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Dharmadas Ji Ki Shabdavali
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भी पुषिक्षी नागरी भार
धनी
धरमदासजी की शब्दावली
जीवन-चरित्र सहित
जिस मैं
उन महात्मा के अति कोमल पद मुख्य मुख्य
अंगों और रागाँ मैं और उन का बारहमासा,
पहाड़ा, नाम लीला और मुक्ति लीला
छपी हैं .
और
गूढ़
शब्दों के अर्थ व संकेत नोट में
लिख दिये गये हैं
[कोई साहेब बिना इजाज़त इस पुस्तक को नहीं छाप सकते]
इलाहाबाद
बेलवेडियर स्टीम प्रिंटिंग धस में प्रकाशित हुई।
सन १९९२ ईस्वी
१८ पृष्ठ]
(दाम ।
॥ संतबानी॥ -प्रसिद्ध महा. संसयानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय लक्त-प्र माओं की धामी व उपदेश को जिन का लोप होता जाता है बचा लेने का है। अब तक जितनी बानियाँ हम ने शापी है उन में से विशेष तो पहिले छपी ही नहीं थीं और कोई २ जो छपी थी तो ऐसे छिन्न भिन्न और बेजोड़ रूप में या छेपक त्रुटि और गलती से भरी हुई कि उन से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था। हम ने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ ऐसे हस्तलिखित दुर्लभ ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक मिल सके अमल या नकल कराके मंगवाये हैं और यह कार्रवाई यरायर जारी है। मर मझ तो पूरे ग्रंघ मँगा कर छापे जाते हैं और फुटकर शब्दों की हालत में सर्व साधारन के उपकारक पद धुन लिये जाते हैं। कोई पुस्तक थिना कई लिपियों का मुकाबला किये और दीफ रीति से शोधे नहीं छापी जाती, ऐसा नहीं होता कि औरौं के छापे हुए ग्रंथों की भाँति बेसमझे और येशाचे खाप दी जाय । लिपि के शोधने में प्रायः उन्हीं ग्रंथकार महात्मा के पंथ के जानकार अनुयायी से सहायता ली जाती है और शब्दों के धुनने में यह भी ध्यान रखा जाता है कि वह सर्व साधारन की रुचि के अनुसार और ऐसे मनोहर और हृदय-वेधक हौं जिन से आँख हटाने का जो न चाहे और अंतःकरन शुद्ध हो । कई परम से यह पुस्तक-माला छप रही है और जो जो कसरें जान पड़ती हैं वह आगे के लिये दूर की जाती हैं । कठिन और अनूठे शब्दो के अर्थ और संकेत नोट में दे दिये जाते हैं। जिन महात्मा की यानी है उन का जीवन-चरित्र भी साथ ही छापा जाता है और जिन भक्तों और महापुरुषों के नाम किसी बानी में आये हैं उन के संक्षेप वृत्तांत और कौतुक फुट-नोट में लिख दिये जाते हैं। पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के लो दोपडन की दृष्टि में भावै उन्हें हमको कृपा करके जिस भे# जिस से वह दूसरे दापे मैं दूर कर दिये जाय और जो दुर्लभ ग्रंप संतधानी के उनको मिल उन्हें भेज कर इस परोपकार के काम में सहायता करें।
सूचीपत्र पृष्ठ (१-८) जीवन-चरित्र . शब्द अचरज ख्याल हमारे देसवा ... अचवन कीजे गुरु ३५ ३० ... .. ... ... . ... ... .. ... २० 3. ... ... ... ... ... ... ... ... अव गुरु मिसे सनेही प्रय माहिँ दर्सन देह अमरलोक से हम आज आनंद भये मेरे घर माज घड़ी भानन्द की आज घर माये साहा मार आश मेरे सतगुरु माये आठ घाग के पुरिया रे .. ... ... ... ... ९३ ... sa शाये दीन दयाल ... .. ... ... १६ भारत शुरु कबीर की भारत बंदीछोर भारत माहि तुम्हारी .0 ... ... : ऐ ऐसी भारत कही -१७ ऐसी शारत दियो ... क - .. ६३ ... 400 ... कब तुम मिलिहा कहवा से जिय प्रायल कहो केते दिन जिययी हो बुझाय दरद को भरमत भटकत फिरो. केहि विधि प्रीतम पाइये कैसे आरत करें ... ... १३ . ... . ३१ ख खेलत रहलों अँगनयाँ सखी सूचीपत्र । शब्द खेलत रहला बाया चावरिया खाजहु संत सुजान पृष्ठ ३४ .. .. ग ... ... गगन पिय बंसी फेरि गाँठ परी पिया बोले न .. ७५ .00 ... गुन कर चोरी .. ... ... .. 404 ३ १९ ... ... ... ... ... .. or गुरु पद अहै सवन से भारी गुरु पैयाँ लागे गुरु मिले अगम के बासी गुरु मेाहिँ सजीवन मूर दई गुरू धिन कौन हरे गुरू माहिँ खूब निहाल किया .. ... १५ ... . ... घ घडा एक नीर का फूटा .. च ... .४३ ४४ ... ... ... ... .... ... 3 ... चढ़ि अमवा की डारि चढ़ि नौरंगिया की डारि घरन छाँड़ि प्रभु जावें कहाँ चलो सखि देखन चलिये चलो साहंगम नारि चलो हंसा सतलोक चाकर है। निज नाम का चेतो हंसा चेतो कोई ... ... ... ... OL ६ ... ... ... ... ... ... २९ जग ये दोउ खेलत होरी जमुनिया की हारि मारी ला के दुवरवा जमिरिया जागु यहुरिया जेहि सुमिरे गुन का भये ... ... ... ११ । सूचीपत्र । ३ झरि लागै महलिया ... त ... ... तुम सतगुरु हम सेवक तुम संतो खेलु सम्हारि ... घोरे दिन की जिंदगी .. दीनानाथ दयाल देवो न देवो प्रभु जन अपने को ... ७. ध ... ... ... ... ... धन हो धन साहेब धनुप बान लिये धरमदास भारती साजा धर्मनि वा देस हमारी ४६ १६ ... .. ... ... ... ... .." नाम रटन रट लागि रहै नाम रम ऐसा है भाई नेन दरस बिन मरत नैनन आगे ख्याल ... ... ... .. ... ... १२ ६८ .. ... प .. ... ... ... .. पढ़ सुगना सतनाम पधारी साहेब पाहुना 'प्यारे कंत से मिलि पिया परदेसिया 'पिया बिन मोहिं नींद न आवै पिया बिना माहि नीक ५४ ५७ ७४ ... ... .. . 400 644 +00 १५ व . . बधावा संत जाऊँ हो .. 1- सूचीपत्र । पृष्ठ ६७ 93 ... ... . ... ... গল্প बरनों मैं साहेब तुम्हरे बरनों संत समाज -बाजा बाजा रहित का बिल दरसन भइ बावरी बिरले साधू पावै हो धुढ़िया ने काता सूत बंदी-छोर बिनती सुनि लीज ... .. . २३ ... सा ३६ २२ ... ... ... , भक्ति दान गुरु दीजिये भव सागर नदिया ७३ ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... मन रहो शासन मारि मितक मडैया सूनी मिहरबान है साहेब मेरा मेरे मन बसि गये मेहीं मेही बुकवा पिसावो मैं तो तार भजन भरोसे व्यापारी नाम का मैं हेरि रहूं नैना साँ मोर मन लागा साहेब से मोरा पिया बसे मारे आये संत सनेही मेरे पिया मिले २५ ... ... १२ २९ ... .. ५६ ... ... ... य यह जिव रहत भुलाइ ४१ वा करता को सेइये ... स ७४ सइयाँ महरा मार डालिया सखि अनहद धाम निवास ...
सूचीपत्र। पृष्ठ ... ... ४८ ४० ... ५२. सजन से प्रीत माहिं सतगुरु आये द्वार मन मैं.. सतगुरु माये द्वार सुरति रस सतगुरु प्रायो हमरे देस सतगुरु कहत नाम गुन सतगुरु के उपदेस फिरो सतगुरु चारित बरन से सतगुरु.धोबी जो मिले सतगुरु सगुन धरावो सतगुरु सनमुख वैठि के सतगुरू.सरन में आइ सत नाम जपु जग सत्त सकत सत नाम सब्द की बेरिया जात सब्द सिंहासन पाट में साजन हमरे दरस सतगुरु साहेव कौन कमी साहेब कौन देश मोहि साहेब खेइ लगावी पारा साहेब चितवो हमरी ओर साहेब तेरी देखाँ साहेब दीनबंधु साहेव पतिया पठाये साहेब बूष्ठत नाव साहेब बंदी-छोर हमारे साहेब.मेटी चूक... साहेब मोर बसत अगमपुर साहेब मारी ओर निहारी साहेब मारी बहियाँ साहेब मोरे दीन्ही साहेय मोरे पठई साहेब.माहि दरमन दीजे हो १२. १४ ... ४४. २२ २६ ६२ ७२ सूचीपत्र। पृष्ट ... . ७२ ... ... शब्द साहेब येहि विधि ना मिले साहेय ले चलो साहेय साहेबी तन हेरो साहेब सतगुरु घर आया हो साहेब हमरे सहा सकृत.फूल गुलाय को सुधित हो मब्द विचारो हो 'सुरत निरत दौठ सुरत पर सतगुर सूतल रहला मैं सखियाँ संफा भारति नाम तुम्हारा साँई मैं असल गुलाम साँझ भई पिया यिन ७१ .३७ ... ... ११ २१ ...: .४५ १८' २४ ... ह ११ हमरा बियाह करो हमरी उमिरिया हमरे का फरे हाँसी लोग हम सत्त नाम के वैपारी हमैं एक अचरज जानि पहे हीरा झलकै द्वार पर होरी खेली सयानी हंस उबारन सतगुरु हंस उयारि अपन करि ... ... ... १८ ज्ञ ... शाम की धुनरी धुमल ... वारह मासा पहाड़ा नाम लीला मुक्ति लीला ७७ ८१ धर्मदासजी का जीवन-चरित्र धनी धर्मदासजी जाति के काँधन बनिये बांधागढ़ नगर के भारी महाजन थे। उनके जीवन और मृत्यु के समय का उनके मत वालों या किसी ग्रंथ से ठीक ठीक पता नहीं चलता परन्तु इतना पक्का है कि कबीर साहेब से इनकी अवस्था कम थी और उनके पन्द्रह बीस वरस पीछे चोला छोड़ा । इस हिसाब से उनके जन्म का समय बिक्रमी सम्बत् १४७५ और १५०० के दर्मियान और परमधाम सिधारने का समय सम्बत् १६०० के करीब समझना चाहिये क्योंकि उन्होंने पूरी अवस्था को पहुँच कर शरीर त्याग किया। धर्मदास जी बाल अवस्था ही से बड़े धर्मात्मा और भगवत भक्त थे परन्तु आदि में पुराने कर्म धर्म और मूर्ति पूजन के बँधुए थे। सैकड़ों पंडितों और पुजारियों और साधुओं की उनके यहाँ सदा भीड़ भाड़ लगी रहती थी और अपना मुख्य समय ठाकुर की और शालग्राम की पूजन और ब्राह्मणों और साधुवाँ के खिलाने पिलाने और आदर सत्कार और कथा कीर्तन में खर्च करते थे और दूर दूर के तीर्थों में दर्शन और यात्रा कर पाये थे। जब धर्मदास जी के चेताने का समय आया तब सतगुरु कबीर साहेब पहिले उनसे मथुरा में मिले और रास्ते में चरचा मूर्ति पूजन और तीर्थ व्रत के खंडन और संत मत के मंडन की की। कुछ दिन पीछे धर्मदास जी काशी यात्रा को आये तब कबीर साहेब के फिर दर्शन, मिले और जो कुछ संशय भर्म धर्मदास जी के मन में बाकी रह गये थे उनको कबीर साहेब ने पूरी भाँति मिटा दिया और इसके पीछे संत मत का उपदेश देकर दया दृष्टि से उनके घट के पद खेल दिये। "अमर मुख निधान" ग्रंथ में कबीर साहेब और धर्मदामजी की गोष्टी विस्तार के साथ लिखी है-उसकी थोड़ी सी कड़ियाँ जिनमें धर्मदासजी के कबीर साहेब का दर्शन पाने और फिर काशी में शरण लेने का वर्णन है नीचे लिए जाते हैं--- २ जीवन-चरित्र ॥ रमैनी ।। . ॥ (जिन्द) चौपाई-कहै कबीर में काया सोधा । जो जस बूझि ताहि तस योधा ।। अपने घट में कीन्ह विचारा । देखों धरमदास दरवारा॥ धरमदास बंधो के वानी । प्रेम प्रीति भक्ती मैं जानी ॥ सालिगराम की सेवा करई । दया धरम बहुतै चित धरई ।। साधु भक्त के.चरन पखारै । भोजन कराइ अस्तुति अनुसारै ।। भागवत गीता बहुत कहाई । प्रेम भक्ति रस पियै अघाई॥ मनसा वाचा भजै गोपाला । तिलक देइ तुलसी की माला ।। द्वारिका जगन्नाथ होइ आये। गया बनारस गंगा नहाये। बोलत वचन सत्त सुभ वानी । या कहै कबहूँ ना जानी ॥ दोहा -राम कृप्न को सूमिरे, तीरथ व्रत दृढ़ चेटा। मथुरा परसत जब गये, भे कवीर सा मैट || चौपाई-जिंदा रूप जव घरे सरीरा । धरमदास मिलि गये कवीरा ।। उदित बदन मुदित सुख चैना । हँस मुसुकाइ कहे मुख वैना धरमदास तुम ही पड़ शानी। परम भक्त भक्ती मैं जानी ॥ तुम सा भक्त न देखों आना । धर्म तुम्हारा कवन स्थाना॥ कवन दिसा से तुम चलि आये । जैहो कहाँ कहा मन लाये ॥ काकी भक्ति करौ चित लाई । सो कित यसै कौन से ठाँई। पूछत मन में दुख जनि मानो। करता आदि पुरुष पहिचानो। काभे माला तिलक के दीन्हे । का भे तीरथ चरत के कीन्हे. का भे सुनत भागवत गीता । चिन्ता मिटी न मन को जीता। दोहा-जेहि कर्ता से ऊपजे, सो बसे, कौने देस।. ताहि चीन्ह परिचय करो, छोड़ सकल भ्रम भेस ॥ (धर्मदास जी) चौपाई-सुनि धर्मदास अचंभो भयऊ । ऐसो वचन काहु ना कहेऊ ॥ जिंद रूप इन ही कै देखा । कहत बचन सुख बहुत विवेका ।। सुनो जिंद मोरे , दृढ़ ज्ञाना । वास मोर. बंधों अस्थाना ॥ यरन कसौधन जाति को यानी । मजी राम कृप्न सारंग पानी ॥ पारब्रह्म सेवी चित लाई । सीताराम जपा सुखदाई ।। सेवा सालिगराम के पाऊँ। मई मुखी सची लय लाऊँ । * शेगड निवासी धनिये। जिलालि मुख पर। .
जीवन-चरित्र .' सकल भक्त के रहीं अधीना । गुरु सेवा जिन दिच्छा लीन्हा । चिरथा पचन सुनी ना कहऊँ। प्रेम भक्ति में निस दिन रहऊँ ॥ दोहा-मोरे संका कछु नहीं, सेवों धीरघुनाथ । (जिन) 5 प्रहलाद उवारिया, सो हरि हमरे साथ ॥ (जिद) मैं ही जिद सुनु यचन हमारा | तुम जनि होहु काल के चारा । राम नाम सब दुनी पुकारे । राम अगिन जो वाठे जारे ॥ काहे न सुरति करौ घट माहीं । चीन्ह चीन्ह वूडौ भव माहीं । जिन्हें कहत ही नंद के लाला ! सो तो भये सदन के काला॥ छल पल करि वे सय छलि डारे । पांडव जाइ हिवारे गारे ॥ पांडव सम को भक्त कहावा । तिनहुँ को काल वली भरमावा ॥ दसरथ सुत कहिये श्रीरामा । तिनहूँ चीन्ही काल अकामा ॥ करता राम कस भे,मति-हीना । कपट मृगा उनहूँ नहिं चीन्हा ॥ 'दोहा-दोउ करता विरतंत है, कीन्हे जम के काम । जीव अनेक प्रलय किये, ऐसे हप्न अरु राम ॥ चौपाई--धर्मदास है नाम तुम्हारा । काहे न चीन्ही वचन हमारा ॥ 'शान दृष्टि से चीन्ही बानी । पाखंड पाहन पालँड पानी ॥ करता पाखंड कबहुँ न होई । यह संलय सब दुनी विगोई ॥ सालिगराम है वोलनहाय । देह सरूप तन साजि हमारा ॥ धर्मदास सुनि चीन्हेउ ज्ञाना । हित के वचन सुनत मन माना ॥ कोई करता कहिये भगवाना । नाम मोर इन कैसे जाना ॥ इन कर यवन शान औगाहा । जिंद भेष धारे कोउ आहा॥ थापै सालिगराम न सेवा । तीरथ चरत को मेटै भेवा ॥ राम कृन को मेट बताना । अहै जिंद को कैसो शाना । दोहा-धर्मास मरटी रहे, बहुत खोज नहिं कीन्ह । सीधा ले डेरे गये, जिंद उतर नहिं दीन्ह ।। चौपाई-इतना गुष्ट बंजार में कीन्हा । आप दुकान में डेरा लीन्हा॥ धर्मदास पहुँचे निज डेरा ! मन महँ सोच कीन्ह बहुतेरा ।। बारह बरस तीर्थ हम कीन्हा । द्वारिका जाइ छाप हम लीन्हा । "श्रीनाथ परसे चित' लाई । राम नाथ दक्खिन होइ.नाई ।। दक्खिन परस गोदावारे गयेऊ । मेला भये दरसन तह कियेऊ ॥ * गहरा मौन, ।। भोजन की सामग्री । इप्रयाय । -- ४ जीवन-चरित्र परसि सिवाला औ हरिद्वारा । नीमपार मिस्त्र पग धारा॥ बद्रीनाथ दुवारे गयेऊ । श्रीविंद्रायन मथुरा अयेऊ ॥ ; दोहा-मकर त्रिवेनी परसेह, औ कासी अस्थान। औरौ परसे जगन्नाथ, गंगासागर किये अस्नान ॥ चौपाई-इतने तीर्थ छेत्र म धाये । यह दुसरे हम मथुरा आये ॥ राम नाम निज प्रान अधारा । सो यह जिंद मेटि सव डारा॥ कीजे कहा जिंद को भाई । जाति मलेच्छ कथै चतुराई ॥ धरमदास जव नफर* युलावा । घर लिपाय ज्योनार चढ़ावा ॥ चौका वैठि कीन्ह अस्ताना । छानिछानि जल अदहन दीन्हा।। अति पवित्र से करै रसोई । सालिगराम के भोजन होई ॥ लकड़ी चिउँटी उठी अपारा । कोरिन जीव भये जरि छाय । दोहा-धरमदास को दुख भयो, हरि हरि करत पुकार । जीव अनेक प्रलय भये, अस ज्योनार धिकार ।। चौपाई-लकड़ी कादि जल माहि बुझाई । चूल्हा युझायो यहु जल लाई ॥ जो कछु जरे सो जरिगे भाई । जो वाचे सो लेहु यचाई ॥ नफर हाथ जिंद बुलवाई । यह भोजन लै जिंदहि खाई ।। (जिंद) धरमदास तुम बड़े सुजाना । जीव दया काहे नहिं जाना ॥ कीन्हा नेम अनेक अचारा ! लकड़ी धोई रचे ज्योनारा ॥ निरखि निरखितुम काहे न वीना । नाम तोर देयतन कहि दीन्हा । जोली जीव दया नहिं आवै । तीरथ भरमि के जनम गँवावै ।। दसरथ सुत श्रीराम कहाये। तिनहुँ अपने जिव संताये ॥ दोहा-बैर वालि के हतन को, विप्नु देह धरि दीन्ह । जो जो जिव मारे हृते, तिन तिन वदला लीन्ह ।। चौपाई-वचन हमार हिये में धरह । संसय तजि के भोजन करह ।। प्रातम कष्ट कबहुँ ना दीजे । रचे सो प्रेम से भोजन कीजे ।। हरि ना मिलें अन्न के छाँडे। हरि ना मिले डगर ही माँड़े। हरिन मिले घरवार .तियागे । हरि न मिल निनु बासर जागे॥ दया धरम जाह यस सरीरा । तहाँ खोजिले कहै कीरा॥ मुनि धर्मदास धोर्ज मन कीन्हा । भली सीख जिंद मोहि दीन्हा॥ इन के ज्ञान महा रस पानी । मानो वचन अमी रस सानी॥ आन प्रसाद पत्र भरि लीन्हा । कादि पगसि के भोजन दीन्हा । *मोबर पत्तल ।
५ जीवन-चरित्र दोहा-तुम ले जायो जिंद जी, हम करियै फरहार । लंघन न करिही पीर जी, मानो यचन तुम्हार ॥ चौपाई-दै प्रसाद उठि आसन आयेऊ । धरमदास फरहार मँगायेऊ ॥ सालिगराम को अर्पन कीन्हा । पुनि भोजन आपु ही कीन्हा ।। लिये आचमन अमृत मीठे । प्रासन करि सुचित्त होइ बैठे ॥ पहर एक हरि चरचा भयेऊ । पुनि निद्रा करने को गयेऊ ॥ रैन सिरानी भयो विहाना । नफर सहित उटि वाहिर आना ॥ धरमदास यंधो चलि आये । बाल गोपाल मनहि सुख पाये ॥ जिंद वचन जय हिरदे आये। अंतर गत बहुते सुख पाये ॥ आयै फिरि तब दरसन पाऊँ । पू, आदि अंत चित लाऊँ । दोहा-सत्त सत्त सब उन कही, जानि पर मोहिं सार । जिंद नाहिं कोइ पुरुष है, अस घोले ब्रह्म हमार ॥ चौपाई-धरमदास मन कीन्ह विचारा । देव महोच्छः करों भंडारा ॥ सीधा सामग्री बहुत मैंगाई । भेष भगत तहँ बहुत बुलाई ॥ आये बैरागी औ ब्रह्मचारी । नागवीर आये दूधाधारी ॥ फलाहारी अन्नधारी आये । जोगी जिंद यहु भेप बनाये ॥ बहुत आये तपसी सन्यासी। जदा भभूत सुन्न विस्वासी ॥ धाजै ताल मृदंग निसाना । संख नाद धुनि होइ निधाना ।। आव भगत सबहिन को कीन्हा । इच्छा भोजन सब को दीन्हा ।। सब को ज्ञान परख्यो धर्मदासा । लख्यो शान सब को विनु सारा ॥ कोइ तीरथ कोइ मूर्ति बँधावै । कोइ कलि केवल नाम दृढ़ावै । कोई कृप्न गोपालहिं गावै । कोइ दुर्गा सिय सक्ति थियावै ॥ जोगी अलख अलख उच्चरई । जिंद सुमिरै अल्लाह खोदाई ।। सन्यासी राम देत ठहराई । परमहंस अविनासी गाई ॥ दोहा-एक बात कोइ ना कहै, नाना मति परचंड । धम्मंदास परखे मते, जानि परे पाखंड ॥ चौपाई-समुझि परौ ऐसा मन माहीं । जिंद का मता काहु सम नाहीं ॥ वरस दिना गिरही में रहेऊ । बहुत सुरत कासी की कियेऊ ॥ धर्मदास कासी चलि आये । हृदय हुती सो दरसन पाये ॥ मुक्तिरूप सुख अमृत यानी । नाम कबीर जन्त गुरु, ज्ञानी ॥ विमल विमल साखी पद गावै । जुरी भीर सयहिन समुझावै ॥ धर्मदास तहँ निरखे ठाढ़ा । चंद चकोर जिमि आँखि पसारा ।। पंडित ज्ञानी सबै हराये। थाह कबीर की कोइ नहिं पाये। धर्मदास चीन्हे मन माना। येहि जिंद ताज होय न आना ॥ । , जीवन-चरित्र दोहा-पिरथम मोहिं मथुरा मिले, बहुत याद हम कीन्ह । साँच साँच सब उन कही, मन हमार हर लीन्ह ॥ चौपाई-धर्मदास हरप मन कीन्हा । बहुरि पुरुष मोहिं दरसन दीन्हा॥ अपने मन में कीन्ह विचारा। इनकर ज्ञान महा टकसारा ।। दोइ दीन के करता कहाई । इनकर भेद कोऊ नहिं पाई॥ इतना कहि मन कीन्ह विचारा । तब कबीर उन और निहारा॥ आओभक्तमहाजन पगुधारो। चिहुँकि निहुँकि तुम काह निहारो॥ कहिये छिमा कुसल हो नीके । सुरत तुम्हार यहुन हम झोंके ॥ धर्मदास हम तुम को चीन्हा । बहुत दिनन में दरसन दीन्हा । बहुत ज्ञान कहसी हम तुमहीं । बहुरि के अब तुमचीन्हो हमहीं ॥ तुम तो भक्त हम जिंद फकीरा । सुधि करि देखो सत मत धीरा ॥ दोहा-भली भई दरसन मिले, बहुरि मिले तुम आय । जो कोई मोसे मिले, ते जुग विछुरि न जाय ॥ चौपाई-सुनि धर्मदास हिये सुख भरे । सन्मुख धाइ पाँव जा परे । दया सिन्धु चितय भरि नैना । उठि धर्मदास अंक भरि लीन्हा । धर्मदास कबीर भे भेंटा । सत्त सब्द के खुले कपारा ॥ परगट ज्ञान ध्यान की खानी । सत्त सब्द निज. अमृत वानी ॥ जो कोइ सुनै चेत चिन लाई । संसय टरै पाप छय जाई ॥ तुलसी साहेब के ग्रंथ घटरामायन में लिखा है कि कबीर साहेय काशी में धर्मदास जी के घर गये जब वह मूर्ति पूजा कर रहे थे और बहुत से पंडित और पुजारी जमा थे। कबीर साहेब ने पूछा की गढ़ी मूरत और पत्थर की बदिया के पूजने का क्या फल है इस पर पुजारी बहुत बिगड़े और उनको नास्तिक और भला बुरा कह कर निकाल देना चाहा परन्तु धर्मदास जी ने रोका और उनसे देर तक चर्चा करते रहे जिससे उनकी कुछ शांति हुई। फिर कबीर साहेब ने मौज से यह चमत्कार दिखलाया कि एक हिचकी लेकर अपने गले से शालग्राम की बटिया निकाल कर धर दी और फिर उसको बुलाया तो वह हाथ पर भा वैठी। यह कौतुक देखकर धर्मदासजी के वित्त में पूरी रीति से कबीर साहेब की महिमा वैठ गई और अपनी स्त्री और पुत्रों को भी उनके घरणों पर गिराया। उनकी स्त्री और जेठे पुत्र चूडामणि ने तो पूरे भाव से कबीर साहेब की शरण ली और कि धात जीवन चरित्र ७ .. -जब समय उनको धारण किया परन्तु छोटे बेटे नारायणदास ने नाक भंव सिकोड़ ली और कबीर साहेब को पाखंही और जादूगर ठहराया। इन दोनों कथाओं से संतों के इस वचन का प्रमाण मिलता है कि जय स्वतः संत जगत में पधारते हैं तो अपनी निज अंश अर्थात् गुरुमुख को भी देर सबेर लाते हैं और उसी के द्वारे सारी रचना को पवित्र करते हैं । यद्यपि गुरुमुख को परमार्थ का चाव लड़कपन ही से रहता है परंतु पहिले माया का पर्दा उस पर पड़ा रहता है- नाता है तब सतगुरु उसे अपने दर्शन और वचन से एक छिन में चेता देते हैं और माया के परदे को हटा देते हैं । जैसे कबीर साहेब पहिले संत अवतार हुए ऐसे ही धनी धर्मदासजी पहिले गुरुमुख प्रगट हुए जो कबीर साहेब की दया दृष्टि से संत गति को प्राप्त हुए। धर्मदासजी ने कबीर साहेब की शरण लेने पर अपना सारा धन दौलत लुटा दिया और काशी में गुरु चरणों में रहने लगे। उनके पीछे उनके बड़े बेटे चूड़ामणिजी ने भी यही ऊँचा पद पाया परन्तु नारायण- दास संतों की साखी के अनुसार फाल के अवतार समझे जाते हैं । कवीर साहेब के सम्बत् १५७५ में परमधाम को सिधारने के पीछे धर्मदास जी को उनकी गद्दी और सब ग्रंथ मिले और वह बहुत बरस तक जगत जीवों को चेताते और संत मत दृढ़ाते रहे । उनके गुप्त होने पर चूडामणि जी को गद्दी हुई और सय ग्रंथ मिले सिवाय कबीर साहेब के बीजा के जिसे भागू धर्मदासजी के गुरुभाई ने.चारा कर भगवान गोसाँई के हाथ मुकाम धनौली जिला तिरहुत को भेज दिया और फिर वहाँ अपनी गद्दी अलग काइम की। धर्मदास जी के शब्द हम पाँच बरस से इकट्ठा कर रहे हैं और उनकी बाबत खास काशी के कबीरचौरा की गद्दी और दूसरे महंतों और कबीर पंथी साधुओं से दरियाप्त किया तो मालूम हुआ कि उनके शब्द कहीं लग पाथी में लिखे नहीं हैं वरन कबीर साहेय की वानी में मिल गये हैं। कहते हैं कि न केवल वह पद जिन में अकेले
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चौरासी ॥२॥ । धरमदास जी की शब्दावली । सतगुरु महिमा का अंग॥ ॥ शब्द १॥ गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥ उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अविनासी ॥१॥ उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय अमृत बंद करै घट भीतर, साध संत जन लासी* ॥३॥ धरमदास विनवै कर जोरी, सार' शब्द मन बासीtuen ॥ शब्द २॥ ::-गुरू मोहि खूब निहाल कियो । टेक॥ बूड़त जात रहे अवसागर, पकरि के चाँहि लियो ॥१॥ चौदह लोक बसँ जम चौदह, उनहुँ से छोरि लियो ॥२॥ तिनुका तोरि दियो परवाना, माथे . हाथ दियो ॥३॥ नाम सुना दियो कंठी माला, माथे तिलक दियो ॥४॥ धरमदास बिन कर जोरी, पूरा : लोक दियो ॥४॥ सतगुरु: धोबी जो मिलै, दिल दाग छोड़ावै ॥ टेक ॥ ब्रह्म अगिन परगट करै, कर्म. अर्म जरावै। तत्त की रेह : लगाइ लगाई के, तब भाठि . चढ़ावै ॥१॥ सरोवर सागरे, चित घाट बँधावै। सुरति -सिला.. पर धोइ के, मन. मैल. छोड़ावै ॥२॥ नाभि पवन निर्मल निरति, सूरति लौ बजी अवाज. ब्रह्मड..में, विरले लखि 'आवै ॥३॥ चाशनी।। दूसरे लिपि में "लागी" है। ॥ शब्द ३॥ लावै। , - सतगुर महिमा का अंग परसावै ॥४॥ : गुरु , गम बानी ऊंचरै, पूरुप दरसावै। कह कबीर धर्मदास से, अच्छर म ॥ शब्द.४॥ सतगुरु चारिउ बरन से ऊँचे ॥ टेक। ना मानो तौ साखि बताऔं, सेवरी के फल. रूचे ॥१॥ राजा युधिष्ठिर जज्ञ रचा है; घंटन बाजे.संत के रूसे॥२॥ सुपच भगत जव ग्रास उठाये, वाजे घंट गगन चढ़ि ऊँचे३ धरमदास विनवै कर जोरी, सतगुरु सब्द लौँ माहिँ नीके ? ॥ शब्द ५॥ - अब गुरु मिले सनेही आई ॥ टेक ॥ चलो सखी जहँ जाइये, जहँ वसै पुरुप पुराना । चरन चुरामनि* चॅवर डोलावै, तन की तपन बुझाई ॥१॥ सुरति समानी सार सब्द में, निरत रही लव लाई ।, प्रेम पियारी रटै पिया को, यह जिव पुलकित जाई ॥२॥ भवसागर औगाह अगम है, सूरै वार न पारा । हंस उबारन संतगुरु आये, वही कादि ले जाई ॥३॥ जन्म जन्म के हंस उबारन, अजहु, उबारनहारा । जा के साँची लगन लगी है, सो वोहि लेोकै जाई. ॥४॥ धर्मदास से, निरति रहो ला लाई। नाम पान जोपाँजी पावै, सो सतलोक बसाई ॥५॥ ॥ शब्द६ ॥ आज घड़ी आनन्द की, संतगुरुं आये मारे धाम हो ।टेक॥ आये गुरुदेव संजन पठयो, भयो हरप'अपार हो। सकल सुन्दर साजि आरत, होत मंगलचार हो ॥१॥ धरमदास जी के पुत्र और गुरुंमुख का नाम । कह कंबीर --
सतगुर.महिमा
1
दियो दरसन मन लुभायो, सुन्यो वचन अमोल हो।
अछय छाया सघन घन की, करत, हंस- कलोल हो-॥२॥
दया कीन्हो निर्गुन दीन्हो, आपनी करि सैन हो ।
भक्ति मुक्ति सनेही सजन, लियो परथम चीन्ह हो ॥३॥
भये कलमल दूर, तन के, गई तपन :नसाय हो ।
अटल पन्थ कबीर दीन्हा, धर्मदास : लखाय हो ॥४॥
॥शब्द ॥
:
:: : मोरे पिया मिले सत ज्ञानी ॥ टेक ।
ऐसन पिय हम कबहुँ न देखा, देखत सुरत लुभानी ॥१॥
आपन रूप जव चीन्हा विरहिन, तव पिय के मनमानी॥२॥
जब हंसा चले मानसरोवर, मुक्तिभरै जहँ पानी ॥३॥
कर्म जलाय के काजल' कीन्हा, पढ़े प्रेम को बानी ॥४॥
धर्मदास कबीर पिय पाये, मिट गइ आवाजानी॥५॥
शब्द
गुरु पद अहै सबन से भारी ॥ टेक ॥
चारौबेद तुलै नहिँ गुरु पद, ब्रह्मा विष्नु और ब्रह्मचारी॥१
'नारद मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत सेस संकर की नारीर
सुरनर मुनि भये गुरुपद भजिकै, जपत राम अरु जनक दुलारी
धर्मदास में गुरुपद भजिहाँ साहेब केवीर समरथ बलिहारी
॥शब्द ॥
उबारन
सतगुरु, जग
में
आइया ।
प्रगट भये : कासी. में, दास .... : कहाइया:॥१॥
बाम्हन औ -".सन्यासी, तो हाँसी. कीन्हियाः।।
कासी. से :मगहरः आये; कोई नहि चोन्हियाः॥२॥
४ पान सतगुर महिमा मगहर गाँव' गोरखपुर, जग में आइया ।. हिन्दू तुरुक प्रमाधि के, पंथ चलाइया ॥३॥ बिजुलीखाँव पठान, सो कबुर खोदाइया । विजुलीसिंह बघेल, साजि' दल* 'आइया ॥४॥ रानी पतिया पठाय, जीव जनि मारिया।। मुरदा न होय : कबीर, बहुरि पछिताइया ॥५॥ खोदि के देखी कवुर, गुरु दँह न पाइया । लै हाथ, सेन* फिरि आइया ॥६॥ बाँधो दरियाव, उड़ीसा : जाइ . जाइ कै। लछमि सहित जगन्नाथ, मिले, "तहँ:- धाइः कै ॥७॥ पंडा पाखंड जानि के, कौतुक कोन्हिया।... एक से अनँत कला होइ, दरसन दीन्हिया ॥ आगम कहें कबीर, सुनो धर्म: : आगरा। बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा ॥९॥ • ॥ शब्द १० ॥ धन हौ धन साहेब बलिहारी॥ टेक॥ कासी में हाँसी करवाई, गनिका; संग लगाई। हरि के पंडा जरत उबारे, अपने चरन जल ढारी ॥१॥ मगहर में एक लीला कीन्हीं, हिन्दू तुरुंक व्रत धारी। कबर खोदाइ के परचा दीन्हो, मिटि गयो झगरा भारी॥२॥ *फौज। कबीर साहेब के जो चरित्र इन दोनों शब्दों ( और १०), मैं थारे में लिखे हैं उनकी सविस्तार कथा कबीर साहेब के,जीवन- परित्र में मिलेगी जो कबीर शब्दावली भाग १.के प्रादि मैं.छपा है ।... - " नाम महिमा पांडव जज्ञ सुफल ना होई, कोटिन जुरे अचारी। सुपच भक्त ने ग्रास उठायो, घंट बज्यो तब भारी ॥३॥ तच्छक आन डस्यो रानी-को, विपम लहर तन भारी। रानी पर जव किरपा कीन्हीं, उनहूँ को हंस उबारी ॥४॥ हरि को मंदिर बनन न पावै समुंद लहर उठि भारी । आसा रूप के समुंद हटायौ तीरथ करै संसारी ॥५॥ जो, जा सुमिरै सौ ता प्रगट, जग मैं नर अरु नारी। धरमदास पर किरपा कीन्हीं, हंसराज. लखे भारी ॥६॥ जोजो सरन गही सतगुरु की, उबरे नर अरु नारी। साहेव कवीर मुक्ति के दाता, हम को लियो उवारी:- ॥ नाम महिमा का अंग ॥ ॥ शब्द नाम रसं ऐसा है भाई ॥ टेक ॥ आगे आगे दाहि चलै, पाछे हरियर होइ। बलिहारी वा वृच्छ की, जड़ काटे फल होइ ॥१॥ अति कडवा खहा धना रे, वा को रस है आई सांधत साधत साध गये हैं, अमली होय से खाई ॥२॥ Vघत के 'बौरा भये हो, पीयत के मरि जाई नाम. रस्स से जन पियें, धड़ पर सीस न होई ॥३॥ संत जवारिस* साजन पीवै. जी को ज्ञान' 'प्रगासा" 'धरमदासपी छकित भये हैं, और पिये कोई दासा ॥४ii ii. पेट के दर्द की दवा । +bana नाम महिमा ॥ शब्द २॥ नाम रटन रट लागि रहै, कोई साधु सयाना ॥ टेक ॥ साध के चाकर दुइ जना, बंका सुर* ज्ञाना। सीस अरप आगे धरो, तव बाँधो 'वाना ॥१॥ साहेव द्वारे भीड़ भे, विरला ठहराना। कंचन कोट सुमेर बना, गज दीन्हा दाना ॥२॥ चाल चले गजराज की, अलमस्त 'समाना सीस तिलक बंस वेलि है, जम देखि · डेराना ॥३॥ धरती मूल विचारि के, तब धुनि उदकाना। कोटि गऊ को दान दे, नहि नामः समाना ॥४॥ कह कवीर धर्मदास . से, पावै पद निरवाना। आदि अंत की वारता, सतगुरु परवाना ॥५॥ ॥ शब्द ३॥ . चाकर हौं निज नाम का, सुना संत सिपाही ॥ टेक ॥ चरन कँवल सतगुरु दिया, हम सीस : चढ़ाई। .. दरस.. ऐसे. भया, गुरु . कमर बधाई ॥१॥ मारे मुरचा, : सब्द से, भ्रम के गढ़ - टूटे। अछर पुरुप : एक वृच्छ है, तहँ.. लांगे - जाई. ॥२॥ काँपन लागे दूतवा, चढ़े संत सिपाही । मारे गोला : नाम के सब फउज़ . पराई ॥३॥ नौबत बाजे लोक में, जीते जमराई। कह कवीर धर्मदास से, फिरी नाम दोहाई ॥४॥ ... बाँका भूरमा । मानी।
चेतावनी . म ॥ शब्द ४ ॥ हम सत्त नाम के बैंपारी ॥टेक ॥ कोइ कोई लादै काँसा पीतल कोइ कोइ लौंग सुपारी। हम तो लाद्यौ नाम धनी को पूरन : खेप हमारी ॥१॥ पूँजी न टूटै नफा चौगुना बनिज किया हम भारी हाट जगाती रोक न सकि है, निर्भय गैल . हमारी ॥२॥ माती बुंद घट ही में उपजै सुकिरत भरत कोठारी । नाम पदारथ लाद चला है, धर्मदास ::. वैपारी ॥३॥ ॥ चेतावनी का अंग ॥ ॥ शब्द १॥ १४.५० : सब्द की,बेरिया, जात टरी ॥ टेक॥ १६. उहाँ सो आये का कहि आये, का करने लगे आन इहाँ : आइ. परपंच : भुलाने, बैठे अधम ठिकान ॥१॥ भाई बंधु सुत कुटुम कबीला, ये कह जग में नाम । तुमः जाने उनहीं सँग रहना ठाढ़ काल मुसक्यान ॥२॥ ' आये नाव काठ से बोझी, दिन दिन अति गुरुवाई। आगे जाम* लेइः कर लूटी, देइ छाती पर लाती ॥३॥ गहे सब्द ज्ञान कर दीपक, बैठे सत के पासा। साहेब कबीर हंसन के राजा, धरमदास निजुदासा ॥४॥ :: : ॥ शब्द २॥ "थोरे दिन की जिंदगी मन चेत गँवार ॥ टेक ॥ कागद के तन पुतरा, डोरी, साहेब : हाथ ।। नानानाच नचावही; नाचैः संसार ॥१॥ " . * जम। ।
चेतावनी,
-
प्रेत, ॥३॥
काच माटी कै घइलिया, भरि लै पनिहार ।
पानी परत गल जावही, ठाढ़ी...:... पछिताय ॥२॥
जसः धूआँ के धरोहरा जस बालू कैः रेत ।
हवा लगे सब मिटि गये, जसे ,, करतय...
ओछे जल. कै नदिया हो, बहै . . अगम अपार ।
उहाँ नाव नहि बेरा हो, कस उतरव
पार ॥2॥
धरमदास गुरुसमरथ हो, जा. को अदल: अपार ।
साहेब कबीर
सतगुरु
मिले, आवा , गवन निवार ॥५॥
॥ शब्द ३.॥
कहो केते दिन जियवी हो, का करत गुमान ॥ टेक ॥
कच्चे बासन का पिँजरा हो जा में पवन समान ।
पंछी का कौन भरोसा हो, छिन में उडि जान ॥१॥
कच्ची माटी के घडुवा हो, रस बूंदन : सान ।
पानी बीच बतासा हो, छिन में गलि जान ॥२॥
कागद की 'नइया बनी, डोरी साहेब हाथ ।।
जौने नाच नचैहैं. हो, नाचब वोही
नाच ॥३॥
धरमदास एक बनिया हो, करै झूठी बजार।
साहेब कवीर बनजारा हो, करें, सतवैपार ॥a
॥ शब्द ४॥
घड़ा एक नीर का फूटा । पत्र : एक डार से टूटा ॥१॥
ऐसहि नर जात जिंदगानी। अजहु नहिं चेत अभिमानीर
भुला जनि देख तेन गौरा। जगत में जीवना थोरा ॥३॥
निकरि जब प्रान जावैगा। कोई नहि काम आवैगा॥१॥
सजन परिवार सुत दारा। सभे एक रोज होइ न्यारा॥५॥
तजो मद लाम चतुराई। रहो निरसंक जग माहीं ॥६॥
उपदेश सदा ना जान ये देही । लगावो नाम से नेही ॥४॥ कहै, धर्मदास कर जोरी । चलो जहँ देस है तोरी ॥८॥ ॥ उपदेश का अंग॥ ॥ शव्द १॥ सुचित होइ सब्द विचारो हो । टेक ॥ सब्द विचार नाम धर दीपक, लै उर बारी हो। जुगन जुगन कै अरुझनि छन मैं निरुवारी हो ॥१॥ पंथे चला गरीव हाय, मद मोह निवारो हो । साहेब नैन निकट बसै, सत दरस निहारो हो ॥२॥ आंपे जिताइ के, मन सब से हारा हो। जवन विधी मनुवा मरे, साइभाँति सम्हारो हो॥३॥ वास करो सत लोक में, दुख नगर उजाड़ा हो । धरमदास' निज नाम पर, तन मन धनवारो हो ॥४॥ जगत . ॥ शब्द २॥ . मन रही आसन मारि, मॅदिल से न डोला हो ॥ टेक ॥ राते माते . . रहो, बहुत जनि बोलो हो । निरखत परखत :-रहो, पलक जनि खोला हो ॥१॥ रजनी के दिहल किवार, सत कंजी खोला हो। ते. उँजियारि में वैठि, निर्भय होइ खेलो हो ॥२॥ चौका बना चौगान, जगमग अभिराज' हो। रविससि की छवि निरखि हंसा होइ गाज हो ॥३॥ ब्रह्मा विप्नु · महेस, निर्गुन अस्थूला," हो। हिलिमिलि करु सतसंग; फिरत - कहाँ भूला हो ॥४॥ सर्वोपरि, सब का राजा। 2 तन पाई ॥२॥ १० उपदेश गुरु के चरन धरु सीस, और सब त्यागो हो । जहाँ जहाँ तुम रहो, भक्ति बर माँगो हो ॥६॥ चमकत निर्मल रूप, कलकै जस हीरा हो। होइ मगन धर्मदास, बैठे तेहि तीरा हो ॥६॥ ॥ शब्द ३॥ वा करता को सेइये, जिन संष्टि उपाई ॥ टेक ॥ कोटिन ब्रह्मा बेद पढ़ि, पढ़ि जनम गंवाई। कोटिन बिष्नू होइ गये, कोइ पार न पाई ॥१॥ तीर्थ गये कोई ना तर, चलि चलि मरि जाई । जल बिच आस लगाइ कै, मंगर* फूठे पंडित वेद पढ़ि, पढ़ि जग भरमाई। उन के पुरखा मरि गये, उन काहे न जियाई ॥३॥ आदि अंत की बारता, सतगुरु से पावा। कह कधीर धर्मदास से, हंसा समुझावा ॥४॥ ॥ शब्द ४॥ का भरमत भटकत फिरो, करो खोज बनाई। मूल सब्द चीन्हे बिना, जिव जम ले जाई ॥१॥ पान परवाना पोइ कै, निज लगन धरावो । जम की कला मिटाइ कै, लेव अंग मूल सन्द हम कहि दिया, जुग जुग समुझाई। जो निस्चै करि मानिहै, तेहिँ लँव बचाई ॥३॥ कह कवीर धर्मदास से, हम लीन्ह चिताई। अजर अमर घर ले चलूँ, जहँ काल न जाई ॥४॥ चढ़ाई ॥२॥ * विरह और प्रेम ॥ शब्द ५॥ सुरत निरत दोउ मत करत हैं, चलो सतगुरु पैजइये होटे सतगुरु चीन्हि चरन चित लेये, दृष्टि से दृष्टि मिलइये हो। सतगुरु साह साध सौदागर, भक्ति पटो' लिखवइये हो ॥१॥ मन मानिक की खुली किवरियाँ, चढ़ गइ झमकिनटरिया हो। नहिं वहँ डोरि नहीं वह रसरी, अमर लोक कस पइये हर है वहँ डोर सुरति कर सोझो, गुरु के सब्द चढ़ि जइये हो। घर है रमाना मेरो बगर रमाना, फूल रही फुल बगिया हो अछै कमल पर बहै सुरसरों', तहँ बैठे हंस नहइये हो। धरमदास की अरज गुसाँई, आवागवन मिटइये हो ॥४॥ । ॥ बिरह और प्रेम का अंग ॥ ॥ शब्द १॥ सतगुरु आवो हमरे देस, निहारौं बाट खड़ी ॥ टेक ॥ वाहि देस की वतियाँ रे, लावें संत सुजान । उन संतन के चरन पखारौं, तन मन करौं कुरबान ॥१॥ वाही देस की बतियाँ हम से, सतगुरु आन कही। आठ.पहर के निरखत हमरे, नैन की नौंद गई ॥२॥ भूल गई तन मन धन सारा, व्याकुल अया सरोर। घिरह - पुकारै बिरहनी, ढरकत नैनन नीरं ॥३॥ धरमदास के दाता सतगुरु, पल में किया निहाल । आवागवन की डोरी कटि गई, मिर्ट नरम जंजाल. ॥४॥ 1 पहा । सीधी। रमनीक " हाता। गंगा । सलाह। M बिरहा और प्रेम ॥ शब्द २॥ ॥ शब्द ३॥ मितऊ मडैया सूनी करि गैलो ॥ टेक ॥ अपन बलम परदेस निकरि गैलो, हमरा के कछुवो न गुन दै गैला ॥१॥ जोगिन होइ के मैं बन बन ढूँढौं, हमरा के विरह वैराग दै गैलो ॥२॥ सँग की सखी सव पार उतरि गैली, हम धन ठाढ़ी अकेली रहि गैलो ॥३॥ धरमदास यह यह अर्ज करतु है, सार सब्द सुमिरन दै गैला ॥४॥ नैन दरस विन मरत पियासा ॥ टेक ॥ तुमही छाँड़ि भघु नहिँ औरै, नाहिँ दूसरी आसा ॥१॥ आठो पहर रहूँ कर जोरी, करि लेहु आपन दासा ॥२॥ निसु बासर रहूँ लव लीना, विनु देखेनहिँ बिस्वासा॥३ धरमदास बिनवै कर जोरी, देहु निज लोक निवासा ॥४॥ साहेब चितवो हमरी ओर ॥ टेक ॥ तुम चितवो नाही, तुम्हरो हृदय कठोर ॥१॥ औरन को तो और भरोसा, हमें भरोसा तोर ॥२॥ सुखमनि सेज बिछाऔं गगन में,नित उठि करौं निहोर॥३ धरमदास विनवै कर जारी, साहेब कवीर बंदीछोर ॥४॥ मैं हेरि रहूँ नैना सा नेह लगाई ॥ टेक ॥ राह चलत माहि मिलि गये सतगुरु, सो सुख बरनि न जाई देइ के दरस मोहिं बौराये, ले गये चित्त चुराई ॥२॥ ॥ शब्द ४॥ हम चितवें ॥ शब्द ५॥
विरह और प्रेम
--
कहौं
1
छवि सत दरस कहाँ लगि वरनौँ, चाँद सुरज छपि जाई॥३॥
धरमदास विनवै कर जोरी, पुनि पुनि दरस दिखाई॥४॥
॥ शब्द ६॥
बुझाय दरद पिय तो से ॥ टेक ॥
दरद मिटै तरवार तीर से।
किधौँ मिटै जब मिलहुँ पोव से ॥१॥
तन तलफै हिय कछु न सेोहाय ।
तोहि विन पिय मो सेरहल न जाय ॥२॥
धरमदास,
की अरज गुसाँई।
साहेब कबीर रहौँ तुम छाँही ॥३॥
॥ शब्द॥
आज मेरे सतगुरु आये मिहमान ।
तन मन जिवड़ा करौं कुरबान ॥१॥
फूली फिरौं न
अंग समान।
सतगुरु आवन सुनि लये कान ॥२॥
चंदन चौकी 'अँगना बिछान ।
ता
सतगुरु आन ॥३॥
फूलन
हार
गले पहिरान।
चंद चकोर ज्याँ इकटक ध्यान ॥४॥
धोय चरनोदक पान ।
सगले पाप मोचन किये आन ॥५॥
प्रेम सहित विजन पकवान ।
कंचन थाल' 'संजाये
"आन ॥६॥
हाथ 'जारि 'पुनि विनती ठान ।
जवा
सतगुरु । पुरुप
पर बैठे
.
चरन
पुरान ॥७॥
विरह और प्रेम सीत प्रसाद सतगुरु दियो दान । जम किंकर को मर्दन मान ॥८॥ धर्मदास अमन गुजरान। साहेब कधीर निछावर 'प्रान ॥६॥ ॥ शब्द ॥ मोरा पिया बसै कौने देस हो ॥ टेक ॥ अपने पिया के हुँढ़न हम निकसी, कोइ न कहत सनेस हो १ पिया कारन हम भईहैं बावरी, धरोजोगिनिया कै भेस हार ब्रह्मा विप्नु महेस न जाने, का जानै सारद सेस हो ॥३॥ धनि जो अगम अगोचर पइलन, हम सब सहत कलेस हो। हाल कबीर गुरु जानें, आवत जात हमेस हो ॥५॥ उहाँ के ॥ शब्दा सजन से प्रीत माहिँ लागी। दरस कोभयो अनुरागी॥१॥ नहीं वैराग माहिं आवै। साहेब के गुन नितै गावै ॥२॥ अभरन भूपन तनै साजूं। पिया को देखि हँस हुला ॥३ भया है गैब का डंका । चलो जहँ देस है बंका ॥४॥ विना ऋतु फूल एक फूला । भँवर रँग देखि के भूला ॥५॥ तकत छवि टरै ना टारी । होय तिस बरन बलिहारी ॥६॥ कहै धर्मदास कर जोरी। साहेब से अर्ज है मारी ॥७॥ ॥ शब्द १०॥ साहेब तेरी देखाँ सेजरिया हो ॥टेक ॥ लाल महल के लाल कँगूरा, लालिनि लागि किवरिया हो॥१॥. लाल पलँग के लाल बिछौना, लालिनि लागि कलरिया हो॥२ रंग।
विरह और प्रेम लाल साहेब की लालिनि मूरत, लालि लालि अनुहरिया हो३ धरमदास विनवै कर जारी, गुरु के चरन बलिहरिया हो ॥४ ॥ शब्द १९॥ साजन हमरे दरस सतगुरु के ॥ टेक ॥ अपने सजन को आवत देखू, दरसन करूँ नैन भरिभरिक॥१॥ चरन धोइ चरनामृत लेहूँ, जूठन पाउँ पेट भरि भरि ॥२॥ नीचा कर्म काटि गुरु दीन्हा, चरन कँवल पै सीस घरि घरि के ॥३॥ धरमदास बिनवै करजोरी, भव उताँ सतनाम सुमिरि के? ॥ शब्द १२ ॥ गुरु मोहि सजीवन मूर दई ॥ टेक ॥ कान लागि गुरदिच्छा दोन्हीं, जन्म जन्म को मोल लई ॥१॥ दिन दिन औगुन छूटन लागे, वाढन लागी प्रीति नई ॥२॥ मानिक सुंभ से मानिक उपजे, हीरा हंस से भेंट भई ॥३॥ धरमदास विनवै कर जारी, दिल की दुर्मति दूर भई ॥४॥ ॥ शब्द १३॥ पिया विन मोहिँ नींद न आवै ॥ टेक ॥ . खन गरजेखन विजुली चमकै, ऊपर से मोहिँ भाँकिदिखावै सासु ननद घर दारुनि आहे, नित माहिँ बिरह सतावै ॥२॥ जोगिन है के मैं वन बन ढूँहूँ, कोऊ न सुधि बतलावै ॥३॥ धरमदास विनवै कर जारी, कोइ नेरे कोइ दूर बतावै ॥४॥ ॥ शब्द १४॥ पिया विना माहिं नीक न लागै गाँव ॥ टेक॥ चलत चलत मोरे चरन दुखित भे, आँखिन परिगै धूर ॥१॥ आगे चलूँ . पंथ नहिँ सूझै, पाछे परै न पाँव ॥२॥ ससुरे जाउँ पिया नहिँ चीन्है, नैहर जात लजाउँ ॥३॥ .
प्रारती ॥ शब्द १५ ॥ इहाँ मोर गाँव उहाँ मार पाही, बीचे अमरपुर धाम ॥४॥ धरमदास विनवै कर जारी, तहाँ गाँव ना ठाँव ॥५॥ साँ भई पिया बिन अकुलानी ॥ टेक ।। देस देस ढूँदि फिरि आई, लोक लोक'मैं छानी। कोइ न खाजै पिय अपने को, झुंड की झुंड गुमानी ॥१॥ आतुर जाय पूछ सखियन से, कहोपिय रूप बखानी । निरंकार सब के मन भावे, सुनि सुनिभे गलतानी॥२॥ पुनि अकुलाय भवन को लौटी, त्रिकुटी महल समानी। सोहं सब्द सत्त दरसावै, वाही के रूप लोभानी ॥३॥ धन सतगुरु जीवन के दाता, दीन्हा नाम निसानी। कहैं कबीर बहुत दिन बीता, धर्मनि तुम पहिचानी ॥४॥ ॥ आरती का अंग ॥ कैसे आरत करौं तिहारी। महा मलिन गति देह हमारी ॥१ मैलहिँ तँ उपज्यो संसारा । मैं कैसे गुन गावाँ तुम्हारा ॥२॥ झरना करै दसो दिस द्वारे। कस ढिंग आवाँ साहेब तुम्हारे जो प्रभु देहु अगर को दही। तव होवौँ मैं सब्द सनेहीं ॥४॥ मलयागिर में बसत भुवंगा। विप अमृत रहै एकै संगा ॥५॥ तिनुका तोड़ दिया परवाना । तब हम पायौ पद निर्वाना धर्मदास कबीर बल गाजै। गुरु परताप आरती साजै ॥७॥ आरत गुरु कबीर की कीजै। जा के सेव जुगो जुग जीजै॥१॥ संतन दया कीन्ह अधिकारी सतसंगत मिलि अधम उधारी दूसरे गाँव की खेती ॥ शब्द १॥ ॥ शब्द २॥
भारती ९७ ॥ शब्द ३॥ जन्म अनेक बीति गयो मारा। अब मै दरसन पायो तारा३ अवके आरत सतगुरु चीन्हा। सुरत लगाय बंदगी कीन्हा अजर अमर है तुम्हरी काया। धरमदास गुरु सरनी आया ५ आरतिमाहिँ तुम्हारी परम गुरु, आरति माहिँ तुम्हारी । प्रातःकाल सकल विधि पूरन, धारी साज सँवारी ॥१॥ नरियर पान बदाम छुहारा, लौंग लायची सारी । भाव भक्ति से गुरु हिलोरा, संत मिले फल चारी ॥२॥ दयावंत धरनी पग धारे, हरपि साधु संसारी । मेटे बंधन त्रास जिवन के, चिन्ता सकल निवारी ॥३॥ पूरन पुरुप सिँहासन राजे, सोभाबहु विधि धारी । आरति करें संत सब गावै, धरमदास बलिहारी ॥४॥ ॥ शब्द ४॥ ऐसी आरतिदियो लखाई। परखो जोति अधर फहराई॥ धरती थंबन उदित अकासा । ता पर सूर करै परकासा ॥१॥ हीरा कोटि होय उँजियारी । विना सुगंध पुहुप की बारी॥२ चन्द्र लगन कीन्हा परकासा । चौदह जम जा के डरै तरासा गहो निरच्छर निस्चै डोरी। धर्मराय से तिनुका तोरी॥४॥ कहँ कबीर सुनो धर्मदासा। यह निज भेद कहाँ परकासा ऐसी आरत कहो समुझाई। जा सुमिरन तँ काल नसाई॥१॥ धरती धंध करो परकासा। चौदह जम जा की माने त्रासार अललपच्छ भृङ्गी तन बासा । सेा निज भेद करो परकासा ३ पवन पचासी नाम कहि लीजै। पाछे ज्ञानसिँहासन दीजै? सुनौ कबीर कहै धर्मदासा। उदय दीप लौँ कसै प्रकासा ॥५॥ ॥ शब्द५॥ 3 भारती ॥ शब्द६॥ ॥ शब्द 9॥ आरति बंदीछोर समरथ की।चरन कँवल चितराखु पुरुप की आरति साँ भूमी पग धारे। सतजुग में सत सब्द उचारे ॥२॥ आरति साँ जग प्रगटे आई। त्रेता मंदर नाम कहाई ॥३॥ आरति साँमुख मंगल गाये। द्वापर करुनामय कहवाये ॥४॥ आरति साँ जग बंधी आसा। कलजुग केवल नाम प्रकासाथ चारोजुग धर प्रगट सरीरा। आरत गावै धर्मदास कबीरा६ धरमदास आरतीसाजा। पाँच तत्त मुख बेद उचारा ॥१॥ पहिले तेज पवन अरुपानी। रहे निरंतर अंतरजामी ॥२॥ गगन जाति गरजै असमाना। देखो दृष्टि धुजा फहराना॥३॥ कोटि ब्रह्म जहँ पढ़त पुराना। कोटिन संभु धरै उर ध्याना॥४ कोटि विप्नु बिनवै कर जोरी। और देव सब तँतिस क्रोरी५ सेस सहसमुख निसु दिन गावै । अस्तुति करत पार नहिँ पावै सतगुरु मिलें तो भेद बतावै। पाँच तत्तलै अगम लखावै॥७ कहें कबीर हंस-पति राई। धरमदास आरति फल पाई॥ ॥ शब्द ८॥ हंस उचारिअपन करि लीन्हा। संझा आरति सुकिरत कीन्हा पहिले आरति अलख विराजै। ओअंसोहं ध्यान लगावै॥२ गगन मँदिल विच फूल एक फूल ।तरे भई डार उपर भयो मूल अंखंड विराजैता की छाया। लख चौरासी के फंद छुड़ाया। साख से उपजि सकल संसारा।लख चौरासी से होइ रहु न्यारा धरमदास विनवै कर जोरी।गुरु प्रताप से आरति जारी॥६ संघमा आरतिनाम तुम्हारा। अनहद धुनि गुरु ज्ञानबिचारा तत का तेल काया कीबाती।ब्रह्म अगिन अंदर धधकारी । ॥ शब्द ॥
विनती
१
पाँचीबाती निरमल करि बारी।सुरति चँवर लै सन्मुख भारी
प्रेम के पुहुप धूपधरो ध्याना। चित चंदन घसि अंग लगाना
अदभुत जोति अधर परगासा। आरति करै कवीर धर्मदासा
॥ बिनती का अंग॥
॥ शब्द १॥
गुरु
पैयाँ लागौं नाम लखा दीजो रे ॥ टेक ॥
जनम जनम का साया मनुवाँ, सब्दन मार जगा दीजो रे ॥१
घट अँधियार नैन नहिँ सूरी, ज्ञान का दीप जगा दीजो रे
विपकी लहर उठत घट अंतर, अमृत बूंद चुवा दीजो रे॥३॥
गहिरी नदिया अगम वह धरवा, खेय के पार लगा दीजो रेट
धरमदास को अरज गुसाँई, अब के खेप निभा दीजो रे ॥५॥
॥ शब्द २॥
भक्तिदान गुरु दीजिये देवन के देवा हो।
चरन कँवल विसरौं नहीं करिहौं पद सेवा हो ॥१॥
तिरथ वरत में ना करौं ना देवल पूजा हो।
तुमहिं ओरनिरखत रहाँ मेरे और न दूजा हो ॥२॥
आठ सिद्धि नौ निद्धि हैं वैकुंठ निवासा हो ।
सेा मैं ना कछु माँगहूँ मेरे समरथ दाता हो ॥३॥
सुख सम्पति परिवार धन सुन्दर बर नारी हो।
सुपनेहु इच्छा ना उठे गुरु आन तुम्हारी हो ॥४॥
- धरमदास की बीनती साहेब सुनि लीजै हो।
....दरसन देहु पट खोलि के आपन करि लीजै हो ॥५॥
विनती
॥ शब्द ३॥
साहेव साहेवी तन हेरी ॥ टेक ॥
चंच पंख विन जटा पखेरू, मम गति समझ सवेरो ।
अब जनि तजो नाहिँ यह खंडा, तुम सत लोक बसेरो ॥१॥
निस बासर मोहिँ संसय व्यापै, काम क्रोध मद घेरो।
या से नाम लेन नहिं पाऊँ, धग जीवन- जग मेरो ॥२॥
प्रभु पद भिन्न भयो मैं जब से, देह धरे बहुतेरो।
त्रिविधि ताप दुख सहे निरंतर, कबहुँ न भयो सुखेरो ॥३॥
मम हित जानि प्रान-पति सतगुरु, जुगन जुगन तुम टेरो।
मैं अचेत प्रीति माह बस, तुम तजि भयो अनेरो ॥१॥
मैं हौं जीव तुम्हार दया-निधि, आदि अंत को चेरो।
अब मोहिँ लेहु छुड़ाइ काल से, औगुन मेटो मेरो ॥५॥
बंदी-छोर सुनो करुना-मय, करो हिये विच डेरो।
धर्मदास पर दाया कीजै, चौरासी से फेरो ॥६॥
॥ शब्द ४॥
साहेब दीनबंधु हितकारी ॥ टेक ॥
कोटिन ऐगुन बालक करई, मातु पिता चित एक न धारी १
तुम गुरु मात पिता जीवन के, मैं अति दीन दुखारी ॥२॥
प्रनत-पाल करुना-निधान प्रभु, हमरी ओर निहारी ॥३॥
जुगन जुगन से तुम चलि आये, जीवन के हितकारी ॥४॥
सदा भरोसे रहूँ तुम्हारे, तुम प्रतिपाल हमारी ॥५॥
मोरे तुम ही सत्त सुकृत हौ, अंतर और न धारी ॥६॥
जानत है। जनकेतन मन की, अब कसमोहिं बिसारी ॥७॥
को कहि सकै तुम्हारी महिमा, केहिन दिह्यो पद भारी ॥८॥
धरमदास पर दाया कीन्ही, सेवक अहाँ तुम्हारी.॥६॥
यिमती २१ ॥ शब्द५॥ साहेब मेटो चूक हमारी ॥ टेक ॥ बार बार माहि डंड भयो है, चूक भई अति भारी। अब हम आये निकट तुम्हारे, अब मो तनहिँ निहारी॥१॥ करुनामय तुम नाम धराये, तुम समरथ अब मेरी । ऐसी विपति भई मोहिं ऊपर, कोइ ना हीत* हमारी ॥२॥ तरसत जीव रहै निस वासर, जानि जनहिँ तुम दौरो। अव की चूक छिमा कर साहेब, अब सन्मुख है हेरो ॥३॥ तुम सतगुरु सकल सुख-दाता, सब्द पान दे तारो। धरमदास विनवै कर जोरी, करौं बंदगी तेरो ॥४॥ ॥ शब्द६॥ सुरति पर सतगुर धरि दियो बाढ़ ॥ टेक ॥ घर माँ रहौँ रहन नहिं पावौं, घर के लोग माहिँ देहि निकार ॥१॥ बाहर जावं डाइन इक लागै, सुनि पावै जिय डाहै मार ॥२॥ ऐसी बाढ़ धरो मोरे साहेब, जहँ मारौं तहाँ पल्ले पार ॥३॥ धरमदास पर दाया कीजै, साहेब कवीर दुख मेटनहार ॥४॥:. बंदी-छोर विनती सुनि लीजै ॥ टेक ॥ कपट कुटिल अपराधी द्रोही, ठहरावो मन निस्चै । नाम तुम्हारा अधम उधारन, ता की दिच्छा दीजै ॥१॥ हितकारी। ॥ शब्द ७॥
बिनती
पाप पुन्न नहिँ जाँचन कीजै, काटि फंद अब दीजै।
माँगें अपन सुभाव दयानिधि, सुनि अनुमान न कीजै ॥२॥
बिपे बिनास रहूँ निसु बासर, यह तन छिन छिन छीजै।
साठ जन्म को हाँ अपराधी, अबकी छिमा प्रभु कीजै॥३
सतगुरु नाम मुनींद्र कहाये, साहेब कबीर सुनि लीजै ।
धरमदास विनवै कर जोरी, काटि चौरासी दीजै ॥४॥
॥ शब्द ८॥
तुम
मिलिही कंथ
कबीर।
धर्मदास पर दाया कोज, हंस लगावो तीर ॥१॥
"भक्ति अचल औ दृढ़ बैरागा, पूरन ज्ञान गंभीर ।
जती सती संतापी तुमहीं, सव के दाता धीर ॥२॥
तुम प्रताप परवाह न केहु की, सागर सलिता नीर ।
एक धुंद दयाल माहिं दीजै, जाय जीव की पीर ॥३॥
महा कठोर कठिन मन मेरो, हरो ताहि की भीर ।
कामी क्रोधी झूठा लंपट, धाखो अधम सरीर ॥४॥
सुक्ख करन और दुक्ख हरन तुम, ऐसे मत के थोर ।
ज्ञानमंडन भर्मखंडन, दया सिन्धु
कवीर ॥५॥
॥ शब्द
साहेब बूडत नाव अब मेरी ॥ टेक ॥
काम क्रोध की लहर उठतु है, माह पवन कझारी ।
लोभ मोरे हिरदे घुमरतु है, सागर वार न पारी ॥१॥
कपट की भँवर परतु है वहुतै, वा में बेड़ा अटको ।
काल फाँस लिये है द्वारे, आया सरन तुम्हारी ॥२॥
धरमदास पर दाया कीन्ही, काटि फंद जिव तारी।
कहैं कवीर सुना हो धर्मन, सतगुरु सरन उवारी ॥३॥
विनती दिली नागरी मर बंदगी, तुम पार करावा ॥३॥ ॥ शब्द १०॥ बिन दरसन भइ बावरी, गुरु यो दीदार ॥ टेक ॥ ठादि जाहौँ तोरी बाट म, साहेब चलि आवो । इतनी दया हम पर करो, निज छवि दरसावो ॥१॥ कोठरी रतन जड़ाव की, हीरा लागे किवार । ताला कुंजी प्रेम की, गुरु खोलि दिखावा ॥२॥ चंदा भूला वकसनहार। धर्मदास अरजी सुना, भव ॥ शब्द ११॥ दीना-नाथ दयाल, भक्त की पछ करौ। सरन आये की लाज, साहेब जन की करौ ॥१॥ नौ दरवाजे विकार, धार नौका बगै । मेरि सुरत नहीं ठहराय, लगन कैसे लगै ॥२॥ तीन का, आदर साजिया। जम , राखै बिलमाय, तो फंद न फंदिया ॥३॥ तिर्गुन फाँस का फंदा, माया मद जाल में । भवसागर जंजाल अक्ति मुक्ति देव दान, दया जन पर करौ । नौका पार लगाय, दास अपनो करौ ॥२॥ साहेब कबीर वंदी-छोर, अरज एक मानिये। धर्मनि पतित उबारि, सरन में आनिये ॥६॥ ॥ शब्द १२॥ चरन छाँड़ि प्रभु जावँ कहाँ, मोरे और न कोई। जगं मैं आपन कोइ नहीं, देखा सब टोई ॥१॥ बगदै, बेठिकाने बहै। पाँच, तत्त गुन बीच, महा में ॥४॥ * २४ बिनती . सत मात पिता हित बंधु तुम, का से दुख राई । सब कछु तुम्हरे हाथ है, तुम्हरै मुख जाही ॥२॥ गुन तो मेरे है नहीं, औगुन बहुतेरे। ओट लई तुम नाम की, राखी पत सोई ॥३॥ सतगुरु तुम चीन्हे बिना, मति वुधि सब खाई। सब जीवन के एक तुम, दूजा नहिँ कोई ॥४॥ मैं गरजी अरजी करौं, मरजी जस होई। अरज बिपति लिखाँ आपनी, राखौँ नहिँ गाई ॥ धरमदास साहेबी, घट घटाहिँ समाई। साहेब कबीर सतगुरु मिले, , आवागवन न होई ॥६॥ ॥ शब्द १३ ॥ साँई मैं असल गुलाम तिहारा ॥ टेक ॥ काया नगर बन्यो अति सुन्दर, मोह को लग्यो बजारां। कुमति कलोल करै दसहाँ दिसि. लोभ को ठुक्यो नगारा॥ मोह समुन्दर भरे अपरबल, भँवर 8वें अति भारा । काम क्रोध की लहर उठतु है, केहि विधि होय निवारा ॥२॥ पाँच के ऊपर पचिस महतिया, इन परपंच पसारा । मन अदली जहँ अदल चलावै, कहा करैजीव बिचारा ॥३॥ ना मारे नाव नाहि खेबटिया, डर लागै मोहिं भारी। चौदह लोक में कोइ नहिँ दीसै, तुम गुरु पार उतारी ॥४॥ धरमदास की यही बीनती, उरम को निर्वारो। साहेब कबीर मिले गुरु समरथ, हम से अधम उवारो ॥३॥ घूमैं । * बिनती २५ ॥ शब्द ९४॥ मैं तो तारे भजन भरोसे अविनासी ॥ टेक ॥ तीरथ बरत कछू नहि करहूँ, बेद पढ़ौँ नहिँ कासी ॥१॥ जंत्र मंत्र टोटका नहिँ जानौं, निसु दिन फिरत उदासी ॥२॥ यहि घट भीतर वधिक बसत है, दिये लोन की टाटी ॥३॥ धरमदासं विनवै कर जारी, सतगुरु चरनन दासी ॥४॥ ॥ शब्द १५ ॥ साहेब बंदी-छोर हमारे ॥ टेक ॥ टाढ़े बैठे चलत निहारे, जागत साँक सबारे । करुना-सिंधु दया के आगर, नैनन के उँजियारे ॥१॥ बोलत वचन मीठ यह लागै, पूरन पुरुप पियारे। उनकी रहनि गहनि जब पैहो, होइ रहुँ सब से न्यारे ॥२॥ है बहु ज्ञान ध्यान बहुतेरो, खोला गगन किवारे । दया सरूप बसै सिंधू में, हीरा लाल निकारे ॥३॥ साहेब कबीर सदा के सतगुरु, हंसन के रखवारे । धरमदास पर दाया कीन्हा, आया सरन तुम्हारे ॥४॥ ॥ शब्द १६ ॥ साहेब मोरी ओर निहारो। परजा पुत्र अहाँ मैं साहेब, घहुत बात मैं टारो ॥१॥ हैं। मैं कोटि जनम को पापी, मन बच करम असारो। एको कर्म छुटे ना कबहूँ, बहु विधि वात बिगारो ॥२॥ हाँ अपराधी बहुत जुगन को; नइया मोर: उवारो। बंदीछोर सकल सुख-दाता, करुनामय करत पुकारी ॥३॥ 4 बिनती सीस चढाइ पाप की मोटरी, आयो तुम्हरे द्वारो। को अस हमरे भार उत्तारै, तुमहीं हेतु* हमारो ॥४॥ धरमदास यह बिनती विनवे, सतगुरु मा को तारो । साहेव कबीर हंस के राजा, अमर लोक पहुँचावा ॥५॥ ॥ शब्द ९७ ॥' साहेब मोरी बहियाँ सम्हारि गही ॥ टेक। गहिरी नदिया नाव झाँझरी, बोका अधिक भई। मोह लोभ की लहर उठत है, नदिया झकार वही ॥१॥ तुमहिं बिगारो तुमहिं सँवारो, तुमहिं भंडार भरी। जब चाहो तब पार लगावो, नहिं तो जात यही ॥२॥ कुमति काटि के सुमति बढ़ावो, बल बुधि ज्ञान दई । मैं पापी बहु बेरी चूकूँ, तुम मेरी चूक सही ॥३॥ धरमदास सरन सतगुरु के, अब धुनि लाग रही । अमर लोक में डेरा परिगै, समरथ नाम सही ॥४॥ ॥ शब्द १८ ॥ साहेब कौन कमी घर तेरो ॥ टेक ।। भूखे अन्न पियासे पानी, कपड़ा से तन घेरो । जा कछु न्यामत सबै महल में, खरच खजाना ढेरी ॥१॥ खाक से पाक कियो पल माही, हे समरथ बल तेरो । भव से काढ़ि कियो तरनी पर, खेइ लगावो सयेरो ॥२॥ रहे न घाम छाँह दुनिया मैं, रहे न जम को चेरो । राव से रंक रंक से राजा, छिन में बाजत तूरो ॥३॥ माना सत्त झूठ जनि जाना, सत्त बचन है पूरो । धर्मदास चरनन पर बिनवै, तुम गति सब भरपूरो ॥४॥ हितकारी । नाव। *
बिनती
२७
॥ शब्द १९॥
साहेब खेइ लगावो पारा ॥ टेक ॥
असी कोस में कील अरुझाँकर, असी कोस अँधियारा ।
'असी कोस बैतरनी नदिया, जहवाँ हंस उतारा ॥१॥
बड़े बड़े सीकारी जोधा, आगे पग है डारा ।
खाल बंचि जम भुसा भरावै, एंचि लेहि जस आरा ॥२॥
लेखा माँगै जम फुरमावै, तीन लोक लै डारा ।
उपजत बिनसत जनम बीतिगे, चौरासी की धारा ॥३॥
गगन मँदिल में सतगुरु बोले, सुनि लै सब्द हमारा ।
धरमदास चरनन पर बिनवे, अब की अरज हमारा ॥४॥
॥ शब्द २० ॥
अब मोहिं दरसन देहु कबीर ॥ टेक ।।
तुम्हरे दरस से पाप कटत हैं, निरमल होत सरीर ॥१॥
अमृत भोजन हंसा पावै, सब्द धुनन की खीर ॥२॥
जहँ देखाँ जहँ पाट पटंबर, ओढ़न अंबर चीर ॥३॥
धरमदास की अरज गोसाँई, हंस लगायो तीर ॥४॥
॥ शब्द २१॥
.
साहेब मोहि दरसनदीजे हो। करुना-निधिमेहर करीजे हो
पपिहा के चित स्वाँति बसै, भावै नहिँ जल दूजा हो ।
जैसे काग : जहाज चढ़े, वा को और न सूझा हो ॥१॥
बार बार बिनती करूँ, मेरी अरज सुनीजे हो।
भवसागर से काढ़ि के, अपना करि लीजे हो ॥२॥
सत्त लोक से सुरत करी, तब जग में आये हो।
ज़म से जीव छोड़ाइ के, धर्मनि मन भाये हो ॥३॥
२८ यिनती ॥ शब्द २२ ॥ ७ मोर मन लागा साहेब से, बंदी-छोर कवीरा ॥टेक ॥ सतगुरु सरनै मैं गई, सब दुख हरि लीन्हा । करम भरम सब मेटि के, निरमल करि दीन्हा ॥१॥ तीन लोक के बीच में, जम कातर दीन्हा। ता से मोहिँ छुड़ाइ के, आपन करि लीन्हा ॥२॥ सतगुरु सब्द सुनाइ के, पारस करि दीन्हा । कागा वरन मिटाइ के, हंसा करि लीन्हा ॥३॥ काम क्रोध सब त्यागि के, बन हंस गंभीरा । सब्द हमारा मानि ले, गुरु कहत कबीरा ॥४॥ धरमदास की बीनती, संतन महँ हेरा। जाति बरन कुल त्यागि के, सत लोक बसेरा ॥३॥ ॥ शब्द २३ ॥ साहेब कौन देस मेाहिँ डारा ॥ टेक ।। वह तो देस अमर हंसन को, येहि जग काल पसारा ॥१॥ देवहु सब्द अजर हंसन को, बहुरि न है अवतारा ॥२॥ निरगुन सरगुन दुंद पसारा, परि गये काल की धारा ॥३॥ जहाँ देस है सत्त पुरुप का, अजर अमी का अहारा ॥४॥ धरमदास विनवै कर जोरी, अबकी अरज हमारा ॥५॥ साहेब लेइ चलो देस अपाना ॥ देक॥ जम की त्रास सही नहिं जाई, केहि बिधि धरौंमैं ध्याना॥१ माया मोह भरम की मोटरी, यह सब काल कलपना ॥२॥ माया मोह भरम सब काटो, दीजै पद निरवाना ॥३॥ अमर लोक वह देस सुहेला, हंसा कीन्ह पयाना ॥४॥ धरमदास विनवैः कर जोरी, आवागवन । नसाना ॥५॥ . ॥ शब्द २४ ॥
विनती - ॥ शब्द २५ ॥ तुम सतगुरु हम सेवक तुम्हरे ॥ टेक ॥ जो कोइमारै औगेरियावै, दाद फिरियाद करब तुमहीं से सोवत जागत के रछपाला, तुमहीं छाँड़ि भजौँ नहिँ औरै तुम धरनीधर सन्द अनाहद, अमृत भाव करी प्रभु सगरे॥३॥ तुम्हरी विनय कहाँ लगि वरना.धरमदास पद गहे हैं तुम्हरे ॥ शब्द २६॥ जमुनियाँ, की डारि मारी तोड़ देव हो ॥ टेक ॥ एक जमुनियाँ के चौदह डारि, सार सदद लेके मोड़ देव हो १ काया कंचन अजब पियाला, नाम बूटो रस घोर देव हो सुरत सुहागिन गजब पियासी, अमृत रसम बार देव हो ॥३ सतगुरु हमरे ज्ञान जौहरी, रतन पदारथ जोरि देव हो॥४॥ धर्मदास की अरज गुसाँई, जीवन की बंदी छोर देव हो ॥५॥ ॥शद २७ ॥ मिहरबान है साहेव मेरा । दिल भर दरसन पाऊँ तेरा ॥१॥ तुम दातामैं सदा भिखारी। देव दीदार जाउँ बलिहारी ॥२॥ कबंदगी खिजमत दीजै। बकसा चूक दया बहु कीजै ॥३॥ सेवक तेंचिगरै सौ बारा । सतगुरु साहेब लेव उवारा ॥४॥ औगुन सेवक साहेब जान। साहेब मन मैं ना गिल्यान॥५॥ धर्मदास लइ तुम्हरि पनाह । अगले पछिले बकस गुनाह॥६ ॥ शब्द २० ॥ .. बाजा वाजा : रहित का, पड़ा नगर में सौर । (मेरे) सतगुरु संत कबीर हैं, नजर न आवै और ॥१॥ मुक्ति, उद्वार।
३०
भेद
॥ शब्द २९॥
परवान ॥५॥
भूमी पर पग धरत हो, सुनी संत मतधीर ।
माथ नाय बिनती करूँ, दर्सन देव कबीर ॥२॥
घाट बाट औघट महीं, माहि कबीर की आस ।
धर्मनि सुमिरै नाम गुरु, कभी न होय विनास ॥३॥
अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥ टेक ॥
सेवक लिये प्रेम जल झारी, खरिका ब्रह्म गियान ॥१॥
भाव भक्ति साँ बीरा लीजे, संतन जीवन प्रान ॥२॥
अमी उगाल दास को दीजे, जन को परम कल्यान ॥३॥
हृदय कमल बिच पलँग बिछाऊँ, पौढ़ें पुरुप पुरान ॥४॥
चरन कमल की सेवा करहूँ, दासा-तन
सुरत की बेनियाँ डोलाऊँ ठाढ़ी, इक टक लाऊँध्यान ॥६॥
धरमदास पर दाया कीजे, पूरन पद निरबान ॥७॥
॥ भेद का अंग॥
। ঘর
धर्मनि वा देस हमारो बासा, जहँ हंसा करै बिलासाटेक॥
सात सुन्न
के ऊपर साहेब,
सेतै
सेत निवासा।
सदा अनंद रहै वा देसा, कयहुँ न लगै उदासा ॥१॥
सूरज चंद दिवस नहिं रजनी, नाहीधरनि अकासा।
ऐसा अमर लोक है अवधू, केवला फरै धारामासा ॥२॥
ब्रह्मा विष्नु महेसुर कहिये, छके जोति के पासा ।
चौधा लोक बसै जम चौधा, ये सब काल तमासा ॥३॥
उहाँ के गये बहुरि ना अइहौ, आवागवन भय नासा ।
ब्रह्म अखंडित साहेब कहिये, आपु मैं आपु प्रगासा ॥४॥
भेद कहैं कबीरं सुना हो धर्मनि, छाँडो खल के आसा । अमृत भोजन हंसा पावै, बैठि पुरुप के पासा ॥५॥ ॥ शब्द २ ॥ केहि बिधि प्रीतम पाइये, गुरु राह बतावो ॥ टेक ॥ अरध उरध विच बागिया, तहँ सुरति लगावो। अष्ट कँवल दल पाँखुरी, उन को बिहसाधो* ॥१॥ इँगला गिला दोइ है, त्रिकुटी मन लायो। आपन रैयत बसि करो, चलावो ॥२॥ छज्जा ऊपर वैठि के, फिर संख बजावो। सुखमनि हीरा सोधि कै, बाहर चढ़ि आवो ॥३॥ कहैं कबीर धर्मदास से, पद गहु निरवाना। मनुप जनम दुर्लभ अहै, तन तपन बुझावो ॥४॥ बैठे अदल ॥ शब्द ३॥ चेतो हंसा चेतो कोई, अगम सँदेसा लाये हो। हम हैं हजूरी भविगति ब्रह्म के, हंस उयारन आये हो ॥१॥ सही छाप सूरति मुख बानी, जग मैं आनि सुनाये हो । जीव दुखित देखा संसारा, तेहि कारन पठवाये हो ॥२॥ आवागवनमैं सब जिव अरुझे, इस्थिर घरनहिं पाये हो। आदि अंत.इस्थिर लखावन को, समरथमोहिँ पठाये हो॥३ अंडज.खानी माया बनाई, पिंडज ब्रह्मा सिरजी हो । उपमज खानि विप्नु जो कीन्ही, अस्थावर सिव साजी होne ये बटमार भये या जिव के, सबै राखि भरमाई हो। चेतन अंस पुरुप को भाई, चारो माहि भुलाई हो ॥५॥ खिलायो।
विरह और प्रेम बिन सतगुरु कोइ पार न पावै, फिरि फिरि.जोनी फूला हो। नौ साहंग परे जिनहीं से, साई पुरुप निज मूला हो ॥६॥ तीन दैह उनहीं से उपजी, कारन सुगम स्थूला हो । कारन दैह में सहज सुरति है, औ अंकूर पसारा हो ॥७॥ सुछम दैह मैं ओहं साह, इनको ख्याल अपारा हो । स्थिर देह मैं अंस है अच्छर, इच्छा उनसे धारा हो ॥८॥ ते अच्छर त जोति निरंजन, सबको करत अहारा हो। तेजाती मैं तिन देव लागे, जाकै सृष्टि पसारा हो ॥६॥ सात सुन्न दोइ बेसुन कहिये, दसवाँ धाम अखंडा हो । समरथ सब्द हमरो अस्थाना और सकल ब्रह्मडा हो ॥१०॥ सारह सुत तेही के माही, तेहि विच पाँचो अंडा हो। अमर लोक में पुरुप विदेही, निगम न पावै पारा हो ॥११॥ उनकी उपमा कहँ लगि बरनौं, मुख हाय न पारा हो । कोठिन सूर चन्द्र तारागन, एक रोम पर वारा हा ॥१२॥ सेत सिंघासन सेतं छत्र सिर, सेतहि हंस पियारा हो। सेत भूमि जहँ सेत वच्छ है, सेतहि 'कमल' सुहेला हो ॥१३॥ पारंसं पान लेहु तुम सुकिरित, तब देखा दरबारा हो । कहै कबीर सुना धर्मदासा, तुम से होइ निरधारा हो ॥१४॥ ॥ शब्द ५॥ गगन पिय बंसी' फेरि बंजावो ॥ टेक॥ भँवर गुफा से उठत बुलबुला, सा अंजन पिय नैन लगावो? जो बंसी सुर नर मुनि माहे, सोवंसी पिय माहिँ सुनावो २ आनो कुंजी खोलो ताला, मोहनि मूरति मोहिं दिखावा३ धरमदास विनवैकर जारी, चरन कँवल तरेमाहिँ लगावाट तीन ।
भेद ३३ ॥ शब्द ५॥ झरि लागै महलिया, गगन घहराय ॥ टेक ॥ खन गरजै खन विजुली चमकै, लहर उठे सोभा बरनि न जाय ॥१॥ सुन्न महल से अमृत वरसै, प्रेम अनँद हाइ साध नहाय ॥२॥ खुली किवरिया मिटी अँधियरिया, धन सतगुरु जिन दिया है लखाय ॥३॥ धरमदास विनवै कर जोरी, सतगुरु चरन में रहत समाय ॥४॥ ॥ शब्द६॥ हमैं एक अचरज जानि पडै ॥ टेक ॥ जल भीतर इक वृच्छा उपजै, ता मैं अगिन जरै। ठाढ़ी साखा पवन कोरे, दीपक जोति बरै ॥१॥ माथे पर तिरबेनी बहत है, चढ़ि ऊपर असनान करै। लरजै गरजै दामिनि दमकै, कामिनि कलस अरै ॥२॥ मही का गढ़ कोट बना है, जा में फौज लडै। सूर बीर कोउ नजरि न आवै, नाहक रार करै ॥३॥ साहेब अमर मरै ना कबहूँ, नाहक सोच करै । धरमदास या पद को गावै, फिर कबहूँ न टरै ॥४॥ ॥ शब्द७॥ आठ चाम के गुरिया रे, मन माला फेर सबेरिया ॥टेका। अमी रस निकसत राग, फाग तंत मनकरिया । नाम से और सौदा नहिँ भावे, पिय की मौज लहरिया ॥१॥ 5 ॥ शब्द ८॥ वोहि मैं भेद मिलहु सत्त सुकृत रस भागो, होवहु प्रेम पियरिया । मीच हाहु तन मन धन जारो, जैसे सती सिंगरिया ॥२॥ नव दिसि द्वार तपत तहँ देखो, दसर्वं खोल किवरिया । पाँच रागिनी कुमक पचीसा, छठएँ धरम नगरिया ॥३॥ अजपा लागि पागि रहै डोरी, निरखा सुरति सुंदरिया। धरमदास के साहेव कबीरा, लै पहुँचायो सत्त नगरिया ॥४॥ विरले साधू पावै हो, रतनन कै माला ॥ टेक ॥ मुलुक मँडल चौकी बनी, पूरन धर्मसाला । आपु विराजै हो, प्रभु दीनदयाला ॥१॥ चाँद सुरज मानिक भये, करु सूरति के धागा । हर दम हर दम फेरो हो, अंतर गुरु माला ॥२॥ पाँच तत्त के पिंजरा हो, हीरा लागे आस । वाहि में साहेब रमि रह्यो, कोटिन भानु प्रकास ॥३॥ नर नारी मैं ढूँढ़ो हो, घट घट में माला । कहै कबीर धर्मदास से, निज होत निहाला ॥४॥ खेलत रहलौँ बाबा चौबरिया, आइ गये अनहार हो। राँध परोसिन मँटहूँ न पायाँ, डोलिया फंदाये लिये जात हो ॥१॥ डोलिया से उतरी उत्तर दिस धनि, नैहर लागल आग हो। सब्दै छावल साहेब के नगरिया, जहँवाँ लिआये लिये जात हो ॥२॥ ले जाने वाला।
भेद ३५ । भादों नदिया अंगम वहै सजनी, सूझै वार न पार हो। अब की बेर साहेब पार उतारो, फिर न आइब संसार हो ॥३॥ डोलिया से उतरो साहेब घर सजनी, बैठी घुघुट टार हो। कहै कृवीर सुनो धर्मदासा, पाये पुरुप अपार हो ॥४॥ ॥ शब्द २० ॥ अचरज ख्याल हमारे देसवा ॥ टेक ॥ हमरे देसवा बादर उमड़े, नान्ही परै फोहरिया । बैठि रहौं चौगान चौक मैं, भीजै हमरी दहिया ॥१॥ हमरे देसवा उर्धमुख कुँइया, साकर वा की खोरिया । सुरत सुहागिनि जल भरि लावै, चिन रसरी विन डोरिया॥२ हमरे देसवा चूनरि उपजै, मँहगे मोल विकइया । की तो लेइहैं सतगुरु साहेव, को कोइ साध सुजनिया ॥३॥ हमरे देसवा बाजा बाजै, गैबी उठे अवजवा । : साहेव धरमदास मगन बैठे तखत परगसवा ॥४॥ सब्द सिंहासन पाट मैं, तुम हंसा बैठों जाई हो ॥ टेक ॥ कौन नाम मुक्तामनी हो, कौन नाम वे हंस । कौन नाम वे पुरुप हैं. हो, कौन नाम वे अंस ॥१॥ अपर नाम मुक्तामनी हो, अग्न नाम वे हंस । ज्ञान नाम. वे पुरुप हैं. हो, सुरति नाम. वे अंस ॥२॥ एक लिपि में "अपार" की जगह "पुरान" है । . ॥ शब्द ११ ॥ * वैठिं हंस हो ॥३॥ मूल दीप निज दीप है हो, तुमहिं सुनो हम पाँह । उचारिये हो, सोहंगम के बाँह ॥३॥ जम्बू दीप के हंसा भाई, पाँजी बैठी आय । कहै कबीर धर्मदास से, तुम लावो बाँह चढ़ाय ॥४॥ ॥ शब्द १२॥ बुढ़िया ने काता सूत, जोलहवा ने बीना हो। दरजी ने टुक टुक कीन्ह, दरद नहिं जाना हो ॥१॥ भेड़ी चरावत बाघ, मूस रखवारा हो। मैंगुची ने बाँधा ताल, सिंह के ठाटा हो ॥२॥ गोडिया' पसारा जाल, ऊँट एक बाझा हो। दुलहिनि के सिर मौर, बिलारी साजा भाँडा गढ़त काँहार, मास दस लागा हो। छिनहिं में जात बिलाय, विलँब नहिँ लागा हो ॥४॥ यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहिं हो। कहैं कबीर धर्मदास, अमर पद पावहिँ हो ॥५॥ ॥ शब्द १३ ॥ मैं व्यापारी नाम का, हाटे चल भाई ॥ टेक ॥ जस कुम्हरा के चाक घुमै, वैसे नर घूमै। इँगल पिंगल के मद में, जिन पवन चलाई ॥१॥ बिन रसना रटना करै, नहिँ जीभ ,डोलाई । कसि के बाँधो कामदेव, तब अलख, लखाई ॥२॥ पूरव दिस को जाइ के, खिरकी खोलवावा। तिरवेनी पर, हंसा नहवावो ॥३॥ * मैंढकी। f कहार, धीमर । घाट ।
भेद
३७
रोके द्वारा।
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विदेही पूर
तीन लोक दसवाँ दिसा, जम
कहैं कवीर धर्मदास से हंसा समुझावो ॥४॥
॥ शब्द १४ ॥
.सुकृत फूल गुलाव को, सब घट रह्यो समाय ।
कहो कैसे कर पाइये, गुरु बिन लख्यो न जाय ॥१॥
तीन त्रिकुट के ऊपरे, फूल सोहंगम फूल ।
जहाँ रहो आसन धर्म को, विन अचछर निज
मूल ॥२॥
चार जोजन के ऊपरे, पुरुप विदेही
जगर मगर वो नगर है, बाजै अनहद तूर ॥३॥
अपने ढिगे हम खड़े, सतगुरु दियो बताय ।
खिड़की खोल देखाइया, राह गगन की जाय ॥४॥
कहै कबीर धर्मदास से, परगट दिया जनाय ।
जो हंसा चढ़ि जावही, नहिँ पुनि आवै जाय ॥५॥
॥ शब्द १५॥
हीरा लकै द्वार पर, निरखै कोइ सूरा हो ॥ टेक ॥
जिमी आसन है संत को, बैठे हहिं धीरा हो
सुन्न समाधि लगाइ के, पहुँचे वहि तीरा हो ॥१॥
बाजै विरहिन बाँसुरी, सुनि के गइ पीरा हो।
आठ पहर नौवत करै, अति गरुअ गभीरा हो ॥२॥
गंग जमुन के बीच में, एक झिरहिर नीरा हो।
पूरब से पच्छिम भये, अति गगन गभीरा हो ॥३॥
यह हीरा अनमोल है, सब के घट पूरा हो।
कहहिँ कवीर धर्मदास से, पायो पद पूरा हो ॥१॥
३६ मंगल सतगुरु के ॥ मंगल ॥ ॥ शब्द १॥ उपदेस, फिरो धन बावरी । उठि चलो आपन देस, इहै भल दाव री ॥१॥ हम कहि दिया है सनेस, तुम्हारे पीव का। विनु समुझे नहिँ काज, आपने जीव का ॥२॥ जुगन जुगन हम आइ, कहा समुझाइ बिनु समुझे धनि परिही, काल मुख जाइ ॥३॥ काम क्रोध मद लाभ, छाँडु सब दुंद रे। . का सोवै दिन रैन, बिरहिनी जागु रे ॥४॥ भव सागर की आस, छाँडु सब फंद रे। फिरि चलु आपन देस, यही भल रंग रे ॥५॥ सुन सखि पिय कै रूप, तो बरनत ना बने । अजर अमर तो देस, सुगंध सागर भरे ॥६॥ फूलन सेज सँवार, पुरुप चैठे जहाँ । दुरै अग्र कै चँवर, हंस राजै जहाँ ॥७॥ कोटिन भानु अँजोर, रोम एक में कहा ।' ऊगे चन्द्र अपार, भूमि सोभा जहाँ ॥८॥ सेत बरन वह देस, सिंहासन सेत है। सेत छत्र सिर धरे, अभय पद देत है ॥६॥ करो अजपा के जाप, प्रेम उर लाइये। मिला सखी सत पीव, तो मंगल गाइये ॥१०॥ 'जुगन जुगन अहिवात, अखंड सो राज है। पिय मिले प्रेमानंद, तो हंस समाज है ॥११॥ साहाग। * मंगल कहैं कधीर पुकार, सुना धर्मदास हो। हंस चले सतलोक, पुरुप के पास हो ॥१२॥ ॥ शव्द २॥ खोजहु संत सुजान से मारग पीव को । समुझि सब्द देहु सवन, मूल जहँ जीव को ॥१॥ भव सागर अगम अथाह, लहर विकरार है। कठिन है पाँचा मार्ग, विचे जम धार है ॥२॥ सिव संकर औ ब्रह्मा, पार न पावहीँ । यह बहिया बल जोर, संत पार लगावहीं ॥३॥ देहिं नाम निज डोरि, तो दुख विसरावहीँ। विन जल लहर अनूप, माती फलकावहीं ॥४॥ मारग पंथ सिधार, तो आरति साजहीं। देहिँ छत्र उँजियार, तो लोक सिधावहीं ॥५॥ महल, प्रेम गुन गावहीं । सँग में सुमति सयानी, तो नेह लगावहीँ ॥६॥ सतगुरु जग में आइ, तो जीव चेताइया । सार सब्द लखवाइ, तो लोक पठाइया ॥७॥ का. लै पान खियाउँ, तो तिनका तारही। कवन सब्द की ओट, सो नरियर मारही ॥८॥ संत अंक लिखि दीन्ह, तो पान खियावही । सार सब्द की ओट सो, नरियर मोरही ॥६॥ नरियर भेद अगम्म, बंस जन मारही। कहै कबीर धर्मदास, जिवन बँदि छोरही ॥१०॥ बैठे अनहद *.पंच दूत।
४० मंगल . मंगल एक अनूप, संत ॥ शब्द ३॥ सतगुरु सनमुख वैठि के, मंगल गाइये। मन बच क्रम करि ध्यान, चरन चित लाइये ॥१॥ जन गाइये। उपजत आतम ज्ञान, प्रेम पद पाइये ॥२॥ चंदन अँगना लिपाइ के, चौक पुराइये। मोतियन थार अराइ के, कलस धराइये ॥३॥ सतगुरु विप्र बोलाइ के, लगन साधाइये । हीरा हंस विठाइ के नाम सुनाइये ॥४॥ जो कल भगति विवेक, प्रेम पद पाइये । सजन सहित परिवार, तो लोक सिधाइये ॥॥ मेटे कर्म के अंक, जाहि गुरु ज्ञान भै । तजो पखंड अभिमान, तो दुरमति दूरि कै ॥६॥ यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहीं। कहै कबीर धर्मदास, अमर पद पावहीं ॥७॥ ॥ शब्द ४ ॥ चला साहंगम नारि, प्रीत पिय से करी। है संसार, तो तामस परिहरी ॥१॥ दिना चारि को रंग, संग नहिँ जाइया । रंग पतंग, नहीं ठहराइया ॥२॥ पाँच चार बड़ जोर, कुसँगि एते घने । इन ठगियन के संग, मुसै घर निसु दिने ॥३॥ जग सोवत दिन रैन, मुसै घर आइ के । आपु भये कोतवाल, अली विधि लूटिये ॥४॥ किया । शूठा है यह तो * मंगल - इन ठगियन को पकरि, जो कोई लीजिये। जोर करें तब हाथ, छोडि नहिं दीजिये ॥५॥ चार कोस लै गाँव, ठाँव एको नहीं। द्वादस नगर मँझार, जो पुरुप विराजहीं ॥६॥ साभा' अगम अपार, पुरुप को ध्याइये। द्वादस नगर मँकार, दरस सुख पाइये ॥७॥ कहैं कवीर धर्मदास, साई पिय चीन्हिये । सुरति निरति लै, गैल बहुरि नहिँ फेरिये ॥८॥ ... यह जिव रहत भुलाइ, घने दिन चार को। बाँह पकरि सतगुरु की, चलो भव पार को ॥१॥ तेजि : कुमति वेकार, सुमति गहि लीजिये। सतगुरु : सरन सम्हार, चरन चित दीजिये ॥२॥ :: गहि सतगुरु के चरन, चलो भव · पार को। बहुरि न मिलना होय, पीर हरो जीव को ॥३॥ चलहु आपने देस, पुरुप बल जोर लइ। लाँघो अवघट घाट, कँवल छवि छाजई ॥४॥ गगन गुफा के घाट, निरंजन भैटिये। चीन्ही कलसा, जाड, अगम तहँ गम किये ॥५॥ निरंकार :निज रुप, सो हिरदे देखिये । अगम 'महल में जाइ; पिया जहँ भैटिये ॥६॥ पुहुप दीप के , मटु, पुरुप का नूर है। कह ,कबीर धर्मदास, साई भरपूर है ॥७॥ * तजि फर। 6 मंगल ॥ शब्द६॥ चलो हंसा सतलोक हमारे, छाँड़ो यह संसारा हो। यह संसार काल जम फंदा, कर्म का जाल पसारा हो ॥१॥ चौदह लोक बसत वा के मुख मैं, सब को करत अहारा हो । जारि जि कोइला करिडार, फिर फिरिदै औतारा ह॥२॥ ब्रह्मा विप्नु सिव दह धरि आये, उन कै कौन विचारा हो । सुर नर मुनि सब छल बल मारे, लै चौरासी डारा हो ॥३॥ मह अकास आपु जहँ बैठे, सेत सरूप अकारा हो। उन के रूप कहाँ लगि बरनौं, संख भान उँजियारा हो ॥४॥ नौ मुकाम दसएँ अस्थाना, जहाँ बसै पुरुप पुराना हो । कोटि चाँद सूरज छिपि जैहै, एक रोम परगासा हो ॥५॥ सेत सरूप सब्द जहँ फूले, हंसा करत विहारा हो। जोजो सरनि गहे सतगुरु के; उन कै होत उघारा हो ॥६॥ वोहि देसवा एक अजर वस्तु है, बरसत अमृत धारा हो। कहै कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुप दरेबारा हो ॥७॥ ॥ शब्द ७॥ सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये । ऊँच नीच कहि जाय, तो उठि नहिँ लागिये ॥१॥ उठि बोलै रा रार, सो जानो घींच है। जेहि घट उपजे क्रोध, अधम.अरु नीच है ॥२॥ माला, वा के हाथ, कतरनी काँख में। सूझै नाहीं आगि, दबी है राख. में ॥३॥ अमृत वा के पास, रुचै नहिँ राँड को। स्वान को यही सुभाव, गहै निज हाड़ को ॥४॥ टैटी, झगड़ा बढ़ाने वाला। . . * मंगल ४३ न प 'का मे बात बनाये, परचे नहिं पीव साँ। अंतर : का वदफैल, फैल गै जीव साँ ॥५॥ कहै कबीर' पुकारि, सुनो धर्म आगरा। "" बहुत हंस लै- साथ, उतरो भव सागरा ॥६॥ ॥ शब्द ८॥ पढ़ सुगना सत नाम, बैठ तन ताख में । चार दिना का रंग, मिलै तन खाक में ॥१॥. लावडं तेल फुलेल, काया है घाम की। अर्द गर्द मिलि जाय, दोहाई सत नाम की ॥२॥ नीव नः मीठी होय, सींचे गुड़ धीव से ! .. जा कर जौन सुभाव, छुटै नहिँ जीव से ॥३॥ जहँ सौदागर होय, तहाँ कछु भाखिये । बिन' गाहक बिन मोल, वस्तु ना खोलिये ॥४॥ चौमुख दीपक - बारि, महल विच सोइये। नौ नारी से नेह, भक्ति बिन रोइये ॥५॥ चेतहु संत सुजान, तो ज़म से राड़ि है। काल के हाथ गुलेल, तडाका धरती है मस्तूल, तंबु. असमान है। नौ,लख जरत मसाल, सीढ़ी बंकनाल है ॥७॥ आगम कहें कबीर, सुनो धर्म आगरा। बहुत. हंस : लेइ साध, उत्तरी भव सागरा ॥८॥ ॥ शब्द ॥ चढ़ि अमवा की डारि, अकेली धन का रे खड़ी। चले जाव ,मुरुख गँवार, मारी ताहि का रे पड़ी ॥१॥ मारिहै ॥६॥ .
४४
मंगल
ना मोरी
की तोरी सासू दारुनिया, की नैहर दूर घसै ।
की तारे पिय परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥२॥
सासु दारुनिया, न नैहर दूर बसै ।
हमरे चलम परदेस, जोहत वा की वाट खड़ी ॥३॥
पचरँग पहिरु चुनरिया, ऊपर धरो आरसी ।
सतगुरु
संग
सुजान, समुझे मोर
पारसी ॥2॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन 'गावहीं।
कहैं कबीर धर्मदास, प्रेम पद पावहीं ॥५॥
॥ शब्द १० ॥
चढ़ि नौरंगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ।
अगम महल चढ़ि चलो, जहाँ पिय से मिला ॥१॥
मिलि चलो आपन देस, जहाँ छवि छाजई।
सेत सब्द. जहँ खिले, हंस होइ आवही ॥२॥
अग्र बस्तु मिलि जाय, सब्द -टकसार हो।
चहुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो ॥३॥
अंबु दीप एक देस, पुरुप जहँ रहहि हो ।
कहै कबीर धर्मदास, बिछुरन नहिँ होइ हो ॥४॥
॥ शब्द १९॥
साहेब पतिया पठाये, सो हंसा बाँचे हो।
पाती बाँचि घर जावो, पुरुप के पासे हो ॥१॥
ज्ञान रंग पालान, सुरति की काठी हो।
अनहद सब्द सवार, अनंत कला सेोमा हो ॥२॥
कामिनि करहि सिँगार, हंसा सुनु वानी हो ।
आवो पलँग चढ़ि बैठो, तो दरसन देहु हो ॥३॥
मंगल ४५ . हंसाः सब्द घिदेह, रूप नहिँ रेखा हो। कामिनि रहत लजाय, सोमा निजु देखा हो ॥४॥ धर्मराय उठि बोले, हंसा सुनि लेहु हो । १ कह को किया है पयान, से कहो समुताइ हो ॥५॥ तवः हंसा.. अस बोले, सुना धर्मराय हो। पाये पुरुप के पान, तो लोक के जाइब हो ॥६॥ तब धर्मराय पुनि बोले, हंसा सुनि लेहु हो । : जाहु पुरुष. के पास, सीस पगु देहु हो ॥७॥ मानसरोवर ताल, जहाँ अमी सागर हो। हंसा करै बिसराम, तो • अग्र उजागर हो ॥८॥ ,अमर लोक एक दीप, तो सेभा सुहेल हो। तहँ हंसन के बास, सुरति मिलि खेलै हो ॥६॥ • अनहद धाम अचिंत, पुरुप जहँ छाजै हो। अमर लोक निज धाम, हंसन कै देसा हो ॥१०॥ कहैं. कवीर पुकारि, सुनो धर्मदासा हो। वह तो अगम अगाध, पहुँचे कोइ हंसा हो ॥११॥ ॥ शब्द १२ ॥ सूतल रहलौं मैं सखियाँ, तो विप कर आगर हो। सतगुरु दिहलें जगाइ, पायौँ सुख.सागर हो ॥१॥ जब रहली जननी के ओदर, परन सम्हारल हो । जब लौँ तन में प्रान, न ताहि विसराइब हो ॥२॥ एक बुंद से . साहेब. मँदिल बनावल हो। बिना नँव के मंदिल, बहु - कल लागल हो ॥३॥ मा के पेट-यानी गर्भ में।
मंगल इहवाँ गाँव "न ठाँव, नहीं पुर पाटन हो। नाहिन बाट बटोही, नहीं हित आपन हो ॥४॥ सेमर है संसार, भुवा उधराइल हो। सुंदर भक्ति “अनूप, चले : पछिताइल हो ॥५॥ नदी वह अगम अपार, पार कस पाइब हो। सतगुरु बैठे मुख मोरि, काहि गहिराइब हो ६॥ सत्तनाम गुन गाइय, सत ना डोलाइय हो। कहै कबीर धर्मदास, अमर घर पाइव हो ॥७॥ ॥ शब्द १३ ॥ धनुप बान लिये ठाढ़, जोगिनि एक माया हो । छिनहिं मैं करत विगार, तनिक नहिं दाया हो ॥१॥ शिर फिर वहै बयार, प्रेम रस डोलै हो। चढ़ि नौरंगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ॥२॥ पिया पिया करत पुकार, पिया नहिं आया हो। पिय विनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो ॥३॥ कागा हो तुम.. का रे, कियो बटवारा हो; पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूटहि हो ॥४॥ कहैं कबीर धर्मदास, गुरू सँग चेला हो। हिलि मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो ॥५॥ ॥ शब्द १४ ॥ सखि अनहद धाम निवास, से देखों ये घड़ी। तहँ पहुँचै कोइ दास, सो देखा ॥१॥ सुख कोइ एक सर हंस, सो देखा परखि गहां निज नाम, सेा देखो ॥२॥ यारह बाट यांनी बेठिकाने या इधर उधर । *
मंगल
४७,
जन्म जन्म दुख मिटे, सेो देखो।
राखों निज धाम, सेा देखो० ॥३॥
अछय बछ के डहर समाय, सेा देखो।
सत्त नाम परताप, सेा देखो० ॥४॥
हंसा निज घर चले, सो देखो० ।
काल रहा मुरताय, सो देखा ॥५॥
अधरदुलीचा अमर पद; सो देखो। .
सतगुरु दिया बिछाय, सो देखो० ॥६॥
धर्मनि., मिले कवीर, सो देखो।
हिलि मिलि करहिकलोल, सो देखो० ॥७॥
॥ शब्द १५॥
गुन कर बौरी, जब लौं नैहर माहिँ हो ।
फिरि "जैहै। ससुरारि, पिया के पास हो ॥१॥
जब लगि राज़ पिया कर, तू सुख करिले हो।
. सासु ननदिया दारुनि, उत्तर जनि देहु हो ॥२॥
सतगुरु डोलिया फंदावल, लगे चार कहार हो।
आगे चलै मार साहेब, पाछे चालनहार हो ॥३॥
जाइ उतारे बोहि देसवाँ, जहँ दिस न दुवार हो ।
मोतियन चुनि घर बने, हीरा लगे किवार हो ॥४॥;
चंद्र लंगन मोर अँचरा, सुरज लंगन मार दह हो ।
हृदे लगन मारा साहेब, जहँ लगि फैले दृष्टि हो ॥५
भन मन विहसै दुलहिनि, 'अमर बर पाये हो ।
साहेब कबीर के दिहल, सुनिले धर्मदास हो ॥६॥
४- मंगल ॥ शब्द १६ ॥ मेहीं मेहीं चुकवा पिसावो, तो पिय के लगावो हो। सुरति साहंगम नारि तो दुरमति छाँड़ा हो ॥१॥ घटहि में मानसरोवर, घाट बँधावो हो। घटहि में पाँच कहार, दूलह नहवावहिं हो ॥२॥ घटहि में नेह नउनिया, तो चरन पखारहिँ हो। प्रेम प्रीत के ललना, तो पलना झुलावहिं हो ॥३॥ घटहि में दया के दरजी, तो दरज मिलावहि हो। पाँच तत्त के जामा, दुलह के जामा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥४॥ घटहि में लोह लोहार, तो कँगना डावहि हो । तीन गुनन के सेहरा, दुलंह पहिरावहिं हो ॥५॥ घटहि में चंदन चौक, तो चौक पुरावहिँ हो । सत्त सुकृत को कलसा, तहाँ धरावहिं हो ॥६॥ घटहि में मन सत माली, तो मौर ले आवंहि हो । घटहि में जुगति के जौहरि, जात पहिरावहि हो । घटहि सोहंगम नारि, तो पिय को 'रिझावहि हो । वार बार गुरु झगरि, तो अरज सुनावहि हो ॥८॥ यह मंगल सतलोक, हंस जन · गावहि हो। कहैं कबीर धर्मदास, बहुरि नहिँ आवहि हो ॥९॥ ॥ शब्द ९७॥ सतगुरु संगुन धरावो मेरे बाबा, .... हम अइँ व्याहन-जोग हो।' तन मन सबै प्रेम रस माते, हँसै. नैहर के लोग हो ॥१॥ हरहना-धात को गला कर गढ़ना ।
मंगल सुरज के बाम्हन बेगि पठावा मोरे बाबा, देखि आवै वोहि देस हो । रबि ससि तारा दिवस न रजनी, बसै अलख अलबेल हो ॥२॥ कर पगु पीठ पेट नहिँ काया, हम से कहा न जात हो । अस बर लिखा लिलार हमारे, बाम्हन कहु तहँ जाइ हो ॥३॥ बंध झलरिया बँदी झलकै, चंद पार हो। मानिक दियना तहवाँ झलकै, जगमग जोति अपार हो ॥४॥ विना सुरत संसारहि निरखै, विन मुख बोलनहार हो। स्रवन नैन बिनु सुनै औ देखे, आसन अधर अधार हो ॥५॥ प्रेम प्रीत से खंभ गड़ाया, गैवी अलँब बिछावा हो। कनक कलस धरि मंगल गावा, मोतियन भालरि लाव हो ॥६॥ दुलहिनि दुलहा व्याहन आये, भये दोऊ एक ठौरं हो। भया बियाह उछाह परम पद, भये उर सत्त, उचार हो ॥७॥ सहारा, भरोसा।
मंगल
पाये साहाग माँग भर सँदुर,
नखसिख सारहौ सिँगार हो।
फूल जड़ित रतनन से राजित,
बँदी झलकै लिलार हो ॥८॥
सुखमनि पलँग बिछावा सखियाँ,
पदमन धुनि झनकार हो।
अब का सोवो उहि जागो धनियाँ,
आखिर करो सम्हार हो ॥६॥
विनति करूँ मैं चरन कँवल में,
सुनो मारे प्रान-नाथ हो।
धरमदास के सतगुरु समरथ,
तोहरे हाथ निवाह हो ॥१०॥
॥ शब्द १८॥
हमरा बियाह करो मारे बाबा,
तुम साँ नाहिं निबाह हो ।
जिन के नाहिं रूप औ रेखा,
उन से हमरो बियाह हो ॥१॥
आवे न जाय मरै ना जीये,
सो घर खोजो जाई हो ।
बूढ़ न बार तरुन नहिं चेलिका,
वा को तिलक लगाई हो ॥२॥
गगन मँदिल वह गढ़ मारे बाबा,
अंरचं 'उरघ के बीच हो।
पवन वराती ब्याहन आये,
मान करो सनमान
* शोभित । मीजयान ।
हो ॥३॥
मंगल सत्त सुकृत तिरबेनी से नीर मँगावा,, अछय वृच्छ के डार हो। कै कलस धरावो, पूजो पाँव हमार हा ॥४॥ तिरगुन सेंदुरा मैंगावो मेरे बाबा, पिय से माँग भराइ हो। सतगुरु बिप्र के चरन पखारो, जुग जुग रहै सोहाग हो ॥५॥ सब्द सुरत से गाँठ जुरावा, माँड़ो राखो छाइ हो। पाँच भंवरिया घुमाओ मेरे बाबा, गठिया देवो नियुकाइ हो ॥६॥ चाँद सुरज दोउ कोहधर बाबा, पाँजी दसो दुवार हो । ऊँच दुवारी निहारो सखियाँ, निहुरि कै घर को जाहु हो ॥७॥ ज्ञान के डोलिया फॅदावा मोरे वावा, करि देवो विदा हमार हो । धरमदास से छुटल भव सागर, सब साँ अँटि अकवार हो ॥८॥ ॥ शब्द १८ ॥ चलो सखि देखन चलिये, दुलह कबीर हैं। उन साँ जुरल सनेह, जठर साँ राखिहँ ॥ टेक ॥ * रास्ता : F मंगल पाँच तत्त को बासा, त्यागो बेगि के छाँड़ा शिलि मिलि नेह, पुरुप गम राखि कै ॥१॥ लाँघो औघट घाट, पंथ निज ताकि कै गहो सुकृत निज डोर, अगम गम राखि कै ॥२॥ चार कोस आकास, तहाँ आकास, तहाँ चढि देखिये। आगे मारग झीनि, तो सुरत विवेकिये ॥३॥ मुकुट एक अनूप, छत्र सिर साजिहै। दुरत अग्र को चौँर, सब्द धुनि गाजिहै ॥४॥ सेत धुजा फहराय, भँवर तहँ गॅजहीं । नितहि उठे झनकार, गगन घनघोरहीं ॥५॥ कहैं कबीर धर्मदास साँ, मूल उचारिये। आगम गम्य बताइ कै, हंस उबारिये ॥६॥ ॥ शब्द २०॥ [प्रश्नोत्तर ] सत्त सुकृत सतनाम, सेा आदि मनाइये। लीजै साहेव को नाम, प्रेम पद पाइये ॥१॥ सुरति नहीं बिलगाइ, तो मुक्ती होइ हो । चलो हंसा वहि देस, बसै जहँ पीव हो ॥२॥ चाँद सुरज के पूरब, हंसा पच्छिम हो। वोहि देसवाँ मत जाव, बसै जहँ पंछी' हो ॥३॥ चाँद सुरज के दक्खिन, हंसा उत्तर हो। खोलो मुक्ति दुवार, उतरि चलो पार हो ॥४॥. तीन से साठ कड़िहार, काल जम जार हो । उन के वार जनि भूलो, भवसागर धार हो ॥५॥ * ऊपर । । शरीर-बद्ध जीय । मल्लाह ।
मंगल ५३ विहीँ सब सखियाँ, तो रानी मनाइहै। रानी देहु बकसीस, हंसा गहि आनों हो ॥६॥ [रानी]-जो तुम सखियाँसयांनी, हंसा गहि आना हो। सात दीप नौ खंड की, रानी कहावी हो ॥॥ [सखी]-हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ को जाइब हो। सात दीप नौ खंड की, रानी छाँड़ि हो ॥८॥ [हंस]-सात दीप नौ खंड बसै, बकवादिन हो। ठाकुर' मति के हीन, कर्म वस बाँधा हो ॥६॥ स्याम रंग पहिराव, कुसुम रँग सारी हो। मानो मेघ घन गरजि, उमँगि दल बादल हो ॥१०॥ चलि जाहु नारि गँवारि, तु जगत पियारी हो। चित्रगुप्त दुर्ग दानी की, रहो दुलारी हो ॥१९॥ [सखी]-हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ के जाइब हो , सन्मुख होइ कै देखा, तो करहुँ जवाव हो ॥१२॥ स्याम रंग पहिराव, कुसुम रँग चुनरी हो। कठिन कला छविझलकै, तौ काल दुलारी हो॥१३॥ मैं तोहि पूछौँ हंसा, कहाँ तोरे बाप हो । हम से कहो समझाय, कहा करे पाप हो ॥१४॥ [हंस]-सत साहेब जो पिता, तो सतगुरु माता हो। चित्रगुप्त दुर्गदानी, सेा येहि बिधि जाता हो ॥१५॥ सब सखि माथ नवाया, तो हंसा चलि भे हो। आगे मिले धर्मराय, काल सिर नाये हो ॥१६॥ * रानी से मतलब भाया और · संखियाँ से माया की शक्तियाँ। + काल । दुर्ग-कठिन । दुर्ग-दानी नाम फाल का है। .
बधावा अचिंत पुरुप को मंगल, हंसा गावै हो। कहैं कवीर धर्मदास, अमर पद पावै हो ॥१७॥ ॥बधावा ॥ ॥शब्द१॥ पधारी साहेब पाहुना, मारे मन में बहुत अनंद ॥टेक॥ सखि का से पाताओँ आँगना, का से पाताओँ चौक ॥१॥ चंदन पोताऔं आँगना, गजमोतियन पुराऔं चौक ॥२॥ सखि आँगन बोऔं लायची, मारे फलसी नागर बेल । पधारो साहेब पाहुना ॥३॥ ऊँची चढ़ कर जोवती, साहेब का रथ केती दूर ॥४॥ ऊँची लहर समुद्र की, तल बहै जमुना का नीर ॥५॥ भलि भई साहेब आइया, बाजत अनहद घोर ॥६॥ कनक- सिंहासन बैठका, ओढ़न अंबर चीर ॥७॥ सखि भवसागर हेरिया, लह्यो सुख सागर तीर ॥८॥ धरमदास की बीनती, मोहिँ मिलियो साहेब कबीर ॥६॥ ॥ शब्द २॥ बधावा संत सजाऊँ हो। जा विधि सतगुरु मेहर करें, सेाई विधि लाऊँ हो ॥ टेक ॥ रतन पटोरा डारि पाँवड़ा', सन्मुख जाऊँ हो। सव सखियाँ मिलि बाँटत बधाई, मंगल गाऊँ हो ॥१॥ घसि घसि चंदन अँगना लिपाऊँ, चौक पुराऊँ हो । मेवा नरियर पान मिठाई, संजम सबै मँगाऊँ हो ॥२॥ कपड़ा । कालीन या बढ़िया कपड़ा जो बड़े प्रादमियाँ के चलने के लिये बिछाया जाता है।
बधावा ५५ खीर खाँड घृत अमृत भोजन, संत जिमाऊँ हो । चरन धाइ चरनामृत लेऊँ, सीस नवाऊँ हो ॥३॥ जब मेरे साहेब तखत विराज, आरति लाऊँ हो। पान पर्वान दया से पाऊँ, सब मिलि गाऊँ हो ॥४॥ सतगुरु पलँग पधारें, चरन दधाऊँ हो। धरमदास याही बिधि करि, सतलोक सिधाऊं हो ॥५॥ जब मोरे ॥ शब्द ३॥ साहेब सतगुर घर आया हो। अँगना मार जगमग भया, सुख सम्पति लाया हो ॥१॥ आधि* गई मेरी हे सखी, आज सज्जन पाया हो । धन्य विधाता लेख लिखा, निज भाग जगाया हो ॥२॥ कोमल बचन अंग दया घनेरी, कल्प वृच्छ की छाया हो। धन जननी अस संत जिन जाया, अनँद बधाया हो ॥३॥ जपतप नेम धर्म बहु कीन्हा, रसना नामहिं गाया हो। धरमदास सतगुरु सतसंग से, छिन मैं परम पद पाया हो । ॥ शब्द ४॥ सतगुरु आये द्वार, मन में बजत बधाइया । सतगुरु साहेब दीन-दयाला, द्वारे मारे आइया । जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥१॥ प्रेम सुरत की करी रसाई, व्यंजन आसन लाइया । जॅबन बैठे सतगुरु साहेब, अधर से चौर डोलाइया ॥२॥ दया भाव के पलँग विछाये, प्रेम दुलीचा लाइया । ता पर सोये सतगुरु साहेध, सुरति के तेल लगाइया ॥३॥ मानसी दुक्ख ; चिन्ता ।। भोजन । * ५६ बधावा धरमदास विनवै कर जोरी, सुनिये समरथ साँइया । साहेब कबीर प्रभु मिले बिदेही, मीना दरस दिखाइया ॥४॥ ॥ शब्द ५॥ आज आनंद भये मेरे घर, निरगुन संत पधारे हो ॥टेक॥ घसि घसि चंदन अंगनालीपाऔं, गजमोतियन चौक पुराऔं है।। कनक रतन का कलस मँगाऔं, हीरा जड़ाव की भारी हो॥२ सतगुरु तो सिंहासन बैठे, सब्द का चँवर टुराऔं हो ॥३॥ धरमदास की अरज गोसाँई, मंगलचार नित गाऔं हो॥४॥ ॥ शब्द६॥ मारे आये संत सनेही, धन धन घड़ी आज की हो॥टेक॥ अतर फुलेल न्हवावाँ सजनी केसरि तिलक लगाओँ हो॥१ धूप दीप नैवेद आरती, फूल माल पहिराऔं हो ॥२॥ जिनके दरस होय सब काजा, तरसै राना राजा हो ॥३॥ सत्त सब्द जहँ होय प्रकासा, अस कवीर धर्मदासा हो ॥४॥ ॥ शब्द॥ आज घर आये साहेब मार ॥ टेक ॥ हुलसि हुलसि धन अँगना बुहारे, मोतियन चौक पुराई ॥१॥ चरन धाय चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठाई ॥२॥ पाँच सखी मिलि मंगल गावै, सब्द मैं सुरति समाई ॥३॥ बाँधोगढ़ कै आमिन विनवै, धनि हो कबीर गोसाँई॥४॥ *धर्मदासजी की स्त्री का नाम ।
बारहमासा ॥ बारहमासाः॥ धर संत्य पुरुप को ध्यान, तुम्हारी पूरन है आसा ॥टेक॥ पिरथम मासं असाढ़ जो लागे, सोधी काया को । बाहर दृष्टं कहाँ से आया, भीतर छाया को ॥. पंच का नगर वसाया को। नख सिख से रचि नैन नासिका, इसे बनाया को ॥ उसी का खोज करो बासा ॥१॥ सावन सार नाम निज जपि ले, यह जप अपने से । कर नहि हलै न डोले जिभ्या, साहं जपने से ॥ काल नहिं व्यापै सुपमनि से । इँगल पिँगल के मारग की, तुम डोर गहो मन से । नाम साहंग जपो स्वाँसा ॥२॥ भादौँ भर्म मेटि सतगुरु.. की सेवा कछु करना । गगन गुफा के मारग को, तुम धीरज से चढ़ना ॥ केवाड़े द्वादस हैं लागे। वैकुंठ पुरी में दसम द्वार है, तहाँ जोति जागे ॥ वहाँ नहिँ लगै काल फाँसा ॥३॥ कार सुमति इजराज़, कोई जन अंतर. ध्यान धरै.। .... नाभि कँवल में सुरति लगावै, आतम नजर परै ।। .. झलक्कै दसम दुवारे में। अगम अगोचर पुर्ष अविनासी, सुन्न अटारी में । वहाँ नहिं लगै भख, प्यासा ॥2॥ कातिक. पप्ट कँवल दल भीतर, अगम,जाति दरसै। चमकै विजुली मेघ जो गरजे, अमृत जल बरसै ॥.' 8 यारहमासा . बिना दल बादल झनकारा। उलटि पवन के नीचे होई, बहै.. अमृत धारा॥ वहाँ नहिँ लागै भी फाँसी ॥॥ अगहन आसा लगी हमारी, गगन गुफा माहीं । वज केवारे लगे द्वार में, सहज खुलें नाहीं ॥ जहाँ कछु हिकमत का काजा । उलटि पवन के ठोकर मारो, खोलो दरवाजा । तिन्हीं का छूट जम त्रांसा ॥६॥ पूस मास में पिया आपना, खोज करो भाई। जनम जनम के संसय तुम्हरे, सबै छूटि जाई ॥ लखो घट वीच पिया छाया । सतगुरु पूरे किरपा करिके, हमको बतलाया ॥ किया मारे वैरियन को नासा ॥७॥ लागत माघ अगम की वानी, सुनो संत प्यारे । भर्म ‘जाल भौसागर से तुम, रहो सदा न्यारे । गगन में अनहद बाजत है। सुन्न महल के भीतर में, सिव सक्ति विराजतं है ॥ बने वह खूबंहि कैलासा ॥८ फागुन फाँस लगै नहिँ जम की, गहौ नाम डोरी। पाँच चौर वसे काया माहीं, करत सदा चोरी ॥ कोई की हाँक नहीं मानें। नर नारी औ. देवी देवा, संव को भरमाने । काया मैं साँच, करौ वासा ॥. चैत चित्त के मारग को, तुम खोजो दिन राती। सुन्न महल में दीपक बारों, विनां तेल बाती॥
वसंत और होली दरस कोइ साधू जेन पावै। पट चक्कर के खोल केवारा, ऊपर चढ़ि जावै॥ तहाँ है जगर मगर हंसा ॥१०॥ बैसाख बात को मारी मानि ले, सब से छोट' रहना । भला बुरा मत कहो केहू को, भला बुरा सहना ॥ भला तुम छाँड़ेि बड़ाई को। तामसखीस मत करो जगत में, यह भाव संतनको ॥ बनो तुम दासन के दासा ॥११॥ जेठ जागती जाति की महिमा, परखो संत सुजान । अजपा जाप जपो साहंगम, पावो पद निरबान । सब्द धुन पाँचो लौ लावा।। गुरु कबीर किरपात धर्मन, गुन बारह मास गावो ॥ जिन्हीं का ज्ञान नगर बासा ॥१२॥ ॥ बसंत और होली । ॥ बसंत ॥ प्यारे.कंत से मिलि खेलौ.विमल बसंत । खोला अँधेरी कोठरी, मन बैठौ महल एकंत ॥ टेक ॥ गगन मँदिल, दीपक,धरो हो, भवन करी उँजियार। छैल छवीले कब मिलिहँ, मेर जीवन प्रान अधार ॥१॥ गंगा . जमुना सरसुतीः हो, चंद सूर के बीच । अर्ध ऊर्ध के मध्य में हो, अमी अरगजा कीच- ॥२॥ बिन पग नटवा निरत करत हैं, बिन कर बाजै ताल । बिना नयन छवि देखनी हो, बिन सरवन झनकार ॥३॥ A घसंत और होली -- सहज सुरंगी रमि रहा हो, हिलि मिलि एकै ठाँव। धर्मनि भेटे भाव से हो, साहेब फवीर के पाँव ॥४॥ ॥ होली ॥ हमरी उमिरिया होरी खेलन की, पिय मासाँ मिलि के विछुरि गयो हो.१०॥ पिय हमरे हम पिय की पियारी, पिय बिच. अंतर परि गयो हो ॥२॥ पिया मिलैं तब जियौं मारी संजनी, पिया विन जियरा निकरि गयो हो ॥३॥ इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच डगर पिय मिलि गया हो ॥४॥ धरमदास विरहिनि पिय पावै, चरन कँवल चित गहि रही हो ॥५॥ । हाली २॥ होरी खेलो सयानी, फागुन की ऋतुं आनी ॥ टेक ॥ मनुपा जनम बहुरि ना पैहो, 'साखी बेदं पुरानी । फिर पाछे पछिताहुगी सजनी, परिहौ चौरासी खांनी । फिरौ जुग जुग भटकानी ॥१॥ सील संतोप कै केसर चोरी, छिरकत पियरुचिमानी। . आतम नारि करत न्यौछावर, तन मन धनहिँ लुटानी। जवै पिया के मन मानी ॥२॥ वाजत ताल मृदंग झाँझ डफ, अनहद घोर निसानी। पाँच पचीस लिये सँग अबला, गगन में धूम मचानी। उठे । सुर बारहवानी ॥३॥ . ।
६१ वसंत और हाली गगन गली में केके अबिनासी, मगन भई मुसुकानी । भक्ति दान माहि फगुआ दीजै, अमर लोक सहदानी । मिटै जब आवा जानी ॥४॥ जग के अरम छोड़ दे बौरी, लोक-लाज बिसरानी। साहेब कबीर मिले मोहिँ सतगुरु, धरमदास भल जानी... : भई निर्भय पटरानी ॥५॥ होली ३॥ जग ये दोउ खेलत होरी। माया ब्रह्म विलास करत हैं, एक से एक बरजोरी ॥ टेक ॥ सचिदानंद सरूप अखंडित, व्यापक है सब ठौरी। हिये नैन से परख परी जेहि, जोति समाय रहोरी ॥१॥ जायन जोर नैन सर मारत, ठहर सकै,को कोरी'। मदन प्रचंड उठे चमकारी, काया करी चित चोरी ॥२॥ निरगुन रूप अमान अखंडित, जा मैं गुन बिसरो री। माया सक्ति अनंद किया है, सबहि मैं अगर भरो.री ॥३॥ कारन सूछम स्थूल दँह धरि, भक्ति हेत टन. तोरी। : धर्मनि विना दरस गुरुः मूरत, कस भव पार भयो री ॥४॥ : ॥ होली ॥ तुम संताखेलु सम्हारि, जग मैं होरी मचि रहि भारी टेक। जड़ चेतन दुई रूप बनाये, एक कनक दुजे नारी । पाँच पचीस लिये सँग अबला, हँसि हँसि मिलि गावैगारी१ दुरमति दम्भ गहे कर में डफ हबड़ हवड़दै तारी। तिरगुन तार तँधूरा बाजे, आस तुस्ना गति न्यारी ॥२॥ + तिरछी चितवन । कपट । * यान।
सोहर चावा चंदन अबिर अरगजा, माया की गहवर भारी । पट दरसन पाखंड छानवे, पकरि किये वेगारी ॥३॥ लोन.मोह दुइ भरि पिचुकारी, छूटत वारम्बारी। जो कोइ सन्मुख होइ के खेले, तिनहिं छौंट लगै कारी ॥१॥ कुमति गुलाल डारि मुख मीजै, काम पुटरिया मारी। सुर नर मुनि अरु पीर औलिया, भौंजि रहे संसारी ॥५॥ चतुरन फगुआ दे दे छूट, मूरख को लगै प्यारी। कहैं कबीर सुना हो धर्मनि, निर्गुन ज्ञान गलि* न्यारी ॥६॥ ॥ सोहर ॥ - ॥ शब्द १॥ साहेब मार बसत अगमपुर, जहाँ गम न हमार हो ॥ टेकं । साहेव के ऊँची अटरिया, तरे विपम बंजार हो। पाप पुन्न दोउ बनियाँ, हीरा लाल विकाय हो ॥१॥ आठ कुवा नव बावड़ी, सोरह पनिहार हो। भरलि गगरिया ढरकि गै, ठाढी धन पछिताय हो ॥२॥ छोट मेट ढोलिया चॅदन के, छोटे चार. कहार हों। लै कै उतारे वोहि देसवाँ, जहाँ दिस न दुवार हो ॥३॥ कहै कबीर सुनु धर्मन, मेरो, वाहि. देस हो । जो रे गयेसा बहुरे नहिँ, कस. कहत:सनेस, हो ॥४॥ ॥ शब्द २॥ जाके दुवरवा. जमिरिया : सो कैसे सोइल हो। महर महर; करै फूल, : नींद नहिँ आइल हो ॥१॥ • - • * गली सोहर ६३ काटौं मैं पेड़ मिरिया, तो पलँगा विनाइब हो । तेहि पर सावै मार साहेव, बेनिया डोलाइब हो ॥२॥ सास मार सुतल अगरिया* :ननद गजओबरा हो। सैयाँ मार सुतल धौरहरिया, मैं कैसे जगाइव हो ॥३॥ उठो मारी लहुरी ननदिया, तुम ठाकुराइन हो । पाँच चोर घर मूसँ., तो दियना जगाइव हो ॥४॥ एहि नगरी बसै पिय मार, तो कोइ न जगावलं हो। नइहर के, अभिमानी, पिया नहिं चीन्हल हो ॥५॥ इहाँ कै. नाच भवनवा, नीक 'नहिँ लागै हो। घटहि में एक छिदुनिया, नाच तहँ देखब हो ॥६॥ छोट मोट पेड़ जमिरिया, तो फुलवा लहर करै हो। तेहि तरे बाजन वाजै, तो सब्द सुनावले हो ॥७॥ साहेब कबीर के साहर, संत जन गावल हो । धर्मदास, अमर' पद पावल हो ॥६॥ ॥ शब्द ३ ॥ कहँवाँ से जिव आइल, कहँवाँ समाइल हो। कहँवाँ कइल मुकाम, कहाँ लपदाइल हो ॥१॥ निरगुन से जिव आइल, सर्गुन समाइल हो । कायागढ़ कइल मुकाम, माया. लपटाइल हो ॥२॥.. एक बुंद: से. काया महल : उठावल हो :- बुंद परे गलि जाय, पाछे पछितावल हो. ॥३॥ हंस कहै भाइ सरंवर, हम उड़ि जाइव हो। मार तार एतन,दिदार, बहुरिनहिं पाइब हो ॥४॥ . याहर। भीतर ।। नपर। छेद अर्यात तीसरा तिल । सूनहु हो * सोहर इहवाँ कोइ नहि आपन, केहि सँग बोलै हो.। बिच तरवर मैदान, अकेला (हंसा) डोलै हो ॥५॥ लख चौरासी भरमि, मनुख तन पाइल हो। मानुख जनम अमेाल, अपन साँ खोइल हो ॥६॥ साहेब कबीर सोहर गावल, गाइ सुनावल हो। सूनहु हो धर्मादास, एही चित चेतहु हो ॥७॥ ॥ शव्द४॥ रूप, मनै खेलत रहलूँ अँगनवाँ, सखी सँग साथी हो । आइ गवन निगिचाय, बदन भयो धुमिल हो ॥१॥ पहिले गवनवाँ ऐलूँ, पनियाँ के भेजलन हो । देखि कुवाँ के पछितैलूँ हो ॥२॥ कुवाँ भीर भई भारी, तो गागर फूटल हो । कौन उत्तर , घर दव, हाथ दोउ छूछे हो ॥३॥ घर मेरी सासु दारुनी, तो ननदं हठीली हो । केहि से कहब दुख आपन, संगी न साथी हो ॥४॥ ठाढ़ि माहोरे* धनि सुसुकै; मनै पछताइल हो। पिया मो से मुखहुँ न बोले, कवन गुन लागल हो ॥५॥ सजन की ऊँची अटरिया; तो चढ़त लजाऊँ हो । कल नहिं लेत पहरुआ, कवन विधि जाइब हो:॥३॥ गल गंज माती कै हार, तो दीपक हाथे हो। मकि के चढ़ा अटरिया, -पुरुप के पासे हो ॥७॥ कहें. 'कबीर : पुकारि, सुनो. धर्म, आगर हो। बहुत हंस लै साथ, उतरु भव सागर हो ॥८॥ दरवाज़े पर।
सोहर ६५ ॥ राग गारी १॥ देवो न देवा प्रभुः जन अपने को, समरथ के गुन गाआँ किहाँजू । गगन मँदिल मोरे सजन बसत हैं, उनहुँ को नेवत बोलायें किहाँजू ॥१॥ काम क्रोध मद लाभ पाँवड़े, भीतर भवन बुलाओँ किहाँजू । "नयन के जल लै चरन पखारौं, चित चौका बैठारौं किहाँजू ॥२॥ करनी के पातर कथनी के दोना, साखी के सौंक लगाऔं किहाँजू । भाव के भात औ.दाल दया के, सब्द कै बरा बनाऔँ किहाँजू ॥३॥ मनसा मंडे। सरस बनाऔं, प्रेम के घिरत चुवाओँ किहाँज । सत कै दूधकरनी के खोवा, सक्कर सुमति मिलाऔं किहाँजू ॥४॥ सुख पाय जेवें संजन हमारे, स्वाँस के वायु डोलाऔं किहाँजू। सीसा सारं भरे जल 'अमृत, सेा अचवन करवाओँ किहाँजू ॥५॥ * कालीन या फ़र्श जो बड़े लोगों के चलने को विछाया जाता है। +राटी । - 9
सोहर
-
पाँच पचीस पकरि नौ नारी,
सजन को गारी गवाऔं किहाँजू ।
तत्त तमोलिन सुघर सुमति ले,
सजन को बीरा खवाओँ किहाँजू ॥३॥
एकइस खंड महल के भीतर,
निर्भय पलँग विछाऔं किहाँजू
धर्मदास कहे साहेब मोरे,
मुक्ति मनोरथ पाओँ किहाँजू ॥७॥
॥ राग गारी॥
सतगुरु आये द्वार, सुरति रस विजना।
काहे कै बैठक देउँ, सुरति रस बिंजना ॥१॥
चंदन पीढ़ी बैठक, सुरति रस बिजना ।
नारी नर चरन पखारी, सुरति रस पिंजना ॥२॥
भात रींचा रस दूध, सुरति रस विंजना ।
धोइ मूंग के दाल, सुरति रस बिंजना ॥३॥
काहे को थाल परोसाँ, सुरति रस विंजना
काहे कटोरी आन दूध, सुरति रस पिंजना in.
सोने के थार परोसा, सुरति रस बिंजना।
रूपे कटोरी आन दूध, सुरति रस बिंजना ॥५॥
अँइ लेहु सतगुर पाहुन, सुरति रस बिंजना ।
मुख भर देहु असीस, सुरति रस बिंजना. ॥६॥
पाथर को का पूजे, सुरति रस विंजना ।
मुख वाले ना खाय, सुरति रस पिंजना ॥४॥
साँचे पूजहु साध, सुरति रस विंजना ।
मुख बोलै औ खाय, सुरति रस बिंजना ॥८॥
मिश्रित आइ पिया सुख पाउ, सुरति रस विजना। :: करि लेहु सब्द सिँगार, सुरति रस विंजना ॥ विजना बिजना सब कहै, सुरति रस विंजना। बिंजन लखे न कोई, सुरति रस बिंजना ॥१०॥ कह कबीर धर्मदास, सुरति रस बिजना । रहत अमर पुर छाय, सुरति रस बिंजना ॥११॥ . मिश्रित का अंग ॥ शब्द १॥ . गुरू बिन कौन हरै मारी पीरा ॥ टेक ॥ रहत अलीन मलीन जुगनजुग, राई विनत पाये एक हीरा १ पाये हीरा रहै नहिं धीरा, लेइ के चले वाहि पारख तीरा २ सेा हीरा साधू सब परखे, तव से भयो मन धीरा'३ धरमदास बिनवै कर जोरी, अजर अमर गुरु पाये कबीरा ? ॥ शब्द २॥ :' ,'' आये दीन-दयाल दया कीन्हा ॥ टेक ॥ दोन जानि गुरु समरथ आये, विमल रूप दरसन दीन्हा १ चरन धोइ चरनामृत लीन्हा, सिंहासन बैठक दीन्हा २ करूँ आरती प्रेम निछावर, तन मन धन अरपन कीन्हा ३ धरमदास पर दाया कीन्हा, सार सब्द सुमिरन दीन्हा? ॥ शब्द ३॥ धरनों मैं साहेब तुम्हरे चरना ॥ टेक ॥ संतन सुख-दायक लायक ..प्रभु दुख हरना ॥१॥ यिंजन बिंजन। ।
मिश्रित सतजुग नाम अचिंत कहाये, खोड़स हंस को दई सरना ॥२॥ त्रेता नाम मुनेन्द्र कहाये, मधुकर विप्र को दई सरना ॥३॥ द्वापर करुनामय कहलाये, इंद्र मती के दुख हरना ॥४॥ कलजुग नाम कवीर कहाये, धर्मदास अस्तुति बरना ॥५॥ ॥ शब्द४॥ ज्ञान की चुनरीधुमल भइ सजनी,मन की नपुरइल आसा हो वारहि बार जीव मार लरजै, कैसे कट दिन राता हो ॥१॥ सास दुख सहली ननद दुख सुहलौँ,पिय दुख सहल न जाई हो. जागो हो मारि सासु गोसाँई, पिय मोर चलल विदेसवाँ होर पइयाँ परि परि ननदि जगावै, कहै न पावै सनेसवा हो । मोर मुख ताको मतजा विदेसवाँ, हाँ मैं चेरि तुम्हार हो ॥३ बहियाँ पकरि स्वामीसेजिया विठाब, जनिरोवो धनियाँ हमार हो कहँ कबीर सुनो धर्मदासा, जुगन जुगन अहिवात' हो ॥४॥ ॥ शब्द ५॥ सत नामै जपु जग लड़ने दे॥ टेक ॥ यह संसार काँट की बारी, अरुकि सरुक्ति के मरने दे ॥१॥ हाथी चाल चले मोर साहेब, कुतिया बँकै तो भुंकने दे॥२॥ यह संसार भादी की नदिया, इवि मर तेहि मरने दे. ॥३॥ धरमदास के साहेब कबीरा, पथर पूजै तो पुजने दे ॥४॥ ॥ शब्द.६॥ नैनन आगे ख्याल घनेरा ॥टेक॥ जेहि कारन जग डोलत भरमे, सो साहेब घट लीन्ह बसेरा ॥१॥ * स्त्री । । सोहाग।
मिश्रित
का संझा, का प्रात सबेरा,
जहँ देखू जहँ साहेव मेरा ॥२॥
अर्ध उर्ध विच लगन लगी है,
साहेब घट में कीन्हा डेरा ॥३॥
साहेब कवीर एक माला दीन्हा,
धरमदास घट ही विच फेरा ॥४॥
.
॥ शब्द ॥
'. साहेव मोरे दीन्ही चोलिया नई ॥ टेक ॥
तीन पाँच मोरि चोलिया के धुंडी,
लागी कुमति सुमतिया की पाती ॥१॥
यह चोलिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि धनि भई अलमाती ॥२॥
सुनहु. हो मारी पार परोसिन,
यह चोलिया बिरला जन जानी ॥३॥
पहिले वियाह मोर भयो सतगुरु से,
चोलिया के बँद मोरे
सतगुरु
खोली
॥४॥
धरमदास विनवै कर जारी,
विसरि गई नइहरवा की बोली.॥२॥
-1
॥ शब्द ८॥
साहेब मोरे पठई चाली अनमोल ॥ टेक॥
यह चालिया मोरे ससुरे से आई,
चोलिया पहिरि हम भई अतोल ॥१॥
.:. यह चोलिया में सहस बँद लागे,
चोलिया के बँद मोरे सतगुरु खोल ॥२॥
90 मिश्रित । ॥ शब्द - .. चोलिया पहिरि धनि चली है गवनवा, सेत पितंबर लागे हिंडोल ॥३॥ धरमदास विनवै कर जोरी, नैहर सुपना भयल अब मोर ॥४॥ जागु वहुरिया पहिरु रँग सारी ॥ टेक ॥ जागत आगी पाँच कुँआरी, जनम जनम के ताप निवारी ॥१॥ तजि कुल कानि से होइ रहु न्यारी, अबके बिछुरे विपति अति भारी ॥२॥ 'जो खोलो पिय आय किवारी, पहिरौँ चीर अमर अति भारी ॥३॥ धरमदास बिनवै कर जारी, साहेव कबीर मारगवन निवारी ॥४॥ ॥ शब्द १०॥ बरनौँ संत समाज, जिनकी 'ज्ञान कचहरी ॥ टेक ॥ काया नगर में सुरति जजीरा, सेत घजा फहराना । सहन बिछौना सब्द सिपाही, सतगुरु नाम खजाना ॥१॥ संतोष तख्त पर ज्ञान है राजा, विवेक भया दीवानी। जगमग जोति छत्र सिर ऊपर, मुक्ति भरे जहँ पानी ॥२॥ काम क्रोध को सहज निकारो, माया कैमूंड़ मुँडावा। लोभ मोह सब दूरि वहावा, ऐसन अदल चलावो ॥३॥ सहज को दयां वचन करु सीतल, संघ को सब्द सुनावा। धरमदास विनवै कर जोरी, समरथ सरना आवो ॥४॥ बर्दाश्त । * ।
मिश्रित ७१ ॥ शब्द ११ ॥ हमरे का करे हाँसी लोग ॥ टेक । मारा मन लागा सतगुरु से, भला होय के खोर* । जव से सतगुरुं ज्ञान भयो है, चले न केहु कै जोर ॥१॥ मात रिसाई पिता रिसाई, रिसाय बटोहिया लोग। , ज्ञान खड़ग तिरगुन को मारूँ, पाँच पचीसो चोर ॥२॥ अब तो मोहि ऐसी बनि आवे, सतगुरु रचा सँजोग । आवत साध बहुत सुख लागै, जात बियापै रोग ॥३॥ धरमदास विनवै कर जोरी, सुनु हो बंदी-छोर । जा को पद त्रयलोक से न्यारा, सो साहेब कस होय ॥४॥ ॥ शब्द १२ ॥ जेहि सुमिरे गुन'का भये, जा से कर्म न नासा ॥ टेक ॥ पौड़त पौंडत भवजले, काहू पार न पावा । बूड़ि गये नईया मिले, कहो केहिक चढ़ावा ॥१॥ स्वाँति बुंद के कारने, चात्रिक चित लावै। प्यास गये सलिता मिलै, कहो केहि कपियावै ॥२॥ नौ कन्या के कारने, धरो बंक कराला । कपट रूप पाखंड रच्यो, वोहि पैज सँवारा ॥३॥ औगुन है सब दास को, गुन साहेब तुम्हारा । धरमदास बिनती करै, स्वाँसा धन धारा ॥४॥ , सतगुरु कहत नाम गुन न्यारा ॥ टेक॥ कोइ निर्गुन कोइ सर्गुन गावै, कोई किरतिम कोइ करता। लख चौरासी जीव जंतु मैं, सब घट एकै रमिता ॥१॥ t * बुरा।
७२
मिश्रित
पार
उतारे ॥२॥
सुनो साध निरगुन की महिमा, बूझै बिरला कोई।
सरगुन फंदे सवै चलत है, सुर नर मुनि सब लोई ॥२॥
निर्गुन नाम निअच्छर कहिये, रहे सवन से न्यारा।.
निर्गुन सर्गुन जम के फंदा, वाहि कै सकल पसारा ॥३॥
साहेब कबीर के चरन मनावो, साधुन के सिर-ताजा ।
धरमदास पर दाया कीन्हा, वाँह गहे की लाजा ॥३॥
॥ शब्द १४ ॥
साहेब हमरे सहज लगी डोरी ॥ टेक ॥
यह डोरी मोहिँ सतगुरु दीन्हा,
हमहिँ अधीन अपन करि लीन्हा ॥१॥
यह डोरी मारे प्रान उवारे,
भवसागर
यह डोरी चढ़ि जात गगन में,
निसुदिन साहेब सँग रहत मगन मैं ॥३॥
धर्मदास बिनवै कर जोरी,
काल कष्ट से तिनुका, तोरी ॥४॥
॥ शब्द १५ ॥
साहेब येहि विधि ना मिले, चित चंचल भाई ॥ टेक ॥
माला तिलक उरमाइ के, नाचै अरु गावै।
अपना मरम जानै नहीं, औरन समुझावै ॥१॥
देखे को वक अजला, मन मैला भाई।
आँखि मंदि मौनी प्रया, मछरी धरि खाई ॥२॥
कपट कतरनी पेट में, मुख वचन उचारी।
अंतर गति साहेब लखै, उन कहा छिपाई ॥३॥
आदि अंत की वार्ता, सतगुरु से पावो ।
कहै कबीर धर्मदास से, मूरख समतावो ॥४॥
मिश्रित N ॥ शब्द १६॥ भव सागर नदियां बहुत अगम है, केहि विधि उतरौं पारा हो. ॥ टेक ॥. ' यह भव देख जिया मोर काँपै, नैन, बहै जल धारा हो । वार पार कछु सूझत नाही, माह लहर कझारा हो ॥१॥ नहिं देखाँ नाव न देखेाँ बेरा, नहिं देखाँ खेवनहारा हो येहि औसर प्रभु केकाँ गोहराऔं, बूड़त हौँ मैं धारा हो ॥२॥ असी कोस बालू कै रेतिया, असी कोस अँधियारा हो। असी चार चौरासी जोजन, जहँवाँ जम रखवारा हो ॥३॥ जोग जाप एकोनहिं कीन्हा, ना गुरु से ब्योहारा हो । खाल बैंचि ,जम भूसा भरिहै, 'बढ़ई चलावै जस आरा हो ॥४॥ अगम भूमि से गुरु चलि आये, सब्द हमारा हो। कहै कबीर सुनो धर्मदासा, अपने जनहि उबारा हो ॥५॥ किस को। --- : सुनि के * 10 १२ मिश्रित पार उतारे-२॥ सुना साध निरगुन की महिमा, पूरी बिरला कोई । सरगुन फंदे सबै चलत है, सुर नर मुनि सब लोई ॥२॥ निर्गन नाम निअच्छर कहिये, रहे सवन से न्यारा । निर्गुन सर्गुन जम के फंदा, वोहि कै सकल पसारा ॥३॥ साहेब कबीर के चरन मनावो, साधुन के सिर-ताजा । धरमदास पर दाया कीन्हा, बाँह गहे की लाजा ॥४॥ ॥ शब्द १४ ॥ साहेव हमरे सहज लगी डोरी ॥ टेक ॥ यह डोरी मोहिँ सतगुरु दीन्हा, हमहिँ अधीन अपन करि लीन्हा ॥१॥ यह डोरी मेरे प्रान उबारे, लै भवसागर यह डोरी चढ़ि जात गगन में, निसुदिन साहेब सँग रहत मगन मैं ॥३॥ धर्मदास बिनवै कर जोरी, काल कष्ट से तिनुका, तोरी ॥४॥ साहेब येहि विधि ना मिले, चित चंचल भाई ॥ टेक ॥ माला तिलक उरमाइ के, नाचै अरु गावै । अपना मरम जानै नहीं, औरन समुझावै ॥१॥ देखे को चक ऊजला, मन मैला भाई। आँखि मूंदि मौनी अया, मछरी धरि खाई ॥२॥ कपद कतरनी पेट में, मुख बचन उचारी । अंतर गति साहेब लखै, उन कहा छिपाई ॥३॥ आदि अंत की वार्ता, सतगुरु से पावो । कहै कबीर धर्मदास से, मूरख समझावो ॥४॥ ॥ शब्द १५ ॥
मिश्रित १३ ॥ शब्द १६॥ भव सागर नदियां बहुत अगम है, केहि बिधि उतरौं पारा हो.॥ टेक ॥ यह भव देख जिया मोर काँपै, नैन, बहै जल धारा हो। वार पार कछु सूझत नाही, माह लहर झकझोरा हो ॥१॥ .. नहि देखाँ नाव न देखेाँ बेरा, नहिं देखाँ खेवनहारा हो । येहि औसर प्रभु केकाँ गोहराऔं, बूड़त हौँ मैं धारा हो ॥२॥ असी कोस बालू कै रेतिया, असी कोस अँधियारा हो । असी चार चौरासी जोजन, जहँवाँ जम रखवारा हो ॥३॥ जोग जाप एको नहिं कीन्हा, ना गुरु से व्योहारा हो । खाल बँचि जम भूसा भरिहै, बढ़ई चलावै जस आरा हो ॥४॥ अगम भूमि से गुरु चलि आये, सुनि. के सब्द हमारा हो । कहैं कवीर सुनो धर्मदासा, अपने जनहिं उबारा हो ॥५॥ फिस को। 10
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मिश्रित ७५ ॥ शब्द १९ ॥ गाँठ परी-पिया वाले न हम से ॥१॥ माल मुलुक कछु संग न जैहै, नाहक वैर किया है जग से ॥२॥ जो मैं जनितिउँ पिया. रिसियै है, ::... नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥३॥ निसु बासर पिय सँग मैं सूतिउँ, नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥४॥ जस पनिहारि धरे सिर गागर, सुरति न दरै वतरावत* सब से ॥५॥ धरमदास बिन कर जारी, साहेव कवीर को पावै भाग से ॥६॥ ॥ शब्द २०॥ मेरे मन बसि गये साहेब कबीर ॥ टेक !! हिन्दू के तुम गुरू कहाओ, मुसलमान के पीर । दोऊ दीन ने अंगड़ा माड़ेव, पायौ नहीं सरीर ॥१॥ सील संताप दया के सागर, प्रेम प्रतीत मति-धीर । बेद' कितेय मते के.आगर, दोउ दीनन के पीर ॥२॥ "बड़े बड़े संतन हितकारी, अजरा अमर सरीर । धरमदास की बिनय गुसाँई, नाव, लगावो तीर ॥३॥ ॥ शब्द २१॥ अमर लेक से हम चलिआये आये जगत मँझारा हो।' स्याही छाप पर्वाना लाये, समरथ के कढ़िहारा हो ॥१॥ जीवन दुखित देखि संसारा, तेहि कारन पग धारा हो ।। बंस बयालिस थाना रोपं, जंबू दीप मकारा है। ॥२॥ बात चीत करती है। . + * .
मिश्रित ॥ शब्द .१७॥ -- सइयाँ महरा, मार डोलिया फंदावा ॥ टेक ॥ काहे के तार डोलिया पालकी, काहे के ओहि में बाँस लगायो ॥१॥ आव आव कै ढोलिया पालकी, सत्त नाम कै: वाँस लगाव:२॥ प्रेम के डोर जतन से बाँधेो, । ऊपर खलीता' लाल ओढ़ावा ॥३॥ ज्ञान दुलीचा झारि बिछावो, नाम के तकिया अरंध लगाव-in. धरमदास बिनवै कर जोरी, गगन मँदिल में पिया दुलरावो ॥६॥ ॥ शब्द १८ ॥ पिया परदेसिया, गवन लैजा मार ॥ टेक ॥ आव भाव का अनवट बिछुआ, सब्द के घुघुरू उठे घनघोर ॥१॥ तन सारी मन रतन: लहँगवा, ज्ञान की अंगिया भई सरवार ॥२॥ चारि जना मिलि लेड चले हैं.. जाइ उतारेजमुनवा के कोर ॥३॥ धरमदास बिनवै कर जारी, .:::::: नगरी के लोग कहैं कुल-बार ॥४॥ कहार।प्रहार। * मिश्रित ७५ ॥ -- शब्द:१६ ॥ गाँठ परी पिया वाले न हम से ॥१॥ माल मुलुक कछु संग न जैहै, नाहक बैर किया है जग से ॥२॥ जो मैं जनितिउँ पिया रिसियै है, नाहक प्रीति लगाती न जग से ॥३॥ निसु बासर पिय सँग मैं सूतिउँ, नैन अलसानी निकरि गये घर से ॥४॥ जस पनिहारि धरे सिर गागर, !! सुरति न टरै बतरावत सब से ॥५॥ धरमदास--विनवे कर जोरी; साहेब कबीर को पावै भाग से ॥६॥ ॥ शब्द २०॥ मेरे मन वसि गये साहेब कबीर ॥ टेक ! 'हिन्दू के तुम गुरू कहाओ, मुसलमान के पीर । दोऊ दीन ने झगड़ा माड़ेव, पायौ नहीं सरीर ॥१॥ "सील संताप दया के सागर, प्रेम प्रतीत मति-धीर । वेद कितेब मते के.आगर, दोउ दीनन के पीर ॥२॥ बड़े बड़े संतन हितकारी, अजरा अमर सरीर । धरमदास को बिनय गुसाँई, नाव लगावो तीर ॥३॥ ॥ शब्द २९॥ अमर लोक से हम चलिआये, आये जगत मैंझारा है।। स्याही छाप पर्वाना लाये, समरथ के कढ़िहारा हो ॥१॥ जीवन दुखित देखि संसारा, तेहि कारन पग धारा हो। चंस वयालिस थाना रोपं, जंबू दीप मैंकारा हो ॥२॥ बात चीत करती है।
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पहाड़ा
दसे मेाकाम की भक्ति दृढ़ाऊँ, चौका पान पर्वाना हो ।
बारह पंथ चलेंगे आगे, घर घर बोध पसारा हो ॥३॥
गुरु सहित सब चेला डूबे, फिर फिर गर्भमैंकारा हो।
बचन बंस को बीरा पावै, तब होइहै निरवारा हो ॥४॥
तेरह पीढ़ी ज्ञान रजधानी, चूरामनि औतारा हो।
उनके अंग छाँह नहिं होइहै, देह विदेह अपारा हो ॥५॥
उनके आगेजुग मति चलिहै राजनीति उठि जाई हो।
पाँच सब्द की इच्छा नाही, यह गति सब मैं आई हो ॥६॥
जब लौँ कौल पूर नहिं आवै, तब लग भेद छिपावो हो ।
कोटिन करै बहुत को थापै, फेरि काल घर आवै हो ॥७॥
पाँच हजार पचीस के बीते, सत्त चाल ठहराई हो।
पारस पान जवै पुनि उगिहै, जग निद्रा मिटि जाई हो ॥८॥
जो कोइ होय सत्त कैतिनुका, साई मोहिँ पतियाई हो।
की तो अमी अंकुरै वा में, की गुरु चरन सिंधाई हो ॥६॥
ना गुरु सरन न नाम की करनी, कैसे हंस, कहावै हो।
बारह. पंथ. मिलेंगे आगे, छाँड़ कपट चतुराई हो ॥१०॥
कहै कबीर सुना धर्मदासा, आगम ताहि लखाऊँ हो ।
जो कोइ हंसा होइ हमारा, तिन का देहु लखाई हो ॥११॥
॥ पहाड़ा॥
कोई लोढ़त संत सुजान, काया बन फूलि. रहा.॥ टेक ॥
एका एक मिलै गुरु पूरा, मूल मंत्र तब पावै।
सब साधन की बानी बूझै, मन. परतीत बढ़ावै ॥१॥
दूआ दुई तजै मन दुविधा, रज गुन मन से त्यागै ।
सतगुरु अरघ माही निरखै, सेवित- से उठिं जागै ॥२॥
नाम लीला, 99, " तीआ तीन त्रिवेनी संगम, जहाँ अंगम अस्थाना। तन मन की सवं त्रिस्नात्यागै, कोइ हरिजन करै अस्नाना ३ चौआ चार चतुर्भुज, साहै, पँचवें पद को धावै प्रेम : हिंडोला झूला झूले, उपजे चित अनुरागै ॥४॥ पाँचे पाँच पचीसो बस करि, साँचे होइ ठहरावै । इँगला पिंगला सुखमनि सोधे, तव चरनोदक पावै ॥५॥ छठएँ छैयो चक्र बेधै, सुन्न भवन मन लावै । बिगसै कवल काया के भीतर, तब चंदा दरसावै ॥६॥ सतएँ सात सत्त. धुनि उपजै, धुनि सुनि आनंद बाढ़ी । सहजै दीनदयाल कृपा-निधि, चूड़त भौजल काढ़ी ॥७॥ अठएँ. आठ अप्ट कँवल में, अरध निरखै साई । आतम चीन्हि परमातम चीन्है, ताहि तुलै नहिं कोई ॥८॥ नवएँ नवा द्वार होइ निरखै, जहँ बरै जगमग जाती। दामिनि दमकै अमृत बरसै, अजर झरै जहँ मोती ॥६॥ दसएँ दसम द्वार. चढ़ि बैठे, पढ़ि लै एक पहाड़ा। धरमदास चरनन पड़ि बिनवै, निसु दिन बारम्बारा ॥१०॥ ॥नाम लीला॥ साहेब अविचल नाम, दया करि पाइये ॥ टेक ॥ प्रथम बन्दौँ गुरु चरन, सीस संतन को नाऊँ सतगुरु होय दयाल, तो नाम चरित्र सुनाऊँ। सत्त सुकृत हिरदे बसै, 'कबहुँ न आवै हारि। "अविगति से परिचै भई, तो आवागवन निवारि॥१॥ कहा आन की सेव, जीव को भर्म न भाजै । अलख सरूपी आप, तहाँ अनहद धुनि गाजै ॥ .
१८ नाम लीला ... ' . यह धुनि सुनि अविचल रहो, इत उत्त मन नहिँजाय।। : 'अमृत' केरी बुन्द है; से अमृत माहिँ समाय ॥२॥ प्रथम पुरुप पग धयो सत्त, सतजुर्ग में आये। .. परमारथ के काज, जीव की वन्दि छोडाये॥ कागा ते हंसा किया, जाति बरन कुल खायं । "जम से तिनुका तारि' के, गंज न सक्के कोय ॥३॥ सतजुग गयो व्यतीत, सुना त्रेता की यानी । धखो मुनिन्द्र को रूप, आप संत सुकृत ज्ञानी हंसन को परमाधि के, आप रह्यो नीनार नाम प्रतीत वसे जो जिव को, सेा जन उतरे पार ॥४॥ त्रेतां गया व्यतीत, सुंना द्वापर की बानी । करुनामय को रूप धस्यो, संतं सुकृत ज्ञानी ॥ चेतनहारा चेतिया, बहुरिन चेता जाय। सत्त सुकृत चीन्हे विना, काल' सभन को खाय ॥ ५ ॥ कलिजुग प्रगट कबीर, काल को देखा जारा । 'किये कासी अस्थान, आप मैं बन्दीछोरा ॥ मुनि पंडित सब बादहीं, कोई न पहुंचे ज्ञान । निर्गुन लीला धारि के, आप पुरुप निर्वान ॥६॥ कलिजग कर्म अपार, जीव. कोई कहाँ न मानै सीखें साखी सब्द, उलदि के बाद बखानै ॥ बाद किये पहुँचै नहीं,"मन ममता के. जोर । लख चौरासी जिया जानि में, भर्मे नरक अघोर॥७॥ कठिन काल को रूप, अंत कोइ जानि न भाई। जब आवै मृतु अंध, जीव कह जाय, पराई ।
नाम लीला -- नाम . बिना बाचै नहीं, केतो करै उपाय। तीरथजाय सकल भ्रमि आवै,जमको त्रास न जाय ॥८॥ वहुत ज्ञान बहु गम्य, बहुत मूरत को पूजे । दीपक बरै अनेक, 'अंध को आँखि न सूझै ॥ बहुतक जुग अरंमंत फिरे, कितहुँ न न पावै दाद। सात द्वीप नौ खंड में, सत्य नाम बिनु बाद ॥६॥ संतगुरु का. उपदेस, संत कोउ बिरला जाने । करे तत्त्व का खोज, बहुरि संकठ "नहिं आने । ऐसे सुरति लगाइये, जैसे चन्द चन्द चकोर । कठिन पड़े सुख दुख सहै, प्रीत निभाव और ॥१०॥ अविगति अगम अपार, और सब दीसै बाजी पढ़ि. पढ़ि वेदं कितेव, भुले पंडित औ. काजी अगम गम्य जाने नहीं, बीचहिँ, परे झुलाय जैसे ज्वारी जुवा खेलि के, सरबस चले गँवाय ॥११॥ नहिं सागर नहि सिखर, नहीं तहँ पवन न पानी। नहि धरती आकास नहीं कछु और निसानी ॥ ::चन्द सूर वा घर नहीं नहीं दिवस नहि, राति। जहाँ पुरुष आपै बसै, तहँ कुल कर्म,न: पाँति ॥१२॥ वहाँ, नहीं तीरथ व्रत, नहि, तहँ बेद विचारा। नहि देवी नहि, देव, नहीं कछु नेमः अचाराः॥ जरा,मरन वा घर नहीं नहीं लाभ नहिँ हाना प्रेम मगन हंसा रहै सो धरै पुरुप को ध्यान ॥१३॥ जहाँ पुरुप रहै आप, तहाँहिंसन को बोसा ।' तह नहिं माया मेाह नहीं तहँ हप्ना आसा ॥
नाम लीला हर्ष सोक वा घर नहीं, नहीं कर्म: व्यवहारः। हंसा परम अनंद में, (से) छूटे भ्रम जंजार ॥१४॥ चारो जुग के हंस, सत्य सतलोक सिधाये । भ्रमत फिरे सब काग, दूत बैठे रखवाये । मुनि पंडित जोगी जती, धरे काल को, ध्यान । तीन लोक के बाहरे, कोई न पाये जान ॥१५॥ भ्रमत फिरे जुग. चारि, रूप कीन्हा विस्तारा। अंजहुँ न समुझे अंध, परे जम कालं की धारा ॥ बहुत भाँति परमोधिया, कोइ कोई लीन्हा मान । आदि अंत के हंस हैं, सो प्रगट भये हैं आन. ॥१६॥ अनजाने को दूरि, जाने को निकट विराजै । संब्द" सनेही संत, साई सबं ऊपर 'छाजै॥ मगन होय मन को गहै, हंस रूप आनन्द । सुमिरन दोनदयाल को, ज्याँ उड़गन में चन्द ॥१७॥ बहुत 'गुरू संसार रहत, घर कोई न बतावै। आपने स्वारथ लागि, सीस पर भार चढ़ावै ॥ सारं सब्द चीन्हे नहीं, बीचहिँ परे भुलाय । संत्त सुकृत चीन्हे बिना, सब जुग काल चवाय ॥१८॥ यह लीला निर्वान, भेद कोइ बिरला जाने। सब जगभरमे डार, भूल कोइ विरला माने ॥ मूल नाम एक पुरुप है, पुष्पट्वीप में बास। सतगुरु मिलें तो पाइये पूरन प्रेम विलास ॥१६॥ नाम सनेही हाय, दूत जम निकट न आवै।. परमतत्व पहिचानि, सत्त. साहेब गुन गावै ॥ . 'तारा।
मुक्ति लीला । * अजर अमर बितसै नहीं, सुख सागर में बास।। केवल नाम कबीर है, गांव, धनि धर्मदास ॥२०॥ ॥ मुक्ति लीला ॥ हीरा जन्मान बारम्बार, समुझि मन चेत हो ॥ टेक ॥ जैसे: कीट : पतंग : पपान, भये पसु पच्छी। जलतरंग जल माहि, रहे कच्छा औ मच्छी ॥ अंग, उघारे रहे सदा, कबहुं न पावै सुक्ख । सत्य नाम जाने विना, जन्म जन्म बड़ दुक्ख ॥१॥ सीतल : पासा. . ढारि, दाव . खेला सँम्हारी । . जीता, . पक्की. सार, आव जनि , जैहै। हारी॥ रामै ‘राम पुकारि के, लीन्हो नरक निवास . मूड: गड़ाय : रहे जिव, गर्भ माहिँ दसमास ॥२॥ गर्भ दुक्ख तें काढि, प्रगट प्रक्षु बाहर कीन्हो । भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हो । वा को नाम विसरि गयो, जिन पठयो संसार,i: रंचक सुख के कारने, विसरि गयो निज सार ॥३॥ नहिं जाने केहि पुन्य, प्रगट भे भानुप, देही.. मन बच कर्म सुभाव, नाम से, कर ले. नेही। ११ लख चौरासी भर्मि के पायो, मानुप.. देह । सा: मिथ्या कस , खोवते, झूठी प्रीति सनेह ॥४॥ बालक बुद्धि अजान, कळू मन में नहिँ आने । खेले : सहज सुभाक जहाँ आपन मन माने । :अधर कलाले होइ. रह्यो, ना काहू को. मान। भली बुरी ना चित, धरै, बारह बरस समान ॥५॥ -- *- -- .
मुक्ति लीला जोवन रूंप अनूप, मसी मुख, ऊपर छाई अंगः सुगंध लगाय, सीस, पगिया लटकाई अंध भये सूझ नहीं फूटि गई. है चार । झटके पड़े पतंग · ज्याँ, देखि विरानी नार ॥६॥ जविन जोर झकार, नदी उर । अंतरवाढीग संतो। हो हुसियार; किया ‘ना याँहू गाढ़ी ॥ दे गंजगीरी प्रेम की, मूंदो दस दुवारा वो. साँई के मिलन में, तुम जनि लावा चारा 'वृद्ध भये पछिताय, 'जथै तीनौं पनाहारगः भई : पुरानी प्रीति, बोल अब लागत प्यारे । लच कच दुनियाँ है रही, केस भव संबः सेती बोलत बोल न आवई, लूदि लिये जम खेत ॥८॥ माया रंग.. कुसुस्म; महाँ देखन को नीको मीठो. दिन दुइ! चार, अंतग लागत है फीको । कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूली ज्योः पतंग उड़ि जायगो, ज्याँ: माया काफूर ॥ नाम रंग मंजीठ, लगे छूट निहिँ : भाई। लच पंच रहो समाय, सार ता में अधिकाई केतीः वार - धुलाइये, देदे करड़ी धायगर. ज्याँ ज्याँ भट्ठी पर दिये, त्या त्याँ उज्जल होय ॥१०॥ निकट जमन- के "जात, तबै हँगा मुख कारी। बोले बोल न आय, तब तोहि करिहै गारों काल छली तिहुँ लोक मैं, नहि काहूं की मान । 'राजा राना मारिया, संवहीं कीन्ह दिवाना ॥११॥ दोन्तर को दो भीतर की प्रास। िकारागार याजेलखाना दिवानी। । .. .
मुक्ति लीलो देऊँ सुमति बिचार, सीख जो मेगें मानी "चलो. सुमारग चाल, अलो जो अपना जाना तिरिया निकट बुलाइ के, दे गई। माथें हाथ । लेंगई. रंग निचोइ के, ज्याँ तेली के काथ* या१२॥ जो मरि भाखा बाल, बोलि कामिन चित चोखो "छिनहीं 'प्रोति बढ़ाय, नाम से नाता तोखो रसं बर्स कीन्हीं आई 'के, गयो ठगारी मेले जीव लाभ बस भंमि रहे, करि केवल सुख केले ॥१३॥ सेवित हो केहि नींद; मूढ़ मूरख अंज्ञानी । 'भोर भये परभात, अंबहिँ तुम करो पानी । अब हम साँची कहत हैं, 'उड़िया पंख पसारी छुटि जैहों या दुक्ख तँ, तन सरवर के पार ग॥१४॥ नाव, माँझरी साजि, बाँधि बैठो वेपारी। बोझ लद्यो'पापान, माहि डर लोगै भारी माँझ धार भव. तखत में, आइ परेगी भीर एक नाम केवटिया करि ले, साई लगावै तीर गा१५॥ सौ भइया : की बाँह, तपे दुधिन राना । परे नरायन बीच, भूमि देते गरवाना ॥ जुद्ध रच्यो कुरुछेत्र में, बानने बरसे मैंहा तिनहीं के अभिमान , गिधहुँ न खाया दह गारदा छत्रपती भूपाल' भूपाल' रहत, देखो नहि कोई दिन दस गये बजाई, गर्द माँ मिलि में साई । *तरण्ट । । दुर्योधन कारवों के राजा के सी. भाई थे, जो संय महाभारत में मारे गये । राजा युधिष्ठिर को याही ज़मीन श्रीकृष्ण ने दिलाना चाहा था पर दुर्योधन ने गेली से इनकार किया। - ८४ . मुक्ति लीला परिहै। नरक अघोर में, अब किन चेतो अंध। : सत्त नाम जाने बिना, परो काल, के फंद ॥१७॥ सलीता :संग,: बहुत हाथी और घोराः। मरन की बेरिया संग, चले नहिँ एको डोरा ॥ कंचन महल धरे रहे, और सुंदरी नारि । ज्याँ करि आये त्याँ गये, चले..दोज कर झारित॥१८॥ जोधा आगे उलट पुलट, यह पुहमी करते ।--: बस नहिँ रहते सोय, छिने इक में वल होते ॥ सौ जोजन मरजाद सिंध के करते एकै, फाल। हाथन पर्वत तालते, तिन धरि खायो कालः ॥१९॥ ऐसा यह संसार, जैसी रहट की घरिया। इक रीते फिरि जाय, एक आवै फिरि भरिया ॥ उपजि उपजिबिनसन करै,फिरिफिरि जमे गिरास । यही तमासा देखि के, मनुवा भयो उदास ॥२०॥ जैसे. कलपि कलपि के, भये हैं गुड़ की माखी। , चाखन लागी बैठि, लपट गइ दोनों पाँखी ॥ . पंख लपेटे सिर । धुने, मनहीं मन पछित्ताय । वह मलयागिरि छाँड़ि के, इहाँ कौन बिधि आय ॥२१॥ खेत बिरानो देखि, मृगा एक बन को रीझेव । नित प्रति चुनि चुनि खाय, वान मैं इक दिन बीधेव॥ उचकन चाहै वल करे, मनहीं. मन पछिताय । अब सो उचकि न पाइ हो, धनी पहूँची आय ॥२२॥ रहे दूध के . दूध, जाय पानी के पानी । सुना वन चित लाय, कहाँ कछु. अकथ कहानी ॥ अकह कमल तें सुति उठी, अनुभव सन्द प्रकास केवल नाम कवीर है, गावै धनि धर्मदास ॥२३॥ *पश्वी। िफलाँग । सेतिहर । " in- .
यद्यपि ऊपर लिखे हुए कारनों से इन पुस्तकों के शापने मैं बहुत सर्च होता है तो भी सर्व साधारन के उपकार हेतु दाम भाध प्राना फी आठ पृष्ठ से अधिक किसी का नहीं रक्खा गया है । जो लोग सम्सयर प्रर्यात पर गाहक होकर कुछ पेशगी जमा कर देंगे जिम की तादाद दो रुपये से कम न हो उन्हें एक चौथाई कम दाम पर जो पुस्तके आगे छपेंगी बिना मगे भेज दी जायंगी यानी रुपये में चार भाना छोड़ दिया जायगा परंतु हाफ महसूल उन के जिम्मे होगा और पेशगी दान न देने की हालत में वी० पी० फनिशन भी उन्हें देना पड़ेगा । जो पुस्तके भय तक छप गई हैं (जिन के नाम आगे लिखे हैं) सय एक साथ लेने से भी पके गाहकों के लिये दाम में एक चौथाई की कमी कर दी जायगी पर हाक महसूल और वी० पी० कमिशन लिया जायगा । अब प्राण-संगली गुरु नानक का अनमोल और दुर्लभ ग्रंथ जिसे उन के उपदेश और गुप्त भेद का कोप कहना चाहिये, राबिस्तार टीका के साथ छप रही है। मलूकदास जीव विहारवाले दरिया साहेब की शब्दावलियों का छपना लिपियों के बहुत अशुद्ध होने के कारण अभी मुल्तवी रखा गया है। प्रागैटर, बेलवेडियर छापाखाना, मार्च, १९१२ ई० इलाहाबाद। फ़िहरिस्त छपी हुई पुस्तकों की तुलसी साहेब (हायरस वाले) की शब्दावली और जीवन-चरित्र २) रब सागर मय जीवन-चरित्र घद रामायन दो भागों मैं, मय जीवन-चरित्र के, पहिला भाग ... " m) " , ... " दूसरा भाग ... ... ग़रीबदास जी की बानी और जीवन चरित्र कधीर साहेव का साखी-संग्रह ( २१५२ साखियाँ) . In m ... ...
" ... ... " ... " ... .. ... ... भाग २ " . ... ... .. " फयोर साहेब क्षी शब्दावली और जीवन-चरित्र, भाग ९ दूसरा एडिशन ) शब्दावली भाग २ 19) ज्ञान-गुदड़ी व रेस्ते सरायती " धनी धरमदास जी की शब्दावली और जीवन-चरित्र पलटू साहेब की शब्दावलो (कुंडलिया इत्यादि ) और जीवन- चरित्र, भाग १ 1) पलटू साहेब की शब्दावली, भाग २ घरनदासजी की यानी और जीवन-चरित्र, भाग १ IBN रैदासजी की बानी और जीवन-चरित्र जगजीवन साहेब की शब्दावली और जीवन चरित्र, भाग १ 1) शब्दावली भाग २ दरिया साहेब (बिहार वाले) का दरियासागर और जीवन-चरित्र D दरिया साहेब ( मारवाड़ वाले) की यानी और जीवन-चरित्र UR भीसा साहेब की शब्दावली और जीवन-चरित्र. गुलाल साहेब (भीखा साहब के गुरू) की बानी और जीवन चरित्र - मीरा बाई की शब्दावली और जीवन चरित्र सहजो बाई की बानी और जीवन-चरित्र १). दया बाई की बानी और जीवन-धरित्र गुसाँई तुलसीदासजी को बारहमासी यारी साहेब सी रत्नावली और जीवन-चरित्र युल्ला साहेब का शऽदसार और जीवन-चरित्र केशवदासजी की अमीचूंट और जीवन-चरित्र धरनीदासजी की पानी और जीवन-चरित्र " अहिल्याबाई का जीवन-चरित्र अंग्रेज़ी पद्य मैं मूल्य में हाफ महमूल व वाल्यू पेशवल यामिशन शामिल नहीं है। ननेजर, बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद ! Printed at'l be ceivedere etorin Printing Works, Allalabad, Ts E Init. ... ...
धरनीदासजी की बानी
[जीवन-चरित्र सहित]
जिस में
उन महात्मा के चुने हुए शब्द और राग,
गर्भ-लीला, कवित्त, ककहरा, अलिफ़-नामा,
पहाड़ा, बारहमासा, बोध-लीला,
और साखियाँ छपी हैं
और गूढ़ शब्दों के अर्थ भी नोट में लिखे हैं।
dll rights reserved.
[[कोई साहब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते
इलाहाबाद
येलवेडियर स्टीम प्रिंटिंग धर्फस में प्रकाशित हुई।
सन् १८११
६४ सफ़हा
[दाम)
Priated at the Bolrelers Stena Printing Worki, Allahabad, LyE. Hall
निवेदन संतबानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जक्त- -प्रसिद्ध महात्माऔं की बानी व उपदेश को जिन का लोप होता जाता है बचा लेने का है। अब तक जितनी बानिया हम ने छापी हैं उन में से विशेष तो पहिले छपी ही नहीं थी और काई २ जो छपी थी तो ऐसे छिन्न भिन्न, बेजोड़ या अशुद्ध रूप में कि तन से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था। हम ने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ ऐसे हस्त- लिखित दुर्लभ ग्रंथ या फुटकर शब्द जहा तक मिल सके असल या नफल कराके मंगवाये हैं और यह कार्रवाई बराबर जारी है। भर सफ तो पूरे ग्रंथ मंगा कर छापे जाते हैं और फुटकर शब्दो की हालत में सर्व साधारन के उपकारक पद घुन लिये जाते हैं। . कोई पुस्तक बिना कई लिपियों का मुकाबला किये और ठीक रीति से शीधे नहीं छापी जाती, ऐसा नहीं होता कि औरों के छापे हुए ग्रंथों की भाँति बेसमझे और बेजाचे खाप दी जाय । लिपि के शोधने में प्रायः उन्हीं ग्रंथकार महात्मा के पंथ के जानकार अनुयायो से सहायता ली जाती है और शब्दों के चुनने में यह भी ध्यान रखा जाता है कि यह सर्व साधारन की रुचि के अनुसार और ऐसे मनोहर और हृदय बेधक हौं जिन मे आरा हटाने का जो न चाहे और अंतःकरन शुद्ध हो । कई घरस से यह पुस्तक-माला छप रही है और जो जो कमरे पड़ती हैं यह आगे के लिये दूर की जाती हैं। फठिन और अनूठे शब्दो. के अर्थ और संकेत नोट में दे दिये जाते हैं। जिन महात्मा की बानी है उन का जीवन-धरिन भी साथ ही छापा जाता है और जिन भक्तों मीर महापुरुषों के नाम किसी वानी में आये हैं उन के संतप वृत्तांत . और कौतुक फुट-नोट में लिए दिये जाते हैं। . जान -THIS LIST CANCELS ALL PREVIOUS LISTS. सूचना-कागज़ का दाम इधर और भी बढ़ जाने और छपाई तथा सिलाई बहुत बढ़ जाने से कितायों का दाम अब नीचे लिखे मुताविक रखना ही पड़ा- 4 फ़िहरिस्त छपी हुई पुस्तकों की जीवन चरित्र हर महात्मा के उन की पानी के आदि में दिया है १०) "" . .. " . कबीर साहिब का साखी संग्रह कबीर साहिब की शब्दावली, भाग पहला ॥), भाग दूसरा भाग तीसरा), भाग चौथा मान-गुदड़ी, रेखते और झूलने ... গল্প धनी धरमदास जी की शब्दावली और जीवन चरित्र तुलसी साहिब (हाथरस वाल) की शब्दावली और जीवन चरित्र भाग प० १६) भाग २, पक्षसागर ग्रंथ सहित रत सागर मय जीवन-चरित्र । घट रामायन मय जीवन चरित्र, भाग १ २॥) शा) गुरु नानक की माण-संगली सटिप्पण, और जीवन चरित्र, भाग पहिला १ भाग दूसरा १) दादू दयाल की घानी, भाग १ "साखी' २॥) भाग २ "शब्द" " " ... " ... " " भाग २ " सुंदर विलास ... . ... पलटू साहिय भाग १-कुंडलियाँ भाग २--रेखते, झूलने, अरिल, कवित्त, सवैया भाग ३-भजन और साखियाँ जगजीवन साहिय की धानी भाग पहला - भाग दूसरा दूलन दास जी की बानी १. चरनदासजी की धानी और जीवन चरित्र, माग प० il), भाग दू० गरीबदास जी की बानी और जीवन-चरित्र रैदास जी की बानी और जीवन-चरित्र दरिया साहिब (बिहार वाले) का दरिया सागरं और जीवन-चरित्र के चुने हुए पद और सांची ... दरिया साहिय (मारवाड़ वाले) की पानी और जीवन चरित्र ... मोना साहिय को शब्दायली और जीवन-चति FIEBEEEEES ... " . -- ... ... ... ॥ 2) " lajm गुलाल सादिय (नामा साहिप के गुम) को पानी मोर जीयन नरित्र ... lty पाया मल गादास जी को पानी और जीवन चरित्र गुसाई तुलसीदास जी को पारदमासी यारी सादिय की रमायली और जीयन चरिम अशा सादिर का शप्रसार और जीवन चरित्र कंशयदास जी की ममीट और जीवन चरित्र धानोदासजी की यानी नीर जीयन चरित्र ... मीरा याई की शम्दायली पीर जीयन-चरित्र सहजो पाई का सदम-प्रकाश और जीयन-चरित्र पया याई की पानी और जीयन-चरित्र संतवानी संग्रह, भाग? [साम्नी] [प्रत्यंफ महारमा के सरित जीवन चरित्र सहित] भाग २ [शब्द पिसे महात्माओं के संक्षिप्त जीवन-चरित्र सहित जो भाग १ में नहीं दी है] कुल ३३- दूसरी पुस्तकें लोक परलोक हितकारी सपरिशिष्ट [जिसमें ऐतिहासिक) तसवीर सहित सूची प १०२ स्वदेशी और विदेशी संतों, महात्माओं और विद्वानों और ग्रंथों के अनुमान ६५० चुने हुए वचन सजिल्द १४२ पृष्ठों में छपे हैं। ma) (परिशिष्ट लोक परलोक हितकारी) अहिल्याबाई का जीवन चरित्र अँग्रेज़ी पद्य में नागरी सारीज़ सिद्धि उत्तर ध्रुव की भयानक यात्रा "गायत्री सावित्रो" स्त्रिों के लिए अत्यन्त उपयोगी और दाम में डा महसूल व रजिस्टरी लिया जायगा। [सन् १८२१] मनेजर ... m) जिल्द ...
धरनीदासजी
का
जीवन-चरित्र
वाया धरनीदाराजी जाति के श्रीवास्तव्य कायस्य एक बहे
महात्मा थे। इनका जन्म जिला छपरा (सूमा विहार) के मांझी
१७१३
विक्रमी में
हुमा पर चोला छोड़ने का
समय ठीक मालूम नहीं होता । माँझी का गाँव सरजू नदी के तट
है जहाँ अव एक बड़ा पुल रेल का बन
नामो गाँव में संवत
पर उत्तर की ओर यसा
रहा है।
धरनीदास जी के पिता का नाम परसरामदास था और
घर में खेती, का काम होता था। धरनीदास जी आप माँझी के
बाबू के दीवान थे और उनके मालिक उनकी बड़ी कदर
करते थे और पूरा भरोसा रखते थे पर उनकी अंतर गति से
बेखबर थे
कहते हैं कि एक दिन धरनीदास जी ज़मींदारी के काम में
लगे हुए थे कि अचानक पानी भरा हुआ लोटा जो पास रक्या
हुआ था उन्हाँ ने काग़ज़ और बस्ते पर ढलका दिया जिस
-पर पूछा गया कि ऐसा क्यों किया । धरनीदासजी ने कुछ
जवाय न दिया; आखिर को बाबू की अप्रसन्नता और उन्हें
पागल. समझ लेने पर उन्हाँ ने कहा कि जगन्नाथजी के वस्त्र मैं
आरती करते समय आग लग गई थी जिसे मैंने पानी डाल कर
बुझाया है। इस कथन का विश्वास याबू और उनके अधिकारियों
11 को न हुआ और इनकी हमी उहाई जिस पर धरनीदासजी यस्ता छोड़ कर यह कहते हुए चल दिये-"लिरानी नाहि करौं रे भाई। मोहि राम नाम सुधि आई" । राला ने दी भरोसे के आदमी जगन्नाथपुरी को भेज फर तहकीकात की तो मालूम हुआ कि सचमुच जिस समय फि वाया घानीदास ने लोटे का पानी गिराया वहाँ आग लगी थी जिसे उनकी सूरत का एक आदमी प्रगट हो कर बुझा गया। इस हाल को सुन कर बायू बड़े लज्जित हुए और आप वाया घरनीदास को बुलाने और उनसे अपना अपराध छिमा कराने को गये पर उन्हों ने फिर नौकरी पर लौटने से इनकार किया और कहा कि अय हम को भगवत्भजन करने दो । बाबू ने यहुत कुछ नकद और ज़मीन भी उनके गुज़ारे के लिये देना चाहा पर उन्हों ने नामंजूर किया । यही कथा जगन्नाथ पुरी में आग बुझाने की कबीर साहब की बाबत भी प्रसिद्ध है और यह कहाँ तक एतयार के लायक है इसे हम पढ़नेवालों की राय पर लोड़ते हैं। इसके बाद बाधा धरनीदास जी गृहस्थ आश्रम छोड़ कर साधू हो गये और उसी गाँव में एक झोपड़ी डाल कर रहने लगे। कहते हैं कि उन्हों ने गृहस्य आश्रम में चन्द्रदाम नाम के एक माधू से दीक्षा ली थी और मेष लेने पर एक दूसरे साधू सेवानंद को गुरू धारन किया। जो हो इसमें संदेह नहीं कि धरनीदास जी आप ऊँचे । दरजे के शब्द-अभ्यासी और गहिरे भक्त थे जिनकी गति उनकी अत्यंत मधुर, मैं पगी हुई, और अंतरी भेद की बानी से प्रगट होती है। कितनी ही करामाते बाबा धरनीदास जी की महिमा की मशहूर हैं ममलन एक बार उनको कई अहीर जाति के चोर रात को मिले और उनसे अपनी राग में गीत गवाई फिर वहाँ से चल कर चोरी को गये और चोरी करने के पीछे आँखों पर ऐसी अंधेरी - प्रेम रस . ---
छा गई कि रास्ता घर मे निकलने का न सूझता था; जब उनको
बहुत दुखी देखा तो धरनीदास जी ने अपने बड़े चेले सदानंद जी
को दया करके भेजा जो उनको अपने गुरु की सेवा में लाये।
उनके सन्मुख पहुंचते ही चोरौं की आँखें खुल गई और वह
महात्मा जी के चरनों पर गिर कर सच्चे साधू बन गये ।
इसी तरह कहते हैं कि एक बार बहुत से भेष रामत करते
हुए आये जिनके भोजन का प्रबंध किया गया पर जब खाने का
समय आया तो उन लोगों ने शरारत से कहा कि तुम जाति के
कायस्य हो और द्वारिकाधीश का छाप लगा कर अपनी शुद्धि
नहीं की है इससे हम तुम्हारा धान्य ठाकुर जी को कैसे भोग लगा
सकते हैं । धरनीदास जी ने हज़ार समझाया पर उन लोगों ने एक
न सुनी आखिर को महात्मा जी बोले कि अच्छा थोड़ी मी.
मुहलत दो तो हम द्वारिका जाकर छाप ले आते हैं यह कह
कर अपनी कुटिया में घुस गये और तुर्तही बाहर निकल कर
द्वारिका जी की छाप अपनी बाँह पर दिखला दी जिसको देखकर
वह लोग अचरज मैं आ गये और चरनों पर गिरे।
ऐसे ही धरनीदास जी के शरीर त्याग करने की कथा प्रसिद्ध
है कि जब समय आया तो अपने चेलों से कहा कि अब हम बिदा
होते हैं यह कह कर उस स्थान पर आये जहाँ गंगा और सरजू
का संगम है और जल पर चादर बिछा कर उस पर शासन जमा
कर बैठ गये। थोड़ी देर तक धारा के साथ बहते नज़र आये
फिर उनके चेलों को दीख पड़ा कि पानी में आग लगी जिसकी
लवर आकाश तक उठी और धरनीदास जी गुप्त हो गये।
कथाओं पर टीका करना ऐसे भोले भक्तों का जो उन
पर सचोटी से विश्वास करते हैं जी दुखाना होगा, तो भी इतना
कहना अनुचित न होगा कि बाबा धरनी
सरीखे महात्मा की
,
.
( ४ )
महिमा ऐमी शिदिशक्ति की कथाओं की. मुहताज नहीं है और
न सच्चे महात्मा कभी ऐसी करानात दिखलाते हैं।..
'बाया धरनीदासजी की गद्दी पर उन के गुरुमुख चेले सदानंद
जी बैठे। अब तक वह गद्दी कायम है' और हिन्दुस्तान भर मैं
हजारौं अनुयायी उनके पंथ के फैले हुए हैं, यद्यपि शब्द-अभ्यास
बिरले ही करते हैं। धरनीदामगो के लिखे हुए दो ग्रंथों का
पता चलता है-एक 'सत्यप्रकाश' और दूसरा 'प्रेम प्रकाश'।
इस पुस्तक
के
पद
और साखी इत्यादि कुछ ,तो.
याबू सरजूप्रसाद जी मुआफीदार तेरही ज़िला बाँदा ने दिये जिन
की सहायता संतबानी पुस्तक माला के काम में कई बरस से
चली आती है और कुछ बाबू धीरजदास जी सेक्रिटरी संतमत
मुमैटी, जोतरामराय ज़िला पुरनिया,के भेजे हुए वरकों से चुने
गये हैं, जिन दोनों महाशयों को हम धन्यवाद देते हैं ।
इलाहाबाद,
दास,
जून सन १९१९ ३०
एडिटर।
हम
को.
.
11
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धरनीदास जी की बानी फुटकर शब्द (१) एक पिया मोरे मन मान्यो पति व्रत ठानी हो । अवरो जो इन्द्र समान, तो वैन करि जानौं हो ॥१॥ जहँ प्रभु बैसि सिंहासन, आसन डासब हो। तहवाँ बेनियाँ डोलइबाँ, बड़ सुख पइयाँ हो ॥२॥ जहँ प्रभु करहि लवासन*, पवढ़हिँ आसन हो । कर तैं पग सुहरैबाँ, हृदय सुख पइवौँ हो ॥३॥ धरनी प्रभु चरनामृत, नितहिँ अचइवौँ हो । सन्मुख रहिवाँ मैं ठाढ़ी अंतै नहिं जड़वाँ हो ॥४॥ बहुत दिनन पिय बसल बिदेसा । आजु सुनल निज अवन सँदेसा ॥१॥ चित चितसरिया मैं लिहली लिखाई। हृदय कमल धइलाँ दियना लेसाई ॥२॥ *भोजन । चित्रशाला ।.
फुटकर शब्द प्रेम पलँग तहँ धडलौँ बिछाई। नख सिख सहज सिँगार बनाई ॥ ३ ॥ मन हित अगुमन दिहल चलाई। नयन धइल दोउ दुअरा वैसाई* ॥४॥ धरनी धनि' पल पल अकुलाई । विनु पिया जिवन अकारथ जाई ॥ ५ ॥ . पिया मोर वसैं गउर गढ़, मैं बसाँ प्राग हो। सहजहिँ लागु सनेह उपजु अनुराग हो ॥ १॥ असन बसन तन भूपन, भवन न भावै हो । पल पल समुझि सुरति, मन गहबरि आवै हो ॥२॥ पथिक न मिलहि सजन जन, जिनहिं जनावाँ हो । बिहबल बिकल बिलखि चित, चहुँ दिसि धावौं हो ॥३॥ होय अस मोहिं ले जाय, कि ताहि ले आवै हो । तेकरि होइबौँ लउँड़िया, जे रहिया बतावै हो ॥४॥ तबहिं त्रिया पत" जाय, दोसर जब चाहै हो । एक पुरुष समरथ, धन बहुत न चाहै हो ॥५॥ धरनी गति नहिँ आनि, करहु जस जानहु हो । मिलहु प्रगट पट" खोलि, भरम जनि मानहु हो ॥६॥ (४) जहिया भइल गुरू उपदेस । अंग अंग के मिटल कलेस ॥१॥ सुनत सजग भयो जीव । जनु अगिनी परै घीव ॥२॥ *पिठलाय दिया । सिाहागिन स्त्री। नाम नगर का (अर्थ. सपेद शहर) । पिछताना, घबरामा । हुर्मत । "पूंघट । **जाग उठना । । ** फुटकर शब्द ३ उर उपजल प्रनु प्रेम । छुटि गे तब व्रत नेम ॥३॥ जब घर भइल अँजोर । तन मन मानल मार ॥१॥ देखे से कहल न जाय । कहले न जग पतियाय ॥५॥ धरनो धनि तिन भाग। जेहि उपजल अनुराग ॥६॥ जग में कायथ जाति हमारी । पायो है माला तिलक दुसाला, परमारथ ओहदा री ॥१॥ कागद जहँ लगि करम कमायो, कैंची ज्ञान रसा रो। गुरु के चरन अनंद जाप करि, अनुभव वरको उतारी ॥२॥ मन मसिहानी साँच की स्याही, सुरति सेफि" भरि डारी। मरम काटि करि कलम छुरो छवि, तकि तृस्ना खत मारी। तबलक तत्त दया को दफदर, संत कचहरी भारी । रैयत जगत सब्द के कौंडी, दूजी मार न मारी" ॥४॥ नाम रतन को भरो खजाना, धरी सो हृदय कोठारी। है कोइ परखनहार विवेकी, यारम्बार पुकारी ॥५॥ धरनी साल व साल अमाली, जमाखरच यहि पारी। प्रभु अपने कर कागज मेरों, लीजै समुझि सुधारी ॥६॥ मन तुम यहि विधि करो कैथाई। सुख संपति कबहूँ नहिँ छीजै, दिन दिन बढ़त बड़ाई ॥१॥ *उजेरा । तीव्र पन्ना । दावात। "खुधना । कत जोकि फलम में घीरा जाता है। **मुट्ठा काग़शों का कायदा है कि कचहरी (अदालत) मैं जो कुभूयार समझा जाता है उस को सज़ा या मार दी जाती है परंतु संतों की कचहरी में जगत की रैयत (जीयौं) को शब्द रूपी काँड़ी (कोड़ा। की मार के सिवाय दूमरी मार नहीं दी जातो । जाँच करने वाला प्रमला। हाथ । - - फुटकर शब्द त निस कसबा काया करु ओहदा री, चित्त-बिठा धरु साधी । मोहासिक करि अस्थिर मनुवाँ, मूल मंत्र अवराधी ॥२॥ तत्त को तेरिज वेरिज' बुधि की, ध्यान निरखि ठहराई । हृदय हिसाव समुक्ति के कीजै, यादहि हक लगाई ॥३॥ राम को नाम रटो रोजनामा, मुक्ति सौँ फरद बनाई। अजपा जाप अवरिजा' करि के, सर्व कर्म बिलगाई ॥४॥ रैयत पाँच पचीस वुझाए, हरि हाकिम रहे राजो । धरनी जमाखरच विधि मिलि है, को करि सकेगमाजी (७) पानी से पैदा कियो सुनु रे मन वौरे, ऐसा खसम खुदाय कहाई रे। दाह भयो दस मास को सुनु रे मन बौरोतर सिर ऊपर पाँई २१ आँच लगी जब आग की मन बौरे, आजिज है अंकुलाई । कवल कियो मुख आपने सुनु रे मन बौरे, नाहक अंक लिखाईरे२ अव की करिहाँ बंदगी सुनु रे मन बौरे, जो पइहाँ मुकलाई ॥२॥ जग आये जंगल परे सुनु रे मन बौरे, भरम रहे अरुमाई रे ३ पर की पीर न जानिया सुनु रे मन बौरे, नाहक छुरी चलाई रे। बाँधि जंजीरे जाइ हौ सुनु रे मन चौरे, बहुरि ऐसही जाई २४ *गाँव । बैठायो। हिसाब करनेवाला' या न्याव करने वाला हाकिम । खुलासा जमाबंदी या हिसाब का । "मीजान या जोड़ती का काग़ज़ ! मालिक । **रोजनामचा । हिसाव का चिट्ठा । गबन, - चोरी । गर्भ की जलन । ||मुकलना भेजना ; गर्भ में जब बालक बहुत तकलीफ पाता है "तो मालिक से प्रार्थना करता है कि अब को कष्ट से छुड़ा दो तो अब बंदगी - भक्ति करूँगा।
फुटकर शब्द सतगुरु कै उपदेस ले सुनु रे मने बौरे. दोजख दरद मिटाईरे। मानुप देह दुरलभ है सुनु रे मन बौरे, धरनी कह समुहाई रे।। (८) भाई रे जीभ कहल नहिं जाई। नाम रटन को करत निठुराई, कूदि चलै कुचराई ॥१॥ चरन न चलै सुपंथ पै पग दुइ, अपथ चलै अतुराई।। देत बार कर दीन्ह दूबरो, लेत करै हथियाई ॥२॥ नैना रूप सरूप सनेही, नाद स्रवन लुबधाई। नासा, चहती वास विपै की, इन्द्री नारि पराई ॥३॥ संत चरन को सीस नवै नहि, ऊपर अधिक तराई। जो मन घेरि वेन्हिये बाँधौ, भाजै छाँद तुराई ॥४॥ का साँ कहाँ कहे को माने, अंग अंग अकुठाई । धरनीदास आस त पूजै, जो हरि हाहिँ सहाई ॥५॥ मन बसि लेहु अगम अटारी ॥टेक॥ नव नारिन को द्वारा निरखो, सहज सुखमना नारी ॥१॥ अजब अवाज नगारा वाजत, गगन गरजि धुनि भारी ॥२॥ तहँ बरे वाती दिवस न रातो, अलख पुरुस मठ धारी ॥३॥ धरनी कै मन कहा न मान, तबहिं हुना है कटारी ॥४॥ (१०) मन रे तू हरि भजु अवरि कुमति तजु, है रहु विमल विरागी अनुरागी लो ॥१॥ *बैल के भड़ने की कूवर कहते हैं। जिलदी । देने की घेर अपने हाथ को कमजोर कर लेता याने सोंचे रहता है और लेने की बेर हाथं फैला देता है । खाहिशमंद । पकहना. रस्सी । **अकुलाता है।
. आरती व भोग देई देवा सेवा झूठी, जैसे मरकट मूठी, अंत बहुरि बिलगाने पछिताने लो ॥२॥ जठर अगिन जरै, भोजन भसम करै, तहँ प्रभु पालल दही, नित तेही लो ॥३॥ सुत हितु बंधु नारी, इन सँग दिना चारी, जल सँग परत पखाने, असमाने लो ॥४॥ पर जन हाथी घोरा, इहव कहत मोरा, चित्र लिखल पटा देखा, तस लेखा लो ॥५॥ धरनी भिच्छुक बानी, हम प्रभु अज्ञा मानी, मिलहु पटा खोली, अनमेली लो ॥६॥ (११) मन तुम कस न करहु रजपूती ॥१॥ गगन नगारा बाजु गहागह, काहे रहो तुम सूती ॥२॥ पाँच पचीस तीन दल ठाढ़े, इन सँग सेन बहूती ॥३॥ अब ताहि घेरो मारन चाहत, जस पिँजरा महँ तूनी ॥४॥ पडही राज समाज अमर पद, है रहु बिमल विभूती ॥५॥ धरनीदास विचार कहतु दूसर नाहिँ . सपूती ॥६॥ - प्रारती व भोग भक्त धछल जब भोग लगावै। पंचामृत पट रस रुचि भावै ॥१॥ आदि कुमारी चउका सारै। चरन पखारि कै वेद विचारै ॥२॥ ब्रह्मा बिस्नु महेसुर देवा । कर जोरे टाढ़े करि सेवा ॥३॥ *ओला । पिटरी । फिवाह । फौज । भक्त बत्तल ।
चितावनी गर्भ लीला आरति सेत अनंत बिराजै। सहजहिँ सब्द अनाहद गाजै ॥४॥ धरनी प्रभु देवन को देवा । मानि लेत सब जन की सेवा ॥५॥ (२) मन वच क्रम मेरे राम कि सेवा । सकल लोक देवन को देवा १ बिनु जल जल भरि भरि नहवावौँ । बिना धूप के धूप धुपावौँ २ विन घंटा घरी घंट बजावौँ । बिनहिं चँवर सिर चैवर दुरावाँ३ विन आरति तहँ आरति वास्। धरनी तहँ तन मन धन वारौं। ॥ चितावनी गर्भ लीला ॥ ॥रखता ॥ जै जै उचारो, “धरनी" ध्यान धारो। तजो मन विकारो, भजो प्रान प्यारो ॥१॥ जबै गर्भ बासा, कियो मानहिँ खासा । वनो माथ हाथा, चरन पीठ साथा ॥२॥ लगो पेट ग्रीवा, अहुट हाथ सीवा । रकत मास हड्डी, तुचा रोम चड्ढी ॥३॥ कियो दसव द्वारा, पवन प्रान धारा । तहाँ प्रान प्यारा, दियो आय चारा ॥४॥ बँधे अष्ट गाता, अधो मुख गुलाता । भयो कष्ट भारी, तो कहता पुकारी ॥५॥ नरक त निकारा, हौं चंदा तिहारो। करौं भक्ति ऐसी, कहौं आज जैसी ॥६॥ *गर्दन ।
चितावनी-गर्भ लीला चरन चित्त लावाँ, न काहू दुखावाँ । दया करि दयाला, उहाँ त निकाला ॥७॥ कछुक दिन अचेते, गये दूध लेते। बहुरि अन्न पानी, बचा बोल जानी ॥८. कही काहु माता, पिता बहिन भाई । लगो काहु चाचा चंचानी सगाई ॥६॥ ममेरा फुफेरा खलेरा घनेरा । अरोसी परोसी चिन्हा चेर चेरा ॥१०॥ कुला कर्म जानी यगानो विगाना। उहाँ गुष्ट' कीन्हो सो भरमा भुलाना ॥११॥ गई बालवस्था भयो दह कामा । बहू व्याह लाये बजाये दमामा ॥१२॥ घोडे बटोरे बराती बनाये। बड़े डॅिम करि कै बहू व्याह लाये ॥१३॥ त दुनिया के परिपंच देखौ जु आये । अपहिँ आपने पाँव बेरी बँधाये ॥१४॥ खनी खंदकै कोट कीन्हो कँगूरी । मैं घनेरे मजूरा ॥१॥ माया को पसारा कियो फौज भारी । बड़ी साहबी चाँप कीन्हो सवारी ॥१६॥ कबहूँ जाय पच्छिन साँ पंछी धरावे । कबहुँ जंगली जीव कुत्तन तुरावै ॥१७॥ *मयसियारत नाता । जिो गर्भ में प्रतिज्ञा की थी। धूमधाम, महल के सटराग । तो।
चितावनी गर्भ लीला । कबहूँ जाल'जंजाल मच्छी घशावै । 'कबहुँ बन घेरावै अगिन से जरावै ॥१८॥ सो तोपें गढ़ावै गढ़ी को ढहावै । कबहुँ बंद बेसी मवेसी ले आवै ॥१९॥ बड़े चाक चौखूट ईंटा पकावै । ज. पाथरै नक्सगीरी करावै ॥२०॥ धरा धौरहर धवल ऊँचा उठावै । तहाँ जोरि आछे बिछौना विछावै ॥२१॥ तहाँ फूल फैलो लगे तूल तकिया। दरीची बरीची उठे झाँक अॅकिया ॥२२॥ सिपाही घनेरे खडे सीस नावें। किते भिच्छुको झूठ सोभा सुनावै ॥२३॥ हरिन माल मेढ़ा व हस्ती लड़ावै । नई नागरी नारि+ नाटिन नचावै ॥२४॥ घरी को बजावै समुझि जिय न आवै । हरै धन विराना धसेरा लगावै ॥२५॥ कतेको भले जीव सूली चढ़ावै । महा मस्त है मुंड-माला बँधावै ॥२६॥ जो हरि की भगति जीव-दाया दिढ़ावै । करै ता की निंदा नगीचा न आवै ॥२७॥ विलोका पसारा मनहिँ मन बिचारा । जगत जेर मारा जिवन धर हमारा ॥२८॥ *पहलवान । पितुरिया । धाँधली। 2 १० चितावनी गर्भ लीला त करता कला देखि ऐसा विचारा। लगे दूत गैवी पलंग पछारा ॥२९॥ किते वैद वैठे करें औपधाई। किसेको करें आप संसा ओझाई ॥३०॥ किते जंत्र तावीज लीखें लिखावें । कितेको सगुनिया झरा फुकावें ॥३१॥ कहें आज ऐसा मिलै जो जियावै । बरायर कया भार सोना सो पावै ॥३२॥ जयहिँ जुक्ति जगदीस ऐसी बनाई। तबहुँ राम को नाम निहचै न आई ॥३३॥ तकावै तवेला मेला के हाथी । परो धूमि यह दाँव संगी न साथी ॥३४॥ खजाना रुपझ्या सोनझ्या जहाँ ही। रही सुंदरी जो जहाँ सेा तहाँ ही ॥३५॥ कमाई समुझि जीव आई रोआई। गये ऐसही जन्म अक्ती न आई ॥३६॥ चलावन चहै जाहि जगदीस रइया । कहो ताहि को जग कवन है रखइया ॥३७॥ दैव को न जाना दिया से बुझाना। जगीरी तगीरी व थाना निसाना ॥३॥ पयानो पयानो" पुकार जु लोगा। त रोवै कबीला परी मुंड सेोगा ॥३६॥ *ओझा जो जन्न मंत्र करते हैं। किाया, देह। फूिमने वाला । सोना। बुलाना । निकाली निकालो।
चितावनी गर्भ, लीला जना-चारि आये वहाँ तें उठाये । अगिन मैं जराये नदी में बहाये ॥४०॥ पिन्हाये कफन खादि खादे गड़ाये । जु दीवान साहब सलामत को आये ॥४१॥ प्रधोधो न पाँचो बहुत नाच नाचो । कला खेलि खाली चले इन्द्रजाली* ॥४२॥ जहाँ धर्मराया चितरगुप्त छाया। उहाँ पत्र देखा सुकृत की न रेखा ॥४३॥ नहीं नाम गाया नहीं जीव दाया। भगति की न भेवा नहीं साधु सेवा ॥४४॥ जुआ जन्म हारे वे गुरु के बिचारे । भुलाने अनारी परो वीचि भारी ॥४॥ गये यहि प्रकारा कितेको भुवारा। अवर जो बेचारा करे को सुमारा ॥४६॥ गये कौरवो और सिसुपाल रावन । गये छप्पना कोदि जादव कहावन ॥४७॥ गये चक्कवे चक्रवर्ती कहाये । गये मंडली कोउ सँदेसों न पाये ॥४॥ गये साकबंधी सका बाँधि केते । ते माटी मिले बीर बलवान जेते ॥४॥ 'काम क्रोध आदिक पाँचो दूत को रोका नहीं बल्कि इन्हीं का नाघ नाचते थे सो मरने पर ऐसाही हुआ जैसे कि इन्द्रजालवाला तमाशा फर के चल देता है। भुवाल राजा। ऐसे राजा जिन का शाफ पलता है और शूर वीर धूल में मिल गमे ।
चितावनी गर्भ लीला गये खानखानाँ सुलताँ छत्रधारी । गये मीर उमरा करोरौं हजारी ॥५०॥ जो वेगम बेचारी गमें मार डारी । हुती प्रान-प्यारी से नारी पवारी ॥५१॥ गये रावना और रानी गुमानी। तिन्हीं की कहो धौं कहाँ है निसानी ॥५२॥ गये लखपती जो धजा वाँधि कोटी। दियो डारि पाँसा लई मारि गोदी ॥३॥ हिये चेति चेतो चितौनी चिताऔं । संभारो सँभारी अगाओँ अगाऔं ॥५॥ भरे दाग पीछे जतन कर धुवइये । अगाऊँ नहीं दाग के वाट जइये ॥५५॥ कृपा तँ भई मानुपा दैह यारो। चलो राह नेकी बदी को पिसारो ॥६॥ भगति भाव चूके साई भवन फूंके । जिन्हौँ भक्ति भैंटा जरा मरन मेटा ॥५॥ सोई जन सुभागे उलटि पंथ लागे हिये दाग दागे पिया प्रेम पागे ॥८॥ भगति ध्रुव कमाया अचल राज पाया। भले आपु जागे अवर को जगाया ॥९॥ त प्रहलाद अहलाद बहु भक्ति धारी। तपै इन्द्र कैसा सकै कौन टारी ॥६॥ *शोक । आगे ही से। मंग से। उन को इंद्र कितनाही दुख दे पर भक्ति से नहीं टाल सकता। ..
१३. चितावनी गर्भ लीला मोरधुज* तमधुज । जनक* अम्मरीपा। जुधिष्ठिर, भरथ* गोपिचंदें परीछा* ॥६१॥ विभीपन को देखा कि जो भक्ति साजे । अजहुँ लोक निकलंक निरसंक गाजे ॥६॥ भगति भरथरी की अवर जानि पीपा । जिन्हाँ का अमर नाम है दीप दीपा ॥३३॥ कवीरा गोरखनाथ मीरा बड़ाई। कामा व नामा सुदामा भलाई ॥६॥ सुकदेव जयदेव सोभा सुहाई। रैदास सेना* धना धीरताई ॥६॥ अमर नाम अहमद तजी पादसाही । दुनी+ में प्रगट प्रेम जा को सराही ॥६६॥ फकीरी करै कोउ साँचे अकीदा । मिसाले रहीमा बजीदा फरीदा ॥६॥ नीके जानि के चत्रभुज* चित्त लाया। भजी लोक लज्जा तजी मोह माया ॥८॥ विराजे जहाँ लाँ भगत लोक माहीं। कहाँ लौँ कहौं संत को अंत नाहीं ॥६॥ सकल संत दाया चितवनी चिताया। धरनिदास आया सरन राम राया ॥७॥ * *मतों के नाम । दुनिया।
१४ অঙ্গ -- , ॥ शब्द ॥ (राग सारंग) ॥१॥ भइ कंत दरस बिनु बावरी। मो तन व्यापै पीर प्रीतम की, मूरुख जाने आवरी ॥१॥ पसरि गया तरु प्रेम साखा सखि, विसरि गयो चित चाव री भोजन भवन सिँगार न भावै, कुल करतूति अभाव री ॥२॥ खिन खिन उठि उठि पंथ निहारौं, बार धार पछिताँवरी नैनन अंजन नींद न लागै, लागै दिवस विभाव* री ॥३॥ देह दसा कछु कहत न आवै, जस जल ओछे नावरी । धरनी धनी अजहुँ पिय पाऔं, तो सहजै अनँद वधाव री ॥४॥ ॥२॥ -- हरि जन हरि के हाथ बिकाने । भावै कही जग धग जीवन है, भाव कहो वीराने ॥१॥ जाति गँवाय अजाति कहाये, साधु सँगति ठहराने । मेटो दुख दारिद्र, परानो, जूठन खाय अघाने ॥२॥ पाँच जने परवल परपंची, उलटि परे बंदिखाने । छुटी मजूरी भये हजूरी, साहब के मन माने ॥३॥ निरममता निरवैर सभन त, निरसंका निरवाने । धरनी काम राम अपने ते, चरन कमल लपदाने ॥ ॥३॥ हरि जन वा मद के मतवारें। जो मद बिना काठि यिनु भाठी, विनु अग्निहि उदगारे ॥१॥ *थुरा। भागा। ।
१५ ॥४॥ घास अकास घराघर भीतर; बुंद करै कलका रे। चमकत चंद अनंद बढ़ो जिव, सब्द सघन निरुवारे ॥२॥ बिनु कर धरे धिना मुख चाखे, विनहिँ पियाले ढारे । ताखन स्यार सिंह को पौरुप, जुत्थ गजंद विडारे ॥३॥ कोटि उपाय करै जो कोई, अमल न होत उतारे। धरनी जो अलमस्त दिवाने, साइ सिरताज हमारे ॥४॥ हित करि हरि नामहिँ लाग रे । घरी घरी घरियाल पुकारे, का सेवैि उठि जाग रे ॥१॥ चोआ चंदन चुपड़ तेलना, और अलबेली पाग रे । से तन जरे खड़े जग देखो, गूद निकारत काग रे ॥२॥ मात पिता परिवार सुता सुत, बंधु त्रिया रस त्याग रे । साधु के संगति सुमिर सुचित होइ, जो सिर मोटे भाग २॥ 'सम्बत जरै वरै नहि जब लगि, तब लगि खेलहु फाग रे । धरनीदास तासु बलिहारी, जहँ उपजै अनुराग रे ॥४॥ ऐसे राम भजन करु वावरे । वेद साखि जन कहत पुकारे, जो तेरे चित चाव रे ॥१॥ काया द्वार है निरखु निरंतर, तहाँ ध्यान ठहराव रे । तिरबेनी एक संगहि संगम, सुन्न सिखर कहँ धाव रे ॥२॥ हद्द उलंघि अनाहद निरक्षा, अरध उरध मधि ठाँव रे। राम नाम निसु दिन लव लागै, तवहिँ परम पद पाव रे॥३ तहँ है गगन गुफा गढ़ गाढ़ो, जहाँ न पवन पछाँव रे । धरनीदास तासु पद बंदै, जो यह जुगति लखाव रे ॥४॥ *तत्छन-चटपष्ट ।
१६ शब्द मेरो राम भलो व्यौपार हो। वासाँ दूजा दृष्टि न आवै, जाहि करो रोजगार हो ॥१॥ जा खेती तो उहै कियारी, विनु बीज बैल हर फार हो। रात दिवस उद्दम करे, गंग जमुन के पार हो ॥२॥ बनिज करो तो उहै परोहन*, भरो विविधि परकार हो. लाभ अनेक मिले सतसंगति, सहजहिँ भरत भंडार हो ॥३ जो जाचौ तौ वाहि को जाची, फिरी न दूजे द्वार हो । धरनी मन वच क्रम मन मानो, केवल अधर अधार हो ॥४ ( राग गंधार) री जुगजुग संतन की बलिहारी। जो प्रभु अलख अमूरत अविगत, तासु मा मन वच क्रम जगजीवन को व्रत, जीवन संतन साँच कही सवहिन तें, सुत पितु ढोलिया ढोल नगर जो मार, गृह गृह गोधन जुत्थ पार करिये को, पोदत पी एहि जग हरि भगता पतिवरता, अवर धरनी धृग जीवन है तिन्ह को, जिन्ह ॥२॥ जो जन भक्त बछल उपवासी ता को भवन भयो उँजियारो, *गाड़ी । 'माँगो । गौओं के झुंड को की पीठ पर लाठी मारते हैं। सेवक ।
* लोक लाज कुल कानि बिसारी, सार सब्द को गासी। तिन्ह को सुजस दसा दिसि बाढ़ो, कत्रन सकै करि हाँसीर हरि व्रत सकल भक्त जन गहि गहि, जम तें रहे मवासों दँह धरी परमारथ कारन, अंत अभैपुर बासी ॥३॥ काम क्रोध तृस्ना मद मिथ्या, सहज भये बनबासी । संतत दीन दयाल दयानिधि, धरनी जन सुखरासी- ॥४॥ ( राग बेलावल) ॥१॥ मोहिँ कछु नाहि बिसाय, कोउ कैसहु कहि जाव री॥टेक काँकि झरोखे रावला, मन मोहन रूप देखाव री। दृष्टि परे परबस पस्यो घर, घरहु न माहिँ साहाय री ॥ जस जलचर जल में चरै, मुख चारो सहज समाय रो। निगलत तो वहि निर्भय, अव उगलत उगलि न जाय ॥२ जस पंछी बन बैठियो, अपना तन मन ठहराय री। नर को भेद न भेदिया, पर अवचक लागे आय री ॥३॥ ॥दोहा॥ जाहि परो दुख आपना, सेा जाने पर पीर । धरनी कहत सुन्यो नहीं, वाँझ की छाती छीर ॥ ॥ २॥ तब कैसे करिहा राम भजन । अबहिँ करौ जब कछु करि जानौ, अवचक कौंच मिलेगो तन ॥१॥ *रक्षा में, बचे हुए । निगमा, ख़ारिज । निरंतर । निरकुल जिसमें लासा.लगा कर चिड़िया फँसाते हैं। मही। 3 शब्द मेरो राम भलो व्यौपार हो। वा साँ दूजा दृष्टि न आवै, जाहि करो रोजगार हो ॥१॥ जा खेती तो उहै कियारी, चिनु बीज वैल हर फार हो। रात दिवस उद्दम करे, गंग जमुन के पार हो ॥२॥ बनिज करो तो उहै परोहन*, भरो विविधि परकार हो । लाभ अनेक मिले सतसंगति, सहजहिँ भरत भँडार हो ॥३॥ जो जाचौ तौ वाहि को जाचौ, फिरौ न दूजे द्वार हो । धरनी मन वच क्रम मन मानो, केवल अधर अधार हो ॥४॥ ( राग गंधार) - जुगजुग संतन की बलिहारी । जो प्रभु अलख अमूरत अविगत, तासु भजन निरबारी॥१॥ मन बच क्रम जगजीवन को ब्रत, जीवन को उपकारी । संतन साँच कही सबहिन तें, सुत पितु भूप भिखारी ॥२॥ ढोलिया ढोल नगर जो मारी, गृह गृह कहत पुकारी । गोधन जुत्थ पार करिवे को, पोटत पीठि पहारी ॥३॥ एहि जग हरि भगता पतिवरता, अवर वसै विभिचारी। धरनी धृग जीवन है तिन्ह को, जिन्ह हरि नाम विसारी॥४॥ ॥२॥ 4 जो जन भक्त बछल उपवासी। ता को भवन भयो उँजियारो, प्रगटी जोति दिवा सी ॥१॥ *गाड़ी। माँगो । गोऔं के मुंह को इधर उधर विचर जाने से याने को पीठ पर लाठी मारते हैं। सियक्ष ।' है लोक लाज कुल कानि बिसारो, सार सब्द को गासी।... तिन्ह को सुजस दसा दिसि बाढ़ो, कत्रन सकै करि हाँसी॥२॥ हरि व्रत सकल भक्त जन गहि गहि, जम तें रहे मवासो । दह धरी परमारथ कारन, अंत अभैपुर बासी ॥३॥ काम क्रोध तृस्ना मद मिथ्या, सहज भये बनबासी .....? संतत दीन दयाल दयानिधि, धरनी जन सुखरासी ॥४॥ ( राग बेलावल ) ॥१॥ मोहिँ कछु नाहि विसाय, कोउ कैसहु कहि जाव रीटेक॥ झाँकि झरोखे रावला, मन मोहन रूप देखाव री। दृष्टि परे परबस पस्यो घर, घरहु न माहिँ साहाय री ॥१॥ जस जलचर जल मैं धरै, मुख चारो सहज समाय रो। निगलत तो वह निर्भय, अब उगलत उगलि न जाय री॥२॥ जस पंछी बन बैठियो, अपना तन मन ठहराय री। नर को भेद न भेदिया, पर अवचक लागे आय री ॥३॥ ॥ दोहा॥ जाहि परो दुख आपना, सो जाने पर पीर । धरनी कहत सुन्यो नहीं, वाँझ की छाती छीर ॥ । तब कैसे करिहा राम भजन । अबहिँ करौ जब कछु करि जानौ, अवचक कौंच मिलेगो तन ॥१॥ . *रक्षा में, बचे हुए । निकममा, खारिज । निरंतर । निरकुल जिसमें लासा लगा कर चिड़िया फँसाते हैं। मही। 8 शब्द -- अंत समौ कस सीस उठेही, बोल न ऐहै दसन रसन* । थकित नाटिका' नैन स्रवन बल, बिकल सकल अँग नख सिख सना ॥२॥ ओझा बैद सगुनिया पंडित, डोलत आँगनद्वार भवन । मातु पिता परिवार बिलखि तारि लिये तन सव अभरन ॥३॥ बार बार गुनि गुनि पछतैहै।, परवस परिहै तन मन धन । धरनी कहत सुनो नर प्रानी, बेगि भजो हरि चरन सरन॥४॥ मन, M एक अलाह के मैं कुरवानी। दिल ओझल मेरा दिलजानी ॥१॥ तू मेरा साइव मैं तेरा बन्दा। तू मेरि सभी हवस पहिचन्दा ॥२॥ बार बार तुम कहँ सिर नावाँ । जानि जरूर तुम्हें गोहरावौँ ॥३॥ तुमहिं हमारे मक्का मदीना। तुमहीं रोजा रिजिक राजीना ॥४॥ तुमहिं कोरान खतम खतमाना । तुम तसवी अरु दीन इमाना ॥५॥ *दांत और जबान । नाड़ी। सिर से-पैर तक। रो कर मोट में ।
में आसिक महबूब तू दरसा । बेगर ताहि जहान जहर सा ॥६॥ देहु दिदार दिलासा एही। नातर जाव बिनसि बरु ही ॥७॥ कादिर तुमहिं कदर को जाना । मैं हिन्दू किधौँ मूसलमाना ॥८॥ धरनीदास खड़े दरवाजा । सब के तुमहिं गरीब निवाजा ॥६॥ मैं अति कच्चा । मैं मिरगुनियाँ गुन नहिं जाना । एक धनी के हाथ विकाना ॥१॥ सोइ प्रभु पक्का मैं झूठा मेरा साहब सच्चा ॥२॥ मैं ओछा मेरा साहब पूरा। मैं कायर मेरा साहब सूरा ॥३॥ मूरख मेरा प्रभु ज्ञाता। मैं किरपिन मेरा साहब दाता ॥५॥ धरनी मन मानो इक ठाउँ । सेो प्रभु जीवो मैं मरिजाउँ ॥५॥ दूरि न भाई खसम खुदाई । है हाजिर पहिचानिन जाई॥१॥ ढूँढो अपना एही वजूदा । बैठा मालिक महल मजूदा ॥२॥ *बगैर, बिना । शरीर । मौजूद ।
जा को साहब देत वफीक । पारि पियाला करु तहकीक॥३॥ महरम कोइ मिले जो यार । पल में पहुंचावै दरबार ॥४॥ धरनो बखत-बलंदी सोइ । जाकी नजरि समासा होइ॥५॥ प्रभु तुमहि मेरे अवर नहिं कोइ। बहु विधि कहत सुनत नर लाइ ॥१॥ तुव बिस्वास दास मन मान । जुग जुग भगत-बछल जा की बान ॥२॥ अवरन्ह त मेरो होत अकाज । छोड़ि कुल कानि बिसरि जग लाज ॥४॥ धरनी जनम हारि भावे जीति । अब मन बच क्रम हृदै प्रतीति ॥४॥ जब लग परम तत्तु नहिं जाने । तब लगभरम भूत नहिं भाजे, करम कौंच लपटाने॥१ सहस नाम कहि कहा भयो मन, कोटि कहत न अघाने। भूले भरम भागवत पढ़ि के, पूजत फिरत पखाने॥२॥ का गिरि कंदर मन्दर माहँ, कंद मूरि खनि खाने । कहा जोबरप हजाररह्यो तन, अंत बहुरि पछिताने३ दानि कयीसुर सरसुती, रंक होउ भा राने । प्रेम प्रतीति अमिय परचे बिनु, मिले न पद निरबाने? मन वच करम सदा निसियासर, दूजो ज्ञान न ध्याने। ':. : धरनी जन सतगुरु सिर ऊपर,भक्त-बछल भगवाने॥५॥ "तीशी । मागवान पिहाड़ की गुणा।
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(राग टोड़ी) जब मेरो यार मिलै दिल जानो। होइ लवलीन कराँ मेहमानी हृदय कमल विच आसन सारी। ले सरधा जल चरन खटारी*२ हित के चंदन चरचि चढ़ायो । प्रीति के पंखा पवन डोलायो ३ भाव के भोजन परसि जवायो। जो उवरा से जूठन पायो ? धरनी इत उत फिरहि न भारें। सन्मुख रहहि दोऊ कर जोरे ५ (राग भद) ॥१॥ करता राम करै सोइ होय । कल बल छल बुधि ज्ञान सयानप, कोटि करै जो कोय ॥१॥ देई देवा सेवा करिके, भरम भुले नर लोय । आवत जात मरत औ जनमत, करम काँट अरुझाय ॥२॥ काहे भवन तजि भेप बनाया, ममता मैल न धोय । मन मवास चपरि नहिँ तोड़ेउ, आस फाँस नहिँ छोय ।। सतगुरु चरन सरन सच पायो, अपनी दैह बिलोय । धरनी धरनि फिरत जेहि कारन, घरहिं मिले प्रभु साय ॥४॥ ॥२॥ प्रभुजी अव जनि मोहिँ विसारो। असरन-सरन अधम-जन-तारन, जुग जुग विरद तिहारो' ।१॥ जहँ जहँ जनम करम बसि पायो तहँ अरुझे रस खारी। : पाँधहुँ के परपंच भुलाना, धरेउ न ध्यान अधारो ॥२॥ *भोया । भूल से । हिबरा, तलैया ।
शब्द अंध गर्भ दस मास निरंतर, नखसिख सुरति सँवारो। मंजा मुत्र अग्नि मल कृम जहँ, सहजै तहँ प्रतिपारी ॥३॥ दोजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न विचारो । धरनी भजि आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो। ॥३॥ अजहुँ मन सब्द प्रतीति न आई ॥१॥ चंचल चपल चहूँ दिसि डोलै, तजत नाहि चतुराई ॥२॥ सब्द त सुक मुनि सारद नारद, गारख की गरुआई ॥३॥ सब्द प्रतीत कबीर नामदेव, जागत जक्त दोहाई ॥४॥ सदन धना रैदास चतुरभुज, नानक मीराबाई ॥५॥ संत अनंत प्रतीति सन्द की, प्रगट परम गति पाई ॥६॥ धरनी जो जन सब्द-सनेही, मोहिँ बरनी नहिँ जाई ॥७॥ ॥४॥ जो लौँ मन तत्तुहिँ नहिँ पकरै । तो लॉ कुमति किवार न टूटे, दया नाहिँ उधरै ॥१॥ काहे के तीरथ बरत भटकि भ्रम, थाकि थाकि थहरै। मंडप महजिद मुरति सुरति करि, धोखेहिँ ध्यान धरै ॥२॥ काहेके अनत जिवन फल तोरै, का पचि अनल बरै। काहेके बल करि जल पर सेवैि भुइँ खनि बँदक परै ॥३॥ दान विधान पुरान सुनै नित, तौ नहि काज सरै। धरनी भवजल तत्तु नाव री, चढ़ि चढ़ि भक्त तरै ॥४॥ नाहही का गूदा या सहा पंछा। भाग कर । गाली।
(राग टोड़ी) जब मेरो यार मिलै दिल जानी। होड लवलीन करौं मेहमानी हृदय कमल विच आसन सारी। ले सरधा जल चरन खटारी* २ हित के चंदन चरचि चढ़ायो । प्रीति के पंखा पवन डोलायो ३ भाव के भोजन परसि जवायो। जो उबरा से जूठन पायो ? धरनी इत उत फिरहि न भार। सन्मुख रहहि दोऊ कर जोरे ५ (राग नट) ॥१॥ करता राम करै सोइ होय । कल बल छल बुधि ज्ञान सयानप, कोटि करै जो कोय ॥१॥ देई देवा सेवा करिके, भरम भुले नर लोय । आवत जात मरत औ जनमत, करम काँट अरुझाय ॥२॥ काहे मवन तजि भेष बनायो, ममता मैल न धोय । मन मवास चपरिग नहिँ तोड़ेउ, आस फाँस नहिँ छोय ।। सतगुरु चरन सरन सच पायो, अपनी दैह बिलोय । धरनी धरनि फिरत जेहि कारन, घरहिँ मिले प्रभु सेोय ॥४॥ प्रभुजी अव जनि मोहिँ विसारो । असरन-सरन अधम-जन-तारन, जुग जुग बिरद तिहारो ।। जहँ जहँ जनम करम बसि पायो तहँ अरुझे रस खारी। पाँचहुँ के परपंच भुलाना, धरेउ न ध्यान अधारो ॥२॥ *धोया । भूल से । 'हबरा, तलैया । .
अंध गर्भ दस मास निरंतर, नखसिख सुरति सँवारो। मंजा' मुत्र अग्नि मल कृम जहँ, सहजै तहँ प्रतिपारी ॥३॥ दीजै दरस दयाल दया करि, गुन ऐगुन न विचारो । धरनी भजि आयो सरनागति, तजि लज्जा कुल गारो।। अजहुँ मन सब्द प्रतीति न आई ॥१॥ चंचल चपल चहूँ दिसि डोलै, तजत नाहिँ चतुराई ॥२॥ सब्द तँ सुक मुनि सारद नारद, गारख की गरुआई ॥३॥ सब्द प्रतीत कबीर नामदेव, जागत जक्त दोहाई ॥४॥ सदन धना रैदास चतुरभुज, नानक मीराबाई ॥५॥ संत अनंत प्रतीति सन्द की, प्रगट परम गति पाई ॥६॥ धरनी जो जन सब्द-सनेही, माहि बरनी नहिं जाई ॥७॥ -- जो लौँ मन तत्तुहिँ नहिँ पकरै । तो लौँ कुमति किवार न टूटै दया नाहिँ उघरै ॥१॥ काहे के तीरथ बरत भटाकि भ्रम, थाकि थाकि थहरै। मंडप महजिद मुरति सुरति करि, धोखेहिँ ध्यान धरै ॥२॥ काहेके अनत जिवन फल तोरै, का पचि अनल बरै । काहेके बल करि जल पर सेवैि भुइँ खनि खंदक परै ॥३॥ दान विधान पुरान सुनै नित, तौ नहिं काज सरै। तत्तु नाव री, चढ़ि चढ़ि भक्त तरै ॥४॥ दही का गूदा या सहा पंछा। भाग कर । गाली। धरनी भवजल "मना (राग गौरी) ॥१॥ सुमिरो हरि नामहि बौरे ॥टेक॥ चक्रहुँ चाहि चलै चित चंचल, मूल मता गहि निस्चल को रें। पाँचहुँ तँ परिचै करु प्रानी, काहेके परत पचीस के शोरें॥१ जौँ लगि निरगुन पंथ न सूझ, काज कहा महि-मंडल दौरे॥२ सब्द अनाहद लखि नहिं आवै, चारो पन चलि ऐसहिँ गौ रे॥४ ज्यों तेली को बैल बेचारा, घरहिं मैं कोस पचासक भौरे । दया धरम नहिँ साधु की सेवा, काहेके सो जनमे घर चौरे धरनीदास तासु वलिहारी, झूठ तजा जिन्ह साँचहिँ धौरे ७ ॥२॥ रे बन्दे तू काहे के होत दिवाना । एक अलाह दोस्त है तेरा, अवर तमाम बेगाना ॥१॥ कौल करार बिसारि बावरो, मान मनी मन माना । आखिर नहिँ दुनियाँ में रहना, बहुरि उहाँई जाना ॥२॥ जाहिर जीव जहान जहाँ लगि, सब माँ एक खोदाई। बहुरि गनीम कहाँ तँ आया, जा पर छुरी चलाई ॥३॥ दूर नहीं है दिल का मालिक, बिना दरद नहिँ पैहौ। धरनी बाँग बुलंद पुकार, फिरि पाछे पछितैहौ ॥४॥ - अब हरि दासि भई, तातें गही चरन चित लाय ॥टेक॥ रही लजाय लोक की लज्जा, बिसरि गई कुल कानी। उपजी प्रीति रीति अति बाढ़ी, बिनुहीं मोल विकानी ॥१॥ *झमेला। गहा। शत्रु ।
शब्द छाजन भोजन की नहिं संसय, सहजहिँ सहज कमाये । संग सहेलरि छोडि कै अघ, नेकु नाहिँ बिलगाये ॥२॥ दुखदाई दरसे नहीं हो, दहु दिसि सकल दयाल । अपनो प्रभु अपने गृह पायो, छटकि परो जंजाल ॥३॥ अव काहू के द्वार न आवो, नहिँ काहू के जाव । धरनी तहँ सच पाइयो, अब जहाँ धनी को नाँव ॥४॥ (राग कल्यान) - जाके गुरु चरनन चित लागा। ता के मन की भरम भुलानी, धंधा धोखा भागा ॥१॥ सेा जन सेवत अवचकही में, सिंह सरीखे जागा । धनि सुत जन धन भवन न भावत, धावत वन वैरागा॥२॥ हरखित हंस दसा चलि आयो, दुरि गयो दुरमत कांगा। पाँचहुँ को परपंच न लागै, कोटि करै जौँ दागा। ॥३॥ साँच अमल तहँ झूठ न झाँकै, दया दीनता पागा । सत्त सुकृत संतोप समाना, ज्यौँ सूई मध धागा ॥४॥ लै मन पवन उरध को धावै, उपजु सहज अनुरागा। धरनी प्रेम मगन जन कोई, सोइ जन सूर सुभागा "५॥ (राग केदार) अजहु न गुरु चरनन चित दैहौ ॥टेक॥ नाना जोनि भटकि ममि आये, अब कत्र प्रेम तीरथहिँ न्हैहौ॥१ बड़ कुल बिधव भरम जनि भूलोप्रभु पैहौ जब दास कहैहौ॥२॥ "श्री। 'दगा। 4 शब्द एह संगति दिन दस कि दसा है, कथि कथि पढ़ि पढ़ि पार न पैहो ॥३॥ करम भार सिर तँ नहिँ उतरे, खंड खंड महि-मंडल धैहौं ng विनु सतगुरु सतलोक न सूझै, जनमि जनमि मरि मरि पछितैहो ॥५॥ धरनी हैहै। तबही साँचे, सतगुरु नाम हृदय ठहरैहौ ॥६॥ ॥३॥ अजहुँ मिला मेरे प्रान-पियारे । दीनदयाल कृपाल कृपानिधि, करहु छिमा अपराध हमारे॥१ कल न परत अति विकल सकल तन, नैन सकल जनु। बहत पनारे। माँस पचो अरु रक्त रहित भे, हाड़ दिनहुँ दिन होत उघारे॥२॥ नासा नैन खवन रसना रस, इंद्री स्वाद जुआ जनु हारे । दिवस दसा दिसि पंथ निहारति, राति बिहात गनत जस तारे॥३ जो दुख सहत कहत न बनत मुख, अंतरगत के है। जाननहारे । धरनी जिय झलमलित दीप ज्याँ, होत अँधार करो उँजियारेण्ट (राग बिहागरा) ॥१॥ जग मैं सोई जीवनि जिया । जा के उर अनुराग उपजो, प्रेम प्याला पिया ॥१॥ कमल उलटो भर्म छूटो, अजप जप जपिया। जनु अंधारे भवन भीतर, बारि राखो दिया ॥२॥ *दौड़ोगे। जैिसे । बीतती है। .
। शब्द काम क्रोध समाधिया, जिन्ह घरहि मैं घर किया। माया के परिपंच जेते, सकल जाना छिया ॥३॥ बहुत दिन को बहुत अरुझा, सहजहीं सरुकिया। दास धरनी तासु बलि बलि, भैंजियो जिन्ह बिया*॥४॥ सहर से रमैया राम भजि लेहु हो, जा तँ जनम मरन मिटि जाय ॥टेक॥ एक चौहटा हो, एकै हाट परवान । ताही हाट के बानिया हो, बनिज न भावत आन ॥१॥ तीनि तरे एक ऊपरे हो, बीच बहै दरियाव । कोइ कोइ गुरुगम ऊतरे हो, सुरति सरीखे नाव ॥२॥ तीनि लेक तीनि देवता हो, सेा जाने नर लोय । चौथे पद परिचै भई हो, सो जन विरले कोय ॥३॥ सोइ जोगी साई पंडित हो, सोइ बैरागी राव । जो एहि पदहिँ बिलोइया हो, धरनी धरेता को पाँव ॥४॥ . ॥३॥ . पिय बड़ सुन्दर सखि, बनि गैला सहज सनेह ॥टेक॥ जे जे सुन्दरि देखन आवै, ता कर हरि ले ज्ञान । तीन भुवन कै रूप तुलै नहिँ, कैसेके करउँ बखान ॥१॥ जे अगुवा' अस कइल धरतुई, ताहि नेवछावरि जाँव । जे वाम्हन अस लगन विचारल, तासु चरन लपटाँव ॥२॥ चारिउ ओर जहाँ तहँ चरचा, आन कै नाँव न लेइ । ताहि सखी की बलि बलि जैहौं, जे मारी साइति देइ ॥३॥ *श्रीन । बिचौलिया। मगाई । मुहूर्त (ध्याह का)। - शब्द झलमल झलमल कालकत देखो, रोम रोम मन मान । धरनी हर्पित गुन गन गावै, जुग जुग है जनि आन ॥४॥ ॥४॥ अवचक आइ गैलापिया कै सनेसवा, ताखना उठलिउँ जागि । राम राम करि घर से निकसलिउँ, जे जहँ से तहँ त्यागि रे ॥१ सत कै सिँघोरा कर पर मारा, प्रेम पटम्बर पागिरे । धाजन लागु चपल चौघरिया, चित्त चतुरता भागि रे ॥२॥ पूर परी कुरखेतहिँ चढ़लिउँ, जन परिजन से बागि रे । करम भरम कर चिता सजावल, ब्रह्म अगिन तेहि लागि रे॥३ धरनी धनि तहँ भक्ति भाँवरी, चित अनुभै अनुरोगि रे । अबकी गवना बहुरि नहिँ अवना, बोलहु राम सुभागि रे ॥४॥ (राग पंजर) ॥१॥ तुहि अवलंय हमारे हो। भावै पगु नाँगे करो, आवै तुरय सवारे हो ॥१॥ जनम अनेकन वादि गौ, निजु नाम बिसारे हो । अब सरनागत रावरी, जन करत पुकारे हो ॥२॥ भवसागर बेरा परो, जल माँक मशारे हो। संतत दीनदयाल हो, कर पार निकारे हो ॥३॥ धरनी मन बच कर्मना, तन मन धन वारे हो । अपना विरद निवाहिये, नहिं बनत विचारे हो ॥४॥ *अनेक । तुिर्त । कुरुक्षेत्र अर्थात रणभूमि । अलग होकर । ||घोड़ा । 'निरंतर।
शब्द प्रभु तो विनु को रखवारा ॥टेक॥ हौं अति दीन अधीन अकर्मी, बाउर बैल बेचारा । तू दयाल चारो जुग निस्चल, कोटिन्ह अधम उधारा ॥१॥ अबके अजस अवर नहिँ लागै, सरबस ताहिँ बड़ाई। कुल मरजाद लोक लज्जा तजि, गह्यो चरन सरनाई ॥२॥ मैं तन मन धन तो पर वास्यो, मूरख जानत ख्याला । व्याउर वेदन' बाँझ न बूझै, बिनु दागे नहिँ छाला ॥३॥ तुलसी भूपन भेप बनायो, स्त्रवन सुन्यो मरजादा । धरनी चरन सरन सच पायो, छुटिहै बाद विवादा ॥४॥ प्रभु तू मेरो प्रान पियारा देक॥ परिहरि ताहि अवर जो जाचे, तेहि मुख छीया छारा । तो पर वारि सकल जग डारौं, जौ बसि हाय हमारा ॥१॥ हिन्दु के राम अल्लाह तुरुक के, बहु बिधि करत बखाना । दुहुँ को संगम एक जहाँ, तहवाँ मेरो मन माना ॥२॥ रहत निरंतर अंतरजामी, सब घट सहज समाया । जोगी पंडित दानि दसो दिसि, खोजत अंत न पाया ॥३॥ भीतर भवन भयो उँजियारो, धरनी निरखि साहाया । जा निति देस देसंतर धावा, सो घटहाँ लखि पाया ॥४॥ *यचे वाली प्री। पिीडा। छोड़कर।
कवित मो साँ प्रभु नाहिँ दुखित, तुम साँ सुखदाई ॥टेका दीनबन्धु बान तेरो, आइ करु सहाई । मो साँ नहिँ दीन और, निरखो नर लाई ॥१॥ पतित-पावन निगम कहत, रहते हो कित गाई । मो सौं नहिं पतित और, देखो जग टोई ॥२॥ अधम को उधारन तुम चारो जुग ओई। मो त अव अधम आहि, कवन धाँ वड़ाई ॥३॥ धरनी मन मनिया, एक ताग में पराई । आपन करि जानि लेहु, कर्म फंद छाई। ॥४॥ कबित किया पट कर्म, तन दया नहिँ धर्म, तजो नहिं भर्म, किमि कर्म छुटै। दियों बहु दान, करि बिबिध विधान, मन बढ़ो अभिमान जम प्रान लूटै ॥ जग्य अरु जोग, तप तीरथ व्रत नेम करि, विना प्रभु-प्रेम कलि काल कूट। दास धरनी कहै, कौन विधि निर्वहै, जब गुरुज्ञान तब गगन फूटै ॥ *गुप्त । छिोड़ा कर, कांट कर ।
कवित ॥२॥ जीव की दया जेहि जीव व्यापै नहीं, भूखे न अहार प्यासे न पानी। साधु से संग नहिं सब्द से रंग नहिं, वोलि जानै न मुख मधुर वानी ॥ एक जगदीस को सीस अरपै नहीं, पाँच पच्चीस बहु वात ठानी ॥ राम को नाम निज धाम विस्राम नहि, धरनी कह धरनि माँ धृग से प्रानी* ॥ अधो मुख वास दस मास अवकास नहिँ, जठर में अनल की आँच बारी। बालपन बीति गौ तरुनपन तेज भौ, परे विप स्वाद धन धाम नारी ॥ रद्धपन आइ गौ चौंकि चित चेत भौ, विना जगदीस जम त्रास भारी। बूकि मन देखु तोहिँ सूझि कछु परत नहिँ, धरनी तजि चलै गो हाथ झारी ॥. दुर्लभ दह बिदेह कहा भयो अंत को है पुहमी सदना । छिति छार परो मुख भार! जरो, तन गार परो प्रभु जा घट ना ॥ पृथ्वी पर ऐसे जीव को धिक्कार है। गिर्द में मिलना । भाड़ । मिही,।
१२ कबित धरनी धरनी धरु एक धनी पगु, जो कलि को फंद चहै कटना। तजु तीरथ बर्त विधान सबै, करु नाम निरंजन की रटना ॥ ॥५॥ । मौत महा उत्कंठा चढे, नहिँ सूझत अंध अभागहु चित चेतु गँवार विकार तजो, जब खेत पड़े कित भागहु रे॥ जिन बुंद विकार सुधार किया, तन ज्ञान दियो पगु ता गहु रे। धरनी अपने अपने पहरे, उठि जागहु जागहु जागहु रे॥ दिन चार को संपति संगति है, इतने लगि कान मनी करना। इक मालिक नाम धरो दिल में, धरनी भवसागर जो तरना। निज हक पहिचानु हकीकत जानु, न छोडु इमान दुनी घर ना। पग पीर गहो पर-पीर हरो जिवना न कळू हक है मरना। ॥9॥ जीवन थोर बचा भौ भोर, कहा धन जोरि करोर बढ़ाये। जीव दया करु साधु की संगति, पैही अभय पद दास कहाये॥ जा सन" कर्म छपावत हो, सो तो देखत है घट में घर छाये । बेग भजो धरनी सरनी, ना तो आवत काल कमान चढ़ाये ॥ ॥८॥ आवत जात परवाह सदा, धन जोरि बटोरि धरो न कवाही । तू महराज गरीब-निवाज, अकाज सकाज की लाज तुमाहाँ । *टेक ; धारना । वेिग या जोश के साथ । विच्चा । सवेरा । से। भागी।
कवित जो हिरदे हरि को पद पंकज, सो मत. मा मन ते विसराहाँ। कह धरनो मनसा बच कर्मना, मोहि अवर अवलंघन नाहीं॥ L सुधा रस पागे॥ ज्ञान को यान लगो धरनी, जन सेवत चौंकि अचानक जागे। छूदि ग़यो विपया विप बंधन, पूरन प्रेम भावत वाद विवाद निखाद ,न स्वाद जहाँ लगि से सब त्यागे। [दि गई अँखियाँ तब तँ, जबसे हिय में कछु हेरन लागे। ॥ १०॥ जननी पितु बंधु सुता सुत संपति, मीत महा हित संतत जाई। आवत संग न संग सिधावत, फाँस मया परि नाहक खोई॥ केवल नाम निरंजन को जपुः चारि पदारध जेहि त है।ई। पूति बिचारि कहै धरनी, जग कोइ न काहु के संग सगाई। - दियो जिन्ह प्रान कया सुख सम्पनि, धीच मिले तिन्ह नेह न को होतो कहाँ और कहा कहि आयो सो क्रौं विसराय करो कछु औरे॥ जोग' औ त्याग पैराग गहा: : धरनी धन काज कहा पचि दारे । अंतहि तो तजिहै सब ताहिक से तू न तजै अवहीं क्यों न वौरे । "निषेध किर - +- 1 . ॥ ककहरा ॥ (१) प्रथम करता पुरुप को, कर जारि मस्तक नाउँ । ककहरा निरवारि निर्मल, बोलि सबै सुनाउँ ॥१॥ क-कया परिचै करहु प्रानी, कवन अवसर जात । ख-खोजि ले निजु यस्तु अपनी, छोड़ि दे बहु वात ॥२॥ ग-ग्यान गुरु को कान सुनि, धरु ध्यान त्रिकुटी पास । घ-घूमते एक चक्र भंवरा, सेस उड़त अकास ॥३॥ उ.-उदै चंद अनंद उर अति, मोति वरसै धार । घ-चमक विजुली रेख दहुँ दिसि, रूप को नहिँ पार ॥४॥ छ-छोट मोट न काहु जानो, सबै एक समान .. ज-जुक्ति जानै मुक्ति पावै, प्रगट पद निरबान ॥ झ-झूठ झगर पवारि* डारी, झारि झटकि विछांव । ज-इद्रियन के स्वाद कारन आपु जनि जहँडावा ॥६॥ ट-टेक टंडस छेडि करूं साध सब्द विवेका। ठ-ठोर सो ठहराइ ले, जहँ बसत साहब एक ॥७॥ ड-डार पात समूह साखा, फिरत पार न पाव । ढ-ढोल मारत साध जन, नहि बहुरि ऐसे दाव । न-नाम नौका चढ़ो चित दे, बिना वाद विवाद। त-तहाँ ले मन पवन राखो, जहाँ अनहद नाद ॥ घ-थकित होइ हैं पाँच, अरुः पच्चीस रहि हैं थीर । द-दसैं द्वारे झलमलै, मनिश्माति मानिक हीर ॥१०॥ *फैको । उिगाय । दसी यानी पाखंडियों का संग छोड़ कर शब्द-अभ्यासी विरोध का संग कर।
घ-धोख धंधा जगत बंधा, कथै बहुत उदास । न-निस्यहैगा तबहिं जब अभि. अंतरे विस्वास ॥११॥ प-प्रेम जा घट प्रगट भा, तहँ यसै पुन्न न पाप । .. फ-फेरि मन तहैं उलटि, धरु, जहँ उठत अजपा जाप.॥१२॥ ब-चिना मूल के फूल फूल्यो, हिये माँ मैंझार । भ-भेदिया कोड, जानिहै, नहिं और जाननहार ॥१६॥ म-मूल मंत्र ओंकार अदभुत, निराधार अनूप । य-यहाँ पहुँचहि कोई जन, जहँ छाँह नाही धूप ॥१४॥ र-राम जपु निजु धाम धवला, मन हृदै करु बिसराम । ल-लोक चार विचार परिहरु, प्रीति करु तेहि ठाम ॥१५॥ व-वारि तन मन धन जहाँ लौं, जिव पवन अरु प्रान ।.. श-समुझि आपा मेटि अपनो, सकल बुधि बल.ज्ञान ॥१३॥ प-खैर रँड बबूर सेहुँड, सेा न फरिहँ दाख । स-सर्य के. सुन्न एकै, दूसरी जनि राख ॥१७॥ ह-होत नर परमातमा. तब, आतमा मिटि जात । रहै अचल. अबोल अस्थिर, कहै अविचलं वात.॥१८॥ क्ष-छुए ताहि पवित्र हूजै, पुजै मन की आस सही करिहै संत जन, जत कही धरनीदास ॥१६॥ "निर्धाह होगा यि । हफेद । लोहारा । यति जैसा कि !
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ककहरा . ट-टारि दे निज भजन सेती, जन्म जन्म विकार । एक भक्ति बिनु मुक्ति नाही, कोटि करहु विचार ॥१९॥ ठ--ठाँव साई सराहिये, जह बरसई जल धार । इक गिल विच अंगरे, तह प्रेन धुनि ओंकार ॥१२॥ ड-डंस औ पट स्वाद जारो ब्रह्म अग्नि प्रचारु । अपनो सीप रहिके, द्वादसो र भारु ॥१३॥ कठिन ए यार देखो, नाथ की यह रीति । पाँति विसाइ नाही, अतजन साँ प्रीति ॥११॥ व राखो, उर्ध सौँ करु नेह । परग दोन्हो, छुटो भरम सँदेह ॥१५॥ १, जहँ सक्ति सीय निवाम । • खोजहिँ, संत कहिँ निवास॥१॥ ग, जस सलिला में नीर । न पुनि, करत कृत वेपीर ॥१७॥ 1. प्रीति करु वहि देस । ..।, ब्रह्म नटवर भेस ॥१८॥ • जहँ उठत अजपा जाप । चुटै जम को दाप" ॥१॥ दूसरो अस स्वाद। सब तजो वाद विवाद ॥२२॥ जहाँ जोति अपार । जब प्रगट है अनुसार ।२१॥ करनी करता है। बांका, मनमुख m . क-कायापुर मैं अलख झूले, तहाँ करु पैसार* । सुरत द्वादस लाई के, तुम बाद करहु हैं कार ॥१॥ ख-खड़ग गहि गुरु ज्ञान को, तब मारु पाँच पचीस । उनमुनी घर रहनि करि, तुम जपा जन जगदीस ॥२॥ ग-गगन धुनि मन मगन भी, करु प्रेम तत्त प्रकास । ज्ञान अंकुप्स देइ के गज' राखु त्रिकटी पास ॥३॥ घ-घेरि है मन मोह माया. कहूँ नाहि निकार । संत जन जेहि पंथ कहहीं, ताहि चेतु गँवार ॥४॥ ह-अघधपुर मैं जाइ के, तू देखु ब्रह्म सुहाव । तहँ लोकचार" विचार नाही, बेद को नहिं भावं ॥५॥ च-चारि दिन सुख कारने, नर भुला सकन सवान । काम क्रोधहिँ कैद करिके, परसु पद निर्वान ॥६॥ छ -छुदा भौ अभि' अंतरे, मन गयो सहज अकास । तहँ सुखमना दह कमल फूलो, सेत भंवर तेहिं पास। ज-जनम दुर्लभ जात है, नहि जक्त कोउ पतियाय । बहुरि न ऐसेो दाँव पैहै।, लेहु उरथ बनाय ॥८॥ -झपी है" जहँ वातु झिलमिल, अभय घर उँजियार । तहाँ अमृत बुंद बरसै. जोगि करत अहार ॥ ज-आदि इंद्र सुकादि" खोहि, पार- किनहुँ न पाय । तुम आपु अपनी सीख रहि कै, द्वार दसम समाय ॥१०॥ "पैठारी, पहुं व । अहंकार हाथी अर्थात मन । संतों का दसवाँ द्वार। लाका बार। गहरा 'तालाय । छिपी है। शुकदेव मादिक ऋषि मुनि।
ट-टारि दे निज भजन सेती, जन्म जन्म विकार । एक भक्ति बिनु मुक्ति नाही, कोटि करहु विचार ॥१९॥ ठ--ठाँव साई सराहिये, जहं बरसई जल धार । इक गिल विच अंगरे, तहँ प्रेन धुनि ओंकार ॥१२॥ ड:-डंस औ पट स्वाद जारी ब्रह्म अग्नि प्रचारु । आपु अपनो सीप रहिके, द्वादसो रंभारु ॥१३॥ ढ--ढरन* कठिन ए यार देखो, नाथ की यह रीति । तह जाति पाँति बिसाइ नाही, भक्तजन साँ प्रीति ॥१४॥ न-नाम को सतनाव राखो, उर्ध साँ करु नेह । जब अभयपुर कह परग दोन्हो, छुटो भरम सँदेह ॥१५॥ त--तही पूरन रहनि करु, जहँ सक्ति सीय निवास । ब्रह्मादि औ सनकादि खोजहि, संत कहिँ निवास॥१॥ थ-धीर नाहीं जगत देखो, जस सलिल में नीर । जात जनमत मरत पुनि पुनि, करत कृत वेपीर ॥१७॥ द-दैहि में कछु दया राखो. प्रीति करु वहि देस । सुरति के घर निरति कथिया, ब्रह्म नटवर भेस ॥१८॥ ध-ध्यान धरु निमु बासरे, जहँ उठत अजपा जाप । बिना रसना मंत्र ठहरै, बुटै जम को दाप" ॥१९॥ न-नाम रसना पाइरे, नहिँ दूसरो अस स्वाद । यह मूढ को समझाइ कै, सब तजो बाद बिबाद ॥२०॥ प-प्रेम पवन ले तहाँ राखो, जहाँ जोति अपार । तब पाप पुन्न नसाइया, जब प्रगट है अनुसार ।२१॥ "मन । सिरिततदो। म्योर गुरु के मनमुख करनी करता है। बांका, भनूठा। नं १६ (२) . क-कायापुर मैं अलख ले, तहाँ करु पैसार* । सुरत द्वादस लाइ कै, तुम वाद करहु हैं कार । ख-खड़ग गहि गुरु ज्ञान को, तत्र मारु पाँच पचीस । उनमुनी घर रहनि कपि, तुम जपो जन जगदीस १२॥ ग-गगन धुनि मन मगन भा, करु प्रेम तत्त प्रकास । ज्ञान अंकुस देइ के, गज' राखु त्रिकुटी पास ॥३॥ घ-घेरि है मन मोह माया. कहूँ नाहि निकार । संत जन जेहि पंथ कहहीं, ताहि चेतु गँवार ॥ 3-अवधपुर मैं जाइ के, तू देखु ब्रह्म सुहाव । तहँ लोकचार विचार नाही, वेद को नहि भाव ॥५ घ-चारि दिन सुख कारने, नर जुलो सकाल सयान । काम क्रोधहिँ कैद करिके, परसु पद निर्वान ॥६॥ छ -छुटा भी अभि' अंतरे, मन गयो सहज अकास । तह सुखमना दह” कमल फूलो, सेत भँवर तेहिं पास ॥७॥ ज-जनम दुर्लभ जात है, नहि जक्त कोउ पतियाय । बहुरि न ऐसेो दाँव पैही, लेहु उरध बनाय ॥८॥ क-झपी है" जहँ वातु शिलमिल, अभय घर उँजियार । तहाँ अमृत धुंद बरसै, जोगि करत अहार ॥६॥ ज-आदि इंद्र सुकादि" खोजहि, पार किन हुँ न पाय । तुम आपु अपनी सीख रहि के, द्वार दसम समाय ॥१०॥ "पैठारी, पहुंव। अहंकार । हाथी अर्थात मन । संत का दसवाँ द्वार । हिस। 'तालाप ! छिपी है। शुकदेव भादिक यपि मुनि । * लाकावार।
-- विचार ॥११॥ - . ट-टारि दे निज भजन सेती, जन्म जन्म बिकार । एक भक्ति ग्रिनु मुक्ति नाहीं, कोटि करहु ठ-ठाँव साई सराहिये, जहँ बरसई जल धार । इक गिल विच अंगरे, तह प्रेन धुनि ओंकार ॥१२॥ ड--इंस औ पट स्वाद जारी ब्रह्म अग्नि प्रचारु । आप अपनो सीप रहिके, द्वादसो भारु ॥१३॥ ढ--ढरन* कठिन ए यार देखो, नाथ की यह रीति तहैं जाति पाँति बिसाइ नाहीं, अतजन साँ प्रीति ॥१२॥ न-नाम को सतनाव राखा, उर्ध साँ करु नेह । जब अभयपुर कह परग दोन्हो, छुटो भरम संदेह ॥१५॥ त--तही पूरन रहनि करु, जहँ सक्ति सीय निवाम । ब्रह्मादि औ सनकादि खाजहिँ , संत कहिँ निवासा'१६॥ थ-धीर नाही जगत देखो, जस सलिल) में नीर । जात जनमत मरत पुनि पुनि, करत कृत वेपीर ॥१७॥ द-दहि में कछु दया राखा. प्रीति करु वहि देस । सुरति के घर निरति कथिया, ब्रह्म नटवर भेत ॥१८॥ ध--ध्यान धरु निमु वासरे, जहँ उठत अजपा जाप । घिना रसना मंत्र ठहरै, छुटै जम को दाप" ॥१९॥ न-नाम रसना पाइ रे, नहिँ दूसरो अस स्वाद । यह मूढ़ को समझाइ कै, सब तजो वाद विवाद ॥२२॥ प-प्रेम पवन ले तहाँ राखो, जहाँ जोति अपार । तब पाप पुन्न नसाइया, जब प्रगट है अनुसार । २१॥ "मन । सिरित-तदोबार गुरु के मनमुख करनी करता है। बांका, मनूठा पनी म फकहा। फ-फरन लागो प्रेम तरु, जहँ गगन गूफा माहि । तहं भानु सति के उदै नाही, हात धूप न छाहिँ ॥२२॥ घ-घातिये निसु बासरे, जहैं ब्रह्म बिस्नु महेस । निगम को जहँ गम्म नाही, जपहि ध्रुव फनि सेस ।२३। भ-भेद पायो भजन को, तव अवर नाहि सुहाय । जस कृपिन कछु कनक पायो, लिया हृदय जुड़ाय ॥२४॥ म-मोह माया जाल में, नर परो है संसार । तुम जोग जुक्ति विचारि करि कै. उतरु भव जल पा२ि५॥ य-यरा मरना दुख बहुत पायो, लियो सरन तिहार । अब नाम नेम निधाहये, हौं संत तुव बलिहार ॥२६॥ र-राति दीवस तहाँ नाही, हात साँझ न मात । कोदिन महँ कोइ जानिहै, नहिं अवर बूझै वात ॥२७॥ ल-लोक लाज सौं भाजि करि कै मिलो हरि' कह जाय । जस मीन जल के अंतरे, तस रहे संत समाय ॥२८॥ व-व्योम ऊपर नाद अनहद, तहँ उटै झनकार कोइ प्रेमि विरहिनि जानिहै, नहिं अघर जाननहार ॥२६ । स-वंग-मुख एक सर्प जड़े, रहे सुन्न समाय । जो देखिया से मगन है, नहिं दूसरो पतियाय ॥३०॥ प-खोह" मैं एक पर्वतो, तहँ बना भिन्न अवास" संत जन तेहिं भवन अटके, सुनत अनहद वास ॥३१॥ श-सकल संसय त्यागि के, तुम सेव पुरुप पुरान । जिन पाइया वा ब्रह्म को तिन भया ऐसे ज्ञान ॥३२॥ *पेह, रक्ष. 'जरा मरन । आकाश के परे । स्वर्ग को मुँह किये कुंडलिनी नाही है। कंदरा या घाटी पहाट फी । "जुदा जुदा मंदिर या दीप बने हैं। +1 फहरा . मार। ह-हरखं भा अभि अंतरे, मन मगन वह खिचि.लाग। बिना मूल के फूल फूल्यो, देखि पटपद जाग ॥३३॥ क्ष-छाया नाही अपनि देखो, अवर के जब अभयपुर को परग दोन्हा, छुटो हाथी घोर ॥३४॥ चौतीस आखर, जोग धरनन, काल कर्म विचार । घरनिहिं निज प्रभु जानिये, अव राखु सरन मुरार ॥३॥ (३) क-करना आदि अंत अधिनासी । करता अगम अगोचर वासी ॥१॥ करता केवल आपहि आप । करता के कोउ माय न वाप ॥२॥ ख-खासा होय सो करतहिँ जाना। खामा खलक धंधा लपटाना ॥३॥ खुसी होत धन आवत हाथे । खाली जात चले नहिं साथे ॥४॥ ग-गुरु के चरन गहो चित लाई। गुरु सत मारग देत दिखाई ॥५॥ गह्यो जो दृढ़ करि अधर अधारा । गयो उतरि सो भवजल पारा ॥६॥ घ-घट घट बसे कतहुँ नहिँ सूना। घाट लखें जेहि पुरवल पूना ॥७॥ *पटपद मैंरा को कहते हैं यानी वरा रूपा मन जागा.। शहर कन्धे पानी । पुन्य ।
फफहरा घट में जो आवे विस्वासा। घर में बैठे बिलसि बिलासा ॥८॥ उ-उत्तम जनम जगत में ता को। उरध उलदि चढ़े मन जा को ॥ उज्ज र मनसा हरि व्रत धारी। उन त कहो कवन अधिकारी ॥१०॥ च-चंचल चित अस्थिर करि राखो। चंचल वचन कवहि जनि भाखा ॥११॥ चारि दिना जगजीवन आधी* । चलत बार कोउ संग न साथी ॥१२॥ छ--छिया बंद पर छथि लपटाई। छिया साई छवि देखि लोभाई ॥१३॥ छित' महँ करि ले राम सनेही । छिन यक माहि छुटेगी देहो ॥१४॥ ज-जक्त माहि जगदीस पियारा । जो बिसरावे से चंडारा ॥१५॥ जिन जिन जगजीवन व्रत धारी। जरा मरन की संसय टारी ॥१६॥ झ-गरा करै कथे सधुवाई। भाँरि नाव पार कस जाई ॥१७॥ फूठ कहत जेहिं त्रास न आवै। मोरि झारि जमताहि लावै ॥१८॥ "है। एषी, संहार .. ।
फकहरा अ-इंद्री स्वाद रहे अरुनाई। ईसुर अक्ति हृदय विसराई ॥१९॥ इहै प्रमान करो मन माहीं। इह अवसर पैहौ पुनि नाहीं ॥२०॥, ट-टहल करो साध जन के री। टार बार परिहरि बहुतेरी ॥२२॥ टंडस तँ वाढ़े जंजाला। टापा लेइ पुनि छ।पै काला ॥२३॥ ठ--ठाकुर एक है सिरजनहारा । ठाँत्र ठाँव दै सवाहिँ अहारा ॥२४॥ ठाकुर छोड़ि आन मन लावै। ठावहिं आपन काज नसावै ॥२५॥ ड--डारी धरि मूलहिँ विसराय । डाँकिलेोक पाखंडहिं खाय॥६॥ डर नहिं आवै ता दिन के रा। डोलत अंध बकै बहुतेरा ॥२७॥ ढ-ढालिया साधु सदा संसारा । ढाल धरो सतसंग उबारा ॥२८॥ ढाल कहाँ होइ रहे बेदानी' । दरकि जाइहा ज्याँ घट पानी ॥२॥ न-नाम निरंजन करो उचारा नाम एक संसार उवारा ॥३०॥ *छोड़ कर । बाहरी कया यानी दिखावे का काम । जित से लोप पर मडली मारते हैं। अपनी ढोल बजाने वाला, अर्घात अपनी तारीफ करने वालाजिससे तलवार की वार रोकते हैं। बेदांती। १ 6 ककहरा घट में जो आवे विस्वासा। घर में बैठे बिलसि बिलासा ॥ उ-उत्तम जनम जगत में ता को। उरध उलदि चढ़ो मन जा को ॥', उज्ज र मनसा हरि व्रत धारी। उन तँ कहो कवन अधिकारी ॥१॥ च-चंचल चित अस्थिर करि राखो। चंचल वचन कयहि जनि भाखा ॥११॥ चारि दिना जगजीवन आधी* । चलत बार काउ संग न साथी ॥१२॥ छ-छिया बुंद पर छत्रि लपटाई । छिया साई छवि देखि लोभाई ॥१३॥ छित महँ करि ले राम सनेही । छिन यक माहिँ छुटेगी देहो ॥१४॥ ज-जक्त माहि जगदीस पियारा । जो विसरावे से चंडारा ॥१॥ जिन जिन जगजीवन व्रत धारी। जरा मरन की संसय दारी ॥१६॥ झ-गरा करै कथै सधुवाई । झाँरि नाव पार कस जाई ॥१७॥ झूठ कहत जेहिं त्रास न आवै मारि झारि जम ताहि कुलावै ॥१८॥ "दै। एवी, संसार,
प. परसुराम अरु विरमा माई।
पुत्र जानि जग हेतु बड़ाई ॥४२॥
प्रगटि धरनि ईसुर करि दाया ।
पूरे भाग भक्ति हरि पाया ॥४३॥
फ- फोकट फंद परे नर भूले ।
फिरि फिरि गर्भ अधोमुख फूले ॥१४॥
फेरै अरध उरध ले लावै।
फिर नाही भवसागर आवै ॥४॥
प. बहुत गये तरि यही उपाई।
बहुत रहे यहि दिसि अरुझाई ॥४६॥
बड़े पुत्र भव मानुप ही।
याद जात मिनु राम सनेही ॥४७॥
म-भेष बनाय कपट जिय माहीं।
भवसागर तरिहं सो नाहीं ॥४॥
भाग. होय जा के सिर पूरा ।
भक्ति काज बिरले जन सूरा ॥४॥
म.-मन गुड्डी गहि गगन चढ़ावै।
ममता तजि समता उर छावै ॥५०॥
मधुर दीनता लघुता भाखै ।
मन बच कर्म एक ब्रत राखै ॥१॥
य-युक्ति बिना कोइ मुक्ति न पावै ।
यो ब्रह्मड खंड लगि धावै ॥५२॥
फफहरा नाम नाव चंढ़ि उतरहि दासा । नाम विहूने* फिरहिँ उदासा ॥३१॥ त तारन तरन अवर नहिँ कोई। ताहि देखु मूरख नर लाई ॥३२॥ तुलसी पहिरि तमोगुन त्यागे । ताके आदि अंत नहिँ खाँगे ॥३३॥ प-थापन अथपन थापनहारा" । धीर करै मन गगन मैंझारा ॥३०॥ थिर भयो मन छूटेव जंजाला । थरथर थहरै ता को काला ॥३॥ द--दुरलभ तन नर दही पाय । दाव इहै हरि भक्ति दृढ़ाय ॥३६॥ देखा देखी मरत अनारी । देखु आपने हिये विचारी ॥३॥ घ--धर्म दया कीजे नर प्रानी। ध्यान धनी को धरिये जानी ॥३॥ धन तन चंचल थिर न रहाई । "धरनी" गुरु की करु सेवकाई ॥३॥ न-नहिँ तामस नहिँ तुस्ना होई। नर अवतार देव गन साई ॥४०॥ निरमल पद गावै दिन राती। निरमल सेभै कवनिहुँ जातीं ॥४१॥ *शाली । घटी। जिसका स्थापन किया जाता है। जिसका स्वीपमा नहीं हो सकता। यापन करने वाला यानी सम का करता मन।
कमहरा
प.-परसुराम अरु विरमा माई।
पुत्र जानि जग हेतु बड़ाई ॥४२॥
प्रगटि धरनि ईसुर करि दाया ।
पूरे भाग भक्ति हरि पाया ॥४३॥
फ--फोकट फंद परे नर भूले
फिरि फिरि गर्भ अधोमुख क्ले ॥४॥
फेरै अरध उरध ले लावै ।
फिर नाही भवसागर आवै ॥४॥
घ--बहुत गये तरि यही उपाई।
बहुत रहे यहि दिसि अरुझाई ॥४६॥
यड़े पुन भव मानुष ही।
याद जात बिनु राम सनेही ॥१७॥
म भेष बनाय कपट जिय माहीं।
भवसागर सरिह सो नाहीं ॥४॥
भाग होय जा के सिर पूरा ।
भक्ति काज बिरले जन सूरा ॥६॥
म-मन गुड्डी गहि गगन चढ़ावै।
ममता तजि समता उर छावै ॥५०॥
मधुर दीनता लघुता भाखै ।
मन यच कर्म एक ब्रत राखै ॥५१॥
य--युक्ति बिना कोई मुक्ति न पावै ।
यो ब्रांड खंड लगि धावै ॥५२॥
ककहरा याके* हिय ना भेद समाना। यप, तप संयम करि पछिताना ॥३॥ र--राम नाम सुमिरो रे आई। राम नाम संतन सुखदाई ॥४॥ राम कहत जम निकट न आवै । रिग यजु साम अथर्वन गावै ।।५।।... ल-लछमी जोरि संग जो लेई । लाख उपर दीया जो देई ॥ २६ ॥ लोकचार चाटक" दिन चारी । लेहु आपनो काज सुधारी ॥ ५७ ॥ व-वा से कहाँ सुनो चित लाई। वासर गये बहुत पछिताई ॥ ५६ अवलोकहु अपने मन माहीं । अवर प्रकार अंत सुख नाहीं ॥५६॥ श-सेत झलाफाल झलकै जहाँ । सुरति निरति लव लावो तहाँ ॥६॥ सहजहि रहो गहो सेवकाई । सन्मुख मिलिहै आतमराई ॥६१॥ प-खोजत धन नर फिरत बेहाला । खबरि न जाने पाछे.काला ॥ २ ॥ खोटा बहुरि जाय खोटसारा । खरा चहूँ दिसि चलन पियारा ॥ ६३ ॥.. -2 *जाके । जिप । वेदों के नाम । अगले ज़माने में लाल काये के प्रशाने पर असंह दीपक बालते थे। ॥चेटक धोखा। 'अवतर । "देखो। - - कदिरा . स-सार बस्तु ढूँढ़हु रे भाई । सांध कि संगति रहो समाई ॥ ६ ॥ सत मारग विनु मुक्ति न हाई। साँच सब्द सुनियो सब कोई ॥६५॥ ह-होहु दयाल घिसंभर देवा । हम नहिं जानहिं पूजा सेवा ॥ ६६ ॥ हमरे नहिं कछु करम निकाई । हरि किरपा होई सो हाई ॥६७ ॥ छ- छोड़हु फाँसी करम गोसाँई । छोरि लेह जम त बरियाई ॥६॥ छोटो मति में निपट अनारी । छुटे जानि इक नाम तुम्हारी ॥ ६ ॥ करम ककहरा जग लिपटाना । संत ककहरा कोइ कोइ जाना ॥ ७० ॥ जा घट आ अनुभव परगासा । तिन की बलि बलि धरनीदासा ॥ ७१ ॥ -- । ॥ अलिफ़नाम ॥ अलिफ़-आप अन्दर बसैं, वे--बतलावै दूर । ते--तन में तहकीक कर, अलिफ अजाएब नूर ॥१॥ से--सालिसा होय समुझि लें, जीम--जहान बसी । हे-हयात को खाक में, खे-आखिर हात खमीर ॥२॥ *नेक, शुभ । पिंथ; बिचौलिया । सुझाका । जीवन, ज़िन्दगी । मेला ।
दाल--दिलहि में दोस्त है, जाल--ज़िकर कर पेश । २-रहीम' के राह चढ़, जे-ज़िन्दा दरवेश ॥३॥ सीन--सपेद सुधासागुल; शीन--शिकम दर माँहि । साद--सुरत साबूत है; जाद-ज़मीर राहि ॥ ४ ॥ तो-तालिब" दीदार होय, जो--ज़ालिम उठ जाग। जैन--अकीदा बाँध ले, गैन--ग़ाफ़िली त्याग ॥ ५ ॥ 1-फ़ाज़िल अन्दर पढ़े, काफ़--कोरान तमाम । काफ़-करे मति काहिली", लाम--लेत निज नाम ॥ ॥ मीम--मेरा माशूक है। नूँ--नादि कोइ जान । धाव--वाही की फिकर में, हे- हर दम रह मस्तान ॥७॥ डाम--लेहु ठहराय के, अलिफ़--अकेला सोय । हमज़ा--ये मुरशिद विना, धरनी लखै न कोय ॥८॥ . पहाड़ा एका एक मिलै गुरु पूरा, मूल मंत्र जो पावै । सकल संत की यानी यू, मन परतीत बढ़ावै ॥१॥ दूआ दुई, तजे जो दुबिधा, रजगुन तमगुन त्यागै। सतगुरु मारंग. उलटि निरेखैतब सेवित उठि जागै ॥२॥-.. *सुमिरन दयाल । पिट । मन की सफ़ाई फरी। मांगनेवाला। मतीत । "मस्ती। मनूठा; अपरजी ।
बारहमासा
तीया तीन त्रिबेनी संगम, से बिरले जन जाना ।
तृस्ना तामस छोड़ि दे भाई, तब करु वहँ प्रस्थाना ॥३॥
चौथे चारि चतुर नर सेाई, चौथे पद. कहँ लागी
हँसि के परम हिंडोलना फूलै, निरखत भा अनुरागी ॥४॥
पँचय पाँच पचीसहिं बस करि, साँच हिये ठहरावै ।
इँगला. पिंगला सुखमन सोध, गगन मँडल मठ छावै ॥५॥
छठय छवो चक्र को बँधे, सुन्न भवन मन लावै ।... "
बिगसत कमल काया करि परिचै, तब चंदा दरसावै ॥६॥
सतयँ सात सहज धुनि उपजै, सुनि सुनि आनँद यात्।।
सहजहिँ दीनदयाल दया करि, बूड़त भवजल काढ़े ॥ur
अठय आठ अकासहिँ निरखो, दृष्टि अलोकन हाई।
पाहर भीतर सर्व निरंतर, अंतर रहै न कोई ॥८॥
नवें नंवो द्वारहिँ निरखै, जगमग जगमग जाती।
दामिनि दमकै अमृत बरसै, निझर झरै मनि मोती ॥६॥
दसय दस दहाइ पाइ कै, पढ़ि ले एक पहारां। -
घरनीदास तासु पद चंदै, अहि निसु योरम्यारा ॥३०॥
घारहमामा साजहु सहज सिँगार। बारहमासा ॥दोहा॥ चैत चलहु मन मानि के, जहँ बसै प्रान पियार । । हिलि मिलि पाँच सहेलरी, पंच-पाँच* परिवार ॥१॥ ॥ छंद ॥ परिवार जारि वटोरि लीजै गोरि खारि। न लाइये बहुरि समय सरूप अस ना जानिये कब पाइये ॥२॥ ॥दोहा॥ वैसाखहि वनि ठनि धनी , पहिरो प्रेम पटम्बारो, सुनि लो मंत्र हमार ॥३॥ ॥ छंद ॥ सुनि लेहु मंत्र हमार सुन्दरि हार पहिरु एकावरी । छोडि मान गुमान ममता अजहुँ समहु बावरी ॥४॥..: ॥दोहा॥ जेठ जतन करु कामिनी, जन्म अकारथ जाय । जोबन गरब भुलाहु जनि, कछु करि लेहु उपाय ॥५॥ ..!" ॥ छंद ॥ करि लेहु कछुक उपाय नहिँ दुख पाय फिर पछिताई है। जब गाँठि को गथ नाठि" है तब ढूँढते नहिँ पाइ है ॥६॥ ॥ दोहा। अजहुँ असाढ़ समुझि चित, यहि दिस हित नहिं कोय । अदभुत अरथ दरब सब, सुपन अपन नहिं होय ॥७॥ *पञ्चीम प्रकृति । भिरम। धनखी। बंधा हुआ । गिर जाना।
धारहमासा । अपन नहिँ कछु सुपन सत्र सुख, अंन चलि है। हारिकै मांतु पितु परिवार पुनि तोहि, ड.रि हैं परिचारि के ॥८॥ ॥दोहा॥ सावन सकुच करहु जनि, धावन* पठबहु चेखि । वहुत दिवस लगि भटकियो, अब जनि लाव? धेखि ॥ ॥ छंद ॥ जनि धाख लाव चाख धावहु, जो कहावहु पीव की। करत कोटि उपाव चिंता, मेटि है नहिं जीव की ॥१०॥ ॥दोहा॥ भामिनि भइल जोवन तन, भजि लेहु भादौँ माम। पत न रहहि निजु पतो बिनु, है है जग उपहाँस ॥११॥ ॥ छंद ॥ होइ है उपहाँस जग में, मान मानन जनि करो। समुझि नेह सनेह स्वामी, हरखि लै हिरदै या ॥ दोहा॥ आसुना बिरह विलासिनी, मिलहु कन्डक्ट तोल । नाहिँ तो कंत रिसाइ हैं, मुख हूँ ना बैल १३॥ . मुख.वोलि नहिँ कछु आइडवर घर तब कहा कूप खनाई है जिउमर *हरकारा । जिल्दी युद्धमाका ५०. बारहमासा ॥ दाहा ॥ कातिक कुसल तबहिं सखी, जवहिँ भजो पिय जानि । वहुरि बिछोह कबहुँ नहीं, है है। जुग जुग रानि ॥१५॥ ॥ छंद ॥ जुग रानि हैहै। जानि जिय धरि, दानि* कोइ न टूसरो। हित सारिन खेत बिसारि अपना, वीज डारत ऊसरो॥१६॥ ॥ दोहा॥ अगहन उत्तर दिये सखि, हम अबलाई अवतार । जतन करत ना बनत कछु, कठिन कुटिल संसार ॥१७॥ ॥ छंद ॥ कुटिल यह संसार, बरु जुरि जाइ जोबन ऐसहीं । निज कंत जो अपनाई हैं, चलि आइ हैं घर वैसहीं ॥१८॥ ॥ दोहा॥ पूस पलदि प्रभु आयऊ, प्रगटेव परम अनंद । घर घर सगर नगर सुखी, मिटेव दुसह दुख दुंद ।।१९।। दुख दुंद मेटेव चन्द भैंटेव, फंद सबन छुटाइया । पुलकि बारम्बार है, परिवार मंगल गाइया ॥२०॥ ॥ दोहा॥ माध मुदित मन छिनहिँ छिन, दिन दिन बढ़त सोहाग । नैहर भरम भठकि गयो, सासुर संक" न लाग ॥२१॥ ॥ छंद ॥ नहिँ लागु सासुर संक हे सखि, रंक जनु राजा भयो । निज नाहा मिलियो बाँह ग्रिदै, सकल कलमख दुरिंगयो२२ "दानी, दाता । च्छिा, उपजाऊ । 'स्त्री। चाहे। सघ । 'मगन । **शंका, हर । जिपति । गर्दन मैं । ॥ छंद ॥
वोध लीला ५१ ॥दोहा॥ फागुन फस्यो अमी फल, झस्यो सकल दुख पात । निसु दिन रहत मगन मन, सो मुख कह्यो न जात ॥२३॥ ॥ छंद ॥ कहि जात नहि मुख ताहि मूरति, सुरति जहँ ठहराइया। सुनि बिमल बारह मास को, गुन दास धरनी गाइया ॥२४॥ .. - । बोध लीला। प्रथमहिं बरनौँ एकै करता । आदि अंत मधिभरता हरता॥१ तब बंदी सतगुरु के पाँव । परस जो सेवित जीव जगावॅ॥२ तब पुनि सकल साधु सिर नावौँ । जा की दया अमय पद पावौँ३ स्रवनन्ह सुनी संत की बानी। तब पुनि बेद पुरान कहानी॥४॥ संसकार सतसंगति पाई । तब यह जग मिथ्या ठहराई ॥५॥ जित देखा इस्थित नहिँ कोई । सेो इस्थित जा त सब होई॥६ संसा करि संसार भुलाना । सेो सब हृदय कियो अनुमाना॥७ जस सपने सुख संपति पावे। जागे काज कछू नहिं आवे॥ मरकट मुट्ठी छोड़ि न देई । विनु बंधन तन बंधन लेई ॥६॥ नाभि सुगंध नासिका बासा। चरचत* फिरे चहूँ दिस घासा१० दूजा देखो दरपन माहीं । छवि जनु एक बहुरि कछु नाही११ नलनी बैठि सुगा जिमि भूला। भरमत अंध अधोमुख झूला१२ जल मढ़े प्रतिमा देखलावे । खोजत विनसे हाथ न आवे१३ *हूँढता - ५२ योध लीला अपनी दूंह घुमाव बारा* । घूमत कहे सकल संसारा ५११ जानत जैवरित सरप अंधारे। निरजिव होत से दीपक वारे१५ तृन को मानुप खेत मैंझाग । मृग तेहि मटु चरे नहिँ चारा॥१६ फटिक सिला अरुझे मै मता । अपनी कुबुधि गँवायो दंता१७ देखत खाल गऊ गरबानी । हेतु करे अपना सुत जानी ॥१८ अस्थिर आपु नावरी माहीं। जानत अवर चले सब जाहीर भैंसत स्वान काँचु के ग्रेहा । मन अभिमान घिसारे दहा ॥२० मृग-तृसना जल धोखे धावे । थाकि परे पाछे पछितावे ॥२१॥ मानुप जन्म जुआ में हारे । हरि भक्ती नहि हृदय विचारे॥२२ उदय अस्त जहाँ लगि देखा। सत्त आतमा राम बिसेखा॥२३ एकै बीज वृच्छ होए आया । खोजत काहु अंत नहिं पाया२४ देखो निरखि परखि सब कोई । सब फल माहिँ बीज एक हाई ॥२५॥ पुरइन ज्याँ जल मध्य अकासा । एकै ब्रह्म सकल घट बासारंद मनि-गन माल मध्य जिमि डोरा । सागर एक अनेक हिलारा२७ एक भँवर सब फूल मँझारा । एक दीप सब घर उँजियारा॥ तत्तु निरंजन सब के संगा। पसु पंछी नर कीट पतंगा ॥२६॥ देखो आपन कया बिलाई। बाद विवाद करे मति कोई॥३०॥ काम क्रोध मद लोन नेवारे। समता गहि ममता को मारे३१ आन के दोस कबहुँ नहि धरई। जानत जीव के घात न करई३२ निरपच्छी साँचहि अस्थावे । निरदावा धन मृथा न खावे३३ संतत धर्म अनासृत काई । सेो ग्रानी भवसागर तरई ॥३४॥ दुख सुख एकै भ व जनावे। अभिअंतर विस्वास बढ़ावे॥३५ *बेर; समय । रवी । मदांध हाथी । ठराहवे; गहै ।
साखी ५३ अस्तुति निंदा दुवो समाना । सुरनर मुनि गन ताहि बखाना३६ तेहि समान तुले नहिं कोई । जीवन-मुक्त कहावे साई ॥३०॥ मन परमोध जाहि मनाये।त्रिविधि पाप तन ताप नसावे चित्रगुप्त धरमाधी राजा । काल दूत जम आरति साजा ३६ अपना आपा आपु मिटाई । धरनीदास तासु बलि जाई.४० ऐसी दसा विराजी जा की। धरनी तहँ नरही कछु बाकी४१ ॥साखी॥ भेस। ॥ गुरु॥ धरनी जहँ लगि देखिये, तहँ लौँ सवै भिखारि । दाता केवल सतगुरू, देत न मानै हारि ॥१॥ धरनी यह मन मृग भयो, गुरू भये ज्यौँ व्याध । यान सब्द हिये चुभि गयो, दरसन पाये साध ॥२॥ धरनि फिरहिं देसंतरो, धरि धरि के बहु कोई कोई देखिहै, अंतर गुरु उपदेस ॥३॥ धूवाँ कै धवरेहरा* औ धूरी को धाम । ऐसे जीवन जगत में, बिनु गुरु विनु हरि नाम ॥४॥ धरनी सब दिन सुदिन है, कबहुँ कुदिन है नाहिँ । लाभ चहूँ दिसि चौगुना, (जे) गुरु सुमिरन हिये माहि ॥५॥ ॥घेतावनी॥ धरनी धरि रहु हरि व्रतहिँ, परिहरि सबही मोह। धन सुत बंधु विभवा जता होवे अंत बिछोह ॥६॥ * * ऊँचा घर । ऐश्वर्य ।
माखी धरनी धोख न लाइये, कवहीं अपनी ओर । प्रभु साँ प्रीति निवाहिये, जीवन है जग थोर ॥७॥ गोरिया गरव करहु जनि, अपने गोरे गात । काल्हि परौं चलि जाइ है, जैसे पियरे पात ॥ धरनी चहुँ दिसि चरचिया*, करि करि बहुत पुकार । नाहीं हम हैं काहु के, नाही कोउ हमार ॥६॥ ॥ विरह और प्रेम ॥ धरनी धन वो बिरहनी, धारै नाहीं धीर । बिहबल बिकल सदा चित, दुर्बल दुखित सरीर ॥१०॥ धरनी परवत पर पिया, चढ़ते बहुत डेराँव । कबहुँक पाँव जु डिगमिगै, पावाँ कतहुँ न ठाँच ॥११॥ धरनी धरकत है हिया, करकत आहि करेज । ढरकत लोचन भरि भरी, पीया नाहिन सेज ॥१२॥ धरनी धवल, धरेहरहिँ , चढ़ि चढ़ि चहुँ दिसि हेर । आवत पिय नहिँ दीखतो. भइली बहुत अबेर ॥१३॥ धरनी से दिन धन्न है, मिलब जब हम नाहा । संग पौंदि सुख विलसिहाँ, सिर तर धरि के बाँह ॥१४॥ धरनी धन की भूल हो, कछू बरनि नहिं जाय । सनमुख रहती रैन दिन, मिलत नहीं पिय धाय ॥१५॥ धरनी पलक पर नहीं पिय की झलक साहाय । पुनि पुनि पीवत परम रस, तवहूँ प्यास न जाय ॥१६॥ धरनी धन तन जिवन यह, चाहे रहै कि जाय । हरि के चरनहिं हृदय धरि, अब तो हेत बढ़ाय ॥१७॥ "ढूंढ़ा। सिफ़ेद । पति !
माखी धरनी सो धन धन्य हो, धन धन कुल उँजियार ।' जा कर वाँह धइल पिया, आपन हाथ पसार ॥१८॥ धरनी पिय जिन पावल, मेटि गइल सब दुंद । अरध उरध सुर गावल, हिरदय होय अनंद ॥१६॥ धरनी खेती भक्ति की, उपजे होत निहाल । खर्चे खाय निबरै नहिँ, परैन दुक्ख दुकाल ॥ २० ॥ धरनी भन मिलयो कहा, जो तनिक माहिँ मिलगाय । मन को मिलन सराहिये, जो एक में इक होइ जाय ॥ २१ ॥ ॥ तत्व बस्तु ॥ तेरे मन में तत्वहै, तो अनते कित धाव । धरनी गुरु उपदेस लै, धरहिँ माहिँ घर छाव ॥ २२ ॥ अर्ध कँवल के ऊपरे, तहाँ दुवादस एक । धरनी भाजल बूड़ते, गुरु गम पकरी टेक ॥ २३ ॥ दिया दिया घर भीतरे*, बाती तेल न आगि । धरनी मन बच कर्मना, ता सेाँ रहना लागि ॥ २४ ॥ बिनु पगु निरत करो तहाँ, विनु कर दैदै तारि । विनु नैनन छवि देखना, बिनु सरवन कनकारि ॥ २५ ॥ दँह देवखरा भीतरे, मूरति जोति अनूप । माती अच्छतं चढ़तु है, धरनी सहज सरूप ॥ २६ ॥ धरनी अरध उरध चढ़ि, उदयो जोति सरूप । देखु मनोहर मूरती, अतिही रूप अनूप ॥२०॥ बहुत दुबारे सेवना , बहुत भावना कीन्ह । धरनी मन संसय मिटी, तत्व परो जब चीन्ह ॥२८॥ *अंतर में दीपक धरा है। , .
साखी
घरनी चहुँ दिसि दौरिया, जहँ लेाँ मन की दौर ।
एक आतमा तत्व विनु, अनत न पाई हौर ॥ २ ॥
तब लगि प्रगट पुकारिया, जब लगि निबरी नाहिँ ।
धरनी जव निवरी परी, मन की मनही माहिँ ॥ ३० ॥
धरनी हृदय पलंगरी, प्रीतम पौढ़े आय ।
समा सुनी जो सवन त, कहे कवन पतियाय ॥ ३१ ॥
धरनी तन में तख्त है, ता ऊपर सुलतान ।
लेत माजरा सबहिं को, जहँ लौँ जीव जहान ॥ ३२ ॥
विनु अच्छर के अच्छरा, विनु लिखनी का लेख ।
विनु जिभ्या का वाँचना, धरनी लखा अलेख ॥३३ ॥
लिखि लिखि सिखि सिखि का भयो, पढ़ि गुनि गाय बजाय
धरनी मूरति मोहिनी, जौँ लगि हिये न समाय ॥ ३४ ॥
अचछर सब घट उच्चरै, जेते जिव संसार ।
लागि निरच्छर जो रहे ता अच्छर टकसार ॥ ३५ ॥
॥ ध्यान ॥
धरनी ध्यान तहाँ धरो. उलटि पसारो दृष्टि ।
सहज सुभावहिँ होत जहँ, पुहुप माल की दृष्टि ॥ ३६
धरनी ध्यान तहाँ धरो, जहवाँ खुलहि किवार ।
निरखि निरखि परखत रहो, पल पल बारम्बार ॥३७॥
धरनी ध्यान तहाँ धरो, प्रगट जोति फहराहि।
मनि मानिक मोती रै, चुगि चुगि हंस अघाहि ॥ ३८ ॥
धरनी ध्यान तहाँ धरो, त्रिकुटी कुटी मॅझार ।
धर के बाहर अधर है, सनमुख सिरजनहार ॥ ३८ ॥
~ -- साखी धरनी अधर ध्यान धरु, निसिबासर लो लाई । कर्म काँच मगु बीच है, (सा) कंचन गच है जाइ ॥ ४० ॥ । भारती॥ धरनी प्रभु की आरती, करिये वारंवार । ऊठत बैठत सावते, अह निसि साँझ सकार ॥ ११ ॥ - साँश समय कर जारि के, उभे घरी जस गाव । धरनी दास सुचित्ता है। गुरु भक्तन सिरनाव ॥ ४२ ॥ ॥ विनती॥ . धरनी जन की बीनती, करु करुनामय कान । दोजै दरसन आपनो, माँगों कछु नहि आन ॥४३॥ धरनी बिलखि विनती करै, सुनिये प्रभू हमार । सब अपराध छिमा करो, मैं हौँ सरन तिहार ॥४॥ धरनी सरनी रावरी, राम गरीब-नेवाज । कवन करेगा दूसरो, माहिँ गरीब के 'काज ॥ ४५ ॥ काहू के बहु बिभव भइ, काहू बहु परिवार । धरनी कहत हमहिं बल, ए हो राम तुम्हार ॥४६॥ यार बार संसार में, धरनी लागत चोट । अब पकरो परतच्छ है, राम नाम की ओट ॥ १७ ॥ तिनुका दांत के अंतरे, कर जोरे भुइँ सीस । धरनी जन बिनती करै, जानु परो जगदीस ॥ ४ ॥ "दो। एकचित । रोकर । जाँघ, चरन । ।
साखी
धरनी नहि वैराग बल, नाहिँ जोग सन्यास ॥
मनसा बाचा कर्मना, विस्वंभर विस्वास ॥४९॥
बिनती लीजे मानि करि, जानि दास को दास ।
धरनी सरनी राखिये, अवर न टूसर आस ॥ ५० ॥
॥ ब्राह्मण ॥
धरनी भरमी बाम्हने, असहिँ अरम के देस ।
करम चढ़ावहिँ आपु सिर, अवर जे ले उपदेस ॥५१॥
करनी पार उतारिहै, धरनी कियो पुकार ।
साकित बाम्हन नहिँ भला, भक्ता भला चमार ॥५२॥
मास अहारी वाम्हना, सेो पापी वहि जाउ ।
धरनी सूद्र बस्नवा, ताहि चरन सिर नाउ ॥५३॥
॥ य॥
कुल तजि भेप बनाइया, हिये न आयो साँच
धरनी प्रभु रीझै नहीं, देखत ऐसे नाच ॥५४॥
भेष लियो दाया नहीं, ध्यान धतूरा भाँग ।
धरनी प्रभु काँचा नहीं, जो भूलत ऐसे स्वाँग ॥५५॥
॥ नारी॥
नारी बटमारी करै, चारि चौहटे माहिं ।
जो वाहि मारग होइ चले, धरनो निबहे नाहि ॥६॥
दामिनी ऐसी कामिनी, फाँसी ऐसेा दाम ।
धरनी दुइ ते बाचिये, कृपा करै जो राम ॥५॥
धरनी व्याही छोड़िये, जो हरिजन देखि लजाय ।
स्या संग बिराजिये, जी भक्ति अंग ठहराय ॥५॥
साखी ॥ मिश्रित॥ धरनी काहि असीसिए, औ दीजै काहि सराप । दूजा कतहुँ न देखिये, सब घट आपै आप ॥६॥ धरनी कथनी लोक की, ज्याँ गीदर को ज्ञान । आगम भाखै और के. आपु परे मुख स्वान ॥६॥ धरनी सो पंडित नहीं, जो पढ़ि गुन कथै बनाय । पंडित ताहि सराहिये, जो पढ़ा विसरि सब जाय ॥१॥ धरनी कागद फारिकै, कलम पवारै* दूर । कया कचहरी पैठिकै, बैठा रहै हजूर ॥६२॥ धरनी कोउ निंदा करै, तू अस्तुति करु ताहि । तुरत तमासा देखिये, इहै साधु मत आहि ॥३३॥ धरनी जिव जनि मारियो, माँसहिं नाही खाहु । नंगे पाँव बबूर बन, होइ नाहिँ निरवाहु ॥४॥ माँस अहारी जीयरा, सो पुनि कथै गियान । नाँगी हाय चूंघट करै, धरनी देखि लजान ॥६५॥ धरनी यह मन जम्बुका बहुत कुभोजन खात । साधु संग मृग होइ रहु, सब्द सुगंध बसात ॥६६॥ धरनी वाहर धुंधरो, भीतर ऊगा चंद । भयो भले को अति भलो, है मंदे को मंद ॥६॥ विप लागे दुनिया मरै, अमृत लागे साध । , घरनी ऐसा जानिहै, जाको मता अगाध ॥६॥ घरनी सब्द प्रतीत बिनु, कैसहु कारज नाहि । सब्द सिढ़ी बिनु को चढ़े, गगन झरोखा माहिँ ॥६६॥ ॥ शव्द ॥ *बाले। स्यार।
सब्द सब्द सब कोइ करे, धरनी कियो विचार ।
जो लागे निज सब्द को, ता को मता अपार ॥६०i
सब्द सकल घट ऊचरे, धरनी
बहुत
प्रकार।
जो जाने निज सब्द को, तासु सब्द दकसार ॥७९॥
धरनी धरम अरु करम के, कलि में
कछू नं काम।
मनसा वाचा करमना, भजिये केवल नाम ॥७३॥
परमारथ को पंथ चहि, करते करम किसान ।
ज्याँ घर में घोड़ा अछत, गदहा करै पलानं ॥ ७ ॥
धरनी आपन मरम हो, कहिये नाही काहि ।
जाननहार सेा जानिहै। जैसा जो कछु आहि ॥ ७५ ॥
. - 'पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोष उन की दृष्टि में प्रावै उन्हें हमको कृपा करके लिख भेजें जिस मैं वह दूसरे छापे मैं दूर कर दिये जा और जो दुर्लभ ग्रंथ संतबानी के उन को मिल उन्हें भेज कर इस परोपकार के सहायता करें। यद्यपि ऊपर लिखे हुए फारनों से इन पुस्तकों के छापने में बहुत खर्च होता है तो भी सर्व साधारन के उपकार हेतु दाम आध माना झी आठ पृष्ठ से अधिक किसी का नहीं रक्खा गया है। जो लोग मस कैबर अर्थात पक्के गाहक होकर कुछ पेशगी जमा कर देंगे जिम की तादाद दो रुपये से कम न हो उन्हें एक चौथाई कम दाम पर जो पुस्तके आगे छपेंगी बिना माँगे भेज दी जायंगी यानी रुपये में चार आना छोड़ दिया जायगा परंतु डाक महसूल उन के ज़िम्मे होगा और पेशगी दाम न देने की हालत में वी० पी० कमिशन भी उन्हें देना पड़ेगा। जो पुस्तमैं अब तक छप गई हैं (जिन के नाम आगे लिखे हैं) सब एक साथ लेने से भी पक्के गाहकों के लिये दान में एक चौपाई की कमी कर दी जायगी पर हाफ महसूल और वी० पी० कमिशन लिया जायगा। माटर,बेलवेहिपर छापाखाना, अपरैल, १९१९६० इलाहाबाद।
संतबानी पुस्तक-साला " ... सुलसी साहय (हाथरस वाले ) की शब्दावली और जीवन-चरित्र ... २) रन सागर भय जीवन-चरित्र .. me) गरीबदास जी की यानी और जीवन-चरित्र फयीर साहब की शब्दावली और जीवन-चरित्र, भाग १ दूसरा एटिशन |) शब्दावली भाग २ 1) , ज्ञान-गुदड़ी व रेखते असरावती पलटू साहय की शब्दावली (कुंडलिया इत्यादि) और जीयन-चरित्र, ... ... ... " ... ... भाग १ ... भाग २ ... ... " ..19)" धरनदासजी की बानी और जीवन-चरित्र, भाग १ आग २ " " ... ... ... ... ... .. रैदासजी की बानी और जीवन-चरित्र ... ' जगजीवन साहब की यानी और जीवन-चरित्र, भाग १ दरिया साहब (विहार वाले) का दरियासागर और जीवन-चरित्र दरिया साहब ( मारवाड़ वाले ) की बानी और जीवन-चरित्र भीखा साहब की शब्दावली और जीवन चरित्र गुलाल साहब (भोसा साहय के गुरू) की बानी और जीवन-चरित्र- ") मीरा बाई की शब्दावली और जीवन-चरित्र सहजो बाई की वानी और जीवन-चरित्र " दया बाई की बानी और जीवन-चरित्र गुसाँई तुलसीदासजी की बारहमासी M यारी साहब की रत्नावली मय जीवन-चरित्र बुल्ला साहब का शब्दसार और जीवन-चरित्र केशवदासजी की अमीचूंट मय जीवन-चरित्र ) धरनीदासजी की वानी और जीवन-चरित्र " अहिल्याबाई का जीवन-चरित्र अंग्रेजी पद्य में १) मूल्य में डाक महसूल व बाल्यू पेबल कमिशन शामिल नहीं है। मनेजर, बेलघेडियर प्रेस, इलाहाबाद । 4.. . ... ... ... ...
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