Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Grana Fala Darpana
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श्री प्रदा देव तथा शिवजी के घर प्रदान से 'ग' नामक प्रह चन्द्र ग्रहण के समय तो पृथिवी की छाया में और सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा के यम्य में प्रवेश कर जाता है। इसी लिये पुराण आदि धर्म शास्त्रों में ग्रहण का कारण राह मानकर उस के निमित्त स्नान दान जप तप हवनादि करने से अक्षय पुन्य होने का विधान सहाय इष्टि मे वर्णन कर है। पदार्थ विद्या के सिद्धान्तानुसार ग्रहण के समय मूर्य चन्द्र और पृथियी की जो एक प्रकार की एक दूसरे के साथ आक- पण शक्ति या विद्युत् शक्ति है उस में कुछ अन्तर पड़ जाता है जिसके कारण जगत् में भी अनेक प्रकार का परिवर्तन हो जाता है परन्तु किस प्रकार के ग्रहण के समय किस प्रकार का परि. घर्तन होगा इसका ज्ञान सर्व साधारण को हो जाने के लिये परी- पकारी महर्पियोंने अनेक शास्त्रो में बहुत विस्तार से वर्णन करा है। परन्तु आज कल के निरुद्यमी मनुष्यों के लिये उन अलभ्य ग्रन्यों का एकत्र करना ही महान दुर्लभ है तो फिर उन महान् विषयों से युक्त अनेक ग्रन्थों में से ग्रहण से सम्बन्ध रखने वाले समन विषयों ही को छांटकर एकत्र कर लेना कितना दुर्लभ है? यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है। इसीलिये मैंने अनेक प्राचीन ग्रन्थों का माररूप "वृहदर्य माण्ड" नामक एक महान विस्तृत ग्रन्थ सरल आर्य भाषा दीका सहित निर्माण किया है। यह अन्य लोकोपकारार्थ अंक अंक रूपसे प्रकाशित किया जाता है । इन में 'सर्वतो भद्रचक (त्रैलोक्य दीपक)' 'वृष्टि प्रबोध (भारत का वायु शास्त्र), और 'संक्रान्ति प्रकाश' नामक तीन अक* तो प्रथम प्रकाशित किये जा चुके उसी प्रकार यह 'ग्रहण निबन्ध' नामक चौथा अंक भी प्रकाशित करने के लिये तीन भागों * सर्वतों भरचक तथा 'वृधि प्रबोध' नामक अक ती प्रकाशित होत ही हाधोदाय विक गये । परन्तु ग्राहकों की माग दिन पादिन यदती हो गई इसलिये वृष्टि प्रबोध को पहिले से भी अधिक पदाकर दूसरी बार छपवाया है जो घोडे ही दिनों में सप प्राइयों की सेश में भेजी जा चुरेगी और 'क्रान्ति प्रकाश को भी इनी गिनी प्रतिये शेष हैं वे भी शीघ्र ही बिक जायेगी।
३ , में बनाया है । इन में महण होने का मुख्य तथा गीण कारण, उस के जानने के गौण तथा मुख्य उपाय और उस के स्पर्श म- ध्य-मोक्ष-स्थिति तथा विश्व आदि का यथावत् ज्ञान कुछ भी गणित किये विना सहज ही केवल दो चार अंक मिलाने ही से हो जाने का सरल विधान तो गणित के सिद्धान्त से 'ग्रहण ज्ञान दर्पण' नामक भाग में, ग्रहण के निमित्त से जगत् में होने वाले अनेक प्रकार के शुभाशुभ फलों का विधान फलित के सिद्धान्त से 'ग्रहण फल दर्पण' नामक भाग में और ग्रहण के समय स्रान -दान, जप-तप, हवन, तथा अनिष्टकारक ग्रहण की शान्ति आदि का विधान धर्म शास्त्रों के सिद्धान्त से 'ग्रहण पुण्य दर्पण' नामक भाग में किया गया है। इन में से यह 'ग्रहण फल दर्पण' नामक भाग प्रथम प्रकाशित किया जाता है इस विषय का ऐसा विस्तुत ग्रन्थ आज तक कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ है। इस को देख कर यदि पाठकों की इच्छा उन 'ग्रहण ज्ञान दर्पण' तथा 'ग्रहण पुण्य दर्पण' नामक भागों के देखने की हुई तो वे दोनों भाग भी शीघ्र ही प्रकाशित कर दिये जायेंगे। * ~ १९७० पण्डित मीठालाल व्याम, पाली (मारवाड़) चैत्र सुदि७ * हमारे यहा की पुस्तकें प्रकाशित होते तो दर लगती है। किन्तु विक्री होत कुछ भी देर नहीं लगती अतः जो लोग मगाने में देरी करते है उनके हाथ पुस्तक न आने से दूसरी आवृत्ति छपने तक उन्हें पछताना परता है इप्ती से हमारे यहा की पुस्तकों की उपयोगिता पादक स्वय ही जान सकते हैं।
सूचीपत्र । पृष्ठ. लोक. ... ... १ ... २ " . ७ ... ८ " ४ ... १० ... " " प्रकरण विषय. १ मङ्गलाचरण २ ग्रहण निर्णय ३ ग्रहण होने का मुख्य कारण ४ ग्रहण शमी फल प्रकरण (१) स्वामि निर्णय (२) ग्वामि ज्ञान (३) ब्रह्मा स्वामि फल (९) चन्द्र स्वामि फल (4) इन्द्र स्वामि फल (६) कुयेर स्वामि फल (७) मरुण स्वामि फल (८) आनि स्वामि फल (९) यम स्वामि फल (१०) स्वामि रहित पर्व पल ५ अयन फल प्रकरण (१) उत्तरायण फल... (२) दक्षिणायण फल... ६ मास फल प्रकरण (१) कार्तिक मास फल (२) मृगशिर मास फल (३) पोप मास फल... (४) माघ मास फल... (1) फाल्गुन मास फल (६) चैत्र मास फल (७) पेशान मास फल (८) ज्येष्ठ मास फल ૨૨ १३ १४ .. ... ६ ... १७ ... " " " २१ " " ... २४ ...
५ पृष्ठ. लोक. : २ ... . ... ૨૮ २९ ३० "" ... . ફેર " ... " प्रकरण. विषय. (९) आपाढ़ मास फल (१०) श्रावण मास फल (११) भाद्रपद मास फल (१२) आश्विन मास फल (१३) मास विशपे फल (१४) सूर्य ग्रहण विशेष मास फल (१५) चन्द्र ग्रहण विशेप मास फल (१६) अधिक मास फल ७ घार फलमकरण ... (१) रविवार फल (२) चन्द्र वार फल ... (३) मगल चार फल... (४) बुध वार फल ... (५) गुरु धार फल (६) शुक्र बार फल (७) शनि घार फल (८) सूर्य ग्रहण विशेष चार फल (९) चन्द्र ग्रहण विशेष वार फल ... ... " ... " ... ... ३९ ... ... ... ... .. કર ... १३ १४ ८ नक्षत्र फल प्रकरण " (१) अश्विनी नक्षत्र फल (२) भरणी नक्षत्र फल (३) कृत्तिका नक्षत्र फल (४) रोहिणी नक्षत्र फल (१) मृगशिर नक्षत्र फल (६) आर्द्रा नक्षत्र फल (७) पुनर्वसु नक्षत्र फल (८) पुष्य नक्षत्र फल (९) अश्लपा नक्षत्र फल ... ... ... કર ... १६ ... t - पृष्ठ. लोक. ... ... ६७ १ ७० ... .. ७१ ७२ ... ... ७४ ... ... o H प्रकरण. “विषय. (१०) मघा नक्षत्र फल... (१९) पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र (१२) उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र फल (१३) हस्त नक्षत्र फल (१४) चित्रा नक्षत्र फल (१५) स्वाति नक्षत्र फल (१६) विशाखा नक्षत्र फल (१७) अनुराधा नक्षत्र फल (१८) ज्येष्ठा नक्षत्र फल (१९) मूल नक्षत्र फल (२०) पूर्वापाढा नक्षत्र फल (२१) उत्तराषाढा नक्षत्र फल (२२) श्रवण नक्षत्र फल (२३) धनिष्ठा नक्षत्र फल (२४) शतभिषा नक्षत्र फल (२५) पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र फल (२६) उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र फल (२७) रेवती नक्षत्र फल (२८) नक्षत्र घश से धान्यादि की तेजी मन्दी. (२९) सूर्य ग्रहण नक्षत्र फल ... ९ नक्षत्रानुसार कूर्म चकोत देश फल प्रकरण. १० प्राह्मणादि जाति नक्षत्र प्रकरण ११ नक्षत्रानुसार मण्डल फल प्रकरण (1) मण्डल ज्ञान (२) वायु मण्डल फल (३) भन्नि मण्डल फल (४) घरण मण्डल फल (१) महीन्द्र मण्डल फल (६) घायु आदि मण्डलों का फल पाक फाल २१ ७. ... " ८० ... ... " ૨૨ ૮૨ ... 4.. २४ " ... ९७ २६ १०० 4. ... " ... २७ ... ... " १०४ ... १०७ -- पृष्ठ. श्लोक. १०८. १०९ ... ... " ૧૧૨ ११३ ११४ " ... " ... " ३० १२७ " ... ... ... " प्रकरण. विषय. (७) मण्डलों की शान्ति करने की आवश्यकता १२ योग फल प्रकरण ... (१) विष्कुम्भ योग फल (२) प्रीति योग फल... (३) आयुष्मान् योग फल .(४) सौभाग्य योग फल (१) शोभन योग फल (६) अति गण्ड योग फल (७) सुकर्मा योग फल (८) धृति योग फल... (९) शूल योग फल... (१०) गण्ड योग फल... (११) वृद्धि योग फल .. (१२) ध्रुव योग फल (१३) व्याघात योग फल (१४) हर्षण योग फल (१५) वज्र योग फल .. (१६) सिद्धि योग फल (१७) व्यतिपात योग फल (१८) परियाण योग फल (१९) परिघ योग फल (२०) शिव योग फल (२१) सिद्ध योग फल (२२) साध्य योग फल (२३) शुभ योग फल (२४) शुक्ल योग फल (१५) ब्रह्म योग फल (२६) ऐन्द्र योग फल (२७) वैधृति योग फल ११९ १२० १२१ १२२ " " .. १२४ " " १२६ १२७ १२८ १२२ ... ... " १३० ३४ " ... " .. ..
पृष्ठ. लोक. ... ... . ... ... १३९ ... ... " १४१ १४२ १४३ ... ... " ८ १४७ " प्रकरण. विषय. १३ पशि फल प्रकरण (१) मेष राशि फल... (२) वृप राशि फल... (३) मिथुन राशि फल (४) कर्क राशि फल (५) सिंह राशिफल (६) कन्या राशि फल (७) तुला राशि फल (२) वृश्चिक राशि फल (९) धन राशि फल (१०) मकर राशि फल (११) कुम्भ राशि फल (१२) मीन राशि फल (१३) राशि परासे हरएक वस्तु की तेजी मन्दी (१४) नीच राशि स्थित चन्द्र ग्रहण फल १४ खांश (आकाश भाग) फल प्रकरण (१) खांश निर्णय (२) प्रथम खांश फल (३) द्वितीय खांश फल (४) तृतीय खांश फल (१) चतुर्थ खांश फल (६) पञ्चम खांश फल (७) पर खांश फल (८) सप्तम खांश फल (९) प्रन्यान्तर से आप खांश फल (१०) मध्य खांश फल अन्त्य खांश फल सन्ध्या काल फल (१३) मोश समय खांश फल ३९ ... " ... " ... " ४० " ३१ ... १६० " .. " 1. 5 १६४ " १६६ पृष्ठ. श्लोक " १६७ " ४३ " ... ... " १७२ १७२ ... ... २४ " १७३ १७४ ... " ... ... ... ... प्रकरण. विषय. १५ ग्रस्तोदय, ग्रस्तास्त, व मनास फल प्रकरण. (१) सूर्य चन्द्र ग्रस्तोदय फल ... (२) मूर्य प्रस्तोदय प्रस्तास्त फल (३) चन्द्र प्रस्तोदय प्रस्तास्त फल (४) खग्रास फल (५) खग्रास पाप हष्टि फल १६ दिशा फल प्रकरण ... (२) ईशान कोण फल (२) पूर्व दिशा फल (३) अग्नि कोण फल (४) दक्षिण दिशा फल (4) नत्य कोण फल (६) पश्चिम दिशा फल (७) वायव्य कोण फल (८) उत्तर दिशा फल १७ पास फल प्रकरण ... (१) दश प्रकार ग्रास निर्णय " (२) सव्य ग्रास फल (३) अप सव्य ग्रास पल (७) लंह पास फल ... (१) ग्रसन ग्रास फल (६) निरोध पास फल (७) अवमर्दन ग्रास फल (6) आरोहण ग्रास फल (९) आघात ग्रास फल (१०) मध्यतम मास फल (११) अन्ततम पास फल १८ वर्ण फल प्रकरण (१) धून वर्ण फल ... " ... ... " १८२ ... .. " ... " " १८७ " ... १९० । ... ... " १२ पृष्ठ. श्लोक " :: " १९६ १ ... ... " " २२ " २०७ २०८ .. " २०९ ... ." प्रकरण. विषय. (२) कृष्ण वर्ण फल... (३) रक्त घर्ण फल (४) कपिल वर्ण फल (4) धर्ण घश से ब्राह्मणादि को अशुभ फ्ल... (९) वर्ण वश विशेष फल १९ ग्रह दृष्टि फल प्रकरण (२) भीम दृष्टि फल (२) बुध दृष्टि फल (३) शुक्र दृष्टि फल... (४) शनि दृष्टि फल... (6) गुर रहि फल ... २० ग्रह अस्त-फल (१) भीम ग्रस्त फल (२) वुध ग्रस्त फल... (३) गुरु ग्रस्त फल... (४) शुक्र ग्रस्त फल... (५) शनि ग्रस्त फल... २१ मोक्ष फल प्रकरण (.) दश प्रकार के मोक्ष निर्णय... (२) दक्षिण हनु मोक्ष फल (३) वाम हनुमोक्ष फल () दक्षिण कुक्षी मोक्ष फल (६) चाम कुक्षी मोक्ष फल (६) दक्षिण पायु तथा वाम पायु मोक्ष फल.... (७) संछईन मोक्ष फल (८) जरण मोक्ष फल (२) मध्य विदारण मोक्ष फल (१०) अन्य विदारणा मोक्ष फल... (१९) मोक्ष समय का वर्ण फल ... २१० ૨૧૧ " २१३ " ... २१४ " ... " " " २१६ २१७ २१८ ... " " .." २२० ૨૨૬ રરર २२३ २२४ ११ पृष्ठ. लोक. .. २२५ " ... ... २२९ २३० ૨રૂર " ... २३३ " ... " ५९ २३५ " ... ... ... २३७ प्रकरण. विषय. २२ काल फल प्रकरण ... (१) एक ग्रहण से आगे होने वाले अन्य ग्रहण का मासानु सार फल (२) छः मास से होने का फल (३) तेरह महीनों से होने का फल (४) अठारह महीनो से होने का फल () चन्द्रमा का ५ । ११ और सूर्य का १७ महिनों से होने का फल (६) चन्द्रमा का ५ वर्ष और सूर्य का १२ वर्ष पीछे होने का फल (७) एक मास में दो ग्रहण होने का फल... (८) एक पक्ष में दो ग्रहण होने का फल... (९) चन्द्र ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य ग्रहण होने का फल (१०) सूर्य ग्रहण के एक पक्ष पीछे चन्द्र ग्रहण होने का फल (११) सूर्य, चन्द्र और फिर सूर्य ग्रहण होनेका फल (१२) अति बेला ग्रहण फल ६० (१३) हीन बेला ग्रहण फल (१४) अति वेला हीन वेला ग्रहण होने में शका (१५) अति वेला हीन बेलाकी शंका का समाधान २३ उत्पात फल प्रकरण... (१) उत्पातों का पृथकर अशुभ फल ६१ २४ ग्रहण समय यादल वर्षा आदि शान प्रकरण... (१) नवांश वश से वर्षादि निर्णय- (९) निमित्तों द्वारा वर्षा आदि निर्णय २५ मनुष्यादि को जन्म कर्मादि नक्षत्र फलप्रकरण. (१) जन्म कर्मादि नक्षत्र निर्णय... (२) जन्म कर्मादि नक्षत्र फल (३) जन्म नक्षत्र फल ६४ ... २३८ " " ... " २४० २५१ ૪૨ २४३ " ... २४२ DF ... " .." ... " २५४ पृष्ट. लोक. ... " ... " ... " ... प्रकरण. विषय. (४) जन्म राशि तथा जन्म लग्न फल (4) जन्म राशि मल... (६) जन्मादि द्वादश राशि फल... २१० २६ अनिष्ट ग्रहण शान्ति प्रकरण २६१ (१) साधारण शान्ति... २६३ २७ ग्रहण श्रवण फल... ૨૬૪ ॥ इति सम्पूर्णम् ॥ नई शोध । नई शोध ॥ नई शोध ॥ आयुर्वेद में बुद्धि बढाने का उपाय । आजकल विना विद्या के मनुष्यों का जीवन हो ही नहीं म. कता और विद्या के लिये बुद्धि की तीव्रता चाहिये इसीलिये प. रोपकारि महर्पियोंने बुद्धि बढ़ाने के अनेक उपाय वैद्यक शास्त्रमें वर्णन करे हैं उनकी अत्यन्त आवश्यकता देखफर 'आयुर्वेद पञ्चा- नन' व्यास पुनमचन्द तनसुख वैद्यने बहुत पोजके साथ उन उपायों को एकत्र फरके सरल हिन्दी भाषा टीका सहित निर्णय सागर यन्त्रालय में छपवाकर प्रसिद्ध करी है जिसकी प्रशंसा वैद्यक के सभी समाचार पत्रोंने मुक्त कंठसे की है मूल्य रू.१) वी.पी से १)रु. पुस्तक देखने ही योग्य है। बुद्धि वर्धक वटी। यह वटी कई वर्षों के अनुभव से बनाई है इसके सेवनसे मस्तिक के शान तन्तु पुष्ट हो जाने से स्वभाविक ( Natura) बुद्धि बहुत तीव हो जाति है जिससे स्मरण शक्ति घढ जानेसे फिर विद्यार्थियों को परिक्षामा फेल होने का भय नहीं रहता इसके २१ दिन सेवन करने योग्य एक डिग्री का मूल्य स.१)पी-पी से११)रु. इस विषय में अधिक हाल जानना हो तो हम से पत्र व्य- वहार करें। पण्डित मीठगाल व्यास, म्यानर-राजपूताना।
॥ श्रीः॥ ग्रहण फल दर्पण। ब्रह्मेशविष्णूश्च महापासवान् सन्दर्शिनोऽगम्य निमित्तशास्त्रान् । श्रीमन्महाराममुनामधेया- नन्यान्समनाँश्च गुरुन्नमामि ॥२॥ ब्रह्मा, विष्णु, महादेवनी आदि देवों को; गर्ग, पराशर, नारद आदि महर्पियों को; वराहमीर, नरपति, चण्डूनी आदि ज्योतिष के आचार्यों को; और श्रीमान महारामदासजी व्यासनी आदि सम्पूर्ण गुरुओं को मन, वचन, और कायासे प्रणाम-नमस्कार करता है कि जिनके अनुग्रह से मेरा यह कार्य निर्विघ्नता से मिद्ध हो । बहुफलं जपदानहुतादिके स्मृतिपुराणविदः प्रवदन्तिहि । सदुपकारिजने च चमत्कृतिः ग्रहणमिन्द्रिनयोः भवदेत्ततः॥२॥ परम पूज्यनीय महर्पियों ने जगत के हितार्थ मूर्य तथा चन्द्रमा के ग्र- हण सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रकारका ज्ञान तीन भागों में बहुन विस्तार से वर्णन किया है उनमें ग्रहण होने के समय, स्पर्श, मध्य, मोक्ष, स्थिति, शर, स. न्मीलन, उन्मीलन, और विश्वे आदि के ज्ञान का निर्णय तो सिद्धान्त आदि गणित के ग्रन्थों में ग्रहण के समय स्नान, दान, जप, तप हवन और सूतक आदि के विधि निषेध का निर्णय पुराण आदि धर्म शास्त्रों में; और ग्रहण के निमित्त से सम्पूर्ण जगत् में होनेवाले अनेक प्रकार के चमत्कारी शुभाशुभ फलों का निर्णय संहिता आदि फल विधायक ज्योनिप् के ग्रन्थों में किया है।
सारं सारं समुद्धत्य पूर्व शास्त्र कदम्बतः । क्रियते सुखयोधाय ग्रहस्य फलदर्पणम् ॥ ३ ॥ ग्रहण से सम्बन्ध रखने वाले उपरोक्त तीनों विपयों का सर्व साधा- रण को सुख से वोध-ज्ञान हो जाने के लिये मैंने अनेक प्रकार के प्राचीन ग्रन्थों में से सारका भी परम सार रूप संग्रह एकत्र करके फिर ग्रहण जानने की गणित तथा धर्म शास्त्रों के विधान तो 'ग्रहण निबन्ध' नामक ग्रन्थमें किया है और फलिन् सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रकारका विधान इस 'ग्रहण फल दर्पण' नामक ग्रन्थ में करता हूं। भारद्वाजकुलारविन्दतरणिर्माध्यन्दिनीयो द्विजो नानाशास्त्रविचार मनहृदयो व्यासावटङ्काङ्कितः। वास्तव्यो मरुमण्डले मुविदिते पालीपुरे धार्मिको जात्यापौष्करणो महीवर सुतः श्रीमिष्टलालामिधः ॥४॥ मारवाड़ देशस्थ जोधपुर राज्यान्तरगत व्यापार के लिये सुप्रसिद्ध 'पाली नगर में निवास करनेवाला, पुष्करणा ज्ञातीय, भारद्वाज गोत्री,मा- ध्यन्दिनीय शाखाध्यायी-शुक्ल यजुर्वेदी, टङ्कशालावटंक-व्यामपदाधिकारी. श्रीमान् महीधर शर्मा का पुत्र, ज्योतिः शास्त्र आदि अनेक पानीन शास्त्रों के तत्व का अन्त करण से विचार करने में मदा मन रहनेवाला ('प्राचीन ज्योति-शास्त्रश्रमी, दैवज्ञ भूपण, ज्योनिय रत्न आदि) मैं पण्डिन मीठा- लाल व्याम इस मन्य को प्रकाशित करता है। ग्रहण निर्णय। चन्द्रस्प यदिवा भानोः राहुणा सह संगमः। उपरागमिति ख्याता तानन्त फलं स्मृतम् ॥ ५॥ राहु वा केतु के साथ चन्द्रमा का योग होने से चन्द्र ग्रहण और सूर्य का योग होने से सूर्य ग्रहण होता है उमे पर्व, उपराग, ग्रह वा . ग्रहण कहते हैं।
. ग्रहण होने का मुख्य कारण । राहुः कुभामण्डलगः शशाङ्कं शशाङ्कग छादयतिन विम्बम्। तमोमयः शम्भुवर पदानातू सर्वागमानाम विरुद्धमेतत् ॥ ६ ॥ चन्द्रमा का बिम्ब पृथिवी की छाया में आ जाने से चन्द्र ग्रहण ओर सूर्य के आडा आ जाने से सूर्य ग्रहण होता है यही ग्रहण होने का मुख्य कारण है । परन्तु श्री महादेवजी के वरदान से नन्द्र ग्रहण के स- मय तो पृथिवी की छाया में और सूर्य ग्रहण के समय चन्द्रमा के बिम्ब में अन्धकारमय राह प्रवेश होता है इसी लिये पुराण आदि धर्मशास्त्रों तथा जाणित व फलित आदि ज्योति शास्त्रों में ग्रहण होने का कारण राह माना है । इसका विशेष निर्णय मेरे बनाये हुये "वृहदयं मार्तण्ड” नामक ग्रन्थ के 'ग्रहण निवन्य' नामक अङ्क में किया गया है। ग्रहण स्वामि फल प्रकरण । पर्व स्वामि निर्णय- पण्मासोत्तर वृद्धवाः पर्वेशाः सप्तदेवताः क्रमसः । ब्रह्माशीद्र कौवेरावरुणाग्नियमाश्च विज्ञयाः ॥ ७॥ सृष्टि प्रारम्भ से ६ । ६ महीनों के क्रम में ब्रह्मा आदि देवता पर्व (ग्रहण ) के स्वामि होते है जैसे (१) से ब्रह्मा, (२) से चन्द्र, (३) से इन्द्र, (४) से कुबेर, (५) सेवरुण, (६) से अमि और (७) से यम। पर्व स्वामि ज्ञान- शाकरविगुणंमासातैरादयं विभाजितं ॥ तानशेपेट्टतेचाश्वैः शेषेपर्वेश निर्णयः ॥ ८ ॥ विक्रम संवत् में से १३५ हीन करने से जो शेप रहे उसे शालीवा- हन का शक कहते हैं उस शक को १२से गुना करके फिर चेत्रादि गणना से ग्रहण के मास तक की संख्या मिला के ४९ का भाग दें फिर जो शेष रहे उसको ७ का भाग देने से जो शेष रहे उसका स्वामि. ब्रह्मादि क्रम से जाने। नझा स्वामि फल- पर्वाधिपेब्रह्मणिसस्यसंपत्वृद्धिद्विजानांचतथा पशूनाम् । मंमजानां धनधर्मदिनिरोगतास्याद्विजयोमरार्गः ॥९॥ ग्रहण का स्वामि ब्रह्मा हो तो वर्षा श्रेष्ट, वतियों की स्मृद्धि, वा ह्मणों व पशुओं को मुख, नगन् में क्षेम कल्याण आरोग्य आदि शुमनथा धन व धर्म की वृद्धि और देवताओं की नय हो । चन्द्र स्वामि फल- चंद्रेचपर्वाधिपती मजानाक्षेमवविद्वजन पीडनस्यात् ।। अवर्षणं धान्यमहर्यताचविनाश मायांतितयौपीनाम् ॥ १० ॥ ग्रहण का स्वामि चन्द्र हो तो प्रजा मे क्षेम कल्याण, विद्वानों को पीडा, वर्षा की कमी, धान्य तेन और मम्पूर्ण प्रकार की औषधियों का नाश निम से किराना नेन हो । इन्द्र स्वामि फल- इन्द्रोपदापर्वपतिस्तदानीम्परस्परं स्यात्कुकटो नृपाणाम् । धान्यानिनश्यन्तिशरद्भवानिक्षेमम्मजानां नभवेत्कदाचित् ॥१२॥ ग्रहण का खामि इन्द्र हो नो राजाओं के परस्पर वैर, शरद ऋतु में उत्पन्न होने वाले धान्यों का नाश और जगन् में अक्षेम तथा अकल्याण आदि अशुभ फल होवे। कुबेर म्वामि फल- यदाकुरेरोग्रहणाधिपः स्यात्तदाधनाशोधनिनां जनानाम् । क्षेमं मुभिक्षंचनिरामयत्वं लोकाश्वसर्वेभयवर्जितास्युः ॥ १२ ॥ ग्रहण का स्वामि कुबेर हो तो धनवानों के धन का नाश, जगन में क्षेम कल्याण, आरोग्य, निर्मयता और सुभिक्ष हो ।
५ वरुण स्वामि फल- जलेश्वरोपर्वपतौ मुभिक्षप्रजास्तथोपद्रववर्जिताश्च ।। क्षेमंचसर्वत्रधनमद्धिः पीडांसमायांति च राजपुत्राः ॥ १३ ॥ ग्रहण की स्वामि वरुण हो तो जगत् में क्षेम कल्याण, धन की वृद्धि, उपद्रवों का नाश, और मुभिक्ष होवे जिस मे प्रजा को आनन्द किन्तु राज पुत्रों को पीडा हो। अग्नि म्यामि फल- पर्वाधिपोग्निः सतुमित्रनामाधनप्रदिवभयं क्षितीचः ॥ शुभाचाष्ट्रपतीन्हितस्छान् निरोगतांचापिकरोतिसस्यम्॥ १४ ॥ ग्रहण का स्वामि अग्नि हो तो वर्षा श्रेष्ठ, खेतियों की वृद्धि, धन की प्राप्ति, भय तथा रोगों का नाश और राजाओं का कार्य सिद्ध होवे । यम स्वामि फल- यमोयदापर्वपतिस्तदास्याद वर्षर्णभूपभयमनानाम् । अन्नभयंचौरभयं पृथिव्यांदुर्भिक्षमेवं मुनिभिः मदिष्ठम् ॥ १५ ॥ ग्रहण का स्वामि यम हो तो जगन में अनावृष्टि, दर्भिक्ष, धान्य का नाश, चोरों का उपद्रव और राना का भय हो। स्वामि रहित पर्व फल- पर्चेशहीनंग्रहणं यदास्थानदामजानाम शुभप्रदहि ॥ अष्टिदक्षन्मरकमदं च कदापिकालांतरतोभवेत्तत् ॥ १६ ॥ कोई काल में कदाचित् स्वामि के विना ही ग्रहण हो वे अर्थात् ६।६ महिनों का क्रम छोडकर ५ । ७ । ११ । १३ आदि महिनों में चाहे जिस समय ग्रहण हो जावे तो जगत् मे अनावृष्टि, दुर्भिक्ष और महामारी आदि अशुभ फल होवे ।
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अयन फल प्रकरण ।
उत्तरायन फल-
द्विजानो क्षत्रियाणांचगवांच पीडनंभवेत् ॥
धान्यं महर्घपणमासैः ग्रहणेचोचरायणे ॥ १७ ॥
ग्रहण उत्तरायन में हो तो माम तक ब्राह्मण, क्षत्री तथा गायों
को पीडा और धान्य मँहगा होवे ।
दक्षिणायन फल-
दक्षिणायनगेराहो वैश्यशुद्र प्रमईनम् ॥
महिपेकुंजरेपीडानिभिर्मासैर्महर्घताः ॥ १८ ॥
ग्रहण दक्षिणायन में हो तो ३ मास नक वैश,शूद्र तथा भैमियों और
हाथियों को पीडा नथा मँहगे हो जावें ।
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मात फल प्रकरण ।
कार्तिक मास फल-
काचिक्यामनलोपजीविमगधान् मान्याधिपान् कोशलान्
कल्मापानथमूरमेनसहितान् काशीश्च संतापयेत् ।
हन्याच्चाकलिंगदेशनृपति सामात्यभृत्यं तमो
दृष्टं क्षत्रियतापदं जनयति क्षेमं मुभिक्षान्वितम् ॥ १९ ॥
ग्रहण कार्तिक में होतो मुनार, लुहार, हलवाई, भाइ ने, वा अंज-
मेर आदि अग्नि से भीवीका करने वाले; मगध देश, पूर्व देश, कौशल देश,
कल्मष देश, सूरसेन देश, काशि देश, व कलिंग देश के राना तथा प्रजा
को पीड़ा; और धान्यादि का माव सस्ता हो जावे ।
मंगशिर मास फल-
काश्मीरकान् कोशलकामपौरांन् मृगांश्च हन्यादपरांतकाश्च ।।
ये सोमपास्तांश्च निहंति सौम्ये मुटाएकोममुभिक्षकच ॥३०॥
७ ग्रहण मिगशिर में हो तो काश्मीर कोशल पोद अपरान्तक-इन देशों में कट, पशुओं का नाश, सोमपान करने वालों को पीड़ा और ज- गत् में सुवृष्टि सुभिक्ष तथा क्षेम कल्याण होवे । पोप मास फल- पौपे द्विजक्षत्रजनोपगेधः ससैन्धवाख्याः कुकुराविदेहाः ॥ वंसं व्रजंत्यत्र च मंदष्टि भयं च विद्यादभिक्षयुक्तम् ॥ २१ ॥ ग्रहण पोप में हो तो ब्राह्मण तथा क्षत्रियों को पीड़ा, सिन्ध कुकुर विदेह-इन देशों में कट, और जगत् में वर्षा की कमी तथा दुर्भिक्ष आदि का भय होवे। माघ मास फल, माघे तु मातृपितृभक्त वशिष्टगोत्रान् स्वाध्यायधर्मनिरतान् करिणस्तुरंगान् ॥ वंगांगकाशिमनुजांश्च दुनोति राहु- दृष्टिं च कर्युकुजनानुमतां करोति ॥ २२ ॥ ग्रहण माघ में हो तो मातापिता की भक्ति करने वाले, वसिष्ठ गोत्री, वेद पाठी व विद्यार्थि तथा धर्मात्माओं को कट; हाथी तथा घोड़ो का नाश; वंग, अंग, काशी, इन देशों में क्लेश और जगत में वर्षा खेति करने वालों के मन चाही होवे। फाल्गुन मास फल- -- पीडाकर फाल्गुनमासिपर्व बंगास्मकावंतकमेकलानाम् । नृसज्ञ यस्य भवरांगनानां धनुष्कर क्षत्रतपस्विनां च ॥२३॥ ग्रहण फाल्गुन में हो तो नाचने तथा गाने वालों, श्रेष्ठ स्त्रियों, धनुप बनाने वालों, क्षत्रियों तथा तपस्या करने वालों को पीडा; और वंग, अम्मक, आवन्त, मेकला-इन देशों में क्लेश होवे।
चैत्र मास फल- चैव्यं तु चित्रकरलेखकगेयशक्तान रूपोपजीवि निगमज्ञाहरण्यपण्यान् पौदान्धकैकयजनानधकाश्मकांश्च- तापस्पृशत्यमरपोत्रविचित्रवर्षी ॥ २४ ॥ ग्रहण क्षेत्र में हो तो चित्रकार तथा फोटाग्राफर, लेखक, घर बनाने वाले, वेश्या भांड तथा नाटककार आदि रूप से नीविका करने वालों को पीड़ा; पौदूर, आन्ध्रक, कैकेय तथा अस्मक-इन देशों में क्लेश और सोना तथा व्यापार की अन्य वस्तुओं का भाव तेज हो जावे । वैशाख मास फल- वैशाखमासे ग्रहणे विनाशमायांति कार्पासतिलासमुदाः ।। इक्ष्वाकुयौधेयशकाः कलिंगाः सोपद्रवाः किंतु मुभिक्षमस्मिन्॥२५॥ ग्रहण वैशाख में हो तो इक्ष्वाकु, योधय, शक, कलिंग-इन देशों में उपद्रव; कोस रुई सूत कपडा, तिल तैल, तथा मुंग का भाव तेन और जगत् में सुभिक्ष होवे। ज्येष्ठ मास फल- ज्येष्ठे नरेंद्र द्विजराजपत्न्याः सस्यानिप्टिश्च महागणश्च ।। प्रध्वंशमायांति नराश्च सोम्याः शालैः समेताश्च निपादसंघाः॥२६॥ ग्रहण ज्येष्ठ में हो तो ब्राह्मण राना तथा रान स्त्री, महागण, निपाद तथा सोमपान करने वालों को पीडा; और वर्षा की कमी, तथा खेतियों का नाश जिम मे धान्य तेज हो भावे । आषाढ़ मास फल- आपादपर्वल्पुदपानवा नदीमवाहान् फलमूलवारीन् ॥ गांधारकाश्मीरपुलिंदचीनान हतान्वदेत् महलबर्पमस्मिन् ॥२७॥ ग्रहण अपाद में हो तो तालाव नादि आदि, फल, भूल, कन्धार, का. इमीर, पुलिंद, चीन आदि का नाश और वर्ष सर्वत्र एकमी नहीं होवे।
श्रावण मास फल-
८
काश्मीरान् सपुलिंदचीनययनान् हन्यात् कुरुक्षेत्रजान्
गांधारानपिमध्यदेशसहितान दष्टो ग्रहश्रावणे ।
कांवोजैकशफाश्वशारदमपि त्यक्त्वा यथोक्तानिम-
नन्यत्र प्रचुरानहष्टमनुर्द्धात्री करोत्यारताम् ॥ २८ ॥
ग्रहण श्रावण में हो तो काश्मीर, पुर्लिद, चीन, यवन देश,
देश, कन्धार, मध्य देश, कांबोज, एकपाद देश-इनका तया शरद ऋतु में
उत्पन्न होने वाले धान्यों का नाश किन्तु उपरोक्त देशों को छोड़ के अन्य
देशों में धान्य की वृद्धि तथा मनुष्यों को आनन्द होवे।
भाद्रपद्मास फल-
कुलिंगवंगानं मगधान् सुराष्ट्रनम्लेछान् सुवीरान् दरदाश्मकांश्च ॥
स्त्रीणां चगर्भानशुरा निइंति मुभिक्षकद्भाद्रपदेभ्युपेतः ॥ २९ ॥
ग्रहण भाद्रपद में हो तो कलिंग, बंग, मगध, मुराष्ट्र, म्लेछ देश,
सुवीर, दर्द, अश्मक, इन देशों को पीड़ा, स्त्रियों के गर्भ नाश और जगत्
में सुवृष्टि तथा सुभिक्ष होवे।
आश्विन मास फल-
कांबोजचीनयवनान् सहशिल्पिकृद्भि
बाह्रीकसिंधुतटवासिजनांश्च हन्यात् ।
आन-पौद्राभिषनश्च तथा किरातान्
दृष्टोमुरोषयुजि भूरि मुभिक्षकञ्च ॥ ३० ॥
ग्रहण आसोज में हो तो कांबोन, चीन, यवन, बाल्हीक, सिन्ध, अ-
नात, पोद्र किरात-इन देशों में कष्ट, शिल्पी (बढई आदि) तथा वैद्यों को
पीड़ा और जगत में बहुन श्रेष्ट सुभिक्ष होवे ।
मास विशेष का फल-,
अश्वयुजमाधकार्तिकभाद्रपदेष्वागतः मुभिक्षकरः ।
राहुरवशेषमासेष्वशुभकरो वृष्टिधान्यानाम् ॥ ३१ ॥
. ग्रहण यदि भाद्रपद, आसोज, कार्तिक वा भाव में हो तो सुमित तथा धान्य मन्दा और जो मिगशिर, पोप, फाल्गुन, नेत्र, वैशाख, ज्येठ, आषाढ वा श्रावण में हो तो वर्षा तथा धान्य का नाश होवे । सूर्य ग्रहण का विशेष मास फल- सूर्य ग्रहण कार्तिक में हो तो मुभिक्ष, मिगशिर में हो तो रस कस तेन, पोप में हो नो धान्य तेन, मात्र में हो तो मध्यम फल, फाल्गुन में हो तो धान्य बहुत तेज, चैत्र में हो तो धान्य संग्रह करने से शीघ्र लाम, वैशाख में हो तो धान्य संग्रह करें, ज्येष्ट में हो तो धान्य अवश्य संग्रह करें, आपाठ में हो तो दुर्भिक्ष राज्यविग्रह, श्रावण में हो तो धान्य बेचने से लाभ, भाद्रवा में हो तो मुभिक्ष और आसोन में हो तो घृत तेलतेन होवे।३२॥ चन्द्र ग्रहण का विशेष मास फल- चन्द्र ग्रहण कार्तिक में हो तो समुद्र में विग्रह, मिगशिर में हो तो धान्य संग्रह करने से ७ महिनों से लाभ, पोप में हो तो रस कस तेज, माय म हो तो रस संग्रह करने से शीघ्र लाभ, फाल्गुन में हो तो आगे रस तेज, चैत्र में हो तो वर्पा काल में दुर्भिक्ष, वैशाख में हो तो मर्व वस्तु तेग, ज्येठ में हो तो मुभिक्ष इसलिये धान्य शीघ्र वेच दें, आपाट में हो तो रम कस वस्तु तेन, श्रावण में हो तो सर्व वस्तु का नाश, भाद्रपद में हो तो धान्य बेचकर रस संग्रह करें और आसोज में हो तो कपाम रई मूत आदि तेन होवे । ३३ ।। अधिक मास फल- कदाचिदधिके मासे ग्रहणं चन्द्रसूर्योयोः । सर्वगष्ट्रभयं भंगः क्षयं यान्ति मही भुजः॥ ३४ ॥ ग्रहण अधिक मास में हो तो मर्व राष्ट्र का भंग तथा भय और रा. नाओं को देश होवे। --- वार फल प्रकरण | रविवार फल- अल्पं धान्याल्प मेघाश्च स्वल्पक्षीराश्च धनेवः । कलिंगदेश पीडा च ग्रहणे रविवासरे ॥ ३५ ॥ ग्रहण रविवार को हो तो वी की कमी, धान्यकी उत्पत्ति अल्प, संवन् साधारण, गायों के दूध थोडा, रानाओं मे युद्ध, कलिंग देश में पीड़ा और घृत तैल के वेच देने से लाभ होवे । चन्द्रवार फल- कर्पूरं मदिराश्चैव विनश्यन्ति वरांगनाः । यमुनातट पीडा च दुर्भिक्ष तस्कराद्भयम् ॥ ३६ ।। ग्रहण चन्द्रवार को हो तो कपूर तथा मद्य का नाश, किसी श्रेष्ट स्त्री को काट यमुना के किनारे के देशों में पीड़ा और धान्य तथा तेल के संग्रह करने से लाभ होवे । मंगलयार फल- राजकुंगरपीडाच दुर्भिक्षं तस्कराद्भयम् । अवन्ति देशपीडाच मगलग्रहणं यदि ॥ ३७॥ ग्रहण मंगलवार को हो तो राज्यहाथी को कप्ट, दुर्भिक्षका मय, चोरों का तया अग्निका उपद्रव और अवन्ति (मालवा) देशमें पीडा होव। बुधवार फल- पीत धातु महर्षवं सार धान्यं विनश्यति । कोशले छत्रभंगश्च ग्रहणे बुधवासरे ॥ ३८ ॥ ग्रहण बुधवार को हो तो चावल आदि सार धान्यों का नाश, सोना पीतल आदि धातू तेन, कोशल देश में किसी रानाको पीडा और सुपारी तथा लाल वस्त्र के संग्रह करने से लाभ होवे।
१२ गुरुवार फल- सत्य शौचरतायेच चित्रवस्तु प्रकारकाः। पीडयोत्सन्धु देशच ग्रहणं गुरुवासरे ॥ ३९ ॥ ग्रहण गुरुवारको हो तो सत्य बोलने वाले, पवित्र रह्ने वाले, चित्र विचित्र वस्तु बनाने वाले तथा मिंध देश के रहने वाले पीडा भोगे और पीली, लाल व सुगन्धी वस्तु तथा नेल आदि सग्रह करने में राम हो । शुक्रवार फल- राज्ञामन्तः पुरं चैव भृगुकच्छं विनाशयेत् । रजतमौक्तिक वस्त्र ग्रहण भृष्टवासरे ॥ ४० ॥ ग्रहण शुक्रवार को हो तो राज्य के महलों में उपद्रव, भडोंच देश मे पीडा किन्तु अन्य देशों में सुख, चादी मोती तथा स्वेत कपडे का भाव तेन और जगत् में मगलीक उत्सव अधिक होवे। शनिवार फल- सिन्धुतीरे च सौराठ महर्घ तस्काराद्भयम् । राजमन्त्रि विनाशार्थ गृहणे मन्दवासरे ॥ ४॥ ग्रहण शनिवार को हो तो सिंध तथा सोरठ देश में धान्य तेन, चोरो का उपद्रव, रानके मन्त्रियो को कष्ट ज्वार तथा अफीम आदि काली वस्तु तेन और पीले व राते वस्त्र तथा ताना आदि सग्रह करनेसे २ मास में लाभ होवे। सूर्य ग्रहण विशेप वार फल-- सूर्य ग्रहण रविवार को हो तो गेहू चावल मुंग आदि धान्य तथा गुड का समह करने से दो मास में बहुत लम होवे ॥४२॥ सोमवार को हो तो घृत तिल तेल मुग उडद तथा अफीम आदि कारी वस्तु का सग्रह करने से लाभ होवे।४३॥ मगलवार को हो तो कपास रुई सूत कपडा चादी मोती सुमारी ना.
१३ लेर मनीठ हींगलु घृत खांड गुड़ तांबा मुंगा गेहुं चावल आदि सर्व वस्तु का संग्रह करने से साढे चार मास से बहुत लाभ होवे।४४॥ बुधवार को हो तो ज्वार बाजरी मोठ चने आदि धान्य सुपारी कपास कपड़ा लवंग अफीम आदि संग्रह करने से दो मास पीछे लाभ होवे।४५॥ गुरुवार को हो तो तिल तेल एरंड अलशी सरमों खारक काले वस्त्र संग्रह करने से चार मास पीछे लाभ होवे 1८६।। शुक्रवार को हो तो वायु का जोर वर्षा अधिक धान्य भाव साधा- रण और खेतियों की वृद्धि होवे।४७॥, शनिवार को हो तो तिल तेल तमाखू काली वस्तु तथा शस्त्र का संग्रह करने से बहुत लाभ होवे।४८॥ चन्द्र ग्रहण विशेष वार फल-- चन्द्र ग्रहण रविवार को हो तो अफीम और चांदी मन्दी हो वे इसलिये पहिलेही से वेच दें।४९॥ सोमवार को हो तो रुई पहिले से संग्रह करने से २ मास में एक खंडी पर रु. २५) ३०) का लाभ होवे ॥५०॥ मंगलवार को हो तो रुपा तथा जसद राई के मेथी आदि के संग्रह करनेसे ३ मास पीछे लाभ होवे ।५१॥ बुध वार को हो तो कसुंभा मनोठ तथा सोने के संग्रह से लाम होवे।५२ गुरुवार को हो तो रुई के संग्रह करने से ४ मास में एक खंडीपर रु. २०) २५) का लाभ हो वै ॥५३॥ शुक्रवार को हो तो, जगत् में आनन्द और रुई मन्दी हो जावेगी उस समय खरीदने से आगे ४ मास पीछे अच्छा लाभ होवे।५४॥ शनिवार को हो तो अलशी सरसों एरंडी तिल आदि का संग्रह क- रने से ६ मास पीछे लाम होते ६५॥
. नक्षत्र फल प्रकरण । अश्विनी नक्षत्र फल- अश्वाश्च सेनापतिवैद्य सेवकास्तु रंगदक्षा वणिजश्च वारकाः। रूपान्विताश्चाश्वहराः फलानि च प्रयान्तिपीडां ग्रहणे यदाचिने॥५६॥ ग्रहण अश्विनी में हो नो घोड़े, सेनापति, वैद्य, नोकर, घोड़ों का पहिचानने वाले, व्यापारी, रखवाले, स्वरूपवान् घोड़ों को हरने वाले, और नालेर आदी फल-इनको पीड़ा होवे । भरणी नक्षत्र फल- येबन्ध ताडनवद्या निरता मनुष्या: क्रूरास्तथा रुधिर मांसभुजो पियेस्युः । येचापि नीचकुलजाअपि सत्वहीना स्तान् पीडयेत्तुपकणान् ग्रहणं भरण्याः ॥ ७ ॥ ग्रहण भरणी में हो तो वध बन्धन तथा ताडन करने वाले, मांस भक्षी, नीच कुलोत्पन्न, सन्यसे हीन और चने आदि तुप वाले धान्य-इनको पीड़ा होते। कृत्तिका नक्षत्र फल- येसूत्रभाष्प कुशला अपिमन्त्र दक्षा आकारिका द्विज पुरोहित कुम्भकाराः। येचामिहोत्र निपुणा अपि मेघ दक्षा• स्तान् पीरयेद्ग्रहणक यदिकचिकायाम् ॥५॥ ग्रहण कृत्तिका में हो तो सूत्र मानने वाले, भाष्य करने वाले, मन्त्र शास्त्री, खाँनी के दरोगे, ब्राह्मण, राज्यपुरोहि, कुमार, अमिहोत्री और वृष्टि विद्या जानने वाले इनको पीड़ा होवे। रोहिणी नक्षत्र फल- वाणिज्यभूप धनिसु व्रतककाश्च तोयान्त शाकाटकगौ सप शैलमान्याः ।
, भोगान्विताश्च घृतखंड वराङ्गनाश्च पीडां प्रयान्ति यदिगोदिणिभे ग्रहास्यात् ।। ५९ ॥ ग्रहण रोहिणी में हो तो व्यापारी, राना, धनवान्, श्रेष्ठ व्रत धारण करने वाले, खेती करने वाले, जल धान्य, गाडीवान्, गाय तथा बेल, पर्वत- वासी, नाना प्रकारके भोग भोगने वाले, धृन, खांड और वेश्या-इन को पीडा होवे। मृगशिर नक्षत्र फल- वस्त्राज्य पुष्प फल रत्नवि गमाश्च गान्धर्व कामुकसुगन्धि बनेचराश्च । येसोमपाश्चहरिणा अपिलेखहारा- स्तान्पीडयेचनटकान् ग्रहणं मृगः ।। ६० ॥ ग्रहण मृगशिर में हो तो वस्त्र, कमल, फल, पुष्प, मोती आदि रत्न, पक्षी, गाने वाले, कामी, सुगन्धी वस्तु, वन में विचरने वाले, सोमपान करने वाले, हरण और लेखक-इनको पीड़ा होवे । आर्द्रा नक्षत्र फल- येचौर्य शादयववन्धन भेदकारा मन्त्राभिचार कुशला परदार सक्ताः । चैतालिका नृपतराः कटुकीपानि हन्यादग्रहोर्कशाशनो यदि रौदर्भस्यात् ।। ६१ ।। ग्रहण आर्द्रा में हो तो चोर, सट, बन्धव भेद करने वाले, मन्त्रप्रयो- गसे शत्रुओं को दण्ड देने वाले पराई स्त्रियों से स्नेह रखने वाले, वैताल को वश में रखने वाले, नाचने वाले और कड़वी औषधी--इनको पीड़ो हो । पुनर्वसु नक्षत्र फल- ये सत्यशौच निरता कुशला यशोषिता रूपान्विताश्च धन धान्य युताश्चशिल्पिना ॥ , सेगयुताश्च वणिजःशुभधान्यमन्त्रिणः पीडाम्प्रायन्त्यपि च ग्रहणं पुनर्वमौ ।। ।। ६२ ॥ अहण पुनर्वसु में हो तो सत्यवादी, पवीत्र रहने वाले, चतुर, यशपा- नेवाले स्वरूपवान् , धन धान्यसे युक्त, कारीगर, नोकरी करने वाले, व्या- पारी, चावल आदि धान्य प.और राज्य मन्त्रि-इनको पीड़ा होवे । पुष्य नक्षत्र फल- पुप्यतुशाली वनानि मन्त्रिणो भूपाश्च गोधूम यवाश्च साधकः! यज्ञेष्टिसक्ताः सलिलोपजीविनः पीडांमयांति ग्रहणे सोमयोः ॥६॥ ग्रहण पुष्य में हो तो चावल, गुड़ खांड, स्त्री, राज्य मन्त्रि, राजा, गेहूं, जव, साधु, यज्ञ करने वाले, और जल से जीविका करने वाले इनको पीडा होने अश्लेषा नक्षत्र फल- शिल्पानि पन्नग विषाणिच कंदमूल कीटो परस्वहरणाभिरताश्च वैद्याः। धान्यानिचैव सतुपानि च नाग चल्यो नाशं भयान्ति यदि पर्व भुजंगभे स्यात् ॥ ६४ ॥ ग्रहण अश्लेषा में हो तो कारीगर, सर्प-सर्प का विष अफीम, भंस आदि के शीग, कन्द मूल, कीट-रेसम, चोर, वैद्य, नुप वाले सर्व धान्य और नागरवेल के पान-इनको पीड़ा होवे। " मघा नक्षत्र फल- पित्र्यसंगं यदि भवेद ग्रहणं तदानीम् नारीद्विपश्च पितृभक्ति रत्ताश्च शूराः । शैलाश्रयाः फलभुजो वणिजश्वकोष्टाः पीडामयान्ति धनधान्य युता रसाश्च ।। ६५ ।।
"
ग्रहण मया में हो तो स्त्रियों से देप रखने वाले, पितॄश्वरो के भक्त,
शूरवीर, पर्वत पर रहने वाले, फल भक्षण करने वाले, व्यापारी और कोष्ठा-
गार-इनको पीड़ा होवे ।
पुची फाल्गुनी नक्षत्र फल-
गर्वाविवालि शिल्पिपण्य कुमारिकाश्च
कासितैल लवणान्यति सुन्दरांश्च ।
दुर्गाश्रयाश्च फलमाक्षिकयोषिताश्च
भाफाल्गुनीजनित पर्वणियांन्ति पीडाम् ॥६६॥
ग्रहण पुर्वा फाल्गुनीमें होतो गर्ववाले, शिल्पी, खरीदने वेचनेकी
वस्तुएं, कुमारी कन्याएं, कपास रुई सून कपड़ा, सर्व प्रकारका तेल, सर्व
प्रकारका लवण, स्वरूपवान्, किलेमें रहनेवाले, नालेर आदि सम्पूर्ण फल,
सहत और स्त्रियो-इनको पीड़ा होवे ।
उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र फलम्-
ये शौर्य माईवयुता विनयान्विताश्च
पाखंडिदानशुभकर्म रतानराश्च ।
शास्त्रमवीण शुमधान्य महा धनाढया
स्तान् पीडयेद्रहणमुत्तर फाल्गुनीषु ।। ६७ ॥
ग्रहण उतरा फाल्गुनीमें होतो पराक्रमी, दयालु, विनयवान् पाखंडी,
दानव, शुभ कर्म करनेवाले, शास्त्री, चावल आदि धान्य और श्रीमन्त व
धनाध्य-इनको पीड़ा होवे ।
हस्त नक्षत्र फल-
तेजो युताश्च वणिजो रविकुंजराश्च
पण्यानिशिल्पि तुप धान्यगजाधिरोहाः।
चौराश्च शासकुशलाः परिपीडिताःस्यु-
इस्तेयदाग्रहण मिन्द्रिनयोस्तदानी ॥६८॥
ग्रहण हस्तमें होतो तेजस्वी, व्यापारी, रथीयोघा, हाथी, व्यापारकी वस्तुएं, कारीगर, चावल चने आदि तुपवाले धान्य, हाथीपर चहनेवाले, और पण्डित-इनको पीड़ा होवे। चित्रा नक्षत्र कल- शालाक्य चित्रमणि भूषण रागलेख्यः गंधादियक्तिकुशला आपतन्तुवाया। तान्पीडयेाणितकोविदराजधान्यां चित्रारख्यमेयदि भवेद्रहणंरवीन्दोः ॥ ६९ ॥ ग्रहण चित्रामें होतो शस्त्र चिकत्सावाले वैद्य वा सरनन-डाकदर, चित्रकार य फोटोग्राफर, जोहोरी, रंगरेन, लेखक, अतर बनानेवाले, काड़ा वुननेवाले, गणितज्ञ और उत्तम धान्य-इनको पीड़ा होवे । स्वाति नक्षत्र फल- धान्यानि वात बहुलानि खगा मृगाश्च येतापसाचलघुसल तुरंगमाश्च । पेचापि पण्यकुशला चल सौहदाश्च स्वातीग्रहे च वणिजः पारपीडितास्युः ॥ ७० ॥ ग्रहण स्थानिमें होती मटर चने आदि वायुकारक धान्य, गवादि पशु, मयुरादिपक्षि, तपस्वी, सत्वहीन, घोड़, व्यापारमें कुशल. चल नित्त- वाले और व्यापारियों को पीड़ा होवे । विशाखा नक्षत्र फल--- आरक्त पुप्प फल गाखि जलानिमुद्राः कांसमाप चणकाः मुरयाग्निसक्ताः। नाशंभयांसपिपुरंदरवाहिपिण्ये चंद्रार्कयोदिमवेद्रहण समर्थः ॥ .." महा विशाग्या में होती लाल रंगके पुष्प. लाल रंगके फल, लाल . " . शाखावाले वृक्ष, नल, मुंग, रुई, उड़द, चने, देवता और अग्निसे काम लेनेवाले इनको पीड़ा होवे किन्तु धान्यादि पदार्थ मन्दे हो जावे । अनुराधा नक्षत्र फल- शौर्यान्विताश्च गणनायक साधुगोष्ठी यानप्रसक्त हृदया आपसाधवश्च । मस्यं शरद्भवमपि प्रशमं प्रयान्ति मैत्राख्य जो ग्रहण मिन्द्रिनयोर्यदास्यात् ।। ७२ ॥ ग्रहण अनुराधामें होतो पराक्रमी, बहुनसे मनुष्योंके स्वामि, साधु- ओंकी सत्संग करनेवाले, वाहनपर चढ़ने के सौखीन, साधु महात्मा, और सरद ऋतुमें उत्पन्न होनेवाले चावल मकी ज्वार मुंग तिल आदि धान्य- इनको पीड़ा हो । ज्येष्ठा नक्षत्र फल- असन्त गौर्यकुलवित्त यशोन्विताश्च सेनाधिपानृपतयो विजिगीषवाये। ताम्रादिकं परधनापहृताश्चयेते पीडांप्रयान्ति यदि पर्व मुरधिपः ॥ ७३ ॥ ग्रहण ज्येष्ठामें होतो अधिक पराक्रमी, कुलीन, धनवान् , यश- स्वी, सेनापति, राजा, शत्रुओंको जीननेकी इच्छावाले, तांबा आदि धातु और चौर-इनको पीड़ा होवे । मूल नक्षत्र फल- वीजानि चाति धनयुक्त गणाधिपाश्च पुष्पोपधानि भिपजः फलमूलवार्वा । येचापि मूल फलवर्तिजनाश्चतेषां पीडाकरं रविशशि ग्रहणं च भूले ॥७४॥ ग्रहण मूल में हो तो सर्व प्रकार के बीन, अति धनवान्, बहुत २ २० मनुष्यों में मुख्य, पुष्प, ओषधी, वैद्य, सर्वफल, कन्दमूल, और इन वस्तु- ऑसे अनीविका करनेवाले-इनको पीडा होवे । पूर्वाषाढ नक्षत्र फल- ये ससशौच निरता मृदवो धनाढया: पानीय मार्गगमना जल जीवकाश्च । तोयाद्भवानि कुममानि फलानि चैव नश्यन्ति पर्वणि च सेतुकराजलो ॥ ७५ ॥ ग्रहण पूर्वाषाढा में होतो सत्यवादी, शौचयुक्त, मुशील, धमादन्य, समुद्र आदि जल शिंचन करनेसे उत्पन्न होनेवाले फल पुष्प और पुल बनानेवाले-इनको पीड़ा होवे । उत्तराषाढा नक्षत्र फल- तेजस्विन स्तुरगकुंजर मल्लयोधा ये स्थावराजगतियन्त्रिक देवभक्ताः। भोगान्विताश्च मनुजाः परिपीडिताः स्युः क्षेमंसुभिक्षं मिहवैश्वगतोग्रहश्वेत् ॥ ७ ॥ ग्रहण उत्तराषाढा में हो तो तेजस्वी, घोड़े, हाथी, मछ-कुस्ती कर- नेवाले, योधा-शूरवीर, स्थावर-वृक्षादि, यन्त्र बनानेवाले, देवनाओंके भक्त, नाना प्रकारके भोग भोगनेवाले--इनको पीड़ा किन्तु जगत्में क्षेम कल्याण तथा शुभिक्ष होवे। +- श्रवण नक्षत्र फल- मायाविनिसोयम ससघर्मा उत्साहिनो भाग पतोक्त धर्माः। धान्यं द्विजाकर्ममुयेसमा स्तान्पीडये द्राणश्रुतौस्यात् ॥७७॥ ग्रहण श्रवणमें हो तो माया फैलानेवाले, नित्य उद्यम करनेवाले, सत्य धर्मि, उत्साही, भागवत पाठी, गोधूमादि धान्य और वेदिक कर्म कर नेवाले ब्राह्मण-इनको पीड़ा होवे ।
धनिष्ठा नक्षत्र फल- क्लीवाश्च मानहिताश्चल सौहदाश्चये स्त्रीषिणः शमपरा बहुवित्तयुक्ताः । ये चापिदान निरताः परिपीडितास्युः श्चौराग्निभिश्च वसु ग्रहणं यदिस्यात् ।। ७८ ॥ ग्रहण धनिठामें हो नो नपुंमक, मानरहित, चल चित्तवाले, स्त्रियों से द्वेष रखनेवाले, शमपरायण, बहुत वितवाले और दानी इनको पीड़ा तथा चोरों का व अग्निका उपद्रव होवे। शतभिषा नक्षत्र फल- येमत्स्य वंधनिरता अपिपाश हस्ता जीवाश्च ये जलचरा जलजायाश्च । येशोडिका रजकसौकरि शाकुनाश्च नाशंपयान्ति वरुणसंगतो ग्रहश्चेत् ॥ ७९ ॥ ग्रहण शतभिषामें हो तो मन्त्री पकड़नेवाले, पाश डालने वाले, जल- चर जन्तु, कमल, घोड़े, कलाल आदि मद्य बनानेवाले, धोवी, सोकरीक और पक्षीपाती-इनको पीड़ा हो । पूर्वा भाद्रपदा नक्षत्र फल- कीनाशाहिसं पशुपालक तस्कराश्च धर्मव्रतविरहिताः शठनीचचेष्ठाः । ये चापि युद्धकुशला मनुजा विनाशं पूर्वामु पर्वयदि भद्रपदासुयान्ति ॥ ८ ॥ ग्रहण पूर्वा भाद्रपदामें हो तो कीनाश, हिंसा करनेवाले, पशु पालने. वाले, चोर अधर्मि, व्रतरहित, सठ, नीच प्रकृत्तिवाले और युद्ध करनेमें कुशल-इनको पीड़ा होवे । , .
उत्तरा भाद्रपदा नक्षत्र फल- विमामहा विभव दानस्तास्तपोन्विताः पाखंडिनः ऋतुरताश्रमिणो नरेश्वराः । तान् शारधान्य महितान् विनिहन्ति पर्व चन्द्रार्कयोमवति भद्रपदोत्तराम ॥ ८ ॥ ग्रहण उत्तरा भाद्रपदामें हो तो ब्राह्मण, अधिक वैभववाले, महा. दानी, तपस्वी, पाखंडी, यज्ञ करनेवाले, आश्रमी, राना, और शार धान्य • श्रेष्ठ पुरुष-इनको पीड़ा हो । रेवती नक्षत्र फल- तोयोद्भवानि कुसुमानि फलानि गन्धाः शंखांबुनानिलवणं च मुगन्धि पुष्पम् । नौकर्णधार वणिजो मणिमौक्तिकानि नश्यन्ति पौप्णभगते ग्रहणं रवीन्दोः ॥ ८२ ॥ ग्रहण रेवती हो तो जलमे उत्पन्न होनेवाले फल पुष्प, सुगन्धी द्रव्य, शख, कमल, लवण, सुगन्धीवाले पुष्प, नवीन करणधार, व्यापारी और मणि तया मोती-इनको पीड़ा होवे । नक्षत्र पश से धान्यादि की तेजी मन्दी- अश्चिन्यां पीडिनायां स्यात् मुगादीनां महर्घता । भरण्यां श्वेत वस्त्रेभ्यो लाभं मासत्रये भवेत् ॥ ८३ ॥ कृतिकायां हेमरूपा प्रवालमणि मौक्तिकम् । संग्रहीत लाभदायी मासे च नवगे स्मृतम् ॥ ८४॥ रोहिण्यां सूत्रकर्पास संग्रहो लाभदायकः । दश मासान्तरे मोक्तः सोमवेधा न चेदिह ।। ८५॥ मृगशीर्षेपि मंजिष्ठा लाक्षा क्षारः कुमुम्भकम् । मह दामासान्त लामंदते रहोरिजम् ।। ८६ ।। घृतं महर्घमायां लाभदं मासपञ्चके ।
३३ तैलाल्लाभः पुनर्वसौः मास पञ्चकतः परम् ॥ ८७ ॥ पुष्येमासे खिभिाभो भवद्गोधूम ग्रहः । आश्लेषायां तु मुद्नेभ्यः मामिः स्यान्मासपञ्चके ॥ ८८ ॥ ग्रहण अश्विनी नक्षत्र में हो तो मुंग आदि तेज, भरणीमें हो तो श्वेत कपडा संग्रह करने से ३ महिनों से लाभ, कत्तिका में हो तो सोना चांदी प्रवाल मोती तथा मणी आदिके संग्रह करने से ९ महिनों के बाद लाभ, रोहिणी में (सूर्य ग्रहण) हो तो कपास रुई सूत आदि के संग्रह करने में १० महिनों के बाद लाम किन्तु चन्द्रमा के ग्रहण में यह फल नहीं, मृगशिर में हो तो मनीठ लाख क्षार कसुम्भा आदि के संग्रह करने से १० महिनों के बाद लाभ, आर्द्रा में हो तो घृत के संग्रह कर- नेसे ५ मास में लाभ, पुनर्वसु में हो तो तैल के संग्रह करने से ५ महि- नों के बाद लांभ, पुष्प में हो तो गेहूं के संग्रह करने से ३ महिनों से लाभ, और अश्लेया में हो तो मुंग संग्रह करने से ५ महिनों से लाभ होवे। मघा चतुष्टये चोलाचणकः खलुतुष्टये । चित्रायां च युगन्धर्या मासोलाभयान्तरे ॥ ८९ ।। त्रिपञ्चनवाभिर्मासैः स्वाती लाभ स्तथातया । विशाखायां कुलित्थेभ्यः पण्मासे लाभ सम्भवः ॥ ९॥ राधायां कौव्वाल्लामो मासैनवभिराप्यते । ज्येष्ठायां गुडखण्डादेः पञ्चमासे धनोदयः ॥ ९१ ॥ ग्रहण मया, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी वा हस्त में हो तो चवले तथा चनों के संग्रह से लाभ, चित्रा वा स्वाति में हो तो जवार वा बाजरी के संग्रह से २ महिनों से लाभ, विशाखा में हो तो कुलयों के संग्रह से ६ महिनों से लाभ, अनुराधा में हो तो कोदो धान्य के संग्रह से ९ म- हिनों से लाम और ज्येष्ठा में हो तो गुड़ तथा खांड के संग्रह से ५ महिनों से लाभ होवे। 1- तन्दुले पस्तयाभूले पूषायां श्वेतवस्त्रतः । उपायां श्रीफलात्पुंग्या सर्वत्र मास पञ्चकम् ॥ ९२ ॥ अवणे तुरीलामा धनिष्ठायां तु मापतः । चणकेभ्योति वारुण्यां तेभ्यः पूभानिपीडने ॥ ९३ ॥ लामखिमासि निर्दिष्ट उभायां लवणादितः। मास पदकालाभदृष्टो रेवसां मुद्गमाषतः ॥ १४ ॥ अहण मूल नक्षत्र में हो तो चावलों के संग्रह से ९ महिनों से लाभ, पूर्वाषाढा में हो तो श्वेत वस्त्रों के संग्रह से ५ महिनों से लाभ, उत्तराषाढा में हो तो नालेर तथा सुपारी के संग्रह से ५ महिनों से लाभ, श्रवण में हो तो तुहर के संग्रह से लाभ, धनिष्ठा में हो तो उड़दों के संग्रह से लाभ, शनमिपा वा पूर्वाभाद्रपदा में हो तो चनों के संग्रह से लाभ, उत्तराभाद्र- पदा में हो तो लवण आदि के संग्रह से ३ महिनों से लाम और रेवती में हो तो मुंग तथा उड़दों के संग्रह करने से ६ महिनों से लाभ होवे । सूर्य ग्रहण नक्षत्र फल- आंदिस ग्रासकाले तु दुर्भिक्ष मायसो भवेत् । तत्तियि विष्णवाच्यानि महर्याणी भवन्ति ही ॥ १५ ॥ सूर्य का ग्रहण हो तब प्रायः दुर्भिक्ष होता है और उस समय जो नक्षत्र हो उस नक्षत्र के अक्षरों के नामवाली वस्तुएं भी महंगी हो जाति है। . 'नक्षत्रानुसार कूर्म चक्रोक्त देश फल प्रकरण । नक्षत्रत्रय वगैरामपायैर्व्यवसित नवधा । भारतवर्षे मध्यात्मागादि विभाजिता देशाः ॥ ९६ ॥ कृतिका आदि २७ नक्षत्रों के ९ विभाग को फिर इस भारत देश के मध्य से लेके पूर्वादि क्रम से सम्पूर्ण भूमण्डल के ९ भाग करके कृत्ति कादि नक्षत्रों के ९ भाग वांट दे जैसे-कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिर, ये ३ मध्य देशके; आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्प ये ३ पूर्व के अश्लेपा, मघा, पूर्वा फा- ल्गुनी ये ३ अग्निकोण के उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्राये ३ दक्षिण के; स्वाति, विशाखा, अनुराधा ये ३ नैर्ऋत्यकोण के ज्येष्ठा, मूल, पूर्वा- पाढा ये ३ पश्चिम के; उत्तरापाढा श्रवण, धनिष्ठा ये ३ वायव्यकोणके शतमिया, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद्रपदा ये ३ उत्तर के और रेवती, अश्विनी, भरणी ये ३ ईशान कोणके देशोंके है । ग्रहण जिस दिशा के नक्षत्र पर हो उस दिशा के देशोंको दुर्भिक्ष युद्ध महामारी चोर आग्नि आदि उपद्रवों की पीड़ा होवे । , ब्राह्मणादि जाति नक्षत्र-प्रकरण ब्राह्मणादि जाति नक्षत्र निर्णय- पूर्वात्रयं सानलमग्रजानां राज्ञान्तु पुष्येण सहोत्तराणि । सपौष्ण्यमैत्रं पिलदैवतं च प्रजापते, च कृषीवलानाम् ||९७॥ आदिस हस्ताभिजिदाश्विनानि वणिक्जनानां प्रवदन्तिभानि । मूलात्रिनेत्रानिल वारुणानि भान्युग्रजातेः प्रभविष्णुतायाः ॥९॥ सौम्येन्द्र चित्रावमु दैवतानि सेवाजनाधाम्य मुपागतानि । साप विशाखा श्रवणा भरण्याश्चाण्डल जातोरभिनिर्दिशन्ति ॥१९॥ कृत्तिका, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वापाढा, पूर्वाभाद्रपदा ये ४ नक्षत्र ब्राह्मणों के पुप्य, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरापाढा, उत्तराभाद्रपदा ये ४ क्षत्रियों के; रोहिणी, मवा, अनुराधा, रेवती ये ४ खेती करनेवालों के; अश्विनी, पुन- वसु, हस्त, अभिनित् ये ४ वैश्यों-ज्यापारियो के; आद्रा, स्वानि, मूल, * इसका विस्तारपूर्वक निर्णय मेर प्रकाशित कीये हुये 'सर्वतो भद्र- घक (प्रैलोक्य दीपक) प्रन्यके 'कूर्मचक्र प्रकरण' में कीया है। .
शतभिषा ये ४ उग्र जातिवालों के मृगशिर, चित्रा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा ४ सेवा-नौकरी करनेवालों के और भरणी, अश्लेषा, विशाखा, श्रवण ४ नक्षत्र चांडाल जाति के हैं। ग्रहण निस जातिके नक्षत्र पर हो उस जाति के मनुष्यो को अनेक प्रकार से कष्ट पीड़ा होवे। नक्षत्रानुसार मण्डल फल प्रकरण । अत्रापि कचिजगविशेष वायव्य हौताशन वारुणेन्द्राः। स्युसराभवास्तु वर्गाश्चत्वार एपां च पृथक् फलानि ॥१०॥ जगत् का विशेष शुभाशुभ फल जानने के लिये महर्षियोंने अश्वि- न्यादि रेवती पर्यन्त अभिनित् सहित २८ नक्षत्रों के ७ । ७ नक्षत्रों का (१) वायु, (२) अनि, (३) वारुण और (४) माहेन्द्र नामक चार मण्डल माने हैं। वायु, अग्नि, वारण, व माहेन्द्र मण्डल नक्षत्र शान- आर्मणचित्रदिति मैन्दवाधि स्वासोभं चेतिगणोनिलस्याः । याम्यानपादानि भतिप्यभाग्य माविशाखा हुतभुगणोपमा १०१। तोपेशाहिर्बुध्न्यरक्षोम्बुपूपा सामानां वारुणनीति भानि । मैत्र्यं ब्राह्मधं वैष्णवं वासवेन्द्रो वैवं चेन्द्रोपं भवर्गोऽभिजिश्चा१०२ अश्विनी, मृगशिर, पुनर्वसु, पूर्वाफाल्गुनी, हम्न, चित्रा, स्वाति, ये ७ नक्षत्र वायु मण्डर के हैं। भरगी, रतिका, पुष्प, मया, उत्तराफाल्गुनी, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद ये ७ नक्षत्र अग्नि मण्डल के है। महलोंका विशेष निर्णय मेर समाये हु 'वृहदार्थ मातह' प्रन्थ के सक्रान्ति प्रकाश' नामक अफ में की गया है।
२७
आर्द्रा, अश्लेषा, मूल, पूर्वापाढा, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपदा, रेवती,
ये ७ नक्षत्र वारुण मण्डल के है।
रोहिणी, अनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तरा पाडा, अभिजित, श्रवण, धनिष्ठा,
ये ७ नक्षत्र माहेन्द्र मण्डल के हैं।
वायु मण्डल फल-
वायुर्गणे कोपि यदोपसर्गो भवेत्तदानी पक्नोतिचण्डः ।
सिक्ताग्रहो वीरहतोरणाना लोके नृपे चापि महानधर्मः ॥१०॥
ग्रहण के समय वायु मण्डल में का नक्षत्र हो तो प्रचंड वायु का
वेग अधिक, युद्ध करने वाले योधाओं को कष्ट पीड़ा, और राना तथा
प्रजा को दुःख केश होवे।
अग्नि मण्डल फल--
वर्गणे नेत्ररुजोतिसार याहानिर्बलनप्रकोपः ।
गावोऽल्पदुग्धास्तरवोऽफला स्युः गर्भपाताश्च नितंबिनीनाम्।१०४१
ग्रहण के समय अग्नि मण्डल में का नक्षत्र हो तो अग्नि का कोप,
नेत्र तथा अतिसार रोगों का उपद्रव, वर्षा का नाश, गायों के दूध अल्प,
वृक्षों के फलों की हानी और स्त्रियों के गर्भपात होवे ।
वारुण मण्डल फल-
.
गावोबहुक्षीर धृताफलाट्या सक्षाः प्रजाक्षेममुभिक्षयुक्ताः ।।
मेघाः प्रभूतांबुमुचो भवंति वर्गे जलेशस्य त सोपिवर्गे ॥१०॥
ग्रहण के समय वारुण मण्डल में का नक्षत्र हो तो वर्षा अधिक मु.
भिक्ष की वृद्धि वृक्षों के फल फूल अधिक, गायों के दूध तया घी की वृद्धि
प्रना में आनन्द और रानाओं में शान्तिं होवे ।
माहेन्द्र मण्डल फल-
महेन्द्रवर्गे वनितामुसौख्यं मजाश्च सर्वे मुदिताभवन्ति ।
निकामवर्षा मघवाधरित्री प्रभूतसस्याधिगतेति विद्यात् ॥१०॥
૨૮ ग्रहण के समय माहेन्द्र मण्डल में का नक्षत्र हो तो वर्षासमयानुकूल, खेतियों की वृद्धि, स्त्रियों को सुख, और राजा प्रना को आनन्द होवे । वायु आदि मण्डलों का फल पाक काल- बिमासिकं स्यादाग्नेयं वारुणं पंचमासिकम् । माहेन्द्रं चैववायव्य सप्तरात्रं फलं भवेत् ।। १०७ ।। वायु मण्डल का ७ दिनसे, अनि मण्डल का ३ मास मे, वारुण मण्डल का ५ माम से और माहेन्द्र मण्डल का ७ दिन से शुभाशुभ फल उपर लिखे अनुसार होता है। मण्डलोंकी.शान्ति करणेकी आवश्यकता- आग्नेयी कारयेच्छांति शांति कुर्याञ्च वारुणीम् । वायथ्यां शांतिमिप्पेत माहेन्द्री कारयेदपि ॥ १०८॥ वायु, अमि, वास्थ्य और माहेन्द्र-इन मण्डलों में मे जिस मण्डल में ग्रहण आदि कोईभी उत्पान हो तो उसकी शान्ति कर देने से फिर अशुभ फल का नाश हो जाता है। विपुम्म योग फल- विष्कुंभयोगे ग्रहणं रविवो मानवा शोभनबुद्धियुक्ताः । तान् पीडयेद्वाजिगजान पांश्च दुर्गाणि लोकेच तदा भयस्मात् १०९ ग्रहण विष्कुंभ योग में हो तो श्रेष्ठ बुद्धिवाले, घोड़े, हाथी, चेल इनको पीड़ा और किले में रहनेवाले लोकों को भय होवे । प्रीतीयोग फल- चेत्मीतियोगे ग्रहणं तदा! परस्परं मित्रविरोधकृतमात् । भेदं च राज्ञां सइमंत्रिंभिश्च वरांगनाभिविरह करोति ॥११॥ ग्रहण प्रीतीयोग में हो तो मित्रों के परस्पर वैर, राजाओं और मन्त्रियों में फूट और श्रेष्ठ स्त्रियों में भी कलह होवे ।
२९
आयुष्यमान योग फल-
योगे तथायुष्मति चेत् ग्रहः स्यात् पीडातदांनी द्विचतुष्पदानाम् ।
योद्धास्तथा ये चिरसंग्रहाश्च तेपां महद्देशभयं च विद्यात् ॥१११॥
ग्रहण आयुष्मान योग में हो तो मनुष्य, पशु, पक्षी आदि को पीड़ा;
और योधाओं को, बहुत समय से' संग्रह करनेवालों तथा देश को
भय होवे ।
सौभाग्य योग फल-
सौभाग्ययोगे ग्रहणं यदा तदा निहीत युनः पुरुषांश्च कामिनः ।
सौभाग्ययुक्ता परयोपिताश्च या मुवतसौरभ्यगुणानुलेपनम् ॥११२।।
ग्रहण सौभाग्य योग में हो तो कामी पुरुषों को, सौभाग्य युक्त श्रेष्ठ
स्त्रियों को पीड़ा और वस्त्र तथा सुगंधी पदार्थों का नाश होवे ।
शोभन योग फल-
योगे रवींदोग्रहणं च शोभने महाक्षितीशांच शुचीन समंत्रिणः ।
ज्योतिषिदो इंति च वेदपारगान अवन्तिदेशे परिपीडन भवेत् ॥११३
ग्रहण शोभन योग में हो तो महाराना, राज्यमन्त्रि, ज्योतिषी, वेद-
पाठी और अवन्ति (मालवा) देश-उनको पीड़ा होवे ।
अतिगण्ड योग फल-
ग्रहो यदि स्यादतिगंडयोगे तदा युवानः पुरुषाश्च वेश्या।
नृपास्त्वमात्याः शुचयो नराश्च काशी तथोपद्रवपीडिता स्युः।११४॥
ग्रहण अतिगण्ड योग में हो तो युवान पुरुप, वेश्या, राना, राज्य-
मन्त्रि, पवित्र रहनेवाले और काशी देश-इनको पीड़ा होवे ।
सुकर्मा योग फल-
मुकर्मयोगे ग्रहणं यदा भवेत् क्षितीशदैवज्ञमुराश्च मागधाः ।
मुवर्णकाराश्च मुकर्मकारिणः किरातदेशा हुपयांति पीडन् ॥११॥
. महण सुकर्मा योग में हो तो राना, देवज्ञ, देवता, मघद देशवासी, सुनार, सत्कर्म करनेवाले और किरान देश-इनको पीड़ा होवे । घृती योग फल- योगे धृतौ रविशशिग्रहणं यदा सयदादित्रगीतकुशलापि च नृत्यकारान् ॥ ये काटकर्मकुशलाः परयाचकाश्च कर्णादि भूपणयुताः परिपीडयेतान् ॥१६॥ ग्रहण धृतीयोग में हो तो गाने बनाने तथा नृत्य करनेवाले, लकड़ी का काम करनेवाले, दूसरों से याचना करनेवाले और कानों में आभूषण पहरनेवाले–इनको पीड़ा होवे । मूल योग फल- योगे च शूले ग्रहणे विनाशमायांति वैद्या जलजंत्रवाहाः। महेन्द्रजालप्रवरा नाराये कैवर्तकाचा पि स पूर्वदेशाः ॥११७॥ प्रहण शूल योग में हो तो वैद्य, जल मे यन्त्र चलानेवाले, इन्द्रनाल के खेल करनेवाले, कैवर्त देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । गण्ड योग फल- दृश्येत राहुर्यदि गंडयोगे पीडां तदा युद्धकराः प्रयांति ॥ ये योगिनो मंत्रविदो गनाश्च देशाश्च येदक्षिणदिस्थितास्ता ११८ ग्रहण गण्डयोग में हो तो युद्ध करनेवाले, योगी, मन्त्रवादी, हाथी और दक्षिण देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । वृद्धि योग फल- ग्रहो वीवीर्यदि वद्धियोगे तदा कुलीनान्नृपतीन् प्रपीडयेत् । कुटंबिनी ये च तथोत्कटाश्च कांवोनदेशाधिपतिनिहति ॥११९।। ग्रहण वृद्धि योग में हो नो कुलवानों, रामा, कुटुंबवाले, उत्कट पुरुष और कांवोन देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । , . , ध्रुव योग फल- ध्रुवाख्ययोगेपि पुराणवाचकान् व्यासान्निहन्यादपि देवनायकान्। ये हेममार्गोत्तरगामिनश्च तान् जनान् रविंद्रोहणं यदा भवेत्॥१२० ग्रहण ध्रुव योग में हो तो पुराण पाठी, कथा व्यास, देवताओं के पूनारी और हेमालय की और से उत्तरदिशिकी यात्रा करनेवाले-इनको पीड़ा होवे। व्याघात योग फल- ये मद्यमांसाभिरताश्च लोलुपा ये तस्करा ये पि च जीवघातकाः। निपीडयेत्तान् गिरिवासिनो जनान् व्माघातयोगे रविशीतयुग्रहः १२१ ग्रहण व्याघात योग में हो तो मध पीनेवाले, मांस खानेवाले, स्त्री- लोलुप, चोर, जीवघाती और पर्वतपर रहनेवाले-इनको पीड़ा होवे | हर्पण योग फल- मिष्टान पानाभिरताश्च कामिनः सौभाग्ययुक्ताः सुखिनश्च ये जना। निपीडयेतान भृगुकछवासिनो योगे यदा हर्पणनामनिग्रहः ॥१२२॥ प्रहण हर्पण योग में हो तो मिष्ठान खानेवाले, मधुर रस पीनेवाले, कामी, सौभाग्य युक्त, सुखी, और भृगुकच्छ-भडोंच देशवाशी-इनको पीड़ा होवे। वज्र योग फल- ये काष्टकमकुशलाश्च धनुर्द्धरा ये गानकर्मकुशलाः परिपीढयेत्तात् । ये कौशले जनपदे निवसति लोका स्तांश्चापि वजयुजि चे ग्रहणं रवींद्वो ॥१२॥ प्रहण पत्र योग में हो तो लकड़ी का काम करनेवाले, घनुप रस- नेवाले, गानेवाले और कौशल देशके मनुष्य-इन की पीड़ा होवे ।
३२ सिद्धि योग फल- ये धातुकर्मकुशलाश्च तपस्विन योगिनः कापालिकाश्च तिलका हस्मेकलाश्च । वांछन्ति सिद्धिमपि ये परिपीडयेत्तान् योगे यदा ग्रहणमिद्रनयोश्च सिद्धौ ॥ १२ ॥ ग्रहण सिद्धि योग में हो तो धातु के वरतन बनानेवाले, तपस्वी, योगी, कपाली कनफटेनाथ, मन्त्रादि की सिद्धि चाहानेवाले और निलक हर नया मेकल देश में रहनेवाले-इनको पीड़ा होवे । व्यतिपात योग फल- ये चित्रकारा अपि रंगकार ये पूर्वरत्तांतकथानकाश्च । किरातदेशाः परपीडिताः स्युग्रहो यदा स्याव्यतिपातयोगे१२५॥ ग्रहण व्यतिपात योग में हो तो चित्रकार, रंगकार, प्राचीन इनि.. हासवेत्ता, तथा किस्से कहानिये कहनेवाले और कीरात देशवाशी-इनको पीडा होवे । वरियाण योग फल- योगे वरीयसि यदि ग्रहणं रवीद्वोः संपीडयेन्नृपयुता वरयोपिताश्च । ये भोगिनो नरवरा अपि यौवनस्छा स्तान कोंकण जनपदं त्वचिरात्तदानीम् ॥ १२६ ॥ ग्रहण नरियाणा योग में हो तो राजा, श्रेष्ट स्त्री, भोगी पुस्प, उत्तम भनुप्य, योवन अवस्थावाले और कोकण देशवाशी-इनको पीड़ा होवे । परिघ योग फल- नंदाश्च गोपा ऋषयश्च भृसास्तुरंगमा ये वनवासिनश्च । ये जीवहिंसानिरताश्च तेषां पीडा हेस्यात् परियारुपयोग।१२७
!
ग्रहण परिघ योग में हो तो नन्द, गोप, ऋषि, नोकर, घोडोंवाले,
वनवासी, और जीव हिंसा करनेवाले-इनको पीड़ा होवे ।
शिव योग फल-
। ये होमपूजानिरताश्च शैया ये चापि पड्दर्शनवादिनश्च ।
संपीडयेत्तानपि मध्यदेशं ग्रहो यदिस्पाच्छिवनानियोगे ॥१२८॥
ग्रहण शिव योग में हो तो होम करनेवाले, देव पूजारी, शिव के
भक्त, षट्दर्शनवादी और मध्य देश-इनको पीडा होवे ।
सिद्ध योग फल-
धनुर्द्धराश्चैव तपस्विनश्च ये योगिनो भिक्षुकसिद्धसंघाः ।
इन्याचतान् काहरमेकलांश्च सिद्धाख्ययोगे ग्रहणं रवींदोः॥१२९॥
ग्रहण सिद्ध योग में हो तो धनुष्य रखनेवाले-मेने भील आदि,
तपस्वी, योगी भिक्षुक, साधुओ की जमात और काहर तथा मेकल देश-
इनको पीड़ा होवे ।
साध्य योग फल-
उपवाशपराश्च सायवः शुचयः सत्यरतावणिग्जनाः।
स्मृतिवेदविदश्च वाडवा युजि साध्ये ग्रहणं निहति तान् ॥१३०॥
ग्रहण साध्य योग में हो तो उपव स करनेवाले, साधु, पवीत्र रहने-
वाले, सत्यवादि, व्यापारी, स्मृति तथा वेदके जाननेवाले और पण्डित-
इनको पीड़ा होवे ।
शुभ योग फल-
योगे शुभे ग्रहणमिद्विनयोर्यदास्यात्
पीडां मयांति शुभकर्मकरानरा ये ।
श्रेष्ठाः स्वजातिषु च भर्तृपराश्च नापे
रेवातटस्थितजना अपिवोत्तमा ये ॥ १३१॥
ग्रहण शुभ योग में हो तो शुभ कर्म करनेवाले, स्वजाति में श्रेठ, पतिवृत्ता स्त्रिये, उत्तम पुरुप और नरबदा के किनारे के देश म रहनेवाले मनुष्य-इनको पीड़ा होवे। शुक्ल योग फल- शुक्लाखायोगे ग्रहणं यदा स्यात्कर्पूरशुक्लांबरपुष्पकाराः। विनाशमायांति शुभाः खियश्च धनक्षयश्चाप्यमृतक्षयश्च ॥ १३२॥ ग्रहण शुक्ल योग में हो तो कपूर, श्वेत वस्त्र पुप्पो से भीवीका करनेवाले माली आदि, तथा शुभ स्त्री इनको पीड़ा और जगत् में धन तथा अमृत का क्षय होवे । ग्रह योग फल-- ये देवार्चनहोममाप्यानरता ये स्वक्रियापालकाः । सद्धर्मानुरताश्च वाडववरा ये वेदपारंगमाः। तान् सर्वान्परिपीडयेदपि तथा ये लोकमान्याजनाः मूर्याचन्द्रमसोहो यदि भवेब्रह्माख्ययोगे तदा ॥१३॥ ग्रहण ब्रह्म योग में हो तो देवपूना में रत, होम करने में आशक्त, जाम्य करनेवाले, स्वक्रिया पालक, सद्धर्म कर्ता, पण्डिल, वेदान्ती, और अगत् में माननीय पुरुष-इनको पीड़ा होवे । ऐन्द्र योग फल- महायलिशाश्व महानरेन्द्रा विनाशमायांति धनुर्द्धराश्च । भीतयुद्धानि महातिचैन्ने योगे यदा स्याद्राण वादो ॥१३४|| ग्रहण एन्द्र योग में हो तो महाबलवान् , महाराना, धनुप्यधारी योधा -इनको पीड़ा और रानाओं में युद्ध होवे। धैधृति योग फल- व्यापारिणश्च धनधान्यचतुप्पशानि सर्वाकराश्च सहभाडतुमश्रितश्च ।
नश्यंति सागरजलोद्भवभूषणानि ।
चंद्रार्कपर्व यदि वैधृतिनामयोगे ।। १३५ ॥
ग्रहण वैधृति योग में हो तो व्यापारी, धन, धान्य, चौपाये पशु
सर्व प्रकारकी खाने, तोलसे बिकनेवाली सम्पूर्ण वस्तुए और समुद्र के
जलसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ तथा मोतियों के आभूषण इनको पीड़ा होवे।
राशि फल प्रकरण ।
मेष राशि फल-
ये पांचाला शूरसेनाः कलिंगाः कांबोजांधा शस्त्रवानांकिराताः
येषां वृत्तिहिना मध्यदेशस्ते पीड्यंते मेपराशि ग्रहेण ॥१६॥
ग्रहण मेप राशि में हो तो पनाव, शूरसेन-मथुरा, कलिंग, कार्बोग,
अन्ध्र, किरात, मध्यदेश और शस्त्र से तथा अनिसे आनीविका करनेवाले
इनको पीड़ा होवे।
वृष राशि फल-
गोषा पशवो थेगोमिनो यनुजा ये च महत्वमानिनः ।
त पीडामुपयांति भास्करे ग्रस्ते शीतकरे थवाटपे ॥१३७॥
ग्रहण वृष राशि में हो तो गोप, पशु, गोमिन मनुष्य, और बहुत
अपिमान वाले इनको पीड़ा होवे।
मिथुन राशि फल-
भूपाश्च भूपसदृशाः प्रवरांगनाश्च
सुमाश्च वाहिकजना वलिन कलाशा !
मत्स्या तथा जनपदा यमुनानटस्था
पीडा प्रयान्ति मिथुने ग्रहणे रविन्दोः ॥१५॥
. ग्रहण मिथुन राशि में हो तो राना, राजाओं के सहश्य, उत्तम स्त्रिय, सुन्न देश, बाहीक, वलवान , कलाकुशल, मत्स्य देश और यमुना तटके देश-इनको पीड़ा होथे। कर्क राशि फल-- आभीरपल्हवशान् शररांश्च मत्स्यान् पांचालमल्लविकलांश्च गुरुन्निहन्यात् । मांजिष्टमोतिकघृतान गुडाश्च सैल नश्यति कर्कटगतं ग्रहणं यदि स्यात् ॥ ३९॥ ग्रहण कर्क राशि में हो तो आभीर, पल्व, शबर, मत्स्य पंजाब, मल्ल, विकल मनुष्य, गुरुगन-इनको पीड़ा और मनीठ, मोती, घृत, गुड़, नेल-इत्यादि का भाव तेज हो जावे । सिंह राशि फल- सिहे पुलिदगणमेकलसत्वयुक्तो स्तेजोमयानरपतिन्वन गोवरांश्च । काश्मीरकांश्च विनिहति पशुंश्च दुर्ग ये संश्रिता अपि च तान् प्रहणं रवीन्दोः ॥१४॥ ग्रहण सिंह राशि में हो तो पुलिंद, काश्मीर, गण, मेरल, देश, किले में रहने वाले, सत्व युक्त, तेजस्वी राना, वन में विचरने वाले, और, पशु-इनको पीड़ा होवे। कन्या राशि फल- कन्यागते रविवाशिग्रहणे विनाश . मायोति सस्पकविलेखकगेयमक्ताः। देशास्तथाधिपुरशालिपुताश्मकाश्च सिदौपायुक्ती ननिताश्च गर्भा ॥ १४१ ।।
३७ , ग्रहण कन्या राशि में हो तो खेती वाले, लेखक, मकान में रहने वाले, त्रिपुर तया अश्मक देश कोकट, स्त्रियों के गर्भो को पीड़ा और . चारल तथा ओपधियों का नाश होवे । तुला राशि फल- तुलाधरेखंसपरांखसाघून् वणिग्दर्शाणान् रुरुकछपांश्च । हन्यारवीन्द्रौर्गहणंतु राज्ञां करोति युद्धं त्वय दृष्टिनाशं ॥१२॥ ग्रहण तुला राशिमें हो तो परान्त देश, साधूनन, व्यापारी, दशार्ण, कुरु तथा कच्छ देशमें कट; वर्षाका नाश और रानाओ में परस्पर युद्ध होवे। * वृश्चिक राशि फल- अलिन्यथोडुयरमद्गचोलान् हुमान सयोधेयधिपांबुधीयान् । हिमांशुसूर्यग्रहणं निहति धनाधिपश्चिापि मुभिक्षकृतस्मात् ॥१४॥ ग्रहण वृश्चिक राशि में हो तो उदंबर, मद्र, चोल तथा योधैय देश, अफीम आदि विप, जल, और बुद्धिवान् तथा धनवान-इनको पीड़ा और जगत् में सुभिक्ष होवे। धन राशि फल- ग्रहो खींदोर्यदि चापरासौ इन्यादमासान्वरवाजिमल्लान् । विदेहपांचालणिग्जनोग्रा युद्धज्ञवैद्यांश्च तथौपधानि ॥ १४४ ॥ ग्रहण धन राशि में हो तो राज्य मन्त्रि, श्रेष्ठ घोड़े, मल्ल विदेह व पंजाब आदि देशो, व्यापारी, योधा, वैद्य और ओपी-इनको पीड़ा हो। मकर राशि फल- - हन्यान्मृगे तुझपमंत्रिकुलानि नीचान् मंत्रौपधेषु कुशला स्थविरायुधे यान् । अन्यांस्तथायुधकरान् ग्रहणं रौदी देशांश्च दक्षिणभवान् प्रवदति संतः ॥१४५॥ .
ग्रहण मकर राशि में हो तो मच्छियों, मन्त्री, नीच कुल के मनु प्य, मन्त्रवादि, ओपधियों को पहिचानने वाले, स्थिर-तृक्षादि, आयुष, युद्ध कुशल मनुष्य और दक्षिण देश वासी-इन को पीडा हो। घुम्म राशि फर- कुथे यदा ग्रहणमिद्विनयोस्तदांनी पाश्चासनान गिरिभवान् दरदानजनाश्च । आभीरकानपि पुरानपिचर्वराश्च भारोद्वहार्य गजचाग्नृपाः निहन्ति ॥ १४६ ।। ग्रहण कुभ राशि में हो तो पश्चिम देश वामी, पर्वनों पर रहने वाले, दरद देश निवासी, आमीर व वर देश, भार उठाने वाले उट आदि, हाथी, चोर और राना- इनको शेडा हो। मीन राशि फल- मीनसिउत ग्रहमिदुसहश्वभान्योः माहान जनाश्च धनिनो जलजीविनश्च । हन्याच मागरतरं च समुद्रनानि द्रव्याणि ना शमुपयान्ति च मानयुक्ताः ॥ १४७ ॥ अहण मीन राशि में हो तो विद्वान, धनवान , मेल से जीविका क रनवाले, समुद्र के किनार के देशों में रहने वाले, समुद्र में उत्पन्न होने वाले शीप शख आदि द्रव्य और अभिमान वाले मनुष्य--इन को पीडा होवे। पशि घश से हरएक वस्तु को तेजी मन्दी- यस्मिन् राशी भवेत्पर्य तस्यावाच्य ऋयाणकम् । अत्यपलभतेमूल्यं पीव्यमाने च गहुणाः ॥ १४८ ॥ ग्रहण मेषाद चाहे निस राशि में हो उस राशि के नामकी वस्तुए मत महगी हो नावे नो ग्रहण मेप राशि में हो तो निन वस्तुओं की मेष राशि होगी वे वस्तुए बहुत महगी हो जावे ।
नीच राशि स्थित चन्द्र ग्रहण फल-
नीचावलम्बिसोमस्तु यदा गृह्येत राहुणा ।
सर्पाकारास्तदा भर्ता सरूस्थम्पारे पीडयेत् ॥ १४९ ॥
अल्पां चन्द्रश्च दीपाश्च म्लेको पूर्वापराविनाः ।
दीक्षिताः क्षत्रिया भृत्याः शूद्राः पीडामवाप्नुयः ॥१५०॥
चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्रमा नीच राशि-वृश्चिक राशि का हो तो
सर्पाकार तथा भर्त देश में रोगादि का उपद्रव, तथा ग्रह भक्ति में चन्द्रमा
जिन देशों का स्वामि है उन देशों में तया म्लेछ, बाह्मण, दीक्षित, क्षत्री
मृत्य-नोकर और शूद्र-इन को पीडा होवे ।
,
खांश (आकाश भाग) फल प्रकरण ।
खांश निर्णय-
रादिनस्य च मितिस्तुरगविभाज्या
लब्ध नभोशक मितिस्तुगतेष्टनाड्यः ।
खांश प्रपाण विद्वताः फल संख्ययाव
खांशादिने निशि च ते नगसंख्यकास्युः ॥१५॥
ग्रहण का स्पर्श अर्थात् प्रारम्भ दिन में हो तब तो दिन मानकोटि
पल ( सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त ) के और रात्रि में हो तो रात्रि मानकी
घटि पल। सूर्यास्त से सूर्योदय पर्यन्त ) के ७ भाग कर इसे आकाश भाग
माने हैं। फिर ग्रहण के पर्श समय की घटि पल निस आकाश भागमें
हो उस के अनुसार ग्रहण के स्पर्श समय का आकाश भाग जाने इसे
खाश भी कहते हैं।
प्रथम खांस का फल-
आधे नमोशे ग्रहणं रवीन्दोः गुणाधिकान कृषि कांश्चविमान
हुताशत्तिश्च समस्तयज्ञान प्रज्ञांस्तथैवाश्रमिणो निहन्तिः ॥१५२॥
ग्रहण का स्पर्श आकाश के प्रथम भाग में हो तो गुणि जन, खेती
करने वाले, ब्राह्मण, लुहार, सुनार, हलवाई भाड़ भूने अंजनेर आदि अनी
जीवि, यज्ञ करने वाले, बुद्धिवान् और वान प्रस्तादि आश्रमी-इत्यादिको
कष्ट होव।
दूसरे खांश का फल-
खांशे द्वितीये ग्रहणं रवीन्दोः कृषीवलानां बलनायकानाम् ।
पाखण्डिनां चापि वणिजनानां राजन्यकानां च विनाश करस्यात्
ग्रहण का स्पर्श आकाश के दूसरे भाग में हो तो खेती करनेवाले,
सेनापति, पापड़ी, व्यापारी वा महाजन और राजपूत आदि के पीड़ा होवे ।
तीसरे खांश का फल-
खांशे तृतीये गृहणं रवींदोः म्लेशांश्च शुद्रानपिमंत्रिणश्च ।
कानिहन्यादपि मध्यदेशं छत्रं च कांस्यत्रपुकं महर्घम् ॥१५॥
ग्रहण का स्पर्श आकाश के तीसरे भाग में होतो म्लेछ, शूद्र,राज्य मन्त्री,
कारुक जन आदि को कष्टः मध्य देश के राजा को पीड़ा और कांसी तथा
कतीर काभाव तेज होवे।
चौथे खांश का फल-
खांशे चतुर्थे ग्रहणं रविंद्वोः तदा निहन्यात्वलुमध्यदेशम् ।
नृपस्तियामंत्रिजनान् पशूश्च धान्यं च सर्वं कुरुते मार्यम् ॥१५॥
ग्रहण का स्पर्श आकाश के चौथे भाग में हो तो मन्य देश का
नाश, राजा तया राज्य मन्त्रियों को कर, पशुओं वो दुस और सर्व प्र.
कार के धान्यों का मान तेज हो जाये।
पांचधे खांश का फल-
आकाशमागे यदि पंचमे स्यात् हिमांशु सूर्य ग्रहणे तदानीम् ।
वैस्यानपयांश्च पशूश्चहन्यादतः पुरवापितिलान् शिशृंश्च ॥१५६॥
४१ . ग्रहण का सर्श-आकाश के पाञ्चवें भाग में हो तो वैस्य, वालक, पशु तथा रानाओंके अन्नपुर (रनवास) आदि को कष्ठ पीड़ा और तिलों का भाव तेन हो जाये। छठे सोश का फल- पष्टेन मोशे ग्रहणेरविन्दोः स्त्रीशूद्ररत्नांश्च निहतिकन्याः ॥ मुवर्ण कर्पूरक कुंकुमानां महतस्यादपिनागवल्माः ॥१६॥ ग्रहण का स्पर्श-आकाश के छठे भाग में हो तो स्त्रियो, कन्याओं, तथा शूद्रों का नाश; नागरवेल के पानों की कमी, और सोना, रत्न, क- पूर, केसर आदि का भाव तेन हो जाये। सातवें खांश का फल- खांशे यदा सप्तमके रविन्दोः ग्रहस्तदा चौर विमर्दकर्ता । प्रसंतहिचापि गजाश्ववैश्यापीडा करो वस्त्र विनाशकृच ॥१६॥ ग्रहण का स्पर्श आकाश के सातवें भाग में हो तो चौरों का उपद्रव, हाथी तथा घोड़ों को कष्ट, वेश्यों को पीड़ा और कपड़े का भाव तेज हो जावे। ग्रन्थान्तर में आद्य सांश फल- यौवनस्थांश्च पूर्वाह हन्ति यज्ञविदाधनान् । औदकानि च सत्वानि नागेन्द्रश्चात्र दुःखितः ॥१६२॥ ग्रहण का स्पर्श आकाश के आद्य भाग में हो तो योवन अवस्था वाले, यज्ञ करने वाले, जल से उत्पन्न होने वाले और हाथीयों के स्वामि-इनको पीड़ा होवे । ग्रन्थान्तर से मध्य खांश फल- अथ मध्यस्थ संभास शूदान् हन्ति सतस्करान् । उपरक्तो नृपं हन्ति चन्द्रश्च घरवारणात् ॥१६३॥ १
ग्रहण का पर्श आकाश के मध्य भाग में हो तो शूद्र, चौर, और,
सजा को पीड़ा होव।
प्रन्थान्तर से अन्त्य खांश फल---
मलम्बः प्रमदां हन्ति क्षत्रं राष्ट्रं च सर्वशः ।
त्रिगश्चिात्र पीड्यन्ते मत्स्याश्च कुरवो जनाः॥१६४॥
ग्रहण का पर्श आकाश के अन्न भाग में हो तो स्त्रियों, क्षत्री.
राज्य, त्रिगर्त, मत्स्य और कुरु देश-इनको पीड़ा होवे।
ग्रन्थान्तर से सन्ध्याकाल फल-
सन्ध्याकाले तु गर्भस्था गृहीतः पीडयेत् प्रजाः।
गावो गर्भ विमुञ्चन्ति न च वर्पेत् पुरन्दरः ॥१६५॥
ग्रहण का स्पर्श सन्ध्या काल में हो तो गर्भवन्नी स्त्रियों को पीडा,
गायों के गर्मों का नाश और वर्षा का अभाव होवे।
मोक्ष समय का खांश फल-
एवं खांश फलं प्रोक्तं ग्रहणे स्पर्श कालनम् ।
पस्मिन् स्वांशे विमुक्ति स्यात्तलोक्तानां शिवं भवेत् ॥ ६॥
ग्रहण के स्पर्श समय के आकाश भाग के अनुसार जिन के लिये
निम प्रकार से उपरोक्त अशुभ पल लिया है उन्ही के लिये मोक्ष समय
के आकाश भाग के अनुमार उमी प्रकार से शुभ फल होता है अर्थात्
निस भाग में स्पर्श हो उम भाग वालों के लिये अशुभ और निम भाग में
मोक्ष हो उस भाग वालों के लिये शुभ फल जाने ।
प्रस्तोदय, ग्रस्तास्त व खग्रास फल प्रकरण ।
सूर्य चन्द्र प्रस्तोदय फल-
उदितो प्रहणं सूर्य चन्द्रमा यदि वा भवेत् ।
राजा युद्ध मनानाशं मर्व प्रस्तोति दुम्वदा ॥१६७॥
५३ प्रत्युत्तमो रविश्चन्द्रो गृह्यते यदि तत्र च । भयं तदा विजातीया ब्राह्मणानामुपस्थितम् ॥१६॥ ग्रहण यस्तोदय हो तो रानाओं में युद्ध, प्रना में क्लेश, ब्राह्मणों में भय और सम्पूर्ण ग्रहण हो तो जगत् में बहुत दुःख होवे। सूर्य प्रस्तोदय प्रस्तास्त फल- उदया स्तमयेवाऽपि सूर्यस्य ग्राणं भवेत् । सदा नृपमपं विद्यात् पर चक्रस्प चागमम् ॥१६९॥ मूर्य या ग्रहण प्रस्तोदय वा प्रस्तास्त हो तो श्रेष्ठ राजा को भय, देश में सेना का उपद्रव और महाजनों को कष्ट पीड़ा होवे । चन्द्र प्रस्तोदय प्रस्तात फाल- यावतःशान गृहीत्वन्दुरुदयसस्तमेति वा । तायनोशाकृथिव्यास्तु तम एव विनाशयेत् ॥१७॥ नन्द्रमा का ग्रहण ग्रस्तोदय वा यस्लास्त हो परन्तु ऐसा ग्रहण जिस दिशा में तथा मिलना ग्रस्त हो उस दिशा के देशों का उतने प्रमाण से नाश होवे। रखनास फल- मूपेन्द्रोसर्वथा प्रासे सर्वस्यापि महर्षता ॥१७॥ ग्रहण खग्रास अर्थात् सम्पूर्ण ग्रहण हो तो व्यापार की सम्पूर्ण व- स्तुएं मंहगी हो जावे अनः पहिले से खरीदने वालोंको लाभ होवे । खग्रास पाप इष्टि फल- ग्रस्तो समस्तौ यदि पापदृष्टौ हिमांशुसूयौँ मरक प्रदौस्ता। दुर्भिक्षदौ क्षत्रियदुःखदौ च भयं प्रजानां परचक्रजस्यात् ॥१५२॥ ग्रहण खग्रास हो और सूर्य ग्रहण समये सूर्य पर तथा चन्द्र ग्रहण समय.चन्द्रमा पर कर ग्रह की दृष्टि भी हो तो जगत् में महामारी का
દર
ग्रहण का सर्श आकाश के मध्य भाग में हो तो शूद्र, चोर, और,
राजा को पीड़ा हो ।
प्रन्थान्तर से अन्य खांश फल-
मलम्बः प्रमदां हन्ति क्षत्रं राष्ट्रं च सर्वशः।
विगश्चिात्र पीड्यन्ते मत्स्याश्च कुरवो जनाः॥१६४॥
ग्रहण का सशं आकाश के अन्न भाग में हो तो स्त्रियों, क्षत्री.
राज्य, त्रिगर्त, मत्स्य और कुरु देश-इनको पोड़ा हो।
अथान्तर से सन्ध्याकाल फल-
सन्ध्याकाले तु गर्भस्था गृहीतः पीडयेत् प्रजाः ।
गावो गर्भ विमुञ्चन्ति न च वर्षेत् पुरन्दरः ॥१६॥
ग्रहण का स्पर्श सन्ध्या काल में हो नो गर्भवन्ती लियों को पीड़ा,
गायों के गर्मों का नाश और वर्षा का अभाव होवे।
मोक्ष समय का खांश फल-
एवं खांश फलं प्रोक्तं ग्रहणे स्पर्म कालनम् ।
यस्मिन् खांशे विमुक्ति स्यारत्मोक्तानां शिवं भवेत् ॥६६॥
ग्रहण के स्पर्श समय के आकाश भाग के अनुसार जिन के लिये
निम प्रकार मे उपरोक्त अशुभ फल लिखा है उन्ही के लिये मोक्ष ममय
के आकाश भाग के अनुसार उसी प्रकार से शुभ फल होता है अर्थात्
निस भाग में स्पर्श हो उस भाग वालों के लिये अशुभ और निस भाग में
मोक्ष हो उस भाग वालों के लिये शुभ फल जाने ।
ग्रस्तोदय, ग्रस्तास्त व खग्रास फल प्रकरण ।
सूर्य चन्द्र प्रस्तोदय फल-
उदितो प्रणं सूर्य चन्द्रमा यदि वा भवेत् ।
राजा युद्धं प्रजानाशं मर्व प्रस्तोनि दुम्वदा ॥१७॥
होवे।
समय चन्द्रमा पर कर ग्रह की दृष्टि भी हो तो जगन्म महामारी का
प्रत्युत्तमो रविश्चन्द्रो गृह्यते यदि तत्र च ।
भय तदा विजातीया ब्राह्मणानामुपस्थितम् ॥१६॥
ग्रहण प्रस्तोदय हो तो राजाओं में युद्ध, प्रजा में क्लेश, ब्राह्मणों में
भय और सम्पूर्ण ग्रहण हो तो जगत् में बहुत दुःख
सूर्य प्रस्तोदय ग्रस्तास्त फल-
उदया स्तमयेवाऽपि मर्यस्प प्रणं भवेत् ।
तदा नृपभयं विद्यात् पर चक्रस्य चागमम् ॥१६९॥
सूर्य का ग्रहण ग्रस्तोदय वा ग्रस्तास्त हो तो श्रेष्ठ राजा को भय,
देश में सेना का उपद्रव और महाननों को कष्ट पीड़ा होवे ।
चन्द्र प्रस्तोदय ग्रस्तात फल-
यावतःशान गृहीत्वन्दुरुदयसस्तमेति वा ।
ताव शान्धृधिव्यास्तु तम एव विनाशयेत् ॥१७॥
चन्द्रमा का ग्रहण ग्रन्तोश्य वा ग्रस्तास्त हो परन्तु ऐमा ग्रहण
निस दिशा में तथा निनना ग्रस्त हो उस दिशा के देशों का उत्तने प्रमाण
से नाश होवे ।
सूयेन्द्रो सर्वथा प्रासे सर्वस्यापि महर्घता ॥१७१॥
ग्रहण खग्रास अर्थात् सम्पूर्ण ग्रहण हो तो व्यापार की सम्पूर्ण य-
स्तुएं मंहगी हो जावे अतः पहिले में खरीदने वालोको लाभ शो।
खग्रास पाप दृष्टि फल-
ग्रस्तौ समस्तौ पदि पापदृष्टौ हिमांशुसूयौँ मरक मदौस्तः ।
दुभिंसदौ क्षत्रियदुःखदौ च भयं प्रजानां परचक्रजस्यान
ग्रहण खग्रास हो और सूर्य ग्रहण समये सूर्य पर तथा चन्द्र ग्रहण
खग्रास फल-
॥१२॥
उपद्रव, दुर्मिक्ष का भय, रानाओं सत्रियों को पीड़ा और प्रजा को पराई
सेना के उपद्रव का भय होवे।
-
दिशा फल प्रकरण।
ईशान कोण फल-
ईशान्यां दृश्यते राहुहिमरुवेयंदा ।
महावात महाशीतं मुभिस क्लशिता मजाः ॥१७३ ।।
ग्रहण का स्पर्श ईशान कोण से हो तो वायु का वेग अधिक, अति
शीन, सुभिक्ष और प्राजाको क्लेश होवे ।
पूर्व दिशा फल-
पूर्वस्यां दृश्यते राहुस्तोयपूर्णावसुंधराम् ।
करोति राजपुत्रांश्च हन्माचैव वरांगनाः ॥ १७ ॥
ग्रहण का स्पर्श पूर्व से हो तो वषी अधिक, क्षत्रियों को कष्ट और
श्रेष्ठ स्त्रीको पीड़ा होवे।
अग्नि कोण फल-
अनियां हिमगोगेसे दृश्यते राहुमण्डलम् ।
अग्निचौरभयं चंच मन्नवस्रमहर्षत ॥ १७५ ॥
ग्रहण का स्पर्श अग्नि कोण से हो तो अमि का भय, चोरों का उ.
पद्रव और धान्य तथा वस्त्र तेन हो जावे ।
दक्षिण दिशा फल-
चन्द्रार्कग्रहणे ग्रासो दक्षिणस्यां यदा भवेत् ॥
हन्याजलचरान् वैश्यान् गांश्च जलदानापि ॥ १७६ ॥
ग्रहण का स्पर्श दक्षिण से हो तो जलचर प्राणियों का नाश, वैश्यों को पीडा, हाथियों को कष्ट और वर्षा की कमी होवे । नैऋत्य कोण फल- मूर्यविवे यदानासो नैऋसां राहु दर्शनम् । दुर्भिक्षं निष्ठुरालोका साधवो याति पीडनम् ॥ १७७ ॥ ग्रहण का स्पर्श नेत्य कोण से हो तो दुर्भिक्ष का भय, लोगो में निष्ठुरता, और साधु पुरुषों को पीड़ा होवे । पश्चिम दिशा फल- मूर्यग्रासश्च वारुण्यां क्षेमारोग्यमुभिक्षकृत् ॥ हन्यात् कृषिकरान् वीजं शुद्रान् सेवाकरांस्तथा ॥ १७८ ॥ ग्रहण का स्पर्श पश्चिम से हो तो जगत् मे क्षेम, आरोग्य, सुभिक्ष आदि का सुख किन्तु खेती करने वालों, शूद्रों, नोकरी करने वालों और सर्व प्रकार के बीजों का नाश होये । यायव्य कोण फल- भास्करग्रासकाले च वायव्या दृश्यते तमः ॥ महावातमचंडाभिप्टिभिः खंडमंडलम् ।। १७९ ॥ ग्रहण का स्पर्श वायव्य कोण से हो तो वायु महान् प्रचड चले और वर्षा विषम अर्थात् कही तो होवे और कहीं विलकुल ही नहीं होवे । उत्तर दिशा फल- उत्तरस्यां दिशि यदा दृश्यते सिहिकामुतः। गवां पीडा च विमाणामधानां वनवासिनाम् ।। १८० ॥ ग्रहण का स्पर्श उत्तर से हो तो गायों को पीड़ा, ब्राह्मणों को कट, घोड़ों की हानी और वनवाशियों को क्लेश होवे ।
ग्रास फल प्रकरण ।
दश प्रकार ग्रास निर्णय-
सव्यापसव्य लेह ग्रसन निरोधावमर्दनारोहाः।
आघ्रान्तं मध्यतमस्तमोऽत्य इति ते दश प्रासाः ।। १८१ ॥
ग्रहण के (१) सव्य, (२) अपमव्य. (३) लेह, (४) असन, (५)
निरोध, (६) अवमर्दन, (७) आरोहण. (८) आघान, (९) मध्यतम और
(१०) अन्न नम नामक दश प्रकार के ग्राम होते हैं।
सव्य प्रास फल-
राहुयंदा मव्यगतः शदृश्यते प्रजाविवृद्धिः समुभिक्ष्यनिभर्य
वृष्टिः प्रभूतायुदितं जगहवेत् सेव थुनाधर्मरताश्च मानवाः ॥ १८२ ।।
मूर्य ग्रहण का स्पर्श वायव्य कोण मे और चन्द्र ग्रहण का स्पर्श
अग्नि कोण से हो तो वह मव्य भ्रमण नामक ग्रास होता है । ऐमा ग्रास
हो तो सुवृष्टि, सुभिक्ष, प्रजा की वृद्धि, जगत मे प्रमन्नना, परोपकार में प्र
वृत्ति और धर्म में श्रद्धा वाले मनुष्य हो ।
अपसव्य ग्राम फल-
राहुयंदा यात्यपसव्यगत्या तदा प्रजानां नृपपीडनं स्यात् ।।
दुर्भिक्षचोरामिभयं सरोगमल्पां च वृष्टि मकरोति मेघः ॥१८॥
सूर्य ग्रहण का पर्श नेऋत्य कोण से और चन्द्र ग्रहण का स्पर्श
ईशान कोण से हो तो वह अप मन्य नामक ग्रास होता है ऐसा पास हो
तो प्रजा को रानाका क्ट, दुर्भिक्ष का भय, चौरों की पीड़ा, अग्नि का उ-
पदव, रोगों का भय, और वर्षा की कमी होवे ।
लेह ग्रास फल-
जिह्वोपलेविपरितस्तिमिरनुदो मंडलं यदि सलेहः ॥
प्रमुदितसमस्तभूताः प्रभूत तोया च तत्र मही ॥ १८४ ॥
ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा का विम्ब बीचमें से जैसे निव्हासे नाटे हुये के सदृश्य दीखे उसे लेह नामक ग्राम कहते हैं । ऐसा पास हो तो सम्पूर्ण प्राणि प्रशन रहे और वर्षा बहुत होवे । आसन ग्रास फल- यसनामति यदा अंशः पादो वा गृहाते तथाप्यर्द्ध । स्फीतनृपवित्तहारीपीडा च स्फीतदेशानाम् ॥ १८५ ।। ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा के तृतीयांश, चौथाई वा आधे गि- म्त्र को ग्रहण हो तो उसे ग्रसन, नामक ग्रास कहते हैं । ऐसा ग्रास हो तो स्फीत देश के राजा को कठ, प्रजा को पीड़ा और धन की हानी होये। निरोध ग्रास फल- पर्यंतेपु गृहीत्वामध्यपिंटिभूतं तमस्तिष्ठेत् सनिरोधो विज्ञेयः प्रमोदकृत्सर्व भूतानाम् ॥ १८६ ॥ ग्रहण के समय सूर्य वा चन्द्रमा का बिम्ब के चरों ओर मे ग्रहण लग कर वीच में पिंडाकार हो तो उसे निरोध नामक ग्रास कहते हैं । ऐमा ग्राम हो नो मम्पूर्ण जगत् को आनन्दप्रद होवे । अवमर्दन ग्रास फल- अवमई मितिनिः शेपमेवसंछायामेव तिष्ठेत् ।। हन्यात् प्रधानपुरुपान् प्रधानदेशांश्चतिमिरमयः ॥ १८७॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा के सम्पूर्ण विश्व को छादन करके ब- हुत समय तक ग्रहण रहै तो उसे अवमर्दन नामक ग्रास कहते है । ऐसा ग्रास हो तो प्रधान पुरुषों को कष्ट और प्रधान देशों के पीड़ा होवे । आरोहण ग्रास फल- वृत्ते ग्रहे यदि तमस्तक्षणमावत्यदृश्यते भूयः ॥ आरोहणमित्यन्यान्यमईनर्भयकरं राज्ञा ॥ १८८ ॥ .
ग्रहण होने के उपरान्त फिर तत्काल ग्रह होता हुआ दीखे तो उसे आरोहण नामक ग्रास कहते हैं। ऐमा ग्राम होतो रानाओं को परस्पर एक दूसरे का मय होवे। आघात ग्रास फल- दर्पणापिवैकदेशे मवाप्पनिश्वासमारुनापहतम् । दृश्येताघातं तत्मदृष्टिदयावहजगतः ॥ १८९ ॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का निम्ब एक और दर्पन के समान वायु वा धूप से मलीन दीखे तो उसे आघात ग्रास कहते हैं । ऐसा प्रास हो तो वर्षा श्रेष्ठ तथा जगत् की वृद्धि होवे। मध्यतम पास फल-- मध्य तमः प्रविष्टं वितमस्तं यदि मंडलं परितः ॥ तन्मध्यदेशनाशं करोति कुश्यामयभयं च ॥ १९० ।। ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का विम्ब बीच में से ग्रस्त तथा अन्त में मण्डल के समान हो तो उसे मध्यतम नामक ग्रास कहते हैं । ऐसा ग्रास हो तो मध्य देश को पीड़ा और उदर रोग का भय होते। अन्ततम ग्रास फल- पर्यन्तेवति वलं स्वयं मन्यतमस्ततोन्याख्ये । सस्यानांमिति भयं भयंमस्मिन्रतस्कराणां च ।। १९१॥ ग्रहण के समय सूर्य चन्द्रमा का विम्ब बीन मे से तो स्वच्छ और अन्त पास हो तो उसे अन्ततम ग्राम कहते हैं। ऐसा ग्राप्त हो तो किमी प्रकार के उपद्रवो से खेतियों का नाश तथा जगन् में चोरो का भय होवे ।
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वर्ण फल प्रकरण ।
धूम्र वर्ण फल-
धूम्र क्षेमं मुभिक्षं च वर्षते मृतोपमम् ।
महोत्साही भवेल्लोकः सर्वोपद्रवजितः ॥ १९२ ।।
ग्रहण का वर्ण धूम्र हो तो जगत् में क्षेम, कल्याण, सुवृष्टि, सुमिक्ष
तथा मंगलीक उत्सव अधिक और सर्व प्रकार के उपद्रवों का नाश होवे ।
कृष्ण वर्ण फल
महिपा मधकाराश्च कुंजरा वह्निजीविनः ।
शूद्राश्चैव प्रपीड्यंते कृष्णवर्ण विधुन्तुदे ॥ १९३ ॥
ग्रहण का वर्ण कृष्ण हो तो मद्य बनाने वालों, भैतियों, हाथियों,
आनि से आजीविका करने वालों और शूद्रों को पीड़ा होवे ।
ताम्र वर्ण फल-
रक्तः कृष्ण विमिश्राभे सस्यानां वजनभयम् ।
युद्धं परस्परं राज्ञा प्रजानां पीडनं भवेत् ॥ १९४ ॥
ग्रहण का वर्ण लाल और काला-मिला हुआ ताम्र के समान हो
तो बिजली गिरने से खेतियों का नाश होवे ।
कपिल वर्ण फल-
कपिले शीघ्रगाः सत्वा म्लेछानाशं मयांति हि ।
दुर्भिक्ष नृपपयुद्धं च शेषवर्णा अनिष्टदा ॥ १९५ ॥
ग्रहण का वर्ण काला और पीला मिला हुआ कपिल वर्ण हो तो
शीघ्र चलनेवाले हरण तथा उंट आदि पशुओं को पीड़ा, म्लेछों को कष्ट,
दुर्भिक्ष का भय और राजाओं के युद्ध होवे।
वर्णवश ब्राह्मणादि वर्णों को अशुभ फल-
रक्तो राहु शशी सूर्यो इन्याक्षेत्रान् सितद्विजान् ।
विशः पीतो विवर्णस्तु कृष्णः शूद्राभिधांसति ॥ १९६ ॥
ग्रहण का वर्ण श्वेत हो तो बाह्मणों का, लाल हो नो क्षत्रियों का, पीला हो तो वैश्यों का काला हो तो शुद्रों का और विवर्ण (मिश्र वर्ण) हो तो विजातियों का नाश होवे । वर्णवश विशेप फल-~ श्वेतेक्षेम सुभिक्षं ब्राह्मणपीडां च निर्दिशेद्राहौ। अग्निभयमनिल.वर्णे पीडा च हुताशवृत्तिनाम् ॥ १९७ ॥ हारेरोगोल्वणता सस्यानामीतिभिश्च विध्वंसः । कपिले शीघ्रगसत्व म्लेछश्वंसोऽथ दुर्भिक्षम् ॥ १९८ ॥ अरुणकिरणानुरूपे दुर्भिक्षावृष्टयो विहग पीडा । आधूने क्षेममुभिक्षमादिशेन्मन्द वृष्टिं च ॥ १९९ ॥ कापोतारण कपिलश्या वामे अद्भय विनिर्देश्यम् कापोतः शुद्राणां व्याधिकरः कृष्ण वर्णश्च ॥ २० ॥ विमलक मणिपीताभो वैश्यध्वंसी भवेत् सुभिक्षाय । साचिप्मत्याग्नभयं गैरिकरूपे तु यद्धानि ॥ २० ॥ दर्वाकाण्डश्यामे हारिदे वापि निदिशेन्मरकम् । अशनिभयमदायी पाटलि कुसुमोपमो राहुः ॥ २०२॥ पांचविलोहितरूपः क्षत्रध्वंसाय भवतिवृष्टेश्च । बालरवि कमल मुरचाप रूपमृच्छवकोपाय ॥ २०३ ॥ ग्रहण का वर्ण श्वेत हो तो सुभिक्ष किन्तु ब्राह्मणों को पीड़ा, अग्नि के समान हो तो अग्नि का भय तथा अग्नि से जीविका करने वाले सुनार लुहार अमर आदि को पीडा, हरा हो तो रोगों का उपद्रव तथा अति वृष्टि अनावृष्टि वीडि आदि में वेनियों का नाश. कपिल होती गीय चलने वाले उट आदि प्राणियों व म्लेओं को कष्ट नथा दुर्भिक्ष या भय, लाल हो तो अनावृष्टि व दुर्भिक्ष का भय तथा पसियों को पीड़ा, धूम्र हो तो क्षेम व मुभिक्ष किन्तु वर्षा अधिक नहीं होवे, कपोन, लाल वा कपिल मि- 20492 श्रित श्याम हो तो दुर्भिक्ष का भय, कपोत वा सम्ण हो तो शुद्रों को रोग भय, नील माणके सदृश्य हरा का पीला हो तो वैश्यों को पीड़ा, ज्वाला सदृश्य हो तो अग्नि का भय, गेसेंके सदृश्य लाल हो तो युद्ध मया दूरखा वा हरिद्रा सदृश्य हरा पीला हो तो महा मारी का भय, गुलांत्री हो तो बि- अली गिरने का भय, लाल मिश्रित धूलि सदश्य हो तो क्षत्रियों का नाश तथा अनावृष्टि का भय, और प्रातकाल के सूर्य, कमल वा इन्द्र धनुष्य के महश्य वर्ण हो तो शस्त्र भय होवे । ग्रह दृष्टि फल प्रकरण। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य पर और चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्र पर निस ग्रह की दृष्टि होगी वही हाट ग्रहाण पर भी हो जाती है । भौम दृष्टि फल- ग्रस्तं यदा पश्यति भूमिपुत्रो रक्तानि वस्तपखिलानि नाशम् । मयंति चौराग्निनृपाहवैश्च पीडा प्रजानां च भवेनदानीम् ॥२०४|| ग्रहण पर मंगल की दृष्टि हो तो लाल रंगकी सम्पूर्ण वस्तुओं का नाश, चोरों का भय, अग्नि का उपद्रव, रानाओं के युद्ध भय और प्रना को काट होवे ! बुध दृष्टि फल- अस्तं बुधः पश्यति चेत्तदानीं मचायतैलक्षयकृमराझार । पीतानि धान्यानि च पीतधावन स्वर्णादिकानाशयति प्रभूतान्०९ ग्रहण पर बुध की दृष्टि हो तो सहत, तेल, न मक्की आदि पीला धान्य, साना तथा पीनल आदि पाली धातु का नाश और सनाओं को काठ हो। 201920 शुक्र दृष्टि फल- शुक्रस्य दृष्टिग्रहणे यदि स्यात्सस्यमणाशो भवति क्षितौ च । क्लेशो महाश्चापि सिताश्चधातु धान्यांवराणि मध्यंति मूल्यम्॥२०६ ग्रहण पर शुक्र की दृष्टि हो तो खेतियों का नाश, बावल ज्वार आदि स्वेत धान्य तथा नांदी कतीर आदि स्वेत धातु मलमल जगनाथी आदि स्वेत कपड़े का भाव तेन और जगत में महान क्लेश हो। शनि दृष्टि फल- शनैश्चरश्चग्रहणं निरीक्षे दुर्भिक्षचौरोत्यभयं वृष्टिम् । कृष्णानि धान्यानि च कृष्णधातून कुर्यान्महर्यान्यासिवान् विलेपान्। ग्रहण पर शनि की दृष्टि हो तो वर्षा का नाश, दुर्भिक्ष का कष्ट, नारों का भय, उद आदि कृष्ण धान्य लोहो आदि कृष्ण धातु नया कु- प्णागर कस्तुरी आदि कृष्णा लेपन वस्तुओं का भाव तेन हो जावे। गुरु दृष्टि फल- जीको यदा पम्पति सूर्यमिन्टुं प्रस्तं तदा सर्च खगेक्षणायत् । फलं त्वनिष्ट गदितं निहन्यात्सर्वत्र लोकेप्वपि सौख्यकृत्स्यातू२०८. ग्रहण पर गुरु की दृष्टि हो तो भोमादि ग्रहों की दृष्टि के सम्पूर्ण अशुभ फलों का नाश होकर जगत्में मर्व प्रकार का सुख होवे। ग्रह ग्रस्त फल प्रकरण। सूर्य ग्रहण के समय सूर्य निम राशि का हो उसी राशि पर और चन्द्र ग्रहण के समय चन्द्र जिस राशि का हो उसी राशि पर नो ग्रह हो वह ग्रह भी ग्रस्त कहलाता है। भीम ग्रस्त फल- आवंतिका जनपदा कावेरीनर्मदातदाश्रमिणः । दिशाश्च मनुजयतयः पीडचंते क्षितिसुते ग्रस्ते ॥ २०९ ॥ ग्रहण के समय मंगल ग्रस्त हो तो उन्नयनी देश के रहनेवालों का.
५३ . बेरी तथा नरबदा के किनारो पर रहने वालों को पीड़ा और अभिमानी रानाओं को कष्ट होवे । बुध प्रस्त फल- अंतर्वेदी मरमु नेपालं पूर्वसागरं शोणम् । स्त्रीनृपयोधकुमारान् यस्तो ज्ञो इंति विदुपश्च ॥ २१ ॥ प्रहण के समय बुध ग्रस्त हो तो अन्तरवेदी देश, सरयू नदी के देश नेपाल, पूर्व दिशा का समुद्र, शोणनद, स्त्री, राजा, बालक और विद्वान्- इन को पीड़ा होवे। बृहस्पति ग्रस्त फल- ग्रहणोपगते जीवे विद्वन्नृपमंत्रिगजहय ध्वंसः । सिंधुतटवासिनामप्पुदीग्दशं संश्रितानां च ॥ २११॥ ग्रहण के समय वृहस्पनि ग्रस्त हो तो विद्वान्, राज्य मन्त्रि, हाथी, घोड़ों, मिन्ध देश तथा उत्तर देश के लोग-उनको पीड़ा होवे । शुक्र ग्रस्त फल- भृगुतनये राहुगते दशार्ण केकयरोपकाहणाः । आर्यावर्ताः शिवयः स्त्रीसचिवगणाश्च पीडयंते ॥ २१२ ॥ ग्रहण के समय शुक्र ग्रस्त हो तो दशार्ण, केकेय, रोम, हूंण, आर्या वत्तं और शिवी-इन देशों को पीड़ा, स्त्रियों को कष्ट राज्य मन्त्रियों को रमेश और प्रजा के गुल्य पुरुषों को दुःख होवे। शनि ग्रस्त फल- सौरे मरुभवपुष्करसौराष्ट्रा धातयोर्बुदांसजनाः । गोमंत परियात्राश्रिताश्च ग्रस्ते विनश्यति ॥ २१३ ॥ ग्रहण के समय शनि ग्रस्त हो तो मारवाड़, पुष्कर, सौरठ, आबू गोमंत और पर्वत प्रदेश-इन देशों में रहने वालो को पीड़ा और सर्व घानू का भाव तेज हो जावे।
मोक्ष फल प्रकरण । दश प्रकार के मोक्ष निर्णय- हनुकुक्षिपायु भेदा द्विदिः संछईनं व जरणं च । मध्यंत्मयोश्च विदारणमिति दश शशिमूर्ययोर्मोक्षाः ॥२१॥ ग्रहण का मोक्ष (१) दक्षिण हनु, (२) वाम हनु, (३) दक्षिण कुक्षी, (४) वाम कुक्षी, (6) दक्षिण पायु. (६) वाम पाय, (७) मर्दन, (८) जरण, (९) म य विदारणा और (१०) अन्त्य विदारण ऐसे दश प्रकार से मोक्ष होते हैं। दक्षिण हनु मोक्ष फल- अग्नेयामपगमनं दक्षिणहनुभेदसंज्ञितं शशिनः । सस्याविमो मुखरुक्नृपपीडा स्पारसुवृष्टिश्च ।। २१५ ।। ग्रहण का मोक्ष अग्नि कोण में हो नो वह दक्षिण हनु नामक मोक्ष होता है । ऐसा मोक्ष हो नो ग्वेतियों का नाश, लेगों के मुख मे रोग पीडा, रानाओं को कष्ट और वर्षा श्रेठ होवे। घाम हनु मोक्ष फल- पूर्वोत्तरेण वामो हनुभेदो नृपकुमारभयदायी। मुखरोगः शस्त्रभयं तस्मिन् विद्यात् मुभिक्षं च ॥ २१६ ॥ ग्रहण का मोक्ष ईशान कोण मे हो तो वह वाम हनु नामक मोक्ष होता है। ऐसा मोक्ष हो नो राजकुमारों को भय, मुख का रोग, उपद्रव और सुभिक्ष होवे। *दक्षिण कुक्षी मोक्ष फल । दक्षिणक्षिविभेदो दक्षिणपार्षे यदि भवेन्मोक्षः । पीडा नृपपुत्राणाममियोज्या दक्षिणारिपवः ॥ २१७ ॥ + ग्रहण का दक्षिण कुक्षी और वाम कुक्षी मोक्ष रिम्बा है परन्तु गणित के सिद्धान्त से दक्षिण तथा उत्तर दिशा में मोक्ष होता ही नहीं अत यह पल शामों में उत्पात से मोक्ष होने का पाना होगा । युद्ध का ग्रहण का मोक्ष दक्षिण में हो तो वह दक्षिण कुक्षी नामक मोस होता है । ऐसा मोक्ष हो तो राजपूतों को पीड़ा और दक्षिण दिशा के शत्रुओं को कष्ट हो। *वाम कुक्षी मोक्ष फल- वामस्क्त कुक्षिभेदो यद्युत्तरमार्गमाश्रितो राहुः । खिणां गर्भविपत्तिः संस्थानि च तत्र मध्यानि ॥ २१८ ।। ग्रहण का मोक्ष उत्तर में हो तो वह वाम कुक्षी नामक मोक्ष होता है। ऐसा मोक्ष हो तो स्त्रियों के गर्मों का नाश और खेतियों की उत्पत्ती साधारण होवे। दक्षिण पायु तथा वाम पायु मोक्ष फल- नैतिवायव्यस्थौ दक्षिणवामौ तु पायुभेदौ द्वौ । गुहारुगल्पावृप्टियोस्तु राज्ञीक्षयो बामे ॥ २१९॥ । ग्रहण का मोक्ष नैत्य कोण में हो तो वह दक्षिण पायु और वा- यव्य कोण में हो तो वह वाम पाय नामक मोक्ष होता है । ऐसे मोक्ष हो, नो लोगों को गुह्य रोग की पीड़ा. वर्षा अल्प होवे और वाम पाय मोक्ष में महाराणी को कष्ट होवे। मंछदन मोक्ष फल- पूर्वे प्रग्रहणं कृत्वा प्रागेपचापसर्पति । मंछईनमितिप्रोक्तं क्षेमं सस्यपदं जने ॥ २२० ॥ प्रहण का स्पर्श पूर्व में होकर पीछा मोक्ष भी पूर्व में ही हो तो वह मछर्दन नामक मोक्ष होता है । ऐसा मोक्ष हो नो जगन् में सेम कल्याण नया ग्वेतियों की वृद्धि होते। जरण मोक्ष फल-- मा प्रग्रहणं यस्मिन् पश्चादपमर्पणंतु तन्जरणम् । क्षुछसभयोवग्ना न शरणमुपयांति तत्र जनाः ॥ २२१ ॥ --
ग्रहण का स्पर्श पूर्व में होकर पीडा माक्ष पश्चिम में हो तो वह ज.
रण नामक मोक्ष होता है । ऐमा मोक्ष हो तो नगन् मेंदुर्भिक्ष का कष्ट और
युद्ध का भय होन मे लोग दुःखी हो जाते हैं।
मध्य विदारण मोक्ष फल-
मध्ये यदि प्रकाशः प्रथमं तन्मध्यविदरणं नाम ।
अतः कोपकरं स्यात्सुभिक्षदं नातिवृष्टिकरः ॥ २२२ ।।
ग्रहण के बीच में से प्रथम प्रकाश हो तो वह मध्य विदारण मोक्ष
होता है । ऐमा मोक्ष हो तो राजाओं के घर ही में उपद्रव, और वर्षा
साधारण होवे तथापि मुभिक्ष हो जावे ।
अन्त्य विदारण मोक्ष फल-
पर्यंतषु विमलता बहुलं मध्ये तमोऽत्पदरणाख्यम् ।
मध्याख्यदेशनाशः शारदसस्यक्षयश्चापि ॥ २२३ ॥
प्रहण के अन्न में प्रथम प्रकाश हो तो वह अन्त्य विदारण नामक
मोक्ष होता है । ऐसा मोक्ष हो तो मध्य देश को कठ और शरद ऋतु में
उत्पन्न होने वाले चावल मुंग ज्वार आदि की खेतियों का नाश होवे ।
मोक्ष समय का धर्ण फल-
यथोत्साहं गृहीत्वा तु राहोनिक्रमते शशी ।
तदा क्षेमं मुभिक्षं च मदरोमाश्च निदिशेत् ॥ २२४ ॥
ग्रहण के मोक्ष समय में मृर्य वा चन्द्रमा का विम्म निर्मल कान्ति
का तथा मोभायमान हो तो जगत् में क्षेम कल्याण नथा मुभिक्ष होवे।
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काल फल प्रकरण।
एक ग्रहण में आगे होनेवाले ग्रहण का मासानुसार फल-
पण्मासात्मकृतिया ग्रहाणां वापिकम्भयम् ।
वा त्रयो दशमामानां पुररोषां समादिशेत् ॥ २२५ ॥
५७ प्रचतुर्दशमासानां विन्यादाहन जम्भयम् । अथ पञ्चदशे मासे वालानां भयमादिशेत् ॥ २२६ ॥ षोडशानान्तु मासानां महामन्त्रीभयं वदेत् । सप्तदशानां मासानां महाराज्ञी भयं दिशेत् ॥ २२७ ॥ तथाऽटादश मासानां विन्द्याद्राज्ञस्ततो भयम् । एकोनविंशकं पर्व विशं कृत्वा नृपंवघेत् ॥ २२८ ॥ अतः परन्तु यत्सर्वं तचिनोति कलिं भुवि । सूर्य के ग्रहण से आगे फिर सूर्य का ग्रहण और चन्द्रमा के प्रह- णसे आगे फिर चन्द्रमा का प्रहण ६ । ६ महिमों से होने का स्वभावीक क्रम है परन्तु जिस देश में इस क्रम को छोड कर कोई भी ग्रहण होते यह प्रण उस देश के राजा के लिये अशुभ फलकारक होता है जैसे-प्र- थम के ग्रहण से आगे का ग्रहण १२ महिनों से हो तो जगत् में भय, १३ महिनों से हो तो किसी देश के राज्य के नग्र को शत्रुओं की सेना से घिर जाने का भय, १४ महिनों से हो तो वाहन से भय, १५ महिनों से हो तो रानकुमारों को भय, १६ महिनों से हो तो महा मन्त्रि को भय, १७ महिनों से हो तो महाराणी को भय, १८ महिनों से हो तो स्वयं राजा को भय और १९ वा २० महिनों से हो तो राजा को मृत्यु समान महान् क्लेश होवे । और इससे आगे चाहे नितने महिनों से ग्रहण होवे तो वे सब ग्रहण जगत् के लिये महान् अशुभ फल कारक होते हैं। छ मास से होने का फल- स्वर्भानुरिन्दुषष्टे तु मासे यापतिष्ठति । तदा क्षेमं मुभिक्षं च योगक्षेमं च निर्दिशेत् ॥ २२९ ॥ सूर्य का चन्द्रमा का प्रथम ग्रहण हो उस से आगे होने वाला ग्रहण यदि ६ मास से हो तो जगन् में क्षेम कल्याण आरोग्य तथा सुभिक्ष आदि शुभ फल हो होवे।
तेहेरे महिनों से होने का फल- मासि त्रयोदशे दृश्यो चन्द्राको ग्रहणं गतौ । छत्राण्यनेकानि तदा भज्यन्ते नृपतिक्षय ॥ २३० ॥ काला शोकावह पुंसां देशाऽनेकविनाशनः । स्वचक्र परचक्रैश्च विनश्यति बहुमनाः ॥ २३१ ।। सूर्य वा चन्द्रमा का प्रहण प्रथम के ग्रहण से आगे १३ वें महीने में हो तो कई देशों में उपद्रव, अपने राज्य की वा शत्रु की सेना से प्रजा को कष्ट, और राजाओं की मृत्यु अधिक होवे । अठारह महिनों से होने का फल- पदा त्वष्टादशे मासि राहुः सोममुपक्रमेत् । रसक्षयो व्याधिभयं विनाशः फलपुष्पपोः ।। २३२ ॥ सूर्य वा चन्द्रमा का ग्रहण १८ वें महीने में हो तो घृत तेल गुड़ खांड सहन आदि रमों का नाश, फल तथा पुष्पों की हानी और रोगों का उपद्रव होवे। चन्द्रमा का ५। ११ ध मूर्य का १७ महिनों से होने का फल- चन्दे पञ्चममासे तु मासे त्वेकादशे थवा । सप्तदशे वा सूर्यस्य ग्रहणं शुद्भयायतत् ।। २३३ ।। चन्द्रमा के प्रथम प्रहण मे आगे होनेवाला ग्रहण ५ वें वा ११ वें महीने में हो ऐसही सूर्य का ग्रहण १७ वें महीने में हो तो जगन् में नि. श्चय दुर्भिक्ष-अकाल का भय होवे । चन्द्रमा का ५ वर्षों और सूर्य का १२ वर्षों पीछे होने का फल- पंञ्चसंवत्सरं घोरं चन्द्रस्य ग्रहणं परम् । विग्रहं च पर विन्यात्सूर्यद्वादश वार्षिकम १ २३४॥ चन्द्रमा के प्रथम ग्रहण से आगे का प्रहण यदि ५ वर्षों ( ६० म. हिनों) पीछे होते ऐसे ही सूर्य का प्रहण १२ वर्षों (१४४ महिनों)
पीछे होवे तो जगत में युद्ध महामारि आदि अनेक प्रकार के महान् घोर
उपद्रव होते।
एक मास में दो ग्रहण होने का फल-
यद्यैकमासे ग्रहणं भवेच शशि सूर्ययो ।
राजयुद्धं तदा ज्ञेयं क्षयं याति वसुंधरा ॥ २३५ ॥
एक ही महीने मे चन्द्रमा और सूर्य का-दोनों ग्रहण हो जावे तो
गनाओं के युद्ध, चोरों का उपद्रव, पाप कर्मों की वृद्धि. माधूओं को पीड़ा
और जगन् में अनेक प्रकार का वेश होवे ।
एक पक्ष में दो ग्रहण होने का फल-
एक पक्ष मैं भडली दोय ग्रहण हुवन्त ।
महि डोले छत्र पडे आई शाख गमन्त ॥ २३६॥
कदानित उत्थान वशसे एक ही पक्ष में दो प्रण हो जाये तो जगत्
में भय, राजाओं को कष्ट और सेतियों का नाश हो।
चन्द्र ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य ग्रहण होने का फल-
सोम ग्रहे निवृत्ते पक्षान्ते यदि भवेद्ग्रहोस्य ।
तत्रानयः प्रजाना दम्पत्योवेरमन्योन्यम् ॥ २३७ ॥
चन्द्रमा के ग्रहण के एक पक्ष पीछे सूर्य का ग्रहण हो तो जगत में
अनेक प्रकार के रोगों का उपद्रव तथा स्त्री पुरुषों के परस्पर में वैर होवे ।
सूर्य ग्रहण के एक पक्ष पीछ चन्द्र ग्रहण होने का फल-
रविग्रहाच पक्षान्ते यदि चन्द्रग्रहो भवेत् ।
तदा दनिनो पूजा धर्म वृद्धिर्महोदयः ॥ २८ ॥
सूर्य के ग्रहण के एक पक्ष पीछे चन्द्रमा का ग्रहण हो तो यज्ञों की
वृद्धि माननीय पुरुषों का सत्कार धर्म का प्रचार और जगत् में आनन्द होवे।
सूर्य चन्द्र और फिर सूर्य ग्रहण होने का फल-
रवि ग्रहणं प्रथमं कुर्यात् चन्द्र ग्रहण रविपुनः ।,
तदा च षटका योगं रुण्ड मुण्डा च मेदिनि ॥ २३९ ॥
प्रथम तो सूर्य महणा, फिर चन्द्रमा का ग्रहण और उस के पीछे फिर सूर्य का ग्रहगा-ऐसे ३ प्रण कभी भी हो तो अनेक प्रकार के उपद्रों से जगत् का नाश होवे। अतिवेला ग्रहण फल- अतिवेला गतं पर्व फलं सस्य विनाशनम् । मध्यउत्रं विनश्येत मध्यदेश उपपवः ॥ २४० ।। प्रहण होने का जो समय गणिन से निश्चय किया है उस समय पर न होकर उस से पीछे हो तो वह अति वेला प्रहण कहलाता है । ऐमा प्रहण कभी होवे तो फलों का तथा खेतियों का नाश, मध्य देश के राना को क्लेश तथा मध्य देश के लोगों को उपद्रवों से कष्ट होवे । हीन घेला ग्रहण फल- रेलाहीनं यदा पर्व शस्त्रकोप भयंकरः । स्त्रीणां च सवते गर्भो महाराज्ञां नुचिप्रहः ॥ २४१ ।। इसी प्रकार गणित से निश्चय किये हुवे समय से पहिले ही ग्रहण हो जावे तो वह होन वेला प्रहण कहलाता है । ऐसा ग्रहण कभी हो तो शस्त्रों का भय, महाराना को विग्रह और स्त्रियों के गर्भपात होवे। अति धेला हीन घेला ग्रहण होने में शंका- हीनातिरिक्तकाले फलं मया उक्तं पूर्वशाख दृष्टत्वात् । स्फुट गणितविदां काल कदाचिदपि नान्यथा भवति ॥२४२॥ ग्रहण के अति वेला और हीन वेला का फल प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है किन्तु वराहमिराचार्य इस पर शका करते हैं कि जिसकी गणित सच्ची होगी उस के निश्चय कीये हुवे समय से आगे वा पीछे महण कदापी नहीं हो सकता। .
६१ अति घेला हीन चेला की शंका का समाधान- पूर्वाह्न वा पराह्ने वा वेलाहीनं तदुच्यतेः । मध्याने अति वेलास्यात् वयोवेला गुणाः फलम् ।। २४३ ॥ किसी ग्रन्थकारने मध्यान से या मध्य रात्रि से पहिले होने वाले ग्र- हा को तो हीन वेला और मव्यान वा मध्य रात्रि में होनेवाले ग्रहण को अति वेला मानकर वराह मिहिराचार्य की उपरोक्त शंका का समाधान करा है । उत्पात फल मकरण। मुक्त समाहान्त पांशुनिपातोऽनसझयं कुरुते । नीहारो रोगभयं भूकम्पः भवरनृपमृत्युम् ॥ २४४ ॥ उल्का मन्त्रिविनाशं नानावर्णा धनाश्च भयमतुलम् । स्तनितं गर्भविनाशं विद्युन्नृपदष्ट्रि परिपीडाम् ॥ २४५ ॥ परिवेपो रुक्पीडां दिग्दाहो नृपभयं च साग्निभयम् । सक्षो वायुः प्रवलश्चौरसमुत्थं भयं धत्ते ॥ २४६ ॥ निर्यात मुरचापं दण्डश्व शुद्धयं सपरचक्रम् । ग्रहयुद्धे नृपयुद्धं केतुश्च तदेव सन्दृष्टः ।। २४७ ॥ ग्रहण का मोक्ष होने के बाद ७ दिन के भीतरर आगे लिखे हुयेनि- मित्तों के होने से प्रत्येक का पृथक् २ अशुभ फल होता है नेसे आंधी आवे तो अन्न का क्षय, धूहर नो रोगों का उपद्रव, भूकम्प हो तो श्रेष्ठ राना को लेश, उल्का गिरे ( नानावर्ण के तारा टूटे) तो राज्य म- त्रि का नाश, अनेक वर्ण के बादल हो तो बहुत भय, मेव गाने तो मेय के गों का नाश, विनालि चमके तो राना का नया सर्प शूकर आदि दोनों वाले जन्तुओं का भय, परिवेष (सूर्य नन्द्र के कुण्डल) हो तो रोगों की पीड़ा, दिग्दाह हो ( चारों और बहुत तेनम्वी सन्ध्या फ़्ले ) तो राना का " २ तथा अनि का भय, रूक्ष वायु जोर में चले तो प्रबल चोरों का उपद्रव, निर्यात ( बिना बादल गाने ) तथा ईन्द्र धनुष्य अथवा दंड का चिन्ह हो तो दुर्भिक्ष का भय नथा पराये रामा की मेना आने का उपद्रव और ग्रह युद्ध हो ( भोमादि शनि पर्यन्त ग्रहों में से कोई २ ग्रह आकाश में बहुत मनीक आवे ) अथवा केतुका उदय हो (धूमकेतु वा चोटी वाला नाग दीव ) नो राजाओं के परम्पर युद्ध होने। अधिकृतसलिलनिपातः मप्ताहान्तः मुभिक्षमादेश्यम् । यचाशुभ ग्रहणनं तत्सर्वं नागमुपयाति ॥ २४८ ॥ परन्नु ७ सात दिन के भीतर २ यदि पानी वर्ष जाय तो उपरोक्त निमित्तों का नथा ग्रहण सम्बन्धी अन्य भी सम्पूर्ण अगभ फले का नाम हो कर जगत में सुभिभ हो जावे। ग्रहण समय वादल वर्षादि ज्ञान प्रकरण । नवांश वश से धादि निर्णय- विभौमनवांशेतु निरभ्र ग्रासमादिशेत् । बुध सौरिनवांश तु मलिनं क्षुद्रवर्पणम् ॥ २४९ ॥ गुरोरंशकमासाय दृश्यते सबलाहकः । शशिशुक्रनवांशे तु पावद् काले महांजलम् ॥ २५० !! अन्यत्राव्यक्तभूतौ तौ दृश्यते छादिताम्बररौ । प्रहण मूर्य वा मंगल के नवाश में हो तो ग्रहण के समय बादल नहीं, बुध वा शनि के नवांश में हो तो बादल तथा थोडी वर्षा, गुरु के नवांश में हो तो वहुत बादल, और चन्द्र वा शुक्र के नवांश में हो और उस समय वर्षा काल हो तर तो वा वर्ग और अन्य काल हो तो आ- काम बादलों मे ढक जावे इतने बादल होवे।
निमित्तों द्वारा वर्षा आदि निर्णय- यस्मिन्यक्षे नपनराशिनोः हिके यावमर्द- स्तत्राष्टम्यां ग्रहण समयेन्वेपणीय पुरैवः । दृश्या दृश्यो यदि जलधरैर्यधदृश्याविनेन्दू छायाछन्नौभवत इहलो पर्वकालेपि तद्वत् ॥ २५१ ॥ जिस पक्ष में जिस समय ग्रहण होनेवाला हो उस पक्ष की अष्टमी को उसी समय अर्थात् सूर्य ग्रहण में तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन में और चन्द्र ग्रहण में शुक्ल पक्ष की अष्टमी की रात्रि में ठीक प्रण होने के समय पर जो बादल, वर्षा, वा निर्मल आदि जैसे निमित्त होंगे ठीक वैसेही निमित्त आगे प्रहण होने के समय भी होगे ऐसा जाने । . मनुष्यादि को जन्म कर्मादि नक्षत्र फल प्रकरण । जन्म कर्मादि नक्षत्र निर्णय- जन्मर्शमाचं दशमं च कर्म संघातिक पोडशमक्षपावाद । अष्टादशं वै समुदायसं भवेत्त्रयोविंशतिक बिनामाम् ।।२५२॥ यत्पञ्चविंशं खलुमान च पडर्स एवं मनुजस्तु सर्वः। विश्वभरेशो नवमः स्वजाति देशामिपेकोद्भवमः प्रदिष्टम्॥२५॥ प्रथम तो जन्म नक्षत्र, जन्म नक्षत्र से १० वा कर्म, १६ वा संवा- निया१८ वा समुदायक, २३ वां विनाश, और २५ वा मानस-ये छनत्र मनुष्य मात्र है और राजाओं के नानि, देश और राज्याभिषेके ये तीन नक्षत्र अधिक होने में ना नक्षत्र मान है। जन्म कर्मादि नक्षत्र पर ग्रहण होने का फल--- जन्मभे भतिहते तनुपीडा कर्मणा फलहतिर्दशमः । पोडो भवनि पान्धवपीहाष्टादशे तनुभृतां धनहानि ।। २५४ ।।
माणिनाममुद्दतिश्च विनाशे मानमे विकलतामनसः स्गात् । जातिभे भवतिगोत्रविनाशो देशभे सकलदेगविनाश ।। २५५ ।। पपीडिते ससभिपेकधिष्ण्य भवेन्नृपाणां तनु देशपीडा । घोरापि पीडा प्रशमं प्रयाति स्नानैर्य तस्तानि ततोभिधास्ये ॥२५ प्रहण निम मनु के जन्म नक्षत्र पर हो उस मनुष्य के शरीर को पीडा, कर्म नक्षत्र पर हो तो कर्म में हानी, समुदाय नक्षत्र पर हो तो कु- टम्बियों को पीड़ा, विनाश नक्षत्र पर हो तो मित्रों का नाश और मानस नक्षत्र पर हो तो मन में विकल्पना होवे । और रानाओं के जाति के नक्षत्र पर हो तो गोत्र वालों को पीडा, देश के नक्षत्र पर हो तो देश का नाश और राज्याभिप के नक्षत्र पर हो तो राजा के शरीर को तथा देश को महान् पीड़ा होवे । परन्तु इन नक्षत्रों की शान्ति कर देने से इन सम्पूर्ण अशुभ फलों का नाश हो जाता है। जन्म नक्षत्र फल- यस्यपड्जन्मनक्षत्रे गृह्यते शशि भास्करौ ! तस्य पुंसः मजायन्ते दुःखशोकाप मृत्यवः ।। २५७ ॥ प्रहण निम के जन्म नक्षत्र पर हो उमको दुःख, शोक, नया अप मृत्यु का भय होवे । जन्म तारी तथा जन्म लग्न फल- यस्मिनराशौ विलग्ने वा ग्रहणं चन्द्र सूर्पयोः । तज्जातानां भवेत्तीडा नराः शान्ति विवर्जिताः ॥ २६८।। प्रहण जन्मराशि पर वा जन्म लग्र की राशि पर हो तो उम मनुष्य को रिमी प्रकार की पीडा हो। परन्तु उम की शान्ति कर देने में फिर पीटा नहीं होरे ।
३५ जन्मादि द्वादश राशि फल- घातहानिमश्रियं जतनभाध्वस्ति च चिन्तामात् सौख्यंदारवियोजनं प्रकुरुते व्यापि च मानक्षयम् । सिद्धि लाभपपायमर्कशशिनोः पण्पासमध्ये ग्रहो राशिनां समुदीरतेन विधिना ज्ञेयं हि सम्यक्फलम् ॥२५९॥ ग्रहण जन्म राशि पर हो नो पात, दूसरी पर हो तो हानी, तीसरी पर हो तो धन प्राप्ति, चौथी पर हो तो विश्वंम, पांचवी पर हो तो चिन्ता, छठि पर हो तो सौख्य, ,सातवीं पर हो तो स्त्री का वियोग, आठवी पर हो नो रोग, नववा पर हो तो मान का क्षय, दशवी पर हो तो सिद्धि, ग्यारवीं पर हो तो लाभ और वारहवीं पर हो तो हानी ये फल ६ महिनों में होवे। अनिष्ट ग्रहण शान्ति प्रकरण । साधारण शान्ति-- सिद्धार्थकुट रजनीद्वयलोध्रमुस्ता लाजानकैः सफलिनीमुरामांसि युक्ताः । नानं हितं ग्रहणदोष विनाशनाय सर्वे ग्रहा रवि मुस्खा शुभदा भवन्ति ॥ २६० ॥ अनिष्ट ग्रहण की शान्ति के लिये सरसों, कूट, हलदी, अरु हलदी, लोद, लाजा, मफली, और मुरामांसी-इन ओषधियों को जल में डालकर उस जल से स्नान करने मे ग्रहण के अनिष्ट कारक अशुभ फल का नाश हो कर सूर्यादि सम्पूर्ण ग्रह शुभ फल दायक हो जाते है । शान्ति की वि. शेष विधि ग्रहण पुण्य फल दर्पण नामक भाग में लिवेग । है , ग्रहण श्रवण फल- शृण्वन्तिये पटगवं ग्रहणं रवीन्दो- भेदैरनेकवियुलै रुपपत्रमत्र । ते प्राप्नुवन्तिहरमस्तक सापूत गगावगाहन फलं विपुलं च लक्ष्मी ॥ २६१ ॥ पश्चाङ्ग में लिखे हुवे ग्रहण सम्बन्धी नाना प्रकार के भेदों सहित लों का विधान शृवश करने से गङ्गा में स्नान करने के समान फल प्राप्त ना है और ग्रहण के निमित्त मे नगन् में होने वाली सुवृष्टि, अनावृष्टि, 'भिस, दुर्मिक्ष, तथा हरएक वस्तु की तेनी मन्दी आदि फेरफार को प हले से जानकर व्यापार द्वारा बहुत से धन की प्राप्ति भी सकती है। इति श्री मारवाड देशस्थ जोधपुर राज्यान्तर गत पाली नगर नि शी पुष्करणा ज्ञातीय व्यासपदवी समलङ्कत श्रीमन्महीधर तनय नाना- स्त्र विचारणे मना भन हृदय, ज्योतिर्विद वरिष्ठ 'प्राचीन ज्योनिः शास्त्र मी', 'दैवज्ञ भूपग', 'ज्योतिप रत्न', आदि पण्डिन मीठालाल व्यास स- हीत "वृहदर्य मानण्ड " नाम्नो महलो ग्रन्थादुघृत 'ग्रहण निबन्ध' मक चतुर्थ अंकस्य ग्रहण फल दर्पण 'नामक (१) माग आर्य भाषा टीका हिन सम्पूर्णम् ।। 20qW ॥ इति ॥
हमारे महा की पुस्तकें । वृष्टि प्रध( भारत का वायु शास्त्र)। प्राचीन वृष्टि विद्या का भण्डार और सुभिक्ष दुर्भिक्ष को पहिले से जान लेने का सहज उपाय । प्रथम बार की छपी सब पुस्तकें बिक गई । अब दुसरी चार पहिलेसेभी विशेष उपयोगी उपदेशों सहित छापी है। मूल्य वही रु. १३) वी पी. से १३) संक्रान्ति प्रकाश। इस में सूर्य की १२ संक्रान्तियों का फलादेश बहुत विस्तार मे लिखा है जिससे जगन्का शुभाशुभ फल तथा धान्य घृत गुड़ वस्त्र धातु आदि हरएक वस्तु की तेजी मंदी ज्ञात हो जाती । ऐसी उपयोगी पुस्तक हरएक ज्योतिषी तथा व्यापारी को पास रखनी चाहिये । भाषा टीका सहित मूल्य रु. १) पोटेज धी. पी.माफ। प- सिद्धान्त सार (पद्यपञ्चाशिका) जन्म पत्रिका का फल देखने में परम उपयोगी होने हिली पार की छपी सघ यिक गई । तय दूसरी पार अयिक उपयोगी धनाफर छापी गई थी पर इस फी भी अब थोड़ी पुस्तकें रह गई है मुल्य -) पोटेज प. पी. पी. से।)
उपश्रुति (सोई के शकुन)।
इस में पुरुष, स्त्री, बालक आदि के शब्द के शकुन पर से
सुभिक्ष दुर्मिक्ष तथा हरएक वस्तु की तेजी मन्दी एव लीलाम
के आंक फरक आदि का ज्ञान होने की विधि भाषा टीका सहित
है मुत्य =) पोटेज ) बी पी. मे ।)
भवानी वाक्य (१०० वर्ष की मैकी)।
इसमें प्रत्येक वर्ष में होनेवाली दृष्टि अनावृष्टि, सुभिक्ष दुर्भिक्ष
आदि तथा धान्य, घृत तेल गुड, परियाना, कपास, रई, मृत,
कपडा आदि की तेजी मन्दी लिग्वि है मूल्य ) पोटेज माफ ।
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पं० मीठालाल च्याम
"यावर-राजपूनाना।
BHAVAN'S LIBRARY
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