुर्थोपि दशधैव, पञ्चमादयस्तु त्रिंशदधिकशतपरिमाणाः प्रत्येकं श्रीमन्मल्लवादिप्रभृतिभिर्दर्शिताः ।। पुनश्च षट्रिशदधिकचतुर्दशशतपरिमाणास्त एव च न्यादिसंयोगकल्पनया कोटिशो भवन्तीत्यभिहितं तैरेवेति तद्विस्त. रस्तद्धन्धादेवावसेयः ॥ अथानन्तधर्मात्मके वस्तुनि तत्प्रतिपादकवचनस्य सप्तधा कल्पनेऽष्टमनवमविकल्पयोः कल्पनमपि ससुभङ्गेष्व- वान्तरमेदैः कोटिशोवि- भागप्रद- निश्च ।। 1॥ ७१ ।।
सप्तसु भङ्गे- वेव सर्व . किंन क्रियत इति चेत् ?, न, तत्परिकल्पननिमित्ताभावात् , तथाहि, न तावत्सावयवात्मकमन्योन्यनिमित्तकं तत्परिकल्पयितुं युक्त, चतुर्थादिवचनविकल्पेषु तस्यान्तर्भावप्रमक्तेः, नापि निरवयवात्मकमन्योन्यनिमित्तकं तत्परिकल्पनामर्हति, प्रथमादि- ध्वन्तर्भावप्रसक्तेः, न च गत्यन्तरमस्तीति नाष्टमभङ्गकल्पना युक्ता । किं चासौ क्रमेण वा तद्धर्मद्वयं प्रतिपादयेद्योगप- येन वा, प्रथमपक्षे गुणप्रधानभावेन तत्प्रतिपादने प्रथमद्वितीययोरन्तर्भावः, प्रधानभावेन तत्प्रतिपादने चतुर्थे, योगपद्येन तत्प्रतिपादने तृतीये, भङ्गकसंयोगेन भङ्गान्तरकल्पनायां प्रथमद्वितीयसंयोगे चतुर्थ एव प्रसज्यते, प्रथमतृतीयसंयोगात्पश्चमः, द्वितीयतृतीयसंयोगात्षष्ठः, प्रथमद्वितीयतृतीयसंयोगात्सप्तमः, प्रथमचतुर्थादिसंयोगकल्पना तु पौनरुक्त्यभयादनुत्थानोप- हता । न च देशिदेशभेदेन धर्मिभेदादपौनरुक्त्यं, प्रथमचतुर्थसमाजादेतादृशप्रतीतिसिद्धौ तत्संयोगस्य निराकाक्षत्वात् , तस्मान्न कथञ्चिदष्टमभङ्गसम्भव इति नाधिक्य, न चावक्तव्यत्वसप्तभङ्ग्यां तृतीयभङ्गस्य प्रथमभङ्गाद्वक्तव्यत्वसप्तमङ्ग्यां च द्वितीयभङ्गादविशेषान्न्यूनत्वमपि शङ्कनीयं, तत्रांशांशग्राहकधर्मणावक्तव्यत्ववक्तव्यत्वयोरेव प्रथमद्वितीयभङ्गार्थत्वा- दंशावक्तव्यत्ववक्तव्यत्त्वतद्विपर्ययाभ्यामवक्तव्यस्यैव तृतीयभङ्गार्थत्वादिति दिग् । इत्थमुक्तन्यायेन वस्तुप्रतिपादने सप्त. विध एव वचनमार्ग इति स्थितम् । अत्रैवं नयविभागमुपदिशन्ति श्रीसिद्धसेनदिवाकरपादाः-"एवं सत्तवियप्पो, वयण- पहो होइ अत्थपज्जाए ॥ वंजणपज्जाए पुण, सवियप्पो णिवियप्पो य ॥१-४१॥" अस्यार्थः, एवमनन्तरोक्तप्रकारेण, सप्तवि- कल्पः सप्तमेदः, वचनपथो भवत्यर्थपर्यायेऽर्थनये सहव्यवहारर्जुसूत्रलक्षणे, सप्ताप्यनन्तरोक्ता भङ्गका भवन्ति ॥ तत्र प्रथमो भङ्गः सबहे सामान्यग्राहिणि, नास्तीत्ययं तु व्यवहारे विशेषग्राहिणि, ऋजुसूत्रे तृतीयः, चतुर्थः सङ्ग्रहव्यवहारयोः, विकल्पानां समवतारा- बाधिकक- ल्पनमित्यु- पपादितं, भङ्गानां न- यसमवता- रश्चसम्मति- संवादेन दर्शितः॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
भङ्गानां न-
यसमवता-
रोपपादनं
अर्थव्यञ्ज-
नपर्याय
देन वचन-
॥७२॥
पञ्चमः सङ्ग्रहर्जुसूत्रयोः, षष्ठो व्यवहारर्जुसूत्रयोः, सप्तमः सङ्ग्रहव्यवहारर्जुसूत्रेष्विति विभागः। अत्र यद्धर्मप्रकारकः सङ्ग्र-
हाख्यो बोधः प्रथमभङ्गफलत्वेनाभिमतस्तद्धर्माभावप्रकारको व्यवहाराख्यबोध एव द्वितीयभङ्गफलत्वेनैष्टव्यः, तेन स्याद्धटः
स्यानीलघट इत्यादिसामान्यविशेषसङ्ग्रहव्यवहागभ्यां न सप्तभङ्गीप्रवृत्तिरित्यवधेयम् ।। अथ तृतीयभङ्गस्य ऋजुमूत्रनिमित्तता-
यां किं बीजं युगपत्सच्चासत्वाभ्यामादिष्टं हि सङ्ग्रहव्यवहारावयवक्तव्यमेव ब्रूतः, सङ्ग्रहव्यवहारौ युगपदुभयथाऽऽदि-
शत एव, नेति चेत्, ऋजुसूत्रोऽपि कथं तथाऽऽदिष्टुं प्रगल्भतां, मध्यमक्षणरूपायाः सत्तायास्तेनाप्यभ्युपगमात् । सङ्ग्रहामि-
मतयावत्सजातीयविशेषानुवृत्तसामान्यानभ्युपगमादृजुसूत्रेणावक्तव्यत्वभङ्ग उत्थाप्यत इति चेत् , सोऽयं प्रत्येकावक्तव्यत्व-
कृतोऽवक्तव्यत्वमङ्गः, तदुत्थापने च सङ्ग्रहोपि समर्थः, ऋजुमूत्राभिमतमध्यमक्षणरूपमत्तानभ्युपगन्त्रा तेनापि तदुत्थाप-
नस्य सुकरत्वादितिचेत् , अत्रेदमाभाति-सङ्ग्रहव्यवहारौ युगपन्नोभयथादेष्टुं प्रगल्भेते, स्वानभिमतांशादेशेऽनिष्टसाधन-
त्वप्रतिसन्धानात् , ऋजुसूत्रस्य तु वर्तमानपर्यायमात्रग्राहिणस्तिर्यगूर्खतास्पदाधारांशान्यतररूपमामान्यान्यापोहरूपविशेषौ
च सांवृतावेवेति तदपेक्षया युगपदुभयथाऽऽहार्यतदादेशसम्भवादवक्तव्यभङ्गोत्थानमनाबाधम् , न चैवमपि तजनितबो-
धस्य प्रसङ्गरूपत्वाद्विपर्ययपर्यवसाने समहव्यवहारान्यतरसाम्राज्यमिति वाच्यं, विषयाबाधे कूटलिङ्गजानुमितेरिव प्रकृत-
भङ्गजबोधस्य प्रमात्वेन विपर्ययपर्यवसानकदर्थनानवकाशाद् ।। अधिकं बहुश्रुता विदन्ति । व्यञ्जनपर्याये शब्दनये पुनः
सविकल्पः प्रथमे पर्यायशब्दवाच्यताविकल्पसद्भावेऽप्यर्थम्यैकत्वात् , द्वितीयतृतीययोनिर्विकल्पकच, द्रव्यार्थात्सामा-
न्यलक्षणानिर्गतस्य पर्यायरूपस्य विकल्पस्याभिधायकत्वात्तयोः, समभिरूढस्य पर्याय मेदभिन्नार्थत्वात् , एवम्भूतस्यापि
मार्गस्य स-
प्सविधत्वं
विकल्पक-
त्वनिर्विक-
ल्पकत्वेच॥
॥ ७२ ॥
विवक्षितक्रियाकालार्थत्वात् , तथा च घटो नाम घटवाचकयावच्छन्दवाच्यः शब्दनयेऽस्त्येव, समभिरूढवम्भूतयोर्नास्त्येवेति द्वौ भङ्गो लभ्येते, लिङ्गसंज्ञाक्रियामेदेन भिन्नस्यैकशब्दावाच्यत्वाच्छन्दादिषु तृतीयः, प्रथमद्वितीयसंयोगे चतुर्थः, तेष्वेव चान- भिधेयसंयोगे पञ्चमषष्ठसप्तमा वचनमार्गा भवन्ति ॥ अथवाऽन्यथास्याः व्याख्यातात्पर्य, अर्थनय एव सप्त भङ्गाः ॥ शब्दादिषु तु त्रिषु नयेषु प्रथमद्वितीयावेव भङ्गौ ॥ यो ह्यर्थमाश्रित्य वक्तृम्थः सङ्ग्रहव्यवहारर्जुसूत्राख्या प्रत्ययः प्रादुर्भवति सोऽर्थनयः," अर्थवशेन तदुत्पत्तेरथं प्रधानतयाऽसौ व्यवस्थापयतीति कृत्वा, शब्दं तु स्वप्रभवमुपसर्जनतया व्यवस्थापयति, तत्प्रयोगस्य परार्थत्वात् । “यस्तु श्रोतरि शब्दश्रवणादुद्गच्छति शब्दसमभिरूदैवम्भूताख्यः प्रत्ययस्तस्य शब्दः प्रधानं तद्वशेन तदुत्पत्तेः, अर्थस्तूपसर्जनं तदुत्पत्तावनिमित्तत्वात्म शब्दनय" उच्यते, तत्र वचनमार्गः सविकल्पकनिर्विकल्पतया द्विविधा, मविक- ल्पं सामान्यं, निर्विकल्पः पर्यायः, तदभिधानाद्वचनमपि तथा व्यपदिश्यते, तत्र शब्दसमभिरूढौ संज्ञाक्रियामेदेऽप्यभिन्नमर्थ प्रतिपादयत इति तदभिप्रायेण सविकल्पो वचनमार्गःप्रथमभङ्गकरूपः, एवम्भूतस्तु क्रियाभेदाद्भिनमेवार्थ तत्क्षणे प्रतिपादय- तीति निर्विकल्पो द्वितीयभङ्गरूपस्तद्वचनमार्गः, अवक्तव्यभङ्गस्तु व्यञ्जननये न सम्भवत्येव, यतः 'श्रोत्रभिप्रायो व्यञ्जननयः', स च शब्दश्रवणादर्थ प्रतिपद्यते, न शब्दाश्रवणात्, अवक्तव्यं तु शब्दाभावविषय इति नावक्तव्यभङ्गको व्यञ्जनपर्याये सम्भ- वतीत्यभिप्रायवता व्यञ्जनपर्याये तु सविकल्पकनिर्विकल्पौ प्रथमद्वितीयावेव भङ्गाव भिहितावाचार्येणेति टीकाकृतो व्या- चक्षते । अत्र वक्तरि यत्सप्तभङ्गयर्थज्ञानं तन्मानसोत्प्रेक्षोपनीतपदार्थसंसर्गभानरूपं, श्रोतरि तु शाब्दमेव तत् सम्भवति, अवक्तव्यं तु न शब्दविषयः किन्तु शब्दामावविषय इति यद्व्यञ्जननयतात्पर्यमुनीतं तत्कथं सङ्गच्छते ?, शब्दाभावस्या- शब्दादिषु- नयेषु सप्त- मङ्गयाम- ङ्गविभजन, अर्थनय- शब्दनय- लक्षणं, त- योर्भङ्गवि- चारणाचा १३
श्री
बनेकान्त-
ब्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
प्रमाणत्वेन कस्याप्यर्थस्य तदविषयत्वात् , कथञ्चिन्मते शब्दानुपलब्धेः शब्दाभावविषयप्रमाणत्वेऽपि तां विना तद्विषयं विल-
क्षणं ज्ञानं माजनि, अवक्तव्यपदाद्वक्तव्यत्वाभावविषयशाब्दबोधोत्पत्तौ किं बाधकं, न हि भावविषयक एव शाब्दबोधो
भवति, न त्वभावविषयक इत्यत्र प्रमाणमस्ति, पदज्ञानादिकार्यतावच्छेदककोटी भावशाब्दत्वप्रवेशे गौरवात् , घटो नास्ती-
त्यादेर्घटाभावादिबोधस्य सार्वजनीनत्वाच्च । तत्रापि नञ उपसर्गवद्द्योतकतया तात्पर्यग्राहकत्वमात्रमेव घटपदस्य घटप्र-
तियोगिके लक्षणाधौव्येऽभावान्तर्भावेनैव तस्यायुक्तत्वादिति चेत् , न, न नघट इत्यत्रैकस्माद् घटपदाद् घटत्वघटाभावा-
भावत्वाभ्यामेकदा शक्तिलक्षणाभ्यां बोधासम्भवेन नञः पृथक्शक्तिकल्पनावश्यकत्वाद्, द्योतकन्वपक्षेऽपि घटो नास्ती-
त्यादिवाक्यरीत्यैव स्यादवक्तव्यो घट इत्यतोऽवक्तव्यत्वबोधाप्रतिरोधाच्च, तस्मानायं प्राञ्जलः पन्थाः, किं तु कश्चिद-
वक्तव्यत्वमिह 'एकपदजन्यप्रातिस्विकधर्मद्वयावच्छिन्नविषयकशाब्दबोधाविषयत्वम् , तद्वोधनं त्वर्थनये मानसोत्प्रेक्षोपस्थित-
खण्डशःप्रसिद्धपदार्थासंसर्गाग्रहमात्रात्कथश्चित्संसर्गग्रहाद्वा सम्भवति, व्यञ्जननये तु तन्न सम्भवति "असतो णत्थि णिसेहो"
इत्यादि भाष्यकृद्वचनादुक्तविशिष्ट प्रतियोगिनोऽसिद्ध्या तदभावस्याप्यसिद्धत्वात्पदार्थमर्यादया वाक्यार्थमर्यादया वा
बोधयितुमशक्यत्वात् । न च स्यात्पदसमभिव्याहृतावक्तव्यपदान्प्रकृते खण्डशःशक्या बोधः सम्भवति, एकपदार्थयोः पर-
स्परमन्वयबोधस्याव्युत्पन्नत्वात् , अन्यथा हरिपदादुपस्थितयोः सिंहकृष्णयोगधाराधेयभावसम्बन्धेनान्वयबोधप्रसङ्गादितिसूक्ष्मे-
क्षिकामनुसरता व्यञ्जननयेन प्रकृते नव्यत्यासादेकपदाजनिनप्रातिस्विकधर्मद्वयावच्छिन्नविषयकशाब्दबोधविषयत्वं स्यादव-
क्तव्यत्वं वाच्यं,तच्च भङ्गद्वयार्थमादाय पर्यवस्यतीति व्यञ्जननये द्वावेव भङ्गाविति व्याख्यातृतात्पर्य सुष्टु घटामटाव्यते। देश-
व्यञ्जनन-
यार्थनय-
तत्वनिरूप-
णपूर्व तत्र
मङ्गप्ररूप-
णा सप्तम-
अयुपसंहा-
रश्च ॥
॥ ७३ ॥
कृतश्चतुर्भङ्ग(ताश्चत्वारो भङ्गा)स्तु व्यञ्जननयेन शुद्धेन देश्यतिरिक्नदेशाभावादेव नोद्भावनाह(ही)इति विभावनीयं सुधीभिः॥ इति बुधहितहेतोर्दर्शिताः सप्त भङ्गा, जिनवचनसमुद्रोत्तुङ्गगगातरङ्गाः ॥ दलितकुनयवादं निर्विशेष मया श्री-नयविजयगुरूणां प्राप्य पूर्णप्रसादम् ॥१॥ तदेवं सप्तभङ्गीमङ्गीकुर्वाणमनेकान्नात्मकमेव वस्तु नयप्रमाणात्मकचैतन्यगोचरः, सदृशासदृशपर्यायाभ्यामेकान्तसदस- द्विलक्षणस्य जात्यन्तरात्मकस्यैव घटादेग्नुभूयमानन्वान् , येऽपि सदृशपर्यायास्तेऽपि सट्रव्यपृथिव्यादिवचनप्रतिपाद्या व्यञ्ज- नपर्यायाः, न तु ऋजुसूत्राभिमता अर्थपर्यायाः, अन्योन्यव्यावृत्तवस्तुस्वलक्षणग्राहकत्वात्तस्य । न च सामान्यमात्रस्य न शब्दवाच्यत्वं, शब्दादप्रवृत्तिप्रसक्तेः, सामान्यस्यार्थक्रियाऽक्षमत्वात् , सामान्यप्रतिपादनद्वारा लक्षणयाऽनुमानतो वाऽर्थक्रि- याक्षमस्य विशेषस्य प्रतिपत्तेश्च क्रमप्रतिपत्तेरसंवेदनेन वक्तुमशक्यत्वात् , नापि विशेषाणां शब्दवाच्यत्वमानन्त्यात्सङ्केता- सम्भवात् , किन्तुभयात्मकं वस्तु गुणप्रधानभावेन शब्दवाच्यं, तच्चार्थपर्यायरूपमेवेति कुतस्तद्विलक्षणव्यञ्जनपर्यायसिद्धिर्यद- पेक्षया सत्वमुच्यतेति शङ्कनीयम् , केचिदेवार्थधर्मेषु शब्दवाच्यतापरिणत्यभ्युपगमादाख्यातुमशक्यत्वेऽपि प्रत्याख्यातुम- शक्यानां माधुर्यविशेषादीनां बहूनामर्थधर्माणामनुमवसिद्धत्वात् , अत एव "प्रज्ञापनीया भावा अप्रज्ञापनीयानामनन्तभाग एव" इति सिद्धान्तव्यवस्था,तेनार्थपर्यायवैलक्षण्यं व्यञ्जनपर्यायेषु नाप्रामाणिकम् , अवश्यं चैतदभ्युपगन्तव्यम् , अन्यथाऽदृष्टदश- रथादीनामिदानीन्तनानां तदीयार्थपर्यायापरिज्ञानादशरथाविपदाच्छाब्दबोधो न स्यादित्यधिकमनेकान्तवादप्रवेशे ॥ ततः सदृशव्यञ्जनपर्यायैरेव सर्वमस्ति न त्वन्यरित्ययमनेकान्त एवं व्यवस्थितः, तदिदमुक्तं"परपजवेहिं विसरि-सगमेहि अनेकान्ता- त्मकवस्तु- न एव नय- प्रमाणविष- यत्वं, व्य- अनपर्या- यार्थपर्या- यविषय- मेदेन यो मेंदनिष्टङ्क- . नम् ॥
वर्तमानप- येणव- श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ स्तुनः सत्त्वे ॥ ७४॥ णियमेण णिच्चमवि णत्थि ॥ सरिसेहि विवंजणओ, अस्थि, ण पुण अत्थपजाए ।।३-५॥" विसदृशगमैर्विजातीयज्ञानग्राडैः। नन्वेवमपि प्रत्युत्पत्रपर्यायेणास्तित्वनियमेऽप्येकान्तवादापत्तिरिति चेत्, अत्राहु:--"पच्चुप्पण्णंमि वि प-जयंमि भयणा- गई पडइ दवं ॥ जं एगगुणाईया, अणतकप्पा गम(गुण)विसेसा ॥३-६॥" प्रत्युत्पन्नेऽपि वर्तमानेऽपि, पर्याये, स्वपररूप- तया सदसदात्मिकां मध्यो दिरूपेण च भेदाभेदात्मिका भजनागतिं विकल्पपद्धति, पतत्यासादयति, द्रव्यं, यय- स्मात्कारणाद्, एकगुणकृष्णत्वादयोऽनन्तकल्पा अनन्तप्रकारास्तत्र गुणविशेषाः, तेषां च मध्ये केनचिदेव गुणविशे- षेण युक्तं तत् , तथाहि, कृष्णं द्रव्यं तद्रव्यान्तरेण तुल्यमधिकमूनं वा भवेत् , प्रकारान्तराभावात् , प्रथमपक्षे सर्वथातुल्य- त्वे तदेकत्वापत्तिः, तथा च नीलनीलतरादिप्रतीतिबाधः, उत्तरपक्षयोः सख्येयादिभागगुणवृद्धिहानिभ्यां षट्स्थानकप्रतिप- त्तिरवश्यम्भाविनीति प्रत्युत्पन्नपर्यायेणापि भजनाऽबाधितैव ।। स्यादेतत्, पुद्गलद्रव्यस्य तादृग्भूताऽपरपुद्गलद्रव्यापेक्षयाऽनेकान्त- रूपता युक्ता, प्रत्युत्पन्ने चात्मद्रव्यपर्याये कथमनेकान्तरूपता युक्ता, मैवं, आत्मपर्यायस्यापि ज्ञानादेस्तत्तद्ग्राह्यार्थापेक्ष- याऽनेकान्तरूपतायाः पुद्गलवदविरोधात् ,अनेनैव हि न्यायेन सिद्धेष्वपि त्रैलक्षण्यं व्यवतिष्ठते,तथा द्रव्यकषायादिभेदादप्या- त्मनः पुद्गलवदनेकान्तरूपता सिद्धान्तसिदैव ॥ तथा च वाचकमुख्यः (प्रशमरति)"द्रव्यं कषाययोगा-वुपयोगो ज्ञानदर्शने चैव ॥ चारित्रं वीर्य चेत्य-ष्टविधा मार्गणा तस्य ॥१९९।। जीवाजीवानां द्र-व्यात्मा सकषायिणां कषायात्मा ॥ योगः सयो. गिनां पुन-रुपयोगः सर्वजीवानाम् ॥२००॥ ज्ञानं सम्यग्दृष्टे-दर्शनमथ भवति सर्वजीवानाम् ॥ चारित्रं विरताना, तु सर्वमंसा- रिणां वीर्यम् ॥२०१॥ द्रव्यात्मेत्युपचारः, सर्वद्रव्येषु नयविशेषेण ॥ आत्मादेशादात्मा, भवत्यनात्मा परादेशात् ॥२०२॥ एवं परोक्ताप- त्तिपरिहार सिद्धेष्वने- कान्तत्व- मात्मनोऽ. टधानिरूप- नानेका- न्तत्वप्रद- निंच॥
संयोगाल्पब-हुत्वाधैर्नेकशः स परिमृग्यः ॥ जीवस्यैतत्सर्व, स्वतचमिह लक्षणैर्दृष्टम्॥२०३॥"इति ॥ प्रकारान्तरेणाप्यात्मनो. ऽनेकान्तरूपतामुपपादयति सम्मतिकार:-"कोवं उप्पायन्तो, पुरिसो जीवस्म कारओ होइ ।। तत्तो विभइयो, परंमि सयमेव भइयत्रो ॥३-७॥" कोपं कोपपरिणतिम् , उत्पादयन् पुरुषः, जीवस्य परभवप्रादुर्भावपरिणतिविशिष्टस्य, कारको निर्वर्तको भवति, तन्निमित्तिकर्मण उपादानात् , कोपपरिणाममापद्यमानश्च पुरुषः, ततः परभवजीवाद् ,विभजनीयो भिन्नो व्यवस्थाप- नीयः, कार्यकारणयोर्मुत्पिण्डघटवत्कथञ्चिन्नेदात् , अन्यथा कार्यकारणभावाभावप्रसङ्गात् । 'वीतरागजन्मादर्शन' न्यायेनैक- त्वेन सिद्धस्य जीवस्य कथं भवभेदेन भेद इति चेत् १, मृद्रव्यतयैकत्वेन सिद्धस्य मृत्पिण्डघटभावाभ्यामपि कथं भेदो, न हि मृत्पिण्डघटभावाभ्यां मृद इव देवमनुजभावाभ्यां जीवस्य लक्षण्यमप्रामाणिकमिति विभावनीयम् । न चासौ ततो भिन्न एव, यतः, परस्मिन्भवे, स्वयमेव पुरुषो, भजनीय आत्मरूपतयाऽभेदेन व्यवस्थापनीयो, घटायाकारपरिणतमृद्मव्यवदि- त्यनेकान्तः ।। यद्वा कोपपरिणतिमन्यस्मिन् जीवे उत्पादयन् पुरुषः कारको भवति, ततोऽसौ कोपकारकत्वेन विभजनीयः कोपपरिणतियोग्ये जीवे कारकोऽन्यत्राकारक इति ॥ अथ द्रव्यगुणानां भेदाभेदानेकान्तममृष्यमाणानां मतमुत्थापयति- रूवरसगंधफासा, असमाणग्गहणलक्खणा जम्हा ॥ तम्हा दवाणुगया, गुणत्ति ते केइ इच्छंति ।। ३-८॥" रूपरसगन्ध- स्पर्शा असमानग्रहणलक्षणा यस्मात्ततो द्रव्याश्रिता गुणास्तद्भिन्ना एवेति, केचन वैशेषिकाचाः स्वयूथ्या वा सिद्धान्ताऽनभिज्ञा अभ्युपगच्छन्ति । तथा हि गुणा द्रव्याद्भिन्ना भिन्नप्रमाणग्राह्यत्वाद्भिन्नलक्षणत्वाच्च, स्तम्भात्कुम्भवत् । न चासिद्धौ हेतू, द्रव्यस्य 'यमहमद्राक्षं तमेव स्पृशामि'इत्यनुसन्धानाध्य(व्य)क्षग्राह्यत्वाद् ,रूपादीनां च प्रतिनियतेन्द्रियप्रभवप्र- सम्मतिपा- ठेनात्मनो- ऽनेकान्त- त्वस्य प्रका- रान्तरेणोप- पादनं, द्र- व्यगुणानां- भेदाभेदाऽ- सहमानानां कणादादी- नां मतख- ण्डनोपक्र- मश्च ॥ -
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
अकरणम् ॥
॥७५॥
त्ययावसेयत्वाद्, 'दार्शनं स्पार्शनं च द्रव्यम्' इत्याद्यभिधानादसमानग्रहणता द्रव्यगुणयोः सिद्धा । तथा विभिन्नलक्षणत्वमपि
"क्रियावद्गुणवत्समवायिकारणं वा द्रव्यम्," "द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा" इत्यादिवचनात्सिद्धम् । एतन्मतं परिजिहीर्घ-
राह-"दूरे ता अण्णत्तं, गुणसद्दे चेव ताव पारिच्छं । किं पन्जवाहिए होन्ज, पजवे वा वि गुणसण्णा !!३-९॥" दूरे तावद् गुण-
गुणिनोरेकान्तेनान्यत्वं, अमम्भावनीयमिति यावत् , गुणात्मकद्रव्यप्रत्ययबाधितन्वादेकान्तेन गुणगुणिभेदस्य । न च समवा-
यनिमित्तोऽयममेदप्रत्ययः, तत्र प्रमाणाभावात् , न चैकत्वप्रत्ययस्य प्रागुक्तानुमानबाधा, एकत्वप्रत्ययाध्यक्षबाधितकर्मनि-
देशानन्तरं प्रयुक्तत्वेनैकशाखाप्रभवत्वानुमानस्येव तस्य कालात्ययापदिष्टत्वात् , ततो गुणगुणिनोरेकान्तान्यत्वस्यासम्भवाद्,
गुणशब्द एवं तावत्पारीक्ष्यमस्ति, किं पर्यायादधिके गुणसंज्ञा गुणशब्दः प्रवर्तते किं वा पर्याय एव भवेत् ,
पर्यायानन्यत्वे कथञ्चिद्रव्यात्मकत्वमेवेत्यभिप्रायः । यदि च पर्यायादन्यो गुणः स्यात्तदा पर्यायार्थिकवद् गुणार्थोऽपि नयः
स्यादित्यनिष्टापत्तिमाह -"दो उ णया भगवया, दवट्ठियपञ्जवट्टिया नियया ॥ एत्तो य गुणविसेसे, गुणट्टियणओ वि जु-
जंतो ॥३-१०॥" द्वावेव मूलनयो, भगवता द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिको नियमितावितः पर्यायादधिके, गुणविशेषे
ग्राह्ये सति,तद्राहको गुणास्तिकनयोऽपि नियमि(मयितुं,युज्यमानकः स्याद् ,अन्यथाऽव्यापकत्वं नयानां भवेत्।।न च भगव-
ताऽसावुक्त इत्याह-"जं च पुण अरहया, नेसु तेसु सुत्तेसु गोयमाईणं । पञवसण्णा णियया, वागरिया तेण पजाया॥३-११॥
यत् पुनर्भगवता तस्मिँस्तस्मिन्सूत्रे 'वण्णपजवेहिं' इत्यादिना, पर्यायसंज्ञा नियमिता वर्णादिषु, गौतमादिभ्यो
व्याकृता, ततः पर्याया एव वर्णादयो न गुणा इत्यभिप्रायः ॥ अथ तत्र गुण एव पर्यायशब्देनोक्तः किं न स्यादित्या.
द्रव्यगुणा-
नामेकान्त-
भेदस्थाप-
कपरोक्तहे-
त्वोःखण्डनं
प्रसङ्गतस्त-
त्र तृतीय-
गुणार्थिक-
नयापत्ति-
प्रदर्शनच॥
॥ ७५ ॥
विस्तरतो- गुणपर्याय तत्वनिरूप- णेन तुल्या- दिशङ्कायामाह " परिगमणं पजाओ, अणेगकरणं गुणत्ति तुल्लत्था ॥ तहवि ण गुणत्ति भण्णह, पजवणयदेसणा जम्हा ॥३-१२॥ परि समन्तात्सहभाविभिः क्रममाविभिश्च मेदैर्वस्तुनः परिणतस्य गमनं परिच्छेदो यः स पर्यायो, विषयविषयि- णोरमेदादनेकरूपतया वस्तुनः करणं 'करोतेर्ज्ञानार्थत्वात् ज्ञान, विषयविषयिणोरमेदादेव गुणो 'गुण्यते पृथक्रियतेऽनेन' इति धात्वर्थानुसाराद्, इति व्युत्पत्तिनिमित्तमपेक्ष्य, तुल्यौ(ल्यार्थों) गुणपर्यायशब्दौ, तथापि गुणा इति पर्याया न भण्यन्ते, पर्यायविशेषवाचकस्य गुणशब्दस्य पर्यायसामान्योक्नावप्रवृत्तेः, न च गुणशब्दस्य पर्यायसामान्य एव शक्तिः कल्पनीया, यस्मात् पर्यायनयद्वारेणैव भगवता देशना कृता, न तु गुणार्थिकनयद्वारा, अतो व्युत्पत्तिनिमित्ततौल्येऽपि गुणपर्यायश- ब्दयोः सामान्यविशेषभावापन्नप्रनिनिमित्तभेदान्न पर्यायत्वमिति । ननु पर्यायशब्दः क्रमभाविधर्मवाचक एव, गुणशब्दश्च सहभाविधर्मवाचक एव, तथा च गुणाः पर्यायेभ्योऽतिरिच्यन्ते पर्यायातिरिक्तगुणाभिधानान्यथानुपपरया च गुणार्थिकनयोऽपि भगवताऽर्थादुपदिष्ट एवेत्याशङ्कते " जपंति अत्थि समए, एगगुणो दसगुणो अणंतगुणो । रूबाइयपरिणामो, भण्णइ तम्हा गुणविसेसो॥३-१३॥"जल्पन्ति द्रव्यगुणान्यत्ववादिनो, अस्ति विद्यत एव, सिद्धान्ते एगगुणकालए दुगुणकालए'इत्यादिः रूपादौ व्यपदेशः, तस्माद्पादिपरिणामो गुणविशेष एवेत्यस्ति गुणार्थिकोऽपि नय उपदिष्टश्च भगवतेति । अत्राह सिद्धान्तवादी-"गुणसद्दमन्तरेणा-वि तं तु पजवविसेमसंखाणं ॥ सिज्झइ णवरं संखा-णसत्थधम्मो न उ गुणो ति॥३- १४॥" तत्तु प्रागुक्तं वचनं,गुणशब्दमन्तरेणापि रूपाद्यभिधायकगुणशब्द विनापि, पर्यायविशेषसंख्यानं पर्यायविशेष- संख्यावाचकं, सिध्यति, न त्वतिरिक्तगुणगुणार्थिकनयप्रतिपादनपरं, तत्र गुणशब्दस्यैतावताऽधिको न्यूनो वा भाव इति र्थत्वस्थाप- नं तत्र च परोक्तसि- द्धान्तपाठ- विरोधप- रिहारश्च ॥
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥७६ ॥
गणितशास्त्रधर्मवचनत्वादिति भावः ॥ दृष्टान्तद्वारेणामुमर्थ दृढीकर्तुमाह-“जह दससु दसगुणमि य, एगंमि दसत्तर्ण समं
चेव ।। अहियंमि वि गुणसद्दे, तहेव एवं पि दट्ठवं ॥३-१५॥" यथा दशसु द्रव्येषु, एकस्मिन् वा द्रव्ये दशगुणिते गुणश.
ब्दातिरेकेऽपि, दशत्वं सममेव तथैवैतदपि न भिद्यते परमाणुरेकगुणकृष्णादिरित्येकादिशब्दाधिकगुणशब्देनापि तदधिका-
प्रतिपादनादिति द्रष्टव्यम् । न चैवं गुणानां पर्यायानतिरेके वाचकचक्रवर्तिसूत्रं " गुणपर्यायवद्रव्यं" इति विरुध्यते,
युगपदयुगपदाविपर्यायविशेषप्रतिपादनार्थत्वात्तस्य, सहभाविधर्मवाचकगुणशब्दसमभिव्याहृतस्य पर्यायशब्दस्य धर्ममात्रत्राच-
कस्यापि 'गोबलीवर्द'न्यायेन तदतिरिक्तधर्मप्रतिपादकत्वे दोषाभावात् , न हि काल्पनिको गुणपर्याययोमेंदो वास्तवं तदभेदं
विरुणद्धि, कल्पनाबीजं च तत्र तत्र प्रदेशे व्युत्पत्तिविशेषाधानमेव ।। अत एव-गुणाणमासओ दवं, एगदवस्सिया गुणा ।।
लक्खणं पजवाणं तु, उमओअस्सिया भवे ॥६॥ इत्यायुत्तराध्ययन(अ०२८) वचनं 'दवनामे गुणनामे पजवणामे' इत्याद्यनु-
योगद्वारवचनं च शिष्यव्युत्पत्तिविशेषाय काल्पनिकगुणपर्याय मेदाभिधानपरमेव, म्वाभाविकतद्भेदाभिधानपरत्वे तु गुणार्थि-
कनयप्रसङ्गात् । न च-' नाणदंसणट्ठयाए दुवे अहं' इत्याद्यागम एव गुणार्थिकप्रतिपादक इति शङ्काशेषो(लेशो)ऽपि
विधेयः, अनेकीकरणस्य पर्यायार्थगोचरत्वादस्येति दिक् ॥ इत्थं च गद्दिगम्बरैः परिभाष्यते " गुण्यन्ते पृथक्रियन्ते
द्रव्यं द्रव्या(न्तरा)यैस्ते गुणाः, तेषु चास्तित्वं १ वस्तुत्वं २ द्रव्यत्वं ३ प्रमेयत्वं ४ अगुरुलघुत्वं ५ प्रदेशत्वं ६ चेतनत्वं ७ अचे.
तनत्वं ८ मूर्तत्वं ९ अमूर्तत्वं १० चेति द्रव्याणां दश सामान्यगुणाः॥ प्रत्येकमष्टावष्टौ सर्वेषाम् ।। ज्ञानदेर्शनसुखवीर्यस्पर्श-
सगन्धर्वर्णगेतिहेतुत्वस्थैितिहेतुत्वाऽवगाहनाहेतुत्ववर्तनाहेतुत्वचेतनत्वाऽचेतनत्वमूर्तत्वाऽमूर्तत्वलक्षणाः षोडश विशेषगुणाः। प्र-
सिद्धान्त-
वाक्यस्प-
टीकरणपूर्व
वाचकमू-
त्रीयविरो-
धपरिहार
गुणनिरूप-
णे दिगम्ब-
रप्रक्रियया
गुणाद्यपद-
शंनञ्च॥
॥ ७६ ॥
त्येकं जीवपुद्गलयोः षट् षट्,इतरेषां च प्रत्येकं त्रयस्त्रयो गुणा, अन्तस्थाश्चत्वारः स्वजात्यपेक्षया सामान्यगुणा विजात्यपेक्षया वि- शेषगुणाः, तत्रास्तीत्येतस्य भावोऽस्तित्वं सदूपत्वं ।। वस्तुनो भावो वस्तुत्वं सामान्यविशेषरूपत्वं २॥ द्रव्यस्य भावो द्रव्यत्वं, निजनिजप्रदेशसमूहैरखण्डवृत्त्या स्वभावविभावगुणपर्यायान्द्रवति द्रोष्यति अदुद्रवदिति द्रव्यं ३॥ प्रमेयस्य भावः प्रमेयत्वं, प्र- माणेन परिच्छेद्यं रूपं प्रमेयं ४॥ गुरुलाघवाभावोऽगुरुलघुत्वं, मूक्ष्मा अवाग्गोचराः प्रतिक्षणं विवर्तमाना आगमप्रामाण्यादभ्यु- पगम्या अगुरुलघुगुणाः ५ ॥ "सूक्ष्मं जिनोदितं तत्त्वं, हेतुभि व हन्यते॥ आज्ञासिद्धं हि तद् ग्राह्यं, नान्यथावादि- नो जिनाः ॥१॥" प्रदेशस्य भावःप्रदेशत्वं, अविभागिपुद्गलपरमाणुनावष्टब्धत्वम् ६॥ चेतनस्य भावश्चेतनत्वं, चैतन्यमनु- भवनम् ७॥ श्लोकः-" चैतन्यमनुभूतिः स्या-त्मा क्रियारूपमेव च ॥ क्रिया मनोवचःकायै-रन्विता वर्तते ध्रुवम् ॥१॥" अचेतनस्य भावोऽचेतनत्वम् , अचैतन्यमननुभवनं८॥ मूर्तस्य भावो मूर्तत्वं रूपादिमनिवेशः९।। अमूर्तस्य भावोऽमूर्तत्वं, रूपादिर- हितत्वम् १०॥ज्ञानादयः प्रतीताः॥ स्वस्य भावाः स्वभावास्ते चैकविंशतिः, तत्र अस्तिस्वभावो नास्तिस्वभावो नित्यस्वभावो- नित्यस्वभाव ऐकस्वभावोऽनेकस्वभावः 'भेदस्वभावोऽभेदस्वभावः भव्यस्वभावोऽभव्यस्वभावः परमस्वभाव इति द्रव्या- णामेकादश सामान्यस्वभावाः, 'चेतनस्वभावोऽचेतनस्वभावः मूर्तस्वभावोऽमूर्तस्वभावः ऐकप्रदेशस्वभावोऽनेकप्रदेशस्व- भावः विभावस्वभावः शुद्धस्वभावोऽशुद्धस्वभाव उपचरितस्वभावः इत्येते द्रव्याणां दश विशेषस्वभावाः, एते जीवपुद्गल- योरेकविंशतिः। चेतनस्वभावमूर्तस्वभावविभावस्वभावाऽशुद्धस्वभावैकप्रदेशस्वभावान्विना धर्मादित्रयस्य षोडश।। बहु- प्रदेशं विना कालस्य पञ्चदश॥ श्लोक: " एकविंशतिभावाः स्यु-र्जीवपुद्गलयोर्मताः ॥ धर्मादीनां षोडश स्युः, काले दिगम्बर- प्रक्रियया द्रव्येषु सा- मान्यविशेष गुणानां सामान्यवि- शेषस्वमा- वानां च प्र- दर्शनं, गुण- लक्षणादि- निरूपणश्च॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
॥ ७७॥
पश्चदश स्मृताः ॥ १॥" स्वभावलाभादच्युतत्वादस्तिस्वभावः१॥ पररूपेणाभावान्नास्तिस्वभावः२॥ निजनिजनानापर्यायेषु
तदेवेदं द्रव्यमिति प्रतीतेनित्यस्वभावः३॥ तस्याप्यनेकपर्यायपरिणामित्वादनित्यस्वभावः४॥ स्वभावानामेकाधारत्वादेकस्व-
भाव:५॥ एकस्याप्यनेकस्वभावोपलम्भादनेकस्वभावः६।। गुणगुण्यादिसंज्ञादिभेदाढ़ेदस्वभाव:७॥ गुणगुण्याघेकस्वभावादभेद-
स्वभावः८॥ भाविकाले पररूपाकारभवनाद्भव्यस्वभावः९।। कालत्रयेऽपि पररूपाकाराभवनादभव्यस्वभावः१०॥ उक्तं च-
" अण्णोण्णं पविसंता, दिता ओगासमण्णमण्णस्स || मेलन्ता वि य णिचं, सगसगभावं ण विजहंति ॥१॥" पारिणामि-
कभावप्रधानत्वेन परमस्वभावः११॥ चेतनस्वभावादिचतुष्टयं४ गुणपाठमध्य एव व्याख्यातम्१५।। एकप्रदेशस्वभावोऽखण्ड-
वृत्त्याऽवस्थितिः१६॥ अनेकप्रदेशस्वभावः सखण्डवृत्यावस्थानम्१७।। स्वभावादन्यथाभवनं विभायः१८॥ शुद्धस्वभावोऽन्यामि-
श्रणेन केवलस्वभावः१९॥ अशुद्धस्तद्विपरीतः२०॥ स्वभावस्याप्यन्यत्रोपचारादुपचरितस्वभावः२१॥ स द्वेधा कर्मजस्वाभावि-
कभेदात् , आयो यथा--जीवस्य मूर्तत्वमचेननत्वं च, द्वितीयो यथा-सिद्धात्मनां परज्ञता परदर्शकत्वं च ।। एवमितरेषां
द्रव्याणामुपचारो यथासम्भवं ज्ञेयः ॥ एते स्वभावा अनेकान्तवाद एव घटन्ते, एकान्तस्य वक्तुमशक्यत्वात् , तथाहि,
सर्वथैकान्तेन सद्रूपस्य न नियतार्थव्यवस्था, सङ्करादिदोषप्रसङ्गात १, एकान्तेनासद्रूपस्याऽपि न नियतार्थव्यवस्था, सकलशू-
न्यतापत्तेः२, सर्वथा नित्यत्वेऽप्येकरूपस्य नानाविधार्थक्रियाकारित्वाभावस्तदभावे द्रव्यस्याप्यभावः३, सर्वथाऽनित्यपक्षेऽपि
निरन्वयत्वादर्थक्रियाकारित्वाभावम्तदभावे द्रव्यस्याप्यभावः४, एकान्तेनैकस्वरूपत्वे विशेषाभावस्तदभावे सामान्यस्याप्य-
भावः५ । यतः-"निर्विशेषं हि सामान्यं, भवेत्खरविषाणवत् ।। सामान्यरहितत्वाच्च, विशेषास्तद्वदेव हि॥१॥" एकान्तेनानेक-
दिगम्बर-
प्रक्रिययैक-
विंशतिसा-
मान्य विशे-
षस्वभावा-
नां स्वरूपं,
अनेकान्त-
वाद एव ते-
षामुपपत्ति-
रित्युपपाद-
॥ ७७॥
दिगम्बर- प्रक्रियया स्वभावाना-- मनेकान्त- वाद एवो- स्वभावपक्षेऽपि द्रव्याभावो निराधारत्वाद् ६, भेदैकान्तपक्षेऽपि विशेषस्वभावानां निराधारत्वादर्थक्रियाकारित्वाभावस्तदभावे द्रव्यस्याप्यभावः७, अभेदैकान्तपक्षेऽपि सर्वेषामेकन्वं, तथा च प्रतिनियतार्थक्रियाकारित्वाभावस्तदभावे द्रव्यस्याप्यभावः८, एकान्तेन भव्यस्वभावाभ्युपगमे द्रव्यस्य द्रव्यान्तरत्वप्रसङ्गात्मङ्करव्यतिकरविरोधवैयधिकरण्यानवस्थासंशयाप्रतिपत्त्यभावदोषा- नुषङ्गः९॥ सर्वथाऽभव्यस्वभावाभ्युपगमे ऽपि शून्यताप्रसङ्गः१०, स्वभावकान्ते संसाराभावः, विभावकान्ते मोक्षाभाव:११,सर्वथा चैतन्यस्त्रभावाभ्युपगमे सर्वेषामात्मनां शुद्धज्ञानचैतन्यावाप्निप्रसङ्गेन ध्यानध्येयज्ञानज्ञेयगुरुशिष्याघभावः१२, अचैतन्यै कान्तेऽपि सकलचैतन्योच्छेदाजडत्वापत्तिः१३,एकान्तेन मूर्तस्वभावाभ्युपगमे आत्मनो न मोक्षावाप्तिः१४,अमूकान्तेऽपि संसारविलोपाप- तिः१५,एकप्रदेशस्यैकान्तेनाखण्डपरिपूर्णस्यात्मनोऽनेककार्यकारित्वहानिः१६,सर्वथाऽनेकप्रदेशत्वेऽपि तस्य नार्थक्रियाकारित्वं, स्वस्वभावशून्यताप्रसङ्गात्१७,शुद्धैकान्तस्वभावे चात्मनो न कर्ममलकलङ्कावलेपः,सर्वथा निरञ्जनत्वात्१८,अशुद्धैकान्तस्वभावेऽ- प्यात्मनो न कदाचिदपि शुद्धस्वभावप्रसङ्गः स्यात् ,तन्मयत्वात्१९,उपचरितैकान्तपक्षेपि नात्मज्ञता सम्भवति, नियमितपक्षत्वात् २०,तथात्मनोऽनुपचरितैकान्तपक्षेपि परज्ञाना(ज्ञतादीनां विरोधः स्यात्र२१॥ अत्र नयोपनययोजना कर्तव्येति तद्भेदा उ- च्यन्ते, द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिको नैगमाद्याश्च सप्तेति नव नयाः, नयानां समीपे उपनयास्ते त्रयः, सद्भूतव्यवहारोऽसद्भूत- व्यवहार उपचरितासद्भूतव्यवहारश्चेति, तत्र द्रव्यार्थिको दशधा, आद्यः कर्मोपाधिनिरपेक्षः शुद्धद्रव्यार्थिकः, यथा संसारि- जीवः सिद्धसदृशशुद्धात्मा १॥ द्वितीय उत्पादव्ययगौणत्वेन सत्ताग्राहकः शुद्धद्रव्यार्थिको, यथा द्रव्यं नित्यं २ ॥ तृतीयो भेदकल्पनानिरपेक्षः शुद्धद्रव्यार्थिको, यथा निजगुणपर्यायस्वभावाद्रव्यमभिन्नं ३ ॥ चतुर्थः कर्मोपाधिसापेक्षोऽशुद्धद्रव्या- पपत्तिप्रद- र्शनं, नयो- पनयभेद- निरूपण- श्च ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
दिगम्बर-
प्रक्रियया
द्रव्यार्थिक-
भेददशक-
स्य पर्याया-
॥ ७८ ॥
र्थिकमेदष-
थिको, यथा क्रोधादिकर्मजभाव आत्मा ४ ॥ पश्चम उत्पादव्ययसापेक्षोऽशुद्धद्रव्याथिको, यथैकस्मिन् समये द्रव्यमुत्पादव्य-
यधौव्यात्मकं ५॥ षष्ठो भेदकल्पनासापेक्षोऽशुद्धद्रव्यार्थिको, यथात्मनो दर्शनज्ञानादयो गुणाः ६।। सप्तमोऽन्वयसापेक्षो द्रव्या-
थिको, यथा गुणपर्यायस्वभावं द्रव्यं ७ ॥ अष्टमः स्वद्रव्यादिग्राहको द्रव्यार्थिको, यथा स्वद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यम-
स्ति८॥ नवमः परद्रव्यादिग्राहको द्रव्यार्थिको, यथा परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यं नास्ति९।। परमस्वभावग्राहको द्रव्यार्थिको
दशमो,यथा ज्ञानस्वरूप आत्मा,अत्रानेकस्वभावानां मध्ये ज्ञानाख्यः परमस्वभावो गृहीतः१०॥इति द्रव्यार्थिकभेदाः॥१०॥
अथ पर्यायार्थिकस्य षड् भेदाः ।। आयोऽनादिनित्यपर्यायार्थिकः, यथा पुद्गलपर्यायो मेर्वादिनित्यः१॥११॥द्वितीयः
सादिनित्यपर्यायार्थिकः, यथा सिद्धपर्यायो नित्यः २॥१२॥तृतीयः सत्तागौणत्वेनोत्पादव्ययग्राहकोऽनित्यशुद्धपर्यायार्थिकः,
यथा समयं समयं प्रति पर्याया विनाशिनः ३॥१३॥ चतुर्थः मत्तासापेक्षो निन्याशुद्धपर्यायार्थिकः, यथैकस्मिन् समये त्रयात्म-
कः पर्यायः४॥१४॥ पञ्चमः कर्मोपाधिनिरपेक्षो नित्यशुद्धपर्यायार्थिकः, यथा संमारी सिद्धसदृक शुद्धात्मा ५||१५|| षष्ठः कर्मोपा-
धिसापेक्षो नित्याशुद्धपर्यायार्थिंकः, यथा संसारिणामुत्पत्तिमरणे स्तः६॥इति॥१६॥नैगमनेधा,भूतभाविवर्तमानकालभेदात् ,
अतीते वर्तमानारोपणं यत्र स भूतनैगमः, यथाऽद्य दीपोत्सवपर्वणि वर्धमानस्वामिनो मोक्षं गताः १॥१७॥ भाविनि
भूतवत्कथनं यत्र स भाविनैगमः यथार्हन्सिद्ध एव२॥१८॥ कर्तुमारब्धमीषनिष्पन्नमनिष्पन्न वा वस्तु निष्पन्नवत्कथ्यते यत्र स
वर्तमाननैगमः, यथा ओदनः पच्यते इति॥१९॥सङ्ग्रहो द्विविधः, सामान्यविशेषभेदात् , आद्यो यथा द्रव्याणि सर्वा-
ण्यविरोधीनि॥२०॥द्वितीयो यथा सर्वे जीवाः परस्परमविरोधिनः शाइति॥२१व्यवहारोप्येतद्भेदको द्विविधा, आद्यो
हकस्य नैग-
मसंग्रहव्य-
वहाराणां च
मेदप्रदर्श-
नम् ॥
॥ ७८॥
यथा जीवाजीवाः ॥२२॥ द्वितीयो यथा जीवाः संसारिणो मुक्ताश्च ॥२३॥ इति ॥ ऋजुसूत्रः स्थूलसूक्ष्मभेदाद् द्विधा, आद्यो यथा मनुष्यादिपर्यायास्तदायुःप्रमाणकालं तिष्ठन्ति॥२४॥ द्वितीयो यथा एकसमयावस्थायी पर्यायः ॥२५॥ इति शब्दादयस्त्रयः प्रत्येकमेकैकभेदाः ॥ २६-२७-२८ ॥ इति सर्वेऽप्यष्टाविंशतिर्नयभेदाः ॥ उपनयेषु एकवस्तुभेदविषयः सद्भूतव्यवहारः, स च शुद्धाशुद्धभेदाद्विविधः, आद्यः शुद्धगुणगुणिशुद्धपर्यायपर्यायि- भेदकथनं, यथा केवलज्ञानादयो जीवस्य । द्वितीयोऽशुद्धगुणगुण्यादिभेदकथनं यथा मतिज्ञानादयो जीवस्य ।। असद्भूतव्य- वहार उपचरितस्य पृथक्कथनादनुपचरितो गृह्यते, म च संश्लेषमहितवस्तुसम्बन्धविषयः स्वजातिविजात्युभयविषयभेदेन त्रिविधः, आयो यथा परमाणुबहुप्रदेशीति कथनं ।। द्वितीयो यथा मूर्त मतिज्ञानं यतो मूर्तद्रव्येण जनितम् ॥ तृतीयो यथा ज्ञेये जीवेऽजीवे च ज्ञानमिति कथनं, तस्योभयनिष्ठत्वात् ॥ असद्भूतव्यवहार एवोपचारस्तत उपचारानन्तरं य उपचारः क्रियते स संश्लेषरहितवस्तुसम्बन्धविषय उपचरितासद्भूतव्यवहारः, सोऽपि स्वजातिविजात्युभयविषयभेदेन त्रिविधः, आयो यथा पुत्र- दारादि मम । द्वितीयो यथा वस्त्राऽऽभरणहेमरजतादि मम । तृतीयो यथा दुर्गदेशराज्यादि मम ।। एते नयोपनयभेदा यथासम्भवं स्वभावेषु योज्यन्ते, स्वद्रव्यादिग्राहकेणास्तिस्वभावः१, परद्रव्यादिग्राहकेण नास्तिस्त्र- भावः२, उत्पादव्ययगौणत्वेन सत्ताग्राहकेण नित्यस्वभावः३, केनचित्पर्यायार्थिकणानित्यस्वभावः४, मेदकल्पनानिरपेक्षेणै- कस्वभावः५, अन्वयद्रव्यार्थिकेनैकस्याप्यनेकद्रव्यस्वभावत्वं६, सद्भूतव्यवहारेण गुणगुण्यादिभिर्भेदस्वभावः७, भेदकल्पना- निरपेक्षेण गुणगुण्यादिभिरभेदस्वभावः८, परमभावग्राहकेण भव्याभव्यपारिणामिकस्वभावाः९-१०-११, शुद्धाशुद्धपरमभा- दिगम्बरः प्रक्रियया नयोपनय- मेदविचारे ऋजुसूत्रादी नां भेदा: उपनयम- दा नयोप- नयानां स्व- भावेष्वव- तारश्च ॥
श्री
अनेकान्त-
प्रकरणम् ॥
॥७९॥
वग्राहकेण चेतनस्वभावो जीवस्य, असद्भूतव्यवहारेण कर्मनोकर्मणोरपि चेतनस्वभावः१२, परमभावग्राहकेण कर्मनोकर्म-
णोरचेतनस्वभावः, जीवस्याप्यमद्भूतव्यवहारेणाऽचेतनस्वभावः१३, परमभावग्राहकेण कर्मनोकर्मणोर्मूर्तस्वभावः, जीवस्या-
प्यसद्भूतव्यवहारेण मूर्तस्त्रभावः१४, परमभावग्राहकेण पुद्गलं विहायेतरेषाममूर्तस्वभावः, पुद्गलस्योपचारादपि नास्त्यमूर्तत्वं,
मुख्यार्थानाधे सति तथाव्यवहाराभावात् , एवं मति पुद्गलस्यैकविंशतितमो भावो न लभ्येतेति पुद्गलाणोः परोक्षप्रमाणा-
पेक्षयाऽसद्भूतव्यवहारेणोपचारेणामूर्तत्वं स्वीकर्तव्यं १५, परमभावग्राहकेण कालपुद्गलाणूनामेकप्रदेशस्त्रभावत्वं, भेदकल्प-
नानिरपेक्षेणेतरेषां च धर्माधर्माकाशजीवानामखण्डन्वादेकप्रदेशत्वं१६, भेदकल्पनासापेक्षेण चतुर्णामपि नानाप्रदेशस्वभाव-
त्वं, पुद्गलाणोरुपचारतो नानाप्रदेशत्वं, न च कालाणोः स्निग्धरुक्षवाभावात् । अरूक्षत्वाच्चाणोरमूर्तकालस्य चैकविंशतितमो
भावो न स्यात् , परोक्षप्रमाणापेक्षयासद्भूनव्यवहारेणाप्युपचारेणामूर्नत्वं१७ । पुद्गलस्य शुद्धाशुद्धद्रव्यार्थिकेन विभावस्वभाव-
त्वं१८, शुद्धद्रव्यार्थिकेन शुद्धस्वभावः१९, अशुद्धद्रव्यार्थिकनाशुद्धस्वभावः२०, उपचरितस्वभावश्चासद्भूतव्यवहारेणेति२१॥
गुणविकाराः पर्यायाः, ते द्वेधा स्वभावविभावभेदात् , स्वभावपर्यायाः षद् वृद्धिरूपाः षट् च हानिरूपा
इति द्वादश ॥ विभावद्रव्यव्यञ्जनपर्याया जीवस्य नरसारकादयः१, स्वभावद्रव्यव्यञ्जनपर्यायाश्चरमशरीरात् किञ्चिन्न्यून-
सिद्धपर्यायाः२, विभावगुणव्यञ्जनपर्याया मत्यादयः३, स्वभावगुणव्यञ्जनपर्याया अनन्तचतुष्टयरूपा जीवस्य४, पुद्गलस्य
तु द्वथणुकादयो विभावद्रव्यव्यञ्जनपर्यायाः५, रसरसान्तरगन्धगन्धान्तरादयो विभावगुणव्यञ्जनपर्याया:६, अविमागिपुद्गल-
परमाणवः स्वभावद्रव्यव्यञ्जनपर्यायाः७, वर्णगन्धरसैकैकाविरुद्धस्पर्शद्वयं च स्वभावगुणव्यञ्जनपर्याया८॥इति।। [अनाद्यनिधने
दिगम्बर-
प्रक्रियया
नयोपन-
यानां स्व-
भावेष्वव-
तार: स्व-
भावविभा-
वपर्याया-
णां निदर्श-
नान्युपसं-
हारश्च ॥
॥७९॥
द्रव्ये, स्वपर्यायाः प्रतिक्षणम् ।। उन्मजन्ति निमञ्जन्ति, जल(कूल)कल्लोलबञ्जले॥१॥ धर्माधर्मनभाकाला, अर्थपर्यायगोचराः॥ व्यञ्जनेन तु सम्बद्धौ, द्वावन्यौ जीवपुद्गलौ।।२।।" इति पर्यायाधिकारः।।"]इति । तदेतत्स्वकपोलकल्पनामानं वातूलतर- लार्कतूलतुल्यं, गुणानामेव पर्यायानतिरेक गुणस्वभावभेदकल्पनायां प्रमाणाभावात् ,सहभावित्वक्रमभावित्वभेदविवक्षया गुणप- र्यायभेदोक्तिसम्भवेऽपि सहभाविनामपि धर्माणामानन्त्यात् यथोक्तेयत्नाक्षतेः, द्रव्यव्यवस्थाहेतोश्योपयोगादिगुणानां यथासूत्र प्रत्येकमेव ग्रहणौचित्यात् , स्थूलव्यवहारेण यथोक्तमङ्ख्यग्रहणेऽपि प्रमेयत्ववदभिधेयत्वादेरपि त्यागे बीजाभावात् । किश्च द्रव्यत्वं यदि गुणः, पर्यायत्वं कुतो न गुणो, द्वयोस्तुल्याश्रयत्वात , एवं सामान्यत्वविशेषत्वादावपि पर्यनुयोगो विधेयः । वस्तुत्वकुशावेव सामान्यविशेषप्रवेशान तदाधिक्यमिति चेत् , वस्तुत्वं यथा मामान्यविशेषात्मकत्वं तथा द्रव्यपर्यायात्मक- त्वमपि किं न स्यात् , जात्यन्तरात्मके हि वस्तुनि प्रामाणिकमर्वधर्मात्मकत्वं सुवचमेव ।। किश्च स्वभावा अपि गुणपर्याया- तिरिक्ताः के नाम, ये पृथगुद्दिष्टाः, धर्मापेक्षया स्वभावा गुणा न भवन्तीति ते पृथगुद्दिष्टा इति चेत् , तत्कि विध्येकनियमि- धर्मा गुणा विधिप्रतिषेधान्यतरनियन्त्रितधर्माः स्वभावा इति भवतोऽभिप्राय:, ओमिति चेत्, तर्हि चैतन्याचैतन्य. मूर्तत्वाऽमूर्तत्वादीनां कथं गुणमध्ये परिगणनयापि स्वभावनययोजनिकाभिहिता, सापि न सर्वा सिद्धान्तानुपातिनी,अन्वय- द्रव्यार्थिनानेकस्वभावत्वयोजनस्याघटमानत्वात् , प्रतीत्यसमुत्पादसमुत्पन्नानेकधर्मस्वभावत्वस्य पर्यायार्थिकेनैव ग्रहणात्, तन्मत एव क्रमिकनानाधर्मग्राहिप्रत्यक्षानन्तरं तेवनेकत्वविकल्पोत्पादेन तथाव्यपदेशसम्भवात् , धर्मिण एकत्वप्रतीत्यर्थ तत्रा- न्वयद्रव्यार्थिकोऽपेक्षणीय इति चेत्, न, पत्रस्य नीलता तैलस्य धारेत्यादाविव धर्मिण एकत्वस्याप्यौपचारिकस्य पर्यायार्थि. दिगम्बर- प्रक्रियोक्त गुणस्वभा- वमेदानाम- प्रमाणकत्व- स्थापनेन- निरसनम् ।। तस्वभावा , श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ केनाश्रयणात् । एवं सति एकत्वसापेक्षानेकत्वग्राहकोऽशुद्धपर्यायार्थिकोऽप्यतिरिच्येतेति चेत् , अतिरिच्यतां नाम नास्माकमनु- पपत्तिः, न हि वयं भवानिव दशमेदमेव द्रव्यार्थिकं पड़भेदमेव च पर्यायार्थिकं प्रसिद्धनयविलक्षणभेदमभ्युपगच्छामः, किन्तु यथासम्भवं यथानुभवं च शुद्धान्द्रव्यार्थिक भेदान् सङ्ग्रहे शुद्धान् पर्यायार्थिकभेदांश्चर्जुसूत्रेऽशुद्धाश्च तान् व्यवहारेऽन्तर्भाव- यामः, ततश्च न कमपि दोषमासादयामः । यदि चानुपचरितैकस्वभावधर्मिण्यन्वयद्रव्यार्थिकणेवानेकस्वभावो गृह्यते इत्यभि- मानः, तदाऽनुपचरितस्यैव प्राधान्यादेकस्वभाव एवायातः । तथापि आधारांशो तासामान्यांशभेदाद् ग्राहकग्राह्यभेद इति चेत्, तर्हि तिर्यक्सामान्यार्थिकेन ग्राहकेण ग्राह्यस्तिर्यक्रमामान्यस्वभावोऽप्यधिकः कल्प्यतामिति ।। "परिगमणं पजाओ, अणे- गकरणं गुणत्ति तुल्लत्था ॥३-१२॥" इत्यादिमम्मतिमहातर्कवचनानुमारेणानेकम्वभावत्वं पर्यायार्थिकेनैव ग्राह्यमिति प्रति- पत्तव्यमिति किमल्पीयसि क्षोदेन ॥ 'परमभावग्राहकेण कालपुद्गलाणूनामेकप्रदेशस्वभावत्वं भेदकल्पनानिरपेक्षेणेतरेषां चेत्या- दि' यदुक्तं, तदपि चिन्त्यम् , भेदकल्पनानिरपेक्षशुद्धद्रव्याधिकेन नानाप्रदेशस्त्रमावस्याप्येकप्रदेशस्वभावव्यवस्थिती धर्मादीनां षोडश स्युः, ' इत्यस्य व्याघातात्, कथायामत्र नयद्वयावतारेऽपि परमार्थचिन्तायां परमभावग्राहकेणैवे- कप्रदेशस्वभावग्रहणे च जीवपुद्गलयोरेकविंशतिरिन्यस्य व्याघातात् , न हि जीवः कालपुद्गलाणुवत्कदाप्येकप्रदेशः सम्भवति, क्षेत्रतोऽप्यस्यासङ्ख्येयप्रदेशावगाहनस्वाभाव्यात् । अणूनामेकप्रदेशस्वभावत्वं वास्तवमेव तदतिरिक्तपुद्गलजीवानां तु सङ्को- चविकासप्रयुक्तच्छेदभेदाप्रतियोगिप्रदेशत्वलक्षणं पारिभाषिकमेव तदिति नातिप्रसङ्गः इति चेत् , तर्हि तद्ग्रहः प्रदेशार्थनये- नैव, न तु भेदकल्पननिरपेक्षेण । तथा च सोमिलप्रश्ने भगवद्वचनं "पएसट्टयाए अक्खये अहं, अबए अहं ति" || कथं दिगम्बर- प्रक्रियोक्त- विलक्षणन- यमेदानाम- पाकरणं स्व- भावमेदा- नां खण्ड- ॥८०॥ ।। ८० ॥
दिगम्बरप्र- क्रियोक्त- नयैः स्त्रमा- च 'भेदकल्पनासापेक्षेण चतुर्णामपि नानाप्रदेशस्वभावत्वम्' इति वदंस्तनिरपेक्षेणैकप्रदेशस्वभावत्वमपि नाम्युपेया:१, देशप्रदेश- कल्पनारहितमखण्डैकस्वभावत्वलक्षणमेकप्रदेशस्वभावत्वं च द्रव्यार्थिकेन वदते ते कृतान्तः कथं न कुप्येत् , शुद्धपर्यायार्थिकै- वम्भूतनयमत एवं प्रदेशदृष्टान्ते तादृशवस्तुग्रहणम्यानुयोगद्वारादिषु व्यवस्थापनात् । अखण्डवस्तुग्राहित्वे सत्येवम्भूतस्य द्रव्यार्थिकत्वं बलादापतेदिति चेत् , तत्कि दिक्पटडिम्भ? कृतान्तेन सह योद्धमुद्यतोऽसि ?, न जानी सर्वतो बल. वता तेन स्वप्रतिकूलवर्तिनः कस्य बलं न भग्नं, धर्मास्तिकायादिप्रदेशानां देशप्रदेशादिकल्पनाराहित्येनैकग्रहणगृहीतत्वमेव त. न्मतेऽखण्डत्वं, स्वलक्षणविलक्षणघटादिपरमाणुष्विव पुञ्जत्वमिति न पर्यायार्थिकत्वभङ्गो न वा द्रव्यार्थिकत्वापत्तिरिति निःशङ्क प्रतिपद्यस्व । एवमन्यदपि चिन्त्यमुपयुज्य चिन्तनीयम् ।। गुणविकाराः पर्याया इत्युद्दिश्य द्रव्यपर्यायानपि तन्मध्ये विभजता देवानांप्रियेणोदेशविभागविरोध एव किं न ज्ञातः । न च पर्यायाणां गुणविकारत्वं सूत्रसिद्धम् , अपि तु 'अणंतेहिं वण्णपजवेहि अर्णतेहिं गंध-रस-फास-संठाणपञ्जवेहि अणतेहिं गुरुअलहुअपजवेहिं अणतेहिं अगुरुलहुअपजवेहिं इत्यादिसूत्रपाठदर्शनाद् गुण- रूपत्वमेव तेषां सिद्धगिति किमुत्सूत्रविस्पन्दितेन । किञ्च किं नाम गुणविकारत्वं, किं गुणोपादेयत्वं१,उत गुणाव्यवहितोत्तरक्षणो- पजायमानत्वं२, आहोस्विद्गुणजातीयत्वे सति कार्थत्वं३, किं वोत्कर्षापकर्षशालिगुणपरिणामत्वं४, यद्वा द्रव्यक्षेत्रादिसनिधा- नकृत लक्षण्यशालिगुणपरिणामत्वं५, नाद्यःगुणोपादेयपर्यायाप्रसिद्धेः, गुणस्य पर्यायोपादानत्वे द्रव्योच्छेदप्रसङ्गात् । द्रव्यं गुण- पर्यायोभयोपादानं गुणास्तु पर्यायाणामेवोपादानानीति न द्रव्यमुच्छेत्स्यत इति चेत् , न, एकस्योभयोपादानत्वे विरोधाभावा. दतिरिक्तोपादानकल्पने गौरवस्यैव बाधकत्वात् , अन्यथा केवलपर्यायोपादानवत्केवलगुणोपादानमपि किश्चित्कल्पनीयं स्यात् १ । वचिन्तानि- रासः, गुण- विकारत्व- रूपपर्याय- विचारख- ण्डनोपक्र- मश्च ॥ - श्री बनेकान्त- वस्था- करणम् ॥ ॥८१॥ न द्वितीयः, गुणस्य द्रव्यवदविचलितकम्वभावत्वे तदव्यवहितोनरक्षणाप्रमिद्धेः, न च तदव्यत्रहिनोत्तरक्षणोपजायमानत्वेन तद्विकारत्वं च वक्तुमपि शक्यं, घटाव्यवहितोत्तरक्षणोपजायमानस्य पटादेर्घटविकारत्वव्यवहारप्रसङ्गात् । न च तृतीयः, शु. द्धात्मद्रव्यव्यञ्जनपर्याये शुद्धपुद्गलद्रव्यव्यञ्जनपर्याये च गुणजातीयत्वाभावान् ३ । नापि तुरीयः, अनन्तचतुष्टयादिस्वभावगुण व्यञ्जनपर्यायाणां स्वरूपेणोत्कर्षापकर्षशालिन्याभावात् ४ । नापि पञ्चमः, द्रव्यपरिणामे गुणपरिणामत्यायोगेन द्रव्यपर्या. यासमहात् , गुणपदपरित्यागेनैव लक्षणकरणौचित्यात् ५ ।। गुणा एव हि पर्यायाः, ते च द्रव्यस्यैवावस्थाविशेषाः, अत एव केवलज्ञानात्मकपर्यायोऽपि पष्टिवर्षायुषस्त्रिंशद्वर्षीयराज्यपर्यायमदृशः सम्मतौ प्रतिपादिनः, नेन द्रव्यगुणपर्याययोर्जा- त्या भेदाभिधानमयुक्तम् । एतेन "पर्यायाश्चतुर्विधाः, ममानजातीयद्रव्यपर्याया द्वथणुकाणुकादयः१, विजातीयद्रव्यपर्यायाः मनुजादयः२, स्वभावगुणपर्यायाः केवलज्ञानादयो३, विभावगुणपर्यायाश्च मत्यादय४" इति प्रवचनमारवृत्ती पर्याय विभाग कुर्वन्नमृतचन्द्रोऽप्यपास्तः, द्रव्यगुणपर्याययोर्जात्या भेदाभावात् , केवलज्ञानादिपर्यायाणां मादिनित्यानामपि भवस्थसिद्ध- द्रव्यावस्थाभेदेनैव बैलक्षण्यस्य लक्षण्यस्य शास्त्रे व्यवस्थापनान् । किश्चास्मिन्निभागे विभागजपर्यायः परमाण्वादिः कुत्रान्तर्भावनीयः, न चासौ पर्यायो नास्त्येवेत्याशङ्कनीयम् , “अणु-दुअणुएहिं, दवे आरद्धे तिअणुयं ति ववएसो ॥ तत्तो य पुण विभत्तो, अणुत्ति जाओ अणू होइ ॥३-३९." इत्यादिग्रन्थेन सम्मती तद्व्यवस्थापनात् । एगत्तं च पुहुतं च, संखा संठाणमेव य ।। संयोगो य, विभागो य पजवाणं तु लक्रवणं ।। १३ ॥ इति (उत्तराध्ययन अ० २८) पारमर्षे एकत्वपृथक्त्वादीनां पर्यायलक्षणानां व्यक्त्या परिगणितानां परमाणुपर्यायव्यवस्थापकत्वात् , अत एव धर्मास्तिका- दिगम्बरप्र- क्रियोक्त- गुण विकार- रूपपर्याय- विचारख- ण्डनं, दि. पटामृत- चन्द्रोक्त- पर्यायवि. भागनिरा- सश्च ॥ . .
यादीनामप्येकत्विकोत्पादमपेक्ष्य शुद्धपर्यायाणामिव परसंयोगजपर्यायाणामशुद्धानामपि सत्त्वं ध्रुवं, आगासाइआणं, तिण्णं परपञ्चओऽणियमा ॥ ३-३३ ।। " इति सम्मतिप्रतीकेऽनियमादित्यकारप्रश्लेषेण व्याख्यानेऽस्याभिप्रायस्यैव लाभात् । इत्थञ्चाशुद्धस्वभावोऽपि धर्मादिषु स्यात्कारसंवलिनः किं नोपदिश्यते ?, धर्मादिषु परसंयोगजाः पर्याया उपच. रिता एव न त्वशुद्धा इति चेत्, आत्मनि मनुजादयः पर्याया अप्यमद्भूता एव न न्वशुद्धा इति शब्दमात्रेण किं नापलापः क्रियते ?, शेपाशुद्धस्त्रभावकार्यस्य विभावस्वभावादेव मम्भवादिति द्रव्यपर्यायातिरिक्तगुणस्वभावप्रक्रिया दैगम्बरी न विचारसहेति दिग्ननु पर्यायानिरिकनगुणाभावेऽपि युगपदयुगपद्भाविपर्यायविशेषप्रतिपिपादयिषया वाचकमुख्यानां "गुणपर्यायवद्रव्यम्" इतित०५-३७सूत्रप्रणयनम्य युक्तत्वेऽपि मतुव्योगाद्रव्यपर्याययोभदापत्तिरिति चेत् ,न,नित्ययोगे मतुपो विधानात् , यथाहि एकस्यैव पुरुषस्य पितृपुत्रादिगम्बन्धविशेषेण पुत्रादिनानारूपत्वं तथै कस्यैव द्रव्यस्य चक्षुरसनादिग्राह्य- तयारूपरसादिपरिणतिभेद इति न द्रव्यगुणयोरन्यत्वं, आह च महामतिः-" पिउपुत्तणत्तुभाणि-जभाऊणं एगपुरिससं- बन्धो ।। ण य सो एगस्स पिय-त्ति सेसयाण पिया होइ ॥३-१७!। जह सम्बन्धविमिट्ठो, सो पुरिमो पुरिसभावणिरइसओ।। तह दवमिंदियगयं, रूबाइविसेसणं लहइ ॥३-१८॥" पितृपुत्रजप्तृभागिनेयभ्रातृभिर्य एकस्य पुरुषस्य सम्बन्धः तेनासावेक एव पित्रादिव्यपदेशमासादयति, न चासावेकस्य पिता पुत्रः संवृत्त इति शेषाणामपि पिता भवति, यथा प्रदर्शितसम्बन्धविशिष्टः पित्रादिव्यपदेशमाश्रित्यासी पुरुषरूपतया निरतिशयोऽपि संस्तथा द्रव्यमपि घ्राण- रसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रसम्बन्धमवाप्य गन्धरसरूपस्पर्शशब्दव्यपदेशमात्रं लभते द्रव्यस्वरूपेणाविशिष्टमपि, न हि शक्रेन्द्रादिशब्द- दिक्पटप्र- क्रियाखण्ड नोपसंहार, द्रव्यपर्या- ययोरेका- न्तमेदवादि मतनिर- सनश्च॥
श्री अनेकान्त- व्यवस्था- प्रकरणम् ॥ मेदाद्गीर्वाणनाथस्येव रूपादिशब्दमेदाद्वस्तु मेदो युक्तः, न चैवं पित्रादिवद् घटादेरपि सावधिकत्वप्रसङ्गः, पित्रादित्यवहार- स्येव रूपादिव्यवहारस्य सावधिकत्वेऽपि वस्तुनोऽतथात्वात् । न च चक्षुर्ग्राह्यताविशिष्टद्रव्यस्य रूपादित्वे ग्राह्यतायाः शक्ति- रूपायाः अतीन्द्रियत्वेन रूपाद्यतीन्द्रियतापत्तिः, विशेषणाप्रत्यक्षत्वेऽपि विशेष्यविधया तत्प्रत्यक्षत्वसम्भवाच्छक्तिभेदाच न चाक्षुपादिज्ञानसङ्कर इति दिग् ॥ नन्वेवं द्रव्याद्वैतैकान्तसिद्धेः कथश्चिद्भेदाभेदवादो द्रव्यगुणयोरघटमानः स्यादिति चेत्, न, रूपादीनां गुणभेदेन व्यवहारोपपत्तावपि द्रव्याविशेषेऽपि तद्विशेषदर्शनेन भेदस्यापि सम्भवात् , आह च-" होजाहि दुगुणमहुरं, अणंतगुणकालयं तु जं दवं ।। ण उ डहरओ महल्लो, व होइ मम्बन्धओ पुरिसो ॥३-१९॥" यदि नामाम्लादिद्र. व्यमेव रसनसम्बन्धाद्रस इति व्यपदेशमात्रमामादयेत् ,द्विगुणमधुरं रमनतो कुतो भवेत्, तथा नयनसम्बन्धाद्यदि नाम कृष्ण- मिति भवेदनन्तगुणकृष्णं तत्कुतः स्यात् , वैषम्यभेदावगते यनादिसम्बन्धमात्रादसम्भवात् , तथा पुत्रादिसम्बन्धद्वारेण पित्रादिरेव पुरुषो भवेन्न स्वल्पो महान्वेति युक्तः, विशेषप्रतिपत्तेरुपचरितत्वे मिथ्यात्वे वा सामान्यप्रतिपत्तावपि तथा- प्रसक्तेरिति भावः ।। अत्राहैकान्ताऽभेदवादी-“भण्णइ सम्बन्धवमा, जइ सम्बन्धित्तणं अनुमयं ते ॥ नणु सम्बन्धविसेसे, सम्बन्धिविसेसणं सिद्धं ॥ ३-२० ॥" सम्बन्धसामान्यवशाद्यदि सम्बन्धित्वसामान्यमनुमतं तव, ननु सम्ब- न्धविशेषद्वारेण सम्बन्धिविशेषोऽपि किं नाभ्युपगम्यते ? ॥ सिद्धान्तवाद्याह जुअइ सम्बन्धवसा, सम्बन्धिवि- सेसणं ण उ ण एयं ॥ नय(रस)णाइ विसेसकओ, रूवा(रसा)इ विसेसपरिणामो ।। ३-२१॥" सम्बन्धविशेषाद् युज्यते सम्बन्धिविशेषो, यथा दण्डादिसम्बन्धविशेषजनितसम्बन्धविशेषसमासादितपुरुषादिसम्बन्धिविशेषोऽवगतः, द्रव्याद्वैतवा- द्रव्याद्वैत- कान्ताप- त्तिदोषनि- रास एका न्तामेदवा- दिमतख- ण्डनोपक्र- मश्च ॥ ॥ ८२ ॥ - ।। ८२।।
दिनस्तु न सम्बन्धिविशेषो नापि सम्बन्धविशेषः मङ्गच्छत इति कुतो रसनादिविशेषसम्बन्धजनितो रसादिविशेषपरि- णामः। नन्वनेकान्तबादिनोऽपि रूपरसादेरनन्तगुणद्विगुणादिवैषम्यपरिणतिः कथमुपपन्नेत्याशङ्कायामाह-"भण्णइ विसम- परिणयं(ई) कह एयं होहिइ त्ति उवणीयं तं होइ परणिमित्तं, णव त्तिणस्थित्थ एगंतो॥३-२२॥"शीतोष्णस्पर्शवदेकत्रैकदा विरोधा. गण्यते एकत्राम्रफलादौ विषमपरिणतिः कथं भवतीति परेण प्रेरिते,उपनीतं प्रदर्शितमाप्तेन-तद्वैषम्यं भवति परनि- मित्तं-द्रव्यक्षेत्रकालभावानां महकारिणां वैचित्र्यानदाम्रादिवस्तु विषमरूपतया परिणमतीति वैषम्यं परनिमित्तमित्यर्थः, न च परनिमित्तमेवेत्यत्राप्येकान्तोऽस्ति, स्वरूपस्यापि तत्र कथञ्चिनिमित्तत्वाद् , अन्यथा द्विगुणरसादीनां देशनियमानुपपत्तेः, विरो- धश्च कालभेदेन देशभेदेन वा निरसनीयः, न चैकत्रैव प्रदेशे द्विगुणरमादित्वे एकगुणरसादिद्वयसमावेशाद्विरोधः सम्भावनीयः, एकैकगुणापेक्षया द्विगुणपर्यायवतो रसस्य प्रत्येकातिरिक्तत्वेनाविरोधात् , अत एव परापेक्षया षट्स्थानपतितत्वमप्यविरुद्धं, आ- पेक्षिकधर्मयोईस्वत्वदीर्घत्वयोरिव विरोधासिद्धेरिति दिग् ॥ तन्न द्रव्याद्वैतैकान्तः सम्भवी।। अथ द्रव्यगुणयोभैदैकान्तवादिनो द्रव्य. गुणलक्षणानुपपत्तिमुद्भावयन्ति-"दत्वस्म ठिई जम्मवि-गमा य गुणलक्खणं ति वत्तवं ॥ एवं सइ केवलिणो, जुजइ तं णो उ दवियस्स॥३-२३॥" द्रव्यस्य लक्षणं स्थितिः, जन्मविगमो लक्षणं गुणानामेवं सति केवलिनो युज्यत एतल्लक्षणं, तत्र किल केवलात्मना स्थित एव चेतनाचेतनरूपा अन्येऽर्था ज्ञेयभावनोत्पद्यन्ते,अज्ञेयरूपतया च नश्यन्ति, न तु द्रव्यस्याण्वादेले- क्षणमिदं युज्यते, न ह्यणौ रूपादयो जायन्ते अत्यन्तभिन्नत्वाद् गव्यश्वादिवत् , अथवा केवलिनोऽपि सकलज्ञेयग्राहिणो नैतल्ल- क्षणं युज्यते, न चापि द्रव्यस्याचेतनस्य, गुणगुणिनोरत्यन्तभेदेऽसवापत्तेरसतोच खरविषाणादेरिव लक्षणासम्भवादिति अनेकान्त- वादे रूप- परसादेवै- षम्यपरि- णामोपपा- दनं द्रव्य- गुणभेदै- कान्तवादि- मतपूर्वपक्ष- पूर्व निरस- नंच॥
दव्याद्भिमा
श्री
बनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
गुणा इति
॥८३ ॥
द्रव्यार्थान्तरभूतगुणवादिनः । अत्रोत्तरं-- "दवत्थंतरभूया, मुत्तामुत्ता य(व) ते गुणा होजा । जइ मुत्ता परमाणू , णस्थि अमुत्तेसु
अग्गहणं ॥ ३-२४ ॥ " द्रव्यार्थान्तरभूता गुणा मूर्ता अमूर्ना वा भवेयुः, यदि भूर्ताः न नहि परमाणवो
भवन्ति, मूर्तिमद्रूपाद्याधारत्वाद्, अनेकप्रादेशिकस्कन्धवत् , अथामूर्ताः, अग्रहणं तेषां अमूर्तत्वादाकाशवत् । ततो द्रव्य-
गुणयोः कथञ्चिद्भेदाभेदावभ्युपगमनीयौ, अन्यथा प्रतीतिविरोधान् , तथाहि द्रव्यगुणयोर्यथाक्रममेकानेकप्रत्ययावसेयत्वा-
कथञ्चिद्भेदः प्रतीयते, कथञ्चिदमेदोऽपि रूपाद्यात्मना द्रव्यम्वरूपस्य रूपादीनां च द्रव्यात्मकतया प्रतीतेः, अन्यथा तदभा-
वापत्तेः, एतच्च विवक्षामात्रेणोच्यतेऽन्यथा जान्यन्नगत्मक बम्तुनि भेदाभेदादन्यतरकथाया एवासम्भवात् , न हि चित्रं
वस्तु नीलपीताद्यन्यतरतया कथ्यते चर्च्यने वा, एकतरजिज्ञामया केवलं तथा प्रतीयत इनि, एतदाह-" सीसमईविष्फा.
रण-मेत्तत्थोयं को समुल्लावो ॥ इहरा कहामुहं चेव, णथि एवं सममयम्मि ॥३-२५॥" शिष्यवुद्धिविकासनमात्रा-
र्थोऽयं कृतः प्रवन्धः,इतरथा कथैवैपा नास्ति स्वसिद्धान्त, 'कि मेने गुणा गुणिनो भिन्ना आहोस्विदमिन्ना? इति, अने-
कान्तात्मकत्वात्सकलवस्तुनः । एवंरूपे च वस्तुतच्येऽन्यथारूपं तत्प्रतिपादयन्तो मिथ्यावादिनो भवन्तीत्याह-"ण वि
अस्थि अण्णवाओ, ण वि तवाओ जिणोवएमम्भि !। तं चेव य मणना, अवमणताण याणं ति।।३-२६॥" नैवास्त्यन्यवादो
गुणगुणिनो प्यनन्यवादो जिनोपदेशे द्वादशाङ्गे प्रवचने, सर्वत्र कथञ्चिदित्याश्रयणात् ,तदेवान्यदेवेति वामन्यमाना
मननीयमेवावमन्यमाना वादिनोऽभ्युपगतविषयावज्ञाविधायित्वादज्ञा भवन्ति, अभ्युपगमनीयवस्त्वस्तित्वप्रतिपादकोपायनि-
मित्तापरिज्ञानान्मृषावादिवदिति तात्पर्यार्थः । ततोऽनेकान्तबाद एव व्यवस्थितः ॥ ननु सर्वत्राऽनेकान्त इति नियमेऽनेकान्तेऽ-
वादिमत-
खण्डनयु-
क्तयःगुण-
गुणिमेदा-
भेदरूपव-
स्तुतत्त्वा-
स्वीकारे
मिथ्यात्व-
प्रदर्शनम् ॥
॥ ८३॥
प्यनेकान्तादेकान्तप्रसक्तिरिति चेत् ,अत्र वदन्ति- "भयणा वि हु भइयचा, जह भयणा भयइ सबदबाई॥ एवं भयणाणियमो वि, होइ समयाविरोहेण!॥३-२७॥"यथा भजनाऽनेकान्तो भजते-मर्ववस्तूनि तदेतत्स्वभावतया ज्ञापयति, तथा भज- नाप्यनेकान्तोऽपि, भजनीया-अनेकान्तोऽप्यनेकान्त इतीष्टमस्माकं इति नयप्रमाणापेक्षयैकान्तश्चानेकान्तश्चेत्येवमसौ ज्ञाप. नीयः, तथाहि नित्यानित्यादिशबलैकम्वरूप वस्तुनि नित्यत्वानित्यत्वाद्यकतरधर्मावच्छेदकारच्छेदेनैकतरधर्मात्मकत्वमुभया- वच्छेदेन चोभयात्मकत्वं तथा नित्यानित्यत्वादिमप्तधर्मात्मकत्वप्रतिपादकतापर्याप्त्यधिकरणेऽनेकान्तमहावाक्येऽपि सक- लनयवाक्यावच्छेदेनोक्तरूपमनेकान्तात्मकत्वं प्रत्येकन यवाक्यावच्छेदेन चैकान्तात्मकत्वं न दुर्वच मिति भावः । एतदेवाह एवमुक्तरीत्या, भजनाऽनेकान्तः सम्भवति, नियमश्चैकान्तश्च, समयस्य सिद्धान्तस्य-" रयणप्पभा सिय मासया सिय असासया"-इत्येवमनेकान्तप्रतिपादकस्य-" दवट्टयाए सासया पञ्जवट्टयाए असासया "-इत्येवं चैकान्ता- भिधायकस्याविरोधेन । न चैवमव्यापकोऽनेकान्तवादः, स्यात्पदसंसूचिनानेकान्नगर्भस्यैवैकान्तस्वभावत्वादनेकान्तस्यापि स्यात्कारलाञ्छनैकान्तगर्भस्यानेकान्तस्वभावत्वात् । न चानवस्था देशकानाभ्यामवयवावयविरूपस्य वस्तुन इव स्या- द्वादस्याप्येकान्तानेकान्तात्मकस्यैव प्रमाणादेव प्रतीतेः, भिन्नैकान्ताऽनेकान्तावलम्बनेऽप्यस्या ज्ञप्तिविरोधित्वाभावा- स्वसामग्रीमहिम्ना तादृशस्यैवोत्पत्तेमिथोऽनपेक्षणादुत्पत्तिविरोधिनाया अपि वक्तुमशक्यत्वात् , न चोत्पत्तिज्ञप्त्यन्यतरा- प्रतिबन्धिकाप्यनवस्था दूषणं, यत्तार्किका:-" मूलक्षयकरी प्राहु-रनवस्थां हि दूषणम् ।। इति, न चेदेवं तदा प्रमे- यत्वे प्रमेयत्वायुपगमेऽप्यनवस्थादोषो दुर्निवारः स्यात्, यद्वा यथा नैयायिकादीनां 'घटाभावोऽतिरिक्त एव, तदभावश्च अनेकान्त- स्यव्यापक- त्वेऽनेका- न्तेय- नेकान्ता- ङ्गीकारे ए- कान्ताप- त्तिपरिहार: सिद्धान्ताऽ- विरोधप्र- दर्शनं च ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम्
घट एव, तृतीयाभावश्चाद्य एव, चतुर्थश्च द्वितीय एव' इत्यादिरीत्या नानवस्था तथाऽस्माकं अनेकान्तः१, अनेकान्तानेकान्त
एकान्तः२, तदनेकान्त आद्य एव, तदनेकान्तश्च द्वितीय एवेति तृतीयचतुर्थाद्यनेकान्तानामाद्यद्वितीययोरेव पर्यवमानात्काऽन-
वस्था नाम । एकान्तनियामकस्वपररूपयोरनवस्थानादेकान्तगर्भानेकान्तस्य परिज्ञातुमशक्यत्वाज्झप्तिप्रतिबन्धिकैवेयमनवस्थे-
ति कश्चित्, तन्न, इत्थमपि 'गुडशुण्ठी' न्यायेनानवच्छिन्नानेकान्ते दोषाभावात् । सावच्छिन्नानेकान्तवादेऽपि सूक्ष्मा-
वच्छेदकजिज्ञासोपरम एवानेकान्तप्रयोगान्तरपरिश्रमोपरमेऽनवस्थानवकाशादिति दिग् ॥ नन्वनेकान्तस्य व्यापकत्वे 'पद्
जीवनिकायास्तद्घाते चाधर्म' इत्यत्राप्यनेकान्तः स्यादिति चेत् , अत्राहुः ॥ “णियमेण सद्दहतो, छक्काए भावओ ण सद्द-
हइ ॥ हंदी अपज्जवेसु वि, सद्दहणा होइ अविभत्ता ॥३-२८॥" नियमेनावधारणेन षडेवैते जीवाः कायाश्चेन्येवं श्रद्दधानः
षदायान्भावतः परमार्थतो न श्रद्धत्ते. जीवराश्यपेक्षया तेषामेकत्वात्कायानामपि पुद्गलतयैकत्वात् , जीवपुद्गलप्रदेशानां
परस्पराऽविनिर्भागवृत्तित्वाजीवप्रदेशानां स्यादजीवत्वं, प्रत्येकं प्राधान्यविवक्षया स्यादनिकायत्वं, सूत्रविहितन्यायेन प्रवृ-
त्तस्याप्रमत्तस्य न हिंसेति, तद्धातेऽपि स्यादधर्म इति न भावमम्यग्दृष्टिरमी, द्रव्यसम्यग्दृष्टिस्तु स्यादेवान्यदर्शनासद्हनिवृत्त्या
जिनवचनरुचिस्वभावस्य संक्षेपसम्यक्त्वलक्षणत्वात् , तथा च पारमर्ष (उत्तरा० अ०२८) " अणभिग्गहियकुदिट्ठी, संखेवरुहत्ति
होइ णायबो॥अविसारओ परयणे, अणभिग्गहिओ य सेसेसु ॥२६॥ति"ततोऽपर्यायेष्वपिन विद्यन्तेऽचिर्मुर्मुरादयो विवक्षितपर्या
या येषु पुद्गलेषु तेष्वप्यविभक्तश्रद्धानं यत्तदपि भावत एव भवेदर्चिष्मानयं भावो भूतो भावी वेति,न हि भूतभाविपर्यायोपरक्त-
वाक्यं द्रव्यतः सत्यं भवति, 'सविशेषेण' इति न्यायाद् भूतभाविपर्यायध्वंसप्रागभावावगाहित्वात् ,तत्र द्रव्यतः सत्यत्वमिति चेत् ,
प्रमेयत्व-
घटाभावा-
दिदृष्टान्ते-
नानेकान्ते
प्रसक्ताऽन-
वस्थादोष-
परिहारः,
व्यापित्व-
मनेकान्त-
॥८४॥
स्य निष्टङ्कि-
तश्च॥
॥ ८४॥
न, तथापि धर्माशे द्रव्यतोऽविभक्तस्यापि धयंशे विभक्तस्य प्रत्ययस्य भावत एव सम्भवात् ,तन्नात्राप्यव्यापकोऽनेकान्तवादः।। वस्तुतो नियमेन पद कायान् श्रदधद्भावतो न सम्यग्दृष्टिरित्यत्रैव हेतुरयं, हन्दि यतः, अपर्यायेषु एकादिप्रकाररहि. तेषु पद्सु कायेषु श्रद्धाऽविभक्ता भवति स्याद्वादज्ञानपरिसमाप्याकाक्षापरिपूर्त्याऽविश्रान्ता भवति-" एगविहदुविह- तिविहा"-इत्यादिप्ररूपणयैव तद्विश्रान्तिसम्भवादित्ययमर्थोऽनुभवसम्मुखीन इति ध्येयम् । नन्वनेकान्तस्य व्यापकत्वे गच्छति तिष्ठतीत्यत्राप्यनेकान्तः स्यादिति चेत्, स्यादेवेत्याह-" गइपरिणयं गई चेव, केइ णियमेण दवियमिच्छति ॥ तं पि य उड्डगई, तहा गई अण्णहा अगई ।।३-२९॥" गतिक्रियापरिणतं द्रव्यं गतिमदेवेति केचिन्मन्यन्ते, तदपि गतिक्रियापरिणतं जीवद्रव्यं सर्वतो गमनायोगादृर्वादिप्रतिनियतदिग्गतिक तैर्वादिभिरभ्युपगन्तव्यं, एवं च तत्तथाप्रति- नियतदिग्गमनेन गतिमदन्यथा चागतिमदेव, अन्यथापि यदि गतिमत्स्यात् तदाऽभिप्रेतदेशप्राप्तिवदनभिप्रेतदेशमा- प्तिरपि तस्य भवेदित्यनुपलभ्यमानयुगपद्विरुद्धोभयदेशप्राप्तिप्रसक्तिरित्यत्राप्यनेकान्तो नाव्यापकः, अभिप्रेतगतिरेव तत्रा- नभिप्रेतागतिरिति चेत्, न, अनभिप्रेतगत्यभावाभावे प्रतिनियतगतिभावस्यैवाभावात् , तत्सद्भावे च तदवस्थोऽनेकान्तः । ननु गतिमदेवेत्येकान्तेन गतिसामान्यवति गतिसामान्याभावो निषिध्यते स च गतिविशेषाभावेन नापोद्यते, नहि विशेषा- भाव एव सामान्याभाव इति कोऽयमनेकान्त इति चेत् , न, गतिसामान्यवत्यपि गतिविशेषाभावेन भावाभावोभयरूपता- समावेशादेवानेकान्तसाम्राज्यात् । न च विशेषाभावेभ्यः सामान्याभावोऽपि सर्वथातिरिक्तः, किन्तु यावद्विशेषाभावाधि- करणावच्छेदेनातिरिक्तो यत्किञ्चिद्विशेषाभावाधिकरणावच्छेदेन चानतिरिक्त इति गतिसामान्यवति विशेषरूपेण तत्सामा- अनेकान्त- वादस्य वि. श्वव्यापक- त्वं तत्र स- म्मतिमहा- तर्कग्रन्थ- संवादो नि- दर्शनानि.
भी
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ।।
न्याभावोऽपि न दुर्लभः । गतिमति गतित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकामावनिषेधानकान्तव्याघात इति चेत्, न, सामान्यरू-
पेण विशेषाभावमादायेत्थमपि वक्तुमशक्यत्वात् , गतित्वावच्छिन्नगतिसामान्यनिष्ठप्रतियोगिताकाभावेन सह गतिसा-
मान्यविरोधैकान्त एवेति चेत्, न, सामान्यावच्छिन्नप्रतियोगिताकत्वस्याधिकरणविशेषावच्छेदेनैव सम्भवात् , तत्तदधि-
करणान्तर्भावेन विरोधाविरोधयोरप्यनेकान्तस्यैव साम्राज्यात् । यदि च सामान्यावच्छिनप्रतियोगिताकोऽभावोऽतिरिक्त
एव तदा द्रव्यविशेपे रूपं न तु द्रव्यसामान्य इति प्रतीत्या सामान्यावच्छिन्नाधिकरणताकोऽप्यभावोऽतिरिक्तोऽभ्युपगन्त.
व्यः, तस्मादभावस्य सामान्याधिकरणकत्वस्य सामान्यप्रतियोगिकत्वस्य स्वतः सामान्यविशेषभावस्य चानेकान्तकोडी-
कृतत्वादावाभावयोर्विरोधाविरोधावपि तादृशावेवेत्यभिप्रायात् । एतेन ‘भावाभावसामान्ययोरेव विरोधकल्पनाभेदाभेदा-
धनेकान्तसमावेशोऽप्रामाणिकः' इत्यपास्तं, विरोधस्यापि विशेषविश्रान्तत्वेन यथानुभवं गुणगुण्यादिभेदाभेदाद्यविरोधकल्पन
एव लाघवादित्यधिक मत्कृतनयरहस्ये । स्यादेनद् , दहनादहनः पचनात्पचन इत्यत्राप्यनेकान्ते दहनादावदहनादिवि-
रुद्धरूपस्य सम्भवात् स्वरूपाभावप्रसङ्गस्तत्राह गुणनिवत्तियसण्णा, एवं दहणादओ वि दट्टछा ॥ जंतु जहापडि-
सिद्धं, दवमदवं तहा होइ ।। ३-३०॥" गुणेन दहनादिना निर्वर्तिता उत्पादिता संज्ञा येषां तेऽपि दहनपचनादयः,
एवमेवानेकान्तात्मका द्रष्टव्याः, तथा हि दाहपरिणामयोग्यं तृणादिकं दहतीति दहन:, तदपरिणतिस्वभावं त्वात्माका-
शाप्राप्तवज्राण्यादिकं न दहतीत्यदहनः, तेन यद्रव्यं यथा दहनरूपतया प्रतिषिद्धं, तद्रव्यमदहनादिकं, तथा भजनाप्र-
कारेण स्याद्दहनः स्यान्नेति भवति, ततो नाव्याप्यऽनेकान्तः । तथाऽदहन इत्यत्राप्यनेकान्तः, तथाहि यदुदकद्रव्यं दह-
अनेकान्त-
वादस्य वि-
श्वव्यापक-
त्वं तत्र स-
म्मतिमहा-
तर्कग्रन्थ-
संवादो नि-
दर्शनानि-
च ॥
॥८५॥
॥ ८० ॥
त्वात्, अनेकान्त- वादे जीवा- जीवद्रव्य- विपर्यास- शंकानिरा- सः, अने- नरूपेण प्रतिषिद्धं दहनो न भवतीत्यदहन इति भवति तदपि न सर्वथाऽदहनद्रव्यं भवति, पृथिव्यादेरदहनरूपाद् व्यावृत्त- अन्यथा दहनव्यतिरिक्तभूतैकत्वप्रसङ्ग इत्यनेकान्त एव, दहनव्यावृत्तस्य तदतद्रव्यत्वात् । नन्वेवं तदतद्रव्यत्वा- जीवद्रव्यमजीवद्रव्यं अजीवद्रव्यं च जीवद्रव्यं स्यात् इत्याशङ्कायामाह- "कुंभो ण जीवदवियं, जीवो धिण होइ कुंभदवियं ति || तम्हा दोवि अदवियं, अण्णोण्णविसेसिया होति ॥१॥३-३१॥" कुम्भो जीवद्रव्यं न भवति, जीवोऽपि न भवति घटद्रव्य, तस्माद्वावप्यद्रव्यमन्योन्यविशेषितौ परस्पराभावात्मको, यतोऽयमभिप्रायः जीवद्रव्यं कुम्भादेरजीवद्रव्याद्, व्यावृत्तमव्यावृत्तं वा, प्रथमपक्षे स्वरूपापेक्षया जीवो जीवद्रव्यं कुम्भाद्यजी- बद्रव्यापेक्षया तु न जीवद्रव्यमित्युभयरूपत्वादनेकान्त एव । द्वितीयविकल्पे तु सर्वस्य सर्वात्मकत्वापत्तेः, प्रतिनियतरूपाभा- वतस्तयोरभावः खरविपाणवत् , ततः सर्वमनेकान्तात्मकम् , अन्यथा प्रतिनियतरूपतानुपपत्तेरिति व्यवस्थितम् “अनेकान्त- व्यवस्थिति श्रद्धैव भावतः सम्यक्त्वम्", तद्विकलानामुत्कृष्टचारित्रानुष्ठानस्यापि तथाविधफलाभावात् , तदुक्तं वादिगजके. सरिणा श्रीसिद्धसेनदिवाकरेण-" चरणकरणप्पहाणा, ससमयपरसमयमुक्कवावारा ॥ चरणकरणस्स सारं, णिच्छय- सुद्धं ण याणंति ॥ ३-६७ ।। चरणं श्रमणधर्मः ॥ वयममणधम्मसंजम-वेयावचं च बंभगुत्तीओ ॥ नाणाइतियं तवको- हणिग्गहाई चरणमेयं ॥ १ ॥" इति वचनात् । व्रतानि हिंसाविरमणादीनि पञ्च, श्रमणधर्मः क्षान्त्यादिर्दशधा, संयमः पश्चाश्रयविरमणादिः सप्तदेशभेदः, वैयावृत्त्यं दशधाऽऽचार्याराधनादि, ब्रह्मगुप्तयो नव वसत्यादयः, ज्ञाना- दित्रितयं ज्ञानदर्शनचारित्राणि, तपो द्वादशधाऽनशनादि, क्रोधादिपायषोडशकस्य निग्रहश्चेत्यष्टधा चरणम् ॥ करणं कान्तव्य- वस्थानि- यस्यैव भावस- म्यक्त्वो- पदेशः' ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
पिण्ड विशुद्ध्यादि "पिंडविसोही समिई, भावणपडिमा य इंदियनिरोहो ॥ पडिलेहणगुत्तीओ, अभिग्गहा चेव करणं तु ॥१॥"
इति वचनात् । तत्र पिण्डविशुद्विस्त्रिकोटिपरिशुद्धिराहारस्य, समितिरीर्यासमित्यादिः पञ्चधा, भावना अनित्य-
त्वादिका द्वादश, प्रतिमा मासादिका द्वादश भिक्षूणां, दर्शनादिका एकादशोपासकानाम् , इन्द्रियनिरोधश्चक्षुरादिकरण-
पञ्चकसंयमः, प्रतिलेग्वनं मुखवस्त्रिकाद्युपकरणप्रत्युपेक्षणमनेकविध, गुप्तिमनोवाकायसंवरणलक्षणा विधा, अभिग्रहा वस-
तिप्रमार्जनादयोऽनेकविधाः। एतयोश्चरणकरणयोः प्रधानास्तदनुष्ठानतत्पराः, स्वसमयपरसमयमुक्तव्यापारा:-
अयं स्वसमयोऽनेकान्तात्मकवस्तुस्वरूपप्ररूपणाद् , अयं च परममयः केवल नयाभिप्रायप्रतिपादनादित्येतस्मिन् परिज्ञानेऽ-
नादृताः, अनेकान्तात्मकवस्तुतचं यथावदनवबुध्यमानास्तदितरव्यवच्छेदेनेति यावत् , चरणकरणयोः सारं फलं, निश्च-
यशुद्धं निश्रयश्च तच्छुद्धं च ज्ञानदर्शनोपयोगात्मकं, निष्कलङ्क न जानन्ति नानुभवन्ति, ज्ञानदर्शनचारित्रात्मककारणप्र-
भवत्वात्तस्य, कारणाऽभावे च कार्यस्यासम्भवात् , अन्यथा तस्य निर्हेतुकत्वापत्तेः, करणचरणयोश्च चारित्रात्मकत्वात् ,
द्रव्यपर्यायात्मकजीवादितत्वावगमस्वभावरुच्यभावेऽभावात् , अथवा चरणकरणयोः सारं निश्चयेन शुद्धं सम्यग्दर्शनं ते न
जानन्ति, न हि यथावस्थितवस्तुतच्चावबोधमन्तरेण तद्रुचिः, न चम्बसमयपरसमयतात्पर्यार्थानवगमे तदवबोधो बोटिकादेरिव
सम्भवी । अथ जीवादिद्रव्यार्थपर्यायार्थापरिज्ञानेऽपि यदर्हद्भिरुक्तं तदेवैकं सत्यमित्येतावतैव सम्यग्दर्शनसद्भावः-"
तमेव सच्चं णिस्संकं जं जिणेहिं पण्णत्तं "--इत्याद्यागमप्रामाण्यात्, न, स्वममयपरसमयपरमार्थानभिज्ञेनिरावरणज्ञान-
दर्शनात्मकजिनस्वरूपाज्ञानवद्भिस्तदभिहितभावानां सामान्यरूपतयाप्यन्यव्यवच्छेदेन सत्यस्वरूपत्वेन ज्ञातुमशक्यत्वादवि-
अनेकान्त-
वादश्रद्ध-
या भावस-
म्यक्त्व-
प्ररूपण-
प्रसङ्गेनोप.
देशरह-
॥८६॥
स्यम् ॥
भण्ण
॥८६॥
भक्तसर्वज्ञश्रद्धानस्य चापुनर्बन्धकादिसम्भवित्वेन सम्यग्दर्शनानियामकत्वात् , नन्वेवमागमविरोधः, सामायिकमात्रपद- विन्माषतुषादेर्यथोक्तचारित्रिणस्तस्य मुक्तिप्रतिपादनात् , सकलशास्त्रार्थज्ञताविकलस्य व्रताद्याचरणनैरर्थक्यापत्तेश्च, तत्सा- ध्यफलानवाप्तेः, न च यथोपदर्शितचरणकरणे सम्यग्दर्शनवैकल्ये सम्भवतो ज्ञानादित्रितयस्यापि तत्र पाठादिति, मैवम् , ये यथोदितचरणकरणप्ररूपणासेवनद्वारेण प्रधानादाचार्यात्स्वसमयपरसमयमुक्तव्यापारा न भवन्तीति नजोऽत्र सम्बन्धात् ते- चरणकरणसारं निश्चयशुद्धं जानन्त्येव, गुर्वाज्ञया प्रवृत्तेः, चरणगुणस्थितस्य साधोः सर्वनयविशुद्धतयाभ्युपगमात् , " तं सवणयविसुद्ध" इत्याद्यागमप्रामाण्यात्।अगीतार्थस्यापि गीतार्थनिश्रितस्य तत्पारतन्त्र्यस्यैव फलतो ज्ञानदर्शनलक्षणत्वात् । आह च हरिभद्राचार्यः (पंचाशके) "गुरुपारतंतनाणं, सदहणं एयसंगयं चेव ॥ एत्तो उ चरित्तीणं, मासतुसाईण निद्दिट्ट ॥११-७॥त्ति" गीतार्थाऽनिश्रिताऽगीतार्थस्य स्वतन्त्रचरणकरणप्रवृत्तस्य व्रताउनुष्ठानवैफल्यं त्वभ्युपगम्यत एव-"गीयत्यो य विहारो, बीओ गीयत्थमीसि(निस्सि)ओ भणिओ ॥ [इत्तो तइयविहारो, नाणुनाओ जिणवरेहि ॥]" इत्यायागमप्रामा- ण्यात् । तदेवं व्याख्यानद्वयेनानेकान्ततत्वविदुषस्तदाज्ञापरस्य वा महाव्रतधारिणश्चारित्रसाफल्यं, नान्यस्येति व्यवस्थित- मिति मोक्षार्थिभिः पुरुषसिंहैरनेकान्ततत्त्वपरिज्ञानाय भूयानुद्यमो विधेयः ॥ अनेकान्त. वादसर्वस्व- निरूपण- प्रसङ्गेन मोक्षार्थि- भिरादरणी- यतवोप- देशः॥ ........................000000000000000000000000000000000.....000000000000000000000.........00000000000000000000000.00 ॥ इति श्रीजैनतत्यपराभिधानं श्रीअनेकान्ततत्त्वव्यवस्थाप्रकरणं सम्पूर्णम् ॥ D .....00000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000
॥ अथ श्री-अनेकान्तवादस्य विश्वव्यापकत्वरूपमाहात्म्यप्रदर्शयित्री प्रशस्तिः॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ॥
अनेकान्त-
वादमाहा-
त्म्यप्रद-
र्शिका प्र-
शस्तिः॥
अनेकान्त-
॥८७॥
स्य सर्वदर्श-
विना यं लोकानामपि न घटते संव्यवहृतिः, समर्था नैवार्थानधिगमयितुं शब्दरचना ॥
वितण्डाचाण्डाली स्पृशति च विवादव्यसनिनं, नमस्तस्मै कस्मैचिदनिशमनेकान्तमहसे ॥१॥
कथायां लुप्यन्ते वियति वत तारा इव रवौ, नयाः सर्वे दीप्ता अपि समुदिते यत्र सहसा ॥
उदासीने त्वब्धाविव जलतरङ्गा बहुविधाः, समन्ताल्लीयन्ते यत तमनेकान्तमनिशम् ॥ २ ॥
अनेकान्तं वादं यदि सकलनिर्वाहकुशलं, मतानि स्पर्धन्ते नयलयसमुत्थानि बहुधा ।।
तदा किं नो भावी
बहुलकलिकौतूहलवशाद् , घटानां निर्मातुस्त्रिभुवनविधातुश्च कलहः ॥ ३ ॥
मिथो द्राग् युध्यन्ते महिषसदृशा ये परनयाः, प्रयातारः खेदं त इह बहुधा जर्जरतराः ।।
अनेकान्तो द्रष्टा पुनरवनिपालः प्रकृतितः, परावृत्ति नभ्यो ब्रजति परिपूर्णाभिलषितः॥४॥
विरुद्वैः सत्वाचैरिह बहुगुणैर्गुम्फिततर्नु, प्रधान यो वाञ्छत्यखिलजगतः सर्गनिपुणम् ।।
अनेकान्तं सांख्यः स कथमवमन्येत विलसेत्, प्रमाणाक्षक्रीडारसिकहृदयश्चेत्परिषदि ॥५॥
अपद्धं तत्वेन व्यवहतियशाहद्धमुपयन्, परं ब्रथ व्यष्ट्या जगदपि समष्ट्या च विविधम् ॥
तपस्वी वेदान्ती धरतु बदनेनास्यकथा-मनेकान् कान्तं स्मरति हृदयेन त्वविकलम् ॥ ६ ॥
नसम्मत-
त्वं च ॥
॥ ८७॥
अनेकान्त- माहात्म्य- प्रदर्शिका प्रशस्तिः॥ अनेकान्त- स्य सर्वद- प्रमाणं नीलादौ क्षणपरिचयादौ च न तथा, वदन्नेकं ज्ञानं सुगततनयश्चित्रमपि च ॥ अनेकान्तं स्वान्ते स्मरति यदि नो तन्निजमत-ग्रहावेशक्लेशः क्षपयति तदीयं गुणगणम् ॥ ७॥ घटे चित्रं रूपं पृथगपि च नीलादिकमपि, ब्रुवाणी हेतुं वाप्यजनकमपीष्टान्यविधया ।। अनेकान्तं छेत्तुं बत कथमुभौ योगकणभुक्-तनुजी स्वारूढद्रुमविटपतुल्यं प्रभवतः ॥ ८ ॥ परोक्षं मेयांशे किमपि म(मि)तिमात्रंशविषयेऽ-परोक्षं चैकं यः प्रभणति गुरुनिमवशः। परोपि द्वैरूप्यं जगति कलयन जैमिनिसुतः, कुतः स्याद्वादं यस्पृहयति न रुच्यार्थविमुखः ॥९॥ न यन्नाम ब्रूते समयविगमहीपरवशा, हृदा तु स्नेहं न त्यजति विपुलं यद्गुणकृतम् ॥ अनेकान्तस्याग्रे कलितविनया मौनरचना-दिदानी सञ्जाता ननु नववधू,दिपरिषत् ॥ १० ॥ स्मिताक्षीणां मुक्तौ सकलविदि भुक्तौ च न भजे-न्मुनीन्दूनां धर्मोपकरणविधौ चापि भजनम् ।। विहस्तो दिग्वासा यदि मदिरयेवावृतमतिः, प्रसिद्धैः सिद्धान्तैस्तदहह महरिशुदयेत् ॥ ११ ॥ क्रियायां ज्ञाने च व्यवहृतिविधौ निश्चयपदे-ऽपवादे चोत्सर्गे कलितमिलितापेक्षणसु(मु)वैः ॥ हतैकान्तध्वान्तं मतमिदमनेकान्तमहसा, पवित्रं जैनेन्द्र जयति सितवस्त्रयतिवृषैः ॥ १२ ॥ इमं ग्रन्थं कृत्वा विषयविषविक्षेपकलुषं, फलं नान्यद् याचे किमपि भवभूतिप्रभृतिकम् ।। इहामुत्रापि स्तान्मम मतिरनेकान्तविषये, ध्रुवेत्येतद् याचे तदिदमनुयाचध्वमपरे ॥ १३ ॥ र्शनसम्म- तत्वं च ॥
श्री
अनेकान्त-
व्यवस्था-
प्रकरणम् ।।
सूरिश्रीविजयादिदेवसुगुरोः पट्टाम्बराहमणो, सूरिश्रीविजयादिसिंहसुगुरौ शक्रासनं भेजुषि ।।
सूरिश्रीविजयप्रभे श्रितवति प्राज्यं च राज्यं कृतो, ग्रन्थोऽयं वितनोतु कोविदकुले मोदं विनोदं तथा ॥१॥
वाचकपरिषत्तिलक-श्रीमत्कल्याणविजयगणिशिष्याः॥श्रीलाभविजयविबुधा, अभवन्विद्यावतां धुर्याार
श्रीजीतविजयविवुधा-स्तेषां शिष्यास्तपागणप्रथिताः॥ तेषां सतीर्थमुख्याः,श्रीनयविजयाभिधा विबुधाः॥३
तत्पादपश्नमधुपः, श्रीपद्मविजयानुजः ॥ सत्तर्कमकरोदेनं, यशोविजयवाचकः ॥४॥
ग्रन्थकृत्प-
रम्पराप्र-
शस्तिः ॥
॥८८॥
॥ इति जगद्गुरुविरुदधारकभट्टारकश्रीहीरविजयसूरिपुरन्दरशिष्यमुख्यषट्तीविशारदमहोपाध्याय-
श्रीकल्याणविजयगणिशिष्यतिलकपण्डितश्रीलाभविजयगणिशिष्यकोटीरपण्डितश्रीजीतविजयगणि-
सतीर्थ्यालङ्कारपण्डितश्रीनयविजयगणिचरणकमलचञ्चरीकेण पण्डितश्रीपद्मविजयगणि-
सहोदरेणोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिना विरचितोऽनेकान्तव्यवस्थाभिधान:
श्रीजैनतर्कग्रन्थः सम्पूर्णः ॥
-
प्रत्यक्षरं निरूप्यास्य, ग्रन्थमानं विनिश्चितम् ।। त्रिसहस्री त्रिशती च, सप्तपश्चाशदुत्तरा ॥१॥
॥८८॥