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Sabhashyatatwarthadhigamsutram

Madumaswati · 2009/10

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ॐ
रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला.
श्रीमत-उमास्वातिविरचितं
सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् ।
हिंदीभाषानुवादसहितम्.
सम्बन्धकारिकाः
सम्यग्दर्शनशुद्ध यो ज्ञानं विरतिमेव चामोति ।
दुःखनिमित्तमपीदं तेन मुलब्धं भवति जन्म ॥१॥
जन्मनि कर्मक्लेशैरनुवद्धेऽस्मिंस्तथा प्रयतितव्यम् ।
कर्मक्लेशाभावो यथा भवत्येप परमार्थः॥२॥
परमार्थाला वा दोपेप्वारम्भकखभावेषु ।
कुशलानुवन्धमेव स्यादनवयं यथा कर्म ।। ३ ।।
कर्माहितमिह चामुत्र चाधमतमो नरः समारभते ।
इह फलमेव बधमो विमध्यमस्तूभयफलार्थम् ॥ ४ ॥
परलोकहितायैव प्रवर्तते मध्यमः क्रियासु सदा ।
मोक्षायैव तु घटते विशिष्टमतिरुत्तमः पुरुपः॥५॥
यस्तु कृतार्थोऽप्युत्तममवाप्य धर्म परेभ्य उपदिशति ।
नित्यं स उत्तमेभ्योऽप्युत्तम इति पूज्यतम एव ॥६॥
तस्मादर्हति पूजामहनेवोत्तमोत्तमो लोके ।
देवर्पिनरेन्द्रेभ्यः पूज्येभ्योऽप्यन्यसत्त्वानाम् ॥ ७ ॥
अभ्यर्चनादर्हतां मनामसादस्ततः समाधिश्च ।
तस्मादपि निःश्रेयसमतो हि तत्पूजनं न्याय्यम् ॥ ८ ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् तीर्थप्रवर्तनफलं यत्मोक्तं कर्म तीर्थकरनाम | तस्योदयात्कृतार्थोऽप्यहस्तीर्थ प्रवर्तयति ॥९॥ तत्स्वाभाव्यादेव प्रकाशयति भास्करो यथा लोकम् । तीर्थप्रवर्तनाय प्रवर्तते तीर्थकर एवम् ॥ १० ॥ यः शुभकर्मासेवनभावितभावो भवेप्वनेकेषु । जज्ञे ज्ञातेक्ष्वाकुपु सिद्धार्थनरेन्द्रकुलदीपः॥११॥ ज्ञानैः पूर्वाधिगतैरप्रतिपतितैर्मतिश्रुतावधिभिः । त्रिभिरपि शुद्धैर्युक्तः शैत्यद्युतिकान्तिभिरिवेन्दुः ॥ १२ ॥ शुभसारसत्त्वसंहननवीर्यमाहात्म्यरूपगुणयुक्तः। जगति महावीर इति त्रिदशैर्गुणतः कृताभिख्यः ॥१३॥ खयमेव बुद्धतत्वः सत्त्वहिताभ्युद्यताचलितसत्वः । अभिनन्दितशुभसत्वः सेन्द्रैलॊकान्तिकैर्देवैः ॥ १४ ॥ जन्मजरामरणात जगदशरणमभिसमीक्ष्य निःसारम् । स्फीतमपहाय राज्यं शमाय धीमान्मवत्राज ॥१५॥ प्रतिपद्याशुभशमनं निःश्रेयससाधकं श्रमणलिङ्गम् । कृतसामायिककर्मा व्रतानि विधिवत्समारोप्य ॥ १६ ॥ सम्यक्वज्ञानचारित्रसंवरतपःसमाधिवलयुक्तः। मोहादीनि निहत्याशुभानि चत्वारि कर्माणि ॥ १७॥ केवलमधिगम्य विभुः स्वयमेव ज्ञानदर्शनमनन्तम् । लोकहिताय कृतार्थोऽपि देशयामास तीर्थमिदम् ॥ १८ ॥ द्विविधमनेकद्वादशविधं महाविषयममितगमयुक्तम् । संसारार्णवपारगमनाय दुःखक्षयायालम् ॥१९॥ ग्रन्थार्थवचनपटुभिः प्रयत्नवद्भिरपि वादिभिनिपुणैः । अनभिभवनीयमन्यैर्भास्कर इव सर्वतेजोभिः ॥२०॥ कृत्वा त्रिकरणशुद्धं तस्मै परमर्पये नमस्कारस् । पूज्यतमाय भगवते वीराय विलीनमोहाय ॥ २१ ॥ तत्वार्थाधिगमाख्यं वह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् । वक्ष्यामि शिष्यहितमिममहद्वचनैकदेशस्य ॥ २२ ॥ महतोऽतिमहाविषयस्य दुर्गमग्रन्थभाष्यपारस्य । का शक्तः प्रत्यासं जिनवचनमहोदधेः कर्तुम् ॥ २३ ॥ :

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्। शिरसा गिरि विभित्सेदुच्चिक्षिप्सेच्च स क्षितिं दोभ्याम् । प्रतितीपेच समुद्रं मित्सेच्च पुनः कुशाग्रेण ॥ २४ ॥ व्योम्नीन्दु चिक्रमिपेन्मेरुगिरि पाणिना चिकम्पयिपेत् । गत्यानिलं जिगीपेच्चरमसमुद्र पिपासेच्च ।। २५ ॥ खद्योतकप्रभाभिः सोऽभिंधुभूपेच भास्कर मोहात् । योऽतिमहाग्रन्थार्थ जिनवचनं संजिघृक्षेत ॥ २६ ॥ एकमपि तु जिनवचनाद्यस्मानिर्वाहक पदं भवति । श्रूयन्ते चानन्ताः सामायिकमात्रपदसिद्धाः ।। २७ ।। तस्मात्तत्प्रामाण्यात् समासतो व्यासतश्च जिनवचनम् । श्रेय इति निर्विचारं ग्राह्य धार्य च वाच्यं च ॥ २८ ॥ न भवति धर्मः श्रोतुः सर्वस्यकान्ततो हितश्रवणात् । ब्रुवतोऽनुग्रहबुद्ध्या वक्तुस्त्वेकान्ततो भवति ॥ २९ ॥ श्रममविचिन्त्यात्मगतं तस्माच्छ्रेयः सदोपदेष्टव्यम् । आत्मानं च परं च हि हितोपदेष्टानुगृह्णाति ॥३०॥ नते च मोक्षमार्गाद्धितोपदेशोऽस्ति जगति कृत्स्नेऽस्मिन् । तस्मात्परमिममेवेति मोक्षमार्ग प्रवक्ष्यामि ॥ ३१ ॥ ॥ इति सम्वन्धकारिकाः समाप्ताः ॥ मनुष्य सम्यग्दर्शनसे शुद्ध ज्ञान तथा (उसकेद्वारा इस संसारसे) विरतिको प्राप्त करता है, (संसारमें ) अनेक दुःखोंका कारण होनेपरभी यह जन्म, उस मनुष्यको उत्तम लाभदायक है. ॥१॥ अनेक प्रकारके कर्मोंसे उत्पन्न हुवे क्लेशोंसे निरन्तर संबद्ध इस जन्ममें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि, जिस्से कर्मजनित क्लेशरहित मोक्षरूप परमार्थ सिद्ध हो. ॥२॥ यदि मोक्षरूप परमार्थका लाभ न हो, तथा जन्मके आरम्भकारी कपायरूप दोषोंकी अस्तितामें, ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि, जिस्से कुशल अर्थात् शुभप्रयोजनसहित, और निन्दारहित हो कर्म हो. ॥ ३ ॥ अत्यन्त अधम मनुष्य, इस लोक तथा परलोकमें दुःखदायक कर्मोंका ही आरंभ करता है, अधम मनुष्य, इस लोकमें केवल फलदायक कर्मोका आरम्भ करता है, और विमध्यम श्रेणीका मनुष्य, उभय लोकमें फलदायक कर्मोको करता है; और मध्यमजन परलोकमें हितकारी क्रिया- ओंमें सदा प्रवृत्त रहता है. परन्तु विशिष्टवुद्धि उत्तम मनुष्य तो केवल मोक्षकेही लिये निरन्तर प्रयत्न करता है. ॥ ४५ ॥ और जो मनुष्य, उत्तम धर्मको प्राप्त करके स्वयं कृतार्थ हो गया है, और अन्य मनुष्योंको धर्मका उपदेश देता है, वह निरंतर उत्तम जनोंसे भी अति उत्तम तथा सवका पूजनीय है ।। ६ ॥ इस हेतुसे उत्तमोत्तम जो अर्हन् GC रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भगवान् हैं वेही लोकमें अन्य प्राणियोंके पूज्यदेवर्षिनरेन्द्रोसेभी पूजाके योग्य हैं. ॥ ७ ॥ अहंन् भगवान्की पूजासे मनकी प्रसन्नता प्राप्त होती है, और मनके प्रसाद अर्थात् प्रसन्नतासे समाधि प्राप्त होती है, तथा समाधिरूप योगसे निःश्रयस मोक्ष प्राप्त होता है; इस कारणसे अर्हन् भगवान्की पूजाही इस लोकमें उत्तम वस्तु है. (क्योंकि उसीके द्वारा मोक्षपदकाभी लाभ होता है) ॥ ८॥ तीर्थप्रवर्तनरूप (संसारसे उद्धार करनेवाले) फलदायक जो तीर्थकरनाम कर्म शास्त्रमें कहा गया है उसीके उदयसे यद्यपि तीर्थकर अर्हन् भगवान् कृतार्थ हैं, तथापि तीर्थकी प्रवृत्ति अर्थात् संसारसागरसे पार उतारनेवाले. धर्मका उपदेश करतेही हैं. ॥ ९ ॥ उसी तीर्थकरनामकर्मसे, जिस रीतिसे सूर्य लोकमें प्रकाश करता है उसी रीतिसे तीर्थके प्रवर्तनके अर्थ तीर्थकर लोकमें प्रवृत्त होते हैं. ॥ १० ॥ जो कि अनेक जन्मोंमें शुभ कर्मोंके निरन्तर सेवनसे भावित अर्थात् पूजित भाव, सिद्धार्थ नरेन्द्रोंके कुलमें प्रदीपके समान समुज्वल ज्ञातसंज्ञक इक्ष्वाकुवंशके क्षत्रियोंमें, जन्म लिया. ॥ ११ ॥ तथा अति शुद्ध, और अप्रतिपाती पूर्व जन्मोंमें प्राप्त, मति, श्रुत, तथा अवधि, इन तीन ज्ञानोंसे युक्त होकर ऐसे शोभित हुये जैसे शैत्ययुति (उप्णतारहित प्रकाश) तथा कान्तिगुणोंसे युक्त होनेसें चन्द्रमा ।। १२ ।। तथा शुभ, सार, सत्व, संहनन (शरीर- रचनाविशेष) वीर्य्य, और माहात्म्यरूप गुणोंसे युक्त, तथा त्रिदश (अर्थात् शास्त्रोक्त तीस) गुणोंसहित जगत्में महावीरस्वामी इस नामसे प्रसिद्ध (इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न हुये.) ॥ १३ ॥ खयमेव सप्त तत्वोंके ज्ञाता, निराकुलताके कारणोंसे जिनका अचल सत्व अभ्युदयको प्राप्त था, और इन्द्रसहित लोकान्तिक देव जिनके शुभ सत्वकी प्रशंसा किया करते थे, ऐसे वे महावीरस्वामी थे. ॥ १४ ॥ तथा जन्म, वृद्धावस्था और मरणसे पीड़ित इस असार संसारको अशरण देखके अपने उत्तम विशाल राज्यको त्यागकर बुद्धिमान् महावीरस्वामी शान्तिके लिये वनमें चले गये. ॥१५॥ और अशुभ कर्मोको दमन करनेवाला तथा मोक्षका साधक श्रमणों (जैनमतके मुनियों) के लिङ्ग (चिन्ह) धारण करके, सामायिक कर्मोको करतेहुये विधिपूर्वक सब व्रतोंको करके, ॥ १६ ॥ सम्यग्ज्ञान, चारित्र, संवर, तप, समाधि, और बल इनसे तो युक्त और मान, मोह, लोभ तथा माया इन चार अशुभ कर्मोंका सर्वथा घात करके, ॥ १७ ॥ पश्चात् स्वयमेव वे प्रभु अनन्त, ज्ञान और दर्शन आदिकी प्राप्तिसे कृतार्थ होनेपरभी इस तीर्थ (जैनधर्म) का उपदेश किया. ॥ १८ ॥ प्रथम प्रमाणनयके अनुसार दो प्रकार, पुनः अनेक प्रकार, वा द्वादशभेदसहित तप आदि धर्म, जो कि sto , १ यह अर्थ "सत्वहिताऽभ्युद्यताचलितसवः" इस पदका कियागया है परन्तु हमारी समझमें इस पदका "जीवोंके हितकेवास्ते अभ्युद्यत और अविचलित सत्वको धारण करनेवाले" ऐसा अर्थ 'प्रतीत होता है. संशोधक.

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । महान् विपयोंसे युक्त, और अमित आगमोंके प्रमाणोंसे युक्त, तथा संसारसमुद्रसे पार उतारने और संपूर्ण दुःखोंके नाशके लिये समर्थ धर्म है उसका उपदेश दिया. ॥ १९ ॥ तथा यह धर्म अनेक ग्रंथोंके अर्थनिरूपणमें प्रवीण, और अति प्रयत्न- शाली निपुण वादियोंसेभी वैसे अखण्डनीय है जैसे अन्य सव तेजोंसे सूर्य ॥ २० ॥ ऐसे पूर्वोक्त धर्मके प्रवर्तक परमऋपिखरूप मोहादिरहित, तथा सर्वपूज्य वीरभंगवान् महावीरखामीको मैं ग्रंथकर्ता त्रिकरण (मन वचन तथा काया) की शुद्धिपूर्वक नमस्कार करके, ॥ २१ ।। अधिक अर्थसे पूर्ण, और अल्पशब्दयुक्त इस तत्त्वार्थाधिगम नामक लघु ग्रंथको जो कि अर्हत् भगवान्के वचनोंकाही एक देश है, शिष्यजनोंके हितार्थ वर्णन करूंगा. ॥ २२ ।। और महान् तथा महाविषयोंसे पूर्ण, और अपार, जिन भगवान्के वचनरूपी महासमुद्रका प्रत्यास (संग्रह) करनेको दुर्गमग्रंथभाषीभी कौन समर्थ होसक्ता है? ।। २३ ।। जो मनुप्य अति विशाल गम्भीरार्थोंसे पूर्ण जिनवचनरूपी महासमुद्रका संपूर्णरूपसे संग्रह करनेकी इच्छा करता है वह मानो शिरसे पर्वतको तोडना चाहता है, पृथिवीको दोनों भुजाओंसे फेकना चाहता है, भुजाओंसे समुद्रको पार करना चाहता है, और उसी समुद्रका कुशाके अग्रभागसे थाह (पत्ता) लेना चाहता है, आकाशमें उछलके चन्द्रमाको लंघन करना चाहता है, मेरुपर्वतको हाथसे कंपाना चाहता है, गतिमें वायुसेभी आगे जाना चाहता है, अन्तिम महासागरको पान करना चाहता है, और निजमूर्खताके कारण वह खद्योत (जुगन् वा आगियाकीडा) की दीप्तिसे सूर्यके तेजकोभी अभिभूत (पराजित) करना चाहता है. ॥ २४।२५।२६ ॥ जिनभगवानके उपदेशवचनका एकभी पद अभ्यास करनेसे उत्तरोत्तर ज्ञानप्राप्ति- द्वारा संसारसागरसे पार उतार देता है, क्योंकि केवल सामायिक मात्र पसे अनंत सिद्ध होगये, ऐसा श्रवण करनेमें आता है. ॥ २७ ॥ इस हेतु, शास्त्रप्रमाणसे जिन भगवान्का वचन संक्षेपसे तथा विस्तारसे अभ्यस्त होनेसे कल्याण (मोक्ष) दायक है। इस कारण सन्देहरहित होकर जिनवाणीको ग्रहण करना चाहिये, उसके अनुसार धारण करना चाहिये, और दूसरोंको सुनानाभी चाहिये ॥ २८ ॥ हितवाक्यके श्रवणसे संपूर्ण श्रोताओंको सर्वथा धर्मसिद्धि नहीं होती, परन्तु अनुग्रहबुद्धिसे वक्ताको धर्मसिद्धि अवश्य होती है ॥ २९ ॥ इसकारण अपने श्रमका विचार न करके सदा मोक्षमार्गका उपदेश करना चाहिये, क्योंकि हितपदार्थोंका उपदेशदाता अपने तथा जिसको उपदेश देता है, दोनोंके ऊपर मानो अनुग्रह करता है ॥ ३० ॥ इस संपूर्ण संसारमें मोक्षमार्गके सिवाय अन्य कोई हितोपदेश नहीं है, इस हेतुसे सर्व श्रेष्ठ इसी मोक्षमार्गकाही कथन मैं करूंगा ॥ ३१ ॥ इति मोक्षमार्गप्रतिपादक तत्वार्थाधि- गमसूत्रसम्बन्धप्रकाशकैकत्रिंशत्कारिकाः समाप्ताः ॥

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्रथम अध्यायः॥ मूलसूत्रम्-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥१॥ सूत्रार्थः-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्षमार्ग है।।१॥ भाग्यम्-सम्यग्दर्शनं सम्यग्ज्ञानं सम्यक्चारित्रमित्येप त्रिविधो मोक्षमार्गः। तं पुरस्ताहक्ष- णतो विधानतश्च विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । शास्त्रानुपूर्वीविन्यासाथै तद्देशमात्रमिदमुच्यते । एतानि च समस्तानि मोक्षसाधनानि । एकतराभावेऽप्यसाधनानीत्यतस्त्रयाणां ग्रहणम् । एपां च पूर्वलाभे भजनीयमुत्तरं । उत्तरलाभे तु नियतः पूर्वलाभः । तत्र सम्यगिति प्रशंसाओं निपातः समञ्चतेर्वा । भावः । दर्शनमिति । हशेरव्यभिचारिणी सर्वेन्द्रियानिन्द्रियार्थप्राप्तिरेतत्सम्य- ग्दर्शनं । प्रशस्तं दर्शनं सम्यग्दर्शनं । संगतं वा दर्शनं सम्यग्दर्शनम् । एवं ज्ञानचा- रित्रयोरपि ॥ विशेष व्याख्या:-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र (आचरण) यह तीन प्रकारका मोक्षमार्ग है । उस त्रिविध मोक्षमार्गको हम लक्षण तथा परीक्षा भेदनिरूपणपूर्वक आगे विस्तारसे कहेंगे; और यहांपर केवल शास्त्रानुपूर्वी (क्रम) की रचनाके प्रदर्शनार्थ केवल उद्देश मात्र कहते हैं । ये तीनों मिलेहुये, अर्थात् सम्य- ग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक्चारित्र तीनों मिलकर ही मोक्षमार्गके साधक हैं, क्योंकि तीनोंमेंसे एकके भी न होनेपर एक वा दो मोक्षके साधन नहीं हो सकते, इसलिये भगवान् सूत्रकारने तीनोंका ग्रहण किया है । इनमेंसे पूर्वका लाभ होनेसे उत्तरको प्राप्त करना चाहिये; (अर्थात् सम्यग्दर्शनका लाम होनेसे उत्तर सम्यग्ज्ञान, तथा सम्यक् चारित्रको निजप्रयत्नसे प्राप्त करना चाहिये,) और उत्तरके लाममें तो पूर्वका लाभ अवश्यही नियत है, (तात्पर्य यह कि सम्यग्ज्ञानका लाभ होनेसे सम्यद्ग- र्शनका लाभ अवश्य नियत है, तथा सम्यक्चारित्रके लाभसे दर्शन, ज्ञान दोनोंका लाभ नियत है)। सूत्रमें दर्शन आदिका विशेषण जो सम्यक् पद दिया है वह प्रशंसा अर्थका द्योतक वा वाचक निपात है, (अर्थात् प्रशंसित उत्तम दर्शन आदि मोक्ष मार्गके साधन हैं) । अथवा सम् उपसर्गपूर्वक अच्च धातुसे विष्प्रत्यय करनेसे सम्यक् बनता है. (व्यभिचारशून्य) अर्थात् अवश्य संपूर्ण इन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय के द्वारा जो पदार्थोंकी प्राप्ति है उसको सम्यग्दर्शन कहते हैं; यह दर्शन पद दृश धातुसे ल्युट् (अन) प्रत्यय करनेसे सिद्ध होता है. । प्रशस्त अर्थात् उत्तम (निन्दाव्यभिचार आदिसे शून्य) पदार्थोके केवल नाम मात्रके निरूपणको उद्देश कहते हैं-अनुवादकारः. २. व्युत्पत्तिपक्षमभी सम्यक्पद प्रशंसारूप अर्थका प्रतिपादक होकर दर्शनआदि पदोंका विशेषण होता इसके लिये प्रकारान्तर कहते हैं । अर्थात् जो पूर्णरूपसे द्रव्यभावोंका प्राप्त हो वह सम्यग्दर्शन आदि । अनु० मभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । जो दर्शन है उसको सम्यग्दर्शन कहते हैं. । अथवा संगतं (निरन्तर व्यवधानशून्य) जो दर्शन है उसको सम्यग्दर्शन कहते हैं. 1 इसी प्रकार ज्ञान तथा चारित्रमंमी सम्यक् पढ़की योजना करनी चाहिये. ॥ तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥ सूत्रार्थ:-तत्वार्थको जो श्रद्धान है वह सम्यग्दर्शन हैं । भाग्यम्-तत्त्वानामर्थानां श्रद्धानं तत्त्वेन वार्थानां श्रद्धानं वत्त्वार्थश्रद्धानम् तत् सम्यग्दर्श- नम् । तत्त्वेन भावतो निश्चितमित्यर्थः । तत्त्वानि जीवादीनि वक्ष्यन्ते । त एव चास्तिपां श्रद्धानं तेषु प्रत्ययावधारणम् । तदेवं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्तिलक्षणं तत्त्वार्थ- श्रद्धानं सम्यग्दर्शनमिति ।। विशेष व्याख्या:-(जिनशास्त्रोंसे प्रतिपाद्य ) तत्त्वभूत पदार्थोंका श्रद्धान, अथवा तत्त्वसे जो अर्थोका श्रद्धान है उसको तत्त्वार्थश्रद्धान कहते हैं, और उसी तस्त्रार्थश्रद्धानको सम्यग्दर्शन कहते हैं, तत्त्वसे अर्थात् भाव (यथार्थरूप) से निश्चियको सम्यग्दर्शन कहते हैं। (तात्पर्य यह है कि, जो पदार्थ जैसा है उसीरूपसे उसका जो निश्चय है उसको सम्यग्दर्शन कहते हैं) जीव आदि पदार्थ तत्त्व कहेजाते हैं जिनको हम आगे निरूपण करेंगे। वेही तत्त्वभूत जीवादि जो पदार्थ हैं, उनका श्रद्धान अर्थात् उनके यथार्थ स्वरूपमें विश्वास करनाही सम्यग्दर्शन है । इस प्रकार प्रशम, अर्थात् रागादिकोंकी उत्कटताका अभाव, संवेग, अर्थात् संसार देह भोग इनका भय, निर्वेद, अर्थात् संसारके पदार्थोंमें घृणापूर्वक वैराग्य, अनुकम्पा (सर्वभूतदया) और शास्त्रबोधित पदार्थादिमें अस्तित्वकी अभिव्यक्ति (आविर्भाव) रूप जो तत्त्वार्थश्रद्धान है वही सम्यग्दर्शन है. ॥ २ ॥ तन्निसर्गादधिगमादा ॥३॥ सूत्रार्थ-वह सम्यग्दर्शन निसर्ग तथा अधिगमसे होता है । भाष्यम्-तदेतत्सम्यग्दर्शनं द्विविधं भवति । निसर्गसम्यग्दर्शनमधिगमसम्यग्दर्शनं च । निसर्गादधिगमाद्वोत्पद्यत इति द्विहेतुकं द्विविधम् ।। निसर्गः परिणामः स्वभावः अपरोपदेश इत्यनन्तरम् । ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणो जीव इति वक्ष्यते । तस्यानादौ संसारे परिभ्रमतः कर्मत एव कर्मणः स्वकृतस्य बन्धनिकाचनोदयनिर्जरापेक्षं नारकतिर्यग्योनिमनुप्यामरभव- ग्रहणेपु विविध पुण्यपापफलमनुभवतो ज्ञानदर्शनोपयोगखाभाव्यात् तानि तानि परिणामा- ध्यवसायस्थानान्तराणि गच्छतोऽनादिमिथ्यादृष्टेरपि सतः परिणामविशेपादपूर्वकरणं ताह- ग्भवति येनास्यानुपदेशात्सम्यग्दर्शनमुत्पद्यत इत्येतन्निसर्गसम्यग्दर्शनम् ।। अधिगमः अभि- १. जो पदार्थ जैसे अवस्थित है तसा तिसका होना सो 'तत्व' है, और जो निधय किया जावे वह अर्थ है; तत्त्वरूप जो निश्चय सो 'तत्वार्थ' है; तात्पर्य कि, जो पदार्थ जिसप्रकार अवस्थित है उसका उसी प्रकारसे प्रहण-निश्चय-होना सो "तत्वार्थ है--संशोधकः ८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् गम आगमो निमित्त श्रवणं शिक्षा उपदेश इत्यनर्थान्तरम् । तदेवं परोपदेशाद्यत्तत्त्वार्थश्रद्धान भवति तदधिगमसम्यग्दर्शनमिति ।। विशेष व्याख्याः यह सम्यग्दर्शन दो प्रकारका होता है, एक तो निसर्गजसम्यग्दर्शन, और दुसरा अधिगमजसम्यग्दर्शन, निसर्ग तथा अधिगम दो हेतुओंसे उत्पन्न होनेसे दो प्रकारका है। निसर्ग, परिणाम, स्वभाव, और दुसरेके उपदेशादिका अभाव, ये सब एकार्थवाचक, अर्थात् पर्यायशब्द हैं. ज्ञान तथा दर्शनरूप जो उपयोग है उस उपयोगसे युक्त होना यह जीवका लक्षण है वह आगे कहेंगे. उस जीवके अनादिकाल सिद्ध इस संसारमें कर्मसेही भ्रमण करते हुये निजकृतकर्महीका; नारक तिर्यग् मनुष्य तथा देव जन्म ग्रहणों में बन्ध निकाचन उदय तथा निर्जराकी अपेक्षा रखनेवाले अनेक प्रकारके पुण्य तथा. पाप फलोंको अनुभव करते हुवे, उस जीवके ज्ञान तथा दर्शनरूप . उपयोग खभावसे उन २ परिणाम अध्यवसाय तथा अन्य २ स्थानादिको प्राप्त होते हुवे अनादि कालसे मिथ्यादृष्टि होनेपरभी परिणामविशेष (कर्मोंका परिपाकतासे भावविशेष) से अपूर्व करण ऐसा होता है कि जिसके द्वारा विना किसीके उपदेश आदिके स्वयं किसी समयमें जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है वही निसर्गजसम्यग्दर्शन है। और अधिगम, अभिगम, आगम, निमित्त, श्रवण, शिक्षा, तथा उपदेश, ये सब समानार्थ कही हैं, इन अधिगम परोपदेशादिकेद्वारा जो तत्वार्थश्रद्धान उत्पन्न होता है वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है ॥३॥ अत्राह । तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । तत्र किं तत्त्वमिति । अनोच्यते । अब यहांपर कहतेहैं कि, "तत्त्वरूप अर्थोंका जो श्रद्धान है वह सम्यग्दर्शन है" यहांपर तत्व शब्दसे किस २ का ग्रहण है! इस हेतुसे अग्रिम सूत्रका कथन है. ॥ जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥ ४ ॥ सूत्रार्थ:--जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, सम्वर, निर्जरा, तथा मोक्ष, ये सात तत्त्व हैं। भाष्यम्-जीवा अजीवा आस्रवा बन्धः संवरो निर्जरा मोक्ष इत्येष सप्तविधोऽर्थस्तत्त्वम् । एते वा सप्त पदार्थास्तत्त्वानि । ताल्लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ।। विशेष व्याख्या । जीव मनुष्यादि अजीव आकाश आदि आस्रव, बन्ध, संबर निर्जरा तथा मोक्ष इन सप्तभेदोसहित जो पदार्थ है वही तत्व है । अथवा ये जीव आदि सात पदार्थ तत्त्व हैं। उन सात प्रकारके तत्त्वरूप पदार्थोंको आगे लक्षण तथा भेद निरूपणपूर्वक विस्तारसे कहेंगे. ॥ ४ ॥ नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्यासः॥५॥ सूत्रार्थ:-नाम, स्थापना, द्रव्य, तथा भाव इन अनुयोगोंसे जीव आदि सप्त तत्त्वोंका न्यास होता है.।

समाप्यतत्त्वार्याधिगमसूत्रम् । एभिर्नामादिभिश्चतुर्मिरनुयोगद्वारस्तेषां जीवादीनां तत्त्वानां न्यासो भवति । विस्तरेण लक्षणतो विधानतश्चाधिगमार्थ न्यासो निक्षेप इत्यर्थः । तद्यथा । नामजीवः, स्थापनाजीवो, द्रव्यजीवो, भावजीव इति । नाम, संज्ञा, कर्म इत्यनन्तरम् । चेतनावतोऽचेतनस्य वा द्रव्यस्य जीव इति नाम क्रियते स नामजीवः ॥ यः काप्टपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिपु स्थाप्यते जीव इति स स्थापनाजीवो देवताप्रतिकृतिवदिन्द्रो, रुद्रः, स्कन्दो, विष्णुरिति ॥ द्रव्यजीव इति गुणपर्यायवियुक्तः प्रज्ञास्थापितोऽनादिपारिणामिकभावयुक्तो जीव उच्यते । अथवा शून्योऽयं भङ्गः । यस्य हजीवस्य सतो भन्यं जीवत्वं स्यात् स द्रव्यजीवः स्यात्। अनिष्टं चैतत् ।। भावतो जीवा औपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकोदयिकपारिणामिकभावयुक्ता उपयोगलक्षणाः संसा- रिणो मुक्ताश्च द्विविधा वक्ष्यन्ते । एवमजीवादिपु सर्वेष्वनुगन्तव्यम् ॥ -विशेष व्याख्या-नाम आदि जो चार अनुयोगद्वार हैं उनके द्वारा जीवादि तत्त्वोंका न्यास होताहै, अर्थात् विस्तारसे लक्षण तथा विधान (अर्थात् भेद संख्याआदि ) से ज्ञान होनेके लिये जो व्यवहारोपयोग है वही न्यास वा निक्षेप है । (तात्पर्य यह कि नामआदि निक्षेपोंसे न्यस्तजीवादि पदार्थोंका बोध पूर्णरूपसे होता है। जैसे नामजीव,स्थापना- जीव, द्रव्यजीव, और भावजीव । नाम, संज्ञा और कर्म ये पर्यायवाचक अर्थात् समानार्थक हैं । चेतनावान् अथवा अचेतन द्रव्यकी व्यवहारके लिये जो जीव ऐसा नाम वा संज्ञा की जाती है उसको नामजीव कहते हैं । और काष्ठ, पुस्तक, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेप (फांसा आदिके प्रक्षेपने) में जीवरूपसे स्थापना की जाती है उसको स्थापनाजीव कहते हैं । देवताओंकी प्रतिमाके सदृश यह इन्द्र हैं, यह रुद्र हैं, तथा यह विष्णु हैं, इत्यादि रूपसे जो पापाण वा धातु आदिकी मूर्तियोंमें स्थापना होती है; वही स्थापनाजीव कहा जाता है । गुणपर्यायरहित और अनादि पारिणामिक भावोंसे युक्त और प्रज्ञा (केवल बुद्धि, मात्र) से स्थापित किया जाता है वह द्रव्यजीव है । अथवा यह भङ्ग शून्य है। जैसे अजीवरूपसे विद्यमान द्रव्यका भव्यरूपसे जीवत्व हो सके वह द्रव्यजीव होगा, किन्तु यह अनिष्ट है। और मावसे औपशमिक, क्षायिक, क्षायौपशमिक, औदयिक, तथा पारिणामिक भावोंसे युक्त और उपयोग लक्षणवाले जीव, संसारी तथा मुक्त ऐसे दो प्रकारके आगे कहे जायगे. इसी रीतिसे अजीव आदि संपूर्ण पदार्थों में नामादि निक्षेप विधिका अनुसरण करना चाहिये. पर्यायान्तरेणापि नामद्रव्यं, स्थापनाद्रव्यं, द्रव्यद्रव्यं, भावतोद्रव्यमिति । यस्य जीवस्या- जीवस्य वा नाम क्रियते द्रव्यमिति तन्नामद्रव्यम् । यत्काप्टपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिपु स्थाप्यते द्रव्यमिति तत् स्थापनाद्रव्यम् । देवताप्रतिकृतिवदिन्द्रो, रुद्रः, स्कन्दो, विष्णुरिति । द्रव्यद्रव्यं नाम गुणपर्यायवियुक्तं प्रज्ञास्थापितं धर्मादीनामन्यतमत् । केचिदप्याहुर्यव्यतो द्रव्यं भवति तच्च पुदलद्रव्यमेवेति प्रत्येतव्यम् । अणवः स्कन्धाश्च सङ्घातभेदेभ्य उत्पद्यन्त इति वक्ष्यामः । भावतो-द्रव्याणि धर्मादीनि सगुणपर्यायाणि प्राप्तिलक्षणानि वक्ष्यन्ते । आगमतश्च प्रामृतज्ञो द्रव्यमिति भव्यमाह । द्रव्यं च भव्ये । भव्यमिति प्राप्यमाह । भू २ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्राप्तावात्मनेपदी । तदेवं प्राप्यन्ते प्राप्नुवन्ति वा द्रव्याणि ॥ एवं सर्वेपामनादीनामादिमतां च जीवादीनां भावानां मोक्षान्तानां तत्त्वाधिगमार्थ न्यासः कार्य इति ॥ तथा अन्य पर्यायसे योभी कह सकते हैं कि, नामद्रव्य, स्थापनाद्रव्य, द्रव्यद्रव्य, तथा भावसे द्रव्य,। जैसे जीव वा अजीवका द्रव्य ऐसा नाम किया जाता है वह नामद्रव्य है । तथा जो काष्ठ, पुस्तक, चित्रकर्म, तथा अक्षनिक्षेप आदिमें द्रव्यरूपसे स्थापना की जाती है उसको स्थापनाद्रव्य कहते हैं । जैसे देवताओंकी प्रतिमाके तुल्य यह इन्द्रद्रव्य, यह रुद्ररूप तथा यह विष्णुरूप द्रव्य है । और द्रव्यद्रव्य, द्रव्यगुण- पर्यायोंसे रहित केवल प्रज्ञामात्रसे स्थापित धर्म आदिमेंसे किसी एकको जानना चाहिये. और कोई ऐसा भी कहते हैं कि, जो द्रव्यनिक्षेपसे द्रव्य होता है वह तो पुद्गलद्रव्यही है ऐसा निश्चय करना चाहिये. अणु और स्कन्ध, संघात भेदसे उत्पन्न होते हैं ऐसा आगे चलके कहेंगे । और भावसे द्रव्य, गुण, तथा पर्यायसहित, तथा प्राप्ति आदि लक्षणसंयुक्त धर्म आदि आगे निरूपण करेंगे । और आगमसेभी "प्राभृतज्ञ (जीव वा अजीव विधीका ज्ञाता) द्रव्य ही है" यह वचन भी भव्यको कहता है, क्योंकि 'द्रव्यं च भव्ये' 'भव्य अर्थमें द्रव्य यह निपात होता है। यहांपर भव्य यह शब्द भी प्राप्य अर्थको कहता है, क्योंकि आत्मनेपदमें भूधातु प्राप्तिरूप अर्थमें है । इस प्रकार गुण- पर्याय आदिसे प्राप्त किये जाय अथवा स्वयं गुणादिको प्राप्त हों वे द्रव्य हैं। इस रीति अनादि वा आदिमान् संपूर्ण जीवआदि मोक्षान्तपदार्थोंके तत्त्वज्ञानार्थ न्यास अवश्य करना चाहिये। प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥ सूत्रार्थः-पूर्वकथित जीवादि तत्त्वोंका ज्ञान प्रमाण तथा नयोंके द्वारा होता है । भाष्यम्-एपांच जीवादीनां तत्त्वानां यथोद्दिष्टानां नामादिभियंतानां प्रमाणनयैर्वि- स्तराधिगमो भवति ।। तत्र प्रमाणं द्विविधम् परोक्षं प्रत्यक्षं च वक्ष्यते । चतुर्विधमित्येके । नयवा- दान्तरेण || नयाश्च नैगमादयो वक्ष्यन्ते ।। किं चान्यत् । विशेष व्याख्या-यथा क्रमसे संकीर्तित तथा नाम स्थापना आदि निक्षेप विधिसे उपन्यस्त जीवादि सप्त तत्त्वोंका ज्ञान प्रमाण तथा नयोंसे यथार्थ रूपसे होता है । उसमे परोक्ष तथा प्रत्यक्ष दो प्रकारका प्रमाण कहेंगे । और कोई प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, तथा उपमानरूप, नयवादसे चार प्रकारका प्रमाण कहते हैं। और नैगमसंग्रह आदि नय आगे कहेंगे ॥६॥ और प्रमाण नयसे अन्य भी जीवादिके ज्ञानका उपाय है वा नहीं । सो अन्य भी है इसलिये आगेका सूत्र कहते हैं। .

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ११ निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः॥७॥ सूत्रार्थ:-निर्देश (वस्तु नाम संकीर्तन) स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति, और विधान (भेदसंख्या) इनके द्वाराभी जीव आदि तत्त्वोंका ज्ञान होता है। भाष्यम्-एभिश्च निर्देशादिभिः पइभिरनुयोगद्वारैः सर्वेषां भावानां जीवादीनां तत्त्वानां विकल्पशो विस्तरेणाधिगमो भवति । तद्यथा । निर्देशः । को जीवः । औपशमिकादिभाव- युक्तो द्रव्यं जीवः । विशेष व्याख्या-ये निर्देश आदि षट् अर्थात् छः जो अनुयोगद्वार हैं उनसे सब भावोंका जीव आदि तत्त्वोंका विकल्प तथा विस्तारसे वोध होता है। जैसे निर्देश-जीव क्या है? उ० औपशमिक तथा क्षायिक आदि जो भाव हैं उनकरके सहित यह द्रव्यही जीव है ।। सम्यग्दर्शनपरीक्षायाम् । किं सम्यग्दर्शनम् । द्रव्यम् । सम्यग्दृष्टिजीवोऽरूपी नो स्कन्धो नो प्रामः ।। स्वामित्वम् । कस्य सम्यग्दर्शनमित्येतदात्मसंयोगेन परसंयोगेनोमयसंयोगेन चेति वा- च्यम् । आत्मसंयोगेन जीवस्य सम्यग्दर्शनम् । परसंयोगेनजीवस्याजीवस्यजीवयोरजीवयोर्जीवा- नामजीवानामिति विकल्पाः। उभयसंयोगेन जीवस्य नोनीवस्य जीवयोरजीक्योर्जीवानामजी- वानामिति विकल्पा न सन्ति। शेपाः सन्ति ।। साधनं । सम्यग्दर्शनं केन भवति । निसर्गादधिग- माद्वा भवतीत्युक्तम् । तत्र निसर्गः पूर्वोक्तः । अधिगमस्तु सम्यग्व्यायामः । उभयमपि तदा- वरणीयस्य कर्मणः क्षयेणोपशमेन क्षयोपशमाभ्यामिति ॥ अधिकरणं त्रिविधमात्मसन्निधा- नेन परसन्निधानेनोभयसन्निधानेनेति वाच्यम् । आत्मसनिधानमभ्यन्तरसन्निधानमित्यर्थः । परसन्निधानं बाह्यसन्निधानमित्यर्थः । उभयसन्निधानं वाह्याभ्यन्तरसन्निधानमित्यर्थः । कस्मि- न्सम्यग्दर्शनम् । आत्मसन्निधाने तावत् जीवे सम्यग्दर्शनं, जीवे ज्ञान, जीवे चारित्रमित्ये- तदादि । बाह्यसन्निधाने जीवे सम्यग्दर्शनं नोजीवे सम्यग्दर्शनमिति यथोक्ता विकल्पाः । उभयसन्निधाने चाप्यभूताः सद्भूताश्च यथोक्ता भङ्गविकल्पा इति ॥ स्थितिः । सम्यग्दर्शनं कियन्तं कालम् । सम्यग्दृष्टिर्द्विविधा । सादिः सपर्यवसाना सादिरपर्यवसाना च । सादि सपर्यवसानमेव च सम्यग्दर्शनम् । तज्जघन्येनान्तर्मुहूर्त उत्कृप्टेन पट्षष्टिः सागरोपमानि साधिकानि । सम्यग्दृष्टिः सादिरपर्यवसाना । सयोगः शैलेशीप्राप्तश्च केवली सिद्धश्चेति ।। विधानं । हेतुत्रैविध्यात् क्षयादित्रिविधं सम्यग्दर्शनम् । तदावरणीयस्य कर्मणो दर्शनमोहस्य च क्षयादिभ्यः । तद्यथा । क्षयसम्यग्दर्शनं, उपशमसम्यग्दर्शनं, क्षयोपशमसम्यग्दर्शनमिति । अत्र चौपशमिकक्षायौपशमिकक्षायिकाणां परतः परतो विशुद्धिप्रकर्पः ।। किं चान्यत् । तथा सम्यग्दर्शनकी परीक्षामें सम्यग्दर्शन क्या है? द्रव्य सम्यग्दर्शन है. सम्यग्दृष्टि जीव रूपरहित नो स्कन्ध तथा नो (ईषत् ) ग्राम है ॥ स्वामित्व सम्यग्दर्शन किसका है वा किसको होता है ? इस हेतुसे कहते हैं कि यह सम्यग्दर्शन आत्माके संयोगसे ही आत्मासे भिन्न अन्य पुद्गल धर्म आदिके संयोगसे, तथा आत्मा और अनात्मा उभयके संयोगसे होता है, ऐसा कहना चाहिये । आत्माके संयोगसे जीवको सम्यग्दर्शन होता है, वा जीवका सम्यग्दर्शन अर्थात् सम्यग्दर्शनका स्वामी जीव है । तथा पर (आत्मासे ॥

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रायचन्द्रजैनशान्त्रमालायाम
मिन्न) के संयोगसे जीवको, अजीव (ईपत् जीव) को, दो जीवोंको, दो अजीबोको, बहुत
जीवोंको, वा बहुत अजीवोंको होता है; इत्यादि विकल्प हैं । और समयके संयोगसे,
अर्थात् आत्मा तथा परसंयोगसे जीवको, नो (ईषत् ) जीवको, दो जीवोंको, दो मजीवोंको,
बहुत जीवोंको, बहुत नो जीवोंको इत्यादि विकल्प नहीं हैं और शेप विक्रल्ल हैं। साधन
(जिससे होता है ) जैसे सन्यग्दर्शन किससे उत्पन्न होता है । निसर्ग तया अविगनसे होता
है, यह प्रथम कहचुके हैं। उनमें से विसर्गतो कहनुके हैं। और अविगनतो सन्या व्या-
याम है, अर्थात् गुल्आदिके समीप रहनेवाले शिप्यकी जो सन्यन्दर्शनके उत्पन्न करने
वाली शुम क्रिया है वही व्यायान है ! निसर्गज तया अधिगमन दोनों प्रकारका
सन्यग्दर्शन सन्यग्दर्शनावरणीय जो कर्म है उसके भयले उपशमसे अथवा क्षयोपशम दोनोंसे
होता है। अधिकरण तीन प्रकारका है, एक आत्लाले सन्निधानसे, दूसरा पर अर्थात्
अनात्माके सन्निधान (सामीप्य) से, और तीसरा आत्मा और अनाना एतदुमय
सन्निवानसे ऐसा कहना चाहिये । आत्माका सन्निवान इसका यह तात्पर्य है कि
आत्माके आभ्यन्तरीय सानीप्य वा सान्निध्यसे, और पर सन्निधानना तात्पर्य आनाके
बाह्य सन्निधानसे है। और उभय सन्निवानका अर्थ बाह्य तथा आन्यन्तर उभय सनिधान
है । आत्नाके सन्निधानका उदाहरण जैसे जीवनें सन्यग्दर्शन है, जीवमें ज्ञान है, तया
जीवमें चारित्र है इत्यादि । और बाह्य सन्निधानका उदाहरण जैसे जीवमें सन्यदर्शन,
नो (ईपत् ) जीवमें सन्यग्दर्शन, इत्यादि पूर्वोक्त विकल्प हो सकते हैं । और उमवसन्नि-
धानमें उभयसन्निवानसे अप्राप्य तथा सद्भूत पूर्वोक्त मङ्गविकल्प होते हैं। स्थिति; जीवमें
सन्यग्दर्शन कितने कालतक स्थित रहता है। जीवकी सन्यग्दृष्टि दो प्रकारकी होती है, एक
तो सादिसान्त अर्थात् आदितहित और भन्तसहित, और दूसरी सादिननन्त, अर्थात् उत्पन्न
होकर जिस सन्यग्दृष्टिका पुनः अन्त वा नाश नहीं होता । और सन्यदर्शन सादि तया
अन्तसहितही होता है । वह सन्यग्दर्शन न्यूनले न्यून अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त होता है,
अर्थात् कमसे कम अन्तर्मुहुर्त पर्यन्त सन्यग्दर्शनकी स्थिति रहती है । और
अधिकसे अधिक अर्थात् उत्कृष्टतासे किंचित् अविक पदयष्टि छियासठ ६६ सागरो-
पम कालपर्यन्त रहता है । और सन्यग्दृष्टि सादि मनन्त है । जैसे सयोग अर्याद
त्रिविधयोगसहित, शैलेशी प्राप्त केवली और सिद्ध हैं। विधान जय आदि हेतुओं के
त्रिविध होनेसे तीन प्रकारका है। और यह सन्यग्दर्शनका तीन प्रकारका विवान (मेह)
दर्शनावरणीय कर्मक तथा दर्शन मोहके क्षयादि तीनों हेतुओंसे है । जैसे क्षायिक मन्यन्द-
र्शन, औपशमिक सम्यग्दर्शन, तथा क्षायौपशमिक सन्यग्दर्शन, इन औपशनिक, क्षायो-
पशमिक, और क्षायिक, सम्यग्दर्शनोंमेंसे पर पर अर्थात् आगे आगेके में विशुद्धि और
प्रकर्षता (अधिक उत्तमता) है ॥ ७ ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १३ प्रथम कहे हुये इन प्रकारोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारोंसेभी सम्यग्दर्शनादि तथा जीवादि तत्त्वोंका ज्ञान होता है यह जनानेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं । सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पवहुत्वैश्च ॥ ८॥ सूत्रार्थ:-सत्, (अस्तितानिर्देश ) संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, तथा अल्पवहुत्व इनसे जीवादि पदार्थ तथा सम्यग्दर्शनादिका अधिगम अर्थात् ज्ञान विस्तारसे होता है। भाष्यम्-सत, संख्या, क्षेत्रं, स्पर्शनं, कालः, अन्तरं, भावः, अल्पवहुत्वमित्यतैश्च सद्भूतप- दप्ररूपणादिभिरष्टाभिरनुयोगद्वारः सर्वभावानां विकल्पशो विस्तराधिगमो भवति । कथमिति चेटुच्यते । सत् सम्यग्दर्शनं किमस्ति नास्तीति । अस्तीत्युच्यते । कास्तीति चेदुच्यते । अजीवेपु तावन्नास्ति । जीवेपु तु भाज्यम् । तद्यथा । गतीन्द्रियकाययोगकपायवेदलेश्यासम्यक्त्वज्ञान- दर्शनचारित्राहारोपयोगेपु त्रयोदशस्वनुयोगद्वारेषु यथासम्भवं सद्भूतप्ररूपणा कर्तव्या ।। संख्या। कियत्सम्यग्दर्शनं किं संख्येयमसंख्येयमनन्तमिति । उच्यते । असंख्येयानि सम्य- ग्दर्शनानि, सम्यग्दृष्टयस्त्वनन्ताः ॥ क्षेत्रम् । सम्यग्दर्शनं कियति क्षेत्रे । लोकस्यासंख्येय- मागे ॥ स्पर्शनम् । सम्यग्दर्शनेन किं स्पृष्टम् । लोकस्यासंख्येयभागः । सम्यग्दृष्टिना तु सर्वलोक इति ।। अत्राह सम्यग्दृष्टिसम्यग्दर्शनयोः कः प्रतिविशेप इति । उच्यते । अपाय- सहव्यतया सम्यग्दर्शनमपाय आभिनिवोधिकम् । तद्योगात्सम्यग्दर्शनम् । तत्केवलिनो नास्ति । तस्मान्न केवली सम्यग्दर्शनी, सम्यग्दृष्टिस्तु ।। कालः । सम्यग्दर्शनं कियन्तं काल- मित्यत्रोच्यते । तदेकजीवेन नानाजीवश्च परीक्ष्यम् । तद्यथा । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मु- हूत उत्कृष्टेन पटपष्टिः सागरोपमानि साधिकानि । नानाजीवान् प्रति सद्धिा ।। अन्तरम् । सम्यग्दर्शनस्य को विरहकालः । एक जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त, उत्कृष्टेन उपार्धपुद्गलपरि- वर्तः । नानाजीवान प्रति नास्त्यन्तरम् ॥ भावः । सम्यग्दर्शनमौपशमिकादीनां भावानां कतमो भाव उच्यते । औदयिकपारिणामिकवर्ज त्रिपु भावेषु भवति ॥ अल्पवहुत्वम् । अत्राह सम्यग्दर्शनानां त्रिपु भावेषु वर्तमानानां किं तुल्यसंख्यत्वमाहोखिदल्पवहुत्वम- स्तीति । उच्यते । सर्वस्तोकमापशमिकम् । ततः क्षायिकमसंख्येयगुणम् । ततोऽपि क्षायौपश- मिकमसंख्येयगुणम् । सम्यग्दृष्टयस्त्वनन्तगुणा इति ॥ एवं सर्वभावानां नामादिभियासं कृत्वा प्रमाणादिमिरधिगमः कार्यः ॥ उक्त सम्यग्दर्शनम् । ज्ञानं वक्ष्यामः । विशेष व्याख्या-सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, तथा अल्पवहुत्व, सदादि पद, अर्थात् विद्यमान अर्थक प्ररूपणाकारक आठ अनुयोगद्वारोंसे सव भाव तथा तत्वों का विकल्प तथा विस्तारपूर्वक ज्ञान होता है । कैसे होता है ऐसा कहो तो कहते हैं ।। सत्-सम्यग्दर्शन है वा नहीं है? है ऐसा कहते हैं। यदि यह प्रश्न करो कि कहां है तो कहते हैं । अजीव पदार्थों में तोसम्यग्दर्शन नहीं है। और जीवोंमें विभाग करना चाहिये अर्थात् गति, इन्द्रिय, काय, योग, कपाय, वेद, लेश्या, सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तथा आहार, योग, इन अनुयोगों ( मार्गणा स्थानों ) से यथासंभव सत् आदि प्ररूपणा करनी - ये .

? १४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् चाहिये । जैसे मनुष्य आदि चारों गतियोंमें स्त्री पुरुष दोनोंमें शास्त्रोक्त रीतिसे यथा- संभव सम्यग्दर्शन होता है। ऐसेही इन्द्रिय, काय, योगादिसहित जीवोंमें भी आगमके अनुसार सत् आदि प्ररूपणा करनी चाहिये । संख्या-सम्यग्दर्शन कितना है ? क्या संख्येय है. वा असंख्येय है अथवा अनन्त है ? इसका उत्तर कहते हैं. कि सम्य- ग्दर्शन असंख्येय हैं । और सम्यग्दृष्टि अनन्त हैं । क्षेत्र अर्थात् सम्यग्दर्शन कितने क्षेत्रमें है ? उ०-लोकके असंख्येयभागमें सम्यग्दर्शन है। स्पर्शन-सम्यग्दर्शननें क्या स्पर्श किया है ! उत्तर-लोकका असंख्येयभाग सम्यग्दर्शनसे स्पृष्ट है; अर्थात् लोकके असंख्येय- भागको सम्यग्दर्शनने स्पर्श किया है; और सम्यग्दृष्टिने तो संपूर्ण लोकको स्पर्श किया है । यहां प्रश्न करते हैं कि सम्यग्दृष्टि तथा सम्यग्दर्शनमें क्या भेद है ? उत्तर कहते हैं- अपाय और सद्व्यरूपसे सम्यग्दर्शन अपाय वा आभिनिवोधिक है । अर्थात् सम्यग्दर्शनका कदाचित् अपाय (नाश ) होता है और कदाचित् स्फुरण होता है, उस अपायके योगसे सम्यग्दर्शन है वह केवलीको नहीं होता, अतः केवली सम्यग्दर्शनी नहीं है. और सम्यग्दृष्टि तो है । काले निरूपणा-सम्यग्दर्शन कितने कालतक रहता है ? इसका उत्तर कहते हैं । वह कालकी स्थिति एक जीव तथा नाना जीवोंसे परीक्षा करने योग्य है । जैसे जघन्यतासे अर्थात् न्यूनसे भी न्यून एक जीवके प्रति अन्त- मुहर्त पर्यन्त सम्यग्दर्शनकी स्थिति है । और उत्कृष्टतासे अर्थात् अधिकसे अधिक कुछ अधिक छियासठि (६६) सागरोपम इसकी स्थिति है । और नाना जीवोंके प्रति सं- पूर्ण कालमें सम्यग्दर्शनकी स्थिति है, अर्थात् नाना जीवों से किसीनकिसी जीवमें सदाकालमें सम्यग्दर्शन बना ही रहता है । अन्तरकी प्ररूपणा-सम्यग्दर्शनका अन्तर अर्थात् विरहकाल क्या है ? उत्तर-एक जीवके प्रति जघन्यतासे तो अन्तर्मुहूर्त है, और उत्कृष्टतासे उपार्द्धपरिवर्तन काल तक है । और नाना जीवोंके प्रति अन्तर अर्थात् विरह काल है ही नहीं; क्योंकि नाना जीवोमेंसे किसीनकिसी जीवमें सदा सम्यग्दर्शन बना रहेगा । भाव प्ररूपणा-औपशमिक आदि भावोंमेंसे सम्यग्दर्शन कौनसा भाव है ? उत्तर- औदयिक तथा पारिणामिक भावोंको छोड शेष तीन भावोंमें अर्थात् औपशमिक, क्षायौपशमिक, और क्षायिकभावमें सम्यग्दर्शन होता है । अल्प वहुत्व प्ररूपणा-औपश- मिक आदि तीन भावोंमें वर्तमान सम्यग्दर्शनोंकी तुल्य संख्या है अथवा अल्पबहुत्व अर्थात् न्यूनाधिक है ? उत्तर कहते हैं। सबसे न्यून औपशमिकभाव है । और उससे असंख्येयगुण क्षायिकभाव है । और उससे भी क्षायौपशमिक भाव असंख्येयगुण है। और सम्यग्दृष्टि तो अनन्तगुण है । इसप्रकार सब भावोंका नाम स्थापना आदिसे न्यास करके प्रमाण आदि द्वारा उनका बोध सम्पादन करना चाहिये । सम्यग्दर्शनका लक्षण आदि कहचुके । अव आगे ज्ञानके विषयमें कहेंगे ।

समाप्यतत्त्वार्थाधिगमस्त्रम् । १५ मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेबलानि ज्ञानम् ॥ ९॥ सूत्रार्थ:-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्याय, केवल ये पांच ज्ञानके भेद हैं। भाष्यम्-मतिज्ञानं, श्रुतज्ञानं, अवधिज्ञानं, मनःपर्यायज्ञानं, केवटज्ञानमित्येतन्मूलवि- धानतः पञ्चविध बानम् । प्रमेदास्त्वस्य पुरसाहक्ष्यन्त ।। विशेष व्याख्या-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान, और केवलज्ञान, मूलमेदसे यह पांच प्रकारका ज्ञान है । इनके मेढ़ प्रभेद आगे वर्णन करेंगे ॥ ९॥ तत्प्रमाणे ॥ १०॥ सूत्रार्थ:-पूर्वोक्त पंचविधज्ञान दो प्रमाणों में विभक्त हैं। माप्यम्-तदतत्पञ्चविधमपि ज्ञानं हूँ प्रमाण भवतः परोक्षं प्रत्यक्षं च ॥ विशेष व्याख्या-यह अनन्तर कथित मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्य्यय, तथा केवल- ज्ञान, दो प्रमाण होते हैं, अर्थात् पूर्वोक्त पंचविधज्ञान ही प्रमाण हैं, और यह प्रमाण प- रोक्ष, तथा प्रत्यक्ष भेदसे दो प्रकारका है ॥ १० ॥ आये परोक्षम् ॥ ११ ॥ सूत्रार्थ:-प्रश्रमके दो ज्ञान परोक्षप्रमाण हैं। माप्यम्-आदी भवमाद्यम् । आये सूत्रक्रमग्रामाण्यात प्रथमद्वितीय शास्ति । तदेवमाये मविज्ञानश्चतज्ञाने परोक्षं प्रमाणं भवतः । कुतः । निमित्तापेक्षत्वात् । अपायसद्व्यतया मति- बानम् । तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तमिति वक्ष्यते । तत्पूर्वकत्वात्परोपदेशनत्वाच श्रुतज्ञानम् ॥ विशेष व्याख्या-आदि आरंममें जो हो उसको आद्य कहते हैं । “आये " यह द्विवचन है. इसलिये 'मति श्रुतावधि' इत्यादि सूत्रक्रमके प्रमाणसे सूत्रकार ही प्रथम तथा द्वितीयज्ञानको परोक्ष रूपसे आज्ञा देते हैं । इस हेतुसे पूर्वोक्त रीतिसे आदिके दो ज्ञान अर्थात् मतिज्ञान, और श्रुतज्ञान ये दोनों परोक्षप्रमाण होते हैं । क्योंकि-नि- मित्तकी अपेक्षा रखनेसे मति, श्रुतज्ञान, परोक्षप्रमाण ही हैं । अपाय तथा सद्रव्यरूपतासे मतिज्ञान संज्ञा है । वह मतिज्ञान इन्द्रिय, तथा अनिन्द्रियमन निमित्तक है अर्थात् नेत्र- आदि इन्द्रिय और अनिन्द्रिय मन इनसे उत्पन्न होता है । वह आत्मासे मिन्न निमि- तकी अपेक्षा रखता है इसलिये परोक्ष है । और मतिपूर्वक होनेसे तथा परोपदेशजन्य होनेसे श्रुतज्ञान भी परोक्ष ही है ॥ ११ ॥ प्रत्यक्षमन्यत् ॥ १२॥ सूत्रार्थ:-मति और श्रुतसे अन्य तीनों ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण होते हैं। भाग्यम्-मतिश्रुताभ्यां यदन्यन त्रिविध ज्ञानं तत्प्रत्यक्षं प्रमाणं भवति । कुतः । अती- न्द्रियवान् । प्रमीयन्तेऽतिरिति प्रमाणानि ॥ अत्राह । इह अवधारितं द्वे एवं प्रमाणे १. कही. २. "मनःपर्यय" ऐसे प्रथम यकार हस्त्र है, और इस ग्रन्थमें 'पर्याय' दीवही लिखा है।

रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
प्रत्यक्षपरोक्षे इति । अनुमानोपमानागमार्थापतिसम्भवाभावानपि च प्रमाणानीति केचिन्म-
न्यन्ते । तत्कयमेतदिति । अबोच्यते । सवाण्येतानि भविश्रुतयोरन्तर्भूतानीन्द्रियार्यसन्निक-
पंनिमित्तत्वात् । किं चान्यत् । अप्रमाणान्येव वा । कुतः । नियादर्शनपरिग्रहाद्विपरीतोप-
देशाच । मिथ्याटेहि मतितावधयो नियतमज्ञानमेवेति वक्ष्यते । नयवादान्तरेण तु यथा
मतिश्रुतविकल्पनानि भवन्ति तथा परस्तावत्यामः ॥
विशेष व्याख्या-मति और श्रुत इन दोनोंमे अन्य अर्थात् मिन्न त्रिविध ज्ञान
अर्थात् अवधि, मनःपर्य्यय, तथा केवल ये तीनों प्रत्यक्षप्रमाण हैं। क्योंकि ये तीनों अती-
न्द्रिय ज्ञान हैं । जिनके द्वारा संपूर्ण पदार्थ प्रमाविषयीभूत किये जाय, अर्थात् सा-
क्षात् अनुभवगोचर किये जाँय उनको प्रमाण कहते हैं । अब यहांपर कहते हैं कि इस
शास्त्रमें अर्थात् जैनशास्त्रमें प्रत्यक्ष तथा परोल दो ही प्रमाण निश्चित किये हैं। और अ-
नुमान, उपमान, आगम, (शब्द) अर्धापत्ति, संभव, तथा अमाव, इनको भी कोई २ -
न्यमतवाले प्रमाणरूपसे मानते हैं, सो यह दोही प्रमाण आपने कैसे माने ? अर्यात् दो
प्रमाणोंकी व्यवस्था असंगत प्रतीत होती है। अब यहांपर समाधान कहते हैं । इन्द्रियां
तथा पदार्थोंके सन्निकर्पसे उत्पन्न होनेके कारण अनुमान उपमान आदि ये सब प्रमाण
मति तथा श्रुत ज्ञान जो कि परोक्ष प्रमाणरूपसे कहे गये हैं उन्हीमें गतार्य अर्थात् अन्त-
भूत हैं । अथवा अनुमान आदि सब अप्रमाण ही हैं। क्योंकि-इनमें निथ्या-
दर्शनका परिग्रह है, और विपरीत उपदेश जन्य हैं । कारण यह कि मिथ्याष्टिके मति,
श्रुत, और अवविज्ञान, ये तीनों नियमसे अप्रमाण ही हैं ऐसा आगे कहेंगे । और यद्यपि
अप्रमाण होनेसे मतिश्रुतमें अन्तर्भूत हैं यह कहनाभी अयोग्य है तथापि नयोंके वा-
दसे, अर्थात् स्वरचितार्थप्रकाशनरूप जो नयवाद है उसके मेदले नतिश्रुतके विकल्प-
(भेद) जन्य जिसप्रकार प्रमाण होते हैं उसप्रकार आगे निरूपण करेंगे ॥१
अत्राह । उक्तं भवता मत्यादीनि ज्ञानानि उद्दिश्च तानि विधानतो लक्षणतच परता-
द्विस्तरेण वक्ष्याम इति । तदुच्यतामिति । अत्रोत्र्यते।
अब यहांपर कहते हैं कि-प्रथम आप (ग्रन्थकार) ने मतिश्रुतादि पांचो ज्ञानोंको
कहा और उनको लक्ष्य करके यह भी कहा कि इन (नतिआदि) को मेद तथा लक्षण-
पूर्वक आगे कहने सो अब वही कहना चाहिये । इसलिये आगेका सूत्र कहते हैं-
मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिवोध इत्यनान्तरम् ॥ १३ ॥
सूत्रार्थ:-मति,स्मृति, संज्ञा, चिन्ता, अभिनिवोध यह पर्यायवाचक शब्दनाने गये हैं।
भाष्यम्-मतिज्ञानं, स्मृतिज्ञानं, संज्ञाज्ञानं, चिन्ताज्ञानं, आमिनिबोधिकज्ञानमित्सना-
,
न्तरम् ।।
विशेष व्याख्या-मतिज्ञान, स्मृतिज्ञान, संज्ञाज्ञान, चिन्ताज्ञान, तथा आमिनिवो-
धिक ज्ञान ये पांचों एकार्थवाचक हैं ॥ १३ ॥

. सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । १७ तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥ सूत्रार्थ:-यह पूर्वोक्त मति तथा स्मृति आदि शब्द वाच्य मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रियनिमित्तक है। भाष्यम्-तदेतन्मतिज्ञानं द्विविधं भवति । इन्द्रियनिमित्तमनिन्द्रियनिमित्तं च । तत्रे- न्द्रियनिमित्तं स्पर्शनादीनां पञ्चानां स्पर्शादिपु पञ्चस्खेव स्खविपयेषु । अनिन्द्रियनिमित्तं मनोवृत्तिरोघज्ञानं च ॥ विशेपव्याख्या-मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता, और अभिनिवोध इन पांचो पर्या- योंसे वाच्य मतिज्ञान दो प्रकार होता है । इन्द्रियनिमित्तक अर्थात् इन्द्रियजन्य, और अ- निन्द्रिय निमित्तक अर्थात् मनःकारणक । उनमेंसे इन्द्रियनिमित्तसे उत्पन्न होनेवाला ज्ञान स्पर्शन आदि पांचो इन्द्रियोंके स्पर्श आदि पांचो निजविपयोंमें ही होता है । और अनिन्द्रियनिमित्त अर्थात् मनोजन्य ज्ञान मनकी सब वृत्तियां तथा ओघ अर्थात् अ- विभक्त सर्वेन्द्रियविषयक ज्ञान है ॥ १४ ॥ अवग्रहहापायधारणाः ॥ १५ ॥ सूत्रार्थ:-यह मतिज्ञान अवग्रह, ईहा, अपा (वा) य, तथा धारणा, इन चार भागोंमें विभक्त है। भाष्यम् तदेतन्मतिज्ञानमुभयनिमित्तमप्येकशश्चतुर्विधं भवति । तद्यथा । अवग्रह ईहा- पायो धारणा चेति । तत्राव्यक्तं यथास्वमिन्द्रियविषयाणामालोचनावधारणमवग्रहः । अवग्रहो ग्रहणमालोचनमवधारणमित्यनर्थान्तरम् ॥ अवगृहीते विपयाथैकदेशाच्छेपानुगमनं निश्चय- विशेपजिज्ञासा ईहा । ईहा ऊहा तर्कः परीक्षा विचारणा जिज्ञासेत्यनान्तरम् ॥ अवगृहीते विपये सम्यगसम्यगिति गुणदोपविचारणाध्यवसायापनोदोऽपायः । अपायोऽपगमः अपनोदः अपव्याधः अपेतमपगतमपविद्धमपनुत्तमित्यनर्थान्तरम् ।। धारणा प्रतिपत्तियथास्वं मत्यवस्था- नमवधारणं च । धारणा प्रतिपत्तिरवधारणमवस्थानं निश्चयोऽवगमः अववोध इत्यनान्तरम् ।। विशेषव्याख्या-यह पूर्वोक्त इन्द्रिय और अनिन्द्रिय उभयनिमित्तक मतिज्ञान एक होनेपर भी चार प्रकारका है । अर्थात् अवग्रह, ईहा, अपाय तथा धारणा ये चार, भेद मतिज्ञानके हैं। वहांपर ऐसा कहा है कि निज २ विषयोंके अनुसार इन्द्रियोंकेद्वारा पदार्थोंका आलोचन, वा अवधारण, जो है उसको अवग्रह कहते हैं । अवग्रह, ग्रहण, आलोचन, तथा अवधारण, ये सब शब्द अनर्थान्तर अर्थात् एकार्थवाचक हैं । अव- ग्रह रूपज्ञानसे गृहीत जो विषय एकदेश है उस पदार्थके एकदेशसे शेपपदार्थके जाननेकेलिये जो अनुगमन है, अर्थात् विशेष निश्चय करनेकी चेष्टाविशेप वा जि- ज्ञासा है वही ईहा है । ईहा, ऊहा, तर्क, परीक्षा, विचारणा, और जिज्ञासा, ये समा- नार्थक शब्द हैं । और अवग्रह तथा ईहासे गृहीत विषयमें यह सम्यक् है वा असम्यक् ३ , १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् अर्थात् योग्य है वा अयोग्य इसप्रकार गुणदोषके विचारका जो उद्योग वा अपनोद है उसको अपा (वा) य कहते हैं । अपाय, अपगम, अपनोद, अपव्याध, अपेत, अपगत, अपविद्ध, और अपनुत्त, ये एकार्थवाचक हैं। पदार्थके स्वरूपके अनुसार जो उसकी प्रतिपत्ति, अर्थात् यथार्थबोध, वा बुद्धिकी पदार्थमें युक्त चिरकालार्थ स्थिति, अथवा अवधारणा है उसको धारणा कहते हैं । धारणा, प्रतिपत्ति, अवधारण, अवस्थान, निश्चय, अवगम, और अवबोध, ये शब्द एकार्थवाचक हैं ॥ १५ ॥ बहुवहुविधक्षिप्रानिश्रितानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥ सूत्रार्थः-बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त, ध्रुव और इनसे इतर अर्थात् अल्प, अल्पविध, अक्षिप्र, निःसृत, उक्त, अध्रुव ये १२ भेद अवग्रहादिम होते हैं। भाष्यम्-अवग्रहादयश्चत्वारो मतिज्ञानविभागा एपां वहादीनामर्थानां सेतराणां भवन्त्ये- कशः। सेतराणामिति सप्रतिपक्षाणामित्यर्थः। वह्ववगृह्णाति अल्पमवगृह्णाति बहुविधमवगृहाति एकविधमवगृह्णाति । क्षिप्रमवगृह्णाति चिरेणावगृह्णाति । अनिश्रितमवगृह्णाति निश्रितमवगृ- हाति । अनुक्तमवगृह्णाति उक्तमवगृह्णाति । ध्रुवमवहाति अध्रुवमवगृह्णाति । इत्येवमीहादीना- मपि विचात् ।। विशेषव्याख्या-मतिज्ञानके जो अवग्रह, ईहा, आदि चार विभाग हैं उन प्रत्येकमें वहु, वहुविध, तथा इनके विरुद्ध अल्प एकविध आदि १२ भेद होते हैं। यहां “सेतरा- णाम् " इससे वहुआदिके प्रतिपक्ष (विरुद्ध) अल्प, तथा एकविध, इत्यादिसे तात्पर्य है। जैसे वहुत ग्रहण करता है, अल्पग्रहण करता है । वहुविध (बहुप्रकार) से ग्रहण करता है, एकविध ग्रहण करता है । क्षिप्र अर्थात् शीघ्र ग्रहण करता है, चिरकालसे ग्रहण करता है। अनिश्चित (चिन्हादिसे अज्ञात) ही ग्रहण करता (जानता) है. निश्चित (लिङ्ग वा चि- न्हसे ज्ञात) को ग्रहण करता है । अनुक्त विना कहा हुआ ही ग्रहण करता है, उक्त कहा- हुआ ग्रहण करता है । ध्रुव ग्रहण करता है, तथा अध्रुव ग्रहण करता है । इसीप्रकार ईहादिके विषयमें भी वहु, बहुविध, तथा इनके विरुद्ध अल्प, एकविध आदिकी योजना करनी चाहिये । अर्थात् वहुईहा अल्पईहा इत्यादि जानना चाहिये ।। १६ ।। अर्थस्य ॥ १७॥ भाष्यम्-अवग्रहादयो मतिज्ञानविकल्पा अर्थस्य भवन्ति ।। विशेषव्याख्या-अवग्रह आदि जो मतिज्ञानके विकल्प (मेद) है, सो अर्थके हो होते हैं ॥ १७ ॥ व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥ सूत्रार्थ:-व्यञ्जनका तो अवग्रह ही होता है। भाष्यम्-व्यञ्जनस्यावग्रह एव भवति नेहादयः । एवं द्विवियोऽवग्रहो व्यञ्जनस्वार्थस्य च । ईहादयस्त्वर्थस्यैव ॥

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम्। १९ विशेपव्याख्या-व्यञ्जन (अव्यक्तशब्द आदि) का अवग्रह ही होता है न कि ईहा आदिः । इसप्रकार अवग्रह दो प्रकारका होता है. एक अर्धाऽवग्रह और दुसरा व्यञ्जनाऽवग्रह और ईहा आदि तो अर्थके ही होते हैं ।। १८ ॥ न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १९॥ सूत्रार्थ:-नेत्रइन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय (मन) से व्यञ्जनका अवग्रह नहीं होता । भाष्यम्-चक्षुपा नोइन्द्रियेण च व्यसनावग्रहो न भवति । चतुभिरिन्द्रियः शेपैर्भवती- सर्थः । एवमंतन्मतिज्ञानं द्विविध चतुर्विध अष्टाविंशतिविध अष्टपष्ट त्तरशतविधं पत्रिंशवि- शतविधं च भवति ॥ विशेपव्याख्या-चक्षुप नेत्रइन्द्रिय और अनिन्द्रिय अर्थात् ईपत् इन्द्रिय मन, इन दोनोंसे व्यञ्जनका अवग्रहरूप ज्ञान नहीं होता है किन्तु शेष स्पर्शन आदि चार इन्द्रियोंसे होता है । इस रीतिसे इन्द्रिय और अनिन्द्रिय निमित्तसे मतिज्ञान दो प्रकारका होता है, अवग्रह तथा ईहा अपाय और धारणा इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । तथा स्पर्शन (वा) आदि पांचइन्द्रियां और मन इन छहोंके प्रत्येकके अवग्रह आदि चार २ भेद मिलके २४ और नेत्र तथा मनको छोडके शेप स्पर्शन आदि चार इन्द्रियोंका चार प्रकारका व्यञ्जनाऽवग्रह सब मिलकर २८ प्रकारका भी मतिज्ञान होता है। और इन्हीं अट्ठावीस २८ मेदोंको बहु, बहुविध आदि छह २ मेदोंसे एकसोअड़सठ १६८ भेद मतिज्ञानके होते हैं । तथा इन्हीं पूर्वोक्त अट्ठावीस २८ भेदोमसे प्रत्येकको वहु, बहुविध, तथा इनके इतर अल्प, एकविध आदिसे बारह भेद करनेसे तीनसोछत्तीस ३३६ भेद मतिज्ञानके होते हैं ॥ १९ ॥ अत्राह । गृहीमस्तावन्मतिज्ञानम् । अथ श्रुतज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते ।। अव कहते हैं कि मतिज्ञानको पूर्वोक्त भेदोसहित ग्रहण करते हैं, अब क्रमप्राप्त श्रुतज्ञान क्या हैं, सो कहिये ? इसलिये श्रुतज्ञानके भेद प्रदर्शन करनेकेलिये अग्रिम सूत्र कहते हैं। श्रुतं मतिपूर्व ड्यनेकद्वादशभेदम् ॥ २० ॥ सूत्रार्थ-श्रुतज्ञान मतिपूर्वक होता है, और उसके दो अनेक तथा द्वादश भेद हैं। माण्यम्-श्रुतज्ञानं मतिज्ञानपूर्वकं भवति । श्रुतमाप्तवचनमागम उपदेश ऐतिह्यमानायः प्रवचनं जिनवचनमियनर्थान्तरम् । तद्विविधमङ्गबाह्यमङ्गप्रविष्टं च । तत्पुनरनेकविध द्वादश- विधं च यथासङ्ग्यम् । अङ्गवाहमनेकविधम् । तद्यथा । सामायिकं चतुर्विशतिस्तवो वन्दनं प्रतिक्रमणं कायव्युत्सर्गः प्रत्याख्यानं दशवकालिकं उत्तराध्यायाः दशाः 'कल्पव्यवहारी निशीथमृपिभापितान्येवमादि ।। अङ्गप्रविष्टं द्वादशाविधम् । तद्यथा । आचारः सूत्रकृतं स्थानं समवायः व्याख्याप्राप्तिः ज्ञातधर्मकथा उपासकाध्ययनदशाः अन्तकृद्दशाः अनुत्तरीपपातिक- २० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् दशाः प्रश्नव्याकरणं विपाकसूत्रं दृष्टिपात इति ॥ अत्राह । मतिज्ञानश्रुतज्ञानयोः कः प्रति- विशेष इति । अत्रोच्यते । उत्पन्नाविनष्टार्थग्राहकं साम्प्रतकालविपयं मतिज्ञानम् । श्रुतज्ञानं तु त्रिकालविपयं उत्पन्नविनष्टानुत्पन्नार्थग्राहकम् ।। अत्राह । गृहीमो मतिश्रुतयोर्नानात्वम् । अथ श्रुतज्ञानस्य द्विविधमनेकद्वादशविधमिति किं कृतः प्रतिक्शेिप इति । अत्रोच्यते । वक्तृ- विशेषाद्वैविध्यम् । यद्भगवद्भिः सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः परमर्पिमिरहद्भिस्तत्स्वाभाव्यात्परमशुभस्य च प्रवचनप्रतिष्ठापनफलस्य तीर्थकरनामकर्मणोऽनुभावादुक्तं भगवच्छिष्यैरतिशयवद्भिरुत्तमा- तिशयवाग्बुद्धिसंपन्नैर्गणधरैईव्धं तदङ्गप्रविष्टम् । गणधरानन्तर्यादिभिस्त्वत्यन्तविशुद्धागमैः परमप्रकृष्टवाङ्मतिशक्तिभिराचार्यैः कालसंहननायुर्दोपादल्पशक्तीनां शिप्याणामनुग्रहाय यत्प्रोक्तं तदङ्गवाह्यमिति ॥ सर्वज्ञप्रणीतत्वादानन्याच ज्ञेयस्य श्रुतज्ञानं मतिज्ञानान्महाविपयम् । तस्य च महाविपयत्वात्तांस्ताननधिकृत्य प्रकरणसमाप्त्यपेक्षमङ्गोपाङ्गनानात्वम् । किं चान्यत् । सुखग्रहणधारणविज्ञानापोहप्रयोगार्थ च । अन्यथा ह्यनिवद्धमङ्गोपाङ्गशः समुद्रप्रतरणवहुरध्य- वसेयं स्यात् । एतेन पूर्वाणिवस्तूनि प्राभृतानि प्राभृतप्राभूतानि अध्ययनान्युद्देशाश्च व्या- ख्याताः ।।अबाह । मतिश्रुतयोस्तुल्यविपयत्वं वक्ष्यति । द्रव्येष्वसर्वपर्यायेष्विति। तस्मादेकत्व- मेवास्त्विति । अत्रोच्यते । उक्तमेतत् साम्प्रतकालविपयं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं तु त्रिकालविपयं विशुद्धतरं चेति । किं चान्यत् । मतिज्ञानमिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तमात्मनो ज्ञवाभाव्यात्पारि- णामिकम् । श्रुतज्ञानं तु तत्पूर्वकमाप्तोपदेशाद्भवतीति ॥ विशेपव्याख्या-मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है । श्रुत, आप्तवचन, आगम, उपदेश, ऐतिह्य, आम्नाय, प्रवचन, तथा जिनवचन ये सब अनर्थान्तर अर्थात् समानार्थ- वाचक शब्द हैं । पुनः वह श्रुत दो प्रकारका है । एक अङ्गवाह्य, और दूसरा अङ्ग- प्रविष्ट और दोनो यथा संख्यासे अर्थात् अङ्गवाह्य अनेक प्रकारका है और अङ्गप्रविष्ट द्वादश १२ प्रकारका है। इनमें अनेकभेदसहित अङ्गवाह्य के कुछ उदाहरण. जैसे:- सामायिक, चतुर्विशतिस्तव, २४ स्तोत्र वन्दन, प्रतिक्रमण, कायव्युत्सर्ग, अर्थात् किये हुए पापकी शुद्धता जहां शरीरके त्यागसे वर्णन की गई है, प्रत्याख्यान दशवकालिक, उत्तरअध्याय, दशा, कल्प तथा व्यवहार, और निशीथ, इत्यादि ऋपियोंसे भापित अनेक प्रकारका अङ्गविध है । अङ्गप्रविष्ट बारह प्रकारका है जैसे:-आचार १ सूत्र- कृत २ स्थान ३ समवाय ४ व्याख्याप्रज्ञप्ति ५ ज्ञातृधर्मकथा ६ उपासकाध्ययनदशा, ७ अन्तकृद्दशा ८ अनुत्तर औपपातिक (उपपात सम्बधिनी) दशा ९ प्रश्नव्याकरण १० विपाकसूत्र ११ तथा दृष्टिपात १२ । यहांपर प्रश्न करते हैं कि मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञान क्या भेद है ? उत्तर देते हैं कि उत्पन्न होकर जो नष्ट नहीं हुआ है ऐसे पदार्थका वर्तमानकालमें ग्राहक तो मतिज्ञान है । और श्रुतज्ञान तो त्रिकालविषयक है, जो पदार्थ उत्पन्न हुवा है, अथवा उत्पन्न होकर नष्ट हो गया है, वा उत्पन्न ही नहीं हुआ, किन्तु भविष्यमें उत्पन्न होनेवाला है वा नित्य है उन सबका ग्राहक श्रुतज्ञान है । यह भेद इन दोनों में है । अब पुनः यहांपर कहते हैं कि - , . समाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २१ मति तथा श्रुतज्ञानका नानात्व (मंद.) तो अङ्गीकार करते हैं, किन्तु श्रुतज्ञान द्विविध (दो भेद ) अनेकविध, तथा द्वादशविध अर्थात् १२ भेद सहित है, इस विशेषता क्या कारण है, यह परस्पर भेद किसका किया है ? अब इसका उत्तर देते कि वक्ताके भेदसे प्रथम दो भेद माने गये हैं, अङ्गवाह्य और अङ्गप्रविष्ट ये भेद वक्ताओंके मिन्न २ होनेसे माने गये हैं। जो कि सर्वज्ञ, सर्वदर्शी तथा परमऋपि स्वरूप भगवान् अर्हतोंने परमशुम, तथा प्रवचन प्रतिष्ठापन फलदायक तीर्थकर नाम कर्मक प्रमावसे तादृश स्वभाव होनेके कारणसे कहा है; उसीको अतिशय अर्थात् साधारण जनोंसे विशेषता युक्त, और उत्तम तथा विशेषवाणी तथा बुद्धि ज्ञान आदि संपन्न भगवान् शिष्य गणधरोने जो कुछ कहा है वह अङ्ग प्रविष्ट है । और गणधरोंके अनन्तर होनेवाले अत्यन्त विशुद्ध आगमोंके ज्ञाता तथा परमोत्तम वाक् वुद्धिआदिकी शक्तिसम्पन्न आचा- य्याने कालसंहनन तथा अल्पायु आदिके दोषोंसे अल्पशक्तिवाले शिष्योंके ऊपर अनुग्रहार्थ जो अन्य निर्माण किये हैं वे सब अङ्गवाह्य हैं । सर्वज्ञसे रचित होनेके कारण तथा ज्ञेयवस्तुके अनन्त होनेसे मतिज्ञानकी अपेक्षा श्रुतज्ञान् महान् विपयोंसे संयुक्त है । अतएव श्रुतज्ञानके महाविषय होनेके कारण उन २ जीवादि पदार्थोंका अधिकारकरके प्रकरणोंकी समाप्तिकी अपेक्षा संयुक्त अङ्ग तथा उपाझोंका नानात्व अर्थात् अनेक भेदत्व है । और भी, सुखपूर्वक ग्रहण, धारण, तथा विज्ञानके निश्चय प्रयोगार्थ भी श्रुतज्ञानका नानात्व (अनेक भेदत्व) है और यदि ऐसा न हो अर्थात् प्रत्येक विषय निज २ प्रकरणमें निबद्ध न हो तो समुद्रके तरनेके सहश उन २ पदार्थों का ज्ञान दुःसाध्य हो जाय । और इस सुखपूर्वक्रग्रहणआदि रूप अङ्ग तथा उपाोंके भेदस्वरूप प्रयोजनसे पूर्वकालिकवस्तु, प्राप्तव्य जीवादि द्रव्य, तथा जीवादि द्वारा ज्ञेय विद्या आदि अध्ययन और उनके उद्देशोंका भी निरूपण हो गया, अर्थात् ज्ञेयकी युगम- ताकेलिये ही जीवसे ज्ञेय जीवसम्बन्धी ज्ञान, तथा जीवसे वोध्य अचेतन पदायाँका ज्ञान, यह सब नाना भेद सहित श्रुतज्ञान द्वारा वर्णन किया गया है । अव यहांपर कहते हैं कि मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानकी तुल्यता "द्रव्येष्वंसर्वपायेपु" ( तत्वार्थसूत्र, अध्याय १ सूत्र २७ ) में कहेंगे अर्थात् असर्वपायों (कतिपय पायों) में संपूर्ण द्रव्योंमें मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानका विषय निवन्ध है, तात्पर्य यह कि इस सूत्रद्वारा यह कहा गया है कि संपूर्ण द्रव्योंके कुछ पर्याय मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानके विषय हैं, इससे दोनोंकी एकता हो गई । अव उत्तर कहते हैं कि यह विषय प्रथम ही कह चुके हैं कि मतिज्ञान तो वर्तमानकालविषयक है, और श्रुतज्ञान त्रिकालविषयक है, तथा मतिज्ञानसे अधिक विशुद्ध और महाविषययुक्त है अर्थात् मतिज्ञानसे तो केवल वर्तमानकालके ही पदार्थ जाने जाते हैं, और श्रुतज्ञानसे तीनों कालके पदार्थ जाने जाते हैं । और दूसरी बात यह भी है कि २२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् मतिज्ञान तो इन्द्रिय तथा अनिन्द्रिय (मन) को निमित्त मानकर आत्माके शस्वभाव (जाननेके स्वभाव ) से उत्पन्न होता है अतएव पारिणामिक है; और श्रुतज्ञान तो मतिपूर्वक है और आप्तके उपदेशसे उत्पन्न होता है; इस हेतुसे भी दोनोंका भेद है ॥२०॥ अत्राह । उक्तं श्रुतज्ञानम् । अथावधिज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते ॥ अवकहते हैं श्रुतज्ञान तो कह चुके उसके अनन्तर जो अवधिज्ञानका उद्देश (नाम संकीर्तन ) किया है उसका क्या स्वरूप है ?. इसलिये अग्रिम सूत्र कहते हैं । द्विविधोऽवधिः॥२१॥ सूत्रार्थ:-अवधिज्ञान दो प्रकारका है। भाप्यम्-भवप्रत्ययः क्षयोपशमनिमित्तश्च ॥ विशेषव्याख्या-भवप्रत्यय अर्थात् केवल जन्ममात्रके कारणसे उत्पन्न होनेवाला तथा क्षयोपशमनिमित्तसे उत्पन्न होनेवाला, इस रीतिसे क्षयोपशमनिमित्तक तथा भव- प्रत्यय भेदसे अवधिज्ञान दो प्रकारका है ॥ २१ ॥ तत्र- उनमें- भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् ॥ २२ ॥ सूत्रार्थः-नारकी जीव तथा देवोंको अवधिज्ञान केवल जन्म निमित्तसे होता है। भाष्यम्-नारकाणां देवानां च यथाखं भवप्रत्ययमवधिज्ञानं भवति । भवप्रत्ययं भवहे- तुकं भवनिमित्तमित्यर्थः । तेपां हि भवोत्पत्तिरेव तस्य हेतुर्भवति पक्षिणामाकाशगमनवत् न शिक्षा न तप इति ।। विशेष व्याख्या-नरकमें उत्पन्न होनेवाले जीव तथा देव इनको अवधिज्ञान भव- प्रत्यय होता है । अर्थात् इनके अवधिज्ञान होनेमें नरकयोनि तथा देवयोनिमें उत्पत्ति होना ही एक हेतु है; जैसे पक्षियोंमें जन्म होना आकाशगमनमें हेतु है । अर्थात् जैसे पक्षियोंका जन्म ही आकाशमें गतिका कारण है न कि शिक्षा वा तप आदि, ऐसे ही नारकी तथा देवोंमें उत्पत्तिमात्रसे अवधिज्ञान प्राप्त होता है ॥ २२ ॥ यथोक्तनिमित्तः षडूविकल्पः शेषाणाम् ॥ २३ ॥ सूत्रार्थ:-क्षयोपशमनिमित्तक तथा पभेद सहित अवधिज्ञानशेष अर्थात् तिर्यग् योनि और मनुष्य योनियोंमें होता है । भाष्यम्-यथोक्तनिमित्तः क्षयोपशमनिमित्त इत्यर्थः । तदेतदवधिज्ञानं क्षयोपशमनिमित्त पविधं भवति शेपाणाम् । शेपाणामिति नारकदेवेभ्यः शेपाणाम् तिर्यग्योनिजानां मनुष्याणां .

ममाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । च । अवधिज्ञानावरणीयस्य कर्मणः श्योपशमाभ्यां भवति पद्धिवम् । तद्यथा अनानुगामिकं आनुगामिक हीयमानकं वर्धमानकं अनवस्थितं अवस्थितमिति । तत्रानानुगामिकं यत्र क्षेत्रे स्थितस्योत्पन्नं ततः प्रच्युतस्य प्रनिपतति प्रश्नादेशपुरुपनानवत् ॥ आनुगामिकं यत्र कचिटु- त्पन्न क्षेत्रान्तरगतस्यापि न प्रतिपतति भास्करप्रकाशवत् घटरक्तभाववच्च ॥ हीयमानकं असंख्येयेपु द्वीपेषु समुद्रेषु पृथिवीपु विमानेपु तिर्यगूर्वमधो यदुत्पन्नं क्रमशः संक्षिप्यमाणं प्रतिपतति आ अङ्गुलासंख्येयभागान प्रतिपतत्येव वा परिच्छिन्नेन्धनोपादानसंतत्सग्निशिखा- वन् । वर्धमानकं यदङ्गुलस्यासंख्येयभागादिपूत्पन्नं वधते आ सर्वलोकान् अधरोत्तरारणिनि- मथनोत्पन्नोपात्तशुष्कोपचीयमानाधीयमानेन्धनराश्यग्निवत् ॥ अनवस्थितं हीयत वर्धते च वर्धत हीयते च प्रतिपतति चोत्पद्यते चेति पुन: पुनर्मिवन् ।। अवस्थितं यावति क्षेत्र उत्पन्नं भवति ततो न प्रतिपतत्या केवलप्राप्तः आ भवक्षयाद्वा जात्यन्तरस्थायि वा भवति लिङ्गवत् ।। विशेष व्याख्या--पूर्व प्रसंगमें जो क्षयोपशमनिमित्त कहा है उस यथोक्त निमित्तसे उत्पन्न तथा आनुगामिक आदि भेद सहित अवधिज्ञान देव तथा नारकियोंसे शेप जो तिर्यग्योनिज और मनुष्य हैं, उनको होता है । अवधिज्ञानावरणीयक्रमके क्षय तथा उपशमसे जो अवधिज्ञान होता है, वह पडिकल्प है, अर्थात् उसके छह भेद हैं । जैसे १ अनानुगामिक, २ आनुगामिक, ३ हीयमान, १ वर्द्धमानक, ५ अनवस्थित और अवस्थित । इनमसे अनानुगामिक अवविज्ञान वह हैं, कि जो जिसक्षेत्रमें स्थित पुरुषको उत्पन्न होता है, उस क्षेत्रसे जब वह पुरुप च्युत होता है अर्थात् गिरता है, तब उसका वह अवधिज्ञान भी गिर जाता है, उसके साथ ऐसा नहीं जाता जैसे प्रधान पुरुपनिष्ठज्ञान. अर्थात् जैसे निमित्तज्ञानी किसी स्थानविशेपमें ही किसी पुरुपमें ज्ञान प्राप्त कर सकता है न कि सर्वत्र और सो भी पृष्ट अर्थको ही कह सकता है । और आगामिक व अनुगामी अवधिज्ञान वह है, कि जो किसी क्षेत्रमें किसी पुरुपको उत्पन्न हुआ उससे अन्यक्षेत्रमें जानेपर भी उस पुरुपसे ऐसे पतित नहीं होता जैसे सूर्यका प्रकाश घटादिका रक्तभाव । हीयमान अवधिज्ञान वह है, जो कि असंख्यातद्वीप. समुद्रोंमें, पृथ्वीके प्रदेशोंमें, विमानोंमें तथा तिर्यक् (तिरछे) ऊर्द्ध व अधोभागमें उत्पन्न हुआ है, वह क्रमसे संक्षिप्त होता हुआ यहां तक गिर जाता है वा न्यून हो जाता है, जबतक अंगुलके असंखेय भागको नहीं प्राप्त होता अथवा सर्वथा गिर हो जाता है, जैसे परमित उपादान कारण (ईंधन) वाले अग्निकी शिखा । वर्द्धमानक अवधिज्ञान वह है, जो कि अंगुलके असंखेय भाग आदिमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण लोकपर्यन्त ऐसे वढता है, जैसे ऊपर नीचेके अरणिके मंथनसे उत्पन्न तथा शुष्क ईंधनकी राशिपर फैकाहुआ वर्द्धमान अग्नि । अनवस्थित अवधिज्ञान वह है, जो कि तरंगके समान जहांतक उसको वढना चाहिये वहां तक पुनः २ वढता है और छोटा भी यहांतक होता है कि जहांतक उसको छोटा होना चाहिये. इसी १ काटरचित यंत्रविशेप.

२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् रीतिसे वह बार २ वढता तथा न्यून होता और गिरता तथा उत्पन्न होता रहता है. एकरूपमें अवस्थित नहीं रहता किन्तु न्यूनाधिकभावमें सदा अनवस्थितरूप रहता है । और अवस्थित अवधिज्ञान वह है, कि जो जिस क्षेत्रमें जितने आकारमें उत्पन्न हुआ हो, उस क्षेत्रसे केवलज्ञानकी प्राप्तिपर्यन्त नहीं गिरता अथवा भवके नाश तक नहीं गिरता, वा लिङ्गके समान वह अन्यजातिमेंभी स्थिर रहता है ॥ २३ ॥ उक्तमवधिज्ञानम् । मनःपर्यायज्ञानं वक्ष्यामः । अवधिज्ञान कह चुके अब मनःपर्यायज्ञानका निरूपण करेंगे। ऋजुविपुलमती मनःपर्यायः ॥ २४ ॥ सूत्रार्थ:--मनःपर्यायज्ञानके ऋजुमति तथा विपुलमति ये दो भेद हैं। भाष्यम्-मनःपर्यायज्ञानं द्विविधम् । ऋजुमतिमनःपर्यायज्ञानं विपुलमतिमनःपर्याय- ज्ञानं च ॥ विशेष व्याख्या-ऋजुमतिमनःपर्याय तथा विपुलमतिमनःपर्याय इन दो भेदोंसे मनःपर्यायज्ञानके दो भेद हैं । ऋजु अर्थात् मनवचनकायकी सरलतासे मनमें स्थित रूपी- पदार्थ तथा परके मनमें स्थित पदार्थ जिससे जाने जाते हैं वह ऋजुमतिमनःपर्याय है. और सरल तथा वक्ररूप दूसरेके मनमें स्थित रूपीपदार्थ जिससे जाने जाते हैं, वह विपुलमतिमनःपर्याय है ।। २४ ॥ अत्राह । कोऽनयोः प्रतिविशेप इति । अत्रोच्यते । अव यहांपर कहते हैं कि ऋजुमतिमनःपर्यायज्ञान तथा विपुलमतिमनःपर्यायज्ञानमें क्या मेद है ? यहां कहते हैं। विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः॥२५॥ सूत्रार्थ:-विशुद्धि तथा अप्रतिपात इन दोनों हेतुओंसे ऋजुमति तथा विपुलमति मनःपर्यायज्ञानमें विशेप (भेद) है । भाष्यम्-विशुद्धिकृतश्चाप्रतिपातकृतश्चानयोः प्रतिविशेपः । तद्यथा । ऋजुमतिमनःपर्या- याद्विपुलमतिमनःपर्यायज्ञानं विशुद्धतरम् । किं चान्यत् । ऋजुमतिमनःपर्यायज्ञानं प्रतिपत- त्यपि भूयो विपुलमतिमनःपर्यायज्ञानं तु न प्रतिपततीति ।। विशेष व्याख्या-विशुद्धिकृत तथा अप्रतिपातकृत इन दोनोंमें विशेषता है । जैसे ऋजुमतिमनःपर्यायज्ञानकी अपेक्षासे विपुलमतिमनःपर्याय विशुद्धतर है; अर्थात् अधिक विशुद्ध है । और भी ऋजुमतिमनःपर्यायवाला गिर जाता है और विपुलमतिमनः- पर्यायज्ञानवाला पुनः नहीं गिरता ॥ २५ ॥ अत्राह । अथावधिमनःपर्यायज्ञानयोः कः प्रतिविशेप इति । अब कहते हैं कि अवधिज्ञान तथा मनःपर्यायज्ञानमें क्या भेद है ? ॥

समाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २५ अत्रोच्यते। यहाँ सूत्र कहते हैं। विशुद्धिक्षेत्रवामिविपयेभ्योऽवधिमनःपर्याययोः ॥ २६ ॥ मन्त्रार्थ:-विशुद्धि, क्षेत्र, खामी तथा विपयकृत अवधिज्ञान और मनःपर्यायज्ञानमें विशेषता है। भाष्यम्-विशुद्धिकृतः क्षेत्रकृतः स्वामिकृतो विपयकृतश्चानयोर्विशेपो भवत्यवधिमनःपर्या- यज्ञानयोः । तद्यथा । अवधिज्ञानान्मनःपर्यायज्ञानं विशुद्धतरम् । यावन्ति हि रूपाणि द्रव्या- ण्यवधिज्ञानी नानीते तानि मनःपर्यायज्ञानी विशुद्धतराणि मनोगतानि जानीते । किं चा- न्यत् । क्षेत्रकृतश्चानयोः प्रतिविशेषः । अवधिज्ञानमङ्गुलस्यासंस्थेयभागादिपूत्पन्नं भवत्या- सर्वलोकात् । मनःपर्यायज्ञानं तु मनुप्यक्षेत्र एव भवति नान्यक्षेत्र इति ॥ किं चान्यत् । खामिकृतश्चानयोः प्रतिविशेषः । अवधिनानं संयतस्य असंयतस्य वा सर्वगतिपु भवति । मनःपर्यायनानं तु मनुष्यसंयतस्यैव भवति नान्यस्य ॥ किं चान्यत् विषयकृतश्चानयोः प्रति- विशेषः । रूपिद्रव्येवसर्वपर्यायेप्ववधेविपयनिवन्धो भवति । तदनन्तभागे मनःपर्यायस्येति ।। विशेपव्याख्या-विशुद्धिकृत अर्थात् अधिक शुद्धिद्वारा क्षेत्रकृत अर्थात् उत्पत्तिस्थान- द्वारा खामिद्वारा और विषयद्वारा अवधिज्ञान तथा मनःपर्यायज्ञानमें भेद है। जैसे अवधि- ज्ञानकी अपेक्षासे मनःपर्यायज्ञान अधिकतर विशुद्ध है, जितने रूप वा रूपी द्रव्योंको अव- धिज्ञानवाला जानता है, उनको मनःपर्यायज्ञानी अधिकतर शुद्धतासे मनोगत होनेपर भी अधि- कतर शुद्धतासे जान लेता है । और क्षेत्रकृति भी इन दोनों अर्थात् अवधि तथा मनःपर्या- यज्ञानमें विशेषता है । जैसे अवधिज्ञान तो अंगुलके असंख्येय भागादि क्षेत्रोंमें उत्पन्न होकर सम्पूर्ण लोकपर्यन्तमें हो सक्ता है और मनःपर्यायज्ञान मनुष्य क्षेत्रमें ही उत्पन्न होता है न कि अन्य किसी क्षेत्रमें । और इन दोनोंमें स्वामिकृत भी विशेषता है । जैसे अवधिज्ञान तो संयत असंयत सब ही जीवोंको सव गतियोंमें होता है; परन्तु मनःपर्यायज्ञान मनुष्य योनिमें सो भी केवल संयतीको होता है, अन्य जीवको व असंयत मनुष्यको नहीं । और इन दोनोंमें विषयकृत भी विशेषता है । जैसे रूपवाले द्रव्योंमें असर्वपर्यायोंमें ही अवधिज्ञानका विषय निबंध है, अर्थात् अवधिज्ञानी रूपीद्रव्योंके कतिपय पर्यायोंको ही जान सक्ता है, न कि सम्पूर्ण द्रव्य तथा सर्व पर्यायोंको, परन्तु मनःपर्याय ज्ञानका विषय उसके अनन्त भागमें भी है । तात्पर्य यह कि जो रूपीद्रव्य अवधिज्ञानसे जाना जाता है, उसके अनन्तवें सूक्ष्म भागको भी मनःपर्यायज्ञान जान लेता है ।। २६ ॥ अत्राह । उक्तं मनःप-यज्ञानम् । अथ केवलज्ञानं किमिति । अत्रोच्यते । केवलज्ञानं दशमेऽध्याये वक्ष्यते । मोहक्षयाज्ज्ञांनदर्शनावरणान्तरायक्षयाच केवलमिति ॥ अव यहांपर कहते हैं, कि मनःपर्यायज्ञानका वर्णन तो कर चुके, अब उसके अन- न्तर क्रमप्राप्त केवलज्ञान क्या वस्तु है ? । यहां कहते हैं कि, केवल ज्ञानको विशेप- २६ रायचन्द्रजैनशानमालायान रुपले दशवें अध्यायमें "मोहक झयले तया ज्ञानावरणी दर्शनावरणी अन्तराम केवल ज्ञान होता है, इस प्रकार रहेंगे। अत्राह । एपां भतिज्ञानादीनां ज्ञानानां कः कस्य विषयनिबन्ध इति अत्रोच्यते । अब पुनः कहते हैं कि ये जो नतिश्रुतादि जान हैं, इन किसा क्या विश्य नि- बन्ध है अर्थात् किन ज्ञान कोना किस प्रकारका पदाये जाना जाता है। इन उत्तरमें स्त्र कहते हैं। मतिश्रुतयोनिवन्धः सर्वद्रव्यवमर्वपर्यायेषु ॥ २७ ॥ मृत्रार्थ:-सन्पूर्ण चोंके असत्र (ऋतिपय) पयायो नतिज्ञान और श्रुतिज्ञान इन दोनोंका विषय निवन्य है। माध्यम्-मविज्ञान तन्त्रानयोविषयनिवन्धो भवनि नचंद्रयवनवायांचा । नाभ्यां हि सवाणि च्याणि जानीत न तु नः पार्थः । विशेषव्याख्या-नतिज्ञान तथा शुनज्ञानका विषय ऋतिश्य (कुछ, न कि नत्र, पर्याय सहित जो कि सम्पूर्ण द्रव्य हैं, उनमें है अर्थात् इन दोनों झानों जीव मत्र - व्योको जानता है, परन्नु न बोके न पयायोंको नहीं जानता। मरने योग्य छ पायोंको ही जानता है ॥ २७ ॥ सपिप्पवयः ॥ २८॥ सूत्रार्थ:-कृष्णपीतादि जो रूपवान् द्रव्य हैं, उन्होंने अवविज्ञान विश्य दि- बन्ध है। माग्यम्-रुपिष्वेव द्रव्यष्ववधिज्ञानन्य विषयनिबन्यो भवनि अमबरायेषु । मुश्छि- द्वेनाप्यवपिनानेन रूपीण्यत्र द्रव्याण्यवधिज्ञानी लानीत तान्यपि न न पार्थिन ।। विशेष व्याख्या-जो पदार्य व द्रव्य नपत्राले है, वे हो मषि ज्ञान विश्व है। उन रुपी द्रव्योंमें सम्पूर्ण पांव अवधिज्ञानके विषय नहीं है, किन्तु ऋतिय पांच अत्यन्त शुद्ध अवधिनानद्वारा भी रूपवान ही पढ़ाये जाने जाते हैं, नन्दित रहिन् । और रूपवान् द्रव्य मी सम्पूर्ण पयायों सहित नहीं जाने जाते, किन्नु कतिपय पर्याय नाहन हो जाने जाते हैं ।। २८॥ नदनन्तभागे मनःपर्यायस्य ।। २९ ।। सूत्रार्थः-उसके अनन्तवें मागमें मनःपर्यायज्ञानका विषयनिबन्ध है। माण्यम्-यानि पीणि द्रव्याण्यवाविज्ञानी जानीत वनोऽनन्तमा मनःपयाय विष- यनिबन्यो भवति । अवधिज्ञानविषयन्यानन्तमानं मनःपचायनानी जानी नपित्यानि मनोरहस्यविचारगतानि च मानुपक्षेत्रपापन्नानि विशुद्धतगणि चति ।।

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २७ विशेपव्याख्या-जिन रूपीद्रव्योंको अवधिज्ञानी जानता है, उससे अनन्त मा- गमें मनःपर्यायज्ञानका विषय निबंध है । अवधिज्ञानका विषय जो पदार्थ है, उसका अनन्तभाग अति सूक्ष्मतर मनःपर्यायज्ञानका विषय है । अतएव अवधिज्ञानके विषयके अनन्तवें भागको मनःपर्यायज्ञानी जानता है । और रूपीद्रव्योंको भी जो मनमें रहस्य गुप्त भावको प्राप्त मानुपक्षेत्रमें व्यवस्थित हैं, उनको जानता है । और मानुपक्षेत्रमें स्थित विशुद्धतर रूपी द्रव्य हैं, उनको मनःपर्यायज्ञानी जानता है ॥ २९ ।। सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥ ३० ॥ सूत्रार्थ:--सम्पूर्ण द्रव्य तथा सम्पूर्ण पर्यायोंमें केवल ज्ञानका विषय निबन्ध है । भाष्यम्-सर्वद्रव्येषु सर्वपर्यायेपु च केवलज्ञानस्य विपयनिवन्धो भवति । तद्धि सर्व- भावग्राहक संभिन्नलोकालोकविपयम् । नातः परं ज्ञानमस्ति । न च केवलज्ञानविषयात्परं किंचिदन्यज्ज्ञेयमस्ति । केवलं परिपूर्ण समग्रमसाधारणं निरपेक्षं विशुद्ध सर्वभावज्ञापकं लो- कालोकविषयमनन्तपर्यायमित्यर्थः ।। विशेष व्याख्या-जीवादि सम्पूर्ण द्रव्य तथा उन द्रव्योंके यावत् पर्याय हैं, वे सव केवल ज्ञानके विषय हैं । वह केवल ज्ञान संभिन्न लोक तथा अलोक सर्व विषयक है और सर्वभावोंका ग्राहक अर्थात् ग्रहण करनेवाला है। केवल ज्ञानसे बढकर कोई भी ज्ञान नहीं है । और केवल ज्ञानका जो विषय है, उससे परे कोई ऐसा अन्य पदार्थ भी नहीं है, जो कि केवल ज्ञानसे प्रकाशित न होवे । तात्पर्य यह है, कि सम्पूर्ण विषय तथा सम्पूर्ण विषयोंके सम्पूर्ण स्थूल तथा सूक्ष्म सर्व पर्याय हैं, उन सवको केवल ज्ञान प्रकाशित करता है । केवल ज्ञान परिपूर्ण है । समग्र है । असाधारण है । अन्य ज्ञानोंसे निरपेक्ष है अर्थात् निज विषयोंको अन्यकी अपेक्षा न रखके स्वयं सवको प्रकाशित करता है। विशुद्ध है । सर्व भावोंका ज्ञापक अर्थात् जतानेवाला है। लोकालोक विषयक है, अर्थात् लोक अलोक सभी इसके विषय हैं । तथा अनन्त पर्याय है, अर्थात् सब द्रव्योंके अनन्त पर्यायोंको यह केवलज्ञान प्रकाश करता है ॥ ३० ॥ अत्राह । एपा मतिज्ञानादीनां युगपदेकस्मिजीवे कति भवन्तीति । अत्रोच्यते । अव यहांपर कहते हैं, कि ये जो मतिज्ञानादि ज्ञान हैं, इनमेंसे एक कालमें तथा एक जीवमें कितने ज्ञान हो सक्ते हैं, अर्थात् एक ही कालमें एक ही जीवमें एक वा दो अथवा और कितने ज्ञान हो सकते हैं ? इस हेतुसे यह अग्रिमसूत्र कहते हैं । एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्ना चतुभ्यः ॥ ३१ ।। सूत्रार्थः-एक कालमें तथा एक जीवमें मति आदिज्ञानोंमेंसे एकसे लेकर चारतक ज्ञान हो सक्ते हैं।

२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भाष्यम्-एपां मत्यादीनां ज्ञानानामादित एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिजीवे आ चतुर्थ्यः । कस्मिंश्चिज्जीवे मत्यादीनामकें भवति । कस्मिंश्चिज्जीवे द्वे भवतः । कस्मिंश्चित्रीणि भवन्ति । कस्मिंश्चिञ्चत्वारि भवन्ति । श्रुतज्ञानस्य तु मतिज्ञानेन नियतः सहभावस्तत्पूर्वक- त्वात् । यस्य तु मतिज्ञानं तस्य श्रुतज्ञानं स्याद्वा न वेति । अत्राह । अथ केवलज्ञानस्य पूर्व- मंतिज्ञानादिभिः किं सहभावो भवति । नेत्युच्यते । केचिदाचार्या व्याचक्षते । नाभावः । किं तु तदभिभूतत्वादकिंचित्कराणि भवन्तीन्द्रियवत् । यथा वा व्यभ्रे नभसि आदित्य उदिते भूरितेजस्त्वादादित्येनाभिभूतान्यन्यतेजांसि ज्वलनमणिचन्द्रनक्षत्रप्रभृतीनि प्रकाशनं प्रत्यकि- चित्कराणि भवन्ति तद्वदिति । केचिदप्याहुः । अपायसद्व्यतया मतिज्ञानं तत्पूर्वकं श्रुत- ज्ञानमवधिज्ञानमनःपर्यायज्ञाने च रूपिद्रव्यविषये 'तस्मान्नैतानि केवलिनः सन्तीति ॥ किं चान्यत् । मतिज्ञानादिपु चतुर्यु पर्यायेणोपयोगो भवति न युगपत् । संभिन्नज्ञानदर्शनस्य तु भगवतः केवलिनो युगपत्सर्वभावग्राहके निरपेक्षे केवलज्ञाने केवलदर्शने चानुसमयमुपयोगो भवति ॥ किं चान्यत् । क्षयोपशमजानि चत्वारि ज्ञानानि पूर्वाणि क्षयादेव केवलं । तस्मान केवलिनः शेपानि ज्ञानानि सन्तीति ।। विशेष व्याख्या-ये जो मतिज्ञानादि ज्ञान कहे हैं, उनमंसे आरंभसे (मतिज्ञा- नसे लेकर) एक कालमें तथा एक जीवमें एक ज्ञानसे लेकर चार ज्ञानतक प्राप्त हो सक्ते हैं। किसी जीवमें एक ही ज्ञान होता है, किसीमें दो होते हैं, किसी जीवमें तीन होते हैं और किसी जीवमें चारों ज्ञान होते हैं। तात्पर्य यह है, कि एक कालमें किसी जीवमें एक मतिज्ञान ही होता है। किसीमें मति श्रुत दोनों होते हैं, अथवा मति अवधि और मति मनःपर्याय होते हैं, किसीमें मति, श्रुत अवधि ये तीन होते हैं। और किसीमें मति, श्रुत, अवधि तथा मनःपर्याय ये चारों होते हैं । किन्तु यह अवश्य जानना उचित है, कि जहां श्रुतज्ञान है, वहां उसके साथ मतिज्ञानका पूर्व सहभाव अवश्य नियत है, क्योंकि मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है । अतएव यह नियम है, कि जिसको श्रुतज्ञान है उसको नियमसे मतिज्ञान है; परन्तु जिसको मतिज्ञान है उसको श्रुतज्ञान हो भी और न भी हो । अव यहांपर यह कहते हैं कि, केवल ज्ञानका मतिज्ञानादिके साथ सहभाव है कि नहीं है ? उत्तर-केवल ज्ञानके साथ मतिज्ञानादिका सहभाव नहीं है । परन्तु कोई २ आचार्य कहते हैं कि, केवल ज्ञानकी सत्ता दशामें मतिज्ञानादि ज्ञानोंका अभाव नहीं है किन्तु केवलज्ञानसे वे मत्यादि ज्ञान अभिभूत (पराजित ) होनेसे ऐसे अकिंचित्कर हैं, जैसे कि नेत्रादि इन्द्रियां । केवल दशामें मति- श्रुतादि अन्यज्ञान अभिभूत होकर ऐसे अकिंचित्कर हैं, जैसे मेघ रहित आकाशमें सूर्यके उदित होनेपर अधिक तेजके कारण सूर्यसे अभिभूत अग्नि, मणि, चन्द्रमा तथा नक्षत्रा- दिके तेज प्रकाश करनेमें अकिंचित्कर हैं । और कोई ऐसा कहते हैं कि अपाय सद्रव्यता अर्थात् श्रोत्रादि इन्द्रियोंसे उपलब्ध पदार्थक निश्चयार्थ मतिज्ञानकी प्रवृत्ति होती है।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । २९ इस हेतुसे श्रुतज्ञान मतिज्ञान पूर्वक है । अवधिज्ञान तथा मनःपर्याय ज्ञान भी रूपी द्रव्यके विषयमें अपायसद्रव्यतासे ही प्रवृत्त होता है। अतः उनकी सत्ता मतिज्ञान रह सकता है । और केवलज्ञानीको इन्द्रियद्वारा पदार्थोपलब्धि नहीं होती, इस कारणसे केवलज्ञा. नीको मतिज्ञानादिज्ञान नहीं है । किं चान्यत् । और भी यह बात है, कि मतिज्ञानादि चारों ज्ञानाम पर्याय वा क्रमसे उपयोग होता है न कि एक ही कालमें । और मिलित है ज्ञानदर्शन जिसका ऐसे भगवान् केवलीको तो एक ही कालमें सर्वमावके ज्ञापक वा ग्राहक और अन्यज्ञाननिरपेक्ष केवलज्ञान तथा केवलदर्शन होते हैं और प्रतिक्षण वा प्रतिसमय ज्ञानोपयोग तथा दर्शनोपयोग होता है । और यह भी है, कि पूर्वमतिज्ञानादि चार ज्ञान तो ज्ञानावरणके क्षयोपशमसे उत्पन्न होते हैं, और केवल ज्ञान क्षयसे ही उत्पन्न होता है; इसलिये भी केवलज्ञानीको मतिज्ञान आदिशेप चार ज्ञान नहीं होते ॥३१॥ मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥ ३२ ॥ सूत्रार्थ:-मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान विपर्यय रूप भी होते है अर्थात् ये अज्ञान- रूप भी हो जाते हैं। (१) नेत्रादि इन्द्रियोंसे उपलब्ध जो इंहित पदार्थ है, उसके निश्चयको अपाय कहते हैं. अर्थात् अवग्रह तथा ईहारूप मतिज्ञानसे गृहीत पदार्थके निश्चयको अपाय कहते हैं. ऐसा अपाय केवलीको अपेक्षित नहीं है, इस कारण केवलीको मतिज्ञानादिकी आवश्यकता नहीं है । (२) किं चान्यत् इससे अपने दोनों आशयोंको ग्रन्थकर्ता प्रकाश करते हैं, कि मतिज्ञानादि चारो ज्ञानोमें पर्यायसे क्रमसे उपयोग तथा निज : विपयग्राहिता होती है, न कि एक कालमें । इनमें एक २ का. लमें न तो उपयोग ही है, और न निज २ विषयोंमें ग्राहकतारूप व्यापार ही है । जिस समय मतिज्ञानी मतिज्ञानसे उपयुक्त हैं अर्थात् मतिज्ञानरूप उपयोग उसमें है, उस समय अन्यश्रुतादि ज्ञानसे नहीं; और इसीप्रकार जिस समय श्रुतवानसे उपयुक्त है, उस समय अन्यमतिआदि ज्ञानसे नहीं है । और केवलीको तो क्रमसे एतदज्ञानगत उपयोग नहीं है क्योंकि उसके विषयमें यह कहा गया है कि उसके दर्शन तथा ज्ञान संमिलित हैं । विशेष ग्राहक ज्ञान और सामान्य ग्राहक दर्शन ये दोनों जिस केवली भगवानके संभिन्न हैं, अर्थात् सर्वभाव ग्राहक हैं और माहात्म्यादि गुणोंसे संयुक्त सर्व द्रव्यपर्यायग्राहक केवल ज्ञान जिसको है वह केवली भगवान् है । उनको एक कालमें ही प्रतिसमय उपयोग होता है । सर्वभाव पंचास्तिकावादिका ग्राहक तथा इन्द्रियादिकी अपेक्षासे रहित उसका ज्ञान है। उसमें कालकृतव्यवधानसे शून्य निरन्तर उपयोग होता रहता है । 'अनुसमय, पदसे वारंवार उपयोग होता है, यह तात्पर्य है। कोई २ पंडितमन्य इस सूत्रका अन्यथा व्याख्यान करते हैं वह असंगत हैं । कदाचित् यह कहो कि, साकारज्ञान तथा निराकारदर्शन इन शब्दोंमें भेद होनेसे वारंवार एक कालमें ही दर्शनोपयोग तथा ज्ञानोपयोग नहीं हो सका, क्योंकि प्रथम सामान्य ग्राहक निराकार दर्शन हो लेगा, पश्चात् ज्ञानोपयोग होगा सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि केवली भग- यानका जव ज्ञानावरणी सर्वथा क्षीण हो गया और दर्शनावरणी भी सर्वथा निरवशेष नष्ट हो गया तव आव- रण भेद कहां रहा? भगवान् केवलीका ज्ञान तो सर्वथा और सर्वदा विशेषरूपको परिच्छिन्न करके पदार्थ ग्राहक है। वहां अष्टविधि ज्ञानोपयोग और चतुर्विधि दर्शनोपयोग यह भी भेद न रहा, इससे सिद्ध हुआ, कि केवलीको मत्यादि ज्ञान नहीं होते। । - . ३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भाष्यम्-मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानमिति । विपर्ययश्च भवत्यज्ञानं चेत्यर्थः । ज्ञान- विपर्ययो ऽज्ञानमिति । अत्राह । तदेव ज्ञानं तदेवाज्ञानमिति । ननु च्छायातपवच्छीतोष्णवच्च तदत्यन्तविरुद्धमिति । अत्रोच्यते । मिथ्यादर्शनपरिग्रहाद्विपरीतग्राहकत्वमेतेपाम् । तस्मा- दज्ञानानि भवन्ति । तद्यथा । मत्यज्ञानं श्रुताज्ञानं विभङ्गज्ञानमिति । अवधिर्विपरीतो विभङ्ग इत्युच्यते ॥ विशेषव्याख्या-मतिज्ञान, श्रुतज्ञान तथा अवधिज्ञान ये विपर्यय अर्थात् अज्ञान खरूपताको भी प्राप्त होते हैं क्योंकि विपर्यय कहनेसे ज्ञानका विपर्यय वा विरोधी अज्ञान हुआ । अव यहांपर कहते हैं, कि वे ही मति आदि ज्ञान और वे ही अज्ञान हैं ऐसा कथन किया सो यह कथन छाया और आतप अथवा शीत और उप्णके समान अत्यन्त विरुद्ध है, अर्थात् एकहीमें दो विरुद्ध धर्म कैसे रह सक्ते हैं? अब इसका उत्तर कहते हैं कि मिथ्यादर्शनके होनेसे इन मत्यादिज्ञानोंकी विपरीतग्राहकता हो जाती है, इस कार- णसे ये अज्ञान हो जाते हैं । जैसे मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान, और विभङ्गज्ञान । विपरीताव- विज्ञानको ही विभङ्गज्ञान कहते हैं, अथवा कुमति, कुश्रुत कुअधि वा विभङ्गावधि यों भी मति आदिके विपर्ययको कहते हैं ।। ३२ ॥ अत्राह । उक्तं भवता सम्यग्दर्शनपरिगृहीतं मत्यादिज्ञानं भवत्यन्यथा ज्ञानमेवेति मिथ्या- दृष्टयोऽपि च भव्याश्चाभन्याश्चेन्द्रियनिमित्तानविपरीतान्स्पर्शादीनुपलभन्ते उपदिशन्ति च स्पर्श स्पर्श इति रसं रस इति । एवं शेपान् । तत्कथमेतदिति । अत्रोच्यते । तेषां हि विपरी- तमेतद्भवति । अब यहांपर कहते हैं, कि आपने यह कहा, कि सम्यग्दर्शनके होनेसे तो मत्यादि ज्ञान हैं और अन्यथा अर्थात् मिथ्यादर्शनके होनेसे विपरीत अर्थात् अज्ञान हो जाते हैं, यह कैसे संगत होता है? क्योंकि मिथ्याष्टिजन भी कोई भव्य हैं, कोई अभव्य हैं वे भी इन्द्रिय अनिन्द्रिय निमित्तक अविपरीत स्पर्शादि विपयोंको प्राप्त होते हैं। और स्पर्शको स्पर्श, रसको रस, तथा रूपको रूप कहते हैं, इसी प्रकार शेप इन्द्रियों के विपयोंको आपके समान मिथ्यादृष्टि भी उपलब्ध करते हैं, तब यह कैसे हो सकता है कि आपगृहीत तो मत्यादि ज्ञान है और अन्यगृहीत अज्ञान है? । अब यहां उत्तर देते हैं कि मिथ्यादृष्टि- योंके मतिआदिज्ञान विपरीत अर्थात् अज्ञान ही होते हैं, क्योंकि उनको विवेक नहीं है। इसलिये यह अग्रिमसूत्र कहते हैं। सदसतो रविशेषाद्यदृच्छोपलब्धरुन्मत्तवत् ॥ ३३ ॥ सूत्रार्थः-मिथ्यादृष्टियोंके उन्मत्तके समान सत् तथा असत्की अविशेपसे यह- च्छापूर्वक उपलब्धि होनेसे मत्यज्ञान श्रुताज्ञान विभङ्गज्ञान ही होते है। १ सम्यग्दृष्टी. २ मिथ्यादृष्टी.

सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३१ भाष्यम्-यथोन्मत्तः कर्मोदयादुपहतेन्द्रियमतिविपरीतग्राही भवति सोश्वं गौरित्यध्य- वस्यति गां चाश्व इति लोप्टं सुवर्णमिति सुवर्ण लोष्ट इति लोष्टं च लोष्ट इति सुवर्ण सुवर्ण- मिति तस्यैवमविशेपेण लोष्टं सुवर्ण सुवर्ण लोप्टमिति विपरीतमध्यवस्यतो नियतमज्ञानमेव भवति । तद्वन्मिध्यादर्शनोपहतेन्द्रियमतेर्मतिश्रुतावधयोऽप्यज्ञानं भवन्ति ।। विशेषव्याख्या--जैसे उन्मत्त पुरुष कर्मोंके उदयसे इन्द्रियोंकी मति वा शक्तिके नष्ट हो जानेसे विपरीतअर्थका ग्राही हो जाता है और विपरीत ग्रहणके स्वभावसे अश्व को गौ, गौको अश्व निश्चय करता है। पापाण को सोना, सोनेको पापाण, माताको स्त्री, तथा स्त्रीको माता, और कदाचित् अविशेषरूपसे घोडेको घोडा, पापाणको पापाण, मा- ताको माता, और स्त्रीको स्त्री भी यदृच्छासे जानता है । उसको इस प्रकार अनालोचन- पूर्वक यदृच्छासे अविशेषतापूर्वक पापाणको सुवर्ण, सुवर्णको पापाणरूपसे विपरीत निश्चय होनेसे अज्ञान ही है, ऐसे ही मिथ्यादर्शनके आग्रहसे जिसकी इन्द्रियां उपहत (नष्टशक्ति) गई हैं, उसको मति, श्रुत तथा अवधिज्ञान भी अज्ञान ही हैं ॥ ३३ ॥ उक्तं ज्ञानं । चारित्रं नवमेऽध्याये वक्ष्यामः । प्रमाणे चोक्ते । नयान्वक्ष्यामः तद्यथा । ज्ञानका वर्णन कर चुके, चारित्र नववें अध्यायमें कहेंगे। प्रमाण भी परोक्षप्रत्यक्षभेदसे कह चुके, अब आगे नयका निरूपण करते हैं। जैसे:- नैगमसङ्घहव्यवहारर्जुसूत्रशन्दा नयाः ॥ ३४ ॥ सूत्रार्थ:-नैगमादि पांच नय हैं। भाष्यम्-नैगमः सङ्ग्रहो व्यवहार ऋजुसूत्रः शब्द इत्येते पञ्च नया भवन्ति । तत्र । विशेपव्याख्या नैगम, संग्रह व्यवहार ऋजुसूत्र, तथा शब्द ये पांच नय हैं ॥३४ ॥ उनमें। आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ ॥ ३५ ॥ सूत्रार्थ:-आद्य अर्थात् प्रथम नैगम नय दो प्रकारका है, शब्दनयके तीन भेद हैं। भाष्यम्-आद्य इति सूत्रक्रमप्रामाण्यान्नैगममाह । स द्विभेदो देशपरिक्षेपी सर्वपरिक्षेपी चेति । शब्दस्त्रिभेदः साम्प्रतः समभिरूढ एवम्भूत इति ।। अत्राह । किमेपां लक्षणमिति । अत्रोच्यते । निगमेपु येऽभिहिताः शब्दास्तेपामर्थः शब्दार्थपरिज्ञानं च देशसमग्रग्राही नैगमः। अर्थानां सर्वैकदेशसङ्ग्रहणं संग्रहः । लौकिकसम उपचारप्रायो विस्तृतार्थो व्यवहारः । सतां साम्प्रतानामर्थानामभिधानपरिज्ञानमृजुसूत्रः । यथार्थाभिधानं शब्दः । नामादिपु प्रसिद्ध- पूर्वाच्छब्दादर्थे प्रत्ययः साम्प्रतः। सत्स्वर्थेष्वसमः समभिरूढः । व्यञ्जनार्थयोरेवम्भूत इति ॥ विशेष व्याख्या-उन पांच नोंके मध्यमं आदिमें होनेवाले नैगम नयके दो भेद हैं । जैसे देशपरिक्षेपी और सर्वपरिक्षेपी । और शब्दनयके तीन भेद हैं, साम्मत, सम- ३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भिरूढ, एवंभूत । अब इन नयोंके लक्षण क्या हैं । इसलिये कहते हैं:-निगमोंमें (शास्त्रोंमें ) जो शब्द कहे गये हैं, उनके अर्थ, और शब्द तथा अर्थका जो ज्ञान है वह एकदेशसे ग्राही वा समग्ररूपसे ग्राही नैगम है । अर्थोका सब रूपसे वा एकदेशसे जो संग्रह है, उसको संग्रह कहते हैं । लौकिकके समान उपचारसे बहुधा पूर्ण और विस्तृत अर्थका बोधक जो है वह व्यवहार नय है । विद्यमान सांप्रतिक अर्थोंका अभिधान अथवा परिज्ञान जो है, उसको ऋजुसूत्र कहते हैं । और यथार्थ वस्तुका कथन वा नाम जो है, उसको शब्दनय कहते हैं । नामादिकमें प्रसिद्ध पूर्व शब्दसे जो शब्दार्थमें प्रत्यय अर्थात् ज्ञान है, वह सांप्रत शब्द नय है । विद्यमान अर्थोंमें जो असंक्रम है, वह सममिरूढ शब्द- नय है । और व्यञ्जन तथा अर्थमें जो प्रवृत्त है, वह एवंभूतनय है ॥ ३५ ॥ भाष्यम्-अत्राह । उद्दिष्टा भवता नैगमादयो नयाः । तन्नया इति कः पदार्थ इति । नयाः प्रापकाः कारकाः साधका निर्वतका निर्मासका उपलम्भका व्यञ्चका इत्यनर्थान्तरम् । जीवादीन्पदार्थान्नयन्ति प्राप्नुवन्ति कारयन्ति साधयन्ति निवर्तयन्ति निर्भासयन्ति उपल- म्भयन्ति व्यञ्जयन्तीति नयाः ।। अब यहांपर कहते हैं, कि आपने नैगम आदि नयोंका संकीर्तन किया, अब उन न- योंमें नयत्व क्या पदार्थ हैं ? अर्थात् यहां नयशब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ क्या है? इसका उत्तर कहते हैं:- नय, प्रापक (अर्थविशेषको प्राप्त करानेवाले) कारक (विशेष कार्यके करनेवाले ) साधक, निवर्तक, निर्भासक (किसी अर्थके प्रकाशक) उपलम्भक, तथा व्यञ्जक ये सब पर्यायवाचक वा समानार्थक शब्द हैं । जो जीवादि पदार्थोंको प्राप्त करते हैं, प्राप्त होते हैं, कराते हैं, सिद्ध करते हैं, व्यवहारमें वर्ताते हैं, प्रकाशित करते हैं, उपलब्ध करते हैं, और प्रकट करते हैं, वे नय हैं । तात्पर्य यह कि नयशब्दका प्रापक, कारक तथा साधक आदि अर्थ है। भाग्यम् अत्राह । किमेते तन्त्रान्तरीया वादिन आहोखिस्वतन्त्रा एव चोदकपक्षमाहिणो मतिभेदेन विप्रधाविता इति । अत्रोच्यते । नैते तन्त्रान्तरीया नापि स्वतन्त्रा मतिभेदेन विप्र- धाविताः । ज्ञेयस्य त्वर्थस्याध्यवसायान्तराण्येतानि । तद्यथा । घट इत्युक्ते योऽसौ चेष्टांभि- निवृत्त अर्ध्वकुण्डलौष्टायतवृत्तग्रीवोऽधस्तात्परिमण्डलो जलादीनामाहरणधारणसमर्थ उत्तर- गुणनिर्वर्तनानिर्वृत्तो द्रव्यविशेपस्तस्मिन्नेकस्मिन्विशेपवति तन्नातीयेपु वा सर्वेष्वविशेपात्प- रिज्ञानं नैगमनयः । एकस्मिन्वा बहुपु वा नामादिविशेपितेपु साम्प्रतातीतानागतेपु घटेपु सम्प्रत्ययः सङ्ग्रहः । तेष्वेव लौकिकपरीक्षकग्राह्येपूपचारगम्येपु यथास्थूलार्थेषु संप्रत्ययो व्यव- हारः । तेष्वेव सत्सु साम्प्रतेषु संप्रत्यय ऋजुसूत्रः । तेष्वेव साम्प्रतेपु नामादीनामन्यतम- ग्राहिपु प्रसिद्धपूर्वकेपु घटेपु सम्प्रत्ययः साम्प्रतः शब्दः । तेपामेव साम्प्रतानामध्यवसाया- सङ्कमो वितर्कध्यानवत् समभिरूढः । तेषामेव, व्यञ्जनार्थयोरन्योन्यापेक्षार्थग्राहित्वमेवम्भूत इति ॥

, सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३३ यहांपर यह शंका करते हैं, कि ये नय है, सो जैनतन्त्र (शान्त्र ) से मिन्न जो कणाद आदिक शास्त्र वैशेषिक आदि हैं, उनमें कुशल जो बादी है उनके संकेत हैं अर्थात् वैशे- पिकतन्त्रवादीजन इनको नय कहते हैं ? अथवा स्वतन्त्र (निज जैनशास्त्र) के संकेतसिद्ध, चोदक पक्षग्राही अर्थात् दुरुक्त विषयके सूचक पक्षको ग्रहण करनेवाले अयथार्थ अर्थको मतिमंदमे कहनेकेलिये सहसा प्रवृत्त होनेवाले ये नय हैं? इसका समाधान करते हैं, कि ये नय कणाद वैशेपिक आदि शास्त्रांके नहीं हैं, और स्वतंत्र मतभेदसे अयथार्थ अर्थक निरूपणकेलिये भी नहीं दौड पड़े हैं, किन्तु ज्ञेय जीवादिक पदार्थोंके बोध करानेको उपाय विशेष ये नंगमादि नय हैं। जैसे घट (घटा) ऐसा कहनेपर कुंभकारकी चेष्टाओंसे उत्पन्न उर्ध्वदेशमें कुंडलाकार, विस्तृत, ओप्टसहित, वर्तुलाकार, ग्रीवायुक्त, भयोदेशम परिमंडलाकार, जलादि द्रवीभूत पदार्थोंके आनयन तथा धारणादि कार्याम समर्थ, तथा उत्तरोत्तर पाकजनित रक्तादिगुणोंकी समाप्तिसिद्ध, जो द्रव्य विशेप है उस एकमें वा उस जातिके सम्पूर्ण घटॉमें अविशेषरूपसे जो परिज्ञान है, वह नगम नयका विषय हैं। तथा एक अथवा अनेक वर्तमान, अतीत, अनागत (होनेवाले) नाम आदिसे विशेपित घटोंका जो ज्ञान है, वह संग्रहनय है, अर्थात् संग्रहनयका विषय है । और लौकिक परीक्षाओंसे ग्रहण करने योग्य उपचारसे जानने योग्य उन्हीं घटॉम स्थूल पदार्थोके तुल्य जो ज्ञान है वह व्यवहार नय है । तथा वर्तमान कालमें विद्यमान उन्हीं घटॉम जो ज्ञान है वह ऋजुमूत्र नयका विषय है । तथा नामादिममे किसी एकके द्वारा ग्राह्य और प्रसिद्धिपूर्वक उन्हीं वर्तमानकालिक घटोमें जो ज्ञान है वह सांप्रत शब्द नयका विषय है । और वितर्क ध्यानके समान उन्हीं सांप्रत घटॉम अध्यवसाय (निश्च- यात्मक ज्ञान ) का जो असंक्रम है वह समभिरूह नय है । और उन्हींम व्यञ्जन तथा अर्थकी परस्पर अपेक्षासे जो पदार्थग्राहकता है, वह एवंभूत नयका विषय है । भाष्यम्-अत्राह । एवमिदानीमेकस्मिन्नर्थऽव्यवसायनानात्वान्ननु विप्रतिपत्तिप्रसङ्ग इति । अत्रोच्यते । यथा सर्वमेकं सदविशेषात् सबै द्वित्वं जीवाजीवात्मकत्वात् सबै त्रित्वं द्रव्य- गुणपर्यायावरोधात सर्व चतुष्वं चतुर्दर्शनविषयावरोधात सर्व पञ्चत्वमस्तिकायाबरोधान सर्व पट्त्वं पड्व्यावरोधादिति । यथैता न विप्रतिपत्तयोऽथ चाध्यवसायस्थानान्तराण्येतानि तद्वन्नयवादा इति । किं चान्यन् । यथा मतिनानादिभिः पञ्चभिनिर्धर्मादीनामस्तिकाया- नामन्यतमोऽर्थः पृथक् पृथगुपलभ्यते पर्यायविशुद्धिविशपादुत्कण न च ता विप्रतिपत्तयः तद्वन्नयवादाः । यथा वा प्रत्यक्षानुमानोपमानाप्तवचनः प्रमाणरेकोऽर्थः प्रमीयते स्वविषय- नियमान न च ता विप्रतिपत्तयो भवन्ति तद्वन्नयवादा इति । आह च- अब यहांपर कहते हैं, कि एक ही पदार्थमं ज्ञानकी अनेकता (नैगम संग्रह आदि रु- पसे अनेक ज्ञानविपयता) होनेसे विवादका प्रसङ्ग हो गया, अर्थात् कीदृशज्ञानसे यहां- ५ ३४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् पर घट ग्राह्य है ? इस प्रकार विवाद प्राप्त हुआ। इसका उत्तर कहते हैं:- सबै एक ही है, क्योंकि सत्वरूपसे सबमें अभेद है, अर्थात् सद्रूपसे सब अभिन्न है । जैसे जो सत् है धर्म सत् है, अधर्म सत् है, आकाश सत् है, इस प्रकार सत्स्वरूपसे किसीमें भेद नहीं है। तथा सब द्विविध है, क्योंकि सव कुछ चेतन और अचेतनमय है, चेतन और अचेतनसे भिन्न कुछ नहीं है, इसलिये चेतन और अचेतन भेदसे सब विविध है । तथा सव त्रित्व संख्यायुक्त है; क्योंकि द्रव्य, गुण और पर्यायरूप ही समस्त लोक है। द्रव्य गुण और पर्याय इनसे भिन्न कुछ नहीं है। इसलिये सब जगत त्रिविध है । तथा सब चार संख्या युक्त है, क्योंकि चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन तथा केवलदर्शन इन चार प्रकारके दर्शनविषयों में सव गतार्थ है । तथा सब कुछ पंचसंख्यामय है, क्योंकि जीवास्तिकायादि पंचास्तिकायमें सब गतार्थ है । तथा सब कुछ पसंख्यामय हैं; क्योंकि पद्रव्यमें सब अन्तर्भूत है।जैसे एकत्व, द्वित्व आदि विवादके स्थान नहीं हैं, किन्तु कथन तथा ज्ञानकी भिन्न २ परिपाटी है, ऐसे ही नयवाद भी हैं। किं च दूसरी यह भी वार्ता है, कि जैसे मतिज्ञान आदि पांच ज्ञानोंसे धर्मास्तिकाय आदि पंचास्तिकायोंमें कोई एक अस्तिकायरूप पदार्थ पर्यायविशुद्धि तथा उत्कर्षसे पृथक् २ उपलब्ध होता है; और वह पृथक् २ उपलब्धि विप्रतिपत्ति नहीं है, ऐसे ही नयवाद भी हैं । अर्थात् पृथक् २ नयसे भिन्न प्रकारसे पदार्थों के स्वरूप जाने जाते हैं, इसमें कुछ विवाद नहीं है। अथवा जैसे निज २ विपयके नियमसे प्रत्यक्ष अनुमान उपमान तथा आप्तवचनसे एक ही पदार्थ प्रमाण साक्षात् विषयीभूत किया जाता है, किन्तु वह अनेक प्रमाणोंसे एक पदा- र्थकी प्रमिति विवाद नहीं है। ऐसे ही नयवाद भी हैं। अब इस विषयमें संक्षिप्त रुचिवा- लेको वोध करानेके अनुग्रहसे आर्याद्वारा कहते हैं,:- नैगमशब्दार्थानामेकानेकार्थनयगमापेक्षः। देशसमग्रमाही व्यवहारी नैगमो ज्ञेयः ॥ १ ॥ यत्सङ्गृहीतवचनं सामान्ये देशतोऽथ च विशेपे । तत्सङ्ग्रहनयनियतं ज्ञानं विद्यान्नयविधिज्ञः ॥ २ ॥ समुदायव्यक्ताकृतिसत्तासज्ञादिनिश्चयापेक्षम् । लोकोपचारनियतं व्यवहारं विस्तृतं विद्यात् ॥ ३ ॥ साम्प्रतविपयग्राहकसृजुसूत्रनयं समासतो विद्यात् । विद्याद्यथार्थशब्दं विशेपितपदं तु शब्दनयम् ॥ ४ ॥ इति ।। निगमजन पदमें होनेवाले शब्द और उनके अर्थोंको नैगम, और उन नैगम शब्दार्थों- मेंसे एक विशेष तथा अनेक सामान्यविपयों वा अर्थों के एकदेशसे वा समग्ररूपसे ग्रहण करानेमें जो समर्थ है, उसको व्यवहारी नैगम कहते हैं ॥ १ ॥ १ द्रव्यसमूह ।

सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३५ . सामान्य विषय वा विशेपके विषयमें जो संगृहीतका बचन अभिधान है, उस संग्रह नयके नियत ज्ञानकी नग्रविधि जाननेवालेको संग्रह नय जानना चाहिये ॥२॥ समुदाय, व्यक्ति, आकृति, सत्ता और संज्ञा अर्थात् नाम स्थापना द्रव्य और भाव आदिके निश्चयकी अपेक्षा रखनेवाला, तथा लौकिक उपचारसे जो नियत है; उसको वि- स्तृत व्यवहार नय जानना चाहिये ॥ ३ ॥ और संक्षेपसे साम्प्रतविषयका जो ग्राहक है, उसको ऋजुत्र नय जानना चाहिये । तथा यथार्थविषयक साम्प्रतसमभिरुड और एवंभूत इत्यादि पदेस जो विशेपित उ- सको शन्द नय जानना चाहिये ॥ ४ ॥ भाष्यम्-अत्राह । अथ जीवो नोजीवः अजीबो नोऽजीव इत्याकारित केन नयेन कोऽर्थः प्रतीयत इति । अनोच्यते । जीव इलाकारिते नैगमदेशसङ्ग्रव्यवहारर्जुसूत्रसाम्प्रतसमभिरुद्वैः पञ्चस्वपि गतिप्वन्यतमो जीव इति प्रतीयते । कस्मान् । एते हि नया जीवं प्रत्यौपशमि- कादियुक्तभावग्राहिणः । नोजीव इत्यजीवद्रव्यं जीवस्य वा देशप्रदेशौ । अजीव इत्यजीवद्र- व्यमेव । नोऽजीव इति जीव एव तस्य वा देशप्रदेशाविति ॥ एवम्भूतनयेन तु जीव इत्या- कारित भवस्थो जीवः प्रतीयते । कस्मात् । एप हि नयो जीवं प्रत्यौदायिकभावग्राहक एव । जीवतीति जीवः प्राणिति प्राणान्धारयतीत्यर्थः । तच जीवनं सिद्धे न विद्यते तस्माद्भवस्थ एव जीव इति । नोजीव इत्यजीवद्रव्यं सिद्धो वा । अजीब इत्यजीवद्रव्यमेव । नोऽजीव इति भवस्थ एव जीव इति । समग्रार्थवाहित्वाचास्य नयस्य नानेन देशप्रदेशी गृह्यते । एवं जीवो जीवा इति द्वित्वबहुत्वाकारितेष्वपि । सर्वसङ्ग्रहणे तु जीवो नोजीवः अजीवो नोऽजीवः जीवो नोजीवो अजीवी नोऽजीवी इत्येकद्वित्वाकारितेपु शून्यम् ! कस्मात । एप हि नयः सङ्ख्या- नन्याजीवानां बहुत्वमेवेच्छति यथार्थग्राही । शंपास्तु नया जात्यपंक्षमेकस्मिन्बहुवचनत्वं ब- हुपु च बहुवचनं सर्वाकारितग्राहिण इति । एवं सर्वभावपु नयबादाधिगमः कार्यः । अब यहांपर कहते हैं । जीव, नाजीव तथा अजीव और नो अजीव ऐसा कहनेपर किस नयसे और कौनसा पदार्थ प्रतीत (ज्ञानविषयीभूत ) होता है ? इसका उत्तर कहते हैं, कि 'जीव, ऐसा कहनेसे वा पुकारनेसे नंगम, देशसंग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, साम्प्रत और समभिरूढ नयोंसे पांचो गतियोंम किसी एक जीवका ज्ञान होता है, क्योंकि ये नैगम आदि नय जीवके प्रति औपशमिकादि भावयुक्त पदार्थके ग्राहक हैं । तथा 'नोजीव, ऐसा कहनेसे अजीवद्रव्य वा जीवक देश प्रदेशका बोध होता है । और 'अजीव, ऐसा कहनेसे अजीव द्रव्यका ही ज्ञान होता है । और 'नो अजीव, ऐसा कहनेसे जीव अथवा जीवके देश प्रदेशका बोध होता है । और एवंभूत नयसे तो 'जीव, ऐसा कहनेसे भवस्थजीवका ग्रहण होता है, क्योंकि यह नय जीवके प्रति औदयिक भावका ग्राहक है। जीव इस शब्दकी व्युत्पत्ति यह है "जीवति (पाणिति ) इति जीवः" अर्थात् जो दशों . १अवस्था.

३६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् प्राणोंको धारण करै । और वह प्राणधारणरूप जीवन सिद्धोंमें नहीं होता, इस हेतुसे 'जीव, ऐसा कहनेसे एवंभूत नयसे तो भवस्थजीवका ही ग्रहण होता है। और 'नो जीव, ऐसा कहनेसे अजीवद्रव्य अथवा सिद्धका ग्रहण होता है । अजीव ऐसा कहनेसे अजीव द्रव्यका ही ग्रहण होता है, और नोजीव ऐसा कहनेसे संसारस्थ जीवका ही ज्ञान होता है। क्योंकि यह एवंभूत नय सम्पूर्णरूपसे पदार्थका ग्राहक है; इसके द्वारा देश तथा प्र- देशका ग्रहण नहीं होता। इसी रीतिसे "जीवौ जीवा" दो जीव वा बहुत जीव इत्यादि द्वित्व तथा बहुतरूपसे कहनेपर भी संसारस्थ जीवका ही इस नयसे ग्रहण होता है । और सम्पूर्ण जीवमात्रका ग्रहण होनेपर तो जीव, नोजीव (ईपत् जीव ), अजीव, नोऽ- जीव (ईपत् वा किंचित् अजीव) जीव (दो जीव) नोजीव (द्वित्वसंख्या सहित नो- जीव ) तथा दो अजीव और दो नोऽजीव इत्यादि एकत्व वा द्विरूपसे कहनेपर शून्यका ही बोध होगा । क्योंकि यह यथार्थग्राही नय संख्याकी अनन्ततासे जीवोंके बहुत्वको ही चा- हता है। और पूर्वोक्त उदाहरणमें तो एकत्व तथा द्वित्व ही हैं, अर्थात् एकवचन और द्वि- वचन ही हैं । और शेष जो नय हैं, वे तो जातिकी अपेक्षासे एकमें बहुवचन तथा वहुतमें भी बहुवचनको सम्पूर्ण वचनोंसे एक वचनादिसे आकारित उच्चारित विकल्पोंको ग्रहण करनेवाले हैं । इसी प्रकार सब पदार्थोंमें नयवादका ज्ञान समझना चाहिये । भाज्यम्-अनाह । अथ पञ्चानां ज्ञानानां सविपर्ययाणां कानि को नयः श्रयत इति । अत्रोच्यते । नैगमादयस्त्रयः सर्वाण्यष्टौ श्रयन्ते । ऋजुसूत्रनयो मतिज्ञानमत्यज्ञानवर्जानि पत् ।। अत्राह । कस्मान्मतिं सविपर्ययां न श्रयत इति । अत्रोच्यते । श्रुतस्य सविपर्ययस्यो- पग्रहत्वात् । शब्दनयस्तु द्वे एव श्रुतज्ञानकेवलज्ञाने श्रयते । अत्राह । कस्मान्नेतराणि श्रयत इति । अत्रोच्यते । मत्यवधिमनःपर्यायाणां श्रुतस्यैवोपग्राहकत्वात् । चेतनाज्ञस्वाभाच्याच सर्व- जीवानां नास्य कश्चिन्मिथ्याष्टिरज्ञो वा जीवो विद्यते । तस्मादपि विपर्ययान्न श्रयत इति । अतश्च प्रत्यक्षानुमानोपमानाप्तवचनानामपि प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायत इति । आह च- अब यहांपर कहते हैं, कि कुमति कुश्रुत तथा विभङ्गरूप विपर्यय (अज्ञान) सहित जो मत्यादि पांच ज्ञान हैं, उनमेंसे किन ज्ञानोंको कौन नय आश्रय करता है? इसका उत्तर कहते हैं, कि नैगमसे आदि लेके जो तीन नय हैं, अर्थात् नैगम संग्रह और व्यवहार; सो आठों ज्ञानका अर्थात् कुमति कुश्रुत तथा विभङ्गज्ञान सहित पांचों ज्ञानोंका आश्रय करते हैं। और ऋजुसूत्र नयतो मतिज्ञान तथा मत्यज्ञानको छोड़के पद ज्ञानोंको आश्रय करता है । यहां कहते हैं, कि ऋजुसूत्र नय विपर्यय सहित मतिज्ञानका आश्रय क्यों नहीं करता? इस पर कहते हैं, कि विपर्यय सहित श्रुतका ही इससे उपग्रह होता है । और शब्दनय तो श्रुतज्ञान तथा केवलज्ञान इन्हीं दोनोंका आश्रय करता है । यहांपर कहते हैं, कि शब्द नय इन दोनोंके सिवाय अन्यका आश्रय क्यों नहीं करता? इसका सभाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३७ - . उत्तर कहते हैं, कि मति, अवधि, तथा मनःपर्याय ज्ञानोंको श्रुतकी उपग्राहकता है । तथा सब संसारी जीवोंका चेतनन स्वभाव होनेसे इस नयकी दृष्टिमें कोई मिथ्यादृष्टि अथवा अज्ञानी जीव है ही नहीं । इस कारणसे शब्दनय विपर्ययोंका आश्रय नहीं करेगा। इसी कारण प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, तथा आप्तवचन इनका भी प्रामाण्य हम स्वीकार करते हैं । और कहा भी है, विज्ञायैकार्थपदान्यर्थपदानि च विधानमिष्टं च । विन्यस्य परिक्षेपान्नयैः परीक्ष्याणि तत्त्वानि ॥ १ ॥ ज्ञानं सविपर्यासं त्रयः श्रयन्यादितो नयाः सर्वम् । सम्यग्दृष्टेनिं मिथ्याक्टेविपर्यासः ॥ २ ॥ अाजुसूत्रः पटू श्रयते मतेः श्रुतोपग्रहादनन्यत्वात् । श्रुतकेवले तु शब्दः श्रयते नोऽन्यच्छृताङ्गत्वात् ॥ ३ ॥ मिथ्याष्टयनाने न श्रयते नास्य कश्चिदज्ञोऽस्ति.। ज्ञवाभाव्यान्जीवो मिथ्याष्टिर्न चाप्यनः ॥ ४ ॥ इति नयवादाश्चित्राः क्वचिद्विरुद्धा इवाथ च विशुद्धाः । लौकिकत्रिपयातीतास्तत्त्वज्ञानार्थमधिगम्याः ॥ ५ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽहत्प्रवचनसङ्ग्रहे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः॥ एक अर्थवाचक पदोंको तथा अनेक अर्थके वाचक पदोंको जानकर और इष्ट विधानका विन्यास करके अनन्तर परिक्षेपसे नयोंके द्वारा तत्त्वोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ १॥ आदिसे नैगम आदि तीन नय विपर्यय सहित सब ज्ञानोंका आश्रय करते हैं, उसमें सम्यग्दृष्टिको तो ज्ञान होता है और मिथ्यादृष्टिको विपर्यास होता है ॥ २ ॥ ऋजुसूत्र नय विपर्यय सहित मतिज्ञानको छोड़के शेप पट् ज्ञानोंका आश्रय करता है, क्योंकि मतिज्ञानका अभेद होनेसे श्रुतसे ही उपग्रह हो जाता है, शब्दनय तो श्रुत और केवल ज्ञानका ही आश्रय करता है, न कि अन्यका; क्योंकि शब्दनय श्रुतका ही अङ्ग है ॥ ३ ॥ तथा मिथ्यादृष्टि अज्ञानका आश्रय नहीं करता। क्योंकि इसकी दृष्टिमें ज्ञस्वभाव (ज्ञानी स्वभाव) होनेसे न तो कोई मिथ्यादृष्टि है, और न कोई अज्ञानी है ॥ ४ ॥ इस रीतिसे विचित्र नयवाद कहीं विरुद्ध सदृश होनेपर भी अति विशुद्ध तथा लौ. किक विपयोंसे परे हैं, इसीसे तत्त्वार्थज्ञानकेलिये इनको जानना चाहिये ॥ ५ ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमेऽर्हतप्रवचनसद्महे आचार्योपाधिधारिपण्डितठाकुर- प्रसादशर्मविरचितभापाटीकासमलङ्कृतः प्रथमोध्यायः ।

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३८.
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
अथ द्वितीयोऽध्यायः।
अत्राह । उक्तं भवता जीवादीनि तत्त्वानीति । तत्र को जीवः कथं लक्षणो वेति ।
अत्रोच्यते।
यहांपर कहते हैं, कि आपने जीव आदि तत्वोंको कहा है, सौ जीव क्या और
उसका लक्षण क्या है ? इसलिये यह अग्रिमसूत्र कहते हैं ।
औपशमिकक्षायिको भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपा-
रिणामिकौ च ॥ १॥
सूत्रार्थ:-औपशमिक, क्षायिक और मिश्रभाव जीवके स्वतत्त्व हैं, तथा औदयिक
और पारिणामिक भी है।
भाष्यम्-औपशमिकः क्षायिकः क्षायोपशमिक औदायिकः पारिणामिक इत्येते पञ्च
भावा जीवस्य स्वतत्त्वं भवन्ति ।
विशेपच्याख्या-औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक तथा पारिणामिक ।
ये पांचभाव जीवके निजतत्त्व अर्थात् निज स्वभाव हैं ॥ १ ॥
दिनवाटादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
मन्त्रार्थ:-औपशमिक आदि पांच भाव यथाक्रमसे दो, नव, अठारह, इक्कीस तथा
तीन भेदवाले हैं।
भाप्यम्-एते औपशमिकादयः पञ्च भावा द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा भवन्ति ।
तद्यथा । औपशमिको द्विभेदः क्षायिको नवभेदः क्षायोपशमिकोऽष्टादशभेदः औदयिक एक-
विंशतिभेदः पारिणामिकस्त्रिभेद इति । यथाक्रममिति येन सूत्रक्रमेणात ऊर्ध्व वक्ष्यामः ।
विशेपव्याख्या-पूर्वोक्त औपशमिक आदि पांच भाव जो जीवके स्वतत्त्व है उनके
भेद इस प्रकार हैं । जैसे औपशमिकके दो भेद, क्षायिकके नव भेद, क्षायोपशमिकके अठा-
रह भेद, औदयिकके इक्कीस भेद, और पारिणामिकके तीन भेद हैं । 'यथाक्रम, इसका
यह तात्पर्य है, कि जिस क्रमसे सूत्रमें उपनिबद्ध है, उसीसे ये भेद हैं । और जो जिसके
भेद हैं, उनको क्रमसे आगे कहते हैं ॥ २ ॥
सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
सूत्रार्थ:--प्रथम अर्थात् औपशमिकके सम्यक्त्व चारित्र दो भेद हैं ।
भाष्यम्- सम्यक्त्वं चारित्रं च द्वावौपशमिको भावौ भवत इति ।
विशेपव्याख्या-सम्यक्त्व तथा चारित्र ये दो प्रकार औपशमिक भावके हैं अर्थात्
औपशमिकसम्यक्त्व और औपशमिकचारित्र दो भेद हैं॥३॥
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥४॥

. , , समाप्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् । ३९ सूत्रार्थ:-दूसरे अर्थात् क्षायिकके ज्ञान, दर्शन, दान, लाभ, भोग, उपयोग, वीर्य सम्यक्त्व और चारित्र ये नौ भेद हैं। मान्यम् --ज्ञानं दर्शनं दानं लाभो भोग उपभोगो वीर्यमित्येतानि च सम्यक्त्वचारित्रे च नव नायिका भावा भवन्तीति । ज्ञान, दर्शन, दान, लाभ, भोग, उपयोग और वीर्य ये सात तथा च शब्दसे सम्यक्त्व और चारित्र मिलाकर नव प्रकारका क्षायिक भाव होता है, अर्थात् क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक वीर्य, शायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ॥४॥ ज्ञानाज्ञानदर्शनदानादिलब्धयश्चतुस्वित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचा- रित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥ सूत्रार्थः—चार प्रकारका ज्ञान, तीन प्रकारका अज्ञान, तीन प्रकारका दर्शन और पांच प्रकारकी लब्धि, तथा सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम ये अष्टादश भेद क्षायो- पशमिक भावके हैं। माप्यम्-नानं चतुर्भदं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमवधिज्ञानं मनःपर्यायज्ञानमिति । अनानं त्रिभेदं मत्सनानं श्रुतानानं विभङ्गज्ञानमिति । दर्शनं त्रिभेदं चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमवधिद- निमिति । लन्धयः पञ्चविधा दानलन्धिाभलब्धि गलब्धिमपभोगलब्धिीयलन्धिरिति । सम्यक्त्वं चारित्रं संयमासंग्रम इत्येतेऽष्टादश क्षायोपशमिका भावा भवन्तीति । विशेपव्याख्या-मतिज्ञान, श्रतज्ञान, अवधिज्ञान तथा मनःपर्याय ज्ञान ये चार ज्ञान मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान तथा विमंगावधि ये तीन अज्ञान; चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधि- दर्शन ये तीन दर्शन; दानलब्धि, लाभलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि, तथा वीर्य- लब्धि ये पांच प्रकारकी लब्धि; इस प्रकार ज्ञानादि पन्द्रह और सम्यक्त्व, चारित्र, तथा संयमासंयम सब मिलाकर अठारह भेदवाला क्षायोपशमिक भाव है ॥ ५ ॥ गतिकपायलिङ्गमिथ्यादर्शनाजानासंयतासिद्धत्वलेझ्याश्चतुश्चतु- ख्येकककैकपभेदाः ॥६॥ सूत्रार्थ:-चार गति, चार कपाय, तीन लिङ्ग, मिथ्यादर्शन एक, अज्ञान एक, अ- संयत एक, असिद्धत्व एक, और लेख्या छह; ये औदयिक भावोंके २१ भेद हैं। भाप्यम्-तिचतुर्भदा नारकतैर्यग्योनमनुप्यदेवा इति । कपायश्चतुर्भेदः क्रोधी मानी मायी लोभीति । लिङ्गं त्रिभेदं बीपुमानपुंसकमिति । मिथ्यादर्शनमेक्रभेदं मिथ्यावृष्टिरिति । अज्ञानमेकभेदमन्नानीति । असंयतत्वमेकभेदमसंयतोऽविरत इति । असिद्धत्वमेकभेदमसिद्ध इति । एकभेदमेकविधमिति । लेझ्या पभेदाः कृष्णलेश्या नीललेश्या कापोतलेश्या तेजो- लेश्या पद्मलेश्या शुक्ललेश्या । इत्येते एकविंशतिरौंदयिकभावा भवन्ति । .

४० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् विशेपव्याख्या-नारक, तैर्यग्योनि मनुष्य और देव ये चार गति; क्रोध, मान, माया, तथा लोभ ये चार कपाय; स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये तीन लिङ्ग मिथ्या- दृष्टिरूप मिथ्यादर्शन एक, अज्ञान एक, अविरत असंयतरूप असंयत एक, असिद्धत्व एक, और कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेझ्या पद्मलेझ्या तथा शुक्ललेश्या इस प्रकार सब मिलकर इक्कीस प्रकार औदयिक भाव है ॥ ६ ॥ जीवभव्याभव्यत्वादीनि च ॥७॥ सूत्रार्थ:-जीवत्व, भव्यत्व, और अभव्यत्व ये तीनों पारिणामिक भाव हैं । भाग्यम्-जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वमित्येते त्रयः पारिणामिका भावा भवन्तीति । आदि- ग्रहणं किमर्थमिति । अत्रोच्यते । अस्तित्वमन्यत्वं कर्तृत्वं भोक्तृत्वं गुणवत्त्वमसर्वगतत्वमना- दिकर्मसन्तानवद्धत्वं प्रदेशत्वमरूपत्वं नित्यत्वमित्येवमादयोऽप्यनादिपारिणामिका जीवस्य भावा भवन्ति । धर्मादिभिस्तु समाना इत्यादिग्रहणेन सूचिताः । ये जीवस्यैव वैशेपिकाते स्वशब्देनोक्ता इति । एते पञ्च भावाखिपञ्चाशद्भेदा जीवस्य स्वतत्त्वं भवन्ति । अस्तित्वाद- यश्च । किं चान्यत्--- विशेषव्याख्या-जीवत्व, भव्यत्व, तथा अभव्यत्व आदि पारिणामिक भाव हैं। पारिणामिक भावके तीन ही भेद कहे हैं, तब इस सूत्रमें आदिग्रहण क्यो किया.? इसका उत्तर कहते हैं:-अस्तित्व, अन्यत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, गुणवत्व, असर्वगतत्व, अनादि- कर्मसन्तानवद्धत्व, प्रदेशत्व, अरूपत्व तथा नित्यत्व, इत्यादि और भी अनादिकालसिद्ध पारिणामिक भाव जीवके हैं। और ये अस्तित्वादि भाव धर्मादिके समान हैं, इसलिये आदिग्रहणसे उनको भी सूचित किया है। जो जीवके वैशेपिक अर्थात् जो विशेप करके जीवमें ही होते हैं, उनको तो पृथक् २ स्व शब्दसे कहा है । ये औपशमिकादि पांचों भाव मिलके त्रिपञ्चाशत अर्थात् ५३ भेद जीवके स्वतत्त्व हैं, अर्थात् निज विशेष भाव हैं, जो कि जीवमें ही होते हैं । और अस्तित्वादि भी जीवके भाव हैं ॥ ७ ॥ और भी कहते है:- उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ सूत्रार्थः-उपयोगवत्ता जीवका लक्षण है । भाग्यम्-उपयोगो लक्षणं जीवस्य भवति । विशेपच्याख्या-जीवका उपयोग लक्षण होता है अर्थात् जीव उपयोगलक्षणयुक्त होता है.॥ ८ ॥ स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥ सूत्रार्थ:-वह उपयोग दो प्रकारका है। एक अष्टविध है, और दूसरा चतुर्विध है। भाष्यम्-स उपयोगो द्विविधः साकारोऽनाकारश्च ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्चेत्यर्थः । १

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Sabhashyatatwarthadhigamsutram

Author
Madumaswati
Title
Sabhashyatatwarthadhigamsutram
File name
Sabhashyatatwarthadhigamsutram
Text
OCR done
Published
2009/10
Publisher
Mumbai, Param Shrut Prabhavak Mandal
Language
Sanskrit
Pages
42
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344188
Barcode
99999990234067.00
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Banasthali University
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