Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Ishadhyastopanishad
Front matter
वेद और ब्रह्म का रहस्य वा तत्त्व । ईशाद्यष्टोपनिषद् भाव-श, फेन, कट, मम, पुर, मारक्य, तेतिरीप मोर ऐतरेप पाना अन्वय. पदार्थ और भापार्थ सहित । छापा सुन्दर बम्बई टाइप, कागज चिकना और पुष्ट' पृष्ठ-४३६ जिल्द कपड़े की मजबूतं. मूल्य १)रुपया डाकमहसूल आना। यदि भाप.दुर्लभ मनुष्य शरीरको फूकर शूकर की समामम खोकर सार्थक कररोहुए संसारसागर के पार होना चाहते हों, यदि आप अपने स्वारको पहिचानकर जीविसं समय पर्यन्त जीवन्मुक्ति और भन्नामें सायुज्यमुक्ति चाहते हो सो प्रतिदिन थोड़े समय अप- पदोंका विचार किया कीजिये, जिस भगवद्गीवाकोदेशी, विदेशी हिन्दु, महिन्द् सब ही गौरव की दृष्टिसे देखते हैं. यह गांसापी अमृत भगवान् श्रीकृष्ण ने उपनिषदोंमें से ही दुइकर अर्जुन को पिलाया था, इतने से ही मानपदों की महिमा समझ देखिये, उन ही ईश'भादि पाठ उपनिषदों को भन्मय पदार्थ और सरल भाषा सहित छापा है जो कि सुबोध गुरुको काम देता है। पता: पण्डित रामस्वरूप शर्मा सनातनधर्मप्रेस मुरादाबाद, --
सनातनधर्मप्रेसकी छपी पुस्तके
सनातनधर्मशिक्षा-वेदशास्त्रोंके प्रमाण और युक्तियं
तगारानधर्मका मण्डन जिल्द साहिरा मूल्य १ रुपया । व्याख्यान
माला-स्वामी इंसम्पनी के मूर्तिपूजा, भवतार, भासा
सन्ध्यादिपर जगत्मसिद्ध दश व्याख्यान कीगन १० आना:
व्याख्यान कुसुम-मरिसा, वेदमहिमा और कुरीतिसंशोधन
पर महामहोपाध्याय स्वामी रामामेभशास्त्रीजीके व्याख्यान मूल्य
४ माना । तीन व्याख्यान-कर्म, ज्ञान, भक्तिार मि० एनी.
घसेंटके व्याख्यान मूख्य ४ भाना 1 विधवाविवाहमीमांसा-
ममाण युक्तिसहित विधवाविवाहका तएडन कीमय ११ रुपया
श्रीगतत्त्व-मि० पनिवसेट का व्याख्यान मूल्य २ भान
सादसिदि -प० रामप्रापशाखिका १ थाना । ईशायष्टो
पानपट् --मन्वय पदार्थ भोर भावार्थ सहित ईश, फेन, कठ
मन, सुएट, माण्डूक्य, चितरीय और ऐतरेय उपनिषद् सजिर
मूल्य १ रुपया । गायत्री व्याख्या-भूला १॥ माना । भारा।
कीर्ति-राजयक्त,देशभक्त.स्वामिभक्त मारधर्मभक,राजपूत,मराठे
भारसियखोंके जीवनचरित कीमत १२थाना। शंकरविजय:
नाटक-जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यजीका जीवनचरित्र की०१६
पंचमहायज्ञविधिक)सन्ध्याविधि ) वैराग्यशतक-यन्वय
पदार्थ और भावार्थ सहित ४माना । वेदान्तसम्म भा. टी. स.।।)
हरिकीर्शनगजलसंग्रह प्रथमभाग ) द्वितीयमाग १) चेतावनी
गजरनौवहार) सुदामाचरित्र मजल भजन लिलीला भजन
पोधपरीक्षा) गंगालहरी भा.टी.-महिम्नास्गोत्र भापाटीका)
महिम्न स्तोत्र और शिवगाएरक भाषाछन्दमें टीका) गंगारी
भाषाछन्दमें रीका ) रामगीता भा० टीवक्तामाका
इनके सिवाय बंबई की छपी सवप्रकारकी पुस्तकें मिनंगीपुर
मिलने का पता-
भेनेजर-सनातनधर्म छापाखाना मुरादावार
भूमिका । ता करने के लिये उस पवित्र वाक्यराशिके चार भाग किये ऋक्, यजु, साम और अयर्य । पद्यमय वाक्यावलि ऋक्, गीतिमय वाक्यावलि साम, और. शेषगयायमय वाक्योंका नाम यजु हुआ, इस विभागसे पहिले यह समस्त वाक्यावलि त्रयी नामसे प्रसिद्ध यी, त्रयीका ही एक अंश स्वतत्र भावसे अथर्व नामसे प्रसिद्ध है, यही विभाग व्यासनी ने किया है, त्रयी के कर्मों. को अपेक्षा अथर्व के कर्म स्वतन्त्र हैं, इसीकारण त्रयोविषयक कर्नामें अथर्वका नामोल्लेख और अयविपयंक कर्मोंमें त्रयीका नामोल्लेख नहीं है। ऋक्, यजु और साममें कर्म, उपासना और ज्ञानका वर्णन कहीं स्वतन्त्ररूपसे और.कहीं मिश्रितरूप से है, अन्तःकरणशुद्धिके द्वारा प्रति मार्गसे निवृत्ति लानके निमित्त यजुर्वेद यज्ञीयप्रयोगोंकीभित्ति है, ऋग्वेद के मंत्र उस भित्तिको सुशोभित करनेवाले चित्ररूप हैं और उन चित्रोंमें सामगीतिका मणिमुक्ता सनेहुएं हैं, परन्तु वैदिक कर्मको भूमिरूप यजु- वैद हो है, इसकारण सबसे पहिले यजुर्वेद संहितासे ही धार्मिकोंका गृह मुशोभित होना चाहिये। वेद किसी का रचाहुआ नहीं है, प्रतिकल्मकी आदिमें परमात्मा उस का स्मरणा करकै प्रजापतिके हृदयमें उसकी प्रेरण करते हैं इसीकारण लिखा है कि- न कश्चिद्वेदकत्तास्ति वेदस्मता महेश्वरः । वेदका बनानेवाला कोई नहीं है' महेश्वर उसका स्मरण किया करते है, तदनन्तर ऋषिपरम्परासे श्रवण हो होकर उसका प्रचार होता रहता है, इसी कारण वेदका दूसरा नाम श्रुति भी है ।वेदकी आनुपूर्वी सदाते एकरूप और अनादि है इंसीकारण वेदके अक्षरोंका यथाविधेि उच्चारण होनेपर हो शास्त्रोक्त फल प्राप्त होता है, इसीकारण मंत्रोंका यथावत् उच्चारगा होने के लिये स्वरोंका विन्यास और उच्चारण का क्रम स्वत- न्त्ररूप से विधिवद्ध कियागया है। कर्न में पेदके मंत्रोंका अर्थज्ञान कवन उच्चारणशाद्धके निमित्त ही जानना आवश्यक है, मुख्य तो मंत्रोंका यथार्थरूपसे उच्चारण हो है, इसीकारण कर्मके समय वेदमंत्रों के अर्थका विचार वा वर्णन नहोकर . *- हता शुक्लयजुरंद की- पर कुछ ध्यान नहीं दिया कि मनमाना अर्थ करने से पुरातन मर्यादामुक्त- स्वरविन्यास के प्रतिकूल मेरा हास्य और वैदिकधर्मको मूल में कुठारा घात होगा, जो केवल अर्धमात्र दिखाकर वेद को एहिकोन्नतिमात्र साधन के प्रेमियोंका रुाचेकर बनाना चाहते हैं, वह वेद के वेदत्व को जानते ही नहीं। ऐसे कलित अर्थमात्रसारवाले वैद न समझे जायें इसका- -रण यह वेदका संक्षिप्त अर्य पुरातन महीधर उज्वट आदि रचित भाष्यों के अनुसार लिखा है। वैदिक यज्ञादिमें पधालम्भनके दिपयको लेकर प्रानकात प्रायः विवाद होता है, इसका कारण यह है कि पानकल लोग धर्मका स्वरूप मन- माना बनाते हैं, पहिले लोगोंका विश्वास था कि--गिसको वेद कर्तव्य क- वह धर्म है और जिसका वेद निषेध करता है वह अधर्म है, इस नियमका पालन करके निजकर्त्तव्यका पालन करनेवालोंकों कुछ शक्ति प्राप्त होती घो, उस शाक्तको धार्मिकजन योगानुष्ठानसे सम्मानितकर पञ्चभूनोंपर प्रमुता नमालेते थे, सूक्ष्मसृष्टिमें पहुँचजाने के कारण उनको, देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन होता था, वह प्रकृति और पुरुष के स्वरूपको करामलकवत् देखते घे, इसप्रकार अपना उद्धार करकै वह परमपदको पाते घे, एसेही महात्मा वैदिक यज्ञों में यजमान होता ऋत्विम् आदिक आसनको सुशोभित करते थे, उनके मंत्रों के प्रभाव से स्यूनसूक्ष्म दोनों प्रकारक पाँचभातिक शरीर उनकी इच्छानुसार पारचालित होते थे, उनके विशासानुसार जैसा कि-पूर्वमीमांसादमें निर्णय किया है, वैदिक यज्ञोंमें ययाविधि पश्चालम्भन धर्म घा, उसमें उदरम्भरोकी कोहुई हिंसा की समान भाव नहीं होता था, आजकल के शिश्नोदरपरायण स्वकल्पित, कृत्यका धर्म माननेवान्तों के सामने इस बातको रखकर मानो वैदिकधर्मसे उनको हाने हटाना है इसोकारण शान्त्रने सिद्धान्त किया है कि हरएक बात अधिकारीसे कहना चाहिये, यानरुलक खतन्त्रचित्तोंका अनुमान करकही पुरातन महर्षि कालमें 'प्रश्वमेवादि यज्ञोंके करनका निषध करगये इसके अतिरिक्त ऐम यज्ञाम श्रद्धा न होने के कारण आजकलके वेद २ पुकारनेवाले उन यगों के अधिकारी भी तो नहीं हैं, फिर वह इनकी चर्चा - - " भूमिका । हो क्या करें, अयवा वेदिक यज्ञादि कर्मकलाप काम्य हे, जो प्रवृत्तिमार्ग के वोही स्वर्गादिको चाहना रखते हो, ओर उनको यह विश्वास हो कि-इन यज्ञोंके करनेसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होताहे, तो वह इन यज्ञाका पुरा तन रीतिमे यथावियि अगुठान करे, पोर उनको यदि इन उपायोंसे स्वर्गा दि मिलने को श्रद्धा नहाहे तो वह इनका अनुष्ठान करंग ही क्यों ओर मात्र उनको करने का प्रेरणा ही कव करता है, क्योंकि वह प्रद्धाहीन होनेमे उम कर्म के अधिकारी नहीं है, वर्ममे तो सबसे पहिले अधिकारी होने की आवश्यकता है, जैसे वेद्याशास्त्रम अनेकों रोगोंपर बहुतसी ओप धेिय काष्ठादिक लिखा है और बहुतमी मासमयी लिखी ह, जिनकी मास में घृणा हो वह मासमयी औषधि क्या खायें, जिन प्रवृत्तिप्रेमियोको मासका अभ्यास हे उनके ही निमित्त वह उपयोगी होगी, ऐसे ही जिनकी माससे घृणा हे और जो प्रवृत्तिको हेय समझकर निवृत्ति से प्रेम करनेवाले हे वह उन काग्य यज्ञोंको क्यों करे उनकी चित्तशुद्धिके लिये नित्यनेमि तिक कर्तव्य कर्मानुप्शन तथा योगसाधनाके अङ्गरूप शमदमादि र्निदष्ट है । ऐसे ही निवृत्तिमार्गप्रेमा कितने ही धामिक मिनोंको प्रेरणासे मेने इस साततार्थको लिखतसमय अचानम्भनादि म्यत्तापर पुरातन भाप्याके अविरुद्ध हिंसाभासको भी वचादिया है, वास्तवमें मुझे इस साक्षिप्तार्थके जिपनेका अहन्त्य नहीं है, क्योंकि इस अनुवादमें मेरी अपनी रचना कुछ नहीं है, मने अवतरुके छपहुए सस्कृतभाप्य और भापानवादाको सामने रखकर इस अनुवादका स्वतन्त्र रातिपर सम्पादनमान करदियाहै, ओर अतिसुलभ मूल्यपर पताकाके ग्राहकोंकी सेवा में भेजनेकी इच्छा से छपवाकर प्रकाशित किया है। निवेदक- ऋ० कु. रामस्वरूप शर्मा
।
धन्यवाद।
मुरादाबादके प्रतिष्ठित रईस साहू पुरुषोत्तमशरण
जीको कोटिशः धन्यवाद हैं, इस सनातमधर्म प्रेस
की स्थिति और सानुवाद यजुर्वेदसंहिता के प्रका-
शित होनेका आश्रयं आप ही हैं, क्योंकि-आपने
ही स्वर्गीय परोपकारपरायग महाराज गोपालजी
की प्रेरणा से उपयुक्त रुपये की ऋणरूप सहायता.
देकर प्रेसको स्थायी किया और आपने ही यजुर्वेद
की तयारीके निमित्त भी ऋणस्वरूप रुपमा देकर
इस कार्यको भेरे हाथसे पूर्ण करादिया, कदाचित
आपकी यह सहायता न मिलनेसे में इस कार्यका
निर्वाह न करसकता, साहूसाहवकी ऐसी ही सहायता
समय २ पर मिलते रहनेसे पाशाहै सनातनधर्मपता-
काके ग्राहक बहुतसे धर्मग्रन्थोंको बहुत ही सुलभता
से पासकेंगे, आपका पवित्र चित्र भी किसी दूसरे
पुस्तकमें ग्राहकों की भेट कियाजायगा । में ईश्वर
से प्रार्थना करता हूँ कि वह साहू साहब के पुत्रपौत्र
धनधान्यादिकी दिनप्रतिदिन वृद्धि करें। इसके
सिवाय खुरजेके रायबहादुर ला. नत्थीमल साहवने
भी पंचास रुपया यजुर्वेदके छपनेकी सहायतार्थ
धर्मार्थ दिया था, तिसका धन्यवाद है।
रामस्वरूप शर्मा
सम्पादक सनातनधर्मपताका मुरादाबाद,
* हरिः ॐ* श्रीशुक्लयजुर्वेदः अन्वयेन भावार्थन च सहितः प्रथमोऽध्यायः प्रणम्य सामं गिरिशं गणेशं भाष्यं समालोक्य मद्दीपरीयम् । पर्मननां निलिखामि चार्य परोपशराय निक्षणाय ॥१॥ हरिः ओं। परमात्मा का श्वासरूप वेद प्रथम ब्रह्माजी को प्राप्त हुग्रा, ब्रह्माजी से ऋपियों को प्राप्त हुआ, परन्तु कितने ही काल के अनन्तर मनुष्यों को मन्दमति देखकर कृपालु भग- चान वेदव्यास ने वेद को ऋक्-यजुः-साम और अथर्व इन चार भागों में विभक्त किया एवं क्रम से पैल वैशम्पायन-जैमिनि राथा सुमन्तु इन अपने चार शिष्यों के अर्थ उपदेश किया, उन्होंने भी अपने शिष्यों के अर्थ उपदेश किया, इस मकार वेद की सहस्रों शाखा होगई । उनमें से व्यासजी के शिष्य वैशम्पायन जी ने याज्ञवल्क्यादि अपने शिष्यों को यजुर्वेद पढ़ाया था, सो दैवाद किसी कारण से क्रुद्ध होकर वैशम्पायन जी ने याज्ञवल्क्य जी से कहा कि मेरे पढ़ाये हुए वेद को त्याग दे, उसी समय याज्ञ- वल्क्य जीने योगसामर्थ्य से वेदविद्या को मूर्तिमान् करके उग दिया उन उगलेहुए यजुर्मन्त्रों को, " ग्रहण करलो" इसमकार गुरु के कहने पर वैशम्पायन जी के अन्य शिष्यों ने तित्तिरि (तीतर ) वनकर चुगलिया, वह यजुः बुद्धि की मलिनका के कारण कृष्ण होगए । तब दुःखित हुए याज्ञवल्क्य जी ने सूर्य भगवान की आराधना करके अन्य शुक्ल यजुर्मन्त्र पाए । उन यजुर्मन्त्रों को याज्ञवल्क्य जी ने जावाल यौधेय-कराव एवं मध्य- न्दिन नादि अपने १५ पन्द्रह शिष्यों के अर्थ उपदेश किया, इस विपय को सूचिरा करनेवाली श्रुति भी है-" आदित्यानीमान १ १ अध्याय। शुक्लानि यशप वाजसनेयेन याज्ञवल्क्येनास्यायन्त इति (वृह- दारण्य माध्य०५॥५॥३३ ! अर्थात्-(आदित्यानि ) आदित्य से पढ़ेहुए (शुक्लानि) शुद्ध ( वाजसनेयेन )वाज कहिये अन्न का सनि कहिये दान है जिसके वह हुआ वाजसनि तिसके प्र. पत्य-वाजसनेय ( याज्ञवल्क्येन ) याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों के अर्थ (आख्यायन्ते ) कहेजाने हैं " तिन याजवल्क्य ऋषि से मध्यन्दिन महार्प ने जो यजुर्वेद की शाखा प्राप्त करी वह माध्य न्दिन नाम वाली हुई । यद्यपि याज्ञवल्क्य ने यह मन्त्र बहुत से शिष्यों को उपदेश किये थे, परन्तु ईश्वर की कृपा से मध्यन्दिन महार्ष के नाम से ही लोक में मसिद्ध हुए उस माध्यन्दिन वेद को जो पढ़ते हैं वा जानते हैं शिष्यपरम्परा से वर्तमान वह भी माध्यन्दिन कहाते हैं। शतपथ ब्राह्मण ११।५।६।७ में लिखा है कि-"स्वा- ध्यायोध्येतन्यः" अर्थात् स्वा-याय (अपने पितृपितामहादि परम्परा करकै माप्त वेदशाखा ) को पढ़ना चाहिये, परन्तु वह अध्ययन (पढ़ना ) प्रत्येक मन्त्र के ऋपि छन्द देवता विनियोग और अर्थ को जानकर करना चाहिये, नहीं तो "एतान्यविदित्वा योऽधीतेऽनुयूते जपति जुहोति यजसे याजयते तम्य. ब्रह्म निर्मार्थ यातयाम भवत्यथान्तराश्वगः वापद्यते स्याग व ति ममीयते वा पापीयान् भववि" अर्थात् इन ऋषि छदं आदि को विना जाने जो वेद पढ़ता है, पढ़ाता है गायत्री आदि का जप करता है व्याहत्यां दि से हवन करता है, यज्ञ करता है तथा औरों को यज्ञ कराता है उसकाब्रह्म (वेद)नियि (कार्यको सिद्धन करनेवाला) यातयाम (निष्फल ) होता है, और ऋपि छन्द आदि को न जानकर चेदा- ध्ययन आदि करने के अनन्तर वात (नरक विशेप ) में पड़ता है, वायु आदि से टूटी है शाखा जिसकी ऐसे शुकदृक्ष की योनि को माप्त होता है (प्रमीयते ) अन्ध वा बधिर होता है और अत्यन्त पापाचारी होता है जिसका फल , ३ - शुक्लयजुर्वेद । यह होता है कि म्लेच्छ चाण्डाल आदि योनि में जन्म धारणं करना पड़ता है। ऐसा कात्यायन ऋपि का कथन है । जो ऋपि छन्द आदि को जानकर वेदाध्ययन आदि करते हैं उनके विषय में कात्यायन ऋपिका ऐसा कथन है कि-"अथ विज्ञायैतानि योऽधी ते सस्य वीर्यवदय यार्थवित्तस्य वीर्यवत्तरं भवति जापित्वा हुत्वेष्वा तस्फलेन युज्यते" अर्थात्-"जो ऋपि छन्दमादि को जानकर . वेदाध्ययन आदि करता है उसका वेद वीर्यवान् (कार्यको सिद्ध करने वाला) होता है, जो अर्थ को भी जानता है, उसका वेद अत्यना वीर्यवान् होता है, ऋपिछन्द देवता विनियोग और अर्थ को जानकर जो जप होम. तथा यज्ञ करता है वह उसका फल पाता है। इस कारण वेद मन्त्रों के पिअादि का जानना तथा अर्थ को जानना अत्यन्त ही श्रावश्यक है, नहीं तो वेदाध्ययनादि का फल नहीं मास होसक्ता । अतएव हम पूर्वाचार्यों के भाप्यों के अनुसार' वेदों के ऋपि छन्द देवता विनियोग और अर्थ के लिखने का कल्प करके प्रथम यजुर्वेद का मारम्भ करते हैं, तहां यजुर्वेद के मन्त्रों में कोई यजु है और कोई ऋचा हैं, जिनमें नियत हैं - क्षर पादावसान जिनके ऐसी ऋचाओं का आवश्यक छन्द का- त्यायन ऋषि ने कहा है, और एकाक्षरादि नियताक्षर यजुपों का छन्द पिङ्गल से जानना क्योंकि साधारणतः तो बत्तीस अक्षर का अनुष्टुप् होता है, परन्तुं "इपे त्वा" इस तीन अक्षर के मन्त्र का . जो अनुप् छन्द कहा है सो कैसे ? इस विषय में पिङ्गल का यह सूत्र है कि छंदः । गायत्री । दैव्येकम् । प्रामुरी पञ्चदश । प्राजा पत्याप्टौ । यजुषां पट् । साम्नां द्विः। ऋचा त्रिः द्वौ वी साम्नां वर्द्रत । त्रीस्तीनृचाम् । चतुरबतुरः माजापात्यायाः। एकैकं शेपे । जह्यादासुरी तान्युपिणगनुग्रवृहत्तीपंक्तित्रिजगत्यः। तिम्रस्तिमः सगाम्न्य एकैका ब्राह्मयःमाग्यजुपामा इसिमर्थात् दैवी गायत्री छंद पंद्रह अक्षर का प्राजापत्या गायत्रीचन्द पाठ अक्षर का,याजुपी गायत्री छन्द छः नक्षर का, साम्नीगायत्री छन्द बारह अक्षर का, १ अध्याय आर्चीगायत्रीछन्द अठारह अक्षर का, आगिायत्री छन्द चौवीस अक्षर का, ब्राह्मी गायत्री छन्द छत्तीस अक्षर का है। दैवीगायत्री पर एकर बढ़ाने पर क्रमसे जाणिक, अनुाप,बृहती, पंक्ति, त्रिग्रुप और जगती छन्द होते हैं। और आसुरी में एकर घटाने से,माजा पत्या में चार २ वढ़ाने से, याजुपी में एक २ बढ़ाने से, साम्नी में दो २ वढ़ाने से, पार्टी में तीन २ बढ़ाने से बाली में छः२ बढ़ाने से, तथा आपी में चार बढ़ाने से क्रमशः उष्णिक आदि छन्द होते हैं,स्पष्ट होने के लिये नीचे ७२ कोट का यन्त्र लिखते हैं। छन्द गायत्री | उप्णिय अनुष्ट वृहती पंक्ति | त्रिष्टुप् जगती आप २८ १६ ४० ४८ देवी १ ३ ५ ६ मामुरी १५ ܘܕ ९ माजाप १२ ६ १२ २० ९ २८३२ याजुपी ६ ७ १० ११ । १२ साम्नी ૧૨ २२ २४ श्राी २४ ग्रामी १२ १८ ५१ जहाँ दो शनि छन्दों की संख्या समान हो, जैसे कि दैवी त्रिग्रुप और याजुपी गायत्री की तथा सानी गायत्री-याजुपी जगती एवं भामुरी बृहली की है, ऐसे स्थल पर यदि सन्दह हो कि + शुक्लयजुर्वेद। यहाँ कौनसा बन्द है तो " देवतादितश्च " पिछल ७।२ के ममाणानुसार चतुर्थाध्याय के ११११ । १२ खण्डों में वर्णन करेहुए गायत्री आदि छन्दों के देवताओं से निश्चय करे, और यदि वहाँ वर्णन करेहुए देवताओं से अन्य देवता होय तो जितने छन्द माप्तहों उन में से चाहें जौनसा छन्द मानलेय और जहां आचार्य ने स्वयं छन्द लिखे हैं तदां तो सन्देह करने की कोई पावश्यकता है ही नहीं। इसमकार एक अक्षर से लेकर एक सौ छः अक्षर राक के यजुः का 'छन्द पिङ्गलं के अनुसार जानना,परन्तु इस से भविक अक्षरों के होता यक्षद्वनस्पतिभित्यादि (य० २।४६) मंत्रों में छन्द की कल्पना है ही नहीं। अब ऋपिका स्वरूप लिखते हैं कि-'ऋपिर्दर्शनान, इस निरुक्त के प्रमाणानुसार जिस ने जिसमन्त्र को देखा वह उस का ऋपि हुआ, क्योंकि-'अजान्ह वै पृश्नीस्तपमानान प्रशस्वयम्भवम्या नर्पतहपयोभवन, इस प्रमाण के अनुसार वेद की प्राप्ति के नि- मित्त तप करनेवाले जिन पुरुषों को स्वयम्भू वेद माप्त हुया,वह परमेश्वर के अनुग्रह से अतीन्द्रिय वेद का मानस दर्शन करने से ऋपि कहलाए, इस ही श्राशयको लेकर स्मृति में भी लिखा है। कि-'युगांतेऽन्तहितान् वेदान्सेतिहासान् महर्पयः। लेीभरे रापसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयम्भुवा ।। अव देवता का स्वरूप कहते हैं, कि-" देवता मंत्रांतर्भूता अग्न्यादिका हविर्माजः स्तुतिभाजो वा, अर्थानमंत्रों के मध्य में पहेहुये हविर्भोक्ता वा सूक्तभोक्ता अग्नि-सोम-इन्द्र-विषाणु श्रादि देवता हैं । और "यत्काम ऋपिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमि च्छन्स्तुतिं प्रयुब्ते तदेवतः स मंत्रो भवति ( नि० ७॥ १) श्र- थीद जो कामना करनेवाला ऋपि जिस देवता में प्रार्थपत्य( उस कार्यसाधनके स्वामित्व) की इच्छा करता हुआ स्तुति करता है वह उस मंत्र का देवता होता है। प्रथम भध्याय से मारम्भ करके द्वितीय अध्याय की हाईस.
. १ अध्याय। कण्डिका पर्यंत दर्शपोर्णमास यन्त्र (1) के मंत्र हैं, उनका परमेष्ठी प्रजापति ऋपि है, अथवा प्रजापति के पुत्र देवता ऋोप हैं । उ- ब्बट भाप्य में ऐसा लिखा है कि-'परमेष्टिनः प्राजापत्यस्याएं देवानां वा प्राजापत्यानाम्., अर्थात्-इन दर्शपौर्णमास मंत्रों का प्राजापात्य (प्रजापति-का अपत्य) परमेष्ठी ऋषि है अथवा मना- पति के पुत्र देवता ऋपि हैं। ऐसा ही ब्राह्मण में भी लिखा है कि-"परमेष्ठी प्राजापत्यो. यबमपश्यद्यदर्श मौर्णमासाविति, तथा "ते देवा अकामयते, त्युपक्रम्य "ततएतंहविर्य ददृशुर्यदर्श, पौर्णमासाविति। इस कारण आगे हम दर्शौर्णमास मंत्रों का महीधर के अनुसार 'मजापति परमेष्ठीं ऋषि न लिखकर श्रुति प्रमाणयुक्त होने के कारण उव्वट के अनुसार दर्शपौर्णमास मंत्रों का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि लिखेंगे॥ द्वितीय अध्याय के अन्त की छः कण्डिका पितृयज्ञ के मन्त्र हैं, उनका मजापति ऋपि है। मथम अध्याय में सर्व मन्त्र यजु हैं एक पुरा क्रूरस्प" इत्यादि मन्त्र ऋक् है, यजुः मन्त्रों का पिगल के अनुसार छन्द जानना, अधिक विस्तार होजाने के कारण यहां नहीं कहेंगे । ऋचों के छन्द कहेंगे। वहां (मथम अध्याय में)प्रथम कण्डिका में पांच मन्त्र हैं,दो तीन २ अक्षर के, तीसरा चार अक्षर का, चौथा वासठ अक्षर का और पाँचवा नौ अक्षर का है। भकृतिरूप होने के कारण प्रथम दर्शपौर्णसास के मन्त्र कहते हैं। विधि दो मकार की होती हैं, एक प्रकृतिसंज्ञक,दूसरी विकृतिस- जक जहां सकलं श्रहों का उपदेश होता है अर्थात् जिन के मन्त्रों में सकल विधान परिणत होता है वह प्रकृति कहाती हैं और जहां किसी विशेष अङ्कमात्र का उपदेश होता है एवं शेष अङ्क(विधान) (७)अमावास्या में जब कि-चन्द्रमा सूर्ग का परस्पर दर्शन हो, जो याग किया जाता है उसको दंश कहते हैं, और पूर्णिमा के दिन जो इष्टि की जाती है उस को पौर्णमासयाग कहते हैं,इस विषय में यह अति है कि-"दर्शपौर्णमासाभ्यां यजेता, " शुक्लयजुर्वेद । प्रकृति मन्त्रों से जाने जाते हैं वह विकृति कहाती है। प्रकृति तीन प्रकारकी है, अग्निहोत्र, इष्टि और सोम । यद्यपि दर्शपौर्णमास यज्ञ में कृताधान (अग्निहोत्र करनेवाले) को ही अधिकार है, इसकारण मथम अग्न्याधान ( अग्निस्था पना) के मन्त्र कहने चाहिये थे परन्तु अन्याधान में पवमान नामक इष्टि करनी पड़ती है, अतः पवमान इष्टियों के विना अ- ग्याध्यान होही नहीं सक्ता और पवमान इष्टि दर्श पौर्णमासकी विकृति हैं अतः दर्शपौर्णमास के ज्ञान के विना पत्रमानेष्टि नहीं होसक्ती इसकारण से, तथा सोमयाग में भी दीक्षणीय मायणीय श्रादि के वि4 दर्शपौर्णमास की अपेक्षा होती है इसकारण भी मथम दर्शपौर्णमास मन्त्रों का कथन ही उचित है यह दर्शपार्ण- मास के मन्त्र आगे लिखे .इपे तार इत्यादि हैं- हरिः ओम. इथे त्वा । ऊर्जे त्या वायव स्थ। देवोव: सविता प्रापर्यतु श्रेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्वमन्न्या इन्द्राय भागप्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मामा चस्तेन ईशत माघश छ सोया अस्मिन् गोप॑तौ स्यात बव्हीः । यज- मानस्य पशून पाहि ॥ १।। मावार्थः-मूल में जो "इपे त्वा ” इत्यादि लिखा है, वह एक काण्डका है और उस कण्डिका में पाँच मन्त्र हैं, प्रथम मात्र के दो पद और तीन अक्षर हैं, उसका देवी अनुष्टुप् छन्द, शाखा देवता और पलाश की शाखा का छेदन करने में विनियोग है, यहाँ शद्धा होती है कि-शाखा तो अचेतन (जड़) है वह देवता कैसे होसक्ती है ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि यह शाखा उखा आदि अचेतन हैं परन्तु इनके अभिमानी देवताओं का सान्निध्य होने से इनमें देवतात्व माना है, भगवान् वेदव्यासजी ने भी वे- दान्तदर्शन में “ अभिमानिन्यपदेशस्तु अ०२ पा० १ सूत्र ५" इस मंत्र के द्वारा यही वर्णन किया है, तथा "मृदयवीदापोऽनु- वन् ” अर्थात् मृत्ति का बोली, जल वोले यह श्रुति अभिमानी १ अध्याय। देवताओं के सान्निध्य से मृत्ति का श्रादि में देवतात्त मानने से ही सङ्गत होती है, यही कारण है कि- शास्त्र के तत्त्व को जानने वाले विद्वान् अचेतन भी शालिग्राम की शिला में शास्त्रदृष्टि से विष्णु भगवान् की सन्निधि मानतेहुए विष्णु भगवान् को ही स- म्वोधन करके पोडशोपचार के द्वारा पूजन करते हैं । ऊपर उत्था- निका में लिख आये हैं कि-"इपेवा" इत्यादि दर्शयौर्णमास के मन्त्र है उसका ही मसङ्ग उठाते हैं कि-प्रतिपदा में दर्शयागको करने की इच्छा करनेवाला पुरुष, अमावस्या के दिन प्रातःकाल के समय अग्निहोत्र करके दर्शयाग के निमित्त, कात्यायन मुनि मणीत श्रौतसूत्र अ० २ का० १ ० ३ में कहेहुए "अग्निवर्च इत्यादि " मन्त्र के द्वारा अग्निपों में समिदाधान रूप अन्वाधान करके वत्सापाकरण (गौओं के समीप से बछडों को हटाना): करे, दर्शयाग में तीन हवि होते हैं-पाठ कपालों ( इस मकार के पान) में पकाया हुना अग्नि है देवता जिसका ऐसा दाध, इंद्र है देवता जिसका ऐसा दधि, तथा इंद्र है देवता जिसका.ऐसा पय (दुग्ध)। इस दधि दुग्धाधिरूप हवि की भविपदा के दिन हवन करने की आवश्यकता होती है इस कारण दाध बनाने के लिये अमावस्या की रात्रि में गौओं को दुहे, तिस दुहने के निमित्त प्रमा वास्या के दिन मातःकाल के समय प्रतिदिन के नियमानुसार गौमों के लौकिक दुहने के अनन्तर अपनी माताओं के साथ चररोहुए बछड़ों को पलाशकी शाखा से अलग करै, इसकारण पलाशकी शाखाका वेदन कियाजाता है। शतपथ ब्राह्मण १।७।१।८।२।१० में लिखा है कि-जब गायत्री पक्षी का रूप धारण करके स्वर्ग सेसो मवल्ली लाई थी, उससमय तिस सोमवल्लीका पत्र (पत्ता) भूमि पर गिरकर उगाया तिस से पलाशहुआ इसकारण शाखों में पलाशकी मशंसा करी है और उसको ब्रह्मत्व कहा है, अतएर बछड़ों को हटाने के लिये पलाशकी शाखा का तथा शमी (१)की शाखा (१)पशाखां शामीलीवा(कात्या)भस्याध पालाशशाखाशमीशाखा वाव विकल्पिता।
- शुक्लयजुवेंदा का भी छेदन करना कहा है,तिस छेदन करने के समय प्रथम का मन्त्र “इषेत्वा" पढ़ना चाहिये इसका अर्थ यह है कि-(शाखे) हे पलाशकी शाखे ! अथवा शमी की शारखे (त्वा) तुझको । (इपे) पृष्टि के निमित्त (छिनमि)छेदन करता हूँ (क्योंकि- शाखा से बछड़ों को पृथक् कियाजायगा तव गौओं का दुग्ध दुह- कर दधि होगा-तिस दधि का हवन करने से "अग्ने धमो जायसे धूमादभ्रमभ्रादृष्टिः" इस श्रुति के अनुसार वर्षा होती है। इस कण्डिका में दो पदं और तीन अक्षर का दूसरा मन्त्र है "ऊर्जे त्वा" इसका भी परमेष्ठी माजापत्य ऋपि दैवी अनुए छन्द, शाखा देवता माध्यन्दिनी शाखा वालों के मत में इस मन्त्र का भी शाखा के छेदन में विनियोग है अर्थात् इन के यहां शाखाछेदन के मन्त्र में विकल्प है चाहें इस द्वितीय मन्त्र से शाखाछेदन करें और चाहें प्रथम मन्त्र से शाखा छेदन करे, प- रन्तु काण्व शाखावालों के मत में इस द्वितीय मन्त्रका शाखा 'के सनमन में विनियोग है अर्थात् काण्व शाखावाले शाखा छेदन प्रथममन्त्र सेही करते हैं और इस दूसरे मन्त्र से शाखाका सनमन (शाखा में लगी हुई धूलि आदि को दूर करके शुद्ध, और सूधी) करते हैं(१)इस द्वितीय मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे शाख ! मैं (अर्ने ) सकल मनुष्य पशु आदिकों को पान भादि के द्वारा दृढ़ शरीर करनेवाले अथवा चेष्टारूप जीवन देनेवाले वर्षा के जलरूप रसकी माक्षिके लिये (त्वा ) तुझको । (छिनधि) : (माध्यन्दिनी शाखावालों के मसमें) छेदन (काएव शाखावालों के मतमें ) शोधन करता हूँ। इस सब का तात्पर्य यह है कि- अवयु ( यजुर्वेदियों को यज्ञ करानेवाला प्राचार्य ) इन दोनों (१)पेवेतन खेति वा छिनमि इति वोभयोः साकांशत्वात्सत्रमयामोति योत्तर इति कात्यायनोक्तेः । अस्यापः-मासाच्छेदने इसेलोत्वति द्वौ मन्त्री विकल्पिती तयोः किपापासवाइयांवोधाय छिनानि इति पदमध्याहत्तव्यमिरपैक: पक्षः । पत्येति नायों मन्त्रः जमेवेति सममनार्थः। सामनं अफरणं शाखालग्नधल्पायपनयनम् । र पक्षान्तरमिस्पर्धः।
" ११ अध्याय। मन्त्रों को पढ़कर शाखाभिमानी देवता से मार्थना करता है कि- इस वृक्षकी शाखा का छेदन औरशोधन जो कियाजाता है'तिससे 'यज्ञ के द्वारा वर्षा हो और वर्षा के द्वारा हमारे इस यजमान को अन्न तथा बलकारक घृत दुग्धादि प्राप्त हो । दो पद और चार अक्षर का तीसरा मन्त्र है। है "वायवःस्थ इसका भी परमेष्ठी माजापत्य ऋषि, देवी बृहती छन्द, वायुदेवता और गौओं के समीप से बछड़ों को हटाने में इसका विनियोग है । इस मन्त्र को पढ़कर गौओं को दुहने के निमित्त तिस पलाश शाखा के द्वारा वड़ों को गौओं से अलग करके हटादेय । इस मन्त्रका अर्थ यह है कि-(वत्साः) हे बड़ों ? 'तुम, (वायवः) 'गमन करनेवाले होजाओ, क्योंकि बिना तुम्हारे अलग हुए सा- 'यंकाल को यज्ञ के निमित्त दोहना नहीं होसकेगा । अथवा ऐसा अर्थ समझना कि- हे बछड़ों तुम वायुरूप वायु की समान ] हो, जिस मकार वायु पादप्रक्षालन [ चरण धोना ] निष्ठीवन [यूकना ] आदि से दोपयुक्त हुई पृथ्वी को सुखाकर पवित्र क- रता है तिसी प्रकार सुम लीपने के निमित गोमय (गोवर) देकर भूमि को पवित्र करते हो । अथवा इस मन्त्र का अभिमाय .यह है कि जिस प्रकार अपने निवास करने के निमित्त मनुष्यों को गृह आदि बनाने की सामर्थ्य है तिस मकारपशुओं को नहीं है अंतः पशु निरावरंण (विना छाये ) अन्तरिक्ष में विचरते है 'सिस अन्तरिक्ष का अधिपति वायु अपने अवयवों ( श्रो) की समान पशुओं का पालन करता है अनः हे बछड़ो ! हम तुमको गौमों से पृथक् करकै चरखे हुए तुम्हारी रक्षा करने के निमित्त वायु देवता को समर्पण करते हैं । अथवा यह अर्थ जानना कि- हे बदड़ो नुम वायुरूप होवो अपछि अव गौओं से पृथक् हुए तुम दिन में तृण भक्षण के निमित्त जहाँ तहाँ वन में विचरकर सायं काल के समय वायु की समान वेग से लौटकर यजमान (अपने स्वामी) के घर को प्रायो।
शुक्लयजुर्वेद। ११ बासठ अक्षर का तीसरा मन्त्र है, इसका भी परमेष्ठी प्राजापत्य ऋषि, ब्राह्मी पङ्क्ति छन्द,इन्द्र देवता और पलाशशाखा सेगौओं का उपस्पर्शन करने में विनियोग है । पूर्वोक्त मन्त्र से पृथक् करेहुए वछहों की माता जो गोएं हैं, उनमें से एक गौ को पृथक् करके "देवोव इत्यादि, इस मंत्र को पढ़ताहुआ पलाश से स्पर्श कर, ऐसा करने से उस गौ का दविरूप हवि इन्द्र देवता का होता है । इस मंत्र का अर्थ यह है कि- मावः) हे गौओं ( सविता ) सव का मेरक (देव) ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर (ः) तुमको,( श्रेष्ठ तमाय) यज्ञरूप श्रेष्ठराम* (कर्मणे ) कर्म के निमित, (मार्पयतु) बहुत से तृणोंवाले वन में पहुँचाये ( जिस से तुम यथेष्ट वृणभक्षण करके बहुत से दुग्धदधिरूप इषि को उत्पन्न करतीहुई यज्ञ में सहा- यक होचो ) (अन्याः) हे अवध्य गौओं! [ यज्ञ में ] (इन्द्राय) इन्द्र के निमित्त (भागम् ) हवि बनाने के अर्थ तिस हवि सूप दधि के हेतुभूत दुग्ध को (आप्यायध्वम् ) बढ़ाओ, (मजा- चतीः) जीवित सन्तति वाली (अनमीवाः) कृमिपीहा आदि क्षुद्र रोगरहित (अयक्षमाः)राजयक्ष्माअादि प्रवल रोगरहित (का), तुमको, (स्तेनः) चोर पुरुप, (अपहत्तुम् ) चुराने को, (मा) मत, (अघशंसः) चाण्डाल वा व्याघ्रादि हिंसकजीव(निह-तुम्). वध करने को (मा)मत, (ईशत) समर्थ हो, (अस्मिन्) इस (गोपती ) गौओं के स्वामी यजमान के समीप, (भूवाः) नि रन्तर रहनेवाली, (बव्ही: ) बहुतसी, (स्पास ) होवो। अक्षर का पांचवां मंत्र है"यजमानस्य पशूपाहि, इसका भी परमेष्ठी माजापत्य ऋपि,याजुपी वृहती छन्द, शाखा देवता और शाखा के उपगृहन (ग्रहण ) करने में विनियोग है । यजमान के । अग्न्यागार (आहवनीय वा गाईपत्य अग्नि के स्थान ) के * कर्म चार प्रकार के होते हैं, अप्रशस्त, प्रशस्त, श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम सोफ विरुद्ध हिंसा चौरी आदि अप्रशस्त कर्म हैं, छोक में श्लाघनीय कुटुम्बपालन आदि प्रगस्त कम है, स्मृतियों में कई ए पापी कप तदागादे श्रेष्ठ कर्म है और पेदोक्त यज्ञ श्रेष्ठतम कम हाते हैं,ऐसाही श्रुति में भी कहा है कि-'यशो वैश्रेष्ठतम कर्म,, १ अध्याय । श्रागै शाखा को उपाहन करता हुआ "यजमानस्य पश-पाहि" इस मन्त्र को पई। इस मंत्र का अर्थ यह है कि-(शाखे) हे शा- खाभिमानी देवते! ( यजमानस्य ) यजमान के (पशन )पशुओं [गौत्रों के बछड़ों को,( पाहि) व्याघ्र चोर आदि से रक्षाकर [जिससे कि सायंकाल को आनन्दपूर्वक यजमान के घरको लौट कर पाते और गौओं के दुहने में सहायक हों तथा यक्ष के निमित्त इवि सम्पादित हो.] ॥२॥ वसः पवित्रमसि चौरसि एधिव्यसि मातरिश्वनो धर्माऽसि विश्वधौ असि । परमेणधाम्नादृछहस्व माहा- मी ते यज्ञपतिव्हीपीत् ॥२॥ इस, करिडका में तीन मंत्र हैं-प्रयम "वसोरित्यादि मंत्र का मजापति का अपत्य परमेष्ठी ऋपि,याजुपी उपिएक छंद,वायु देवता और पलाशशाखा में पवित्र वांधने में विनियोग है।दो या तीन कुशा को पवित्र कहते हैं, पलाश की शाखा में वह कुशाओं का पवित्र वांधे, तिस पवित्र के बांधते में इस प्रथम मंत्र को पढे, "सोः पचित्रमसि " इसका अर्थ यह है कि-(पवित्र ) हे कुशा वों के पवित्र.! (वसोः)इन्द्र देवता के भागरूप दुग्धं को (पवित्रम्) पवित्र करने वाले (असि) हो। "चौरसि पृथिव्यांस,,यह दूसरा मंत्र है जिसका माजापत्य पर- मेष्ठी ऋपि, दैवी जगी छंद, उखा देवता और दुग्ध धारणार्थ उखाग्रहण में इसका विनियोग है। पलाशशाखामें पवित्र वांधने के अनन्तर जिस स्यालीमें दुग्ध रखना हो उस को ग्रहण करते समय धौरसत्यादि मंत्र को पटै इसका अर्थ यह है कि-(स्थालि) हे स्थालि अर्याद हांडी (चौ.) युलोक के अवयवम्त जल से धनी हुई, (भसि )है इस कारण थुलोक रूप है, (पृथिवी) पृ- थिवी में से ली हुई मृत्ति का के द्वारा बनीहुई (असि) है, अतः प्रथिवी रूप है। "मातरिश्वत्यादि" तीसरा मन्त्र है, इसका परमेष्ठी माजापत्य - शुक्लयजुर्वेद । ऋषि प्रजापत्या जगती छन्द. उखा देवता और दुग्ध की हांडी को अग्निपर चढ़ाने में इसका विनियोग है , द्वितीय मंत्र से हांडी में दुग्ध करने के अनन्तर उस दूध की हांडी को गार्हपत्य अग्नि में से अङ्गारों को निकाल, उस गाईपत्य के उत्तर में विछाय उनपर चढा देय उस समय "मातरिश्वत्यादि" यह तीसरा मंत्र पढ़ाजाता है। इस मंत्र का अर्थ यह है कि-(उखे) हे उखे! अर्थात् हांडी सुम्हारे भीतर अन्तरिक्ष शून्य स्थान में वायु का सञ्चार होता है अतः तुम (मातरिश्वनः) वायु की (धर्मः) दीपक कहिए अभिव्यञ्जक वा प्रकाशक (असि ) हो, इसकारण अन्तरिक्ष लोकं रूप हो, दूसरे मंत्र में द्युलोकरूप पृथिवी लोकरूप स्थाली को कहा और इस मंत्र में अन्तरिक्ष लोकरूप कहा, इस प्रकार तीनों लोकों केधारण करने से (विश्वधाः) विश्व को धारण करने में समर्थ (असि) हो, (परमेण) वहुत दुग्ध को धारण करने की सामर्थ्यरूप उत्तम (धाम्नां ) तेज करकै (इंहस्व ) दृढ़ हो अर्थात् तेज का अधि- ठान देवता तुमको दृढ करें, नहीं तो टूटजाने से दुग्ध निकलजा- यगा, (व्हाः ) टेढी (मा) मत होवो, जिस से कि (से )तेरा ( यज्ञपतिः) यजमान ( माव्हापात् ) कुटिल [तुझ में स्थितदुग्ध के निकलजाने से यज्ञानुष्ठान में विघ्नवाला ] नहो ( यह मैं यज्ञ पुरुष परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ ) ॥२॥ वोः पवित्रमसि शतधारं वः पवित्रमसि सहस्र- धारम्।देवस्त्या सविता पुनातु वसोपविण शतधारणे सुप्वां । कामधुक्षः ॥ ३॥ इस काण्डका में तीन मंत्र हैं, प्रथम “यसोः पवित्रमसि शत- धारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्" का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि, यजुः छद,वायु देवता और उखा पर पवित्र को स्थापन करने में विनियोग है । उखा [ हांडी ] के मुखपर कुशों के पवित्र को इस मकार रक्ख, कि जिस में पवित्रे के कुशाओं का अग्रभाग पूर्व वा उत्तर दिशा की ओर को रहे इस प्रकार पवित्रे को रखते समय www ११ अध्याय। यह मंत्र पढाजाता है। इस मंत्र का अर्थ यह है कि (शाखापवित्र) हे शाखा में रंधे हुए पश्त्रि (बसोः) इंद्रदेवता के निवास के हेतु दुग्ध का (त्वम्) र (शवधारम्) सैंकडों धारावाला(सहस्रधारम्) सहस्रों धारावाला। (पवित्रम् )शोधक (पास) है। । दूसरे "देवस्त्वा सविता पुनातु वसो:पवित्रेण शसंधारेण मुप्पा". मंत्र का परमेष्ठी माज्यापस्य ऋपि, साम्नी त्रिष्टुप्छन्द,पयो देवता और दुग्ध के पवित्र करने में विनियोग है। वुइने के अनन्तर हांडी में दुग्ध डालते समय यह मन्त्र पढाजाता है। इस मंत्र का अर्थ यह है कि हे क्षीर ! ( सविता ) सबका भरक ( देवः) थोत मान परमात्मा(शतधारण) सम्बन्धी शतधार, (सुप्वा) अच्छे शोधक (पवित्रेण ) पवित्र से (वा) तुझ को (पुगतु ) पवित्र [निर्दोप] करे। तीसरे"कामधुक्षः" मंत्र का परमेष्ठीमाजापत्य ऋषि,देवी बृहती चंद,मश्न देवता और गोदोहन के प्रश्न में विनियोग है । अध्वर्यु इस मंत्रको पढकर दुहनेवाले से मश्न करै । इसका मंत्र का अर्थ यह है,अवयु दुहनेवाले सेवूझता है कि हे दोग्धः! तुम ने इन विद्यमान गौनों में से (काम् ) कौनसीको(अधुलः) दुहात! ३ 11 सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा। विश्वायाः । इन्द्रस्प खा भाग सोमेनानिच्मि विष्णौ हुव्यरक्ष ॥४॥ .'इस कण्डिका में पांच मंत्र हैं, प्रथम "सा विश्वायुः' मंत्रका परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, देवी बृहती छन्द, गौ देवता और मथम प्रश्न के उत्तर में चिनियाग है। दोग्धा जब उत्तर देय कि मैंने इस गौ को दुद्दा तव अर्यु इस मंत्र को पहै। इसका अर्थ यह है अवयु कहता है कि हे दोग्धः ! जिस गौ को तुम ने दुहा और मैंने झा (सा) वह गो (विश्वायुः ) विश्वायु शब्द से कहने योग्य है अर्थात् परमेश्वर से मार्थना है कि यह गौ यजमानको पूर्ण आयु देने वाली हो। दूसरे "सा विश्वकर्मा" मन्त्र का परमेष्ठी माज्यापत्य ऋषि, शुक्लयजुर्वेद। दैवी पंक्ति छन्द 'गो देवता और द्वितीय प्रश्न के उत्तर में विनियोग है। कात्यायन महर्षि ने लिखा है कि -जिस मकार मयम गौ के दुहने का भी प्रश्न करै, इस कारण, दुसरी गोके दुहने पर दोग्धा से अध्वर्यु प्रश्न करे कि “ कामायः ” कौनसी गौ को दुहा तव अध्वर्यु इस मंत्र को पढ़े। इसका अर्थ यह है कि प्रध्वर्यु क- हता है हे दोग्धः ! जिस दुसरी गौ को तुमने दुहा और मैंने झा (सा) वह (विश्वकर्मा ) विश्वकर्मा शब्द से कहने योग्य है अर्थात् बह गौ जगत् की स्थिति की कारण है क्योंकि यज्ञों में हवि की साधन होकर सबकी कामनाओं को सिद्ध करती है सो हमारे इस यजमान की कामना को सिद्ध करें। तीसरे"सा विश्वधायाः,मंत्र का परमेष्ठी माजापात्य ऋषि,देवी पङ्क्ति वंद, गौ देवता और तृतीय भश्न के उत्तर में विनियोग है । वृतीय वार किस गौ को दुहा, अध्वर्यु के इस मकार प्रश्न करने पर जब दोग्धा कहै कि मैंने इस गौ को दुहा तव अध्वर्यु इस मंत्र को पढे । इस का अर्थ यह है कि-मययु कहता है है दोग्यः! जिस सीसरी गौ को तुमनें दुहा और मैंने वझा, (सा) वह (विश्वधायाः) विश्वधाया शब्द से कहनेयोग्य है क्योंकि क्षीर दधि आदिएप हपि देकर सकल देवताओं को पुष्ट करती है सो परमेश्वर से प्रार्थना है कि इस यत में मी इन्द्रादि देवताओं को दधिदुग्धादिरूप हवि देकर हमारे यजमान की कामना को सिद्ध करावे॥ चौथे "इन्द्रस्य त्वा भागः५ सोमेनातनमि" मन्त्रका परमेष्ठी माजापत्यऋपि, याजुपी जगती छन्द, इन्द्र देवता और दधिको जमाने में विनियोग है । गरम करेहुए दुग्ध को अग्निपर से उतार 'कर कुछ एक गरम रहनेपर उसमें मातःकाल के होम से बचेहुए दधिको डालकरदधि वनावैउस समय इस.मन्त्र को पढ़े। इसका भर्थ यह है कि---हे क्षीर ! ( इन्द्रस्य ) इन्द्र के (भागम्.) भाग प (त्वा) तुझको, (सोमेन) सोमवल्ली के रसरूप मानहुए 1 १ अध्याय। हवनसे बचेहुए दधि के द्वारा, ( आतनचिम ) कठिन करता हूँ कहिए जमाता हूँ,मर्यात् परमेश्वर की कृपा से यह दधि जमै और उससे देवता को भागमाप्त होकर यजमान की अभीष्टसिदि हो। पाँचवे "विप्णो हव्यं रक्ष,, मंत्रका परमेष्ठी प्राजापत्य ऋषि, याजुपी गायत्री छंद, पयो देवता और विष्णु की मार्थना में विनि योग है । उस दुग्ध की हाँटी को जल भरेहुए किसी,मृत्तिका का न हो, ऐसे पात्रसे ढके और उससमय इस मंत्र को पढे। इसका अर्थ यह है कि-(विष्णो). हेयजपुरुप ( हव्यम् )हवि को(रस) रक्षा करो, [क्योंकि-जगत् में रक्षा करने का भार आप के ही ऊपर है अर्थात् आप रक्षा के अभिमानी देवता है ] ॥४॥ अग्ने व्रतपते व्रतचरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् इदमहमन्तात्सत्यमुपैमि॥५॥ इस काण्डका में दो.मंत्र हैं, प्रथम ".अग्ने व्रतवरिप्यामि सच्छकेयं तन्मे राध्यताम् " मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋषिः उप्क् िछन्द,अग्नि देवता और यज्ञानुष्ठान की मतिज्ञा में इसका विनियोग है यजमान श्रावनीय अग्नि के समीप पूर्व को मुखकर अग्नि को, देखता हुआ दाहिने हाथ में जल लेकर इस मंत्र को पढे । इसका अर्थ यह है कि (प्रतप्ते ) हे इस 'कियेजाते हुए कर्म के पालक [विष्णुभगवान के अंशयुक्त ] अग्निदेव ! (घराम् )वत जो, (चरिष्यामि ) कहंगा, (तत्) उस को,(शकेयम् ) करसकूँ (म) मेरे,(तद)उसवत को,(राध्यताम् )सिद्ध करो । अर्थात् तुम्हारा भरोसा करके मैं इस क्रम को करता हूँ, आपके अनुग्रह से मैं इस कर्य के कर ने को समर्थ होऊ, मेरा यह कर्म निविघ्नतापूर्वक फलकी माप्ति पर्यन्त सिद हो। "इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि"मंत्रका परमेप्री माजापत्य अपि,साम्नी गायत्री छंद,अग्नि देवता और सत्यमाप्ति की प्रार्थना में विनियोग है। माहवनीय अग्नि के समीप पूर्वोक्त प्रकार से इस मंत्र को भी पहै। इसका अर्थ यह है कि-हे अग्निदेव ! (अहम् ) मैं यजमान, शुक्लयजुर्वेद । १७ १ (अनृन त) अन्त कहिये स्वम में देखेहुए इस्ती आदि की समान शीघही नाशको प्राप्त होनेवाले मनुष्यशरीर से (इदम्)इस (सत्यम्) सत्य कहिपे बहुत काल पर्यन्त स्थित रहनेवाले देवशरीरको(उपाय) मातहोता हूं ऐसा अर्थ करने में इदमहमनृतात्सत्यमुपैमीति तन्मनु- प्येभ्यो देवानुपावर्तत इति(११११११४)यहशतपथ की श्रुति प्रमाण है अथवा लोकमसिद्ध ही सत्य अन्त को मानकर ऐसा अर्थ क- रना चाहिये कि-हे अग्निदेव!(अहम् )मैं (अमृताव) मिथ्याभापण से पृथक होकर (इदम्)इस (सत्यम् ) सत्य भाषण को (उपैमि) प्राप्त होता हूँ। "नानृतं वदेत्" अर्थात् मिथ्याभापण न करे, इस प्रमाण के अनुसार सत्य भापण कर्म का अङ्ग है अतः कर्मानुष्ठान के समय सर्व मकारसे सत्यभापण का पालन करना चाहिये ।।५।। कस्त्वा युनक्ति स त्वा युनक्ति कस्मै त्वा युनक्ति तस्मै त्वा युनक्ति । कर्मणे वां वेपाय वाम् ॥ ६॥ "इस काण्डका में दो मंत्र हैं-प्रथम "कस्त्वा इत्यादि मंत्र का पर- मेष्ठी माजापत्य ऋपि, साम्नी त्रिगुप्छन्द, प्रजापति देवता और जलमणयन तथा पाहवनीय अग्नि के उत्तर प्रदेश के विधारण में विनियोग है।पञ्चम कपिडका में कही हुई रीति से सत्यभापणादि रूप मतिज्ञा करके यज्ञ के प्रारम्भ में अपने कर्तृत्व ( मैं कती हूं, इस अभिमान) को त्यागकर प्रजापति को यज्ञ का कर्ता मान प्रत- एच तदनन्तर ब्रह्मा का वरण करके जलों का मणयन करें। यंज- मान ब्रह्मा से प्रश्न करै कि-ब्रह्मन्नपः प्रणेप्याम-हे ब्रह्मन् ! जलों का प्रणयन कर । तब ब्रह्मा "(का० २।२।८ मणययज्ञ देवता वर्द्धय स्वं नाकस्य पृष्ठे यजमानोऽस्तु सप्त ऋपीणा सुकृतां यत्र लोकस्तत्रेम यज्ञ यजमानञ्च धेहि) इस मकार धीरे २ पढ कर "ॐ प्रणय" इस मकार ऊँचे स्वर से कहै कि-जिस में अवयु सुनलेय फिर अध्वर्यु चमस( काष्ठ के बने हुए यज्ञ के पात्र विशेष) को लेकर ग्राहवनीय अग्नि की उत्तर दिशा में वेदी के बाहर कुशों पर स्थापन कर उस समय इस मंत्र को पडै । इस मंत्र २ १ अध्याय। का अर्थ यह है कि हे मणीता जल को धारण करने वाले पात्र ! (त्वा)तुझको (का)कौन पुरुप, (युनक्ति)आइचनीय भग्नि के उत्तर भाग में स्थापन करता है, यह प्रश्न है, जो माल मेदों में जगत् का निर्वाह करने वाला प्रसिद्ध है, वह मजापति परमे- श्वर ही हे पात्र ! तुझको स्थापन करता है यह उत्तर हुआ। (कस्म)किस भयोजन के लिये(वा)तुझको(युनक्ति) स्थापन करता है ? यह प्रश्न है, (तस्मै ) तिस प्रजापति परमेश्वर की प्रसन्नता के अर्थ (त्वा) तुझको (युनक्ति) स्थापन करता है, (इसका ही निष्कर्ष श्रीकृष्णभगवान् ने गीता में अर्जुन से कहा है-"ब्रह्मार्पण मन हविर्मशाग्नौ ब्रह्मणाहुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमा- धिना ।। यत्करोपि यदश्नासि यज्जुहोपि ददासि यन् । यत्तपस्योग कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ दूसरे "कर्मण इत्यादि मन्त्र का परमेष्टी माजापत्य ऋपि माजा पत्या गायत्री छन्द, सुक् और शाभिमानी देवता तथाशू एवं अग्निहोत्रहवरणी के ग्रहण में विनियोग है ! कुशों का परिस्तरण . कर दो दो पात्रों को रखकर शूर्प और अग्निहोत्रहवणी को ग्रहण करे, उससमय इस मन्त्र को पहै। इस मन्त्रका अर्थ यह है कि-हे शूर्प! हे भोग्नहोत्रकी हरिण ! मैं (कर्मणे ) यज सम्बन्धी कर्म के निमित्त (वाम् ) तुम को, ग्रहण करता हूँ तथा (वेपाय) भूचित कम्मों में व्याप्ति के अर्थ (वाम्) तुम दोनों को ग्रहण क- रसा हूँ शकट [ गाड़ी में स्थित धान्यों को हवि के निमित अलग करना तथा मोक्षण करने के निमित्त जलको धारण करना इत्यादि भोग्नहोत्रहनणी [ काष्ठ के पात्रविशेप के व्यापार हैं। धान्यों का फ़टकना धारण करना और उलखलमें डालना फिर निकालना इत्यादि शर्प के व्यापार हैं)॥६॥ प्रत्युष्ट र रक्षः प्रत्युष्टाअरांतयः। निष्टप्न रक्षो निष्पता अरातयः । पुर्वन्तरिक्षमन्वैमि ॥७॥ इस करिडका में तीन मन्त्र है प्रथम "मत्युष्टं रसः प्रत्युष्टा -- शुक्लयजुर्वेद। अरातयः मन्त्र और द्वितीय "निष्टस रसो निहप्ता अरातयः" मन्त्र का परमेष्टी प्राजापत्य ऋपि आसुरी वृहती छन्द, रक्षोन्न देवता और अग्निहोत्रहवणी तथा शूर्प को तपाकर राक्षसों के ज लाने में विनियोग है । इन दोनो मन्त्रों में से किसी एक को प ढ़ताहुआ अग्निहोत्रहवणी और शूर्प को गाईपत्य अग्नि में सपाय इन दोनो मन्त्रों का अर्थ यह है कि अग्निहोत्रहवणी और सर्प के तपाने से इन में अपनी माया के बल से स्थित ( रक्षः) राक्षस जाति ( मत्युष्टम् ) एक एक करके दग्धहुई, (भरातयः) देवतामों को हविदेने में प्रतिवन्धक होकर यज्ञ में विघ्न करने वाले (मत्युष्टाः) दग्ध हुए } अपनी माया के मभाव से शर्प आदि के विर्षे गुप्त रूप से स्थित (रक्षः) राक्षस जाति (निष्टप्तम्) निःशेपरूप से सन्तप्त हुई, (अरातयः) यज्ञसिद्धि में विघ्नकरने वाले (निष्टप्ता.) निःशेषरूप से सन्तप्त हुए । तीसरे "उर्वन्तरिक्षमन्वेमि" मन्त्रका परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, प्राजापत्या गायत्री छन्द, रक्षोन्न देवता अवकाश में चलने में विनियोग है । धान्यों की गाड़ी के समीप जाताहुआ इस मन्त्र को पहै। इस मन्त्र का अर्थ यह है कि-(उरु) विस्तारयुक्त (म न्तरिक्षम्) अवकाश को अन्वेमि पाकर चलता हूँ अर्थात् जाने में मुझको विघ्नकर्ता प्रतिबन्धक न हों इसलिय यज्ञपुरुप परमेश्वर चलते समय मेरे दोनो ओर के राक्षसों को दूर करें ।। ७ ।। धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व त योऽस्मान् धूर्वति तं पूर्व यं वयं धूचीमादेवानाममि चन्हितम सस्नितम पर्मितमंजुष्टतमं देवहूतमम् ॥ ८॥ इस कण्डिका में दो मन्त्र हैं, प्रथम "धूरसीत्यादि" मन्त्र का पामेष्ठी माजापत्य ऋपि, यजुः, अग्नि देवता और अग्नि की प्रार्थना में विनियोग है । गाईपत्य अग्नि के पश्चात् भाग में स्थित सुन्दर अङ्गो वालाशकर छकडा होता है उसके धुर [वृपभ] जोतने के(स्थान ) को स्पर्श करता हुआ ."धूरसीत्यादि" मन्त्र .. ३ १ अध्याय।। को पड़, वृषभ को जोतने के स्थान में शास्त्र में वरिणत एक हिंसक अग्नि है, उसकी प्रार्थना करने का यह मन्त्र है । इस मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे अग्ने ! तुम (धूः) हिंसक दग्ध करनेवाले (असि) हो, भतः (धूर्वन्तम्) हिंसा करने वाले पाप को (पूर्व) विनष्टकरो, (यः) जो राक्षसादि, यज्ञ में विघ्न करके ( अस्मान) हम को(पूर्वति) हिंसा करने को उयत होता है, (सम )उसको एन जिस पालस्यादि रूप वैरी का (वयम्) हम(धूर्वामः) हनन करना चाहते हैं (सम्) उसको (पूर्व) विनष्ट करो ॥ दुसरे " देवानामसीत्यादि मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, यजुः, शकटाभिमानीदेवता और शकट के उपस्तम्भन नामक काष्ठ के पथाद्भाग में ईपा का स्पर्श करने में विनियोग है। गाड़ी के दी काष्ठ ईषा का अग्रभाग जिस में कि युग (जुमा) वाँधा जाता है भूमि में स्पर्श न हो इस कारण इस के रोकने के निमित्त एक काष्ठ लगाया जाता है उसको उपस्तम्भ कहते हैं, तिस उपस्तम्भ के पश्चाद्धाग में तिस ईपा का स्पर्श करता हुआ इस मन्त्र को पढ़े। इस मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे शकटाभिमानी देव ! (स्वम्) तुम (देवानाम्) देवताओं के (चन्हितमम्)प्रातिशय करकै बीहीरूप हधि के पहुँचाने वाले (सस्तितमम्) अत्यन्त शुद्ध (पमितमम् ). बीहियों करके अत्यन्त पूर्ण (जुष्टतमम् ) देवताओं के अत्यन्त मिय (देवहतमम् ) देवताओं का प्रतिशय करके आवाहन क रने वाले (असि) हो ( तुम मेरे ऊपर भी अनुग्रह करके अपनी सकल शक्तियों के द्वारा मेरे यज्ञ को पूर्ण करो)॥८॥. तमास हषिर्धान इछस्व माव्हार्माते यज्ञपतिदपीत्। विष्णुस्त्वा भामताम् ।उक याताय अपहतरक्षा यच्छन्तां पर्व ॥९॥ इस कण्डिका में " बहुत यहाँ से लेकर माव्हापात् पर्यन्त जो मन्त्र है वह पूर्व की अष्टम कण्डिका के अन्तिम मन्त्र का शेष है। शेष नवम काण्डका में चार मन्त्र हैं-प्रथम विष्णुस्त्वा- शुक्लयजुर्वेद। क्रमताम मन्त्र का परमेष्टी माजापत्य ऋपि, याजुपी गायत्री छन्द, शकटाभिमानी देवता और शकटपर भारोहण करने में विनियोग है । दूसरे"उरु वाताय मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, देवी पक्ति छन्द, शकटाभिमानी देवता और घीहियों के अवलोकन में विनियोग है। तीसरे " अपहत रक्षः"मात्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि. याजुपी, गायत्री छन्द, रक्षोदेवता और तृणादि के अपाकरण में विनियोग है । चौथे " यच्छन्तां पञ्च मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, देवी पक्ति छन्द, हवि देवता और हवि ग्रहण करने में विनियोग है। मापार्थः-यहुतमित्यादि प्रथम मन्त्र के शेप का अर्थ यह है कि- हे शकट के अभिमानी देव! तुम (अहुतम् ) अकुटिल हो [अतः चढ़ते समय टूटने का भय नहीं है ] (हविर्धानम् ) ग्रीहिरूप हानि के धारण करनेवाले (असि ) हो, (दंहस्व ) दृढ होवो (मा) मत, (व्हाः) कुटिल होवो, जिससे कि-(ते)तुम्हारा (यज्ञपतिः) यजमान,(माहापीत् ) यज्ञक्रिया में विघ्न रूप कुटिलतायुक्त नहो॥ विष्णुरित्यादि मथम मन्त्र को पढ़कर शकटपर प्रारोहण किया जाता है तिस मंत्र का अर्थ यह है कि-हे शकट (विष्णुः) सर्व- व्यापी यज्ञ पुरुप विप्णु भगवान् (त्वा )तुम्हारे ऊपर (क्रमसाम्) चहै, [इस प्रकार कर्म करने में अपनी निरभिमनिता दिखाई] ॥ उरु इत्यादि द्वितीय मन्त्र को पढ़कर शकट में के ग्रीहियों को देखाजाता है, इस मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे शकट ! अपने में स्थित ग्रीहियों के वि (वाताय)वायु का सवार होने के निमित्त, (उरु) विस्तीर्ण हो [इस मन्त्र से प्रीहिरूप हवि को वायुरूप प्राण का प्रवेश करके समाण कियाजाता है ] अपहरामित्यादि तीसरे मन्त्र को पढ़कर ब्रीहियों के ऊपर से तृण आदि अलग कियेजाते हैं, इस मन्त्र का अर्थ यह है कि- (रक्षः) राक्षम [यज्ञ विघातक तृणादि] (अपहतम् )दूरहुआ। • यच्छेत्यादि चौथे मन्त्र को पढ़कर शकट में से मुट्ठी भरकर F २२ १ अध्याय। । " वीहि लियेजाते हैं, इस मन्त्र का अर्थ यह है कि-( पञ्च ) पांच हुलियों की बँधीहुई मुट्ठी ( यच्छन्ताम् ) ब्रीहिरूप हचि को ग्रहण करें ॥९॥ देवस्य त्वा सवितुःप्रसवेऽश्विनौ हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्। अग्नये जुष्टं गृह्णामि अग्नीषोमाभ्यांजुष्टं गृह्णामि ।। १०॥ इस दशवीं कण्डिका में तीन मन्त्र हैं-उनमें से प्रथम "देवस्य त्वा सवितुः मसवेऽश्विनो हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्" मन्त्रका परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि, प्राजापत्या वृहती छन्द, सविता देवता और हवि के ग्रहण करने में विनियोग है । दूसरे " अग्नये जुष्ट्र गृह्णामि " मन्त्र का परमेप्री माजापत्य ऋपि माजापत्या गायत्री छन्द, लिङ्गोक्तदेवता और हघि के ग्रहण में विनियोग है। तीसरे "अग्नीपोमाभ्यां जुष्टं गृहामि मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, याजुपी पंक्ति छन्द, लिङ्गोक्त देवता और हवि के ग्रहण में विनियोग है ॥ भापाथ:--इस कण्डिका के तीनों मन्त्रों को पढ़कर हवि ग्रहण कियाजाता है और वह अग्निहोत्रहवणी में अग्नि के निमित्त चार मुट्ठी तदनन्तर अग्नि सोम के अर्थ चार मुट्ठी, तिस में से तीन मुट्टी मन्त्र पढ़कर और चौथी मुट्ठी मान होकर डाली जाती है इन तीनों गन्त्रों का अर्थ यह है कि-हे हवि ! (सवितुः) सब के प्रेरक (देवस्य ) ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर के (मसवे) प्रेरणा करनेपर (अश्विभ्याम् ) देवताओं के अध्वर्यु अश्निीकुमार की वाहुओं की करी है भावना जिन में ऐसे अपने बाहुओं से (पूष्णः) देवताओं के समीप उनके भागको देनेवाले पूपा देवता के (हस्ता- भ्याम् ) इस्वों की करी है भावना जिनमें ऐसे अपने हस्तों से, (अग्नये ) अग्नि देवता के अर्थ (मियम् ) प्रिय तुमको (गृहाम) ग्रहण करता हूं (थानीपोमाभ्याम् )अग्निसोमदेवताओं के अर्थ (जुष्टम् ) गिय वुमको (गृहामि ) ग्रहण करता हूँ । "सत्पं देवा अनृतं मनुष्याः" इस भुति के अनुसार देवता शुक्लयजुर्वेद । सत्यरूप हैं सो उनके नामके स्मरण के साथ हवि ग्रहण करने से यज्ञ सत्यफल और निर्विघ्न होगा । देवताओं का स्मरण न करके मनुष्यों का किया हुआ अनुष्ठान मनुष्यों के अनृतरूप (अमन-शीघ्रविनाशी) होने से अमृत (निष्फल) होता है ।। सर्वात्मक अग्नि के मंत्रों से अभिमंत्रित करेहुग हवि को ग्रहण करने में मनुष्य समर्थ नहीं हांसक्ता, अतः प्रार्थना करने पर पर- मेश्वर की यात्रा से बाहुओं में अश्विनी कुमार की बाहुओं की और हस्तों में पूषा देवता के हस्तों की भावना करनी होती है, क्योंकि --अश्विनीकुमार देवताओं के अध्वर्यु और पूपादेव देव- ताओं का भागधुक् है ॥ १० ॥ भतायाः त्वा नारीतये। स्वराभविख्येषम् । दृश्हन्तां दुर्योः पर्थिव्याम्। पूर्वन्तरिक्षमन्वमि । पृथिव्यास्त्वा नाभी सादयाम्यदित्या उपस्थेऽग्ने हृव्यरक्ष॥ ११ ॥ इम कण्डिका में पाँच मंत्र हैं-प्रथम 'भूताय त्वा नारातये' मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, प्राजापत्या गायत्री छन्द हविर्देवता, और व्रीहिशेष के विचार में विनियोग है। दूसरे 'स्वरभिविख्येपम्' मंत्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि याजुपी गायत्री छंद, सूर्य देवता और पूर्वाभिमुख होकर यज्ञभूमि के अवलोकन में विनियोग है। तीसरे 'इछ हन्तां दुर्य्याः पृथिव्याम्' इस मंत्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि प्राजापत्या गायत्री छंद, गृह देवता और शकट से उतरने में विनियोग है । चौथे 'उर्वन्तरिक्षम- न्वमि' मंत्र का परमेष्टी प्राजापत्य ऋपि, माजापत्या गायत्री छंद, शकट देवता और अन्तरिक्ष में चलने में विनियोग है, पाँचवें 'पृथिव्यास्त्वानाभा सादयाम्यदित्या उपस्थेऽग्नेहव्यशक्ष' मंत्र का परमेष्टी माजापत्य ऋपि साम्नी पंक्ति छंद, हविर्देवता और हदि के स्थापन करने में विनियोग है। इस कएिडका के प्रथम मंत्र को पढकर शकट में शेष रहे हुए बी 'हियों का अभिमर्शन कियाजाता है। इस. मंत्र का अर्थ यह है 1 २४ १ अध्याय कि-हे शकट में शेप रहे हुए नाहि! हम (त्वा) तुझे [ सद्भाव के अर्थ अर्थात् शेप रहे हुए तुम्हारे द्वारा अन्य याग ब्राह्मण भोजन तथा वीज बनाकर अन्यवहुत से ब्रीहियों की उत्पत्ति हो इसनिमित्त शेष छोडताई] (अरावये) कृपणता के कारण प्रदान के अर्थ (न) नहीं। दूसर मंत्र को पढ़कर पूर्वमुख होकर यज्ञभूमि को देखाजाता है, इस मंत्र का अर्थ यह है कि मैं (स्वः) यज्ञको (अभिविख्येपम्) दे (अर्थात् ईश्वर मुझको अन्न धनादि से सम्पन्न करें जिस से कि-मैं फिरभी अपने को ऐसाही यज्ञ करता देहर) तीसरे मंत्र को पढ़कर शकट परसे उतरै, इस मंत्र का अर्थ यह है कि-(पृथिव्याम् ) भूमि पर( दुर्याः) गृह ( हन्ताम् ) दृढ हों (हव्य लेकर ब्रह्मभाव को माप्तहुए उतरतेहुए अध्वर्यु के भार से गृहक्षोभ होने की सम्भावना है वह इस मन्त्र के द्वारा निवारण करीजाती है)। चौये मंत्र को पढ़कर उत्तर दिशा की ओर को चले, तिस मंत्र का अर्थ यह है कि-(उरु) विस्तीर्ण (भन्तरिक्षम् ) अवकाशको (अन्वोमे) अनुसरण करकै गमन करता हूँ। पाँचवें मंत्र को पढ़कर गाईपत्य वा आहवनीय अग्नि के पश्चात भाग में पूर्व में स्थित हाव को स्थापन कर, मंत्र का अर्थ यह है कि हे हवि मैं (पृथिव्या :)पृथिवी के (नामी ) मध्य में,(अदित्याः) देवमाता की (उपस्थे) गोद में (सादयामि ) स्थापित करता हूं. (भग्ने ) हे अग्ने ! (हव्यम् ) तुम्हारे समीप में स्थापन करहुए इस इविकी ( रस ) रक्षा करो ॥ ११ ॥ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौं। सवितुः प्रसव उत्युनाम्ध- छिद्रेण पवित्रैण सूर्यस्य रश्मिभिः । देवीरापो अग्रेगुपो अग्रोपुचोऽयं इममद्य यज्ञं नयता यज्ञपति ५ मुधातु युज्ञपतिं देवयुवम् ॥ १२ ॥ इस करिडका में तीन मन्त्र है-मथम "पवित्रे स्थो वैष्णब्यौ" ।
शुक्लयजुर्वेद । २५ मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, देवी वृहती. छन्द, लिङ्गीत देवता, और पवित्री के छेदन में विनियोग है। दूसरे "सवितुर्व इत्याद" गल का परमेष्ठी माजापत्य ऋषि, प्राजापत्या पङ्क्ति छन्द, पापोदेवता और जलके अतिशय करकै पवित्रकरने में विनि योग है। तीसरे "देवीरापो इत्यादि" मन्त्र का परमेष्टी प्राजापत्य ऋषि, यजुः श्रापो देवता और अतिशय पवित्र जल से पूर्ण अ- ग्निहोत्रहवणी को ऊपर चलाने में विनियोग है। इस बारहवीं कण्डिका के प्रथम मन्त्र को पढ़कर पूर्ण, अन्तर्गर्भ (जिसकी ते के भीतर से हों) एक समान दोकुशों को, पुरूप धनाए हुए अन्य कुशों से छेदन करें; मन्त्र का अर्थ यह है कि (पवित्रे) हे कुंशरूप शोधक दोनों पवित्रों ! (वैष्णव्यो )पसंबंधी (स्थः) हो (अतः तुम यज्ञमें सहायता देकर यजमान की अभीष्ट 'सिद्धिकरो)। दूसरे मन्त्र को पढ़कर, अग्निहोत्रहवणी में जल डालकर पूर्वो क्त दोनों कुशों से पवित्र करै-मन्त्र का अर्थ यह है कि हे जलों ! (स. वितुः) मेरक परमात्मा के (मसके) मेरणाकरनेपर (प.) गुमकों (अच्छिद्रेण) अच्छिद्र (पवित्रण)वायुकी समान शोधक पवित्र के द्वारा (सूर्यस्य) सूर्यकी (रश्मिभिः) किरणों के द्वारा (उत्पुनामि) पवित्र करता हूँ। सीसरे मन्त्र को पढ़कर, पूर्वमन्त्र से पवित्र करेहुए जलों से.भरी हुई अग्निहोत्रहवणी को वाम हाथ पर स्थापन करके दाहिने हाथ से ऊपर को चलाये मंत्र का अर्थ यह है कि-(देवी:.).हे मकाशमान, (अंग्रेगुवः) मथम समुद्र को माप्त होनेवाले (अग्रेपुवः) जहाँ जाओ उस स्थान को प्रथम पवित्र करनेवाले अथवा. सोम रसका पान करनेवाले (आपः)जलों (अय) आज मुन्दरदिन में मवर्तमान (इमम् ) इस (यहम् ) दर्शपौर्णमास नामक ज्ञको (नयत) निर्विघ्न समाप्त करो, (मुधातुम् ) दक्षिणादि के द्वारा याको पुष्ट करनेवाले,(यज्ञपात में) यज्ञका पालन करने(देवयुषम्) A - ४ १ अध्या। देवताओं को या में एकत्र करनेवाले अथवा यापुरुष परमेश्वर की कामना करने वाले ( यज्ञपतिम् ) यजमान को (नया) यज्ञका फल माप्त कराओ ॥ १२॥ सुष्मा इन्द्रोऽवृणीत त्रतूर्ये यूयमिन्द्रमणीध्वं वृत्रतये प्रोक्षिता स्थ । अग्नये त्वा जुलं मोक्षामि। अग्नीपोमाभ्यां "स्था जुनं प्रोक्षामि । दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्याये पदोऽशुद्धाः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छन्धामि ॥१३॥ इस तेरहवीं कपिटका में प्रथम का"युप्मा इंद्रोऽणीत वृत्रतूर्ये 'यूयमिन्द्रमणीवं त्रनू" इराना भाग मथम काण्डका के भातेम मंत्र का शेष है। आगे चार मंत्र है-उन में से मथम प्रोक्षितास्थ' मिका परमेष्टी प्राजापत्य ऋापे दैवी बृहती छन्द,पापो देवता और जलों के मोक्षण करने में विनियोग है । दूसरे "अग्नये त्वा जुष्टं मोक्षामि' मंत्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि- याजुपी वृहती छन्द. 'लिशक्ति देवसा और देवतानामोचारण पूर्वक हवि के मोक्षण कर 'ने में विनियोग है तीसरे "अग्नीपोमाभ्यां त्वा जुष्टं मोक्षामिमंत्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, याजुपी त्रिगुप्छन्द लिङ्गोक्त देवता भार देवतानामोचारणपूर्वक हचि के मोक्षण करने में बिनियोग है। चौथे "दैन्याय कर्मणे शुन्धर्व देवयज्यायै यवोऽशुद्धाः परा अध्नुरिदं वस्तच्छुन्धामि" मन्त्र का परमेष्ठी भाजापत्य ऋपि, यजुः, पान देवता और यज्ञपात्रों के मोक्षण करने में शिनिपोग है ॥ "भावार्थ-पूर्वमन्नशेप " युप्मा इत्यादि सूत्रतूर्ये पर्यन्त " का अर्थ यह है कि-हे जलों ! (इन्दः) इन्द्र (इत्ततूर्ये) वृत्रासुर के धके (निमित्व (युष्मा )तुमको ('अणीत) सहायता के निमित्त चाँहा- साहुआ और (यूयम्) तुमने ( इन्द्रम् ) इन्द्र को (स्त्रपूर्ये ) त्रासुर कानामत्त, (अत्रणीध्वम्)महायता देवेहुए (इसीमकार यह यजमान अपने पापकी निवृत्ति केअर्थ तुमसे मार्थना करता है तुमभी पापको सकरम के निमिचइस यजमानको पाँहो)। इसकपिएका के प्रथम मन्त्र को पढकर अल्लाका प्रोक्षण किया शुक्लयजुर्वेद । जाता है, अर्थ यह है-हे जलों ! तुम (मोक्षिताः) मोक्षित (स्थ) हो [क्योंकि विना संस्कार हुए औरों को संस्कृत (शुद्ध)करने को समर्थ नहीं होसक्ने] दूसरे मन्त्रको पढकर अग्नि देवता के निमित्त इविका मोक्षण किया जाता है,मन्त्रका अर्थ यह है कि-देहवि ! (अग्नये) अग्नि देवता के निमित्त (जुष्टम् ) मिय (त्या)वुमको( मोक्षामि)मोक्षण करताहूं।। तीसरे मन्त्र को पढकर अग्निसोम के अर्थ हवि का मोक्षण किया जाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे हवि! (अग्नीपोमाभ्याम्) अग्नीपोम देवता के निमित्त(जुष्टम् )मिय(वा)तुम को(मोक्षामि) मोक्षण करता हूँ। [इसीप्रकार अन्यदेवताओं के हरियों का भी मोक्षण करें] चौथे मंत्र को पढकर कृष्णाजिन उलूखलादि अन्य यज्ञ के पात्रों को मोक्षण कियाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि हे यज्ञ के पात्रों (दैव्याय) ईश्वर सम्वन्धी (देवयज्यायै देवता सम्बन्धी(कर्मणे) दर्शादि यागकर्म के निमित्त (शुन्धध्वम्)तुम शुद्ध होवो,(अशुदाः) नीचजाति बढई आदि ( यत् ) जो (व)तुम को ( पराजघ्नुः) अंग को छीलन आदि के समय अपने हस्तस्पर्श से अपवित्र करते हुए (तत्)सो (इदम् ) इस ( वः)तुम्हारे अंग को(शुन्धामि) मोक्षणादि से पवित्र करता हूँ ॥ १३ ॥ शम्मासि अवधूत रक्षोऽर्धघृता अरातयः। अदित्या- स्त्यास प्रति स्वादितिर्वेत्तु । अबिरसि वानस्पत्यः प्राचासि पृधुवुनः प्रति स्वादित्यात्त्ववेत्तु ॥ १४ ॥ इस चौदहवी कण्डिका में पाँचमन्त्र है-मयम"शर्मासि मंत्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋषि, दैवी अनुगुप् छन्द, कृष्णाजिन देवता और कृष्णाजिन को ग्रहण करने में विनियोग है। द्वितीय"अब धूत शक्षोऽवधूता अरातयः,, मंत्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋषि, भासुरी भनुएप् छक, रक्षो देवता और राक्षसदरीकरण में विनि- योग है। तीसरे" अदित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु मन्त्र का २८ १ अध्याय। . परमेष्ठी माजापत्य ऋषि, बासुरी अनुष्टुप्छन्द, कृष्णाजिन देवता और कृष्णाजिन के विवाने में विनियोग है । चौथ "अद्विरसि चानस्पत्यः' मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि, याज़पी अनुष्णुए इन्द,उलूखल देवता और कृष्णाजिनपर उलूखल रखने में विनियो- गह पाँव"णवासि पृयुबुध्न प्रतित्यादिलास्त्यम्पेत्तु ,मन्त्रका पर मेष्ठी माजापत्य ऋपि, आसुरी गायत्री छन्द, उलखल देवता और कृष्णाजिन पर उलखल रखने में विनियोग है। ; प्रथम मंत्र को पढकर कृष्णाजिन (छपण मृगका चर्म:) ग्रहण किया जाता है, मन्त्रका अर्थ यह है कि-हे कृष्णाजिन ! तू उनखल के धारण के निमित (शर्म ) मुख का हेतु (असि) है। याद तुझको हम शासकी विधि के अनुसार कृष्णाजिन पैरख कर यज्ञको पूर्ण करैतिस तेरा अभिमानी देवता हमको मुखदेय)। दूसरे मन्त्र को पढ कर पात्रों से अलग कर मृगचर्म को झाडा जाता है---मंत्र का अर्थ यह है कि कृष्णाजिन के झड़ने से उस में छुपाहुआ (रक्षा) राक्षस (अधूतम् )अलग गिरा दिया और (परावयः)पज्ञ में विघ्न करने वाले शत्रु भी(अंधूनाः) गिरांदिये। तीसरे मंत्र को पड़कर दोनों हाथों से कृष्णाजिन को इसमकार विवाव दिनधि को श्रीवा रहै, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे कृष्णा बिन तू (अदिलाः) भूमिदेवता का (त्वक् ) चर्मरूप (असि )२ इस कारण (अदितिः) भूमि देवता (वा) तुझयो (प्रतिवेत्तु) ग्रहण करके अपना दी जाने । चार्य मंत्र को पढकर कृष्णाजिन पर उलूखल रक्स मंत्र का पर्य यह है कि वे जलखततू( भादिः)वीहियादिका विदीर्ण करने पाला है और ययपि (धानसत्यः)काष्ट का है परंतु (ग्राबा) बढ होने के कारण पापाणु की समान (असि) है। * पुरा यसो देवो कटः कृष्णमृगो भूस्वागमसदा देवा भावातदीयां स्वचनाधिप जस्तस्मावास्सरणमित्यभिप्रायः प्रतावानात१।१।।१॥
शुक्लयजुर्वेद। पाँचवें मंत्र को पढकर भी* कृष्णाजिनपर उलखल रक्खाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे उलखल ? (पृथुवुनः)राजह स्थूल है ( मसल लगने के आधार से दिले नहीं यह उलखलाभ देवता से प्रार्थना की जाती है ) अतः दृढता में पापाण की समान है, (अदित्याः) नीचे विाईहुई कृष्णाजिनरूप भूमि की (त्वक खचा (वा)तुझको (मसियत्तु ) अपना करके जाने अर्थात् अपने भनके अभिमान से चेतन करै ।। १४ ॥ अग्नेस्तनरसि वाचो बिसर्जन देववीतये वा गृहामि ।वृहद्गाचासि वानस्पत्यास इदं देवे- भ्यो हविः शमीप्य सुशाम शमीप्य । होप- एकदेहि हविकृदेखि हविष्फदेहि ॥ १५ ॥ इस कण्डिका में चार मंत्र है-मयम "अग्नेस्तनूरसि बाचो विसर्जन देनीवये स्वागृणामि" मंत्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋषि आर्ची उष्णिक छन्द, हवि देवता और हरि का भावपन करने में विनियोग है। दूसरे "वद्यावासि वानस्पत्यः” मंत्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋपि आसुरी जगी छन्द, मुसल देता और मुसल के ग्रहण करने में शिनियोग है। तीसरे "स इदं देवेभ्यो हविःश, मी व सुमि शमीप्व' मंत्र का परमेष्टी माजापत्य ऋपि, यजुः मुसल देवता और मुसल को उलूखल में स्थापन करने में विनि- योग है। चौथ "इविष्फदेहि हदेहि हविष्कददि, मंत्र का पर- मेष्ठी माजापत्य ऋपि, याजुपा पंक्ति छंद, वाग्देवता और हवि का संस्कार करनेवाले का आहान करने में विनियोग है। पहिले मंत्र को पढ़कर हवि छोड़ने के निमित्त ओखली में हालाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि ई हवि ! (जलों के मणयन काल में मौन हुई यजमान की वाणी हविके आवपन के * कृष्णाजिन पर उछूखल रखने मचाय और पांच दोनो मन्त्रों का विकल्प है अयोर चाहें चौधे को पाकर रवरी और चाहे पांचों को पाकर रफ्नै परन्तु"प्रति पाविस्पास्ववेत, यह दोनो ही मन्त्रों में पड़ना पड़ता है। : , १ अध्याय समय में खुलती है भवः)(वाचः) वाणी का (विसर्जनम् ) खोलनेवाला, (अग्नेः) भाग्नि का (वनू.) शरीर (पास) है। (क्योंकि-हाचे अग्नि में डालते ही अग्निरूप होजाता है) (देववीतये ) देवताओं की तृप्ति के लिये (त्वा)तुझको (गृहा- मि) ग्रहण करता हूँ। दूसरे मन को पढकर मुसल को हाथ में लियाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि---हे मुसल ! तू (वानस्सत्यः ) काष्ठ का वनाहुआ (ग्रावा) पापाण की-समान हड़ (बृहत ) महान् (असि ) है। सीसरे मंत्र को पढकर मशल उलूखल (ओखली) में स्थापन कियाजाता है, इस मंत्र का अर्थ यह है कि-हे मूसल ? (सः) घह (त्वम् ) तू (देवेभ्यः) आग्नि आदि देवताओं के उपकार के निमित( इदम् ) इस हवि को (शमीय) भूसी आदि को दूर करके शान्तरूप करो तथा ( मुशमि) भूसी दूर होनेपर तण्डुलों के ऊपर की मलिनता को भी दूर करकै (शमीप्व)शान्तरूपकरो। चौधे मंत्र को पढकर अध्वर्यु हरि को कूटने के निमित्त यजमान की पत्नी ना और जो कोई हो उसको तीन बार पुकार कर बुलावे मंत्रका अर्थ यह है कि-(इविष्का ) हे हवि का संस्कार करने वाले (एहि) आओ ( हविष्कृत् ) हे हवि का संस्कार करनेवाले (पहि) शाओ ( हविष्कृत ) हे हवि का संस्कार करने वाले (पहि) यायो [सीन वार कइहुए थर्थ को देवसा मानते है इस कारण तीन वार बाहान है] ॥ १५ ॥ कुक्कुटोसि मधुजिव इपमूर्जमाट त्वर्यालयास- घात संघात जेष्म ।वर्षद्धमासि प्रति त्वा वर्ष वेत्तु । परापूतछ रक्षः परापूता अरोतयः। अपहत छ रक्षः। वायुर्वो विविनक्तु । देवोवः सविता हिरण्य- पागिः प्रविगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना ॥ १६ ॥ इस करिडका में सास मन्त्र है-भयंम "कुक्कुटोऽसि मधुजि - + शुक्लयजुर्वेद। इषमूर्जमावद त्वया वयं संघातं संघातं जेष्म" मन्त्र का परमेष्ठी भाजापत्य ऋपि, आर्ची त्रिगुप् छन्द, वाक् देवता और शम्या से दृषत् उपल को कूटने में विनियोग है । दूसरे "वर्पबद्धमसि"मन्त्र का परमेष्ठी माजापत्य ऋषि, याजुपी गायत्री छन्द, सूर्य देवता और शर्प के ग्रहण में विनियोग है। तीसरे "गति त्वा वर्षद्धं चेत्तु' मन्त्र का परमेष्टी माजापत्य ऋपि.याजुपी वृहत्ती छन्द, हवि देवता और हवि को उलूखल से बाहर निकाल कर शूर्प में डालने में विनियोग है। चौथे "परापूत छ रक्षः परापूता अरातयः मन्त्र का परमेष्ठीमा- जापत्य ऋपि, प्रामुरी उष्णिक छन्द, रक्षो देवता और निष्पवन करने में विनियोगदै । पाँचवें "अपहतछ रक्षः" मन्त्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋपि, याजुपी गायत्री छन्द, रसो देवता और भूसी को दूरकरने में विनियोग है । छठे "वायुओं विविनक्तु" मन्त्र का परमेष्ठी प्राजापत्य ऋषि, याजुपी उप्णिक् छन्द, तण्डुलाभिमानी देवता और भूसीमिलतएदुलों को पृथक् करने. में विनियोग है। सातवें "देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पा- णिना" मन्त्र का परमेष्टी प्राजापत्य ऋपि, साम्नी त्रिगुप् छन्द, राण्डुलाभिमानी देवता और तण्डुलों को पात्र में रखकर श्रमि- मन्त्रण करने में विनियोग है। भावार्थ--पहिले मन्त्र को पढकर शम्या से दृपद् और उपल को कूटानाता है * मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे शम्या नामक * मन राजा का एक पभ था, उस टपभ में असरों की नाश करनेवाली वाणी स्थित धी अतः उस अपम के शब्द करनेपर तिस शब्द को सुनतेही असुर मरण को प्राप्त होगाते थे, इसकारण फिलात और अकुली मामक असरपाजकों (अरों को 'यज्ञ करानेवालों) ने मनुके पास जांकर तिस उपभ के द्वारा ही यज्ञ कराया, तब । यह पभ को असरनी वाक् मनुको घी में प्रविष्ट होगई, तब तोउन असुर याजको पे उस श्री के द्वारा भी मनुको यज्ञ कराया, तब वह भरनीवार यज्ञके शास्त्रों में प्रविध होगई, अतः असरों का तिरस्कार करने के निमिरा उस असरनी वाक् प्रकट करने की इच्छा से शम्या से दृषद् और उपल को कूटाजाता है पर श्रुति का । धन ? (पत०१।१।४।१५) १ अध्याय। यज्ञ के श्रायुध के अधिष्ठात्री देवता !तुम ( कुक्कुटः),कुकुट अर्थात् यज्ञ में विन्न करनेवाले असुर कहाँ कहाँ है, यह जानने के लिये उनको मारने के अर्थ सर्वत्र विचरते हो, अथवा असुरों को भय. भीत करने के निमित्त कुक्कुट की समान शब्द करनेवाले ( मधु- जितः) मधुरभापिणी जिज्ञावाले देवताओं के भृत्य (प्रासे) हो, हम को (इपम् ) अा को और ( ऊर्जम् ) बलदायक रसको (भावद)बोलो अर्थ तुम अपना शब्द करकै असुरों को यन्त्र- भूमि से दूरकरो जिससे कि-(त्वया) तुम्हारे द्वारा (वयम् ) हम (संघातम् संघातम्) मत्येक समूह को (जेप्म )जीते। हम निर्वि- नता के साथ यज्ञ करें और उस यज्ञ के द्वारा वर्षा होकर हमको भत्र और बलकारक रसकी माति हो, जिससे कि हम बलिष्ठ होकर मत्येक संग्राम में यमुरों मोजी और कदापि हमारा पराजय न हो। दूसरे मन्त्रको पढ़कर श ग्रहण कियाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे शू ! (वर्षद्धम् ) वर्षा के जल से बढ़ी हुई वेणुश- लाका (तुली)ओं के बने होने के कारण वर्षद्ध (पास) हो (अत:तुम्हारा अभिमानी देवता इस यज्ञ में सहायता देकर तुम्हारी वृद्धि की कारणरूप वर्षा को यज्ञ के द्वारा करावै)। सीसरे मन्त्रको पढ़कर हवि को पोखली में से बाहर निकालकर शर्प में डालाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे इवि! (वर्षद्धम्) शाभिमानी देवता (त्या)तुझको (मतिवेत्तु ) अपना करकै जाने (क्योंकि-शर्प और तुम दोनो दृष्टि से वृद्धि को माप्त हुए हो)। चौथे मन्त्र को पड़कर हति फटकाजाता है अर्यात् भूसी उससे पृथक् करकै नीचे गिराई जाती है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(रक्षः) राक्षसों को ( परापूतम् ) दरकिया (अरातयः) आलस्यादिशत्रु (परापूताः) निरादर किएगए।(अर्यात गर्प से भूसी को दूरकरनेपर उसमें माया से छुीहुई राक्षस जाति को भी दूरकिया )। पाँच मन्त्र को पढ़कर पृथिवी पर गिरीहुई हावं की भूसी को उठाकर कूड़े के स्थानपर डाले, मन्त्र का अर्थ यह है कि:-(रक्षा) - शुक्लयजुर्वद। राक्षस का (अब्रतम्) दूर लेजाकर मारा (अर्थात् भूसी में माया से स्थित राक्षसों को भी भूसी के साथ हवि से मय किया)। छठे मन्त्रको पढकर भूसी के चावलों में से विनाभूसीकों को पृथक् कर मन्त्र का अर्थ यह है कि-दे तण्डुलों ! (वायुः शूर्प के चलाने से उठाहुावायु (व.) तुमको (विविनक्तु) मूक्ष्मकणोंसे पृथक्करे। सातवें मन्त्र को पढकर शूर्प में के तण्डुलों को किसी पात्र में डाल कर अभिमन्त्रण कर, मात्र का अर्थ यह है कि-हे तण्डुलों! (हिरण्यपाणि:) हिरण्यपारिण(सुवर्णीकी अंगूठी आदि आभूपण युक्त हैं हाय जिसके, अथवा दैत्यों ने माशिन के प्रहार से सविता के हाथ कारदिये थे उनको देवताओं ने हिरण्यमय किया यह वव्हच कहिये ऋग्वेद के किसी सक्त की कथा है इस कारण हिरण्यपारिण) (सविता) सचिता (देवः) देव (व:) तुमको; (विविनक्तु) मिलित है अलिये जिसमें ऐसे हायसे (मविगृभ्णात् )स्वीकार करे( जिस से कि पात्री में डालते समय तण्डुलं भूमि में न गिरें)॥ १६ ॥ धृष्टिरसिं । अपांग्ने अग्निमामाद जहि निष्क्रयाद सेध । आदेवयज यह। धुवमसि पृथिवी हे सहनाम वान वा क्षनि सजानुचन्युप॑दधामि भ्रातृव्यस्य बधार्य ॥ १७॥ इस कंडिका में चार मन्त्र हैं । मधम "धृष्टिरसि" मन्त्र का पर- मेष्ठी माजापत्य ऋपि, दैवी बहती छन्द-उपवेप देवता और पलाश शाखा का उववेप ग्रहण करने में घिीनयोग है । दूसरे"अपाग्ने - ग्निमामादं जहि निष्क्रपादं सेध'मन्त्रकामाजापत्य परमेष्ठी ऋषि प्राजापत्या अनुष्टुप् बन्द, अग्निदेवता और अङ्गारों को पूर्वभाग में स्थित करने में विनियोग है । तीसरे "श्रादेवयजं वह मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि,दैवी जगसी छन्द,अग्नि देवता और अङ्गारों में से उपवेप से एक प्रकार को अलग करने में विीनयोग है। चाये "ध्रुवमसि पृथिवीं दंह ब्रह्मपनि त्वा क्षनवनि सजाववन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय,, मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, यजु, क- १ अध्याय। पन्त देवता और अङ्गार को कपाल से ढकने में विनियोग है ।। भावार्थ-प्रथम मन्त्र को पढकर उपवेप (पलाश की शाखा को मूलसे काटकर लिए हुए काष्ठ के भाग) को ग्रहण किया जा है, मंत्रका नर्थ यह हैकि- उपरेनू (ष्टिः) धष्ट जाज्वल्यमान शंगारों को इधर उधर हटानेशला ] (असि) [इस यज्ञ में भी तेरा अभिमानी देवता तुझ को अङ्गारों को इधर उधर हटाने को शक्ति देय]] दुसरे मन्त्र को पढकर उपवेप से गाहपत्य अग्नि में से तीन ग्र- शारा को पूर्वभाग में अलग करा जाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(आग्ने ) हे गार्हपत्य अग्ने : ( आमादम् ) गिस में याग की योन्यता नहीं है ऐसे अपक्क भक्षण करनेवाले (अग्निम् ) लौकिक अग्नि [लीवित सोमनामक अपनरूप] को अपजहि त्यागो गया (व्यादम्)शवका दाहकरने के समय मांसभक्षणकरनेवाले चिताग्नि [ चिताग्नि नामक अपने कंप] को भी (नि:पेध ) त्यागो । तीसरे मन्त्र को पढकर उपवेप से अलग करेहुए अहारों में से . एकप्रहार लियाजाता है,मन्त्रका अर्थ यह है कि-हेअग्ने देवयंजम्) देवताओं के अर्थ याग करने के योग्य सीसरे अग्नि [ अपने रूप) को (आवह ) हमारे समीप में प्राप्त करो। चौथे मन्त्र को पढकर उस अलग करेहुए अङ्गार को कपाल से इकाजाता है, मन्त्रका अर्थ यह है कि हेपाल ! (ध्रुवम्) स्थिर ( असि) है [ क्योंकि-अङ्गार के अपर स्थित होकर इधर उधर को चलायमान नहीं होता है । (पृथ्वीम् ) पृथ्वी को (इरह)दृढ कर [ निप्त से कि-पुरोड़ाश का पाक करने के समय तेरे व्यर- भान से भामे को अग्नि के दाह से शिथिलता न हो अर्थात् जल कर घसक न जाय ] और ( ब्रह्मवनि)उरोहाश वनान के निमित्त ब्राह्मण से स्वीकार करे हुए, (क्षनवनि ) क्षत्रिय करके स्वीकार . हुये एवं ( सजावनि ) यजमान के सजातियाँ करके सी. कार कर हुए. (वा) तुझ को मैं (भ्रातृव्यस्य) असुर और पाएँ शुक्लयजुचंदा १५ का ( वधाय) नाश करने के निमित्त ( उपचामि) अङ्गार पर स्थापन करता है ।। १७ ।। . - अग्ने ब्रह्म-गृभणीव । धर्णमस्यन्तरिक्ष दृह नया पनि त्वा क्षत्रनि सजातवन्युपधामि भाव्यस्य अधाय । धुर्वमसि दिवं दृह ब्रह्मवनि त्वा क्षति सजातवन्युपंदधामि भ्रातृव्यस्य बधाय। विश्वाभ्य- स्त्वाशाभ्य उपदधामि । चितं स्थार्श्वचितः। भृणाम बिरसा तपसा तप्यत्वम् ।। १८ ॥ • इस कण्डिका में छः मन्त्र हैं-प्रथम "अग्ने प्रह्मगृभ्णी' मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, याजुपी उष्णिक छन्द, अग्नि देवता और स्थापन में विनियोग है । हमरे "धरुण मस्यन्तरिक्षं देह ब्रह्मपनित्वा क्षत्रवनि सजात वन्यु पदधामि भावव्यस्त वधाय"मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, पन्हा,कपालदेवता और पूर्व स्थापित कपाल के पश्चिमभाग में द्वितीय कपाल के स्थापन करने में त्रिी योग में । तीसरे "मसि दिवं दृछह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रनि स- जातवन्युपधामि भ्रातृव्यस्प वधाय'' मन्त्र का माजापत्य पर- मेष्ठी ऋपि, आर्ची विणए छन्द, कपाल देवता और प्रथम क- पाल के पूर्वभाग में तीसरे कपाल को स्थापन करने में विनियोग है। चीये "विश्वाभ्यस्त्ताशाभ्य उपदधामि” मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋोप, याजुपात्रिष्टुपछन्द, कपाल देवगा और मथम क- पालके दक्षिणभाग में चतुर्थ कपाल को स्थापन करने में विनियोग है। पांचवें "चितस्थोचित मात्रका प्राजापत्य परमेमी ऋषिय, माजुपी गायत्री छन्द, कराल देना और दक्षिण एवं उत्तर में हो २ कपाल स्थापन करने में मिनियांग है । इठे " भृगूणामदि- रसां तपसा तप्यध्वम् " मन्त्र का मानपत्य परमेष्ठी मृपि, प्रा. मुरी अनुग्रुप् छन्द, कपाल देवा योर माहरों से कगालों के छादन करने में विनियोग है। मामार्थ:-प्रथम मन्त्र को पढ़कर सम्म हाथ की अंडलि करके १ अध्याय। शून्य में प्रकार को स्थापन कियाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है . कि-(मग्ने ) हे स्थापन करेहुए अङ्गार रूप अग्ने ! (ब्रह्म) हमारे करहुए मौढ़ कर्म को वा ब्राह्मण को (गृभ्णीष ) ग्रहण करो अर्थात् हमारे ऊपर अनुग्रह करके इस कर्म में विन करने वाले राक्षसों को वध करके इस यज्ञ को पूर्ण करो अथवा हे अग्ने ! मुझ वालण के ऊपर अनुग्रह करो अर्थात् अग्नि के विर्षे लगी हुई मेरी अंगुलि को दृढ करो जिससे दाहजनित पीडा न हो । दूसरे मन्त्र को पढ़कर पूर्व स्थापित कपालके पश्चिम में दूसरा कपाल स्थापन कियाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे दूसरे कपाल के अभिमानी देव ! तुम (धरुणम् ) पुरोड़ाश धारण क- रनेवाले (असि) हो, इस कारण (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष को (दृह) दृढ़ करो, [जिससे कि पुरोड़ाश के पाकसे उत्पन्न हुई ज्वाला करकै अन्तरिक्ष में उपद्रव न हो यद्यपि यह कपाल, ज्वाला और अन्तरिक्ष के बीच में व्यवधान करनेवाला नहीं है तथापि अन्तरिक्ष की दृढ़ता के निमित्त कपालाभिमानी देवता की मार्थना कीजाती है.] हे कपाल ! पुरोदाश सिद्धि के लिये ( ब्रह्मानि) ब्राह्मणों करके स्वीकार करहुए (क्षत्रवान)क्षत्रियों करके स्वीकार करेहुए और ( सनातवाने ) यजमान के सजातियों करके स्वीकार करहुए (स्वा) तुमको (भ्रातृव्यस्य.) शत्रु वापाप का (बधाय) बध होने के लिये ( उपदधामि) स्थापन करता हूं। सीसरे मन्त्र को पढ़कर पूर्व स्थापित कपाल के पूर्व में तृतीय कपाल स्थापन कियाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे तृतीय कपालाभिमानी देव ! तुम (धम् ) पुरोडास को धारण करने वाले (असि ) हो, तुम (दिवम् ) द्युलोक को (ह) दृढ़करो [अर्थात् यज्ञ समाप्ति में साधन होकर धुलोक को वर्षा करनेवाला करो] पुरोगांशा सिद्धि के निमित्त (ब्रह्मवाने ) ब्राह्मणों करकै मार्थना करेहुए (क्षत्रवनि ) क्षत्रियों करके मार्थना करेहुए सथा (सजारावनि ) यजमान के सजातियों करकै मार्थना करेहुए (वा) शुक्लयजुर्वेद । तुझको (भ्रावृव्यस्य ) शत्रु वा पापका (वधाय) वध होने के लिये (उपदधामि ) स्थापन करता हूं। चौथे मन्त्र को पढ़कर पूर्वस्थापित कपाल के दक्षिण में चतुर्थ कपाल को स्थापन कियाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-हे चतुर्ध कपाल ! (विश्वाभ्यः) सकल (अाशाभ्यः) दिशानों की दृढ़ता के लिये तुझको (उपदधामि ) स्यापन करता हूं। [इस प्रकार तीन कपालों को स्थापन करने से यजमान त्रिलोकी जीतता है और चौथे से दिशाओं को जीतता है, अर्थात् उन कपालों में का पुरोड़ाश त्रिलोकी रूप होकर देवताओं को वृत करता है ] आग्नेय पुरोडाश अष्टाकपाल [आठ कपालों में पकाया हुआ होता है, उनमें से चार कपाल तो उपरोक्त मन्त्रों से स्थापन कियेगये, शेप चार कपालों में से दो २ पांचवे मन्त्र को पढ़कर दक्षिण और उत्तर में स्थापन किये जाते हैं, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे कपाल वि- शेपों ! तुम (चितः) प्रथम कपाल का तथा (अचिराः) ऊर्ध्व स्थापित द्वितीयादि कपाल का उपकार करनेवाले (स्थ) हो। पष्ठ मन्त्र को पढ़कर आगारों से कपालों का आच्छादन किया जाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे कपालों! तुम (भृगूणाम् ) भृगु और (अङ्गिरसाम् ) अङ्गिरा नामक देवर्षियों के (तपसां) तपो रूप अग्नि से ( तप्यध्वम् )तप्त होवो [अर्थात् तुम्हारे अभि- मानी देव तुम्हारे विपै भृगु और अङ्गिरा नामक देवर्षियों का 'तपोरूप रोज प्राप्त करें] ॥ १८॥ .. शमीसि। अवधूत रक्षाबंधूता अरोतयः । अदित्या स्स्वर्गमि प्रति स्वादिनिवेत्तु विपणासि पर्वतीपति- त्वादित्यास्त्ववेत्तु । टिव स्कैम्भानीरसि । धिपणास पार्यनयी प्रति त्या पर्वती बत्तु॥१९॥ इसाकाण्डका में बगान है-मथम शम्मासि मंत्र कामा. जापत्य परमेष्टी.ऋपि, देवी अनुष्टुप्छन्दः कृष्णाजिन देवता और कृष्णाजिन के ग्रहण में विनियोग है। "दूसरे अवधूत छरक्षो । -- १ अध्याय। ना अगतयः मन्त्र का परमेष्टी प्राजापत्य ऋपि, आमुरी जि छंद, सो देवता और राक्षस नथा शत्रुओं के अपाकरण में विनियोग है । नसिरे "अदित्यास्त्वमसि मनित्वादिनित्तु" मंत्रका माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, प्रामुरी अनुष्टुप् छंद, कृष्णाजिन देवता और कृष्णा जिनकोविदान गविनियोग है । चौथे "धिप- रणासि पर्वनी प्रति वादित्यास्त्वम्चेतु" मंत्र का प्राजापत्य परमेष्टी पि, प्रामुरी गायत्री बन्द, दृष्ट दभिमानी देवता और मृग चर्म पर शिला को स्थापन करने में विनियोग है। पांचवें “दिवस्क- भनीरसि" मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, याजुपी उणिक छंद, शम्या देवता और शिला के पश्चाद्भाग में नीचे से शम्या रखने में विनियोग है । छठे " धिषणासि पार्वतेयी मतिया पर्वती वेत्तु" मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, प्राजापत्या अनुगुप् छंद, उपल देवना और ऊपर की शिला को ग्रहण करने में विनियोग है ।। भावार्थ-प्रथम मंत्र को पढ़कर मृगचर्म ग्रहण किया जाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि--हे मृगचर्म के अधिष्ठातृ देव ! तुम (शर्म) मुख के हेतु ( असि) हो। दूसरे मंत्र को पढ़कर राक्षसादि दूर किये जाते हैं, मंत्र का अर्थ यह है कि ( रसः) राक्षस जाति (अपहसम्) दूर हुई,(अरातयः): आलस्पादि शत्रु (अवधूताः)निरादर किये गए।.. तीसरे मेत्र को पढकर मृगचर्म विछाया जाता है,मंत्र का अर्थ यह है कि-दे मृगचर्म तुम (अदित्याः) मामि देवता के (त्वक्) त्वचा रूप) असि) हो, (अदितिः )भूमि देवता (त्या)तुमको (प्रति- वेनु)अपना करकैजाने । चीये मंत्र को पढकर मृगचर्म के अपर शिला रिवाई जाती है मंत्र का अर्थ यह है कि-हे शिला! तुम (पर्वती) पर्वत की पुत्री (अस्ति) हो [क्योंकि पर्वत से उत्पन्न हुई हो] (विषणा:)कर्म को देने वाली [ साधन होकर यह रूप कर्म का फल देने वाली] (असि) हो, (आदिसाः) भूमि की ( वक्) त्वचा । सगरम] - - शुक्लयजुर्वेद। (त्या) तुझ को (प्रतिवेत्तु) स्थिति की आज्ञा देय । पाँचवे मंत्र को पढकर शिला के पश्चिम की ओर नीचे शम्या को स्थापन कपा जाता है,मंत्र का अर्थ यह है कि-हे शम्या के अधिष्टार देव ! तुम (दिवः )स्वर्ग लोक की ( स्तम्भनी ) स्तम्भन करने वाली (श्रमि) हो। छटे मंत्र को पढकर शिला पर उपल [ ऊपर का छोटा पत्थर ] रक्खा जाता है,मंत्र का अर्थ यह है कि-हे ऊपर की शिला !(पार्व- तेयी)पेपण के व्यापारको धारण करने वाली और नीचे की शिला की वालक रूप (असि) है, (पर्वती) माताकी समान नीचे की शिला (वा) तुझको (मरािवेतु) पुत्रीभाव से जाने ॥१६॥ धान्यमसिधिनुहि देवान् । पूणार्यत्वा। उदानायं त्वा। व्यानाय त्या । दीपीमनु प्रसितिमायुपे धान्देवो वः सविताहिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्यणावच्छिद्रेण पाणिनां चक्षुपे त्वा । महानां पयोऽसि ॥ २० ॥ इस कण्डिका में सात मंत्र है-प्रथम,,धान्यमसि धिनुहि देवान, 'मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, याजुपी रहती छंद, हचिर्दवता और तगडुलों को शिलापर स्थापन करने में विनियोग है । दूसरे "माणायत्वा, तीसरे "उदानायता,, एवं चौथे ध्यानाय त्वा,, मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, दूसरे चौथे मंत्र का देवी रहती. छन्द तथा तीसरे का दैवी पंक्ति छन्द, सब का इधिदेवता और तण्डुलों को पीसने में विनियोग है । पाँचवे,, दीर्यामनु मसितिमायुपे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभणात्व: च्छिद्रेण पाणिना,, मंत्र का मानापत्य परमेष्ठी ऋपि, आपी त्रिग्रुप छन्द, निर्देवता और मृगचर्म पर पिसे नण्डुलों को गिराने में वि. नियोग है। छटे "चक्षुपेत्वा मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि दैवी बृहती बन्द, इंचिदेवता और पिष्ट तण्डुलों का अवलोकन करने में विनियोग है । सात महीनां पयोऽसि मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, देवी नियुप छन्द, भाग्य देवता और अन्यपात्र में से घृत .
४० . को रवि में डालने में विनियोग है। भावार्थ-मयम मंत्र को पढकर शिलापर चावल रखेनाते हैं,पत्र का अर्थ यह है कि-हे हवि! (धान्यम् ) दम करने वाला होने के कारण त धान्य (असि) है सोनू इस यज्ञ में (देवान) अम्यादि देव- ताओं को(धिनुहिवन कर [ जिससे यज्ञ सिद्ध होकर यजमान की अमीष्टनिद्धि हो:]: दूसरे तीसरे और चौथे मंत्र को पढकर तण्डुलों को पीसा जासा है. मंत्रों का अर्थ यह है कि-हे वएडुलों ! (ला) तुमको (मा: गाय ) सादा अधिकता के साथ मुख मे चेष्टा करनेवाले माण [श्वास] वायु के देने के लिये,पीमता है। ( उदानाय) ऊपर को चेष्टा करने वाले उदानवायु के देने के लिये त्वा तुमको,पीसता हूँ. तया (व्यानाय ) सब शररिमें व्यापक होकर चेष्टा करनेवाले बलके हेतु व्यानवायु के देने के लिये (वा) तुमको, पासता हूँ [देवताओं का हत्रिसजीच होता है इस कारण यह हवि संजीव किया गया। पाँचवें गंत्रको पढकर शिलापर का पिसाहुआ तण्डुल रूप हवि. मीचे बिछी हुई कृष्णाजिन पर गिराया जाता है. मंत्रका अर्थ यह है कि-हे हवि ! (आयुपे) निरन्तर यज्ञादिकर्म परम्परा के होने के निमित्त यजमान की प्रायुको बढाने की इच्छा से (दीर्घाम् ) 'अविच्छिन्न (प्रसितिम् ) कर्म सन्तति को (धाम् ) धारण करता हूं। ( अधवा पूर्व के तीन मॅत्रों से हवि को सजीव किया और इस मंत्र से हवितो आयु दियाजाता है, अर्थ ऐसा होगा कि-हे हवि ! सेरी श्रायु की वृद्धि करने के नै लिये तुझको दीर्घ कृष्णाजिन पर स्थापन करता है, इस वेदोक्त कर्म से कृष्णाजिन का अभिमानी दे शामायुदय) हे हाय !(हिरण्यपागि.)हिरण्यपाणि (सविता) सविता (देवः) देवता (व: वुमको(अच्छिद्रेण)अच्छिद्र(पाणिना) इस्तसे (मतिनभातु) ग्रहण करें। छठे 'चक्षुपे वा' मंत्र को पढकर उस पिसे हुए हवि को देखा .
मान Ad * 1 T शुक्लयजुवद् । ११ जाता है, इस मन का अर्थ यह है कि इ हावे ! (चक्षुषे) यज, के चः इद्रिय का भकाश अधिक होने के लिये अथरा हदि को सजीव करने पर चक्षुगदि की अपेक्षा होती है अस चक्षु शक्ति के देने के निमित्त (वा) तुम को (पश्यामि ) दखता हूँ। साता मन को पढकर पिसे हुए हवि में दूसरा पुरुष मृत हाल ता है, मन का अर्थ यह है कि-हे पाय, तू दुग्ध से उत्पन होने के कारण (महीनाम्) गौओका (पयः) दुग्धरूप (असि) हा २०॥ देवस्य त्या सपितुः प्रसवेऽपिनो दुन्या पूष्णो । रस्ताभ्याम् । संवपामि । ममाप ओपंधीमि' समोपंधयोरसैन:सरेवतीर्जगतीभिः पृच्यन्ता । समधुमतीमधुमतीभिः पच्यन्ताम् ॥२१॥ उस काण्डका में सीन मन है, प्रथम "देवस्य त्वासपितु मसरे ऽश्विना हुन्या पूणो हस्ताभ्याम्'' मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, माजापत्या बृहती छद, सविता देवता पिg को पवित्रायुक्त पात्री के विप डालने में विनियोग है। दूसरे "सवपामि'' मत्र का माजापत्य परमेष्ठी सपि, देवी वृहती छा हविर्देवता और पिएको पानी में डालने में विनियोग है, तीसरे "समाप थोपीमि, समोप धयो रसेन सदरेवतीजगतीभि पृच्यासा समधुमीमधुमतीभिः पृच्छ ताम्" मत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषि, यजु, भापोदेवता और पिष्ट म जल मिलाने में विनियोग है। प्रथम...तथा दूसरे मन को पड़कर कुशा के पवित्रे युक्त पात्र में पिसाढुभा यदुनों का हवि डाला जाता है,दोना मत्रों का अर्थ यह है कि-(सवितु )सबके मेरक सविता(देवस्य) देवता के(मसवे), मेरणा करने पर ( अश्विनो.) अश्विनीकुमार की बाहुओं की करी है मावना जिन में ऐसे ( वाहुभ्या) पाहुयों करके और (पूष्ण) पूषा देवताके हरलो की करी है भावना जिनमें-पेस(हस्ताभ्याम् । इस्ता करके हे हवि ! ( त्वा) तुझको (सबपामि ) विधि पू. वक भलीमकार पात्र में डालता हूं [ सविना देव, तुझको F ४२ १अध्या - --- . 7 . पूर्ण करने की शक्ति देय] तीसरे मंन्त्र को पढ़कर अग्नीध, पिष्ट हवि में डालने के उ. पसर्जनी नामक जलको लावै मौर मध्वर्यु पवित्रामों करके उस जल की पात्री में लेय अर्थात् पवित्रों के ऊपर होकर जल की धारा पात्र में गिरावै,मन्त्रका अर्थ यहहै कि(आप:)जेल(ओषधीभिः) पिष्ट संगदुल रूप ओपधियोंसे (सम्पृच्यन्ताम् ) भली प्रकार मिले, मोषधयः) पिष्ट तण्डुल (रसन) जल करकै (सम्पृच्यन्ताम्) मिल (रेवती) जल (जगसीभिः) पिष्ट सगालों से (संपाय- साम् ) मिले और ( मधुमती:) माधुर्ययुक्त जल (मधुमतीमिः) मधुर भोषधियों से ( सम्पृच्यन्ताम् ) भली मकार मिलेंप२१॥ जनयत्यै स्वासयामि । इदमग्नेः । इदमनीषों- मामपो । त्यो घर्मोऽसि विश्वायु उरूपया जुर्क प्रस्थस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथताम् । अमिष्टे स्वयं माहिछसीत् । देवस्त्या सविता अपयतु वर्षि- धि नाके ।। २२।। कण्डिका में प्राट मात्र है, मथम "जनयत्यै त्वा संयोमि" मन्त्र को भाजापत्य परमेष्ठी ऋपि माजापत्या गायत्री छन्द, हबि- देवता और जलपिष्ट के संमिश्रण में विनियोग है। दूसरे "इद- मंग्ने मन्त्र का माजापत्य परमेष्टी ऋपि, देवी वृहती छन्द, शनिदेनसा और हरिके पिएर को स्पर्श करने में विनियोग है। तीसरे "इदमग्नीषोपयोः" मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी भर देरी जगती छन्द, हविर्देवता और हवि के पिएड को स्पर्श करने में विनियोग है। चौथे "इथे त्वा' मन्त्रका माजापत्य परमेष्ठी अषि, देवी मनुष्टुप् छन्द, प्राध्य देवता और घृत को सपाने में विनियोग है। पाचवे "धर्मोऽसि विश्वायुः, मन्त्र का माजापरण परमेही ऋषि, याजुषी गायत्री छन्द, 'पुरोड़ाश देवता और पुरो- गाय को अग्नि पर चढाने में विनियोग है। छठे "उरुपया उस अयस्वोरु ते यइपसि. मयताम्, मन्त्रका प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषि ।
शुक्लयजुर्वेद) भार्षि गायत्री छन्द, पुरोड़ाश देवता और पुरोदाशके कपाल में फैनाने में विनियोग है । सातवें, "अग्निष्टे त्वचं मारिसीव। मन्त्रका माजापत्य परमेग्री ऋषि, माजापत्या गायत्री छन्द, पु. रोडाश देवता और पुरोड़ाश के ऊपर,जलस्पर्श करने में विनि- योग है। आठवें ॥ देवस्त्वा सविता अपयतु वर्षिष्ठेऽधिनाके मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठीऋपि, माजापत्या अनुषुप् छन्द, पुरो गश देवसा और पुरोडाश को पकाने में विनियोग है । . 1, " प्रथम मन्त्र को पढकर जल और सण्डुलों के पिष्ट कोगम- लाया जाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे जल और पिट ! (त्वा) तुमको । (जनयत्यै ) पुरोड़ाश बनाने के निमित्त अथवा यजमान के सन्तति उत्पन्न होने के निमित्त (संयौमि )मिलाता क्योंकि-जैसे जल और पिष्टका मेलन होता है तिसीप्रकार शुक्र शीणत (वीर्यरज ) के मेलन से यजमान के सन्तति की उत्पत्ति हो। दूभरे मन्त्र को पढकर मिलाए हुए पिष्ट के अवदान (छेदन) के चिन्हयुक्त दो पिण्ड करके अलग २ स्थापन कर एकको स्पर्श करै, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(इदम् ) यह पिण्ड ((अग्नेः) अग्नि देवता का, है ( अतः इसको अग्नि ग्रहण करके यजमान के ऊपर मसन्न हो) सीसरे मन्त्र को पढकर पूर्व की समान दूसरे पिण्ड को स्पर्श करै, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(इदम् ) यह पिण्ड (अग्नी- पोमयोः) अग्नीषोम देवती का, है र उक्त देवता इसको ग्रहण करके यजमान के ऊपर प्रसन्न हों)। चौथे मन्त्र को पढ़कर पिघलाने के लिये घृत का पात्र माग्न पर सपाया जाता है, मन्त्र को अर्थ यह है कि- हे घृत (इषे) इच्छिस वृष्टि के अर्थ (वा) तुझको, तपासा हूँ, ( क्योंकि सेरे द्वारा पुरोडाश तयार होने पर उस से यह होकर दृष्टि होगी)। पाचवे मन्त्र को पढकर पुरोडाश अग्नि पर बताया जाता है, ग . १ अध्याय 71 . मन्त्रका अर्थ यह है कि हे पुरोडाशन (धर्मः)दीप्यमान का को अंश (विश्वायुः ) यजमान को पूर्ण आयु देनेवाला (असि)का छठे मन्त्र को पढकर पुरोडाश सब कपालों में रखने के लिए फैलायाजाता है, मन्त्रका अर्थ यह है कि--हे पुरीडाश! तस्वपाक्से ही (उरुमथाः ) विस्तारके साथ फैलनेवाला है । ( उरू) फैलकर (प्रथस्य ) प्रख्यात हो। और (ते) तेरा (यज्ञपसिः) यनपनि यजमान ( उरु ) बहुत से पुत्रपश्चादि को प्राप्त होकर (प्रयता) प्रसिद्ध हो। (सातवें मन्त्र को पढ़कर पुरोडाश के ऊपर जनाहिरका जाता है, मन का अर्थ यह है कि हेपुरोदाश ! ( अग्निः) पकाता हुआ अग्नि (ते.) तेरे (त्वचम् ) त्वचारूप पर के भागेको (माहिसीत् ) जलाकर का काला करकै नष्ट न करें । To आठवें मन्त्र को पढकर पुरोडाश पकाया जाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे पुरोडाश ( सविता) सविता (देष.) देवधर (वषिष्टे) वडे वेगके साथ घडी ज्वालाओं से मज्वलित होते हुए, राक्ष सों के नाशक (माके) स्वर्ग के नाकनामा अग्नि में (वा) तुझको (मधिश्रयितु) पक कर ॥२२॥ "मामा सविक्यामितीय॑ज्ञोऽतमेर्यज॑मानस्य मला भूयात् त्रिताय त्वा । हिताय त्वा एकताय त्वा ॥२॥ इस कण्डिका मैपॉचमन्त्र हैं, प्रथम " मार्मासाविकथा- मन्त्र 'को प्राजापत्य परमेष्ठी एपि, याजुपी गायत्री छन्द, पुरोडाश देवता और पुरोहाशाको स्पर्श करने में विनियोग है। दूसरे "अजमेर्स जोऽतमयजमानस्य प्रजा भूयान् । मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषि, आपीगायत्री छन्दा पुरोटाश देवना और अङ्गारों के द्वारा दमौकर भनी प्रकार पके कान में विनियोग है तीसरे "बितायत्वा" मन्त्रको माजापत्य परमेष्ठी ऋपि,दैवी वृहतीइन्द, क्ति देवता और अदुलियों के मक्षालन के जल को औंधाने में चिनियोग है। चौथे "दिनायत्वा " मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋषि देवीसहनी, 7 - , -१५ शुक्लयजुर्वेद। बन्द, द्विव देवता और तृतीय मन्त्रोक्त विनियोग है। पांचवें "एकामा यत्ला मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, देवी पंक्ति छन्दा एकरी देवता और तृतीय मंत्रोक्त विनियोग है। Tr:मयमामन्त्र को पढकर, पुरोडाश पका है या नहीं यह जाने के निमित्त स्पर्श कराजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि हे पुरो- डाश (मभः) भयभीत मत हो, (मा सम्निस्थाः) चलायमान मा हो दूसरे मन्त्रको पढकर पके हुए पुराडाश को अनारों से टककर पकाया जाता है, मन्त्रका अर्थ यह है कि:- ( यज्ञः) यज्ञसाधक पुरोडाश(अतमेरुः) ऊपर भस्म जमजाने की मलिनसाम्प ग्लानि पहिताहो (यजमानस्य); यजमान, की: (: मजा): पुत्रपौत्रादि सन्नति (तमेरूलानिरहित र भूयात् .) हो, भर्थात् राज- (मान की सन्तति को केंदापि दुःख न हो। सीसरे चौथे और पाँचचे मन को पढ़कर पिटलिप्तपात्र तथा अंगु लियों के धोवन का जल पात्र में पाकर गार्हपत्य, अग्नि के ऊपर (ौंधाप मन का अर्थ यह है कि हे पान और अंगुलियों के प्रक्षा- लन के जलः! (बितायः) त्रित (१) नामक देवता के अर्थ (स्वा) तुझ को (द्विताय.) द्वित नामक देवता के अर्थ (त्या ) तुझको और (पकताय - एकतनामक देवता के अर्थ (वा.)तुझ को त्यागता हूँ॥३३॥ देवस्य त्या सवितुः सवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ता भ्याम् आददेऽध्वरकृत देवेभ्यः। इन्द्रस्य बाहरमिक्षिणः सहस्रभृष्टिः गततेजा वायुरसि-तिग्मतजा हिपतो वधः।। इस कंडिका में सीन मंत्र हैं, प्रथम देवस्य त्वा सपिनुः मसवेऽधि- जो हुभ्यां पूष्णो दस्ताभ्याम्' मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी साप, (१) पूर्वकाल में किसी कारण से. भयभीत:हाअग्नि देवता जल में प्रवेश करगया बदमन्तर देवताभों ने जानकर ग्रहण किया। उस समय भग्नि ने अपने वीर्य को जल में त्यागा, उस से त्रित, द्वित और एकत नामफ पक्ति उत्पन्न हुए, उन्होंने देवताओं के साथ विचरते हुए. पक्ष में पात्र और भंगुलियों के प्रक्षाटने का सप भाग पापा, कथा औतपE3-12-मे लिखी है।
शुक्लयजुर्वेद । अजं गछ गोष्ठानम् । वर्षतु ते चौ. बधान देव सवित परमस्या पृथिव्या ७ गतेन पाशर्योऽस्मान् बेष्ठि यं वयं विष्मस्तमतो मा माक् ॥ २५॥ इस कारटका में चार मन्त्र है, प्रथम "पृथिवि देवयजन्योप- ध्यास्ते मूलमाहिसिषम्, मन्त्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषि, यजुः, बेदि देवता और वणों को हटाकर भूमि को स्फ्य से खो- दने में, विनियोग है। दूसरे "ब्रज'गच्छे गोष्ठानम्" ' मन्त्र का भाजापत्य परमेष्टी ऋपि, देवी जगसी छन्द, पुरीप देवता और खोदीहुई मृतिका को ग्रहण करने में विनियोग है । 'तीसरे "व- पतु ते चौ. मन्त्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, दैवी पंक्ति छन्द चेदि देवता और वेदी को अवलोकन करने में विनियोग है चौथे 'वधान देव सविस. परमस्या पृथिव्या शतेन पार्योस्मान दोष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक' मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी । ऋपि, यजु संविसा देवतां और खोदी हुई मृत्तिका को उत्कर (पूरा) स्थान में डालने में विनियोग है। प्रथम मन को पढकर वणों को हटाकर भूमि खोदी जाती है, मंत्र का अर्थ यह है कि--(देवयजानि ) देवताओं के यज्ञ करने के योग्य (पृथिवि ) हे पृथिवी ! मैं (ते) सेरी (भोयध्या ) सृणरूप मोषाध की (मूलम् )मूल को (माहिसिपम् ) नट नहीं करता हूँ, (किन्तु यज्ञ के निमित्त खोदता हू)। दूसरे मन को पढकर पुरीप (कुदाल से खोदने पर उत्पन्न हुई मृत्तिका ) को ग्रहण कियाजाता है भत्र का अर्थ यह है कि- हे सुदी हुई मृत्तिका! (गोष्ठानम् ) जहा इस समय गौ स्थित हैं ऐसी (प्रजम् ) गोशाला को ( गच्छ)जा। तीसरे मंत्र को पढकर वेदिको ( ठीक हुई या नहीं यह जानने के लिये ) देखा जाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि हे वेदी । (से) सेरे लिये (पौ') धुलोक का भाभिमानी देवता (वर्पसु जल की वर्षा करें (जिस से खोदने से होनेवाले दाख की शान्ति हो) . - १ अध्याय - - चाये मंत्रको पढकर उत्कर, कूडा डालने के स्थान) र कु- दाल से खोदी हुई मृत्तिका सालीजाती है. मत्रका अर्थ या कि-(सचितः.) हे सविता (देव) देवता ! (य )जो (9. समान ) हमारे ऊपर (दृष्टि) देपदृष्टि रखताद (त्र)और (यम् )जिसके मति (वयम् ) हम (द्विष्मः) देषदृष्टि रखते हैं (सम्) इसदोनो प्रकार के हमारे शत्रु को (परमस्याम् ) अन्तिम (पृथिव्याम्.) पृथिवी के विष अर्यात जहा भूमिके अन्तिम स्थान में अन्धतामिन नरक है तहा (शनेन ) सैंकडों (पार्श:) पाशों से (बधान) वाधी और (अ) उस अन्धातामिव नरक में से (मामौक) कदापि मत छोडो ।। २५॥ अपारस पृथिव्यै देवयजनाट् वध्यासम् | जं गच्छ गोष्ठानम् । वर्षतु ते द्यौः । बधान देव, सवितः परमस्या पृथिव्या शतेन पार्शोरमा न देष्टियं च वय हिमस्ततो मामाक । अररो दिय मा पप्तः। दृप्सस्ते द्यां मा स्कन् । व्रज, गच्छ गोष्ठानम् । वर्षतुते योबधान देव स- वितं परमस्या पृथिव्या शतेन पाशैयोऽस्मान् बेष्टि य चं यं द्विष्मस्तमतो मा माक् ॥ २६ ॥ इस कण्डिका में नौ मन है-प्रथम अपार पृथिव्यै देवयन नाद-पासम्" मंत्र का मांजापत्य परमेष्ठी श्रा, शामुरी गायत्री छन्द, अपुरदेवता और उत्कर स्थान में द्वितीय वार मृत्तिका हाल ने में विनियोग है । द्विसीय " बजमिस्यादे." सृतीय स्थि त्यादि और चतुर्थ "वधानत्याद" मन्त्र इनके अपि इत्यादि पचीसी कंडिका की समान जानने । पाँच. " भररो दिवमा मन्त्र का प्रा०प० पर० ऋपि, यजु.भमुर देवता और उत्तर के अभिमुख हायों को रखने में विनियोग है। छठे " ट्रेप्सस्ते यां मा कन' मंत्रका मा०प०ऋषि, यजु,अमुर देवसा और तृतीय कम मृत्तिकाको उत्करस्थान में डालने में विनियोग है। सप्तम भष्म भोर, - न - शुक्लयजुर्वेद। नवम मंत्रका ऋषि चन्दादि पच्चीसी कंडिका की समान जानना। प्रथम मंत्र को पढकर द्वितीयवार, खोदी हुई मृत्तिका को ग्रहणकर उत्कर स्थान में टाले, मंत्र का अर्थ यह है कि- (पृथिव्यैः पृथिवी के (देवयजनात् )देवयजननामके वेदिके स्थान से (भररुम् ) भररु नामक अमुर को (अपवध्यासम्)दूरलेजाकर मारता हूं। (द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ मंत्र का कार्य और भावार्य पूर्व भ- द पचीसवा कंटिका की समान जानना) पांचवें मन्त्र को पढकर उत्कर के अभिमुख हाथ रखे जाते है मंत्र का अर्थ यह है कि हे अरस्नामक अमुर ! ( दिवम् )यह के फलरूप धुलोक को (मा पसः) तू मत प्रास हो । छठे मंत्र को पढकर हनीय वार मृत्तिका को ग्रहण कर उत्कर स्थान में हालाजाता है,मंत्र का अर्थ यह है कि-हे वेदिके देवता! (से) पृथिवी रूप जो रा तिसका (द्रप्स.) उपर्जीव्य रस भ र्थात् भोग (थाम् ) स्वर्गलोक को ( मास्कन् ) मतजाभो । (सासवे भाठवे और नवे मंत्रों का कार्य और भावार्थ पच्चीसवी कण्डिका की समान जानना) ॥ २६ ।। गायत्रेण त्वा छन्दमा परिगृह्णामि । श्राभेन त्वा छन्द मा परिगृहामि ।। जागतेन त्वा छन्दमा परिगृहामि । सुस्मा चासि शिवा चासि।स्योना चासि सुपा चासि । ऊर्जस्वती धासि पयस्वती च ॥ २७॥ इस कपिटका मेछ: मंत्र है-प्रथम 'गायत्रेण त्वा छन्दसा परि गृह्णामि' मंत्र का मा० पर• ऋषि, आसुरी अनुष्टुप् छंद विणण देवता और वेदि खोदने से पाहले स्फथ से रेखा खेचने में विनि- योग है। द्वितीय 'त्रैष्टुभेन त्वा छंदसा परिगृहामि' मंत्र का प्रा. पर• ऋषि आसुरी अनुष्टुप्छन्द, विष्णु देवता और स्फ्य से दि. सीय रेखा खंचने में विनियोग है।'सृतीय "जागतेन त्वा छन्दसा परिगृहामि"मंत्र कामा० पर० ऋषि, आसुरी अनुष्टुप छंद, विष्णु . - y.. १.अध्याय। देवता और स्पय से तीसरी रेखा करने म विनियोग होचोये 'मु- क्ष्मा चासि शिवा चासि मंत्र का प्रा० पर० ऋषि, माजापत्या गायत्री छद वेदि देवता और बेदि खोदने के पश्चात समय से रेखा करने में विनियोग है । पाँचवें 'स्पोना चासि मुपदा चासि मंजकर मा० पर० ऋपि, श्रासुरी जगती छंद. वेदि देवता और द्वितीय रेखा करने में विनियोग है। छठे 'ऊर्जस्वती चासि पयस्वनी च' मंत्र का माजापत्य प० थपि, मामुरी पंक्ति छद वेदि देवता और तृतीय रेखा करने में विनियोग है। जिस स्थान से अररु नामक अमुर को निकाला तहाँदी के पार माण का निश्चय करने के लिये दक्षिण पश्चिम उत्तर इन तीन दिशाओं. में स्फ्यसे रेखा करीजाती है,तिसमें से प्रथम मंत्रको पडका दलिय में द्वितीय को पढकर पश्चिम में और तृतीय मंत्रको पढकर उत्तर में रेखा करे इस कर्म का नाम पूर्वपरिग्रह है तीनों मंत्रों का अर्थ यह है कि-हे यज्ञ ! गायत्री त्रिप्टुप् और जगती ईद रूप से भावना करे हुए स्स्य के द्वारा (वा) तुझ को (गायत्रेण ) गायत्री के (छन्दसा) छन्दोम्प स्फ्य करके (परिगृलामि)परिग्रहण करता (त्रैष्टुभेव) त्रिष्टुप के (छन्दसा)इंदोरुप स्फ्य करके (त्वा) तुझको (परिगृहामि)परिग्रहण. करता हूँ (जागतेन ) जगती के (चन्दसा) छंदोरूप सय करके (वा) तुझको (परिगृहाम) परिग्रहण करताहूं.(तीनोंछंदों के देवता तीनों दिशाओं में तेरी असुरों: से रक्षा करेंगे और पूर्व दिशा में पाहवनीय अग्नि-ही रक्षा करेगा:: चौथे पांचवें और छठे मंत्र को पढ़कर उत्तरपरिग्रह कियाजाता है अर्थात् पहिले जो पूर्व परिग्रह कर्म कहा बद वेदिखोदने से पूर्व कियाजाता है, और वेदी खोदने के अनन्तर चर्यादि तीनों मंत्रों, को पढ़कर फिर दाक्षिणादि तीनों दिशाओं में स्स्य से तीन रेखा करी जाती हैं, इस का नाम उत्तरपरिग्रह कर्म है। मंत्रों का अर्थ यह है कि है.वेदी तुम ईश्वर,के सेज से युक्त होने के कारण (मुरूमा) मुन्दर (भासे ) है (1) और उन अमुर के निकल A शुक्लयजुर्वेद । जाने तथा यज्ञपुरुप का निवासस्थान होने से (शिवा) शांतस्वरूप (च) भी (असि ) हो (च) और (स्योना) मुखरूप (असि) हो (चाऔर(सुपदा) देवताओं की सुन्दर स्थिति की स्थान(चाभी(असि) हो (ऊर्जस्वती) अन्न वाली ( असि ) हो(च) और( पर्यस्वती) दध्यादि के मूलभूत दुग्ध की खनि (च) भी हो ।। २७ ।। पुरा करस्य . विमृपा विरशिन्नुदादाय पृथिवी जीव- दोनुम् यामै रयंश्चन्द्रमास स्वधानिस्तामधीरासोऽनु दिश्य यजन्ते।भोक्षणीरासादय। पितो वधोऽसि:२८ इस कण्डिका में तीन मन्त्र हैं, प्रथम "पुरा रस्य विस्पो विशिन्नदादाय पृथिवीं जीवदान यामेरयन् चन्द्रमास संधा- भिस्तामु धीरासोऽनुदिश्य यजन्ते,, मन्त्र का अयशस 'पि,त्रि- मुप् छन्द, चन्द्रमा देवता और वेदी को समान तथा शुद्ध करने में नियोग है । दूसरे "प्रोक्षणारासादय' मन्त्र का अघशंस ऋपि याजुपी उपिणक छन्द, 'मैपदेवता और मोक्षणीपात्र को स्थापन करने में विनयोग है। तीसरे "द्विपतो वधोऽसि, मन्त्र का अघ- शंस ऋषि, याजुपीगायत्री छन्द, अभिचारिक देवता और स्फ्यको ऊपरको उठानेम विनियोग है । प्रथम मन्त्र को पढकर वेदी को लोग्रादि निकालकर समान और शुद्ध किया जाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(विरप्शिन) हे परमेश्वर विष्णो ! सुमं मार्थना को (शृणु ) मुनो, और अनुग्रह करो * (विसृपः) माना योधायुक्त (फरस्य) युद्ध के (पुरा.) मथम देवताओं ने (जीवदानुम् ) जीवों की पारण कानेवाली सारभूत ( याम् ) जिस (पृथिवीम ) पृथिवी के आत्मा को ( उदादाय ) ऊँचा उठाकर (म्पधाभिः) वेदों, सहित (. चन्द्रमसि.)। चन्द्रमा में • * किसी समय अमरों के साथ देवताओं का युद्ध हुआ उस समय देवताओं ने आपस में सम्मति करी:कि इस भमिका जो देवयजन,नाम उत्तम स्थल है.उमको चन्द्रमा में स्थापन करकै युद्ध कर, यदि हमारा पराजय होगायगा तो फिर भी यश करकै असरो को जीतलेंगे, यह सम्मति करकै पृथिवी के सारभूत देवयजन भागको चन्द्रमा म्यापित कियां, अवं भी यह कृष्णवर्ण शससा है। (शत ॥२॥१८) १ अध्याप (परयन्.) स्थापन कर दिया था (ताम् ) उसही चन्द्रमा में स्थिा पृथिवी के आत्मा को (अनुदिश्य.) शास्त्रोपदेश के द्वारा सिद्धकरके 'अर्थात् वहीं सारभूत भूमि इस वेदीम विधमानहै ऐसी भावना करके (धीरासः) धीर पुरुष ( यजन्ते ) यह करते हैं। दूसरे मंत्र को पढकर मोक्षणी को लायाजाता है, अध्वर्यु क- हता है, हे अग्नीध्र ! (मोक्षणी:) मोक्षण करने के जलों को (मा- सादय) वेदी पर स्थापन करो। तीसरे मंत्र को पढकर स्य को ऊँचा करकै उत्कर स्थान में हालाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे स्फ्य ! तू (दिषतः) यज्ञ में विघ्न करने वाले शत्रुओं का (बधः ) वध करने वाला (पास) है ॥२८॥ प्रत्युष्ट छ रक्षा प्रत्युठा अरांतयः । निष्टप्न छ रक्षा ! ,निष्टप्ता अरातयः अनिशितोऽसि सपत्नक्षिद वाजिन : त्वा वाजेध्याय सम्मास्मि । प्रत्युष्ट छ रक्षः प्रत्युष्टा अरंतयः । निष्टप्त रक्षो निष्टप्ता अरांतयः । अनि शितासि सपलक्षिहाजिनी त्वा वाजेध्याय सम्माभिः इस कण्डिका में छ: मन्त्र हैं, मथम "प्रत्युष्ट रसः प्रत्युष्टा रात्तयः,, और दूमरे "निष्टप्त छ रक्षो निष्टता परातयः ।म- नका ऋषि,भादि सांसी कण्डिका के अनुसार जानना केवल विनियोग में अभार है अर्थात् इसका बुव को तपान में विनियोग है। सीसरे "अनिशितोऽसि सपतिद्वाजिनं त्वा बाजेध्यायै सम्मा. मि., मन्त्रका मा० पर ऋषि,माजापत्या हती छन्द, सुखदेवता और मुक्का माजन : करने में बिनियोग है। चौथे "प्रत्युष्ट रसः प्रत्युष्टा अरातयः,, और पांच निष्टत छ रसो निष्टप्ता अरासया, मन्त्रां ऋषि भादि ७ वो काण्डका के समान है और मुङको पाकर अध्वर्यु को समर्पण करने में विनियोग है । छठे "अनि- 'शिसेत्यादि' मन्त्रका मा० पर० ऋषि, प्रा०प० बृह मन्द, 'घुन् देवता और मुन्का मार्जन करने में विनियोग है । प्रथम .
१ अध्याय " वा द्वितीय मन्त्रको पढकर सुव (खर के काठका इस्तकी समान यत्रका पात्र)अग्निपर तपायाजाता है,इन दोनो मंत्रोंका अर्थ७ वीं कण्डिका कारमंत्रक अर्थकी समान जाननाातीसरे मन्त्रको पढ़कर स्रुव का सम्मान कर,मंत्र का अर्थ यह है कि-हे सुव ! तुम हमारे विषय में (अनिशितः) तीक्ष्णता रहिरा, उपदव न करनेवाले, (आस) हो (सपत्नजित् ) हमारे शत्रुओं का वध करते हो, इस कारण, हमारे हितपी होने से, (वाजिनम् ) यन्त्र के द्वारा अन्न से युक्त, अथवा यजनामक अन्न के योग्य तुम को ( वाजेध्याय) यत्र नामक अन्नके प्रकाशके अर्थ (सम्माज्मि) भली प्रकार शो- धता हूँ, क्योंकि मार्जन करे हुए सुर में प्राज्य के ग्रहण करने और होम करने से अग्निदेवता प्रज्वलित होता है । उसमें बाहुति देने से तिस पाहुति का फलरूप अन्न प्रकाशित [उ. त्पन्न होता है । छठे मन्त्र को पढ़कर सम्मान करहुए जुहू, उप- भृत और ध्रुवनामा तीन मुच् ( वटके पत्रकी समान आकृति वाला वाहुकी वरावर विङ्ककत काष्ठका पत्रका पात्र) का मा- जैन करकै प्रत्येक को चौथे और पांचवें मन्त्रको पढ२ कर अग्निपर तप्त कर २ के वेदी में स्थापन करने के निमित्त अध्वर्यु को देय चौथे और पांचवें.मन्त्रका अर्थ ७वीं कण्डिका में कहे अनुसार जानना और छठे मन्त्रका अर्थ इसीकण्डिका के तीसरे मन्त्रकी समान जानना॥ २९ ॥ अदित्यै रास्नॉसि । विष्णोर्वेष्योऽसि । कर्जे त्वा । • अदन्धेन त्वा चक्षपावपश्यामि। अग्नेर्जिन्हासि सह- • देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने मेभुव पजुपे यजुषे ।। ३०॥ इस कण्डिका में चार मंत्र है, मथम "अदित्यै रास्नासि" मंत्र का मा० पर० ऋपि, याजुषी गायत्री छन्द, योक देवता और मुंज की रज्जुसे यजमानकी खी की कमर को युक्त करने में विनियोग है। दूसरे "विष्णोर्वेष्योऽसि" मंत्र का माजापत्य परमष्ठी ऋषि देवी पंक्ति छन्द, योक देवता और कमर की रज्नु + ५४ शुक्लयजुवद । को दलिणके पाश को उत्तर की ओर कमर में लगाने में विनियोग है, तीसरे "ऊर्जे ता, मंत्र का माल पर ऋषि, देवी छन्द, आज्य देवता और घृतपात्र को अग्निपर से उतारने में विनियोग है । चौथे "अदब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामि अग्नेजि- उहासि सुहदेवेभ्यो-धाम्ने, धाम्ने भव यजुपे यजुपे"मंत्रका मा०पर० पि, यजुः, याज्य देवता और पनी के घृनावलोकन करने में विनियोग है । प्रथम मंत्र को पढ़ कर, अग्नीध योक ( तीन बल की मुंज की मेखलाः) से, गाईपत्य अग्नि के दक्षिण में ई. शान कोण को मुख करके बैठी हुई यजमान की भार्या की नामि से नीचे कमर में प्रदक्षिण लपेटे, मंत्रका अर्थ यह है कि-हेमुं. जकी मेखला तू (अदित्यै ). भूमि की (रास्ना), मेखला (:असि) है । दूसरे मंत्र को पढ़ कर, तिस मेखला के दक्षिण पाश (सिरे) को शंकुस्थानीय (युएडी युक्त) दूसरे पाश (सिरे) में दो लपेटों से उरस कर ऊपर को उद्गूहन कर, मंत्र का अर्थ यह है कि-हेदक्षिण पाश ! तू (विष्णोः) यज्ञ का (वेयः) व्यापक (असि.) है । तीसरे मंत्र को पढ कर घृत को अग्निपर से नीचे उतार कर यजमान की स्त्री के.सन्मुख रखकर कहै कि-हेयजमान की पत्नी वृतको अवलोकन कर, मंत्रका अर्थ यह है कि हेवृत ! (स्वा) तुझको (ऊर्जे) उत्तम, रसकी प्राप्ति के अर्थ । अग्निपर से तायकर उतारता हूँ (क्योंकि साया हुआ घृन दोषरहित होनेकेकारण अति स्वादरंस'युक्त होता है..) 1 चौथे मन्त्र को पढो समय यजमान,की सी मुसको देखे, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे पृरा (वा) तुझको ( अदब्धेन) अधोमुखी होकर नीरोग (चक्षुषा) नेत्रों में (अवपश्यामि) अवलोकन करती हैं,हेत! (अग्नेः) अग्निकी (जिला) जिहाफपहै. (क्योंकि- भग्नि में घृतका हवन करनेपर जिव्हा की समान ज्वाला उत्तम होती है) तुम (देवेभ्यः) देवताओं की प्रसन्नता के निमित्त(सुहः), ॥ से होमेजानेवाले. (मसि.) हो, अथवा सुम अग्नि की १ अध्याय। yy जिव्हा हो कि---जिसके द्वारा दवाओं का नांवाइन होना है, ( क्योंकि-यज्ञमें घेदके मंत्रों से प्रज्वलित हुई अग्नि की ज्वालाको देखकर देवता यात है) प्रवाहे घृत यज्ञकी बाहुनियों में उत्तमता से साधनरूप होकर सू (में) मेरे (धाम्ने धाम्ने) सबयागों के फलों के उपमोग के स्थानों की प्राप्ति कराने के अर्थ और ( यजुपे यजुपे.) तिम २ यागकी सिद्धि कराने के अर्थ [ समर्थ ] (भव ) हो३० मंचितस्त्वा प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य मंश्मिभिमयितुः प्रमुव उत्पुनाम्यच्छिन्द्रण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मितिः । तेजोऽसि शुममस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि ॥३१॥ इस कण्डिका में चार मंत्र हैं, प्रथम "सवितुस्त्वा प्रसव उत्पु- नाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण मूर्यस्य रश्मिभिः " मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋपि, साम्नी जगती छन्द, भाज्य देवता और घृतको पवित्र करने में विनियोग है । दूसरे " सवितुर्वः प्रसव उत्पुना- भ्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः"मंत्र का माजापत्य परमेष्ठी ऋपि, प्राजापत्या पंक्ति छन्द, आपो देवता और मोक्षण के जल का शोधन करने में विनियोग है । तीसरे " रोजोऽसि शुक्रमस्य- मृतमसि " मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋापे, याजुपी त्रिगुप् छन्द श्राज्य देवता और घृतके अवलोकन में विनियोग है। चौथे "धाम नामासि भियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि" मंत्र का प्राजापत्य' परमेष्टी ऋपि, प्राची उष्णिक छन्द, प्राज्य देवता और सुवे से घृत को ग्रहण करने में विनियोग है । प्रथम मंत्र को पढ़कर 'घृत को पवित्र कराजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि-( सवितुः ) सविता देवता की (प्रसवे) प्राज्ञा में वर्तमान होनेपर मैं हे युत (त्वा) तुझको (अच्छिद्रेण ) वायुरूप (पवित्रेण )पवित्रा और (सूर्यस्य ) सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों से (उत्पुनामि) पवित्र करता हूँ। द्वितीय मंत्र को पढ़कर मोक्षण का जल शोधाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि हे जलों! (सवितुः) सर्वप्रेरक देख - " शुक्लयजुवंद । की ( प्रसवे ) मेरणा होनेपर मैं (मः) सुमको (अच्छिद्रेण ) वायुरूप (पवित्रण) पवित्रा और (मूर्यस्य )सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों से (उत्पुनामि )पवित्र करता हूँ। तीसरे मंत्रको पदकर मृत का अवलोकन कियाजाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि आज्य ! तू (तेज:)शरीर की कान्ति का हेतु होने से तेजःस्वरूप (असि ) है (अथवा गीता के भगवट्चनानुसार भगवान की विभूति है) दीप्तिमान् अथवा वर्षा अन्नादि की उत्पत्ति का हेतु होने से वीर्यरूप है, (अमृतम् ) अमृत (चिरकाल पर्यन्त निर्दोष रहनेवाला)(असि ) है अथवा अमृत की समान देवताओं को तृप्ति देनेवाला है, अथवा पूर्ण मंत्र का ऐसा वाक्यार्थ समझना कि-जो घृत का भक्षण, दान वा हवन करता है उसको घृताभि मानी देवता, सेज, वीर्य और अमृत (चिरकालस्थायित्व) देता है। चौथे मंत्र को पढकर एक सुवे में घृत लेय और तीन स्रुवे में बिना मंत्र बोले मौन होकर घृत लेय, मत्रका अर्थ यह है कि- हे भाग्य ! तू (धाम ) धाम ( देवताओं की चित्त की वृत्ति के धारण होने का स्थान) (असि) है (नाम) नाम ( सकन जीवों को अपनी ओर झुकाने चाला (असि) है क्योंकि घृतको देखकर भोजन करने के लिये सब नमते है)(देवानाम् ) देवताओंका (मि- यम्) मिय (अनाधृष्टम् ) यज्ञ में विघ्न करनेवाले राक्षसों करके अप्रतिहत (देवयजम् ) देवताओं के याग का साधन (असि) है, इस कारण मैं तुझको ग्रहण करता हूँ ॥ ३१ ॥ इतिश्री शुक्रायवैदान्तर्गत माज्यान्दिनीयशास्वाटयेत भारयाजगोत्रो भूतगौडवंशावतसश्रीमद्भालानाधास्मनरामस्वरूपशमा द्वारा प्राचीन उज्वरमहीपरपद भाष्यों के अनुसार सम्पादित अन्वय पदार्थ भोर भावार्थ सहित शुक्ल यजुर्वेदशी माध्यन्दिनीय शालाकी , आग्यहा त प्रथम आपाय ममाप्त, -- २ अध्याय . . द्वितीयोऽध्यायः। कृष्णोऽस्याखरेष्टोग्नये त्वा जुष्टं मोक्षामि। वेदिरसि दि त्वा जुष्टां प्रोक्षामि । बर्हिरसि साभ्यस्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥१॥ : : इस कण्डिका में तीन मंत्र है, मथम "कृष्णोऽस्याखरेष्ठोग्नये त्वा जुष्टं मोक्षामि,, मंत्र का प्रा०पर०. ऋपि, आसुरी उपिएक छन्द, इध्म देवता, इध्ममोक्षण में विनियोग है । दूसरे वेदि: रसि वहिपे स्वा जुष्टां मोक्षामि,, मंत्र का.मा पर० ऋपि, श्रा- मुरी अनुष्टुप छन्द, 'लिङ्घोक्त देवता थोर वेदी के मोक्षणम विनियोग है। तीसरे वाहिरसि सुग्भ्यस्त्वा दुष्टं मोक्षामि, मन्त्रका'. मा०पर० ऋपि माजापत्य उणिक छन्द लिखोक्त देवता और कुशमोक्षण में विनियोग है। प्रथम मन्त्रको पढकर इध्म र ईधन- । काठ) का मोक्षण कियाजाता है मन्त्रका अर्थ यह हैकि--हे इध्मः तू (पाखरेष्टः) स्वर्ग देनेवाले ग्राहवनीय अग्निमें स्थित, (कृपणः), कृषणमंगरूप यज(असि)है, अग्निके अर्थ(जुष्टम् )मिय (त्वा) तुझको ' (मोक्षामि)शुद्धिके निमित्त जलसे मोक्षण करताहाहूसरे मन्त्रको पढ़- करवेदीका मोक्षण कियाजाता है,मन्त्रका अर्थ यह है कि-हेवेदी तुम. (वेदी:) असुरों से देवताओं को प्राप्त होने के कारण वेदी नाम- चाली (पास) हो(वहिप)वर्दिक अर्थ (जुष्टाम् )भिय. (त्वा तुझको, (प्रोक्षामि-) मोक्षण करता हूँ । तीसरे मन्त्रको पढ़कर, वेदी में। पूर्वग्रन्यि करकै कुशों का मोक्षण कर, मन्त्रका अर्थ यह है कि हे दर्मः (वहिः) बहुत होने से बेदी की वृद्धि करने में समर्थ. (असि) हो (मुम्भ्या) सुचों के धारणार्थ (जुष्टम) यि (त्या); तुझको.( मोक्षामि) प्रोक्षण करता हूं ॥१॥ अदित्यव्युन्दनमसि विष्णोस्नुपोऽसिर्णभूदसंवाना स्तृणामि स्वासस्थां टेवेभ्यः भुर्वपतये स्वाहा। भुव- नपतये स्वाहां। भूतानां पतये स्वाहा ॥२॥ - . 1. शुक्लयजुर्वेद । इस कपिटका में छ: मंत्र हैं, पथम "अदित्य च्युन्दनमाम" मंत्रका मा० पर० ऋषि, माजापत्या गायत्री छन्द आगे देवता और मोक्षणावशिष्ट जल को कुशों के पूले की मूल पर-गलने में विनियोग है । द्वितीय " विष्णोस्नुपोऽसि मंत्रका पा०. पर० ऋपि, देवी पंक्ति छन्द, प्रस्तरो देवता और प्रस्तरग्रहण में पिनि योग है । सृतीय “ऊर्णनदसं त्वा तृणामि स्वासस्थां देवेभ्यः" मंत्र का.मा० पर० ऋषि, प्रासुरी गायत्री छन्द वेदि देवता भीर वेदी को कुशाओं से माच्छादन करने में विनियोग है। चतुर्थ "भुवपतये स्वाहा" मंत्र का मा० पर० ऋषि,देवी जगती चन्द, अग्निदेवता स्कन्न के स्पर्श में विनियोग है । पंचम "भुवनपतये स्वाहा” मा पर० ऋषि, प्राजापत्या गायत्री छन्द, अग्निदेवता और स्कन्न को स्पर्श करने में, विनियोग है। छठे "भमानां पतये स्वाहा." मंत्र का मा०पर ऋषिः मामापत्या गायत्री बन्द, भग्नि देवता और स्कन्न को स्पर्श करने में विनियोग है । मयम मंत्र को पदकर मोक्षण से बचेहुए जल को कुशों के पूले की जहमें डाले मंत्रका अर्थ यह है कि हे मोक्षणशेपजल के अभिमानी देव! सुम (अदित्य ) भूमि को (व्युन्दनम् ) विशेष करके भाई करनेवाले (भसि ) हो । दूसरे मन्त्र को पदकर कुशाभों के पूले को खोल कर पूर्वभाग से प्रस्तर को ग्रहण कर मंत्रका अर्थ यह है कि-के दर्भ के पूलेरूप.मस्तर तुम (विष्णोः ) यज्ञपुरुष की (स्नुपः) शिखा (असि) हो। तीसरे मन को पढकर.वेदीके ऊपर, कुशाओं, को विद्यार, मंत्रका अर्थ यह है कि-हे वेदी (जगदसम् ) जिस प्रकार स्वामी के बैठालने को भूमि अर्णासन विधाकर कोमल करीजाती है तिसीप्रकार (देवेभ्यः) देवताओं के.अर्थ (सास स्थाम् ) मुखपूर्वक स्थिति होने के लिये ( त्वा). तुझ.को... शामों से.(स्तृणामि ) माच्छादन करता हूँ। चौथे पांचवें और छठे मंत्र को पढकर कत्र ( हविको ग्रहण करतेसमय जो परिधि * काल मे भग्नि के प्राना यादकार के भय से भूमि में प्रवेम करगर .
- २ अध्याय। से बाहर गिरा हो उस) को स्पर्श कराजाता है, चतुर्थ मंत्र का अर्थ यह है कि यह स्कन्न हेवि अग्नि के प्रथम भासा (मुंवपतये) भुवपति के अर्थ (स्वाहा) दिया । पंचम मंत्रका अर्थ यह है कि यह स्कन्न हवि अग्नि के द्वितीय भ्रांसा (भुवनपसये ) भुवनपति के अर्थ (स्वाहा) दिया । छठे मंत्र का अर्थ यह है कि यह स्कन्न हर्षि अग्नि 'के तृतीय भ्रासा (भूतानां पतये) भूसंपति के अर्थ ( स्वाहा') दिया ॥ २॥ गन्धर्वस्त्वां विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यारिष्टय- जमानस्य परिधिरस्य॒ग्निरिड इंडितः।इन्द्रस्य बाहरंसि दक्षिणो विश्वस्यारिष्ट्य यजमानस्य परिधिरस्युमिरिड इंडितः। मित्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधत्तांवेणधर्मणा विश्वस्यारिष्ट्रय यजमानस्य परिधिरस्याग्निरिड इंडितः३ इस कण्डिका में तीन मन्त्र हैं, "प्रथमं गन्धर्वस्त्वा विश्वा- पमुः परिदधातु विश्वस्यारिटय यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ईडितः' मंत्र और द्वितीय, "इन्द्रस्य वाहुरसि दक्षिणो विश्व. स्यारिष्टय यजमानस्य 'परिधिरस्यग्निरिड ईडिसेंः " मंत्र तथा सीसरे “मित्रावरुणात्वोत्तरतः परिधत्तां ध्रुवण धर्मणा विश्वस्पाः रिष्टय यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ईडितः, मंत्र का मा० पर० ऋपि, यजुः, परिधि देवता और क्रमसे पश्चिम दक्षिण और उत्तर में तीनों पारधियों के स्थापन में विनियोग है । प्रथम" मन्त्र को पढ़कर, पश्चिमंदिशामें परिधि को स्थापन कराजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-हेपरिधिदेव । ( विश्वावसः) विश्वा- के दुःखस अग्नि भी भागकर जल में प्रवेश करगया, तब देवताओं ने अग्नि को ला. कर सके अधिकार में स्थापित किया, उससमय अग्नि ने कहा कि मेरे भाताभी को मेरे पास ही चारों ओर एक्सो, और इनको यस का भाग दो, उससमय से या भग्नि के भाता परिषिरूप हुए और कल (गिराष्ट्रभा) हवि उनका भाग हुआ । पापा राय १३।१।११-१६ में मिली है। .
. ६. शुक्लयजुर्वेद वसु (सर्वत्र निवास करनेवाला) * (गन्धर्वः:) गन्धर्व (विश्वस्त्र) प्राहवनीय अग्नि के सकलं स्थान को (अरिष्टय )रक्षा के निमित (वा) वुमेको ( परिदधातु ).पश्चिम दिशाम सर्वत्र स्थापन करे, जिससे राक्षस उस स्थान में प्रविष्ट होकर, विघ्न न करें, तुम केवल आहवनीय अग्नि के ही परिधि नहींहो किंतु तुम (यजमानस्य)रज मान की भी रक्षा के लिये ( परिधिः) पश्चिम दिशा में स्थापन कर हुए हो। तुम (इंडः) स्तुति के योग्य और (इंडितः) होता आदि करकै स्तुति (असि)। को स्थापन घिदेव तुम (विश्वस्य ) सकल विघ्नों की (अरिष्य) शांति करने के निमित्त (इंद्रस्य) इंद्र के (दक्षिणः) दक्षिण (बाहुः) वायु की समान समय (असि) हो, तथा( यजमानास्य ) यजमान के भी (परिधः) रक्षक (असि ) हो, तुम (इडः) स्तुति के योग्य और (ईडितः) होता आदि करकै स्तुति करे हुए (अग्निः) भुवनपति : नामक आग्नि के द्वितीय भ्रासा-(प्रास ) हो । तीसरे मंत्र को पद कर उत्तर दिशा में तीसरे परिधि को स्थापन करा-जाता है, मंत्र का अर्थ, यह है कि हे तीसरे परिधिदेव ! (मित्रावरुणौ )वायु । आदित्य देवसा, (विश्वस्य) सकल विघ्नों की (आरटचे) शान्ति के लिये ( त्वा) सुमको ( ध्रुवेण) निचलता के साथ (धर्मया) धारण करकै (उत्तरवः) उचर दिशा में (परिधत्ताम) स्थापन कर, तुम (यजमानस्य) यजमान के भी. (परिधिः) रक्षक (इ) स्तुति के योग्य और (ईटितः) होता आदिकों करके रनुति करे हुए (अग्निः) भूसपति नामक अग्नि के तीसरे भ्राता (प्रति) हो..३॥ प्रीतिहान त्वा कवे घुमन्त समिधीमहि अग्ने छ हन्तमध्वरे॥१॥ * पुलोक मे स्थित सोम की रक्षा करने के लिये उसके समीप में सर्वत्र पर्वत था यह शनाय को अति में कया है। M T २ अध्याय इस मंत्र का प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषिोंगायत्री छंद अग्नि देवता और परिधि को स्पर्श करसमिधा को अग्नि में छोटने में विनियोग है। इस मंत्र को पढ़कर समिश से परिधि को"म्पर्श कराकर भाग्न में छोडमेर का अर्थ यह दै.कि-(क) हे भूत भविष्य और दरवर्ति पदार्थों के प्रतिक्षण जाननेवाले कवि(अग्ने) भगवान भाग्नदेव ! हवन करने से (वीतिहोत्रम्.) यजमान को पुत्रं पौत्र पशु धनादि समृद्धि प्राप्त कराने वाले (घुमन्तम् ) स्वतः प्रकाश- धान (:बृहन्तम् ) महान (त्या)तुमको (अध्वरे) इस यज्ञ में । यजमान कोःपुत्र.पौत्र पशु.धनादि समृद्धि की प्राप्ति के निमित्त (सामधीमहि) ईंधन के काष्ट से हम प्रज्वालतकरते हैं ॥४॥ समिदमि । सूर्यस्त्वा पुरस्तात्पातु फस्यांश्चिदभिश- : : 'स्त्यै। सवितुर्वाह स्थर्णिमृदसं त्वा. स्तृणामि स्वास स्थं देवेभ्यः ।आ त्वा वसवोन्द्रादित्या संदन्तु ।। + : इस करिडका में पाँच मंत्र हैं, प्रथम "समिदास" मंत्र का प्रा० पर० ऋपि, दैवी वृहती छंद अग्नि देवता और परिधि को विना स्पर्श करे दूसरी समिधा को अग्नि में छोडने में विनियोग है । दूसरे ;'सूर्यस्त्वा पुरस्तात्पातु कस्याचिदभिशस्त्यै" मंत्रकामा पर ऋपि, प्रामुरी; गायत्री छिद्र लिङ्गोक्त-देवता. और आग्नि को,देखते हुए इस मंत्र का जप करने में विनियोग है। सीसरे "सवितुर्वाहस्थः मंत्र का मा. पर ऋपि, याजुपी गायत्री छंद, विधृति देवता और दो लशों को उत्तेरान स्थापन करने में विनियोग है। चौथ ऊम्रदस त्वा शृणामि स्वासस्यं देवेभ्यः' मंत्र का माजापत्य पर ऋपिअंसुरी,गायत्री छंद, मस्तर देवता और कुओं पर मस्तरको स्थापना करने में विनियोग है। पाँचवें "मा.स्वा. वसवो. रुद्रा आदित्या सदन्तु" मंत्र का मा० पर० ऋोप भामुरी गायत्रीं वंद, गस्तर देवता और मस्तर पर दोनों हाथ रखने में विनियोग हैं । प्रथम मंत्र को पढकर परिधिको विना स्पर्शःकरे अग्नि में दूसरी समिधा छोडे, मम का अर्थ यह है कि-हे - शुक्लयजुर्वेद । समिया त् र समिद् ) अग्नि को दीप्त करने वाला (मास) है। दूसरे मंत्र को अध्वर्यु वैठकर हवनीय भग्नि को देखना हुमा पढे, मंत्र का अर्थ यह है कि-ई माहवनीय अग्ने? (पु. रस्वाद ) पूर्वदिशा में (सूर्यः) सूर्य (त्या) सुम को (कस्सा- वि.) किसी (अभिशस्त्यै) हिंसाओंसे (पासु) रक्षा करे (तीनों दिशाओं में सीन परािध रक्षक हैं, इस कारण शेष पूर्ण दिशामें सूर्य को रक्षक कहा, इसही विषय को 'गुप्त्यै वा प्रमि- तः परिधयो भवन्त्यथैतत्सूर्यमेव पुरस्ताद् गोतारं करोति, मा. शतपथ'. ३।४।८ की श्रुति कहती है)। तीसरे मंत्र को प. दकर दो कुशा के तृणमस्तर को स्थापन करने के लिये उत्तर को अग्रभाग रहै इस प्रकार स्थापन कर, मंत्र का अर्थ यह है कि हे कुशनृणों-तुम दोनो (सवितुः) सविता की (वाह) वाहुरूप (स्यः) हो। चौथे मंत्र को पढकर उन दोनों कुशाओं पर म.. सर विधाय, मंत्र का अर्थ यह है कि- हेप्रस्तर ! (ऊर्णनसम्) उनकी समान कोमल (स्वासस्यम् ) देवताओंके मुखासनकर (वा) तुझको (स्तृणामि ) विद्यावा हूँ। पांचवें मंत्र को पर. कर मस्तर पर दोनो हाथ रक्खे, मंत्र का अर्थ यह है कि हेमस्तर !, मासः माध्यन्दिन और तृतीय इन तीनों सदनों के अभिमानी (. सवः) वसु, (रुद्राः) रुद्र और (भादित्याः) मादित्य देवता (वा) बुझ (प्रासदन्तु ) सर्वतः फैला३ ॥५॥ji.. घृताच्यसि जहर्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय सहः आसौदाघूताव्यस्युपभृन्नाम्ना सेदं मियेण धाम्ना मिय छसद आसीद घृताच्यसिवा नाम्ना सेदं मियण धाम्ना मियछसट आसौद । प्रियेण धाम्ना प्रिय सद आसौद । धूवा असदन्नृतस्य योनौ ताः विष्णा- पाहि पाहि पज्ञम् । पाहि यज्ञपतिम् । पाहि मां ये जन्यम् ॥ ६॥ इस काण्डका में छ: मंत्र हैं, प्रथम 'गताच्यसि जुहु ना सई . '.
२ अध्याय। भियेण धान्ना,भियछसद अासीद' मंत्र का मा० पर० ऋषि, सानी विष्णुप् छन्द, मुहू देवता और जुहू को प्रस्तरपर स्थापन करने में विनियोग है। दूसरे घृताच्यम्युपभृन्नाम्ना सेदं प्रियेग धान्ना भि- यछसद मासीद' मन्त्र का प्रा०पर०.ऋषि, सान्नी त्रिगुप् छन्द, उपभृत् देवता और प्रस्तरपर उपभृत् को स्थापन करने में विनियोग है। सीसरे घृताच्यसि धुवा नाम्ना सेदं भियेण धाम्ना-मियछसद भासीद' मन्त्र का प्राजापत्य पर ऋपि, सान्नी त्रिगुप् छन्द,धुवाः देवता और ध्रुवा को प्रस्तरपर स्थापन करने में विनियोग है। चौथे नियेण धाम्ना पियछसद श्रासीद' मन्त्रका मा०पर ऋपि याजुपी जगतीछन्द हविर्देवता और हवियों को वेदीपर स्थापन करने में विनियोग है। पांचवें 'ध्रुवा असदन्नृतस्य योनौता वि- यो पाहि पाहि यज्ञम् पाहि यज्ञपतिम् ' मन्त्र का मा० पर० ऋषि यजु, विषणुदेवता और.सबका स्पर्श करने में विनियोग है। छठे पाहिमा यज्ञन्यम्', मंत्रका मा०पर ऋपि, यानुपी गायत्री छन्द, विषणुदेवता और अपने को स्पर्श करने में विनियोग है। प्रथम मंत्रको पढकर जुहू को ग्रहण कर प्रस्तरपर स्थापन कर मंत्रका अर्थ यह है कि-हे जुहू ! तुम (घृताची) घृत से पूर्ण (नाना) नाम करके प्रसिद्ध (जुहूः) तुम्हारे द्वारा हवन कियाजाता है, इसकारण जुह नामवाले.(असि ) हो । (सा) ऐसे तुम(भियेण) 'देवताओं के मिय (धाम्ना) घृत करके सहित ( इदम् ) इस (भियम् ) भियं (सदः) मस्तररूप स्थानपर (असीद) स्थित होवो । मरे मंत्रको पढकर उपभृत् को ग्रहण कर मस्तरपर स्था- पन कर, मंत्रका अर्थ यह है कि-हे उपभून् ! तुम (घृताची) घृत से पूर्ण (नाना) नामकरकै प्रसिद्ध (उपमृद) समीप में स्थित होकर घृत को ग्रहण करनेवाले (भसि ) हो । (सा.) वह तुम (मियेण) देवसामों के मिय (धाम्ना) घृत करके सहित (इदम) इस मस्सररूप (सदः) स्थानपर. (आसीदः)स्थित होवो । सी- सरे मंत्र को पढ़कर ध्रुवा को ग्रहणकर मस्सरपर स्थापन कर, मंत्र " शुक्लयजुर्वेद। का अर्थ यह है कि हे ध्रुव तुम (घृताची ) धृत से पूर्ण ( नानां) नामकरकै मसिद्ध (मासि)हो। (वा) निश्चल अर्थात् जुह और उपेम वकी समान चलायमान नहीं (असि) होते हो [इसकारण सु. म्हारा नाम ध्रुवा है ], (सा) वह तुम(भियेण) देवताओं के मिय (धाम्ना)स करके सहित (इदम् इस मस्तररूप (प्रियम् ) मिय ( सदः) स्थानपर (आसीद) स्थित होवो । चौथे मंत्रको पढ़कर आज्यस्थाली पुरोडाशादि हवि को वेदी के विर्षे स्थापित कर, मन्त्रका अर्थ यह है कि हे हवि ! (भियेण) देवताओं के मिय (पाना ) पृत करके सहित (इदम् । इस (भियम् ) भिय (सदः) स्थानपर ( श्रासीद) स्थित होवो।.. पाँचवें मन्त्रको पढकर सक्को स्पर्श करै, मन्त्र का अर्थ यह है कि (तस्य) अवश्य फल युक्त होने के कारण सत्यरूप याके (योनी) स्थान में जो हवि (असदन ), (विष्णो) हे व्यापक यज्ञ. पुरुष विष्णभगवान् (ता.) उन हवियों को ( पाहि) रक्षा करो, (यज्ञम् ) यज्ञ को ( पाहि ) रक्षा करो, ( यज्ञपतिम् ) यजमान को (पाहि) रक्षा करो। छठे मंत्रको पदमर भध्वर्यु अपने हृदय को स्पर्श करे, मंत्रका अर्थ यह है कि-हे विष्णुभगवन् ( यजन्यम् ) यज करानेवाले (माम् ) मुझ अध्वर्यु को (पाहि.) रक्षाकरो ॥६॥ 'अग्ने वाजजिहाज स्वा सरिप्यन्तै वाजजित सम्मा- .. मिनमो देवेभ्यः। स्वधा पितृभ्यः । सुयमे मे भू- यास्तम्॥७॥ "इस कण्डिका में चार मन्त्र हैं, मयम 'अग्ने वाजजिदाज त्या सरिप्यन्ते वाजजित सम्मामि मन्त्र का मा पर० अंपि मनुः अग्नि देवता और अग्निके मार्जन में विनियोग है। दूसरे नमो देवेभ्यः' मंत्रका मा० पर ऋषि, देवी.पंक्ति छंद, देवा देवता और भन्नुलि करने में विनियोग है। तीसरे "स्वघा पिता मंजका प्राजापत्य परमेष्ठी ऋषि,दैवी पंक्ति इन्द, पितर देशवा और दक्षिण को उत्तान अंजुलि करने में मिनियोग है। नौ .
२.अध्यायः 'मुंयमे मे भूयासम्' मंत्रकामा पर ऋपि, आची उपिणक्छंद जुहपभृत् देवता और जुहु उपमनु और ग्रहण करने में विनियोग है। मथम मंत्र को पढकर इन्धन के बाँधने के दल र जने ) से दक्षिण उत्तर और पश्चिम की परिधियों के समीप सीन सनिया नीय अग्नि का मार्जन कर, मंत्रका अर्थ यह है कि-(वाज़जित् ) हे मन्त्र को जीतनेवाले (अंग्नेः) अग्निदेव ! (.अन्नम् .) अन्नको ( सरिप्यन्तम् .) सम्पादन करने में उपयुक्त ( वाजजित). अन्न के प्रतिबन्ध का निवारण करनेवाले (त्वा) गुमको (सम्मार्जिम) सम्मान करता हूँ । दूसरे मंत्र को पढकर पूर्व दिशा की ओर को हाथ जोई, मंत्र का अर्थ यह है कि- देवेभ्यः) जो देवता, इस यज्ञरूप अनुष्ठान क कार अनुग्रह करते हैं-उनको (नमः) नमस्कार करता हूँ। ससरे मंत्र को पढकर दक्षिण दिशा की ओर को ऊपर को हाय जोडे जाते हैं, मंत्र का अर्थ यह है कि-(पितृभ्यः) जो पालन करने वाले पितर हैं, उनके अर्य (स्वधा ) स्वधा हो अर्थात् उन को जो देना योग्य है सो दूंगा। चौथे मंत्र को पढकर जुहू और उपभृत को ग्रहण कर. मंत्र का अर्थ यह है कि-जुहू और उपमृत् (मे) मेरे निमित्त (मुयमे) भली प्रकार सावधाम (भूयास्तम्) होवो जिससे कि अनुष्ठान में तुम्हारे वि. धारण कराहुआ घृत गरे नहीं, तुम्हारे अभिमानी देव तुमको ऐसी शक्ति दें ॥७॥ अन्नमय देवेभ्यु आज्य सम्ध्रियासम् । अघिणा ': विष्णो मा त्वार्यक्रमिपम् । वसुमतीमग्ने ते छाया- मुपस्थे विष्णो स्थानमसि । इत हन्द्रो वामकृणो ध्वोऽध्वरं आस्थात् ॥ ४॥ इस कण्डिका में अस्कन्नमय देवेभ्य प्राज्य छ सम्भ्रियासम्' पूर्व मनकाशेप है, इस से आगे प्रथम अंघ्रिणाविष्णो मा त्वाव- ऋमिपम मंत्रका मा०पर ऋषि, याजुयी त्रिष्टुप् छन्दा विष्ण देवता और दक्षिणतिक्रमण में विनियोग है दूसरें बसमती- +1
शुक्लयजुर्वेद ।
मग्ने से छायामुपस्येषं विष्णो स्थानमसि' गत्रका मा पर अषि
'यजुः भग्नि देवता और प्रापान में विनियोग है । सीसरे "इत
इन्द्रो वीर्यमाऽवर आस्थात्" मंत्रका मा० पर० ऋषि,
इन्द्रदेवता और हवन करने में विनियोग है। मथम मन्त्रके
शेष का अर्थ यह है कि-सुम्हारे सावधान होनेपर ( अय ) भाग
'इस अनुष्ठान के दिन में (देवेभ्यः) देवताओं के उपकारके नि-
'मित (भाज्यम् ) घृत तुम में (अस्कनम् ) जैसे भूमिमें न गिरे
(तिस प्रकार (सम्भ्रियासम् :) धारण करता हूँ। प्रथम मंत्र को
पढकर दक्षिण दिशा अर्थाद यजन के स्थान को गमन करे, मंत्र
को भर्य यह है कि-विष्णोई व्यापक यापुरुप विष्णु भगवन!मैं
(भघ्रिणा) चरण करके (त्वा) सुमको (मावक्रमिषम्) भव.
क्रमण न ककं अर्थात् चरण से तुमको उल्लंघन करनेका दोप मुझ
को न हो। दूसरे मंत्र को पढकर यजनस्थान में ईशान को मुखकरके
बैठे, मंत्रका अर्थ यह है कि-( अग्ने ) हे भग्निदेव ! (ते)
सुम्हारी (छायाम् ) छाया की समीपवर्ती (वसुमतीम्) भमिको
1. स्पेपम् ।) सेवन कह दे भूमि तू ( विष्णोः )
यापुरुष, का ( स्थानम् ) स्थान (असिः) है अर्थात् यहां
बैठकर यज्ञ करने में समर्थ होते हैं, अथवा ऐसा अर्थ करना कि
हे अग्निदेव ! मैं धनमाप्ति करानेवाले तुम्हारे आश्रय का सेवन
करता हूँ क्योंकि तुम यज्ञ पुरुष विष्णु का स्थान हो । तीसरे
मंत्र को पढकर अग्नि में घृत का हवन कर मंत्र का अर्थ यह है कि-
(इन्द्रः) इन्द्र (इह.) इस देवयमन नामक स्थान से उद्युक्त होकर
(वीर्यम् ) शत्रुवरूप वीर का कार्य (अकृणोत् ) करता हुमा
इस कारण ही (अध्वरः ) या (ऊर्ध्वम् ) श्रेष्ठ (भास्थात् )
'मानागया है।॥८॥
आने बहोत्रं चेयम् । अबतां त्वां पाषाएथिली ।
अव वंद्यावापृथिवी विष्टकोबेभ्य इन मापेम
विषाभूत स्वाहा । संम्पोसिमा ज्योतिः॥९॥
२.अध्याया इसमें " अग्ने वेहोत्रं वेर्दूत्यम् अवतां त्वां धावापृथिवी अव त्वं पावापृथिवी स्विटकईवेभ्य इन्द्र प्राज्येन हविषा भत् स्वाहा, यह पूर्व मंत्रका शेष है, और " संज्योतिषा ज्योतिः," मंत्र का मा० पर० ऋषि, याजुपी गायत्री छन्द, प्राज्य देवता और जुहस्प घृत को ध्रुवा में टपकाने में विनियोग है।। भावार्थ-इसमें प्रथम मंत्र के शेष "अग्ने इत्यादि" का अर्थ यह है कि-(अग्ने.): अग्निदेव! तुम (होत्रम् ) होताके कर्म को (वे.) जानो, और देवताओं के (.दूत्यम् ) दूत कर्म को (वेः) जानो (अर्थात इस न्याग में दूतरूप * होकर देवताओं का भाग पहुंचाओ)(घावा पृथिवी) घुलोक और पृथिषी के. अभिमानी देवसा (त्वाम् ) तुमको (अवताम् ) रक्षा करें और सुम (घावापृथिवी).धुलोक तथा पृथिवी के अभिमानी देवताओं की (अव) रक्षा करो, इस मकार परस्पर रक्षा करने से (इन्द्रः) इन्द्रदेव इस याग में हमारे दियेहुए. (श्राज्येन ) घृरारूप हवि के द्वारा (देवेभ्यः) देवताओं के अर्थ (स्विष्टकत ) शोमन इष्ट करनेवाले (भले प्रकार अभीष्ट भाग देनेवाले) (मन) हों अर्थात् हम जो २ भाग जिस २ देवता के अर्थ दें वह (स्वाहा ) पूर्णाङ्गतापूर्वक उन सकल देवताओं को प्राप्त हो हमारा इदके उद्देश्य से होमाहुआ घृतरूप हषि महंत हो भर्यात् इन्द्र देवता को माप्त हो इस संज्योतिपेत्यादि मन्त्रको पढ़कर जुहू नामक मुच में के घृत का विन्दु ध्रुवा में डाले.मंत्रका अर्थ यह है (ज्योतिपा) ध्रुवा में स्थित घृसमप ज्योति के साथ ( ज्योतिः) टपकायाहुया. परा (सङ्गच्छनाम् ) मिले ।।९।। मयीदमिन्द्वन्दियं दधात्वस्मान.रायोमघवानः सच- न्ताम, अस्मारसत्याशिप:सत्यान:सन्त्वाशिषः उपहता पृथिवी मातोप मां पृथिवी माता लयताम, अग्निराग्नीत स्वाहा ।। १०.॥ * होतत्वं देतवं चाग्नेः कर्म तपाइ भुतिः " उभय वा एतदग्निदेवाना होता *TRE ( शत. [! ५/५):
शुक्लयजुर्वेद। इस काटिका में दो मंत्र हैं, प्रयम" मयादमिन्द्र इन्द्रियं दधा- त्वस्मान् रायो भघवानः सचन्ताम्, अस्मांक सन्त्वाशिषः सत्वा मेंः सन्त्वाशिषः" मंत्र का मा० पर० ऋषि, यजुः, प्राशीदेवना भौर आशासन में विनियोग है । दूसरे " उपहूता पृथिवीमातोप मां पृथिवी माताहयताम्, अग्निराग्नीध्रात् स्वाहा "मंत्र का मा० पर ऋपि, यजुः पृथिवी, देवसा और हविः माशन में विनियोग है। प्रथम मंत्र को प्रधान याग के अनन्तरं शेष पुरोडाश के माशन के समय होता आशीर्वाद देय उस समय यजमान पढे, मंत्रका अर्थ यह है कि-(इन्द्रः।) परमेश्वर (इदम् ) इस(इन्द्रियम् ) इच्छित वीर्य को (मयि) मुझ यजमान के नि (दधातु) स्थापन करे, (रायः) धन और (मघवानः) धनधान् ( अस्मान् ) हमको (सचन्ताम्.) सेवन करें, (अस्माकम् ) हमको (अशिषः) अभीष्ट अर्थ के आशीर्वाद (सन्तु ) हों और वह (म:) हमारे विषय के (आशिपः) आशीर्वाद (सत्याः) सत्यः (साबु)हाँ। होता के द्यावा. पृथिवी का उपहान करते समय दोनों पुराड़ाओं में से एक २ अंशके छः छ: भागकर भाग्नीध्र को, देव और इस दूसरे मंत्र को पढ़कर उनका भक्षण कर, मंत्र का अर्थ यह है कि- (माता) जगत् का निर्माण करने वाली पृथिवी, (अपहता.) मुझ से आवाहन कीगई है, यह (माता) मारूप मानी हुई (पृथिवी ) पृथिवी (माम्) मुझको ( उपश्यताम् ) शेषहवि के मक्षण की माज्ञा देय मैं (भाग्नीधान) भग्नि का कर्म करनेवाल होने के कारण (अग्निः) अग्निरूप (अग्नि देवकरके अपनाया हुआ) होकर तिस हविःशेष को मक्षण करता हूँ, यह जाठराग्नि में (स्वाहा) मुहुत हो ।' उपडतो चौरिकतोष मां पौष्पिता इयतामग्निराग्नी- ..धात् स्वाहा।देवस्य त्वा सवितु ममवेऽश्विनो हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृहामिाग्नेष्ट्वास्येन पानामिटर इस कण्डिका में चार मंत्र हैं, मथम "उपहूनो यौष्णिसाप मां AA .२ अध्याय.. . चौरिसा इयंतामानिराग्नीध्रात् स्वाहा मंत्र का प्रा० पर०.मृपि सान्नी त्रिगुप् छन्द, धौदेवता और द्वितीयवार प्राशन में विनियोग है। द्वितीय "देवस्य त्वा सपितुः भसवेऽचिनोर्वाहुभ्यां पूष्णो हस्ता भ्याम्' मंत्र का बृहस्पति *पि-माजापत्या वृहती छंद, सविता देवता एवं तृतीय "प्रतिगृह्णामि' मंत्र का बृहस्पति ऋषि, देवी पंक्ति चंद, माशित्रदेवता और द्वितीय तृतीय इन दोनों मंत्रों का स्वीकार करने में विनियोग है । चौथे "अग्नश्वास्येन मानामि" मंत्र का वृहस्पति प्रापि, मांजापत्या गायत्री छंद, पाशित्र देवता और भक्षण में विनियोग है। प्रथम मंत्र को पढकर दूसरा भाग भक्षण किया.जाता है। मंत्र का अर्थ यह है कि-(पिता) जगत् का पालन करनेवाला (चौः) स्वर्ग ( उपहता)मुझ से आवाहन कियागया यह (पिता) पितारूप भावना किया हुआ ( द्यौः.) स्वर्ग (माम् मुझको (उपक्ष्यताम् ) इस शेष हवि के भक्षण की आज्ञा देय, मैं (आग्नीध्रात ) अग्नि का कर्म करने वाला होने के कारण(अग्निः) अग्निरूप (अग्नि देवता करके अपनाया हुआ) होकर तिस हविः शेष को भक्षण करता हूँ, यह जाठराग्नि में (स्वाहा.) मुहत हो। दूसरे और तीसरे मंत्र को पढकर माशित्र को ग्रहण कियाजाता है मंत्रों का अर्थ यह है कि--हे माशित्र ! (सवितुः:) सविता (देव- स्प.) देवता की (-सवे) मेरणा होने पर मैं (अश्विनो) अ- श्विनी कुमारों के बाहुओं की करी है भावना जिन में ऐसे (वाहु- भ्याम् ) वाहुओं करके और (पूपणः):पूपा देवता के इस्तो करी है भावना जिन में ऐसे (-हस्ताभ्याम्.) हस्तों करकै (त्वा) तुझ को.(प्रतिगृह्णामि) स्वीकार करता हूं । चतुर्थ मंत्र को पढ़कर सिंस ग्रहण करे हुए माशिन को इस मकार भक्षण करै कि--दंतों से स्पर्श न हो, मंत्र का अर्थ यह है कि-हे माशिन ! (अग्निः) अग्नि देवता के (आस्थेन) मुख करकै (त्वा.) तुझको(मानामि) यहां से लेकर प्रतिए, यहां पर्यन्त के मंत्रों को,मनल है। इन का आदि रस वृहस्पति ऋषि है।
- शुक्लयजुर्वेद। स्पैन मसवेनापाहामि ॥१५॥r. 'इस काण्डका में । अग्नीपमियोरिल्यादिइन्द्राग्न्योरित्यादि। इन्द्राग्नी इत्यादि । यह तीन मन्न है, सीनों का माजापत्य अषि, बैद पहिलेका यमुः, दूसरे की आषी उष्णिक, तीसरे का पार्षी पंक्ति और तीनों का लिङ्गोक्त देवता । पहिले मंत्र को पढकर । यजमान 'जुहू को अपने स्थान पथिम से उठाकर पूर्व में रक्खे, और उपभृव को पूर्व से उठाकर पश्चिम में रक्सै। मंत्र का अर्थ यह है कि-('अग्नीपोमयोः) द्वितीय पुरोड़ाश देवताओं के (उ. जितम् ) निर्विघ्नता के साथ हविको स्वीकार करनेपर उत्तम वि. जयको ( अनु ) अनुसरण करके ('उज्जेषम् ) उत्तम जयको प्राप्त हुआ हूँ ( वाजस्य) पुरोडाशादि अन्न की ( प्रसवेन) मेरणां से (मा) मुझ जुहरूपं यंजमान 'को ('मोहामि) उत्साह देता हूँ [उपभृत् को पश्चिम में रक्खे ] (य) जो अमुरादि-शत्रु (अ. मान् ) हमारे मति ('देटि) देप करता है (च) और (यम् ) जिसअनुष्ठान विरोधी शत्रु के मति (चंयम् ) दम (द्विप्मा) देष करते हैं (रोम् ) उसको' ('अंग्नीपोमो) अग्नि और सोमदेवता (अपदताम् ) तिरस्कन करें (वाजत्य) अन्न के (मसन।) आँध करनेपर (अपोहामि) निराकरण करता हूं। अगले, दूसरा और तीसरा दोनों मंत्र दर्श के अधिष्ठात्री देवता की प्रार्थना विषय के हैं, एकसमान पदे होने से संबको अर्थ प्रथम मंत्र के अनुसार कैवल (बानीपोमो) के स्थान में (इन्द्राग्नी ] पद है। उसका अर्थ है-इन्द्र और श्रग्निदेवता ॥ १५॥ TER 'वसुभ्यस्त्वा ट्रेभ्यस्त्वा आदित्येभ्यस्त्वा सञ्जांनाथा) धावापृथिवी मित्रारणी- त्वा वृष्टावताम् व्यन्तु वयोऽक्त रिहाणा मला पतीगच्छ वशा प्रभिभूस्खा दिवङ्गच्छ ततो नो घृष्टिमावह । चक्षुप्पा अग्रेमि बभुमे पाहिं ॥१६॥ इस काण्डका मेवमुव्हमद्रायादिमा मई २ अध्याय न्बु१० । बामन्त्र हैं। सब का मजापति ऋषि है। बन्द- पहिले और दूसरे का देवी बृहती, तीसरे का दैवीपंक्ति । चौथे का यजुः । पाँचवें का प्राजापत्या गायत्री । छठे का बृहती।। २१.३ मंत्र का परिधि देवसा । ४।५ का प्रस्तर देवता और ६ का परिध्यग्नि देवता है । पहिले मंत्र को पहकर मध्यमपरिधि को जुहू के द्वारा मृत से छिडके मंत्र का अर्थ यह है कि- मध्यम परिधि (वसुभ्यः) वसुदेवताओं की प्रीति के लिए (त्वा) तुझको, घृत से सींचताहूं । दूसरे मंत्र से दक्षिण परिधि को सींचा जाता है, मंत्र का अर्थ यह है कि हे दक्षिण परिधि ! (रुदेभ्यः ) रुद्रों की प्रगति के निमित्त ( त्वा) तुझको, वृत- सिक्त करता हूं। तीसरे मंत्र से उत्तरपरिधि को सींचाजाता है, अर्थ यह है-हे उत्तर परिधि (श्रादित्येभ्यः) आदित्य देवता ओं की मसन्नतार्थ (वा) तुझ को, घृतसिक्त करताहूं । चौथे मंत्र से प्रस्तर ग्रहण कियाजाता है, मन्त्रार्थ यह है कि-( धावा- पृथिवी ) हे धुलोक भूलोक के अधिष्ठात्री देव (सञ्जानाथाम्) इस. ग्रहण किएहुए मस्तर को भलीमकार जानो । हे मस्तर (मित्रावरुण) वायु और सूर्य देवता (त्वा) तुझको (. एथा) जल की वर्षा से ( अवताम् ) रक्षा करें। पांचवें मंत्र को पढकर ग्रहण करेहुए मम्तर के अग्र-मध्य-और मूलभागों को क्रम से जुहू-उपमृत्--और धुवा में स्थित घृत से लिप्त करें, मन्त्रार्थ-(अक्तम् ) सालस मस्तर को (रिहाणाः) चाटतेहुए (वयः) अन्तरिक्षचारी देवता वा पक्षिरूप गायत्री श्रादिछन्द (व्यन्तु) विचरें [इस प्रस्तर कहिए पूली में से एक कुश अलग करके उस को नीचे हाथ से छटे मंन को पढताहुआ अग्नि में छो] मन्त्रार्य यह है-दे प्रस्तर तुम (मरुताम् ) मरुन नामक देवताओं के (पृपतीः) वाइन को (गच्छ) मास हो अर्थात् पवन के वाहन की समान वेग से जा। ( वशा) स्वाधीन (पाश्निः) दिव्यशरीर धारिणी कामधेनु गौकी समान ति करने वाली ७४ शक्लयजुर्वेद । (भूत्वा) होकर दिवम् ) स्वर्ग से (ग)जा (म) तिस के अनार (नः) हमारे निमित्त ( दृष्टिम् ) ची को । (मानय) ला। अर्थात् अतरिक्ष में जाकर तहों वाहनसहित मरुन्गग्गा को तृप्त करो फिर स्वर्ग में आकर देवताओं को कृप्न करो जिससे पृथिवीपर वर्षा हो, यह आहुति का फन दिखाया [आगे के मत्र से अध्वर्यु प्रस्तर से लियेहु क्षण को नाहनीय अग्नि में डालकर प्रात्मा को हृदय देशपर स्पर्श करके नाचमन करें] मनार्थ यह है-(अग्ने ) हे यग्निदेव ! क्योंकि-तुम (च. क्षुप्पा) नेत्रों की रक्षा करनेवाले (असि) हो, इसकारण (मे) मेरे (चक्षु ) नेत्र को ( पाहि) रसाकरो, अर्थात् प्रस्तर की सील ज्वाला से नेत्रों को पीटा न पहुँचे ।। १६ ।। य परिधि पर्यवत्या आग्ने देव पूणिभिर्गह्यमान तं ते एनमन जोपम्भराम्येप नेत्त्वपचेतयांन । अग्ने. मिप पायोऽपीतम् ॥ १७॥ इस काण्डका में-य परिधिमित्यादि और अग्नेरित्यादि दो मत्र हैं, दोनों का देवल प्रापि, अग्निदेवसा तया पहिले का विराटप त्रिष्टुप् छन्द और दूसरे का याजुपी छन्द है । पहिले मन को पद कर मध्यम परिधि को अग्नि में डालाजाता है, मन्त्र का अर्थ यह है कि-(अग्नेदेव ) हे आहवनीय अग्निदेव (परिणाम ) अनुरो से (गुह्यमान ) रुकेहुए तुम (यम् ) जिस (परिधिम् ) परिधि को, अमुराका उपद्रा दूर करने को पश्चिम दिशा में (पर्यवत्या ) स्थापिाकरोहुर (ने) तुम्हारे ( जोपम् । मिय (नम् )उस (एतम्) इस परिष को (अनुमरामि ) अग्नि में डालकर तुम्हारे अर्पण करता हूँ (एप) यह पारधि (स्वर) तुमसे (न इत्-अपचेतयाते) प्रियुक्त न हो [दूसरे मन्त्रको पहरर दक्षिण उत्तर परिधि काभ ग्नि में डालाजाहै ] मन्त्रार्थ-हे दक्षिण उत्तर परािधे ! तुम (प्रग्ने ) अग्नि के रमियम् ) मिय (पाथः) भक्षणयोग्य म सामायो (इगम ) माम करो ॥ १७॥ । -- . २.अंध्याय । मनवभागा स्थेपा वृहन्तः प्रस्तरेष्ठाः परिधेयांश्च देवाः । इमां चोचमाभिविश्य गृणन्तं आसास्मिन् . बुर्हिपि मादयध्वम् । स्वाहा वादः॥१८॥ इस कण्डिका में दो मंत्र हैं। १ संम्रवभागा इ०१२ स्वाहा- बांट। दोनों का सोमशुप्मऋपि:। पहिले का त्रिगुप्छन्द। दूसरे को यजुः । और दोनों के विश्वेदेवा देवता हैं । पहिले को पढ़कर अवयु घृत से गीले प्रस्तर का हवन करै । मंत्रार्थ यह है-(हे विश्वे- देवाः) हे विश्वदवा तुम ( सस्रवभागाः) सापहुए घृत के भागी (इपा) संयुक्त अन्न के द्वारा (वृहन्तः) महान् (च.) और (मस्तरेष्ठाः) मस्तर पर स्थित (परियाः) परिधि से दुर्थन (स्थ) हो (इमाम् ) इस मेरी (वाचम्) वाणी को (अभिगृणन्तः) सादर ग्रहण कर वर्णन करनेहुए (अस्मिन् ) इसं( वहिपि ) यश में (आसय) माप्त होकर ( मादयध्वम् ) तृम होवो दूसोमंत्र से होम करे ] (स्वाहा )हमारे दिपहुए इवि को ग्रहण करो (बा) हमारी दीहुई आहुति को भली प्रकार स्वीकार करो ॥१८॥ १' घृताची स्थो धुर्यो पात छ मुम्ने स्थ: मुम्ने माधत्तम् । यज नमश्च त उप च यज्ञस्य शिवे सन्तिधस्व स्विफ्टे मे सन्तिष्ठस्व ।। .१९ ॥ * . इस कण्डिका में दो मंत्र हैं-घृताची इत्यादि पहिले मंत्र का मजापनि ऋषि, अनुग्रुप् छन्द सुक् सुन् देवता और यज्ञ नम इत्यादि दूसरे मंत्रका गूंपादि पि, यजुश्छन्द तथा यज्ञ देवता है । पहिले मंत्र को पढ़कर अध्वर्यु जुहू और उपभृत् को शकट की, धुरी पर धर। मंत्रार्थ-हे जुहू उपभून् तुम दोनों (घृताची)घृत को प्राप्त करनेवाले (स्य)हो(धुर्यो) शकट के दोनों वाहनों को (पातम्) रक्षा करो, तुम (सुन्ने ) मुखम्हप (स्थ ) हो (सुम्ने ) सुख में (मा) मुझको (धत्तम् ) स्थापन करो [ दूसरे मंत्र को पढ़कर वेदी को. पर्श कियाजाताहै ] मंत्रार्थ-(यज) है.वेदी ने.) तुम्हारे अर्थ (नमः) नमस्कार हो।(ब) और (अपच वृद्धि न शुलपमुट। भी हो ( यत्रस्यः) या के (शिवे) कल्याण में (सन्तिटस्व.) स्थित हो (मे) मेरे (स्विष्टे) सुन्दरयाग में (सन्तिष्ठस्य) माप्ति कराभो ॥ १९॥ अग्नेऽदधापोशीतम पाहिमांदियोः पाहि पसिस्ट। पाहि दुरिष्ये । पाहिदुरम॒न्या अविषनः पितुं कृणु। सुषदायोनौ स्वाहा वाद अग्नये संवेशपतये स्वाहा। सरस्वत्यै यशोभगिन्यै स्वाहा ॥ २० ॥ इस कण्डिका में ३ मंत्र है। १ अाने धाइ। भग्नये०३०॥ ३ सरस्व० ३० । पहिले का म०प० ऋपि, याजुषी छन्द, गार्ड पत्याग्नि देवता । दूसरे का प्र० ऋ०, याजुपी त्रिगुप् छन्द, द- क्षिणाग्नि देवता । और तीसरे का प्र० ऋ०, या त्रि० छन्द... तथा लिङ्गोक्त देवता है। पहिले मंत्र को पढकर अध्वर्यु होमार्थ मुक् और सुद को ग्रहण करै । मन्त्रार्थ-( अदब्धायो)ो यजमान के मालकारिन् (अशितम् ) बहुमोजी वा सर्वत्र ग्या पक (अग्ने) गाईपत्यनामाने (मा.)मुझको ( दियोः) शत्रु के पनसमान शख से (पाहि ) रक्षा करो (मसित्यै ) बंधन करने वाले जाल से ( पाहि ) रक्षा करो (दुरिष्टौ ) अशासीय • याग से ( पाहि) रक्षा करो (दुरबन्याः) पितभोजन से (पाहि ) रक्षाकरो (सुपदायोनौ ) सम्यक स्थितियोग्य स्थान में (ना) हमारे (पिम् ) अन्न जल को (अविषम् ) विषरहित (भाकण) करो ( स्वाहाबाद) यह आहुति मलीमकार स्वीकृत हो [दूसरे सीसरेमंत्र को पढकरमुवे से दक्षिणाग्नि में हवन करें] मन्त्रार्थ (सेवेशपतये ) खीपुरुषों के एकत्र शयन को सेवेश कहते ईतिसके पति(अग्नये ) अग्नि के निमित्त (स्वाहा) मुन्दर हचिदिवा भर्यात् इस आहुति के फल से हम को सेवेश का फल मिले (यशोमगिन्यै ) यश की वहिन वापीरूप (सरस्वत्यै ) 'सरस्वती के भर्प (साहा) मुन्दर पाहुति हो भर्गत् इसके कल इम को मामले ॥२०॥ --- २ अध्याय। ७७ . वेदोऽसि येन स्वन्दैव वेद देवेभ्यो धेदोवस्तेन मही वेदो भूयाः । देवा गातु विदो गातुं वित्त्वागातुर्मित मनसस्पत इमं देव यज्ञ स्वाहा वाते धाः ॥ २१ ॥ इस कण्डिका में दो मंत्र हैं। १ वेदोसीति । २ विवा इत्या. पहिले का प्रजापति ऋपि, याजुपी छन्द, वेदा देवता । दूसरेका मनसस्पति ऋपि, त्रिपदा विराट् छन्द और वासदेवता है, पहिले को पढकर यजमान की पत्नी मुट्ठीभर दर्भके पूलेकी गाँठ को खो- लती है जो कि-वेदी से पहिले ही बनायाजाता है, मन्त्रार्थ-हे कुश मुटिसे निर्मित वेदपदार्थ (वेदोऽसि ) तुम गादि वेदरूप हो (देव) प्रकाशात्मक ( वेद ) सबके ज्ञाता (येन) जिसकारण से तुम यज्ञका समस्त वृत्तान्त माद्योपान मानते हो अतः (देवेभ्यः). देवताओं के अर्थ ( वेदः)ज्ञापक (अभवः ) होतेहुए (तेन ) तिसकारण से ( मह्यम् ) मेरे निमित्त (वेद) बापक (अयाः) हो [ दूसरे मंत्र को पढकर यज्ञके आगे से देवताओं का विसर्जन कियाजाता है ] मन्त्रार्थ-(गातुविदः ) यज्ञके जाननेवाले (देवाः) देवताओं ! (गातुम् ) यज्ञके सब वृत्तान्त को (वित्वा ) मानकर (गातुमिरा ) यज्ञ के मात भामो वा हमारे यवसे सन्तुष्ट हो- कर अपने लोकों को जानो (मनसस्पते ) हे मन के मवर्क .(इमम् ) इस ( यज्ञम् ) यज्ञ को (स्वाहा) तुम्हारे अर्पण क- रता हूं, भाप इस यज्ञको (वाले ) वायुरूप देवता में (धाः) स्थापित करो ॥ २१॥ सम्बाहरडताछ हविपा घुतेन समादित्यैर्वसुभिः सम- रुटि समिन्द्रो विश्वदेवेभिरक्तां दिव्यं नगच्छ तु यत् स्वाहा ॥ २२॥ इस कण्डिका में १ मंत्र है, इसका म०प० ऋपि, विराटपा मिथुप् छन्द और वाई देवता है, इसको पढ़कर जुहू से कुशा का होम होता है । मन्त्रार्थ-(इन्द्रः) इन्द्र देवता ( वाहः ) कुशा को (इविषा) हरिरूप (घृतेन ) घृत से ( समक्ताम् ) भनी " ७८ . शुक्लयजुर्वेद । प्रकार लिप करो (आदित्यैः) १२ आदित्यों के ( सम् । साथ (वसभि:) वसुत्रों के (सम् ) साथ ( विश्वदेवेभिः) विध- देवों के ( सम्)साथ (अङ्क्ताम् ) लिप्त करो, वह (यत जो (दिव्यम् )दिव्यमंकाशरूप ( नमः सूर्यरूपज्योति को (गरञ्चन) माप्त हो (स्वाहा ) सुन्दर होम हो ॥ २२ ॥ :- कस्त्वा विमुंश्चति: सत्या विमुंश्चति कस्म त्वा विमु चति तस्मै त्या विमुञ्चतिपोपीयरक्षसांमागोऽसि॥ . इस कण्डिका में दो मंत्र हैं । १ कस्त्वाला रक्षसा पहिले का म० ऋपि, यानु पी. ईन्द, प्रजापति देवता। दूसरे का प्र० ऋपि, यार्नुपी गायत्री छन्दःऔर रक्षो देवता है। पहिले मंत्र को पढ़कर पूर्व स्थापित (१,६ ) पात्र का विसर्जन करें। मन्त्रार्य- अध्धयु स्वयं पाहवनीय की परिक्रमा करकै वेदी के दक्षिणभाग में उत्तरमुख होकर माणीतापात्र को वेदी के मध्य में स्थापन कर किसी स्थान पर पलट देय । हे मणी तापान ! (क) कौन (वा) तुमको (विमुञ्चति)त्याग करता है (सः) वह मजापति (त्वा) तुमको (विमुञ्चारी) त्यागता है (काम.) किस निमित (वा.) तुमको विमुञ्चति) त्यागवा है (तस्मै )उस मजापति के सन्तो. पार्थ, (त्वां ) तुझको ( विमुभात ) त्यागता है (पोपाय ) यजमान फे पुत्र पौत्रादि को पोपण करने के निमित्त तुझको त्यागता हूं। दूसरे मंत्र को पड़कर प्रथम पुरोड़ाश के कपाल से प्रोदनकणों को निकालकर कृष्णाजिन के समीप स्थान में उत्करपर डाले। मन्त्रार्थ हे कणसमूह तुम :( रससाम् ) राक्षसों के (भागः) भाग (मसि ) हो ॥२३॥ संबचमा पर्यमासन्नुभूतिरगन्महि मनसासंशियम स्वष्टा मुबो विदधातुरायोऽनुमाष्टु तन्यो यहिलिएम्।। इस कण्डिका में ! मंत्र है, जिसका मऋीप, त्रिय छन्द 'और त्वष्टा देवना है। इस मंत्र को पढकर यजमान अंजाल से पूर्ण पात्र को ग्रहण करें। अध्ययु भावनाय की परिक्रमा कर २ अध्याय दक्षिण में बैठा हुआ उत्तर को मुखकर पूर्णपात्र को लेय बघा य- जमान अनुील में जल लेकर मुख शुद्र करे। मनाथ हो श्राज (वर्चसा) ब्रह्मतेज से वा अन्न से (समगन्माहे.) संयुक्त हो.(पयसा) दुग्धादि रस से संयुक्त हों ( राशूभिः )..अनुमान में समर्थ शरीर के अवयवों से संयुक्त हों। (शिवेन) शान्कर्म श्रद्धायुक्त (मनसा) मन से संयुक्त हो । सुत्रः) उत्तम दानी ( त्वष्टा ) त्वष्टा देवता (राय::) धन (विदधातु.) विधान करे यत् ) जो (तन्यः । शरीरका ( विलिष्टम् ) दोपरूप न्यून अङ्ग है उस को ( अनुमा?) शोधन करै ॥ २४॥ . अदिवि विष्णुकस्त जागतेनः छन्दमा ततो निर्भ- 'तो.योऽस्मान् देष्टि यञ्च वयं द्विष्मः अन्तरिक्षे वि.. ष्णुर्य कस्तत्रभेन छन्दसाततो निक्तो! योऽस्मा-" न देटियञ्चर्यः द्विष्मः। पृथिव्यां विष्णुर्व्यस्त “गायत्रेण छन्दसा ततो.निर्भक्तो योऽस्मान् द्वेष्टि यञ्च वयं द्विप्मः । अस्मादन्नात् । अस्यै प्रतिष्ठायै । अगर स्वः ।.संज्योतिपाभूम।। २५-।।:: : इस कण्डिका में ७ मंत्र है । पहिले दिवि इत्यादि मंत्र का मऋपि; यांजुपी छ, विगुर्देवता । दूसरे अस्य इत्यादि का म ऋमियाजुपी गायत्री छ०विष्णदेवता । तीसरे पृथि,० इत्यादि का प्र०, याजुपी गा० . छ०, विष्णु दे० । चौथे थेस्मात् इत्यादि मंत्र का-प्र-ऋ०, दैवी ह० ० भाग देवता पांचव अस्य इत्यादि का प्र० ऋ०, याजुपी गा० छ०, भूमिदेव. ता. छठे अगन्मस्वः का म ऋ०, देवी ००देवा देवता और सातवें संज्यो इ० का म० ऋ०, गा० ० आहवनीय देवता है । पहिले तीन मंत्रों को पढ़कर यजमान अपने-आसन से उठकर वेदीपर खडा हो धीरेर कुछ पम चले, ऐसे मदक्षिणा कर और यह विचारै कि- यज्ञपति विष्णु ही यह चरण रखरहे है। मन्त्रार्थ-(विष्णुः) सर्वव्यापी नारायण(जागरान छन्दसा) २. अध्याय। ८१ "4 -- १०सूर्य देवता है। पहिले दूसरे मंत्रको पढ़कर सूर्य को देखे । मन्त्रार्थ--हे सूर्य तुम (स्वयंभः) स्थसिद्ध (असि ) हो (श्रेष्ठः) अत्यन्त श्रेष्ठ (रश्मिः) हिरण्यगर्भ पुरुप, हो । क्योंकि तुम (वर्षोंदा ) सेज के देनेवाले (असि) हो, अतः (मे) मेरेनिमित्त ( पर्चः') ब्रह्मतेज को (देहि ) दो तीसरे मंत्र को पडकर प्रदक्षिणा करै। मन्त्रार्थ-(सूर्यस्य) सूर्य की (आवृत्तम् ) प्रदक्षिणा को (आवर्ते) करता हूँ ॥ २६ ॥ अग्ने गृहपतेसुगृहपतिस्त्वंयाग्नेऽहंगृहपतिनाभूयास सुगृहपतिस्त्वं मर्याग्नेगृहपतिना भूयाः अस्थूरिणी गार्ह पत्यानिसन्तुशतछहिमा सूर्यस्यायतमन्यात २७ इस काण्डका में दो मंत्र है, पहिले अग्ने इत्यादि मंत्र काम ऋ०, बानी बहती छ०, गाईपत्याग्नि देवता । दूसरे सूर्यस्य इत्यादि का प्र० ऋ०, याजुपी ४० छ० और सूर्य देवता है, प. हिले मंत्र से गार्हपत्य का उपस्थान करें। मंत्रार्थ-(गृहपते) मेरे घर के रक्षक (अग्ने ) हे गाईपत्य अग्निदेव ! (त्वया सुम (गृहपतिना) गृहपति करके (अहम् ) मैं ( सुगृहपतिः) सुन्दर गृहपति (भूयासम्) होऊँ (अग्ने ) हे अग्निदेव (त्वम् )तुम (मया) मुझ (गृहपतिना) गृहपनि करके (सुगृहपतिः) श्रेष्ठ यरके रक्षक (भूयाः) होवो (अग्ने) हे अग्निदेव (नौ) हमदोनोंके (गा- हेपत्यानि ) गृहपति संबन्धी कर्म (शतम्) पूर्णायुपर्यन्त (हिमाः) वर्षांतक (अस्थूरि) निरन्तर ( सन्तु ) हों। अगले मंत्र से सूर्य की परिक्रमा करें। मंत्रार्थ--(सूर्यस्य ) सूर्य की (पातम् ) परिक्रमा को (आवर्ते) करता हूँ ॥ २७ ॥ 'अग्ने बतपते तमंचारिष तर्दशकं तन्मेराधि।महं पवासि सोऽस्मि ॥२८॥ इस कण्डिका में दो मंत्र है, पहिले अग्ने इ० का म० ऋ०, साम्नी पंक्ति छ०, अग्नि देवता । दूसरे इदमहमित्यादि काम० याजुषी पंक्ति में और अग्नि देवया है। पहिले को पढ़- ११ शुक्लयजुर्वेद । कर व्रत का विसर्जन करै । मंत्रार्थ-( अग्ने ) अग्निदेव । (प्रसपते ) व्रत के पालक (व्रतम् ) जिसनतको (अचारिषम् ) किया ( तम् ) उस को (अशकम् ) तुम्हारी कृपा से करने में समर्थ हुआ (मे) मेरे (तत् ) उस कर्म को (अराधि) आपने सिद्धकिया । दूसरे मंत्र को पढकर कर्म को समाप्त करै । (इदम्) यह (अहम् ) मैं (यः) जो (अस्मि ) या (स.) वही देवता (अस्मि ) हूँ ॥ २८ ॥ भग्नये कन्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृमते स्वाहां। अपहता असुगरक्षांछसि वेदिपदः॥२९॥ इस कण्डिका में ३ मंत्र हैं, पहिले अग्न इ० का प्र० ऋ०, याजुपी गा० छ०, देव देवता । दूसरे सोमाय इ० का म० ऋ०, याजुपी छ०, देव देवता और तीसरे अपहता इ० का प्र० ऋ., उष्णिक छ०, असुर देवता है। पहिले और दूसरे मंत्र को पढ़ता हुआ सार चावल को कुछ एक पकाकर अभिधारण उद्वासन और देखने के पश्चात् होम करै । मंत्रार्थ-( कन्यवाहनाय ) पितरों के हवि को उनके पास पहुँचानेवाले (अग्नये )अग्नि के अर्थ (स्वाहा) यह आहुति सुन्दर रूप से माप्त हो (पितृमते ) पितरों के अधि- धान (सोमाय) सोमदेवता के अर्थ (स्वाहा) यह आहुति सुन्दर रूप से मास हो । तीसरे मंत्र से दक्षिण ओर रेखा कर मंत्रार्थ- (वेदिपदः) वेदी पर स्थित होनेवाले (असुराः) असुर (रक्षांसि) राक्षस (अपहता.) वेदी से दूर निकालेगए ॥ २९ ॥ ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना अमुंगः सन्तः स्वधया घ रन्ति । पागपुरों निपुगे ये भरन्त्यग्निष्टान् लोकात प्रणुदास्यस्मात् ॥ ३०॥ इस कण्डिका में ? मंत्र है, उसका म० ऋ०, त्रिशुध्छन्द और कम्यवाहन अग्नि देवता इस को पढ़कर वेदी के आगे एक जलती हुई लकही घुमाकर रखदेय । मंत्रार्थ-(स्वधया) पितरों का अब भक्षण करना चाहिये इस इच्छा से ( रूपाणि) अपने रूपों को २ अध्याय। (प्रतिमुञ्चमानाः ) पितरों की समान करते ( सन्तः) हुए (ये) जो (असुराः) अमुर (चरन्ति ) पितृग में फिरते हैं (ये) जो असुर (परापुरः) स्थूल शरीर (निपुरः) अपना असुरत्व छुपाने के लिए सूक्ष्म शरीरों को (भरान्ति ) धारण करते हैं (अग्निः) उपमुकरूप अग्नि (अस्माल्लोकात् ) इस पित्यज्ञस्यान से (खान्) उन असुरों को (प्रगद) दूर इटाभो॥ ३० ॥ अत्रं पितरो मादयध्वं यथाभागमावृधायध्वम् । अमी मदन्त पितरी यथाभागमापायिपत ॥३१॥ इस करिडका में दो मंत्र हैं। पहिले अन इ० का प्र० ऋ०, साम्नी बृहती छन्द, पितर देवता । दूसरे अमी इ० का म० ऋ०, सा० ०० और पितर देवता है। यजमान पडञ्जलि करे पीछे पिण्ड के सामने श्वास रोककर जब तक न थकै पहिले मंत्र का जप करे, थकनेपर दूसरे मंत्र को पढ़कर रोकाहुआश्वास छोडदेय मन्त्रार्थ-(पितरः) हे पितरों!(अत्र)इन कुशों पर(मादयध्वम्) बैठकर प्रसन्न हूजिए ( यथाभागम् ) अपने २ भागों को (आर- पायध्वम् ) वृप की समान भोजन कर कृप्ति पायो ( पितरः)यह पितर ( अमीमदन्त ) अत्यन्त मसन्न होतेहुए ( यथाभागम् ) अपने २ भागको (आरपायित ) वृषभ की समान स्वीकार कर तृप्त होवो ॥ ३१ ॥ नमो वः पितरो रसाय । नमो वः पितरः शोपाय । नमो वः पितरोजीवाय नमोयः पितरः स्वधायें। नौ यः पितरो घोराय । नमो वः पितरो मन्यानमो वः पितरः पितंगेनौ यः। गृहान्नः पितरो दत्त सुतोवः पितरो देम । एतः पितरो वास आधत्त॥३२ ।। • इस काण्डका मे ८ मंत्र हैं । नमो वः इत्यादि पहिले ६ मंत्रों काम०म०, याजुपी वृ० छ० पष्ठयापी उणिक् छन्द लिङ्गोक्त देवता । गृहान्त इ० सातवे का प्र० ऋ०, साम्नी अनुप् छन्द, पितर देवता, और एतत् इ० आठवें काम. ऋ०, माना० गाय. . .
८४
शुक्लयजुर्वेद ।
छ. पितर देवता हैं । पहिले छ: मंत्रों को पढ़ताहुआ पितरों के
श्रागे हाथ जोडे । मंगाय-१( पितरः) हे पितरों ! (वः)तुम्हारे
(रसाय ) रसस्वरूप वसन्त ऋतु के अर्थ (नमः) नमस्कार है।
२( पितरः) हे पितरों (वः) तुम्हारे (शोपाय) ग्रीष्मऋतु के
अर्थ (नमः) नमस्कार है । ३(पितरः ) हे पितरों (व:) तुम्हारे
(जीवाय) माणियों के जीवनस्वरूप वर्षाऋतु के अर्थ (ममः)
नमस्कार है । ४ (पितरः) हे पितरों (व:) तुम्हारी (स्वधायै)
स्वधारूप शरदऋतु को (नमः) नमस्कार है।५ (पितरः) हे पि-
सरों (.) तुम्हारी ( पोराय) जीवमात्र को असह्य हेमन्त ऋतु
को ( नमः ) नमस्कार है। ६ (पितरः) हे पितरों (वः) तु-
म्हारे । मन्यवे ) क्रोधरूप शिशिरऋतु को ( नमः) नमस्कार
है, अर्थात् हे पितरों ! आप के अनुग्रह से देश में वसन्त ऋतु के
मंचार से सब वस्तु रसयुक्त हों ग्रोप्म शुभदायक होकर वर्मी, सब
को सीव करनेवाली वर्षा उत्तम हो, शरद में श्रेष्ठ अन्न उत्पन्न
हो, हेमन्त से किसी को कष्ट न हो और शीतऋतु में किसी का
स्वास्थ्य न विंगडै । ( पितरः) हे छः ऋतुरूप पितरों (क)
मुम्हारे भर्य ( नमः) ममत्कार है(पिवरः, वः, ममः)हे पितरों,
आपको नमस्कार है । सातवें मंत्र को पढता हुआ स्त्री की ओर
देखें । भवार्थ-(पितरः ) हे पितरों (नः) हमारे अर्थ (गृहान्)
स्त्री पुत्रादि घर के स्वरूप को (दच । दो। (पितरः ) हे पितरों
(4) तुम्हारे अर्थ ( सतः ) देने योग्य विद्यमान वस्तुएं (देष्मः)
देते हैं अर्थात् दानकरसे हुए हमारा धन कमी कम न हो। पाठेव
मंत्र को पढकर . पिीपण्डों परं ऊन के दशासूत्र या साठ वर्ष से
अधिक अवस्था का यजमान अपनी बासी के बाल धरै मंत्रा-
('पितरः) हे पितरों ! (क.) तुम्हारे अर्थ है (एतत् ) यह (बासः)
सूत्ररूप पहिरने का पत्र ( श्रायत्त ) धारण करो॥ ३२ ।।
आपत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजम् । यथेह पुरु
पोऽसत् ॥ ३३॥
२ अध्याय। इस कण्डिका में १ मंत्र है, उसका प्र० ऋ०, गायत्री छ० भोर पितर देवता है। इसको पढ़ते में पुत्र की इच्छावाली पत्नी वीच के पिण्ड को उठाकर खालेय मंत्रार्थ-(पितरः )हे पितरों ! पंथा) जैसे (इह) इस ऋतु में ( पुरुपः) देव पितर मनुष्यों की अभि- लाषा को पूरी करनेवाला (असत्.) होवे, इसमकार (पुष्करस्रजम्) पुष्कर मालाधारी अश्विनीकुमार की समान नीरोग सुन्दर (कु- मारम् ) पुत्ररूप (गर्भम् ) गर्भको (पाधत्त ) स्थापन करो॥३३॥ अर्ज वहन्तीरमृतं धृतं पर्यः कीलाल परिसुतम् । खुधा 'स्थ तर्पयत मे पितृन ॥ ३४॥ इस कण्डिका में १ मंत्र है, उसका प्र० म०, त्रिपदाविराष्ट्र छन्द और श्राप देवता है, इसको पढ़कर कुशमार्जन से बचे जल को पिडा परसींचे। मंत्रार्थ-(ऊर्जम् )अनेक प्रकार के स्वादुरस (अमृतम् ) सकल रोग और मृत्युनाशक (परिमुतम् ) पुष्पसार (वृतम् ) घृत (कीलालं) सब बंधन दूर करनेवाले (पयः.) दुग्ध को ( वहन्तीः ) धारण करनेवाले जलों (स्वधा, स्य) पितरों की इचिःस्वरूप हो (मे ) मेरे (विन ) पितरों को (तपर्यंत) वप्त करो ॥ ३४॥ इन दोनों अध्यायों का दयानन्दजी का किया अर्थ ग्रामण कल्पसूत्र मीमांसा आदि के सर्वथा विरुद्ध होने के कारण मान्य नहीं होसक्ता॥ इति श्रीशक्लयजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनीयशास्वाध्येत् भारद्वाजगोत्री. द्भूतगौडवंशावतंस श्रीमद्भोलानाथात्मजरामस्वरूपशर्मा द्वारा सम्बरमहीपरादिप्राचीनभाष्यों के अनुसारसम्पादित अन्वय पदार्थ और भावार्थसहित मप्रोक्षादि पित्र्यान्त द्वितीय अध्याय समान द . यत्री ०१ शुक्लयजुर्वेद । आदधे ) अन्नादि लाभ की इच्छा के लिए, अन्न के भक्षक, भग्नि को, स्थापन करता हूँ। और उसको स्थापन करके (भम्ना, घौरिव ) बहुतायत से तारागण से भरे द्युलोक की दुश्य पुत्रपौत्र आदि से युक्त होऊँ (वरिम्णा, पृथ्वीव) बहुतों के भाश्रय से बड़ी होने के कारण, पृथ्वी की समान अनेकों का आश्रय होऊँ (निरीय उपनिषद् के ५ वें अनुवाक में ३ व्याहृति का विस्तार के साथ वर्णन है )॥५॥ आय गौः पृश्निरक्रमीदसंदमातरं पुरः । पितरै घ प्रयन् स्वः॥६॥ इस कएिटका में एक मंत्र है. उसका सर्पराजी कद् ऋ०, गा- और अग्नि देवता है, यहां से तीन मंत्रों को पढ़कर गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि को क्रम से स्थापन करै । मन्त्रार्थ -(अयम्) यह अग्नि (गः) यज्ञसाधनार्थ यजमान के घर जानेवाला (पृश्निः) अनेकों वर्ण की ज्वालायुक्त ( मा. भक्रमीद )सब ओर वीनों अग्नियों के स्थानों में पादक्रमण करता हुआ(पुरः,मातरम्, असदद)मैंने आहवनीयरूप से पृथ्वीको, पाया (स्वः, प्रयन् ) सूर्यरूप से स्वर्ग में, विचरा,(पितरक्ष असदत् ) यु. तोक को भी, प्राप्त किया अर्थात् अग्नि से सब, जगन का पालन होता है ॥ ६॥ अन्तरति रोचनास्य प्राणादानती। व्यख्यन्म- हिपो दिवम् ॥ ७॥ इस कण्डिका में १ मंत्र है, उस का म० ०, गायत्री छन्द, अग्नि देवता है । वायुरूप से अग्निकी स्तुति करते हैं। मंत्रार्थ- (अस्य, रोचना, माणात्, अपानती, अन्तः, चरात ) इस भग्नि की, वायुनामक कोई शक्ति, माण के अनन्तर, अंपान की शक्ति को बढाती हुई, पृथिवी स्वर्ग के मध्य में, चलती है। इस प्रकार वायु मादित्यस्वरूप अपनी शक्ति से जगत् के ऊपर मनुग्रह का रके ( महिषः, दिवम्, व्यख्यत् ) अग्नि, भोगस्थान युलोक को . अध्याय। विशेष प्रकाशित करता हुआ ॥७॥ हिजाम विरांजति वा पतकार्य धीपते । पति वस्तोरहयुभिः॥८॥ इस कपिटका के मंत्र का प्र० ऋ०, और अग्नि देवता है। इस से भगिन का उपस्थान होता है। मंत्रार्थ (वाक्, त्रिंशदाम, वि. राजति.) जो वेदवाणी, सीस मुहूर्त स्थानों में, शोभा पाती है (मतिवस्तोः), अयुमिः, पतङ्गाय, धीयते ) प्रतिदिन, प्रदरिद आगे कहे रूपों से, अग्नि के अर्थ, उच्चारण कीजाती है । अर्थात् वेदमंत्रों मे अग्नि की जो स्तुति कीजाना है, वह विशेष विरा- जित होती है ॥ अमियोंतिज्योतिमिः स्वाहा ! मूर्योज्योतिज्योति: सूर्यः स्वाहा । अग्निवों ज्योनिर्वर्च: स्वाहा। सूर्यों वों ज्योतिर्वः स्वाहा । ज्योतिः मृर्यः मूर्यो ज्योतिः स्वाहा ॥१॥ इस कण्डिका में । १ अग्निरित्यादि । २ सूर्योज्योतिरित्यादि ३. अग्निवर्चरित्यादि। ४ सूर्योवर्चरित्यादि । ५ ज्योतिः सूर्यइत्यादि ५ मंत्र हैं। ऋपि पहिले और दूसरे का सक्षा, तीसरे चौथे का म० और पाँचवे का जीवल । छन्द पाँचों का एकपदा गायत्री, सया देवसा पाँचों का.लिङ्गोक्त है। यहाँ से अग्निहोत्र के मंत्र हैं। पहिले मंत्र को पढ़कर सार्यकाल समिधा से होम करै। मंत्रार्य- (अग्निः, ज्योतिः, ज्योतिः, अग्निः, स्वाहा) जो अग्निदेव है, वही ब्रह्मज्योति है, जो ब्रह्मज्योति है, वहीं अग्निदेव है, ऐसे अग्नि को मैं हवि देसा हूँ। दूसरे मंत्र से मातःकाल होम करें। भना-(सूर्यः,ज्योतिः,ज्योतिः,सूर्यः,स्वाहा )जो सूर्य देवसा है। वहीं प्रमज्योति है, जो ब्रह्मज्योति है, वही सूर्य है, इससे ज्योतिको में हवि देता हूँ। ब्रह्मतेज चाहने वाला ३ रे मंत्र से सन्ध्या के समय हवन करे। मनाथ-(अग्निः; वर्चः ज्योतिः, एचः, स्वाहा ) जो अग्नि है, वही प्रमतेम है, जो मान ज्योति .. शुक्लयजुर्वेद । है वही सेज है, उस के अर्थ अच्छा होम-हो. ब्रह्मसेज की इच्छा से प्रातःकाल हवन करने का ४ था मंत्र है उस की मर्थ-(सूर्यः, चर्चः ज्योतिः, वर्चः स्वाहा )जो सूर्य है। वहीं ब्रह्मसेज है, जो ज्योति है, वहीं तेज है, उस के अर्थ श्रेष्ठ होम हो । मात कोलं हवन, करने के पांचवें मंत्र का अर्थ-( ज्योतिः सूर्यो, 'सूर्यः; ज्योतिः स्वाहा ) जो ज्योति है, वही मूर्य है। जो सूर्य है। वही प्रभज्योति है, उस के लिए श्रेष्ठ होम हो ।।९।। मजदेवेने सविधा' मजूराम्येन्द्रवत्या । जाणों अ.. "ग्निर्वेतु स्वाहा ।। मजूदेवेन सवित्रा संजूरपसेद्रवत्याः जयाणः सूर्यो वेतु स्वाहा !! १० ॥ इस कण्डिका में २ मंत्र हैं, । १ सजरित्योदि । र सक्रित्यादि दोनों का मजापति ऋ०, एकपदा गा०६० और लिङ्गोक्त देवना है। दोनो मंत्रों को पढ़कर हवन कियाजाता है । मंत्रार्थ-१ ('स- चित्रा, देवेन, सजूः) सब के मेरक, सूर्यदेव के साथ, मीति करने वाले (इन्द्रवत्या राज्या, सतः) इन्द्र देवतावाली, रात्रि के साथ, मीति करनेवाले (जुपाणः, अग्निः, वेतु, स्वाहा ) हम पर प्रीति करनेवाले अग्नि देवता, इसको स्वीकार करें, उनको यह श्रेष्ठ श्रीहुति दी।२(सवित्रा, देवेन, सजूः) सर्वमेरक, देव के साथ प्रीति करनेवाले (इन्द्रवत्या, उपसा, सजः) इन्द्र देवतावाली, उपा के साथ, प्रीति करनेवाले (जुपाणः,सूर्यः वेवु, स्वाहा) हम पर भेम करनेवाले सर्पदेव, आहुति को वा हमारे कर्म को प्राप्त करो, उनके निमित्त यह सुन्दर होम हो ।। १०. । उपमयन्तो अध्वरं मन्त्र घोचेमाग्नये । आरे अस्मे पवते ॥११॥ इस कण्डिाको के मंत्र को गौतम ऋ०, निच्युद्गायत्री और अग्नि देवता है। यहां से लेकर ३६वीं कणिकका संक मंत्रों को तीन १. बार पढ़कर-तीन २,आंहुति देताहुआ दोनों प्र. ..ी अग्नि का उपस्थान कर, पहिले माहवनीय का उपस्थान
२. अध्याय।
है। मन्त्रार्थ:-(अध्वरं, उपप्रयन्तः, आरे, चं, अस्मे, भृएवते,
। अग्नये, मन्त्रं, वोचम) यज्ञ के प्रति , जाहिए हम दूर, :ौर,
अपने समीप मुननेवाले अग्नि देव के अर्थ, मनन करतेहोरी
और उच्चारण करते ही मनोरथ सिद्ध करनेवाले शब्दसमूह रूप
मन्त्र को, उच्चारण करते हैं । ११..:..
अग्निद्र्घा दिवः ककुत्पतिः पृयिव्या अयम् । अपा
। रेतासि जिन्वति ॥१२॥
इस कण्डिका के मंत्र का विरूप०,
निच्यूद्गायत्री छ०, और
अग्नि देवता है। मन्त्रार्थ-(अयम्, अग्निः, दिवः, मूर्द्धा,ककुन्)
यह अग्नि,स्वर्गलोक का,शिर की समान प्रधान,वैल के कन्धे की
समान सर्वोन्नत वा जगत् का महान् कारण है । (पृथिव्यां पीतः)
सूर्यरूप से प्रकाश देने के कारण पृथिवी का, पालक है (अपा-
म्, रेतांसि, जिन्वति) जलों के,सारभागों को,पुष्ट करता है अर्थात्
धुलोक से गिरतेहुए बी. के जलों को' भन्नादि के पकाने की श-
क्तिदेता है,वा पाहुति के फल से वर्षा को उत्पन्न करता है।।१
उभा यामिन्द्राग्नी आहुवया उभा राधसः मह मां-
दपध्ये । जशा दाताराविषारयीणामुभा वाजस्य
मातयै हुवे वाम् ॥१३॥
इस करिडका के मंत्र का भरद्वाज ऋ०,त्रिष्टुपन्द और इन्द्रा-
ग्नी देवता हैं । मन्त्रार्थ- (इन्द्राग्नी, वाम् उमा, पाहुवध्यः) हे
इन्द्र अग्नि देवताओं !, तुम दोनो को, पाव्हान करना चाहता हूँ
(उमा, सह, राधसः मादयध्य दोनों को, एकसाथ, हविरूप
धन से, प्रसन्न करना चाहता हूँ ! (उभा,इपाम्, रयीणाम्दा-
तारी ) तुमदोनो, अन्नों के, और धनों वा जलों के,देनेवाले हो।
(वाम् उभा, बाजम्य, सातये हुवै) तुम, दोनों को अन्न के,
दानार्य, आव्हान करता हूँ॥१३॥"
अयं ते योनिझवियो यतो जातो अचयः
जाननग्न आरोहाथों नो यर्मया रयिम् ॥१४॥
... - - । on - . इस कपिडका के मन्त्र का देवश्रव और देवबात कृषि, स्वराद अनुगुप् छन्द और भग्नि देवता है । मंत्रार्थ:-( भग्ने, से ऋत्वियः, योनि) हे गाईपत्य भन्ने ! यहा सुमारा, सायं मातःकाल सम्बन्धी, उत्पत्ति स्थान है (यतः, जाता,अरोचवाः) जिसस, मकट हुए तुम कर्मकाल में प्रज्वलित होते हो (तम्, जानन्, आरोह) उस गाईपत्यः को, जानते.अर्थात् अपना अंश मानतेहुए, उसमें प्रविष्ट हूजिये (अय, ना, रयिम् आवर्दय) फिर हमारे निमित्त या साधन धनको चारों भोरंस बढाइये॥१४॥ अयमिह प्रथमो धायि धातृभिहोता यजिष्ठो अध्वरे- प्वीडीयममवानो भृगवो विरुधुर्वनेषु चित्र विद्यु , विशेविशे॥१५॥ इस करिडका के मन्त्र का वामदेव ऋषि, जगती वा भुरिक् त्रिष्टुप् छ, और भ० दे० है । मन्त्राई-(अयम्, होता. यजिष्ठः अध्वरेषु, ईक्यः, इह, धातृभिः, आधायि )यह अग्नि, देवताओं का आवाहन करनेवाला, यज्ञ में स्थित वा अतिशय याक रानेवाला, यज्ञों. में, ऋत्विजों से स्तुति : कियाहुआ, इस कर्म स्थान में, स्थापन करनेवालों.करके, स्थापित कियागया है। (श्रम- चानः, भृगवः, विशेविशे, चित्रम्, विमुम्, यम्, वनेषु, रुरुः) पुत्रवान, यज्ञविधा जाननेवाले भृगुवंशी मुनियों में, यजमान के उपकारार्थ, आश्चर्यरूप, व्यापक शक्तिवाले, जिस अग्नि को, पनों में, प्रज्वलित किया है.॥ १५ ॥.. अस्प मुस्लामनु शुत शुक्रं दुहे अन्यापर्यःसास- सामृषिम् ॥१६॥ , इसकण्डिकाके मन्त्रका प्रवत्सार ऋ०,गा०० भौरगोग्निपय देवता है । मन्त्रार्थ-(भायः, अस्य, मत्नाम्, धुतम्, मनु, ऋषिम्। सहस्त्रसाम्, शुक्रम्, पयः दुदुहे) संस्कारशुद्ध होने से अयोग्यता की लज्जा से रहित ऋषि, इस अग्नि की, पुरासम, कान्ति को, अनुसरण करके, दोहनस्थान में जानेवाली,गोके द्वारा सहनाकारों , - ।
३३.. .. , , के साधक, शुद्ध, दूधको, दुइरोहुए ॥१६॥ . शुनपा अग्नेऽसि तन्छु मे पाहि । आपुर्दा अग्नेऽस्पायु में देहि । वक़दा अग्नेऽसि वर्गों मे देहि अग्ने यन्मे तन्वा फनं तन्मे आपण ।।१७ ।। इस कपिडका के मंत्र का अवत्सार ऋ० त्रिष्टुप् छ. और अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-(अग्ने, सनूपाः असि)हे अग्निदेव, तुमस्व- भाव से ही अग्निहोत्रियों के रक्षक, हो ( मे, तन्वम्, पाहि ) मेरे, शरीर को, रक्षा करो (अग्ने, भायुर्दा, असि) हे अग्ने तुम, पायु देनेवाले, हो (मे, आयुः, देहि.) मेरे लिये, भायु, दीजिये (भग्ने, वक़दा, असि) हे अग्ने, तेज देनेवाले, हो (मे, वर्चः, देहि) मेरे लिए, रोज, दीजिए (अग्ने, मे, तन्याः, यत् ऊनम्, तत्, पापणः) हे भग्निदेव, मेरे शरीर का, जो अङ्ग, कम हो, उसको, सवप्रकार से पूर्ण करो ॥ १७ ॥ इन्धानास्त्वा शत हिमा शुमन्त समिधीमहि । वर्यस्वन्तीवयस्कृत ५ सहस्वन्तः सहस्कृतम् । अग्ने सपत्नदम्भनुमदब्धासो अदाभ्या चित्रावसो स्युस्ति पारमशीय ॥१८॥ , इस कपिटका के मंत्र का अवत्सार ऋ० निच्याघी पंक्ति वामहापंक्ति छन्द पौरभग्निदेवता है । मन्त्रार्थ (अग्ने,इन्धानाः, वयस्वन्तः, सहस्वन्तः, अदब्धासः, थुमन्तम्, अयस्कृतम्, सहरक- राम, सपनदम्भनम्, अदाभ्यम् त्वा,शतम्, हिमाः, समिधीमहि) हे अग्निदेव ! दीप्तिमान, अन्नवान्, बलवान, पीडारहित हम, कान्तिमान, 'अन्नवान, बलवान्, शत्रुओं के हिंसक, किसी से पीडा न पानेवाले, तुमको, सी, वर्षापर्यन्त, निरन्वर- भज्वलित करें । अर्थात् हमको यह सब पदार्थमाप्त हों (चित्रावसो, स्वस्ति, . से, पारम् अशीय) हे चन्द्रतारागणादिकी निवासस्थान रात्रि, कल्याणपूर्वक, तेरे, पारका, पाऊं । देवयज्ञ में राक्षस, न युस . भाइसलिये रात्रि से प्रार्थना की है.॥१८॥ -4 - , शुक्लयजुर्वेदी से त्वमग्ने सूर्यस्य चर्चसागवाः समृषीणा स्तुतेम। 'सं मियण धाम्नासिमहमायुषा स वसा से मजया सं रायस्पोषण मिषीय ॥ १९॥ इस मंत्र का अवत्सार ऋ०, जगतीछन्द और अग्नि देवता है मंगर्य(अग्ने, त्वम्, सूर्यस्य, वर्चसा,समगा:) हे अग्निदेव! तुम, रात में सूई के, सेज से, युक्त हुए हो (ऋपीगणाम्, स्तुसेन, सम्) मंत्रों के स्तोत्र से, संयुक्त हुए हो (प्रियेण, धाम्ना सम्) भिय, आहुति से, संयुक्तहुए हो। उसी प्रकार (अहम्, भाषा, सम्भिधीयः) मैं आपकी कृपा से अपमृत्युरहित आयु से, युक्त हो (वर्चसा, सम्) विद्या ऐश्वर्य आदि के तेज से युक्त हो (मजयां, सम् ) पुत्रादि से, संयुक्त होॐ (रायस्पीपेण, सम् ) धनकी पुष्टि से, संयुक्त होऊँ ॥ १९ ॥ . अन्ध स्थान्धों वो भक्षीय मह स्थ महौ धौ भक्षीयोर्ज स्था वो भक्षीय रायस्पोप स्थ रायस्पोपे वोभक्षीय। इसकढिका के मंत्र का याज्ञवल्क्य ऋ०, भुरिहनी छ और गौ देवता है। वीसवीं और इसी करिडका को पढकर गौओं, के पास जाय मंत्रार्थ-हे गौओं ! तुम (अन्धः, स्थ) दूध आदि अन्न को उत्पन्न करनेवाली, हो (वः, अन्धः, भक्षीय) तुम्हारे दूध सीमादे को खाता रहूँ (महा स्य) पूज्यरूप, हो- (का, महाभक्षीय) मुम्हारीमापूजनता को, पाऊँ (. ऊर्जा स्था) मलरूप, हो (वः, ऊम, मुसीय) तुम्हारे,न्दुग्धादि के द्वाराबल पाऊँ (रायस्पोप, स्था) धनपुष्टिरूप, हो (वः, रायस्पोषम्, म सीय) तुम्हारे अनुग्रह से, धन की पुष्टि को, पाऊँ॥२०॥ रेवतीरमध्यमसिन्यानावस्मिन् गोटेऽस्मिल्लोकेऽस्मि नजयोहवरमागत इस कॉरिडका के मंत्र की याज्ञवल्य ऋ०, उष्णिक छ, गौ देवता मन्त्रार्थ अस्मिन्, गोठे, मस्मिन,लोकें,शस्मिन क्षये, रमध्वम् ) हे धनमासि की साधना गौनाइस,दुहने के स्थान - २ अध्याय.।' में, इस, गोठ में इस. यजमान् की दृष्टिमें वा रारामें, इस, यजमान, के घर में क्रीडा करो (इह, एक स्त, मा, अपॉत) यहां यजमान केघर में, ही, रहो, मत जाओ ॥२१॥ 'सहितासि विश्वरूप्यूर्जमाविश गोपत्येनः । उप त्वाग्ने दिवदिवे दोपावस्तार्धिया व्यम् । नमो भरन्तु एमसि ॥२२॥ इस कण्डिका में दो मंत्र हैं । पहिले संहितेत्यादि का वैश्वामित्र मधुच्छन्दा ऋषि, मुरिगासुरी गायत्री छ०, गौ देवता दूसरे,उ. पेत्यादि.का.पूर्वोक्त प्र०, गायत्री छन्द, और अग्नि देवता है। पहिले मंत्र से गौ को स्पर्श करै । मन्त्रार्थ हे गौ ! वुम ('विश्वरूपी, संहिता, असि) अनेकों रूपवाली, हवि के निमित्त यज्ञ में संयुक्त हो ( ऊर्जा, गोपत्येम, माम्, विश) दूध प्रादि रस से, गो- स्वामित्व से, मुझ में, सबमकारसे प्रवेशकर अर्थात् हमारा मो. स्वामित्व अटल रहै । दूसरे मंत्र से गार्हपत्य में जाय । मित्रार्थ (दोपावस्तः, अग्ने; वयं, दिवे दिवे, धिया, नमोभरन्तः, त्या उ- पएमसि ) रातमें भी निरन्तर वसनेवाले, हे अग्निदेव ।। हम.प्र. तिदिन श्रद्धायुक्त धुदि से, नमस्कार करते हुए, तुम.को मात होते हैं ।। २२::: राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमान छ स्वे दमें।।२३... इस कण्डिका के मंत्र का वै० मधु० ऋ०, गायः छ, लग्नि दे है। मंत्रार्थ:-(राजनराम्, अध्वराणाम्, गोपाम्, नस्याददि- लिम, . दमे वर्धमानम् दीप्तिमान यत्रों के सामनन रूपनत के, रसक अपना घर में; सोमादि से बढ़नेवाले। अग्नि की हम शरणं हैं ॥२३॥ सनः पितेर्व सूनवेजने सूपायनो भवः। सचखा ना . स्वस्तये ॥२४॥::.... Mirr: इस कपिटका के मंत्र का वै० मधु० ०/विराट् गायत्री छन्द + २८ शुक्लयजुर्वेद । ब्रह्मणस्पते ॥ ३०॥ इस कण्डिका के मंत्रका सत्यधृति वारुणी ऋषि, निच्यद् गा. यत्री छन्द और ब्रह्मणस्पति देवता है मंत्रार्थ (ब्रह्मणस्पते, पररुषः मर्यस्पाशंसः पूर्तिः नः,मा, मरणक, मः, प्रारक्ष) हे वेदरक्षक ज- गदीश्वर !, देवपितरों को कभी हव्यकव्यं न देनेवाले यज्ञ से वि- मुख, मनुष्य का, अनिष्टचिन्तन, द्रोह, हमको, न, सतावै, इमारी, सबमकार से रक्षा करो ।। ३० ॥ महि त्रीणामवोऽस्तु शुदं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्ष वरुणस्य ॥ ३१॥ इस कण्डिका के मंत्रका सत्यधृति वारुणी ऋषि, विराट् गायत्री वंद और श्रादित्य देवता है। मन्त्रार्थ (मित्रस्य, अयम्णः, वरुणस्य, त्रीणाम्,महि, गुलम्, दुराधर्षम्, अवः, अस्तु) प्राणवृत्ति और दिन के अधिष्ठात्रीदेव मित्र, नेत्र वा सूर्य के अधिष्ठात्री देव अर्थमा, अ- पान और जलों के अधिष्ठात्री देव वरुण, इन तीनों से सम्बन्ध र- खनेवाली, बड़ी, कान्तिमान सुवर्णादि से युक्त, तिरस्कार पाने को अशक्य, रक्षा, हमको प्राप्त हो ॥ ३१ ॥ नहि तेपाममा धन नावसु धारणेपुं । ईशे रिपुरघ- छिसः ॥ ३२ ॥ इस कण्डिका के मन्त्र का सत्यधृति वारुणी ऋपि, निच्य. द्गायत्री छन्द और प्रादित्य देवता है । मन्त्रार्य-(सेपाम्, अ. मा. श्रध्वपु, वारणेषु, चन, अघशंसः, रिपुः, नहि ईशे ) ईपर और इनतीन देवताओं की उपासना करने वालों के घर में, मार्ग में दुर्गम वन प्रादि और संग्रामों में, भी, स्थित यजमान को, कष्टपहुँचाने को पापकर्मा, शत्रु, समर्थ नहो ॥ ३२ ॥ ते हि पुनासो आदेतेः प्रजीवसे माय । ज्योतिषः, सन्त्यजेस्रम् ॥ ३३॥ इस कण्डिका के मंत्र का सम्धृ०वारु० ऋ०, वि० गा०, बन्द मौर भादित्य देवता है । मन्त्रार्थ-(हिते, अदितेः, पुत्रासः ..
३ अध्याय। माय, मजीवसे, अजस्रम्, ज्योतिः, प्रयच्छन्ति ) क्योंकि, वह मित्र अर्यमादि,देवमाता के,पुत्र इसमनुष्य यजमानको, चिरजीवन के निमित्त, निरन्तर, अखण्ड तेज, देते हैं ॥ ३३ ॥ कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशु । उपोपेन्नु मंघठन भूय इनु ते दान देवस्य पृच्यते ॥ ३४ ॥ इस कण्डिका के मन्त्र का मधुरछन्दा०, पथ्या तहसी छ०, और इन्द्र देवता है । मन्त्रार्थ-(इन्द्र, कदाचन, स्तरी:, न, अ- सि) हे परमैश्वर्यवान तुम, कभी भी, हिंसक, नहीं, हो (दाशुषे, उप इन्नु, सवसि ) हवि देनेवाले के, हवि को समीप होकर, से- वन, करते हो ( मघवन, देवस्य, ते, भय इव, दानम्, नु, इत, उ- पपृच्यते)हे ज्ञानधनवाले इन्द्र नामक जगदीश्वर, दीप्यमान, तु. हमारे, बहुतसे. दान को, शीघ्र ही यजमान, मास होता है ॥३४॥ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ॥ ३५ ॥. इस करिडका के मंत्रका विश्वामित्र ऋपि, निच्युद्गायत्री छन्द और सविता देवता है । मन्त्रार्थ-( सवितुः, देवस्य, राव, धरणीयम्, भर्गः, धीमहि, या, नः, धियः, मचोदयात् ) शादित्य मण्डलस्थित अन्तर्यामी सविता नामक, प्रकाशस्वरूप परब्रह्म के, उस, सबके वरणीय, सर्वपापनिवर्तक तेज को, ध्यान करते हैं, जो सविता देवता, हमारी, बुद्धियों को, सत्कर्मोंमें मेरित करें ॥३५॥ परि ते दूडभो रथोऽस्मान् | अश्नोतु विश्वतः । येन रक्षसि दाशुपः ।। ३६ ॥ इस कण्डिका के मन्त्र का वामदेव ऋपि, नि० गायत्री छन्द और अग्नि देवता हैं । मन्त्रार्थ-हे अग्ने (से, दूडमः, स्थः, अस्मान्, विश्वतः, पर्यश्नोतु, येन, दाशुषः, रक्षसि ) तुमारा, स्वच्छन्दगतिवाला, रथ, हमको, रक्षा करने के लिए.सवदिशा- ओं में स्थित हो, जिसके द्वारा, यजमानों की रक्षा करते हो ३६ भूर्भुवः स्वःमुमजाःमजाभिः स्याछ मवीरों वीरैःसुपोषः - . - . शुक्लयजुर्वेद पोपैः । नय प्रजा मैं पाहि । शछस्य पशून्म पाहि । 1 'अधर्य पितु मैं पाहि ॥ ३७॥ इस कण्डिका में चार मन्त्र हैं. १ पूरित्यादि का वामदेवऋषि ब्राह्मी उष्णिक छन्द, और अग्नि देवता है । २ नर्येत्यादि का वाम० ऋ० यजु छ०, अग्नि दे० शस्येत्यादि का वाम० ऋ०, यजु छ०, अग्नि देवता । १ अर्थयित्यादि का वाम० ऋ०, यजु . .छ० और अग्नि देवता है । पहिले मंत्र से क्षुल्लकोपस्थान, दूसरे से ग्रामान्तर को जातेसमयः गार्हपत्य उपस्थान, तीसरे सेआहवनी योपस्थान और चौषि से दक्षिणाग्नि का उपस्थान करी मन्त्रार्थ- (शः, भुवः स्वः, मजाभिः.मुमजाः, वीरः, सुवास,पोपैः,सुपोषः, स्याम् (हे अग्ने तुम मः,भुवः स्वःनीन व्याहृति वा तीनलोकस्वरूप हो सुमारे अनुग्रह से, सन्तानों से, सुन्दर सन्तानवाला, वीरपुत्रों से,पशसित ,वीर पुत्रों वाला, और अधिक सम्पत्तियों से, सुन्दर सम्पत्तिवाला, प्रसिद्ध होऊँ (नर्य, मे, प्रनाम्, पाहि )ई हि संसाधक अग्ने, मेरी, पुत्रादि मजा को, रक्षाकरो।३-(शस्थ, मे, पशन, पाहि) हे अनुष्ठान वालों से प्रशंसित अग्ने, मेरे, गौ- श्रादि पशुओं को रक्षाकरो। ४-(अथर्य, मे, पितुम्, पाहि) हे निरन्तर गमन शील अग्ने, मेरे, पिता को, रक्षा करो ॥३७॥ ।' आर्गन्म विश्वचैदसमस्मभ्य वमुवित्तमम् । आने स. 'मामि दुम्नमभि सह आयच्छस्च ।। ३८॥ इस कण्डिकाः के मन्त्र का आमुरि ऋ०, अनुग्रुप् छन्द और भाह अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-(सम्राट्, अग्ने, अभ्यागमन्म, विश्ववेदसम्, भस्मभ्यम्, वसुविचमम्, घुम्नम्, सह, अभि आय- स्छस्व ) हे सम्यक्मदीस, अग्निदेव!, ग्रामान्तर से आये हैं, क्यों कि-सुम विश्व के सब चरित्र जानते हो, हमको, अत्यन्त धन के देनेवाले हो, धनयुक्त वलके सहिरा, पाइये, और इम में धन बल स्थापित कीजिये ॥ ३८ ॥ अपग्निहपनिर्हिपत्यः प्र॒जायो बमुवित्तमः।- - 4 5 ३ अध्याय। 2AH १०१ . . में गृहपतेऽभि द्युम्नमभि सह आयछस्व ॥ ३९॥ इस कण्डिका के मंत्र का आसुरि ऋ०, न्यगुसारिणी बृहती छन्द और गाईपत्याग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-(अयम्, गार्हपत्यः, अग्निः, गृहपतिः, मजाया, वसुवित्तमः) यह,गार्हपत्य, अग्निही, हमारे घरका अधिपति है, पुत्र पौत्रादि का अनुग्रह करनेवाला, अत्यन्त धनवान है । (गृहपते, अग्ने,युम्नम्, अभि, सह अभि, प्रा- यच्छस्व) हे गृहपालक, अग्निदेव, धन को, सब ओर से, बलको भी सव भोरसे, दीजिये ॥ ३९ ॥ अयमग्निः पुरीप्यो रयिमान् पुष्टिवर्धनः । अग्ने पुरी- प्यामि युम्नमभि सह आयच्छस्व ॥ ४०॥ इस कण्डिका के मन्त्र का प्रामुरिऋ०, निच्यद् अनुग्रुप् छ, और दक्षिणाग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-(अयम्, अग्निः, पुरीप्यः, रयिमान्, पुष्टिवर्द्धनः, पुरीप्य, युम्नम्, अभि, सह प्राभि, आय- च्छस्व ) यह, दक्षिणाग्नि, पशुओं का हितकारी, धनी, पुष्टिवर्धक है, हे पशुओं के हिनकारिन् !, सब ओर से धनको, सब ओर से वलको, दीजिये ॥ ४०॥ गृहा मा बिभीत मा वैपध्वमूर्ज विभ्रंत एमसि । ऊर्ज • विद्महःसुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनमा मोदमान॥४॥ इस कण्डिका के मन्त्र का पासुरि, ऋषि, पापी पंक्ति छन्द और वास्तु अग्नि देवता है । मन्त्रार्थ-(गृहाः, मा, विभीत ) हे घर के अधिष्ठात्री देवताओं !, मत, डरो (मा च, वेपध्वम् ) और मत. काँपो (अर्जम, विभ्रतः, एमसि )वल को, धारण करनेवाले आपके, निकट मास हुए हैं ( ऊर्जम्, विभ्रत्, सुमनाः, मुमेधाः, मनसा, मोदमानः, गृहान्, एमि) मैं भी बलको, धारण करता हुआ, श्रेष्ठमनवाला, सुन्दर बुद्धि से युक्त, दुःखरहित मन से, मसन्न होता हुआ, घरों में, प्राप्त होता हूं ॥४१॥ . येपामध्येति प्रवसन येपुं सौमनसो बहुः । गुहानुपंड- यामहे ते नौ जानन्तु जानतः ॥ ४२॥: . । , .
- शुक्लयजुर्वेद । इस कण्डिका के मंत्रका शयु ऋ०, अनुग्रुप् छन्द और वास्तु पति अग्निदेवता है । मन्त्रार्ध-(प्रसवन, येषाम्, अध्येति ) दे- शान्तर को जाताहुआ यजमान, जिन घरों की, कुशल चाहता है (येपु, बहुः, सौमनसः, गृहान, उपह्वयामहे) जिन घरों में, बहुत, भीति करता है, उन गृहों को, मीति से आव्हान करते हैं। घर के अधिष्ठात्री देव हमारे निकट आवें (से, जानराः, नः. जानन्तु ) वह हमारे बुलाएहुए देवता, उपकार को जाननेवाले, हम को, अकृतघ्नी जानें ॥ ४२॥ उपहता इह गाव उपहता अजावयः। अथो अनस्य कीलाल उपहतो गृहेषु नःक्षेमाय वः शान्त्री प्रपंथे शिवछ शरम शंयोः शयोः ॥ ४३ ॥ • इस काण्डका दो मंत्र हैं, उपहूता इत्यादि पहिले मंत्रका शेयु चाईस्पत्य ऋभुरिग जगती छन्द, वास्तुपति देवता ।क्षेमायेत्यादि का शेयु वार्हस्पत्य ऋ०, यजुरबन्द और वास्तुपति देवता है । मंत्रार्थ-(इह, नः, गृहेषु, गावः, उपहृताः, अजावयः, उपहृताः, अ. थ, अन्नस्य, कीलालः, उपहूतः ) इन, हमारे, घरों में, गौएं, ह- मारी मात्रा से सुखपूर्वकरहो, वकरी भेडादि मुखपूर्वक रहो और, अन्नसम्बन्धीरस, वदता रहै । यह हमारी आप से मार्थना है। २ (समाय, शान्त्य, वा, मपये) हे गृहों ! के अधिष्ठात्री देवों! धन की कुराल केलिए, सकल अरिष्टों की शान्ति के लिए, आप को, शरणागत होता हूँ । (उशंयोः, शिवम्, शंयोः, शग्मम् ) सब मुखसाधन चाहने वाले मुझ यजमान का, कल्याण हो, पार लौकिक मुख चाहनेवाले मुझ यजमान का, कल्याण हो ||४|| अप धातुमास्पमन्त्राः प्रधासिनो हवामहे मरुतश्च रिशादसः । काम्भेणं मुजोषसः ॥४४॥ इस कण्डिका के मन्त्र का,प्रजापति ऋ०, गायत्री छन्द और मस्त देवता है । चातुर्मास्य यज्ञ के चार पर्व हैं, वैश्वदेव, वरुण ३ अध्याय।" " प्रघास, सांकमेध,शुनासीरीय । वैश्वदेव और शुनासीरीय का इस में उपदेश नहीं है, शेष दोनों का विधान करते हैं । वरुणमघास नाम दूसरे पर्व में दक्षिण उत्तर दोनों वेदियों में हवि स्थापन कर श्राव्हान करे। मन्त्रार्थ-(रिशादसः, करम्भेण, सनोपसः च, प्रमासिनः, मरुतः, हवामहे) शत्रु की कीहुई हिंसा को दूर करने वाले, दधि मिले सक्तु के साथ सव समान मीति करने वाले तथा, प्रघासनामक हाव को भक्षण करनेवाले, हे मरुतगणों ! हम तुम्हारा श्रावाइन करते हैं ॥ १४ ॥ यद्ग्रामे यदरण्ये यत्सभायां यदिन्द्रिये। यदेनश्चकृमा व्यमिदं तदवयजामहे स्वाहा ॥ १५ ॥ इस कएिडका के मन्त्र का प्रजापति ऋपि, स्वराट् अनुष्टुप छन्द और मरुद देवता है । यजमान पत्नी को साथ लेकर करम्भ भरे कई पात्रों को शूर्प में मस्तकपर रखकर वेदी के पूर्व पश्चिम में खड़ा होकर दक्षिणाग्नि में हवन करताहुआ इस मंत्र को पढ़े। मन्त्रार्थ-( यत्, एनः, ग्रामे, यद, अरण्ये, यत्, सभायाम्, इन्द्रिये, भचकम, तन, इदम्, अवयजामहे, स्वाहा ) जो, पाप, ग्राम में वसरोहुए, जो पाप, वन में, जो पाप, सभा में और इन्द्रियोंके विषय में, किया है, उस, इस पाप को, माहुति देकर नष्ट करता हूँ, यह हवि पापनाशक देवता को सुन्दर रूप से मांस हो ॥ ४५ ॥ मो पूर्ण हुन्दा पत्सु देवैरस्ति हि प्मा ते शुष्मि- अवया। महश्चिद्यस्य मीढुपो यव्या हविष्मतोम- रुतो वन्दते गीः ॥ ४६॥ इस कण्डिका के मंत्र का अगस्त्य ऋषि, मुरिक पंक्ति बन्द और इन्द्रमरुद देवता है। इसका जप करै । मन्त्रार्थ (शुष्मिन, इन्द्र, अत्र, पृत्स, देवैः, नः, मा, सु, ते, अवयाः, हिस्म, मीदुषः, इविप्मतः, यव्या: महश्चित, गी:, मरुतः, वन्दते) हे वलवन् !, इन्द्रदेव, इन, संग्रामों में, मरुन देवताओं के साथ, हमको, विनष्ट न करो, भले प्रकार रक्षा करो, तुम्हारा, यनीयभाग, स्थित है, , , . १०४ शुक्लयजुर्वेद। वर्षा के द्वारा जगत् को सींचनेवाले, हवि पानेवाले श्रापकी, यवकी पिही के करम्भ पात्रों से निष्पन्न हुई होमक्रिया से, निश्चित पूजा करते हैं, हमारी स्तुति, आपके सखा मरुदेवतामों को, प्रणाम करती है ।। ४६ ॥ अन् कर्म कर्मकृतः सह वाचा मयोभुवा । देवेभ्यः फमै कृत्वास्त प्रेत सचाभुवः॥ ४७ ।। इस करिडका के मन्त्र का अगस्त्य ऋपि, विराट अनुष्ठप् छन्द और अग्निदेवता है। प्रतिपस्थाता यजमान को, करम्भपान के होम- स्थान से अपने स्थान को लेजासाहुमाइस मन्त्र को परे । मन्त्रार्थ- (कर्मकता, मयोभुवा, वाचा, सह, कर्म, अक्रन, सचाभुवः, देवेभ्यः कर्मकृत्वा, अस्तम्, मेत )वरुणमयास कर्म को करनेवाले ऋत्विज्, मुखरूप, स्तुति के साथ, वरुणमघास को, करचुके, इसकर्मीस्थत है विजों देवताओं के लिए, वरुणप्रघास कर्म, करके, घर को, नामो॥४७॥ अवभृथ निचुम्पुण निचरसि निचुम्पुणः । अर्थ दे. देवकृतमेोऽयासिपम मर्मयकृतम्। पुराणों देव रिषस्पाहि ॥ ४८॥ ..इस काण्डका के मन्त्र का और्णवाम अपि, ग्रामी अनुष्टुप छन्द और यज्ञ देवता है । वरुणमघासकर्म के अन्स में, खी पुरुष को जल में अवयस्नान करावे, उस समय पढने का यह मन्त्र है। मन्त्रार्थ:-(निचुम्पुण, भवभृथ, निचेसा, भसि) हे 'मन्दगति जलाशय, अवभृथ नामक यन्न, सुम अत्यन्तगमन करनेवाले, हो (निचुम्पुण) यहां पर मन्दगति हूजिये ( देवैः, देवकृतम्, एनः, अवयासिषम् ) बानेन्द्रियों से,जो कुछ हविके स्वामी देवता ओंका, मानपूर्वक पापकिया, वह सब मैंने इस जलाशय में त्या- गदिया (मः, मयंकृतम्, अब) हमारे सहायक स्थिज्यों करके, या देखने को आएहुए मनुष्यों का, अवज्ञा स पाप- किया है, उसको इसजल मेत्यागीदया,( देव, पुरुराष्णः, रिसा - पाहि ) हे अवभृथ यज्ञ के अधिष्ठात्री देव, विरुद्धफल देनेवाले वध वा हिंसा से, हमारी रक्षा करो ।। ४ ।। पूर्णा दर्वि परांपत सुपूर्णा पुनराफ्ता वस्लेव विक्रीणा-' वहा इपमूज शतप्रांतो ॥४९॥ . इस कण्डिका के मंत्रका और्णवाम ऋ०, अनुष्टुप् छन्द और इन्द देवता है । इस मन्त्र को पढ़कर दकेि द्वारा स्याली से प्रोदन ग्रहण कर । मन्त्रार्थ-(दर्वि, पूर्णा, परा, परा) हे अन्न देने के सा. धन काठपात्र, तुम स्याली के निकट से अन्न,को ग्रहण करने से पूर्ण होकर, उत्तमता को माप्त होतेहुए. इन्द्र के प्रति गमन करो। (सुपर्णा, पुनः, आपत) कर्मफल से सम्यक् पूर्ण होकर, फिर, हमारे निकट थानो (शतक्रतो, वम्नेन, इपम्, ऊर्जम्, विक्रीणावहै) हे बहुकर्मा इन्द, मूल्य द्वारा, अभीष्ट हविरूप अन्न को, परस्पर वैचैं। अर्यात में तु, इविदेता हूँ और तुम मुझको बल तथा पुण्यदो ४९ देहि मे ददामि ते नि मै धेहि नि ते दधे । निहारञ्च - हरासि मे निहारं निहराणि ते स्वाहो ॥ ५० ॥ इस कण्डिका के मंत्र का और्णवाम ऋपि, भुरिक अनुष्टपू छन्द और इन्द्र देवता है । इस को पढकर आहुति देय । मन्त्रार्थ मन में यह कल्पनाकर कि-इन्द्र कहरहे हैं (मे, देहि. ते, ददामि) हे यजमान ! तुम मुझ इन्द्र के अर्थ. प्रथम हविदो, तुझयजमान के अर्थ, पीछे अपेक्षित इचि दूँगा (मे, निधेहि, से, निदधे .) मुझ इन्द्र के निमित्त, पहिले हवि सम्पादन कर, तुझ: यजमान के अर्थ, फिर मैं इच्छितफल देताहूँ । यजमान कहता है.. (निहारम् मे, हरासि, निहारम्, से, निहराणि, स्वाहा ) हे इन्द्र मूल्य से खरीदने योग्य पदार्थ, मुझे दीजिये, मूल्यरूप हवि को, मैं तुझारे अर्थ, समर्पण करता हूँ, यह आहुति भलीमकार फलीभूत हो ॥५०॥ अक्षम्नमीमदन्त धर्व मिया अधूषत । अस्तोपत स्व- भानवोचिमा नविष्ठया मतीयोजान्विन्द्र ते हरी|२१|| . । इस कण्डिका के मन्त्र का गौतम ऋपि, विराट् पंक्ति छन्द - शुक्लयजुर्वेद। और इन्द्र देवता है । इस को पढकर पित्यजन करै । मंत्रार्थ-इस पिठ्यज्ञ कर्म में जो पितर हैं वह हमारे दिए हविस्वरूप अन्न को (असन् ,हि,ममीमदन्त, मियाः, अधूषत, मिया,अवाघूषत खाचुके, क्योंकि, प्रसन्नहुए, और हमारी भक्ति को जानकर भीतियुक्त हो, मपना शिर हिलातेहुए, अपने शरीरों को, कम्पित करतेहुर । और स्वभानवः, विमा,मविष्ठया,मती,अस्तोषत)स्वयं दीसियुक्त, यह बुद्धिमान, नवीनवुद्धि से, युक्त होकर, स्तुति करतेहुए, अ. चीन इमारी पाहुति को स्वीकार करके कृतज्ञता प्रकाशित की, इस कारण (इन्द, नु, से, हरी, अयोज ) हे इन्द्र ! तुमभी स- सुष्ट होकर इन पिसरों के साथ मिलने के उद्देश्य से, शीघही, तुम अपने, हरितवर्ण के दोनो घोडों को, जाने के निमित्त रथ में जोसो अर्थात् पितरों की सप्ति से सन्तुष्ट होकर प्राप को श्राना चाहिये ॥५१॥ समर्श त्या वयं मघवन् वन्दिपीमहि । प्रनूनं पूर्ण- बन्धुरः स्तुतो योसि वशान २॥ अनुयोज़ान्विन्द्र ते हरी ॥५२॥ इस कण्डिका के मन्त्र का गौसम ऋषि, विराट् पंक्ति छन्द और इन्द्र देवता है, इस से माहवनीय का उपस्थान होता है। म- नार्थ-(मघवन, वयम्, सुसन्दशम् त्वा, बन्दिपीमाहि) हे इन्ददेव! दम, सबको अनुग्रह युक्त समदृष्टि से देखनेवाले, आपकी, स्तुति करते हैं (स्तुतः, वशान, अनु, नूनम्, मयासि, पूर्णवन्धुरः, इन्द, से, हरी, आयोज) स्तुति कियहुए सुम, अभिलाषावाले यजमानों को, देखकर, अवश्य, प्राओगे, कारण कि तुम हमारी काममा पूरी करने को रथपर स्थित हो, अतः हे इन्द्र ! तुम, अपने, घोड़ों को, जोतो ॥५२॥ मनो न्वाहामहे नाराश सेन स्तोमैन । पिणाञ्च भन्मभिः ॥ ५३॥ इस कएिरका के मंत्रका बन्धुरी०, प्रतिपाद निम्य गायत्री , - ३.अध्याय। २०७ - . " छन्द और मन देवता है। इससे गाईपत्य का उपस्थान करै । म- त्रार्थ-(नाराशंसेन, स्तोमेन, च, पितृणाम् . मन्मभिः नु, मनः, आव्हामहे) हम मनुष्यों के योग्य स्तुति वाले, स्तोत्र, और, पि- सरों के..इच्छित स्तोत्रों से, शीन, मन के अधिष्ठात्री देवता को, श्राव्हान करते हैं । अर्थात् पिवृयज्ञ को करते समय हमारा मन, पितृलोक को गयासा होगया था, उसको बुलाते हैं ॥ ५३॥ आ न एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे । ज्योक्च सूर्य दृशे ॥ ५४॥ इस कण्टिका के मंत्र का बन्धुरी, विराट् गायत्री छन्द और मन देवता है । इस से भी गार्हपत्य का उपस्थान करै । म- न्त्रार्थ-(नः, मनः, क्रत्वे, दक्षाय, ज्योक्, जीवसे; सूर्यन्दृशे, च, आएतु ) हमारा, मन, यज्ञसइल्प के लिए, कर्मानुष्ठान के उत्साद के लिए, चिरकालतक, जीवन के लिए, चिरकालतक सूर्य के दर्शन के लिए भी, प्राप्तहो ।। ५४ ॥ पुनः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवं बात सचेमहि ।। ५५ ॥ इस करिडका के मन्त्र का बन्धुळपि, नित्यद् गायत्रीछन्द और मन देवता है। इससे भी उपस्थान करें । मन्त्रार्थ-(पितरः, देव्यः, जनः, ना, मनः, पुनः, ददातु ) हे पितरों !आपकी आज्ञा से, देवसम्बन्धी, पुरुष, हमारे लिए. हमारे पूर्वोक्त मनको, फिर इस कार्य के लिये देय । इसमकार अनुष्ठान करके हम भापके अनु- ग्रह से (जीवम्, बातम्, सचेमहि ) जीवन वाले, पुत्र पशु आदिकों को, हम सेवन करें ॥५५॥ वयछ सौम व्रते नुव मनस्तनूपु विभ्रतः । पूजावन्तः सचेमहि ॥ ५६ ॥ इस कण्डिका के मन्त्र का बन्धुक्रपि, गायत्री छन्द और सोम देवता है। इससे दक्षिणाग्नि का उपस्थान कर जप करै । मन्त्रार्थ .(सोम, क्यम्, सव, व्रते, तनपु, मनः, विभ्रतः, मजावन्तः, सचे- १०८ शुक्लयजुर्वेद । महि) हे पितृयज्ञ के सोमदेव ! हम यजमान. तुम्हारे, व्रतानुष्ठान में पर्चमान हुए, अापके शरीरों में, चित्तको, धारण करतेहुर, श्रापके अनुग्नह से. पुत्र पौत्रादि को पास हुए, हम, सेवन करते हैं ।। एषते रुद्र भागः मह स्वसाम्बिकया तं जुषस्व स्वाहां। । एष ते रुद्र भाग आखुस्तै पशुः ।। ५७ ।। इस कण्डिका में दो मन्त्र हैं.। एपत इत्यादि पहिले मंत्रका बन्धुभ्रषि, प्राजापत्या गायत्री छन्द और रुद्र देवता है। दूसरे एपस इत्यादि मंत्र का याजुपीगायत्री छन्द और रुद्र देवता है । शाकमेध के अग, पितृयज्ञ के शेषांश त्र्यम्बकयाग [ चन्द्रयाग] का प्रारम्भ होता है, उस में इस कण्डिका के पहिले मंत्र से अ- बदान हवन,करै । मन्नार्थ -(रुद्र, ते, स्वसा, अम्बिकया, एषः, भागः, से, अपस्व) हे पापियों और देहाभिमानियों को रुला- नेवाले रुद्र, अपनी, भगिनी, अम्बिका के साथ, यह हमारादिया हुआ, पुरोडाशरूपमाग है, उसको, सेवन करिये। यजमान के जि. तने पुत्र पौत्रादि पुरुषहों, उनमे से हरएक का एक २ पुरोडाश, फिर उन में से और एक अधिक पुरोडाश निर्वपण करै, उस अतिरिक्त पुरोडाश का होम न करै, किन्तु चूहे के खोदे विल के समीप ,खोदी हुई मट्टीपर इस दूसरे मंत्र को पढकर वखरदेय । मंत्रार्थ-(रुद्र, एपः, ते, भागः, ते, श्राखु:, पशुः ).हे: रुद्र, यह हमारा, वखेराहुया, मारा, पुरोडाश, सेवनीय है, आपका, चहा, क्षणीय पशु है ।। ५७ ॥- अव मुद्रमंदीमह्य देवं व्यम्बकम् । यो नो वस्यस- स्कग्यो नः श्रेयसस्करी नो व्यवसायात् ॥१८॥ इप्स काण्डका के मंत्र का बन्धुर्ऋषि, विराट् पंक्ति छन्द और रुद्र देवता है। चूहे की मट्टी के पास से आकर इस का जप करै। मन्त्रार्थ--(स्दम्, त्र्यम्बकम्, देवम्, अब, अदीमहि ) शत्रुओं को रुलानेवाले तीनों लोकों के रक्षक, सृष्टि मादि से क्रीड़ा करने वाळे वा शत्रुजयशीलवा सब प्राणियों में भात्मस्वरूप से चेष्टा ३ अध्याय। करनेवाले, द्युतिमान, स्तोत्रों से स्तुत वा सर्वगत परमेश्या को, गुरु तथा शास्त्र के द्वारा जानकर, सव दुःखों का नाश करते हैं (यथा, नः, वस्यस्करन्, यथा, नः, श्रेयस्करन्, यथा, न:, व्यवसा- ययात् ) जिस प्रकार हमको वह, उत्तम मकार से निवास करने वाले करें, जिसमकार, हमको, ज्ञातियों में श्रेष्ठ करें; जिस प्रकार हमको, सब कार्यों में निश्चययुक्त करें। इस प्रकार इनका जप करते हैं ।। ५८॥ भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुपाय भेषजम् । सुखं मेषार्य मेष्यै ॥ ५९॥ इस करिडका के मन्त्र का वन्धुर्ऋपि, स्वराइ गायत्री छन्द और रुद्र देवता है । जप करै । मन्त्रार्थ-(भेषजम्, असि ) हे रुद्र भाप औषध की समान सब उपद्रवों को दूर करनेवाले, हो (गवे, अश्वाय, पुरुपाय, भेषजम्, मेषाय,मेप्य,सुखम् ) गौ, घोडे, और पुत्र पौत्रादि परिवार के लिये, रोगदूर करने को औषधि दो, मेप, मेपी आदि पशुओं के निरुपद्रव जीवन के लिये, अपने सुखदायक स्वरूप का प्रकाश करिये ॥ ५९ ॥ व्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव धन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । त्र्यम्बकं यजामहे । सुगन्धि पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनाद्वितो मुं- क्षीय मामुतः ॥ ६०॥ इस कण्डिका में दो मंत्र हैं, ऽयम्बकम् इत्यादि पहिले का वशिष्ठ ऋपि, वाड् ग्राह्मी त्रिगुप् छन्द और रुद्र देवता है दूसरे ध्यम्बकमित्यादि का ऋषि श्रादि पूर्वोक्त है । जैसे पितृमेध में पुत्रादि अपनी वाम उरु को ताड़न करकै उलटी प्रदक्षिणा करते हैं तथा देवता की सेवा में दाहिनी जंघा साइन करके, तीन पद- क्षिणा करते हैं, तिसी प्रकार इसमें भी पुरुप पहिले मंत्र जपकर अग्नि की तीन प्रदक्षिणा करते हैं । मन्त्रार्थ--(मुगन्धिम्, पुष्टि वर्नम्, त्र्यम्बकम्, यजामहे दिव्यगन्धयुक्त मर्यधर्महीन उभर éܕ܀ " शुक्लयजुर्वेद। लोक का फल देनेवते. धन धान्धादिकी पुष्टि बढ़ानेवाले. पूर्योक तीन नेत्रोंवाले शिवको. हम पूजते हैं। वह हमको ( मृत्योः, मुक्षीय, बन्धनात उर्वारुकमिय, अमृतात, मामुक्षीय) संसार के मरण से छुड़ाय,बन्धन से, कर्कटी फल को जैसे, अर्थान् जैसे पकाहा फल अपनी पुंडी से छूटकर भूमि पर गिरजाता है, तैसेही, शिवकी कपा से मैं जन्ममरण रहित होजाऊँ, और अमरतारूप मुक्ति से, भ्रष्ट न होऊँ। दूसरे मंत्र को पढ़कर यजमान की कन्या तीन परि- क्रमा करै । मन्त्रार्थ-(प्रतिवेदनम्, सुगन्धिम्, त्र्यम्बकम्, यजा- महे, उर्वारुकम्, इव. इतः, बन्धनात्, मुक्षीय,अमुतः, मा)सुन्दर पति के प्राप्त करानेवाले, दिव्य यशवाले–धर्माधर्म के माता, ध्यम्बक शिवको हम पूजती हैं, कर्कटीफल की, समान, इस माला पितादि कुटुम्ब रूप बन्धन से, छूटकर, विवाह उपरान्त पति के समीप से, मत छुटाओ। अर्थात् पिता के गोत्र और घर से अलग होकर पति के घर और गोत्र में शिवजी के अनुग्रह से सदा नि.. वास करूँ॥६०॥ एतत्तै रुद्रावसं तेने पुरो मूर्जवतोऽतीहि । अब तत- धन्वा पिनाकावमः कृत्तिवासा अहि सन्नः शिवो- ऽतीहि ॥ ६१ ॥ इस.कण्डिका के एतत्त पहिले मंत्र का वशिष्ठ ऋषि, भुरिगा- स्तार पंक्ति छन्द और रुद्र देवता है दूसरे कत्तिवासा इत्यादि का वशिष्ठकोष, भुरिगास्तार पंक्ति छन्द और रुद्र देवता है। ज्य- म्वक याग के हवन से बचे हुए चावल जो श्रादि पुरोडाश को हण वांस प्रादि के बने हुए दोपात्रों में रखकर एक बांस की लकही के दोनो सिों में उस को बांध कंधेपर रखकर उत्तर को मुख किए कुछ दूरंजाकर जिसको गौ मुख उठाकर सूंघन सके ऐसे क्ष आदि ऊँचे स्थान पर इस मंत्रको पढकर स्थापन करै, से गौओं को रोग न होगा। मंत्रार्थ-(रुद्रएकत, ते, अवसम्) हे रुद्रदेव ! यह भापका, हविशेष नामक भोजन है ( सेन, अ- . न ३ अध्याय । --- वतसधन्वा, पिनाकावसः, मूजवतः, परः, अतीहि)सिस के साथ "तुम, हमारे विरोधियों के न रहने से मत्यञ्चा उतारे हुए अपने पिनाक धनुष को वन से ढांपे, मुंजवान नाम पर्वत के, पार हो- कर,गमन करो। जिससे कि प्राणी भयभीत न हों। दोनों पात्रों को वृक्ष प्रादि ऊँचे स्थान में स्थापित करके यजमान वेदी के पास आ दूसरे मंत्र से जल स्पर्श करै । मन्त्रार्थ-(कृचिवासाः, न:, अहिंसन्, शिवः, अतीहि ) हे रुद्र तुम चर्माम्बर धारण किए हो वा सवप्राणियों के, अन्तर्यामी होने से चर्माम्बरधारी हो, ह. मारी हिंसा न करतेहुए, हमारी पूजा से मसन्न हो कल्याणस्वरूप होतेहुए, अपने स्थान में निवास करो ॥ ६१ ॥ त्र्यायुपं जमदग्नेः कश्यपस्य व्याधुपम् । यदेवघु ध्या- युषं तन्नो अस्तु व्यापम् ॥ ६२ ॥ इस कण्डिका के मंत्र का नारायण ऋपि, उपिणक् छन्द और । रुद्र देवता है । यजमान शिर का मुण्डन करावै उससमय पहिले इस मंत्रको पढ़े । मन्त्रार्थ-(जमदग्नेः, व्यायुपम्, कश्यपस्य, घ्यायुपम्, यत्, देवेषु, व्यायुपम्, तत्. व्यायुपम, नः, अस्तु ) जमदग्नि ऋपिकी, जो वालकपन आदि तीन अवस्था है, कश्यप मजापति की, जो तीनों अवस्या है, जैसी, देवनाओं में, सीन अ- वस्या हैं, वह सब, न्यायुष, हम यजमानों को, पात हों अर्याद रुद्र के अनुग्रह से हमारे चरित्र इनके से होजाय ॥ १२ ॥ शिवो नामांसि स्वधितिस्ते पिता.नमस्ते अस्तु मा मा हिरासीः । निवर्तयाम्पायुवेऽन्ना य प्रजननाय रायस्पोपीय मुप्रजास्त्वार्य सुवीर्याय ।। ६३ ॥ इस कण्डिका में दो मंत्र हैं, पहिले शिव इत्यादि का नारायण ऋषि, भुरिग भगती छन्द और पुर देवता है, निर्वयेत्यादि दूसरे मंत्रका नारायण ऋ०, भुरिग्जगती छन्द और लिङ्गोक्त देवता है । पहिले को पढकर पुर उठाये। मंत्रार्थ-( सर्वव्यापक होने से.पुरे में भी विद्यमान देव ! सुम (नाम, शिवा, प्रसि ) .
११२ शुक्लयजुवेंद। नाम से, शान्तस्वभाव वा कल्याणकारक, हो ( स्वधिसि., ते, पिता ) बन्न, तेरा, रक्षक है (ते, नमः) तुझको, नमस्कार है (माम्, मा, हिंसी:) मुझको, मत, हिसितकरो। दूसरे मंत्रको पहकर मुण्डन करे । मन्त्रार्थ-हे यजमान इस कर्म के फल से (आयुपे, अन्नाद्याय, मजननाय, रायस्पोपाय, सुमजास्त्वाय, मुवीय, निर्वयामि) जीवन के लिये, अन्नादि भक्षण के लिए अधिक सन्तान के लिए, धनपुष्टि के लिए, सन्तान उत्पन्न करने की उत्तम शक्ति के लिए, और श्रेष्ठ बलकी प्राप्ति के लिये, भु- एहन करता हूँ ॥ ६३ ॥ इति श्रीशुक्लयजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनीपशाखाध्यै मारद्वाजगोत्रो. , रा: - तृतीय अध्याय समाप्त. अथ चतुर्थोऽध्यायः । एभगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्रं देवासो अर्जुषन्त विश्वे । ऋक्सामाभ्यां सन्तरन्तो यजुभी रायस्पो- ण समिपा मंदेम । हमा आपः शर्मु मे सन्तु देवी। भोपंधे त्रायस्व । स्वर्धिते मैनंछ हिसीः ॥ १ ॥ इस कांडका में ४ मन्त्र हैं । १ एदमित्यादि का. प्रजा० ऋ० विराह वाली जगती छन्द देवयजन देवता है। २ प इत्यादि का ५० ऋ०, पूर्वोक्त छ, आप देवता है। ३ ओषध ई. का .* वि० प्रा० पंक्ति छ• औषधि देवता है। ४-स्वधित इत्याद का ऋषि छन्द पूर्वोक्त और क्षुर देवता है। तीसरे अध्याय में प्राधान, अग्निहोत्र, उपस्थान और चातुर्मास्य के मन्त्र कहे अब अध्याय में ३२ काण्डका तक अग्निष्टोम के मंत्र कहे जायमे,'माद में यज- मान १६ ऋत्विजों का वरण करके भरणी में भग्नि का समारोपण कर पहिले मंत्र को पढता हुआ यज्ञशाला में प्रवेश करे, । मन्त्रार्थ- ३ अध्याय। (इदम् पृथिव्याः, देवयजनम्, श्रा अगन्म) हम इस, पृथ्वीसम्म ची, देवयजनस्थान में,आये है (यत्र, विश्वेदेवाः, अजुषन्त) जहाँ, सवदेवता, भीति से स्थितहुए (ऋक्सामाभ्याम्, यजुभिः, सन्तर- न्तः, रायः, पोपेण, इपा सम्मदेम) हम ऋग्वेद सामवेद, और यजुर्वेद के मन्त्रों से, समुद्रसमान गम्भीर सोमयाग को कररो हुए, धनकी, पुष्टि, और इच्छिन अन्न से, हृष्ट और तृप्त हों। दूसरे मन्त्र से यजमान के वालं भिगोवै । मन्नाथ (देवी:, पापः, मे, शम्, उ, सन्तु) मकाशयुक्त निर्मल, शिरपर लगाएहुएजल, मुझ यज- मान के निमित्त, सुखदायक-दी, हों । तीसरे मन्त्र को पढतेहुए सूक्ष्म कुशाग्र को छुरेसे काटकर जलपात्र में डाले। मन्त्रार्थ-(ओपधे, मायस्व) हे कुशतरुण प्रोपाधि के देवता, यजमान की हुरे से रक्षा करों। अध्वर्यु चौथे मन्त्र के पढेजाने पर नाई को छुरादेय वह यज- मान का क्षौर करे। मन्त्रार्थ-( स्वधिते, एनम्, मा, हिंसी) सुर के अधिष्ठात्री देव इस यजमान को, मत पीड़ा दो ॥१॥ आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेने नो घृतप्वः पु- नन्तु । विश्व हि रिसम्भवहन्ति देवीरदिदाभ्यः शु. चिरापूत एमि । दीक्षातपसौस्तुनूरंसि तान्त्वा शिवा- छ शग्माम्परिंदधे भद्रं वर्णम्पुप्यन् ॥२॥ १.इस कण्डिका में दो मन्त्र है, आप इत्यादि और दीक्षेत्यादि 'दोनों का प्रजा० ऋ८ और स्वराड् ब्राह्मी त्रिगुए बन्द है, पहिले का पाप और दुसरेका वास देवता है । १मन्त्र मे तडागं श्रादि में स्नान करके निकले । मन्त्रार्थ-(मातरः, श्रापः, अस्मान, शु- न्धयन्तु) माताकी समान पालनकर्ता, हेजलो, हम को शुद्ध करो। (घृतप्वः. नः, घृतेन पुनन्दु पहराहुए जलों से पवित्र करनेवाले देजलदेवतों ! क्षरिराजलसे, हमको, शुद्ध करो (दि, देवी, आपः विश्वम्, रिमम्, मवहन्ति ) निश्चय, दीप्तिमान, निर्मल, जल, सपूर्ण, पाप को, धौदेते हैं । ( आभ्यः, शुचिः, श्रापूतः, उद- श्व, एमि ) इनजलों से, स्नान करने पर शुदा वाहर भीतर प. - -- - ११४ शुक्लयजुर्वेद। वित्र हुआ मैं, इस जल से ऊपर, पाता हूँ।दूसरे मन्त्र से स्नान के अनन्तर रेशमी वाकोरी धोती पहिरै फेंट न बांधै । मन्त्रार्थ-दी. क्षातपसोः,तना असि) हे क्षोमवस्त्रनुमदीक्षाभिमानी और तपोऽभि मानी देवता के शरीरसमान प्रिय, हो (ताम् शिवाम् शग्माम् त्वा, वर्णम्, पुष्यन्, परिदधे ), उस दीक्षा तप के शरीर रूप. कल्याण रूप, सुखस्पर्श, तुमको, तुम्हारे धारने से कल्याणरूप कान्ति को पुष्ट करता हुआ, में धारण करता है ॥२॥ महीनाम्पोऽसि योंदा असि यच्चों में देहि । - प्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा अमि चक्षुर्मे देहि ॥ ३॥ इस कगिद्धका में महीनामित्यादि और वृत्रस्येत्यादि दो मंत्र हैं, दोनों का मजा० ऋ०. मुरित्रिगुप्छंद और पहिले का नंबनीत देवता तया दूसरे का अञ्जन देवता है । पहिले मन्त्र से यजेमान' शाला के पूर्व में कुशाओं पर पूर्वमुख बैठ फर गौ के मक्खन का मस्तक से चरणतक उवटन करै । म.. प्रार्थ-- (महीनाम्, पयः, असि ) हे नवनीत तुम गौओं के... दूधरूपं, हो । ( वर्णोदा, असि, म, वर्गों, दोह) तेजसम्पादन करने में समर्थ हो, 'मुझको रोज, दो । दूसरे मंत्र से त्रिककुन् पर्वत के, उसके न मिलने पर दूसरे अञ्जन को यजमान दाई आँख में दो बार और वाई में तीनवार आँज । मन्त्रार्थ- (वृत्रस्य, कनीनकः, असि ) हे अन्जन तुम वृत्रासुर की,काली पुतलीरूप, हो, (चक्षुर्दाः, असि. मे, चक्षुः, देहि) चक्षु इन्द्रिय को शक्ति देने वाले हो, मुझको दृष्टि,दो ॥३॥ चित्पतिर्मा पुनातु वास्पतिर्मा पुनातु देवो मा स- 'विता पुनास्वच्छिद्रेण पविण सर्पस्प रिमभिः । तस्यं ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने स- केपम् ॥ ४॥ ..इसकापेटका में तीन मन्त्र है तीनोंका प्रजापति ऋनिब्राह्मी पंक्ति छन्द और प्रजापति सविता देवता है। इन ३ मन्त्रों को सात सास वार पड़कर कुश से शिर परमार्जन करें। मन्त्रार्थ-(चित्पतिः, ३ अध्याय। . मच्छिद्रेण, पवित्रेण, सूर्यस्य, रश्मिभिः, मा,पुनातु.) ज्ञानाधीश ब्रह्मा, वायुरूप, पवित्रसे, सूर्यकी किरणों से,मुझको, पवित्र करें। (वाक्पतिः, मा, पुनातु) वाणी का अधिष्ठात्री देवता, मुझको पवित्र करे । (सविता, देवः, मा, पुनातु) सर्वान्तर्यामी, देव, मुझको, पवित्र करें। (पवित्रपत तस्य पवित्रपूतत्य,ते, याकामः, पुने, तत्, शकेयम् ) हे पवित्रात्मा के रक्षक, उस पवित्रपूत, श्रापके, पवित्र से मैं पवित्र हुमा हूं, जिस, कामनासे, में पवित्र हुआहूँ उसको करने, को,में समर्थ होऊँ ॥४॥ 'आवौ देवास ईमहे चामम्प्रयत्यध्वरे । आवों देवास "आशिपो यज्ञियासो हवामहे ॥५॥ इस. कण्डिका में १ मन्त्र है, उसका प्र० ऋ० निच्यदानु मुग्छन्द और आशीर्देवता है । इस मंत्र को अध्वर्यु यजमान से कहलाये । मन्त्रार्थ-(देवासः, अध्वरे, प्रयात, वामम् वः, प्राइम- है) देवताओं !, इस यज्ञ के, वर्तमान होनेपर, आपसे माँगनेयोग्य यज्ञफल को, आपसे, माँगते हैं । (देवासः; यज्ञियासः, आशिपः, श्रा,वः, हवामहे) हे देवताओं, यज्ञसम्बन्धी,फल रूप याशीवादों के, प्राप्त करने को, आपको, प्राचाहन करते. हैं ।। ५ ॥ स्वाहां यज्ञम्मनसः स्वाहोरोग्न्तरिक्षात् ।स्थाहा धावा पृथिवीभ्याछ स्वाहा वातादारसे स्वाहा ॥६॥ इस कण्डिका में ४ मन्त्र हैं, चारों का म० अ०, नित्यदार्य नु० छन्द और यज्ञदेवता है । पहिले मन्त्र से दोनो हाथ की कन अंगुलियों को सकोडकर तथा शेप मन्त्रों से, और अंगुलियों को सकोडकर मुट्ठी वाँध स्वाहा कहै और मौन होकर फिर खोले । मन्त्रार्थ-(मनसः, यशम्, आरभे स्वाहा) चित्त सें, यज्ञ को, पार- म्म करता हूं, यह सुसिद्ध हो । (उसे, अन्तरिसाव, स्वाहा) वि. स्तर्णि, अन्तरिक्ष से, यज्ञलाम करते हैं। (यावापृथिवीभ्याम्, स्वाहा), युलोक और भूलोक से, यज्ञलाम करते है। (वातात, १५, प्रवहमानवायु से, यज्ञलाभ करते हैं। (वाहा)यह अनुष्ठान में . , " - शुक्लयजुर्वेद । । आकृत्यै मयुजेन्नये स्वाहा मेधा मनमेऽग्नये स्वाहा दीक्षायै सपसेऽग्नये स्वाहां सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वा- हो। आपो देवीवृहतीविश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरी अन्तरिक्ष बृहस्पतये हविर्षा विधेम स्वाहा ॥७॥ । इस कण्डिका में ५ मन्त्र हैं । पहिले चार काम ऋ., पंक्ति छ, अग्नि देवता है । ५ वे का म० ऋ०, याी वृहती छ. और लिङ्गोक्त देवता है । इन में पहिले ४ मन्त्रों से अन्नग्रहण करके ५ वें मन्त्र से तथा अगली कण्डिका के मन्त्रों से स्थाली में से खुवे के द्वारा दो उग्रपण ( कार्यारम्भसूचक) आहुति देय । मन्त्रार्य (आकूत्यै, प्रयुजे, अग्नये, स्वाहा ) यज्ञ करने की मनकी प्रबल इच्छा को पूरी करने के लिए, प्रेरक, अग्नि के अर्थ, यह आहुति मुसिद्ध हो(मेधार्य,मनसे,अग्नये स्वाहा)धारण शक्ति के लिये, मनके मेरक, अग्नि के अर्थ, यह आहुलि, मुसिद्ध हो (दक्षायै तपसे, अग्नये, स्वाहा ) प्रतनियमादि दीक्षा की सिद्धि के लिये,तप के मवर्चक,अग्निदेव के अर्थ,यह आहुति मुसिद्ध हो (सरस्वत्यै, पूष्णे, अग्नये, स्वाहा ) मन्त्रोचारण की शक्ति के लिये, पुष्टि के साधक, अग्निदेव के अर्थ, यह पाहुति सुसिद्ध हो (देवी:, वृहती:,विश्वशम्भुवः पापः,पावापृथिवी उरो, अन्तरिस, बृहस्पतये, इविषा, विधेम, स्वाहा ) मकाशवान, महान्, जगत् के सुखदांता, हे जला, हे पृथिवी पुलोक हे विस्तीर्ण, अन्तरिक्ष तुम्हारे अर्थ और बृहस्पति के अर्थ, हविदेते हैं, मुंहुत हो ॥७॥ विश्वो दे॒वस्य॑ नेतुर्मत्ततॊ बुरीत मुख्यम् । विश्वो गय 'ईयुध्यति धुम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा ॥६॥ इस काण्डका में एक मन्त्र है। उसका स्वस्त्यात्रेय ऋ०, मा. नुग्रुप्यन्द और सविता देवता है। इस मन्त्र से भागभण का हवन करे । मन्त्रार्थ-(विश्वः, मनः, नेतुः, देवस्य, सवितुः, म. ख्यम्, बुरीत,) सर्कल मनुष्यों के, कर्मानुसार नियामक, दाना. दिगुणयुक्त, परत्मा के, भाक्तभाव को, चाहो । ( पुष्पसे, घुम्नम् - 47.
, . ३ अध्याय। ११७ वृणीत ) कर्म-उपासना-ज्ञान की पुष्टि के लिये, अन्नको, चाहो (विश्वः, राये, इपुध्यति, स्वाहा :) सकल मनुष्य, धन के लिए परमात्मा की प्रार्थना करते हैं, उस परमेश्वर के लिये श्रेष्ठ होम हो ॥८॥ अषमामयोः शिल्पै स्थस्ते गमारंभे ते मापातमास्य यज्ञस्योः । शम्मासि शर्म में यच्छ नमस्ते अस्तु मा.मा हिछसी ॥९॥ इस काण्डका में २ मन्न हैं, दोनों का प्राङ्गिरस ऋ०, पार्षी पंक्ति छन्द और कृष्णाजिन देवता है। पहिले मंत्र से यजमान बैठने को बिछाई हुई मृगचर्म के शुक्ल कृष्ण रोमों की संधि को छुए । मन्त्रार्थ-- (ऋक्सामयोः, शिल्पे, स्थः) हे मृगचर्म के श्वेतश्याम रेखाओं, तुम ऋक्साम के मंत्रों के अधिष्ठात्री देवताओं के, चातुर्य, हो (ते, वाम्, थारभे ) उन, तुमको, स्पर्श करता हूँ (ते, मा, अस्य, यज्ञस्य, श्रा उदृचः, पातम्).वह तुम, मुझको, इस, यज्ञकी, समाप्तितक, रक्षा करो। दूसरे मंत्र से मृगचर्म पर दाहिने जानु से चढे और पश्चिम भाग में उसी दक्षिण जानु से बैठे । मन्त्रार्थ-(शर्म, असि, मे, शर्म, यच्छ) शरणदाता, हो, मुझे, शरण. दो । (ते, नमः, अस्तु, मा, माहितीः ) तुम्हे नम स्कार, हो, मुझको, मत पीडा दो ॥ ९ ॥ ऊगैस्यादिरस्पूर्णमृदा ऊर्ज़म्मयि धेहि । सोमस्य नी- विरसि विष्णोः शम्मासि शर्म यजमानस्पेन्द्रस्य यो- निरसि समस्याः कृपीस्कृधि । उच्छूपस्व वनस्पत ऊो मा पायछहंस आस्य यज्ञस्योढचः॥ १० ॥ इस कण्डिका में ६ मन्त्र हैसिव का आंगिरस ऋ० १॥२॥३॥४॥ कानियदापी जगती छन्दश६का साम्नीत्रिगुप् छन्दाराशंका मेखला-नीवी-वस्त्र-कृष्णविपाण देवता । ५। ६.का कृष्ण विषाण दण्ड देवता है । पहिले मन्त्र से यजमान वेणी के आकार तिहेरी सन मुंज मिलीमेखला धोती के भीतर बांधे। मन्त्रार्थ-श्रा. .
१२० शुयजुवेंद। निरसी, ऊर्ज, उर्णम्मृदाः, असि, ऊर्जम्, मयि,धेहि) हे मेखला सुग अंगिरावंशी ऋपियों से सम्बन्ध रखने वाली, अन्नरसरूप, उनकी समान कोमल, हो, अन्नरस को, मुझ में स्थापन करो। दूसरे मन्त्र से मेखलाको कमर में बांध । मन्त्रार्थ-(सोमस्य नीतिः) मेखले ! तुम सोम देवता की, नीची हो । सरे मन्त्र से शिरपर पगडी पहिरै । मन्त्रार्थ-(विष्णोः, शर्भः आसे) हे उष्णीप तुम बहुव्यापी यज्ञकी, कल्याणरूप, हो (यजमानस्य, शर्म) मुझ यजमान का, कल्याण करो। चौथे मन्त्र से तनि वा पांच रेखावाले कालमृग के सींग को दुपट्टे के किनारे में बांधै इस से झुंजावे और दक्षिण भौं के ऊपर ललाट में स्पर्श करें। मन्नार्थ- (इन्द्रस्य, योनिः ) हे विपाण तुम जैसे इंद्र के स्थान हो तैसे मेरे होओ। पांचवे मंत्र से वेदी के बाहर विपाण से रेखा कर में- त्रार्थ--(कृपिः, सशस्याः, कृधि) हे विपाण नुम खेती को, मु. न्दर धान्य वाली, करो। छठे मंत्र से यजमान अपने मुखतके ऊंचा गूलह का दण्डा लेकर उस को खडा करै। मंत्रार्थ-(ब- नस्पते,उच्छ्रयस्व,उर्ध्वः अस्य यज्ञस्य,उदृचः, मा, अंहसः, पाहि-) हे वनस्पति के दण्ड, तुम ऊंचे होवो, ऊंचे. होकर, इस, यत्रकी, समाप्ति पर्यंत मुझको, पाप से, रक्षा करो ॥ १० ॥ मृतकृणुत तकृणुतामिमानिर्यज्ञो वनस्पतिर्य- ज्ञियः देवीन्धियम्मनामहे सुमृडीकामभिष्टये घोंपा यज्ञवाहसछ सुतीर्थी नौ असहशे। ये देवा मौजाती मनोयुज़ो दक्षतवृस्ते नौवन्तु ते नः पान्तु तेभ्यु स्वाहा ।। ११ ।। इस कपिरका में ३ मंत्र हैं, तीनों के आशिरस ऋषि, पहिले का स्वरावाली अनुष्टुपन्द, यज्ञ देवता, दूसरे का प्राजापत्या जगती छन्द यज्ञ देवता और तीसरे कामाजापत्या त्रि० छ० और अनिमित्रावरुणादित्यविश्वेदेवा देवता हैं। पूर्वमुख दीक्षिसं यज मान आहवनीय के सामने व्रत कुणत, इस मंत्र को सीन बार ३ अध्याय। . पढकर 'अग्निम' कहकर वाग्विसर्जन कर ऋत्विजों को यकी प्राज्ञादेय। मन्त्रार्य-(प्रतम्, कृणुत, व्रतम् कृणुत, अग्नि:, ब्रह्म मान, यज्ञः, बनस्पतिः, याईयः) हे ऋत्विजों, प्रतानुष्ठान, करो, दुग्धको. दोइन,यादि से सम्मादन करो, यह याग्नि, तीनों बेदरूप है, यह अग्नि, यबसाधनसूप है, खदिरादि वनस्पति, यज्ञ के योग्य होने से यज्ञस्वरूप है । दूसरे मंत्र से..यगमान पाचमन करै । मन्त्राथ-(अमिष्टये, देवीम्, सुमृडीकाम, वर्षीधाम, यन्त्र वाहसम्, धियम्, मनामहे ) इस अनुष्ठान की सिद्धि के लिए देव- संबंधिनी, मुन्दर,सुखकारिणी,तेजोधारिणी,यत्र का निर्वाह करने वाली, बुद्धि को परमात्मा से प्रार्थना करते हैं ( मुतीः नः वशे, असत्सवमसनीय बुद्धि, हमारे, वशमें, हो । तीसरे मंत्र से यजमान मृत्तिका के पात्रमें दूधपिये। मन्त्रार्थ-(ये, मनोजासाः, मनोयुजः, दक्षतवः, देवाः, ते, नः, अवन्तु, तेभ्यः, स्वाहा ) जो; इच्छारूप मनसे प्रकट हुए, रूपादि को देखते में मन से युक्त, सत्स- कल्पवालेचक्षुरादि इन्द्रिय रूप माण, वे सब, हमको, विनदूरकर रक्षाकरो, उन देवताओं के अर्थ, यह क्षीर मुफल हो॥११॥ श्वात्राः पीता भवत यूयमापो.अस्माकमन्तरुदर म- शेवाः। ता अस्मभ्यमयक्षमा अनमीचा अनोगमा स्व- दन्तु देवीग्मृतो ऋतावृधः ॥ १२ ॥ ......... ? ... इस करिडका में एक मंत्र है, इसका आजि००,जगती छन्द और भाप देवता है । इस मंत्र से यजमान अपनी नाभि का स्पर्श करें। मंत्रार्थ-( प्रापः, यूयम्, पीताः, श्वात्राः, भवत ) हे दु- ग्धरूप जलो, तुम, पिये हुए, शीघ्रही जीर्ण, होजाओ(अस्माकम् अन्नरूदरे, सुशेवाः, तोः, अयक्ष्माः, अनमीवाः, अनागसा, माता- वृधः, देवीः, अमृताः, अस्मभ्यम्। स्वदन्तु)हम पीनेवालों के, उदर के भीतर, सुखकारी, वह तुम, रोगादिरहित, साधारण रोगों को दूर करनेवाले, भूख प्यास आदि दोपों को दूरकरनेवाले, यज्ञवृद्धि के हेतु, मकाशवान, मृत्युको हटानेवाले स्वयं मरण धर्मरहित तुम, . " , १२० शुक्लयजुर्वेद । हमारे लिए, स्वादयुक्तहोयो ।॥ १२ ॥ इयन्ते युज्ञियालभरपो मुंञ्चामि न मुजाम् । अहो मुचः स्वाहाकृताः पृथिवीमाविशतं पृधिव्या सम्भव१३ इस कण्डिका में ३ मन्त्र हैं, तीनों के आहिरस ऋपि, ११३का माजापत्या गा० छ,२ का याजुपी छन्द ।१ कायदेवता २ का यजमान देवता और ३ का पृथिवी देवता है ।१ मन्त्र से प्रस्राव के समय यजमानकाले हिरन केसींग से मट्टीया,कुछ वृण ग्रहण करें। मन्त्रार्थ- (इयम्, ते, यज्ञिया, सन्ः) हे यज्ञपुरुष ! यह पृथिवी, तुम्हारा, यज्ञ के योग्य, शरीर है। अत: यहां मूत्र की, अपवित्रता दूर करने को देले वा तृण गृहण करता हूँ। दूसरे मन्त्र से मूत्र- त्याग कियाजाता है । मन्त्रार्थ-(अपः, मुनामि, न, मनाम्, अं- होमुचः स्वाहासाः, पृथिवीम्, प्राविशव ) में मूत्ररूप जल को, छोडता हूँ, नकि,सन्तानोत्पात्ति के कारण वीर्य को,हे मूत्ररूपजल अशुचिरूप तुम, दूधपीसेसमय स्वाहामन्त्र से स्वीकृत वुम, पृथिवी में प्रवेश करो। वहग्रहणकी हुई मृत्तिका वा हण दुर्गन्धि दूरकरने- को मून की भूमिपर डालै । मन्त्रार्य-(पृथिव्या, सम्भव) हे लोप्ट आदि तुम पृथिवी के साथ, एकीभाव को प्राप्त होजायो ॥१३॥ अग्ने त्वछ सुजागृहि वपछ सुमंन्दिपीमहि । रक्षाणो अप्रयुच्छन् मधुर्धे न: पुनस्कृधि ।। १४॥ इस कपिडका में ! मंत्र है उसके बाहिरस ऋ० अनुप् छन्द और अग्नि देवता है । इस मन्त्र से यजमान आहवनीय अग्नि के दक्षिण में उत्तरमुख वा पूर्व को शिरकरके अग्नि की अपेक्षा नीची भूमि में सौवै। मंत्रार्थ-(भग्ने, लं सुजागृहि ) अग्ने ! भाप, मलेमकार जागिये (वयम्, सुमन्दिपीमाई) हम, मुख से सो (अप्रयुच्छन, ना, भारत.) सावधानी से, ..हमको, चारों ओर से रक्षा करो (नः, पुनः,पबुधे, कधि ) हम को, फिर, प्रबोध के निमिच, उपयुक्त करो ॥ १४ ॥ पूनमनः पुनरायुम भागन् पुनः माणः पुनगत्मा म .
४ अध्याय। १२१ , ।' ६ आगन् पुनश्चक्षः पुनः श्रोत्रम्म आगन् । वैश्वानरो अन्धस्तनूपा अग्निनः पातु दुरितार्दवद्यात् ।। १५ ।। इस कण्डिका में १ मन्त्र है,उसके मागिरस ऋपि, भुरिग्वामी रहती छंद और अग्नि देवता है । फिर जागकर इस मंत्र को प? मन्त्रार्थ-(मे, मनः, पुनः आगन् ) मेरा, मन, सुपुप्ति काल में विलीन होकर फिर, शरीर में प्राप्त हुआ (आयुः, पुनः,) स्वप्न में नष्टमाय हुई प्रायु फिर मासहुई(माणा,पुनः,आगन्) वही माण, फिर, मास हुए ( मे, आत्मा, पुनः) मेरा, जीवात्मा, फिर, माप्त हुआ (चक्षुः, पुनः ) चक्षु इन्द्रिय, फिर माप्त हुई (मे, श्रोत्रम्. पुनः, आगन् ) मेरी,योत्र इन्द्रिय, फिर,माप्तहुई (वैश्वा- नरः, अदव्यः, तनूगा, अग्निः, अवयात, दुरितात्,नः, पातु) सवमनुष्यों का उपकारक, अविनाशी, हमारे शरीर का रक्षक, ईशानाग्नि, निन्दित, पाप से, हमारी, रक्षा करै ।। १५ ॥ स्वमग्ने बतुपा असि व आमत्त्येष्वा । त्वं यज्ञेप्वी- ट्यः । रास्वेयत्सोमाभूयों भर देवो नः सविता वसों दाता वस्वंदात् ।। १६॥ इस कण्डिका में २ मन्त्र हैं,दोनो का वत्स ऋभुरिगापी पंक्ति छन्द १ का अग्नांपोम देवता और २ का सोम देवता है। १ मन्त्र से यजमान, किसी कारण क्रुद्ध होना पडा हो या यज्ञवि. रुद्ध भाषण करना पडा हो उसका दोष दूर करने को प्रायश्चित्त करै । मन्त्रार्थ-(अग्ने, देवः त्वम्, आमत्यपु, प्रतपास, आर्स), हे अग्ने, प्रकाशात्मक, वुम, मनुष्यपर्यन्त सब माणियों में, यज्ञकर्म के रक्षक, हो ( यज्ञेषु, आईडयः) यज्ञों में, सब प्रकार से पूजनयोग्य हो । दूसरे मंत्र से अग्नि में हवन करने को लाएहुए सुवर्ण को स्पर्श करै । मन्त्रार्थ -( सोम, इयत्, रास्व, भूयः, प्राभर, ' सो.. दाता, सविता; देवः नः वसु, अदात् ) हे. सोम, इतना, धन दीजिये, फिरभी, धन दीजिये। क्योंकि धन के दाता सविता, देवता ने, हमको, धन, दिया था । १६ ।। - १२२ शुक्लयजुवेंद। एपी ते शुक तनरेतद्वर्चस्ता सम्भव भ्राजङ्गच्छ । जूरंसि धृता मनसा जुष्टा विष्णवे ॥१७॥ इस करिडका में २ मन्त्र है-दोनों का वत्स ऋपि और पार्षी त्रिगुप्छन्द, पहिले का हिरण्याज्य देवता और दूसरे का वाग्देवता है : पहिले मंत्र से अध्वर्यु धुवे के आज्य से जुहू को ४ वार भर कर उस घी में दर्भ से बँधे हुए सुवर्ण को बोडे, मन्त्रार्थ -(शुक्र एपा, ते, तनूः एतत्, वर्चः, तया, सम्भव, भ्राजम्, गच्छ ) हेदी प्यमान अग्ने, यह वृत तुम्हारा, शरीर है, यह सुवर्ण, तेज है, इन दोनों से एकीभाव को माप्त हजिये, सुवर्ण में की कान्ति को प्राप्त हजिये। दूसरे मंत्र से अग्नि में समिदाधानकरताहुआ होम करे। मन्त्रार्थ-(जूः, असि, मनसा, धृता, विष्णवे, जुष्टा) हे वाणी तुम वेगवान्, हो, वा जीवन देने वाली हो. मन से, धारण की हुई, यज्ञ पुरुप के लिये,मीतियुक्त हो ॥ १७ ॥ तस्यास्ते सत्यसंवसा प्रसवे तन्यो यन्त्रमशीय स्वाहा। शुक्रमसि चन्द्रमस्यमृतमसि वैश्वदेवमसि ।। १ ॥ इस कण्डिका के मंत्र का वत्स ऋ०, स्वराडापी रहती छ० और वाक्य हिरण्य देवता हैं । इस मंत्र से जुह में के तणवद मुवर्ण को निकाल कर वेदी पर धरै । मन्त्रार्थ-(तस्याः, ते, सत्यसवसः, प्रसवे, तन्वाः, यन्त्रम्, अशीय स्वाहा ) उस, वुझ, सत्य अनुज्ञा वाली वेदवाणी की, आज्ञा में वर्तमान मैं,शरीर के नियमनकी, दृढता को, गाप्त कर, इस घृत की सुन्दर पाहुति हो ( शुक्रम, आसे, चन्द्रम्, मासि, अमृतम्, असि, वैश्वदेवम्, असि ) सुवर्ण तुम दीप्यमान, हो, आल्हाद के देनेवाले, हो, जीवन के उपाय, हो, सब देवताओं के सम्बन्धी,हो ।क्योंकि-सब देवतासुवर्णदान सहप्त होते हैं ||१|| चिसि मनामि धीरसि दक्षिणासि क्षत्रियांसि यज्ञि- ग्रास्यदितिरस्युभयतःशीर्णी । सानः सुमाची सु- तीच्येधि मित्रस्त्वोपदि बघ्नीताम्पूषाध्यनस्पात्वि.. न्द्रायाध्यक्षाय !! १९॥ . .
४ अध्याय। १२३ - , . . इस कण्डिका के मंत्र का वत्स ऋ०, भुरिग्वामी पंक्ति छन्द और वाग्देवता है। इस मंत्र से वारूप अध्यारोप कल्पना करके सोम-' क्रपणी गौ की स्तुति कीजासी है। मंत्रार्थ-(चित्, असि,मनासि, धी:, असि ) हे सोमक्रयणी गौ ! तुम चिदात्मा, हो, ब्रह्मावि- प्णुमहेशरूप पूज्य, हो, बुद्धिस्वरूपा, हो, (दक्षिणा, असि, क्ष- बिया, असि, यज्ञिया, असि ) दक्षिणाम्प, हो, दाता की कष्ट से रक्षा करने वाली, हो, यज्ञसम्बन्धिनी होने से, यज्ञ के योग्य हो (अदितिः, असि. उभयतःशीपणी) अखण्डिता देवमाता रूप. हो, पृथिवी श्रोर स्वर्ग दोनों ओर शिर रखनेवाली अर्थात् दिव्य एवं भौम भोगों की देने वाली हो (सा, नः, सुमाची, सु- प्रतीची, एधि ) वह तुम, हमारे लिये,पूर्वमुखी, पश्चिममुखी, होवो (मित्रः, पदि, त्वा, वनीताम् ) सूर्य, दक्षिणपाद में, तुझको, वाँधे ( पूपा, अध्यक्षाय, इन्द्राय, अध्वनः, पातु ) पूपा देवता, यत के स्वामी, इन्द्रदेवता की प्रसन्नता के अर्थ, मार्ग में, सुम्हारी रक्षा करें।। १९ ॥ अर्नु त्वा माता मन्यतामर्नुपितानु भ्राता सगभ्याँऽनु सग्या सयूथ्यः । सा देवि देवमच्छहीन्द्राय सोमछ रुद्रस्त्वा धर्तयतु स्वस्ति सोमसखा पुनरहि ॥ २० ॥ इस काण्डका के मन्त्र का वत्स ऋ०, पूर्वार्द्ध का साम्नी जगती और उत्तरार्द्ध का भुरिगार्युष्णिक छन्द और वाक् तथा गौ देवता हैं । इस से भी गौ की स्तुति कीजाती है । मन्त्रार्थ-(त्वा, माता, अनुमन्यताम् ) हेगौ हे वाक्, सोम लाने में प्रवृत्त तुमको, तुम्हारी पृथिवी माता, प्राज्ञा देय ( पिता, अनु ) पिता स्वर्ग, आज्ञादेय (सगर्यः, भ्राता, अनु)सहोहर, भाई ईशाज्ञा देय( सयूथ्यः, . सखा, अनु.) एक यूपमें प्रकट होने वाला,सखा श्रात्मप्रतिविम्ब, आशा देय (देवि, मा, इन्द्राय, सोमम्, देवम्, अच्छेदि)हे दिव्य- गुणयुक्त सोमक्रयणी, वह तुम, इंद्रके अर्थ, सोमलता, देवता को, पाने को जानओ (रुदः, वा, वर्तयतु) रुद्रदेवता, तुम को, हमारी , .
. १२४ शुक्लयजुर्वेद। ओर को लौटा (सोमसखा, स्वस्ति, पुनः, पहि) सोमसहित तुम, खेमपूर्वक, फिर,श्रायो॥ २० ॥ वस्वस्यदितिरस्यादित्यासि मरासि चन्द्रासिं । वृहस्स- तिष्ट्या सुम्ने रेम्णा तु मुद्रो वसुभिराचंके ॥ २१ ॥ इस मंत्र का वत्स ऋ० विराडापी रहती छंद और वाक् गौ देवता है। इस मंत्र से सोमक्रयणी को उत्तर की ओर गमन कराके उस के पीछे २ जाकर स्तुति करै । मन्त्रार्थ-(वस्वी, असि,अदितिः, असि, मादित्या, असि, रुद्रा, असि,चन्द्रा, सि) हे वाक हे गों तुम वसुदेवता की शक्तिरूप, हो, देवमातारूप,हो, दादश आदित्य रूप, दो, एकादश रुद्ररूप, हो, चन्द्ररूप, हो, (हस्पतिः, वा, मुम्ने, रम्णातु) वृहस्पति देवता, तुमको, सुख में, रमण करावें. (रुद्रः, वसुभिः, आचके ) रुद्र देवता, थाठ वसुओं के साथ, तुम्हें रक्षा करने की कामना करें ॥२१॥ अदित्यास्त्वा मूर्धन्नाजिघर्मि देवयजने पृथिव्या इड़ा- यास्पदमसि घृतवत्स्वाहा । अस्मे रमस्वास्मे ते वन्धु- स्त्वे रायों मेरायो मा व्यरायस्पोण वियौपम तातो। रायः॥ २२ ॥ इस करिडका में ७ मंत्र हैं, सबका वत्स ऋ० और ब्राह्मी पंक्ति छन्द है। देवता पहिलेका श्राज्य, दूसरेका स्थान, तीसरेका पद, चौये और पांचवेंका यजमान, छठेका अवयु और सातवें का परनी है। पहिले.मंत्र से सोमक्रयणी के पीछे छः पग चलकर जहां ७वाँ पग पडकर सुरका चिन्ह हो उसमें सोनेका टुकडा डा. लकर उसपर घीकी आहुति देय । मंत्रार्थ-(अदित्याः, पृथिव्याः मूर्धन, देवयजने, स्वा, अाजिघमि, इडायाः, पदम्, असि, घृत- घव, स्वाहा ) अखंदित, पृथ्वी के, शिरःस्वरूप हे घृत, देवताओं के यज्ञयोग्य स्थान में, तुमको, टपकाता, हूं, हे स्थान तुम गौके, चरणचिन्ह, हो, घृतयुक्त, श्रेष्ठ होम होय दूसरे मंत्रसे अध्वर्यु गो- चरणचिन्ह में स्फ्यसे ३ रेखा कर। मंत्रार्थ-(अस्मे, रमस्त्र)
१ अध्याय।
१२२
हे गोपद तुम मुझमें, क्रीडा करो। तीसरे मंत्रसे उसमें की मट्टी
सोनेको हटाकर हाथसे ले थाली में डाले । मंत्रार्थ-(मस्मे, ते,
वन्धुः ) हम, तुम्हारे, वन्धुरूप हैं । चौथे मनसे गौके
उठाए हुए
पद के स्थानपर जल डालकर वह पद यजमान को देय । मंत्रार्थ
(ले, रायः) हे यजमान, तुम में, धन इस पद से स्थित हो ।
पांच मंत्रसे यजमान ग्रहण करै मंत्रार्थ-(मे, रायः) यह मेरे;
धन वा पशु हैं। छठे मंत्रसे अध्वर्यु अपने हृदय को हुए । मंत्रार्थ
(वयम्, राया, पोपेश, मा, वियोम) हम, धनकी, पुष्टिसे, न,
वियुक्त हो । अध्वर्यु यजमान से पद लेकर पत्नी को देय और
सहकारी अध्वर्यु ७ वें मंत्र को पढ़े । मंत्रार्थ-(तोतः, रायः) ब्रह्म
विष्णु महेश-परारूपधारी पत्नीसहित यजमान को, धन या पशु,
प्राप्त हों ॥ २२ ॥
समख्ये देव्या बिया सन्दक्षिणयोरुर्चक्षसा । मा म
आयुः प्रमोयीर्मो अहन्तवं वीरं विदेय तवं देवि स-
शिं ॥ २३ ॥
इस मंत्रका वत्स ऋ०, आस्तारपंक्ति छन्द और वाग्देवता
है। सोमयरणी को देखनेवाली पत्री से अवयु यह मंत्र पाठ
करावै । मंत्रार्थ-(देव्या, दक्षिणया, उरुचक्षसा, धिया, समख्ये)
हे सोमकयणी गौ प्रकाशवान्, यत्रंकी प्रधान दक्षिरणा के योग्य,
विशाल दर्शनवाली तेरे द्वारा, मैं वुद्धिपूर्वक, यज्ञपुरुप को देखनी
हूँ (मे,आयुगमा, ममोपी:) तुम मेरी, आयुको,मत, खण्डित करो
(तव, आयुः, अहम्,.मा, उ)तेरी, आयु को, मैं, खण्डित न करें
(देवि, तव, सन्दशि, वीरम्, विदेय) हे पराशक्ति,तेरा, सुन्दरदर्शन
होने पर, बली पुत्र को, माप्त करूँ॥२३॥
एप ते गायत्रो भाग इति मे सोमाय यूताटेप ते त्र-
मुभो भाग इति मे सोमाय चूतादेप ते जागतो भाग
• इति मे सोमाय बेताच्छन्दोनामानाछ सामाज्यम-
• होति में सोमाय ग्रूतादात्माकोसि शुक्रस्ते अहो ।
विचितस्त्या विचिन्वन्तु ॥२४॥
१२६ शुक्लयजुर्वेद। इस काण्डका में ४ मन्त्र है, ११२१३ का वत्स , ब्राह्मी जगती छन्द, लिङ्गोक्त देवता ४का वत्स ऋ०, याजुपी पंक्ति छन्द और लिङ्गोक्त देवता हैं। १।२।३ मंत्र को अध्वर्यु सोमकी ओर जानेवाले यजमान से कहलाये। माथ-(सोमाय, मे, इति, दूताव, ते, एपः, भागः, गायन:) हे अध्वर्यु, सोमाधिष्ठात्री देवता के अर्थ मेरा, यह वचन, कहो, कि तुम्हारा, यह भाग, गायत्रीसम्बन्धी है (ले, एपः, भागः, त्रैष्ठभः, इनि, मे, सोमाय दूताव:) तुम्हारा यह, माग,त्रिगुप्छन्दसम्बन्धी है, ऐसा, मेरा, वचन, सोमदवता के अर्थ, कहो २।(एपः, ते, भागः, जागतः, इति, मे, सोमाय, व्रतात्) यह तुम्हारा, भाग,जगतीचन्दसम्बन्धी है, यद्द,मेरा बचन, सोमदेवता से, कहो (बन्दोनामानाम्, साम्राज्यम्, गच्छ, इति, मे, सोमाय व्रताद ) तुम उष्णिक आदि सब छंदों के, आधिपत्य को, पाओ, यह मेरा वचन, सोम देवता से, कहो ३ । यजमान पूर्वमुख वैठकर इस ४ मंत्र से सोम स्पर्श करै । मन्त्रार्थ- (आस्माकः असि, शुक्रः, से, ग्रह्यः, विचितः, वा, विचिन्वन्तु ) हे सोम क्रर्यमार्ग प्राप्त हुए तुम हमारे, हो, यह शुक्रनामक सय, तुम्हारे, ग्रहण करने, योग्य है, यह सव माहात्मा तुम्हारा सारासार जानने में समर्थ हैं, सारासार विचार कर तुम्हारे सारभाग को, ग्रहण कर॥ २४ ॥ अभियन्देवछ सवितारमोपयोः कविक्रंतुम मि स. त्यसवछ रत्नधामभि प्रियम्मतिविम् । ऊहवा यस्या मतिर्धा अदितत्सवीमनि हिरण्यपाणिरमि मीत सुनातुः कृपावाजाभ्यस्त्वा मजास्त्यानुप्राणन्तु मशास्त्वमनुमाणि हि ॥२५॥ इस कण्डिका में ३ मंत्र हैं, तीनोंका वत्स ऋ०, १ का विराट प्राली जगतीचन्द, २का निच्यूदाी गायत्रीचन्द, ३ का यजुश्छंद और तीनोंका सविता देवना है। १ मंत्रसे सोम बांधने के कपड़े को दुहरा तिहरा करके उसमें १० चुकटी सोम डाले । मंत्रार्थ- (वम्, भोण्योः, देवम्, कवितुम्, सत्यसक्सम्, रनधाम, श्र- भिमियम्, मतिम्, कविम्, सवितारम्, अभ्यर्चामि ) उस, पावा ४.अध्याय। १२७ , . पृथिवी के, प्रकाशक, ब्रह्मसङ्कल्पसे प्रकट, सत्य भेरणावाले, रनों पारक, समस्त चराचर के मिय, अनूपम कल्पना शक्तिवाले, वेदविद्या के उपदेशक, सूर्यदेव को, सब ओरसे पूजता हूँ (यस्य, अमितिः, ऊर्धा,भाः, सीमनि, अवियुतत) जिस सूर्यकी, अनंत आकाशाभिमुखी, दीप्ति, आकाश अथवा पराप्रकृतिरूप ब्रह्माण्ड को, प्रकाशित करती है (हिरण्यपाणिः, सुझतुः, कपाः, स्वः) ज्योतिःस्वरूप, हाथवाले, सत्यसंकल्प जिसकी, कृपा से, स्वर्ग रचागया है, उसकी पूजा करता हूँ। दूसरे मंत्रसे उप्रणीश के दोनों सिरे मिलाकर गांठ देय । मं- त्रार्थ-(प्रजाभ्यः, त्वा ) हे सोम ! मजाके उपकार के अर्थ, तुझ को वांधता हूँ। तीसरे मंत्रसे गांठ के वीचमें अंगुली देकर छिद्र करे, जिससे उणीश में बँधे सोमका श्वास न रुकै । मंत्रार्थ- (मजाः, त्वा, अनुमाणन्तु, त्वम्, मजाः अनुपाणिहि ) हे सोम ! मजा, श्वास लेतेहुए तुझको, अनुसरण करके जीवित रहैं, , यास लेनेवाली, प्रजा का, अनुसरण कर ॥ २५ ॥ शुक्रन्त्या शुक्रर्ण क्रीणामि चन्द्रश्चन्द्रेणामृतममृतेन सम्म ते गोरस्मे से चन्द्राणि तर्पसस्तनूरंसि प्रजापते वर्णः परमेण पुशुना फ्रीयसे सहस्रपोपम्पुंपेयम् ।।२६।। इस कण्डिका में १ मंत्र हैं। सबका वत्स प्रपि, मुरिग् ब्राह्मी पंक्ति छन्द और देवता पहिलेका सोम, दूसरे तीसरेका लिङ्गोक्त, तथा चौथेका अजा है। यजमान को सुवर्णका स्पर्श कराकर पहला मंत्र उच्चारण करवावै । मन्त्रार्थ-(चन्द्रम्, अमृतम्,शुझम्, त्या, शुझेण, अमृतेन, चद्रेण, क्रीणामि) हे सोम! तुम पाल्हाद करने पाले, श्नमृरा की समान स्वादु. दीप्तिमान् हो, तुमको, दीप्तिमान विनाशरहित, आल्हादकारक, सुवर्ण से क्रय करता हूँ। दूसरे मंत्र से सोना सोम बेचने वाले को देकर उसको कंपित करै । मन्त्रार्थ (गोः, ते, सम्मे) हे सोम वेचनेवाले,सोम के मूल्य में दीहुई गौ, तेरी गौ, फिर लौटकर यजमान के घर में स्थित हो । तीसरे मंत्र शुक्लयजुर्वेद। इस कण्डिका में ३ मन्त्र हैं,ऋपि तीनों का वत्साछन्द पहिले का स्वाराइ याजुपी त्रिमुप, दूसरे का विराडापी त्रिगुप् और ती सरे का स्वारा ब्राह्मी है । देवता पहिलेका कृष्णाजिन दूसरे का सोम और तीसरेका वरुण है। पहिले मन्त्र से शकट के ऊपर मग घमविलावै । मन्त्रार्थ-(अदित्या;, त्वक, असि ) हे कृष्णाजिन बुम पृथिवी के, त्वचारूप, हो । दूसरे मंत्र से उसपर सोम की गाँवरक्खे । मन्त्रार्थ-(अदित्य, सदः, पासीद) भूमिसम्बन्धी, स्थानपर, सवमकार स्थित होवो। तीसरा मंत्र सोम को स्पर्श क रताहुआ पढे । मन्त्रार्थ-(वृषभः, याम्, अन्तरिक्षम्, अस्तभ्नान ) थेष्ठब्रह्मरूप वरुण,युलोक को, अन्तरिसको, स्थिर करता हुआ (पृथिव्याः, परिमाणम्, अमिमीत ) पृथिवी के,विस्तारको,जानता हुमा (सम्राट्, विश्वा, भुवनानि,आसीदत,विश्वा,इन्,वरुणस्य, प्रतानि ) सम्यक् मकाशवान् ब्रह्म सम्पूर्ण,संसार में प्रविष्ट हुआ, सव, ही, वरणदेव के, कर्म हैं अर्थात् वह सदा जगन्निर्माणाद कर्म करता है ॥ ३० ॥ वनेषु पन्तरिक्षन्ततान वाजमवत्सु पर्य उलिासु । हृत्सु क्रतुं वरुणो विश्वग्निन्दिवि सूर्यमद्धात्सोम- मुद्रा ॥ ३१॥ इस कण्डिका के मन्त्र का वत्स ऋ०, विराडापी त्रिष्टुप् छन्द और वरुण देवता है, सोमं वांधने के वस्त्र से सोमको सब ओर से बांधकर इस मंत्रको जपे । मन्त्रार्थ-( वरुणः, वनेषु, अन्तरिक्षम् विततान ) वरुणस्वरूप विष्णु ने, वनके सोंके अग्रमें, 'आकाश को, फैलाया है (अवत्स, वाजम्, उस्रिया, पयः, इत्म, क्रतुम्, विक्षु, अग्निम्, दिवि, सूर्यम् अद्रौ, सोमम्.) पुरुषों में, वीर्य को गौमों में, दुग्ध को, हृदयों में, संकल्पात्मक मन को. प्रजानों में, माठराग्नि को, धुलोक में, सुर्यफो, पर्वतो.में, बलीरूप सोम को, स्थापित किया है ॥३१॥ सूर्यस्य चक्षुरारोहाग्नरक्ष्णः कनीनकम् । यत्रतशेभि- .
४ अध्याय। - . रीयसे भ्राज॑मानो विपुश्वितो ॥ ३२॥ इस कण्डिका के मन्त्र का वत्स ऋ.. निच्यदायेनु० छ० और कंप्णाजिन देवता है। इस मंत्र को पढकर, प्रासन के लिए जो दो मृगचर्म हैं, उन में से एक को शकट के पूर्वभाग में, जुए के समीप ऊंचे दण्ड में लगावै, यदि प्रासन का मृगचर्ग एकही हो तो उस की ग्रीवा की ओर के भाग को अलग करके शकट के पूर्वभाग में लगा । मन्त्रार्थ-( मूर्यस्य, चक्षु, अग्नेः, अक्ष्णः, कनीनकम्, श्रारोह ) हे कृष्णाजिन तुम-सूर्य के, नेत्र, श्री अग्नि के, नेत्र के सारे पर,आरोहण करो ( यत्र, विपश्चिता, भ्राजमानः, एतशेमिः, ईयसे) जहाँ इन दोनों के दर्शन वा मकाश में सर्वज्ञ सूर्य और अग्नि से; प्रकाशित होता, अश्वों के द्वारा, गमन करता है । क्या कि-सूर्य और अग्नि की दृष्टि, पढने से मार्ग, राक्षसों की चापा से मुक्त होता है ॥ ३२॥ उसावेतं धूपीही युज्यामनश्रू अवीरहणो ब्रह्मचोद- नौ । स्वस्ति यजमानस्य गुहान् गच्छतम् ॥ ३३ ।। इस कण्डिका के मंत्र का च० ऋ०, ऊर्ध्ववृहती छ० और अन- ड्वाह देवता हैं। इससे बैलों को शकट में जोड़े। मंत्रार्थ-(उस्री, धूर्पाही, अनल, प्रवीरहणी, प्रलचोदनौ, एतम् युज्येयाम्,स्वस्ति, यजमानस्य, ग्रहान्, गच्छतम् ) हे अनइवानों, शकट के धुर को धारण करने में समर्थ, उत्साहिवाले,सींगोसेवालकों कोन. मारने वाले प्राह्मणों को यज्ञ में प्रेरणा करनेवाले तुम दोनों,इस शकट में, जुत जाओ, कुशलपूर्वक, यजमान के, घरों को,जाओ ॥ ३३ ॥ अद्रोमैसि प्रच्यवस्व भुवस्पते विश्वान्यभिधामानि । मा त्या परिपरिणो विदन्मा वो परिपन्थिनो विढन्मा त्या घृर्का अपायों विदन् । स्पेनो भूत्वा परीपत यजमानस्य गृहान् गच्छतन्नों संस्कृतम् ॥ ३४॥ इस काण्डका के मम का व० ऋ०,भुरिगाी गायत्री औरभु० भा०० छन्द तथा सोम देवता है । सोम लेकर यज्ञशाला में जा . , , .
" - २३२ नेवाले यजमान से अध्वर्यु यह मंत्र कालावै । मन्त्रार्थ-(मे,माः असि, भुवः पते, विश्वानि,धामानि, अभिपच्यवस्व)हेसोम तुम मुझ यजमान के लिए कल्याणरूप, हो, हे यजमान अध्वर्यु भादि सबके पालक, सव, पत्नीशाला हविधानादि स्थानों को, देखकर चलो(वा, परिपरिणः,मा, विदन)तुमको,सब भार फिरनेवाले तस्कर, न, जानै( परिपन्यिनः, त्वा, मा, विदन् ) यज्ञद्रोही, तुम को, न, जानै (अघायवः, वृकाः, त्वा, मा, विदन्)दूसरों का अप- राध करनेवाले, दुर्जन, तुमको, न, जानें (श्येनः, मत्वा परापत) श्येन की समान वेगगामी, होकर, सन्मख चलो ( यजमानस्य, गृहान्, गच्छ, सत्, नौ संस्कृतम् ) यजमान के घरों को, जामो,वह यज्ञस्थान, हम तुम दोनों के लिए, सब सामग्री से युक्त है।क्षा नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसे महोटेवाय तदृत स- पर्यत । दोशे टेवजाताय केतवे दिवस्पुत्राय सूर्याय शंसत ॥ ३५॥ इस क० के मंत्र का व० ऋ० नि० जगती छ• और सूर्यदे। इसको पढकर मतिप्रस्थाता शाला के पूर्व में कृष्णशारण पशु को, उसके अभाव में लोहित सारंग को लेकर स्थित होय । मन्त्रार्थ- (मित्रस्य, वरुणस्य, चक्षसे, महोदेवाय,दूरदृशे,देवजाताय,केसवे, दिया,पुत्राय, मर्याय, नमः सत्, ऋतम्, सपर्यंत,शंसत) चराचर के मिन दुःखों को दूर करनेवाले सूर्यदेववा के,सन्मुख,महातेजःस्वरूप प्रकाशवान्, सब जगद को दूर से ही देखनेवाले, देवसाओं पर अनु- ग्रह करने को उत्पन्न हुए, प्रज्ञानयन, युलोकके,पुत्रवत् मिय, सूर्य देवता के अर्थ, नमस्कार है, उस, सत्यब्रह्मको, भजो, तथा उन की स्तुति करो ॥३५॥ वरुणस्योत्तम्भनमामि वरुणस्यस्कम्मसर्जनी स्थो व-. णस्थ अतसर्दन्यविरुणस्य ऋतसदनमामि वरुणस्य ऋतसदनमासीद् ॥ ३६॥ इस काण्डका में ५ मंत्र हैं। ऋषि सक्का वत्स,छदापिराइमामी १ अध्याय .. वृहती और देवता वरुण हैं । पहिले को पहकर शाला के समीप श. कट को पूर्वमुख वा उत्तरमुख खडाकर तिपाए से बाँधै। मंत्रार्थ- (वरुणस्य, उत्तम्मनम्, असि) हे काष्ठाभिमानी देवता तुम- वरुण देवता की प्रीति के लिए इस शकट में वस्त्रबद्ध सोम के उन्नमन, हो। दूसरे मंत्र से दोनों बैलों को शम्या से मुक्त करै । मन्त्रार्थ-- (वरुणस्य,स्कम्भसर्जनी, स्थः) हे शम्पे तुम दोनों-वरुण की, रोकनेवाली,हो । तीसरे मंत्र से अवयु प्रादि चारों ऋत्विज गलह की लकडी की वनीहुई, नाभिप्रमाणवाले पायों की, फैली कन अंगुलि से मुहीतक नाप में लम्बी, दिव्य कपास के डोरों से चुनी हुई मचिका को आसन्दी कहते हैं, उस सोम रखने को शकट के समीपलावै और हाथसे स्पर्श करै मन्त्रार्थ-(वरुणस्य ऋतसदनी, असि ) हे आसन्दी तुम-वरुण देवता की भीति के लिए, यक्षकी प्राप्तिका स्थान, हो । चौथे मंत्र से मंचिका पर मृगचर्म विछावै । मंत्रार्थ-(वरुणस्य, ऋतसदनम्, असि) हे कृष्णाजिन तुम-वरुण की भीति के लिए अथवा वद्ध सोमके, यज्ञके निमित्त वैठने का स्थान, हो । पांचवें मंत्रसे मृग चर्म पर सोमवल्ली की गांठ धरै । मन्त्रार्थ-(वरुणस्य, ऋतसदनम्, भासीद) हे सोम तुम-घरुणदेव की भीति के लिए लाएगए हो, यज्ञसम्बन्धी आसन्दीपर विछेहुए मगचर्म पर, मुख से स्थित हुजिए ॥ ३६॥ . या ते धामानि हुचिपा यजन्ति ता ते विश्वा परिभू-: रस्तु यज्ञम् । गयस्फान मृतरणः सुवीरो वीरता पर्च- रा सोम दुर्यान् ॥ ३७.॥ इस कण्डिका के मन्त्र का गोतम ऋ०, निच्युदापी प्रिष्टुप् छन्द और सोम देवता है । सोम को स्थापित कर अध्वर्यु यजमान से यह मंत्र कहलावै । मन्त्रार्थ-(सोम, ते, या, धामानि,इविपा, यडम्, यजन्ति ) हे .सोम, तुम्हारे, जिन, मातःसोमादि स्थानोंको पाकर, तुम्हारे रसरूप हविसे, यज्ञपुरुष का, पूजन करते हैं (से, सा, विश्वा, परिभः, अस्तु ) तुम्हारे, वह, सम्पूर्ण, स्थान; तुमसे - . शुक्लयजुर्वद। सब ओर से व्याप्त, हों (गयस्फाना, मतरणः, सुवीरः, अवीरहा, दुर्यान, पाचर ) घरकी वृद्धि करनेवाले, यज्ञको माप्त कराने वाले, हम ऋत्विज् वा यजमान के पुत्र पौत्रादि से सम्पन्न तुम, चीर पुरुषों को पालनवाले, यागृहों को, माप्त हूजिये ॥ ३७॥ इति श्रीशालयजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनीयशाखाध्ये भारद्वाजगोरो : द्भूनगौरवगावतंस श्रीमद्भोलानापात्मजरामस्वरूपशर्मा द्वारा मटमहीधरादिप्राचीनभायों के अनुसार सम्पादित अन्वय पदार्थ और भावार्थसहित शालागमनावाचानान्त चतुर्थ अध्याय समाप्त. ॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः॥ . . - . r चौथे अध्याय में ऋत्विज सहित यजमान के शालाप्रवेश से लेकर सोमक्रय करके शाला श्रागमनतक के मंत्र कहे, अब पांचवें अध्याय का मारम्भ होता है. जिसकी श्रादिमें प्रातिय्येष्टि हविग्रह- णादि के मंत्रोंका वर्णन है- : ॐ अग्नेस्तनरंसि विष्णवे त्या सोमस्य तनूरसि वि-। : प्णवे त्वातिधेरातिथ्यमसि विष्णवे श्येनार्यत्वा सो. मभृते विष्णवे त्याग्नये त्वारायस्पोपदे विष्णवेत्त्वा॥१॥ इस कण्डिका के मंत्रका गोतम ऋषि, स्वराह नानी बृहती छन्द और विष्णुदेवता है...इस मंत्र से हविग्रहण कर, मन्त्रार्थ- १-(अग्ने, तनूः, असि. विष्णवे, त्वा ) हे. सोम तुम-अग्नि के, शरीर, हो, परमात्मा की प्रीति के निमित्त,तुमको ग्रहण करता है। २(सोमस्य, वनः, असि, विष्णवे, स्वा) तुम सोमदेवता के, शरीर,हो; विष्णु के अर्थ, तुमको ग्रहण करता हूं । ३अतिथेः, प्रातिथ्यम्, विष्णवे, त्या) हे सोम चुम-यज्ञमंडप में पायेहुए अतिथि के अधितिसत्कार से सन्तुष्ट करनेवाले हो, विष्णदेव की मीति के निमित्त, तुमको ग्रहण करता हूं। ४ (सोमभृते; श्येनाय, विष्णवे, त्वा ) हे सोम सोम लानेवाले, शत्रुके दमन , ५ अध्याय। " करनेको श्येन की समान उद्योगी मुझ यजमान के कल्याणार्थ यद्वाधिष्ठात्री विष्णुदेवता के पूसन्नतार्थ, तुमको ग्रहण करता हूं। ५ (रायस्पोपदे, अग्नये, स्वा, विष्णवे, खा) धनसम्बन्धी पु- टि देनेवाले, अग्नि के निमित्त, तुमको ग्रहण करता हूं, यबपति विष्णुदेव की प्रीति के निमित्त, तुम को ग्रहण करता हूं ॥१॥ अग्नेर्जनिनमामि पणो स्य उर्वश्यस्यायुरसि पुरवा असि । गायत्रेण त्या छन्दसामन्यामि त्रैष्टुंभेन त्या छन्दसा मन्धामि जागतेन त्वा छन्दसा मन्यामि॥२॥ इस काण्डका में ८ मंत्र हैं,ाप सब का गोतम छंद पहिले ५ का श्राी गायत्री, ६।७।८ का आी त्रिष्टुप् देवता १ से ५ तक का शकलादि,६ से ८ तक का अग्नि है, पहिले से यज्ञसंबंधी वृक्ष के टुकडे को लेकर वेदीपर उत्तर को अग्रभाग करके धरै। मंत्रार्थ--(अग्ने, जनित्रम्, असि ) हे खण्ड तुम-श्रानि के, 3- सन्न करनेवाले,हो, । दूसरे से उस टुकडेपर कुशतरुण को रक्दै मन्त्रार्थ-(वृपणौ, स्थः) हे दोनों कुश तुम-सींचनेवाले अर्थात् अरणिकाष्ठों में अग्नि उत्पन्न करने की शक्ति देने वाले हो । तीसरे से इन दोनों कुशामों पर नीचे की अरणि को उत्तरामधरै मन्त्रार्थ-(उर्वशी, असि) हे नीचे की अरणि! अग्नि की उत्पत्ति के लिए हमने तुमको स्त्रीरूप माना है अब तुम--उर्वशी नामवाली, हो । चीये मंत्र से भाज्यस्थाली से, उत्तरारणि का स्पर्श करै। मन्त्रार्थ-(प्रायुः, असि)हे स्थाली के आज्य तुम- अग्नि की प्रायु, हो।पाँचवें मन्त्र से नीचे की याणि पर उत्तर अराणि धरै। मन्त्रार्थ- (पुरूरवाः,असि) हे उत्तरारणि ! हम अग्नि उत्पन्न करने के निमित्त तुमको पुरुप रूपसे कल्पना करते हैं अतः तुम-पुरुरवा नामक, हो।६।७८ मन्त्र से दोनो अरणियों को मंयकर अग्नि निकाले। मन्नार्थ-(गायत्रेण,छन्दसा,त्वा,मन्यामि) गायत्री, छन्द के अधि. प्रासा,अग्नि देवता केवलसे,तुम को-मन्यन से मकद करता हूं। (अनु. भेन, छन्दसा, वा, मन्यामि) त्रिगुप् छन्द के अधिष्ठाता इन्द्रदेवता - शुक्लयजुर्वेद । के बल से,तुझको, दो अरणियों के द्वारा मयता हूँ ( जांगसेन, छन्दसा, वा, मन्यामि ) हे अंग्ने-जगती, छन्द के अधिष्ठांसा, विश्वेदेवा के वलसे, तुझको, दो अरणी के द्वारा मयता हूँ॥२॥ भवतन्नः समनमी सचेतसावरेपसौ । मा यज्ञछ हि सिष्टमा यज्ञपतिम्जातवेदसा शिवाभवतमय न.३३ इस करिडका के मन्त्र का ऋगो०, छन्द प्रापी पंक्ति और देवता निर्मथ्याहवनीयाग्नि । इस से मथीहुई अग्नि को माहव- नीय अग्नि के साथ युक्त करै । मंत्रार्य (जातवेदसौ, नः, स- मनसो, सचेतसी, मरेपसौ. भवतम् ) हे दोनो अग्नि !, हमारी 'कार्यसिदि के लिए, एकाग्रमन, समानचित, हमपर कोप न क- रनेवाले, हूजिये ( यजम्. मा, हिसिष्ट, यापतिम्, मा) यव को, मत, नष्ट करो, यजपति को, मत क्षतग्रस्त करो (अय, नः, शिवा, भवतम्) आज, हमारे निमित्त, कल्याणस्वरूप, हूजिये ॥ ३ ॥ अग्नायग्निश्वरतिप्रविष्ट ऋषीणाम्पुत्रो अभिशस्तिपा वासनः स्योनः सुयजा यजेह देवेभ्यो हव्यछ सदर मयुच्छन्वाहा ॥४॥ • इस कार्यडका के मंत्र का ऋ० गोतम, छंदा० त्रि० और देवता भग्नि है । सुवे से भाज्यस्थाली में का घी लेकर डाली हुई अग्नि पर इस मंत्र से आहुति देय । मन्त्रार्थ-(ऋषीणाम्, पुत्रः, वा, अ. भिशस्तिपा, अग्निः, अग्नौ, प्रविष्टः चरति, सः, नः, स्योना, म- यजा, इह, सदम्, भमयुच्छन्, देवेभ्यः, हव्यम्, यज, स्वाहा) बेदवेत्ता ऋषियों के, उत्पन्न कियेहुए शीपकुमार, या, वैकल्यनि- मित्तक अभिशाप से-या दुष्टों के आक्रमण से रक्षा करने वाला, मयित अग्नि, पाहवनीय अग्नि में प्रविष्ट हुआ, दवि को भक्षण करता है,वह अग्नि तुम, हमको, सुखरूप होकर, मन्दर याग से, इस स्थान में, सदा प्रमादरहित होकर,इन्द्रादे देवसानों के अर्थ, हवि, लेजाभो, तुम्हारे निमित्त घृतका श्रेष्ट होम हो॥ ४ ॥ आपतये रण परिपतये गृणामि तनून वावराय +1 . . E न ५ अध्याय। ..शचन ओजिष्ठाय । अनाधृष्टमस्यनाधृष्यन्देवाना- : मोजोनंभिशस्त्यभिशस्तिपा. अनभिशस्तेन्यमजसा मुत्यमुपंगेपछथित मां धाः ॥५॥ : इस कण्डिका में २ मंत्र हैं, ऋपि दोनों का गोतम छन्द पहिले का श्राष्णिक दूसरेका भुरिगापी पंक्ति, देवता पहिले का वायुःभार दूसरे का प्राज्य है । पहिले को पढकर व्रतपदान पात्र में सुबे से दो वार शाज्य लेय । मन्त्रार्थ-(त्वा, परिपतये, रानूनप्त्रे, शाफराय, शाने, भोजिष्ठाय आपराये,परिपतये, गृहपामि) हे याज्य । तुझ को, सर्वज्ञ, सब जगद के विस्तारका आत्मा के पौत्र, आकाश के पुन,सवकों में समर्थ,बलवान्,सदागति वायुदेवता के लिए,ग्रहण करता हूँ। वेदी की दक्षिण श्रोणि अर्थात् नैर्ऋत्य कोणपराज्यपान रखकर ऋत्विक और यजमान सब मिलकर पात्र को स्पर्श करतेहुए इसदूसरे मन्त्रको पढ़मन्त्रार्थ-(अनाधृष्टम् अनाधृष्यम्, देवानाम्, ओजः,अनभिशस्ति, अभिशस्तिपम्, असि,ग्रामञ्जसा,अनभिशरत्ये नम, सत्यम्, उपगेपम्, स्विते, मा, धाः)हे श्राज्य तुम बाजराक किसी से तिरस्कार नपानवाले,न आगे किसी से तिरस्कार पाओगे, सुम देवताओंके,सारपदार्थ,स्वयं अनिन्दनीय,निन्दित कर्म से हमारी रक्षाकरने वाले, हो। इस कारण हे श्राज्य सीधे मार्गसे, अनिन्दिरा मोक्ष के प्राप्त करानेवाले हो आज हम सरल अन्तःकरण से तुम को स्पर्श कर शपथपूर्वक, यज्ञ करने का भार लेते हैं । अव शोभन मार्ग वाले यज्ञानुष्ठान में, मुझ को, स्थापन करो॥५॥ अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाया तव तनरियछ सा मयि यो भम तुनरेपा सा त्वयि । सह नौ तपते व्रतान्यनु मे दीक्षान्दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः ॥ ६॥ . ., इस मन्त्र का प्रपि गोतम,बन्द विराइ ग्राहली पंक्ति और देवता मान है। इस को पढ़कर आहवनीय और गाईपत्य अग्नि में समिधा छोडे। मंत्रार्थ-(व्रतपाः अग्ने, त्वे, व्रतपाः तर, या, सनूः, सा, इय मयि, या, मम, सन:, सा एपा, त्वाय, यापते, नो अशानि,सह, , -- १.
" शुक्लयजुर्वेद । दीक्षापति, मे, दीक्षान्, अनुमन्यताम् वपस्पतिः, सपः, अनु देसत्र असों के रसक, अग्निदेव, तुम, हमारे प्रसकी रक्षाकरो..सुम्हारा, जो, शरीर है, वइ, यह, मुझ में हो । जो, मेरा शरीर है,वह, यह, सुममें, हो । हे अतरसक,हमदोनोके, अनुष्ठित कर्म,साथ दो दीक्षा का रसक सोम, मेरी,दीमाको, माने ।उस सद्प वप का रक्षासोम देवता, मेरे सपनपको, माने ॥ ६॥ अछशुरछशुष्टे देव सोमाप्यायतामिन्द्रापैकवनविद । • आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायतामात्वमिन्द्राय प्यायस्वाआ. : पायथास्मान्त्सखौन्त्सन्या मेधर्या स्वस्ति ते देव सोम .. सत्यामशीय। एटाराय: प्रेपे भगाप तमृतवादिभ्यो नमो धावापृथिवीभ्याम् ॥ ७॥ : इस काण्डका में २मंत्र हैं, कापि पहिले को गोतम, दूसरे का. 'पसो छन्द पहिले को आहती, दूसरे का था. लगतीनदेवता पहले का सोम और दूसरे का लिझोक्त है । पहिले मंत्र से बहा उद्गाला; होता, 'अध्वर्यु, अग्नीघ्र यह पाँचों ऋत्विक और छठा यजमान सोमको जल से सजीव करें । मनार्य-(देव, सोम, रो, अंशुः,अंशुः एकपनविदे,इन्द्राय,आप्पायसाग,तुभ्यम्,इन्द्रा प्राप्या पताम्, त्वम् इन्द्राय, आप्यायस्व, संखीन अस्मान,संन्या, मेधयां, आप्यायस्व सोमदेव, ये, स्वस्ति, मुत्याम्, अशीय) सोमःदेवता, तुम्हारे. सब यवयव, गाँठ, मुख्य धन माप्त करने वाले, इन्द्रदेव की प्रीति के लिये, वृद्धि पाओ। तुम्हारे पीने के लिए, इन्द्र, मादु भूत हो। तुम, इन्द्रके पान के लिए, सब ओर से वृद्धि पायो। हे सोम-सखा की समान प्रीमि के पात्र हम विजों को, धनदान, और धारणशक्ति से, वढायो। हेसोम, देवता, तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी कृपा से मैं-सोमयज्ञ के अन्तस्नान दिनको, पाऊँ। दूसरे मासे सब ऋत्विज प्रसार के ऊपर दोनों हाथों को ऊँचा कर के या दाहिने हायको ऊँचा रखकर रक्षा के लिए सोम की परिचर्या करेंकार्य-(पष्टा, राषः, मेथे, भगाय, ऋतवादिभ्यः, ऋतम्।
५ अध्याय १३९ - - धावापृथिवीभ्याम्, नमः) हे सोम-हमारेइच्छ्रित, धन, जिसेतुम अवश्य प्रेरणा करो ऐसे, ऐश्वर्यादि हमको माप्त हों। सत्य बोलने वाला हमारा अवश्यमावियुक्त कर्म सम्पादन करो, स्वर्गपूविवी के अभिमानी देवताओं को, नमस्कार है ॥७॥. या ते अग्नेयाशया, तनूर्यपिंटा गहरेप्टा उग्रं वचो अ- पावधीत्वयं वचो अपविधीत्स्वाहा।याते अग्ने रज:- शुपा तनूपिटा गहरेष्ठा उग्रं वो अपविधीचे वचो अपविधीत्स्वाहा । याते अग्ने हरिशया तनूर्व पिठा-गोष्ठा उग्रं वचो अपावधीत्वेप घचो अपाय:.. धीत्स्वाहा ॥८॥ इस काण्डका में ३ मंत्र हैं, ऋपि पहिलेका गोतम दूसरे तीसरे का वत्स । छन्द पहिल का वि.मा वृहती, दुसरे तीसरे का नि०. श्रा० वृ० । देवता तीनो का अग्नि है । पहिले मंत्र से जुहादिमें मस्तर को लगाकर परिधिस्थापन पूर्वक सुरेस उपसद अग्नि में हवन कर । मंगाथ-(अग्ने, या, से अय:शया, तनूः वर्षिष्ठा, गव्हरेष्ठा, उमे, वचः, अपावधीत्, त्वेषम्, वचा,अपावधीत, खादा उपसद नामक अग्ने, जो, तुलारा, लोहपुरवासी, शरीर,देवताओं को.इ. च्छित फल देनेवाला, और असुरों के विपम देश में स्थित रहने वाला है उसने, दैत्यों की कठोर, वाणीको, प्रतिकल्प में नष्टकिया है। असुरों के कहे देवताओं पर आक्षेपरूप, वाक्यको, नष्ट किया, ऐसे उपकारक तुझ अग्नि के लिये श्रेष्ठ होम हो। दूसरे दिन दूसरी उपसंद नामक अग्नि में आहुति देय । मंत्रार्थ-(अग्ने, या, ते, रजाशया, तनूः, पिष्ठा, गहरेष्ठा, उग्रम् वचः, अपावधीत, त्वेषम्, वचा, अपावधीत, स्वाहा) हे उपसद अग्ने, जो, तुम्हारा, रमत- पुरयासी, शरीर, देवताओं को इच्छित फलदाता, और अमरों के विपम देश में स्थितिशील है उसने, दैत्यों की चिन्धि मिन्धिरुप उन, वागीको, नष्टकिया था, उनके भालेपम्प वचन को, नकिया था, ऐसे उपकारक अग्नि के लिए श्रेष्ठहोम हो । सीसरे दिन तीसरे शुक्लयजुर्वेद। मंत्र से प्राहुतिदेय। मन्त्रार्थ-(अग्ने,या,ते हरिशया,तनुः पिष्ठा, गहरेष्ठा, उनम्, वचः अपावधीत त्वेपम्, वचः, अपावधीन, स्वाहा) हे अग्ने, लो, तुम्हारा सुवर्णपुरवासी, शरीर, देवताओं को इच्छित फलदाता,और असुरों के विपमदेश में स्थितिशील है उसने. अमरों के तीन, वचनों को, विनष्ट किया है। असुरों के मानेपरूप, वचनों को,नष्टीकया है,ऐसे उपकारक अग्नि के लिए श्रेष्ठ होम हो । आख्यायिका-ततोऽमुरा एषु लोकेषु पुरंधक्रिरे अयस्मयीमे- वास्मिन लोके रजतामन्तरिसे हरिणी दिवि[३।४।४।२ शत- पय] इत्यादि श्रुतियों में लिखा है कि-मजापति के पुत्र देवता और असुरों में परस्पर वैर था अतः असुरों ने तप करके त्रिलोकी में । पुर बनाये, पृथिवी में लोहे का, अन्तरिक्ष में चाँदी का और स्वर्ग में सुवर्ण का । सव देवताओं ने अग्नि की उपासना करी वह अग्मि 'उपसद नामवाला हुश्रा, उसने देवताओं के हितार्थ उन पुरों में प्रवेश कर उनको भस्म करडाला तव वह तीनों पुरभग्नि के शरीर कहीए और देवताओं की विजय हुई, इसीप्रकार जो कोई उन अग्नि- यों की उपासना करेगा वह शत्रुओं के किले आदि तोडकर जय पावेगा || सप्तायनी मेसि विसार्यनी मेस्पर्वतान्मा नाथिसार्व- तान्मा ब्यधितात् । विदेग्निनभोनामाग्ने अनि आयुनानाम्नेहि योस्याम्टेधिव्याममि यत्तेनाधृष्टनाम यजियन्तेन त्वादधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अहिर आयुना नाम्नेहि यो द्वितीयस्यां पृथिव्यामसि यते- नाधृष्टन्नाम गुज्ञियन्तेन त्वादधे विदेदग्निर्नभो नामाग्ने अविर आयुना नाम्नेहि यस्तृतीयस्याम्पृधि- व्याममि यत्तेनाधृष्टन्नाम यज्ञियन्तेन त्वादधे । अर्नु त्वा देवीतये ॥२॥ इस रिडका मे १४ मंत्र है, ऋपि १ से १ तक का मोसम, से .४ तक का वत्स छन्द १ से ४ तक का भुरिगापी गायत्री,श्वे का . . - " अध्याया- १४. . , भुरिग्वाली वृहती,पेठे का निच्यूद्राही जणी,७ वे का यजुः, वे का भुवा वृ०,९म का नि० वाज०,१० का यजुः, ११वें का भुरि०, १२ का निवा०ज०,१३ वे का यंः, १४वे का याजुपी अनुपुप है। देवता १ से ४सक का पृथिवी, ५।८।११ का अग्नि, ६।७।९।१०।१२।१३।१४ ३ का लिङ्गोक्त है। चारोंदिशा में शम्या गाड़कर स्फ्य से चौकोण रेखा कर उन चारों रेखाओं को करतेसमय पहिले चारों मंत्र पढ़े। मंत्रार्थ-(मे, रामायनी, असि) हे भूमि तुम मेरे ऊपर अनुग्रह करने को, निर्धनसासे दुःखी पुरुषों को शरण देनेवाली, हो (म, वित्तायनी, असि ) हे भूमि--मेरे निमित्त, धनार्थियों को धनकी खानि, हो (मा, नाथिसात, अ वत्तात् ) हे भूमिदेषि-मुझको, याचना से, रक्षाकरो (मा, व्य- धितात्, अवतात् ) हे भूमि-मुझ, मन की पीड़ासे, रक्षाकरो। -५वे मंत्र से उन रेखाओं के आगे को स्फ्य.से चत्वाल खोदै,जिस स्थानमें से वेदी बनाने के लिए मट्टी खोदीजाय उसको चत्वाल कहते हैं। मंत्रार्थ-(नमः, नाम, अग्निः, विदेत ) है, चत्वालमें की मृत्तिके-नभ, नामवाला, सेरा अधिष्ठासा अग्नि, मुझसे खो- दीहुई तुझको जानै । छठे मंत्रसे गढ़े में से खोदीहुई मिट्टी निका लै । मंत्रार्थ-अगिरः, अग्ने, आयुना, नाम्ना, एहि) हेगतिमान, भग्ने,आयु,नामसे--तुम इस स्थानमें,आओ।७वे से उत्तरवेदी के स्थानमें उस मृत्तिका को डालमित्रार्थ-(अस्याम् पृथिव्याम् असि, ते यत् यज्ञियम् अनाधृष्टम्,तेन,त्वा,आदधे) हे अग्ने जो तुम-इस, पृथिवी में हो इससे तुम्हारा,जो,यज्ञ के योग्य,अनिन्दनीय,नामह उससे तुमको,इस स्थान में स्थापन करता हूं।८ से दूसरी रेखाकी ओर चत्वाल खोदै.। मंत्रार्थ-(नमः, नाम, अग्निः, विदेव) हे मृत्तिके तुमको नभ, नामा, अग्नि, जाने। ९३ से खोदी मट्टी गड़े से निकाले । मंत्रार्थ-(अङ्गिरः, अंग्ने, आयुना, नाम्ना, एहि) हे गतिमान्, अग्ने, आयु, नाम से, श्राओ। १० वें से उत्तर वेदी के स्थान में सव मट्टीडाले। मंत्रार्थ-(यः, द्वितीयस्याम्, पृथिव्याम्, १४२ शुक्लपजुर्वेद। असि ) हे अग्ने क्योंकि तुम दूसरी, पृथ्वी अर्थात् अन्तरिक्ष में हो (रों, यत्, अनाधृष्ट, यझियम्, नाम, तेन, त्वा, श्रादधे) इसकारण तुम्हारा, जो, यड़के योग्य, अमिन्दनीय, नाम है, उससे, तुमको, यहाँ स्थापन करता हूँ। ११ वेसे तीसरी, और खोदै मंत्रार्थ-(नभ- इत्यादि) अर्थ ५ वे की समान जानना। १२वें से मृतिका निकाले। मनाथ-(प्रदिर इत्यादि) अर्थ नवम की समान । १३३ से मृत्तिका दाले । मंत्रार्थ-यः, तृतीयस्याम् पृथिव्याम्, असि, ते, यत्, यशि- यम्, अनाधृष्टम्, गाम, तेन, त्वा, आदधे ) हे श्राने जिससे कि तुम तासरी,पृथ्वी धुलोक में स्थित,हो,शेपंअर्थ १० वे मंत्रवत् जानना। १४ वे से चौथी ओर खोदकर मट्टी निकालना डालना आदि सव कार्य करे। मंत्रार्थ-देववीतये, वा, अनु) हे मृत्तिके-देवताओं की मीति के निमित्त उंचरवेदी बनेगीश्रतः पूर्ववत्,तुमको,आहरणादि करता हूँ ॥९॥ सिसि सपत्नसाही देवेभ्यः कल्पस्व सिसि सपतमाही देवेभ्यः शुन्धस्व मिसि सपत्नमाही: देवेभ्यः शुम्भस्वः ॥ १०॥ "इस काण्डका में ३ मंत्र हैं, तीनों का गोतम, ग्रामी उपिणक, और देवता वेदि है । पहिले को पढकर वेदी को शम्या से ठीककर चारों और मध्यभाग में समान करें। मंत्रार्थ-(सिंही, सपलसाही, असि, देवेभ्यः, कल्पाच) हे वेदी तुम-सिंही के समान शत्रुनों का विरस्कार करनेवाली, हो, देवराानो के उपकारार्थ, उत्तर दीकर से समर्थ होजाओ । दूसरे को.पढकर वेदी का प्रोक्षण कर मन्त्रा-(सिंदी, सपत्नसाही,असि, देवेभ्यः, शुन्धख)सिंही समा न, शत्रुओं का पराभव करती, हो, देवताओं की नीति के अर्थ, शुद्ध होजाओ। तीसरे को पढकर वेदी के कंकर आदि-दूर करे। मंत्राथ--(सिंही, सपनसाही, असि, देवेभ्यः, शृम्भव ) हे उत्तर वेदी तुम-सिंहीसमान,शत्रुगों का तिरस्कार करनेवाली, हो, देव के लिए सिकवा पड़ने से शोभित होजागो.॥१०॥ -- " , ना ५ अध्याय। १४३ 7. , . - इन्धोपस्त्वा वसुभिः पुरस्तात्पातु प्रतास्त्वा : - पश्चात्पातु मनोजवास्त्वा पितृभिर्दक्षिणतः पातु वि- श्वकर्मा स्वादित्यैमत्तातः पात्विदमहन्तसं वाहिर्धा, यज्ञाग्निःमृजामि ॥११॥ इस कण्डिका में ५ मंत्र है, पाँचों का गोतम ना, निद्राह्मी त्रिगुप् छन्द और उत्तर दि देवता है। पहिले चार मंत्रों से उत्तर घेदी की पूर्वादि चारों दिशा में जलद्वारा हाथ से मार्जन करे । मंत्रार्थ-(इन्द्रधोपः, वसुमिः, त्वा, पुरस्तात्, पातु.) हे उत्तर वेदी- इन्द्र नाम से प्रसिद्ध देवता, पाठ वसुओं के साथ, तुमको. पूर्व- दिशा में, रक्षा करें । (पचेगाः, रुद्रैः, पश्चात्, त्वा, पातु ) वरुण देव, ११ रुद्रों के साथ, पश्चिम में, तुमको, रक्षा करें। (मनोजवाः, पिभिः, दक्षिणतः, त्या, पातु.) मनकी समान वेगवाले यमदेवता, दिव्य पितरों सहित, दक्षिण में, तुम्हारी, रक्षाकरे ( विश्वकर्मा, श्रादित्यैः, उत्तरतः, त्वा, पा.) विश्वकर्मा, १२ आदित्यों के साथ, उत्तर में तुम्हारी, रक्षा करें। पाँचवें मंत्रको पढ़कर मार्जन से बचा जल वेदी के बाहर दक्षिण में लगाहुआ.डाले । मंत्रार्थ-(अहम्, राप्तम्। इदम्, वाः, यज्ञात्, पहिर्धाः, निःसृजामि) मैं, पारणार्थ जिससे मोक्षण किया था उस अग्राह्य, इस, जलको, यज्ञकी वेदी से वाहेर, डालता हूं ॥ ११॥ सि यमि स्वाहा मि हास्यादित्यचनिः स्वाहां मि- सि ब्रह्मवनिः क्षत्रवामिः स्वाहा । मि मि सुम- जावनी रायस्पोपानः स्वाही मिछास्यावह देवान्य... जमानाय स्वाहां भूतेभ्यस्त्वा ॥ १२ ॥ "इसकंएिडका मदमत्र हैं, ले५ तक का गोराम ऋ०,मुरिग्वाली पंक्ति छ० वेदि देवताः । ६ठे का गो० ऋ०,यजुः, औरसुग देवता है। पहिले ५.मन्त्रों को पढकर बेदी की दोनो श्रोणी और दोनों अंश सथा नाभि में कुछ २ सुवर्ण स्थापन करके उसको देखते २ अध्वर्यु जुहू में भाज्यलेकर पाँच पाहुति देय। पहिली दक्षिण भरा अमरनि- १४४ शुक्लयजुर्वद। आग्नेय कोण में, मंत्रार्थ-(सिंही, सि, साहा) हे उत्तरवेदी- असुरों का भक्षण करनेवानी,हो,सुमको यह इनि देते हैं सुन्दर पसे ग्रहण करो। दूसरी पाहुति उत्तर श्रोणि वायुकोण में देयामन्त्रार्थ- (आदित्यवनि, सिंही, असि, स्वाहा ) हे उत्तरवेदि तुम मादित्यों को प्रसन्न करनेवाली, सिंहीरूप, हो, सुगको हवि देते हैं सुन्दर रूप से ग्रहण करो । सीसरी आहुति दक्षिण श्रोणी नर्थ- स्यकाण में देय । मन्त्रार्थ-(ब्रह्मनि, सिंही, सि, स्वाहा) हे उत्तरवेदी तुम-ब्राह्मण क्षत्रियों की प्रीति को देनेवाली, सिंही समान, हो, यह सुन्दर पाहुति तुमको देने हैं । चौथी आहुति उ. तर अंश ईशानकोण में देय । मंत्रार्थ-सुपजावनि,रायस्पोपवाने, सिंही, असि, स्वाहा ) हे उत्तरवेदी तुम, अच्छी प्रजा और 'धन पुष्टि को देनेवाली, पराक्रममें सिंही, हो, यह पाहुति देते हैं इसको श्रेष्ठरूप से स्वीकार करो । ५.वीं पाहुति उत्तरवेदी कोमः ध्यबिंदु नाभि में देय । मन्त्रार्थ-(सिंही, प्रसि, यजमानाय, दे- वान, भावह, स्वाहा) हे उत्तरवेदी दुम-सिंहीरूप हो, यजमान के उपकारार्थ, देवताओं को, यहां पहुँचामो, यह हवि तुमको देवे है। छठे से वेदीके ऊपर जुह -को ग्रहण करै । माय-(भतेभ्यः त्वा.) हे घृतयुक्त जुहू--सब प्राणियों की नीति के लिये, तुम को वेदी के ऊपर ग्रहण करता हूं-तुम जरायुजादिमाग हो ॥ १२ ॥ ध्रुवोसि पृथिवीन्दह ध्रुवक्षिदस्य॒न्तरिक्षन्दरहाच्युस. क्षिदसि दिवे हाग्नेः पुरीपमसि ।। १३ ।। इस कण्डिका में ४ मन्त्र हैं, चारों का गोतम ऋ०, राक का मुरिगार्ण्यनु छन्द, ४ थे का दैवी जगती छ०, देवता ? से ३ राकका परिधि और ४ थे का सम्भार है। पहिले ३ मंत्रों को पढकर देवदारु की वनी ३ परिधियों के द्वारा उत्तर वेदी की नाभि से. दर्श पौर्णमास इष्टि की समान पश्चिम, दक्षिण, उत्सर सीन दिशा मों में परिधि करे। मंत्रार्थ-धुवः, असि, पृथिवीम, ह ध्रुवति श्रीस, मन्तरिक्षम,दं । अच्युवक्षित, भासे विषम् रह) हे मध्य " .५ अध्याय " मपरिधि तुम-स्थिर हो, यहां की पृथ्विी.को,दृढ़ करो । हे दक्षिण परिधि तुम-स्थिर. यज्ञ में निवास. करती, हो, अन्तरिक्ष को, दृढ करो। हे उत्तरपरिधि ? तुम-अविनाशी यज्ञ में निवास करती हो, धुलोक को, दृढ करो । चौथे मेत्र से नाभि के मध्यविन्दुम संभार (गूगल. तेजपास भेड़के वाल)स्थापन कर। मंत्रार्थ--(अग्नेः, पुरीपम्, असि) हे सम्भार तुम अग्नि के, पूर्णकर्ता हो ॥ १३ ॥ युम्जते मन उत युञ्जते धियो विप्राविप्रस्य वृहतो वि-'; पश्चितः ।। विहोत्रादधे वयुना विदेक इन्महीदेवस्य सवितुः परिष्टुतिः स्वाहा ।। १४ ।।.! इस कण्डिका के मन्त्र का स्यावाश्व ऋ० स्वराडाी ज.छः और सविता देवता है । हविर्घान मण्डप बनाकर अध्वर्युशाला में मवेशकर प्राज्य का संस्कार करके चार वार ग्रहण किएहुए आजम को परिस्तरणसमिदाधानपूर्वक अग्नि में इस मंत्र से आहुति देय । मनाथ-(बृहतः, विपथितः, विपस्य, विप्राः, होत्रा, मनः युखते, उत, धियः युञ्जते, वयुनावित्, एकः, इत् विदधे, सवितुः देवस्य परिणति, मही/ स्वाहा ) वेदपाठा से महत्व को प्राप्त, सर्वज्ञ, यज- मान के वेदवेत्ता, होम करने वाले ऋत्विज्ञ, मनको, यज्ञानुष्ठान में लगाते हैं, और इंद्रियों को, लगाते हैं, क्यों कि-सवाप्राणियों के मन बुद्धि की वृत्तियों को जाननेवाले, अकेले सृष्टिकर्ती मे, ही इन ब्राह्मणों की मनोवकारादि सामर्थ को रचा है, क्योंकि-रक धन्तर्यामी, परमात्मा की, सदी कीहुई: तुति,परी है। उस पर- मेघर के निमित श्रेष्ठ होम हो ।रिष्ठ दम्बिष्णुर्षिचक्रमे धानिर्दधे पदम्।।1.30 31 समूढमस्य पासुरे स्वाहा ॥ १५॥ इस मंत्र का मेघातिार्थ ऋ,मुगायई और विणण देवता है। फिर घृत का संस्कार कर और ४ चार ग्रहण किएहुए को लेकर दक्षिण हविर्धान के दक्षिण चक्रमार्ग में, सुवर्ण को रखकर शाला द्वार की अग्नि में इस मंत्र से होम करै । मन्नार्थ-(विष्णुः, 'इदम्, १९ शुक्लयजुर्वेदी विषकमे त्रेधा, पदम्:निदधे, अस्य, पांमुरे, समूहम् स्वाहा सर्व व्यापी त्रिविक्रमावतारधारी विष्णाने, इस विश्व को, विभागपूर्वक उल्लंघन किया,पहिला भूमि में दूसरा अन्तरिक्ष में तीसरा द्युलोक में ऐसे तीन प्रकार, पद, रक्खा इस.विष्णु के, पद में, सम्यकप- कार विश्व अन्तर्भूत है, उस परमात्मा को हवि देते हैं ।।...: इस मंत्र में वामनावतार की कथा गर्मित है जिसका प्रमाण नि- रुक्त का.यह वचन है-“यदिदं किञ्च विक्रमते विष्णवेश निधत्ते पदं श्रेधाभावाय पृथिव्यामन्तारिखे दिवातिशाकपूणिः समारोहण विष्णुपदे गयशिरसीत्यार्णनाभः।समूहमस्य पांसुरे प्यायनेऽन्तरिक्षे पदंन दृश्यतोप वापमार्थे स्यात्समूढमस्य पांमुर इव पदं न दृश्यन इति पांसवः पादैः सूयन्त इति वा पंन्नाः शेरतः इति वा पंसनीया भवन्तीति वा" ॥१५॥ रावती धेनुमती हि भूत सूयवसिनी. मवे दश-: स्था । व्यस्कन्ना रोदसी विष्णवे ते दार्थ पृथिवीम- भितो मयूखैः स्वाहा ।। १६:॥... इस कण्डिका के मंत्र का वशिष्ठ ऋणस्व० प्रा०त्रिक छाऔर विष्णु देवता है। श्रावनीय अग्नि के ईशानकोण में रक्षिसं उत्तर शकट (हविर्धान) के दक्षिण चकमार्ग में मुंवर्ण रखकर प्रतिमस्थाता और अध्वर्यु के दियेहुए सुने और स्थाली को लेकर चारवार लिए हुए पृत का इवन करे। मंत्रार्थ-(रोदसी, इरावती, धेनुमती, सूर्य- वसनी, मनवे, दशस्या, भूतम् विष्णो, पते, व्यस्कन्नाः, पृथिवीम् मयूखैः, अमितः, दर्थ स्वाहा) हे घावाप्रथिवी, इस यजमान के कल्याणार्थ भन्नजल बाली, बहुतसी धेनुओं से युक्त, बहुत से उत्सम खाने के पदार्थवाली, ज्ञानी यजमान के लिये, यक्षसाधनों की देने वाली, हो, हे सर्वव्यापी परमात्मन् !,इन स्वर्ग पृथिवी को,स्तंभित किये हो, पृथिवी को, अपने तेजास्वरूप सूर्यचन्द्रादि के द्वारा, सवभोर से,धारण कररहे हो, उन विष्णु को यह आहुति देते हैं ॥ १६ ॥ ठेवश्रुतौ देवेष्वाघोषतम्माची प्रेतमनरल्पयन्तीऊ- ५ अध्याय १४७ ध्य यशन्नयतम्मा जिव्हरतम् । स्वोठमावदतन्देवी दुर्थे आएमी निर्वादिष्टम् जाम्मा निर्वादिष्टम रमेधा , चर्मन् पृथिव्याः ॥ १७॥ इस काण्डका में ४ मन्त्र हैं, ऋपिचारों काबशिष्ठ, छन्द पहिले चौथे का याजुपी पंक्ति, २ रे का निच्यूदापी गायत्री, तीसरे का भुरिगा गा० और देवताचारों का हविर्धान है । शाला के दक्षिण द्वार से लाईहुई पत्नी चारवार लिपहुए होम से शेषघृत को लेकर दोनों अक्ष के धुंरों मे इस मंत्र से लगावे । मंत्रार्य-देिवश्रुती,देवेषु, अघोपतम्) हे अक्षधुरों तुम-देवसमा में मसिद्ध, देवतामों में, स्वर.से.कहो कि-यजमान यज्ञ करता है । शकट के यथास्थान में आने पर यजमान इस मंत्र को पढ़कर पूर्वमुख हो इसकी दृहप से रक्षा करै । मंत्रार्थ-(अध्वरम्, कल्पयन्ती, माची, भेराम्. यवम्, ऊर्ध्वम्, नयराम्, मा-जिह्वरतम्) हे दोनो शकट-यज्ञ को; समर्थकर तेहुएं,पूर्वमुख,जानो। यज्ञ को, ऊर्ध्वलोकवासी देवतांत्रों के समीप, लेजाओ, कुटिल मतहोयो। तीसरे मंत्र से यजमान अक्ष को आधा तकरशन्दकरै । मन्त्रार्थ-(दुर्ये,देवी, स्त्रम्, गोष्ठम्,आवदतम् आयु: मा-निर्वादिष्टम्, गजाम्, मा-निर्वादिष्टम) हे गृहसमान, शकटरूप देवताओं, अपने, गोठ को, संब ओर से कहो, यजमान की मायु को, पशु आदि से रहित मत उच्चारण करो, पुत्रादि प्रजा को, शाप रूप दुर्वाक्य को मत कहो । चौथे मंत्र से उत्तर वेदी के पश्चिम में ३ परिक्रमा होजाने पर दोनों शकट को मध्यफलकाधारस्थ कर के स्थापन कर इस मंत्र से अभिमन्त्रण करै। मंत्रार्थ-(पृथिव्याः, अंत्र, वर्मन्, रमेथाम् ) पृथिवी के, इस देवयजन रूप स्थान में, कीड़ा करो ॥१७॥ विष्णोर्नुकधीर्याणि प्रचोंच यः पार्थिवानि विममेर- जासि। यो अस्कशायदुतर सधस्थै विचक्रमाणवे. घोरुगायो विष्णवे त्वा ॥ १८ ॥ इस करिका में २ मंत्र हैं, 'दोनो का औतथ्य दीर्घतमा ऋ०, - १४८ शुक्लयजुर्वेद। छन्दले का स्वरादापी त्रि०,२:रे की यजु और देवता दोनो काविष्णु है। प्रध्वयु दोंनो हविर्धान को उत्तर और से परिकपण कर दक्षिण हविर्धान को इस मंत्र से सम्भ पर खडा करै। मंत्रार्थ- (विष्णोनुकम्, वीर्याणि, प्रबोंचम, यः, पार्थिवानि रजांसि,विम मे, यः, धा, विचक्रमाणः. उरुगायः, उत्तरम्, सधस्थम्, अस्क भायत) सर्वव्यापी विष्णुभगंवान् के किनर कर्मों को, कहूँ, अर्थात् परमात्मा की क्या स्तुति करूं उनकी महिमा असीम है, जिस परमात्मा ने, भूमि अन्तरिक्ष स्वर्गसम्बन्धी ज्योतिषियों को, रचा है, जो परमात्मा, तीन लोक में अग्नि वायु-सूर्यरूप से तीन पदधारण करताहुआ,महात्माओं से गायागया है,ऊपरके देवता ओं के स्थानरूप धुलोक कोस्तम्भित किया है। दूसरे मंत्र संअग्नि कोण में स्थूण गाहै। मंत्रार्थ-(विष्णवे, वो)हे स्थूणकाष्ठ,विष्ण देव की प्रसन्नता के लिए, तुझको गाढ़ता हूँ॥१॥ दियो वा विष्णं उतवां पृथिव्या महो वा विष्ण उरो रन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पुणस्वाप्रयच्छ दक्षिणादोत सव्याद्विष्णवे त्वाः॥ १९ ॥ इस कविष्टका के मंत्र का पौत दीप० ऋ०, नित्यदापी जग और विष्णुदेवता है । इस मंत्र से प्रतिमस्थाता उत्तर शकटको खड़ा करता हुआ भूमि में पूर्ववत् स्तम्भको खननकर गाहै । मंत्रार्थ (विष्णो, विष्णो, दिवः, वा, पृथिव्याः, उत्त' चा, महः उरो, अन्तरिक्षात्, वा, वमुना, उभा, हि, हस्ता, पूणस्व, दक्षिणाव, उत, सध्यात्, प्रामयच्छ, विष्णवे, त्या) हे सर्वव्यापिन्, परमात्मन्, स्वर्गलोक से, वा, पृथिवीलोक से, भी; और, बड़े, विस्तीर्ण, अन्स- रिस से, भी, धन से,दोनो, ही,हाथ, पूर्णकरो,तब धन पूर्ण-ददिने, वा, वामहस्तसे, अनेक प्रकार के धनरत्र हमको दो,हे.काष्ठस्तम्भ, विष्णुदेव की प्रीति के लिए, तुझको गाढ़ता हूँ॥१९॥ प्रतद्विष्णुंस्तवते वीर्येण मृगो न-भीमः कुचरो गिरि- .याः । यस्योरप त्रिषु विक्रमणीष्वधिक्षिपन्ति भुर्व... 0' . " + - C ५ अध्याय नमानि विश्वा॥ २० ॥m.r: ini) इस मंत्रका औल्दी ऋ०, विरात्रि छन्द और विष्णुदेवता है। मध्यम छदी को स्पर्शकर इस मन्त्र को पढ़े। मन्त्रार्थ--सत् भीमः, मुचर) मंगः-न, गिरिष्ठाः, विष्णुःघीण, मस्तवते, यस्य, उरुपु, त्रिपु, विक्रमणेपु, विश्वा, भुवनानि, धिक्षियन्तिः) वह, जिससे चराचर भयमानते हैं, सिंहकी-समान, पृथिवीपर मत्स्यादिरूप से विचरनेवाला, देह में अन्तर्यामीरूप से स्थित, सर्व व्यापी परमा- स्मा, अमुरंबंध तथा भक्त और धर्मकी रक्षाम्प पराक्रम से, सुति को मातहोता है, जिस परमात्मा के,महान् ,तीन, पदिमक्षेपण स्थान सीनी लोकों में सब, लोक, निवास करते हैं । २० विष्णोरामसि विष्णोरम्नास्थो विष्णोःस्यूरसि विष्णोधवोसि । वैष्णवमसिं विष्णेचे त्वा ।। २१॥ । इस कण्डिका में ५ मन्त्र हैं,ऋषि चारों का औ०दी०,चन्द श्ले की, पाजु उ०२।३।४ का दै० पंक्ति, ५.वेंका याजु० रद्द।। देवता चारों का विष्णु है । दोनो हविर्धान शकट को दक्षिणोत्तर स्थापन करके उनके ढकने को मण्डप बनावै और विष्णुदेवता होने से मण्डप को भी विष्णु कहते हैं और विष्णु के संव-अवयव होने से जैसे ललाट उच्च अवयव है उसी मकार हविर्धान मण्डप के पूर्व द्वारवर्ती स्तम्म के मध्य में एक कुंशों की माला गूंथीजाती है उस माला' वा उसके बन्धनाधार तिरछे बाँसको सम्बोधन करते हैं उसका मंत्र । मन्त्रार्थ-(विष्णोः, रंराटम, असि) हेदर्भ- मालाधार वंश तुम-यज्ञम्प विष्णु के ललाट स्थानीय,हो । दसरे मंत्र से उच्छाई ललाट के प्रान्तों को स्पर्श करे। मन्त्रार्थ-(विष्णोः, भने स्थः) हे ललाट के प्रान्त तुम दोनो-यज्ञरूप विष्णु के, ओं- सन्धिरूप हो। तीसरे मंत्र से अध्वर्यु सूर में सुखली पिरोकर उस से रराटी के चारों धूण द्वारशाखाओं की सीवे। मन्त्रार्थ-(विष्णोः स्यू:, असि)हे बृहत्सूची तुम यज्ञीयमण्डप की सूची, हो। चौथे मंत्र से सीवन के प्रारम्भ में रस्सी की जड़ में गाँठदेय । मन्त्रार्थ- १५० शुल्लयजुर्वेद। (विष्णोः, ध्रुवः, असि) हे ग्रन्थि तुम-रङ्गीय विप्रारूप मण्डप की; अतिद ग्रन्थि, हो । पाँचवें मंत्रसे पूर्वान' वाँसों के मण्डपको बनाकर स्पर्श करै मन्त्रार्थ-(वैष्णवम्, मसि, विष्णवे, त्वा) हविर्धान तुम-विषाणु सम्बन्धी, हो, इस कारण विष्णु की प्रीति के अर्थ, तुझको स्पर्श करता हूँ ॥ २१ ॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवैश्विनौ हुभ्याम्पूष्णो हस्ती भ्याम् । आददे नायसीदमहछ रक्षेसां रससां ग्रीवा अपि कृन्तामि बृहन्नसि वृहद्भवा वृहतीमिन्द्राय वाच :वद् ॥२२॥ इस कण्डिका में ४ मंत्र हैं, चारों का .औ० दीर्घ १०, छंद १ ले का माजा. वृह०,२ रे का याजु० गायरे का भामु० उणिक, ये का भाषीपक्ति । देवता पहिले और दूसरे का मनि, का रसोन और.४ थेका उपरख है। लेमंत्र से काठका कुदाल सेकर य्पवाटकी समान चार गढ़ोंका चिन्द करे। मन्त्रार्थ-(सबिवः देवस्या मसवे अचिनो, याहुभ्याम्. पूणः हस्ताभ्याम्, त्वामा ददें ) हे अभ्रि-सविता, देवता की, प्रेरणा होनेपर, अश्विनीकुमार की, वाहुमावको माप्त अपनी भुजाओं से पूपादेवता के, हस्तमाष को प्राप्त अपने हाथों से, तुझको, उपरवकार्य में ग्रहण करता हूँ। इस प्राधि को खननोन्मुख करके दूसरे मंत्र से मुष्टि करै ।मंत्रार्थ (नारी, असि) हे अभ्रि तुम हमारा उपकार करनेवाली हो । तीसरा मंत्र पढ़कर अभ्रिद्वारा अग्निकोण आदि.चारों कोनों में चार गदहें खोदने को:मादेश भर गोल आकार में कुरेदै । मंत्रार्थ- (दिम, श्रम, रससामग्रीवा, अपि, कुन्तामि) यह मैं अध्वर्यु यविनाशक राक्षसों की, गर्दनों को, भी, काटता हूँ । चौथे मंत्र से परकाण्डका के प्रथम मंत्रसक चारों ओर लिखनेके अनुसार वाहु भर के चार गड़हे खोदै.। मंत्रार्थ-गृहन्ः वृहद्रवाः, असि इन्द्राय, बृहनीम्, चाचम, बद) हे घोरतर शब्दकारी उपरव-नुम-महान, महाशब्द करते, हो, इन्ददेवता की प्रीति के लिए, ऐसी उचध्वनि . - .
५ अध्याय । - न वाली, वाणी को, वोलो ॥२२॥ पक्षोहण वलगहनं वैष्णवीमिदमहन्तं बलगमुत्किरामिः । • यम्मे निष्टयो यममात्यो निखानेदमहन्तं बलगमु.,. किरामि यम्मे समानो यमसमानो निचखानेदमहन्त । चलगमुकिरामि यम्में सवन्धुर्यमसंवन्धुर्निचखानेद- .. महन्तं बलगमुत्किरामि यम्मे सजातोयमसजातो.नि... चखानोत्कृत्याविरामि ॥ २३ ॥....! इस काण्डका में ५ मंत्र है, पाँचों का औत० दी० ऋ०, छद- 'रले का.निच्यू० गाय०, २।३।४ थे का भुरि गाय०, ५ये का यायुपीगा देवता सबका लिसोक्त है। पूर्व मंत्र का शेप-(रक्ष- हणम्। बलगहनम् वैष्णवीम् ) राक्षसवीषयक,कत्यांनाशक, और यज्ञरक्षक विष्णु से सम्बन्ध रखनेवाला है. यह इन्द्र से कहो । १ले मंत्र से अग्निकोण के गढ़े में से मट्टी निकाले।मन्त्रार्थ-(निष्टया, यम्, अमात्यः, यम्, मे, निचखान, अहम्, तम्, इदम्, बलगम्। उत्किरामि ) अत्यन्त संघातरूप से वर्चमान चाण्डाल आदि या शरीर के सम्बन्धी प्रांदि ने, जिसका, घर के कृत्यज्ञाता सम्म- तिदावा ने, जिसका, मेरे अनिष्ट के लिये, मयोग किया,मैं उस इस, अभिचार को, दूर करता हूँ। दूसरे मंत्र से नैऋत्यकोण के गढ़हे से मट्टी निकालकर फेंकै। मंत्राथ-(समाना, यम्, असमानः, यम्, मे, निचखान, अहम्, तम्, इदम, वलगम्, उत्किरामि) धनकुल आदि समान ने, जिस कृत्यको, सथा जिसको, धनकुल आदि में न्यून वा.अधिकने मेरे वधके निमिचे, प्रयोग किया है, मैं, उस, इस, कत्या को, उत्खारा सहित निकालकर फेंकता हूँ। तीसरे मंत्र से वायुकोण की मृत्तिका निकाले। मंत्रार्थ-(सबन्धुः, यम्, असबन्धुः, यम्, मे, निचखान, अहम्, तम्, इदम्, बलगम, उकिरामि.) मातुलादि समान, कुलवाले ने, जिसकृत्या को, राथा असम्बन्धीने, जिसको, मेरे निमित्त, प्रयोग किया, मैं, उस, इस करयाको, दूर फेंकता है। ये मंत्र से ईशानकोण के अ- .
५ अध्याय। . ऋषि सब का औतथ्य दीर्घतमा है। छन्द ४ का प्रासुरी उष्णिक, ५का याजुपी जगती, ६ का याजुपी. पंक्ति और ७ का देवीन. गती है । देवता ४।५१.६ का यव, ७ का श्रौदुम्बरी, १९का पितर है । २२ वी कण्डिका में प्रथम ३ मंत्रों का विनियोग भोर ग्याल्या होचुकी है। चौथे मंत्र से इस गरी के चारों ओर जल बिहककर गीली भूमि में जो योवै। मंत्रार्थ-(यवः, मसि. देषः, . मस्मन्, यवय,भराती:, यवय ) हे शस्य ! तुम यवहो, हमारे, शत्रु मा दुर्भाग्य को हमसे दूर करो, हमारे वैरियों को, दूर करो। ५मंत्र से गलड़ की शाखा के अंग्र, मध्य और मूल में, जलपान में जोडालकर मोक्षण करें। मंत्रार्थ-(देवि, त्या, अन्तरिक्षाय, • त्वा, पृषिय, त्वा)हे मूलट की शाखा के अग्रभाग !शुलोक की प्रीति के अर्थ, सुझको मोक्षरण करता हूं, हे मध्यभाग! अन्तरिक्ष की प्रीति के अर्थ, सुझको मोक्षण करता हूँ, हेमलभाग ! पृपिवी की मीति के भर्य. तुझको मोक्षण करता हूँ। दढे मंत्र से बचेहुए- मल को उस गर्न में डाले । मंत्रार्थ-(पिपदनाः, लोकाः,शु. चन्ताम् ) पितरों के निवासस्थान, लोक, शुद्धहों। वे मंत्र से गर्ष के चारों मोर उत्तराय कुशा विछाव । मंत्रार्थ-(पितृपदनम् भसि) हे कुशाभों ! तुम पितरों के बैठने का भासन, हो ।२६।। सरिवठस्तभानान्तरिक्षम्पृण दृहस्व पृथिव्यान्यु. तानस्त्या मारतोमिनोतुमित्रावरुणीध्रुवेण धर्मणा। ग्रह्मबनिस्त्वाक्षवनिरायस्पोपचनि पहामिब्रह्म रह क्षत्रं दृश्हायुदरह प्रजान्द५ह ॥ २७ ॥ इसकण्डिका में मंत्र हैं, ऋपि चोरों का मौतथ्य दीर्घतमा। छन्द पहिल का भुरिक प्राजापत्यानुाप, दूसरे का भाष्युणिक, तीसरे का रिक्साम्नीबदसी और चाय को भारी गायत्री है। देवसा चारों का मौदुम्बरी है। प्रथम मंत्र से भौदुम्बरी को खदा करें । मंत्रार्थ-(दिनम्, उत्तभान, भनारितम्, पृण, पृथिवीम्, पादास)ो भौटुम्बरी देवतां ! पुलोक को, ताम्भम करो। .
, . , , शुक्लयजुर्वेद। अन्तरिक्ष को, परित करो । पृथिवी को, दृढ करो । दूसरे मन से मूलट की शाखा को गढे में डाले । मंत्रार्थ-(मित्रावरुणो, पुतानः, मारुतः, ध्रुवण, धर्मणा, स्वामिनोनु ) हे गूलरकी शाखे मिनावरण नामक दोनों देवता, दीप्तिमान, वायुदेवता, स्थिर, धर्म से, तुझको, गढे में हालै । तीसरे मंत्र से यूप की समान मट्टी डालकर जल से पूरित करै । मनार्थ-( ब्रह्मवाने, क्षत्रवान, रायस्पोपवनि, त्वा, पर्यहामि) हे गूलर की शाखे ! यात्मणों से सेवनीय, क्षत्रियों से सेवनीय, धनपुष्टि के लिये सेवनीय । तुझ को, इस गढे में मट्टी डालकर दृढ करता हूँ । चौथे मंत्र से अध्वर्यु उस मट्टी से भरेहुए गढे को मैत्रावरुण दण्ड से कुटै भौर मट्टी को गढ़े में डाले । मंत्रार्थ-(ब्रह्म, इंह । क्षत्रम्, टुंह । श्रायुः,देह।। मजाम् ई) हे शाखा ! ब्राह्मणजातिको,दृढ कर।क्षत्रियजातिको; दृढकर । जीवन को दृढकर । पुत्र आदि मजा को दृढ कर ।। २७ ।। ध्रुवासि ध्रुवोऽयं यजमानोस्मिन्नायतने मजया पशुभिर्भूयात् । घुतेन द्यावापृथिवी पूर्यामिन्द्र- स्य छदिरसि विश्वजनस्य छाया ॥ २८ ॥ इस काऐडका में ३ मंत्र हैं। ऋपि तीनों का श्रौतथ्यदी०,छन्द- १ ले का निदापी गायत्री, २ रे का याजुपी त्रिग्रुप और ३ रेका साम्न्युष्णिक है ।देवता-ले का औदुम्बरी, २रेका घावापृथिवी और ३ रे का इन्द्र है। ' ले मंत्र को पढ़कर औदुम्बरी को स्पर्श करै । मंत्रार्थ-(ध्रुवा, असि । भयम्, यजमानः, अस्मिन् , पाय- तने; मजया, पशुभिः, ध्रुवः, भूयात् ) हे शाखा! तू स्थिर है। यह, यजमान, इस, अपने स्थान में, सनगान सहित, पशुओं सहित, स्थिर, हो । दूसरे मंत्र से अध्वर्यु प्रौदुम्बरी के, जहाँ से दोशाखा उत्पन्न हुई हो उस प्रदेश में मुवे से घृत का होम करै । मंत्रार्थ-(प्रतेन, यावापृथिवी, पूर्येथाम् ) होमेहुए घृत से, पृथिवी और स्वर्ग, परित हो । तीसरे मंत्र से प्रौदुम्बरी को गाड़कर सदः नाम मण्डप को बनाकर उसको छाने के लिये तृणों की चटाई को लगावै । मंत्रार्थ .
. , १५ अध्याय । (इन्द्रस्य, बदिः, विश्वजनस्प, छाया, मास) हे तण की चटाई तू. ऐश्वर्यवान् यनमान के, इसमण्डप को छानेवाली, सरजनों की छायारूप, हो ।। १८॥ परित्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः ।। बुद्धायुमनुवृदयो जुष्टो भवन्तु जुष्टयः ॥ २९ ॥ इस का मधुच्छन्दा ऋपि, अनुष्टुप् छन्द और इन्द्र देवता है। इस मंत्र से छाने के परिवारकों से छतको चारों ओर से आच्छादन करे। मंत्रार्थ-(गिर्वणः, इमाः, अनुवृद्धयः, गिरः, त्वा, विश्वतः, परिभवन्तु । दायुम्, जुष्टयः,जुष्टाः, भवन्तु ) हे स्तुतियोग्य सभा के अधिष्ठात्री इन्द्रदेव !, यह, सवनक्रम से वृदियुक्त, स्तोत्र शास्त्र रूप वाणी, तुमको, सब भोर से,ग्रहण करो,बड़े अन्नवान् तुमको हमारी सेवा, मिय, हों ॥ २९ ।। इन्नस्यस्परसीन्द्रस्य ध्रुवोसि।ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि ३० इस कण्डिका में ४ मंत्र हैं । ऋषि-४ रों का मधुच्छन्दा । छन्द-१।२।। का याजुपी गायत्री और ३ रे का दैवी बहती है देवता १।२।३ का इन्द्र और ४ थे का विश्वेदेवा है। १ले मंत्र को पढ़कर पूर्व द्वार के दक्षिण स्थूण मादि के पदाक्षिण कम से चारों दायों का परिपीवण करै अर्थात् रस्सी को मिलाये। मंत्रार्य- (इन्द्रस्प,स्य,असि) हे रस्सो त सभा के अधिष्ठात्री इन्द्रदेवता के सम्बन्ध की, सीवन, है। दूसरे मंत्र से गाँठ देय । मंत्रार्थ-(इ- दस्य, ध्रुवः, भसि) हे गाँठ त् इन्द्र के सम्बन्धवाली, स्थिर, रेमंड से सभा को सम्बोधन करै । मंत्रार्थ-(ऐन्द्रम, असि) हे समात् इन्द्रदेवता की प्रसन्नता के लिये निर्मित, है । ४ थे मंत्र सहविर्षान मण्डप के वायव्य कोण के उत्तरभाग में आग्नीध्र मामक भग्निस्थान बनाकर उसको स्पर्श करै । मंषि (वैश्वदे- बम् मसि) हेभाग्नध्रि तुम सब देवताओं के आवाहनस्थान,हो।' विभूरसि मुवाहणी वन्हिरसि हव्यवाहनः । वायोमि प्रचैतास्तुधोसि विश्वर्षेदाः ॥ ३१ ॥ ..
शुक्लयजुर्वेद । इस काण्डका में ४ मंत्र है । ऋषि-सबका मधुच्छन्दा। छन्द- १ ले का प्राजापत्या गायत्री, दूसरे सिरेका याजुपी गायत्री और पौषे का देवी जगती है। देवता चारों का अग्नि है, अध्वर्यु उत्तरमुख बैठकर भाग्नियों की प्राश्रय छोटी वेदीप विषग्यों को मट्टी से बनावै, उस में पाहिले श्राग्नीध की वेदी को प्रथम मंत्र पढ़कर सम्हाले । मंत्रार्थ-(विभः, प्रवाहणः, असि) हे भाग्नीधीय धि- एय के भग्नि तुम नानारूपधारक; हवि के पहुँचानेवाले, हो । तदनन्तर पश्चिममुख अवयु पूर्व में सद के द्वार को, उसके उत्तर में होता के धिष्ण्य को दूसरे मंत्र से सम्हाले । मंत्रार्थ-(वन्हिा, हव्यवाहनः, असि.) हे होवृधिष्ण्य के अग्नि तुम यज्ञकर्म के निर्वा हक, देवताओं को हव्य प्राप्त करानेवाले, हो फिर उत्तरमुख अध्वर्यु औदम्बरी के अग्निकोण और होधिष्ण्य के दक्षिण में मैत्रावरुण के धिण्य को तीसरे मंत्र से सम्हाले । मंत्राये-(श्वात्रः प्रचेताः, असि ) हे मैत्रावरुण धिप्राय के अग्नितुम शीघ्रगामीमित्ररूप,श्रेष्ठ ज्ञानवाले वरुणरूप हो। होधिएय के उत्तर ब्राह्मणाच्छंसि,पोता, नेष्टा, भच्छावाक् चारों ऋत्वजों के घिएयों को समानान्तर चौथे मंत्र से सम्हाले । मंत्रा-(तुथः, विश्ववेदाः, मासे) हे ब्राह्मणा- च्छसि धिष्ण्य के अग्नितुम ब्रह्मरूप अथवा देवताओं में दक्षिणा विभाग करनेवाले, सर्वज्ञ, हो॥३१॥ एशिगसि कविरंघारिरस बम्भारिरवस्यूरसि दुर्वस्वान्छन्भ्यूरंसि माज़ीलीय: सम्राईसि कुशा . k:परिपयोसि पर्वमानो नभौसि मतक्या मृष्टोसि. हव्यसूदन तामासि स्वज्योतिः ॥ ३२॥ : इस करिडका में ९ मंत्र हैं। ऋपि-सबका मधुच्छन्दा, छन्द-१ । ६१७का याजुपी गायत्री, २।३।४।८।९वेंका याजुप्यनुहुए और एका याजुष्युनिष्क है । देवता-१।२।३।४का अग्नि, ५ का माहवनीय, ६ ठेका वहिप्परमान, ७ वेंका चत्वाल, वेंका शामित्र और ९ ३ का प्रौदुम्बरि है । ब्राह्मणाच्छसि धिष्एय " .
५ अध्याय। के कुछ उत्तर में पोवृधिष्ण्य वनाकर उसपर अधिष्ठित अग्नि का मथम मंत्र से नामकरण करै । मंत्रार्थ (उशिन, कविः, असि) हे योवृधिष्एमाग्ने ! तुम कमनीय, भौर क्रान्तदर्शी होने से कविनाम वाले, हो । पोवृधिप्एय के कुछ दूर नेमृधिष्ण्य बनाकरउसपर अधि- ष्ठिस अग्नि का दूसरे मंत्र से नामकरण करै। मंत्रार्थ-(भंघारिः, वम्भारिः, असि) हे नेपृधिष्ण्य के भग्नि ! तुम पापनाशक होने से अंधारि, पोपक होने से वंभारि, हो । ३ रे मंत्र से नेष्टधिष्ण्य के कुछ दूर मण्डप के मध्यगत माग्नीध्र से कुछ दक्षिण में भच्या- वाक् धिष्ण्य बनाकर उसपर स्थित अग्नि का नामकरण करे। मंत्रार्थ-(अवस्य:, दुवस्वान्, असि) हे भच्छावाक् धिष्ण्य के अग्नि तुम अन्न चाहनेवाले, हविष्मान हो । चौथे मंत्र से मार्जा- नीयधिपाय बनाकर उसपर अधिष्ठित अग्नि का नामकरण करे। मंत्रार्थ-(शुन्थ्यः,माजीलीयः,मसि) हे मार्जालीय धिप्पय के मनि तुम पवित्र करनेवाले,मार्जन करनेवाले हो।श्वे मंत्रसे सभामण्डप के पूर्वभाग की उत्तरवेदी में स्थित आहवनीय अग्नि का मामकरण करे मंत्रार्थ-(सम्राट्,कशानुः, मसि)हे उत्तरवेदी के प्राइवनीय अग्ने सुम बहुतमकार की आहुति धारण करने से भलेमकार शोभाय- मान, और पयोव्रत श्रादि से कृश यजमान के अनुगामी, हो।६४ मंत्र से पश्चिम में ऐष्टिक वेदी के उत्तर वहिप्पवमान धिष्ण्य वना कर उसका नामकरण करें। मंत्रार्थ-(परिपद्यः, पवमानः, असि) हे वहिप्पवमान देश तुम स्तुतिकारक ऋत्विजों की सभा के योग्य और पवित्र करनेवाले, हो । ७ वे मंत्र से सभामण्डप के पूर्वद्वार मॅचत्वाल का नामकरण करें। मंत्रार्थ-नमः, मतक्षा, असि.) हे चत्वाल तुम छिद्रयुक्त होने से ग्राकाशस्वरूप, और विनों के प्रदक्षिण चलने से पाका नामवाले, हो । ८ व मंत्र से चत्वाल के दक्षिण में शामित्रधिष्ण्य का नामकरण करें । मंत्रार्थ-(मृणः, हव्यसूदनः, असि) हे शामित्रनुम पवित्र, और हविपाक के कारण, पर मंत्र से सदोमण्डप के मध्य पश्चिम प्रान्त की औदुम्बरी . , .
शुक्लयजुर्वेद । का नामकरण करै। मंत्रार्थ-(धामा, स्वज्योतिः, असि ) हे श्रौदुम्बरि तुम उद्गाता की प्रधान कार्यस्थान, और स्वर्गमकाशक,हो। . समद्रोसि विश्वव्यचा अजोस्थेकपादारसि चु- धन्यो वागस्यैन्द्रमसि सदोस्पृतस्य दाग मा मा सन्ताप्तम नामध्वपते ममातिरस्वस्ति मे. स्मिन् पथि देवयाने भूयात् ॥ ३३ ॥ इस काण्डका में ६ मंत्र हैं। पि सब का मधुच्छन्दा, छन्द १ ले का माजा० . गाय०, २॥ ३ कादै० पंक्ति, ४ का याजुपोवृ० ५ वे का याजुपी• प०, ६ ठे का निच्युदापांगा है,देवता १ ले का ब्रह्मासन, २ रे का अग्नि,३ रेका गार्हपत्याग्नि, ४ थे का सदः, ५ का द्वार्यशाखे, ६ ठे का सूर्य है १ । २ । ३ मंत्र से सदोमण्डप के पूर्वद्वार के पूर्वभाग में स्थित होता,यस्मासन शालाद्वार और मान- हित को देख मंत्राय- (१ समुद्रः, विश्वव्यचाः, असि )हे ब्रह्मासन तुम सब देवताओं के सम्मुख माने के स्थान अथवा समुद्र तुल्य ज्ञान से गम्भीर ब्रह्मा के आसन, यज्ञ में कृत अकृत देखने के स्थान हो । ( २ अजः, एकपाद, असि ),हे शालादार के अग्ने तुम आह- वनीय रूप से यझ में जानेवाले वा अजन्मा, अद्वितीय रक्षक वा सव पाणी मिस के एक चरण में हैं ऐसे, हो । ( ३ अहिः, युध्न्यः असि) हे माजहितनाम गाईपत्य अग्ने ! तुम शालाद्वार के नए गाईपत्य के उत्पन्न होने परभी अक्षयरूप, और भाधानकाल में प्रथम स्थापित होने के कारण मूलरूप, हो । ४ थे मंत्र से सदोम- भय का मानन करें। मंत्रार्थ-(४ वाक्, मसि । ऐन्दर, मसि, सदः, मसि) हे सभामण्डप तुम अपने मध्यवान से कर्म होने के कारण वाणीरूप, हो, इन्द्र को देवता रखनेवाले, हो । बैठने के स्थान, हो । ६ वे मंस से द्वार के दोनों मोर स्थापित केले के खभ.भादि का.मार्जन करै । मंत्रार्थ (५ ऋतस्य, दारी,.मा, मा सन्ताप्तम् ) हे यज्ञ के द्वार के शाखाओं तुम, मुझ को, मत सन्तप्त करो। ६ठे मंत्र से यजमान देवयानमार्ग के. ।
५ अध्याय। . संस्कार के लिये सूर्य का अभिमंत्रण करै । मंत्रार्थ-(६ अध्वपते, अध्वनाम्, मा, मतिर । मास्मिन्. देवयाने, पथि, मे, स्वस्ति भूया) हे मार्ग के रक्षक सूर्य, मार्गों में वर्तमान, मुझको बदामो। इस, देवयान, मार्ग में, मेरा, कल्याण, हो ॥ ३३ ॥ मित्रस्यमाचक्षुषेक्षध्वमग्नयःसर्गराःसगरास्थ सगरेण नाम्ना रौद्रेणान केन पातमाग्नयः पिपत.. , मानयो गोपायतमा नमो वोस्तुमा मा हिसिष्ट ३१ इस कण्डिका में २ मंत्र हैं। ऋषिदोनों का मधु०, छन्द -१ ले का याजुषीइती और २रेका निष्पहाझी अनु० है । देवता से का ऋत्विज और दूसरे का धिएय है। १ ले मंत्र से यजमान सब प्रविजों का भभिमन्नण करै। मंत्राथ-( मित्रस्य, चापा, मा, ईक्षध्वम् ). ऋत्विों ! मित्र को, दृष्टि से, मुझको, देखो। दूसरे मंत्र से मध्वर्यु भागे धिप्पयों को देखता हुआ मार्थना करै । ममार्थ (सगराः, अग्नयः, सगरण, नाम्ना, सगराः, स्थ । अग्नयः, शैद्रेण भनीकेन, मा, पातम् । अग्नयः, मा, पिपृत । मा, गो पायत । वा, नमः, अस्तु। मा,मा.हिसिष्ट) हे स्तुतियुक्त,धियों की अग्नियों ! स्तुतियुक्त नामधिप्पय ते स्तुति कीहुई, हो। हे भग्नियों ! उग्र. सेना वा मुख से मुझको, रक्षा करो। हे अग्नियों,मुझको, धनादि से, पूर्ण करो। मुझको रक्षा करो । तुम्हारे अर्थ, मणाम हो। मुझकोमत मारना अर्थात् यज्ञ में कोई विघ्न न हो ॥ ३४॥ ज्योतिरसि विश्वरूप विश्वपांघानाठसमित् । त्वर सौम तकृयो डेपोभ्योन्यकृतेभ्य उरु यन्तामि वरभट स्वाहाँ । जुषाणो अप्तुराज्यस्य वेनुस्वाहा॥३५॥ इस काण्डका में ३ मंत्र हैं। ऋषि-रले का मधु०,२१३ काभृणु मुस ऋतु । छन्द-रले का साम्नी मनुष्एए,२ का भनवसानागाय०, अरे का एकपदा चिराट् है। देवता ले का विश्वेदेवा, २३ का सोम।लेभप से धुबे में से ५वार दधि मिला पृषदाय लेयामनार्थ- (विश्वकपम्, ज्योतिः, भसि । विश्वेषाम, देवानाम्, समित्) हे - ५ अध्याय। . आज्य ! तुमरूप देने से विश्व के ग और दीप्ति देने से ज्योति, हो । सब देवताओं के, प्रकाशक हो । २ मंत्र से प्रज्वलित समिधा के ऊपर एकवार लियेहुर घी का जुह से होम करें। मंत्रार्थ-(सोम, त्वम्, अन्यकोभ्यः, देपोभ्यः, रानूरुद्भ्यः यन्ता,उरु, वरूथम्, प्रास चाहा) हे सोम ! तुम हमारे विरोधियों से मेरित, शत्रुओं और शरीरछेदक राक्षसों के लिये, दण्डदाता, और बढे वलरूप, हो, ऐसे के निमित्त यह होम हो । ३ मंत्र से फिर भी जुहम एकवार लियेहुए घृतको मदीस समिधा पर माहुति देय । मंमार्थ-(जुपाण: अप्वः, माज्यस्य, वेवु, स्वाहा ) मसन सोम, मेरे दियेहुए घृत का, पान करो, हमारी दीहुई आहुति सुन्दररूप से ग्रहण कीजाय ।। अग्ने नय सुपो गये अस्मान्विश्वानि देव वयु नानि विद्वान् । गुयोध्यस्मर्जुहगणमेनो झूर्यि- . ठान्ते नम उक्ति विधेम ॥ ३६ ॥ इसका अगस्त्य ऋ०, मिठबन्द और अग्नि देवता है । इस मंग को पढ़शाहुपा अध्वर्यु प्राग्नीध्र के समीपं जाने को प्रवृत्त होनेपर यजमान से कह । मंत्राध-(अग्ने, देव विश्वानि, वयुनानि,विज्ञान अस्मान, राये, मुपथा, नय । अस्मत्, जुहुराणम् एनः, युयोधि, ते, 'भूयिष्ठाम्, नम उक्तिम्, विषम ) हे अग्नि, देव, सव, ज्ञानों को जानने वाले सुम, हमको, धन और यज्ञफल के लिये, श्रेष्ठमार्ग से मात करो। हमारी, इच्छित क्रिया के प्रतिवन्धक, पाप को ,दर करो ! तुम्हारे अर्थ, बहुस, नमस्कार वचन को, हम उच्चारण करते हैं ।। ३६ ॥ अपन्नों अग्निर्वरिवस्कृणोत्वयम्मृधः पुर एंतु प्रभिन्दन् । अयम्बाजाजयतु वाजसाताव: शाञ्जयत जहिपाणः स्वाहा ।। ३७ ॥ .. इसका अगस्त्य ऋ०,प्रा० वि० छन्द और अग्नि देव० है इसको पढ़ताहुआ सब को मण्डप के उत्तर भाग में लेजाकर.. नीधीय धिपण्य में अग्नि को स्थापित कर,मंत्रार्थ-(भयम्, - + . 11 १६२ शुक्लयजुर्वेद। नः, वरिवः, कणोनु) यह, आग्न, हमारे, धनको, करें। (अयम् मृधः, अभिन्दन, पुरः, एतु) यह अग्नि, संग्राम में शत्रुसेनाओं को,छिन्नभिन्न करताहुआ, आगेआ। (अयम् वाजसाती,वामान, जयतु) यह अग्नि,अन्नविभाग करने में अन्नों को, हमैं देने के निमित्त जीते। (जईपाणः, अपम्. जया. स्वाहा) अत्यन्त प्रसन्न होता हुआ, यह अग्नि, शत्रुओं को, जीतो, वह हमारी माहुति को सुन्दर रूप से ग्रहण करें ।। ३७॥ ... उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयर्याय नस्कृधि धृत घृतयोने पिवमर्म यज्ञप॑तिन्तिर स्वाहा ।। २८ ।। । इसका अग० ऋ०, भुरिग प्रा० अनु छन्द, विष्णुदेव है । इस को पड़कर उत्तरवेदी के भाचनीय आग्नकुण्ड में आहुति देय मंत्रार्थ-(विष्णो,उरु, विक्रमस्व ) व्यापक आहवनीय अग्निरूप परमात्मन्, बहुत पराक्रम करो, (क्षयाय, नः, उरू. कृषि) ब्रह्म में निवास के निमित्त, हमको, प्राधेिकता, करो। (घृतयोने, घृतम्, मपिव) हेघृत से बढनेवाले, घृतको,पियो ।(यज्ञपतिम् पासिर,स्वाहा) यजमान को, पढामो, तुमको यह माहुति देते हैं ।। ३८।। देव सवितोपतसोमस्तछ रक्षा मा त्यो भन् एतत्त्वं देव सोम दे॒वो दे॒वाना उपांगा इदम- हम्मनुप्यान महायस्पोषेण स्वाहा निर्वणस्य पाशोन्मुच्ये ।। ३. इस कण्डिका में ३ मंत्र हैं। ऋपि तीनों का भगस्त्य छन्द- काभागाय०,२ का मा०नि०,३ का याजु० त्रि० है । देवता-१ का सनिता का सोम,३ का लिङ्गोक्त है,जुहादि माज्यस्थानीपर्यन्त स्थापन करके, यजमान से सोमलेकर हविधान में प्रवेश करें फिर दक्षिण हविधान में माचर्म विछाकर उसपर सोम रखना हुआ पहिला मंत्र पहै। दूसरे मंत्र से सोम का उपस्थान करीतीसरे मंत्र से हविर्धानमण्डप से निकले । मंगाध-(१ सविता,देव, एप, सोमः, से । तम, सरव । वा, मा, दभन ) ह सब के गेरक दे- 4 -- ५ अध्याय . वता यह सोम आप के अर्पण है । उसको रक्षा करो ।तुम सोम के रसक को कोई उद्रपद प्राप्त न हो ।(२ सोम, देव, देवः देवान, एतत्, उपागाः । इदम,अहम,रायस्पोपेण,सह, मनुष्यान) हे सोमदेव तुम देवता हो, अरा: देवताओं को इस समय मास हो 'जायो। यह मैं यजमान धन और पुष्टि के साथ अपने मनुष्यों, को माप्त हूँ। (३ स्वाहा, वरुणस्य, पाशात्, निर्मुच्ये) सामरूप अन्न देवताओं को पहुँचे, उस सोमदान के प्रभाव से मैं वरूण की पाश से छु, ।। ३९॥ अग्ने व्रतपास्त्त्वे व्रतया यात तुमय्यभूदृपा सात्वयियाममं तनुस्त्वय्यटिय सामयि। गधायथन्नौं तपते तान्यनु मे दीक्षान्दीक्षाप- तिरमस्तानुतपुस्तस्पपतिः ॥ ४० ॥ इस का अगस्त्य ऋ०, नि० प्रा०वि० छन्द और अग्नि दें- चता है, इस मंत्र से माहवनीय में समिध रखकर मदन्ती का स्पर्शकर गाढ़रार मुष्टि मेखला को करै । मंत्रार्थ -(अग्ने, व्रतपाः, स्वे,व्रतपाः,सव,या,तनूः, मयि,अभूत,सा,पपा,त्वयि) हे अग्निदेव ! तुम स्वभाव से सव व्रता रक्षक हो,अतः तुम मेरे व्रत के पालक होमो । आपका जो शरीर मुझ में स्थितहुआषा,सो यह तुम्हारा शरीर तुम्हारा ही हो । (या, उ, मम, तनूः त्वीय, अभूत, सा,इदम्, माय) और जो यह मेरा शरीर तुम में स्थित था, वह यह मेरा शरीर मुझ में स्थित हो । (ब्रगपते, नौ, व्रतानि, यथायथम् ) हे ग्रतके पालक हम तुम दोनों के कर्म सम्बन्ध को न तोहैं। (दी- क्षापतिः, मे, दीक्षाए, अन्वमंस ) दीक्षा के स्वामी तुमने, मेरी दीक्षाको अंगीकार किया है। (सपस्पतिः तपः अनु) उपसद् सप के पालक अग्नि ने,मेरा व्रतपालन उपसदरूप तप स्वीकार किया४० उरु विष्णोविक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि। घुतङ् घृतयोने पिवप्र गुज्ञप॑तिन्तिर स्वाहा ।। ४ ।। सूप काटने के लिये वनको जाताहुभा,सफलता के लिये चार बार . शुक्लयजुचद। मुचे में घी लेकर इस मंत्र से भादवनीय कुण्ड में हवन करें। इस की व्याख्या ३८ वें मंत्र में होचुकी ॥ ४ ॥ अत्यन्या अग्रान्नान्या उपांगामर्याक्त्या परे भ्योविदरोघरभ्यःातन्त्या जुपामहे देववनस्पते देवय॒ज्याय देवास्त्वा देवय॒ज्याय जुपन्तां विष्णं- वेत्या। औपंधे त्रायस्व स्वर्धिते मैनं हि छ सीः ॥४२॥ इस कण्डिका में ४ मंत्र हैं। ऋ० सबका अग०, छन्द.१।२का ३० वा० ४०, ३ का याजु० गा०, ४ का देवीजा है । हुतशेष वृत लेकर तक्षा (बई)के साथ वन में जानेपर १ मंत्र से यप के योग्य एकक्षको पूर्वाभिमुख हो भभिमर्शन वा भभिमन्नण करे। २मंत्र से सुचे में जो हुतशेप घी हो उससे वृक्ष को स्पर्श करे । ३ मंत्र से कुशतरुण को रखकर उसके ऊपर कुठार का प्रहार कर । ४ मंत्र से यूप के योग्य वृक्ष को काटे । ममार्य- भन्यान्, भत्यगाम्, अन्यान्, न, उपागाम् । त्वा, परेभ्यः, भकि, अवरेभ्यः, परः, अविदम्, वनस्पते, देव, देवयज्याय, तम्, स्वा, जुपामहे, देवाः, देवयज्याय, त्वा, जुपरताम) हे आगे वर्तमान यूपक्ष मैं तुमसे अन्य वृक्षों को छोड़कर आया हूँ। यूप के योग्य अन्यों के समापनहीं गया । तुझको दूर के वृक्षों से निकट और निकटों से श्रेष्ठ पाकर आया हूँ । हे वन के पालक देव ! देवयज्ञ के लिये ऐसे तुमको हम सेवन करते हैं । देवताभी देवयजन के कार्य के लिये तुमको सेवन करें। (२ त्वा, विष्णवे)हे यूपक्ष तुमको परमात्मा की मीति के लिये स्पर्श करता हूँ।(३औषधे,त्रायस्व) हे औषध तुम वन्नभय से मेरी रक्षा करो। (४ स्वधिते, एनम्, मा, हिंसीः) हे कुठार इस गूप के अन्य स्थान का मत व्याघात करो॥१२॥ द्याम्मा लेखीरन्तरिक्षम्मा हिंछ सीः पृथिव्यास- म्भव अय हित्वा स्वधितिस्तेतिजानःप्राणि 'नाय महते सौगाय । अतस्त्वन्देय वनस्पते शतवल्यो विरोह सुहसवल्गो विषय रहेम।।४।। - '६ अध्याय। " इस कएिकाम३ मंत्र हैं। पिसवका अगस्त्य है। छन्द का निक साम्नी०, २ का साम्नीत्रि०, ३ का पार्षीकृ० है । देवता तीनों का वृहस्पति है । १ मंत्र से यप के निमित्त कटकर गिरतीहुई शाखा का अभिमन्त्रण करै । २ से उस शाखा के पचे भादि दर कर । से श्राज्याथाली में से एकवार लिये को जुहू में लेकर, काटने के “स्थान में आहुति देय, मंत्रार्थ-(१ घाम,मा,लेखी । अन्तरिक्षम्, मा, हिंसीः । पृथिव्याः, सम्भव ) हे यूप वृक्ष तुम द्युलोक को मत विगाटो । अन्तरिक्ष को पीटा मत दो । पृथिवी के साथ मिलो, अर्थात् तीनों लोकों में शान्ति हो । (२ हि, सेतिजाना, अयम्, स्वधितिः, महरो, सौभगाय, त्वा, प्रणिनाय ) क्योंकि यह भति तीक्ष्ण कुठार, वहाभारी ऐश्चर्य पाने के लिये सुमको यूप बनाता है। ( ३ वनस्पते, देव, अतः, त्यम्, शतवरशः, विरोह । वयम्, संह- स्रवल्शः, विरुहेम) हे वृक्षदेवता इस स्थान से तुम बहुत भड्डरवाले होतेहुए उपनो । हम पुत्रपौत्र आदि बहुरासी शाखा वाले हों॥४३॥ इति सक्यमुर्वेदान्तास पाजसनेयिसहिता का सानुनाद पष्चम भापाय समाप्त. अथ पठोऽध्यायः जिसमें सोम की वेदी प्रधान है ऐसे पञ्चम अध्याय में आतिथ्य से लेकर यूपनिर्माणपर्यंत मन्त्र कहे। अब छठे अध्याय में यूपसंस्कार से लेकर सोमाभिषर उद्योगपर्यन्त मन्त्र कहेजायेंगे-- देवस्प त्वासवितुः सश्विनो हुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम्।आदेनार्यमीदमहरक्षसाङ्ग्रीवा अपिं कृन्तामि । यचौसि यवयास्मद्धेपो यवया रातार्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्या पृथिव्य त्वा शुन्ध- न्ताल्लोकाः पितृपदनाः। पितृपदनमसि ॥१॥ पछि पाँचवें अध्याय की २६ वी काण्डका में इस मंत्र की व्याख्या करचुके हैं। वहाँ लिङ्गशरीर का संस्कार या यहाँ स्यूलशरीर के संस्कार का वर्णन है।
. शुक्लयजुर्वेद । अग्रेणीरंसि स्वावेश उन्नेतृणामेतस्य वित्तादर्षि त्वा स्थास्यति देवस्त्वां सवितामध्वानक्तु सुपि- पुलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः । धामणास्पक्ष आन्त- रिक्षम्मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेणा छ ही ॥२॥ इसक० में ४ मंत्र हैं। सबका साकल्य १०, छन्द-४का नि. गाय०,२ का याजु० प०, ३ का याजु० ०1 देवता ? का शकल २१ ४ का यूप, ३ का चपाल है। १ से यप के गढ़े में पहिले यूप के मूलमाग का खंभ डाले।२ से उसके ऊपर के भाग में प्रत लेप ३से ऊपरघुरा से लिप्त चपाल को यूप के अग्रभाग पर स्थापन करे । ४ से ऊँचा करें । मंगाय-१ उन्नेत्रणाम्, स्वावेशा, अग्रेणी, असि । एतस्य, विचात्, स्वा, अधि, स्थास्यति) हे यूपखण्ट उठाने वाले ऋत्विजों को, हलकी होने से मुख से मवेश करने योग्य अग्रसर हो,तुम इस कर्मकोजानोजो कि-तुम्हारे ऊपर दूसरा और खण्ड स्थापित होगा (२ सनिता, देवः, मध्वा, त्वा, अनक्तु) सव के प्रेरक देव मधुर घृत से तुम को सीचे ( ३ मुपिप्पलाभ्यः, भोप- धीभ्यः, त्या) हे चपाल !शुभफलयुक्त औषधियों के निमित्त तुझ को यूपखण्ड पर स्थापित करता हूँ ( ४ भद्रण, धाम, अस्पृक्षा, मध्येन, अन्तरिक्षम्, पाश्रमाः, उपरेण, पृथ्वीम् भदं ही। ) है यूप तुमने अग्रभाग से गुलोक को स्पर्श किया है, मध्यभाग से अन्तरिक्ष को पूर्ण किया है, अधोभाग से पृथिवा को रद किया ॥२॥ . या ते धामान्युश्ममिगमध्यै यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परम म्पदमवारिधीर।ब्राह्मवनित्वाक्षत्रवर्नि राय स्पोपवनि पहामिब्रह्म छह पुत्रन्दु-हायुदृह प्रजान्दह ॥ ३॥ इस कण्डिका में ३ मंत्र हैं। ऋषि सबका दीर्घत, बन्द-रले का नि०,२ का सामन्यु, ३ का नि• मा०वृः । देवता तीनों । यूप है । १ से गड़े के मध्य में गुपकी जड़ को प्रविष्ट करें। . ।
६ अध्याय । १६७ दृढ़कर ॥ ३॥ २से उस गढ़े को मही से भरे । ३ से भरे हुए गढ़े को चारों भोर दण्टे से कुटे । मंत्रार्थ-(१ या, रो; धामानि, गमध्ये, उश्मास, यन्त्र भूरिशृङ्गाः, गावः, प्रयासः, अत्र, उरुगायस्य, विष्णोः, परमम्, पदम्, पाह,सद सरि, भवभारि) हे यूप ! जो रोरे स्थान परगमन करने को हम कामना करें, जहाँ सूर्यदेवता की प्रति प्रकाशवान् किरणे विस्तृत होती हैं, इस स्थान में महात्माओं से स्तुति किये हुए व्यापक परमात्मा के उत्तम स्थान को कहते हैं,वह बहुरा मकार से मकाश करता है । (प्रमावनि, क्षत्रवनि, रायस्पोपवनि, त्वा, पर्य हामि ) है यूप ! ब्राह्मणों से स्वीकारयोग्य, अभियों से चाहनेयोग्य . धन पुष्टि के निमित्त स्वीकृत तुझपर चारोंभोर से मट्टी डालता है (ब्रह्म, दंह, क्षत्रम्, दंह, श्रायुः, दंह,मनाम् इंड) हे यूप ब्राह्मण जाति को दृढ़कर क्षत्रिय जाति को दृढ़कर, भायु को दृढकर,सन्तान को विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्य: सखा ॥४॥ इस का मेघा तिथिऋ०,मियदा गा० छन्द और विष्णु देवता है।पाध्वर्यु यूप का मध्यभाग यजमान को छुवाकर इस मंत्रको पढवावे मंत्राथ- (विष्णोः कर्माणि पश्यरायसः इन्द्रस्य, युज्यः,सखा, व्र- तानि, पस्पशे) हे ऋत्विजों परमात्मा के, सृष्टि संहार आदि . कर्मों को देखो, क्योंकि वह इन्द्रका अनुरूप मित्र है, उसने लौकिक वैदिक कर्मों को रचा है ।। ४ ।। तद्विष्णोः परमम्पपदछ सो पश्यन्ति सूरयः । दिचीच चक्षुराततम् ॥५॥ इस का मेघा० ऋ०, नि० मा० गा०, छन्द और विष्णु देवता है । मध्वर्यु यजमान को चपाल दिखाताहुआ. यह मंत्र पढ़वाये । मंत्रार्थ-(सूरयः, विष्णोः, सह, पदम, सदा, प- श्यन्ति, दिवि चक्षुः, इब, भानतम् ) वेदान्त के वेत्ता योगी स- वव्यापक परमात्मा के उस.मोल स्वरूप परम पदको सदा देखते .
" शुक्लयजुर्वेद । हैं, गिरावरण आकाश में चक्षु की समान व्याप्त ॥५॥ प्रसिधीरसि परि त्या देचीविंशो व्ययतां पगमं यजमान राघो मनुष्याणाम् । द्विवासनुरस्येपते पृधिव्याल्लोक आंगण्यस्तै पशुः ॥ ६॥ इस क० में ३ मंत्र हैं। सबका दीर्घ ० ३०, छन्द-१ का मा. जा० त्रि०, २ का दै० त्रि०, ३ का साम्न्यु० है । देवता-३ का यूप, २ कास्वरु है । १ मंत्र से तीन लढवाली कुशा की रस्सी बनाकर एप की नाभि में लपेटे । २ सेमग्नि के उत्तरभाग में स्वरू का अवाहन करै ३ से वापट यूप के दक्षिण में बिना छिले १९ यूप स्थापन करै । मंत्रार्थ-( १ परिवीः, असि. देवी:, विश:, त्वा,परिव्ययन्ताम् । मनुष्याणाम् रायः, इमा, यजमानम्,परि) हे यूप तुम चारों ओर रस्सी से येष्टित वा हम से घिरे हो, देवता ओं की मरुगण आदि मजा अथवा पशु तुमको चारों ओर स मेरे, मनुप्य सम्बन्धी धन इस यजमान को चारों ओर से घेरें (२ दिवः, सूनुः, असि ) हे स्वरु ! तुम स्वर्ग के पुत्र हो । भ- चोर गुलोक से नी से वृक्ष, उप से या भोर गूप से स्वरू होगा, इस कारण पुत्र कहा है । (पृथिव्याम, पपः, ते, लोकः, भारययः, पशुः, रो) हे यूप पृथिवी पर यह रोरा आश्रयस्थान है, बनस- म्बन्धी पशु सेराही है ॥ ६॥ अग्निपोमीप पशुपयोग मीमांसादर्शन में बताई हुई परिसंख्याविधि के अनुसार, जो समियासि पाखेट में अत्यन्त मत्त होकर तामसमवृत्ति में को झुकनी चलीजारही है, उसको निवृत्ति माम में लाने के लिये वेद में अग्निपोमीय पशुप्रयोग देखने में आता है । यह भग्नि- पोमीय यश सोमयाग का अङ्गभूत है, इस में पशु का संस्का कियाजाता है । मैत्तिरीय कृष्ण यजुर्वेद काण्ड ६ प्रपाठक १ श्र- नुवाद ९ में लिखा है-"आसोमं यहन्त्यग्निना प्रतिष्ठते तो सम्भवन्ती यजमानमानिसम्भवतः ।यग्निपामीर्य - ६ अध्याय , पशुमालभते, आरमनिष्क्रय एव सः। जिस समग ऋत्विक यज्ञशालामें अनिके पास सोमको लासे हैं उस समय यह किया दीक्षितहमा यममान भाने शरीरको वाकोनमित्त समर्पित मानता है, उससममजोरिनम देषशाके निमित्त पशु दिया जाता है सो मानो यजमान अपने शरीरका पूम्य देतादै,इसमकारके पणुमयोमके द्वारा स्वाभाषिक हिंसा करनेवालोंके कामाचारका संकोच किया अर्धाच राज्यरक्षानिमित्त भार्टआदि करनेपर स्वाभाविक प्रति के अनुसार पशु अत्यन्त मीशिवाला क्षत्रिय पदि स्वच्छ मुख घाई तो इन हिंसामधान कोको सर्वथा वागदेय और यदि एफसीप इन्द्रियों को रोकनेमें असमर्थ होतो उनके रोकनकी शास्त्र में यह युक्ति कही है कि-यक्ष में ही ऐसा कर और वद मी केवल सोमादि में ही और यह भी सनिय ही, इससे यह नहीं समझलेमा कि-- वेद मांसमक्षण के लिये पशुवागकी मात्रा देता है, किन्तु इसका भी एकमकारसे हिंसाके निषेध ही तात्पर्य है, जैसे यदि कोई बालक अत्यन्त खेलकूद में लगादो और खेल में गुपीहुई उसके मनकी प्रवृत्ति यदि एकसाथ नरोकीजासकै, तो कुछ नियम कर दियाजाता है कि-देवालक ! यदिवझसे खेतविना सहाही नहीं: जाता तो अपने पढ़ेहुएको थुदिस्य करलेनेके अनन्तर खेशलिया- कर और वह भी अच्छे सड़कों के साथ तथा घोड़े ही समय, इस प्रकार खेलनेका सशेष करते २.विया और संगति के प्रमावसे वह स्वयं ही खेलको, अमूल्य समय- और भषिप्य जीवनका विनाशक समझकर स्यागदेगा, इसीप्रकार यदि उपकारक शास्त्रमय भनेको मकारकी प्रचियों में भासक्त पुरुषों को धन हानिकारक प्रवृत्तियों से एक साथ निवृत्त करें तो कुछ भी परिणाम न निकलै, इसकारण कुछ नियम लिखकर संकोच किया है। इसमकार जैसे बालकके खेलनेका नियम बाँधनेसे उसकी मासाका तात्पर्य खिलाने में नही होता है, किन्तु खेलनेका स्वभाव मुनाने में होता है । जैसे ही माखेटासक क्षत्रियोंके लिये. १ - शुक्लयजुर्वेद । पशुयाग भादिके नियम, धीरे २ हिंसा में भरच कराकर उस अनर्यकारी स्वभावसे सर्वथा बचाने के लिये हैं। इसीकारण पशुपाण श्रादिका वेदमें विधानसा दीखनेपर मी वास्तवमें वह निवृत्तिमार्गमें ही पहुंचानेका उपाय है, क्योंकि यहांतक संकोच किया कि-यज्ञ करनेवाला भी उसको सूंघकर ही छोडदेय । और सच्चा सुखतो सर्वथा अहिंसा आदि नियमों के पालन में ही है। यह के निमित्त कीहुई हिंसाका भी शान में दुःखरूप फल ही “कहा है। इसकारण पशुयाग श्रादि विषयके वाक्य विधि नहीं, किन्तु अगतिकगति है, कि-शिससे नैष्ठिक ब्रह्मचर्य न होसके वह ऋतुकालमें स्वभार्यागमन करने के लिये घेदविधिसे विवाह करलेय जिसको मांसविना ग सरे घर हुतशेषको स्वीकार करे, और जिस को मंपिना न सर वह यज्ञ करकै विजोक निर्मित महौषधियों के रसका सेवन करें, वास्तवमें सोजहाँसक होसकै सहाँसक मधुरता के साथ इनके त्यागमे ही वेदका तात्पर्य है, वेद यह नहीं कहता कि-सयको ऐसा करना ही चाहिये, इसकारण जो हिंसादियुक्त कमोसे स्वयं निवृत्त है, यह वो यज्ञादि करनेवालोंसे उन्हाकोटिक जीव हैं, उनको ऐसे यज्ञ कर की कोई प्रावश्यकता नहीं है, क्योंकि- इस कर्मकी वेद भी मशंसा नहीं करता, किन्तु २० वी कण्डिका में कहाहै यजमान कहै कि मैंने जो पशुके साय वृरा व्यवहार कियाहै वह मेरा पाप दूर हो क्या मेरे पर पशु शादि बहुत बड़े सिद है कि-इसप्रकारके उपदेशसे यकी मोसमी भी सचेत होकर अवश्य ही हिंसामधान कमों को त्यागदेगा, क्योंकि- उस प्रवृत्ति परममग्न यजमानको निवृत्तिमार्गको लगाने के लिये यह यागादिकर्म सोपानरूप है, इससे भागे उपासना और जानकी भूमिकामें कोबढ़नेपरंवो इसकासर्वथा ही निषेध है, देखो राजा जो अफीम भाँग प्रादि मादक वस्तुओं पर कर लगाता है, और उनके पेचनेके नियम बनाता है, तो इसका तात्पर्य मादकपस्तु के प्रचारके तिरे नहीं होता किन्तु रोकने के लिये होताहै याद .
६ अध्याय। १७१ ऐसा न होतो उनके प्रचारका कुछ ठिकाना न रहै, यह ही अभि- गाय यागादिके चिपयमें है, बहुत सूक्ष्म रीतिके साथ विचार करने पर विद्वानोंने यह ही तत्व निकाला है। धर्म अधर्मका धान हमको वेदसे ही होता है, इसकारण वेदमें गो कर्तव्य लिखा है वह धर्म है जिसका निपध किया वह अधर्म है, उसमें अल्पत मनुष्यको ननु नच करने का अधिकार नहीं है। । घेदमें जो कर्तव्य है यह, सांसारिक अल्पा पुरुपों की दृष्टिमें अशुद प्रतीत होता हो राप भी यह शुद्ध है, उससे अन्य संस्कार- शन्य होने के कारण अशुद्ध है जैसे ज्वरकी मौषष रोगीकी दृष्टिमें घृणास्पद होनेपर भी शान की दृष्टि से वह ज्वर को दूर करनेवाली है, परन्तु वह ही भोप संग्रहण के लिये अनुपयोगी है, इसीप्रकार वेद जिसकर्मको कल्याणकारक बताता है, यह वेदविधिसे प्रतिकूल कियाजाय तो शुभदायक न होकर उलटा हानिकारक होजायगा। 'प्रयवा इस पशुयागके विषय में एक प्रकार का तत्व और भी है, वह यह कि इस संसारक्षेत्रमे तिसमें भी भारतवर्ष में मनुष्य शरीरको पाकर तिसपर भी मोक्षसाधन मार्गके द्वारपर्यन्त पहुँचे हुयं द्विजशरीरको पाकर अपने चंदारका उपाय करते हुए: मातिदुर अन्धकारमें पड़कर कष्ट पानेवाले पशु आदिका भी उद्धार कर उनको भी निरतिशय मुखका भागी बनाना चाहिये, अन्यथा पशु- गोसे स्वयं को अपनी धस योनि के दुःखसे उद्धारका उपाय वन नहीं सकता, मत: महात्माओंका कर्तव्य है कि वह कृपाकर उनके उद्धारका उपाय करें । तुरीयावस्था में पहुंचने पर ही माणीको मिरसिंशय सुख वा. प्रक्तिकी प्राप्ति होती है, जो-तुरीया मनुष्यों के परमसाधन, करनेपर प्रकट होताहै वह पशु शरीरों में नादसे ही प्रकट होनेलगती है, इसीकारण सर्प मग आदि बीनके. नादको सुनतेही अपने शारीरिक मानको भूल जाते हैं, उससमय सांसारिक सुख . दुःखका मान दर होकर एक थनिर्वचनीय मुखका प्रवाह वहने लासाई, जिससमय यज्ञ में सामवेदका नाद होनेपर पशु तुरीया, १७२ शुक्लयजुर्वेद । वस्था पाते थे उसीसमय जमा ऋषिक भादि यथोचित मन्त्र प्रयोगसे उसके परलोकगमन का विधान करोये, यह मानो पशुके संक्षाररोगकी चिकित्सा है चिकित्सा के निमित्त शरीरका खण्डन टोनेमेचिकित्सकको कुछ दोपनहोकर उसको दुःखसे छुटाने के कारण कुछ पुण्यही होताहै और रोगीमी रोगमुक्त होनेपर अनेकों भाशी- चोद देता है, इसीमकार यज्ञीय पशु,पशुशारीरसे छूटनेकै मनन्तर मन्न - केममाघसे दिव्यशरीरको पाकर स्वर्गादि सुखमधान लोकोंमें गमन कररोथे, परन्तु तुरीयाको मकट करने की योग्यता भौर तपका ममान म दस कलियुगमें पायागोंके करमेका स्मृतियों में निषेध कर दिया तथा उपसिना और ज्ञानकी भूमिकामें पहुँचनेपर एवं पालण वेश्यों के निमित्त तो इन पशुयागादिका विधान हैही नहीं इसकारण भागैके पयागविषयक मंत्रोंका पश्यागविषयक विनि- योगोंके भनुसार अर्थ लिखकर हम निवृत्तिमार्गोन्मुख धार्मिको के सिसको प्रवृत्तिमार्गकी उममममें नहीं डालना चाहते। किन्तु, बेदकी प्राधिमौतिक, भाषिदैविक और आध्यात्मिक इन , गनिमकारकी व्याख्यानों में से प्राध्यात्मिक व्याख्या लिखना सात समझरोहैं । और मसङ्गवश पश्याग के विषयपर जो यह इतना पान्दोनम कियाइसका कारण यहहै कि-संस्कृत तथा भापा आदिमें जो अन्य व्याख्याएं पश्यागविषयक विनियोगों के मनु- सार लिखीजानुकी हैं, उनको पढ्नेपर वास्तविक तत्त्वके न जानने से पावैदिक नामधारी प्रच्छन्न पेदशत्रुनोंके बहकानेसे धार्मिकों के चित्र में उत्पन्न हुए सन्देहामास. दूर होनायें । यजुर्वेद मा २३ । ११ में लिखा है, कि-'इयं वेदि परो अन्तः पृधिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः प्रर्याद घेदी ही पृथ्वीका अन्त है जहाँ सर्वप्र यज्ञ क्रिया होरही है वह या भुवनकी नाभि है, जिसमें सम क्रियाएं समाप में होती हैं। से प्राकृतिक या दीक्षिराहुए पुरुषको चितई कि योगाग्नि शानाग्निमें पाएका पशुका बलिदेव श्योकि-'अग्नि: -- tr - " - ६ अध्याय। पोमात्मकं जगत् ।' अर्थात् यह जान मारनपोमात्मक है और ऐसा जग जिसका देवता है वह पशु अभिमान एवं प्राण ही है, उसी कालिदान करनेपर माध्यात्मिक उन्नति होसकती है, मतएव भागे के पशुपागविषयक मन्त्रोंका माध्यात्मिक यर्थ ही लिखते है- - जपावीरस्युपदेयान्देवीपिशः प्रागुरुशिजो व- हितमान् । देव त्वष्टवसुरम हल्पा ते स्वदन्ताम् ॥७॥ (उपायी:, मसि) दे सुपुम्माके अधिष्ठातृदेव ! तुम प्राणपशके निकटमें रहकर उसके रक्षक सखा हो (देवी बिशः, उशिनः वहि: समान देवान, उप, पागुः )योगसाधना करनेवाले कमाण, योग- युक्तों को चाहनेवाले, श्रेष्ठ अग्निकी समान मकाश स्वरूप नर नारायण को प्राप्त हों (देव, त्वष्टः, यमु, रम) हे दिव्यस्वरूप भगवन् ! योगीके प्रात्मप्रतिविम्य वा माणरूप धनमें रमण की. जिये (रो, हव्या, स्वदन्ताम् ) हे भूतात्मन् । तुम्हारी माणरूप हवि तुमको रुचै ।। ७ ॥ रेवती रमन्हवम्वृहस्पते धा रया चरनि । मत्तस्प त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि धमानुपः ॥ ८॥ (रेवती, रमध्वम् ) क्षार श्रादि धनवाली गोशोंकी समान शम दम यादि धन से युक्त इन्द्रियरूप पशु धात्मस्वरूप यन. मानके शरीरमें क्रीडा करें (वृहस्पते, वनि, रया, धा) हे परमात्मन् ! माण मार इन्द्रियोंको योगलक्ष्मी के द्वारा पुष्ट करो (देवहविः, सस्य, पाशेन, स्वा, मतिमंचामि ) हे मूसात्मन् ! योगयतके पाशसे सुझको पांधता हूं और कर्मवन्धनके पाशसे सुझको योगयाकेद्वारा मुक्त करता हूं (मानुपः, धर्पा) विष्णुगुरूप प्राणाभिमानी देवता तुझको शमन करनेमें समर्थ है।॥ ८ ॥ देवस्पं त्वा सवितुः प्रसुधिनार्धाष्टुिभ्याम्पूष्णो. इस्ताभ्याम् । अग्नीपोर्माभ्याम्जष्टभियुनज्मिा ८
१७४
1: शुक्लयजुद।
अद्यस्त्वौषधीभ्योन त्या माता. मन्यतामर्नु
पितानु भ्राता सगोनु सम्बा: सयूत्थ्यः ।
आनीपोमाभ्यां त्या जुष्टम्मोक्षामि ॥९॥
प्रतिविम्बके इवनसे पहिले भूतात्माके इवनको कहा है, कि-
हे भूतात्मन् ( सवितुः, देवस्य, प्रसवे, अग्नीषोमाभ्याम्, जुष्टम्,
स्वा, अश्विनोः, बाहुभ्याम्, पक्ष्णः, ईस्वाभ्याम्, नियुनज्मि
यात्मविचारकी पोरको मेरणा करनेवाले गुरु देवकी मेरणा करने
पर में प्रकृति पुरूषके लिये प्रिय, पेसे तुझको मन हृदयकी ग्रहण
करने की शक्तिरूप बाहुओंसे और मानससूर्यको ग्रहण करनेकी
शक्तिरूप हायोंसे, निश्चल.करसाई (अग्नीपोमाभ्याम, जुष्टम्,
स्वर, मद्यः, ओषधीभ्यः, प्रोज्ञामि ) हे भूतात्मन् ! प्रकृति
पुरुषके लिये मिय, ऐसे तुझको ज्योति रसरूपजल और जन्म-.
रूप रोग का नाश करनेवाली ज्ञानम्वरूप औषधियों से प्रोक्षण
करताहूं (सा, माता, भनुमन्यताम् ).ऐसे पोक्षित तुझको प्रकृति
आज्ञा देय ( पिता, अनु ) पुरुप आज्ञा देय (भ्राता, अनु) सहोदर
भ्रातासमान जीवात्मा अनुमति देयं (सयूथ्यः, सखा, अनु)
समान यूथवाला ईशरूप मित्र भाज्ञा देय ॥९॥
अपाम्परुटस्थापों देवीः स्यदन्तु स्वात्तचित्स:
देवहषिः । सन्ते प्रागो पातेन गच्छनासम-
.: । शानि धजः म यहपतिगशिपा॥१०॥
हे भूतात्मन् ! :(अपाम्, पेरुः मसि ) महाज्योतिके संप
अमृतका पान करनेवाला है (देवी:, भापः, स्वदन्तु ).ब्रह्मज्योति
के रसरूप जल तुझको स्वीकार करें (देवहविः, स्वाम, सत्।।
चिद् )क्योंकि-ईशका हवि भलीमंकार भक्षित होताहुमा प्रारूप
होजाताहै (ते, माणा, वान, सद्गच्छताम् ) हे भूतात्मन् ! तेरा
माण. समष्टिमाणसे संयुक्त हो (भङ्गानि, यजत्रः; सम्) तेरे मङ्ग
योगयड़की साधनामें लग.(येहपतिः, माशिपा, सम्) भात्मा-
रूप यजमाना योगयतके फलरूप आशीर्वादसे युक्त हो ॥ १० ॥
६ अध्याय। घुतेनाक्ती पशूधनाथां रेचति यजमाने मि. यन्धा माविश उरोग्न्तरिक्षात्मजदेवेन वात- नास्य दृषिपुस्त्मनो यज समस्पतन्या भव। वर्पो वीयसि यजे यज्ञपतिन्धाःस्वाही देवेभ्यों देवेभ्य: स्वाहा ॥११॥ (घृतेन, अक्ती, पशून, आयेषाम् ) हे बुद्धि मन, तुम दोनों अग्निकी समीपतासे पृसकी समान विपयोंकी समीपतासे पिलंघने वाली इन्द्रियोंकी संकलशक्तियोंसे लिप्त हो, भूतात्माकै अङ्गमारण आदिकी रक्षा करो (रेघसि, यजमाने, मियम् धाः) हे महावाणी! 'श्रात्मरूप यजमानमें इसके इच्छित मोक्षको धारण करो (देवेन वारोन, सजू, दरोः, अन्तरिक्षाव, शांपिश) प्रकाशयान माणके साथ प्रीशिवाली होकर गुरुके हृदयाकाशसे जानदानके द्वारा यज मान में प्रवेशकर (अस्य, इविषस्त्मना, यज ) इस भूतात्माके हचिरूप शरीरका हवन कर (अस्य, सन्वा, सम्भव) इस भूतात्मा के शरीरसे नई प्रमाश्मि इस माकारसे प्रकट हो (वो, वी- यसि, यशे, यापतिम्, धाः) हे विस्तारवाली सुपुम्ना! प्रति यि. स्वारवाले विष्णापरमात्मामें योगयज्ञके कर्नीको स्थापन कर (देवे- भ्यः, स्वाहा) कर्मेन्द्रियोंके लयस्थान देवताओं के भर्प कौन्द्रियों का इधन हो (देवेभ्यः, स्वाहा) ज्ञानेन्द्रियों के लयस्थान देवनामों के अर्थ जानेन्द्रियोंका होम हो ॥११॥ मादिभूर्मा पृदाकुनमस्त. आतानान_ प्रेहि। .. घृतस्य फुल्या उप ऋत्तस्य पथ्या अनु॥ १२ ॥ (मीदः, पृक्षाः, मा, भू:) हे सुपुम्ना ! न. सर्पकी समान कुटिल चाल चलनेवाली और वीरूके समान मर्मस्थान को पीड़ा देनेवाली मरा हो (थालान, ते, नमः) हे योगयज्ञ ! तुम्हारे लिये भतात्मारूप अन्न है (अनी, मोदि.) हे योगयक्षके साधक !' , 4 - .
शुक्लयजुर्षद।
तुम काम मादि शत्रुओं से रहिस होरोहुए सुपुम्नाके द्वारा गमन
करो (ऋतस्प, पथ्याः, घृतस्य कुल्याः, अनु उपदि) महामार्भम
हितकारी इन्द्रियोंकी सकल शक्तियों के प्रवाहरूप नदियों को देख
कर त्रिदेवरूपधारी महाविष्णुको प्राप्त करो ॥१२॥
देवीरापः शुद्धा घौद्य सुपरिविष्टा देवेषु सु.
परिविष्टा त्यम्परिवेष्टारों भूयास्म ॥१३॥
(देवी, भाप:, शुदाः, सुपरिविटाः, देवेषु, बोहवम् )
इन्द्रियसम्बन्धी गोलकरूप अन्तरिक्षो) सांसारिक मुख
और
शयनका दासा जो मुख है उसके धारण करनेवाले, देहमें प्रविष्ट
हुए तुम भूतात्माको देवताओं में पहुंचामो अर्थात् उसकी गान-
दशांकी प्राप्तिके साधन बनो (सुपरिविष्टाः, वयम्, परिवेष्टार,
भयास्म) और तुम्हारे प्रसादसे सबप्रकार योगयज्ञ में प्रविष्ट
होकर तृप्तहुए हम वाक् प्रादि प्रात्विज़ देवताघोंको ही कर्मका
फल अर्पण करनेवाले हों ॥१३॥
वान्ते शुन्धामिप्राणन्त शुन्धामि चक्षुस्ते शु-
न्धामि श्रोत्रन्ते शुन्धामि । नाभिन्ते शुन्धामि
मेनते शुन्धामि पायुन्तै शुन्धामि चारित्रास्त
शुन्धामि॥१४॥
धुदि कहती है कि हे भूतात्मन (ते, वाचम्, शुन्धामि) मैं तेरी
घाक् इन्द्रियको शुदकरती हूँ (से, माणम्, शुन्धामि ) सेरे प्राण
को शुद्ध करती हूँ (ते, चक्षु भुन्धामि ) तेरी पा इन्द्रियको
शुद्ध करती हूँ (ते, श्रोत्रम्, गुन्धामि) तेरी थोत्रेन्द्रियको शुद्ध
करती हूँ (ने, मामिम्, शुन्धामि ) तेरी नाभिको शुद्ध करती हूँ
(से, मेहम्, शुन्धामि ) बेरी लिङ्गेन्द्रियको शुद्ध करती हूँ ( से,
पायुम्, शुन्धामि) सेरी गुन्द्रियको शुद्ध करती हूँ (ते चारित्रा
शुन्धामि ) तेरे चरणोंको शुद्ध करती हूँ ॥१४॥
- . शुक्लयजुर्वेद । मनस्त बाप्पोपताम्बा भाप्पापताम्माजास्त आप्यायताश्चक्षुस्त भाप्पायतानोनन्त आ- प्पोपताम् । पत्ते ऋरं यदास्थितन्तत आप्पा- यतानिष्टयोपताततै शुजयतु समहोम्यः । ओषधे प्रायस्व स्वधित मैन हिसी ।।११॥ हे भूतात्मन् (ते, मने, पाप्यायताम् ) सेरा मने सारूप्य मोड को पाने के लिये समष्टिमनके भाषको पानारूप दिको पावै (से, वाफ, माप्यायताम् ) रोरा वाक इन्द्रिय समष्टिमावको पांव (ते, माणः, पाप्यायताम् ) वेरा माणं समष्ट्रिभाषको पावै (से, चक्षुः, बाप्यापसाम् ) तेरा चक्षु समष्टिभावको पावै (से; श्रोतम्, भाप्या: यगाम् ) तेरी श्रोमेन्द्रिय समष्टिमाषको पावै (से, यंत, फरम्, स्थितम्, से, सद, भाप्यायसाम् ) तेरा जो कष्टदायक संसार वन्धन है वह सेरा शान्त हो (निष्टचायवाम् )देशमावरदित होकर एकीभावरूप प्राभावको, पावै (ते, तत्, शुद्धयत) सेरा यह सब शुद्ध हो (अहोभ्यः, शम् ) देवयानके सम्बन्धी दिनोंके निमित्त कल्याण हो (भोपधे, प्रायस्थ) हे. इन्द्रियोंकी शक्तियों ! रक्षा करो सन्मार्गमको न नामो ( स्वधिरो, एनम्, मा हिंसीः)हे मन इस भतात्माको संसारबन्धन से नष्ट न करो॥ १५॥ रक्षसाम्भागोमि निरस्त रक्ष इदमहध रक्षा- भितिष्ठामीदमय रक्षोषाध इसमय रक्षो- धमन्तो नयामि । घृतेन यावापृथिवी मोर्ण- वायां चायो येस्तोकानामग्निराज्यस्य वेतु स्थाहावादाकृते फर्जनभसम्माहतच्छतम्॥१६॥ हे क्रोध भादिक समूह तुम (रक्षसाम, भागः, असि) राक्षस समान काम आदिके भाग हो (रस, निरस्तम्) योगयतमें विघ्न करनेवाले अडानका त्याग कियागया (अहम् इदम, रक्षः अभि; तिष्ठामि.) मैं इस राक्षातरूप भवानको पाँव से दताकर स्थिक होताहूँ (अहम्, इदम्, रक्षा, अववाधे ) मैं इस प्रज्ञानको ना ६ अध्याय। करताहूँ ( अहम, इदम्, रक्षा, अधमम्, समः, नयामि.) में इस भवानको असिनिकृष्ट इसके उत्पत्तिस्थान तमोगुणमें पहुँचाताहूँ (घााषिची घरोन मोगाथाम् ) मेरे हृदय मन तुम दोनो इन्द्रियों की शक्तियोंके समूहसे अपने .मात्माको माच्छादनकरो (वायो, स्तीकानाम्, ः) हे माणावायो ! ममरन्ध्रसे पकने- चाले अमृतरसकी दोंका ज्ञान पाकर उसको पियो (भगिणः,माय- स्य,चेतु स्वाहा) पारमाग्नि इन्द्रियोंकी शक्तियों के समूहको पिये और मलीमकार स्वीकार करे (स्वादाकते, जलममसम्, मारुतम्, गरछतम् ) ब्रह्मज्ञानका उपदेश होनेपर तुम दोनो पति और स- माष्टमतिविम्व ब्रह्मान्यांकाश ऊपरंपर्चमान समष्टिवायुको पायो। इमाप: पर्वहताधञ्च मलञ्च यात् । यचा. 'जिद्रोहान्त पर्व गुपै मभीरुणम् । भापोमा । तस्मादनमा पिर्वमानश्य मुञ्चतुः॥ १७ ॥ (भापा, इदम्, माहत ) है ज्योतिरसाम्रारूप जलों इस कामताभोंके दाता भज्ञानको दूर करो (चयन् अयम्,.स मलम्, च, यत्, भनृतम्, अभिदुद्रोह) और जो निन्दित विषय भोग और मो शामको भाषरण मत है तथा नोमांकार ममता युक्त मिथ्यामोह है उसको मारदिया (प, यत, मभीरुणम्। शेषे श्रापः, च, पवमानः सम्मानः एनेस, मा, मुञ्चन) और नो अद्वैत आत्माको ब्रह्मस पृषक जानकर उसकी अवोलमादी प्रमामृतरूप जल और समष्टिवायु सस पापसे मुझे गुहायो । १७ ॥ सन्ते मनो मनसा सम्माणः माणे गमताम् । रेटेस्युग्निट्या श्रीणावास्त्विा समोरया- सस्यत्वा धाज्य पूष्णो रबैया जमणो व्यथि- प्रत्ययुतन्या ॥१४॥ हे मृतात्माके हृदय (ले, मना, मनसा, संगम्छताम् ) रामन समष्टि मनसे संयुक्त हो (माणः,माणेन, सम्) प्राण समष्टिमा से संदोगको पात्र (रेटे, मसि) मानसम्र्य तृम परिचिन्न , 1, शुक्लयजुर्वेद । होनेसे मष्ट से हो ( अग्निः, ला, श्रीणानु.) प्रमाग्नि युझको स्वीकार करकै बढ़ावै (पापः, स्वा, समीरणन् ज्योतिरसामृत तुझको भलेप्रकारं वदावे ( वासस्य ध्राज्य, पूणः, रही, त्वा) माणको दहराकाशमें पहुँचाने के लिये और मानससूर्यकी भृकुर्य में गति के लिये तुझको स्वीकार करता हूँ (ऊप्मण, व्यथिपद) प्रमाग्निकी क्षुधारूप व्यथा भकाट हो ('देपा, प्रयुतम् ) कामनारूप राक्षस दर शुश्रा ।। १८॥:::::::: घृतं; वृत्तपावानः पिवत' वसा चसापावानः पिषतातान्तरिक्षस्य इपिरसि स्वाद दिश:: प्रदिर्श आदिशों विदिश-उधिशा, दिग्भ्यः स्वाहा ॥ १२ ॥ (घृनपावानः, घृतम्,पिवा) हे इन्द्रियोंकी शक्तियोंके समूहको पीनेवाले समष्टिरूप मन बुद्धि-माण इन्द्रियोंकी सकलं शक्तियों- के समूहको पियों (वसापांवानः, साम, पिबरा) हे मानसर्यका पान करनेवाले प्रह्मपरा नारायण नामक देवताभो ! मानससूर्य को पियो (अन्तरिक्षय, हषिः, प्रसि, स्वाहा ) हे मानससूर्य ! तुम हादीन्तरिक्षक हवि हो तुम्हारा श्रेष्ठ होम होप (दिशा,विदिशः प्रदिशः, णादिशः, उदिशः, दिग्भ्यः, स्वादा) विशेषरूपसे शास्त्र का उपदेष्टा ब्रह्मपराका उपदेष्टां तीन प्रकारका है-सावित्रीका सप- देष्टा, निर्गुण और सगुणका उपदेष्टा एवं उत्तम योगमार्गका उप- देशा, इन प्रभा विष्णु महेशप गुरूओंसे उपदेश कियागया है ॥१९॥ ऐन्द्रः माणों अझै अंगे निदीपढेन्द्र, संदानो' * . है अंगे निधीतः । देव त्वष्टरितेस समेतु सलधमा यहिपुरपं भवाति । देवघायनामवसे सखायोर्नु त्वा माता पितरो मदन्तु॥२०॥ (ऐन्दा, प्राणः, अङ्गे, अङ्गे निदीध्यत्) भूयात्माका प्राण ईश्वरके भङ्ग २ में स्थित हुमा (ऐन्द्री उदानः श्रो, अंगे, निधीतः । भूतात्माका उदान ईश्वरके अंगोम धरित हुआ (देव, RE, ते, सम भूरि-) हे योनिस्वरूप ईश्वर तुम्हारा विष्णुए -- ६ अध्याय रूप.परिपूर्ण है (भ, यव, वः, इपुरूपम्, भवासि; सलक्ष्मा, सम्, एतुरे.सर्वध्यापिन् ! क्योंकि-निवृत्तात्मां वाणरूप होता है, अतः अंगुष्ठस्वरूप भात्मा विष्णुको प्राप्त हो (देव, श्रवसे, प्र, सायन्तम्, स्वा. सखायः, मात्रा, पितरः, अनुमदन्तु ) हे सायुज्य के योग्य प्रारमन ! संसारसे रक्षा पाने के निमित्त विष्णुरूप भीनमें जाने पाले.तुझको प्राण भादि प्रकृति और देवसा मानादें ॥२०॥ समुद्रच्छ खाहान्तरिक्षाच्छु स्वाहा देष, स- ... वितारह साहा मित्रावरुणो गरा स्पाई- होरा गठ स्वाहा छन्दांसि गच् स्वाहा चार्वापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञ स्वाहा सोमाय स्वाहा टिव्यत्रभो गच्छ स्वाहाग्नि घेश्वानरच्छ स्वाहा मनो मे हापि यच्छ दि- बन्ते धूमो गए स्तुज्योतिः पृथिवीं भस्मना पूर्ण स्वाहा ॥२१॥ देरके भवयवों में हरएक अवयरको उपदेश करता कि-(समुद्रम् गच्छ, स्वाहा ) हे भूतात्मामें के अन्त ! तुम अपनी समनिरप समुद्र में लीन होगाभो, श्रेष्ठ, होम हो(अन्तरिक्षम्, गच्छ, स्वाहा) हे भूतात्मामें के वायु ! तुम भन्तरिक्षमें जामो, श्रेष्ठ होम हो (देषम, सवितारम, गरम, स्वाहा)ो भारममतिबिम्ब ! तुम सूर्य देवसाको पहुँचों, श्रेष्ठ होम हो (मित्रावरुणौ, गच्छ, स्वाहा) हे जीवात्मा तुम नर नारायणको पहुँचो, थेष्ठ हवन हो (महो- रात्रे, गच्छ, स्वाहा.) भन्म मरणकाल ! महोरात्रिको पहुँचो भेष्ठ हरन हो (बन्दांसि, गम्छ, स्वाहा) हे शरीरके भयर्यो ! तुम समष्टि शरीरके भलाको पहुँचो मुन्दर हवन हो (चावापृथिवी गच्छ, स्वाहा) हे मन , हृदय आदिके कमलों ! तुम पृयिती भौर स्वर्गके अधिष्ठावदेवाको पहुँचो, भेष्ठ होम हो ( यन्त्रम्, गच्छ, स्वाहा) हे यज्ञक्रियामो ! तुम यज्ञ पुरुष विष्णु को पहुँचो, श्रेष्ठ.होम हो (सोमम्, गच्छ, स्वाहा) हेमन्न पान .
१८१ शुक्लयजुर्वेद । शादि. भोगके समूह तुम सोमदेवताको पहुँचो, उत्तम होम हो (दिव्यम्नमा,गरक, स्वाहा) हे भूतात्मामें के भाकाश! तुम दिव्य आकाशमें जामिलो, थेष्ठ होम हो (वैश्वामाम्, भरिना, गच्छ, साहा) हे जठराग्ने ! तुम वैश्वानर भाग्न देवताको माप्त होमो श्रेष्ट होम हो (मे, हादि, मनः; यच्छ) हे योगशक्त ! मेरे हृदय- सम्बन्धी मनको.सेको (रो, धमा, दिवस, गच्छ) हे भूतात्मन्!' सेरा धूम्र वर्ग को जाय (ज्योतिः, स्वः) भारमल्योति सूर्यको प्राप्त हो ( भस्मना, पृथिवीम्, थापूण, स्वाहा) भस्मके पृथिवीको पूर्ण कर, इसप्रकारका माहसिक होम हो ॥२१॥ मापोमोपपीघिसाम्नो-धाम्मो राजस्ततो परुण मोमुधापनाइन्याति पक्षणेति शपां महे ततौ वरुण नो मुझेध.। सुमिनिया न आप ओषधयः सन्तु दुमिनियास्तस्मै सन्तु'योमा- प्रेष्ट्रिय व्यन्विष्मः ॥ २२ ॥ वाणीसे भूतात्मा का हवन करकै भव प्रारब्ध समाप्तिपर्यना' फिर मार्थना कराई कि-हे मन तु (भापा, मा, हिंसी) इन्द्राग्मियों के अन्तरिसों को मस नष्ट करो ( भोपपीः मा) इन्द्रियोंकी शक्तियोंको मत नष्ट करो ( राजन् वरुण, रातः, धाम्ना, धाम्नः, नः; मुञ्च ) है राजन् मन अपने पाशरूप प्रत्येक इन्द्रिय से हमको छोडो (अध्न्याः, इति, यत्, माहुः, वरुण, इसि, शंपामहे, 'घरुण, रोतः, ना, मुंग) ईश्वरके पूजक' देहके अवयव अवध्य है, पैसा जो शास्त्र कहते हैं, हे मन हमसो इस योगकी विधिसे इनका वध करते हैं, हे मन उस पापसे हमको मुक्त कर (भापः, श्रोषधयः, ना, मुभित्रियाः, सन्तु) इन्द्रियों के अन्तरिक्ष और इन्द्रिये हमारे श्रेष्ठ मित्र हों (यः, अस्मान, द्वेष्टि, च, वयम्, यम, द्विष्मः, तस्मै, दुर्मित्रियाः, सन्तु) जो काम हमारे प्रतिकूल होता है और हम योगी जिस काम को शत्रुदृष्टि से देखते हैं पस काम के लिये इन्द्रियान्तरित और इन्द्रिये शत्रुरूप' ..
६ अध्याय। - हो अर्थात् हमारी इन्द्रियों में किसीमकारकी विषयवासना सत्सम न हो ॥२२॥ इति भनिपोमीय पयमशेगकी भापारिमक ध्याहया समास प्रथम प्रयोग भ०५ की क० ७ तक पूर्ण किया, भवशेष कृत्व लिख कि-सूर्यास्त से पहिले नदी मादिमें से बहरोहुए वस्तीवरी नाम जलको ग्रहण करे तिसका मंत्र 'हविष्मतीरिमा आपो.हविष्मान आपिघासप्ति। हुषिमान्देवो अब विधमान् अस्तु सूर्प ॥२३॥ ( हविष्मान, इमा, विमती, आपः, प्रापिवासात हापसे युक्त यजमान इन विसे युक्त वस्तीवरी माम जलोंको परिचयां करतापपीत जलके सपा से पृथक करके केसाई ( देवः प्रधारः हविष्मान, अस्तु ) प्रकाशवान यज्ञ हपिसे युक्त हो (सूर्यः, हधि- मान ) सूर्य भी हनिम्मान हो । क्योंकि-सूर्य जलको अन्य सब देवताओं के लिये ग्रहण करता है. सब देवसा इस विरादास्मा सूर्य की किरणें हैं ।।१३।। अग्नेयोपनगृहस्य सदसि सादयामीन्ठान्यो भागधेयों स्थ मित्रावरुणपोभीगधेषी स्थ वि. श्वैपान्देवानी - भागधेपीथ असूर्या उपमर्य पाभिर्वा सूर्पः मह । सानो दिन्वन्त्वध्वरम् ॥२॥ इस कपिटका ९ मंत्र है , सबका मेधातिथि मा० १० १ प्रापुरीगा० १ प्राजापत्या, गा०.३ पाजुपी त्रि. ४ या नि०५ धाफि मार देवा, सरका माप है. मनाय- (अयन- गृहस्य अग्ने सदसि सादयामि ) हे वस्तीवरी जलों ! तुमको अधिनश्वर परवाले मरिन के निकट स्थापन करता हूँ (इन्द्राग्योः भागधेयी,स्थ ) तुम इन्द्र और अग्निदेवता के भाग हा विषा देवानां भागधेपी, स्प) तुम सम्पूर्ण देवताभोंके भाषरूप हो(भ- मूर्याः, उपसूर्य, वा, सूर्यः, पाभः, सहा ताः, न: अध्वरम् हिन्वन्तु) को सम्पूर्ण जल बहुत कालबक रहने के कारण सूर्यको किरणोंस and 4 । शुक्लयजुर्षेद। अदृश्य सूर्यके समीप स्थित है अथवा जिनके साथ सूर्य गमन करते है ये जल हमारे यकको परितृप्त करो ॥ २४ ॥ हृदेवा. ममसे त्या टिषेत्या सूर्याप त्वा ऊर्ध्व मिममध्वरन्दिवि देवेषु होम्रो यच्छ ॥ २५ ॥ इसका मेधाति ऋषिराउनुष्टुप्छन्द, सोमो दे । माप-- ((मनसे, स्वा, हदे, वा, विष, स्वा, सूर्याय, रवा, होत्रा, इमम् भध्याम, कर्षम्, दिषि, देवेषु, यच्छ ) हे सोम ! हवयवान मनुष्योंके निमिरा, संकल्प पिकापात्मक मनके निमित, सुमको पुलोककी. प्रासिके निमिण सूर्यदेवता के निमिरा उपाहरण करता इस यज्ञ को उन्नत करके, यस वपट्कर्मो सास होताओं को देन- लोकमें देवसायोंके मध्य देवत्व प्रदान करों ।। २९ ॥ सोमराजन्विश्यास्त्वम्मजा उपाधरोह विश्वाः स्त्वाम्मजा.पाघरोइन्तु। शृणोत्पग्निः समिधा हम्मे शृण्वन्त्यापों; घिषणाच.देवीः श्रोता : : ग्राषणो विदुषो न यज्ञ शुणोतु देवः सविता : हम्मे स्वाहा ॥ २६.1.:.:: : इस कं०.३ मंत्र है । सबका मेपानिधि : १ का साम्न्यु- शिक, २ याजुपी त्रिष्टुर, ३.मिष्टु० मंत्राध: (सोमराजन, स्वं पिरवा, मनाः उपाघरोह, विश्यां मनाः त्वां पावरोहन्तु) हे राजा.सोम सुम इन सम्पूर्ण प्रतिवण, गणोंको अपनी प्रभा नानकर कृपा करो, हे सोम सम्पूर्ण प्रना तुमको प्रणामद्वारा प्राप्त हो.(अग्निः समिधा; मे, इय, माप, च, धिषणा, देवी, च, ग्रावाणा, विदुपः, नः, यज्ञम्, पाश्रोत, सविता, देषः, मे, चं, शृणोतु ) अग्निदेवता समिधापूर्वक मेरी इस पाहुतिसे मेरे मामा गको पुन । हे ग्रावासमूह : भाभपवके मिमिश-माप्त हुए हुम विद्वानों की समान एकाग्न चित्तसे मेरे यज्ञ. के. मापान को सम प्रकार.सुनो, सबका प्रेरक परमात्मा देवता मेरे थाहामको भवणं करो यह पाहुति भलीप्रकार सहीत हो ।। २६ ... ... .. . -- , 1: ६ अध्याय। १८१ देवारापोअपान्तपाद्यो वऊर्मिइविष्य पत्रिपा- वान् मदितमा । : तन्वन्धों देवत्रा शुक्रपेभ्यो येषां भागस्प स्वाहा ॥ २७॥ इस कण्डिका में दो मंत्र है। सबका मेधातिषि ऋ०ई०१ भुरिगापी पं०२ देव्युष्णिक और देवसा १, २ का पाए । मंत्रार्थ- (भापो,देवी, वः, अपाम्, नपान, इविषः,इन्द्रियांवान्, मदिन्तमः जमिः) हे जलदेवियो तुम्हारे जलों के, अपत्यरूप, इषियोग्य, पीर्यवान, तृप्त करनेवाली, नहर है (देवत्रा, सम, शुक्रपेभ्यः, देवेभ्यः, दच) देवसानों के प्रतिभानेवाली, उस ऊर्मिको शुकादि सोम ग्रह पीनवाले देवतामाको मदान करो (येषा, देवामा,भागः, स्पः) जिन देवताओं के तुम भाग हो.इन सबके उद्देश्य से तुमको इवि देते हैं (स्वाहा) यह आहुति भलीमकार गृहीत हो ॥२७॥ कापिरसि समुद्रस्य त्वा क्षित्या उन्नधामि । समापौ अद्विरम्मत समोषधीभिरोषधी२८॥ इस फरिरका में ३ मं० । सबका.मेधा 1 छ० १देवी १०२ याजु० त्रि० ३ साम्न्यनु० भौर देवता १ का माज्य २, ३ का भाप । मंत्रार्य-हे पृत तुम (कार्षिः पसि ) देव सबिष्ट पापके दूर करनेवाले हो (समुद्रस्य, महित्य, त्वा, उन्नयामि ) हे जलो घस्तीवरी लक्षणवाले सागररूप जलके भक्षीणताके निमित्त सुमको ग्रहण करवाई (भापः, अति, समग्मत, औषधी, औषधीभिः, सम्) हे मित्रावरुण चमसमें स्थित जलो तुम इस बलीवरी के जनके संग भलीपकार मिश्रित हो, सम्पूर्ण भौषधी पोपधिपों के साथ भलीप्रकारसे मिथित हो ॥ २८ ॥ यमग्ने पत्सु ममदा बाजेपु यन्जनाः । स. यन्तां शरवंतीरिषः स्वाहा ॥ २९ ॥ इसका मधुरधन्दा भरिणापी गायत्री ० अनिर्देवना है मंत्रार्थ-(भग्ने, प्रत्म यम्, मर्त्यम्, प्रवाः, बानेषु, यम् जुनाः सः शश्ववीः इषः, यन्ता स्वाहा) हे भग्निदेव, बड़े संग्रामाम जिस .. । - ६ अध्याय। -- , मनुष्यको तुम एसा करते हो, किश्व विलक्षणवाले भन्नों में अन्न के निमित्त गित मनुष्य के निकट तुम इधिग्रहण करनेको उपस्थित होरोहो वह मनुष्प तुम्हारे प्रसादसे निरन्तर असय अन्नों तथा धनोंको पाता है, हमारी यह आहुति भजीपकार गृहीत हो. २९ देवस्य त्या सपितुः सचिनोाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् । आददे रायासि गभीरमिममध्वर . ! : 'धीन्द्रीय सुपूत्तमम् उत्तमेन पविनोजस्वन्त- मधुमम्तम्पयस्वन्तन्निग्राभ्या स्थ देश, श्रुत स्तपर्यत मा ॥३०॥ इस करिहका २ मंत्र है। सबका मधु० ऋ०ई०१ मा० पं० २ मा० घ. और देवया १ मदिरापामगार्थ-हे उपांशु सवन ( सवितुः देवस्य, मसवे, अश्विनोः बाहुभ्याम्, पूषणः, हस्ताभ्याम् स्वा, पाइदे) सविता देवताकी प्रेरणासे अश्विनी- कुमार की बाहु, पूषा देवचा के हाथों से तुझको ग्रहण करताई (रावा, प्रसि ) अभीष्ट फल के देनेवाले हो (इमम्, अध्वरम्, गभीरम्, कृषि, उत्तमेन, पघिना, इन्द्राय, सुपतमम्, अर्ज- स्वनराम, मधुमन्तम्, पयस्वन्तम् ) -इस हमारे यज्ञको महान करो उत्कृष्ट श्रेष्ठ वनसदृश तुम्हारे द्वारा इन्द्रदेवता के निमित्त मीतिवर्द्धक बलयुक्त स्वादिष्ट मधुर रसयुक्त दुग्ध के स्वादुरससे युक्त सोमको अभिपुमराम करताई (गिनीभ्यः, स्य, देवभुराः, मा, तर्पयरा ) हे जलो तुम हमसे सम्मकमकार से ग्रहण किये हो देवसायोंके मध्यम चिरप्रसिद्ध हो इसपकार बहुस मानसे युक्त तुम इस समय इस यज्ञमें मुझको तृप्त करो॥३०॥ मनो मतप्पंपत चाय में तर्पयत माणसर्प- यत चक्षुम तर्पयत प्रोन मे तवतात्मानं मे तर्पयत पूजां मे तर्पयत पुशू तर्पयत गणान्में सर्पयत गणामे मा पितृपन् ।। ३ ।। '. इसका मधु छ० भ० वाहना० ज०,०, श्राप देवसा है। - २५ - १८६ शुक्लयजुर्वेद । मंत्रार्थ-हे निग्राभ्यः (मे, मनः, तर्पयत, मे, वाचं, तर्पयत, मे, माण, सर्पयत, मे, चक्षुः, चर्पयत, मे, श्रोत्रं, तर्पया, मे, शात्मान, सर्पयत, मे, मजा, तर्पयत, ) मेरे मनको तृप्त करो, मेरे प्राणको । वृप्त करो, नेरी नेपइन्द्रियको सृप्तकरो, मेरे कणों को तृप्त करो, मेरी श्रात्माको तृप्त करो, मेरी मजाको तृप्त करो, (मे, पशून, तर्पयत, मे, गणान्, तर्पयत, मे, गणाः, मा. वितृपन्, ) मेरे पशुओंको तृप्त करो, मेरे मनुष्यसमूहों को सृप्त करो, मेरे श्रात्मीयजन किसीमकारसे हप्णासे कातर नहीं। इन्द्रायत्या वसुमते रुप्रवत इन्त्राप त्वादित्य ...बत इन्द्रायवाभिमातिने नापं त्वा सोम- भृतेऽग्नय त्वा रायस्पोपदे ॥१२॥ इस कं० में ६ मंत्र है। सबका मधुच्छन्दा ऋः । छं० १सा० गा०, २,३,४ मा० गा०, ५ या० ४०, और दे० सबका सोम है। मंत्रार्थ-हे ताम: (सुमते रुद्रवते, इन्द्राय, ला, आदित्यवरो, इन्द्राय, त्वा, अभिमातिघ्ने, इन्द्राय, स्वा, सोमभृरो, श्येनाय, रायसोपदे, अग्नये, त्वा) यमुनाम देववा से युक्त माध्यन्दिन सबनके रुद्रदेवतासे युक्त इन्द्रदेवताके निमिच तुमको परिमिरा करता हूँ, हे सोम सीसरे सवनके श्रादित्य देवता सहित वर्तमान इन्द्रदेवताके निमित्त तुमको परिमित करताई,हे सोम शांघाती इन्द्र देवताके निमित्त तुमको परिमिस करसाहू, हे सोमधन और पुधि देनेवाले अग्निदेवता के निमित्त तुमको परिमिस करताई ॥३२ ।। यसे सोम विषि ज्योतिर्पत्पृधियां यदुरा- चन्तरिक्षे तेनास्मै यजमानाया गये कुध्यार्घि-, दाने वाचः ॥ ३३ ॥ इस मंत्र का मधुच्छं० ऋ०, भुरिगा० ० ० सोम देवता है । मन्नार्य- सोमदिषि, यत्, रो, ज्योतिः, पृथिव्याम्, यत्, उरो, भन्तरिक्ष, यत्, रोन, यस्मै, उरु, कृषि,हे सोम ! पुलोक में जो तुम्हारी ज्योति है, पृथ्वी में जो ज्योति है, विस्तीर्ण, . ६ अध्याय। . . अन्तरिक्ष में जो ज्योोते है, उस ज्योति के प्रभावसे इस यजमानके निमित्त इष्टधन विस्तार करो अथवा इसके यज्ञ में अपने शरीर को विस्तार करो) राये, उरु कपि, दाने, अधियोचा,) स्विस गणों को धनमाप्ति के निमित अपने शरीरका विस्तार करो, दाता यामानके निमिच मैं सम्पूर्ण ज्योतिसे प्राप्त हुआ.ऐसा कहो।। यात्रा स्थ पुत्रतुगेराधोगती अमृतस्य पन्नीः । सा' देवीवप्रेमं यज्ञन्मयतोपहताः सोमस्प पियत ॥ ३४॥ इसका मधुई० ऋ०, सुराडा १० ८० ई०, पापो देवताहै मंत्रार्थ-हे जलो ! तुम (वात्राः, स्त्रतुरी, राधोगतः, अंमृतस्य, पत्नी,स्थ) शीप्रकार्यकारी,शत्रुहृदयमर्दनकारी, इष्ट कामनाके देने वाले सोमके पालक हो (देवीः, ताः, इमम्, देवत्रान, नयत) हे सम्पूर्ण निग्राभ्पदेवता इसमकारके तुम इस यज्ञको देवतामोंके मारा प्राप्त करो ( उपहूताः, सोमस्य, पिवस) यनुज्ञा को प्राप्त हुए तुम सोमको पियो ॥ ३४॥ माभेर्मा संचिक्या उजन्धत्स्व धिपणे धीवी मत्ती घोडयेयामूर्जन्दधापाम् । पाप्मा हतो न सोमः॥ ३५॥ इसमें मधुछदा ऋ० । भुरिगानु० छ। अस्य यावा पृथिवी दे० । मंत्रार्य-हे सोमसयूह तुम (मामः, मासंविषयाः अर्ज धत्स्व ) श्राघातसे भय मत करना, कम्पित मत होना, रस को धारण करो (धिपणे वीवी सती चोदयेथाम् उचं दधायाम्) हे द्यावापृथिवी रहताको प्राप्त हुई इस उपांशु सबनके प्रोपास और सोम सवनकोद करो, इस सोमके रसको द्धिकर बलमदान करो इस वनाघातसे यजमानके सम्पूर्ण (पाप्मा,हराः सोमःम ) पाप नष्ट होते हैं मौर सोम नहीं इस होता किन्तु संस्कारयुक्त होताह.. प्रागा गुगधराफ्मर्वतस्त्या दिशआधावन्तु! भम् निप्पर समरीर्विदाम् ॥ २६ ॥ A } शुक्लयजुर्वेद । इसका मधु ६० अ० घार्युष्णिक छ० सोमदेवता ई मंहार्य- (पाक, अपाक्, उदक, अधराक, दिशः सर्वतः त्वा प्राधावन्तु ) पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिणादि सम्पूर्ण दिशा सब ओर से तुमारे सन्मुख धावमान हों(हे अम्ब निप्पर भरी: सम्पिदाम् ) हे माता अपने भागोंसे सोमको पूर्ण करो, सब मना इस यज्ञ को जाने ३६ त्वमङ्ग प्रशंसिपो व शंपिष्ट मत्वम् ।न त्वदन्यो मघवनस्ति माईतेन्द्रप्रवीमितेष:। इसका गौतम ऋषि-पथ्या हसी यद्वा भुरिगाप्यनु० छं० इन्द्र देवता । मनार्थ-(भग शविष्ठ, मघवन, इन्द्रादेव,त्वं मर्यम् प्रशं. सिपः ) हे सर्वत्र प्राप्त, अतिशय वलवान सुखकारी धनवान पर- मैश्वर्य सम्पन्न परमात्मन् थाप इस मनुष्य यजमान को मशंसा देश हो (स्पद अन्यः मंडिया न अस्सि) आपके सिवाय और कोई मुख देनेवाला नहीं है (रो वचः प्रवीमि ) पापका, मापही मुखरूप हैं, यह वचन कहता हूँ ॥ ३७॥ इति शुश्यनुदान्तर्गत वानसनेवि संहिता का सानुवाद पष्ट भध्याय समाप्त । अथ सप्तमोध्यायः। छठे अध्यायमें यूपसंस्कारसे सोमाभिपत्र तक मंत्र कहे भव सातवें अध्यायमें ग्रहग्रहणके मंत्र कहेनाये हैं। ॥हरिः ॐ ॥ वाचस्पतये पयस्व पृष्णो अधनु- भ्यागभस्तितः । देवो देवेभ्यः पवस्व येपी भागोसि.॥१॥ इस कपिटकाम २ मंन । सबका गोतम कृषि है, इन्द ? का साम्नी ० २ श्रा० चौर देवा प्राण है। मंत्राध-हे सोम तुम (पृष्णः, अशुभ्याम्, गभस्तिप्तः, वाचस्पराये पवस्त्र) सम्पूर्ण कामनाके फलवी, अंशद्वय तथा हमारे हाथ से पवित्र हुए तुम माणोंकी भीतिके निमित्त इस पात्र में गमन करो, हे सोम (देना, देवेभ्यः, पवस्व, येषाम्, मागः असि) देवशारूप तम .. " ७ अध्याय। १८९ देवतोंकी नीतिके निमित्त इस पात्रमें गमन करो, जिन देवताओं का भाग हो ॥१॥ मधुमतीन इस्कृधि यत्रो सोमादाभ्यन्नाम जा. गृषि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा स्वाहोर्य- न्तरिक्षमन्वमि ॥ २॥ इस सं० में ३ मं० हैं । सबका गो० ० । बन्द १ या० ४० आयु०३ पासु० ज० और देवता सबका लिङ्गोक्ता है। मंत्रार्थ-. हे सोम (नः, षः, मधुमी: कृषि ) हमारे अन्न मधुर रसयुक्त मुस्वादु करो, (सोम ते यत्, भदाभ्यम्, मावि, नाम, सोम, तस्मै,ऐ, स्वाहा) हे सोम! तुम्हारा जो हिंसा शून्य, जागरणशील नाम है, (दे सोम रास्मै ते स्वाहा,स्वाहा उरु अन्तरिक्षम् गन्वेमि) हे सोम उस तुम्हारे निमित्त यह अशुद्वय फिर प्रदान करते हैं उद्देश्य देवताकी प्रीति निमिष यह भलीप्रकार पाहत होताहै, इस विस्तीर्ण अन्तरिक्षक मध्यमें गमन करता हूँ। स्वाइकृतोमि विश्वभ्य इन्दिपेश्यों दिव्येभ्यः पार्थियेभ्यो मर्मस्त्वाष्टुः स्वाहा त्या सुभय सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यो देवागो यस्मै स्वेहे तत्सत्यमुपरि प्रता भझेन हुतोसी फट प्राणाय त्या व्यानाय त्या ।। ३ ।। इस के० में ५ मंत्र हैं। सबका गो छ १ भू० मा० ज०२ या वृ०३ सा. प्रि०, ४, ५ दै० ४० है और देवता १ उपांशु २ देवा ३ लिंगोक्ता ४ ग्रह ५ उपांशु हैं । मंत्रार्थ-हे प्राणरूप उपांशुग्रह ( विश्वेभ्यः, इन्द्रियेभ्यः, पार्थिवेभ्यः, दिव्येभ्यः, स्वोकसः, असि ) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे सम्पूर्ण पार्थिव द्विपद चतु- प्पद और दिन्य प्राणियोंसे स्वयं मादुर्भत हो (मनः, त्वा, अन) मन प्रजापति तुम्हारे प्रति आधिपत्य कर (मुभव, स्याय, त्वा, स्वाहा ) हे प्रशंसिराजन्मन् सूर्यरूप प्रभापतिकी मीशिके निमित्त समको आहुत करता हूँ यह भासि मुन्दररूपसे गृहीतहो, पहले, .
: शुक्लयजुर्वेद । पान ( मरीचिपेभ्यः, देवेभ्यः, त्वा) मरीचिपालक देवगणकी हमिके निमित्त तुमको मार्जन करता हूँ (देव, अशो, यस्मै, स्वा, है, यद, सत्य, उपरि, मुता, भोन, इतः, असौ, फट) हे दीप्य- मान अंशुदेव जितके अभिचार मारणादिकी कामनाके निमित तुमको गार्थना वा साधन करता हूँ वह यह अमुक मेरा शत्रु सत्य. दी अकस्मात् प्राप्त हुई महापीडासे निहरा हुआ यह शत्रु विशार्ण होजाय-हे उपांशुसवन (धानाय, स्वा) व्यान देवताकी प्रीतिके निमिन 'तुमको इस स्थान में स्थापन करता हूँ ॥३॥ उपग्रामगृहीतोस्यन्तच्छ मघधन्पादिसोमम् । - उरुष्य राय एपो यजस्व ॥३॥ इस मंत्रका गो छ० मागा० वि० इन्द्रदेवता है। मंत्रार्य है अन्तरीम ग्रह सोमरस तुम (उपयामगृहीतः, असि, मयः वन, यन्तः, यच्छ, सोमम् पाहि,) क्षुद्र कलश द्वारा गृहीत हो, देइन्द्र ! तुम इस गृहीत सोम रसको अन्तर्यह पात्र में ग्रहण करो सोमरसको शत्रु थादि से रक्षाकरो तथा (रायः, 'उरुष्य, इषः, भा, यजस्व) पशुओं को रक्षाकरो, मनोकोसब प्रकारसे दो॥४॥ अन्तस्ते याचापृथिवी दधाम्यन्ताम्युर्ष- न्तरिक्षम् । मवेभिरपरैः परश्चान्तराम मघवन्मादयस्व ॥ ५॥ इस मंत्रका.गो० ऋ०। भापपिं० छ० और मघवा देवता है। माम्बाय-दे मघवन्(से,गवापृथिवी, भन्तर्दधामि,उरू, भन्नारिक्षा अन्दामि ) पापके अनुग्रहसे स्वर्ग, मोर पृथ्वी अन्तः स्थापन करशाहूं, विस्तीर्ण अन्तरिक्षको धावापृथिवीके मध्यमें स्थापन करताहूँ (मघवन अवरःपाः देवः अन्तर्यामे मादयस्व) हेइन्द्र ! पृथ्वीकै स्थानवाले स्थान निवासी देवताओं से समान प्रीविषाले तुम अन्तर्याम ग्रहम अपने को तृप्तकरो। स्वाकृतोषि विश्वभ्य इन्द्रियभ्या दिध्येभ्यः '. पापिवेभ्यो मर्नस्त्वाष्ट्र स्वाहा, । स्वा सभा - सजू ६ अध्याय सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्य उदानाय त्या|६|| इसके में ३ मं. हैं। सबका गो० ऋ० है। छ०१ मुरिग्मा० २ या०३० ३ दै० पं० और देवता १ अन्तर्यामीर देव ३ ग्रह है। मंत्रार्थ-मयम दूसरे मं० की व्याख्या इस अध्यायके ३ मंत्रमें है हे अाम ग्रह (पदानाय त्वा) उदानं देवताकी प्रीति के निमित्त तुझको इस स्थान में स्थापन करता हूं ॥ ६ ॥ आ वायो नूप शुचिपा उप नः महन्ते नि- युतो विश्वधार । उपो ते अन्धो मर्चमयामि यस्य देय दधिषे पूर्णपेय वायचे त्या ।। ७॥ इस मंत्रका वशिष्ट प्राप निचूदापी ज०ई० वायुदेवता । मंत्रार्थ-(शुचिपाः, वायो, ना, प, शाभूप, विश्ववार, ते, सहसं नियुतः, मघम्, अन्धः, रो, उप, मायामि) हे भग्ने ! पवित्र पानकारी वायुदेवता तुम हमारे समीप वागमन करो, तृप्तिका करने घाला सोम लक्षण अन्न तुम्हारे समोपमें समर्पण करके भिज- बाता हूँ ( देव, यस्य, पूर्वपेयं, दधिपे ) हे दीप्यमान वायो जिस सोमका प्रथम वपट्कार लक्षणवाला पूर्वपान तुम धारण कियेहो उसीको इससमय तुम्हारे निकट उपस्थित करते हैं ॥ ७ ॥ इन्द्रवायू हमे सुताउप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो पामुशान्ति हि । उपपामगृहीतोसिवायंघ इन्द्र- घायुयान्वैप ते योनिः सजोषोभ्यान्त्वा ।। इस कं० में २ मं० हैं सबका मधु. १०,०१, आप गा०२ मुराडा० गा० और देवता १ इन्द्रवायू १ इन्द। मन्नार्थ-(इन्द्रवायु इमे, सुसाः, मयोभिः, उप भागतम्, हि, इन्दवः। चाम्, उनि) हे इन्द्रवापू । तुम्हारे निमित्त यह सोम प्रस्तुत किये है, इस } सोमरसरूप अन्नपानके निमित्त हमारे समीप बाइये, जिसकारण कि यह सोमरस तुम्हारे प्रिय होने की इच्छा करते हैं, हे तृतीय ग्रह सोमरस तुम (वायवे, उपयामगृहीतः, पास ) वायु देवता के उद्देश्यसे उपयागपत्र द्वारा ग्रहण कियेगये हो (इन्द्रमायुभ्यां .
१९२ शुक्लयजुर्वेद । त्वा ) युगचर इन्दवायु देवताके संतोष निमित्त तुमको ग्रहण करता हूं, इन्द्र वायु ग्रह ( पपः, रो, योनिः, सजोषोभ्यास, त्वा) यह तुम्हारा स्थान है, युगचर इन्द्र वायु देवतादपकी प्रीसिके निमिरा तुमको इस स्थानमें स्थापन करता है॥ ८॥ अयं वा मित्रावरुंगा सतः सोम ऋतावृधाः । ममेदिह श्रुत हवम् । रुपयामगृहीतोसि मित्रा- घरुणाभ्यानया ॥९॥ इस के० में २ ० हैं। सबका गृत्समद ऋ० है। छ. १ पापी मा० २ बासुरी गा० और देवता सबका मित्रावरुण है। मंत्रा- (मित्रावरुणा, ऋताधा,चाम्, अर्थ, सुताइइ, ममेव हवम् श्रुराम्) हे मित्रावरुण, हे सत्य, तुम्हारी प्रीति के निमित यह सोमरस मस्तुत किया है इस यज्ञ में हमारे ही इस माद्वानको थवय करो हे चतुर्थग्रह सोमरस तुम (उपयामहीतः, मासे, मित्रा- बरुणाभ्याम्, त्या ) पिनावरुण सहक उपयामपानमें गृहीत हो मित्रावरुणु संज्ञक देवताओंकी प्रीसिके निमित्त तुमको ग्रहणकरलाई रापा व समवासौ मदेम हव्येन देवा पर्व सेन गाः । तान्धेनुर्मित्रावरुणा युपनो वि. थाहा धत्तमनपस्फुरन्तीमेप ते घोनिऋता. युभ्यान्त्वा ॥१०॥ इसके २ ० हैं । सबका त्रिसदस्यु ०ई०१ मा त्रि०२ याजुपी पं० और देवसा १ मित्रावरुणौ २ ग्रह है। मंत्रार्थ जिस गौ घरमें होने से (चर्य, राया, ससबासः, मदेम, देवाः, हव्येन, गावः,वसेन, मित्रावरुणा, युवम्, ताम्, अनपस्फुरन्तीम्, धेनु, मः, विश्वाहा, धचम् ) हम धनसे सम्पन्न होकर प्रसन्न होते हैं, देवगण हविपानेसे जैसे प्रसन्न होरोई, गौ से यासादि से प्रसन्न होती है, हे मित्रावरुण देवनामों तुम उस दूसरे पुरुष के निकट न जानेवाली धेनु को हमारे निमित सर्वदा प्रदान करो (५५ः, के, योमिः, ऋतायुभ्याम् त्वा .) हे ग्रहयह तुम्हारा स्थान ७ अध्याय । है, मित्रापरुण देवता ! मन की समुष्टिके निमित्त तुमको इस स्थानमें स्थापन करता हूँ ॥१०॥ या वारशा मधुमत्पविना सूनुतापती तो यज्ञम्मिमिक्षतम् । उपयामगृहीतोस्थश्विभ्यो- . न्स्यैप ते योनिर्माधीभ्यान्त्वा ॥ ११ ॥ इस कंमें मं० हैं। सबका मेधातिपिषि है । ६०भुरिगा- गा० १ याजुपी प्रि० और देवता १ अश्विनौ २ ग्रह। मंमा (अश्विना, पाम्, या, कशा, मधुमती, सूनृतापती, तया, याम्, मिमिक्षराम् ) हे अश्विनीकुमारदय तुम्हारी को प्रकाश करने बाली पाणी समयसी यामण उपनिषद प्रशंसा से युक्त. प्रिय और सत्यतासे युक्त है पर वाणीसे इस पत्र को सींचकर पूर्ण करो। हेपंपमत्रह ! तुम अश्विनी देवता की नीति के निमित्त इस (उपयामगृहीतः, असि, एपः, . रो, योनिः, माध्वीभ्यान्त्वा) पयाम पानमें ग्रहण कियेहुए हो हे अरिषग्रह ! यह तुम्हारा स्याग है, मधुमय मन बाह्मण पड़नेवाले परिघगीकुमार के निमित्त तुमको प्राण करता हूं ॥ ११ ॥ तम्पृत्ना पूर्वी विश्वधेमी ज्येष्ठतालिम्ब- हिपद स्वचिदम् । मतीची बृजनं दोहसे धु. निमाशुवर्यन्तमनु यासु पसे । उपयामही- तोमि शण्डायवैषतेपोनिरिताम्पायपमृदा शकश देवापां शुमपाः प्रयन्त्यनाधृष्टासि॥१२॥ इस कं० में ५० हैं । सबका यस्सार काश्यप नापि है।०१ निनु० ज०, २ आर्युष्णि. ३ या गा० ४ या०५०५ दै०५० और देवता १ विश्वेदेवा २ ग्रह ३ लिंगोक्ता ४ आभिचारक ५शुरूपा १ वेदिश्रोणि । मंत्रार्थ-हे इन्द्र! तुम (पासु, अनुब से तम, ज्येष्ठमातिम्, वाहपदम्, स्वर्विदम्, धुनि, मानम्, जयन्तम्, जनम्, दोहसे ) जिन यज्ञ क्रियानों में पुन: पुन: सोमरस पान करकै रद्धिको प्राप्त होवे हो चप्त होतेदो, उस उत्कृष्ट विस्तारमान शुक्लयजुर्वेद । सर्पज्येष्ठ यज्ञ में फुशासनके सेवी स्वर्गवेता शत्रुओंको कम्पित करने याले जेवण्य वस्तुमा को शीघ्र जीतनेवाले हम बलपूर्वक यइफल को यजमानके प्रति देतेहो (प्रलया, पूर्वथा, विश्वथा, इमथा, रो) समस्त यज्ञके माचीन नियम की समान पूर्वमयाके अनुसार सब प्रकार इस समयके यजमानकी समान इस यज्ञका फल दो हो, ऐसे भापकी हम स्तुति करते हैं, हे षष्टाह ! शुक्र (उपयामगृहीता, भसि, शण्डाय, स्वा) तुम उपयामपानमें गृहीत हुप हो, शण्ड नामक भनके निवासके निमित्त तुमको ग्रहण करता हूँ (एपः, ते योगितवीरवां, पाहि ) यह तुम्हारा स्थान है इस स्थानमें अव: स्पान करके यजमानके वीरत्वकी रक्षा करो (शएडा, अपमृष्टः शुक्रपाः, देवाः, त्या, मीणायन्तु ) भारलेवा अपमानित हुमा हे अह शुकमामक ग्रह में स्थित सोमपान करनेवाले देवता तुमको निरापद माहवमीय स्थानमें गाप्त करें; हे उत्तर,वेदी श्रोणी तुम (अनाधृष्टा, भसि ) भनुपहिसित हो, भी तुम्हारे द्वारा इस ग्रहको दानि नहीं पहुँचसकती ।। १२.॥ मषीरों धीरान्प्रजनयपरिभि गयस्पोर्पण यजमानम् । गजरमानो ढिवा पृधिव्या शुक्रः शुक्रशोचिण निरस्तः शण्ड: शुक्रस्पांधिष्ठा- नमस्ति ।। १३॥ इस क में 8 ० हैं। सबका परसार काश्यप ऋ० छन्द १साप० २ साम्न्यनु०३ देवी पं०४ मा० गा० और दे०१,२ का शुक ३ मभिचारक ४ सकल मंत्रार्य-है. यह तुम (मवीरः, वारान, मजनयन्, रायस्पोपण, यजमानम्, अभि, परीहि) सुन्दर पारगासे युक्त हो इस यजमानके शूरसासे युक्त पुत्र भृत्यादिको पत्पन्न करते हुए, अनेक प्रकारकी धन पुष्टिद्वारा यजमानके ऊपर कपाकर सब प्रकार से प्राप्त करो (शुक्रा, नशोचिपा, पृथिव्या, दिवा, सनग्मान:) यह शुक्रग्रह भएनी पवित्र कानित के साथ पृथिवी और लोकसे संगति को प्राप्त होकर दीप्तिमान होरा ६ अध्याय। . है (शरः, निरस्ता, शुक्राय, अधिष्ठानम्, असि ) शण्डनामक अमुर दूर हुश्रा, हे यूपकाष्ठ खण्ट! सुम शुक्रग्रहके अधिष्ठान हो १३ अन्निस्प देव सोम मुषीर्यस्य गायस्पो- पस्य दद्वितारः स्याम । सा प्रथमा संस्कृति वियोगस प्रथमोपणो मिनो अग्निः॥१॥ इस क. में २ म० हैं।सबका वत्सार काश्यप ऋ०ई० १मा० पं०१ विराही त्रिऔर देवता १ सोम २ इन्द्र है। मगार्थ- (सोमदेव, अच्छिन्नस्य, वीर्यस्प, रो, रायसोपस्प, ददितारः, स्थाम) हे सोमदेवता खण्डरहित निरन्तर कल्याण प्रभावपाले चली, भापके प्रसादसे हम धनपुष्टिके देनवाले हों (सा, विश्व- वारा, संस्कृतिः, प्रयमा, वरुणः, मित्रः, सः, अग्निः, प्रथमः) वह सम्पूर्ण भत्विग्नगों से वरणीय यह. संस्कार क्रिया, जिसकारण कि इन्द्र के निमिरा कीजाती है, इससे यह मुख्य है और जगत्की उत्पत्ति का कारण होने से सोमका, वरुण, मित्र और यह मग्नि- देवता मुख्य भृत्य है ॥२४॥ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा इन्द्राय मु. तमार्जुहोत साक्षी तृप्यन्तु होला मध्यो पाः खिष्टापासुमीताः सुता यत्स्वाहायोडग्नीत्।।१५।। इस कं० में २ में हैं। सबका वत्सार काश्यप ऋई. १प्रा०प० २ दै०० और सबका होत्रा देवता है मंमार्थ-(स:, चिकित्वान्, वृहस्पतिः, मथमः, तस्मै, इन्द्राय, सुगम् स्वाहा, प्राजुहोत ) वह अनुपम चेतनावान् महाबुद्धित्तम्पन्न बृहस्पति मुख्यमंत्री है, उस इन्द्र के उद्देश से यह प्रस्तुत सोमरस आहुत होता है यह श्राति भलीमकार स्वीकार हो, इस मकार माहा- कार कर हवन करो(होत्राः, तृप्यन्तु, याः, मध्वः, स्विष्टाः,या:,. प्रीताः, यत्, स्वाहा, मुहताः, अग्निः, अयाट्) छन्दों के अभिमानी वे देवता रप्त हों जो मधुस्वादवाले सोम को इष्टवाले प्रेम करने वाले जो अत्यन्त प्रसन्न हैं, जिसकारणसे स्वाहाकार द्वारा होम , - .. शुक्लयजुर्वेद । के निमित्त नियुरू हुए हैं, शुक्रग्रह सोमसम्पन्न हुथा ।।१५।। अपं नधोदयत्पृनिंग ज्योतिर्जराय रजसो विमाने । ममपासंगमे सूर्यस्य शिशुन्न विमा मतिनी रिहन्ति । उपयामठीतोसि मीयत्वा ।। १६॥ इस के० में २ म० हैं। सबका यत्सार का० ऋ०। पं० रनिय०नि०, साम्नीगा. और देवता १, सोम मंत्रार्य- (भयं, ज्योतिर्गरायुः, पेगा, रजसः, पृश्निगर्भाः, अघोदयत् ) यह विद्युत् लक्षणवाली ज्योतिसे वेटिरा कान्तिमान चंद्र जलके निर्माण करने में पालों को मेरणा करता है (विमाः, सूर्यस्य, अपां संगमे, इम, शिशु, न, मातीमः, रिहन्ति ) युद्धिमान ग्रामण सूर्य के जलकी सातिके समयमें इस सोम को मिपपुमकी समान बुद्धिपूर्वक पाणियों से स्तुति करते हैं है सप्तग्रह तुम (उपयामग्र- होस, भसि, मीय, स्वा.) उपयाम पात्रद्वारा ग्रहण कियेगये हों मर्क असुरके निमित्त तुमको स्थापन करता हूँ। १६ ।। ममोनयेषु एपनेषु सिग्मं पिणः शायो धनुयो चन्ता । आ यः शांशिस्तुविनम्णो अस्या श्रीणीतादिशं गर्भरताप ते पोनिः मजाः पा: छपमाटोमर्को टेपास्त्वामधिपाः मयस्त्वना धृष्टासि ।। १७॥ इस कं. में ४ मा हैं । सबका वत्सार का. छ. १ मा. पं० २ या ३०३ या०५०४ या गा० चौर देवता १सोम २ ग्रह । मन्यि ४ भाभिधारक मित्रार्थ-(द्ररम्मा, विपा, शच्या, मनोनपेपु, वनेषु, तिग्म, धनुथः, यः, सुविनम्णः, गभस्तो अस्य, शोभिः, भादिशम, प्रश्रीणीत ) हस्त, क्षिप्रकारी, बुद्धिमान् कर्मद्वारा मनके उत्साहपूर्वक जिन सोमरसके इवनामें मनकी. समान तीक्ष्ण उत्साहसे विशेष मन लगाये रहे हैं जो बहुत धनवाला ऋत्विक, हायोंमें स्थित इसको पहली समूह के द्वारा ७अध्याय। १९७ , मर्क सब भोरसे सक्तुभोंसे मिश्रित करता है, हे मन्यिग्रह (ते, एपः, योनिः, मजाः, पाहि, मर्कः, अपमृष्टः ) तेरा यह स्थान है, इस स्थान में स्थित करते यजमान की मजाकी रक्षा करो, असुर अपमाभिरा हुभा हे मन्थीग्रह ( मन्यिपाः, देवा त्या; मग्णयन्तु, अनाधृष्टा, असि) मन्यिा हके पान करनेवाले देवता तुझको यज्ञ स्थानमें प्राप्त कर हे दिधोणी अनुपहिसित हो ।। १७ ।। मुमजा मसाः प्रजनयन् परीघमि रायस्पोपण यजमानम् । मञ्जरमानो दिया पृथिव्या मन्धी मन्थिशोचिषा निरस्तो मका मन्धिनौधिष्ठा- नमसि ॥१८॥ इस कं. में ४ में हैं। सबका वत्सार का० ऋ०।२० १ सा० वि०, २ साम्न्यनु., ३ देवी पं०, ४ माजपत्या गा. और १, २, मन्यि दै०, ३ भाभिचारिक, ४ शरुले । मंथ-हे यह (मुपजाः,मजाः, प्रजनयर, रायस्पोपेण, यजमान, अभि परीहि) तुम सुप्रजा हो यजमानसम्बन्धिनी प्रमाको उत्पन्न करतेहुएधनकी पुष्टिके साप यजमान के संमुख श्रागमन कीजिये (मन्थी, मन्पिशोषिपा, दिना, पृथिव्या, सहच्छमानः) यह मन्थी नाम ग्रामपनी वारिससे धुलोक और भूलोक के सहित संगतिको माप्त होकर यूपकी पालना करता है ( म निरस्तः, मन्यिनः अधि- डानम् मसि) मर्फ निरस्तहुआ दूर हुश्रा, हे यूपकाष्टखएट तुम मन्पीयहके अधिकरण हो ॥ १८॥ ये देपासोदिव्येकादश स्थथिव्यामध्येकादश स्थ । अपमुक्षितो महिनैकादश स्थ, देवासो यहमिम पाइयम् ॥१९॥ इसका परुच्छेप का भुरिगा पं० छं० विश्वदेवा देवता है। मंत्रार्य-( देवासः, ये, महिमा, दिषि, एकादश, स्थ, प्रथिम्यां, भधि, एकादश स्प) हे देवतायो ! जो तुम अपनी महिमा के अमावसे युलोक में सवार हो गया महाभाग्य होनेसे पृथिवी के " , पात्र शुक्लयजुर्वद। ऊपर ग्यारह हो (अक्षिता, एकादश स्थ, देवासा, , इमम्, यजम्, जुपध्वम् :) भसरिल में भी ग्यारह स्थित हो हे देवतामो इस यज्ञको सेवन करो ॥ १९ ॥ उपयामगृहीतोत्यागूगणोमि स्वाग्रयणः । पा. दिपज्ञम्पाहि यज्ञपति विष्णुस्त्वामिन्ट्रियण. पातु विष्णुत्वम्पाघभि सर्वनानि पाहि ॥२०॥ इसका पञ्छर ऋषि है, पं. निवृदपिग छ भाग्रयण देवताई। मंत्रार्थ-ई ग्रहः तुम (सपयामगृहीतः, असि, प्राग्रयणः स्वाग्रयणः, भसि, यज्ञ, पाहि, यज्ञपि, पाहि, ) उपया द्वारा गृहीरा हो भाग्रयण नामवाले श्रेष्ठताले मात करनेवाले हो, इस यज्ञकी रक्षा करो यापति यजमानकी रक्षाकरो (विष्णः, इन्द्रियेण, त्वां, पातु, स्वं, विष्णु, पाहि, सवनानि, भाभि,पादि) यस के अधिपति विष्णुदेच, अपनी सामर्थ्य से तुमको रक्षा करें तू भी यादेचको रक्षाफर मातरादि तीन सवनको सब भोर से रक्षा कर ॥२०॥ · सोमः पवते सोमःपयतेम्म प्रायपोस्मै क्षत्रापास्मै सुन्वते यजमानाय पचत इप फर्ज पवद्धः ओषधीभ्यः पयते चापापृधिषीभ्याम्पो सु- भूताय पघले विश्वभ्यस्त्वा देवेभ्यः । एप से योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः ॥ २१ ।। इस कं० में ३ मं० है। सबका परुछेप मा० है। छ. १६० बा०प०, २० ज०३ यात्रु०० और देवताविश्वेदेवा, २, },ग्रह। मंत्राय ( सोमः, भरम, ब्रह्मणे, सोमः, भस्म, क्षत्राय, पवसे, भस्मै, सुन्चरो, यजमानाय, पवते, भद्भयः, भोपधीभ्यः, पवते, ) यह सोम, इस ब्रामण जाति की भीति के निमित् ग्रह- पात्रमें क्षरित होता है, सोम इस प्रजातिकी तुष्टिके निमित्त ग्रहंपा) क्षरित होता है इस सोमामिषव करने वाले यसमाम के ६ अध्याय। १९९. निमित्त ग्रहपाप्रम क्षरित होता है, शादी पपीके निमिस मोपषि- यों से परिव होता है (यावापृथिवीभ्याम्, पवरो, समूगाय, पयते विश्वभ्यः, देवेभ्यः, वा) दोनो लोक की सन्तुष्टसाके निमिच सरित होताहै, लोकप्रय और समस्त पराचर की संतुष्टताके मिमिरा क्षरित होता है, समस्तके ही आनन्द के निमिच यह सोम ग्रह पात्र में क्षरित होता है,हे मह (एषा, रो, योनिः, विश्वपा, देवेभ्यः, स्वा, ) यह तुम्हारा स्थान है सम्पूर्ण देवताओं की प्रीति के निमिश तुझे स्थापन करता हूं ॥ ११ ॥ उपयामगृहीतोसीन्द्रीय त्या बृएईते पर्यस्वत उफ्याव्यगृह्णामि । यत्तइन्द्र सहवयस्ती त्या विप्णये त्यैष ते योनिरुत्थेभ्यस्त्वा देवेभ्यस्त्या देगव्यङ् यज्ञस्पायुपे गृह्णामि ॥२२॥ इक में ३ में सबका परुच्छेप मूलाई श्राप पं.२ दे ज. १ भार्थी गा०और सबका लिङ्गोक्ता देवता । मन्त्रार्थ-हे उपयप्रद ! (उश्याव्यम्, त्वा, बृहदते, ययस्वते, इन्द्राय, गृहणामे) उक्य साहित्य देवताओंका सिकारक जानकर तुमको हत्साग सोमरूपं भन्नवाले इन्द्र देवताकी मीति के निमित्त ग्रहण करता हूँ (इन्द्र, यत्, रो, सदव, वयः, रास्मै, स्वा, विष्णव, त्वा) हे परम भाग्यवान इन्द्र जो तुम्हारा महान सोमकप अन्न है उसके पागे के निमित तुम्हारी गार्थना करते हैं, हे सोम यज्ञ के अधि- हामी देवता विद्याकी प्रीति के निमित तुझको ग्रहण करता हूँ हे उपग्रह ( एपः, रो, योनिः, उक्षेभ्यः, त्वा) यह तुम्हा स्थान है, उपयमियदेवताओं की प्रीति के निमित्त तुमको इस स्थान में स्थापन करता हूँ हे सोम (देवाव्यम्, देवेभ्यः, वा, यज्ञस्य, भायुपे,गाणामि) मित्रावरुणादि देवताभोंके प्रीतिकारक जानकर देवताओंकी सन्तुष्टिके अर्थ तुझको ग्रहण करता हूँ, यज्ञकी समाप्ति के फल पर्यन्त ग्रहण करता हूँ ॥ २२॥ - २०० शुक्लयजुर्वेद। मिनावरुंगाभ्यान्मादेवान्यं यज्ञस्यायुषे गृणा- मीन्द्राय त्या देवाव्यं यज्ञस्थागुषे गृहणमीन्द्रा- ग्निपान्त्वा देवाव्यं यज्ञस्पायुपे मृणामीन्द्रा- यणाभ्यान्त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुपे गृणामीन्द्रा घहस्पतिभ्यान्त्वा देवाव्य यज्ञस्यायुपे गृणा- मीन्दायिष्णुभ्यान्त्वा देगव्य य॒ज्ञस्यायुपे गृ. हणामि ॥ २३ ॥ इस फै० में ६ मं० है । सबका परच्छेप ऋ० १६०१ प्राची गा०, २, श्रासुरी गा०, ३ माजापत्यानु० ४. प्राी गा. ५नियुट् मा० ६ भुरिग सामन्यतु और सबका लिंगोक्त दे। मंत्रार्थ ( देवाव्यम्, मित्रावरुणाभ्यां, यज्ञस्य, भापुरे, स्वा, देवाव्यम्, इन्द्राय, यइस्य, प्रायुपे, स्वा, ) देवगणों की वृप्ति कारक जानकर मित्रावरुण देवताकीमीरिके निमिच यज्ञकी निर्विन समाप्ति के निमिच हम भंश को ग्रहण करनाई देवगणों की दीप्त कारक मानका इन्द्रदेवता की प्रीति के निमित्त यज्ञ समाति के निमित्त तुझको ग्रहण करता हूं (देवाव्यम्, इन्द्राग्निभ्याम्, पश स्थायुपे, त्वा, देवाव्यम्, इंद्रावरुणाभ्याम्, यज्ञस्प, पायुपे, त्वा, देवाज्य, इन्द्रावृहस्पतीभ्याम्, त्वा, यस्ग, प्रायुपे ) देवसराहोंका प्रतिकारक जाम इन्द्र भग्निदेवताके निमित्त पाकी समाप्ति के मिमित तुझको प्रहण करता हूं, देवगणोंका प्तिकारक मानकर इन्द्रवरूण देवता की प्रीति निमित्त याकी निर्विघ्न समाप्तिके गिमिश तुझको ग्रहण करता है, देवगणोंका सिकारक नामकर इन्द्र पौर हसति देवता की भीषिके निमित्त तुमको ग्रहण करता है, पक्षको निर्विघ्न समासिके निमित्त तुमको प्रहण करता हूं, (देवाव्य, इन्द्राविष्णुभ्याम्, यहस्प, घायुपे, त्वा ) देवताओंका प्तिकारक जानकर इन्द्र पौर विष्णुदेवताकी प्रीतिके निमित्र या की निर्विघ्न समाप्ति निमित्त सुझतीसरेअंशको ग्रहणकरसाहस ७ अध्याय। . , मूनिम्दिषो अतिम्पृथिव्या वैश्वामरमत मा. जातमग्निम् । कृषि मम्राजमतिथिजनाना- मासन्नापात्रञ्जनयन्त देवाः ॥ २४ ॥ इसका भरद्वाज ऋ० आर्षी त्रि०० वैश्वानर दे मंत्रार्थ. (देवाः, दिवः, मदीन, पृथिव्याः, शरतिम, वैश्वानरम्. रो, श्राजासम्. कविं, सम्राजम्. जनानां, अतिथि, अग्नि, पापाचं, अननयन्त ) देवताओंने लोकके मस्तकस्वरूप सूर्यरूपसे प्रका- शिव पृथिवीके सीमास्वरूप जाठरानिरूपसे समस्त नरलोक के हितकारी यज्ञ में अरणीद्वयसे उत्पन्न, अविचल तथा दीप्तिमान्, क्रान्तदर्शी, भक्तों के सम्मुख होनेवाले, नक्षत्रमण्डलीमें सम्राट यज मानादि समस्तजनोंके अतिथिवद, इविसे पादरणीय इस- माग्निको मुख्यपान चमस करके प्रकट किया ।। २४ ॥ उपग्रामगृहीतोसि धुवासि पाक्षितिष्ठवाणा- मधुवतमोच्युतानामच्युतक्षितम एप त योनि- बचानराप त्वा । ध्रुवन्धुघेण मनसा याचा सोममर्चनयामि । अर्थान इन्दु इद्विशो सपनाः समममस्करत् ॥२५॥ इसके० में ४ म० हैं।.सबका भरद्वाज ऋ० । छं० १ नि- दार्ण्यनु०२ या०वि०३ नियसाम्नी वृ०४ निच्यूदा गा. और दे० १, २, ३, ध्रुध, ४ इन्द्र है । मंत्रार्थ-हे सोम ! तुम (उपयामगृहीतः, प्रसि, धुवक्षिसः, ध्रुवाणां, ध्रुवरामः, अच्युतानां अच्युततितमः, ध्रुवः, अति) उपयामपात्र में गृहीत हो स्थिर निवासकाले समस्त गृह नक्षत्र मण्डलकी अपेक्षा अत्यन्त मधल तथा च्युतिरहित पात्र में निवास करनेवाले, ध्रुवनामसे प्रसिद्ध हो । ध्रुवदेवके प्रीति के निमित्त तुमको ग्रहण करता हूं । हे ध्रुवग्रह ! (पपः, ते, योनिः, वैश्वानराय, त्वा, ध्रुवेण, मनसा, वाचा, ध्रुवंसोम, भवन यामि ) यह वेरा स्थान है, समस्त नरलोक के हितकारी देवकी नीति के निमित्र तुमको इस स्थान में स्थापन , - , शुक्लयजुर्वेद। करता है, स्थिर मन और वाणीसे इस ध्रुवग्रहमें स्थित सोमको होहमचस पात्रान्तरमें सिंचन करता हूं, (अय, भा, इन्द्रः, इन् मः, विशः, असपत्नाः, समनसः, करव) इसके अनन्तर इन्द्र देवता ही हमारी प्रजाको शत्रुशन्य स्थिरमा करें ॥ २५ ॥ यस्तै दृप्स स्कन्दति यस्ते अशुनावच्युतो धिषर्णयोरुपस्यात् । अवोपरि वा यः पवित्रात्तन्ते जुहोमि मनसाधपटकृत स्वाहा । देवानांमुत्क्रमणमसि ॥२६॥ इस कं० में ३ मं० हैं। सबका देवश्रवा ऋ० है। ई०१ भरिगा त्रिदैन्यु०,३ यापु० जा और देवता १, सोम २ अग्नि, ३ चत्वाल मंत्रार्थ-दे सोम ( ते, यः, द्रासः, स्वान्दति, यः ते, अंशुः, ग्रावन्युनः, विपणयोः, उपस्थान, वा, अध्वरयोः, वा, यः, पमित्राद, परितं, मनसा, चपट्नं, साहा, जुहोमि ) तुम्दारा, लो, किञ्चित् रस, पात्र में करते समय भूमि में पतित होताहै, और जो तुम्हारा खण्ड अभिपत्रकाल में पत्थर द्वारा कण्डन करते करते ग्रावच्युग होकर इधर उधर उड़ताई और जो तुम्हारा अंश रस अधिपवण फलक के मध्य से गिरता है या पर्यु के व्यवहार समयमें जो कुछ नष्ट हुआ है, या जो पवित्रता से सकल रसविन्दु भूमिमें पतित हुई है, हे सोम तुम्हारे यह सत्र अंश'मनसे ग्रहण कर वषट्कारपूर्वक स्वाहाकारपूर्वक माहुति प्रदान करता हूं हे. पत्वाल तुम (देवानां, उत्क्रमणम्, असि) देवताभोंके स्वर्गगमनके सोपान हो ॥ २६ ॥ ..." माणार्य मे वादा वर्चसे पवस्व व्यानाय मे वर्जेदा वर्चसे पवस्वोदानाय मे वर्णोदा वर्चसे पवस्व वाचे में वर्जेदा चर्चमे पवस्व ऋतू द. क्षाभ्याम्मे वादा पसे पयस्य श्रोग्राय मे बादा चर्चसे पयस्व पक्षुभ्याम्मे पदग्गी व- चसे पवेधाम् ।। २७ ।। . . 17 ७ अध्याय . . , . इस कं० में ७ में हैं। सबका देवश्रवा ऋ० छं० १ भामु- नु. २, मासुर्यनु०३, मामुटुंगिणक, ४ साम्नी, गायत्री ५ सासुरी गा० ६ पासु० ७ आसुयुः । मंत्रार्थ-यह ग्रह यज्ञ के. प्राण है इसकारण प्राणरूपसे स्तुति करते हैं; हे उपांशुग्रह ! जिस कारण से कि तुम स्वगावसे (चर्चीदाः, मे, प्राणाय, वर्चसे, पस)रोज के देनेवाले हो इसकारण मेरे हृदय में स्थिरा माणवायु में रोज बढ़ाने के निमिा प्रवृत्त होमो। हे उपांशु सवन ! तुम स्वभावसे ही ( वर्नादा, मे, व्यानाय, वर्षसे, पवस्व ) कानित देनेवाले हो, मेरे व्यानवायुसम्बन्धी कान्तिके बढ़ाने के निमित महरा होमो, हे अन्तर्याम ग्रह जिसकारणसे कि तुम (पर्बोदा: मे, उदानाय, वर्चसे ) कान्ति देनेवाल हो मेरी उदानवायुसम्ब- न्धी कानको वहानके निमित्त महरा होमो, हे इन्दवायव ग्रह सुन स्वभाव से ही (पदिाः, मे, वाचे, पर्चसे ),कान्तिपद हो, मेरी चामयसम्बन्धी कान्ति बढ़ाने के निमित प्रय होयो, हे मैत्रा- वरुण ग्रह तुम स्वभावसे (वर्षोदाः, मे, ऋतू. दक्षाभ्यो, वर्चसे पवस्त्र ) कानि देनेवाले हो मेरे कामना और समृद्धि तथा कार्य निपुग्णसा सम्बन्धी कारन्तके वढाने के निमित प्रत्त होओ। हे माश्विन ग्रह तुम स्वभावसे ही (च!दा., मे, श्रोत्राय, पर्चस, पवस्व ) कान्ति देनेवाले हो मेरे श्रोत्रेन्द्रियको कान्तिदानके निमित्त प्रत्त होयो हे शुक्र ! और मधिग्रह जिसकारण कि तुम (व!- दसो, मे, चक्षुभ्याम्, वर्चसे, पयाम् ) स्वभावसे ही कान्तिप्रद हो मेरी नेसम्बन्धी कान्तिको बढ़ाने के निमित्त श्वत होनो २७ आत्मने में चर्चादा पर्चसे पस्यो मे वादा चर्चसे पयस्वायुपे मे पोंदा चर्चसे पचस्व वि- इयाभ्यो मे मुजाभ्यो वर्नोदमी पर्चसे पधाम् ॥ २८॥. इस कं में ४ मन्त्र हैं। सरका देवश्रवा ऋ है।ई० १,२, ३ का सासुर्थनु०.४ भुरिग्साम्न्यु० और देवता सबका लिंगो है। मंत्रार्य-हें पारायण ग्रह ! ( चर्चादा, मे, मात्मने,.
- २०४ कुशक्तयजुर्वेद । पवस्व ) तुम स्वभावसे ही कातिमद हो, मेरी आत्मसम्बन्धी कान्तिक देने को मच होभो हे प्रत्यग्रह ! (बोंदा,मे, मोजसे वर्चसे, पवस्व ) तुम स्वभावसे ही कान्तिमद हो मेरे शरीरादिषल सम्बन्धी कान्तिकी वृद्धि करनेको प्रत्त होमो, हे ध्रुवग्रहः (वर्षोदाः मे, प्रायुपे, वर्चसे, परम्व ) स्वभावसे कान्ति देनेवाले हो मेरी आयुःसम्बन्धी कान्ति की सीड करनेको महत्व होयो हे पूतभृत ! भाइवनीय ग्रह ! तुम स्वमानसे (पर्षोंदसौ,मे विश्वाभ्यः, पजाभ्यः वर्चसे, पवस्व ) कान्तिपर हो, मेरी सम्पाई प्रमार्ग को कान्ति देने को प्ररत्त होभो ॥ २८॥ : कोसि कप्तमोसि कस्पामि को नामांसि। यस्य तेनामामन्महि यन्त्या सोमेनातीपाम भूक्षुषः स्वः सुमजाः प्रजाभिः स्याधमुचीरों नीरः मु- पोपः पोषः॥ २९ ॥ इस क० में २ ० हैं। सबका देवभुवाश है। ई० मार्ची पं० २ भुरिग्सा० पं० भौर सघका मजापति देवता है। मंत्रार्थ-- हे द्रोणकलश ! तुम (कः, असि, कामः, असि, कस्य, असि, का, नामासि, यस्य , से, नाम, ममन्महि, यं, ला, सोमेन, भती- पाम ) कौग प्रजापति हो कौनसे भसिराय या बहुतों के मध्यमें हो किस मजापति के हो, क्या नाम है, जिस तेरे नामको हमजाने जिस तुमको जानकर सोमरस से तृप्त करचुके हैं, क्या तुम वही हो, तुम हमको नाम वताकर काममासे कृप्त करो (भूर्भुवः स्वः, प्रजामिः, सुमजाः, स्याम् ) हे अग्नि ! वायु और सूर्य ; आपके प्रसादसे में प्रजाघोंसे अच्छी प्रजावाला होऊँ (वार, सुधीर, पोपैः, सुपोषः) वीरतायुक्त पुत्र पौत्रादि लाभ करयो सुपुरवान्, विख्यात होऊँ, उस्कष्ट धन संपत्तिसे मसिद्ध होकर अच्छी संपत्ति वाला विख्यात होऊँ ॥ २९ ॥ उपयामगृहीतोमि मधंधे वोपयामग्रहीतोमि मायाप स्वोपणमाहीतीसि वाकाय त्वोपन ' -- ७ अध्याय २०५. . यामहीसासि शुर्चये त्वोपयामगृहीतामिन.. असे त्योपयामगृहीतासि नभस्याय त्वोपयाम- गृहीतोसीपेत्वापामगृहीतोस्यूजे खोपयामगृही- तोमि सहसे त्वोपामगृहीतोमि सहस्याय त्वो पपामगृहीतोमि तसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याप त्योपणामहीतोस्पधहसस्पत्तय त्वा ॥३०॥ इस कं० में ११ मं० है, सबका देवश्रवा ऋपि है । छ. १, २, ३, ४, ५, ९, ११ का साम्नी गा० ६, १०, १२,का मासु- नु० ७, ८ का याजुपी ५०, १३, का आयुणिक और सबका देवता मृतु है। मंत्रार्थ-हे मयम ऋसुराद (उपयामगृहीरा, मास मधये, स्वा.) तुम उपयाम पानमें गृहीराहुए हो मधु देवताकी प्रीति के निमिरा तुमको ग्रहण करता हूं-हे द्विनीय अनुग्रह (उपय.म गृहीतः, असि, माधवाय, स्वा) तुम उपयाम पात्रमें गृहीत हुए हो, वैशाख की सन्तुष्टि के मिमिच तुमको ग्रहण करताहूं-हे तृतीय ऋतुग्रह ! ( उपयामगृहीतः, असि, शुक्राय, त्वा) तुम उपयाम पात्रमें गृहीताप हो ज्यटके निमिच तुमको ग्रहण करता हूँ हे ऽनुग्रण(अपामगृहीतः,शखये,त्वा) तुम उपयाम पात्र में गृहीत हुए हो,पापाढ मासके निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं-हे पंचग ऋतु- ग्रह (उपयामगृहीतः,यास,नभसे,त्वा ) उपयाम पात्र गृहीत हो श्रावण मासके निमित्त ग्रहण करता हूं-हे पष्ठ अनुग्रह ! तुम (उपयाम गृहीना,यसि, नेमस्याय, त्वा,) तुम उपयाम पात्र में गृहीत हो भाद्र- सासके निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं-हे सप्तमगृह (उपयामगृहीतः, असि,इपे, त्वा उपपाम पात्र में गृहीत हो योश्विन मासके निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं-हे अष्टमग्रह (पयामगृहीतः, ऊर्ज, त्वा,) वुम उपयाम पात्रमें गृहीत हो कार्तिकमासके निमित्ता तुमको ग्रहण करसाई हे नवम ऋतुप्रद (उपयामगृहीतः, मासे, सहसे, ' त्वा) तुम उपयामपात्र द्वारा गृहीत हो मार्गशीर्प के निमित्त तुमको ग्रहण करताह हे दशम गह (उपयामंगृहीतः, मासे, सह- - क ३ . . शुक्लयजुर्वेद। स्याय, त्या ) तुम उपयाम पात्र द्वारा गृहीत हो पापमासके निमित्त तुमको ग्रहण करताह-द एकादशगह (अायाम गृहीतः, असि, सपसे, त्वा,) तुम उपयाम पात्रमें गृहीत हो माघ मासके निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं हे द्वादश प्रतुग्रह ! (उपयाम गृहीतः, असि, रापस्याय, वा) तुम उपयाम पाममें गृहीत हो .फ न्गुन मासके निमित तुमको ग्रहण करसाई हे त्रायोदश ग्रह उायाम गृहीतः, असि, हस्तये, त्वा) तुम उपयामराम द्वारा गृहीत हो पापके अधिपति ममास के मिमिरा तुमको ग्रहण करताई ॥३०॥ इन्द्राग्नी भागतमुतङ्गीशिनभो वरेण्यम् । अस्य पातन्धियेपिता । उपयामगृहीतोसीन्दा. ग्निपान्त्वैप ते योनिरिन्दाग्निभ्यान्वा ॥३१॥ इस केन्मे २ ० हैं । सबका विश्वामित्र ऋ० है । ई निन्दा गा०२शानु० और देवता इन्त्राग्नी,२ ग्रह। मंत्रार्य-(इन्द्राग्नी सुरम्, गाभिः, नमः, वरेण्यम्, श्रागतम्, धिया, अस्य, पासम् ) हे इन्द्राग्नी देवताओ तुम अभिपवण ऋक् यजुःसाम के मंत्रोंसे यादित्य की समान प्रार्थनीय, सोमरस पान के निमित भागो, यजमान की बुद्धि से प्रार्थनीय होकर तुम इस सोमरसके स्वभाग को पान करो, (उपयामगृहीतः, असि, इन्द्राग्निभ्यान्वा ) हे चौबीस ग्रह तुम उपयाम पात्रमें गृहीन हो इन्द्राग्नी देवता की प्रीति के निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं हे इन्द्राग्नी ग्रह (एपः, ते, योनिः, इन्द्राग्निभ्यां वा) यह तुम्हारा स्थान है इन्द्राग्नी देवताकी मीति के निमित्त तुमको इस स्थान में स्थापन कर खाई३१ आज ये अग्निमिन्यते स्तुणन्ति बहिरानुपक। : पामिन्द्रो युवा सखो। उपयामगृहीतोस्यग्नी न्द्राभ्यान्त्वैपते योनिरग्नीन्द्राभ्यान्त्वा ||३२|| इस के० में २ मंत्र हैं। सरका त्रिशोक ऋषि है । छ । मापी गा०२ आर्युष्णिक और दे०१ अग्नीन्द्र र ग्रह है ।मंत्रार्थ- (ये,याग्नम् ,शाइन्यते, भानुपरु, बहिः; स्वृणन्ति, येपाम्, - ७अध्याय। '२०७ .. युवा, इन्द्रः, सखा, अघा ) जो यजमान अग्निको इष्टि आदि यशों में प्रज्वलित करते हैं और क्रमसे कुशाओंको विछाते हैं और जिनके सदा तरुण इन्द्रनारायण सखा है वह सदा निष्पाप हैं (उपयामगृहीतः, असि, अग्नीन्द्राभ्याम् त्वा, एपः, ते. योनिः, मग्नीन्द्राभ्याम्, त्वा,) हे सोम उनके यज्ञ में तुम उपयामपान से गृहीत हो, अग्नि इन्द्रदेवताओंके लिये तुम्हें स्वीकार करता हूँ, हे सोम यह तेरा स्थान है अग्नि इन्द्र देवताओंके निमित्त तुझे स्थापन करता हूँ ॥ ३२॥ ओमासस्यर्पणीधृतो विश्वेदेवास आगत । दाश्चासौ दाशुपः सुतम् । उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य एपते योनिर्विश्वेभ्यस्त्या देवेभ्यः ॥ ३३॥ इस कं० में २ मंत्र हैं। सबका मधुच्छंदा ऋ० । ई० १ पापी गा० २ भार्थी वृ० और देवता १ विश्वेदे० २ ग्रह । मंत्रार्थ-(विश्वेदेवासः, प्रोमासः, चर्पणीधृतः, सुतम्, दाशुपः, दाश्वांसः, माया) हे विश्वेदेवा ! तुम सब, हमारे सबमकार से रक्षक हो तथा मनुष्यों को पुष्ट करनेवाले हो मनुष्य तुम्हारे प्रसाद से ही पुए होते हैं अभिपुनसंस्कार किये सोम को देनेवाले यजमान को फल देनेवाले तुम सोमान के निमिच पानी हे पंचविशाह ( उपयामगृहीतः, असि, विश्वभ्यः, देवेभ्यः, वा,) तुम उपयामपात्र में गृहीत हो विश्वेदेवा देवताओंकी नीति के नि. मित तुमको ग्रहण करता हूँ हे वैश्वदेवगृह (एपः, ते, योनिः, विश्वेभ्यः, देवेभ्यः, त्या ) यह प्रापका स्थान है विश्वदेवा देव- शाओं की नीति के निमित तुमको इस स्थानमे स्थापन करताहूं३३ विश्दयाम आर्गत शृणुताम इम हवम् । पदमाइनिपीदत उपगमगृहीतोमि विश्वय- स्त्वाचेभ्य एपते पोनिर्षिइवेभ्यस्त्वा देवेभ्य॥३॥ . .
૨૦૮ शुक्लयजुर्वेद । क० में २ में है। सबका समद ऋछ०१ मार्च गा०२ श्रा वृ• और देवता १ विश्वेदेवा २ ग्रह मंत्रार्थ-(विश्वे- . देवासः, भागव, मे, इमं, हवं, माशृणुत) हे विश्वेदेन देवताओं! हमारे इस यज्ञ में पाओ मेरे माहानको सबमकार से अषण करो (इदम्, वहिः, पानिपीदव ) इस विस्तीर्ण कुशापर स्थित होमो, शेपं पूर्ववत् ॥ ३४ ॥ इन्द्र मरुत्व इह पाहि सोम यो शागते अ. पिंपः सुतस्य । तब प्रणीती तब शूर शर्मन्ना- 'विवासनित कवपः सुयज्ञाः । उपयामहीतो- सीन्द्रीय त्या मरुस्थत एप ते योनिरिन्द्राय स्वा मरुत्वते ।। ३५॥ इस कं० में २ म० हैं। सबका विश्वामित्र ऋ० { छ ? पापी त्रिपुर १ प्राप्युटिणक और देवता, १ विश्वेदेवा, २ ग्रह मंत्रार्थ-( मरुत्वः, इन्द्र, यया, शार्याते, सुतस्य, भपिवः ) मस्त देवतामोंवाले हे इन्द्र ! जिसमकारबड़े परिश्रम करनेवाले शाति यह अभिपुन सोमक अंशीको तुमने पिया था, इसी प्रकारसे (इह. सोम, पाहि, शूर, सब, प्रणीती, सुयज्ञाः, कवयः, तव, शर्मन् आदिवासन्ति ) इस हमारे यज्ञ में सोमकी रक्षा करो और पियो विक्रान्यवीर तुम्हारी सुनीति और अनुज्ञा से श्रेष्ठ यज्ञ करनेवाले ददी, तुम्हारे मुखमद स्थानमें चिरकालयक तुम्हारी परिचर्चा करते है, हे पथमग्रह ! (उपयामगृहीतः, असि, मरुत्वते, इन्द्राय त्वा) तुम इस उपयामपात्र में गृहीत हो, मरुत देवतामोंसे युक्त इन्द्र देवता की प्रीति निमित्त तुमको ग्रहण करता हूं । हे प्रथम महत्वतीय ग्रह (एपः, ते योनिः, मरुत्वते, इन्द्राय का ) तुम इस उपयामपात्रमें गृहीत हो मरुतू देवताओंसे युक्त इन्द्रदेवताकी भीति के निमित्त तुमको इस स्थान में स्थापन करता हूं ॥३५॥ - - - ७ अध्याय . मुरुत्वन्तं वृपयांधानमकंवारिन्द्रिव्यो , शासमिन्द्रमविश्वासाहमसे नूतनायोग्य सहोदामिह त टुंघमाउपयामगृहीतोसीन्द्रीय त्वा मरुत्यत एप ते योनिरिन्द्राय त्या मरस्व- ते। उपयामहीलोसि मरुतान्योजसे ॥३६॥ इस कं. में मं० हैं। सबका विश्वामित्र प्रा. है। छ०१ विराडा २ माध्युणिक ३ साम्न्युष्णिक और देवता १ इन्द्र २ ३ ग्रह है। मंत्रार्थ-( मालन्त उपभ, वाधान, प्रकवारिम्, दिव्यम्, शासं, विश्वासाई, सहोदा, मानाय, श्रवसे, उग्र, तं, इन्द्रं, इह, पाहुवेम ) मरुद्गणों से युक्त उचित समय जल वर्षाने धाने, मीहि धान्वादिक चढ़ानेवाले, उत्कृष्ट ऐश्वर्यवान, धुलोक में रहनेवाले, दुरों के शासक, भालस्यरहित, विश्व के पालक, बल देनेवाले, नूसन यजमान का रक्षण करने के निमित्त निरन्तर उद्यत वनचाले उस इन्द्रको इस यज्ञ में रक्षा के मिमित्त बाहान करते हैं। हे द्वितीय ग्रह तुम ( उपयामगृहीतः, थसि, महत्वले, इन्द्राय, त्वा, एप, रो, योनिः, मरुत्वते, इन्द्राय, त्वा, उपयाम- गृहीतः, भसि) उपयाम पाप्रम गृहीतहो, शेप भर्थ पूर्वषत् । हे गीय महत्वतीय ग्रह ! ( मरुत्वता, भोलसे, त्वा) मास देव ताओं के बलसम्पादन के मिमिर तुमको इस ऋतुपद में ग्रहण करता हूँ॥ ३६॥ सजोपा इन्द्र सगणोमुरुद्भिः सोमम्पिय तृत्रहा ': शूर विद्वान् । जहि शपभूधानुदस्वाथान भंपकृण हि विश्व नः। पंयामगृहीतोसी. न्द्रीय त्वा मरुत्यात एप ते योनिरिन्द्राय वा मरुस्यते ॥ ३७॥ इस कं० में २ ० हैं। सवका.विश्वामिम ००१ नि. चूदापी त्रि २ माजापत्या त्रि०, और देवता १ इन्द्र २ गृह. मंत्रार्थ-(शर, इन्द्र, सोपः, सगणः, साहा, विद्वान्, . , गुक्लयजुर्वेद । सोम, पित्र, शन, जहि ) हे विफ्रान्त इन्द्र तुम हमारे यज्ञको प्रीतिसे सेवन करे हम के मारने वाले सबकुछ जानने वाले मरु गणों के परिवारसहित सोमको पानकरो शायों को मारो (भूपः, अपनुदस्व, भप, नः, विश्वराः, अभयम्. फणुदि) संग्रा. मसे शोंको निवृत्त करो, शत्रुनाशके अनार हमको सब मकार से ममय कीजिये (उपयामगृहीतः, इत्पादि पूर्ववद )हेगूह इत्यादि च्याख्या पूर्ववत् ॥ १७ ॥ मत्यार इन्द्र धूपो रणाय पिया सोममनुप्व- धम्मदाय । आसिञ्चस्व जठरे मर्च ऊर्मि- त्यराजासि प्रतिपत्सुतानाम् । उपयामही- सोसीन्द्रीय त्वा मरुत्वतएप ते योनिरिन्द्राय स्वा मरुत्वते ॥२८॥ ' इस ० में २ मं० हैं । सपका विश्वामिम ई० १ निचदापी त्रि, २ माजापत्या त्रि० । देवता १, इन्द्र, २ ग्रह मंत्रार्थ-(इन्द्र, मरुत्वान्, पभा, प्यनुष्वधम्, सोम, मदाय, रंणाय, प्रापिच, मध्वः अम्मि, जठरे, मासिञ्च) हे इन्द्र मरुद्गणों से संयुक्त जलके वर्षानेवाले तुम.स्वधापूर्वक पुरोडाश धान्यमन्य दधि पय लक्षणपाले सोमरसको तृप्ति के निमित्त और दैत्यों से युद्ध के निमित्त पान कीजिये, इस मधुररसकी करलोलको उदर में भासिंचन करो (त्वं, मसिपमुसाना, राजा प्रसि ) तुममति- पद्मभूति तिथियोंमें मभिपुन हुए सोमके राजा हो, हे ग्रह ! सुम (उपयामगृहीतः) उपयाम पात्र में गृहीस इत्यादि पूर्व यत् २८ महा इन्द्रो नृवदाचर्षणिमा जामिया भमिनः सहाभिः । अस्मद्रयग्यायुधे वीर्णोरुः पुचः मुकृतः फर्टभिभूत् । उपयामग्रहातोसि महेन्द्राय पैष ते योनिमहेन्द्राय स्वा॥ ३९ ॥ इस के० में २ मंत्र है। सबका मरद्वाज का है। ई० . भारे गा, १ साम्नी पिक और देवता र माहेन्द्र २ ग्रह है। मंत्रार्थ- - - ७ अध्याय - राजा जिस मकार मजावर्ग की अभिलाषा पूर्ण करता है, सदद (प्रापिमाः, द्विवहींः, संहोभिः, अमिनः, उत, अस्मद्रयक, महान्, इन्द्रः, वीर्याय, वारधे, उरुः, प्युः, कर्तृभिः, सुकराः, अभूत), मनुष्योंके अभीष्ट पूर्ण करनेवाले, मकति विकतिरूपं सोमयाग के घड़ानेवाले, वलों करके उपमारहित तया हमारे प्रारो अनुकूल महा प्रभावशाली इन्द्र वीरकर्म के निमित्त वृद्धिको प्राप्त होता है, तथा यक्षसे विस्तीर्ण, वलसे विस्वग इन्द्र यजमानों द्वारा सत्कारित मुत्रा हमारी बलवीर्य की पृद्धि करे। हे चतुर्य ग्रह ! तुम (चए- यामगृहीतः, पास, महेन्द्राय, स्वा) उपयाम पात्रमें गृहीत हो, महेन्द्र देवता की प्रीतिके मिमित्त तुमको ग्रहण करता हूं, हे माहेन्द्र अह ! ( एपः, ते, योनिः, महेन्द्राय, वा ) यह तुम्हारा स्थान है महेन्द्र देवताकी मीशि के निमिश तुझको इस स्थान में स्थापन करता हूँ॥ ३९ ॥ महार इन्द्रीय ओजसा पालन्यो दृष्टिमाइव । स्तोमवत्सस्य बाधे। उपयामगृहीतोसि माहे- न्द्राय स्वैप से योनिमहेन्द्राय त्या ॥ १० ॥ इस क. में २ मंत्र है । सवका वत्स १० है । छ० माषी गा० २ विरादापी गा० । देवता । महेन्द्र २ ग्रह है मंबार्थ (यः महान्, इन्द्रः, मोजसा, दृष्टिमान, पर्जन्य, इत्र, वत्सस्य, स्तोमः, बाधे ) जो महा मभावशाली इन्द्र रोजसे महान् चर्पावाले मेघ के समान मनसे कीहुई स्तुतियोंसे दि को माप्त होता है, हे ग्रह (उपयामगृहीतः ) तुम अप्रयाममें गृहीत हो । पूर्ववत् ॥ १० ॥ त्यम्जातवेदसलेयं वहन्ति क्षेतवः दुशे वि- श्वान सूर्य स्थाइ ॥११॥ इसका मकण्व ०, भुरिगाी गा० छ, सूर्य देवता है। मंत्रार्थ (फेतवः, त्यम्, जातवेदसं, देवं, सूर्यम्, विश्वाय, एशे, , उदरन्सि, स्वाहा) किरणसमूई, उस मसिद्ध, सब पदार्थों को जानने चाले, प्रकाशात्मक, सूर्यदेव को, इस समस्त विश्व के, मका " शुक्लयजुषद । करने के निमित्त, वितर्क के साथ, प्रतिनियत ऊर्य बइन करसी अर्थात् स्वर्ग में पहुँचाती हैं इन्ही देव के उद्देश्य से दियाहुधा यह हवि भलीमकार गृहीत हो ॥ ४॥ चिनदेवानामुदग़ादनीकुश्चक्षुम्मित्रस्य वरुण. स्याग्नेः आमा पााथिवी अन्तरिक्ष सूर्य, आत्मा जगतस्तस्थुपश्च स्वाहा ।। १२ ।। इसका कुत्स ऋ०, भुरिगा० वि० ई०, सूर्य दे० । मंत्रार्थ- (चित्रं, देवानां, अनीके, मिनस्य, वरुणस्य, भग्मः, चक्षुः, जगतः, तस्थुपः मारमा, सूर्यः, उदगाव, घाघापृथिवी, अन्तरिक्ष, मामाः, स्वाहा) यह कैसा आश्चर्य है कि देववाभों के जीवनाधार ब्रह्मा विष्णु महेश रूपधारक परमेश्वर के नेमवत् प्रकाशवान् जंगम और स्पावर जगतके अनार्यामी सूर्य उदय को प्राप्तहुए, भूलोक से घुलोक पर्यन्व अन्तरिक्ष को अपने तेज से पूर्ण करना है उन सूर्यदेव के निमिच दीहुई माहुवि भलीमकार से स्वीकृत हो॥४॥ अग्ने नय मुपा गाये अस्मान्विश्वानि देव चयुनानि विद्वान् । युगोस्वस्मर्जुहुराणमेनो . ; भूपिष्टान्ते नम उक्तिं.विधेम स्वाहा ।। ४३ ॥ इस मंत्र की ध्याख्या ५ २० १६ ये मन्त्र में होगई ॥४३॥ अपन्नो अग्निरियस्कृणोत्यम्मृधः पुर एंतु प्रभिन्दन् । अयं वाजाजयतु वाजसातावपळ शम्जयतु जहपाणः स्वाहा ॥४४॥ इस मन्त्र की व्याख्या १.५.३७ में होगई॥४४॥ रूपेण वो रूपमभ्यागांन्तुथो वो विश्वधैा वि. भेजतु । भातस्य पथा.मेत चन्द्रदक्षिणा विस्वः पन्य व्युन्तरिक्ष यतस्व सदस्यः ॥ ४५ ॥ इसके० में ३ मन्त्र हैं। सवका धाङ्गिरस ०१.भ. जाप० २०, २ याजुम्पनुष्टुप, १ देवी त्रि, और सबका दक्षिणा देवशा है । मन्त्रार्थ-(चन्द्रदक्षिणाः, रूपेण, यः, रूप, अभ्यगां, विश्ववेदाः, नुथः, विभननु,) सुवर्ण दक्षिणावाली हे गौमों में, ...
७अध्याय। २१३ " यजमानकी मत्ति से,तुम्हारे,रूप को प्राप्तहुमा हूं, सर्वज्ञ,ग्रह तुमको यथायोग्य विभाग करके ऋत्विजों के निमित्त प्रदान करै (ऋ- रास्य, पथा, प्रेत ) यज्ञ के, मार्ग से, गमन करो। हे दक्षिणारूप संपूर्ण गोश्रो ! माज हम तुमको प्राप्त करके (स्वः विपश्य, श्र. न्तरिक्ष, वि) स्वग के देवयान मार्गको देखते हैं, अन्तरिक्ष पित्यान मार्ग को देखता हूं। हे ऋत्विग्गण ! तुम इसमकार (यसर्व, सदस्यैः ) यत्न करो कि जिसप्रकार सभासदों को यथाभाग पूर्ण होकर भी कुछ गोदक्षिणा शेष रहनाय।। १५॥ ब्राह्मणमय विदेपम्पित्तृमन्त पैतृमत्यापिमा- यमुधातुदक्षिणम् । अस्मद्रांता देवत्रा गच्छ प्रदातारमाविर्शत ॥ ४६॥ इस कं० में २ मंत्र है । सवमा पाङ्गिरस ऋपि है। ई०१ श्राची १०, २ भाचीगा और देवता १ लिंगोक्ता, २दक्षिणा देव है । मंत्रार्थ-मैं ( अय, पितृमन्तम्, पैसमत्यं, ऋपि, आये, सुधावुदक्षिणं, ग्रामणं, विदेयम् ) माज विख्यात घि- द्वान यशस्वी पितावाले, जनमान्य पितामहवाले, मंत्रों की व्याख्या करनेवाले ऋपियों में विख्याग, जिसके निकट सम्पूर्ण सुवर्णदक्षिणा संचय कोजाय ऐसे सर्वकुलगुणसंपन्न ग्रामण को में प्राप्त करूं । हे सम्पूर्ण दक्षिणा ! तुम (अस्मद्रासाः, देवत्रा, गच्छच, दासारं, माविशत, ) हमारे द्वारा दीहुई देवतामों से अधिष्ठिन ऋत्विग्गण के समीप यथाभाग उपस्थित होत्रो और देवताओं को हप्त कर, इस यज्ञ का फल देने के लिये दाता यज- माम में प्रवेश करो॥४६॥ अग्नये त्वा मह्यं धरुणो ददातु सोमृतत्वमशी- यायन एधि मयो महा प्रतिग्रहीने । रुद्राय स्वा मह्य धरुणो ददातु सोऽमृतत्वमशीय माणो दान एधि भयो मय प्रतिगृहीने । बृहस्पतये त्यामा वरुणो ददातुसोमृतत्यमशीय त्वग्हात्र । . . २१४ शुक्लपजुर्वेद । एधि मयो मयं प्रसिग्रहीने यमायत्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्वमंशीय इयों दात्र ऐधि वो मयप्रतिग्रहीरो ॥ १७ ॥ . इस कं० में ४ मं० हैं । सपका भारिस भा है । छ। पाची वि० २ भुरिगा! त्रि० ३ निदापी ज०, ४ भुरिगावी नि० थौर देवता १ हिरण्य, र गौ ३ वन, ४ मश्व है। मंत्राध- हे सुवर्ण ! ( वरुणः, भग्नये, मह्यं त्वा, ददातु) वरुण देवता अग्निरूपको प्राप्त हुए मेरे निमित तुमको मदान करें, इसमकार से ग्रहण कियेहए सुवर्ण से (सा, अमृतत्वं, मशीय, दारे, प्रायुः एधि, प्रतिग्रहीने, मां, मयः) वह मैं भारोग्यता प्राप्त करूं, हे सुवर्ण तुम दासाकी परमायुकी वृद्धि करो, मतिग्रह करने वाले मुझको मुखकी प्राप्ति हो हे गौः ! (वरुणः, रुद्राय, महां, स्या,ददाशु सः, अमृतात्वं, मशीय, दाने, प्राणः, एधि मह्यं मतिगृही चयः) वरुण देवता रुद्ररूप मुझे तुमको प्रदान करता है, वह मैं भारो- ग्यता को माप्त हूं तुम दाता के चल माणकी वृद्धि करो मुझ पति- यहीसा के भन्नपyकी वृद्धि करनेवाले हो, हे वख ! (-वरुणः, हसतये, मध, त्वा, ददातु, सः, अमृतत्वम्, मशीय, दाने, त्वक एधि, प्रतिग्रहीने, मयः ) वरुण देवता वृहस्पतिरूप मेरे निमित्त तुमको देसाहै, वह मैं तुमको प्राप्त करके अमृतत्व को माप्त कर, तुम दासा की त्वगिन्द्रियशक्तिकी वृद्धि करो, प्रसिग्रहीता मेरे सुख की वृद्धि करो। हे अश्व ! (वरुणः, यमाय, मयं, स्वा, ददातु. सः अमात्वं, मशीय, दाने, इयः, पषि, मतिगृहीत्रे, मध, क्यः) वरूण देवता यमका धर्मरूप मेरे निमिच तुझको देता है यह मै तुमको मासकर आरोग्यसाको माप्त ककं दाता के यहां घोड़ोंकी दिकरो प्रतिग्रह करनेवाले मेरी पशुसम्पत्ति की वृदि करो ॥ १७ ॥ कोद्वारका अटारकामाद्वारकामायादात् । कामो दाता कार्मः प्रतिगृहीता कामतत्ते ॥ १८॥ इसका भारिस ऐपि मानापत्या त्रिगुप् ई० कामो देवता । .
७अध्याय। . मन्त्रार्थ (का, भदाद, कस्मै, भदाद, कामाय, अदाव, कामः, दाता, कामः, प्रतिमहीसा, काम, एतत्. ते, ) कौन महात्मा ने दान किया किसके निमित्त प्रदान किया । यत्रफल कामना ही के निमित्त दान किया कामना ही देनेवाली है, . प्रमिलापा ही मरिग्रह करनेवाली है, हे अभिलाप भाभलापा करने योग्य यह समस्त वस्तु तुम्हारी ही है ॥ १८ ॥ इति शालपदान्तर्गत याजसनेपि संहिता का सायाद सप्तम अध्याय समाप्त. ॥ अथ अष्टमोऽध्यायः॥ " जिसमें उपांशुग्रहादि प्रधान, ऐसे सप्तम अध्याय में दक्षि- णादान तक मन्त्र कहे । भव आठवें अध्यायमें तीसरे सवन के आदित्य ग्रह थादि सम्बन्धी मंत्र कहेजायंगे। उपयामगृहीतोस्पाटि स्यभ्यस्त्था । विष्णरु- गायप ने सोमस्तरक्षस्व मा स्पो दान् ॥१॥ इस कं० में ३ मं० हैं। सबका बाहिरस प्रा. है ।छ. १ यासुध्यनु०, २ दैवीपं० ३ साम्नी और देवसा १, २, सोम, ३ वि है। मंत्रार्थ-हे सोम ! तुम (उपयामगृहीता, असि) उपयाम पान में गृहीरा, हो । हे सोम ! (मादित्यभ्यः, त्वा) शादित्यगणों की प्रीति के निमित्त, तुमको ग्रहण करा हूँ (विष्णो, उरुगाय, एपा, सोम, रसास्व, मा, दभम् ) हे बहुस्तुरा यशपुरुप देवढी स्तुतिको माप्त होने वाले यह सोम तुम्हारे निमिष श्रीपत है उस सोमको रक्षा करो रक्षाकरने में तुमको यमुरदल पीडान, देय ॥ १॥ कदाचन स्तरीरमि नेन्द्र सश्चसि दाशंपे। उ पोपेमघवन्नु भयपन्न ते दानन्दयस्प पृच्यत्त मादित्येभ्यस्त्या ॥२॥ इस केस में रम है। सर्वका बाहिरस है।०२ . २१८ शुक्लयजुर्वेद । वार्षी मि०, २पिराइ ग्रामयनु० और देवता सपका सविता। मंत्रार्थ (सवितः, भय, अम्मभ्यम्, वामं साधी: वः, उ, वामप, 'उ,) हे जगत के उत्पन्न करनेवाले ! माज, ६मारे मिमित, व. रणीय यज्ञफल को, प्रेरणा करो, अगले दिन भी, यसफल को दीजिये (दिवे, दिवे, वामम्, घामस्य, भरे, तपस्य, हि, देव भया, धिया, वाममाजः स्याम ) प्रसिदिन यज्ञफल को दीनिये संभजनीय विस्तीर्ण स्वर्गलोकनिवास की सिद्धि के निमिच, जिस से, हे देव, इम इप्स असायुक्त पुदि से यहफल के भोगनेवाले होवे ॥६॥ उपणमगृहीतोसिसाविट्रोसि चनोधाचनीया अमि चनो मार्यि धेहि । जिन्य यज्ञजिन्य यज्ञपतिम्भगाय देवाय त्या सवित्रे ।। ७ ।। इसका भरद्वाज ऋ०, विराङ् ब्राह्मघनुष्टुम्छ०, सविता देवसा है। मंत्रार्थ-हे सोम ! तुम (उपयामगृहीतः, असि, सावित्रः, मासि, चनोधाः पनोधाः चनः, माय धीह) उपयाम पाम में ग. हीत हो, हे सोमाइ तुम सविसादेवतासम्बन्धी हो, 'मन के धारण करनेवाले अधिकतर अन्न के धारण करनेवाले हो इस कारण या मुझको दो ( यज्ञं, जिन्व, यज्ञपति, जिन्व, भगाय, सचिने, देवाय, त्या ) यह को प्रीति करो यजमान को मीति करो ऐश्वर्यादि गुणयुक्त, सब के उत्पादक सविता देवता के निमित्त तुमको ग्रहण करता हूं ॥७॥ पयामगृहीतोसि मुशासि सुप्रतिष्ठानो दक्षाय नमः। विश्वभ्यस्त्वा देवेभ्य रो- योनिषिवैभ्यस्त्वा दे॒षेभ्यं ॥८॥ इस कं० में २ मंत्र हैं । सवका भरद्वाज ऋ० है। छं० १ नि- मुटु माजाप० न०,२ याजु० ज० और देवता १ विश्वेदेवा २ ग्रह है। मंत्रार्थ-ई महावैश्वदेव गई । (उपयामहातः, भास, मुशर्म मप्रतिष्ठानः, नमः भास ) उपयामपात्र में गृहीतहो,श्रेष्ठ कल्याण - ८.अध्याय। २१९ की खान भलेमकार पात्र में स्थित यह अन्न है (विश्वेभ्यः दे. वेभ्यः त्या ) विश्वेदेवा देवताओं की प्रीति के निमित तुमको उपयामपान में ग्रहण करता हूं। हे महावैश्वदेव ग्रह ! ( एपः, रो, योनिः) यह तुम्हारा स्थान है (विश्वभ्यः, देवेभ्यः त्वा) विश्वेदेवा देवताओं की प्रीति के निमित्त तुम को इस स्थान में स्पापन करता हूं ॥८॥ उपयामगृहीतोमि बृहस्पतिसुत्तस्य देवसोम इन्दौरिन्द्रियायतः पत्नीवता महा ऋझ्या- सम् । अष्ठम्परस्तादहमवस्तापढन्तरिक्षन्तर्दू मे पिता त् अहसूर्यमुभयताददर्शाहन्देवाना- म्परमं गुहा यत् ।। ९ ।।. इस कं० में ३ मं० हैं। सबका भरद्वान ऋ० है। छ० १ मामी गा० २, ३, भार्युष्णिक और देवता १ सोम २,३ का प्रजापति रूपात्मा है । मंत्रार्य-(देवसोम, उपयामगृहीराः, असि, बृहस्पति, सुनस्य, रो, इन्दोः, इन्द्रियावसः, पत्नीवतः, ग्रहान प्राध्यासम्) हे दीप्यमान देव सोम तुम उपयामपात्र में गृहीत हो, इसकारण यज्ञकर्मवाले यजमानसे अभिपुत, तुम्हारे सम्बन्धी रसयुक्त वीर्य- वान, पत्नीसंयुक्त तुम्हारे थनुग्रहसे, अन्यान्य उपांशु प्रभृति ग्रहों को पूर्ण करता हूं। (यह, परस्ताव, अहं, अधस्ताद, यत्, मन्स- रिक्ष, सद्, उ, मे, पिसा, मई, उभयतः, सूर्य, ददर्श ) मही नीचे भूलोकादि में स्थित हूँ, जो मध्यवर्ती लोग हैं वह ही मुझ देह धारी का पिठ्वत् पालक होता है, मैं परमरूप हुआ उपर मीचे स्थित होकर, सूर्य को देखता हूँ ( देवानां, यत्, परम, गुहा, मई) देवताओं का जो अत्यन्त गोप्य हृदय है सो में हूँ ॥९॥ अग्ना३.इ पत्नीपतमजूवेन त्यष्टांसोमम्पिव. स्वाहा । प्रजापतितपासि रेतोधा रेती मार्षि धेहि पूजापंतस्ते वृष्णों रेतोधसौरतोधामशीय १० 1. इस के० में २ मं० हैं। सबका भरद्वाज मा० । छ. १ मुरित , २३२ शुक्लयजुर्वेद । तुम मुझ यजमानमें धन पुष्टिको धारणकरो हम ऋत्विगादिको सुन्दर सामर्थ्य से युक्त ब्रह्मतेज दो। हे प्रथम असिग्राम ग्रह! तुम ( उपयाग्रहीराः, मासे. वर्चसे, अग्नये, ला)उपयाम पामें गृहीत हो कान्तिमद अग्नि देवताकी गीति के निमित्त तुमको प्राइण करताहूँ । दे पपम भतियामग्नः(एषः ते,योनिः, वस्सिने, अग्नये त्वा) यह तुम्हारा स्थानह तेनामद भग्निदेवसाकी प्रीति के निमित्त तुमको इस स्थानमें स्थापन करता हूँ (पस्विन, अग्ने, त्वं, देवेषु, वर्चस्वान् असि, अई, मनुष्यपु, वर्षवान, भूयासम् ) हे विशिष्ट तेजोयुक्त भाग्नदेव सुम देवतामों में भाव दीप्तिमान हो इस कारण तुम्हारे मसादसे में मनुष्यों में कान्ति युक्त प्रासितेजस्वी होजाऊं ॥३८॥ उत्तिष्ठन्नोसा मह पीवी शिमें अवेपयः। सोममिन्द्र चमूसुप्तम् । उपयामगृहीतोसीन्द्रय त्त्वौजस एप से पोनिरिन्द्रीय त्वौजसे । इन्द्री- जिष्ठौजिष्ठस्त्वन्दे॒वेषस्पोर्जिप्ठोहम्मनुष्येषु भूपासम् ॥ ३९ ॥ इस कं० में ४ मंत्र है । समका कुरुस्तुति ऋ० । छ० १ भापी गा०, भासूनुष्टु. ३ याजुपत्रि० १ भायुरिणा भौर देवता १ इन्द्र, २, ३ सोम०, ४ इन्द्र है। मंत्रार्थ ( इन्द्र, मोजसा, सह, उतिष्ठन्, चमूमुतम्, सोम, पीत्पी, शिमे, भोपयः) हे इन्द्र ! तुम अपने बल के साप उठते हुए अधिषवण में भभिः पुत हुए सोमको पान करके अपनी ठोही और नासिकाको कम्पित करो हे द्वितीय प्रतिमान प्रह! तुम ( उपयामगृहीतः, मसि, मोजसे, इन्द्राय, त्वा ) उपयाम पात्रमें गृहीत हो बलवान् इन्द्र देवकी नीति के निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं-हे द्वितीय प्रति.' ग्राह्य ग्रह ! ( एषः, से, योनिः, भोजसे, इन्द्राय, सा) यह तुम्हारा स्थान है बलवान इन्द्र देवताकी मीतिक निमित्त तुझको मासादन करसाहूं (मोजिष्ठ, इन्द्र, त्वं, देवेष. भोजिष्टः, असि, . .
< अध्याय स " *. मनुष्येषु, महं, मोनिष्ठा, भूयासम्, ) हे मलवचम। इन्द्र देव ! तुम सब देवताओं में बलवान हो तुम्हारे प्रसाद से मनुष्यों में अति बालवान् होऊ ॥ ३९ ॥ अदृशमस्थ केयो विश्मयोजनाअनु भ्राज- न्तो अग्नयों यथा। उपयामगृहीतोमि सूपाय स्वा भाजायैप ते योनिः सूर्याय त्वा भाजाय । सूप भानिष्ठ प्राजिष्ठस्त्वन्देवेष्यामि भ्राजिल प्ठोहम्मनुप्येषु भूयासम् ॥ १० ॥ इस क० में ४ मन्त्र है । सवका मस्कएव ऋ० । छ०१ यापी गा०, २ मामुरी गा०, ३ साम्नीगा०,४ापीगा और देवता १ सूर्य, २, ३, सोम, ४ ग्रह है ( अस्य, केसवः, रयमयः, जमान, अनु, चि, महअम्, यथा, भ्राजन्तः अग्नयः ) इस सूर्य की, माके हेतु सम्पूर्णपदार्थका ज्ञान करानेवाली संपूर्ण किरणें माणियों के अनुगत विशेप कर दीखवी हैं जिसप्रकार प्रज्वलित अग्नि सर्वत्र भासती है । हे वतीय प्रतिग्राहग्रह । ( उपयाम गृहीतः, असि, भ्राजाय, सूर्याय, त्वा ) उपयामपान में गृहीतहो दीप्तिमान सूर्य की प्रीति के निमित्त तुमको ग्रहण करताहूँ । हे तृतीय प्रतिग्राह्यद (एपः, ते, योनिः, भ्राजाय, सूर्याय, स्वा) यह तुम्हारा स्थानहै दीप्तिमान सूर्यदेवकी तुष्टिके निमित्त तुमको इस स्थानमें प्रासादन करताहूं ( भ्रानिष्ठ, सूर्य, त्वं, देवेपु, भ्राजिष्ठः, असि, मनुष्ये', अहम्, भ्रानिष्ठा, भूयासम् ) है भदीस सूर्य तुम सब देवताभोंमें अतिदीप्तिमान हो तुम्हारे प्रसाद से ममुप्यों में मैं अतिशय दीप्तिमान होऊ ॥ ५० ॥ उदृत्य सातवेदसं देवं धन्ति केतवः। दुशे विश्वाय सूर्यम् । उपयामगृहीतोमि सूर्याय स्वा भाजाय ते योनिः सूर्याय स्वा भाजाय॥११॥ इस कं० में ३ मं० हैं। सबका प्रस्कण्व ऋ. छ. १ मिचः दार्पा गा०, २ आसुरी गा०, ३ साम्नी, गा० और देवता .
शुक्लयजुर्वेद। १सूर्य, २,सोम है। मंत्राय-(केतवः, त्य, जातदसे, य, देवं मूर्षम् विश्वाय, दशा, उद्वहन्ति ) माकी हेतु किरणें, उस, सबके देखनेवाले, जिस देव, सूर्यको समस्वजा सकी दृष्टिदेने के निमित्त उदहन करती हैं (उपयामगृहीतः) पूर्वयत् व्याख्या जाननी ॥४१॥ आर्जिन फलशम्मह्या त्या विशन्त्विन्धः पुन- रनो नितम्ब सा नः सहस्रन्धुत्वोरु घाग पर्यस्वती पुनर्मा विशतादृपिः ॥ १२ ॥ इसका कुमुरुविन्दु है। स्वराड् याहयुणिक छ । गौ देवता है । मंत्राय ( मदि, कलश, पानिन, इन्दवः, वा, प्रा. विशन्तु, सा, ऊर्जा, पुनः, निवर्चस्व, नः, सहसं, धुक्ष्व ) हे पूज- मीय गौ ! तुम इप्त द्रोण कलशको स्यो, यह सोम के सार तुम्हारी नासारन्ध्र में प्रवेश करें, वह तुम श्रेष्ठ रस दुग्ध के साथ फिर हमारे मति निवृत्त हो, इसपकार से स्तुति को प्राप्त हुई तुम, हम को सहस्र संख्या के धन से पूर्ण करों (उरुधारा, पयस्वती, रायिः, पुन:, मा, श्राविशताद ) वहुत दूध की धारावाली दुधारी गायें प्रया धन सम्पत्ति, फिर हमारे परको, माप्त हो ॥ १२॥ . । हे रन्तु इये काम्ये चन्द्रे ज्योतदित सरस्वति महि पिटुति । एताते अघ्न्ये नामानि देपेभ्यों मा सुकृतम्भूतात् ॥४३॥ इसका कुरुविन्दु भाषी पं०६० और गौ देवता है । मंत्रार्य (इटे, रन्ते, इज्ये,काम्ये, चन्द्र, ज्योते, अदिते, सरस्वति, महि. विभुति, अध्न्ये, ये, पता, नामानि, देवेभ्यः, सुकृतम्, मा, धूवार .) सरसे स्तुति को पानेवाली, सबकी दृष्टि में रमणीय, यज्ञ में सब मनुष्य जिसका भावान करते हैं, देव मनुष्य जिसकी कामना करते हैं, जिसको देख भाल्हाद होता है, सकाशमान पूर्ण अवयवदानी प्रदीन दुग्धवती महामान्य भनेक प्रकार की स्तुतिवाली प्रयध्य मारने के भयोग्य हे धेनु तुम्हारे यह अतिशय गुणयुक्त नाम हैं इन नामों से आव्हान कीहुई तम ८अध्याय। . - देवताओं के निमित्त इस हमारे सुन्दर कर्म को और इस कर्म कारनेवाले मुझको देवताओं से कपन करो देवता हमारे इस कार्य को जाने ॥ १३ ॥ यि ने इन्द्र मृधौ जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः । योमा अभिदासत्यधरामया तम उपया- मगृहीतोसीन्द्रोप त्या विमृध एप ते योनि- रिन्द्रीय त्वा विमृधै ॥ १४ ।। इस कं० में ३ मं० है । सबका भरदानशास ऋ० । ई०.१ भुरिगनु०, २ मासुयुणिक, ३ याजुपीज और देवता १ इन्द्र,२ ३ प्रहहै । मंत्रार्थ-(इन्द्र, ना. मृधः, विजहि, पृान्यतः, नीचा, यच्छ, या, अभिदासति, अधरं, तमः, भागमय) हे इंन्द्र ! हमारे संग्राम में शत्रुओं को विशेपकर जीयो, संग्राम की इच्छा कर सेना संग्रह करनेवाले शत्रुओंको नीचोंकी समान निग्रह करो, जो हमको क्लेश देवाहे उसको निकृष्ट अन्धकाररूप नरक को प्राप्त करो । हे महामसीय इन्द्र ग्रह ! तुम (उपयामगृहीसा, सि, विमधे इन्द्राय स्वा) उपयाम पात्रमें गृहीत हो विशिष्ट संग्राम वाले इन्द्र देवता की सन्तुष्टि के निमिच तुमको ग्रहण करता हे महाप्रतीय इन्द्र ग्रह! (एपः, ले, योनिः, बिमधे, इन्द्राय, त्या) यह तुम्हारा स्थान है विशिष्ट संग्राम वाले इन्द्र देवताकी प्रीति के निमिच तुमको प्रासादन करताहूं ॥ ४४ ॥ वाचस्पति विश्वकर्माणमुराये मनोजु पाणे अद्या९वेम । स नो विश्यानि छचनानि लोप- विश्यशम्भूरवसे साधुकर्मा । जपणामहीमा- सीन्द्रीय त्वा विश्वकर्मण एप पोनिरिन्द्राय त्या विश्वकर्मणे ॥४५॥ । इस कण्डि में ३ मंत्र हैं। संवका शासऋ० छ०१का भुरित नि०, २ का सा० उ.३ का सा• गा देनता १ का इन्द्र, का.मह ३ को लिङ्गोत है। मंत्रा--(भधा, बाजे, वापस . - २३१ . शुक्लयजुद । शिम्, मनोजु, विश्वकर्माण, ऊतये, हुवेम, सा, विश्चशम्, साधुकर्मा नः, विश्वानि, वनानि, अबसे, जापत् ) आज हम महामसीय अन्न के विषयमें पाणियों के पालक मनकी समान वेग वाले सृष्टिकर्चा को रक्षाके निमित्त पुकारते हैं,वह संसारका कल्या- णकर्ता, मुन्दर कर्म करने पाला हमारे सकल हवगों को रक्षा मिमित सेवन करे (उपयामगृहीतः, मास, विश्वकर्मणे, इन्द्राय, त्या ) हे इन्द्रग्रह तुम उपयामपात्र में गृहीत हो, विश्वकर्मा इन्द्र की तुष्टि के निमित्त तुमको ग्रहण करताहूं (एपः, वे, योनिः, विश्वकर्मणे, इन्द्राय, ला) यह तुम्हारा स्थान है, विश्वकर्मा इन्द्र के निमित्त तुमको पासादन करताहूं ॥ ४५ ॥ विश्वकर्मन्हुथिया वर्धनेन नातारमिन्द्रमकृणो- रखध्यम् । तस्मै विशः समनमन्त पूर्वाग्यमुग्री विध्यो यथासत् । उपामगृहीतोसीन्द्रीय त्वा विश्वकर्मण एप ते योनिरिन्द्राय स्था वि- श्वकर्मणे ॥ १६ ॥ इस कं० में ३ ० हैं। सबका शास । ई० १ भुरिगा० मि०, २ साम्न्युणिक ३ सान्मी गा. और देववा १ इन्द्र, २ ३ ग्रहहै। मंमार्य (विश्वकर्मन्, अर्धमेन, इषिपा, इन्द्रम्, मातारं, अवध्यम्, अकृणोः, तस्मै, पूर्वीः, विशः, समनमन्त, यया, भयं उग्रः, विहन्यः, प्रसव ) हे विश्वकर्मन् परमात्मन् । वर्धमान इपिष्मदान द्वारा धन के वाक्यों से प्रीति करने वाले तुमने इन्द्र को जगत् का रक्षक, जिसको कोई न मारसकै ऐसा किया, इस प्रकार इन्द्र के निमित्त पूर्वकाल की मजा महर्षि भादि प्रणाम करों हुए, जिस मकारसे यह इन्द्र वन उठायं अनेक कार्यों में भाव्हान योग्य हुभाहै इस कारण सबमणाम करते, हे परमात्मन आपके एपिसामर्थ्य से इन्द्रका यह प्रभाव है (उपयामगृहातः,) हे ग्रह ! तुम उपयाम पात्रमें गृहीरा हो पूर्ववत् ।। ४६ ।। उपपामगृहीतोस्यग्नये त्वा गायनच्छन्दसंगृहा.. - . - ८ अध्याय २३७ मीन्द्रीय स्वात्रिष्टुप्छन्दसंगृह्णामिविश्वेभ्यस्त्वा देवेम्पो जगच्छन्दसंगृणाम्पनुष्टुप् तेभिगरः ॥४॥ इसके ममं हैं।सवका देवा प्राकई०१ स्वराहा गा. २सा० गा०३ भागा०, देवी जग और सबका भदाभ्य देवता है। मंत्रार्थ-हे प्रथम भदाभ्य ग्रह सोम! (उपयामगृहीतः, असि, गायत्रच्छन्दसं, त्वा, भानये, गृणामि ) तुम उपयाम पात्र में गृहीत, हो गायत्री छन्दके घरणीय तुमको भाग्नि देवताकी प्रीति के निमिरा ग्रहण करताहूं (त्रिष्टुप्छन्दसं, त्या, इन्द्राय गृहणामि) उपपाम पारमें ग्रीस त्रिष्टुप्छन्द से वरणीय तुमको इन्द्र देवता की प्रीतिके निमित प्राण करसाई, हे उसीय प्रदाभ्य ग्रह ! तुम उपयाम पानमें गृहीत हो (जगच्छन्दसं, त्वा विश्वेभ्यः, देवेभ्यः, गृहणाम ) जगतीन्दसे परणीय तुमको सम्पूर्ण विश्वेदेवा देवसाभी की मीति के मिमिर ग्रहण करताहूं। हे अदाभ्य नाम से गृहीत सोम !(अनुष्टुपु, से, भीमगरः,) अनुष्टुप्छन्द तुम्हारी स्तुतिके निमित्त है ॥ १७॥ बेशीनानन्या पत्मन्नाधुनोमि कुकूनना नान्या पत्मन्नाधुनोमि भन्दनानान्त्वा पत्मनानामि मुदिन्तमानान्त्वा पत्मन्मावूनोमि पधुन्तमा नान्त्या पत्मन्नाधूनोमि शुक्रन्त्यो शक आधू- नोम्पन्हाँ पूपे सूर्यस्य रिमधु ॥ १८ ॥ इस कं० में ६ मंत्र हैं। सत्रका देवा ऋ० । छ०१ याजुपी०, २ याजुपीज०, ३ याजु० त्रि०, ४, ५, याजु००, ६ भुरिग्साम्नी १० है। मंत्रार्य-हे सोम (प्रेशीमां, पत्मन, त्वा, माधूनामि, कुकूननानाम, पत्मन, स्वा, आधुनोमि, भन्दनानां, पत्मन, स्वा, आधुनोमि ) इधर उधर धापमान मेघों के उदर में वर्तमान जो जल के समूह हैं उन सबके वर्पने के निमिच तुझको कम्पित करता हूँ-हे सोम ! शब्द करतेहुए जगत् के कल्याणकारी मेघों के उदर में जो जल है उसके वर्पण के निमित्त तुझको कम्पित करता हूँ, हे सोम ! हमको प्रत्यारा प्रसन्न करनेवाले शो .
शुक्लयजुधेद। मेघों के उदर में जल है उनके अपने के निमित्त तुझको कम्पित करता हूं, हे सोम ! ( मंदिनसमानां, पत्मन्, त्या, धनोमि ) अत्यन्न वृप्तिकारी जो मेघों के उदर में जल है उनके वपने के निमित्त तुझको कम्भिरा करता हूं (मधुनतमानां, पत्मन्, त्या प्राधूनोमि ) अमृतस्यरूप जो मेयोदय हैं जिनके भूमिपर वर्पण के निमित्त तुझको कमिगत करता हूं-हे सोम (शुक्र, वा, शुक्रे, भाधनोमि, पन्हः, रूपे, सूर्पस्य, रश्मिपु) अलिष्टकर्मा शुद्ध तुभाको शुद्ध अक्लिष्ट कर्मवाले निग्राभ्य लक्षणवाले जल में कमिा करता हूं दिन के रूप मूर्य की किरणों से कम्पित करता हूं ॥४८॥ ककुम पंहपभस्र्य रोचते वृहच्छुकः शुक्रस्य पुगेगाः सोमः सोमस्य पुरोगाः। यत्र मोमो- दाभ्पनाम जाबितही त्या गृणामि तस्मै तमाम सोमाय स्वाहा ॥ १२ ॥ इस के० में २ मन्त्र हैं । सबका देवा • छ० १ नि- दापी ज०, २ याजुपी पं० है और देवता सबका सोम है ॥ म. न्त्रार्थ-ई सोम ! (पभस्य, ककुभ, रूप, रोचो, बृहन् शुक्रः, शुक्रस्य, पुरोगाः, सोमः, सोमरय, पुरोगा:-) श्रेष्ठ वर्षणकारी तुम्हारा, ककुद् महत् मादित्य लक्षण, का मदीस होता है, महान्, शुद्ध श्रादित्य, शुद्ध सोमका पुरोगामी है, सोमही सोम का पुरोगामी है (ते, थदाभ्य, जागृषि, यत्, नाम, राम्मै, स्था, । गृहामि) तुम्हारा अनुपहिसिन जागरणशील जो तुमको ग्रहण करता हूँ (सोम, सस्मै, से, सोमाय, स्वाहा ) हे सोम ! उस आप सोमाप के निमित श्रेष्ठ होम हो ।।१९।। उशिवपन्देय मोमानः मिपम्पाधापीहि यशी त्वन्देय मोमेन्द्रस्य मिषम्पाधोपी पुस्मत्संया स्वन्देषसोमविश्वपान्देवानाम्यम्पाधापीहि इस क में हैं। सत्रका देवाऋषि है। ६.१ आमुयुणिक, नाम है उस अध्याय। २३९ २ भासुरी गा०, ३ भायुरिक और देनत्ता सबका सोम है । मंत्रार्थ ( देव, सोम, उशिक, त्वं, भग्ना, प्रियम्. पायः, अपहि) है सोम देवता ! तुमको पानेकी सब कामना करते हैं इस कारण तुम अग्निके पियखाच भावको माप्त होमो (देव, सोम, वशी,, त्वं, इन्द्रस्य, मिय, पाथः, अपीदि ) देदीप्यमान सोम ! काना. मान तुम इन्द्र के प्रिय अन्नको माप्तहोयो (देव, सोम, अस्मत, सखा, लं, विश्वपा, देवानां, प्रियं, पाथः, अपाहि ) हे देवसोम हमारेवन्धु तुम सम्पूर्ण विश्व देवाओंके गिय यन्नको मातहोयो५० हुए रतिपिछ रमद्यमिह धृतिमिह स्वधृतिः स्वाहा । उपसृजन् धगम्माने धरुणो मात- उन्धय॑न् । गयस्पोपंगस्मासुदीधरस्थाहा ॥५१॥ इस कं. में २ मंत्र । सबका देवाशापि है। ई० १. प्राजाप- स्या वृ०, २ भुरिगाषिक और देवया १ पशु, २ अग्नि है। मंत्रार्थ-दे गोविन्द तुम्हारी,( रतिः, इह. रमध्वम्, इह, धृतिः, स्वधृतिः, स्वाहा, ) रति इस यजमानमें हो, इस यजमानमें तुम रमण करो इस यजमानमें तुम्हारा संतोषही इसी के स्थान में स्वकीयों का संतोष हो यह माहुति भली प्रकार गृहीत हो (धरुणः, माने, धरूणग, उपसूजन, मातर, धयन्, भरमासु रायः, पोर्प, दीघरद, स्वाहा ) धारण करनेवाला अग्नि पृथ्वी के धारण करनेवाले अग्निको समीपमें प्राप्त करशाहुमा पृथ्वीको पीता हुधा हमको धन पशु पुत्र सुवर्णादि की पुष्टि प्रदान कर यह माहुति भलीप्रकार स्वीका हो ॥५१॥ मन्त्रस्य शादिरस्पर्गन्मज्योतिरमृता भन्नुम । दिवं पृधिव्या अध्यारहामाविदाग देवांन्स्यज्योतिः।। * इसका देवा नपि, भुरिगापी ३०ई० सोम देवता है। मंत्राप उत्तर इविनि ! तुम (सत्रस्य, ऋद्धिः, मसि, ज्योतिः, भगन्म, श्रमृता, अभम, पृधिव्या दिवम्, अध्यारुहाम, देवान, अविदाम, ज्योतिः, स्व:) यज्ञ की समृदिप हो तुम्हारे प्रसादसे ही हम " , . । २४० शुक्लयजुर्वेद। यजमान प्रादित्य लक्षणवाली ज्योति को मात होकर भरणधर्म से रहित होने की आशा करते हैं, पृथ्वी से पुलोक को भारूढ हुए देवगण इन्ट्रादि जाने, ज्योतिरूप स्वर्ग के देखने जानने की पाशा करते हैं ।। ५२॥ गुवन्तमिन्द्रापर्यता पुगेयुधा यो नः पृतन्या- दपतन्तमिद्धत पण तन्तमिद्धतम् । दुरेस- सायउत्सद्हनं यदिनक्षत् भस्माध शप- रिशर विश्वती दादीष्ट विश्वतः पूर्भुव: स्वः सुपुताः प्रजाभिः स्पाम मुबारा वीरः सुपोषाः पापैः ।। ५३॥ इसके में ३ में हैं। सबका परुप ० । छ. १ मार्यनु०; २विरादापी १०, ३ पिरा०मा०६० और देवता.१ इन्द्र पर्वत, २ इन्द्र, विराइ ३० । मन्त्रार्थ-(पुरोयुधा, इन्द्रापर्वसा, युर्व,सं सं, गम्, इत, भपहस, वजेण, सतम्, इद, हतं, पः, ना, पृतन्यान, शूर, यव, गान, दूरे, चचाप, छन्त्सन, इनक्षत् ) आगे युद करने वाले, शनुओं के सन्मुख युद्ध करनेवाले इन्द्र और पर्वत, सुम दोनों, उस उस शत्रुको और विशेषकर ही उस शत्रुका विमाश फरो, धज नामक अपने सीक्षण मायुध से, उसी शत्रुका विशेष करके, विनाश करो, जो शन, हमसे, सेना द्वारा युद करे, हे शूर 'हे इन्द्र ! तुम्हारा बन्न, मव अत्यन्त गम्भीर वन में, दर वर्तमान गये शत्रुके निमित्त, कामना कर जव उस दूर गए हुएको मात करले (दर्मा, भस्माकं, विश्वमः,शत्रून्, परिदपीए) विदा: रण करने वाला बन, हमारे, सर भोर स्थित सम्पूर्ण शत्रुभों को, सब भोर से विदीर्ण करो (भूर्भुवः, स्वःमजाभिः, शुमला, वार, सुपीरा, पोपैः, सुपोपाः, स्वामी अग्नि वायु सूर्यादि' श्रापके मसाद से इम, प्रजाभो द्वारा अच्छी प्रजावाले वीर पुवोस, सुपुत्रवान, उत्कृष्टसम्पति काम करके तुम्हारे मसाद से मुंसम्पत्तिवान्, विरूपाराहो ॥ ५३॥ !
८ अध्याय २४१ - परमेष्टुअभिधीतः मजापतिर्वाचि च्याहसाया. 'गन्धो अच्छतः सविता मन्यां विश्वकर्मा दी- क्षायों पूपा सोमपण्यम् ॥ ५४॥ इस के० में ६ मंत्र हैं। सबका वशिष्ठ ऋ० है । ई० १,५,६, देवी जमती २ याजुपी पं०, ३, ४ देवीपं० है । देवता सपका लि- गोक्त है। मंत्रार्थ-जिससमय यजमान सोमयाग करने को भर हो मन मनमें (भभिंधीतः, परमेष्टी,वाचि, व्याहतायां, प्रजापतिः, अच्छा, इतः, अन्धः ) सोम चिन्ता कियाहुमा, परमेष्ठी होता है। वाणी के, उच्चारण करने में,सोम प्रजापति नामक होता है। जिस काल में यजमान के अभिमुख, प्राप्तामा तव, अन्ध माम 'वाला होता है। सोम के (सन्या, सविता, दीक्षायां, विश्वकर्मा, सोमक्रयापाम, पूषा) यथाभाग रक्षित होनेपर सविता नाम होता है, दीक्षा में, सोमका, विश्वकर्मा नाम होता है, सोमत्र- यणी गौ को लाने में सोम, पूपा नामबाला होता है ।। ५४ ॥ इन्द्रश्च मरुतश्च पायोपोस्थितो मुरः पुपय- मानो मित्रः क्रीतो विष्णु: शिपिविष्ट ऊराया- सन्नो विष्णुरधिपः पोह्यमाणः॥ ५५ ॥ इस कं० में ५ मंत्र हैं । सवका वशिष्ठ ऋ० है । छ० १ प्रा. सुर्थनु०, २ देवीज०, ३ देवी ४०, ४ याजुपी त्रिगुप्, ५ याजुपी पं० है और सर्वका देवता लिंगोक्त है । मन्त्रार्था(क्रयाय, पो. त्यितः, इन्द्रः, च, मरुतः च ) सोम के ऋयार्थ उपस्थित होने में सोम इन्द्र, और, मरुत नामवाला भी होता है (पण्यमानः, अमरस, फीत:, मित्रः, उरौ, नासन्नः, शिपिविष्टः, विष्णः, मो- द्यमाणः, नरन्धिपः, विष्णु:) क्रय करने के समय सोम, अमुर संज्ञक है, मोल लियाहुआ सोम, मित्र संज्ञक होता है, यजमान की गोदी में स्थित सोम, प्राणियों में मविष्ट विष्णु नामवाला होता है, शकट में वहन करतेसमय सोम, जगत्वंही वा जगत्पालक, विष्णु नामवाला होता है ।। ५५ ॥ ३१.... .
. .२४४ शुक्लयजुर्वेद । विष्णुवरुणा,अगन)जिन विष्णु और वरुपके,मभावसे,लोकठहरे हैं, जो विष्णवरुण,भपने क्लासे, अत्यन्तवीर, अत्यन्त बलशन हैं जो अपने क्लासे अप्रतिम है, लोकत्रयका आधिपत्य करते हैं, उन यज्ञमें प्रयमही थाव्हान किर, विष्णु और वरुण के प्रसि, यह सोम गया ॥ ५९॥ ट्रेयान्दिवमगन्यज्ञस्ततामा द्रविणमदु मनुष्या नन्तरिक्षमगन्यजस्तो मा द्रविणमप्टु पितन पृथिवीमंगन् यज्ञस्ततो मा द्रविणमष्टु यचं लोकमान्यज्ञस्ततों मे भद्रमभूत् ॥ ६० ॥ इसका वसिष्ठ ऋषि अत्यष्टि छ० थौर यशदेवताहै । मंत्रार्य (पशः, दिचम्, देवान, भगन्, ततः, द्रविणं, मा, अष्टु) यह, यज्ञ, धुलोक में, देवताओंको पहुंचा उस स्वर्भ में स्थित यत्र से विशिष्ट भोगका साधन धनरूप यसका फल मुझको प्राप्तहो (यज्ञः, मनुष्याम्, अन्तरिक्ष, भान् रातः द्रविणं, मा, भष्टु ) स्वर्गसे । उतरत समय यह यउ मनुष्यलोक में भावा हुआ वृष्टिरूपसे अन्तरिक्ष लोकमें प्राप्तहुधा, वहां स्थित याके फल से अनेक प्रकार के धनकी माप्ति मुझको हो, ( यजः, पिन, पृथ्वी, अंगन, ततः, द्रविणं, मा षष्टु,) यह पब धूमादि मासे पिसरों के प्राप्तहो कर, भूलोकको, भाया उसस्पानमें स्थित यज्ञके फलसे, धनादि मुझको मासहो ( यज्ञाः, य, कंच, लोक, भगन, उतः, मे भद्रं अभूव ) यह यज, जिस, किसी भी, लोकको, गया हो, इसके फलसे, मेस, कल्याण हो । ६० ।। चतुस्त्रिशतन्तको ये वित्तनिरेय इमयज्ञ स्वधया ददन्ते । तेपोच्छिन्न सम्वेत धामि . स्वाहा धुम्मों अप्यतु दे॒वान् ॥१॥ इसका वसिष्ठ ऋषि वा उष्णिक छ. और धर्म देवताहै। मंत्रार्थ ( ये, चतुस्विंशव, तन्तवः, इम, यडे, विततिरे,ये, स्वधया, अध्याप। . ददनो,रोपां, छिन्नं, उपरान्, सन्दधामि,स्वाहा) जो, चौंगसि यज का विस्तार करने वाले प्रजापति श्रादि देवता, इस यज्ञको विस्तार देशई जो, अन्नादि द्वारा पुष्ट करते हैं उन यत्र के विस्तार करने वाले देवताओंका नो, अंश छिन्न था है, उसको इस धर्मपाल में संग्रह करताहूं यह आहुति भली प्रकार गृहीत हो, इस तसे महावीर संहितहो ( यमः, देवान, अप्पेतु ) महावीर देवताओं. को प्राप्त हो ॥ ११॥ यज्ञस्य दोहो विततः पुत्रासो अष्टधा दिव- मन्न्याततान । स यज्ञ धुक्ष्व महि मे जाया गयस्पोप विश्वमायुरशीय स्वाहा ॥१२॥ इसका वसिष्ठ ऋपि स्वराहापी त्रि० छ. और या देवता है मंत्रार्थ-( यजस्य,दोहः, सः पुरुत्रा, विततः, अष्टधा, दिवं, अन्या- जान ) यज्ञका जो, पाहुतिपरिणाम हुमा, वह बहुरा मकार से विस्तारको प्राप्त होताहुआ पाठों दिशाओं में फैलताना धुलोक में व्याप्तहुया है (सः, यजर,मे,प्रजायां. महि.धुश्व, राया, पोप, विश्व, भायु, अशीय, स्वाहा ) वह यज, मुझको सन्ततिमें, महिमाको मदानकर, धनकी पुष्टि, सम्पूर्ण अवस्थारूप भायु को पाऊं यह पाहुति भली प्रकार गृहीत हो ।। ६२ ।। आपवस्व हिरण्यदइववत्सोमवीरचंत् वाज- होमन्तमाभर स्वाहा ॥६३ ॥ इसका कश्यप ऋषि, स्वरादापी गा.छ० और सोम देवता है। मंत्रार्थ (सोम, पापवस्व, दिरण्यवत, अश्वयन, वीरवद,गोमन्तम्, चाज, भाभर, स्वाहा ) हे सोम ! तुम, पाकर इस यूपस्तम्भको पवित्र करो, सुवर्णयुक्त, अश्वयुक्त, वीरयुक्त, होकर, धेनुयुक्त अन्न, हमको सब प्रकार से मदान करो, यह याहुति मली प्रकार गृहीत हो ।। ६३ ॥ इति शक्ल यजुर्वेदान्तर्गत वाजप्तनयिमीहता का सानुवाद - अक्ष्म अध्याय समाप्त . - शुक्लयजुर्वेद । अथ नवमोऽध्यायः। जिसमें अग्निष्टोम और प्रासंगिक मंत्र है ऐसे अष्टम अध्याय में शादित्य नहादि सम्बन्धी मंत्र कहे । अब नवम अध्याय में चौंतीसी कण्डिका सक वाजपेय यक्ष के मंत्र कहते हैं ।। ॥ हरिः ॐ ॥ देव सवितः प्रतुंघ यज्ञम्प्रमुंघ यज्ञपतिम्भगाय । दिव्यो गन्धर्वः केतपू। तन्नः पुनातु वाचस्पतिजन्नास्वदतु स्वाह॥१॥ इसका वृहस्पति प्रा०, स्वराडापी पिछ और सबिता देवता है। मंत्रार्थ-(देव, सवितः, यज्ञ, प्रसुव, यज्ञपात, भगाय, मसुत्र) हे दीप्यमान सव के मेरक परमात्मन् ! बाजपेय यज्ञ को, मवृत्त करो, यजमान को, अनुष्ठानरूप ऐश्वर्य के निमित्त, मेरणा करो, (दिव्यः, केसयूः, गन्धर्वः, नः, केतं, पुनातु ) दीप्यमान, अन्न के पवित्र करनेवाले, रश्मियों के धारण करनेवाले सूर्यमण्डल में वर्तमान नारायण, हमारे, अन्न को, पवित्र करें ( वाचस्पति, ना, पाज, स्वदत, स्वाहा ) वाक्य के अधिपति प्रजापति, हमारे, इवि रूप भन्नको,प्रास्वादन करें, यह माहुति भलीमकार गृहीत हो।।१।। धृवसदन्या नृपदम्मनःसदमुषणामहातोसी- न्द्रीय त्वा जुटेलाम्येष ते योनिरिन्द्रीय त्या जुष्टतमम् । अषमुपदन्त्या घृतसदै व्योम- सदमुपयामाहीतोसीन्द्राय वा जुष्टं गृहा- म्येप ते योनिरिन्द्राप त्या जुटतमम् । पुधिवी- मदन्वान्तरिक्षसन्दिविसदन्देवसदन्लाकस. दमप्यामशीतोसीन्द्रीय त्या जुष्टंगप्रणाम्येप ते योनिरिन्द्रीय त्या जुष्टनमन् ॥ २॥ इस के० में ९,मह । सका वृहस्पति मा० छ० १ याजुपी, २,५,८, साम्न्यनु० ३,४, ६, ९, भामुयनु० ७ निगा० नारे देवता सबका इन्द्र है । मंत्रार्थ हे प्रयम ग्रह ! तुम इन्द्र देवताकी ९ अध्याय २४७ पीरिके निमित्त (उपयामगृहीतः, असि, धुवसद मृपदं, मगः, सद, त्वा, इन्द्राय, जुष्टं त्वा गृलामि, पपः ते, योनिः, नुष्टतमम्, त्वा ) उपयाम पानमें गृहीस हो, स्थिर इस लोकमें स्थिरा मनुष्यों में स्थित मनमें स्थिा, तुमको, इन्द्र देवताके, मिय तुमको, ग्रहण करता हूं, यह तुम्हारा, स्यानहै, इन्द्र देवताके अत्यन्त पिय तुमको इस स्थानमें स्थापन करताहूं । हे द्वितीयग्रह । तुम (उपयामगृहीतः, असि, समुपदम, घृतसदम्, व्योमसदम्, वा इन्द्राय, जुएं, त्वा, गृहणामि, एपः, , योनिः, इन्द्राय, जुएतमम्, त्या) उपयाम पामें गृहीत हो जलमें स्थित, घृतमें स्थिरा, आकाशमें स्थित तुमको, इन्द्र देवताको, प्रिय, तुमको, ग्रहणे करताहूं, यह तुम्हारा, स्थान है, इन्द्र देवता के अत्यना प्रिय, तुमको, इस स्थानमें स्थापन करताहूं । हे तृतीय ग्रह ! तुम (उपयामगृहीत, असि, पृथिवीसदम्, अन्तरिक्षसंद,दिविसदं, देवसदम् नाफसान्द्राय, जु, वा, गृहणामि,एपः, ते, योनि, इन्द्राय, जुष्टतम,त्वा) उपयाम पात्रमें गृहीत हो, पृथिवीमें स्थित अन्तरिक्षमें स्थित धुलोक में स्थित देवतालों में स्थित दुःख रहित देवस्थान में स्थित तुमहो इन्द्र के प्रिय तुमको ग्रहण करता यह तुम्हारा स्थान है, इन्द्रके, अत्यन्त प्रिय, तुमको इस म्यानमें स्थापन करताहूं ॥२॥ अपार्थ रसमुयम सूर्यसन्त ममाहितम् । अपा रखस्य यो रसस्तं घौ गृणाम्युत्तम. मुपयामगृहीतोसीन्द्रीय त्या जुष्टगृणाम्येप ते योनिरिन्द्राय त्या जुष्टतमम् ॥ ३ ॥ इसका वृहस्पति ऋ०, निदा० अ० छ. और रस देवता है। हे चतुर्थ ग्रह! (सूर्ये, समाहित,सन्त, उठ्यस, रस, अपां, रसस्य, या रसा, तं, उत्तम, वः, गृणामि) सूर्य में, स्थापित, विद्यमान, समस्त अन्न के उत्पादक, जलों के, सार का, जो, 'सार है, हे देवताओं, उस, श्रेष्ठ उत्कृष्ट मजापति को, ग्रहण । करता हूँ शेप - . - २४८ शुक्लयजुर्वेद । पूर्व मन्त्र के समान है ॥३॥ ग्रही जर्जाहुत्तयो व्यन्तो प्रिय मतिम् ।.. तेणं विशिप्रियाणां बोहमिपमूल्ज सभग्राम- सपयामहीयोसीन्द्रीय रखा जुष्टंभाणाम्येप से गोनिरिन्द्रीयत्वा जुष्टतमम् सम्पृचौ स्थःसम्मा भद्रेण पूउक्त विचौ स्थाविमा पाप्मना पूडतम् ॥४॥ इस कं० में ५ मं० हैं। सबका एहसाते ना. है । छं. १ निपदार्षनु०, २, ३, मामु. अनु० ४, ५, विराडामुर्यनु० और देवता १,२,४,५, काग्रह ३ इन्द्र है। मंत्रार्व-(ग्रहाः, ऊर्जा- हुतयः, विप्राय, मसि, व्यन्तः, रोषां, विशिमियाणां, वः इपम्, उज, अहं, समग्रभम् गृहणामि ) हे सम्पूर्णग्रहो ! अन्नरसका श्राव्हाग करनेवाले तुम, बोदमान यजमान के निमित्त, विशिष्ट बुद्धि को प्राप्त करानेवाले हो, उन, यजमानों के मिय, तुम्हारे, सम्बन्धी अन्न, रस को, मैं सम्यक् मकार से प्रण करता हूं । हे पक्षन ग्रह 1 ( उपयामगृहीतः, असि, इन्द्राय, जुष्टं त्वा, एप, ते, योनिः, इन्द्राय, जुष्टनम, त्वा) तुम उपयामपानमें गृहीत, होइन्द्र देवताके, प्रिय, तुमको ग्रहण करताहूं-हे पञ्चम ग्रह यह तुम्हारा स्थान है, इन्द्र देवताके, अतिमिय जानकर तुमको इस स्थानमें स्थापन करताहूं । हे सोम मुराग्रह गो कि तुम दोनों (समचौ, स्पः मा, भद्रेश, सभृक्तम् ) मिले हुए हो, सो तुम दोनो, मुझको, कल्याण से, संयुक्त, करो, हे सोम सुरग्रह तुम दोनों (विपचौ स्यः,)वियुक्त हो, (मापाप्मा विपक्तम् ) मुझको पापाचरणसे पृयक करो॥४॥ . इन्द्रस्य पज़ोसि वाजसास्त्वयाय चाज सेत् । चार्जस्यनु मसये पातरम्मदीमदितिनाम चर्चसा फरागहे । पस्पामिदं विलम्वनमाविवश तस्यान्नो देवः सविता धर्भ साधिपत् ॥५॥ इस कं० में २ ० हैं । सक्का गृहस्पति ऋ० छ०१ मास० ९मध्यापा २१९ गां०३ विरारति ज और देवता का रब २ कृषियी सविता हैं मंत्रार्थ-हे रथ ! तुम ( वानमा, इष्ट्रस्य, बना, प्रसि, भयं त्वयां, चा, सेव ) अन्न देनेघाले हो, इन्द्रके वनहो यह यजमान तुम्हारी बचतुल्य सहायता से अन्नको प्राप्त हो । ( बासस्प, प्रसपे, नु, मातरं, अदिति, मही, नाम, वचसा, करामहे.) अन्न के अनुया में वर्तमान हम जिस माता, जगत की निर्माण करनेवाली श्रदीन पूजनीय मसिद्ध भूमिको वेदपाययों द्वारा अनुरा करते हैं (यस्या इदं, विश्व, भुवन, प्राविषेश. देवः, समिता, तस्यां , धर्म, साविपत् ) जिसमें यह सम्पूर्ण संसार मषिष्ट है;मकाशात्मक सब . के मेरक परमात्मा तिस भूमिमें हमारी द धारणाकी प्रेरणा करें ५ अपस्वन्तरकृतमाउ भएनमपामुरा प्रशस्ति- ज्वाचा भयंत वाजिनः देवारापोपो चाजर्मिः प्रततिः कुन्मान्यापाजसास्तेनापं घासेत्॥६॥ इस कं० में २ मंत्र हैं। सबका हस्पति प्रा०, ० १ पिरा. डापुं० २ निवृ० मा०प० है और देवता १ अश्य, २ पाप है। मंत्रार्थ-( मप्मु,मन्ना, भमुश, उत्, अमु, भेषभ, प्रवा, मागिनः, भवद, अपां, प्रशस्तिपु ) मलों के मध्य में अमृव स्थिसंह और जनों के मध्य में प्रारोग्य और पुष्टिकारक औपाय स्थित है, हे अश्यो इस प्रकार से अमृत भेपज युक्त जलों में वेगवान होयो, प्रथा जलोंके प्रशस्त भागों में मानके निमित्त पेश करो। (देवीः, भाषः, यः, या, गति, ककुन्मान, पाजसाः, अमिः, तेनं, भयम् चाजग, सेत् ) हे दीप्यमान लो! तुम्हारी जो शीघ्र चलने वाली ककुद्के समान ऊँची अन्नकी देनेपाली, तरंग हैं उनसे सिक्ता यह प्रश्न, यनमामके इच्छितानुरूप अन्नको देने में समर्थ हो ॥६॥ वातों धामनो वा गन्धर्वाः सप्तविंशतिः । ते अग्रे म्युजसले मस्मिम्जपमादपु.॥७॥ इसका दृहस्पति मा०, भुरिगार्यु ० छ भश्व देवताहै । ममा '(बासा, बा, गमः, पा, सप्तविंशतिः, गन्धर्वाः, से, अग्ने, भरप, २५० शुक्लंयजुर्वेद। अयुञ्जन, रो, घस्मिन्, मर्च, मादधुः) वायुयामन या सचाईस गंधर्व भूमिके धारण करनेवाले नक्षत्र वे सब वासादि के प्रथम अश्वको रयम युक्त करते हुए ही इस प्रश्नमें अपने २ धेगके भेशको धारण करते हुए ॥७॥ पारिहा भष पाजिन्युग्यमान इन्द्रस्पेष दृक्षिणः श्रियैधि । युञ्जन्तु त्वा मरतो विश्व- वैदस आ ते त्वष्टा पत्सु जवन्दधातु ॥८॥ इसका वृहस्पति ऋ०, भुरिगापी नि० ई०, अश्व देवताहै । मंत्राध-(पाजिन, युज्यमानः, वातरंहाः, भर, दक्षिणः, इन्द्रस्प, इव, श्रिया, एपि, विश्ववेदसः, मरुतः, वा, पुसन्तु, श्वष्टा, से, पत्स, जर्ष, भादधातु ) हे पेगवान् भश्व ! जुतेहुए सम.वायुके समान वेगवान इजिपे, दक्षिण भागमें स्थित हुए इन्द्रके अश्वनी समान शोभासे युक्त होभो, सर्पन मरुत देवता, तुमको रथ में नियुक्त करें त्वष्टा देवता सुम्हारे चरणों में बेगको स्थापनकर ८ जयो यस्तेवाज़िन्निहितो गुहा याइग्रेने परीसो अचरञ्च वात। तेनं नो वाजिन बसचान बन वाजजिच्च भव समने च पारयिष्णुः पाजिनो याजजितो वाजसहिष्यन्तो बृहस्पतभाग- मजिघ्रत ॥ ९॥ इसकमें २ म० हैं। सपका वृ० ऋ० है।ई १ भान., २ पापी गायत्री और सबका देवता अश्व है. ममाप-(पाजिन, यः, से, जवः, गुहानिहिसः, यः, श्येने, परीता, प, पाते भघरत पामिन सेनापळेन, पलपाम, मः,पाजजित्, च,सममे, पारयिष्णः) हे यश्च ! जो तेरा घेग हृदय में स्थापित है, जो श्येम पक्षी में तुम्हारा दिया पेग है, और बासमें जो वेग स्थित है। हे भव उस बल करके बलवान हुए हमारे निमित्त भन्न जीतनेवाले होभी और संग्राम में शत्रुके सेनानिवेश का परामर करके हमारेनिमिच प्रचुर भन्न जीतो (बामक्षित, बाज, सरिप्पन्तः, वाजिनः, - - - ९अध्याप स्पते, भांग, अवनिप्रस) अन्नके जीतनेवाले भन्नके प्रति नाते हुए हे मयों! यसरि के भाग चरुको घो॥९॥ देवस्याहसवितुः सवेसत्यसवमो बृहस्पते. रुस्तमन्नाथमहेयम् । देवस्याहय सेपितुः सबै मत्पसंयस इन्द्रस्योचमन्नाको हेयम् । देव- स्थाह सवितुः मये सत्यप्रसपमो बृहस्पत- रुतमन्नामरहम् देवस्याहं सवितुःम सत्य- प्रसवम इन्द्रस्योत्तमन्नामकम् ॥ १० ॥ इस के० में ४ में हैं । सषका वृद. ० ईद-- १ लि. र, २ साम्नीज०, ३ प्राची ३०, ४ भुरिगसान मोर सबका लिङ्गक्त देवसाहै। माय-(सत्यसबसः, सवितुः, देवस्य, सरे, अई, इससेः, उत्तमम्, माकं, रुहेयम् ) सत्यप्रेरक सविता देव की,मनुझा में वर्तमान में वृहस्पति सम्बन्धी श्रेष्ठ स्वर्गम भारोपण के । सत्यसयसः, सविता,देवस्य,इन्द्रस्य उत्तम, माके, रुहेयम्) मनुल्लंघनीय प्रेरणावाले सवितादेवकी मनुशा में वर्तमान में इन्द्रसम्बन्धी उत्कृष्ट स्वर्ग कामनासे चक्र पर मारोहण करता हूं। ( सत्यसबसः, सवितुः, देवस्य, सने, अयं, वहस्पसे, उत्सम, नांक, मरुहम् ) मनुल्लंयनीय प्रेरणापाले सविता देवकी मेरणा- वश मैं रहस्पति के उत्कृष्ट स्वर्गकी कामनासे इस रथचक्र पर थारूढ हुमा ( सत्यसबसः, सवितुः, देवस्य सवे, मद, इन्द्रस्य उधर्म, नाक, अरुहम् ) अनुसंधनीय सविता देवताकी आम वर्तमान में इन्द्रकै उत्कृष्ट स्वर्ग लामकी कामना से इस चक्र में चढा हूँ॥१०॥ बृहस्पते वाजय वृहस्पतये वाचे वदतु वृह- स्पति वाजजापपत । इन्द्र वा जञ्जपेन्द्रीय 3 याचं बढ़तेन्दु वाजन्जापपत ॥ ११॥ इस के० में २ मं० हैं। सबका वृहस्पति १०ई०-१प्रामा सं० २ मामा० पृ० और देवता-१ यूहरू, २ इन्द्रहै । मगार्थ हे -- . २५२. !.शुक्लयजुर्वेद। दुन्दुभियो ! तुम (बृहस्पराये, वाचं, पदव, बृहस्पसे, बांज, जय दृहस्पति, पाजम्, जापयत) वृहस्पारिके निमितइस प्रकार वचन को कही हे यदसते । नुम अन्नको जयकरो दे. दुन्दर्भियो ! तुम वृहस्पति को गन्न जय कराभो। हे दुन्दुभियो तुम (इन्द्राय, वाचं, वदत,इन्द्र, वाजं, भय, इन्द, वाजं, जापयत) इन्द्र निमित्त इस प्रकार वाणीको कहो हे इन्द्र अन्नको जीतो तुम मी इन्द्रको अन्न जप कराम्रो ॥११॥ प्रपा नः सा सत्या संवागंभूषण वृहस्पति वाजमजीजपुताजीणापत एहस्पति वाज पन- सतणे घिच्घद्ध्वम् । पासा सत्पा से . पागभूधयेन्द्रं घाजमजीजपताजीजपतेन्द्रं वाज वनस्पतमो विमुच्यद्ध्यम् ॥१२॥ इस के० में २ ० हैं। सबका पूर० ०ई० १ माल्यु. २ बासी० गाणी और देवया सबका दुन्दुषि है । मंगाय-हे दुन्दुभियो ! (का, पपा, सा, पाल, सत्या, समभूत, यया, बह- सति, वा, अजीजपत, वृहस्पति पाज, मनीमपत, वनस्पण्यः विधिपत्यम् .) तुम्हारी यह वह वाणी सत्य हुई, जिससे वहस्पति को भन्न गय करामा, हे वनस्पति काप्ठनिर्मित दुन्दुभियो भय कृतकृत्य होकर अनुमति दो, वृहस्पति का रय धावमान हो । हे दुन्दुभियो । (वा, पा, सा, पाक, सत्या, समभूत् ) तुम्हारा दिया था, वह आशीर्वादरूप वचन सत्य हुभा (यया, इन्द्र वानं अनीसपत्र) जिससे इन्द्रको अन्न आय कराया ( इन्द्र, वानम्, मनीपत, घनस्पवयः, पिमुख्यध्वम्) इन्द्रको मन्नजय कराया, हे काष्टनिमित वनस्पतियो अव कृतकृत्य होकर अनुमति दो यज- मान का रथ धापमान हो ॥ १२॥.. टेषस्याह संचितुः मवेसत्यप्रैसवमो बृहस्पत- जिजितो पाजजेपम्। वाजिनो वाजजितो. - घनस्कनुवन्तो योजना मिमनः काष्टाङ्ग उत्त १३ '.
अध्याय। २५३ - इस कं० में २ मंत्र हैं । सर्वका रह० प्रा० है । छ.. २ मापी १०, २ साम्नी जग और देवता र लिङ्गोक्त, २मध है। मंत्रार्थ-सत्यसबसः, सवितुः, देवस्य, सफे, नई,वान जिसः, वृदसतेः, घाग, पम् ) सत्य थाहाचाले सब के मेरक सविता देव के अनुशा में वर्तमान में, मन जीरानेमाले वृहससि सम्बंधी अन्न को जय क (वाजिना, वाजजिराः, अध्यनः, स्कभ्नुवन्तः, योजनाः, मिमानाः, काठाम, गच्छरा ) हे घोड़ों ! अन्नके जीराने' थाले गुम, मागों को सुमित करो, योगनों को भारी शीघ्रता से गमन करतेहुए अठारह मिमेप में मात छोसे हो ।। १३ ।। एपश्य वाली क्षिपणिन्तुरण्यत्ति गावापायको अपि कक्ष आसनि । मतुन्दधिक्रा भनु म सप्पिदपथामडास्पन्वायनीफणस्वाहा ॥१४॥ इसका दधिक्राया प्रा० है । प्राजि० ई०, अस देवता है। मंत्रार्थ-(पपः, पाजी, यः, ग्रीवायां, कक्षे, भासनि, श्रपि, बद्धः, दधिमता, ऋतुं, अनु, संसमिप्यदत् ) यह घोड़ा जो ग्रीवा कक्ष में मुख में बंधाहुमा है, वह यह अपधार को लेकर मार्ग अवरोधका पापाण गर्त कण्टकादि का भी प्राक्रमण करनेवाला रथी के प्रमिलाय को जानकर उसके अनुसार सम्यक् अनुसन्धान करताहुमा (पयां, अशांति, धन्वापतीफणव, क्षिपणिम, तुर- एयारी, स्वाहा) मागों के ऊँचे नीचे चिन्हों को, शारी शीप्रगति से सम करसा, घायुफ के थायातकी अपेक्षा न करके भी किंचित इंगित से, शीघ्र धापमान होता है, यह शाहुति भली प्रकार . गृहीरा हो ।॥ १४ ॥ डास्मास्य द्रवतस्तुरगृतः पूर्णन्न पेरन वाति प्रगर्दिनः । श्येनस्पैवधजतो अङ्गसम्परि दधि- काव्णामहोजातरितः स्वाहा ॥ १५ ॥ इसका दधिक्राण प्रा०, आज० ०, अश्व देवता है। भनार्थ (अस्य, दविकाव्यः, द्रवतः, पुरएयता, प्रादिना श्नाय..
शुक्लयजुर्वेद। इव, ध्रजाः, ऊर्जा, सह, परित्रः, उजस्म, अङ्कसं, परि, अनुशाति, नः, थे, पर्णम् ) इस, भदिपापाणुगत कष्टकादिका भतिक्रमण करेहुए गमन करनेवाले शीघ्रता से, शवधि को प्राप्त होने वाले श्येन पक्षी की समान वेग से गमन करते पन के साथ, भविशय मार्ग को लांघते, भी, इस अश्व के शृंगार चिन्ह पत्र पामरादि, संपूर्ण देश में वर्तमान होते, जाते हुए में लक्षित होते हैं, जिस मकार, पत्ती के, पंख दिखाई देते हैं ।। १५॥ शन्नोभपन्तु वाजिनो हदेवतांतामितद्रयः स्वीः । जगायन्तोहिं की रक्षांसि सने-' पुस्मधुपचन्नमीषाः ॥१६॥ इसका वसिष्ठ ऋ० भुरिगापी पं०/- मार देवता है मंमार्थ- ( देवताता. हरेषु, मिराद्रवः, स्वाः, भाई, वृकं, रक्षासि, जम्म, यन्तः, वाजिनः, नः, शं, भवन्सु, भस्मत, समि, ममीवार, पुयु- घन् ) देवसामों के कार्यके निमित्त यज्ञ में आहान करनेपर परि- मित धाधमान होनेवाले, श्रेष्ठ प्रकारावाले सर्प भेड़िये राक्षसोंको नाश करसेहुए घोड़े हमारे कल्याणको करनेवाले हों, हमसे सब मकार की दीर्घकाल की व्याधियों को पृथक् करें ॥ १६ ॥ ' ते नो अर्धन्तो हवनथुनो एवं विश्व शृण्वन्तु वाजिनो मितद्रवामहमूसामेघसांतासनिष्पनों मुहो ये धन समिधेषु जभिरे ।। १७ ॥ इसका नामा नेदिष्ट ०, मापी ज०, छ० परव देवता है । मंत्रार्थ-(से, विश्वे, मिराद्रवः, हवनभुतः, भन्ता, सहस्रसाः, मेध साता, सनिष्यवः, पाजिनः, ना, हवम्, शृण्वन्तु, ये, समिषेषु, महः, धन, जझिरे) वे सम्पूर्ण यजमानके चिचके अनुसार मित• गामी, हमारे बाहानको सुनने वाले, कुटिल गति वाले, अनेक जनाको तृप्त करनेवाले, यज्ञशालाके पूरक घोड़े हमारे भाहानोंको श्रवण करें, जो संग्रामों में बड़े धनको ले भाते हैं ॥ १७ ॥ वाज वाजे पत वाजिनो नो धनेषु विमा अमृता ८ अध्याय २५५ शतज्ञा अस्प मध्वः पिचत मादपद्ध्यन्तप्ता यात पमियानः ॥ १८ ॥ इसका वशिष्ठ ऋ०, निचदापी नि० छ, भन देनता है। मंत्रार्थ-(पाजिनः, विमा, अमृमाः, सहा: बाजे, बाजे, धर्मपु, ना, अमर, अस्य, मध्वः, पिषत, मादयध्यम्, देवपानः, पथिभिः, पात) हे भश्यों ! तुम बुद्धिमान, दीर्घजीवी, सत्य, सम्पूर्ण अन्न भौर, धनों में, हमारी, पालमा करो, इस धापमान होने से पहिले, नोवार स्पेहुर मधुर लक्षण हवि को, पान करके, इस होजागो और वृप्त होकर, देवयान में अधिष्ठिरा मार्गों से, गमन करो ॥ १८॥ आमावास्प मसूषोपाम्पादेमे चायां पृथिवी विश्यरूपे।आमागताम्पिारा भाग चामा सोमो अमृतत्वेनं गम्पात् । वाजिनो घाम- जितो या समृषामो गृहस्पतांगमय- जिघत निमृजाना ॥ १९॥ इस क० में २ मन्त्र है। सपका पशिष्ठ ० है। छ० १ मि. चुदापी वि०, २ माजापत्या नि०, और देवता-१ मजापति, २ भरव है । मन्त्रार्य-(पाजस्य, प्रसका, मा, भानगम्याद, इमे, विश्वकपे, घाचा पृषिव्यो, भा, पिशरामायरा, मा, भागन्ताम्, घ, सोमः, अमृतस्येन, मा, मागम्पाद) भन्न की उत्पाप हमारे घर में प्रागमन करे, यह, सर्पकपात्मक स्वर्ग और पृथ्वी सब मकार, हमारे माता पिसारूप हमारे रतण और प्रतिपालन को मा और सौम अमृतभाष से हमारे मसि मामहो (वामिना, वामनिरा, बाज, सरावासः, मिमृजाना, इस्पः, भाग, अयाजेनस) हे अश्यो ! भन्नके जीतने वाले भन्न के जीतने को मसिक्षण गमन करनेवाले इस यरूपा यजमाम को शोधन करते हुए वृहस्पति सम्बन्धी हमारे भागको घो॥ १९ ॥ आपये स्वाहा स्वापये स्वाही पिजाय स्वाहा २५६ शुक्लयजुर्वेद । ऋतवे स्वाहा वसवे स्वाहां पतये स्वाहान्ने मुन्धाय स्वाहा:मुग्धाय चैनशिनाय स्वाहा चिन शिन, भान्त्यापनायु स्याहान्त्याय भौ- बनाय स्वाहा भुधनस्य पतये स्वाहाधिपतये स्थाई ॥२०॥ इस कं में १२ में हैं। सबका वशिष्ठ ऋ० है । ई० १, २ १,५ देयी०३ या०मा०६,७,१२ याजुम्युनिष्कर याजुपोपं० ९पानुषी पिक १०,११ याजुषी बृहती है । और सबका गनापति देवा । मंत्रार्थ-(भापपे,स्वाहा,स्वापय स्वाहा,मपिजाय स्वाहा, प्रसस्वाहा, यसवे स्वाहा, महराये, स्वाहा, मुग्धाय अन्हे स्वाहा, वैगशिनाय, मुग्धाय स्वाहा) व्यापक, सम्बत्सर, कालात्मक आदित्य प्रगापति देवता के मील के निमिर यह चाहुति दी जाती है यह मती प्रकार गृहीत हो, सर्वव्यापी मनापति के निमित, पाहुषि'पुनःपुनः मगट होनेवाले के निमित मा० सकस भोगादि विपथ के निमिरा पा० नगत्के स्थिति कारण के निमिरा माहु० दिवसके निमिरा आहु० विनाशशील मुग्धनामकके निमित्त श्रेष्ठ होम यान्त्यायनाय, पिन शिने स्वाहा, भौषगाय,अन्त्याय, स्वाहा, भुवनस्य, पराये, स्वाहा, मधिपरये, स्वाहा ) सीमावान विनाश शील मामाके निमित श्रेष्ठ हो०, त्रिभुवनकी सीमापान के निमित, माइति सम्पूर्ण भुवनके पति के निमिश भासि, समसा माण वर्गकी उत्पति स्थिरा विनाश में समर्थ के निमिरा यह माहुराि भनी मझार दीजाती है सम्पक स्वीकार हो॥१०॥ • आयुशेन फल्पताम्गणो यज्ञेन फल्पताध - प्शन पाल्पता नो यज्ञेन कल्पताम्मुष्ठं पझेनं फल्पतां यज्ञो यझर्ग कल्पताम् । भुजापत्तेः पूजा रमः स्पर्देषा भान्मामृता अभूम ।। २१ ॥ इस के में ९ म. है। सपका पशिष्ठ ऋ है। छ ९ का माजा गा०,७ यांजु० १०८ देवी लि० ९ या० गा. से - .
९अध्याप। २५७ और देवता १-६ का प्रजापति ७ पजमान ८ यज०, ९ या है। मंत्रार्थ ( यज्ञेन, श्रायुः, कल्पनाम्, पज्ञेग, माणः, कल्पनाम, गधन, चक्षुः, कल्पसाम्, यडेनं, और, कल्पयाम, यजेन, पृष्ठं, कल्पता, यशेत, यड, कन्यताम् ) इस वाजपेय याके फलसे हमारी, भाप, दिको प्राप्त हो, इस वाजपेय यस के.फलसे पांचोप्राण दिवल को मातहों, इस पत्रके कलसे चक्षुरिन्द्रिय, सामर्थ्य को मामहो इस पत्रके फलसे श्रोत्र इन्द्रिय का क्लवृद्धि को माहो, इस वाजपेय यज्ञके कलसे हमारा पृष्टवल, वृद्धिको मासहो, इस वाजपेय याके फलसे, यके अधिष्ठान देवता विष्णु सथा यज्ञ करनेकी क्षमया, सृद्धिको मातहो । हम (प्रजापः, मना, अभूम) मजापति की सन्तति, हुए। द्दे ऋत्विगण (सा, मगन्म, अमृता प्रभूम ) हमने स्वर्गलाभ, प्राप्त कियाई इम दीर्घायु · अमर घिर.. कीरिवाले ह५ ॥२१॥ अस्मे चौ मस्त्विन्द्विपमस्मे नृम्णमृत कतुरस्मे वर्षीसि मन्तु यः। नो मात्रे प्रथिव्यै नमो माने पृथिव्या प्रयन्ते राड्यन्तासि पर्म नो वयोसि धुणः । कृष्य त्या क्षमाय त्या य्यै त्या पोपीय त्वा ॥ २२ ॥ इस के० में ४ म० हैं। सबका वसिष्ठ ऋ० है । छ०-१ निचर दाप गा०,२साम्न्युपिणक, ३ देवी सरसी, निचूदाी है है और देवला-१ दिशा, २ पृथिवी, ३ आसंदी, ४ यजमान हैं। मंत्रार्थ-ई दिक चतुष्टय ( वः, इन्द्रिये, अस्मे, यस्तु, नम्णं, अस्मे, उत, या, अनु, वास, भस्मे, सन्तु) तुम्हारे सम्बन्धी, पार्ष हमारे विषय में हों, तुम्हारा सम्बन्धी धन हमको मातहो, और तुम सम्बन्धी, यज्ञ कर्म, राया तुम्हारे सम्बन्धी रोज इमारे विषय हो अर्थात् इस जगत में हम' सब से अग्रगण्य हो । (मात्र, पृथिव्यै नमः नमो मात्रे ) मावारूप, पृथिवी के निमित्त, नम- स्कार है, पृथिवी माताको नमस्कार है। हे भासन्दी (श्यं वे ० , - २५१ हुक्लयजुर्वेद । राह) यह तुम्हारा राज्यहै। हे यजमान! तुम (यन्ता, असि, यमन, पो. ध्रुवः, धरुणः, मसि, कृप्य, त्वा, क्षेमाय, स्वा, रय्य, त्वा, पाय, त्या) सपके नियमन करने वाले, हो, स्वयं संपमन करता रियर धारक हो कृषिकार्य की उन्नति निमिरा, घुमको, राज्यकी शान्ति पूर्णताके निमित, तुमको, धन सम्मतिके वर्धनार्थ, तुमको मजा पालनके निमित, सुमको, इस स्थानमें उपवेशन कराते २२ पास्येममयः सुपधेने सोमराजानमोप- धीप्यतु । ताऽअस्मभ्यम्मधुमसीभवन्तु पर्छ गष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा ॥ २३ ॥ इसका वसिष्ट का मुरादापी भि००, मजापति देवताहै। मंत्रार्थ-( वाजस्य, प्रसवः, अग्न, भोपधीपु, भप्सु, इम, सोम, राजानं, गुपुरे ) अन्नके, उत्पन्न करने वाले प्रजापतिने, सबसे मथम मादि सृष्टिमें, भोपधी, पौर जलोंके मध्य में, इस सोम- पल्ली रूप दीप्तिमान पदार्थ को उत्पन्न किया है (:, भस्मभ्यं, मधुमती, भवन्तु, पुरोहिताः, वर्ग, राप्रे, जागृयाम ) चे सोम उत्पादक, भोपधाजल, हमारे निमित्त, रसवाली माधुर्यसे युक्त हों, याग अनुष्ठानादि में मघाग, हम उनसे अभिषिक्त होकर, सपने राज्यमें सर्व साधारणके हिसकारी होकर, भप्रमत्त होकर कालयापन करें ॥ २३ ॥ वास्येमांम्प्रेसवः शिश्रिये दिवमिमा च विश्ववनानि सम्राट। अदित्सन्तन्दापयत्ति मज़ानत्स नौ रपि सम्ववीरन्नियच्छतु स्वाहारा इसका पशिष्ट प्र०, पापीलगती ई० प्रजापति देवताहै। मंत्रार्थ (पानस्प, मावः, इमा, दिवं, इमा, विश्मा, भुवनानि, शिश्रिये) इस समस्त भन्नके, उत्पन्न करने वाले परमात्माने, इस धुलोक को इन सम्पूर्ण भुवनाको सृजन कियाहै ( सः, सम्राट्, भदि. त्यन्तम्, प्रजानन् दापयति, नः, सर्ववीरम्, रयिं, नियच्छतु, साहा) वह सबका मधिपति हविदेने की भनिच्छा वाले मुझ . .
९अध्याय। को जानताहुआ मेरी बुहिमें प्रेरणा कर मुझसे बाहुति दिाताह हमारे निमित्त सत्र पुप्रभृत्यादिस युक्त धनको. हमें प्रदान करे, यह पाहुति भलीपकार गृहीन हो ।। २४ ॥ पास्य प्रमुख आय मा विश्वा- भुवनानि सर्वत: । सनैमि राजा परियाति- विद्वान् जाम्पुष्टि वर्द्धयमानो अस्मे स्वाहा ॥ २५ ।। इसका वशिष्ट ऋ• सुराधापी नि० छ० और मजापति देवता है। मंत्रार्थ-(नु, पाजस्य, मसवः, इमा, विश्वाभुपनानि, सर्वतः, आवभूव, च, सनेमि, विद्वान, राना; अस्मे, प्रजा, पुष्टि, वर्धयमानः स्थाहा ) कैसे विस्मयकी चाल है, अन्नके मृननेवाले मजापति ने इन सम्पूर्ण भुवनोंको सब ओर से ब्रह्मा से स्तम्ब पर्यन्त उत्पन्न किया और पुरातन सब कुछ जानने वाला दीसिमान् दमारे निमित्त सन्तति धन पुष्टिको वृद्धिको प्राप्त होता हुआहै, उसके निमित्त यह माहुति दीमारी है ॥ २५ ॥ सोमराजानमधमेग्निमन्वारभामहे । आदि- त्यान्विष्णुछ सूप प्रमाण च वृहस्पनि स्वाहा ॥२६॥ इसका सपस मु०, भार्यनुष्टुप छ०, सोमादय देवता हैं। मंत्रार्थ-जो सम्पूर्ण भन्न के उत्पादक हैं जिन प्रजापति ने हमारे, (भवसे, राजानं, सोम, अग्नि, आदित्यान, सूर्य, रहस्पति, प अन्वारमामहे, स्वाहा ) प्रतिपालनार्थ राजा सोम को वैश्वानर अमि को वारह भादित्यों को नहला को बृहस्पति को भी नि- युक्त किया है, भाव्हान करते हैं, उसके उद्देश्य से दीहुई थाहुति सम्यक गृहीत हो ॥ २६ ॥ अर्यमणम्बृहस्पतिमिन्द्रन्दानाय चोदप । पाच विष्णु सरस्वती सवितारञ्च वाजिन स्याहाँ २७ इसका तापस ऋ० स्वराडायनुष्टुप छ., अर्थमाया देवता है। मंत्रार्थ-हे परमात्मन ! तुम (अर्यमणं, वृहस्पति, इन्द्र वाचं, सरस्वशी, विष्णं, चाजिनम्, दानाय, चोदय, स्वाहा ) शुक्लपक्षुर्वेद अर्यमा देवता को पृहस्पति को इन्द्र को पाणी की अधिष्ठात्री सरस्वती को सबके प्रसवका सूर्य को. जो कि यह सब देवता धन्न के देनेवाले तुमने मुजे हैं इनको धनमशान के निमित्त प्रेरणा करो, यद्दपाहुति भलीपकार गृहीत हो जो तुम्हारी मीशि के उद्देश्य से देते हैं ॥२७॥ " - 'अग्ने अच्छापदेह नाप्रति नः सुमना भच प्रनों पच्छ सहस्रजित्यहि धनदा आणि स्वाहा ॥२८॥ इसफा तापस ऋ०, भुरिगार्ण्यनुप ई०, भग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(हे अग्ने, इह, नः, अच्छावद, ना, सुमनाः, भव, सहस्रजित, हि, त्वं, धनदाः, असि, मः, मयच्छ, स्वाहा) हे अग्नि में मधिष्ठित देव ! इस यज्ञ में, हमारे हित को सन्मुख भाकर कहो हमारे प्रति करुणायित्व हो, हे सबके जीतमेमाले, जिसं कारण से तुम स्वभाव से धन के देनेवाले हो, इसकारण हम को धन दीजिये तुम्ही एकमात्र प्रार्थना पूर्ण करणे में समर्थ हो, इसकारण इस माहुति से हमारी प्रार्थना स्वीकार करो, यह माहुति भलीप्रकार गृहीत हो२८ ॥ } । प्रनो यच्छत्वर्यमांप्रपूपाप्रवृहस्पंतीः । म पाग्देवी ददातु नः स्वाहा ॥२९॥ : इसका सापस प्रा०, भुरिगापी गा० ई., वागादय देवता है। मंत्रार्थ हे परमात्मन् ! श्रापके साद से (भर्यमा, ना, मय- च्छत, पा, म, वृहस्पतिः, म, देवीवान, नः, ददातु ) भर्यमा देवता हमारे निमिच अमीए मदान कर. पूपा देवता मभीरमदान करे, वृहस्पति अभीष्ट प्रदान करे, सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री इमारे निमिच अभीष्ट दान करै ।। २९ ॥ टेक्स्प त्वासवितुः प्रमुश्विनो हुभ्यां पूरणो हस्तान्पाम् । सरस्वत्यै वाचो गन्तुर्यन्त्रिय दधामि बृहस्पतष्ठासाम्रोज्पनाभिषिञ्चाम्पसौ ३० इसका तापसकभापी जगई सम्वाद देता है। - ९अध्याय मंत्रार्थ-(सपितुः, देवस्य, प्रसवे, सा, अश्चिमोबाहुभ्यां, पूरा:, हस्ताभ्यां, इससे, साम्राज्येन, अभिपिञ्चामि) सविता देवता की प्रेरणावश होकर तुझको अश्वनीद्वयकी भुजयुगल पूपा देवता के हाथोंसे वृहस्पतिके साम्राज्यमावसे अभिषेक करता हूं, हे यगमान ! (वा, सरस्वत्यै, यान्त्रये, दधामि, याचा, यन्तु, असौ ) तुमको सरस्वती के ऐश्वर्य में स्थापन करता हूँ, तुम को वाणी वागधिष्ठात्री देवी सरस्वती नियमन कर, अमुक नाम यजमानको अभिषेक करसाहूँ यहां यजमानका नाम उच्चारणकर३० ..', अग्निरेकाक्षरेण प्राणमुदजयत्तमुझेपमुश्विनी ध्यक्षरेण हिपदों मनुप्पानुदजपनान्तानु विधायक्षरण श्रील्लोकानुजयुत्तानुजेप, सोमवतुंरक्षरेण चतुष्पदःपशनुदंजयत्तानुपम् ३१ इस केक में ४ म० हैं। सबका सापस ० है । ई० १, ३, गिदापी गा० या साम्मी ० २ ४ साम्नी त्रि० और सबका दे० लिङ्गोक्ता है। मंत्राई (अग्निः, एकाक्षरण, माणं, उदजयत, सं, उज्जेपं, अश्विनी, यक्षोण. द्विपद , मनुप्यान, उदजयताम्, तान, उज्जेयं ) अग्नि देवताने एकाक्षरकेमभाव से उत्कृष्ट रूपमाण को जय किया है मैं भी उस प्राण को एकाक्षरके प्रभाव से जय क, अश्विनीकुमारने दो अक्षरवाले छन्दके प्रभाव से दो यदवाले मनुष्यों को उत्कृष्ट रूपसे जय कियाई, मैं भी दो अक्षरके प्रभाव से उन मनुष्योंको भय करस.। (विष्णुः, यक्षरण, त्रीन, लोकान् मुदनपन, सान, पम्, सोमः, चतुरसरेण, चतुष्पदः, पशून, ज्दजयतः तान्, उज्जेपम् ) विष्णुदेव ने तीन अक्षर छन्द से तीन लोकोंको जय किया, मैं भी उनके प्रभाव से उन सीन कोकों को जय कर, सोम देवता ने चतुरक्षर मंत्र के मभाव से पादचतुष्टयात्मक पशुओं को जय कियाहै, मैं भी उसके प्रभाव से उनको जय कर॥३१॥ पूपा पञ्चाक्षरेण पञ्च दिश उजयत्ता उन्जे: ।
" . . . . . शुक्लपजुर्वेद। पॐ सविता पडक्षरेण पडतूनुदजयत्ता उज्जैप- मरुतः सप्ताक्षरेण सप्तगाम्पान्पशनुदंजय स्तानुग्नैपम्वृहस्पतिष्टाक्षरेण गायत्रीमुदजय- . सामुज्जैपम् ॥ ३२॥ . इस कं० में ४ मंत्र हैं । सर्वका तापस ऋ० है। ई०-१.१ नित्साम्नी पं०, १ साम्नी त्रि०, १ साम्नी पं०, और सबका लिझोक्ता है। मंत्रार्थ (पूषा, पंचाक्षरेण, पञ्च दिशः, उदजयत्, साः, पजेपं) पूपा देरसा ने पंचाक्षर छंद के प्रभाव से, पाँचदिशा (एक ऊपर की, )उत्कृष्टरूप से जय की उसी के प्रभाव से मैं. उन . दिशाओं को जय करूं ( सषिता, पडक्षरेण, पट् असून, उदजयत्, तान्, उज्जे ) सविता देवता ने पडक्षर छन्द के प्रभाव से, छ: ऋतुओं को उत्कृष्टरूप से जय किया, उसी के प्रभाव से उन छ: प्रस्तुओं को मैं जय क ( मरुतः, सप्तातरेण, सप्तग्राम्यान, उद- जयन्, तान्, उज्जेसम्, रहस्सातिः, अष्टाक्षरेण, गायत्री, उदजयव, ता, उज्जेपम् ) मरुत देवता ने सप्ताक्षर मंत्र के प्रभाव से, सात ग्राम्य गवादि पशुओं को जय किया, मैं भी उनको जीतू । दृह- स्पति ने महाक्षर मंत्र के प्रभाव से, गायत्री छन्द के अभिमानी देवता को वशीभूत किया मैं भी उसके मभाव से, उसको वशी मा करसकं ॥ ३२॥ मित्रो नवाक्षरेण त्रिवृत स्तोममुर्दजयत्समुज्जे- वरुणो दशाक्षरेण विराजमुदजयत्तामुज्जै- प्रमिन्द्र एकादशाक्षरेण विष्टुभमुद्जयत्ता. मुजपं विश्वेदेवा द्वादशाक्षरेण जगतीमुद- जयस्तामुपम् ॥ ३३ ॥ इस प० में ४ म० है । सबका सापस ० है । छ०- मा. वृ० २ मिनु० सा० १०, ३ सा० ५०, ४ भायु और सवका देवता तिक्त है। मंत्रार्थ (मित्रा, नवाक्षरण, त्रिहतं, उदनयन, सम्, उरजेपम्, वरुणः, दशाक्षरण, विराज, उदजयत्, तम्, ९ अध्याय। २६३ ५ उज्वपम् ) मित्र देवताने मराक्षर बन्दसे निवृत् सोमको, जय किया इसी प्रकार में भी उसको जयफ वरुण देवने 'दशाक्षा छन्दसे दशाक्षरा विराट के भभिमानी देवता को जयक्रिया में भी इसी प्रकार उसको जयकर्क (इन्द्रः, एकादशाक्षरेरण, त्रिष्टुभ, उदजयत्, तर, उज्जेपम् ) इन्द्रने एकादश अक्षरसे एकादशाक्षर निप्छन्द के अभिमानी देवता को जयकिया उसको मैं जएक (विश्वेदेवाः, द्वादशाक्षरेण, जगतीम्, उदजयन्, सा.उज्नेपर ) विश्वेदेवामोंने बारह अक्षर से जाती छन्दके अभिमानी देवता को जयकिया है मैं भी उसको वशीभूत करसर ॥ ३३ ॥ पसंयनपोदशाक्षरेण प्रपोटश स्तोममुदजय स्तमुपदाश्चतुर्दशाक्षरेण चतुर्दश स्तो- ममुजयस्तमुपमादित्याः पञ्चदशाक्षरेण पंचदशास्तोममुदसतमुज्जैपपजापतिः स. सदशाक्षरेण सप्तदश स्तोमुद्जयत्तमुज्जपम् ॥३१॥ : इस कं. ५ मं० हैं । सवका तापस ऋषि है । छ०-१, ३, आर्यनु० २ भूरि त्रि०, १ साम्नी त्रि० ५, भूरिगापी गा०, और देवता सबका लिझाता है । मंत्रार्थ ( वसवः, प्रयोदशाक्षः : रेण, त्रयोदशम् सोम, उदनयत, , उजोपम् ) बमोने सेरह अक्षर वाले बदसे त्रयोदशस्तोम को उत्कृष्ट रूपसे वशीभूरा किया उसीको मैं जपकरूं (रुद्राः, चतुर्दशाक्षरेण, चतुर्दश, स्तोम, उद- जयत् तम् उज्जेपम् ) रुद्रों ने चौदह प्रक्षर छन्दसे चौदहवे तोम को उत्कृष्ट रूपसे जयकिया उसको मैं जयकर ( श्रादित्याः, पंचदशाक्षरेण, पंचदर्श, स्तोम, उदजयन्, तं, उपम) श्रादि. त्यौनि पंचदश अक्षरके बन्दसे पन्द्रहवें स्तोमको, उत्कृष्ट रूपसे , जयकिया उसको मैं सम्यक्प्रकार से जयकम् (गजापतिः, सप्त- दशाक्षरेण, सप्तदश स्तोम, उदजयत्, सं, उज्जेपम् ) मजापति ने सप्तदशातर बन्दसे सनदशाख्य स्तोमको जयकिया उसको में वशीभूत कर ।। ३४॥ " . शुक्लपजुर्वेद । एप से निळते भागस्त पस्य स्वाहानिनेत्रे. भ्यो देवेभ्यः पुरःसद्भ्यः स्वाहा यमभ्यो ट्रेवेन्यो दक्षिणासः स्वाहां विश्वदेवनेभ्यो देवेभ्यः पश्चात्सद्भपःस्थाहा मित्रावरुणनेनेभ्यो पामरुन्ग्रेभ्योवाटेवेभ्य उत्तरासद्भ्यः स्वाहा सोमनेत्रेभ्यो देवेभ्य उपरिसद्भ्यो दुवस्वः स्वाहा ॥ ३५ ॥ , इस कं० में ६ में हैं। सबका परुण भू० है। छ. १, २, साम्न्युनिक ३ श्रा० गार ४ साम्न्यनु० ५ भुरिगा गा०६ भुरिक सा० ऋ० और सबका देवता वरुण है। मंत्रार्य-(निर्मवे, एपः, से, भागः, रो, जुपस्व, स्वाहा ) हे पृथिवी ! यह तुम्हारा भाग है, इसको प्रतिपूर्वक सेवन करो, यह माहुति भलीमकार गृहीत हो (अग्निनग्रेभ्यः, पुरःसद्भ्यः, देवेभ्यः स्वाहा )जिसका अग्नि नेता है, पूर्व दिशा में बसनेवाले देवतामोंकी मातिके निमित्त यह माहुति दीजाती है, भलीमकार गृहीत हो । ( यमनेत्रेभ्यः, दक्षिणासद्भ्यः, स्वाहा ) यम जिनका नेता है, उन दक्षिणदिशा चाशी देवताओं की प्रीति निमित्त यह माहुति देने हैं, मली मकार गृहीन हो, (विश्वदेवनेोभ्या, पश्चात्सद्भ्यः, देवेभ्यः, स्वाहा ) विश्वेदेवा जिनके नेता हैं उम पश्चिम दिशा में निवास करनेवाले देवताओंकी प्रीतिके निमित्त यह पाहुति दीजातीहै भली गकार गृहीतहो । वा,मित्रवरुण नेत्रेभ्यः, या, मरुन्नेत्रभ्या, उत्तरा सद्भ्यः देवेभ्यःस्वाहा) या जिनके नेता मित्रावरुण हैं,या जिनके नेता मरुत देवता हैं, उत्तर दिशा में निवास करनेवाले देवताओं की मीति के निमित्त, यह माहुति भलीपकार गृहीत हो, ( सोम. नेत्रेभ्या, दुवस्वनयः, उपरिसद्भया, देवेभ्यः, स्वाहा ) जिनका मेवा सोम है ऐसे परिचर्यावाले, ऊपरभाग अन्तरिक्ष, देवताओं की नीति के निमित्त यह माहुति दीजातीहै सम्यक गृहीराहो ३५ ये या अग्निनेघाः पुरःसहस्तेभ्यः स्वाहा ये १अध्याय। . देवा यमनेनादक्षिणासदस्तेभ्यः स्वाहा.ये वेषा विश्वदेवनेत्राः परवारसदस्तेभ्यः स्वाहा..ये देवा मित्रावरुणनेत्राचा महोत्राघोचगसदस्ते- भ्यः स्वाहा ये देवाः सोमनेघाः परिसदो दुवस्वन्तस्तेभ्यः स्वाहा ।। ३६ ॥ - इसक०में ५ मंत्र हैं । सरका वरुण ना, प्रामरी, गायत्री, भाजापत्यानुष्टुप भुरिन्प्राजापत्यानुष्टुप पार्टानुष्टुप् प्राजापत्या १० छ० है। सबकादेवा दे० है । मंत्रार्थ (ये, देवाः, अग्मिनेपाः, पुरसदा, भ्यः, स्वाहा ) जो, देवता अग्निनेसा संयुक्त हैं, पूर्व में निवास करते हैं, उन देवसामोंके निमिच यह भाहुति दीमाती है (ये, देवाः, यमनेत्राः, दक्षिणासदः, सेभ्यः, स्वाहा) यम जिनका नेशा ये रेवता दक्षिण दिशानिवासी हैं। उनके निमित्त यह आहुति० (ये, देवाः, विश्नदेवनेत्रा पश्चात्सदः, तेभ्यः, स्वाहा) जो देयता विश्वदेवा नेताले पश्चिमनिषासी हैं, उनके निमित यह माहुति दीनातिल है(ये, देवाः, मित्रावरुण नेत्राः, पा, मरुमाः वा, उत्तरासदः, सेभ्यः, स्वाहा) जो देवता मित्रावरुण नेतावाले अपवा मरुत् नेवाले और उत्तर दिशा निवासी हैं, उनके मिमिच, आहुति दीजासा है (ये, देवाः, सोमनेवाः, दुरस्चन्ता, उपरिसदा वेभ्यः, स्वाहा ) जो देवता सोमके नेशवाने, हषि के स्वीकार करनेवाले पुलोकवासी हैं, उनके निमित श्रेष्ठ बाहुति प्राप्तहो २६ छाने सदस्य पृतना अतिमातीरपास्य । दृष्ट- रस्तान्तरातीचाधा यशायाहसि ॥ ३७॥ इसका देवभका देवयास ऋ० भुरिगार्यता छ० अग्निदेवता है। मनार्थ-(भाने, पृतनाः, सहस्त्र, अभिमाती, अपास्प, दुष्टर, भरातीः, सरन्, मझवाइसि, वचः, दि) हे भाग्नदेव ! तुम शत्रु सेनामाको पराभव करो, शत्रुओं को विदारित करो, हे दुर्निवार बुम शत्रुओं को तिरस्कार कररोहुए यानि हकारी इस प्रहमान- को भन्नमदान करो ॥१७॥ - . ।
1 · शक्लयजुर्वेद। देवस्य त्वा समितुः प्रसवेश्विनौवाहभ्यो पुष्णो इस्ताभ्याम् । उपाधशो वीर्येण जुहोमि हती रक्षः स्वाहा रक्षसान्त्यां धोयाधिष्म रक्षा- अधिष्मांमुमसी हतः ॥ ३८॥ इस के में ३० हैं। सबकी देववातं ० हैं। ई० १ निन गा० २ याजुप्युणिक ३ साम्न्युगिक और देवता सर्वका रसोध्न हैमिनाय-निस देवता ने इस समस्त मंगहं को निज र कर्म करने में रित किया है उस(सेपितुः ऐवस्य. मसवे, अश्विनो बाहुभ्यां - ghणः, रस्ता घी, त्या उपांशोः, वीण, नुहोमि, रसा, इस स्वादी) सविता देकी याज्ञामें वर्चमाम अश्निीकुमारके वाहू युगुलसे पूषा देवताके दोनों हाथों से तुझको सपा नाम मम ग्रहके पराक्रमसे आहुवि मदान करता हूँ राक्षसकुन इस माहुति के ममावसे निहत एमा, यह पाहुति भलीमकार गृहीस हो, देश्रुवः, (रक्षसां पधाया त्वा) राक्षसों के वध के निमित्त तुमको मक्षेप करता हूँ (रस, अवधिम, भ, अवधिम, सी, इराः) रासस कुलको विनष्ट किया, यमुक शत्रुको [इस स्थल में जो मंधान शेमु है उसका नामलेय ] मारा, यह शत्रु मारागया ॥८॥ मपिता को संवाना सुक्तामग्निहपती- ना सोमो वनस्पानाम् । बृहस्पतिवा, इन्द्रो ज्येष्ठपाय रुद्रः पशुभ्यो मित्रः मन्यो वरुणो घम्मपतीनाम् ॥ ३९ ॥ इसका देववास ऋ । प्रतिजगती छ. यगमान देवता है । मनाप-हे यजमान ! ( संचिता, सवाना, त्वा, सुपताम्, भग्निः गृहपसीनाम्, सोमः, घमस्पीनाम्, इंस्पति, घाचे, इन्द्रायेदार रुद्रा, पशुभ्यः, मित्रः, सत्या, वरुणः, धर्मपतीनाम् ) जगद का नियन्ता परमात्मा याज्ञामों के याधिपत्य, तुझको प्रेरण करें। भनिदेवता गृहस्थ गणके उपास्यदेव गृहस्था प्राधिपत्यमें तुम को भेरणा करे । वनस्पतिमधान सोम देवता तुमको पनस्पति १० अध्याप। २९७ विषय के प्राधिपत्य प्रदान करे। वाक्यमकाएक सहस्पारी, देवता चाग्विषयक माधिपत्य में इन्द्रदेवगा ज्येष्ठ माधिपत्यमें पशुगण के जीवोंके रक्षक रुद्र देवता पशुदल के आधिपत्य में सत्यस्वरूप मित्रदेवता सप्तव्यवहारके आधिपत्य में धर्मरक्षक वरुणदेवया तुम को धर्म के प्राधिपत्य में मेरणा कर ।। ३ ।। मंन्देवा असपल सुबई महते संत्राय महते ज्येष्ठंयाय महते-जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियार्य । इमममुप्प पुत्रममध्ये पुनमस्य विश एप पोमा राजा सोमोस्माकम्बामणानाथराला॥१०॥ इसका देववात ऋ० है। मंत्पष्टि छ है और यजमान देवसा है। मंत्राथ-(देवाः, अमुष्प, पुत्र, अमुष्य, पुत्र, इम, मावे, मनाथ, महते, ज्येष्ठचाय, मइंस,मानराज्याय, इन्द्रस्य, वीर्याय, असपत्नम् मुवध्वम्, इमम्, अस्प, विशे, अमी, पापा राजा, सोमः) मुइविदेवगण ! तुम अमुक महाशयके पुत्र [ यहाँ यज्ञमानके पिसा का नाम लेना ] अमुफ्री. देवी के पुत्र [ यहाँ यजमान की माताका नाम लेना ] इस यजमानको महत् क्षत्रधर्म के निमिय मंहत ज्येष्ठता के निमित्त महानु जनोंके भाधिपत्यमें प्रात्मा के शानमें सामर्थ्य के निपिच, शशून्य करके प्रेरण करो अपने । प्रसाद से इस यजमानको इस अमुक जातका रोजा करो, हे अमुजाति प्रमागण! तुम्हारा यह ममुकनाम राजा हो और हम माह्मणों का राजा सोम चन्द्रमा हो ॥ १० ॥ इति शुक्ल पर्वेदान्तर्गत वाजसनेपि संहिता का सातवाद नयम अध्याय समास अथ दशमोध्यायः निस में वाजपेय यज्ञ और राजस्घसम्बन्धी कर्म प्रधान है ऐसे नवम अध्याय में राजस्यान्त मन कहे । अब दशम अध्याय में अभिपेकार्थ जतदानाद राजसूयके ऐप कर्म और चरक सौन धामणि यज्ञमंत्र कजायेंगे- . शुक्लयजुर्वेद। ॥ हरिः ॥ अपो टेवा मधुमतीरगृष्णन्न 'जैस्वती राजस्वश्चिताना पाभिर्मिघ्रावरुणा- सम्पपिश्चन् याभिरिन्टमनयन्मत्परतीः॥१॥ इसका परुण भा० निचूदापी त्रि-छ० है, माप देवता है। मंत्रार्थ-(देवाःमधुमती: जर्मस्वसी:, राजस्वः, चिवानाः, भपः, अरभान, याभिः, मित्रावरुणी, अभ्यपिश्चन यामिः पराधी, अति, इन्दम्, अनयन् ) इन्द्रादि देवताओंने मधुरस्वाद से युक्त विशिष्ट मन्नासयुक्त राज्याभिषेक करनेवाले, चायमान ज्ञानके सम्पादन करनेवाले मलोंको ग्रहण कियासिन जलोंसे,मिमावरुण देवतामोंने शभुओं को तिरस्कार कर इन्द्रको राज्याभिषेक किया उनजलों को ग्रहण करते हैं ॥ १ ॥ वृष्ण अम्मिसि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मै देहि स्वाहा घृष्ण, मिरसि राष्ट्रदा राममुष्मै देहि। वृषसेनोसि राष्ट्दा राष्ट्रमें दो? स्वाहा वृपमेनोसि राष्ट्रदा गाममुष्मै देहि ॥ २॥ इस के में ४ ० हैं। सवका परुण ऋ० है। छ:-१,२.मा. जापत्यानु०, ३, ४, और देवता सबका लिंगोत है । मन्त्रार्थ- हे कल्लोल! तुम (कृपणः, कमिः, मसि, राष्ट्रदा, राष्ट्र, मे, देहि, स्वाहा ) सेचनकरनेवाले मनुष्यसम्बन्धी तरंग हो स्वभाव, से ही राष्ट्र देनेवाली हो राज्यको मेरे निमित्त दो तुम्हारी पीय- "माण यह माहुति भलीप्रकार गृहीत हो । कल्लोल!तुम (पणा, रा०, मिः, असि, अमुष्मै, रा० देहि) सेपनसम्बन्धी नर, 'स्वमासे रा०दाता तरंग हो अमुक यजमानको [इस स्थल में यन- भानका नामले] राज्य मदान करो। हे पसेन ! तुम (कृषसेनः रादाः, असि, राष्ट्र मे देहि, स्वाहा) सेचन समर्प जलराशि रा० दाता हो मुझे रा० मदान करो; यह माहुति गृहीत हो (सपसेनः राख्दाः, अति, राम, यमुष्मै, देहि ) हे वृषसेन ! तुम रा० दाता हो, रा० अमुक यजमान को प्रदान करो ॥१॥.. - १० अध्याय। . अर्थतस्य राष्ट्रदा राष्ट्रग्में दत्त स्वाहात स्प राष्ट्ररा राष्ट्रमनुष्मै दत्ताजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रम्मै दच नाहौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्र मुष्मै दत्तापापरिवाहिणी स्थ राष्ट्रदाराष्ट्र में दत्त स्वाहापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्र- समुम दत्तापाम्पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मै देहि स्वाहापाम्पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देद्य- पागभौसि राष्ट्रदाराष्टुम्में देहि स्वाहापाङ्गी राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि ॥३॥ इस कं० में १. में हैं। सबको वरुण ऋ० है । ०,१, २ साम्न्युणिक ३, ४, ९, प्रा० गा० ५, ६, १० साम्नीय०७,८ साम्न्यनुयुय और देवता सबका लिडोक्त है। मंत्रार्थ-(भर्षतः, रादाः, स्थ, राष्ट्र, मे, दत्त, स्वाहा ) मदी आदि के मवाद में स्थिरा मलों ! तुम स्वमावसे ही रा० के देनेवाले हो, रा० को मुझ यजमागके निमित्त प्रदान करो। तुम्हारे भीति के निमित्त दीहुई यह माहुसि भली प्रकार स्वीकार हो, ( प्रातः, रादाः, स्य, अमुष्मै, रा, दस ) हे जलों ! तुम स्वभावसे रा० देनेवाने. हो मुझे रा० प्रदान करो (भोजस्वतीः, रादाः, थ, मे, राष्ट्र दर, स्वाहा ) हे वलयुक्त जलों तुम ! सुम स्वभावसे रा०दन वाले हो, रा० को इस यजमानके निमित्त प्रदान करो।(परि वाहिणी, भापः, रादाः, स्थ, मे, रा, दच, स्वाहा) हे परिवाही जलों ! तुम स्वभावसे रा० देनेवाले हो, रा० को इस यजमानके निमित्त प्रदान करो, यह माहुति भलीमकार गृहीत हो (परि. वाहिणी, आपः, रादाः, स्य, रा०, अमुध्मै, दत्त) हे परिवाही जलों तुम स्वभावसे जलदेनेवाले, रा० नमुक यजमानको मदान करो। (भापति, रा. दा., भास, रा० मे, दता, स्वाहा ) हे सागर के जलों तुम सदावा हो, रा० को मेरे निमिच करो। यह माइति मलीप्रकार गृहीत हो ( भाषिक . .
-शुक्लयजुर्वद। असि, राई, अमुष्मै, दत्त) अापति तुम स्वभावसे राज्यदासा हो, रा० भमुक यजमान के निमित्त प्रदान करो (अपांगर्भः, रा० दाः, असि, मे, राई, दह, स्वाहा ) भवरके जलो! तुम स्वभाव से रा०के देनेवाले हो मुझ रा० दो, यह माहुति तुम्हारी-मीति के निमित्त दीजासी है ( अपांगभिः, रादाः, असि. रा अमुष्मै देहि ) हे अपांगर्भ जलों! स्वभावसे रा० देनेवाले हो रा० अमुक यजमानके निमिच मदान करो ॥३॥ सूर्यत्वचस स्थ राष्ट्रदा. राष्ट्रम्मै दत्त स्वाहा सूर्यत्वचस स्थ, राष्ट्रदा राष्ट्रममुप्मे दत्त सूर्य- वर्चस स्थ.राष्ट्रदा गोष्ट्रम्म दत्त स्वाहा सूर्प-- 'वर्चस स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्त मान्दा स्थ: राष्टदा राष्ट्रम्मै दत्त स्वाहामान्दा स्थ राष्ट्रदा, गष्ट्रममुम.दत्त ब्रजक्षित स्थराष्टदा राष्ट्रमें दत्त स्वाहा, ब्रजक्षित स्थ राहदा राममुमै ; दत्त वाशी स्थं ग़दा रामम्मै दत्त स्वाहा, वाशा स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दन्त शबिधा: स्थ राप्ददा राष्टुम्मै दत्त स्वाहा शविष्ठा स्थ राप्दा राष्ट्रममुप्म दल शक्वरी स्थं राष्टदा,.' राष्ट्रम्मै दस्त स्वाहा शकरी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्र- ममुष्मै दल जनभृत,स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रम्:दत्त : स्वाहां जनभृत-स्थ राष्ट्रदा गममुमै दत्त... - विश्वभृत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रम्मै दत्त स्वाहा -विश्वभृते स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुपमै दत्तापः। स्पराज व राष्ट्रदा राष्ट्रप्रमुष्मै दत्त । मधुमती- मधुमतीतिः पृच्यन्ताम्महि क्षेत्रङ्क्षत्रियाय बन्नाना, अनावृष्टाः सीदत महौजमा महि : सुबङ्क्षत्रियाय द्धती:-11:४ . इस केस में २१ ० है । सूचका वरुण ऋ० है ई० १, २, ::१० अध्याय। २७ ३, ४ सामन्यनु० ५, ६, ९१०, आर्यनु० ७, ८, १५, १६ १७, १८ असु गा० ११, १२ भामुयुणिक, १३, १४, १९ २० निदा० ११ साम्नी त्रि० और संयको लिङ्गोक्त देता है। मन्नार्य-( सूर्यत्वचसा स्प, सदाः, रामे दा, स्वाहा ) हे जला दुम सूर्यत्वच हो स्वमाक्से हो रा० देनेवाले हो, रा. मेरे निमित्त प्रदान करो, यह आहुति मलीगकार गृहीत हो (सूपरव- घसः, स्थ, रा०दाः, अगुष्मै, राष्ट्र दा ) हे सूर्यत्वकझप जलों ! स्वभावसे ही रा० देनेवाळे तुम अमुक यजमानके निमित्त रा० प्रदान करो । हे नली (सूर्यवर्चसः, स्थ, सदा, मे, रादा स्वाहा ) सूर्य की कान्तिमें स्थित हो, स्वभावसे रा० देनेवाले हो मुझं रा० 'मदान करो यह आहुति मलीगकार गृहीत हो (सूर्य- पर्चसः; स्व रा०दा, अमुष्मै, राष्ट्र, दच) हे सूर्पवर्चस जलों! तुम सूर्यकी वर्षस में स्थितहो स्वभावसे रा० देनेवाले हो अमुक पज़मानके निमित्त रा० प्रदान करो। हे मान्दजलों तुम (रादाः रा० मे, दरा, स्वाहा) समावसे ही रा० देनेवाले हो रा० मेरे निमित्त प्रदान करो। यह प्राहुति भलीप्रकार गृहीत हो (मान्दा: स्वरादाः, रा० अमुदमै दत्त) हे मान्द ! तुम स्वभावस ही राज्यमंद हो, रा. अमुक यजमान के निमित्त दो, हे जलों सुम (प्रजक्षिरः, स्य, रादा मे, रा०, दक्ष, स्वाहा) तुम ममक्षित कूपरिषत् हो, स्वभावसे ही रा० देने वाले हमारे यजमान के निमिरा रा प्रदान करो, यह माहुति भली प्रकार गृहीत हो । हे जलो तुम (अक्षिता, स्थ, रा०, अमुष्मै, रा०, दर ) ग्रम क्षित हो, स्वभाष से राज्य देनेवाले, इस यजमान के निमिय राज्य हो । है जलो तुमः(वाशाः, स्थ, रा० अमुष्मै, रा०. दत्त) पाशामें स्थित जलो स्वभावसे राज्यदेनेवाले इस यजमान को रा दो। हे जलो (शविष्ठाः, स्थ, रा०, मे, राधे, दस, साहा) मधुर रूप तुम त्रिदोपशमन कारण से वस देनेवाले स्वभावसे रा. देनेवाले मुझे रा० प्रदान करो। यह आहुति मलीमकार मास हो - . २७२ शुक्लयजुर्वद। (शविष्ठाः, स्य, रादा०, अमुष्मै, रा. दत्ता) हे शविष्ठ ! तुम स्वभाव से ही राज्य देनेवाले अमुक यजान को रा० दो । हेजलो तुम (शक्वरी, स्य, रा०दा., मे, रा०, दरा, स्वाहा) बाह दोहादि से जगव का उद्धार करनेवाली गोसम्बन्धी हो स्वभाव से राज्यदाता हो मुझे राज्य दो यहः पाहुति भलीपकार गृहीत हो। (शश्वरी, स्प, रादा, अमुष्मै, राम, दस,)शस्वरी जलो तुम रा० दनेवाले इस यजमान के निमित रा० दो, हे जलो तुम (जनभृतः, स्य, रा दा०:,राम्, मे, दत्त, स्वाहा) वालभाव में मनुष्यों को पुष्ट करनेवाले हो स्वभावसे ही राज्यके देनेवाले हो राज्य मेरे निमिश दो यह भाति मलीमकार गृहीत हो । ( जनभृतः, स्थ, रा०दाः, अमुष्मै, रा०म्, दरा)हे समभृव जल तुम स्वाभाव से ही रा० देनेवाले हो इस भमुक यजमान के निमिष रा०प्रदान करो, हे मलो तुम (विश्वभृतः, स्प,रादा, ने, राम्, दर, स्वाहा ) मनुष्योंसे देवताभों पर्यन्त घृरा द्वारा जागत् को धारण करनेवाले हो स्वभावसे राम्यदेनेवाले हो मेरे निमित्त रा० को, गदान करा यह पाहुति भलीमकार गृहीत हो। हे घराकप जलो (विश्वभृतः,स्य, भमुष्मै राम्, दच)तुम विश्वभृत अमुक यजमानके निमित रा० मदान करो । (आपा, सराजा, स्थ, रा०दाः, रा०, भमुम, दत्त) हे मरीचिकप जलों! तुम अपने प्रकाशमें अनन्यानिस हो, स्वभावसे राज्य के देनेवाले हो राज्य अमुक यजमान को दो, ( मधुमतीः, मधुमतीभिः, महि, संत्र, त्रियाय, पन्चान, पृयन्ताम् ) हे मधुर रसयुक्त सम्पूर्ण जलों ! उस सब मधुररस जलोंके सहित बड़े बच्चाले को राजा यजमानके निमित्त सम्पादन करते हुए अपने रसोंसे सोंचो, सम्पर्क करो। हे जलो ! तुम (भनाष्टाः, महौजसः, महि, क्षत्रम् क्षत्रि- याय, दपती, सीदा ) असुरों से अनाधृष्ट पराभव न पानेवाले, वलके सहित बड़े बलको इस क्षत्रिय राजा में स्थापन कररोहुए, इस स्पानमें भवस्थान करो ॥ ४॥ -
१० अध्याय।
२७३
+
,
सोमस्य विपिरमि तव मे स्विपिभूयात् ।
अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा..
सरस्वत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा बृहस्पतये स्वाहे-
हेन्द्रीय स्वाहाघोपाय स्वाहा श्लोकाय स्वाहा
शाय स्वाहाभाय स्वाहाम्णे स्वाहा ॥५॥
इस के० में १३ म०है। सबका वरुण प्रा० है छ०१मासु
गा० १, ३, ४, ८, ९, १०, ११, १२, १३, देवी पं० ५ दैवी
नि० ६ देवी च ७ दै० ज०, और देवता १ चर्म ,अन्य सवका
लिङ्गोक्त है। मंत्रार्थ-दे चर्म ! तुम ( सोमस्य, स्विपिः, अति,
राय, विपि, मे, भूयात् ) सोमदेवकी कान्तिरूप हो, धापकी
कान्ति मुझमें होनाय (अग्नये, स्वाहा, सोमाय, स्वाहा, सत्रिने
वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूणे स्वाहा, बृहस्सयये, स्वाहा) अग्नि
देवता की प्रीति के निमित्त यह माहुवि दीजाती है, भलीमकार
गृहीत हो, प्रेरक सोमदेवना के निमित्त माहुति सविता देवता
के निमित्त श्रेष्ठ भाविक प्रयाहरूप सरस्वती के निमित्त पाहुतिः
पोपक पूपादेवता के निमित्त यह आहारी, बृहस्पति के निमित्त
यह आहुति दीजाती है स्वीकार हो।(इन्द्राय, स्वाहा, घोपाय,
स्वाहा, श्लोकाय स्वाहा, अंशाय, स्वादा, मगाय, स्वाहा, अर्थम्णे
स्वाहा ) इन्द्र देवताकी प्रीति के निमित यह माहुसि० शब्द करने
वाले देवता के निमित्त यह पाहुति जनोंसे कीर्तित परस्पर था.
न्दोलन रूपके निमित यह माहुति० पुण्य पापके विभाग करने
वाले के निमित्त यह पाहुति ऐश्वर्य के निमित यह थाहुति.
विश्व को च्याप्त करनेवाले भीमा देवता के निमित्त यह आहुति
दीजाती है ॥ ५ ॥
पुवित्र स्थो थैष्णव्यौ सवितुर्यः प्रसव पुना-
म्पच्छिद्रेण पवित्रण सूर्यस्य गुश्मिभिः ।
अर्निभृष्टमास याचो पन्धुस्पोजाः सोमस्प
द्वानमसि स्वाही राजस्वः ॥ ६ ॥
२७४. शुक्लयजुर्वेद । इस कं० में ३ ० हैं । सयका वरुण ऋ० है। छः १. देवी ज०२ मामा ६०३ भुरिग्माजापत्या पं० और देवता १ पवित्र २ भाप ५ भाप है। मंत्रार्थ-(पवित्र, वैष्णुब्यो, स्थः) हे पवित्र कुशद्वय, तुम यज्ञकार्य में नियुक्त हो, (सवितुः, मसवे, पच्छिद्रेणु पवित्रण, सूर्यस्य, रश्मिभिः, वा, प्रत्पुनामि ) जगके एकमात्र नियन्ता इस परम देवता के नियोग से नियुक्त होकर चिद्रशून्य, पवित्रद्वारा सूर्यको किरणों से तुमको उत्पवन सिंचन करता हूं। जलों ! तुम (अनिभृष्टम्, चाचा, वधु:) राक्षसों से भपराभूत वाक्यके प्रकृतवन्धु हो ( सपोनाः, सोमस्य, दात्रम्, असि, स्वाहा राजस्वः) तेगसे समुत्पन्न सोमके उत्पादक हो तथा स्वाहाकारसे पवित्र हुए, इस यजमानको राजश्री सम्पादन करो ॥६॥ सधमादो धुम्निनीराप प्र॒ता मनाधृष्टा अपस्यो चसोनाः । पस्त्यास चके वरुणः मधस्धमपाई ', शिशुर्मातृतमास्वन्तः॥७॥ इसका वरुण ऋ०, विरा०नि० छ. और वरुण देवता है। मंत्रार्थ-(एताःसधमादः, घुम्निनी:, अनाधृष्टाः, अपस्यः वसानाः आपः, पस्त्यामु, मास्तमास, अन्तः, अपांशिशुः, वरुणः, सदस्य, चक्रे) जो यह एकत्र चार पात्र में स्थित, प्रसन्न होनेवाले वीर्यवान, अपराभूत पात्रोंकामाच्छादन करनेवाले यह जल इस समय अभि- पेक कार्यमें नियुक्त हुए हैं, इसप्रकार सबके धारण करने में गृह कप जगनिर्माता मातृरूप इन जल देवियों के भीतर में जलों के शिशु वरण यजमानने सादर स्थिति की है ।।७॥ . शुषस्योत्वमसि क्षत्रस्य जरायबासिशनस्पयोनि रसि पुत्रस्य नाभिसीन्द्रस्य वात्रघ्नमसि मित्रस्यामि वरुणस्पानि त्वणायं बुन्नं बघेत् । टुवासि जासि अमासि पातनम्याचम्पातेनं- मुत्यञ्चम्पातैनन्तिचन्दिग्भ्यः पात ॥८॥ इस कं० में ११ म हैं। सबका वरूण १० है। ई०१ -- . .
.१० अध्याय। ९७५ :. याजुपी गा० २, ३, ४, यानुष्युपिणक ५० गा० ६ देवी० ७ देवी पं० ८, ९, १० दैव्यनु० १६ आयुष्णिक और देवता १ वाप्यं २, ३, ४ पाएड्वादय ५, धनु ६, धनुःको०७ वाम को ८, ९, १०.इपु ११, इपर देवता है। मंत्रार्थ-हे शार्य वन तुम! ( त्रस्य, एल्वम्, असि) सत्रधर्मावलम्बी इस यजमानकी गर्मी धार भूरा जलरूप हो हे पाण्डरक्त कम्बल ! तुम (मनस्य, जरायु:) क्षत्रिय यजमान की गर्भवेष्टन चर्मरूप हो । हे अधिवास ! तुम (सनस्य, योनिः, मसि ) क्षत्रधर्मावलम्बी यजमानकी योनिरूप हो । हे उष्णीय ! 'तुम (पत्रस्य, नामिः, अति) सत्रधर्मावलम्बी यजमानकी गर्भवन्धनस्थान हो । हे धनुप! तुम ( इन्द्रस्य, वाघ्नं अखि) इस इन्द्ररूप यजमानके सत्रनाशक पनुःसम्बन्धी हो । हे दक्षिणकोटि ! तू (मित्रस्य, असि, वरुणस्य, असि) मित्र सम्ब- धिनी है । हे वामकोटि ! तू वरुण सम्बन्धिनी है । हे धनुष ! (अयं, त्वया, सूत्र, वधे ) यह यजमान तुम्हारे द्वारा सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करै । हे वाणो ! तुम (दृवा, प्रसि ) शत्रुओं के विदीर्ण करनेवाले हो । हे वाणों ! तुम (रुजा, असि) शत्रुः ओंके भंग करनेवाले हो । हे वाणों तुम (क्षमा, असि) शत्रुओं के कम्पित करनेवाले हो । हे चाणों तुम (एनम्, प्राध्चम्, पार) इस यजमानको पूर्व दिशाकी पोरसे रक्षा करो। हे वाणों ! सुम (एन, प्रत्यर्थ, पात ) इस यजमानको पश्चिम ओरसे रक्षाकरो। हे वाणों वुम (एन, तिर्यञ्च, पास, दिग्भ्यः, पात) इस यजमान को उत्तर दक्षिण की ओर से रक्षा करो, बहुत क्या सम्पूर्ण दिशायों से रक्षा करो ॥८॥ आविर्या आपित्तो अग्निग्रहपतिराषित इन्द्रो वृद्धश्या आचित्तौ मित्रापरुणी धत- व्रतावावित्तः पुपा विश्ववेदा आचि धावा. पृथिषी विश्वशम्भुवावावित्तादितिरुरुशर्मा ॥ ९ ॥ इसकं में मंत्र हैं। सबका बरुण ० है । ई०१ दे०४९ - १ - शुक्लपजुर्वेद । "२७६ २, ३, ५, ७, या० १०४.मामु १० मा और देवता १ मजा० २.३, ५, ७ लिङ्गोत्ता ४, ६ लिटोक्त है। मंत्रार्थ- 1 (मदर्याः, भाषिः, गृहपतिः, भग्निः, आविचः, धृतवती, मित्रा- वरूणी, प्रावित्तौ, विश्ववेदाः, पा, पावित्तः) भूमण्डनवासी मनुष्यमएडनी इस यजमान को जाने, गृहपालक अग्नि, इस यजमानको जाने, विख्यातकीचि इन्द्र इस यगमानको जाने, नियम में तत्पर मित्रावरुण सूर्यचन्द्र इसको जाम, सम कुछ जाननेवाले पूषा देवसा इसको जाने । (.विश्वशम्भुवी, पावापृथिवी, मा- विरो,उरुशमा,अदिसिः, भाविता) संसारके कल्याण की विधात्री पृथ्वी और पुलोक के भगिमानी देवता जाने, बड़े मुविस्तार्थ, पुख के माधयरूप देवमाता काल इसको जाने ॥९॥ : अष्टा दन्शूकाः माचरीमारोह गायनी त्वायतु १; रचन्तर सामं प्रिवृत् स्तोमों पमन्त ऋतुर्ब्रह्म वर्षिणम् ॥१०॥ इस कं० में २ मं० हैं। सरका वरुण ० है। ई० १ दै० न० २निवृदा०५० और देवतारमा ना. २ यजमान है, ममार्थ- (बन्दशूकाः, भवेशाः ) काटने के स्वभाववाले मृत्यु के कारण सादि पिमष्ट हुए। हे यममान ! तुम(माचीम,मारोह) पूर्वदिशा को पारोहण करो, (गायत्री, स्या, प्रपतु) गायत्री छन्द तुमको रक्षा कर सोमों के मध्यमें (रपतरसाम, भिटत्स्सोमः, वसन्त मृतुः, अझ, द्रषिणम् ) रयंवर साम सोमके मध्य में त्रिवृत्स्सोम अनुभोंमें पसन्त ऋतु परमात्मा का ऐश्वर्य सुम्हारी रक्षाकरै १० दक्षिणामारोह त्रिष्टुप्त्वावतु वृहत्साम पञ्चः दश स्तोमो ग्रीष्म ऋतुः अनन्द्रर्विणम्॥ ११ ॥ इसका वरुण ऋ० आ० परछ यजमान देवता है। मंत्राय-हे यजमान | तुम (दक्षिणा, पारोह) दक्षिण दिशाको भाक्रमण करो (त्रिगुप् चात्साम पंचदशस्तोम, ग्रीष्मजातुः, क्षत्र, द्रविणं, ला, भवद् ) त्रिष्टुप्छन्द हात्साम पंचदशस्सोम ग्रीष्मऋतु १० अध्याय। २७७ , सत्रिपजाति सम्बन्धी ऐश्वर्य तुझको रक्षाकरे ॥ ११ ॥ मृत्तीचौमारोह जगती त्वावतु वैरूप साम सप्तदशस्तोमो वर्षा ऋतुर्वि द्रविणम् ॥१२॥ इसका बरुण , निचदार्यनुपूर ई० यजमान देवता है। मंत्रार्थ-हे यजमान सुम (पतीची, पारोह, जासी, रुप साम, सप्तदशस्तोमः, वर्षासुः, विद्, द्रविणं, स्या, भवतु ) पश्चिमदिश को माक्रमण करो, जगती बन्द, वैपसाम, वर्षाऋतु, वैश्य स. म्बन्धी ऐश्वर्य, तुम्हारी रक्षाकरै ।। १२ ।। उदीचीमारोहानाप्त्वायतु पैराज सामयिक शस्तोमः शरदृतुः फलन्द्रविणम् ॥ १३॥ इस के० में २ में हैं। सबका वरुण ऋ० है। छ० १ निच- ग्रामयुनिणक १ मा० मा. और देवसा १ यजमान २ अमर है मन्त्रार्थ-हे यजमान तुम (उदीचीम्, पारोह, भनुपर वैराज साम, एकविंशस्तोमः, शरहतुः, फलं, द्रविणं, स्वा. अवतु) उत्तर दिशाको आक्रमण करो, पनुपछन्द, उत्पन्न वैराजसाम एकविंश स्तोम, शरदृतु, यज्ञफरारूप ऐश्वर्य सुमको रक्षाकार १३ अदांमारोह पंफिस्त्यषितु शाक्यररैवरो सामनी निणयन्त्रयस्त्रियशो स्तोमा हेमन्त- शिशिरावन चाम्पित्यस्तन्न च शिर: १५ इसका वरुण ० है । भुरिग जाती छ० और यजमान देवता । मन्त्रार्थ-ई यजमान तुम (ऊम्, पारोह, पंक्तिः, शावर घसे, सामनी, प्रिणयत्रयस्त्रिंशी, स्त्रोमो, हेमन्सशिशिरो, ऋतू, वर्ग: द्रविणं, त्वा, अवतु) ऊपर मागको आक्रमण करो पंक्तिबन्द, शक्तरसाम पौर स्वरा, साम, त्रिनव भौर प्रयस्त्रिंश, स्तोम, हेमन्त और शिशिर, दोनो भातु, तेजोभिमानी देवका ऐश्वर्य तुम्हारी रक्षा करे ( नमुचः, शिरः, मत्यस्तम् ) नमुचि अमुरका शिर दूर फेकागया ॥ १४ ॥ : सोमस्य विपिरनि तथैव में विपियार . + - -- शुक्लयजुर्वेद । मनुरीयमाणाः, धरान, भावन) स्वयं ही विश्वको सींचने वाले गमनशील, स्तुसियोंको प्राप्त होनेवाले वर्षा करमेवाले पर्वतके पृष्ठसे आदित्य मण्डलकी भोर गमन करते हैं। वे माहुतिके परिणामभूव जल ऊपर माप्त हुए मन्तरिक्षमें होनेवाले, मेघौंको अनुसरण करतेहए नीचे भूमिको माप्त होते हैं।॥ १९ ॥ प्रजापते नत्वदेतान्यन्योषिचारपाणि परिता । भूपा परफामास्ते जुटुमस्तन्नो अस्वयममुष्य पितासावस्य पिताब्यय स्पाम पत्तोरणीणा- स्याहो । रुट्ट पत्तै फ्रिवि पान्नामतस्मिन्छ तभरपमेटमसि स्थाहा ॥ २०॥ इसके० में ३ मं० हैं । सका देवराव मा है। ई० १ मि. २ मापी गा० ३ साम्नी वि० है और देवता १ प्रजापति र भाशीः ३ रुद्र है। मंत्रार्थ-हेमजापो ( त्वत्, भन्यः, एसानि, विश्वा रूपाणि, न, परिता, बभूष) हे परमात्मन्, मापसे भौर कोई भी इन सम्पूर्ण प्रजापालनादि कार्य तथा नाना जातीय वर्चमान भूम, भविष्यत्, कालमें के माणियोंके सृजन पालन संहार में नहीं समर्थ है इसकारण तुम्ही हमारी पार्थना पूर्ण करने में समर्थ हो (यत्कामाः, ते, जुहुमः सन्, नः, अस्तु. भयं, ममुग्य, पिता, असो, मस्य, वयं, रपीणां, परायः स्पाम, स्वादा) जिस कामना से आपके निमित हवन करतेहैं, वह कामना हमारी पूर्ण हो, यह अमुक का पिता है. यह इसका पिसा चिरस्थायी रहै, हम अपरिमित ऐश्वर्य के स्वामी हों, वह माहुति भलीमकार गृहीत हो, (रुद्र, यत्, ते, क्रिषि, परं, नाम, सस्मिन्, हुतं, असि, अमेष्टं. भास, स्वाहा) हे रुद्रदेव ! जो तुम्हारा प्रययकारी, दुष्टनाशक, उत्कष्ट नाम है, दे इघि उस रुद्रनाममें तुम हुत होमो, तुम हमारे घरमें माहुत होती हो, इस कारण सवप्रकार हमारी उपकारी होश्रो, यह पाहुति भलीप्रकार गृहीव हो । २०.॥ इन्द्रस्थजोसि मित्रावरुणयोस्त्वा प्रणास्त्रो " .
१० अध्याप २८१ . शिषा पुननिमा भव्यधाप स्वा धाप स्वा , रिष्टो अर्जुनी तामसवेन जपापाम मनमा समिन्द्रियेण ॥११॥ इसके में ५ ० हैं। साका देवपांत ऋ००१ देवी वि० २ सामन्य. १ साम्न्युणिल ४ या०४.५३० वि और देवसार, २, ३, स्थ, ४ धुर्य, ५ यजमान है। मंत्रार्थ-हे रप ! तुम (इन्द्रस्य, बना, असि) इन्द्रके बन की समान अतिदुश्रेय काठसे निर्मित हो। (शास्त्री:, मित्रावरुणयोः, प्रशिपा, वा, : युनज्मि) शासनकारी मित्रावरुण देवशाके मशासनसें तुमको इस स्य में युक्त करता है। (मरिष्टा, अर्जुनः, श्रव्यंपाय, त्या, स्वधाय स्वा) भनुपाहिसित, भर्जुनतुल्य इन्द्र, देशका भय दूर करने के निमिच मचलताके निमिरा, तुझमें सथा देशमें मुभिक्ष सम्पादन करने के निमिता तुमपर भारोहण करता हूं। हे रथधुरवाह अश्व ! ( महतो, प्रसपम, जय) मरुद्गणों की नज्ञासे वेगान होकर शत्रुभोंको जीयो हमने जो कार्य प्रारम्भ किया, उसको (मन- सा, भाम्) मनके अनुसार सम्पन्न किया। हम (इन्द्रियेण, सम्) वीर्यसे संगत हुए ॥ २१॥ मात इन्द्र ते पन्तुरापाडयुक्तासो अग्रता विदसाम. तिष्ठारयमधि य वनस्तापश्मी- न्दैव यमस्यश्वान् ॥ १२ ॥ इसका संवरण ऋ० निच० वि० छ? और इन्द्र देवता है मंत्रार्थ-( सुरापाट, वनइस्त, इन्द्र, देव, यं, रपं, प्राधितिष्ठ, स्व. श्वान, रमीन, भायमसे से, वयं, ते, भयुक्ताः, मा, बिदेसाम भारता) शीघ्र शत्रुओंका तिरस्कार करने में लघुहस्त हापमें वजधारण करनेवाले हे ऐश्वर्ययुक्त, है दीप्यमान ! दुम जिस रथ में स्थित होकर अच्छे मुशिक्षित घोड़ोंकी लगामों को थामसे हो हम तुम्हारे तिस रयसे भिन्न हुए हानि को भास न कों, प्रम नहीं है इसमकार ब्रह्मभानसे अन्य वस्तु न जाने ।। २२ ॥
शुक्लपजुवर्द। अग्नये रिपतये। स्वाहां सोमाय वनस्पतये स्वाही मरुतामोजमे स्पोइन्द्रस्येन्द्रियाय स्वाही पुधिवि मातम्मामाहिमीर्मों अहन्त्वाम् ॥ २३ ॥ इस क० में ५ म० हैं। सरका संवरण ०० १, २, याजुपी प० ३, ४, याजुप्य०५ मामु और देवता सबका लि कोक्त है । मत्रार्थ-(गृहपतये, अगये, स्वाहा, बनस्पतये सोमाप स्वाहा, मरुमा, प्रोजसे स्वाहा, इन्द्रस्य, इन्द्रियाय, स्वाहा )गृह पालक अग्निदेवताके निमित्त श्रेष्ठ शाहुति हो, घनस्पति रूपी, सोमकी प्रीति के निमिच श्रेष्ठ होम हो. मरुद्गणों के बज के निमिय इचि देते, इन्द्र के वीर्य निर्मिरा हवि देते हैं। (मात , पृथिवि, मा माहिंसी, श्रह त्वा, माउ) ६ जगत् की निर्माता पृथ्वी ! तुम मुझको मतहिंसा करो मैं तुमको स्नेश न द्॥२३॥ हुए स. शुचिपदसुरन्तरिक्षसद्धोती पेट्टिपति- पिरोणसत् । नुपरसतसव्योमसढब्जा गोजातजा अद्विजा ऋतम्बृहत् ॥ २४ ॥ इसका वामदेव प्रा० । अति ज.'छ और सूर्य देवता है। मनार्थ-(शुचिपत, हंस , अन्तरिक्षसन, वसु , दिपन्, होता, दुरोणसत्, अतिथि , नृपत, वरसत, ऋतसद, पौमसत्, उ, अन्ना, गोजाः, बहराजा', अद्रिना, सम्वृहद ) पवित्रस्थान दीप्ति में मादित्यरूप से स्थित प्रकारका दूर करनेवाला आत्मा वायुरूपसे अन्तरिक्ष में स्थित मनुष्योंका प्रवर्तक अनिरूपसे वेदी में स्थित होकर देवताओं का आहान करनेवाला प्राइवनीय रूप से पॉमें स्थित सबका पूजनीय मनुष्यों में माणभाव से स्थित, उत्कष्ट स्थानों क्षेत्रों में स्थित, यज्ञ में स्थित प्राकाश में मण्डल रूपसे स्थित इसमकार सर्व स्थितिसे प्रार्थना करके सबके सत्पात द्वारसे प्रार्थना करते हैं, और जो मत्स्यादिरूप से जलों में होता चतुर्विध मूतमाम रूपसे भूमिमें होनेवाला, सत्यमें होनेवाले पा- धमाण अग्निपके होनेवाले, मेघौ जलापसे होनेवाले सर्वगत -- :१० अध्याय। .२८३ . - . अपर्यन्त परब्रह्मरूप परमात्मा का स्मरणकर रथस उतरता हूं २४ इपदस्यायुरस्पायुमयि धेहि युमि वर्षोंमि वों मयि धेधार्गस्यूजम्मपिधेहि। इन्द्रस्य-वा. वीर्यकृतो वाह मभ्युपायहरामि ।।:२६ ।। इस फै० में ३ ० हैं:1 सवका वामदेव ऋ० २.१ साम्नी ०२ माजा. गा३, नि० प्रा०, नु० और देवता: । हिरण्य, शाखा ३.बाहु है । मंत्रार्थ:-हे शतमान ! तुम (.इयत, प्रसि यायः, असि, मपि, मायुः, घोह) सौ रतीके इतने परिमाणवाले हो । जीरन हो, सवर्णदांतसे दीघीयु होतीदै मुझमें जीवधारण करो। हे शंामान ! तुम (युङ्, मसि, वर्च, प्रसि, में,. वर्षः, दानसे पहरमे से तेनकी धारण करायो । हे उद- धदि वर्पिकता, इन्द्रस्य, चाहू, यां, अभ्युपासहरामि.), अमोद के कारण हो, शकट में होकर थन्न पाता है अन्न को मुझ में स्थापन करो, वीर्ष के करने चाली परमऐश्वर्यवान.यजमान की, हे दोनो भुजाओं । मैं, तुम दोनों को मित्रावारुणी यस्मा के प्रति नीची करता हूँ ॥२५॥ स्योनासि मुपदाखि पुत्रस्य योनिरसि । स्यो... नामासौद मुपदामासीद प्रप्रस्थ योनिमासीद २६१ इस के० में ३ मंत्र हैं.। सबका वामदेव ाम है, ०,१,२ देवीज०, ३ भुरिगार्थी गाः, और देवता १, २ आसन्दिवस्त्रे, ३ यजमान है ।. मंत्रार्थ : हे न्यूया प्रासन्दि गुम (स्योना; यसि, सुखदा, अति ) सुखरूप हो सथा सुखसे बैठने योग्य हो। हैं अघोषास 1 तुंम (जमध्य पौनिः, असि सवधर्माश्रिख इस यजमान के अाधार के उपयुक्त स्थान हो,। हेयजमान ! (स्योनां भासीद, सुखदा। प्रासीद, नस्य, योनि, मासोद ) मुख की करनेवाली. प्रासन्दी में चारोहण कर सुख से अपधेशन के योग्य में बैगे, यह अधिवास और यासन्दी तुम्हारी समान राजपुरुष . - २८१ शुक्लयजुर्वेद। के उपवेशन योग्य आधार है, इसपर बैठो ॥ २६ ॥ 'निषसाद धृतनतो वरुण पुस्त्यास्वा । साम्रो. ..ज्याप मुकतुः ॥ २७॥ इसका शुनाशेप ऋ० है । वर्दमाना गा० ई० वरुण देवता है। मंत्राथ-(समता, मुक्तः, वरुणः, साम्राज्याय, पस्त्यास, पानिपसाद) यहलक्षण प्रत के धारण करनेवाले श्रेष्ठ संकल्प भनिष्टके निवारण करनेवाले इस यजमानने सत्रामाव के निमित .मनामोंमें आधिपत्यरूपसे स्थिति की ॥२७॥ अभिभूरस्पेतास्ते पञ्च दिशः कल्पनतां ब्रह्म- स्त्वम्वूहह्मासि सवितासि सत्यप्रेसयो बरणोसि मृत्यौजा इन्द्रोमि विशाजा रुद्रोर्सि सुशेवः। बटुकार श्रेयस्करभूयस्करेन्द्रस्य वासि तेनं मे रदय ।।२८॥ इस कं० में ८ म० हैं। सबका शुनःशेष ऋषि है। छ०१ साम्युष्णिक २ याजुपी गा• ३ या००४ याजुप्युणिक, ५ र या गा०७ याजु० ज०८याजुनि और देवता र पक्षा यम २, ४, ५, ६ ग्रह्म दे०७ लिङ्गो ८.स्फ्य है। मंत्रार्थ- हे यममान ! तुम (भभिः प्रसिपता, पञ्चदिशः, ते कल्पं. ताम् ) इन पाच के द्वारा सकल जगत के पराभव करनेवाले हो, यह पांच पूर्व, पश्चिम, उच्चर, दक्षिण और कई दिशा इसके हिरा सुंम्हारे हस्तगत प्राप्त हो । ( ब्रह्मन्, प्रसा, प्रसि, अशा सत्यमसनः, सविता, असि)ो ब्रह्मन् ! तुम ब्रह्माकी महिमावाले हो, हे यजमान ! तुम महा महिमावाले भनुन्लंघ्य उपदेश देने में समर्प मनावर्ग के नियन्ता होने से सरिता हो, (अमा, च, ब्रह्मा, भसि, सत्यौजाः, वरुणः, मति) है यजमान ! महाम- हिमावाले तुम अमोघवीर्य मजाच के भनिष्ट निवारण करने से वरुण हो, (प्रसन्, विशौजाः, इन्द्रा, प्रसि, ब्रह्मन, मुशेवा रुद्रा, असि, असन, प्रक्षा, भति) हे महिमावाले, यजमान ! तुम १० अध्याय। २८५ ऐचर्यवान् देशकी शान्ति की रक्षा करने से इन्द्र हो, हे महा- महिमा वाले यजमान ! तुम आश्रित जनोंके मुख देनेवाले पुनः देवनीय तथा शत्रुगणों की स्त्रियोंके रुलानेवाले रुद्र हो हे यजमान तुम ब्रह्मा अर्थात् महा महिमावाले हो, इसकारण प्रहा हो। (बहुकार, श्रेयस्कर अयस्कर) हे सम्पूर्ण कार्यम निपुण प्रत्येक श्रेष्ठकार्यप्रवर्चक बहुत कार्यकारी, इस स्पानमें भागमन करो हे स्पय ! तुम (-इन्द्रस्य, वचः, मसि, सेन, मे, रथ्य ) इन्द्र का वज्र हो, इसकारण मेरे यजमान के पशवी होकर, कार्य सापन करो।॥२८॥ अग्निः पृथुईमणस्पतिर्जुषाणों अग्निः पृथु- ईमणस्पतिराज्यस्थ घेतु स्वाहा स्वाह/कृताः । सूरयस्य रश्मिभिर्यतस्वयंसजातानाम्म हय. 'मेष्ठचाय ।। २९ ।। इस के० में २ मंत्र हैं। सबका शुनाशेप १०ई०.१ मा त्रि०, २ साम्नी त्रि० और दे०-१ अग्नि, २ भक्ष है । मंत्रार्थ- (अग्निः, पृयुः, धर्मणः, पविः, नुपाणः, पृथुः धर्मणः, पसि; अग्निः भाज्यस्य वेतु, स्वाहा ) महान अग्निदेवता, देवताओं में प्रथम होने से विशाल, जगत के धारण करनेवाले धर्मका स्वामी श्रीयमाण हवि का सेवन करनेवाला, जो देखते २ मति मन्द होता है जो गृहस्थियों के गृहधर्म का प्रधान साक्षी. है वह असि विपुल धर्मस्वरूप, अग्निदेवता हमारी दीहुई घृत की इवि मीति पूर्वक भक्षण करे, यह पाहुति मलीमकार गृहीत हो । हे अक्षण! (स्वाहाकृताः, सूर्यस्य, रश्मिभिः, सजाताना, मध्यमेष्ठपाय, यतध्वम् ) भाहुति मदानपूर्वक गृहीच तुम, प्रतिप्रचण्ड सूर्य की किरणों से सम्मिलित हुए स्पर्धा करो, समानजन्म क्षत्रिय भाइयों के मध्य में सब से श्रेष्ठ करने को यत्न करो।॥ २९ ॥ मुविधा प्रेसवित्रा सरस्वत्या वाचा स्वत। पूष्णा पूशुभिरिन्द्रणास्मे पृहस्पतिनाः । "
२८६
शुक्लयजुर्वेद.।
ब्रह्मणा वरुणेनौजमाग्निना तेजमा. सोमैन ।
राजाविष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतःप्रसपामि.३०
इसंका शुनःशा ऋ० मिचूदत्यष्टि ई०:सविवाया देवता,
मंत्रार्य-( प्रसवित्रा, सवित्रा, याचा, सरस्वत्या, प, त्वना,
पशुभिः पूष्णा, भस्म, इन्द्रेण, ग्रमणा, इससिना, मोजसा,
वरुणेन तेजसा, अग्निना, राज्ञा, चन्द्रेण, दशम्पा, देपचया,दि.
पुणना, प्रसूनः प्रसामि) समय जीवोंके प्रेरणा करनेवाले सविता
सूर्य चाकपा सरस्वती, रूपके अधिष्ठात्री त्वष्टा देवता पशु से
उपलक्षित पूपा देवता स्वय, इन्द्र, देवयाग में ब्रह्मत्वको मासहुए
वृहसति बड़े रोजसंयुक्त वरुण तेजसियुक मग्नि भौपधि मामणोंके
अधिपःदीप्यमान"चन्द्रमा दश संख्या के पूर्ण करनेवाले यज्ञ के
अधिष्ठात्री देव परमात्मा, नारायण के द्वारा, अनुशाकियाटुमा, मैं
प्रसर्पण करता हूं ॥ ३०॥
।' अश्विभ्यो. पयस्व सरस्वत्यै पयस्वेन्द्रीय
+ सुनाम्णे पच्पस्व । वायुः पूतः पविण प्रत्यङ् .
* . सोमो अतिसुतः । इन्द्रस्य युज्यः सखा ।। ३१॥
इस के० में ४ मंत्र हैं । मु. १ अधिना ०.२, ३, ४,शुन:
शेप ० है.छि०१ या गा० २ यात्रुप्यु. ३ मा० १०-४ नि-
चूदा गा० दे०देवता १, २, ३, लिहोक्त १ सोम है। मंत्रार्थ-
हे सुरोंके योग्य-वीहि ! (अश्विभ्यां, पज्यस्त्र, सरस्वत्यै, पयस्व
मुनाम्णे, इन्द्राया पक्ष्यस्व .) अश्विनीकुमार देवताओं की नीति
के निमित्त रसरूपसे परिणा हो, सरस्वती देवी की प्रीतिके नि-
मिल पंपकर रूपान्तर को परिणन हो, भलीमकार रक्षा करने
वा इन्द्र देवता की मीति के निमित्त पाकको प्राप्त हो (इन्द्रस्य
युज्यः, सखा, पवित्रणा पूत पायुः, सोमः, मत्यङ, अतिसुतः)
इन्द का योग मित्रभून, पवित्रदारा शुद्ध किया तथा वायु द्वारा
पवित्र 'हुआ, सोम इस पवित्रद्वारा मधोमुख सारित होताहुना,
-
--
अतिक्रमण करगया ॥ ३५ ॥
१. अध्याय। २८७ + कुषि पर्वमन्तो यचिच्या दान्त्यनुपूर्व...... विपूर्व डहे पाकृणुहि.भोजनानि ये हिपो नम उक्ति यन्तिा उपयामगृहीतोस्थश्विभ्यां न्वा सरस्वत्यै स्वेन्द्रीय त्या मुन्नाणें ॥३१ ॥ इसका काशीचां मुकी िमुनिव्राह्मी त्रि०० सोमदेवता है। मंत्राय है सोम ( यया, ह, यधमनी, कुषित, या चित, मा नुपूर्वम्, विषय, प्रग, दान्ति ) जिसप्रकार इस लोक में बहुत पर से सम्पन्न एकमात्र किसान, बहुतसे यवसे पूर्ण शस्य को पिपार काके क्रम से पृथक करके शीघ्र कर्जन कारो हैं, इसीप्रकार प्रास अल्पमात्र तुम देवगणों के प्रिय हो (पपा, भोजनानि, इह, गुणदि, ये, वहिपि, ममः, उक्ति, यजन्ति ) इन यजमानों के सम्बन्धी, विविध प्रकार के भोजन, इस यजमान में सम्पादन करो, 'नो शासन पर बैठे हुए विग्गण, हविलक्षणवाले सन्न को लेकर याय का नाम लेकर योग करते हैं। हे सोम! तुमार उपयाम- गृहीतः, असि ) उपयामपात्र में गृहीत हो (माश्विभ्यां त्वा) अश्विनीकुमार की प्रीति के निमित्तं, तुमको ग्रहण करता हूं। हे सोम ! तुम उपयामपात्र में गृहीत हो ( सरस्वत्यै, स्वा) सर- स्वती देवता की मीति के निमित सुमको ग्रहण करता हूं। हे सोम तुम उपयामपात्र में गृहीत हो (सुत्रामणे, इन्द्राय, स्वा) पालक इन्द्रदेवता की प्रीति के निमित्त तुम को ग्रहण करता हूं.३२ 'गुवा सुरांममश्विना नपुंचापासुरे मा । विपिपाना शंभस्पती हन्दूधर्मस्वावतम् ॥ ३३ ॥:: : इसका काशीस सुकीति, निवदाय॑नुष्टुप् ई०अश्वि सरस्वीन्दा देवता है। मंत्रार्य (अश्विगा, नमुचौ शासुरे, मुरामम्, सचा, विपिपांना, शुभः, पती, युवम्, कर्म सु। इन्द्र, भा. काम् ) हे सर्वजनहितकारी अश्विनीकुमार । नमुचिसंशक दैत्य में व भपिक रमणीय सोम को, सीप विविधमकार से पीते हुए 'शुपकर्म के पाळक तुमने उन उन कार्यों में इन्द्र' का. . - , २८८ शुक्लयजुर्वेद । पालन किया ॥३३॥ पुत्रमिव पितरायश्चिनोभेन्द्राषथुः काम्पै - * सेनाभिः। परसुराम पपिचाशचीभिः सरस्वती स्वा मघवन्नभिष्णक ॥ ३४॥ इसका कातीवत मुकीचि . भुरिगारी पं० ई० अविसर- सतीन्द्रा देवता है । मंत्राप-(इन्द्र, उमा, अश्विना, काव्यैः, देस. नाभिः, वा, सावथुः, इव, पितरी, पुत्र, यत्, मपवन, शचीभिः पुरामम्, व्पपित्रः, सरस्वती, भभिष्णक ) हे इन्द्र दोनों हित- कारी अश्विनीकुमार मन्त्र देखनेवाले महर्षियों के काव्य और कर्मों से प्रयोगोंसे प्रसुर सहवाससे मशुद्ध सोमरस पानकर विपति को प्राप्त हुए तुमको रक्षा करते हुए जैस माता पिता पुत्रकी रक्षा करते हैं, जिसमकार हे इन्द ! तुमने नमुचि वधाश्किर्म करके पान करते ही प्रसन्न करनेवाले रमगीय सोम को विशेषकर पान किया सरस्वती वाणी तुम्हारी अनुगत है, सेवा करती है ॥ ३४ ॥ .. इति शकठ यजदार्गत वाजसनेयि संहिता का सानुवाद इसम अथ एकादशोध्यायः अध्याय समात. १७ पर्यंत जिसमें अभिषेक के लिये जल लाना प्रादि रानसूय यज्ञ प्र. धान है ऐसे दशम अध्याय में अभिषेक से लेकर राजसूय मन्त्र कहे । भर ग्यारह से लेकर प्रारहवें अण्याय तक भग्नि- चपन के मन्त्र कहेजायेंगे। जान. प्रथमम्मनस्तत्वार्य सविता धिर्यम् । आनेोतिमिचाय्यं पृथिव्या अक्षारत् ।। ३ ॥ मनापति ऋ०, विराडार्ण्यनुप बन्द और सविता देवता है। मंत्रार्थ-( सविता, मनः, प्रथम, युनानः, अग्नि, ज्योतिः, धि. यम्, तत्वाय, निचाप्य, पृथिव्यै, मध्याभरद ) सबके मेरण करने बाले प्रजापति भग्निके भारम्भ में मनको पाले एकाग्रकर अग्नि .
११ अध्यापन . " के रोज को, बुद्धिपूर्वक इष्टिकादि शाग को पंच पशुओं में प्रविष्ट जानकर मानसभाम के लिये धारण किया ।। १ ।। युक्तेन मनसा यूपन्देवस्य सवितुः सथे । स्व... याय शक्तया ॥२॥ प्रजापति , शमती गा० ० और सविधा देवता है। मार्थ-( सवितुः, देवस्य, सथे, पयं, युक्तेन, मनसा, स्वग्याय, शनचा) संसार को अपने २ कम में मेरणा करनेवाले सविता देव की आज्ञा में वर्तमान हम एकान मनसे स्वर्ग के साधन करनेवाले कर्म में, अपनी सामर्थ से गयल करते है ॥२॥ युक्तार्य सविता दे॒पारस्वतोधिदियम् । ज्योतिः फरिप्यतः संविताप्रलुवाति तान् ॥ ३॥ इसका मजापति ०, निदा०० सघिसा दे है । मनार्थ 'जिसकारण से जामेरक देवरा ( सविता, मान, धिया, दिवा स्वः, यतः, शहद, ज्योतः, करिष्यतः, देवान् युकाय, या मसु- चति) सब देवताओं को स्वर्ग में मेरणा करनेवाला तथा इन्द्रिग गखों को दमन करनेवाला , ग, बुद्धिपूर्वक कर्मानुष्ठान से प्रकाशमान स्वर्ग को जानेवाले, महान् मादित्य नामक आत्मज्योति को संस्कार करनेघाले, प्रसिद्ध देवताओं को अग्नि कर्म में संयुक्त कर मेरणा करता है ॥ ३ ॥ .. युञ्जते मन उत. युनते पियो पिणा विस्प बृहतो विश्चितः । वि होना दधे वयुना विदेश इन्मही देवस्य सपितुः परिष्टुतिः ॥ ४॥ इसका प्रजापति, जातीचन्द, सविता देवता है। मंत्रा- । (हाः, विपश्चितः, विनस्य, होना, विशाः, मनः, युञ्जते, उस, धियः, युजते, एकंः, इत, चयुनावित, विदधे, सवितुः, देवस्य, परिष्टुतिः, मही) अतिमहान महापण्डित ब्राह्मण यजमान था, होत कार्य करनेवाले अर्यु आदि, इस अग्निचयन कार्य में मा नियुक्त करते हैं, भौर बुद्धि नियुक्त करते हैं, एक, प्रद्वितीय ही, - . - - , २९० शुक्लयजुर्वेद। मज्ञा तपा मात्विक् यजमान के अभिप्राय के ज्ञाता ने, यह सब जगत् निर्माण किया है, सब के प्रेरक सविता देव की, सब वेदों में मुनीहुई स्तुसि महान है ॥४॥ युजे वाम्ग्रा पूर्व्यन्नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूरः। मृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुन्ना भाये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥ इसका प्रजापति ऋ०, विराडापी त्रि० छ०, सविता दे० है । मंत्रार्थ-(पाम्, नमोभिः, पूर्ण, ब्रह्म,पुने, ब्रह्म,सूरेः, श्लोकः,व्येनु, श्व,पथ्या, अमृतस्य, पुत्राः,विश्वे,शएवन्नु, ये,दिव्यानि, पामानि, मातस्यः ) हे पत्नी और यजमान ! तुम्हारे निमित्त, नम उक्ति साहस, 1, पुरासन महर्षियों से अनुष्टित, अग्निचयनारूप मारम- ज्योतिपर्दक कर्म सम्पादन करता है, ब्राह्मण जाति को भत्रों से खप्त करता हूं, पपिडप्स यजमान की कीर्ति लोकदय में माप्त हो, जैसे यक्षमाग में प्रवृत्त हुई पाहुति लोकदय को प्राप्त होती है, मरणधर्मरहित मनापति के पुत्र सम्पूर्ण देवता यजमान की कीर्ति को मुमें, जो दिव्य स्वर्ग के स्थानों में स्थित हैं ॥५॥ यस्प मपाणमन्नन्य इद्ययुर्देवाटेवस्य महिमान- मोर्जसा । यः पार्धिषानि विममे स एतशो रजांसि देवः सनिता महित्वना ।।६।। सबका मनापति ऋ०, निदापी ज०० सविता देवता है। मंत्रार्य (अन्ये, देवाः, याप, देवस्य, मयाण, महिमान, इव, मोजसा, प्यनुयपुर, यः, सविता, रनसि, विममे, सः, देवः, महित्वना, पतशः) और देवता लिस सविता देवता की प्रति फो, मामा को, अवश्य तपोषल से बात है, जिस परमात्मा ने सम्पूर्ण लोक निर्माण किए हैं वह परमात्मा भपनी महाभाग्य मरिमा के प्रमाव से इस स्पावर जंगम लोक में प्राणपसे प्रविष्ट हुमा व्याप्त है ॥६॥ देव सविता प्रसुव यज्ञम्प्रसुव पज्ञपतिम्भगांय! . - २९२ शुक्लपर्धेट् । हस्ताभ्याम् । आदे' गायत्रेणच्छन्दसाझिर- स्यत्पृथिव्याः सुधस्थादग्विपुगेप्यमजिस्वदा- 1. :भैर त्रैप्दुभेनुच्छन्दसालिस्यत् ॥९॥ इसका मनापास प्रा०, भुरिगतिशयरी इं सवित्री देवता है । मनार्थ-हे अनि ( सविता, देवस्य, प्रसवे, गायत्रेण, चंदसा भारियनो, वाहुभ्यां, पूष्णः, इस्ताभ्यां, त्या, मनिरस्पा, माददे, अहिरस्पद, त्रैष्ठभेन पन्दसा, पृथिव्याः, संघस्पात्, पुरीप्यम, अग्नि मालिस्वन्याभर) सपके मेरक सविता, देवकी प्रेरणा से गायत्री छन्दके मभाषसे, माश्विनीकुमार की मुशास, पूपा देवताके हायोंसे बुझ को अहिराशी ऋषियों के समान ग्रहण करता हूं, माहिरा वंशियों की समान त्रिगुप् छन्दफे प्रमायसे पृथिवीके उत्सा भीधरसे पशुओंकी दिनकारिणी अग्निको हिरा की समान थाहरण कर॥९॥ अभिरमि नामि त्वयां पयमग्नि शम खनितुगधस्य भाजागतेनछन्दसानिरस्वत्?01 इसका मजापति र भुरिंगनुापर. अनि दे. है । मंत्राध- हे पणवी तुम (अभिः, भास, नारी, असि, त्मया, वयं, आदि: रस्सत, जागोन, छन्दसा, सधस्पे, अग्नि, खानेतुं, शकेम)उखा निर्माण करने को मृत्खननका कारण काष्ठ पिशेप मध्रि नामवाली दो, स्त्रीरूपा हो, तुम्हारे द्वारा हम अहिरा की समान जगती छंद के प्रभारसे पृथ्वी के उत्साह में वर्तमान अग्नि को खनन करने -को समर्थ हो ॥१०॥ । : इस्ताधार्य सविता विभृद्मि हिरण्ययाम् अग्नेज्यातिनिचायं पृथिव्या अशाभंगदा- नुगुभेनच्छन्देसालिस्वत् ॥ २१ ॥ इसका जापति ऋ० भुरिगापी पं० ई० सविता देवता है। मंत्रार्थ-(सविता, इस्ते, अनिरस्वत, हिरण्ययीम्, अभ्रिम्, पाधाय विभ्रन्, अग्ने, ज्योति, निचाय्य, पृथिव्याः, साप, भानुठभेन . : -- - ११ अध्याय। . छन्दसा, भाभर ) प्रेरक सविता देवताने, हायमें अङ्गिरा की समान सुवर्ण की अभ्रिको लेकर उसको धारण करतेहुए अग्नि की ज्योतिको निधय करके भूमिके सकाश से अनुग्रुप्छन्दके प्रभाव से थाहरण किया ॥ ११ ॥ प्रत वाजिन्ना द्रय वरिष्ठामर्नु संवतम्। दिवि ते जन्म परममन्तरित तव नाभिः पृथिव्या- मधि योनिरित् ॥१२॥ इसका नाभा नेदिष्ट ऋ०, भारतार पं० /०, वामी देवता है। मंत्रार्य-(वाजिन्, वरिष्ठाम्, सम्बयम्, अनु, मत्तम्, आदर, ते, दिषि, परम, जन्म, अन्तरिक्ष, सब, नाभिः, पृयिव्यां, भाधि, तर, योनिः, इत्) हेमध! हे शीघ्रगामी श्रेष्ठ यज्ञभूमि को, लक्ष्य करके, फिर शीघ्र प्रानो, सेरा धुलोक में, श्रादित्यरूप से उत्कृष्ट, जन्म ई, अन्तरिक्ष में सेरी नाभि है, पृथिषी के ऊपर तुम्हारा स्थान है, अर्थात् भूमि में तुम्हारा निवासस्थान प्रत्यक्ष दीखता है विराट रूप से अश्व की स्तुति कीजाती है ।। १२ ।। गुञ्जाथा रासभं युथमस्मिन्याम कृपण्वस् । 'अग्निमारन्तमस्मयुम् ॥ १३ ॥ इसका कुग्निपि है, गायत्री छं०, रासभ देवता है । मंत्रार्थ- (पण्यसू. युवम्, अस्मिन्, यामे, अस्मयुम्, 'अग्निम्मरन्तं, रासभम् ) हे अध्ययु ! और यजमान, तुम दोनों इस अग्निकर्म में अपने दिवकारी अग्नित मुचिका को बदन करनेवाले, रासम को नियुक्त करो ॥ १३ ॥ पोंगे योगे तयस्ता वाजे बाजे हवामहे । स- खाय इन्द्रमूतये ॥ १४॥ इतका शुनःशेप , गायत्री छ० अज देवता है। मंत्रार्थ- (सखायः, योगे योगे, सवस्वरम्, इन्द्रम्, अतये, वाजे धाने, हवा. महे) परस्पर मिनताको प्राप्त हुए, हम ऋत्विज् यजमान सब प्रत्येक कर्म में उत्साहवान वलवान भेजका, रक्षाके निमिच : - - " २६४ शुक्लयजुषंद। और पितरों के तस होनेयोग्य अन्नप्राप्तिके कर्मम माहान करते हैं १४ प्रतबन्नेछचक्रामन्नशस्ती रुद्रप गाणपत्यम्मयो भूहि । उर्वन्तरि वीहि स्वस्तिर्गन्यतिर - ' पानि कृण्वन्पूष्णा सयुजा मह ॥ १५ ॥ इस के० में २ में हैं। सबका शुनाशेप ऋछ० १ निच. गा० २भुरिगा गा और देवता १ अन्व, २ रासम है। मंत्रार्थ-- (प्रर्वन, प्रशस्तीः, अवकामन, पहि, मयोभः, रुद्रस्य, गाण- पत्यम्, एहि ) हे अश्व ! तुम शत्रुगण को वध कररो शत्रुओं की कोहुई निन्दाको निव करते हमारे निकट श्रावो, हमारे सुख के कारण होतेहुए रुद्र देवसाके गणपतिरवको माप्त हो, हे रासम! (स्वस्ति. गव्यूतिः, अभयानि, कृन्धन, सयुना, पूष्णा, रु, अन्त. रिक्ष, वीहि ) भयरहित गमनवाले तुम हमको अभय करते ऋ. सिज यतमानादि का रोग दूर करते समान योगी पृथ्वी के साथ विस्तीर्ण अन्तरिक्षको विशेषकर प्राप्त हो ॥१५॥ पृथिव्याः मधस्थादम्मिम्रीप्यमशिसस्पदाक्षरा निम्पुरीप्यमशिरस्पदच्छेमोग्निपुगीप्यमदिर- स्वरिष्यामः ॥ १६ ॥ इसके० में ३ म० हैं। सबका शुनाशेष झ• ई० १ श्रा. गा० २ सा० गा० ३ श्रामु०० और देवता १ अग्नि २ श्वाया. अग्नि है। मंत्रार्य-हे अभ्रे (पृथिव्याः, सधस्यात्, पुरीप्यम्, अग्नि, अंगिरस्वत, भाभर ) भूमिके स्थानसे पशु सम्बन्धी अग्नि को मनिराकी समान प्राहरण कर (पुरीप्यम्, अग्नि, अगिर- स्वद, मच्छ, इमः)पशु सम्मन्धी अग्निको अंगिराकी समान माप्त होनेको अभिमुख प्राप्त होते हैं (पुरीप्य, अग्नि, आगरस्वत् भरिप्यामः) पशु सम्बन्धी अग्नि को अंगिरा की समान सम्पा. दन करेंगे ॥ २६ ॥ अग्निरूपमामग्नमस्पदन्य हानि प्रामो जा- तदाः । अनुसूर्यस्य पुग्या रश्मीननद्यापी .
११ अध्याय २९५ पृथिवी आततन्ध ।। १७ ॥ इसका पुरोधा ऋ०, निदापी त्रि० स०, अग्नि देवता हैं। मंत्रार्य-(भग्निः, उपसा, अयम्, अन्वख्यत, जासवेदाः, मथमः, महागि, मनु, पाय, रश्मीन, पुरुत्रा, मनु, च, द्यावापृथिवी, अनु, पासतन्य ) जो भग्नि उपाकाल से पहले अग्निरूप से अनुक्रम से प्रकाशित रहा, सबका जाननेवाला यह मग्नि मुख्य रूप से दिनों को प्रकाश करसाहुमा, सूर्य की किरणों को बहुत कार से प्रकाश करताहुआ और स्वर्ग पृथ्वी को कम से सब प्रकार प्रकाशित करताडया, उस सर्वकाशक लोकमष्टा भाग्नि को हम देखते हैं ॥ १७॥ आगत्यं वाज्यध्यान सीमृधो विधूनुते । अग्नि मघस्पै महुति चक्षुषा निधिकीपते ॥१॥ इसका मयोभू पि है, निन्दनु छ, अश्व देवता है। मंत्रार्थ-(चाजी, अध्वानं, श्रागत्य, सर्वाः, मृधः, विधुमुते, म. हति, सधाये, चनुपा, अग्नि, निचिकीपरो ) यह वेगवान अभ्य मार्ग को माफर सब संग्रामों को कम्पित करता है, उस्कृष्ट पृथ्वी के स्थान में वर्तमान, स्थिर चक्षु से अग्नि को देखता है ॥१८ ॥ आक्रम्य वाजिन्पृथिवीमनिमिच्छरुचात्यम्। भूम्पा तत्वार्य नो हि यतः खनैम तं वयम् ॥ १९॥ इसका मयोभू ऋ० मिथदनु० छ० अश्व देता है मंत्रार्थ- (वाजिन त्वं, पृषियी, साम्य, रूचा, भाम, इज्छभूम्याः, स्वाय, न, महि, यसः वयं, तम्, खम) हे अरर ! सू भूमिको श्राझमण करके दीहि मादि के द्वारा अग्निको, अन्धेपण कर भूमिके मदेशको छूार हमसे यह कहो कि यह देश अग्नि हेतु के मृतिकाके योग्य है इसमकार कथन करो कि जिस देशसे हम उस अग्निको समन करे ।। १९ ॥ चौसो पृष्ठम्भृथिवी सुधस्थमात्मान्तरिक्ष स. मुद्रो योनिः । विख्याय चक्षुपा त्यामभितिष्ठ २९६ शुक्लयजुर्वेद । . पृतन्यतः ॥२०॥ इसका मयोभूईपि, निचूदाी वृ०,०, अश्य देवता है। मंत्रार्थ-हे भव ! (धौः, ते, पृष्ठम् पृथिवी, सघस्यम्, अन्तरिक्ष मात्मा, समु, योनिः, त्य, चनुपा, विख्याय, पृान्यतः यभिीतष्ठ) सर्ग तुम्हारा पृष्ठ है, शमे पात्र है, अन्तरिक्ष जीवात्मा है समुद्र के जल तुम्हारी उत्तत्ति का कारण है तुम नेत्रों से उखाके योग्य मृचिका को देखकर संग्राम करने की इच्छा करनेवाले शव राक्ष सादि को मृचिका में ग्रह स्थित जानकर, चरणों से आक्रमण कर नष्ट करो ॥२०॥ उत्कीम महते सौभंगाणास्मादास्थानद्रवि- शोदा पोजिन् उप स्पाम सुमतौ पंधिया अग्निहखनना उपस्थे अस्पाः ॥२१॥ इसका मयोभू o, विरादापी पं० छ०, अश्मदे है । मंत्रार्थ- (बाजिन पिणोदा: महशे, सौभगाय, अस्मात्, भास्थावात, उस्काम, शस्पाः, पृषिव्याः, उपस्थे, अग्नि, खनन्तः, वयं, मुमती स्थाम) हे अश्व । धनके देनेवाले तुम बड़े महमाग्य की वृद्धि के निमित्त, इस स्थान से उत्क्रमण करो इस पृथ्वी के उपरीभाग में अग्नि को खनन करनेका उद्योग करतेहुए हम सानुग्रह श्रेष्ठ बुद्धि में स्थित होयें ॥ २१॥ उर्दक्रमीद्रविणोदा चाज्पक: सुलोक सु- कृतम्पृथिव्याम् । ततः खनेम मुमतीकग्नि स्वो रहाणा अधिनामुत्तमम् ॥ २२ ॥ इसका मयोमा भूपि, निदापी त्रि० ई०, अश्य दे है । मंत्रार्थ-(भा, प्रविणोदा बाजी, पृथिव्यां, उदक्रमीद, सलोकं, सुकृतं, अकः, तता, नाकम्, उत्तमम् स्वः, अधिरुदाणा, सुमती- कम्, अग्नि, खनेम) पम्पल धनमद अश्व पृथिवी में मृत पिण्ड से उतर आया सुन्दरलोक को पुण्यवान किया उस देशसे दुःख रहिन श्रेष्ठ स्वर्ण को. शारोइण करने की इच्छा करनेवाले इम २९७ ११ अध्याय। - - c - सुन्दर सुखदेनेवाले पुरीप्य अग्निको मृत्तिण्ड से खनन करनेका उद्योग करते हैं ॥ २२॥ मा त्यो जिमि मनसा घृतेन प्रतिक्षिपन्त- म्भुवनानि विश्वा । पृथुन्तिरश्चा पय॑सा वृहन्त व्यधिष्ठमन्न रभसं दृशानम् ॥ २३ ॥ इसका गृत्समद प्रापि, यापी त्रि० ई०, अग्नि देवया है । मेवार्थ-अग्ने । (विश्वानि, भुवनानि, प्रवितियन्य; सिरमा, पृथुम्, वयसा, टहन्त, व्यविष्ठं, अने, रभसम्, दृशानं, त्या, मनसा, घृनेन, शाजियाम ) सम्पूर्ण भुवनों में निवास करोडर सिर्या प्रमाण, ज्योति से विस्तीर्ण, राम से महान, भयकाशवान्, विविध.अन्नों करके परिपूर्ण, उत्साइसम्पन्न, प्रत्यक्ष गोचर, तुम को श्रदायुक्त चिच से, घराद्वारा प्रदीप्त करता हूं ॥२३॥ आ विभ्यतः प्रत्यञ्चजिघर्पारक्षमा मनमा तर्जुपेत । मयनी स्पृहयदों अग्निर्नाभि- मृर्श सन्या जभुराणः ॥ २४ ॥ इसका गृत्समद , भाी पं० २०, भंग्नि दे० है ।। मन्त्रार्थ-हे भग्ने ! (विश्वतः, मत्यचम्, माजिघाम, परक्षसा, मनसा, रात्, जुपेत, मर्यश्रीः, स्पृहयदर्णः, पन्ना, जर्मुराण:, अग्निः, अभिमशे, न .) सब भोर मत्यगात्मा रूपसे व्याप्त हो मद्वारा निष्कपट मन से सिध्धन करता हूं, क्रोधरहित चिच से उस घृत को सेवन करो, मनुष्यों से सेवन करनेयोग्य दर्शनीय कानिगमान स्वरूप वाले शरीर से इधर उधर गमन करने वाली अग्नि अभिमर्शन के योग्य नहीं है ॥२४॥ परिवाजपत्तिः कथिग्निहव्यान्यक्रमीत् । द- धद्रत्नानि द्वारा ॥ २९ ॥ इसका. सोम ० नि० गा० छ०, अग्नि देवता है मन्त्रार्थ-(वाजपतिः, कविः, अग्निः, दाशुषे, रत्लानि,.दधत, ह च्यानि, पर्यक्रमीत ) अन्न का पति, कारादर्श अग्नि हनि . - २९८ - शुक्लपजुद। 'बाले यजमानकै निमित, मनोहर विविध रत्न मदानपूर्वक हवियों को स्वीकार करताहुा ।। २९ ।। परित्याग्ने पुरं वयं विप्रंॐ सहस्प धीमहि । धूपहर्णन्दिवे दिवे हन्तारम्भंगुरापताम् ॥२६॥ इसका पायु ऋपि है, अनुप छन्द, अग्नि देवता है। मंत्र ( सहस्य, अग्ने, पुरूं, मिं, धृपद्वर्ण, दिवे, दिवे, भरायताम, हन्तारं, त्वा, वयं, परिवीमाह ) वलसे मथनका उत्पन्न होनेवाले हे अग्नि ! पुरु रूपसे सबके शरीर में स्थित, पालन करने वाले बुद्धिसम्पन्न, असह्यरूप प्रतिदिन राक्षस दल को मारनेवाले, तुमको हम सब पोरसे ध्यान करते हैं ।। २६ ॥ त्वमग्ने युभिस्त्याशशुक्षणिस्त्वमद्भधस्त्वम- इमनपरि । त्यं धनेभ्यस्त्वमोपंधीभ्यस्त्वन्मू- णान्नृपते जायमे शुचिः ॥ २७ ॥ इसका गृत्समद ऋ० पंक्ति ई० अग्नि देवता है। मंत्रार्य- ( नृपते, अग्ने, भुचिः, आशुशुक्षणिः, त्वं, धुमिः, नापसे, त्वम् अद्भ्यः, त्वं, अश्मना, परि त्वम्, वनेभ्यः, त्वम्, ओपधीभ्या, त्वम्, नृणाम् ) मनुप्पोके पालक अग्नि परमपवित्र पाद भूमिको कान्तिसे शोपकर कान्तिसे अन्धकारके दूर करनेवाले हो। तुम पति- दिन मयग' करने से उत्पन्न होने हो । तुम जलों से बिजलीरूप करके उत्पन्न होरो हो, सुमपापाणसे दूसरा पापाण लगने से उत्पन्न होयेहो तुम धनोंमें अरणि काष्ठ से तुम भोपधिपोंसे शादिसे घुम अग्नि होत्र करनेवाले मनुष्यों के घर में होते हो ॥ २७ ।। देवस्य त्या सयितुः मवेश्विनौष्टिभ्याम्पूप्णो हस्ताभ्याम् । पृथिव्याःमघस्थादग्निम्पुरीप्यम- निस्यत्तनामिज्योतिष्मतन्त्वाग्ने मप्रती- कमजनेण भानुना दीयतम्। शिवाजाभ्यो • हिंध सन्तधिष्यामस्थांदग्निापुरध्यमनि- - , 1 अस्पतपनामः ॥ २८ ॥ .:.
१९ अध्याय २९९ः " . इस के० में ३.म० हैं । सबका गृत्समद ऋ० छन्द ? गाजा प. ० २ भाची गा० ३ मुराडा नि है । मौर दे० १ अनि २, ३ अग्नि है। मंत्रार्थ-दे अधि ( सविता, देवस्य, मसने, अ. शिवनोः, याहुभ्यां, पूणः हस्ताभ्यां पुरीयं, अग्निम् पृथिव्याः सघस्थात्, अहिरवद, खनामि)सके प्रेरक सविता देवके प्राक्षा में वर्तमान अश्विनीकुमार की भुजाओं से पूपा देवसाके हाथोंसे पशु सम्बन्धी गतिको भूमि के ऊपर प्रदेशसे अंगिराकी समान खनन करता हूँ.(अग्ने ज्योतिष्मांक, अजस्रण, भानुना दीक्ष्य सम्, मजाभ्यः, शिवम्, अहिधंसन्रा, स्या, पुरीयं, अग्नि, पृथिव्याः, सपस्यात्, थातिरस्वत, खनामः ) हे अग्ने ज्वालायुक्त सुमुख निरन्तर वर्चमान, रश्मियों से दीप्तिमान, मनाके उपकार के निमित्त, शान्तरूप हिंसा न करनेवाले तुझ पुरीप्य अग्निको भूमिके गर्भ से अंगिरा की समान खनन कररो हैं ।। २८ ।। अपाम्पृष्ठममि योनिग्नेः समुहमाभितः पिन्द- मानम् । वर्द्धमानो महा आ. पुष्कर दियो माया परिणामंधस्त्र ।। २९ ।। इस प० में २ में है। सबका गृत्समद अपि है ०१ मुरि गार पं० २, मा० ५० और देवता पुष्करपर्ण है, मंगार्थ-हे पत्र तुम (अपां, पृष्ठं भग्नः, योनिः, यसि पिन्यमान, समुद्र, अभितः वद्धमानः, महान, पुष्करे, श्रा) जलोंके ऊपर रहने से पृष्ठप हो अग्निके निमित्त पिएड के कारण हो, सींचतेहए जल समुद्रको सब बोरसे वृद्धिको मास, बड़े जलमें समकार स्थित हो । दे पत्र (दिवः, मात्रया, परिम्णा, मयस्व) घुलोकके परिमाण की दीर्घता से विस्तारको प्राप्त हो ॥ १९ ॥ शर्म स्थो धर्मच धोरिछद्रे बहुले उभे । व्यचस्वती संवसायाम्भूतमग्निम्पुरीप्यम् ॥३०॥ इसका गृत्समद ऋ० विराडायनु० छ० कृष्णागि पुष्कर पणं देवता है । मंत्रार्थ-हे कृष्णाजिन ! पुष्कर पूर्ण (अनिद्रे - . शुक्लयजुर्वेदी बहुले, व्यवस्वती, उमे, शं, स्पः, च, धर्म, स्यः, पुरोध्य, अग्नि संवसायां, च, भृतम् चिद्रशून्य बहुलविस्तारवाले अवकाशवाने तुम दोनों अग्निके मुखकारी हो, और कवचकी समान रक्षा करने वाले हो, पुरीष्य भग्निको पाञ्छादन करो, और धारण करो३० सर्वसाधा मुर्विदा समीची उरमारमना । अग्निमुन्तरिष्यन्ती ज्योतिप्मन्तममृमित्॥३१॥ - इसका गृत्समद ऋ०निचदनु छै०कृष्णाजिन युष्करपर्ण देवता है। मनार्थ-डे कुष्णाजिना हे पुष्करपर्ण ! (स्वर्विदा, समीची, अज- घमिद, ज्योविमन्तम्, अग्नि, अन्तः, उदरे, मरिष्यन्ती, उरसा- त्ममा, यरिंग सम्बसायाम् ) स्वर्गलाभके साधन एकचित मिले हुए, निरन्तर तेजमान अग्निको भीतर उदरमें धारण करतेहुए, हृदयरूप अपने शरीर से अग्नि को चिरकाल धारण करते भा. च्छादित रखो ॥११॥ पुगष्योति विश्वभर अर्धा त्वा प्रथमो निरमन्धदग्ने ! त्यामग्ने पुष्कराद्ध्यर्थर्वा नि. रमन्यत । मूह विश्वस्य वाघतः ॥ ३२ ॥ . इस कं० में में हैं। सबका भर० ऋ० है । ई० १ मा[- पिणक । निन्दापी गा० और सबका अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (अग्ने, पुरीप्यः, विश्वमरा, असि, प्रथमा, अथर्या, त्या, निरम- न्यत्) हे अग्ने ! तुम पशुयोंके हितकारी समस्स चराचर के पालन करनेवाले हो,सबसे प्रथम मापने तुझको प्रकाशित किया'पा । थाम ! (अपर्वा, पुष्करात्, 'अपि, त्वां, निरमायत्, विश्वस्य, चायतः, पूर्भः) माण ने जलके सकाशसे तुमको मथित किया, सम्पूर्ण संसारके सम्बन्धी प्राविनाने श्रादरसे तुमको मथित किया : तमु स्पा'दृष्यकृषिः पुत्र ईधे अधर्षणः । वृन- हणम्पुरन्टरम् ॥ ३३॥ इसका भरद्वाज ऋ० निन्द् गा० ई० अग्नि देवता है मंत्रार्थ ( अपर्दपः, पुत्रः, ध्यद्, समु, मृत्रणम्, पुरन्दरम्, त्या धेइ). - ११ अध्याय . . अथर्व के पुत्र दध्यह नामक ऋषि ने उस पापनाशक रुद्ररूपसे पुर सम्बन्धी शीन भावरणों के भेदक तुमको सञ्चालित किया ३३॥ तमु वा पध्यो वृपा समधेि दस्यूहन्तमम् । धनन्जयर्थ र रणे ॥४॥ भरद्वाज ऋ०, निवृ० गा०ई०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (पाया, सपा, तम्, दस्युहन्तमम्, रणे, रणे, धनञ्जयं, त्वा, इथे). सन्मार्गमें पर्समान मनके सिञ्चन करनेवाले हे माने ! उस यति- शय शत्रुओं का नाश करनेवाले उन उन संग्रामों में धनके जीतने चाले तुमको सन्दीप्त करता हूँ ॥ ३४ ॥ सीद होनः स्वलोके चिफित्वान्तमाया यज्ञ सुकृतस्य पोनों । देवावीयान्डषिपा यनास्यग्ने वृहयजमाने क्यों धाः ॥ ३५ ॥ इसका देवश्रय और देववास ०नि० पि. और अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-( होतः, पाने, चिकित्वान्, खेड, लोके, सीद सकरात्य, योनौ, यज्ञ, प्रासादय, पम्ने, देवावी, इषिपा, देवान् प्रापजास, यजमागे, बहन, वयः, धाः) भाहान कार्य में नियुक्त हे अग्ने ! चरानवान अपने अधिकारको जानने घाले अपने स्थान कृष्णा जिनपर स्थापित किए पुष्कर पर्णपर स्थित हो, श्रेष्ठकर्म के स्थाममाले यज्ञको स्थापनकर है अग्ने । देवतामों के प्रसन्न करने चाने तुम हविद्वारा देवताओं को पूजनकर तृप्त कररो होइसकारगण, यजमानमें बड़ी भायु धारणकर इसमें वड़ा यश स्यापिरा करो ३९ नि होता होतृपने विदानरत्येपो दीदिवा अंसदत्मद अब्धतामानिसिष्ठः सह- सम्भरः शुधिजिव्हो अग्निः ॥ ३६॥ इसका गृत्समद ऋ० है । त्रिपुर छ. अग्नि देवता है मंत्रार्य- (होता, विदामः, स्वपः, दीदिवान, मुदत्तः, पदव्धवाप्रमतिः, वशिष्टः, सहनम्भरः शुचिजिदः, अनि, होक्षपदने, न्यमीदव ) देवताओंका आहवान करनेवाले अपने अधिकार को जाननेवाले , - शुक्लयजुर्वद । रताके निमिच सबके प्रेरक सूर्य देवता की समान ऊंचे होते ऊर्च स्थिम हो ऊंचे होते तुम अन्न के देने वाले हो जिसकारण कि मंत्र के उच्चारण करने वाले हव्यवाहरु ऋतिजों द्वारा श्राव्हान करते हैं ।। ४२॥ सजातो गौ असि रोदस्टोरग्ने चारविभूत ओपंधीयु । चित्रः शिशुः परि तमधिस्यक्तून् प्रमाभ्यो अधिकनिदनाः॥४३॥ इसका त्रिस ऋ०, विराट् नि: छ० अश्व देवता है। मंत्रार्थ- (अग्ने सः, चारु, भोपधीपु, विभृतः, चित्रः, शिशुः रोदस्योः, जातः, गर्भः, मसि, अक्तून, समांसि, पार, माइभ्यः, अधिक निक्रदत्, प्रगाः ) हे भग्ने । वह तुम शोमन पूजनीय पुरोहाशादि लक्षण वाली श्रोपधियों में पुष्ट करने को स्थित अनेक वर्ण की ज्यालाओं से पिचित्ररूप इस समय उत्सन्न होने के कारण शिशु रूप याचा पृथिवी के मध्य में उत्पन्न हुए गर्भरूप रात्रि लक्षण वाले अन्धकारों को दूर कररो हुए प्रोपधि वनस्पतियों के मकाश से अत्यन्त शब्द करते हुए शीघ्रता से चलो॥४३॥ स्थिरोभव वीड्यङ्गः अनुभव बायर्वन् । पृथुभव ' ' मुखदस्त्वमग्नः पुरीपबाईणः ॥ ४४ ॥ इस का वित • विरानुष्ठ० छ० रासभ देव है। मंत्रार्थ- (मन, स्थिरः, बीड्वा भव, भानु, वानी, भव, पुरीपवाहणः त्वं, पृथुः, अानेः, सुखदः भव) हे गमन में कुशल रासम! स्थिर होकर स्थिर कायावाले हो, वेगवान होकर अन्न के हेतु हो, पुरीप्य भग्नि तुम पृष्ठ को विस्तीर्ण करते अग्नि देहरूप मृतिका के मुख से स्थिति के योग्य हो ॥ ४४ ।। शिवो अब पूजाभ्यो मानुपीभ्यस्त्वमंदिरः । मा द्यावापृथिवी अभिशौचीननिरिक्षुम्मा बनस्पतीन् ॥१५॥ इसका त्रित ऋ० विराट् पथ्या १० छ० अज दे० है । मंत्रार्थ ११ मध्याय। --- (अहिरः, स्वं, मानुपीभ्यः, मनाभ्यः, शिवः, भवः धावा पृथिवी मा, अमिशाची: मन्तरितम्, मा वनस्पतीन्, मा) हे अग्निरूप अग्नि के प्रियशिशु आज तुम मनुष्यसम्बन्धी मनाओं के नि- मित्त कल्याणकारी शान्त हो, चावा पृथियों को मत सन्मत करो अन्तरिक्ष को मा सन्तापित करो वनस्पतियों को मा सन्तापित करो।।४५॥ प्रेतुं वाजी कर्निकदन्नानदासभः पत्यो । भ. रैन्नग्निम्पुरीयम्मा पाखायपः पुरा । वृपानि यूषगम्भीन्नपा समुद्रियम् । अग्न आया. हि वीतये ॥ ४६॥ इस 20 में ३ मा हैं। सबका मित०, ई० १ पंक्ति २, साम्यनु० ३ एकपदा गा० और देवता १ अश्व, २ रासम, १ अग्नि है । मंत्रार्थ-(पाजी, कनिमदत्, प्रेतु, परवा, रासभः, नान- दव, पुरीयं, अग्नि, भरन, भायुषः, पुरा, मा, पाहि ) वेगवान् अब आरोपित शब्द करसाहुपा, वेगसे गमन करो, पतनशील गर्दभ दिशाओं को शन्दायमान करताहमा, यस वाहनके नि- मिन पीछे चल यह अश्व पशुसम्बन्धी अग्निको धारण करताहमा कर्म से पहले मत विनाशको प्राप्त हो, कर्मसमाप्तिपर्यन्त जीवन को माप्त हो (पा, पणम्, अपां, गर्म,समुद्रियम्, अग्नि, भरन) सिंचन में समर्थ रासभ, आहुतिपरिणाम से फलदान में समर्थ जलों के मध्य मेघों में विद्युत रूपसे होनेवाले सागरमें बड़वारूप से होनेवाले अग्नि को धारण करसा भागमन कर(अग्ने, वीतये भायाहि) हे अग्निदेव ! हवि भक्षण के निमित मागमन करो १६ मत्यमृत सुंत्यमग्निम्पुरीष्यमनिशस्व- रामः । ओषधयः प्रतिमोद्ध्वमुग्निमेत शिवमापैतमभ्यन गुप्माः । व्यस्यन्विश्या भ- निरा अमीचा निपदिन्नोअपंदुर्मतिजहि ॥ १७ ॥ इस के० में ४ मं है। सबका त्रित छ. १ मानाप, " 1 शुक्लयजुर्वद। गा० २ सा० गा० ३ मिच० तु. ४ गि० सा० त्रि० और दे० १, ३, ४ अग्नि ३ ओपधी है । मंत्रार्थ-(ऋतम्, सत्यम्, सत्यम् ऋतम् ) शादित्यरूप, अग्निरूप व्यष्टि समाष्टरूप, अग्नि है, ऐसी मत और सस्यरूप अग्निको अजापर रक्षित करते हैं (पुरीय, अग्नि, अंगिरस्वत, भरामः, पशु सम्बन्धी अग्निको अंगिरा की समान संग्रह करते हैं ( भोपधयः, एतम्, शिवं, अन, युप्मा, अभिभा- यन्स, अग्नि, मधि, मोदध्यम्, निपीदन, मः, विश्वाः, अनिराः, अमीवाः, प्यस्यन्, दुमति, अपजाहि) हे सम्पूर्ण औपधियों ! तुम इस शान्त कल्याणकारक भौर इस स्थल में तुम्हारे सन्मुख पाते हुए अग्नि के सन्मुख प्रत्युत्थानादि से भामोदित करो। हे अग्ने तुम यहाँ स्थित होसे हमारे सम्पूर्ण दुभिक्षपीड़ा ईति व्याधियोंको दूर कररोहुए हमारी, हवनदान से पराङ्मुख दुर्मतिको नाश करो ४७ ओषधयः प्रतिगृहणीत पुष्पवती: सुपिपलाः। अयं वो गर्भ ऋत्यियः प्रत्न सधस्थमासदत्।।४८॥ इसका पिस प्र० भुरिगानु० छ अग्नि देवता है। मनाये- (भोपधया, पुष्पवती:, सुपिपलाः, प्रतिगृभ्णीस, व', गर्भः, पर- स्वियः, अयं, प्रत्न, सधार्थ, भासदत् ) हे सम्पूर्ण भोपधियो । तुम फूलोंवाली, अच्छे फलवाली तुम इस अग्नि को स्वीकार करो, तुम्हारे गर्भरूप प्रातुकाल को माप्त यह मग्नि पुरातन स्थान को स्थित हुभा॥४८॥ पिपासा पधुना शोशुचानो बाधस्व रक्षमो अमीषाः । मुशर्मणो वृहतः शमीण स्पामग्ने र सुदयस्य प्रणीतौ ।। ४९ ॥ इसका उस्की ३. त्रि० छ० अग्नि देवता है। मंत्रार्थ--- (प्रधुना, पानसा, शोशुचाना, दिपः, रससः, अमीबाः, विवा. पाय, पर्मणः, वृहतः, मुहबस्य, भग्ने, मणीती, अई, शमणि स्याम् ) बड़े विस्तारवाले बलसे दीप्तिमान हे अग्नि! तुम शत्रुनों को, राक्षसों को समस्त व्याधियों को विशेष दूर करो अच्छे ११ अध्याय . सुख के कारण मौढ़ महान सुखसे बुलानेकोशक्य अग्निमसन करने के कार्य में नियुक्त मैं मुखमें प्राप्त हूं ।। ४९ ।। आपोहि छा मयोभुवस्तान अजें दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥५०॥ इसका सिन्धुद्वीप ३० गा०/० श्राप देवता है । मंत्रार्थ- (आपः, मयोभुवः, स्थ नः, महे रणाय, पक्षसे, हि, ऊर्भ, प्राधारान ) हे जलसमूह ! तुम सुखके करनेवाले मुखकी भावना करनेवाले स्नानापानादिस सुखके उत्पादक हो, हमारे बड़े रम- णीय, दर्शन के निमित्त, और निश्चय ही रसानुभव के निमिरा स्थापन करो ॥५०॥ यो वः शिवतमो रमस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः ॥५॥ इसका सिन्धुदीप ऋ० गायत्री छ० माप देवता है। मंत्रार्थ- हे जलों! (पः, यः, शिवरामः, रसः, पह, ना, तस्य, माजयत, उशती:, मातरः, इच) तुम्हारा जो शान्तरूप सुख का एक ही कारण रस इस कर्म में है, हमको उस रसका भागी करो प्रीति युक्त माता जैसे कि अपने स्तनको बालकों को पिलाती हैं ॥५१॥ तस्मा अङ्गमाम घो यस्य क्षयाय जिन्वध। आपो जनयथा च नः ॥५२॥ इसका सिन्धुदीप ऋ० गायत्री छ० श्राप देवता है। मंत्रार्थ. (आपः, षः, तस्मै, अरं, गमाम, यस्य, क्षयाय, जिन्वय, घ, नः जनयय ) हे जलों ! तुम्हारे सम्बन्धी उस रसके निमित्त, शीघ्र चलें, जिसके निवास जगत के आधारभूत तृप्त करते हो और उसके भोगसे हमको उत्पन्न करते हो ॥ ५२ ॥ मित्रा मुसक्यं पृथिवीम्भूमिच ज्योतिषा मुह । सुजातजासर्वदतमयक्ष्मा त्या स सृजामि पूजाभ्यः ।। १३ ॥ • इसका सिन्धुदीप ऋ० उपरिष्टा १० छ. मित्र देवता है मंत्रार्य- .
शुक्लपजुर्वेद । (मित्रा, पृथिवी, च, मूर्मि, ज्योतिषा, सह, समृज्य, सुजासं, जातवेदसं, त्वा, प्रजाभ्यः, भयक्ष्माय, सगजामि)मित्रदेवता श्रादित्य धुलोक और इस पिण्डरूप भूमिको ज्योतिरूप मजलो. भके साथ एकत्र करके मुझ अयु को देखा है, और मैं भी सुन्दर जन्मवाले प्रज्ञासंयुक्त अलोम नामक तुझ अग्नि को प्रजामों के रोगनिवृत्ति के निमित्त पिएडसे युक्त करता हूं ।।५।। " रुद्राः समृज्य पृधिची बृहज्ज्योतिः समाधिरे। तेपाम्भानुरजसू इच्छुक्रोटे येथु रोचते ॥१४॥ इसका सिंधुदीप ऋ०, अनुष्टु० ई०, रुद्र देवता है । मंत्रार्थ- (रुद्राः, पृथिवीं, संसृज्य, सहज्ज्योतिः, समीधिरे, सेपा, शुरु, भानुः, देवेषु, अजस्रः, इद, रोचते ) जिन रुद्रों ने पार्थिवपिण्ड को, चालु लोहकिट और पापाण चूर्ण से संयुक्त करके मौद अग्नि को प्रदीप्त किया, 'उन रुद्रों की शुद मदीप्त ज्योति देवताओं के मध्य में परिपूर्ण भली प्रकार प्रकाशित होती है ।। ५४ ॥ समृष्ट्रां वमुनी रुद्रहारः कर्मण्याम्मृदम् । हस्ताभ्यां मुहीकृत्वा सिनीयाली कृणोंग ताम् ५५ इसका सिंधुदीप ०, विराउनुष्टुए 5०,सिनीवाली देवता है। मंत्रार्य-(सिनीवाली, धीरः, वसुमि, रुदैः, संसष्ठाम, मृदं, इस्ताभ्यां, मुदी, कत्ला, तां, कर्मण्यो, कणोतु ) चन्द्रकलायुक्त अमावस्याभिमानी देवसा, चुदिमान वगण, रुद्रगणों द्वारा, शर्करादि से संयोजित मृतिका को हायों से कोमल करके उसको ऊखा कर्म के योग्य करें।॥ ५५ ॥ मिनिवाली मुकपर्दा मुकीरा स्वीपा। सा तुभ्यमदिते मधोखान्दधातु हस्तयोः ॥५६॥ इसका सिन्धुदीप भू०, पिराउनु छ, अदिति देवता है। मंत्रार्थ--(प्रदिसे, महि, सा, मुरुपर्दा, मुकुरीरा, पोपशा, "सिमीचाली, तुभ्यं, भस्वयोः, उखा, वापयतु ) हे दीनलारहित देवमासा, हे पूजित, यह मुन्दर केश और धनवाली, सुन्दर मस्तक - . " , ११ अध्याय " - 7 के चन्द्रिका वाली, विलास में चतुर अवयमवाली, चन्द्रकलायुक्त अमावास्याभिमानिनी देवी, तुम्हारे हाथों में पारुपात्र उखा को स्पापित करो ॥५६॥ उखाद्धृणोतु शक्पा बाहुभ्यामदितिधिया। माता पुत्रं यधोपस्थे साग्नि विभा गर्भ आ । मत्स्य शिरोसि ॥२७॥ इस के० में २ मंत्र हैं, सपका सिन्धुदीप १०, छ०-१ निष. नु०, २ याजुपी गा०, भौर दे० १ भदिति, २ मृपिएड है। मंत्रार्थ-( अदिति, शक्तचा, पिया, बाहुभ्यां, उखाम्, कणोत, सा, गर्थे, श्रा, अग्नि, विभर्नु, यथा, माता, उपस्थे, पुत्रम् ) अदिति देवता अपनी सामर्थ से, युद्धि दारा, हाथों से उत्कर्प विधानपूर्वक पाकपात्र कर, वह उखा अपने मध्य में सब मकार से अग्नि को धारण करें, जैसे जननी गोदी में पुत्र को धारण करती है ।। ५७॥ घसयस्त्वा कृण्वन्तु गापुत्रेणच्छन्दसास्वि- धुयासि पृधिव्यामि धारया मपि पूजा गय- सोपनौपत्य मुबीर्य सजातान्यजमानाय रुद्रास्स्या कृण्यन्तु त्रैभनछन्दसास्विद्धवा स्थन्तरिक्षमसि धारया मपि मजा गयस्पो- पौपत्य, मुधार्य सजातान्यजमानाया- दित्यास्त्वा कृण्वन्तु जागतेनुच्छन्दसाङ्गिरस्व- द्धवामि ग्रौरसि धारया माय पूजा राप- स्पोपत्रौपत्य सुवीर्य सजातान्यजमानाय विश्व स्वा देवा श्वानराः कृण्वन्वानुष्टुभे. नछन्दसागिरस्वतधामि दिशौसि धारणा मपि पूजा रायस्पोपहीपत्य मुवीप स- जातान्यजमानाय ॥५॥ इस कं० . में ४ मंत्र है, सबका सिन्धुदीप ऋ, छ । * , शुक्लपजुचंद । ह्मयनु०, २ आर्यनु, ३ ग्राह्मयनु०. ४ माशी ०, और सबका उखा देवना है। मंत्रार्थ-ई उखे ! वसवः, गायत्रेण, छन्दसा अङ्गिरस्वत. त्वा, कृण्वन्तु, ध्रुवा, असि, पृथिवी, असि, मयि, यजमानाय, मना, रायः, पोपम्, गौपत्यं, सुवीर्यम्, सजावान, माधारय ) यामुगण गायत्री छन्द के प्रभाव से अंगिरा की समान तुझको करें, उनकी कीहुई तुम दृढ हो, पृथ्वीरूप हो, मुझ य- जमान के निमित्त, सम्तान, धन, पुष्टि, गोपतित्व, सुन्दर पराक्रम, सहोदरगण के सहित हमको यथोचित सौहाई धारण करायो। हे उखे! ( रुद्राः, श्रेयुभेन, छन्दसा,, भगिरस्वत, स्वा, कृण्वन्तु, धुवा, असि; अन्तरिक्ष, असि ) रुद्गण मिगुभ छन्द के प्रभाव से अंगिरा की समाम तुझको निर्माण करे, तुम दृढ़ हो कारण कि अन्तरिक्षम्पा हो, शेष पूर्ववत् । हे उखे । (भादिल्याः, जागसेन, छन्दसा, अंगिरस्वत, त्वा, कृण्वन्तु, धुवा, मसि, द्यौः पसि) चारह भादित्य जगसी छन्द की सामर्थ्य से अंगिरा की समान तुझको निर्माण करें, तुम दृढ हो कारण कि युलोकरूप हो शेष पूर्ववत् । (वैश्वानराः, विश्वेदेवाः, भानुाभेन, बन्दसा, स्वा, अंगिरस्वत, कृण्वन्तु, ध्रुवा, सि, दिशः, असि ) सब मनुष्यों से प्राप्त होनेयोग्य विश्वेदेवा देवता मनुष्टुभ चन्द के प्रभाव से हे उखे! सुझको भगिराकी समान निर्माण करें, तुम दृढ हो कारण कि दिशास्वरूप हो, शेष पूर्ववत् ॥ १८ ॥ अदित्य रास्नास्यादतिष्टे बिलंगृभ्णातु कृत्वा ग सामहीमुखाम्मन्मपी योनिमग्न । पुत्रेभ्यः प्रायंच्छदादितिः शृपयामिति ॥ ५९॥ इस के० में ३ मंत्र हैं। सबका सिन्धुदीप ऋ०, छ० १, या गा०, २ या० ऋ०, ३ उदिगनु० और दे. १ रास्ना, २ वखा, ३ अदिति है। मंत्रार्थ-हे मृत्तिकानिर्मितरेखा ! तुम (भदित्य रास्ना असि) अदितिरूप उखाकी कांचीगुण के स्थानवाली हो। दै उहे ! (अदितिः, रो, चिलं, गृभ्णातु ) देवमासा तुम्हारे मध्य ११ अध्याय। . क - को ग्रहण कर (सा, अदितिः, मही, मृण्मयीं, अग्नये, योनि, उखा, कृत्वाय, श्रायान, पुत्रेभ्यः, मायरछन्, इति ) देवमाता अदिति यह बड़ी मृत्तिका की अग्गि की स्थानभूत उखा निर्माण कर पाककार्य सम्पादन के निमित्र इसाकार कहकर कि हे पुत्रो ! तुम इसको पाफ करो प्रदान करतीहुई ।। ५९ ॥ 'वसंवस्त्या धूपपन्तु गायनेणच्छन्दसांगिरस्व- द्रुद्रास्त्वां धूपपन्तु त्रैप्टुभेनच्छन्दसादिस्य- दादियास्त्वा धूपपन्तु जागतेनच्छन्दसांगिर- स्वद्विवे त्या टेवा पदयान राधूपयन्त्वानुष्टुभे. नछन्दसांगिरस्वादिन्द्रस्त्यापपतु वरुणस्त्वा धूपयतु विष्णुस्त्या धूपयतु ॥६०॥ इस के० में ७ मंग हैं। सयका सिन्धुद्वीप ऋ०, छं० १ मार्ची गा०, २ निचदापी गा०, ३ श्राची गा०, १ नि०मा०, ५, ७ याजु०, ६ माजापत्या गा० है और सबका उखा दे० है । मंत्रार्थ हे उखे! (घसवः, गायत्रेण, छन्दसा, अङ्गिरस्वत, त्वा, धूप- यन्तु ) बमु गायत्री छन्द के प्रभाव से प्रशिरा की समान तुझको धूपित करें (रुद्राः, अष्टभेन, छन्दसा, प्रशिरस्वत्, त्या, भूपयन्तु ) रुद्र निगुभ छन्द के प्रभाव से अंगिरा की समान तुझको धूपिस करें (मादित्याः, जागतेग, बन्दसा, अंगिरस्वत्. त्वा, धूपयन्तु ) आदित्य जगतीचन्द के प्रभाव से अंगिरा की समान तुमको धूपित करे ( पैश्वानराः, विश्वदेवाः, प्रानुष्ठभेन, छन्दसा, अंगिरस्वत्, त्या) सब के हितकारक विश्वेदेवा देवना अनुपए छन्द के प्रभार से अंगिरा की समान तुझको धूपियं करें । (इन्द्रः, स्वा, धूपयतु, वरुणः, षा, धूपयतु, विष्णुः, त्वा, धूप- यत् ) इन्द्र घुझको धूप दे, परुणदेव तुझको धूप दे, विष्णुदेवता मुझको धूपदे ॥६॥ अदितिष्ट्वा देवी विश्वव्यावती. पृथिव्याः मधस्थ अंगिरस्वत्खनत्ववर देवानान्त्या पत्नी . " .
३११ शुक्लयजुषद् । ये, परिददामि, पपा, मा भेदि) हे मित्र देवया ! पाणिपों के हित करनेवाले, इस तसा को खरिबरा न होने के लिये, आपके मिमिव देता है, यह तुमै सौपी हुई उखा किसीमकार विदीर्ण न हो यथावद रहे ॥ ६॥ वसंघरवा इन्दन्तु गायत्रेण छन्दसाहिरवद्रा- स्त्वामुन्दन्मु त्रैभन उन्दसानिसस्वादिस्पा स्त्वा ऐन्दन्तु जागतेन छन्दसादिरस्पद्विश्वे स्याटेवायें वानराआमुन्दन्वाभेन छन्दसा- शिरस्पत् ।। ६५॥ इस के० में ४ मं० हैं। सबका विश्वामित्र ३०, ई० १,३ भुरिगारी २ माना० नु० ४ नि० सा०, ज०, और सबका उखा देपता है। मंत्रार्थ-ई उखे ! (बसवः, गायत्रेण, छन्दसा, मह्नि रवद, त्वा, भाड्रन्दन्न) व गायत्री छन्दके प्रभाव से अगिरा की समान सुझको अजादुग्ध से सिंचित करें। हे उरखे ! ( रुद्राः, अणुभेन, छन्दसा, अनिरस्वत, स्वा, भातृन्दन्तु ) रुद्रगण निशुभ छन्द के प्रभाव से अहिरा की समान तुझको सिञ्चन करें । हे सखे ! (मादित्या, जागसेन, छन्दसा, अंगिरस्वत, स्वा, भाट न्दन्दु) मादित्यगण नगती छन्दकी सामर्थ्यसे अगिराकी समाम तुझको सिंपन करें । हे उखे! (पैश्वानराः विश्वेदेवाः, भानुः- मेने, इन्दसा, मंगिरस्वत, सा, पाहन्दन्तु) विश्वके हितकारी विश्देवा, मनुनुप् छन्द के प्रभाव से अंगिरा की समान तुझको सिवन करें ॥६५॥ आत्तिमग्निम्मयुजय स्वाहा मनों मेधामग्नि- मयुजय स्वाहाँ चित्तं विज्ञातमग्निं प्रयुज, स्वाहा वाचो विधुतिमनिस्प्रयुज स्वाहा मजा पतये मनवे स्वाहारनपै वैश्वानराय स्वाहा ।।६६ ॥.. इस के० में ६ मंत्र हैं। सबका विश्वामित्र ऋ० है । ई. मा० पं०, २, ३, ४ या०नि०,५ यापं०, ६ मा० त्रि०, और , ११ अध्याय देवता सबका लिहोक्त है । मंत्रार्थ-(भाति, अग्नि, मयुज, स्वाहा ) यज्ञ संकल्प के प्रेरक अग्नि को इस यज्ञकर्म में मयुक्त किया उसके निमित्त यह आहुराि मदान कीजाती है । (मना, मेघां, प्रयुजम्, अग्नि, स्वाहा ) मन और मेधा मंत्रधारणशक्ति को प्रेरणा करनेवाले भरिन को प्राइसि देते हैं । (चित्त, विज्ञातं, प्रयुनम्, अग्नि, स्वाहा ) चित अविज्ञात अनुष्ठान के बानसाधन विज्ञान के प्रेरक अग्नि को प्राहुति देते हैं । (वाचा, विधृति, प्रयुजम्, अग्नि, स्वाहा ) मंत्रपाठरूप वाणी और विशंप धारणा के मेरक अग्नि को आहुति देते हैं । ( मनवे, प्रजापतये, स्वाहा, वैश्वानराय, अग्नये, स्वाहा ) मन्वनार को मत करने वाले मजापति के निमित श्रेष्ठ माहुति हो, विश्व के हितकारी अग्नि देवता के निमित्त श्रेष्ठ होम हो ।। ६६ ॥ बिचौ देवस्प नेतुर्मौ धुरीत मुख्यम् । विश्वों राय ईपुद्धयानि घुम्न एणीत पुष्यसे स्वाहा ।।६७॥ इसका वस्त्यात्रेय ऋ०, प्राय॑नुष्टुप छ०, सविता देवता है। मंत्रार्थ-(विश्वः, मतः, नेतुः, देवस्य, सख्यं, धुरीत, पुण्यसे, घुम्न, पृणीत राये, विश्वः, इपुध्यति, स्वाहा ) सम्पूर्ण मनुष्य फल को मात करानेवाले परमात्मा के सख्यभाव को प्रार्थना करें, कर्म उपासना बान की पुष्टि के निमित्त यश वा अन्न की इच्छा करो, धनमाप्ति के निमित सब मनुष्य उनसे प्रार्थना करते हैं, उनके निमित्त श्रेष्ट होम हो ॥१७॥ मासु भित्थामा रिपोम्ब धृष्णु धीरयस्व सु अग्निश्चेदकैरिप्पथः ॥ ६८॥ इसका प्रात्रेय ऋ, मापी गा० ई०, उखाग्नीदे है। मंत्रार्ष (अम्ब, सु, मा, मित्थाः, मु.मा, रिपः, धृष्णः, स. वीरयस्थ, अग्निः, च, इदम्, करिष्यथः । माला उखे ! तुम अवश्य ही मा विदीर्ण हो, अवश्य ही मग विनाश को प्राप्त हो, किन्तु मारमतापूर्वक भली प्रकार वीरकर्म करों, अग्नि और तुम समाप्ति .
। . शुक्लयजुर्वेद । पर्यन्त इस हमारे कार्य को करोगे-॥१८॥ दृहख देवि पृथिवि स्वस्तर्य आमुरी माया स्वधया कृतामि । जुटन्देवेभ्य हुदमस्तु हव्यम- ष्टिा त्वमुदिहि यज्ञास्मिन् ॥ ६९ ।। इसका मात्रेय #०. त्रिप इन्द, उखा देवता है। मंत्रार्थ- (दोष, पृथिवि, स्वसये, दृधेरत, बधया, श्रामुगी, माया, कृता मसि, इदं, हव्यं, देवेभ्यः, जुष्टं, प्रस्तु, त्वं, अरिष्टा, स्मिन्, यज्ञे, उदिहि ) हे देवी! पृथिवि उग्व यजमान के कल्याण के निमित्त दृढ हो, अन्न के निमिच माणसम्बन्धिनी महा कीगई। हो, यह हवियोग्य अन्न देवताओं के निमिश मिय हो कार्य शेप पर्यन्त तुम अभग्नरूप से इस पक्ष में अवस्थिति करो ॥ ६९ ॥ छन्नमपिरामुतिः पूत्नो होता वरेण्यः सहस.. स्पुत्रो अद्भुतः ।। ७० ॥ इसका सोमाहुसि ऋ०, विराइ गा० ई०, मग्नि देवता है। मंत्रार्य-(द्वन्नः, सपिरामुतिः, प्रस्तः, होता, वरेण्यः, सहसः, पुत्रः, अद्भुतः ) जिसका प्रधानभक्ष्य पलाशकाप्ट है, जिसका प्रधान पानी घृत है, जो पुरासन, देवगणों का आव्हान करनेवाला, धरणीय, बल से मयन करनेपर उत्पन्न होनेवाला प्रार्थयाप है चह अग्नि देवता कार्मुकी समिद् को भत्तण करै ।। ७० ॥ परस्याधि मयतो बरा अभ्यासर । यत्राह- मस्मि ता अव ॥ १ ॥ इसका विरूप ० विराइ गा० छ०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ (परस्पाः, सम्वतः, अंबरान, अभ्यातर, यत्र, अई. अधेि, मरिम, ता, श्रम ) शमुसम्बन्धी संग्राम से हमारे जनों को दुख से तारने को सन्मुख खायो' भौर जिस स्थान में में सम्यक् स्थित है उस स्थान की रक्षा करो ॥७१॥ • परमस्या परावतो रोहिदव दागह। पुरीष्ण पुरुषियोग्ने स्वन्तंग मृधः ।। ७२ ।। .
११ अध्याय। ० इसका वारुणि प्रापि है, भुरिगेनुष्टुप् छन्द, अग्नि देवता है । मंत्रार्थ-(अग्ने, राहिदश्वः, पुरीप्यः पुरुपियः, त्वं, परमस्याः, पराधसः, इह. पागहि, मृधः, याता) हे अग्निदेव ! रोहित नाम अश्व रखने वाले, पशुओं के हितकारी, बहुजनमिय, तुम अत्यन्त दर देश से इस यज्ञ कर्म में श्रीगमन करो, संग्राम में शत्रु मों का विनाशकर उत्तीर्ण हाम्रो ॥ ७२ ॥ : यदन कानि कानि चिदा ते दारूणि दृध्मसि । सर्वतदस्तु ते घृतं तर्जुषस्व यषिष्ठय' ।। ६३ ।। इसका जमदाग्न ऋ०, निचा छं०. अग्नि दे० है। मंत्रार्थ- ( यविष्ठय, अग्ने, यत् कानिचिन् दारूणि रो, रो, पाद्ध्यासि रात सरे, रो.पुन, प्रस्तु. तत्, जुषस्व ) हे युवश्रेष्ठ ! अग्नि ! जो कोई भी काष्ठ मुम्हारे निमित्त अर्पण कर वह सब तुमको घृसकी समान मिय हो, उसको प्रीति सहित सेवा करो ॥ ७३ ॥ . यदत्युपजिविका यदम्रो अति सम्पत्ति । स- धुनत दस्तु ते घतन्तज्जुषस्व पचिप्ठ्य ।। ७४ ।। इमका जमदग्नि ऋ०, विरानुगुप्छ०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ हे अग्ने ! ( उपजिविका, यत्, अत्ति, वनः, यत्, अतिसरशि, यषिष्टय, तर , घृतं, अस्तु, तद, जुपस) दीपकगण जो काट मक्षण करते हैं वन्मीक जिस काष्ठ के पार हो निकलती है हे तरुण अग्ने ! यह समित तुमको पृतवत् प्रिय हो, उसको प्रीति से सेवन करो ॥ ७४॥ अरिहरप्रयायपरन्तोश्चात्र तिष्ठते घास- मस्मै गयस्पोण समिपा मन्तोग्ने मा ते . प्रति वेशा रिपाम ।।७५ ॥ इसका नाभनिदिष्ट ऋ०, विगद् त्रिष्टुप छ, अग्निदेवता है। मंत्रार्थ-( भग्ने, से, मशिवशा रिहः, अभयावम्, अस्मै, घासं, भरन्तः, तिष्ठते, अम्वाय, इव, राया, पोपण, पा सम्मदन्तः, रिपाम ) हे अग्ने ! तुम्हारे पाश्रयवाले हम निरन्तर अममत्तको - .. . - मा - शुक्लपजुर्वेद ।। समान इस अग्निदेव के निमित जैसवानिशाला में स्थित घोड़ को मारीदिन घास दीजाती है सेसे समिधाप धन की पुष्टि और अन्न से हप को सम्पादन करते नाशको माप्त नहो।। ७॥ नाभा पृथिव्याः समिधाने अग्नौ गयस्पोपाय वृहत्ते हवामहे । परम्मदंदुक्थं पजेता- रमग्निम्पृतनासु सामहिम् ॥ ७६ ॥ इसका नामानेदिष्ट ऋ०, सराडापी त्रिष्टुप्छन्द है, अग्निदे- पता है । मंत्रार्थ- पृथिव्याः, नाभा, समिधाने अग्नौ इरम्मदम् हदुस्थम्, यजत्रम्, पूतनाम, जेतारं, सासहि, भग्नि, रहते, राय पोषाय, हवामहे ) पृथ्वी के गाणिस्वरूप रखा के मध्यमें दीप- मान आहवनीयमाम अग्नि के प्रज्वलित होनेपर थन से दप्त होने वाले बड़े शस्त्रस्तोत्रवाले यजनपूजन के योग्य संग्रामों में जीतनेवाले शत्रुमों का निरादर करने वाले अग्नि के अधिष्ठात्री देवताको बहुत से धनकी पुष्टि के निमित्त प्राव्हान करते हैं ।। ७६ ॥ याः सेना अभीवरीराव्याधिनीरुगंणा जरा । ये स्तेनाय च तस्कंगसांस्ते अग्नेपिदम्यास्ये ७७ इसका नामा नेदिष्ट ऋ०, भूरिंगनुष्टुप्छन्द, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(या, सेना: अभीत्वरीः, उरा, भाव्याधिनी:, उगण: ये, स्तेनाः, च, ये, तस्कराः, भन्ने, सान, रो, धास्ये, अपि धाम) जो शत्रुकी सेना हमारे सन्मुख थानेवाली है, और जो सेना हमारी सब प्रकार से साड़न करने वाली है, और जो शस्त्रधारी है, जो दाकू ,, हे भग्ने ! उनको तुम्हारे मञ्चालित मुख में भा. हुति करता है ॥ ७७॥ दष्ट्राभ्याम्मलिम्लूजम्भ्यस्तस्करा, उत्त । हनुभ्याध स्नान भगवस्तारस्वखोढ मुखादितान् ।। इसका नामा मेदिष्ट ऋ०, भुरिगायुणिकर, शनि दे है। मंत्रार्थ-( भगवः, स्वं, मलिम्लून, दयाभ्या, तस्करान, जम्भ्य, उप, स्तेनान, हनुभ्यां तान्, एखादिवान, खाद ) हे परमएरर्वये . , ११ अध्याय - सम्पन्न परात्पर परमेश्वर हे अग्निस्वरुप ! जो गांव में प्रकटभाष से चोरी करते हैं उनको केवल दादों से, तस्करों को शो निर्जन • स्थान में दस्युत्ति करते हैं उनको भागे के दोनों से और चोरों को ठोदी से पीड़ित को जनच्छेपकार नष्ट करने योग्यों को. जीवितरहित करके भक्षण करो।॥७८ ॥ ये जनैपु मलिम्लव स्वनामस्तस्कंग करें। ये कक्षेप्यायवस्ताँसौ धामि जम्भयोः ॥ ७९ ॥ इसको नाभा नेदिष्ट ऋ०, निचुद० छं०, अग्नि देवता है। मन्त्रार्य-(ये, जनेषु, मलिम्लवः, सेनासः, वने, तस्कराः,ये, कोपु, अघायवः, ताग, से, जम्भयोः, दधामि) जो ग्रामवर्ती मनुष्यों के स्यान में पूर्वोक्त मलिम्लु च और स्तेन नाम से प्रसिद्ध गुम चोर हैं, जो वा में निर्जन मदेश में गमन करते हैं रास्कर नाम से गसिद्ध चोर हैं, जो नदी पर्वत गहन स्थानों में पापाभिलापी लोभ से मनुष्यों के माण हरनेवाले हैं, देशाने ! उन रात्रको तुम्हारी डादों के अन्तर में खाने को स्थापन करता हूं ।। ७९ ॥ सर्शितम्मे ब्रह्म सर्शितं वीर्यम्बलम् । स- शित चत्रजिष्णु यस्याहमस्मि पुरोहितः ॥2011 इसका नामानेदिष्ट ऋ० अनुष्टुप् छ, अग्नि दे० । मंमार्थ- ( यः, जनः, अस्मभ्यं, अरातीयात, च, या, नः, द्वेपते, य', निन्दात, च, अहमान, धिप्सात्, तं, सर्वम्, भस्मसा, कुरु ) जो मनुष्य हमसे शत्रुता करै जो हमारे देयधनको हमें न दे और जो हमसे द्वेपकर हमारे कार्य को नष्ट करै जो हमारी निन्दा करै गुगण में 'दोष कर और जो हमारे पाणवध का यत्न की उन चारप्रकार के भरती देवा निन्दक नियांमु सवको भस्म करो ॥८॥ यो अस्मभ्यमरातीयाचम्च नो हेपत जनः । निन्दाद्यो अस्माधिप्साच्च सर्वन्तम्भस्मसाकुरू ८१ इसका नामानेदिष्ट ऋ०, निच० ५० छ०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ हे अग्ने वा हे पेरमात्मन् ! भापके मसाद से ( मे, ब्रह्म . - शुक्लयजुवद । संशिनम्, वीर्य, वलं. संशित, यस्य, अई, पुरोहिता, अस्मि, क्षत्रं, जिष्याः संशिनम् )मेग ब्रह्मोन सीक्षण मा इन्द्रिय शक्ति शरीर शक्ति, स्वकार्य में समर्थ हुई जिसका मैं पुरोहित हूं उसके क्षनरोज जयशील को तीक्ष्ण किया ।। ८१ उम्रपाम्बाह अमिरमुरच्चा भयो पलम् । लि- णोमि ब्रह्मणा मित्रानुन्यामि स्वा अहम् ।।८२॥ इसका नाभानेदिष्ट ३० घिराउनु० छ. अग्नि दे। (प... पाम्, वाहू, उदितरम्, वचः, वलम्, महम्. ब्रह्मणो, भमित्रान्, क्षिणीमि, स्वान्, उन्नयामि ) मंत्रार्थ-इन परमात्मा अग्नि के मसाद से इन अपने ग्राह्मण राजा भोके बीच में अपनी भुजा ऊंची की यह लोकोक्ति भी है कि जब कोई औरों से उत्कृष्ट होता है सब लोक कहते हैं इसने अपना हाय कार किया तेजने सबकी कान्ति को भतिक्रमण किया वनने शरीरशक्ति ने सबके वयको पभिमूरा किया मैं मंत्रकी सामर्थ से ममित्र शत्रुओं को नष्ट करता हूं, अपने पुन पौनादिको उत्कृष्टता को प्राप्त करता हूं इस भकार सेरह समिधा के मंत्र कहे ॥ २॥ अन्नतेनस्प नो देखनीवार्य शुष्मिणः । प्रहातारन्तारिप ऊजन्नो धेहि दिपटे चतुष्पदे । इसका नामानेदिष्ट, उपरिष्टा० ० छ० अग्नि दे है। मंत्रार्थ-(मन्नपते, मा, मनमीवस्य, शुटिमणः, मन्नस्य, देहि, प्रदातारं, मसारिषः, नः, दिपदे, चतुष्पदे, ऊन, धेहि) हे अन्न के पालक भाने हमारे व्याधिरहित बलदायक अन्न को पदान करो, अन्न के देनेवाने हमारी मतिदि करो और हमारे मनुष्प पुत्रादि गौ मादिकों में भन्न को धारण करो ॥ ८३ ।। इनि शुक्ल पदान्तर्गत वामप्तनेवि संहिता का सानुवाद . ग्यारहवां अध्याय समाप्त १२ अध्याय दादशोऽध्यायः है A जिसमें अग्निचयन प्रधान है ऐसे ग्यारहवें अध्याय में उखा सम्भरणादि समिदधानान्त के मन्त्र कहे । भव बारह अध्यायमें उखापारण के मन्त्र कहेजायंगे ।। दृशानो कक्म जा पचोदुर्मर्पमाथिपे रुचानः अग्निरमतो अभवत्योंभिर्यदैनन्यौ.. रजनयत्सुरेसा ॥१॥ इसका वत्समी ऋ०, भुरिग पंक्ति छ रुक्म देवता है ममार्य- (शानः, प्रिये, रुचाना, दुर्मपम्, प्राय: रुस्मः, चा व्पद्यात् अग्निः, योभ, ममृत्तः, भवभव, यत्, सुरेसाः, यौः, एन, अन्न- नयत् ) प्रत्यक्ष प्राप्त मनुष्यों को लक्ष्मी मदान करने के निमिच अमिलपित प्रखपिडस आयुगाला मुवीभरण बड़ी दीप्ति प्रका. शिस होताहै, सो यह भग्नि अन्नादि के पुरोडाशादि से चिर- स्थायी हुमा क्योंकि सुन्दर अग्निकर पुलोकवासी देवाणों मे इस अग्निको प्रकट कियाहै ॥१॥ नक्तोपा मा समनसा विरूपे धापते शिशुमे- के समीधी । चावाक्षामा रुक्मो, अन्तर्षि- भौति देवा अग्निधारयन्द्रविणोदः ॥२॥ इस कं० में ३ मंत्र हैं। सबका कुत्स ऋ० ई., १ साम्नी दि० २, ३, याजुयी शि और देवता सबका भग्नि है । मंधार्य हे उखे ! ( समनसा, विरूपे, समीची, नक्तोपा, एकं, शिशु, धापयेगे ) समान मनवाले, कृष्ण शुक्ल भेदसे विलक्षण रूप, परस्पर मिले हुए रात्रिदिन, एक पालकरूप अग्नि को सायं मातः अग्निहोत्रादि कर्म से तृप्त करते हैं, (धावाक्षामा, अन्तः, रमा, विमाति ) ऊपर धुलोक और नीचे भूलोक के मध्यमे मो रोपमान अग्नि विशेष शोभित होती है, उसको उठाता हूं। (द्रविणोदा, देवा पानि ) याद्वारा घनरूप फलके दाता देवगणों ने अग्नि को ३२२१ शुक्लयजुर्वेद । - पारण किया ।। २ ॥ विश्वा रूपाणि प्रतिमुञ्चत्ते कपिः प्रासावीद्रं निपढे चतुष्पदे । वि.नामख्यत्मविता पो. एपोर्नु मयाणमुपमा विराजति ॥ ३ ॥ इसका शावाश्च ०, विराङ्गगती ई०, सविता दे० है । मंत्राप (वरेण्यः, सविः, सविता, विश्वा, गणि, मतिमुको द्विपदे, पाप्पदे, भंद्र. प्रासावीद, नाकं, व्यख्य, उपसः, प्रयाणम्, अनु, घिराजसि ) श्रेष्ठ विधान जगत् के प्रेरक सविता के भभाष से, सम्पूर्ण जगत् की वस्तुएं विविधमकार के रूपों को धारण करसी है, द्विपाये मनुष्यादि चौपाये गौ आदि सब प्रकार के प्राणियों को स्वस्वव्यवहार प्रकाशनरूप श्रेय को प्रेरणा करता है (नाक, व्यख्यद, उपसः, मयाणं, अनु, विराजति) वर्ग को प्रकाश करता है और जो उपाकाल के गमन के पीछे विराजमान होता है ३ सुपर्णोसि गुरुत्मास्मियत्त शिरों गायनञ्चक्षुः । . बृहद्रयन्तरे पक्षौ । स्तोम आत्मा छन्दास्य- ' झानि यधपि नाम । साम ते तनुपर्धामटेश्यं यज्ञायजियापुच्छन्धिष्णा: शफाः सुपर्णोखि गरस्मान्दियगन्छ स्वः पत ॥४॥ इसका श्यावाश्य १० इरिग्धति छ, पर्ण देश है। मंत्रार्थ हे उखाग्ने ! जिसकारण कि तुम ऊर्ध्वगामी होने में समर्थ हो और महार हो इसकारण तुम (सुपर्णः, गरुत्मान्, 'असि, निन्, दे, शिम, गायत्रम्, वे, चतुः, वृध्द्रयन्तरे, पक्षी, स्तोमः, यात्मा, चन्दा सि, अङ्गामि, यधपि, नाम, बामदेव्यं, सामः रो, रानूः, यज्ञायचिय, पुच्यम्, धिष्ण्याः, शफाः, गरुत्मानमुपर्णः, प्रसि, दिवं, गरछ, स्वः, पत्त) सुन्दर पहचालें पेगगामी गाड की समान हो, पिटरा स्तोम तुम्हारा शिर है, गायत्री तुम्हारे नेत्र हैं; बृहत् और रवन्तर साम तुम्हारे दोनों पंख हैं, पंपदशस्तोम तुम्हारा अन्तःकरण है, गायत्री प्रादि इक्कीस छन्द तुम्हारे हृद- . - .१२ अध्याय पादि अङ्ग है, पेत्या अादि यजुः, तुम्हारेगाम, वामदेव्प नामक साम तुम्हारा शरीर है, यज्ञायज्ञिय नामक साम तुम्हारी पुच्छ है, छोय यादि विष्ण्य में स्थिा अग्नि तुम्हारेखुरोके नख है, इस मकार दे भग्ने ! तुम वेगवान गरूड़की समान पक्षिरुप हो । इस कारण माशको गमन करो स्वर्गलोकको प्राप्त होओ ।। ४ ॥ विष्णोः कमोति सपत्नहा गायनन्छन्द आरोह पृथिवीमनु विक्रमस्य विष्णोः क्रमास्यभिमा- सिहा भन्न आरोहानारिखमानुविक्रमस्व पिप्णोः मामोस्परातीयशो हुन्ता जागतञ्छन्द आरों दिवमनुषिर्फमस्व विष्णोः मासि शभूयतो हन्तानुष्टुभश्छन्द्र आरोह दिशोनु, विक्रमस्व ॥ ५॥ इस कं० में मं० हैं । संघका शावाश्व ऋ० छ०१,२,४ निन्दा १० ३ श्रार्थी १० और देवता सबका खाग्नि है। मंत्रार्थ-हे प्रथम पादविन्यास ! तुम (विषणो, सपत्नहा, नमः, अंसि, गायन,इन्दा, मारोह, पृथिवीम्, अनु, विक्रमस्य) याग्नि के शमुपासी क्रम हो, इसकारण गायत्री छन्दको मनुग्रह कर स्वी- कार करो, फिर भदेवता रूप इस भूमिके मदेशको विशेषकर माप्त करो । हे द्वितीय पादविन्यास ! तुम (विष्णोः, अभिमातिहा, क्रमः, असि, त्रैमुभम्, छन्दा, भारोह, अन्तरिक्षम,अनु, विक्रमस्य) उखाग्निके पापनाशक क्रम हो, त्रिभ छन्दको अनुग्रह कर स्वी. कार करो, पश्चात् अन्तरिक्ष स्थान को प्राप्तकरो। हे तृतीय पाद पिन्यास ! तुम (विष्णोः, कामा, परासीयसः, इन्सा, सि, नागतं छन्दः, आरोह, दिवं, अनु, विक्रमस्व) पखाग्नि के क्रम धन ले कर न देनेवालों के नाशक हो, जाती छन्दको भारोहण करो, पुलोकको गमन के पीछे स्थानको गास करो । हे चतुर्यपाद वि. न्यास ! ( विष्णोः, क्रमः, शवयसः, हन्ता, असि, बन्दः, सारोद) तुम उखाग्नि के मम शत्रुता करने का . - , .
- - ३२४ शुक्लयजुर्वेद । हो, अनुपम छन्दको भारोहण करो। हे अरने ! तुम (दिशा मनु विफमस्य) सब दिशा-शिदिशाओं में परिव्यात होभो ॥५॥ भन्ददग्निस्तनयन्निव द्यौःक्षामा रिहवी. रुधः समनन् । यो संज्ञानो विहामिडो भ. ख्यदारोदनी भानुनी भात्यन्तः ॥ ६ ॥ इसका वरसमी मा०, मिच० पि.छ. अग्नि देवताहै | मंत्रार्थ (पौः, इष, सनयन, सामां, रेरिहद, वीरुधः समश्नन्, अग्निः अमन्दम्, हि,जज्ञामाः, सपः, इदः, इम्, व्यख्यत्, रोदसी, अन्सः भानुना, भाभाति ) वर्गकी समान अर्थात् मेषकी समान गर्जना फरसे पृथ्वीको पास्वादन करो, क्षोंको भकुरित करताहुमाग्नि प्रदीप्त होता है, जिसकारण से कि मकट होतामा शीघ्रही दीप्त हो, इस सबको पिण्यास पर्याव प्रकाश करता है, चापापिषी के मध्यमें रश्मिद्वारा प्रकाशित होताहै ।। ६ ।। ' अग्नेभ्याधर्तिन्नति मा निवर्तुस्वायुशा वर्चसा प्रजया धनैन । सन्पा मेधया रय्या पोपेण ॥ ७॥ इसका बस्सपी ०, भुरिगार्ण्यनु०, ई० मग्नि देवता है। मंत्रार्य-(अभ्यावधिन, भाने, मायुषा, पर्चसा, मनया, सन्या, मेधया, रय्या, पोपेण, मा, भामि, निवर्तस्व ) हमारे सन्मुख आमे के स्वभाववाले, गमनागमन में समर्थ, हे अग्निदेव परमा- स्मन् ! भायु, तेनकान्ति, सन्तान, इटलाम, धारणारसी धुदि, सुवर्णादि अलझार, पायु मादि की पुष्टि के साथ मेरे सन्मुख पास हूजिये ॥ ७॥ में अहिरः शतन्तै सन्नायुतः सहस्रन्त . उपाहतः । अधा पोपस्य पोण पुन्नों नष्ट माकृधि पुनन्नों गुपिमाकृधि ॥ ८ ॥ इसका वत्सपी ऋ०, भापी त्रि० छ, अग्नि दे। मंत्रार्थ:- (अगिरः, अग्ने, ते, थायराः, शतम्, से, उपास्ता, सह, सन्द, अध, पोपस्य, पोपेण, नः, नष्टं, पुनः, प्राकृधि, पुनः, ना, रयिम्, . , -- १२ अध्याय १३२५ माधि) हे श्रेष्ठ अंगवाले! हे अग्निदेवता ! आपकी गमना- गमन शक्ति सैकड़ों हैं, आपकी मित्ति शक्ति सहस्रों है, इस कारण माना करते हैं कि शससंख्यक माहति शक्तियों की समृद्धि की लक्षसंख्यादिशद्धि द्वारा हमारे व्ययहुए धन को फिर सबमकार सम्पादन करो, फिर भी हमारे पूर्वसम्पादित धन को सबमकार सम्पादन करो अर्थात् प्रावृत्ति शक्ति के प्रभाव से हम को पसंख्य धन का अधिकारी करो और उपाधि शक्ति के ममाव से नष्टधन पुनः माप्त कराओ ।। ८॥ पुनर्जा निर्वस्व पुनरग्न पायुपा । पुनः पाह्य हसः ॥९॥ इसका वत्समी ०, निन्दा गा. ई०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-( भग्ने, ऊर्मा, पुनः, निवर्चस्व, पा, प्रायुपा, पुनः पुनः, महसः, पाहि) हे भग्निदेवता ! तुम क्षीरादि रस के सहित फिर भागमन करो, अन्न, जीवन के साथ, फिर प्रागमन कर थायेहुए तुम हमको फिर पापों से रक्षा करो ॥९॥ सह ग्या नियंत्तस्थाग्ने पिवस्त्र धारया । विश्वप्रन्यो यिभ्यतस्परि ॥१०॥ इसका वत्सभी ऋ०, निन्दापी गा० छ०, अग्नि देवता है । मंत्राप-(अग्ने, रय्या, सह, निवर्तव, विश्वप्न्या, धारया, विश्वा, परि, पिस्त) हे अग्निदेव ! धूम के सहित लौटो, सब संसार के उपयोग योग्य दृष्टिरूप जलधारा से सम्पूर्ण जगद के रण धाग्य लता वृक्षों के ऊपर सिंचन करो ॥१०॥ मा त्योहामन्तरभूध्वस्तिष्टाविचीचलिः । पिशस्त्वा सी यामछन्तु भा त्यामधिभ्रशत् ११ इसका ध्रुव ०, मायेनु० छ, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ- हे अग्नि ! (त्या, महापम्, अविचाचलिः, ध्रुवः, अन्तरभा, सिष्ठ, सर्वाः, विशः, स्वा, वाञ्छन्तु ) तुमको मैंने बाहरण किया है, अत्यन्त अचल होकर सुम स्थिरतायुक्त प्रखा के मध्य में स्थित १२६ शुक्लयजुर्षद। दो हमारी सम्पूर्ण मजा तुम्हारी इच्छा कर ( राप्रं. त्वत, मा, अधिनरात ) हमारा राज्य सुमसे नही गुन्य हो । ११ ॥ उद्युतमा पाशमस्मदेवाचमं विद्यम अंधाप अथा उपमादित्य प्रसे तधानीगनी अदितये स्पाम ॥ १२॥ इसका-पुनाशेष ०, विरादापी ई०, वरुणदेमंत्रार्थ (वरुण, उचमम, पाश, भस्मव वद, पाश्रयाय, अधमम, पव मध्यमं,,अय, श्रादित्य, अनागसा, सब, प्रये, पयम्, मदिराये, स्पाम ) हे सकलपाशंशापागवारक देव ! हमारे उत्तम अंग शिर में स्थापित अपनी पाशको हम से निकालकर दूर करो सपा अघमण पादप्रदेश में स्थित अपनी पाशको सरकार पशर दूरको मध्यप्रदेश में स्थित अपनी पाराको विच्छेद को शीनों पाशके विनाश के धननार हे अदिमिपुत्र ! अखपिटा शक्तिमान वरुण ! अपराध रहिरा, तुम्हारे कर्म में वर्तमान दमदीनधारहित भखारिहरा तत्व के योग्य हो ।। १२ ॥ भने वृहन्नुपसमूषों अस्थानिजगन्धाना. मनो ज्योमिपागात् । अग्निर्धानुनारशंता स्चंग आ जातो पिश्या सीन्यप्राः ।। १३.॥ इसका विस भा०, भुरिगा०प० ई. अग्नि दे० है। मंत्रा (हत, भग्निः, उपसाम्, अने, ऊर्ध्वाः, अस्थात्, रामसः, जगन्धान, ज्योगिपा, पा-भगात, रुपना, मानुगा, स्वजा जाता, विश्वा, सदानि, पा, प्रामाः) ममारसे महान भाग्नि, उपाहाल फे आगे ऊंचा स्थिराहुमा राप्रिरूप अन्धकार से निकले दिनरूप ज्योति के संग यहाँ माप्त हुवा अन्धकार को दूर करता हुवा किरणगान से शोभन शरीर घाला हुशा उत्पन्नमात्र ही संपूर्ण स्थान भर्थात् सय लोकों को सरकार अपने रोज से पूर्ण करता था॥१३॥ हुमशुचिपदसरन्तरिक्षसद्धोतविटिपदात - - १२ अध्याया ६२७ - पिढेरोणमत् । नपहरसहतसयोमसदमा गोडा प्रोतुजा अग्रिजा बातम्वृहत् ॥ १४ ॥ इस केस में २ मंत्र हैं। सबका त्रित ०, ई० १-निव ज०, २ दैव्युनिएक, और देवता सबका अग्मि है । दशा मध्याय के २४ वें मंत्र में इसकी व्याख्या होगई ।। १४॥ सीटु स्यमातुरस्था उपस्थे विधान्यग्ने वयु- नांनि विद्वानन् । मैनन्तिपसा मार्चिपातिशों- चीरनास्या शकज्योतिर्थिशाहि ॥ १५ ॥ · । इसका गित मा० है, विराट् त्रि० छ, भगि दे० है । मनाथ (अग्ने, विश्वामि, वयुनानि, विद्वान, त्वं, अस्याः,मातुः, उपस्थे, सीद, एनाम्, तपसा, मा, अभिशोचीः, चिपा, मा, अस्यां, अन्तः, शुक्रज्योतिः, विभादि ) हे अग्निदेवता ! सम्पूर्ण ज्ञान के उपायों को जाननेवाले तुम, इस माता की समान उखा की गोद में स्थित हो, इसको सन्ताप से मारा सन्तापित करना, ज्वाला से मत दीप्त कागा, इस उखा के मध्य में निर्मल मकाश से विशेप प्रदीप्तिमान दो ॥१५॥... अन्तरंग्ने चा त्वमुखायरः सर्दने स्व । रास्या- स्त्वहरसा पन्जातवेदः शिवोभव ।। १६ ।। इसका मिरा ऋ० है, विराडमु० छ, अग्नि दे है। मंत्रार्थ- भग्ने, त्व, रुचा, उखाया:, अन्तः, स्वे, सदने, बारावेदः, त्य; हरसा, तपन, तस्याः, शिषः, भव ) हे अग्ने । तुम अपनी दीप्ति से, इस उखा के मध्य में, अपने घर में दीप्त होकर स्थित हो, हे सरके जाननेवाले तुम ज्योति से सपतेहुए उस उखा के कल्याण कारी हूजिये. ॥ १६ ॥ शियो भूत्वा मद्यमग्ने अोसीद शिवस्त्वम् । 'शियाः कृत्वा दिशः सा स्वयोनिमिहासदः॥१७॥ इसका भित ऋ• विराडनु० ० अग्नि देवता है । मभाई- (अग्ने, स्थ, मही, शियः, भूत्वा, भयो, शिवः, सीद, सर्वाः, दिशा . :
- १२८ शुक्लयजुवद । शिवाः, इह. योनि, भासद ) हे अग्निदेवता । तुम मेरे निमित्त कल्याणकारी होकर और इसके अनन्तर सर्वात्मा से शान्तस्वरूप होकर स्थित होत्रो, सम्पूर्ण दिशाभों को कल्याणरूप करके इस भखारूप अपने स्थानमें स्थिरा हूजिये ॥ १७ ॥ दिवपरि प्रथमञ्जज्ञे अग्निरस्मद्वितीयम्परि जातवेदाः । तृतीयमप्सु नुम्णा अजममिन्धान एनजरते स्वाधीः ॥ १८ ॥ इसका वत्सपी ०, निनु प्रि० ई०, भग्निदे है । ममार्य (जारावेदाः, भग्निः, प्रथमम् दिवः, परिजझे, द्विगीय, भस्मत्परि) सबके झासा भग्नि, प्रथम धुलोक में सूर्य रूप से प्रकट हुए.दसरा जातवेदा अग्नि, हम ग्राह्मणों के सकाश से मात हुमा (न म्या, तृतीय, मजस्रं, असु) मजापति ने तीसरीधार निरन्तर . जलों के भीतर स्थित अग्नि को सृजन किया ( स्वाधी:, एन; इन्धान जरसे) सुन्दर बुदिवाला यजमान, इस अग्निको मदीप्त करसाहुमा प्रकट करता है।॥ १८॥ चिदमा त माने मेधा याणि चिदमा ते धाम विभृता पुरुघा । बिमा ते नाम परमं गुहा पहिमा तमुत्म यत आजगन्ध ॥ १९ ॥ इसका यत्समी र निचू नि ६०, अग्निदे०है। मंत्रार्थ (अग्ने, धा, प्रयाणि, से, भाविद्य, पुरुत्र, विभृता, से, धाम, श्राविद्य, यत् ते, परमं. गुहा, नाम भाविद्य, सं, उत्सम्, भाविद्य यतः, भाजगन्य ) हे भग्निदेव ! जो पूर्व मंत्र में कहे सीमस्वरूप मादित्य भनि वदमानळ रूप हैं, तीनों उन तुम्हारे रूपोंको हम नामरो हैं और आपके सम्बन्धी गाईपत्प भाइवनीय भन्माकार्य पचन भाग्नीप्रीयादि स्थानों में तुम धारण करनेवाले के स्थानों को भी हम जानते हैं, और नो तुम्हारा अत्यन्त गुप्त मंत्र में परि- गणित प्रसिद्ध नाम है उसको भी जानते हैं और उस उत्स्यन्दन जनरूप स्पानको भी जानते हैं, जिस जलरूप स्थानसे विधुवरूप १२ अध्याय.. तुम से प्राप्त हुए हों ।। १९॥.... - समुद्र वा लम्णा अप्सतर्मचक्षा ईघे दिवो " अग्न ऊन् । तुती त्या रसि तस्थिवा समपामुपस्थै महिपा अवर्मन् ॥ २० ॥ इसका वत्समी ऋ०, निवृ० वि० छं० अग्नि दे० है। मंत्रार्थ- (अग्ने, नृम्णाः, समुद्र, ईघे, तृपक्षाः, श्रम, अनाः, दिवः, ऊधन, तृतीये, रजासे, तस्थिवांसं, खा, महिषाः, अपा, उपस्थे, अवर्धन ) हे भग्ने ! मनुष्यों के हितकारी मनापति मे समुद्र में वडवानल रूप से वर्तमान धुमको मदीप्त किया पढ़ते हुए पुरुषों म स्पष्ट मंत्र के कहनेवाले प्रजापति ने राष्टिरूपजलों के भीतर विद्युतरूप से प्रकाशित किया पुलोक के उत्कृष्ट तीसरे रंजन करने वाले, तेजोमण्डल आदित्यरूप से स्थित होते हुए तुमको प्रजापति ने दीप्त किया महान माणों ने जलों के उत्साह में स्थित तुमको मदीप्त किया ॥ २०॥ अक्रन्दग्निस्तनय निवा चौः क्षामारेरहवी रुधः समनन् । संघों जजानो विहामिद्धो अं. ख्यदारोदसी भानुना भात्युनतः ॥ २१ ॥ इसकी व्याख्या छठे अध्याय में होचुकी है। भावार्थ-अग्मि देवता मेघकी समान गर्जन कररो, पृथ्वी को भास्वादन करते, औषधि वृक्षादि को अंकुरित करते शीघ्र प्रकट होकर धावापृथ्वी में परिव्यास होकर प्रभावसहित देदीप्यमान होते हैं ।। २१ ।। श्रीणामुदारो घणों रयीणाम् मनीपाणाम्मा- पणः सोमंगोपा: 1 व मनुः सहसो अपतु राजा विभात्प उपसामिधानः ।। २२ ।। इसका वरसमी , निचदा त्रि० छ, अग्निदे है मंत्रार्थ (श्रीणा, उदार, रयीणाम, धरुणा, मनीषाणाम्, प्रार्पण: सोमगोपाः, वसः सहसः, मनुः, अप्सु, रामा, तपसाम्, अग्रे, . इधानः, विभाति ) गी बोडे थादि सम्पनिका भतिशय देमेवरला - ३२० शुक्लयजुवंद। धोका धारण करनेवाला, मन के अभिलापोंका माप्त करानेवाला यजमान के किये सोमयाग काः रक्षक सबका निवासहेतु मन्यन के वेगरूप बल से प्रकट होने से पुत्ररूप जल में स्थित वरुणरूप से राजा प्रभात के प्रथम थादित्यर से दीप्यमान अग्नि विशेष कर प्रकाशित होता है कारण कि प्रभातकाल में अग्नि होमादि से प्रकट होसा है ॥२२॥; : विचस्प केतुर्भुवनस्य ,गर्भआरोदसी अपृणा- जाय॑मानः । बीडुचिदद्रिमभिन परायजना.. यदग्निमयजन्त पञ्च ॥ २३ ॥ : इसका वत्समी का, भार्थी नि छ, अग्नि दे है। मंत्रार्थ या भग्नि (विश्वस्य : केतुः भुवनस्य, जायमानः, रोदसी, भा, अपृणा) सम्पूर्ण जगत् का विज्ञानस्वरूप प्रात्माग्नि, सब प्राणिमात्रों के अन्तरमें वायु भात्मा से प्रकट होने वाला द्यावापृथिवी को सब प्रकार तेजसे पूर्ण करता है ( परा; यन, वीदुम्, चिन भादि, अभिनत ) चन्द्ररूप से सब ओर गमन करता प्रतिहद भी, मेघको विदीर्ण करता है अर्थात् जो प्रतिदिन पदित होकर अतिशुद्ध पर्वतका भी रन्ध्रमेद कर लोक से धुलोक पर्पन्त को मनी ज्योति से पूर्ण करता है (पक्षजना अग्नि, भा.भ- जयन्त ) मनुष्यगण उस अग्नि का सबप्रकार यजन करते हैं २३ शिक पानको सुरतिः अमघा मस्पैग्निर- मतो निर्धापि । इपति धूममरुपम्भरिभव- मुकेणं शोचिपा यामिनक्षन् । २४ ।। इसका यत्समी ऋ०नि० त्रिअग्नि दे है । मनार्थ- (पशिक, पावकः, अरविः मुमेधाः ममता, अग्निः, मर्येषु, नि- थापि, अरुपा, धूमम्, सदियत्ति, भरिभ्रव, शुक्रेण, शोचिपा, घाम्, इनसन.) लोकों का काम्य कान्तिमान, शोधक, दुष्टों से प्रीखिरोदय श्रेष्ठ बुद्धिमान, मरणधर्मरहित मग्नि मरणधर्मा भनष्पों में देववानों द्वारा पापन कियागया, उपवरहिस यूम "" १२ अध्याय को दृष्टि के निमित्त आकाश में प्राप्त करता है, जगत् को धारण करताहुआ निर्मल मभावयुक्त कान्तिसे युलोक को व्याप्त किया। दृशानो रुक्म उा व्ययौ दुर्घमायु: थिये रुचानः । अग्निरमृतो अभयडयोभिर्यदैन. न्धौरजनपत्मरेताः॥ २५ ॥ . :... इसकी व्याख्या अध्याय १२ के मंत्र, १ में होचुकी है ॥२५॥ यस्तै अव कृणवद्र शोचेपूपन्देष व्रतवन्तमग्ने। '. प्र तन्नप प्रतरं परणे अछानि मुम्नन्देवभक त्यधिष्ठ ॥२६॥ इसका वरसमीर: विराडा० त्रि०ई० भाग्नि देषता हैमिनार्थ- (भदशाचे, देव, अग्ने, अध, या, से, घृतवना, अपूर्व, कृपत, यविष्ठ, तं, प्रतरम्, वस्यः, प्रणय, देवपक्तम्, मुम्म, भाभि) हे कल्याणदीप्ति । हे दिव्यगुण संयुक्त अग्ने ! इस समय पान प्रति- पदा में जो यजमान तुम्हारे निमित्त वृतसित पुरोटाशको करता हैं, हे अतियुवा ! उस यजमानको मतिश्रेष्ठ स्थान दो देवताओं के भोगयोग्य मुख सब प्रकारसे प्राप्त कराभो ॥ २६ ॥ आतम्भज सौभयमेष्वग्न उक्थक्य माभंज शस्यमाने। मिपा सूयमियों अग्नाभवात्युज्जा- तेन भिनदुजनित्यैः ।। २७ ... !": इसका वत्समी ऋषिराहा छ, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(अग्ने, तम्, सौश्रवसेषु, श्राभन, उत्थे, तस्ये, शस्यमाने भाभज, सूर्ये, मियः, अग्ना, मिया, भवाति, मासेन, सहिनदव, जनित्व, उद् ) हे माने ? उस यजमानको कीति बदामेराले यज्ञ कर में सबमकार सेवन करो, गति उपकाण्ड में गोत्र शमादि द्वारा सम्मन्न कर तुम उसको अपना मीसिपान करो, और पूर्यका मियपान करो अग्निका प्रिय हो उत्पन्नाहुएं पुनसे वृद्धिको माहाहो२७ ...त्यामग्ने पळमाना अनु पन्विश्वा वसु दधिरे ... बायपाणिवा संघ द्रविणमिच्छमाना वजहो - शुक्लयजुर्वेद मन्तमुशिजो विषः ।। २८ ॥ इसका बत्समी ऋ०, पिराडापी नि छ०, अग्नि देवता है। मंत्रा-(अग्ने, यममानः, त्यो, मनुन, पाणि, विश्वा, पमु दधिरे, स्वया, सह, पिणं, इच्छमामाः, उशिमा, गोमन्त, मन, विषत्रुः ) हे अग्नि देवता ! यजमानः सुम्हारी सेवा में वर्तमान हुए, दिममें घरणीय सम्पूर्ण धमधाम्प गोहिरण्यादि पेपर्य माश करते हैं, तुम्हारे साप यधफलको..तुम्हारी सेवा करने से इच्छा करतेहुए बुदिमान ज्ञानमसमुच्चयकारी जनों मे रधिमण्डलके मध्यमें देवयान मार्गको सेवन किया ॥ २८॥ : - ... .. जस्ताव्यग्निरामशेषों पैश्वानर मापिभिः सोमंगोपाभावापृथिवी टुवेम देषाधत्त ६ रयिमस्मै सुपीरम् ॥ २९॥ इसका वरसपी , विराडा. बिछ, मस्ति देवता है। मंधार्थ-( नराणां, पुशेषः, वैश्वानरः, सोमगोपा, अग्निः, ऋपिभिः, यस्तावि, अद्वेपे, चापापृथिवी, हुम, देवा। अस्मे, मुवीरम्, रायम्, धत्त) मनुष्यों को सुन्दर सुख देनेवाला, जठ- राग्निरूप से साका हिसकारी, सोमरक्षक भक्ति देवसा, ऋषिपों द्वारा स्तुसि कियागया, देपरहिस, भूमि मोर पुनोक के भधिष्ठात्री देवा को माहाम फरसे हैं, हे देषतामों हमारे निमित्त वीरपुत्र पुन्दर ऐश्चर्य को स्थापन करो ॥ २९ ॥ ममिधाग्निन्दुवस्वत घृतवाँधयतातिधिम् । । अस्मिन्हल्या जुहोतन ॥३०॥ इसकी व्याख्या ३ ०.१ क में होगई है ॥३०॥ सद त्या विश्वेदेवा अग्ने भरन्तु चितिभिः । स नो भव शिवस्त्वयं मुप्रतीको विभावसुं॥३१॥ इसका तापसका विराटनु, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (अग्ने, विश्वे, देवाः, पितिभिः, उद्भरन्तु, सः, सुमतीका, विभावसुः, त्वंना, शिलः,भव ) हे भग्ने ! सम्पूर्ण माणरूप • १२ अध्याय। . देवता हो उयम में प्रवीण बुदि की वृत्तियों के द्वारा तुमको ऊँची धारण करें यह ऊर्ध्वहुए सुन्दर मुखवाले दीप्तिरूप धनवाले तुम हमारे कल्याणकारक होथो ॥३१॥ प्रेदग्ने ज्योतिष्मान्याहि शिवभिषिभिष्ट्वम् : वृहभिर्भानुभिभामन्मा हिंसीस्तन्या प्रजाः॥३२॥ इसका कापस १० पिराइनु० ई० अग्नि देवता है मंत्राथ-- (अग्ने, शिनीमा, चिभिः, इ, ज्योतिष्मान, स्वं,मयादि, वृद्भिः, भानुभिः, भासन, तन्वा, मनाः, माहिंसीः ) हे अग्ने ! मंगलयुक्त ज्वालाभों करके ही प्रकाशवान तुम गमन करो बड़ी किरणों से मकाशवान शरीर से मजा पुगदि को किसी प्रकार पहिा मतदो ॥३२॥ अक्रन्दढाग्निस्तनयंत्रिय घौः क्षामा रोरिहहीरुधः समनन् । मधो जलानो विहीमिद्धो अख्यदा- · रोदसी भानुना भात्यन्तः ॥ ३३ ॥ इस मं० की व्याख्या इसी अध्याय के ६ मंत्रमें होगई।३३। • प्रायमग्निरतस्प शृण्वे विपत्स्यो नरोचते वृहद्भाः । अम यः पूरुम्पृतनासु तस्थौ दीदाय देव्यो अतिथिः शिवो नः ॥ ३३ ॥ इसका वशिष्ठ ऋ० है, पापी वि० छ० अग्नि देवताहै मनाथ; (भयं, मग्निः, भरतस्य, मशृण्वे, सूर्यः, मा, इलाः, मरोचते यः पृतनाम, पूरुम्, भमिसस्यौ, दैव्यः, अतिथिः, मः, शिवः दीदाय) यह अग्नि हवि धारण करनेवाले यजमान के भावानको मुनता है। सूर्यकी समान वटा दीप्तिमान होताहुआ अत्यन्त मकाशवान होता है, जो संग्रामों में राक्षसके सन्मुख स्थित होता है देहसम्बन्धी अतिथि हमारा मंगलरूप अग्नि दीप्तिमान होताहै ॥ ३४ ॥ आपो देवी प्रतिगृभ्णीत भसमैतत्स्योने कृणु- व मुरमा.उं लोके तस्मै नमन्ताजनयः- • सुपनीतिच पुत्रबिभृताप्येनत् ॥ ३५॥ :
शक्लयजुर्षद। । इसका वशिष्ठ ऋ० मा नि छ० श्राप देवता है। मंत्रार्थ- हे ( देवी, आपः, भस्म, प्रतिभागीत, स्पोने, 'सुरमी, लोके,उ, एतत्, कृणुध्वम्. सुपत्नीः, जनयः, तस्मै, नमनाम्, एनत्, अमर विभूस, माता, पुत्र इव ) दीप्यमान! जलों! तुम भस्म को ग्रहण करो, सुखकारक पुष्प धशाद से सुन्दर गन्धयुक्त स्थान में ही इसको धारण करो, जिनके सुन्दर पति वरुण हैं वह तादि को उत्पन्न कर अग्नि की प्रकट करनेवाली हैं, उस भस्मरूप अग्नि के निमिश नवो। हे जलों । इस भस्म को जलों में धारण करो जैसे कि मैया पुत्र को धारण करती है ।। ३६॥ 'अपस्वग्ने सधिष्टयसौंपधीर रुद्धपसे । गर्भ सजायमे पुनः ॥ ३६॥ इसका विरूप मा, निवृ• गा ०, अग्नि देवता है । मंत्रार्थ-(भाने, अप्स, सब, संधिः, सः, भोपधी:, भनुरुध्यसे, गर्भ, सन, पुनः, जायसे) हे मानीभूत अाने ! जलों में तुम्हारा स्थान है, वहीं भस्म जल से प्रकट होकर यवादि रूप को माप्त होते हो, 'अरणी के मध्य में होते हुए फिर प्रकट होते हो । ३६ ।। गशी अस्पोपीनारों घनस्पतीनाम् । गों विश्वस्य भूतस्पाग्ने गौ अपामसि ।। ३७ ॥ इसका विरूप प्रा० भुरिगाप्यु० ई० अग्नि देवता है मंपि- (भाने, प्रोपधीनाम्, गर्भः, अति, घनस्पतीनाम्, गर्भ: विश्वस्त भूतस्य, गर्भ:, अपां, गर्भः असि.) हे अग्ने ! तुम बोधियों के गर्भ हो, घनस्पतियों के गर्भ हो, सम्पूर्ण माणियोंके गर्म हो सम्पूर्ण सलोंके गर्म हो । ३७ ॥ "पुसा भस्मना योनिमपर्थ पृथिवीमग्ने । मधे सुष्प मातृमिवज्योतिष्मान पुनरासंदः ॥८॥ - इसका विरुप प्रा० निदाय ९० अग्नि देवता है मंत्रार्थ- (भग्ने, त्वं, भस्मना, योनिम् पृथिवीं, च,अपः, मसय, मातृभिः संसृज्य, ज्योतिष्मान, पुनः भासदः ) हे अग्ने !तुम भस्मद्वारा १२ अध्याय । -- कारण मून पृथ्वीको और जलोंको.माप्त होकर मासारूप जलोंसे सम्मिलत हो.रोजस्वी होकर फिर उखामें स्थित हूजिये ।। ३०॥ : - पुनरास सदनमपश्च पृथिवीमग्ने । शेपें मातु: ., र्यथोपस्थेन्तरस्याशिवतमः ।। ३९ ।। इसका विरूप १०. निवृदनु० ई० अग्नि देवता है। मंत्रार्य- (अग्ने, शिवरामः, अपः, च, पृथ्वीम्, सदन, पासथ, पुनः अस्यां अन्तः, शेप, यथा, मातुः उपस्ये) हे अग्ने ! पति कल्याणम्प तुम जल और पृथ्वी के स्थान को प्राप्त होकर फिर इस उखा के मध्यम शपन करो हो जैसे कि माताकी. गोदी में बालक सोताहै ३९ पुनर्जा निर्वत्तस्य पुनरग्न पाथुपा पुननि:: पाह्य हसः ॥ ४॥ सहाय्या निवस्वाग्ने पिन्वस्व.धारयो । विश्व न्या विश्वतस्परि॥ ४५ ॥.. ... ... ..... इन (४० | ११:) दोनों की व्याख्या होचुकी है... :, चोर्धा मे अस्य वचसो यपिष्ठ महिष्ठस्य पूभृतस्य स्वधावः । पीयति यो अनु त्यो गृ- जाति बन्दारष्टे तन्वं बन्दे अग्ने । ४२ ॥ इसका दीर्घतमा प्रापि है, विरादापी त्रि०ई०, अग्नि दे है। मंत्रार्थ-(स्वधावः, यविष्ठ, अग्ने, मे, अस्य, मंहिष्ठस्य, मभृतस्य, वचसः, बोधः, स्वः, पीयति, त्वः, अनुगृणाति, बन्दासः, ते, तन्वम्, वन्दे ) हे धनवान् । श्रेष्ठ युवाका भरने, मेरे इस महान् ' बारम्बार कथन करने से श्रवणपय को प्राप्तहुए वचन के अभिपाय को जानो, कोई तुम्हारी निन्दा करे कोई एक पुरुप तुम्हारी स्तुति कर यह मनुष्यों का स्वभाव है, परन्तु स्तुति करने के स्वभाववाला मैं तुम्हारे शरीर को प्रणाम करता हूं ॥.४२ ॥ स पोधि सूरिर्मघा पसुपते वसुंदावन् । युयो- यमद्वेपासि विश्वकर्मणे स्वाहा ॥ १३ ॥ इस कं० में मंत्र है, सबका सोमाहुषि ऋ० है । ई०-निः । *. " - . शुक्लयजुर्वेद। दार्षी गा०, २ याजुभयुपिणक, और देवता सबका अग्नि है। मंत्रा-विमुपसे, वमुदायन, सा, हरिः, मघवा, बोधि,देवासि, अस्मत्ता, युयोधि, विश्वकर्मणे, स्वाहा ) हे धनपते । धनके दाता माने ! यह तुम सबके ज्ञाता धनयुक्त हो हमारे भाभिमाय को जानो भाप सन्तुष्ट होकर दुर्भागों को हमसे पृथक करो, जगत् की सृष्टि, स्थिति आदि कर्म करनेवाले तुम्हारे निमित्त भरिम में माहुत यह हवि भलीमकार गृहीत हो । ४३ ॥ पुर्नस्त्वाद्वित्या रुद्रा घसंवः सन्धिताम्पुन.. : प्राणों वसुनीष यज्ञैः ! घृतेन त्वन्तन्वं वर्सयत सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः ।। १४ ॥ इसका सोमाहुति ० स्वराडापा त्रिगुप छन्द अग्नि देवसा है मंत्रार्थ हे भग्ने ! (वमुनीय, श्रादित्याः, रुद्राः; वसवः, त्या, पुनः, समिन्धसाम, प्रमाणः, यज्ञैः, पुनः, त्वं, घृतेन, सन्वं, वर्ष- यस्व, यजमानस्य कामाः, सत्याः, सासु) धन के निमित्त स्तुति वाले हे देव ! मादित्यगण, रुद्रगण, वगण तुमको फिर प्रदीप्त ' करें, हे धननेता ! ऋविन्यजमान या करके फिर तुमको प्रदी करें, तुम घृत के द्वारा शरीरको बढ़ाभो तुम्हारे होगको प्राप्त होने में यजमानके मनोरथ सफल हो ॥ १४॥ अन चीन पि च सर्पता ये स्थ पुराणा पेच नुतनाः । अदायमो बसानम्पृथिष्पा अक्र- ...न्निमम्पितरी लोकर्मस्मै ॥ १५ ॥ -इसका सोमाहुति ऋ० निचंदापी पि००बिलोक देवता'. है । मन्त्रार्थ-हें यमभृत्यगण ! (ये, पुराणाः, च, ये, नेतना, भत्रस्प, अता, अपेत, घीत, च, विसर्पत, यमः, पृषिव्याः, अव- सान, सदाव, पितरः इम लोके, भस्म, अक्रन) जो पुराने और मो नये तुम इस स्थान में हो, वह तुम यहांसे दूर चलेजायो प्रति दूरही संघात स्यागकर अनेक स्थानों में चलेजायो, यमने पृथ्वीका अवकाश इस मनमानके निमित्त दिवाई, पितरोने इस लोकको . - .
११२ अध्याय । -- यजमानके मिमित करियम कियाई ।। ४५॥ संज्ञानमति फामरणम्मपि ते कामधरणं भू. यात् । आने स्मास्यग्नो पुरीयममि चितस्स . :- परिचितं चितः अयध्यम् ।। ४६॥ इस कं० में : मं० हैं। सबका सोमाहुति ० है।९०१ सा० पं. २ मा. पं० ३ प्रा.णि और देवता १ उखं २ सिकता, ३ परिधित हैं। मंगाप--हे उपास्वा ! तुम (संज्ञानम्, असि, कामधरणं, रो, कामधरणं, मषि, भूयात् ) पशुओं के मम्पक शान के साधन हो, सपा यनद्वारा मनोय सम्पादन करनेवाल हो, इस कारण तुम से मार्थना करी है कि तुम्हारी मनोरथ स. पादनकी सामर्थ मुझयममानमें हो। ई सिकता ! तुम (भग्गे, भस्म, पति, भग्मः, पुपम् ) भग्निकी भस्म हो, भन्निके पूरण करने पाले हो । (रारा, चिराः, परिचितः, स्य, भयध्वम्) परिभिरा गण ! तुम भूमिपर दालेहुए सब मोर स्थापित हो, अर्ध में स्पापिस तुम इस गाईपत्य स्थानको सेवन करो ॥ ४६॥ पतो अग्निर्यस्मिन्सोमामिन्द्रः एतन्दधे जठरें घायशानः। महस्रियं याजमत्यन्न ससिंध समयानरस्तूंपस जातवेदः ।। ४७ ।। इसका विश्वामिन मृ० है, भापी नि० २०, भग्नि दे० है । मंत्रार्थ (सा, मयं, मग्निः, यस्मिन, वावशानः, इन्द्रः, सुगम्, सहमियम, पागं, प्रत्पम्, न, सप्ति सोम, जठरे, पत्ते,जातवेदः,. ससरान्, सन, स्तूपसे ) वह यह भग्नि है, जिस पग्निचयन में इच्छा करने वाले इन्द्रो, मभिपर किए सदनों के योग्य अन्न की समान भक्षण करने में मदन करनेवाले हर्षकारक दृप्तिकारक सोमको उदर धारण किया, हे अगि ! तुमभी हवियों को भत्तण करते हुए मीत्वा यजमानों से स्तुतिको माप्त होतेहो ॥ १७॥ मम्मे यत्तं टिपि.बः पृधिव्यां पदोपयात- स्यार्यजत्र । पेनान्तरिक्षमाततन्य स्खेपः स. - शुक्लयजुषद। भानुरर्णगे नृचक्षाः ॥ १८॥ इसका विश्वामित्र , भुरिगापर्षी पं० छं० अग्नि दे०है। मंत्रा--(भायजनं, अग्न, से, यत्, दिवि, वर्षः, यत्, पृथिव्या, मओषधीष, अप्सु, येन, उरु, अन्तरिक्ष, याततन्य, 'सः, स्वेषः, धर्णवः, नृपक्षाः, भानुः) मर्यादासे यजनयोग्य हे अग्निदेव । तुम्हारी जो चुलोक में सूर्यरूप ज्योतिहै भो भोममें श्रीरमा ओषधियों में भास्कर रूप, जलोंमें ममारूप ज्योति है, जिसने विद्युत् रूपसे बड़े अन्तरिक्ष लोकको व्यास कियाई वह विश्व प्रकाशक सब भोर गमनशील मनुष्यों के शुभाशुभ कर्मका द्रष्टा, सूर्पकप दीप्ति है पैसे तुम महा नारायणस्वरूपहो ॥ १८॥ अग्ने हियो अर्णमा जिगास्पच्छ देवा चिप्ले धिष्ण्या योया रोचने पुरस्मात्सूर्यस्य याश्चावस्तादुपतिष्ठन्त आपः॥ ४९ ॥ इसका विश्वामित्र ऋषि है, मुरिगापी पं० ई०. भग्नि देवता है । मप्रार्थ-(भग्ने, दिवः, अर्णम्, भच्छ, जिगासि ) हे अग्नि देवता ! (लोक सम्बन्धी जलको अभिमुखसे माप्त करते हो (ये, विष्याः, चिपे, देवान्, मच्छ. पा रोचने, सर्पस्य, परस्ताव याः, मापः, च, अवस्तात्, याः, उपतिष्टन्ते ) जो बुदि इन्द्रियों के मेरक प्राण कहते हैं उन माणरूप देवताओं के मात, सन्मुख - गमन करते हो, दीप्तिरूप मण्डल में वर्तमान सूर्यके ऊपर जो जल "है और नीचेजो जलउन सबके मध्यमें तुम विराजमान हो 'आशय यह कि तुमही इन रूपों को धारण करते हो ॥ ४९ ॥ पुष्पासो अग्नयः प्रामणेभिः सजोषसः । जपन्ती यज्ञमट्टोनमीक्षा इषों महीः ॥ ५० ॥ इसका विश्वामित्र भू०, भाषी पं० ई० है, भग्नि देवता है। मंत्रार्थ-पुरीप्यासः, मावणेभिः, सजोपसः, भद्रुः, अग्नयः, यक्षम्, मनमीनाः, मही:, इपः, जुपन्ताम् ) पशुओं के हितकारी मनों से मीतियुक्त हिंसा न करनेवाले अग्नि इस इष्टकारुप यज्ञ .
४१२ अध्याय। - को क्षुधा कृष्णा निवर्तक बहुस अन्नयुक्त को सेवन करो ॥५॥ इडामग्ने पुमदास मनिहोः शश्वत्तमय ह। मानाय साध । स्थानः सूनुस्तनयो विजावाग्ने साते सुमति त्यस्मे ॥२१॥ इसका विश्वामित्र मा०, मुरिगापी पं० छं०, अग्नि दे० है। मंत्रा-(अग्ने, पुरुदसम्, इडाम्, शश्वत्तमम्, गो, सनिम्, हवमामाय, साध, नः, विजाया, पनयः, सूनुः, स्पात, अग्ने, सा, से, मुमसिः, भस्मे, भूतु ) हे अग्ने ! बहुत कर्मों के साधनरूप अन्न को, निरनता विद्यमान धेनु सम्बन्धी दान को अर्थात् दूष दही घृतादि को हवन करनेवाले यजमान के निमित्त सम्पादन करो पर्याद दो, हमारे प्रभावान औरस पुत्र हो, हे अरने ! पह तुम्हारी भन्न गौ पुत्रदान के विषय की मन्दर बुद्धि इममें हो॥५१॥ अयन्ते योनि ऋत्वियोयतो जातो अरोधात तानन्ग्न आरोहा नो पईया रयिम् ॥५२॥ इस मंत्र की व्याख्या १०३ क०१४ में होगई ॥५२॥ चिदमि तया देवतयानियस्वद् धुषा सौंद । परिचिंदामि तया देवतयोगिरस्पद ध्रुघासीद।।५।। इसका विश्वामित्र १० है स्वरानुष्टुर छ० है, अग्नि देवसाहै। मंत्रार्थ-है इष्टके ! तुम (चित, असि, गया, देवराया, महिरस्वत प्रवासीद) स्थापित की हुई हो उस मसिद्ध बाकरूप देवसाद्वारा स्थापित होकर शगिरा की समान दता पूर्वक इस स्थानमें स्थित- होमो हे इष्टके ! (परिचर, श्रीस, तया,देवतया भनिरस्वर, ध्रुवा सीद) सब ओर से भोगों को चयन करनेवाली हो उस मसिद्ध पाकप देवता द्वारा सम्पादित हुई, अङ्गिराकी समान दीर्घ काल तक निश्चल इस स्थान में स्थित होथो ॥ ५३॥ लोकम्पृणच्छुिद्रम्पृणांथो सीह ध्रुवा स्वम् । - न्ट्राग्नी त्या वृहस्पतिरस्मिन्पोनावतीपदान ।।५।। , इसका विश्वामिन ऋ०, विराडनु छ, अग्नि दे० है । हे .
- ए '३४० शुक्लयजुर्षद। इष्टके ! (त्वम, लोकम्, पृण, चिद्रन, पृण, अयो, धुवा, सीद) तुम गाईपत्य चपन स्थानमें पूर्व इष्टकामोंसे मनाक्रान्त होकर स्थानको पूर्णकरो और दृढ़ होकर- स्थितहोमो (इन्द्राग्नी, गृह- सतिः, अस्मिन्, योनौ, त्वा, मासीपदन् ) इन्द्र देवता अग्नि देघसा और वृहस्पति देवताने इस स्थानमें तुमको स्थापन किया है। ता.अस्य मुददोहसःसोम श्रीणन्ति प्रश्नयः। जन्मन्देयानां विशस्विचारोचने दिवः ।।५।। इसका प्रियमेधा मा. विराउनु छ, श्राप दे० है । मंशाप (दिवः, प्रश्नया, मददोहसः, ता, देवानां, जन्मम्. मिपु, भारो- भने, यस्य, विशः, सोम, धाश्रीणन्ति) पुलोक सम्बन्ध भनेक मकार के जल और मनसे संयुक्त वे प्रसिद्ध जल देवसामों के जन्मवाल सम्बत्सरमें सीन संबनों के मध्य में इस यन सम्बन्धी सोमको सम्यक मकार से परिपक्व करते हैं ॥ ५५ ॥ । इन्दं : पियो अचीवन्समुद्रव्यचमतिरा ! । स्थीराम धीनां घाजाना, सत्पलिम्पतिम् ॥५६॥ इसका सुरात मधुच्छन्द ऋ०, ०, नि० नु० छं० इन्द्र देवता है। मंत्रार्थ-(विसा; गिरा, समद्रव्यचसम्, रयीनाम, रपीसमम्। पानिनाम्, पति, सत्पसि, इन्द्रम, भवीधन ) सम्पूर्ण प्राक यजुः सामरूप स्तुति, समुद्रवत् व्यापक सब रपियों के मध्य में भस्या रथी अन्नों के पति निजधर्म में रहनेवालों के पालक इन्द्र को पर्षित करती है।॥ ५६ ॥ समित सकल्पेया सम्मियौ रोचिष्णू सुम- नस्पमानौ । इपमूज भिमसानी ॥ ५७ ॥ इसका मधुच्छन्द ऋ०, भुरिगुटिणक ई० अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- सम्पियी, रोचिए, सुमनस्यमानौ, इप, ऊउनम्। अभिसंवसानी, समिनम् सपेयाम ) समान प्रीशिवाले कानि मान परसर श्रेष्ट चित्तवाले हे उखा और चितिक अग्निदेवताओं अन्य घृतादे रसको भोग करते हुए अर्याद हमारे दियेहुए मन्न [१२ अध्याय। और रस को स्वीकार करते हुए एक मन होकर मिलो एक संकल्प होमो ॥ ५७ ॥ सं वाम्मनासि संग्रता समुचितान्याकरम् । अग्नै पुरीप्याधिपा भव स्वन्न इपमूर्ज पज- मानाय धेहि ।। ५८ ॥ इसका मधुच्छन्द • भुरिगुपरिष्टा यही छन्द माग्नि देषता है । मन्त्रार्थ-दोनों भग्नियों ! ( वाम, मनांति, समाफरम, मता, सम्, चिसानि, सम्, उ, पुरीय, भग्ने, त्वं, मः अधिपार, भय, इपम्. अर्जम, यजमानाय, धेहि ) तुम्हारे मन सब मकार संगस करता हूं, व्रत संगत करता हूं, मनोगरा संस्कारों को संगत करता है, और है पशुसम्बन्धी गृहस्थकार्यसाधक अग्निदेव । सुम हमारे अधिपति हो भन्न चल यजमान के निमित्त पदानकरो५८ आने त्वं पुरीप्यो रयिमान्पुटिमा जति । शिवाःत्या दिशः सर्वाःखं योनिमिहासदः॥५॥ इसका मधुचन्दा १० मुरिगुष्णिक छं०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(भग्ने, त्वं, पुरीप्यः, रयिमान, पुष्टिमान, श्रास, सर्वाः दिशः, शिपा, कस्वा, इद, स्व, योनिम्,भासदः) हे अग्नि देवता सुम पशुसम्बन्धी पशुहितकारक धनवान् मुष्टियुक्त हो, सुम्हारे मसाद से हम पुष्टि भौर ऐश्वर्यलाभ करें, सब दिशायें कन्यण कारक करके यहां अपने स्थान में स्थितहो ।। ५९ ॥ भयतन्नः समनमा सचेतसा वरेपसी। मा यज्ञ दिवासिष्ठ मा यज्ञपत्तिसातवेदसी शिपी भेषतमद्य नः ॥६० ॥ इसका मधुच्छन्दा प्रा० मापी पं० छ० अग्नि देवता है। इस मंत्रकी व्याख्या ५ अध्यायके तीसरे मंत्रमें होचुकी है।॥ ६ ॥ मासेय पुत्रम्पृथिवी पुरीप्यमग्नि, स्वे योना. यभारुण्या ( तां विश्वरतुभिः संविधाना, प्रजापतिर्विश्वकर्मा विमुन्चतु ॥६॥ . . . - . १४२ शुक्लपजुद। इसका मधुच्छन्दा ऋ० पापी त्रि०ई० उखा देवता है मंप्रार्थ (पृथिवी, उखा, पुरीप्यम्, भनि, स्खे, योनी, अमाः, मावा, पुण, इव, विश्वैः देवैः ऋतुभिः, सीवदानः, विश्वकर्मा, मजापतिः ताम्, विमुञ्चतु ) भामरूप मृत्तिकानिर्मित एखा पशुओंके हित. कारी प्रदिनको भपने गर्भस्थानमें धारण करती हुई, मैया पुत्रको असे धारण करती है, सम्पूर्ण देवतामों और ऋतुओं द्वारा एक मसको माप्तहुए, थहो । उखाने महद कर्म किया इसप्रकार संवाद करते हुए मुष्टि के निर्माता प्रजापति इस उखाको शिक्य पाश से विमुक्त करो ॥ ६१॥ भमन्यन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्यत्यामा यहि . तस्करस्प | अन्यमस्मदिच्छ सात इत्यानमों देखि निरने तुभ्यमस्तु ।। ६२ ।। इसका मधुरभन्दा १० नि नि निसि देवता है, मन्त्रा हे नि ! [ अलक्ष्मी ] ( भान्वनराम्, अयजमानम्, छ। स्रोनस्य, तस्करस्य.. इत्याम्, भन्विाह, भस्मत, अन्यं, इच्छ, सा, रो, इत्या, देवि, तुभ्यम्, नमः, मस्तु ) सोमयाग न करने वाले हचि मादि से किसीमकार चैदिक कर्म न करगेवाले पुरुषों को संगति की परछाकर पोरकी प्रकट चोरकी गतिको मात्र हो हमसे अन्य पुरुषकी इच्छाकर वही दुष्टशिक्षा तेरी गति है । हे देवी! रेनिमित्त नमस्कार हो ॥१२॥ नमः सुते निभईते तिग्मजोयस्मयं पिता धन्धमेतम् । यमेन त्वं, गुम्या सैविद्वानोत्तमे नाके अधिरोहयैनम् ॥ १३ ॥ इमका मधुच्छन्दा ऋ०, भुरि० ५०० निति देता है। मन्त्रार्थ-( सिग्मोजा, निर्भसे, रो, मु. नमः, अयस्मयम्, एतम्। वन्धनम्, भाविचम, यमेम, यम्या, सम्बिदाना, एमम, उत्तम नाके, अधिरोहय ) दे तीक्ष्ण वाले ? घोर कररूप निसे, तुम्हारे निमित निरन्तर नमस्कार है, लोहपाशी समान , .
१२ अध्याय ३४३ - . . इस जन्म मरणम्प प्रज्ञानको छेदन करो, और परिन पृथ्वीके साथ एक मसको माप्त होकर, इस यजमानको उत्कृष्ट स्वर्गलोक में स्थापन करो।। ६३ ॥ संस्थास्ते घोर आमजुहोम्येपाम्यन्धानामय सनाय । यान्त्वा जनो भूमिरिति प्रमन्दसे नितिन्याहम्परियेट विश्वतः ॥ १४ ॥ इसका मधुच्छन्दा प्रा० भाविक छ. निर्भसि देवता है। मंत्रार्य-(घोरे, पपा, पन्धानाम्, अयसनमाय, याया, रो, थासन् नुहोमि, मनः, यां, स्वा, भूमिः, इशि, प्रमन्दरी, मई, स्वा, दि. श्वसः, नितम्, परिषेद) हे विषमशील मररूपा, निति देवी इम यजमानों के स्वर्गमाप्ति के मशिवन्धक पारों को नाशके म उस तुम्हारे मुखमें पाहुति की समान इटका को धारण करता हूं, मनुष्यमात्र जिस वुझको भूमि है, इसपकार शास्त्राभिक्ष होने से स्तुति कररो हैं, मैं तो शास्त्रशानसे तुझको सपमकार निर्मति देषी ही नामता हूं ॥ ६ ॥ यन्त देवी नितिराद्ययन्ध पार्शप्राधास्वधि- चस्यम् । सन्ते चिप्याम्पायुणो न मसादधेत- पितुमति प्रसृतः । नमो भूत्यै येदश्चकारं ॥६॥ इस कं० में २ मंत्र है। सबका मधुच्छन्दा ० छ. १ निय पं० २ एकप० वि० और देवता १ यजमान २ भूति है । मन्त्रा है यजमान ! (मिति:देवी, रो, प्रविास, यम्, भषिचत्यम्, पाशं, ' आघबन्ध, रो, ते, मायुपः, मध्यात्, न, विप्यामि ) निसि देवी ने तुम्हारी ग्रीवामें जो दृढ़ छेदनके अयोग्य पाशको बाँधा था उस को तुम्हारी अग्निके मध्य इसी समय दूर करता हूं(भप प्रमः एतम, पिवुम, भद्धि) पाशविमोचन के मनन्तर निर्गतिकी अनुज्ञा को प्राप्त हो, इस रक्षा करनेवाले अन्नको हे यजमान ! * भक्षण को ( या, इंदं, चकार, भूत्यै, नमः) जिस देवीके प्रसाद से यह समस किया सम्पन्न हुई उस ऐश्वर्य रूप देषी के निमित्त ३४४ शुक्लयजुर्वेद । नमस्कार है ।। ६५॥ निवेशनः समनो वसूनां विश्वा पाभिचष्टे शचीभिः । देव इव सबिता अत्यधर्मेन्द्रो न तस्यौ समरे पंधीनाम् ।। ६७ ॥ इसका विश्वावसु ऋ०, वि०नि० छ०, अग्निदेवता है। मंत्रार्थ-( निवेशनः, घमना; संगमनः, सत्यधर्माः, शचीभिः, विश्वा, रूपा, भभिचष्टे, सवितादेवा, इच, पपीना, समरे, सस्थी, इन्द्रोन ) स्वगृहमें यजमानका स्थापक धनोंका मापक अपश्य होने पाले फल से युक्त अग्निहोत्रादि लक्षण से युक्त अग्नि अपने माने कर्मोंसे संयुक सम्पूर्ण माहवनीय असिप्रणीता भाग्नीध्र धिष्ण्यादिरूपों को प्रकाश करता है सविता देव साकी समान मका- शक होकर शभुओं के साथ युद्धमें स्थित हुया जिसमकार इन्द्र युद्ध में स्थित होता है ॥६६॥ सीरा पुञ्जन्ति फवपो युगा वितन्वते पृथक् । धीरा देवेषु सुम्नपा ।। ६७ ॥ इसका सोमपुत्र बुध १०, गायत्री ई०, सीर देवया है। मंत्रा (धीराः, कवयः, देवेषु, मुम्नया, सीराः, युघ्नति, युगा, पृषा वितन्वते ) घुद्धिमान भाग्न विया में कुशन कपिकर्म के मर्म को जाननेवाले विद्वान देवलोक में मुख प्राप्त करने को इलों का वैलों से योग करते हैं, युगोंको मिन्न २ विस्तार करते हैं । ६७ ।। गुनक धीरा वियुगातनुध्वंकृते योनी धपतह पीजम् ।गिरा पशुटिसग मसन्नो नेदीय इत्सण्यः पक्यमेपोत् ॥ १८॥.. इस का सोमपुत्र बुध प्रापि, विराडापी नि० छ०, सीर दे० है । मन्त्रार्प-हे कर्षकगणों (सीरा, युनक्त, युगा, वितनुपए कसे, ह, योनी, गिरा, च, चीजम्, वपस, श्रुष्टिः, सभरा असता पक्षम् इद मृएयः नः नेदीया यात्.) हलोको जोहो हलके जुप शम्या और यो प्रादि से विस्तार करो कपणसे संस्कार :
१२ अध्याय । करने पर इस स्थान में "या औषधी: पूर्वा• १५ क." यह मंत्रपाठ करकै और चमस द्वारा संस्कृत ग्रीहिमादि वीभको पोमो मन्न समूह नीदि आदि फलादि सहित वर्तमान होकर पुष्ट हो, पकेहुए धान्यको मल्लकाल में ही दरांती से काटकर हमारे प्रति- समीप घरमें मातफरों ॥ ६८।। शन मुफाला विकृपन्तु भूमि शुनकीनाशा अभियन्तु बाहैः शुनासीरा हुचिता तोशमाना सुपिपुला ओपंधी फतनास्मे ।। ६९ ॥ इसका कुमार हारीत ऋ. त्रिगुप् छन्द सीता देवता है मंत्राथ- (सुफालाः, भूमि, शुनम्, विकृपन्तु, कीनाशाः, बाहै:, शुभम्, अभियन्तु, शनासीरा, हविपा, तोपमाना:, अस्मे, प्रोपधी, मुपि. पलाः, कर्तन ) हे सुन्दर फलयाले हलों! सुम पृथ्वी को सुख पूर्वक जीतो, हलवाले मनुष्य पभादके संग मुखपूर्वक गमन करें वायु मादित्य दोनों देवताओं ! जलसे भूमिको सींचो हुप हमारी प्रोपधियों को सुन्दर फलवाली कर्तन करो ॥ १९ ॥ घुतेन सीता मधुना समग्यतां विश्वैरमप्ता मरुद्भिः । अस्पती पर्यमा पिन्व॑मानास्मा- न्सीते पर्यमाभ्यायवृत्स्व ।। ७० ॥ इसका कुमार हारीत आपी मि० ई० सीता देवता है मंप्रार्थ-(विश्वैः, देवैः, मरुद्भिः, अनुमता, सीता, मधुमा घृतेन, समग्यताम्, सीते, पयसा, पिन्वानाः, पयसा, अस्मान, अभ्या- चस्व ) सम्पूर्ण देवतागण मरुतगणों से अंगीकार कीहुई इल की फॉल मधुर घृत अर्थात् अमृतमय जलसे सिंचित हो, 'परोक्ष से कहकर गत्यक्ष कहते हैं। हे फाल ! ऊर्जस्वती भगवान तुम पय दही घृतादि से दिशाओं को पूर्ण करतीहुई दुग्धादि से हम को सबमकार अनुकूल हो और क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण औषधी अमृत जलसे परिपुष्ट होकर सनेज हो इसकारण तुम अमृत जल संग्रह पूर्वक इमारी और अनुकूल हो ।॥ ७० ॥ .
३४९ शुक्लयजुर्वेद । छालं पारपत्रमुशेष सोमपित्तनात पति गामषिकर्व्यञ्च पीवरीम्मस्थापन भधानम् ॥ ७१ ।। इसका कुमार हारीव प्र०, विराट् पं० छ० सीता देवता है। 'ममा-(सन्, पनीरवत, सुशेवं. सोमपित्सहा, लाल प्रकर्षम् अत्रि, पीवरीम्, गां, च, प्रस्थावत्, स्थवाहनम्, उपसि ) पर पूर्वोक्त फाल संयुक्त मुखकारक यजमान मिमित्त भूमिका खोदने पाला हल अति पेगवान् छाग स्थूल पुष्ट श्रृंगवाली गौ और गमन में समर्थ रथवाहक प्रवादिको प्राप्त कराता है ।। ७१।। कामकामदुधे धुक्ष्व मित्राय चरुणाय च । इन्द्रा- पाश्विभ्यां पूष्णे मुजाभ्य ओषधीभ्या ।। ७२ ॥ इसका कुमार हारीत ऋ०, विराहनु०६० सीसा देवता है। मंप्रार्थ-(कामदुघे, मित्राप, वरुणाय, इन्द्राय, भाश्वभ्या, पुणे, प्रमाभ्यः, घ, भोपधीभ्यः, कामम् धुत्व) हे मनोरथ पूरक सीते! मित्र वरुण इन्द्र दोनों भारवनीकुमार प्रपा प्रजामों के भोगार्थ और भौषधियों के निमित्त अपेक्षित भोगको सम्मादम करो ७२ पिम्पयधमन्या देवपाना अन्म तमस- स्पारमस्प ज्योतिरापाम-॥७३ ।। इसका कुमार हारीस ऋ० है, भुरिगा० गा० ई. सृषम थे. है। मंत्रार्थ-(देव यामाः, अध्या विमुच्यध्वम्, भस्य, तमस, पार, भगन्म, ज्योतिः, श्रापाम) हे देवतामों के निमित्त कर्म करने वाले मारने के प्रयोग्य गोरलीवर्दादि जगतकी स्थिति के हेतु कृषिको सम्पादन करो युगसे पृथक् हो तुमारी पासे इम इस क्षधापिपासा से उत्पन्न हुए दुःखके पारको प्राप्त हुए परमात्मारूप को प्राप्तहुए ॥७३ ।। मजूरन्दो अपोतिः सपा अरुणीभिः । म. जोपमावृदिषना दरसोभिा मजूः सूर एतशेन । मवानर इंडिया प्रतेन स्वाहा ॥ ७ ॥ 4
'१२ अध्याय।
इसका कुमार हारी १० मालधनुष ई. हिमोक्त।
मंत्रार्थ ( भन्दः, भयरोमिः, समः, उषा, भरणीमिः, सनः
अश्विनी दंसोभिः, सजोषसौ, सूरा, पराशेन, सना, वैश्वानर,
श्या, सेन, सनः, स्वाहा ) संपत्सर नलों का दाता अश्या
मास मधुमासके सहित मीसियुक्त, पास: फालके अधिष्ठात्री देवता
उषा परुण पर्ण वासी गौओंसे मीसियुक्त, अश्विनी कुमार पिकि-
रसादि कर्मों से मीसियुक्त, सूर्य घोड़े से प्रीतियुक्त, वैश्वानर
भग्नि पृथ्वीसे घृससे गीशियुक्त हैं इन देवताओंके मिमिच.
श्रेष्ठ होम हो ॥ ७४॥
पाओषधीः पूची जाता देम्पस्त्रियुगम्पुरा ।
मनैनु धVणामह शातन्धामानि सप्त च ।।५।।
इसका भिषगृषि, अनुष्टु छ० भोपधि देवसा है। महार्य (पुरा
या पूर्व, मोषधी:, देवेभ्यः, त्रियुगम्, मासा, पणाम्. शत,
प, सप्तधामानि, धामानि मई, मनेनु) मुष्टिकी भादि में जो
पहले भोषधी ऋतुओं के द्वारा वसन्त वर्षा और शाद मासु में
उत्पन्न हुई हैं, मगर की उत्पत्ति पालन में समर्प और पाक से
पाली हुई मौषधियों के विशेषकर सौ सौ और मामान्यतः श्रीहि
गोधूमादि सास नाम में जानलाई ।। ७५ ।।
शतम्यो अम्ल पामानि सहनमुक्त घो कई:
माधो शतक्रत्वो गूपमिमं में अगदे कूत ॥७॥
इसका भिषगृषि है, अनुष्टुप छ• भोपधप दे० है। मंगाई
भम्म भावः, धामानि, शस, उत, वः, कहा, सहनं, शस्करसो,
गयम्, मे, इम, भादं, कृस) हे माता की समान प्रोषधियो!
सब मकार के तुम्हारे नाम सैरुदों हैं और तुम्हारे भेफर मसंख्यात
हैं, तुम्हारे सत्वसे सब जगत के कार्य होते हैं, इस कारण हे भमन्स-
कर्मधर्फ भोपथियो ! तुम मेरे इस यनमानको क्षुत्पिपासादि,
घमिरोगों से रहिस करो भर्यात् यजमान किसी प्रकार के रोग
से पास नहो ॥ ७ ॥
។ . शुक्लयजुचंद। भोपधी प्रतिमोदय पुष्पवतीः प्रसूरी अन्या इव मुजिपरी रुषः पारमिष्णवः॥७७ ॥ इसका भिपगृपि नि दनु०० मोषधय दे० है । मनार्थ मोषधी, पुष्पवती, मसूबरी:, अश्वाः, इच, सजित्वरी, वीरुधः, पारयिष्णवः प्रतिमोदध्वम् ) हे भोपधीगण ! पुष्पोंसे युक्त फल उत्पन्न करने वाली, घोड़ों की समान वेगसे गमन वाला अनेक प्रकारकी व्याधि निधारण करने वाली, फलपाकान्त के सिवाय बहुत काल तक कर्मपरायण प्रसन्म होमो अश्वकी समान वेगते शीघ्र पुष्पवान फलवान् होयो ॥ ७७॥ ओपधीरिति मातरस्तयों देवीरुपये । सने- यमरवङ्गां वास आत्मानन्तवं पूरुप ॥७॥ इसका भिपग् ऋ० निच्य• छ०, मोषधय दे है। मंत्रार्थ ( मातरः, देवाः, पोपधीः, यः, इति, सत्, उपग्रुबे, पूरुप, राव, अश्वम्, गाम, यासः, भात्मानम्, समेयम् ) हे जगत्की निर्माण करनेवाली, हे दिव्य गुणों से युक्त हे सम्पूर्ण श्रोपधी तुमसे इस भागे कही विधि के द्वारा वह जो हममार्थना करते हैं हे यज्ञपुरुप! आपके प्रसाद से घोड़े गौ वस्त्र रोगरहित शरीर को भोग यह पुरुपसे जो मेरी प्रार्थना है उसे प्रौपधी माने ।। ७८ ॥ अश्वत्थे वो निपटून पूर्ण धौ घमतिष्कृता। भाज इत् किलोसथ यत्मनपंथ पूरुपम् ॥७९॥. इसका भिपग प्रा० अनुष्टुप छ०, भोपय दे० है । मंमार्थ हे भोषधियो। (वा, भवत्य, निपदनम्, वः, पर्णे, वसतिः, कृता, फिल, गोमानः, इव प्रसथ, यत्, पुरुष, सनस्थ ) तुम्हारा पीप- लकाष्टीनीमत्त उपभृत् और बुचपात्र में स्थान है, तुमने पलाश : पनसे बनी हुई जुहू में स्थान किया है, पात्रमें इघि स्थापन करते हैं, दोमके निमित्त इवि जुह में रखते हैं, हे, इविभत भोषधियो । निश्चय करके तुम मादित्य की भजनेवाली ही हो, कारण.कि , . अग्निमें दीहुई माहुरि थादित्यको माप्त होती है । इस कारण तुम १२ अध्याप। ३४९ यामानको अन्नादि से पुएकरो ॥ ७९ ॥ यत्रौषधीः समरमत राजानः समिताविया चिः सलच्यते भियग्रंक्षोहामीवचातनः ॥ ८० ॥ इसका भिषा का है, अनुपुर छ० ओषधि दे० है। मंत्रार्थ (ोपधी:,यत्र,समम्मा, इच, राजानः समितो, सा, रक्षोहा, अमी चधातना; विमा, भियग, उच्यते) हे थोपधियो ! तुम मिस भोपधी करने वाले वैद्यके पास जाती हो, जैसे राजा संग्राम में शत्रुजयको, जाते, वह तुम्हारे भाविविध पुरोडाशक्वाथादि से : रासमरूप रांगोंका नाशक होता है । भौषधी देकर रोगका नार्थ करनेवाला बामगा वैद्य कदाताहै ।। ८० ॥ . अध्यायनी सोमायतीमूर्जयन्तीमुदौजमम् । आपिरिम सर्वा भोपधीरस्मा अरिष्टसातये ।।४॥ -इसका भिपा ,अनुष्टुप् छ०, वैद्य देवता है।मिश्राधि-(परम, अरिष्टनाराये,अश्वावनीम्, सोमावतीम,ऊर्जयन्ती उदोजसम,सची: मोषधीः, श्रा, अवित्सि) इस यजमानको भरिए नाश के निमित्त यादि पशुगण के उपयोगी सोमयाग को , उपयोगी वल माण की समादन करनेवाली रोजःसम्पादक सम्पूर्ण भोपांधयों का सप रकार से जानता हूँ ॥ ८॥ उाछुप्मा ओषधीनां गायो गोष्टाधेिरते । धन सनिष्पन्तीनामात्मानं तप पूरुष ॥८॥ इसका मिपा प्रा०, विरानु० ५०, ओपधय देवता है। मंशाप-(पूरुप,गप,मात्माम, धनम्, समिष्यन्तीनाम्, भोपधीनाम शुष्मा!, उदीरा, इच, गायः गोष्ठात् ) हे यशपुरूष । तुम्हारे शरीर के प्रति धनम्प हघि देने की इच्छा करनेवाली थोपाधियों की सामय प्रकट होती है, जैसे गौ गोठ से मिर्गत होती हैं ।।८२॥ इस्कृतिनर्मि पो माताधों यूयर्थ स्थ निष्कृतीः' .. मीराः पत्रिणी स्थन यंदामपति निष्कृय ।। ८३॥ इसका मिपा पीक निच०ई०, श्रीपय दे० है। मंत्राप-- - " - - शुक्लयजुर्षद। हे भोपधियों ! ( निष्कृतिः,माम, कः, माता, अयो, यूयम, मिक सीस्प, सीराः, पतंत्रिणी, स्वन, भामयति, निष्कप) निष्कृति नामयाती तुम्हारी मासा है और तुम मीच्याधि को दूर करनेवाली हो और अन्न के सहित वर्तमान गमनयुक्त प्रसरण शील हो, इसकारण मनुष्यों में स्यिस रोगका विनाश करो।। ८३॥ अतिविश्षा: परिछा स्तेन इंच जमफ्रमुः । मोषधीःमाचुप्पधुर्यकिञ्च तन्नो रयः ॥८१ ।। इसका भिषा प्र., पिराइनु० छ.,मोपचय देवता है। मंत्रार्य (परिठा, विश्वा, भौषधीः, प्रत्यक्रमुः, इव, स्तेना मम्, सम्वा पद, किच, रयः, मान्यवुः) सब भोर से रोग को दवाकर बैठनेवासी रोगनाशक सम्पूर्ण भौषधियो जब भाक्षिरा होकर देह को व्याप्त करती हैं, जैसे दस्यु गोएको व्याप्त करता है, उससमय शरीर में जो कुछ भी शिरकी व्यथा गुल्म अतिसारादिकप पाप 'को फल है उस सबको नाश करती हैं।। ८४॥ पटिमा घाजपन्नापीईस्त आढघे । आस्मा पक्ष्मस्य नश्यत्ति पुराजीगृतो यथा ॥५॥ इसका भिषटपि, मनुष्टु० २०, औषधि दे है। मंत्रार्य- ('पर पहम् इमाः मोषधी:, वामयन, इस्ते, भादधे, यक्ष्मस्या मारमा, पुरा नश्यति यथाजीवमा ) जिस समय इन पोष- पियोंका पूजन करसाहुमा हाथ में धारण करता हूं, उस समय पक्ष्मा रोग का स्वरूप भक्षण से पहले ही नाशको माप्त होता है मैंस वध के निमित्त लेजाया हुमा भाणी वध से पहले ही अपने को हरा मामला है ॥ ५॥ पस्यौपधीः सर्पयामिंग पपरूः। ततो यक्ष्म विधोधच उग्रो मध्यमशीरिव ।। ८६ ॥ इसका भिषा मा०, भिवृदई मोपाधि है। मंत्रा- (औषधीः, यस्प, भई भई, परूपः, सर्पग, यक्ष्म, विवाघाये, इस, मध्यमशीः, उग्रः, ) हे भोपधियों तुम जिसके मंग .
१३ अध्याप। भंग में ग्रन्थी ग्रन्थी में फैलती हो और यक्ष्मा रोग को वाधा देसी हो जिसमकार देह के मध्यमें मम भागको पाडा देनेघाला उप. रुन युगान्समें त्रिशूल के मध्यभाग से जगतको पीड़ा देता है ८९ माकं यक्ष्म मर्पत चाण किक्टिीपिनामा चात्तस्य धाज्या माकं नश्य निहाकपा ।। ८७।। इसका भिषा प्रा०, वि० नु• ई०, यक्षमा दे० है । मंपार्य- (पक्ष्म, किकिदीपिना, चापेण, साफ, मपरा, पारास्य, ध्राज्या, साक, निहाकपा, साफ, मश्य ) हे व्याधियों तुम कफसे रुके कंठसे उठे शब्दके द्वारा क्रीडा करने याले श्लेष्म रोग और पित्त रोगक साथ गमन करो पात रोगके साप नष्टहोमो सग घेदना से जो रोगीका हाहाकार है उस दुःखके सहिरा गटहोभो । ८७ मन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या उपायत । ताः सर्षाः संविदाना इदं में प्राचता पची॥४८॥.. इसका मिपा ० घिरानुष्टुप छ• प्रोपधय दे. हे माय हे मोपपियो (वा अन्या, भन्याम्, भवतु, भन्या मन्यस्याः उपावस, साः, सर्वाः, संचिदानाः, मे, इदं, पचः, प्रायस) तुम्हारे मध्य में कोई एक भोपधी दूगरी की रक्षाकरे रक्षित हुई कोई दूसरी की रक्षा करने को समीपमा भर्याद योगम पदार्थों से मुम्हारी शक्ति माधकहो, सुम सब परस्पर एकमत होकर मेरे इस मार्थना रूप पचन की रक्षाकरो ॥ ८॥ पाःफलिनीर्या अफला अपुष्पा याच पुप्पिणी:: बृहस्पतिप्रसनास्ता नौ मुञ्चत्वहसः ॥ ८९ ॥ इसका भिपा प्रमु०, विराहनु० छं० भोपधि दे है। मंत्रा' ( याः, फलिनी:, याः अफलाः, अपुष्पाः, च, याः, पुटिपणीः, ताः, सहस्पतिमसूताः, मः, महसः मुञ्चन्तु ) जो औपधी फल वाली जो थोपरी फल रहिव है जो फल रहित हैं और मो. पौषधी फूल वाली हैं ये सब प्रौपधी मजापालक परमात्माकी मेरणा से हमको पापसे छुड़ा ।। ८९ ।। .
. । - शुक्लयजुर्वदा मुम्चन्तु मा शपथ्याधों वरण्याडरा । अथों यमस्य पडवींशात्सर्वस्माइ देपकिस्विपात् ॥२०॥ इसका यन्धु मू०, भुरिगुष्णिक ई० योपधी देयताह । मंत्रार्थ ओपधि (शपथ्यात्, किल्विपात्. अयो, वरुण्यात, उरा, यमस्य, पड्यीशाव, अथो, सर्वस्मात्, एव, मा, मुञ्चन्तु;) शपथके कारण होने वाले पापसे जल क्रीडादिजन्य गलरोगसे,यम सम्बन्धी बन्ध के कारणरूप पारसे सब प्रकार के पापसे देवापराध के कारण होने वाले पापसे मुझको छुढाओ ॥९० ॥ अवपतन्तीरवदन्दिय ओपधगृस्परि । जीप मनाम है न सरप्याति पूरुपः॥ ९१॥ इसका वन्धु १०, अनुगु० छ०, ओपधि दे० है । मंत्रार्थ (दिवः, परि, अपरान्ती, भोपधयः, अवदन्, यम, जीव, अनवामह, सः पुरुषः न रिष्यति ) द्युलोक से भूमिपर मात होती हुई भोषधियों ने कहा, जिस माणी को हम थ्याप्त करती है. यह पुरूप नहीं नष्ट होता ॥९॥ .' या ओषधीः सोमराज्ञीडीः शतपिचक्षणाः । - तासांमसि त्यमुत्तमार कामाय श हुदे ।।१२।। "इसका बन्धु ऋ०, चिराडापर्य० ६०, भोपध दे० है । मंप्राय (याः, सोमराझी, बहनीः, शवविचक्षणाः, योपवीत, तांसाम, स्व, उत्तमा, असि. कामाय, अरं, हृदे शम्) जो सोमपस्ती, भनन्त असंख्यात शुभगुणों से युक-यापधी हैं, उन के मध्य में हे प्रापधी! तुम उत्तम हो, इच्छित के निमिच समर्थ तुम हृदय के निमिरा मुखफारिणी हूजिये ॥ ९ ॥ पा भोपंधीः सोमराजार्षिष्ठिताः पृथिवीमर्नु ।.. वृहस्पतिप्रसूता अस्मै संदत्त वीरयम् ॥ ९३ ॥ इसका पन्धु अ. विरादा० /०, प्रोपधध दे० है । मनाये (याः, सोमराहीः, भोपयः पृथिवीम्, अनु, विष्टियाः, पृहस्पति- भगाः, अस्यै, वीर्यम्: सन्दछ ) जो सोमपत्नी भोपधिय पृथिनी ५ १२ अध्याप। --- , पर नाना प्रकार से स्थित हैं वहस्पति द्वारा प्रेरणाकी हुई औषधी इस हमारी लाई हुई औपधी के निमित्त पराक्रमको दें अर्थात् वार्यसम्पन्न करें ।। ९३ ॥ याइदमुपशुपवति याच दूरं परांगताः। सी संगत्य वीरुधोऽस्यै सन्दत्त वीर्यम् ॥ ९४॥ इसका वन्धु १० विराडनु० छं० ओषधि देवता है। मंत्रार्थ:- (या, उप, च, याः, दूर, परागताः, च, इदं, एवन्ति, पीरुधा, सर्वाः, समात्य, अस्यै, वीर्यम्, सन्दत्त ) जो श्रौषधी समीप स्थित हैं, और जो औषधी हमसे दूर स्थित हैं और इस हमारे वचनको सुनसी हैं, वे तरुजात सम्पूर्ण पोषधी मिलकर हमारी ग्रहण की हुई इस थोपधी में वलको धारण करें ।। ९४ ॥ मा वा रिपत्खनिता यस्मै चाहं खनामि वः । मिपाचतुष्पादस्माक समस्त्वनातरम् ॥ ९ ॥ इसका बन्धु विराडनु० छ, गोपधि देवता है मंगार्थ- हेयोपधियो रोगकी चिकित्सा के निमित तुम्हारी मूलकी भाव- श्यकता है इस निमित्त ( यः, खनिसा, मा, रिपर, यस्मै, वो, अई, खनामि, च, अस्माकम्, ट्रिपान, चप्पात् सर्व, मनातुरम) जो कोई तुमको खनन करता है, वह खनन करने के अपराध से हानिको न माप्त हो, जिस रोगी की चिकित्सा के निमित्त वुमको मैं खनन करता हूं वह भी हानि को माप्त न हो, हमारे सम्बन्धी श्री पुत्रादि द्विपाये और चौपाये सबही रोगरहित हो ॥ १५ ॥ ओषधयः समपदन्त सोमेन मह राज्ञा । पत्म कृणोति ब्राह्मणस्तराजन् पारयामसि ॥९६ ॥ इसका बन्धु ऋ० मिच्य छ, औषधी देवता है । मंमार्थ- राज्ञा, सोमेन, सह, श्रोपधयः, समवदन्त, ब्राह्मणः, यस्म, कृणोशि, राजन्, तम्, पारयामसि ) अपने स्वामी सोमके सहित ओषधिये कहती हुई, ब्राह्मण जिस रोगी के निमित्त हमारे र फल पसे चिकित्सा करता है हे स्वामिन सोम ! उसं -
1
.
३५४
शुक्लयजुर्धेद ।
मनुप्यको हम रोगरहित करती हैं ॥१६॥
नाशयित्री लासस्पार्शस उपचितामासि अर्थों
शतस्य यक्ष्माण पाकारोरमि नाशनी ॥ १७ ॥
इसका वन्धु ऋ०, अनुग्रुप छ०, मोषधी देवता है । मंत्राय-
हे.ओपधी ! (बलासस्य, मर्शसः, उपचिताम्, नाशयित्री, यति
अथो, ससस्य, यक्ष्माणाम्, पाकारां:, नाशनी, पसि )क्षय पर्श
भेदरोग और अनेकों वयथु "मूजन" रलीपद भ्रादि रोगों की
नाश करनेवाली हो, और क्षतादि सैकड़ों रोगों की तथा मुखा.
कादि रोगों की नाश करनेवाली हो ।। ९७।।
त्यान्धर्या अखनस्वामिन्द्रस्त्यां बृहस्पतिः ।
त्वामापधे सोमोराजा घिद्वान यक्ष्मादमुच्यता॥
इसका बन्धु • निच्युदनुपछं० ओपधय देवता है मंत्रार्थ--
(ोपथे, गन्धर्वाः, स्याम्, अखनन, इन्द्रः, त्यो, रहस्पतिः, त्यां
सोमः, राजा. विद्वान्, त्वां, यक्ष्मात, अपुच्यत) हे.अोपधि !
गन्धर्षों मे तुमको खोदा इन्द्रने तुमको खोदा वृहस्पति ने तुमको
खोदा सोम राजा ने तुम्हारी सामर्थ्य जानकर तुमको सेवनकर
यक्ष्मारोगसे मिस्कृति लाभ की तुम्हारे गुणज्ञाता तुमको पाकर
श्रनेकों रोगों से मुक्त हुए ॥९८॥
सहस्य मे अरोतीः सहस्प पृतनायतः। सहस्य
सधैं पाप्मान सह मानास्योपधे ॥९९ ॥
इसका वन्यु ऋपि है, विराडनु० /०, पौषधि दे है। मंत्रार्थ
(ओपधे, सहमाना, असिमे, भरासी, सहस्व, पृतनायराः,सहरवा
सधै, पाप्मानम्, सदस्वं ) हे ओपपि.! तुम शत्रुओं की सिस्कार
करने वाली हो मेरे श्रदानशील शत्रुकी सेनाको शिकार करो,
संग्राम चामे याले शत्रुभोंको जीतो सबभशुभको शिकार करो९९
दीर्घायुस्त ओपधै खमिता यस्मै च स्वा खना-
म्यहम् । अथो त्वं दीर्घायु त्वा शतवल्शा वि.
रोहतात् ॥ १०॥
१२ अध्याय। . - - इसका बन्धु , विराट् यह० छ, भोपधी दे है। मंत्रार्थ (ोपधे, रो,खनिसा,दीर्घायुः, यस्मै,मई, त्वाम् खनामि,च,भयो, स्वं, दीर्घायुः, भूत्वा, शराबल्शा, पिरोहात्) हे मोपी ! तुम्हारा करने वाला दीर्घायु हो. जिस रोगी के निमित्त मैं तुमको खनन खनन करूं वह भी दीर्घायु हो और तुम भी दीर्घायु होकर सैकड़ों अंकुरवाली होकर वृद्धिको माप्त होभो ॥ १० ॥ स्वमुत्तमास्योप तय वृक्षा उपस्तयः । उपस्ति- रंस्तु सोस्माकं यो अस्मां अभिदासति ॥ १० ॥ सबका वन्यु ऋ०, निच० ६०, थोपधि देवता है। मंत्रार्य- (श्रोपधे, त्वं, उत्तमा असि, वृक्षा, 7व, उपस्तयः, यः, अस्मानः अभिदाससि, सः, अस्माकं, उपस्तिः, अस्तु ) हे ओपधी ! तुम श्रेष्टहो, तुम्हारे निकटके शाल, ताल समालादि पक्ष तुम्हारे समीप में स्थित होकर उपद्रव निवारण कर छायादि द्वारा उपकार करते है, जो हमसे चिरकालतक ट्रेप कररहा है वह हमारे अनुगतको १०१ मा मां हि सीजनिता. यः पृथिव्या' यो वा दि प्रत्यधर्मा व्यानंद यश्चापश्चन्द्राः प्रयुमो जजान कस्मै देवार्य हुयिया विधेम ।। १०२ ॥ इसका हिरण्यगर्भ ० नि. नि० छ• मजापरि देवता है। मंत्रार्थ-( यः, पृथिव्याः, जनिता या, सत्यधर्मा, दिवं व्यान, चं, यः, प्रथमः, आपश्चन्द्राः,जजान, प्रथमः, मा, मा, हिंसीत्, कस्मै, देवाय, इविपा; विधेम ) जो मजापति पृथिवी का उत्पन्न करनेवाला है, जो सत्य को धारण करनेवाला द्युलोक को सृजन कर चुका है और जो आदियुरुप जगत् के प्रारदादक और मिसा- धक जलको उत्पन्न करताहुआ जो पहिला शरीर है वह मनापति मुझे मा मारो, उस मनापतिके निमित्त हवि देते हैं वह हमारी रक्षा कर ॥१.२॥ अभ्यायस्थ पृथिवि यज्ञेन गर्यसा मुहानो अग्निरिपतो रोहत ॥ १०३ ॥ , + , शुक्लयजुर्षद। इसका हिरण्यगर्म ऋमि दु०६० अग्नि देवता है। मंत्र (पिवि, यज्ञेन, पयता, सह, अभ्यावर्तस्व, इपिता, पग्निः, ते, वेपाम, भरोहरा ) हे पृयिावे ! यह और उसके फल दृष्टि के साथ सन्मुख प्रायो, परितृप्त हो मजापति के मेरित अग्नि तुम्हारे पृष्ठदेश में मारोहण करै ॥१०॥ अग्ने पशर पश्चन्द्र यत्यूतं । पंच्च यशियम् तद् देवेभ्यों भरामास॥१०॥ इसका हिरण्यगर्भ ऋ०, भु० गा० ई० अग्नि दे । मंत्रार्थ (भग्न, ते, यत्, शुक्र यत, चन्द्रम्, यत्, पूर्त, ध, यत्, यझियम्, तत्, देवेभ्यः, भरामसि ) अग्निदेव तुम्हारा जो अंग शुलवर्स दीप्तिमान है,जो मंगज्योसि चंद्रमाकी समान माल्हाद करने वाली है, जो ज्योति पवित्र है गृहकार्य के योग्य है और जो. यसकार्य के योग्य है उस सब प्रकार श्लाघनीयज्योतिको देवकार्य की सिद्धि के निमित्त सम्पादन करते हैं ॥ १०४ ।। इषमूर्जमहमित आदमतस्य योनि महिपस्य धाराम् । आमा गोषु विशत्यातनूपु जहामि मेदिमनि रामाधाम् ॥१.५॥ इस कं. २ म० है सबका हिरण्यगर्भ ० है, ई०-१ वि०मि०, २या त्रि० है देवता-१ घाशीः, यजमान है। मंत्रार्थ-(भातस्य, योनि, इपम्, अनिम्, महिपस्प,धारा इसः,मई, मादम् ) सत्य की उत्पत्ति के कारण अन्न उसके उपसेचन दही दूध घृतादिको, महद इन्छ। चाले अग्निकी भाहुतिको इस प्रदेश उदीची दिशा में भक्षण करसाह ( माविशन, वनपु, गोपु, भा,) मुझमें प्रवेश करे, मेरे पुरादि शरीरों में मेरे धेनु मादिः पशुओं में प्रपेश करे (भनिराम् अमावाम् सेदि जहामि ) अन्नराहेस ग्लेशदायक अग्ने तव अगे यो महि प्राजन्ते अर्चयों विभावसो । बहानो शवसा वामुक्थ्यं होमेकी व्याधिको त्यागन करताहूँ ।। १०५ ।।
१२ अध्याय।. इसका पावकाग्नि - . . धामि दाशुषे कवे ।। १०६॥ विटार पं० छ, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(विभावसो, वृहद्भानो, कवे, अग्ने, तव, अवा, महि.. वयः, अर्चयः, भ्राजन्ते, दाभुपे, शवसा, उक्थ्यम्, पाजस्, द- धासि ) हे कान्तिका धनवाले बड़े मकाशवान यजमान के य- मिपाय को जाननेवाले अग्नि देवता ! तुम्हारी यज्ञमत्ति देवताओं को सुनानेवाला वहा धूम और दीप्ति प्रकाशित होती है, तुम हवि- दाता यजमान के निमित्त बलसहिरा शस्त्रादि से युक्त यज्ञके योग्य अन को देरो हो ॥ १० ॥ पाचकवर्धा शुफरी अननवर्चा दियर्षि भानुः ना पुनो मातरा विचरन्नुपाषसि पृणाति रोदसी उभे ॥ १०७॥ । इसका पावकाग्नि ऋ० है,वि०५० छं०, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ- हे अग्ने ! (पावकः, शुफवा: अनूनन :, भानुना, उदियाप, विचरन, उपावसि, पुत्रः, मातरा, उभे, रोदसी, पृणति ) शोधक दीप्तिलाले निर्मल कान्तिवाले पूर्ण शक्तिवाले तुम अपनी दीप्ति से उत्कृष्टता को प्राप्त हो तथा सब ओर से विचरतेहुए देवता म. नुष्यों सहित जगत की रक्षा करते हो, असे पुत्र वृद्धहुए माता पिता की रक्षा करता है, इसीप्रकार तुम माता पिसारूप दोनों धावा पृथिवी का धूमपुंज द्वारा अर्थात् हवि से द्युलोक का जत से भमि का पालन करते हो ॥ १०७॥ ऊजॉनपायातपेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्य धीति- हिंसः । त्वे इप: संदधमूरिवर्पसश्चित्रोक्यो घामजीताः ॥ १०८ ॥ इसका पा० ऋ०, सो ४०.छ० श्रीन दे० है । मंत्रार्थ-- ( अर्जीनपात, जातवेदः, धीतिभिः, हितः, सुशस्तिभिः, मन्दस्व, भूरिवर्षसः, चित्रोत्या, बामजामा, स्वे, इस सन्दधुः ) हे जलोंके पो जलसे रक्ष और वृक्षों के मथनसे अग्नि होने के कारण जलों . -- - शुक्लयजुघद। का पोता कहा ] हे प्रज्ञावान.! यज्ञकमी के निमित्त स्थापन किए तुम श्रेष्ठ स्तुगियों से हृष्टपुटहो, अनेक रूपवाले बहुत प्रकार की रक्षा वाले तुम से तपिरा श्रेष्ट जाति कुलम उत्पन्नहुए यजमानों ने तुममें अपने हावरूप भन्नको होमा ॥१०८।। राज्यन्नंग्ने प्रथयस्व जन्तुभिस्मे राया अमर्त्य, सदर्शतस्य वपुणे घिराजसि पुणक्षि सानसिं मातुम् ।। १०९॥ इसका पावकाग्नि ऋ०, सतो ० छ. अग्नि दे है। मंत्रार्थ. (अमर्य, अग्न, जन्तुभिः, इरज्यन्. रायः, प्रस्मै, प्रथयस्व, सः, दर्शतस्य, वपुषः, विराजसि सानसिम्, ऋतुम्, पृणक्षि) हे मरण धर्मरहित अग्नि देवता । हवि देनेवाले माणियों द्वारा प्रदीप्त होगे हुए चुभ, अनेक प्रकार के धनोंको हमारे निकट विस्तार करो, वह तुम दर्शनीय चित्याग्न रूप शरीरके मध्यमें विशप महीप्त होते हो पिरसन संकल्पको पूर्ण करते हो ॥ १०९ ॥ हष्कारमध्वरस्य प्रचैतम क्षन्त राधसा महः । गति वामस्य मुगाँ महीमिर्प दाप्ति सानसि रयिम् ॥ ११०॥ इसका पाव० प्रा० है, सो०६० माग्न दे० है। मंत्रा-- (अध्वरस्य, इप्कोर, प्रचेतसम्, पन्तम्, वामस्य, महः, राधसः, रातिम्, सुभगाम, महीम्, इपम्, सानसिम् रथिम्, दधासि ) यज्ञ के रचनेवाले श्रेष्ठ चित्तवाले हे अग्नी यज्ञ स्थान में निवास करने वाले यजमान के,निमित्त श्रेष्ठ बड़े धनके दान को और श्रेष्ठ ऐचर्य युक्त वड़े भन्नको चिरन्तन धन को धारण करते हो।।११।। प्रत्ताचान गद्विपं विश्वतमुग्निः सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः । श्रुत्कर्ण, समर्थस्तमं त्वा इसका पा० ऋ० उ० ज्यो०ई० अग्निदे है। मंत्रार्थ--- दे भग्ने । (मानुपाः जनाः युगा, गिरा, वा, ऋतापानं, महिपं, गिरा दैव्य मानुपा गुगा ॥ १११॥ ।
१२ अध्याय। । विश्वदर्शनम्, थुरकर्णप, समथस्तमम्, देव्यम्. अग्नि, मुम्नाय; पुरः, दधिरे ) बुद्धिमान मनुष्यों ने पर्णिमास मावस्या आदि पों में वेदवाणी द्वारा तुम सत्याप महान् संसार के दर्शनीय कणों से प्रार्थना सुननेवाले अति कीचिमान देवताओं के हिसकारी अग्नि को यज्ञ के निमित्त पूर्वभाग में स्थापन किया ॥ १११ ॥ आप्यापस्य ममैतु ते विश्य सोम वृतम् । भवा बाजेस्य संगथे ॥ ११.२ ॥ इसका गो० ऋ०, नि० गाछ० सोम देवता है। मंत्रार्थ- ( सोम, विश्वतः, वृष्ण्यम्, से, समेतु, पाप्यायस्व, वाजस्य, सगये, भाभव.). हे.सोम ! सब ओर से सब माणियों की उत्पति करनेवाला रोज तुमको मात्र हो, अपने वीर्य से सरकार परि- वद्धिरा हो यज्ञादि सरकार्य के उपयोगी अन्न की माप्ति के निमित हमारे निकट पानी ॥ ११२ ॥ सन्ते पयामि समुयन्तु बाजाः संवृक्षण्यान्प- भिमातिपा: । आप्याधमानोसमताय सोम विवि'वास्युत्तमान धिप्व ॥ ११३ ॥ ० मा ४: पं० ई०, सोमदे० है । मंत्रार्थ-(सोम, पयांसि, से, श्रीममारोिपाहः, संपन्तु, वाजाः, सम्। पृपण्यागि, सम्, पाप्यापमानः, उ, अमृताय ) हे सोम! पीनेयोग्यरस तुम से पापनाशक को प्राप्तहो भन्न संगतिको माप्तहों वीर्य तुमको प्राप्तहों दुग्ध अन्न और वाय से वृद्धिको प्राप्तहोते हुए तुम ही अमरण धर्म के निमित्त हो और (दिवि उत्तमानि भवारिस विप्व)युलोक में श्रेष्ठ माहुति परिणामकाले अन्नों को धारण करो। आप्यायस्व मदिन्तासोम विश्वविशुभिः। भर्या नः सप्रथस्तमः सखो वृधे ॥ ११४ ॥ इसका गो० ऋ० प्रत्रि० छ०, सोम दे है। मंत्रार्थ-- (मदिन्तम, सोम, सरपस्तमः, विश्वभिः, अशुभिः, पाप्या- यस, धे, सखा, प्राभा) अतिशप तृप्त अन्तःकरणवाशे दे इसका गो. - , शुक्लपजुद। सोम अत्यन्त विख्यातकीर्ति वाले तुम सम्पूर्ण सूक्ष्मांशोके द्वारा वृदिको पाया, और हमारी वृद्धिके निमित्त सहायक हजिये ११४ आ है उत्सो मनों पमत्परमाचित्मघस्तात् भग्ने त्वां कामया गिरा || ११५॥ इसका वत्सार ० है, नि. गा० ६० है अग्नि देवता है। मंत्रार्य-(अग्ने, रो, वसा, त्वां कामया, गिरा, परमाद, स- धस्थाद, चित, मनः, आयमत् ) हे भग्ने ! तुम्हारा पत्सस्वरूप यजमान तुमको स्तुति करने की इच्छावाली वेदवाणी के द्वारा उत्कृष्ट घुलोकसे मी तुम्हारे मनको हटाता है ।। ११५ ॥ तुभ्यं ता अंगिरस्तम विश्वाः सुतितयः पृथुक् अग्ने कामाय येमिरे ॥ ११६ ॥ इसका विरुप गाय० ई० अग्नि देवता है । मन्त्रार्य- (अङ्गिरस्तम, भग्ने, पृथक्, विश्वाः, ताः, मुक्षितयः, कामाय, तुभ्य, योमरे ) हे अति हविर्भक्षक अग्नि देवता ! अनेक मकार की सम्पूर्ण वह प्रसिद्ध स्वर्गादि सुन्दर स्थान की देनेवाली. स्तुसिय, अभिलापा पूर्ण करनेवाले तुम्हारे निमित्त की गई हैं ॥११॥ अग्निः मियेषु धाममु कामौ भूमस्य भव्पस्प । ममाडेको विराजति ॥ ११७॥ इसका मजरपति ऋ० गायत्री छन्द अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (भास्य, भवस्य, कामः, सनाद,अग्निः, प्रियेषु, धामसु, एकः, विराजति ) उत्पन्न उत्पद्यमान यजमानों की कामनामोंको पूर्ण सम्यक प्रकार से विराजमान अग्निदेवता अपने प्रिय स्थानों में असहायभूत प्रधान रूपसे विराममान होते हैं ।।११७॥ इति शुरद यमुदागत वाजसनयि संहिता का साइबाद द्वादश करनेवाले अपाय समाध २३ अध्याय अथ त्रयोदशोऽध्यायः ।। . जिसमें उखा धारण, गाईपत्यचयन, क्षेत्रकर्षण भौर औषधि घपन प्रधान हैं। ऐसे वारहवें अध्यायमें उसाधारणादि के मंत्र काहे । अब तेरहवें अध्यायमें थुप्फरपर्ण आदि के उपधान मंत्र काहे जायेंगे। मार्य गृहाणाम्पग्ने अग्नियापस्पोपाय सुमा- ..... स्त्वार्य मुवीपीय । मामु देवताः सचन्ताम् ।। १ ।। इसका वत्सार प्रा०, ककुष्छन्द भग्नि देवता है। मंत्रार्थ- मैं यजमान (भग्ने, रायः, पोपाय, सुमनास्त्याय, सुवीर्याय, अग्नि मधि, हामि, देवता, मांस, सचन्ता ) प्रथम पनकी पुष्टि के निमित्त थेष्ठ पुत्रादिकी प्राप्तिके निमित्त उत्तम सामर्थ्य के निमित अग्निको अपने प्रात्मा में धारण करता हूं, देवता भी मुझको सेवन करें ॥१॥ अपां पृष्टमस योनिपुग्ने समुद्रमभितः पिन्व मानम् वर्धमानो महाँ । मा च पुष्करे दियो मानया परिम्णा प्रधस्य ॥ २॥ इस मं० की व्यारुपा ११ अध्यायके २९ मंत्र में होगई है ।।२।। ब्रह्मजजान प्रथम पुरस्लाहि सीपतः मुरुषों वेन भावः । सध्या उपुमा अस्प विष्ठाः सत- रच योनिमसंतश्च विवः ॥३॥ इसका बरसा० ऋ० प्रा०वि०० मादित्य देवा मनाथ- (पुरस्ताद, गयमं, जवान, ब्रह्म, सीमा, मुरुचः, विश्रायः सः, वेनः, उपमा, च, अस्य, विष्ठाः, युध्याः, ससा, प, अससः, योनि 'विषा) पूर्व दिशामें सबसे प्रथम माटहुए आदित्यरूप ब्रह्मने भू- गोलके मध्य में भारंप करके सुन्दरसचिवाले इन लोकोको अपने 'मकाश से फैलाया और वह कामनीय मेधावी सूर्य अवकाशयुक्त और इस जगराको वासस्थान अन्तरिसमें होनेवाली दिशाओं को ४६ -
शुक्लयजुर्वेद।
तथा विद्यमान पूर्व घट पटादि और भपूर्ण वायु आदि के उत्पत्ति
स्थान ब्रह्माण्डको मकाशित करता है ।।।।
हिरण्यगर्भः समवताने भूतस्प जाप्तः पतिरेक-
आसीत्। स दोधार पृथिवीं धामृतेमां कस्म
देवाय इषिपा विधेम ॥ ४॥
इसका हिरण्यगर्भ ऋ• भापी त्रि. ई० मनापाले देवता है।
मंत्रा-(हिरण्यगर्भः, भूतस्य, भग्न, समवत, नाता, एकः पतिः
भासीव.स,पृथिवीप, पाम, उत,इमाम,दाधार,कस्म,देवाय इविषा
विधेम) हिरण्य पुरुषरूप ब्रह्माण्डमें गर्भपसे भवस्थित ममापति
हिरण्यगर्भ माणिमामकी उत्पत्तिके प्रथम शरिधारी हुमा, और
घह उत्पन्न अर्थात् प्रकट होतेही एकही इस उत्पन्न होनेवाले सब
जगत्का ईश्वर हुभा, वही भन्तरिक्ष युनांक औरइसभूमि भाव,
प्रिलोकीको निर्माण कर धारण करताहै, उस प्रजापतिके निमिर
इविदारा विधान करतहैं ॥४॥
तृप्सचे स्कन्द पृथिवीमनुयामिमं च योनिमन
याच पूर्वः समानं योनिमर्नु संघरन्तं दृप्स
जुहोम्यनु सप्तहोत्राः ॥५॥
।" इसका देवश्रवा ०मि. मि. छ,मादित्या दे० है मंत्रार्थ
यः, पूर्वी, द्रप्सः, पृथिवीं, अनुचस्कन्द, प, पाम्, अनु, घ इमप
योनिम्, भनु, समान, योनि, सञ्चरन्तम्, द्रप्सम, सप्तहोत्रा, मन-
जुहोमि) जो मपम मुरुप सबकी भादि है जिसकी भादि नहीं जो
कि द्रप्स नामसे मसिद आदित्यर्पका कारण भन्तरिक्षको मनु
प्यादि केधारणके निमित्त सींचताद, और पुलोकको सींचता है,
मौरइस भूलोकको माहुविके परिणामाप रससे साँचताई,सम्पूर्ण
के सुन्य विजोकीमें विचरण करतेहुए मादित्य को सर दिशामा
में स्पापन करता ॥५॥
नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ऐकेच पृथिवीमाये अन्त-
रिक्ष दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः ॥ ६ ॥
.१३ अध्याय २१३ इसका देवश्रवा ऋ० भ० मा त्रि०५० सर्प देवसाई मंत्राएं:- (ये, च, पृथिवीं, अनु, सर्पेभ्यः, नमः, अस्त, ये, भन्गारिसे ये, दिवि, तेभ्यः, सभ्यः, नमः) जो भी पृथ्वी के अनुगा लोक नक्षम उन लोक नक्षत्रों के निमिरा नमस्कार हो, जो लोक अनारिष में वर्तमान हैं, जो सम्पूर्ण लोक घुलोकके भाथिस हैं, सम सपों के निमिरा नमस्कार है ॥६॥ या इपयो यातुधानानां ये या वनस्पतीः। रने येषावटेषु शेरते तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः ॥ ७ ॥ इसका देवश्रया अनुष्ठ० ई० सर्प देवता है। मंत्राय- (यानुधानाना, याः, इपयः, या, ये, भवटेषु, शेरसे, तेभ्यः, सम्मः नमा) राक्षसगणोंके जो सर्प वाणरूपसे वसते हैं, या जो सर्प, चन्दन वृक्षादि वनस्पतियोंके आश्रित है, या जो पिलोम शयम करतेहैं उन सब सो के निमि नमस्कार है।॥७॥ घेवामीरोंचने डिवो येचा सूर्यस्य रश्मि येपा- मप्सु सदस्कृतं तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः ॥८॥ इसका देवश्रवा १०, निच० ०. सर्प देवता है । मंगा- (ये, वामी, दिवः, रोचने, वा,ये, सर्वस्प, रश्मिपु, येपास, भा, सदः, कृतम्, तेभ्यः सर्पेभ्यः, नमः) जो सम्पूर्ण लोकर्म पुलोक के दीसि स्थानमें है, जो हमको नहीं दीखते मयामोलोक सनकी किरणों में निवास करते है, मिन सर्प लोकों का नलों में स्थान कियाई, उन सब सोंके निमिरा नमस्कार है ॥ ८॥ कृणुष्व पाज्ञा प्रसिनि न पृथ्वी याहि राजे वाम: वान् ।हमै न तुवीमनु प्रसिति णानोऽस्तासि विध्याक्षसस्तापिष्ठैः ।। ९ . इसका वामदेव ऋ• भु० पं० छ० अग्नि देवता है। मनार्थ- हे भग्ने ! तुम (मामा, प्रसि, याहि. इवं, मामवान, रामा, इभेन, पृथिवी, मसिसि, ने, पाना, कृणुष्य, हनीम्, प्रसिति मत दूणानः, सपिष्ठैः, रससः, विध्य ) शशुओंके हटानेवाले हो, शामों - - शुक्लयजुर्वद। के ऊपर जामो, नसे सहायवान नृप हायीद्वारा शत्रुभोपर गमन करता है, ऐसे तुम गमन करो, विशाल पक्षियाणके मिमित फैजायेहुए जालकी समान वलको विस्तार करो, वेगवान् जालद्वारा सम्यक्शनुओंको मारनेवाले तपानेवाले राक्षसोंको ताड़नकरो॥ तवं भूमास आशुपा पतन्त्य स्पृश धूपता शो चानः । सधष्यग्ने जुन्छा पतुझान सं- न्दितो विगंज विष्वंगुरका ! १० ॥ इसका वामदेव ., भु० पं. छ. अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- हे (पाने, तब, मामुया, भ्रमास:, पतन्ति, धृपताः, शोशुचानः, तषि, पतझान्, अनुस्पृश, जुम्हा, भासन्दिसः, विप्न, उरका, विसज) अग्निदेवता ! तुम्हारी जो शीघ्रगामी ज्वालाएं परम से इधर उधर चलायमान होती हैं, उस प्रगन्म ज्यालासमूह से प्रकाशमान तुम सपानेवाले राक्षसों और पतंगों ज्वालासरह से दग्ध करो, शुक से हूयमान तुम अरनीएडस होकर सर्वत्र तिरछी ऊँची नीची ज्वालानों को राक्षसों के नाश करने को छोड़ो पतंग की समान राक्षस तुम में प्रविष्ट हो नष्ट होते हैं ॥१०॥ प्रतिस्पशो विसृज़ पूर्णितमो भवो पायुर्विशो अस्या अन्याः । यो नौ दूरे अघधिमो यो अन्त्यग्नेमाकिर व्यथिराधीत् ।। ११ ।। इसका बामदेव , निवृ० वि० छ०, भग्नि देवसा है। मंत्रार्थ-(अग्ने, नः, दरे, यः, भेषशसः, या, भन्सि, ताणतमम भदधा, प्रतिस्पशः, पिसृज, अस्याः, विशः, पायुः, भर, रो, किः, मा, मादपद ) हे भग्ने ! हमारा दुर देश में जो शत्रु है जो निकट में वर्चमान शत्रु है, बड़े वेगवान अनुपरिसित तुम उसकी भोर पन्धन को भैरण करो, इस हमारी प्रजा के रक्षक जिपे, गुमको कोई पी शत्रु मन धर्पणा करो ॥ ११ ॥ उदग्ने लिए प्रत्यात नुवन्यमित्रान ओपतात्ति: ग्महेते। योनो अरांतिय समिधानचक्रे नीयात . - १३ अध्याय। धक्ष्यतसं न शुष्कम् ॥ १२॥ इसका वामदेव ऋ०, मुगा०५०/०, अग्नि दे० है । मंत्रार्य (अग्ने, उत्तिष्ठ, मत्यातनुष्क, सिग्महेते, अमित्रान्, न्योपतात, समिधान, नः, यः, अराति, चक्रे, तम, नांचा, पक्षि, ग, शुष्कम, भातसम्) हे अग्निदेवता । तुम जागृत होवो ज्वाला विस्तार करो, हे उत्साहरूप आयुधवाले शत्रुओं को अत्यन्त भस्मीभूत करो, हे दीप्तिमान् ! हमारे जो शत्रु दानका प्रतिपेध करता है उसको निकृष्ट करके भस्म करां जिसमकार सूखे अतस (अलसीके) क्ष को भस्म करते हो इसमकार शत्रु को नष्ट करो ॥१२॥ कहाँ सच प्रतिविध्याध्यस्मदाविष्कृणुप्य दैव्यो नग्ने अब स्थिरातनुहि यातु जूनां जामिमजामि प्रमणीहि शबून अग्नेप्ट्या तेजसासादयामि॥१३॥ इस के० में २ मंत्र हैं, सबका वामदेव ऋ० है, ई.-१ भु०५० २ मा त्रि०, देवता सबका अग्नि है। मंत्रार्थ-(भग्ने, उदः, भव, अस्मत्, अधि, शशून्, पतिविध्य, दैव्यानि, प्रावि, काष्च, पातुजनाम, स्थिरा, भवरानुहि, मामिप, अजामिप, शत्रून्, प्रमृ णीहि ) हे मग्निदेव ! उद्योगी उदा हो हमारे ऊपर वर्तमान शत्रुओं को साइन करो, देवसम्बन्धी कर्मों को प्रकट करो, राक्षसों के स्थिर धनुषों को ज्यारहित करो, ताडित अतादिरा शयमों को बिनाश करो। हे नुक-(अग्नेः, तेजसा, त्वा, सादयामि ) अग्नि के रोज से तुझको स्थापन करता हूँ ॥ १३ ॥ अग्निर्मूञ दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपा रेतासि जिन्यति इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि ॥ १४ ॥ इस कं०में २ मंत्र हैं,सवका वामदेव ऋ०ई०-१ निगा, मा. त्रि० भौर देवता सवका भग्नि है । इसकी ३ | १२ में व्याख्या कीगई है ॥ १४ ॥ वो पज्ञस्य रजशश्च नेता यत्रो नियुद्भिः सबसे . .
शुक्लपजुर्वेद । शिवाभिःदिवि मूर्छाने दधिषे सपा जिव्हामग्ने चकृपे हपवाहम् ॥ १५ ॥ इसका त्रिशिरा भा०, निदापी त्रि० ई. अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(अग्ने, हव्यवाहम, जिव्हाम, चकपे, यज्ञम्य, प, रजसः, मेला, भुवः, यत्र, शिवाभिः, नियुन्द्रिः, सबसे, दिवि, स्वर्षाप, पूनम, दधिपे ) हे अग्निदेव ! वुम नब इवि धारण करनेवाली जिव्हारूप ज्याला को प्रगट करते हो तब द्रव्यदेवता त्यागात्मा सूप यश के और यज्ञ परिणामका जल के मवर्चक और मापक होरो हो, यहाँ मंगलरूप अश्वों के सहित तुम सम्बन्ध को माप्त होते हो और घुलोक में स्वर्ग के देनेवाले मादित्य को धारण करते हो।॥ १५॥ सुवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा मा स्वा समुद्र उदयधीन्मा सुपर्णो अव्यधमाना पृथिवीं देह ॥६॥ इसका विशिरा ३०,उद्व०० ई०, स्वयमावणा दे० है। मंत्राथ-हे स्वयमाणे ! तुम (धरुणा, विश्वकर्मणा, भाम्वृता, धुवा, असि समुद्रा, स्वा, मा, उद्धीद, सुपर्णः, मा, अव्ययमामा, पृथिवी, दृछह ) भूमिपसे विश्व की धारण करनेवाली मजापति द्वारा विस्तार कीहुई दृढ हो, समुद्र अर्थात् रुक्म तुमको मत नष्ट करो, अचल होकर तुम भूभाग दृढ करने में समर्थ हो इस कारण पृथ्वी को पृढ करो ॥ १६ ॥ मजापतिण्या सादयत्वपों पृष्ठे समुद्रस्येमन् । व्यर्चस्वती प्रस्वतीं प्रस्व प्रथिव्यसि ॥१७॥ इसका त्रिशिरा ऋषि है, अनुपुछ, स्वयमाणादि दे० है । मंत्रार्थ-रे स्वयमातुरणे ! (पजापतिः त्वा व्यवस्वसीम,मथस्वती प्रपा, पृष्ठे, समुद्रस्य, एमन, सादयतु, प्रथस्त्र, पृथिवी, असि) प्रजापतिनै तुझ अवकाशवान विस्तार युक्त को जलोके ऊपर और समुद्र के स्थान में स्थापन किया और तुम मजापतिसे सादिस १३ अध्याय होकर विस्तारको मात हो जिस कारण कि भूमिसे प्रकट होनेसे तुम पृथ्यीय हो ॥ १७॥ भूरतिभूमि स्पदितिरसि विश्वर्याया विश्वस्य भुवनस्य धी. । पृथिवीं यच्छ पृथिवीं छह पृथिवीमा हिधसीः ॥ १८॥ इसका त्रिशिरा ० है. प्रस्तार पंक्ति छ० स्वयमाणादे०है मंत्रार्थ-दे स्वयमातणे तुम (भा भूमिः, असि,विश्वधाया,अदिसित, असि विश्वस्य, भुवनस्य, धी, श्रीस, पृथिवी, यच्च, पृथिवीं, इ. पृथिवी, मा, हियसीः ) मुखों की भावना करनेवाली शमि नामसे प्रसिद्ध हो, विश्वपुट करनेवाली देवमासा हो सम्पूर्ण संसारकी धारण करने वाली हो पृथ्वीको कृपा दृष्टिसे अवलोकन करो भूभागको दृढकरो पृथिवीको मरा कष्टदो ॥१८॥ विश्वस प्राणार्याणनार्य ध्यानायौदानाय म- सिष्ठाय चरित्राय अग्निवाभिपातु मह्या स्व- स्त्या दिपा शन्त मेन तया देवतपाशिरस्वद सुवासीद ।।१९।। इसका त्रिशिरा मृ• भुरिग०,१० छन्द, स्वयमातृणा दे० है । मंत्रार्थ हे स्वयमातृणे (विश्वम्मै, माणाय, अपानाय व्यानाय,उदा. नाय, मनिष्ठांय,चरित्राय, अग्निा, मझा,स्वस्त्या,शतमेन,छर्दिपा, वा, श्रभि सया, देवराया, ध्रुवा, भगिरस्वत,सीद ) सम्पूर्ण प्राण अपान पान उदान नामक शरीर वायुकी उन्नतिकी कामना के निमित्त तथा प्रतिष्ठाकोसि लामके निमित्त शास्त्रीय प्रापरण के निमित्त अग्निदेवता घड़ी कल्याण योगक्षेम की सम्पत्ति और अत्यन्त सुखकारी गृहके द्वारा तुमको रक्षाकर उस परम देवताके धनुग्रह से दृढहुई अहिरा की समान स्थिसहो ॥१९॥ काण्डकापहात्मरोहन्ती परुपः परुपस्परि एवानो दुबै मतनु माहौण शतेन च ।। २० ॥ इसका भोग्न ऋ०, अनुष्टुप् छ०, दुष्टिका देव० है। मंत्रार्य - २६८ शुक्लयजुर्घद । (दूर्वे, कापडाद, काण्डात्, पहपः, परुषः, परि, मरोहन्ती, पर, सहस्रेण, घ, शसैन,नः,श्रा, मसनु ) हे दुर्गा, इटके ! तुम प्रत्येक काएड से और मत्येक पर्व से सब घोर से अंकुरित होती हो और निधय ही साख और सैकड़ों भर्शद भसंख्य ऐश्वर्य पुत्र-पौत्रादि से अश्वत् हमको सरकार वृद्धि को प्राप्त करो ॥ २० ॥ या शतने प्रतनोपि महौण विरोहासि। तपास्ते देवीष्टके विधेम हथिपा ययम् ॥ २१ ॥ इसका अग्नि ऋ०, मिचूदनुपए छन्द, दुष्टिका देवता है । मंत्रार्थ-( देवी, इटके, पा, शतेन, मानापि, सहस्रण, पिरोसि, वयं, से. हविषा, विधेम ) हे दीप्यमान ! हे एके जो तुम सैंकड़ों काण्ड से विस्तार को प्राप्त होती हो, सहस्र अफुरों से अनेकप्रकार से अंकुरित होती हो, हम तुमको हवि विधान करसे हैं ॥२१ ।। यास्त आग्ने सूर्ये रुचो दिवमानपनित गरिम- भि: । तामिनों अद्य सर्कभी रुचे जनाय नंस्कृधि ॥ २२ ॥ इसका इन्द्राग्नी ऋ०, भुरिगनु छ अग्नि देवता है । मनाथ (अग्ने, पा. ते. रुचः, सूर्य, रश्मिभिः, दिवं, थारान्वन्ति, भय, वाभि, सर्वाभिः, नः, रुचे, नः, जनाय, कधि ) हे भग्ने ! जो सेरी दीप्ति मूर्यमण्डल में वर्तमान किरणों द्वारा धुलोक को प्रकाश करती हैं, इससमय उन सम्पूर्ण कान्तियों समाज इमारी शोभा के मिमित्त करो तथा हमारे पुत्र पौत्रादि का जगत्मसिद्ध करो॥२२॥ या पो दे॒वाः सूर्ये रुषो गोप्यन्वेषुपा रुचाइ न्द्राग्नी ताभिः सीभी रुपैनो धत्त वृहस्पते ॥२३॥ इसका इन्द्रानी ऋ०, अनुपुर छ०, रहस्सत्यादय देवता है। मंत्रार्थ-(इन्द्राग्नी, हसते. देवाः, वः. याः, रूपा, सूर्ये, याः, रुषः, गोपु अश्षेपु, ताभिः, साभिः, ना,रुवम्,धत । हे इन्द्राग्नी हे सहस्पते ! हे देवसमा । तुम्हारी जो दीप्ति सूर्य मंडामेपर्तमान है जो दौति धेनुमों में जो भवॉम स्थित है, उग सम्पूर्ण दीलियों - .
. - १३ अध्याय। से देदीप्यमान तुम हमारे मिमित कान्ति नीरोगताको प्रतिपादन कीजिये ॥२३॥ विराद ज्योसिरधारयत्स्व राइ ज्योतिरधारयत मजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योति- मतीम् विश्वस्मै माणापापानापं . व्याना । विश्यं पोतिर्यच्छ अग्निप्टेऽधिपतिस्ता नेप- संपानिरस्पट् ध्रुषासौंद ॥ २४ ॥ इस कं० में २ मं० हैं। सबका इन्द्राग्नी पंछ-१ मा० गा, २४० प्रा०, देवसा-१ रेसः सिचौ २ विश्वज्योति है । मंत्रार्थ- (विराह, ज्योतिः, मंधारयत्, स्वराङ्, 'ज्योतिः, अंधारयत्) विशेष शोभायमान विराटप इस लोक ने अग्निरूप ज्योति को धारण किया, स्वयं प्रकाशघानं घुलोक ने भग्निरूप ज्योति को धारण किया। इसके ! (प्रभापतिः, विश्वस्मै, प्राणायं, अपा- नाय, व्यामाय, ज्योतिष्मतीम् त्वा, पृथिव्याः, पृष्ठे. सादयतु, विश्वम्, ज्योतिः, यग्छ, अग्निा, रो, अधिपतिः, तया, देषाया, ध्रुषा, प्रारम्बन, सीद ) मजा के पालक सम्पूर्ण माण अपान न्यान की सम्पत्ति के निमित्त पोतिर्युक्त तुझको पृथ्वी के ऊपर स्थापित करैः सम्पूर्ण ज्योति को निग्रह करो, अग्नि तुम्हारा माधिपति है, उस मसिद्ध देवता के सदिरा घर होकर माहिरा की समाम स्थिरा हो ॥२४॥ मधुन माधपश्च धासन्तिकावत अग्नेन्तः मलेपोऽसि कल्पनांद्यावाधियो कल्पतामापु ओषधयः पाल्पतामग्नयः पृथङ्मम ज्येष्ठपाप सत्रेताये मानयः समनसोऽन्तरा पायोपयिषी क्षमे पासनिसकावृतू अभिकल्पमामा इन्द्रमिय देवा अभिविशन्तु तया देयतयास्पिट् ध्रुवे सीदतम् ॥ २५॥ इसमें २ मंत्र हैं । सवता इन्द्राग्नी ऋ०,०-१४००, ।
- - ३७० शुक्लपजुर्वेद। २४० नावृ०, सबका ऋजु देवता है। मंत्रार्थ-(मधुः, च, माधवा, प, वासन्तिको, ऋतू) चैत्रमास और वैशाखमास यह दोनों ही वसन्स सम्बन्धी ऋतु है, अथवा हे (भूट, अग्मे, मनसः, श्लेपः, असि) मधुरूप दोनों इष्टकायो ! तुम चापमान मग्मि के अम्मर में स्थिर होकर रलेप अर्षाव सहसा के निमित्त लगायेहुए हो ( मम, ज्येष्ट्याय, यावापृपिषी, कल्पेसाम्, भापः, मोषधयः, कल्पन्ताम्, सबताः, पृथक् अंग्नयः कस्यन्ताम् ) मुझ यजमान की उत्कर्पता के निमिच यह घुलोक मौरभूलोक अपने योग्य उपकार को कल्पना करें, जल और भोपधी हमारा माघान्य सम्पादन करें, समान व्रत अनेक नाम की मग्नि सयमातृणा मादि इष्टका उत्कृष्टता सम्पादन करे ( इमे, पावापृथिवी, अन्तरा, समनसः, ये, अग्नयः, यासन्तिको, मान, भभिकल्पमानाः, अभिसंविशन्तु. देवाः, इन्द्रम् इय, ) यह पावापृथिवी के मध्य में वर्तमान एक मनबाली जो भाग्निये हैं अर्थात् औरों से चयन की हुई वसन्त सम्बन्धी तु को सम्पादन करते इस कर्म का प्राश्रय करो, जैसे देवता इन्द्र को परिचर्पा कर सम्पादन करते हैं इसीमकार इष्ट का माप्त हो, हे इष्टके ! ( वया, देवतया, भनिरस्वद, धुथे, सीद- तम् ) उस प्रसिदं देवता द्वारा अङ्गिरा की समान स्थिर होकर स्थित हो ॥२५॥ अपोदामि सहमाना सहस्पारातीः सहस्व पृतः नापप्तः 1 महावीर्यासि सामा जिन्य ॥२६॥ इसका सविता , निच० छ०, इष्टका देवता है। मंत्रार्थ- हे इष्टके ! तुम (सहमाना, अपादा, असि, अरासी:, सहस्त्र, पृतनापतः, सहस्प, सहस्रबीर्या, असि, मा, जिन्व ) स्वभाष रे शत्रुओं को नप करनेवाली तथा शत्रुभों को न सहनेवाली हो शत्रुभों को तिरस्कार करो, संग्राम की इच्मा करनेवाले शाम को तिरस्कार करो, तुम धनात बलवाली हो, मुझपर मुभीसा हो २ - -- १३ अध्याय मधुयातो कुतायत्ते मधु क्षरन्ति- सिन्धयः । माध्वीन: मन्त्वोपंधी ॥२७॥ इसका गोतम १० मि. गा० ई०, विश्वेदेवा देवता है। मंत्रार्थ-(प्रशायरो, वाताः, मधु, क्षरमिा, सिन्धवः, मधु, नः, भोपधीः, माध्वीः सन्तु ) यज्ञ की इच्छा करनेवाले यजमान के निमिच वायु पुष्परस को वहन करती हैं, स्यन्दमान नदियें मधु समान जल को क्षरण करती हैं, हमको सम्पूर्ण ओषधी मधुर रस से युक्त हों ॥ २७ ॥ मधु नक्तमुतोपसो मधुमत् पार्थिव रजः । मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥ २८ ॥ -इसका गोतम ऋ०, गापत्री ई०, विश्वेदेवा दे०है। मंत्रार्थ- (मः, पिता, धौः, मधु, अस्तु, पार्थिवम्, रमः, मधुमद, नक्तं, त, उपसा, मधु ) हमको पिसाषद पालन करनेवाला पुलोक अपस, मय हो, माताकप पृथ्वी सम्बन्धी रन अमृतमय हो, रात्रि और दिन अमृसमप.हो अर्थात् सब से हमको मंगल हो ॥ २८ ॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमा । अस्तु सूर्यः मा- ध्वीपों भवन्तु नः ।।२९ ।। इसका गोतम ऋ०, निच० गा० छ, विश्वेदेवा देवता है। मंमार्थ-(पमस्पतिः, ना, मधुमान, सूर्यः, मधुमान, भस्नु, गायः, नः, माध्वी, भवन्तु ) सम्पूर्ण वनस्पति हमको मधुररस से युक्त हों, सूर्य इमको मधुर रसयुक्त- हों, गौ हमको मधुर रसयुक्त हों ॥ २९ ॥ अपां गम्भन्सीद मा त्या सूर्योऽभितापसी- न्माऽग्निश्वानरः । अच्छिसपनाः प्रजा अनु- वीक्षस्यानु त्वा दिव्या दृष्टिः सचताम् ॥३०॥ इसका गोतम ऋ० स्वराट् पं० /०, कूर्म देवता है। मंत्रार्थ- कर्म से मनापति वा भादित्य का ग्राण है, हे कूर्म ! तुम (म. पाम्, गम्भम, सीद, ला, सूर्यः मा, अभिवासीर, बैश्वानर, . . " - ३७२' - , , शुक्लयजुर्वेद । अग्निः; मा, अचिन्नपपाः, प्रजाः, अनुषीक्षस्व, दिव्या, गृष्टिः, ला, अनुसयताम् ) जलों के गंभीर स्थान भादित्यमण्डल में हिपत हो, तुमको सूर्य वहां स्थित होने से मत सन्तप्त करो, संपूर्ण मनुष्यों के हितकारी माग्नि सुमको मत सन्तापित करो, भवंदिय अवयघवाली इष्टका तुमको निरन्सर देखो और दिग्ध वर्षा तुमको सेवन करो॥३०॥ जीन्सगुद्रान्समस्पृत्स्वर्गानुपांपतिपक्ष इष्ट. कानान् । पुरीप घसानः सुकृतस्प लोके तन गुच्यत्र पूर्व परेताः ॥३१॥ इसका गोतम , भिाप छ०, कर्म देवता है। मंत्रार्थ- (अपां, पतिः, इष्टकानाम्, पमः, श्रीन, स्वर्गान, समुद्रान, समसपत्, पुरी, वसानः, सत्र, गच्छ, यत्र, सुकृतस्य, लोके, पूर्ये, परेताः ) जलों के स्वामी इष्टिकाओं की उपधानक्रिया का मधाम भंग हो तुमने तीन भोग के साधन लोगों को भलीपकार माप्त किपा, पुरीप को माच्छादन करते उस स्पान में गमन करो जहां पुण्यात्माओं के लोक में पुरातन धर्म अग्मियों से उपहित होकर गये हैं ॥ ३१ ॥ 'मही यौः पृधिषी प न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिता नो भरीमभिः ॥ ३२ ॥ इसकी व्याख्या ( म०३२ म० में होगई ॥३२॥ विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो प्रतानि पस्पृशे इन्द्रस्य युज्यः सखो ॥३३॥ इसकी व्याख्या ६.४ मं० में होगई ॥१३॥ ध्रुषासि धरुणतो जज्ञे प्रथममेभ्यो योनिभ्यो अधिजातदाः । स गायच्याविभाऽनुगुलाच देवेम्पो हव्यं यत्तु प्रजानन् ॥२४॥ इसका गो० प्रा०, मु० निछ खा देवता है । मनार्थ- हे उखे ! (धरुणा, धुवा, मास, जातवेदाः, प्रयमम, इतः, अधि- ।
१३ अध्याय। ३७३ ज: ) जगद की धारण करनेवाली तुम स्थिर हो. शनि पहिले इस दसा से प्रकट हुया है (एभ्यः, योनिभ्यः, सः, प्रजानन्, गायत्र्या, पिष्ठभा, च, मनुष्ामा, देवेभ्यः, हगं, वदतु ) फिर इन अपने कारणों से प्रकट होता है यह अग्नि अपने अधिकार को. भनीमकार नानताहुआ गायत्री त्रिशुभ और अनुभ् छन्द की सामर्थ से देवताशों के निमित हघि को लेजामो ॥ ३४ ॥ प्रपे गाये रमत्त साईसे गुस्न अपत्याप | सम्राईसि स्वराति सारस्वती स्वोमो प्रायताम् ।। ३५ ॥ इसका गो० ऋ०, निच० ० छ, उखा दे है । मंत्रार्थ- उखे! (इपे, राये, सहसे, घुम्ने, ऊर्ज, अपस्याय, रमस्व, सम्राद्, असि, स्वराट्, असि, स्वा, सारस्वती, उत्सो, मावसाम् ) अन्न धन वल यश दुग्ध दधि घृतादि रस और पुन पौत्रादि देने के निमित्त यहां दीर्घकाल पर्यन्त स्थिर हो तुम भूमिके भलेगकार प्रकाशमान हो, स्वर्ग के स्वयं दीप्तिमान राना हो, तुमको सर- स्वती सम्बन्धी वाणी मन पालन करें ॥ ३५ ॥ अग्ने युक्ष्या हि ये तवाश्चासो देष माधः । अपहन्ति मन्यथै ।। ३६ ॥ इसका भग्दान ०, निवृ० गा० छ, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(देव, अग्ने, ये, रो, साधवः, भवासः, भरं, मन्यवे, बहन्ति, हि, आयुष्व ) हे दीप्यमान पग्नि देवता ! जो तुम्हारे चतुरश्रेष्ठ घोड़े शीघ्र हमको यई के निमिच मात करते हैं नको ही रथ में जोतो ॥३६॥ युवा हि दैवहतमा । अश्वा । अग्मे पीरिय निहोतो पूर्पः खदः ॥ १७ ॥ इसका विरुप , निगा० छ', अग्नि दे. है। मंत्रार्थ- (माने, देवहूतमान, अश्वान्, दि, स्थी, इच, मायुक्ष्य, पूर्व्यः, , होता, निपदः) हे भागे ! देवताओं के अतिशय वुलामेषाले . . , - - शुक्लपजुर्यद। होनेवाले (पद्रिवनिम्, अवं, मा, विधेसी: ) खा से परा को खोदनेवाले इस पो को मा मारो ॥ ४२ ॥ असुमिन्दुमरूपं भुगण्यमग्निमीडे पूर्वधिति नमोभिः सपर्वभिर्गतुशः पाल्पमानो गां मा धिमीरदिति विराजम् ॥१३॥ इसका विरुप मह, नि० मि. ई०, अग्मिदे है। मंत्राथ- (अमर्स, इन्दुम, अरुपम्, पूर्वचिचिम्, गमोभिः, भुरण्युम्, अग्नि, ईहे. सः, पर्वभिः, प्रागुशः, कल्पमामः, अदिर्शि, पिरानम्, गा, मा, दिध सीः ) क्षयरहित ऐश्चर्य से पुक्त रोपरहित पूर्व महर्षियों से चयन के पोग्य अन्मों से सबके पोपण करने वाले अग्नि को स्तुसि करता , वह अग्नि प्रमावास्या माघि पर्व, भात मनु में कर्मों को सम्पादन करताहुया, भखपिहरा अदीन दुग्ध दानादि से विराजमान गौ को न मारे ॥ ४॥ यस्मी त्यष्टुरेणस्य नाभिमर्षि जमाना रजमः परस्मात् । मही साहसीमरस्प मायामामे मा हिंसीः परमे व्योमन् ॥४४॥ इसका विरुप मा, नि० नि० २०, अग्नि दे. है । मनार्थ- (अग्ने, परमे, व्योमन्, त्यष्टुः वरूत्रीम. परुणस्य, नाभि परस्मात रजमः, पागम्, मही, साहसीम्, भमुरस्य, भविं,मा,हि सीः) 'हे भग्ने ! उत्कृष्ट रणस्थानमें स्थापित रूपोंकी निर्माण करनेपाली वरुणकी 'नाभितुल्य रक्षणीय दिवस लोकसे जायमान बड़ी सहस्र मूल्य के योग्य सहतों उपकार साधक प्राणियोंको गामा देंगे पाली अविको मरा नष्ट करो ॥ ४४ ॥ यो अग्निम्मेरध्यापत शोकात्पृधिध्या खत वो दिपस्परि पेम मजाविश्वकर्मा जजान तम- इसका विरूप मा, मिपुर छ, अग्नि दे है। मंत्रार्य- (यः, अगः, घग्नेः, शोकात अध्यायत, उत, दिवः पृथिव्या, - ग्ने हेतु परिते वृणा ॥ ४५ ॥ " ३७७ १३ अध्याय। परि ) जो अग्निम्प, श्रज, प्रभापतिके शोकसे उत्पन्नहुआ और युलोकके पृथ्वीके शोकरूप अग्नि से उत्पन्न हुआ (विश्वकर्मा येन मना, जजान. अग्ने, ते, हेडः, तम्, परिणतु) मजापति ने जिस अज अर्थात् वागूपसे मजाको उत्पन्न किया है, हे चिति- अग्निदेव ! तुम्हारा क्रोध उस अजको त्यागे ॥४५॥ चित्रं देवानामुदंगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुण- स्याग्नेः । आमा चापापृथिवी अन्तरिक्ष सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ ४६॥ इसका विरूप प्र०, विराट् नामी पं० छ०, अग्नि दे. है। इसकी व्याख्या अ० ७ १ ४२ में होगई ।। ४६ ।। ढुम मा हिंसीढि पादं पशुधे सहस्राक्षो मेधार चीयमानः । मयुपशु मेधमग्ने जुपस्य तेन चिन्यानस्तन्यो निपीद मर्प से शुगृच्छतु यदि प्मस्तं ते शुगुच्छतु ॥ १७॥ इसका विरूप ऋ, वि० वा०५०,०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(अग्ने, मेधाय, चीपमानः, सहसाक्षा, इम, द्विपाद, पy, मा, हिसी ) हे अग्ने ! यज्ञ के निमित्त चयन कियेहुए सहनों नेत्रचाले सुवर्णखण्डरूप सहस्रनेत्र तुम इस पुरुपरूप पशु को मत पीडा देना और पीड़ा की इच्छा हो तो (मेधम्, मयुम्। पशुम्, जुषस्व ) पवित्र तुरङ्गवदन किम्पुरुष पशु को सेवन करो (तेन, सन्वः, चिन्वानः, निपीद, ते, शुक्, मयुम्, ऋच्छतु. यं, द्विष्मः, ते, शुक्, तम्, अच्छतु ) उसके सेवन से ज्वालारूप शरीर पुष्ट करतेहुए तुम यहां स्थित हो, तुम्हारा सन्ताप किम्पुरुप को माप्त हो, जिससे हम देष करते हैं तुम्हारा सन्ताप उसको माप्त हो १७ हम मा हिमीरकशकं पशु कनिकद वाजिनं वाजिनागौरमारण्यम तेदिशामि तेन चिन्या- नस्तन्यो निपीद गौर ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्त. ते शुगृच्छतु ॥१८॥ .
- - शुक्लयजुर्वेद। देवता उसके द्वारा पूर्वजन्म में यज्ञादि कर्म करके देवत्त को प्राप्त हुए तथा यज्ञ के.योग्य यजमान स्वर्ग को इसी के द्वारा प्राप्त हुए हैं (भारण्यम्, शरभम, से, अनुदिशामि ) चनका शरम नामक सिंहघाती भाठ चरण का मृग तुमको देता हूँ (तन्वः, तेन, चि- न्वान:, निषीद, ते, शुक्र, शरभ, ऋच्छतु, यम, द्विष्मः, सं, , शुक्र, ऋच्छत ) शरीर उसके द्वारा पुष्टि को प्राप्त करते हुए तुम यहां स्थित हो तुम्हारी ज्वाला शरभ के प्रति माम हो जिससे हम देष करते हैं उसको तुम्हारी ज्वाला प्राप्त हो ।। ५. ॥ . त्वं यविष्ठ दाशुषो न्,। पाहि शृणुधी गिरः रक्षातोकमुत त्मना। ५२ ॥ इसका उशना , नि० गाछ०, अग्नि देवता है। मंत्रार ( यविष्ठ, त्वं, गिरः, भृगुणधी, दाशुपः, नन्, पाहि, उत,आत्मना, तोकम, रक्ष ) हे अतिशयतरुण भाग्ने ! तुम हमारी स्तुतियों को श्रवण करो हवि देनेवाले यजमान के मनुष्यों की रक्षा करो और अपने यजमान के अपत्य की रक्षाकरो।॥५२॥ अपां स्वमन्सापाम्यपां त्वोमन्सादयाम्य- पान्ता भस्मन्सायाम्यपां. त्वा ज्योतिपि सायाम्यपांत्वायने सादयाम्यर्णधे त्वा सदने सादयामि समुद्रे त्वा सदने सादयामि सगिरे स्वा सदने सादयाम्पा स्वाक्षय सादयाम्यपां. स्वा सधिपि सादयाम्यपां.त्या सर्दने'सादपा- म्य॒पां खग मधस्थे सादयान्युपां त्वा योनौ सा- दपाम्यपांत्य पुरीपेसादयाम्यां खा पार्थसि सादयामि गायत्रेण त्या छन्दसा सादयामि नैष्टुभेन त्वा छन्दसा सादयामि जागतेन त्वा छन्दसा सादयाम्यानुष्टुभेन त्वा छन्दसा . : सादयामि पान त्या छन्दसा सापामि ॥५॥ इस कं० में २० मं हैं। सबका उशना ऋ० छं० १, . २ १३ अध्याय। . - - याजुष्यनु० ३, ५, ९, १३, या० १०, ४, १०, ११, ५.३, १४, १५, या०५०, ६, ७, २०, या, त्रि०, १६, १७, १८, या जु. ११, मासुर्यनु० और सबका इष्टका दे० है । मंत्रार्य-हे अपस्या नामक इप्टका (अपां, एमन, त्वा, सादयामि)जलों के स्थान में तुमको स्थापन करता हूं । हे अपस्या ! (ता, अपा, पोछन् सादयामि ) तुझको भोपधियों से स्थापन करता हूं । हे अपस्या (स्वा, अपा, भस्मन्, सादयामि ) तुमको अन में स्थापन करता हूं । हे सपस्या ( स्वा, भां, ज्योतिपि, सादयामि ) तुमको विधुत् ज्योति में स्थापन करता हूं। हे अपस्या (त्वा, अपां, भयने सादयामि ) तुझको भूमिमें स्थापन करता हूं। हे,अपस्या (त्वा.. अर्णये, सदने, सादयामि) तुझको माणके स्थान में स्थापन करता हूं । हे अपास्या (त्वा, समुद्र, सदने सादयामि ) तुझको मनके स्थान में स्थापन करताहूं। हे अपस्या (त्वा, सरिरे, सदने सादयामि)वुझको वाणी के स्थान में स्थापन करता हूं। हे मपास्या (त्या, अपांच सादयामि ) तुझको चक्षु के निवास में स्थापन करता हूं । हे अपस्या (त्वा, अपां, सधिपि, सादयामि) तुमको श्रोत्र में स्थापन करसाई । हे अपस्या (त्वा, अपांसदने सादयामि) तुमकोथुलोक में स्थापन करता हूं। हे अपस्या ( त्वा, अपां सधस्थ सादयामि ) तुमझो अन्तरिक्ष में स्थापन करता है । हे अपस्या (त्वा, अपां योनी सादयामि ) तुझको समुद्र में स्थापन करता हूँ । हे अपस्या (त्वा अपां पुरीपे, सादयामि) सुझको सिकता में स्थापन करता हूं । हे अपस्या (त्या, अपांपाथसि सादयामि) तुझको अन्नों में स्थापन करताहूं । हे अपस्या ( त्वा, गायत्रण छन्दसा, सादयामि) तुझको गायत्री चन्दके ममावसे सादन करता हूं । हे अपस्या (श्रेष्टुभेन, छन्दसा, त्वा, सादयामि ) त्रिष्टुप छन्दके प्रमावसे तुझको स्थापन करता हूँ । हे अपस्या (त्वा, जागतेन छन्दसा सादयामि) तुझको जगसी छन्दके मभावसे स्थापन करता हूं। हे अपस्या (त्वा अनुष्टुमेन छदसा - - २ शुक्लयजुर्वेद सादयामि) तुझको अनुष्टुर चन्दके प्रभाव से स्थापन करताहूं. हे अपस्या (त्वा, पांकन छन्दसा सादयामि ) तुझको पंक्ति पन्दके प्रभाव से सादन करता हूं ।। ५३ ॥ अयं पुरो भुनस्तस्य माणो बचायनो बसन्तः प्राणायनो गायत्री बामन्ती गोयन्यै गायत्रं गायनापाशुरुषाशोस्नियत् त्रिवृतो रथः भारं वसिष्ठ पिः मजापतिगृहीतया त्व माणं गृहणामि पूजाभ्यः ॥ ५ ॥ इस कं. में १० म० हैं । सबका उशना ऋ०, छन्द-१ दैवी त्रि०, २ याजु: नु० ३, ८, या० पिण, ४, ५, ६, या० गा० ९,७, दै० ५० १० मार्ची गा है। और सबका माणभृदिष्टका. दे है। मंत्रार्थ- हे इष्टका जो ( अयं, पुरम, भवः, पाणः, तस्य, भौवायनः, प्राणायनः, वसन्तः, वासन्ती, गायत्री, गायव्य गायत्रं गायत्र्याद, उपांशुः, उपांशोः, त्रिन, त्रितः, स्थन्तरम्, वसिष्ठः, पिः ) यह मथम होनेवाला अग्नि है । इसके रूपवाली है प्राण उस भुव नाम अग्निका समानहै प्राणका पुत्र वसन्त ऋतु है वसन्त की सन्तान गायत्री है गायत्री से गायत्र साम रत्पन्न है गायत्र सामसे उत्पन्न उपाशुग्रह है उपाशुग्रहसे उत्पन्न निवृत्स्योम त्रिवृत्तीम से निर्मित स्थन्तरसाम, सर्वजन्तुओं में अधितिल, सर्वाधार वशिष्ठ रूप माण ज्ञाता । हे इष्टके ( प्रजापति गृहीण्या.. स्वया, प्रजाभ्यः, प्राणम्, गृहणामि ) मजापति के द्वारा ग्रहण कीहुई तुम्हारी सहायतासे में मजायों के निमिच नीरोग माण- लाम के निमित्त ग्रहण करता हूं ॥५४॥ अपं देतिमा विश्वकर्मा तस्य मनोवैश्वकर्मण ग्रीमो मानसस्ट्रिप्ट ग्रेप्मी त्रिष्टुभःस्वारम् । स्वारादन्तर्यामोऽन्तर्णमात्पञ्चदशःपञ्चदशाद् बृहद् भरमाजक्राषिः पूजापतिगृहीतया स्वया . . मनो गृणामि पूजाभ्यः ।। ५५ ।।
१३ अध्याय इस कं० १० मं० हैं । सबका उशना ऋ० । छं० १-२ या. १०३, ५ दै० ५०, ४दै० १०६,५९ या गा० ७ यात्रुप्यनु०, १० प्रा० गा० है, देवता सबका मनोभृदिएका है । मंत्रार्थ- यह इष्टका (विश्वकर्मा, अयम, दक्षिणा) विश्व का निर्माता विश्वकर्मा नाम से प्रसिद्ध यह दक्षिण दिशा में प्रार्यावर्च से बहन करती है ( मनः, सस्य, वैश्वकर्मणं, मन उस विश्वऊमी का अपत्य है ( ग्रीष्मः मानसः ) ग्रीष्मस्तु मनका अपत्य है ( त्रिपुर गैष्मी विनुभः स्वारं ) त्रिष्टुइन्द ग्रीष्म से प्रकट है, त्रिगुप्छन्द से स्वारसाम प्रकटहुआ (स्वारा अन्तर्यामः ) स्वार सामसे अन्तर्यामि ग्रहहुआ ( शनार्या मात् पञ्चदशः ) अन्तर्याम से पंचदशस्तोम हुमा ( पञ्चदेशात राहत ) पञ्चदशनाम से वृहद साम हुआ ( भरद्वाजः प्रापिः ) अन्न का धारण करनेवाला मन सचेतन है । हे इष्टके (प्रजापतिगृहतिया स्वया मजाभ्यः मनः गृहणामि ) प्रजापत्ति द्वारा सादर ग्रहण कीहुई तुम्हारी सहायता से मजायों का मन ग्रहण करता हूं ॥१५॥ अयं पश्चाद विश्वव्पचास्तस्य चक्षुधश्चच्यचसं चाक्षुष्यो जगती वापी जगत्या भक समम् प्रकसमाच्छुकः शुझात्तदशः सप्तदशा द्वैगुपं जमदग्निीपिः प्रजापतिगृहीता स्वया पाहणामि पूजाभ्यः॥ ५६ ।। इस कं० में मंत्र हैं। सबका उशना ऋ००-२याजुप्पनु, २ या ३० ३, ४, ६ दै०५० ५, ७, ९, या० गा०, ८ याजुप्यु० १० मा० गा० और देवता सबका चक्षु दिष्टका है । मंत्रा-- (भयं, पश्चात, विश्वव्यचाः, चक्षुः, यस्य, वैश्वव्यचसम्, वी, चाक्षुष्पा, जगती, वापी, जगत्त्यै, नक्सामम्, अवसामात, शुकः, शुझाव, सप्तदशः, सप्तदशाद, बैरूप, जमदग्निपिः) यह पथिममामी ने उस राव से उत्पन्न है, ऋतु चक्षु से मकट है, जगवीछन्द वर्षाऋतु से भकट है, जगतीछन्द से उत्पन्न ऋक्साम ;
शुक्लयजुर्वेद । अथ चतुर्दशोऽध्यायः॥ - जिसम चितिपकरण का वर्णन है ऐसे त्रयोदश अध्याय में इष्टका सम्भरण के मंत्र कहे हैं, अब चौदहें अध्याय में दूसरी तीसरी और चौथी चिति के मंत्र कहेजायेंगे- सुवक्षितिष्टवयोनिर्धवासि ध्रुवं योनिमासीद, साध्या। उख्यस्य केतुं प्रथमं जुषाणा अधिना ध्व' सादयतामिह त्यो १ ॥ इसका उशना , निन्दापी त्रिष्टुप् छन्द, अश्विनी देवता है। मंत्रार्थ- हे इष्टके तुम (ध्रुवक्षितिः, धुवयोनिः; उख्यस्य, मयमम्, केतुम्. जुपाणा, ध्रुवा, मसि, सुवम् साधुपा, योनिम्, भासीद, देवानां, अध्वर्ण, इह, त्वा, सादयताम् ) स्थिर निवास वाली अंचल कारणवाली उख्य अग्नि के पहले, मम चितिरूप स्थान को सेवन करती हुई स्थिर होयो, स्थिर रेतः सिग्वेला नामक श्रेष्ठ स्थानपर बैठो, देवताओं के अध्वर्यु अश्विनीकमार इस रेतः सिवेला पर तुमको स्थापन करें ॥१॥ कुलापिनी घुतवती पुरैन्धिः स्याने सींद सईने पृथिव्याः। अभि त्वा रुद्रा वसयो गृणनिस्वमा ब्रह्म पीपिहि सौभगाप अश्विनाएं साद- यतामिह त्या ॥२॥ इसका उशना ऋ०, नि० ग्रा० ३० छ, अश्विनौ देवता हैं। मंत्रार्य-दे इष्टके ! (कुनायिनी, पृतवती, पुरन्धिः, पृथिव्याः स्यौने, सदने, सीद, रुद्राः, वसवः, त्वा, अभिगृणन्तु, इमा, मझ, सौमगाय, पीपिदि, अश्विनी, अचई, इह, स्वा. सादय. ताप) पक्षी के योसले के प्राकारवाली, होमेहुए धन से युक्त " नीचे स्थित प्रथम पिति इष्टकाओं को धारण करनेवाली तुम पृथ्वी के मुखदायक स्थान में स्थिम होमो, ग्यारह रुद्र पाठ वसु तुमको स्तुत करें, इन मंत्रों को ऐश्वर्य के निमिच दाढ़े दो यज- ८ - - . १४'अध्याय। ३८७ मान का माग्योदय हो, अश्विनीकुमार अध्ययं इस स्थल में तुमको स्थापित करें ॥२॥ स्वैर्ददक्षपितेह सौंद दे॒वाना मुम्ने बृहते राप पितेवधि सूनव आ मुशेवा स्वावेशा तुन्या संयिशस्व । अभियनाध्वर्य सांदय- 'तामिह त्या ॥३॥ इसका उ० प्र०, वि• मा०, ०७०, अश्विनौ देवता है। मंत्रार्थ-हे इष्टके ! ( दक्षपिसा, देवानाम्, रणाय, बहते, सुम्ने, इह, सैः, दौः, सीद) बल की रक्षा करनेवाली तुम देवताओं के रमणीय बड़े मुख के निमित्त इस दूसरी चिसि में अपने वलों से- स्थित दोमो, और (श्रा, सुरोका, एधि, इव, पिसा, सुनचे, स्वा. वेशा, तन्वा, संविशस्त्र ) सदा सुख की देनवाली हो निसाकार पिता पुत्र के निमित्त मुखदायक होता है, भौर मुख प्रवेशवाले शरीर के साथ यहां भवस्यान करो. ( मध्वर्य, अश्विना, इह, स्वा, सादयताम् ) अध्वर्यु अश्विनीकुमार इस स्थान में तुम को स्थापन करें ॥ ३ ॥ पृथिव्याः पुरीपमुस्यामानामे तात्या विश्व आर गुणन्तु देवाः स्तोमपृष्ठा प्रतवतीह सौद मजायनुस्मे द्रविणा यजस्व अश्विनाध्वसौ- दयतामिह त्वा ।। ४॥ : इसका उशना :; भुरिक प्रा०० छ, माधिनौ,दे है। मंमार्थ-(पृथिव्याः, पुरीष्यम्, भप्सोनाम, अति ताम्, त्वा, विधेदेवाः, अभिगृणन्तु, सोमपृष्ठाः, घृतवती, इहासीद, मजापत द्रषिणा. भस्मे, प्रायजस्व, अध्वर्य, अश्विना इहात्वा सादय- ताम् ). हे इष्टके ! तुम पहली चितिकी पूरक भप्स कहिये जलके कारणीभूत रसाप हो, उस तुझको सम्पूर्ण देतता सव. ओरसे रतुग करें, प्रित प्रादि स्तागे रथन्तरादि पृष्ठ जिसमें पढ़ेजाते हैं ऐसी हवन होनेयोग्य घृत से युक्त तुम इस दूसरी चिति में ठहरा - " -- - - शुक्लयजुर्वेद । को इस दूसरी चितिम स्थापन करो। (ऋतुभिः सन. विधायिः' सज, यमुभिः,,सतः, वयोनाङ्कः, देव, सता, त्या, वैश्वानराय समये, अध्यं अश्विना, वा, १६ सादयताम् ) हे इष्ट के फतु- शोंके साथ प्रीतिमान् जलोंके साथ प्रीतिमान वसु भोंके साथ प्रीतिमान प्राणोंके साथ देवताओं के साथ प्रीतिमान तुमको विश्व के हितकारी अग्निदेवताकी ताप्ति निमित्त स्थापन करता हूं, अव, भावनीकुमार तुमको इस दूसरी चितिमें स्थापन करें, (मायुभिः, सजूः, विधाभिः, सजूः, रुदैः, सजूः, वयोनाधैः, देवैः सजः, स्वा पैश्वानराय अग्नये, अवयं अश्विना, त्वा, ३६, सादयताम् ) हे इष्टके ! ऋतुओंके साथ प्रीतिमान जलोंके साय मीतिचाले रुद्रोंके साथ प्रीतिवाले प्राणों के साथ देवताओं के साथ प्रीतिवाले चुमको विश्वके हितकारी अग्निदेवताके निमित्त स्थापन मारता अध्वर्यु भाविनीकुमार तुमको इस दूसरी चितिम स्थापन करें । (ऋतुभिः,सतः विधामिः,सजः,प्रादित्यैः, राजू, वयोनाधः, वैः, सजः, वा, वैश्वानराय, अग्नये, अध्वर्य, अश्विना, वा, इह, सादयनाम ) ऋतुओं के साथ प्रीतिवाले जलों के साथ भीतिवाले शादित्य के साथ भीशिवाले माण देवताओं से प्रीति चाले वुमको सब विश्व, के. हिराकारी अग्नि देवता की प्रीति के निमित्त स्थापन करता हूं, अध्वर्य, अश्विनीकुमार तुमको इस दूरी चिति में स्थापन करें। (ऋतुभिः, सजः, विधामिः, सनः विश्वैः वैश्वदेवैः, सतः, योनाङ्कः, देवैः सजः त्वा, वैश्वानराय अग्नये, अवर्ग, अश्विना त्वा इह सादयताम् ) हे इष्टके ! अतुओं से सचिरा प्राणोंसे रोविन सम्पूर्ण देवताओंसे सेवित प्राण देवताओं से सेवित तुमको सब जगत्के हितकारी अग्निदेवताकी प्रीतिके निमिन ग्रहण करता हूं, अवयू अश्विनीकुमार तुमको इस दूसरी चितिमें स्थापन करें ।।७।। । प्राणमें पायानम्मे पाहि ध्यानम्मे पाहि ' चक्षुर्म उा विताद्वि श्रोत्रंम्मे श्लोकय । अपः। . .
. - . . १४ अध्याय। पिन्वौपधीजिन्ध दिपाय चतुष्पात् पाहि द्वियो वृष्टिमेरेय ॥८॥ इसक०४ मं० । सबका विश्वदेवा ऋ०. ६, ८,०७० १, ३, ७, ९, दै० ५०, २, ५, दे, त्रि० १० दे० ज०, ४० गा. और देवता ६, ८, माप, 1, ३, ७, ९, वायुराप, २,५, वायु, १०, माप, ४ वायु है । मंत्रार्थ-दे इष्टके ! तुम ( मे मावं पाहि, मे अपानं पाहि, मे, ज्यान, पाहि ) मेरी नाभिसे ऊपर चलनवाली माणवायुकी रक्षा करो मेरी नाभिसे नीचे चलनेवाली अपान वायुकी रक्षाकरो मेरे शरीरकी सन्धित वायुकी रक्षाकरो . हे इष्टके ! तुम ( मे, चक्षुः, उा. विभाहि, मे भो श्लोकय ) मेरे नेत्रों को विस्तार्णि दृष्टित देखने में समर्थ करो. मेरे कर्णन्द्रिय को बहुत शब्दों के श्रवण में समर्थ करो। (अर पिन्य औषधी, जिन्य, द्विपाद, अव, चतुपात पाहि, दिनः, टिम्, एरय') । हे इष्टके ! सुम्हारे प्रसादसे यह पृथ्वी सृष्टि के जनस सिंनिनदो, श्रीपधियों को वप्त करो द्विषाये माणी मनुष्यों की रक्षा करो, चौपाये पशुओंकी रक्षाकरो, धुलोकसे वर्षाको सब और प्रेरणा करो। मूर्हा पर्यः प्रजापतिश्छन्दः पुत्रं वो भन्द छन्दौ विशम्भो क्योधिपतिश्छन्दो विश्वकर्मा वर्यः परमेष्ठी छन्दो यस्तो आयो विवलं छन्दो राणियों विशालं छन्दः पुरूंपोवयंस्तन्द्रं छंदों। व्याघो थयो नाधृष्ट छन्द: सियो घदछदि. पाठवाड़ चयों बृहीछन्दै उक्षा पर्यः फकुपछन्द अपभोवः सतो वहती छनः ॥९॥ इस कमें १९ मंत्र हैं, सबका विश्वदेवा ऋ० छिं०-१,६,१०, १. १७, याजुपी पं०, २, ५, ६, ७, ८, १३, १४, १६, १८, १९, या०वृ०, ९, ११, १५, याजु नु०, ४, १२ या० ज० और सय का लिङ्गोक्त देवता है । मंत्रार्थ-(मजापतिः छन्दः, वयः, सूर्दा) मजापति ने गायत्री छन्द होकर वयद्वारा प्रधान (ब्राह्मण) जाति. श्छन्ः - । से रक्षा शुक्लयजुर्चद । की रचना की है स. वयः, मपन्दं, छन्दः) दुश्व करनेवाली क्षत्रिय अवस्था प्रजापति हुए. सुख देनेवाल अनिरुक्त छन्द प्रजापति हुए (श्राधपतिः, विष्टम्मः, वयः, छन्दः) अधिक पालन करनेवाले जगत् के स्तम्भनकर्ता जापाने संसाररूप पशु सम्बन्धी अवस्थावाले छन्द हुए (परमेष्ठी, विश्वकर्मा, क्या, छन्दः) परमपद में स्थित होनेवाले सबके सष्टा प्रजापति वय द्वारा छन्दहुए अर्थात् प्रजापति ने छन्द के प्रभाव से विविध कर्मचारी 'सेवावृत्तियुक्त' शूद्रजाति उत्पन्न की (वस्तः, विवलम्, छन्दः, षयः) प्रजापति ने अजा वकरी जानि को एकपद नामक छन्द से उसी अवस्था के अनुसार उत्पन्न किया (विशाल, बन्दः, दृष्णिम्, क्यः ) द्विपदा गायत्रीरूप छन्द होकर सेचन में समर्थ मेप पशु को उसी अवस्था से उत्पन्न किया ( तन्दं. छन्दः, पुरुप, चयः ) पंक्ति छन्द होकर जारोहुए किन्नर की अवस्या को उत्पन्न किया (भमाएं, छन्दः, व्याघ्र, वयः ) विराट् छन्द होकर बाहुए व्यान पशु को उस अवस्था से प्रजापति ने उत्पन्न किपा (बदिः, छन्दः, सिंहम्, ययः) प्रति जगसी मादि बन्द होकर जातेहुए सिंह शो उस भवस्था से इतन्न किया (बृहनी छन्दः, पावाद, नयः ) वृहत्ती छन्द होकर जाते हुए पांच वर्ष के पीठार भार वहनेवाले पशु को अवस्था द्वारा उत्पन्न किया (क- कुस्, छन्दः, उक्षा, वयः) आदि अन्त में अष्ट अक्षर के दो चरण मध्य मध्य का वारह अक्षर का इसप्रकार के ककुर छन्द होकर जागहुए उता को उसी अवस्था से उत्पन्न किया ( सनोवृहत्ती, वन्दः, ऋपमम्, षयः ) बारह अक्षर के त्रिपादवाले सतावृहसी बन्दरूप से गमन करते, भल्लकादि को उसी अवस्था से उत्पन्न किया ।।.९.॥ अनवान्यः पंक्ति छन्दो धेनु यो जातीछंद नवियस्त्रिपू । छन्दों द्वित्यवादपों विराह छन्दः । पंचाधियों गायत्रीछन्दचिनुत्सो वर्ष - १५ अध्याय उटिक छन्दस्तुपवाड्यानुष्टुएछन्दः ॥१०॥ ऋष्यादि (१) ॐ अनध्यामिति विनियोगादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(पंक्तिः, छन्दः, अनवान, वयः ) पंक्ति छन्द होकर मासेहए वलीबद को उस भवस्था से उत्पन्न किया (जगती छन्दः, धेनु, वयः ) जगती छन्द होकर गमन करतेहुए.धेनु को वय से भाप्त किया ( विग्रुप् छन्दः, त्र्यविः, वयः) त्रिगुप्छन्द होकर गमन करते हुए अठारह मासके पशु को वय से उत्पन्न किया (विराट् छन्दः, दित्यबाट, वयः) विराट् छन्द के रूप से गमन करते धान्य वहन करनेवाले को उसी अवस्था से उत्पन्न किया ( गायत्री छन्दः, पंचाषिः, वयः ) गायत्री छन्द से गमन करते ढाई वर्ष के पशु को उसी अवस्था से उत्पन्न किया ( उणिक छन्दः, निवत्सः, वयः) सणिक छन्द होकर गमन करते तीन चर्प के पशु को उसी अवस्था से उत्पन्न किया' ( अनुष्टुए उन्दः, तुर्यवाह, पयः ) अनुप्छन्द होकर गमन करसे चार वर्ष के पधु को उसी अवस्थासे उत्पन्न किया ॥ १० ॥ इन्द्राग्नी अव्यंधमानामिष्टका दृध हतं युवम् । पृष्ठेन द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं च पिर्याधसे ।।१।। इसका विश्वेदेवा ३०, मुरिगनुष्टुप्छन्द, इन्द्राग्नी तथा स्वय मारणा देवता है । मंत्रार्थ-(इन्द्राग्नी, युवम्, अव्ययमानाम, इष्टकाम्, 'हत ) हे इन्द्राग्नी दोनों देवताओं तुम दोनों अचल भङ्गगारहिस स्वयमातणा इष्टका को रद करो। हे स्वयमातृणा इष्टके ! (पृष्ठेन, चावापृथिवी, च, अभारितम्, विवाधसे ). तुम अपने ऊपर के भाग में पृथ्वी स्वर्ग और अन्तरिक्ष को वापित करने में समर्थ होतो ॥११॥ विश्वकर्मा त्या सादयत्यन्तरिक्षस्य पृष्ठे व्यच-: स्वती प्रथस्वतीमन्तरिक्षं पच्छान्तरिक्ष र हान्तरिक्षमा हिंसी। विश्वस्मै प्राणायाणा- नार्य व्यानायौदानार्य प्रतिष्ठायै चरित्रायवायु- . शुक्लपजुर्वेद । गाभिपातु मद्या स्वस्त्या छर्दिपा शतमेन तपा · देवतयानियस्वंद् धृषामाद ।। १२॥ इसका विश्वकर्म कपि, विकृतिश्छन्द, वायु दे है। मंत्रार्थ- हे स्वयमावणे ! (विश्वकर्मा, वा, व्यवस्वतीम्, प्रथातीय, अन्तरिक्षस्य, पृष्ठे, सादयतु ) विश्वकर्मा प्रजापति तुम भवकाश युक्त विस्तारवाली को अन्तरिक्ष के ऊपर स्थापन करै । हे इष्टके ! तुम (विश्वस्मै, माणाय, श्रपानाय, व्यानाय, उदानाय, प्रतिष्ठाये, परिमाय, अन्तरिक्षम्, यच्छ, अन्तरिक्ष, छह, अन्तरिक्ष, मा, हिसीः ) सम्पूर्ण प्राणियों के प्राण अपान व्यान उदान की कृतिलाम अर्याद घायुबल की दृढता के निमित्त, स्वगृह की प्रतिष्ठा और शास्त्र प्राचरण करने के निमित्त तुम अन्तरिक्ष को गन्धर्वादि अप्सराओं के धारण योग्य करो, अन्तरिक्ष को दृढ करो, अन्तरिक्ष को मस पीड़ा दो ( घायुः त्वा, मा. स्वस्त्या, शरामेन, चर्दिपा, अभिपातु, सया, देवतया, अरिस्वत, ध्रुवा, सीद ) वायु देवता तुमको वढी यो गक्षेम की सम्पत्ति से शुभकारी विशेष तेज से सब भोर से रक्षा करै तुम्हारा जो अधिष्ठात्री देवता है उस देवता से अनुग्रहीत हुई मदिरा की समान निवल स्थित होयो ।। १२॥ राश्पसि माची दिग्विरामि दक्षिणा दिक सम्राटेसि पृप्तीची दिक स्वराइस्युदर्दीची दिगधि परन्पसि हुती दिफ ।। १३ ।। इस ६० में ६ मंत्र हैं। सबका विश्वदेव झा, छः-१ या. गा०, २, ३, या० नु०, ४, याजुप्यु०५ या० ० है मौर दिग्वे देवगा है । पार्थ-हे दिश्या इष्टके ! नुम (राड़ी, प्राची, दिक, असि ) राजमान होती पूर्व दिशा गायत्रीरूप हो) विराट्, दक्षिणा दिक, प्रसि) नानामकार से विराजमान तुम दक्षिण दिशा ': त्रियुएफप हो । ( सम्राट्, मसीची दिक, प्रसि ) भलीमकार वि. राजमान तुम पश्चिमदिशा जगतीरूप हो। (स्वराट, उदीची दिक मसि.) स्वयं विराममान तुम उत्तरादिशा भनुपरूप हो (भधि:
११ अध्याय। पत्नी, बृहती, दिक, असि ) स्वयं अधिक रक्षा करनेवाली तुम पंक्तिरूप हो तुमको स्थापन करता हूँ ॥ १३ ॥ विश्वकर्मा त्या सादयत्वन्तरितस्य पृष्ठे ज्योति धमतीम् । विश्वस्मै माणार्यापानार्य यानाप विश्व ज्योतिर्यच्छ । वायुप्टेधिपतिस्तया देवत: यारिस्वद् धृवासी ॥१४॥ इसका विश्वेदेवा ऋ०, शक्वरीछ ०. वायु देवता है । मंगाय- हे इष्टके : (विश्वकर्मा, ज्योतिष्मती, त्वा, अन्तरिक्षस्य, पठे, सादयतु, विश्वस्मै, प्राणाय, अपानाय, व्यानाय, विश्व ज्योतिः, यच्छ, चायुः, रो, अधिपतिः सया, देवतया, अस्मिन, धृषा, सीद ) मजापति वायुरूप तुझको अन्तरिसके ऊपर स्थापन करें, यजमानके सम्पूर्ण प्राण अपान व्यान के निमिस सम्पूर्ण ज्योति को दो, चायु.देवसा रोग.स्वामी है उस अधिष्ठात्री देवता के प्रभाव से समष्टि प्राण की समान इस अग्निचयन कार्य में निश्चल ठहरो १४ नभश्च नभस्पश्च, पापिकातू भारततः इले- पोमि कल्पना . पाषांपृथिवी फल्पतामाप ओषधय. कल्पतामग्नयः पृथग मम पैटाय सर्वताः । ये आग्नयः समनसोन्रा द्यावापृथिवी हमे वार्षिकावर अभिकल्पमाना इन्द्रमिव देवा अभिसंविशन्त तया देवतयारिस्पद ध्रुवे. सीदतम् ॥ २५॥ इसका विश्वेदेव ऋ०, स्वराडतिकृति ई०, ऋषवं देवता है। मंत्रार्थ-(नभः) श्रावण ( नभस्य) भादों शेष की व्याख्या १३ १.२५ में होगई ॥१५॥ हपश्चार्जश्च शारदावतं. अग्नेरन्तः इलेपोसि कल्पैताम् द्यावापृथिवी कल्पन्तामांप भोपधयः कल्पनतामग्नयः पृथक् मम पैठाय सततः। ये. अग्नयः समनसोनारा, थानापृथिवी इसे ... - .
३९६ शुक्लपजुर्वेद । शारदावतु अभिकल्पमाना इन्द्रमिव देवा अभिसंविशन्तु तो देवतयाङ्गिरस्वट् ध्रुवे सौदतम् ।। १६ ।। इसका विश्वेदेवा ऋ०, मुरिगुत्कृति छन्द, ऋतु देवता है। मैत्रार्थ-(इंपः ) भाश्विन (ऊर्जा) कार्तिक ( शारदा शरद (अ ) ऋनु के दो अवयव । १० १३ । ० २५ में शेष की व्याख्या होगई ॥ १६ ॥ .'. आयुम्म पाहिमाणम्पाद्यपान में पाहि च्यानं में पाहि चक्षुमें पाहि प्रोत्र में पाहि वाचम्मे पिन्य मनों मे जिन्वात्मानम्मे पाहि ज्योति यच्छ॥ १७॥ इस कं. में १० मंत्र हैं। सबका विश्वदेव ०; छं. ३-९, देवी त्रि०, १,२,४ से १० तक दे०५०, सबका लिंगोक्त दे हैं। मंत्रार्थ-(मे, भायुः, पाहि, मे, पाणं, पाहि. मे, अपानं, पाहि, मे, व्यान, पाहि, मे, चक्षुः,पाहि, मे, श्रोत्रं, पाहि, मे, वाचं, पिन्व, मे, मनः, जिन्व, मे, मात्मानं, पाहि, में, ज्योतिः, पाहि) हे इष्टके ! मेरी भायु की रक्षा करो, मेरे माण की रक्षा करो, मेरे अपान वायु की रक्षा करो, मेरे ध्यान वायु की रक्षा करो, मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करो, मेरे दोनों कानों की रक्षा करो, मेरी वाणी को कामनाओं से पूर्ण करो, मेरा मन प्रसन्न करो, मेरे शरीर की पारध समाप्तिपर्यन्त रक्षा करो, मेरे प्राणकप तेज की रक्षा करो ॥ १७॥ मा छन्दः प्रमा छन्दः प्रतिमा छन्दों अमीषय- छन्दः पंक्तिश्छन्दः पुष्णिक छन्दो वृहती इन्दौनुष्टुप् छन्दो विराट् छन्दौ गायत्री छन्द स्त्रिष्टुप छन्दो जागती छन्दः ॥ १८ ॥ इस कं. में १२ मंत्र हैं। सबका विश्वदेव ऋ०, छं०१,२५, ३८, २२ दैव्यनुप २, ५, ६, ९, ११, १६, १९, २०, - १४ अध्याय। . . हूं - २३, २४, दै० ४०, ३, ७, ८, १०, १२, १३,, २१, २५, २६, २७, ३०. ३५, दै०६०.४, १५, १७,२८, २९.३१.३२, २६. देवि और सबका लिङ्गाक्का दे है। मंत्रार्थ-(ममा इन्द।) हे इष्टके ! अन्तरिक्ष, लोक को मनन करते तुमको स्थापन करता । (प्रतिमा, छन्दः) प्रतिकारक घुलोकके चादकरूप हो. प्रतिमा छन्दको मनन करते तुमको स्थापन करता हूं. (अस्रीवयः छन्दः) पतनशील अन्न त्रिलोकोप छादक हो, अस्त्रीवय छन्दको मनन करते तुमको स्थापन करता हूं (पंक्तिश्छन्दः उष्णिक्' छन्दः, वृहतीछन्दः, मनुाप्छन्दः, विराट, छन्दः, गायत्री छन्दः निप्छन्दः, जगीछन्दः ) पंक्ति छन्दको मनन करते तुमको स्था- पन करता हूं, उपिएक छंदको मनन करते तुमको स्थापन करता हूं, सहतीछेदको मनन करो तुमको स्थापन करता हूं अनुष्टुप्छदं को मनन करते तुमको स्थापन करता हूं, विराट्छंदका मनन करते तुमको स्थापन करता हूं, गायत्री छंदको मनन करो तुमको स्था- पन करता हूं. त्रिगुप्छन्द को मनन करसे तुमको स्थापन करता हूं जगती छंदको मनन करते तुमको स्थापन करता हूं तुम इन सब की रूप हो ।। १८॥ पृयिवी छदौन्तरिक्षमचन्द्रोद्यौग्छन्दः समारबंदो नक्षत्राणि छन्दों वाक् छन्दो .मनश्छन्दः कृषि- छन्दो हिरपयछन्दो गौश्छन्दोजा इन्दों श्य छन्दः ॥ १९ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(पृथिवी, छन्दः, अन्तरिक्ष, 'छन्दः, द्यौः, छंद. समाः छन्दः, नक्षाणि छन्दः, वाक छन्दः मनः छन्द: कपिः छंदः, हिरण्यं छंदा, गौः छन्दः, अनाः छंद, अश्वः छंदः) पृथिवी देवताबाले छन्दको ममन करते यह इष्टका स्थापन करता हूं.अन्तरिक्ष देवतावाले छन्दको मनन करो यह इष्टका स्थापन करता हूं. युदेवतावाले छन्दको. मनन करते यह इष्टका स्थापन करता हूं, वर्ष देवताबाले छन्दको मनन करते यह इएका स्थापन . - शुक्लयजुर्वेद । करता हूं, नक्षत्र देवतावाले छन्दको मनन करते यह इष्टका स्थापन करता हूं, वाग्देवता वाले छन्दको मनन करते यह इष्टका स्थापन करता हूं, मनदेवता वाले कृपि देववादाने हिरण्य देवतावाले. गौ देवनावाले मजा देवनाबाले० अश्वदेवशावाने छन्दको मनन फरते यह इष्टका स्थापन करता हूं ॥ १९ ।।. अग्निपत वातौदेवता सूर्यो देवता चन्द्रमा देयता वसवो यता रुद्रा देवता हत्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता वृहस्पतिवतेंद्रो देवता परुणो देवता ॥२०॥ इसका विश्वदेवं ऋ०, भुरिरमाही त्रि०० अग्न्यादय दे' है। मंत्रार्थ-(अग्निा, देवता, वारा: देवता, माँ देवता, चंद्रमा देवता, वसवो देवता,रुद्राः देवता, आदित्या.देवता मरुतो देवना विसंदेवाः देवता वृहस्पतिःदेवता इन्दो देवना वरुणः देवता) भग्नि देवताको मगन करते यह इष्ट का स्थापन करता ई. वायु देवता० करते सूर्य देवताको मनन करते यह ०,चन्द्रमा देवताको मनन करते यह • वसुदेवनामोंको मनन करते यह०, रुद्र देवताओंको मनन करते यह धादित्यदेवताओंको मनन करते मरुत्देवताओंको मनन करते यह विश्वदेवां देवताओं को मनन करते यह० बृहस्पति देवताको मननं करते यह०; इन्द्र देवताको मनन करते यह इष्टका स्थापन करता हूं ॥२०॥ म मि राड ध्रुवासि धरुणां धस धरणी । आयुपेत्वा वर्चसे त्वा कृष्य त्या क्षमाय स्वा :२१॥ 'इसका विश्वदेव ऋ०, निवृ० नु०.६०, और प्राणदेवता है। मंत्रार्य-(राट् पूर्धा, असि, धरुणा, धुवा, भासे धी, धरणी श्रायुपे. त्वा, वर्चसे, वा अप्य, वा, क्षमाय, त्वा.) हेवालखि- ल्य ! तुम मकाशवार पूर्धाको समान उत्तम हो, धारण इतु और स्थिर हो, तुम ध्रुवरूपसे इस स्थलको धारण करो, धारण करनेवाली शमिरूप हो, तुम धरणस्विरूपसे इस स्थलको - . . १४ अध्याय। ३९९ : धारण करने में तत्पर होमो, आयुद्धिके निमित तुमको स्थापन करता हूं, कान्तिके निमित्त तुमको स्थापन०, अन्नकी वृद्धि के निमित्त तुमको कल्याणकी वृद्धि के निमित्त तुमको स्या- पन करता हूं ॥ २१ ॥ यन्त्री राइ यल्युसि यमनी वासि धरित्री। इप स्पोज त्वां रय्य त्या पोपीय त्या लोकन्ता : इन्द्रम् ॥ २२॥ इसका विश्वदेव ऋ०, परोणिक छ, माणदेवता है। मंत्रार्थ हे बालखिल्ये:! तुम ( यंत्री राट्, यंत्री, यमनी, असि, ध्रुवा, धरित्री, असि) नियमसे युक्त विराजमान हो इस स्थान में -वि. . राजमान हो, स्वयं भी नियमवाली सबकी नियम करानेवाली हो स्थिर धरणी भूमिरूप हो, हे वालखिल्ये ! (इपे, त्वा, जें वा, रय्यै त्वा, पोपाय त्वा,) अन प्राप्तिके निमित्त तुमको स्था- पन करता हूं,बलमाप्तिके निमित्त तुमको धनप्राप्तिके निमित्त तुमको स्थापन करता हूँ धनपुष्टि के निमित्त तुमको स्थापन करता हूं २२, आशुस्ति भान्तः पंचदशी व्योमाससदशो धरुण एकबिधशः प्रर्तृतिरष्टादशस्तपो नवद् शोभीयुत्ता संविधशो वर्ची द्राविधशःसम्भ. रणत्रयोविशो योनिश्चतुर्विशः गी: पंच- विधश ओजस्टिंगवक्रतुरेकत्रिशः प्रतिष्ठा प्रयस्त्रियंशो मृध्नस्य विष्ट चतुस्त्रिशोनाक: पदधिशो विवोंष्टाचत्वारिधशो च तुष्टोमः ॥ २३ ॥ '. इस कं में १८ मंत्र है । ऋ० १ विश्वदेव और सबका विश्व कर्मा है,०-१.१०, २, ३, ६, १०, ११, १३, १८ दैनिक ४,५, ७, १४ दै० ज०८, १२, १६३०५०, ९, १७ याजुष्य १५ या०५०, सबका लिंगोक्त देवता है। मंत्रार्थ-हे इष्टके ! (त्रिद माशः) त्रिन स्तोम तथा त्रिलोक में व्यासं वायु देववा शुक्लयजुर्षद। को मनन करो बित् आशुरूप तुमको इस स्थान में स्थापना । करता हूं, ( पञ्चदशः भान्तः) पन्द्रह दिनमें हास और वृद्धिपाने । पाल पंचदश कलाफ भापति चन्द्रज्योतिको मनन करते तुमको सादन करता हूं ( व्योमा सप्तदश ) अनेक प्रकार से रक्षा करने बाला मजापसि सप्तदश स्तोमरूप है, (धरुणः एकविंशः) धारण कती प्रतिष्ठाप, एकविंश सोम है (मतात अशादश)सम्ब- सर बारह महीने पांचऋतु एक सवत्सरइन अठारह अवयववाला है (तपः, गवदश. ) तपझप नवदश स्तोम है, ( अभीवर्सः, स- विशः) समावृत्तिाप सचिशस्तोम है, (वर्चः, विरा) विशप चल देनेवाला द्वाविंशस्योम है, (सम्भरणः त्रयोविंशः) सम्यक् पुष्टिकारक त्रयोविंशस्तोमहै, (योनिः चतुर्विशः)प्रमाका उत्सा- दक, चतुर्दिश सोम है (गर्भाः पञ्चविंशः) सामगर्भ, पञ्चशस्सोम है (भोज:त्रिवणः) तेजस्वी, त्रिवण स्तोम है। क्रतुः. एकत्रिशः) यसके उपयोगी, एकविंशस्तोम है ( प्रतिष्ठा, पमिश:) स्थिांगका हेतु, यखिशस्तोमहै (अध्नस्य विटय चतु स्त्रंशः ) सूर्य का, स्वाराज्य निवासस्थान भुवन देनेवाला, चतुस्त्रिंशस्नोम (नाकः पद्मिशः ) स्वर्गका देनेवाला, पदी शस्तोम है, (विवर्त:, भष्टचत्वारिधशः) सामके भावर्तनोंसे युक्त. अष्ट पत्त्वारिंश स्तोम है ( धम् चतुष्टोमः ) धारक होनेसे, जिन पञ्च- दश सप्तदश, एकविंश इनचार स्तोमोंका समूलरूप ॥२३॥ आने गोसि दीक्षाया आधिपत्यं ब्रह्ममृतं वित्स्तोमः इन्द्रस्य भागोस विष्णोराधिपत्यं अत्र स्मृतं पंचदशस्तोमः नचक्षसां भागोसि धातुराधिपत्यं जनित्र स्प्रतं सप्तदशस्तोमः। मिप्रस्प भागामि चर्कणस्पाधिपत्यं मिबो दृष्टि- पतिस्मृत एकविधशस्तोमो पसना भागः ॥२४॥ इसके० में ४ म० हैं। सबका विश्वदेव' ऋ०, छ- साम्नी पं०, २ सा०वि०३ साम्नी ज०माची . और दे० सवका - १५ अध्याय ४०१ " लिझोक्त है । मंत्रार्थ-हे इष्टके जो तुम (अग्नेः भागः, असि, दीक्षायाः, प्राधिपत्यम्, त्रिवृत्स्तोमः, ब्रह्म, स्पृतम् ) अग्निकी, भागहा जो तुम्हारे ऊपर दीक्षाका आधिपत्य है इस कारण तुमसे वित्तोमदारा, ग्रामणजाति, मृत्युसे रसित हुई है प्रियवस्खोम को मनन करते तुमको सादन करताहूं (इन्द्रस्य, मागः, असि, विष्णोः प्राधिपत्यं, पंचदशस्तोमः, क्षत्र, स्पृतम् ) इन्द्रका, भाग हो, तुम्हारे ऊपर, विष्णुका पाधिपत्यद, पंचदशस्योमसे, क्षत्र जातिकी मृत्युमुरवसे रसाकी है, (नृवत्तसाम्, भागः, असि,धातुः, अधिरत्यम, सप्तदशामा जनि स्पृशम् ) मनुष्योंके शुभाशुभ मानवाले देवसामोंके, माग, हो :तुम्हारे ऊपर धाताका माधि- पत्य सुमने, समदशास्तोमदास वैश्यजातिको मृत्युमुखसे. रक्षर किया ससदशस्तोमको मनन करते तुमको सादन करसाई( मित्रस्य, भागः, मसि, यरुणस्य, प्राधिपत्य :एकाधेशस्तोमः, दिया, राष्टिः, वातः, स्पूनः ) माणोंका भागहो तुम्हारे अपर वरूणका प्राधिपत्य है एकाशिस्तोमकेदारा धुलोक सम्बन्धिनी वर्षा पवन मृत्युमुखसे रक्षिा है ॥ २४॥ यमनांभागोसिरुद्राणामाधिपत्यं चतुप्पास्मृतं चतुर्धि शस्तोमः । आदित्यानां भागोसिम- स्नामाधिपत्य गीस्पृताः पंचविशस्तोमः ।.. अदित्यै भागोसि पूष्ण आधिपत्यमोजेस्पृतं. • प्रिंणवस्तोमो देवस्य सचितुर्भागोमि हस्पते राधिपत्यं समीचीदिशेस्पताश्चतुष्टोमः स्तोमो यांना भागः ॥२५॥ इस क०में ४ मं० हैं सबका विश्वेदेव ऋछ० १,२ सा..., ३, भार्युष्णिक, ४, भाची पं० है देवता सबका लिझोक्त है। मंत्राथ-हे इष्टके तुम.( वसूनाम्, भागः, असि, रुद्राणाम् आधि- पत्यम्, चतुर्विशस्तोमः, पवुष्पाद स्पृतम् ) बसगणका भाग हो तुम्हारे ऊपर रुद्रोंका, श्राधिपत्यई, पतुर्विशस्तामकेद्वारा तुमने
-
शुक्लयजुर्वेद।
चौपायोंकी मृत्युमुखसे रक्षाकी है ( भादित्यानां, भाग, प्रसि,
मरुता, माधिपत्यं, चराविशस्तोमः, गर्माः, स्मृतम् ) आदित्य
गणोंका माग, हो तुम्हारे ऊपर मस्टोका प्राधिपत्य, पंच-
विशस्वोमकेदारा गर्मोकी मृत्युमुखसे रक्षाकी है पंचर्षिशस्तोम
देवताको मनन करते तुमको इसस्थानमें सादन करताई (अदित्य
भागः, मसि, पृष्णः, प्राधिपत्यं, त्रिणवस्तोमः, मोजः स्मृतम् )
अदितिके, भाग हो तुम्हारे ऊपर पूपादेवताका अधिकार त्रिण-
यस्तोमदारा मजामोंके योग पाठची धातकी रक्षाकी है त्रिणा
रसोम देवताको मगन करो तुमको स्थापना करसाई ( सषिः,
देवस्य, भागः, भसि, वृहसाः प्राधिपत्यम्, चतुष्टोमः,'समीची
दिशः स्मृता) सरके प्रेरक सविता देवका भागहे। तुम्हारे ऊपर
वृहस्पति टेवताका स्वामित्व है, चतुष्ठोम स्वोमदारा संपूर्ण
मनुष्यों के जाने योग्य दिशा मृत्युसे रक्षा कीगई चतुष्टोमस्तोम
देवताको मनन करसे तुमको स्थापन करसाहू ॥२१॥
यानाम्भागोस्पयवानामाधिपत्यं मजा स्मृतार्थ
तुश्चत्वारिशस्तोम प्रभूणाम्भागोसि विश्व
पान्देवानामाधिपत्यम्भूत स्मृतन्घ्रपस्त्रिधश-
स्तोमः सहश्च ॥ २६॥
इस के० में २ मं० हैं। सबका विश्वदेवऋपिछ० १९. गा.
१ स्वरा गा०, भौर लिङ्गोक्त देवताहै मंत्रार्थ-हे इष्टके तुम
( यवानाम्, भागः, असि, अंयवानाम्, श्राधिपत्यं, चत्वारिक
शस्तोमः, मजा, स्मृताः) पूर्वपक्षों के भागहो तुम्हारे ऊपर
कृष्णपक्षकी सिपियोंका स्वामित्व है तुमने चत्वारिंशस्तोमके
द्वारा मनाकी मृत्युमुखसे रचाकी (भूणां,भागः,भति विश्वेपाम्
देवाना, माधिपत्यम्। प्रयनिस्योमः, भूते, स्मृतम् ) अभूना
मकदेवताओंकाभागही तुम्हारे ऊपर सम्पूर्ण देवसामोंका आधि-
पत्य है, यस्त्रिंशस्तोमके द्वारा तुमने प्राणीमात्रकी, मृत्युमुखसे
-
रक्षाकी है ॥ २६॥
१४ अध्याय। -- २ , सहध सहस्पषच हैमंतिकावृतू अग्नरन्तः ... प्रलेपोसि कल्पेतां घायाधिषी कल्पन्तामापू ओषधयः कल्पनतामग्नया पृथङ् मम ज्येष्ठपाय : सवता। ये आनः समनसोन्तापावापृथिवी हमे हैमन्तिकातू अभिकल्पमाना इन्द्रमिवः देवा अभिसंविशन्तु तां देवतपाकिस्षद् ध्रुषे सीदतम् ॥ २७ ॥ इस के० में २मंत्र हैं। सबका विश्वेदेव ऋ०, छं०-१. मुरिगति ज०, २ भु० प्रा०र० और देवता-सबका मृतु है। मंत्रार्थ-(साः) मार्गशीर्ष (च) और (सदस्यः).पौष (ईमन्सिको, ऋतू) देमंद प्रातु के अवयव हैं। शेष की व्याख्या म०१३० १५में होगई २७ एकया स्तुवात प्रजा. अंधीपन्त मजापतिरधिप. तिराप्तीत् । तिमृभिरस्तुपा ब्रह्मासज्या शुस्पतिरधिपतिरासीत् । पञ्चभिरस्तुवतभूता न्येसृज्यन्त भूतानां पतिरधिपतिरासीत सप्स- निरस्तुवत. सत पयोऽसज्पन्त धाताधिप तिरासीत् ।। २८ ॥ इस कं० में ४ मंत्र हैं । सबका विश्वदेव ऋ०,०-१ सानी नि०, २नि गा', ३ सा० न०,४ सा०वि० है। मंत्रार्थ- (एकया, मजाः, अधीयरा, मजापतिः, अधिपतिः, 'मासीत् ) प्रजापति ने एक ही वाणी के साथ भारमा की स्तुति की उससे सब प्रजा उत्पन्न हुई मजापति उनके स्वामी हप (सिभिः, भ.. स्सुवस, ग्रा, अमृज्या, ब्रह्मणस्पतिः, अधिपतिः.. भासीत ) प्राण उदान व्यानोंसे स्तुसिकी-वेदकी रचनाकी घेदकर्ता सामी हुए (पञ्चभिः, अस्तुवरा, भूतानि, अमृज्यन्त, मानापतिः, अधिपतिः, पासीत ) पांच माणों से स्तुति की उससे पधभूय . - ४०४ शुक्लयजुर्वेद । मासीत्.) श्रोन २ नासिका २ चक्षु २.जिव्हा . इन सातों की सहायता से स्तुति की सपाऋपि प्रकटहुए भगकर्ता देव उनके स्वामी हुए ॥ २८॥ नवनिरस्तुवत पितरोमानतादितिरधिपक्ष्या- सीत्। एकादशभिरस्तुघत तयाँमृज्यनता- वा ...अधिपतय आसंस्त्रयोदशभिरस्तुवत मासा असृज्यन्त संवत्सरोधिपतिरासीत्पञ्च- दशक्षिरस्तुवस सत्रमंसृज्यतेन्द्रोधिपतिरासी. सप्तदशभिरस्तुवत . ग्राम्याः पशषौमुज्यन्त पृहस्पतिरधिपतिरासीन्मवदशभिरस्तुवत ॥२५॥ इस कं० में ५० हैं, सबका विश्वदेव ऋ०, छ.-साम्नी पं०२, ३ सा०.७० ४ मा[०,५भा• पृ०, भौर सबका सृष्टी. ष्टिका.दे है । मन्त्रार्थ-(मभिः, भस्तुवत, पितरः, अदिति, अधिपस्नी, आसीत् ) सातशिरकेमाण और दो नीचे मर्याद नथ द्वार शरीरके माणोंकी सहायसासे प्रार्थनाको उससे पितृगण अग्नि- चाचादि उत्पन्न हुए भखण्डिस प्रभापति शक्ति उनकी स्वामिनी हुई कारण कि पितर अपनी भखण्ड शक्तिसे ही सर्वत्र श्राद्ध करमेवालोको पास होते हैं ( एकादशभा, मस्तुबस ऋतवः, अमृत ज्यन्स, पापाः, अधिपतयः, मासन्) देशमाण ग्यारहवां भात्मा इन ग्यारहस, स्तुतिकी उससे वसन्तादि ऋतु मकट हुई उनके ऋतुपालक देषविशेष स्वामी होते हुए ( प्रयोदशमिः, मस्तुषस, मासाः, अमृज्यास, संवत्सरः, अधिपतिः, मासीत् ) दश प्राण दोपाद [ प्रतिष्ठा ] एक मारमा अभ्यन्तरीय संस्पान से स्तुतिः की, उमसे चनादि भधिक मास सहित रमनाकी दो भयन मास का भीममानी वर्ष उनका पालक हुआ (पञ्चदशभिः; भस्तुगत चनम्, भसग्यत, इन्द्राः, अधिपतिः, भासीत् ) दश हायकी अंगुली दो हाय दो भुजा एक नाभिमा अर्बभाग इनके द्वारा स्तुतिकी क्षत्रिय जातिको उत्पन्न किया, उनका इन्द्र स्वामी हुआ " १४ अध्याय। ४०५ " (सप्तदशभिः, अस्शुवरा, ग्राम्यान, पशवः, अमृज्यन्त हस्पतिः, अधिपतिः, मासीत् ) दश पैरकी अंगुलि दो उम दो जानु दो पाद और नाभिका अधोभाग इनके देषणामों सहित स्तुतिकी उनसे ग्रामके गी प्राटि पशुमों की रचना की वृहस्पति देवता उनके स्वामी हुए ॥२९॥ नवदशभिरस्तुवात शवा-मुज्येतामहोगने अधिपत्नी आस्ताम् । एकविधशल्यास्तुबरीफ- शफाः पशवोसूज्यन्स यरुशोधिपतिरासीत् । अपाविशत्पास्तुषत क्षुद्राः पदावोसृज्यन्त पूपाधिपतिरामीतापविशत्यास्तुवतारण्याः पशवासृज्यन्त घायुरधिपतिरासीत् । सस. पिशयास्तुवरा चााथिवी व्यता पसयो मुद्रा आदित्या अनुव्यास्त प्रवाधिपतय आसन्॥३०॥ इस कं० में ५ मं० । सरका विषत्र प्रा०, छं०- १ नि. दा०३०, २४ सा० ज०, ३ नि० सा० ज०, ४ सा० ज०, ५ मा• 50 और सबका सृष्टीष्टिका देवगा है। मानार्थ- (मघाशभिः, प्रस्तुबा, दायौं, असूज्यताम् अहोरात्रे, अधिपली, मासाम् । दश हाथ की अंगुनि ऊपर नीच के छिद्ररूप नौ माणों से स्तुति की उससं शूद्र और वैश्य जाति उत्पन्न की,उनके दिनरात स्वामी हुए ( एकाशित्या. अस्तुवन, एकशफाः,पशवः, भरज्यन्त, वरुणः,मधिपतिः ,मासीत् ) वास हाथ पैरकी अंगुली दोचरण एक मात्मा उनसे स्तुतिकी.एकखुरवाले पशु उत्पन्न किये, वरुण उनका स्वामी हुआ ( अयोविंशत्या, अस्तुबस, क्षुद्राः, पशवः अमृज्यन्त, पा, अधिपतिः, मासीत ) वीस हाथ पैर की अंगुलि दो चरण एक मात्मा इनके साथ स्तुसिकी इससे क्षुद्र पशु मजाभादि उत्पन्न किये पूपा देवता उनका स्वामी हुश्रा (पञ्चपिधशत्या, अस्वस, भारएया, पशवः, अमृउपन्त, पायुः, अधिपति, भासीत् ) वीस हाथ पैर की अंगुलि दो हाय दो चरण एक मात्मा के साथ .
१.६ - शुक्लयजुघद। स्तुति की उससे वन के कृष्णमृगादिक पशु उत्पन्न किये वायु देषया उनका स्वामीडया (सप्ाविशत्या, मस्तुबस, याबा- थिवी, व्यसाम्, यसवः, रुद्रा, श्रादित्याः, मनुव्यायन, रो, एव, अधिपतयः. प्रासन् ) वीस हाथ पैर की अंगुनी दो भुगा दो ऊस दो प्रतिष्ठा एक मात्मा इन के साथ स्तुति की स्वर्गलोक भूलोक भन्तरिक्षलोक प्ररुटहुए वगण रुद्रगण श्रादित्यगण इन के अनुगस होने से कम से ये ही इनके स्वामी हुए ॥ ३० ॥ मविशत्यास् तुषत वनस्पतयोमृज्यन्त सोमो अधिपतिरासीत् । एकत्रिशतास्तुवतं । मजा अमृज्यन्त यवाश्चायवायाधिपतय आसन् । प्रयंनिधशतास्तुषत तान्यशाम्पन्मजापतिः परभेष्ठधधिपतिरासीत् ॥ ३१ ॥ इस कं० में ३ में हैं। सबका विश्वदेव ऋ०. छ. १नि सा० ज० २,३ नि० प्रा० - सचका सृष्टीष्टिका दे० । मंत्रार्य (नवविध शत्या, अस्तुवग, वनस्पतयः, अमृज्यन्स, सोमः, धि- पति: भासीत् ) वीस हाथ पैर की भरली नवप्राणके विद्रों के साथ स्तुतिकी इससे वनस्सारी भवत्य वट भादिकी रचाकी उमका सोम स्वामी हुमा (एकषिशप्ता, यस्तुवस, गजात, थमध्यनरा, यवाः, घ, अपवाः, प, अधिपतयः, श्रासन) २० हाथ पैरकी अंगुनी १. इन्द्री एक मात्माके साथ स्तुतिकी उन से अन्यान्य सम्पूर्ण प्रमाकी रचनाकी पूर्वपक्ष और उत्तरपक्षमी उनके सामी हुए, (प्रयविशा, मस्तुवरा भूतानि प्रशाम्यन परमेष्ठी, पजापतिः, मधिपतिः, मासीद ) घीस भगुली दश इंद्रिय दो पाद और आत्मा सहित स्तुतिकी उसमे उत्पन्न समस प्राणियोंने शांगिलामकी भर्यात मुखीहए, सरपलोकमें रिया होने वाले गजापालक ईश्वर उनके स्वामी हुए॥३१॥ इति धुश्ल यजुगारतर्गत वामसनरिमदिता का सामुवार चौरहवां अध्याय समाप्त ॥
१५ अध्याय।
"
अथ पंचदशोऽध्यायः॥
>
जिसमें चिति प्रधान हे पसे चौदहवें अध्याय में दूसरी तीसरी
चौथी चिसिके मन्त्र कहे । अव पन्द्रह अध्यायमें पांचवीं विति
के मन्त्र कहे जायेंगे।
॥ हरिः ॐ ॥ अग्ने जातान् मणुंदानः सपत्नान्
प्रत्यजातान्नुद जातवेदः। अधि नो हि सुमना
अहेस्तवं स्याम शमस्त्रिवरूध उद्भौ ।।१।।
इसका परमेष्ठी ऋ०, त्रिपुर छ०, भग्नि दे० है। मंत्रार्थ
(जारावेदः, अग्न, नः, जातान,सपत्नान,मा, मणुद, भजागान,
प्रसिनुद, सुमनाः अहेडन, मः, अधिनाद) हे सर्वक जानने वाले
अग्नि देव हमारे पूर्व उत्पन्न शत्रु मोंको सब मकारसे अधिकतासे
नष्टकरो, अनुत्पन्न शत्रुमको विनष्ट करो भच्छे भन्तःकरणसे
फ्रोधरहिस होकर हमको वर प्रदान करो-हे भग्ने (सव शर्मन,
उदो. बियरूथे रयाम) थापके सम्बन्धी मुखके आश्रय मनुप्य
पशु धन धान्य प्रादिके प्रभवस्थान,सदोमएडप हविर्धान्य श्राग्नीध्र
प्रदेश इन तीन स्थानों में, सदा यज्ञ करें ॥ १ ॥
सहसा जातान प्रणुदानः सपत्नान् प्रत्यजीता-
जातवेदो नुदस्व । अधिनायूहि सुमनुस्यमानो
वयस्पाम प्रणुदानः सपत्नान् ॥ २॥
इसका परमेष्ठी ऋपि, निबन्द, अग्नि देवराई । मंत्रार्थ
(जाविदः, सहसा,मासान् नः सपत्नान, भा,प्राद, प्रजातान,
मतिनुदस्व, सुमनस्यमान', नः, अधिमूहि, वयम्,मा, साम ) हे
जारामशान अग्ने ! बलसे उत्पन्न हुए हमारे शत्रुओका सबोरसे
नाशकरो भविष्य में होने वालोंकी उत्पत्तिको रोको सदनराकरण
से फोधरहित हो हमको शभुओं से बली कहो,तुम्हारे प्रसादसे हम
सपप्रकार अधिक हों, (नः, सपत्नान, प्रगुद) हमारे शत्रुओंका
नाश करो ॥२॥
शुक्लपजुचंद। पोडशीस्तोम ओजो द्रविणं चतुश्चवारिश स्तोमो चर्चा द्रर्षिणम् । अग्नेः पुरीपमरमो नाम नान् त्या विचे अभिगन्तु इयाःमाता- मपृष्ठातवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविमा यस्य । इसमा परमेष्ठी ऋ०, छ०१-मा. त्रि०, २ मासुर्यनु०, १ निघ• त्रि० और देवसा सबका इष्टिका है । मंप्रार्थ-हे इष्टके ! पोहशीस्तोमः, भोजः द्रषिण)पंचदशकला भौर पक्षका स्वामी श्रादित्यरूप पोडशत्तिरूप स्तोमके प्रभावसे तुमको स्थापन करता हूं, इस स्थलम सेज और धन की प्राप्ति हो, हे इष्टके ! ( चत्वारि शः, वर्चः द्रविणम् ) चौचालीस आत्तियुक्त चतुश्चत्वारिंशम्तो रूप वन कान्तिरूप धन पाये (असा; नाम, अग्नेः, पुषिम्, श्रास, साम, वा, विश्वे, देवाः, अभिगन्तु, स्तोमपृष्ठा, घृत. की, इह, सीद, अस्मे, प्रजापत, द्रविणं, भायजस्व) रक्षक नाम से युक्त, पंचदश कलाबाले चन्द्रकप भग्निके पूर्ण करनेवाले हो उस तुमको सम्पूर्ण देवता स्तुगि करें, सम्पूर्ण स्तोमपृष्ट मंत्रों के प्रभावस होमहुए तसे संयुक्त होती तुम इस चौथी चितिके ऊपर ठहरो हमको इसके फनरूपसे पुत्रयुक्त धनदो ॥ ३ ॥ पवरच्छन्दो परिवइच्छन्दःशमलइन्छन्दः पार- श्करन्दः आच्छच्छन्दो मनश्च्छन्दो व्य- श्च्छन्दः सिन्धुश्च्छन्दः ममुद्रच्छन्दः सरिर- छन्दः कृपछन्दविककुप्छन्दः काव्यं छम अकुपं छन्दोक्षरपंफिन्दी पदपंक्तिश्छन्दों विधारपैकिश्छन्दः पुरोभ्रजभन्दः॥४॥ . इस कं० में १० में हैं। सबका परमेष्ठी है। ई०-१, ३, ५, ६, ७, ८, ११, १३, १९, २०, २१, २२, २३, २७। २८, २९, ३१, ३६. ३७, २९, देवी ४० २, ४, ९, १०, १२, १४, २५, २६, १०, ३२, ३४, २५, ३६, ४०, दे० पं. १५ १८, २४,३८, दे० मि०, १५, १७, देज है और सबका .
-- १५ अध्याय इष्टका दे है। मप्रार्थ-दे इष्टके (पवश्छन्दः, परिवश्छन्दः, शम्श्छन्दः, परिभश्छन्दः,माच्छन्दः, मनश्छन्दः, व्यचरछन्दः, सिन्धुश्बन्दः, समुद्रश्चन्दा सरिर छन्दः,कछन्दःत्रिककुप्छन्दः काव्यंछन्दः, अकछन्दः, अक्षरपंक्तिश्छन्दः, पदपंक्तिश्छन्दः, रिटारपंक्तिम.रानजरछन्दः) जिसमें सब प्राणी चलसे है ऐसे भूलोकको मनन कररो तुमको स्थापन करताह प्रभामण्डलसे व्याप्त अन्तरिक्षलोक,सुखदायक धुलोकको मनन करते सबभोर से ध्यास होकर वर्गमानदिशाको मनन करते, अपने रसम शरीरको पाच्छादन करनेवाले अन्नको प्रजापतिरूप मनको सब जगवको ज्यान करने वाले आदित्यको० नाडियों द्वारा शरीर को व्यास करनेवाले गाणवायुको समुद्र के समान गम्भीर विकल्पयुक्त मग को मुखसे निकलने वाली वाणीको शरीरको दीसकर धारण करने वाले प्राणको पिये हुए जलको तीन प्रकार का करने वाले उदानको त्रयी विद्या अर्यात वेदत्रयको कुटिलगति चलने वाले • जलको नाशहित स्वर्गलोक को, जिसमें चरण रखेजाते. इस भूलोकको, जहां सकल वस्तु विस्तारितहैं उस दिशा पाताल को०, तीयतासे आकाश को लिखने प्रकाशनेवाले विद्यत्पुज या प्रादित्यको मनन करते हुए स्थापन करताहूँ ॥४॥: आच्छच्छन्दःच्छच्छन्दःसंयच्छन्दौ विपच्छंदी वृहच्छन्दो रधन्तरं छन्दों निकाय छन्दों वि- वधरच्छन्दो गिरश्छन्दो अजश्छन्दः मस्तु- पन्दौनुष्टुप्छन्दः एवमउन्टो वरिपश्चन्दो चय- श्छन्दों घयस्कृच्छन्दो विपर्दाश्छन्दों विशालं' छन्दश्छादिश्छन्दो दृरोहणं छन्दस्तन्द्रग्छन्दों अंकाङ्कन्छन्दः ॥ ५॥ 'प्यादि-पूर्ववत् मंत्रार्थ-(भाच्छच्छन्दः,मच्छन्दः संयच्छन्दः विपच्छन्दः, पहच्छन्दा,स्थन्तर छन्दः,निकायश्छन्दः,धिषिधरबन्दः रिश्चन्दा, भ्रमरपन्दः, संस्तु बन्दः, अनुग्छन्दः, एबश्छन्दः, " . - शुक्टपजुर्वेद । परिवहन्दः, क्यश्छन्दः, वयस्कन्छन्दः,विपन्दः, विशा- लंडन्दः, छदिश्चन्दः, दरोहणे छन्दः, गदैछन्दः, अकाछन्दः) शरीरका आच्छादक अन्न उसको मनन करते०, शरीर पछा- दक जलके व्यापारकी निवर्चक रात्रिकी विशेष व्यापार पर्वतक दिन को० जहां रथादि द्वारा गमन कररों हैं उस भूलोकको०, अत्यन्त शब्दकारक वायुको०, जहाँ भूत मेन रूपसे विविध प्रकार के पाप भोगे जाते हैं उस अन्तरिक्षको, मक्षणयोग्य अन्नको, प्रकाशवान् अग्निको, वैखरी वाणीको मध्यमा वाणीको पृथ्वी लोकको प्रभामण्डलको वाल्यादि अवस्या के हेतु अन्नको वाल्यादिकारक जाठराग्निको० विविध ऐश्वर्य की प्राप्तिताले स्वर्गको, स्पर्धामूलक भईसवको,जहां मनुष्य भनेका भकारसे शोभित होतेहैं उस भूतलको, सूर्यको किरणोंसे आच्छा दित होने वाले अन्तक्षिको ज्ञानको समानको०, थास्तिकताके निदर्शन अथवा गर्त पापाणादि युक्त जलको मनन करते तुमको स्थापन करताहूं ॥५॥ मुश्मिना सत्याप सत्यजिन्य प्रेतिना धर्मगा धर्मजिन्यान्वित्सा ढिवा दिय जिन्य मन्धिना- तरिक्षेणान्तरिक्षं जिन्व प्रतिधिना पृथिव्या पृथिवीं जिन्व विएम्भेत दृष्टया दृष्टि जिन्य प्रव. यान्हाहर्जिन्वानुपा राधा रात्रीनिंबोशिजा वसुभ्यो पंजिन्व प्रकतेनादित्येभ्ध आदित्या. जिन् तन्तुना गयः ॥ ६॥ इस के में २९ म० है सबका परमेष्टी ६०,२.६ १७, या० पं० ३,८, १८,२६,२९.या० वृ०४,५,१०,या जा ७, २०, यानुप्यु, ११ सा० उ०, १३, १४, १५, १६, या वि०२९, २१, २२, २३.२४, २५, २७, २८, याजुय० सपको विन्य) अनके प्रभारसे सत्यानिमित्त सत्य जाणीको गीति करो . . इष्टता देवसाहै। मंत्रार्थ-दे इष्टके तुम (रश्मिगा, सत्याय, सत्य, १५ अध्याय। - . 1 (भीतना, धर्मशा, धम्मै, जिन्य ) देद्दमें गतिवाले अन्नके प्रभार से, धर्म के निमित्तं धर्मको प्रीतिकरो, (अन्वित्या, दिया, दिवं जिन ) देहमें गणिवाले अन्नके प्रभावसे, दिव्य लोकके निमित्त शुलौकाको मीनिकरो, ( सन्धिना, मन्वरिशेण, अन्तरिक्ष, जिन्य) पलादिक भाधार अनिके गमावसे अन्तरिक्ष के निमित्त अन्तरिक्ष तो प्रीति करो, प्रतिधिना, पृषिच्या, पृथिवीम् जिन्न ) मत्येक इन्द्रियके भाधार अन्नके प्रभावसे, अन्तरिक्ष के निमित्त पृथिवी को प्रीतिकरो (विष्टम्मन, दृष्टया, दृष्टिम्, जिन्व) देहादिके स्तम्भ करने वाले अन्नके प्रभावसे दृष्टिके निमित्त वर्षाको प्रीतिकरो (. पचया,अन्हा,अहः, जिन्व) देहमें गमनागमनकारी भनके प्रभाव से दिनके निमित दिनको मीसिकरो (अनुया, राज्या, रानी, जिन्य ) देहान्तर्गत ७२ नाडियों में गमनागमनकारी अनके प्रभाव से रात्रिक निमित्त रात्रिको प्रीतिकरो, (उशिना, मुभ्यः, वसून, जिन्व) समस्त माणियों के प्राकक्षिणीय, अनके प्रभावसे, वसु. ऑफै निमिच वसुगरणको प्रीतिकरो (मकतेन, श्रादित्येभ्यः, यादि- स्यान्, जिन्व ) मुखानुभव के कारण अन्नके प्रभावस भादियों के निमित्त शादित्योंको पीतिकरो ॥६॥ तन्तुना गयस्पोर्पण ग़ायस्पो जिन्व समर्पण. शुताप श्रुतं जिन्डेनौषधीभिरौषधीनिन्वोत्तमे तनूभिस्तजिन्य घयोधसाधतेनार्धातचिन्वा- विजिता तेजमा तेजों जिन्य ॥ ७ ॥ प्यादि ६ मंत्र में कहदिये । मंत्राय-(सन्तुना, रायपोपेण, 'रायसोपम् जिन्य) शरीरके बर्दक: अन्नके प्रमावसे धनकी पुष्टिके निमित्त धनकी पुष्टिको भीतिकरो (सधेसर्पणा, श्रुताय, श्रुतं, जिन्व) पति इन्द्रियमें फैलनेवाले भन्नके प्रभावसे शाखके निमित्त शास्त्रको मीसिकरो (पडेन ओपधीभिः, थोपधी:, जिन्व ) प्रसिद्ध अन्नके प्रभारस भोपाधियों के निमित्त योपधियोंको नीतिकरो ( उत्तमेन, जनमिः चन:, जिन्य )पृथ्वी के उत्कृष्ट पदार्थ अन्म प्रभास .
४१२ शुक्लयजुद। चनुमोके निमित्त शरीरोंको प्रीतिकरो (चयोधसा, प्रधान अधी- तम, जिन्य) शीरके उपचयकारी अन्नके प्रभावसे अध्ययन के निमिश मध्ययमको प्रीतिकरो (अभिजिता. रोजमा, तेजः, जिन्व) बलकारी भन्नके प्रभावसे सेनके निमित्त क्षेत्रको प्रीतिक॥७॥ मतिपदसि प्रतिपदें स्वानुपर्दस्यनुपर्दे खा सम्प- दसि सम्पदै त्वा तेजोसि तेजसे त्वा त्रिदेसिया ऋष्यादि. ६ठे मंत्र में कहदिये । मंत्रार्थ-हे इष्टके (मतिपत, प्रसि, प्रतिपदे, त्वा ) जिससे जीवनका अस्तित्व प्राप्त होता है ऐसे भन्नरूप हो, अन्नमाप्ति के निमिश तुमको उपधान करताहूं तुम-( अनुपन, असि, अनुपदे, त्वा) इन्द्रियों को स्वस्वकार्य में समर्थ करनेवाले अनाप हो भन्नके निमित्त तुमको उपधान करताहूं तुम ( सम्पत्, भसि, सम्पदे. स्वा) सम्पत्तिमतिपादक भन्नरूप हो अन्नसम्पत्ति के निमित्त तुमको मादन करताहूं(तेजः, भासि, सेजसे, त्वा) शरीरमें सेनोदायक अन्नम्प हो तेजके निमित्त सुमको सादन करताहूं ॥ ८॥ त्रिदेसि विडते त्वा मदति ते त्या विदसि विते त्वा सदसि मवृते त्वाकमोस्याममाय स्वा संक्रमोसि संकमा त्वोत्कमागुत्क्रमाय त्योत्क्रान्तिरस्युत्क्रन्त्यैि स्वाधिपतिनाजों - जिन्य ॥९॥ ऋष्यादि ६ ठे मंत्र में लिखचुके । मंत्रार्थ-ई इष्टके ! तुम एशियम, असि, निस्ते, त्वा ) कपि दृष्टि और बीजसं उत्पन्न मनाप हो, अन्नके निमिच तुमको सादन करता हूं-तुम (मत मास, मट्टते, स्वा) सब माणियाँको कार्य में प्रवृत्तिकारी अन्न रूप हो, कार्यमवृत्ति के निमित्त तुमको सादर करता हूँ (पिचूद भास, पिरो त्वा) मत्येक इन्द्रियको उस २ कार्यमें प्रवर्तक अन्नरूप हो मचिके निमित्त तुमको सादन, करता हूं (सहवा असि, सहसे, वो ) जीवनके सहचारी अन्नरूप हो भन्नके निमित्त . . .
१५ अध्याय तुमको पादन करता हूं । तुम (आमा, असि,पानामाय,वा) क्षुधाका तिरस्कार करनेवाले मन्गरूप हो, अन्नपातिक निमिच तुमको सादन करता हूं (संक्रमः, असि, संप्रमाय, त्या) संता- नोत्पत्तिका वीज अन्नम्प हो संतानमाप्ति के निमित्त तुमको उप- हिरा करता हूं. तुम (उत्क्रमः, असि, उत्क्रमाय, त्वा ) जन्मका निदानमत अन्नरूप हो, उत्कमके निमित्त तुमको सादन करता हूँ. (उत्क्रान्तिः मसि, उत्क्रान्त्यै त्वा ) उत्कृष्ट गमनवाले अन्न रूप हो उत्क्रान्तिके निमिरा तुमको सादन करता हूं।। १ ।। रायसि प्राची दिग्वसंवस्ते देषा अधिपतयो. नितीनां मंतिधर्ता वित् त्या स्तोमः पृधि. व्याश्रयत्वाज्यमुक्थमव्यधार्य स्तभ्नातु रथ. न्तर साम प्रतिष्ठित्या अन्तरिक्ष नापयस्त्वा प्रधमजा देवेषु दियो मात्रया परिम्णा प्रयन्तु विधा चायमधिपतिश्च ते त्वा सवै संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्ग लोके यजमानं च सादयन्तु॥१०॥ इस कं० में २ मंत्र है सबका परमेष्ठी ०, वि० कात्रि. छ०, २ वा. वृ०ई०, लिङ्गोक्तं देवता है । मंत्राध--हे इष्टो ! तुम (राज्ञी, माची,दिक, असि, वसवः, देवा से, अधिपतयः, अग्निः, शीनाम, प्रतिधर्ता, त्रिवृत्स्तोमः, त्या पृथिव्यां, श्रयतु, 'भाज्यं, उस्थ, अन्यथाथै, स्तनातु, रथन्तरं, साम, अन्तरिक्ष, प्रतिष्ठित्ये, प्रथमजा, ऋपयः, देवेपु, दिवः, मात्रया, परिम्णा, स्वा, प्रथन्तु, विधर्ना, च, अयम्, अधिपतिः, प, स्वा, ते, सर्वे, 'संविदानाः, नाकस्य, पृष्टे, स्वर्गलोफे, यजमान, च, सादयन्तु ) राजमान पूर्वदिशाम हो पाठवसु देवता तुम्हारे पालको, अनि देवता तुम्हारी सम्पूर्ण बाधाओं का निवारक है, निवृत्स्तोम तुम को पृथ्वीमें स्थापन करो, भाज्यनामक शत्र व्यथाहीनता अर्थाद दृढ़ताके निमित्त तुमको दृढ़ कर. रथन्तर साम अन्तरिक्षलोकम 'मतिष्ठाके निमि तुमको दृढ करैप्रथमोत्पन्न प्राण देवता पाका . .
शुक्लाजुबंद। की परिमाणमा उहानिस्तारले तेरा विस्तार कर इष्टका गिप्पादन कग्नवाना और यह इष्टकापातक भी तुमको विस्तारित करे, इसमकार व सम्पूर्ण वसुमादि देवगा एकमाते स्थित हुए मुख साप लोका ऊपर स्वर्गलोकमें यजमानको अवश्यही प्राप्तकर।। दिरासि दक्षिणा दिमुद्रास्ते देवा अधिपतय इन्द्रो हतीनां प्रतित पञ्चदशस्त्या स्तोमः प्रधिव्याघ्रंयनुप्रउगमुक्यमव्ययायै स्तन्मातु बहत्साम प्रतिष्ठित्या अन्तरिक्ष ऋपपस्त्या प्रधमजा देवे' दियो माया परिम्णा प्रयन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्या सर्व विद्वाना नास्य पृष्ठे स्वर्ग लोके यजमानं च सादयन्तु ॥११॥ इसका परमेष्ठी , पूर्व य भुरिग्ब्राह्मी त्रि० ई०, लिङ्गोक्त देवता है ( प्रथमजा इत्यस्य प्रा० ० छन्दः ) मंत्रार्थ-हे इटके ! तुम (विराट्, दक्षिणा, दिक्, भास, रुद्राः, देवाः, ये, अधिपतयः इन्द्रः, देतानाम्, प्रतिधी, पंचदशः, स्तोमः, रवा, परिष्याम्, अपतु, मउंगे, उश्यम् अव्याय, स्नातु, दृइत्सांम, भवारिस, प्रतिष्टित्यै ) विशेष विराजमान दक्षिण दिशा हो रुद्र देवता तुम्हारे पालक है, इन्द्र देवता व्याधियोंका निवर्धक है, पंचदश स्तोम तुमको पृथिवी में स्थापिसकरैमउगनामक उक्य ढहता के निमित्त गुमको रतभित करे, यहत्साम अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठाका कारण हो, शेप पूर्वकी समान है ॥ ११॥ सम्राईसि प्रतीची दिगांदिल्यारतें देया अधि- पतो वरुणो हेतीनां प्रतिवर्ती संप्तदशस्त्या स्तोमः पृधिच्यां श्रेयतु मरुत्वतीयंगुक्थमन्य- धापै स्तनातुं पैप साम प्रतिष्ठित्सा अन्त. ' विध पयस्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया चम्मिा प्रचन्तु विधत्ती चावधिपतिश्च से त्या सधैं संविदाना नात्य पृष्ठे सर्गे लोगों .
१५ अध्याय । ४१५ . . " यजमानं च सादपन्तु॥१२॥ इसका परमेष्ठी ऋपि, पूर्वस्य नि० वा० ज००,या गंधमजा इत्युत्तरस्य प्रा० ० ई०, लिमोक्त दे० है । गंगा-हे ! तुम (सम्राट्, प्रशीची, दिक, बास, मादित्याः, देवाः, ते श्राध पतयः, वरुणः, हेतीनाम्, गतिधर्ता, सप्तदशः, स्तोमः, त्मा, पृषिव्या, अयातुमरुत्वीयम् उरगं, प्राच्यचाय, समानु,कएं, साम, गतिष्ठित्यै, अन्तरिक्षे०) विशप दीशिमान पथिमा दिशा हो आदित्य देवता तुम्हारे पालक है, वरुण दुःखों का निवर्गक है,सप्तदश स्तोम नुमको पृथ्वी में दृढकरो मरुत्वतीय शवदहताके निमिच तुमको स्थापन कर वैरूप साम मतिष्ठाके निमित्त सन्त- रिक्षमें सुमको दृढकर शेष पूर्ववत् ॥ १२ ॥ स्वराइस्युदीची दिड मरुतस्ते देवा अधिपतयः सोमों हेतीनां प्रतिधुतकविधशस्त्वा स्तोमः, पृथिव्यां धतु निकैवल्यमुस्थमव्यथायै स्त- भनातु राज साम प्रनिष्ठित्या अन्तरिक्ष अपयस्त्वा प्रथमजा देथेषु दियो माया परिम्णा प्रथन्तु विधा चायमधिपतिश्च ते स्वा सबै संविधाना नास्य पृष्ठे स्वर्गला यजमानं च साधन्तु ॥ १३ ॥ इसका परमेठी र पूर्वभ्य भुरिग्वा० नि० २. लिङ्गोक्त देवताहै ( प्रथमजा इत्युत्तरस्य मा० ० छ०) मंग्रार्थ-दं इष्टये तुम (वराट्, उदीची, दिछ, अशि, महतः, देवाः, रो, अधिप- रायः, सोमः, तीनों, प्रतिधा, एकविंशः, स्तोमः त्वा, पुथि- च्याम् श्रयनु, निफेवल्यम्..उक्यम्, अधयाय, असाम, मतिष्ठित्य, अन्तरिक्षे० ) लयं विराजमान होने वाली उत्तर दिशा हो, महा देवसा तुम्हारे पालक, सोम व्याधियों का निवारक है, एकशिस्नाग तुगको पृथ्वी स्थापन कारो, नियस्य नाग शस्त हताके निमितुमको स्थापन करो, नैराजसाग गानेष्टा - स्तनातु, चरान-
-
.
शुक्लयजुषद।
के निमिता गुमको अन्तरिसमें दृढकरो । शेष पूर्ववत् ॥ १३ ॥
अधिपत्न्यसि वृहती दिग्विश्वे ते देवा आधि.
पतयो वृहस्पतिहतीनां प्रतिवर्ती त्रिणवत्रया
स्विी त्या स्तोमा पृथिव्या या वैच
देवाग्निमारुने उक्थे पंधापै.स्तनीना.
शाकरवते सामनी प्रतिष्ठित्या अन्तरिक्ष ऋर्ष-
यस्त्या प्रथमजा देवेपु दियो माघ्रपा परिणा
प्रथन्तु विधा चायमधिपतिश्च ते त्या सर्व
संविदामा नास्प पृष्ठे स्वर्ग लोके यजमानं
च साद्यन्तु ॥ ११ ॥
इसका परमेष्ठी ऋ०. पूर्वस्य वा०. ज० ई० लिटोक्त दे ।
यस्त्वेत्युचास्य ब्राह्मी त्रि.छं । मंत्रार्य हे इष्टके! तुम (धि-
पत्ती, सही, दिक, भसि, विश्वे, देवाः, वे, अधिपतयः, इसतिः
देशनिाम्, पशिधर्चा, भिवत्रयतिधेशी, स्तोमो, त्वा, पाचव्यां,
श्रययाम् वैश्वदेवाग्निमारते,उक्ये,अब्धया स्तनाम,शाश्वर-
रखने, सानी, प्राष्ट्रिय, अन्तरिक्षे०)अधिक पालन करनेवाली
घडी उर्व दिशा हो, सम्पूर्ण देवता तुम्हारे पालक हैं, वृहससि
बना विनदुःखों का निवाकरहै,पिणवत्रयस्त्रिशसोम तुमको पृथ्वी
में स्थापितकर वैश्वदेव अग्निमारुतरा उक्य दृढताके निमित्त तुमको
स्थापित करें शाश्ववत दोनोसम्म प्रतिष्ठाके निमित अन्तरिक्षमें
तुमको स्थापित करें । शेप पूर्ववत् ॥ ४ ॥
अयं पुरो हरिकेशः सूयर मिस्तस्य स्थगृत्सरच
रथाजाश्च सेनानी ग्रामपौ । पुजिकस्थला
च ऋतुस्थला चोप्सरसाटण:पशवा हतिः
पौम्पयो युधः प्रतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते
नौषन्तु ते नो मुडपन्नु ते पन्ष्मिो पश्च नो
इसका परमेष्ठी ऋ० ऋतिक लिङ्गोक्त दे है। मंत्रार्थ-(मग
देष्टि तमेपाली दमः ॥ ३५ ॥
- - शुक्लयजुचंद। अयं पश्चाद् विश्वव्यचास्तस्य स्थंप्रोतश्चासमा रथश्च सेनानीग्रामण्यो पुम्लोचन्ती चानुम्लो- चन्ती चाप्सरसा च्यांना हेतिः सः प्रति- स्तेभ्यो नमो अस्तु ते नौवन्तु ते नो मृडयन्तु रोहिप्मा यश्च नो इष्टुि तपासमो द्धमः ॥१७॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, विराट् कृतिरछ० लिट्टोक्त दे०है। मंत्रार्थ (अये, पश्चात्, विश्वव्यचाः, तस्य, रथोत., च, असमस्या, सेनानीग्रामण्यो, मम्लोचन्नी, च, अनुम्लोचन्ती, अप्सरसो, च, व्याघ्रः, हेतिः, सपः, महविः)यह पश्चिम दिशाम स्थापित इष्टका रूप सब विश्वका प्रकाशक आदित्य है, उसका रथयुद्ध में धैर्यवान शूर और अनुपम रथी सेनापति और ग्रामपालक वर्षाऋतु हैं, अपने चेशविन्यासादि द्वारा सर्वसाधारणका मन हरने में समर्थ और एकबार मुग्ध होकर क्लेश पानेवाले व्यक्तिको फिर मोह करने वानी दोनों अप्सराहें और व्याघ्रनीय शस्त्र है, सर्प क्षिण शस्त्रह, शेपं.पूर्ववत् ॥१७॥ अपतरात्संपर्वमुस्तस्य ताय॑श्चारिष्टनेमिश्च सेनानी ग्रामण्या विश्वाचीच घृताची चार- मावापो हेतिर्वातः प्रतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नौवन्नु ते नौ मृडयन्तु ते पं दिमो यश्च नो येष्टि तपां जम्भे दध्मः ॥१८॥ इसका परमे० प्रा०, भु० ग० धृ० छ०, लिङ्गोक्त दे है। मंत्रा-( भयं, उराव, संपदः, तरूप, तायः, च, अरिष्टनेमिः, सेनानीग्रामदयो, च, विश्वाची, च, पृनाची, सप्सरसौ, च. मार, इतिः, वाता, प्रहेतिः) यह उत्तर दिशामें स्थापित इष्टका धनसे प्राप्त होनेवाला या है, उसका अन्तरिक्ष में तक्षिण पक्षरूपी प्रायुधोंका विस्तार करनेवाला और भरिष्टनाशक अमतिहरा पायुधवाना सेनामी और ग्रामपालक शरद् ऋतु है संसार में विदित और मराठी भोजन करने वाली दोबस, जल शबई, .
१५ अध्याय ४१९ और पवन सीक्षाण शस्त्र है, शेपं पूर्ववत् ।। १८ ॥ अपमुपग्विमुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीग्रामण्यो। उर्वशी च पूर्यचित्तिश्चाप्स- रसायवस्फूर्जन् हुतिर्वियुत्महे तिस्तेभ्यो नमो अस्मु ते नौवन्तु ते नौ मृडयन्नु ते यं द्विप्मो यश्च ना द्वेष्टि तमैषां जमो दध्मः ॥ १९ ॥ इसका परमे० ऋ०, नि० ० छ०, लिदे. है । मंत्रार्थ (अयं, उपरि, अग्विमुः, तस्य, सनजित्, च, सुपेणः, सेनानी ग्रामणी, न, उर्वशी, प, पूर्वचित्तिः, अप्सरसौ, च, भवस्फूर्जन, हेनिः, विद्युत्, महेशि:) यद मध्यदिशा में वर्तमान इष्टकापर्जन्य है, उसके सेना जीरानेवाले और मुन्दर सैन्यवाले सेनापति और गामालक हेमनाना है और विस्तीर्ण काम को वश में करने पानी और श्राधिकरू होने से पुरुषों का मन हरने करनेवाली पूर्वचिति नाम दो अप्सरा हैं और भयका हेतु वनका शब्द शस्त्र ई, विनी तीक्षण शन है, इनको नमस्कार है, इत्यादि पूर्ववत् १९ अग्निमा हिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अधम् । अपा रेता सि जिन्वति ॥२०॥ मंत्राथ-इसकी व्याख्या ३ अ० ११० में होगई ॥ २० ॥ अपमग्निःसंहस्रिणो वाजस्य शतिनस्पतिःमूर्ती कवी रयीणाम् ॥ २१॥ इसका परमे० ऋ०. नि० ० /०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ (अयं, अग्निः सानिमः, शनिना, वाजस्य, पतिः, कविः, रथीणाम्, मा) पह अग्नि सास संपावाले श संख्यावाले अन्नका स्वामी क्रान्तदर्शी और सब धना में प्रधान धनवाला है २१ स्वामने पुरादध्यर्वा निरमन्धत । मध्नों विश्वस्य वापतः ॥ २२ ॥ मंत्रार्थ--इसकी व्याख्या ११० ६२ कं० होगई ॥ २२ ॥ भुवो ज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रो निद्भिः सचसे %3D ।
. ४२० शुक्लयजुर्घद। शिवाभिः । विवि मूनि दधिपेस्वाँ जिन्हा- मग्ने धकृपेहव्यघाहम् ॥ २३ ॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, नित्रि० छ. अग्नि देवता है। मनार्थ- इसकी व्याख्या १३ अ० १५ कण्डिका में होगई ।। २३ ॥ अयोध्यग्निः समिधा जनानां प्रतिधनामवाय. तीमुपासम् । यहा इय प्रव्यामुजिहानाः म भान सिस्रते नाकमच्छ । २४ ।। इसका परमेष्ठी १०, नि० त्रि०० है अग्नि दे० है। मंत्रार्य (अनानां, समिधा, भग्निः, अयोधि, इच, गायतीय, धेनुम्, उपासम्, प्रति, मानवाः, नाकम्, अच्छ, प्रसिस्रते, इच, वपाः यहा, मोज्जिहाना,) ज्ञान श्रद्धा द्विजतर्पण, सत्यादिसे सम्पन्न अग्निहोत्रियोंकी समिधासे अग्नि प्रचलित होते हैं, दीप्तिमान' उसकी किरणें स्वर्गके चारोंओर से फैलती हैं, जिसमकार पक्षी बड़े पक्षोंसे वृक्षोंकी शाखामोसे आकाशको उड़से हैं ॥ २४ ॥ अपोचाम कबऐ मेध्याय वचो बन्दा पाप वृष्णे । गर्षिष्ठिो नमसा स्तोममग्नी दिवीय रुपममुरुपंचमत् ॥ २५ ॥ इसका परमेष्ठी प्रा०, नि० मि० , भग्नि दे० है । मंत्रार्थ उद्गाशा कहते हैं-हम ( कवये, मेध्याय, वृषभाय, तृष्णे, बन्दा वचः, श्रवोचाम, गविष्ठिरः, नमसा, स्तोम, अग्नौ, अश्रव, इव, दिवि, रुक्म, उरुव्यञ्चम.) क्रान्तदर्शी यज्ञके योग्य श्रेष्ठ कामना पूर्ण करनेमें समय अनिके निमित स्तुतिवन्दना करनेवाले वचनको कथन करते हैं। वाणीमे स्थिर होताहुमा पुरुष अन्नसे युक्त स्तुति को भाइवनीय अग्निमें भर्पण करता है, जिसमकार स्वर्गम रोच मान मादित्यको सध्यावन्दन सूर्यपस्थानादिम प्रयुक्त कीहुई • अपमिह प्रथमोपापि यावृभिहोता यजिष्ठो अरेवीया यमर्मवानो भृगयो विरुरुधुनें बड़ी स्तुति भर्पित होती है ।। २५।।
१५ अध्याय। १२१ . चित्रं विश्व विशे चिशे ॥ २६ ॥ इसकी व्याख्या ३ अ० १५ २० में होगई ।। २६ ॥ जनस्य गोपा अजनिष्ट जाग्रविरग्निः मुदक्षः सुविताय नव्य॑से घृतप्रेतीको हतादिविस्टशा घुमद्विभाति भरतेभ्य: शुचिः ॥ २७ ।। इसका परमेष्ठी मा०, नि०दाज. छं०, माग्नि दे० है। मंत्रार्थ (जनस्य, गोपाः, जागृवि, सुदक्षः 'घृतप्रतीकः, शुचिः, अग्निा, नव्यसे, मुविसाय, भरतेभ्यः, अजनिष्ट, दिपिपृशा वृहसा, द्युमत्, . विभाति ) यजमानोंका रक्षक कर्म में सावधान अति उत्साहयुक्त घृत को मुख में रखनेवाला पवित्र माग्नि नवीन यज्ञ के निमित स्विजोंके द्वारा प्रकटहुआ वह अग्नि स्वर्ग को सश करनेवाली बड़ी कान्तियों से प्रकाशवान होता है ॥ २७॥ त्यामग्ने बिरसो गुहाहितमन्व॑विन्दछिश्रि- गणं घने बने । स जापसे मध्यमानः सही महत्त्वामहः महसस्पुत्रमशिरः ॥ २८ ॥ इसका, परमेष्ठी ऋ० विरादापी ज० छं०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(अङ्गिक, अग्ने, अङ्गिरसः, त्वाम, गुहाहितम्, वने वने, शिश्रियाणं,अन्धविन्दन,सः, महत्सहः, मध्यमानः,जायसे त्वाम्, सहसा, पुत्र, माहुः ) अनक रूपसे यबमें विचरनेवाले हे अग्नि देव, मङ्गिरा ऋपिके वंशमें उत्पन्न हुए ऋपियोंने तुमको निगृह देश में स्थित अनेक वनस्पतियों में निवास करने वाले को ढूँढकर मासाकिया, वह तुम अब बटे बलसे मध्यमान होने के कारण अरणीसे उत्पन्न होते हो, तुमको इसी कारण मुनि, वलका पुत्र ब्रह्मज्योति कहाँहै ।। २८ ॥ सखायः संवः सभ्यश्चमिषध स्तोम चाग्नये । वर्षिष्ठाय क्षितीनामूो नजे सहस्वते ॥ २९॥ इसका परमे १०, वि०, ज०,०, अरिम दे. मंत्रार्थ- यजमानने कहा हे ऋत्विजों ! (सखाया, वा, क्षितीनां बापटाय, - - . ४२२ शुक्लयजुर्वेद । ऊजः, नप्त्रे, सहस्वरो, अग्नये, सम्यञ्च, इपं, च, स्वोमं, समम् ) मित्ररूप तुम मनुष्यों के श्रेष्ठाम जलके पौत्ररूप वहे वनवाले अग्नि देवताके निमित्त समीचीन नवीन हविरुप मनको और स्तोत्रको समादन करो ॥ २९॥ स समिथुपस पन्नग्ने विश्वान्यर्य आ। हुड. स्पदे समिध्यस स नो वसून्यातरं ।। ३०॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, विरानु० ई. मरिन दे. है। मार्थ (वृपन, मम्ने, भर्यः, विश्वानि, सम्, भा, संयु बसे इउपदे, समिध्य से, सः, इत्, नः, वमूनि प्राभर ) हे सेवन करनेवाले अग्निदेव : रवामी तुम सम्पूर्ण यज्ञफनोंको सबभोरसे यजमान को प्राप्त कराते हो, पृथ्वी स्थान उत्तरवेदीमें कर्मके निमित्त मदीप्त होते हो, वह तुम ही हमारे निमित्त धनोंको सबमकार' लाकर प्रदानकरो ॥ ॥ ३०॥ वांचित्रश्रवस्तमहवन्ते विक्षु जन्मवः। शोचि- केशं पुरुमियाग्नै हुव्याय वौढचे ॥३१ ।। इसका परमे० ऋ०, वि. नु० ई०, अग्नि दे०है । मंत्रार्थ- (चित्रश्रवः, पुरुमियः, अग्ने, विक्षु, जन्तवः, तं, स्वां, हव्याय, वोढवे, हवन्ते ) कीर्ति और ऐश्वर्य से प्रतिविचित्र यजमानों के मिय हे अग्ने ! मजाओं में प्राविग्यजमान उस तुमको हवि वदन करनेके निमित पुनाते हैं ॥ ३१ ॥ एना पो अनि नमसोजों न पातमाईखे । मियः । चेतिष्टममि स्वध्वरं विश्वस्प दृतममृतम्॥३२॥ इसका परम० ऋ०. वि. वृ० छ०, अग्नि दे है। मंत्राथे-- हे ऋत्तिग्यजमानों ! (वः, एनाः, नभसा, ऊर्जा, न, पागम्। भियं, चेशिष्ठम्, प्रासिम, स्वध्वरम् विश्वस्या दूरी. अमो, अग्निम् माहुरे ) मुम्हारे इस अन्नद्वारा जलाके पोमे यत्नमानकी प्रीति के कारण अतिशय चगन्याशी ज्ञानदाना सदा उद्यमी श्रेष्ठ यज्ञबारे सम्पूर्ण के गृहपाकादि कार्य करने से. दतम मरणरवि भान 4 . .
१५ अध्याय । ४२३ - ६. को स्तुति पूर्वक पाव्हान करते हैं ॥ ३२ ॥ विश्वम्य दूतममृतं विश्वस्य दुतममनम् । स योजा अरुपा विश्वभोजमा सदुद्रवत्स्याहुत: ३३ इसका परमेष्ठी ०.नि. दु० ई० भोग्न० दे० है मंत्रार्थ अमृत, विश्वस्थ, दूस, अमृत, विश्वस्य, दगम्, सः, अरुपा, विश्व- भेजसा, योजते. स्वाहता, सः, दुद्रस्त ) मरणधर्माहित सब के दूसचत् कार्यकर्ता माणुधर्मरहित सम्पूर्ण के दूत जिस अग्नि को हम चलाते हैं, वह अग्नि फ्रोधरहिस श्रेष्ठ सब यज्ञके भाग भोगने वाले दो अन्योंको अपने रथमें योजना करता है, रथारूढ होकर भलीप्रकारस शाहुशिको प्राप्त हुआ वह भोग्न शीघ्र प्राप्त होता है ३३ सदुद्रधत्स्वाहतः स दुद्रवत्स्वाहुत्तः । मुब्रह्मा यज्ञः मुशमीघट्नां देवराधो जनानाम् ॥ ३४॥ इसका परमेहती , अग्नि देवता है। मंत्रार्थ--(सुब्रह्मा, सुशनी, यज्ञः स. स्वाहतः, द्राव, साहतः, सः, जनानाम् देवं,' राधः, वसूनाम्, दुदवत् ) श्रेष्ठ ऋविजोंसे युक्त शुभकर्मवाला यह उसमें वह श्रग्नि शुभ पकारसे श्राव्हान किया हुआ यह जहां यजमानोंका दीप्यमान धन है वहां वसु रुद्र प्रादि देवगणोके तीन 'सबनके यज्ञमें जाता ॥ २४ ॥ अग्न वाजप गोमत ईशानः सहसो यही अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः॥ ३५ ।। ० अप्णिक् छ० अग्नि देवताह । मंत्रार्थ-- (सहसा, यहो, जातवेदः, अग्ने, गोमतः, व जस्य, ईशानः, अस्म- महि, श्रवः, धेहि ) बनके पुत्र ज्ञानसम्पन्न हे अग्ने धेनुयुक्त भन्न के शापति तुम. हमारे निमित्त बहे धनको दो ॥ ३५ ॥ स धानो वसुष्कविग्निरोडेन्यो गिरा बढ़- स्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि ॥ ३६ ।। इसका परमे० ऋ, नि० दु०,०, अग्नि दे. है। मंत्रा (पुर्वणीकः सः, इधानः, वसुः, कविः, गिरा, इंडेन्या, भनि:, इसका परमे . - . . . शुक्लयजुर्वेद । तो न उऍपूर्या उक्थेपुं शवसस्पन इपं स्तोतृभ्य भाभर ॥४३॥ इसका परमे०३०. नि०प०/०, अनि दे० है । मंषि-(मु. चन्द्र, प्रासमि, सर्पिषः, उमे, दवी, श्रीणीपे, मतो, शवस: पत, उस्पेषु, नः, पूर्णः. स्वोभ्यः, इपम्, पाभर) चन्द्रमाकी समान भान्हाद करनेवाले हे अग्ने ! तुम अपने मुखमें घूमपान करने के निमित दोनों दर्शक श्राकारवाले हायोंको ग्रहण करते हो और हे बलके अधिपति ! शस्त्रनाम स्तुतिवाले यहॉमें हमको धनास पूर्ण करो स्तुति करने वालोंको अन्न दो । ४३ ॥ अग्ने समद्याश्यं न स्तोमैः ऋतु न भद्र हटि- स्पृशम् । प्राध्यामातु ओहः ॥ १४ ॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, पदपंक्ति छ, भरिन दे० है । मंत्रार्थ-- (अग्ने, अय, से, तम्, ऋतुं, मोहैः, स्तोमः, पा, अध्यास, न, अश्वम् न हादस्पृशम, भद्रम् ) हे अग्ने ! अाज तुम्हारे उस यज्ञ । को तुम्हारे नामरूप कर्मके प्रतिपादन करनेवाले फलप्रापक साम मनोंसे सवभकार समद करते हैं, जैसे अनेक स्तुतियोंसे मश्वमेध के घोड़ोंको श्राह्मण समृद्ध करते हैं जिसमकार असिमिय चिरकाल से मनमें स्थित कल्याणरूपी यज्ञके संकल्पको समृद्ध करते हैं ४४ अधाह्यग्ने क्रतो द्रस्य दक्षस्य माधोः । धीमतस्य बृहतो बभूध ॥ ४५ ॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, मु०, ५०, छ०, अग्नि दे । मंत्रार्य- (अग्ने, अथ, हि, दक्षस्य, साधो: भद्रस्य, ऋतस्य, बहराः, फ्रता, रथी, वय) हे अग्ने ! इसके अनन्तर अवश्य समृद्ध सम्पक प्रकारसे अनुष्ठान किए कल्याणम्प अमोघ फलवाले बड़े हमारे यहके, सारपी जिसमकार रपका निर्वाह करता है सिसाकार नि- हक हजिये ॥ १५ ॥ एभिन्ना अभयानो अदि स्वर्णज्योतिः । . अग्ने विश्चति सुमना अनीकः ॥ ४६ ॥ - - १५ अध्याय . . इसका परमेष्ठी ऋ०, पदपीक छ, अग्नि दे. है । मन्त्रार्थ (अग्ने, नः, एभिः यः, सुमनाः, विश्वमिः भनीकः, नः भाड़ श्रा भन, न, स्वज्योतिः ) हे अग्ने ! हमारे इन पदहुए मन्त्रों से प्रसन्नमन होकर अपने सम्पूर्ण मुखों से सबमकार इमारे सन्मुख हजिये, जैसे सूर्य प्रकाश में उदित होकर सम्पूर्ण जनतके सन्मुख. होता है ।। ४६.३ अग्नि होतारं मन्ये दास्वन्तं वसुंध सूनु सहसो जातवेदसं विपून जातपैदसम् । य ऊर्ध्वपो स्वञ्चरो देवो देवाच्या कृपा । घृतस्य विभाट्रि मनुवाष्टिशोचिषा जुनस्य सर्विः॥१७॥ इसका परमे० ऋ०, अतिश्छन्द छ०, अग्नि दे है ।मंत्रार्थ (या, देषः, स्वध्वरः, ऊर्ध्वपा, देवाच्या, कपा, शोचिपा, मा. जुरहानस्य, सर्पिपः, पृरास्य, विभ्राष्टिम, अनुष्टटि, माग्न,होसारं, दास्तराम्, वमुम्, सहसः, मर्नु, जातवेदसं, जातवेदसं, विम, न, मन्ये) जो दानादि गुणयुक्त शुभयशाला अग्नि ऊंची, देवताओं के समीप जानेवाली समर्प ज्वालासे सबभोर होमेहुए मा २ में फैलनेवाने घृतके निरन्तर पानको इच्छा करता है,उस अग्नि को देवताओंका बुलानेवाला दानशील वासदेनेवाला प्रायोति का पुत्र समकारके ज्ञान से सम्पन्न सर्व शास्त्रके मानवाले ग्रामण की समान जानता हूँ ॥४७॥ अग्ने त्वन्नो अन्तम त माता शिवो भवा. यथ्या, यमुरग्निमुश्रूषा अच्छानक्षिणुमत्तम गपिन्दः । सन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवा । मुम्नार्य नूनीमहे सखिभ्यः ॥४८॥ मंत्रार्थ इसकी व्याख्या [ ३ १०२५, २६ ] काण्डका में होगई ॥१८॥ येन ऋषयस्तपसा सुत्रमायन्निन्धाना अग्नि स्वाभरतः तस्मिन्नई निर्दधेना अग्नि : - -- . शुक्ल यजुषद। यमातुमनवस्तीर्णयहिपम् ॥ ४९ ॥ इसका परंमे० ऋ०, धापी त्रि०,०, अनिदे० है। मंत्रार्थ (अग्नि, इन्धानाता, भामरन्तः, अपयः, येन,तपसा, साम् आयन, तास्मिन, नाके, अग्नि, मह, निदधे, मनमः, स्लीवाई- पंम्, पाहुः) अग्नि को मदीश करते स्वर्गको स्वीकार करते ऋपि जिस चितकी एकाग्रतारूप तपसे यज्ञ करनेको उद्यत हुए उस सपके होनेपर स्वर्गलोकमें प्राप्त करानेवाले अग्निको मैं स्था. पन करता हूँ. मनन करने में प्रधान विद्वान जिस अग्निको यज्ञ साधन सहित कहते हैं ।। ४९ ॥ - तम्पनीभिरनुगच्छेम देवाः पुत्रैभ्रातृभिनत वा हिरण्यैः। नाकै गृभ्णामाः सुकृतस्य लोके तृतीय पृष्ठे अधिरोचने दियः ॥५०॥ .. इसका परमेष्ठी प्रा०, भु. गा०, त्रि०,०, अग्नि देवताहै। मंत्रार्थ--('देवाः, तृतीये, दिवः, पृष्ठे, सुकूनस्य, रोचने, लोके, मार्क, अधिगृमंगाना:, पत्नीभिः,पुत्रैःचा, भ्राताभ, उत,हिरण्यैः वम्, अनुगदम ) हे विद्वान यात्वजों ! भुमिस सीसरे घुलोक के ऊपर शुभकर्म के फलरूप दीप्यमान मादित्यमण्डल में दुःखद्दीन स्थानको स्वीकार करते हुए हम स्त्री, पुत्र, भाई और सुवर्णादि देव्योंके साथ उस अग्निका सेवन करें इस्से हमको सीसरे लोक की प्राप्ति होगी ॥ ५० ॥ आवाचो मध्यमारुहटुर एयुग्यमग्निः सत्पति- श्वेकितानः । पृष्ठे पृथिव्या निहितो विद्युतद्- धस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः ५१ ॥ इसका परमे० ऋ०, स्वराडापी त्रि०, छ, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ-(अय, भुररायुः, सत्पतिः, चेकितानः, पृथिव्याः, पृष्ठे, निहिता, दविद्युतत, मग्निः, चाचः, मध्य, प्रारूहन, ये. पृसन्यवः अधस्संदम्, कृणुताम् ) यह जगत्का कर्ता. सत्पुरुपोंका पालक भानी पृथिवीके ऊपर स्थापित अत्यन्त प्रकाशवान अग्नि चयनके - . - १५ अध्याय। ४२९ . . मध्यस्थान में स्थित हुमा, जो शुदकी इच्छाचाले पापी है तिनको चरणोंके अधोभागमें करें ।। ५१ ॥ अयमग्निचरितमो घगोधाः सहस्त्रियो घोतवा- मंयुक्छन् । विम्राजमानः सरिरस्य मध्य उपप्रयाहि दिव्यानि धाम ।। ५२ ॥ 'इसका परमे० प्रा०, निदापी त्रि०ई०, श्रीपदे मंत्रार्थ (अयम्, वीरतमा, बयोधाः, सहलिया, अग्निः, अमयुन्छन्, धोतताम्, सरिरस्य, मध्ये, विभ्राजमाना, दिव्या, धामानि, उप- प्रया ) यह बड़ा वीर हविग्रहण करनेवाला सहस्र इष्टकानास केतुल्य अग्नि देवता काम प्रमाद न करताहुना प्रमलित हो, . त्रिलोकीके मध्य में दीयमान दिव्य स्थानोको प्राप्त हो ॥५२॥ सम्प्रच्यवध्वमुपसंप्रयाताग्ने पुधो देश्यानाम- कृणुभ्यम् । पुनः कृष्वाना पिता युवानान्यात सीत् त्वयि तन्तुमेतम् ॥ १३ ॥ इसका परमेष्ठी मा० मु००प० छ, अग्नि दे० है । मार्ग, देशपियों ! तुम (प्रन्यवधा. उप, सम्यान, अग्ने, देवपानान, पथः, कंगुध्वम् पुन:, गिरा, युवाना, करवागाः, एतम्, 'रान्सू, त्वयि, तन्वाता सीत् ) इस अग्तिके समीप पासो. समीप पाकर भलेमकार मात करो, हे भग्ने, देवयान मार्गको सिद्ध फरो, फिर वाणी और मनको तरुण करतेहुए ऋषियोंने इस यज्ञ को तुझमें क्रमपूर्वक विस्तार दिया है।। ५३ ।। उद्बुध्यस्याग्ने, प्रनिजागृहि त्वमिष्टापू स. मुंजेधामयं च । अस्मिन्सधस्थे अध्युत्तरास्मिन् विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत !! ५४॥ सबका परमे० ऋ०, प्रा० वि० छ०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ ' (अग्ने, ले, उद्ध्वस्त गतिजागृहि इष्टापूर्ते, संस्कृयाम्, अयम्,च, विश्वेदेवाः, यजमानः, च, सरस्थे, श्रीमन, उनरस्मिन, अधि सीदत) हे अग्ने तुम सावधान होओ, श्रौतस्मात कर्ममें यजमान , - ० शुक्लयजुर्वेद । से संसर्ग करो तुम्हार मसादसे यह इष्टापून से निप्पाप यजमान भी देवताओं के साथ स्पिनियोग्य इस सबसे उत्कृष्ट स्वर्गलोक में निरकाल तक निवास करे ॥ ५४॥ येन वहसि सह पनीने सर्वचेदसम् । तेने यज्ञं नौ नय स्वदेवेषु गन्तवे ।। ५५ ॥ इसका परमें० ऋ०, नि० अ. ०. अग्नि दे० है । मंत्रार्थ ( अग्न, येन, सहस्र, वासि, येन मनदसं चेन, नः, इमम्. यज्ञम, देवेष, गन्तवे, स्वः, नय ) हे पाने जिस सामय से सहस्र दक्षिणाचाले यसको प्राप्त करातेहो जिस सामर्थ से सर्वस्व दक्षि- णाराने यनको माप्त करासे हो उस सामर्थ्य से हमारे इस छोटे यज्ञको देवतामोके प्रति गमन करने को स्वर्गमें प्राप्त करो या के स्वर्गम गमन होनेसे हमारा भी वहां गमन होगा ।। ५५ ।। अपनो पोनिविणो यतो जातो अरोंचधाः। तनानन्नान आरोदार्था नो यर्डया गपिम् ।। ५६ ॥ इस मं० की व्याख्या ३.१४० के १२१५२ मं० में होगई ५६ तपश्च तपस्पर्य शैशिगवतू आनेरन्तः श्लेपो- -ऽसि कल्पेतां चायापृथिवी कल्पनामापु ओप- धपः कल्पतामानयः मधुङ् मम ज्यैष्ठयाय सवताः । ये अग्नपः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी हमे शशिरावृतू अभिकल्पमाना इन्द्रमिव देवा अभिसंविशन्तु तपो देनयाहिटस्वट् ध्रुवे मादतम् ॥ ५७ ॥ इसका परम ऋ०, स्वरादुत्कृति छ०, ऋतु दे० है । मंत्रार्थ (तपः ) माघमास ( तपस्यः ) फाल्गुनमास. ( शशिरात् ) शिशिर ऋतुक अवयवहैं। शेषकी व्याख्या १३ ॥२५ में होगई ५७ परमेष्टी त्या सादयतु दियस्पृष्ठे ज्योतिष्मतीम् । विश्वस्मै गणार्यापानापं व्यानाय विश्वयो। तिर्पच्छ । सूर्यस्तेधिपतिस्तो देवतयानि- - ४३१ १५ अध्याय। स्वद्धृवामीद ॥ ५८॥ इसका परमेष्ठी ऋ०, शश्वरी ०, सूर्य देवताहै । मंत्रार्थ-हे इंटक ( परमेष्ठी, ज्योतिष्मसीम् त्या, दिवः, षष्टे सादयतु, मू:, रो, अधिपतिः ) विश्वकर्मा वायुरूप ज्योतिष्मनी तुझको धुनोक के ऊपर स्थापनकर सूर्य तुम्हारा स्वामी है ।। ५८ ।। लोकं पृण छिद्रं पृणाधों सीद ध्रुवा त्वम् इन्द्राग्नी । त्वा वृहस्पतिरस्मिन्यांनाघमीपदन् ॥ ५९॥ ता अस्य मुददोहसः मोम श्रीणन्ति प्रश्नयः जन्ममन्देवानां विशस्त्रिधारोंचने दिवः ।। ६०॥ इन्दं विश्वा अवीवृधन्ममुद्रव्यंचसं गिरः । प्रीतम राधीनां चाजाना, मत्पनिम्पतिम् । ६१॥ इन तीन मंत्रों की व्या• [१२ ० ५४..५५-५६ क० ) में होगई ॥ ५९-६०-६१॥ प्रोथदश्वो न यसैविष्यन्दा महः संवरणा- यस्थात् । आदस्य यातो अनुवाति शोचिर स्मतं व्रजनकृष्णमस्ति ।। ६२ ।। इसका वशिष्ठ ०, विराट् त्रि० छ०, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ ( यदामहः, संवरणात्, व्यस्थान, मोथत, न, अश्वः, अविष्यन्, यवसे, पात्. शोचिः. वातः, अस्य, अनुवाति, अधः, से, वजन, कृष्णम्, अस्तिस्म ) जिस समय बड़े अरणीकाठसे अग्नि प्रकाशित होती है. तव शब्द करती है जिसमकार घोडा भोजनकी इच्छा करता हुमा घासके निमित्त शब्द करता है माग्न के प्रज्वलित शब्दके उपरान्त प्रज्वलिन करनेवाला वायु अग्नि की ज्वालाको देखकर वहन करना है, इसके उपरान्त हे अग्ने ! उस समय तुम्हारा यह गमन कृष्णवर्ण होता ही है । ६२ ।। आयोवा सदने सादयाम्यवंतश्छायायो, समुद्रस्य हृदये । रश्मीवतीम्मावतीमायाद्या. म्भारपा पृथिवीमान्तरिक्षम् ॥ १३ ॥ , . .
१३२ - शुक्लयजुर्वद। इसका वसिष्ठ प्रा०. वायुणिरई, सयमातृगणा दे० है। मंत्रार्थ-हे स्वयमावृणे ! ( अवतः, समृद्रस्य, शायोः, छायायाम, हृदये, सदने, रश्मिवतीम्, भास्वनीम्. स्वा. सादयानि) जमवले पालन करनेवाले वर्षासे जगन्को भाद्र करनेवाले आयु नामसे प्रसिद्ध आदित्यदेवताके पाश्रयरूप प्रधान हृदयरूप स्थान में बहुत किरणों से युक्त महाशवान तुमको स्थापन करसाई (स्वम्, थाम् आभासि, पृथिवीम्, ऊरु, अन्मरिसं,मा) तुम घुनांकको प्रकाश करती हो, भनोकको प्रकाश करती हो, विस्तीर्ण अनारिक्षको प्रकाशमान करती हो ॥६॥ • . मेष्ठी त्यो सादयतु दिपस्पृष्ठे व्यर्चस्वतीम्म स्वतीन्दिव यच्छ दिवन्द्रह दिक्म्मा हि सी। विर्श्वस्मै प्राणार्यापानायं व्यानायौदानाचे प्रति ठाय चरिमाय । सूर्यस्याभिपातु मह्या स्व. स्त्याच्छदिपा शन्तमेन तयाँ देवतयागिरस्वद् ध्रुवे सीदतम् ॥ ६४ ॥ इसकी व्या० १४ अ० के १२ मं० १५ १०५८ मे० में होगई१४ समस्य प्रमासि सहस्रस्य प्रतिमासि सहस्र- स्योन्मासि माहस्रोसि सहनाप त्वा ।। ६५ ।। इसका मधुम्बनमा प्रा०, देवी जगती याजुप्यनुष्एर दैवी प.. छ, अग्निदे है। मंत्राय-हे भग्ने तुम (सहस्रस्य, प्रमा,यसि, सहस्रस्य, प्रतिमा, असि, सहस्रस्प, उन्मानं, असि, साहन:, श्रास, सहस्राय, त्वा) सहप इष्टताओं की ममाण हो, तुम सहस इष्टाकाओंकी प्रतिनिधि हो, तुम सहन इप्टाकाओं की तुझा हो, तुम सहन्न इष्टकामोंके उपयुक्त हो, अनन्त फलमाप्तिके निमित्त तुमको प्रोक्षण करता हूँ ॥ १५ ॥ इति एक्टय वेदान्तर्गत बाजरानेयिसहि ताका सानुवाक पंचदश अध्याय समाश १६ अध्याय अथ पोडशोऽध्यायः। । . (रुद्राध्याय,). जिसमें पञ्चम चिति मधान है ऐसे पंचदश अध्याय में चयनके मंत्र समाप्त करके सोलहवें अध्याय में शतरुद्रिय. होम के मन्त्र वर्णन करते हैं- ॥ हरिः ॐ 1) नमस्ते रुन मन्पर्वउत्तो त इपये. नमः । बाहुभ्यामृत ते नमः ॥ १॥ इसका परमेष्ठी , गायत्री छ०, रुद्र देवता है । 'मनार्थ- (रुद्र, से, मन्परे, नमः, उसो, से, इपये, नमः उस, रो, बाहुभ्याम्, नमः) हे दुःखके दूर करनेवाले अथवा ज्ञान के देनेवाले प्रयया पापीजनों को उनका कर्मफन देकर रुलानेवाले रुद्रोव ! आपके क्रोधको नमस्कार है और तुम्हारे पाणोंको नमस्कार है अर्थात् हे रुद्रदेव! भापका क्रोध और वाणधारी दस्त शत्रुओंपर प. हमको शान्ति प्राप्त हो 11 111 या से रुद्र शिवा तनूरघारापापकाशिनी । तपोनस्तुन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि इसका परमेष्ठी ऋ०, पापी स्वराटनु छ, रुद्र देवसा है। मंत्रार्थ-(गिरिशस, रुद्र, या, से, शिवा, अघोरा, अपापकाशिनी, साना, सपा, शन्तमपा, तन्वा, नः, अभिचाकशीहि ) कैलाश पर्वत पर वा वेदवाणी में स्थित होकर प्राणियों के मुख को बढ़ानेवाले वा मेघ में स्थित होकर वर्षों से सुख देनेवाले हेरुद्र । जो तुम्हारी शान्त मालरूप, सौम्य, पुण्यफल की देनेवाली पराशक्ति है उस परमानन्दरूप शरीराकार शक्ति से हमको देखिये ॥ १॥ पामिपु गिरिशन्न दस्ते विभपर्यस्तये | शिवा- मिरित्र तारुमा हिंसी, पुरुपं जगत् ॥३॥ इसका परमे० ऋ०, वि. ५०, रुद्र देवता है। मंत्रार्थ- (गिरिशन्त, गिरित्र, घाम, इपुम्, अस्तबे, हस्ते, विमा, वाम, ५९ . , ।"
१३४ शुक्लयजुर्वेद । शिवाम, कुरु, पुरुषम, जगद, मा, हिधंसी:) हे वेदवाणी में स्थित होकर जगत् का कल्याण करनेवाले, कैलास वा वदवाणी में स्थित होकर माणियों की रक्षा करनेवाले तुम जिस बात को शत्रुओं के नाश करने को हाथ में धारण करते हो है. रक्षक उस घाण को कल्याणकारी करो, पुत्रपौत्रादि और जगन के गाश्वादि को मस मारो अथवा जीवात्मा और इन्द्रियों के समूह को संसार बन्धन से नष्ट न करो, किन्तु सदुपदेश देकर मोक्ष प्राप्त कराओ ३ शिवेन वचसा वा गिरिशाच्छ वदामसि । यथा नः सर्वमिजगदयक्षम, मुमना असत् ॥ ४॥... इसका परमेष्ठी , नि. म. छ०, रुद्र देवगा है। मंत्रार्थ- (गिरिश, शिवेन, वचसा, वा, अच्छ, बदामसि, नः, सर्वे, इव जगत्, यथा; भयक्ष्म, सुमनाः. असं ) हे वेदवचन में शयन करनेवाले परमात्मन हम मालंकारी वेदरूप स्तुतिवचन से, तुम को माप्त होने के निमित्त प्रार्थना करते हैं, हमारे सब ही जंगम मनुष्य पशु आदि वा इंद्रिये जिसमकार नीरोग वा संसाररोग से मुक्त शुभ मनवाले हों से करों॥ १ ॥ अयवोचदधिवक्ता प्रथमो देव्यों भिषक् । अहीश्च संवीजम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्योध- राची: परासुवं ॥५॥ इसका जापति ऋ०, मु० गा० ०/०, रुद्र देवता है । मंत्रार्य माधिवक्ता, प्रथमः, देच्या, भिपक्, मध्यवोचत्, च, सर्पान, भहीन, जम्भयन्, सर्वाः, अधराची: यातुधान्यः, च, परामुवी तारकमन्त्रका उपदेश करनेवाले सब देवताओंमें मुरुप पूजनीय देवसानों के हितकारी संसाररोग नाशक रुद्र हमको सबसे अ- धिक दें वा महामंत्रका उपदेश दें, और सब सादिकी समान इसनेवाले कामादिका विनाश करतेहुए सम्पूर्ण भयोगमनशील कामकलारूप राक्षसीको भी हमसे दूर करें ॥५॥ "असी यस्ताम्रो अंगण इत भ्रा सुमंगलः । -- -- . .
१६ अध्याय . ये चन द्रा अभितो दिक्षु भिवासहस्रशो वैपा, हेड ईमहे ।। ६ । इसका मजापनि ०, निवृ०६०/०, रुद्र देवता है। मंत्रार्थ (च, यः, 'असी, जानः, अरुणः, उस, पभुः, मुमला, च, ये, सरमशः, रुद्राः, एनम्, श्रीमतः,दिनु,श्रिताः. एषाम्, हेड: ईमहे) और जो यह प्रत्यक्षरुद्र सूर्यप उदयसमयमें अत्यना लालवर्ण अल्लासमय रक्तवर्ण और मध्यान्ह समयमें पिङ्गलवर्ण मंगलरूप कोका विस्तार करनेवाले हैं और जो सहखों रुद्रांशरूप देवता इनके सपभोर दिशामि. स्थित है, इनका क्रोध जोकि हमाहे थपरापसे प्रकट हुमा है उसको हम भाक्तिद्वारा निवारण कररोहैं। असौ योपसर्पति नीलग्रीवो विलोहिता उतनं गोपा भन्नअन्नुहोर्यु:स दृष्टो हयाति नः॥ इसका मजापति ऋविरादापी पंक्ति छ०, रुद्र दे० है। मंत्रार्य (यः, असो, नीलग्रीवा, उत, विलोहितः, भवसर्पति,एन, गोपाः, अश्रन्, उदहार्यः, अदृशन, सः, दृशः, ना, मृदयाति) जो यह विषधारणसे असमय नीलग्रीव भौर विशेप रक्तवर्ण श्रादित्य रूपसे उदय अस करते निरन्तर गमन करते हैं इनको घेदोक्तसंस्कार दोन गोगलतक देखो हैं, जल लेगानेवाली नारीपर्यन्त भी देखसी ह वह रुद्र दर्शनपश्में पास होते ही हमको मुखो करें,अथवा गोप कहिये इन्द्रियगोतकोंकी रसक इन्द्रियशक्तियां देखती हैं, और उदहारी कहिये अमृसको प्राप्त करानेवाली प्रभाशक्तिये दे: सती है वह रुद्र दर्शन देशहुए हमको मोतमुख दें।॥७॥ 'नमोस्तु नीलग्रीवाय सहनाक्षाय मीदु। 'मया पे अस्प सत्वानो इन्तेभ्यो कानमः ॥८॥ इसका प्रजापति ० वि०, ५०, ई०, रुद्र दे० हैं। मंत्रार्थ- (नीलग्रीवाय, सहन्नाक्षाय, मीदुपे, नमः,प्रस्तु, अयो, अस्य, ये सत्वानः, रोभ्यः, अहम, नमः, अकरम् ) नीलकण्ठ सामने से सर जातको देखनवाले इन्द्ररूप वा चिराष्ट्रकप सेचतम समर्प - . " -- - . शुक्लयजुर्वेद ।। पर्जन्यरूप वा वरुणरूप रुद्रके निमिच नमस्कार हो और इस रुद्र देवताके जो अनुचर देवता है उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥८॥ :: प्रमुच धवनस्त्वमुभयोराल्योाम् । याच ते हस्त इषवः परा ता भंगवो वप ॥९॥ इसका प्रजापति ऋ० वि०, ५०, ई० रु० देवता है । मंत्रार्थ (भगवः, धन्वनः, उभयोः, प्रायो।, ज्याम्, त्वम्, प्रमुच, च, या ते. हस्ते इपत्रः, सा, पराकप ) हे पश्चर्य सम्पन्न भावन । आप धनुषकी दोनों कोटियोंमें स्थित ज्याको दकरो उतार लो और जो आपके हाथमें वाण हैं उनको दर त्यागदो हमारे निमित्र सौम्यपूति होजाभो ॥९॥ विज्यन्धन कंपईिना. विशंल्यों वाणवान् ।' त । मनेशन्नस्य या इपय अ"भुरस्य निषाधिः॥१०॥ इसका सभापति ऋ०, भु० गा० छ०, रुद्र दे. है। मंत्रा' (. कपर्दिनः, धनुः, विज्यं उत, पाणवान, विशल्यः, अस्य, याः, पवः, भने शन, अस्य, निपलधिः, पाभुः ) जटाजूटधारी रुद्रका धनुपाज्यारहित और सरकस भालापाले वाणास. रीता हो, इन ईश्वर के.जों, वाण हैं - प्रदर्शनको माप्त हों इनका खा रखने का कोश स्वासे रीसा हों, क्योंकि-योगस जीवन्मुक्त मैं धके योग्य नहीं हूँ ॥१०॥ या ते, हेतिमौदुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः ।। ...तिमारमान्विश्वतस्त्वमक्ष्मया परिभुज ॥ ११ ॥ इसकागजापति ऋगि छ, रुद्र दे० है । मंत्रार्थ (महु-. टम, ते, या; इतिः, से, इस्ते; धनुः, बभूव, तया, यक्ष्मया, त्यप,विश्वतः अस्मान,परिभुज) हे ज्ञानामृतसे सीचनेवाले तुम्हारे जो ज्ञानरूप श्रायुध है भापके हाथ में जो माणरूप धनुष है, उस संसाररोगरूपी उपद्रव से रहित धनुष से आप सब ओरसे इम-, को पालन करोभर्थात हमभक्तों की संसारबन्धनसे.रक्षा करो११. । परि ते धन्वनो हेतिस्मान्द्रेणक्तु विश्वतः ।। . - . . . '१६ अध्याय। .४३७ अयो य ईपुषिस्तवारे अस्मन्निहितम् ॥ १२ ॥ इसका प्रजापति, निवृ० छ०, रुद्र दे० है। मंत्रार्थ-दे रुद्र से, धन्वनः, इतिः, विश्वतः, भस्मान, परिणस्तु, अथो, या, गव इपुधिः, तम्, भस्मत,भारे, निधेहि ) हे रुद्रतुम्हारे धनुपसम्ब- न्धी भायुध सबओरसे हमको त्यागें, और जो तुम्हारा सरकस है उसको हमसे दूर स्थापन करो ॥ १२ ॥ 1. अवतत्य धनुष्ट्व सहमान शतेपुधे। निशीर्य शल्यानां मुख शिवो न मुमनां भव ॥१३॥ इसका प्रजापति , नि०ई०, रु. देवता है। मंत्रार्थ- : सहस्रात, शतेपुरे, त्वम्, धनुः, अवसत्य, शयानाम, मुखा, नि- शीर्य, नः, शिवः, सुमनाः, भव) हे विराटप होनस सहस्रनेत्र हे सहस्रो तरकसवाने तुम धनुषको ज्यारहित करके वापोंके मुख भाला रहित करके हमारे निमित्त शान्त और. शोभनचित हुजिये क्योंकि मैं सायुज्यके योग्य हूँ ।। १३ ॥ नमस्तु आयुधापानांतताय विष्णवे। उमाभ्यां : मुत ते नमो बाहुभ्यान्तच धन्वने ॥ १४ ॥ इसका गजापति ऋ०, भु० गा० छ रु० देवता है। मंत्रार्थ- हे रुद्र (रो, मनासंसाय, प्रायुधाय, नमः, रो,उमाभ्याम्. बाहुभ्याम् उत, सब, धृष्णवे, धन्वने, नमः ) श्रापके धनुपपर न चढ़ाये हुए वाणके निमित्त नमस्कार है आपके दोनों बाहुओं के निमित्त और मापके शत्रुओको मारने में मगरम धनुपके निमिच प्रणाम है १४ . 'मानों महान्तमुत्तमा नौ अर्मकम्मा न उ... 'तमुत मान उक्षितम् :मा नौ वधीः पितर..." मोतं मातरम्मा नामियांस्तन्यो रुद्ररीरिपः ॥१५॥ इसका कुरस नि जगती ०,०देवता है। मंत्रार्थ है. रुद्र (नः, महासं, मा, वधीः, उत; ना, अर्भके,मा,नःअसं- न्तम्, मा, पत, ना, उक्षितम्, मा, न, पिवर, मा, उस नामा तर, मा, ना, प्रिया, तन्वा,मा, गरिपा) हमारे रद्ध गुरु पितृ- ।
शुक्लयजुर्वेद । पगडीधारण करनेवाले सभ्यगण मगरों में विचरने वाले शून्यमस्तक गिरिवनमें फिरनेवाले दोनों प्रकारके दलोंके हृदय में स्थित परमा- त्माको नम दे,इल बल कौशलसे दूसरोंकी भूमि भादि हरने वालों के पालक को नम है, मनुष्यों के डराने को वाण धारण करनेवाले और धनुप साथ लेकर चलनेवाले आपको नम है, कुनुञ्चों के दमनार्थ धनुपपर ज्या चढ़ानेवाले को नम० है और धनुषपर बाण चढानेवाले भापको नम० है और वाण को छोड़ने वाले आपको पारंवार नमस्कार है ।। २२ ।। नमो विसृजद्धयो विद्धय द्यश्च वो नमो नमः पद्रो जादूयश्च वो नमो नमः शयानभ्य आसीनेभ्पश्च वो नमो नमस्तिष्ठयो धागायश्च .. घो नमः ॥ २३ ॥ इसका कुत्स ऋ०, निच० ज० ई०, रुद्र देवता है । मंत्रार्थ- (विसृजद्भधः, नमः, च, विध्यद्भयः, वः, नमः, स्वपद्भधः, नमः, च, नागदपा, वः, नमः, शयानेभ्यः, नमः, च, पासी- नेभ्यः, वः, नमः, तिष्ठद्भयः, नमः, घ, धावद्भधः, वः, नमः) पापियों के दमनार्थ वाण छोड़नेवान्ने को नम मौर शत्रुभों के लक्ष्य को वेधनेवाले आपको नम है, सोनेवालों के अन्तर में स्थिर को नम० है और जाग्रत् अवस्थाके भनुभवी आपको नम० सुपुति अपस्यावालों के अन्तर में स्थित भापको नम है, और बैठनों के अन्तर में स्थित आपको नमः है और घेगयुक्त गतिवालों के अन्तर में स्थित प्रापको नम है ॥ २३ ॥ नमस्मनाभ्यस्मभापतिभ्यश्च वो नमो नमो. ऽश्वेभ्योऽश्वपतिभ्यश्च यो नमो नम आव्याधि- नीभ्यो यिपिध्पन्तीभ्यश्च वो नमो नम उर्गणा. भ्यस्तृणहतीभ्यश्च वो ममो नमः ॥ २४ ॥ इसका कुत्स ऋ, शपथरी ई०,०दे० है।मंत्राप-समाभ्यः ममः, च सभापतिभ्यः वः नमः, भरे-पा,नमः, च, भरवपतिभ्यः .
है - . १६ अध्याय वा, नमः, भाव्याधिनीभ्यः, नमः, च,विविध्यन्तीभ्यः,वः, नमः, उगणाय, गमा, च. वहतीभ्यः, वा, नमः) सभापको नम है [ समादिमें रुद्रट्टोष्ट करनी चाहिये सभापतिरूप प्रापको नम० प्रत्येक अवोंके अन्तरमें स्थितको नम० भवोंके अधिपतिको नम० है देवसेनामों में स्थितको नम है, विशेषकर बेधनेवाली देवसेनामों में स्थित आपको नम० उत्कृष्ट भृत्यसपहचाला प्रामीमादि मासाको नम० दे, युद्ध में प्रहार करनेवाले दुर्गादिमें स्थित आपको नम० है ।। २४ ।। नमो गणेभ्यो गणपतिभ्पश्चलो नमो नमो चातेभ्यो वातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्संपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्व. रूपेभ्यश्च वो नमः ॥२५॥ इसका कुत्स ऋ०. भु०, श०, छ०, रुद्र दे है। मंत्रार्थ- (गणेभ्य नमः,च,गणपतिभ्यः, वः,नमः प्रातभ्यः, नमः, च,ग्रात- पतिभ्यः, वः, नमः, यत्सपतिभपश्च धः, नमः, विरूपेभ्यः, नमः, च, विश्वरूपेभ्यः, 4ः, नमः ) गणरूप को नम है और गणों के अधिपति श्रापको नम है, समूहरूपको नम है और मावोंके अधिपति भापको नम० है बुदिमानाको नम है और बुद्धिमानों के रक्षक आपको नम है नग्न मुबह जटिलादि विकृताएको नम० है और सर्वरूप नानाविधरूप आपको नम० है ।॥ २५ ॥ नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्च वो नमो नमों राषिभ्यो आधेभ्यश्च वो नमो नमः क्षुत्तृभ्यस्- गृहीतृभ्यश्च वो नमो नमो महट्यो अके- भ्यश्च वो नमः ॥ २६ ॥ इसका कुत्स ०. मुरिग० ज०,०, रुद्र दे० है। मंत्रार्थ (सेनाभ्यः, नमा, च, सेनानिभ्यः, वा, नमः, रविभ्यः, नमा, च, भरथेभ्यः, वः, नमः, सत्तभ्यः, नमः, च, संगृहीरभ्यय, वा, ममः, महद्भयः, नमः, च, अर्भकेभ्यः, वः, नमः ) सेनारुपको . .
- . शुक्लंपजुर्वेद । नमः है, और सेनापतिरूपको नम है, रसीपको नम०१, अरथीको नम है, रयके अधिष्ठालके अन्तरमै स्थिको नम है और सारथियों के अन्तरमें स्थित श्रापको नम है, जाति विद्या ऐश्वर्यमें पूज्यको नम० है और प्रमाणादिसे अल्परूप प्रापको नमक है।॥१६॥ नमस्तक्षम्पो रथकारे पैश्च वो नमो नमः फुला- लेभ्यः कर्मारेभ्यश्च वो नमो नमो नितादेभ्यः पुजिष्टेभ्यश्च वो नमो नमः श्वनिभ्यो भृग- युभ्यश्च यो नमः ॥२७॥ इसका कुत्स ऋ०, भिवृच्छकरी ६०, रुद्र दे०है। मंत्राप (तक्षभ्यः, नमः, च, रथकारेभ्यः, वा, नमः, कुलालेभ्यः, नमः, च, कर्मारेभ्यः, यः, नमः, निपादेभ्यः, नमः, च, पुनिष्टेभ्यः, पः, ममः, धनिभ्यः, नमः, , मृगयुभ्यः, वः, नमः,) काष्ठकी शिल्पविधाके जाननेवालोंमें व्याप्तको नम है और विमान रथ- निर्माणकारी उत्कृष्ट सत्ताके अन्तरमें स्थित आपको नमः प्रशसित मृत्तिकाके पात्र बनानेवालोम स्थितको नम है और लोके शस्त्र बनाने वालों में स्थितको नम० है और गिरिचारी भीलादि में स्थितको नम० है और पक्षियानक पुल्कसादि में स्थित मापको नम है कुत्तोंके गलेमें रस्सी वाँधकर धारण करनेवालों के अन्तरंकी जाननेवालेको नम है और मृगोंकी कामनापाले म्याधौके अन्तर स्थित भापंको नम है ॥ २७ ॥ नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो अवार्य च मुद्रार्य च नमः शर्षायं च पशुपतये च नमो नीलग्रीषाय य शितिकण्ठाय च ॥ २८ ॥ इसकाकुत्स वार्षी जगददे है। मंत्रार्थ (सभ्यः नमः, च,वपतिभ्यः,वः गमः,च, भवाय नमः,च,स्द्राय नमः च,शर्वाय, नमः,च,पशुपाये,च, नीलग्रीवाय, नमः, च, शितिकण्ठाय ) कुक्कुरो के अन्तरमें स्थितको नम० ई और फुक्कुरों के अधिपति किरातोंके है . १६ अध्याय। १४५. अन्तर में स्थित पापको नम० है और जिनसे सब जगत् उत्पन्न होताह उनको नम है और दुःख दूर करनेवाले देवको नम है और पापका नाशकरनेवालेको नम है और माणियों के अधिपति को नम है और नीलवर्ण ग्रीवाचालेको नम है और नीलकण्ठ वाले को नम है।॥ २८॥ नमः कपर्दिन च व्युप्तकेशाय च नमः सहमा- क्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीदुष्टमाय चेपुमते च ॥२१॥ इसका कुत्स ऋ०, ४० ज० छ०, रुद्र दे० है । मंत्रार्थ- (कदिने, च, व्ययुप्तकेशाय, नमः, च, सहस्राक्षाय, च, शतधन्नने नमा, च, गिरिशयाय, शिपिविष्टाय, नमः, च, मीदुष्टमाय, च, इपुमरो, नमः) जटाजूटधारीको भी नम है, पुण्डिराकेशको नम. और सहस्रलोचन इंद्ररूपको नम० है और वहुरा धनुप धारण करनेवालेको नम है भौर पर्वता शयन कानेवालेको० मौर सब प्राणियों के अन्तारमें व्यापक विष्णुारपको नम० है और मेघ- रूप से वृप्तिकाको और वाणधारीको नम० है ॥ २९ ।। नमो हुस्वायं च यामनाय नमो वृहत च पीपसे च नमो वृद्धाय च सुटधै च नमोऽध्याय च प्रथमाय च ॥ ३०॥ इसका कुत्स भा०, वि०नि० छं०, रुद्र दे है। मंत्रार्थ (स्वाय, च, नमः, च, वामनाय, च, यूहरो, च, वयसे, नमः च, वृद्धाय, साधे, 1, नमः, च, माघ्याय, च, मयमाय, नमः) अल्पशरीर को भी नम है और संकुचित अवयवमें व्याप्त वामगरूपको नमः और बड़ेशरीरवालेको० और भतिद्धको नम है और अधिक भवस्थाबालेको और विद्याविनयादि गुणयुक्त ज्ञानियों के साथ परीनेवाले युवाको नम० हैं और जंगल में प्रथम प्रकट होनेवाले को और सबमें प्रथम ब्रह्मरूपको नमस्कार है ॥ ३० ॥ नमे आशा चाज़िराय च नमः शीध्याय च - . - ४४६ शुक्लयसुवद । शोभ्याय च नम ऊम्याप चावस्वन्याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च ॥ ३१ ॥ इसका कुत्स ३०, स्वराडापर्षी पं०छ० रुद्र दे है। मंत्रापाशवे, च, च. अजिराय, नमः, च, शीघ्रयाय, च, शीभ्याय च, नमः, 'च, जाय, च, अवस्वन्याय, नमः, च, नादेयाय, च, द्वाप्याय, नमः,) जगद्व्यापकको और गतिशील गंगादि धिरूपको नमः है और वेगवाली वस्तु विधमान और जलप्रवाहमें विद्यमान आत्मश्लाघी को नम० है और जलरंगमें वर्तमान वा भूख प्यास आदि पडूमि में वर्तमान और स्थिर जलों में विद्यमानको नमस्कार है और नदी में वर्तमानको नमस्कार है और दीपमें होनेवाले व्यास. रूपको नमस्कार है ॥३१॥ नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजार्य चापरजायं च नमो मधमार्य चापगलमाय च नमो जघन्याय च बुध्न्याय च ॥ ३२॥ इसका कुत्स ऋ०, स्व. त्रि० ई०, रुद्र दे० है । मंत्रार्थ- (च, ज्येष्ठयाय, च, कनिष्ठाय, नमः, च, पूर्वजाय, च, अपरजाय, नमः, च, मध्यमाय, च, मागभाय, नमः, च, जघन्याय, च, बुध्याय, नमः ) और ज्येष्ठाप को और कनिष्ठरुपको नमस्कार है [अर्थात् मष्टि के प्रारम्म में प्रथम उत्पन्न होने से ज्येष्ठरूप गिसके भीवर मी ,विद्यमान और उसके पीछे जो कुछ उत्पन्न होरहा है उस सबके हृदपमें भी विधमान होने से कनिष्ठरूप है ] और जगद् की यादि में हिरण्यगर्भरूप से उत्पन्न और प्रलय काल में कालाग्निरूप से होनेवाले को नमस्कार है और सृष्टि संहार के अनन्तर देवगिर्यगादिरूप से होनेवाले को और भमगरम अव्युत्पन्न इन्द्रिय इन्द्रियादिप्रकाशरहित अण्डरूप को नम० और गवादिके पीछे होनेवाले खेदज कृमि कीटादि में वर्तमान को नम० है और क्षादि की मूल में पोपकरूप से चर्स. नम, मान को नमस्कार है ।। ३२॥
१६ अध्याय। ૭ नमस्सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षम्पाय च नमः श्लोक्यांप चावसान्यापर नम उर्वर्याग च खल्पोप च ॥ ३३ ॥ इसका कुत्स ऋ०, मा०शि०,०, रुद्र दे है। मंत्रार्थ (सोम्पाय, च, नमः, प्रतिसर्याय, नमः, च, याम्याय, च, क्षेम्याय, नमः, च, श्लोक्याय, च, अवसान्याय, नमः, च, उर्वव्याय, च,खल्याय, नमः ) गन्धर्वनगर में होनेवालेको भी नम है और विवाहादिः कार्यमें हाथमें बंधे मंगलसूत्रमें विद्यमानको नम० और पापियों . को दुःखदेनेवाळे यममें वर्तमानको और क्षममें होनेवालेको नम० और इस संसारमें यशःप्रचार के कारणभूत और वेदोंमें स्थित को नम० है और उपजाऊ भूमिमें उत्पन्न हुए धान्यादिमें भी विधमानको नम है और धान्य निकालने के स्थानमें होनेवालेको नमस्कार है॥ ३३ ॥ नमो वन्याय च कक्ष्याय च नमः शृवार्य च प्रतिश्रृंयाय च नम आशुषणाय चाशुरंधाय चु नमः शरीय चावभेदिने च ।। ३४ ॥ इसका मनापति ऋ०, स्वराडा त्रि०, रुद्र दे है। मंत्रार्थ (वन्याय, च, नमः, कल्याय, नमः, च, वाय, च, मतिश्रवाय,. नमः, च, पाशुषेणाय, च, प्राशस्थाय, नमः, च, शूराय, च, अब भौदिने, नमः) वनमें वृक्षादिस्वरुपको भी नम है, और तृण. वल्ली में होनेवालेको नम है, भौर शब्दरूपको नम है और मसि ध्वनिमें विद्यमानको नम है और शीन चलनेवाले रथोंकी श्रेणी में विद्यमानको नम है और युद्धविशारदोंके हृदय में विद्यमान को और शत्रुका हृदय वेधनेवाले शस्त्रमें भी विद्यमानको नम हा नमो बिल्मिने च कवचिनै च नमो वर्मिमणे च धाथिने च नमः श्रुतायं च श्रुतमेनाय च नमो हुन्दुभ्याय चाहनन्याय च ॥३५॥ इसका कुत्स ऋ०, स्वराडापी त्रि०, रुद्र देवता है ।
. ३४८ शुक्लयजुर्वेद । मंत्रार्थ-(च, विरिमने, नमः, कवचिने, नमः, च, वामणे,नमः, च, वधिने, नमः,च, श्रुताय.च, श्रुतसेनाय,च, नमः, दुन्दुभ्याय, च, आनन्याय, नमः ) और शिास्त्राणधारी को नमः ई और कवचधारी को नम और मंत्रमय कवचधारी को नम है और 'चौदह भुवनवासी को नमस्कार और प्रसिद्ध को नम है पौर मसिद्ध सेनावाले को भी नम है और रणके बाने में विद्यमान को और वाजे के दराडे भादि में विद्यमान को नमस्कार है ।।३।। नमो धृष्णये च प्रमुशाय च नमो निङ्गिणे चेपुधिमते च नमस्तीणेपवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च मुधन्वने च ।। ३६ ॥ इसका कुत्स ऋ०, स्व. त्रि० ई०, इन्द्र दे । मंत्रार्थ (च, धृष्णव, च, समुशाय, नमः, च, निषङ्गिणे, नमः, च. इपुधिमते, नमः, च, तीक्ष्णेपवे, च, आयुधिने, नमः, च, स्वायुधाय, च,. सुधन्वने ) और प्रगल्भरूप अपने पक्षकी रक्षा करनेवालको.नमः है और विचारशील पंडितरपको नम० है और खड्कधारीको नमः है और तरकासधारीको नमः है और तीक्ष्णवाणधारी को गौर अन्य श्रायुधधारीको. नम० है . भौर शामन भायुध निशुल धारीको और पिनाकपनुपधारीको नमस्कार है ३६ ।। नमः शुत्पाप च पथ्याप च नमः फाट्याए चु नीप्याय च नमः कुल्पाय च सास्याप च नमो मादेयाय च वैगन्तायं च ।। ३७ ॥ इसका कुत्स ऋ०, नि, त्रि, छ, रुद्र दे. है। मंत्रा-- (न, मुत्याय, च, पथ्याय, नमः, घ, काव्याय, च, नीप्याय,. नमः, च, फुल्याय, च, सरस्याप, नमः, च, नादेयाय, च, वैश- माप, नमः') और मुक्तिदाताको और मुक्तिमार्ग में दर्शन देने घालेको नम है और दुर्गम मार्गमें दर्शनदेनेपालको और । संसारस सरूपको नमस्कार है और नारके मार्ग स्थितको. चौर सरोवरों में विद्यामानको नम: है और नदीम जनप से .
४४६.. १६ अध्याय स्थितको नमस्कार है ॥ ३७ ॥ नमः कूप्याय चावटणाय च नमो वीर्याय चातयाय च नमो मेध्याय च विद्युत्याप चं नमो वाय चावाय च ॥ ३८ ॥ इसका कुत्स १०, ०००, रुद्रदे०है। मंत्रार्थ-(च, कूष्पाय, च, अवघ्याय, नमः, च, वीचाय, च, 'श्रातप्याय, नमः, च, मेध्याय च, विद्युत्याय, नमः, च, वाय, च, अवर्याय, नमः) और कूपमें भात्मारूपसे विराजमानको और गरीनल में विरा- जमानको नमस्कार है और महामकाशमें स्थितको और धूपमें विद्यमानको नमस्कार है और मेघमें विद्यमानको० भौर विजली में विराजमानको नमस्कार है और वपकी धारा में स्थितको.' और दृष्टिक प्रतिबन्धमें स्थितको नमस्कार है ।। ३८॥ नमो वात्याय च रेम्पोय च नमो धास्तव्याय च वास्तुपाय च नमो सोमाय च रुद्राय च नमः स्ताम्राय चारुणाय च ।। ३९॥ इसका कुत्स ऋ०, स्वराडापी पं०७०, रुद्र दे०है। मंत्रा (च, वात्याय, च, रेभ्याय, नमः, च, वास्तव्याय, घ, वास्तुपाय, नमः, च, सोमाय, च, रुद्राय, नमः, च, ताम्राय, च, भरुणाय, नगा) और वायुगवाहमे विराजमानको भौर प्रनयकी पवनमें रहनेवालेको नमस्कार है और वास्तुगृहमें विराजमानको और गृहमामेके देवताको नम है और चन्द्रमामें स्थितको भौर दुःख नाशकको मम है और सायंकालके सूर्यमें स्थितको नम है और प्रभातकालीन सूर्य में स्थितको नमस्कार है ॥ ३॥ नमः शुषे च पशुपतये च नम उग्राय च भीमाय च नमाग्रेवीय च दृरेवधाय च नमो हुने च हनीयसे च नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यो नमः स्तारायं ॥ ४०॥ इसका परमे वा म० देवा ऋ० भु० श. ई०, रुद्र दे० है.... ५७ .
४५०, शुक्लयजुवद । मंत्रार्थ-(शङ्गवे, नमः, च, पशुपतये नमः, च,उपाय, च, भीमाय, नमः,च, अग्रेवधाय च दे॒वधाय, नमः,च इन्त्रे नमः,हनीयसे,नमः, हरिकेशेभ्यः, क्षेभ्यः, नमः,ताराय नमः.) कल्याणरूप वेदवाणी वालेको नमस्कार है और, माणियोंके पालकंको नमः है और शत्रुओंके मारनेको कठिन माथुध उठाये कठिन अन्तःकरणवाले को और शत्रुभयोत्पादक भयानक को नम० है और सन्मुख के शत्रुका वध करनेवालेको और दरके शत्रुका वध करने वाले को मम है और मारनेवालके रूपमें स्थित स्थावर पदार्थ के लयकारीको नम० है और अतिशय हन्ता सदाको मृत्युका प्रभाव करनेवालेको नम है, इरे पत्तेवाले कल्पतरूपको नमः संसारके तारनेवालको नमस्कार है ॥ १० ॥ नमः, शम्भचार्य च मयोभवाय च नम, शंकराये चमपस्कराय च नमः शिवाय च शियतराय चा४॥ इसका परमे प्रवा० देवा .०, स्वई, रुद्र दे. है। मंत्रार्थ-('शम्भवाय, नमः) इस लोक कल्याणकारी जिन से मुख होताहै अथवा सुखरूप संसाररूप मुक्तिरूपको नम० है (च, मयोभवाय, च, शङ्काय, नमः) भोर संसारके सूखदाता पारलौकिक कल्याणको नम० है और लौकिक सुखदेनेवालेको नम है (चे, मयस्करायच, शिवाय, नमः) और मोतमुख देनेवालको नमः है और कल्याणरूप निष्पापको नम है (चं, शिवराय) और भक्तोंके मत्यन्स कल्याणकारक तथा निष्पाप करनेवालेको नमस्कार है ॥ ४ ॥ नमः पायर्याय चाचार्याय च नमः मृतरणाय चौतरणाय च नमस्तीपि च कूल्याय, च नमा शप्प्याप च फेन्यामध॥ १२ ॥ इसको परमै पदे० निमि०, रुद्र देः है। - मंत्रार्प-(च, पार्याय, च, अवाय, नमः, च, भतरणाय, च, उचरणाय, नमः, घ, तीर्थ्याय, च, कूल्याय, नमः च, शप्प्याय, २६ अध्याय ५१ प, फेन्पाय, नमः,) और समुद्रके पारमें भी विद्यमानको और सागरके इस पारमें गी विद्यमानको नम है जहाजम विद्यमान को पार होंगेमें भी विद्यमानको नम है और सागरादिके गर्भ में विद्यमानको गौर जलमणाली में प्रकट होनेवालेको नम० है . और गंगादिके तटमें उत्पन्न कुश अमुरादिम विधमानको नमः है और सांगरादिक फेनमें होनेवालको नम० है ॥४२॥ नमः सिकत्याय व माखाय च नमः किशि- लाय च क्षयणाय च नमः कपदिन च पुलस्तये च नम इण्णिांप च पथ्णय च ।।४३. इसका परमेष्ठी प्रजापतिको देवा , जगसी छ०, रुद्र दे है । मंत्राय--(, सिकलाय, च, वाद्याय, नमः, च, फिशिलाय, च, क्षयणाय, नमः, च, कपादने च, पुलस्तये, च, इरिएयाय, च, अपथ्याय, नमः) और सायरजगूगको और प्रवाह कपको नमस्कार है और नदी भादिके भीतर घृतककारादि में विद्यमान को और स्थिरजलमें विद्यमानको नम० है और जटाजूटपुंक्त व पुरजलमें विद्यमानको और तारहित ऊपरभूमिमें विद्यमानको भार बहुरा सेवितमान में विद्यमानको नम है ॥ ४॥ नमो व्रज्याप चे गोष्ठयाय च नपस्तरप्पाय च गेटोय च नमो हृदयाप च निवेष्याय च नमः कायाय घ गहरेष्ठाय च ॥ ४४ ।। इसका परमे, पापी नि००, रुद्र दे० है । मंत्रार्थ- (च, अन्याय, च, गोष्ठयाय, नमः, च, सप्याय, प, गेयाय, नमः, च, हरपाय, च, निष्पाय, नमः, चे, काट्याय च, गह- रेष्ठाय ) और गोचारणस्पनिमें विद्यमान और अजमें विद्यमान को नम है और शपशव्यापको भौर घरमें देवता से विरा- नमानको नम है और हृदय में जीवापसे स्थितको और हिम- समूहमें विराजमानको नम है और दुर्गम मार्गमें विराजमानको और गिरिगुहामें विरागानको नम है ॥४४॥ o ।
, नमः शुष्क्याय च हरित्याय च नमः पार्थम. व्याय च रजस्याय च नमो लोप्याय पालप्याय च नम जपाय च सूपाय च ॥ ४५ ॥ इसका परमेष्ठी प्रनापसि; निदा त्रि० ई०, रुद्र दे है। मनार्थ-(च, शुष्क्याय, च, हरित्याय, नमा, च, पार्थसध्याय, प,रजस्याय, नमः, च, लोप्याय, च, उलप्याय, नमः, च, जाय, च, मूर्याय, नमः) और सूखे काष्ठादिम विराजमानको भौर हरेपत्तेआदिमें विराजमानको नम० है भोर धालमें विराजमान को और रजोगुणमें विधमानको नमः है और अगम्य देशमै विराजमानको और वरवजादि तृणमें विराजमानको नम है और उर्वरभूमिमे विराजमानको नमस्कार है और.महामलपकी भग्निमें विराजमानको नम० है ॥ ४५ ॥ 'नमः पर्णीय'च पर्णशदाय च नम उद्गुरमा णाय चाभिघ्नते च नम आखिदते च प्रखिते घनम इपुन्थ्यो धनुष्कृदयश्च वो नमो नमों वः फिरिकेम्पों देवाना हृदयेभ्यो नमो विचिः 'न्वत्केभ्यो नमों विक्षिणकेभ्यो नम आनिहतेभ्यः।।६।। इसका परमेष्ठी प्रा०, स्वराट् प्रकृति ई०, रुद्र दे। मंत्रार्थ- (च, पर्णाय, च, नमः, च, उद्गुरमाणाय, च, मभिन्नसे, नमः, च, पाखिदते, च, मखिदते, नमः, इषुभ्यः, च, नमः) भौरपर्णमें विद्यमानको भार पर्णपतित वर्णस्यस देशरूप में विद्यमानको नम है और निरन्तर उधमाको और शनुभोके संहारकको नम है और अभक्तोंको सदा दुःखदाता त्रिविधतापके नाशकको और प्रिविधतापके उत्पन्नकर्ताको नम०१ वाणक उत्पन्न करनेवालको और धनुष रचनवाल भापको नमस्कार है (देवानां, हृदयेभ्यः, किरिके पाचनमः, विचिन्वस्केभ्यः,नमा,विक्षिण-के- - भ्यः, नमः, मानिई सेभ्यः ) जो देवतामोंके हृदयस्वरूप प्रधान अग्नि घायु सूर्यके हृदयरूप दृष्टयादि द्वारा जगतको सनन करते -
मंधार्थ-(द्रापे,अन्धसः,
१६. अध्याय।
४५३
हैं ऐस'श्रापको नमस्कार है जो देवताओंका हृदयस्वरूप हैं जो
दृष्टियादिसे जगत्का पालन करते हैं जो धर्मात्मा और पापात्माओं
को पृथक् करते हैं उन अग्नि वायु सूर्य के हृदयको नमस्कार है,
चिनिध पापाको दूर करनेवाल अग्नि पादेको नमस्कार है मर्याद
जो देवताओंका हृदयस्वरूप विक्षिणक दृष्टिमादिसे जगदका संहार
करते हैं अग्नि वायु सूर्यके हृदयस्वरूप हैं उनको वारंवार नम० है
सुष्ठिकी मादिमें होनेवाले रुद्रावतारको नमस्कार है ।। ४६ ॥
... द्रापे अन्यसपते दरिद नीललोहित । आप्ता.
मजानामपाम्पशूनाम्माभेर्मा रोङ मो च नः
फिन्चनाममत् ।। १७॥
इसका परमे० मजा ऋ०, मु०. गा० १००, रुद्र दे० है।
परो, दरिद्र, नीललोहित, नः, प्रासाम्, '
मजाना, पा, पशूनां, मा, मे, मा,रोक्,च, किञ्चग, मा, प्राम-
मव ) हे पापियोंकी दुनीत करनेवाले हे सोमके पालक अद्वितीय
होनेसे सहायशून्य हे नील और लोहित शुक्लकपण उभयात्मक
शिव ! हमारे इन पुत्र पौत्रादिको इन पशुओं को मत भय दो तथा
गजापशुओंका भंग मत करो और किसीमकार भी हम राथा हमारी
'प्रजा पशुको मत रुग्ण करो सरप्रकार मजाप में मंगल करो,४७
मा रुद्राय तयसै कपर्दिने तपबीरराय प्रभरा-
महे मतीः। यथा शमसहिपदे चतुष्पदे विश्व-
म्पुष्टं ग्राम अस्मिनानुरम् ।। १८॥
इसका कुत्स ऋः, पापी ज० छं० रुद्रदेवता है। मंत्रार्थ (यया,
द्विपदे, चतुप्देश, अस्मिन, ग्रामे, विश्व, पुष्ट, अनातुरम्, असक,
इमाः, मी सवसे कपाईने, क्षयद्वाराय, रुद्राय, प्रभरामहे)
जिसप्रकार पुत्रादिमें गवादिपशुओं में उसकी प्राप्ति हो सथा इस
ग्राममें सम्पूर्ण प्राणिसमूह पुष्ट उपद्रवरहित हो उसीप्रकार हम
इन यंपनी युदियों को महावली जटिल शूरवीरोंके निवासभूरा
रुद्रादेवनाके तिमिच समर्पयं करते हैं ॥८॥
-- . १५४ शुक्लयजुवंद । यात रुद्र शिवा तनः शिवा विश्वाहां भेजी। शिवा रुतस्प भेजी तो नो मृड जीवसे ॥१९॥ इसका परमे० प्रजा० ऋ०, आर्यनु० छं० रुद्रद । मंत्रार्थ (हे सद्र, या, से, शिवा,विश्वाहा,शिवा, भेषजी, रुनस्य, शिवा, भैपनी तनूः, तया, न: जीवसे, मृड) हे शंकर जो आपका शान्त निरन्तर कल्याणकारी औपधीरूप संसारकी व्याधि निवृत्त करने वाला तपा शरीराच्याधिकी समीचीन भोपधीमा शरीर वा शक्ति है उस शक्तिसे हमको जीवनके लिये मुखी करो॥१९॥ परि नो रुद्रस्य हेतिणत्तु परि तपस्य दुर्मति- रघायोः अस्थिरा मघवद्धस्तनुष्व मीढ्व- स्तोकाय तनपाय मृड ॥५०॥ इसका परमे० मजा १०, प्रा. त्रि० छ०, रुद्र दे है। मंत्रार्थ-(रुद्रस्य, इतिः, नः,परिदृणक्तु, वेपस्य, अघायोः, दुर्मतिः, परि, मीढ्वः, मयवद्रयः, स्थिरा, अवतनुष्च, तोकाय, तनयाय, मृड ) रुद्र सम्पूर्ण प्रायुध हमको परित्याग करें पापियों पर क्रोधित भर्यात कोपनस्वभाव, दण्डदेने की इच्छावाली दुर्मशि हम फो सबमकार त्याग करे हे अभिलपित फल पद हविरूप धनसे युक्त यजमानोंके भय दरकरनेको दृढ धनुपोंको ज्याहीन करो हमारे पुत्र पौत्रादिको सुख दो ॥५०॥ मीढुष्टम शिवंतम शियो नः सुमना भव । परमे वृक्ष आयुधन्निधाय कत्ति घसान आंचर पिनाकम्बिभ्रदागहि ॥५॥ इसका परमे०म० ऋ०, नि०,०, रुद्र देवता है । मंत्रार्थ- (मीदुएम, शिवराम, ना, शिक्षा, सुमनाः, भव, परमे, वृक्षे, भा. युध, निधाय, कांच, घसाना, माचर, पिनाकं. विभ्रत् मागाह ) हे अतिशय अमिनपित फलदाता भत्यन्त कल्याणकर्ता हमको शान्त सुन्दरमनवाने होमो दूर स्थित पाऊँचे क्षार सपना त्रिशूल सका मृगवर्म धारणाकये भागमन कीजिये पिनाक धनुषको - -- १६ अध्याय। ४५५ धारण किये मागमन कीजिये || ५१ ॥ विकिरिद विलोहितानमस्ते अस्तु भगवः । ' यास्त सहस्र इतपोन्धमस्मन्नियंपन्त ताः ॥५२॥ इसका पर० ऋ०, आर्यनु० छं० रुद्र देवता है। मंत्रार्थ- (विकिरिद्र, विलोहिन, मायः,ते, नमः, अस्तु, रो, या, सहसं, हेरायः, साम, अस्मत्, अन्यम्, निवपन्तु ) . अनेक उपद्रा नष्टः करनेवाले देशुदस्वरूप भगवन् ! भापको नमस्कार हो तुम्हारे जो सामों शस्त्र बद हमको छोड़कर और कहीं उपद्रवियोपर पड़ें ॥५२॥ सहस्राणि सहसशों बाहोस्तव हेतयः । तासामीशानो भगवः पराचीना मुखां कृधि ॥५३॥ इसका पर० ऋ०, निच००, रुद्र देवता है । मंत्रार्थ-(भगवः, • तब, वाहो, सहस्राणि, सहमशः, हेतयः, ईशानः, सासाम,मुखा, पराचीना, कधेि ) हे भगवन् ! पश्चर्य सम्पन्न ! आपके मुजाओं . में बहुत मकार के सदो-खड्गशूनादि आयुध हैं, जगत के पति श्राप उन संहारकारी आयुधों के मुखों को हमसे पराङ्मुख करो ५३ असंख्याता सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् । तेषां सहस्रपोजनेव धन्यानि तन्मसि ।। ५४ ॥ इसका पर०:०, विराडा० छ० रुद्र देव० । मंत्रार्थ--(ये, असंख्याता सहवाणि, रुद्राः, भूम्याम् अधि, सेपाम, धन्वानि, सहसयोजने, अवतन्मास ) नो असंख्य साखों रुद्र भूमिके ऊपर स्थित है उनके धनुप सहस योजनदर फेंको ॥ १४ ॥ अस्मिन्महत्यर्णवेन्तरिक्ष भवा अधि। .... तेपछि सहस्रयोजनेच धन्वानि तन्मसि ॥५५॥ इसका पर० ऋ० भुरिगा०, ०, रुद्र देवता है । मंत्रार्थ अस्मिन, अन्तरिक्ष, महास,अर्णवे, अधिभवाः, सपा, धन्यानि, पइस्त्रयोजने, अनसन्मसि) इस अन्तरिक्षमें और बड़े सागर अर्थात् प्राकाशांगानामसे प्रसिद्ध नक्षत्र पुञ्चरुप धारामवाहमें आश्रय , ४५९ . 'शुक्लयजुवंद करके जो रुद्र स्थित हैं उनके सम्पूर्ण धनुप सहस्र योजन दर ज्यारहित करके हम निभयहोते हैं ।। १५ ।। नीलग्रीवा शितिकण्ठा दिकद्रा उपभिता तेषां सहस्पोजनेय धन्यानि तन्मसि ॥५६॥ इसका पर० ऋ०, निच० छ०, रुद्र दे० है । मंत्रार्थ (नील- ग्रीवा:, शिशिककण्ठाः, रुद्राः, दिचं, उपश्रिवाः, तेषां, धन्नानि, सहस्रयोजने, भवतन्मसि ) नीलग्रीव श्वेताएठवाले विपक्षण से कितनाएक कण्ठ श्वेत और कितना एक नीलहै ऐसे जो रुद्र घुलोक में आश्रय किये हुए हैं उनके सब धनुपोंकोसहस्रयोजन दरज्यारहित' कर हम निर्भय हो हैं ।। ५६ ॥ नीलग्रीवा शितिकण्ठाःगर्वा अधाक्षमाचराः। तेपछि सहमघोजने धन्यानि तन्मसि ॥१७॥ इसका पा० ऋ०, नि० ०, रुद्र दे० है । मंत्रार्य (नील- ग्रीवाः, शितिकण्ठाः, शर्वाः, अधः, क्षमाचराः सेपा, धन्वान, सहयोजने, अवतन्मसि) नीलीगर्दनवाले श्वेतकण्ठवाले लो शवनामक रुद्र नीचे पातालमें वर्तमान हैं उनके सव धनुष सहन याजन दुर ज्यारहित करके हम निर्भय होता है ।। १७ ॥ ये वृक्षेपुं शपिजंग नीलग्रीवा विलोहिताः। तेषां सहसूयोजनेव धन्वानि तन्मास ॥ ५४॥ इसका पर• ऋ०, मिच्दा छ०, रुद्र देव० । मंत्रार्थ (ये, शपिचराः, नीलामीया, पिलोहिता, वृक्षेषु, सेपा, धन्यानि, सहसयोजनने. भवनन्मसि) जो हरिसवर्ण नीलग्रीवावाले विशेष रकवर्ण वृक्षों में वर्तमान में उनके सम्पूर्ण धनुष सहस्र योजन दर ज्यारहित करकै प्रभय होतेहैं ।। ५८॥ पे भूतानामधिपतयो विशिखास कपर्दिनः। तेपछि सहसूपोजनेव घन्वानि सन्मसिn५९॥ इसका पर० ऋ०, निः०, रुद्रदेश मंत्रार्थ-(ये, भूतानां अधिपतयः, विशिखासः, कपादना, तेपा, धन्वानि, साध्ययोजन, . . . . -- 1 -
१६ अध्याय
१५७
अवतन्मसि ) जो देवविंशपोंके अधिपति है सपा शिलाहान
मुण्डितशिर हैं जो जटाजूट से युक्त हैं उनके सम्पूर्ण धनुष सहम
योजन दूर ज्यारहित करकै निर्भय होते हैं ॥ ५९॥ . ,
पेपधाम्पधि रक्षय ऐलवृदा आयुयुधः । तेपा,
सहत्रयोजनेव धन्यानि तन्मसि ॥६० ॥
इसका पर० प्र०, मायनु० छ०, रुद्र दे । मनाथ-(ये,
पयाम्, पथिरक्षयः, ऐलभृतः, भायुधः, पाम् धन्वानि सहन.
योनने, अनसन्मसि ) जो लौकिक वैदिक मागों के अधिपति मागों
के पालक राज्यशासनकारी जीवनपर्यन्त युद करनेमें रसहैं उनके
सब धनुप सहमयोजन दूर ज्यारहिसकरके निर्भय होतेई ॥६॥
ये तीर्थानि चरन्ति सकारस्ता निपुतिः ।
तेपछि सहमपोजनेव धन्धामि तन्मासि ॥६॥
इसका पर० प्रा०नि००,रुद्र दे. १ मंत्रार्थ-(सकारा,
निपहिण, तीर्थानि, प्रवरन्ति, सेपा,धनानि, सहसयोजने, अब-
भन्मसि ) जो आयुध विशेष ढालको हाथमें लिये सपा स्वागधा.
रण किये काशी मयागादि तीर्थीम फिरतहैं उनके सम्पूर्ण धनुप
सहसूघोजन दूर ज्यारहित करके निर्भय होते हैं ।। ६ ।।
येपु विविक्ष्यन्ति पात्रेषु पितो. जनान् ।
पा सहसयोजनेव धन्यानि तमसि ॥६२ ।।
इसका.पर० म०, विराहार्यनु० छ०, रुद्र देवता है। मंत्रार्य
(ये, भन्ने पु, जगान, विविध्पन्ति, पात्रेषु, पिवतः, रोपाम्, धन्नानि
सहस्पोजने, भवान्मसि ) जो भन्नभोजन करने में पाणियोंको
विशेषकरके साइन कररो, अर्थात् धातुसी विषमता पर रोगोंको
उत्पन्न करते हैं पात्रों में जल धादि पीराहुए जनोको फुत्सित जल
आदिसे रोगग्रसित करते हैं उनके सम्पूर्ण धनुपोंको सहनयोजन
दर ज्यारहित करके भभय होत. ॥ ६ ॥
• ए एतान्तिंदच भूयासच दिशों रुद्रावित-
स्थिरे। तेपछि सहप्पोजनेव धन्वानि तन्मसि ॥३॥
१५४ शुक्लयजुवद!.. इसका पर० ऋ०, नि० छ०,रुद्र दे० मिनार्थ-(च,ये,रुद्राः, एतावन्तः, च. यासः,दिशः, वितस्पिरे सेषाम्, पन्नानि, सहन योजने, भवान्मसि ) और जो हद इन दो दिशा में और इन कहेहुओं से भी अधिक सपूर्ण दिशाओंम पाश्रित हैं उनके धनुषों को सहस्रयोजनकी दूरीपर ज्यारोह काकै समय होते हैं ।। ६३ ।। नमोस्तु मुद्रेभ्यो ये दिषि पेपौ वर्पमिपंथः । तेभ्यो दश प्राची ईश दक्षिणा दश प्रतीचीई शो- दीची देशोः । तेभ्यो नमो अस्तु ते नौवन्तु ते नौ मृडयन्तु ते यन्दिप्मो पच नो देधि तपाञ्जम् दमः ॥ ६४॥ इसका परमे० ऋ०, नि० ई०.रुद्र दे है। मंत्राध-(ये, दिवि, येपाम्, चर्पम्, इपत्रः, रोभ्यः, रुद्रेभ्या, नमः, तेम्पः, दध, माची, दश दक्षिणाः, दश प्रसीची, दशोदीची:, दशोः नमः.ते, ना, ते, नः, मृडयन्न, ते, यम, द्विष्मः, च, यः,मा, देटि तम् पुपाम्. जम्मे, दध्मः) जो रुद्र घुलोको विद्यमान हैं जिन रूद्र के दृष्टि ही बाण हैं उन रुदोंके पूर्व दिशामें दश भंगुनी होकर अर्थात् हाथ जोड़कर दक्षिण में देश अंगुली होकर पश्चिममें दश अंगुनी होकर उत्तरमै दश भंगुली होकर अर्ध में दश भंगुली भर्यात करजोफ प्रार्थना करताहूं उनको नमस्कारहो, वे रुद्र हमारी रक्षा करें, चे हमको सुखी करें वे रुद्र जिससे हम देष करते हैं *पौर जो हमसे देष करता है उसको इन रुद्रोंके टाढमें स्थापन करते हैं ॥ ६॥ नमोस्तु रुनेभ्यो पेन्तरिक्ष येषां पात इर्षयः । तेभ्यो दश प्राचीईर्श दक्षिणादर्श पुतीचीदेशो- दीचीर्दशीर्वाः । तेभ्यो नमो अस्तु ते नौपन्त से नौ पृढपन्तु ते पन्धिष्मो यश्च नो ष्टि अवन्तु, तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥ ६५ ॥ इसका पर० तिचा स्ट्र दे। मंत्राप-(स्ट्रेभ्या, १७ अध्याय। नमः, अस्तु, ये,, अन्तरिक्ष, येषाम, इषवः, वासः ) उन रुद्रोंको नमस्कार हो, जो अन्तरिक्षमें विद्यमान है, जिनके वाण परन है अर्थात पवनद्वारा जो मुजन पालन और भाषी प्रादिसे संहार करते हैं उनको नमस्कार है शेषपूर्ववद ॥ ६१ ॥ नमोस्तु रुद्रेभ्यो ये पृथिव्यां येपामन्नमिर्षवः । तेभ्यो दशप्राचीदर्श दक्षिणा दर्शपुतीचीर्दशो. दीचीर्दशोदाः । तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नों मृडयन्तु ते पन्दिप्मो यश्च नो द्वेष्टि तपाञ्जम्भे दध्मः ॥६६॥ इसका परमं० ० ० छ रुद्र दे० है । मंत्रार्थ-(रुद्रेभ्यः, नमः, ये, पृथिव्याम, येपाम्, इषवः, अन्नम् ) उन रुद्रोंको नमस्कार है जो रुद्र पृथ्वी में स्थित हैं जिनके वाण भन्न जो अन्नद्वारा ही सूजन पालन और मिथ्याहार विहारसे रोग उत्पन्न कर प्राणि. योंका संहार करते हैं उनको नमस्कार है शेषपूर्वत् ।। १६ ॥ इति शुक्लपदान्तर्गत वामसनेपिसंहिताका सानुवाद पोदश अध्याय समास अथ सप्तदशोऽध्यायः। सोलहवें अध्यायमें शतरुद्रीका होम कहकर भवसाहवें अध्याय में चित्यपारेपेक श्रादिक मंत्रों को कहते हैं। ॥ हरिः ॐ अम्पान्न जम्पर्वते शिश्रियायामद्य ओपंचीभ्यो धनस्पतिभ्यो अधि सम्भृताया। तान्न इपमूर्जन्धत्तमरुतःसरगणा अस्मस्ते शुन्मयि त अर्यन्विष्मस्तन्ते शुरच्छन्तु ॥१॥ इस कं० में ३ मंत्र है, सबका मेधातिथि , छन्द १ मा० त्रि०, २ दै. वृ०, ३ या वृ०, और दे. १-मरुद र-भश्मा, ३-भूक है। मंत्रार्थ-(मरुता, सधाराणाः, अश्मन, पर्वते, शि. श्रियाणाम्, जम्, प्रद्भ्यः भोपपीभ्यः, बनपत्तिभ्यः, भधि, शुक्ल.. सम्भृगम्, पयः, साम्. इपम्, ऊनम्, ना, धत्त) हे मरुद्गण ! मसिद्भिदाया तुम पापाणमें विन्ध्याचल हिमालयादि पर्वतों में माश्रित सारभूत बनका हेतु जलोंसे भोपधियोंसे वनस्पति अश्व- स्थादि से अधिक सिद तथा गोद्वारा सम्पादित. ध अर्थात् मेय जनित जलरूप और गौसे उत्पन्न दुग्धरूप प्रसिद्ध भन्न और रस को हमारे निमित्त स्थापन कीजिये अर्थात हमें दीजिये ( भास्मन् ते, तुन् ) हे प्रस्तारूप ! सर्वभक्षक अग्ने ! तुमको क्षुधा प्राप्त हो अर्थात वहन हवि भागो (भरमन्, से, फर्क, मयि ) हे प्रस्तर ! तुम्हारा सारभाग मेरे वि स्थित हो, हे भग्ने (ते, शुक, तं, ऋच्छतु यं, दिप्मः ) तुम्हारा क्रोध उस मनुष्यको मात हो जिस के साथ हम देष करते हैं अर्थात् जो कोई हमाराशत्रु हो तुम्हारा दाह उसको माप्त हो ॥१॥ मा में अग्न इष्टका धेनवः मन्त्येको च दर्श च दर्श च शतश्च शप्तश्च सहस्रञ्च सहस्रञ्चा- युतश्च युतथ निगुतञ्च नियुतध्य प्रयतश्चा(दश न्यर्बुदंश समुद्रमच मचान्तश्च परार्द्धश्चैता में मग्न इष्टकां धेनयस्सन्स्वमुत्रानुस्मिल्लोके ॥२॥ इसका मेधातिथि ऋ०, नि:, वि०, छ०, मग्नि दे० । म० (भग्ने, इमाः, इष्टकाः, मे, धेनवः, सन्तु, एका, चं, दश च शतं, च, शी, च. सहमं च स.सं च, प्रयुग; च, अयुत, च, नियुतं, घ, निपुग च. प्रयु, च, मयुग, च, अर्बुद, च, न्यचुदव, समुद्रः, च, मध्यञ्च, अन्तः, च. परादः, अग्ने- पता:, इष्टकाः, भमुत्र, च, अमुस्मिन, लोके, में, धेनवः, सन्तु ) हे अग्नि देवता यह जो पांच चिनिमें स्थापित इष्टका , तुम्हारे मसादसे इसलोक में मेरे निमित्त अभिमत फल देनेपाली गोरूप हो उनकी संख्या कहते हैं जो एक ही दशसे गुणा करनेपर दशसंख्या और दशगुणा करने से सौ संख्या और सौको दशगुणा करनेसे ही सहस होता है, लौर सहसको दशगुणा करनेस भयुत संख्या होती है(१००००). . - - १७ अध्याप। और मयुगको दशगुणा करनेसे लाख १००००० संख्या और नियुराको दशगुणा करनेसे दशलाख १०००००० संख्या होती है और इसको दशगुणा करनेसे करो १००००००० संख्या होती है इसको दशगुणा करनेसे भटुंद.और इसका दशगुणा करनेसे न्य- झुंद (अज) और इसका दशगुणा करनेसे खर्व और खां का दशगुणा करनेसे निखा इसका दशगुणा करनेस महापम इसका दशगुणा शङ्ख इसका दशगुणा समुद्र और इसका दशगुणा मध्य और इसका दशगुणा करनेपर अन्त और इसका दशगुणा कानेस पराद संख्या होती है। मग्ने ! यह इष्टका दूसरे जगमें और दूसरे लोकमें मेरी कामदुधा गौर हो, अर्थात् इष्टका पराद संख्या तक एकरस्थायी होती हैं और कामदुधा हैं इसकारण प्रार्थना है कि हमको इसलोक परलोक और परगन्म किसी कालमें भी कामनारूप धदानसे कासर न करें ॥ २ ॥ ऋतय स्थ प्रामावृध शतष्ठा स्थ ऋताच । घृत च्युतो मधुरच्युतो विराजो नाम फामदुघा अक्षीपमाणा: ॥ ३ ॥ इसका गेधा० ऋ० विरादापी पं० छ०,याग्नि दे० है मंत्रार्थ- दे इष्टके! तुम(नाटधः आसवः स्य, प्रसाध ,तुष्ठाः,गरव्युतः, मधुन्युमः, विराजः, नाम, कामदुधाः, अक्षीपमाणाः, स्य) सत्य वा यसकी बढ़ानेवाली वसनतांदिप हो, यक्षकी वृद्धि करनेवाली बसन्तादि भातुमों में स्थित हो, राया पुतकी क्षरण करनेवाली मधु की क्षरण करनेवाली, विराग नामसे मसिद्ध कामना पूर्ण करने वाली, सय रहिराहो, मुझे सब कामना दा ॥ ३ ॥ समुद्रस्य त्वाकयाग्ने परिपपामसि। पाचको अस्मभ्यं शिवो भव ॥ ४ ॥ इसका म०प्र०, भु० गा० ई०, अग्नि देवता है। मंत्र- (माने; समुद्रस्य, भकया, स्वा, परिव्ययामास, अस्मभ्यम्, पावकः, शिवः, भव) हे अग्ने ! जलके शैवालद्वारा तुमको सब . , - . .
T - - - शुक्लपजुधद। बोरसे वेपन करताई हमारे निमित्त शोषक कल्याणकारी होमो ४ हिमस्य त्वा जरायुगाग्ने परिव्ययामसि । पायको अस्मभ्यशियो भव ॥५॥ इसका मे० ० भु०.गा० छ० अग्नि देवता है । मंत्रार्थ- (अग्ने, हिमस्य, जरायुणा, त्वा, परिव्ययामाम, सस्मभ्यम्, पावकः, शिवा, भय ) हे अग्निदेव !.हिमके जरायुवत् उत्पत्ति स्थान शैवालस तुमको सब भोरसे वेष्टन करताई. हमारे निमिच शोधक कल्याणकारी इजिये ॥५॥ उप जमन्नुपं वेलसेवंतर नदीप्या । अग्नै पित्त- सुपाममि मण्डूं कि ताभिरागत सेमन्नो पुज्ञ- म्पावकवर्ण शिष कृधि ।। ६॥ 'इसका मे० ऋ० भाषी छ. भाग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (अग्ने, जमन, उपावनर, वेतसे, उप, नदीपु श्रा, अपाम्, पिचम् असि, मएकि शाभिः, भागहि, सा, इमम्, भस्माभिः. याम्, पावरुवर्णम्, शिव, कृधि ) हे भग्ने ! पृथ्वीके ऊपर भाभो वेतस शाखाको अवलम्बन करो, सर नदिया शिवारको अवलम्बन करो, हे भग्ने तुम जलाके तेजःस्वप हो, हे मएड्की ! तुम भी जलोंको पित्तस्वरूप हो, इसकारण पूर्वोक्त जलोंके साथ आगमन : करो, भयो जिनका अग्नि पित्त है जिससे तुम उत्पन्न हो, जो तुम भग्निकी शान्तिक निमिच इधर उधर लेनाईजाती हो, सो तुम इस हमारे चयन लक्षणवाले यज्ञको अग्नि की समान सेन- स्वी फलदायक करो॥६॥ अपामिदं पर्यन समुद्रस्प निवेशनम् । अन्यस्तैि अस्मत्तपन्तु हेय: पायको अस्मः शिवो भव ॥७॥ इसका मंधा, भापी० ए०, छं०, अग्नि दे० । मंत्रार्थ- (इदम, माम्. न्ययनम्, समुद्रस्य, निवेशनम्, से, देतयः भामद, भन्या, सपन्तु, भरमभ्यम्, पावकः, शिवः, भव) यह चिसिमे - १७ अध्याय। १६३ . स्थिा अग्निका स्थान जलाकी प्राप्तिका साधन समुद्रका गृहकप है हे भग्ने ! यापकी ज्वाला हमारे विरोधियोंको ताप दे क्लेश दें हमारे निमित्त शोधक और कल्याणकारक हो॥७॥ अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रयाँ देव जिहयो । आ देवान्याक्षि यक्षि च ॥८॥ इसका वसपि, पा., गाई, अग्नि देव है । मन्त्रार्थ- (पाचक, देव, भग्न, रोचिपा, मन्द्रया, मिहया, देवान, भापति च, यक्षि ) हे शोधक ! देव अग्ने तुम ज्वालासर माहवनीयरूप और मानन्दस्वरुप होता की वाणीरूपसे स्थित तुम देवताओं को श्राव्हान करो और यजन करो॥८॥ स नः पावक दीदियोग्न देवा हावह । उपं. यज्ञ हुचिश्व नः ॥९॥ इसका मेधा. 1० ऋ०, नि०, गा०,०, अग्नि दे. 1 मन्नार्थ (पावक, दीदिवः, पाग्ने, सः, देवान, ना, इच, श्रावद, च, नः हविः, याम् उप ) हे शोधक ! दीलिमान अग्निदेव ! वह तुम देवानीको हमारे इस पत्र में बुनानी और हमारी हघि यज्ञ के समीप देवाओंको प्राप्त करानी ॥ ९ ॥ पायरया यश्चितयन्त्वा कृपा क्षामन् रुरुच उपमोन भानुनी । तूर्वन्नपामन्नतशस्य नू रण आ यो पूणेन ते पाणो अज॥ १० ॥ इसका भारद्वाज ऋ० निवृ० ज० ई० अग्नि दे. है ।मंत्रार्थ- (यः, पावकया, चितयन्त्या, कृपा, क्षामन्, रुरुचे, न, उपसः, भानुना, या, :, अरः शस्य, शासन, रो, जून, न, घृणे, नु, भा)जो अग्नि पवित्रकरनेवाला हद चयन करने वाला सामर्थ्य से पृथ्वीपर शोमाको प्राप्त होता है, जैसे उपःकाल अपने मकाशसे शोभा देता है, जो पूर्णाहुतिक पानकी इच्छा करने वाला जरारहित अग्नि गमन में कुशल घोडेसे कार्य लेनेवाले युद्ध में शशोंको मारते हुएकी समान दीति निश्चय ही सर 1 . -- . शुक्लयजुर्वेद । शोमा देता है, उस अग्निको यार्पण करतेहैं ॥१०॥ नमस्ते हरसे शोचिये नमस्ते अवधि । अन्पास्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्यं, शिवो भव ॥११॥ इसका लोपामुद्रा ऋ०, भु० वृ०ई० अग्नि दे है। मंत्रार्थ- हे अग्ने । (से, हरसे, शोचिषे. नमः, ते, मचिपे, नमः, अन्तु, से, देशयः, अस्मत्, अन्यान, सपन्तु, अस्मभ्यं, पावकः, शिवः भव) तुम्हारी सब रसोको आकर्षण करनेवाली तेजःस्वरूप ज्वालाको नमस्कार है । तुम्हारे पदार्थ प्रकाशक तेजको नमस्कार हो, श्राप कीजाला हमसे दूसरोंको तपायो, हमको शोधक कल्याणकारक हो नपढ़े 'घे.'पदे घेवहिप घेड्यनसदे बेट स्थविद वेद ।। १२ ॥ इस कं० में ५ ० हैं, सपका लोपामु० ऋ०, छ०, १।५ दै०१० २०३-४६०५० और देवता सबका भाग्न है । मत्रार्थ- यह अग्नि ( पदे वेट्, अमुपदे, वेट्, पहिपदे, वेद, वन सदेचेट् स्वर्षिद, ये ) मनुष्योंमें जठराग्नि रूपसे स्थित प्राणरूप है उस की प्रीगि निमिन यह पाहुति दीजातीहै, सो सम्यक रूप से गृहीत हो, जो अग्नि समुद्रादि जलके मध्य में बदवाग्नि रूपसे स्थित है, चसको थाहुति देते हैं, भलीप्रकार गृहीत हो, जो अग्नि यज्ञीय कुशादिके ऊपर निवास करते हैं, उनकी प्रीतिके निमित्त यह माहगि दीजाती है मलीकार गृहीत हो, जो अग्नि वृक्षसमूह मे दावाग्नि रूपसे स्थिराई, उसकी प्रतिके निमित्त यह माहुति दी जाती है गलीमकार गृहीत हो, जो अग्नि सर्लोकके प्रधान अभिः सूर्य नाम से प्रसिद्ध है उसकी प्रीतिके निमित्त यह माहुति देते हैं। भलीमकार गृहीन हो ॥१२॥ ये देवा देवानां यज्ञियो यज्ञियाना सम्बत्म- रोणमुपंभागमासते । बहुतादों हषिपो यज्ञे. अस्मिन्नस्वम्पियन्तु मधुनो घृतस्य ।। १३ ।। , - . ܝܢ १७ अध्याय। - इसका लोपामुद्रा •, नि० न० छ, प्राण देवता है। मंत्रायः (ये, देवाः, भहुनादः, मस्मिन्, यथे, मधुनः, घृतस्य, कृषिषा, स्वयं, पिबन्तु, यन्त्रियाना, देवानां, यज्ञियाः, सम्बसारणम्, मार्ग उपासते) जो देवता विना स्वाहाकार किये भन्नको भक्षण करते हैं, वे प्राणरूप देवता इस चयनरूप यज्ञमें मधु, र भर्थात् घृत दधिरूप इविका भाग स्वयं ही साहाकारके विना पान करें जो कि यजन करने योग्य देवताओं के मध्यमें यज्ञयोग्य दीप्तिमान हैं वे सम्बत्सामें होनेवाले या मागका सेवन करते हैं ॥ ११ ॥ ये देवा देवेवधि देवस्वमायन्ये ब्रह्मणः पुर एतारों अस्य । येभ्यो न ते पते धाम किचन नते दियो न पृथिव्या अधि स्नुषु ॥ १४ ॥ इसका लोपामुद्रा अ०, मा० न० छ, प्राण दे० 1 मंगा (ये, देवा, देवेषु, अधिदेवत्वम्, प्रायन, ये, अस्य, पुरः, एतारः, येभ्यः, से, किञ्चन, धाम, न, पवते, से, न, दिवः, न. पृथि- पाम्, स्नुपु, यधि) माणादि देवताओंने इन्द्रादि देवतामों में जो अधिप्रातृत्व प्राप्त किया अदि देवगणोंमें प्रधान देवत्व पाया है जो माण इस जांच के आगे गमन करतेहैं जिन माणोके बिना कोईभी शरीर चेष्टा नहीं करसकता ये माण न पुलोकमें न पृथ्वी में हैं किन्तु मत्येक इन्द्रियमें वर्तमान है ॥ १४ ॥ पुरणदा अपानदा व्यनिदा बचौदा वरिवोदाः। अन्यात अस्मत्तंपन्तु इतः पावको अस्म- भ्य शिवो भव ॥ १५॥ इसका लोपामुद्रा ऋ०, विरा० पं०, छ, भग्नि दे० है । मंत्रार्य-( माणदा, अपानदाः, व्यानदाः, वक़दाः, परिवोदा, अस्माक, पाचकः, शिवा, भव, ते, इत्या, भस्मत, भन्यान, सपन्तु ) हे अग्ने ! वुम पाण देनेवाले अपानदेनेवाले सर्व शरीर -वर्षी पानवायु देनेचाले बलदाता धनके देनेवाले होभो, हमारे शोधक कल्याणकारी होमो ज्वालारूप प्रायुध हमसे दूसरों -- ४६६ शुक्लयजुषेद । ताप देय ॥ १५॥ अग्निस्तिरमेशोचिषा यासहिश्वन्यमिणम् । अग्निना बनते रयिम् ॥ १६ ॥ इसका भर० ऋ०नि० गा००पीरन दे। मंत्रार्थ (अतिः, तिग्मेन, शोचिपा, विश्वं, अत्रिणं, नियासत्, अग्निः, नः, रायम् बनते ) अग्नि तीक्ष्ण रोजसे सम्पूर्ण यज्ञविनकारी राक्षसादिको वरकर भाग्न हमको धनदेय ॥ १६ ॥ य इमा विश्वा भुवनानि जुपिहोता पसी दपिता नः । स आशिपा द्रविणमिच्छमान: प्रथमच्छदयगन् आविवेश ॥ १७॥ इसका भुवनपुत्र विश्वकर्मा , नि० मि०६. विश्वकर्मा दे है । मंत्रार्थ- यः, ऋषिः, होता, ना, पिता, उमा, विश्वा, भुवनामि, जुहन न्यपीदव, सः, भयमध्छन्, माशिपा, द्रविणम्, इच्छमानः, अबरान, आविवेश) जो अतीन्द्रियद्रष्टा सर्व संहार. रूप होमका की हम सम्पूर्ण प्राणियों का पालन करनेवाला है जो इन सम्पूर्ण लोकोंका संहारकाता हुमा स्वयं स्थित हुमा पद परमेश्वर मयम एक अद्वितीय रूपको छादन करता में बहुसरूप होकर प्रकट होऊँ इस भमिलापासे जगद्प धनको इच्छा,कररा। हुआ अंभिव्यक्त उपाधिवाले मायाके विकारयुक्त जीवों में प्रवेश- करगया ॥ १७॥ किंस्विदासीदधिष्ठान मारम्भणतमस्वित्क- पासीत् । यतो भूमिजनयन् विश्वकर्मा घिद्या- मौणोन्महिना विश्वच॑क्षाः ॥१८॥ इसका विश्वकर्मा ऋ०, मु०५० छ० विश्वकः देवता है । मंत्रार्थ-(स्वित्, अधिष्ठानम्, किम्, आसीत्, भारम्भणम्, कथा, कामत, आसीत्, यतः, विश्वचताः, विश्वकर्मा, भूमिम्, द्याम् जनयन्, महिना, विनोद .) मन है कि द्यावाभूमिका निर्माण करतेमें इस परमात्माका रहनेका आश्रय क्या था ? घट - १७ अध्याय ४९७ . . को बनाने में मृत्तिकाकी समान उपादानकारण रूप निर्माण की सामग्री क्रिया वतामेवाली वेदवाणी वा थी ? जिससे प्रतीत अनागा वर्तमानकालको एकसाथ देखनेवाले विश्वका परमात्मा ने इस विस्वा भूलोक और धुलोकको सुशन करके अपनी बड़ी सामर्षसे विशेष प्राच्छन्न किया है, भाप सर्वदर्शी भाषसे सर्वत्र विराजमान है ॥ १८ ॥ विश्वतश्चक्षुरुा विश्वतोमुखी विश्वतों पाहुरत विश्वत्तस्पात् । सम्बाहुभ्यान्धर्मति सम्पस- योवामी जनयन्दे एकः ॥ १९ ॥ इसका भुवनपुत्र विश्व० शापि, भु०. त्रि० के० विश्वकर्मा देवता है। मंत्रार्थ-(विश्वगम्यतुः, उत, विश्वतोमुखः, विश्वतोवा: उरा, विश्वासाद, एकः, देवः, धावामी, जनयनं, वाईभ्याम, सन्धमति, पसौ, सम् ) सबभोर नेत्रवाला और संघभोर मुख वाला सबओर भुजावाला और सबथोर धरणसे युक्त एक अद्वि- तीय परमात्मा द्युलोक और भूलोकको अधिष्ठानशून्य होकर प्रकट करताहुमा 'भपनी भुजाभास संयोगको माप्त होता है ॥ १९ ॥ किस्विनं स वृक्ष मास यतो धापाप- थिवी निष्टताः । मनीपिणो मनसा पुछत्तदु तयध्यातिद्धवनानि धारयन् ।। २०॥ इसका भुवनपुत्र विश्व० प्रा०, भु०नि००, 'विश्वक० दे० मंत्रार्थ--प्रश्न (स्वित, वनम्, किम्, श्रास, उ, सा, रतः, क, पास, यत, यावापृथिवी, निमः, मनीपिणा, भुवनानि धार- यन्, 'या. अध्येतिष्टत, तवे, मनसा, इ, उ, पृच्छत ) करो तो वह कारणरूप वन किस प्रकारका था भौर वह कार्यरूपं दक्ष कौन था जिस बनवृत विश्वकर्माने स्वर्ग और पृथ्वी अलकर की है हे विद्वानो ! मनका निग्रहकरनेवालो संव भुवनोंको धारण करें हुए विश्वकर्माने जो स्थान अधिष्ठित किया उसको मनसे भातो चनाकर उस गसिद्धको पूछो ॥ २० ॥ 5 , - शुक्लयजुंद। या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । शिक्षासखिभ्यो प्रविर्षि स्वधावः स्वयं पंजस्व तन्न्वं वृथानः ।। २१॥ इसका भु० वि० ऋ०, मार्षी त्रि० छं० विश्व० दे० । मंत्रार्य (स्वधावः, विश्वकर्मन, ते, या, परमाणि, या, भवमा, उत, या, मध्यमा, धामानि, इमा, धामानि, सखिभ्यः, माशिक्ष, इविषि, सन्वम्, धानः, स्वयम्, यजस्व) सधावान् बहुत पन्नसे युक्त सब जगतके की ईश्वर आपके जो उत्कृष्ट जो निकृष्ट भौर जो मध्य पीके स्थान है इन ऊपर नीचे और मध्मके लोकोको भक्त यजमानोंको सवप्रकारसे दीजिये. तथा यजमानकी दीहुई इविक उपस्थित होने में अपने शरीरको वृद्धिको प्राप्त करते भाप ही यजन कीजिये हम यजन करते हैं यह हम कैसे कइसकते हैं कौन मनुष्प तुमको यजन करनेको समर्थ है ! इससे मैं कहताहै सय यजनं करो ॥ २१॥ विश्वकर्मन् विपा वाधानः स्वयं य॑जस्व पृथिवीमत द्याम् । मुर्धन्वन्पे आमतः सपत्ना हास्माकम्मघा सूरिरस्तु ॥ २२ ॥ इसका मु० वि० ऋ०, निदा० वि० छ, विश्वा देवसा. है। मनधि-(विश्वकर्मन, हविपा, वाघाना, पपिवीम्, उत, पाम्, स्वयं, यजस्व, अमिता, अन्ये, सपत्नाः, मुमन्तु, इह, मघना भस्माकं, मूरिः, भस्तु ) हे परमात्मन् ! मेरे दिये हुए हविरूप अन्नसे प्रसन्न हुए भाप मेरे यज्ञमें पृथिवीके प्राथित जीवोंको और पुलोकके माश्रित जीवोको मेरे ऊपर अनुप्रद्द कर स्वयं ही यजन करा, और तुम्हारे मसादसे सब ओरसे दूसरे शत्रु वा का- मादि मोहको प्राप्त हों, इस यंत्र में इन्द्र यचद्रष्टा ब्रह्मा हमको भात्म जानके उपदेशक हों ॥१२॥ वाचस्पति विश्वकर्माणमूतघे मनोजुवं वाजे अया हुँ । स नो विश्वानि नानि जोषमिव .
२७ अध्याप। - शम्भूरपसे साधुकर्मा ॥ २३ ॥ विश्वकर्मन्हविया धनेन आतारमिन्द्रमकृणोर- वद्धधम् । तस्मै विशः समनमन्त पूर्वाग्यमुग्रो विहन्यो यचासत् ॥ २४ ॥ इन दोनोंकी व्याख्या १० ८ मं० ४५, ४६ में होगई है ।। धक्षुपः पिता मनसा हि धारों धृत्तमने अजन नम्नमाने । यदन्न्ता अद्दहन्त पूर्व आदि- दद्यावापृथिवी अप्रणेताम् ॥ २५ ॥ इसका भु० मि० भ०, मा. त्रि० ई०वि०क देवता है। मंत्रार्थ-( यदा, इव, पूर्ण, अन्तः, श्रदान्त, यात्, इन्, घावा. थिवी, अप्रयताम्, चक्षुपः, पिता, मगसा, धीरः, हि, पने, नम्न माने, घृतम्, मजनयत् ) निससमय पूर्वमहर्पियोंन द्यावा भूमिके अन्तर्दिशाओंको दृढ़ किया, इसके अनन्तर ही द्यावापृथिवी विस्तार गुरू हुई सव सम्पूर्ण ज्योतिको पालन करनेवाला मनसे धीर होता ही इन मममान यावापृथिवी में घृतनलको उत्पन्न करताहुमा २५ : विश्वकर्मा विर्मना आमिहाया धाता विधाता परमोत मन्दृक् । तेषाष्टिमानि समिपा मदन्ति यत्रा सप्त ऋपीन्पर एकमाहुः ॥ २६ ॥ इसका मु० वि० ऋ० भापी प्रि० छ० विश्वक० दे०। मंत्रार्थ ( यत्र, सम, पीन, पेरण, एकप, पाष्टः, विश्वकर्मा विमनाः, भाद, बिहायाः, पासा, विधागा, उरा, परमा, सन्दक, तेषाम्, इष्टानि, इपा, सम्बदन्ति ) जिस लोक सस प्रापियोंको विश्व- कीके साथ एक कहाँहै जिनका जगन्निीसा श्रेष्ठमन सम्पूर्ण कर्मका ज्ञाता और आकाशमें व्यापक,धारण पोपण स्पिति करने वाला सबका उत्पादक और सबसे उत्कृष्ट परमात्मा सम्यक देखने वाला है उस लोकमें उन पुरुषोंके अभिलपित वस्तु आहुतिके रसभूत अन्नके संग भानन्दसे मोदयुक्त होकर पुष्ट होते हैं।२६॥ पोना पिता अनिता पो विधाता धामानि ४७० शुक्लयजुषद। वेद भुवनानि विश्वा । यो देवानाम्नामधा एक एव त सम्पृश्नम्भवना यन्त्य॒न्या ॥ २७ ॥ इसका भु० वि० ऋ० मिच्दा त्रि० छ०. विश्वक० दे. मंत्राध-(य:, नः, पिता, जनिता यः, विधाता, विज्ञा, धामानि भुवनानि, वेद, यः, एका,देवानां,नामधाः, अन्या, भुवना, संप्रश्न तं, यन्ति ) जो विश्वामी परमेश्वर हमारा पालक उत्पादक है जो विशेषकर धारण करनेवालाई सम्पूर्ण स्थान भौर मागियों को जागताहै जो एक होकर भी देवताओंके अनेक नामोको धारणा कामाद और भक्त जन प्रश्नोचर करतेहुए उन परस्मामा प्रवेश करते ६॥ २७ ॥ त आर्यजन्तु द्रविण समस्मा भूपयः पूर्व जरितागे नभूमा । अमूर्ते मूर्ने रजसि निपुत्ते ये भूनामि ममकृण्वन्निमानि ॥ २८ ॥ इसका भु. वि० प्रा० निवदा० नि०० विश्वकर्मा दे। मंत्रार्थ ( ते, जरिवारः, पूर्व, अपयः, अस्म, द्रविणं, समाय गन्न, नमुना,ये,भान रजीस निपनेइमानि भूनानि,सम्भकृण्वन) वे स्तुतिकरनेवाले विश्वकर्माके रचे पूर्वकालीन भूपि इस भूप्स समूहको जलरूप धन सम्यक प्रकारसे देवेहुए अधिकतास कामना को देशहुए, जो पीसत्रह अवयवपाले लिगशरीरोंसे भलीमकार प्रेरित रिस लोकमें स्थितहो इन प्राणियोंको रचते हुए २८ परो द्विषा पर एना पृथिव्या परो देवेभिरंसु. यंदस्ति ।' को विदर्भम्प्रथमन्दध्र आपो पत्रं देवाः समर्पश्यन्त पूर्व ।। २९ ।। इसका भुन वि० ऋ० मापी पिछ०,मिश्वकर्मा दे है। भवार्य-( यह, अस्ति, दिवः, पर, एना, धिया, परः, देवभिः, अ. प., in; भापः, 'प्रपम, के, गर्भम, दधे कास्थित यत्र, पूर्ने, देवा, समपश्यन्त ) जो ईखरका तत्व हृदयकमलमें विद्यमान है वह पुलोकसे भी दूरभर्यात दाय है, इस पृथ्वीस मी " १७ अध्याय। - - दूर है और जलोंने पहले किसके गर्भको धारण किया यह तो - देखो कि उसने प्रथम जलको उत्पन्न किया जिस समय उसको गथम गर्भ धारण किया वह गर्भ कैसा माश्चर्यकम है जहां प्रथम के देघा तथा महर्पि जगतको देखगेहुए ॥ २९ ॥ तमिद्गर्भप्रथमन्दध्र आपो पत्र देगस्तमा- छन्त विश् । अजस्य नाभावध्येकमपितं यस्मि. विश्वानि भुवनानि तस्थुः ॥ ३० ॥ इसका भु० वि० ३०, मात्रि. छ०, विश्वकर्मा देवता है । मनार्थ-(भापः, प्रथम, समिद, गर्म, दधिरे, यत्र, विश्वे, देवाः, समगन्छना, अजय, नाभी, एक, अर्पिनम् यस्मिन्, वि. श्वानि, भुवनानि, अधिस्थुः ) जलोंने पहले उसको ही गर्भ में धारणकिया क्योंकि गर्भमै सम्पूर्ण देवता एकत्र होकर वती है उस गर्भका आधार क्या है ? जन्मरहित परमेश्वरकी नाभिस्था- नीय मध्यमें एक अविभक्त अनन्यभूत किंचित् वीजगरूप स्था- पित किया जिसमें सम्पूर्ण भासमूह स्थित हुए, अर्थात् वह सबका माश्रर है उसका कोई आश्रय नहीं है ॥ ३० ॥ न तं विदाथ य हुमा जजामान्यधुम्माकान्तर स्वाय । नीहारेण प्राईवा जल्प्यां चाप उक्थशासश्चरन्ति ॥ ३१॥ इसका भु० वि००, भु० पं० छ, विश्वकर्मा देवता है। मंत्रार्थ- [ उपदेश करते हैं ] ( यः, इमा,जजान,युष्माकम्,अन्तरम्, अन्यत् वव,सं,न.विदाप, नीहारेण,च, जल्प्या:मानाः, अमृतपः उक्थशासः, चरन्ति ) जिस परमात्माने इस सर जगत्को उत्पन्न किया और जो अहंकारादिसे युक्त जीवोंके अन्तर में, वास्तव में भाईकारको छोड़नपर जाननेयोग्य ईश्वरतच है उसको वम नहीं जानते हो कारण कि कुइरसहश अजानसे और मैं देवता हूँ मनुष्य हूं, यह मेरा गृहक्षेत्र है, इत्यादि असद वातासे आच्छादित हुए किसमिफारसे हो गाणपोपणकी चिन्ता नगे ईश्वरराव नवि- . . शुक्लयजुचंद। चारनेवाले परलोक भोग पानेको सकाम यजों में स्तुति करते थे प्राणी विचरते ६॥३१॥ विश्वकर्मा ह्यनिष्ट देव आदिवन्धर्वो अभवद् द्वितीयः । तुतीयः पिता जनितौषधीनामपाइर्म व्यदधात् पुरुत्रां ॥ ११॥ इसका भु०, वि०, ऋ०, मा०३००, विश्व० दे। मंत्रर्षिः प्रामाण्ड के मध्य गांकी सटिकहरो ग्रह्माण्ड के बीच में मथम(विश्व- कामी, देवः, भाजनिष्ट, मात्, इत, द्वितीयः, गन्धर्षः, अमवत् । देवसिषगादि जातका भेद करनेवाला सत्यलोकवासी, चतुर्मुख देव शता, अर्थात् प्रादित्यके भनार पुरुपरूपसे प्रकट हुआ अनन्तर दूसरी सीपमें गन्धर्व पृथ्वीको धारण करनेवाला माग्न अथवा गानविद्या चतुर देवयोनि, मकट हुभा (तीया, मोपीनाम्. जानिता, पिता, अपाम्, गर्भम्, पुरुना, व्यदधात) तोसारा सोपधियोंका उत्पादक पालक पर्जन्याप हुमा वह पर्ज- न्य उत्पन्न होनेही पाहुतिके परिणाममून जलोके गर्भको बडुन प्रकार से धारण करता हुआ ॥ ३२ ॥ आशुः शिशांनो पातो न भीमो धनाधन: क्षोभणश्चर्पगीनाम् । संक्रन्दनो निमिप एक: चीर: शत सेना अजयस्माकमिन्द्रः ॥ ३३ ॥ इसका मतिरय ऋ०, पापी नि०ई० इन्द्र देवता है। मंत्रार्थ- (प्राशुः, शिशानः, सपभः, न भीमः, घनाघनः, चर्षणीनाम् क्षो. भाणः, संन्दनः, अनिमिषः, एकवीर, इन्दः, साकम्, शतसेनाः अजय ) शीघ्रगामी वज्रनाक्षणकारी वपने के स्वभावकी उपमा चाला भयकारी शत्रुओंका अतिशय घातक मनुष्योंके क्षोभका हेतु वारंवार गर्जन करनेवाला, देवता होनेसे पलक न लगानेवाला, अत्यन्त सावधान अदितीय वीर इन्द्र एकसाथ ही सौ सौ शत्रु मकन्दनेनानिमिषर्ण जिष्णुना युत्कारेण दुनय- . - सेनाको जीनामा : ३॥
१७ अध्याय। चनेन पृष्ानी । तदिन्द्रेण जयत् तत्संदर्य , युधो नर इपुंहस्तेन वृष्णा ॥ ३४ ॥ इसका भतिरय मा०, विराद प्रा०६० इन्द्र दे मंत्रार्थ- (युधः, नरः, पाना, संक्रन्दनेन, युत्कारेण, भनिमिपण, इपु. हस्पेन, मिना, दुश्म्यवनेन, वृष्णा, इन्द्रेण, सत, यत, रात, सहवम् ) हे युद्ध करनेवाले मनुष्यों ! प्रगलम भयरहित शब्द करनेवाले, कहा युद्ध करनेवाले एकचित्त हायमें वाण धारणकिए जपशील अनेय कामनाभोंके घर्षानेवानेइन्द्र के म पावसे उस शत्रु सेनाका जप करो और उस सेनाको पराम काके विनष्ट करो ३१ सइपुस्तस्सनितिभिर्षशी सणा सयुध इन्नों गुणेने । मधेसजित्सोमपा शर्युग्र- धन्वा मतिहिताभिरस्ता ॥ १५ ॥ इसका सिर १०, भाषी मि० ईन्द्र देवता है मंधार्थ- (सः, वशी, इपुदः, निपडिमिः, संस्रष्टा, सः, गणेन, युधः, सः इन्द्रः संहष्टजिद, सोमपाः, माशी, उग्रपन्ना, प्रणिहिताभिः, अस्या) यह मितेन्द्रिय वाण हापमें लिये धनुपधारियोंसे युदके निमिघ संसर्ग करनेाला पह शत्रुसमोसे युद्ध करनेवाला है यह इन्द्र युद्धके निमिन इकटे हुए शत्रुभोंको जीतनेराला पजमानोंके यसमें सोमपान करनेाला वाहमों के बलसे युक्त उत्कृष्ट धनुपवाला भपने धनुपत छोड़हुए घाणोंसे शत्रुओं पर घलशाद, वह इन्द्र हमारी सा कर ॥ ३५॥ वृहस्पते परिदीया रन रक्षादा मित्रांन अपु. पायमानः । भवन्सेन अपणो युधा जपन्न- स्मामेष्यपिता रानाम् ।। ३६ ॥ इसका मतिय ३०, मापी कि० ई. वृहद है। मंत्रार्थ- (वृहस्सो, रक्षोहा. रयेन, परिदीया, भमित्रान, अपराधमानः, सना, प्रभजन, युधा, प्रमुणः, जयन्, भस्माके, स्थानां, प्रविना एधेि) "वाग्व, वृहसी" वाणी के पति व्याकरणकर्ता होने से इन्द्रा .
११७ अध्याय ७५ स्माक सेना अवतु प्रयुत्सु ।। ३९ ॥ इसका अप्रतिरथ ऋ, नि पिछ० इन्द्र दे० है । मंत्रार्थ- (अदय: वी.शामन्युः, दुश्च्यवना, पृतनापाद अयुध्या, इन्द्रः युत्स, गोत्राणि, सहसा,.अभिगाहमानः, अस्माकम्, सेना, मा. यतु ) शत्रुमापर दयारहित, विक्रान्त अनेक प्रकारके शोधयुक्त, जिसको काई च्यावित न करसके मजेय संग्राम में सेनाको सहकर तिरस्कार करनेवाला. जिसके संग कोई युद्ध नहीं कर सका, सो इन्द्र युद्धोंमें असुरकुनाको एकसाथ ही विलोड़ित करताहुमा, हमारी सेनाकी रक्षा करे ।। ३९ ॥ इन्द्र आसान्नशा.पृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञापुर,पतु, सोमः । देवसेनानामभिभवतीनाञ्जयन्तीना. : मरुतो यन्त्वग्रंम् ॥ ४०॥ इसका मातिरथ ऋ०, बाहयु० छ० इन्द्रादय दे है। मंत्रार्थ-' (बृहसतिः, इन्द्रः, यासाम्, भभिमजीनामे, जयन्तीनाम् देव सेनानाम्, नेसा, यज्ञः, सोमः, दक्षिणा, पुरः, पंतु, मरुतः अंग्रम् यन्तु ) बृहस्पति इन्द्र न शत्रुओंको मर्दन करनेवाली विजयशील' देवसनाथों के शिक्षक हैं, यज्ञपुरुष विष्णु, सोम, दक्षिणा, भाग - गमन करें. गणदेवता सेनाके अग्रभागमें गमन करें ॥ ४०॥ इन्द्रस्य कृष्णो वरुणस्य राझं आदित्यानां मरुता शधै उग्रम् । मुदामनसां भुवनच्ययानां घोपों :' देवानाम्जयतामुदस्थात् ॥ ४॥ इसका मनोरंथ ऋ० प्रा०नि००, इन्द्रादिदे है। मंत्रार्य ((महामनसाम्, भुवनच्यवानाम्, जयंती, देवाना, श्रादित्यानाम्, मंग, वृष्णः. इद्रस्य, राज्ञः, परुणस्प, उग्रम्, शर्थः, घोषः, उद स्थान ) महानुभाव. लोकनाशकसामर्थ्यवाले, विजयपानवाले, देवता, श्रादित्य, मेल, कामनाकी चपी करनेवाले इन्द्र और . राजा वरुणको उनको.जयशदमारा।। ४१॥ इक्षप मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां. ..
. , , शुक्लयजुवदा मनासि । उनहन् वाजिनां वाजिनान्युद्र- थानां जपतां पन्तु घोषाः ॥ ४२ ॥ 'इसका मम ऋ० मा० उ० छ० इन्द्र देवताहै । मन्त्रार्थ (मपन, भायुधानि, उपय) हेइन्द्र अपने शस्खोंको मत्रीप्रकार हर्षितकरी (मामकानां, सत्वानां, मनांसि, उत् ) मोवारों मनोंकों हर्षित करों (वृत्रहन, वाजिना, वाजिनानि, उत्) संघनाशक ! घोड़ोंकी शीघ्रगतियोंको उत्तम करो (जयता, स्थानां, योपाः, उधन्तु )विजयशालरयोंके जयघोष उचारण कियेजाय ४२ अस्माकमिन्द्रः समृतेषु जेबस्मार्क या इष.. वस्ता यन्तु । अस्मा गेरा उत्तरे भवन्त्य- स्मान देवा अवताइवेषु ॥४॥ इसका धम० , नि० मा. मि००, इन्द्रादि दे०६ मार्य (ध्वजे', सम्भृतेषु, इन्द्रः, भस्माकम, भस्माकम्. याः, इषवः, RE, जयन्तु ) पताकासे पताकाभोंके मिलनेपर इन्द्र हमारी रक्षाकरे और हमारे जो पाणहें यह शत्रुमोको नष्ट करनेमें जयपा (मामार्फ, वारा, उत्तरे, भवन्त ) हमारे शर शमोंके वासेसे पसम हो (उ, देवाः,माइवेषु, अस्मान, अषस) पौर देवता संग्रा- मोंमें हमारी रक्षा करें ॥ ४ ॥ अमीपाश्चित्तम्प्रतिलोमपन्ती गृहाणान्यप्ने परेहि। अभिप्रेहि निदेह हुत्सु शोकसन्धना- मित्रास्तमसा सचन्ताम् ॥ १४॥ इसका अम० भ०, मा. आ. छ., इन्द्रादय देता है। मन्त्रार्थ- अप्चे.समीपाय, चिंत,मशिलोभयती, भङ्गानि गृहाणा, परोहि, अभिप्रेहि ) हे शत्रुभोक माणोंको कष्ट देनेवाली व्यापि इन पीयाँक चित्तको मोहित करती हुई और वैरियोंके शरीरोंको ग्रहण करतीदिन चलीजा, सब बोरसे शत्रुओंको पकड़कर पत्त (हस्सु,शोकः, नि उनके हृदयोंको शोकास दग्धकर (अमित्रा, मन्धन,समसा, वचन्ताम) इमारे पैरीगाढ अन्धकारसे व्यास हो।४ १७ अध्याय 1. - अर्थसण परीपत' शरव्ये ब्रांसशित । गच्छामिवान्प्रपद्यस्य मामीपांकञ्चनोमिछपः॥४॥ -इसका अम० अ०, आ० भ० छ०, इपु देवता है। मंत्राप (प्रामासी, शाव्य, अवस्या, पगपन ) वेदमंत्रोस तीक्ष्ण किये हुए हे वाणरूप ब्रह्मास्त्र ! हमार छोटेहुए तुम वैरिसेनापर गिरो (श्रीमान्, गच्छ, प्रायव)वैरियोंपर पहुँचो और उनके शरी- रोंमें प्रवेश करो (अमीषां,कचन, मा, उच्छिपः)इनमेंसे किसीको भी शेष न छोड़ो ॥ ४५ ॥ प्रेताजपताना इन्द्रो वशम यच्छतु। उग्रायः सन्तु बायोऽनाधृष्यो यथासंथ ।। १६ ।। इसका भा० ऋ० वि० प्रा० भ० छ०, योधा दे० है । मंप्रार्थ ('नरः, प्रेत, जयतः) हे हमारे वीरपुरुषों वैरिसेनाके ऊपर शीघ्र- जाओ और जय पायो (इन्द्र. धः शर्म, यच्छतु ) इन्द्र तुमको वियप.सुख दें (का, वाहयः, उग्राः, सन्तु ) तुम्हारे भुजदएड शस्त्रपठानमें समर्थ हों (यथा, भनाधृष्या:, भसप)जिसमकारकि तुम किसीसे तिरस्कार न पाभा ।। ४६ ।। असौ या सेना मानः परैपामभ्यति न ओजसा साधमाना। तां गृहत समसापनतेन यथामी अन्पो अन्पन्नजानन् । ४७ ।। इसका १० ऋ०, नि० प्रा०वि० छन्द, मरुत् दे० है। मंत्रार्थ-( मरुतः, या, असा, परेपाम्,सेना, मोजसा, स्पर्धमान म:, मा-अभ्यैति, ताम्, अपननेन, समसा, गहत, यथा श्रमी, भन्यान्यम्, न, जानन ) हे मरुत् देवसामों ! जो यह वैरियोंकी सेना क्लसे ईपी करतीहुई हमारे सामनेको भा रहीहै, उसको । अमएयभावके अन्धकारसे ढकदो कि जिसमें वह वारसना के पुरुष एक दूसरे को न पहिचाने और परस्पर शख्न चलाकर नष्ट हालाय ॥४७॥ पत्र वाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखाई।
છ૭૮ "शुक्लपजुपद। शत्रन्हो बृहस्पनिरदिति शी यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥ ४॥ इसका अ५० ऋ०,पंक्ति छ, वृहस्पति अदितिदे है। मंत्रार्य (वन,पाणा,विशिखा,कुमारावसम्मानित जिस गुदमें, के धनाये हुए बाण फैनीहुई शिखापाले पालकोंकी समान गिरसे है (तव, सहसतिः, अदितिः, इन्द्रः, नः शर्म, यच्छतु ) उस युद्ध में वृहसति अदिगि और इन्द्र हमको विजयमुख दें (विश्वाहा, शाम, यच्छतु )वह सकल वैरियोंका नाशक कल्याण दे॥१८॥.. मीणि ते वर्मणाच्छादयामि सोमहत्या राजा:. मृतेनानुंधस्ताम् । पुरोईरीपो बरुंगाते कृणोतु जयन्तन्वान देवा मदन्तु॥ ४९ ॥ इसका मम० प्रा०, नि०, ० सोम वरुण देवता है। मंत्रार्ष (रो, मर्मणि, पर्मणा, छादयामि ) पुरोहिरा कइसाईजि-हे या- मान ! तेरे मर्मस्थानोंको कवचसे ढकसाहूँ (राजा. सोमः, त्वा, अमोन, अनुषाम् ) ग्राह्मणोंका राजा सोम तुझको मृत्युको हटानेवाले कवचसे पाच्छादन करै (वरुण, रो,उरो, वरीयः, कृणोतु:) वरुण तेरे कवचको बड़से बड़ा करे (देवाः, जयन्तम्। स्वा, अनुमदन्तु ) अन्य देवता विजय पाराहुए तुझको उत्सा- हिरा करें ।। ४९ ॥ उदैनमुजरान्नपारने घृतेनाहुत । रापस्पार्पण सस मजा च बहुकृधि ।५ ॥ - इसका शम० ऋ०, अनु० छ०, भग्नि दे है। मंत्रार्थ-(नेन भाहुन, अग्ने, एनम्, उत्तराम्, नय) होम करताहुमा कहै कि-हे' रासे हस भन्ने ! इस यजमानको ऐन्धर्य वा मनको उत्तमना पर पहुँचायो ( रायसोपेण, संमृग ) धनकी पुष्टिसे युक्त करो (च, मजया, बहुम, कृषि) भौर पुत्रपौत्रादि सन्तागसेवहुत कुटुम्ब- चाला करो।।५० इन्टेमन्त्रालय सजातानामसदृशी । समैन - . 7 . . १७ अध्याय। वर्चसा सूज देवानाम्नागदा असंतु ॥५॥ इसका भा० प्रा०, अनु० छ०, इन्द्र दे० है । मंत्रार्थ ( इन्द्र... इमम्, प्राराम्, नय ) हे इन्द्र ! इस यजमागको बड़े ऐश्वयं पर पहुंचाओ ( सजातागा, वी, असत् ) शाशिवालोंको वश में कर नेवाला हो ( एनम्, मर्चसा, संज) इसको जसे संयुक्त करो (देवानाम्, मागदा, असत् ) देवनानीको भाग देनेवाला हो २१ यस्य कर्मो गृहे इविस्तामग्ने चर्चयात्यम् । ती देवा अधिग्रुवन्नपञ्च ब्रह्मणस्पतिः ॥५२॥ इसका अम० ऋ०, मनु० ई०, लिमोक्त दे० है । मंधि- मग्ने, यस्य, गृहे, हविः, कुर्मः, सम्, त्वम्, वर्धय ) हे अग्निदेव । जिसके घरमें पुरोटाशका इषि करते हैं, “उस यजमानको तुम बदामो (देवाः, तस्मै, अधित्रुवन् ) देवता उस यजमानको सन, से अधिक कहैं ( अयं, ब्रह्मणः, पतिः, च ) यह यजमान वैदिक कर्मका स्वामीभी हो ॥५२॥ उर्दु त्या विश्वेदेवा अग्नै परन्तु चितिभिः । स नो भव शिवस्व मुप्रतीको विभावसुः ॥५३॥ । इसकी व्याख्या १२ वें अध्यायके ३१ वे मंत्रमें होगई ॥५३॥ पञ्च दिशो देवाज्ञमयन्तु देवीरपामतिन्दुर्म- तिम्याधमानाः । रायस्पोर्षे यज्ञपतिमामन्ती रायस्पोपे अधि गुज्ञो.अस्यात् ॥ ५४॥ इसका अम० ऋ०, बि०,०, दिक दे है। मंत्रार्य-(देवी, पथ, देवी, दिशः, अमनिम्, दुर्मतिम्. अपवाधमाना, रायस्पोप यजपतिम्. भाभजन्तीः, यज्ञम्, भवन्तु) इन्द्र, यम, वरुण, सोमः और ब्रह्मासे सम्बन्ध रखनेवाली, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और मध्य यह पाँच दिशाएं हमारी बुद्धि की मन्दता और पापबुद्धिको नष्ट करती हुई और धनकी पुष्टि में यजमानका भागी करसीहुई, हमारे यज्ञकी रक्षा करें ( यः, रायः, पोपे, अधि, अस्थाव ) हमारा पक्ष धनकी पुष्टि में अधिक वृद्धि-पावै ॥ ५४॥ :
४८० - शुक्लयजुर्षद। समिद्धे अग्नावधि मामहान उथप ईज्यो गृधीत । सुप्तं धर्म परिगृद्या यजन्नोर्जा ययज्ञ- मजन्त दे॒वाः ॥ ५५ ॥ इसका श्रम ,त्रि० छ. अग्नि दे है। मंत्रार्थ-(देवाः, यद, सप्तम्, धर्मम्, परिगृह्य, यन्त्रम्, भयजन्न, ऊर्जा, 'मयजन्त, ईडया, उक्थपत्रः, गृभीता, मामहानः, अग्नी, समिदे, अधि) मामा आदिके स्थान में वरण किये हुए प्रयु प्रादि जव मज्वलित [ ३७ वें अध्यायमें वर्णित ] प्रवर्यको ग्रहण करकै राजपुरुषका पूजन करतहैं और जब इविप अन्नसे यजन करते हैं तब स्तुति के योग्य यज्ञ उक्थ शनवाला यत्रमाप्त होता है, देवराामोंका परमप्नक यजमान अग्निक मालत होनेपर सेजस्वी होता ॥५५॥ देव्यायधजोप्ट्र देव श्रीः श्रीमनाः शतर्पया। परिगृह्य देवा यज्ञापन्देवा देवेभ्यो अध्वयन्तो अस्थुः ॥५६॥ इसका भम० ०. बृह० छ० अग्नि दे० है। मंत्रार्थ-(देव श्रीः, श्रीमनाः, शतपयाः, दैव्याय, धर्म, जापते) हवि देनके द्वारा देवताओंकी सेवा करनेवाला, यजमानमें मन रसनेवाला, भक्तोंको धन देनेके निामेन 'मन करनेवाला दक्ष आदि सैकड़ों प्रकारकी सामग्रीवाला या देवताओंके हितकारी वर्षा भादिके द्वारा वा यत्र के द्वारा जगदमा रक्षक हमारी दीहुई भीसिार हनिको साकार करने वाले अग्निका निमित्त होता है (देवाः परिगृहा, यवम् प्रायन ) ऋत्विज उस अग्निको पाकर यतको प्राप्त कर हैं ( देवाः, देवेभ्यः, अध्वर्यन्तः माथुः) दीलिमान अात्तिज देवताओं के निमित्त यस करने की इच्छासस्थित होसह ५६ दीत हविः शमितय इमिगा यजय तुरीयो । राज्ञो यन हुव्यमेति । ततो वाका आशिषों नो जुपन्ताम् ॥ ५७॥ इसका भम० ०००, हविर्य देवता है। मंत्रार्थ- . - १७ अध्याय g६१ P (तुरीया, यशः, यत्र, हव्यम, वीरां, शमिता, यजध्य, शमिरा, हविः, एसि, तसः, याशिपः, पाका, नः, जुपन्साम्.) चौथा यज्ञ, जिसमें हवायोग्य देतामोंके और परमशान्ताप अधी के द्वारा हवनकरने के निमित्त संस्कार किया हुआ हवि प्राप्त होता है, उसमें यहस उठेहुए प्रभाट सके कहनेवाले तीनों चेदोंके बचा हमको फलीभूत हो ।। ५७ ॥ सूर्यररिमहरिकेशः पुरस्तात्सविता ज्योतिरुद- गान अजस्त्रम् । तस्य पूषा प्रेसवे पोति विदा नाम्पश्यन् विश्वाभुषनानि गोपाः ॥ ५८ ॥ सका अप्र० प्र०, त्रि० छ०, भग्नि दे. है । मंत्रार्थ (सूर्य- 'रश्मिः, हारकेशः, सपिया, पोति, पुरस्ताद, उदयान ) यं जिस की किरण हैं, करकवर्ण ज्वालारूप केशवाला, प्राणियोंको अ. एने २ व्यापारमें लगानेवाला ज्योतिरूप भरिन पूर्व दिशा प्रकट होताहै (गोणः, विद्वान, पूपा, रास्य, मसले, विश्वा, भुवनानि, सम्पश्यन, मनस्रम्. यात) धर्मरक्षक विद्वान सूर्य उम प्रायोति की साझामे रहकर साक भुवनोंको देखनाहुआ निरन्तर चलताहै५८ विमान एप दियो मध्य आस्त आपमियान रोदसी अन्तरिक्षम् । स विश्वाचीरभिचष्टे घृताचीरन्तरा पूर्वमपरब्ध फेतुः ।। ५९ ।। इसका विश्वापसु ऋ०. त्रि० छ०, मादित्य दे० है । मंत्रार्थ. (एपः, विमानः, दिवः, मध्ये, पास्ते ) यह जगतको रचनेकी शक्तिवाला सूर्य स्वर्गके मध्यमें स्थितहै ( रोदसी, अन्तरिक्ष, अपमिवान, सा, विश्वाची:, घृताची, अभिषष्टे) पृथिषी सा और अन्तरिक्षको सब ओर तेजसे परिपूर्ण करताहुआ वह सूर्य वेदी और खुवेको देखता है (पूर्व, मगर, अन्तरा, केतु, प ) इस . लोक और अन्य लोकों में स्थित मनुष्योंके चित्रको भी जानताहै ५९ उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः पूर्वस्य योनिम्पित- राविषेश । मध्ये दिवो निर्दितः पृश्निरममा: . " , . शुक्लयजुचंद । विचक्रमे रजसस्थात्पनों ॥६॥ इसका श्रम ऋ०,त्रि० छ, अादित्य दे. है । मंत्रार्थ ( उक्षा, समुद्रः, अश्माः, सुपर्णः, दिवः, मध्ये,निहिता, शिक्षा, अरुणः, पूर्वस्थ, पियुः, योनि, प्राविवेश, विचक्रमे ) वर्षासे सींचनेवाले, जीससे गीला करने वाले,आकाशमें व्याप्त, श्रेष्ठ गपिवाने धुलोकने स्थित, विचित्रवर्ण अनेकों मकारकी किरणोंसे व्याप्त उदयके समय अरुणवर्ण सूर्पने पूर्वदिशाकवि स्वर्गस्यान में प्रवेश किया और विचरण किया ( रजसः, अन्ती, पाति ) यह ब्रह्माण्डकी सब पोरस रक्षा करता है ।। ६० ॥ इन्हें विश्वा अवीवृधन्समुद्रव्यचसहित धी- तम. रधीनां घाजाना सत्पति पत्तिम् ॥ ११ ॥ इसकी व्याख्या अ० १२ मं० ५६ में होचुकी ।। ६१ ॥ देवहुर्यज्ञ आ च वक्षमुम्न_ज्ञ आ च वक्षत् । याग्नियो देवा आ चं वात् ॥ ६२॥ इसका विधृति मा, मन छ, यज्ञ दे० है । मंत्रार्थ (देवहः, यज्ञः, पात्रक्षन च, यक्ष, ) देवताओंको बुलानेवाला यज्ञ देवता- ओंको बुलाये और यजन कर ( सुम्नहः, यतः, भावक्षव ) धन पुत्र आदि सान सुखोंको प्रकट करनेवाला यज्ञ देवताओं को पुनाव (च, देवः, अग्निः, देवान, भावक्षत, च) और देवता अग्नि देवताओंको प्राव्हान कर शोर यजन करे ।। ६२ ॥ वाजस्य मा प्रसव उद्गातेणोद्ग्रभीत् । अर्धा सुपानामिन्द्रों में निग्राभेणारा अफः ।। ६३ ॥ इसका विधृति ऋ० धन० छ०, इन्द्र दे० है । मंत्रार्थ (इन्द्रा, चाजस्य, प्रसवः, उग्रामेण,मा, उदग्रभीत ) इन्द्र श्रनकी उत्पत्ति और दानके द्वारा मुझको अनुगृहीन कर (अधा, निग्नामेण, मे, सपत्नान अधरान, अकः) और मेरे शत्रुभोंको माँगनेकी इच्छा होनीचा करो ।। ६३ ।। वृद्धगाभश्च निगामश्च नाम देवा अपीधन् । - १७ अध्याय। १८३ - - अधा सपत्मानिन्दाग्नी मे विपूचीनां व्यस्थताम् १४ इसका विधृति , अनु छ०, इन्द्राग्नी दे० है। मंत्राथ- ( देवाः, पदनाभ, च, निशाभ, च, ब्रह्म, भवीवृधन,) देवता हमको बाई और हमारे शत्रुओको निन्दा और यवसाधक वेदों. को वृद्धि दें (अधा, इन्द्राग्नी, मे, सपत्नान्, विपूर्वीनान, व्यस्य. माम् ) और इन्द्र गया भग्नि देवता मेरे शत्रुओंको अनेकगतिवाला करके विनष्ट करदै ।। ६४॥ मध्वमुग्मिना नाकघरव्य हस्तेषु पिभ्रतः। नियस्पष्टं स्वगत्या मिश्रा देवेभिराध्यम् ॥ ३५ ॥ इसका विधु १०, अनु • छ०, गग्नि दे० है। मंत्रा--( उरव्यं दस्तेपु विनतः, अग्निना, ना, मध्यम् ) हे ऋत्विों! उवा. पानमें संस्कार की शाग्नको हार्थोपर धारण करते चित्य अग्नि के साथ स्वर्गलोकको जाओ (दिवः, पृष्ठम्, स्वः, गत्वा, देवेभिः मिश्राः, आध्वम् ) स्वर्गके ऊपर ब्रह्मलोकमें जाकर देवताओंके साथ होकर स्थित होभो ।। ६५ ॥ प्राचीमनुप्रदिशम्नहि बिहानग्गेरंग्ने पुरो अं. निर्भयेह। विश्या आशा दीयानोविमानो धेहि द्विपद चतुष्पदे ॥६६॥ इसका विधृ० प्र०, नि० छ, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ-(मग्ने, चिद्दान्, माचीम्, प्रदिशं अनु गेहि ) देउखापार में स्थित अग्ने ! अपने अधिकारको जानने वाले तुम श्रेष्ठ दिशाकी भोरका ध्यान देकर मानो ( इह, शरने, पुरः, भव ) यहाँ अग्नि से अग्रगामी चनो (विधा, आशाः, बीद्यानः, विभादि साल दिशाओंको प्रकाशित करतेहुए विशेष प्रदीप्त होनो (नः, द्विपदे, चतुष्पदे, } जज, धेहि ) हमारे पुत्रादि परिवार और गौ आदि पशुओं को अन्न दो ।। ६६ ।। पृथिव्या अहमुदन्तरिक्षमारहमन्तरिक्षाविमा- महम् । दिवो नाकस्य पुष्टात्स्यज्योतिरगामहम् ६७. N 1 " ४८४ शुक्लयजुचंद। इसका विधृ० प्रा०, पिपीलिकामध्या वृहती छ, अग्नि दे० है, मार्य-(अई, पृथिव्याः, अन्तरिक्ष, पारुहा) में यजमान पृथ्वीसे ऊँचा होताहुआ अन्तरितपर चढ़ा हूँ (अन्तरिक्षाद, दिवं. पारुहप) भन्नारिक्षसे ऊपर स्वर्गलोक, चढ़गया हूँ, (मई, दिवा, नाका, पृष्ठात्, स्वः, ज्योतिः, अध्यगाम ) मैं स्वर्गके दुःखरहित स्थानसे ऊपर सूर्यमण्डलको माप्त हुआ हूँ ।। १७ ॥ स्वर्यन्तो नापैक्षन्त आधा रोहन्ति रोदसी। यज्ञं ये विश्वसाधार मुविधा सोवितेनिरे ॥१८॥ इसका विधृ० प्र०, अनु० ई०, अग्नि देवता है। मप्रार्थ- (ये, सुविद्वांसा, विश्वतोधारम, यज्ञम, विनेनिरे, रोदसी, पाय, भारोहन्ति, स्वर्यन्तः, नः, अपेक्षन्ते ) जो भक्तिज्ञानसे सम्पन्न योगीजम सब जातको धारण करने वाले यज्ञको करते हैं, जरा मृत्यु शोक धादिको रोकनेवाले स्वर्गपर चढो है और स्वर्ग में गमन कररोहुए कनकृत्य होनेसे पुत्र पौत्रादिकी अपेक्षा नहीं करते हैं ॥१८॥ अग्ने प्रेहि प्रथमो देवपताचक्षुर्देवानामृत म- या॑नाम् । इयक्षमाणा भृगुभिः सजोपाः स्व- यन्तु यजमानाः स्वस्ति ॥१९॥ इसका पिटऋ, नि० छ, भग्नि दे० है मंत्राध-(अग्ने, देवपता, मथमः, देवानां, उस, मीनाम, चक्षुः, मेहि ( दे भग्ने! तुम देवताओंके चाहनेवाले यजमानों में मुख्य हो तथा देवता और मनुष्यों के चक्षुरूप हो इसकारण प्राधो ( इयक्षमाणः, भृगुभिः, सगोपाः, यजमानाः, मस्सिा, स्वः, यन्तुं ) यज्ञ करने की इच्छा चाले और महात्मा ग्राह्मणों के साथ प्रीति करगेवाचे यममान कल्याण पूर्वक स्वर्गलोकको जा॥ १९ ॥ नकोपा मा समनमा चिपधापो शिशुमेक समीची। थाना क्षार्मा रुक्मो अन्तर्विभाति टेवा अग्निन्वारन्द्रविणोदाः ॥ ७० ॥ . - .
१७ अध्याय। इसकी माख्या १२ अ० के २ मंत्र में होगई ।। ७० ॥ अग्ने सहमाक्ष शंतमूर्धन्तन्ते गाणा: सहलं यानाः । त्वं सहस्रस्य राय ईशिप तस्मै ते विषम वाजाय स्वाहा ।। ७१।। इसका वि० ० कि पंक्ति छ०, अग्गि दे० है । मंत्राथ- ( सहस्रामा, शतपूर्धन, गाने, रो, शतं, माणा, सदन, व्यानाः, स्व, सहस्रस्य, रायः, ईशिप ) दे अपनानेत्र और अनन्त वाले अग्ने ! आपके संकड़ों मारण सहस्रों व्यानहै, तुम अनन्त धन को स्वामी दो (रास्मै, रो, पागाय, विधेम, स्वादा) पेसे यज्ञस्वरूप मापको हम हवि देरोह अष्ट होम हो ।। ७१ ।। सुपर्णोऽसि गरुत्मान् पृष्ठे थिव्याः सीद । भासान्तरिक्षमापृण ज्योतिपा दिवमुर्तमान रोजमा दिशमह ६ ॥ ७२ ॥ इसका विधृ० म०, पंक्ति ६०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ-(सुपर्ण: गरुत्मान, असि ) हे भग्ने ! तुम श्रेष्ठ परोवस्ने पक्षीप हो (पृ. थिव्याः, पृष्ठे, सीद) पृथ्वी के ऊपर स्थित होमो (भासा, रिक्ष, प्राण ) कान्तिसे अन्तरिक्षको पूर्ण करो (ज्योतिपा, दिवं, उत्तभान ) अपनी ज्योशिसे युनोकतो ऊँचा ठहरागो ( तेजसा, विशः, उछह )अपने तेजस दिशाओंको दृढ़ वा दीप्त करो७२ आजुहाना सुमतीका पुरस्तादग्ने स्वं योनिमा- सौद माधुपा । अस्मिन्मधस्थे अध्युत्तरसिमन्दि- श्वेदेवा यजमानश्च सीदत ।।७३ ।। इसका विधृ० ० पि. • छ, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ-(अमे, आजुबानः, सुमतीकः, पुरस्तात्, स्वं, साधुया, योनि, आसीद ) हे भग्ने ! पापादन कियहुए तुम प्रसन्नमुख होकर पूर्व दिशा में अपने श्रेष्ठ स्थानपर स्थित हुजिये (विश्वेदेवाः, यजमानः च, प्रस्मिन, उत्तरास्मन, सबस्थे, अधिसीदत) विश्वेदेवालों तुम और यजमान इस परमश्रेष्ठ मणिके साथ उगम स्थानका यह श्रन्त- - ४८६ शुक्लयजुर्वेद । शालामें स्थित होशो ॥ ७ ॥ सावितुर्वरेण्यस्य चितामा वृणे मुमति विश्वजन्याम् । यामस्य कण्वो अदुहृत्प्रपामा सहस्रधारा पर्यसा महीं गाम् ।। ७४ । इसका कएव ऋ०, वि० ०,सविता दे० है। मंत्रा--(वरेण्य स्य, सवितुः, सां, चित्रां.विश्वजन्यां, सुसि, अहं, श्रारणे ) मार्थ- नायोग्य प्रेरक ईश्वरकी, उस अनेकोंप्रकारके फल देनम तमर्य सहितकारिणी श्रेष्ठ बुद्धिको मैं स्वीकार करता हूँ ( करावा, अस्प, यां, मपीना, सहसूधारा, पयसां, महीं, गां, अदुहत् ) ज्ञानीने इस मेरक परमात्माकी जिस भासपुष्ट अनन्तधारापाली भमतद्वारा सई सिद्धि देनेवाली युद्धिको दुहा ॥ ७४ ॥ विधेम ते परमे जन्मनग्ने विधेम स्तोमरवरे भधस्थे । यस्माद्यो मदारिया यजे तम्म स्वे वीपि जुहुरे समिदे ॥ ७५ ।। इसका गृत्समद म०, त्रि०५०, अग्नि दे० है। मंत्राय-(अग्ने, परमे, जन्मन, ते, विधेम ) हे अग्ने ! परमोत्तम जन्मवाले स्वर्ग . में तुम्हारे निमित्त दाव देश (अवरे, सघस्पे, सोमः, विधम) उससे नीचे अन्तरिक्ष में विद्युत पसरवतको स्तोत्र पढ़कर हीच देत हैं ( यस्माद, योने, वदारिथ, तं, यजे ) क्योंकि तुम इष्टका चिति- रूप स्थान में प्रकट हुए हो उन आपको मैं पूजता हूं ( समिद, त्वे. हापि, जुहुरे ) और इसी कारण भलीमकार प्रचलित मुम्हारे विर्षे ऋत्विन हवियोंको होमो हैं ॥ ७५ ॥ पेदो आने दीदिहि पुरो नोऽसया सा यविष्ट । त्व , शभ्यन्त उपपति वाजः ॥ ७६ ॥ इसका पशिष्ट ऋ०, विश्रा, अग्नि दे. है। मंत्रा- ( योषष्ठ, भाने, अजस्रया, सूया, प्रेद्वः, ना, पुरः, दीदिहि ) हे अवितरण अग्निदेव ! अखएड लाटोंवाली ज्यागासे अत्यन्त प्र- काशवान् तुम, हमारे भागे मदीत होमो ( शवाजाः, त्याग - १७ अध्याय ४८७ - उपयन्ति ) मिनर होनेवाले अन्नरूप हपि तुमको भाति होग७६ अग्ने तमयाश्चन स्तः क्रतुन्न भद्र हदि स्पृशम् । ऋध्यो मा तु ओहः ॥ ७ ॥ इसकी व्याख्या १५ वें अध्याय ४९ मंत्रमें होगई ।। ७ ॥ चिनिनुहोमि मनसावतेन यो टेवा हागर्म बीतहमा मतापूर्वः । पत्ये विश्वस्य मनो जुहोमि विश्वकर्मणे विश्वाहादापय हयिः॥७८ ।। इसका रशिष्ट प्रा०, प्रतिजगती छ, विश्वकर्मा दे० है मंत्रार्य- (मनसा, घृोग, चिति, जुहोमि) मन लगाकर घृगके द्वारा इस चितिम स्पिन यतिको माहुति देकर मसभ करगा हूँ ( यथा, इद, चीराहोप्राः, प्रशारः, देवाः, पागमन ) जिसप्रकार इस यध , में माहसिकी गिनापावाले सत्य वा यत्रके वृदिकी देवता प्रकट हों ( विवाहा, भूमनः, विश्वम्ये, पत्ये, विज्ञकर्मण, पदा- भ्यम्, हविः, जुहोमि) सका दिनों में महान जगतानि जगदुत्पा. दक निमिरा स्वादयक्त हा दरो ॥ ७ ॥ मस से अग्ने ममियरसप्तं जिव्हास्यप्त अप- पस्मपा धाम प्रिपाणि । मुप्त होनसाधा स्वो गजतिरप्स योनीरागस्व पतेन स्वाहाँ १७९।।' इसका समर्षि प्र०, त्रि०, ६०, पग्नि देवना है। मंत्रार्थ-' (अग्ने सप्त. समिधा) हे अग्गे ! आपकी शमी यादि सारा समिधा हैं (सा, जिात्राः) साग ज्वालाप जिन्दा है ( सप्त. अपयः ) सात पि हैं (सत, मियाणि, धाम) सान गायत्री भादि छन्द पमियधाम है ( सप्त, होत्रा: त्वा, सप्तया, यजनि)सात होता तुमको भग्निष्टोम आदि सारा मकारके यज्ञासे पूजते हैं (सप्त,योनी: धुनेन, भापृशस्व, स्वाहा) तुम सात चितियोंको तसे पूर्ण करो, श्रेष्ठ होम हो ।। ७९ ॥ शुक्रव्योतिश्च चित्रग्योतिश्च सत्यज्योतिरच पतिमांश्च शुक्र तुपाश्चात्यहाः ॥ ८॥ - .
४८८ - - . शुक्लयजुष। इसका सप्तर्षि ०, उष्णिक छ, मरुद देवता । मंत्रार्थ- '(शुक्रज्योतिः,नचित्रच्योगिा, च, सत्यज्योतिः च, ज्योतिष्मान स, शुमाः, घ, EATIE, च, अस्याः ) शुद सेजस्वी, विधिम ज्योतिवाले, सत्यप्रकाशमय, ज्योशियान्ले दीप्तिमार सत्य वा पन्न की रक्षा करनेवाले और पापास रहिस हगण हमारे यशमें प्राय हा चान्यादृ च सदृह च प्रतिसदृङ च । मि. तश्च सम्मितच सभराः ।। २ ।। इसका सत िऋ, गाय० छ०, मरुत दे०६ । मन्त्रार्थ- (ईक, च, थन्यादृत, च, सदृत, प्रतिसहक, च मितः, घ, संमितः च,सभगः) इस पुरोडाशको ग्रहण करनेवाले और दूसरे पुरोहाश को देखनेवाले,समानदृष्टि और प्रत्येकको समान देखनेवाले और मानको माप्त और सम्यक एकीभानसे मानको माप्त और समान भावको धारण करनेवाले मरून देवरा हमारे यशमें भावें ॥८१|| प्राप्तश्च मुम्पाव व धमर्णश्च । धा च.वि- धर्ता च विधारयः ।। ८२ ॥ प्राप्पादि करके मंत्र की समान है। मंत्रार्थ-(प्रश्ना, च, सत्या, प, धुधः, च, धरूगः, च, पो, च, विधा, च, विषारयः) सत्यस्वरूप, सत्वस्तुम प्रकट और स्थिर तथा धारणकशी, धी और विशेष धारण करने वाले पौर विविध प्रकारसे धारण करने- घाले मस्त देवता हमारे यज्ञम भावे ।। ८२ ।। जिच्च सत्यजि गाशिवं सुषेणय । अतिमिनश्च दूरे अमिनब्ध गणः ॥ ८ ॥ इसका सप्त० ऋ०, उणि छ०, मरुन दे है। मंत्रार्य (कारा- निस, प, सत्यजित, च, सेनजित, च, सपेणः, च, थन्निामिना, च, मित्रः, च, गण:) यज को जीतनेवाले और सत्यको जीतने-. पाले एवं शुभुसनाको जीतनवाले मौर श्रेष्ठ सेनाबाले मित्रों समीप रहनेवाले और शत्रुओंसे दूर रहनेवाले और सोगिनमे- पाले मस्त देवता हमारे यसमे गावै ॥ ३३॥ P २७ अध्याय। १६९ . ईक्षास एवादृतांस पुर्ण: सुदृक्षामा प्रतिसट्ट तास एतन । मितासंश्च सम्मितासोनों अध सभैरसो मरुतो यज्ञे अस्मिन् ॥ ८४ ॥ इसका सप्त ऋ०, जगती ई०, मरु० दे० है। मंत्रार्य-(ई- क्षास, उ, एतादृक्षासः, उ, सहवासाउ, प्रतिसहसासन, मि- तासः, उ, सम्मिशासा, उ, सरमसः, मरुतः,भध, नः, अस्मिन प, एतन ) इस लक्षणको देखनेवाले और इसप्रकारके देखनेवाले और भलाकार देखनेवाले और समान देखनेवाले और प्रत्येक को देखनेवाले और प्रमाणयुक्त और इकडेहोकर प्रमाण करनेवाले भाद्रपानेमाने महल देवता भान हमारे इस यज्ञमें औंध ।। ८४ ॥ स्वतंवाँश्च प्रघासीच सान्तपना गृहमेधी च। मोडी शाकी-चौज्जेपी ।। ८५ ॥ इसका सप्ता, स्वराड्गा० छ०,मरु० दे० है। मंत्रार्थ(स्वतवान्, च, मघासी, च, सान्सपनः, प, गृहमेधी च, क्रीडी, च, शाकी, च, उज्जपी) स्वाधीनवनायुक्त मौरपुरोड़ाश भक्षण करने वाले और शत्रुमों को ताप.देनेवाले और गृहधर्मसे युक्त और सदा क्रीडा करनेवाले और समर्थ और सस जयशील मरुन् देवसा हमारे यहमें श्रावे ।। ८५ ॥ उग्र भीमश्च ध्वान्तर धुनिश्च मासहाँश्चा- लियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा। यह विमुख नामक मंत्र अध्याय ३९ का ७ चा मंत्र है, प्रस. अवश इसकी व्याख्याभी यहाँ की जाती है। मंत्रार्थ-( उग्रः, च, भीमः, २, वासः, च, धुमिः, प, सासवान, च, अभियुग्वा, स्वाहा ) उत्कृष्ट और भयंकर और शत्रुओंको अन्धाकरनेवाले और शनों को पानेवाले गौर शत्रुमोको हरानेवाले और भक्तों को मुख देनेवाले और शत्रुओंको इटानेवाले इन मरुतगणोंको था- हुति दीजाताह श्रेष्ठ होम हो । इन्दन्दैवीविशो मरुतोवानोभवन्यथेन्द्र- - - शुक्लयजुर्वेद । न्दैवीपिशो मरुतोनुवनिभियन् । एवमिमं यजमानन्दैवीश्च घिशा, मानुपीयानुवर्माना भवन्तु॥१६॥ इसका सप्त० ० शस्वरी छ०, मरुन देमिंग (देवी:, मरुता, विशः, इन्द्रम्, अनुवमानः, अभयन) देवसम्बन्धी मरुव- रूप मनाइन्द्रकी अनुगामिनी हुई(यथा, देवी,मरुतः, विशः, इन्द्रं. ध्यनुवमानः, अभवत्, पर्व, देवी, च, मानुपी:, च, विशः, इम, यजमार्ग, अनुवमानः, भवन्न) जिसमकार देवसम्बन्धी मरुवरूप मजा इन्द्र को अनुगामिनीहुई इसीप्रकार देवलोक और मनुष्य लोककी मजा इस यजमानकी अनुगामिनी हो ॥६॥ हम स्तनमूजस्वन्तन्धयापाप्रपीनमरने सरि- रस्य महये । उत्सवस्व मधुमन्तगनसमुद्रि- J सदनमार्षिशस्त्र ॥ ८७॥ इसका सप्त० म०, वि० २०, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ ( भग्न, सरिरस्य, मध्ये, इम, ऊर्जस्वन्त, अपां, पीने, स्तनम्, धय) हे अग्ने ! मूलोकके मध्यमें नर्तमान तुम, इस श्रेष्ठरसबाले घृग- धाराभोंसे पूर्ण रूप स्वनको पियो (भवन, मधुमन्ते, उत्स मुपस्व ) ई सब भोर गमन करनेवाले भने । मधुरस्तादवाले पुनसे युक्त खुप कूपको सेवन करो ( समुद्रिय, सदनं, प्राषि- शस्त्र ) चयनयागनाले घाम मवेश करो ॥ ८॥ घृतम्मिमिक्षतमस्य पोनित धितो घुतम्यस्य घाम । अनुध्वधमाइ मादयस्थ स्वाहा कृतं पान विक्षि हव्यम् ॥८॥ इसका गृत्समद ३०, त्रि. छ०, अग्नि दे है। मंत्रार्थ-(घृतम् मिमिले ) में पृथको अग्निके शुषमें सींचना चाहता हूँ (श, भस्य, योनिः ) घृत इस भाग्नका उत्तत्तिस्थान है (वृत्त, भिराः) पूनम बाधिन है (घून, उ, अस्य, धाम ) घृत ही इसको रोग करनेवाला है (अनुवर्ष, भावद, मादयस) हे अध्वर्यु ! इविका . . . .
१७ अध्पाय। . - संस्कार कानेक अनन्तर अग्निका आवाहन करावृप्त करो (षम, 'स्वाहाकृतं. इचिः, बक्षि) और कहो कि-द काममाओंको पूर्ण करनेवाले वाहा कहकर होमाहुआ हवि देवताओंकोमास करा , ममुद्रादूमिर्मधुमान उदारदृपाशुना सम- सत्यमानद । धृतस्य नाम गुधे यदर्सित जिला देवानाममृतस्य नाभिः ।। ८९ ॥ इसका वामदेव ऋ०, नि० छ, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ- (मधु- मान, मिः, समुद्रावं, उदारद ) मधुररसवाली तरंग पृतरूप समुद्रसे उठी (मेशुना, सम् अमृसत्वम् उपान ) फिर प्राणभूस अग्निके साथ मिलकर अमृतत्वको प्रासह ( यस्, घृतस्य, गुप, गाम, देपानी, जिया ) जो उस घुराका गुप्तनाम धिमें पदाइ, वह देवताओंकी मिला है ( अमृगस्थ, नाभिः, अस्ति) अमृतकी नाभि है भयात् जो घी खाताहै वह दीर्घायु होता है ।। ८९ ॥ . वपनाम प्रवधामाधृतस्यास्मिन्यज्ञे धारपामा नमोभिः । उप ब्रह्माणवच्छस्यमानश्चतुः- गोधमीगौर एतत् ॥ ९॥ • इसका वामदेव ०, त्रि०७० श्रीन दे है। मंत्रार्य-(पयम् अस्मिन्, यझें, घृतस्य नाम, प्रनवाम ) हम इस यबमें घृतका नाम लेकर स्तुति करने हैं, क्योंकि- देवताओंको प्याराहै (नमो- भिः, धारयामः ) श्रन्नोंक द्वारा यज्ञको धारण करण्हें (ग्रमा, शस्षमान, उपशगवत ) ग्रेहानामधारी ऋतिक स्मृति कियेजारो र घृतक नामको सुने ( चतुःशृगः, गौरः, एसत्, भचमीत ) , चार होता वाला गौरवर्ण यह घृत आहुतिके परिणामसे यहफल को मकट करता है। 8011 चत्वारिशमा प्रयो अस्य पादा देशी सुप्त इस्तांसो अस्य । प्रिया बद्धो पो रोरवीति महो देवो मान माविवेश ॥ ११ ॥ इसका वामदेव झा, विराट् भाषर्षी नि छ, यज्ञपुरुष देवरा + ४९४ शुक्लयजुषेद। काष्ठा भिन्दन्नम्मिाभिः पिन्धमानः ॥१५॥ ऋष्यादि पूर्ववन् । मंत्रार्थ-(घृतस्य, यहाः, धाराः पतयन्ति) घृशकी बड़ी २ घाराएं सुबेस गिरती (सिन्धो, शूधनासा, बारा ममयः, माध्वने, इच) से कि-नदकी शीघ्रगमनवानी पनसे चलायमान तारे विषमत्थान में पड़नी है (काठा..भिन्दन मिमिः, पिवमानः, प्ररुपः, पाजी, म) जैस कि-संग्रामकी दिशाओंको विदीर्ण करता हुआ संग्रामभेदन के श्रमसे निकलेहुए पसीनोंसे पृथ्वीको सींचतामाकोधरीक्षा उत्तम,घोड़ा गमनकरता है ।९।। अभिप्रवन्त समनेव योपा:कल्याण्यासमयमाना- सो अग्निम् । घृतस्य धारास्ममिधा नसन्त ता जुवाणा इस्पति जातवेदाः ॥९६॥ . . ऋष्यादि पूर्ववत् । मनार्थ-घृतस्य,धाराः,समानाः कल्याएयः, स्मयमानाः; योपाः, इय, अग्नि, अभिप्रवन्त ) की धाराएं, समान मनवाली रूपयौवन सम्पन्न मुसकुराती हुई स्त्रियोंकी समान अग्निके गति गमन करती है (ता:,समिधः, नसन्त ) वह धाराएं शनिको दी करने वाली भग्निको च्याप्तकरती हैं ( जातेबदाम, जुपाणः, इति ) मशावाला अग्नि प्रसन्न होकर उन धाराओं की इच्छा करताहै ॥ ९६॥ कन्या इव बहतुमेतया उ अध्यजाना अभि- चाकशीमि। पत्र सोमः सूयते यत्रं पक्षो घुप्तस्य धारा अभिसत्पंवन्ते ॥ ९७ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ--( यत्र, सोमः. सगरो, यन, यज्ञः) जहां सोमका अभिपत्र होता , जहां सौत्रामणि आदि यज्ञ होता है ( मन्, उ. घृनध्य, धाराः; अभिचाकशीमि ) राहा ही घृतकी धाराएं जातीहुई देखनाहूँ (इव, अति, अन्जानाः. कन्याः,वहतुं, एनये, पबन्ने ) जैसे कि सुन्दर रावती वा अधर्मको प्रकट कर• सीहुई कन्याएं पति के समीप माप्त होने को गमग करती हैं ॥ ९७ ।। अभ्यर्पत सुष्ट्रप्तिङ्गन्यसाजिम स्मासुभद्रा द्रर्षित - - १८ अध्याय। णानि धत्त । हुमं यज्ञन्नपात देवतां नो घृतस्य धारा मधुमत्स्यन्ते ।। ९८ ॥ इसका वाम००,देवा दे है । मंत्रार्थ- ( सुनि, गध्यं, अनि, शभ्यर्परा ) है.देवतायो ! श्रेष्ट स्तुसिवाने घृतयुक्त यज्ञमें यागमन करो (घृतस्य, धाराः, मयुमन, पवन्ते ) जहां घराकी धाराएं मधुरस्वादवाली गिरनी (नः, इम, यह, देवता, नयत ) हमारे इस यज्ञको देवलोकम पहुँचायो (अस्मासु भद्राः, द्रविणा- नि, धत्त ) हमारे यहां पल्याण और अनेकों प्रकारको धनोंको स्थापन करो.९८॥ धामन्ते विश्वम्भुपनमधिश्रितमन्तः समुद्रे दृष्य- तरायुपि । अपामना के समय य आभृगस्तम. ... श्याम मधुमन्तन्त कृम्मिम् ॥ ९९ ।। इसका वाम० ऋ०,त्रि० छ, अग्नि दे० है। मप्रार्थ-(समुद्रे, हदि, अन्तरायुपि, विश्वम्, भुवनम्, रो, धामन, अधिनितम् ) हे अग्ने ! जो समुद्र में हृदयम तथा श्रायुमें अर्थात् ब्रह्माके जीवन पर्यन्त जितने गाणिसाद हैं वह सब तुम्हारी विभूति का प्राथय करकै स्थिरा हैं ( यः, अमिः, समिथे, अपां, अनीके, आभृतः, सं, मधुमन्स, के, कॉमम्, अश्याम ) जो धृतको तरंग असे युद्ध करके जलों के भीतरसे लाई गई पापकी कृपा से उस रसयुक्त तुम्हारी सरंगको भक्षण कर अर्थात हमको देवभाव माप्त हो ९९ इति यजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनीय शायाका मापानुवाद सहित - सप्तदश अध्याय समाह. अथ अष्टादशोऽध्यायः। सत्रहवें अध्यायमै चिति पारोहण आदि के मंत्र कहे अव अठारहवें अध्यायमें वसोर्धारादि मंत्र के जायेंगे । यहाँ से २९ कण्डिकापर्यन्त के मंत्रों को पढ़ताहुआ बड़े मुवे में घृत लेकर नि. रन्तर धारापातसे छोड़बाहुपा इवन करे, इसी.को वसोर्धारा कहा वाजश्व मे प्रसुवश्च मे प्रयतिश्च मे प्रसितिश्च - . - शुक्लपजुवद। मेघीतिश्च में गुंध में स्वरंध में श्लोकश्च में श्रृयश्च मे तिश्च मे ज्योतिश्च मे स्थध मे यज्ञ कल्पन्ताम् ॥१॥ इसका देवा ऋ०, शक्चरी छ ०, भरिन दे० है । मंत्रा( यवन, मे, पाजः, कराताम्, च, मे, प्रसवः, च, मे, मयतिः, ष, मे, मसितिःच) इस यज्ञके फरमे देवना मेरे निमित्त अन्नको सिद्ध करें भर्यात दे और मुझको देने और भोजन करानेकी पाबाभी दें मुझको शुद्धि भी मुझको अन्नकी उत्कण्ठा भी दे (च. मे. धीतिः, च, मे, क्रा, च, मे, स्वरः, च, मे, श्लोकः) मेरे निमित ध्यान विचार और मुझको श्रेष्ठ संकल्प वा यह भी मौर मुझको मुन्दरशन्द मौर स्तुति भी हैं (च मे, श्रवः, च, मे, श्रुतिः च, मे, ज्योतिः, च, मे, स्वः ) मुझको वेदमंत्रोंके भवणकी साम- र्य और मुझे ब्राह्मणभागके सुननकी शक्ति और मुझे प्रकाश तया मेो निमिन सर्ग भी दें पर्याद मुझको याके फलसे यह सर पदार्थ माहो॥१॥ ': भाणच मेपानश्च मे व्यानरच मेसुध मे चित्तच में आधीतच में पाक च मे मनच पे चक्षुश्च मेश्रोत्रंश्च मे दक्षश्च मे चलञ्चमे यज्ञेनं कल्प। न्ताम् ॥ २ ॥ इसका देवा० ०, नि० अगिज छ०, अग्नि दे० है | मंत्रार्थ (च, मे, माण:) और मेरे निमिन प्राणवायु (च. मे, अपान:) और मेरे निमित्त अधोरायु (च, मे, पान:) और निमित्त सर शरीर में विचरनेवालावायु (च, मे, ममः) और मुझको प्रवृत्ति चाना वायु ( च, म, चिनम् और मुझको मानस संकल्प (च, मे, अधाराम् ) और मुझको बाहरी ज्ञान (च, मे, वाक् ) और .. मुझको वाणीकी सामथ्य (च, मे, मनः) और मुझको मन (च, मे, चक्षु: और मुझको दृष्टि (न, मे, श्रोत्रं ) और मुझ को सुनने की शक्ति (च, में, दक्षः) और मेरे निमित्त बामकी . - १८ अध्याय। फारी (च, मे, बलम् ) और मुझको बल (यझेन, कल्पन्ताम् ) यज्ञफलसे माप्त हो ॥२॥ ओजश्च मे सईश्च मे आत्मा च मे तनूश्च मे शम्मै च मे वर्म च मेऽङ्गानि च मेऽस्थानि च मे पपिच मे शरीराणि च म आयुश्च मे जरा च मे यज्ञेने कल्पन्ताम् ।।३।। इसका देवा १० भु० शक्न०. छ०, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ (च, मे, भोजः, च, मे, सहा) मुझे वलकी कारण शरीरकी आठवी धातु मोज और देहवल (.च, मे, पात्मा, च, मे, सन:) मुझे पात्मज्ञान और मुन्दर शरीर (च, मे, शर्म, च, मे, वर्म) मुझे सुख और कवच (च, मे, अङ्गानि, च, मे, अस्थीमि ) मुझ पुष्ट अङ्ग भौर अस्थियोंकी दृढ़ता (च, मे, पखंपि, च मे, शरीराणि ) मुझे अंगुलियोंके पोरुनोंकी दृढ़ता और देहकी नी- रोगमा (च, मे, प्रायुः, च, मे, जरा, योग, कल्पन्नाम् ) मुझे सुखमय भायु और वृद्धावस्थापर्यन्त प्रायु यज्ञके फलसे देवता दें ३ ज्यैष्ठ्यंच म आधिपत्यञ्च मे मन्युश्च मे भामश्च मेऽमच मेऽम्भश्च मे जेमा च मे महिमाच-मे परिमा च मे पृधिमार्च मे र्पिमा च मे द्राधिमा च मे वृद्ध मे वृदिश्च मे यज्ञेन . कल्पन्नाम् ॥ ४॥ इसका देवा ०, नि० अत्यष्टि छ०, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ (च, मे, पैश्य, च, मे, प्राधिपत्यम् )मुझे वड़ाई और मभुता (च. मे, मन्युः, च, मे, भामः) मुझे दोपो पर कांप और मनुः चित अपराध पर कोप (च, म,अमः, च, मे, श्रम्भः ) मेरे अर्थ गंभीरता और श्रेष्ठ जल (च, मे, जेमा, च, मे, महिमा ) मेरे निमित्त जीतने की शक्ति और प्रतिष्ठा (च, मे, परिमा, च, मे, प्रधिमा) मुझे सन्तानादिकी अधिकता तथा स्थान प्रादिका विस्तार (च, मे, पर्पिमा, च, मे, द्राधिमा) मुझे दीर्घजीवी.. " .
- - ४९८ शुक्लयजुषद। पमा और वंशपरम्पराकी प्राप्ति (च, मे, दं, च मे वृद्धिः यज्ञेन, करसन्ताम् ) मेरे निमिस भधिक भन्नादि तथा विद्यादि गुणोंकी उन्नति यज्ञके फलसे माप्त हो ॥४॥ सत्यश्च मे धुदा च मे जगच्च मे धन च मे विश्व में महश्च मे कीड़ा च में मोदश्च मे जातच मे जानिध्यमाणश्च मे सूक्तञ्च मे मुकृतच मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥ ५ ॥ इसका देवा ऋ०,वि. शकरी छ०, भग्नि दे हमित्रार्थ-(व, में, सत्यं, च,मे श्रद्धा)मरे अर्थ यथार्थ भाषण तथा परलोकपर विश्वास (च, मे, जगद, च, मे, धनम् ) गौ प्रादि पशु तथा मुवर्ण आदि धन (प, मे, विश्वं, घ, , महः ) मुझे स्यावर पदार्य एवं प्रकाश (च, मे, क्रीडा, प, मे, मोदः) मी क्रीडा एवं क्रीड़ाके देखनेका भानन्द (च, मे, जारा, च, में, जमिप्यमाणं ) मुझे पुत्रस उत्पन्न सन्तान और होनेवाली अपत्य सन्तान ( च, मे, सूक्त, आ, मे, मुकन, यझेन, कस्पताम् ) मुझे शुमदायक ऋचा. मोका समूह भोर पाठ करने से शुभअष्ट या के फलसे प्राप्त हो ५ तञ्च मेऽमृतश्च मेऽयक्ष्मा मेऽनामयंच में जीवातुथ मे दीर्घायुन्वञ्च मेऽनमित्रा में पञ्च मे सुखच मे शयनञ्च मे सूपाश्च मे सुदिनंच मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥ ६॥ इसका देवा भू०, मुरिगतिशक छ०, भग्नि देवता मंत्रार्थ (च, मे, अगं, प, म मृग) मुझे यज्ञादि कर्म मथा उसका स्व. दिफल (च, मे, भयम, च, मे, मनामयद) रोगको नाश नथा साधारण व्याधिका भभाव (च, मे, जीवातु, च, मे. दीर्घायुस्वम्) मायु बढ़ानेवानी गोपध तथा दीर्घायु (च, मे, अनमित्रम्, च, मे, भमपम् ) शत्रुओं का प्रभाव और निर्भयता । च, मे, सुखंच, मे. शपनम् ) मुझे सुख राधा सेज (च, में भूपाच, मे, मुदिनं यझेन करसन्ताम् ) मुझे सन्ध्याचन्दनाटियक्त मप्रभात भाग्य + १८ अध्याय। , नादियुक्त दिन यसके फलसे प्राप्त हो । ६. 11, यन्ता च मे घी मे क्षेमेश्च मे धृतिश्च मे विश्वञ्च महश्च मे मविच में ज्ञानश्च मे सूश्च मे पुसूश्च मे सीरश्च मे लपच में यज्ञेनं कल्पनताम् ॥ ७॥ इसका देवा , नि० असिजग छ०, भग्नि दे० है मंत्रार्य- (च, मे, यन्मा, च, मे, धी) मुझे गुरु भादि नियन्ता एवं प्रजा पालनकी शक्ति (च, मे, क्षेमः, घ, मे.धृतिः) मेरे निमिवर्ग- मान धनकी रक्षा तथा थापशिमें चित्तकी स्थिरता ( च, मे, विश्व प, मे, महः) सबकी अनुकूलता और पूना सत्कार (च, मे, संविद, च, मे, मात्र ) वेद शास्त्रादिका ज्ञान और विज्ञानकीशक्ति च, मे, सः, च. मे, मसः ) प्रा.देनेकी सामर्थ्य एवं पुत्रादि को उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य (प, मे, सीरंच, मे, लयः, योन, कल्पनाम् ) मुझे हल प्रादिके द्वारा अन्नकी प्राप्ति और खतीके विघ्नोंका नाश इस यके फनसे देवता दें ॥ ७॥ शच मपेश्च मे मिपञ्चे मेऽनुकामच मे कामश्च मे सौमनसर्थ मे अगश्च में द्रविणञ्च मे भद्र से श्रेयश्च में वप्तीपश्च मे पर्शच मे यज्ञने कल्पनताम् ॥ ॥ इसका देवा ऋ०, वि० शकरी छ०, भाग्नि दे० है। मंत्रार्थ- (प, मे. शे, च, मे, मपः ) मुझे शारीरिक सुख सथा परलोकका सुख (च. मे, मियम्, च, मे, मनुकामः) प्रीसि उत्पादक वस्तु तथा सहज यस्ल साध्य पदार्थ ( च, मे, कामा, च, मे, सौमनसः) चिहित विषयमोगका मुख एवं मनको स्वस्थ करनेवाले बान्धव 7 (च, मे, माः, च, मे, द्रविणम् । सौभाग्य सया धन (च, मे, भद्र, ध, मे.श्रेयः) इमलोकका कल्याण तथा पग्लोकका कल्याण (च, मे. वसीयः च मे, यशः, यत्रेन, कल्पनाम् ) निवासयोग्य धनसे पूर्ण घर तथा कीरिस भी इस पत्र के फलसै देवता ॥८॥ - - .
शुक्लयजुर्वेद। उक् च मे सूनृतोच में पर्यश्च मे रसश्च मे घुत से मधु च मे सग्धिश्च मे सपीतिश्च मे कुपिश्च मे दृष्टिश्च में जैत्रंश्च म औड़ियश्च मे यज्ञनं कल्पन्ताम् ॥९॥ इसका देवा ऋ०, शक्वरी छ० अग्मि दे है। मंत्रार्थ-(च, मे, ऊर्क, च, मे, सूनृता) मुझे अन्न तथा सच्ची और प्रियवाणी (च, मे, पयः, च, मे, रसः) द्ध तथा दूधका सार (च, में, घृतं च, मे, मधु) घी तया सहद (च, मे, सम्धिः, च, मे, सपांत.) चान्धवोंके साथ खान पान (च, मे, कपि, च, मे, वृष्टिः') धान्य की सिीद एवं अन्न उत्पन्न होनेके अनुकूल वर्षा (च, मे, जैत्र, च, मे भौद्भियम्, यजेन, कल्पन्साम् ) जयकी शक्ति तपा भानादि वृक्षोंकी उत्पति भी मुझे यके फलसै देवता ॥९॥ पिच मे रायश्च मे पुष्टच मे पुष्टिं च मे विभु च मे पृभु च मे पूर्णञ्च में पूर्णतरञ्च में कुर्यवध मेक्षितञ्च मेऽनञ्च मे क्षुश्च मे यज्ञेन फरूपन्ताम् ॥१०॥ इसका देवा , निः शश्वरी छ०, अग्नि दे है । मंत्रार्थ- (च, मे, रविः, च, में, रायः) मुझको सुवर्ण तथा मौक्तिक मादि मे, पुष्ट, च, मे, पुष्टिः') धनको पुष्टि तथा शरीरकी पुष्टि (च, मे, विभु, च, मे, मंभ) व्यापकताकी शक्ति एवं ऐश्वर्य (च, मे, पूर्ण, च, मे, पूर्णरारं ) धन पुत्रादिकी अधिकता तथा हापी घोड़ों भादिकी अधिकता (च, मे, फुप, च, मे, अक्षित) ययास रहिस धान्य तया भक्षय अन्न (च, मे, अन्न, च, मे,भुद यझेन, कन्यन्ताम् ) भात आदि सिद्धान्न सपा भोजन पचानेकी . . मणि (च, शक्ति पी याके फलसे देवता दें ॥२०॥ वित्त में देश मे भूत में भविष्य में मुगाच मे सुपध्यक्ष म प्रदश्च म ऋदिश्च मे क्लप्सर्च में फ्लतिश्च मे मतिश्च मे यज्ञेनं १८ अध्याय। - " . कल्पम्ताम् ॥ ११ ॥ इसका देवा ऋ० भुरिक शक्वरी छ०, अग्नि दे है। मंत्रार्थ- (च, मे, विसं, च, में, वधम् ) और मुझको पूर्वमाप्त धन राया थांग मासव्य धन भी (च, मे, भूत, च. मे भविष्यत् ) पूर्वपास क्षेत्रादि एवं भविष्यद में प्राप्त होने वाले क्षेत्रादि भी (च, मे, सुगं, च, मे, सुपथ्यम् ) एखगम्य देश एवं परमपथ्य पदार्थ ( च मे, ऋद्धं च, मे, दिः) बड़ेमारी यज्ञ का फल तथा यज प्रादिकी समृद्धि (न, म, क्लुप्त, च, मे, क्लप्तिः) कार्यसाधक अपरिमित धन त कार्यसाधनकी शक्ति (च, मे, मतिः, च, मे, मुमतिः, यतन, क- पन्ताम् ) पदार्थमात्रका निश्चय तथा दुर्घट कार्यका निश्चय इस यबके फनस देवता दें ॥ ११ ॥ घायश्च मे पचांश्च मे मापाश्च मे मिलाश्च में मुगाश्च मे खल्वाश्चामे मिययश्च मेऽ. यश्च में श्यामाकाश्च म नीवारश्च मे गोधू- मांश्चम मसूरीच में यज्ञेन कल्पन्ताम् ।। १२ ।। इसका देचा प्रा० मु.अगिशस्व००, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ (च, मे, मीहयः, च, मे; यवा ) मुझे चावलों के धान तथा जो (च, म, माषा:, च, मे, तिलाः ) उड़द तथा तिल (च. मे, मुद्गाः, च, मे, खन्याः) मूंग नया चन (च, मे, भियङ्गवः, च, मे श्रणवः ) कंगनी चना (च, में श्यामाका, च, मे, नीधाराः) समा कांदो सथा वन के मुन्यन्न नीवारादि (च, मे, गोधूमाः, मे, मसूराः, यझेन, कल्पन्नाम-) गेहूँ और ममूर इस यज्ञ के फल से देवता ॥१२॥ अश्मा च मे मृतिका च मे गिरयश्च मे पर्व- ताश्च मे सिताश्च पे वनस्पतयश्च मे हिर- प्पञ्च मेऽयंञ्च मे इग्रामश्च मे लोहा मे सीसच मेश्रपुं च मे गुजेन करपन्ताम् ॥ १३ ॥ . - शुक्लयजुर्वेद इसका देवा ऋ• भुरि० प्रतिश० छ• अग्नि देवताहै। मंत्रार्थ (च, मे अश्मा, च, मे. मृत्तिका ) मुझे मुन्दर पापाण तथा श्रेष्ठ मृत्तिका (च, मे, गिरयः, च, मे, पूर्वता ) गोदनादि छोट पर्वत सथा हिमालयादि पहाइ (च, मे, सिकमाः, च, मे, वनसासंयः ) सुन्दर रेती सपा विनापून भाए फलदायक वृक्ष (च मे, डिग्गय, च. मे भयः) पुनः गया लोहा (च. मे, श्याम, च, मे. लोहम् ) तापा कांसाभादि गया फौलाद(च, में, सीस; च. मे, पा, यज्ञन, कल्पनताम् ) सीसा धातु तथा राँगाइस यज्ञ फल से देवता दें ॥१३॥ अग्निश्च म आपश्च मे धीरुधश्च म ओपंध. यश्च मे कृष्टपच्याश्च मऽकृष्टपच्याश्च मे गाभ्यार्थ में पशव आरपारचं में वित्तञ्च मे वित्तिश्च मे प्रतञ्च भूर्तिश्च मे यज्ञन कल्पनाम् ॥ १४॥ इसका देवा , निष्टि छ० अग्नि दे० है मंत्रार्थ (चमे, मग्निः, च, मे, मापः) मुझे पृथिवीके अग्निकी अनुक्नता तथा अन्तरिक्षक जनकी अनुकूना (च, में, वीरुधः, च. म. भोपषयः). झदतृण भादि तथा पकते ही मूखनेवाली औपध(च में कष्टपच्या:, च, मे, भकष्टपच्याः) हल बनाकर उत्पन्न होनेवाले तथा ना हलगोते उत्पन्न होनेवाल मन्न (च, मे, ग्राम्याः, च, मे, पशक ) गौ मैंस भादि ग्राम्पपशु सपा हाथी भादि वनक पशु (च, म. वित्तं च, मे, विति) पूर्वलम्धन तथा होनहार धनको कामना (घ, मे, भूत, च, मे, मतिः, यमन,' कम्पन्ताम् ) विद्य- मान पुत्रादि तथा भपना उपार्जन किया हुआ धन इस यज्ञके फल से हमको देना ॥१४॥ चमुच मे पमतिश्च मे कम्मै च मे शक्तिश्च मेश्यश्च म एमश्च म हत्या में गर्तिश्च मे • 1 अध्याय 1. . यज्ञेने कापन्ताम् ॥ १५॥ इसका देवा ऋ०, विराडा० ऋ० छ०, अग्नि दे है मंत्रार्थ- (न, मे, मुः, च, मे, वसनिः) मुझे गौ मादि धन नथा निवा- सस्थान (चं, मे, कर्म, च, मे, शक्तिः) अग्नि होत्रादि कर्म गया उसके भनुष्ठानकी शक्ति (च, मे, अर्थी च, मे, एमः) इच्छिा पदार्थ तथा प्राप्तियोग्य पदार्थ (च, मे, इत्या, च, मे, गतिः) इट पाक्षिका उपाय एवं इष्टाप्ति ( यज्ञेन, करसन्ताम् ) यज्ञक फल से प्राप्त हो ॥१५॥ अग्निश्च म इन्द्रश्च मे सोमश्चम इन्द्रश्च मे स. विता च म इन्द्रश्च मे सरस्वती च म इन्द्रश्च मे पूपा च ग इन्द्रश्च मे वृहस्पतिश्च इन्द्रश्च मे गुज्ञेनं कल्यन्ताम् ॥ १६ ॥ इसका देना ऋ०, नि. ग्रा०प००, अग्नि दे० है । मनाथ , (च, मे, मोना, च, मे, इन्द्रः ) मुझे अग्नि और इन्द्र (च, मे, सोमः, च, मे, इन्द्रः) सोम तथा इन्द्र (च, मे. सविता, च म, इन्द्रः ) सविता और इन्द्र (च, मे, सरस्वती, च, मे. इन्द्रः) सर- 'खसी तथा इन्द्र (च, मे, पूषा, च. मे, इन्द्रः) पूपा तथा इन्द्र (च, मे, इस्पतिः, का, मे, इन्द्रः) साति सया इन्द्र ( यजैन, कला- तामू ) यज्ञके फनसे प्राप्त हों ।। १६ ॥ मित्रच म इन्द्रश्च मे वरुणश्च म इन्द्रश्च मे घाताचेम इन्द्रश्च मे खष्टा च म इन्द्रश्च मे मरुतय प्र इन्द्रश्च मे पिच च मे देवा इन्द्रश्च मे यजन कम्पन्ताम् ॥ १७ ॥ इसका देवा ऋ० वि० शक्य ३०, भाग्न दे० है । मंत्रार्थ (च, मे, मित्रा, I, मे, इन्द्रः ) मुझे मित्र. पर्व इन्द्र देवता (च, मे, वरुणाच,मे,इन्द्रः) वरुण तथा इन्द्र (च,मे, धाता, च, में, इन्द्रः) धाता तथा इन्द्र (का, मे, मष्टा, च, मे, इन्द्रः) त्वधा तपा.इन्द्र . शुक्लयजुचद । 'च, मे, मरुतः, च; मे. इन्द्रः) मस्त राथा इन्द्र (च, मे, विश्वेदेवा च, मे. इन्द्रः, यज्ञेन, कल्यन्ताम् ) विश्वदेवा तथा इन्द्र इस यज्ञके फलसै अनुहन भावसे प्राप्त हो ॥ १७ ॥ पुथिवी च म इन्द्रश्च मेऽन्तरिक्षच म इन्द्रश्च म चौरच म इन्द्रश्च मे समाश्च म इन्द्रश्च म नक्षत्राणि च इन्द्रश्च मे दिश च म इन्द्ररच में यज्ञेन कल्पनाम् ॥ १८ ॥ इसका देवा १०, भु० शफ० छ०, अग्नि दे. है । मंत्रार्थ (च, मे, पृथिवी, च, मे, इन्द्रः) मुझं पृथ्वी तया इन्द्र (प, भे. अन्तरिक्षम्, च, मे. इन्द्रः ) अन्सान गया इन्द्र (च, मे, चौ., च, मे, इन्द्रः) स्वर्ग सपा इन्द्र (च, मे, समाः, च, मे, इन्द्रः ) वर्षका अधिष्ठात्री देवता राया इन्द्रच, मे, नक्षत्राणि च, मे. इन्द्रः) नक्षत्र तथा इन्द्र (प. मे, दिशा, च, म, इन्द्रः, योन कल्पन्ताम् )दिशा और इन्द्र यड के द्वारा अनुकूलतासेमाप्त हो अशुश्च मे हिमश्च मेऽदाभ्यश्च मेऽपिप तिश्चम उपाधे मेऽमि म एंन्द्रया. युवश्च मे मैत्रायगश्च म आधिनच में प्रति पृस्थानश्च मे शुकरच मे मुन्धी चे मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥ १९॥ इसका देवा म०, गि० अत्य० छ०, अग्नि दे० है । मनार्थ- (च, मे, अंशुः, च, में, रश्मिः) अंशु नया रश्मि नामक ग्रह (च, मे, दाभ्यः, न, मे, अधिपतिः) यदाम्य गथा निग्राह्य, ग्रह (न, मे, उपांशुः, च, मे अन्नाम.) गांशु गया अनार्याम ग्रह (च, मे. ऐन्द्रवायत्रः, च म, मैत्रावरुणः) एन्द्रवायव मथा मावरुण ग्रह (च, मे, मारिसमः, च,मे, मतिमस्थान:) प्राधिन राया प्रतिमाधान ग्रह (च, मे, शुक्रः, च, म, मन्धी,, यज्ञेन, कल्यन्ताम् ) शुक्र और मन्त्री ग्रह यसके द्वारा अनुकुलपासे पास हो। - १८ अध्याय । . से प्राश हो॥१२॥ आगूयण मे वैश्वदेवश्च मे धुवश्च मे पैन्धा- नरच म पन्छाग्न मे महावैश्वदेवश्च मे मम- त्यतीयांश्च मे निष्कचल्यश्च मे सावित्रश्च मे सारस्वतश्च मे पानीयतश्च मे हारियोजनव मे यजेन कल्पन्ताम् ॥२०॥ इसका देवा ०, स्वराट श्रीतसि छ, अग्नि देवता है। मंत्रा-(च, मे, आनयणः, च,मे, वैश्वदेवः ) मुझे अाग्रपण और वैश्वदेव (च, म, ध्रुवः, च, मे, वैश्वानर) ध्रुव तयां थैश्व गर ( च, मे, ऐन्द्राना, च, मे, महावैश्वदेवः ) ऐन्द्राग्नि तपा महविशदेव (च, मे, मरुत्वीया, च, मे, निष्केवल्यः ) महत्वतीय सया नियल्प (च, मे, सावित्रः, च, मे, मारस्राः ) साचिन राया सारस्वत (च, मे, पालीवतः, च, मे, हरियोजना) पानीस एवं हारियोजननद ( यज्ञेन, कल्पन्ताम् ) यज्ञके द्वारा अनुकूलतासे प्राप्त हो ॥ २० ॥ मुश्व मे चमसाइच में वायव्यानि च मे द्रोणकलशच में ग्राथापाश्च मेऽधिपणे च मे पूतभूच म आघवनीय च मे घेदिश्च मे धर्पिश्च मेघधश्च मे स्वगाफारश्च मे गुज़न फ- रूपन्ताम् ॥ २॥ इसका देवा २०, विराटीत छ, अग्नि दे है। मंत्रार्थ (च, मे, सुप, च, मे, चमसाः ) मेरे अर्थ जुहू तथा चमा( च, म, वायव्याने, च मे, द्रोण कलश:) वायव्यपान एवं द्रोएकनारा (च, मे, ग्रावाणः, च, म. धिपत्रणे ) नावा एवं काठफलक (च, मे, पूलभूत्, च, मे, प्रांधचनीय: ) सोमपात्र पूराभूत तथा प्राधमनीय (च, मे, वेदिः, च, मे, बर्हिः ) बंदी एनं कशा (च, मे, अवयः, च, मे, स्वगाकार:, यज्ञेन, कल्पनाम् ) अनभूयाने. तथा शम्युबाफ पात्र यइके द्वारा माम हो ॥ २१ ॥ ६४ . ܀ ܀ शुक्लयजुर्वद। अग्निश्च मे धर्मच कय मे सूर्यम में प्राणश्च मेश्वमेधश्च मे पृथिवी च मे दितिश्व मेदितिश्च मे चौवं मेहुलयः शक्रयो दिश्चि मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥ २२ ॥ इसका देवा ० मुरि० शक्व० छ०, श्रग्नि देव० है । मंबार्ष (च, मे, श्रीरना, च, मे, धर्मः) मुझै श्रोग्नटीम भौर प्रार्य (च, मे, भकः, च, मे, सूर्यः ) मुम पुरोड़ाशकाय और सूर्य का चरु ( च, मे, माणः, च, मे मेवः) मुझे प्राण और अश्त्र मेघयज्ञ (च, मे, पृथिवी, च, मे, दितिः, च, मे, अदितिः ) मुझे पृथिवी दिसि और अदिति देवसा (च,मे, पाच, मे अंगुलयः)मुम धुलोक और विराट् पुरुपके अवयव ( च, मे, शक्करयः, च, मे दिशा,यशेन, कल्पताम् ) मुझे शक्ति और दिशामाकी अनुकूलता इस यज्ञके फलसै प्राप्त हो ॥ २२ ॥ तञ्च म ऋतश्च मे तपश्च मे सम्वत्सरश्चं मेऽहोने ऊषीय वृहदश्रन्तरे च मे घुजन कल्पन्ताम् ॥ २३ ॥ इसका देवा ऋ, पंक्ति०, छ.,अग्नि देव० है । मंत्राध-(च, मे, प्रस, च. मे, ऋरावः ) मुझे नियम तथा ऋतुएँ (च, मे, सपः, च, मे, सम्वत्सरः, च, मे, अहोरा )मुझे तप, सम्मत्सर सपा दिन रात्र (च, मे, ऊष्ठांव, च, मे, पन्तरे, पवेन, कल्पन्ताम् ) मुझ जानु गया वृहद्रपन्तर साम इस यज्ञके फलस देवता दें ॥ २३ ॥ एका च मे तिस्रम् मे तिस्रश्च मे पञ्च॑ च मे पञ्च च मे सप्त च मे सप्त च मे नवं च मे नर्ष घम एकादश च म एकादश च मे प्रपोदश च मे त्रयोदशच में पञ्चदश च मे पलंदश चं मे मप्तदश च मे मतदंश च मे नवदश च मे मर्षदश च म एकषि शतिश्च म एकविधश. , .
%3D - . १८ अध्याय ५०७ तिच मेघ्रयोविशतिश्च मेंनयोंविधशातच मे पञ्चविधेशतिश्च मे पञ्चषिधेशतिश्च मे मसाविशतिश्च मे सप्तविधेशतिश्च मे नर्व- विशतिश्च मे नविशतिश्च में एकत्रि- शच्च म एकत्रिशच्च मे यतिधेशच्च मे यज्ञेनं कल्पेन्ताम् ॥ २४ ॥ इसका देवा अ०, पूर्वार्द को संकृति संथा उत्तरादिका विराट संकृति वंद, अग्नि देवया है । यहाँस भयुग्मसोम होमके मंत्र हैं, जोकि-संव कामनाओंके दाता हैं। मंत्रार्थ-(च, मे, एका, प, मे, शिनः) मुझे एक और तीन ( च, मे, शिनः, च, मे, पंच ) मुझे, तीन तथा पाँच (च, मे, पंच, च, मे, सस) पाँच तथा सास ( च, मे, सप्त, च, मे, नई ) सास तथा नौ (च, मे, नव, च, मे, एकादश ) मुझे नौ और ग्यारह ( च, मे, एकादश, घ, मे, प्रयोदशं ) ग्यारह और रोरह (च, मे, प्रयोदशः च, मे, पंच दश) सेरह और पन्द्रह (च, मे, पञ्चदश, च, मे, साहश ) पं. द्रह और सत्रह ( च, मे, सप्तदश, च, मे नवदश) सत्रह सथा उनीस (च, मे नवदश, घ, मे एकविंशतिः) उन्नीस तथा :- कीस (च, में, एकविंशतिः, च, मे, त्रयोविंशतिः) इफीस तया' ईस (च मे, योविंशतिः, च, मे, पञ्चविंशतिः) सेईस यथा' पचीस (च, मे पचविंशतिः, च, मे, सप्तविंशतिः)पचीस तथा सत्ताईस (च, मे, सहाविशतिः, च,मे, नवविंशतिः) सत्ताईसपा उनवीस (च, मे, नवविंशतिः, च, में, एकत्रिंशत् ) उनसीस तथा इकसीस (च, मे, एकशिद, चं, मे, पतिशत, च, मे, यात्र- शव, यझेन, कल्पन्ताम् ) मुझे इकतीस, सीस तथा फिर सँसीस इन संख्यायोंसे कहेजानेवाले संसारके सकल उत्तम पदार्थ युझे इस यज्ञके फनस देववा प्राप्त करावें ॥ २४ ॥ चततश्च मेऽष्टौ च मेऽष्टौ च में मादश च मे द्वादश च मे पोडश च मे पोर्टश च में विधा.. - ५०० शुक्लपजुर्वेद । तिश्च मे चितिच से चतुर्षि शतिश्च मे चतुर्विधेशतिश्च मेऽष्टाविंशतिश्च मेऽष्टा- विशतिश्च मे द्वात्रिशच्च मे द्वात्रिंशञ्च मे पनशच्च मे पनि शच में चत्वा- निशच मे चत्वारिशच मे चतुश्चत्वारि- धेशच्च मे चतुश्चत्वारिधशच मेऽष्टाचत्वारि- शच्च मे यज्ञेने कल्पन्ताम् ॥ २५ ॥ इसका देवा , उत्कृति छ, भग्नि दे है । मंत्रार्थ च, मे, चतस्रः, च, मे, भष्टौ ) मुझे चार तथा पाठ (च, मे, अष्टो, च,मे, द्वादश)आठ सथा बारह (च, मे, द्वादश, च, मे, पोश) वारह.तथा सोलह (च, मे, पोइश, घ, मे; विंशतिः ) सोलह तथा बीस (च, मे, विंशतिः, च, मे, चतुर्विंशतिः) वास तथा चौबीत (च, मे, चतुर्विंशतिः, च, मे, भष्टाविंशतिः ) चौवीस तथा भट्ठाईस (च, मे, थष्टाविंशतिः, च, मे, द्वारिंशत् ) पहाईस सपा यत्तीस (च, मे, द्वात्रिंशत्, च, मे, पटत्रिशद ) वनीस तया छत्तीस (च, मे, पटत्रिंशत्, च, मे, चत्वारिंशत् ) छत्तीस सपा चालीस (च, मे, चत्वारिंशद, च, मे, चतुश्चत्वारिंशव ) चालीस तथा चौबालीस (च, मे, चतुश्चत्वारिंशत, च,मे भष्टचत्वारिंशद, च,मे, अष्टचत्वारिंशद, यज्ञेन, कल्पन्नाम्) चौघालास अहवालीस तया फिर अहवालीस. इन सब संख्याभोस कदेजानेवाले पदार्थ यमके द्वारा देवना पुझे दें ॥ २५॥ उपविश्च मे व्यपी च मे दित्यवाट् च मे दित्याही च मे पञ्चाविश्व मे पञ्चावी च मे त्रिवत्सर्थ मे त्रिवत्सा च मे तुर्यवाट् च मे तुही च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ।। २६ ॥ माझी बृहसी छ०, भग्नि दे है। मंत्रार्थ (च, मे, न्यविः, च, मे, व्यवी) मुझे देढ वर्षका पछड़ा तथा रेट वर्षकी बलिया (च, मे, दित्यवाह, च, मे, दित्याही) दो - इसका देवा , - १८ अध्पाय। वर्षका बछडा तथा दो वर्षकी वछिया (च, मे, पंचायः, च, में पञ्चावी ) ढाई घर्षका वृप राया ढाई वर्षकी गो (च, में, भिवत्सः, च, मे, त्रिवत्सा ) तीन वर्षका वृप तथा तीन वर्षकी गो (च, मे, तुर्पबाट, च, मे, तुर्थीही, यज्ञेन, कल्पन्ताम् ) साढ़े चीन वर्ष का प सथा साढ़ेगीन वर्षकी गौ यज्ञ के फलस देवता ॥२६॥ पवाद च मे पतोही च म उक्षा च मे वशाच मपभश्च में वेश्च मेऽनड्वार्थ मे धनुश्च मे यजन कल्पन्ताम् ।। २७ ॥ इसका देया ऋ०, नि० ग्रा० उ० छ०, अग्गि दे है। मंत्रार्थ (घ, मे,पष्टवाट्, च,मे पष्ठीही ) चार वर्षका प तथा चार वर्ष की गौ (च, म, उमा, च, मे, पशा ) सेचनम समर्थ वृष तथा पन्ध्या गो (च, मे; पभः, च, मे, चेहद ) तरुण प तथा गर्भघातिनी गौ ( च, म अनवान्, च, मे, धेनुः, यज्ञेन, कल्प- साम् ) वोझा उठानों समर्थ टप तथा नईच्याही हुई गौ यतक फरसे देवता मुझदै अर्थात् मैं सत्र मकारके बैल तथा गौओंको पालनेवाला ऊँ॥ २७ ॥ पाजाय स्वाहां प्रसवाय स्वाहापिजाय स्वाहा ऋतंय स्वाहा यसरे स्याहाहर्पतये स्वाहान मुग्धाय स्वाही मुग्धाय चैन शिनाय स्वाहा पिन शिन आन्यायनाय स्वाहान्त्याय भोय. माय स्वाहा भुवनस्पतय स्वाहाधिपतये स्वाहा पूजापतये स्वाहा हुयन्त रामित्राय यन्तासि यमन अर्ज त्वा वृष्टय त्वा पूजानानवाधिपत्याया॥२८॥ इसका देवा , आर्चीवृह० छ०. अग्नि दे० है । अव सकल कामनामद नामग्रह होम कहते हैं। मंत्रार्थ (वाजाय, स्वाहा) अधिक भन्न उत्पादक चत्रमासानिमिन श्रेष्ठ होम हो (प्रसवाय, स्वाहा) चशासक मिमित्त भष्ट होम हो (अपिजाय, स्वाहा) जामाड़ा .
. - शुक्लप द । रशिदायक ज्येष्ठ अर्य,श्रेष्ठ थाहुशि हो ( फ्रावे, साहा) याग- रूप भाषाढ के निमित्त ( वसेवे, स्वाहा ) चातुर्मास्पकी यात्रा के निषेधक श्रावण के नि० (अहर्पतये, स्वाहा) तपाकारक भाद्र- मासके निमिरा० (मुग्धाय, अन्हे, स्वाहा ) तुपारसे मोहकारक पाश्विन के नि. (प्रमुग्धाय, बनाशनाय, साहा) पोड़ा घटने से विनाशी कार्तिको निमिरा० अविनंशिने,भान्त्यायनाय स्वाहा) विनाशरहित अन्त में स्थित विष्णुरूप मा शपिके० (अन्याय, भौवनाय, स्वाहा ) स्वरूपमें होनेवाले लोकोंके पीपक पोपमास के नि० (मुनस्य, पतषे, स्वाहा) सम्पूर्ण प्राणियोंके पालक माघमास के निमित० (अधिपतये, स्वाहा ) वर्षान्तके कारण अधिक पालक फाल्गुनके नि० ( मजापतये. स्वाहा ) वारहों मासके अधिष्ठात्री देवनाप्रमापति के निमित्त यह पाहूति दी जाती है । हे प्रजापति अग्ने । (इयम्, ते, राट्, यमना, मित्राय यन्ता, भसि ) यह यज्ञस्यान तुम्हारा राज्य है भग्निष्टोमादि काम सबके नियन्ता तुम सखारूप इस यजमानके प्रेरक हो (अर्ने, स्वा, दृष्ट्यै, त्वा, मजानाम्, प्राधिपत्याय, त्वा) अधिक अन्नके निमित, तुमको अभिषिक्त करताहूँ, वर्षाका निमित्त तुमको भमि पित करताहूँ और 'मजामोंपर प्रभुना पानेके निमिरा तुमको श्रीभषिक्त करता हूँ ॥ २८॥ आयुर्यज्ञेनं कल्पताम्माणो यज्ञेनं कल्पताञ्च क्षुर्यज्ञेनं कल्पना श्रोत्रं यज्ञेने कल्पना पार यज्ञनै कल्पताम्मनों गज्ञेन कल्पतामात्मा गृज्ञेनं कल्पताम्ममा यज्ञने कल्पताज्योतिर्यज्ञन कल्पना स्वयज्ञेने कल्पताम्मष्ठं राजन कन्पतां गुज्ञो गुन करपताम् । स्तोमरच यर्जुश्च ऋक् च सामं च वृहच रथन्तश्च । स्वर्दषा अग. न्मामृतो अभूम पूजागतेः पूजा अष्ठम घेट स्वाहा ।। २९ ॥
- - , १८ अध्याय इसका देवा , विराष्ट्र विकृति ६०, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ ". कलहोम (यज्ञेन, थायुः, कल्पताम) यज्ञके फ से आयु बहै (य- क्षेन, माणः, कल्पताम् ) या फलसे माण वलिष्ठ हो ( यजेन, चक्षुः, कन्पाम् ) यनसे नेत्रोंकी ज्योति बढ़े ( यजेन, श्रोत्रं, कल्पताम् ) यजफलसे श्रवणशक्ति उत्तम हो । यजेन वाक कल्प- ताम् ) यशफलसे वाणी उत्तमहो ( यजेन, मगः, कल्पताम् ) यज्ञफलसे मन स्वच्छ हो ( यज्ञेन प्रात्मा कल्प) यत्रफलसे मात्मा वली रे ( यवन, ब्रह्म, कला ) यजफलसे घेद प्रसन्न हो ( यजग, ज्योतिः, कल्प०) यजफनसे परमात्मज्योति माम हो ( यज्ञेन, स्वः, कल्पनाम् ) यज्ञफनस स्वर्ग माप्त हो ( यज्ञन, पृष्टं, कल्पता ) यजके ममावसे सर्वोपरि मुख प्राप्त हो ( यक्षेन, यक्षः कल्पताम् ) यज्ञके प्रभावसे महायज्ञ करनही सामर्थ्य प्राप्त हो (स्तोमः, यजुः, ऋक, च, साम, च, वृहत, च, स्थातरम्. च, देवाः सः, अगन्म ) यह पञ्चदश प्रादि स्तोम, यजुर्मन, ऋचा मौर गीतिमन्त्र और सहरसाम और स्थन्तर सामगी यजके फल से प्रसन्न हों, हम इस यज्ञके फलसे देवभाव पाकर स्वर्गको प्राप्तहुए ( अमृगाः अभूम ) अमरहुए ( प्रजापत, मनाः प्रथम ) हिरण्यगर्भकी प्यारी सन्तानहुए (वेद, स्वाहा ) इन सब देवताओंको यह आहुति दीगई, भलीमकार गृहीत हो यहां तक वसोर्धारा मंत्र हुए ॥२९॥ वाजस्य नु प्रसवे मानरमहीमर्दिशिलाम घ. चसा करामहे । यस्पामिदं विश्वम्भुचनमाविषेश तस्यानो यस्सविता धर्मसाविषत् ॥३०॥ अव बाजपेय सम्बन्धी सारा मंत्र कहते हैं, इस मन्त्रकी व्याख्या अध्याय ९ मं. ५ में होगाई ॥ ३०॥ विवे अथ महतो विश्व जती विश्व भवनाग्नयः समिदाः । विश्य नो देवा अवसा मेमन्त वि.
मिछ - - , शुक्लयजुर्वेद। श्चमस्तु द्रपिणं पाजो अस्मे ॥ ३१ ॥ इसका लुशोधानाक मा० विश्वेदेवा देवना है। मंत्रार्थ-(भय, विधे, मरुतः, आगमन्तु)माज इस यबमें से. पूर्ण मरुन देवता भाव (विश्व, ऊनी, विश्वेदेवाः, नः, प्रासा, विश्वे, अग्नयः, समिदाः, भवन्तु ) सम्पूर्ण रुन श्रादित्य आदि मण देवता इस निमिचसे माचे, सम्पूर्ण देवगा हमारे इविको ग्रहण करने के निमित्त पात्र, गाईपत्य माद सब अग्नि प्रदीप्त हो (विश्व, द्रविणं, चाजः, अतु) गौ. भूमि, सुवर्ण मादि सम्पूर्ण धन और अन्न एमको गाप्न हो ॥ ३१ ॥ वाजो नः सप्त दिशश्चतस्रो वा परावतः । याजों नो विश्वयनसातापिहायतु ।। ३२ ।। इसका लुशोधानाक प्रक०, अनु०, ६० अन्न देवता है। मंत्रार्थ (पाजा, सप्त, प्रदिशः, पा, परावतः, चतस्रः, इह, धनस सी, वाजः,नः, विश्वैः, देवः, अवतु ) हमारा अन्न सात दिशा अर्थात् प्रादि सनि लोक और पूर्वादि चारदिशा तथा दूर स्थित महः थादि चार लोकोंको पूर्ण करे, इस लोकमें धनाविभागका समय मानेपर अन्न हमारी सम्पूर्ण देवतामों सहित रक्षा करे ॥ ३२ ।। वाजो नो अद्य प्रसुवाति दानं पाजो देवान् मृतुभिः कल्पयाति वातो हि मा सर्ववीरज- जान विश्या आशा पाजपतिर्जयेयम् ॥ ३३ ॥ इसका लुशो० श्रा, त्रि. ० ०, अन्न दे है। मंत्रार्थ (अद्य, वाज:, न. दान, प्रसुवाति ) आज अन्नका अधिष्ठात्री देवता हमको दानके निमित्त प्रेरणाकर (बाजः, ऋतुभिः, देवान, कल्प. याति) अन्न ऋतुओंके साथ देवतामाको यपास्थानपर कल्पना कर वाजहि, मा, सविरम्, जजान ) अन्नही मुझको पुत्र पीवादियुक्त करै (बाजपतिः, सर्वाः, भाशाः, जपेयम् ) मनका स्वामी हुमा में सबदिशामाको घर्शभूत करने में समर्थ होई३३ .
. . , .१८ अध्याय। पाजः पुरस्तात मदतो नो पाजो देवान इपिपांवपाति। बाजोहि सधीरचकार सर्वा आशा वाजपतिर्भयेयम् ॥ ३४ ॥ इसका लुशो० त्रि० छ०, अन्न दे० है। मंत्रार्य-(वाजा, नि:, . पुरस्ताद, उस, मध्यतः ) अन्न हमारे आगे और मध्य में स्थित हो ( वाजः, हविपा, देवान, पदयाति ) अन्न इषिसे देवनामोंको तृप्त करता है (चामः, हि, मा, सविी, चकार ) अन्नने ही मुझ को पुत्र पौत्रादिसे युक्त किया ( वाजपतिः, विश्वाः, आशाः, भवेयम् ) अन्नका. स्वामी हुमा मैं सब दिशाओंको जीतने में समर्थ होऊँ॥ ३४॥ सम्मा सृजामि पर्यसाधिव्यास्सम्मासृजाम्य शिरोपधीमः । सोऽहं पा सनेयमग्ने ।। ३५ ॥ इसका लुशो० प्रा०, त्रि २०, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ (भग्ने पृथिव्याः, पयसा, मा, समृजामि ) हे अग्ने पृथिवीके रससे अपने को संयुक्त करताहूँ (अद्भिा, भोपधीभिः, मा, सप) जलों और औपधियोंसे अपनेको संयुक्त करता हूँ (सः, अई, बाज, सनेयम् ) यह मैं भन्नकी उपासना करताहूं अथवा हे अग्ने ! जो मैं औप- धिजलसे हवनद्वारा तुमको संयुक करताहूं वह मैं अन्नका उपा- सक हूं ॥३५॥ पर्यः पृथिव्याम्पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पौधाः । पर्यस्वतीः प्रदिशस्सन्तु मयम् ॥ ३६॥ इसका लुशो० ऋ०, विराट् छ०, अग्नि दे है। मंत्राथ (पृथिव्यां पयः, धाः ) हे अग्ने ! पृथ्वीपर हमारे देने.अर्ध रस को धारण करी(मोपधी, पयः) ओपधियोंम रस हालो (दिवि, पयः) गुलोक में रसको स्थापन करो (मा, मदिशः, पयस्वती, सन्तु )माहुगि देने से मेरे अर्थ दिशा विदिशाएँ रसयुक्त हौ ३६॥ देवस्प त्या सवितुः प्रेमवेश्विनाभ्याम् । पूपणो हस्ताभ्यां सरस्वी वाचो यन्तुर्यन्त्रंणाग्नेः , . शुक्लपजुवद । सानाश्पनाभिपिशामि ।। ३७ ।। इसका लुशो० ऋ०,पापीपंक्ति छ०, लिंगोक्त दे० है । यजमान. के मीभपेकका मंत्र मंत्रार्थ-(सवितुः, देवस्य, प्रसथे, अश्निमोर, बाहुभ्यां पूष्णः, इस्ताभ्यां, सरस्वत्यै, वाचः, यन्तुः यन्त्रेण,अग्नेः साम्राज्येन, त्वा, अभिपिचामि ) सचिनादेवकी श्राझामें चर्चमान मैं अश्विनी कुमारकी वा भौर पूपा देवता के हाथोंसे, तथा सा- स्वतीकी वाणी से प्रभापतिक नियमवश अग्नि चक्रवर्तीपनेसे हे यजमान तुम्हारा अभिषेक करता हूँ ॥ २७ ॥ तासाहतामाग्निगन्धर्षस्तस्पपियोऽप्स- रमो मुदो नाम । स न हुदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्थाहावाद ताभ्यः स्वाहां ॥ ३८ ॥ इसमें २ मंत्र है । दोनों का लुशो० ऋ०, विराट् उ००, देवता :म का गन्धर्व और २ यका अप्सरस है। होमके मंत्र मंत्रार्थ-(प्रतापाट्, प्रतधामा, गन्धर्वः, अग्निः, सः, नः, इदं ग्रा, सणं, पासु) सत्यवक्ताभचिनाशीधामवालापृथ्वीका धारक गन्धर्व नामक भग्नि, हमारी इस मामणजाति मौरक्षायजाति की रक्षाकरे (तस्मै, स्वासरावाट् ) उसको यह पाहुति देते हैं भली- प्रकार गृहीत हो(मुदः, नाम, मोषधया, तस्य, अप्सरसः, ताभ्यः, स्वाहा) माणियोंको मान्न करनेवाली मुद नामक भौपधियें गन्धर्वनामा भग्नि की अप्सरा अर्थात भोगने योग्यहें वह भी हमारी रक्षाकरें उन ओपधियों को यह माहुति देताह, भजीपकार गृहीत हो ॥ १८ ॥ सहितो विश्वसामा सूर्योगन्धर्षस्तस्य मरीच- पोऽसरस आयुवो नाम सन हुदम्बा पप्रम्पा तु तस्मै स्वाहावार ताभ्यः स्वाहा ॥ ३९ ॥ इसमें १ में हैं। ऋ० दोनोंका लुशो०, १०१ का प्राची हत्ती २य का साम्नी वृ०, देवसा १ मका गन्धर्व २य का भप्स- इस है। मंत्रा-(सीहतः, विश्वसामा, सूर्य, गन्धर्षः) दिन .
१८ अध्याय । . . राको मिनानेवाला और जिसकी सब साममंत्र स्तुति करते हैं ऐसा रूप गन्धर्व है ( सः, नः, ब्रह्म, नत्र, पातु )वह हमारी प्रामणमाति और क्षत्रियजातिकी रक्षाकरे, (तस्मै, स्वाहाबाद) उसको भाति देते हैं भनीप्रकार ग्रहण कीजाय (भायुचः, नाम, मरीचयः, तस्य, अप्सरसः, साभ्यः, स्वाहा ) परसर मिलनेके स्वभावाली भायुव नामक किरणें उसकी अप्सरा हैं वह हमारी रसाकर उनको पाहुसि देशहैं ॥ ३९ ॥ मुपुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्ष- बाण्यासासो भेकरयो नाम । सन हदम्ब्रह्म पत्रपातु तस्मै स्वाहावाट ताभ्यः स्वाहा ॥४०॥ इसमें २ मंत्र हैं । ऋ० दोनोंका लुशो०, छ १० मका माजा. पत्या त्रि०२ य का मार्ची गा०, दे० क्रमसे गन्धर्व शौरभास- रस है । मंमार्थ-( सुपुम्णः, सूर्यराश्मः, चद्रमा, गन्धर्वः, ) या के द्वारा सुख देनेवानी मूर्यकी किरणोंसे किरणोंवाला चन्द्रमा नामक भूमिका धारक होनसे गन्धर्व है ( सः, ना,इदं, ब्रह्म क्षत्रं, पातु ) वह हमारी इस ब्राह्मण जाति और क्षत्रिय जातिकी रक्षा कर (स्म,स्वाहाचाट् ) उसको माहुति दीजाती है ( मेकरयः, नाम, नक्षमाणि, तस्य,अप्सासा, ताभ्यः, स्वाहा ) कान्ति करने से भेकुरिनामक नक्षत्रा उसकी अप्सरा वह हमारी रक्षा करें जमकी प्रीषिके निमित्त प्राहुति देते हैं ॥४०॥ धिरो विश्वव्यचा घातो गन्धर्षस्तस्यापों अ- सरस अर्जी नाम । सहदम्पत्रम्पातुप्तस्म स्वाक्षवाद साधः स्वाहा ॥ इसमें २ मं० हैं । अ. दोनोंका लुशो०, छ० क्रमसे आर्ची पृह भापी गा० है, दे क्रमसे गन्धर्व तथा अप्सास है। मं० (इपिरः, विश्वव्यचा, वायुः, गन्धः) शीघ्रगामी सर्वव्यास भूमिको धारण करनेसे गन्धर्व नामक वायु है (सः, नः, इद, ब्रह्मा, क्षत्रं, पातु ) यह हमारी इस माह्मणजाति और क्षत्रियजाति . .. ,
॥
.
,
44
शुक्लयजुबंद।
की रक्षाकरे (तस्मै, स्वाहावाट ) उसको आहुति दीनाता है
(ऊर्गः नाम,आपः, तस्य, अप्सरसः ताभ्यः, स्वाहा ) गाions
को जीना देनेवाले रस नामक जक उसकी अप्सरा है यह हमारी
रक्षा करें, उनके निमित्त बाहुति देते हैं।॥ ११ ॥
भज्युः संपणों यज्ञो गन्धर्वस्तस्य दक्षिणा अप्सरस
स्थापा नाम । स न हदम्ब्रम सम्पातु तस्मै ,
स्थाहाघाट ताभ्यः स्वाहा ॥४॥
इसमें २.मन हैं। दोनों का लुशो, १० कमसे भापी गा.
साम्नी अनु०, देवता पूर्ववत है । मंत्रार्थ--(भुज्युः, सुपर्णः, .
यज्ञः, गन्धर्वः) प्राणियों का पालक वर्ग में गमा करनेवाला
पृथ्वी को धारण करने से गन्धर्व नामक यज्ञ है ( सः, नः इदं,
ग्राम, क्षत्रं, पातु) वह हमारी इस ब्राह्मण जाति तथा क्षप्रियजाति
की रक्षा करै ( रास्मै, स्वाहावाट ) उसको आहुति दीजाती है
(स्ताना, दक्षिणा, तस्य, अप्सरस: ) यज्ञ और यजमान की
स्तुति करनेवाली स्तावा नामक दक्षिणा उस यज्ञ की अप्सरा है
वह हमारी रक्षा करें (ताभ्यः, स्वाहा) उनको पाहुति देते हैं ।।४२।।
.' जापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वस्तस्य पाक
सामान्यप्सरम एष्टयो नाम । स ने इदम्बम
जनम्पातु तस्मै स्वाहावा ताभ्यः स्थाहा ॥ ४३ ॥
इसमें २ में हैं। दोनोंका लुशो०, छन्द कम से साम्नी
जग मा पाय है, देवता पूर्ववत् । मंत्रार्थ-( मजापति,
विश्वकर्मा, मनः, गन्धर्वः ) प्रजापालक सब कुछ करनेवाला
मनाप गन्धर्व है (स, न.इदं, ब्रह्म, क्षत्र, पातु ) वह हमारी
इस माह्मण जाति और क्षत्रियजाति की रक्षा करे ( तस्मै, स्वाहा
वाद ) उसको श्राहति देते हैं (एष्टया, नाम, ऋक्सामानि,
ताप, अप्सरसा ) अभीष्ट देने से एष्टि नामवाली ऋचा और .
साम उस ) असा है वह हमारी रक्षा करें, उनको आहुति
देने ६॥ १३ ॥
१८ अध्याय । ५१७ स नो भुवास्प पते प्रजापत यस्य त ऽउपरि गुहा याय येह । अस्मै ब्रमणेऽस्मै जत्राय महि शर्म यच्छ स्वाहा ॥४४॥ इसका लुशो० ०, मस्तारपंक्ति छ०, गजापति देवता है। • मंत्रार्थ-(भुवनस्य, परो, प्रजापरो, यस्य, रो, उपरि, गृहाः, वा, यस्य, इह, सः, ना, अस्मै, प्रमणे, अस्मै, क्षत्राय, महि, शर्म, यन्छ, स्वाहा ) हे संसार का पालन करनेवाले मजापरो ! जिन भापके स्वर्गलोक में घर है, अथवा जिन श्रापके इस लोक में घर हैं ऐसे भाप हमारी इस ब्राह्मण जाति और इस क्षत्रियजाति के निमित महान् मुख को दीजिये, इस दीहुई थाहति को स्वीकार कीजिये || ४४ ॥ समट्टोऽसि नर्भस्वानादानुः शम्भूर्मयोभूग- भिमा चाहि स्वाहां मारुतोऽसि मरुतांगण: शम्भूमय भाभि मांचाहि स्वाहाऽवस्यूमि दुस्थन्छम् मयोभुगत मा चाहि स्वाहा ॥ ४५ ॥ इसमें ३ मं० हैं । ० सवका लुशो०, छ० १ मका नि० गाप० २ । ३.य का श्राप ३०, दे० सबका घायु है । मंत्राथ.. (समुद्रः, नभस्वा, आईदानुः, शम्भूः, मयोभा, असि ) हे चायो तुम अगाधजलसे भाई श्राकाशचारी वर्षांस पृथ्वीको गीला करनेवाले इसलोक को मुखं देनेवाले राया परलोकका मुख देने चाले हो (मा, अभि, बाहि') मेरे सन्मुख होकर चलो वा मेरे अनुकून रहो ( मारुतः, मरुसा, गरणः, मसि ) हे वायो ! तुम अन्तरिक्षचारी और शुक्रज्योति भादि मरुद्गण हो (शभूः, भयोधः, मा,भाभि, बहि.स्वाहा ) तुम इसलोक और परलोकमें का मुखदेते हो मेरे सन्मुख नपना बहनरूपप्रकाश करो इस पाहुति को स्वीकार करो (अवस्था, असि.) हे वायो जगदके रक्षकही ( दुवस्वाद, शम्भूः, मयोभा, मा, मंभि, बाहि, स्वाहा) अन्न के उत्पादक इसलोक तथा परलोक का सुख देनेवाले हो मेरे . " - शुक्लयजुर्वेद । सम्मुख भपगा बहनका प्रकाश का इस माहुति को स्वीकार करो ॥ ४५ ॥ याराने मध्ये रुचोपियमातन्वन्ति रश्मि भिः । तानिनों अद्य मा भीकचे जनाय नस्कृधि४६ इसकी व्याख्या अ० १३ मं० २२ में होगई ॥ ४ ॥ या वो देवाः सूर्य रुचो गोप्यम्पु या रुषः। इन्द्राग्नी ताभः सर्वामी रुचन्नो धत्त बृहस्पते ४७ इसकी व्याख्या अ० १३ मं० २३ में होगई ॥ ४७ ॥ रुचन्नो धेहि प्रामणेपुरुच राजमु नस्कृधि । रुचं विपु शूदे मयि धेहि मचा चम् ॥ ४८ ॥ इसका लु गो० भ०, अनु० २०, भोग्न दे है। घी की आहुति देय मंगाय-(नः, ब्राह्मणेपु, रुच, धेहि ) हे अग्ने हमारे ब्राह्मणों में कान्तिको स्थापन करो ( ना, राजसु, रुचं, कृधि ) हमारे क्षत्रियों में कान्निको (विश्येपु, शूद्रेप, रुचम् ) वैश्य और शूद्रों में कान्तिको स्थापन करो (मयि, रुचारुचं, धेहि) मुझमें कान्ति- के साथ अविच्छिन्न कान्तिको स्थापन करो ॥४८॥ तत्या यामिब्रह्मणा चन्दमानस्तदाशास्ते पज मानो हविर्भिः । अहैडमानो वरुणेह योद्ध्यु- रंशसमान मायुः प्रमोपीः ॥ १९ ॥ इसका शुनःशप ऋ०,त्रि०, छ०, वरुण द है मंत्राथ (वरुण, यजमानः हचिभिः, सत, भाशास्ते ) हे स्तुति किये हुए वरुण ! यजमान इवियों के द्वारा जोकुर याचना करनाहै ( सत्. ग्रह्मणा, वन्दमाना, वा, यामि ) वह वेदके द्वारा स्तुति करताहुमा प्राप- को शरण जाकर याचना करता हूँ ( उरुशंस, इह, अहहमानः, बोधि ) हे परम भाराध्यदेव ! यहां क्रोध न करोतुंए तुम मेरी मापनाको जानो (नः, भायुः, मा, प्रमोपीः) मेरी मायुको मरा : नष्ट हानेदो ॥४९॥ .
१८ अध्याय - . - स्वर्ण घर्मः स्वाहा स्वर्णाः स्वाहा स्वर्ण शकः स्वाहा स्वर्ण ज्योतिः स्वाहा स्वर्ण सूर्यः स्वाहा ॥५०॥ इसमें ५ मं० है । प्रापि सबका शुनःशेष, छन्द १।३।४।५ का दै० मि०, २का दे० पंक्ति, देवता सबका अग्नि है। मार्य (स्वः, न, घमः, स्वाहा) दिन की समान मादित्य देवता की पीति के निमित्त यह साहति देते हैं, भलाप्रकार गृहीत हो (स्पः, न, अर्कः, स्वाहा) मूर्य की समान अग्नि को श्रादित्य में स्थापन करता हूं, उसकी भीति के निमित्त दीहुई भाहुति गृहीत हो (स्वः, न. शुक्रः, स्वाहा.) दिन की समान शुक्लवर्ण मादित्य के निमित्त दीहुई पाहुति भलीपकार गृहीत हा (स्वः, न, ज्योतिः, . स्वाहा ) स्वर्गदाणा अग्नि को अग्नि में स्थापन करता हूं उसकी मति के अर्थ दीहुई माहुति भलीपकार गृहीत हो ( स्वः, ग, सूर्यः, स्वाहा ) सम्पूर्ण देवताशों के रूप की समान सूर्य को उत्तम करता हूं अर्थात् भ्रान्ति से अनेकत्व की प्रतीत होती है वास्तव में एक सूर्य ही नानाम है ॥ ५० ॥ अग्नि युनाम शर्वमा तेन हिव्या संपूर्ण घसाहन्तम् । तेन वपमेमध्नस्य बिष्ट स्वो कमाण अधि नामुत्तमम् ॥५१॥ इसका शुनाशेष अपित्रि० २०, अग्नि दे है । मंत्रार्थ (दिव्यं, मुपर्ण, वयसा, हन्त, अग्नि, शवसा, घृगेन, सेन, अध्नस्य विष्टपं. चयं, गर्मम ) स्वर्ग में वर्तमान सुन्दर गतिवाले धुएंसे बड़े हुए अग्नि को बल और पृरासे सयुक्त करसाहूँ, इससे हम मादित्यके लोग- को जाय (आंध, स्वः, रुदाणाः, उत्तम, नाम) उसके का स्वर्ग में जालहुए उत्तम दुःखरहिरा लोक गमन करें। ५१५ इमी ते पंक्षाजरी पतत्रिणी यायाय रक्षा स्पस्यग्ने । ताभ्याम्पतेम कृताम: पत्र ऋपयो जग्मुः प्रथमजाः गाः।
शुक्लयजुर्वद । इसका शुनःशेष भ०, विराट् ब्रा०प्र० छ, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ-(अग्ने, से, इमो, पक्षी, अजरी, पतत्रिणी) हे अग्ने ! तुम्हारे यह दोनों दाहिने पाएं पर जरारहित सड़ने वाले - ( याभ्यां, रक्षासि, अपसि) जिनसे तुम राक्षसों को नष्ट करते हो(वाम्या, दसका, लोक, पतम) उनसे ही हम पुण्यात्मामों. के लोक को गमन करें ( यन, प्रथमजाः, पुराणा, भूपयः, जग्मुः ) जहाँ प्रथम उत्पन्न पुरातन प्रापि गये हैं ॥५२॥ इन्दुर्दक्षः येन कृताया हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः । महान्मधस्थें ध्रुष आनिषत्तो नमस्ते अस्तु मी हिसीः ।। ५३ ।।। इसका शुन: ३०, पापीप० छ०, श्रीग्न दे० है। मंमार्थ (इन्दुः, दक्षः, श्येनः, पाताना,हिरण्यपक्षः,शकुनः, भुरण्युः, महान्, धुवः, सधस्थे, पानिपत्तः, ते, नमः, अस्तु, मा, माहिंसी:) हे अग्न! तुम चन्द्रमाकी समान भानन्दके दाता, उत्साहयुक्त अाकाश में पाजकी समान वेपसे गमन करनेवाले, सत्यसम्पन्त सुवर्णमय पक्षवाले पक्षीकी समान फेले पक्षवाले जाठरानिरूपसे पोपक बड़े प्रभाववाले स्थिर ब्रह्माके स्थान में स्थिर, थापको वारंवार 'नमस्कारहा, मुझसी प्रकारकी पीड़ान देकर मेरी रक्षा करना५३ दियो मुसि पथिष्यानाभिर्गपामोपीनाम्। विश्वायुः शम्म मप्रथा नम स्पधे ॥ ५४॥ इसका शुन: ००, परोधिएक छ०, श्रग्नि दे है । मंबार्थ (दिचः, पूर्धा,पृथिव्याः, नाभिः, भपा, भोपवीना.जक,विश्यायुः, शर्म, समयाः, असि) हे भोग तुम स्वर्गके मस्तकरूप हो. पृथिवीके नाभिप हो शार्यात् सब तुमसे ही जीवित रहते हैं, तुम जल सया औपधियोंके सार हो, विश्वभरके जीवन हो, सके शरणदाता सपा सव मार्गोम वर्तमान हो (पये, नमः) स्वर्गके मार्गरूप भाषको प्रणाम है ॥१४॥ - १८ अध्याय। चिम्चस्प मूर्दशधितिष्ठसि श्रितः समुद्रे ते हृद- यमस्वायुरपो दत्तोदधिम्भिन्त द्विवस्पर्जन्या. दन्तरिक्षात् पृथिव्यास्ततो नो पृष्ट्याव ।। ५५ ।। इसका शुन: ऋ, महापंक्ति जगती छ०, भग्नि दे० हैं। मंत्रार्थ-(श्रितः. विश्वस्य,सूर्धन्, श्रीधशिष्ठसि ) हे सूर्यरूप अग्न तुम सुपुम्नाम व्यासहए सबके शिरम स्थित हो (रो, हदयं, समुद्र.) तुम्हारा हृदय समुद्र में है (मायुः, मनु) जीवन जलों में है क्योंकि जल से वृक्ष पुष्ट होकर उनसे अग्नि प्रकट होती है (दिवः, पर्ज- न्याय, अन्तरिक्षाद, पृथिव्याः, ससा, दृष्ट्या, नः, थप) धुलोक से, मेघ से, अन्तरिक्ष से, भूमि से जहाँ जल हो यहाँ से लाकर वर्षा के द्वारा हमारी रक्षा करो (उदधि, मिना ) मेघ को विदीर्ण करो (अपः, दत्त) जलाको दो ॥ ५५ ॥ दृष्टो यज्ञो मृ[भिराशीही धमभिः । तस्प न दुष्टस्य पीतस्य गणिहार्गमः ॥५६॥ इसका गालय १०, उनिएक छ०, यज्ञ देवता है। मंत्रार्थ- (दविण, ना, इष्टस्य, मीतस्य, तस्य, इह, प्रागमे ) हे धन ! हमारे मित्र और गेमी इस यजमान के यहां आनो (आशीर्दाः, यश, भृगुमि, मुभिः, इष्टः) इच्छित वस्तु देनेवाला पक्ष नाहाण और देवताओं के द्वारा पूर्ण कियागया || ५६ ॥ इप्टो अग्निराष्ठतः पिपर्नु न हष्ट हविः । स्व- गेदन्देवेभ्यो नमः ।। ५७ ॥ इसका गालव ३०, गायत्री 8०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ- (इष्टः, अग्निः, हविः, पाहुता, नः, इष्ट, पिपाषु ) यज्ञ के द्वारा पूजित भग्नि दवि के द्वारा तृप्त किया था हमारे मनोरय को पूर्ण कर (इदं, नमः, देवेभ्यः, स्वगा. ) यह इवि सब देवताओं के निमित्त हो, स्वयं पहुँचनेवाला है ।। ५७ ॥ यदाकृतारसमसुस्रोढ्दो वा मनसो पा सम्भृत- उचक्षुपो या । सदन मेत मुकृतानु लोक यर ..
६२२ शुक्लपजुवेंद। यो जरमुः प्रथमजाः पुगणाः ॥ ५८ ॥ इसका विश्वकर्मा, जगती छ०, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ (सद, मनु मुकता, लोक, उ, ) हे ऋत्विजों ! तम उस प्रजापति के किये हुए कर्मको सम्पादन करके पुण्यात्माओंके लोक- को अवश्य प्राप्त होश्रो (यत् संभृतं, याकूतात्. . या, हा, वा, मनसः, वा, चक्षुषः, समानुस्रोत ) जो कर्म पूर्ण सामग्री से युकहै, तथा जो मजापतिके अभिप्राय वा हृदयसे वा मनसे, अपना चहु मादि इन्द्रियोंसे ब्रह्माने रचा है, उसके करनेसे पवित्र लोक- को गमन करो (या, प्रथमनाः, पुराणाः, पयः, गग्मुः) जिसलोकमें प्रथम उत्पन्न पुरातन ऋपि गये हैं ॥ ५८॥ एत संघस्थ परि ते दामि पणावहाच्छेचधि- जातवेदाः । अन्वागनगा यज्ञपतियों अन्न त स्म जानीत परमे व्योमन् ।। ५९ ।। इसका विश्वकर्म ०, नि०, छअग्नि दे० है । मंत्रा (संघस्थ, जातवेदाः, यं, शेवधि, भाव हाव) हे देवगायोंके स्थान भूतस्वर्ग ! सर्वज्ञ अग्निने सुखके खजानेमन यज फेफनको जिसे सौपाहै । पतं, से परिददामि ) इस यजमानको तुम्हारे अर्पण करताहूँ ( यज्ञपतिः, यः, अन्वागन्ता ) हे देवतानो ! यज्ञ के समाप्त होनेपर यह यजमान तुम्हारे पास भावैगा (भत्र, परमे व्योमन्. से, जानीत, स्म) इस उत्तम परम विस्तारवाले स्वर्गमें प्राप्तहुए उस यजमानको तुम जानो अर्थात् सर्गम पहुँचने पर सत्कार करो।। ५९॥ एतनानाथ परम व्योमन्देवाः सधस्था विद. रूपमस्य । पहागच्छत्यधिभियपानारिष्टापूर्ते. उपवाथाविरस्म ॥ ६ ॥ इसका विश्वकर्मा ऋ०; त्रि०७०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-. (परमे, व्योमन्. सधस्थाः, देषाः, एरो, जानाय ) 'उराम स्थान स्मर्ग में रहनेवाले हे देवताओं । इम यजमान को जानो (अस्य, -- ।
१८ अध्याय । . रूपं, विद) इसके कप को जानो ( यदा, देवयानः, पथिभिः, मागच्यात ) जर देवयान मार्गों से प्रागमन करे ( इष्टापूर्वे, अस्म, भाषिः, करवाथ ) व श्रौरा स्मात कर्म के फल इस यजमान के निमिरा प्रकाशित करो ॥६॥ उद्बुद्धयस्याग्ने प्रतिजागृहि त्यमिष्टापूर्त सह- सृजेथामयञ्च । अस्मिन् सघस्थ अधुरस्मि- विश्वे देवा पर्जमानश्च सीदत।। ६१ ॥ इसकी व्याख्या अ० ११ कण्डिका ५४ में होगई ॥६१ ।। येन वहसि सहनं पनाग्ने सर्यवसम् । तेनेम यज्ञनो नए स्वदेषेषु गन्तये ।। ६२ ।। इसकी व्याख्या अ० १५ कण्डिका ५५ में होगई ।। १२ ।। मस्तरेणं परिधिना सुचा घेया च हिंपा। अचेमं यज्ञन्नो नय स्वदेवेषु गन्तघे ॥ ६३ ॥ इसका विश्वकर्मा ऋ०, अनु० छ०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ- (नः, मस्सरेण, परिधिना, चा, वेया, बहिपा, ऋचा, इम, यज्ञं, गन्तचे, स्वः, नय ) हे अग्ने हमारे सुर का आधार दर्भ का मुहा, पाहमात्र के तीन काठ, जुहू आदि, वेदी, कुशा, ऋचा भादि से सम्पन्न इस यज्ञ' को देवतामों में प्राप्त करने के निमित स्वर्ग को लेजायो । ६३ ।। यदत्तं यत्प्रादानं यत्पूर्स याच दक्षिणाः । सदग्निवश्वकर्मणः स्वर्दवेघु नो धत् ॥ ६४॥ इसका विश्व० ०, नि० अनु० छ०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ-( वैश्वकर्मणः, अग्निः, ना, तन, स्वः देवेषुः दधत ) विश्वकर्माका अग्नि हमारे उस दानको स्वर्गलोक देवतामोंमें स्थापन करै (यत, दत्त, यत्, परादानं, यत, पूर्त, च, या, दक्षिणा) जो कि -जामाता आदि को दिया है, जो परोपकारके निमित्त दुःस्त्रियोंको दियाई, जो स्मृतिके अनुसार कुपोत्सर्जन आदि किया और जो यज्ञकी दक्षिणा है ॥ ६॥ - - , 1 । शुक्लयजुर्वद । यत्र धारा अनपेता मधोधुतस्य च याः, सग्निश्वकर्मणः स्वदेवेनो धत् ।। ६५॥ इसका वि० ऋ०, नि० अनु० छ, अग्निदे है। मंत्रार्थ- (वैश्वकर्मणः, अग्निः, सत्, स्वः, देवेषु, नः, दधत् ) विश्व- कर्मासम्बन्धी भग्नि तहां स्वर्ग में देवताओं में हमको स्थापन कर ( यत्र, मधोः पृत्स्य, च, या, धाराः, अनपेताः ) जहां शहद की घृतकी और दूध ही मादि की धाराएं शीण न होगी हुई स्थित हैं ॥६५॥ अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतम्मे परम- तम्मआसन् । अस्त्रिधातू रजसो विमानो- जिस्रो घुम्मो इपिरस्मिनाम ॥ ६६ ।। इसका देवश्रवा देवघात , पिछ०, अग्नि देवता है। मंत्राध-(जावेदाः, भा, विधातुः, रजसः, विमानः, अजन्ना, अग्निः, अजन्मा, अस्मि) सब सृष्टिका स्वामी, अर्चनीय यज्ञ, रिदेवस्वरूप, जल का निर्माता अविनाशी अग्नि उत्पतिसे ही मैं हूं (मे, चक्षुः,पृत) मेरी भाँखें घृस हैं पृत होमनेवाले को देखता हूं ( मे, भास्थ, अमृतम् ) मेरे मुख में हविरुप अमृत है (धर्म, नाम, हविः, अस्मि ) मेघरूप और नाम से पुरोडाशादिक भी मैं हूँ ॥ ६६ ॥ चोनामास्मि भपि नामास्मि सामानि नार्मास्मि । ये ऽअग्नयः पाञ्चजन्या अस्याम्पृ- थिम्पमाधि सेपोमामि त्यमुत्तमः प्रनो जीवात सुध ॥ ६॥ इसमें २ मंत्र हैं। दोनों का देवश्रवा देवघात ऋ०, छन्द क्रम से भापी जाती और अनुष्टुप है, देवता क्रमसे आत्मा और अग्नि है। मंत्रार्य-(प्रचा,नाम,अस्मि) भग्वेद नामबाला हूँ । यपि नाम ) यद नामक अग्नि हूँ ( सामानि,नाम अग्मि) •सामवेद नामक मैं (मस्यां पापन्या, मधि, ये, पाञ्चजन्याः, , - १८ अध्याय । . अग्नयः, रोपां, खं, उत्तमः, असि ) इस पृथिवी पर जो मनुष्यों के हिसकारी अग्नि हैं, हे यज्ञाग्ने तुम उनमें श्रेष्ठ हो (नः, जीवा- तवे, प्रमुव ) हमारे चिरजीवन के निमित्त याज्ञा दो।। ६७॥ चाहत्याय शबसे पृतनापायाय च। इन्द्रत्वा वर्तयामास ।। ६८।। इसका विश्वामित्र ऋ०, नि. गा० २० इन्द्र देवता है इसका पाठ करै । मंत्रार्थ-(इन्द्र, वाहत्याय, , पृतनापाह्याय, शवसे, स्वा, श्रावयामसि ) हे इन्द्र ! वृत्रासुरके मारनेवाले, शत्रुसेना का तिरस्कार करने में समर्थ, पलदर्शनके निमिस तुम्हारा बार- वार'मावाहग करते हैं ॥१८॥ महदानुम्पुरुहूतक्षियन्त महस्तमिन्द सर्मिपण. णाम्। अभिवनं वर्दमानम्पियोरुमपादमिन्द्र नवसा जघन्ध ॥ ६९॥ इसका विश्वामित्र ऋ• आपी त्रि० छन्द, इन्द्र दे० है । (पुरुहूग, इन्द्र, क्षियन्तं, कुणालं, सहदानु, प्रहरी, सम्पिण) अनेकोंबार भक्तोंसे भावाहन किये हुए हे इन्द्र निकट वसनेवाले, दुर्वचन कहनेवाले शत्रुको हाथोंसे रहिन करके चूर्ण करो (इन्द्र, वर्धमाने, पियार, त्रं, अपाद, अभिजघन्य ) है इन्द्र ! वृद्धि को माम होते देवताओं को मारनेवाले वृत्रासुर वा पापको गति हीम करके मारो ॥ १९ ॥ विन इन्द्रमृधौ जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः । यो अस्मान् अभिदासत्यधरङ्गमया तमः ॥ ७० ॥ इसकी व्याख्या १०.८ मं० ४४ में हो ॥ ७० ॥ मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परायन पाज- गन्यापरस्पाः । सुक सुशार्य प्रविमिन्द्रः तिग्मं विशन्ता ढ विमृधों नुदस्व ।। ७१ ॥ इसका जय , त्रि० छं० इन्द्र देवता है। मंत्रार्थ-- (इंद्र, भीमः, कुचरा, गिरिष्ठा, मृगः, न, पास्याः, परावराः, भाजघन्य' न . शुक्लयजुपद । हे इंन्द्र । भयानक दीखनेवाले डरावनी चालघाले पर्वतकी गुफामें सानवाले सिंहकी समान मन्दिर स्थानोंसे थायो ( सकं, तिग्गं पषि, संशाय, शून्, पिशाहिट) शत्रके शरीर में गयेश करनेवाले सीक्षण मत्साहमरे,वनको पैना करके शत्रुओंको विशेषरूपस ता. ना करो (मृधः, नुदस्व ) संग्रामोंको विशेष प्रेरणा करो वा दर करो ।। ७१॥ वैश्वानरोनऊलय आ प्रयातु परावतः अग्निनः सुष्टुतीरूप ॥ ७ ॥ इसका जय भए० गायत्री छ०, वैश्वानर देवता है। मंत्रार्थ- (वैश्वानरः, अग्निः, न:, सुप्ती:, उप, नः, ऊनये, परावराः प्रयातु ) सब माणियोका हितकारी अग्नि देवता हमारी सुन्दर स्तुतियोंको सुनने के निमित्त और हमारी रक्षा करनेको दूर देशसे श्रावे ।। ७२ ॥ पृष्टो विचि पुष्टो अग्निः पृधिव्याम्पृष्टो विश्वा ओपधाराविषेश । वैश्वानरः सहसा पृष्ठो अ. ग्निस्स नो दिवा स रिपस्पातु नक्तम् ।।७३ ।। इसका कुत्स ऋ०, छ०, सानर देवता है। मंत्रार्थ (वैश्वानरः, अग्निः, दिवि, पृष्टः ) सा प्राणियोंका हितकारी अग्नि देवता गुलोकमें मादित्यरूपसे पूछागया वर्षात य' आदि- त्यरूप क्या है, इसपकार मुमुक्षुओंने प्रश्न करके विचार किया (पृधियां, ए ) "अन्तरिक्षमें जलके श्रमिलापियोंने बुझारि जो विजलीरूपसे मकाश करता है यह कौन है !(विश्वाः, भोपधी:, माविवेश ) जो सकल शोपों में प्रवेश कांगया ( सः, पृष्टः ) वह बूझागया कि-जीवन के कारणरूप साप पाक गकाश धादि से प्रजाओंका उपकार कानेवाला यह कौन है (सहसा, पृष्टः) जो बनपूर्वक अध्वर्युसे मयाहुमा मनुष्योंसे बझागया कि यह कौन है जो अरणी काठमें से निकालाजाताहै (सः, दिवा, मक्तम्, नः, रिपः, पातु ) वह अग्नि.दिन रात वध वा कष्टसे हमारी रक्षा + .
१८ अध्याय। ५२७ . कार प्रयासर्वत्र अग्नि मूर्य विद्याप परमात्माहे यह सदा हमारी रक्षा कर ।। ७३॥ अश्याम सकाममग्ने तयोती अश्याम पि, रयियस्मवीरम् । अश्याम पामभिवाजयन्ती ऽश्याम झुम्ममजाजरन्ते ॥ ७४ । इसका भरद्वाज प्रमु०, त्रि० छ०, अग्नि देवताहै । मंत्रार्थ (अग्ने, तब, ऊती, तं, काम, अश्याम ) हे भग्ने ! तुम्हारी रक्षा से हम उसयामलापाको प्रशहा ( रथिना, सुधीरं, रार्थ, अश्याम). दे धनवन् आपकी कपासे हम सुन्दर पुत्र शोर श्रेष्ठधनको पार. ( वाजयन्रा, वाजं, अभि, अश्याम ) अग्निका पूजन करत हुए हम तुम्हारी कृपासे अन्नको सब ओर से पा ( अजर, से, अजरं, घुम्न, अश्याम ) हे जरारहित ! तुम्हारे जो न होनेवाले यश को पावै अर्थात् सदा यशस्वी हों ॥ ७४ ॥ चुयन्ते अद्य रसिमाहिकाममुत्ता हस्तानमसो.. पसर्व । यजिष्ठेन मनसा यक्षि देयानधता मन्मना विप्रो अग्गे ॥ ७५ ॥ इसका उत्कीन ऋ०, त्रि० ६०, अनि दे० है। मं०-(अग्ने, उत्तानहाः, वयं, नमसा, असय, शय, यजिष्टेन अस्ट्रेधना, मन्मना, मनसा, काम हविः, रो, रिरिम ) हे अम्ने ! दानके निमित्त खुलेहग हैं हाथ जिनके एसे हमने नमस्कारपूर्वक निकट जाकर आज या करने में ततार अगन्यगगि एकान देवताओंकी महिमा और श्रास्माके स्वरूपको जाननेवाले साधान मनसे इ. च्छित होषको अापके अर्थ दिया (विमः, देवान्, यति ) हे अग्ने! बुद्धिमान तुम देवतागोंको राप्त करो ॥ ७ ॥ धामच्छदाग्निरिन्द्रो वृह्मा देवो बृहस्पतिः । सचेतलो विश्वे देवा यज्ञम्प्रावन्तु नः शुभे1७६॥ इसका उत्कील ऋ०. शनु छ०, विश्वेदेवा दे है। मंत्रार्थ (धामच्छन्, सः, देवः, अग्नि, इन्द्रः, ब्रह्मा, वृहस्पतिः,सचेनमः, " शुक्लपर्जुचद ! विश्वेदेवाः, मः, यज्ञ सुभे, माचन्नु ) लोकोंकी न्यूनताको पूर्ण । करने वाले, रीतोंको भरनेवाले वा परमधाममें विराजमान, दिव्य गुणधारी, अग्नि, देवराज इन्द्र, चतुर्भुख ब्रह्मा, देवगुरु बृहस्पति तथा परम बुद्धिमान विश्वेदधा वा सम्पूर्ण देवता हमारे यज्ञको इष्टस्थान स्वर्गम स्थापन करें। ७६ ॥ त्वं यविष्ठ दाशुषो नः पाहि शृणुधी गिरः। रक्षा नोफमुतत्मना ॥ ७७ ।। इस मंत्रकी व्याख्या १० १३ मं० ५२ में होगई है, सिसका सरल भाव यह है कि-हे नित्यतमा अग्नि देव तुम हमारी स्तुति प्रार्थनाके बचनोंको सुनो यजमानके वंश और सम्बन्धियों की विना याचनाके ही रक्षा करो ॥७७॥ इतिश्री यजुर्वेदान्तर्गत माध्यन्दिनीय शाखाका मापानुवाद सहित अष्टादश अध्याय समांत अथ एकोनविंशोऽध्यायः। ॥ हरिः ओं ॥ स्वादीन्यो स्वादुना तीव्रान्ती- वेशामृता ममतेन मधुमतीम्मधुमना सूजामि स सामैन । सोमौस्यश्विभ्याम्पच्यस्य सर- स्वत्यै पयस्वेन्द्रीय सुत्राम्णे पच्यस्व ॥ १ ॥ अब तीन अध्यायों में सत्रामीण यज्ञक मंत्र कहेजायगे, इस यज्ञको धनसमृद्धि, पशुदि भौर छिनेहुए राज्यको फिर चाहने- वाले करते हैं, सोमरस बनाने के मंत्र | मंत्राथ-(स्वाद, सीमा, अमृता, मधुमती, स्वा, स्वादुना, सीनेण, अमृतेग, मधुमता, सो. नेन, समजामि ) हे अन्नरस ! शिस्वादु तीन अमृतकी समान मधुर और गुणकारी मीठे रससे भरेहुए तुझको, स्वादु तीन अमरासमान मधुररस भरे सोमके साथ मिनाताहूँ (सोमः, असि) हे सोमामले अन्नरस तुम सोम हो ( अश्विभ्यो, पयस्व) दोनो भश्विनीकुमारोंके निमित्त पको (सरस्वत्यै, पन्यस्त्र ) सर• +4 " - - १९ अध्याय। स्वती के निमित्त पाचिरा होमो ( मुत्राम्गो, इन्द्राय, पक्ष्यस्व ) रसा करनेवाले इन्द्र के निमिच पाचि होनी ॥१॥ परीतो पिश्चता सुतों सोमो य उत्तम हृषिः । धन्यायो नयाँ अस्वन्तरासुपाव सोममदिभिः ॥२॥ इसका भरद्वाज H०, हाती छ०, सोमदे है। मंत्रार्थ-यः, सोमः, इषिः, चा, यः नः, दधन ) हे ऋविनो! मो सोम श्रेष्ठ • हवि है और जो सोम मनुष्पोका हिसकारी होगामा यजमान को धारण करणाहै (अप्पु, भन्नः, सोमं. भौद्रिभिः, भासपार) मलों में पर्समान जिस सोमको पत्थरों से भवने भीमपुत किया है (मुत, इतः, परिपिचास ) उत्त अभियुत सोमको इसगाके दक्ष से सींची अर्याद देवताओंकी श्रेष्ठ हघिमें गौ का द्ध मिलामोरे चामोःपूतः पवित्रेण प्रत्यक्सोमो अतिदुतः। इन्द्रस्य युज्यस्सो । बायोः पूतः प्रविण प्रा. इक्सोमा अतिदुतः। इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥३॥ इसमें २ मं० हैं। दोनों का प्राभूति ऋ०, गायत्री छ०. सोम दे है। मंत्रार्थ-(प्रत्यङ्, प्रतिद्वतः, सोमः, पायो, पवित्रेण पूराः) अधोमुख शीघ्रतासे निकला हुआ सोम वायु देवताके पवित्र से शुद्ध हुभा (इन्द्रस्य, युज्यः, सखा)न्द्रका योग्य सखा है अपाद 'हे सोम तुम शीघ इस पात्र में प्रवेश करसकते हो वायु देववाके अनु. ग्रहसे तुमपचित्र के द्वारा पवित्र होरोहो, इन्द्र के योग्य प्यारे सखा हो (माङ्, श्रीशमा, मोमा, वायोः, पवित्रण, पूनः, सोमः, इन्द्रस्प, युज्या, सखा)पूर्वमुख निकलाहुमा सोम वायुके पवित्रासे पवित्र हुआ जोकि-इन्द्रका योग्य सखाई मर्याद हे सोम तुम शघ्र ही इस पात्रमें से निकल सकते हो, वायुदेवताके अनुग्रह से तुम पवित्र फे द्वारा पवित्र होरो हो । पुनाति ते परिघुत सोम/ सूपस्य दुहिता। पारेण शश्वता तना ॥ ४ ॥ ॥
. . + . १९ अध्याय के भोज्य पदार्थों को सम्पादन करो (ये, वहिपः, नमः, उक्ति, यजन्ति ) जो कुशासनपर बैठे हुए हविरूप अन्न को लेकर मंत्रो- धारण करते हुए होमस हैं (उपयामगृहीता, असि ) हे सोम ! तुम उपयामान में गृहीत हो (अश्विभ्यां त्या ) अश्विनीकु- मारी की नीति के मिमित तुमको ग्रहण करता हूं (पपः. ते, योगिः ) यह तुम्हारा स्थान है (रोजसे, स्वा) तेज के निमित्त तुमको यहां सम्पादन करता हूँ (सरस्वत्यै, त्वा ) हे पयोग्रह ! तुमको सरस्वती देवता की नीति के निमिश ग्रहण करता हूं भीपाय, सा) हे दुसरे पयोग्रह ! वीरता पाने के निमित्त तुमको यहाँ स्थापन करना ई ( सुप्रामणे, इन्द्राय, त्वा ) हे दलीय पयो- ग्रह ! रक्षक इन्द्र देवता की प्रीति के निमित तुमको ग्रहण करता ई (बनाय; त्व! ) यह तुम्हारा स्थान है बल के निमित्त तुमको स्थापन करता हूं ॥६॥ नाना हि चन्दियाहत सदस्कृतम्मा' सध. क्षाधाम्परमे व्योमन् । सुरा त्वमसि शुष्मिणी मोम एप मा मां हि सीः स्वां योनिमा विशीं ॥ ७ ॥ इसका माभूति मा० सुरासोम दे. है । अभि- मंत्रण करें। मंत्रा-(दि, वां, देवहिस, नाना, सदः, कृतं ) हे 'सुरासोम क्योंकि तुम दोनोके, देवताओं के हितकारी पृथकंस्थान कियगए है ( परमे, व्योमन्, मा, संसतापाम) इसकारण श्रा- काशकी समान विशाल इवनस्थान में संयोग माकरो, क्योंकि पाहवनीयमे दूध और दक्षिणाग्नि में सुरा होमीजातीहै मतः मलंग रहो (वं. शुष्मिणी, मुरा, भासि) हे मुरारस तुम वसवान देव तामांके स्वीकार करने याम्य रसयुक हो ( पपः, सोमः, स्वां योनि, प्रविशन्ती. सोम, मा. हिंसीः) यह सोमशान्त है इसकारण अपने स्थान दक्षिगरिनमें प्रवेश करते हुए सोमको पीडा मत दो७: - उपयामहीमोऽस्पानिनोज सारस्वत वीर्य' . जगती २० । - - शुक्लयजुर्वद। मैन्द्रम् बलम् । पते योनिमोदाय त्यानन्दाय स्या मईसे त्या॥८॥ । इसका पाभूति २०, वि. भा. प. छ, सोमदे है । मंशार्थ-(उपयामगृहीतः, अति )उपयामपात्र में गृही। हो (सेजा, आश्विनम् )रोजास्वरूप तुमको परिवनीकुमारकी मीतिक मिमिच ग्रहण करता हूँ (एषः, रो, योनिः) हे प्रथम मुराग्रह ! यह तुम्हारा स्थान है (मोदाय, स्वा) भानन्दकनिमित्त तुमको यहां स्थापन करता हूँ (वार्य सारस्वतं) हे द्वितीय मुराग्रह ! वर्षिया तुमको सरस्वती देवताकी श्रीति के निमित्त उपयामपामें ग्रहण करताहूँ ( भानन्दाय, त्या,) हे द्वितीय सुपामह भानन्दकी प्राशि के निमिच तुमको इस स्थान में स्थापन करताहूँ ( बल, ऐन्द्रम्) हे सगीयारागृह बलकी प्राप्ति के निमिच इन्द्रदेवताकी प्रसन्नता के अर्थ उपयामपाटमें तुमको ग्रहण करताहूँ ( महसे, त्वा) हे तृतीयपुराग्रह ! महत्वको पाने की कामनासे तुमको यहां स्थापर करता हूं॥८॥ सेजोऽमि तेजो मयि धेहि चायमास वीर्प माप हिवलममि बलम्मपि धेशोजोपाजो मपि धेहि मन्युरसि मन्यु माप घेहि सहोऽसि महो माय धेहि ॥९॥ . इसमें ( मंत्र हैं। सरका भाति का है, छन्द ११का भासुरी जाती, २ १२॥ १ का सामुसी० ४ का पात्रा० भनु० भौर देवता ।।२३।५।६ का सुरासोम तया ४ का मुरा है। मंत्राध- (सेज:, भति, रोजः, मयि, घेहि ) हे दूध ! सेनको • बढ़ानेवाले हो, मुझमें तेजको धारण करो (वीर्य, भसि, वीर्य, मयि, धेहि ) तुम चीरसाहो मुझमें वारणाको स्थापन करो (बलं, भास, रलं, मयि, धेहि ) तुमबलहो मुझमें बलको धारणकरो • (भोगः, मासि, मयि, भोजा,हि) हे मुगारस ! तुम कान्ति हो ..मुझमें कानिसको स्थापन को माया प्रतिमन्युमपि,पदि) तुम . .
१९ अध्याय। अहंकार हो मुझमें सद्भारके अंहकारको धारण करो (सहा मसि,' सामयि, धेहि) तुमबल हो मुझमें बल स्थापन करो ॥९॥ या व्याघ्र विचिकोभी कश्च रक्षति श्येनम्ब- तत्रिण मिसेमम्पावसः ॥ १० ॥ इसका हैमचि ऋ०, अनु० विचिका द है। नाभिसे ऊपर नीचं इसको पढ़कर अध्वर्यु और प्रतिषस्थाता यजमानको उपेनपिरछसे पवित्र करै । मंत्रार्थ -(या, विचिका; बयानं, च, एक, उमौ, रक्षास ) जो सर्वप्र फैलनेवाला उदररोग व्याध और भषिपोंके समूहकी रक्षा करता है (पेन, परिपूर्ण, सिंहम् ) श्येग पक्षी और सिंहकी रक्षा करता है (सा, इम, अहसा, पातु) बह इस यजमान की पापाप व्याधिसे रक्षा कर भर्थात् सिंह में- ड़िये भादिको चिपचिका रोग नहीं होता है, रौसही हमारे इस यजमानको भी न हो ॥१०॥ पदापिपेप मातरम्पुत्र प्रमुदितो धन् । एमत्त देग्नेऽनणो भवाम्पहतो पितरी मया । समचं स्थ सम्माभद्रण पंक्त धिपूछ स्थधिमा पाप्मना पंक्त॥११॥ इसमें १ म० हैं । सबंका हैमर्षि ०, १ का वृहती २ । ३ का मि. छन्द है। देवता का भाग्नि, २ का पयाग्रह, ३ का मुराग्रह है । १ से अध्वर्यु यगमान को अग्नि दिखाये, मंत्रार्थ- (प्रमुदिशः, धयन, भर, यत्, मासरं, प्रापिपेप, अग्ने, रात, एरात, अनृणा, भवामि) प्रति प्रसन्नता से स्तन पीते हुए पुषका मैंगे जो मासा को चरणों से ताड़ित किया भग्ने ! वह में यह तुम्हारी साक्षी में तीनों ऋणों से मुक्त होता हूं ( मया, पितरौ, महतो) मुझ से माता पिता पीड़ित नहीं हुए अर्थाद जो पुत्र प्रत्युपकार नहीं करसकता वही मा वाप का हन्ता है । पयोग्रह को स्पर्श करे ( सम्पच, स्य, मा, भद्रेण, सम्पृक्तम् ) हे पयोग्रह संयोजक हो इसकारण मुझको कन्याण से संयुक्त करो। मुरा .
शुक्लयजुपंद। राह को परीकी-(विपना, स्य, मा, पापना, विपृटतं) हे सुराग्रह! तुम थियो जक होइनकारग मुझको पाप से अलगकरो ।। देवा रामनगन्या सेपजन्धिपजाश्विना । वाया सरस्वती भिषगिन्यापन्द्रियाणि दधाः ॥ १२ ॥ यहां से २० काण्डिका नामाका है संस्काररहिन रसको पानसे इन्द्र वन, वीर्य, गधानताको मुनि हरनिया राव जो गत दिन त्याजा मय को सुरा कहकर पाते हैं। उनके पगित होने में तो कुछ भी मन्देह नहीं भराएवं श्रुनि कहती है-(देवाः, पज, यां, अग्न्या ) देवतामाने इन्द्रो भोपाम्प सौत्रामणि यज्ञको विस्तृत किया (गिपना, मश्चिना, सावनी, वाचा, वीर्यागिण, दधनः) वैध अश्विनीकुमार और प्रपीकप सरस्वनी वाणीके द्वारा इन्द्र में, सामयं धारण कीगई ।। १२ ॥ द क्षार्थ उप शप्पणि प्रायणीयस्य तो.. योनि । यस्पंपळ सोर्मस्प लाजा सोमा शनी मधु ॥२३॥ ( शष्पाणि, दीक्षायै, तोकमानि, प्रायणीयस्य, रूप, लाजाः, यस्य, सोमध्य, रूप, मधु, सामांशवः) नए उत्पन्न हुए ग्रीहि इस यज्ञकी दीक्षा निमित्त अावश्यक होत नवीन प्रदजी प्रायणीय इष्टकारूप जानने स्त्रीले गोलीलये सोमका रूप है, गांठी खील सोमके खण्ड हैं ॥१३॥ आनिगरपम्मासम्महावीरस्य नग्न रूपमुप: " सदा मतिम्रो रात्री मुरा सुता ॥ १४ ॥ ( मामर, प्रानिध्यरूपम् ) शातिथ्यके निमित्त ग्रीहि श्यामाक लागा प्रादिमिनाहा चूर्ण ( नग्नहा. महावीरम्य ) २६ घासुमोका मिनकर वनाहुआ नग्न हु पदार्थ महावीरस्थानी है (निमः, रात्री:, पासुना, सुरा, उपसदा रूपम् ) नागा मभि. पारण किया हुभा सुरम उपमद नामक इष्टिका रूप है ।। १४ ॥ सोमस्य रू कीतस्प परिचुत् परिपिच्यते ।। , -- . .
१९ अध्याय ॥ अश्विभ्यांदरम्भमागिन्द्रन्द्रिय परस्यापा १५ (इन्द्राय, ऐन्द्र, भपन, सातत्या, भोगाभ्यां, दुग्ध परि-- युत, परिरीपच्या ) इन्द्र के निमित्त इन्द्रमम्बन्धी सीपध, सरस्वती और अश्विनीकुमारोंके लिये दहाएमा तुच अभिषु। महापथि रस सुसके संग सीन दिन साँवाजातहि वह (क्रीतस्य, सोमस्य, रूपम् ) ऋयकिये हुए सोमका रूप है अर्थात सोगके साथ परिपेक करने अश्विनी कुमार, गानो गौर इन्द्र के निामस भिन्न गकारके दूधी अवश्यकता है ॥ १६ ॥ आसन्दी गई राजासन्यै येथै कुममी संग. • धानी । अन्तर उत्तरउद्या रूपाकारोतरी भिपंक ॥ १६ ॥ (भासन्दी, राजासन्य ) यजमानके अभिषेक की चौकी सोग की. मचिकाका रूप है ( सुराधानी, कुम्भी, वेधै) सुरा रखनकी कालशी सोमकी दीका है (अन्तरः. उत्तरवेया, पम् ) दोनोवेदियोंका मध्यभाग उनादका प है (काशेवर,भिपक) मुरापावनकी चमनी इन्द्रकी श्रीपांचौ ॥ १६ ॥ चेया वेदिः समाप्य बर्हिवा चर्हिरिन्दूिपम् । यून पूर्व आप्त प्रतिो अग्गिाग्निना । १७ ॥ (घेया, वदिः, समाप्या) वरीमान बेदीके द्वारा सोमकी वेदी भलेमकार प्राप्त होती है (हिपा, बहिः, इन्द्रियम् ) वरी. मान कुशासे सोम सम्बन्धी कशामा हाती है नया वन प्राप्त होता है (गूपेन, यूपः, थाप्यरो ) वर्तमान मे माम सम्बन्धी यूप माप्त होगाह (अग्निना, गीत, भोग्नः ) वरीमान अग्नि से प्राणी नामक यति मात हालाह ॥ १७ ॥ इविन पश्चिगाना, यत्सरस्वती । इन्द्रा सैन्दु सदस्कृतमानीशालुवा पित्यः ॥ १८ ॥ ( यत्, भश्विना, दविन ) जो अश्विनी कुमार हैं यह इषि- धान है (यन्, साली, प्राग्नीधम्) जो सरलती है वह माग्नीध्र - - , शुक्लयजुर्वेद । है ( इन्द्राय, पेन्द्र, सदः, पत्नीशाल, कृतं. गाईपत्यः) इन्दके निमिरा जो इन्द्रकी देवताला स्थान पत्नीशाक नामक रचा. गया वह गाई पत्य है ॥१८॥ अपेतः मैपानांमोत्याप्रीमिंगप्रीज्ञस्य । प्रया- जेभिरनुयाजान्वपट्कारेभिरातीः ॥१९॥ (गैपभिः, मैपान्. श्रामोति ) भेजनेरूप पनामक यज्ञकर्मों से अपों को पाता है (आमीभिः, यास्य. मामी:) प्रयान याज्यों से यक्ष की प्रसन्न करनेवाली क्रियारूप प्रयाजों को पाता है (प्रयाजेभिः भनुयाजान ) प्रयाजों से उत्तम यज्ञकर्मकप प्रयाजों को, अनुयाजों से अनुकूल यज्ञ पदार्थरूप अनुपाजों को पाता है (नपटकारेमिः, अाहसी ) वषट्कारों से वषट्कारों को और याहुतियों से माहुतियों को पाता है ॥ ९॥ पशु पशूनामोति पुरोडाशयाच्या .. छन्दोभिः सामिनीर्याज्याभिर्वषट्कारान् ॥ १९ ॥ (पशुभिः, पशन, भामोति ) पशुभों से पशुओं को पाता है (पुरोहा :, हवापि, पामोति ) पुरोडाश नामक दवियों से इषियों को प्राप्त होता है ( बन्दोभिः, सामधेनीः) छन्दों से छन्दों को, सामनियों से सामनियों को प्राप्त होता है ( या. ज्याभिः, वषट्कारा ) याज्यों से पाज्यों को वषट्कारों से वपट् कारों को पास होता है ।। २. । धानी फरम्भः सर्कपः परीवापः पयो दधि । सोमस्य रूप हविपं आमिक्षा वाजिनम्मधु ॥२॥ (धानाः, काम्भा, सक्तवः, परीलापः, पयः, दधि. सोमप, रूपम् :) भुनेहुए धान्य खील, उदमन्थ, सन, हविप पंक्ति, ध, .. दही सोम का कप है । प्रामिक्षा, मधु, वाजिनं, हविपा) गरम * दूध में दही डालनेपर होनेवाला गाढ़ामागरूप प्रामिक्षा, शहत और भन्न हविका रूप है अर्थात् सोम की सामग्री है ॥२१॥ * धानानां रूपं कुर्वलम्परीणापत्य गोधूमः । - १९ अध्याय। है सतना रूपम्बदरसुवाका फरमास्य ।। २२ ।। (कुबल, धानानां. क) इस यज्ञ में कोमल बेर के फल पूर्वोक्त धान की खीलोका रूप हे (गोधूमाः, परीषापस्य ) गेहूं इविपंक्ति का रूप है (बदरं, सतना, क) पदरीफल सन्तुषों का रूप हैं ( उपवाकाः, करम्मस्य ) जो करम्भ का रूप हैं ।।२२।। पर्यसोपं यद्य नो रूपं कर्कन्धूनि। सोमस्य रूपं धार्जिन मौम्यस्य रपमामिक्षा ॥ २३ ॥ ( यत्. यवाः, पयसः, रूपं) नो यब हैं वह द्ध का रूप (कर्कन्धूनि, दध्मः, रूपं । बड़े बदरीफल दही का रूप हैं (वानिम, सोमस्य, रूपं) अन्न सोम का रूप है (आमिक्षा, सौम्यम्य: दपि मिला गरम दुध सोम में पकोहुए घर का रूप है ।। २३ ॥ आश्रावपति स्तोत्रियाः प्रत्पाधावो अनुरूपः । यजेत्ति धारपापम्मंगाया ये यजामहाः ॥२१॥ शास्त्रसम्पत्ति कहते हैं-(पाश्रावय, इरीि, स्नोत्रियाः) मुनामो यह शब्द सोसा है (मत्याश्रापः, अनुपः) पीछे सुनायाजाता है यह उार तीन ऋचापाले अनुवाक का रूप है ( यज, इति, धारपारूपं ) यजन-करो यह शब्द धाम्या का रूप है (येयजा- मदाः, प्रगाथा: ) येयजामहं यह शब्द पगाथा का रूप है ॥२४॥ अर्ट ऋचमुस्थाना रूपम्पदैरोमोति निधिः । पुषवः शस्त्राणां रूपम्पयंसर सोम आप्यते ॥२५॥ (भर्धचः, उपथाना, रूप, प्राप्यते ).पी ऋचाओं से उक्यों का रूप पायाजाता है ( पदैः, निविदः, सामोति) मत्येक पदों से न्यूंखों को पाता है ( प्रणवः, शहाणा रूप) प्रणवों से शस्त्रों का रूप पायाजाता है ( पयसः, सोमः) ध से.सोम : प्राश होता है ॥ २५॥ अश्विभ्याम्प्रातःसवनामिन्द्र पौन्द्रम्मान्दिनम्। ... वैश्वदेव, सरस्वत्या तृतीयमाप्तसर्यगम् ॥ २६ ॥ सबनसम्पतिको कहते हैं-(अश्विभ्या, :, सबनं ) मभिती . शुक्लपजुर्वेद । फुमारोंके द्वारा प्रातःसवन मिलता है (इन्देग. पेन्द्र माध्यनि- नम् ) इन्द्र द्वारा इन्द्रदेवतावाला माध्यन्दिन सपन प्राप्त होता है ( सरस्वत्या, वैश्वदेवं, गीय, प्राप्तम् ) सरस्वती के द्वारा विश्व. देवासा तीसरा सवन मास हुना अर्याद तीनोंकालमे इन देवतामों की भाराधना करनी चाहिये ॥ २६ ॥ वायव्यैवीयन्यान्यानोति सौन द्रोणकलशम् । कुम्भीभ्यामम्भुणौ मुते स्थालीभिः स्यालीरामोति॥ (वायव्यैः, वायव्यानि, पामोति ) वायव्य सोमपात्रों के द्वारा वायव्य पानोको पाताहै ( सनेन. द्रोणकलशम्) कलशको चलान 'के वेसके पानसे द्रोण भरके कलशको पाताई (कुम्भीभ्यां सम्भृणी सुते ) सौ छिदवाली झारी और दक्षिणाग्निपरके सुराधानी पान से पूसभृत् और माधवगीयको सोमाभिपव होनेपर,पाताहै (स्था लीभिः, स्पाली:, भानोति ) स्थालियों के द्वारा स्पालियों का माप्त होता ॥ २७ ॥ य भिराप्यन्ते ग्रहा ग्रहः स्तोमाश्च विटुंतीः । छन्दोभिरक्या शस्त्राणि साम्नांवभूध आप्यते॥१८॥ ( यजुर्भिः, ग्रहाः, पाप्यन्ते ) यजुमंत्री द्वारा ग्रह माप्त होते हैं ( ग्रहै, स्तोमा, विद्युनी:, घ) ग्रहों के द्वारा सोम और अनेकों प्रकारकी स्तुति सम्पन्न होती है (छन्दोभिः, उक्थाः, शस्त्रारिण) छन्दोस उक्य और कथन करने योग्य स्तुतियें सम्पन्न होती है (साम्ना अवभृषा, भाप्यसे । सामसे अवभृथ प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ इडाभिर्भक्षानामोति सूक्तवाकेनाशिषः शपुन पत्नीसंग्राजान्समिष्टयमुपा मयस्थाम् ।। २९॥ (इडामिा, भत्तान, पामोति) अन्गोंसे भक्ष्य पदार्थों को गाला १(क्तवाकेन, पाशिपः) सूक्तवाक्यों द्वारा भाशीर्वादोको पाता है । शंयुना, पत्नी संयाजान ) शंयुडोमस शंयुको और पत्नीसंपाज से पत्नीसंपानको पाताहै ( समिष्टयजुपा, संस्था ) यजुःसमूह " से संस्थाको पासलाई ।। १९ ॥
१९ अध्याय। (यत् ६ वृतेन दीक्षामांमोति दीक्षांमोति दक्षिणाम् । दक्षिणा श्रृद्धामामोति श्रदय सत्यमाप्यते ॥ ३०॥ (बोन, दीक्षा, श्राप्नोति ) हुनशेष भक्षणरूप चार रात्रिके प्रत से दीक्षाको पाता है (दीक्षया, दक्षिणां, पामोति) दीक्षासे दक्षिणा को पासाहै (दक्षिणा, अदा) दक्षिणा से प्रास्तिक्यबुदि को (श्रद्धया, मत्य, प्राप्यते) और आस्तिस्य बुद्धिरूपथदाकद्वारा सत्यस्वरूप परमात्माको पाताहै ॥ ३० ॥ प्रताबद्रूपं यज्ञस्य यहह्मणा कृतम् । तदेत- सर्यमामोति यज्ञे सौत्रामणी मुते ॥३१॥ ..देवैः, ब्रह्मणा, कृतम् )जो देवताओंने और ब्रह्मा प्रजा पनिन किपा (परस्प, एतावद, रूपम् ) उस यज्ञका इसना ही रूप है ( सौत्रामणीमुते, यशे. रात्, एतत्, सर्प, नामोति) सौत्रा- मारण प ज में पुरासोमका अभिपवण होनेपर वह यह याग संपूर्ण प्राप्त होता है । अर्थात् जो मद्यपान करतेहैं वह भ्रष्ट होजाते उनका रोज बल बुद्धि नष्ट होजाताहै, जैसे कि-स्वर्गके भधिपति इन्द्रका • जातारदा, तब वह सौग्रामाणके द्वारा चिकित्सा से ठीक हुआ, इसकारण पुरुपको चाहिये कि-मद्यपानादि नीचकर्मोंसे वचै यही इस प्रकरणका औपररूप उपदेश है ॥३१॥ सुरवन्तम्बाहपर्दछ सुवीर यज्ञ हिन्वन्ति महिपा नमोभिः । दधानाः सोमन्दिवि देवता सुमंटेमेन्दं यजमानाः स्वकोः ॥ ३२ ॥ इसका है मचि ऋ, त्रि० छ०, अग्नि सरस्वती इन्द्र दे० हैं। अवयु होम करै । मंत्रार्थ-(नमोभिः, दिषि, देवताम, सोम, देवानाः, महिपा.. वापर, मुरायन्स, मुनीरं, यज्ञ, हिन्वन्ति ) नमस्कार वा अन्नों के द्वारा स्वर्ग में स्थित देवताओं में सोम को धारण करते हुए महान ऋत्विज कशासनपर बैठेहुप देवताओं से युक्त सुरारसवाल भौर जिसमें श्रेष्ठ ऋत्विज है ऐसे सौत्रामाण यज्ञ को माप्त कराते हैं। इस यज्ञ में (स्वर्काः, इन्द्रं. यजमाना, - - शुक्लयजुर्षद। मनार्थ-( सोम्यासः, पितरः, शनायुपा, परित्राण, मा. पुनमा ) सौम्यमूत्ति पितर पूर्ण श्रायु दनवाले पवित्र से मुझको पवित्र करें (पितामहाः, मा, पुनन्तु ) पिनाम मुझको पवित्र कौ ( प्रपि. तामहाः, पुनन्तु ) प्रपितामह पवित्र का ( पितामहाः, शनायुपा, पवित्रण, मा, पुनन्नु) पिना के पिना शनायु देने वाले पनि से गुझे पवित्र करें (प्रपितामहाः, पुनन्तु ) प्रपितामह मुझको अति पवित्र प्रानन्दयुक्त सौ वर्ष की भायुसे पवित्र करें । विश्व, श्रायु, व्यश्नर ) इसाकार मैं संपूर्ण श्रायु को पाऊँ ॥ ३७ ॥ अग्न आयपि पवम् आसुयोर्जमिपंञ्च नः । आरे वधस्य दुच्छुनाम् ॥ ३८ ॥ इसका प्रजापति ऋ०, गाय० छ०, अग्नि दे. है। मंत्रार्थ- (अग्ने, मायूपि, पवसे) हे भान ! नुम भापही आयु भातराने- वाले कोको करतहो (नः, इपं, ऊन, मासुत्र) दमको धान आदि भाग श्रादही मादिरस दीजिये ( पारे दुग्छुवां, वाघस्त्र) टूर स्थिम दुए नोंकी समान दुर्जनों को बाधां दो, जिससे हम उन के माममाणस व ३८ ॥ पुनन्तुं मा. देवजनाः पुनन्नु मनमा धियः । पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि मां ॥३९॥ इसका वैखागस ०. मनु छ°, देवजनीविश्वभूगजातवेदस दे हैं। मंत्राथ-( देवनगा, मा, पुनन्तु ) देव नुगामी भक्तजन मुझको पवित्र कर (मनसा. धियः, पुरन्तु ) मनसहिग बुद्धि वा मनको पवित्र क( विश्नानानि. नन्तु ) सकन पाणी पझको पनित्र करें (जारावेदः, मा, पुनीहि ) हे भरने ! तुम भी मुझको पवित्र करो ॥ १९॥ पुषिण पुनीहि मा शुनगं देव दीयंत् । अग्ने मान्या ऋतुर ॥ ४० ॥ इसका प्रजापति ऋ०, गाय० २०, बांग्न दे० है । मंत्रार्थ (देव, अग्ने, दीयत्. शुक्राणु, पवित्रण, मा. पुनदि) हे देच १२ अध्याय । .: अग्ने ! दीप्तिमान तुमशुद पवित्र से प्रार्थव शुद्धज्योग के द्वारा मुझको पवित्र करो (असून, अनु, कत्वा) हमारे यज्ञको देख- कर माने जननादिकमास पवित्र को ॥ ४० ॥ यो पचिनर्षियग्ने वितिमन्तुरा । ब्रह्म सेन पुनातु मा || ११ ॥ इसका मनापति ऋ० गयात्री छ, प्रमाग्नि दे. है। मंत्रार्थ (अग्ने, से, अधिपि, अन्नग, यत्, यम, पवित्र, विराग, रोग, मा, पुनातु ) हे अग्ने ! तुम्हारी बालाके गध्यमें जो कमीका शुद्ध प्रम विस्तृग है उसके प्रभावस मुझको पवित्र कगे ॥४॥ पर्वमानस्सो अयन: पित्रेण घिपणिः । यः पोता स पुनातु मा ॥ ४२ ॥ इसका प्रा० ०, गाय० छ०, वायु देवगा है । मंत्राथ- ( यः, विचार्पिणः, परमानः, ना, पोरा ) जो देव किये न किये को जाननेवाला स्वयं पवित्र और दूसरोंको पवित्र करने वाला है (सा, अद्य, पवित्रण, मा, पुनातु ) वह आज पनित्रसे मुझे पवित्र कर ४६॥ साभ्यन्देिव सथितः पुषिण मधे च । माम् नीहि विश्वतः ॥ ४३ ॥ इसका जापति० ० गाय० छ०, ० है। मंत्रार्थ- (देव, सवितः, उगाभ्यां, पवित्रण, न, सेवेन, मा, विश्वमः, पुनीहि ) हे देव सर्वक प्रेरक ! तुम, दोनोसे अर्थात् शुद्ध करनेवाले पवित्र के द्वारा और नाशाके द्वारा मुझको सब ओरसे पवित्र करो क्योरि-तुम्हारी माज्ञास यज्ञसिदि हाती है ।। ४३ ॥ वैश्वदेवी पुनती देव्यागावस्यामिमा वहव्यस्त- न्बोवीनष्ठाः । तया मदन्तस्सधमादेषु वय, स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ४४ ॥ इसका पजाप० प्र०, त्रि०,०, वैश्वदेवी देहै । मंत्रार्थ-. (देवी, पुनती, नैश्वदेवी, आगला) नामामकारके शवलासे क्रीमा . - - . . " शुक्लयजुषेद । करनेवाले महानारायणकी शक्ति, पवित्र करतीहुई, विश्वमरको प्रकाशित करनेवाली परानामक प्राप्त हुई ( यस्यां, इमा, वहयः रान्वः, नागपृटाः )जिसमें दीखोप यह वासे शरीरधारी स्तुति करनेवाले हैं (नया, सदमाघेपु मदन्ता, पर्य, रयीणां, पाया, स्थाम) उसपराशक्तिसे यज्ञस्यानाम आनन्द पाते हुए हम धनों के स्वामीहों ये समानाः समनमः पितरौ यमराज्य ।तेपी. स्लोका स्वधा नमो यज्ञो येपुं कल्पताम् ।। ४२ ।। इसका गना० मा. अनु० छ०.पितर दे० है । प्रासव्य दक्षिण मुख होकर यजमान एकवार लिये घृतको जुहसे अग्निमें होमै । मंत्रार्थ-(ये, समानाः, समासः, पितरः, यमराज्ये ) जो जाति' मर्यादा आदिसे समान सपिण्डीपतर यमलोक में वर्तमान हैं (रोपां लोकः, स्वधा, नमः, यज्ञः, देवेषु, कल्पताम् ) उन पितरोंके लोक में स्वधा नामक अन्न दृष्टिगोचर हो अथवा स्वधा अन्न और नम- स्कार प्राप्त हो, पितृयज्ञ चसु रुद्र श्रादित्य देवताओं को तृप्त करने में समर्थ हो ।। ४५॥ ये सममानाः तीनसो जीचा जीयेयु मामकाः . तैपा भानयि कल्पतामस्मिल्लोके शत, समः॥ इसका मजा०म० अनु० छ०,श्री दे० है । यजमान उपीती होकर उत्तरवेदीमें याहुति देय मंत्रार्थ-(ये, जीवे पु,समानाः, समनसः, मामाकाः,जीवाः) जो प्राणियोंमि समदर्शी मनस्वी हमारे सपिए ह पितर है ( तेपी,श्री,अस्मिन. लोके,शत,समाः,मयि, कल्पताम् ) उगकी लक्ष्मी इस भूलोक सौ वर्ष पर्यन्त मुझमैं रहै ॥ १६ ॥ देसृतीभृणवाम्पितृणामहन्दवानामुप्त मत्या नाम् । ताभ्योमिदं विश्वमेजरसमति यदधरा पि- सम्मातरञ्च ॥१७॥ इसका प्रमा० प्रा०. त्रि० छ., देवपान पित्यान मार्ग दे है दुधका होम करै । मंत्रार्थ-ई, माना, देवानां, उत, पितृणां दे, सुसी, प्रणवम् ) मेने मरणधर्मी प्राणियोंके देवताओंके शौर . 1 १९मध्याय . पित एमन करनेयोग्य दो मागको सुनाई (यव, पितरं, र, मासर, भनारी, पद, पजतः विश्व, साभ्यां, समेखि) जो पुलोक और भलोकके मध्य में वर्तमान है. यह क्रियावान जगद उन दोनों मासे प्राप्त होगाई ॥१७॥ दर्थ हुषिः प्रजननम्मे अस्तु दश वीर सर्व गण स्वस्त । आत्मसान प्रजासनि पशुसनि छोफसन्यभएसनि अग्निः पूजाम्बहुलाम्मे क- रोत्वन्नम्पयो रेतों अस्मासु धत्त ॥४८॥ इसका मजा० ऋ०, व्यवसानापि, यजमानाशी दे है। द्ध पिप । मप्रार्थ--(इदं प्रजनम दशवीरम् ) यह प्रजाको उत्पन्न करनेवाला गया दशमाण और दश इन्द्रियोंको उन्नति देनेवालाई (संवेग) सप अशोको पुष्टिदाता (प्रात्मसीम) यात्माका प्रसन्न क (प्रशासन) प्रनाको उन्नतिदाता (पशुप्समि) पशुद्धि- कारी (लोकसनि ) लोकमे मलिष्ठादायक (अभयसाने ) वळ, देकर समयकरनेवाला( हविः, मे, सस्तये, अस्तु)यह दवि मुके करपाणदायक हो (अग्निः, मे, मजा, बहुला, करोतु ) अग्नि देवसामेरी मनाको बहुत कर (प्रस्मासु, अन्न, पया, रेतः, पप) हमारे विमन्न, दूध और वीर्यको धारण करै ॥ ४८ ॥ दीरतामधर उत्पराम जन्मदहमा पितरःसो. भ्यासः । असु य ईयुखिका ऋतूज्ञास्ते नौवन्तु पितरो हर्वेषु ॥ ४९॥ इसका शंख ऋ०, त्रि. ७०, पिसर दे० है । पिसरोंका उप- स्थान करै। मंत्रार्थ-(अबरे, उद, परासः, उवामध्यमाः, सोम्पासा, उदरताम् ) इस लोकमें स्थितं पितर और परलोक में स्थित पिगर और मध्यलोक में स्थित सोमभागी पिसर ममसे ऊपरके लोकको माहा हों ( ये, मो, ईयुः, से, प्रकाः, तज्ञाः, पितरः, इप, ना भयातु ) जो पित्तर प्राणरूपको प्राप्त बदं शभुरहित होगे निरपेस सत्यके दामा, स्वाध्यायनिष्ट पितर भाइवानों में हमारी: V , शुक्लयजुर्षद। रक्षा करें ॥१९॥ महिरसो नः पितरोनग्या अर्धर्षाणो गवः- सोम्पास तेषां उप मुमती गझियानामपि भने सौमनसे स्याम ॥ ५॥ इसका शंख ऋ० वि० त्रि० छ०, पितर दे० है । मंत्रार्थ-(नर. अवा,सोम्यासः, अंगिरसः, भयाणः भृगवः, नः, पितरः ) स्तुति के योग्य मा नबीनगतिवाले, सोमेसम्पादक. ङ्गिरावंशी अघर्ष वंशी, भृगुवंशी हमारे पितर अर्थात् मो इसममय पितृनोक धाम को पास हुपरें (रोषां, यज्ञियानां, सुमको, भद्र. सौमनस, अपि, वर्थ, स्याम ) उन यज्ञमें पूजनीय पितरोंकी मुन्दर -बुद्धि में तपा कल्याणकारक सुन्दर मन में भी हम हों अर्थात् इनकी बुद्धि और मन हमारा कल्याण करने में लगे ॥ १०॥ ये नः पूर्व पितरः मोम्पासोऽनहिरे सोमपी वसिष्ठाः । तेनियम संघाराणो हपीथप्यु: शन्नुशद्भिः प्रतिकाममनु ॥ ५१ ।' इसका शंख ०, नि० मा० उ०७०, पितर दे० है। मंत्रार्थ- (ये, सोम्पासः, पशिष्ठाः, नः, पूर्वे, पिगरः, सोमणीयं, अनूहिरे) जिन सोमसम्मादक वशिष्ठवंशी हमारे पूर्व पितरोंने सोमपान के निमिरा देवताओं का आवाहन-किया था, वह ही इससमय सोम. पानके निमित्त आमंत्रित हुप हैं ( उशन्, यमः, रोभिः, उद्भिः, संगणे, प्रतिकाम, पि, भत्तु ) सोमकी इच्छावाला पिछ: पति उन सब पितरोंके सहिग प्रसन्न होलाहुमा हमारी दीहुई हवियोंको यथेष्ट भक्षण करै ।।५१ ॥ स्वधं सोम प्रचिकितोमनीपा व रजिष्ठम- नुनेपि पन्याम् । तप प्रीती पितरों न इन्दो देवेषु रमभजन्तु धीराः॥५२॥ इसका शंख , मामी १००, पितर दे० है । मंत्रार्थ (सोग, त्वं, मचिकिस हे सोम ! तुम कान्तियुक्त वाचेतनसा- " - : १९ अध्याय च:) युक्ताहो (त्व, मनीपा. रजिष्ट्र, पन्या, अनुष ) तुम मपनी चुदिके द्वारा यतिसरल देवयानमार्गको माप्त करारोहो ( इन्दो, ना. धीराः, पितरः, तव, मणीसी, देधेपु, रत्नम्, अमजना) हे सोम ! हमारे धैर्यवान् पिसरोंने तुम्हारे पाश्रयसे देवताओं में श्रेष्ठ यह फलको पाया है ।। ५२.॥ त्वया हि नः पितरः सोम पूर्व कम्माणि चक्रुः पयमान धीर धन्वनघांतः परिधीरपौणुहि । धोरेभिर धर्मघों भयानः ॥ १३ ॥ इसका शंख ऋ०, पापी त्रि० सोम दे० है। मंत्रार्थ- (पवमान, सोम, नः, धीराः, पितर त्वया, कर्माणि, हे शुद्ध करनेवाले सोम ! हमारे धीर पितरों में तुम्हारे द्वारा यज्ञादि कमों को किया. इसकारण मार्थना करते हैं कि-(वन्धन, भवासा, परिधीन, अपोर्णहि.) इस कर्म में लगेहुए वारा मादि के उपद्रवों से रहिरा तुम उपद्रवकारियों को दूर करो ( वीरेभिः, अवैः, नः, मघवा, भाभव ), वीर भवों के द्वारा हमको सब ओर से धन देनेवाले हजिये ॥ ५३ ।। त्य सौम पितृभिः संविद्वानोऽनु थाधिषी आतंतन्धः। सस्मै ते इन्दो हविषा विधेम वय स्पाम पतयो रयीणाम् ॥ ५४॥ इसका शंख , नि० ग्रा० ००, पिसर द० है। मंत्रा (सोम, पिसृभिः, संविदाना, त्वं, घावापृथिवी, अन्वारान्थ ) हे सोम पिगरों के साथ सम्बाद करतेहुए तुमने स्वर्ण और पृथिवी को विस्तारित किया है (इन्दो, सम्मै, से, हरिपा, धिम ) हे सोम ! उन तुम्हारे भर्य हविक द्वारा विधानकर हैं (वयं, रयीणा, - पतयः, स्याम ) हम धेनों के स्वामी हो ॥ ५४॥ विहिपदः पितर ऊत्यगिमाधो हव्या चंकृमा- जूपद्धसम् । त. आगतामा शन्त मेनाथाश पोररपो दधात ।। ५५ ॥ .
इसका शंख शुक्ल यजुर्वेद । इसका मध्यादि पूर्ववत है। बाईपद पितरोंका उपस्थान । मनार्य (सपिपदः, पिताः,से, उत्पा,भाकामागत)ोकुशासनपरविराजमान होनेवाले पितरों! वह तुमरसा निमित्त कल्याण बुद्धिसे समीप भाइये (पः, इमा, हव्या, पकम) तुम्हारे यह हावि हमने संस्कृत किये (प्रामपध्यम् ) सुम हमको सेवन करो (अथ, शन्तमेन, अवसा, ना, शयो।, परपः, दधात) और परमसुखदायक अन्न सेतृप्त होकर हमको मुख,पभय और पापका प्रभाव धारणकरो५५ आइपिरहन्मुघिदनान् भवित्मि नपातञ्च विक्रमणञ्च विष्णो:बाहिपढोये स्वधा सुतस्य ! : जन्त पित्वस्त हागमिष्ठा ॥५६॥ प्रापी नि• P०, पितर दे० है । ममाप- (मई, सुविदमान, पिहन, प्रावित्ति) मैं कल्याण देनेवाले पितरोंको भाभिमुख जानता हूँ ( विष्णोः, मपातं, घ, विक्रमण, घ, ये, बापदा, पिसरः, स्वधया, सुरास्य; पित्या, भजनो, से, भागमिष्ठाः ) व्यापक और मंध्युत देवपाम मार्गको और अनेक प्रकार के गमनवाले कि-जहांसे लौटकर पाना पड़ता है . उस पिवयान मार्गको मैं नामसा हूं जो मुशासनपर बैठनेपाल पिसर स्वधा मनके साथ भाभिषुप्त सोमपानको सेवन करते हैं वह यहाँ मागमन करें।। ५६॥ एपद्ताः पितरस्सोम्यासाँवहिप्येषु निधि' पुगेषु । त आगमन्तु त ह ध्रुवन्त्वधिध्रुवन्तु । सेघवस्मान् ।। ५७ ॥ इसका शंख ऋ०,मुरिगाषी पंक्ति छ०, पिवर दे है। मंत्रार्प (पितरः इह, प्रागमन्तु ) हे पितरों इस यज्ञम भागमन करो, (प्रियेषु, परिष्येपू, निधिषु, उपहूताः, सोम्यासः, से, ध्रुवन्तु ). प्रिय कुशाोंपर स्थित निधिकी समान स्थापिस इषियोंके निमित्त मुलायहुए जो सोमके योग्य पिरार हैं, यह हमारे भावाइनको सुने (ते, भधिभुवन्त, से, भवन्तु) मह पितामाको पुनाते जो कामा . - १९ अध्याय ५४९ A- 1 . चाहिये सो कहैं. वह हमारी रक्षा करें ।। १७ ।। मायन्तु मः पितरस्मोम्पासोग्निप्यासा पुधि- नियमानः । अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदनाोभि. वन्तु सेवन्तस्मान् ॥५८॥ इसका शव प्रस० ब्राह्मी गाय छ ०,पिना दे है। अग्नि- प्वात्त पितरोंका उपस्थान करें। मंत्रार्थ-(सोम्यासः, अभिनयाताः मः, पिसरः, देवयानः, पथिभिः, भायन्तु ) सामो योग्य दिन करके स्वादिरा हमारे पिगर देवयान मागास शांचे (स्मिन्, यडे, स्वपया, मदन्तः, अधिवुवन्तु, से, अस्मान, भवन्तु ) इस यक्ष स्वधानाम भनसे प्रसन्न होते हुए मानसिक उपदेश दें और हमारी रक्षा करें ।।५८॥ अग्निप्वाता पिता एड गच्छत सदः सदः । सदत सुप्रणीतयः । असा हुवीपि प्रतानि .. बर्दिया रविध सवारन्दधातन ॥ ५९॥ इसका शंख , नि० प्रा० अनु० छ०, पितर दे० है मनार्थ (अग्निवासाः पितरः, इह, मागत ) हे अग्निप्वात, पितरो हमारे इस यज्ञमें भाओ (सुपणीयः, सा, सदा, सारा ) दर. नीतिकाले तुम प्रत्येक सभात्यान में विराजो (वहिपि, अयतानि, हपि, भा, अत्त) मुशायॉपर नियमसे प्यापित हधियोंको सब प्रकार से भक्षण करो (अथ, सर्मवीर, रपि, मादधातन ) और सकल वीर पुत्रादि नया धनको संघारसे लाकर यापनकरो ५९ ये अग्निध्यात्ता ये अनग्निप्याना मध्ये दिवा 'स्वधा मादयन्ते । तेभ्यः स्वदमनीतिमेतां .यथायशन्तन्यङ्कल्पयाति ॥ ६॥ इसका शंख १० ग्रा6 उ०० पिसर देहै। मंत्रार्थ- (ये, अग्निष्पाता ये, अनमिनाताः, दिना, मध्ये, स्वधया, मायको.) जिन पिता पिक अनिदाद कर सोध्यो- हिक कर्म हुमा और जिनका मानिसंदाइ नहीं हुमाद और ध., . . + ।
शुक्लयजुर्वेद ।
लोकमें अपने उजित कर्मफे भागसे प्रसन्न रहते हैं ( सराट्, रोभ्यः
यथावकाशं, पगान, अनीति, सन्यं, कल्पयाति) स्वापति धर्म-
राज उन पितरोंको इच्छानुमार इस मनुष्य सम्बन्धवाले मारण
युक्त शरीरको देता है, अर्थात् यमकी मालासे उनको स्वकर्मानुसार
पवनाश्रिय शरीर मिलता है और वह अपने पुरादिक शास्त्रोक्त
भाबादन में जाते, उनकेनिमित्त दियाहुआ अन्न विश्वेदेवानों
के द्वारा मूक्ष्मभावसे प्राप्त होताहै ॥ ६ ॥
अग्निप्वात्तातुमतों हवामहे माराधसे
सोमपीधं य आशुः। ते ना विप्रासःमुहवा भवंतु
आप स्पाम पतयो रयीणाम् ।। ६१ ॥
इसका शंख ऋ०, पापी त्रि०, छ०, पिस दे हैं। मंत्रार्थ-
(अतुमगः, अग्निप्वात्तान, हवामहे ) ऋतुमान अग्निप्वात्त
नामक पितरोंको हम चुनासे हैं (ये,नाराशंस, सोमपीय, भाशुः)
जो पिनर चमसपात्र में सोमपान को भोजन करते हैं (रो, वि.
मासः, ना सुहवाः, भवन्तु ) वह वेदाध्ययन सम्पन्न पितर हमारे
सुखसे बुनान पोय हो ( प; रयीणा,परायः, स्याम ) हम धनों
स्वामी हों ॥६॥
आच्या जार्नु दक्षिणतो निषोमं यज्ञमभिगृणीत
विश्वै । मा हिसिष्ट पित्तरः केनचिन्नो यह
आर्ग: पुरुपता करीम ॥ ६२॥ .
इसका शंख प्रा०. नि. त्रि० छ०, पितर देवता है। मंत्रार्य--
(पितरः, विश्वे, जानु, प्रामाच्य, दक्षिणन:, निषय, इमं यज्ञ,
अभिगृणीत ) हे पिगरों ! तुम सब बामजंघाको सरकार झुका
कर दक्षिणमुख बैठकर इस पनकी प्रशंसा करो ( केनचित,
मा, हिसिष्ट ) चिनकी चंचलगावश किसीमकारका अपराध होने
से हमारे कार क्रोध मग को (यत् पुरुपता. कः, भागः, वयं,
कराम ) क्योंकि मनुष्य स्वभाववश तुम्हारामपराध हमसल
से बनजाता है, उसको क्षमा पारना ॥ ६२ ॥
११९ अध्याय - " आसीनासो अरुणीनामुपस्थै यिन्यत्त दारापे माय । पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य स्वः प्रयच्छत स होजन्दधात ॥ ६३ ॥ इसका शंख , मा० उ० छ०, पितर दे० है । मंत्रार्थ- (पितरः, अरुणीनां, उपस्थे, भासीनासः, दाशुपे, माय, रवि, धत्त) पितरों ! लालउनके भासनोपर वा अरुणवर्ण मर्यकी किरणों में स्थित सूर्यकोककी गोदमे बैठेहुए हविदनेवाले यजमान को धनदो (पुत्रेभ्यः, सस्य, वसुनः, मपच्छत ) इसके पुत्रोको इसका-धनदो (रो, इ, ऊन, दधात) वह इस यजमानके यज्ञमें यानन्दरस दें॥ ६३ ॥ यमग्ने व्यवाहन त्वञ्चिन्मन्यसे पिम् । तन्नों गाभिः धुवापन्देवनापन या युजम् ॥ ६४ ॥ इसका शंख ऋ०, पापी अनु० छ०, अग्नि दे० है। मंत्रार्थ (कव्यवाहन, अग्ने, त्वं, चिंच, य, गर्षि, मन्यसे.) हे पितरोंको अन्न पहुँचानेवाले भग्ने ! तुम भी जिस हविरूप धनको उम जानसे हो (नः, संगीमिः, अवाययं, युनं, देवत्रा, मापनय ) हमारे उस वपट्कार आदि वाणियों से सुनने योग्य उचित इषिको देवता- ओंके अर्थ सब ओरसे पहुँचामो ॥ ६४ ॥ यो अग्निः कन्यवाईनः पितृन्यक्षताः। प्रेवु च्यानि चोचति देवेभ्यश्च पिनभ्य आ ॥६५॥ इसका ऋ० श्रादि पूर्ववत है। मंत्रार्थ-(यः, कव्यवाहनः, अग्निः प्राधः, पितृन्, यक्ष ) जो कव्य पहुँचानेवाला अग्नि सत्य वा यज्ञको बढ़ानेवाने पितरोंका यजन करताहुआ (उ इद देवेभ्यः च, पितृभ्यः च्यानि, श्रा, पवोचति ) वहीं अग्नि देवतामोंके और पितरोंके अर्थ इवियोंको सब भोरसे नालासाहै ॥ ६५ ।। त्वमग्न ईडितः कव्यवाहनावाढढव्यानि सुर- भौणि कृषी । प्रादा पितृभ्यः स्वधा ते अक्ष- नदि स्वन्दैव प्रपंता हर्वपि ।। ६६॥ - " . . - शुक्लयजुद । इसका शस्त्र बल, नि. नि. छ:, अग्नि,३० हैमंत्रार्थ- (कव्यवाहन, भाग्ने, ईडितः, त्वं, दव्यानि, सुरभीणि, कृस्वी. अ- बाद ) हे कन्य पहुँचानेवाले प्राग्नदेव ! महात्वजोंसे स्तुति किये हुए तुम हवियों को मनोहर गन्धयुक्त करकै पहुँचासे हो (स्वधया पितृभ्यः, मादाः) पितृमंत्रोंसे पितरोंको दो ( रो, अ) उन पितरोंने भक्षण किला (देव, स्वं, मयगा, हवींपि, अद्धि ) हे देव! तुम शुद्ध हांचोंको भक्षण करो ॥ ६६ ।। ये चह पितगे ये च नेह यांच विम यान् उ च न प्रविध । त्वं चैत्य यति ते जातवेदः स्वधाभि- र्यज्ञयं सुकृतम्जुषस ।। ६७ ।। इसका शंख F०, मा० उ००, भग्नि दे० है। मंत्रार्थ-(ये, पितरः इह, च,इह,न)जो पितर इस लोकमें हैं।जो पिता इस लोकमें नहीं, अर्थात स्वर्गमें हैं, (च,यान, विधः, च, यान, न, प्रविमः। और जिन पितरोंको हम जानते हैं, और जिनको स्मरण न होनेसे नहीं जानते हैं ( जानवेदः, से, यति. त्वम्, उ, वत्य ) हे भग्ने ! वह पितर गितने हैं तुम ही जानते हो ( स्वधामिः, 'गुकृतं, जुपस्व) पितरों के यज्ञद्वारा श्रेष्ठ भन्नको सेवन करो।। ६७ ॥ इदम्पतृभ्यो नमो अस्त्यय ये पूर्वी सोय उप. रास ईयः। ये पाथिये रजस्यानिपं ये या नून सुवृजनामु विक्षु ।। ६८ ॥ इसका शंख , मा० ० ०. पिसर दे० है । मनार्थ- (भय, इदं, नमः, पितृभ्यः, भातु)माज यह मन पितरोंके नि- मिन हो (ये, पूर्वासः, ये, उ, परासः, ईयः) जो पहिले सर्गमेशा पुके जो कनकत्य होकर परग्रह्मको मास हुएहे (ये, पार्थिवे. रजः, मिपना ) नो पृथिवी पर होने वाली भनिनरूप पोशिमें स्थित वा वर्गम स्मि (वा, ये, नूनं. सृजनामु, विक्षु) अथवा जो पिरार भवश्य ही धर्मप बनयुक्त मनाओं में. देह धारण किये समान है, उन पितरों के निमि। हम भान । अथवा । . - १९ अध्याय . " . जो (पूर्वासः) यजमानचे पूर्व उत्पन्न ज्येष्ठ भ्रातपितामहांदि (ईयुः) पितृलोकको मातहुए हों, जो. (उपरासः) यजमानका जन्म होनेके उपरान्त उत्पन्न हुए छोटे भ्राता पुत्र आदि पितृलोक को मासहुए हैं (पार्थिवे, रजसि, पानिपता) रजोगुणकार्यमें हवि स्वीकार करने को पाकर बैठे हैं उनको थाहुति देते हैं ।। ६८॥ अधा यथा नः पितरः परासः पुत्नासौं अग्न तमाशुपाणाः । शुचीदयन्दीधितिष्ठकथशासः क्षामा भिन्दन्तौ अमणीरपनन् ॥ ६९।। इसका शंख म०, श्रा०वि० छ, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ (अग्ने, नः, परासः, प्रत्लासः, ऋतं, पाशुपाणाः, पितरः, यथा प्रधा, शुचि, दीधिति, इत्. अयन ) हे अग्ने ! हमारे उत्तम पुरा- सन यज्ञको. पानेवाले पितर जैसे देयात्राके अनन्तर निर्मलका- शिवाले सूर्यमण्डलरूप देवघानमार्गको ही माप्तहुए (उक्यशासः, सामा, भिन्दन्तः, अरुणी, अपवन यशो में शस्त्रनामक स्तोत्रीको पढनेवाले और पृथ्वीको चेदी के निमित खोदतेहुए अर्थात् सब सा- मग्री से यज्ञ करतेहुए हमभी सूर्यसम्बन्धीज्योतिमार्गको पावै ६९ उशन्तस्त्वानिधीमधुशन्तः समिधीमहि। जुश- न्नुशत आवह पितॄन्हविषे अतवे ॥७॥ इसका शस्त्र प्र०, अतु. २०, अग्नि दे० है । मंत्रार्थ (उशन्तः, वा, निधीमहि ) हे अग्मे ! तुम्हारी इच्छा करतेहुए हम तुमको स्थापन कररोहैं ( उशन्तः, समिधीमहि ) यज्ञकी इच्छासे तुमको प्रज्वलित करते हैं ( उशन, उशतः, पिन्, हरिप, अत्तवे, भाघह) चाहते हुए तुम हघि चाहनेवाले पितरोंको हचि भक्षण करने के निमित्त पुलामो ॥ ७० ॥ अपाम्कनेन नच्चे शिर इन्द्रोवर्सया विश्वा यदर्जयः स्पृधः ।। ७१ ॥ इसका शंख ऋ०, गाय० छ०, इन्द्र दे. है। मंत्रार्थ ( इन्द्र, यद, विश्वाः, स्पृधः, यजयः.) हे इन्द्र जब तुमने संपूर्ण संग्राम - - ५५४ शुक्लयजुवेंद। मोसे (अपां, फेनेन, ममुचः, शिरः, उर्द्धयः) तव जोंके भाग से मनुचि दैत्यका शिर फाटा भर्थात् पापाप नमुचिको मारकर पल धारण किया ।।७१॥ सोमो राजामृत, मुत पुँजीपेण जहान्मृत्युम तेन मत्पमिन्द्रिय विपान शुभमन्स इन्द्र- स्पेन्दूिधमिदम्पयोमृतम्मधु ॥ ७२ ।। इसके अश्वि-सरस्वती-इन्द्र ०, महाहहती छ, सोमदे० है। यहां से पयोग्रहका उपस्थानक मनार्थ-(मुतः, राजा, सोमा, अमृतम् ) अभिपुत वनस्पतियों का राजा सोम. अमृतरूप होता है (भाजीपेण, मृत्यु, अजहाद ) नीरस स्थूल सोमलगाके चूर्णसे स्यूनभागको त्यागा भर्याव स्थूलभागको अलग करने पर यह रस- भाग- अमृतरूप है (ऋसेन, सत्य ) इस सत्यवा यद्वारा सत्य- रूप परमात्माको नाना (इन्द्रस्य, इद, भन्धसः, शुक्रं. इन्द्रिय, पिपाम, इन्द्रियं, अमृतं, मधु, पयः ) इन्द्रका यह अन्न वा सोम सम्बन्धी शुद्ध पिदायक पान बलकारक अजर अमरता देने- बाला मीठा दूध है ॥ ७२ ॥ अड्या क्षीरं व्यपियाड्डा जिएसो. धिया । वृतेन सत्यमिन्द्रियं विपान शुक्रमन्धम इंद्र- स्वेमिट्टपमिदम्पयोमृतम्मधु ॥ ७३ ।। इसका प्रापि छन्द पूर्ववत् और ग्रह देवसा है । मंत्रार्थ- (पानिरसः, द, पिया, घनघः, सीरं, भापिबत् ) हो के रस को माण ऐसे पीता है, जैसे हंस बुद्धि के द्वारा जलों में से ध को पीता है (पावेन, सत्य, शेष पूर्ववत् ). इस सत्य से सत्स जानाजासा है, शेप पूर्व मंम की समान, जानना ।। ७३ ।। सोममदापो व्यपिवच्छन्दसा हसाशंविषत् । प्रतेन मत्यमिन्द्रियं बिपान. शुक्रमन्धम इन्द्रस्येन्न्यिमिदम्पयोमृतम्मधु ।।७४ ।।. इसका अप्पादि पूर्ववत् मित्रार्प-(शुचिषत्, हंसः, अद्भधा, .
१९ अध्याप। छन्दसा, सोम, व्यापियन ) निर्मल भाकाश में विचरनेवाले मादित्य ने जल मिले सोम को जलों में से वेद के द्वारा वाहिरणों के द्वारा अलग करके को पिया । शेष पूर्ववत् ॥ ७४ ॥ अनोत्परिनतो रसम्ब्रह्मणा व्यपिबरक्षत्रम्पयः सोमभापतिः । ऋतेन सत्यमिन्दियं विपान शुभमन्धन इन्द्रस्येन्द्रियमिदम्पोमतम्मधु ॥ ७५ ॥ इसका ऋषि अश्वि--सरस्वती-इन्द्र, 'भतिजगणी छन्द, प्रह देवता है। मंत्रार्थ-(प्रजापतिः परिसुतः, अनार, रस, सोमर, पयः, विविष्य, व्यपिषद) प्रजापति ने परिसुस भन्न से रसरूप सोमरूप ध को गायत्रीलक्षण से विचारकर पिया (स) सप्रिय को वश में किया। शेष पूर्ववत् ॥ ७॥ रेतो मूत्रं विजेहाति योनिम्मविशदिन्टियम् । गौ जरायुणात उल्बजहाति जन्मना । प्रते नं मत्यमिन्द्रिय विपान शुक्रमन्धमइन्द्रस्पे- न्दुिपमिदम्पयोमृतम्मधु ॥ ७६ ॥ इसका अतिशयरी छ० है, ऋषि आदि पूर्ववत् । मंत्रार्थ- (इंद्रिय, योनि, प्रविशत, रेवा, मूत्रम्, विज्ञहाति ) इन्द्रिय योनि में प्रवेश करसाहुमा वीर्य को छोड़ता है तथा अन्यत्र मन को त्यागया है, अर्थात् एक ही मार्ग से कार्यवश मिन्न ९ वस्तु निक- लती हैं, इस नार्य से गर्भस्थिति होती है ( जरायुणा, भावतः, गर्भः, जन्मना, उल्वं, नहाति ) झिल्ली से ढकामा रह गर्भ जन्म लेकर उस झिल्ली को त्याग देता है, तब भूमिपर माता है। शेष पूर्ववत् ॥ ७ ॥ दृष्ट्या रूपे व्याकरोरसत्यानुते प्रजापतिः । अ- अंधामनुते दाछुद्धा मत्ये पूजापतिः । ऋतन मुत्पमिन्दुियं पिपानं शुक्रमन्धंस इन्द्रस्यन्दूियमिदम्पयोमृतम्मधु ॥ ७७ ॥ ऋपि भादि पूर्ववत । मंत्रार्य-(प्रजापति, रूपे, सत्यानृते, - 4 - - -" " शुक्लयजुर्वेद । दृएवा, व्याकरोद ) गजापति ने मूर्तिमान सत् और असत को . देखकर विचारपूर्वक दोनों को पृथक १ स्थापन किया । (प्रजा- पतिः, अनुते, अश्रद्धां, श्रदधात् ) उस परमात्मा ने अनृत मिथ्याभाषण में मास्तिकतारूप अश्रद्धा को स्थापन किया (सत्ये, श्रद्धा, अदधात् .) सत्य में शास्तिक्यबुद्धिरूप श्रद्धा स्थापन किया । शेप पूर्ववत् ॥ ७७ ।। , : धैर्दैन रूपे व्यपिवत्सुतासुतौ पूजापतिः । तेन : 'सत्यमिन्दियं विपान शुक्रमन्धम इन्द्रस्पे- ', ::न्दुिपमिदम्पोमृतम्मधुः॥ ७८ ॥ । - इसका महाचइती छ०, ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(प्रजापति, मुतासुरो, रूपे, वेदेन, व्यपिबत् ) मजापति प्रेरित अमेरित धर्मा- धर्मके रूपोंको ज्ञानकदारा प्रयवा वेदके द्वारा विचारकर पीयाहुप अथवा प्रजापतिने सुत अमुरा दोनों प्रकारके पदापोंको अपना भश्य जानकर भक्षण किया । शेप पूर्ववत् ॥ ७० ॥ दृष्ट्या परितो रसं शक्रेण शुक्र पंपियत् पयः सोमम्पूजापतिः । तेन सत्यमिन्द्रियं विपान शक्रमन्स इन्द्रस्येन्दुियमिदम्पयो- मृतम्मधु ॥ ७॥ "इसका भतिजगती छ० प्रा० देपूर्ववत् । मंत्रार्थ-(पजापतिः, परिसुराः, रस, एषा, शोण, पयः, सोम, गुर व्यपियन ) मजा- पतिम परिघुत्के रसको देखकर शुद्ध मंत्रसे दुग्ध और सोमको पवित्र करकै पिया अथवा मजापतिरूप मर्यमें परिनुतका रस दुग्ध और सोम देखकर ही उसको किरणोंसे स्वच्छ करकै पिया। शेष पूर्ववत् । इन मंत्रोंमें सोमकी शुद्धि कही सब ही सोम पीते हैं, क्योंकि यद्यपि सोम एकलताका नामहै परन्तु अन्न धादि में उसका सार रहता है. उसको ग्रहण करने की रीति कही ॥७९॥ मीन तन्यमनसा मनीषिर्ण ऊर्णामंत्रण कवों क्यान्त । अश्विना यज्ञ संदिता सर- : .
१९ अध्याय । 1. स्वतीन्द्रस्य रूपं वरुणो भिपज्यन् ।। ८० ॥ इसका प्रजा , जगसी छ० देवता पूर्ववत् । अव एक २ मंत्रसे दो २ थाहुति देय । मन्त्रार्थ-(अश्विना, सविता, सर- स्वती, घरुणा, मनीषिणः कवयः, इन्द्रस्य, रूप, भिपज्यन्, म- नसा, यज्ञ, वयनित ) अश्विनीकुमार नियन्तादेव सरस्वती वरुण बुद्धिमान वीरोहुपको देखनेवाले इन्द्र के रूपको रोगरहित करतेहुए मनसे विचारकर सौनामणि यज्ञको सम्पन्न करते हैं (सीसेन, ऊर्णासूत्रेया, सन्त्रम् ) सीसे धासुस भगदको और उनके सरासे पटको युनते हैं ।। ८० ॥ तदस्य रूपममृत शचीभिस्तिस्रो देधुर्देवताः संरगणाः। लोमानि शप्पैबहुधा न तोकमभिः सस्वर्गस्य मासमंयन्न लाजाः॥ ८१ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत । मंत्रार्थ-(तिस्रः,देवताः, सराणाः,' अस्य, राव, अमरा, रूपं, शचीभिः, सन्दधुः ) दोनों अश्विनीकुमार और सरस्वती सीनों देवताओं ने सम्यक् प्रकार क्रीडा करतेहुए इस इन्द्रके उस मरण धर्मरहित रुपको कर्मके द्वारा सन्धान किया वा एक वाक्य होकर यज्ञका स्वरूप निर्माण किया (अस्य, लोमाति, शष्पैः, म, त्वक, सोक्ममिः, बहुधा, न, लाजाः, मांस, सम्भवन) इस इन्द्र के रोमोंको जमेहुए धानोंसे सम्पन्न किया और त्वचाको जमेहुए यवोंसे अनेक प्रकारसे प्रकट किया तथा खीले मांसरूप ई अर्थात् मासको पुष्ट किया [ इस अध्यायमें यहाँसे समाप्तिप- या मकार चकारका अर्थ देताहै ] ॥ ८१ ॥ सदश्विना भिपजा रुद्रवर्तनी सरस्वती पयप्ति पेशो अन्तरम् । अस्थि मम्जान मासरे। कारो- तरेण द्धतो गपान्त्वचि ।। ८२ ॥ - मष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्य-( गवां, त्वधि, दधतः)पृथ्वीको त्वचा कहिये मट्टीके पके हुए पात्र में सोमको स्थापन करतेहुए (रुद्र वचिनीकी समान मार्गवाले (गिपा, अश्विनी) मैद्य अश्विनी . . शुफ्लपजुर्वेद। कुमार ( सरस्वती) वाग्देवी (अन्तरं, पेशः, क्यान) शरीरात पच्ची इन्द्र के रूपको परिपूर्ण करता (मासः, अस्थि, न, कारो- रेण, मज्जानम् ) शमादिचूर्णमयचहके टपकापसे इष्ठियोंको और गलनयनसे मध्माको पूर्ण करते हैं ।। ८२॥ सरस्थती मनसा पेशलं वमुगा सत्याभ्या घयति दर्शतं घः । रसम्परिभुता न रोहितन्न. ग्नीरस्तसगन्न घेमं ॥३॥ अष्यादि पूर्वपन । मंत्रार्थ-( नासत्याभ्यां सरस्वती, मनसा, पेशलं. पमु,दर्शसे, वपुः, पयति । अश्विनीकुमारोंके साथ सरस्वती मन से.विचारकर इन्द्र के सुपर्ण और रजरारूप धगको सथा दर्शनीय रूपका उत्पन्न करते हैं (न, परिनुता, लोहित ) और परिमुत मुरारससे मधिरको इन्द्रके शरीर रजनके निमित्त पूर्ण किपा, आत एर इन्द्रको वेदमें रोहित नामसे कहा है (धौरः, नग्न, रस, न, परस, चेम) पुद्धिको मेरणा करनेवाले सजको हालसे रसको पूर्ण किया और ससरका साधन चुननेका दण्ड हुभा ॥५८३॥ पर्यमा शुक्रममृतंजनित्र सुरैया मूत्रांजनय- न्त रेतः।अपामतिन्दुर्मतिम्वाधमाना ऊबदा वात सम्वन्तदारात् ॥ ८४ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-( पयसा, भुकं, अमृन, जनित्र, रेतः, जनयन्स ) तीनो देवताओने निर्मल धके भागसे निर्मल अमृतरूप जननशील वीर्यको उत्पन्न किया पाराव, श्रमति, दुर्मति, बाधमानाः, तत्, उवध्य, वात. सव्वं सुरया,अपमूत्रात्) समीप में स्थित होकर अज्ञान और दुर्मति को वाधा देतेहुए उस आमाशयम अन्नको नाड़ी में प्राप्त अन्न और पक्वाशयमेंके अग्न को मुरारससे कल्पिसकर पूत्रसे मूत्रको कल्पित करते हुए ।। ८४॥ इन्द्रःसुप्रामा हृदयेण सत्यम् पुरोदाशैन सविता जान । यकृत्यलोमानं वरुणो भिपज्यन्मतले वायव्यैर्न मिनाति पित्तम् ।। ८५ ॥
१९ अध्याय । . - ऋप्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(सुत्रामा, इन्द्रः, दृश्येन ) मनी • प्रकार रक्षक पुरोडाशका अधिष्ठात्री देवता इन्द्र हृदयसे हृदयको प्रकट करता है ( सविता, पुरोडाशेग, सत्यम्, जजान ) सचिताने पुरोडाशसे इन्द्र के सत्यको उत्पन्न किया ( वरुण, शिपज्यन, यकृत्, क्लोमानम् ) वरुणने चिकित्सा करते हुए दृदयको पाई और स्थित मांसर्पितरूप तिल्लीको और गलेकी नाड़ी को मगट किया · वायव्यैः, मास्ने, न, पित्तं, मिनाति ) सोम सम्बन्धी. ऊर्ध्व पात्रोंसे हृदयकी दोनो पोरकी हडिड्यों और पित्तको कल्पित किया।। ८५॥ आन्नाणि स्थालीमधु पिन्व॑माना गुट्टाः पा: प्राणि मुद्धा न धेनुः । श्येनस्य पत्रन्न प्लीहा शचीभिरामन्दीनाभिरुदान्न माता ।। ८६ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत । मंत्रार्थ-( मधुः, पिन्वाना, स्थाली, भावाणि, सुदुघा, धेनुः, न, पात्राणि, गुदाः) मधुसिक्त सकल स्थाली भासा स्थान हुई, भलेपकार दूध देनेवाली शादित्य इष्टि और पात्र गुदास्थानापन्न हुए (न, श्येनस्य, पत्रं, प्लीहा) श्वेगका पंख हृदयका वामभागहुआ(न,माता, आसन्दी,शचीभिः, गाभिः,उदरम् ) और मासा स्थान श्रासन्दी "चौकी" कर्मों के द्वारा नाभि म्यान और उदररूप हुई ॥८६॥ फुमो पनि निता शचीभिर्यस्मिन्नगे यो- न्यानी अन्तः। प्लाशियतः शतधार उत्सों दुइन कुम्भी स्वधाम्मितृभ्यः ॥ ७ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(जनिता, कुम्भा, शचीभिः, वनिष्ठः, जीमता) रसका साधन घड़े कमी करकै स्थूल शाँतको उत्पन्न करसाद ( यस्मिन, योन्याम, अन्तः, अग्ने, गर्मः, शतधारः, उत्सः व्यक्तः, प्लाशिः, न, कुम्भी, पितृभ्यः, स्वधा, दुहे.) जिस कुम्भरूप योनिके भीतर प्रथम सोमरूप गर्भ स्थित हुशा कृपतुल्य घट स्पष्ट जननेन्द्रिय हुआ और पुराधानी ने पितरों के निमित्त स्वधा ।
. शुक्लयजुर्षद। अन्तको मकट किया।। ८७ ।। मुग्व सदस्य शिर इत्सतेन जिवा पवित्र मश्विना सन्त्सरस्वती । चप्पन्न पायुर्भिपर्गस्य . घालो वस्तिन शेपो हरसा तरस्वी ॥८॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(सत्, अस्य, मुखं, 'ससेन, इस शिरः ) सत नामा पात्र इस इन्द्रका मुख हुमा, उसही पात्रसे शिरकी चिकित्सा हुई ( पवित्रं, जिन्हा ) पवित्र जिल्हा सम्पादक हुमा (मश्विना, सरस्वती,मासन्) मंदिनीकुमार और सरस्वती मखमें स्थिराहुए (म, चप्प, पायुः ) और चप्प पायु इन्द्रिय हुई (वाला भस्य, भिषक् ) रसको छाननेका वस्त्र इसकी चिकित्सा हुई (वस्तिः, न. हरसा, सरस्वी, शेपः) गुदा तथा वेगसे वीर्यवान् पुरुपकी जननेन्द्रिय हु॥८॥ अइिनभ्याञ्चक्षुग्मृतबहाभ्याञ्छागेन तेजो हु- विपी शुते । पक्ष्माणि गोधूमः कुवलैरुतानि पेशो न शुक्रमसितं धसाते ॥ ८९ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ (अश्विभ्यां, ग्रहाभ्यां, अमरो, चक्षुः ) अश्विनीकुमार देवतावाले ग्रहों के द्वारा अविनाशी नेत्र कल्पित हुआ (दागेन, शृजेन, इविया, रोजः ) बकरी के दूध में पकेहुए इदि के द्वारा चक्षु का तेज कमि हुआ (गोधूमः, प. क्ष्माणि ) गेहुओं से नेत्रों के नीचे के लोम (कुबलैः, उताने) घेरों से नेत्रों के ऊपर के लोम कल्पित हुए (शुक्ल, न, असिस, पेशः, वसाते ) जो स्वेत और कृष्णरूपको अर्यात नेत्रों में की सफेदी और कालिमा को ढकते हैं ।।८९॥ अविन मेपो नसि वीर्याय प्राणस्य पन्या अमृतो ग्रहाभ्याम् ।सरस्वत्यपचार्यानन्नस्यानि बहि.' पदरज्जजान ॥ ९ ॥ अध्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(भाविः, न, मेपा, नास, वीर्याय) मेड़ और मेहा नासिकामें बलका कारण हुए (ग्रहाभ्या, माण- .
११ अध्याय . . स्थ, पन्थाः, अमृगः ) सरस्वती सम्बन्धी ग्रहोके द्वारा मानायुका मार्ग भविनाशी हुमा ( सरस्वती, उपवाकर, ज्यान, जना) सरस्वती देवी ने जो के अंकुरों से व्यागवायु को मस्ट किया (पदरः, पहिः, नस्यानि) वेरों के द्वारा कुशा नासिका के लोम हुरे, अर्याद इनकी उपयोगी क्रियामों से बल प्रकट कियागया, जिससे इन्द्र रोजस्वी हुआ ॥९० ॥ इन्द्रस्प पपभो घलोय कर्णाभ्या श्रोग्रम- मृतवहाभ्याम् । यवा न हि वि केसराणि फर्कन्धुजजे मधु साघम्मुखांत्।। ९१ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । ( वलाय, इन्द्रस्प, रूप, ऋषभः ) बाके निमित्त इन्द्रका रूप श्रेष्ठ किया (कर्णी यां, ग्रहाभ्यो, श्रा) श्रोत्रसम्बन्धी ग्रहों के द्वारा विकास के शब्दको सम्पन्न करनेवाली श्रोत्र इन्द्रिय सम्मादिरा हुई (यवाः, न, वहिः, भ्रषि, केसराणि) जौ और कुशा मौके बालों को सम्पन्न करनेशले हुए ( मुग्वाद, कर्कन्धु, सारघं, मधु, जज्ञे) मुखसे वेरकी समान मधुमालेका सम्पन्धी शहदकी समान लारश्लेष्मा आदि प्रकट हुया ॥९॥ आत्मन्नुपथे न कस्य लोम मुखे मणि न व्यापलोम। केशा न शीर्पयशंसे श्रियै शिखा मिइस्य लोम स्विपिरिन्द्रियाणि ॥ १२ ॥ अष्पादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(भात्मन, छपस्ये, न, लोम, सकस्य ) अपने शरीरमें उपस्य और अधोभागके रोम क्लोम से करितहुए (न, मुवे, स्मश्राणि, व्याघ्र नाम ) शौर मुखपर जो बाढीमूछोंके वाला है वह व्याघ्रलोमसे कलिग हुए (न, शी- पस, यशसे, केशाः, श्रिये) और शिरमें यशके निमित्त जो बाल हैं शोभाके निमित (शिखा, विपिः ) शिवा कानि (इ- न्द्रियाण सिंहस्व, लोम ) जो इन्द्रिये है सो सब सिंह के रोग हैं। महान्यात्मभिपजा तदश्विनात्मानमंग मर्म- धात्सरस्वती । इन्द्रस्य रूप शतमानमायुश्च:
10 शुक्लपजुर्वद। न्द्रेण ज्योतिरमृतन्दधानाः ॥१३॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्य-(इन्द्रस्य, रूपं, शनमान, मायुः, चन्द्रेण, ज्याोते, अमृतं, धानाः) इन्द्र के रूपको और सैकड़ों पुरुषोंसे पूजनीय वा सौवर्ष वा पूर्ण भायुको प्रसन्नतादायक चन्द्र सम्बधी ज्योतिके द्वारा अधिनाशी सम्पादन करतेहुए ( भिपजा, अश्विना, प्रात्मन्, अङ्गानि ) चिकित्सक अश्विनी कुमागेने शरीरमै श्रङ्गाको संयुक्त किपा (सरस्ववी, राक्ष, अरमान, मो. समपाद ) और सरस्वती ने उस शरीरको अवयवों द्वारा सन्धान किया अर्थात अश्विनीकुमार और सरस्वतीन पूर्वोक्त विधिसे मङ्गो के द्वारा इस यज्ञशरीरको सम्पादन किया इसके द्वारा इन्द्र (यज. मान ] को मुखमय जीवन और अमृनत्य प्राप्त होता है ।। ९३ ।। सरस्वतीयोन्यादर्भमन्तरभ्यिभ्याम्पत्नी सुई- तम्बिासति । अपा, रसैन बरुणो न साम्ने- न्ध थिय जनपन्ना राजा ॥ ९ ॥ प्राध्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ (सरस्वती, अश्विभ्यां, पत्नी, गर्भ, सगं, योन्या, अन्तः, वित्ति ) सरस्वती देवी अश्विनीकुमारके पत्नीत्वको स्वीकार करतीहुई इन्द्ररूप गर्भको सम्यकप्रकारसे योनि के भीतर धारण करती है (न, अप्मु, राजा, वरुणः, अपां, रसेन, साम्ना, श्रियै, इन्द्र, जनयन ) और जलौका देवता रागा धरुण जलोंके सारभून रसके द्वारा सामके प्रभावसे जगतकी शोमारूप वा ऐश्वर्यफ निमित्त इन्द्रको जनमकी समान पोषण करता है अषमा पत्नी सरस्वती इसको धारण करती है, अश्विनीकुमारों के द्वारा घरूण इस इन्द्रका पोषण करतहैं [ यहां इन्द्रपदसे ऐश्वर्य- पान यज्ञका वर्णन है, वापीही सरस्वतीहै, जिस घेवाणी में यह पर स्थापित होताह धुलोक और भूमिके अधिष्ठात्री देवता इसको स्थापन करते है अपवा अहोराम स्थापकहै ।। ९४ ॥ रोज पशूना हुचिरिन्दिपावत्परिघुता पर्यसा साघम्म । अश्विभ्यांन्दुग्धम्भिपजा सरस्वत्या - २० अध्याय । सुतामुताभ्याममृतः सोम इन्दुः ॥ ९५ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । प्रार्थ-भिपना, अश्विभ्यां सरस्वत्या; इन्द्रियावद, पशूना, सार, मधु, हविः, परिभुता, पयसा, रोना, दुग्धम् ) चिकित्सा करनेवाले अश्विनीकुमार और सरस्वतीने वीर्यवान् पशुसम्बन्धी दुग्ध घृतं और मधुमक्षिकाभोंके बनाए शहदरूप हविको लेकर परिमु किये धसे इन्द्रके निमित्त तेज को दुहा ( सत्तामृताभ्यां, अंमृतः, इन्द्रः सोमः ) मुरा अंमुत दुग्ध से अमनरूप ऐश्वर्यदायक सोमको निकाला, इसमकार अश्विनी कुमार और सरस्वती शादि ने भनेकों द्रव्योंसे रस लेकर इन्द्रको उपकार कियां ॥ ९५ ॥ . इतिश्री यजुर्वेदान्तगर्त माध्यन्दिनीय शाखाका मापानुवाद सहित एकोनविंश अध्याय समाप्त. अथ विंशोऽध्यायः। शंत्रस्प योनिरसि त्रस्य नाभिरसि । मा त्यां हिंसीन्मा मा हि सीः ॥ १ ॥ इसमें २ म० हैं। दोनोंका गजापति ऋ०, १ कातिपदा विराट गां० २का मागाछ०,१का ग्रासन्दीरका कृष्णाजिनदे है।इसको पढ़नाहुभा चौकी के दो पाये दक्षिणवेदी पर और दो उत्तरवेदी पर रख । मंगाध-(क्षत्रस्य, योनिः, असि) हे आसन्दी! तुम क्षत्रिय जांतिकी राजपदंवी की उत्पत्तिस्थान हो (क्षात्रस्य, नाभिः, असि) तुम क्षत्रिय जातिकी नामि अर्थात एकताके बन्धनकी निदान हो । फिर चौकी पर मृगचर्म विछाव (त्वा; मा, हिंसी:) हे कृष्णाजिन श्रासन्दी तुमको पीडा न देय (मा, मां, हिंसी:) तुम मुझको पाहा.मत दो ॥१॥ निर्पसाद धृततो वरुणः पस्त्यास्त्वा । साम्रो- ज्याय सुक्रतुः। मृत्यो पाहि वियोत्पाहि ॥ २ ॥ इसमें में हैं। शीनाका प्रजापति देवा माची उदिणक छ.
। । शुक्लयजुर्यद। यजमान दे० है । यजमान बैठे।। मंत्रकी व्याख्या १० मंत्र २७ में होगई भावार्थ यह है कि-हे यजमान ! तुम इसपर बैठने के फलसे दण्ड पुरस्कारके द्वारा देशके अनिष्टको दूर करनेवाले न्यायपरायण और राजकार्य में चतुर होकर प्रनामोंपर सम्रपद को गने में समर्थ हूजिये । फिर यजमान वामचरणके नीचे नाँदी का मण्डलाकार रुक्मभूपण रक्खै ( मृत्योः, पाहि ) हे रुक्म भ. काल मृत्युसे मेरी रक्षा करो । फिर दाहिने चरणके नीचे सुवर्ण का रुक्म रक्ख ( विद्योत्, पाहि ) हे रुक्म ! विजलीके उत्सात से मेरी रक्षा करो ॥१॥ देवस्य त्या सवितुः प्रसवेऽश्विनौ हुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । अश्विनभिज्येन तेजसे ब्रह्मवर्च- सायाभिर्पिधामि सरस्वत्यै भैषज्येन वीराया न्नाधायाभिर्पिञ्चामीन्द्रस्यैन्दूिपेण वलाय भिपै पर्शसेशिपिंक्षामि ॥ ३॥ इसमें ३ म० हैं । तीनोंका अश्विनौ, १ का प्राजापत्या वृ०॥२ का मा गाय०/०,सवकालि दे है।अध्वर्यु यजमानका भाभिषेक करावै । मनार्थ-(सवितुः, देवस्य मसव, भावनोः,बाहु- भ्यां पूटाणः, इस्ताभ्यो, अश्विनो;, भैपज्येन, तेजसे, ब्रह्मवर्चसाय त्या, अभिपिशामि ) हे यजमान ! सचिना देवताकी भाशा होने . पर अश्विनीकुमारकी मुगा भौर पूषा देवताके हायोंसे राधा भ- श्विनीकुमारकी चिकित्साके द्वारा कान्ति और ब्रह्मतेमके निमित्त । दुई भाभिषेक कराता हूं । सरस्वत्यै भैपज्येन, वार्याय, अन्नाथाय भाभिपिनामि) सरस्वती करकै सम्पादन कीहुई औपधिसे पराक्रम और अन्नभक्षणकी सामर्थ्य के निमिच तुमको अभिषेक कराता है।(इन्द्रस्य, पेन्द्रियेण, बलाय, प्रिय, यशसे, भामिपिनामि) इन्द्रकी इन्द्रिय चिकी सामर्थ्यसे बल समृद्धि और यशकी प्राप्ति के निमित्त तुमको अभिषेक कराता हूँ. ३॥ कोसि फतमामि कस्न त्या कार्य त्वा । मुश्लो ' २० अध्याय क सुमंगल सत्यराजन् ॥ ४॥ इसमें २ मंहैं। दोनोंका प्रजा० ऋ०, १ का माना गा० २ का उप्णिगर्भा प्राना गा०६० दे० दोनोंका यजमान है। श्र. ध्वर्यु यजमानको स्पर्श करें । मार्थ-(का, अखि) हे यजमान ! तुम कौन मजापारी हो (कतमः, असि ) बहुगों में कौनसे हो (कस्मै, सा) मनापति पदकी प्राप्तिके निमित्त तुम्हारा अभिषेक करता हूँ ( काय, त्वा) प्रजापतिकी प्रतिके निमित्त तुम्हारा अभिषेक करता हूँ, अर्थात् तुम कौन प्रधान पुरुप हो, तुमने किप्त देवता की प्रस- नताके अर्थ इस महान अनुष्ठानका भारम्म किया है, क देवनाकी प्रसन्नता किया । फिर यजमान नामस्मरण करें। (अश्लोक, मङ्गल, सत्यराजन ) हे मुन्दर कीचिवाले, हे श्रेष्टमङ्गलमय, हे सत्पराज्यके भो पाइयं ॥४॥ शिरों में श्रीर्यशो मुम्वन्त्विपिः केशाइच इमणि । राजा मे माणो अमृत सम्राट चक्षुचिराट्योत्रम् ॥५॥ इसका प्रजा० ऋ०, मनु० छ० इन्द्र शरीरावय दे० है । यहाँ से ५ मंत्र पढ़कर यजमान अपने शरीरको स्पर्शकरै। मंबाथ (शिरः, श्रीः ) मेरा शिर ब्रह्मरोजसे शोभायुक्तहो ( मुखं, यशः ) मुख वेदपाठसे यशःवरूप हो (केशाः, च रमणि, विपिः,)शिर के बाल हादीप, हृदय मे ब्रह्माग्निक काशसे कान्तिरूप हो (राजा, मे, माणाः, अमृतम् ) तेजस्वी मेरा माण समाधि लाभसे अमृत हो (चक्षुः, सम्राट् ) चक्षु इन्द्रिय दिव्य दृष्टि पानेस मुशोभित हो (श्रोत्रं, विराट् ) दरश्रयणकी शक्तिसे प्रात्रेन्द्रिय विशेप विरा- जमान हो ॥५॥ जिहया में अद्रं वाङ्महो मनो मन्युः स्वराइ. भाम: मादाः प्रमोदा अंगुलीरंगानि मित्रम्मे सह। ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ-( मे, जिव्हा, भद्रम् ) मेरी जीभ कल्याणरूप हो (वाक्, महः ) वाणी वैदिक सिद्धान्तको कहनसे - शुक्लयजुबंद। पूजित हो ( मनः, मन्युः) मन अहं ब्रह्मास्मि के उच्चारणसे नई भावयुक्त हो (मामः, स्वराष्ट्र) को अपनी मर्यादामें विराजमान हो (अङ्गुलयः, मोदाः ) अङ्गुलिये करन्याससे आनन्दरूप हाँ, ('अगानि, प्रमोदाः ) मग अहन्याससे परमानन्दरूप हों (मे, मित्रं, सदः) मेरे मित्र शत्रुनाशक हो ॥ ६ ॥ वाह मे चलमिन्दूिरा) हस्ती मे कम्मैवीयम् । आत्मा जत्रमुगे ममे ॥ ७॥ इसका प्रना० प्रा०, गाय० छ० देवता पूर्ववत् । मंत्रार्थ-(मे वाह, इन्द्रियं, बलम् ) मेरी दोनों भुजा इंद्रिय वलिष्ठ हों ( हस्ती, कर्मवीर्यम् ) मेरे दोनों हाथ देवार्चनादि करने में समर्थ हों (मम, मात्मा. उरः, क्षत्रम् ) मेरा अन्तरात्मा हृदय भी संसारसे रक्षा करगेवाला हो ॥७॥ पृष्टीम्म ग़ष्ट्रमुदरमसी ग्रीवाश्च श्रोणी । ऊरू अग्नी जानुनी विशो मेगानि सर्वतः ॥८॥ इसका प्रजा० प्रा०नि० अनु० छ०, देवतापूर्वचन है । मंतार्थ ( मे, पृष्ठी, रामम् ) मेरा पृष्टदेश सबको धारण करनेवाले राष्ट्रको समान हो ( उदरं, भंसी, ग्रीवा, जरू, अरनी. श्रोणी, जानुनी, च, सीता, बङ्गाने, मे, विशः । पेट कंधे, गरदना, दोनो ऊरू, हाथ, दोनो थोर का कटिभाग दो जंघा और सब अंग मेरे प्रनासमान पोपणीय हो अर्थात राष्ट्ररूप शरीरमें यह सब अंग निरुपद्रवहों ।। ८॥ नाभि चित्तं विज्ञानम्पायुमेऽपचिति सत् । आनन्दनन्टावाण्डौ में भगः सौभाग्यम्पसः । जंघाभ्याम्पड्यान्धर्मोऽस्मि विशिराजा प्रतिष्ठितः९ इसका गाना० ऋ०, नि० जगती छ, पूर्ववत् दे० है मंत्रार्य- (मे, नाभिः, चित्तं ) मेरी नाभि भगवानकै ध्यानसे ज्ञान मय हो (मे, पायु:. विज्ञानम् ) मेरी पायु इन्द्रिय झानजनित संस्कारका आधार हो (भसद, भपचितिः) मेरी सी की योनि सन्तानको २०. अध्याय ५६७ उत्पन्न करने में समर्थ हो ( मे; भण्डौ, प्रानन्दनन्दौ ) मेरे थण्ड- कोश मानन्दसे समृद्ध हो ( गसः, भगः, सौभाग्यम्) मेरी जन- गेन्द्रिय योगधर्य और योगसम्पतिसम्पन हो (जंघान्या, पद्भयां धर्मः, पस्मि)जंघा शौर चरगसि धर्मरूप होऊँ, नक्षि-विपगासक्त (विशि, परािष्टिना, राजा ) गजानों में प्रशिष्ट्रिय राजा हूं ॥९॥ भति क्षत्रे प्रति तिष्ठामि गले प्रस्यश्यपु प्रति तिष्ठामि गोएं। प्रत्यझैपप्रतितिष्ठाम्यात्मन्प्रति भाणेए प्रति तिष्ठामि पुष्टे प्रति द्यावापृथिव्योः प्रति तिष्ठामि यज्ञे ॥ १० ॥ इसका मजा० ऋ०, अतिशकरी छ०, विश्वेदेवा दे० है चौकीसनी विदे मृगदालापर उत्तरीमंत्रार्थ-(क्षत्रे,मति,सिटामि), मैं क्षतिपजातिम गतिष्ठित होता हूँ ( राष्ट्र, प्रति ) राणमें प्रतिष्ठित होता हूँ (अश्वेपु, प्रात) घोडा प्राधिपत्य पाता हूँ ( गोपु, प्रति ) गौओंके विपयमें माधिपत्य पासा हूं (थङ्गेपुप्रति ) शरीर के अययनों में प्रतिष्ठा पागा हूं ( प्रात्मन्, पति) आरोग्यतासे चितम गतिष्ठित होता हूँ ( गाणेपु,प्रति) पाणोंमें प्र० को पाता: ई (युटे. प्रासे) धनसम्पत्ति में प्र० को पाता हूं ( घावापृषिव्योः . प्रतिष्ठामि ) स्वर्ग और भूनोककी पति को पाता हूं ( यझे, प्रतिष्ठामि ) यतके विषय में प्रतिष्ठिर होता हूं ॥ १० ॥ यो देवा एकादश वयस्त्रिशाः मुराधसः। पृहस्पर्तिपुरोहिता देवस्य सवितुः सके। देवा देवरचन्तु मा ॥ ११ ॥ इसका मना० ०, व्यवसानापंक्ति छ ०, विश्वेदेवा दे० है। ग्रहहोम करै । मंत्रार्थ-( सुराधसः, वृहस्पतिपुरोगहताः, प्रया, एकादश, देवाः, त्रयस्त्रिशाः, देनाः, सवितुः, देवस्य, सवे, देवैः, • मा, भवन्तु ) मन्दर धनवाले इसति है पुरोहित जिनका ऐसे. ब्रह्मा विष्णु शिव गानों देवता,ग्यारह देवता, सेंतीस देवता अथवा ग्यारके सिने तैंतीस देवता सबके प्रेरक देवताकी साझामें घर्त- - ५६० - - . शक्लयजुद। मान देतानोंके साथ बा ब्रह्मादिके साथ मेरी रक्षा करें ॥१९॥ पथमा द्वितीयर्दिवृत्तीगौस्मृतीपस्तृतीया:सत्येनं सत्यं यज्ञेन यज्ञो यजुभिर्पगंधपि सामक्षिरसा- मांन्युग्मिचंः पुरोनुवाक्याभिः पुरोऽनुवाक्या याज्याभिज्यिा चपटकारपट्कारा आहुतिभि राहुं तयो मे कामान्तसमयन्तु भूः स्वाहा ॥ १२ ॥ इसका प्रमा० ऋ०, प्रकृति छ०, विश्वेदेवा दे० है । मंत्रार्थ- (प्रथमाः, दिनीयः ) पहिले कहेहुए वह देवता दूसरे रुद्र देवता- ऑसे मिलकर मेरी रक्षा कर ( द्वितीयाः, तनीधैः ) दूसरे तीसरो के साथ ( हतीयाः, सत्येन ) तीसा आदित्य देवता सत्यरूप प्रम के मा० ( सत्य, यद्देन ) ब्रह्म यज्ञके साथ ( यज्ञः, यजुभिः) यज्ञ य के मंत्रों के साथ ( यजूंपि. सामभिः ) यजु साममंत्रों के साथ ( सामानि, ऋमिः ) साम चाओंके साथ ( ऋचः. पुरोऽनु वाक्पाभिः ) ऋचाएं पुरोऽनुवाक्य मंत्रों के साथ ( पुगेनुवाक्या: याज्याभिः ) पुरोनुवाक्य या मंत्रों के साथ (याज्याः, चपटका) याय इनि:समर्पण के मंत्री के साथ ( वषट्काराः, प्रातिभिः) चपकार आहुतियों के साथ (आहुतयः, मे, कामान, समयन्तु) आहुतिये मेरी यामनाराको पूर्ण कर (भः, स्वाहा ) भुवनको भलेमकार दीहुई बाहुशि स्वीकृत हो ।। १२ ।। लोमानि प्रयनिर्मम त्वड न आनतिरागतिः । मांसम्म उपनांतर्वस्वस्थि मजाम आनतिः॥१३॥ इसका प्रना , अनु० छ, लिङ्गोक्त दे है। यजमान ग्रहशेषको भनाण करें। मंत्रार्थ-- मम, लोमानि, प्रयतिः ) मेरे सम्पूर्ण रोग विशाल हो ( मे, त्वक, भानतिः,'आगाति: ) मेरी त्वचा एसीहों कि-जिसको सब भुककर प्रणाम करें और सब समीप माने ( मे, मांस, उपनतिः) मा मांस माणियोंको नम- स्कार करानेवाला हो ( भास्थ, वसु ) मेरी इडिये धनरूपहों (मे, मज्जा,भानतिः) मेरी मज्जा रड्डीके भीतरका माग जगन् २० अध्याय । को नमन करानेवालाहो, अर्थात् मेरे शरीरमकी सातोपातु जगत् को वशमें करसीं ॥ १३ ॥ पवा देनहेडनन्देवासश्चकृमा वपम् । अग्नि- तस्मादेनमा विश्वोन्मुञ्चत्वहसः॥१४॥ इसका प्रजा० ऋ०, अनु० छ०, अग्नि दे० है । मासरकुंभ को जल में सैरावै । मंत्राध-(देवाः, देवासः, वयं, यत्, देवहेदन, वाचकम, तस्मात्, एनसः, विश्वात्, अहंसः, श्रग्निः, मा, मुभतु ) हे प्रकाशवान देवतामो! हमसे जो देवताओंका अपराध हुमा हो उस पापसे और सकल विनरूप पापोंसे अग्नि देवता मुझे मुक्त कर ॥ १४ ॥ यदि दिवा यदि नक्तमेनासि चकमा वयम् । वायुर्मा तस्मादेनसो विश्वान्मुञ्चत्व, हसः ॥१५॥ इसका मजा० ऋ०, अनु० छ०, वायु दे है ।मंत्रार्थ-(वयं यदि, दिवा, यदि,नक, एनासि, पाचकम, वायुः, सस्मान्, एनस: विश्वात्, मंहसः, मा, मुञ्चतु ) हमने याद दिन में और यदि रात में जो पाप किये हो वायु देवंसा उस पापसे तथा सम्पूर्ण पापोंसे मेरी रक्षा करै ।। १५॥ यवि जागृद्यदि स्वप्न एनसिं चकमा वयम् । सूयौ मा तस्मादेनसो विश्वान्मुश्चत्व हस.॥ १६ ॥ इसका प्रमा० ऋ०, अनु० छ०, सूर्य दे० है। मंत्रार्थ (वयं, यदि, जानत्, यदि, स्वमे, एनासि, पाचकम, मर्यः, तस्माद, एनसः विश्वात, अंहसः, मा, मुञ्चतु) हमने यदि जागते में यदि सोम कुछ पाप किये हैं मूर्थ देवता उस सब पापसे और सकल पापा से मुझको मुक्त करै ।। १६ ॥ यद ग्रामे यारण्ये पसभायां यदिन्द्रिये । यच्छूद्र यद यदेनश्चकृमा वयं यदेकस्याधिधर्मणि तस्यायपजनमसि ॥ १७ ॥ इसका मजा० ०, नि० :अनु०७०, लिदोक्त दे० है मंत्रार्थ . - ५. - - - . शुक्लपजुवद। ( यत, ग्रामे, यद, अरण्ये, यद. सभायां, यत्, इन्द्रिये, यत्, शूद्रे, यत् अर्थे, यत्, एनः, वयं, चकृम ) जो ग्राममें, जो वन में वृक्ष- च्छेदनरूप, जो सभामें असत्यभापण मादि, जो सकल इन्द्रियों से परदोपकथन परनारीदर्शनादि वा जो देवताओंमें, जो दास. चर्गमें, जो वैश्यों में जो पाप हमने किया है (यत्, एकस्य, शधि- धर्मणि, पाचकृम) जो पाप पत्नीसहित यजमानके पककर्म में किया है (तस्य, अवयजनं, असि ) उस सब पापको है देवताओं वा कुम्भके हे अधिष्ठात्री देवता निवारण करनेवाले हो ॥१७॥ यदीपो अघ्न्या इति घरुणेति शंपामहे ततो वरुण नो मुञ्च । अवभृधनिचुन्पुण निचेसि निचुम्पुणः । अब देवकृतमेोऽयक्ष्यत्र मत्- मत्यकृतम्पुरुराव्णो देष पिस्पाहि ॥ १८ ॥ इसका मजा० ऋ०, अनु० ०, लिङ्गोक्त दे है । वरुण की भार्थना मंत्रार्थ-(वरुण, यत्, पापः, अध्न्या,' इति, शपामहे. घरुण, ततः नः, मुञ्च ) हे वरुण ! जो जल स्वच्छ रखनेयोग्य हैं वा जो सोमलता काटनेयोग्य नहीं है उसको हमने जो आगे- मुस आदि किया है, दे. वरुण उस पापसे हमको मुक्त करो। कुम्भको जलमें डुबोवे । (निचुम्पुण, अवभृथ, निरुः, असि) हे मन्दगति जलाशय ! अवभृय ! यद्यपि तुम अतिगमनशील हो (निचुम्पुण) तो भी मन्दगति होजाओ (देवः, देवकर्म, एनः, भवयक्षि ) क्योंकि मैन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा जानकर हविके स्वामी देवताभोंका जो कुछ अपराध किया है वह इस जलाशयमें दूर किया ( मयः, मर्यका, श्रव) हमारे सहायक ऋत्विजों करकै यइका दर्शन करनेको आयेहुए मनुप्पोंकी पवारूप जो पाप बना वह हमने इस जल में नष्ट करदिया (देव, पुरुराव्णः, रिपः माहि) हे यज्ञ ! विरुद्ध फल देनेवाले पापसे मेरी रक्षा करो १८ ममनेने हृदयमपावन्तः सन्त्वाविशन्तोषधी- सत्तापः । मुमित्रिया न आप ओपंधपः सन्तु इ.
-
२० अध्याय।
मिश्रियास्तस्मै सन्नू योऽस्मान्द्वेष्टि यञ्च
यन्द्रिप्मः॥ १९॥
इसमें ४ मं० हैं । जिनमें १ममंत्र समुदेते इत्यादिसे यजमान
प्रायस्थानसे दो चरण पत्तै इसकी व्याख्या भ० ( म०२५
में होगई। दसरे मंत्र समित्रिया इत्यादिसे उत्तरमुख होकर जल
की भजुलिलेय । सासरे दुर्भिप्रिया इत्यादिसे जिधर शत्रु रहतहों
उस दिशा में अनुनिटालदेय, इसकी व्याख्या ६।२२ में होगई १९
द्रुपदार्दिव मुमुचानःचिन्नः स्नातोमलांदिव।
पूतम्पवित्रणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः ॥२०॥
इसका प्रमा० ऋ०, अनु० छ०, श्राप दे० है । पत्नी सहित
यजमान कर्मसमयमें धारण किये वस्त्रोंको त्याग । मंत्रार्थ--(भाप:
मा, एनसः, शुन्धन्तु ) जल देवसा मुझको पापसे पवित्र करें (इव
द्रुपदाद, मुमुचाना ) जैसे पुरुप सहजमें ही खड़ाऊँ से अलग हो
नातेहैं ( इत्र, सिन्नः, स्नातः, मलात ) अथवा जैसे किसीको
पसीना, बारहा हो वह पुरुष स्नान करनेपर मैलसे मुक्त होजाता
है (मा, पवित्रण, पूर्व, भाज्यम् ) भयका जैसे ऊनी वनमें छामा
हुमा घृत मलसे रहित होजागाह ॥ २० ॥
उपन्तममुत्परिस्वः पश्यन्त उत्तरम् । देव-
देवत्रा मूर्यमाम ज्योतिरुतमम् ।। २१ ।।
इसका मस्कएच ऋ:,अनु: छ°,
सूर्य दे० है ।जनमेसे निकले
मंत्रार्थ-( नमसः, परि, उत्तम, म्वा, पश्यन्तः, वयं, देवत्रा, देवं
सूर्प, उत्तम, ज्योतिः, उदगन्म.) अन्धकारमय लोकसे परमश्रेष्ठ
म्नानोकको देखबहुए इम.देवलोकमें सूर्यदेवताको देखतेहुए श्रेष्ठ
अपो अधान्यचारिप, रमैन समसक्षमहि ।
पपरवानग्न आगन्तन्मास सज वर्चसा प्रजयां
च धनेन च ॥ २२॥
इसका प्रजा० ऋ०, पंक्ति छ., अग्नि दे है। यजमान भा.
ब्रह्मज्योनिको प्राप्त हुए ॥ २१ ॥
९७२ शुक्लयजुर्वेद । हवनीयका उपस्थान करें। मंत्रार्थ-(अग्ने, अद्य, अपः, अन्वनारि- पम् ) हे प्राने ! भाज मैंने जलकर्नको पूर्ण किया अर्थात् अवभृय कर्मसे जलको विलोड़ा है ( रसेन, समक्ष्महि ) जलके रसर संयुक हुश्रा हूँ (पयस्वान्, श्रागमम् ) जलवान अायाहूँ (सं, मा वर्चसा, च, प्रजया, च, धनेन, सहज ) ऐसे मुझको तेगसे, पुत्र चौमादिसे वथा सुवर्णादि धनसे संयुक्त करों ॥ २१ ॥ ऐपोस्पेधिपीमाई ममिदमि तेजामि तेजोमार्य धेहि समावर्ति पृथिवी समुपाः समु सूर्यः। समु विश्वमिदं जगत्।वैश्वानरज्योति यासं वितन्कामान्व्यश्नच मृः स्वाहा ॥ २३ ॥ इसमें ४ म० हैं। सबका मना० प्रा०, ११२ का माना ह० ३ । ४ का मा० उदिएक छ०, १।२ का समिध् देवना। ३.४ का अग्नि देव् है। भाइतिके निमित्त समिधा उठाये। मंत्रार्थ (पधः, एधिपीमहि ) हे समिध सुम मकाश करनेवाले हो. तुम्हारे मनु- ग्रहसे मैं धनादिकी वृदिको पाऊँ । यह समिधा आहवनीयमें छोड़ने को उचत होय (सीमन, असि, तेजः, प्रसि, माय, रोजा, धेहि ) हे समिधा तुम पूर्ण प्रकाश करनेवाली हो तुम तेनासरूप हो, मुझमें तेजको धारण करो। समिधामें घी लगाव-पृथिवी, समावर्ति ) पृथिवी प्रशिक्षण परिवर्तनशील है ( उपाः, सम् ) प्रभातकाल आतेजाते रहते (सूर्यः, उ, सम्) सूर्य भी बार २ उदिरा और मस्त होतेहैं । इदं, विश्वम्, जगत्, उ, सम् ) यह सब संसारभी आवागमनशील है कुछ भी स्थिर नहीं है । उस समिधाको भग्निमें होमै-( वैश्वानरज्योतिः, भूयासम् ) साल कामनाओंको पाने के निमित्त में सकल प्राणियों के हितकारी परमा- स्माकी उगोगिको माप्त हूं (विभून् कामान,व्यश्न) वहुनसे मनो- रयोंको पाऊँ (भूः, स्वाहा) सत्स्वरूप ब्रह्म को दीहुई यह पाहुति भलपकार गृहीत हो ॥२३॥ अभ्पादचामि ममिधमग्न वसंपते त्वाय । प्रतवं. , 4 २० अध्याय। . - श्रदाभोषमीन्धे त्वा दीक्षितो अहम् ॥ २४ ।। इसका अश्वाराधी ऋ०, नि० अनु० छ. अग्नि दे० है । अग्न्याधान और ब्रह्मवरण के अनन्तर यजमान श्राइवनीयाग्निमें शीन समिया छोडे । मंत्रार्थ-( व्रतपते, अग्ने, समिधं, त्वयि, अभ्यादधामि) हे कमके पालक अग्ने ! यह समिधा तुममें स्था- पन करता हूँ ( दीतिमा प्रह, व्रतं, च, श्रद्धां उपमि ) यज्ञमें दीक्षिराहुआ मैं कर्म और श्रद्धाको प्राप्त होता हूँ ( त्वा, इन्धे च) और तुमको प्रदीप्तमी करता हूं ॥ २४ ॥ पत्र ब्रह्म च पुत्रच सम्पधी घरत: महतल्लो- कम्पुण्यम्प्रज्ञेप यत्रं देवाः सहाग्निना ॥ २५ ॥ इसका अश्वाराश्वी ऋ०, अनु० छ०, अग्नि देवता है। मंत्रार्थ-(यत्र, ब्रह्म, च, क्षत्रञ्च, सह, सम्यश्ची, परतः ) जहाँ ग्राहाण और क्षत्रियजाति भी साथ एकमन होकर विचरते हैं (यत्र देवाः, अग्निना, सह) जहाँ देवता अग्निके साथ निवास करते हैं (सं, पुग्य, लोक, मझेपम्) उस पवित्र सर्गलोकको मैं पाऊँ १५ योन्द्रश्च वायुश्च सम्पञ्चौ चरंतः सह । त- लोकम्पुण्यम्प्रक्षेप पत्रं सदिन्न विद्यते ॥ २६ ॥ इसका ऋष्यादि २३ वे मंत्रकी समान है। मंत्रार्थ-(यत्र, इन्द्रः च, वायुः, च, सह, सम्पञ्चौ, चरतः )जहाँ इन्द्र और वायु पी साथ एकमन होकर पिचरते हैं ( यत्र, सेदिः, न. विद्यो) जहाँ शन पाने के निमिच दुःख नहींहै ( तं, पुण्य, लोके, संज्ञपम् ) उस पवित्र लोकको मैं प्राप्त होऊँ ॥ २६ ॥ अशुना ते अशुः पृच्यताम्परुपा परः । • गन्धस्ते सोमवतु मदाय रसो अच्युतः॥ २७ ॥ इसका मजा , अनु० ६०, सुरा दे० है । इस मंत्र से रसको मिलाये। मंत्रार्थ-(त, अंशुः, अंशुना), हे महोपधिरस । तुम्हारा भाग सोमके भागसे मिले ( पः, परुपा, पृच्यताम् ) तुम्हारा पर्व सोमके पर्व से मिले ( तब, गन्धः,अच्युतः,) तुम्हारा - किस ५७४ शुक्लयजुर्पद। गन्ध अविनाशी हो ( रसः, मदोय ) रस पिमाप्तिके निमिच हो ( सोम, भरतु ) सोमसे थालिंगन को ॥१७॥ मिञ्चति परिपचन्युत्सिंचन्ति पुनन्ति च सुपि बम्ब्रै मर्दै शिन्वो चदति फिन्यः ॥ २८ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । पवित्र किये रसको ग्रहण कर । मंत्राध (वभत्रै, मुरायै,मदे,किन्त्वः,किन्तः,बदी)वलकीधारक कपिलवर्ण महौषधियों के रसपानसे प्रसन्नतामें स्थित हना इन्द्र, तुम के तुम किसके हो ऐसा कहना है (सिञ्चन्त ) इसकारण उसको पात्रमें ऋत्विज सोचत (परीिपञ्चन्ति)द्धसे सींचो हैं (उत्सि- चन्ति ) ग्रहोंसे सींचते है (च, पुनन्ति ) पावन सुवर्ण मादिसे पवित्र करतेहैं ॥२८॥ धानापन्नं करम्भिमपूपयन्समुकधिनम् । इन्द्र भातर्जुपस्व नः ॥ २९ ॥ इसका विश्वामिन फ्राः, गाय छ०, इन्द्र दे० है । खीलोंका होम करै-(इन्द्रः, मातः, नः, धानावन्त, करम्भिणं, अपूपबन्त । उक्थिनं, जुपस) हे इन्द्र ! RA:काल हमारी खीलों से युक्त ददी, सत्त थोर मालहुए भादिसे युक्त स्तुतिके साथ पुरोगाश को सेका करो ॥२९॥ चुडदिन्द्रय गायन मरुतो वहन्तमम् । येन ज्योतिरपन्नाधों देवन्देयाय जागीच ॥ ३० ॥ : इसका नृमेध पुरुपमेध ऋ०, वृद० २०, इन्द्र दे० है । ब्रह्मा इस मंत्रसे सामगान करै । मंत्रार्य-(मरुतः, इन्द्राय नहनाम वृहत्साम, गायरा ) हे ऋत्विजों ! इन्द्रकै मिमित्त श्रति पापनाशक वा त्रासुर नाशक बृहत्सामको गायो (असाधः, येन, देवाय. देवं, जागृषि, ज्योतिः, अजनयन ) यज्ञकी द्धि करनेवाले देवता वा ऋत्विजोंने जिस सामगान से इन्द्र के निमित्त दीप्तिमान जागो हुए अविनाशी तेजको माहा कराया अर्थात् सामगानसे इन्द्रते . जस्वी होताहै ॥ २०॥ - , ५७५ . . २० अध्याय । अध्ययो अद्रिभिः सुतसोमम्पवित्र आनय। पुनाहीन्द्रीय पातये ॥३॥ इसका मजा० ऋ०, गाय० छ० इन्द्र दे है। दुग्धको अभि- गति को मंत्रार्थ-(अनर्यो, अद्विमिः, मुतं, सोम, पवित्रे, आनय) हं श्रध्वर्यु खुम पत्थरोंगे अभिपुन सोमको पवित्र मलाओं (इन्द्रस्य, पात, पुनाहि ) इन्द्र के पीने के लिये पवित्र करों ॥ ३१ ॥ यो भूतानामधिपतिस्मिल्लोका विधिताः। य ईश महतो महांस्तेन गृहणामि त्वामहमापि गृहणामि त्वामहम् ॥ ३ ॥ इसका कौण्डिन्य , पंक्ति छ०, ग्रह दे० है । ग्रहको ग्रहण गरे । मंत्रार्थ-(यः, भूगानां, अधिपतिः) जो प्राणियों का पालन करनेवालाई ( यस्मिन, लोकाः, अधिश्रिताः) भूमादि लोक जिस परमात्मा पाश्रयसे ठहरेहए हैं। ( यः,महान महंगा, ईशे) जो सबसे बड़ा और वढोंका भी नियन्ताहै ( अहं, सेन, वा, गृह- णामि ) हे ग्रह उसी पात्मात्माकी प्राज्ञ नुसार मैं उस परमात्मा के अनुग्रह से तुझको ग्रहण करताहूँ ( गई. त्वा, माय, गृणामि) मैं तुझको परमात्मभाषको प्राप्तहुए अपने में ग्रहण करताहूँ ३२ उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यान्वा सरस्वत्यै स्वे न्द्रीय त्वा मुत्रामण एप ते योनिश्विभ्यान्त्वा सरस्वत्यै स्वेन्द्रीय त्या मुत्रामा ॥ ३३ ॥ . इसकी व्याख्या अ० १० म० २ में होगई ।। ३३ ।। पापा में अपानपाश्चतुप्पाः' औपाच मे । पाचो में विश्वोपजो मनसोसि पिलायंकः ॥३४॥ इसका मजा० ऋ०, मनु० छ०, ग्रह दे० है । हुतशेषको सूप चा भक्षण करै । मंत्रार्थ-(मे, माणपाः, अपानपान, चक्षुप्पाः, च. मे, श्रोत्रपाः, मे, वाचा, विश्वभेपजः, च, मनसः, विलायकः असि ) हे ग्रह वा हे परमात्मन् ! तुम मेरेमाणों के रक्षक अपान वायुके रक्षक, मेत्रों के रसक, श्रोत्रोंके रक्षक, मेरी वाणीरूप, सकल -- -- . शुक्लपजुर्वेद। श्रोपधाम मधान तथा मेरे मनको विषयोंसे हटाकर आत्मस्वरूप में स्थापन कानवाल हो ॥ ३४ ॥ अश्विनकमस्य ते सरस्थतिकृतस्येन्द्रेण मुत्रा- मणां कृतस्य । उपहत उपहातस्य पक्षयामि ॥ ३५॥ इसका मजा १०, उपरिष्टात् बृहती छ०, ग्रह दे० है। मंत्रार्थ- (उपहमश्विन कास्य, सरस्वतिकनरूप,सुत्राम्णा,इन्द्रेग कृगस्य, उपहूतस्य, ते, भक्षयापि ) हे ग्रह ! अाझा पाया हुभा में अश्विनी कुमसे संस्कार किये हुर, सरस्वती प्रस्तुत कियहुए रक्षा करने धान इन्द्रसे संस्कार किये वा देखेहुए और ऋत्विजोंस नावाइन किये हुए सुझको भनग करता हूँ ॥ ३५ ॥ समिट इन्द्र उपमामौके पुरोरुची पूर्वकृया- वृधानः । त्रिभित्रिशता- घजूबाहुजंघान पुत्रं यि दुरो ववार ॥ ३६॥ इसका मागिरस १०, त्रि० छ, इन्द्र दे० है । ग्यारह मंत्रों से पेन्द्रनामक आप्रियीमयाजयाज्य कर। मंत्रार्य-समिदः,उपसां, भनीके, पुरोरुवा, कन, त्रिभिः, शिवा, देवः, वाधान:, बनवाइ, इन्द्रः, वृत्रं. जघान ) भलेपकारसे दीप्त उपःकाल के. मुख अर्थात् प्रातःकान के समय आगै चननेवाले प्रकाशसे सर्प- रूपसे पूर्वदिशाको प्रकाशित करनेवाले वान और विस अर्थात सीस देवताओके साथ वृदि पानेवाले नत्र पारी इन्द्रने वृत्रासुर वा मेय को वाइन किया ( दुरः विववार) पोंके सोग वा दैत्यपुरीके द्वारको मना किया वा खोला ॥ १६ ॥ नगशसः प्रति शरो मिमानस्तनूनपारमति ज्ञस्य धाम । गोपिायान्मधुना समजनहिरे- पश्चन्द्रो यजति प्रचेताः ॥ ३७॥ इसका भागिरस भू०, त्रि० छ०, सन्नपात् दे. है। मंत्रार्थ- (नराशंसः, शूगः, यशस्य, धाम, प्रसिमिमाना, तनूनपात्. गोभिः पावान, मघना, समचन्, हिरण्यैः, चन्द्री, प्रचेताः, प्रतियनति) .
. ५८२ शुक्लयजुवंद। तु विश्ववेदाः। वाधतान्द पो अभयं कृणोतु मुवी. यस्य पतयः स्याम || ५१ ॥ इसका गर्ग ऋ०, भुरिक पंक्ति ई०, इन्द्र दे०है। माय-- (सुदामा, स्ववान, विस्ववेदाः,इन्द्रः भवोभिः, समृट्टीकः, भवत) सुरक्षक, धनवान, सर्वज्ञ इन्द्र अन्नोंके द्वारा सुखकारी हो (द्वेषः, बाधता ) हमारे दुर्भाग्यको दूर करे (श्रम, कृणोतु ) हमको अभय देय ( सुवीर्यस्य, पतयः, स्पाम) हम श्रेष्ठ धनके स्वामी हों अथवा सपुत्रवान हो ॥ ५ ॥ तस्प वपर्थ सुमतौ यज्ञियस्पार्पि भद्रे सौमनसे स्थामा समुन्नामास्ववार इन्द्रो ऽभस्मे ऽआरा चिडेपः सनुतर्युयोतु॥५२ ।। इसका गर्ग ऋ०, पंक्ति छ०, इन्द्र दे० है। मंत्रार्थ-(वये; रास्य, योन्जयस्य, मुमतौ, स्याम ) हम उस यज्ञका सम्पादन करने बाले इन्द्रकी मुमारीमें मात हों ( भदे, सौमनसे. अपि) कल्याण रूप श्रेष्ठ मन में भी स्थित हो अर्थात इन्द्र हमारे मनको मुमारी भोर कल्याणसे युक्त करे ( सः, सूत्रामा, स्ववान्, इन्द्रः, अस्मे भारात्, चित, देपा, सनुतः युयोतु ) यह पुरतक, धनवान इन्द्र हम से दूर स्थितभी जोकुछ दुर्भाग्य हो उसको अन्तर्हित करके दूर करै ॥ ५२॥ आमन्तैरिन्द्र हरिभिर्याहि मरोमभिः । मा त्या केचिनियमन्विन्न पाशिनोऽतिधन्वैव तान् इंहि ॥ ५३॥ इसका विश्वामित्र वृहती छ० इन्द्र देवत्ता है। मंत्रार्य-- इन्द्र, मन्द्रः, मयूरोममिः, हरिभिः, आयादि) हे इन्द्र ! गभ्भीर हिनहिनाहट और मोरकी समान रोमवाले अपने घोड़ों के द्वारा यहाँ आइये (कचित्, वा, मा,नियमन ) कोईभी भाते हुए तुमको वाधा नहीं देसकता (न, पाशिनः, विम् ) जैसे पाश धारी व्याधे पक्षीको पकहते हैं (तान, धन्य, इच, मतोहि ) उन , - २० अध्याप। . . को मरुभूमिकी समान लाँधकर पायो । ५३ ॥ एवेदिन्द्रं वृषणं धजचाहुं वसिष्ठासो अपर्च- न्त्यक: स नस्तुतो वीरबद्धातु गोगद्यूयम्पात स्वस्तिभिः सदा न ॥५४॥ इसका वशिष्ठ मा०वि० छ०, इन्द्र दे० है । मंत्रार्थ-(वसिष्ठा- सः, पब, इच, श्रा, वृपणं, वजूबाई, इन्द्र, सभ्यन्ति ) परम ब्रह्मविचारपरायण महापं इसप्रकार ही गोंके द्वरा मनोरथ पूर्ण करनेवाले वजधारी इन्द्रकी अर्चना कररो हैं (सः, स्तुनः, चीर- वत्, गोमत. नः, धातु ) वह स्तुतिको प्राप्त हुआ. पुप्रयुक्तं गोधन युक्त हममें स्थापन करे ( यूथ, स्वस्तिभिः, नः, सदा, पात ) हे प्राविमों ! तुम भनेको कल्याणों के द्वारा निरन्तर हमारी रक्षा करो।। ५४॥ समिदो अग्निरश्विना तप्तो पो विराट् मुतः। दुई धेनुः सरस्वती सोम शुक्रमिहेन्द्रियम् ॥५५॥ इसका विदर्भ ऋ०, अनु० छ०, अश्विसरस्ववीन्द्र दे० है। मंग-(इन प्रापिय मंत्रोंको पढ़-(अश्विना, अग्निः, समिद्धः) हे अधिनीकुमारों अग्नि पदी हुमा ( घमः, राप्तः ) श्वार्य- राप्त हुया ( विराट्, सुना) विराजमान सोम श्रमिपुत किया गया (धेनु, सरस्वती, इ, शुक, इन्द्रिय, सोम, दुद्दे) स करन वाली धेनुरूपा सरस्वती देवीगे इस यज्ञम शुद्ध इन्द्रियों के निमित्त वलदायक सोमको दुहा ॥५५ ।। वनपा भिपजा मृतोऽश्विनोमा सरस्वती। मध्वा रजा सीन्द्रियमिन्द्राय पुधिभिर्वहान् ॥ १६ ॥ इसका विदर्भ ऋ०, विराट् अनु० छ०, है। मंत्राय- (सनूगा, भिपजा, उभा, अधिना, सरस्वती, मध्या रजांसि, सुने, पथिभिः, इन्द्राय, इन्द्रियं, वहान् ) शरीरके रक्षक वैध दोनो अश्विनीकुमार और सरस्वती देवी मां से लोकोंको पूर्ण करणी सोमका अभिषव होनेपुर उसको मामि इन्द्रकी अश्विसरशीन्द्र दे० .
शुक्लयजुर्पद। इन्द्रियों की दिके निमित्त वहन करत ।। ५६ ।। इन्द्रायेन्दं सरस्वती नसेन नग्नम् । 'अधांतामश्विना मधु सेजभिपजा सुते ॥ १७ ॥ इसका वि िऋ० अनु० ८० श्यसास्वनीन्द्र दे है। मंत्राथ-( सरस्वती, नर्गशंसेन, इन्द्राय, इ, नग्न हुँ, मिपना असिना, सुने, मधु, भेपज,'अंधाताम् ) सरस्वतीने के साथ इन्द्र के निमित्त सोमनामा महौषधाके कन्दको धारण किया और वैध अश्विनीकुमारोंने अभिपुत होनेपर इस मधुर श्रीप. धिको धारण किया ॥१७॥ आजुबांना सरस्वतीन्द्रायेन्दुियाणि चीयम्। इंडोमिश्विनाविप समूज़ सपिन्दधुः ॥६॥ इसका विदर्भ ०, नि० अनु० छ, अश्विसरवीन्द्र दे. है। मंत्रथि-(भाजुह्वाना,सरस्वती, अचिनी, इन्द्रीय, इन्द्रियाणि वीर्यम, सन्दधुः ) इन्द्रको बुलातीहुई साम्बनी और अश्विनी कुमारोंने इन्य के निमित्त चक्षु श्रादि इन्द्रिों और समयको स्थाान किया ( इडाभिः इप, अर्ग, पि, सम् ) गा प्रादि पशु ओसहित अन्न, दही आदि रस भौर धनको स्थापन किया ५८ अश्विना नमुः सुतसोम शुक्रम्परिनुमा सरस्वती तमाभर हहिपेन्द्रीय पान 11५९ ॥ इसका चि िऋ०, अनू. छ. अश्वि० दे० है । मंबा (शश्मिनी, परिमुप. सुगं. शुक्र.सामं नमुषः, सरस्वती) अश्विनी कुमारोंके द्वारा महीपाक रसाक साथ अभिपुग, पवित्र सोम को नमुचि असुर चा पापसे सरस्वतीने हरण किया (तं, इद्राय, पात, बाईपा, सागर ) उसको इन्टकी रक्षानिमित्त कशा पर धारण किया ॥ ५९॥ कचप्यो न व्यचस्वारश्विभ्यान दुगे दिशः। 'हन्दी नरोदसीले दुरे कामान्सरस्वती ॥६॥ - ।
२० अध्पाप , ५८३ इसका विद० मा अनु००० अश्विन्दे है। मंत्रार्थ-अश्विभ्यां, सरस्वती,न, इन्दः उमेरोदसी, न,कविष्यः, व्यवस्वती, दुः,न, दिशा कामान् दुहे)अश्विनीकुमारीके साय सरस्वतीने और इन्द्रने दोन धावा पृथिवी और विद्रयुक्त तथा अवकाशयुक्त यज्ञीय द्वार और सब दिशामासे कामनाओं को दुहा ।। ६०॥ उपामा नक्तमश्विना दिवेन्द्र मायमिन्द्रियः। सज्ञानाने सपेशंसा समजाने सरस्वत्या ।। ६ ।। इसका विदा, अनु. छ०, ओश्व० दे० है। मंत्रार्थ (सर. स्वत्या, अश्विना सचानाने, सुपेशसा, उपासा, नक्त. दिवा, सायं द्रं इन्द्रियः, समजागे ) सरस्वती के साथ अश्विनीकुमार एकमा होकर मुन्दर रूपयाले उपकाल, रात्रि, दिन और सायं काल के समग इन्द्रको सामव्यों से संयुक्त वारते हैं ।। ६१ ।। पागनों अश्विना दियां पाहि नकर सर. स्वति । देव्या होतारा लिपजा पातमिन्दु सो सुते ॥ ६२॥ • ऋष्यादि पूर्ववत् । ममार्थ-(अश्विना, दिवा, गः, पासम्). माणीकुमारों दिन में हमारी रक्षा करो ( सरस्वति, नकं, पाहि ) हे सरस्वी तुम राभिमें रक्षा करो ( देव्या, होगारा, भिपना मुते, सचा, इन्दं. पातम् ) हे देवसम्बन्धीहोगामा, वैद्य मश्विनी कुमारों ! सोमके श्रीभषुत होनेपर इकट्ठे होकर इन्द्रकी सा करो।। ६२ ।। तिम्रलेषा सरस्वत्यश्चिना भारतीटा तीन- परिनुमा सोममिन्द्राय सुपुवर्मदम् ।। ६३ ।। इसका विदः अनु० ६० प्रवि० दे. है। मंत्रार्य (प्रेमा, सरस्वती, भारती, इटा, शिमः, पश्चिना, परिमुता, साय, गर्द, इन्द्रं सोमाय, सुपुवुः ) तीनमकारसे स्थित थात् मध्यस्थानों में सरस्वती पुलोकमें भारगी और पृथिवीपर इदा इन तीनो मीश्व- नाकुमारके द्वारा महीपोंके रससेयुत श्रधिक हर्पित करनेवाले सोमका भाषण कियागया ॥ ६३ ।। ७४ + ५८६ शुक्लपजुर्वेद । अश्निापजम्मधु पजन्नस्सरस्वती। इन्हे स्वण यशः श्रियं यूपं रूपं मधुः सुते ॥ ६४ ॥ धादि पुचत् । मंत्रार्थ-(सुने,न:, इन्द्रे. शनिवना, भेषनं. सरनी, मधु, भेपनं, तुष्टा, यशः, श्रियं, रुपंरूपं, अधुः) सोम का अभिपत्र होनपर हमारे इन्दमें शश्विनीकुमारने महापषि, सरस्वतीने मधुरूप चौपप, त्वष्टा देवताने का लक्ष्मी और अनेक भकारके कप स्थापन किये ।। ६४ ॥ मतधेन्द्रो घनस्पतिः शशमान परिमना । पीलालमश्विभ्याम्मधु दु धेनुः सरस्वती ॥६५॥ प्राप्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्थ- ( वनस्पतिः, इन्द्रः. शशमानः, धातुथा, परिमुना, कीनालं, इन्दः, अश्विभ्यां, सरस्वती, धेनुः, म .. दुई ) पयाजदेवता इन्द्र स्तुनिको मात होगाभा प्रत्यक ऋतु में गहोपोंके नसके साथ अन्न रसको रन्द्र के निमित देना. हुमा तथा अश्विनीकुमारों सहित सरस्वतीने घेतुप होकर इन्द्र के निमिा मयको दुहा ॥ ६५। गोपिन मार्ममश्विन। मामीण परिसुगासन- धानं सरस्वत्या स्वान्नै सुनम्मधु ।। ६६ ॥ ऋष्यादि पूर्ववत् । मंत्रार्य-( शश्विना, सरस्वत्या. गोषिः, परिमुवा, गुतं, मधु, सोम, इन्द्र, समधारा, म्वाहा ) अभिननी कुमारों ! तुम साली के साथ दुध घृतमादिके द्वारा महापधों के रसमे शभिघुग मधुर सोगको इन्द्र के निमित्त स्थापन को, उसका श्रेष्ठ होम हो ॥६॥ धानि पिरिन्गिन चड़िया नरस्थगी। आशुक्रां मुरादसु मवमिद्रांप जझिरे ।। ६७ इसका विद• ० म०, मनु० २०, अश्विक देवता है। मंत्राग-(धाविना, सरस्वती, धिया, नपुने, घासरान्, इंद्राग, भुकं, एकिः, इन्द्रियं, गयं वसु, शाजधिरे ) शश्विनीकुमार गौर सरस्नीने दिपूर्वक नमुचि नामक दैत्यमे इन्द्र के निमित्त शुद्ध हवि पत्रकारक और पूजनीय धन भादरण किया ॥ ६ ॥ ।