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Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-i

Maharishi,vedvyas · 2012/08

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महाभारन [ आदिपर्च सुखासीनानभ्यगच्छद्रह्मन् संशितव्रतान् । विनयावनतो भूत्वा कदाचित् सूतनन्दनः ॥ २ ॥ तमाश्रममनुप्राप्त नैमिषारण्यवासिनाम् चित्राः श्रोतुं कथास्तत्र परिवब्रुस्तपस्विनः ॥ ३ ॥ अभिवाद्य मुनीस्तांस्तु सर्वानेव कृताञ्जलिः । अपृच्छत्स तपोवृद्धिं सद्भिश्चैवाभिपूजितः ॥ ४ ॥ अथ तेपूपविष्टेषु सर्वेष्वेव तपस्विषु । निर्दिष्टमासनं भेजे विनयाल्लोमहर्षणिः ॥ ५ ॥ सुखासीनं ततस्तं तु विश्रान्तमुपलक्ष्य च । अथापृच्छदृपिस्तत्र कश्चित् प्रस्तावयन् कथाः ॥ ६ ॥ कुत आगम्यते सौते क्व चायं विहृतस्त्वया । कालः कमलपत्राक्ष शंसतत् पृच्छतो मम ॥ ७॥ एवं पृष्ठोऽब्रवीत् सम्यग्यथावल्लौमहर्पणिः । वाक्यं वचनसंपन्नस्तेषां च चरिताश्रयम् ॥ ८॥ तस्मिन् सदसि विस्तीर्णे मुनीनां भावितात्मनाम् । सौतिग्वाच-जनमेजयस्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः ॥ ९ ॥ ऐमे कदाचित् मूतकुर को प्रसन करने वाले सुग्व पूर्वक विराजमान सूत जी को जानकर कथाओं उग्रश्रवा विनय मे नम्र होकर मुग्व से विराजमान का प्रस्ताव ( मुग्वनन्ध ) करता हुआ पृघ्ने लगा॥६॥ गानकादि म मपियों के समीप आये ॥२॥ हे सूतपुत्र ' आपका कहा से यहा आना हुआ सूत जी को देखकर मव कपि विचित्र कथा और यह समय आपने कहा कहा विहरण से व्यतीत मुनने की अभिलपा से चारों ओर घेर कर बंट गए । क्यिा। हे कमल के महश विशाल लोचन यह मुझ मूतपुत्र ने नग्रता पूर्वक हाथ और करमरको मे आप क्थन कीजिये ॥७॥ प्रणाम करके तपोवृद्धि का समाचार पृछा, उन मर ऐमा पृाने पर रोमहर्पण के पुत्र जो कि कहने गंगों ने भी सत जी का बडा आदर मन्कार किया। में बंड कुशल ये उन के चरिती का आश्रय वाक्य उम इमर अनन्नर गेमहर्पण के पुत्र (उप्रश्रवा जी) उन ममा में क्थन करने ग॥८॥ मव नपम्पिया के यथा ग्धान घट जान पर आप भी जो विस्तृत ममा उन भाविता मा मुनियों में निर्देश दिये आगन पर विगजमान हो गय ॥३- शोभायमान थी। मृतपुर जी योर-हे महर्षियो नय उन में से कोई एक ऋपि विधाम पर महात्मा राना जनमेजय के मर्प यन में वैमम्पायन .

आदिपर्व] महाभारन 3 समीपे पार्थिवेन्द्रस्य सम्यक् पारिक्षितस्य च । कृष्णद्वैपायनप्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः ॥ १० ॥ कथिताश्चापि विधिवद्या वैशम्पायनेन वै । श्रुत्वाऽहं ता विचित्रार्था महाभारतसंश्रिताः ॥ ११ ॥ वहूनि संपरिक्रम्य तीर्थान्यायतनानि च। समन्तपंचकं नाम पुण्यं द्विजनिपेवितम् ॥ १२॥ गतवानस्मि तं देशं युद्धं यत्राभवत् पुरा । कुरूणां पाण्डवानां च सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥ १३ ।। दिदृक्षुरागतस्तस्मात् समीपं भवतामिह । आयुप्मन्तः सर्व एव ब्रह्मभूता हि मे मताः । अस्मिन् यज्ञे महाभागाः सूर्यपावकवर्चसः ॥ १४ ॥ कृताभिपेकाः शुचयः कृतजप्या हुताग्नयः । भवन्त आसने स्वस्था ब्रवीमि किमहं द्विजाः ॥ १५ ॥ पुराणसंहिताः पुण्याः कथा धर्मार्थसंश्रिताः । इतिवृत्तं नरेन्द्राणामृषीणां च महात्मनाम् ॥ १६ ॥ ऋपय ऊचुः-द्वैपायनेन यत् प्रोक्तं पुराणं परमार्षिणा। सुरैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव श्रुत्वा यदभिपूजितम् ॥ १७ ॥ जी ने कृप्याद्वपायन (वेदव्याम) रचित अनेक प्रकार पर विराजमान हुए हैं । पवित्र पुराणों की स्थाएँ, की पवित्र कथाओं का वर्णन किया था वहां मैन सर्व राजाओं के इतिहाम, महात्माओं के जीवन चरित्र, कथाएँ सुनी । महाभारत नामक विचित्र अर्थो वारी जो आप कहें मो मैं सुनाऊँ ॥१३॥१६॥ उन कथाओं को सुनकर बहुत मे तीर्थ और आश्रमों ऋपि बोले-वेदव्याम जी ने जो पुराण कथन में घूमते घूमते द्विजों मे गोभित ममन्तपञ्चक नाम किये हैं देवता और ब्रह्मर्पियोंने जिम की स्तुति की पुण्य देशमें गया जहा पर पहिले कुरु पाण्टवों का है, आम्ल्यानकों में श्रेष्ठ आश्चर्य देने वाले पद-मन्धि- मनाम हुआ था ॥९॥१२॥ गूढ अर्थ और न्याय मे युक्त वेद अर्थों में अलकृत, वहा से आप लोगों के दर्शन करने की इच्छा मिले हुए अर्थ मे युक्त सम्कार की गई भारत नामक से सेवा में उपस्थित हुआ है । इस यजमें आप सपने इतिहास अनेक मात्रों के आगय लिये हुए ब्रह्मोप- अभिषेक (यज्ञान्तम्नान ) क्यिा है पवित्र होकर देश देने वाली, पवित्र कथा हमे सुनाओ॥१७॥१९॥ जप और अग्निहोत्र करके म्वन्यचित होकर आमनों जनमेजय राजा के यन में वेदव्याम जी की ४ महाभारत [ आदिपर्व तस्याख्यान वरिष्ठस्य विचित्र पद पर्वणः । सूक्ष्मार्थन्याय युक्तस्य वेदार्थभूषितस्य च ॥ १८ ॥ भारतस्येतिहासस्य पुण्यां ग्रंथार्थसंयुताम् । संस्कारोपगतां ब्राह्मीं नाना शास्त्रोपवृंहिताम् ॥ १९ ॥ जनमेजयस्य यां राज्ञो वैशम्पायन उक्तवान् । यथावत् स ऋपिस्तुष्टया सत्रे द्वैपायनज्ञया ॥ २० ॥ वेदैश्चतुर्भिः संयुक्तां व्यासस्याद्भुतकर्मणः। संहितां श्रोतुमिच्छामः पुण्यां पापभयापहाम् ॥ २१ ॥ सौतिरुवाच-आद्यं पुरुपमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् । ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥ २२ ॥ असच्च सदसञ्चैव यद्विश्वं सदसत्परम् । परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ २३॥ मङ्गल्यं मंगलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् । नमस्कृत्य हृपीकेशं चराचरगुरुं हरिम् ॥ २४ ॥ महर्षेः पूजितस्येह सर्वलोकैर्महात्मनः। प्रवक्ष्यामि मतं पुण्यं व्यासस्याद्भुतकर्मणः ॥ २५ ॥ आचख्युः कवयः केचित् संप्रत्याचक्षते परे। आग्ब्यास्यन्ति तथैवान्य इतिहासमिमं भुधि ॥ २६ ॥ आजा मे यह वैगम्पायन जिम क्था को स्तुति करके बडे बडे कठिन तप और प्रत धारण किये जाते है । यथारत कहते हुए ॥ २० ॥ उन इन्द्रियों का स्वामी, चराचर जगत के गुरु, विश्व उप्रश्रया मृत ने कहा-जो इस स्थर और का पारन करने वाग, अनादि, अनन्त, मङ्गल फा मूक्ष्म मम्पूर्ण ब्रह्माण्डमण्टर के आदि पुरष और देने वारा, और मङ्गलरूप, हरिके चरणों में नमस्कार ईश्वर है, निमशा नाम लेकर बहुत रोग हवन और करके महात्मा वेदव्यास के कटे हुए पवित्र इतिहास म्नुनि पर से है, निन फो अद्वितीय एकमात्र मन्य का में वर्णन करता हूँ ॥ २२ ॥ २५ मप परब्रल पहले , जो मत और अमन है, इम इतिहास का ममार में कवियों ने पहिले भी निन गिय पहुन पुरप ईवन होकर यम आहुति वर्णन किया है, अप भी वर्णन कर रहे है और आगे पोरन है, जिनकी याहुन रोग महिमा करते है, जो भी वर्णन करेंगे ॥ २६ ॥ मनानन अपिनानी है, जिन को प्राम करने निय यह इनिहाम तीनों को मरा हुआ है। .

आदिपर्व] महाभारत इदं तु त्रिषु लोकेषु महज्ज्ञानं प्रतिष्ठितम् । विस्तरैश्च समासैश्च धार्यते यद्विजातिभिः ॥ २७ ॥ अलंकृतं शुभैः शब्दैः समयैर्दिव्यमानुषैः । छन्दोवृत्तैश्च विविधैरन्वितं विदुषां प्रियम् ॥ २८ ॥ निष्प्रभेऽस्सिन्निरालोके सर्वतस्तमसावृते। वृहदण्डमभूदेकं प्रजानां वीजमव्ययम् ॥ २९ ।। युगस्यादौ निमित्तं तन्महद्दिव्यं प्रचक्षते । यस्मिन् संश्रयते सत्यं ज्योतिर्ब्रह्म सनातनम् ॥ ३० ॥ अद्भुतं चाप्यचिंत्यं च सर्वत्र समतां गतम् । अव्यक्तं कारणं सूक्ष्मं यत्तत्सदसदात्मकम् ॥ ३१ ॥ यस्मात् पितामहो जज्ञे प्रभुरेकः प्रजापतिः । ब्रह्मा सुरगुरुः स्थाणुर्मनुः कः परमेष्ठयथ ॥ ३२ ॥ प्राचेतसस्तथा दक्षो दक्षपुत्राश्च सप्त वै । ततः प्रजानां पतयः प्राभवन्नेकविंशतिः ॥ ३३ ॥ पुरुषश्चाप्रमेयात्मा यं सर्व ऋषयो विदः । विश्वेदेवास्तथादित्या वसवोऽथाश्विनावपि ॥ ३४ ॥ ब्राह्मण लोग इसे भली भान्ति धारण किये हुए है। हुए। उसके बाद स्थाणु, म्वायभुव मनु, दन प्रचेता यह महाभारत ग्रंथ अनेक भान्ति के छन्दों तथा अलं. दक्ष, दक्ष के सात पुत्र, सप्त ऋषि और चौदह मनु पैदा कारों करके, अच्छे कोमल और मधुर शब्दों और हुए । फिर वह अप्रमेय. विराट् पुरुष उत्पन्न हुआ। वहुत ही मनोहर भावों से भरा हुआ है। इसलिये वि- फिर दग विश्वेदेवा, बारह आदित्य, आठ वसु, अश्वि- द्वान् लोग इसका बहुत आदर करते है ॥२७/२८॥ नीकुमार, यक्ष, साध्यगण, पिशाच, गुह्यक, और पितृ- पहिले यह मारा संमार घोर अंधकार से ढका गण उत्पन्न हुए। पश्चात् सब गुणों से सुशोभित विद्वान् हुआ था। इसमें प्रकाश और ज्योति नहीं थी। इसके ब्रह्मर्पि, और राजर्पियों ने जन्म लिया। फिर जल, पश्चात् जगत् का चीज ज्योतिमय एक बड़ा अण्डा पृथिवी, म्वर्ग, वायु, आकाश, दश दिशायें, वर्ष उत्पन्न हुआ। टम अडे के भीतर आदि और अन्त ऋतु, माम, पक्ष, दिन, रात्रि और सब पदार्थ धौरे २ मे रहित, अचिन्तनीय, सत्य, मनातन, ज्योतिर्मय, उत्पन्न हुए ॥३२॥३७॥ परब्रह्म ने प्रवेश किया ॥२९॥३१॥ जब प्रलय का समय आवेगा तब इस विगाल फिर उस अंटे मे भगवान् प्रजापति ब्रमा उत्पन्न विश्व का लोप होजायगा । जैसे ऋतुओं के आरम्भ .

महाभारत
[ आदिपर्य
यक्षाः साध्याः पिशाचाश्चगुह्यकाः पितरस्तथा ।
ततः प्रसूता विद्वांसः शिष्टा ब्रह्मर्पिसत्तमाः ॥ ३५ ॥
राजर्षयश्च बहवः सर्वे समुदिता गुणैः ।
आपोद्यौः पृथिवी वायुरन्तरिक्षं. दिशस्तथा ॥ ३६ ॥
संवत्सरतवो मासाः पक्षाहोरात्रयः क्रमात् ।
यच्चान्यदपि तत्सर्वं संभूतं लोकसाक्षिकम् ॥ ३७ ॥
यदिदं दृश्यते किंचिद् भूतं स्थावरजंगमम् ।
पुनः संक्षिप्यते सर्व जगत्प्राप्ते युगक्षये ॥ ३८ ॥
यथावृतुलिंगानि नाना-रूपाणि पर्यये।
दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ ३९ ॥
एवमेतदनाद्यन्तं भूत-संहार-कारकम् ।
अनादिनिधनं लोके चक्र संपरिवर्तते ॥ ४० ॥
त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि त्रयस्त्रिंशच्छतानि च ।
त्रयस्त्रिंशच्च देवानां सृष्टिः संक्षेपलक्षणा ॥ ४१ ॥
दिवः पुत्रो बृहद्भानुश्चक्षुरात्मा विभावसुः ।
सविता स ऋचीकोऽर्को भानुराशावहो रविः ॥ १२ ॥
पुत्रा विवस्वतः सर्वे सह्यस्तेषां तथावरः ।
देवभ्राट् तनयस्तस्य सुभ्राडिति ततः स्मृतः ॥ ४३ ।।
सुभ्राजस्तु प्रयः पुत्राः प्रजावन्तो बहुश्रुताः ।
दशज्योतिः शतज्योतिः सहस्रज्योतिरेव च ॥ १४ ॥
में उमफे तरह तरह के चिन्द फल फुलआदि और तेतीम मा से नैतीस हमार उत्पन्न हुए।।४१।१२।।
दिखाई पड़ने है और पातु बदलने के समय वह मर इन गय में मह जो मर मे छोटे थे उनके
चिन्ह एक एक करके अन्त होजाते हैं चमे ही युग देवनात पुत्र उत्पन्न हुआ । देवमात के मुनाद नामी
के आरम्म में मय वातुएं उत्पन्न होती और प्रलय पुत्र रम उत्पन्न हुआ। मुनाद के तीन पुत्र उत्पन्न
पाल मगन नजानी हैं । इसी प्रकार में ही यह हुए नाग्योति, नज्योनि और महयज्योनि
मंमार चक्रमर्षदा पदरता रहता है॥८॥१०॥
शित उम अंम नेनीम देवता उत्पन्न हुए। दगग्यानि पं. दहा हजार पुग्न उत्पन्न हुए।
।
॥४३॥22॥

आदिपर्व ] महाभारत ७ दश पुत्रसहस्राणि दशज्योतेर्महात्मनः । ततो दशगुणाश्चान्ये शतज्योतेरिहात्मजाः ॥१५॥ भूयस्ततो दशगुणाः सहस्रज्योतिषः सुताः । तेभ्योऽयं कुरुवंशश्च यदूनां भरतस्य च ॥१६॥ ययातीक्ष्वाकुवंशश्चं राजर्षीणां च सर्वशः । संभूता बहवो वंशा भूतसर्गाः सुविस्तराः ॥ ४७ ॥ भूतस्थानानि सर्वाणि रहस्यं त्रिविधं च यत् ।। वेदा योगः सविज्ञानो धर्मोऽर्थः काम एव च ॥१८॥ धर्मकामार्थयुक्तानि शास्त्राणि विविधानि च । लोकयात्राविधानं च सर्व तद् दृष्टवानृपिः ॥ १९ ॥ .इतिहासाः सवैयाख्या विविधाः श्रुतयोऽपि च । इह सर्वमनुक्रान्तमुक्तं ग्रन्थस्य लक्षणम् ॥ ५० ॥ विस्तीर्यंतन्महज्ज्ञानमृपिः संक्षिप्य चाबवीत् । इष्टं हि विदुपां लोके समासव्यासधारणम् ॥ ५१ ॥ मन्त्रादि भारतं केचिदास्तीकादि तथा परे । तथोपरिचराद्यन्ये विप्राः सम्यगधीयते ॥ ५२ ॥ गतज्योति के एक लक्ष और सहस्रज्योति के दशलक्ष जो जो इतिहास तथा श्रुतियों का वर्णन किया है। पुत्र उत्पन्न हुए। उनहीं से कुस्वय, यदुवा, मरत- उन सरको क्रम में इस प्रथम अध्याय में वर्णन वश, ययाति वग, इश्वाकु वा, आर-और बहुत मे करते है।॥१८॥५०॥ वग और बहुत मी जातिया उत्पन्न हुई । वही सब कुछ लोग इसको नक्षेपरूप में जानना चाहते हैं, वश इस समय पृथिवी पर फेले हुए हैं ॥४५॥४७॥ और कोई कोर्ट विद्वान् इसे विस्तार पूर्वक जानना सव भृतों के रहने के स्थान तीन प्रकार के चाहते हैं। ऐमा जान कर वेदव्यामजी ने इम रम्य, कर्म उपासना और जान आदि काड, धर्म, अन्य में ऊपर लिम्बे हुए विषयों का वर्णन सक्षेप अर्थ ओर काम के देने वाले अनेक प्रकार के रूप में भी किया है और विस्तार से भी किया है। मात्र अर्थात् म्मृति, नीति. मीमामा, कोकशास्त्र, कोई कोई बुद्धिमान् ब्राह्मण 'नारायण नमस्कृत्य इस वेदगात्र जमे आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि इन रोक मत्र से, कोई आम्तीक वश से ओर कोर्ट उपरिचर से सम्बन्ध रखने वाले शास्त्रों को महर्षि वेदव्यास राजा की कथा में ग्रन्थ का आरम्म समझ कर अपने योगनल से जानते थे। अब उस अन्य में पढ़ने लगते है। कई जानी रोग इस भारत के ८ महाभारत [ आदिपर्व विविधं संहिताज्ञानं दीपयन्ति मनीषिणः । व्याख्यातुं कुशलाः केचिद् ग्रन्थान् धारयितुं परे ॥ ५३॥ तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम् । इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ॥ ५४॥ पराशरात्मजो विद्वान् ब्रह्मर्पिः संशितव्रतः । तदाख्यानवरिष्ठं स कृत्वा द्वैपायनः प्रभुः ॥ ५५॥ कथमध्यापयानीह शिष्यानित्यन्वचिन्तयत् । तस्य तच्चिन्तितं ज्ञात्वा ऋद्वैपायनस्य च ॥ ५६ ॥ तत्राजगाम भगवान् ब्रह्मा लोकगुरुः स्वयम् । प्रीत्यर्थं तस्य चैवर्लोकानां हितकाम्यया ॥ ५७ ॥ तं दृष्ट्वा विस्मितो भूत्वा प्रांजलिः प्रणतः स्थितः। आसनं कल्पयामास सर्वैर्मुनिगणैर्वृतः ॥ ५८॥ हिरण्यगर्भमासीनं तस्मिंस्तु परमासने । परिवृत्यासनाभ्याशे वासवेयः स्थितोऽभवत् ॥ ५९ ॥ अनुजातोऽथ कृष्णस्तु ब्रह्मणा परमेष्टिना । निपसादासनाभ्याशे पीयमाणः शुचिस्मितः ॥ ६० ॥ गृह मर्म । विषयों ) पर विचार करके लोगों संमार के हित की इच्छा मे म्वय वहां उपस्थित हुए। जाने । उनमें कोई कोई ना अपूर्व व्याख्या करते उन्हें देखकर व्याम जी को बड़ा विम्मय (हैरानगी ) है और कोई इमयो धारण करने में कुमाल ( चतुर ) हुआ । मय ऋषियों महिन व्याम जी ने ब्रामा जी को प्रणाम किया और मुन्दर आमर पर उनको बड़े आदर ग्रनपि ब्याग जी ने अपनी नपस्या और तंज. और मन्कार में बैठाया।न्याम जी हाथ जोड़ कर परफे. प्रभार मे चाग वेदों क. मागाया ममह का मामने बडे रहे । ब्रम्मा जीदी आजा पाकर व्यासनी इस पवित्र निरप यो ग्ना है । नब उनके चित उनके गम बंट गये ॥ ५४॥५०॥ में या पिगार दान आरिम पवित्र इनिताम धोटी देर बाद महर्षि व्याम जी प्रमा जी से पीपना पचान नगमिमगर अपन मिष्यों फॉग लगे, कि भगवन् ! मने एकोमा पवित्र पान्य दीका मांगा । मपि गायन दिव्याग दो ग्ना जिसनदा फेमय अग राम्य उपनिषद वेटों infपन्ना में पाए जान पर, गर भनिनान पीरिया. अंक निहाग मार पुगणों वा यांत, भृत, भगवान माना ग्यामना दामन वग्ने कंप. भविष्यन और पमान इन नानी बालों का वर्णन है। मम- - आदिपर्व] महाभारत उवाच स महातेजा ब्रह्माणं परमष्ठिनम् । कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम् ॥ ६१ ॥ ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चान्यत् स्थापितं मया । सांगोपनिपदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया ॥ ६२ ॥ इतिहासपुराणानामुन्मेषं निर्मितं च यत् । भूतं भव्यं भविष्यं च त्रिविधं कालसंज्ञितम् ॥ ६३॥ जरामृत्यु-भय-व्याधि-भावाभाव-विनिश्चयः विविधस्य च धर्मस्य ह्याश्रमाणां च लक्षणम् ॥ ६४॥ चातुर्वर्ण्यविधानं च पुराणानां च कृत्लशः । तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्चन्द्रसूर्ययोः ॥ ६५॥ ग्रह-नक्षत्र-ताराणां प्रमाणं च युगैः सह । ऋचो यपि सामानि वेदाध्यात्म तथैव च ॥ ६६ ॥ न्यायः शिक्षा चिकित्सा च दानं पाशुपतं तथा। हेतुनैव समं जन्म दिव्यमानुपसंज्ञितम् ॥ ६७॥ तीर्थानां चैव पुण्यानां देशानां चैव कीर्तनम् । नदीनां पर्वतानां च बनानां सागरस्य च ॥ ६८॥ पुराणां चैव दिव्यानां कल्पानां युद्धकौशलम् । वाक्यजातिविशेषाश्च लोकयात्राक्रमश्च यः ॥ ६९ ॥ बुढ़ापा, जन्म, मरण, भय, व्याधि, इनके होने न होने यन, सागर, दिव्यपुरी, युद्ध कौशल, विशेष विशेष का निश्चय, और अनेक प्रकार के धर्म आश्रमों के जातियों का वर्णन है; लौकिक आचार व्यवहार का लक्षण, सब पुराण चारों वर्षों का विधान, तप और भी वर्णन है। इस सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त ब्रह्म का ब्रह्मचर्य का तत्व बतलाया गया है। सूर्य, चद्रमा, प्रतिपादन ही इस ग्रन्थ का मुख्य उद्देश्य है । परन्तु पृथवी, गृह, नक्षत्र, तारागण और युगों का परिमाण, मुझे इस जगत् में इम महान् ग्रन्थ को लिखने के ऋगवेद, मामवेद, यजुर्वेद, वेदांत विद्या, दर्शन लिये कोई योग्य लेखक नहीं देख पड़ता ॥६०/७०! शास्त्र, वैद्यक, दान, पाशुपत धर्म आदिका भली भांती यह सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि मैं तुमको इस वर्णन है। मंसार में होने वाले भगवान् के दिव्य अव. रहस्य और ज्ञान के जानने से बड़े बड़े तपस्वियों तारों का वर्णन है पवित्र तीर्थ, देश, नदी, पर्वत, । से मी श्रेष्ठ समझता हूं। तुमने जन्म से लेकर आज ।

महाभारत [ आदिपर्व यच्चापि सर्वगं वस्तु तच्चैव प्रतिपादितम् । परं न लेखकः कश्चिदेतस्य भुवि विद्यते ॥ ७॥ ब्रह्मोवाच-तपो विशिष्टादपि वै विशिष्टान्मुनिसंचयात् । मन्ये श्रेष्ठतरं त्वां वै रहस्यज्ञानवेदनात् ॥ ७१ ॥ जन्मप्रभृति सत्यां ते वेझि गां ब्रह्मवादिनीम् । त्वया च काव्यमित्युक्तं तस्मात्काव्यं भविष्यति ॥७२॥ अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणे। विशेषणे गृहस्थस्य शेपास्त्रय इवाश्रमाः ॥७३॥ काव्यस्य लेखनार्थाय गणेशः स्मर्यतां मुने । मौतिश्याच--एवमाभाष्य तं ब्रह्मा जगाम स्वं निवेशनम् ॥ ७४॥ ततः सस्मार हेरम्वं व्यासः सत्यवतीसुतः । स्मृतमात्री गणेशानो भक्त-चिन्तितपूरकः ॥७५ ॥ तत्राजगाम विघ्नेशो वेदव्यासो यतः स्थितः। पूजितश्चोपविष्टश्च व्यासेनोक्तस्तदाऽनघ ॥ ७६॥ लेखको भारतस्यास्य भव त्वं गणनायक । मयेव प्रोच्यमानस्य मनसा कल्पितस्य च ॥ ७७॥ श्रुत्वेतप्राह विघ्नेशो यदि मे लेखनी क्षणम् । लिखतो नावतिष्ठेत तदा स्यां लेखको त्यहम् ॥ ७८ ॥ नक कभी अन्यथा नही पहा । तुम्हारे मुख से सदा को चले गये ) ॥७१७४६ प्रम-गम्बंधी याक्य ही निकल करते है । तुमने इस फिर मत्यवती के पुत्र व्याम जी ने हेरम्म अन्य को पाव्य पहा इममे इम पृथवी पर यह (गणेशजी) का म्मरण किया। मो गणेश जी अपने पाच्याही पायेगा । जो मय आश्रमों में गृहस्थ भक्तों का मनोरथ पूरा करने वाले व्यास जी के ध्यान आम थष्ठ है नगदी मप छायों में मुम्हाग यह परत ही यहा आन पहुंचे। व्याम ने उनको पाय भ्रष्ट समझा जायगा। दाई भी विहान पपि आये हुए जानकर योचित मत्कार करके मुदर गगे गुन्दर मान्य नहीं रव मांगा। अप नुमाइमक आमन दिया और हाथ जोड़ पर कहा--गणेश जी, शिगन पिगंगा जी का ध्यान करो। यह मन भारत नाम का एक दाव्य रना है, आप मंमार परपर ममात्री ना अन्नधान हो गये (अपनगंक के उपचार के लिय निगढीनिय-म बोलना जाऊँगा। । wwwwwwwwwwwww N आदिपर्व] महाभारत Akachakickass व्यासोऽप्युवाच. तं देवमवुध्वा मा लिख कचित् । ओमित्युक्त्वा गणेशोऽपि वभूव किल लेखकः ॥ ७९ ॥ ग्रन्थयन्थि तदा चक्रे मुनिगूढं कुतुहलात् । यस्मिन् प्रतिज्ञया प्राह मुनिद्वैपायनास्त्विदम् ॥ ८ ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । अहं वेद्मि शुको वेत्ति संजयो वेत्ति वा न वा ॥ ८१ ॥ तत् श्लोककूटमद्यापि ग्रथितं सुदृढं मुने । भेत्तुं न शक्यतेऽर्थस्य गूढत्वात् प्रश्रितस्य च ॥ ८२ ॥ सर्वज्ञोऽपि गणेशो यत् क्षणमास्ते विचारयन् । तावञ्चकार व्यासोऽपि श्लोकानन्यान् वहूनपि ॥ ८३ ॥ अज्ञानतिमिरांधस्य लोकस्य तु विचेष्टतः । ज्ञानाञ्जनशलाकाभिर्नेत्रोन्मीलनकारकम् ॥८४ ॥ धर्मार्थकाममोक्षार्थः समासव्यासकीर्तनैः। * तथा भारतसूर्येण नृणां विनिहतं तमः ॥ ८५ ॥ पुराणपूर्णचन्द्रेण श्रुतिज्योत्स्नाः प्रकाशिताः । नृवुद्धिकरवाणां च कृतमेतत्प्रकाशनम् ॥ ८६ ॥ यह सुनकर गणेश जी ने उत्तर दिया—मैं इस गर्त न ही समझा जा सकता है । गणेश जी भी यद्यपि पर लेखक होने को तैय्यार हूं कि क्षणभर भी मेरी सर्वज्ञ थे परन्तु उनको भी अर्थों में क्षणभर विचार कलम रुकने न पावे ॥७५/७८॥ करना पड़ता था। उसी समय में व्यास जी और व्यास जी बोले-अच्छी बात है; किन्तु आप भी । बहुत से श्लोकों की रचना कर लेते थे ॥७९।८३।। ठीक अर्थ समझे बिना नहीं लिखना। गणेश जी ने यह महाभारत अज्ञान के अन्धकार से घिरे यह बात स्वीकार कर लिखना प्रारम्भ कर दिया। हुए लोगों के आगे से मोह रूपी पर्दे को हटाकर इस महाभारत में व्यास जी ने आठ हजार आठ सौ उनकी ज्ञान की आंखें खोलने वाला सूर्य है । इतनी श्लोक ऐसे कूट और कठिन (जिसका अर्थ सहज । कथा सुनाकर सूत पुत्र बोले कि हे ऋषियो ! इसमें में ममझ न आसके ) जहां जहां लिखवाये कि उनके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का विस्तार पूर्वक वर्णन बारे में व्याम जी ने यह कहा है कि इनका ठीक अर्थ किया गया है। महाभारत-रूपी पूर्ण चन्द्र ने पृथवी या तो मैं जानता हूं या शुकदेव जी जानते है और ; पर प्रकट होकर, श्रुतियों की किरणें फैलाकर, कुमुद सञ्जय के बारे में ठीक नहीं कहा जा सकता है और के समान उज्ज्वल भनुप्यों की बुद्धि को विकसित १२ महाभारत [ आदिप पर्जन्य इव इतिहास-प्रदीपेन मोहाऽऽवरण-घातिना । लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत्संप्रकाशितम् ॥ ८७ ॥ संग्रहाध्यायत्रीजो वै पौलोमास्तीकमूलवान् । संभवस्कन्धविस्तारः संभारण्याविटंकवान् ॥८८ ॥ अरणीपर्वरूपाढयो विराटोद्योग--सारवान् । भीप्मपर्वमहाशाखो द्रोणपर्वपलाशवान् ॥ ८९ ॥ कर्णपर्वसितैः पुप्पैः शल्यपर्वसुगन्धिभिः । स्त्रीपर्वपीकविश्रामः शांतिपर्वमहाफलः ॥९० ॥ अश्वमेधाऽमृतरसस्त्वाश्रम-स्थान-संश्रयः मौसलः श्रुतिसंक्षेपः श्रुतिसंक्षेपः शिष्टद्विजनिपेवितः ॥ ९१ ॥ सर्वेपां कविमुख्यानामुपजीव्यो भविष्यति । इव भूतानामक्षयो भारतद्रुमः ॥ ९२ ॥ मोतियाच-तस्य वृक्षस्य वक्ष्यामि शश्वत्पुष्पफलोदयम् । स्वादु-मध्य-रसोपेतमच्छेद्यममरैरपि ॥ ९३॥ करके विमल बनाया है । यह इतिहास मोह को अश्वमेध पर्व इस फलका अमृत के समान रस मिटाने के लिये एक दीपक के समान है। इसने है । आश्रम पर्व इस वृक्ष के नीचे बैठने का स्थान है। संसार भर को नान के प्रकाश से प्रकाशित कर रक्स्या मोसल पर्व इस वृक्ष की लम्बी शाखाओं के आगे का १॥८४८७) हिम्सा है। और इस माहभारत रूपी वृक्ष की उत्तम यह महाभारत एक बड़ा भारी वृक्ष है । संमहा कथा के सुनने वाले महात्मा लोग इस वृक्ष के फल के ध्याय इसका पीजह कालरोग और आप्तीक, इसकी ग्याने वाले पक्षी है । उसे मेघ के जल से तरह-तरह जर । सृष्टि के उपजने की जो कथा है वह एमके के अन्नादि उत्पन्न होकर लोगों की क्षुधा तृप्त करते रहनों का फलाव है। सभा पर्व पक्षियों के रहने के हैं वैसे ही इस महाभारत की कथाओं पर कवियों के पागले हैं। यन पर्व इम महान वृक्ष का सना है। फान्य नाटकादि मनुप्या का मन खुश करेंगे। विगद और उद्योग पर्व हम वृक्ष के मार भाग है। ॥९१०.२॥ मीन पर्व हमीभाया है। द्रोण पर दमक पत्ते हैं। इतनी कथा मुनकर सूत जी बोले कि मैं अय पण प म . मफेद फूल है । गल्य पर्य इन उमी वृक्ष के स्वादिष्ट और पवित्र रम भरे नित्य धर्म पुगेकी मुगन्धि हानी पर्व हम वृक्ष की छायाद। रूपी फल और फगे मे युक्त फया कहुंगा ॥१३॥ हम पर है॥८८॥ हे प्रापियो । पूर्व पालमें धर्मात्मा कृष्णद्वपा- - - wawowww आदिपर्व] महाभारत मातुर्नियोगाद्धर्मात्मा गांगेयस्य च धीमतः । क्षेत्र विचित्रवीर्यस्य कृष्णद्वैपायनः पुरा ॥ ९४ ॥ श्रीनग्नीनिव कौरव्याञ्जनयामास वीर्यवान् । उत्पाद्य धृतराष्ट्रं च पाण्डं विदुरमेव च ॥ ९५ ॥ जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति । तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम् ॥ ९६ ॥ अब्रवीद्भारतं लोके मानुषेऽस्मिन् महानृषिः । जनमेजयेन पृष्टः सन् ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ॥ ९७ ॥ शशास शिव्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके । स सदस्यैः सहासीनः श्रावयामास भारतम् ॥ १८ ॥ कर्मान्तरेषु यज्ञस्य चोद्यमानः पुनः पुनः । विस्तरं कुरुवंशस्य गांधार्या धर्मशीलताम् ॥ ९९ ॥ क्षत्तुः प्रज्ञां धृनि कुन्त्याः सम्यग्दैपायनोऽब्रवीत् । वासुदेवस्य माहात्म्यं पाण्डवानां च सत्यताम् ॥ १०० ॥ दुर्वृत्तं धार्तराष्ट्राणामुक्तवान् भगवानृषिः । इदं शतसहस्त्रं तु लोकानां पुण्यकर्मणाम् ॥ १०१ ॥ यन जी (वेदव्यास ) ने अपनी सत्यवती माता और कृपालु व्यास जी ने पास बैठे हुए अपने शिष्य श्री भीष्मपितामहके कहने मे विचित्रवीर्य के क्षेत्र में तीनों वैशम्पायन जी से महाभारत ग्रन्थ सुनाने की आना अग्नि के समान तेजवी तीन पुत्र उपजाये थे । वेद- दी। यज्ञ का मर्व कार्य समाप्त हो जाने पर वैशम्पा. व्यास जी महागज इस प्रकार मे धृतराष्ट्र,पाण्ड, यन जी नित्य उन महात्माओं को महाभारत सुनाने विदुर इन तीन मंतानों को जन्म देकर तपस्या के लगे ॥९७१९.८॥ लिए फिर आश्रम को चले गये । नियम के अनुमार भगवान् द्वैपायन ने इस महाभारतमें कौरवशी वहीं तीनों पुत्र जब वृद्धावस्था को प्राप्त होकर परलोक राजाओं का विस्तार, गान्धारी की धर्म शीतला, विदुर चले गये तब महर्षि व्याम जी ने यह महाभारत की पन्ना, ( समझदारी ) कुन्ती का धैर्य, कृष्ण का मारतवर्ष में प्रकागित (प्रकट) किया ॥९४४९६॥ महात्म्य, पाण्डवा की सत्यनिष्टा और धृतराष्ट्र के पुत्री अनन्तर जनमेजय राजा के मर्पयज्ञ में हजारों की दुष्टता का वर्णन अच्छी तरह किया है।९९।१००। ब्राह्मणों और म्वयं जनमेजय ने महाभारत इतिहाम व्यास जी ने प्रथम इस महाभारत को चौबीस सुनने की इच्छा प्रकट करके व्यासजी से प्रार्थना की। हज़ार लॉकों में निर्माण किया (बनाया) था। ।

१४ महाभारत [ आदिपर्य उपाख्यानैः सह ज्ञेयमाद्यं भारतमुत्तमम् । चतुर्विंशतिसाहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम् ॥ १०२ ॥ उपाख्यानविना तावद्भारतं प्रोच्यते बुधैः । ततोऽध्यर्धशतं भूयः संक्षेपं कृतवानृपिः ॥ १०३ अनुक्रमणिकाध्यायं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् । इदं द्वैपायनः पूर्वं पुत्रमध्यापयच्छुकम् ॥ १०४ ॥ ततोऽन्येभ्योनुरूपेभ्यः शिष्येभ्यः प्रददौ विभुः । पष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ॥ १०५ ।। त्रिंशच्छतसहस्रं च देवलोके प्रतिष्ठितम् । पित्र्ये पंचदश प्रोक्तं गन्धर्वेषु चतुर्दश ॥ १०६ ॥ एकं शतसहस्रं तु मानुषेषु प्रतिष्ठितम् । नारदोऽश्रावयद्देवानसितो देवलः पितॄन् ॥ १०७ ॥ गन्धर्वयक्षरक्षांसि श्रावयामास वै शुकः । अस्मिंस्तु मानुपे लोके वैशम्पायन उक्तवान् ॥ १०८ ॥ गियो व्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः । एकं शतसहस्रं तु मयोक्तं वै नियोधत ॥ १०९ ॥ दुर्योधनो मन्युमयो महाद्रुमः स्कन्धः कर्णः शकुनिस्तस्य शाखाः । दुःशासनः फलपुप्पे समृद्धे मूलं राजा धृतराष्ट्रोऽमनीषी ॥ ११ ॥ पंडित लोग चामिहनार इलोको ही को 'महाभारत' मनुष्यलोक में प्रतिष्ठित हुए है । देवलोक में नारद ने, पहा करता है। उसके पश्चात व्याम जी ने हेतु मा पितृलोक में असितदेवल ने और गन्धर्वलोक में शुक- शाका में मंक्षेप करफे या पहला अनुक्रमणिकाध्याय देव जी ने मुनाये थे । व्यामदेव जी के शिष्य वैशम्पायन बनाया। भगवान द्वायन ने पहले अपने पुत्र शुक्टेय मुनि ने जनमेजयके मर्प यज्ञ में एफ गय श्लोकों की जी की पाया; पछि ग अपने योग्य शिष्यों कमी जिग भारत मंहिता फोपनिन किया था यही में इम पंदा दिया। इस पर व्यागजी ने इस महाभारत ममय आप रोगों के मन्मुग कहता। आए लोग गाठ गपगपाम पहा । उमपंचल नीम गम एवाम चित होकर मुनिए ॥१०॥१०॥ गेम वर्ग में, पर गार झांक गिंक में, चोटा, दुर्योधन अहंकारी एक महा वृक्ष है । कर्ण उस माग्न र धनगर में मार पर गम काक का नना है । गुनि उसी गाया है। । दुचामन J आदिपर्व ] महाभारत युधिष्ठिरो धर्ममयो महाद्रुमःस्कन्धोऽर्जुनो भीमसेनोऽस्य शाखाः । माद्रीसुतौ पुष्पफले समृद्धे मूलं कृष्णो ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च ॥ १११ ॥ पाण्डुर्जित्वा वहून देशान् बुद्ध्या विक्रमणेन च । अरण्ये मृगयाशीलो न्यवसन् मुनिभिः सह ॥ ११२ ॥ मृगव्यवायनिधनात् कृच्छ्रां प्राप स आपदम् । जन्मप्रभृति पार्थानां तत्राचारविधिक्रमः ॥ ११ ॥ मानोरभ्युपपत्तिश्च धर्मोपनिपदं प्रति । धर्मस्य वायोः शक्रस्य देवयोश्च तथाश्विनोः ॥ ११ ॥ तापसैः सह संवृद्धा मातृभ्यां परिरक्षिताः । मेध्यारण्येषु पुण्येषु महतामाश्रमेषु च ॥ ११५ ॥ ऋपिभिर्यत्तदानीता धार्तराष्ट्रान् प्रति स्वयम् । शिशवश्चाभिरूपाश्च जटिला ब्रह्मचारिणः ॥ ११६ ॥ पुत्राश्च भ्रातरश्चेमे शिष्याश्च सुहृदश्च वः । पाण्डवा एत इत्युक्त्वा मुनयोऽन्तर्हितास्ततः ॥ ११७ ॥ उसका फल और फूल है। अजान से अन्धे, बुद्धि तव मर जायेगा। राजा पाण्डु उस शाप से बहुत डरकर हीन धृतराष्ट्र उसकी जड़ है । युधिष्ठिर धर्ममय एक अपने स्थान पर आये )। कुन्ती ने धर्म, वायु, और बड़ा भारी वृक्ष है । अर्जुन उसका तना है । भीमसैन । इन्द्र तीनों देवताओं को बुलाया। उनसे उनके उसकी शाखा है। नकुल, सहदेव उसके फूल और युधिष्ठिर, भीमसैन और अर्जुन उत्पन्न हुए। अश्विनी- फल है, कृष्णदेव और ब्राह्मण उसकी जड कुमार के वीर्य से नकुल और सहदेव माद्री के गर्भ से हैं ॥११०११११॥ उत्पन्न हुए। ऋशियों के आश्रम में ही, पाँचों पुत्रों के पूर्व समय एक महा पराक्रमी महावली राजा जात कर्म आदि संसकार हुए और वहीं उनका पालन पाण्डु ने अपनी बुद्धिवल से वहुत से देगों को जीतकर पोषण होने लगा । ( एक दिवस माद्री से सहवास अपने राज्यको बढाया । राजा को गिकार का शौक करने पर मृगभेषधारी ऋपि के शाप के प्रभाव से,राजा पड़ जाने पर वह अनुचरों सहित वन में ही मुनियोंके । पाण्डुकी मृत्यु होगई ।) कुछ दिनों बाद ऋपि रोग उन मंग रहने लगा । (एक दिवस पाण्डु राजा ने मृगों का राज लक्षणास मुग्नोभित जटाधारी, ब्रह्मचारी पाण्डयों जोडा रमण करते देख उनपर बाण चलाया वाण लगते । को लेकर धृतराष्ट्र आदि के पास पहुंचे। आगे ही वह मृग मर गया। मरते समय उमने राजा को शाप वे मुनि लोग यह कहकर, कि "यह पाण्टु पुत्र गण दे दिया कि जब तू भी अपनी स्त्री से भोग करेगा। तुम्हारे पुत्र, माता, चेले और मुहृत . हैं वहा भे महाभारत [ आदिपर्व तांस्तैर्निवेदितान्दृष्ट्वा पाण्डवान् कौरवास्तदा । शिष्टाश्च वर्णाः पौरा ये ते हर्षाच्चुक्रुशु शम् ॥ ११८ ।। आहुः केचिन्न तस्यैते तस्यैत इति चापरे । यदा चिरमृतः पाण्डः कथं तस्यति चापरे ॥ ११९ ।। स्वागतं सर्वथा दिष्टया पाण्डोः पश्याम संततिम् । उच्यतां स्वागतामिति वाचोऽयंत सर्वशः ॥ १२० ॥ तस्मिन्नुपरते शब्दे दिशः सर्वा निनादयन् । अन्तर्हितानां भूतानां निःस्वनस्तुमुलोऽभवत् ॥ १२१ ॥ पुष्पवृष्टिः शुभागन्धाः शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाः । आसन् प्रवेशे पार्थानां तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १२२ ॥ तत्प्रीत्या चैव सर्वेपो पौराणां हर्पसंभवः । शब्द आसीन्महांस्तत्र दिवस्पृक्कीर्तिवर्धनः ॥ १२३ ॥ तेऽधीत्य निखिलान् वेदान्शास्त्राणि विविधानि च । न्यवसन् पाण्डवास्तत्र पूजिता अकुतोभयः ॥ १२४ ॥ युधिष्ठिरस्य शोचेन प्रीताः प्रकृतयोऽभवन् । धृत्या च भीमसेनस्य विक्रमेणार्जुनस्य च ॥ १२५ ॥ चले गये ॥११२।११७॥ अद्भुत रूप से आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, पाण्डव पालकों को देख कुरुवंशी लोग और मुगन्धित वायु चलने लगी, देवलोक में शंख और नाना जानि-पुरवामी हर्प प्रगट करने लगे। उनमें से नगाड़ों की आवाज़ आने लगी। सब लोग जय जय- किसी ने कहा- यह पाण्टु पुत्र नहीं है । किमी ने फार करने लगे। पांडव निर्मय-होकर नाना प्रकार पहा-नदी, यह पाण्डु के पुत्र ही है। किमी ने कहा के शास्त्र और वेद पढ़ने लगे ॥१२१११२४॥ पाण्टु राजा को पारोक गए नो बहुत दिवस होचुके युधिष्ठिर की सरलता और धर्म परायणता, मय पर उनके पुत्र को हो सकते है। किसी ने भीमगन फा धर्म, अर्जुन का पराक्रम, नकुल और पा-आज हमारे यह मा-माग्य जो पाण्डु पुत्रों का महदेय की नग्रता और कुन्ती की श्वसुर सामु आदि दोन दुभा । इनका म्यागन पाना चाहिये पड़ों की मेया देखकर मय पुरवासी लोग प्रसन्न हुए। इमफे उपरांन जय मे अर्जुन ने बहुत मे राजाओं के यहाटगाना न पा चागं दिगामी पाँच में मछली का निभाना मारफर द्रोपदी को मेश्राम नाई । पाटयों का नगमे पहुंचने ही जीता नय में अर्जुन मन धनुर्धारियों में पीर हुए और - . - SNN Swam आदिपर्व] महाभारत गुरुशुश्रूपया क्षान्त्या यमयोविनयेन च । तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च ॥ १२६ ॥ समवाये ततो राज्ञां कन्यां भर्तृस्वयंवराम् । प्राप्तवानर्जुनः कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १२७ ।। ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन् पूज्यः सर्वधनुष्मताम् । आदित्य इव दुप्प्रेक्ष्यः समरेष्वपि चाभवत् ॥ १२८ ॥ स सर्वान् पार्थिवाञ्जित्वा सर्वांश्च महतो गणान् । आजहारार्जुनो राज्ञो राजसूयं महाक्रतुम् ॥ १२९ ॥ अन्नवान् दक्षिणावांश्च सर्वैः समुदितो गुणैः । युधिष्ठिरेण संप्राप्तो राजसूयो महाक्रतुः ॥ १३० ॥ सुनयाद वासुदेवस्य भीमार्जुनवलेन च । घातयित्वा जरासंधं चैद्यं च वलगर्वितम् ॥ १३१ ॥ दुर्योधनं समागच्छन्नर्हणानि ततस्ततः । मणिकांचनरत्नानि गोहस्त्यश्वधनानि च ॥ १३२ ।। विचित्राणि च वासांसि प्रावारावरणानि च । कम्बलाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि समृद्धां तां तथा दृष्ट्वा पाण्डवानां तदा श्रियम् । ईर्ष्यासमुत्थः सुमहांस्तस्य मन्युरजायत ॥ १३४ ॥ उनकी तरफ शत्रु ऐसे नहीं देख सकता था जैसे और जिन जिन राजाओं को पाण्डवों ने जीता था, मूर्य की ओर मनुष्य नहीं देख सकता है । इसके उनके यहां से युधिष्ठिर के अर्थ दुर्योधन के पास पीछे अर्जुन ने सब राजाओं को जीत कर युधिष्ठिर अच्छी अच्छी मणि, म्वर्ण, रल, गाय, हाथी, घोड़े को राजसूय यज्ञ करवाया जिसमें दीन दुखिया धन, रंग, बिरंगे उत्तम वन्त्र और अनेक प्रकार के लोगों को अनन्त अन्न और ब्राह्मणों को अनंत — कपड़ों के घर जैसे कम्बल, रेशमी वस्त्र, डेरे तंव दक्षिणा दी गई ॥१२५।१३०|| इत्यादि और कीमती मृगचर्म जो राजाओं के विछाने इस यज्ञ को युधिष्ठिर ने जरासंध और शिशुपाल योग्य होते हैं आए ॥१३१६१३३॥ जो बड़े बल के घमंड में थे श्रीकृष्ण की नीति और पाण्डवों की बढ़ी हुई प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य को अर्जुन और भीमसैन के बल से मरवाकर कराया था देखकर दुर्योधन के हृदय में ट्रेप उत्पन्न हुआ और [ आदिएव महाभारत विमानप्रतिमां तत्र मयेन सुकृतां सभाम् । पाण्डवानामुपहृतां स दृष्ट्वा पर्यतप्यत ॥ १३५ ॥ तत्रावहसितश्चासीत् प्रस्कंदन्निव संभ्रमात् । प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानाभिजातवत् ॥ १३६ ॥ स भोगान् विविधान् भुञ्जन रत्नानि विविधानि च। कथितो धृतराष्ट्रस्य विवर्णो हरिणः कृशः ॥ १३७ ।। अन्वजानात्ततो द्यूतं धृतराष्ट्रः सुतप्रियः । तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः संभवन्महान् ॥ १३८ ॥ नातिप्रीत-मनाश्चासीद्विवादांश्चान्वमोदत द्यूतादीननयान् घोरान् विविधांश्चाप्युपेक्षत ॥ १३९ ॥ निरस्य विदुरं भीष्म द्रोणं शारद्वतं कृपम् । विग्रहे तुमुले तस्मिन् दहन क्षत्रं परस्परम् ॥ १४० ।। जयत्सु पाण्डुपुत्रेषु श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । दुर्योधनमतं ज्ञात्वा कर्णस्य शकुनेस्तथा ॥ १४१ ॥ धृतराष्ट्रश्चिरं ध्यात्वा संजयं वाक्यमब्रवीत् । शृणु संजय सर्व मे न चासूयितुमर्हसि ॥ १४२ ॥ माप से जलने लगा और मयदानव की बनाई हुई ।१३८॥ ममा जिममें यज हुआ था उसे देगकर भी दुर्योधन यह सुनकर श्री वासुदेव जी को वग गोध नुग्ने गगा। एप दिन दुर्योधन युधिष्ठिर की सभा पैदा हुआ । वह इस उद्योग से प्रसन्न नहीं हुए। में भाया । उनको परम पानी का योन्या आ। उन्होंने रडे असतोप के माथ इस झगड़े में अपनी यह गिरने गिरन पचा भामंगन ने उसकी हमी मी मम्मति दी और विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य दी ग पोई गयार के गाय पाना है। इस अपमान का कहना न मान कर आपम की उस घोर युद्ध में में दुर्योधन यहन जिन हुआ। और वह उस पोध भिरे हुए क्षत्रियों के नष्ट होने के कारण रूपी आर दाद मे यपि नाना प्रकार भोग भोगना भयावने जुआ आदि नाना यनीतियों की ओर आर नानामका रस उमर पाप माजूद परन्तु ग्यान नहीं दिया ॥१३०॥१४॥ पनिनगदग आर पांग परगा। अन म पाटयों की विनयाई । नव यह युग सब पर बगर नगर ने दुर्योधन की इच्छा पूर्ण हर मजय मे धृतराप ने मुना तब धृतराष्ट्र, मेरे रिश जुमामलले ही गाना दी ॥१३४ दुर्योधा, कर्ण और गानी पी सम्मान को आदिपर्व महाभारन - श्रुतवानसि मेधावी बुद्धिमान् प्राज्ञसंमतः । न विग्रहे मम मतिर्न च प्रीये कुलक्षये ॥ १४३ ॥ न मे विशेषः पुत्रेषु स्वेषु पाण्डुसुतेषु वा । वृद्धं मामभ्यसूयंति पुत्रा मन्युपरायणाः ॥ १४४ ॥ अहं त्वचक्षुः कार्पण्यात् पुत्रप्रीत्या सहामि तत् । मुह्यन्तं चानुमुह्यामि चानुमुह्यामि दुर्योधनमचेतनम् ॥ १४५ ॥ राजसूये श्रियं दृष्ट्वा पाण्डवस्य महौजसः । तच्यावहसनं प्राप्य समारोहणदर्शने ॥ १४६ ॥ अमर्पणः स्वयं जेतुमशक्तः पाण्डवान् रणे । • निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं सुश्रियं क्षत्रियोऽपि सन् ॥ १७ ॥ गान्धार-राज-सहितश्छद्म-यूतममंत्रयत् तत्र यद्यद्यथा ज्ञातं मया संजय तच्छृणु ॥ १४८ ॥ श्वत्वा तु मम वाक्यानि बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः । ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुपमित्युत ॥ १४९ ।। यदाश्रीपं धनुरायम्य चित्रं विद्धं लथ्यं पातितं वै पृथिव्याम् । कृष्णां हृतां प्रेक्षतां सर्वराज्ञां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५० ॥ समझा कर बड़ी देर तक विचार करके संजय । हाम्य जब देखा और क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होने पर से बोला-कि हे संजय ! तुम बड़े बुद्धिमान् भी जब पाण्टवा मे वह ऐश्वर्य लेने की अपनी और शास्त्रों के जानकार हो । इसलिए मुझे सामर्थ्य न देखी, तब क्रोध और ईर्षा से दुखित दोप देना तुम को उचित नहीं । तुम निश्चय होकर शकुनी की सलाह मे छलरुपी जय में पाण्डवों जानो कि मै युद्ध को पसन्द नहीं करता और न ही से वह लक्ष्मी जीती और उस जुर से पहले और मुझे कुल का नाग होने में प्रसन्नता है । मैं पाण्डु पीछे जो जो बातें अयग शुकुनरुपी जीत की आगा के पुत्रों को अपने पुत्र समझता है। मेरे पुत्र क्रोधी दूर करने वाली हुई थीं सो मैं सब कहता हूं। हे हैं जो मुझ वड़े का कहा नहीं मानते । में अंधा और मूत पुत्र ! मेरे यह सत्र बुद्धियुक्त बचन सुनकर दीन हूं । पुत्र म्नेह के कारण सब कुछ सह लेता हूं मुझे सच्चा प्रज्ञाचक्षु जानोगे ॥१४१११४९॥ अचेत दुर्योधन के मोह युक्त होने मे मैं भी मोह में मैंने जब सुना कि अर्जुन ने विचित्र धनुप पड़ता हूं । हे संजय ! युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में चढ़ा कर निगाने को मार कर पृथवी पर गिरा दिया दुर्योधन ने पाण्डवों का ऐश्वर्य और ममा में अपना और सब राजाओं के मामने द्रौपदी को हर लायाह - २० महाभारत [ आदिपर्व यदाश्री द्वारकायां सुभद्रां प्रसह्योढां माधवीमर्जुनेन । इन्द्रप्रस्थं वृष्णिवीरौ च यातौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५१ ॥ यदाश्रीपं देवराजं प्रवृष्टं शरैर्दिव्यैर्वारितं चार्जुनेन । अग्निं तथा तर्पितं खाण्डवे च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५२ ॥ यदाश्रीपं जातुपाद्वेश्मनस्तान्मुक्तान पार्थान् पञ्च कुंत्या समेतान् । युक्तं चैपां विदरं स्वार्थसिद्धौ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५३ ॥ यदाश्रीपं द्रौपदी रङ्गमध्ये लक्ष्यं भित्वा निर्जितामर्जुनेन । शृरान्पंचालान्पांडवेयांश्च युक्तांस्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५४ ॥ यदाश्रीपं मागधानां वरिष्टं जरासन्धं क्षत्रमध्ये ज्वलन्तम् । दोभ्यां हतं भीमसेनेन गत्वा तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५५ ।। यदाश्रोपं दिग्जये पाण्डुपुत्रैर्वशीकृतान् भूमिपालान् प्रसह्य । महाक्रतुं राजसूयं कृतं च तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५६ ॥ यदाश्रोपं द्रोपदीमश्रुकंठी सभां नीतां दुःखितामेकवस्त्राम् । रजस्वलां नाथवतीमनाथवत्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५७ ॥ तमी संजय, मने जय की आमा नहीं की । जब पाण्डवों से पांचाल देश के बड़े बड़े राजाओं से मन सुना कि अर्जुन ने द्वारका में जाकर कृष्ण की मित्रता हुई, तभी हे मंजय, मैंने जय की आशा छोटी बहिन मुभद्रा मे बलपूर्वक द्वारकापुरी में जाकर नहीं की। फिर जब मैने सुना कि भीमसैन ने विवाह किया, पीछे मे कृष्ण और बलभद्र इन्द्रप्रम्त मगध देश के बडे बडे प्रतापी राजा जरासंध को में आये, तभी है मजय, मन जय की आगा नहीं बिना गम्त्रों के हाथों में मार डाला है, तभी है की। फिर मैंने जब गुना कि अर्जुन ने याणों की संजय, मैने विजय की आशा नहीं की। जब सुना वर्षा करके इन्द्र की जन, यपी को गान्त कर दिया कि रोती हुई, फेवल एक वस्त्र धारण किये हुए, और म्याण्डय वन को जला कर अमिटेव को तृप्त द्रौपदी को उसके सिर के बाल पकड़ कर उसके किया, नभी है मजय, मैन जय की आगा नहीं पतियों के सामने ही, दुशासन सभा में पकड़ कर दी। फिर जब पानी पाण्टय जन्ती महिन लाम के गया, नभी है गंजय, मन जय सी आशा नहीं की। पाम जाने में यच गये और हमार भाई विदुर उन फिर उप मुना कि कपटी दुइशामन ने द्रोपदी को धीमगई कर द. नी है, मजय, मने जय की ना करने के लिये यात्रों को ग्वींच-खींच कर देर माना नही शिव मुना कि अर्जुन ने पड़े लगा दिया, निम पर भी यम्न का ( अन्त ) नहीं यो मारमा गलामी में द्वारा को पाना और पा मका, तभी हे मंजय, गने जय की आशा नहीं - आदिपर्व] महाभारत यदाओं वाससां तत्र राशिं समाक्षिपत् कितवो मन्दबुद्धिः । दुःशासनो गतवान्नैव चान्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५८ ।। यदाश्रो हृतराज्यं युधिष्ठिरं पराजितं सौवलेनाक्षवत्याम् । अन्वागतं भ्रातृभिरप्रमेयैस्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १५९ ॥ यदाश्रीपं विविधास्तत्र चेष्टा धर्मात्मनां प्रस्थितानां बनाय । ज्येष्टप्रीत्या क्लिश्यतां पाण्डवानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६० ॥ यदाश्रीपं स्नातकानां सहस्त्रैरन्यागतं धर्मराजं वनस्थम् । भिक्षाभजां ब्राह्मणानां महात्मनां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६१ ॥ यदाश्रौषमर्जुनं देवदेवं किरातरूपं त्र्यम्बकं तोप्य युद्धे । अवाप्तवन्तं पाशुपतं महास्त्रं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६२ ॥ यदाश्रीपं त्रिदिवस्थं धनंजयं शक्रात् साक्षाद्दिव्यमस्त्रं यथावत् । अधीयानं शंसितं सत्यसंधं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६३ ॥ यदाऔषं कालकेयास्ततस्ते पौलोमानो वरदानाच दृप्ताः । देवैरजेया निर्जिताश्चार्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६४ ॥ यदाश्रौषमसुराणां वधार्थे किरीटिनं यान्तममित्रकर्शनम् । कृतार्थ चाप्यागतं शकलोकात्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६५॥ की। जब मुना कि शकुनि ने कपट के पॉसों से जब मैंने सुना कि अर्जुन ने किरातरूपधारी युधिष्ठिर का सन राज्य जीत लिया और वे माइयों को देवाधिदेव महादेव को युद्ध में प्रसन्न करके साथ ले बन को चले गये, तभी हे सजय, मैने जय पाशुपतनामक अन्त्र पाया है, तभी हे सजय, की आगा नहीं की। जब सुना कि धार्मिक पाण्डव मैंने जय की आगा नहीं की। फिर जब अर्जुन लोग वन में जाकर बडे बडे कष्ट उठाकर भी धर्म ने देवलोक में जाकर वहा इन्द्र से बड़े बड़े दिव्य को नहीं छोड़ते हैं। बड़े भाई को प्रसन्न रखने के अम्त्रों के चलाने की विद्या को सीखा, तमी है लिए घेटे भाई दुख उठा रहे है, तभी है सजय, सजय, मैने जय की आगा नहीं की। जन सुना मैने जय की आशा नहीं की ॥१५०।१६०॥ कि वरदान के घमण्ट में भरे कालकेय और फिर जब मैने सुना कि हजारों म्नातक ब्राह्मण पौलोम राक्षसों को जिन्हे देवता भी नहीं जीत युधिष्ठिर के साथ वन में निवास करते हैं और वे सकते अर्जुन ने उनको जीत लिया है, तभी ब्राह्मण युधिष्ठिर से भिक्षा पाते है, तभी है सजय, हे सजय, मैंने जय की आया नहीं की । जब मैने जय की आशा नहीं की ॥१६॥ मुना कि अर्जुन देवरोक में राक्षसों को मारने १२ महाभारत [ आदि - यदाऔपं वैश्रवणेन साधं समागतं भीममन्यांश्च पार्थान् । तस्मिन् देशे मानुपाणामगम्ये तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६६ ॥ यदाश्रीपं घोपयात्रागतानां बंधं गन्धर्वमोक्षणं चार्जुनेन । स्वेपां सुतानां कर्णबुद्धौ रतानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥१६७ ॥ यदाश्रीपं यक्षरूपेण धर्म समागतं धर्मराजन सूत । प्रश्नान् काश्चिद्विब्रुवाणं च सम्यक् तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १६८॥ यदाश्रीपं न विदुर्मामकास्तान् प्रच्छन्न रूपान् वसतः पाण्डवेयान् । विराटराष्ट्रे सह कृष्णया च तदा नाशंसे विजयाय संजय, ॥ १६९॥ यदाश्रीपं मामकानां वरिष्ठान् धनजयेनकरथेन वरिष्ठान् धनंजयेनैकरथेन भग्नान् । विराटराष्ट्रे वसतः महात्मना तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७० ॥ यदाश्रीपं सत्कृतां सत्स्यराज्ञा सुतां सुतां दत्तामुत्तरामर्जुनाय । तां चार्जुनः प्रत्यगृह्णात्सुतार्थे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७१॥ यदाश्रीपं निर्जितस्याधनस्य प्रवाजितस्य स्वजनात् प्रच्युतस्य । अक्षोहिणीः सप्त युधिष्ठिरस्य तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७२ ॥ यदानापं माधवं बासुदेवं सर्वात्मना पाण्डवार्थे निविष्टम् । यस्येमां गां विक्रममेकमाहुस्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७३॥ के लिय गए और वहां अपने कार्य को माध कर युधिष्ठिर के समीप आकर कुछ प्रश्न पूछे है मगर गट आये, नमी हे मंजय, मन जय की और उसने ठीक ठीक उत्तर दे दिये हैं, तभी हे 'आगा नहीं की । जय मन मुना कि भीममन मजय, मैंने जय की आगा नहीं की । फिर जर। और नागें पाण्डय उम म्यान में जाकर जहां मुना कि पाण्डव विराटपुर में द्रोपदी महित गुप्त मनुष्य नहीं जा सकने यक्षगज कुंबर में मिटकर रहे और मेरे पुत्र उनका पता नहीं पा मके, तभी आय. नी है मजय, मन जय की आमा नहीं है मंजय, मने जय की आगा नहीं की । जय मुना दी॥१६२१६॥ कि पाण्डयों के विराट् नगर में रहने समय एकरथ अब गना कि कर्ण की गगा में सगे हुए. अ) धननय ने हमार्ग और के बड़े बड़े वीरों मेरे पुत्र पाप याया में जाकर गधों में पो पो पगम्न कर लिया है, तभी है गंजय, मने जय गये और फिर अन ने उनण एदाया. नी पी पागा नहीं की ॥१६७११७०॥ जय जय | आमा नहीं की। जय जब मन मुना कि विराद दा के गना मैं गुना धर्म ने यस ा प पाणा मम्य ने अणुन का पराक्रम देगका नाना आरं.

आदिपर्व ] महाभारत यदाऔषं नरनारायणौ तौ कृष्णार्जुनौ वदतो नारदस्य । अहं द्रष्टा ब्रह्मलोके च सम्यक्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७ ॥ यदाश्रोपं लोकहिताय कृष्णं शमार्थिनमुपयांतं कुरूणाम् । शमं कुर्वाणमकृतार्थ च यातं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७५ ॥ यदाश्रीयं कर्णदुर्योधनाभ्यां बुद्धिं कृतां निग्रहे केशवस्य । तं चात्मानं बहुधा दर्शयानं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७६ ।। यदाश्रीपं वासुदेवे प्रयाते रथस्यैकामग्रतस्तिष्ठमानाम् । आता पृथां सान्वितां केशवेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७७॥ यदाश्रीषं मंत्रिणं वासुदेवं तथा भीष्मं शान्तनवं च तोपाम् । भारद्वाजं चाशिपोऽनुत्रुवाणं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७८ ॥ यदाश्रीपं कर्ण उवाच वाक्यं नाहं योत्स्ये युध्यमाने त्वयीति । हित्वा सेनामषचक्राम चापि तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १७९ ॥ कारों से सुहाती हुई उत्तरा नाम कन्या दे दी है और कौरवों का विरोध शांत करने के लिये दुर्योधन और अर्जुन ने उस कन्या को अपने पुत्र अभि- के यहां आये और वहां उनका निरादर हुआ, मन्यु के निमित्त ग्रहण किया है, तभी हे संजय, तभी है संजय, मैने जय की आशा नहीं की। जब मैंने जय की आशा नहीं की । जब सुना कि ' मुना कि कर्ण और दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को पकड युधिष्ठिर ने जुए में जीते जाने, धन हीन होने, लेना चाहा और उस समय कृष्ण ने अपना बिराट् देश से निकाले जाने, म्वजनों से विछुड़े हुए रूप दिखलाया, तभी हे मंजय, मैने जय की आगा भी मात अक्षौहिणी सेना इकट्टी करली है, तभी नहीं की। जब सुना, कि वासुदेव ने जाते समय है संजय, मैने जय की आगा नहीं की । जव दुःखित कुन्ति उनके रथ के सामने खड़ी हुई है सुना कि एक पग से पृथ्विी भर को नापने वाले और उन्होंने अनेक प्रकार से समझाया है, तभी वमुदेव सब प्रकार से पांडवों की भलाई में तत्पर है संजय, मैने जय की आशा नहीं की। जब हो रहे है, तभी हे संजय, मैने जय की आशा मुना कि भगवान् कृष्ण और शान्तनु के पुत्र भीष्म नहीं की । जब नारद जी ने मुना, कि कृष्ण पाण्डवों को सम्मति देते है और द्रोणाचार्य उन्हें चंद्र और अर्जुन नर नारायण के अवतार है, आशीर्वाद देते है, तभी है मजय, मैंने जय की और उन्होंने उनका ब्रह्मलोक में भली भाति दर्शन आशा नहीं की। जब सुना कि कर्ण भीष्म से यह कर किया है, तभी हे मजय, मैने जय की आगा कर कि "जब तक तुम युद्ध करोगे तब तक मै नहीं नहीं की ॥१७१११७४]] लडुंगा।" सैना को छोड़कर चला गया है, तभी है जब सुना कि श्रीकृष्णचन्द्र लोकों के हितार्थ संजय, मैने युद्ध की आशा नहीं की ॥१७५।१७।।

[ आदिपय
२४
महाभारत
यदानोपं वासुदेवार्जुनौ तौ तथा धनुर्गाण्डीवमप्रमेयम् ।
त्रीण्युग्रवीर्याणि समागतानि तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८०॥
यदाश्रोपं कश्मलेनाभिपन्ने रथोपस्थे सीदमानेऽर्जुने वै।
कृष्णं लोकान् दर्शयानं शरीरे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८१॥
यदाश्रोपं भीप्मममित्रकदर्शनं विघ्नन्तमाजावयुतं रथानाम् ।
नेपां कश्चिद्वध्यते ख्यातरूपस्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८२॥
यदाश्रोपं चापगेयेन संख्ये स्वयं मृत्यु विहितं धार्मिकेण ।
तयाकार्पः पाण्डवेयाः प्रहृष्टास्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८३॥
यदाश्रीपं भीप्ममत्यन्तशृरं हतं पार्थेनाहयेप्वप्रधृप्यम् ।
शिखण्डिनं पुरतः स्थापयित्वा तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८४ ॥
यदाधापं अरतल्पे गयानं वृद्धं वीरं सादितं चित्रपुङ्खैः ।
भीष्मं कृत्वा सोमकानल्पशेपास्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८५॥
यदाश्रोपं शान्तनवे शयाने पानीयार्थे चोदितार्जुनेन ।
भूमि भित्त्वा तर्पितं तत्र भीष्मं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८६॥
जब मैंने सुना कि कृष्ण, अर्जुन आर गाण्डीव होकर वैसा ही किया, तभी हे संजय, मैने जय
अनुप यह नान क्टोर वीर्य एकत्र हो गये है, तभी की आमा नहीं की ॥१८३॥
मजय. मने जयकी आमा नहीं की ॥१८॥
जय मुना कि अर्जुन ने नपुंसक शिखण्डी को
जय मुना कि युद्ध के आरम्भ में रथ के उपर आगे करके भीष्मपितामह जैसे शूरवीर को मार
हुए. अर्जुन ने मोहयुन और विकल होने पर लिया, तभी है मजय, मैने जय की आगा नहीं
पारनपटने पि हिरमना पा उपग ११८
रियाद, नी मजय, मन जय ही आमा नहीं जब मुना कि भीष्मपितामह जो महायुद्ध और
दी। पर मना बिभारितामा युद्ध में निन्य दम महापराक्रमी ५ अर्जुन के अनेक प्रकार फे पर लगे
हर की माने थे परन्तु पाण्डव युन हा नानी हुण पाणों में वेधिन होकर ग्ध मे गिर पडे, तभी
अंगप पाप उन दाहगार में कभी को नहीं है मजय, मैने जय पी आगा नही दी॥१८५।।
FIR,न.प. जय हो मानह।
जप मुना कि भाप्मपितामह ने गर्नुन मे पान
निए पानी मागा और अर्जुन ने धरती फोड़ कर
friftaar ने पारयों को भीमपोजर पिगया, नी मजय, मने जय की
Kritय ! पाश्री हनं प्रसन्न आमा नही दी ॥१८॥

आदिपर्व महाभारत २५ यदा वायुश्चन्द्रसूर्यों च युक्तौ कौन्तेयानामनुलोमा जयाय । नित्यं चास्मान्श्वापदा भीपयन्ति तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८७॥ यदा द्रोणो विविधानस्त्रमार्गानिदर्शयन् समरे चित्रयोधी । न पाण्डवान् श्रेष्ठतरान्निहति तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८८॥ यदाश्रीपं चास्मदीयान् महारथान् व्यवस्थितानर्जुनस्यान्तकाय । संशप्तकानिन्हतानर्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १८९ ॥ यदाश्रीपं व्यूहमभेद्यमन्यैर्भारद्वाजनात्तशस्त्रेण गुप्तम् । भित्त्वा सौभद्रं वीरमेकं प्रविष्टं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९ ॥ यदाऽभिमन्यु परिवार्य बालं सर्वे हत्वा हृष्टरूपा वभूवुः । महारथाः पार्थमशक्नुवंतस्तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९१ ॥ यदाश्रीपमभिमन्युं निहत्य हर्षान्मूढान् क्रोशतो धार्तराष्ट्रान् । क्रोधादुक्तं सैंधवे चार्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९२ ॥ यदाश्रीपं सैन्धवार्थे प्रतिज्ञा प्रतिज्ञातां तद्वधायार्जुनेन । सत्यां तीर्णां शत्रुमध्ये च तेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९३ ॥ जब सुना कि वायु, इन्द्र और सूर्य पांडवों | चला गया, तभी हे संजय, मैंने जय की आशा की विजय के लिए उनके सहायक बने हैं और | नहीं की ॥१८७४१९०॥ हिंसक जंतु गण हमको यात्रा के समय भय दिखला जब मैंने सुना कि अर्जुन का सामना न कर रहे हैं, तभी है संजय, मैने जय की आशा नहीं की। सकने वाले सात महारथियों ने अकेले बालक वीर जब मैंने सुना कि योद्धा द्रोणाचार्य लड़ाई में अस्त्र अभिमन्यु को मार कर आनन्द मनाया, तभी हे चलाने के अनेक कौशल दिखाकर भी पांचों पांडवों सजय, मैने जय की आगा नहीं की । जब सुना में से किसी एक को भी नहीं मारते, तभी हे संजय, कि वीरों के अभिमन्यु को मार कर आनन्द मनाते मैंने जय की आशा नहीं की। जब सुना कि अर्जुन सुनकर अर्जुन ने क्रोध में आकर जयद्रथवध के को मारने के लिए मात महारथी एक स्थान खड़े होकर मारने की प्रतिज्ञा की, तभी है संजय, मैंने जय अर्जुन से युद्ध करने लगे और अर्जुन ने उन की आशा नहीं की । जब मुना कि अर्जुन ने सातों को मार डाला, तभी हे मंजय, मैने जय की जयद्रथवध के मारने की प्रतिज्ञा करके शत्रुओं के आशा नहीं की। जब सुना कि वीर अभिमन्यु, बीच में सत्य कर दिखाया, तभी हे संजय, मैने शम्त्रधारी द्रोणाचार्य से रक्षित और दूसरों से न जय की आशा नहीं की ॥१९१११९३॥ भेदे जाने वाले चक्रव्यूह को भेद कर उसमें जब सुना कि अर्जुन के थके और प्यास से ।

[ आदिपर्य म हा भारत यदाश्रीपं श्रान्तहये धनंजये मुक्त्वा हयान् पायित्वोपवृत्तान् । पुनर्युक्त्वा वासुदेवं प्रयातं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९४ ॥ यदाश्रीपं वाहनेष्वक्षमेषु रथोपस्थे तिष्टता पाण्डवेन । सर्वान् योधान् वारितानर्जुनेन तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९५ ॥ यदानोपं नागवलैः सुदुःसहं द्रोणानीकं युयुधानं प्रमथ्य । यातं वाणेयं यत्र तो कृष्णपार्थों तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९६ ॥ यदाश्रीपं कर्णमासाद्य मुक्तं वधाद्भीमं कुत्सयित्वा वचोभिः । धनुष्कोटया तुद्य कर्णेन वीरं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९७ ॥ यदा द्रोणः कृतवर्मा कृपश्च कों द्रौणिमद्रराजश्च शूरः । अमर्पयन् सेन्धवं वध्यमानं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९८ ॥ यदाश्री देवराजेन दत्तां दिव्यां शक्तिं व्यंसितां माधवेन । घटोत्कचे राक्षसे घोररूपे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ १९९ ॥ यदानोपं कर्णघटोत्कचाभ्यां युद्धे मुक्तां सूतपुत्रेण शक्तिम् । यया वध्या समरे सव्यसाची तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०० ॥ यदाश्रोपं द्रोणमाचार्यमेकं धृष्टद्युम्नेनाभ्यतिक्रम्य धर्मम् । रथोपस्थे प्रायगतं विशस्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥२०१॥ व्यातुल घोड़ों को ग्योल कर श्रीकृष्ण ने पानी पिला को मार कर कटु वचन कहता हुआ चला गया कर फिर जोन कर रथ को चग दिया, तभी है परन्तु उसे मारा नहीं छोड दिया, तभी हे संजय, मन जय की आगा नहीं की। जब सुना मैने जय की आशा नहीं की । जब मुना कि कि घोड़ों के थक जाने पर रथ पर बैठे हुए द्रोणाचार्य, कृतवर्मा, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा अंकन, जुन ने मर चांग को हरा दिया, तभी और शल्य पास खड़े है; अर्जुन से जयद्रथवध को है गंजय, मैन जय या आगा नहीं की। जब मैने बचा नहीं सके, तभी है संजय, मैने जय की गना कि हाथियों की बड़ी गेना को जिमे लेकर आगा नहीं की । जब सुना कि जो शक्ति कर्ण को द्रोशानाय युद्ध वग्न | अपेग मान्यी मारकर इन्द्र ने इस प्रतिमा से दी थी कि तु इसको जिस किया और अर्जुन के पास पहुंच गया, पर चलायेगा वह मर जायेगा परन्तु फिर यह काम मना गरय, मैन नय पामा नहीं की नहीं रहेगी और यह शक्ति कर्ण ने अर्जुन 4110॥ के मारन के लिए रखी थी गो श्रीकृष्ण जी ने कर्ण गुनगाव धनुष नाक भीमगन का नित्तनम फराके उम गति को घटोत्कच नाम मजय, आदिपर्य] महाभारत २७ 4 यदाश्रोपं द्रौणिना द्वैरथस्थं माद्रीसुतं नकुलं लोकमध्ये । समं युद्ध मण्डलेभ्यश्चरन्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०२॥ यदा द्रोणे निहते द्रोणपुत्रो नारायणं दिव्यमस्त्रं विकुर्वन् । नेपामन्तं गतवान् पाण्डवानां तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०३ ॥ यदाोपं भीमसेनेन पीतं रक्तं भ्रातुयुधि दुःशासनस्य । निवारितं नान्यतमेन भीमं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०४ ॥ यदानोपं कर्णमत्यंतशूरं हतं पार्थेनाहवेष्वप्यप्रधृप्यम् । तस्मिन् भ्रातॄणां विग्रहे देवगुह्ये तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०५ ॥ यदाश्रीपं द्रोणपुत्रं च शूरं दुःशासनं कृतवर्माणमुग्रम् । युधिष्ठिरं धर्मराज जयन्तं तदा नाशंस विजयाय संजय ॥ २०६ ॥ यदाश्रीपं निहतं मद्रराजं रणे शृरं धर्मराजेन सूत । सदा संग्रामे स्पर्धते यस्तु कृष्णं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २०७ ॥ यदाश्रीपं कलहद्यूतमूलं मायावलं सौवलं पाण्डवेन । हतं संग्रामे सहदेवेन पापं तदा नाशंसे विजयाय संजय ।। २०८ ।। दैत्य पर चलवाकर उसे व्यर्थ करवा दिया, तभी दुर्योधन आदि उसे कोई भी रोक नहीं सके, तभी हे हे संजय, मैंने जय की आशा नहीं की॥१९७१२००॥ संजय, मैंने जय की आशा नहीं की। जब सुना कि जब मुना कि द्रोणाचार्य के अस्त्र छोड़ कर भाईयों के इस युद्ध में अर्जुन के हाथ से वीर मृत्यु की आगा से अकेले रथ पर बैठे हुए को कर्ण मारा गया, तभी हे संजय, मैंने जय की धृष्टद्यम्न ने अधर्म से मार डाला, तभी हे मंजय, आमा नहीं की । जब सुना कि युधिष्ठिर ने मैंने जय की आशा नहीं की। जब सुना कि नकुल अश्वत्थामा, दुश्शासन और उग्र कृतवर्मा को जीत ने मंडल वांधकर अश्वत्थामा के साथ समान युद्ध लिया, तभी हे संजय, मैने जय की आशा नहीं किया, तभी हे संजय, मैने जय की आगा नहीं की। जब सुना कि रणभूमि में श्रीकृष्ण के तुल्य की ॥२०॥२०२॥ दावा करने वाले शूरवीर गल्य को धर्मराज ने जर सुना कि दोणाचार्य के मारे जाने पर मार दिया, तभी है संजय, मैने जय की आगा अश्वत्थामा दिव्य अम्त्र मार कर भी पांडवों को मार नहीं की। जब सुना कि शकुनी जो जुआ और नहीं सका, तभी है संजय, मैंने जय की आशा लड़ाई की जड़ था उसको सहदेव ने मार डाला, नहीं की । जब सुना कि भीमसैन ने रणभूमि में तभी है संजय, मैने जय की आगा नहीं की। अपने भाई दुश्शासन · का रुधिर पिया और ॥२०३।२०८] [ आदिपर्व २८ महाभारत यदाश्रीपं श्रान्तमेकं शयानं हृदं गला स्तंभयित्वा तदभः । दुर्योधनं विरथं भग्नशक्तिं तदा नाशंले विजयाय संजय ॥ २०९ ॥ यदाश्रीपं पांडवांस्तिष्ठमानान् गत्वा हृदे वासुदेवेन सार्धम् । अमर्पणं धर्षयतः सुतं मे तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २१० ॥ यदाश्रीपं विविधांश्चित्रमार्गान् गदायुद्धे मण्डलशश्चरन्तम् । मिथ्याहतं वासुदेवस्य बुद्धया तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २११ ॥ यदाश्रीपं द्रोणपुत्रादिभिस्तैर्हतान् पंचालान् द्रौपदेयांश्च सुप्तान् । कृतं वीभत्समयशस्यं च कर्म तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २१२ ॥ यदाश्रीपं भीमसेनानुयातेनाश्वत्थाम्ना परमास्त्रं प्रयुक्तम् । क्रुद्वेनेपीकमवधीद्यन गर्भ तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २१३ ॥ यदाश्रोपं ब्रह्मशिरोऽर्जुनेन स्वस्तीत्युक्त्वाऽस्त्रमस्त्रेण शान्तम् । अश्वत्थाम्ना मणिरत्नं च दत्तं तदा नाशंसे विजयाय संजय ॥ २१४ ॥ यदानोपं द्रोणपुत्रेण गर्भे वैराट्या वै पात्यमाने महास्त्रैः । द्वैपायनः केशवो द्रोणपुत्रं परस्परेणाभिशापैः शशाप ॥ २१५॥ जब मुना कि मेरा पुत्र दुर्योधन सग्राम में सजय, मैंने जय की आशा नहीं की ॥२०९।२१२॥ था पर अवेग कमल के तारार में उसका पानी फिर जब सुना कि भीमसैन को पुत्र-वध के गय कर छुप कर मो रहा और श्रीकृष्ण आदि ने कारण क्रोध से अधे बनकर अश्वत्थामा के पीछे उमर पाम जाकर उसे स्टाई करने के लिए दौडा ओर अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाया रफाग, तभी है सनय, मने जय की आशा और उससे उत्तरा का गर्भ नष्ट किया है, नहीं पी। 11 मुना कि मेरा प्रोधी पुन दुर्योधन तभी है सजय, मैंने जय की आशा नहीं की। उटकर भीगन से गठा युद्ध करने रगा और जन सुना कि अर्जुन ने "स्वम्ति जय" कहकर मटा यापार रटने पर भी धीरण ने उम अधर्म अश्वत्थामा के फैंके हुए ब्रह्मास्त्र को अपने अस्त्र युद्ध में मग्माया ( अन्याय म्प मे घायर हुआ) से मात कर दिया और असत्थामा के सिर का नभी मतय, मन य ही आगा नहीं की। मणि रन हीन रिया, तभी हे सजय, मैने जय की उर गना मि मेरे दुर्योधन पुर ने अश्वत्थामा आगा नहीं की। जब सुना कि अश्वत्थामा ने पाटिया या और भयानक का धर्म फगया उत्तरा के गर्भ को अम्न से नष्ट करना ही चाहा तिने पाचार देश ६ गला ६ पुगे और और न्याम जी और श्रीकृष्ण जी दोनों ने शाप द्वादी युग का मान हुए मार दाग, तभी है दे दिया, तभी है सजय, मैने जय की आशा नहीं आदि पर्व महाभारत . शोच्या गान्धारी पुत्रपौत्रेविहीना तथा बंधुभिः पितृभिर्धातृभिश्च । कृतं कार्य दुष्करं पाण्डवेयैः प्राप्त राज्यमसपत्नं पुनस्तैः ॥ २१६ ॥ कष्टं युद्धे दश शेषाः श्रुता मे त्रयोऽस्माकं पाण्डवानां च सप्त । दयनाविंशतिराहताऽक्षौहिणीनां तस्मिन्संग्रामे भैरवे क्षत्रियाणाम् ॥ २१७ ॥ तमस्वतीव विस्तीर्ण मोह आविशतीय माम् । संज्ञां नोपलभे सूत मनो विह्वलतीव मे ॥ २१८ ।। मौतिश्याच इत्युक्त्वा धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य बहु दुःखितः । मूर्छितः पुनराश्वस्तः संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ २१९ ।। धृतराष्ट्रवाच संजयैवंगते प्राणांस्त्यस्तुमिच्छामि मा चिरम् । स्तोकं ह्यपि न पश्यामि फलं जीवित धारणे ॥ २२० ॥ मोतिम्बाच--तं. तथा वादिनं दीनं विलपन्तं महीपतिम् । निःश्वसन्तं यथा नाग मुह्यमानं पुनः पुनः ॥ २२१ ॥ गावल्यणिरिदं धीमान् महार्थं वाक्यमत्रवीत् । संजय उवाच--श्रुतवानसि वै राजन् महोत्साहान् महावलान् ॥ २२२ ॥ द्वैपायनस्य बदतो नारदस्य च धीमतः । महत्सु राजवंशेषु गुणैः समुदितेषु च ॥ २२३ ॥ की । है संजय ! जब यह सब बातें हुई तब मैंने पाण्डवों की ओर और तीन हमारी और ! यह अपने अन्तःकरण (मन) में यह निश्चय ठहराया सब समरण करके मेरी आंखों के आगे अंधेरा कि हमारे पुत्रों की जय न होगी । मेरे पुत्र और और गरीर में मोह होता आता है । मेरा चित्त पाण्डव एक ही हैं अर्थात् जो पाण्डवों की जय है बड़ा व्याकुल हो रहा है ।।२१३२२१८॥ मो मेरी ही जय है परन्तु गान्धारी शोचनीय दशा उग्रश्रवा मूत जी बोले-इस तरह विलाप में पड़ी हुई है क्योंकि इस लड़ाई में उसके पुत्र, पोत्र, करके धृतराष्ट्र मूर्छित हो गये। आगे फिर चेतना याप, भाई आदि सब मृत्यु को प्राप्त हो गये हैं। आजाने पर धृतराष्ट्र ने संजय से कहा है संजय ! पाण्डवों ने ऐसा कठिन कार्य करके फिर अकंटक अब मेरे भी प्राण छूटने चाहते हैं क्योंकि इस राज्य प्राप्त कर लिया है। बड़े दुःख की बात है ! कि जीवन के रखने का कुछ भी विशेष फल नहीं इस युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना और बड़े देख पड़ता ॥२१९/२२०॥ महारथी और बड़े बड़े शूरवीर इतनी कथा सुनाकर उग्रश्रवा मूत जी बोले गये हैं। केवल दश आदमी बचे हैं कि हे ऋपियो ! जब धृतराष्ट्रइस प्रकार से विलाप कटकर मर --सात ।

[ आदिपय ३० मद्दा भारत जातान् दिव्यास्त्रविदुषः शक्रप्रतिमतेजसः । धर्मेण पृथिवीं जित्वा यज्ञैरिष्ट्वाप्तदक्षिणैः ॥ २२४ ॥ अस्मिल्लोके यशः प्राप्य ततः कालवशं गतान् । शैव्यं महारथं वीरं संजयं जयतां वरम् ॥ २२५ ॥ सुहोत्रं रन्तिदेवं च काक्षीवन्तमथौशिजम् । बाह्रीकं दमनं चैद्यं शर्यातिमजितं नलम् ॥ २२६ ॥ विश्वामित्रममित्रघ्नमम्बरीप महावलम् । मरुत्तं मनुमिक्ष्वाकं गयं भारतमेव गयं भारतमेव च ॥ २२७॥ रामं दाशरथिं चैव शशविन्दु भगीरथम् । कृतवीर्यं महाभागं तथैव जनमेजयम् ॥ २२८॥ ययाति शुभकर्माणं देवैर्यो याजितः स्वयम् । चैत्युयूपांकिता भूमिर्यस्येयं सवनाकरा ॥ २२९ ॥ इति राज्ञां चतुर्विशन् नारदेन सुरर्पिणा । पुत्रशोकाभितप्ताय पुरा उवैत्याय कीर्तितम् ॥ २३० ॥ तेभ्यश्चान्ये गताः पूर्व राजानो बलवत्तराः । महारथा महात्मानः सर्वैः समुदिता गुणैः ॥ २३१ ॥ करके दिन होने रंग और मोह में आकर सर्प बडे यज्ञ किये और ब्राह्मणों को अनत दक्षिणा दी की तरह .श्वास रेने रंगे तब बुद्धिमान् सजय ने और जिन का यश आज तक इस पृथ्वी पर छाया पटा कि दे राजा ! आप ने व्यास जी और नारद हुआ है। परन्तु इस लोक में वह अनेक कर्म मुग में यह सुना होगा कि बडे बडे घरानों में करके काल के गाल में चरे गए है। ( काल के "न्यन और महायरी, महारथी राना गय, जय वगीभूत हुए हैं ) ॥२२१।२२९|| मीन मजय, मुहौर जार रतिदेय, काक्षीवान, पूर्व समय में पुत्र शोक से पीडित राजा श्वैत्य आभिज, हक, दमन, अनुनागी गर्याति, से नारद ने इन चीनीस राजाओं की कथा कही रिन, नर, विश्वामित्र, महापरी जबरीप, महामा थी । इन राजाओं से पहले और भी बलवान् मा, मनु, इध्याय, गय, भग्न, गम, गविन्दु, महारथी महात्मा और गुणवान् राजा--पुर, कुरु, भाग्य हनवार्य, जनमेजय और ययाति का यदु, विश्वगरय, महाद्युति, अणुह, युवानाच, वृन्न गुनाहा गना ययाति (को म्यय देवनाना फारम्थ, रघु, विजय, वीति होत, अग, भव, खेत, ने धन काय ) जिही ने पृथ्वी जीत पर बटे वृहदगुर, उगानर, शतरथ, फक, युलिदुह, द्रुम, आदिपर्व ] म हा मारत पुरुः कुरुर्वदुः शूरो विष्वगचो महाद्युतिः । अणुहो युवनाश्वश्च ककुत्स्थो विक्रमी रघुः ॥ २३२ ।। विजयो बीतिहोत्रोऽङ्गो भवः श्वेतो बृहद्गुरुः । उशीनरः शतरथः कंको दुलिदहो द्रुमः ॥ २३३ ॥ दंभोद्भवः परो वेनः सगरः संकृतिनिमिः । अजयः परशुः पुण्ड्रः शम्भुर्देवावृधोऽनघः ॥ २३४ ॥ देवाह्वयः सुप्रतिमः सुप्रतीको वृहद्रथः । महोत्साहो विनीतात्मा सुकृतुनैपधो नलः ॥ २३५ ।। सत्यवतः शान्तभयः सुमित्रः सुवलः प्रभुः । जानुजंघो नरण्योऽर्कः प्रियभृत्यः शुचित्रतः ॥ २३६ ॥ बलवंधुनिरामर्दः केतु,गो वृहद्वलः । धृष्टकेतुवृहत्केतुर्दीप्त-केतुनिरामयः ॥ २३७॥ अविक्षिञ्चपलो धूर्तः कृतवन्धुषुधिः । महापुराणसंभाव्यः प्रत्यंगः परहा श्रुतिः ॥ २३८ ॥ एते चान्ये च राजानः शतशोऽथ सहस्रशः । श्रूयन्ते शतशश्चान्ये संख्याताश्चैव पद्मशः ॥ २३९ ॥ हित्वा सुविपुलान् भोगान् बुद्धिमन्तो महावलाः । राजानो निधनं प्राप्तास्तव पुत्रा इव प्रभो ॥ २४० । येषां दिव्यानि कर्माणि विक्रमस्त्याग एव च । माहात्म्यमपि चास्तिक्यं सत्यं शौचं दयार्जवम् ॥ २४१ ॥ विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणे कविसत्तमैः । सर्वद्धिगुणप्तम्पन्नास्ते चापि निधनं गताः ॥२४२ ।। दम्मोद्धच, वेन, सागर, मकृति, निमि, अजेय परशु, निरामय, अविक्षित, चपल,. धूर्त, कृतबन्धु. पुण्ड्, शम्मु, देवावृध, अनघ, देवाहय, सुप्रतिम, हडेपुधि, महापुराण संभाप्य, प्रत्यंग, परहों, श्रुति, मुप्रतीक, वृहद्रथ, विनीत मुक्रतु, नेपध नल, सत्य आदि बड़े बड़े प्रतापी राजा हुए। इनके सिवाय और व्रत, गान्तमय सुमित्र, सुबल, जानुजंघ, अनरराय, भी हज़ारों राजा इस पृथ्वी पर होगये हैं। और जिन अर्क, प्रियभृत्य, शुचित्रत, वलबन्धु, निरामर्द, जिन राजाओं का कवियों ने यम, पगकम, बुद्धि, केतुशृंग, बृहद्बल, धृष्टकेतु, बृहत्केतु, दीप्तकेतु, । दातृशक्ति, मत्यता, शुद्धता, दया, ऋद्धि और ।

[ आदि महाभारत तव पुत्रा दुरात्मानः प्रतप्ताश्चैव मन्युना । लुब्धा दुर्वृत्तभूयिष्ठा न ताञ्छोचितुमर्हसि ॥ २४३ ॥ श्रुतवानास मेधावी बुद्धिमान् प्राज्ञसमतः । येषां शास्त्रानुगा बुद्धिर्न ते मुह्यन्ति भारत ॥ २४४ ॥ निग्रहानुग्रहौ चापि विदितौ ते नराधिप । नात्यंतमेवानुवृत्तिः कार्या ते पुत्र रक्षणे ॥ २४५ ॥ भवितव्यं तथा तच्च नानुशोचितुमर्हपि । देवं प्रज्ञाविशेषेण को निवर्तितुमर्हति ॥ २४६ ॥ विधातृविहितं मार्ग न कश्चिदतिवर्तते । कालमूलमिदं सर्व भावाभावी सुखासुखे ॥ २४७ ॥ कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजा । संहरन्तं प्रजाः कालं कालः शमयते पुनः ॥ २४८ ॥ कालो हि कुरुते भावान् सर्वलोके शुभाशुभान् ।। कालः संक्षिपते सर्वाः प्रजा विस्तृजते पुनः ॥ २४९ ॥ कालः सुतेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः । कालः सर्वेषु भूतेषु चरत्यविधृतः समः ॥ २५० ॥ अतीतानागता भावा ये च वर्तन्ति साम्प्रतम् । तान् कालनिर्मितान् बुद्ध्वा न संज्ञा हातुमर्हसि ॥ २५१ ।। अनेक गुणों की मम्पन्नता का कीर्तन किया है वे को कदापि शोक करना नहीं चाहिए। होनहार भी मन्यु को जीन न सके । फिर आप के पुत्र तो कभी नहीं टल सकती। पूर्वकृत कर्मों का फल बड़े क्रोधी, लोभी और दुरात्मा थे। उनके लिए अनेक उपाय करने से भी नहीं जाता है । जगत् आप को शोच करना उचित नहीं ॥२३०।२४३॥ के कर्ता ने इस प्राणी ही को शुभ और अशुभ है, धृतराष्ट्र ! आप तो यई बुद्धिमान और कर्मों का फल भोगने को शुभ और अशुभ कर्म नामों के जानकार है। जिनकी बुद्धि मात्र के रच रखे हैं । उनको उल्लङ्घन करने की किसी की अनुगन यनी रहती है यह मोहम्पी जाल में भी सामर्थ्य नहीं है। इस मब जगत् का काल मूल नही पंगतं । पाण्यों को तिरम्पार और अपने है । क्योंकि सब प्राणियों को दु ख, सुख, ऐश्वर्य और पुरों में प्रानि यह मय आप में था और आप ही दरिद्रता सब काल के अनुसार होते है । जगत् का टमा अनी कार में जानते हैं इगरिए आप रचने और नाग करने वाला काल ही है । उस - आदिपर्व.] महाभारत ३३ aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaani सौतिरुवाच--इत्येवं पुनशोकात धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । आश्वास्य स्वस्थमकरोत् सूतो गावल्गणिस्तदा ॥ २५२ ॥ अत्रोपनिपदं पुण्यां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । विद्वद्भिः कथ्यते लोके पुराणे कविसत्तमैः ॥ २५३ ॥ भारताध्ययन पुण्यमपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥ २५४ ॥ देवा देवर्पयो ह्यत्र तथा ब्रह्मर्पयोमलाः। कीर्त्यन्ते शुभकर्माणस्तथा यक्षा महोरगाः ॥ २५५ ॥ भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः। स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥ २५६ ॥ शाश्वतं ब्रह्म परमं धवं ज्योतिः सनातनम् । यस्य दिव्यानि कर्माणि कथयन्ति मनीषिणः ॥ २५७ ॥ असच्च सदसञ्चैव यस्माद्विश्वं प्रवर्तते । संततिश्च प्रवृत्तिश्च जन्म-मृत्यु-पुनर्भवाः ॥ २५८ ॥ अध्यात्म श्रूयते यच्च पञ्चभूतगुणात्मकम् । अव्यक्तादि परं यञ्च स एव परिगीयते ॥ २५९ ॥ यतद्यतिवरा मुक्ता ध्यानयोगवलान्विताः । प्रतिविम्बमिवादशैं पश्यंत्यात्मन्यऽवस्थितम् ॥ २६० ॥ काल को भी महाकालरूपी महात्मा नाश करता है। ने इस प्रकार से राजा धृतराष्ट्र को समझा कर वह महाकाल ही सब शुभ अशुभ भावों का कर्ता उनका चित्त शान्त किया । श्रीकृष्णद्वैपायन जी है । और प्रजा का नाश करने वाला और रचने इस विषय में परम पवित्र उपनिषद् कह गए है। वाला भी यही है । यही सोते में जागृत् रूप है चतुर विद्वान् लोग पुराण में उस उपनिषद् का वर्णन और मब प्राणियों में समान फिरता है । उसको करते है। बड़े बड़े बुद्धिमान् कवि लोग कहते है' कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता है भूत, भविष्यम्, कि इस महाभारत का पाठ करने से पापों का नाम वर्तमान सभी वस्तु काल से रची हुई है, यह सब होता है और पुण्य (तेज ) बड़ता है। यहां तक जानकर आप को मोहबग होना नहीं चाहिए । कि श्लोक का एक चरण भी पढ़ लेने में पाप का २४४४२५१॥ भय नहीं रहता। क्योंकि टम महाभारत में देवता, श्री उग्रश्रवा जी बोले- हे ऋपियो ! संजय देवऋषि, ब्रह्मऋपि, यक्ष और नाग आदि का महाभारत [ आदिपर्य . श्रद्दधानः सदा युक्तः सदा धर्मपरायणः । आसेवन्निममध्यायं नरः पापात्प्रमुच्यते ॥ २६१ ॥ अनुक्रमणिकाध्यायं भारतस्यममादितः । आस्तिकः सततं शृण्वन्न कृच्छ्रेप्ववसीदति ॥ २६२ ॥ उभे संध्ये जपन् किंचित् सद्यो मुच्येत् किल्विपात्। अनुक्रमण्या यावत्स्यादन्हा रात्र्या च संचितम् ॥ २६३ ॥ भारतस्य वपुर्येतत्सत्यं चामृतमेव नवनीतं यथा दनो द्विपदां ब्राह्मणो यथा ॥ २६ ॥ आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधीभ्योऽमृतं यथा । हृदानामुदधिः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुप्पदाम् ॥ २६५ ॥ यथैतानीतिहासानां तथा भारतमुच्यते । यश्चैनं श्रावयेच्छ्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्ततः ॥ २६६ ॥ अक्षय्यमन्नपानं वै पितॄस्तस्योपतिष्ठते । इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत् ॥ २६७॥ वर्णन है । और श्री वासुदेव भगवान् जो सत्य, आस्तिक पुरुष भारत ग्रंथ के इस अनुक्रमणिका- पवित्र, सब पापों के नाम करने वाले, भाग्य के ध्याय को पहले ही सुना करें वह कभी कष्ट में उदय करने वाले, सर्व देश और सर्व वस्तुओं में नहीं पड़ेंगें । इस अध्याय का संध्या और प्रातः- व्याप्त, परब्रह्म अचल, ज्योति के समान चैतन्य, काल में कुछ कुछ पाठ करने से दिन और रात्रि मनातन, अमत्, ( मुख मे वर्णन नहीं किए जा के पाप सब दूर हो जाते हैं । यह अनुक्रमणिका- मक्न ) मदमत् ( कारण कार्यम्प) जन्म ध्याय महाभारत ग्रंथ की सत्य और अमृत भरी मृत्यु के देने वाले और अव्यातम है। जिनका देह के सदृश हुआ है । जैसे दही में मक्खन, ध्यान करके यति रोगों ने मुक्ति पार्द; और जिन काभानी गंग अपने हृदय में हम प्रकार से देखते मनुष्यों में ब्राह्मण, वेद में उपनिषद्, औषधियों में अमृत, जलाश्यों में सागर और चतुष्पदों में गाय है, जमदर्पण में मुम्ब देख पढ़ना है । उमी भगवान् श्रेष्ठ है वैसे ही इतिहासों में यह महाभारत श्रेष्ठ कृष्ण का अदभुन चरित्र इम महाभारत प्रथ में है। जो कोई पितरों के श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन पाहुन विनार पूर्वक वर्णन किया गया है । धार्मिक कराने में दम श्रेष्ठ प्रथ को सुनाये तो उसके गग म अध्याय का नियम और श्रद्धा के माथ पितरों को वह अन्न अक्षय होकर पहुंचता है । पटन पाने में गम्पूर्ण पापों में छूट जान हैं। यदि कोई पुस्प वेदों को जानना चाहे वह पहिले । , ।

आदिपर्व म हा भारत विभत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति । काणं वेदमिमं विद्वाश्रावयित्वार्थमश्रुते ॥ २६८ ॥ भ्रूणहत्यादिकं चापि पापं जह्यादसंशयम् । य इमं शुचिरध्यायं पठेत् पर्वणि पणि ॥ २६९ ।। अधीतं भारतं तेन कृत्स्नं स्यादिति मे मति । यश्चैनं शृणुयान्नित्यमापं श्रद्धा समन्विंतः ॥ २७० ॥ ‘स दीर्घमायुः कीर्ति च स्वति चाप्नुयान्नरः । एकतश्चतुरो वेदा भारत चैतदेकतः ॥ २७१ ॥ पुरा किल सुरैः सर्वैः समेत्य तुलाया धृतम् । चतुर्थ्यः सरहस्येभ्यो वैदोभ्यो ह्यधिकं यदा ॥ २७२ ॥ तदा प्रभृति लोकेऽस्मिन् महाभारतमुच्यते । महत्वे च गुरुत्वे च ध्रियमाणं यतोऽधिकम् ॥ २७३ ॥ महत्वाद्भारवत्त्वाच महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २७४ ॥ इस महाभारत को पढ़े जो इसको बिना पढ़े वेदों तभी से इसे संसार में महामारत कहने लगे। महा- में परिश्रम करता है उसका परिश्रम व्यर्थ है । हे भारत का ठीक अर्थ यह है कि सब ग्रन्थों में यह ऋपियो ! इस व्यास जी के बनाये हुए. वेदमय अन्य वड़ा होने के कारण इसको महत्व पदवी मिली ग्रंथ को सुनाकर विद्वान् लोग धन उपार्जन करते और सब ग्रंथों से इसका अर्थ कठिन होने से भारत्व हैं। इसके पढ़ने पढ़ाने से गर्भ-पात आदि के कहलाया सो इसलिए इसका नाम महाभारत हुआ। समान पाप भी निःसंशय दूर हो जाते हैं । जो • यदि कोई पुरुष यह कहे कि इस महाभारत पवित्रता के साथ प्रति पर्व के दिन इस अध्याय में छल, प्रपंच और निग्रह है और जहां जहां को पढ़ेगा उसको सब महाभारत पाट करने का भगवत् कथा भी है तो इसको इस प्रकार फल मिलेगा । जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा से इसे नित्य से त्यागना चाहिये जैसे विष मिश्रित अन्न त्याग सुनता है वह बड़ी आयु, कीर्ति और स्वर्ग लोक दिया जाता है ऐसे पुरुष के लिए यह है कि जैसे पाता है ॥२५२१२७०॥ तप आदि का करना, वेदों का पढ़ना और भृस्त्र पहिले इस भारत को देवताओं ने एक और प्यास आदि को सहन करके धन मंचय का करना चारों वेद और दूसरी और भारत को रखकर केवल पुण्य ही है पाप नहीं है परन्तु वही बातें तोला जब वह भारत चारों वेदों से अधिक निकला चित्त का भाव दूषित होने पर पापम्प हो जाती [ आदिपर्व ३६ महाभारत तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वाभविकोवेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्कस्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥ २७५ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अनुक्रमणिकापर्वणि प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥ अनुक्रमणीपर्वममाप्तम् ।। है इसी प्रकार से भारत में भी धर्म और ब्रह्म का युधिष्ठिर आदि का सा धर्म करें और कौरवों जैसा निरुपण होने से पुण्य का देने वाला है । कौरवों की । अन्याय न करें और यदि कदाचित् ऐसा करेंगें भी तो दुष्टता और पाण्डवों की सत्यता इस कारण से उनका कौरवों की तरह नाग हो जायेगा । दिग्वलाई है कि संसारी लोग भी इसको पढ़कर ॥२७१।२७५॥ - द्वितीयोऽध्याय २ ऋपय उचु-समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन । एतत्सर्व यथातत्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ १ ॥ मातिरुवाच-शृणुध्वं मम भो विप्रा बुवंतश्च कथाः शुभाः । समन्तपञ्चकाग्व्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ॥ २ ॥ त्रेताद्वापरयोः संधौ रामः शस्त्रभृतां वरः। असकृत्पार्थिवं क्षत्रं जघानामपंचोदितः ॥ ३ ॥ स सर्व क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः । समन्तपञ्चके पञ्च चकार रौधिरान्ह्रदान् ॥ ४ ॥ स तेषु रुधिराम्भःसु ह्रदेषु क्रोधमूछितः । पितृन्सतर्पयामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥ अर्थ/कादयोऽभ्येत्य पितरो राममब्रुवन् । राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ ६ ॥ ॥ दूसरा अध्याय २॥ ऋषियों ने कहा -हे मन पुत्र : ममन्नपञ्चक कई वार क्षत्रियों का नाम किया ॥३॥ नार्थ का नाम जो आपने कहा है हम उममा उस अमि के समान तेजम्बी ने अपने बल विस्तार पूर्वक वर्णन मनना चाहते है । मन पुत्र से, क्षत्रियों को नाम करके समन्तपञ्चक में रक्त में का पापियो, में कथा मुनाता हु, आप एक के पाच तालाव बनाय, और क्रोध में आकर रुधिर गिनु र गुना । त्रना और द्वापर की मधि में में अपने पितरों का तर्पण किया । उसके पश्चात् गम्य पारियों में भ्रष्ट पाशुगम ने नाथ में आकर ऋचीक आदि पितर परशुराम के समपि आकर आदिपर्व] महाभारत अनया पितृ भक्त्या च विक्रमेण तव प्रभो । वरं वृणीष्व भद्रं ते यमिच्छसि महायुते ॥ ७ ॥ गमोवाच-यदि मे पितरः प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि । यच्च रोपाभिभूतेन क्षत्रामुत्सादितं मया ॥ ८ ॥ अतश्च पापान्मुच्येऽहमेप मे प्रार्थितो वरः । हृदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः ॥ ९ ॥ एवं भविष्यतीत्येवं पितरस्तमथाब्रुवन् । तं क्षमखेति निपिपिधुस्ततः स विरराम ह ॥ १० ॥ तेषां समीपे यो देशो ह्रदानां रुधिराम्भसाम् । समन्तपञ्चकमिति पुण्यं पुण्यं तत्परिकार्तितम् ॥ ११ ॥ येन लिहून यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते । तेनैव नाना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ॥ १२ ॥ अन्तरे चैव संप्राप्ते कालद्वापरयोरभूत् । समन्तपञ्चके युद्धं कुरु-पाण्डव-सेनयोः ॥ १३ ॥ तस्मिन्परमधर्मिष्टे देशे भूदोपवर्जिते । अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ॥ १४ ॥ बोले-हे मृगुवंशि महामाग परशुराम, तुम्हारी कुण्डों के समीप का सब स्थान समन्तपञ्चक कह- यह पितरों की भक्ति और पराक्रम देखकर हम लाता है । विद्वान् लोग कहते हैं कि जो देश जिस अत्यन्त प्रमन्न हुए है । अव अपनी इच्छानुसार वर चिह से युक्त हो वह उसी नाम से प्रसिद्ध होता है । माँगो । यह मुनकर परशुराम जी ने कहा, यदि कलियुग और द्वापर के संगम में समन्तपञ्चक आप मुझ पर प्रभन्न हैं और मुझ को अनुग्रह योग्य में कौरवों और पापड़ों की सेना का युद्ध हुआ समझते हैं तो मैने जो क्रोधित होकर क्षत्रिय वंग था ॥१०॥१३॥ का नाम किया है उसके पाप मे निवृत हो जाऊँ हे ब्रामणो ! उस निर्दोष तीध-म्यान में यही मेरी इच्छा है और यह रक्त मे भरे पाँच कुण्ड अठारह अक्षौहिणी सेना लड़ने के लिये जमा हुई तीर्थ माने जाने लगें ॥९॥ और सब मारी गई । यह ममन्तपंचक नाम का पितरों ने कहा-ऐमा ही होगा । टमक कारण हे ममन्तपंचक का अर्थ यह है कि ममेत उसने क्षत्रियों की हिंमा का निध किया और अंत दोनों मिलकर ममन्त हुआ जिमका और परशुराम जी ने स्वीकार किया। उन पाँचों अर्थ यह है कि वह जगह जहां अठारह अनौहिणी . उपर [ आदिपय महाभारत ३८ . समेत्य तं द्विजास्ताश्च तत्रैव निधनं गताः । एतन्नामाभिनिवृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः ॥ १५ ॥ पुण्यश्च रमणीयश्च स देशो वः प्रकीर्तितः । तदेतत्कथितं सर्व मया ब्राह्मणसत्तमाः । यथा देशः स विग्यातत्रिपु लोकेपु सुनताः ॥ १६ ॥ कृपय उचु-अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वया सूतनन्दन । एतदिच्छामहे श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ॥ १७ ॥ अक्षौहिण्याः परीमाणं नराश्वरथदन्तिनाम् । यथावञ्चैव नो हि सर्व हि विदितं तव ॥ १८॥ मोतियाच-एको रथो गजश्चको नराः पञ्च पदातयः । त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्यभिधीयते ॥ १९ ॥ पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः । त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ २० ॥ त्रयो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रयः । स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ॥ २१ ॥ चमूस्तु पृतनास्तिस्त्रस्तिस्रश्चम्बस्त्वनीकिनी । अनीकिनी दशगुणां प्राहुरक्षौहिणी बुधाः ॥ २२ ॥ मना कटी और उस जगह पाच कुण्ड होने से इतने को 'पत्ति' कहते है। तीन पत्तियों का एक ममन्तपार नाम हुआ। सो वह देश तीनों लोकों 'सैनामुम्ब होता है । तान सेनामुखों का एक में विख्यात है और यग रमणीक और देगने के 'गुल्म' होता हे । तीन गुल्मों का एक 'गण' योग्य है । इतनी कथा सुनकर मपि लोग बोले, कहलाता ह । तीन गणा का एक 'वाहिनी' है गन पुर ' अभाहिणी स्गि कहत है, सो हम कहराती है। तीन वाहिनियों की एक 'पृतना' मे आप कही । अभारिणी के मनुष्य, घारे, रथ, होती है । तीन पृतनाओं की एक 'चमू' होती है। हाधिया का प्रमाण हम यताओ क्यामि तुम मर तीन चम्ओं की एक 'अनीकिनी' होती है । दस यए जानने ॥१८॥ जनीकिनिओं की एक 'अधौहिणी' होती हे । गन परी योरे, विहे पियो 'm एक अधारिणी में २१८७० ग्थ, २१८७० हाथी, य, काया, पाच पदर रिपारी, तीन पोर- ६५६१० घोटे और १०९३५० पैदर सिपाही - आदिपर्व ] महाभारत अक्षौहिण्याः प्रसंख्याता रथानां द्विजसत्तमाः । संख्या गणितत्वनैः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ २३ ॥ शतान्युपरिचैवाष्टौ तथा भूयश्च सप्ततिः । गजानां च परिमाणमेतदेव विनिर्दिशेत् ॥ २४॥ ज्ञेयं शतसहस्रं तु सहस्राणि नवैव तु । नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघाः ॥ २५॥ पञ्चसष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च । दशोत्तराणि पट् प्राहुर्यधावदिह संख्यया ॥ २६ ॥ एतामक्षौहिणी प्राहुः संख्यातत्वविदो जनाः । यां वः कथितवानस्मि विस्तरेण तपोधनाः ॥ २७॥ एतया संख्यया ह्यासन्कुरुपाण्डवसेनयोः । अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डिताप्टादशैव तु ॥ २८ ।। समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः । कौरवान्कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ॥ २९ ॥ अहानि युयुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रिवित् । अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ॥ ३० ॥ अहनी युयुधे द्वे तु कर्णः परवलार्दनः । शल्योऽर्धदिवसं चैव गदा युद्धमतः परम् ॥ ३१ ॥ तस्यैव दिवसस्यान्ते द्रौणिहार्दिक्यगौतमाः । प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुधिष्टिरं वलम् ॥ ३२ ॥ होते हैं । हे ऋपियो ! कौरवों और पाण्डवों की कर्ण ने दो दिवस तक और गन्य ने आधा ऐसी अठारह अक्षौहिणी सेना समन्तपंचक पृथ्वी दिन तक युद्ध किया । अन्त को आधे दिन पर ईकट्टी हुई थी और कौरवों को केवल कारण भीमसेन और दुर्योधन ने गढा-युद्ध किया । उमी बनाकर अदभुत कर्म करने वाले काल ने उन मव दिन सन्ध्या के समय अश्वत्थामा, कृपाचार्य और का वहां नाग किया । अदभुत अम्त्र विद्या के कृतवर्मा ने रात्रि के समय युधिष्ठिर की मना का जानने वाले भीष्म दस दिन तक और द्रोण पांच नाग किया ॥३१॥३२॥ दिवम तक कॉग्यों के मेनापति रहे ॥१९॥३०॥ दतनी कथा सुनाकर मूत पुत्र बोले, आदिप] महाभान यतु शौनक सत्रे ते भारताच्यानमुत्तमम् । जनमेजयस्य तत्सत्रे व्यासशिष्येण धीमता ॥ ३३॥ कथितं विस्तरार्थ च यशो वीर्य महीक्षिताम् । पोप्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादितः स्मृतम् ॥ ३४ ॥ विचित्रार्थ-पदाख्यानमनेक-समयान्वितम् । प्रतिपन्नं नरैः प्रावैराग्यमिव मोक्षिभिः ॥ ३५॥ आत्मैव वेदितव्येषु प्रियेष्विव हि जीवितम् । इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमप्वयम् ॥३६॥ अनाश्रित्येदमाख्यानं कथा भुवि न विद्यते । आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥३७॥ तदेतद्भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते । उदय-प्रेप्सुभिर्भूत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥३८॥ इतिहासोत्तमे यस्मिन्नर्पिता बुद्धिरुत्तमा । स्वरअनयोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रयेव वाक् ॥ ३९ ॥ तस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः । सूक्ष्माईन्याययुक्तस्य वेदार्थभूपितस्य है मृपियो ! तुम्हारे यज्ञ में जो मैं यह महामारत है, वैसे ही सर्व पदार्थों में यह भारत श्रेष्ठ है । कह रहा हु, इमे व्याम जी के शिष्य बुद्धिमान् जैसे भोजन के बिना शरीर का रहना असम्भव है वगम्पायन ने गजा जनमजय के सर्प यज्ञ में वर्णन वैसे ही महाभारत के आश्रय के बिना कोई कक्षा किया था । इमक आदि परम मगाचरण रपी पृथ्वी में नहीं हो सकती । जैसे निधन मनुष्य पाप्म, पारोम और आम्ती प में राजाओं के धनी की सेवा तन और मन से करते है वैसे हा अमाधारण चरित्र विशेष रूप में ( है ) गये है कवि रोग इस महाभारत का आश्रय लेते है । जैसे सर रोविक और वैदिक वाक्य, म्वर ओर व्यजन हर्गम अनेक समय में शिनित्र अर्थ पद वर्गों से परिपूर्ण रहते है, तैसे ही इतिहासो में श्रेष्ठ वां निहाम वर्णन किये गये। से मोक्ष यह महाभारत हित माधने वाली बुद्धि का आधार पीछा कान वाग का गग्य प्याग होता है है ॥३॥३०॥ 'म । युदिमान गंग म महाभारन का नाश्रय से । म गय पदार्थों में अपना जीवन श्रेष्ठ पाले और मूक्ष्म अर्थ न्याय में युक्त और वेदों के उम बुद्धियुक्त और विचित्र पर्व और पद 1 11३३४ आदिपर्व ] म हा भारत भारतस्येतिहासस्य श्रूयतां पर्वसंग्रहः । पर्वानुक्रमणी पूर्व द्वितीयः पर्वसंग्रहः ॥४१॥ पोप्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् । ततः संभवपर्वोक्तमद्धतं रोमहर्पणम् ॥१२॥ दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्वं पर्व चोच्यते । ततो वकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः ॥४३॥ ततः स्वयंवरो देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते । क्षात्रधर्मण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् ॥ १४ ॥ विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च । अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः ॥४५॥ सुभद्राहरणादूचं ज्ञेया हरणहारिका । 'ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मयदर्शनम् ॥ ४६॥ सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् । जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजयं तथा ॥४७॥ पर्व दिग्विजयादूर्व राजसूयिकमुच्यते । ततश्चार्धाभिहरणं शिशुपाल वधस्ततः ॥४८॥ द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् । तत आरण्यक पर्व किमीरवध उच्यते ॥१९॥ अर्जुनस्याभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । ईश्वरार्जुनयोर्युद्धं पर्व कैरातसंज्ञितम् ॥५०॥ अर्थों से अलंकृत भारत इतिहाम पर्वसग्रह को वाला )जतुगृहपर्व, लाख के घर का दाह । हिडिम्य- सुनो ॥४०॥ वधपर्व, वकवधपर्व, चैत्ररथपर्व, द्रौपदीम्वयंवरपर्व, इस महाभारत का यह पहला अध्याय वैवाहिकपर्व, विदुरागमन और राज्यलाभपर्व, अनुक्रमणिकापर्व और दूसरा पर्व संग्रहपर्व अर्जुन-वनवासपर्व, सुभद्राहरणपर्व, यौतुकाहरणपर्व, कहलाता है । फिर क्रम से पौप्यपर्व, पोलोमपर्व, खाण्डव-दाहपर्व और मयदर्शनपर्य है । सभापर्व में आम्तीकपर्य, अंगावतरणपर्व और सम्भवपर्व, जो मंत्रपर्व, जरासंध-वधपर्व, दिग्विजयपर्व, राजसूयपर्व, अद्भुत और रोमांचकारी है ( आनन्द के देने अर्घ्यहरणपर्व, शिशुपालवधपर्व, द्यूतपर्व और अनुद्यूत्त- आदिएच ] महाभारत इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । नलोपाख्यानमपि च धार्मिकं करुणोदयम् ॥५१॥ तीर्थयात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः । जटासुरवधः पर्व यक्षयुद्धमतः परम् ॥५२॥ निवातकवचेयुद्धं पर्व चाजगरं ततः । माकण्डयसमास्या पर्वानन्तरमुच्यते ॥ ५३॥ संवादश्च तत. पर्व द्रौपदीसत्यभामयोः । घोषयात्रा ततः पर्व मृगस्वप्नोद्भवं ततः ॥ ५४ ॥ व्रीहिद्रोणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव द्रौपदीहरणं पर्व जयद्रथविमोक्षणम् ॥५५॥ पतिव्रताया माहात्म्यं सावित्र्याश्चैवमतम् । रामोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् ॥ ५६ ॥ कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते । आरणेयं ततः पर्व वैराटं तदनन्तरम् । पाण्डवानां प्रवेशश्च समयस्य च पालनम् ॥ ५७॥ कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः । अभिमन्योश्च वेराव्याः पर्व वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ५८ ॥ उद्योगपर्व विजेयमत ऊर्ध्वं महाद्भतम् । ततः संजययानाग्यं पर्व ज्ञेयमतः परम् ॥ ५९॥ प्रजागरं तथा पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तया । पर 1812॥ म्यापर्व, द्रौपदी और सत्यभामा का सम्वादपर्व, वनपर्व में दिमीरवधपर्व, अर्जुन-बन-गमनपर्व, घोषयात्रापर्व, मृगम्वप्नोद्भवपर्व, ब्रीहिद्रौणिक आर किंगन, निमम अर्जुन और महादेव का युद्ध इन्द्रद्युम्नपर्व, द्रोपदीहरणपर्व, जयद्रथमन्थनपर्व, आहै । इन्द्ररीर-गमनपर्व, धर्म और करणा के पतिना मावित्री के अद्भुत महात्म्यपी, रामोपाख्या भाव में युा राना मन पाक्था का पर्व, युधिष्टिर यनपर्व, कुण्डराहरणपर्व और आरणेयपर्व है । विराट दी नार्थयात्रापर्य, कामुर-वधपर, यक्ष-युद्धपर्व, पर्व में पाण्डवप्रवेशपर्व, ममयपारनपर्व, कीचक-- पिानकवच युद्धपर, अनगरपर्व, माईण्टेयमम यधपर्व, गोग्रहणपर्व और अभिमन्यु और उत्तरा आदिपर्व ] म हा भारत पर्व सानत्सुजातं वै गुह्यमध्यात्मदर्शनम् ॥६॥ यानसंधिस्ततः पर्व भगवद्यानमेव च । मातलीयमुपाख्यानं चरितं गालवस्य च ॥११॥ सावित्रं वामदेव्यं च वैन्योपाख्यानमेव च । जामदग्न्यमुपाख्यानं पर्व पोडशराजकम् ॥६॥ सभाप्रवेशः कृष्णस्य विदुलापुत्रशासनम् । उद्योगः सैन्यनिर्याणं विश्वोपाख्यानमेव च ॥६३॥ क्षेयं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः । निर्याणं च ततः पर्व कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ ६४ ॥ रथातिरथसंख्या च पर्वोक्तं तदनंतरम् । उलूक दूतागमनं पर्वामर्य–विवर्धनम् ॥६५॥ अम्बोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् । भीपमाभिषेचनं पर्व ततश्चाद्भुतमुच्यते ॥ ६६ ॥ जंबूखण्डविनिर्माण पर्वोक्तं तदनन्तरम् । भूमिपर्व ततः प्रोक्तं द्वीपविस्तारकीर्तनम् ॥ ६७ ॥ पूर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः । द्रोणाभिषेचनं पर्व संशप्तकवधस्ततः ॥ ६८॥ आभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञा पर्व चोच्यते । जयद्रथ वधः पर्व घटोत्कच-बधस्ततः ॥ १९ ॥ विवाहपर्य है । अद्भुत उद्योगपर्व में सेनोद्योगपर्व, पाण्डव सेना का निर्याणपर्व, रथातिरथसंख्यापर्व, सञ्जय यानपर्व, धृतराष्ट्र की चिन्ता का प्रजागरपर्व, क्रोधी उल्लूक दूतागमन, अमर्पविवर्द्धन, अंबोपा- अध्यातम विद्यासनत्सुजातपर्व, यानसधिपर्व और ख्यान, भीष्माभिपेकपर्व, जम्बुखण्ड-निर्माणपर्व, द्वीप भगवद्यानपर्व है । भगवद्यानपर्व में गालवचरित्र, विस्तार वर्णन युक्त भूमिपर्व, भगवद्गीतापर्व और भीष्म सावित्री, वामदेव, पृथु और परशुराम की कथा, पोड़ग- वधपर्व है। द्रोणपर्व में द्रोणाभिपेकपर्व, संशप्तक-वध- राजकपर्व, कृष्ण का सभा-प्रवेश, विदुला पुत्र शासन, । पर्व, अभिमन्यु-वधपर्व, प्रतिज्ञापर्व, जयद्रथ-वधपर्व, उद्योगपर्व में सैन्यनिर्याणपर्व है। सैन्यनियाणपर्व के घटोत्कच-वधपर्व, द्रोण-वधपर्व, लोमहर्षणपर्व, नारा- अन्तगत विश्वोपाग्व्यान, महात्मा कर्ण का विवाद, कुरु । यणशास्त्रपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, दुर्योधन जल- - [ आदिपव महाभारत ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेयं लोमहर्पणम् । मोक्षो नारायणास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ॥ ७० ॥ कर्णपर्व ततो ज्ञेयं शल्यपर्व ततः परम् । हृदप्रवेशनं पर्व गदायुद्धमतः परम् ॥ ७१॥ सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशानुकीर्तनम् । अत ऊर्ध्वं सुवीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ॥ ७२ ॥ ऐपीकं पर्व चोद्दिष्टमत ऊर्ध्व सुदारुणम् । जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीविलापस्ततः परम् ॥ ७३ ॥ श्राद्धपर्व ततो जेयं कुरूणामौलदहिकम् । चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो ब्रह्मरूपिणः ॥ ७ ॥ आभिपेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः । प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ॥७५॥ शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुशासनम् । आपद्धर्मश्च पर्वोक्तं मोक्षधर्मस्ततः परम् ॥ ७६ ॥ शुकप्रश्नाभिगमनं ब्रह्मप्रश्नानुशासनम् । प्रादुर्भावश्च दुर्वासः संवादश्चैव मायया ॥७७॥ ततः पर्व परिक्षयमानुशासनिकं परम् । म्वर्गारोहणिकं चैव ततो भीप्मस्य धीमतः ॥ ७८ ॥ तनोऽश्वमेधिक पर्व सर्वपापप्रणाशनम् । अनुगीता ततः पर्व ज्ञेयमध्यात्मवाचकम् ॥ ७९ ॥ प्रवापर्व, गदायुद्धपर्व, अनन्तर मारम्बनतीर्थवभानु- नुगामन, दुर्यामा प्रादुर्भाव और माया के साथ पाननपर्व, अनि भयानर मानिकपर्व में पार्ष गम्याद है। पिर अनुशासनपर्व में भीष्म स्वर्गा- पार में रपटानिकार्य, ग्नाविपर्य और रोहणपर्व है ।सर्व पापाक नाम करने वाला अश्वमेधपर्व প্রথা। fr বাধা ঃ কথা, আমি और अगुप्ता पर्व है । आश्रमवासिकर्प,पुत्रदर्शनपर्व पनिक भार पाविमाग । मान्निपर्य ग और नाग्दागमनपर्व । पिर मीमपर्व, महासम्धा- धानुन, अनन्तर मादधर्म और निरुपर्व और स्वर्गारोहणपर्व है । हरिवणपर्व में inामानाभिगमन, प्रामा मृण की गग भार कमवध का वर्णन किया आदिपव ] महाभारत . पर्व चाश्रमवासाख्यं पुत्रदर्शनमेव च । नारदागमनं पर्व ततः परमिहोच्यते ॥ ८॥ मौसलं पर्व चोद्दिष्टं ततो घोरं सुदारुणम् । महाप्रस्थानिकं पर्व स्वर्गारोहणिकं ततः ॥ ८१ ।। हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम् । विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथः ॥ ८२ ॥ भविष्यपर्व चाप्युक्तं खिलेप्वेवाद्भुतं महत् । एतत्पर्वशतं पूर्ण व्यालेनोक्तं महात्मना ॥ ८३ ॥ यथावत्सूतपुत्रेण लोमहर्पणिना ततः। उक्तानि नैमिपारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु ॥ ८४ ॥ समासो भारतस्यायमंत्रोक्तः पर्वसंग्रहः । पौण्यं पौलोसमास्तीकमादिरंशावतारणम् ॥८५॥ संभवो जतुवेश्माख्यं हिडिम्ववकयोर्वधः । तथा चैत्ररथं देव्याः पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरः ॥ ८६ ॥ क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् । विदुरागमनं चैव राज्यलंम्भस्तथैव च ॥ ८७ ॥ वनवासोऽर्जुनस्यापि सुभद्राहरणं ततः । हरणाहरणं चैव दहनं खाण्डवस्य च ॥८८॥ मयस्य दर्शनं चैव आदिपर्वणि कथ्यते । पौप्ये पर्वणि माहात्म्यमुत्तङ्कास्योपवागतम् ॥ ८९ ॥ गया है, अद्भुत भवप्यिपर्व, यह महात्मा ज्याम के , स्वयंवर. वैवाहिक, विदुरागमन, राज्यलाभ, अर्जुन- कहे हुए एक मौ पर्व है । उग्रश्रवा ने नैमिपारण्य । वनगमन, मुभद्राहरण, यौतुकाहरण, खाण्डवढाह में उन मा पों को मंभिप्त करके केवल अठारह , और मयदर्शन, यह मब पर्व आदिपर्व. में हैं । पों में कहा है । मो मत्र पर्वो की कथा संशेपम्प पौप्यपर्व में उत्तक ऋषि का महास्य वर्णन मे कही जाती है ॥५०॥८॥ किया है । पौलोम पर्व में भूगुवंश का विस्तार कहा पौप्य, पौलोम, आम्तीक, अंशावतरण, मम्मव, है । आम्तीकपर्व में नागों और गरुड़ की उत्पत्ति जतुगृह, हिटिम्बवध, वकवध, चैत्ररथ, द्रौपदी- और ममुन्दर मथने और जनमेजय के मर्पयन ।

[ आदिपर्व महाभारत पौलोमे भृगुवंशस्य विस्तारः परिकीर्तितः । आस्तीके सर्वनागानां गरुडस्य च संभवः ॥९॥ क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्चैःश्रवसस्तथा । यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारीक्षितस्य च ॥९१ ॥ कथेयमभिनिर्वृत्ता भरतानां महात्मनाम् । विविधाः संभवा राज्ञामुक्ताः संभवपर्वणि ॥९२ ॥ अन्येषां चैव शूराणामृषेद्वैपायनस्य च । अंशावतरणं चात्र देवानां परिकीर्तितम् ॥९३ ॥ दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् । नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्रिणाम् ॥ ९४ ॥ अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भवः । महराश्रमपदे कण्वस्य तपस्विनः ॥९५॥ शकुन्तलायां दुप्यन्ताद्भरतश्चापि जज्ञिवान् । यस्य लोकेपु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम् ॥ ९६ ॥ वसूनां पुनरुत्पत्तिर्भागीरथ्यां महात्मनाम् । शान्तनोवेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ॥९७ ॥ जोशानां च संपातो भीमस्याप्यत्र संभवः । राज्यान्निवर्तनं तस्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ॥९८॥ प्रतिज्ञापालनं चेव रक्षा चित्राङ्गन्दस्य च । हते चित्राइदे चेव रक्षा भ्रातुर्यवीयसः ॥ ९९ ॥ और उचया पार के जन्म होने की कथा का गहा के गर्भ से आठ वसुओं का जन्म और फिर वर्णन है। गंगास्नग्णर्य में यश, राक्षम, गर्व, म्वर्गारोहण तथा अंशावतारों का वर्णन है । सम्भव- विसर, देवता, दन्य, दानव, नाग, मर्प आदि पक्षी में राजाओं और वीर भत्रियों और महर्षि व्यास और दम नाना प्राणियों की उत्पत्ति, और भात जी की उत्सति है। इसी तरह कम से भीष्मपिता- पा के. श्रादिपुरष, हर नएम्ची फ आश्रम में मह की उत्पत्ति, गज्य का त्याग करना, ब्रह्मचर्य मन्नरा गर्म में सन्न दुप्यन के पुत्र भग्न धारण और प्रतित्रा पालन, चित्रांगद की रक्षा, पमा बनिन । मान्नु गला के आग्म और निप्रांगद की मृत्यु पीछे छोटे भाई फी रक्षा, sar आदिपर्व ] महाभारत विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये संप्रतिपादनम् । धर्मस्य नृषु संभूतिरणीमाण्डव्यशापजा ॥ १० ॥ कृष्णद्वैपायनाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा । धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च संभवः ॥ १०१ ॥ वारणावतयात्रायां मंत्रो दुर्योधनस्य च । कूटस्य धार्तराष्ट्रेण प्रेपणं पाण्डवान्प्रति ॥ १०२ ॥ हितोपदेशश्च पथि धर्मराजस्य धीमतः । विदुरेण कृतो यत्र हितार्थ म्लेच्छभापया ॥ १०३ ॥ विदुरस्य च वाक्येन सुरङ्गोपक्रमक्रिया । निषाद्याः पञ्चपुत्रायाः सुप्ताया जतुवेश्मनि ॥ १०४ ॥ पुरोचनस्य चात्रैव दहनं संप्रकीर्तितम् । पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्बायाश्च दर्शनम् ॥ १०५ ॥ तत्रैव च हिडिम्बस्य वधो भीमान्महावलात् । घटोत्कचस्य चोत्पत्तिरत्रैव परिकीर्तिता ॥ १०६ ॥ महदर्शनं चैव व्यासस्यामिततेजसः । तदाज्ञयैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ १०७ ॥ अज्ञातचर्यया वासो यत्र तेषां प्रकीर्तितः । वकस्य निधनं चैव नागराणां च विस्मयः ॥ १०८॥ संभवश्चैव कृष्णाया धृष्टद्युम्नस्य चैव ह । ब्राह्मणात्समुपश्रुत्य व्यासवाक्यप्रचोदिताः ॥ १०९ ॥ विचित्रवीर्य का राज्याभिषेक, अणीमाण्डव्य के शाप से हित समझाना, विदुर के कहने से सुरग का खोदा धर्म का मनुप्य शरीर धारण करना ॥८५१००|| जाना, पाच पुन्नों के माथ मो रही, मल्लाहिन और व्यास के वरदान से धृतराष्ट्र पाण्डवों का पुरोचन का लाग्य के घर में जल जाना, पाण्डयों का जन्म होना, पाण्डवों को वारणावत नगर में भेजने घोर वन में हिडिम्बा राक्षसी का दर्शन, वहीं भीमसैन के लिए दुर्योधन से सम्मति, दुर्योधन का पुरोचन वली के हाथ से हिटिम्ब का मारा जाना, घटोत्कच को दूत बनाकर पाण्डवों के निकट भेजना, रास्ते में की उत्पत्ति, महर्षि न्यास का पाण्डवों को दर्शन बुद्धिमान् युधिष्ठिर को विदुर का म्लेच्छ भाषा में ' देना, व्यास जी की आजा मे एक चक्रानगरी में -- आदिएवं ] म हा भा रन द्रौपदी प्रार्थयन्तस्ते स्वयंवरदिदृक्षया । पञ्चालानभितो जग्मुर्यत्र कौतूहलान्विताः ॥ ११० ।। अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा । सख्यं कृत्वा ततस्तेन तस्मादेव च शुश्रुवे ।। १११ ॥ तापत्यमथ वासिष्ठमौर्य चाख्यानमुत्तमम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पञ्चालानभितो ययौ ॥ ११२ ॥ पाञ्चालनगरे चापि लक्ष्यं भित्त्वा धनंजयः । द्रौपदीं लब्धवानत्र मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ॥ ११३ ।। भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान्पृथिवीपतीन् । शल्यकों च तरसा जितवन्तौ महामृधे ॥ ११४ ॥ दृष्ट्वातयोश्च तद्वीर्यमप्रमेयममानुपम् । शङ्कमानौ पाण्डवांस्तान्रामकृष्णो महामती ॥ ११५ ॥ जग्मतुस्तैः समागन्तुं शाला भार्गववेश्मनि । पंचानामेकपत्नीत्वे विमों द्रुपदस्य च ॥ ११६ ॥ पञ्चेन्द्राणांमुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुपः ॥ ११७ ॥ क्षत्तुश्च धार्तराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान्प्रति । विदुरस्य च सम्प्राप्तिदर्शनं केशवस्य च ॥ ११८ ॥ ग्रामण के घर में पाण्टयों का छिपकर रहना, बकासुर से तपती, वसिष्ठ और और्व की कथा सुनना, भाईयों का भागमन के हाथ में मारा जाना, उसके मारे के साथ पांचाल देश में जाना, द्रुपद के नगर में जान में नगर वामियों का विम्मय (हंगन) होना। जाकर सब राजाओं के बीच में लक्ष्य भेदकर द्वापी आर धृष्टद्या की उत्पत्ति, ब्राह्मणों मे द्रोपदी अर्जुन का द्रौपदी को जीतना, अर्जुन और भीम के के स्वयंवर की यानां मुनकर श्रीव्याम न की हाथों मे युद्ध में शल्य, करण आदि वीर राजाओं माता मे पाग्टयों का दापढी गम की आगामे की हार, भीम और अर्जुन के अत्यंत और मनुप्य म्दयंवर दम्पने के लिए पाचाल देश की और जाना, शक्ति मे बाहिर पराक्रम को देग्यकर कृष्ण और अनाप नाम के गन्धर्य को गङ्गा किनारे अर्जुन पनगम का उनकै पछि पछि कुमार के घर में जाना, वा जानना. उगम मित्रता करना और उसके मुग्य यह जानकर कि 'द्रौपदी के पांच म्यामि होंगे' राजा आदिपर्व ] महाभारत १९ खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यासिर्जनम् । नारदस्याज्ञया चैव द्रौपद्याः समयक्रिया ॥ ११९ ॥ सुन्दोपसुन्दयोस्तद्वदाख्यानं परिकीर्तितम् । अनन्तरं च द्रौपद्या सहासीनं युधिष्ठिरम् ॥ १२० ॥ अनुप्रविश्य विप्रार्थे फाल्गुनो गृह्य चायुधम् । मोक्षायित्वा गृहं गत्वा विप्रार्थं कृतनिश्चयः ॥ १२१ ॥ समयं पालयन्वीरो वनं यत्र जगाम ह । पार्थस्य वनवासे उलूप्या पथि संगमः ॥ १२२ ।। पुण्यतीर्थानुसयानं बभ्रुवाहनजन्म तत्रैव मोक्षयामास पञ्च सोऽप्सरसः शुभाः ॥ १२३ ॥ शापाद् ग्राहत्वमापन्ना ब्राह्मणस्य तपस्विनः । प्रभासतीर्थ पार्थेन कृष्णस्य च समागमः ॥ १२४ ॥ द्वारकायां सुभद्रा च कामयानेन भामिनी । वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ॥ १२५ ॥ गृहीत्वा हरणं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने । आभिमन्योः सुभद्रायां जन्म चोत्तमतेजसः ॥ १२६ ॥ द्रौपद्यास्तनयानां च संभवोऽनुप्रकीर्तितः । विहारार्थ च गतयोः कृष्णयोर्यमुनामनु ॥ १२७ ॥ द्रुपद का उस बारे में चिन्ता करना, पांच इन्द्रों का भीतर जाना और वहां एकान्त में द्रोपदी के साथ अति आश्चर्य्य उपाख्यान कहा जाना, द्रौपदी का युधिष्ठिर के बैठे देग्वने पर प्रतिज्ञा के मुताबिक दैवी अद्भुत विवाह, धृतराष्ट्र का विदुर को पांडवों प्रायश्चित्त करने को अर्जुन का वन को जाना, पास भेजना, विदुर का उनके पास पहुंचना और , वनवास में उलूपी का मिलना, पुण्य तीर्थों में जाना, श्रीकृष्ण का दर्शन देना, पाण्डवों का ग्वाण्टवप्रथ बभ्रुवाहन की उत्पत्ति, पांच अप्पराओं को जो में वाम करना, धृतराष्ट्र से उनका आधा राज्य पाना, त्रामण के शाप मे प्राह बनी हुई थीं अर्जुन के म्पर्श नारद की आजा से द्रौपदी के मिलने का समय से मोक्ष, प्रभासतीर्थ में अर्जुन का श्रीकृष्ण से समा- ठहराना, सुन्द- उपमुन्द की कथा, प्रार्थी ब्राह्मण की । गम, श्रीकृष्ण की सलाह से अर्जुन का द्वारका में जाकर गाय की रक्षा के लिए शस्त्र लेने को अर्जुन का , सुभद्रा ग्रहण दहेज लेकर श्रीकृष्ण का अर्जुन के के आदिपर्य] b. महाभारत - संप्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् -1 मयस्य मोक्षो ज्वलनाडुजङ्गस्य च मोक्षणम् ॥ १२८ ॥ महर्मन्दपालस्य शाङ्गयां तनयसंभवः - इत्येतदादिपर्वोक्तं प्रथमं बहुविस्तरम् ॥ १२९ ॥ अध्यायानां शते द्वे तु संख्याते परमर्पिणा । सप्तविंशतिरध्याया व्यासेनोत्तमतेजसा ॥ १३० ।। अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । श्लोकाश्च चतुराशीतिर्मुनिनोक्ता महात्मना ॥ १३१ ॥ द्वितीयं तु सभापर्व बहुवृत्तान्तमुच्यते । सभाक्रिया पाण्यानां किंकराणां च दर्शनम् ॥ १३२ ॥ लोकपालसभाग्व्यानं नारदाद्देवदर्शिनः । राजसूयस्य चारम्भो जरासंधवधस्तथा ॥ १३३॥ गिरिबजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् । तथा दिग्विजयोऽत्रैव पाण्डवानां प्रकीर्तितः ॥ १३४ ॥ राजामागमनं चैव साहणानां महाकतौ । राजसूर्यर्घसंवादे शिशुपालवधस्तथा ॥ १३४ ॥ यज्ञे विभूति तां दृष्ट्वा दुःखामान्वितस्य च । दुर्योधनस्यावहासो भीमेन च सभातले ॥ १३६ ॥ पाम जाना, सुभद्रा के गर्भ में महापराक्रमी अभिमन्यु चौरासी श्लोक कहे हैं ॥१०१११३१॥ का जन्म होना, द्वापटी पे पुत्रों का जन्म, दूसरा मभापर्व है । इसम पाण्डयों का सभा श्रीकृष्ण और अर्जन का विहार करने के रिय बनाना, किंकर दर्शन, देवरोक देखने वाले श्री- यमुना में जाना, चा आर धनुष की प्राप्ति, नारद जी द्वारा रोक्पाग की सभा का वर्णन, माडर बन पा जग्ना, दाह में भय और मर्प का राजसूय यज्ञ का आरम्भ, जरासध का वध, गिरि- गुहाना, भार माही के गर्भ में मन्दपार के पुत्र वन में कदी राजाओं को श्रीकृष्ण का छुडाना, उत्पन्ना, TV ही हुई धाएं विनार पूर्वक पाण्डवों का दिग्विजय, उपहार (भेटें) रेकर राज- अदिप में की। इसमें महर्षि घटय्याम जी ने स्य यज्ञ में राजाओं का आना, प्रजा के झगडे में anममाईम अध्याय और जाट हमार आठ मी निशुपार पो श्रीकृष्ण का माग्ना, यन में पाण्डवों ~- आदिपर्व ] म हा भारत क यत्रास्य मन्युरुभूतो येन द्यूतमकारयत् । पत्र धर्मसुतं द्यूते. शकुनिः कितवोऽजयत् ॥ १३७ ।। यंत्र द्यूतार्णवे. मग्नां द्रौपदी नौरिवार्णवात् । धृतराष्ट्रों. महाप्राज्ञः स्नुषां परमदुःखिताम् ॥ १३८ ॥ तारयामास तांस्तीर्णानज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः । पुनरेव ततो द्यूते समाह्वयत पाण्डवान् ॥ १३९ ।। जित्वा स वनवासाय प्रेषयामास तांस्ततः । एतत्सर्व सभापर्व समाख्यातं महात्मना ॥ १४० ॥ अध्यायाः सप्ततिज्ञेयास्तथा चाष्टौ प्रसंख्यया । श्लोकानां दै सहस्रे तु पञ्च श्लोकशतानि च ॥ १४१ ॥ श्लोकाश्चैकादश नेयाः पर्वण्यास्मन्द्विजोत्तमाः । अतः परं तृतीयं तु ज्ञेयमारण्यकं महत् ॥ १४२ वनवास प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु । पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ १४३ ॥ अन्नौपीनां च कृते पाण्डवेन महात्मना । द्विजानां भरणार्थं च कृतमाराधनं रखेः ॥ १४४ ॥ धौम्योपदेशात्तिग्मां शुप्रसादादन्न संभवः । हितं च ब्रुवतः भत्तुः परित्यागोऽम्बिकासुतात् ॥ १४५ ॥ के मारी ऐश्वर्य को देखकर भीमसैन का सभा में का फिर हारना और भाईयों समेत बन में जाना दुखित और क्रोधित दुर्योधन की हसी करना, इसी कहा गया है। इस पर्व में अठत्तर अध्याय और कारण से दुर्योधन के मन में क्रोध उत्पन्न हुआ दो हजार पाच मौ ग्यारह श्लोक हैं ॥१३२।१४१।। वही क्रोध जुए का मूल था । कपट से जुआ खेलना, तीसरा वनपर्व कहलाता है । पाण्डवों का क्पटी शकुनि का जुए में धर्मराज को जीतना, उस बन को जाना उनके माथ हस्तिनापुर के लोगों जुए के ममुद्र में डूबी हुई दुखित द्रोपदी को और ब्राह्मणों का जाना, अनुगत ब्राह्मणों के अन्न धृतराष्ट्र का नाव के समान उभाराना, और के वास्त युधिष्ठिर का सूर्य की आराधना करना, पाण्डवों को भी छुटकारा देना, दुर्योधन का फिर मूर्य के प्रसाद मे इच्छा पूर्ण होना, विदुर जी को जुआ खेलने के लिए युधिष्ठिर को बुराना, युधिष्ठिर दुर्योधन करके निकालना, विदुर का पाण्टयों के ..

[ आदि ८२ महाभारत त्यक्तस्य पाण्डुपुत्राणां समपिगमन तथा । पुनरागमनं चैव धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १४६ ॥ कर्ण-प्रोत्साहनाच्चैव धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । वनस्थान्पाण्डवान्हन्तुं मन्त्रो दुर्योधनस्य च ॥१४७ ॥ तं दुष्टभावं विज्ञाय व्यासस्यागमनं द्रुतम् । निर्याणप्रतिषेधश्च सुरभ्याख्यानमेव च ॥१४८॥ मैत्रेयागमनं चात्र राज्ञश्चैवानुशासनम् । शापोत्सर्गश्च तेनैव राज्ञो दुर्योधनस्य च ॥ १४९ ॥ किर्मीरस्य वधश्चात्र भीमसेनेन संयुगे । वृष्णीनामागमश्चात्रा पञ्चालानां च सर्वशः ॥ १५० ॥ श्रुत्वा शकुनिना द्यूते निकृत्या निर्जितांश्च तान् । क्रुद्धस्यानुप्रशमनं हरेश्चैव किरीटिना ॥१५१॥ परिदेवनं च पांचाल्या वासुदेवस्य सन्निधौ । आश्वासनं च कृष्णेन दुःखार्तायाः प्रकीर्तितम् ॥ १५२ ॥ तथा सोभवधाख्यानमत्रीवोक्तं महर्पिणा । सुभद्रायाः सपुत्रायाः कृष्णेन द्वारकां पुरीम् ॥ १५३ ॥ नयनं द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नेन चैव प्रवेशः पाण्डवेयानां रम्ये द्वेतवने ततः ॥ १५४ ॥ पाम जाना और धृतगर की आजा मे फिर रीट वृष्णियों और पाचारों का वन मे पाण्डवों के निकट आना, वर्ण के उन्माहित करने मे दुर्बुद्धि घृतराष्ट्र जाना, जुग में शकुनि ने कपट से पाण्डवों को कपुर दुर्योधन का पाण्डवा दे मारने का विचार जीता जानकर श्रीकृष्ण का क्रोध होना और अर्जुन पाना. दधिन के उस बोटे विचार को जानकर का उनको मात करना, द्रौपदी का श्रीकृष्ण के ध्याम जी का नाम आना, और दुर्योधन का यन आगे पिलाप करना, दु म्वित द्रौपदी को श्रीप्ण को जार पाने में गश्ना, गाभि का उपाख्यान, का ममझाना, मामवध की क्था रहना, सुभद्रा मंत्रण कपि या निनापर में माना, और गजा को पुत्र महित श्रीकृष्ण का द्वारका नगरी में रोजाना, धृतगर को उपदेश देना, दुर्योधन को माप देना, धृष्टद्युत का द्रोपदी के पुत्रों को रे आना, पाण्डवों गुट में भामंगन में दिमीर का माग नाना, का रमणीय दूत बन में जाना, युधिष्ठिर, भीमसन आदिपय ] महाभारत धर्मराजस्य चात्रैव संवादः कृष्णया सह । संवादश्च तथा राज्ञा भीमस्यापि प्रकीर्तितः ॥ १५५ ॥ समीपं पाण्डुपुत्राणां व्यासस्यागमनं तथा । प्रतिस्मृत्याथ विद्याया दानं राज्ञो महर्षिणा ॥१५६ ॥ गमनं काम्यके चापि व्यासे प्रतिगते ततः । अस्त्रतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ॥१५७ ॥ महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह । दर्शनं लोकपालानामस्त्रप्राप्तिस्तथैव च ॥१५८॥ महेन्द्र-लोक-गमनमस्त्रार्थे च किरीटिनः । यत्र चिन्ता समुत्पन्ना धृतराष्ट्रस्य भूयसी ॥ १५९ ॥ दर्शनं वृहदश्वस्य महर्भावितात्मनः । युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसनं परिदेवनम् ॥ १६०॥ नलोपाख्यानमत्रव धर्मिष्ठं 'करुणोदयम् । दमयन्त्याः स्थितिर्यत्र नलस्य चरितं तथा ॥ १६१ ॥ तथाऽक्षहृदयप्राप्तिस्तस्मादेव महर्पितः । लोमशस्यागमस्तत्रा स्वर्गात्पाण्डुसुतान्प्रति ॥ १६२ ॥ वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् । स्वर्गे प्रवृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ॥ १६३॥ और द्रौपदी का वार्तालाय, पाण्डवों के समीप व्यास वाले महर्षि बृहदश्व के दर्शन, युधिष्ठिर का उनके जी का आना, युधिष्ठिर को स्मृति नामक विद्या समीप अपना दुख कहना ।।१४२।१६०।। का देना, श्रीवेदव्यास के चले जाने पर पाण्डवों धर्म और करुणारस युक्त नलदमयन्ती की का काम्यक वन में प्रवेश, अम्त्र के लेने के निमित्त कथा, दमयन्ती का आपत्ति में भी धर्म में स्थिर तेजम्ची अर्जुन का बन में जाना, व्याधरूपी महा रहना, बृहदश्च से युधिष्ठिर का अक्षहृदय नामक देव के साथ अर्जुन का युद्ध, लोकपालों का दर्शन विद्या का प्राप्त करना, पाण्डवों के समीप स्वर्ग और अस्त्र का प्राप्त होना, दिव्य अत्र के लिए से लोमश ऋषि का आना, और बनवासी पाण्डवों अर्जुन का इन्द्ररोक को जाना, यह सुनकर को म्वर्ग में गये हुए अर्जुन का वृत्तात उनको धृतराष्ट्र का अति चिन्तातुर होना, श्रेष्ठ आत्मा सुनाना, अर्जुन का समाचार पाकर पाण्डवों की , [ आदिपर्व महाभारत संदेशादर्जुनस्यात्रा तीर्थाभिगमनक्रिया । तीर्थानां च फलप्राप्तिःपुण्यत्वं चापि कीर्तितम् ॥ १६४ ॥ पुलस्त्यतीर्थ यात्रा च नारदेन महार्पणा । तीर्थयात्रा च तत्रौव पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १६५ ॥ कर्णस्य परिमोक्षोत्र कुण्डलाभ्यां पुरंदरात् । तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तित ॥ १६६ ॥ आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणं । लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृपेस्तथा ॥१६७॥ ऋष्यशृङ्गस्य चरितं कौमारब्रह्मचारिणः । जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ॥ १६८ ॥ कार्तवीर्यवधो यत्रा हैहयानां च वर्ण्यते । प्रभासतीर्थे पाण्डनां वृष्णिभिश्च समागमः ॥ १६९ ॥ सोकन्यमपि चाग्न्यानं च्यवनो यत्र भार्गवः । शर्याति यज्ञे नासत्यौ कृतवान्सौमपातिनी ॥ १७ ॥ ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः । मांधातुश्चाप्युपाख्यानं राज्ञोऽत्रैव प्रकीर्तितम् ॥ १७१ ।। जन्तूपाग्यानमत्रेव यत्र पुत्रेण सोमकः । पुत्रार्थमयजदाजा लेभे पुत्रशतं च सः ॥१७२॥ नधियाना, नीर्थयात्रा के फल की प्राप्ति और उनके की कथा का वर्णन, प्रभासतार्थ में वृष्णिओं के पवित्र होने का यर्गन, महर्षि नारद की पुलम्त्य साथ पाण्टयों का मिरुना ॥१६१।१६०॥ माधयाया आर पाण्टयों का भी यहा पचना, इन्द्र सुकन्या की कथा, राजा गर्याति के यन में पापा तुड़गे को ले जाना, गयासुर के यन भृगुवंगी च्यवन ऋापि का अश्विनीकुमारों को सोमरस का वन. भगन्य प्रापि की कथा का वर्णन, का माग देना, अश्विनीकुमारों का च्यवन मुनि पानामा दिनान होना, और मनान के, पो सान बना देना, मान्धाता राजा फी कथा का Priमुटा अगाय का विचार करना, वर्गन, जन्तु नामक राजपुत्र का वर्णन, मोमक राजा मुनाफयानमारका मात, पागम का भनेक पुत्रों के पान करिए. पुत्र को मारकर ४. दिनयन, दादी मार दय या ग्ना, निगर मा पुत्रों का प्रास होना, आदिपर्व ] म हा भारत ततः श्येनकपोतीयमुपाख्यानमनुत्तमम् । इन्द्राग्नी यत्र धर्मश्चाप्यजिज्ञासच्छिविं नृपम् ॥ १७३ ॥ अष्टावक्रीयमत्रैव विवादो या वन्दिना । अष्टावक्रस्य विप्रर्जनकस्याध्वरेऽभवत् ॥ १७ ॥ नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च । पराजितो यत्र बन्दी विवादेन महात्मना ।। १७५।। विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लब्धवानृषिः । यवक्रीतस्य चाख्यानं रैभ्यस्य च महात्मनः । गन्धमादनयात्रा च वासो नारायणाश्रमे ॥ १७६ ॥ नियुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने । व्रजन्पथि महावाहुईष्टवान्पवनात्मजम् ॥ १७७ ॥ कदलीपण्डमध्यस्थं हनूमन्तं महावलम् । यत्र सौगन्धिकार्थेऽसौ नलिनी तामधर्षयत् ॥ १७८ ॥ यत्रास्य युद्धमभवत्सुमहद्रासैः यक्षश्चव महावीर्यमणिमत्प्रमुखैस्तथा ॥ १७९ ॥ जटासुरस्य च वो राक्षसस्य वृकोदरात् । वृषपर्वणो राजर्षस्ततोऽभिगमनं स्मृतम् ॥१८०॥ आष्टिपेणाश्रमे चैषां गमनं वास एव च । प्रोत्साहनं च पाञ्चाल्या भीमस्यात्र महात्मनः ॥ १८१ ॥ अद्भुत सुफेद कबूतर और बाज की कथा का वर्णन, पर्वत पर भीमसेन का पुष्प लेने जाना, राम्ते इन्द्र, अग्नि और धर्म द्वारा राजा शिवि की परीक्षा, में हनुमान् का मिलना, कमलपुप्प की प्राप्ति के अष्टावक्र की कथा का वर्णन, वर्ण के पुत्र का शास्त्रार्थ लिए भीमसेन का कमल के वृक्षों को उजाड़ना, में बन्दी को जीतना, अष्टावक्र का समुद्र को जीत- मणिमान् आदि यों और राक्षसों के साथ भीमसेन कर कहोड नामक निज पिता का उद्धार करना, का घोर युद्ध होना, जटासुर राक्षस का भीमसेन के यवक्रीत और महात्मा रभ्य की कथा का वर्णन, हाथों मारा जाना, पाण्डवों का वृषपर्वा नाम राजर्षि गन्धमादन पर्वत में पाण्डवों की यात्रा और नारायण मे मिलना ॥१७०।१८०॥ आश्रम में रहना, द्रौपदी के कहने से गन्धमादन आर्टिषेण ऋषि के आश्रम में जाना और वास सह ।

आदिपर्य] महाभारत कैलासारोहणं प्रोक्तं यत्र यक्षेबलोत्कटेः । युद्धसासीन्महाघोरं मणिमत्प्रमुखैः सह ॥ १८२ ॥ समागमश्च पाण्डूनां यत्र वैश्रवणेन च । समागमश्चार्जुनस्य तत्रैव भ्रातृभिः सह ॥ १८३ ॥ अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थं सव्यसाचिना । निवातकवचैर्युद्ध हिरण्यपुरवासिभिः ॥ १८४ ॥ निवातकवोरैर्दानवैः सुरशत्रुभिः । पौलोमैः कालकेयैश्च यत्र युद्धं किरीटिनः ॥ १८५ ॥ वधश्चैपां समाग्व्यातो राज्ञस्तेनैव धीमता । अस्त्रसंदर्शनारंभो धर्मराजस्य सन्निधौ ॥ १८६ ॥ पार्थस्य प्रतिषेधश्च नारदेन सुरर्षिणा । अवरोहणं पुनश्चैव पाण्डूना गन्धमादनात् ॥ १८७ ॥ भीमस्य ग्रहणं चात्र पर्वताभोगवर्मणा । भुजगेंद्रेण वलिना तस्मिन्सुगहने तस्मिन्सुगहने वने ॥ १८८ ॥ अमोक्षयद्यना चैनं प्रश्नानुक्त्वा युधिष्ठिरः । काम्यकागमनं चैव पुनस्तेषां महात्मनाम् ॥ १८९ ॥ तत्रास्थांश्च पुनद्रष्टुं पाण्डवान्पुरुषर्षभान् । वासुदेवस्यागमनमौव परिकीर्तितम् ॥ १९॥ मार्कण्डेयसमास्यायामुपाग्यानानि सर्वशः । पृथौवन्यस्य यत्रोक्तमाख्यानं परमार्पणा ॥ १९१ ॥ मरना, द्रापर्टी का भीमगेन को उस्माहित करना, माथ युद्ध का वर्णन, तथा उनका वध, धर्मराज के भीमगन का काम पनि पर चदना, वहीं मणिमान आगे अर्जुन का अस्त्र दिखाने का उद्योग, और आदि यही माय चार युद्ध होना, पाण्डवों को कुर देवर्षि नारद का रोकना, गन्धमादन पर्वत से पाण्डवों के दर्शन होना, यहीं अर्जुन का भाईयों मे मिराप का वापस लौटना, एक बलवान् सर्प से बड़े बन में होना, टिय अत्रों को पाकर गुर दक्षिणा के लिए भीमसेन का पट्टा जाना, प्रश्नों के उत्तर कहकर हिरण्यपुर के याग करने वाले नियान क्यचा और युधिष्ठिर का भीमसेन को छुड़ाना, पाण्डवों का फिर देवनानी कर पाय और पागेम दानों के पाम्यक यन को आना, और बडे विस्तार वाले आदिपर्व ] म हा भारत संवादश्च सरस्वत्यास्तायः सुमहात्मनः । मत्स्योपाख्यानमत्रैव प्रोच्यते प्रोच्यते तदनन्तरम् ॥ १९२ ॥ मार्कण्डेयसमास्या च पुराणं परिकीर्त्यते । ऐन्द्रद्युम्नमुपाख्यानं धौन्धुमारं तथैव च ॥ १९३ ॥ पतिव्रतायाश्चाख्यानं तथैवाङ्गिरसं स्मृतम् । द्रौपद्याः कीर्तितश्चाना संवादः सत्यभामया ॥ १९४ ॥ पुनद्वैतवनं चैव पाण्डवाः समुपागतः । घोपयात्रा च गन्धर्यत्र बद्धः सुयोधनः ॥ १९५॥ ह्रियमाणस्तु मन्दात्मा मोक्षितोऽसौ किरीटिना । धर्मराजस्य चाौव मृगस्वप्ननिदर्शनात् ॥ १९६ ॥ काम्यके काननश्रेष्ठ पुनर्गमनमुच्यते । बीहिंद्रौणिकमाख्यानमत्रीव बहुविस्तरम् ॥ १९७॥ दुर्वाससोप्युपाख्यानमौव परिकीर्तितम् । जयद्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ॥ १९८ ॥ यौनमन्वयादीमो वायुवेगसमो चके चैनं पंच शिखं या भीमो महावलः ॥ १९९ ॥ रामायणमुपाख्यानमौव वहुविस्तरम् । यत्र रामेण विक्रम्य निहतो रावणो युधि ॥ २० ॥ मार्कण्डेय की कथा का वर्णन, ॥१८१।१९१॥ छुड़ा लाना, और धर्मराज युधिष्ठिर का मृगम्वम मार्कण्डेय के मुख से राजा वेण के पुत्र पृथु देखकर फिर काम्यक बन को लौट आना, बड़े की कथा सुनना, सरम्बी और गरुड़ का वर्णन, विस्तार वाले ब्रीहिद्रौणिक की कथा का वर्णन, मत्म्यचरित्र, मार्कण्डेयचरित्र का वर्णन, इन्द्रद्युम्न दुर्वासा की कथा का वर्णन, आश्रम से जयद्रथ की कथा का वर्णन, धुन्धुमार की कथा का वर्णन, का द्रौपदी को हर लेना, भीमसेन का उसके पीछे पतिव्रता-वर्णन, अगिरा ऋषि की कथा का वर्णन, दौड़ना, भीमसेन का उसके सिर में पाँच चोटियाँ द्रौपदी और सत्यभामा का वर्णन, पाण्डवों का | रवना, विस्तार से रामचंद्र जी की कथा का वर्णन द्वैतवन में फिर .आना, और घोषयात्रा में गंधों ' जिममें रामचंद्र जी ने अपने पराक्रम मे लड़ाई में से दुर्योधन का पकड़ा जाना, और अर्जुन का उसे रावण को मारडाला ॥१९२।२००|| जवे । , आदिपर्व महाभारत सावित्र्याश्चाप्युपाग्यानमौव परिकीर्तितम् । कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरंदरात् ॥ २०१ ॥ यत्रास्य शक्तिंस्तुष्टोऽसावदादेकवधाय च । आरणेयमुपान्यानं यत्रा धोऽन्वशात्सुतम् ॥ २०२॥ जग्मुलब्धवरा या पांडवाः पश्चिमां दिशम् । एतदारण्यकं पर्व तृतीयं परिकीर्तितम् ॥ २०३॥ अवाध्यायशते द्वे तु संख्यया परिकीर्तिते । एकोनसप्ततिश्चैव तथाध्यायाः प्रकीर्तिताः ॥ २०४॥ एकादश सहस्राणि श्लोकानां पट्शतानि च । चतुः पष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ॥ २०५॥ अतः परं नियोधेदं वैराट पर्व विस्तरम् । विराटनगरे गत्वा उमशान विपुलांशमीम् ॥ २० ॥ दृष्ट्वा सन्निदधुस्तत्रा पाण्डवा पाण्डवा ह्यायुधान्युत । यत्रा प्रविश्य नगरं छद्मना न्यवसंस्तु ते ॥ २०७॥ पाञ्चाली प्रार्थयानस्य कामोपहतचेतसः । दुष्टात्मनो वधो यत्र कीचकस्य वृकोदरात् ॥ २०८ ॥ पाण्डवान्वेषणार्थं च राज्ञो दुर्योधनस्य च । चाराःप्रस्थापिताश्चात्र निपुणाः सर्वतोदिशम् ॥ २०९ ॥ मावित्री की कथा का वर्णन, कर्ण का इन्द्र इमके पश्चात् पिराटपर्व हे । विराट नगर में पहुच का दर देना, और उममे प्रमन होकर इन्द्र पर श्मशान भूमि म जाकर बडे भारी शमी (जड) का वर्ण को पुप को मारने पारी शक्ति के पेट पर पाण्टयों का उसमे अपने गम्त्रों को छिपा देना, आरणेय उपाग्यान, धर्म का युधिष्ठिर को कर रमना, दुष्टात्मा कीचक का द्रौपदी को दुख पन्य का उपदेश करना, वरदान पाकर पाण्डयां देना, और भीमसेन का उमे मार डालना, पाण्डवों या पश्चिम दिशा को पाना, यह नीमरा जारण्यक के तालाग करने के लिए दुर्योधन के भेजे हुए पा गया है। हम परम दो गा उनहतर गुप्त दता का ग्यालरी यापम रोट आना, विगत पाय, ज्यागा नार ४ मा चामट इनगर देश में रहने वाले भत्रियों से विराट की गऊओ स पक्य नाना, निगर्न वामियों ने माथ घोर युद्ध - 47720pc.

आदिपर ] म हा भारत वर्णितम् । न च प्रवृत्तिस्तैर्लब्धा पाण्डवानां महात्मनाम् । गोग्रहश्च विराटस्य विगतः प्रथमं कृतः ॥ २१० ॥ यत्रास्य युद्धं सुमहत्तैरासील्लोमहर्षणम् । ह्रियमाणश्च यत्रासौ भीमसेनेन मोक्षितः ॥ २११ ॥ गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः । अनन्तरं च कुरुभिस्तस्य गोग्रहणं कृतम् ॥ २१२ ॥ समस्ता यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि । प्रत्याहृतं गोधनं च विक्रमेण किरीटिना ॥ २१३ ॥ विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्रा किरीटिनः । अभिमन्युं समुद्दिश्य सौभद्रमरिघातिनम् ॥ २१४ ॥ चतुर्थमेताद्वपुलं वैराटं पर्व अत्रापि परिसंख्याता अध्यायाः परमार्षिणा ॥ २१५ ॥ सप्तपष्टिरथो पूर्णा श्लोकानामपि मे शृणु । श्लोकानां वे सहस्त्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु ॥ २१६ ।। उक्तानि वेदविदुपा पर्वण्यस्मिन्महर्षिणा । उद्योगपर्व विज्ञेयं पञ्चमं शृण्वतः परम् ॥ २१७ ।। उपप्लव्य निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषया । दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ॥.२१८ ॥ का होना, त्रिगों मे पकटकर ले जाते हुए विराट उसके आगे पांचवां उद्योगपर्व है | पाण्डवा को भीमसेन का छुड़ाना, पाण्डयों का गायें हॉक के जय की इच्छा से उपप्लव्य नगर में रहने के कर पीछे आना, फिर कौरव आदि का विराट समय दुर्योधन और अर्जुन दोनों का श्रीकृष्ण के गजा का गोधन हरना, अर्जुन का युद्ध में जीत पाम जाना, उन दोनों के सहायता मांगने पर कृष्ण कर गोधन लौटाना और राजा विराट का अभिमन्यु का यह कहना, कि एक ओर मम्मति देने वाले और के लिए अपनी उत्तरा नाम कन्यादान का देना युद्ध न करने वाले अपने को, एक और युद्ध करने कहा गया है । दम पर्व में महर्षि व्यास जी के कहे वाली एक अक्षौहिणी मेना को टन दोनों में मे कहो हुए सहमठ अध्याय, दो हज़ार पचाम श्लोक कि किमको में क्या दूं जिसमें अभागी और मन्द- बुद्धि दुर्योधन का एक अक्षौहिणी सेना को माँगना, कह है ॥२०६।२१६) ६० म हा भारत [ आदिपर्य नृपः । सहाय्यमस्मिन्समरे भवान्नो कर्तुमर्हति । इत्युक्ते वचने कृष्णो यत्रोवाच महामतिः ॥ २१९ ॥ अयुध्यमानमात्मानं मन्त्रिाणं पुरुषर्षभौ । अक्षौहिणी वा सैन्यस्य कस्य किं वा ददाम्यहम् ॥२२०॥ वत्रे दुर्योधनः सैन्यं मन्दात्मा यत्र दुर्मतिः । अयुध्यमानं सचिवं बने कृष्णं धनंजयः ॥२२१ ॥ मद्रराजं च राजानमायान्तं पाण्डवान्प्रति । उपहारैर्वञ्चयित्वा वर्मन्येव सुयोधनः ॥२२२॥ वरदं तं वरं वत्रे साहाय्यं क्रियतां मम । शल्यस्तस्मै प्रतिश्रुत्य जगामोद्दिश्य पाण्डवान् ॥ २२३ ॥ शान्तिपूर्व चाकथयद्योन्द्रविजयं पुरोहितप्रेषणं च पाण्डवैः कौरवान्प्रति ॥ २२४ ॥ वैचित्रवीर्यस्य समादाय पुरोधसः । तथेन्द्र विजयं चापि यानं चैव पुरोधसः ॥ २२५ ॥ संजयं प्रेषयामास शमार्थी पाण्डेवान्प्रति । यन्त्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ॥ २२६ ॥ श्रुत्वा च पाण्डवान्यत्र वासुदेवपुरोगमान् । प्रजागरः संप्रजज्ञे धृतराष्ट्रस्य चिन्तया ॥ २२७ ॥ विदुरो यत्र वाक्यानि विचित्राणि हितानि च । श्रावयामास राजानं धृतराष्ट्र मनीषिणम् ॥ २२८ ।। और अर्जुन का युद्ध न करने वाले केवल मम्मति पाण्डवों के पास जाना, गल्य का युधिष्ठिर को देने वार श्रीकृष्ण को लेना दुर्योधन का पाण्टयों ममझाना और इन्द्र की विजय वर्णन करना, ६ मीप आने हुए मद्रदेश के राजा शल्य को युधिष्ठिर का दुर्योधन के समीप पुरोहित को भेजना, गाने में ही अनेक प्रकार के उपहार आदि देकर उममे वृत्रासुर के वध और इन्द्र. के विजय की प्रमस पाना, गव्य के प्रमन्नना पूर्वक वरदान देने कथा मुनकर भातचित्त वाले महाप्रतापी धृतराष्ट्र पर दुर्योधन । उनमे युद्ध में महायना करने की का पिदुर की सलाह से मन्जय को दृत बनाकर पापना पना, गम्य का वरदान को म्बीशर करके, पाण्डवों के पाम भेजना, वासुदेव और पाण्डवों की वचः आदिपर ] महाभारत तथा सनत्सुजातेन यत्राध्यात्ममनुत्तमम् । मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ॥ २२९ ॥ प्रभाते राजसमितौ संजयो यत्र वा विभो । ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ॥ २३० ॥ यत्र कृष्णो दयापन्नः संधिमिच्छन्महामतिः । स्वयमागाच्छमं कर्तुं नगरं नागसाह्वयम् ॥ २३१ ।। प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै । शमार्थे याचमानस्य पक्षयोरुभयोर्हतम् ॥ २३२ ॥ दंभोद्भवस्य चाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । वरान्वेषणमन्त्रीव मातलेश्च महात्मनः ॥ २३३ ॥ महर्पश्चापि चरितं कथितं गालवस्य वै । विदुलायाश्च पुत्रास्य प्रोक्तं चाप्यनुशासनम् ॥ २३४ ॥ कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय मन्त्रितम् । योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्रा राज्ञां प्रदर्शितम् ॥ २३५ ॥ रथमारोप्य कृष्णेन यत्र कर्णोऽनुमन्त्रितः । उपायपूर्वं शौटीर्यात्प्रत्याख्यातश्च तेन सः ॥ २३६ ॥ आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिंदमः । पाण्डवानां यथावृत्तं सर्वमाख्यातवान्हरिः ॥ २३७ ॥ बात सुनकर व्याकुलता में पड़े हुए धृतराष्ट्र का करते हुए श्रीकृष्ण का दुर्योधन मे तिरस्कार (अनादर) रात्रि निद्रा त्याग देना, विदुर का धृतराष्ट्र को किया जाना, ढम्भोद्भव का उपाख्यान, महात्मा विचित्र हित के वचन मुनाना, शोक में गलतान का अपनी कन्या के लिए वर की तालाश और चिन्तित धृतराष्ट्र को ऋषि सनसुजात का करना, महर्षि गालब का चरित्र वर्णन, विदुला का अध्यात्म विद्या का ज्ञान मुनाना, प्रातःकाल में अपने पुत्र को उपदेश देना ॥२१७१२३४|| मंजय मे वासुदेव और अर्जुन का ऐकात्मभाव का कर्ण और दुयोर्धन आदि के दुष्ट विचारों को विषय कहा जाना, दया से युक्त शांति की इच्छा जानकर श्रीकृष्ण का राजाओं को अपना योगबल से अपने आप श्रीकृष्ण का दूत बनकर हस्तिनापुर दिखलाना, श्रीकृष्ण का कर्ण को निज रथ पर विठला नगर में आना, दोनों पक्षों की भलाई की इच्छा कर युक्ति मे ममझाना, परन्तु कर्ण का अहंकार के माता मह। भारत [ आदिपर ६. .. ते तस्य वचनं श्रुत्वा मन्त्रयित्वा च यद्धितम् । सांयामिकं ततः सर्व सजं चक्रुः परंतपाः ॥ २३८ ।। ततो युद्धाय निर्याता नराश्वरथदन्तिनः । नगराद्धास्तिनपुरावलसंख्यानमेव च ॥ २३९ ॥ यत्र राज्ञा झुलूकस्य प्रेपणं पाण्डवान्प्रति । श्वोभाविनि महायुद्धे दौत्येन कृतवान्प्रभुः ॥ २४० ॥ स्थातिरथसंग्ख्यानमम्बोपाख्यानमेव एतत्सुबहुवृत्तांत पञ्चमं पर्व भारते ॥ २४१ ॥ उद्योगपर्व निर्दिष्टं संधिविग्रहमिश्रितम् । अध्यायानां शतं प्रोक्तं पडशीतिमहर्पिणा ॥ २४२ ॥ श्लोकानां पट् सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना ॥ २४३ ॥ व्यासेनोदारमतिना पर्वण्यस्मिंस्तपोधनाः । अतः परं विचित्रार्थ भीष्मपर्व प्रचक्षते ॥ २४४ ॥ जम्बूखण्डविनिर्माणं यत्रोक्तं संजयेन ह । यत्र योधिष्टिरं सैन्यं विपाटमगमत्परम् ॥ २४५ ॥ यत्र युद्धमभूढोरं दशाहानि सुदारुणम् । कम्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः ॥ २४६ ॥ माथ उमे अम्बीकार करना, श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर छयासी अध्याय, छ हजार छ सौ अठानवे श्लोक मे उपाय नगर की आर पाण्डवों मे मब हाल कह है । इम पर्व म सधि और विग्रह की कथा पाना, श्रीकृष्ण के वचनों को सुनकर अपना हित का वर्णन है ॥२३५२४३॥ रिचार सय पाण्टयां या मग्राम के शिा तैयार होना, इसके आगे विचित्र अर्थ वारा छठा भीष्मपर्व युट के रिश हम्निनापुर नगर में मनुष्य, रथ, घोडे, कहा है । मजय के मुख से जम्बृग्वण्ऽ का वर्णन, हाधी आदि का निकना, मैना की मग्या, युद्ध युधिष्ठिर की सेना का उदाम होना, दस दिवस का पारम्भ होने के पहले दिन राना दुर्योधन का पाण्डया पोर मग्राम, श्रीकृष्ण का अर्जुन के मोह को युति पाम र दन को भाना, रथ, अतिग्थ माया, के यचना द्वारा दूर करना, यधिष्ठिर के हित चाहने मा भन्दा का उपाग्यान । म प में पद मी वार श्रीकृष्ण का भीष्म यो दुर्जय देवकर रथ से द आदिपर्व] महाभारत asanam मोहजं नाशयामास हेतुभिमोक्षदार्शभिः । समीक्ष्याधोक्षजः क्षिप्रं युधिष्ठिरहिते रतः ॥ २४७ ॥ रथादाप्लुत्य वेगेन स्वयं कृष्ण उदारधीः । प्रतोदपाणिराधावद्भीष्म हन्तुव्यपेतभीः ॥ २४८॥ वाक्यप्रतोदाभिहतो यत्र कृष्णेन पाण्डवः । गाण्डीवधन्वा समरे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २४९ ॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य यत्र पार्थो महाधनुः । विनितनिशितैर्वाण रथाद्भीष्ममपातयत् ॥ २५० ॥ शरतल्प-गतश्चैव भीष्मो यत्र वभूव ह । षष्टमेतत्समाख्यातं भारते पर्व विस्तृतम् ॥ २५१ ॥ अध्यायानां शतं प्रोक्त तथा सप्तदशापरे । पञ्च श्लोकसहस्राणि संख्ययाऽष्टौ शतानि च ॥ २५२ ॥ श्लोकाश्च चतुराशीतिरस्मिन्पर्वणि कीर्तिताः । व्यासेन वेदविदुषा संग्याता भीष्मपर्वणि ॥ २५३ ॥ द्रोणपर्व ततश्चिन्नं बहुवृत्तान्तमुच्यते । सैनापत्येऽभिषिक्तोऽथ यत्राचार्यः प्रतापवान् ॥ २५४ ।। दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थ प्रतिजज्ञे महास्त्रवित् । ग्रहणं धर्मराजस्य पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥ २५५ ॥ कृढकर भीष्म को मारने के लिए दौडना, श्रीकृष्ण का सेनापति होना, द्रोणाचार्य का दुर्योधन का अर्जुन को बचनरूपी कोडे मारना, और शस्त्र की प्रसन्नता के लिए धर्मपुत्र युधिष्ठिर को पकड धारियों में श्रेष्ठ अर्जुन का शिखडी को आगे करके लेने की प्रतिज्ञा करना, सशप्तक सेना का अर्जुन तीक्ष्ण बाणों द्वारा भीष्म को रथ से गिरा देना, को अलग हटा देना, अर्जुन का इन्द्र के तुल्य भीम का बाणगग्या पर सोना, महाभारत का बडा बली राजा भगदत्त को सुप्रतीक नामक हाथी सहित विस्तार वाला यह छठा भीष्मपर्व कहा है । इस पर्व मारना, जयद्रथ आदि कई महारथियों को मिला- में व्यास जी ने एक सौ सत्रह अध्याय, पाँच कर बालक और वीर अभिमन्यु को मारना, वीर हजार आठ सौ चोरासी श्लोक कहे है॥२४४४२५३॥ अभिमन्यु के मरने पर क्रोध से भरे हुए अर्जुन तत्पश्चात् सातवा द्रोणपर्व है। द्रोणाचार्य का सात अक्षौहिणी सेना नागकर जयद्रथ का [ आदिपर्व ६४ महाभारत यत्र संशप्तकाः पार्थमपिनिन्यू रणाजिरात् । भगदत्तो महाराजो यत्र शक समो युधि ॥ २५६ ॥ सुप्रतीकेन नागेन स हि शान्तः किरीटिना । यत्राभिमन्यु बहवो जघ्नुरेकं महारथाः ॥ २५७ ॥ जयद्रथ-मुखा वालं शूरमप्राप्त-यौवनम् । हतेऽभिमन्यौ क्रुद्धेन यत्रा पार्थेन संयुगे ॥ २५८ ॥ अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जयद्रथः । यत्रा भीमो महावाहुः सात्यकिश्च महारथः ॥ २५९ ॥ अन्वेषणार्थं पार्थस्य युधिष्ठिर-नृपाज्ञया । प्रविष्टौ भारती सेनामप्रधृष्यां सुरैरपि ॥ २६० ॥ संशप्तकावशेष च कृतं निःशेपमाहवे । संशप्तकानां वीराणां कोटयो नव महात्मनाम् ॥ २६१ ॥ किरीटिनाभिनिष्क्रम्य प्रापिता यमसादनम् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राश्च तथा पापाण-योधिनः ॥ २६२ ॥ नारायणाश्च गोपालाः समरे चित्रायोधिनः ।। अलम्बुपः श्रुतायुश्च जलसंघश्च वीर्यवान् ॥ २६३ ।। सौमदत्तिर्विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । घटोत्कचादयश्चान्ये निहता द्रोण-पर्वणि ॥ २६४ ॥ अश्वत्थामाऽपि चानव द्रोणे युधि नीपातिते । अत्रं प्रादुश्चकारो नारायणमर्पितः ॥ २६५ ।। मारना, युधिष्ठिर की आना मे मात्यकि और बड़ा महार, गोपाल मेना का विनाश होना, अलम्बुश, भुना वाले, भीममेन का अर्जुन को ग्वोजन के श्रुतायु, जलसन्ध, सोमदत्त का पुत्र विराट, महा- निए पाग्यों की गना के भीतर प्रवेश होना, रथी द्रुपद और घटोत्कच आदि अनेक वीरों का मगतका मेना में जो कुछ वाकी थी वह अर्जुन वध, युद्ध में द्रोणाचार्य जी के मारे जाने पर क्रोध में मय नाश कदी, वीर मशप्तकों की मना मे जले हुए अश्वत्थामा का नारायण शम्न को १०००.०० मग्राम में यमगर में पहुंच गई। चलाना, ग्द्र के महाम का विस्तार पूर्वक वर्णन, धनगद पुत्रों का वध, नागयणी मना का श्री महागज येदव्याम का आगगन, श्रीकृष्ण और आदिपर्य] महाभारत आग्नेयं कीर्त्यते यत्रा रुद्रमाहात्म्यमुत्तमम् । व्यासस्य चाप्यागमनं माहात्म्यं कृष्णपार्थयोः ॥ २६६ ॥ सप्तमं भारते पर्व पर्व महदेतदुदाहृतम् । यत्रा ते पृथिवीपालाः प्रायशो निधनं गताः ॥ २६७ ॥ द्रोणपर्वणि ये शूरा निर्दिष्टाः पुरुषर्षभाः । अनाध्यायशतं प्रोक्तं तथाऽध्यायाश्च सप्ततिः ॥ २६८ ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च । श्लोका नव तथैवात्र संरयातास्तत्वदर्शिना ॥ २६९ ॥ पारागर्येण मुनिना संचिंत्य द्रोणपर्वणि । अतः परं कर्णपर्व प्रोच्यते परमाद्भुतम् ॥ २७० ॥ सारश्ये विनियोगश्च मद्रराजस्य धीमतः । आग्यातं यत्र पौराणं त्रिपुरस्य निपातनम् ॥ २७१ ॥ प्रयाणे पुरुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः । हंसकाकीयमाग्यानं तत्रैवाक्षेपसहितम् ॥ २७२ ॥ वधः पाण्डयस्य च तथा अश्वत्थाम्ना महात्मना । दण्डसेनस्य च ततो दण्डस्य च वधस्तथा ॥ २७३ ॥ टेरथे यत्रा कर्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः । संगयं गमितो युद्धे मियतां सर्वधन्विनाम् ॥ २७४ ॥ अन्योन्यं प्रति च क्रोधो युधिष्ठिरकिरीटिनोः । यौवानुनयः प्रोक्तो माधवेनार्जुनस्य हि ॥ २७५ ॥ अर्जुन का महात्म्य वर्णन, टम पर्व में बडे बडे तीन पुत्रों का इनिहाम, कर्ण के युद्ध में जाते समय वीर रानाओं की मृत्यु का वर्णन हैं । इस में एक वर्ण ओर गल्य का सम्बाद, गल्य का हम ओर मो सत्तर अन्याय, आठ हजार नव मौ नव का की क्या कहना, अश्वत्थामा के हाथों पाण्ट्य श्लोक कहे हैं ||२४४६९॥ का वध, दण्डसेन तथा दण्ड की मृत्यु, द्वन्द्वयुद्ध इसके उपरात आठवा कर्णपर्व कहा हे । में सब धनुपधारियों के आगे कर्ण के हाथों युधिष्ठिर इसमे कर्ण का गल्य को सारथी बनाना, त्रिपुर के के प्राणों पर मक्ट, युधिष्ठिर और अर्जुन का पर [ आविषय महाभारत प्रतिज्ञापूर्वकं चापि वक्षो दुःशासनस्य च । भित्त्वा वृकोदरो रक्तं पीतवान्यत्रा संयुगे ॥ २७६ ॥ द्वैरथे यत्र पार्थेन हतः कर्णो महारथः । अष्टम पर्व निर्दिष्टमेतद्भारतचिन्तकैः ॥ २७७ ॥ एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्यायाः कर्णपर्वणि । चत्वार्येव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ॥ २७८ ।। चतुःपष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः । अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् ॥ २७९ ॥ हतप्रवीरे सैन्ये तु नेता मद्रेश्वरोऽभवत् । यत्र कौमारमाख्यानमभिषेकस्य कर्म च ॥ २८०॥ वृत्तानि रथयुद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः । विनाशः कुरुमुग्न्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ॥ २८१ ॥ शल्यस्य निधनं चात्र धर्मराजान्महात्मनः । शकुनेश्च वधोऽत्रैव सहदेवेन संयुगे ॥ २८२ ॥ सैन्ये च हतभूयिष्ठे किंचिच्छिष्टे सुयोधनः । हृदं प्रविश्य तत्रासौ संस्तभ्यापो व्यवस्थितः ॥ २८३ ॥ प्रवृत्तिस्तत्र चाग्याता यत्र भीमस्य लुब्धकैः । क्षेपयुक्तर्वचोभिश्च धर्मराजस्य धीमतः ॥ २८४ ॥ म्पर में श्रोध करना, और उसी स्थान में श्रीकृष्ण वर्णन, अनेक वीरों के युद्ध का वर्णन, कौरव पक्ष का अर्जुन को समझाना, भीममेनका प्रतिज्ञानुमार के प्रधान प्रधान वीरों का मारा जाना, महानुभाव दुशासन पे हदय को चीरकर खून पीना और युधिष्ठिर के हाथ से शल्य का वध होना, सहदेव द्वरथयुद्ध में अर्जुन से महारथी कर्ण का मारा के हाथ से शकुनि की मयु, बहुत सेना के नाश नाना कहा गया है । इस पर्व में उनहत्तर अयाय, होने के पश्चात् उगाकी रहने पर दुर्योधन का चार हजार नय मा चामट शक यह है। टमा एक तारान में घुसना और जल को वाध कर पभान नवा गल्यपर्व कहा है ॥२७०२७॥ याघी का भीममेन को दुर्योधन का ६७ मारे जाने पर गन्य यो भेनापनि बनाना, समाचार देना, आक्षेप वचनों में क्रोधी धृतराष्ट्र गमार का आग्यान, भय के गज्याभिषेक का के पुन दुर्योधन का तागर में बाहर निस्रना, । टहरना, आदिपर्य] महाभारत हृदात्समुत्थितो यत्र धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्पणः । भीमेन गदया युद्धं यत्रासौ कृतवान्सह ॥ २८५ ॥ समवाये च युद्धस्य रामस्यागमनं स्मृतम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानां पुण्यता परिकीर्तिता ॥ २८६ ॥ गदायुद्धं च तुमुलसत्रैव परिकीर्तितम् । दुर्योधनस्य राज्ञोऽथ यत्र भीमेन संयुगे ॥ २८७ ॥ अरू भग्नौ प्रसह्याजौ गदया भीमवेगया । नवमं पर्व निर्दिष्टमेतदद्भुतमर्थवत् ॥ २८८ ॥ एकोनपष्टिरध्यायाः पर्वण्यत्र प्रकीर्तिताः । संख्याता बहुवृत्तांताः श्लोक संख्याऽना कथ्यते ॥ २८९ ॥ त्रीणि श्लोकसहस्राणि द्वे शते विंशतिस्तथा । मुनिना संप्रणीतानि कौरवाणां यशोभृता ॥ २९० ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि सौप्तिकं पर्व दारुणम् । भग्नोरं यत्र राजानं दुर्योधनममर्पणम् ॥ २९१ ॥ अपयातेषु पार्थेषु त्रयस्तेऽभ्याययू रथाः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिः सायाह्ने रुधिरोक्षितम् ॥ २९२ ॥ समेत्य ददृशुर्भूमौ पतितं रणमूर्धनि । प्रतिजज्ञे दृढक्रोधो द्रौणिर्यत्र महारथः ॥ २९३ ॥ भीममेन के माथ गदायुद्ध होना, युद्ध के समय युद्धभूमि में पड़े दुर्योधन को देवकर महारथी बलराम का आना, सरस्वती और अन्यान्य तीर्थों अश्वत्थामा का क्रोध में होकर प्रतिज्ञा करना कि की पवित्रता का वर्णन, राजा दुर्योधन का भीमसेन "मैं धृष्टद्युम्न आदि मम्पूर्ण पंचालों को और के साथ घोर युद्ध का होना इस पर्व में कहा गया मंत्रियों सहित पाण्डवों को मार विना कवच नहीं है। इसमें उनसठ अध्याय, तीन हजार दो सौ बीस खोलंगा" ऐमा कहकर तीनों महारथियों का श्लोक कहे हैं। तत्पश्चात् दमबां सौप्तिकपर्व कहा है। दुर्योधन को छोड़कर मूर्याम्न के समय वन में जाँघ टूटे जाने से पड़े हुए राजा दुर्योधन के पास प्रवेग करना, बढ़ के वृक्ष के नीचे मक्का मन्या के समय कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्व विश्राम करना, उस पेड़ पर उल्लूओं मे मारे हुए स्थामा तीन रथियों का आना, रक्त में लिपटायमान् बहुत से कच्चों को रात्रि के ममय देखकर पिता ।

[आदिपर महाभारन अहत्वा सर्व पञ्चालान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पाण्डवांश्च सहामात्यान्न विमोक्ष्यामि दंशनम् ॥ २९ ॥ यत्रैवमुक्त्वा राजानमपक्रम्य नायो रथाः । सूर्यास्तमनवेलायामासेदुस्ते महद्वनम् ॥ २९५॥ न्यग्रोधस्याथ महतो यत्राधस्ताद्वयवस्थिताः । ततः काकान्बहून् रात्रौ दृष्ट्वोलकेन हिंसितान ॥ २९६ ॥ द्रौणिः क्रोधसमाविष्टः पितुर्वधमनुस्मरन् । पञ्चालानां प्रसुप्तानां वधं प्रति मनो दधे ॥ २९७ ॥ गत्वा च शिविरद्वारि दुर्दशं तत्र राक्षसम् । घोररूपमपश्यत्स दिवमावृत्य धिष्ठितम् ॥ २९८॥ तेनव्याघातमस्त्राणां क्रियमाणमवेक्ष्य च । द्रौणियंत्रा विरूपाक्षं रुद्रमाराध्य सत्वरः ॥ २९९ ॥ प्रसुप्तान्निशि विश्वस्तान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पञ्चालान्सपरीवारान्द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ३०० ॥ कृतवर्मणा च सहितः कृपेण निजन्निवान् । यत्रामुच्यन्त ते पार्थाः पञ्च कृष्णवलाश्रयात् ॥ ३०१ ॥ सात्यकिश्च महावासः शेषाश्च निधनं गताः । पञ्चालानां प्रसुप्तानां यत्रा द्रोणसुताद्वधः ॥ ३०२ ॥ धृष्टद्युम्नस्य सूतेन पाण्डवेषु निवेदितः । द्रौपदी पुत्रशोका" पितृभ्रातृवधार्दिता ॥ ३०३ ।। की मृत्यु को ग्मग्ण करता हुआ गोधित अश्वत्थामा स्थामा का महादेव की आराधना करना, कृतवर्मा का उमी नरह निश्चिन्त रात्रि को मो रहे पाचारी और कृपाचार्य के साथ अश्वत्थामा का शिविर के का पिनाश करने ाि इरादा करना, पाण्टयां भीतर प्रदेश होना, रात्रि के समय बेखटके सोते गिरिर के समीप अवथामा का पहचना, यहा पार पे मना निवेश के द्वार पर आग से घेरे पुत्रों को मारना, श्रीकृष्ण की महायता से सात्यकि हुए धृष्टद्युम्न आदि पाचारों और मम्पूर्ण द्रौपदी के TO घोरम्प याने गाम का दंग पटना, राधमां का पाँची पाण्ट्या माहित बचना, सबका अश्वत्थामा द्वाग भी अनों को निप्पर होते देखकर अश्व- के हाथ मे महार, मारथी द्वारा पाण्डयों को इस आदिपर्य म हा मारत कृत्तानशनसंकल्पा यत्र भर्तृनुपाविशत् । द्रौपदीवचनायत्र भीमो भीमपराक्रमः ॥ ३०४ ॥ प्रियं तस्याश्चिकीपन्वै गदामादाय वीर्यवान् । अन्वधावत्सुसंक्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ॥ ३०५ ।। भीमसेनभयाद्या देवेनाभिप्रचोदितः । अपाण्डवायेति रुपा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ॥ ३०६ ॥ मैवमित्यब्रवीकृष्णः शमयंस्तस्य तद्वचः । यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमयामास फाल्गुनः ॥ ३०७ ॥ द्रौणेश्च द्रोहवुद्वित्वं वीक्ष्य पापात्मनस्तदा । द्रौणिद्वैपायनादीनां शापाश्चान्योन्यकारिताः ॥ ३०८ ॥ मणिं तथा समादाय द्रोणपुत्रान्महारथात् । पाण्डवाः प्रदुहृष्टा द्रौपद्यै जितकाशिनः ॥ ३०९ ॥ एतद्वै दशमं पर्व सौप्तिकं समुदाहृतम् । अष्टादशास्मिन्नध्यायाः पर्वण्युक्ता महात्मना ॥ ३१० ॥ श्लोकानां कथितान्यत्रा शतान्यष्टौ प्रसंख्यया । श्लोकाश्च सप्ततिः प्रोक्ता मुनिना ब्रह्मवादिना ॥ ३११ ।। सौप्तिकैपीके संबद्ध पर्वण्युत्तमतेजसी । अत ऊर्ध्वमिदं प्राहुः स्त्रीपर्व करुणोदयम् ॥ ३१२ ॥ अनर्थ की खबर मिलना, पुत्रों और भाईयों की मृत्यु आदि का परम्पर अभियाप, विजयी पाण्टयों का के शोक से व्याकुल द्रौपदी को पाण्डवों के पास अश्वत्थामा मे मणि लेकर द्रौपदी को देना कहा खाना पीना त्याग कर धन्ना देना, द्रौपदी के वचनों गया है । इस पर्व में अटारह अध्याय, आठ सौ मे गयानक पराक्रम वाले भीममेन का द्रौपदी के प्रेम मत्तर श्लोक कहे गये हैं ॥२९.१४३११॥ और क्रोध से गुरुपुत्र अश्वत्थामा के पीछे गढा अनन्तर ग्यारहवाँ करुणरसपूर्ण स्त्रीपर्व कहा लेकर दौड़ना, प्रारब्ध के अनुमार भीममेन के भय है । अन्धे राजा धृतराष्ट्र का पुत्रगोक में पीड़ित. से अश्वत्थामा का पाण्डवों के विनाश के लिए अम्त्र होकर कृष्ण की दी हुई लोहे की बनी भीममेन की छोड़ना, अर्जुन का अपने अम्त्र के द्वारा उम छोड़े मूर्ति को अपने बल से दबाकर चूर-चूर कर हुए अत्र को शांत करना, अश्वत्थामा और द्वैपायन डालना, मोक से पीड़ित बुद्धिमान् धृतराष्ट्र को यह .

[ आदिपर्व महाभारत .. पुन्नाशोकाभिसंतप्तः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः । कृष्णोपनीतां यत्रासावायसी प्रतिमां दृढाम् ॥ ३१३ ॥ भीमसेनद्रोहबुद्धिधृतराष्ट्रो बभञ्ज तथा शोकाभितप्तस्य धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥ ३१४ ॥ संसारगहनं बुद्ध्या हेतुभिर्मोक्षदर्शनैः । विदुरेण च यत्रास्य राज्ञ आश्वासनं कृतम् ॥ ३१५ ॥ धृतराष्ट्रस्य चात्रैव कौरवायोधनं तथा । सान्तः पुरस्य गमनं शोकार्तस्य प्रकीर्तितम् ॥ ३१६ ॥ विलापो वीरपत्नीनां यत्रातिकरुणः स्मृतः । क्रोधावेशः प्रमोहश्च गांधारीधृतराष्ट्रयोः ॥ ३१७ ॥ या तान्क्षत्रिीयाः शृरान्संग्रामेप्वनिवर्तिनः । पुत्रान्भ्रातृन्पितॄश्चैव ददृशुनिहताव्रणे ॥ ३१८ ॥ पुत्रपौत्राबधा यास्तथानौव प्रकीर्तिता । गांधार्याश्चापि कृष्णन क्रोधोपशमनक्रिया ॥ ३१९ ॥ यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतांवरः । राजा तानि शरीराणि दायामास शास्त्रतः ॥ ३२० ॥ तोयकर्मणि चारब्धे राज्ञामुटकदानिके । गृढोत्पन्नस्य चाग्यानं कर्णस्य पृथयाऽऽत्मनः ।। ३२१ ॥ मुनम्येतदिह प्रोक्तं व्यासेन परमर्पिणा । एतटेफादर्श शोकवाव्यकारणम् ॥ ३२२ ॥ मायाका दिममा प्रभारी मोध मार्ग विमान यो देगना, पुत्र, पात्र की मृत्यु मे यापुर गाधारी पार यायो ग गावी विदुर दा ममाता, भार को धारण का मात करना, धर्मात्माओं में श्रेष्ठ नगर का गलिया को गर कांग्यों पे ग्णभूमि गना यधिष्ठिर का युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हु" " म राना. ६ निया का अयन यामय वियप वीर गजाश्री के रस को विधिपूर्वक दाह करना, पाना.mpanार कामांध मार माया और मनम्। की निगारीदे गमय कुन्ती का पर्ण पानगावमाम पाटन विमान नम पी गुण या प्रकट करना कहा गया है। ...लि भाला और पनिया दी इस पर्व म यागनी ने मताईम अध्याय, मान मा पर्व आदि पर्य] महा भारत प्रणीतं सज्जनमनोवैक्लव्याश्रुप्रवर्तकम् । सप्तविंशतिरध्यायाः पर्वण्यस्मिन्प्रकीर्तिताः ॥ ३२३ ।। श्लोकसप्तशती चापि पञ्चसप्ततिसंयुता । संख्यया भारताख्यानमुक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३२४ ॥ अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं बुद्धिवर्धनम् । यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। ३२५ ।। घातयित्वा पितृन्भ्रातृन्पुत्रान्संवन्धिमातुलान् । शान्तिपर्वणि धर्माश्च व्याख्याताः शारतल्पिकाः॥ ३२६ ॥ राजभिदितव्यास्ते सम्यग्ज्ञानवुभुत्सुभिः । आपद्धर्माश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शिनः ॥ ३२७ ॥ यान्वुद्ध्वा पुरुषः सम्यक्सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् । मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा बहुविस्तराः ॥ ३२८ ।। द्वादश पर्व निर्दिष्टमेतत्प्राज्ञजनप्रियम् । अत्र पर्वणि विज्ञेयमध्यायानां शतत्रायम् ॥ ३२९ ॥ विंशचव तथाध्याया नव चैव तपोधनाः । चतुर्दश सहस्राणि तथा सप्त शतानि च ॥ ३३० ।। सन श्लोकास्तथैवान पञ्चविंशति संख्यया । अत ऊर्ध्वं च विज्ञेयमनुशासनमुत्तमम् ॥ ३३१ ॥ या प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चयम् । भीष्माद्भागीरथीपुत्रात्कुरुराजो युधिष्टिरः ॥ ३३२ ॥ पिछत्तर श्लोक कहे हैं ॥३१२।३२४॥ जानकर सर्वज्ञतः प्राप्त कर सकता है । टस पर्व अनन्तर वारहवाँ गातिपर्व है । इस पर्व में पिता- में तीन मौ उनीम अध्याय, चौदह हजार सात भाई-पुत्र-सम्बन्धी मातुल आदि का नाश होने के सा बत्तीस श्लोक कहे हैं॥३२५/३३१॥ कारण राजा युधिष्ठिर को वैराग्य उत्पन्न होना, और दमके उपरांत तरवां उत्तम अनुशासनपर्व गरशय्या पर पड़े हुए भीष्म के समीप जाने पर कहा है । इममें भीष्म के मुख से धर्म का निश्चय उनके मुख से राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म । मुनकर युधिष्ठिर का म्वस्थ होना, धर्म, अर्थ सम्बन्धी मुनना कहा गया है । जिनको मनुष्य भली प्रकार सम्पूर्ण व्यवहार, विविध दोनों के तरह-तरह के [ आदिपर्व म हा भारत व्यवहारोऽत्र कात्स्येन धर्मार्थीयः प्रकीर्तितः । विविधानां च दानानां फलयोगाः प्रकीर्तिताः ॥ ३३३ ॥ तथा पात्रविशेषाश्च दानानां च परो विधिः । आचारविधियोगश्च सत्यस्य च परा गतिः ॥ ३३४ ॥ महाभाग्यं गवां चैव ब्राह्मणानां तथैव च । रहस्यं चैव धर्माणां देशकालोपसहितम् ॥ ३३५ ॥ एतत्सुबहुवृत्तान्तमुत्तम चानुशासनम् । भीष्मस्याौव संप्राप्तिः स्वर्गस्य परिकीर्तिता ॥ ३३६ ॥ एतत् त्रयोदशं पर्व धर्मनिश्चयकारकम् । अध्यायानां शतं त्वत्र पट्चत्वारिंशदेव तु ॥ ३३७ ।। श्लोकानां तु सहस्राणि प्रोक्तान्यष्टौ प्रसंख्यया । ततोऽश्वमेधिकं नाम पर्व प्रोक्तं चतुर्दशम् ॥ ३३८ ॥ तत्संवर्तमरुत्तीयं यत्राख्यानमनुत्तमम् । सुवर्णकोगसंप्राप्तिर्जन्म चोक्तं परीक्षितः ॥ ३३९ ॥ दग्धस्यास्त्राग्निना पूर्व कृष्णासंजीवनं पुनः । चर्यायां हयमुत्सृष्टं पाण्डवस्यानुगच्छतः ॥ ३४० ॥ तन्त्र तत्र च युद्धानि राजपुत्रेरमर्पणः चित्राङ्गदायाः पुत्रेण पुत्रिकाया धनंजयः ॥ ३४१ ॥ मंग्रामे बभ्रुवाहेन संशयं चात्रा दर्शितः । अश्वमेधे महायज्ञे नकुलाग्यानमेव च ॥ ३४२ ॥ पण हा दर्गन, दान ये योग्य पात्रों का वर्णन, हजार भोक रहे है ॥३३२॥३३८॥ द्वार निधि, प्राचार व्यवहार का निरपण, मन्य की तत्पश्चात चादहवां अमेधपर्व कहा है । शनि का वर्णन, गाय और दाग कामलाग्य, मंवर्म और मरत का मुंदर उपाग्यान, युधिष्ठिर को हा आरपार मार पनव का रहस्य ग्वर्ण का गनाना मिरना, परीक्षित का जन्म होना, मारे ग्दा वर्णन है। गम अपि में जले, ए. परीक्षित पाश्रीकृष्ण की कृपा मे गाम का अनुमान । म पर्व जीता गना, अधम के पोड़ की रक्षा करते हुए या ने एक बयानगग प्रयाय, नाट, अर्जुन का गय गजामा को जीतमा, चित्राङ्गदा ये आदिपर्व] ઉર महाभारत इत्याश्वमेधिकं पर्व प्रोक्तमेतन्महादभुतम् । अध्यायानां शतं चैव त्रयोऽध्यायाश्च कीर्तिताः ॥ ३३ ॥ श्रीणि श्लोकसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्वदर्शिना ॥ ३४४ ॥ ततस्त्वाश्रमवासाख्यं पर्व पञ्चदशं स्मृतम् । या राज्यं समुत्सृज्य गांधार्या सहितो नृपः ॥ ३४५ ॥ धृतराष्ट्रोऽऽश्रमपदं विदुरश्च जगाम यं दृष्टा प्रस्थितं साध्वी पृथाप्यानुययौ तदा ॥ ३४६ ॥ पुत्राराज्यं परित्यज्य गुरुशुश्रपणे रता । यत्रा राजा हतान्पुत्रान्पौत्रानन्यांश्च पार्थिवान् ॥ ३४७ ॥ लोकान्तरगतान्वीरानपश्यत्पुनरागतान् ऋषेः प्रसादाकृष्णस्य दृष्ट्वाऽश्चर्यमनुत्तमम् ॥ ३४८ ॥ त्यक्त्वा गोकं सदारश्च सिद्धिं परमिकां गतः । यत्रा धर्म समाश्रित्य विदुरः सुगतिं गतः ॥ ३४९ ॥ संजयश्च सहामात्यो विद्वान्गावलगणिवंशी । ददर्श नारदं यत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३५० ॥ नारदाचव शुश्राव वृष्णीनां कदनं महत् । एतदाश्रमवासाख्यं पर्वोक्तं महदद्भुतम् ॥ ३५१ ॥ द्विचत्वारिंशदध्यायाः पर्वतदभिसंख्यया । सहस्रमेकं श्लोकानां पञ्च श्लोकशतानि च ॥ ३५२ ॥ गर्भ से अपने ही वीर्य मे पैदा पुत्र व वाह्न मे ओर विदुर का राज्य को छोड कर वन में जाना, सग्राम में अर्जुन का प्राणान्त के निक्ट होना ओर यह देखकर गुरु आदि की भक्ति करने वाली कुन्ती अश्वमेघ में नकुल का वर्णन कहा गया ह । इम पर्व का भी उनके पीछे जाना, वहा राजा धृतराष्ट्र का में व्यास जी ने एक सो तीन जध्याय और तीन युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए हुए फिर म्वर्ग से वापस हजार तीन सौ बीस शेक कहे हैं ॥३३९१३४४॥ आये हुए पुत्र-पौर और दूसरे वीर राजाओं को इसके उपरान्न पन्द्रहवा आश्रमवामिक पर्व देखना, यह आश्चर्या को देखकर गोक को त्याग कहा है इस पर्व में गाधारी सहित राजा धृतराष्ट्र कर परमपदप्राप्ति, धर्म का आश्रय लेकर सञ्जय [ आदिपव ७१ महाभारत पडेव च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना । अतः परं निवोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् ॥ ३५३ ॥ यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शहता युधि । ब्रह्मदण्डविनिष्पिष्टाः समीपे लवणांभसः ॥ ३५४ ॥ आपाने पानकलिता देवेनाभिप्रचोदिताः । एरकारूपिभिवनर्निजम्नुरितरेतरम् ॥ ३५५ ॥ यत्र सर्वक्षयं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ । नातिचक्रामतुः कालं प्राप्तं सर्वहरं महत् ॥ ३५६ ॥ यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविना कृताम् । दृष्ट्वा विपादमगमत्परां चाति नरर्षभः ॥ ३५७ ॥ ससंस्कृत्य नरश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मनः। ददर्श यदुवीराणांमापाने वैशसं महत् ॥३५८ ॥ शरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः । संस्कारं लंभयामास वृष्णीनां च प्रधानतः ॥ ३५९ ॥ स वृद्धवालमादाय द्वारवत्यास्ततो जनम् । ददर्शापदि कष्टायां गाण्डीवस्य पराभवम् ॥ ३६० ।। सर्वेषां चेव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् । नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावानामनित्यताम् ॥ ३६१ ॥ दृष्ट्वा निवेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः । धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचयत् ॥ ३६२ ॥ और पिदुर का मी परोक को मिधारना, युधिष्ठिर मर्ग मे नष्ट और ब्रमदण्ड से ग्वारी समुद्र के समीप कोनाड मुनि दर्शनाना, और उन्हीं में यादवों मदिरा से उन्मत प्रारब्ध मे प्रेरणा किये हुए परमा ६ दिनाादी मर मिटना कहा गया है । हम ग्प वजों मे परम्पर नाम होना, राम और कृष्ण का में म.पि पदयाम ने व्यागम अध्याय, एक और गर्व का क्षय होने पर काल का लंघन न करना, जापाच मी ए गोर बर है ॥३४॥३५३॥ अनुन या द्वारया में जाकर और यादयों को खानी गई गन्न मोहर योदु महाया मामा देशकर गांक में व्याकुल होना, अजुन का यमुदय, परम भष्ट समान में गात्रों के गृष्ण, यराम आदि यादवों का सम्मार परापर आदिपर्य] महाभारत इत्येतन्मौसलं पर्व पोडशं परिकीर्तितम् । अध्यायाऽष्टौ समाख्याता श्लोकानां च शतत्रायम् ॥ ३६३ ॥ श्लोकानां विंशतिश्चैव संख्यातातत्त्वदार्शनी । महाप्रस्थानिकं तस्मादूर्ध्व सप्तदशं स्मृतम् ॥ ३६४ ॥ यत्रा राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । द्रौपद्या सहिता देव्या महाप्रस्थानमास्थिताः ॥ ३६५ ॥ यत्र तेऽग्निं ददृशिरे लौहित्यं प्राप्य सागरम् । यत्राग्निना चोदितश्च पार्थस्तस्मै महात्मने ॥ ३६६ ॥ ददौ संपूज्य तदिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । यत्रा भ्रातृन्निपतितान्द्रौपदी च युधिष्ठिरः ॥ ३६७ ॥ दृष्ट्वा हित्वा जगामैव सर्वाननवलोकयन् । एतत्सप्तदशं पर्व महाप्रस्थानिकं स्मृतम् ॥ ३६८ ॥ यत्राध्यायास्त्रयःप्रोक्ताः श्लोकानां च शतत्रयम् । विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥ ३६९ ॥ स्वर्गपर्व ततो ज्ञेयं दिव्यं यत्तदमानुपम् । प्राप्तं देवरथं स्वर्गान्नेष्टवान्यत्र धर्मराट् ॥ ३७० ॥ शेष बचे हुए बालकों, वृद्धों और स्त्रियों को द्वारका का द्रौपदी सहित महाप्रस्थान करना, लोहित सागर नगरी से लेजाना, रास्ते में आपत्ति के समय में अमि का देखा जाना, अग्नि के कहने से अर्जुन गाण्डीय धनुष का शक्ति से रहित होना, अम्त्रों का का गाण्डीव धनुष फैक देना, चारों भाई और काम न देना, उसके पश्चात् यादवों की स्त्रियों का द्रौपदी को नष्ट होता हुआ देखकर राजा युधिष्ठिर अलहदा होजाना, और प्रभाव की अनित्यता देखकर का जाना कहा गया है । इस पर्व में व्यासजी ने अर्जुन को वैराग्य होना, और व्यास जी की आज्ञा तीन अध्याय, तीन मौ चीस श्लोक कहे है ॥ से अर्जुन का युधिष्ठिर के सर्माप आकर उन्हें सन्यास ३६५५३६९|| की सम्मत्ति देना कहा गया है । इस पर्व में व्यास इसके पश्चात् अठारहवाँ म्वर्गारोहणपर्व कहा जी के कहे हुए आठ अध्याय, तीन सौ बीस श्लोक है। धर्मराज युधिष्ठिर को ले जाने के लिए स्वर्ग से कहे हैं ॥३५४।३६४॥ दिव्यरथ का आना, अपने साथी कुत्ते के बिना तदनन्तर सत्रहवाँ महासम्थानिकपर्व कहा युधिष्ठिर का उमरथ पर चढ़ने की इच्छा न करना, गया है । राज्य को छोडकर पुरुषों में श्रेष्ठ पाण्डवों | उसकी निश्चल बुद्धि और धर्म में स्थिति को [ आदि महाभारत .. आरोढुं सुमहाप्राज्ञ आनृशंस्याच्छुना विना । तामस्थाविचलां ज्ञात्वा स्थितिं धर्मे महात्मनः ॥ ३७१ ॥ श्वरूपं यत्र तत्त्यक्त्वा धर्मेणाऽसौ समन्वितः । स्वर्ग प्राप्तः स च तथा यातना विपुला भृशम् ॥ ३७२ ॥ देवदूतेन नरकं यत्र व्याजेन दर्शितम् । शुश्राव यत्र धर्मात्मा भ्रातृणां करुणा गिरः ॥ ३७३ ॥ निदेशे वर्तमानानां देशे तत्रैव वर्तताम् । अनुदर्शितश्च धर्मेण देवराज्ञा च पाण्डवः ॥ ३७४ ॥ आप्लुत्याकाशगंगायां देहं त्यक्त्वा स मानुपम् । स्वधर्मनिर्जितं स्थानं स्वर्गे प्राप्य स धर्मराट् ॥ ३७५ ॥ मुमुदे पूजितः सर्वैः सेन्द्रैः सुरगणैः सह । एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३७६ ॥ अध्यायाः पञ्च संग्ग्याताः पर्वण्यस्मिन्महात्मना । श्लोकानां वे शते चैव प्रसंग्व्याते तपोधनाः ॥ ३७७॥ नव श्लोकास्तथैवान्ये संन्याताः परमार्पणा । अष्टादशेवमेतानि पर्वाण्येतान्यशेपतः ॥३७८॥ विलेपु हरिवंशश्च भविप्यं च प्रकीर्तितम् । दश लोकसहस्राणि विंगत्लोकगतानि च ॥ ३७९ ॥ विलेपु हरिवंशे च संग्यातानि महर्षिणा । एतत्स समाग्न्यातं भारते पर्वसंग्रहः ॥३८० ॥ देमार धर्म वा गुत्ते के ग दो छोड पर युधिष्ठिर का आशश गा के जल में स्नान करके, प्रगट होना, युधिष्ठिर और धर्म का म्वर्ग मनुष्य शरीर त्याग करके धर्मराज युधिष्ठिर का पारना. देवदन का किमी चतुराई में युधिष्टिर इन्द्र में आदर मत्तार पार प्रमन्न होना कहा योनार सिमाना, नाव पटे हुए अपने माता गया है। हम पर में व्यास जी ने पाच अभ्याय, कमायो कांगत नार चिनि दमना, युधिष्टिर दो मी नस शोक, यह है ॥३७०३७८।। ११ बारा हाना, धर्म और न्द्र का युधिष्टिर यो इस प्रकार से सम्पूर्ण पटारह पप गये पगा भागने का यही पर" है । इमर पभानविन और मरिप्यपर्व पहा .

आदिपर्व ] म हा भार न अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया । तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥ ३८१॥ यो विद्याञ्चतुरो वेदान्साझोपनिषदो द्विजः । न चाख्यानमिदं विद्यान्नेव स स्याद्विचक्षणः ॥ ३८२ ॥ अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत् । कामशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्विना ॥ ३८३ ॥ श्रुत्वा विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते । पुंस्कोकिलगिरं श्रुत्वा रूक्षा ध्वांक्षस्य वागिव ॥ ३८४ ।। इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः । पञ्चभ्य इव भूतेभ्यो लोकसंविधयस्त्रयः ॥ ३८५ ॥ अस्याख्यानस्य विषये पुराणं वर्तते द्विजाः । अन्तरिक्षस्य विषये प्रजा इव चतुर्विधाः ॥ ३८६ ॥ क्रियागुणानां सर्वेषामिदमाख्यानमाश्रयः । इन्द्रियाणां समस्तानां चित्रा इव मनः क्रियाः ॥ ३८७ ॥ अनाश्रित्यैतदाख्यानां कथा भुवि न विद्यते । आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥ ३८८॥ इदं कविवरैः सर्वैराख्यानमुपजीव्यते । उदयप्रेप्सुभिर्भूत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥ ३८९ ॥ अस्य काव्यस्य कवयो न समर्था विशेषणे । साधोरिव गृहस्थस्य शेपास्त्रय इवाश्रमाः ॥ ३९० ॥ है। इसमें श्लोकों की संख्या व्यास जीने १२००० पण्डित नहीं कहला सकते । महर्षि व्यास जी ने (वारह हज़ार) कही है । यह भारत के सम्पूर्ण पर्वो अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और कामशास्त्र का इसमें का संग्रह पर्वसंग्रहान्याय कहा गया है । अठारह वर्णन किया है। जिस प्रकार कोयल का गब्द अक्षौहिणी सेना युद्ध करने के लिए एकत्र हुई थी और सुनकर कौव्वे की वाणी रुवी मालूम होती है वैमै अठारह दिन तक घोर युद्ध हुआ था ॥३७९॥३८१॥ ही इस उपाग्व्यान को सुन लेने से और कुछ वेद, वेदाङ्ग और उपनिषदों के ज्ञाता इस सुनने की इच्छा नहीं होती । जैसे पंच महाभूतों महाभारत उपान्यान को जाने बिना वह चतुर से तीनों लोकों की रचना होती है वैसे ही इम [वादिगम् ७८ म हा भारत धर्मे मतिर्भवतु वः सततोत्थितानां स ह्येक एव परलोकगतस्य वन्धुः । अर्थाः स्त्रियश्च निपुणेरपि सेव्यमाना नैवाप्तभावमुपयान्ति न च स्थिरत्वम् ॥३९१॥ द्वैपायनौष्टपुटनिःसृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रामथ पापहरं शिवं च । यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥ ३९२ । यदह्ना कुरुते पापं ब्राह्मणस्विद्रियैश्चरन् । महाभारतमाख्याय संध्यां मुच्यति पश्चिमाम् ॥ ३९३ ॥ यद्रानो कुरुते पापं कर्मणा मनसा गिरा। महाभारतमाग्व्याय पूर्वां संध्यां प्रमुच्यते ॥ ३९४ ॥ योगोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुपे च बहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां शृणुयाञ्च नित्यं तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥३९५॥ आग्न्यानं तदिदमनुत्तमं महार्थं विज्ञेयं महदिह पर्वसंग्रहेण । श्रुत्वाऽऽदो भवति नृणां सुखावगाहं विस्तीर्णं लवणजलं यथा प्लवेन ॥३९६।। दनि श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि माहपर्वणि द्वितीयोऽध्याय ॥ २ ॥ पर्वसंग्रहपर्वसमाप्तम् ।। । उत्तम आम्ब्यान मे कवियों की बुद्धिये उत्पन्न होती का साथी है । चतुर लोग धन और स्त्रियों का है। ऋपियो इम महाभारत आम्न्यान में मेवन करते हैं परन्तु वह नित्य नहीं रहते । जो मम्पूर्ण पुगण ऐम ही वर्तमान है जम आगाम में व्यासदेव के बनाये बडे पवित्र, सर्व पाप के नाश चार प्रकार की मष्टि । राफिक और बटिक कमों करने वाले और महाकल्याणकारी भारत को श्रवण के पर में यह आग्यान मा भरा है जमे मन में करता है उसको अनेक तीथों के म्नानों की क्या सम्पप इन्द्रियों की विचित्र किया रहती है। मे आवश्यकता है । जो ब्रामण दिन में इन्द्रियों भानन विना मगर का आधार नहीं है यमे ही मे अनेक प्रकार के पाप करता है यह भारत का हम आज्यान आश्रय विना ममार में कोई कथा पाट मायकाल के समय पढकर उस किये हुए पाप नही । र मानि चारन पार मृत्य अपने में निवृत्त हो जाता है। जो मन, वाणी और काया यानी दावा नन र मन मे करने में नया में रात्रि में पाप करना है वह भारत का पाठ प्रात बगहा परिसंग हम इनिहाय को कार के समय पढकर उस पाप से छूट जाता है । परत पाटन वन? जग चागे आधी में जो मान के मांगों पारी मा गायें वेदपाठी प्रामण माय बाधम भ्रष्ट वम ही मव कायों में यह को देता है, और जो कोई पवित्र भारत की कथा माय ? 1 पापिया ! तुम महा पा निन्य मुनना , उन दोनों को यगवर (एक मह धर्म पाग में मनुष्य जगा , फर मिरना है । इस गानम पर्वो के अयाय ३ ] महाभारत सग्रह से महाभारत को जानना चाहिये । इसको हजैसे बड़े भारी समुद्र में जहाज या नाव आदि आदि में श्रवण करने से महाभारत सुगम हो जाता का सहारा लेना ॥३८३०६॥ आदिपर्न का दूसरा अध्यार पर्वमग्रह नाम ममाप्त हुआ । तृतीयोऽध्याय ॥ 3 ॥ सोतिम्याच-जनमेजयः पारिक्षितः सह भ्रातृभिः कुरुक्षेत्रे दीर्घसनामुपासते । तस्य भ्रातरस्त्रयः श्रुतसेन उग्रसेनो भीमसेन इति । तेषु तत्सत्रमुपा- सीनेष्वागच्छत् सारमेयः॥ १॥ जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतो रोरुयमाणो मातुः समीपमुपागच्छत् ॥ २॥ तं माता रोरुयमाणमुवाच कि रोदिपि केनास्यभिहत इति ॥३॥ स एवमुक्तो मातरं प्रत्युवाच जनमेजयस्य भ्रातृभिरभिहतोऽस्मीति ॥४॥ तं माता प्रत्युवाच व्यक्तं त्वया तत्रापराद्धं येनास्याभिहत इति ॥ ५॥ स तां पुनरुवाच नापराध्यामि किचिन्नावेक्षे हापि नावलिह इति ॥६॥ तच्छ्रुत्वा तस्य माता सरमा पुत्रदुःखार्ता तत्सत्रमुपागच्छद्यत्र स जनमेजयः सह भ्रातृभिदीर्घसत्र- मुपास्ते ॥७॥ स तया क्रुद्धया तत्रोक्तोऽयं मे पुत्रो न किचिदपराध्यति नावेक्षते हबीपि नावलेटि किमर्थमभिहत इति ॥ ८॥ न किचिदुक्तवं- तस्ते सा तानुवाच यस्मादयमभिहतोऽनपकारी तस्माददृष्टं त्वां भयमागमिष्यतीति ॥ ९ ॥ जनमेजय एवमुक्तो देवशुन्या सरमया भृशं ॥ तीसरा अध्याय ३॥ था उग्रश्रवा जी बोले कि हे मापियो । ह । उसकी माता ने कहा कि तू ने वहा अपश्य परीचित का पुत्र जनमेजय अपने भाईया श्रुतसेन, कोई अपराध किया होगा इसीसे जनमेनय के उग्रमेन और भामसैन के साथ बहुत दिनों में भाईयों ने तुझे मारा ह । उम कुत्ते ने अपनी समाप्त होने वाला यज्ञ कर रहे थे। एक दिन एक माता से कहा कि न मैने कोई अपराध किया और कुत्ता यन-मण्डप में चरा आया । ननमेनय के न मैंने यज्ञ के हवि (घी) की ओ देया और न भाईयों ने उस कुत्ते को मारा । वह रोता हुआ उसमें मुख डारा । यह पचन सुनकर उसकी माता अपनी माता के पास ना पहुचा । उसको रोते हुए मरमा पुत्र के दुख से दुखी होकर यज्ञ स्थान में देखकर उसकी माता ने कहा कि तू क्यों रोता आर्ट वह क्रोध में आकर योग कि तुमने बिना है । तुझे किमने मारा । उस कुत्ते ने अपनी माता अपराध किये मेरे पुत्र यो गारा, न उसने कोई मे कहा कि मुझको जनमेनय के भाईयों ने मारा पदार्थ देखा और न गाया , राशि तुमको - [आदिपव ० महाभारत संभ्रान्तो विषपणश्वासीत् ॥ १०॥ स तस्मिन्सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विप्यमाणः परं यत्नमकरोद्यो मे पापकृत्यां शमयेदिति ॥ ११ ॥ स कदाचिन्मृगयां गतः पारिक्षितो जनमेजयः कस्मिंश्चित्स्वविषय आश्रममपश्यत् ॥ १२ ॥ तत्र कश्चिदृपिरासांचके श्रुतश्रवा नाम । यस्य तपस्यभिरतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ॥ १३ ॥ तस्य तं पुत्रमभिगम्य जनमेजयः पारिक्षितः .पौरोहित्याय वत्रे ॥ १४ ॥ स नमस्कृत्य तमृपिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति ॥१५॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाच जनमेजयं भो जनमेजय पुत्रोऽयं मम सर्म्या जातो महातपस्वी स्वाध्यायसंपन्नो मत्तपोवीर्यसंभृतो मच्छुकं पीतवत्यास्तस्याः कुक्षौ जातः ॥ १६ ॥ समर्थोऽयं भवतः सर्वाः पापकृत्याः शमयितुमंतरेण महादेव कृत्याम् अस्य त्वेकमुपांशु व्रतं यदेनं कश्चिद्वाह्मणः कंचिदर्थमभियाचेत्तं तस्मै दद्यादयं यद्येतदुत्सहसे ततो नयस्वैनमिति ॥ १८॥ तेनैवमुक्तो जनमेजयस्तं प्रत्युवाच भगवंस्तत्तथा भविष्यतीति ॥ १९ ॥ स तं पुरोहितमुपादायोपात्तो भ्रातृनुवाचमयाऽयं वृत उपाध्यायो यदयं ब्रूयात- त्कार्यमविचारयर्भिवनिरिति । तेनेवमुक्ता भ्रातरस्तस्य तथा चक्रुः स अम्माा ( अचानर ) भय की प्राप्ति होगी । आपका पुत्र मेरा पुरोहित होचे । सा कहने पर कनिया नाग्मा ये माप पा मुनकर दुम्बिन हो वह पि जनमेनय मे बोरा-हे जनमजय । यह गना नरामय माग्न गा 1121101 मेरा पुत्र वा तपम्बी और वेदपाठी है। मेरे तप यह या दे गमाम होने पर हम्निमापुर में में पुष्ट हुए वीर्य को एक सर्पणी खा गई थी। आकर योग्य पुगहिरन का नाम करन रगा कि टगी योग्य गे यह वार उत्पन्न हुभा है । और जीम पार दादा की। दिन राना तन या महादेव के मिगाये मव गापों को दूर कर परिमनदीया में गये और कहा सकता है। इसकी एक गुप्त प्रतिना यह है कि जो म यो गाम नाधम में नया कोर्ट मम र मांग उमको यह यह यस्तु अवश्य * दिना था। उस पत्र का नाम का है। यदि नुमन्टगर इम नियम पा निर्वाह ia गजानमग्य उम मीमध्या कर गान हो नी इमकोरे गाओ । इस प्रकार मदर ने प्राय दी। म म माप जनमेजय ने या गरि ग वि भगवा' पुष या पातम्चीबार है । सोमश्रया । । पवन का मुनकर

अ याय ३]
म हा मा र त
८०
तथा भ्रातॄन् संदिश्य तक्षशिला प्रत्यभिप्रतस्थेतं च देशं वशे स्थापयामास
॥ २० ॥ एतस्मिन्नन्तरे कश्चिदृपिधौम्यो नामापोदस्तस्य शिष्यास्त्रयो
बभूवुः उपमन्युरारुणिर्वेदश्चेति ॥ २१ ॥ स एकं शिष्यमारुणिं पाञ्चाल्य
प्रेषयामास गच्छ केदारखण्डं वधानेति ॥ २२ ॥ स उपाध्यायेन संदिष्ट
आरुणिः पांचाल्यस्तत्र गत्वा तत्केदारखण्डं बथु नाशकत् । स क्लिय-
मानोऽपत्यदुपायं भवत्वेवं करिष्यामि ॥ २३ ॥ स तत्र संविवेश
केदारखण्डे शयाने च तथातस्मिंस्तदुदकं तस्थौ ॥ २४ ॥ ततः कदा-
चिदुपाध्याय आपोदो धौम्यः शिष्यानपृच्छत्क्वआरुणिः पाञ्चाल्यो गत
इति ॥ २५ ॥ ते तं प्रत्यूचुर्भगवंस्त्वयैव प्रेपितो गच्छ केदारखण्डं
वधानेति । स एवमुक्तस्ताञ्च्छिण्यान्प्रत्युवाच तस्मात्तत्र सर्वे गच्छामो
या स गत इति ॥ २६ ॥ स तत्रा गत्वा तस्याहानाय शब्दश्चकार भो
आरुणे पाञ्चाल्य क्वासिवत्सहीति ॥ २७ ॥ स तच्छुत्वाआरुणिरुपाध्याय-
वाक्यं तस्मात्केदारखण्डात्सहसोत्थाय तमुपाध्यायमुपतस्थे॥ २८॥ प्रोवाच
पुरोहित को लेकर राजा जनमेजय अपने नगर को ऊची गध जिसमे खेत का पाना बाहर न निकलने
आया और आकर अपने भाईया मे गोला, कि हमने पाये । आरुणि गुरु का आज्ञा पाकर खेत में गया
इन माप पुत्र को अपना उपाध्याय ओर पुरोहित परन्तु बहुत चेष्टा करने पर भा क्यारियों का पानी
बनाया है। जो जिस कार्य को यह कहे उसको रोक नहीं सका । अन्त मे उन्ह एक उपाय सूझ
विना विचारे तुम करो। वह इस प्रकार अपने भ्राताओ पटा । वे म्वय पाना की नाली में लेट रहे । उनके
को कहकर राजा जनमेजय तक्षगिरा नगर के निजय ऐमा करने पर पानी की गति भी रुक गई । कुछ
करने को गग और उम नगर को विजय क्यिा । काल के उपरान्त धाम्य माप ने आरुणि को न
देखकर अपने अन्य गिप्यों मे पूरा कि पाचाल
इतना क्था सुनाकर मृत जी गोरे कि, हे देश का आरुणि कहा गया। उनके गिप्यो ने
मापियो ' इसी के मध्य में अपौध ऋपि के पुत्र उत्तर दिया भगरन् आप ही ने तो उसे सेत की
धाम्य नामक एक मपि थे । वह केर जर पीचर नारा का पानी रोकने के लिए भेना था। यह
हा अपना निर्वाह किया करते थे। उनक तान सुनकर धोम्य ने कहा- तो आओ चलो, देगें वहा
शिष्य थे-उपमन्यु, आराण आर वेद । एक दिन वह अब तक क्या कर रहा ह । ग्वत म पहुंचने
धाम्य ऋपि ने अपने गिप्य आराणे का परीक्षा पर धौम्य ने आरणि का नाम लेकर पुकारा | आगे
करने के लिए कहा-अमुक खेत मे जर बहुत गुरु का आवाज सुनकर उस जर के जाने के रास्ते
भग जाता हे तू जाकर क्यारिया की मेड ऐमा से निकर र गुरु के निकट जाया । आराणि
॥११॥२०॥

[आदिपक महाभारत चेनमयमस्म्यत्र केदारखण्डे निःसरमाणमुदकमवारणीयं संरोर्बु संविष्टो भगवच्छब्दं श्रुत्वैव सहसा विदार्य केदारखण्डं भवन्तमुपस्थितः ॥ २९॥ तदभिवादये भगवन्तमाजापयतु भवान्कमर्थं करवाणीति ॥३०॥ स एवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच यस्माद्भवान्केदारखण्डं विढायोस्थितस्तस्मादुहालक एव नाम्ना भवान्भविष्यतीत्युपाध्यायेनानु- गृहीतः ॥ ३१ ॥ यस्माञ्च त्वया मद्वचनमनुष्टितं तस्माच्छ्योऽवाप्स्यसि सर्वे च ते वेढाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति ॥३२ ॥ स एवमुक्त उपाध्यायेनेष्टं देशं जगाम । अथापरः शिष्यस्तस्यैवापोदस्य धौम्यस्योपमन्युर्नाम ॥ ३३ ॥ तं चोपाध्यायः प्रेषयामास वत्सोपमन्यो गा रक्षस्वेति ॥ ३४ ॥ स उपाध्यायवचनादरक्षनाः स चाहनि गा रक्षित्वा दिवसक्षये गुरुगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥३५॥ तमुपाध्यायः पीवानमपश्यदुवा चैनं वत्सोपमन्यो केन वृत्ति कल्पयसि पीवानसि दृढमिति ॥ ३० ॥ स उपाध्यायं प्रत्युवाच भो भध्येण वृत्तिं कल्पयामीति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥ ३७ ॥ मय्यनिवेद्य ने प्रणाम कर कहा गुर जी, मैं नारी में पानी को चरा गया। उसके उपरान्त धाम्य ऋषि ने अपने गवन में गिरा पग हुआ था। मेट बाधने की मैने शिप्य उपमन्यु को वन में अपनी गाय चराने की याहुन नेष्टा की थी परन्तु बाध नहीं मका इमाम आना दी। वह गुर की आगा पाने पर नित्य या। एक मुगम उपाय मांगा था । आपकी प्रति गाया को यनों में चराता आर सायकार को आवान मनन । एटम नर दीनाली में निकर उन्हें लगकर घर बाघ देता था । एक दिन शाम र आर के पाम आया। अब आप तो 3 को उपमन्यु गुर के समीप गये और प्रणाम करके भादमा पर 111301 उन मन्मुम्ब गडे हो गये । गुर ने उनको खून धाग्य मारिने प्रमन कहा कि Fट पुष्ट नानकर पृछा-बेटा उपमन्यु, तुन क्या नारी की नार का मेरे पास प्राय । मयि गान पनि हो, निमग तिने मोरे हो रहे हो' शाम नाम गर म स्टार प्रसिद्ध गा। पम यु ने उत्तर दिया म भिषा में अपनी जीविका सुमन ए को मारा भी मेरी माता का पालन का निर्वाह करता हु । गुर ने उपमन्यु से कहा fart मुमाग पच्या नगा । चाग येद मेरे मांग भिमा को रकम्प पिना तुझको खाना in 41 नुसरी पो । नारंगा ! योग्य नहीं। उपमन्यु ने कहा बहुत अच्छा, उम प्रा. नारदाश्रम पार पापा की दिन में यह भी कए भीम माग का माता मा अपने तुम अध्याय ३] महाभारत भेक्ष्यं नोपयोक्तव्यमिति । स तथेत्युक्तो भैभ्यं चरित्वोपाध्याया- न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥ स तस्मादुपाध्यायः सर्वमेव भैष्यमगृह्णात् । स तथेत्युक्तः पुनररक्षद्गा अहनि रक्षित्वा निशामुखे गुरुकुलमागम्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ३९ ॥ तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो सर्वमशेषतस्ते भैध्यं गृह्णामि केनेदानी वृत्ति कल्पयसीति ॥ ४०॥ स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भगवते निवेद्य पूर्वमपरं चरामि तेन वृत्तिं कल्पयामीति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥ ११ ॥ नेपा न्याय्या गुरुवृत्तिरन्येपामपि भैथ्योपजीविनां वृत्युपरोधं करोपीत्येवं वर्त्तमानो लुब्धोऽसीति ॥ ४२ ॥ स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षद्रक्षित्वा च पुनरुपाध्यायगृहमागम्योपाध्यायस्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ १३ ॥ तमुपाध्यायस्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच वत्सोपमन्योऽहं ते सर्व भैक्ष्यं गृह्णामिन चान्यच्चरसि पीवानसि भृशं केन वृत्तिं कल्पयसीति ॥ १४ ॥ स एव मुक्तस्तमुपाध्यायं प्रत्युवाच भो एतासां गवां पयसा वृत्तिं कल्पयामीति । तमुवाचोपाध्यायो नैतन्न्याय्यं पय उपयोक्तुं भवतो गुरु के पास रख देता था। वह गुरु उम चेले से सब होता है इसमे तू बड़ा लोभी है । वह इस बात को मिक्षा ले लेते थे । वह इस आना को स्वीकार कर भी म्वीकार कर गौओं की रक्षा करने लगा फिर गायों की रक्षा करने लगा। एक दिन संध्या का सायंकाल को आ गुरु के समीप खड़ा हो नमस्कार ममय आने पर गायों को ले गुरु के आश्रम में जा किया । उसको फिर उपाध्याय ने मोटा ताजा देख उमने नमस्कार किया ॥३॥३९|| फिर पूछा कि पुत्र उपमन्यु, मै तेरी मत्र भिक्षा को ले तब भी उपमन्यु को वैमा हो मोटा देवकर लेता हुँ और दूसरी और कोर्ट वृत्ति भी नहीं है फिर धौम्य ऋषि ने कहा कि बेटा उपमन्यु, मैं तुम्हारी तू किस कारण हृष्ट पुष्ट है । तू किम प्रकार अपनी मव भिक्षा ले लेता हूं अव तुम क्या बाते हो। आजीविका करता है ? उपमन्यु ने कहा कि भगवन् उपमन्यु ने कहा कि पहली भिक्षा मांग कर आप मै इन गाओं का दूध पी लेना हु । गुरु ने कहा के अर्पण कर फिर भिक्षा मांग उमम अपनी आजी- कि यह उचित नहीं है । मेरी आना बिना गाओं विका करता हुं । गुरु ने कहा कि ऐमा करना का दूध न पीना । उपमन्यु ने यह भी म्बीकार तुमको योग्य नहीं है । यह गुरु वृत्ति से विपरीत कर लिया और पहले की तरह अपने कार्य में कार्य है और बहुत मे भिक्षा मागकर जीविका तत्पर रहा। फिर एक दिन प्रणाम करके आगे खड़े चलाने वालों की जीविका में बाधा डालने का पाप हुए उपमन्यु को वैसा ही मोटा देखकर धौम्य ने [ आदि महाभार मया नाभ्यनुज्ञातमिति ॥ ४५ ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय गा रक्षित्वा पुनरुपाध्यायगृहमेत्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ॥ ४६ ॥ तमुपाध्यायः पीवानमेव दृष्ट्वोवाच वत्सोपमन्यो भक्ष्यं नानासि न चान्यच्चरसि पयो नपिवसि पीवानसि भृशं केनेदानी वृत्ति कल्पयसीति ॥४७॥ स एवमुक्त उपाध्यायं प्रत्युवाच भोः फेनं पिवामि यमिमे वत्सा मातृणां स्तनात्पिवन्त उद्गिरन्ति ॥ ४८ ॥ तमुपाध्यायःप्रत्युवाच एतेत्वदनुकम्पया गुणवन्तो वत्साः प्रभूततरं फेनमुदिरन्ति तदेपामपि वत्सानां वृत्युपरोधं करोप्येवं वर्तमानः फेनमपि भवान्न पातुमर्हतीति । स तथेति प्रतिश्रुत्य पुनररक्षद्गाः ॥ १९॥ तथा प्रतिपिद्धो भैक्ष्यं नानाति न चान्यच्चरति पयो न पिवति फेनं नोपयुक्ते स कदाचिदरण्ये क्षुधातॊऽर्कपत्राण्यभक्षयत् ॥ ५० ॥ स तैरर्कपत्रैभक्षितैः क्षारतिक्तकटुरूस्तीक्ष्णविपाकैश्चक्षुप्यु पहतोऽन्धो वभूव । ततः सोऽन्धोऽपि चक्रम्यमाणः कूपे पपात ॥ ५१ ॥ अथ तस्मिन्ननागच्छति सूर्ये चास्ताचलावलंविनिउपाध्यायः शिष्यानवोचत् नायात्युपमन्युःत ऊचुर्वनं गतो गारक्षितुमिति तानाहउणध्यायः॥ ५२ ॥ मयोपमन्युः सर्वतः प्रतिपिद्धः स नियतं कृपितस्ततो नागच्छति चिरम् । ततोऽन्वेप्य इत्येवमुक्त्वा शिष्यैः सार्धमरण्यं गत्वा तस्याबानाय पृहा कि येग उपमन्यु, तू भिक्षा नहीं करता नसरी किया हुआ उपमन्यु न तो भिक्षा करता, न दुध पीता पार भी भिता को नहीं पाता आर रध भा नहीं आर न पेन को काम में लाता, इसलिए भूख से पीना पक्या आनीपिका करता है वह गुरु के अत्यन्त राचार होकर आक के पत्ते साने लगा। पृछने पर गांग कि ना तर यह रहे अपनी आर रूगे यारी, कटये आर तीक्ष्ण आक के पत्तो मानानी का दध पीते है उम ममय इनके मुग्व मे को सा करके अधा हो गया । ओर गुर के आश्रम जोपना (झग) निकलता है उसको पीकर मै आजी म आता हुआ कुएँ म गिर पडा १४०-१॥ विका परना दु धीम्य ने कहा कि यह उचित नहीं । मृर्य के अम्त होने पर जब वह आश्रम में न चहरे तुम पर पाकर बहुत मा पना उगरने है जाया नर गुर ने अपने रिप्या से पृज कि क्या और अपना पेट भरन म रणना करने है टमशिा उपमन्यु नहीं जाया । शिप्या ने उत्तर दिया कि तुम पेना भी न पीया बगे । उपमन्यु ने पेना को मापने तो उमे गाय चराने भेना था, गुर ने फिर कहा पास भी याद कर दिया और उमी तग गोआ सा कि मैने उपमन्यु को बार बार रोमाथा टममे यह क्रोध पान कर्ग गा । दम प्रसार अपने गुरम निषेध म आर किमी अन्य स्थान चग गया होगा, दसा अध्याय ३] महाभारन शब्दं चकार भो उपमन्यो क्वासि वत्सहीति ॥ ५३ ॥ स उपाध्यायवचनं श्रुत्वा प्रत्युवाचोचैरयमस्मिन्कूपे पतितोऽहमिति तमुपाध्यायः 'प्रत्युवाच कथं त्वमस्मिन्कूपे पतित इति ॥ ५४ ॥स उपाध्यायं प्रत्युवाचअर्कपत्राणि भक्षयित्वाऽन्धीभूतोऽस्म्यतः कूपे पतित इति तमुपाध्यायः प्रत्युवाच ॥ ५५ ॥ अश्विनो स्तुहि तो देवभिपजौ वां चक्षुष्मन्नं कर्ताराविति । स एवमुक्त उपाध्यायेनोपमन्युरश्विनौ स्तोतुमुपचक्रमे देवावश्विनौ वाग्भिग्भिः॥ ५६ ॥ प्रपूर्वगो पूर्वजो चित्रभानू गिरा वाऽऽशंसामि तपसां ह्यनन्तौ । दिव्यो सुपर्णो विरजौ विमानावधिक्षिपन्तो भुवनानि विश्वा ॥ ५७ ॥ हिरण्मयो शकुनी सांपरायों नासत्यदलौ सुनसौ वैजयन्तौ । शुलं वयन्तो तरसा सुवेमावधिव्ययन्तावसितं विवस्वतः ॥ ५८ ॥ ग्रस्तां. सुपर्णस्य बलेन वर्तिकाममुञ्चतामश्विनौ सौभगाय । तावत्सुवृत्तावनमन्त मायया वसत्तमागा अरुणा उदाऽवहन् ॥ ५९ ॥ पष्टिश्च गावनिशताश्च धेनव एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति । नाना गोष्ठा विहिता एकदोहनास्तावश्विनौ दुहतो धर्ममुक्थ्यम् ॥ ६० ॥ कारण से अभी तक नहीं आया उमको देखना हे अश्विनीकुमारो : तुम सृष्टि के पहले विद्यमान् चाहिये । यह कहकर गुरु अपने मिप्यों को थे और सब मे पहले उत्पन्न हुए । आप विचित्र साथ ले वन में गये । वहां जाकर ऊँची आवाज़ से प्रपंच वाले आकार करके अग्निरूप होकर प्रकाग- बोलने लगे-बेटा उपमन्यु, कहाँ हो ? आओ । अपने मान् हो । मैं आप की वाणी और तप द्वारा स्तुति गुरु के गळों को सुनकर वह उपमन्यु कुएँ के करता हू। आप अन्तरहित पशिम्वरूप रजोगुण- भीतर में बोला कि मैं यहां कुएँ में पढ़ा हूं । गुरु ने रहित अपरिमित मम्पूर्ण भवनों को मत्वगुण में पछा तुम कैमे कुएं में गिर पड़े । उपमन्यु ने उत्तर लाने वाले हो । आप तंजम्बम्प, महाप्रलय में सब दिया कि, मैं आक के पत्ते खाकर अंधा हो गया हूं के निवासम्थान, मिथ्याज्ञान मे रहित, सुन्दर इमाये कप में गिर पड़ा है। गुरु ने कहा-तुम देवताओं नामिका वाले और काल को जीतने वाले हो । के वैद्य अश्विनीकुमारों की स्तुति करो । वह प्रसन्न आप मूर्य को रचकर काले सूत्ररूपी रात्रि और होकर तुझे नेत्र माहित कर देंगे। उपमन्यु इस प्रकार श्वेत मूत्ररूपी दिन के ताने बाने मे मम्वत्सररूपी गुरु की आना पाकर वेद वाक्यों मे अश्विनीकुमारों कपड़े को बुनकर लोक को मुमार्ग में करने वाले की म्नुनि करने लगा ॥५२॥५३॥ हो जीवरूपी पक्षी के परमात्मा की काल शक्ति . - [आदिपर्व महाभारत एका नाभिंसप्तशता अराः श्रिताः प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अराः। अनेमि चक्र परिवर्ततेऽजरं मायाऽश्विनौ समनक्ति चर्षणी ॥ ६१ ॥ एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं पण्णाभिमेकाक्षमृतस्य धारणम् । यस्मिन्देवा अधि विश्वे विपक्तास्तावश्विनौ मुञ्चतं माविपीदितम् ॥ ६२ ॥ अश्विनाविन्दुममृतं वृत्तभूयौ तिरोधत्तामश्विनौ दासपत्नी । हित्वा गिरिमश्विनौ गामुदाचरन्तौ तदृष्टिमह्ना प्रस्थितौ बलस्य ॥ ६३ ॥ युवां दिशो जनयथो दशाये समानं मूर्ध्नि रथयानं वियन्ति । तासां यातमृपयोऽनु प्रयान्ति देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥ ६४ ॥ युवां वान्विकुरुथो विश्वरूपांस्तेऽधिक्षियन्ते भुवनानि विश्वा । ते भानवोऽप्यनुस्मृताश्चरन्ति देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ॥ ६५ ॥ तो नासत्यावश्विनौ वां महेऽहं नजं च यां विभृथः पुष्करस्य । तो नासत्यावमृतावृतावृधावृते देवास्तत्प्रपदे देवास्तत्प्रपदे न सूते ॥ ६६ ॥ द्वारा प्रमित होने के कारण उसको मोक्षरूपी । एक अक्षावाला तथा कर्मफल रूपी आंधार युक्त माभाग्य देने को अश्विनीकुमारों के रूप में प्रकटित हुए जो एक चक्र है जिसमें कालराभिमानी देवता हो । मूर्य मनुप्य रागादि विषयों में जकड़े हुए जब आसक्त है। तुम मुझ जन्म मरण से दु.खित को तक इन्द्रियों के अधीन होकर रहते है तब तक उस काल चक्र से मुक्त करो । तुम विषय आदि आप उनको शरीरधारी ममझते हो। ३६० रात्रि और सम्पूर्ण प्रपंचों से भरे हो। तुम ही आकाशादि दिनापी फर्म फल रूप, दुग्ध देने वाली गाय, मम्वत्सर लय के कारण हो। तुम ही अनादि अविद्या दोष ग्प बालो को पैदा करती है और भिन्न भिन्न प्रकार मे भोगने वाले पदार्थों में इन्द्रिय संयोग करके ही क्रिया याग भी एक प्रकार के ज्ञान को उत्पन्न परम आनन्द से विचर रहे हो। हे अश्विनीकुमारो! करती है। अधिनीरमागे ' तुम उनके दुहने तुमने सृष्टि के पहले दश दिशाओं को, आकाश को चान हो। और वह गम्यत्मरम्प बछडा सर्व ममार और मत्र के समानरूप से वर्तमान सूर्य को उत्पन्न वारण वाग और कमी को उत्पन्न करने वाग किया । दिया और काल के अनुमार ऋपि लोग १ । मन्दमर चक्र में एक नाभी है और मान मी मम्पूर्ण कर्मों का अनुष्ठान करते है । देवता और वाम दिन गति रुप अरगे है । नमन उम मनुष्य अपने अधिकार के अनुमार ऐश्वर्य का अनियन मायामय अभय पारचा को नियुक्तः उपमांग करने है । हे अश्विनीकुमारो ! तुम लाल, किया? । वा, कारचा रस अंक और पाक शुरुल, और कृन टन वणों को उत्पन्न करते हो भीमर मनायो पा कर रहा है । मयादि गामि और इन्हींगों के मेल से सम्पूर्ण लोगों को उत्पन्न ना पण आग, मतमपी हारे और वरपी परन हो और सम्पूर्ण प्रसाशमय जीय, देव, मनुष्य ।

अध्याय ३] महाभारत मुखेन गर्भ लभेतां युवानो गतासुरेतत्प्रपदेन सूते । सद्यो जातो मातरमत्ति गर्भस्तावश्विनौ मुंचथो जीवसेगाः ॥ ६७ ॥ स्तोतुं न शक्नोमि गुणैर्भवन्तौ चक्षुर्विहीनः पथि संप्रमोहः । दुर्गेऽहमस्मिन् पतितोऽस्मि कूपे युवां शरण्यौ शरणं प्रपद्ये ॥ ६८ ॥ इत्येवं तेनाभिष्टुताश्विनावाजग्मतुराहतुश्चैनं प्रीतौ स्त्र एप तेऽपूपोऽशानैन- मिति ॥ ३९ ॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाच नानृतमूचतुर्भगवन्तौ न त्वहमेतम- पूपमुपयोक्तुमुत्सहे गुरवेऽनिवेद्येति ॥ ७० ॥ ततस्तमश्विनावूचतुरावाभ्यां पुरस्ताद्भवत उपाध्यायेनैवमेवाभिष्टुताभ्यामपूपो दत्त उपयुक्तः स तेनानि- वेद्य गुरवे त्वमपि तथैव कुरुष्व यथा कृतमुपाध्यायेनेति ॥७१॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाचैतत्प्रत्यनुनये भवन्तावश्विनौ नोत्सहेऽहमनिवेद्य गुरवेऽपूपमुपयोक्तुमिति ॥ ७२ ॥ तमश्विनावाहतुः प्रीतीस्वस्तवानया गुरुभक्त्योपाध्यायस्य ते कार्णायसा दन्ता भवतोऽपि हिरण्मया और पशु आदि इस पृथ्वी का आश्रय किये हुए इस प्रकार म्तुति किये हुए अश्विनीकुमार वहा इसमें विचन्ते हैं । हे अधिनीकुमारो ! आप सत्य पर आये और कहने लगे कि, हम तुझपर प्रसन्न रूप हैं । मैं आप की पूजा करता हू । आप आकाय हैं और यह पुआ तुझको देते है इसको वा । इम व्याप्त हो रहे हैं । आप नित्यमुक्त और कर्मों प्रकार अश्विनीकुमारों के वचन सुनकर उपमन्यु ने के फल को धारण करने वाले हैं। तुम्हारे बिना कहा कि, आप लोगों का कहना ठीक है परन्तु बिना अभिमानी देवना अपने अपने विषय को प्राप्त नहीं गुरु के अर्पण किये टसको नहीं खा सकता हूँ कर सकने । तुम प्रथम मुख मे गर्भ को धारण ॥६८/७०॥ करते हो इसके उपरांत माता पिता के द्वारा गर्भ अश्विनीकुमारों ने कहा कि, पहले तुम्हारे गुरु को धारण कराते हो तिसके उपरांत उलन्न हुआ ने भी इसी तरह स्तुति की थी। हमने प्रमन्न होकर गर्म माता का दुग्ध पान करता है । है अधिनी- उनको पुआ दिया था। उन्होंने अपने गुरु को कुमार : आप जीने के लिए मुझे चक्षु दो विना अर्पण किये ही पुआ खा लिया था। ऐसे ही ५७/६७|| तू भी खा । इस प्रकार उनके वचनों को सुनकर मैं नेत्र हीन और ज्ञान मे रहित आप की उपमन्यु कहने लगा कि, आप क्षमा कीजिये । मैं गुरु म्नुति नहीं कर सकता हूं और दस कुएं में गिरा को अर्पण किये बिना इस पुए को कदापि नहीं पड़ा हूं । तुम शरणागत की रक्षा करने वाले हो खा सकता हूं। आश्विन कुमार बोले कि, हम तेरी मो तुम दोनों की शरण ली है । मूत ने कहा कि, गुरु भक्ति देवकर अति प्रसन्न हुए हैं । तुम्हारे उपमन्यु ने इमी तरह और भी उन की स्तुति की। ! गुरु के लेहे के दांत हैं किन्तु तुम्हारे सवर्ण के में -- आदिगर्य] महामारन भविष्यन्ति चक्षुष्मांश्च भविष्यसीति श्रेयश्चावाप्स्यसीति ॥ ७३ ॥ स एवमुक्तोऽश्विभ्यां लब्धचक्षुरुपाध्यायसकाशमागम्याभ्यवादयत् ॥ ७४ ॥ आचचक्षे च स चास्य प्रीतिमान्वभूव ॥७५॥ आह चैनं यथाऽश्विनावा- हतुस्तथा त्वं श्रेयोऽवाप्स्यसि ॥ ७६ ॥ सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्ति सर्वाणि च धर्मशास्त्राणीति एपा तस्यापि परीक्षोपमन्योः ॥ ७७ ॥ अथापरः शिष्यस्तस्यैवापोदस्य धौम्यस्य वेदो नाम तमुपाध्यायः समा- दिदेश वत्स वेदइहास्यतां तावन्मम गृहे कंचित्कालं शुश्रूषुणा च भवितव्यं श्रेयस्ते भविष्यतीति ॥ ७८ ॥ स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुस्शुश्रूषणपरोऽवसत् । गौरिव नित्यं गुरुणा धूर्षु नियोज्यमानः शीतोष्णक्षुत्तृष्णादुःखसहः सर्वत्राप्रतिकूलस्तस्य महता कालेन गुरुः परितोपं जगाम ॥ ७९ ॥ तत्परितोपाच्च श्रेयः सर्वजतां चावाप। एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य ॥ ८०॥ स उपाध्यायेनानुज्ञातः समावृत्तस्तस्माद गुरुकुलवासाद् गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रयः शिष्या बभूवुः स शिप्यान्न किंचिदुवाच कर्म वा क्रियतां गुरुशुश्या चेति । दु:ग्वाभिजो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजयितुं नेयेप ॥ ८१॥ अथ कस्मिंश्चित्काले वेदं ब्राह्मणं जनमेजयः पौष्यश्च क्षत्रियावुपेत्य दान होग अथान तेरा गुर अनिरनित मुग्य दुख इसके उपरान्त तीसरे शिप्य वेद से गुर ने कहा के रूप कमों को भोगने पारा होगा और तुझे कि हे पुत्र । तुम कुछ दिन मेरे घर में रहकर सम्पूर्ण मुग की प्राप्ति होगी और नेत्रवान होकर गुर मेगा करो तुम्हारा मगर होगा । वह शिष्य ५. परयाण को प्राप्त होगा ||१ || गुर के वचन को म्वीकार कर सेवा करने में तत्पर इस प्रकार अशिनीमागे पचन सुन हुना। वह जुग में नियुक्त डा बर का भाति गर्मी पर गं नत्र मुले गार गर के ममीप आकर जार मर्दी को सहन करता हुआ गुर मुश्रुषा में माम रिया। उपमन्यु ने गुर को मार कहा। रहने रगा । वहुत काल के व्यतीत होने पर गुरु T गुनार उनपर बहुत प्रसन्न हुए । चार गिप्य प्रगान हुए। और वह अपन गुरु की कृपा से सानिया नुन में अश्विनीमारी ने इन। कन्याण को प्राप्त हो मर्वन हो गया। यह तमिरे वगाही गगा। गम्पूर्ण पेट और धर्मशास्त्र का मिप्य वेद की परीक्षा कहा ॥८८०॥ नगा राजा वह अपने उपाध्याय की आजा मे गुरतुर मे यह दो निप्य उपमन्यु वा पाई। गंटकर गृहपाश्रम में रहने रगा । उमके भी अध्याय ३ ] महाभारत वरयित्वोपाध्यायं चक्रतुः ॥ ८२॥ स कदाचिद्याज्यकार्येणाभिप्रस्थित उत्तङ्कनामानं शिष्यं नियोजयामास ॥ ८३ ॥ भो यत्किंचिदस्मदगृहे परिहीयते तदिच्छाम्यहमपरिहीयमानं भवता क्रियमाणामिति । स एवं प्रतिसंदिश्योत्तकं वेदः प्रवासं जगाम ॥ ८४ ॥ अथोत्तङ्कः शुश्रूपुर्गुरुनि- योगमनुतिष्टमानो गुरुकुले वसति स्म । स तत्र वसमान उपाध्यायस्त्रीभिः सहिताभिराहयोक्तः ॥ ८५ ॥ उपाध्यायिनी ते ऋतुमतीउपाध्यायश्च प्रोपितोऽस्या यथाऽयमृतुर्वन्ध्यो न भवति तथा क्रियतामेषा विषीदतीति ॥८६॥ एवमुक्तस्ताः स्त्रियः प्रत्युवाच न मया स्त्रीणां वचनादिदमकार्य करणीयं न ाहमुपाध्यायेन संदिष्टोऽकार्यमपि त्वया कार्यमिति ॥ ८७ ॥ तस्य पुनरुपाध्यायः कालान्तरेण गृहमाजगाम तस्मात्प्रवासात् । स तु तद्वृत्तं तस्याशेपमुपलभ्य प्रीतिमानभूत् ॥ ८८ ॥ उवाच चैनं वत्सोत्तङ्क किं ते प्रियं करवाणीति । धर्मतो हि शुभूषितोऽस्मि भवता तेन प्रीतिः परस्परेण नौ संवृद्धा तदनुजाने भवन्तं सर्वानेव कामानवाप्स्यसि गम्यता मिति ॥ ८९ ॥ स एवमुक्तः प्रत्युवाच किं ते प्रियं करवाणीति एवमाहुः ॥ ९० ॥ यश्चाधर्मेण वै ब्रूयांद्यश्चाधर्मेण पृच्छति । तयोरन्यतरः प्रेति तीन शिप्य हुए । वह उन शिष्यों से किमी कार्य में गया है ऐसा करो कि इस ऋतु का फल व्यर्थ व सेवा को नहीं कहता था क्योंकि उमको गुरुकुल न जाय । वह अत्यंत व्याकुल है। उत्तंक ने उत्तर निवास के दुख का अनुभव (ज्ञान) था। इस कारण दिया कि मैं स्त्रियों के वचन मे यह अकार्य न करंगा मे अपने शिष्यों को वह कष्ट देना नहीं चाहता था। आप ऐमा कुकर्म करने को गुरु जी ने मुझे आना भी कुछ काल गये पीछे राजा जनमेजय और राजा पोप्य नहीं दी है। उत्तक का गुरु कुछ काल के पश्चात अपने ने वेद को अपना उपाध्याय बनाया वह वेद कदाचित् घर आया और मव वृत्तान्त सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ यजमान के कार्य में जाता हुआ उत्तक नामक और उमको वुराकर कहा कि हम तुम पर अमन है शिप्य को किसी कार्य में लगा गया।ह गिप्य जो अपने घरको जा मैं आना देता हुं तर मय कुछ घर का काम हो उचित अनुचित ममझकर जब कार्य सिद्ध होंगे॥८१४८९॥ नकम वापस न आवे तब तक करना ऐसा कहकर, उत्तक ने कहा-गुरु जी, मै आपका क्या प्रिय वह गुरु परदेश को चला गया ततश्चात् स्त्रियों ने कार्य कर । क्योंकि इस विषय में वृद्ध लोग कहने उत्तंक को एक दिन वुला कर ऐसा कहा, तुम्हारी है कि गुरु यदि दक्षिणा नहीं लेता और गिप्य यदि उपा यायनी ऋतुमती हुई है और गुरु तेरा परदेग गुरु दक्षिणा नहीं देता तो गुरु शिप्य में परम्पर अव तृ

आदि
महाभारत
NA
विद्वेषं चाधिगच्छति ॥ ९१ ॥ सोऽहमनुज्ञातो भवतेच्छामष्टिं गुर्वर्थमुप-
हर्तुमिति । तेनैवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तोप्यतां तावदिति
॥ ९२ ॥ स कदाचिदुपाध्यायमाहोत्तंक आज्ञापयतु भवान् किं ते प्रियमु-
पाहरामि गुर्वर्थमिति ॥ ९३॥ तमुपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क बहुशो
मां चोदयास गुर्वर्थमुपाहरामीति तद्गच्छैनां प्रविश्योपाध्यायिनी पृच्छ
किमुपाहरामीति ॥ ९४ ॥ एषा यद् ब्रवीति तदुपाहरस्वेति । स एवमुक्त
उपाध्यायेनोपाध्यायिनीमपृच्छद्भगवत्युपाध्यायेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तु-
मिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुमिति ॥ ९५॥ तदाज्ञापयतु
भवती किमुपाहरामि गुर्वामिति । सैवमुक्तोपाध्यायिनी मुत्तकं प्रत्युवाच
गच्छ पौयं प्रति राजानं कुण्डले भिक्षितुं तस्य क्षत्रियया पिनद्धे ।। ९६ ॥
आनयस्व चतुर्थेऽहनि पुण्यकं भविता ताभ्यामावद्धाभ्यां शोभमाना
ब्राह्मणान्परिवेष्टुमिच्छामि । तत्संपादयस्वैवं हि कुर्वतः श्रेयो भविताऽ-
न्यथा कुतः श्रेय इति ॥ ९७ ॥ स एवमुक्तस्तया प्रातिष्ठतोत्तङ्कः स
पथि गच्छन्न पश्यदृषभमातिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुपमतिप्रमाणमेव ।
स पुरुप उत्तङ्कमभ्यभापत ॥ ९८ ॥ भो उत्तकैतत्पुरीपमस्य ऋष भस्य
भक्षयस्वेति । स एवमुक्तो नेच्छत् ॥ ९९ ॥ तमाह पुरुषो भूयो भक्षयस्वो-
विरोध होता है और दोनों में से एक अवश्य मृत्यु आज्ञा करो सो मै पूरा कर । यह सुनकर
को प्राप्त होता है । इमरिगए आप मुझे आज्ञा उपाध्यायनी ने कहा कि राजा पोप्य की स्त्री
दानिये कि मैं क्या गुर दक्षिणा द । गुरु ने उत्तर के कान के कुण्डल आज के चौथे दिन मुझे लाकर
दिया बेटा इत्तक, कुछ दिन और ठहगे, फिर कहगा। दो उस दिन मै व्रत करके उन्हीं कुण्डली को पहिर
कुत का व्यनीत होने पर उत्तक ने फिर कहा कि कर ब्राह्मणों को भोजन खिलाऊगी जो तुम उस
महारान जो कुछ आप गुरु दक्षिणा की मुझको ममय तक कुण्डल लाकर न दोगे तो तुम्हारा कल्याण
आना द मोम दृ । यह सुनकर उपाध्याय पोने कि नहीं होगा । उपाध्यायनी के वचन सुनकर उत्तक
अपनी उपाध्यायनी में पछा यह जो कुछ मागे मो वहा मे पौप्य राजा के पास चरा राम्ते में क्या
नो। यह सुनकर उत्तर उपाध्यायनी के ममाप देग्यता है कि एक मनुष्य एक बडे मोटे ताजे बैल
गया और कहा कि में गुर दाक्षिणा देकर अपने घर पर चहा हुआ यह कह रहा है कि हे उत्तक । तुम
जाना चाहता है मो गुरु जी ने कहा कि जो
दम यर का गोचर वालो परन्तु उसने ग्वाने की
गुहाग गुर माना माग मा दो, मा जो कुछ तुम द्दा नहीं की ॥२००९॥

अध्याय ३ ] महाभारत त्तकमा विचारयोपाध्यायेनापि ते भक्षितं पूर्वामिति ॥ १०० ।। स एवमुक्तो बाडमित्युक्त्वा तदा तवृषभस्य मूत्रं पुरीयं च भक्षायित्वोत्तङ्कः संभ्र- मादुस्थित एवाप उपस्पृश्य प्रतस्थे । १०१ ॥ यत्र स क्षत्रियः पौप्यस्त- मुपेत्यासीनमपश्यदुत्तकः । स उत्तङ्कस्तमुपेत्याशीर्भिरभिनंयोवाच ॥ १०२ ॥ अर्थी भवन्तमुपागतोऽस्मीति स एनमभिवाद्योवाच भगवन् पोष्यः खल्वहं किं करवाणीति ॥ १०३ ॥ तमुवाच गुर्वर्थं कुण्डलयोरर्थेनाभ्या- गतोऽस्मीति ये वे ते क्षत्रियया पिनद्धे कुण्डले ते भवान् दातुमर्हतीति ॥ १०४ ॥ तं प्रत्युवाच पौप्यः प्रविश्यान्तः पुरं क्षत्रिया याच्यतामिति स तेनेवमुक्तः प्रविश्यान्तः पुरं क्षत्रियां नापश्यत् ॥ १०५ ॥ स पोप्यं पुनरुवाच न युक्तं भवताऽहमनृतेनोपचरितुं न हि तेऽन्तःपुरे क्षत्रिया संनिहिता नैनां पश्यामि ॥ १०६ ॥ स एवमुक्तः पौष्यः क्षणमात्रं -विमृश्योत्तर प्रत्युवाच नियतं भवानुच्छिष्टः स्मर तावन्न हि सा क्षत्रियेच्छिष्टेनाशुचिना शक्या द्रष्टुं पतिव्रतात्वात्सैपा नाशुचेर्दर्शनमुपै- तीति ॥ १०७ ॥ अथैवमुक्त उत्तङ्कः स्मृत्योवाचास्ति खल्ल मयोत्थिते- नोपस्पृष्टं गच्छता चेति तं पोप्यः प्रत्युवाचैप ते व्यतिक्रमो नोत्थितेनो- पस्पृष्टं भवतीति शीघ्रं गच्छता चेति ॥ १०८ ॥ अथोत्तङ्कस्तं तथेत्युक्त्वा फिर वह पुरुष उत्तंक से बोला कि तेरे गुरु ने पास आया हू । जो कुण्डल आप की स्त्री ने पहिने है भी पहले इमे खाया था इमलिए तू भी विचार न कर वह मुझे ला दीजिये । पाप्य बोला-आप अन्त पुर और दमे खाले । उत्तंक ने बहुत अच्छा कहकर (रनवास) के भीतर जाकर रानी से मांग लीजिये । उम बैल के गोबर और मूत्र को खा यीनता से उत्तक अन्तःपुर में गया और वहा रानी को न उठकर हाथ मुंह धोकर चल दिया ॥१००१०१॥ देखकर वापस आ पाप्य से बोला-कि है राजा ! उत्तक ने जाकर राजा पौप्य को बैठा देख आपको झूट बोलना उचित नहीं था। आपकी रानी उसे आगीर्याद से प्रमन्न कर बोला कि हे राजन ! रनवाम में मुझे कहीं नहीं देख पड़ती। क्षणभर कुछ मांगने के लिए आपके पास उपस्थित हुआ मोचकर राजा पोप्य उत्तक से बोला-भगवन् ! आप हूं। वह राजा प्रणाम कर बोला-हे ऋषि पुत्र ! मै अपवित्र है, अपवित्र पुरुष को पतिव्रता स्त्री दिखाई आपका सेवक हू कहिये मुझे क्या आजा है ? उत्तंक नहीं देती । (और उसके सन्मुख मी नहीं होती) ने उत्तर दिया-गुरु की बी को गुरु दक्षिणा में राजा पौप्य के वचन सुनकर कुछ स्मरण करके वह देने के लिए मैं कुण्टलों के लेने के लिए आप के उत्तक बोला-ठीक है, मैने उठकर चलते चलते आच- --- [ आदिपव महाभारत प्राङ्मुख उपविश्य सुप्रक्षालितपाणिपादवदनो निःशब्दाभिरफेनाभिरनु- प्णाभिहद्दताभिरद्भिस्त्रिः पीत्वा द्विःपरिमृज्य खान्यद्भिपस्पृश्या चान्तःपुरं प्रविवेश ॥ १०९ ॥ ततस्तां क्षत्रियामपश्यत्सा च दृष्दैवोत्तवं प्रत्युत्थाया- भिवाद्योवाच स्वागतं ते भगवन्नाज्ञापय किं करवाणीति ॥ ११० ॥ स तामुवाचैते कुण्डले गुर्वर्थ मे भिक्षिते दातुमर्हसीति । सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमयमनतिक्रमणीयश्चेति मत्वा ते कुण्डलेऽवमुच्यास्मै प्रायच्छदाह चैनमेते कुण्डले तक्षको नागराजः सुभृशं प्रार्थयत्यप्रमत्तो नेतुमर्हसीति ॥ १११ ॥ स एवमुक्तस्ता क्षत्रियां प्रत्युवाच भगवति सुनिवृत्ता भव न मां शक्तस्तक्षको नागराजो धर्षयितुमिति ॥ ११२ ॥ स एवमुक्त्वा तां क्षत्रियामामंत्र्य पौष्यसकाशमागच्छदाह चैनं भोः पौप्य प्रीतोऽस्मीति । तमुत्तकं पौप्यः प्रत्युवाच ॥ ११३ ॥ भगवंश्चिरेण पात्रमासाद्यते भवांश्च गुणवानतिथिस्तदिच्छे श्राद्धं कर्तुं क्रियतां क्षण- इति ॥ ११४ ॥ तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच कृतक्षण एवास्मि शीघमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपस्कृतं भवतेति । स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनैनं मन किया था उसस पाप्य फिर बोला कि यह आपकी कानों से कुण्डल उतार कर दे दिये और कहा कि भूल है, चलंत, उठते और सडे होकर आचमन करना नागों का राजा तक्षक दन कुण्डलों को लेने की अत्यन्त टीक नहीं होता । तब उत्तक ने मुंह और हाथ पैर इच्छा करता है इससे आप सावधानी से लेकर जायें । धो पूर्व की और मुग्व करके बैठ कर म्वच्छ, उप्णता ॥१११॥ रहित और हृदय तक पहुचते हुए जल मे तीन बार यह इस प्रकार वचन सुन कर बोला कि हे रानी', चुपचाप आचमन कर दो बार मुंह शुद्ध कर जल से आप किसी प्रकार की चिन्ता न कगे, नागों का राजा इन्द्रियों की शुदि करके रनवाम म गया । वहा तक्षक उन्हें मेरे हाथ से नहीं छीन सकता आकर उन्होंने गनी को देम्या और वह रानी प्रणाम रानी में यह कह उसकी आमा ले बह राजा पीप्य पर बोरी हे भगवन् ' आपका शुभ आना ही में के समीप आया और कहा-हे पोप्य ! मैं तुमपर भापदी क्या मेवा करू ॥१०२॥११०॥ प्रमन्न ह । पौप्य ने कहा-हे भगवन् ! सदा सुपात्र उत्तर ने कहा में गुर पनी को गुरु दक्षिणा में बामण नहीं मिला करते है । आप अतिथि हैं थोडी देने के गिग तुम्हार युण्डल चाहता हु, यह उसकी देर ठहरिण भोजन करके जावें । उत्तक बोला-मैं गुर भनि मे प्रमश हाया कि यह मुगा। आप नीष जाना चाहता हु आप जो अन्न इस ममय रिपथ ग्न योग्य नहीं है मा जानपर अपने नयार हो वही मैंगा । राजा पाप्य ने कहा- बहुत है ।

अध्याय ३] म हा भारत भोजयामास ॥ ११५ ॥ अथोत्तङ्कः सकेशं शीतमन्नं दृष्ट्वाशुच्येतदिति मत्वा तं पौष्यमुवाच यस्मान्मेअशुच्यन्नं ददासि तस्मादन्धो भविष्यसीति ॥ ११६ ॥ तं पौण्यः प्रत्युवाच यस्मात्त्वसप्यदुष्टमन्नं दूपयसि तस्मात्त्वमन- पत्यो भविष्यसीति । तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच ॥ ११७ ॥ न युक्तं भवताऽन्न- मशुचि दत्वा प्रतिशापं दातुं तस्मादन्नमेव प्रत्यक्षी कुरु । ततः पौण्यस्तदन्नमशुचि दृष्ट्वा तस्याशुचिभावमपरोक्षयामास ॥ ११८॥ अथ तदन्नं मुक्तकेश्या स्त्रिया यत्कृतमनुष्णं सकेशं चाशुच्येतदिति मत्वा तमृपिमुत्तकं प्रसादयामास ॥ ११९ ॥ भगवन्नेतदज्ञानादन्नं सकेशमु- पाहृतं शीतं तत्क्षामये भवन्तं न भवेयमन्ध इति । तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच ॥ १२०॥ न मृषा ब्रवीमि भूत्वा त्वमन्धो न चिरादन्धो भविष्यसीति 'ममापि शापो भवता दत्तो न भवेदिति ॥ १२१ ॥ तं पौष्यः प्रत्युवाच न चाहं शक्तः शापं प्रत्यादातुं न हि मे मन्युरद्याप्युशमं गच्छति किं चैतद्भवता न जायते तथा ॥ १२२ ॥ नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य वाचि क्षुरो निशितस्तीक्ष्णधारः। तदुभयमेतद्विपरीतं क्षत्रियस्य वाङ्नवनीतं अच्छा ऐसा कहकर, उत्तंक के आगे तैयार भोजन ठडा अन्न बिना जाने आप को परोसा है। इससे लाकर परोस दिया । इसके पश्चात् उत्तक उस मैं क्षमा चाहता है कि, मुझे अन्धा होना पड़े भोजन को ठटा और बाल सहित देख अशुद्ध जान, ११२।१२०॥ पोप्य से कुपित होकर बोला, आपने मुझ को अपवित्र उत्तक ने कहा-मेरा वचन झूठा नहीं हो और ठडा भोजन दिया है । इसलिए अन्धे हो मकता । आप अन्धे अवश्य होंगे। परन्तु गीघ्र ही जाओगे । पौप्य ने कहा कि, आपने शुद्ध अन्न को अच्छे हो जाओगे । मै भी चाहता हूँ कि, तुमने अपवित्र कहा है, इसलिए आप सन्तान रहित मुझको जो शाप दिया है, उसमें मुझे मुक्त कर होंगे । फिर उत्तक ने कहा- T-आपने एक तो दो। पोप्य राजा ने उत्तक से कहा-मैं अपने शाप अपवित्र अन्न दिया और फिर उलटा मुझको शाप को नहीं हटा सकता और मेरा क्रोध भी अभी भी दिया, ऐसा करना आप को उचित नहीं था। तक शान्त नहीं हुआ । क्या आप इस बात को तत्पश्चात् पौप्य ने उस अन्न को अपवित्र देख, नहीं जानते कि, ब्राह्मण का हृदय मक्खन के समान अपवित्र मान लिया । वह समझकर कि, खुले केश होता है, और वाणी में छुरे के समान तीक्ष्ण धार वाली ने अपवित्र और ठडा अन्न किया है उसकी होती है। क्षत्रिय का हृदय छुर की धार के समान प्रार्थना करने लगा । हे भगवन् ! यह बाल सहित तीक्ष्ण और वाणी मक्खन के ममान कोमल होती [ आदिपर्व गहाभारत २५ हृदयं तीक्ष्णधारमिति ॥ १२३ ॥ तदेवं गते न शक्तोऽहं तीक्ष्णहृदयत्वात्तं शापमन्यथा कर्तुं गम्यतामिति । तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच भवताऽहमन्नस्या- शुचिभावमालक्ष्य प्रत्यनुनीतः प्राश्च तेऽभिहितं ॥ १२४ यस्माददुष्टमन्नं दूपयसि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति । दुष्टे चान्ने नैप मम शापो भविष्यतीति ॥ १२५ ॥ साधयामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तकस्ते कुण्डले गृहीत्वा सोऽपश्यदथ पथि नग्नं क्षपणकमागच्छन्तं मुहुर्मुहुद्देश्य- मानमदृश्यमानं च ॥ १२६ ॥ अथोत्तङ्कस्ते कुण्डले सन्यस्य भ्रमादुदकार्थ प्रचक्रमे । एतस्मिन्नन्तरे सक्षपणकस्त्वरमाण उपमृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत् ॥ १२७ ॥ तमुत्तोऽभिमृत्य कृतोदककार्यः शुचिः प्रयतो नमो देवेभ्यो गुरुभ्यश्च कृत्वा महता जवेन तमन्वयात् ॥ १२८ ॥ तस्य तक्षको दृढमासन्नः स तं जग्राह गृहीतमात्रः स तद्रूपं विहाय तक्षकस्वरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाविलं प्रविवेश ॥ १२९ ॥ प्रविश्य च नागलोकं स्वभवनमगच्छत् । अथोत्तङ्कस्तस्याः क्षत्रियाया वचः स्मृत्वा तं तक्षक- मन्वगच्छत् ।। १३० ॥ स तद्विलं दण्डकाष्ठेन चखान न चाशकत् तं विश्यमानमिन्द्रोऽपश्यत्स वज्रं प्रेषयामास ॥ १३१ ॥ गच्छास्य ब्राह्मणस्य है। मेरा हृदय तीक्ष्ण होने के कारण, अपने दिये सरोवर के किनारे शौच और आचमन को गया । हुए माप को अन्यथा नहीं कर मकता इसी समय वह भिक्षुक शीघ्रता से पृथ्वी पर पड़े चनं. जावें । उत्तक ऋपि बोले आपने अन्न को हुए कुण्डलों को उठा ले गया । उत्तक शौच आदि पवित्र देगकर, मुझम क्षमा के लिए प्रार्थना की। मे निपट कर गुरु और देवताओं को नमस्कार करके और माप मान्न करा लिया । उसके पहले, अन्न अनि शीघ्रता मे उसके पीछे दौड़ा । वह भिक्षुक को पवित्र ममा कर, आपने मुझको शाप दिया नागों का राजा तक्षक था । उत्तंक ने बहुत ही था। अब अन नि मह अपवित्र निकाह, हम कारण आप का यह माप मुझको नहीं लग मकता। ममीप पहुंच कर, ताक को पकड़ लिया । पकड़ते ही वह भिक्षुक रूप को छोड़, तक्षक रूप से पृथ्वी irमा का उत्तक दानी कुण्टल लेकर बहा में चल के एक बिल में प्रवेश हो, नाग लोक में अपने घर दिया । गम्न में क्या देखना है कि, एक नहा पहुच गया । इसके पश्चात् उत्तंक ने राजा पोप्य पामाटा मिनुक उनकनीर पाल पिता हुआ आ की गनी के वचन को याद कर, उस ताक के गा? २६॥ पाठ गया ॥१२७७१३०॥ उनक टन युण्ड का पानी पर म, एक यहा उम बिल को लकड़ी में ग्बोदने में । आप , अध्याय: ] मद्दा भारत .. साहाय्यं कुरुष्वेति । अथ वजंदण्डकाष्ठमनुप्रविश्य तद्विलमदारयत्॥१३२॥ तमुत्तङ्कोऽनु विवेश तेनैव विलेन प्रविश्य च तं नागलोमपर्यन्तमनेक- विधप्रासादहर्म्यवलभीनियूहशतसंकुलमुच्चावचक्रीडाश्चर्य स्थानावकीर्णम- पश्यत् ।। १३३ ॥ स तत्र नागांस्तानस्तुवदेभिः श्लोकैः ॥ य ऐरावतराजानः सर्पाः समितिशोभनाः । क्षरन्त इव जीमूताः सविद्युत्पवनेरिताः ॥ १३४ ॥ • सुरूपा बहुरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डलाः । आदित्यवन्नाकपृष्टे रेजुरैरावतोवाः ॥ १३५ ॥ वहनि नागवेश्मानि गङ्गायास्तीर उत्तरे । तत्रस्थानपि संस्तौमि महतः पन्नगानहम् ॥ १३६ ॥ इच्छेत्कोऽर्काशुसेनायां चर्तुमरावतं विना । शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः ॥ १३७ ॥ सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदैजति । ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरपथं गताः ॥ १३८ ॥ अहमैरावतज्येष्टभ्रातृभ्योऽकरवं नमः । यस्य वासः कुरुक्षेत्र खाण्डवे चाभवत्पुरा ॥ १३९ ॥ असमर्थ हुआ। फिर इन्द्र महाराज ने उसको ऐरावत की सन्तान मूर्य के तुल्य (समान) शोभित अत्यन्त दुम्वित हुआ जानकर, अपना वज्र भेजा। होते है । मैं गगा के उत्तर तट पर निवास करने नव वज्र ने उम लकड़ी में प्रवेग करके बिल को बाले मों की भी स्तुति करता ह ॥१३१११३६॥ बोट कर चौडा कर दिया । तब उत्तक ऋषि उम मूर्य की किरणों के मामने ऐरावत के सिवाय विल में घुस करके नागलोक को पहुच गये । और कोई नहीं जाता है। जब एरावत का माई वहा मिन्न भिन्न प्रकार के मनुप्यों और देवताओं धृतराप्ट नाग निकलता है तब अट्ठाइस हजार आठ के आश्चर्य क्रीडा के म्थान और राजमहल आदि माँ की सेना उनके पीछे चलती है । जो मर्प उम को देखा । अनन्तर वह नागा की स्तुति करने के अनुचर है, जो सर्प दूर रहते है और जो ऐरावत लगा, जिनका राजा रावत है जो सग्राम में बडे नाग के बड़े भाई है, उन मब की मै स्तुति करता वीर और बादलों के समान शम्त्रों के धारण करने है । जो नगराज ताक पहिले कुरुक्षेत्र और म्वाण्टव वाले और बिजली के समान शीघ्र गति वाले, अनेक बन में था उस राजा तश्चक मे कुण्डलों के लिये रूप वाले और मुन्दर विचित्र कुण्डल पहिरे हुए प्रार्थना करता हू । इक्षुमती नदी के पास कुरुक्षेत्र [ आदिपर्य महाभारत तं नागराजमस्तोपं कुण्डलार्थाय तक्षकम् । तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ ॥ १४ ॥ कुरुक्षेत्र वसतां नदीमिक्षुमतीमनु । जघन्यजस्तक्षकश्च श्रुतसेनति यः सुतः ॥ १४१ ॥ अवसद्यो महदृद्युम्नि प्रार्थयन्नागमुख्यताम् । करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने ॥ १४२ ॥ एवं स्तुत्वा स विप्रर्पिरुत्तङ्को भुजगोत्तमान् । नैव ते कुण्डले लेभे ततश्चिन्तामुपागमत् ॥ १४३ ॥ एवं स्तुवन्नपिनागान्यदा ते कुण्डले नालभत्तदाऽपश्यस्त्रियों तन्त्रे अधिरोप्य सुवेमे पटं वयन्त्यो । तस्मिस्तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवश्चक्रं चापश्यद्- द्वादशारं पडभिः कुमारैः परिवर्त्यमानं पुरुषं चापश्यदश्वं च दर्शनीयम्॥१४४॥ स तान्सर्वांस्तुष्टाभिर्मन्त्रवदेव श्लोकैः ॥ १४५ ॥ त्रीपयर्पितान्यत्र शतानि मध्ये पष्ठिश्च नित्यं चरति धुवेऽस्मिन् । चक्रे चतुर्विंशतिपर्वयोगे पड् वै कुमाराः परिवर्तयन्ति ॥ १४६ ॥ तन्त्रं चेदं विश्वरूपे युवत्यौ वयतस्तन्तून्सततं वर्तमन्त्यौ । कृष्णान्सितांश्चैव विवर्तयन्यौ भूतान्यजत्रं भुवनानि चैव ॥ १४७ ॥ में वमन वाले, नित्य साथ रहने वाले, तक्षाक और कुमार घुमा रहे थे । एक उसके अधिष्ठाता को अश्वमेन नाम के दोनों नागों की में स्तुति करता और दर्शनीय घोड़े को देखा ॥१४॥ है । नागराज होने के लिए मृर्य में प्रार्थना करते वह महर्षि उत्तक सबकी टन मंत्रों से स्तुति हुए सुरक्षेत्र में रहने वाले तक्षक के छोटे पुत्र करने लगा। इस काल-चक्र में तीन सौ साठ दिन शुनमन की भी में स्तुति करता है । इस प्रकार रात्रि रूपी डोरे लगे है । और डोरों मे मिले प्रार्थना और स्तुति करने पर भी जब कण्टरों को चावीस पर्व हैं। और छ कुमार चला रहे हैं । इस न पाया नव उत्तक ऋषि को बड़ी चिन्ना हुई तन्त्र को विश्वरूपिणी दो स्त्रिय युनती है । और 13९४३॥ मैदव काले और श्वेत तन्तुओं को मिलाती है । और उमने दो वियों को देखा, जानि नत्र में मम्पूर्ण प्राणी और लोक इसमे युक्त गन को बहाकर अपने वन को युन रही थी ॥१४५।११७॥ और मम माग और न गत धा और वहा याहर धारण करने वाला, संसार का राक, अगं मे युन. एक मुन्दा चक को देमा जिमका छ। वृत्रासुर और नमुचि को मारने वाग इन्द्र कृष्ण- । । यन्न के अध्याय ३ ] महाभारत वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता वृत्रस्य हन्ता नमुचेनिहन्ता । कृष्णे वसानो बसने महात्मा सत्यानृते यो विविनाक्त लोके ॥ १४८ ॥ यो वाजिनं गर्भमपां पुराणं वैश्वानरं वाहनमभ्युपैति नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय लोकत्रयेशाय पुरंदराय ॥ १४९ ॥ ततः स एनं पुरुषः प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽहमनेन स्तोत्रेण किं ते प्रियं करवा- णीति । स तमुवाच ॥ १५० ॥ नागा मे वशमीयुरिति । स चैनं पुरुषः पुनरुवाचैतमश्वमपाने धमस्वेति ॥१५१ ॥ ततोऽश्वस्यापानमधमत्ततो- ऽश्वाद्धम्यमानत्सर्वस्रोतोभ्यः पावकार्चियः सधूमा निष्पेतुः ॥ १५२ ॥ ताभिनागलोक उपधूपितेऽथ संभ्रान्तस्तक्षकोऽग्नेस्तेजोभयाद्विषण्णः कुण्डले गृहीत्वा सहसा भवनान्निष्क्रम्योत्तङ्कमुवाच ॥ १५३ ॥ इमे कुण्डले गृह्णातु भवानिति स ते प्रतिजग्राहोत्तड्कः प्रतिगृह्य च कुण्डलेऽचिन्तयत् ॥ १५४ ॥ अद्य तत्पुण्यकमुपाध्यायिन्या दूरं चाहमभ्यागतः स कथं संभावयेयमिति। तत एनं चिन्तयानमेवस पुरुष उवाच ॥ १५५ ॥ उत्तकैनमेवाश्वमाधिरोह त्वां क्षणेनैवोपाध्यायकुलं प्रापयिष्यतीति ॥ १५६ ॥स तथेत्युक्त्वा तमश्व- मधिरुह्य प्रत्याजगामोपाध्यायकुलमुपाध्यायिनी च स्नाता केशानावापयन्त्यु- पविष्टोत्तको नागच्छतीति शापायास्य मनो दधे ॥१५७॥ अथैतस्मिन्नन्तरे वस्त्रों को धारण कर सत्य और झूठ का पिनार शरीर के सन छिद्रों से अग्नि निकलने लगी। उस करते है । जो जलों के गर्भ मे, उत्पन्न हुए अग्नि अग्नि से नागलोक जलने लगा । ऐसी दशा देख, के समान तेजस्वी अश्वपान को प्राप्त होता है, व्याकुल ओर भय से उदाम तक्षक नाग अपने उस जगदीश्वर तीनो लोकों के स्वामी को मैं स्थान से निकरा और वे कुण्डर उत्तक को देकर नमस्कार करता है । इस स्तुति से प्रसन्न होकर कहने लगा-इन कुण्डलों को आप रे । उन वह मनुष्य उत्तक से बोला-हे उत्तक । म इस स्तुति कुण्डरों को लेकर उत्तक विचार करने लगा । आन से तुझपर अत्यत प्रसन्न ह । तुम क्या चाहते हो' मेरी गुरु की स्त्री का पुण्यकर्म का दिन हे और उत्तक ने उत्तर दिया म यही चाहता है कि, सब मे बहुत दूर पड़ा है। जिस प्रकार हो सके गुर की नाग मेरे अधीन हो जावें । वह पुस्प फिर पोरा- स्त्री को यह कुण्डल पहुँचाऊँ । उत्तक को इस तुम टस घोडे के गुदा स्थान में जोर से फूक । प्रकार चिन्ता से व्याकुर देखकर वही पुरुष (इन्द्र) रगाओ ॥१४८।१५१॥ कहने रगा-हे उत्तक इस घोडे पर चढ जा यह उत्तक ने वैमा ही किया । तर उम घोडे के । तुझको क्षण भर में उपाध्याय के घर पहुँचा देगा। -- [ आदिपर्य ०८ महाभारन स उत्तङ्कः प्रविश्यउपाध्यायकुलमुपाध्यायिनीमभ्यवादयत्ते चास्यै कुण्डले प्रायच्छत्सा चैनं प्रत्युवाच ॥ १५८ ॥ उत्तङ्क देशे कालेऽभ्यागतः स्वागतं वत्स त्वमनागसि मया न शप्तः श्रेयस्तवोपस्थितं सिद्धिमाप्नुहीति ॥ १५९ ॥ अथोत्तङ्क उपाध्यायमभ्यवादयत् । तमुपाध्यायः प्रत्युवाच वत्सोत्तङ्क स्वागतंते किंचिरं कृतमिति ॥ १६०॥ तमुत्तक उपाध्यायं प्रत्यु- वाच भोस्तक्षकेण मे नागराजेन विघ्नः कृतोऽस्मिन्कणि तेनास्म नागलोके गतः ॥ १६१ ॥ तत्र च मया दृष्टे स्त्रियौ तन्त्रेऽधिरोप्य पटं वयन्त्यो तस्मिंश्च कृष्णां सिताश्च तन्तवः किं तत् ॥ १६२ ॥ तत्र च मया चक्रं दृष्टं द्वादशारं पड़नं कुमाराः परिवर्त्तयन्ति तदपि किम् । पुरुपश्चापि मया दृष्टः स चापि कः अश्व श्चाति प्रमाणो दृष्टः सचापिकः ॥ १६३ ॥ पथि गच्छता च मया ऋपभो दृष्टस्तं च पुरुषोऽधिरूढस्तेनास्मि सोपचारमुक्त उत्तङ्कास्यऋपभस्य पुरी भक्षयोपाध्यायेनापि ते भक्षितमिति ॥ १६४ ॥ ततस्तस्य वचनान्मया तहपभस्य पुरीपमुपयुक्तं स चापि कः तदेतद्भवतापदिष्टमिच्छेयं श्रोतुं किं तदिति स तेनैवमुक्त उपाध्यायः प्रत्युवाच ॥ १६५ ॥ ये ते स्त्रियौ धाता विधाता च ये च ते कृष्णाः सितास्तन्तवस्ते रात्र्यहनी यदपि तच्चक्रं ॥१.५२।१५६॥ कहा-हे पुत्र ! देरी करने का क्या कारण है ? यह उत्तक उमा घोड़े पर चढ़ कर उपाध्याय उत्तक ने उत्तर दिया-भगवन्, नागों के राजा तक्षक के पर पहुंच गया। इधर उपाध्यायनी म्नान करके ने मेरे कार्य में विघ्न किया इस कारण मुझे नाग- फगों को गध रही थी । उत्तक को न आते देखकर लोक में जाना पड़ा। वहां दो स्त्रिये तंत्र में काले शाप देने का विचार करने लगी। इसी बीच में और श्वेत डोरों से कपड़ा बुनती देवी वह कौन उसंक ने घर पहुंच कर उन्हें प्रणाम किया और थी । और बारह आरे वाला एक चक्र देखा उनके आगे कुण्टल रप दिये। गुरु की ग्त्री ने जिम को छ कुमार चला रहे थे वह क्या था ? पहा । पुर : तुम बहुत अन ममय पर आगये यहा एक पुरुष और एक बडा घोडा देग्या वह कौन यदि तुम्हार आन में तनिक भी देर होती तो में था ‘ मार्ग में जाते हुए एक बैर पर एक पुरुष को मुन को मार दे देनी । जा, नंग पाल्याण तोगा दग्या । उस पुरुप ने नम्रता पूर्वक मुझ से कहा-हे और न मय कायों में मिदि को प्रामगा। फिर उत्तक ! इसके गोवर को तू ग्या नर उपाध्याय स ने नर के पास जा प्रणाम किया। गुरु ने ने भी ग्याया था। इसके उपरान्त उम मनुष्य फे ।

अध्याय ३ ] महाभारत ९० द्वादशारं पड्दै कुमाराः परिवर्तयन्ति तेपिऽपऋतवः संवत्सरश्चक्रम् ॥ १६६ ॥ यः पुरुपः स पर्जन्यः योऽश्वः सोऽग्निःय ऋषभस्त्वया पथि गच्छता दृष्टः स ऐरावतो नागराट् ॥ १६७ ॥ यश्चैनमधिरूढः पुरुषः स चेन्द्रः यदपि ते भक्षितं तस्यऋषभस्य पुरीपं तदमृतं तेन खल्वसि तसिमन्नागभवने न व्यापन्नस्त्वम् ॥ १६८ ॥ स हि भगवानिन्द्रो मम सखा त्वदनुक्रोशादिममनुग्रहं कृतवान् । तस्मात्कुण्डले गृहीत्वा पुनरा- गतोऽसि ॥ १६९ ॥ तत्सौम्य गम्यतामनुजाने भवन्तं श्रेयोऽवाप्स्यसीति स उपाध्यायेनानुज्ञातो भगवानुत्तङ्कः कुद्धस्तक्षकं प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे ॥ १७ ॥ स हास्तिनपुरं प्राप्य न चिराद्विप्रसत्तमः । समागच्छत राजानमुत्तको जनमेजयम् ॥ १७१ ॥ पुरा तक्षशिलासंस्थं निवृत्तमपराजितम् । सम्यग्विजयिनं दृष्ट्वा समन्तान्मन्त्रिभिर्वतम् ॥ १७२ ॥ तस्मै जयाशिषः पूर्वं यथान्यायं प्रयुज्य सः । उवाचैनं वचः काले शब्दसंपन्नया गिरा ॥ १७३ ॥ कहने से मैने गोवर को खाया । वह पुरुष और है । इसी कारण तुम कुण्डलों को लेकर यहां बैल कौन था? मैं आप से सब रहम्य जानना आगये हो । हे पुत्र ! मै तुझको जाने की आज्ञा देता चाहता हूं। उत्तंक के इस प्रकार प्रश्न करने पर हूं जा, तेरा कल्याण होगा। गुरु की आज्ञा पाकर वह इस प्रकार कहने लगे-स्त्रियां धाता और विधाता उत्तंक ऋषि वहां से चल दिये । उत्तंक को तक्षक अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा थे । काले और नाग पर बड़ा क्रोध आया। उससे बदला लेने की श्वेत डोरे दिन और रात थे । छः ऋतुएँ ही वे छ: इच्छ से वह हस्तिनापुर की ओर चल पर कुमार थे। बारह आरे वाला वह चक्र सम्वत्सर ॥१५७११७०॥ था । और वह पुरुष पर्जन्य देव था । वह घोड़ा उत्त्रक ऋपि शीघ्र ही हस्तिनापुर में पहुंचे अमि था । मार्ग में जाते समय बैल पर चढ़ा और वहां राजा जनमेजय से मिले । उस समय हुआ जो पुरुष मिला था वह इन्द्र था । और वह तक्षशिला पर चदाई करके उसे जीतकर जनमेजय बैल ऐरावत हाथी था । उम बैल का गोबर अमृत अपने ग्राम में आये थे और अपनी सभा में मन्त्रियों था । उस अमृत के प्रभाव से ही तुम नागलोक के बीच विराजमान थे । विधिपूर्वक जय का आशी- में जीवित रहे हो । वह इन्द्र मेरा मित्र है इसीसे वाद दे उत्तंक अर्थयुक्त वाणी में राजा मे कहने तुझपर दया करके उन्होंने इम विपत्ति से छुड़ाया ' लगा-हे राजन् ! जो कार्य करने योग्य है उसे

[ गादिपर्य
महागार
उत्तङ्क उवाच-अन्यस्मिन्करणीये तु कार्ये पार्थिवसत्तम ।
वाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुपे
नृपसत्तस ॥१७॥
सौतिरुवाच-एवमुक्तस्तु विप्रेण स राजा जनमेजयः ।
अर्चयित्वा यथान्यायं प्रत्युवाच द्विजोत्तमम् ॥ १७५ ॥
जनमेजय उवाच-आसां प्रजानां परिपालनेन स्वं क्षत्रधर्म परिपालयामि ।
प्रब्रूहि मे किं करणीयमद्य येनासिकार्येण समागतस्त्वम् ।। १७६ ॥
सौतित्वाच-स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्टः ।
उवाच राजानमदीनसत्वं स्वमेव कार्यं नृपते कुरुष्व ॥ १७७॥
उत्तव उवाच-तक्षकेण महीन्द्रेन्द्र येन ते हिंसितः पिता ।
तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय दुरात्मने ॥ १७८ ॥
कार्यकालं हि मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः ।
तद्गच्छापचितिं राजन्पितुस्तस्य महात्मनः ॥ १७९ ॥
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना ।
पञ्चत्वमगमद्राजा वजाहत इव
वलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः ।
अकार्यं कृतवान्पापो योऽदशत्पितरं तव ॥ १८१ ॥
छोड़ कर आप बालकों की तरह अन्य कार्य में बदला लेना आप का सब से पहला काम है । इस
लंग हुए हैं ॥१७१।१७॥
कार्य को करके अपने पिता के ऋण से अपने
मून पुत्र उग्रश्रवा शौनक आदि ऋषियों से को छुड़ाइये । राजा परीक्षित ने उसका कुछ
यार, इस प्रकार जनमेजय उस ब्राह्मण का यथायोग्य अपराध नहीं किया था । उस दुष्ट तक्षक ने उन-
मकार पर बोला हे भगवन् ! इस प्रजा का पालन को डस लिया और वह वज्र के टूटे हुए वृक्ष के
परके में क्षत्रियों के धर्म का पालन करता है।
समान मृत्यु को प्राप्त हुआ। अपने बल के घमण्ड
आप करें मैग इम ममय क्या कर्तव्य है जिसके में फूले हुए नीच तक्षक ने अन्याय से आप के
रिये आप यहां आये हैं । इस प्रकार राजा से पिता को मार दिया है। कश्यप ऋपि अपने मत्र'
का हुआ श्रेष्ठ और पुण्य आत्मा उत्तक बड़े प्रतापी वल से आप के पिता को जिलाने के लिये जा रहे
गजा में योग-हे राजन! आप अपना ही कार्य थे, सो उन्हें भी उम पापी तधाक ने धन देकर
दीजिये ।। पृथ्वीनाथ ! नष्टक नाग ने आप के लौटा दिया । हे महाराज ! आप सर्पयज्ञ में उस
पिता का नाम दिया। उमग महान्मा पिता का पापी को जलती हुई अमि में होम करो इससे
द्रुमः ॥ १८० ॥

अध्याय ४] महाभारत 7214 राजर्पिवंशगोप्तारममरप्रतिम नृपम् । यियासुं कश्यपं चैव न्यवर्तयत पापकृत् ॥ १८२ ॥ होतुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने । सर्पसत्रे महाराज त्वरितं तद्विधीयताम् ॥ १८३ ॥ एवं पितुश्चापचितिं कृतवांस्त्वं भविष्यसि । मम प्रियं च सुमहत्कृतं राजन् भविष्यति ॥ १८४ ॥ कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना । विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ॥ १८५ ॥ मौनिम्याच-एतच्छ्वा तु नृपतिस्तक्षकाय चुकोप ह । उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा ॥ १८६ ।। अपृच्छत्स तदा राजा मन्त्रिणस्तान्सुदुःखितः । उत्तङ्कस्यैव सान्निध्ये पितुः स्वर्गगति प्रति ॥ १८७ ॥ तदेव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् । यदैव वृत्तं पितरमुत्तकादश्रुणोत्तदा ॥ १८८ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौप्यपर्वणि पोप्याख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ पौण्यपर्वममानम || शीघ्र ही उस यन का प्रारम्भ किया जाये । इस नाग पर क्रोध किया । क्रोध में आकर राजा प्रकार आप अपने पिता का बदला लेने में नमेजय उत्तंक के समीप पिता के मरने का वृत्तान्त होंगे और मुझे भी इसमें सुख होगा। हे पृथ्वीपाल! मन्त्रियों से पूछने लगा । मन्त्रियों में उसी समय उम दुरात्मा ने गुरु के लिये कार्य करते हुए वित मह हाल सुनकर राजा जनमेजय बहुत टामिन किया है। उग्रश्रवा बोल गजा ने उमके वाक्य हुआ ॥१७५/१८८॥ को सुनकर घी टाले अग्नि के ममान ताक आदिपर्य का नीमरा अध्याय पौप्यपर्व नाम ममान हुआ । चतुर्थोऽध्यायः ४ लोमहर्पणपुत्र उग्रश्रवाः सौतिः पौराणिको नमिपारण्ये शोनकस्य कुलपतेादशवार्पिके सत्रे ऋपीनभ्यागतानुपतस्थे ॥ १॥ पौराणिकः ॥ चौथा अध्याय ४॥ पुराणों के विद्वान लोमहर्पण मून के पुत्र बारह वर्ष के यज्ञ में एकत्रित हुए ऋपियों में हाथ उप्रश्रया नमिपारण्य तीर्थ में कुलपनि गौनक के जोड़ कर बोले-है ऋपियो ! अब आप लोग क्या [आदिपर्य महाभार पुराणे कृतश्रमः स कृताञ्जलिस्तानुवाच किं भवन्तः श्रोतुमिच्छन्ति किमहं ब्रवाणीति ॥ २॥ तमृपय ऊचुः । परमं लोमहर्पणे वक्ष्यामस्त्वां नः प्रतिवक्ष्यसि वचः शुश्रूपतां कथायोगं नः कथायोगे ॥ तत्र भगवा- न्कुलपतिस्तु शौनकोऽग्निशरणमध्यास्ते ॥ ४ ॥ योऽसौ दिव्याः कथा वेद देवतासुरसंश्रिताः । मनुष्योरगगन्धर्वकथा वेद सर्वशः ॥ ५ ॥ स चाप्यस्मिन्मखे सौते विद्वान्कुलपतिर्द्विजः । दक्षो धृतवतो धीमाञ्च्छास्त्रे चारण्यके गुरुः ॥ ६ ॥ सत्यवादी शमपरस्तपस्वी नियतव्रतः । सर्वेपामेव नो मान्यः स तावत्प्रतिपाल्यताम् ॥ ७ ॥ तस्मिन्नध्यासति गुरावासनं परमार्चितम् । ततो वक्ष्यसि यत्वां स प्रक्ष्यति द्विजसत्तमः ॥ ८ ॥ मोतिग्याच-एवमस्तु गुरौ तस्मिन्नुपविष्टे महात्मनि । नेन पृष्टः कथाः पुण्या वक्ष्यामि विविधाश्रयाः ॥ ९ ॥ सोऽथ विप्रर्पभः सर्वं कृत्वा कार्य यथाविधि । देवान्याग्भिः पितृनद्भिस्तर्पयित्वाऽऽजगाम ह ॥ १० ॥ यत्र ब्रह्मर्पयः सिद्धाः सुखासीना धृतव्रताः । यज्ञायतनमाश्रित्य सूतपुत्रपुरः सराः ॥ ११ ॥ गुनना चाहते है। और क्या आप से कह । चाहिये । वह जब आकर उत्तम आमन पर विराज कापियों ने कहा है मन ' तो हम पग सो कहना। मान हागे तब उन्ही के प्रश्न के अनुसार आप इम ममय हमार पननीय कुलपति गानक जी नमि कथा का वर्णन आरम्भ करें । उग्रश्रवा ने कहा-- ग्थान में बैठे है । वट देवना, असुर, मनुष्य, मई, ऐमा ही होना चाहिये । जब हम मा के महात्मा गपर्व पाटि गरकी पथाओ को अच्छी तरह गुर आसन पर आकर बैठेंगे तर उनके प्रश्न के नागने है। यह विमान नतों को धारण करने अनुमार मै पवित्र स्थाओं को कहगा । इसके बार, पुटिमान , मात्रा के जानकार, मत्यवादी, उपरान्त यह श्रेष्ठ सम्पूर्ण कार्यों को विधिपूर्वक विष्टिय, नाम्या में घने बार और पा इम कर देवताआ को वाणी द्वारा और पितरों को यम अधिष्टानाद, हम उनी इतनार कानी जल मे तृप्त कर यज्ञ म्थान में आये । वहा बढे ] महामारन ०३ ऋविश्वथ सदस्येषु स वै गृहपतित्तदा । उपविष्टेपूपविष्टः गौनकोऽथानवीदिदम् ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्नदानार आदिपर्वात पोलेनानीच्या प्रवदो नान योऽपार पोनर सनातन् । बरे द्धि ब्रामपि लेग ल में कठे हुए थे। त में क्या ॥ ना लोग राबट गये नत्र माना जाने आदिपर्व का चाया पार पालोमपर्व नान नमान हुआ। पञ्चमोऽध्याय - वानर पाप-पुराणमखिलं तात पिता तेऽधीतवान्पुरा । कञ्चित्वमपि तत्सर्वमधीपे लोमहर्षणे ॥ १ ॥ पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम् । कश्यन्ते ये पुरास्माऽभिः श्रुतपूर्वा पितुस्तव ॥ २ ॥ तत्र वंशमहं पूर्व श्रोतुमिच्छामि भार्गवम् । कथयस्व कथामेतां कल्याः स्म श्रवणे तव ॥ ३ ॥ मानिम्बाच-यवधीतं सम्यग्विजश्रेष्ठेमहात्मभिः । वेशाम्पायनविप्रान्यस्तैश्चापि कथितं यथा ॥ ४ ॥ यदधीतं च पित्रा में सम्यक्कैव ततो मया । तापच्छृणुष्व यो देवैः सेन्द्रः सर्पिमरुद्गणैः ॥ ५ ॥ पूजितः प्रवरो वंशो भार्गवो भृगुनन्दन । इमं वंशमहं पूर्व भार्गवं ते महामुने ॥ ६ ॥ !! पाचवा अध्याय ॥ गाना नपि गरे हे मृन पुत्र ' तुम्हारे ने कहा-पहले वशम्पायन मुनि ना बामणो म पेष्ट पिना मन पुराणों को जानते थे । क्या तुमने भी और वेदपाठिया मे उत्तम थे उन्होंने पुराणा को भव पुराण पढे है । पुराणा में बुद्धिमाना के दिव्य अच्छी तरह पढ़ा और मुनाया। उसके उपरान्त आनियम कहे गये है। तो क्या तुम्हारे पिता मर पिता ने भी यहा पुराणा को पग भा और मे हमने पहरे भी सुनी थी उमको अर हम कहा उन्हीं पुराणा को मैंने भी पा है । अब आप करने है । इस ममय पहले हम भृगुवा का वर्णन भृगुवा नो वडा उत्तम निम सब देवता और मन्ना चाहने है मो हमसे आप कहो । उग्रश्रया मपि मानते है उसकी क्या मनिय, में पुराणा ।

[ मादिपर्य महाभारत निगदामि यथायुक्त पुराणाश्रयसंयुतम् । भृगुमहर्पिभगवान्ब्रह्मणा वे स्वयंभुवा ॥ ७ ॥ वरुणस्य कतौ जातः पावकादिति नः श्रुतम् । भुंगो सुदयितः पुत्रश्च्यवनो नाम भार्गवः ॥ ८ ॥ च्यवनस्य च दायादः प्रमतिर्नाम धार्मिकः । प्रमतेरप्यभूत्पुत्रो घृताच्या रुरुरित्युत ॥ ९ ॥ रुरोरपि सुतो जज्ञे शुनको वेदपारगः । प्रमद्वरायां धर्मात्मा तव पूर्वपितामहः ॥ १०० तपस्वी च यशस्वी च श्रुतवान्ब्रह्मवित्तमः । धार्मिकः सत्यवादी च नियतो नियताशनः ॥ ११ ॥ गानफ उयाच-सूतपुत्र यथा तस्य भार्गवस्य महात्मनः । च्यवनत्वं परिख्यातं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ १२ ॥ भतिग्वार-भुगोः सुदायिता भार्या पुलोमेत्यभिविश्रुता । तस्यां समभवद्गों भृगुवीर्यसमुद्भवः ॥ १३॥ तस्मिन्गर्भेऽथ संभूते पुलोमायां भृगूदह । समये समशीलिन्यां धर्मपत्न्यां यशस्विनः ॥ १४ ॥ अभिपेकाय निष्क्रान्ते भृगौ धर्मभृतां वरे । आश्रमं तस्य रक्षोऽथ पुलोमाऽभ्याजगाम ह ॥ १५ ॥ के अनुमार कहता ह। ऐमा मन मुना है कि महा वाले थे और आप के दादा थे ॥१॥११॥ ऋषि मृगु जी वरुण के यन में म्ययभुव ब्रह्मा मानक ने कहा-हे सृत पुत्र ! भृगु के पुत्र जी में अमि में उत्पन्न हुए थे। उनके पुत्र च्यवन च्यवन ऋपि का जिम प्रकार नाम पड़ा उम कथा हुए। और च्यवन के प्रमति नामक पुत्र हुए। को हम मुनाओ। उग्रश्रवा ने कहा-भृगु की स्त्री भार धारद प्रमनि के गृनाची बी मे म नानक का नाम पुलोमा था। भृगु के वीर्य से उसको गर्भ पुत्र हुए। म के प्रमद्वारा म्बी में शुनक नामक हुआ । उसके धारण होने पर यह भार्या यश वाले पुत्र एप । शुनक जी नपाची, यशम्बी, वेदों के भृगु के ममान धी॥१३॥१४॥ माना, अपमानियों में भ्रष्ठ, धर्मान्मा, मन्यवादी, एक दिन भृगु जी अपनी स्त्री को आश्रम ममापि नियम में युनः और उचित आहार करने में अकेला छोड़ कर म्नान करने के लिये गये ।

- अध्याय महाभारत तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगो र्यामनिन्दिताम् । हृच्छयेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ॥ १६ ॥ अभ्यागतं तु तद्रक्षः पुलोमा चारुदर्शना । न्यमन्त्रयत वन्येन फलमूलादिना तदा ॥ १७ ।। तां तु रक्षस्तदा ब्रह्मन्हृच्छयेनाभिपीडितम् । दृष्ट्वा हृष्टमभूद्राजाञ्जिहीऍस्तामनिन्दिताम् ॥ १८ ॥ जातमित्यब्रवीत्कार्यं जिहीर्षुर्मुदितः शुभाम् । सा हि पूर्वं वृता तेन पुलोम्ना तु शुचिस्मिता ॥ १९ ॥ तां तु प्रादात्पिता पश्चादभृगवे शास्त्रवत्तदा । तस्य तत्किल्विपं नित्यं हृदि वर्तति भार्गव ॥ २० ॥ इदमन्तरमित्येवं हा चके मनस्तदा । अथाग्निशरणेऽपश्यज्ज्वलन्तं जातवेदसम् ॥ २१ ॥ तमपृच्छत्ततो रक्षः पावकं ज्वलितं तदा । शंस मे कस्य भार्येयमग्ने पृच्छे ऋतेन वे ॥ २२ ॥ मुखं त्वमसि देवानां वद पावक पृच्छते । मया हीयं वृता पूर्व भार्यार्थे वरवर्णिनी ॥ २३ ॥ अवमर को देखकर पुलोमा नाम राक्षस भृगु के ने राक्षस को न देकर अपनी कन्या भूगु को व्याह आश्रग में घुस आया । आश्रम में प्रवेश होकर दी। वह दु.ग्य इस गक्षस के हृदय में वर्तमान उमकी भायां पुलोमा को देख, वह गक्षस कामातुर था ॥११॥२०॥ होकर अचेत हो गया । मुन्दर म्वरूपवती पुलोमा यह अवमा देयकर उस गक्षम ने उसके उमे देवकर यन के फल-फूल आदि मे मत्कार हरणे की इच्छा की। फिर उमन अमिशाला में करने लगी। काम से अत्यत पीड़ित यह राक्षम अग्मि को जलने देना । तब यह गक्षम अमि में उमे देग्यकर, प्रसन्न हो, उस पतित्रता का हरण पूछन लगा कि हे अमिदेव ! तुम ठीर टीक कहो पी इच्छा करने लगा ॥१५॥१८॥ यह भार्या किम की है । हे अग्निदेव : तुम उम उत्तम म्बी की इच्छा करने वाला पुलोमा देवनाओं के मुन हो इमलिय तुम मुन्न मे मत्य नामक राक्षस प्रसन्नता में अपने कार्य की सिद्धि मत्य हो । पहले मन ही विराट मग्न केन्यि ममझने लगा । पहल पुलोमा गक्षस ने स्यम्पवती टम मुन्दरी को इमर पिना में मांगा था । पीर पुरीमा को उसके पिता मे मागा था। किन्तु पिता में अपने वाक्य को मृटा कम उमर रिना ने भृग [ आदिषय महाभारत पश्चादिमां पिता प्रादाभृगवेऽनृतकारकः । सेयं यदि वरारोहा भृगोर्भार्या रहोगता ॥ २४ ॥ तथा सत्यं समाग्व्याहि जिहीम्याश्रमादिमाम् । स मन्युस्तत्र हृदयं प्रदहन्निव तिष्ठति । मत्पूर्वभार्यां यदिमां भृगुराप सुमध्यमाम् ॥ २५ ॥ मौतिग्वाच-एवं रक्षस्तमामन्त्र्य ज्वलितं जातवेदसम् । शङ्कमानं भृगोर्भार्या पुनः पुनरपृच्छत ॥ २६ ॥ त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरस नित्यदा । साक्षिवत्पुण्यपापेषु सत्यं बृहि कवे वचः ॥ २७ ॥ मत्पूर्वाऽपहृता भार्या भृगुणाऽनृतकारिणा । सेयं यदि तथा मे त्वं सत्यमाव्यातुमर्हसि ॥ २८ ।। श्रुत्वा त्वत्तो भृगोर्भायां हरिष्याम्याश्रमादिमाम् । जातवेदः पश्यतस्ते वट सत्यां गिरं मम ॥ २९ ॥ मानिरपाच-तस्येतद्वचनं श्रुत्वा सप्ताचिर्दुःखितोऽभवत् । भीतोऽनृताच शापाच्च भृगोरित्यत्रीच्छनैः ॥ ३० ॥ अमिग्याच-त्वया वृता पुलोमेयं पूर्व दानवनन्दन । किं त्वियं विधिना पूर्व मंत्रवन्न वृता त्वया ॥ ३१ ॥ पित्रा तु भृगवे दत्ता पुलोमेयं यशस्विनी । ददाति न पिता तुभ्यं वरलोभान्महायशाः ॥ ३२ ॥ व माथ मा विवाह कर दिया है। यदि यह लिया है । यदि यह सुदरी वटी ह तो हे सर्वज' मृगु की स्त्री ही है तो मच मच वही । तुझ से तुम ठीक-ठी कहाँ ! तुम से सुनकर तुम्हारे गुनका हम घी को में हम आश्रम मेहर रे मामने मैं भृगु की भार्या का हर रे जाऊगा । नाऊगा 1 उप्रश्रवा ने कहा अग्नि म यह गशम गवस के इन वाक्या को सुनकर वह अग्निव बार-बार पूछने रगा। उसने फिर कहा है अग्नि पर ग म पर गये । यदि नही कह तो गुट व 'नम मपर्ण प्राणिया के दय म सदा पुण्य योरन का पाप होता है, और यदि 'हा कहे तो भार पार मानी हो । मन-मन हो। मग भृगु नापि का माप भोगना पड़ता है । सा नान मांगी ग्नी को ने अन्याय पर इन कर, अग्निदेव धीर से बोले-हे राक्षस तुम ने यह ।

अध्याय 1 महाभारन १०७ अथेमां वेददृष्टेन कर्मणा विधिपूर्वकम् । भार्यामृपि गुः प्राप मां पुरस्कृत्य दानव ॥ ३३ ॥ सेयमित्यवगच्छामि नानृतं वक्तुमुत्सहे । नानृतं हि सदा लोके पूज्यते दानवोत्तम ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पोलोमपर्वणि पुलोमाग्निसंवादे पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ पौलोमपर्वममालम।। पुलोमा वरी थी परन्तु विधिपूर्वक शास्त्रानुसार तुमने स्त्री को ग्रहण किया है । यह उन्हीं की बी है- इमको ग्रहण नहीं किया। अच्छे वर के लोभ यह मै अच्छी तरह जानता हू । और झूठ कहने मे पिता ने अपनी कन्या भृगु को दी तुझको न को मै असमर्थ हू । झूठ बोलने मे समा में दी। विधिपूर्वक मुझे माझी करके भृगु ने ही इम अपमान होता है ||२११३४|| आदिपर्व का पांचवां अध्याय पौप्यपर्व ममाम हुआ । : पष्टोध्यायः । मौनिम्याच अग्नेरथ वचः श्रुत्वा तद्रक्षः प्रजहार ताम् । ब्रह्मन्दराहरूपेण मनोमारुतरंहसा ॥१॥ ततः स गर्भो निवसन्कुक्षौ भृगुकुलोद्वहः । रोपान्मातुश्च्युतः कुक्षेश्च्यवनस्तेन सोऽभवत् ॥ २ ॥ त दृष्ट्वा मातुरुदराच्च्युतमादित्यवर्चसम् । तो भस्मसाद्भूतं पपात परिमुच्य ताम् ॥३॥ सा तमादाय सुश्रोणी ससार भृगुनन्दनम् । च्यवनं भार्गवं पुत्रं पुलोमा दुःखमूर्छिता ॥ ४ ॥ ॥ छठा अध्याय ६|| उप्रश्रवा ने कहा-है अपियो ! अग्निदेव के गिर का भम्म हो गया । दुम्बिन मुन्दरी पुलीमा वचन सुनकर पुलामा नाम राक्षस ने वाराह (शूकर) भृगु के पुत्र च्ययन से लेकर आश्रम की और का रूप धारण करके वहा मे उम मुन्दरी को लेकर चली । ब्रह्माजी भृग की स्त्री को रोते हुए देखकर श्रीमता से भागा । हे गौनक वह भूगु का गर्भ जो बही प्रगट हुए । उन्होंने उमे बहुत समझाया। उम घी को था माता की काम्न में गिर गया । उसके आंसूओं में मार्ग में एक बड़ी नी बहनें हमी में उस बालक का नाम च्यवन हुआ । माता लगा। उस नदी को देखकर ब्रह्माजी ने उमका के उदर में गिरे हुए सूर्य के समान तेजस्वी उम नाम वधूमरा रक्या । वह नी च्यवन के आश्रम गर्म का दबकर वह राक्षम उमै छोड़ पृथ्वी पर के साप बहती थी । उम प्रकार भृग के पुत्र [ माविषर्ष महाभारत तां ददर्श स्वयं ब्रह्मा ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । रुदती बाप्पपूर्णाक्षी भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् ॥ ५ ॥ सांत्वयामास भगवान्वधूं ब्रह्मा पितामहः । अश्रुविन्दुद्भवा तस्याः प्रावर्तत महानदी ॥ ६ ॥ आवर्तन्ती मृति तस्या भृगोः पल्यास्तपस्विनः । तस्या मार्ग मृतवतीं दृष्ट्वा तु सरितं तदा ॥ ७ ॥ नाम तस्यास्तदा नद्याश्चक्रे लोकपितामहः ।' वधूसरेति भगवांश्च्यवनस्याश्रम प्रति ॥८॥ स एवं च्यवनो जज्ञे भृगोः पुत्रः प्रतापवान् । तं ददर्श पिता तत्र च्यवनं तां च भाविनीम् । स पुलोमां ततो भायाँ पप्रच्छ कुपितो भृगुः ॥९॥ भृगुरुवाच-केनासि रक्षसे तस्मै कथिता त्वं जिहीपते । न हि स्वां वेद तद्रक्षो मद्भार्या चारुहासिनीम् ॥१०॥ तत्वमाख्याहि तं ह्यद्य शप्तुमिच्छाम्यहं रुपा । विभेति को न शापान्मे कस्य चायं व्यतिक्रमः ॥ ११ ॥ पुलोमायाय--अग्निना भगवंस्तस्मै रक्षसेऽहं निवेदिता । ततो मामनयद्रक्षः कोशन्तीं कुररीमिव ॥ १२॥ साऽहं तव सुतस्यास्य तेजसा परिमोक्षिता । भस्मीभूतं च तद्रक्षो मामुत्सृज्य पपात वै ॥ १३ ॥ अनापी च्यवन ऋपि हुए। इधर भृगु जी म्नान कर मेरा भारी अपमान किया है ? भृगु की नं करके अपने आश्रम की ओर आकर अपने पुत्र पुलोमा ने कहा-भगवन, अग्नि ने उस राक्षस से और बाकी देर कुपिन हो उममे पृछने लगे। मेरा हाल. कहा। तिसके उपरान्त मुझको कुरंग विभने टम पापी गक्षम को यह बता दिया कि तुम पक्षी के समान रुदन करती हुई को उसने हरलिया। भेग मायां हो ' पर गक्षम टम यान को नहीं परन्तु आप के पुत्र के तेज में मेरा छुटकारा हुआ मानना था ॥१०॥ और यह राम मुझको छोड़कर भम्म हो पृरची नुम मुंभ टाक टीम बनाओ, में क्रोध करक पर गिर पड़ा । उग्रश्रवा बोले-भृगु की स्त्री पुरीमा भार देना चाइना । विमन मा माप मेनडा के मुख मे यह मय हाल सुनकर भृगु ने फांध में अध्याय ७ ] महाभारत गौतिवार--इति श्रुत्वा पुलोमाया भृगुः परममन्युमान् । शशापाग्निमतिकुद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि अग्निगापे पष्ठोऽध्यायः ॥ ॥ आकर अग्नि को शाप दिया कि, तुम सर्वभक्षी होंगे ॥११॥१४॥ आदिपर्व का छठा अध्याय ममाम हुआ । सप्तमोऽध्याय ७ मोतिरुवाच-शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् । किमिदं साहसं ब्रह्मन्कृतवानसि मां प्रति ॥ १ ॥ धर्म प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् । पृष्टो यदुवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥ २ ॥ पृष्टो हि साक्षी यः साध्यं जानानोऽप्यन्यथा वदेत् । स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात्तथाऽपरान् ॥ ३ ॥ यश्च कार्यार्थतत्वज्ञो जानानोऽपि न भापते । सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ॥ ४ ॥ शक्तोऽहमपि शप्तुं त्वां मान्यास्तु ब्राह्मणा मम । जानतोऽपि च ते ब्रह्मन्कथयिष्ये निवोध तत् ॥ ५ ॥ योगेन बहुधात्मानं कृत्वा तिष्ठामि मृर्तिपु । अग्निहोत्रेषु सत्रेपु क्रियासु च मखेषु च ॥ ६ ॥ ॥ मातवां अध्याय ।। उग्रश्रवा बोले है ऋपियो ! अग्निदेव भृगु कार्य में जानकर मन्य या अमत्य जमा हो नहीं जी के भाप को मुनकर बड़े क्रोध से बोले-कि कहता है उसका भी यही पाप लगता है। मैं भी विना विचारे इस प्रकार से एकाएकी माहस करना तुमको शाप देने को ममर्थ हैं परन्तु ब्राह्मण मेरे आप को उचित नहीं था । धर्म वाले और कहने मान्य है इस कारण मैं तुमको शाप नहीं देता है। वाले दोनों को मत्य बोलना उचित है । इसमें जो आप जानते है कि में मूर्तियों में अमि-होर और मन्ययानी उसके पूछने पर मैने वही तो मेग टम उन यनों में जिनमें बहुत में कर्म करने बाग में में क्या दोष है । जो प्राणी माझी होकर असत्य यन की क्रिया का माधन होता है गर्भाधान में भाषण करना है उसकी सात कुलें नीचे की और मान और ज्यातिष्टाम आदि यनों में योग द्वाग अनेक उपर की नरक में जाती है। और जो कोई किमी प्रकार से वाम करता हूं और दूध पी आदि जो कुछ - अध्याय ७] महाभारत मौतिपाच-इति श्रुत्वा पुलोमाया भृगुः परममन्युमान् । शशापानिमतिक्रुद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि अग्निगापे पष्ठो-ध्याय ॥ ६ ॥ आकर अग्नि को शाप दिया कि, तुम सर्वभक्षी होंगे ॥११११|| आदिपर्व का छठा अध्याय ममान हुमा । मतमोऽध्याय ७ मातिम्बाच-शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमयात्रवीत् । किमिदं साहसं ब्रह्मन्कृतवानसि मां प्रति ॥ १ ॥ धर्मे प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् । पृष्टो यदब्रुवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥ २ ॥ पृष्टो हि साक्षी यः साध्यं जानानोऽप्यन्यथा वटेत् । स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात्तथाऽपरान् ॥ ३ ॥ यश्च कार्यार्थतत्त्वनो जानानोऽपि न भापते । सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ॥ ४ ॥ शक्तोऽहमपि शप्तुं त्वां मान्यास्तु ब्राह्मणा मम । जानतोऽपि च ते ब्रह्मन्कथयिष्ये निवोध तत् ॥ ५ ॥ योगेन बहुधात्मानं कृत्वा तिष्ठामि मृर्तिषु । अग्निहोत्रेषु सत्रेपु क्रियासु च मखेषु च ॥ ६ ॥ ॥ मातमा अध्याय।। । अश्रया बोले है मपियो । अग्निदेव भृगु कार्य में जानकर मत्य या अमत्य जैमा हो नहीं जा के माप को मुनकर पंड मोध में गोरे कि कहता ह उसको भी यी पाप लगता है। मैं भी विना विचारे इस प्रकार मे एकाकी माहस करना तुमको शाप देने को ममर्थ है परन्तु ब्रामण मेरे आप को उचित नहीं था। धर्म वाले आर कहने मान्य है इम कारण में तुमको माप नहीं देता है। गाने दाना को मत्य गोरना उचित ह । टममे ती साप जानते है कि मैं मूतिया में अमिहार और मत्य पानी उमा पृटने पर मन कही तो मेग इम उन यनों में जिनमें बहुत मे कम करने माग में में क्या दोष है। जो प्राणी मानी होकर असत्य यन की क्रिया का माधन होना है गर्भाधानम भाषा करता है उसकी सात कुर नीचे की आर मात और ज्योतिष्टाम आदि यनों में योग द्वाग अनेक पर की नरक में जाती है। और जो कोई किमी प्रकार से वाम करता है और दृध घी आदि जोर [ माविपर्ष महाभारत 1 तां ददर्श स्वयं ब्रह्मा ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । रुदतीं वाष्पपूर्णाक्षी भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् ॥५॥ सांत्वयामास भगवान्वधूं ब्रह्मा पितामहः । अश्रुविन्दुद्भवा तस्याः प्रावर्तत महानदी ॥६॥ आवर्तन्ती स्मृति तस्या भृगोः पत्न्यास्तपस्विनः । नस्या मार्ग मृतवतीं दृष्ट्वा तु सरितं तदा ॥ ७ ॥ नाम तस्यास्तदा नद्याश्चके लोकपितामहः । वधूसरेति भगवांश्च्यवनस्याश्रमं प्रति ॥८॥ स एवं च्यवनो जने भृगोः पुत्रः प्रतापवान् । नं ददर्श पिता तत्र च्यवनं तां च भाविनीम् । स पुलोमां ततो भार्या पप्रच्छ कुपितो भृगुः ॥९॥ भृगुग्वार-केनासि रक्षसे तस्मै कथिता त्वं जिहीपते । न हि त्वां वेद तद्रक्षो मद्भार्या चारुहासिनीम् ॥ १० ॥ नत्वमाग्न्याहि तं ह्यद्य शप्तुमिच्छाम्यहं रुपा । विभेति को न शापान्मे कस्य चायं व्यतिक्रमः ॥११॥ पुलामायाप-अग्निना भगवंस्तस्मै रक्षसेऽहं निवेदिता । ततो मामनयदक्षः क्रोशन्ती कुरीमिव ॥ १२ ॥ साऽहं नव मुतम्याम्य तेजसा परिमोक्षिता । भीभूतं च नद्रक्षो मामुत्सृज्य पपात वे ॥ १३ ॥ प्रनारी च्यवन पापि एण। पर भृगु जी म्नान कर मेरा भाग अपमान किया है भृगु की मां हो अपने आश्रम की और भाकर अपने पुत्र पुगेमा ने कहा-भगवन, अग्नि ने उम राक्षम में र मार दुपित हो उमंग पर्छन । मंग हाल कहा। निमक उपरान्त मुझको पुगे । मिन ए पागम को यह बना दिया कि तुम पनी के ममान म्टन करती हुई को उसने हालिया। गादीपा ममम पानी नहीं परन्तु आप के पुत्र के तेल में मेरा छुटपागही और या. गक्षम मुझको डोरकर भाग हा पूर्वी तुम मुशटर नामामें कर पर गिर पड़ा । उप्रया बोल - भृगु कामी पुगेमा TAITI कमर मापन के गुप में यह मय हाल मुनकर भृगु म मांध में अध्याय ७ ] महाभारत मौतिम्नाच-इति श्रुत्वा पुलोमाया भृगुः परममन्युमान् । शशापाग्निमतिकद्धः सर्वभक्षो भविष्यसि ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि अग्निगापे पष्टो-ध्याय ॥ ६॥ आकर अग्नि को शाप दिया कि, तुम सबभनी होंगे ॥११॥१४॥ आदिपर्व का छठा अध्याय ममाम हुआ । मनमोऽध्याय ७ मानियाच-शप्तस्तु भृगुणा वह्निः क्रुद्धो वाक्यमथाब्रवीत् । किमिदं साहसं ब्रह्मन्कृतवानसि मां प्रति ॥ १ ॥ धर्म प्रयतमानस्य सत्यं च वदतः समम् । पृष्टो यदनुवं सत्यं व्यभिचारोऽत्र को मम ॥ २ ॥ पृष्टो हि साक्षी यः साक्ष्यं जानानोऽप्यन्यथा वदेत् । स पूर्वानात्मनः सप्त कुले हन्यात्तथाऽपरान् ॥ ३ ॥ यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानानोऽपि न भापते । सोऽपि तेनैव पापेन लिप्यते नात्र संशयः ॥ ४ ॥ शक्तोऽहमपि शप्तुं त्वां मान्यास्तु ब्राह्मणा मम । जानतोऽपि च ते ब्रह्मन्कथयिष्ये निबोध तत् ॥ ५ ॥ योगेन वहुधात्मानं कृत्वा तिष्ठामि मृर्तिपु । अग्निहोत्रेषु सत्रेषु क्रियासु च मखेषु च ॥ ६ ॥ ॥ मातवा अध्यार ॥ अश्रया गोले है मपियो । अग्निदेव भृगु कार्य में जानकर मय या ग्मत्य जमा हो नहीं जा के माप को मुनकर बडे कोध में पोले-कि कहता ह उमको भी यही पाप लगता है । म भी चिना पिचारे इस प्रकार से एकाकी माहस करना तुमको शाप देने को भमर्थ है परन्तु ब्रामण मेरे आप को उचित नहीं था । धर्म पारे आर कहन मान्य है टम कारण मै तुमको गाप नहीं देता है। गाले दोनों को मत्य बोलना उचित ह । इमम तो पाप जानते है कि में मातयों में समि होऔर मन्या उमरे पृटन पर मैने कही तो मेग इम न यज्ञो म निनमें बहुत में कर्म करने में म क्या दोष है। जो प्राणी माशी होकर असत्य यन की क्रिया का माधन होता है गर्भाधान भाषा करता है उमकी सात कुरे नीचे की और मात और ज्योतिष्टीम आदि यनों में योग द्वाग अनेक उपर की नरम में जाती है। आर जो कोई किमी प्रकार से वास करता हूँ आर दृध घी आदि ना [ आदिपर्व महाभारत वेदोक्तन विधानेन माय यधूयते हविः । देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै ॥ ७ ॥ आपो देवगणाः सर्वे आपः, पितृगणास्तथा । दर्शश्च पौर्णमासश्च देवानां पितृभिः सह ॥ ८ ॥ देवताः पितरस्तस्मात्पितरश्चाऽपि देवताः । एकीभूताश्च दृश्यन्ते पृथक्त्वेन च पर्वसु ॥ ९ ॥ देवताः पितरश्चैव भुञ्जते मयि यधुतम् । देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम् ॥ १०॥ अमावस्यां हि पितरः पौर्णमास्यां हि देवताः । मन्मुखेनैव हयन्ते भुञ्जते च हुतं हविः ॥ ११ ॥ सर्वभक्षः कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् । मौतिग्याच-चिन्तयित्वा ततो बहिश्चक्रे संहारमात्मनः ॥ १२ ॥ द्विजानामग्निहोत्रेषु यज्ञसत्रक्रियासु निरोङ्कारवपट्काराः स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ १३ ॥ विनाऽग्निना प्रजाः सर्वास्तत आसन्सुदुःखिताः । अथर्पयः समुद्विग्ना देवान्गत्वानुवन्वचः ॥ १४ ॥ अग्निनाशाक्रियाभ्रंशाधान्ता लोकास्त्रयोऽनघाः । विधध्वमन्त्र यत्कार्यं न स्यात्कालात्ययो यथा ॥ १५ ॥ वहीत विधि में मुझ में होमा जाना है उसमे देवना सूत पुत्र बोले- हे ऋपियो ! तिसके उपरान्त नार पिनर नृप्त होने है ॥१७॥ कुछ काल सोचकर अग्निदेव लोप हो गए । अग्नि- पार्णमामी को देखना और अमावस्या को पिनर देव के लोप हो जाने में मय संसार में अग्निहोत्र गग जो पुछ मुझ में रोमाजाना है, उसे भागने है यन, मब की क्रिया में वपद्कार म्वाहा और म्वधा नापर्य यह है कि बेटी गनि म देवता और आदि यह मय बन्द हो गए। और इनके बन्द कि दोनों का मुग्व । उन बह हुए. दोनों होने मे ममार बड़ा दु ग्व पाने लगा। तब सभ निधियों में होम हुए. पदार्थ को देवता और पिनर अपि लोग चिंता में आतुर होकर देवताओं के पास मोह। मुम में गति फिर उनका मुग्म र गए और कहने लगे है. देवगण, अग्नि के न मनमा महामना ८1१॥ रहने में और मय कार्य बन्द हो, जाने से नानी अध्याय महाभारत अथर्ययश्च देवाश्च ब्रह्माणमुपगम्य अग्नेरावेदयञ्च्छापं क्रियासंहारमेव भृगुणा – महाभाग शतोऽग्निः कारणान्तरे । कथं देवमुखो भूत्वा यज्ञभागारमुक्तथा ॥ १७ ।। हुतभुक्सर्वलोकेषु सर्वभक्षत्वमेष्यति । श्रुत्वा तु तद्वचस्तेपामग्निमाहृय विश्वकृत् ॥ १८॥ उवाच बचन श्लक्ष्णं भूतभावनमव्ययम् । लोकानामिह सपां त्वं कर्ता चान्त एव च ॥१९॥ वं धारयसि लोकांस्त्रीन्क्रियाणां च प्रवर्तकः । स तथा कुरु लोकेश नच्छिोरन्यथा क्रियाः ॥ २० ॥ कस्मादेवं विमूढस्त्वमीश्वरः सन्हुताशन । त्वं पवित्रं सदा लोके सर्वभूतगतिश्च ह ॥ २१ ॥ सर्वशरीरण सर्वभक्षत्वसेप्यसि । अपान हर्चियो यास्ते सर्व भक्ष्यन्ति ताः शिखिन ॥ २२ ॥ ऋव्यादा च तनुर्या ने सा मर्व भक्षयिष्यति । यथा सूर्याशुभिः स्पृष्टं सर्व शुचि विभाव्यते ॥ २३ ॥ रोक अपने कर्तव्य धर्म का पालन नहीं कर मक्ते नम्रता में कहा है अनिदेव' तुम समार में रोगों आप मर रोग जा रघ इचिन समझ मा माघ्रता का आर नाग कग्ने गार हो। तुम तीनों रोकों मेक । यह मुनम मा देवता ऋपिया महित को धारण किए हो । मा यन आदि कर्म तुम्ही ब्रह्मा जी के पास गए आर कहा है महाराज भृगु में सिद्ध होते है । हे मम्पूर्ण रोक के स्वामी ' तुम जी ने किमी काण में अग्निर को ममली होने मा करी मिनिमम वियागे नाग न हो। तुम का माप दिया था जम कारण में अग्निदेय यह ईश्वर होकर प्रेमी मूम्बना क्या कर रहे हो ' तुन अनुमान करके किम देवताना का मुन्न आर यन मदा ही पनि हो और मम्पूर्ण प्राणिया की गति की हरि के भागने बाग होर ममी क्यास हो । तुम मम्पूर्ण मगर में सर्वमानी न होगे तो हो माना है लोप हो गए । आर उन गप ही नुमार्ग जाग अपनी वायु में रहती है यह आर जाने में मर मिया ममार में वन्द हो गई । पिय तुम्हाग इत्यादि नाम गर्गर यही मर्दभरी होगा। का ब्रमा ने नरे वचन को सुनकर मम्पूर्ण नों व्यादि नाम गरीर यह है निमम मना मगर उत्पन्न कम्न वार नाम रित अमि को वुगन नम्म किए जाने हैं। हे अभिटेव में मयं की [ आदिपव .. महाभारत वेदोक्तेन विधानेन माय यधूयते हविः । देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै ॥ ७ ॥ आपो देवगणाः सर्वे आपः, पितृगणास्तथा । दर्शश्च पौर्णमासश्च देवानां पितृभिः सह ॥ ८ ॥ देवताः पितरस्तस्मात्पितरश्चाऽपि देवताः । एकीभूताश्च दृश्यन्ते पृथक्त्वेन च पर्वसु ॥ ९ ॥ देवताः पितरश्चैव भुञ्जते मयि यधुतम् । देवतानां पितॄणां च मुखमेतदहं स्मृतम् ॥ १० ॥ अमावस्यां हि पितरः पौर्णमास्यां हि देवताः । मन्मुखेनैव ह्रयन्ते भुञ्जते च हुतं हविः ॥ ११ ॥ सर्वभक्षः कथं त्वेषां भविष्यामि मुखं त्वहम् । मौनिग्याच-चिन्तयित्वा ततो वह्निश्चक्रे संहारमात्मनः ॥ १२ ॥ द्विजानामग्निहोत्रेषु यज्ञसत्रक्रियासु निगेकारवपट्काराः स्वधास्वाहाविवर्जिताः ॥ १३ ॥ विनाऽग्निना प्रजाः सस्तित आसन्सुदुःखिताः । अथर्पयः ममुद्विग्ना देवान्गत्वात्रुवन्वचः ॥ १४ ॥ अग्निनाशाक्रियाभ्रंशाशान्ता लोकास्त्रयोऽनघाः । निधध्वमत्र यत्कार्यं न स्यात्कालात्ययो यथा ॥ १५ ॥ बधान विधि में मुहम होमा नाना। टमम देवता सन पुत्र बोरे हे ऋपियो तिमक उपरान्त भारतिर हम न ॥१७॥ छार मोचकर अग्निदेव रोप होगा । अग्नि 41 की देवना और नमाम्या का पितर देव के गप हो जान में मर मसार म अग्निहोत्र पा मा म उम भागने या गय की मिया में वपदकार म्वाहा और म्वधा पर्य याद की गरिम देरना नार आदि यह मय बन्द हो गए। और इनके बन्द inा का गुम। इन बी ए टोनी गने में समार या दुग पान रगा। तय सम fuel - FIR पहा का देवता र निर प्रापि गंग चिना में पातुर होकर देवनाओं के पाम Him नामुम कर गए और पान संग देवगण, अग्नि के न : An arm नेम नार मव कार्य यन्द हो नान में नीना अध्याय ७] महाभारत अथर्ययश्च देवाश्च ब्रह्माणमुपगम्य तु । अग्नेरावेदयञ्च्छापं क्रियासंहारमेव च ॥१६॥ भृगुणा वै महाभाग शप्तोऽग्निः महाभाग शप्तोऽग्निः कारणान्तरे । कथं देवमुखो भूत्वा यज्ञभागाग्रभुक्तथा ॥ १७ ॥ हुतभुक्सर्वलोकेपु सर्वभक्षत्वमेष्यति । श्रुत्वा तु तद्वचस्तेपामग्निमाहूय विश्वकृत् ॥ १८ ॥ उवाच वचनं श्लक्ष्णं भूतभावनमव्ययम् । लोकानामिह सर्वपां त्वं कर्ता चान्त एव च ॥ १९ ॥ त्वं धारयसि लोकांस्त्रीन्क्रियाणां च प्रवर्तकः । स तथा कुरु लोकेश नोच्छिोरन्यथा कियाः ॥ २० ॥ कस्मादेवं विमूढस्त्वमीश्वरः सन्हुताशन । त्वं पवित्रं सदा लोके सर्वभूतगतिश्च ह ॥ २१ ॥ न त्वं सर्वशरीरेण सर्वभक्षत्वसेप्यसि । अपाने ह्यर्चिपो यास्ते सर्व भभ्यन्ति ताः शिखिन ॥ २२ ॥ क्रव्यादा च तनुर्या ते सा मर्व भक्षयिष्यति । यथा सूर्यांशुभिः स्पृष्टं सर्व शुचि विभाव्यते ॥ २३ ॥ लोक अपने कर्तव्य धर्म का पालन नहीं कर सकते नम्रता से कहा- हे अनिदेव! तुम ससार में लोकों आप सब लोग जो कुछ उचिन समझें मो शीघ्रता के कर्ता और नाग करने वाले हो। तुम तीनों लोकों में है । यह मुनकर मव देवता ऋपियों महित को धारण किए हो । मत्र यज्ञ आदि कर्म तुम्ही ब्रह्मा जी के पाम गा और कहा हे महाराज भृगु में सिद्ध होने है । हे सम्पूर्ण लोक के म्यामी ' तुम जी ने किसी कारण में अग्निदेव को मर्वभक्षी होने एमा करो कि निमम किया. नाम न हो। तुम का शाप दिया था उम काग्ण में अग्निदेव यह ईश्वर होकर ऐमी मूर्यता क्या कर रहे हो। तृम अनुमान करके कि 'मैं देवताओं का मुख और यन मदा ही पवित्र हो और मम्पूर्ण प्राणियों की गनि की हरि के भोगने याय होर सर्वभक्षी क्योंकर हो । तुम मम्पर्ण गागर में सर्वभक्षी न होगे जो हो माना है लोप हो गए। और उनके लोप हो तुम्हारी ज्याला अपनी वायु में रहता है वह और जाने मे मत्र किया मंमार में बन्द हो गई । विश्व के तुम्हाग क्रन्यादि नाम गरीर यही मर्यभा होगा । फर्ता ब्रमा ने उनके वचन को सुनकर मम्पूर्ण भूनों (कच्यादि नान गरीर यह है जिसमें मृतक अगर के उत्पन्न करने वाले नाग हित अनि को युगकर भान लिए जाते है) है अमिदेय ! म मर्य की

[आदिपर्व
महाभारत
तथा त्वदर्चिर्निर्दग्धं सर्व शुचि भविष्यति ।
त्वमग्ने परमं तेजः स्वप्रभावाद्विनिर्गतम् ॥ २४ ॥
स्वतेजसैव तं शापं कुरु सत्यमृपेर्विभो ।
देवानां चात्मनो भागं गृहाण त्वं मुखे हुतम् ॥ २५ ॥
मोतिग्याच-एवमस्त्विति तं वह्निः प्रत्युवाच पितामहम् ।
जगाम शासनं कर्तुं
कर्तुं देवस्य
देवस्य परमेष्टिनः ॥ २६ ॥
देवर्षयश्च मुदितास्ततो जग्मुर्यथागतन् ।
ऋपयश्च यथापूर्व क्रियाः सर्वाः प्रचक्रिरे ॥ २७ ॥
दिवि देवा मुमुदिरे भूतसंघाश्च लौकिकाः ।
अग्निश्च परमां प्रीतिमवाप हतकल्मपः ॥२८॥
एवं स भगवाच्छापं लेभेऽग्निगुतः पुरा ।
एवमेप पुरावृत्त इतिहासोऽग्निशापजः ।
पुलोम्नश्च विनाशोऽयं च्यवनस्य च संभवः ॥ २९ ॥
इति श्रीमन्महाभाग्ने आदिपर्वणि पालोमपर्वणि अमिमाप मोचने मप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
किरणों में पर्ग हुई मय वस्तुणे पवित्र समझी जाती प्रगट हो गए । देवता और ऋपि लोग प्रसन्न होकर
है इसी प्रकार से तेरी ज्यालाओं मे जली हुई मव अपने अपने स्थान को चले गए । और ऋषि रोग
यग्नुप. पवित्र होगी। हे अगिदेव : तुम बड़े नेज पहले की तरह अपने मय कर्म करने लगेम्वर्ग के देवता
म्वरूपही। अपने प्रभाव मे मपि के वचन को और मय प्राणी प्रसन्न हुए। अग्निदेवता भी शाप
मन्य कग और देवताओं के लिए हामी हुई हपि में मुक्त होकर प्रसन्नता को प्राप्त हुए । इस प्रकार
को अपने मुग में प्राण गे ॥१५॥ अग्नि ने भृगु में पहले गाप पाया । भृगु मे अग्नि
उपध्या बीजे. अग्नि में भगरान ब्रह्मा में के माप, पुगेमा राक्षम के नाग और च्यवन का
हा मागा। हम पशात अग्नि देवना उत्पत्ति का वृत्तान्न मैने आप मयके आगे वर्णन
महाग पाग्न करने के लिए फिर मगार में क्यिा ॥२६॥२०॥
आदिपर्व का गानयां अध्याय ममान हुआ ।।
पटगायाय ८
viniraru-ग नापि व्यवना वामन्भार्गवोऽजनयत्सुतम् ।
मुफन्यायां महात्मानं प्रमनि दीप्तनेजसम ॥ १ ॥

अध्यायद J महाभारत प्रमतिस्तु रुरुं नाम घृताच्यां समजीजनत् । रुरुः प्रमद्वरायां तु तु शुनकं समजीजनत् ॥ २ ॥ शुनकस्तु महासत्वः सर्वभार्गवनन्दनः । जातस्तपसि तीब्रे च स्थितः स्थिरयशास्ततः ॥ ३ ॥ तस्य ब्रह्मन्रोः सर्व चरितं भूरितेजसः । विस्तरेण प्रवक्ष्यामि तच्छृणु त्वमशेषतः ॥ ४ ॥ ऋपिरासीन्महान्पूर्व तपोविद्यासमन्वितः । स्थूलकेश इति ख्यातः सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥ एतस्मिन्नेब कालेतु मेनकायां प्रजज्ञिवान् । गन्धर्वराजो विप्रर्षे विश्वावसुरिति स्मृतः ॥ ६ ॥ अप्सरा मेनका तस्य तं गर्भ भृगुनन्दन । उत्ससर्ज यथाकालं स्थूलकेशाश्रमं प्रति ॥ ७ ॥ उत्सृज्य चैव तं गर्भ नद्यास्तीरे जगाम सा । अप्सरा मेनका ग्रह्मन्निर्दया निरपत्रपा ॥ ८ ॥ कन्याममरगर्भाभां ज्वलन्तीमिव च श्रिया । तां ददर्श समुत्सृष्टां नदीतीरे महानृषिः ॥ ९ ॥ स्थूलकेशः स तेजस्वी विजने बन्धुवर्जिताम् । स तां दृष्ट्वा तदा कन्यां स्थूलकेशो महाद्विजः ॥ १० ॥ || आठवाँ अध्याय ८॥ उग्रश्रवा बोले---हे ऋषियो ? भृगु के पुत्र पहले ममय में तपम्बी, विद्यावान , मा प्राणियों च्ययन ने सुकन्या मे बंड तेजम्बी पुत्र प्रमति को का हित चाहने वाले स्थूलभ नामक एक महर्षि उत्पन्न क्यिा । प्रमति ने घृताची मे रुरु नामक पुत्र थे । उमी ममय मेनका अप्नग में गन्धवों के गजा उत्पन्न किया । रु ने प्रमद्वरा घी मे शुनक विश्वावसु नाम गन्धर्व ने गर्म स्थापित किया । है नामक पुत्र उत्पन्न किया। शुनक बड़ा प्रतापी, मय गौनक ! दया और नना में रहित वह मेनका भृगुवगियों को आनन्द देने वाला, तप का करने वाग प्रमव के ममय गर्म मे उत्पन्न हुई कन्या को स्थूल- और यश वाग था । बडे तेजम्बी रु के सम्पूर्ण केश ऋषि के आश्रम के पाम नदी के किनारे छोट चरित्र को में विस्तार में कहगा, आप श्रवण करें। कर आप म्नान करने गई । म्यूरवेश मषि उम [ आदिपर्व १४ महाभारत जग्राह च मुनिश्रेष्ठः कृपाविष्टः पुपोप च । ववृधे सा वरारोहा तस्याश्रमपदे शुभे ॥ ११ ॥ जातकाद्याः क्रियाश्चास्या विधिपूर्वं यथाक्रमम् । स्थूलकेशो महाभागश्चकार सुमहानृपिः ॥ १२॥ प्रमदाभ्यो वरा सा तु सत्त्वरूपगुणान्विता । ततः प्रमद्वरेत्यस्या नाम 'चक्रे महानृपिः ॥ १३ ॥ तामाश्रमपदे तस्य रुरुर्दृष्ट्वा प्रमद्वराम् । वभूव किल धर्मात्मा मदनोपहतस्तदा ॥ १४ ॥ पितरं सखिभिः सोऽथ श्रावयामास भार्गवम् । प्रमतिश्चाभ्ययाचत्तां स्थूलकेशं यशस्विनम् ॥ १५ ॥ ततः प्रादात्पिता कन्यां रुरवे तां प्रमद्वराम् । विवाहं स्थापयित्वाग्रे नक्षत्रे नक्षत्रे भगदैवते ॥ १६ ॥ ततः कतिपयाहस्य विवाहे समुपस्थिते । सखीभिः क्रीडती साधू सा कन्या वरवर्णिनी ॥ १७ ॥ नापश्यत्संप्रसुप्तं वै भुज तिर्यगायतम् । पदा चेनं समाक्रामन्मुमूर्षुः कालचोदिता ॥ १८॥ अन्यत सुदर कन्या को उम निर्जन वन में पड़ी कन्या अपने पुत्र सुरु के लिये मागी । स्थूलकेश हुई देवकर अपने आश्रम में उठा लाये और उम ने रुरु को अपनी कन्या का देना म्वीकार कर का पालन करने लगे। उसके शुभ आश्रम में वह लिया और पूर्वाफाल्गुणि नक्षत्र में उसका विवाह कन्या दिन पर दिन बढ़ने लगी ॥११॥ निश्चय किया ॥१२॥१६), म्थलका ऋषि ने उम कन्या के जातकर्म विवाह निश्चय हुए पश्चात् एक दिन वह नादि गम्बार विधिपूर्वक किय । जब वह कन्या कन्या सखियों के माथ खेल रही थी । खेलते और बड़ी हुई तब वह मय त्रियों से मुन्दर लगने खलने देवयोग मे उसका पैर बिना जाने एक मर्प । गी। इसी कारण मपि ने उसका नाम प्रमद्वारा पर जा पडा, जो राम्त म मो रहा था। उस काल मा एक दिन उस कन्या को ऋषि के आश्रम मे प्रेरणा किये हुए को मर्प ने विप भरे दातों से में, ने दम्या और कामातुर हो गया । उमका पर काट खाया । मर्प के काटने से प्रमहरा अपने मित्रों द्वारा अपने पिता प्रमति में गर हाल, का मारा अन विष में काला पड़ गया और वह माह मनाया । प्रमनि ने म्यूमा प्रापि में यह अचानक मर कर पृथ्वी पर गिर पड़ी। और उसके ।

अध्याय ८ ] महाभारत स तस्याः संप्रमत्तायाश्चोदितः कालधर्मणा । विपोपलिप्तान्दशनान्भृशमङ्गे न्यपातयत् ॥१९॥ सा दष्टा तेन सर्पण पपात सहसा भुवि । विवर्णा विगतश्रीका भ्रष्टाभरणचेतना ॥ २० ॥ निरानन्दकरी तेषां बन्धूनां मुक्तमूर्धजा । व्यसुरप्रेक्षणीया सा प्रेक्षणीयतमाऽभवत् ॥ २१ ॥ प्रसुप्तेबाभवच्चापि भुवि सर्पविपार्दिता । भयो मनोहरतरा बभूव तनुमध्यमा ॥ २२ ॥ ददर्शतां पिता चैव ये चैवाऽन्ये तपस्विनः । विचेष्टमानां पतितां भूतले पनितां भूतले पद्मवर्चसम् ॥ २३ ॥ ततः सर्वे द्विजवराः समाजग्मुः कृपान्विताः । स्वस्त्यात्रेयो महाजानुः कुशिकः शङ्खमेखलः ॥ २४ ॥ उद्दालकः कठश्चैव श्वेतश्चैव महायशाः । भरद्वाजः कोणकुत्स्य आर्टिषेणोऽथ गौतमः ॥ २५ ॥ प्रमतिः सह पुत्रेण तथाऽन्ये वनवासिनः । तां ते कन्यां व्यसु दृष्ट्वा भुजङ्गस्य विपार्दिताम् ॥ २६ ॥ फरुदुः कृपयाविष्ठा रुरुस्त्वातों बहिर्ययो । ते च सर्व द्विजश्रेष्टास्तत्रैवोपाविशंस्तदा ॥ २७ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौप्यपर्वणि प्रमहरामपंग अष्टमोध्याय ॥ ८ ॥ अह के गहने और कपड़े इधर उधर बिखर गये । ऋपि उम स्थान पर आय म्बम्ति, आंत्रय, महाजानु इम मुंदरी की पंसी मृन्यु को प्राप्त हुई देवकर उगिक, शंग्यमेश्वर, उद्दालक, कट, यशम्बी, ग्वेन, मपियों को बड़ा शौक हुआ । मृत्यु के होने पर भरद्वाज, कोणकुल्य, आप्टिंपण, गौतम, प्रमति और भी प्रमदग के मुम्ब की योभा वैमी ही बनी हुई उनके पुत्र रुम आदि मन यनयामी ऋषि करणा में थी। ऐसा जान पड़ता था कि वह निश्चित आम्हें आतुर होकर वहां पर उपस्थित हुए। साँप के विष में सन्द क्यि मो रही है । उनके पिता और अन्य मग हुई कन्या से देगरर मर ऋषि गनगे। ऋपियों ने आकर उम कमल महम गरीर वाली म पग कर बाहर कर गये और पवारण उन कन्या को जमीन पर पड़े देमा । कृपा करके मय कन्या के समीप बंट गये ॥१७॥२७॥ आदिपर्व का आठयां अध्याय ममान हुआ ।

[आदिपय महाभारत नवमोऽध्याय ९ सौतिवाच-तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेपु महात्मसु । रुरुश्चक्रोश गहनं वनं गत्वाऽतिदुःखितः ॥ १ ॥ शोकेनाभिहतः सोऽथ विलपन्करुणं बहु । अब्रवीद्वचनं शौचन्प्रियां स्मृत्वा प्रमद्वराम् ॥ २ ॥ शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी । बान्धवानां च सर्वेषां किं नु दुःखमतःपरम् ॥ ३ ॥ यदि दत्तं तपस्तप्तं गुरवो वा मया यदि । सम्यगाराधितास्तेन सञ्जीवतु मम प्रिया ॥ ४ ॥ यथा च जन्मप्रभृति यतात्माऽहं धृतव्रतः । प्रमहरा तथा ह्येपा समुत्तिष्ठतु भामिनी ॥ ५ ॥ एवं लालप्यस्तस्य भार्यार्थे दुःखितस्य देवदूतस्तदाऽभ्येत्य वाक्यमाह रुरुं वने ॥ ६ ॥ देवदृत पाच-अभिधत्से ह यद्वाचा रुरो दुःखेन तन्मृपा । यतो मर्त्यस्य धर्मात्मन्नायुरस्ति गतायुपः ॥ ७ ॥ गतायुरेपा कृपणा गन्धर्वाप्सरसोः सुता । तस्माच्छोके मनस्तात मा कृथास्वं कथंचन ॥ ८ ॥ ॥ नवमा अध्याय ९ ॥ उमश्रा बोले---जब महात्मा ऋषि लोग मन से जितेन्द्रिय ओर ब्रह्मचारी ह तो मेरी स्त्री प्रमद्वरा घट गय तब रर घने वन में जाकर दु वित होकर जीती होकर खडी होवे । टम प्रकार दुखित रुरु विगप करने लगा । शोर मे अनेक प्रकार के दीन को अपनी स्त्री के लिये विलाप करते देखकर उसके यचना में पिराप कर अपनी प्रिया प्रमद्वरा को समीप देवदूत ने आकर यह कहा-हे रुरु याद पर बोन्ग---यह मेरे और अपने मन चान्धवों दु ख मे जो तुम कहते हो वह सब झूठ है क्योंकि गाय को रटानी हुई सूक्ष्म अङ्ग यानी, प्राणहीन मरने वारे मनुष्य की आयु कदापि नहीं रह का पृषी पर पड़ी हुई है उसमे अधिक और मक्ती ॥१७॥ क्या दुग होगा । यदि मने तपस्या की है, दान यह दीन गन्धर्ष कन्या की आयु खतम हो रिया, गुरजी का भी प्रकार आराधन चुकी है । हे तात यह समझकर तुम किमी बियानी यह मग प्रिया जी रट । यदि म जन्म प्रकार की चिन्ता न करो । महात्मा देवताओं ने avaidever अध्याय २] महाभारत वाच उपायश्चात्र विहितः पूर्व देवैर्महात्मभिः । तं यदीच्छसि कर्तुं स्वं प्राप्स्यसीह प्रमदराम् ॥ ९ ॥ करवाच-क उपायः कृतो देवेन॒हि तत्वेन खेचर । करिष्येऽहं तथा श्रुत्वा त्रातुमर्हति मां भवान् ॥ १० ॥ देवदून उवाच आयुषोऽध प्रयच्छ वं कन्यायै भृगुनन्दन । एवमुत्थास्यति रुरो तव भार्या प्रमद्वरा ॥ ११ ॥ -आयुपोऽधं प्रयच्छामि कन्यायै खेचरोत्तम । शृङ्गाररूपाभरणा समुत्तिष्ठतु मे प्रिया ॥ १२ ॥ मातिम्याच -ततो गन्धर्वराजश्च देवदूतश्च सत्तमौ । धर्मराजमुपेत्येदं वचनं प्रत्यभाषताम् ॥ १३ ॥ धर्मराजायुपोर्धेन रुरोर्भार्या प्रमहरा । समुत्तिष्ठतु कल्याणी मृतैवं यदि मन्यसे ॥ १४ ॥ धर्मराज उवाच-प्रमद्वरां सरोर्भायर्या रुरोर्भार्या देवदूत यदीच्छसि । उत्तिष्ठत्वायुपोऽर्धेन रुरोरेव समन्विता ॥१५॥ मौतिश्याच एवमुक्ते ततः कन्या सोदतिष्ठत्प्रमहरा । रुरोस्तस्यायुपोऽर्धन सुप्तेव वरवर्णिनी ॥ १६ ॥ पहले ही मे इसका कुछ उपाय भी कहा है । इसे और देवदूत धर्मराज के मर्माप आकर कहने यदि तुम करना चाहते हो तो यह प्रमद्वरा तुमको लगे—हे धर्मराज ! यह रुरु की मरी हुई मी इम जीवित होकर मिल सकती है । रुरु बोला--है की आधी आयु से जीवित होवे यदि आप म्वीकार आकागगामी देवदूत ! देवताओं ने कोनमा करें । धर्मराज वोले—यदि तुम चाहते हो तो यह उपाय कहा हे तुम मेरे ममीप ठीक ठीक कहाँ इसकी प्रमहरा इमी आधी आयु में जीती में वैमा ही कमगा । तुम मेरी रक्षा करने वाले हो। होरे । उग्रश्रवा बोले-~-धर्मराज के ऐसा कहने देवदूत बोला-हे करु ! तुम अपनी आयु में में पर प्रमद्वग रु की आधी आयु पार जैसे कोई आधा भाग इसको देदो तो यह तुम्हारी प्रमहरा मोते मे उठ म्बडा हो यम ही उटकर यही हो अभी जी उठेगी ।रु योला--हे आकाग गामियों गई । बहुत बड़ी आयु का भाग उसने अपनी में श्रेष्ठ ! मैं अभी इसे अपनी आधी आयु देता है भार्या के लिये दिया । निमके उपरान्त प्रमति और यह मेरी मी जीवित होवे ।।८।१२।। म्थूलकैग ने मिलकर शुभ महूर्त में उन दोनों का उप्रश्रवा बोले-तिम के उपरान्त विश्वासमु विवाह का दिया । परम्पर हित के चाहने वाले. , [ आदिपर्व महाभारन एतद् दृष्टं भविष्ये हि रोरुत्तमतेजसः । आयुपोऽतिप्रवृद्धस्य भार्यार्थेऽर्धमलुप्यत ॥ १७ ॥ तत इप्टेऽहनि तयोः पितरौ चक्रतुर्मुदा । विवाहं तो च रेमाते परस्परहितैपिणी ॥ १८ ॥ स लब्ध्वा दुर्लभां भार्या पद्मकिंजल्कसुप्रभाम् । व्रतं चक्रे विनाशाय जिह्मगानां धृतवतः ॥ १९ ॥ स दृष्ट्वा जिह्मगान्सास्तीत्रकोपसमन्वितः । आभिहन्ति यथासत्त्वं गृह्य प्रहरणं सदा ॥ २० ॥ स कदाचिद्वनं विप्रो रुरुरभ्यागमन्महत् । शयानं तत्र चापश्यत्डुण्डुभं वयसाऽन्वितम् ॥ २१ ॥ तत उद्यम्य दण्डं स कालदण्डोपमं तदा । जिघांसुः कुपितो विप्रस्तमुवाचाऽथ डुण्डुभः ॥ २२ ।। नापराध्यामि ते किंचिदहमद्य तपोधन । संरंभाच्च किमर्थं किमर्थं मामभिहंसि रुपाऽन्वितः ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि प्रमद्वराजीवने नयमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ दोनों प्री-पुरुप मुग पूर्वक रहने लगे । रुरु ने उस महर्षि ने उसके मारने की इच्छा से कालदण्ड कमल के सदृश काति वाली उस स्त्री को प्राप्त के समान टण्टे को उठाकर मारना चाहा तभी करके सपो के नाम करने के लिये व्रत धारण वह सर्प बोला--हे ब्राह्मण ! मैंने दम समय तुम्हारा किया। और अति क्रोधातुर हो सो को मारने कुछ भी अपराध नहीं किया है। फिर तुम इतना गा । एक ममय वह महर्षि बडे वन को गये क्रोध करके मुझे मारने के लिये क्यों तत्पर हो यहा निर्विप बृढे माप को मोता देग्या । क्रोधातुर रहे हो ॥१३१२३॥ आदिपर्य का नवमां अयाय ममाप्त हुआ ।। ॥ अथ दशमोऽध्याय १०॥ गयाघ-मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद भुजगेन ह । तन्न मे समयो घोर आत्मनोरग वै कृतः ॥ १ ॥ । दमयां अध्याय १०॥ र यारा- मरी प्राणों में प्यारी स्त्री को मने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं जिस सर्प को एक मई ने काट माया था । नयमे, हे मर्प : देवगा टमी को मार डालूगा । इसी कारण से मैं .

-- मरामा रन । भुजङ्गं वै सदा हन्यां यं यं पञ्चेयमित्युत । ततोऽहं त्वां जिघांसामि जीवितेनाद्य मोक्ष्यसे ॥ २ ॥ डुण्डुभ 'उचाच-अन्ये ते भुजगा ब्रह्मन्ये दशन्तीह मानवान् । हुण्डुभानहिगन्धेन न त्वं हिंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥ एकानान्पृथगर्थानेकदुःखान्पृथक्सुखान् डुण्डुभान्धर्मविद् भूत्वा न त्वं हिंसितुमर्हसि ॥ ४ ॥ मोतिश्याच-इति श्रुत्वा वचस्तस्य भुजगस्य रुरुस्तदा । नावधीद्भयसंविग्नमृपिं मत्वाऽथ डुण्डुभम् ॥ ५ ॥ उवाच चैनं भगवान्रुरुः संशमयन्निव । कामं मां भुजग ब्रूहि कोऽसीमा विक्रियां गतः ॥ ६ ॥ डुण्डुभ उवाच-अहं पुरा रुरो नाम्ना ऋषिरासं सहस्त्रपात् । सोऽहं शापेन विप्रस्य भुजगत्वमुपागतः ॥ ७ ॥ गावाच-किमर्थं शप्तवान्क्रुद्धो द्विजस्त्वां भुजगोत्तम । कियन्तं चैव कालं ते वपुरेतद्भविष्यति ॥ ८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि करडुडुभमवांद दशमोऽध्याय ॥ १० ॥ तुझे मारना चाहता ह । आज तुम अपने प्राणों को रुरु ने यह समझा कि यह डर गया है, उस सर्प को अवश्य त्यागोगे । सर्प ने कहा—हे ब्राह्मण ' वोह जान से न मारा । इसके पश्चात उन्हाने हुण्डम से साप ओर जाति के होते है जो मनुष्यों को काटते कहा-हे सर्प ' तुम कान हो ' किस कारण तुम है, तुम सो को एक्सा जानकर डुण्टुमी को न सर्प योनि में आये हो। डुण्डुम ने कहा- हे रु मारो। एक के अनर्थ करने से सबको दुख और में पहले सहस्रपात ऋपि था । एक ब्राह्मण के शाप क के शुभ करने में सनको मुग्व नहीं होना मे मुझे यह योनि प्राप्त हुई है । स ने कहा- चाहिये । क्योंकि आप धर्म के जानकार है, इसलिए मर्प ' ब्रामण ने किम रिए कुपित होकर तुमको टुण्डमा को मारना धर्म के विप्रीत कार्य करना है। माप दिया और क्तिने कार तक तुम इस योनि उग्रश्रवा पोले-टुण्डम के इन वाक्यों को सुनकर में रहोगे ॥१८॥ आदिपर्व का नमवा अध्याय ममाप्न हुआ ।। ।

[ आरिपर्य २२० महाभारत अथ एकादशोऽध्यायः ११ डुण्डुभ उवाच-सखा वभूव मे पूर्वं खगमो नाम वै द्विजः । भृशं संशितवाक्तात तपोवलसमन्वितः ॥ १ ॥ स मया क्रीडता बाल्ये कृत्वा ताणं भुजङ्गमम् । अग्निहोत्रे प्रसक्तस्तु भीपितः प्रमुमोह वै ॥ २ ॥ लब्ध्वा स च पुनः संज्ञां मामुवाच तपोधनः । निर्दहन्निव कोपेन सत्यवाक्संशितव्रतः ॥ ३ ॥ यथावीर्यस्त्वया सर्पः कृतोऽयं मद्विभीषया । नथावीर्यों भुजङ्गस्त्वं मम शापाद्भविष्यसि ॥ ४ ॥ तस्याहं तपसो वीर्य जानन्नासं तपोधन । भृशमुद्विग्नहृदयस्तमवोचमहं तदा ॥ ५ ॥ प्रणतः संभ्रमाच्चैव प्राञ्जलिः पुरतः स्थितः । सखेति सहसेदं ते नर्मार्थं वै कृतं मया ॥ ६ ॥ क्षन्तुमर्हसि मे ब्रह्मन्शापोऽयं विनिवर्त्यताम् । सोऽथ मामब्रवीदृष्ट्वा भृशमुद्वग्निचेतसम् ॥ ७ ॥ मुहुरुष्णं विनिःश्वस्य सुसंभ्रान्तस्तपोधनः । नानृतं घे मया प्रोक्तं भवितेदं कथंचन ॥ ८ ॥ || ग्यारहवां अध्याय ११ ।। हुम योग गगम नाम ऋषि एक मेरा को मैं भली प्रकार जानता था । मैने अत्यन्त है, बामण यह नाम्या के बल से युक्त व्याकुल हो शिर नीचा करके हाथ जोड़ उसके समीप नाग बचन वाला था। पर अमिहीर करता था। खड़ा होकर कहा---हे मित्र ! तुमने पारदपन में पग्ने र मन तृणों का एक मर्प बहुत जल्दी की है, मैने तो यह सर्प केवल क्रीड़ा माया । मेरे मित्र गट फर से । मैंने करने को बनाया था, इसलिए है मुनि ! मुझ से सार म म म उनको उगया । यह डरकर क्षमा पूर्वक इस माप को दूर करें । फिर मुझे बागपार घोड़ी देर में मायधान हो कुपिन अन्यन्न व्याकुल देम्प, गर्म सम्बी श्वाम लेकर, उस रा दोरे जमा यहीन या मर्प सुमन मेरे म्यगम मुनि ने कहा --मेरा वचन कभी अन्यथा शान की पनापारी माप तुम मेरे बाप नहीं हो मकना है। जो ग तुझ मे करता है उम गयांग !? मागिदा:टन मुनि नप के पर को तुम श्रवण कगे। है अनप ! तुम मेरे इस मित्र था। माप देने में - अध्याय महाभारत 'यत्तु वक्ष्यामि ते वाक्यं शृणु तन्मे तपोधन । श्रुत्वा- च हृदि ते वाक्यमिदमस्तु सदाऽनघ ॥ ९ ॥ उत्पत्स्यति रुरुनाम प्रमतेरात्मजः शुचिः । तं दृष्ट्वा शापमोक्षस्ते भविता न चिरादिव ॥ १० ॥ स त्वं रुरुरिति ख्यातः प्रमतेरात्मजोऽपि च । स्वरूपं प्रतिपद्याहमद्य वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ११ ॥ स डौंडुभं परित्यज्य रूपं विप्रर्पभस्तदा । स्वरूपं भास्वरं भूयः प्रतिपेदे महायशाः ॥ १२ ॥ इदं चोवाच वचनं रुरुमप्रतिमौजसम् । अहिंसा परमो धर्मः परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वर ॥ १३ ॥ तस्मात्प्राणभृतः सर्वान्न हिंस्याब्राह्मणः क्वचित् । ब्राह्मणः सौम्य एवेह भवतीति परा श्रुतिः ॥ १४ ॥ वेदवेदाङ्गविन्नाम सर्वभूताभयप्रदः । अहिंसा सत्यवचनं क्षमा चेति विनिश्चितम् ॥ १५ ॥ ब्राह्मणस्य परो धर्मों वेदानां धारणाऽपि च । क्षत्रियस्य हि यो धर्मः स हि नेप्येत वे तव ॥ १६ ॥ दण्डधारणमुग्रवं प्रजानां परिपालनम् । तदिदं क्षत्रियस्यासीत्कर्म वै शृणु मे रुरो ॥ १७ ॥ जनमेजयस्य यज्ञेऽस्मिन्सणां हिंसनं पुरा । परित्राणं च भीतानां सर्पाणां ब्राह्मणादपि ॥१८॥ बचन को सदा अपने हृदय में रखना । भृगुवंग में मुनि टुण्टुम के रूप को त्यागकर अपने पहले प्रमति के पुत्र रुरु नाम को देखकर तेरा यह भाप रूप को प्राप्त हुआ और अत्यन्त बल वाले रु से गीघ्र छूट जायेगा ॥१॥१०॥ कहने लगा है रुरु! अहिंसा परम धर्म है । इम- वह रुरु नामक प्रसिद्ध पमति के पुत्र तुम ही लिये ब्राह्मण को किमी जीव की हिंसा न करनी इम सर्प योनि को त्यागकर अमली चाहिये । मदा से यही सुनने में आता है कि, बामण अवस्था को प्राप्त होकर तेरे हितकारी वचनों को मटा शुद्ध और सरल होते हैं। वेद और वेदांग कहूंगा । उग्रश्रवा बोले-हे ऋपियो ! वह श्रेष्ठ के जानने वाले, सम्पूर्ण प्राणियों को अमय देने हो । अब आदिपर्व राभारत तपोवीर्यवलोपेताद्वेदवेदाङ्गपारगात् आस्तीकाद् द्विजमुख्याद्वै सर्पसत्रे द्विजोत्तम ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि पौलोमपर्वणि डुंडुभशापमोक्षे एकादशोऽध्याय ॥ ११ ॥ वाले ब्राह्मण होते है । अहिंसा, सत्य बोलना, क्षमा क्षत्रियों के कर्म है । पूर्व समय में राजा जनमेजय और वेदों का पढ़ना यह ब्राह्मणों का परम धर्म है। के यज्ञ में सर्पो की हिंसा हुई थी । अन्त में तपस्वी, ब्राह्मण क्षत्रियों जैसा धर्म न करें । हे रुरु ! दण्ड वेद वेदांग के पारगामी, आस्तीक नाम ब्राह्मण से देना, उप्रभाव और मजा का पालन करना, यह उनकी रक्षा हुई थी ॥११॥१९॥ आदिपर्व का ग्यारहवां अध्याय समाप्त हुआ । - १ ॥ अथ द्वादशोऽध्याय ।। कल्याच-कथं हिंसितवान्सपोन्स राजा जनमेजयः । सर्पा वा हिसितास्तत्र किमर्थं द्विजसत्तम ॥ १ ॥ किमर्थं मोक्षिताश्चैव पन्नगास्तेन धीमता । आस्तीकेन द्विजश्रेष्ट श्रोतुमिच्छाम्यशेषतः ॥ २ ॥ ऋपिग्याच-श्रोस्यसि त्वं रुरो सर्वमाम्तीकचरितं महत् । ब्राह्मणानां कथयतामित्युक्त्यान्तरधीयत ॥ ३ ॥ मौनिम्बाच-रुरुश्चापि वनं सर्व पर्यवधावत्समन्ततः । तमृपिं नष्टमन्विच्छन्संश्रान्तो न्यपतद्भुवि ॥ ४ ॥ स मोहं परमं गत्वा नष्टसंज्ञ इवाभवत् । नदृपेर्वचनं तथ्यं चिन्तयानः पुनः पुनः ॥ ५॥ . लब्धमंज्ञो रुरुश्चायात्तदाचख्यो पितुस्तदा । पिता चास्य तदाग्यानं पृष्टः सर्व न्यवेदयत् ॥ ६ ॥ ति श्रीमन्महाभारन आदिपर्वणि पालमपर्वणि मर्पमत्रप्रस्तावनायां द्वादशोऽध्याय ॥२॥ ॥यारहवां अध्याय १२॥ र ने कहा - गता जनमेजय ने क्यों मर्पो सम्पूर्ण बड़े विस्तार वाल चरित्र को तुम एक प्रामण की हिमाकी यी और उनकी इस प्रकार से क्यों के मुग से मुनोगे । ऐमा कहकर वह प्रापि गप्प हुई। और बुद्धिमान आम्नीक ने उस यज्ञ में अन्तध्यान हो गया और रह उसको पन में इधर मों का बयों बनाया' या मम्पूर्ण कथा में मुनना उधर दंदने लगा और दौड़ता दौड़ता मच्छित हो पाता । प्राधि पोर - ग. आग्नीक के, यो पर गिर पड़ा । रु. मावधान होकर घर आया हान्याय १३ महाभारत 13 और सब वृत्तान्त उमने अपने पिता प्रति म कहा मुनाट ॥१॥ और प्रमति ने आम्नीक की मर क्या उम आदिपर्व का वारहवा अध्यार ममाम हुआ ।। अथ रोगोऽध्यार ॥ ॥ नानक उद्याच–किमर्थ राजशार्दूलः स राजा जनमेजयः । सर्पसत्रेण सर्पाणां गतोऽन्तं तद्वदल मे ॥ १ ॥ निखिलेन यथा तत्त्वं सोते सर्वमशेषतः । अस्तीकश्च द्विजश्रेष्टः किमर्थ जयतां वरः ॥ २ ॥ मोक्षयामास भुजगान्प्रदीप्ताद्वसुरेतसः । कस्य पुत्रः स राजासीत्सर्पसत्रं य आहरत् ॥ ३ ॥ स च द्विजातिप्रवरः कस्य पुत्रोऽभिधत्व मे । मौतिग्बाच-महदाग्यानमास्तीकं यथैतत्प्रोच्यते द्विज ॥ ४ ॥ सर्वमेतदोपेण शृणु मे वदतां वर । गाना उवाच-श्रोतुमिच्छाम्योपेण कथामेतां मनोरमाम् ॥ ५ ॥ आस्तीकस्य पुराणब्राह्मणस्य यशस्विनः । मौतिवाच--इतिहासमिमं विप्राः पुराणं परिचक्षते ॥ ६ ॥ कृष्णद्वैपायनप्रोक्तं नमिषारण्यवासिपु । पूर्व प्रचोटितः सूतः पिता मे लोमहर्षणः ॥ ७ ॥ शिष्यो व्यासम्य मेधावी ब्राह्मणेविटमुक्तवान् । तस्मादहमुपश्रुत्य प्रवक्ष्यामि यथातथम् ॥ ८ ॥ ॥ तेरहवा अध्याय १३॥ गौनर ने क्या है मून पुत्र ' राजाओं में प्रश्रवा ने कला है त्रामा । आम्नीक ग श्रेष्ट जनमेजय ने मर्पचन द्वारा नरा नाम चरित्र बहुत पग है। हे गौना या मम्पूर्ण मुष किया । यह मम्पूर्ण वृत्तान्त हम न कहो। बागों में श्रवा क्गे । याना बोले-आम्नाक कापि और नितन्द्रियों में श्रेष्ठ आम्नीक ऋषि ने जननी ममनोहर क्या को हम नुनना चाग्ने है। प्रश्रया हुई अमि में में क्यों मपों को बचाया ' निमन गोरे हे वाघो 'टम रनिगम को पुगा ने मायन किया वह राजा जनमेजय किम का पुत्र है। नियाग्ज्य वामी सपियों के पूटने पर व्याम था' और आम्नीक पि मि का पुत्र था' जी के शिष्य रोनहरा ने इस कथा का वर्णन [ आदिपर्व महाभारत इदमास्तीकमाख्यानं तुभ्यं शौनक पृच्छते । कथयिष्याम्यशेषण सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ९ ॥ आस्तीकस्य पिता ह्यासीत्प्रजापतिसमः प्रभुः । ब्रह्मचारी यताहारस्तपस्युने रतः सदा ॥ १० ॥ जरत्कारुरिति ख्यात ऊर्ध्वरेता महातपाः । यायावराणां प्रवरो धर्मज्ञः संशितव्रतः ॥ ११ ।। स कदाचिन्महाभागस्तपोवलसमन्वितः । चचार पृथिवीं सर्वां यत्रसायं गृहो मुनिः ॥ १२ ॥ तीर्थेषु च समाप्लावं कुर्वन्नटति सर्वशः । चरन्दीक्षा महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः ॥ १३ ॥ वायुभक्षो निराहारः शुप्यन्ननिमिपो मुनिः । इतस्ततः परिचरन्दीप्तपावकसप्रभः ॥ १४ ॥ अटमानः कदाचित्स्वान्स ददर्श पितामहान् । लम्बमानान्महागते पादैरूधैरवाङ्मुखान् ॥ १५ ॥ तानववीत्स दृष्ट्वैव जरत्कारुः पितामहान् । के भवन्तोऽवलम्बन्ते गर्ने ह्यस्मिन्नधोमुखाः ॥ १६ ॥ वीरणस्तम्बके लग्नाः सर्वतः परिभक्षिते । मूपकेन निगूडेन गर्तेऽस्मिन्नित्यवासिना ॥ १७ ॥ किया था। उनम निम तरह जितना यह उपान्यान होम करते हैं । ) धर्मज उत्तम व्रतधारी जरत्कारु * गुना हे मी मब पिस्तार पूर्वक तुम को मुनाता नाम आम्तीक का पिता था । वह पृथ्वी पर तीर्थ- है । यह उपाग्यान मपर्ण पापों के नाग करन यात्रा करता हुआ विचर रहा था। और एक रात्रि दाग॥॥ से अधिक कहीं नहीं ठहरता था। जहां सायंकाल प्रतापनि के गमान ग्रनारी, अन्य आहार हो जाता वहीं उसका घर था । उम तीर्थयात्रा दान याग, मयंदा उपए के करन याग, दी अपम्या में ऐसे ऐसे दीक्षित कर्म करता था हर प्रभचारी, रा नानी, यायावरों में श्रेष्ठ, कि, उनका गोटे दिल वाले मनुष्य से होना (पासादर कामायणं यह नोएकराधिक मियाये अन्यन्न पटिन है । जरती हुई अमि के समान किसी नगा में वाग नही पाने और पन्द्रह दिन नजम्ची, यायु भक्षण परके निराहार रहता था।

अध्याय ३] महाभागन १२५ ब्रूत किं पितर ऊचुः- यायावरा नाम वयमृषयः संशितव्रताः । संतानप्रक्षयादब्रह्मन्नधो गच्छाम मेदिनीम् ॥ १८ ॥ अस्माकं संततिस्त्वेको जरत्कारुरिति स्मृतः । मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एक समास्थितः ॥ १९ ॥ पुत्राञ्जनयितुं दारान्मूढश्चिकीर्षति । तेन लम्बामहे गर्ते सन्तानस्य क्षयादिह ॥ २० ॥ अनाथास्तेन नाथेन यथा दुष्कृतिनस्तथा । कस्त्वं वन्धुरिवास्माकमनुशोचास सत्तम ॥ २१ ॥ ज्ञातुमिच्छामहे ब्रह्मन्को भवानिह नः स्थितः । किमर्थं चैव नः शोच्याननुशोचसि सत्तम ॥ २२ ॥ जरत्कारुरुवाच-मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः । करवाण्यद्य जरत्कारुरहं स्वयम् ॥ २३ ॥ पितर ऊचुः-यतस्व यत्नवांस्तात संतानाय कुलस्य नः । आत्मनोऽर्थेस्मदर्थे च धर्म इत्येव वा विभो ॥ २४ ॥ न हि धर्मफलस्तात न तपोभिः सुसचितैः । तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां ब्रजन्ति वै ॥ २५ ॥ दिन और रात्रि जागृत रहता था। और अपने शरीर है ॥१०॥२०॥ को मुखाता था । उसन चारों ओर घूमते हुए उस पुत्र के होने पर भी हम अनाथ की तरह कभी एक बड़े गढ़े में उलटे लटके हुए अपने दुर्गति भोग रहे हैं । हे श्रेष्ठ पुरुष ! तुम कौन हो ? पितरों को देखा और उनको देखते ही उनमे कहने जो बन्धु की तरह हमारी यह दुर्दशा देखकर गोक लगा कि, आप कौन हो ? जो चूहे मे काटे हुए प्रगट कर रहे हो ? हम जानना चाहते हैं कि तुम तिनके के महारे लटके हुए हो । पितरों ने कहा-हे कौन हो और किस लिये हमारे माथ सहानुभूति ब्रामण ! हम उत्तम व्रत के धारण करने वाले प्रगट कर रहे हो ! जरत्कार ने कहा--आप मेर यायावर नामक ऋषि है । मन्तान के भय होन ही पूर्व पुरुष हो और मैं वह जरत्कार ही है। के कारण नीच पृथ्वी में जाते हैं । हम भागहीनों आप लोग मुझे आशा दे अब मैं क्या कर । का जरत्कारु नामक एक पुत्र है जो सदा तप करना जरत्कारु के पितरों ने कहा- हे पुत्र ! वंग चलान है । वह मूर्ख विवाह करने की इच्छा नहीं करता के लिये तुम मन्तान का उद्योग करी । टम्स हमाग तिम कारण मन्नान क्षय होने से हमार्ग यह गति और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा । माय ही [ आदिपर्व १२६ महाभारत तद्दारग्रहणे यत्नं संतत्यां च मनः कुरु । पुत्रकास्मन्नियोगात्त्वमेतन्नः परमं हितम् ॥ २६ ॥ जरत्कारुरवाच-न दारान्वै करिष्येऽहं न धनं जीवितार्थतः । भवतां तु हितार्थाय करिष्ये दारसंग्रहम् ॥ २७॥ समयेन च कर्ताऽहमनेन विधिपूर्वकम् । यथा यापलप्स्यामि करिष्ये नान्यथा ह्यहम् ॥ २८ ॥ सनाम्नी या भवित्री मे दित्सिता चैव वन्धुभिः । भैश्यवत्तामहं कन्यामुपयंस्ये विधानतः ॥ २९ ॥ दरिद्राय हि मे भार्या को दास्यति विशेषतः । प्रतिग्रहीये भिक्षां तु यदि कश्चित्प्रदास्यति ॥ ३० ॥ एवं दारक्रियाहेतोः प्रयतिष्ये पितामहाः । अनेन विधिना अश्वन्न करिष्येऽहमन्यथा ॥ ३१ ॥ नत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय शाश्वतं स्थानमासाद्य मोदन्तां पितरो मम ॥३२॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारुतपितृमंयादे त्रयोदशोऽध्याय ॥ १३ ॥ धर्म भी बना रहेगा । किये हुए बड़े बड़े धर्मों के और उसके पिता-भाई आदि अपनी इच्छा के फल मे या कटिन नपम्या करने मे मनुष्यों को अनुसार भिक्षा के समान वह कन्या मुझको दें तो वह गनि नहीं मिलनी जो मन्नान वाले मनुष्यों को उस कन्या में मैं अवश्य विवाह करूंगा । किन्तु माम होता है। पुत्र : हमारी आना में तुम मुझ निर्धन को अपनी कन्या देगा ही कॉन, यदि विवाह करके अपनी मन्तान उत्पन्न करने की चेष्टा भिक्षा के ममय किमी ने देदी तो मै अवश्य ही मंगे। मीमें हम मुम मिलेगा । जरत्कारु उसे ग्रहण करलगा । है पितरो ! यह मै आप से योग में कभी भी और धन के इकट्ठा करने की प्रतिज्ञा करता हु कि यदि इस प्रकार ऐमी कन्या हना नहीं करता है, पिनगे ' तुमसर दिन के मुझे प्राप्त हुई तो में अवश्य उमके माथ विवाह वाग्ने भय म विवाह मगा पान्तु हम नियम में करलगा । उम मी मे जो बालक उत्पन्न होगा यह कि. यदि को मुंश उत्तम पन्या मिनी । वह कन्या आप को हम अधोगति में उयारकर आनन्द देने मो नाम पारी और मोजमी ही नपम्पिनी हो बारे म्वगंगफ में पहुंचायेगा ॥२४॥३२॥ आरिपाया गयां अध्याग गमान दुआ 11 । ।

अध्याय १४] महाभारत यअ चतुर्दगो-ध्यायः ।। १४ ॥ मोतिरुवाच ततो निवेशाय तदा स विप्रः संशितव्रतः । महीं चचार दारार्थी न च दारानविन्दत ॥ १ ॥ स कदाचिद्वनं गत्वा विप्रः पितृवचः स्मरन् । चुक्रोश कन्याभिक्षार्थी तिस्रो वाचः शनैरिव ॥ २ ॥ तं वासुकिः प्रत्यगृह्णादुद्यम्य भगिनीं तदा । न स तां प्रतिजग्राह न सनाम्नीति चिन्तयन् ॥ ३॥ सनाम्नी चोद्यतां भायां गृह्णीयामिति तस्य हि । मनो निविष्टमभवज्जरत्कारोमहात्मनः ॥ ४ ॥ तमुवाच महाप्राज्ञो जरत्कारुर्महातपाः । किंनाम्नी भगिनीयं ते ब्रूहि सत्यं भुजङ्गम ॥ ५ ॥ चामुकिरवाच-जरत्कारो जरत्कारुः स्वसेयमनुजा मम । प्रतिगृह्णीष्व भार्यार्थे मया दत्तां सुमध्यमाम् । त्वदर्थं रक्षिता पूर्व प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम ॥ ६ ॥ एवमुक्त्वा ततः प्रादाद्भार्यार्थे वरवर्णिनीम् । स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिस्वमवरणे चतुर्दशोऽध्याय ॥ ॥ ॥ चौदहवां अध्याय १४ ॥ उग्रश्रवा बोले-श्रेष्ठ व्रत के धारण करने वाला नाम वाली भार्या ग्रहण करनी योग्य है उसका यह ब्राह्मण जरत्कार स्त्री के लिए पृथ्वी में इधर नाम न जाने क्या है । वह बड़ा बुद्धिमान् , तपम्या उधर घूमने लगा परन्तु किसी ने भी उमको अपनी के करने वाला ब्राह्मण उम वासुकि से बोला-हे कन्या न दी । एक दिन जरत्कारु अपने पितरों का मर्प : इम तरी बहिन का क्या नाम है । मत्य वाक्य याद करके वन में गये और तीन बेर धीर सत्य कही । बामुकि बोला-है जरत्कारु ! म मेरी धीरे विवाह के लिये कन्या की भिक्षा मार्गा। तव छोटी बहिन का नाम जरत्कारु है । और पहले में वासुकि नाग अपनी यहिन को उठा गया और टमकी रक्षा आप ही के लिये की गई थी। आप उममे कहने लगा कि, मैं यह कन्या आप को देता दस ग्रहण करें। ऐसा कहकर अपनी भगिनी है। आप कृपा करके इसे ग्रहण कीजिये । यह मुन जरत्कारु को देदी, उम ब्रामण ने भी शास्त्र की कर जरत्कारु ने विचार किया कि मुझे अपने ही गति में उमको ग्रहण किया ||१|| आदिपर्व का चौदहवां अध्याय ममात्र हुआ ॥

[ आदिपर्व महाभारत २८ अथ पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ मौतिरुवाच-मात्रा हि भुजगाः शप्ताः पूर्वं ब्रह्मविदां वर । जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः ॥ १ ॥ तस्य शापस्य शान्त्यर्थं प्रददौ पन्नगोत्तमः । वसारमृषये तस्मै सुबताय महात्मने ॥ २॥ सच तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा । आस्तीको नाम पुत्रश्च तस्यां जज्ञे महामनाः ॥ ३ ॥ तपस्वी च महात्मा च वेदवेदांगपारगः । समः सर्वस्य लोकस्य पितृमातृभयापहः ॥ ४ ॥ अथ दीर्घस्य कालस्य पाण्डवेयो नराधिपः । आजहार महायज्ञं सर्पसत्रमिति श्रुतिः ॥ ५ ॥ तस्मिन्प्रवृत्ते सत्रे तु सर्पाणामन्तकाय वै । मोचयामास तान्नागानास्तीकः सुमहातपाः ॥ ६ ॥ भ्रातृ॑श्च मातुलांश्चैव तथैवान्यान्स पन्नगान् पितॄश्च तारयामास संतत्या तपसा तथा ॥ ७ ॥ व्रतेश्व विविधैर्ब्रह्मन्स्वाध्यायैश्वानृणोऽभवत् । देवांश्च तर्पयामास यज्ञेविविधदाक्षिणैः ॥ ८ ॥ ॥ पन्द्रहवां अध्याय १५॥ गत जी गोरे है बामणो : पूर्व समय में मपों व्यतीत होने पर पाण्डवों की सन्तान राजा जनमेजय ही माना ने मों को गार दिया था कि तुम ने सों का विनाश करने के लिये बडा मर्पयश जनमजय क या में अमि में भम्म हांग । उम किया मा मुनने में आता है ॥१॥५॥ भाप कामानि के लिय यामुकि ने उम महात्मा उम यज्ञ में जब सर्प जल-जलकर मृत्यु पाने ष्ठ मुनि दी अपनी भगिनी दी । जरत्याग ने लंग तब आम्तीक ने उस यज्ञ मे उनको पचाया। माग्वानुमार टम कन्या को प्राण किया और अपनी नम्रता और तपम्या के प्रभाव में उसने कन्या में प्राग्नीक उत्यात एआ। यह नपम्दी, मामा और उसके पुत्र तथा अन्य सयों और अपने महामा, बह-ववार कसाना, मम्पूर्ण प्राणियों में पिन की भी रक्षा की । जरत्कारु पापि ने पुत्र समान और अपने माता पिता के दुम को दा उत्पन्न करके नया तपस्या करके पितरों के प्ररण पाने रामा । म उपगन्न यहुन काल में, भनेक यन-मन धारण परक, येद पाट करके, उम अन्याय १] महाभारन ऋीश्च ब्रह्मचर्येण संतत्या च पितामहान् । अपहृत्य गुरुं भारं पितृणां संशितव्रतः ॥ ९ ॥ जरत्कारुर्गतः स्वर्ग सहितः स्वैः पितामहः । आस्तीकं च सुतं प्राप्य धर्म चानुत्तमं मुनिः ॥ १० ॥ जरत्कारुः सुमहता कालेन स्वर्गमेयिवान् । एतदाख्यानमास्तीकं यथावत्कथितं मया । प्रवृहि भृगुशार्दूल किमन्यत्कथयामि ते ॥ ११ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पाणामातृशापप्रस्ताव पञ्चदशोऽध्याय ॥ १ ॥ देवताओं के रण मे और ब्रह्मचर्य धारण करके आम्तीक ऋषि का आस्त्यान आप मे कहा । है मपियों के ऋण से अपना उद्धार किया। इन भूगुवशियों में श्रेष्ठ शोनक' कहो में आर क्या सन ऋणों से निवृत्ति पाकर अपने पितरों के साथ कथा आप मे कह ॥६॥११॥ म्वर्गलोक को गये । यह पडा सिम्तार वारा आदिपर्वमा पन्द्रहमा अध्याय समाप्त हुआ । अथ पोडमोऽध्याय ॥ ११ ॥ गौना ग्याच-सोते त्वं कथयस्वेमां विस्तरेण कथां पुनः । आस्तीकस्य कवेः साधोः शुश्रूषा परमा हि नः ॥ १ ॥ मधुरं कथ्यते सौम्य श्लक्ष्णाक्षरपदं त्वया । प्रीयामहे भृशं तात पितेवेदं प्रभापसे ॥ २ ॥ अस्मच्छुश्रूपणे नित्यं पिता हि निरतस्तव । आचष्टेतद्यथाग्यानं पिता ते त्वं तथा बद ॥ ३ ॥ मोतियाय--आयुप्मन्निदभाग्यानमास्तीकं कथयामि ते । यथाश्रुतं कथयतः सकागाहे पितुर्मया ॥ ४ ॥ ॥ मोलहया अध्याय १६॥ गाना बोले-हे मूत पुत्र ' महात्मा आस्तीक चित्त बहुत ही प्रसन्न होता है। तुम अपने पिना की कथा फिर चिन्तार से कहो क्योकि हमें सुनने रोमहर्पण ही तरह भाषण करते हो । तुम्हारे पिना की बड़ी इच्छा है । तुम्हारी वाणी बहुत ही मीटी मदा मन रगार हमें क्या सुनाया करने थे। है। तुम्हार मुख से मनोहर कथाएं मुनकर हमारा तुमने अपने पिता के मुम्ब से निम प्रकार यह कथा [ आदिपर्व महाभारत १३० पुरा देवयुगे ब्रह्मन्प्रजापतिसुते शुभे । आस्तां भगिन्यौ रूपेण समुपेतेऽद्भुतेऽनघ ॥ ५ ॥ ते भायें कश्यपस्यास्तां कश्च विनता च ह । प्रदात्ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ॥ ६ ॥ कश्यपो धर्मपत्नीभ्यां मुदा परमया युतः । वरातिसगं श्रुत्वैवं कश्यपादुत्तमं च ते ॥ ७ ॥ हर्षादप्रतिमां प्रीतिं प्रापतुः स्म वरस्त्रियौ । वत्रे कटूः सुतान्नागान्सहस्रं तुल्यवर्चसः ॥ ८ ॥ द्वौ पुत्री विनता बत्रे कट्टपुत्राधिको बले । तेजसा वपुषा चैव विक्रमेणाधिकौ च तौ ॥ ९ ॥ तस्यै भर्ता बरं प्रादादत्यर्थं पुत्रमीप्सितम् । एवमस्त्विति तं चाह कश्यपं विनता तदा ॥ १० ॥ यथावत्प्रार्थितं लब्ध्वा वरं तुष्टाऽभवत्तदा । कृतकृत्या तु विनता लब्ध्वा वीर्याधिको सुतौ ॥ ११ ॥ कश्च लब्ध्वा पुत्राणां सहस्रं तुल्यवर्चसाम् । धार्यो प्रयत्नतो गर्भावित्युक्त्वा स महातपाः ॥ १२ ॥ मुना है, उमी प्रकार हमम वर्णन करो । उग्रश्रया हजार नाग पुत्र मांगे ॥१८॥ चोर-आयु की वृद्धि करने वाले इस आग्ल्यान को विनता ने दो पुत्र मांग, परन्तु वह कटु जिम प्रशार मे मैंने अपने पिता के मुना हज़ार पुत्रों से गरीर, बल और पराक्रम आदि में 7 उमा गनि म म पाता ह । वामणी : पहले अधिक हो । कश्यप ने उनकी इच्छानुमार पुत्री मनयुग में प्रजापति की पुत्री रुपयनी और यही का वर दिया, ऐसा ही होगा विनता से कश्यप ने अदभुन दो महिने दुई। उनमें एक का नाम कट्ठ कहा । अपनी अपनी इच्छा के अनुसार घर पाकर और दगी का नाम विनता था । प्रजापति ने उन दोनों बहनें अति प्रसन्न हुई। इसके उपरान्त दोनों दोनों का विवाह पश्यप में कर दिया था । और को गर्भ रहा और कश्यप जी यह कहकर कि, गर्भ प्रजाति ममान हश्यप न ममन होकर अपनी का अच्छी तरह मे यत्न करता यन नपाया करने मियों की धा मागने की आता टीम याक्य को चले गये । हमके यहुन दिन पीछे कट्ट ने का मन दोनों मिण यह ६६ का प्रामा । उन इनार और विनता ने दो अंटेदिय । दामियों ने दाग में बने समय के समान नेजम्या एक उन अंटों का गरम यरतनों में पान मी वर्ष मक के मुम्ब मे -- अध्याय १६] महाभारन ते भार्ये वरसंतुष्टे कश्यपो वनमाविशत् । मौतिरूवाच--कालेन महता कद्बरण्डानां दशतीर्दश ॥ १३ ॥ जनयामास विप्रेन्द्र द्वे चाण्डे विनता तदा । तयोरण्डानि निदधुः प्रहृष्टाः परिचारिकाः ॥ १४ ॥ सोपखेदेषु भाण्डेषु पञ्चवर्षशतानि च । ततः पञ्चशते काले कद्रूपुत्रा विनिःसृताः ॥ १५ ॥ अण्डाभ्यां विनतायास्तु मिथुनं न व्यदृश्यत । ततः पुत्रार्थिनी देवी वीडिता च तपस्विनी ॥ १६ ॥ अण्डं विभेद विनता तत्र पुत्रमपश्यत । अध्यर्धकायसंपन्नमितरेणाप्रकाशता ॥ १७ ॥ स पुत्रः क्रोधसंरब्धः शशापेनामिति श्रुतिः । योऽहमेवं कृतो मातस्त्वया लोभपरीतया ॥ १८ ॥ शरीरेणासमग्रेण तस्माद्दासी भविष्यसि । पञ्चवर्षशतान्यस्या यया विस्पर्धसे सह ॥ १९ ॥ एप च त्वां सुतो मातर्दासीस्वान्मोचयिष्यति । ययेनमपि मातस्त्वं मामिवाण्डविभेदनात् ॥ २० ॥ न करिष्यस्यनङ्गं वा व्यङ्गं वापि तपस्विनम् । प्रतिपालयितव्यस्ते जन्मकालोऽस्य धीरया ॥ २१ ॥ विशिष्टं वलमीप्सन्त्या पञ्चवर्षशतात्परः । एवं शप्त्वा ततः पुत्रो विनतामन्तरिक्षगः ॥ २२ ॥ रक्खा रहने दिया । फिर कद्रु के पुत्र अंडों में से निकाला है इससे तुम अपनी सौति की पांच मी निकले और विनता के पुत्र न निकले । तब विनता वर्ष तक दासी होकर रहोगी । यदि तुम मेरी ही ने पुत्र के देखने की इच्छा से एक अंडे को छेद तरह दूसरे बालक के अंडे को तोडकर अङ्गहीन कर देखा । उसमें जो पुत्र था उसका उस समय न कर टालेगी तो पाच सौ वर्ष पछि इममें से एक तक आधा शरीर बना था ॥२॥१७॥ बड़ा बलवान पुत्र उत्पन्न होगा और वह तुमको वह पुत्र अपनी माता से क्रोध कर बोला कि, दासीपने से छुडायेगा । ऐसा कहकर वह बालक तुमने मुझको आधे शरीर की अवस्था में बाहर आकाश को उड गया और मर्य का मारथी हुआ।

[ आदिपर्व म 'भारन अरुणो दृश्यते दृश्यते ब्रह्मन्प्रभातसमये यदा ।' आदित्यरथमध्यास्ते सारथ्यं समकल्पयत् ॥ २३ ॥ गरुडोऽपि यथाकालं जज्ञे पन्नगभोजनः ।। स जातमात्रो विनतां परित्यज्य खमाविशत् ॥ २४ ॥ आदास्यन्नात्मनो भोज्यमन्नं विहितमस्य यत् । विधात्रा भृगुशार्दूल क्षुधितः पन्नगेश्वरः ॥ २५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सादीनामुत्पत्तौ पोटशोऽध्यायः ॥ ६॥ वही प्रात काल के समय अरुणरूप दीखता है। आकाश को उड़ गये। हे भृगुवंशियों में श्रेष्ठ ! इसके उपरान्त माँ के खाने वाले गरुड़ जी उत्पन्न वह भूखे और पक्षियों में श्रेष्ठ ईश्वर के दिये भोग्य हुए. और उसी समय अपनी माता को त्यागकर पदार्थ को पाने की चेष्टा करने लगे ॥१८॥२५॥ आदिपर्व का मोलहवां अध्याय ममात हुआ। । ma- वरम् । अथ मपदमोऽध्याय ॥७॥ मानिग्याच-एतस्मिन्नेव काले तु भगिन्यो ते तपोधन । अपश्यतां समायाते उच्चैः श्रवसमन्तिकात् ॥ १ ॥ यं तं देवगणाः सर्वे हृष्टरूपमपूजयन् । मध्यमानेऽमृते जातमश्वरत्नमनुत्तमम् ॥ २ ॥ अमोघवलमश्वानामुत्तमं जगतां श्रीमन्तमजरं दिव्यं सर्वलक्षणपूजितम् ॥ ३ ॥ प-कथं तदमृतं देवमथितं क्क च शंस में । ,' यत्र जले महावीर्यः सोऽश्वराजो महाद्युतिः ॥ ४ ॥ मोनियाच ज्वलन्तमचलं मे तेजोराशिमनुत्तमम् । आक्षिपनं प्रभां भानोः म्वः काञ्चनोज्ज्वलः ॥ ५॥ मप्रध्यां अध्याय १७ ॥ गन पुन पास है परपियो ! एक ममय इदु मगुद्र में निकाय था । जो अधों में गायबर, और दिनता ने मनाप आये हुए गर्य ये उथ श्रवा चरने वारों में श्रेष्ठ, शोभायुक्त, वृद्धभाव से रहित, पार को दम्दा. निम स्पधान अच पा मय सम्पूर्ण दिव्य रक्षणों से युक्त था । गानक बोले. देवताभान नरय मधन किये हुए भार मन पुन : देवताओं ने यहां पर किस प्रकार मौन पाप-- अध्याय १७ ] महाभारत कनकाभरणं चित्रं देवगन्धर्वसेवितम् । अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मवहुलैर्जनैः व्यालेरावारितं घौरैर्दिव्यौपधिविदीपितम् । नाकमावृत्य तिष्ठन्तमुच्छ्रयेण महागिरिम् ॥ ७ ॥ अगम्यं मनसाऽप्यन्यैनंदीवृक्षसमन्वितम् । नानापतङ्गसङ्घश्च नादितं सुमनोहरैः ॥ ८॥ शृङ्गमुपारुह्य बहुरत्नाचितं शुभम् । अनन्तकल्पमुद्विद्धं सुराः सर्वेः महौजसः ॥ ९ ॥ ते मन्त्रयितुमारब्धास्तत्रासीना दिवौकसः । अमृताय समागम्य तपोनियमसंयुताः ॥ १० ॥ तत्र नारायणो देवो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् । चिन्तयत्सु सुरेष्वेवं मन्त्रयत्सु च सर्वशः ॥ ११ ॥ देवैरसुरसङ्घश्च मथ्यतां कलशोदधिः । भविष्यत्यमृतं तत्र मध्यमाने महोदधौ ॥ १२ ॥ सर्वोषधीः समावाप्य सर्वरत्नानि चैव ह । मन्थध्वमुदधिं देवा वेत्स्यध्वममृतं ततः ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमंथने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ अमृत के लिये समुद्र को मथा, जिस मथन समय लगे हुए हैं । और जहां अनेक पक्षी तरह-तरह की में वह पराक्रमी अश्व उत्पन्न हुआ ? वह सब कथा बोलियां बोलते हैं। और अनेक रत्नों से अलंकृत हमारे आगे विस्तार से कहो । उग्रश्रवा ने कहा उस पहाट के शिखर पर सम्पूर्ण बलवान् देवता कि, सुमेरु पर्वत अत्यत प्रकाशमान, अचल, उत्तम बैठकर अमृत को प्राप्त करने की सलाह करने लगे सवर्ण के समान उजली चोटियों से सूर्य के तेज ॥१॥१०॥ को निरादर करने वाला, जो देवता और गन्धर्वो के वहां पर सबको सोच विचार में पडे देखकर रहने का स्थान है, उसे अधर्मी पुरुष नहीं देव भगवान् नारायण ने ब्रह्मा से कहा-देवता और सकते। जिसमें वडे बड़े सो के रहने के स्थान असुरा ने एकत्र होकर समुद्र को मथने का विचार हैं । और बड़ी बड़ी उत्तम औषधियां उत्पन्न होती है। किया है ! उसके मथन होने पर वहां से अमृत निक- और इतना ऊचा है कि, आमाश को छूता हुआ लेगा। उससे सब औषधियां, फिर रन और तिसके विदित होता है । जिसपर अनेक नदिया और वृक्ष उपरान्त अमृत प्राप्त होवेगा ॥१२॥१३॥ आदिपर्व का सत्रहवां अध्याय समाप्त हुआ } - [ आदिपव महाभारत अथ अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ भौतिरवाच-ततोऽभ्रशिखराकारैगिरिशृङ्गैरलंकृतम् मन्दरं पर्वतवरं लताजालसमाकुलम् ॥ १ ॥ नाना विहङ्गसंघुष्टं नानादंष्ट्रिसमाकुलम् । किन्नरैप्सरोभिश्च देवैरपि च सेवितम् ॥ २ ॥ एकादश सहस्राणि योजनानां समुच्छ्रितम् । अधो भूमेः सहस्रेषु तावत्स्वेव प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ नमुद्धर्तुमशक्ता वै सर्वे देवगणास्तदा । विष्णुमासीनमभ्येत्य ब्रह्माणं चेदमब्रुवन् ॥ ४ ॥ भवन्तावत्र कुर्वीतां बुद्धिं नैः श्रेयसी पराम् । मन्दरोद्धरणे यत्नः क्रियतां च हिताय नः ॥ ५ ॥ मानिग्याप तथेति चाब्रवीद्विष्णुब्रह्मणा सह भार्गव । अचोदयदमेयात्मा फणीन्द्रं पद्मलोचनः ॥ ६ ॥ ततोऽनन्तः समुत्थाय ब्रह्मणा परिचोदितः । नारायणेन चाप्युक्तस्तस्मिन्कर्मणि वीर्यवान् ॥ ७ ॥ अथ पर्वतराजानं तमनन्तो महाबलः । उज्जहार बलादब्रह्मन्सवनं सवनौकसम् ॥ ८ ॥ ततस्तेन सुराः सार्धं समुद्रमुपतस्थिरे । नमृचुरमृतस्याथें निर्मथिप्यामहे जलम् ॥ ९ ॥ ॥ अठारहवां अध्याय १८॥ गन पुत्र याने , ऋपियो ' सर उपरान्त ग्यारह हजार योजन ही पृथ्वी में वर्तमान था। मय देयना मन्दगचर पर्वन को उपाइन के लिये उमको देखकर देवताओं की सामर्थ्य उमे उखाड़ने चर । पर पर्यन अनि गाभायमान अपनी ऊचाई को न हुई । तब गव लौटकर ब्रह्मा जी और भगवान् मे आशाम को हवा हुआ, अनेक वृक्षों की लताओं विष्णु में बोले-आप हमारे हित के लिए मन्दराचल मेगानित, पक्षियों दी अनेक प्रकार की मधुर को उम्पाइन की चेष्टा करें । उग्रश्रया बोले-नारायण वागी में पुन, और अनेक प्रकार के रिमक और प्रधान अनन्तनाग में यह काम करने के लिए होम न्याम. सिर, अपमग आरदवनानी में पहा ।। प्रायगी ! उनकी भाना में महापराक्रम भयन्न गाभिन या नार योजन उचा भार यार नगगन ने जाकर बनी महित मन्नगनल पर्वन - अध्याय ९८] महाभारत अपां पनिरथोवाच ममाप्यंशा भवेत्ततः । सोढाऽस्मि विपुलं मर्द मन्दरभ्रमणादिति ॥ १० ॥ ऊचुश्च कूर्मराजानमकूपारे सुरासुराः । अधिष्ठानं गिरेरस्य भवान्भवितुमर्हति ॥ ११ ॥ कूर्मेण तु तथेत्युक्त्वा पृष्ठमस्य समर्पितम् । तं शैलं तस्य पृष्ठस्थं यन्त्रेणेन्द्रो न्यपीडयत् ॥ १२ ॥ मन्थानं मन्दरं कृत्वा तथा नेत्रं च वासुकिम् । देवा मथितुमारब्धाः समुद्र निधिमम्भसाम् ॥ १३ ॥ अमृतार्थे पुरा ब्रह्मस्तथैवासुरदानवाः । एकमन्तभुपाश्लिष्टा नागराज़ो महसुराः ॥ १४ ॥ विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छं ततः स्थिताः । अनन्तो भगवान्देवो यतो नारायणस्ततः । शिर उत्क्षिप्य नागस्य पुनः पुनरवाक्षिपत् ॥ १५ ॥ वासुकेरथ नागस्य सहसाऽऽक्षिप्यतः सुरैः । सधूमाः सार्चिपो वाता निष्पेतुरसकृन्मुखात् ॥ १६ ॥ ते धूमसङ्काः संभूता मेघसंघाः सविद्युतः । अभ्यवर्षन्सुरगणाञ्च्छ्रमसंतापकर्शितान् को बलपूर्वक उखाड़ लिया ॥१८॥ म्वीकार करके उस पर्वत को अपनी पीठ पर रख फिर उम अनन्तनाग के साथ सब देवताओं लिया । और इन्द्र ने उसे मन्त्र से मथना प्रारम्भ ने पर्वत को उठाकर समुद्र के निकट लाकर रख किया । देवता और दैत्य मन्दराचल को मधानी और दिया । तिसके उपरान्त उन्होंने ममुद्र से कहा-हे वासुकि नाग को उसकी रम्सी बनाकर समुद्र को मागर ! हम अमृत के लिये तेरे जल को मथेंगे। मथने लगे । हे ब्राह्मणो ! पहले अमृत के हेतु असुर ममुद्र ने देवताओं मे कहा-यदि मन्दराचल मे मथोगे और दानव वासुकि के मुख की ओर लगे और मम तो मुझे कष्ट होगा । मैं कप्ट को महने के लिये देवता पूँछ की तर्फ युक्त हुए । अनन्त बार-बार इस शर्त पर नय्यार हू कि मुझे भी कुछ अमृत का नगराज के सिर को पाट कर खींचने लगे। बार- अंग देना । देवताओं और दैत्यों ने कच्छप मे कहा चार रगड ग्वाने से उसके मुख से धुएँ और अग्नि में कि, समुद्र में इस पहाड का आधार आप होने के मिली हुई वायु निकलने लगी । वह धुओं के समूह योग्य हैं । कच्छप ने देवता और दानवों की प्रार्थना विजली महित बादल होकर परिश्रम से दुर्वल देवताओं । । .

[ आदिप १३६ महाभारन तस्माच गिरिकूटाग्रात्प्रच्युताः पुष्पवृष्टयः । सुरासुरगणान्सर्वान्समन्तात्समवाकिरन् ॥ १८ ॥ वभूवात्र महानादो महामेघरवोपमः । उदधेर्मथ्यमानस्य मन्दरेण सुरासुरैः ॥ १९ ॥ तत्र नाना जलचरा विनिप्पिष्टा महाद्रिणा । बिलयं समुपाजग्मुः शतशो लवणाम्भसि ॥ २० ॥ वारुणानि च भूतानि विविधानि महीधरः । पातालतलवासीनि विलयं समुपानयत् ॥ २१ ॥ तस्मिंश्च भ्राम्यमाणेऽद्रौ संघृष्यन्तः परम्परम् । न्यपतन्पतगोपेताः पर्वताग्रान्महाद्रुमाः ॥ २२ ॥ तेषां संघर्षजश्चाऽग्निरर्चिभिः प्रज्वलन्मुहुः । विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ॥ २३ ॥ ददाह कुञ्जरांस्तत्र सिंहांश्चैव विनिर्गतान् । विगतासूनि सर्वाणि सत्वानि विविधानि च ॥ २४ ॥ नमग्निममरश्रेष्टः प्रदहन्तमितस्ततः । वारिणा मेघजेनेन्द्रः शमयामास सर्वशः ॥ २५ ॥ ततो नानाविधास्तत्र सुस्सुवुः सागराम्भसि । महाद्रुमाणां निर्यासा वहवश्चौपधीरसाः ॥ २६ ॥ पर वन रंग । और उग पहाड़ में ऊपर में देवता वृक्षों के परम्पर रगड़ने से पहाड़ के ऊपर के बन में और अमुंग के ममा पर पुषणों की वर्षा चारों और आग लग गई और सारे पहाड में व्याप्त हो गई । मन र ॥१८॥ और वहा पर हाधी, और जो पर्वत की पन्द्राओं मधे दु" ममुह मे बड़े यादगें पं गरनन के (गुणालों) में नियरे थे वह मर जलने संगे। समान भार्गभनहोने रगा। वहा पर अनेक प्रकार इधर उधर जरती हुई अमि को इन्द्र देवता ने जायराय ममुद्र में नष्ट हो गये । वरणगेर यादरी के जर से भात पिया ॥१०॥२५॥ और पानार में रहने वारे मी बहुत मे जीव नष्ट हो निमके उपरान्त बड़े रहे वृक्षा और बहुत सी गये। पहामने मे पाम्पर रकगार, उमरकर, आपधियों के अनेक प्रकार के रस ममुद्र में गिरने परियो महिन यो यो पर नीचे गिग्गे गगे। उन रंगे। उम अमृन का गुण ग्यने बारा आपधियों अव्याय:८] महाभारत २३७ तेपाममृतवीर्याणां रसानां पयसैव अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्चनस्य च निःस्वात् ॥ २७ ॥ ततस्तस्य समुद्रस्य तज्जातमुदकं पयः । रसोत्तमर्विमिश्रं च ततः क्षीरादभूद् घृतम् ॥ २८ ॥ ततो ब्रह्माणमासीनं देवा बरदमब्रुवन् । श्रान्तः स्म सुभृशं ब्रह्मन्नोद्भवत्यमृतं च तत् ॥ २९ ॥ विना नारायणं देव सर्वेऽन्ये देवदानवाः । चिरारब्धमिदं चापि सागरस्यापि मन्थनम् ॥ ३० ॥ ततो नारायणं देवं ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । विधत्स्वैषां वलं विष्णो भवानत्र परायणम् ॥ ३१ ॥ विष्णुरुवाच-चलं ददामि सर्वेषां कर्मतये समास्थिताः । क्षोभ्यतां कलशः सर्वैर्मन्दरः परिवर्त्यताम् ॥ ३२ ॥ मॉनिम्बाच-नारायणवचः श्रुत्वा वालिनस्ते महोदधेः । तत्पयः सहिता भृयश्चक्रिरे भृशमाकुलम् ॥ ३३ ॥ ततः शतसहस्रांशुमश्यमानात्तू सागरात् । प्रसन्नात्मा समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्ज्वलः ॥ ३४ ॥ श्रीग्नन्तरमुत्पन्ना घृतात्पाण्डुग्वासिनी । सुरादेवी समुत्पन्ना तुरगः पाण्डुरस्तथा ॥ ३५ ॥ के रस मे ही अमृत उत्पन्न हुआ, जिसको पीकर है । आप उनको प्रेमी शक्ति देवें जिममै यह देवना अमर हो गये। तिसके उपगन्त उम ममुद्र कार्य को पूरा कर सकें । विष्णु ने कहा-टस का जल उन उत्तम ग्मों के मिलन मे दृध हो गया, कार्य में लगे हुए सब दानवों और देवताओं को और फिर दूध मे घृत बन गया। फिर ब्रह्माजी मै बल देता हूं। यह सब समुद्र को मन्दगचल से मे देवता बोले-हे भगवन् ! हम मधते मथते अत्यन्त मथना शुरु करें ॥२६॥३२॥ थक गये हैं और वह अमृत अभा उत्पन्न नहीं हुआ उग्रश्रवा बोले-नारायण के वचन सुनकर और है । नारायणदेव के बिना हम मब थककर चूर बल की प्राप्ति करके देव, दानव फिर समुद्र को हो गये है । तब ब्रह्माजी ने नारायण भगवान् से मथने लगे । फिर लाम्ब किरणों से युक्त, मान्न कहा-आपही इस समय इनकी सहायता करने योग्य आत्मा, उम्ञ्चल वर्ण चन्द्रमा समुद्र में उत्पन्न हुए।

[ आदिपर महाभारत कौस्तुभस्तु मणिर्दिव्य उत्पन्नो घृतसंभवः । मरीचिधिकचः श्रीमन्नारायणउरोगतः ॥ ३६ ॥ श्रीः सुरा चैव सोमश्च तुरगश्च मनोजवः । यतो देवास्ततो जग्मुरादित्यपथमाश्रिताः ॥ ३७ ॥ धन्वंतरिस्ततो देवो वपुष्मानुदातिष्ठत । श्वतं कमण्डलु विभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति ॥ ३८ ॥ एतदत्यडुतं दृष्ट्वा दृष्ट्वा दानवानां समुत्थितः । अमृतार्थ महान्नादो ममेदमिति जल्पताम् ॥ ३९ ॥ श्वेतैर्दन्तैश्चतुर्भिस्तु महाकायस्ततः परम् । ऐरावतो महानागोऽभवद्वज्रभृता धृतः ॥ ४० ॥ अतिनिर्मथनादेव कालकूटस्ततः परः । जगदावृत्य सहसा सधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ४१ ॥ त्रैलोक्यं मोहितं यस्य गन्धमाघ्राय तद्विषम् । प्राग्रसल्लोकरक्षार्थ ब्रह्मणो वचनाच्छिवः ॥ ४२ ॥ धार भगवान्कण्ठे मन्त्रमूर्तिर्महेश्वरः । तदा प्रभृति देवस्तु नीलकण्ठ इति श्रुतिः ॥ ४३ ॥ एतत्तदद्भुतं दृष्ट्वा निराशा दानवाः स्थिताः । अमृतार्थं च लभ्यर्थं महान्तं धैरमाश्रिताः ॥ ४४ ॥ दम उपगन्न न मे कमरयामिनी २८मी देवी, पिया । इसके उपरान्त चार श्वेत दातों वारा मगटेयी और उसे अपग घोड़ा उम्पन्न हुए । और रावत हाथी निकया जो इन्द्र ने ग्रहण कर लिया। नागया हदय में गोभायमान, शिरगा प्राम फिर देवताओं के अत्यन्त मथने से कारकूट विष मंगुन, दिव्य काम्नुममा मन ए ॥३३॥३६॥ निकाय । धुर्ण सहित प्रचलित असि के ममान गनी मुगदेवी नदिमा गर्य के मार्ग होकर उस विष ने सम्पूर्ण पृथ्वी को न्याल का डान्ग! देवयानी के पास पाच गये । पिर ITथ में धन कागट विष की गन्ध मे तीनों रोक मोहित हो में लगा गि हा भागरिदय समुद्र में गये । कि उस विष को प्रभाजी के करने से Fधयं यो देगा अमृत निय शिवजी ने पी रिया और अपने कण्ठ में स्वम्या गए.मर दागदा ने पहा नागार उग चिप में निपनी का कण्ठ नाग होगया । तब अध्याय : महाभारत १३०. ततो नारायणो मायां मोहिनी समुपाश्रितः । स्त्रीरूपमद्भुतं कृत्वा दानवानभिसंश्रितः ॥ १५ ॥ ततस्तदमृतं तस्ये ददुस्ते मूढचेतसः । स्त्रिये दानवदैतेयाः सर्वे तहतमानसाः ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीफपर्वणि अमृतमंथन अप्रादगो-ध्यायः ।। १८ ॥ मे भगवान् शिवजी का नाम नीलकण्ठ विन्यात बी का बड़ा अद्भुन मोहनीन्दप धारण किया और हुआ। फिर सब दानव लक्ष्मी और अमृत को दैत्यों के पास खड़े होकर उनके मन का मोह लेने के लिये देवताओं में बड़ा क्लेश करने को तत्पर लिया । और उन मूद दैत्य दानवों ने वह अमृत हुए । नारायण ने उन दोनों का झगड़ा देखकर उस मोहनीरप बी को देठिया ॥३७॥४॥ आदिपर्व का अठारहवां अध्याय ममान हुआ । अथ एकोनविंटातोऽध्यायः ॥ १९॥ मातिरुवाच अथावरणमुख्यानि नानाप्रहरणानि च । प्रगृह्याभ्यद्रवन्देवान्सहिता देत्यदानवाः ॥ १ ॥ ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान् । जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः ॥ २ ॥ ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा । विष्णोः सकाशात्संप्राप्य संभ्रमे तुमुले सति ॥ ३ ॥ ततः पिवत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सिनम् । राहुर्विवुधरूपेण दानवः प्रापिवत्तदा ॥ ४ ॥ तस्य कण्ठमनुप्राप्ते दानवस्यामृते तदा । आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया ॥ ५ ॥ ततो भगवता तस्य शिरच्छिन्नमलंकृतम् । चक्रायुधेन चक्रेण पिवतोऽमृतमोजसा ॥ ६ ॥ । उनीमयां अध्याय १५ ॥ उप्रश्रवा बोले-है ऋपियो : नारायण नग्देव अमृत टारर देयताओं ने दिया और उनाने के माथ इस प्रकार दानवों में अमृत लेकर वहां में उमे पड़ आनन्द पूर्वक प्राण किया । गा । मर दैत्य अनेक अस्त्र माया में देवनाओं का रूप धारण करके अमृत में नाम लेकर उनके पाले दौड़ । नारायण ने वह पिया । अमृन गहु के गले नक ही पहुंना था कि, Wintiliatoriteteto. देवताओं काम [ आदिपर्व १५० महाभारत तच्छैलशृङ्गप्रतिमं दानवस्य शिरो महत् । चक्रच्छिन्नं समुत्पत्य ननादातिभयङ्करम् ॥ ७ ॥ तत्कवंधं पपातास्य विस्फुरद्धरणीतले । सपर्वतवनद्वीपां दैत्यस्याकम्पयन्महीम् ॥ ८ ॥ ततो वैरविनिर्वन्धः कृतो राहुमुखेन वै । शाश्वतश्चन्द्रसूर्याभ्यां ग्रसत्यद्यापि चैव तौ ॥ ९ ॥ विहाय भगवांश्चापि स्त्रीरूपमतुलं हरिः । नानाप्रहरणीमर्दानवान्समकम्पयत् ततः प्रवृत्तः संग्रामः समीपे लवणाम्भसः । सुराणामसुराणां च सर्वघोरतरो महान् ॥ ११ ॥ प्रासाश्च विपुलास्तीक्ष्णा न्यपतन्त सहस्रशः । तोमराश्च सुतीक्ष्णाग्राः शस्त्राणि विविधानि च ॥ १२ ॥ ततोऽसुराश्चऋभिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु । असिशक्तिगदारुग्णा निपेतुर्धरणीतले ॥ १३॥ छिन्नानि पहिशेश्चैव शिरांसि युधि दारुणः । तमकांचनमालीनि निपेतुरनिशं तदा ॥ १४ ॥ देवताओं का हित नाहने वार नन्द्रमा और सूर्य कर अनेक अम्स ना मे दानवों का नाम करने ने का दिया कि यर गहु दानव । नर नारायण ग्गे । निमक उपगन्त ग्वारी ममुद्र के किनारे देवता ने मृदान ना मे उम दन्य का मिर काट डाग । और अमुरा का घोर सग्राम होने रगा। हजारी वर पनि मिया ममान म दानव का मिर नण प्राम, नोमर, नरपार आदि मन नल्ने साकार पा गया और यहा भयका गल बग्न रंग ॥१०॥ नगामार यादी मार पर गिग जिमन गिरने फिर चा में काट डा राक्षम रधिर गिराने समय परंत, मन और हगि महिन पृथ्वी को हिला- हुए नगर आदि शम्बा में घायल हुए ती पर दिया १८॥ गिग्ने ग। मरण की मार पाने बड़े कटोर नमत पनि काम गर की गय नाई। यारों के मि पट्टिा आदि गाम्यां मे कटकर युद्ध मी मे. ही पाय गमाकर गमय समय भूमि में गिग्न ग । मरे हुए दया की पिर में पाग पास गर्य को प्रसने से ये दीडना गनी गंग धानु गे गे हुए पहाड़ी के गिपर मी ? गगन नीदमी का पद जान पड़ती थी । गर्य अन्नने समय वहां अनेक

अध्याय ..]
महाभारत
रुधिरेणानुलिप्ताङ्गा निहताश्च महासुराः ।
अद्रीणामिव कूटानि धातुरक्तानि शेरते ॥ १५ ॥
हाहाकारः समभवत्तत्र तत्र सहस्त्रशः ।
अन्योन्यं छिन्दतां शस्त्रैरादित्ये लोहितायति ॥ १६ ॥
परिधैरायसैस्तीक्ष्णेः सन्निकर्षे च मुनिभिः ।
निन्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत् ॥ १७ ॥
छिन्धि भिन्धि प्रधाव त्वं पातयाभिसरेति च ।
व्यश्रुयन्त महाघोराः शब्दास्तत्र समन्ततः ॥ १८ ॥
एवं सुतुमुले युद्धे वर्तमाने महाभये ।
नरनारायणौ देवौ
समाजग्मतुराहवम् ॥ १९ ॥
तत्र दिव्यं धनुर्दृष्ट्वा नरस्य भगवानपि ।
चिन्तयामास तचक्रं विष्णुर्दानवसूदनम् ॥ २० ॥
ततोऽम्बराचिन्तितमात्रमागतं महाप्रभं चक्रममित्रतापनम् ।
विभावसोस्तुल्यमकुण्ठमण्डलं सुदर्शनं संयति भीमदर्शनम् ॥ २१ ॥
तदागतं ज्वलितहुताशनप्रभं भयङ्करं करिकरवाहुरच्युतः ।
मुमोच वे प्रबलवदुरवेगवान्महाप्रभं परनगरावदारणम् ॥ २२ ॥
तदंतकवलनसमानवर्चसं
पुनः पुनर्व्यपतत वेगवत्तदा ।
विदारयहितिदनुजान्सहस्रशः करेरितं पुरुपवरेण संयुगे ॥ २३ ॥
गम्त्रों के प्रहार करने वालों का बड़ा हाहाकार शन देखकर दानवों का नाश करने वाले अपने मुदर्शन
होने लगा। बड़े तीक्ष्ण लोहे के बने हुए आयुधों चक्र को याद किया। और वह म्मरण करते ही
मे और समीप होने पर मुष्टियों में मग्राम
में
आ पहुँचा। भगवान ने उम अत्र के नाम करने
मारने की आवाज आकाग नक गर्ट । और चारों याले बंड बलवान तेजयुक्त भयंकर सुदर्शन चक्र
तरफ से मारो, काटो आदि का घोर गन सुनाई को दैत्यों की सेना में बार
वार घुमाकर
छोडा। भगवान के हाथ मे बडे वेग मे एटे हुप
इस प्रकार युद्ध ने जन भयानक रूप धारण उम मुदर्शन चक्र ने हजारों देन्यों और टानों को
रिया तब नर और नारायणदेव दोनों वहा पर काटकर गिरा दिया । कहीं कही अमि के ममान
आये । नारायणदेव ने नर के दिव्य धनुष को दैत्यों को भम्म क्यिा, कहीं पर केचन मिर काटता,
परम्पर
देने लगा ॥१३॥१८॥

महाभारत [ आदिपर्व दहत्कञ्चिज्ज्वलन इवावलेलिहत्प्रसह्य तानसुरगणान्न्यकृन्तत । प्रवेरितं वियति मुहुः क्षितौ तथा पपौरणे रुधिरमथो पिशाचवत् ॥ २४ ॥ तथाऽसुरा गिरिभिरदीनचेतसो मुहुर्मुहुः सुरगणमार्दयंस्तदा । महावला विगलितमेघवर्चसः सहस्रशो गगनमभिप्रपद्यह ॥ २५ ॥ अथाम्बराद्भयजननाः प्रपेदिरे सपादपा बहविधमेघरूपिणः । महाद्रयः परिगलिताग्रसानवः पररपरं द्रुतमभिहत्य सखनाः ॥ २६ ॥ ततो मही प्रविचलिता सकानना महाद्विपाताभिहता समन्ततः । परस्परं भृशमभिर्गजतां मुहू रणाजिरे भृशमभिसंप्रवर्तिते ॥ २७॥ नरस्ततो वरकनकाग्रभूपणैर्महेषुभिर्गगनपथं समावृणोत् । विदारयान्गिरिशखराणि पत्रिभिर्महाभयेऽसुरगणविग्रहे तदा ॥ २८ ॥ ततो मही लवणजलं च सागरं महासुराः प्रविविशुरर्दिताः सुरैः । वियद्गतं ज्वलितहुताशनप्रभं सुदर्शनं परिकुपितं निशम्य ते ॥ २९ ।। ततः सुर्विजयमवाप्य मन्दरः स्वमेव देशं गमितः सुपूजितः । विनाद्य खं दिवमपि चैव सर्वशस्ततो गताः सलिलधरा यथागतम् ॥ ३०॥ नतोऽमृतं सुनिहितमेव चक्रिरे सुराः परां मुदमभिगम्य पुष्कलाम् । ददी च तं निधिममृतस्य रक्षितुं किरीटिने वलभिदथामरैः सह ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्म भाग्ने आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि अमृतमथनसमाप्ति म एकोनविंशोऽध्याय ॥ १५ ॥ और पियाचा ने ममान मधिर को पाना जाता तब नर ने स्वर्ण से गोभायमान बाणों से था ||१० || पहाड के शियरी को तोडकर आकाग को ढक और इमीनगह घराय हु" दत्य आसाम दिया। उनके वाणा मे पर्वतों के शियर चूर-घर में जाकर पथगे की पी में देवनाआ को पीड़ित हो गये । आकाश में नारायणदेव के चक ने बग्ने नगे । आशाम में मेघमण्ड मे पहार प्रचलित अमि के समान दानवों का नाम करना गिरगिरफर दयनाओं को भयमीत करने गगे। शुभ दिया । तर सर देवताओं से पीडा किये हुए उनकी चौरिया में दर दटकर बड़े नई वृक्ष अमुरा ने पृथ्वी और ग्वारी समुद्र का आश्रय भयानक गल करने गिग्ने जान थे । बड़े लिया। देवताओं ने इस प्रकार अमृत और विजय पंह पग्ली के गिरन गंवर पती कापन नगी। की प्राप्ति करके मन्दराचर पर्वत को अपने स्थान माम में पम्पर गया का हुआ यी पनि में पहुंचा दिया। इसके पश्चात् आमाश और चागजाकर गई | वर्ग म मन पर मय वादर अपने अपने स्थानी अध्याय २० महाभारत को चले गये । फिर प्रमन्न होकर अमृत की रक्षा अमृत को रक्षा के लिये नर को दिया ॥२८॥३॥ की । इन्द्र ने देवताओं के साथ उस निधिम्वरूप आदिपर्व का उन्नीसवां अध्याय ममाप्त हुआ | अथ विंयोऽध्यायः ॥ २० ॥ मौतिम्बाच-एतत्ते कथितं सर्वममृतं मथितं यथा । यत्र सोऽश्वः समुत्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ १ ॥ यं निशम्य तदा कविनतामिदमब्रवीत् । उच्चैःश्रवा हि कि वर्णो भद्रे प्रवहि मा चिरम् ॥ २ ॥ विनतोवाच-श्वेत एवाश्वराजोऽयं किंवा त्वं मन्यसे शुभे । बेहि वर्णं त्वमप्यस्य ततोऽत्र विपणावहे ॥ ३ ॥ कदमवाच-कृष्णवालमहं मन्ये हयमेनं शुचिस्मिते । एहि सार्धं मया दीव्य दासीभावाय भामिनी ॥ ४ ॥ मातिम्बाच-एवं ते समयं कृत्वा दासीभावाय वै मिथः । जग्मतुः खगृहानेव श्वो द्रक्ष्याव इति स्म ह ॥ ५ ॥ ततः पुत्रसहस्रं तु कर्जिी चिकीर्पती । आज्ञापयामास तदा वाला भूत्वाञ्जनप्रभाः ॥ ६ ॥ आविशवं हयं क्षिप्रं दासी न स्यामहं यथा । नावपद्यन्त ये वाक्यं तान्शशाप भुजङ्गमान् ॥ ७ ॥ सर्पसन्ने वर्नमाने पावको वः प्रवक्ष्यति । जनमेजयस्य राजः पाण्डवेयस्य धीमतः ॥ ८ ॥ । बीमयां अध्याय २० ॥ उग्रश्रवा बोले-है. ऋषियो : यह सब कथा तुम ठीक बताओ कमा रह है 'फिर हम तुम अमृत मथने की तुममे कहीं और जहां मे बडा टमपर गर्त लगायेंगी। कटु ने कहा-मै तो मानती हूं पराक्रम वाला, गोमायुक्त उच्चैःश्रवा नामक अध कि, इम घोड़े की पूंछ के बाल काले है। हे भामिनी निकला था । जिम घोड़े को देखकर कट्ठ ने मेरे माथ गर्न दामी होने की कर ॥१४॥ चिनना मे यह वचन कहा कि, हे भद्रे ! उम घोड़े उप्रश्रवा बोले-टम प्रकार यह दोनों बहिन का क्या रंग है ? जलदी बनाओ। विनता ने कहा पाम्पर दामी माव की गर्न रम अपने अपने घर को हे शुमे ! उम घाटे का रङ्ग धत जान पड़ना है। नली गई कि अच्छा, क्न प्रातः काल इस घोडे [ आदिपव महाभारत आहृय कश्यपं देव शापमेनं तु शुश्राव स्वयमेव पितामहः । अतिकरं समुत्सृष्टं कटुवा दैवादतीव हि ॥ ९ ॥ सार्ध देवगणैः सर्वैर्वाचं तामन्वमोदत । बहुत्वं प्रेक्ष्य सर्पाणां प्रजानां हितकाम्यया ॥ १० ॥ तिग्मवीर्यविषा ह्येते दन्दशूका महाबलाः । तेषां तीक्ष्णविपत्वाद्धि प्रजानां च हिताय च ॥ ११ ॥ युक्तं मात्रा कृतं तेषां परपीडोपसर्पिणाम् । अन्येषामपि सत्वानां नित्यं दोषपरास्तु ये ॥ १२ ॥ तेषां प्राणान्तिको दण्डो दैवेन विनिपात्यते । एवं संभाष्य देवस्तु पूज्य कद्रं च तां तदा ॥ १३ ॥ इदं वचनमब्रवीत् । यदेते दन्दशूकाश्च सर्पा जातास्त्वयाऽनघ ॥ १४ ॥ विपोल्वणा महाभोगा मात्रा शप्ताः परंतप । नत्र मन्युस्त्वया तात न कर्तव्यः कथंचन ॥ १५ ॥ दृष्टं पुरातनं ह्येतद्यज्ञे . सर्पविनाशनम् । इत्युक्त्वा सृष्टिकट्टेवस्तं प्रसाद्य प्रजापतिम् । प्रादाद्विपहरी विद्यां कश्यपाय महात्मने ॥ १६ ।। इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मौपणे विमोऽध्याय ॥२०॥ को देखना होगा । कटु अन्न करण में कपट उसका अनुमोदन किया । ब्रह्माजी ने विचार किया था । निगवे उपरान्त कपटी कटु ने हमार पुत्री कि, यह मॉप तीक्ष्ण विप वाले और प्राणियों को को जाना दी कि, तुम उग श्रया घोरे की पंछ हानी पहुंचाने वाले है उनको भी परमेश्वर की और में कार पार र निपट जाओ, निमसे मुंह में प्राणातिक दण्ट दिया जाता । ब्रह्मा ने ऐमा विनना का दामी न बनना परे। कद्र के पुत्र ने परकर कद्र की स्तुति की । तिसके उपरान्त सपना माता की नाना को अम्वीकार किया। उन्होंने पश्यप को बुलाकर कहा यह जो काटने स कद ने शोध म होकर उनको माप दिया कि, पारे, तीक्ष्ण विषयुत्न मर्प तुझसे उत्पन्न हुए गगा रनमेनय ६ मर्पयत में नुम मि में भम्ग वा माता मे माप दिये गये, इगरिये हे नात होगे । प्रथा में गप देवानी मरिन देवयोग मे तुभेग यार में प्रोध करना उचित नहीं है । यज्ञ पदद हिय एप न यन्न धार मार को मुनका ममों का नाम ना ही था। इस प्रकार वाफ्या अध्याय २६] म हामार न मे प्रसन्न करके प्रजापनि ब्रह्मा ने कल्यप को विष दूर करने वाली विद्या बताई ॥१६॥ आदिपर्व का बीनवां अध्याय ममान हुआ ।। अथ एकविंशोऽध्याय ॥२॥ मानिरवाच-ततो रजन्यां व्युष्टायां प्रभातेऽभ्युदिने रवी । कश्च विनता चेव भगिन्यो ते तपोधन ॥ १ ॥ अमर्पिते सुसंरब्धे दास्ये कृतपणे तदा । जग्मुतुस्तुरगं द्रष्टुमुच्चैः श्रवसमन्तिकात् ॥ २ ॥ दहशातेऽथ ते तत्र समुद्र निधिमम्भसाम् । महान्तमुदकागाधं क्षोभ्यमाणं महास्वनम् ॥ ३ ॥ तिमिङ्गलझपाकीर्ण मकररावृतं तथा । सत्वैश्च बहुसाहस्रेर्नानारूपैः समावृतम् ॥ १ ॥ भीपणेविकृतैरन्योरर्जलचरेस्तथा उर्नित्यमनाधृष्यं कूर्मग्राहसमाकुलम् ॥ ५॥ आकरं सर्वरत्नानामालयं वरुणस्य नागानामालयं रम्यमुत्तमं सरितां पतिम् ॥ ६ ॥ पानालज्वलनावासमसुराणां च वान्धवम् । भयङ्करम् च सत्वानां पयसां निधिमर्णवम् ॥ ७ ॥ शुभं दिव्यममानाममृतस्याकर परम् । अप्रमेयमचिन्त्वं सुपुण्यजलमदभुनम् ॥ ८ ॥ ॥ हकीमयां अध्याय॥ उग्रश्रवा बोले-हे ऋपियो : गत्रि के व्यतीत भय में कार्ट उमके भीतर प्रवा नहीं कर माना होने पर और मूर्योदय प्रभात के समय कटु और और सम्पूर्ण रनों की बान. वरूप के घर. नागा के चिनना दोनों बहनें उचःश्रवा अश्व को देखने के उत्तम न्यान.बड़वानन अमि के निवाम म्यान, अमा- रिण चली । इसके उपगन्न जलों के निधि बड़े गण और अनेक प्रकार के भयानक जीवों के निधि, अगाध (अयाह) जन वाले और मन्म्य आदि में शुभ दिल्य रूप देवताओं के अमन का निधि प्रमाण भैर मयानक मन करते हुए निमि. निमिङ्गल. मगर. रदिन. विनार माति में अग्ग. पवित्र. जरयुक्त, काप आदि अनेक प्रकार के जीवों में युक्त, जिनके विचित्र. भयानक अन्नगे के गन्न में भयानक महाभारत [आदिपर्व घोरं जलचरारावरौद्र भैरवनिःस्वनम् । गम्भीरावर्तकलिलं सर्वभूतभयङ्करम् ॥ ९॥ वेलादोलानिलचलं भोभोद्वेगसमुच्छ्रितम् । वीचीहस्तैः प्रचलितैर्नृत्यन्तमिव सर्वतः ॥१०॥ चन्द्रवृद्धिक्षयवशादुवृत्तोर्मिसमाकुलम् पांचजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम् ॥ ११ ॥ गां विन्दता भगवता गोविन्देनामितौजसा । वराहरूपिणा चान्तर्विक्षोभितजलाबिलम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मर्पिणा व्रतवता वर्षाणां शतमत्रिणा । अनासादितगाधं च पातालतलमव्ययम् ॥ १३ ॥ अध्यात्मयोगनिद्रां च पद्मनाभस्य सेवतः । युगादिकालायनं विष्णोरमिततेजसः ॥ १४ ॥ वज्रपातनसंत्रस्तमैनाकस्याभयप्रदम् डिम्बाहार्दितानां च असुराणां परायणम् ॥ १५ ॥ बडवामुखदीप्ताग्नेस्तोयहव्यप्रदं अगाधपारं विस्तीर्णमप्रमेयं सरित्पतिम् ॥ १६ ॥ महानदीभिर्बह्वीभिः स्पर्धयेव सहनशः । अभिमार्यमाणमनिटां ददृशाते महार्णवम् । आपूर्यमाणमत्यर्थ नृत्यमानमिवोर्मिभिः ॥ १७ ।। जिसमें गहरे भंवर पदा कान है, मय जीवों को भय याले महर्षि अत्रि ने जिमकी थाह नहीं पाई ऐसे देने याग, रब के आने पर यायु. नंनल जल के विकार में रहिन, पाताल तल वाले, और आत्मा में मन में घट उंच. रहर रूपी हाथों में नारों ओर योग निद्रा को मेवन करते हुए विष्णु के युगादिकाल मनानन दुपदी महा, चन्द्रमा की वृद्धि और क्षय की शय्या, इन्द्र के यन के भय में डरे हुए मनाक के कामे उनी लहरी मे युन, परमपवित्र विश्नु के पर्यन का अभय देने वाले, देवासुर मग्राम में डरने पारजन्य महकी उनि काने यारे, मत्तिम पृथ्वी बाल और मार हुए. अग यामम्यान. पानी है की प्राण ने नए भगवान बगह रुप में हिरोय मादप तक.ग्रताक धारण करने शिवम् । याम, अध्याय २२] महाभारत १.४७ ----- गम्भीरं तिमिमकरोग्रसंकुलं तं गर्जन्तं जलचररावरौद्रनादैः । विस्तीर्णं ददृशतुरम्बरप्रकाशं तेऽगाधं निधिमुरुमम्भसामनन्तम् ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्ण एकविमोऽध्यायः ॥ २१ ॥ पति बड़ी बड़ी बहुत मी हज़ारों नदियों के जल से हुए अपार, अथाह, समुद्र को देना ॥१॥१८॥ भरते हुए गम्भीर, अनेक प्रकार के जन्तुओं से भरे आदिपर्व का इक्कीसवां अध्याय समाप्त हुआ। अथ द्वाविंगोऽध्याय ॥ २२ ॥ मौनिम्बाच-नागाश्च संविदं कृत्वा कर्त्तव्यमिति तद्वचः । निःस्नेहां वे दहेन्माता असंप्राप्तमनोरथा ॥ १ ॥ प्रसन्ना मोक्षयेदस्मांस्तस्माच्छापाच भामिनी । कृष्णं पुच्छे करिष्यामस्तुरगस्य न संशयः ॥ २ ॥ तथाहि गत्वा ते तस्य पुच्छे वाला इति स्मृतः । एतस्मिन्नन्तरे ते तु सपत्न्यौ पाणते तदा ॥ ३ ॥ ततस्ते पणितं कृत्वा भगिन्यौ द्विजसत्तम । जग्मतुः परया प्रीत्या परं पारं महोदधेः ॥ ४ ॥ कश्च विनता चैव दाक्षायण्यो विहायसा । आलोकयन्त्यावक्षोभ्यं समुद्र निधिमम्भसाम् ॥ ५ ॥ वायुनाऽतीव सहसा श्रोभ्यमाणं महास्वनम् । तिमिगिलसमाकीर्ण मकररावृतं तथा ॥ ६ ॥ संयुतं बहुसाहनेः सत्वेर्नानाविधैरपि । घोरघारमनाधृष्यं गम्भीरमतिभैरवम् ॥ ७ ॥ ॥ बाईमयां अध्याय २२॥ उप्रश्रयों बोले-इधर माता के दिये हुग शाप अवश्य ही हमको भाप में बनायगी । य. दिनार मुनकर नागों ने परम्पर मलाह करके उमकी कर मर्म उम घोड़े की पूल में काले चान होकर आजा का पालन करने के लिये निश्चय कर लिया। चिपट । रमी गमय यह दोनों कल्यय की स्त्रिय इसमें मंदेह नहीं क्योंकि हमारी माता का मनोरथ दासीपने की गर्न रम ममुद्र के पार गई । दश की पग न होने पर पुत्र-मेह को भुगकर हमें माप में पुत्री कटु आर विनना आशय मार्ग में जग के मम्म कर देगी और यदि वह प्रसन्न हो जायेगी तो निधि, वायु के वेग मे उरने मयह गल वाले [ आदिपर्व २४८ महाभारत परम् । से गहर अगम्य, आकरं सर्वरत्नानामालयं वरुणस्य नागानामालयं चापि सुरम्यं सरितां पतिम् ॥ ८ ॥ पातालज्वलनावासमसुराणां तथालयम् । भयङ्कराणां सत्वानां पयसो निधिमव्ययम् ॥ ९ ॥ शुभ्रं दिव्यममानामभृतस्याकरं अप्रमेयमचिन्त्यं च सपुण्यजलसंमितम् ॥ १० ॥ महानदीभिर्वतीभिस्तत्र तत्र सहस्त्रशः । आपूर्यमाणमत्यर्थ नृत्यंतमिव चोमिभिः ॥ ११ ॥ इत्येवं तरलतरोर्मिसंकुलं ते गम्भीरं विकसितमम्बरप्रकाशम् । पातालज्वलनशिखाविदीपिताङ्गं गर्जन्तं द्रुतमभिजग्मतुस्ततस्ते ॥ १२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मौपणे समुद्रदर्शनंनाग द्वावियोऽध्यायः ॥ २२ ॥ तिमि, तिमिहल आदि अनेक प्रकार के जीयों से युक्त, देवताओं के अमृत स्थान, विचार शक्ति अलग, मम्पूर्ण रनों के निधि, वरुणों और बड़ी बड़ी नदियों से भरते हुए लहरों से नाच करते नागों के रहने के स्थान, मनोहर बड़वानल अग्नि हुए के समान चंचल, तरंगों से भरे हुए आकाश के और असुरों के रहने के म्यान, भयंकर जीयों के समान, बड़वानल अमि की ज्वालाओं से प्रकागमान नियाम म्यान, शुद्ध दिव्य रूप प्रमाण में रहित, गर्जना करते हुए समुद्र के पास गई ॥१॥१२॥ आदिपर्य गवाईमवां अध्याय ममाम हुआ । अथ प्रयोविंशोऽध्याय ॥३॥ मानियाग-नं समुद्रमविक्रम्य कविनतया सह । न्यपनत्तुरगाभ्यायो न चिगदिव शीघ्रगा ॥ १ ॥ ननम्न ने हयश्रेष्ट ददृशाते महाजवम् । ठागाशकिरणप्रग्यं कालवालमुभे तदा ॥ २ ॥ निशम्य च यहृन्वालान्कृष्णान्पुच्छसमाश्रितान् । विषण्णरूपां विनतां कदम्ये न्ययोजयत् ॥ ३ ॥ ॥ नईमपा अध्याय २३ ॥ प्रथया यो मनाना और विनता ममान गयन और काले बालों की पूंछ गे युक्त नी म मागुद को गंपकर या अशक पाम था. देगा ! यह देमकर विनता को बड़ा दु.ग्याआ। माया वा पार उगपाईको जी चन्द्रमा के अब पढ़ने, गर्न के अनुमार, विनता को अपनी अध्याय २३] महाभारत २४९ ततः सा बिनता तस्मिन्पणितेन पराजिता । अभवदुःखसंतप्ता दासीभावं समास्थिता ॥ ४ ॥ एतस्मिन्नन्तरे चापि गरुडः काल आगते । विना मात्रा महातेजा विदाडिमजायत ॥ ५ ॥ महासत्वावलोपेतः सर्वा विद्योतयन्दिशः । कामरूपः कामगमः कामवीर्यो विहङ्गमः ॥ ६ ॥ अग्निराशिरिवोद्भासन्समिद्धोऽति भयङ्करः । विद्युद्विस्पष्टपिङ्गाक्षो युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ७॥ प्रवृद्धः सहसा पक्षी महाकायो नभोगतः । घोरो घोरखनो रौद्रो वह्निरोर्व इवापरः ॥ ८ ॥ तं दृष्ट्वा शरणं जग्मुर्देवाः सर्वे विभावसुम् । प्रणिपत्याब्रुवंश्चैनमासीनं विश्वरूपिणम् ॥ ९ ॥ अग्ने मा वं प्रवर्धिष्टाः कच्चिन्नो न दिधक्षसि । असौ हि राशिः सुमहान्समिद्धस्तव सर्पति ॥ १० ॥ अनिश्वाच-नैतदेवं यथा यूयं मन्यध्वमसुरार्दनाः । गरुडो वलवानेप मम तुल्यश्च तेजसा ॥ ११ ॥ दासी नना रिया। नर्त हार जाने के कारण विनता म्वरूप को देखकर सन देवता भयभीत हुए आर ने विषय होकर दु ग्वित भाव मे अपनी सौति की अमि के पास जाकर विनयपूर्वक बोले ॥१॥९॥ दामी बनना स्वीकार कर लिया। इसके उपरान्त ममय हे अग्निदेव ' आप अकम्मात् ऐमा भयानक के व्यतीत होने पर दूसरे अडे को फोडकर गरुड जी रूप धारण कर हमको जाने के लिए क्यों आ रहे उत्पन्न हुए । उनका पराक्रम ओर तेन सर दिगाआ है ' यह देविये, पर्वत के समान अग्नि का देर में उजेरा करने वाला था। नहा चाह तहा चले जाने हमारी ओर पता चला आ रहा है । अग्निदेव और जो चाहें सो रूप धारण करने में समर्थ थे। गोरे हे अमरों के नाम करने वाले देवताओ रूप उनका अति टरारना ओर तेन अग्नि की राशि नम तुम समझ रहे हो वा बात नहीं है । यह मेरे के समान था । विनती के समान चमकते हुए नेत्र समान तेतम्बी गम्ड है । यह विनता को आनन्द थे। थोडे दिनों में वह गरुड नामक महापभी बडे देने वारा उत्पन्न हुआ है । दम तेन के समूह को होकर आकाश म गये । उनके अत्यत घोर भन देख तुमको यह अनान क्यों प्राप्त हुआ। यह नागी करने पारे भयानक आर अग्नि के समान प्रकाशित का धय करने पारा, पग वरपान कश्यप का पुत्र, महाभारत जातः परमतेजस्वी विनतानन्दवर्धनः । तेजोराशिमिमं दृष्ट्वा युप्मान्मोहः समाविशत् ॥ १२ नागक्षयकरश्चैव काश्यपेयो महावलः । देवानां च हिते युक्तस्त्वहितो दैत्यरक्षसाम् ॥ १ न भीः कार्या कथं चात्र पश्यध्वं सहिता मम । एवमुक्तास्तदा गत्वा गरुडं वाग्भिरस्तुवन् ॥ . ते दूरादभ्युपेत्यैनं देवाः सर्पिगणास्तदा । देवा उचुः-त्वमृपिस्त्वं महभागस्त्वं देवः पतगेश्वरः ॥१ वं प्रभुस्तपनः सूर्यः परमेष्ठी प्रजापतिः । त्वमिन्द्रस्त्वं हयमुखस्त्वं शरस्त्वं जगत्पतिः ॥ लं मुखं पद्मजो विप्रस्त्वमग्निः पवनस्तथा । त्वं हि धाता विधाता च त्वं विष्णुः सुरसत्तमः ॥ वं महानभिभूः शश्वदमृतं वं महद्यशः । त्वं प्रभास्त्वमभिप्रेतं त्वं नस्त्राणमनुत्तमम् । बलोमिमान्साधुरदीनसत्वः समृद्धिमान्दुर्विषहस्त्वमेव त्वत्तः सृतं सर्वमहीनकीर्ते ह्यनागतं चोपगतं च सर्वम् ॥ त्वमुत्तमः सर्वमिदं चराचरं गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे । समाक्षिपन्भानुमतः प्रभांमुहुस्त्वमन्तकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवम् ॥ देवनाओं का हितकारी, देस्य राक्षसों का शत्रु है । प्रजापति हो, इन्द्र हो, हयग्रीव किर्मा प्रकार तुमको यहां भय न करना चाहिये और महादेव के विश्नुरूपी वाण हो, 'मो माथ इमको देग्यो। मा कहने पर गरुड के पाम हो, ब्रह्मा हो, विजानी हो, पवन जा, मम्पूर्ण देवना गरूद की याणियों द्वारा स्तुति विधाता हो, विष्णु हो, महातत्त्व सानो ॥१०॥१४॥ मनातन हो, अमृत हो, यगवान है, पक्षियों के राजा ! आप ऋपि हो । मय तेज हो, बुद्धिवृत्ति हो, रक्षणरूप मयों में जानने यान. महाभाग हो, देव हो, पक्षियों तुम बलधारी, परोपकारी, पर ri मम्पूर्ण जगत के प्रभ हो, गयक नाग माली और असम तेजयाले हो पान पार हो गयं ही, पामेष्ठी हिरण्यगर्भ हो, भविष्य, वर्तमान मब तुम्हीं से ।

अध्याय २३ ] महाभारत ५१ दिवाकरः परिकुपितो यथा दहेत्प्रजास्तथा दहसि हुताशनप्रभ । भयङ्करः प्रलय इवाग्निरुत्थितो विनाशयन्युगपरिवर्त्तनान्तकृत् ॥ २१ ॥ खगेश्वरं शरणमुपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् । तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महावलं गरुडमुपेत्य खेचरम् ॥ २२ ॥ परावरं वरदमजय्यविक्रम तवौजसा सर्वमिदं प्रतापितम् । जगत्प्रभो तप्तसुवर्णवर्चसा त्वं पाहि सर्वांश्च सुरान्महात्मनः ॥ २३ ॥ भयान्त्रिता नभसि विमानगामिनो विमानिता विपथगति प्रयान्ति ते । ऋषेः सुतस्त्वमसि दयावतः प्रभो महात्मनः खगवर कश्यपस्य ह ॥ २४ ॥ स मा क्रुधः कुरु जगतो दयां परां त्वमीश्वरः प्रशममुपैहि पाहि नः । महाशनिस्फुरितसमस्खनेन ते दिशोऽम्बरं त्रिदिवमियं च मेदिनी । चलन्ति नः खग हृदयानि चानिशं निगृह्यतां वपुरिदमग्निसन्निभम् ॥ २५ ॥ तव द्युतिं कुपितकृतान्तसन्निभां निशम्य नश्चलति मनोऽव्यवस्थितम् । प्रसीद नः पतगपते प्रयाचतां शिवश्च नो भव भगवन्सुखावहः ॥ २६ ॥ एवं स्तुतः सुपर्णस्तु देवैः सर्पिगणैस्तदा । तेजसः प्रतिसंहारमात्मनः स चकार ह ॥ २७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मौपर्ण त्रयोविंशोऽध्याय ॥ २३ ॥ सर्वोत्तम हो, चराचर मम्पूर्ण जगत् को सूर्य के समान है। हे जगत् प्रभु ' तुम अपने सवर्ण के से तेज प्रकाश करते हो, तुम मूर्य चर अचर जगत् के से सब देवताओं की रक्षा करो । विमानों पर विचरने अन्त हो, जैसे मूर्य अपनी किरणों से सब जगत् वाले देवतागण भय के गारे आकाश में इधर-उधर को भस्म कर दे, इस प्रकार हे हुताशन प्रभु ! तुम भाग रहे है । हे प्रभु ! तुम महर्षि कश्यप के पुत्र सम्पूर्ण जगत् को भम्म कर देते हो, उठी हुई प्रलय हो । क्रोध न करते हुए सम्पूर्ण समार पर दया करो। की अमि के समान भयंकर हो और तुम काल के तुम ईश्वर हो, इससे शांत भाव धारण करो । वज भी काल हो ॥१५॥२१॥ के शब्द के समान तुम्हारे शन से दिशा और अग्नि के समान तेजम्बी, बड़े बलवान् , बिजली आकाश म्वर्ग पृथ्वी और हमारे हृदय चलायमान के समान प्रकाशमान , अन्धकार रहित, बाढलों में होते है । हे पक्षियों के राजा । इस अग्नि तुल्य दीखते हुए आकागगामी गरुड़ की हम शरण लेते अपने शरीर को अब न बढ़ाओ । कुपित काल के है । हे जड़-चेतन--म्वरूप, बर देने वाले, अजेय, समान तुम्हारे अत्यन्त भयानक रुप को देखकर जगत् के स्वामी, तुम्हारे तेज से सब संसार तप रहा हमारा हृदय कांप रहा है। हम प्रार्थना कर रहे [ आदि मरामाम जातः परमतेजस्वी विनतानन्दवर्धनः । तेजोराशिमिमं दृष्ट्वा युप्मान्मोहः समाविशत् ॥ १२ ॥ नागक्षयकरश्चैव काश्यपेयो महावलः । देवानां च हिते युक्तस्त्वहितो दैत्यरक्षसाम् ॥ १३ ॥ न भीः कार्या कथं चात्र पक्ष्यध्वं सहिता मम । एवमुक्तास्तदा गत्वा गरुडं वाग्भिरस्तुवन् ॥ १४ ॥ ते दूरादभ्युपेत्यैनं देवाः सर्पिगणास्तदा । देवा उचु-त्वमृपिस्त्वं महभागस्त्वं देवः पतगेश्वरः ॥ १५ ॥ त्वं प्रभुस्तपनः सूर्यः परमेष्ठी प्रजापतिः । स्वमिन्द्रस्त्वं हयमुखस्त्वं शरस्त्वं जगत्पतिः ॥ १६ ॥ वं मुखं पद्मजो विप्रस्त्वमग्निः पवनस्तथा । त्वं हि धाता विधाता च त्वं विष्णुः सुरसत्तमः ॥ १७ ॥ त्वं महानभिभूः शश्वदमृतं त्वं महद्यशः । वं प्रभास्त्वमभिप्रेतं त्वं नस्त्राणमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ बलोमिमान्साधुरदीनसत्वः समृद्धिमान्दुर्विपहस्त्वमेव । त्वत्तः सृतं सर्वमहीनकीर्ते ह्यनागतं चोपगतं च सर्वम् ॥ १९ ।। त्वमुत्तमः सर्वमिदं चराचरं गभस्तिभिर्भानुरिवावभाससे । समाक्षिपन्भानुमतः प्रभांमुहुस्त्वमन्तकः सर्वमिदं ध्रुवाध्रुवम् ॥ २० ॥ देवताओं का हितकारी, दत्य राक्षसों का शत्रु है । प्रजापति हो, इन्द्र हो, ह्यग्रीव अवतार हो, तुम किसी प्रकार तुमको यहा भय न करना चाहिये और महादेव के विश्नुरूपी वाण हो, जगत्पति हो, मुख मेरे माथ इमको देखा। ऐसा कहने पर गरुड के पास हो, ब्रह्मा हो, विज्ञानी हो, पवन हो, धाता और जा, मम्पूर्ण देवना गरड की प्राणियों द्वारा स्तुति विधाता हो, विष्णु हो, महातत्त्व हो, अहकार हो, करने रंग ॥१०॥१४॥ सनातन हो, अमृत हो, यशवान् हो, सूर्य्य आदि का हे पक्षियों के राजा ' आप ऋपि हो । सन तंज हो, बुद्धिवृत्ति हो, रक्षणरूप हो ओर अनुत्तम हो। मयों के जानने वाले महाभाग हो, देव हो, पक्षियों तुम बरधारी, परोपकारी, परमपराक्रमी, समृद्धि- के ईश्वरी, सम्पूर्ण जगत् के प्रभु हो, मनके नाम गारी और असम तेजवाल हो । यशम्बी ! भृत, पान धान हो, गर्य हो, परमेष्ठी हिरण्यगर्भ हो, भविष्य, वर्तमान सब तुम्हीं से प्रगट हुआ है । तुम अयाय २३ ] महाभारत दिवाकरः परिकुपितो यथा दहेत्प्रजास्तथा दहसि हुताशनप्रभ । भयङ्करः प्रलय इवाग्निरुत्थितो विनाशयन्युगपरिवर्तनान्तकृत् ॥ २१ ॥ खगेश्वरं शरणमपागता वयं महौजसं ज्वलनसमानवर्चसम् । तडित्प्रभं वितिमिरमभ्रगोचरं महावलं गरुडमुपेत्य खेचरम् ॥ २२ ॥ परावरं वरदमजय्यविक्रमं तवौजसा सर्वमिदं प्रतापितम् । जगत्प्रभो तप्तसुवर्णवर्चसा त्वं पाहि सर्वांश्च सुरान्महात्मनः ॥ २३ ॥ भयान्विता नभसि विमानगामिनो विमानिता विपथगतिं प्रयान्ति ते । ऋषेः सुतस्त्वमसि दयावतः प्रभा महात्मनः खगवर कश्यपस्य ह ॥ २४ ॥ स मा क्रुधः कुरु जगतो दयां परां त्वमीश्वरः प्रशममुपैहि पाहि नः । महाशनिस्फुरितसमवनेन ते दिशोऽम्बरं त्रिदिवमियं च मेदिनी । चलन्ति नः खग हृदयानि चानिशं निगृह्यतां वपुरिदमग्निसन्निभम् ॥ २५॥ तव द्युतिं कुपितकृतान्तसन्निभां निशम्य नश्चलति मनोऽव्यवस्थितम् । प्रसीद नः पतगपते प्रयाचतां शिवश्च नो भव भगवन्सुखावहः ॥ २६ ॥ एवं स्तुतः सुपर्णस्तु देवैः सर्पिगणैस्तदा । तेजसः प्रतिसंहारमात्मनः स चकार ह ॥२७॥ इति श्रीमन्महाभारने आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मौपर्ण त्रयोविंशोऽध्याय ॥ २३ ॥ सर्वोत्तम हो, चराचर मम्पूर्ण जगत् को मूर्य के समान है । हे जगत् प्रभु ' तुम अपने सवर्ण के से तेज प्रकाश करते हो, तुम मूर्य चर अचर जगत् के से सब देवताओं की रक्षा करो । विमानों पर विचरने अन्त हो, जैसे मूर्य अपनी किरणों मे सब जगत् वाले देवतागण भय के मारे आकाश में इधर-उधर को भस्म कर दे, इस प्रकार हे हुतागन प्रभु ! तुम भाग रहे है । हे प्रभु ! तुम महीप कश्यप के पुत्र मम्पूर्ण जगत् को भम्म कर देते हो, उठी हुई प्रलय हो । क्रोध न करते हुए सम्पूर्ण समार पर दया करो। की अमि के समान भयंकर हो और तुम काल के तुम ईश्वर हो, इममे गात भाव धारण करो । वज्र भी काल हो ॥१५॥२॥ के गल के समान तुम्होर गळ से दिशा और अग्नि के समान तेजम्बी, बंड बलवान् , विजली आकाग म्वर्ग पृथ्वी और हमारे हृदय चलायमान के समान प्रकाशमान, अन्धकार रहित, बादलों में होने है । हे पक्षियों के राजा । इस अग्नि तुल्य दीखते हुए आकागगामी गगड़ की हम शरण लेते अपने शरीर को अब न वटाओ । कुपित काल के जड़-चेतन-म्वरूप, वर देने वाले, अजेय, समान तुम्हारे अत्यन्त भयानक रूप को देखकर जगत् के म्वामी, तुम्हारे तेज से मब मंसार तप रहा हमारा हृदय कांप रहा है। हम प्रार्थना कर रहे ।

महाभारत आदिपय A है । हम पर प्रसन्न होकर हमारा कल्याण करो। -२०२७॥ आदिपर्व का तेईमया अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतुर्चिगोऽध्याय ॥२॥ मौतिग्वाच-स श्रुत्वाऽथात्मनो देहं सुपर्णः प्रेक्ष्य च स्वयम् । शरीरप्रतिसंहारमात्मनः संप्रचक्रमे ॥ १ ॥ सुपर्ण पाच-न मे सर्वाणि भूतानि विभियुर्देहदर्शनात् । भीमरूपात्समुद्विग्नाम्तस्मात्तेजस्तु संहरे ॥ २ ॥ मौतिग्याच-ततः कामगमः पक्षी कामवीयर्यो विहंगमः । अरुणं चात्मनः पृष्ठमारोप्य स पितुहात् ॥ ३ ॥ मातुरन्तिकमागच्छत्परं तीरं महोदधेः । तत्रारुणश्च निक्षिप्तो दिशं पूर्वा महाद्युतिः ॥ ४ ॥ सूर्यस्तेजोभिरत्युप्रैलॊकान्दग्धुमना यदा । ग्याच–किमर्थं भगवान्सूर्यो लोकान्दग्धुमनास्तदा ॥ ५ ॥ किमस्यापहृतं देवैर्येनेम मन्युराविशत् । प्रमाति पाच-चन्द्रादित्यैर्यदा राहुराख्यातो ह्यमृतं पिवन् ॥ ६ ॥ वैरानुबन्धं कृतवांश्चन्द्रादित्ये तदाऽनघ । वध्यमाने ग्रहेणाथ आदित्ये मन्युराविशत् ॥ ७ ॥ सुरार्थाय समुत्पन्नो रोपो राहोस्तु मां प्रति । ॥ चौवीमवा अध्याय २४ ।। उग्रश्रवा बोरे हे मपियो गरुड़ ने देवताओं मम्म करने के लिए तय्यार हुए । यह देखकर के मुग मे मुनकर और म्वय देखकर अपने शरीर बडी प्राति वाले गस्ड ने अरण को मूर्य के आगे और नेन को कम कर लिया । गरुड ने कहा सर बैठा दिया । महाप रुर ने अपने पिता प्रमति से पाणी मेरे भयानक रूप का देयकर भयभीत हो पूछा-सूर्य ने क्यों लोकों को जलाने का विचार रहे। इस कारण मने अपने तन को ममेट लिया क्यिा है ? और देवताओं ने ही उमरी क्या । उप्रश्रा बोर अपन नेन को समरकर वह हानि की है, जिससे उन्होंने देवताओं पर इतना पगामी गरड़ बड़े भाई अरण को पीट पर चदा पोध किया। प्रमति गोले नत्र चन्द्रमा और सूर्य पर समुद्र के पार माना के मीप आया। इसी ने देवनाआ की मण्डरी में बैठे हुए अमृत पति गमय गय अपने उन तर म नाना रोकी को हुए राहु को बताया, तभी मे रा" और .ins अन्याय महाभारत वह्वनर्थकरं पापमेकोऽहं ससवाप्नुयाम् ॥ ८॥ सहाय एव कार्येषु न च कृच्छ्पु दृश्यते । पश्यन्ति ग्रस्यमानं मां सहन्ते वे दिवौकसः ॥ ९ ॥ तस्माल्लोकविनाशार्थ ह्यवतिष्ठे न संशयः । एवं कृतमितिः सूर्यो ह्यस्तमभ्यगमगिरिम् ॥ १० ॥ तस्माल्लोकविनाशाय संतापयत भास्करः । ततो देवानुपागम्य प्रोचुरेवं महर्पयः ॥ ११ ॥ अद्यार्धरात्रसमये सर्वलोकभयावहः । उत्पत्स्यते महान्दाहस्रैलोक्यस्य विनाशनः ॥ १२ ॥ ततो देवाः सर्पिगणा उपगम्य पितामहम् । अब्रुवन्किमिवेहाय महहाहकृतं भयम् ॥ १३ ॥ न तावद् दृश्यते सूर्यः क्षयोऽयं प्रतिभाति च । उदिते भगवन्भानौ कथमेतनविष्यति ॥ १९ ॥ पितामह पाच-एप लोकविनाशाय रविरुधन्तुमुद्यतः । दृश्यन्नेव हि लोकान्स भस्मराशीकरिष्यति ॥ १५ ॥ तस्य प्रतिविधानं च विहितं पूर्वमेव हि । कव्यपस्य सुतो धीमानस्णेत्यभिविश्रुतः ॥ १६ ॥ महाकायो महातेजाः स स्थास्यति पुरो रवः । सूर्य मे वर रखकर ममय-समय पर उनको प्रसने बदाया। यह देखकर मा मपि रोग देवताना के लिये दौडता ह । राहु मे मर्य से दुम्ब होने के समीप पहुँच आर कहने लगे ॥१॥११॥ पर मूर्य को क्रोध हो आया । उन्होंने अपने मन आर अर्द्धगति के ममय मागका के रिय में यह विचार किया कि, मैने देवताबों के हित भयानक अग्नि-दाह देख पड़ेगा। इसमें तीनों रोक के कारण राहु से वेर म्वरीट गिया है । क्ट के नष्ट हो जायेंगे । तर मर ऋषि जोर देना नमा ममय मग महायता करने वाग कोई नहीं दम के पास नाकर बोले कि, है भगउन् ' आन पर परता । राहु मुझे प्रमता है आर देयता उमे कुछ दार में उत्पन हुआ भय क्मि हैि । अभी नीं कहत । इस कारण सूर्य ने सम्पूर्ण ममार को तक मूर्य उदय नहीं हुआ, तो भा ताप में तीनों नार करने का यन क्यिा है । और अम्नाचर में लोक मानों रे सा रहे हैं। और भगवान सूर्य के नाकर मारे विधको नष्ट करने के लिये अपना तेन उच्य होने पर न जान मा मय होगा। यानी Care ve मराभारत [ आदिपर्व करिष्यति च सारथ्यं तेजश्चास्य हरिष्यति ॥ १७॥ लोकानां स्वस्ति चैवं स्याहपीणां च दिवौकसाम् । प्रमतिरवाच-ततः पितामहाज्ञातः सर्व चके तदाऽरुणः ॥ १८ ॥ उदितश्चेव सविता सविता ह्यरुणेन समावृतः । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्सूर्यं मन्युराविशत् ॥ १९ ॥ अरुणश्च यथैवास्य सारथ्यमकरोत्प्रभुः । भूय एवापरं प्रश्नं शृणु पूर्वमुदाहृतम् ॥ २० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपणे चतुर्विशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ बोले-सूर्य ने क्रोध में होकर तीनों लोकों को भस्म ने ब्रह्मा की आज्ञानुसार वैसा ही किया । प्रात करने का विचार किया है । उसका उपाय कश्यप काल सूर्योदय होने पर अरुण ने उमके तेज को के पुत्र बुद्धिमान् अरुण से होगा । बडे भारी शरीर । धीमा किया और सारथी का काम करने लगे। वाले, महातेजस्वी अरुण सूर्य के आगे बैठेंगे। सूर्य के क्रोधित होने का और अम्ण के सारथी वह सूर्य के सारथी होकर उनके तेज को धीमा । बनने का वृत्तान्त तुमने सुन लिया । अब पहले के कर देंगे । इस प्रकार तीनों लोकों, देवताओं और अपने प्रश्न का उत्तर सुनो ॥१२॥२०॥ ऋपियों का कल्याण होगा । प्रमति बोले-अरुण आदिपर्व का चौबीसवा अध्याय समाप्त हुआ। । -.- अथ पञ्चविंशोऽध्याय ॥ २५ ॥ मातिम्गाच-ततः कामगमः पक्षी महावीर्यों महाबलः । मातुरन्तिकमागच्छत्परं पारं महोदधेः ॥ १ ॥ यत्र सा विनता तस्मिन्पणितेन पराजिता । अतीव दुःखसंतप्ता दासीभावमुपागता ॥२॥ ततः कदाचिद्विनतां प्रणतां पुत्रसन्निधौ । काले चाहृय वचनं करिदमभापत ॥ ३॥ ॥ पचीमयां अध्याय २५ ।। उप्रश्रया पाने. हे पिया ! इसके पश्चात गर्त के हारने पर अति दु.सित दासीपने से रहती महापरी, महापराक्रमी, अपनी इच्छा के अनुसार थी। एक समय विनता अपने पुत्र के पास बैठी गगन कामे वारा यह पनी गाड़ समुद्र के पार हुई थी। उसी समय कद्रु ने बुलाकर कहा-हे माना के गीप आया ! जहां उगा माना विनता भद्र ! मुझे समुद्र में जहा नागों का वड़ा रमणीक अध्याय २५] महाभारत ५. । नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम् । समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय ॥४॥ ततः सुपर्णमाता तामवहत्सर्पमातरम् । पन्नगान्गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ॥ ५॥ स सूर्यमभितो याति वैनतेयो विहंगमः । सूर्यरश्मिप्रतप्ताश्च मूर्छिताः पन्नगाऽभवन् ॥ ६ ॥ तदवस्थान्सुतान्दृष्ट्वा कटूः शक्रमथास्तुवत् नमस्ते सर्वदेवेश सर्वदेवेश नमस्ते बलसूदन ॥७॥ नमुचिन्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते । सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव ॥ ८॥ त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम । ईशो ह्यसि पयः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरंदर ॥ ९ ॥ त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमग्निर्विद्युतोऽम्बरे । त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुमहाधनम् ॥१०॥ त्वं वज्रमतुलं घोरं घोपवांस्त्वं बलाहकः । स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहता चापराजितः ॥ ११ ॥ स्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः । वं महद्भूतमाश्चर्य त्वं राजा स्वं सुरोत्तमः ॥ १२ ॥ स्थान है वहां ले चलो । तव विनता ने कटु को अपने हो । सूर्य की किरणों से तपे हुए सर्यों की जल से कंधे पर चढ़ा लिया और अपनी माता की आज्ञा से रक्षा करो। हे देवताओं में श्रेष्ठ | आप ही इस गरुड़जी ने सी को कंधेपर रख लिया। और वहां समय हमारी रक्षा करने वाले हैं। हे पुरन्दर से सूर्य के सन्मुख होकर चले । सूर्य के तेज से आप बहुत से जल को वर्षाने में समर्थ हो। आकाश सब सर्प मूच्छित हो गये । ऐसी हालत देखकर में आपही मेघ हो । आपही वायु हो । आपही कद्रु इन्द्र की स्तुति करने लगी । हे इन्द्र ! मै अनि हो । आपही बिजली हो । आपही बादली तुझको नमस्कार करती हूं । हे बलसूदन ! आप | के समूह को चलाने वाले हो । आपही को महा- को नमस्कार हो । हे हज़ार नेत्र वाले, हे नमुचि । मेघ कहते है ॥१।१०॥ के मारने वाले इन्द्राणि के पति ! तुझको नमस्कार आप अद्वितीय भयानक वज़ हो और गरजने महाभारत | आ-िपत्र त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षरत्वं देवस्त्वं परायणम् । त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः ॥ १३ ॥ त्वं मुश्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुनः क्षणः । शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा । संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ॥ १४ ॥ त्वमुत्तमा सगिरिवना वसुंधरा सभास्करं वितिमिरमम्बरं तथा । महोदधिः सतिमितिभिंगिलस्तथा महोर्मिमान्बहुमकरो अपाकुलः ॥ १५ ॥ महायशास्त्वमिति सदाऽभिपूज्यसे मनीपिभिमुदितमना महापभिः । आभिष्टुतः पिवसि च सोममध्वरे वपट् कृतान्यपि च हचीपि भूतये ॥ १६ ॥ त्वं विप्रैः सततमिहेज्यसे फलार्थं वेदाङ्गेष्वतुलवलौघ गीयसे च । त्वद्धतोर्यजनपरायणा द्विजेन्द्रा वेदाङ्गान्यभिगमयन्ति सर्वयत्नैः ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मौपणे पञ्चविंशोऽध्याय ।। २५ ।। वाले बादल हो । आप तीनों लोकों को उत्पन्न तिमिगल और अनेक प्रकार के मकर और मछलियों जार प्रलय करने वाले हो। आए अपराजित हो । से भरे हुए समुद्र हो । आप महायगम्बी हो आप सब प्राणियों को प्रकाश देने वाले सूर्य और और इसी से महिप लोग आप की आराधना करते अमि हो । आप सब के राजा और सब देवताओं है । यजों में आप की स्तुति की जाती है । आप में श्रेष्ठ हो । आप विष्णु, समनयन, इन्द्रदेव यज्ञ में आकर सोमबलि और हवि और ससार के और मर्वोत्तम आश्रय हो । आप मोक्ष हो और ऐश्वर्य को ग्रहण करते हो । फल की प्राप्ति के परम पृजिन चन्द्रमा हो । आप महत, तिथि, पल, लिये ब्राह्मण आय की उपासना किया करते है। क्षण, शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष, क्ला, काष्टा, त्रुटि, आप महापराक्रमी हो और सारे चेद और वेदाङ्ग गंवत्मर, ऋतु, माम, रात और दिन हो । आप तुम्हारे ही अचिन्तनीय अनन्त महिमा का कीर्तन पनों आर यनों में युक्त पृथ्वी हो । आप सूर्य करते है । यज्ञ करने वाले बडे ब्राह्मण सम्पूर्ण यत्नों मदिन 'अन्धकार रहिन आगाम हो । आप तिमि, मे वेदाङ्गों को यज्ञों में सफल कराते है ॥११॥१७॥ आदिपर्व का पीसवां अधय समाप्त हुआ। अथ पविमोऽध्याय ॥६॥ गानिमाम-एवं स्तुनम्तदा कन्या भगवान्हरिवाहनः । नीलजीमृतसंघातः सर्वमम्बरमावृणोत् ॥ १ ॥ मेघानालापयामास वर्पध्यममृतं शुभम् ।

अध्याय २७]
म हा भारत
:
ते मेघा मुमुचुस्तोयं प्रभूतं विद्युदुज्ज्वलाः ॥ २॥
परस्परमिवात्यर्थ गर्जन्तः सततं दिवि ।
संवर्तितमिवाकाशं जलदैः सुमहाद्भुतैः ॥३॥
सृजद्भिरतुलं तोयमजस्त्रं सुमहारवैः ।
संप्रनृत्तमिवाकाशं
धारोमिभिरनेकशः ॥४॥
मेघस्तनितनि?पैर्विद्युत्पवनकम्पितैः
तैमघैः सततासारं वर्षद्भिरनिशं तदा ॥५॥
नष्टचन्द्राककिरणमम्वरं
समपद्यत ।
नागानामुत्तमो हर्पस्तथा वर्षति वासवे ॥ ६ ॥
आपूर्यत मही चापि सलिलेन समन्ततः ।
रसातलमनुप्राप्तं शीतलं विमलं जलम् ॥ ७॥
तदा
भूरभवच्छन्ना जलोर्मिभिरनेकशः ।
रामणीयकमागच्छन्मात्रा सह भुजंगमाः ॥८॥
इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे पड्विंगोऽध्याय ॥२६॥
|| छतीसवां अध्याय २६ ॥
उग्रश्रवा बोले-कद्रू के इस प्रकार स्तुति करने ' वादलों से चन्द्रमा और सूर्य आकाश मण्डल में छिप
पर भगवान् इन्द्र ने नीले बादलों से आकाश ढक , गये । और इन्द्र के इस प्रकार जल वर्षाने पर सर्पो
दिया । इन्द्र ने मेघा को उत्तम जल वर्षाने की आज्ञा को वडा आनन्द हुआ । पृथ्वी में चारों और जल ही
दी। और बिजली के प्रकाश से उज्ज्वल उन मेघों से जल दीखने लगा । शीतल और निर्मल जल पृथ्वी
बड़ा जल वर्पने लगा । गर्जते हुए बादल ने आकाश । के विरों से रसातल तक पहुंच गया। पृथ्वी तरहो
को ढक लिया । बडे गन्दों से जल को बर्साते हुए , सहित जल से भर गई । और अपनी माता क्दू के
बादरों की धाराओं से आकाश मण्डर में नृत्य सा साथ सव साँप समुद्र के भीतर रमर्णाय द्वीप में पहुंच
हो गया । उन विजली और पवन से काँपते हुए गये ॥१८॥
आदिपर्वमा छब्बीसवा अध्याय समाप्त हुआ।
.
अथ मप्तविंयोऽध्याय ॥२७॥
सौतियाच संहृष्टास्ततो नागा जलधाराप्लुतास्तदा ।
सुपर्णेनोह्यमानास्ते जग्मुस्तं द्वीपमाशु वै ॥ १ ॥

१५८ महाभारत [ आदिपर्य तं द्वीपं मकरावासं विहितं विश्वकर्मणा । तत्र ते लवणं घोरं ददृशुः पूर्वमागताः ॥ २ ॥ सुपर्णसहिताः सर्पाः काननं च मनोरमम् । सागराम्बुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिनादितम् ॥ ३ ॥ विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम् भवनरावृतं रम्यैस्तथा पद्माकरैरपि ॥ ४ ॥ प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्रदैर्दिव्यैविभूपितम् । दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम् ॥ ५ ॥ उत्पतद्भिरिवाकाशं वृक्षैर्मलयजैरपि । शोभितं पुष्पवर्षाणि पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धतैः ॥ ६ ॥ वायुविक्षिप्तकुसुमैस्तथाऽन्यैरपि पादपैः । किरद्भिरिव तत्रस्थान्नागान्पुष्पाम्बुवृष्टिभिः ॥ ७ ॥ मनःसहर्पजं दिव्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् । मत्तभ्रमरसंघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम् ॥ ८॥ रमणीयं शिवं पुण्यं सर्जनमनोहरैः । नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रूपुत्रप्रहर्पणम् ॥ ९ ॥ तत्ते वनं समासाद्य विजन्हूः पन्नगास्तदा । अब्रुवंश्च महावीर्य महावीर्य सुपर्ण पतगेश्वरम् ॥ १०॥ ॥ सत्ताईसवां अध्याय ।। २७ ।। उग्रश्रवा बोले-हे ऋपियो ! इसके अनन्तर की पंक्ति लग रही थी। तालावों में सुन्दर कमल जल वपन से न्हाए और आनन्द के साथ सब फूल रहे थे । शीतल मंद सुगंध वायु चल रही थी। नाग गरह की पीठ पर सवार हो शीघ्र उस द्वीप और आकाश से मिले हुओं के समान वायु में पहुंच गये। वह द्वीप विश्वकर्मा ने मकरों के वेग से पुष्पों की वर्षा बरसाते हुए मलयाचल के रहने का स्थान बनाया था। वहा आते ही घोर वृक्षों से शोभित था। अनेक प्रकार के वृक्षों से स्वणामुर और मनोरमानन को देगा । और पुष्प गिरे हुए ऐसे प्रतीत होते थे मानों नागों गम्ड गदिन सपा में गमुद्र के जल से व्याप्त और पर पुष्प। वह पुष्प जल की वर्षा के समान वर्पते अनेक प्रकार के पक्षियों के शब्दों से युक्त मनोहर थे। और अन्तःकरण को आनन्द देने वाले दिव्य पनगे देम्वा । यहां अनेक प्रकार के फल फूलों ' गन्धर्य और अप्सराओं के प्रिय और उन्मत्त प्रमरों अध्याय २७ ] महाभारत वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं द्वीपं सुरम्यं विमलोदकम् । त्वं हि देशान्वहूरम्यान्वजन्पश्यसि खेचर ॥११॥ स विचिन्त्यात्रवीत्पक्षी मातरं विनतां तदा । किं कारणं मया मातः कर्तव्यं सर्प भाषितम् ॥ १२॥ विनतीयाच-दासीभूतास्मि दुर्योगात्सपल्याः पतगोत्तम । पणं वितथमास्थाय सपैपधिना कृतम् ॥ १३ ॥ तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः । उवाच वचनं सांस्तेन दुःखेन दुःखितः ॥ १४ ॥ किमाहृत्य विदित्वा वा किंवा कृत्वेह पौरुपम् । दास्याद्वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहाः ॥ १५ ॥ सौतिम्बाच-श्रुत्वातमब्रुवन्सपों आहरामृतमोजसा । ततो दास्याद्विप्रमोक्षो भविता तव खेचर ॥ १६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपणे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ।। के शब्द से युक्त, मनोहर आकृति वाले रमणीय । हे गरुड़ ! मेरी सौति कद्रू ने कपट से शर्त को कल्याणरूप, पवित्र, मनको हरणे वाले अनेक । जीत लिया है, इसीसे मैं उसकी दासी हो गई प्रकार के पक्षियों के शब्द से मनोहर शब्द युक्त, । हूं । उग्रश्रवा बोले-हे ऋपियो ! माता के सब कद्रू के पुत्रों को आनन्द देने वाले उस बन को वृत्तान्त को सुनकर गरुड़ को बड़ा दुःख हुआ । पाकर वह सर्प आनन्द से रहने लगे, और बड़े ! उन्होंने सों को कहा हे सों ! किस वस्तु के पराक्रमी पक्षियों के स्वामी गरुड़ से बोले ॥१॥१०॥ लाने से वा किस के जानने से या किस पुरुषार्थ हे गरुड़ ! आप अनेक प्रकार के मनोहर । के करने से तुम्हारे दासीपने से मेरी माता छूटे । देशों में फिरते हुए देखते है इस कारण हमको उग्रश्रवा बोले-यह सुनकर सर्पो ने गरुड़ से कहा- बड़े उत्तम जल वाले किसी दूसरे द्वीप में ले चलो। आप अमृत ले आवे । हम आप को और आप वह गरुड़ कुछ विचार कर अपनी माता से बोला- | की माता विनता को दासीपने से रहित कर देंगे है माता ! क्या कारण है जो मुझको सर्पो की ११११६॥ आज्ञा का पालन करना पड़ता है । विनता बोली- आदिपर्व का सत्ताईसवां अध्याय समाप्त हुआ ।

[ आदिप १६० महाभारत + अथ अष्टविंशोऽध्याय ॥ २८ ॥ सौतिग्याच-इत्युक्तो गरुडःसपैस्ततो . मातरमब्रवीत् । गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ॥ १ ॥ विनतोवाच-समुद्रकुक्षावेकान्ते निपादालयमुत्तमम् । निषादानां सहस्राणि तान्भुक्त्वामृतमानय ॥ २ ॥ न च ते ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कथंचन । अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो ह्यनलोपमः ॥ ३ ॥ अग्निरों विपं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः । गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥ एवमादिभि रूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणे मतः । स ते तात न हन्तव्यः संकुद्धेनापि सर्वथा ॥ ५ ॥ ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्त्तव्यः कथंचन । न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात्तथाऽनघ ॥ ६ ॥ यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः । तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ॥ ७ ॥ . भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः । -किरूपो ब्राह्मणो माताः किंशीलः किंपराक्रमः ॥ ८॥ ॥ अठाईसवा अध्याय २८ ॥ उग्रश्रवा पारे-हे ऋषियो । गरड जी यह अमि के समान है । प्रोध होने पर ब्राह्मण अमि, यात सों की सुनकर अपनी माता के पास आये सूर्य, विष और शस्त्र के तुल्य हो जाता है । सम्पूर्ण और कहा कि, हे माता अमृत लेने को जाता प्राणियों का गुरु ब्राह्मण कहा है । इसीसे सब है। परन्तु मुझे इस समय भूरा बहुत लगी है। रोग उसका बड़ा आदर करते है । हे बेटा-मोधातुर यताओं में इम सगय क्या साऊ - विनता बोरी होकर ब्राह्मण को कभी न मारना चाहिये और कि, इस समुद्र में आगे एकात में सहसा निपाद उसके साथ किसी प्रकार का उर भी न करना ( माह ) रहते हैं । तुम उनको भक्षण करके चाहिये । जिस प्रकार शमितव्रत ब्राह्मण क्रोध के अमन रे आओ। परन्तु देखियो, किमी ब्राह्मण रश में भम्म कर सकता है उस प्रकार अनि सूर्यादि को माग्ने या गाण करने का निश्चय न करना। नही कर सकते । जनेक प्रकार के चिह्नों से तुम प्रामण मय प्राणियों का अवध्य है क्योंकि वह ब्राह्मण को जानो । प्राक्षण सर्व वर्गों में श्रेष्ठ, अन्य गाड उवाच- । -- । ।

अध्याय २८] महाभारत तं किंस्विदग्निनि भो भाति किंस्वित्सौम्यप्रदर्शनः । यथाऽहमीभजानीयां ब्राह्मणं लक्षणैः शुभैः ॥ २॥ तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि । बिनतोवाच-यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीणं बडिशं यथा ॥ १० ॥ दहेदकारवत्पुत्र विद्यादब्राह्मणपभम् । विप्रस्त्वया न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ॥ ११ ॥ प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जठरे न च जीयेंद्यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम् ॥ १२ ॥ पुनः प्रोवाच विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जानन्त्यप्यतुलं वीर्यमाशीर्वादपरायणा ॥ १३ ॥ प्रीता परमदुःखार्ता नागैर्विप्रकृता सती । विनतोथाच-पक्षी ते मारुतः पातु चन्द्रसूर्यों च पृष्ठतः ॥ १४ ॥ शिरश्च पातु वहिस्ते वसवः सर्वतस्तनुम् । अहं च ते सदा पुत्र शान्तिस्वस्तिपरायणा ॥ १५ ॥ इहासीना भविष्यामि स्वस्तिकारे रता सदा । अरिष्टं ब्रज पन्थानं पुत्र कार्यार्थसिद्धये ॥ १६ ॥ मातिम्वाच-ततः स मातुर्वचनं निशम्य वितत्य पक्षौ नभ उत्पपात । ततो निषादान्वलबानुपागतो बुभुक्षितः काल इवान्तकोऽपरः ॥ १७ ॥ वर्णों का पिता और गुरु के ममान पूजनीय है पीडा करे जैसे मच्छली का काटा गले में छिद गरुड़ ने कहा-हे माता ! ब्राह्मण के जानने की जानेसे खटक्ने लगता है, उमे तुम ब्राह्मण समझना । क्या पहिचान है। उसका रूप, गील और पराक्रम जो पेट में आते पीछे पचे नहीं उसे श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसा है । और वह कभी सौम्यदर्शन और कभी समझना ॥१॥१२॥ अगि के ममान क्योंकर प्रतीत होता है । किम प्रकार विनता ने फिर कहा- यद्यपि उसके पगक्रम मे शुभ लक्षणों से ब्राह्मण को मै आनू । हे माता! को जानती थी तो भी पुत्र-म्नेह के कारण आगी- तुम इम कारण को कहने योग्य हो । बिनता दि देकर बोली-हे पुत्र ! तेरे परों की वायु, पीट वाली-हे पुत्र ! भक्षण करते समय जो पुरुष तुम्हारे की मूर्य और चन्द्रमा रक्षा करें । अनि तुम्हारे गले को अग्नि के ममान-जलावे और कठ में ऐसी मम्तक की रक्षा करें। और वसुगण तुम्हारे सब म हा भारत । [ आदिपर्व ramma स तान्निपादानुपसंहरंस्तदा रजः समुद्भय नभःस्पृशं महत् । समुद्रकुक्षौ च विशोषयन्पयः समीपजान्भूधरजान्विचालयन् ॥ १८ ॥ ततः स चक्रे महदाननं तदा निषादमार्ग प्रतिरुध्य पक्षिराट् । ततो निषादास्त्वरिताः प्रवव्रजुर्यतो मुखं तस्य भुजङ्गभोजिनः ॥ १९ ॥ तदाननं विवृतमतिप्रमाणवत्समभ्ययुगगनमिवार्दिताः खगाः । सहस्रशः पवनरजोविमोहिता यथाऽनिलप्रचलितपादपे वने ॥ २० ॥ ततः खगो वदनममित्रतापनः समाहरत्परिचपलो महावलः । निपूदयन्बहुविधमत्स्यजीविनो बुभुक्षितो गगनचरेश्वरस्तदा ॥ २१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपणे अष्टाविंगोऽध्यायः ।। २८ ।। शरीर की रक्षा करें । हे पुत्र ! मै तुम्हारे मगल के में जलों को सुखा और पहाड़ों को हिलाते हुए लिये यहां पर बैठी हुई सब देवताओं की अराधना उस गरुड़ ने निषाधों के रास्ते को रोककर अपना किया करूंगी। और हे पुत्र ! कार्य करने के लिये मुख खोला । तिसके उपरान्त शीघ्र ही निषाध अपने तुम बेखटके चले जाओ ॥१३॥१६॥ अपने स्थानों से निकलकर गरुड़ के मुख की ओर उग्रश्रवा बोले-तिसके उपरान्त गरुड़ ने माता गये । जैसे वडी आधी से बन के वृक्ष हिलने पर के वचन को सुनकर और दोनों परों को फैला व्याकुल हुए पक्षी आकाश को उडकर जाते हैं, कर आकाश मार्ग की ओर गमन किया । भूखे वैसे ही गमड के परों की हवा, और धूल से विह्वल काल और मृत्यु के समान बलवान् गम्ड निपाधों हजारों मल्लाह गरुड़ के खोले हुए मुख में प्रवेश के समीप पहुंच गये । मल्लाहों का संहार करने के होगये । तब महापराक्रमी और भूख से व्याकुल लिये गरुड़ ने परों से इतनी धूल उडार्ट कि, गरुड हजारों मल्लाहों को खाने लगे ॥१७॥२१॥ आकाम तक पहुंच गई । और समुद्र की कोरव अटार्टमयां अध्याय ममाप्त हुआ ॥२८॥ अथ एकोनत्रिशोऽध्याय ॥ २५ ॥ गौनिवाच -नस्य कण्ठमनुप्रामो ब्राह्मणः सह भार्यया । दहन्दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षगः ॥ १॥ द्विजोत्तम विनिर्गच्छ तूर्णमास्यादपावृतात् । न हि में ब्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ॥ २॥ ॥ उनतीमयाँ अध्याय २५ ॥ आश्रया बोले है सपियो जर गर जी ने प्रामण अपनी स्त्री महित अगार के समान जरता अपना मुग बन्द कर लिया सब उनके गले में एक हुआ चरा गया । गरुड़ जी उसे ब्रामण समझकर । यह -०- अध्याय २९ ] महाभारत m ब्रुवाणमेवं. गरुडं ब्राह्मणः प्रत्यभापत । निषादी मम भाययं निर्गच्छतु मया सह ॥३॥ गरड़ उवाच-एतामपि निषादी वं परिगृह्याशु निष्पत । तूर्णं संभावयात्मानमजीणं मम तेजसा ॥४॥ मोतिम्बाच-ततः स विप्रो निष्क्रान्तो निपादीसहितस्तदा । वर्जयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह ॥ ५॥ सहभायें विनिष्क्रान्ते तस्मिन्विप्रे च पक्षिराट् । वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ॥६॥ तनोऽपश्यत्स पितरं पृष्टश्चाग्न्यातवान्पितुः । यथान्यायममेयात्मा तं चोवाच महातृपिः ॥७॥ कश्यप उवाच-कञ्चिद्वः कुशलं नित्यं भोजने बहुलं सुत । कञ्चिच मानुष लोके तवान्नं विद्यते बहु ॥ ८ ॥ गम्ड उवाच-माता मे कुशला शश्वत्तथा भ्राता तथा ह्यहम् । न हि मे कुशलं तात भोजने बहुले सदा ॥ ९ ॥ अहं हि सर्पः प्रहितः सोममाहर्तुमुत्तमम् । मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिप्चे तमय वै ॥ १० ॥ सात्रा चात्र समादिष्टो निपादान्भक्षयति ह । न च मे तृप्तिरभवद्भवयित्वा सहस्त्राः ॥११॥ बोले- हे ब्राह्मण ! तुम मेरे मुख मे गीघ्र बाहर गम्ड ने उस ब्राह्मण के स्त्री सहित निकलने पर निकल जाओ । यदि ब्राह्मण पापी भी हो तो भी मेरा आकाग को गमन किया । इसके पश्चात् उसने अवय है । ब्राह्मण ने उत्तर दिया-हे महाराज' अपने पिता कश्यप को देया, और पिता के पूछने मेरी निपादिनी म्बी भी है बिना उमके किस प्रकार पर यथायोग्य उत्तर दिया । उसमे फिर महर्षि निकल । गरुड जी बोले-तुम उसे भी लेकर शीघ्र ने पूछा पुत्र ! तुम्हारे सन कुशल तो है, निकल जाओ । उग्रश्रया बोले-इमके उपरान्त वह और भोजन पूर्ण रीति से मिलता है। क्या मनुष्य- ब्राह्मण अपनी बी सहित गरुड जी के मुखम निकल लोक में अन्न बहुत होता है ? गरड बोले-हे पिता भाया और गरुड जी को आशीर्वाद देकर क्मिी जी ! मेरी माता और भाई और में कुगल से हूं। देश को चला गया । मन के समान गति वाले परन्तु मनुष्यलोक में पेट भर भोजन नहीं मिन्ता । कश्यप [ आदिपव महाभारत तस्माद्भक्षं त्वमपरं भगवन्प्रदिशव मे । यद्भुक्त्वाऽमृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ॥ १२ ॥ क्षुत्पिपासाविघाता) भक्ष्यमाख्यातु भवान् । कश्यप उवाच-इदं सरो महापुण्यं देवलोकेऽपि विश्रुतम् ॥ १३ ॥ यत्र कूर्माग्रज हस्ती सदा कर्पत्यवाङ्मुखः । तयोजन्मान्तरे वैरं संप्रवक्ष्याम्यशेपतः ॥ १४ ॥ तन्मे तत्त्वं निवोधस्व यत्प्रमाणौ च तावुभौ । आसीद्विभावसुर्नाम महर्षिः कोपनो भृशम् ॥ १५ ॥ भ्राता तस्यानुजश्वासीत्सुप्रतीको महातपाः । स नेच्छति धनं भ्राता सहैकस्थं महामुनिः ॥ १६ ॥ विभागं कीर्तयत्येव सुप्रतीको हि नित्यशः । अथाब्रवीच तं भ्राता सुप्रतीकं विभावसुः ॥ १७ ॥ विभागं बहवो मोहात्कर्तुमिच्छन्ति नित्यशः । ततो विभक्तास्त्वन्योऽन्यं विक्रुध्यन्तेऽर्थमोहिताः ॥ १८ ॥ ततः स्वार्थपरान्मूढान्पृथग्भूतान्स्वकैर्धनैः । विदित्वा भेदयन्त्येतानमित्रा मित्ररूपिणः ॥ १९ ॥ और मों ने अमृत लाने के लिये मुझे भेजा है । नीचा किये एक हाथी कच्छप रूप अपने बड़े भाई मैं माता को दासीपने मे रहित करने के लिये अमृत को ऊपर की ओर खींचता है, उसके दूसरे जन्म लेने जाता है । और माता ने मुझे आज्ञा दी थी के सम्पूर्ण पैर का वर्णन सुनो । विभावसु नाम वाला कि तुगन निपाधों का भक्षण करना, परन्तु उन महर्षि अत्यत क्रोधी था, और उसका छोटा भाई हजारों को भी पाकर मेरी तृप्ति नहीं हुई है। सुप्रतीक नाम महातपम्बी था । सुप्रतीक अपने बड़े ॥१॥११॥ भाई के माथ नहीं रहना चाहता था । वह अपने इसमे अब आप मुझे कुछ और उपाय यताव बड़े भाई को मंदैव विभाग करने को कहता था। निमका भक्षण कर मैं अमृत लाने को ममर्थ हो टमके उपरान्त एक दिन विभावसु ने सुप्रतीक से जाऊं । भूम और प्याम दूर करने के लिये आप कहा-मर्वदा यहुत से लोग मूर्यता से विभाग करने मुझसे भोजन यतान के योग्य है। कश्यप ने कहा की इच्छा करते है और अलग होकर धन से पुत्र! पाम ही यह नाराब जो देख रहे हो बड़ा मोहित हो परम्पर क्रोध करते हैं । म्याधी मूर्य पवित्र और वर्गक में भी प्रसिद्ध है । इममें मिर गंगों को जब इस प्रकार धन की प्राप्ति होजाती अयाय २९ ] महाभारत २६५ विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्यथ । भिन्नानामतुलो नाशः नाशः क्षिप्रमेव प्रवर्तते ॥ २०॥ तस्माद्विभागं भ्रातॄणां न प्रशंसन्ति साधवः । गुरुशास्त्रे निवद्धानामन्योन्येनाभिशङ्गिनाम् ॥ २१ ॥ नियन्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि । यस्मात्तस्मात्सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यासि ॥ २२ ॥ शतस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमधाब्रवीत् । त्वमप्यन्तर्जलचरः कच्छपः संभाविष्यास ॥ २३ ॥ एवमन्योन्यशापात्तो सुप्रतीकविभावसू । गजकच्छपतां प्राप्तावार्थ मूढचेतसौ ॥ २४ ॥ रोपदोपानुषतेण तिर्यग्योनिगतावुभो । परस्परद्वेषरतो प्रमाणवलदर्पितौ ॥ २५ ॥ सरस्थम्मिन्महाकायौ पूर्ववैरानुसारिणौ । तयोरन्यतरः श्रीमान्समुपैति महागजः ॥ २६ ॥ यस्य बंहिताब्देन कूमोऽप्यन्तर्जलेशयः । उत्थितोऽसौ महाकायः कृत्स्नं विक्षोभयन्सरः ॥ २७ ॥ है । तब मित्रका रूप रखने वाले शत्रु धुसकर आपम इस प्रकार मुप्रतीक विमावसु ये बोला-तुम मी में क्लेग डारते है। जन भाई आपस में अरग मेर गाप से जल्यामी कच्छप होगे ॥२॥२३॥ होते हैं तो उनका गीघ्र नाग हो जाता है इस प्रकार मूर्व सुप्रतीक आर विभावसु धन ॥१२॥२०॥ के लिये परम्पर बाप देकर हाथी आर कच्छप हो दम कारण महात्माओं ने बडा के बड़प्पन गये । धन के कारण उन दोनों मूखों की यह जानने वाले शान्त्र में बताने वाले परम्पर मर्यादा योनि हुई। अपने गरीर के बडे वर के घमण्ड से भन के कारण गका करने वाले भाटयों का विभाग दोनों परम्पर बरी हुए । इस तालाब में वही देह अच्छा नहीं कहा है । विभावमु के समझाने पर वाले और पूर्व वैर के अनुसार द्वेषयुक्त है। उन भी सुप्रतीक ने न माना और सदैव विभाग के दोनों में से एक गोमायुक्त हाथी इस ताराम में लिये कहते रहे । तन एक दिन निमावसु ने क्रोध आता है । उसकी आवान को मुनकर कहआ मी में आकर शाप दिया कि, तुमने मेरा कहना नहीं जल के अन्दर से बडे दह के साथ उठा हुआ माना है इससे तुम हाथी की देह धारण करोगे। मारे सरोवर को हा देता है ॥२४॥२७॥ । ।

[ आदिपव म हा भारत यं दृष्ट्वा वेष्टितकरः पतत्येप गजो जलम् । दन्तहस्ताग्रलांगूलपादवेगेन वीर्यवान् ॥ २८॥ विक्षोभयंस्ततो नागः सरो वहुरुपाकुलम् । कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धायाभ्येति वीर्यवान् ॥ २९ ॥ पडुच्छ्रितो योजनानि गजस्तद्विगुणायतः । कूर्मस्त्रियोजनोत्सेधो दशयोजनमण्डलः ॥ ३० ॥ तावुभौ युद्धसंमत्तौ परस्परवधैपिणो । उपयुज्याशु कमेंदं साधयहितमात्मनः ॥ ३१ ॥ महाभ्रधनसंकाशं तं भुक्त्वाऽमृतमानय । महागिरिसमप्रग्यं घोररूपं च हस्तिनम् ॥ ३२॥ मौतिवाच-इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत्तदा । युध्यतः सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम् ॥ ३३ ।। पूर्णकुम्भो द्विजा गावो यच्चान्यत्किंचिदुत्तमम् । शुभं स्वस्त्ययनं चापि भविष्यति तवाण्डज ॥ ३४ ॥ युध्यमानस्य संग्रामे देवैः सार्ध महावल । ऋचो यपि सामानि पवित्राणि हवींपि च ॥३५॥ उसको देखकर हाथी सूड को रपेट जर के भीतर उग्रश्रवा बोले है इतना कहकर कश्यप ने गरुड अपने शरीर के वेग मे नर में दोडता ह ॥२८॥ को आर्शीवाद दिया कि, हे पुत्र । देवताओं से तिम के उपरान्त यह क्रोधातुर हो जर को युद्ध करते समय तुम्हारा कल्याण हो । पूर्ण करश, हिगता हुआ युद्ध की इच्छा करता है । और ब्राह्मण, गायें ओर जो कुछ उत्तम वस्तु शुभ ओर सगुआ भी युद्ध करने को गिर निकाल कर दाहता कल्याणकारी हैं, हे गरुर वह तुम्हारा मगर है। हाथी छ योनन ऊचा और बारह योनन रें। देवताआ के साथ निस समय तुम युद्ध चांग है और का तान योनन ऊचा और दस करोगे उस समय ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद यज्ञ योना चाग । उन दोनों परम्पर युद्ध म उनमत्त का पवित्र हवि और सम्पूर्ण रम्य तुमको बल दें। एक दमरों के मारने की इच्छा करन वारों को इस प्रकार पिता से आशीर्वाद दिया हुआ गरड माकर अपने कार्य का सिद्धार बड़े यादरों के उस सरोवर के पास गया । उस आकाश मार्ग में मान भयानक पर्वन की माटेर यारे हाथी को जाने वाले और भयानक वेग वार अनेक प्रकार मार अगून रात्री ॥२०॥३२॥ के परियों से युक्त निर्मल जर वारे तागब को अध्याय २९] म हा भारत Ann-AASATA-A-MASA----- ~ काञ्चनै रहस्यानि च सर्वाणि सर्वे वेदाश्च ते बलम् । इत्युक्तो गरुडः पित्रा गतस्तं हृदमन्तिकात् ॥ ६ ॥ अपश्यन्निर्मलजलं नानापक्षिसमाकुलम् । स तत्स्मृत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः ॥ ३७॥ नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् । समुत्पपात चाकाशं तत उच्चैविहङ्गमः ॥ ३८ ॥ सोऽलम्वं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् । ते भीताः समकंपन्त तस्य पक्षानिलाहताः ॥ ३९ ॥ न नोभंज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः । प्रचलाङ्गान्स तान्दृष्ट्वा तान्दृष्ट्वा मनोरथफलट्ठमान् ॥ ४० ॥ अन्यानतुलरूपागानुपचकाम खेचरः । राजतैश्चैव फलैधुदूर्यशाखिनः । सागरांवुपरिक्षिप्तान्भ्राजमानान्महामान् ॥४१॥ तमुवाच खगश्रेष्ठं तत्र रोहिणपादपः । अतिप्रवृतः सुमहानापतन्तं मनोजवम् ॥ ४२ ॥ -येपा मम महाशाखा शतयोजनमायता एतामास्थाय शाखां त्वं खादेमौ गजकच्छपौ ॥ १३ ॥ ततो दुमं पतगसहस्रसेवितं महीधरप्रतिमवपुः प्रकम्पयन् । खगोत्तमो द्रुतमभिपत्य वेगवान्वभञ्ज तामविरलपत्रसञ्चयाम् ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे एकोनत्रिंगोऽध्यायः ॥ २९ ॥ देखा । अपने पिता के वचनों को म्मर्ण करता गाड़ के भय से सुमेरु पर्वत के दिव्य वृक्ष हुआ एक पंजे में हार्थी को और दूसरे में कछुए काँपने लगे । वह उन हिलते हुए फल वाले वृक्षों को पकड़कर । वह गरुड़ आकाश में उट गया । को देखकर दूमरे बड़े सुन्दर रूप वाले वृक्षों के वह बेसहारे मुमेरु पर्वत के तीर्थ रूप निखर में पास गया । उन महावृक्षों के फल सोने और जाकर कल्पवृक्षों के समीप धैठने को तय्यार हुआ। चांदी के और ग्राखायें वैदूर्यमणि की थीं। वह और वह वृक्ष उसके परों की वायु से हिलने लगा वृन समुद्र के जल से सींचे हुए थे । इन वृक्षों में ॥३३॥३९॥ । एक बहुत ऊंचा और पुराना रौहिण नाम बरगद रौहिण उवाच- महाभारत [ आदिप का पेड था । उसने गरुड जी को बडे वेग से आते । पक्षियों से युक्त और पर्वत के समान देह वाले उस हुए देखकर कहा है गरुड जी! यहा मेरी शाखा वृक्ष को हिलाते हुए उस गरुड़ ने उसपर शीघ्र सौ योजन तक फैली हुई है । इसी पर बैठकर बैठकर अत्यन्त पत्तों से भरी हुई उस शाखा को तुम दोनों प्राणियों को खा जाओ । फिर हजारों तोड़ दिया ॥४०॥४४॥ आदिपर्व का उनत्तीसवां अध्याय समाप्त हुआ | । अथ त्रिंशोऽध्याय ॥३०॥ सौतिरुपाच-स्पृष्टमात्रा तु पद्भयां सा गरुडेन बलीयसा । अभज्यत तरोः शास्वा भग्नां चैकामधारयत् ॥ १॥ तां भकत्वा स महाशाखांस्मयमानो विलोकयन् । अथात्र लम्वतोऽपश्यद्वालखिल्यानधोमुखान् ॥ २ ॥ ऋपयो ह्यत्र लम्बन्ते न हन्यामिति तानृपान् । तपारतोन्लघंमानान्ब्रह्मीनभिवीक्ष्य सः ॥३॥ हन्यादेतान्संपतन्ती शाखेत्यथ विचिन्त्य सः । नखैदृढतरं वीरः संगृह्य गजकच्छपौ ॥४॥ तद्विनाशसंत्रासादभिपत्य खगाधिपः । शाखामास्येन जग्राह तेषामेवान्ववेक्षया ॥५॥ अतिदैवं तु तत्तस्य कर्म दृष्ट्वा महर्षयः । विस्मयोत्कम्पहृदया नाम चक्रुर्महावगे ॥६॥ गुरुं भारं समासाद्योडीन एप विहंगमः । गरुडस्तु खगश्रेष्टस्तस्मात्पन्नगभोजनः ॥७॥ 11 तीसवा अध्याय ३०॥ उग्रश्रवा बोले. महापराक्रमी गरड़ के घेटते का नाश न करे ऐसा विचारकर अपने नखों से ही यह शाम्बा टूट गई । गरड़ ने उसे अपनी चोच हाथी और कछुए को पकड़कर और उन ऋपियों में पकड़ रिया । उसने उस टूटी हुई शासा को के नाश के भय से गरड ने शासा को मुख से देगार नीचे को एटफ्ते हुए वालायिव्य नामक पकड़ा ॥१५॥ पापियों को देगा । तपस्या करते हुए ऋपियों को उसके इस फर्म को जो देवताओं से भी होना गामा में रटक्ने हुए देम गिरती हुई गाम्या इन पटिन है देखकर उन प्रापियों ने उस आकान अध्याय ३.] महा मारत ततः शनैः पर्यपतत्पक्षैः शैलान्प्रकम्पयन् । एवं सोऽभ्यपतद्देशान्यहन्सगजकच्छपः ॥ ८॥ दयार्थ बालखिल्यानां न च स्थानमविन्दत । गत्वा पर्वतश्रेष्टं गन्धमादनमञ्जसा ॥ ९॥ ददर्श कश्यपं तत्र पितरं तपसि स्थितम् । ददर्श तं पिता चापि दिव्यरूपं विहंगसम् ॥ १० ॥ तेजोवीर्यवलोपेतं मनोमारुतरंहसम् । शेलशृङ्गाप्रतीकाशं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥ ११ ॥ आचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्र साक्षादग्निमिवोद्यतम् ॥ १२ ॥ अप्रधृष्यमजेयं देवदानवराक्षसैः । भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां समुद्रजलशोपणम् ॥ १३ ॥ लोकसंलोडनं घोरं कृतान्तसमदर्शनम् । तमागतमभिप्रेक्ष्य भगवान्कश्यपस्तदा । विदित्वा चास्य संकल्पमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥ कश्यप उवाच-पुत्र मा साहसं कार्माि सद्यो लप्स्यसे व्यथाम् । मा त्वां दहेयुः संकुद्धा वालखिल्या मरीचिपाः ॥ १५ ॥ में बड़े मारी बोझ को लेकर उड़ने वाले पक्षी का प्रकाशमान् , देव आदि से अजेय पहाड़ों को फोड़ने नाम गरुड़ रक्खा । वहां से गरुड़ जी कछुए आदि वाले और समुद्र का जल सुखाने वाले मृत्यु के को लिये हुए पहाड़ों को हिलाते हुए अनेक देशों समान दर्चन वाले अपने पुत्र को देखकर वोले और देगान्तरों में फिरे परन्तु वहीं उस शाखा के ॥६१४|| रखने का स्थान गम्द जी को नहीं मिला तिसके हे पुत्र ! साहस और जल्दी मत करियो । मूर्य उपरान्त घूमते हुए गन्धमादन पर्वत पर जहां की किरणों के भोजन करने वाले वालखिल्य ऋषि कश्यप जी तपस्या कर रहे थे, पहुंचे। कश्यप जी तुझे क्रोध से भम्म कर देंगे। उग्रश्रवा बोले कि, उस दिव्य रूप आकाम में मन के वेग के समान ने पुत्र के कारण बड़े भागवाले तप के चलने वाले, बल वीर्य से परिपूर्ण, पहाट के बल से निष्पाप वालखिल्य ऋषियों को स्तुति से अति भयानक स्वरूप वाले, रौद्र अग्नि के समान प्रसन्न किया । कश्यप बोले-हे तपोधन ! गरुड़ का कश्यप तुल्य महाभारत [ आदिपय (Vo 1 सौतिवाच-एवमुक्ता सौतिस्वाच-ततः प्रसादयामास कश्यपः पुत्रकारणात् । वालखिल्यान्महाभागांस्तपसा हतकल्मपान् ॥ १६ ॥ कश्यप उवाच-प्रजाहितार्थमारम्भो गरुडस्य तपोधनाः । चिकीर्षति महत्कर्म-तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ १७ ॥ भगवता मुनयस्ते समभ्ययुः । मुक्त्वा शाखां गिरिं पुण्यं हिमवन्तं तपोऽर्थिनः ॥ १८ ॥ ततस्तेष्वपयातेषु पितरं विनतासुतः । शाखाव्याक्षितवदनः पर्यपृच्छत कश्यपम् ॥ १९ ॥ भगवन्क्क विमुञ्चामि तरोः शाखामिमामहम् । वर्जितं मानुपैर्देशमाख्यातु भगवान्मम ॥ २० ॥ ततो निःपुरुपं शैलं हिमसंरुद्धकंदरम् । अगम्यं मनसाप्यन्यैस्तस्याचख्यौ स कश्यपः ॥ २१॥ तं पर्वतं महाकुक्षिमुद्दिश्य स महाखगः । जवेनाभ्यपतत्तार्क्ष्यः सशाखागजकच्छपः ॥ २२ ॥ न तां वध्री परिणहेच्छतचा महातनुम् । शाखिनो महतीं शाखां यां प्रगृह्य ययौ खगः ।। २३ ॥ ततः शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः । कालेन नातिमहता गरुडः पतगेश्वरः ॥ २४ ॥ के हित के रिय कार्य का आरम्भ है और बोले कि, वह वरफ से भरे हुए गुफाओं वाले पहाड यह महान कार्य को करना चाहता है । आप पा जहा मनुप्य नहीं जा सकते वहा छोड़ दो । शाखा, करके इसको आना देयें । इस प्रकार भगवान् हाथी और कछुए सहित गरड बडी कोख चाले पश्यप मे मुनकर बालविल्य सपि उस शाखा को उस पर्वत के ऊपर शीघ्रता से गये ॥१०॥२२॥ सर नपस्या के रिये हमाग्य को नरे गये वह पक्षी वृक्ष की यही शाखा को रेकर थोडे 1170१८ ही कार में एक लाख योजन दूर चलकर उस हमा उपरान्त शिला के पुत्र गरर ने अपने पहार पर पहुंचे। और पिता कश्यप के कहने ना पश्यप में पूछा है भगवन् ये जनुमार उस शाया को यहा छोड दिया । उस बनाव जरा इस माम्या को हीद । पदयप जी माया के गिरने से उस पर्वत की चोटिया जो |मा म्यान

अध्याय ३०]
महाभारत
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स तं गत्वा क्षणेनैव पर्वतं वचनापितुः ।
अमुञ्चन्महतीं शाखां सवनं तत्र खेचरः ॥ २५ ॥
पक्षानिलहतश्चास्य प्राकम्पत स शैलराट् ।
मुमोच पुष्पवर्ष च समागलितपादपः ॥ २६ ।।
शृङ्गाणि च व्यशीर्यन्त गिरेस्तस्य समन्ततः ।
मणिकाञ्चनचित्राणि शोभयन्ति महागिरिम् ॥ २७ ॥
शाखिनो बहवश्चापि शाखयाऽभिहतास्तया ।
काञ्चनैः कुसुमैर्भान्ति विद्युत्वन्त इवाम्बुदाः ॥ २८ ॥
ते हेमविकचा भूमौ युताः पर्वतधातुभिः ।
व्यराजञ्छाखिनस्तत्र सूर्यांशुप्रतिरञ्जिताः ॥ २९ ॥
ततस्तस्य गिरेः शृङ्गमास्थाय स खगोत्तमः । .
भक्षयामास गरुडस्तावुभौ
गजकच्छपौ ॥३०॥
तावुभौ भक्षयित्वा तु स तायः कूर्मकुञ्जरौ ।
ततः पर्वतकूटाग्रादुत्पपात महाजवः ॥ ३१ ॥
प्रावर्तन्ताथ देवानामुत्पाता भयशसिनः ।
इंद्रस्य वनं दयितं प्रजज्वाल भयात्ततः ॥ ३२ ॥
.सधूमा न्यपतत्साचिर्दिवोल्का नभ
नभसश्युता ।
तथा वसूनां रुद्राणामादित्यानां च सर्वशः ॥ ३३ ॥
मणि और कांचन के सदृश थीं फट गई। और बहुत फिर वह पक्षी पहाट के शिखर पर बैठकर
से सोने के प्रभाव वाले वृक्ष जिनमें अनेक प्रकार हाथी और कछुए दोनों को भक्षण करने लगा।
के सुनहले रुपहले फल लग रहे थे उस शाखा से बड़े वेग वाला गरुट उन दोनों प्राणियों को खाकर
टूट-टकर पृथ्वी पर गिरने लगे। और पहाड के आकाश को उड गया । उम समय देवताओं को
हिलने से उसके ऊपर के वृक्षों के फूल गिरने से भय की सूचना देने वाले अनेक उत्पात स्वर्ग में
फूलों की वर्षा हुई । वह वृक्ष सुर्वण के समान होने लगे । इन्द्र का वज्र भय से जलने लगा।
उज्ज्वल और पर्वत के धातुओं से युक्त सूर्य की धुऍ सहित जल रहे तारे आकाग से गिरने लगे।
किरणों के पड़ने से अति शोभायमान् प्रतीत होने ! वसु, ग्द्र, आदित्य, साध्य और मरुत आदि देवताओं
के समूहों के अस्त्र आपस में भिड़ने लगे । देवासुर
लगे ॥२३॥२९॥

१७२ महाभारत { आदिपर्व साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणाः । स्वं स्वं प्रहरणं तेषां परस्परमुपाद्रवत् ॥ ३४ ॥ अभूतपूर्व संग्रामे तदा देवासुरेऽपि च । वर्वाताः सनिर्घाताः पेतुरुल्काः सहस्त्रशः ॥ ३५ ॥ निरभ्रमेव चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् । देवानामपि यो देवः सोऽप्यवर्पत शोणितम् ॥ ३६ ॥ मम्लुमाल्यानि देवानां नेशुस्तेजांसि चैव हि । उत्पातमेघा रौद्राश्च वपुः शोणितं बहु ॥ ३७ ॥ रजांसि मुकुटान्येपामुत्थितानि व्यधर्पयन् । ततस्त्राससमुद्विग्नः सहदेवैः शतक्रतुः । उत्पातान्दारुणान्पश्यन्नित्युवाच वृहस्पतिम् ॥ ३८॥ इन्द्र उवाच-किमर्थं भगवन्धोरा उत्पाताः सहसोत्थिताः । न च शत्रु प्रपश्यामि युधि यो नः प्रधर्पयेत् ॥ ३९ ॥ बृहस्पतिवाच तवापराधाद्देवेन्द्र प्रमादाच्च शतक्रतो । तपसा वालखिल्यानां महीणां महात्मनाम् ॥ ४०॥ कश्यपस्य मुनेः पुत्रो विनतायाश्च खेचरः । हतुं सोममभिप्राप्तो बलवान्कामरूपधृक् ॥ ४१ ॥ समर्थों बलिनां श्रेष्ठो हर्तुं सोमं विहंगमः । मंग्राम जब हुआ था नत्र भी ऐसी अद्भुत बातें नहीं हे भगवन् । अकस्मात् ऐसे घोर उत्पात् होते क्यों हुई थीं। वटे जोर से आँधी चन्ने लगी और उससे दीव पडते है । इस समय में कोई शत्रु नहीं देखता भयानक शब्द होने लगा । हजारों तारे आकाश से जो हमारा युद्ध में तिरस्कार करे ॥३०॥३९॥ दृट-दृटकर गिरने लगे। आकाश में बादल न होने बृहस्पति जी ने कहा-तेरे अपराध और प्रमाढ पर भी गर्जना होने लगी । देवतओं की मालाएँ मुरझा और वालसिल्य ऋषियों के तप के कारण से गई और तेज नष्ट हो गये। यादलों मे रुधिर की कश्यप जी का बड़ा पराक्रमी आकाग मण्डल में गमन वर्षा होने लगी। और उनी हुई धूल मुग्प में जाने करने वाला पुत्र तुमसे अमृत छीनने को आता है । गी। देवताओं सहित ग्राम में व्याकुल हुआ इन्द्र यह यलयाना में श्रेष्ठ अमृत हरने को समर्थ है | उन उगवन उत्तानों को देखकर वृहस्पति से बोरा- आर यह सम्पूर्ण कार्यों को जो औरों से नहीं हो ।

अध्याय ३० ] महा मारन १७३ सर्व संभावयाम्यस्मिन्नसाध्यमपि साधयेत् ॥१२॥ मोतिम्याच श्रुत्वैतद्वचनं शकः प्रोवाचामृतरक्षिणः । महावीर्यवलः पक्षी हर्तुं सोममिहोद्यतः ॥ १३॥ युप्मान्संबोधयाम्येप यथा न स हरेबलात् । अतुलं हि वलं तस्य बृहस्पतिरुवाच ह ॥ १४ ॥ तच्छुत्वा विवुधा वाक्यं विस्मिता यत्नमास्थिताः । परिवार्यामृतं तस्थुर्वजी चेन्द्रः प्रतापवान् ॥ १५ ॥ धारयन्तो विचित्राणि कांचनानि मनस्विनः । कवचानि महार्हाणि वैदूर्यविकृतानि च ॥४६॥ चर्माण्यपि च गात्रेषु भानुमन्ति दृढानि च । विविधानि च शस्त्राणि घोररूपाण्यनेकशः ॥ १७॥ शिततीक्ष्णाग्रधाराणि समुद्यम्य सुरोत्तमाः । सविस्फुलिंगज्वालानि सधूमानि च सर्वशः ॥ १८ ॥ चक्राणि परिघांश्चैव त्रिशुलानि परश्वधान् । शक्तींश्च विविधास्तीक्ष्णाः करवालांश्च निर्मलान् । स्वदेहरूपाण्यादाय गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ॥४९॥ तैः शस्त्रैर्भानुमद्भिस्ते दिव्याभरणभूषिताः । भानुमन्तः सुरगणास्तस्थुर्विगतकल्मपाः ॥ ५० ॥ अनुपमबलवीर्यतेजसो धृतमनसः परिरक्षणेऽमृतस्य । सकते, कर सकता है । उग्रश्रवा बोले कि, वृहम्पति माणयों से जड़ित, मुवर्ण के विचित्र कवचों के वचन सुनकर इन्द्र महाराज ने अमृत की रक्षा को पहनने लगे । और दृढ़ प्रकाश युक्त ढालों को करने वाले देवताओं को बुलाया और कहा कि, महा गरीर में बांध लिया और अनेक प्रकार के भयंकर बलवान् पक्षी यहां अमृत लेने के लिए आरहा है, और तीक्ष्ण चक्र, बेलन, त्रिशूलें, फरसे, शक्तियां, गुरु जी कहते हैं कि, उस पक्षी के बल का प्रमाण चमकीली तलवारें और गढा आदि शस्त्रों को लेकर नहीं है । इतना सुनकर सब देवता बड़े हैरान हुए वहां पर एकत्र हुए। इस प्रकार अग्नि के समान और इन्द्र सहित अमृत को घेरकर बैठ गये। प्रकाशमान् और अनुपम बल तथा तेज वाले देवता ॥४०॥१५॥ अमृत की रक्षा के लिये जमा हुए। उनके और [ आदिपर्व १७५ महाभारत असुरपुरविदारणाः सुरा ज्वलनसमिद्धवपुः प्रकाशिनः ॥ ५१॥ इति समरवरं सुराः स्थितास्ते परिधसहस्रशतैः समाकुलम् । विगलितमिव चाम्बरांतरं तपनमरीचिविकाशितं वभासे ॥ ५२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रिंशोऽध्याय ॥ ३० ॥ उनके गस्त्रों के प्रकाश से वह युद्धभूमि सूर्य की । होने लगी ॥४६॥५२॥ किरणों से प्रकाशमान् आकाश की तरह विदित आदिपर्व का तीसवा अध्याय समाप्त हुआ |॥३०॥ अथ एकत्रिंगोऽध्याय ।। ३१ ॥ मानक साच-कोऽपराधो महेन्द्रस्य कः प्रमादश्च सूतज । तपसा वालखिल्यानां संभूतो गरुडः कथम् ॥ १ ॥ कश्यपस्य द्विजातेश्च कथं वै पक्षिराट् सुतः । अधृप्यः सर्वभूतानामवध्यश्चाभवत्कथम् ॥ २ ॥ कथं च कामचारी स कामवीर्यश्च खेचरः । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पुराणे यदि पठ्यते ॥ ३ ॥ गानिरपाच विषयोऽयं पुराणस्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि । शृणु मे वदतः सर्वमेतत्संक्षेपतो द्विज ॥ ४ ॥ यजतः पुत्रकामस्य कश्यपस्य प्रजापतेः । साहाय्यमृपयो देवा गन्धर्वाश्च ददुः किल ॥ ५ ॥ तत्रेध्मानयने शको नियुक्तः कश्यपेन ह । मुनयो बालविल्याश्च ये चान्ये देवतागणाः ॥ ६ ॥ ॥ हरनीसया ऽध्याय ३१ ।। मानकीन पहा हे गून पुन ' इन्द्र का आपने इस प्रसग को पुराणों में पढ़ा हो ॥१३॥ पपा अपराध और क्या प्रमाद था। पार गरजी उप्रश्रमा बोले-हे ब्राहाणो ! यह पुराणी या पारगिस्य प्रापियामे गे उत्पन्न हुए पश्यप के विषय हो । में इसको पिम्नार से कहगा, आप पशिगज पुत्र वगे हुए ' अपनी इच्छा के अनुसार मुनी । एक समय कश्यप जी महाराज ने पुत्र आने दीजि काम आई । मार ने कहा कि, उसन परने के ग्यि या दिया था। उस यज्ञ में गाह दीवाई जा नहीं माना, यह भी जानन देवना, सपि, गभर्य आदि गय मिल पर पश्यप गुनना चाहना यदि की महायता करने रंग। या के निमित्त रकड़िया . , अध्याय ३१] महाभारत २ शक्रस्तु वीर्यसदृशमिध्मभारं गिरिप्रभम् । समुद्यम्यानयामास नातिकृच्छ्रादिवं प्रभुः ॥ ७ ॥ अथापश्यद्दपीन्हस्वानंगुष्ठोदरवर्मणः पलाशवर्तिकामेकां वहतः सहतान्पथि ॥ ८ ॥ प्रलीनान्स्वेष्विवाङ्गेषु निराहारांस्तपोधनान् । क्लिश्यमानान्मंदवलान्गोष्पदे संप्लुतोदके ॥ ९ ॥ तान्सर्वान्विस्मयाविष्टो वीर्योन्मत्तः पुरन्दरः । अवहस्याभ्यगाच्छीघं लङ्घयित्वावमन्य च ॥ १०॥ तेऽथ रोपसमाविष्टाः सुभृशं जातमन्यवः । आरेभिरे महत्कर्म तदा शक्रभयङ्करम् ॥ ११ ॥ जुहुवुस्ते सुतपसो विधिवज्जातवेदसम् । मन्त्रैरुच्चावचैविप्रा येन कामेन तच्छृणु ।। १२ ।। कामवीर्यः कामगमो देवराजभयप्रदः । इन्द्रोऽन्यः सर्वदेवानां भवेदिति यतव्रताः ॥ १३ ॥ इन्द्राच्छतगुणः शौर्ये वीर्ये चैव मनोजवः । तपसो नः फलेनाद्य दारुणः संभवविति ॥ १४ ॥ तद् वुद्ध्वा भृशसंतप्ततो देवराजः शतक्रतुः । जगाम शरणं तत्र कश्यपं संशितव्रतम् ॥ १५ ॥ राने की आजा कश्यप ने इन्द्र आदि देवताओं सहित हँसी करके चले गये ॥४॥१०॥ को वालखिल्य ऋपियों को दी । इन्द्र अपने पराक्रम इस अपमान को देखकर वालखिल्य ऋषियों से के समान बोझ रकड़ियों का थोडे ही ने बडा बोध किया ओर अपने तप के बल से कष्ट से ले आये । वारखिल्य ऋषि जो कि अगृठे । इच्छानुसार पराक्रम और गमन करने वाले इन्द्र के समान छोटे थे वह भी उसी रास्ते में छक्के को भय दिखाने वाले और मन के समान वेग वाले होकर एक छोटी सी ढाक की लकडी को रिये दूसरे इन्द्र उत्पन्न करने के लिये वडे वडे मन्त्रों चले आ रहे थे । उसको एक गो के चरण जल द्वारा बन करना प्रारम्भ किया ॥११॥१२॥ से भरे तडाग में तरते देखकर आश्चर्य करके अपने इस बात को जानकर इन्द्र अत्यत दुखी पराक्रम के अभिमान से उन ऋपियों की अपमान होकर उन कश्यप जी महाराज के समीप गया जिनकी पहाड [ आदिप १७६ महाभारत तच्छ्रुत्वा देवराजस्य कश्यपोऽथ प्रजापतिः । वालखिल्यानुपागम्य कर्मसिद्धिमपृच्छत ॥ १६ ॥ एवमस्त्विति तं चापि प्रत्यूचुः सत्यवादिनः । तान्कश्यप उबाचेदं सान्त्वपूर्वं प्रजापतिः ॥ १७॥ अयमिन्द्रस्त्रिभुवने नियोगादृब्रह्मणऽकृतः । इन्द्रार्थे च भवन्तोऽपि यत्नवन्तस्तपोधनाः ॥ १८ ॥ न मिथ्या ब्रह्मणो वाक्यं कर्तुमर्हथ सत्तमाः । भवतां हि न मिथ्याऽयं सङ्कल्पो वै चिकीर्पितः ॥ १९ ॥ भवत्वेप पतत्त्रीणामिन्द्रोऽतिवलसत्त्ववान् । प्रसादः क्रियतामस्य देवराजस्य याचतः ॥ २० ॥ एवमुक्तः कश्यपेन वालखिल्यास्तपोधनाः । प्रत्यूचुरभिसंपूज्य मुनिश्रेष्टं प्रजापतिम् ॥ २१ ॥ वारगिल्या उचु -इन्द्रार्थोऽयं समारम्भः सर्वेषां नः प्रजापते । अपत्यार्थ समारम्भो भवतश्चायमीप्सितः ॥ २२ ॥ नदिदं सफलं कर्म त्वयैव प्रतिगृह्यताम् । तथा चैवं विधत्स्वान यथा श्रेयोऽनुपश्यसि ॥ २३ ॥ गानिरगाव-एतम्मिन्नेव काले तु देवी दाक्षाणी शुभा । विनता नाम कल्याणी पुत्रकामा यशस्विनी ॥ २४ ॥ नाम्या यही नीक्षण थी या जाकर उनमे मर हार परना उचित नहीं है । आप का सकल्प भी पदा । वयप जी इन्द्र की यात मुनरर वारबिल्य मिश्या नहीं हो सकता । इससे आप इनपर अनुग्रह प्रारियों के पाम गये और कहा शिश, आप का फीजिये और आप के तप म्प फल से उत्पन्न हुआ पार्य मिद्धती। यागिन्य मपि वारे आप का इन्द्र पक्षियों का इन्द्र हो ॥१५॥२०॥ पहा मत्य हो । निगरे उपगन्न पश्यर जी नमानि उग्रश्रया योले-पश्यप के समझाने से तपम्वी पूर्वक कहा कि, यह इन्द्र ब्रह्माजी की आजा में बालमिरय मपि उनकी प्रशसा परके कहने लगे नांनी गोपा शासन काल की नियन किया कि प्रजापति पश्यप ! हम सब ने इन्द्र के गया है। आर मार भी इन्द्र ही दरिये यन दर उसह परने का यम पिया है और आपने सन्तान पातु भार को प्रमाजी का पापय मिथ्या पाहच्छा में इसका आरम्भ किया तिगगे इस - ~~ अध्याय ३१] महाभारत तपस्तप्त्वा व्रतपरा स्नाता पुंसवने शुचिः । उपचक्राम भर्तारं तामुवाचाथ कश्यपः ॥ २५ ॥ आरम्भः सफलो देवि भविता यस्त्वयेप्सितः । जनयिष्यसि पुत्रौ द्वौ वीरौ त्रिभुवनेश्वरौ ॥ २६ ॥ तपसा वालखिल्यानां मम सङ्कल्पजी तथा । भविष्यतो महाभागौ पुत्रो त्रैलोक्यपूजितौ ॥ २७॥ उवाच चैनां भगवान्कश्यपः पुनरेव ह । धार्यतामप्रमादेन गर्भोऽयं सुमहोदयः ॥ २८॥ एतौ सर्वपतत्त्रीणामिन्द्रत्वं कारयिष्यतः । लोकसंभावितौ वीरौ कामरुपी विहंगमौ ॥ २९ ॥ शतक्रतुमथोवाच प्रीयमाणः प्रजापतिः । त्वत्सहायौ महावीर्यों भ्रातरौ ते भविष्यतः ॥ ३० ॥ नैताभ्यां भविता दोपः सकाशात्ते पुरंदर । व्येतु ते शक्र संतापस्त्वमेवेन्द्रो भविष्यसि ॥३१॥ न चाप्येवं त्वया भूयः क्षेप्तव्या ब्रह्मवादिनः । न चावमान्या दत्ति वाग्वजा भृशकोपनाः ॥ ३२ ॥ एवमुक्तो जगामेन्द्रो निर्विशङ्कस्त्रिविष्टपम् । विनता चापि सिद्धार्था बभूव मुदिता तथा ॥ ३३ ।। सफल कर्म को आप ग्रहण करें और जिसमें | फिर कहा-इस गर्भ को तुम बड़ी सावधानी से कल्याण हो वैसा करें । उग्रश्रवा बोले-हे ऋषियो! रखना । यह लोकों में सत्कार किये हुए इच्छा के उसी समय कश्यप जी की स्त्री विनता तप करके सदृश रूप धारण करने वाले पक्षी सब पक्षियों में पुत्र की कामना से ऋतुम्नान करके अपने पति के इन्द्र पदवी को प्राप्त होंगे ॥२१॥२९॥ पास आई । उसको देखकर कश्यप जी ने कहा इसके उपरान्त प्रसन्न होता हुआ प्रजापति कि, वालखिल्य ऋपियों के तप और हमारे संकल्प । कश्यप, इन्द्र से बोला कि, यह दोनों तरे भाई के प्रभाव से तेरे दो पुत्र एक गरुड़ पक्षियों का। बड़े पराक्रमी होगें और सदैव तेरे सहायक रहेंगे। इन्द्र और दूसरा अरुण सूर्य का सारथी आकाश परन्तु तुझको ब्रह्मऋषि महात्माओं का अपमान में चलने वाले और बड़े पराक्रमी होंगे । कश्यप ने | करना उचित नहीं है । ब्राह्मणों का शाप वन से महाभारत [.आदिपर्व जनयामास पुत्रौ दावरुणं गरुडं तथा । विकलाङ्गोऽरुणास्तत्र भास्करस्य पुरःसरः ॥३४॥ पतत्त्रीणां च गरुडमिन्द्रत्वेनाऽभ्यापिंचयत । तस्यैतत्कर्म सुमहच्छ्यतां भृगुनन्दन ॥ ३५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ भी बढ़ कर होता है । उनका कोप बड़ा ही दारुण ! उन दोनों में अरुण अधूरे शरीर वाला हुआ जो हुआ करता है । इस प्रकार कश्यप ऋषि से कहा सूर्य का सारथी बना । और गरुड़ पक्षियों का हुआ इन्द्र स्वर्गलोक को चला गया। और सिद्ध इन्द्र हुआ । हे भृगुनन्दन ! उसी गरुड़ का यह मनोरथ वाली विनता भी अत्यन्त प्रसन्न हुई । बड़ा भारी कर्म सुनो ॥३०॥३५॥ विनता ने अरुण, गरुड़ दो पुत्रों को उत्पन्न किया । आदिपर्व का इकत्तीसयां अध्याय समात हुआ । -०-- अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२॥ सौतिम्बाच - ततस्तस्मिन्द्विजश्रेष्ठ समुदीणे तथाविधे । गरुडः पक्षिराट् तूर्णं संप्राप्तो विबुधान्प्रति ॥ १ ॥ तं दृष्ट्वाऽतिवलं चैव प्रकम्पंत सुरास्ततः । परस्परं प्रत्यन्नन्सर्वप्रहरणान्युत ॥ २ ॥ तत्र चासीदमेयात्मा विद्युदाग्निसमप्रभः । भोमनः सुमहावीर्यः सोमस्य परिरक्षिता ॥ ३ ॥ . स तेन पतगेन्द्रेण पक्षतुण्डनखक्षतः । मुहर्त्तमतुलं युद्धं कृत्वा विनिहतो युधि ॥ ४ ॥ ॥ यत्तीसवां अध्याय ३२ ॥ उप्रश्रया बोले-हे ऋपियो ! देवताओं की अग्नि के समान तेजम्बी विश्वकर्मा ही अमृत की सेना के कंचन, अस्त्र, शत्रों को धारण कर युद्ध रक्षा करने वाले देवताओं के मुखिया थे । वह कलिय तयार होने पर पक्षियों का राजा गरुड़ विश्वकर्मा उन पक्षियों के राजा गरुड़ के परों और पड़े वेग मे देवताओं के निकट पहुँचा । उस चोंच से घायल होकर महूर्त भर घोर युद्ध अन्यन्न दलवान् को देखते ही मव देवना टर के करके मरे हुए के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा मारे कांपने रंग और व्याकुल होकर आपम में ही ॥१४॥ एक दमर पर गम्य चराने लंगे । अति पराक्रमी, अध्याय ३२] महाभारत १७९ खेचरः । वली । रजश्चोय सुमहत्पक्षवातेन कृत्वा लोकान्निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत् ॥ ५ ॥ तेनावकीर्णा रजसा देवा मोहमुपागमन् । न चैवं ददृशुश्छन्ना रजसाऽमृतरक्षिणः ॥ ६ ॥ एवं सलोडयामास गरुडस्त्रिदिवालयम् । पक्षतुण्डप्रहारैस्तु देवान्स विददार ह ॥ ७ ॥ ततो देवः सहस्राक्षस्तूर्णं वायुमचोदयत् । विक्षिपेमां रजोवृष्टिं तवेदं कर्म मारुत ॥८॥ अथ वायुरपोवाह तदजस्तरसा ततो वितिमिरे जाते देवाः शकुनिमाईयन् ॥ ९ ॥ नानादोच्चैः स बलवान्महामेघ इवाम्बरे । वध्यमानः सुरगणैः सर्वभूतानि भीपयन् ॥ १० ॥ उत्पपात महावीर्यः पक्षिराट् परवीरहा । समुत्पत्यान्तरिक्षस्थं देवानामुपरिस्थितम् ॥ ११ ॥ वर्मिणो विवुधाः सर्वे नानाशस्त्रैरवाकिरन् । पटिशैः परिधैः शुलैंगदाभिश्च सवासवाः ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् उस पक्षी ने उन परों की वायु पर प्रहार किया ॥५॥९॥ से धूलि को उड़ाकर चारों ओर अन्धेरा कर दिया।। उनके प्रहार करने पर बलवान् गरुड़ सब उस धूल में सब देवता अज्ञान को प्राप्त हुए । प्राणियों को डराते हुए आकाश मण्डल में बादलों और अमृत की रक्षा करने वाले देवताओं को कुछ | के समान गर्जने लगा । और शत्रुओं के नाश भी दिखाई नहीं देता था। इस प्रकार स्वर्गलोक करने वाला बड़ा बलवान् पक्षियों का राजा गरुड़ में हलचल मच गई । और गरुड़ ने चाँच और आकाश को उड़ गया । आकाश में वर्तमान गरुड़ परों के प्रहार से अनेक देवताओं को घायल किया। के ऊपर कवच पहिरे हुए सब देवता 'आकाश में तिसके उपरान्त सहस्र नेत्र वाले इन्द्र ने शीघ्र वायु जाकर शस्त्रों की वर्षा करने लगे । इन्द्र सहित को आज्ञा दी कि, हे मारुत ! इस धूलि की वर्षा ! सम्पूर्ण देवताओं के पहिस, परिघ, शूल, गदा और को उड़ाकर दूर कर दो। यह तुम्हारा ही काम है। चक्र जो कि सूर्य के समान चमकदार थे और वायु ने उसी समय धूल को उड़ाकर दूर कर दिया। नाना प्रकार के अस्त्रों की वर्षा से पीड़ित वह गरुड़ अन्धकार के दूर होने पर देवताओं ने उस गरुड़ | घोर युद्ध को करता हुआ न डरा । वह प्रतापशाली ।

महाभारत [ आदिपर्व क्षुरप्रैललितश्चापि चक्रैरादित्यरूपिभिः । नानाशस्त्रविसगैस्तैर्वध्यमानः समन्ततः ॥१३॥ कुर्वन्सुतुमुलं युद्धं पक्षिराट् नव्यकम्पत । निर्दहन्निव चाकाशे वैनतेयः प्रतापवान् । पक्षाभ्यामुरसा चैव समन्ताद्वयक्षिपत्सुरान् ॥ १४ ॥ ते विक्षिप्तास्ततो देवा दुद्रुवुर्गरुडार्दिताः । नखतुण्डक्षताश्चैव सुस्रवुः शोणितं बहु ॥ १५॥ साध्याः प्राची सगन्धर्वा वसवो दक्षिणां दिशम् । प्रजग्मुः सहिता रुद्राः रुद्राः पतगेन्द्रप्रधर्पिताः ॥ १६ ॥ दिशं प्रतीचीमादित्या नासत्यावुत्तरां दिशम् । मुहुर्मुहुः प्रेक्षमाणा युध्यमाना महौजसः ॥ १७ ॥ अश्वनन्देन वीरेण रेणुकेन च पक्षिराट् । क्रथनेन च शूरेण तपनेन च खेचरः ॥१८॥ उलूकश्वसनाभ्यां च निमेषेण च पक्षिराट् । प्ररुजेन च संग्रामं चकार पुलिनेन च ॥ १९ ॥ तान्पक्षनखतुण्डायैराभिनद्विनतासुतः युगान्तकाले संक्रुद्धः पिनाकीव परंतप ॥ २० ॥ महावला महोत्साहास्तेन ते बहुधा क्षताः । गेजुरभ्रघनप्रख्या रुधिरोघप्रवर्पिणः ॥ २१ ॥ गरह आकाश में देवनानी को गाम करने रगा। दक्षिण दिशा को भागे । बारहों आदित्य पश्चिम उमक परों की चोट और हृदय की चपेट में चर दिशा को और अश्विनीकुमार उत्तर दिशा को होपर देयता गिरन रंगे। अन्न को वह इधर भागे । और यार पार गरड़ की और देखते हुए. उभर भागने रंग । नमार गोन के पायों में जाते थे । अब वीर अश्वमन्द, रेणुक, शूरवीर कथन, देवाओं नगरी में पान मा रधिर याने तपन, उदक, वमन, निमेप, प्रमज, पुलिन आदि रमा १०१५ मे गरह पा घोर युद्ध हुआ । शत्रुओं के नाश माय, देवता भीर गन्ध पूर्व दिशा की परने वारे गरड़ ने प्रलयकाल के मगय मोध में और भाग 1 दगण नार रदगम गरह के भय मे रोकर रद की तरह महापगकग वाले देवनाओं को अध्याय ३३ ] म हा भारत करके बहुत तान्कृत्वा पतगश्रेष्टः सर्वानुत्क्रान्तजीवितान् । अतिक्रान्तोऽमृतस्याथै सर्वतोऽग्निमपश्यत ॥ २२ ॥ आवृण्वानं महाज्वालमचिभिः सर्वतोऽम्वरम् । दहन्तमिव तीक्ष्णांशुं चण्डवायुसमीरितम् ॥ २३ ॥ ततो नवत्या नवतीर्मुखानां कृत्वा महात्मा गरुडस्तपस्वी । नदीः समापीय मुखैस्ततस्तैः सुशीघ्रमागम्य पुनर्जवेन ॥ २४ ॥ ज्वलन्तमग्निं तममित्रतापनः ससास्तरत्पत्ररथो नदीभिः । ततः प्रचके वपुरन्यदल्पं प्रवेष्टुकामोऽग्निमभिप्रशाम्य ॥ २५॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ नख, चोंच और परों के प्रहार से घायल किया । चलने से बढ़ रही उस अग्नि की ज्वालाएँ आकाश उनके गरीरों से रक्त वह रहा था । और वह रुधिर तक पहुच रही थीं मानो सूर्य को भस्म कर डलिंगी। की वर्षा करने वाले बादलों के समान जान पड़ते यह देखकर गरुड वहां से चले गये । उन्होंने उस थे ॥१६॥२१॥ समय आठ हजार एक सौ मुख सी सब देवताओं को प्राणरहित सा करके गरुड़ नदियों का जल पीकर शोघ्र उसी स्थान पर आकर जी अमृत के कलश के समीप पहुचे। वहां चारों । अग्नि को शात किया। इसके पश्चात् अमृत को पाने ओर उन्होंने प्रज्वलित अग्नि को देखा । वायु के के लिये अपना म्वरूप छोटा कर लिया ॥२२॥२५॥ आदिपर्व का बत्तीसवां अध्याय समाप्त हुआ ३२॥ अथ त्रयत्रिंशोऽध्याय ॥ ३३ ॥' सौतिरुवाच-जाम्बूनदमयो भूत्रा त्वा मरीचिनिकरोज्ज्वलः । प्रविवेश वलात्पक्षी वारिवेग इवार्णवम् ॥ १ ॥ स चक्र क्षुरपर्यन्तमपश्यदमृतान्तिके । परिभ्रमन्तमनिशं तीक्ष्णधारमयस्मयम् ॥ २ ॥ ज्वलनार्कप्रभं घोरं छेदनं सोमहारिणाम् । घोररूपं तदत्यर्थ यन्त्रं देवैः सुनिर्मितम् ॥ ३ ॥ । तेतीमयां अध्याय ३३ ॥ उग्रश्रवा बोले-है ऋषियो ! इसके उपरान्त । नदियां समुद्र में गिरती है । और वहां पहुंचकर गरुड़ जी जिनके शरीर की चमक सूर्य की किरणों देखा कि, अमृत के चारों तरफ एक लोहे का के समान थी अमृत लेने को ऐसे वेग से चले जैसे वडा तीक्ष्ण चक्र चल रहा है। उस चक्र की प्रभा महाभारत [ आदिपर्य तस्यान्तरं स दृष्ट्वैव “पर्यवर्त्तत खेचरः । अरान्तरेणाभ्यपतत्संक्षिप्यार क्षणेन अधश्चक्रस्य चैवात्र दीप्तानलसमद्युती । विद्युजिह्वौ महावीर्यों दीप्तास्थौ दीप्तलोचनौ ॥ ५ ॥ चक्षुर्विपो महाघोरौ नित्यं क्रुद्धौ तरस्विनौ । रक्षार्थमेवामृतस्य दढर्श भुजगोत्तमौ ॥ ६ ॥ सदा संरब्धनयनौ सदा चानिमिपेक्षण । तयोरेकोऽपि यं पश्येत्स तूर्णं भस्मसाद्भवेत् ॥ ७ ॥ तयोश्चचूंषि रजसा सुपर्णः सहसावृणोत् । ताभ्यामदृष्टरूपोऽसौ सर्वतः समताडयत् ॥ ८॥ तयोरङ्गे समाक्रम्य वैनतेयोऽन्तरिक्षगः । आच्छिनत्तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत्ततः ॥ ९ ॥ समुत्पाटयामृतं तत्र वैनतेयस्ततो वली । उत्पपात जवेनैव यन्त्रमुन्मथ्य वीर्यवान् ॥ १० ॥ अपीत्वैवामृतं पक्षी परिगृह्याशुनिःसृतः । आगच्छदपरिश्रान्त आवार्किप्रभा ततः ॥ ११ ॥ विष्णुना च तदाकाशे वैनतेयः समोयवान् । तस्य नारायणस्तुष्टस्तेनालौल्येन कर्मणा ॥ १२ ॥ सूर्य के ममान थी। उससे देखकर गण्ड जी उसके लगाने वाले उनमें से एक भी जिसको देखले यह चारों ओर घूमने रंग। और अत्यन्त छोटा सा शीघ्र ही भम्म हो जाये । गस्ड ने परों से धूर रूप धारण करके उम चर वे आगे की सधि में उड़ाकर उन साँपों को अधा कर दिया और अवमर से होकर भीतर चले गये ॥१४॥ पारर उनके टुक्डे पर दिये । उस बलवान् गरर उम चा नीचे दो सपा को निनकी प्रभा ने उस चक्र को तोड-पोडकर अमृत का करश जमि समान, जिहा मिनरी के समान, मुख उठा लिया। उस जमृत को रेकर वहा से गरड़ और नेत्रों से परित, यह ग्रोधी, परातमी और पक्षीय वेग से आकाश की ओर उडे । इतना विप पारे जो अमा की रक्षा केतु निराम करते परिश्रम करने पर भी उहीन अमृत नहीं पिया । थे, म । मदा ब्राधयुग और परयों को न गरत के इनना परिश्रम करने पर भी उसको छ - अध्याय ३३] महाभारत तमुवाचाव्ययो देवो वरदोऽस्मीति खेचरम् । स बने तव तिष्ठेयमुपुरीत्यन्तरिक्षगः ॥ १३ ॥ उवाच चैनं भूयोऽपि नारायणमिदं वचः । अजरश्चामरश्च : स्याममृतेन विनाऽप्यहम् ॥ १४ ॥ एवमस्त्विति तं विष्णुरुवाच विनतासुतम् । प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमब्रवीत् ॥ १५ ॥ भवतेऽपि वरं दद्यां वृणोतु भगवानपि । तं चत्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महावलम् ॥ १६ ॥ ध्वजं च चके भगवानुपरि स्थास्यसीति तम् । एवमस्त्विति तं देवमुक्त्वा नारायणं खगः ॥ १७ ॥ वनाज तरसा वेगाद्वायुं स्पर्धन्महाजवः । तं वजन्तं खगश्रेष्टं वज्रणेन्द्रोऽभ्यताडयत् ॥ १८ ॥ हरन्तममृतं रोपाद्गरुडं पक्षिणां वरम् । तमुवाचेन्द्रमाक्रन्दे गरुडः पतता वरः ॥ १९ ॥ प्रहसन्श्लक्ष्णया वाचा तथा वजसमाहतः । ऋपेर्मानं करिष्यामि वज्रं यस्यास्थिसंभवम् ॥ २० ॥ बनस्य च करिष्यामि तवैव च शतक्रतो । एतत्पत्रं त्यज्याम्येकं यस्यान्तं नोपलप्स्यते ॥ २१ ॥ मालम नहीं हुआ। यह सूर्य की किरणों को कुछ होगा । तब गरुड़ जी बोले कि, हे महाराज ! मुझसे न मानकर सन्मुख होकर चले ॥५॥११॥ भी आप वर मागे, विष्णु भगवान् बोले कि, थोड़ी दूरी पर आकाग में विष्णु भगवान् तुग हमार वाहन हो । गरुड़ जी ने कहा- मिले और गरुड़ जी को लोभ रहित देख अति होगा। इसके उपरान्त विष्णु भगवान् नै गरुड़ जी प्रसन्न हो उससे कहा कि, मै तुझको वर को अपनी ध्वजा में रक्सा और गरुड़ जी नारायण देता हू । गम्ड़ ने उत्तर दिया कि, मैं आपकी के वाहन हुए । तदनन्तर गरुड़ जी उस अमृत ध्वजा में रहूं यही वर मागता हूं। फिर भी भगवान् । के घड़े को लिये हुए आगे बड़े वेग से चले । इन्द्र से कहने लगा कि, मै विना अमृत पिये अजर ने उनको अमृत लिये हुए जाता देखकर अपना अमर हो जाऊं । विष्णु भगवान् ने कहा-ऐसा ही वज्र मारा । उसके प्रहार को सहनकर गरुड़ जी -ऐसा ही ।

[ आदिपर्व महाभारत न च वञ्जनिपातेन रुजा मेऽस्तीह काचन । एवमुक्त्वा ततः पत्रमुत्सर्सज स - पक्षिराट् ॥ २२ ॥ तदुत्स्टॅप्टमभिप्रेक्ष्य तस्य पर्णमनुत्तमम् । हृष्टानि सर्वभूतानि नाम 'चक्रुर्गरुत्मतः ॥ २३॥ सुरूपं पत्रमालक्ष्य सुपर्णोऽयं भवत्विति । तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सहस्राक्षः पुरंदरः । खगो महदिदं भूतमिति मत्वाऽभ्यभापत ॥ २४ ॥ मात्र याच-बलं विज्ञातुमिच्छामि यत्ते परमनुत्तमम् । सन्न्यं चानन्तमिच्छामि त्वया सह खगोत्तम ॥ २५॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे त्रयस्त्रिंशोऽध्याय ॥ ३३ ॥ हंसते हुए मधुर वाणी से बोले-मुझे इस बज्रपात को देखकर सम्पूर्ण प्राणियों ने प्रसन्न होकर गरुड से कुछ भी कष्ट नहीं हुआ है। परन्तु हे इन्द्र। का नाम सपर्ण रक्खा । हजार नेत्र वाले इन्द्र ने तेरे वन का और उस ऋषि की हड्डियों का इस बडे आश्चर्य को देखकर कहा कि, मै तेरे जिसमे यह वन वना है मान रखने के लिये अपना पराक्रम को जानता चाहता हू और तेरे साथ एक पर छोड़ता है । ऐसा कहकर गरड जी ने मित्रता करना चाहता हू ॥१२॥२५॥ अपना एक पर छोड दिया । उस पर की मुन्दरता आदिपर्व का तेतीमया अध्याय ममाप्त हुआ ॥ ३३ ॥ अथ चतुम्बिंशोध्याय ॥ ३४ ॥ गरट दगप-सग्न्यं मेऽस्तु त्वया देव यथेच्छसि पुरन्दर । घलं तु मम जानीहि महच्यासह्यमेव च ॥ १ ॥ कामं नेतत्पशंसन्ति सन्तः स्ववलसंस्तवम् । गुणसंकीर्तनं चापि स्वयमेव शतक्रतो ॥ २ ॥ सम्वति कृत्वा तु सम्बे पृष्टो वक्ष्याम्यहं त्वया । न यात्मस्तवसंयुक्तं वक्तव्यमनिमित्ततः ॥ ३ ॥ पानीमया अध्याय ॥ ३४ ॥ उपवा पोर है प्रापियो गर जी यह अधिक होने के कारण कोई सह नहीं सकता। इन्द्र पान गुनकर पार विहे इन्ट ! तुम्हारी इन्छा के अपने यल और गुणों की प्रशसा करना महात्माओं भागार में तुम मे मित्रता परता। मेरा पर अच्छा नहीं कहा तुझी अपना मित्र

अध्याय ३४]
महाभारन
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स पर्वतवनामुर्वी ससागरजलामिमाम् ।
वहे पक्षेण वै शक्र वामप्यत्रावलम्बिनम् ॥ ४ ॥
सर्वान्सपिंडितान्वापि लोकान्सस्थाणुजङ्गमान् ।
वहेयमपरिश्रान्तो 'विद्धीदं मे महद्बलम् ॥ ५ ॥
मौतिग्याच-इत्युक्तवचनं वीरं किरीटी श्रीमतां वरः ।
आह शौनक देवेन्द्रः सर्वलोकहितः प्रभुः ॥ ६ ॥
एवमेव यथात्थ त्वं सर्व संभाव्यते त्वयि ।
संगृह्यतामिदानी मे सख्यमत्यन्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥
.न कार्य यदि सोमेन मम सोमः प्रदीयताम् ।
अस्मांस्ते हि प्रवाधेयुर्येभ्यो दद्याद्भवानिमम् ॥ ८ ॥
गरुड़ उवाच-किंचित्कारणमुद्दिश्य सोमोऽयं नीयते मया ।
न दास्यामि समादातुं सोमं कस्मैचिदप्यहम् ॥ ९ ॥
यत्रेमं तु सहस्राक्ष
तु सहस्राक्ष निक्षिपेयमहं स्वयम् ।
त्वमादाय
ततस्तूर्णं हरेथास्त्रिदिवेश्वर ॥ १० ॥
शक उवाच-वाक्येनानेन तुष्टोऽहं यत्त्वयोक्तमिहाण्डज ।
यामिच्छसि वरं मत्तस्तं गृहाण खगोत्तम ॥ ११ ॥
मौविम्वाच-इत्युक्तः
प्रत्युवाचेदं कद्रूपुत्राननुस्मरन् ।
स्मृत्वा चैवोपाधिकृतं मातुर्दास्यनिमित्ततः ॥ १२ ॥
जानकर मैं कहता हूं । विना कारण अपनी स्तुति के देवताओं का इन्द्र बोला-तुम्हारा वाक्य सत्य है ।
बचन न कहने चाहिये । हे इन्द्र ! पर्वत, वन और तुम सब कुछ कर सकते हो । अब तुम सदा के
समुद्र के जल से युक्त और तेरे सहित इस पृथ्वी लिये मेरे साथ मित्रता कर लो । यदि अमृत से
को अपने ऊपर उठा सकता हू । स्थावर और तुमको कुछ मतलब न हो तो मुझको देदो ।
जंगम सहित एकत्रित सम्पूर्ण लोकों को भी बिना क्योंकि जिनको तुम यह अमृत ढोगे वह हमको
परिश्रम किये उठा सकता हूं। इतना बल मुझमें बड़ा कष्ट पहुंचायेंगे | गरुड़ बोला कि, मै अपने
प्रयोजन से अमृत लिये जा रहा हूं। परन्तु अमृत
उग्रश्रवा बोले-इस प्रकार गरुड़ के बचन किसी को पीने नहीं दूंगा । हे हज़ार नेत्र वाले,
मुनकर मुकुट पहिरे हुए सारे लोक का हितकारक इन्द्र ! जहां मैं इस अमृत को रक्तूंगा वहां से तुम
है ॥१५॥

[ आदिपर महाभारत ईशोऽहमपि सर्वस्य करिष्यामि तु तेऽर्थिताम् । भवेयुर्भुजगाः शक्र मम भध्या महाबलाः ॥ १३ ॥ तथेत्युक्त्वाऽन्वगच्छत्तं ततो दानवसूदनः । देवदेवं महात्मानं योगिनामीश्वरं हरिम् ॥१४ स चान्वमोदत्तं चार्थं यथोक्तं गरुडेन वै । इदं भूयो वचः प्राह भगवांस्त्रिदशेश्वरः ।। १५ ॥ हरिप्यामि विनिक्षिप्त सोममित्यनुभाष्यतम् । आजगाम ततस्तूर्णं सुपर्णो मातुरन्तिकम् ॥ १६ ॥ अथ सर्पानुवाचेदं सर्वान्परमहृष्टवत् । इदमानीतममृतं निक्षेप्स्यामि कुशेषु वः ॥ १७ ॥ म्नाता मङ्गलसंयुक्तास्ततः प्राश्नीत पन्नगाः । भवद्भिरिदमासीनैर्यदुक्तं तहचम्तदा ॥१८॥ अदासी चैव मातेयमद्यप्रभृति चास्तु मे । यथोक्तं भवतामेतद्वचो में प्रतिपादितम् ॥ १९ ॥ ततः स्नातुं गताः सर्पाः प्रत्युक्त्वा तं तथेत्युत । शकोऽप्यमृतमाक्षिप्य जगाम त्रिदिवं पुनः ॥ २० ॥ शीघ्र उटाकर आना । इन्द्र योग कि, हे पशिगज' मोदन नारायण ने भी किया । फिर इन्द्र भगवान् तुम्हौर हम वचन में में बहुत प्रसन्न हुआ है । तुम में गोरा कि, गरड के खग्वे हुए अमृत को मैं हर अपनी हनुमार वर मागा॥३१॥ र रे जाऊगा । तिसके उपरान्त यह गरुड़ शीघ्र उग्रश्रया वारे इस प्रकार इन्द्र रे नन से अपनी माता के पास पहुचा। उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक मनपर और माँ को मरण कर उन रित कारण मों मे कहा कि, हे सर्पो । यह अमृत मैं तुम्हारे माता के दामी भार को यादकर गाड़ दन्द्र मे वहन में ले आया ह आर यह कुशा पर रक्या है । बार में माँ के मारने में म्म, ह तुम्हारे में यही तुम मरम्मान और मगल करके इसको ग्रहण करना। या मागना ह शि, मी माप मेग आहार ही जार आज के दिन में मेरी माना दासीपने से रहित पाय | HORIPATगा का दानों में ना हो ॥११॥ - योगिया भर के पास गये और वहा गोमा ही होगा' गारमें मकर मप सर्प गहा गाजा माथ वो पानवात हुई धावा म्नान करने को गये । और इन्द्र भी अमृत का गमा मनाई। गर? ने नारा था उसका अनु करा रेकर संगो चला गया। इसके उपरान्त ।

अध्याय ३५]
महाभारत
अथागतास्तमुद्देशं सर्पाः सोमार्थिनस्तदा ।
नाताश्च कृतजप्याश्च प्रहृष्टाः कृतमङ्गलाः ॥ २१ ॥
यतदमृतं चापि स्थापितं कृशसंस्तरे ।
नद्विज्ञाय हृतं सर्पाः प्रतिमायाकृतं च तत् ॥ २२ ॥
सोमस्थानमिदं चेति दस्ते लिलिहुस्तदा ।
ततो विधाकृता जिह्वाः सर्पाणां तेन कर्मणा ॥ २३ ॥
अभवंश्चामृतस्पर्शादर्भास्तेऽथ
पवित्रिणः ।
एवं नदमृतं तेन हृतमाहृतमेव च ।
द्विजिह्वाश्च कृताः सर्पा गरुडेन' महात्मना ॥ २४ ॥
ततः सुपर्णः परमप्रहर्पवान्विहृत्य मात्रा सह तत्र कानने ।
भुजङ्गभक्षः
परमार्चितः खगेरहीनकीर्तिर्विनतामनन्दयत् ॥ २५ ॥
इमां कथां यः शृणुयान्नरः सदा पठेत वा द्विजगणमुख्यसंसदि ।
असंशयं त्रिदिवामियाल्स पुण्यभाङमहात्मनः पतगपतेः प्रकीर्तनात् ॥ २६ ॥
दनि श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अस्तीकपर्वणि मीपणे चतुस्त्रिंशोऽध्याय ।। ३४
सर्प म्नान, जप, मंगल किये हुए प्रमन्नचित्त अमृत इस प्रकार गरुट म्यर्ग मे अमृत सो के समीप लाया
पीने को उमम्यान पर आये जहां कुगों पर वह अमृत और उनकी दो जिह्वा हो गई । सपों का भक्षण
रक्खा गया था । यों ने उसे वहां न देखकर, और करने वाला, पक्षियों में पूजा किया हुआ, बड़ी कीर्ति
यह जानकर कि, इन्द्र हर ले गया और यह हमारे वाला वह गरुड़ अपनी माता विनता के साथ उमी
छल का बदला है उन कुशाओं को जिनपर अमृत वन में सुख से रहने लगा । जो मनुप्य टस कथा
रक्खा था चाटने लगे। उसके चाटने मे और कुगा को मुनता वा पड़ता है अथवा ब्राह्मणों के मन्य
के लगने से उनकी जिदा कट गर्ट, और दो फांक में कहता है वह महात्मा गरुड़ के चरित्र का कीर्तन
करने मे पुण्यभागी होता है। और निःसंदेह म्बर्ग-
वह कुया अमृत के म्पर्म में पवित्र हो गई। लोक को जावेगा ॥२४॥२६||
आदिपर्व काचौतीमवां अध्याय ममान हुआ।
हो गई ॥२०॥२३॥
अथ पञ्चत्रिंगोध्याय ॥ ३५ ॥
गौनक उवाच-भुजङ्गमानां शापस्य मात्रा चैव सुतेन च
विनतायास्त्वया प्रोक्तं कारणं
सूतनन्दन ॥ १ ॥

महाभारत [ आदिपव वरप्रदानं भर्ना कद्रूविनतयोस्तथा । नामनी चैव ते प्रोक्त पक्षिणोवैनतेययोः ॥ २ ॥ पन्नगानां तु नामानि न कर्तियास सूतज । प्राधान्येनापि नामानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ ३ ॥ मौतिग्नाच-बहुत्वान्नामधेयानि पन्नगानां तपोधन न कीर्तयिष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृणु ॥ ४ ॥ शेषः प्रथमतो जातो वासुकिस्तदनन्तरम् । ऐरावतस्तक्षकश्च कर्कोटकधनंजयौ कालियो मणिनागश्च नागश्चापूरणस्तथा । नागस्तथा पिञ्जरक एलापत्रोऽथ वामनः नीलानीलौ तथा नागौ कल्मापशवलौ तथा । आर्यकश्चाग्रकश्चैव नागः कलशपोतकः सुमनाग्यो दधिमुखस्तथा विमलपिण्डकः । आप्तः कर्कोटकश्चैव शहो वालिशिखस्तथा ॥ ८॥ निष्टानको हेमगुहो नहुपः पिङ्गलस्तथा । बाह्यकों हस्तिपदस्तथा मुद्गरपिण्डकः म्बलाश्वतरौ चापि नागः कालीयकस्तथा । वृत्तसंपर्तको नागो वो च पद्माविति श्रुतौ ॥ १० ॥ अथ पाममा अप्याय ।। ३ ।। गागर शापि याने हे मूत पुन ' माता में नहीं कह सकता है। जो मुम्ब्य और प्रधान प्रधान गों की माप होने का कारण और पिनता को अक्षण है उनके नाम कहता ह तुम मुनो । सब से पहरे मे पाप का कारण आपने कर दिया । कश्यप से शेष जी उत्पन्न हुए उसके पीछे चामुकि, रावत, कद और गिनना या पाने का वृत्तान्त आपने करकोटक, धनसाय, कारिय, मणि, आप्त, सह, मनाया । अग्ण और गरह का नाम भी हमको पारिशिय, निष्ठानक, हेमगुह, नाप, पिगर, गरम हो गया। बिन्तु है गन पुत्र ' मर गाँ बाइकर्ण, स्तिपद, मुद्गरपिण्टर, अपूर्ण, सिन्नरक, नामाका भार नहीं पहने ना हम प्रधान प्रधान पत्र, गमन, नीर, अनील, परमार, शबर, नामी की गना का अभिगपा दान है। उप्रश्रया आर्य, उग्र, परमपोत, मुमना, दधिमुख, विमर २. नरोधन ! मग ६ घनन में मम नाम पिण्ड, कम्बर, अवता, पारीयक, वृष, सनक, . . - अध्याय ३५ महाभारत : नागः शङ्खमुखश्चैव तथा कूश्माण्डकोऽपरः । क्षेमकश्च तथा नागो नागः पिण्डारकस्तथा ॥ ११ ॥ करवीरः पुष्पदंष्ट्रो विल्वको बिल्वपाण्डुरः । भूपकादः शङ्खशिराः पूर्णभद्रो हरिद्रकः ॥ १२ ॥ अपराजितो ज्योतिकश्च पन्नगः श्रीवहस्तथा । कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च शङ्कपिण्डश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ विरजाश्च सुबाहुश्च शालिपिण्डश्च वीर्यवान् । हस्तिपिण्डः पिठरकः सुमुखः कौणपाशनः ॥ १४ ॥ कुठरः कुञ्जरश्चैव तथा नागः प्रभाकरः । कुमुदः कुमुदाक्षश्च तित्तिरिहलिकस्तथा ॥ १५ ॥ कर्दमश्च महानागो नागश्च बहुमूलकः । कर्कराकर्करो नागौ कुण्डोदरमहोदरौ ॥ १६ ॥ एते प्राधान्यतो नागाः कीर्तिता द्विजसत्तम । बहुत्वान्नामधेयानामितरे नानुकीर्तिताः ॥ १७ ॥ एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः । असंख्येयेति मत्वा तान्न ब्रवीमि तपोधन ॥ १८ ॥ वहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अशक्यान्येव संख्यातुं पन्नगानां तपोधन ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मर्पनामकथने पश्चत्रिंगोऽध्याय ॥ ३५ ॥ पम, महापद्म, शङ्खमुख, कृप्माण्डक, खेमक, पिण्डारक कुण्टोदर, महोदर आदि नाग क्रम से उत्पन्न हुए । करवीर, पुप्पदंष्ट्र, विल्वक, बिल्वपाण्डुर, मूपकाद, यह मुख्य मुख्य नाग मैंने तुमसे कह दिये । बहुत शंखशिरा, पूर्णमद्र, हरिद्रक, अपराजित, ज्योतिक होने के कारण और नाम नहीं कह सकता । इन श्रीवह, कौरव्य, धृतराष्ट्र, शपिण्ड, विरजा, सुबाहु, की मन्तान और सन्तान की सन्तान को असंख्य गालिपिण्ड, हम्तिपिपड, पिठरक, सुमुख, कोण समझकर वह मै नहीं कह सकता । हे तपोधन ! पागन, कुठर, कुजर, प्रभाकर, कुमुद, कुमुदाक्ष, इस ससार मै अगणित सर्प है ॥११॥ तित्तिरि, हलिक, कर्दम, बहमूलक, कर्कर, अकर्कर, आदिपर्व का पैंतीसवां अध्याय ममाप्त हुआ । , %E+ [ आदिपर्व १२० महाभारत अथ पबिंगोऽध्याय || ३६ ॥ गौनक उवाच-आख्याता भुजगास्तात वीर्यवन्तो दुरासदाः शापं तं तेऽभिविज्ञाय कृतवन्तः किमुत्तरम् ॥ १ ॥ सातिरुवाच-तेषां तु भगवाञ्छेपः कहूं त्यक्त्वा महायशाः । उग्रं तपः समातस्थे वायुभक्षो यतवतः ॥ २ ॥ गंधमादनमासाद्य वदर्यां च तपोरतः । गोकर्णे पुष्करारण्ये तथा हिमवतस्तटे ॥ ३ ॥ तेषु तेषु च पुण्येषु तीर्थेष्वायतनेषु च । एकान्तशीलो नियतः सततं विजितेन्द्रियः ॥ ४ ॥ तप्यमानं तपो घोरं तं ददर्श पितामहः । संशुष्कमांसत्वक्स्नायुं जटाचीरधरं मुनिम् ॥ ५ ॥ तमब्रवीत्सत्यधृति तप्यमानं पितामहः । किमिदं कुरुपे शेप प्रजानां स्वस्ति वै कुरु ॥ ६ ॥ त्वं हि तीवेण तपसा प्रजास्तापयसेऽनघ । हि कामं च मे शेष यस्ते हृदि व्यवस्थितः ॥ ७ ॥ पवार -सोदा मम सर्वे हि भ्रातरो मन्दचेतसः । सह तेनात्सहे वस्तुं तद्भवाननुमन्यताम् ॥ ८ ॥ । छत्तीमया अध्याय ३६ ॥ शानक बौने हे मूत पुत्र ! बड़े पराक्रमयुक्त जितंद्रिय होकर घोर तप करते हुए और सूखे माप नाम नो तुमने को । मों ने अपनी माता माम और गर्दन वाला, जटा और भोज पत्रादि को पट्ट के दिय हुए. गाप को जानकर फिर क्या पहिरे हुए मुनि रूप में शेष नाग को ब्रह्मा ने दिया। प्रश्रया बाने उन मर्षों में बड़े या याला देगा ॥१॥५॥ आप अपनी गाना पट्ट को त्यागकर वायु भक्षण पितामह ब्रह्मा ने मत्य धर्ययुक्त तप में बैठे का नियम पूर्वक मनी को यग्ने रगा। प्रथम शेष हुए शेष में कहा कि, तुम क्या कर से हो ! जाने गमादन पनि पातर रिया फिर यर तुम्हारी हम पटोर नपस्या मे मय प्रजा तप रही 4 में रिया । उपरान्न गोदा और शुष्करणमा को निगमें मंगार का कल्याण हो। में और हमारय नरम और पुग्यनीयों, अगिद्ध प जो तुम्हारी ना हा मो हम में मांगो । पानी, नीर शान में हमारा नियम पूर्वक यह मुनकर रोष जी बोले- पितामह ! मेरे मय अयाय ३३] महा भारत अभ्यसूयन्ति सततं परस्परममित्रवत् । ततोऽहं तप आतिष्टं नैतान्पश्येयमित्युत ॥ ९ ॥ न मर्पयन्ति ससुतां सततं विनतां च ते । अस्माकं चापरो भ्राता वैनतेयोऽन्तरिक्षगः ॥ १०॥ तं च द्विपन्ति सततं स चापि बलवत्तरः । वरप्रदानात्स पितुः कश्यपस्य महात्मनः ॥ ११ ॥ सोऽहं तपः समास्थाय मोक्ष्यादिं कलेवरम् । कथं मे प्रेत्यभावेऽपि न तेः स्यात्सह संगमः ॥ १२॥ तमेवं वादिनं डोपं पितामह उवाच ह । जानामि शेप सर्वेषां भ्रातॄणां ते विचेष्टितम् ॥ १३ ॥ मातुश्चाप्यपराधाद्वै भ्रातॄणां ते महद्भयम् । कृनोऽत्र परिहारश्च पूर्वमेव पूर्वमेव भुजङ्गम ॥ १४ ॥ भ्रातृणां तव सर्वेषां · न गोकं कर्तुमर्हसि । वृणीप्य च वरं मत्तः शेप यत्तेऽभिकाइक्षितम् ॥ १५ ।। दास्यामि हि वरं तेऽद्य प्रीतिमें परमा त्वयि । दिष्टयां बुद्धिश्च ते धर्म निविष्टा पन्नगोत्तम । भूयो भूयश्च ते बुद्धिर्धम भवतु सुस्थिरा ॥ १६ ॥ मेष याप-एप एव बरो देव काश्तिो मे पितामह । भाई मन्दमुद्धि है। आपम में परम्पर द्वेष और की कुरीति को जानना है। और तेरी माता के शाप ईपी रखते है । दिनना माना मे भी वह शत्रुता मे तेरे भाइयों को वडा भव प्राप्त हुआ है, टम गम्बन है । और हमारा आकाग में चग्न वाग ग्गिय में मैन पहले ही उगय कर दिया है । इन माई बडा बयान गाड हाउस भी नहीं देख सक्ने । मर भाटयों के लिये तुम गोफ न क्गे जोक म कारण से म चाहता है कि, उनके दर्शन भी अब तुम्हारी इन् । हो मो वर मागो । मैं तुम पर न करु । यह ममझकर तपस्या में बैठ गया है। बहुत प्रसन्न ह यार तुम्गरी र नुमार वर दृगा। सद मेरी इच्छा है कि, उम गरीर को छोड़ने पर हेमों में श्रेष्ट ' मुझको अनि प्रमाना है कि. मेग उनमे किमी नम्ह ममागग न हो ॥६११२॥ तुम्हारी बुद्धि धर्म कार्य में लगी हुई है और यारम्बार यह मुनकर आधा जी बोरे कि, में तेरे माईनों नगरी बुद्धि धर्म में दि' हो। बाग-2 [ आणि महाभारत धर्मे मे रमतां बुद्धिः शमे तपसि चेश्वर ॥ १७ ॥ ब्रह्मोवाच-प्रीतोऽस्म्यनेन ते शेप दमेन च शमेन च । त्वया विदं वचः कार्य मन्नियोगात्प्रजाहितम् ॥ १८ ॥ इमां मही शैलवनोपपन्नां ससागरग्रामविहारपत्तनाम् । त्वं शेष सम्यकचलितां यथावत्संगृह्य तिष्ठव यथाऽचलास्यात् ॥ १९ ॥ शेष उवाच-यथाह देवो वरदः प्रजापतिमहीपति तपतिर्जगत्पतिः । तथा मही धारयिताऽस्मि निश्चलां प्रयच्छतां मे शिरसि प्रजापते ॥२०॥ ब्रह्मापाच-अधो मही गच्छ भुजङ्गमोत्तम स्वयं तवैपा विवेपा विवरंप्रदास्यति । इमां धरां धारयतां खया हि मे महत्प्रियं शेप कृतं भविष्यति ॥२१॥ मैतिवाच-तथैव कृत्वा विवरं प्रविश्य स प्रभु वो भुजगवराग्रज स्थितः । विभर्ति देवी शिरसा महीमिमां समुद्रनेमि परिगृह्य सर्वतः ॥२२॥ ब्रह्मोवाच-शेपोसि नागोत्तम धर्मदेवो महीमिमां धारयसे यदेकः । अनन्तभोगैः परिगृह्य सर्वां यथा हनेवं वलभिद्यथा वा ॥२३॥ मौतिरपाच-अधोभूमौ वसत्येवं नागोऽनन्तः प्रतापवान् । धारयन्यसुधामेकः शासनाद्ब्रह्मणो विदुः ॥ २४ ॥ देव ब्रह्मा । यह मुझो प्रिय वरदान है कि, मेरी ब्रह्मा बोले है सो में श्रेष्ठ शेष । तुम पृथ्वी बुद्धि सदा इमी तरह धर्म से शाति ओर तपस्या के अधो भाग में चले जाओ वह तुमको मार्ग दे में रगी रहे । ब्रह्मा गोरे हे शेष ' तुम्हारे शात देगी। दस पृथ्वी को धारण करके तुम म्वभाव से मैं बहुत प्रमन हुआ ह । मै तुमको प्रजा ही प्रिय कार्य करोगे। उग्रश्रवा बोले-तब शेष के हित के लिये एक कार्य करने की आना देता नाग बिल की राह से पृथ्वी के नीचे पहुचे और ह! तुम पहाड़, वन, ममुद्र, ग्राम, नगर विहार पृथ्वी को समुद्र आदि सहित अपने शिर पर धारण म्थान सहित इस चचल पृथ्वी को यथार्थ राति से कर लिया । ब्रह्मा बोले हे नरोत्तम । तुम शेष और ग्रहण करो निमसे यह चलायमान न हो। शेप धम के जानने वाले हो क्योंकि अकेले अपने अनन्त नाग बोलग-जिम प्रकार वरों का देने वारा, प्रजा, फ्नों से इस पृपी को उठाकर इस प्रकार धारण पी, जगत, प्राणि और मका पति देव ब्रह्मा करते हो जसे मैं आर इद । पाताल रोक में रहता जाता है उसी प्रकार निश्चल पृथ्वी को में धारण हुआ प्रतापवान् अनन्तनाग अकेला ब्रह्मा की करुगा । हे मनापनि । आप पृषी को मेरे गिर आना से पृथ्वी को धारण करके रहता हे ऐसा के उपर म्पदो ॥१३॥२०॥ सब जानते हैं । भगवान् ब्रह्मा ने अनन्त की .. मेरा बहुत

अध्याय ३७ ]
महा मारते
सुपर्णं च सहायं वै भगवानमरोत्तमः ।
प्रादादनन्ताय तदा
वैनतेयं पितामहः ॥ २५॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि शेषवृत्तकथने पत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ।।
सहायता के लिये पक्षी गरुड़ को दिया ॥२१॥२५॥
आदिपर्व का छतीसवां अध्याय ममाप्त आ ।।
.
अथ सप्तत्रिशोऽध्याय ।। ३७ ॥
मौतिरुवाच-मातुः सकाशात्तं शापं श्रुत्वा वै पन्नगोत्तमः ।
वासुकिश्चिन्तयामास शापोऽयं न भवेत्कथम् ॥ १ ॥
ततः स मन्त्रयामास भ्रातृभिः सह सर्वशः ।
ऐरावतप्रभृतिभिः सर्वधर्मपरायणैः ॥ २ ॥
वासुकिस्बाच-अयं शापो यथोद्दिष्टो विदितं वस्तथाऽनघाः ।
तस्य शापस्य मोक्षार्थ मन्त्रयित्वा यतामहे ॥ ३ ॥
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातो हि विद्यते ।
न तु मात्राभिशप्तानां मोक्षः वचन विद्यते ॥ ४ ॥
अव्ययस्थाऽप्रमेयस्य सत्यस्य च तथाऽग्रतः ।
शप्ता इत्येव मे श्रुत्वा जायते हृदि वेपथुः ॥ ५ ॥
नूनं सर्वविनाशोऽयमस्माकं
समुपागतः ।
न ह्येतां सोऽव्ययो देवः शपन्ती प्रत्यपेधयत् ॥ ६ ॥
तस्मात्संमन्त्रयामोऽय भुजङ्गानामनामयम् ।
यथा भवद्धि सर्वेषां मा नः कालोऽत्यगादयम् ।
1, मैंतीयां अध्याय ३७ ।।
उग्रश्रवा बोले -हे ऋपियो ! वासुकि नाग ने सकता । माता ने यह माप हमको जरामरण रहित,
अपनी माता का भाप सुनकर ऐरावत आदि सब अनन्त महिमा वाले, लोकों के स्वामि ब्रह्मा जी
भाइयों को एकत्रित करके कहा कि, कोई ऐसा के मन्मुख दिया है। और ब्रह्मा जी ने
माता को
उपाय मोची जिससे यह माप हनको बाधा न करें। ऐसा माप देने में रोका नहीं है । इसमे हम निश्चय
मर गापों के दूर करने को तो बहुत से यव हैं जानते है कि, यह भाप हम मच का नाग करेगा
परन्तु माता का शाप किसी तरह दूर नहीं हो ॥१६॥

[ आदिपर्व महाभारत सर्व एव हि नस्तावबुद्धिमन्तो विचक्षणाः ॥ ७ ॥ अपि मन्त्रयमाणा हि हेतुं पश्याम मोक्षणे । यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम् ॥ ८ ॥ तथा स यज्ञो न भवेद्यथा वाऽपि पराभवः । जनमेजयस्य सर्पाणां विनाशकरणाय वै ॥ ९ ॥ सौतिरुवाच-तथेत्युक्त्वा ततः सर्वे कावेयाः समागताः । समयं चक्रिरे तत्र मन्त्रबुद्धिविशारदाः ॥ १०॥ एके तत्राऽब्रुवन्नागा वयं भूत्वा द्विजर्षभाः । जनमेजयं तु भिक्षामो यज्ञस्ते न भवेदिति ॥ ११ ॥ अपरे त्वब्रुवन्नागास्तत्र पण्डितमानिनः । मन्त्रिणोऽस्य वयं सर्वे भविष्यामः सुसमताः ॥ १२॥ स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चयम् । तत्र बुद्धि प्रदास्यामो यथा यज्ञो निवर्त्यति ॥ १३ ॥ स नो बहुमतान्राजा बुद्ध्या बुद्धिमतां वरः । यज्ञार्थं प्रक्ष्यति व्यक्त नेति वक्ष्यामहे वयम् ॥ १४ ॥ दर्शयन्तो वहून्दोषान्प्रेत्य चेह च दारुणान् । हेतुभिः कारणेश्चैव यथा यज्ञो भवेन्न सः ॥ १५ ॥ इस कारण हम सब विलम्ब न करके, ऐसा बुद्धिमान् नाग शाप से अपने उद्धार का उपाय उपाय सोचे जिससे सब नागों का भला हो। हम सोचने लगे । उनमें से कुछ एक नागों ने कहा मय बुद्धिमान और चतुर हैं, परम्पर विचार करने कि, हम ब्राह्मण वनकर राजा जनमेजय के पास पर कोई न कोई भलाई का उपाय अवश्य निकल जावंगे और उनसे सर्प यज न करने की याचना आवेगा । जैसे पूर्व समय में अग्नि के लिये देवताओं करेंगे । दूसरे अपने को अति बुद्धिमान् समझने ने विचार किया था और वे सफलता को प्राप्त वाले नागा ने कहा कि, हम राजा के मंत्री बनकर हुए थे। इसी प्रकार आओ. हम भी कोई ऐमा उसको ऐसी सलाह देखेंगे जिससे यह यज्ञ न करे उपाय मोच, जिममे गजा जनमेजय का सर्प यज ॥१०॥१३॥ नही, यदि हो भी तो मफल न हो ||७|| वह श्रेष्ठ राजा हमसे यज्ञ के लिये जब पूछेगा उप्रश्रवा बोले-घासुकि के एमा कहने पर सब तब हम म्पष्ट म्पष्ट कह देखेंगे कि, यह यज्ञ न होना अध्याय ३७] म हा भारत अपरे त्वब्रुवन्नागा अथवा य उपाध्यायः क्रतोस्तस्य भविष्यति । सर्पसत्रविधानज्ञो राजकार्यहिते रतः ॥ १६ ॥ तं गत्वा दशतां कश्चिद्भुजङ्गः स मरिष्यति । तस्मिन्मृते यज्ञकारे ऋतुः स न भविष्यति ॥ १७॥ ये चान्ये सर्पसत्रला भविष्यन्त्यस्य चर्विजः । तांश्च सर्वान्दशिष्यामः कृतमेवं भविष्यति ॥ १८ ॥ धर्मात्मानो दयालवः । अबुद्धिरेपा भवतां ब्रह्महत्या न शोभनम् ॥ ९१ ।। सम्यक्सद्धर्ममूला बै व्यसने शान्तिरुत्तमा । अधर्मोत्तरता नामकृत्स्नं व्यापादयेजगत् ॥ २० ॥ अपरे त्वब्रुवन्नागाः समिद्धं जातवेदसम् । वनिर्वापयिष्यामो मेघा भूत्वा सविद्युतः ॥ २१ ॥ ग्भाण्डं निशि गत्वा च अपरे भुजगोत्तमाः । प्रमत्तानां हरन्वाशु वित एवं भविष्यति ॥ २२ ॥ यने वा भुजगास्तस्मिञ्च्छतशोऽथ सहस्रशः । जनान्दशन्तु वै सर्वे ने त्रासो भविष्यति ॥ २३ ।। चाहिये । इस रोक और परोक में यज्ञ के बहुन नी तुमको उचित नहीं है ! आपत्ति काल में से दोषों को दिखाते हुए जिमसे वह यज्ञ न हो ऐमा कार्य करना चाहिये जिम का फल धर्म हो वही उपाय करेंगे ॥१४॥१५॥ अधनं न हो। अधर्म मन्यूर्ण जगत् का नाम करता इम मर्पयन का जानने वारा जो श्रेष्ठ है । दमर सर्प बोले-हम पिजरी और बादल बन. उपायाय यज्ञ कराने के लिये आवे उसे कोर्ट कर ऐमी वर्मा को कि, या की जरनी हुई अमि साँप जाकर काट स्वाये । वह मर जायेगा । इसके गात हो जाये ॥१६॥२१॥ पश्चात् जो-जो सर्पयश के जानने वाले ब्राह्मण दृमरे माँ में उत्तम मर्प बोले-रात्रि में कुछ यन कराने के रिय उपन्धित होंगे उन्हें हम मय मर्प जाकर मुवादि या के पात्रों को प्रामणों के इसी तरह काट सायेंगे । यत्र कराने वाले ब्राह्मणों माने पर उठा सं जिसने यज्ञ में निम्न हो। और के मरने पर वह यन न होगा । उनमें जो सर्प मैक्डों हजरों सर्म यन में आये हुए मनुष्यों को धर्मात्मा और दयालु थे वे चोले-तुम्हारा यह काटें गेमा करने पर या न होगा क्योंकि उनकी कहना युक्तिपूर्वक नहीं है । ब्राह्मणों की हत्या वास हो जागा । या मर्पयज्ञ में शुद्ध क्येि अन्न १९६ महाभारत [आदिपव अथवा संस्कृतं भोज्यं दूषयन्तु भुजङ्गमाः । स्वन मूत्रपुरीपेण सर्वभोज्यविनाशिना ॥ २४ ॥ अपरे त्वब्रुवंस्तत्र ऋत्विजोऽस्य भवामहे । यज्ञविघ्नं करिष्यामो दीयतां दाक्षिणा इति ॥ २५ ॥ वश्यतां च गतोऽसौ न. करिष्यति यथेप्सितम् । अपरे त्वब्रुवंस्तत्र जले प्रक्रीडितं नृपम् ॥ २६ ॥ गृहमानीय वनीमः क्रतुरेवं भवेन्न सः । अपरे त्वब्रुवंस्तत्र नागाः पण्डितमानिनः ॥ २७ ॥ दशामस्तं प्रगृह्याशु कृतमेव भविष्यति । छिन्नं मूलमनर्थानां मृते तस्मिन्भविष्यति ॥ २८ ॥ एषा नो नैष्ठिकी बुद्धिः सर्वेपामीक्षणश्रवः । अथ यन्मन्यसे राजन्द्रुतं तत्सविधीयताम् ॥ २९ ।। इत्युक्त्वा समुदैक्षन्त वासुकि पन्नगोत्तमम् । वासुकिश्चापि संचिन्त्य तानुवाच भुजगमान् ॥ ३० ।। नेपा वो नैष्ठिकी बुद्धिर्मता कर्तुं भुजङ्गमा. । सर्वेपामेव मे बुद्धिः पन्नगानां न रोचते ॥ ३१ ॥ कि तत्र संविधातव्यं भवतां स्याद्धितं तु यत् । श्रेयः प्रसादनं मन्ये कश्यपस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥ आर सव भोज्य पदार्थों को अपने मल-मूत्र से सर्प बोले हम राना को परडकर शीघ्र काट खराब करो । इससे भी यश में चिन्न हो जावेगा। खायेंगे उसके मरने पर यह सब अनर्थ मिट जायेगा। और सपा ने कहा राना के यहा ऋत्विज बनकर अन्त में सब नाग वासुकि से बोले- चरेंगे और यन को उरग करके उससे दक्षिणा आप का जो कुछ विचार हो सो किया जाये मागंग । और हमारे वश में होकर राजा जैसा हम चहिंगे वैसा करेगा । यह सुनकर और नागों ने गेमा कह सर वासुकि की और देखने लगे कहा-नय राना नर में ग्नान करने नावेगा उस और उसन भी विचार कर उन सपों से कहा-हे ममय उसको पकड़कर अपने रोक में याधकर सो ' यह तुम्हारी बुद्धि उत्तम नहीं है और मुझ रे विंग । जो अपने को पण्डित मानते थे वे को अच्छी नहीं प्रतीत होती । इस विषय में ऐसा -अब आगे ॥२२॥ Bew अध्याय ३८ ] जातिवर्गस्य सौहार्दादात्मनश्च भुजङ्गमाः । न च जानाति मे वुद्धिः किंचित्कर्तुं वचो हि वः ॥ ३३ ॥ मया हीदं विधातव्यं भवतां यदितं भवेत् । अनेनाहं भृशं तप्ये गुणदोषो महाश्रयों ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभाग्ने आदिपर्वणि आम्तीपणि वामुक्याटिमन्त्रणे मानिंगोध्यार ॥ ३ ॥ उपाय करना चाहिये जिममे तुम्हारा मका हित नहीं चाहना, और मैं तुम्हाग हितरी कार्य हो ओर महात्मा स्या को प्रसन्न करके पूछना करना चाहता हूँ । इमसे में अत्यन्न दुबी है योग्य है, टमी को में श्रेष्ठ ममझना ह । अपनी क्योंकि वहा होने के कारण मगर्ट ओर चुगई मेरे जाति की और अपनी भलाट के हित मे ही मे सिर पर है ॥३०॥ तुम्होर बनाये उपायों में से कोई भी उपाय करना आदिपर्व का मतीमा अध्याय ममात्र हुआ । भवेदिह पूम्पः । अथ अप्रतिमोऽध्यार ॥ ८ ॥ मौनिग्नाच-साणां तु वचः श्रुत्वा सर्वपामिति चेति च । वासुकेश्च वचः श्रुत्वा एलापत्रोऽत्रवादिदम् ॥ १ ॥ न स यज्ञो न भविता न स राजा तथाविधः । जनमेजयः पाण्डवेयो यतोऽस्माकं महङ्ग्यम् ॥ २ ॥ देवनोपहतो राजन्यो स देवमेवाश्रयते नान्यत्तत्र परायणम् ॥ ३ ॥ तदिदं चैवमस्माकं भयं पन्नगसत्तमाः । देवमेवाश्रयामोऽत्र शृणुध्वं च वचो मम ॥ 2 ॥ अहं शापे समुत्सृष्टे समापं वचस्तदा । मातुरुत्सङ्गमारुढो भयात्पन्नगसत्तमाः ॥ ५ ॥ । अडतीनवा अध्याय:८॥ उग्रश्रवा बोले-हे सपियो । परात्र ने मर वटन प्राणी को चानिये कि, देव ही 7 आश्रय माँ की और बामुकि नाग की मगह सुनका लेकर दृमग यत्र ग्न में कुछ नहीं हो सकता । वह मर्पयन्न अवर होगा हम रोग मर देवहत है। टमन मिकी मी देव आर का परिश्रम काना व्यर्थ ह । पाण्डवों की का ही आश्रन लेना चाहिये । सुनो, निम मार मन्नान वैन नहीं हनिमको हम टुब माता ने याप दिया था उस समय में माना की . का-द नगगन दे मरें।

महाभारत
[ आदिपर्य
देवानां पन्नगश्रेष्ठास्तीक्ष्णास्तीक्ष्णा इति प्रभो ।
पितामहमुपागम्य दुःखार्तानां महाद्युते ॥ ६ ॥
देवा उचु -का हि लब्ध्वा प्रियान्पुत्राश्छपेदेवं पितामह ।
ऋते कद्रू तीक्ष्णरूपां देव देव तवाग्रतः ॥ ७ ॥
तथेति च वचस्तस्यास्त्वयाऽप्युक्तं पितामह ।
एतदिच्छाम विज्ञातुं कारणं यन्न वारिता ॥ ८ ॥
ब्रह्मोवाच-बहवः पन्नगास्तीक्ष्णा घोररूपा विपोल्वणाः ।
प्रजानां हितकामोऽहं न च वारितवांस्तदा ॥ ९ ॥
ये
दन्दशकाः क्षुद्राश्च पापाचारा विपोल्वणाः ।
तेषां विनाशो भविता न तु ये धर्मचारिणः ॥ १० ॥
यन्निमित्तं च भविता मोक्षस्तेषां महाभयात् ।
पन्नगानां निवोधध्वं तस्मिन्काले समागते ॥ ११ ॥
यायावरकुले धीमान्भविष्यति महानृषिः ।
जरत्कारुरिति ख्यातस्तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥ १२ ॥
तस्य पुत्रो जरत्कारोभविष्यति तपोधनः ।
आस्तीको नाम यज्ञं स प्रतिपेत्स्यति तं तदा ।
तत्र मोक्ष्यन्ति भुजगा ये भविष्यन्ति धार्मिकाः ॥ १३ ॥
देवा उचु-स मुनिप्रवरो ब्रह्यञ्जरत्कारुर्महातपाः ।
गोद में था। उसके शाप को सुनकर मब देवता ब्रह्मा वोरे बहुत से सर्प तीक्ष्ण भयानक और
माना को यह नाम धरते कि, कट्ट बड़ी तीक्ष्ण है विष से भरे हुए है इस कारण से मैने प्रजा के
ब्रह्मा जी के पास गये और कहा महाराज कद के हित के लिये, शाप देती हुई कद्रू को निषेध नहीं
मियाय इस समार में ऐमा कान कठोर होगा जो क्यिा । जो सर्प नीच, पापी और विप से भरे हुए
अपने प्यार पुत्रों को ऐसा शाप देगा परन्तु आपने हैं उनका नाश इस शाप से होगा और जो धर्मात्मा
भी पाम होने पर उमको ऐसा भाप देन मे निषेध हैं उनका नाश न होगा । जिससे उन सपों का
नहीं किया और यह कहा कि, पेग ही होगा। भय से मोक्ष होगा उमको मुनो । ययायगें के कुर
यह पड़े आश्चर्य की बात है दमका क्या कारण में बुद्धिमान प्रसिद्ध तपम्बी, जितेन्द्रिय जरत्कारु
उत्पन्न होगा ! उमका पुन तपम्वी आम्तीक नाम
।
है। ॥१८॥

अन्याय ३२] महा भारत कस्यां पुत्रं महात्मानं जनयिष्यति वीर्यवान् ॥ ११ ॥ ब्रह्मोवाच-सनामायां सनामा स कन्यायां द्विजसत्तमः । अपत्यं वीर्यसंपन्नं वीर्यवाञ्जनयिष्यति ॥ १५ ॥ वासुकेः सर्पराजस्य जरत्कारुः स्वसा किल । स तस्यां भविता पुत्रः शापान्नागांश्च मोक्ष्यति ॥ १६ ॥ लापत्र उवाच --एवमस्त्विति तं देवाः पितामहमथाब्रुवन् । उक्त्वैवं वचनं देवान्विरिश्चस्त्रिदिवं ययो ॥ १७ ॥ सोऽहमेवं प्रपश्यामि वासुके भगिनी तव । जरत्कारुरिति ख्यातां तां तस्मै प्रतिपादय ॥ १८ ॥ भक्षवद्भिक्षमाणाय नागानां भयशान्तये । ऋपये सुव्रतायैनामेप मोक्षः श्रुतो मया ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आम्तीकपर्वणि मौपणे अप्रत्रियोऽध्याय |॥ ३८॥ का होगा । वह उस यन को रोकेगा । जो धार्मिक और वह पुत्र माप मे मा को मोम देगा। इसके सर्प हैं वह इस प्रकार छूट जावेंगे । देवता बोले उपरान्त एलापत्र बोला-सब देवताओं ने 'ऐमा ही हे ब्राह्मण ! मुनियों में श्रेष्ठ वडा तपी जरत्कार हो ब्रह्मा मे कहा । दमके पश्चात् ब्रह्मा अपने रोक क्मि घी मे उस आम्तीक पुत्र को उत्पन्न करेगा। को चले गये ॥१६॥१७॥ ब्रह्मा बोले-वह मुनियों में श्रेष्ठ वह तपोवल जरत्कारु इसलिये मेरी यह सम्मति है कि, तुम सपा अपने ही नाम वाली म्री में तपोबलयुक्त पुत्र को का भय दूर करने के लिय अपनी जरत्कारु नाम उत्पन्न करेगा ॥९॥१५॥ बहिन को भिक्षा मागते हुए जरत्कारु नाम सुनत मों के राजा वासुकि का बहिन जरत्कारु ऋषि को देदी । ऐमा करने में नागों का उद्धार नाम वाली है उमीम पुत्र को उसन्न करेगा। हो जायेगा ॥१८॥१०॥ आदिपर्या अइतीमया अध्याय ममान हुआ। अथ एकोनचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ३९ ।। मातिम्बाच -एलापत्रवचः श्रुत्वा ते नागा द्विजसत्तम । सर्वे प्रहृष्टमनसः साधु साधु माध्वित्यथानुवन् ॥ १ ॥ !! उनतालीमयां अध्याय ३९ ॥ उग्रश्रवा बोले-है ऋपियो ! एगपत्र नाग के अन्दा, बहुत असा कहने लगे । वासुकि नाग यह वचन सुनकर मर सर्प प्रसन्न हुए और बहुत भी प्रसन्न होकर उम जालाम नाम कन्या को महाभारत { आदिपर्य ततः प्रभृति तां कन्यां वासुकिः पर्यरक्षत । जरत्कारुं स्वसारं वै परं हर्पमवाप च ॥ २॥ ततो नातिमहान्कालः समतीत इवाभवत् । अथ देवासुराः सर्वे ममन्थुर्वरुणालयम् ॥ ३ ॥ तत्र नेत्रमभून्नागो वासुकिलिनां वरः । समाप्यैव च तत्कर्म पितामहमुपागमन् ॥ ४ ॥ देवा वासुकिना' सार्धं पितामहमथाब्रुवन् । भगवञ्च्छापभीतोऽयं वासुकिस्तप्यते भृशम् ॥ ५ ॥ अस्यैतन्मानसं शल्यं समुद्धर्तुं त्वमर्हसि । जनन्याः शापजं देव ज्ञातीनां हितमिच्छतः ॥ ६ ॥ हितो ह्ययं सदाऽस्माकं प्रियकारी च नागराट् । प्रसादं कुरु देवेश शमयास्य मनोज्वरम् ॥ ७ ॥ ब्रह्मोवाच-मयैव तद्वितीर्णं वै वचनं मनसाऽमराः । एलापत्रेण नागेन यदस्याभिहितं पुरा ॥ ८ ॥ तत्करोत्वेष नागेन्द्रः प्राप्तकालं बचः स्वयम् । विनशिप्यन्ति ये पापा न तु ये धर्मचारिणः ॥ ९ ॥ उत्पन्नः स जरत्कारुस्तपस्युग्रे रतो. द्विजः । तस्यैप भगिनीं काले जरत्कारुं प्रयच्छतु ॥१०॥ अपनी रक्षा में रखने लगा । कुछ काल व्यतीत भय से छुड़ाओ। हे देवताओं के पति ! यह होने पर देवता और दस्यों ने वासुकि नाग को वासुकि हमारा मढा हितकारी और प्रियकारी है । म्मी बनाकर ममुद्र को मथा । उसके मथने में आप इमपर प्रमन्न होकर इसके दुःख को शांत बवानों में श्रेष्ठ वासुकि मथने की रम्सी बनाया गया और उम कार्य के ममाप्त होने पर मय देयता यह सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि, जो एलापत्र यामुकि नाग को सम्मा जी के पास ले गये और नाग ने वासुकि से पहले कहा था वह वाक्य मेरे कहा कि, हे भगवन ! यह वासुकि शाप म अत्यन्त ही मुग्य से निकले हुए थे । ममय आने पर उसी नारपुनः है। है देव ! अपनी जाति के हित चाहने के अनुसार नगराज वासुकि कार्य करे । वसा करने यांग हा यागकि की माता के माप में उत्पन्न हुए एर पापा मपों का नाश हो जायेगा और धर्मात्मा करें ॥१७॥ ।

महा भारत । अध्याय ४] 7214 एलापत्रेण यत्प्रोक्तं वचनं भुजगेन ह । पन्नगानां हितं देवास्तत्तथा न तदन्यथा ॥ ११ ॥ मौतिम्बाच- एतच्छ्रुत्वा तु नागेन्द्रः पितामहवचस्तदा । सन्दिश्य पन्नगान्सर्वान्वासुकिः शापमोहितः ॥ १२ ॥ स्वसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृर्षि प्रति । सर्पान्वहुञ्जरत्कारी नित्ययुक्तान्समादधत् ॥ १३ ॥ जरत्कारुर्यदा भार्यामिच्छेद्वरयितुं प्रभुः । शीघमेत्य तदाख्येयं तन्नः श्रेयो भविष्यति ॥१४॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आम्तीफपर्वणि जरत्कार्वन्येपणे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ सर्प बच जावेंगे। जरत्कारु नाम ब्राह्मण ससार में यह बात सुनकर अपने स्थान को आया और मर उत्पन्न होकर उग्रतप कर रहा है। ममय आने पर मपों मे उक्त वृत्तात कहकर बहुत से मों को वामुकि अपनी जरत्कारु बहिन उसको दे देव । जरत्कारु ऋषि के खोजने को नियत किया और एलापत्र नाग ने जो कुछ कहा है हे देवताओ ! कहा कि, जब उस ब्राह्मण को विवाह करने की वह सपा का हितकारी है और वैमा ही होगा इच्छा होवे तभी हमको म्बबर देना । इसमें हमारा ॥८॥११॥ कल्याण होगा ॥१२॥१४॥ उग्रश्रवा बोले वासुकि नाग ब्रह्मा जी की आदिपर्व का उनतालीमवां अध्याय ममान हुआ । अथ चत्वारिंगोऽध्याय ॥४॥ गौनक चाच-जरत्कारुरिति ख्यातो यस्त्वया सूतनन्दन । इच्छामि तदहं श्रोतुंऋपेस्तस्य महात्मनः ॥ १ ॥ किंकारणं जरत्कारो मैतत्प्रथितं भुवि । जरत्कारुनिरुक्ति यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥ मौनिरुवाच-जति क्षयमाहुर्वे दारुणं कारसंजितम् । शरीरं कारु तस्यासीत्तत्स धीमाञ्च्छनः शनैः ॥ ३ ॥ । चालीमयां अध्याय ४॥ गानक ऋपि बोल-हे मूतपुत्र ! जो तुमने क्यों पड़ा ' हम मुनना चाहते हैं । उप्रश्रया बोले- जग्वार ऋषि का नाम लिया उसको में मुनने है ऋपियो ! जरत शन का अर्थ गर्गर और की इच्छा करता हूं। उमका नाम पृथ्वी में जरत्कार इन्द्रियों की जान का मय होना है और काम [ आदिपर्व २०२ मद्दा भारत अपयामास तीवेण तपसेत्यत उच्यते । जरत्कारुरिति ब्रह्मन्बासुकेर्भगिनी तथा ॥ ४ ॥ एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत्तदा । उग्रश्रवसमामन्य उपपन्नमिति ब्रुवन् ॥ ५ ॥ शौनक उवाच-उक्त नाम यथापूर्व सर्व तच्छ्रुतवानहम् । यथा तु जातो ह्यास्तीक एतदिच्छामि वेदितुम् । तच्छुत्वा वचनं तस्य सूतः प्रोवाच शास्त्रतः ॥ ६ ॥ मौतिरुवाच-संदिश्य पन्नगान्सर्वान्वासुकिः सुसमाहितः । खसारमुद्यम्य तदा जरत्कारुमृपि प्रति ॥ ७ ॥ अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः । तपस्यभिरतो धीमान्स दारान्नाभ्यकाङ्क्षत ॥ ८ ॥ स तूर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः म्वाध्यायवान्वीत भयः कृतात्मा । चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा न चापि दारान्मनसाऽध्यकाङ्क्षत ॥९॥ ततोऽपरस्मिन्संप्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु । परीक्षिन्नाम राजासीद्ब्रह्मन्कौरववंशजः ॥१०॥ यथा पाण्डुमहावाहुर्धनुर्धरवरो युधि । बभूव मृगयाशीलः पुराऽस्य प्रपितामहः ॥ ११ ॥ गल का अर्थ दारुण है अर्थात् उसका शरीर जो सावधानता के साथ अपनी बहिन को लेकर सर्वदा कामबल से दारुण हो रहा था उसको उसने धीरे उस ऋपि के आने की आकाक्षा (इच्छा ) करने धार तीन तपम्या करके दुर्य कर दिया और लगा ॥१७॥ यासुकि की यहिन भी ऐसी ही थी । इस प्रकार बहुत समय न्यतीत होने पर भी तपस्या में धर्मात्मा गानक ने मृत के घचन को मुनकर उममे लगे हुए जरत्कार ऋपि ने विवाह करने की पुकार कर कहा कि, यह अति योग्य विवाह हुआ। इच्छा नहीं की । वह अखण्डित ब्रह्मचारी तपस्या गानक योग , मनपुत्र ! तुमने जरत्कार नाम में लगा हुआ भय रहित, जितेन्द्रिय, महात्मा का अर्थ हममे कटा अब जिम प्रकार आम्तीक सारी पृथ्वी में विचरता था । परन्तु स्त्री की इच्छा यापि का जन्म हुआ गो हम मुनना चाहते है कभी नहीं करता था। इसके उपरान्त किसी समय यह वचन मुनकर गाम्नानुसार मृत ने शानक मे में कौरववश में परीक्षित नाम राजा कहा । उप्रश्रवा बोले -मर मों में कहकर वामुफि हुआ । यह धनुषधारियों में श्रेष्ठ बड़ी भुजा वाला , - उत्पन्न अध्याय ४०] महाभारत ००३ मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्न्महिपांस्तथा । अन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ॥ १२ ॥ • स कदाचिन्मृगं विध्वा वाणेना नतपर्वणा । पृष्ठतो धनुरादाय धनुरादाय संसार गहने बने ॥ १३॥ यथैव भगवान्द्रो विध्वा यजमृगं दिवि । अन्वगच्छडनुष्पाणिः पर्यन्वेष्टुमितस्ततः ॥ १४ ॥ न हि तेन मृगो विहो जीवन्गच्छति वै बने । पूर्वरूपं तु तत्तूर्ण सोऽगात्स्वर्गगति प्रति ॥ १५ ॥ परीक्षितो नरेन्द्रस्य विहो यन्नष्टवान्मृगः । दूरं चा पहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः ॥ १६ ॥ परिश्रान्तः पिपासात आससाद मुनि वने । गवां प्रचारवासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् ॥ १७ ॥ भूयिष्ठमुपयुञ्जानं फेनमापिवतां पयः । तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् ॥ १८ ॥ अपृच्छद्धनुरुद्यम्य तं मुनि क्षुच्छ्रमान्वितः । भो भो ब्रह्मन्नहं राजा परीचिदभिमन्युजः ॥ १९ ।। और शिकारी अपने राजा पाण्टु पिना के समान म्वर्गगति को गया और वह मृग का अर्मन हुआ । पृथ्वी का स्वामी राजा परीक्षित मृग, वागह होना ही गजा को स्वर्गगति का पहिरा ही कारण तेंदुए और भमे ओर भी अनेक प्रकार के जीवों है । उम मागे हुए मृग को देवता देवता वह को मारता हुआ वन में फिरता था 11८1१२॥ राजा वन में दर निकल गया । भूम्व और प्यास टस राजा ने किमी ममय एक मृग को तिग्छ मे व्याकुन हुआ थोडी दृर पर उमने पर आश्रम अग्रभाग वाले वाण में बंधकर आर धनुष को हाथ देत्या उममें एक यह तपम्बी कपि जी बठहों के में लेकर उम मृग के पीछ बडे वन में भागना दृध पीत में मुम्ब मे निको हुए प्रागों को चाटकर प्रारम्भ क्यिा । जैम भगवान् म्द्र ने यजम्प मृग रहते थे, पाम करने थे। राजा भूम्या प्यामा जल्ली को वैधनकर और आसाम में धनुप को हाथ में मे उन मुनि के आश्रम में चग गया और कहा-- रेकर उस मृग को दृढने के लिये टधर-उघर गमन हे भगवन' में अभिमन्यु सा पुत्र गजा परीक्षिना। क्यिा था । गजा परीक्षित का वाण म्वाकर कार्ड मैंने एक मृग को बाण में बंधा है आग्ने उमरी भी मृग जीता नहीं बचना था । वर गजा परीक्षित दम्या है। यह मुनि माननन में था इस कारण - महाभारत [ आतिपर २०४ मया विद्धो मृगो नष्टः कश्चित्तं दृष्ट्वानसि । स मुनिस्तं तु नोवाच किंचिन्मौनव्रते स्थितः ॥ २० ॥ तस्य स्कंधे मृतं सर्प क्रुद्धो राजा समासजत् । समुक्षिप्य धनुष्कोट्या स चैनं समुपेक्षत ॥ २१ ॥ न स किंचिदुवाचैनं शुभं वा यदिवाऽशुभम् । स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् ॥ २२ ॥ दृष्ट्वा जगाम नगरमृपिस्त्वासत्तिथैव सः । न हि तं राजशार्दूलं क्षमाशीलो महामुनिः ॥ २३ ।। स्वधर्मनिरतं भूपं समाक्षिप्तोऽप्यधर्पयत् । न हि तं राजशार्दूलस्तथा धर्मपरायणम् ॥ २४ ॥ जानाति भरतश्रेष्ठस्तत एनमधर्पयत् । तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूतिग्मतेजा महातपाः ॥ २५ ॥ शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रासादो महावतः । स देवं परमासीनं सर्वभूतहिते रतम् ॥ २६ ॥ ब्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंयतः । स तेन . समनुज्ञातो ब्रह्मणा गृहमेयिवान् ॥ २७ ॥ सग्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल । संरम्भात्कोपनोऽतीव विपकल्पो मुनेः सुतः ॥ २८ ॥ राना को कुछ उत्तर न दिया ॥१३॥२०॥ को अपराध करने पर भी कुछ न कहा ॥२ १२३॥ इम कारण गोध में होकर राना ने उस मुनि उम भारत नशियों में श्रेष्ठ राजाओ में बडे के क्धे पर धनुष की नोक से मरे हुए सर्प को राजा परीक्षित ने उस धर्म में तत्पर मुनि को नहीं टार दिया और फिर उम मुनि ने उसको देवा । जाना टम कारण उसका तिरस्कार किया। उस उम मपि ने भरा या युग कुछ भी न कहा, तर मपि का शृगी नामक पुत्र तरण और कठोर गजा उम मपि को मात म्वभाव देवकर मन में म्यभार वारा, बड़ा तपम्ची, बडा मोधी और दुबी होकर नगर को चरा गया और यह मपि कठिनता से प्रसन्न होने वाला था । वह शृगी भाषि चमटा रहा । उम भमागील मुनि न उम मर प्राणियों के हित चाहने यारा और ब्रह्मरोक पटोर हदय वारे रानाभा में श्रेष्ठ गना परीक्षित म पेटे हुए ब्रह्मा जी के समीप समय समय पर अध्याय ४] महाभारत ( उहिश्य पितरं तस्य यच्छ्वा रोपमाहरत् । ऋषिपुत्रेण धर्मार्थ धर्मार्थ कृशेन द्विजसत्तम ।। २९ ।। कृम उवाच-तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः । शवं स्कंधेन वहति मा शृहिन्गवितो भव ॥ ३० ।। व्याहरत्स्वृपिपुत्रेषु मा स्म किंचिद्वचो वद । अस्मद्विधेपु सिद्धेपु ब्रह्मवित्सु तपस्विपु ॥ ३१ ॥ क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः । दर्पजाः पितरं द्रष्टा यस्त्वं शवधरं तथा ॥ ३२ ॥ पित्रा च तव तत्कर्म नानुरूपमिवात्मनः । कृतं मुनिजनश्रेष्ट येनाहं भृशदुः। :खितः ॥ ३३॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आसीकपर्वणि परीचिदुपारयाने चत्वारिंगोऽध्याय ॥ ४० ॥ म्तुती करने को जाता था। वह शृंगी ऋषि ब्रह्मा है ॥२४॥२०॥ जी की आना पाकर घर को आता था । मार्ग में तुम हमारे मे मिद्ध और ब्रह्मनानी ऋषि पुत्रों उमके कृय नाम मित्र ने हमते बलते किमी बात के मध्य में कुछ मत कहो । तुम्हारा वह पराक्रम पर क्रोध करके ताना देकर कहा-तुम क्या अहंकार और गर्व के वचन कहा गये जो अपने पिता को करते हो। तुम्हारा पिना कमा तेजम्वी और तपम्बी रम अवस्था में देख रहे हो और मुझको बड़ा है जो मरे हुए मर्प को क्न्धे पर धारण किये हुए दुग इस बात में हुआ है ॥३०॥३३॥ आदिपर्व का चालीमवां अध्याय ममात हुआ । अथ एलरसमिोऽध्याय ॥ ११॥ 'मौतिग्याच-एवमुक्तः स तेजस्वी श्रृङ्गी कोपसमन्वितः । मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ॥ १ ॥ स तं कशमभिप्रेक्ष्य सूनृतां वाचमुत्सृजन् । अपृच्छत्तं कथं तातः स मेऽद्य मृतधारकः ॥ २ ॥ ॥ इस्तालीमयां अध्याय ११॥ उग्रश्रवा बोल- ऋषिया ! शृंगी ऋषि कृम कंधे पर मग हुआ मां अभी तक रसमा हुआ है। मे अपने पिता के कंधे पर मरा हुआ म धेर जाने शृंगी ऋषि योग कि. रिना ने टम पापी गना का पृचात सुनकर बड़ा प्रोधित हुआ और पूछने का क्या पिगाटा था जो उसने ऐमा अकार्य किया। रमा कि, मंग पिना कम है ! मग योग कि उमक तुम मेरे आगे टीक टीक कटी और मेरे नर का [ आदिपव महाभारत कम उवाच-राज्ञा परीक्षिता तात मृगयां परिधावता । अवसक्तः पितुस्तेऽद्य मृतः स्कंधे भुजङ्गमः ॥ ३ ॥ शृङ्ग्युवाच -किं मे पित्रा कृतं तस्य राज्ञोऽनिष्टं दुरात्मनः । ब्रूहि तत्कृश तत्त्वेन पश्य मे तपसो वलम् ॥ ४ ॥ वृा याच स राजा मृगयां यातः परीक्षिदभिमन्युजः । ससार मृगमेकाकी विध्वा बाणेन शीघ्रगम् ॥ ५ ॥ न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन्महावने । पितरं ते स दृष्ट्वैव पप्रच्छानभिभाषिणम् ॥ ६ ॥ तं स्थाणुभूतं तिष्ठतं क्षुत्पिपासाश्रमातुरः । पुनः पुनर्मूगं नष्टं पप्रच्छ पितरं तव ॥ ७ ॥ स च मौनव्रतोपेतो नैव तं प्रत्यभाषत । तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्प स्कंधे समासजत् ॥ ८ ॥ शृगिस्तव पिता सोऽपि तथैवास्ते यतव्रतः । सोऽपि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्वयम् ॥ ९ ॥ मोतिग्वार-श्रुत्वैवमृपिपुत्रस्तु गवं स्कन्धे प्रतिष्ठितम् । कोपसंरक्तनयनः प्रज्वलन्निव मन्युना ॥१०॥ आविष्टः स हि कोपेन शशाप नृपतिं तदा । वायुपस्पृश्य तेजस्वी क्रोधवेगवलात्कृतः ॥ ११ ॥ पर देखा । यह मुनकर हम बाल कि, अभिमन्यु दुखी होने मे त्रोध में आकर एक मरा हुआ सर्प का पुत्र राना पर्गभित शिकार बग्ने मी आया अपनी धनुष की नोक से उठाकर तेरे पिता के क्धे था। उमन एक मृग बाण माग । वह मृग उम पर रख दिया ॥१८॥ नीर को ग्वार बनकी और दाड़ा और राजा भी तेरा पिता व्रतयुक्त होने के कारण सर्प सहित गई पछि पार भागा। नप यहा पहुंचा नब तर वही नंटा रहा और यह राजा अपने ग्राम हस्तिना आश्रम में या पिना की 'टे हुए देगार पुर में आया । उग्रश्रवा बोरे हे ऋषियो ' शृगी राजा ने उस मृग र कई बार पछा : परतु मपि ने अपने पिता के कंधे पर मेरे सर्प को सुनकर रिना ने मन गरने के कारण मे पछ उत्तर माधम्पी अमि से जलते हुए की सहम प्रोध से दिया । नय गजा न भूम्प प्याम आर श्रम में मगर नेत्र क्यि । प्रोध के बेग मे भरा हुआ तेजम्बी - - अयाय ४.] महाभारत 13 मुंग्युवाच-योऽसौं वृद्धस्य तातस्य तथा कृच्छ्रगतस्य ह । स्कन्धे मृतं समानाक्षात्पन्नगं राजकिल्बिपी ॥ १२ ॥ तं पापमतिसंवृद्धस्तक्षकः पन्नगेश्वरः । आशीविपस्तिग्मतेज मद्वाक्यवलचोदिनः ॥ १३ ॥ सप्तरात्रादितो नेता यमस्य सदनं प्रति । द्विजानामवमन्तारं कुरूणामयशस्करम् ॥ ११ ॥ मानिग्याच-इति शप्त्वाऽतिसंक्रुद्धः शृङ्गी पितरमभ्यगात । आसीनं गोबजे तस्मिन्वहन्तं शवपन्नगम् ॥ १५ ॥ स तमालभ्य पितरं शृङ्गी स्कन्धगतेन वै । गवेन भुजगेनासीयः क्रोधसमाकुलः ॥ १६ ॥ दुःखाचाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमत्रवीत् । श्रुत्वेमा धर्पणां तात तव नेन दुरात्मना ॥ १७ ॥ राजा परीक्षिता कोपादापं तमहं नृपम् । यथाऽर्हति स एवोयं शापं कुरुकुलाधमः । सप्तमेऽहनि तं पापं तक्षकः पन्नगोत्तमः ॥१८॥ वैवस्वतस्य सदनं नेता परमदारुणम् । और क्रोध के अधीन हुए उम शृगी ने याचमन में बैठे हुए पिना के ममीप गया । वह शृगी कर गजा को शाप दिया | मपि प पर मेरे हुए मर्प मे युक्त अपने पिता शृगी योग-जिम पापी गजा ने वृद्ध और मान- को देम अत्यन्त क्रोध मे व्याकुन हो गया । और बन धारण क्येि हुए मेरे पिता के गले में मरा दुख में आंसु बहाना हुआ अपने पिता में योग- हुआ सर्प डाला है। उस पापी को अत्यन्त रोध है नात ' इन दुष्ट गा पक्षिन में तुम्हारे हम मरा हुआ और दाद में विष को सम्बन वाय निग्मार को सुनकर गाध में मैंने उसको भार दे और तीक्ष्ण तेजयुक्त और में वचन में प्रेग्पा दिया। और जमा व राजा कठोर या मान क्यिा हुआ मों का गता तक्षक आज मे मानवे माप दे दिया। उम कटार पारीगना भी माना दिन टमकर यमगर को पहुनांरंगा, जो गजा दिन मना तन नक्षा टमकर यमक को गुरुओं के यम का नाम ग्ने बारा और ब्रामणों पहुचायेगा । शृगी के वचन सुनकर गनी सरि का अपमान करने वाग है। उमरा बार-इम बोरे हे पुत्र ' उसने मंग र निगाह नही म्यिा पर अत्यन्त प्रोध में होगी मार देकर ग. १. और यह मार देना नाम्बियों का धन गान्ग . -- महाभारत [ आदिपर्व तमब्रवीपिता ब्रह्मंस्तथा कोपसमन्वितम् ॥ १९ ॥ शमीक उवाच-न मे प्रियं कृतं तात नैप धर्मस्तपस्विनाम् । वयं तस्य नरेन्द्रस्य विषये निवसामहे ॥ २०॥ न्यायतो रक्षितास्तेन तस्य पापं न रोचये । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञो ह्यस्मद्विधैः सदा ॥ २१ ॥ अन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः । यदि राजा न संरक्षत्पीडा नः परमा भवेत् ॥ २२ ॥ न शक्नुयाम चरितुं धर्म पुत्र यथासुखम् । रक्षमाणा वयं तात राजभिर्धर्मदृष्टिभिः ॥ २३ ॥ चरामो विपुलं धर्म तेषां भागोऽस्ति धर्मतः । सर्वथा वर्तमानस्य राज्ञः क्षन्तव्यमेव हि ॥ २४ ॥ परीक्षित्तु विशेषेण यथाऽस्य प्रपितामहः । रक्षत्यस्मांस्तथा राज्ञा रक्षितव्याःप्रजा विभो ॥ २५ ।। तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ २६ ॥ अराजके जनपदे दोपा जायंति वै सदा । उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति चै ॥ २७ ॥ हम उम राजा के देश में रहते है ॥१२॥२०॥ परीक्षित जैसा इसका पिता हमारी रक्षा करता था उसने न्याय से हमारी रक्षा की है। उसका वैसे ही वह रक्षा करता है । इसलिये राजा को दोह मुझको अन्टग नहीं लगा परन्तु हमारे जैस शाप देकर नाश करने से तुझको प्रजा का पाप तपस्थियों को मदा अपन अपराध करते हुए राजा हुआ। मार्ग से थक्ति और क्षुधा से व्याकुल उस को भी क्षमा करनी चाहिए। जो मनुप्य धर्म को तपम्धी राजा ने मेरे मौनव्रत को न जानकर मिटा देना है उगे धर्म भी मिटा देता है । इस यह कर्म किया है ऐसा मै जानता ह ॥२१॥२६॥ में मन्दर नहीं यदि राजा न हो तो प्रजा को बड़ी है पुत्र ! जिम देश में राजा नहीं होता यहा पारा होता है । और हे पुत्र ! राजा के न होने चौरी आदि बड़े बड़े दोप निरन्तर हुआ करते है । पर हम धर्म नहीं कर सकते | धर्म की दृष्टि में राजा ही केवल दंड देकर उन उपाधियों को दूर उसमे उनका भी अंश है । हम कारण पाप करते करता है । जब राजा के दंट देने से शान्ति हो हुए भी गजा को क्षमा करना योग्य है । यह राजा जाती है, तब सब रोग निविध धर्म करते है। इससे अध्याय ४२] महाभारत २०० दण्डात्प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते तदा । नोद्विग्नश्चरते धर्म नोद्विग्नश्चरते क्रियाम् ॥ २८ ॥ राज्ञा प्रतिष्ठितो धर्मो धर्मात्स्वर्गः प्रतिष्ठितः । राज्ञो यज्ञक्रियाः सर्वा यज्ञाद्देवाः प्रतिष्ठिताः ॥ २९॥ देवावृष्टिः प्रवर्तेत वृष्टेरोषधयः स्मृताः । ओपधिभ्यो मनुष्याणां धारयन्सततं हितम् ॥ ३० ॥ मनुष्याणां च यो धाता राजा राज्यकरः पुनः । दशश्रोत्रियसो राज इत्येवं मनुरब्रवीत् ॥ ३१ ॥ तेनेह क्षुधितेनाद्य श्रान्तेन च तपस्विना । अजानता कृतं मन्ये व्रतमेतदिदं मम ॥ ३२ ॥ कस्मादिदं त्वया वाल्यात्सहसा दुप्कृतं कृतम् । न ह्यहति नृपः शापमस्मत्तः पुत्र सर्वथा ॥ ३३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि परीक्षिच्छापे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ धर्म का होना राजा ही के होने से होता है। का पालन करे और धर्म से राज्य करे वह दग और धर्म ही से म्बर्गलोक मिलता है । धर्मात्मा राजा वेटपाठियों के बराबर है । उस मार्ग के श्रम मे होने ही से यज होते हैं और यनों से देवता प्रसन्न थकित और क्षुधा से व्याकुल तपम्वी राजा ने मेरे होते हैं । देवताओं के प्रमन्न होने से वपी होती प्रत को न जानकर यह कर्म किया। तुमने बालकपन है । और वर्षा के होने से अन्नादि उत्पन्न होते है। के अज्ञान से शीघ्र ऐमा अकार्य किया मा हे पुत्र ! और अन्नादि के होने से सब जीवों का पालन वह राजा अपराध करता हुआ भी हममे माप देने होता है । मनुजी ने कहा है कि, जो राजा मनुष्यों योग्य नहीं है ॥२७।३३।। आदिपर्व का इक्तालीमयां अध्याय ममाम हुआ । - । अथ द्वचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४ ॥ ग्युवाच-यद्येतत्साहसं तात यदि वा दुष्कृतं कृतम् । प्रियं वाप्यप्रियं वा ते वागुक्ता न मृपा भवेत् ॥ १ ॥ ॥ वनालीमयां अध्याय १२ ॥ शृंगी चोला है तान ! यदि मैने उचित कार्य स्चता हो, जो में कर चुका हू वा अन्यथा नहीं नहीं किया, और वह आप को रुचता हो या न ही माना। क्योंकि में हमी में भी कभी मन्य | आदिप महाभारत नैवान्यथेदं भविता भविता पितरेप ब्रवीमि ते । नाहं मृपा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ॥ २ ॥ द्रामीकं वाच-जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यागरं तथा । नानृतं चोक्तपूर्व ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ ३ ॥ पित्रा पुत्रो बयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु । 'यथा स्याद गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच महद्यशः ॥ ४ ॥ किं पुनर्वाल एव त्वं तपसा भावितः सदा । वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ॥ ५ ॥ सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वाय धर्मभृतां वर । पुत्रत्वं वालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥ ६ ॥ स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् । चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्म प्रहास्यसि ॥ ७ ॥ क्रोधो हि धर्म हरति यतीनां दुःखसंचितम् । ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥ ८ ॥ शम एवं यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥ ९ ॥ नस्माञ्चथाः मततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः । क्षमया प्राप्स्यसे लोकान्ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥ १० ॥ नही कहना यह ना नाप था। नीक चान्ग गर्वित होकर वृद्ध महात्मा भी प्रायः क्रोध के वी- है पुर यह जानना है कि, तुम उपप्रभाव भृन नहीं रहते । हे धर्मनों में श्रेष्ठ ! में तुमसे कुछ धान और मन्यवाद । और पाले भी कभी तुमने बहना योग्य समझता है। तुम्हारे बालकपन और इस अट नहीं योग और ना तुम्हारा कहा जट होगा। न करने योग्य कार्य को और अपने पुत्रत्र को भी पान्नु र 'पागने में श्रेष्ट गुण और या दंगार निक्षा देना उनिन ममझता हूं ॥१॥६॥ min,मनिय में गिना अपने जवान अब तुम बांध के स्वभाव को छोड़कर गांति महाभ याद माता । तुम ना अभी पूर्वक यन के फल मूल ग्याकर नपम्या किया करो। और नया गनुमने महा अपनी हम प्रहार किर धर्म क्षय न करना क्योंकि जिनन्द्रिय अनिया के प्रभाव में पुरुषों का यह पट में ममय किया हुआ धर्म ग्राम anuaweswimweariwww अध्याय ४२] महाभारत मया तु शममास्थाय यच्छश्यं कर्तुमय वे 1. तत्करिष्याम्यहं तात प्रेपयिष्ये नृपाय वे ॥ ११ ॥ मम पुत्रेण शप्तोसि वालेन कृशत्रुद्धिना । ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेभ्य राजन्नमर्पिणा ॥ १२ ॥ सौतिम्वाच-एवमादिश्य शिष्यं स प्रेपयामास सुव्रतः । परीक्षिते नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥ १३ ॥ संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥ १४ ॥ सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् । विवेश भवनं राज्ञः पूर्व द्वाःस्थैर्निवेदितः ॥ १५ ॥ पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा । आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥ शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । गौरमुग्ध उवाच-शमीको नाम राजेन्द्र वर्तते विषये तव ॥ १७ ॥ ऋपिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥ १८ ॥ से नष्ट हो जाता है । धर्म के लोप होने से अच्छी के रखने वाले बड़े तपम्बी गमीक ऋपि ने शिष्य गति नहीं मिलती। जो क्षमा रखते हैं उनका यह को राजा परीक्षित के पास भेजा । उस शिप्य का लोक और परलोक दोनों बन जाते है । तुम सदा नाम गौरमुख था। वह बड़ा सावधान और गीलवान क्षमागील और जितेन्द्रिय होकर तपम्या करते था । उसको कुगल प्रश्नादिक और कार्य समझाकर रहो । क्षमा से ही तुम्हें ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। गजा परीक्षित के समीप भेजा । वह गिप्य मुनि हे पुत्र ! मैं शांति का आश्रय लेकर जो कुछ कर्तव्य की आना पाकर वहां से तुरंत कारवों के कुल को है उसको कम्गा और राजा के पास एक पुरुष को बढ़ाने वाले महाराज परीक्षित के राजमन्दिर में पहुंचा भेगा । जो कह कि हे राजन् ! थोड़ी बुद्धि वाले और द्वारपालों में अपनी म्बवर कराई । मार्ग के मेरे क्रोधी पुत्र ने तुममे मेरे हम अपमान को देख- परिश्रम में यक्ति उम ब्राह्मण का राजा ने मत्कार कर माप दिया है ॥७।१२।। किया और उमन मब घोर वृत्तांत राजा ने कहा । उग्रश्वा बोले-एमा कहकर उन उत्तम मतों मंत्रियों ने भी उम मिप्य के भयानक वृत्तांत को | आदिप २६० महाभारत - नैवान्यथेदं भविता पितरेप ब्रवीमि ते । नाहं मृपा ब्रवीम्येवं स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ॥ २ ॥ शमीफ उवाच-जानाम्युग्रप्रभावं त्वां तात सत्यागिरं तथा । नानृतं चोक्तपूर्व ते नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ ३ ।। पित्रा पुत्रो वयःस्थोऽपि सततं वाच्य एव तु । यथा स्याद् गुणसंयुक्तः प्राप्नुयाच्च महद्यशः ॥ ४ ॥ किं पुनर्वाल एव त्वं तपसा भावितः सदा । वर्धते च प्रभवतां कोपोऽतीव महात्मनाम् ॥ ५ ॥ सोऽहं पश्यामि वक्तव्यं त्वयि धर्मभृतां वर । पुत्रत्वं वालतां चैव तवावेक्ष्य च साहसम् ॥ ६ ॥ स त्वं शमपरो भूत्वा वन्यमाहारमाचरन् । चर क्रोधमिमं हत्वा नैवं धर्म प्रहास्यसि ॥ ७ ॥ क्रोधो हि धर्म हरति यतीनां दुःखसंचितम् । ततो धर्मविहीनानां गतिरिष्टा न विद्यते ॥ ८ ॥ शम एव यतीनां हि क्षमिणां सिद्धिकारकः । क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् ॥ ९ ॥ नस्माञ्चरेथाः सततं क्षमाशीलो जितेन्द्रियः । क्षमया प्राप्स्यसे लोकान्ब्रह्मणः समनन्तरान् ॥ १० ॥ नहीं कहता हु यह ना शाप था । ममीक बोला- गर्वित होकर वृद्ध महात्मा भी प्रायः क्रोध के वशी- पुर ! यह मैं जानता हु कि, तुम उग्रप्रभाव भृन नहीं रहते । हे धर्मों में श्रेष्ठ ! मैं तुमसे कुछ वाले और सत्यवादी हो और पहले भी कभी तुमने कहना योग्य समझता हू। तुम्हारे बालकपन और इस मृट नहीं योग और न ही तुम्हारा कहा गुट होगा। न करने योग्य कार्य को और अपने पुत्रत को भी पान्तु हे पुत्र ' क्या करने में श्रेष्ठ गुण आर यम देयकर शिक्षा देना उचित समझता हूं ॥१३॥ प्राम होता है, हम पिय में पिना अपने जवान अब तुम क्रोध के म्बमाव को छोड़कर शांति- रहक को भी उपदेश दे सकता है । तुम तो अभी पूर्वक बन के फल-मूल ग्वाकर तपस्या किया करो। यापक ही हो। और नपाया मे तुमने सदा अपनी इस प्रकार फिर धर्म क्षय न करना क्योंकि जितन्द्रिय आमा को पवित्र दिया । तपस्या के प्रभाव से पुम्पों का बड़े फष्ट से मध्य किया हुआ धर्म क्रोध - अन्याय ४२] म हा भान मया तु शममास्थाय यच्छक्यं कर्तुमद्य वै । तत्करिष्याम्यहं तात प्रेपयिष्ये नृपाय वै ॥ ११ ॥ मम पुत्रेण शप्तोसि वालेन कृशबुद्धिना । ममेमां धर्षणां त्वत्तः प्रेक्ष्य राजन्नमर्पिणा ॥ १२ ॥ सौदिरुवाच एवमादिश्य शिष्यं स प्रेपयामास सुव्रतः । परीक्षिते नृपतये नृपतये दयापन्नो महातपाः ॥ १३ ॥ संदिश्य कुशलप्रश्नं कार्यवृत्तान्तमेव च । शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं समाहितम् ॥ १४ ॥ सोऽभिगम्य ततः शीघ्रं नरेन्द्रं कुरुवर्धनम् । विवेश भवनं राज्ञः पूर्व द्वाःस्थैनिवेदितः ॥ १५ ॥ पूजितस्तु नरेन्द्रेण द्विजो गौरमुखस्तदा । आचख्यौ च परिश्रान्तो राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥ शमीकवचनं घोरं यथोक्तं मन्त्रिसन्निधौ । गौरमुख उवाच-शमीको नाम राजेन्द्र वर्त्तते विपये तव ॥ १७॥ ऋपिः परमधर्मात्मा दान्तः शान्तो महातपाः । तस्य त्वया नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्वियोजितः ॥ १८ ॥ से नष्ट हो जाता है । धर्म के लोप होने से अच्छी के रखने वाले बड़े तपम्बी गमीक ऋषि ने शिप्य गति नहीं मिलती। जो क्षमा रखते है उनका यह को राजा परीक्षित के पास भेजा । उस शिप्य का लोक और परलोक दोनों वन जाते है । तुम सदा नाम गौरमुख था । वह बड़ा सावधान और शीलवान क्षमाशील और जितेन्द्रिय होकर तपम्या करते था । उसको कुगल प्रश्नादिक और कार्य समझाकर रहो । क्षमा से ही तुम्हें ब्रह्मलोक की प्राप्ति होगी। गजा परीक्षित के समीप भेजा । वह गिप्य मुनि पुत्र ! मैं शांति का आश्रय लेकर जो कुछ कर्तव्य की आना पाकर वहां से तुरंत कारयों के कुल को है उसको कम्गा और राजा के पास एक पुरुष को बढाने वाले महाराज परीक्षित के राजमन्दिर में पहुंचा मेजूंगा । जो कहे कि हे राजन् ! थोड़ी बुद्धि वाले और द्वारपालों में अपनी खबर कराई । मार्ग के मेरे क्रोधी पुत्र ने तुममे मेरे इस अपमान को देख- परिश्रम से थकित उस ब्राह्मण का राजा ने मत्कार कर याप दिया है ॥७॥१२॥ किया और उसने सर घोर वृतांत राजा मे कहा । उग्रश्रवा बोले-ऐमा कहकर उम उत्तम व्रता मंत्रियों ने भी उम शिप्य के भयानक वृत्तात को [ आदिपर्व महाभारत - । - - अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे मोनान्वितस्य च । क्षान्तवांस्तव तत्कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ॥ १९ ॥ तेन शप्तोऽसि राजेन्द्र पितुरज्ञातमा वै । तक्षकः सप्तरात्रेण मृत्युस्तव भविष्यति ॥ २०॥ तत्र रक्षां कुरुष्वेति पुनः पुनरथाऽब्रवीत् । तदन्यथा न शक्यं च कर्तुं केनचिदप्युत ॥ २१ ॥ न हि शक्नोति तं यन्तुं पुत्रं कोपसमन्वितम् । ततोऽहं प्रेपितस्तेन तव राजन्हितार्थिना ॥ २२ ॥ भौतिग्याच-इति श्रुत्वा वचो घोरं स राजा कुरुनन्दनः । पर्यतप्यत तत्पा कृत्वा राजा महातपाः ॥ २३ ॥ तं च मौनव्रतं श्रुत्वा वने मुनिवरं तदा । भूय एवाभवद्राजा शोकसंतप्तमानसः ॥ २४ ॥ अनुक्रोशात्मतां तस्य शमीकस्यावधार्य च । पर्यतप्यत भूयोऽपि कृत्वा तत्किल्विषं मुनेः ॥२५॥ न हि मृत्युं तथा राजा श्रुत्वा वै सोऽन्वतप्यत । अगोचदमरप्रन्यो यथा कृत्वेह कर्म तत् ॥ २६ ॥ विस्तारपूर्वक मना । गोरमुख बोरा हे राजेन्द्र ! का यत्न कीजिये ऐसा बार बार आपसे कहा है । यहा धर्मात्मा, चतुर, शात म्यभार वारा, तपम्बी उसके पुत्र के शाप को लौटाने में कोई समर्थ नहीं दशमीक नाम ऋषि आपके राज्य में रहता है । है है। वह ऋषि भी क्रोध में भरे हुए अपने पुत्र को ' जिम मानग्रत धारण किये हुए के क्धे नहीं रोक सकता है। आपके साथ हित रखने वाले पर आप मरा हुना मर्प रम्य आये थे उन्होंने मुझे महात्मा ने मुझको आपके पास भेजा है। उग्रश्रया या कहने को आप के पाम भेजा है कि, हमने आप बोले वह बुरशुल का आनन्द देने वारा महा के अपराध को क्षमा किया था परन्तु हमारे पुन तपम्बी गजा परीक्षित उस पाप को करके और उस नक्षमा न करके आप को यह माप दिया कि, भयानक वचन को मुनार अत्यन्त तापयुक्त हुआ। गना को आज में माता रान नमक मर्प काटेगा उस मुनियों में श्रेष्ठ को वन में मानवत वारा जान- जारघा मृयु को प्राम होगा ॥१३॥२०॥ कर अत्यन्त गोक से पीड़ित हुआ । उस महात्मा मां पाप दा मृत्यु निश्य होगी। आप रक्षा समीक की दयालुना को विचारकर और उस बड़े - नग्न्यान अध्याय ४] महाभारत ततस्तं प्रेषयामास राजा गौरमुग्वं तदा । भूयः प्रसादं भगवान्करोत्विह ममेति वै ॥ २७ ॥ तस्मिंश्च गतमात्रेऽथ राजा गौरमुखे तदा । मन्त्रिभिर्मन्त्रयामास सह सह सविनमानसः ॥ २८ ।। संमन्त्र्य मन्त्रिभिश्चैव स तथा मन्त्रतत्त्ववित् । प्रासादं कारयामास एकस्तम्भं सुरक्षितम् ॥ २९ ॥ रक्षां च विदधे तत्र भिपजश्चापधानि च । ब्राह्मणान्मत्रसिद्धांश्च सर्वतो वैन्ययोजयत् ॥ ३० ॥ राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः । मंत्रिभिः सह धर्मनः समन्तात्परिरक्षितः ॥ ३१ ॥ न चैनं कश्चिदारुढं लभते राजसत्तमम् । वातोऽपि निश्चरंस्तत्र प्रवेशे विनिवार्यते ॥ ३२ ॥ प्राप्ते च दिवसे तस्मिन्सप्तमे द्विजसत्तमः । काश्यपोऽभ्यागमाद्विद्वांस्तं राजानं चिकित्सितुम् ॥ ३३ ॥ श्रुतं हि तेन तदभूद्यथा ते राजसत्तमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठो नेप्यते यमसादनम् ॥ ३४ ॥ मारी मुनि के अपराध को करसे अति सन्तप्त दिये आर बडे बडे वैद्य आर नाना प्रकार की हुआ। उस देवताओं के तुल्य राजा ने मृत्यु को शिप दर मान गनी औपधिया और बडे बडे मन मुनकर मा विचार नहीं पिया जमा उम अकार्य सिद्ध ब्राह्मणों की रक्षा के लिये एकत्रित किये । को काय सोच क्यिा ॥२॥२६॥ उस स्थान पर बैठा हुआ राना धर्मज और नागें मके पश्चात् राजा ने गोरमुख को विदा किया नगप मे मत्रित्रों मे युक्त मर राज्य कार्यों को करने और कहा कि, भगवान् गीक षि मुझपर फिर ग्गा । और उम स्थान में चढ़े हुए गता के समीप कृपा करें। उसके जाने पर रिक्त मन पारे गजा कोई नही जामकता था ॥२७॥३॥ ने मंत्रियों को बुगकर माह ली भार माह करके उम मानवें दिन में आने पर विद्वान् काम्यप एक मदिर एक स्तम कामा नराया कि, और प्रामण गना की मिश्मिा ई रिय आता था। जीर की ना क्या गति है वायु भी वहा नहीं जा उमन मा वृतान्न म गजा का मन लिया था मनी थी । गजा सम स्थिन हुआ और चागे कि, नभा नाग उमे मान दिन जादिन मे गरिन और ये मागिय बडे पड ग्क्षा नियत कर करेगा उम गता में निविष कमगा । उमम ।

०१४ महाभारत [ आदिपर्व तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् । तत्र मेऽर्थश्च धर्मश्च भवितेति विचिन्तयन् ॥ ३५ ॥ तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि । गच्छन्तमेकमनसं द्विजो भूत्वा वयोऽतिगः ॥ ३६ ॥ तमब्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं मुनिपुङ्गवम् । क्क भवांस्त्वरितो याति किं च कार्य चिकीर्षति ॥ ३७॥ काश्यप उवाच-नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परीक्षितमरिंदमम् । तक्षकः पन्नगश्रेष्ठस्तेजसाऽद्य प्रधक्ष्यति ॥ ३८॥ तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसम् । पाण्डवानां कुलकरं कुलकरं राजानमामितौजसम् । गच्छामि त्वरितं सौम्य सद्यः कर्तुमपज्वरम् ॥ ३९ ॥ ननक उयाच-अहं स तक्षको ब्रह्मस्तं धक्ष्यामि महीपतिम् । निवर्तस्व न शक्तस्त्वं मया दष्टं चिकित्सितुम् ॥ ४० ॥ -अहं तं नृपतिं गत्वा त्वया दप्टमपज्वरम् । करिष्यामीति मे बुद्धिर्विद्याबलसमन्विता ॥ ४१ ॥ पनि श्रीमन्महाभारने आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि काश्यपागमने द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ मुझको धन और धर्म की प्राप्ति होगी, यह विचा- करेगा । है ब्राह्मण-अमि के समान तेजम्ची पाडवों रंने र गा । उम काश्यप बामण को तक्षक ने रास्ते के कुल को बढान वाले और बड़े बलवान उस मेंया जो कि एकान्ननित दिये चला जाता था। तक्षक से काटे हुए. राजा को निर्विप करने को नए तक्षय नाग वृद्ध ब्राह्मण ! रूप धारणकर में शीघ्र जारहा है | तक्षक बोरा-हे ब्राह्मण गनियों में घट उम काश्यप में योग हे ब्रामण ! वह तक्षक नाग मै ह और राजा परीक्षित को अपने नुमापना में कहा जा रहा और क्या कार्य षि मे भम्म करुगा । तुम वापस जाओ क्योंकि पाना चाहने हो । कास्यप योग मधुओं के नाम मेरे काटे हुए की तुम चिकित्सा नहीं कर सक्ते । पाने बारे पुगत में उरान गजा परीक्षित को काश्यप योग-मैं उस राजा को जिसको तुम गों में ठगना नद आज अपने नेज में भमा काटोग अपने विद्यावल से निविष करदगा ॥३३॥४१॥ आदिपर्य या पनागमया अाय ममाम हुआ। याश्यप याच अन्याय ५३] महा मारत अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।। १३ ॥ तन्नक उवाच-यदि दष्टं मयेह त्वं शक्तः किंचिचिकित्सितुम् । ततो वृक्षं मया दृष्टामिमं जीवय काश्यप ॥ १ ॥ परं मन्त्रबलं यत्ते दद्दर्शय यतत्व न्यग्रोधमेनं वक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥ काश्यप उवाच-दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यद्येतदभिमन्यसे । अहमेनं त्वया दष्टं जीवयिष्ये भुजङ्गम ॥ ३ ॥ मौतिग्वार एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना । अदशवृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ॥ ४ ॥ स वृक्षस्तेन दष्टस्तु पन्नगेन महात्मना । आशीविपवियोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ॥ ५ ॥ तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरवीत् । कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ट जीवयैनं वनस्पतिम् ॥ ६ ॥ मौतिम्बाच-भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा । भस्म सर्व समाहृत्य काश्यपो वाक्यमत्रवीत् ॥ ७ ॥ विद्यावलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽद्य वनस्पती । अहं संजीवयाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ॥ ८ ॥ ॥ तेतालीमवां अध्याय १३ ॥ तक्षक बोला-यदि तुम मेरे काट हुप की उमे काटा । उम मर्प मे काटा हुआ वह वृक्ष विष चिकित्मा करने को ममर्थ रखते हो तो मेरे काटे की अग्नि मे जलने लगा । जब जलकर भम्म हो हुए. वृक्ष को फिर हरा करदो। और अपने विद्याबल गया फिर तक्षक नाग ने काश्यप में कहा -है दिखाने का यन्न करो । हे प्रामणों में श्रेष्ठ ! तरे ब्राह्मण ! अब अपने यव मे इम वृक्ष को जिलाओ देखते हुए मैं इम गूलर के वृक्ष को भम्म करता ॥१॥६॥ हूँ । काश्यप ने कहा है माँ में श्रेष्ठ तक्षक ! यदि -उस मर्प के तंज मे भम्म हुए तुम ऐमा समझत हो कि तुम्हारे भम्म किये हुए वृक्ष की मब राब को इकट्ठा करके काश्यप ने को नहीं जिला मकना हूं तो इस वृक्ष को काटो । तक्षक मे कहा-हे मों में श्रेष्ठ तक्षक : तर देवन उग्रश्रवा बोले-उम काश्यप नहात्मा के एम वचन ही में अपने विद्यारन मे इस वृक्ष को जलाता हूं। को मुनकर उस तक्षक नाग ने वृक्ष के समीप जाकर इसके पश्चात् भगवान् काश्यप ने उस राख के टेर उग्रश्रवा बोले- 1 आदिपर्व महाभारत ततः स भगवान्विद्वान्काश्यपो द्विजसत्तमः । भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवयत् ॥ ९ ॥ अङ्कुरं कृतवांस्तत्र ततः पर्णद्वयान्वितम् । पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ॥ १० ॥ तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना । उवाच तक्षको ब्रह्मन्नतदित्यद्भुतं त्वयि ॥ ११ ॥ द्विजेन्द्र यद्विपं हन्या मम वा मद्विधस्य वा । कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ॥१२॥ यत्तेऽभिलपितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् । अहमेव प्रदास्यामि तत्ते यद्यपि दुर्लभम् ॥ १३ ॥ विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुपि नराधिपे । घटमानस्य ते विष सिद्धिः संशयिता भवेत् ॥ १४ ॥ नतो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । निरंशुरिव धर्मांशुरंतर्धानमि बजेत् ॥ १५॥ गाश्यप याच --धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे देहि भुजङ्गम । तनोऽहं विनिवर्तिप्ये स्वापतेयं प्रगृह्य वै ॥ १६ ॥ नाप उपाय - यावद्धनं प्रार्थयसे तम्माद्राजस्ततोऽधिकम् । अहमेव प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ॥ १७॥ को अपनी विधा में जिग दिया। पहले, अपुर प्रगट करो ॥१०॥ उन्मस हुआ फिर दो पर हुए. फिर यहुन मे पत्ते जिम वस्तु की तुम्हे राजा परीक्षित से मिलने और पड़ी बड़ी कामाय नमाई। इसके उपगन की इच्छा हो मैं तुमको यही दगा चाहं दुर्लभ पदार्थ मा वृक्ष या मारा गया। मामा काश्यप वयों न हो । प्रामण के माप में इस राजा की उस वृक्ष का दिया उमा दम्पदा आयु क्षीण हो चुकी । इस कारण से जो आप भागारमाध्यवानरयायाम आर का विद्या न वा काम न दिया ना आपका माना १ युर प्रानुन नही । भार मेरे अभया दमा का में प्रसिद्ध और पागमान या राहु में प्रमे कानिधय अादा मकन । हुए. मयं के समान अन्न हो जायगा । इमम आर. Rig : अव तुम्हाग पया इच् । मा को जो मार गना में मागना हो या मुझम ।।

अध्याय ४.] महामान . नौतिरुवाच-तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः । प्रध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति बुद्धिमान् ॥ १८ ॥ दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपति तदा । श्रीणायुपं पाण्डवेयमपावर्तत काश्यपः ॥ १९ ॥ लब्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद्याबदीप्सितम् । निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्समयेन महात्मनि ॥ २० ॥ जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वयम् । अथ शुश्राव गच्छन्स तक्षको जगतीपतिम् ॥ २१ ॥ मन्त्रैर्गदैविपहरे रक्ष्यमाणं प्रयत्ततः । मोतियाच-स चिन्तयामास तदा मायायोगेन पार्थिवः ॥ २२ ॥ मया बञ्चयितव्योऽसौ क उपायो भवेदिति । ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत्स भुजङ्गमान् ॥ २३ ॥ फलदर्भोदकं गृह्य राजे नागोऽथ तक्षकः । -गच्छध्वं यूयमव्यमा राजानं कार्यवत्तया ॥ २४ ॥ फलपुष्पोदकं नाम प्रतिग्राहयितुं नृपम् । मातिम्वान-ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः ॥ २५॥ उपनिन्युस्तथा राजे दर्भानापः फलानि च । तच सर्व स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् ॥ २६ ॥ लेकर लोट जावें ॥१३॥१६॥ को बडे बडे मत्र और विष हरने वारी औषधियों उग्रश्रवा बोले -तक्षक के वाक्य को सुनकर मे रक्षित सुनकर उपाय माचने लगा। उग्रश्रवा ब्राह्मणों में श्रेष्ठ बड़े तेजम्बी बुद्धिमान् काश्यप ने योले-थोड़ी देर में उपाय सोचकर उमन नागों को गजा के रिपय में ध्यान किया । वह दिव्य ज्ञान बुलाकर कहा कि, तुम तपम्बियों का रूप धारण वाले तेजम्बी ब्राह्मण ने पाण्डव गजा की भीग करके राजा को आगीर्वाद देकर जलकुछ और आयु जानकर अपनी इच्छानुमार धन नक्षक में फल टो। और उनमे कहा कि, हे सपों! तुम ले लिया और अपने स्थान पर रीट आया। महात्मा मावधानी के माथ कार्य करना । उप्रश्ना बोले कि, काश्यप के गुप्तरूप से रोट जाने पर तमा नाम मों ने तलक के ऋने मे मा ही दिया गोमता से हस्तिनापुर नगर को गया । और गजा ॥१७॥२५॥ तक्षक उवाच- [ आदिएवं महाभारत कृत्वा तेषां च कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् । गतेषु तेषु नागेपु तापसच्छमरूपिषु ॥२७॥ अमात्यान्सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः । भक्षयन्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः ॥ २८ ॥ तापसैरुपनीतानि “फलानि सहिता मया । ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत ॥ २९ ॥ विधिना संप्रयुक्तो वै ऋषिवाक्येन तेन तु । यस्मिन्नेव फले नागस्तमेवाभक्षयत्स्वयम् ।।.३० ॥ ततो भक्षयतस्तस्य फलात्कृमिरभूदणुः । हस्वकः कृष्णनयनस्ताभ्रवर्णोऽथ शौनक ॥ ३१ ॥ स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमब्रवीत् । अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भयम् ॥ ३२ ॥ सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिर्मी दशतामयम् । तक्षको नाम भूत्वा वे तथा परिहृतं भवेत् ॥ ३३ ॥ ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः । एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवयां संन्निवेश्य ह ॥ ३४ ॥ कृमिक प्राहसत्तूर्ण मुमूर्पनष्ठचेतनः । प्रहमन्नेव भोगेन तक्षकेण त्ववेष्टयत ॥३५॥ यड पराक्रमी गजा ने वा, जलयुग और फल, नक्षक छिपा था। राजा ने जब उस फल को तोडा र अपन पाम ग्यालय। और उन नपम्बाम्प तब उसमें से एक लाल रंग का कीड़ा जिसकी नागों को पन देकर विदा किया। निमके उपरान आन्य काली काली थी निकला । उसको हाथ में गजा ने अपने भाई कभु श्रीर मंत्रियों को बुलाकर लेकर राजा परीक्षित योग कि, मूर्य अस्त होने का भादेमी, या, नदियों के गये हुए फल कमे ममय है अब मुझे विप में भय नहीं रहा । यही गुन्दर प्रनाल हाने। आप इन पग को मेरे कीहा नक्षक नाग होकर मुझे काटे और मुनि के माय पाभामिक उपगन्न गजा ने मंत्रियों मदिन बचन को मत्य करे । मत्रियों ने भी काल मे प्रेरित पगेको रटान की दी। देवयोग और कर इम पान को पुष्ट किया। उपरात राजा ने भी गनिमार गजा न वापर किया जिसमें उग दाई को अपनी गर्दन पर रम्यका उसका अन्याय महाभारत तस्मात्फलाद्विनिष्क्रम्य यत्तद्राने निवेदितम् । वेष्टयित्वा च वेगेन विनय च महास्वनम् । अदशत्पृथिवीपालं तक्षकः पन्नगेश्वरः ॥ ३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीपर्वणि तपको निचत्वारिंशोऽध्याय ॥४३॥ देखकर हमने रगा। उसी समय तक्षक ने भा वडा गळ करके काट खाया ॥२६॥३६॥ अपना म्वरूप धरकर राना को ल्पेट रिया आर आदिपर्व का तेतालीमवा अध्याय ममान हुआ !! अथ चतुश्चात्वारिंगो ध्यार || " ।। साँतिग्वाच-ते तथा मन्त्रिणो दृष्ट्वा भोगेन परिवेष्टितम् । विषण्णवदनाः सर्वे रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥ १ ॥ नं तु नादं ततः श्रुत्वा मन्त्रिणस्ते प्रदुद्रुवुः । अपश्यन्त तथा यान्तमाका नागमद्भुतम् ॥ . सीमन्तमिव कुर्वाण नभसः पद्मवर्सम् । तक्षक पन्नगश्रेष्ट भृशं गोकपगयणा. ॥ ३ ॥ ततस्तु ते तगृहमग्निना वृतं प्रदीप्यमानं विपजेन भोगिनः । भयात्परित्यज्य दिशः प्रपेदिरे पपात राजाऽशनिताडितो यथा ॥ १ ॥ ततो नृपे तक्षकतेजसा हते प्रयुज्य सर्वाः परलोकसस्क्रियाः । शुचिर्हिजो राजपुरोहितस्तदा तथैव ते तम्य नृपस्य मन्त्रिणः ॥ ५ ।। नृपं शिशु तस्य सुतं प्रचक्रिरे समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः । नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनं कुरुप्रवीर जनमेजयं जनाः ॥ ६ ॥ ॥ चावारीमा अध्याय ।।। उप्रश्रवा बोरे हे सपियो ' मत्रियों ने सर्पोराना दंग्या । इसके उपरान्त वह मा मर्प के विष से के शरार से लिपटा हुआ देखकर अत्यन्न दुखी उत्तन हुई अग्नि से घर नरना हुआ देखक चारों होकर रोने लगे। मर्ग का गन्न मुनर मर मत्रा दिशाओं को भाग गये और गना वज मे मरे हुए भाग गये । अयन गोक में भरे हुए मत्रियों ने के ममान गिर पड़ा ||१|| अदभुन कपल के ग्ग पाले मा म श्रेष्ठ तथा नाग नमक में तेन में मरे हुए गना की मर को रार मा के ममान आकाग मार्ग में जाने प्रियायों से कर पवित्र रानपुरोहित वामानार महाभारत | आदिपर्व सवाल एवार्यमतिनृपोत्तमः सहैव तैमन्त्रिपुरोहितैस्तदा । शशास राज्यं कुरुपुङ्गवाग्रजो यथाऽस्य वीरः प्रपितामहस्तथा ॥ ७ ॥ ततस्तु राजानममित्रतापनं समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः । सुवर्णवर्माणमुपेत्य काशिप वपुष्टमार्थ वरयांप्रचक्रमुः ॥ ८ ॥ ततः स राजा प्रददो वपुष्टमां कुरुप्रवीराय परीक्ष्य धर्मतः । स चापितां प्राप्य मुदायुतोऽभवन्न चान्यनारीषु मनोदधे क्वचित् ॥ ९ ॥ सरःसु फुल्लेपु वनेषु चैव प्रसन्नचेता विजहार वीर्यवान् । तथा स राजन्यवरो विजह्रिवान्यथोर्वशी प्राप्य पुरा पुरूरवाः ॥ १० ॥ वपुष्टमा चापि बरं पतिव्रता प्रतीतरूपा समवाप्य भूपतिम् । भावेन रामा रमयाम्बभूव तं विहारकालेप्ववरोधसुन्दरी ॥ ११ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जनमेजयराज्याभिपके चतुश्चत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४४ ।। मव मत्रियों और नगर वासियों ने मिलकर उसके दिया । और जनमेजय ने भी उस उत्तम स्त्री को पुत्र का राजतिलक किया । उस शत्रुनाशी कौरव पाकर दूसरी स्त्री की तरफ कभी दृष्टि न की । वह श्रेष्ठ पुत्र का नाम जनमेजय था। वह बुद्धिमान् क्षत्रियों में उत्तम राजा जनमेजय खिले हुए कमल कुम्वनी राजाओं में श्रेष्ठ बालक अपने प्रपितामह वाले तालाबों और वनों में उस स्त्री सहित ऐसे गना युधिष्ठिर के समान राज्यगासन करने लगा। विहार करने लगा जैसे पहिले राजा पुरूरवा ने मन्त्रियों ने उमके तेज को देखकर कागी के उर्वशी के साथ किया था। पतिव्रता और प्रसिद्ध मुवर्णवर्मा नाम गजा में उसकी वपुष्टमा नाम रूपवाली बड़ी सुन्दरी वपुष्टमा रनवास में उस कन्या जनमेजय में विवाह करने की मागी। और उत्तम पति जनमेजय को पाकर अनुराग से उसके भाभी के गजा मुवर्णयमा ने भी घर को उत्तम नित्त को प्रसन्न रसने लगी ॥५॥११॥ जानकर उस कन्या का विवाह जनमेजय मे पर आदिपर्य या चौनालीमयां अध्याय मगान हुआ ॥ ४ ॥ अथ पयत्याग्मिोध्याय ||2|| गौनिगाव-एनम्मिन्नेव काले तु जरत्कारुर्महातपाः । चचार पृथिवीं कृत्स्नां यत्रसायंगृहो मुनिः ॥ १ ॥ पनानीमयां अध्याय" || मधमा बोले । पियो !ी ममय में नियम को लिये हुए जी अजिनेन्द्रिय पुरषो मे मरानादा बार नाम पि पृथ्वी पर उम दुपा है पुण्य नीयों में स्नान करता हुआ पिचर अध्याय ४] महाभारत चरन्दीक्षां महातेजा दुश्चरामकृतात्मभिः । तीर्थेष्वाप्लवनं कृत्वा पुण्येषु विचचार ह ॥ २ ॥ वायुभक्षो निराहारः शुष्यन्नहरहर्मुनिः । स ददर्श पितॄन्गर्ते लम्बमानानधोमुखान् ॥ ३॥ एकतन्त्ववशिष्टं वै वीरणस्तम्बमाश्रितान् । तं तन्तुं च शनैराखुमाददानं विलेशयम् ॥ ४ ॥ निराहारान्कृशान्दीनान्गर्ते स्वत्राणमिच्छतः । उपस्मृत्य स तान्दीनान्दीनरूपोऽभ्यभापत ॥ ५ ॥ के भवन्तोऽवलम्वन्ते वीरणस्तम्बमाश्रिताः । दुर्वलं खादितैर्मूलेराखुना विलवासिना ॥ ६ ॥ वीरणस्तम्बके मूलं यदप्येकमिह स्थितम् । तदप्ययं शनैराखुरादत्ते दशनैः शितैः ॥ ७ ॥ छेत्स्यतेऽल्पावशिष्टत्वादेतदप्यचिरादिव ततस्तु पतितारोऽत्र गर्ने व्यक्तमधोमुखाः ॥ ८ ॥ तस्य मे दुःखमुत्पन्नं दृष्ट्वा युप्मानधोमुखान् । कृच्छ्रमापदमापन्नान्प्रियं किं करवाणि वः ॥ ९ ॥ तपसोऽस्य चतुर्थेन तृतीयेनाथवा पुनः । अर्धन वापि निस्तर्तुमापदं ब्रूत मा चिरम् ॥ १० ॥ रहा था । वह जरत्कारु वायु का भक्षणकर निराहार के ग्यान में बहुत कमजोर हो गया है ।।१।। अपने शरीर को सुखाता था । उम ऋपि ने एक और इममा जो एक तन्तु गेप रह गया है बड़े गढ़े में उलटे लटकते हुए अपने पितरों को उसको भी यह चूहा धीरे धीरे अपने तीक्ष्ण दांतों देखा जो एक तिनके के सहारे लटके हुए थे और से काट रहा है । उमके काटे जाने पर तुम टम चूहे जिस जड़ को काट रहे थे । भोजन न करने गढे में गिर पड़ोगे। तुमको नीने की और मुम्ब में दुर्वल और दीन दुःखी जो उम गढे में अपने किये हुए और बडी कटिन आपत्ति में देखकर मुझे रक्षक की इच्छा कर रहे थे उनके निकट जाफर वड़ा दुम्ब हो रहा है मो में इम ममय तुम्हारी दःम्विन होकर उनमे बोला-तुम कौन हो! जो हम क्या मैया करूं । यदि मेरी तपस्या के नाथाई तामरे तिनके के महारे लटक रहे हो जिमश डंठल चूहों अथवा आधे हिम्मे मे या पूर्ण तपम्या में आएका -

महाभारत
-आदिपर्व
अथवाऽपि,,, समयेण तरंतु तपसा मम |
भवंतः -सर्व- एवेह काममेवं विधीयताम् ॥ ११ ॥
पितर उचु-वृद्धो भवान्ब्रह्मचारी यो नस्त्रातुमिहेच्छसि ।
न तु. विप्राग्न्य तपसा शक्यते तद्व्यपोहितुम् ॥ १२ ॥
अस्ति . नस्तान तपसः फलं प्रवदतांवर ।।
संतानप्रक्षयाब्रह्मन्पतास निरयेऽशुचो ॥ १३ ॥
मनानं हि 'पगे धर्म एबमाह पितामहः ।
लम्वतामिह -नस्तात न जानं प्रतिभाति वै ॥ १४ ॥
येन त्वां नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम् ।
हो भवान्महाभागो यो नः गोत्र्यान्सुदुःखितान् ॥ १५ ॥
शोचते चैव कारुण्याचट्टणु ये वे वयं द्विज ।
यायावग वयमृपयः संशितव्रताः ॥ १६ ॥
लोकारपुण्यादिह भ्रष्टाः संतानप्रक्षयान्मुने ।
प्रनष्टं नम्नपस्तीनं न हि नम्नन्तुरस्ति वै ॥ १७ ॥
अम्निवकोऽद्य नम्नन्तुःसोपि नास्ति यथा नधा ।
मन्टभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थितः ॥१०॥

अध्याय ४. ] मा भागने २२३ जरत्कारुरिति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः । नियतात्मा महात्मा चे 'सुबतः सुमहातपाः ॥ १९ ॥ नेन स्म नपसो लोभास्कृच्छ्रमापादिता वयम् । न तस्य भार्या पुत्रो वा वान्धवो वाऽस्ति कश्चन ॥२०॥ तस्माल्लम्बामहे गर्ने नष्टसंज्ञा ह्यनाथवत् । स वक्तव्यस्तया दृष्टो ह्यस्माकं नाथवत्तया ॥ २१ ॥ पितरस्तेऽवलम्वन्ते गर्ते दीना अधोमुखाः । साधुदारान्कुरुप्वेति प्रजामुत्पादयति च ॥ २२ ॥ कुलतन्तुर्हि शिष्टस्त्वमेवेकस्तपोधन । यस्वंपश्यसि नो ब्रह्मन्वीरणस्तम्बमाश्रितान् ॥ २३ ॥ एपोऽस्माकं कुलस्तम्ब आस्ते स्वकुलंवर्धनः । यानि पश्यसि वै ब्रह्मन्मूलानीहास्य वीरुधः ॥ २४ ॥ एने नस्तन्तवस्तात कालेन परिभक्षिताः । यत्वेतत्पश्यसि ब्रह्मन्मूलमस्यार्धभक्षितम् ॥ २५ ॥ यत्र लम्बामहे गर्ने सोऽप्येकस्तप आस्थितः । यमातूं पश्यसि ब्रह्मन्काल एप महाबलः ॥ २६ ॥ सतं तपोरतं मन्दं शनैः क्षपयते तुदन् । जरत्कारु तपोलब्ध तपोलब्धं मन्दात्मानमचेतसम् ॥ २७ ॥ उसका नाम जगतारू है । यह वटा तपस्वी यह मेटे की जद्द जिसके सहारे हम लटके हुए हैं वेट और बेटाहों का जानने वाला है परन्तु उसके हमारे कुल को बदाने बाग बंग है। उमको भी मी नहीं और न कोर्ट पुत्र या माई है । इस कारण हारूपी महाकाल दिन गत्रि भक्षण करता चला हम अनाय के ममान जान मे रहित इम गढ़ में जाता है। और जिम महार में हम इममें स्टक लटक रहे है । हे ब्राह्मण ! कहीं तुमको जरत्कार रहे है वह हमारा पुत्र जगत्कार है जो नपम्या में मिले तो दया करके हमाग मव वृतान कहना और निमम है । वहीं एक तार है और चूहा जिमको कहना कि तुम्हारे पिना गर्दै में नीचे की ओर मुम्ब तुम देख रहे हो वह बडा बलवान् कान है। यह किय हुए लटक रहे हैं इस कारण तुम विवाह करके कालरूपी हा तपस्या में लग दुप, बुद्धि में रहित मन्नान उत्पन्न करने का यत्र कंगे। हे ब्राह्मण : और तपस्या के लोम में युक्त और विचार रहित म हा मार 1 1 [-आदिपर्व अथवाऽपि, समग्रेण तरंतु। तपसा मम ।। भवंतः सर्व एवेह काममेवं विधीयताम् ॥,११ ॥ पितर ऊचु-वृद्धो भवान्ब्रह्मचारी यो , नस्त्रातुमिहेच्छसि । न तु . विप्राग्य तपसा शक्यते तयपोहितुम् ॥ १२ ॥ अस्ति निस्तात तपसः फलं प्रवदतांवर ।। संतानप्रक्षयाद्ब्रह्मन्पतास निरयेऽशुचो ॥ १३ ॥ संतानं हि परो धर्म एवमाह पितामहः । लम्वतामिह नस्तात न ज्ञानं प्रतिभाति वै ॥ १४ ॥ येन त्वां नाभिजानीमो लोके विख्यातपौरुषम् । वृद्धो भवान्महाभागो यो नः शोच्यान्सुदुःखितान् ॥ १५ ॥ शोचते चैव कारुण्याच्छृणु ये वै वयं द्विज । यायावरा नाम वयमृपयः संशितव्रताः ॥ १६ ॥ लोकात्पुण्यादिह भ्रष्टाः , संतानप्रक्षयान्मुने । प्रनष्ट नस्तपस्तीवं न हि नस्तन्तुरस्ति वै ॥ १७ ।। अस्ति त्वेकोऽद्य नस्तन्तुः सोपि नास्ति यथा तथा । मन्दभाग्योऽल्पभाग्यानां तप एकं समास्थितः ॥ १८ ॥ दुख दर होसके तो मैं देने का तय्यार ह ॥१२॥ महात्मा हो, इससे हमारी यह शोचनीय दशा देखकर पितर बोरे आप ब्रह्मचारी है और हमारी तुमको दया आई है । हम तुमको अपना वृत्तात आपति को देखकर हमारी रक्षा करना चाहते है। सुनाते हैं-मुनो । हम उत्तम प्रती के रखने वाले हे ब्राह्मण ' नपम्या में यह हमाग दु ग्व दूर नहीं ययावर नाम मपि है । आर है मुनि । पुण्यलोक हो मरना । हे नात 'हमारे पाम भी तपस्या का में मन्तान क्षय होने के कारण हम यहा गिराये पर हम केवल मन्नान के भय होने में अपवित्र गये है। और आगे को मन्तान न होने से हमारी नरक में ना रहे हैं। क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने कहा घोर तपस्या का पर नष्ट हो गया ह | एक हमारे कि, मन्नान का होना पड़ा भाग कम है आर वा का चगने वाला पुत्र हे हम भागहीनी का मम रटक्ने हुए हमारा जान नष्ट हो गया है। वह भागहीन जमा हुआ विमा न हुआ बराबर नुम अवश्य कोई प्रसिद्ध पुस्प हो । किन्तु हम है क्योंकि यह तपम्या ही म लीन रहता है मी अगाथा में हम गंडे के भीतर उम्टे लटके है, ॥१८॥ माम नमको पहचान नहीं मरते । तुम वृद्ध और --.- अध्याय . ] महाभारत २२३ जरत्कारुरिति ख्यातो वेदवेदाङ्गपारगः । नियतात्मा महात्मा च 'सुव्रतः सुमहातपाः ॥ १९ ॥ तेन स्म तपसो लोभात्कृच्छ्रमापादिता वयम् । न तस्य भार्या पुत्रो वा वान्धवो वाऽस्ति कश्चन ॥ २० ॥ तस्माल्लम्बामहे गर्ते नष्टसंज्ञा ह्यनाथवत् । स वक्तव्यस्त्वया दृष्टो ह्यस्माकं नाथवत्तया ॥ २१ ॥ पितरस्तेऽवलम्बन्ते गर्ने दीना अधोमुखाः । साधुदारान्कुरुग्वेति प्रजामुत्पादयेति च ॥ २२ ॥ कुलतन्तुर्हि शिष्टस्त्वमेवैकस्तपोधन । यस्त्वंपश्यसि नो ब्रह्मन्बीरणस्तम्बमाश्रितान् ॥ २३ ॥ एपोऽस्माकं कुलस्तम्ब आस्ते स्वकुलवर्धनः । यानि पश्यसि वै ब्रह्मन्मूलानीहास्य वीरुधः ॥ २४ ॥ एते नस्तन्तवस्तात कालेन परिभक्षिताः । यत्वेतत्पश्यसि ब्रह्मन्मूलमस्याभिक्षितम् ॥ २५ ।। यत्र लम्बामहे गर्ने सोऽप्येकस्तप आस्थितः । यमाखुं पश्यसि ब्रह्मन्काल एप महावलः ॥ २६ ॥ सतं तपोरतं मन्दं शनैः क्षपयते तुदन् । जरत्कारुं तपोलब्धं मन्दात्मानमचेतसम् ॥ २७ ॥ उसका नाम जरत्कारु है । वह वहा तपम्वी यह मेट की जड जिसके महारे हम लटक है वेद और वेदाहों का जानने वाला है परन्तु उसके हमारे कुल को बटाने वाला चश है । उमको भी स्त्री नहीं और न कोई पुत्र या भाई है । इस कारण चुहारूपी महाकाल दिन रात्रि भक्षण करता चला हम अनाथ के ममान ज्ञान से रहित इस गह में जाता है। और जिम महार में हम इसम लटक लटक रहे है । हे ब्राह्मण ! कहीं तुमको जरत्काम रहे हैं वह हमारा पुत्र जरत्कार है जो तपस्या में मिले तो दया करके हमाग मत्र वृत्तान कहना और निमम है । वही एक तार है और चूहा जिमको कहना कि तुम्हारे पिता गढ़ में नीचे की ओर मुग्य तुम देग रहे हो वह बडा बलवान काल है । घर किय हुग. लटक रहे है हम कारण तुम विवाह करके कालम्पी चहा तपस्या में लग हुए, बुद्धि में रहित मन्तान उत्पन्न करने का यन कगे । हे ग्रामण ! और तपस्या के लोम भे युक्त और विचार रहित महाभारत [ आपि न हि नस्तत्तपस्तस्य तारयिष्यति सत्तम । छिन्नमूलान्परिभ्रष्टान्कालोपहतचेतसः ॥ २८॥ अधः प्रविष्टान्पच्यास्मान्यथा दृष्कृतिनस्तथा । अस्मासु पतितेष्वत्र सह सर्वः सवान्धवैः ॥ २९ ॥ छिन्नः कालेन सोऽप्यत्र गन्ता वै नरकं ततः । तपो वाऽप्यथवा यज्ञो यच्चान्यत्पावनं महत् ॥ ३० ॥ तत्सर्वमपरं तात न संतत्या समं मतम् । स तात दृष्ट्वा यास्तं जरत्कारुं तपोधन ॥ ३१ ॥ यथा दृष्टमिदं चात्र त्वयाऽऽस्येयमशेपतः । यथा दारान्प्रकुर्यात्स पुत्रानुत्पादयेद्यथा ॥ ३२ ॥ तथा ब्रह्मस्त्वया वाच्यः सोऽस्माकं नाथवत्तया । वान्धवानां हि तस्येह यथा चात्मकुलं तथा ॥ ३३ ॥ कस्त्वं बन्धुमिवा स्माकमनुशोचसि सत्तम । श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कामपितृदर्शने पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय ॥ १५ ॥ पापाण के महग उम उरत्कारु को काट रहा है हमको ऐसा देखकर हमारे पुत्र जरत्कारु से हमारी ॥२०॥२७॥ दशा ठीक रीति से कह देना । जैसा तुमने यहा है श्रेष्ठ नाह्मण ' उमकी तपम्या हमको नहीं देखा ह सब पाती कहनी योग्य है और जिस प्रकार तारेगी जिनकी नड़ कट गई और कार जिसका वह विवाह कर पुत्रा को उत्पन्न करे । हे ब्राह्मण जान नष्ट हो गया पापियों के समान अधोगति को हमारे ऊपर दया करके यह पचन हमारे पुत्र से जाने हमको देग और हमारे सर आन्धनों कहना। आपने हमोर ऊपर दया करके जैसे कोई महित नरक में नाने पर कार मे पाया हुआ यह भाई नाधव करता ह हमारा दु ख पूछा । तुम कौन भी नरक को जावेगा। नप या या और कुछ पवित्र हो हम मुनना चाहते है ॥२८॥३४॥ कर्म यह मय गन्तान के गर नहीं है। है तात आदिपर्व का पैंतारीमया अध्याय ममाप्त हुआ । अध पदचत्वारिंशोऽध्याय ॥१६॥ पिगार-एतच्छरुत्वा जरत्कारुर्भृशं जरत्कारुर्भृशं शोकपरायणः । उपाच तान्पितॄन्दुःयाद्वाप्पसंदिग्धया गिरा ॥ १ ॥ - .

अध्याय ४६] महाभारत जरत्काम्मवाच-मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः । तदबूत यन्मया कार्य भवतां प्रियकाम्यया ॥ २ ॥ अहमेव जरत्कारुः किल्विपी भवतां सुतः । ते दण्डं धारयत मे दुष्कृतेरकृतात्मनः ॥ ३ ॥ पितर उचुः--पुत्र दिष्ट्याऽसि संप्राप्त इमं देशं यदृच्छया । किमर्थं च त्वया ब्रह्मन्न कृतो दारसंग्रहः ॥ ४ ॥ जरत्कारुम्बाच-ममायं पितरो नित्यं हृद्यर्थः परिवर्तते । ऊर्ध्वरेताः शरीरं वै प्रापयेयममुत्र वै ॥ ५ ॥ न दारान्वै करिप्येऽहमिति मे भावितं मनः । एवं दृष्ट्वा तु भवतः शकुन्तानिव लम्बतः ॥ ६ ॥ मया निवर्तिता बुद्धिर्ब्रह्मचर्यात्पितामहाः । करिष्ये वः प्रियं कामं निवेध्येऽहसंशयम् ॥ ७ ॥ सनाम्नीं यद्यहं कन्यामुपलप्स्ये कदाचन । भविष्यति च या काचिनैश्यवत्स्वयमुद्यता ॥ ८ ॥ प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेयं च यामहम् । एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुयां यदि । अन्यथा न करिप्येऽहं मत्यमेतत्पितामहाः ॥ ९ ॥ ॥ छियालीमयां अध्याय १६ ॥ उप्रश्रवा बोले है ऋपियो : पितरों के जरत्कार बोला हे पितरी मर हृदय में यह बाती में यह हाल सुनकर जरत्कारु को बडा द ख और सदा है कि, अग्वण्टित ब्रह्मचारी रहगा और मन गोक हुआ। आमुश्री मे गदगद होकर अपने ही मन में ऐमा निश्चय किया था कि कभी विवाह पितरों में बोला-मे आप पिता है, कहो मे आप नहीं करूंगा । परन्तु अब में आपको यहा पक्षियों के लिये क्या प्रिय कार्य करू । आपका पुत्र पाप- के ममान इस प्रकार लटकते हुए देखकर युक्त मैं ही जरत्कार है और मैं दण्ट देने के ब्रह्मचर्य को छोडता है। मैं आपका प्रिय कार्य योग्य हु । पितर बोले. हे पुत्र ! तुम इच्छानुसार करुगा किन्तु गर्त यह है कि, यदि मर ही नाम घूमते हुए हमार सौभाग्य मे दम देश में आगये वाली कन्या मिलेगी और उसके भाई पिता आदि हो, कहो तो मही, तुमने क्यों विवाह नहीं किया। म्वजन भिक्षा के तौर आपही मुझे देंगे तभी में मुख !

२२४ महाभारत [ आदिवं क न हि नस्तत्तपस्तस्य तारयिष्यति सत्तम । छिन्नमूलान्परिभ्रष्टान्कालोपहतचेतसः ॥ २८॥ अधः प्रविष्टान्पश्यास्मान्यथा दुष्कृतिनस्तथा । अस्मासु पतितप्वत्र सह सर्वेः सवान्धवैः ॥ २९ ॥ छिन्नः कालेन सोऽप्यत्र गन्ता वै नरकं ततः । तपो वाऽप्यथवा यज्ञो यच्चान्यत्पावनं महत् ॥ ३० ॥ तत्सर्वमपरं तात न संतत्या समं मतम् । स तात दृष्ट्वा व्यास्तं जरत्कारुं तपोधन ॥ ३१ ॥ यथा दृष्टमिदं चात्र त्वयाऽऽख्येयमशेपतः । यथा दारान्प्रकुर्यात्स पुत्रानुत्पादयेद्यथा ॥ ३२ ॥ तथा ब्रह्मस्त्वया वाच्यः सोऽस्माकं नाथवत्तया । वान्धवानां हि तस्येह यथा चात्मकुलं तथा ॥ ३३ ॥ कस्त्वं बन्धुमिवा स्माकमनुशोचसि सत्तम । श्रोतुमिच्छाम सर्वेषां को भवानिह तिष्ठति ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि जरत्कारपितृदर्शने पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ५५ ॥ पापाण के सदृश उस जरत्कारु को काट रहा है हमको ऐसा देखकर हमारे पुत्र जरत्कार से हमारी ॥२०॥२७॥ दशा ठीक रीति से कह देना । जैसा 'तुमने यहा हे श्रेष्ठ ब्राह्मण ' उसकी तपम्या हमको नहीं देखा हे सब वार्ता कहनी योग्य है और जिस प्रकार तारेगी जिनकी जड़ कट गई और कार जिसका वह विवाह कर पुत्रो को उत्पन्न करे । हे ब्राह्मण मान नष्ट हो गया पापियों के समान जोगति को हमारे ऊपर दया करके यह बचन हमारे पुत्र जान हुए हमको देय और हमारे सा बान्धों कहना । आपने हमारे ऊपर दया करके जैसे कोई महित नरक में जाने पर कार मे खाया हुआ यह भाई बाधव करता है हमारा दुख पूछा । तुम कौन भी नरक को जायेगा। नप यज या और कुछ पवित्र हो। हम सुनना चाहते है ||२८॥३४॥ कर्म यह मय मन्नान गर नहीं है । हे तात । पादिपर्वा पैतालीमचा अध्याय ममाप्त हुआ। अय पदनस्वारिंशोऽध्याय ॥ १६ ॥ मारवार-एनच्या जरत्कारुश शोकपरायणः । उवाच तान्पितृन्दुःयाद्वाप्पसंदिग्धया गिरा ॥ १ ॥ । - से . -awar अन्याय 2 म हा मारन ततस्ते पन्नगा ये वे जरत्कारौ समाहिताः । तामाढाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन ॥ १९ ॥ तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् । प्रगृह्यारण्यमगमत्समीप तस्य पन्नगः ॥ २० ॥ तत्र तां मेध्यवत्कन्यां प्रादात्तस्मै महात्मने । नागेन्द्रो वासुव्रिह्मन्न स तां प्रत्यगृह्णन ॥ २१ ॥ असनामेति वे मत्वा भरणे चाविचारित । मोक्षभावे स्थितश्चापि द्वन्द्वभूतः परिग्रहे ॥ २० ॥ ततो नाम स कन्यायाः पप्रच्छ भृगुनन्दन । वासुकि भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आम्तीपीणि पासुस्तिग्न्याम्ममागमे पट यन्यारिंगो-ध्याय ॥ ६ ॥ आय आर कहने लगे कि हे महारान' जरत्कार कर आर पालन के विचार के न होने में और विवाह विवाह के लिये अब कन्या की तलाम मे मिते का करना दम्ब का रण है इत्यादि बातों को है । यह सुनकर वायकि अपनी बहिन को वस्त्रादि मोचकर उसको ग्राण न किया । टम पश्चात है पहिराकर म ब्रामा ममीप नगल म गया । भृगुनन्दन 'मनापि ने पाररि मे कन्या का हे बामण मानक : मॉं के स्वामि रानुषि ने नाम पछा आर कहा कि, मैं टमका पालन न वहा नाका या कन्या म महामा को मिला कमगा ॥१०॥२३॥ मभान टी आर उसने अपने नाम पारी न नान आन्पिी का जागमा अध्यार ममान हुआ। पथ ममत्वाग्गियोऽध्यार ॥७॥ मौनिम्गा-वासुकिस्त्वववीद्वाक्यं जरत्कारमृपि तदा । सनाम्नी तब कन्ययं स्वसा मे नपसान्विता ॥ १ ॥ भरिष्यामि च ते भार्या प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम । रक्षणं च करिष्येऽन्याः मशरत्या तपोधन । त्वदर्थ रक्ष्यते चेपा मया मुनिवगंत्तम ॥ २ ॥ ॥ मतालीमरा अध्याय १७ ॥ अश्रया गान-सपियो 'रकार सेयर सरकार नाम है । हे नाण 'मैं अपनी पग्नि यान मुनर यामार बाग यह मेगाग्नि तम्धिनी का पालन पापा कंगा, आप इन बात की चिन्ता | आदिपर्व मरागार न तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै ।। शाश्वताश्चाव्ययाश्चैव तिष्ठन्तु पितरो मम ॥ १० ॥ सौतिरुवाच-एवमुक्त्वा तु स पितॄश्चचार पृथिवीं मुनिः । न च स्म लभते भार्यां वृद्धोऽयमिति शौनक ॥ ११ ॥ यदा निवेदमापन्नः पितृभिश्चोदितस्तथा । तदाऽरण्यं स गत्वोच्चैश्चक्रोश भृशदुःखितः ॥ १२ ॥ स त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितृणां हितकाम्यया । उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ॥ १३ ॥ यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च । अंतर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ॥ १४ ॥ उग्रे तपसि वर्तन्ते पितरश्चोदयन्ति माम् । निविशस्वेति दुःखार्ताः संतानस्य चिकीर्पया ॥ १५ ॥ निवेशाया खिलां भूमि कन्या भक्ष्यं चरामि भोः । दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनियोजितः ॥ १६ ॥ यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः । ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतो दिशम् ॥ १७॥... मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् । भरेयं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रयच्छत ॥ १८ ॥ विवाह करूंगा । उस कन्या का भरण-पोपण भी और धीरे धीरे कहा कि, मै अपने पितरों का दुख मुझे न करना पड़े। हे पितरो ' दम प्रकार यदि दूर करने को अपना विवाह पितरों के कहने से कन्या प्राप्त हुई तो में विवाह करूगा अन्यथा करना चाहता हू। जो म्यावर या जंगम जो छिपे नह।। उमम्री मजा मन्तान उत्पन्न होगी वही हुए या प्रगट जीव है वह मेरे इस बचन को आपका उद्धार करेगी और फिर आप सदा मुस से मुने । मुझ दरिद्री को कोई अपनी कन्या जिसका निवाम करो ॥११॥ भरण-पोषण मुझे न करना पड और जिसका नाम उम मुनि ने पिनग में यह कहकर फिर वहा मंग जमा हो भिक्षा में दे ॥११॥१८॥ मे गमन रिया । उमशे वृद्ध जानकार किमी ने इसके उपरान्त जरत्कारु के ऐसा कहने पर पन्या नदी तय दुमी होकर यन में चले गये वासुकि नाग के भेजे हुए मर्प वासुकि के पास अध्याय ४७] महाभारत ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारी समाहिताः । तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ॥ १९ ॥ तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् । प्रगृह्यारण्यमगमत्समीप तस्य पन्नगः ॥२०॥ तत्रं तां भैष्यवकन्यां प्रादात्तस्मै महात्मने । नागेन्द्रो वासुकिब्रह्मन्न स तां प्रत्यगृह्णत ॥ २१ ॥ असनामेति वै मत्वा भरणे चाविचारिते । मोक्षभावे स्थितश्चापि द्वन्द्वभूतः परिग्रहे ॥ २२ ॥ ततो नाम स कन्यायाः पप्रच्छ भृगुनन्दन । बासुकिं भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह ॥ २३ ॥ इनि श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि यासुकिजरत्कारुममागमे पट्चत्वारिंगो-ध्यायः ।। ४६ ॥ आये और कहने लगे कि, हे महाराज ! जरत्कारु कर और पालन के विचार के न होने मे और विवाह विवाह के लिये अब कन्या की तलाग में फिरते का करना दुःख का कारण है इत्यादि बातों को है । यह सुनकर वासुकि अपनी वहिन को वस्त्रादि मोचकर उमको ग्रहण न किया । दमके पश्चात् है पहिराकर उम ब्राह्मण के समीप जंगल में गया । भृगुनन्दन : उम ऋपि ने वासुकि मे कन्या का हे ब्राह्मण गोनक ! माँ के म्यामि वासुकि ने नाम पूछा और कहा कि, मै दमका पालन न वहां जाकर यह कन्यों उस महात्मा को भिक्षा के ' कन्गा ॥१९॥२३॥ समान दी। और उसने अपने नाम वाली न जान आदिपर्व का नालीमवां अध्याय ममान हुआ | अथ मनचत्वारिशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ मोनियाच-वासुकिस्त्वत्रवीद्वाक्यं जरत्कारुमृर्षि तदा । सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता ॥ १ ॥ भरिष्यामि च ते भार्या प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम । रक्षणं च करियेऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन | त्वदर्थ रक्ष्यते चेपा मया मुनिवगेत्तम ॥ २ ॥ ॥ मैंतालीमवां अध्याय १७ ॥ उग्रश्रवा बोर हे ऋपियो ! जरत्कार की यह जगत्कार नाम की है । हे प्रामण ! मैं.अपनी बहिन यात मुनकर बामकि वोगा यह मेरी बहिन तपम्बिनी का पालन पोषण कगा, आप रम वान की चिन्ना महाभारत [ आदिपय ऋपिळवाच-न भरिष्येऽहमेतां वै एप मे समयःकृतः । अप्रियं च न कर्त्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम् ॥ ३ ॥ मातिरुवाच-प्रतिश्रुते तु नागेन भरिप्ये भगिनीमिति । जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ॥ ४ ॥ तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः । जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ५ ॥ ततो बासगृहं रम्यं पन्नगेन्द्रस्य संमतम् । जगाम भार्यामादाय स्तूयमानो महर्पिभिः ॥ ६ ॥ शयनं तत्र संक्लप्तं स्पास्तरणसंवृतम् । तत्र भार्यासहायो वै जरत्कारुरुवास स तत्र समयं चक्रे भार्यया सह सत्तमः । विप्रियं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ॥ ८ ॥ त्यजेयं विप्रिये च त्वां कृते वासं च ते गृहे । गतगृहाण वचनं मया यत्समुदीरितम् ॥ ९ ॥ तत. परमसंविना स्वसा नागपतेस्तदा..::. अतिदुःखान्विता वाक्यं तमुवाचैवमस्त्विति ॥ १०॥ नथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् । उपायः श्वतकाकीयःप्रियकामा यशस्विनी ॥ ११ ॥ न कं । जरत्कार पोलग है मुनिघर ' यह कन्या सहित चला गया । उस घर म बडे श्रेष्ठ विछाने तर हा रिय सखी है । जग्वाम् पौग पान्तु यदि छि हुए पल्गो पर नरकार मपि अपनी स्री यह नरी बहिन किसी प्रकार मेरा आना का पालन के माथ पंह मुख स रहने लगा ॥१७॥ न करेगी तो नेहमको त्याग दृगा । उग्रश्रया बोल अपनी स्त्री मे कहा कि, दृच्छा के विपरीत या मुनकर नगरकार चामुकि के माथ घर को न करना यदि ऐसा करेंगी तो मै तुमको छोडकर गया । मा नाकर दी जानने पग म श्रेष्ठ चन नाऊगा । इस मेरे को हु वाक्य को तुम नाद बड़े घना ग मों का गना वासुकि की ग्रहण करो । वामुफि की बहिन दु स मे व्याकुर मम्मति के अनुमार एक यहुत सुन्दर रमणीय घर हैकर बोली कि, मे ही होगा 1 उसी प्रकार वह में मपिया में स्तुनि क्यिा हुआ जरत्कार मी अपन पनि की आज्ञानुमार चरने लगी । यह अपने अन्याय ४७ ] महा मारन ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिढासुकेः स्वसा । भर्तारं वै यथान्यायमुपतस्थे महामुनिम् ॥ १२ ॥ तस्याः समभवद्गर्भो ज्वलनसन्निभः । अतीव . तेजसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः ॥ १३ ॥ शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः । ततः कतिपयाहस्य जरत्कारुर्महायशाः ॥ १४ ॥ उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् । तस्मिंश्च सुसे विप्रेन्द्रे सवितास्तमियाद्रिरिम् ॥ १५ ॥ अहः परिक्षये ब्रह्मस्ततः साऽचिन्तयत्तदा । वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी ॥ १६ ॥ किं नु मे सुकृतं भूयाद्भर्तुरुत्थापनं न वा । दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुयाम् ॥ १७ ॥ कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथ वा पुनः । धर्मलोपो गरीयान्वै स्यादित्यत्राकरोन्मतिम् ॥ १८ ॥ उत्थापयिष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति । धर्मलोपो भवेदस्य सन्ध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ॥ १९ ॥ पति को प्रसन्न रखने की इच्छा करने वाली बडे लगा तब उस समय वह मंध्या करने का समय यशवाली वासुकि की बहिन कुत्ते और बगुले के जो जानकर वासुकि की यहिन भयभीत होकर विचारन आचरण हैं उन उपायों में अपने स्वामी की मेया लगी, “यदि में मुनि को जगाती हू तो मुनीश्वर 'करने लगी। इसके पश्चात् ऋतुम्नान के आने पर मुझपर क्रोध करेंगे और जो नहीं जगाती हूं तो 'यह वासुकि की यहिन योग्यता में महामुनि पनि मन्या ममय के बीन जाने पर धर्म का लोप होगा" के पाम गई और यहां अमि के ममान तेजम्बी और और इस प्रकार में कुछ माल विकल्प करके अन बड़ा प्रतापगारी और बहा प्रनापी गर्भ उमका में धर्म का रो हाना बडा दोप ममशकर उम स्थित हुआ 1८1१३॥ से प्रकाममान् और अग्नि के समान तेजम्ची वह गर्भ दिन दिन ऐसे बढ़ता था जैम शुक्ल- मे अत्यन्त मधुर बोली से बोलने लगी कि, हे महा- पन में चन्द्रमा बढ़ता है। दुमके उपरान्त एक दिन भाग ! अब मायकाल हो गया है, मूर्य अस्त होने जरत्कार अपनी स्त्री की गोद में गिर रस्वकार मा वाला है, आप उट करके हे भगवन् ! आचमन कर, गया । जब मायंकाल हुआ और मूर्य अम्न होने नियम से सन्ध्या करो । जरनी हुई अमि में हवन तपम्या महाभारत [ आदिपर्व इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा । तमूर्षि दीप्ततपसं शयानमनलोपमम् ॥ २० ॥ उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी । उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति ॥ २१ ॥ सन्ध्यामुपास्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः । प्रादुष्कृताऽग्निहोत्रोऽयं मुहर्तो रम्यदारुणः ॥ २२ ॥ सन्ध्या प्रवर्तते चेयं पश्चिमायां दिशि प्रभो । एवमुक्तः स भगवाञ्जरत्कारुर्महातपाः ॥ २३ ।। भायाँ प्रस्फुरमाणौष्ठ इदं वचनमब्रवीत् । अवमानः प्रयुक्तोऽयं त्वया मम भुजङ्गमे ॥ २४ ॥ समीपे तेन वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् । शक्तिरस्ति न वामोरु मयि सुस्ते विभावसोः ॥२५॥ अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते । न चाऽप्यवमतस्येह वासो रोचेत कस्यचित् ॥ २६ ॥' किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा । - एवमुक्ता जरत्कारुर्भा हृदयकम्पनम् ॥ २७॥ अब्रवीद्भगिनी तत्र वासुकैः वासुकेः संनिवेशने । नाऽवमानात्कृतवती तवाऽहं विप्र वोधनम् ॥ २८ वर्ग। यह मुहूर्त मनोहर और दारण है और है जैसे मनुष्यों का अपमान होता है वहा हम रहना म्वामी ! सध्या समय प्रात्त है गेमा करने उचित नहीं समझते है मुझ जैमे धर्मात्मा को केमे पर का बड़ा तपम्बी जगकाम क्रोधयुक्त होकर रठा अच्छा लग सकता ह । वह वासुकि की बहिन इस और अपनी भायां मे बोरग कि, तुमने मेरा अपमान प्रकार पति के हृदय को कैंपान वाले वचन सुनकर दिया है । उसी स्थान में बैठी हुई बोली-हे ब्रामण ! अपमा अप में तुम्हारे पाम न रहकर अपनी डा नार्थ मैने आपको नहीं जगाया है। आपके धर्म का ६ अनुगार देग को चग जाऊगा। आप सूर्य मरी रोप न हो यह मम मने आफ्को जगाया है। अजगरिय विना अम्नायर को जाने की शक्ति मा रहने पर जरत्कार अपनी भार्या से बोरा- नही सम्बना या मुधो निश्चय? । जहा हमारे मेरा कहना मा अन्यथा नहीं हाता और अब में अध्याय ४७] महाभारत २१२ धर्मलोपो न ते विप्रस्यादित्येतन्मया कृतम् । उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः ॥ २९ ॥ ऋपिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम् । न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे ॥ ३० ॥ समयो ह्येष मे पूर्व त्वया सह मिथः कृतः । सुखमम्युपितो भद्रे बेयास्त्वं भ्रातरं शुभे ॥ ३१ ॥ इतो मयि गते भीरु गतः स भगवानिति । वं चापि मयि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ॥ इत्युक्ता साऽनवद्याङ्गी प्रत्युवाच मुनिं तदा । जरत्कार जरत्कारुश्चिन्ताशोकपरायणा ॥ ३३ ॥ वापगद्गदया वाचा मुखेन परिशुण्यता । कृताञ्जलिवरारोहा पर्यश्रुनयना ततः ॥ ३ ॥ धैर्यमालम्व्य वामोरुहृदयेन प्रवेपता । न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ ३५ ॥ धर्मे स्थितां स्थितो धर्म सदा प्रियहिते रताम् । प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम ॥ ३६ ॥ तदलब्धवती मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुकिः । मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम ॥३७॥ तुमको त्यागकर जाऊँगा ॥२५॥३०॥ हे धर्मन : आप मुझ निरपराधिनी को छोड़ने के मैंने तुमसे पहले यह नियम कर लिया था मै योग्य नहीं हो जो मैं धर्मस्थिति और आपकी हित- यहां बहुत मुम्ब मे रहा । मेरे चले जाने पर तुम चितिका हूं और आप भी धर्मन हैं । है ब्राह्मणों में अपने भाई मे कहना कि, वह ब्राह्मण चला गया श्रेष्ठ ! जिम प्रयोजन से मुझे आपको दिया यह भी है। मेरे जाने पर तुम गोक न करना । ऐमा मुझ मन्दभागवानी को न प्राप्त हुआ। अव मेरा कहने पर चिन्ता और लोक में भरी हुई वह वासकि भाई वाकि मुझको क्या कहेगा और माना के की बहिन जरत्कारु आंसुओं के बहने से गद्गद् ग्राप से युक्त जो मर्प हैं उनको आपमे मेरे मन्नान कण्ठयुक्त और मूने मुन्न मे हाथ जोड़कर, कॉपने होने की इन्च थी मा वह कार्य मुधको अभी हुए हृदय से, धर्य धारण करके उम मुनि मे बोली- प्रतीत नहीं होता है और आपसे जो मन्नान का sak ०३२ महाभार { आदिपर्य अपत्यमीप्सितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते । त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् ॥ ३८ ॥ संप्रयोगो भवेन्नाऽयं मम मोघस्त्वया द्विज । ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादये ॥ ३९ ॥ इममव्यक्तरूपं. मे गर्भमाधाय सत्तम । कथं त्यक्त्वा महात्मा सन्नन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥ ४०॥ एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्या वचनमब्रवीत् । यद्युक्तमनुरूपं च जरत्कारुं तपोधनः ॥ ११ ॥ अस्त्ययं सुभगे गर्भस्तव वैश्वानरोपमः । ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ४२ ॥ एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः । उग्राय तपसे भूयो भूयो जगाम कृतनिश्चयः ॥ ४३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिजरत्कारुममागमे मप्रचत्वारिंशोऽध्याय ॥४७॥ मुझको लाम होगा वह मेरे जाति के सपों का करते है । इस प्रकार उसके वचन को मुनकर कल्याणकारी है ॥३१॥३८॥ वह जरत्कारु अपनी भार्या से बोला-हे शुभगे ! हे भगवन । अपने बान्धयों के हित की इच्छा मुझ से तुम्हारे गर्भ म्थापन हुआ है । वह बड़ा करती हुई मैं आपके और अपने सम्बन्ध के सफल तपम्बी और तेजम्बी वेद और वेदाङ्गी के जानने होने की इच्छा मे प्रार्थना करती ह कि, आप वाला ऋषि उत्पन्न होगा। वह जरत्कारु से महात्मा प्रसन्न हो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ । जिसका निश्चय महषि ऐसा कहकर और तपस्या का निश्चय करके नहीं कि, क्या होगा ऐमे गर्म को और मुझ निर उग्रतप करने को चले गये ॥३०॥४३॥ पराधिनी को छोडकर आप की जाने की इच्छा आदिपर्व का मैंतालीमयां अध्याय ममाप्त हुआ । अथ अष्टचत्वारिंशोऽध्याय ।।१८।। मोतिरवाय---गतमात्रं जरत्कारुरवेदयत् । भ्रातुः सकाशमागत्य याथातथ्यं तपोधन ॥ १ ॥ अड़तालीमया अध्याय ।। ४८ ॥ उप्रश्रया बाल-ह ऋषियो ! पति के जात कर यथार्थ रीति से पति के जाने का हाल कहा। हनाकार ने अपने माई बामुकि के समीप जा- वासुकि ने यह वचन सुनकर अत्यन्त दीन होकर । तु भारं अपाय 1 महाभारत २३३ ततः स भुजगश्रेष्टः श्रुत्वा सुमहदप्रियम् । उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वयम् ॥ २ ॥ नामुक्पिाच--जानासि भडे यत्कार्य प्रदाने कारणं च यत् । पन्नगानां हितार्थाय पुत्रम्ते स्यात्ततो यदि ॥ ३ ॥ स सर्पसत्राकिल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान् । एवं पितामहः पूर्वमुक्तास्तु सुरैः सह ॥ ४ ॥ अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात्ते मुनिसत्तमात् । न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ॥ ५ ॥ कामं च मम न न्याय्यं प्रष्टं त्वां कार्यमीदृशम् । किं तु कार्यगरीयस्त्वात्ततस्त्वाऽहमचूचुदम् ॥ ६ ॥ दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः । नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत्स माम् ॥ ७ ॥ आचश्व भद्रे भर्तुः स्वं सर्वमेव विचेष्टितम् । उद्धरस्व च शल्यं मे घोरं हृदि चिरस्थितम् ॥ ८ ॥ जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्त्वा प्रत्यभापत । आश्वासयन्ती संतप्तं वासुकि पत्नगेश्वरम् ॥ ९ ॥ परत्कारपाच पृष्टो मयापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः । अस्तीत्युत्तरमुहिग्य ममेदं गतवांश्च सः ॥१०॥ उस अपनी बहिन जरत्कार से कहा स्,ि हे भद्रे । साटाने को कठिन ममझकर मैं नहीं जाऊँगा क्दापि तू जानती है कि, किमरिय तुझ मन जरत्कारु को मुझको शाप दे देगाह भद्रे ' तू अपने पति की दिया ना नो उम महात्मा मे तेरे एक पुत्र उत्पन्न सम्पूर्ण चेष्टाओं को कह ार मेरे हृदय ग मे उम हो तो वह हम सबकी मों के यन में रक्षा करे । घोर क्लेग को दूर का ||१८|| आर पहले नहीं पाता देवनाआ से ब्रह्मा जी ने यह वासुकि की रहिन सरकार इस प्रकार कही थी। है शुभगे ' पद्यपि यह वात तझसे पूछनी वामुषि के वचन मनकर उमरे हृदय को आनन् अयोग्य है परन्त वा काम हाने मे मुझे यह यात देती हुई वोर्ग-उम महात्मा में मन्नान के लिये तुझमे पानी पड़ी कि, तुझे उम महात्मा में गर्म मैने पूछा था और वह मुझसे ऐसा कर नग भी हुआ है या नहीं। नरे उम तपम्ची पति के गया। हमी के ममय भा उमर झट बोरने का म्मरण महाभारन [ आदिपर स्वरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं वचः । उक्तपूर्व कुतो राजन्सांपराये स वक्ष्यति ॥ ११ ॥ न संतापस्त्वया कार्यः कार्य प्रति भुजङ्गमे । उत्पत्स्यति च ते पुत्रो ज्वलनार्कसमप्रभः ॥ १२ ॥ इत्युक्त्वा स हि मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोधनः । तस्माद्वयेतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम् ॥ १३ ॥ मोतिग्वाच-एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा । एवमस्त्विति तद्वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ॥ १४ ॥ सान्त्वमानार्थदानश्च पूजया चारुरूपया । सोदयां पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ॥१५॥ ततः प्रववृधे गर्भो महातेजा महाप्रभः । यथा सोमो द्विजश्रेष्ट शुक्लपक्षोदितो दिवि ॥ १६ ॥ अथ काले तु सा ब्रह्मन्प्रजज्ञे भुजगस्वसा । कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ॥ १७ ॥ वधे तु तत्रैव नागराजनिवेशने । वेदांश्चाधिजगे साहान्भार्गवाच्च्यवनान्मुने ॥ १८ ॥ चीर्णवतो याल एव बुद्धिसत्त्वगुण्गन्वितः । नाम चाम्याभवत्न्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ॥ १९ ॥ नहीं। नाम मकट म यह गुट क्या कहना और किया । मधुर पचन और मान धन देना और यहुत मुगम बामति की बहिन ' तुम अपने मन प्रसार में नामुफि ने अपनी बहिन का मत्कार म मंदा न करना । नंग पि के ममान पुत्र उन्न किया। निम प्रकार शुष्ट पक्ष का चन्द्रमा बढता सगा। माई 'गमा मुझमे रहकर वह नपा है उसी प्रकार वह तेजवी गर्म बहने लगा। इसके चला गया म कारण तुम अपी मन उपगन्न ममय के आने पर मुसि की बहिन के दर ग॥100 देवनाआ क पुत्र कामवान अपने माता पिताओं रमथवा बार इस प्रकार पनी यहिन ए के भय को दूर करने वारा पुत्र उत्पन्न हुआ। यह बरन का मनका अनि धमलना में मे ।। बार उसी घर म वृद्धि को प्राप्त हुआ और अगा. पारा मने अपनी यहिन यरन । प्रहण महिन पदों का उसने च्यवन मुनि में अध्ययन 1 । .. दम्ब अध्याय ४९.] महाभारत F अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात्पिता गर्भस्थमेव तम् । वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ॥ २० ॥ म बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् । गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात्परिरक्षितः ॥ २१ ॥ भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्मयः । विवर्धमानः सर्वास्तान्पन्नगानभ्यहर्पयत ॥ २२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आम्तीकोत्पत्ता अष्टचत्वारिंगोऽध्याय ॥ ४८ ॥ किया ॥१४॥१८॥ आम्तीक प्रसिद्ध हुआ । वह बालक बहा रहता यह बालक बनों का धारण करने वाला, बुद्धि हुआ वहा बुद्धिमान था और माँ के राजा वासुकि और सत्वगुण मे युक्त हुआ और उसका नाम के यहा बड़े यन में उसकी रक्षा होती थी और लोक में "अम्ति" प्रचलिन हुआ क्योंकि उसका देवताओं के म्वामी शिवजी के ममान बडा तेजबी पिता आम्तीक कहकर इसके गर्भ में रहने ही पर था और उन मब मों को अपने शरीर की वृद्धि वन को चला गया था। इस कारण उसका नाम में उमने प्रसन्न किया ॥१९॥२॥ आदिपर्व का अड़तालीमवां अध्याय ममान हुआ । अथ एकोनपञ्चागतमोध्याय ॥४५॥ गौनक उवाच-यदपृच्छत्तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजयः । पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद ॥ १ ॥ मोनिग्वाच-शृणु ब्रह्मन्यथापृच्छन्मन्त्रिणो नृपतिस्तदा । यथा चाम्यातवन्तस्ते निधनं तत्परीक्षितः ॥ २ ॥ जनमजय उवाच- -जानन्ति स्म भवन्तस्तद्यथावृत्तं पितुर्मम । आसीद्यथा स निधनं गतः काले महायशाः ॥ ३ ॥ श्रुत्वा भवत्सकागाडि पितुवृत्तमशेषतः । कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातुचित् ॥ ४ ॥ ॥ उद्धामयां अध्याय ४५॥ मानक बोल. कि, गजा जनमेजय ने पिता के था और मंत्रियों ने परीक्षित वा स्वर्ग प्राप्ति के परलोक में जाने के पचान अपने मन्त्रियों में जो विषय में जमा वर्णन किया था वह मुना : जनमेजय कुछ पूछा था, उसे फिर विम्नारपूर्वक कहो। उप्रश्रवा ने कहा है मत्रियो ! म पिता कामा चरित्र योग-हे. माधण : राजा ने मत्रियों से जैमा पूछा था और वह महायशा नरेश काल के वर्मान होकर .

२३६ महाभान [ आदिपव . . " मौतिश्याच -मन्त्रिणोऽयात्रुवन्वाश्यं पृष्टास्तेन महात्मना । सर्वे धर्मविदः प्राज्ञा 'राजानं जनमेजयम् ॥ ५ ॥ मन्त्रिण उचु -शृणु पार्थिव यत्रूपे पितुस्तव महात्मनः । चरितं पार्थिवेन्द्रस्य यथा निष्ठां गतश्च सः ॥ ६ ॥ धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव । आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ॥ ७ ॥ चातुर्वण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत । धर्मतो धर्मविद्राजा धर्मों विग्रहवानिव ॥ ८ ॥ ररक्ष पृथिवीं देवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः । द्वेष्टारस्तस्य नैवासन्स च द्वेष्टि न कंचन ॥ ९ ॥ समः सर्वेषु भूतेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु ॥ १० ॥ स्थिताः सुमनसो राजस्तेन राज्ञास्वधिष्ठिताः । विधवा अनाथविकलान्कृपणांश्च बभार सः ॥ ११ ॥ सुदर्शः सर्वभूतानामासीत्सोम इवापरः । तुष्टपुष्टजनः श्रीमान्सत्यवाग्दृढविक्रमः ॥ १२ ॥ धनुर्वेदे तु शिप्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः । गोविन्दस्य प्रियश्चासीपिता ते जनमेजय ॥ १३॥. जिम प्रकार नाश हुए, वह तुम भी प्रकार जानते आपके पिता जैसे धर्मात्मा, महात्मा तथा प्रजापालक हो । म तुममे पिता का सम्पूर्ण चरित्र सुनकर जेम थे, वह कहता है । उस धर्म के जानन वाले राजा मगन होमके यही राय रुगा कदापि विपरीत न ने चारों वणों को अपने धर्म में स्थापनकर, धर्म मरगा ॥12॥ में उनकी रक्षा की। वे बड़े पराक्रमी थे। पृथ्वी- उग्रश्रवा चोर मय धर्मों को जानने वाले बुद्धि- देवी की रक्षा करते थे। उनके न बहुत शत्रु थे मान मंत्रियों ने गजा के वचन को मुनकर जनमेजय और न ही ये किमी से शत्रुता रखते थे। वे म का कि, राजन : आपने अपने पिता महात्मा प्रजापति के समान थे और सबमे एकसा भाव रखते पर्गक्षित के चरित्र के विषय में जो कुछ पटा और थे। उनके राज्य में ब्रामण, क्षत्रिय, वश्य और जिम प्रकार यह वगगक गये वह श्रवण परी। शूद्र अपना अपना कर्म सावधान होकर करते थे। ..

अध्याय ४९ ] महामान बली । लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय आसीन्महायशाः ।' परिक्षीणेपु कुरुषु सोत्तरायामजीजनत् ॥ १४ ॥ परीक्षिदभवत्तेन सौभद्रस्यात्मजो राजधर्मार्थकुशलो युक्तः सर्वगुणैर्वृतः ॥ १५॥ जितेन्द्रियश्चात्मवांश्च मेधावी धर्मसेविता । पवर्गजिन्महावुद्धिनीतिशास्त्रविदुत्तमः प्रजा इमास्तव पिता पष्टिवण्यपालयत् । ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्वेषां दुःखमावहन् ॥ १७ ॥ ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण धर्मेण प्रतिपेदिवान् । इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कुरुकुलागतम् । बाल एवा भिषिक्तस्त्वं सर्वभूतानुपालकः ॥ १८ ॥ जनमेजय उवाच-ना स्मिन्कुले जातु वभूव राजा यो न प्रजानां प्रियकृत्प्रियश्च । विशेषतः प्रेक्ष्य पिता महानां वृत्तं सहवृत्तपरायणानाम् ॥१९॥ कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः । आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ २० ॥ विधवा म्री, दीन, अनाथ, अङ्गहीन पुरुषों का जितेन्द्रिय, मेधायुक्त, बुद्धिमान् धर्म के सेवन करने पालन पोपन करते थे ॥५॥१२॥ वाले, काम क्रोधादि के जीतने वाले, बड़ी बुद्धियुक्त उनको देखकर मनुष्य ऐसे प्रमन्न होते थे और नीतिशास्त्र के जानने वालों में श्रेष्ट आपके जसे चन्द्रमा को देखकर चकोर प्रमन्न होता है । पिता इस प्रजा को माठ वर्ष तक पालकर मय लोगों उसके राज्य में मनुष्य अति हृष्टपुष्ट रहते थे। को दु.स्व के समुद्र में डुबोकर परलोक को मिधार और वे शोभायुक्त, सत्यवाही और दृढपराक्रमी है ॥१३॥१७|| थे। है जनमेजय ! आपके पिता ने कृपाचार्य मे इसके उपरान्त हे पुरुषों में श्रेष्ट ! हनांग वर्षों धनुप - विद्या ग्रहण की थी । और वे भगवान् मे कुरुकुल से पालन किय हुए गग्य को आपने गोविन्द के बड़े प्रिय थे । वे महायगम्बी मम्पूर्ण प्राप्त किया है और बालपन ही में अमिर्पित होकर लोक के प्रिय थे और कुरुवंश के क्षय होने पर सम्पूर्ण प्रजा को पालन कर रहे हैं । जनमेजय वे उत्तरा के गर्भ में उत्पन्न हुए थे। इसी कारण बोले- ---इम कुर-कुल में ऐमा राजा कदापि नहीं हुआ वे बलवान् अभिमन्यु के पुत्र पर्गक्षित नाम मे जो प्रजा को प्रिय न हो और जो प्रना को प्रिय- प्रसिद्ध हुए । राजधर्म में निपुण, सर्व गुणों से भूषित, कारी न हो और जो कि श्रेष्ठों के आचरणों के ।

महाभा रम [ आदिपर्य मौतिवाय एवं संचोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् । ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रियहितैपिणः ॥ २१ ॥ मन्त्रिण ऊचु -स राजा पृथिवीपालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । . बभूव मृगयाशीलस्तव राजन्पिता सदा ॥ २२ ॥ यथा पाण्डुमहावाहुर्धनुधरवरो युधि । . अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्यापयशेषतः ॥ २३ ॥ स कदाचिद्वनगतो मृगं विव्याध पत्रिणा । विद्ध्वा चा न्वसरत्तूर्णं तं मृगं गहने वने ॥ २४ ॥ पदातिवद्धनिस्त्रिंशस्ततायुधकलापवान् न चा ससाद गहने मृगं नष्टं पिता तब ॥ २५॥ . परिश्रान्तो वयस्थश्च पष्टिवर्षों जरान्वितः । क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिसत्तमम् ॥ २६ ॥ स तं पप्रच्छ राजेंद्रो मुनि मौनव्रते स्थितम् । न च किंचिदुवाचेदं पृष्टोऽपि स मुनिस्तदा ॥ २७ ॥ ततो राजा क्षुच्छमार्तस्तं मुनि स्थाणुवस्थितम् । मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं गतः ॥ २८ ॥ न चुवोध च तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् । सतं क्रोधसमाविष्टो धर्पयामास ते पिता ॥ २९ ॥ करने वाले मेरे पितामह थे, उनके व्रत को देखकर राजा पाण्डु शस्त्रधारियों में उत्तम था उसीतरह विशेषतः यह यान प्रतीत होती है । ऐमा धर्मात्मा वह पृथ्वी का पालन करने वाला यह आपका पिता यह मेरा पिता जिम प्रकार मृत्यु को प्राप्त हुआ यह गजा परीक्षित मत्रियों को राज्यकार्य सौपकर मृगया कथा मुझने कही। आदि मे अन्न तक मुनना के निमित्त बन मे गया। उसने एक समय बम में मृग चाहता है। इस प्रकार गजा में पूरे हुए और को वाण से मारा और बड़े धने यन में शीघ्र उसके तिचिन्तक मंत्रियों ने जिम प्रकार राजा की मृत्यु पछि गया । राजा ने पैदल मन्त्रधारी तीरों से भग हुई थी उसी प्रकार गजा जनमेजय मे कहने लगे हुआ तर्कग बांधे,हुए मृग का पीछा किया, परन्तु मृग को न पाया ।वह युद्ध शरीर मार्ग से थक्ति मंत्रियों ने कहा-जिम प्रकार यही भुजा याग · भूम्य और प्यासे राजा ने उस जंगल में एक मुनि अध्याय.0 ] महाभारत २३९ मृतं सर्प धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् । तस्य शुद्धात्मनः प्रादात्स्कन्धे भरतसत्तम ॥ ३० ॥ न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा । तस्थौ तथैव चाकुद्धः सर्प स्कन्धेन धारयन् ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि पारीभितीय एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥ को देखा । राजा ने उसमे भागे हुए मृग का समाचार किया ॥२२॥२९॥ पूछा । वे मुनि मौनव्रत में थे, इस कारण कोई हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ! उस राजा ने मरे उत्तर न दे सके । वह भूख और परिश्रम से घबराया हुए मर्प को धनुष से उठाकर उस शुद्धारमा मुनि हुआ राजा उस सूखे हुए वृक्ष के समान बैठे हुए के कंधे पर रख दिया । उस बुद्धिमान् ऋषि ने भला मौनव्रतधारी मुनि पर क्रोधित हुआ । उसका मौनव्रत चुरा कुछ न कहा और क्रोध रहित उसी प्रकार न जानकर क्रोधवग आपके पिता ने उसका तिरस्कार सर्प को कधे पर डाल वहीं बैठा रहा ॥३०॥३१॥ आदिपर्व का उनचामवां अध्याय ममाप्त हुआ | अथ पश्चागत्तमोऽध्यायः ।। ५० ॥ मन्त्रिण ऊचु --ततः स राजा राजेन्द्र स्कन्धे तस्य भुजङ्गमम् । मुनेः शुरक्षाम आसज्य स्वपुरं प्रययो पुनः ॥ १ ॥ ऋपेस्तस्य तु पुत्रोऽभूगवि जातो महायशाः । शृङ्गी नाम महातेजास्तिग्मवीर्योऽतिकोपनः ॥ २ ॥ ब्रह्माणं समुपागम्य मुनिः पूजां चकार ह । सोऽनुनातस्ततस्तत्र शृङ्गी शुश्राव तं तदा ॥ ३ ॥ सख्युः सकाशापितरं पित्रा ते धर्पितं पुरा । मृतं सर्प समासक्तं स्थाणुभूतस्य तस्य तम् ॥ ४ ॥ वहन्तं राजशार्दूल स्कन्धेनानपकारिणम् । तपस्विनमतीवाथ तं मुनिप्रवरं नृप ॥ ५ ॥ ॥ पचामवां अध्याय ५॥ मंत्रि बोले- ततश्चात् भूस से घबराया हुआ और बड़ा यग बारा था । वह शृंगी ब्रह्माजी की राजा परीक्षित उस मुनि के कंधे पर सर्प डालकर पूजा किया करता था। जब यह ब्रह्माजी की आमा अपने म्यान को गया । उमके पुत्र का नाम शृंगी पाकर घर को आता था टमने अपने मित्र मे मुना था, जो बड़ा तेजम्बी तीक्ष्ण यल वाला, अत्यंत क्रोधी कि, राजा ने मुनि का तिरस्कार किया है अर्थात् महाभारत [ आदिपर्ण जितेन्द्रियं विशुद्धं च स्थितं कर्मण्यथाद्भुतम् । तपसा द्योतितात्मानं स्वेबङ्गेपु यतं तदा ॥ ६ ॥ शुभाचारं शुभकथं सुस्थितं तमलोलुपम् । अक्षुद्रमनसूयं च वृद्धं मौनव्रते स्थितम् । शरण्यं सर्वभूतानां पित्रा विनिकृतं तव ॥ ७ ॥ शशापाथ महातेजाः पितरं ते रुपान्वितः । ऋपेः पुत्रो महातेजा बालोऽपि स्थविरद्युतिः ॥ ८ ॥ स क्षिप्रमुदकं स्पृष्ट्वा रोपादिदमुवाच ह । पितरं तेऽभिसंधाय तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ९ ॥ अनागसि गुरौ यो मे मृतं सर्पमवास्सृजत् । तं नागस्तक्षकः क्रुद्धस्तेजसा प्रदहिष्यति ॥ १० ॥ आशीविषस्तिग्मतेजा मद्वाक्यवलचोदितः । सप्तरात्रादितः पापं पश्य मे तपसो बलम् ॥ ११ ॥ इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र पिता यत्रास्य सोऽभवत् । दृष्ट्वा च पितरं तस्मै तं शापं प्रत्यवेदयत् ॥ १२ ॥ स चापि मुनिशार्दूलः प्रेरयामास ते पितुः । मूखे हुए. वृक्ष की नाई बैठे हुए मुनि के कंधे पर राजा को शाप दिया ॥५॥८॥ मर्प टाला है ॥१४॥ शीघ्र आचमनकर और राजा को म्मरण कंधे पर मर्प धारण किये हुए, किमी का बुरा करके तेज से प्रज्वलित हो वह शृंगी क्रोध से बोला न करने वाले, साधी, मुनियों में श्रेष्ठ, जितेन्द्रिय, कि, जिप्त फापारमा ने बिना अपराध मेरे पिता शुद्ध अद्भुत कमों में स्थित, जिसका आत्मा सपम्या के गले में मरा हुआ मर्प डाला है उसको महातेज मे प्रकाशमान है, इन्द्रियों को वश में किये हुए, विषधारी तक्षक मर्प मेरे तपोबल के प्रभाव से भेजे शुम भाचरण वाले, जिमकी कोई बुराई नहीं करता, जाकर आज से सात दिन अपने तेज मे जला मावधान, चचलना से रहित, गभीर, किसी की देगा। हे मित्र ! वह मेरे तपोबल को देखे यह निन्दा न करने वाय, वृद्ध मौनव्रतधारी, सब प्राणियों कहकर अपने पिता के समीप आया और अपने की रक्षा करने यार. मुनि का राजा ने अपमान पिना को माप का वृत्तान्त सुनाया ॥२॥१२॥ शिया । नम कोष में आकर उम बड़े तेजम्बी पुत्र उस श्रेष्ठ मुनि ने शीलगुणयुक्त गौरमुख ने जो कि बालक होने पर भी वृद्ध के ममान था, गिप्य, को आपके पिता के पास भेजा । उसने अन्याय .० महामार न शिष्यं गौरमुखं नाम शीलवन्तं गुणान्वितम् ॥ १३ ।। आचरयौ स च विश्रान्तो राजः सर्वमशेषतः । शप्तोऽसि मम पुत्रेण यत्तो भव महीपते ॥ १४ ॥ तक्षकस्त्वां महाराज तेजसाऽसौ दहिप्यति । श्रुत्वा च तद्वचो घोरं पिता ते जनमेजय ॥ १५॥ यत्तोऽभवत्परित्रस्तस्तक्षकात्पन्नगोत्तमात् ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते ॥ १६ ॥ राज्ञः समीपं ब्रह्मर्पिः काश्यपो गन्तुमैच्छत । तं ददर्शाथ नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं तदा ॥ १७ ॥ तमत्रवीत्पन्नगेन्द्रः काश्यपं त्वरितं द्विजम् । क्व भवांस्त्वरितो याति किं च कार्य चिकीर्पति ॥ १८ ॥ काश्यप ग्वाच-यत्र राजा कुरुश्रेष्ठः परिक्षिन्नाम वे द्विज । तक्षकेण भुजङ्गेन धक्ष्यते किल सोऽद्य वे ॥ १९ ॥ गच्छाम्यहं तं त्वरितः सद्यः कर्तुमपज्वरम् । मयाभिपन्नं तं चापि न सो धर्षयिप्यति ॥ २० ॥ ननव ज्याच-किमर्थं तं मया दष्टं संजीवयितुमिच्छसि । अहं स तक्षको ब्रह्मन्पश्य मे वीर्यम तम् ॥ २१ ॥ मावधान होकर राना मे गुर का मदेश कहा कि, उम्पगियों में श्रेष्ठ गना परीक्षित की नमा आज हे गनन ' मेरे पुत्र ने तुमको चाप दिया है, मार अपने तन मे मम्म कंगा। मशीघ्रता में उम धान होजाओ । हे तश्चक्नाग तुमको राना को निर्विष करने के लिये जाता है। मंग अपने तेन द्वारा नांगा । है ननमनय । आपके रमा म मप उमी नहीं मार मरंगा ॥१३॥ पिना यह कठोर पान मुनकर नागों में उत्तम तपक तपक ने का कि, हे ब्राह्मण ' मी काटे का भय स्यावर मास्थान हो ग । अनन्तर उम हुए को गिने की किमरिये इन्हा करना मान दिन के भान पर मपि काश्यप गता के हो उस राता का काटन बारा नषनाग ह. मी मीप आरहे थे परन्तु उमा तक्षक ने देखकर अदभुन वीर्य को देना । मेरे काटे हुए. “गता कहा कि, हे ब्राह्मण ' तुम शीघ्रता मे किम कार्य को तुम किराने के समर्थ नहीं है। यह कहकर हेतु जारहे हो' काग्यप ने कहा-हे ब्राह्मण नया ने एक वृक्ष को काटा । काटते ही वर महागन . है , महाभारत [ आदिपर्य न शक्तस्त्वं मया दष्टं तं संजीवयितुं नृपम् । इत्युक्त्वा तक्षकस्तत्र सोऽदशद्वे वनस्पतिम् ॥ २२॥ स दष्टमात्रो नागेन भस्मीभूतोऽभवन्नगः । काश्यपश्च ततो राजन्नजीवयत तं नगम् ॥ २३ ॥ ततस्तं लोभयामास कामं बहीति तक्षकः । स एवमुक्तस्तं प्राह काश्यपस्तक्षकं पुनः ॥ २४ ॥ धनलिप्सुरहं तत्र यामीत्युक्तश्च तेन सः । तमुवाच महात्मानं तक्षकः श्लक्ष्णया गिरा ॥ २५ ॥ यावद्धनं प्रार्थयसे राजस्तस्मात्ततोऽधिकम् । गृहाण मत्त एव त्वं संनिवर्तस्व चानघ ॥ २६ ॥ स एवमुक्तों नागेन काश्यपो द्विपदां वरः । लब्ध्वा वित्तं निववृते तक्षकाद्यावदीप्सितम् ॥ २७॥ तस्मिन्प्रतिगते विप्रे छद्मनोपेत्य तक्षकः । नं नृपं नृपतिश्रेष्टं पितरं धार्मिकं तव ॥ २८ ॥ प्रासादस्थं यत्तमपि दग्धवान्विषवह्निना । ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजयायाभिषेचितः ॥ २९ ।। एतददृष्टं श्रुतं चापि यथावन्नृपसत्तम । अस्माभिर्निखिलं सर्व कथितं तेऽतिदारुणम् ॥ ३० ॥ वृक्ष भम्म हो गया । हे गजन् ! तब काश्यप ने में श्रेष्ठ काश्यप उससे अपनी इच्छानुसार धन लेकर उस वृक्ष को जिला दिया । इसके उपगन्त तक्षक लौट आया ॥२१॥२७॥ न उभे रोम दिखाकर कहा कि तुम अपनी इच्छा उम ब्राह्मण के चले जाने पर कपटरूप बनाकर प्रगट करो । उम ब्रामण ने उत्तर दिया कि, मैं तक्षक ने मुरक्षित गृह पर बैठे हुए श्रेष्ठ धर्मात्मा और गजा के पाम धनकी इच्च्या में जाता है। तक्षक सावधान आपके पिता को विपरूपी आग से भम्म ने उम महात्मा की मीठी याना में कहा है अनघ किया। इसके उपरान्त मंसार की रक्षा के हेतु तुमने गा में जितना धन पाने की आगा की है, आपको अभिषेक किया गया है । हे नृपश्रेष्ठ ! 2 उममे भी अधिक धन नुमको देना ह, गेट यह वृत्तान्त अत्यन्त दारण देग्या और मुना हुआ माओ। हम प्रकार नमक के कहने पर मनुष्यों मय आपके आगे कह दिया है ॥२८॥३०॥ 1 .

अध्याय ..] महाभारत श्रुत्वा चैनं नरश्रेष्ठ पार्थिवस्य पराभवम् । अस्य चपैरुत्तङ्कस्य विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ३१ ॥ मोतिरुवाच-एतस्मिन्नेव काले तु स राजा जनमेजयः । उवाच मन्त्रिणः सर्वानिदं वाक्यमरिंदमः ॥ ३२ ।। जनमजय उवाच-अथ तत्कथितं केन यद्वृत्तं तद्वनस्पतौ । आश्चर्यभूतं लोकस्य भस्मराशीकृतं तदा ॥ ३३ ।। यवृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै । नूनं मन्त्रैर्हतविषो न प्रणश्येत काश्यपात् ॥ ३४ ।। चिन्तयामास पापात्मा मनसा पल्नगाधमः । दष्टं यदि मया विप्रः पार्थिवं जीवयिष्यति ॥ ३५ ॥ तक्षकः संहतविपो लोके यास्यति हास्यताम् । विचिन्त्यैवं कृता तेन ध्रुवं तुाष्टद्धिजस्य वै ॥ ३६ ॥ भविष्यति छुपायेन यस्य दास्यामि यातनाम् । एक तु श्रोतुमिच्छामि तवृत्तं निर्जने वने ॥ ३७॥ संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च कस्तदा । श्रुतवान्दृष्टवांश्चापि भवत्सु कथमागतम् । श्रुत्वा तस्य विधास्येऽहं पन्नगान्तकरी मतिम् ॥ ३८ ॥ उग्रश्रवा बोले कि, शत्रुओं के नाग कग्ने का अब वैमा विष न रहा यह जानकर तक्षक ने वाला राजा जनमेजय मब मत्रियों में बोला-तुमको अवश्य ब्राह्मण की प्रसन्नता की होगी ॥३२३६|| वृक्ष का वृत्तान्न कैसे विदित हुआ कि, आश्चर्य यदि उपाय हो मका तो यन करके उसका रूप तक्षक ने वनस्पति को जगया और काश्यप बदला उमको दगा परन्तु में एक बान पृछना ह ने उसको जीवन दिया । मुझे यह प्रतीत होता है कि, उस निर्जन वन में काश्यप और नक्षक में कि, मपों के अधम पापात्मा तक्षक ने उम समय यातों का होना किमन मुना और देम्बा है और मोचा था कि, उस ब्राह्मण के मत्र द्वारा विप में तुममे किमने कहा। यह सुनकर उम मई के नाम मुक्त होकर वृक्ष का जीवन मिला है, मो मे राजा करने का विचार कम्गा । मति बोले-है. राजन : को काटने में यह ब्राह्मण जाकर यदि उनकी जिला काश्यप और तक्षक का वृत्तान्न जिमने हमम जिम दे; तो लोग यह रहकर मरी हमी करेंगे कि, तक्षक प्रकार से कहा था, वह कहता है, मुना ! वन में महाभारत ( आदिपर्य । मन्त्रिण ऊचुः शृणु राजन्यथाऽस्माकं येन तत्कथितं पुरा । समागतं द्विजेन्द्रस्य पन्नगेन्द्रस्य चाध्वनि ॥ ३९ ॥ तस्मिन्वृक्षे नरः कश्चिदिन्धनार्थाय पार्थिव । विचिन्वन्पूर्वमारूढः शुष्कशाखा वनस्पतौ ॥ ४०॥ न बुध्येतामुभौ तौ च नगस्थं पन्नगद्विजो । सह तेनैव वृक्षण भस्मीभूतो ऽभवन्नृप ॥ ४१ ॥. द्विजप्रभावाद्राजेन्द्र व्यजीवत्स वनस्पतिः । तेनागम्य द्विजश्रेष्ठ पुंसास्मासु निवेदितम् ॥ ४२ ॥ यथावृत्तं तु तत्सर्व तक्षकस्य द्विजस्य च । एतत्ते कथितं राजन्यथा दृष्टं श्रुतं च यत् । श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ४३ ॥ मोतियाच-मन्त्रिणां तु वचः श्रुत्वा स राजा जनमेजयः । पर्यतप्यत दुःखातः प्रत्यपिंपत्करं करे ॥ ४४ ।। निःश्वासमुष्णमसकृट्टीधैं राजीवलोचनः । मुमोचाणि च तदा नेत्राभ्यां प्ररुदन्नृपः ॥ ४५ ॥ उवाच च महीपालो दुःखशोकसमन्वितः । दुर्धरं वाप्पमुत्सृज्य स्पृष्ट्वा चापो यथाविधि ॥ १६ ॥ उमी वृक्ष की सूखी शाग्वा पर एक मनुष्य इधन समझ चैमा कर । उग्रश्रवा बोले-मत्रियों के वचन के लिये पहले में चढा था। तक्षक और ब्राह्मण ने को सुनकर राजा ने बडा दुःख माना और हाथ मे उस वृक्ष पर चढ़े हुए. उम मनुष्य को देखा नहीं हाथ मरने लगा। कमल सदृश नेत्र वाले राजा था। वह वृक्ष उम मनुप्य सहित भम्म हो गया। उम जनमजय ने रोने हुए बड़े बड़े लम्बे श्वास लेकर काश्यप के प्रनाप में वृक्ष के माथ वह मनुष्य जी आमु गिराये । दु ख और गोक से युक्त बहुत उठा । उम पुरुष ने आकर यह ममाचार हममे आमु गिगकर और विधिपूर्वक आचमनकर एक कहा ॥३७४२॥ मुहर्त तक ध्यान किया और मनम कार्य ठहराकर नमक और ब्राह्मण का वृत्तान्त जसा हमने क्रोधित होकर राजा ने सब मंत्रियों से यह वचन गुना और दम्याचमा आपके आगे कह दिया। हे कहा मेरे पिता के परलोक सिधारने के विषय में गानों में भ्रष्ट ! हमको मनकर जमा आए उचित तुमने जो कहा, उसे सुनकर मैने मन ही मनमें अहाय-0 ] महाभारत १५ मुहूर्त्तमिव च ध्यात्वा निश्वित्य मनसा नृपः । अमपी मन्त्रिणः सर्वानिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७॥ जनमेजय उवाच-श्रुत्वैतद्भवतां वाक्यं पितुर्मे स्वर्गतिं प्रति । निश्चितेयं मम मतिर्या च तां मे नियोधत । अनन्तरं च मन्येऽहं तक्षकाय दुरात्मने ॥४८॥ प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसितः पिता । गृङ्गिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम् ॥ १९॥ इयं दुरात्मता तस्य काश्यपं यो न्यवर्त्तयत् । यद्यागच्छेत्स वै विप्रो ननु जीवेत्पिता मम ॥ ५० ॥ परिहीयेत किं तस्य यदि जीवेत्स पार्थिवः । काश्यपस्य प्रसादेन मन्त्रिणां विनयेन च ॥ ५१ ।। स तु वारितवान्मोहात्काव्यपं द्विजसत्तमम् । सजिजीवयिपुं प्राप्त राजानमपराजितम् ॥ ५२ ।। महानतिक्रमो ोप तक्षकस्य दुरात्मनः । द्विजस्य योददद्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति ॥ ५३ ॥ उत्तङ्कस्य प्रियं कर्तुमात्मनश्च महत्प्रियम् । भवतां चैव सर्वेषां गच्छाम्यपचितिं पितुः ॥ ५४॥ इति श्रीमन्महाभाग्ने अदिपर्वणि आम्तीपरणि पारक्षिन्मत्रिमंबादे पञ्चामत्तमोऽध्याय ॥ ५० ॥ जमा निश्चय किया है कि, दुगत्मा तक्षक को उसने मेरे बल को न जानकर काश्यप को जो ब्राह्मणी इमका बदला देना उचित ही है । तक्षक ने शृगी में श्रेष्ट और राजा को जिराने की इच्छा करके ऋपि के मिस मे मेरे पिता को जीवित में रहित आया था, लोटा दिया। यह मोचकर कि, मामण किया है। और अपनी दुष्टता में काव्यप को रोटा गजा को जीवन न दे, उसको धन देना उम दग- दिया है यदि वह ब्राह्मण आया होना तो मंग पिता चारी नमक का वडा अत्याचार प्रगट करना अवश्य जी उठना ॥४३५०|| अतएव में उत्तक ऋषि और तुम मा को प्रिय यदि काश्यप के प्रमाद और मत्रियों की नम्रता कग्ने को अपने पिना का बदरानगा ।।५१|| मे मग पिना जीना तो तक्षक की क्या हानी थी। आदिपर्व का पचामया अध्याय ममान हुआ । है २४ महाभारत ( आदिपर्व अथ एकपञ्चागत्तमोऽध्याय ॥ ५ ॥ मौतिम्नाच-एवमुक्त्वा ततः श्रीमान्मन्त्रिभिश्चानुमोदितः । आरुरोह प्रतिज्ञा स सर्पसत्राय पार्थिवः ॥ १ ॥ ब्रह्मन्भरतशार्दूलो राजा पारीक्षितस्तदा । पुरोहितमथाहय ऋत्विजो वसुधाधिपः ॥ २ ॥ अब्रवीद्वाक्यसंपन्नः कार्यसंपत्करं यो मे हिंसितवांस्तातं तक्षकः स दुरात्मवान् ॥ ३ ॥ प्रतिकुर्यां तथा तस्य तद्भवन्तो ब्रुवन्तु मे । अपि तत्कर्म विदितं भवतां येन पन्नगम् ॥ ४ ॥ तक्षक संप्रदीप्तेऽग्नौ प्रक्षिपेयं सवान्धवम्'। यथा तेन पिता सह्यं पूर्व दग्धो विषाग्निना । नथाऽहमपि तं पापं दग्धुमिच्छामि पन्नगम् ॥ ५ ॥ 'ऋत्विज उचु-अस्ति राजन्महत्सत्रं त्वदर्थ देवनिर्मितम् । सर्पसत्रमिति ग्यात पुराणे परिपठ्यते ॥ ६ ॥ आहर्ता तस्य सत्रस्य त्वन्नान्योऽस्ति नराधिप । इति पौराणिकाः प्राहुरस्माकं चास्ति स क्रतुः ॥ ७ ॥ एवमुक्तः स राजपिमेने दग्धं हि तक्षकम् । हुताशनमुग्वे दीप्ते प्रविष्टमिति सत्तम ॥ ८ ॥ "कारनवा अध्याय २१।। उमरवा रोले है मपियो गना ननमेजय वधुओं सहित तती हुई अमि में जलाऊ । आप ने मत्रियों में प्रसन्न होकर मर्पमत्र यज्ञ करने की गंगा को मा कर्म कराने की विधि मालम है या प्रनिता की भरनरगिया में श्रेष्ठ गना ने अपने नहीं। यह मुनकर ऋविन बोले कि, इस काम पुरोटिन सन्धिना के। चुगकर कहा कि, तथा में करने के लिय मर्पमत्र यज पुराणों म विख्यात ने अपना दृष्टना में हमार पिना को बिना अपराध है ॥ अपनी पि की अग्निम काटकर भाम कर दिया। उम यन का करने वाला आपक हममे मेरी भी याद कि, अपने पिता का मियाय और कोई नहीं है, यह वाती पौराणिक पटना ने यि ग न नाग की माई रोग कहते है और हम उम य को जानने हैं। है रानन महाभारत ततोऽत्रवीन्मन्त्रविदस्तानराजा ब्राह्मणांस्तदा । आहरिष्यामि तत्सत्रं संभाराः संभ्रियन्तु मे ॥ ९ ॥ ततस्त ऋत्विजस्तस्य शास्त्रतो द्विजसत्तम । देशं मापयामासुर्यज्ञायननकारणात् ॥ १० ॥ यथावद्वेदविद्वांसः सर्वे सर्वे बुद्धेः परंगताः । ऋद्ध्या परमया युक्तमिष्टं द्विजगणैर्युतम् ॥ ११ ॥ प्रभूतधनधान्याढ्यमृतिभिः सुनिषवितम् । निर्माय चापि विधिवद्यज्ञायतनमीप्सितम् ॥ १२ ॥ राजानं दीक्षयामासुः सर्पसत्राप्तये तदा । इदं चासीत्तत्र पूर्व सर्पसत्रे भविष्यति ॥ १३ ॥ निमित्तं महदुत्पन्नं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा । यज्ञस्यायतने तस्मिन्क्रियमाणे वचोऽब्रवीत् ॥ १४ ॥ स्थपतिर्बुद्धिसंपन्नो वास्तुविद्याविशारदः । इत्यब्रवीत्सूत्रधारः सूतः पौराणिकस्तदा ॥ १५॥ यम्मिन्दशे च काले च मापनेयं प्रवर्तिता । ब्राह्मणं कारणं कृत्वा नायं संस्थास्यते ऋतुः ॥ १६ ॥ एतच्छ्रुत्वा तु राजाऽसौ प्राग्दीक्षाकालमनीत । भत्तारं न हि मे कश्चिदज्ञातः प्रविशदिति ॥ १७॥ दति श्रीमन्महाभारनं आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मर्पमत्रोपक्रम एकपञ्चागत्तमोऽध्याय || ५५ ।। है शौनक : यह मुनकर गजा जनमेजय प्रमन्न हुए के ममूह मे युक्त और बहुत धन से मरे हुए और और उमी ममय से नक्षक को मम्म हुआ मानकर ऋविनों में युक्त यथार्थ रीति मे मनोहर यज्ञशाला ऋत्विजों मे बोले कि, मैं उम यन्त्र को करूंगा तुम को बनाकर गजा के मर्पमत्र यज्ञ का फल पाने के उसी मामग्री इकट्ठी कगे। टमके उपगन्न ऋलिनों लिये गवा की दीक्षा दी। और आगे सर्पमत्र में ने मात्रानुमार उस राजा के यन के लिये यज्ञ यह होगा इस प्रकार जाति के मून और गिल्ल- वाला बनाने के लिय म्यान को नापा ७१०॥ विद्या के जानन वानी ने कहा कि, एक ब्रावण के बुद्धि के पारगामी और वेदगामी ऋत्विजों ने कारण में यह यज्ञ ममाप्त न होगा। वह विघ्न बड़ी ममृद्धि मे युक्त और इच्छा के मदृश ब्राह्मणों यजगाला के बनाने ममय विदित हुआ । टम प्रकार महाभारत { आदिपयं " --- . बुद्धिमान् और शाराओं के बनाने में चतुर एक नहीं होगा। यह सुनकर राजा जनमेजय ने दीक्षा शिल्पविद्या के जानने वाले ने कहा-जिस देश और लेने के पहले द्वारपालों से कहा कि, मेरी आज्ञा बिना काल में इस माला को नापा था उससे प्रतीत होता कोई इस यज्ञ के भीतर न आने पावे ॥११॥१७॥ है कि, ब्राह्मण को निमित्त बिना यह यज्ञ समाप्त आदिपर्व का एकावनयां अध्याय समाप्त हुआ। अथ द्विपञ्चागत्तमोऽध्याय ॥ ५२ ।। मातिरुवाच-ततः कर्म प्रववृते सर्पसत्रविधानतः । पर्यक्रामंश्च विधिवत्स्वे स्वे कर्मणि याजकाः ॥ १ ॥ प्रावृत्य कृष्णवासांसि धूम्रसंरक्तलोचनाः । जुहुवुमन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम् ॥ २॥ कम्पयन्तश्च सर्वेपामुरगाणां मनांसि च । सर्पानाजुहुवुस्तत्र सर्वानग्निमुखे तदा ॥ ३॥ ततः सपीः समापेतुः प्रदीप्ते हव्यवाहने । विचेष्टमानाः कृपणमाह्वयन्तः परस्परम् ॥ ४ ॥ विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टयन्तः परस्परम् । पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे ॥ ५ ॥ श्वताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा । नदन्तो विविधान्नादान्पेतुर्दीप्ते विभावसौ ॥ ६ ॥ क्रोशयोजनमात्रा हि गोकर्णस्य प्रमाणतः । पतन्त्यजस्त्रं वेगेन वहावाग्निमतां वर ॥ ७ ॥ " यावनयां अध्याय २ ॥ उप्रश्रया वाले ऋपिया 'दमके उपगन्न नियम को दीन गन मे पुकारते हुए मर्प गिरने लगे अनुगार मर्पयन आरम्भ हुआ और मय ब्राह्मण ॥१॥ अपन अपने कार्यों को करने रंग। और ऋविजी कांपते और श्वाम लेने और एक दूसरे को ने जिनके घर में कपड़े पाले और आग्य रातो लिपटने हुए. उम आमिकुण्ड में गिरने लगे। वेत, गर धी, मय द्वाग अनि हाम रिया। अमि के काले, नीले, वृद्ध, यालक मर्प अनेक प्रकार के मुग में गर्मी का माराहन दिया । दमक उपगन्न गलों को करने हुए अग्नि में गिरे। कोई छोटे कोई म प्रारिन गति में नहपने हुए और एक एक बड़े और कोई गा के कान के बराबर ये बड़े वेग - अध्याय ५३] महाभारन प्राप्त - एवं शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अवशानि विनष्टानि पन्नगानां तु तत्र वै ॥ ८ ॥ तुरगा इव तत्रान्ये हस्तिहस्ता इवापरे । मत्ता इव च मातङ्गा महाकाया महाबलाः ॥ ९ ॥ उच्चावचाश्च बहवो नानावर्णा विपोल्वणाः । घोराश्च परिघप्रख्या दन्दका महाबलाः । प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिताः ॥ १० ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पमयोपक्रम द्विपञ्चागत्तमोऽध्याय में अमि में गिरने लगे। इस प्रकार सेकड़ों हजागें बलबान और कोई बडे और छोटे अनेक रह वाले अा मर्प उम यन में पग्बम होकर मृत्यु बडे विपले भयानक मर्प माता के गापरूपी दण्ड में हुए । कोर्ट घाई कोर्ट हाथी की मूड और कोर्ट अग्नि में जलकर भष्म हो गये ।।०॥ मतवाले हाथियों के ममान नहीं देह वाले और बडे आदिपर्व का वायनवां अध्याय ममाप्त हुआ । अथ त्रिपञ्चाशनमा:ध्याय ॥३॥ मानक उवाच-सर्पसत्रे नदा गजः पाण्डवयस्य धीमतः । जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः ॥ १ ॥ के सदस्या बभूवुश्च मर्पसत्रे सुदारुणे । विपादजननेऽत्वर्थ पन्नगानां महाभये ॥ २ ॥ मर्व विस्तरशस्तान भवाञ्छमितुमर्हति । सर्पसत्रविधाननविनेयाः के मूतज ॥ ३ ॥ मानिम्बाव-हन्न ते कथयिष्यामि नामानीह मनीपिणाम । ये ऋत्विजः सदस्याच नस्यासन्नृपतेस्तदा ॥ १ ॥ ॥ निग्पनवां अध्याय ३॥ शानक वान है मृतपुत्र : पाण्डवों के ममान गय। हे नान मनपुन : इम मपण कथा को आप बुद्धिमान गना जनमेजय के मर्पयन में कान परमर्षि बिम्नारपूर्वक करें और मर्पमत्र के विधि के जानने ऋविन वन । और मपों को पद और महाभय के वान कान थे । उग्रश्रवा यौन-में टम मर्पया में उत्पन्न करने वाले उम यन में कौन सदस्य बनाये जो विद्वान् मान्दिन थे उनके नामों को कहा .

महाभारत [ आदिपर्व तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः । च्यवनस्याऽन्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः ॥ ५ ॥ उदाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान्कौत्सोऽथ जैमिनिः । ब्रह्माभवच्छारिवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः ॥ ६ ॥ सदस्यश्चाभवव्यासः पुत्रशिष्यसहायवान् । उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः ॥ ७ ॥ असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा । आत्रेयः कुण्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा ॥ ८ ॥ वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान् । कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः ॥ ९ ॥ एते चा न्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगः । सदस्याश्चा भवंस्तत्र सत्रे पारीक्षितस्य ह ॥ १० ॥ जुह्वत्स्वृत्विध्वथ तदा सर्पसत्रे महाकतौ । अहयः प्रापस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः ॥ ११ ॥ वसामेदोवहाः कुल्या नागानां संप्रवर्तिताः । तुमुलो दह्यतामनिशं तदा ॥ १२ ॥ पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाऽम्बरे । अश्रूयताऽनिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम् ॥ १३ ॥ और जो सदम्य उनके भी नामों को कहगा। जप, म्याध्यय और शीलयुक्त तथा वृद्ध श्रुतश्रया, च्यवनवंगी प्रसिद्ध वेद जानने वालों में श्रेष्ठ चण्ट- कोहल, देवशर्मा, मौहल्य, ममसौरभ, यह और भार्गव नाम ब्रामण उम यज्ञ में होता था । कुकुत्म इनके मियाये यहुत से वेद के जानने वाले ब्राह्मण वा में उत्पन्न मिनि जी यह विद्वान और वृद्ध थे। उम यज्ञ के मदम्य थे ॥७॥१०॥ यह मामवेदी क्रान्विन थे. शांगरव जी ब्रह्मा और वह बड़े मपयन में ऋपियों के आहुति के गिन, कापि यजुर्वेदी ऋविन थे ||१|६|| डालने पर प्राणियों के भयदायी और भयानक सर्प पुग्न और शिष्यों के माथ न्याम जी महाराज, अपि में गिरने लगे । माँ की चर्बी से छोटी छोटी उहालक, ममनक, वेतकेतु, पिंगल, अगिन, देवल, नदिया उम अमिकुण्ट से बहने लगी । और उनके नारद, पर्वन, आंत्रय, कुण्ड, जठर, कालपट, यात्म्य, जलने का बड़ा घोर शब्द चारों दिशाओं में फल वो गन्धश्च ।

अध्याय ३] महामारन २५१ तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दरनिवेशनम् । गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम् ॥ १४ ॥ ततः सर्व यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः । अगच्छच्छरणं भीत आगस्कृत्वा पुरन्दरम् ॥ १५ ॥ तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक । भयं नागेन्द्र तस्माद्वै. सर्पसत्रात्कदाचन ॥ १६ ॥ प्रसादितो मया पूर्व तवार्थाय पितामहः । तस्मात्तव भयं नास्ति व्येतु ते मानसोज्वरः ॥ १७ ॥ मौतिम्वाच-एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः । उवास भवने तस्मिन्शक्रस्य मुदितः सुखी ॥ १८ ॥ अजस्त्रं निपतत्स्वग्नौ नागेपु भृशदुःखितः । अल्पशेपपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत ॥ १९ ॥ कमलं चाविशद्धोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम् । स चूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत् ॥ २० ॥ दह्यन्त्यङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति च । सीदामीब व संमोहात् घूर्णतीव च मे मनः ॥ २१ ॥ 'दृष्टिम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च । पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन्दी विभावसो ॥ २२ ॥ गया। गिरते हुए और आकाश में वर्तमान और और मैंने पहले ही तुम्हार लिय ब्रह्मा को प्रसन्न अग्नि में जलते हुओं का घोर शब्द सुनाई देने किया था, इम कारण तुमको किसी प्रकार का भय लगा । और माँ के राजा तक्षक ने जनमेजय को नहीं है । यह सुनकर तक्षक मुम्बपूर्वक इन्द्र के म्यान यज्ञ की दीक्षा में बैठे हुम मुनकर म्बर्ग में इन्द्र के में रहने लगा ॥१६॥१७॥ समीप गमन किया। इसके उपगन्न तक्षकनाग उग्रश्रवा बोले इसके उपरान्न मपों के बहुत ने अपना मब वृत्तान्न और अपगध इन्द्र में कहा, में जलन पर बामुकिनाग जिमका परिवार थोडा और इन्द्र की भग्ण ली ॥११॥१५॥ मा रह गया था, बंद करने लगा और अन्यन्त इन्द्र ने प्रसन्न होकर कहा कि, हे तक्षक ! भय को प्राप्त हुआ और हृदय कपिन वामुकि ने उम यम में तुमको किसी प्रकार का भय न होगा। अपना बहिन से कहा कि, हे मंद्र मेरे अंग महाभारत [ आदिपर्य यारीक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मजिघांसया । व्यक्तं मयाऽपि गन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम् ॥ २३ ॥ अयं स कालःसंप्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः । जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान्सबान्धवान् ॥ २४ ॥ आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे । प्रतिपेत्स्यति मां पूर्व स्वयमाह पितामहः ॥ २५ ॥ तद्वत्से हि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसंमतम् । ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ॥ २६ ॥ दनि श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मर्पमत्रेवासुकियाइये त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ जलते है, मुझको दिशा नहीं मुझती, मोह से आगया है जिमके लिये मैने तुमको जरत्कारु को अन्या हो रहा है और मेरा हृदय कापता इसलिये अब तुम अपने पुत्र को जो वेद मुझे कुछ दिखाई भी नहीं देता, हृदय फटा और वेदाग के जानकार है; बुलाकर हमारे कुटुम्ब जाता है और अब में परवा पराधीन हूं अवश्य महित रक्षा करो। हे मर्पनियों में श्रेष्ठ ! तुम्हारा ही उम जलनी हुई अग्नि में गिरुगा ॥१८॥२२॥ आस्तीक पुत्र उस यज्ञ को बन्द करा सकता है। जनमेजय का यह या हमारे मारने की इच्छा यह निश्चय है क्योंकि ब्रह्माजी ने यह बात मुझसे म हो रहा है, अवस्य में भी यमराज के स्थानों को पहले कही थी ॥२३॥२६॥ जाउगा। मेग बहिन ' अब यह वही समय आदिपर्य का त्रिपनयां अध्याय ममाम हुआ । दिया था, --- . अथ चतु पन्चामत्तमाध्याय ।।५४ ॥ मानितपाय तत आहृय -पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजङ्गमा । वासुके गगजम्य वचनादिदमब्रवीत ॥ १ ॥ अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः । कालः म चायं संप्राप्नम्नत्कुमात्र यथातथम ॥ २ ॥ ॥ गायनया अध्याय .." प्रया यांनी पापियो 'दामति की बहिन काम का समय अब आगया है। हम ममय में ने ने माई की बान गुना अन पुन नाम्नीर गुमका भी उगित कर्म करना चाहिये । यह सुनकर ६ गया और ममे 1 पुत्र : तुम्हार मामा भाग्नीक योग मर मामा ने तुमको क्यों में पिना मुमुनाको डिमान दिया था उम को दिया था और वह अव या काम जो मुझ अभ्याय-2 महामार न आम्तीक उवाच- -किनिमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे । तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्ताऽस्मि तत्तथा ॥ ३ ॥ सौतिग्याच-तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैपिणी । भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्लवा ॥ ४ ॥ जरत्कारवाच-पन्नगानामशेषाणां माता करिति श्रुता । तया शप्ता रुपितया सुता यस्मान्निबोध तत् ॥ ५ ॥ उच्चैःश्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिण्या न कृतो मम । विनतार्थाय पणिते दासभावाय पुत्रकाः ॥ ६ ॥ जनमेजयस्य वो यजे धन्यत्यनिलसारथिः । तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ ॥ ७ ॥ तां च शप्तवती देवः साक्षाल्लोकपितामहः । एवमस्त्विति तद वाक्यं प्रोवाचानुमुमोद च ॥ ८ ॥ वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तढा । अमृते मथिते तात देवाञ्च्छरणमीयिवान ॥ ९ ॥ सिद्धार्थाश्च सुराःसर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम् । भ्रातरं मे मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन ॥ १० ॥ ने ने प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसंभवम् । राजा वासुकिना साधं शापोऽसौ न भवेदिति ॥ ११ ॥ करना चाहिये । उग्रश्रया बोले-इसके उपरान्न अपन तुम यमलेक को जाओगे । माप देनी हुई उम कट्ट कुटुम्बियों का हित चाहने वाले जरत्कार ने शान्ति में सम्पूर्ण रोक के पितामह नद्या ने ऐसा ही होगा पूर्वक अपने पुत्र आम्ती से कहा-मपों की माता काकर उम वचन का अनुमोदन रिया ॥३॥ कट्ट ने अपने पुत्रों को आना न मानने के कारण इमके उपरान्त मेरे मामा मुकि ने उम वचन मे निम प्रकार यह भाप दिया था मो मुझमे मुन। को मनच अमृन के मथन ममय देवताओं की हे पुत्र 'उच श्रवा नाम अची के गना को पिनता गरण ग। और मिद्धप्रयोजन वारे मर देवता उत्तम मे गत दामीभाव में जो तुमने मेरे कहन से मिथ्या अमन को रेकर ने मामा को नमानी के पामरे न किरा इस कारण तुमा जनमेनय के यज्ञ में गये । मव देवताओं ने पानुषि के माथ नमानी अमि मम्म कंग्गा और यहा मृत्यु को प्राप्त होर को प्रमन्न किया कि, यह भाप मो की नगगे।

महाभारत [ आदिपर्य देथा ऊचु -वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो जातिकारणात् । अभिशापः समातुस्तु भगवन्न भवेत्कथम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मोवाच-जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्या समवाप्स्यति । तत्र जातो द्विजः शापान्माक्षयिष्यति पन्नगान् ॥ १३ ॥ एतच्छुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः । प्रादान्माममरप्रव्य तव पित्रे महात्मने ॥ १४ ॥ प्रागेवानागते काले तस्मात्त्वं मय्यजायथाः । अयं स कालः संप्राप्तो भयान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ १५ ॥ भ्रातरं चापि मे तस्मात्त्रातुमर्हसि पावकात् । न मोघं तु कृतं तत्स्याद्यदहं तव धीमते । पित्रे दत्ता विमोक्षार्थ कथं वा पुत्र मन्यसे ॥ १६ ॥ मीितन्याच-एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा साऽऽस्तीको मातरं तदा । अब्रवीदुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव ॥ १७ ॥ अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम । तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतदब्रवीमि ते ॥ १८ ॥ भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम् । प्रयतिष्ये तथा राजन्यथा श्रेयोभविष्यति ॥ १९ ॥ देवता बोले हे भगवन ' यह मपों का राजा वासुकि कुटुम्ब को उस यन की अग्नि से बचाओ और जानि के कारण अत्यन्त दुखी हैं। माना का माप उम निमित्त को पूरा करो, जिस निमित्त मेरा दान किमी प्रकार हमको न हो ॥१२॥ तुम्हारे पिता को हुआ था ॥१३॥१६॥ तब ब्रह्मानी ने कहा कि, यासुकि की बहिन यह सुनकर आम्तीक अपनी माता से बोरा जम्माम नाम जरत्कार प्रापि ही ग्रहण करेगा। उमम कि, बहुत अच्छा मैं ऐसा ही कमगा और फिर ओ पुत्र उत्तम होगा यह मतों के माप मे छुड़ायेगा। अपने मामा यामुाम से कहा कि, मैं तुमको शाप 7 पुर ' हम पारण में तुम्हार मामा ने मुझे तुम्हारे मे छुड़ाऊगा, तुम निश्चिन्त होकर यठो और भय यड़ नम्बी पिना जरकार को दिया था। अर को छोड़ दो। मैं कभी हमी में भी कुछ नहीं करता वही समय लागया राजा जनमेजय मर्पयन कर है। मेरे पह को तुम सन्य मानो। मै अभी जनमेजय गा। नु चाहिये कि, अपने मामा आदि के के पास जाना है और उसे अपनी वाणी द्वारा प्रमन्न kirasad अभ्याय '.४] महाभारत २." न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि ततोऽन्यथा । तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम् ॥ २० ॥ वाग्भिमङ्गलयुक्ताभिस्तोपयिष्येऽद्य मातुल । यथा स यज्ञो नृपतेर्निवर्तिप्यति तत्तम ॥ २१ ॥ स संभावय नागेन्द्र मयि सर्व महामते । न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ॥ २२ ॥ वासुकिन्वाच-आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीयते । दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः ॥ २१ ॥ आम्तार पाचन संतापस्त्वया कार्यः कथंचित्पन्नगोत्तम । प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम् ॥ २४ ॥ ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम् । नाशयिष्यामि माऽत्र त्वं भयं कापीः कथंचन ॥ २५ ॥ मौतिवाच-ततः स वासुकेोरमपनीय मनोचरम् । आधाय चात्मनोऽङ्गेपु जगाम त्वरितो भृशम् ॥ २६ ॥ जनमेजयस्य तं यजं सर्वेः समुदितं गुणैः । मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः ॥ २७ ॥ म गत्वापश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम् । वृतं सदस्यैवहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभः ॥ २८॥ करके उमका यन बट क्राता हु । वासुकि यह इमके उपगन्त उग्रश्रवा गोले ऐमा कहकर सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ मानो किमी ने जीपदान आम्तीक ने वासुकि के दुख की उमकी देह में दिया और यह गोरा कि, मेरा शरीर घूम रहा है उतार कर अपने शरीर पर ग्ब लिया, और मपी की हृदय फटा जाता है । मुझे ब्रह्मदण्ट की पीडा में रक्षा के स्यि वहा में गना जनमंनय के पाम चरें। दिगा दिखाई नहीं देती ह । यह सुनकर आम्नीक उमन जाकर रहे उत्तम यागाला को जो कि, मूर्य ने कहा कि, आप किसी प्रकार का भय और मनाप के ममान तेज बारे मदम्यों मे भरी हुई थी, दम्बा । न करें। मैं तुम्हारा भय दूर करके अग्नि के ममान यह उम या में प्रसंग करने की इच्ा वारा तपाची तेज गम्बने वाले महण्ट के ताप को नाग कगा आम्नीक यनगाग में प्रवेश करते समय द्वारपालो [॥१७॥२५॥ मे निषेध क्यिा हुआ यता की स्तुनि ऋग्ने रगा।

महाभार [ आदिपर्य स तत्र वारितो द्वाःस्थैः प्रविशन्द्विजसत्तमः । अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः ॥ २९ ॥ स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्टं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः । तुष्टाव राजानमनन्तकीर्तिमृत्विक्मदस्यांश्च तथैव चाग्निम् ॥ ३०॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मर्पमत्रेआस्तीकागमने चतु पञ्चाशत्तमोऽायः॥ ५४ ।। पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मणों मे उत्तम आम्तीक ने और सभासदो और ऋत्विज् और अग्नि की स्तुति यज्ञशाला के समीप जाकर अनन्त कीर्तिवाले राजा की ॥२६॥३०॥ आदिपर्व का चौवनवा अध्याय ममाप्त हुआ | अथ पञ्चपञ्चागत्तमोऽध्याय ॥ ५५ ॥ आम्तीक उवाच-सोमस्य यज्ञो वरुणस्य यजः प्रजापतेर्यज्ञ आसीत्प्रयागे । तथा यजोऽयं तव भारताग्य पारीक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ १ ॥ शक्रस्य यज्ञः शतसंख्य उक्तस्तथा परं तुल्यसंख्यं शतं वै । तथा यज्ञोऽयं तब भारताग्य पारीक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ २ ॥ यमस्य यज्ञो हरिमेधसश्च यथा यज्ञो रन्तिदेवस्य राजः । तथा यज्ञोऽयं तब भारताग्य पारीक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ३ ॥ गयस्य यज्ञः शशविन्दोश्च राज्ञो यज्ञस्तथा वैश्रवणस्य राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्य पारीक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ४ ॥ नृपस्य यज्ञस्त्वजमीढस्य चासीद्यथा यज्ञो दाशरथेश्च राज्ञः । तथा यज्ञोऽयं तव भाग्नाग्य पारीक्षित स्वस्ति नोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ५ ॥ । पचपनवा अध्याय ५५।। आम्नीक वाला है गजन ' नेग यह यजमा यना हुआ, हे जनमेजय ' 'वमा ही यह या सो है जैम पूर्वकाल में चन्द्रमा, बाण, प्रजापति आपके और हमारे प्रिया का कल्याण हो । यमराज का यश प्रयाग में हुआ था और हमारे और आपके गगनिन्दु राजा वैश्रवण का यज्ञ हुआ, हे जनमेजय ! पियों के लिये कल्याण हो । इन्द्र के मी यम को चैमा ही यह यज्ञ है मो आपके और हमार प्रिया है या उसग भी अधिक मी या गो गुने नथा का फण्याण हो ॥१॥ मा प्रकार जनमजय' नंग याह, हमारे और जमे नृग, अजमीद, दशरथ के पुत्र गमनंद्र आपक प्रियांचा अर्थ कल्याण हो। यम का यश, का यम हुआ है, है जनमेजय ! मा ही यह यश धिमकायम जिम प्रकार गजा गनिदेव का है। जंगर धर्मराज के पुत्र युधिष्ठिर राजा का यक्ष -- अयाय '..] महा मारत हुनभुक्कृष्णवर्मा । यज्ञः श्रुतो दिवि देवस्य सूनोर्युधिष्टिरस्याजमीटस्य राजः । तथा यज्ञोऽयं तव भारताग्य पारीक्षित वस्तिनोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ६ ॥ कृष्णस्य यनः सत्यवत्याः सुतस्य स्वयं च कर्म प्रचकार यत्र । तथा यनोऽयं तव भारताग्य पारीक्षित खस्तिनोऽस्तु प्रियेभ्यः ॥ ७ ॥ इमे च ते मूर्यसमानवर्चमः समासते वृत्रहणः क्रतुं यथा । नेपां जातुं विद्यते ज्ञानमय दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत्कदाचित् ॥ ८॥ ऋत्विक्सनो नास्ति लोकेषु चव हेपायनेनेति विनिश्चितं मे । एतस्य शिष्या हि क्षितिं संचरन्ति सर्वविजः कर्मसु स्वेषु दीक्षाः ॥ ९ ॥ विभावसुश्चित्रभानुमहात्मा हिरण्यरेता प्रदक्षिणावर्तशिखः प्रदीप्तो हव्यं तवेदं हुतभुग्वष्टि देवः ॥ १० ॥ नेह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके समो नृपः पालचिता प्रजानाम् । धृत्या च ते प्रीतमनाः सदाऽहं त्वं वा वरुणो धर्मराजो यमो वा ॥ ११ ॥ शक्रः साक्षाद्वज्रपाणियथेह त्राता लोकेऽस्मिंस्त्वं तथेह प्रजानाम् । मतस्त्वं नः पुरुपेन्द्रह लोके न च त्वदन्यो भूपतिरस्ति जने ॥ १० ॥ ग्बट्वागनाभागदिलीपकल्प ययातिमांधातृसमप्रभाव । आदित्यतेजः प्रतिमानतेजा भीष्मो तथा राजसि सुत्रतस्त्वम् ॥ १३ ॥ हुभा ह हे राजन् ' मा ही वह यन हुआ है। कि होन पदार्थ को प्रण करने वाला निमको नमे मत्यवती के पुत्र याम का यन हुआ जिनमें निग्यग्ना आर कृणवर्मा कहत है वर तो कि र म्वय कार्य करता था, हे जनमन 'बमा ही प्रदधिया बारायुक्त और प्रदीप्त होना हुआ यह न हुआ है । मे इन्द्र के या में विद्वान् हवि को तुम्हारी कामना कर रहा है । और तुम्हारे चंटे थे वमे इस यन में सूर्य के समान तेलम्बी मंठे ममान प्रापानक कोर्ट गना नर्ग है। तुम्गर है । टनको कुछ न जानना शेप नींह निनो धर्य में मेरा मन महर प्रमन्न रहता - । तुम वगण दिया हुआ न कभी न मरी होता ह आर वर धर्मगन वम वा माधान हार में वन यि हुपन्द्र ममार में कोई ऋतिन याम के नहा नहीं ह तम टम ममा नग्या करने हैन अगर तुन मुपका या निश्चय है हमारे गिय मार्ग प्रवी भी पृथ्वी की ग्या ग्ने हो। हे श्रेष्ठ में विचरने है तो कि, अपने कमें पार पग्गे लोक में तुम्गर मिपारे कोर्ट गना न हुआ आर माधन करने वाले कर्मों में चतुर है ।।.1॥ नीहमा मानना हु। हे बवाग नामाग महात्मा विचित्र कान्ति बाग यह पनि दर्गर महा बार यानि नापना के तुल्य गता . - महाभारत [ आदिपर्व वाल्मीकिवत्ते निभृतं स्ववीय वसिष्ठवत्ते नियतश्च कोपः । प्रभुत्वमिन्द्रत्वसमं मतं मे द्युतिश्च नारायणवद्विभाति ॥ १४ ॥ यमो यथा धर्मविनिश्चयज्ञः कृष्णो यथा सर्वगुणोपपन्नः । श्रियां निवासोऽसि यथा वसूनां निधानभूतोऽसि तथा क्रतूनाम् ॥ १५ ॥ दम्भोद्भवेनासि समो वलेन रामो यथा शास्त्रविदस्त्रविच्च । और्वत्रिताभ्यामास तुल्यतेजा दुष्प्रेक्षणीयोऽसि भगीरथेन ॥ १६ ॥ मोतिग्वाच-एवं स्तुताः सर्व एवप्रसन्ना राजा सदस्या ऋत्विजोहव्यवाहः । तेषां दृष्ट्वा भावितानीङ्गितानि प्रोवाच राजा जनमेजयोऽथ ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि मर्पसत्रेपश्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५५ ।। जनमेजय आदित्य के तेज के समान तेजयुक्त और भी तुम स्थान हो । तुम जरासिन्ध के समान बल- भीष्म के समान उत्तम व्रतों के धारण करने वाले वान् और परशुराम के समान शस्त्र और अम्त्र तुम भोमित होने हो। तुम वाल्मीक के समान परा विद्याओं के जानने वाले हो। और्वऋषि और त्रित श्रमी, वशिष्ठ के समान क्रोध को वश में करने वाले, के समान तेजम्बी हो । तुम भगीरथ के समान इन्द्र के समान प्रभुना के रखने वाले, नारायण के किसी से अपमान करने योग्य नहीं हो । इस प्रकार मगान कांनि वाले, यमराज के तुल्य धर्मचारी, कृष्ण स्तुति करने पर सब राजा सभासद् अग्नि और के ममान मम्पूर्ण गुणों से युक्त हो । जैसे अष्टसिद्धि ऋत्विज प्रसन्न हुए राजा ने सभासद् और उन तुम्हारे पाम नियाम करती है इस प्रकार यज्ञों के की मन की चेष्टाओं को देखकर कहा ॥१०११७] आदिपर्य या पचपनयां अध्याय ममाप्त हुआ ।। । - अथ पदपच्वागत्तमोऽध्याय ।। ५६ ॥ अमजग पाच- -चलोऽप्ययंस्थविर इवाव भापते नायं वालः स्थविरोऽयं मतो मे। इच्छाम्यहं धरमम्मै प्रदातुं तन्मे विप्राः संविदध्वं यथावत् ॥ १॥ गदाणा पु-यालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां विद्वान्यो वै स पुनर्व यथावत् । मर्यान्कामांस्त्वत्त मवाहतेऽद्य यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ॥ २॥ । एपनयां अध्याय ५६ ॥ जय पाल पर पारक वृद्धी पान, विग बोरे राजन् ! पालकमा मामण राजाभी पारनर आर या पार नहीं है इसका मत्तार करने के योग्य नार और जो विद्वान पद मानना और हम शादान देना चाहना ? यह ना गया सत्कार करने के योग्य है । मदिराय में मामा भाना? ! मदाय और या प्रामण गुगंग गए मनोरधी को पाने के योग्य अभ्याय ०६ ] म हा मारत मौतिम्बाच-व्याहतुकामे वरदे नृपे द्विजं वरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच । होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्मा कर्मण्यास्मिस्तक्षको नैति तावत् ॥३॥ जनमेजय उवाच-यथा चेदं कर्मसमाप्यते मे यथा च वै तक्षक एति शीघ्रम् । तथा भवन्तःप्रयतन्तु सर्वे परं शक्त्या स हि मे विद्विपाणः॥ ४ ॥ ऋत्विज उचु --यथा शस्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः इन्द्रस्य भवने राजस्तक्षको भयपीडितः ॥५॥ यथा सूतो लोहिताक्षो महात्मा पौराणिको वेदितवान्पुरस्तात् । स राजानं प्राह पृष्टस्तदानीं यथाहुर्विप्रास्तदेतन्नृदेव ॥ ६ ॥ युराणमागम्य ततो ब्रवीम्यहं दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन् । वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति ॥ ७ ॥ एतच्छुत्वा दीक्षितस्तप्यमान आस्ते होतारं चोदयन्कर्मकाले । होता च यत्तोऽस्याजुहावाथ मन्त्रैरथो महेन्द्र. स्वयमाजगाम ॥ ८ ॥ विमानमारुह्य महानुभावः सबर्देवैः परिसंस्तूयमानः । बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो विद्याधरैरप्सरसा गणैश्च ॥ ९ ॥ तस्योत्तरीये निहितः स नागो भयोद्विग्न. शर्म नैवाभ्यगच्छत् । ततो राजामन्त्रविदोऽब्रवीत्पुनः क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ॥ १० ॥ है। ऐसा कार्य हो निमसे तपक शीघ्र आये । महारमा सूत ने पहले ही राना से कहा था यह उमश्रवा बोले-यह सुनकर राना आम्तीक को वर ठीक है। तब राना-नै उम सूत को बुलाकर पूछा देने को ही था कि, इतने में होता ने कहा-इस और उसने कहा कि, तो कुछ यह ब्राह्मण कह रहे कर्म में नम तक तक्षक नहीं आता तब तक वरदान ह सो ठीक है । हे रानन् । तुममे मै पहरे क्ल्प न देना चाहिये । राना ननमेजय पोला-हे ब्राह्मणो की कथा को नानकर कहता ह कि, इन्द्र ने तमक अब ऐसा करो निसमें तक्षक आकर अग्नि में गिरे को वरदान दिया है कि, हे तवक ' तुम यहा मेरे और यह यन समाप्त हो क्याकि तबक ही मेरा पास निमर्य रहो और यहा पर भी प्रकार तुम्हारी शत्रु है ॥१४॥ रक्षा होगी आर अमि तमको नहीं जा सकेगा। झात्विन् गोले -हे महाराप ' हम लोग बहुत प्रकार से मत्र पढते है परतु तक नहीं आता है। यह सुनकर राना अत्यन्त दुखी हुआ और यह भय से पीडित होकर इन्द्ररोक को चला गया कर्म के समय होता को प्रेरणा करता हुआ वठा है। जैसे पुराण के जानने वारे रोहिताश नाम रहा आर होता भी मावधानता से मनों से होम |||७|| महाभारत [ आदिपर्व .. जनमेजय उवाच-इंद्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः । तमिन्द्रेणव साहितं पातयध्वं विभावसौ ॥ ११ ॥ सौनिम्बाच–जनमेजयेन राज्ञा तु नोदितस्तक्षकं प्रति । होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा ॥ १२ ॥ हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः ।.. आकाशे ददृशे चैव क्षणेन व्यथितस्तदा ॥ १३ ॥ पुरन्दरस्तु तं यजं दृष्ट्वोरुभयमाविशत् । हित्वा तु तक्षकं त्रस्तः स्वयमेव भवनं ययौ ॥ १४ ॥ इन्द्रे गते तु राजेन्द्र तक्षको भयमोहितः । मन्त्रशक्त्या पावकार्चिः समीपमवशो गतः ॥ १५ ॥ ऋत्विज उचु-वर्तते तव राजेन्द्र कमैतविधिवत्प्रभो । अस्मै तु द्विजमुग्न्याय वरं त्वं दातुमर्हसि ॥ १६ ॥ जनमेजय उवाच-बालाभिरूपस्य तवाप्रमेयं वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् । वृणीव यत्तेऽभिमतं हृदि स्थितं तत्ते प्रदास्याम्यपि चेददेयम् ॥ १७ ॥ प्रावित चु.-अयमायाति तूर्ण स तक्षकस्ते वशं नृप । श्रूयतेऽस्य महान्नादो नदतो भैरवं रवम् ॥ १८ ॥ करने लगा। इसके उपरान्त बड़ा प्रतापी, मब देवता भणमात्र में व्याकुल तक्षक आकाश में दिसाई निमकी स्तुति कर रहे है और बादल अप्सरा, दिया । दन्द्र को उस यज के देखते ही बड़ा भय विद्याधर जिमके पछि पीछे आते है यह इन्द्र म्बय प्राप्त हुआ और तक्षक को छोड़कर आप ब्याकुल आया। उसके उपरीय यन्त्र में भय म व्याकुल हो आकाश को चला गया । इन्द्र के चले जाने अपंग कल्याण को न देमना हुआ तक्षक था। पर तक्षक अत्यन्त भय से व्याकुल मत्र के पराधीन इसके उपरान्त राजा बामणो मे तक्षा के नाम मकी अग्नि के समीप आगया ।।८।१५।। करने की इच्छा मेमोधित होकर योग कि, है मलिन बोले-हे गजेन्द्र ! तुम्हारा यह यज्ञ प्रानगी नानी इन्द्र के वहा निर्णय होकर का का विधिपूर्वक हो रहा और इम पाहाण गता है, अब नुमगा उपाय करो कि, नक्षा को वरदान दो। हे ब्रामण पालक ! तुम अपनी गरिन इन्द्र का आपा न पाये दोनों को अग्नि में इन्छानुमार या मागो, म यही दगा । ऋधिम मागता का यह यान मुनकराता ने इन्द्र पील हे गजन! या तक्षक नीघ्र तर या होकर प: आवाहन दिया ना आगाम करने पर जग पाता है और उसका भयानक गड मुनाई AA अध्याय ५६] म हा मारन २११ नूनं मुक्तो वज्रभृता स नागो भ्रष्टो नाकान्मन्त्रविसस्तकायः । घूर्णन्नाकाशे नष्टसंज्ञोऽभ्युपैति तीब्रान्निःश्वासान्निःश्वसन्पन्नगेन्द्रः ॥ १९ ॥ मोतिम्वाच-पतिप्यमाणे -नागेन्द्रे नक्षके जातवेदसि । इदमन्तरमित्येवं तदाऽऽस्तीकोऽभ्यचोदयत् ॥ २० ॥ आम्नीक याच -वरं ददासि चेन्मह्यं वृणोमि जनमेजय । सनं ते विरमवेतन्न पतेयुरिहोरगाः ॥ २१ ॥ एवमुक्तस्दा तेन ब्रह्मन्पारीक्षितस्तु सः । नातिहष्टमनाश्चेदमास्तीकं वाक्यमब्रवीत् ॥ २२ ॥ सुवर्ण रजतं गाश्च यच्चान्यन्मन्यसे विभो । तत्ते दद्यां वरं विष न निवर्तेत्क्रतुर्मम ॥ २३ ॥ आम्नीक उवाच- सुवर्ण रजतं गाश्च न त्वां राजन्वृणोम्यहम् । सत्रं ते विग्मत्वेतत्स्वस्ति मातृकुलस्य नः ॥ २४ ॥ मौनिस्वाच-आस्तीकनैवमुक्तस्तु राजा पारीक्षितस्तदा । पुनः पुनस्वाचेदमास्तीकं वदतां वरः ॥ २५॥ अन्य वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम । अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भृगुनन्दन ॥ २६ ॥ ततो वेदविदस्तात सदस्याः सर्व एव तम् । गजानमूचुः महिता लभनां ब्राह्मणो वरम् ॥ २७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आम्नास्वरप्रदाननाम पट्पश्चागत्तमोऽध्याय ॥५६॥ दे रहा है । इन्द्र के छोड जाने मे विकत मून्नि टम प्रकार उसके कहने पर जनमेजय द बित और घुमेर बाखाकर ऊचे श्वाम लेना है । उग्रश्रया हो आम्नीक में यह वचन बोग-हे ब्राह्मण : सुवर्ण बोले- ऋषियो' जब आम्नीक ने देखा कि. चान्दी और जा कुछ तुम लना चाहर्ने हो मो मत्र- नक्षक अग्नि के समीप आपहुचा है घोडा ही अन्तर कुछ तुमको देना ह, परन्तु यह यन ममाप्त नगट्ये । है तब वर जनमजय मे योग कि, आपने जो वर नाम्नीक बोग-हे गजन् ! सुवर्ण. चाटी, गऊप देने में कहा था मा दीजिये, कि तुम्हाग यह मर्प- कुछ नहीं लेना चाहता चल आपके यज्ञ की ममाप्ति मत्र यन अब ममात हो और हम ममय में पीछे चारता है | आम्नीक के ऐमा करने पर जनजय इसम कोर्ट म न गिरे ॥१६॥२१॥ ने बार बार उसमे कहा कि, हे ब्राह्मण ! तुम्हाग म हा भारत ! आदिपर्व भला हो, तुम और कुछ वर मांगो । हे शौनक ! | सर्पसत्र यज्ञ को बन्द करो। उनकी बात सुनकर आस्तीक ने इस वर के सिवाय और कुछ न मांगा। राजा ने ब्राह्मण को वर दिया और सर्पयज को इसके उपरान्त सब सदस्य और ऋत्विज बोले कि, समाप्त किया ॥२२॥२७॥ हे राजन् ! अब कुछ चिंता न करो, वर दो और आदिपर्व का छप्पनवां अध्याय समाप्त हुआ ॥ " अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५७ ॥ शौनक उवाच-ये सर्पाः सर्पसत्रेऽस्मिन्पतिता हव्यवाहने । तेषां नामानि सर्वेषां श्रोतुमिच्छामि सूतज ॥ १ ॥ सौतिम्वाच-सहस्राणि वन्यस्मिन्प्रयुतान्यर्बुदानि च । न शक्यं परिसंख्यातुं बहुत्वाविजसत्तम ॥ २ ॥ यथास्मृति तु नामानि पन्नगानां निवोध मे । उच्यमानानि मुख्यानां हुतानां जातवेदसि ॥ ३ ॥ वासुके कुलजातांस्तु प्राधान्येन निवोध मे । नीलरक्तान्सितान्घोरान्महाकायान्विषोल्वणान् ॥ ४ ॥ अवशान्मातृवाग्दण्डपीडितान्कृपणान्हुतान् कोटिशो मानसः पूर्णः शलः पालो हलीमकः ॥ ५ ॥ पिच्छलः कोणपश्चक्रः कालवेग प्रकालनः । हिरण्यवाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः ॥ ६ ॥ एते वासुकिजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहने । अन्ये च बहवो वित्र तथा वै कुलसंभवाः । ॥ मत्तावनवा अध्याय ५७ ॥ शौनक बोले-हे मनपुत्र ! जो सर्प इस यज्ञ नाम यह है । वासुकि के कुल में उत्पन्न जो प्रधान में भग्म हुए, उन सबों के नाम सुनने की में इच्छा प्रधान और नीले, लाल, सफेद, पड़ी देह वाले भया- परता । । उमश्रवा बोले-उग यश में तो अवों नक विषयुक्त जो सर्प हैं उनके नाम सुनो । जो कि म सभी अधिक अमाच्य सर्प गिरकर भम्म हो माना के शाप से दीन परवश होकर कोड़ों अग्नि गंप, रग मयंक नामों को नहीं यह मरना ह, में भम्म हो गये । कोटिश, मानस, पूर्ण, शल, पाल, पान्तु उम में जले हुए गुण्य मुग्व्य मों के हनीमर, पिच्छल, कोणेय, चक्र, कालयेग, प्रकारन, :

अध्याय ५७ ] म हा भारत प्रदीप्ताग्नौहुताः सर्वे घोररूपा महाबलाः ॥ ७ ॥ तक्षकस्य कुले जातान्प्रवक्ष्यामि निवोध तान् । पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डलेका रमेणकः ॥ ८ ॥ उच्छिखः शरभो भो विल्वतेजा विरोहणः । शिलीशलकरोमूकः सुकुमारः प्रवेपनः ॥ ९ ॥ मुद्गरः शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनुः । एते तक्षकजानागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम् ॥ १० ॥ पारावतः पारियातः पाण्डरो हरिणः कृशः । विहङ्गः शरभो मेदः प्रमोदः संहतापनः ॥ ११ ॥ ऐरावतकुलादेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् । कौरव्यकुलजान्नागाञ्च्छृणु मे त्वं द्विजोत्तम ॥ १२ ॥ एरकः कुण्डलो वेणी वेणीस्कन्धः कुमारकः । वाहुकः शृङ्गवेरश्च धूर्तकः प्रातरातको ॥ १३ ॥ कौरव्यकुलजास्त्वेते प्रविष्टा हव्यवाहनम् । धृतराष्ट्रकुले जाताञ्च्छृणु नागान्यथातथम् ॥ १४ ॥ कीर्त्यमानान्मया ब्रह्मन्वातवेगान्विपोल्वणान् । शङ्कुकर्णः पिठरकः कुठारमुखसेचंकौ ॥ १५ ॥ हिरण्यवाहु, गरण, कक्षक, कालदन्तक, यह सर्प नागों के प्रधान नामों को कहता हूं | पारावत, वासुकि के कुलोत्पन्न अग्नि में भम्म हुए और हे पारियात, पाण्डर, हरिण, कृश, विहंग, शरम, मेद, गौनक ! और भी बहुत से उत्तम कुल वाले प्रदीप्त प्रमोद, संहतापन, ये ऐरावत के कुल के मर्प अग्नि अग्नि में मम्म हुए. ॥१७|| में नष्ट हुए। अब कौरव्यनाग के कुल के मुख्य तक्षक कुल के सपों के नाम कहता हूं । पुच्छ, मुम्न्य मों के नाम कहता हूं । एरक, कुंडल, वेणी, आण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्त, आरभेगक, उच्छिख, वेणीम्कन्द, कुमारक, वाहुक, शृंगवेर, धूर्तक, प्रात, शरभं, भा, विल्वतेजा, विरोहण, मिली, गलकर, आतक, ये कौरव्य कुल के सर्प अमि में भम्म हुए । मूक, मुकुमार, प्रवेपन, मुद्गर, शिगुरोमा, मुरोमा, ' अब धृतराष्ट्र के कुल में उत्पन्न जो कि, वायु की महाहनु, ये तक्षक के कुल में उत्पन्न सर्प अग्नि- गति के समान चलने वाले और बड़े विषयुक्त सर्प कुण्ड में मम्म हुए । अब ऐरावत सर्प के वंश के है उनको में यथार्थ रीति से कहता हूं। मंजुकरण, महाभारत [ आदिपर्व पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहासः शकुनिर्दरिः । अमाहठः कामठकः सुपेसनो मानसोऽव्ययः ॥ १६ ॥ भैरवो मुण्डवेदाङ्ग पिशङ्गश्चोद्रपारकः । ऋपभो वेगवान्नागः पिण्डारकमहाहनू ॥ १७ ॥ रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धपटवासको । वराहको वीरणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ॥ १८॥ पराशरस्तरुणको मणिः स्कन्धस्तथाऽरुणिः । इति नागा मया ब्रह्मन्कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ॥ १९ ॥ प्राधान्येन बहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः । एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च संततिः ॥ २० न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः । त्रिशीर्पाः सप्तशीर्षाश्च दशशीर्यास्तथाऽपरे ॥ २१ ॥ कालानलविपा घोरा हुताः शतसहस्रशः । महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्याः ॥ २२ ॥ योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः । कामरूपाः कामवला दीप्तानलविपोल्बणाः ॥ २३ ॥ दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपीडिताः ॥ २४ ॥ पनि श्रीमन्मााभारने आदिपर्वणि आस्लीयपर्वणि सर्पनामकथने मप्नपञ्चागत्तमोऽध्याय ।। '५७ ॥ (स्टरक, सुटार, सम्पमेनक, पूर्णगद, पूर्णमुरर, महास, की सन्तान जो कि, अग्नि में भस्म हो गय है वह गनिर्दरि,अमाहट, कामठक, मुषेण,मानम, अव्यय, गिनने में नहीं आसकते हैं । किमी के तीन, किसी भग्य, मुण्डयदाग, विग, उद्रपारक, सयम, अंग 7.मात और किमी के दश गिर थे। यह मर्प यान, विण्डारक, महाहनु, रक्ताग, मांगारंग, ममृद्ध, प्रलय की अमि के ममान विप वाले भयानक हमारी पदशागर, वाहक, चारपाक, नाचित्र, चित्रयगिक, मृत्यु को प्राप्त हो गये । यह बड़ी देह वाले और पगार, नाक, मणि, मन्ध और अगणि, यंग यारे ऊचे पहाड़ों के निस्वरों के समान थे। Enातिक पदाने या यहां मुग्य गुग्य कोई एक योजन और कोई दो योजन राय थे जनमगे कर दिये और साल में मर यह हतार गुताविक रुप बनाने वाले और छा कानही पाना । इनर्श मन्नान और मन्नान मा यल याग, अशक ममान नजम्धी, पर विपर -- अध्याय ..] म हा मारन उस बड़े सर्पयन में माता के शाप में पीड़ित भम्म हो गये ॥८॥२४॥ आदिपर्व का मत्तावनवां अध्याय ममाप्त हुआ । अय अपञ्चामत्तमोध्याय ।। ५८ ॥ सौतिम्वाच-इदमत्यद्भुतं चान्यदास्तीकस्यानुशुश्रुम । तथा वरैश्छन्द्यमाने राजा पारीक्षितेन हि ॥ १ ॥ इन्द्रहस्तान्च्युतो नागः ख एव यदतिष्टत । ततश्चिन्तापरो राजा बभूव जनमेजयः ॥ २ ॥ हूयमाने भृशं दीसे विधिवद्वसुरेतसि । न स्म स प्रापतद्वह्नों तक्षको भयपीडितः ॥ ३ ॥ शौनक उवाच-किं सूत तेषां विप्राणां मन्त्रमामो मनीषिणाम् । न प्रत्यभात्तदाऽग्नो यत्स पपात न तक्षकः ॥ ४ ॥ मौतिरुवाच-तमिन्द्रहस्ताद्वित्रस्तं विसंज्ञं पन्नगोत्तमम् । आस्तीकस्तिष्ठतिष्टेति वाचस्तिस्रोऽभ्युदैरयत् ॥ ५ ॥ वितस्थे सोऽन्तरिक्षे च हृदयेन विदूयता । यथा तिष्टति वै कश्चित्वं च गो चान्तरा नरः ॥ ६ ॥ ततो राजाऽब्रवीद्वाक्यं सदस्यैश्चोदितो भृशम् । कासमेतद्वत्तेवं यथाऽऽस्तीकस्य भाषितम् ॥ ७ ॥ समाप्यतामिदं कर्म पन्नगाः सन्त्वनामयाः । प्रीयतामयमास्तीकः सत्यं सूतवचोऽस्तु तत् ॥ ८ ॥ ॥ अट्ठावनवां अध्याय ५८ ॥ उग्रश्रवा यौने हे ऋषियो ! आम्तीक ने एक है। यह मुनकर शौनक ऋषि ने पूछा कि, हे और अदमुन बात की वह भी सुनो । इन्द्र आम्नीक मूतपुत्र ! क्या ब्रामण मंत्रविधि मृल गये थे जिसमे का वर मिलने में देरी देवर भय ने तक्षक को ऐना हुआ । सुनपुत्र बोर नहीं, जब आम्नीक ने छोड़कर चले गये और बी देर हो गई परस्नु देवा कि, तक्षक अनि में गिरना चाहता है तब तीन तलक अग्नि में नहीं गिग । तब राजा के मनमें वर "निष्ठ तिष्ठ अर्यान् टहर जाओ न्हा था वही चिंता यह हुई कि, मंत्र मे आवाहन करने पर इन कारण वह तनक दुन्विन हृदय के भी तक म्वर्ग मे अन्निकुड में क्यों नहीं गिरता आकाश में स्थित हो गया मे कोई आकाम व माथ महाभारत [ मादिपर्य ततो हलहलाशब्दः प्रीतिदः समजायत । आस्तीकस्य वरे दत्ते तथैवोपरराम च ॥ ९ ॥ स यज्ञः पाण्डवेयस्य राज्ञः पारीक्षितस्य ह । प्रीतिमांश्चाभवद्राजा भारतो जनमेजयः ॥ १० ॥ ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो ये तत्रासन्समागताः । तेभ्यश्च प्रददौ वित्तं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ११ ॥ लोहिताक्षाय सूताय तथास्थपतये विभुः । येनोक्तं तस्य तत्राये सर्पसत्रनिवर्तने ।। १२ ।। निमित्तं ब्राह्मण इति तस्मै वित्तं ददौ बहु । दत्वा द्रव्यं यथा न्यायं भोजनाच्छादनान्वितम् ॥ १३ ॥ प्रीतस्तस्मै नरपतिरप्रमेयपराक्रमः । ततश्चकाराव भृशं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १४ ॥ आस्तीकं प्रेषयामास गृहानेव सुसंस्कृतम् । राजा प्रीतमनाः प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम् ॥ १५ ॥ पुनरागमनं कार्यमिति चैनं वचोत्रवीत् । भविष्यसि सदस्यो मे वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ १६ ॥ पृथ्वी के मध्य में सडा रहे । तब राजा जनमेजय यह यज्ञ एक ब्राह्मण के कारण से निवृत्त होगा, सभासदों की प्रेरणा से यह वचन बोला कि, जो वन्न भोजन और धन देकर विदा किया । भोजन कुछ आम्तीक ने कहा है, वह उसी प्रकार हो । यह और वस्त्रादि द्वारा यथायोग्य धन देकर उस पर यन समाप्त किया जाये और मों का कल्याण हो प्रसन्न हुआ। रडे पराक्रम गाले जनमेजय ने शास्त्र और यह आम्नीक प्रमन्न होये । मृत का वचन सत्य विधि से यज्ञान्त म्नान किया ॥११॥१४॥ हो। यह वरदान देने पर या समाप्त हुआ । राजा उस बुद्धिमान् प्रसन्नचित्त आम्तीक को बहुतसा प्रसन्न हुआ और बड़े आनन्द के देने वाला कोला सन्मान करके विदा किया और कहा कि, आप रल हुआ ॥१०॥ फिरभी कृपा कीजियेगा। मै बड़ा अश्वमेधयज्ञ करुगा, उग्रश्रवा योले राजा जनमेजय ने सब ऋविन उस यज्ञ में आप मेरे बड़े सभासद बनोगे । आम्तीक और मदम्यों को बहुतमा धन देकर उनका मन्मान अपना काम साध, राजा को प्रसन्न कर बहुत अच्छा किया और उम लोहिताक्ष सूनको जो कि फागगर ऐमा कहकर वहा से चल दिया । अपनी माता और था, जिसने यशष्ट बनाते समय यह कहा था कि, मामा वासुकि के समीप जाकर सब वृत्तांत विस्तार- अध्याय ५८] महाभारत तथेत्युक्त्वा प्रदुबाव तदाऽऽस्तीको मुदायुतः । कृत्वास्वकार्यमतुलं तोपयित्वा च पार्थिवम् ॥ १७ ॥ स गत्वा परमप्रीतो मातुलं मातरं च ताम् । अभिगम्योपसंगृह्य तथावृत्तं न्यवेदयत् ॥१८॥ मौतिम्बाच-एतच्छ्रुत्वा प्रीयमाणाः समेता ये तत्रासन्पन्नगा वीनमोहाः । आस्तीके वै प्रीतिमन्तो बभूवुरूचुश्चेनं वरमिष्टं वृणीष्व ॥१९॥ भूयो भूयः भवंशस्तेऽत्रुबस्तं किं ते प्रियं करवामाद्य विद्वन् । प्रीता वयं मोक्षिताश्चैव सर्वे कामं किं ने करवामाद्य वत्स ॥२०॥ आम्नीक उवाच-सायंघातर्ये प्रसन्नात्मरूपा लोके विप्रा मानवा ये परेऽपि । धर्माग्न्यानंये पठेयुर्ममेदं तेपां युग्मन्नेव किंचिद्यं स्यात् ॥ २१ ॥ नैश्चाप्युक्तो भागिनेयः प्रसन्नरेतत्सत्यं काममेवं वरं ते । प्रीत्या युक्ताः कामितं सर्वशस्ते कर्तारःम्म प्रवणा भागिनेय ॥२२॥ असितं चार्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् । दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्य सर्पभयं भवेत् ॥ २३ ।। यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारी महायशाः । आम्तीकः सर्पमत्रे वः पन्नगान्योऽभ्यरक्षत । नं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ ॥ २४ ॥ पूर्वक कहा । उग्रश्नवा बोले–मारे वृत्तान्न को सुन- मों ने प्रसन्न होकर कहा कि, तुम्हाग यह वरदान कर जो मर्प यदा एकत्रित थे मर रहुत प्रसन्न हुए. मत्य होवे । प्रीतियुक्त और नम्र होकर हम तुम्हारी और आम्नीक मे बोरे मि.जो वर मांगोगे मो हम इन्छा को पूर्ण केंगे। जो पुरुष अमिन और अनि- देवगे ॥१९॥ मन्न और सुनीथ नागे को दिन या गत्रि में स्मरण व मर मर्प बार बार उसमे न गमिकंगा उमगे माका भय न होगा ॥ १२॥ है विद्वान् : हम तुम्हाग क्या प्रिय कार्य क। जो मनुष्य का पिता और जगकार माना हम मवको नृमने वही आपत्ति ने हटाया है । है में उत्पन्न हुए आर पंडे यगवाने. नाम्नीक को पुन ! कहो. अन क्या तुम्हाग अर्थ है जिनकी जिनने मायन में मों की रक्षा की मगन कंगा हन । आम्नी बोर-जो ब्राझा अथवा और और घटना कि.हे बडे माग वारे ना मुझको मनुष्य इम में चरित्र को मायकार और प्रात मत मागे । और है यह विष यान नपं :तुन या में कार प उनमें नुमने कुछ भी भय न हो । उन चन नामी और नुन्गरा मग हो । उनन्जय के .. ! -- महाभारत [ आदिपव सापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविप । जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर ॥ २५ ॥ आस्तीकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते । शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा ॥ २६ ॥ सौतिग्पाच-सएवमुक्तस्तु तदा द्विजेन्द्रः समागतैस्तैर्भुजगेन्द्रमुस्यैः । संप्राप्य प्रीतिं विपुलां महात्मा ततो मनो गमनायाथ दधे ॥ २७ ॥ मोक्षयित्वा तु भुजगान्सर्पसत्राद्विजोत्तमः । जगाम काले धर्मात्मा दिष्टान्तं पुत्रपौत्रवान् ॥ २८ ॥ इत्याख्यानं मयाऽऽस्तीकं यथावत्तव कीर्तितम् । यत्कीर्तयित्वा सर्पेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २९ ॥ सौतिग्वाच-यथा कथितवान्ब्रह्मन्प्रमतिः पूर्वजस्तव । पुत्राय रुरवे प्रीतः पृच्छते भार्गवोत्तम ॥ ३० ॥ यद्वाक्यं श्रुतवांश्चाहं तथा च कथितं मया । आस्तीकस्य कवेर्विप्र श्रीमच्चरितमादितः ॥ ३१ ॥ श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम् । यन्मांत्वं पृष्टवान्ब्रह्मञ्च्छ्रुत्वा डुण्डुभभाषितम् । व्येतु ते सुमहद्ब्रह्मन्कौतूहलमरिंदम ॥ ३२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि आस्तीपर्वणि सर्पमरे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्याय ॥ ५८ ॥ यन के उपरान्त आम्तीक के वचन को यादर, हो परलोक को सिधार गये । इस प्रकार यथार्थ आम्तीक के वाक्य को सुनकर जो सर्प न लाट तो रीति से मैने आस्तीक का आग्न्यान तुम्होर आगे उस सर्प के गिर के सौ टुकड़े हा जाते है, जैसे कह दिया है, जिसका कीर्तन करने से सपों का गिध के पर हो जाते है ॥२४॥२६॥ कभी भय नहीं रहता । उग्रश्रवा बोले-हे शौनक । उग्रश्रवा बोरे इस प्रकार सब मां में श्रेष्ठ इम स्था को प्रमिति नाम भार्गव ने जैसे अपने मुम्य सा मे "सा कहने पर आम्तीक ने रडी पुत्र रर को सुनाया था यही मैने तुमसे भी रहा ममनना को प्राप्त हो वहा मे नाने का मन में विचार है । यह वही आम्ती की क्या है जो डुडुभसर्प किया । उम वादाण ने मर्पया में सों को छुड़ा ने कही थी और उसके सुनने को आपने मुझसे पर और मायके आने पर पुत्र और पीनों मे युक्त रहा था ॥२७॥३-11 आदिपर्य पा अट्ठावना अध्याय समाप्त हुआ | अध्याय ५१ ] म हा भारत गौनक वाच- अथ एकोनपष्टिनमा ध्याय ॥ ५९॥ गानक उवाच-भृगुवंशात्प्रभृत्येव त्वया मे कीर्तितं महत् । आख्यान मखिलं तातसौते प्रीतोऽस्मि तेन ते ॥ १ ॥ वक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत्सूतनन्दन । याः कथा व्याससंपन्नास्ताश्च भूयो विचश्व मे ॥ २ ॥ तस्मिन्परमदुप्पारे सर्पमत्रे महात्मनाम् । कर्मान्तरेषु यज्ञस्य सदस्यानां तथाऽध्वरे ॥ ३ ॥ या बभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम् । त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सोते त्वं वै प्रचक्ष्व नः ॥ 2 ॥ मोतिग्याच कर्मान्तरेण्वकथयन्द्विजा वेदाश्रयाः कथाः । व्यासस्त्वकथयच्चित्रमान्यानं भारतं महत ॥ ५ ॥ -महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम् । जनमजयन पृष्टः सन्कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ ६ ॥ ' श्रावयामास विधिवत्तदा कर्मान्तरे तु सः । तामहं विधिवत्पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वे कथाम् ॥ ७ ॥ मनःसागरसंभूतां महावितात्मनः । कथयम्ब सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम ॥ ८॥ ॥ उनमठवां अध्याय ५९ !! गौनक बोल-ह मूतपुत्र : भृगुवंग की मब कथाएं कही थी, उनमें व्यासजी ने महामारत नामक कथा सुनकर हम तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हुए है। विचित्र आम्यान को तिन किया था फिर है मृतपुत्र ! जो कथा व्यास जी ने कही है मानम याने पाण्टवा के यशरा याने दाग उमको यथावन कीर्तन करो । उम बई भारी गना महामाग्न का आम्बान है, निमकी उनमंत्रय के जनमेजय के मरमत्र यन में महात्मा मदम्यों के पन पर व्यामजी ने विधिपूर्वक मनाया था । हे अवमर के समय जिन जिन विषयों में जो आश्चर्य मूनपुत्र : उम पवित्र कथा को विधि के अनुसार क्या हुई थी, वह मब तुम्हारे मुख मे श्रवण मुनना चाहता है। माधुओं में श्रेष्ट ! उम शुद्ध करना चाहते है । हे मात : तुम वह नब हममे आन्मा यांन न्याम मनपा समुद्र में उगन और कहो । उग्रश्रवा बोने-मर्पयंत्र यन के अवसर के मम्पूर्ण ग्न्नों में मर्ग दुई टम महामारन की कथा समय ब्राह्मणों ने वेट आश्रययुक्त अनेक प्रकार की कोदो, अभी नक हमाग सुनने की इच्छा निवृत्त २७० महाभारत [ आदिप - । मौतिश्याच-हन्त ते कथयिष्यामि महदाम्यानमुत्तमम । कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः ॥ ९ ॥ शृणु सर्वमशेपेण कश्यमानं मया 'द्विज । शंसितुं तन्महान्हपों ममापीह प्रवर्तते ॥ १० ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीपर्वणि अगावतरणपर्वाण स्थानुनधेण्कानपष्टितमोऽध्याय ॥ ५९॥ न होने के कारण तृप्ति नहीं हुई है। उग्रश्रया कहूगा। है ब्राह्मण ' मैं नाना प्रकार से कहता हू बोले--आपके समीप यासजी के कहे हुए महाभारत तुम श्रवण करो, इसके कहने से मरा मन अति नामक अति श्रेष्ठ आख्यान को आदि से अन्त तक प्रसन्न होता है ॥६॥२०॥ आदिपर्व का उनमठवा अध्याय ममाप्त हुआ। अथ पष्टितमोऽध्याय ॥ ६॥ मोनिग्याच-श्रुत्वा तु सर्पमत्राय दीक्षितं जनमेजयम् । अभ्यगच्छदृषिविद्वान्कृष्णद्वैपायनस्तदा जनयामास यं काली शक्तेः पुत्रात्पराशरात् । कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ॥ २ ॥ जातमात्रश्च यः सद्य इष्टया देहमवीवृधत । वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्सेतिहासान्महायशाः ॥ ३ ॥ यन्नति तपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च । न बोंपवासैश्च न प्रसूत्या न मन्युना ॥ ४ ॥ विव्यासकं चतुर्धा यो वेद वेदविदां वरः । परावग्जो ब्रह्मर्पिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ॥ ५ ॥ ॥ साठा अध्याय ६०॥ उग्रश्रा बोले । मपिया 'मएमत्र या बटा लिया और बिना वेद पटे अथवा तपम्या क्यि लिय दीपा रिय हुए ननमजय को मुनकर विद्वान मब वदागों में पार हो गये । जो वस्तु तपस्या, वेद याममरि यहां गये । नो व्यामना मगराज के पढ़ने व्रता, उपपासा, उत्तम कुर में जन्म होने, पगमा मुनि में यमुना के दीप म मत्यरती माना या करने में नहीं प्राप्त हो सकती उस आत्मविद्या कमार अगम्या म उत्पन । उम महायग को भा उन्हाने जान रिया ॥११॥ यार व्यामजी ने उत्पन्न होते है। अपनी देह का “यासजी सगुण, निर्गुण ब्रह्म जानने वारे - अध्याय ६० ] महाभारत यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं. च विदुरं चाप्यजीजनत् । शान्तनो सन्तति तन्वन्पुण्यकीर्तिर्महायशाः ॥ ६ ॥ जनमेजयस्य राजर्षेः स महात्मा सदस्तथा । विवेश सहितः शिष्यैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ७ ॥ तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजयम् । वृतं सदस्यैर्वहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ॥ ८॥ तथा मूर्धाभिषिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः । ऋत्विम्भिब्रह्मकल्पैश्च कुशलैयज्ञसंस्तरे ॥ ९ ॥ जनमेजयस्तु राजर्पिदृष्ट्वा तमृपिमागतम् । सगणोऽभ्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ॥ १० ॥ काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमतः प्रभुः । आसनं कल्पयामास यथा शक्रो बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणप्यूजितम् । पूजयामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ पाद्यमाचमनीयं च अयं गां च विधानतः । पितामहाय कृष्णाय तदर्हाय न्यवेदयत् ॥ १३ ॥ प्रतिगृह्य तु तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजयात् । गां चैव समनुजाप्य व्यासः प्रीतोऽभवत्तदा ॥ १४ ॥ ब्रह्मऋषि कवि सत्यवत और पवित्र थे। उन्होंने ही शीघ्र मंत्रियों सहित खडा होकर सुवर्ण जटित आसन वेद के चार भाग किये और जिसने पाण्डु, धृतराष्ट्र दिया जैसे इन्द्र वृहम्पति को आमन देते है ।।५।११।। और विदुर को पैदा किया और जिम पवित्र कीर्ति, श्रेष्ठ गजा जनमेजय ने उम आसन पर चैट बड़े यसवाल ने मान्तनु वंग की वृद्धि की, उन्ही हुग देवताओं गे पृजित व्यामजी का शाम्ब की महात्मा'न बंद चंदाङ्ग में पण्डित गिप्यों के माथ विधि से पूजन किया । पाद्य, आचमन, अर्घ्य, गौ, राजर्षि जनमेजय के सभा मण्डप में प्रवेश किया। पूजा के अधिकारी व्यामपितामह के अर्पण किया। जहा राजा जनमेजय बड़े बड़े ब्रह्मकल्प मदम्यों के पाण्डव जनमेजय ने उम पूजा को प्रसन्ननापूर्वक बीन में ऐसे बैठा था जैसे देवताओं में इन्द्र। उम ग्रहण किया और नम्रतापूर्वक कुशल पूछी । भग- ऋपि को आया हुआ देखकर राजर्पि जनमेजय ने वान् व्यामजी ने भी राजा से कुगल कहकर सय [ आदिपर्व म दाभार तथा च पूजयित्वा तं प्रणयात्प्रेपितामहम् । उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ १५ ।। भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य. च । सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यान्प्रत्यपूजयत् ॥ १६ ॥ ततस्तु सहितः सर्वैः सर्वैः सदस्यैर्जनमेजयः । इदं पश्चाद् द्विजश्रेष्टं पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ॥ १७॥" जनमेजय उवाच-कुरूणां पाण्डवानां च भवान्प्रत्यक्षदर्शिवान् । तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ॥१८॥ कथं समभवद्भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तञ्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ॥ १९ ॥ पितामहानां सर्वेषां देवेनानिष्टचेतसाम् । कास्न्येनैतन्ममाचक्ष्व यथावृत्तं द्विजोत्तम ॥ २० ॥ सौतिग्याच-तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा । शशास शिष्यमासीनं । वैशम्पायनमन्तिके ॥ २१ ॥ व्याम उवाच-कुरूणां पाण्डवानां च यथा भेदोऽभवत्पुरा । तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ॥ २२ ॥ गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्पभस्तदा । আন্তৰ ततः सर्वमितिहास पुरातनम् ॥ २३ ॥ राजे तस्मै सदस्येभ्यः पार्थिवेभ्यश्च सर्वशः । सदम्यों के प्रति पूजा की । इसके पश्चात् राजा गई थी ऐसे पितामहों के सम्पूर्ण युद्ध का वृत्तान्त जनमेजय ने हाथ जोडकर न्यामजी से प्रश्न किया। आपसे मुनना चाहता हू। उग्रश्रवा बोले-इस जनमेजय ने कहा-आपने कुरु और पाण्डवों के प्रकार राजा के वचन सुनकर व्यासजी ने अपने चत्रिों को देखा है कृपा करके उनकी कथा कहिये वैशम्पायन शिष्य को पास कुराकर कहा कि, जो कुम पाण्डवों के भेद होने की क्या तुमने हमसे उन राग द्वेष रहित महात्माओं का आपस में सुनी है उसको यमाही वर्णन करो । गुरु के वचन को को भेद हुआ नधा युद्ध में मय राजाओं का नाम सुनकर ब्राह्मणों में श्रेष्ठ वैशम्पायन ने राजा सभासदों क्योंकर हुआ दवयोग में जिनकी वृद्धि नष्ट हो और गजाओं के समीप पहिला इतिहास और कौरव अध्याय महाभारत भेदं .. सर्वविनाशं च कुरुपाण्डवयोस्तदा ॥ २४ ॥ इति श्रीमन्महाभारने आदिपर्वणि अंगावतरणपर्वणि कथानुवन्य पष्टितमोऽध्यायः ॥ ६॥ पाण्डवों का इतिहाम कहना प्रारम्भ किया ॥१९॥२४॥ आदिपर्व का माठवां अध्याय ममान हुआ। अथ एफपष्टितमोऽध्याय ॥ ६१ ॥ वैशम्पायन उवाच-गुरवे प्राङ् नमस्कृत्य मनोवुद्धिसमाधिभिः । संपूज्य च द्विजान्सस्तिथान्यान्विदुपोजनान् ॥ १ ॥ महर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमतः । प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यास्य महात्मनः ॥ २ ॥ श्रोतुं पात्रं च राजस्वं प्राप्येमा भारती कथाम् । गुरोर्वक्त्रपरिस्पन्दो मनः प्रोत्साहतीव मे ॥ ३ ॥ शृणु राजन्यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत् । राज्यार्थ द्यूतसंभूतो वनवासस्तथैव च ॥ ४ ॥ यथा युद्धमभवत्पृथिवीभयकारकम् । तत्तेऽहं कथयिष्यामि कथयिष्यामि पृच्छते भरतर्पभ ॥ ५ ॥ मृते पितरि ते वीरा बनादेत्य स्वमन्दिरम् । न चिरादेव विद्वांसो वेदे धनुपि चाभवन् ॥ ६ ॥ तांस्तथा सत्ववीर्योजः संपन्नान्पोरसंमतान् । नामृप्यन्कुरवो दृष्ट्वा पाण्डवाश्रीयशोभृतः ॥ ७ ॥ ॥ इसमटवां अध्याय ६१ ॥ उग्रश्रवा बोल है ऋपिया ! वैगम्पायन जी हुआ यह मब श्रवण कंगे। राज्य की प्रामि के गुरु और ब्राह्मणों को नमस्कार करके मंमार में लिये न हुआ और यूत मे बनयाम हुआ॥1॥ प्रमिद्ध बुद्धिमान महात्मा ज्यामजी के बनाये हुए कोग्य पाण्टयों में भेट होने और पृथ्वी का इनिहाम को प्रमलता पूर्वक कहन लंग : क्षय कग्न वान युद्ध की प्राप्ति का मंर कारण तुमको मुनने के योग्य ममझकर भारत मपंधी इम नरह पर है । पाटु गजा के यन में मर जान कथा कहना हूं । गुरु के मुन्नम निकग हुआ भारत के पश्चात उन पाचों पुत्र हस्तिनापुर में गये और सपी प्रमाद, मेरे मन को उन्माद दिलाता है। है. थोड ही कार में बंद और धनुपविद्या पदर बड़े गजन : कारबों और पाण्डवों का भंद जिम प्रकार प्रवीण हो गये । उनी नभनी, या, देह, बल, है राजन् ! 1 महाभारत [ आदिपर romart ततो दुर्योधनः क्रूरः कर्णश्च सह सौबलः । .. तेषां निग्रहनिर्वासान्विविधांस्ते समारभन् ॥.८ ॥ ततो दुर्योधनः शूरः कुलिङ्गस्य मते स्थितः ।। पाण्डवान्विविधोपाय राज्यहेतोरपीडयत् ॥ ९ ॥ ददावथ विपं पापो भीमाय भीमाय धृतराष्ट्रजः । जरयामास तद्वीरः सहान्नेन वृकोदरः ॥१०॥ प्रमाणकोट्यां संसुप्तं पुनर्वद्ध्वा वृकोदरम् । तोयेषु भीमं गङ्गायाः प्रक्षिप्य पुरमाबजत् ॥ ११ ॥ यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् । उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो गतव्यथः ॥ १२ ॥ आशीविषैः कृष्णसर्पः सुप्तं चैनमदंशयत् । सर्वेष्वेवागदेशेषु न ममार शत्रुहा ॥ १३ ॥ नेषां तु विप्रकारेपु तेषु तेषु महामतिः । मोक्षणे प्रतिकारे च विदुरोवहितोऽभवत् ॥ १४ ॥ स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः । पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ॥ १५ ॥ उत्माह और इन्द्रियों के घर मे युक्त रौट आया । जब वडी भुजापगला भीमसेन सचेत वामी बडे प्रसन्न हुए। परन्तु धृतराष्ट्र के दुर्योधनादिक हुआ तब तुरन्त बन्धनों को तोडकर पीडा-रहित पुत्र उनको देख न सके । तत्पश्चात् कठोर दुर्योधन जलसे बाहर आया और फिर सो रहा । तब दुर्योधन कर्ण और शनि की सगह मे कुलगपया ममान ने उमको विषधारी सपों मे कटवाया तो भी लो सिंह की दाद का भी मास पिकालने के लिये शत्रुओं के नाग करने वाला भीमसेन न मरा । यन करता है अनेक उपायों में पाण्डा को दु ग्य उन कौरया के अपराधा मे रडी बुद्धि वाला विदुर देने रंग ॥10॥ पाण्टया के पचाने और उपाय रतलाने म महायक नत्पश्चात दुधिन ने भीमगेन को मारने के हुआ ॥१०१४॥ रिये अन म विण मिलाकर दिया । भाममेन उमा वर्ग म रहता हुआ टन्द्र दम ससार की एचा गय और गगा तटपर प्रमाणकोटि घाट पर रक्षा करता है । इसी प्रकार पाण्डया की सहायता में मा गय । दुय्यधिन ने मोते हुए भाममेन को बाध विदुर नित्य तत्पर रहा 1 जब दुर्योधन अनेक गुप्त का गगाल में पर दिया और आप घर को आर प्रस्ट उपायों से देवरभिन शगुनागर पाण्टवा देखकर नगर अन्याय ६. महाभारत यदा : तु विविधोपायैः संवृतर्विवृतरपि । नाशकद्विनिहन्तुं तान्देव भाव्यर्थरक्षितान् ॥ १६ ॥ ततः संमल्य संमन्य सचिवपदुःशासनादिभिः । धृतराष्ट्रमनुज्ञाप्य जातुएं गृहमादिशत् ॥ १७ ॥ सुतप्रियपी ताराजा पाण्डवानम्बिकासुतः । ततो विवासयामास राज्य भोगबुभुक्षया ॥ १८ ॥ ते प्रातिष्टन्त सहिता नगगन्नागसाद्वयात् । प्रस्थाने चाभवन्मन्त्री भत्ता तेपां महात्मनाम् ॥ १९ ।। तेन मुक्ता जतुगृहान्निशीथे प्राद्रवन्वनम् । ततः संप्राप्य कौन्तेया नगरं वारणावतम् ॥ २० ॥ न्यवसन्त महात्मानो मात्रा सह परंतपाः । श्रुतगष्ट्रेण चाजता उपिता जातुपे गृहे ॥ २१ ॥ पुगेचनाद्रक्षमाणाः मंवत्सरमतन्द्रिताः । सुरुङ्गां कारयित्वा तु विदुरेण प्रचोदिताः ॥ २२ ॥ आदीप्य जातुपं वेइम दग्ध्वा चैव पुरोचनम् । प्राद्रवन्भयसंविग्ना मात्रा सह परंतपाः ॥ २३ ॥ ददृशुर्दारुणं रोहिडिम्ब वननिर्झरे । -हत्वा च तं राक्षसेन्द्र भीताः समवयोधनात् ॥ २४ ॥ के मारने में ममर्थ न हुआ, नव ऋग्ण दु:शामन निकलकर वन की गय और जाने ममय उम राम आदि मंत्रियों के माध विचारकर घृनगष्ट्र में कह के घर में आग लगा दी। पुगेचन उम अमि में जर कर लाख के घर बनाने का दुर्योधन ने निश्चय गया। दुर्योधन के मय में भागे हुए पाष्टयों ने क्यिा । पुत्रों के प्रेमी और राज्यमोग की टन्त्रा बन में इग्नों के समीप मयानक दिटिव नान गक्षय कग्ने बान अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र ने उनको गन्य को माग और उनकी बहिन हिटिम्बा को भीममेन मे निकाल दिया ॥१५॥१८॥ ने ग्रहण किया. जिममे घटोक्न नाम पुत्र उत्पन्न विदुर ने पांचों पाण्टयों के हस्तिनापुर में जाने हुआ । यहा मे पुम्पों में श्रेष्ट पाश्टय ननका एक के मम्य उनको महायता दी । विदुर की मगह नकारी नगरी में एक नाम के यहां अपनाग में पाण्डव आधी गत के समय गम के घर में होकर कुछ समय नक में । म जगह यही मुना [ आदिपर्व महाभारत निशि संपाद्रवन्पार्था धार्तराष्ट्रभयार्दिताः । प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः ॥ २५॥ एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः । वेदाध्ययनसंपन्नास्तेऽभवन्ब्रह्मचारिणः ॥ २६ ॥ ते तत्र नियताः कालं कंचिदूपुनरर्षभाः । मात्रा सहकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २७॥ तत्राससाद क्षुधितं पुरुपादं वृकोदरः । भीमसेनो महाबाहुर्वकं नाम महावलम् ॥ २८ ॥ तं चापि पुरुषव्याघ्रो वाहुवीर्येण पाण्डवः । निहत्य तरसा वीरो नागरान्पर्यसान्त्वयत् ॥ २९ ।। ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेपु स्वयंवराम् । श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्तताम् ॥ ३० ॥.. ते तत्र द्रौपदी लब्ध्वा परिसंवत्सरोपिताः । विदिताहास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिन्दमाः ॥ ३१ ॥ त उक्ता धृतराष्ट्रेण राजा शान्तनवेन च । भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति ॥ ३२ ॥ अस्माभिः खाण्डवप्रस्थ युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः । तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम् ॥ ३३ ॥ वाले भीमसेन ने उस नगर के मनुप्यों के खाने वाले तुम्हारे निवासस्थान का विचार खाण्डवप्रस्थ भूखे, बलयान यक नामक गक्षस को माग और पुर किया है । इसलिये कि, भाइयों से तुम्हारा बिगाड़. वामियों को सुप दिया ॥१०॥२०॥ हो । वह ग्वाण्डवसम्थ जो बड़े देशों और मागों में इसके उपरान्न पाचाल देश के राजा की कन्या युक्त है, वहा तुम ईपी को छोड़कर चले जाओ। द्रोपदी का म्वयबर सुनकर यहा गये और उन दोनों की मम्मति में सब प्रकार के रत्न लेकर द्रोपदी को प्राप्त करके एक वर्ष तक वहा रहे। इसके अपने मित्रों के माथ खाण्टवप्रन्थ में गये । वहां पधान जब वे प्रकट हो गये नर वहां महम्निना- अपने शम्त्रों के यल से बहुत मे राजाओं को बंश पुर नगर को गये । हम्निनापुर जाने पर पृतराष्ट्र में पाक रहने लगे। इस प्रकार ये धर्मज्ञ और सत्य- और भीमपिनामह न पाण्टयों में कहा कि, हमने ग्रन में तत्पर, मावधानता में वृद्धि को प्राप्त होते न

अध्याय
महाभारत
२७७
वासाय खाण्डवप्रस्थं ब्रजध्वं गतमत्सराः ।
तयोस्तें वचनाजग्मुः सह सर्वेः सुहृजनैः ॥ ३४ ॥
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यांदाय सर्वशः ।
तत्र ते न्यवसन्पार्थाः संवत्सरगणान्वहुन् ॥ ३५ ॥
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान्महीभृतः ।
एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यत्रतपरायणाः ॥३६
अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितान्वहन् ।
अजयद्भीमसेनस्तु दिशं प्राची महायशाः ॥ ३७॥
उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीची नकुलस्तथा ।
दक्षिणां सहदेवस्तु विजिग्ये परवीरहा ॥ ३८ ॥
एवं चरिमां सर्वे कशे कृत्नां वसुन्धराम् ।
पञ्चभिः सूर्यसंकाशैः सूर्येण च विराजता ॥ ३९ ॥
पसूर्यवाभवत्पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविकमैः ।
ततो निमित्त कस्मिंश्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥१०॥
वनं प्रस्थापयामास तेजस्वी सत्यविक्रमः ।
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरं भ्रातरं सव्यसाचिनम् ॥ ११ ॥
अर्जुनं पुरुषव्याघ्र स्थिरात्मानं गुणैर्युतम् ।
स वे संवत्सरं पूर्ण मासं चैकं बने वसन् ॥ १२ ॥
ततोऽगच्छधृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन ।
लब्धवांस्तत्र बीभत्सर्भायां राजीवलोचनाम ॥ १३॥

२७८ महाभा11 [ आदिम अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् । सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव संगना ॥४॥ सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह । अतर्पयच्च कौन्तेयः खाण्डवे हव्यवाहनम् ॥ ४५ ॥ वीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम । नातिभारो हि पार्थस्य केशवेन सहाभवत ॥ १६ ॥ व्यवसायसहायस्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव । पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ॥ १७ ॥ इपुधी चाक्षयैर्वाण रथं च कपिलक्षणम् । मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ॥ ४८ ॥ स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् । तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ ४९ ॥ ततोऽझर्वश्चयित्वा च सौवलेन युधिष्ठिरम । वनं प्रस्थापयामास सप्त वर्षाणि पञ्च च ॥ ५० ।। अजातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्ष त्रयोदशम् । ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वक वसु ॥ ५१॥ महम नेन थाली, मीठे वचन वागे श्रीकृष्ण की को अमि में जरने से बचा रिया ॥१४॥ छोटी बहिन मुभद्रा को प्रेम प्राप्त क्यिा जमे कृष्ण मय दत्य ने सम्पूर्ण रत्नों से भरा हुई एक ने लमी को और इन्द्र ने इन्द्राणी को प्राप्त किया दि य मभा बनाई और उसमे दुबुद्धि दुर्योधन ने गेम किया। इसके उपरान्त शनि के साथ जुआ मुभद्रा भी अर्जुन मे पड़ी प्रीति गगनी थी। ग्वरकर युधिष्ठिर में उलकर सम्म रे लिया आर हम अनन्नर अर्जुन ने श्रीकृष्ण क माथ पाण्टय बारह वर्ष का वनवाम दिया । पाण्डव बारह वर्ष वन को नराकर अमिदेव का तृप्त किया और ना तो रन म रहे तेरह वर्ष में विराट नगरी म समुदेव की महायना में इन्द्र ग्न को भम्म गुप्त हार रहे और चादहरे र्य में युधिष्ठिर ने वन कर दिया । अनिदेव ने प्रमन्न होकर अर्जुन को मे गटकर अपना सब धन मागा और वह न मिलने. गाण्टीरधनुष और वाणा में न मानी होने वाले लो के कारण हे जनमेनय । तत्पश्चात युद्ध हुआ और नर्क और तक य रिमा पना पर हनुमान जी उन्हांन बहुत से क्षत्रियों और राना दुर्योधन को ही गति थी, दिया। और अर्जुन ने मय नाम दत्य मारकर मब राज्य र रिया। इस प्रकार उत्तम व्रत था ॥३०111 अध्याय १२] महाभारन महाराज ततो नालभन्त युद्धमवर्त्तत. । ततस्ते भत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्योधनं नृपम् ॥ ५२ ॥ राज्यं विहितभूयिष्टं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः । एवमेतत्पुरावृत्तं तेषामलिष्टकर्मणाम् । भेदो राज्यविनाशाय जयश्च जयतां वर ॥ ५३॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि अंगावतरणपर्वणि भारतमूत्रनाम एफपष्टितमोऽध्याय ॥ ६ ॥ के धारण करने वालों का वृत्तान्न तुममे कह दिया मव तुममे कह दिया है ॥१०॥५॥ और जिस प्रकार उनमें भेद होकर युद्ध हुआ वह भी आदिपर्व का इकमठवां अध्याय ममान हुआ । -~ d अथ द्विपष्टितमोऽवाय ॥२॥ जनमेजय उवाच-कथितं वे समासेन त्वया सर्व द्विजोत्तम । महाभारतमाम्यानं कुरूणां चरितं महत ॥ १ ॥ कथां त्वनय चित्रार्थी कथयस्व नपाधन । त्रिस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ॥ मे ॥ २ ॥ भवान्विस्तरणेमा पुनराग्व्यातुमर्हति । नहि तृप्यामि पूर्वपां शृण्वानश्चरितं महत ॥ ३ ॥ न नत्कारणमल्पं वै धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः । अवध्यान्सर्वशो जन्नुः प्रशस्यन्ते च मानवः ॥ १ ॥ किमर्थ ने नरव्याघ्राः शक्ताः सन्नो ह्यनागमः । प्रयुज्यमानान्सक्लेशान्क्षान्तवन्तो दुगरमनाम ॥ ५ ॥ कथं नागायुनप्राणो वाहुशाली वृकोदरः । परिक्लिान्नपि कोधं धृतवान्वे द्विजोत्तम ॥ ६ ॥ 1! बामटवां अध्याय ३२॥ जन्मजय बोले-हे. नामों में श्रेष्ठ सम्पायन ! आपने पूर्वक हैं। अपने पूर्वज मरे मार्ग कार और वैभव और पाडवों का वृत्तान्न मझेप का मुनाया पाण्टयों के नग्त्रि को मुनना हुभा तृन नही परन्तु में सम्पूर्ण कथा जो त्यामजी ने कहाँ है सुनना है । वहा भग्ण प्रीताताई निमम पाठयों चाहना हूं। हममे हम क्या भारफित विम्नार नेमामादिक यह बडे अन्य योदानीको माग - महाभारत */- आदिश्य कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः । शक्ता सती धार्तराष्ट्रान्नादहकोधचक्षुपा ॥ ७ ॥ कथं व्यसनिनं द्यूते पार्थों माद्रीसुतौ तदा । अन्वयुस्ते नरव्याघा बाध्यमाना दुरात्मभिः ॥ ८ ॥ कथं धर्मभृतां श्रेष्ठः सुतो धर्मस्य धर्मवित् । अनर्हः परमं क्लेशं सोढवान्स युधिष्ठिरः युधिष्ठिरः ॥ ९॥ कथं च बहुलाः सेनाः पाण्डवः कृष्णसारथिः । अस्यन्नेकोऽनयत्सर्वाः पितृलोकं धनञ्जयः ॥ १० ॥ एतदाचक्ष्व मे सर्व यथावृत्तं तपोधन । यद्यच्च कृतवन्तस्ते तत्र तत्र महारथाः ॥ ११ ॥ वैशम्पायन उवाच-क्षणं महारज विपुलोऽयमनुक्रमः । पुण्याख्यानस्य वक्तव्यः कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ १२४ महर्षेः सर्वलोकेषु पूजितस्य पूजितस्य महात्मनः । प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः ॥ १३ इदं शतसहस्त्रं हि श्लोकानां पुण्यकर्मणाम् । सत्यवत्यात्मजेनेह व्याव्यातममितौजसा ॥ १४ ॥ और ममर्थ होने पर भी बंड बंड प्लेश सहे ॥१५॥ और क्यों कृष्ण जिसके सारथी है ऐसे अर्जुन ने हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! क्यों दश हजार हाथियों बहुतमी सेनाओं को वाण वर्षाकर सबको यम- के बल से युक्त और बही भुजावाल भीममेन ने लोक को पहुचाया और क्लेश को भी महा हे तपो- हेश पाते हुए भी क्रोध न किया और क्यों दुरात्माओं धन : यह मत्र वृत्तान्त जिम प्रकार उन सब महा- मे लग दी हुई द्रोपदी ने धृनराष्ट्र के पुत्री को भम्म रथियों ने जहा जहा जिम जिस प्रकार किया है करने में समर्थ होनी हुई भी क्रोधम्पी चक्षु से भम्म यह सब मुझको मुनाओ ॥६॥११॥ न किया और किम प्रापन के व्य मन में आसक्त यह सुनकर वैशम्पायन ने कहा-हे महाराज युधिष्ठिर के भीम अर्जुन और माद्री के पुत्र नकुल जनमेजय : व्यामजी में कहा हुआ यह पुण्य आ. महदय यह श्रेष्ठ पुरुष दुरामा दुर्योधनादिकों में ख्यान का विषय कहने योग्य है 1 उसका अनुक्रमण पीड़ा देने पर भी अनुगामा गई । किम प्रकार धर्मा- बहुत बड़ा है इस कारण क्षणमात्र ठहरो, में सायन ग्माभी में श्रेष्ठ और धर्म के जाननेवाले धर्म के पुत्र धानी मे कहता है । पेमे एक लाख श्लोकों का यह युधिष्ठिर ने न महने योग्य वेगों की मद्दन किया आध्यान जिसमें पवित्र कमों का वर्णन है, बड़नेजम्बी अध्याय ..] महामार य इदं श्रावयेद्विद्वान्ये घेदं शृणुयुनराः । ते ब्रह्मणः स्थानमेत्य प्राप्नुयुर्देवतुल्यताम् ॥ १५ ॥ इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्याणामुत्तमं चेदं पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥ १६ ॥ अस्मिन्नर्थश्च कामश्च निखिलेनोपदेक्ष्यते । इतिहासे महापुण्ये वुद्धिश्च बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ॥ १७ ॥ अक्षुद्रान्दानगीलांश्च सत्यशीलाननास्तिकान । काणं वेदमिमं विद्वाञ्च्छ्रावयित्वाऽर्थमग्नुते ॥ १८ ॥ भ्रूणहत्याकृतं चापि पापं जह्यादसंशयम् । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुरुषोऽपि सुदारुणः ॥ १९ ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा । जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीपुणा ॥ २० ॥ महीं विजयते राजा शत्रूश्चापि पराजयेत् । इदं पुंसवनं श्रेष्टमिदं स्वस्त्ययनं महत् ॥ २१ ॥ महिपीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा । वीरं जनयने पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ॥ २२ ॥ धर्मश.स्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् । मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥ २३ ॥ मत्यवती के पुत्र व्यास ने यहा पर कहा है। गील अनाम्निक और अक्षुद्र मनुष्यों को मुनाकर इस क्या के मुनने और मुनाने वाले दोनों ब्रह्मगेक धन उपार्जन करते है। टमके मुनने में गर्भ हत्या पाकर देवताओं के तुल्य हो जाते है । यह महा के पाप में भी नि संदेह हट जाते हैं। हम मनने भारत वेदों की तरह पवित्र और उत्तम ह भार मत्र मे अति क्टोर पुस्प मी गहु में चन्द्रमा के ममान के मुनने के योग्य है, क्योंकि मन कापियों ने हमकी मर पापों मे हट जाने हैं। और नय नारने गाने प्रगमा की है आप इम पढ़ने में मनुष्य को अर्थ, की तय होती हholl काम मोक्ष, मानन्धी बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होता है गता टमको मनकर भी को नानवर की ॥७॥ का नाम करना है । यह मान्यान पुत्र देने वाग विद्वान् लोग इम महाभारत को दानगीर. मत्य आर कल्याणकारी है।नी गना और गनी टमी । , महाभारत ( मादिपय संप्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोप्यन्ति चापरे । पुत्राः शुश्रूपवः सन्ति प्रेप्याश्च प्रियकारिणः ॥ २४ ॥ शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च । सर्व संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ॥२५॥ भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् । नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ॥ २६ ॥ धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वयं तथैव च । कृष्णद्वैपायनेनेदं कृतं पुण्यचिकीर्षुणा ॥ २७॥ कीर्ति प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् । अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥ २८ ॥ सर्वविद्यावदातानां लोके प्रथितकर्मणाम् । य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणाञ्च्छुचीन् ॥ २९ ॥ श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः । कुरूणां प्रथितं वशं कीर्तयन्सतत शुचिः ॥ ३० ॥ वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत् । योऽधीत भारत पुण्य ब्राह्मणो नियतत्रतः ॥ ३१॥ मुने तो उनके बड़ा वीर पुत्र अथरा रडी भाग्यवान यह पाण्डव आदिक बडे बडे क्षत्रियों का कीर्तन कन्या होती ह । बुद्धिमान याम ने इस आम्यान करनेवाला ह आर मन विद्याओ का देनेवाला की पवित्र धर्मगाम्न सत्तिम अर्थशामा और मोक्ष है। नो कोई टस आम्यान को ब्राह्मणा को सुनाता र कहा है। इसके सुनने और सुनाने वाला १ उमर मर पाप दूर हो जाते है । इस प्रसिद्ध मन गाना और कम के यि हुए पाप नल्ली दर कामों के यश को पवित्रता के साथ निरन्तर कीर्तन हो जाते हैं और उनमें आनाकारी और मंया मग्न करता हुआ मनुष्य बड रस को प्राप्त होकर रोक वार पुत्र होने है । भग्नशियों में यह जन्म की में अन्यन्त पञ्य होता है । नो नियमपूर्वक प्रतों कथाओं को श्रद्धापूर्वक मनन याग को याधि का का रखनेवाला ब्राह्मण इस पवित्र आग्न्यान को भय नगा और परक का भय नो क्यार चार महीने वर्षा ऋतु में पढ़ता है वह मत्र पापा मना।। यामनी ने हम इनिहाम को मनुष्यों में हट जाता है ! इस भारत को पटना हुआ मनुष्य के पुण्य, गाय, या पार धन देन को बनाया। रेटा का पारगामी जानना चाहिये । हम भारत देवता और रानपि और पवित्र मर्पि, जिन्होंने । misakse

अध्याय ३२
मदा भारत
चतुरो वार्पिकान्मासान्सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
विज्ञेयः स च वेदानां पारगो भारतं पठन् ॥ ३२ ॥
देवा राजपयो ह्यत्र
पुण्या ब्रह्मर्पयस्तथा ।
कीर्त्यन्ते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा ॥ ३३ ॥
भगाथापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते ।
अनेकजननो यत्र कार्तिकेयस्य संभवः ॥ ३४ ॥
ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते ।
सर्वश्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः ॥ ३५॥
य इदं श्रावयेद्विद्वान्त्राह्मणानिह पर्वसु ।
धूनपाप्माजित स्वर्गो ब्रह्म गच्छति शाश्वतम् ॥ ३६ ॥
श्रावयेब्राह्मणान् श्राद्धे यश्चेदं पादमन्ततः ।
अक्षय्यं तस्य तच्छ्राद्धमुपावरिपतृनिह ॥ ३७॥
अह्ना यदेनः क्रियत इन्द्रियैर्मनसाऽपि वा ।
ज्ञानादज्ञानतो वापि
प्रकरोति नरश्च यत् ॥ ३० ।।
तन्महाभारताख्यानं श्रुत्वैव प्रविलीयते ।
भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ॥ ३९ ॥
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
भरतानां यतश्चायमितिहासो महाद्भुतः ॥ ४० ॥
पापों को नष्ट कर दिया है उनका कीर्तन किया है मुनना चाहिये ॥३४॥३५॥
तथा इस प्रकार केशव भगवान् का भी कीर्तन किया जो विद्वान् पर्यानुसार इस बामणों को मुनाते
गया है ॥२८॥३३॥
है वह निष्पाप होकर देवलोक को जाकर साधन
जिम महाभारत में भगवान् देवताओं के म्यामी ब्रह्मलोक को सिधारत है । जो श्राद्ध के काल में
और उनकी दिव्यक्तिका कीर्तन किया गया है, जिस कम मे कम दमका एक पद भी ब्राह्मणों को मनात
महाभारत में अनेक प्रकार की उत्पत्तियों का वर्णन है, उनके उस श्राद्ध में पितरों की अक्षय तृप्ति
है। जिममें कीर्ति का जन्म कहा गया है, ब्राह्मण और होती है । जो कुछ पाप दिन में इन्द्रियों या मन
गऊओं का महात्म कहा गया है और मारे वेटों द्वारा होता है, महाभारत सुनने में वह पाप उमीक्षण
का समूह यह भारत ग्रंथ धर्म-बुद्धि पुरुषों को में दूर होता है ॥३६॥३०॥

महाभार CHAR [ आदिपर ani महतो खेनसो मान्मोचयेदनुकीर्तितः । त्रिभिर्वपलंधकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ ११ ॥ नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः । '.: तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्पिणा ॥ ४२ ॥ तस्मानियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् । कृष्णप्रोक्तामिमां पुण्यां भारतीमुत्तमां कथाम् ॥ ४३ ॥ श्रावयिष्यन्ति ये विप्रा ये च श्रोष्यन्ति मानवाः । सर्वथा वर्तमाना वैन ते शोच्याः कृताकृतैः ॥ १४ ॥ नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि । निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४५ ॥ न तां स्वर्गगति प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः । . यां श्रुत्वेव महापुण्यमितिहासमुपाउनुते ॥ ४६ ॥ शृण्वञ्च्छ्राद्धः पुण्यशील श्रावयश्चदमद्भुतम् । नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ४७ ।। यथा समुद्रो भगवान्यथा मेरुमहागिरिः । उभौ ग्यातो रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ॥ ४८ ॥ इमम भारतमामियों के बडे जन्म की क्या की कथाआ को जो ब्राह्मण सुनावेंगे और मनुष्य का विस्तारपूर्वक वर्णन है, हमलिये इसको महा मुंगे । रोग चाहे सुकर्म करें या कुकर्म करें, भारन कहते है । जो इसके पदार्थ को नानता है परन्तु कभी पाप से हुए नही जायगे ॥४०॥४४॥ वह सब पापों जाना है । यह इतिहास भारत धर्म और काम की इच्छा करनेवारे मनुष्य गासियों का अदभुन वर्णन करनेवाला है टम कारण को सम्पूर्णता से इम अथ को सुनना चाहिये जिससे भी यह महामारन कहलाता है और टमका कीत्तन वह मिति के प्राप्त होगा। मनुष्य उस प्रसन्नता मनुष्यों को बड़े पाप में छुडा देता है। मम्पूर्ण कार्य को स्वर्ग में जाकर भी नहीं प्राप्त कर सकता जिम जिमी मिदम याम मुनि ने नित्य के उद्योग प्रसन्नता और पुण्य को टम इतिहास के सुनने से में मार शुद्धाचार्ग होकर तीन वर्ष तक तप और प्राप्त होता है । पवित्र म्यभावाला और श्रद्धावान नियम आश्रय काई इमको बनाया । हम कारण इस पवित्र इतिहास को सुनता हुआ राजसूय आर ब्राह्मणा को नियमयुन कर गुनना चाहिये । अवमेध के पन को प्राप्त होता है । जैसे समुद्र व्यागनी की कई इम पवित्र और उत्तम भारत और गुमेर पर्वत रनो के खनाने कहे गये है वैसे m waaaaaves अध्याय ३] मदा भारत इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । अव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्द्धनम् ॥ १९ ॥ य इदं भारतं राजन्वाचकाय प्रयच्छति । तेन सर्वा मही दत्ता भवेत्सागरमेखला ॥ ५० ॥ पारीक्षित कथां दिव्यां पुण्याय विजयाय च । कथ्यमानां मया कृत्स्नां शृणु हर्षकरीमिमाम् ॥ ५१ ।। त्रिभिः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो मुनिः । महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम् ॥ ५२ ॥ धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नहास्ति न तरक्वचित् ॥ ५३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंगावतरणपर्वणि महाभारतप्रशंपायां द्विषष्टितमोऽध्यायः ।। ६२ ।। ही भारत भी रत्नों का खजाना कहा गया है, यह मेरे मुखसे निकली हुई है, श्रवण क्गे।मदा कार्य में भारत आम्ब्यान वेदों के ममान पवित्र और उत्तम लगे हुए व्याममुनि ने इस अद्भुत मारत आग्न्यान है । मनोहर और कानों को आनन्द देने वाला को तीन वर्ष में बनाया है । धर्म, अर्थ, काम और और गील को बढ़ाने वाला है । हे राजन् जनमेजय ! मोक्ष इन चारों विषयों में जो कुछ दम महाभारत जो मनुष्य इस ग्रंथ को कथा कहने वाले बामण में कहा गया है, वह अन्य पुराणों में भी मिलेगा; को देता है, उसने मानो मार्ग पृथ्वी ममुद्र पर्यन्त और जो नहीं कहा गया है, वह अन्यत्र भी कहीं दान में दे दी। हे गजन ! इस सम्पूर्ण दिव्य नहीं मिलेगा॥४५॥५॥ कथा को जो पुण्य और विजय की वृद्धि के लिये आदिपर्व का वामठवां अध्याय ममाप्त हुआ ।। अथ त्रिपटितमोऽध्याय ॥ ६॥ वाम्पायन उवाच- च-राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः । बभूव मृगयां गन्तुं सदा किल धृतवतः ॥ १ ॥ स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः । इन्द्रोपदेशाजग्राह रमणीयं महीपतिः ॥ । निरमठवां अध्याय ३ ॥ वैगमायन ने कहा-पृथ्वी का पनि गजा में तत्सर हुआ। उम पौग्यनन्दन राजा वमुने इन्द्र उपरिचर वनों का धारण करनेवाय शिकार खरने के उपदेश मे दि नामक मुट्टादने देश को ग्रहण ।

मद्दा भारत । आदिपर्व तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्तं तपोनिधिम् । देवाः गक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे ॥ ३ ॥ इन्द्रत्वमों राजाऽयं तपसत्यनुचिन्त्य वै । तं सान्त्वेन नृपं साक्षात्तपसः संन्यवर्तयन् ॥ ४ ॥ देवा ऊचु-न संकीर्यंत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते । त्वया हि धर्मों विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत् ॥ ५ ॥ इन्द्र उवाच-लोके धर्म पालय वं नित्ययुक्तः समाहितः । धर्मयुक्तस्ततो लोकान्पुण्यान्पश्यसि शाश्वतान् ॥ ६ ॥ दिविष्ठस्य भुविष्टस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः । रम्यः पृथिव्यां यो देशस्तमावस नराधिप ॥ ७ ॥ . पशव्यथैव पुण्यच प्रभूतधनधान्यवान् । वा रक्ष्यश्चेव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः ॥ ८ ॥ अर्थवानेप देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः । वसुपूर्णा व वसुधा वस चेदिषु चेदिप ॥ ९ ॥ धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः । न च मिथ्या प्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा ॥ १० किया । एक ममय अग्र-सम्र को आश्रम में छोड- पुण्य और शाश्वत म्वर्गलोक की प्राप्ति होगी। हम कर उनके कठोर नप में प्रवृत होने पर इन्द्रादि वर्ग के रहनेवाले हैं और आप पृथ्वी के रहने देवों ने माना कि, यह जमी कठोर तपस्या कर वाले है। अब आप मेरे मित्र होकर इस पृथ्वी पर रहे है. उमम इन्द्रकी पदवी प्राप्त मरने हैं। जो चेदि नामक सुन्दर देश है, यहां जाकर रहो। मी चिन्नाकर इन्द्र महिन मापूर्ण देयता उम यह देश पशुओं के लिये हितकारी और पवित्र, गजा के निकट पहने और ममा बुझाकर उनको बहुत धन धान्य से युक्त तथा मर्ग के तुल्य भोग नपम्या मे निवृत करने गे॥१॥ करने योग्य है । यह चदिदेश पृथ्वी के गुणों में देवना बोले गनन । जिनमे या धर्म यी युक्त, ऐश्वर्ययुगा और अगणित धन वा से भरा में नष्ट न हो, इस प्रकार तुम धर्म की रक्षा कर्गः हुआ है । यहा वसुधा यमुओं मे भरी हुई है, मनिये सिम मापूर्ण भूमाटर में धर्म रक्षित होगा । इन्द्र इस धान में ही वो ॥५॥९॥ योग कि. गुमा मावधानता के माथ धर्म में इस देश में धर्म और नीरयान् मनुष्य गग हुए धर्म का पानामा पाने में तुमको पंह मनापी माधुगंग गाने है। यहां झूठ काई नदी अन्याय३] महा मारन न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुस्तहिते रताः । युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान्संधुभयन्ति च ॥ ११ ॥ सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद । न तेऽस्त्यविदितं किंचित्रिपु लोकेषु यद्भवेत् ॥ १२ ॥ देवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत् । आकागगं त्वां महत्तं विमानमुपपत्स्यते ॥ १३ ॥ त्वमेकः सर्वमत्पु विमानवरमास्थितः । चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव ॥ १४ ॥ ददामि ते वैजयन्ती मालामम्लानपङ्कजाम् । धारयिग्यति संग्रामे या त्वां शत्ररविक्षतम् ॥ १५॥ लक्षणं चतदेवेह भविता ते नराधिप । इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत ॥ १६ ।। यष्टिं च वैणवीं तम ददो वृत्रनिपूदनः । डप्टप्रदानमुहिग्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम ॥ १७ ॥ नस्याः शक्रस्य पूजार्थ भूमो भूमिपतिस्तदा । प्रवेश कारयामास गते संवत्सरे तदा ॥ १८ ॥ नतः प्रभृति चाद्यापि यः क्षितिपमत्तमः । प्रवेशः क्रियने गजन्यथा नेन प्रवर्तितः ॥ १९ ॥ बोलना है। पुत्रगण पिता से अलग नहीं होतं और यह वनयन्नी माग निमक कमर की नरी मदा गुरु की मेवा में लगे रहते है । इम स्थान में मुग्नात, से नगे आर टमको परिकार समप्राम कोई दुबले पतले बैन को गोझा दोने या हल चीनने मनाओगे नव या गात्रा मे तुम्गगम्भा कोगी। माननीय 'इम चेटिंग हम माना को पहिर हुए ना कोर्ट तुमको देनेगा में सर वर्गों के रोग अपना अपना धर्म करने है वर तुमको धन्य बनेगा। इन्द्र के गंमा कान में मैं तुमको अपना विमान ना देवनाओं योग्य नगना न चदिदेश में बाम किया और इन्द्र है और माटिक की तरह उगई, देना हू । हमर ने उम समय गत्रा को बाम की सकरा पारित चदका तुम निम्मपधारी देवना की नरह विचगे नापिक में दी। गना वमने एक वर्ष के उपगन्न ||४|| दन्द्र की पूजा के निम्ति उम राम की कड़ी में में नहीं लगाता J . मद्दा भारत [ आविषय अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपः । अलंकृतायाः पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणेः ॥ २० ॥ माल्यदामपरिक्षिप्ता विधिवास्क्रियतेऽपि च । भगवान्पूज्यते चात्र हंसरूपेण चेश्वरः ॥ २१ ॥ स्वयमेव गृहीतेन वसोः प्रीत्या महात्मनः । सतां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा देवः कृतां शुभाम् ॥ २२ ॥ वसुना राजमुख्येन राजमुख्येन प्रीतिमानब्रवीत्प्रभुः । ये पूजयिष्यन्ति नरा राजानश्च महं मम ॥ २३ ॥ कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिनृपः । तेषां श्रीविजयश्चैव सराष्ट्राणां भविष्यति ॥ २४ ॥ तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति । एव महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप ॥२५॥ वसुः प्रीत्या मघवता महाराजोऽभिसत्कृतः । उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः ॥ २६ ॥ भूमिरत्नादिभिर्दानैस्तथा पूज्या भवन्ति ते । वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च ॥ २७॥ संपूजितो मघवता वसुश्चेदीश्वरो नृपः । पालयामास धर्मेण चेदिस्थः पृथिवीमिमाम् ॥ २८ ॥ धरती में गाड़ दिया । हे गजन् । उपरिचर राजा पूजे गये है ॥१॥२०॥ ने जमे यास की रकड़ी को गाडा था, आजतक इन्द्र उम यमु से की हुई उस उत्तम पूजा को राना लोग वमा ही किया करते है और उसके दूसरे देसम्र प्रमन होकर बोला- मेरे इस उत्सव को दिन मुगन्धी, मारा, वस्त्र, आभूषण नादि से उम नो मनुष्य और राजा पूजा रेंगे या प्रसन्नतापूर्वक याम की राटी को सुशोभित कर उठा रेन है नधा मे इस राना वसु ने की ह ऐसेही ओरों से करावंग, विधिक टमको मारा स रपेटकर मर्पण की पटरी उनी २५मी, बिनय और राज्य की वृद्धि होगी। गम्बने है । उम काल महमपी भगवान महा उमका देश ममृद्धियुक्त होगा, इसप्रकार हे जनमेजय' दयनी की पूजा होता है, क्योंकि यमुवी प्रीति के इन्द्र ने रमु का प्रीति से सत्कार किया । जो मनुष्य गि हामा मोर ग्वय हम का म्यरूप धरकर मर्यदा इम उत्सर को करावेंगे, उनमें राज्य की श्री ।

अध्याय ६३] महाभारत एने तस्य इन्द्रप्रीत्या चेदिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः । पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः ॥ २९ ॥ नानागज्येषु च सुतान्स सम्राडभ्यपेचयत् । महारथो मागधानां विश्रुतो यो वृहद्रथः ॥ ३० ॥ प्रत्यग्रहः कुशास्वश्च यमाहुर्मणिवाहनम् । मावेल्लश्च यदुश्चैव राजन्यश्चापराजितः ॥ ३१ ॥ सुता राजनराजभूरितेजसः । न्यवेशयन्नामभिः स्वस्ते देशांश्च पुगणि च ॥ ३२ ॥ वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शाश्वताः । वसन्तमिन्द्रप्रासाद आकाशे स्फाटिके च तम् ॥ ३३ ॥ उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम् । राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम् ॥ ३४ ॥ पुरोपवाहिनीं तस्य नदी शुक्तिमती गिरिः । अरोत्सीचेतनायुक्तः कामात्कोलाहलः किल ॥ ३५ ।। गिरि कोलाहलं तं तु पदा बसुरताडयत् । निश्चकाम ततस्तेन प्रहारविवरण सा ॥ ३६ ॥ और जय होगी और उनके अधिकार के देश विस्तृत नाम कुगाव जिमको मणिवाहन भी कहते है, चौथे और हर्षपूर्ण होंगे । बरदान और बड़े यज्ञ और का नाम मावेल और पाचवे का नाम यदु था । उनको इन्द्र का उत्सव इत्यादि शुभ कर्मों में इन्द्र ने गजा भी राजा ने अलग राज्य देकर गजा दिया और वमु का मत्तार क्यिा । वह गजा चेदिदेश में वे मब अपने अपने राज्य में अपने अपने नाम के रहता हुआ धर्म मे मार्ग पृथ्वी का पालन करने नगर बमाकर गन्य ऋग्न लगाउन पाचों के पाच लगा ॥२३॥२८॥ अलग अलग का हुप । महान्मा गना यमु जब इन्द्र की प्रीति के लिये गजा वसु उमका उत्सव इन्द्र के दिय म्फटिक के बने विमान में बंटकर करने लगा नत्पश्चात् उसके बडे पराक्रर्मा और तेजम्बी आकाग में विचन्न थे, नब गन्धर्व और अप्मग- पाच पुत्र उम्पन्न हुए । उम चक्रवर्ती बमुने उन गण आकर उनकी स्तुति करते थे । इमप्रकार ऊपर पुनों को अपने गन्य में अभिषेक किया। उनमें मे विचाने के कारण वह उपग्चिर नाम में प्रमिद प्रसिद्ध प्रधान ग्थी वृहद्रथ नामक एक पुत्र मगधदेश हुए ||२१|३४|| का गना हुआ। दूसरे का नाम प्रत्यग्रह, तीमर का उम राना के चदी नगर के माप एक गुक्ति- [ आदिपत्र हा भारत : तस्यां नद्यांसजनयन्मिथुनं पर्वतः स्वयम् । तस्माद्विमोक्षणात्प्रीता नदी राज्ञे न्यवेदयत् ॥ ३७॥ यः पुमानभवत्तत्र तं स राजर्पिसत्तमः । वसुर्वसुप्रदश्चके सेनापतिमरिन्दमः ॥ ३८ ॥ चकार पत्नी कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः । वसोः पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत् ॥ ३९ ।। ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने पुंसवने शुचिः । तदहः पितरश्चैनमूचुर्जहि मृगानिति ॥१०॥ तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वर । स पितॄणां नियोगं तमनतिक्रम्य पार्थिवः ॥ ४१ ॥ चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन् । अतीव रूपसंपन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ॥ ४२ ॥ अशोकैश्चम्पकैउचूतैरनेकॅरतिमुक्तकैः पुन्नागेः कर्णिकारेश्न वकलैर्दिव्यपाटलेः ॥ ४ ॥ पाटलेनारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनस्तथा । एतैरम्य॑महावृक्षः पुण्यैः म्वादुफलैर्युतम् ॥ ४४ ॥ मनी नाम नदी पहनी थी। उस नदी को काम के म्नान करने को थी, उस दिन पितरों ने गजा वाका कोनार नाम पर्वत ने गमा । गना आकर कहा कि, आन मृग मारकर श्राद्ध करो। नकोप रक म पर्वत को लात मारी और उममें राजा उनकी आजा के अनुसार वन को चला गया पर पिन होगया उमीम शुत्तिमनी नदी यह निकली। और गिरिका के मा को याद करके गजा कामवा बागहर मगम करने में उस नदी में गर्भ रहा हुआ 11.५१८॥ आप उमा एक पुत्र और पर पुरा उत्पन्न हुई । जर रनमें पहुंचा तब देयता क्या है कि, वसत नटी ने उपरिना में मुक्त होने कारण मन्तुष्ट ऋतुने उम यन को अत्यन्त गोभायमान कर रखा कर गना पीर पुत्र और या द दी । गजा है। अनेक नरह मीटे पर देने वारे वृक्ष जैसे नरका नाम वगंमद गम्बर मा पमा मना अशोक वाफ भाम, अनिमुक्त पुन्नाग, बपुर, पनि यनाया और गम गिरिका कन्या को पानी दियपार न पाटर, नागिन, चन्दन, अर्जुन आदि पी बनाया । घाई दिनों म वा गिरिका कन्या गए। नाग आर भार गूज हे है और पानी नातु निमनिया गिरिना यानु कारिगा व झुण्टक झुण्ड जहा जहा मधुर नार मे अध्याय ३] महा भारत कोकिलाकुलसन्नादं मत्तभ्रमरनादितम् । वसन्तकाले नत्तस्य बनं चत्ररथोपमम् ॥१५॥ मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यगिरिकां नदा । अपश्यन्कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया ॥ १६ ॥ पुष्पसंछन्नशाग्वायं पल्वरुपशोभितम् । अशोक स्तवकग्छन्नं रमणीयमपश्यन ॥ १७ ॥ अधस्तात्तस्यच्छायायां सुखामीनो नराधिपः । मधुगन्धेश्च मयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम् ॥ १८॥ वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्राय मुदमन्वगात् । तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने बने ॥ ४ ॥ म्कन्नमात्रं च तद्रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः । प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पनेद्वेत इत्युन ॥५०॥ इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेनो मे न भवेदिनि । ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिनिप्रभुः ॥ ५१ ।। मंचिन्त्येवं नदा गजा विचार्य च पुनः पुनः । अमोघत्वं च विनाय तमो राजसत्तमः ॥ ५२ ॥ शुक्रप्रम्यापने कालं महिप्याः प्रसाध्य वै । अभिमन्याथ तन्टुक्रमारात्तिष्टन्तमाशुगम ॥ ५३॥ कर रहे है। गजा कामवश होकर चागे भोर बटे मार्ग यनमें फिग्न हुए गजा का वीर्य गिग । देखना रहा परन्तु गिरिका को न देन्बका कामानि उमर्यि के गिरनेही 'यह मंगवा नष्ट हो गया में बहुत जन्न रगा ||५३॥६॥ हैमा विचारकर गजा ने उमी पत्ते में ग्रहण गजा कामानिम आविष्ट उस आनन्द का दिया ||७|| टेबना हुआ देबयोग में एक अनोवृक्ष के मनाप यह मंग वार्य वृथा न हो गये और मम्मी निमकी माम्बायें पुगों में दर्ज हुई थी. पहुचा । का यह ऋतुकार मी व्यय न हो, उस गना वमने वट वृत अन्यन्न सुगन्धिन गरे गुच्छों मे पग बार बार विनाने के पश्चन यह निश्चर मिया कि, हुना था । गज्ञा बसु उस वृक्ष के नीचे बंट गया मंग बाय अत्यर्थ और ही के पास मंजन का र मथुन का आनन्द पाने लगा। इस उपगन्न भी ममय हुआ है, मो किमी प्रकार म भेटना ही [ आदिपर्व महाभारत सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत् । मप्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय ॥ ५४॥ गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै । गृहीत्वा तत्तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान् ॥ ५५ ।। जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः । तमपश्यदथायान्तं श्येनं इयनस्तथापरः ॥ ५६ ॥ अभ्यद्रवञ्च तं सद्यो दृष्ट्वामिपशङ्कया । तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ संप्रचक्रतुः ॥ ५७॥ युध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि ममुनाम्भसि । तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्यशापाद्वराप्सराः ॥ ५८ ॥ मीनभावमनुप्राप्ता वभूव यमुनाचरी । उयेनपादपरिभ्रष्टं तवीर्यमथ वासवम् ॥ ५९॥ जग्राह तरसोपेत्य साऽद्रिका मत्स्यरूपिणी । कदाचिदपि मल्सी तां ववन्धुर्मत्स्यजीविनः ॥ ६० ।। मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम । उजहुरुदगत्तस्याः स्त्री पुमांसं च मानुपम् ॥ ६१ ॥ चाहिये । इसके पश्चात पमा निश्चय करके उस मामने आया। आकाशमार्ग में यह दोनों पक्षी धर्म क तत्त्व जानने वाले राजा उपरिचर ने मत्रों चोंच में युद्ध करने लगे । वह वीर्य पन्ने मे छूटकर में उम वीर्य को सुधारकर पास में ठहरे हुए, गान नीचे यमुना क जर में गिर पड़ा। यमुना में आदिका चरने यार एक बाज पक्षी मकहा कि माम्य ! नाम की मुन्दरी अप्मग, ब्रह्मा के शाप से मछली तुम मेरी प्रसन्नता के कारण मेरे हम वीर्य को मेरे होकर रहती थी। उसने वीर्य को वेग में आकर पान जाश्री आर मंगनी गिरिका को शीघ्र दे निगल लिया । अब आदिका को जल में रहते टम दो, क्योंकि उमा या ऋतुकाल का ममय है. महीने व्यान हो गये, नब एक दिन यमुना में जाल गजा का प्रार्थना अनुमा उम बाय की का डालकर मछुआं ने उसे पकड़ लिया । जब मछुओं का भी वो रंग में मार पासा में उड़ा ने उमा पट नाग ना उन्हें उसके भीतर एक पुत्र और एक कन्या देख पड़ी। उन दोनों पालकों को गह में दर एक पाज ने म बात के नाम मकर माटुओं को पड़ा आधयं (भा । उनि वह पन में वार्य म उस माम मगर म राजा क. पाम पुत्र और कन्या को लेजाकर कहा- - अध्याय ३३] महाभारत आश्चर्यभूतं तद्गत्वा राजेऽथ प्रत्यवेदयन् । * काये मत्स्या इमो राजन्संभृतो मानुपाविति ॥ १२ ॥ तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा । स मत्स्यो नाम राजाऽसीद्वार्मिकः सत्यसंगरः ॥ ६३ ।। साऽप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यन । या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा ॥ ६४ ॥ मानुपो जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि । ततः सा जनयित्वा ता विशस्ता मत्स्यघातिना ॥६५॥ संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रुपमवाप्य च । सिद्धर्पिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः ॥६६ ॥ सा कन्या दुहिता नस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी । राक्षा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति ॥ ६७ ॥ रूपसत्त्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणेः । सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात ॥१८॥ आसीत्सा मत्स्यगन्धैव कंचित्कालं शुचिस्मिता । शुश्रूषार्थ पितुर्नावं वाहयन्ती जले च नाम ॥ ६ ॥ तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद्वे पराशरः । अतीव रूपसंपन्नां सिद्धानामपि काश्रिताम् ॥ ७० ॥ हे महाराज ! दम मछग के पेट में हमको यह पुत्र को तो आप ले लिया और यह रूपवनी, गुणयनी और कन्या मिली है। उपरिचर ने उस बालक को कन्या उमी मट्ठा को देकर कहा-टमे तुम अपनी में लिया। वहीबारक महापार्मिक, मन्यवादी मत्स्य कन्या समझकर अपने यहा ग्क्यो । वह कन्या नाम में प्रसिद्ध राजा हुआ । वह अप्मग जो गार मन्यानी नाम से प्रसिद्ध हुई मछुओं के आश्रय में मे मार्ग हो गई थी और भगवान ने उममे यह कुछ काल तक मत्मगन्धा रही और जो अपने पिता कहा था कि न दो मनुन्यों की उत्पन्न करेगी उस की आना का पानार जर में नावको नानीमा ममय तृ दम भाप में उट जायगी, मछुओं के पटे चाग्न पर दिव्यम्प धारण के आकाग की चर्ग कुछ ममय के न्यनीन होने पर नार्थ-याना गई। उपरिचर नेमली गर्भ में उत्पन्न बालम कम्त हुए महर्षि पगार उमी म्थान पर पाये। MA महाभारत [ आदिपर्व दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम् । दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरं मुनिपुङ्गवः ॥ ७१ ॥ सगमं मम कल्याणि कुरुप्वेत्यभ्यभाषत । साऽब्रवीत्पश्य भगवन्पारावारे स्थितानृपीन् ॥ ७२॥ आवयोईष्टयोगेभिः कथं तु स्यात्समागमः । तयोक्तो भगवान्नीहारमस्कृजत्प्रभुः ॥ ७३ ॥ येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत् । दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहार ततस्तं परमर्षिणा ॥ ७४ ।। विस्मिता साऽभवत्कन्या ब्रीडिता च तपस्विनी । मत्यवत्युषाच-विद्धि मां भगवन्कन्यां सदा पितृवशानुगाम् ॥ ७५॥ त्वत्सयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममाऽनघ । कन्यात्वे दूपिते वापि कथ शक्ष्ये द्विजोत्तम ॥ ७६ ॥ गृहं गन्तुमपे चाहं धीमन्न स्थातुमुत्सहे । एतत्संचिन्त्य भगवन्विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ ७७॥ एवमुक्तवती तां तु प्रीतिमानृपिसत्तमः । उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव व भविष्यति ॥ ७८॥ वृणीप्न च वरं भीरु यं त्वमिच्छसि भाविनि । वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते ॥ ७९ ॥ देवताओ और सिद्धा के मन को भी चगयमान र उस जगह चारों और अन्धेरा हो गया और देने वारी उस परमसुन्दरी को देखकर पगार वह तपम्बिनी कन्या उस कोहर को देखकर विम्मित मोहिनी गय । उन्होंने मययनी म कहा है और रजित हुई। सत्यवती बोली है भगवन् ' मैं म्याणी ' तुम मेग इमाण कगं । मत्यपनी ने अभी मारी और पिता के अधिकार में है। आपकी कहा- मदागर पार और पार ऋपि गगगड़े आका पारन करने में मेरा सन्या भाव दृपिन है. उनसे देखने में आपरी आमा का पारन हो जावेगा। है बामण में किम प्रकार अपने घर मिश का मनी मत्यवनी कहने मागी और शिम प्रकार जीवित रह मानी पा भगर न पगार न मी मायबोहा ग्यर आर विचार पर जो उधिन मा कनिय "या !!s.10 ॥७॥ AN-~-AAMA-... -~- a-~ अध्याय ६३ ] महाभारत १. एवमुक्ता वरं वने गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम् । स चास्यै भगवान्प्रादान्मनसः काशितं भुवि ॥ ८ ॥ ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूपिता । जगाम सह संसर्गमृपिणाऽद्रुतकर्मणा ॥ ८१ ।। तेन गन्धवतीत्येवं नामास्याः प्रथितं भुवि । तस्यास्तुयोजनाद्वन्धमाजिघन्त नरा भुवि ।। ८२ ॥ तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम् । पराशरोऽपि भगवाञ्जगाम स्वं निवेशनम् । इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम् ॥ ८३ ॥ पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भ सुपाव सा । जजे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान् ॥ ८ ॥ स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे । स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत् ॥ ८५॥ एवं द्वैपायनो जजे सत्यवत्या पगारात । न्यस्तो द्वीपे स यद्वालस्तम्माद द्वैपायनः स्मृतः ॥ ८६ ॥ पराशर ने प्रसन्न होकर कहा है सुन्दरी ! वती प्रसन्न हुई और पराशर के मयोग से शीघ्र ही मेरा प्रिय कार्य करने से तुम कन्या ही बनी रहोगी। उसने यमुना के नटपर तेजम्बी मृन्दर पुत्र उत्पन्न तुम अपनी इच्छानुमार वर मांगा ! मेरा वचन कभी किया ७८1८४॥ मिथ्या नहीं हो मकता है । इस प्रकार मुनि के वह प्रतापी परागर का पुत्र उत्पन्न होते ही कहने पर अपने शरीर मच्छ-गन्ध को त्यागकर तप करने के लिये वन को चला गया । जाने समय उत्तम गन्ध होने का वरदान मागा और पराशर ने उसने अपनी माता में कह दिया कि, है उसके मनवांछित वर को दिया। इसके उपरान्त आवश्यकता होने पर तुम मुझे म्मरण करना- उसी समय म्री-भाव के गुणों से भूपिन होकर गीघ्र उपस्थित हो जाऊगा ! टम प्रकार पगार मुनि सत्यवती ने मुनि की इच्छा पूर्ण की । तभी से सत्य के वार्य मे मत्याती के गर्भ में भगवान वेदव्या वती गन्धवती और योजन-गन्धा नाम में प्रमिद्ध का जन्म हुआ। यमुना के किनार उत्पन्न होने के हुई । गरीर सुगन्धित होने के कारण गन्धवती और कारण लोग उन्हें द्वैपायन कहते है । उम विद्वान योजन भर तक शरीर की नुगन्ध जाने के कारण ने युग-युग में धर्म को एक एक पद में घटना हुआ, योजन-गन्धा नाम पड़ा। उस उत्तम वर को पाकर मत्य- मनुष्यों की टाक्ति और आयु को और युग माना HAN महाभार [ आदिई : पादापसारिणं धर्म , स तु विद्वान्युगे युगे । आयुः शक्तिं च मानां युगावस्थामवेक्ष्य च ॥ ८७॥ ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथाऽनुग्रहकाङ्क्षया । विव्यास वेदान्यस्मात्स तस्माद्वयास इति स्मृतः॥ ८८ ॥ ८॥ वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् । सुमन्तुं जैमिनि पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम् ॥ ८९ ॥ प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशम्पायनमेव सहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः ॥ ९० ॥... तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः । वसुवीर्यात्समभवन्महावीयों महायशाः ॥ ९१ ॥ वेदार्थविच भगवानृषिविनो महायशाः । शूले प्रोतः पुराणपिरचौरश्चौरशङ्कया ॥ ९२ ।। अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः । स धर्ममाहृय पुरा महर्पिरिदमुक्तवान् ॥ ९३ ॥ इपीकया मया वाल्याद्विद्धा ह्येका शकुन्तिका । नत्किल्वियं स्मरे धर्म नान्यत्पापमहं स्मरे ॥ ९४ ॥ तन्मे सहनममितं कस्मान्नेहाजयत्तपः । गरीयान्त्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद्यतः ॥ ९५॥ की अवस्था को भी देखकर, ब्राह्मणों पर अनुग्रह टमी प्रकार बड़ी कान्ति वाले राजा शान्तनु ने की इच्छा से वेद की रक्षा के लिये, उम पगार के गगा जी मे बडा तेजम्बी भीम जोकि बड़ा यशवारा पुत्र ने उसके चार भाग किये । इसीमे उनको वेद- और पराक्रमी था, वमु के वीर्य से उत्पन्न किया। न्याम करते है । उन चारों वदों को और हम पूर्व ममय में एक ऋषि वेदज महात्मा अणीमाण्डव्य पाचवें महाभारत बंद का व्यासजी ने मुमतु, जैमिनि. था। वह चोर न होने पर भी चोरी की शका में पर नधा बाम्पायन आदि शिष्यों को और अपने शूली पर चढ़ाया गया । महर्षि अणीमाण्डन्य ने पुत्र शुक्दय को पटाया और वैशम्पायन के द्वारा धर्म को बुलाकर उनसे कहा-हे धर्म ! मैने चालकपन यह पाचवा महामारन वेद ममार में प्रगट हा से एक तीर में एक पक्षी कीम्बी को बंधा था उस अपने पाप को मे याद करता है । तबसे जन्मभर 23 AAAAlk-...MAA -AARA Coaawres अध्याय २३) म हा भारत तस्मात्त्वं किल्विषी धर्म शूद्रयोनौ जनिष्यसि । तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत ॥ ९६ ॥ विद्वान्विदुररूपेण धार्मी तनुरकिल्विपी । सञ्जयो मुनिकल्पस्तु जने सूतो गवल्गणात् ॥ ९७ ।। सूर्याच कुन्तिकन्यांयां जजे कर्णो महावलंः । सहज कवचं विभ्रत्कुण्डलोद्योतिताननः ॥ ९८॥ अनुग्रहार्थ लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः । वसुदेवात्तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः ॥ ९९ ।। अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः । अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम् ॥ १०० ॥ आत्मानमव्ययं चैव प्रकृति प्रभवं प्रभुम् । पुरुषं विश्वकर्माणं सत्वयोगं ध्रुवाक्षरम् ॥ १०१ ॥ अनन्तमाचलं देवं हसं नारायणं प्रभुम् । धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम् ॥ १०२ ॥ कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्यमम् । पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः ॥ १०३ ॥ धर्मसंर्वधनार्थाय प्रजजेऽन्धकवृष्णिषु । अस्त्रजो तु महावीर्यों • सर्वशास्त्रविशारदौ ॥ १०४ ॥ मैने तप करने में ही बिताया है । क्या वह उम जो मुनियों के तुल्य था उसने गवल्गण मूत के घर अज्ञान अवस्था मा पाप इतना तप करने मे भी नष्ट जन्म लिया । कुन्नी के गर्भ में कुमार अवस्था न हुआ ' ब्रह्मह्त्या का पाप मब हत्याओं में वह में मूर्य के वीर्य मे कुण्टर और क्यच धारण किय कर हे ! तुम मुझे यह अफारण शूलरी का दण्ड हुए महानरी कर्ण उत्पन्न हुआ ॥९७।०८|| दिलकर ब्रह्महत्या के पाप के भागी हुए हो । इममे मम्पूर्ण रोकों में पूनित भगवान् नारायण, मै भाप देता है कि, तुमको शुद्रयोनि में नन्म समार की भराई के यि वामुदर के यहा देवी रेना पड़े ।।०१।०६॥ के गर्भ से उत्पन्न हुए। उन्हीं को मर रोग अनादि उस धर्म ने विद्वान् विदुर के रूप में धार्मिक अनन्त, जगत के स्वामी, अव्यक्त, अक्षरब्रम, त्रिगुण पाप रहित देह शूद्रयोनि में धारण किया और सञ्जय मय प्रधान तत्त्व, मायारूप, प्रभु, पुरुष, विश्वकर्मा, ।

महाभारत [ आदिपर्व LADKI सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतो । सत्यकाद्धृदिकाञ्चन जज्ञातेऽस्त्रविशारदो ॥ १०५॥ भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत । महरुप्रतपसस्तस्माद् द्रोणो व्यजायत ॥ १०६ ॥ गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः । अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महावलः ॥ १०७॥ अश्वत्थामा ततो जजे द्रोणादेव महावलः । तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः ॥ १०८ ॥ . वैताने कर्मणि तते पावकात्समजायत । वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान् ॥ १०९ ॥ तत्रैव वेद्यां कृष्णाऽपि जने तेजस्विनी शुभा । विभ्राजमाना बपुषा विभ्रती रूपमुत्तमम् । ११० ॥ प्रहादशिष्यो नग्नजित्सुवलश्चाश्वत्ततः । तस्य प्रजा धर्महन्त्री जजे देवप्रकोपनात् ॥ १११ ॥ गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौवलस्तथा । दुर्योधनम्य जननी जजातेऽर्थविशारदौ ॥ ११२।। कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो धृतराष्ट्रो जनेश्वरः क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य · पाण्डुश्चैव महावलः ॥ ११३ ॥ हम, नारायण, विधाता और परमात्मा कहते है। की माता और कृपाचार्य उत्पन्न हुए । द्रोणा- वही धर्म को स्थापन करने के लिय अन्धक वृष्णि चार्य से अश्वत्थामा बडा वीर पुत्र उत्पन्न हुआ । वा में उत्पन्न होकर कृष्ण नाम में प्रसिद्ध हुए । इनके पीछे होम की अमि से अमि जैसा तेज रखने- अब विद्या के जाननेवान, बंड पराक्रमी, मर्वशास्त्र वारा द्रोणाचार्य के मारने के लिये धनुषयान् लिये के पण्डित मात्यकि और कृतवर्मा सत्यक और हुए धृष्टद्युम्न और त्रिलोक-सुन्दरी द्रौपदी उत्पन्न हटिक के यहां उत्पन्न हुए. ॥२.११०५|| हुई । इसके पश्चात प्रहाद के शिष्य नमजित् और उग्रना करने वाले महर्षि भारद्वाज का वीर्य सुबल का जन्म हुआ । दैव के कोप से उनकी पहार की बार में गिरन मे द्रोणाचार्य उत्पन्न हुआ। मंतान धर्म का नाश करनेवाली हुई । गान्धार- गौतम ऋषिका वीर्य भारम्नब पर गिग्न मे अश्वत्थामा देश के राजा मुबल के शकुनि नाम पुत्र और - अध्याय ६३] महाभारत : धर्मार्थकुशलो धीमान्मेधावी धूतकल्मपः । विदुरः शूद्रयोनौं तु जज्ञे द्वैपायनादपि ॥ ११४ ॥ पाण्डोस्तु जजिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक् । द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्टस्तेपामासीद्युधिष्टिरः ॥ ११५ ॥ धर्माद्युधिष्ठिरो जने मारुताच वृकोदरः । इन्द्राद्धनञ्जयः श्रीमान्सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ११६ ॥ जज्ञाते रूपसंपन्नावश्विभ्यां च यमावपि । नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ ॥ ११७ ॥ तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतगष्ट्रस्य धीमतः । दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा ॥ ११८ ॥ ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत । दुर्मर्पणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः ॥ ११९ ॥ जयः सत्यनतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः ॥ १२० ॥ अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत । स्वस्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२१ ॥ पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जजिरे । कुमारा रूपसम्पन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥ १२२ ॥ दुर्योधन की माता पतिवना गान्धारी उत्पन्न हुई। युधिष्ठिर उन मबमें मे बडे थे । धर्म के अंग से उमका विवाह धृतराष्ट्र से हुआ और उसके दुर्यो- युधिष्ठिर, वायु के अग मे भीमसेन, इन्द्र के अंग धनादिक पुत्र हुए । फिर ब्यामजी ने विचित्रवीर्य से अर्जुन और अश्विनीकुमार के अग में रूपवान्, की स्त्री के गर्भ से धृतराष्ट्र और पाण्टु को उत्पन्न बड़ों की मेवा करने वाले नकुल और महदेव उत्पन्न किया ॥१०६।११३॥ हुए। बुद्धिमान् धृतराष्ट्र के दुर्योधनादि मौ पुत्र उत्पन्न धर्म और अर्थ में चतुर, बुद्धिमान् , निष्पाप विदुर हुए,उनमें दुर्योधन, युयुन्यु. करण, दुगासन, दुम्मह, भी व्यासजी के वीर्य मे शुदा के गर्भ में उत्पन्न दुर्मर्पण, विकर्ण, चित्रमेन, विविंगनि, जय, मत्यान, हुए । पाण्टु के मादी और कुन्ती दो रानियां थीं, पुरुमित्र और वैश्या के गर्भ से युयुत्सु यह ग्यारह उनके देवताओं के तुल्य पांच पराक्रमी पुत्र हुए। पुत्र हे जनमेजय ! महारथी उत्पन्न हुए।।११।१२०॥ - ३०० मदा भारम । आदि सर्वशः । प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात । अर्जुनाच्छुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ १२३ ॥ तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान् । हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः ॥ १२४ ॥ शिखण्डी द्रुपदाजने कन्या पुत्रत्वमागता । यां यक्षः पुरुषं चके स्थूणः प्रियचिकीर्पया ॥ १२५ ॥ कुरूणां विग्रहे तस्मिन्समागच्छन्वहून्यथ । राज्ञां शतसहस्त्राणि योत्स्यमानानि संयुगे ॥ १२६ ।। तेषामपरिमेयानां नामधेयानि न शक्यानि समाख्या वर्षाणामयुतैरपि । एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम् ॥ १२७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि व्यासाद्युत्नपौ त्रिपष्टितमोऽध्याय ॥ ६३ ॥ श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा से महात्मा पाण्डु राजा द्रुपद की कन्या थी । म्थून नामक यक्ष ने का पोत्र अभिमन्यु, अर्जुन के वीर्य से उत्पन्न हुआ। राजा की प्रसन्नता के लिये उसको पुरुष बना दिया रूपवान् सम्पूर्ण शास्त्रों के जानकार पाच पुत्र पाचो था। कौरवों के इस महाभारत युद्ध में हजारों पाण्डवों के द्रोपदी से उत्पन्न हुए । युधिष्ठिर के पुत्र राजे सम्राम में युद्ध की इच्छा से आये । उन का नाम प्रतिविद, भीमसेन के पुत्र का नाम सुत असाव्य राजाओ के नाम सहस्रो वर्षों में कहने में सोम, अर्जुन के पुत्र का नाम श्रुतकीर्ति, नकुल के नही आसकते और यह मुख्य मुख्य तुमसे कह पुत्र का नाम शतानीक ओर महदेव के पुत्र का दिये है जिससे कि, महाभारत-रूप आख्यान व्याप्त नाम श्रुतमेन था । भीमसेन के हिडिम्बा राक्षमी के है ॥१२१११२७॥ गर्म मे घटोत्कच उत्पन्न हुआ। शिखण्डी पहिले आदिपर्व कामठवा अध्याय ममापन हुआ । अथ चतु पष्टितमोऽध्याय ॥ ३१ ॥ जनमजय ग्याप-य एने कीर्निता ब्रह्मन्ये चान्ये नानुकीर्तिताः । सम्यक्ताञ्छ्रोतुमिच्छामि राजश्चान्यान्सहस्रशः ॥ १ ॥ ॥ चमठवा अध्याय ६ ॥ जनमेजय बोल है यम्पायन ! आपने जिन नही कहे, उन मबके चरित्रों को मै विशेषरूप से निन राजाओं के नाम का है और जिन जिन के मुनना चाहता है। जिमलिये देवताओं के तुल्य 6- मामा रन ३०६ पर्वतोत्तमे ॥ ४ ॥ अध्याय ६४] 7214 यदमिह संभूता देवकल्पा महारथाः । भुवि तन्मे महाभाग सम्यगाख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥ वैशम्पागन उवाच-रहस्यं खल्विदं राजन्देवानामिति नः श्रुतम् । तत्तु ते कथयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयंभुवें ॥ ३ ॥ निःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वानिःक्षत्रियां पुरा । जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे तदानिःक्षत्रिये लोके भार्गवेण कृते सति । ब्राह्मणान्क्षत्रिया राजन्सुतार्थिन्योऽभिचक्रमुः ॥ ५ ॥ ताभिःसह समापेतुर्ब्राह्मणाः संशितव्रताः । ऋतावृतौ नरव्याघ्र न . कामान्नानृतों तथा ॥ ६ ॥ नेभ्यश्च लेभिरे गर्भ क्षत्रियास्ताः सहस्रशः । ततः सुपुविरे गजन्क्षत्रियान्वीर्यवत्तरान् ॥ ७ ॥ कुमारांश्च कुमारीश्च पुनः क्षत्राभिवृद्धये । एवं तब्राह्मणः क्षत्रं अत्रियासु तपस्विभिः ॥ ८ ॥ जातं वृद्धं च धर्मेण सुदीर्घणायुपान्वितम् । चत्वारोऽपि ततो वर्णा बभूवुाह्मणोत्तराः ॥ ९ ॥ महारथी राजे पृथ्वी में उत्पन्न हुए, वह कथा आप प्रार्थना म्वीकार करना और ऋतुम्नान के उपरान्त विस्तारपूर्वक कहें । बैशम्पायन बोले-हे राजन् ! उनकी इच्छा पूर्ण की । काम के बग होकर या देवताओं के इम गुप्त कार्य को मैंने जिस प्रकार ऋतुकाल के सिवाय और ममय किसी ब्राह्मण ने गुरु के मुख मे श्रवण किया है उसी नरह, नारायण यह काम नहीं किया । हमारों क्षत्रियों की मियों के चरणों को प्रणाम करके, आपके आगे कहता ने गर्म धारण किया। इसके उपरान्न उन्होंने बडे हूँ । पहिले महर्षि जमदमि के पुत्र परशुगमजी ने बडे प्रतापी पुत्रों का उत्पन्न किया । भत्रियवा की इकीसवार पृथ्वी को क्षत्रियों में खाली कर दिया। वृद्धि के लिये उनमे बहुत मे बालक और कन्याप इसके उपरान्त के महेन्द्राचल पर्वत पर उत्पन्न हुई । इस तरह अत्रिय जाति की वृद्धि होने नप करने लगे ॥१४॥ रगी । ब्राह्मणों के वीयं मे धर्मानुमार शत्रि क्षत्रिया उस ममय परशुराम के बल में क्षत्रिय-रहित के गर्भ में उत्पन्न क्षत्रिय चिरनीवी रहकर वन को मंसार के होने पर सत्रियाणिये पुत्र की इच्छा से बढ़ाने लगे । इसके उपरान्न पृथ्वी पर बाप्रणादि प्रामणों के पास गई। प्रतधारी ब्राह्मणों ने उनकी महित चारों वर्ण हो गये ॥५॥ जाकर ३०२ महाभारत । आदिपर्व अभ्यगच्छन्नृतौ नारी न कामान्नानृतौ तथा । तथैवान्यानि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ १० ॥ ऋतौ दारांश्च गच्छन्ति तत्तथा भरतर्षभ । ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः ॥ ११ ॥ ता: प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपरायणाः । आधिभियाधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ॥ १२ ॥ अथेमां सागरापाङ्गी गां गजेन्द्रगताखिलाम् । अध्यतिष्ठत्पुनः क्षत्रं सशैलवनपत्तनाम् ॥ १३ ॥ प्रशासति पुनः अत्रे धर्मेणेमां वसुंधराम् । ब्राह्मणाद्यास्ततो वर्णा लेभिरे मुदमुत्तमाम् ॥ १४ ॥ कामक्रोधोद्भवान्दोषान्निरस्य च नराधिपाः । धर्मेण दण्डं दण्ड्येषु प्रणयन्तोऽन्वपालयन् ॥ १५ ।। तथा धर्मपरे क्षत्रे सहस्त्राक्षः शतक्रतुः । स्वादु देशे च काले च वर्पणापालयत्प्रजाः ॥ १६ ॥ न बाल एव म्रियते तदा कश्चिज्जनाधिप । न च स्त्रियं प्रजानाति कश्चिदप्राप्तयौवनः ॥ १७ ॥ एवमायुग्मतीभिस्तु प्रजाभिर्भरतर्षभ । इयं सागरपर्यन्ता समापूर्यत मेदिनी ॥ १८ ॥ चारों वर्ण पातुकाल में बी के माथ गमन का फिर शासन करने रंगे। क्षत्रियवश के धर्म करन नगे । काम मे और विना ऋतुकाल के में इस पृथ्वी के पालन करने पर ब्राह्मणादि चारों गमन नही करन । इस प्रकार पशु पक्षी आदि वों को वडी प्रमन्नता हुई ॥१०॥१४॥ भी पुरुषों के महा मी-माम करने है। टस भत्रियों ने काम शोधादि दोषों को दूर कर प्रकार प्रमतुकाल में धर्म में गमन करने में मन्नान धर्म म दण्डनीय पुरुषों से पृथ्वी का पालन किया । भी नया हमार वर्ष जीवित रहनी । राजन रामप्रकार अनिययन के धर्म में तत्पर होने पर का मजा धर्म और प्रत में नत्पर होती। और मुन्दरता के माय मव देशों और ममय ममय पर गार, जग, आधि, व्याधि रहित ना? हमके यी मन्द्र में प्रजा का पारन किया। बाल्यायम्या उपगन्न श्री गंग बाबर ममुद्र पर्यन्न पृथ्वीमण्डर में कोई मरता नहीं था। गजन् ! विना नरुण .

मध्याय.६४ । म हा मारत ३०३ ईजिरे च महायज्ञैः क्षत्रिया बहुदक्षिणैः । साङ्गोपनिषदान्वेदान्विप्राश्चाधीयते तदा ॥ १९ ॥ न च विक्रीणते ब्रह्म ब्राह्मणाश्च तदा नृप । न च शूद्रसमभ्यासे वेदानुच्चारयन्त्युत ॥ २० ॥ कारयन्तः कृषि गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविहः । युञ्जते धुरिनो गाश्च कृशागांश्चाप्यजीवयन् ॥ २१ ॥ फेनपांश्च तथा वत्सान्न दुहन्ति स्म मानवाः । न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ॥ २२ ।। कर्माणि च नरव्याघ्र धर्मोपेतानि मानवाः । धर्ममेवानुपश्यन्तश्चक्रुर्धर्मपरायणाः ॥ २३ ॥ स्वकर्मनिरताश्चासन्सर्वे वर्णा नराधिप । एवं तदा नरव्याघ्र धर्मों न हसते क्वचित् ॥ २४ ॥ प्रसूयन्ते नार्यश्च भरतर्षभ । भवन्त्य॒तुषु वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च ॥ २५ ॥ एवं कृतयुगे सम्यग्वर्तमाने तदा नृप । आपूर्यत मही कृत्ला प्राणिभिर्वहुभिर्भृशम् ॥ २६ ॥ एवं समुदिते लोके मानुपे भरतर्षभ । . : असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां तु मनुजेश्वर ॥ २७ अवस्था के कोई मनुष्य स्त्री को जानता नहीं था। बैलों को धुरी में नहीं जोतते थे । जो बैल दुबले हे भरत श्रेष्ठ जनमेजय ! पृथ्वी में सब जगह हृष्ट होते थे उनसे काम नहीं लेते थे और उनका पालन पुष्ट और बहुत दिनों तक जीनवाले मनुष्य देख करते थे । गायों का दूध तबतक नहीं दुहते थे, पड़ते थे । क्षत्रिय लोग वही बडी दक्षिणावाले जबतक बडे का आधार केवल दृध रहता था। यज्ञों को कराते थे और अंगों महित उपनिषदों वैश्य लोग बेचने की वस्तु को कपटयुक्त तील में और वेदों को ब्राह्मण लोग पढ़ने लगे । ब्राह्मण नहीं बेचते थे। चारों वर्ण अपने अपने धर्म में तत्पर उम ममय धन लेकर वेद या विद्या नहीं पढ़ाते थे थे। हे राजन् : वे धर्म के मार्ग पर चलने थे और और न शूद्र के मर्माप वेदों का उच्चारण करने थे । धर्म के अनुसार ही सब काम करत थे । ठीक समय वैश्य लोग बैलों से खेती करते थे, परन्तु आप पर गायें और मियां सन्तान उत्पन्न करती थी। काले .गावः - ALAMAJ { माविपक्ष ०४ महामारी आदित्यैर्हि तदा दैत्या बहुशो निर्जिता युधि । ऐश्वर्याद्रंशिताः स्वर्गात्संवभूवुः क्षिताविह ॥ २८ ॥ इह देवत्वमिच्छन्तो मानुषेषु मनस्विनः । जज्ञिरे भुवि भूतेषु तेषु तेष्वसुरा विभो ॥ २९ ॥ गोष्वश्वेषु च राजेन्द्र राजेन्द्र खरोष्ट्रमहिपेषु च । क्रव्यात्सु चैव भूतेषु गजेषु च मृगेषु च ॥ ३० ।। जातरिह महीपाल जायमानैश्च तैमही । न शशाकात्मनाऽऽत्मानमिय धारयितुं धरा ॥ ३१ ॥ अथ जाता महीपालाः केचिद्वहुमदान्विताः । दितेः पुत्रा दनोश्चैव तदा लोक इहाऽच्युताः ॥ ३२ ॥ वीर्यवन्तोऽवलिप्तास्ते नानारूपधरा नानारूपधरा महीम् । इमां सागरपर्यन्तां परीयुररिमर्दनाः ॥ ३३ ॥ ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वैश्याञ्च्छूद्रांश्चैवाप्यपीडयन् । अन्यानि चैव सत्त्वानि पीडयामासुरोजसा ॥ ३४ ॥ त्रासयन्तोऽभिनिघ्नन्तः सर्वभूतगणांश्च ते । विचेरुः सर्वशो राजन्महीं शतसहस्त्रशः ॥ ३५ ॥ आश्रमस्थान्महपश्चि धर्षयन्तस्ततस्ततः । अब्रह्मण्या वीर्यमदा मत्ता मदवलेन च ॥ ३६ ॥ ठीक समय पर वृक्ष फलते फूरते थे । हे रानन् ' ने आकर मनुष्य, गऊ, घोडे, गधे, ऊट, भैंस और इस प्रकार उस समय सतयुग के वर्तमान होने पर मृग आदि सब योनियों में जन्म लिया। उनके यह सारी पृषी प्राणियों में अत्यन्न भर गई । पीछे दिति और दनु के पुत्र दैत्यों ने राजा रोगों २१.६|| में जन्म लिया । थोडे ही कार में वे दैत्य पृथ्वी पर है ननमेजय इस प्रकार मनुप्याक के जन्म ले रेकर ममुद्र पर्यत फैल गये और अधर्मका आनन्दित होने पर अनेक असुर रानाओं के यहा मेवन करने सँग । उन पराक्रमी, घमण्डी, मदमत्त पुरम्प से उत्पन हुए। देवनाओं में उस समय और विवेकहीन असुरों से ब्राह्मण आदि चारों मनाम में मारे हुए और म्वर्ग के पेश्चर्य से गिराये वर्णा को बड़ा दु ख हुआ। वे रोग जीवों को मारने हुए दन्य यहा पृथ्वी में जन्म लेने रंगे । उन दैत्यों और कपियों को दुख देने लगे। जब मे ऐसे अध्याय मद्दा भारत ३०५ tarashasana वीर्यवलोसिक्तैर्भूरियत्नैर्महासुरैः । पीड्यमाना मही राजन्ब्रह्माणमुपचक्रमे ॥ ३७ ।। न ह्यमी भूतसत्त्वौघाः पन्नगाः सनगां महीम् । तदा धारयितुं शेकुः संक्रान्तां दानवैबलात् ॥ ३८ ॥ ततो मही महीपाल भारार्ता भयपीडिता । जगाम शरणं देवं सर्वभूतपितामहम् ॥ ३९ ॥ सा संवृतं महाभागदेवद्विजमहर्षिभिः । ददर्श देवं ब्रह्माणं लोककर्तारमव्ययम् ॥४०॥ गन्धर्वेरप्सरोभिश्च देवकर्मसु निष्ठितः । वन्द्यमानं मुदोपेतैर्ववन्द चैनमेत्य सा ॥ ११ ॥ अथ विज्ञापयामास भूमिस्तं शरणार्थिनी । सन्निधौ लोकपालानां सर्वेपामेव भारत ॥ ४२ ॥ तत्प्रधानात्मनस्तस्य भूमेः कृत्यं स्वयंभुवः । पूर्वमेवाभवद्राजन्विदितं परमेष्टिनः ॥ ४३॥ स्रष्टा हि जगतः कस्मान्न सबुध्येत भारत । ससुरासुग्लोकानामशेपेण मनोगतम् ॥ ४ ॥ तामुवाच महाराज भूमि भृमिपतिः प्रभुः । प्रभवः सर्वभूतानामीशः शंभुः प्रजापतिः ॥४५॥ प्रोवाच-यदर्थमभिमंप्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे । तदर्थ संनियोक्ष्यामि सर्वानेव दिवौकसः ॥ १६ ॥ अनेक अधर्म पृथ्वी पर होने लगे. तब पृथ्वी उन कहा कि, मै दुष्टों के भार को न महन करने पर दैत्यों के बोझ को न महनकर मब देवताओं के आपकी गरणागत आई हू । उम सर्वन स्वयम्, •पितामह ब्रह्माजी के पास गई ॥२७१३९|| ब्रह्मा को यह बान पहले ही मे विदिन हो गई थी, उम पृथ्वी ने देवता, ब्राह्मण, महर्षियों में घिर क्योंकि जगत् के उत्पन्न करनेवाले, देवता और हुए. देवब्रह्मा मम्पूर्ण लोक के कर्ता को प्रकाशमान् असुरों सहित लोगों के सम्पूर्ण मन के भावों को देखा । वे दिव्य कमों में युक्त थे । पृथ्वी ने मय जानते है । हे महागज जनमेजय : पृथ्वीपनि-नच्या लोकपालों के आंग भगवान् ब्रह्मा को प्रणाम करके सम्पूर्ण प्राणियों के म्बानी और उत्पन्न करनेवाले 1 महामा ( मादिप .. वैपायन उवाच- इत्युक्त्वा स महीं देवो ब्रह्मा राजान्विस्मृज्य च । आदिदेश तदा सर्वान्विबुधान्भूतकृत्स्वयम् ॥ ४७ ।। अस्या भूमेनिरसितुं भारं भागैः पृथक्पृथक् । अस्यामेव प्रसूयध्वं विरोधायेति चाब्रवीत् ॥ ४८ ॥ तथैव च समानीय गन्धर्वाप्सरसां गणान् । उवाच भगवान्सर्वानिदं वचनमर्थवत् ॥ ४९ ॥ ब्रह्मोवाच-खैः स्वैरंशैः प्रसूयध्वं यथेष्टं मानुषेषु च । अथ शक्रादयः सर्वे श्रुत्वा सुरगुरोर्वचः । नथ्यमर्थ्यं च पथ्यं च तस्य ते जगृहुस्तदा ॥ ५० ॥ अथ ते सर्वशोऽशैः स्वैगन्तुं भूमि कृतक्षणाः । नारायणममित्रघ्नं वैकुण्ठमुपचक्रमुः ॥ ५१॥ यः स चक्रगदापाणिः पीतवासाः शितिप्रभः । पद्मनाभः सुरारितः पृथुचाऽश्चितेक्षणः ॥ ५२ ॥ प्रजापतिपतिर्देवः सुरनाथा महाबलः । श्रीवत्साको हृषीकेशः सर्वदेवतपूजितः ॥ ५३ ॥ नं भुवः शोधनायेन्द्र उवाच पुरुषोत्तमम् । अंशनावतरेत्येवं तथेत्याह च तं हरिः हरिः ॥ ५४॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंगावतरणपर्वणि चतु.पष्टितमोऽध्याय ॥ ६४ ॥ पृथ्वी से बोले हे पृथ्वी ' जिस कारण मे तुम मेरे किया । ब्रह्माजी के आगे अपने अपने अंशों से पाम आई हो. उस कार्य के ग्यि मारे देवताओं पृथ्वी पर उत्पन्न होने की प्रतिज्ञा करके सब देवता को नियुक्त करता है 2018६॥ नारायण के पास चैकुण्ठलोक को गये । वहा चक्र वैशम्पायन ने कहा- इस प्रकार मय प्राणियों और गदा को हाथ में धारण किये हुए, पीताम्बर के उत्पन्न करनेवाले ब्रह्मा ने पृथ्वी की पमा कह पहिरे हुए, नील कान्ति वाले, पद्मनाभी, दैत्यों का का विदा किया और मब देवताओं का आज्ञा दी, नाम करने वाले, कमलनयन, प्रजापति के पति, तुम मय पृथ्वी का भार उनाने के लिये अपने प्रकाशमान देवताओं के स्वामी, बड़े बलवान, अपने अंश में मनुष्यलोक में जन्म लो । इन्द्रादिक में लक्ष्मी के चिह से युक्त, इद्रियों के स्वामी और देवनाओं ने देवताओं के गुरु ब्रह्मा के मत्य-अर्थ सब देवताओं मे पूजित जो परमेश्वर हैं, उनको देख- युक्त और दितकारी वचन को मुनकर सर्वन म्बीकार कर सब देवता यहुत प्रसन्न हुप । इन्द्र बोला कि, अध्याय ६५] महा मारत ३०७ हे भगवन् ! पृथ्वी का भार दूर करने के लिये आए ने "अच्छा" कहकर इन्द्र की प्रार्थना को स्वीकार भी अपने अंग मे अवतार लेखें । विष्णु भगवान् कर लिया ॥१७॥५४॥ आदिपर्व का चौमठवां अध्याय ममाम हुआ । अथ पञ्चपष्टितमोऽध्याय ॥१५॥ वैपायन उवाच-अथ नारायणेनेन्द्रश्चकार मह संविदम् । अवतर्नु महीं स्वर्गादंशतः सहितः सुरैः ॥ १ ॥ आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानेव दिवाकसः । निर्जगाम पुनस्तस्मात्क्षयान्नारायणस्य ह ॥ २ ॥ नेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च । अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद्विवौकसः ॥ ३ ॥ ततो ब्रह्मर्पिवेशेषु पार्थिवर्पिकुलेषु च । जजिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः ॥ ४ ॥ दानवाराक्षसांश्चैव गंधर्वान्पन्नगांस्तथा । पुरुपादानि चान्यानि जघ्नुः सत्वान्यनेकशः ॥ ५ ॥ दानवा राक्षसाश्चैव गंधर्वाः पन्नगास्तथा । न तान्बलस्यान्वाल्येऽपि जघ्नर्भरतसत्तम ॥ ६ ॥ उनमेजय उवाच-- देवदानवसङ्घानां गंधर्वाप्सरसा तथा । मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ॥ ७ ॥ श्रोतुमिच्छामि तत्वेन संभवं कृलमादितः । प्राणिनां चैव सर्वेषां संभवं वक्तुमर्हसि ॥ ८ ॥ । मठवां अध्याय ५ ॥ वैशम्पायन ने कहा-इसके उपरान्त भगवान में प्राची में ब्रह्मपियों और गजपियों के दंगों में और इन्द्र ने देवताओं के महित अगों में स्वर्गलोक उत्पन्न हुए। वे दानव, राक्षस, गन्यवं, पनग और मे पृथ्वीलोक में आने का विचार किया । इन्द्र मनुष्या के आहार करनेवाले अनेक प्राणियों को मर देवताओं को आना देकर अपने लोक का माग्ने लगे ॥१५॥ गये । हे नृपों में श्रेष्ठ जनमेजय : मब देवता भत्रुओं जनमेजय बाल कि, देवता, दानव, अप्मा. के नाम और मम्पूर्ण रोक की भलाई के लिये म्वर्ग यक्ष, राक्षस और मनुष्य आदि के जन्म-वृतान्न न .

1 आदिप ३०८ 4 वैशंपायन उवाच- हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य खंयभुवे सुरादीनामहं सम्यग्लोकानां प्रभवाप्ययम् ॥ ९ ॥ ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः पण्महर्पयः । मरीचियङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥१०॥ मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात्तु इमाः प्रजाः ।." प्रजजिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश ॥ ११ ॥ अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा । क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः ॥ १२ ॥ कद्रूश्च मनुजव्यघ्र दक्षकन्यैव भारत । एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनंतकम् ॥ १३ ॥ अदित्यां द्वादशादित्याः संभूता भुवनेश्वराः । ये राजन्नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत ॥ १४ ॥ धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान्पूपा च सविता दशमस्तथा ॥ १५ ॥ एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः ॥ १६ ।। एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः । नाम्ना ग्न्यातास्तु तस्यमे पञ्च पुत्रा महात्मनः ॥ १७ ॥ को मैं और भी विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। हुई । दक्ष की तेरह कन्याएं उत्पन्न हुई, उनके नाम कृपा करके आप कहें । यह सुनकर वैशम्पायन ने यह है अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, मिहिक, कहा-में ब्रह्माजी को प्रणाम करके सब देवताओं कोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और के मम्भव की कथा कहता है, मुनो ! पहले ब्रह्माजी कद्रू, इन सब का विवाह कश्यपजी से हुआ के तो मानमीपुत्र उत्पन्न हुए, उनको कहता है । उनके पुत्र और पौत्र इतने हुए कि, उनकी गिन्नी पहिले का नाम मरीच, दुमो का अत्रि, नीसर का नहीं की जा सकती ॥६॥१३॥ अगिम्म, चौथ का पुगाय, पानवे या पुलह और हे गजन ' अदिति मे लोकों के स्वामी बारह छंटे का कनु था । हम उपगन्त मगन के फल्यप आदित्य उत्पन्न हुए, उनके नाम यह हैं--धाता, मित्र जो पुत्र हुए और कश्यप जी मे यह मम गृष्टि अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अश, भग, वियम्पान , पूषा, और अध्याय ६. महाभारत प्रहादः पूर्वजस्तेषां संहाटस्तदनंतरम् । अनुहादस्तुनीयोभत्तस्माच्च शिविद्याप्कलों ॥१८॥ प्रहादस्य त्रयः पुत्राः ग्याताः सर्वत्र भारत । विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत ॥ १९ ॥ विरोचनस्य पुत्रोऽभूद्वलिरेकः प्रतापवान् । वलेश्च प्रथिनः पुत्रो बाणो नाम महासुरः ॥ २० ॥ मद्रस्यानुचरः श्रीमान्महाकालेति यं विदुः । चत्वारिंगहनोः पुत्राः ग्न्याताः सर्वत्र भारत ॥ २१ ॥ नेपां प्रथमजो राजा विप्रचिनिमहायशाः । गम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः ॥ २२ ॥ असिलोमा च केशी व दुर्जयश्चैव दानवः । अयःशिरा अश्वशिरा अश्वांकुश्च वीर्यवान ॥ २३ ॥ नथा गगनमृर्धा च वेगवान्केतुमांश्च सः । स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिवृषपर्वाऽजकनस्तथा ॥ २२ ॥ अश्वग्रीवश्च मूक्ष्मश्च तुहुण्डश्च महाबलः । इयुपादेकचक्रश्च विरूपाक्षहराहरों ॥ २५॥ निचंद्रश्च निकुम्भथ कुपटः कपटस्तथा । गरभः शलभश्चैव सूर्याचंद्रमा तथा । यविना, त्वष्टा मार विष्णु इन ममें छोटे आविन्य प्रसिद्ध वाणावर उत्पन्न हुआ । दनु के चार्गम गुण में मयम अधिक है । दिति के एक पत्र हिरण्य पुर हुए, नावि मत्र प्रसिद्ध थे । उनी पहिला वर मनिपु नामी पय प्रतापी हुआ पोर मर पाच यमबाग गा विप्रनित्ति नामबाग हुा । ति पुन उत्पन्न हुए टन नाम या गम्बर, नमुनि, पुगंमा यमिगेमा केगी, दुर्नय अनुदान मिवि आर पाक 21'८॥ जय निग, अचमिग अश्वगा. गगनमूर्धा, पेग मान १ जनमेजय ' प्रदाट के न न पुत्र हुए उनम केतुमान मनु अथ. अचान गुपपा, अन, नाम विगेचन, उभ पार निकुम्म 4. 1 किंगचन अवीर, मन, तुष्ट दपुपाट, एकना. विक एक पुत्र बरा प्रनापी बर नाम से प्रसिद्ध हुना। पाभ दृगटर, मिनन्द्र, निउम्भ. कुपट. कपट गम्म, गजा पनि केन्द्रका मन पर महाकार नान में गरम मृयं पीर नटमा. ये दनुवादानव -प्रदाट मद्दाद, मदा मा [ आदिपर्व एते ख्याता दनोवंशे दानवाः परिकीर्तिताः ॥ २६ ॥ अन्यौ तु खल्लु देवानां सूर्याचंद्रमसौ स्मृतौ । अन्यौ दानवमुग्व्यानां सूर्याचंद्रमसो तथा ॥ २७ ॥ इमे च वंशाः प्रथिताः सत्त्ववंतो महावलाः । दनुपुत्रा महाराज दश दानववंशजाः ॥२८॥ एकाक्षो मृतपा वीरः प्रलम्बनरकावपि । वातापी शत्रुतपनः शठश्चैव महासुरः ॥ २९ ॥ गविष्ठश्च बनायुश्च दीर्घजिह्वश्च दानवः । असंख्येयाः स्मृतास्तेषां पुत्राः पौत्राश्च भारत ॥ ३० ।। सिंहिका सुषुवे पुत्रं राहुं चंद्रार्कमर्दनम् । सुचंद्रं चंद्रहन्तारं तथा चंद्रप्रमर्दनम् ॥ ३१ ॥ करस्वभावं क्रूरायाः पुत्रोत्रमनन्तकम् । गणः क्रोधवशो नाम क्रूरकर्मारिमर्दनः ॥ ३२ ॥ दनायुपः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुङ्गवाः । विक्षरो बलवीरो च वृत्रश्चैव महासुरः ॥ ३३ ॥ कालायाः प्रथिताः ः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः । प्रविग्व्याता महावीर्या दानवेपु परंतपाः ॥ ३४ ॥ विनाशनश्च क्रोधच क्रोधहन्ता तथैव च । उत्पन्न हुए, बड़े बडे चन्याल प्रमिद्ध थे ॥१०॥२६॥ देनेवाले गहु, मुचन्द्र, चन्द्रहन्ता और चन्द्रप्रमर्दन मर्य और चन्द्रमा जो देवता है, ये इन दानव नाम के चार पुत्र हुण । क्रूरा के वर म्वभाव रखने- गर्य-चन्द्रमा मे अलग है । दनु के और भी दम वाले अनन्त पुत्र-पात्र उत्पन्न हुए । उनमें से कुछ प्रमिद्ध-बुद्धिमान और बड़े बलवान् पुत्र दानवों के ऋर कर्म करनेवाले क्रोधवश नाम से प्रसिद्ध है । वा में उत्पन्न हुए, उनके नाम ये है-एकाक्ष, मृतप, दनायु के चार पुत्र विक्षर, वर, वीर, वृत्र नामी सर प्रगम्य नरकासुर, वानापी, शत्रुनपन, शट, गविष्ठ, दानवों में श्रेष्ठ हुए । इसके पश्चात् काला के प्रसिद्ध ग्गायु, और दाजिश और उनके पुत्र और पात्र काल के समान प्रहार करनवाल पंड वीर पराक्रमी 7 जनमेजय : अमंग्य ॥२॥३०॥ दानयों में शत्रुओं के नाम मग्नेयाले. पुत्र उत्त frrent गर्भ में चन्द्रमा और सूर्य को पीड़ा हुए. ॥३१॥३१॥ . ।

। मध्याय ६५ ] महाभारत क्रोधशत्रुस्तथैवान्ये कालकेया इति श्रुताः ॥ ३५ ॥ आसुराणामुपाध्यायः शुक्रस्त्पिसुतोऽभवत् । ग्व्याताश्चोशनसः पुत्राश्चत्वारोऽसुरयाजकाः ॥ ३६ ॥ स्वष्टाधरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणों । तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणाः ॥ ३७॥ इत्येप वंशप्रभवः कथितस्ते तरस्विनाम् । असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मया ॥ ३८ ॥ एतेषां यदपत्यं तु न शक्यं तदशेषतः । प्रसङ्ख्यातुं महीपाल गुणभृतमनन्तकम् ॥ ३० ॥ नार्थ्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ । आरुणिर्वारुणिश्चैव वैनतेयाः प्रकीर्तिताः ॥१०॥ शेषोनन्तो वासुकिश्च तक्षकच भुजङ्गमः । कूर्मश्च कुलिकश्चैव कावेयाः प्रकीर्तिताः ॥ ४१ ॥ भीमसेनोग्रसेनौ च सुपर्णो वरुणस्तथा । गोपतिधृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च सहमः ॥ १२ ॥ मत्यवागर्कपर्णश्च प्रयुतश्चापि विश्रुतः । भीमश्चित्ररथचव विग्यातः सर्वविद्वशी ॥ १३ ॥ तथा . शालिशिरा राजन्पर्जन्यश्च चतुर्दशः । विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्ता और क्रोधशत्रु, में असमर्थ ह । विनता के ताय, अरिष्टनेमि, गरुड़, इनके अतिरिक्त और भी काला के पुत्र प्रसिद्ध हुए। अरुण, आरुणि और वारुणि नाम के पुत्र उत्पन्न महर्षि शुक्राचार्य असुरों के उपाध्याय हुए और हुए. ॥३५॥१०|| शुक्र चार पुत्र त्वष्टाघर, अत्री और दो भयानक कट्ट के रोप, अनन्त, यामुकि, तक्षक, कर्म कर्म के करनाल थे जोकि ब्रह्मलोक में तत्पर और और कुलिक नाम के पुत्र उत्पन्न हुप । मुनि के नेज में सूर्य के ममान थे । है. राजन ' पराक्रमी भीमसन, उनमन, मुपर्ण, वरुण, गोपति, धृतराष्ट्र, देवताभी और देत्या के जन्म का यह वृत्तान्त, मर्यवर्चा. मत्य राव, अपर्ण, प्रयुन, भीम, चित्ररथ, पुराणों के अनुमार, मैंने आपको सुना दिया। इनके पारिगिरा और पजन्य ये चीदा देयना और गन्धर्व पुत्र और पात्र असभ्य होने के कारण गिनती कग्ने उत्पन्न हुए | मुनि के करि और नाग्द नाम के के ।

३.२ AE मा14 [ माविष कलिः पञ्चदशस्तेषां नारदश्चैव पोडशः । इत्येते देवगन्धर्वा मोनेयाः परिकीर्तिताः ॥ ४ ॥ अथ प्रभूतान्यन्यानि कीर्तयिष्यामि भारत । अनवद्यां मनुं वंशामसुरां मार्गणप्रियाम् ॥ ४५ ॥ अरूपां सुभगां भासीमिति प्राधा व्यजायत । सिद्धः पूर्णश्च बर्हिश्च पुर्णायुश्च महायशाः ॥ ४६ ॥ ब्रह्मचारी रतिगुणः सुपर्णश्चैव सप्तमः । विश्वावसुश्च भानुश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा ॥ ४७ ॥ इत्येते देवगन्धर्वाः प्राधायाः परिकीर्तिताः । इमं त्वप्सरसां वंशं विदितं पुण्यलक्षणम् ॥ ४८॥ प्राधासूत महाभागा देवी देवर्पितः पुरा । अलम्बुपा मिश्रकेशी विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा ॥ १९ ॥ अरुणा रक्षिता चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा । केशिनी च सुवाहुश्च सुरता सुरजा तथा ॥ ५० ॥ सुप्रिया चातिवाहुश्च विख्यातौ च हाहा हहः । तुम्वुरुउचेति चत्वारः स्मृता गन्धर्वसत्तमाः ॥ ५१ ॥ अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा । अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम् ॥ ५२॥ इति ते सर्वभूतानां संभवः कथितो मया । यथावत्संपरिग्यातो गंधर्वाप्सरसा तथा ॥ ५३॥ दो पुत्र और भी उत्पन्न हुए । जनमेजय ' इसके सतान कही गई है । प्राधा ने कश्यप के वीर्य से उपगन्न बहुत मे और भी कहता है, अनवद्या, मनु, अरम्युषा, मिस्रकेगी, विद्युत्पणी, तिलोचमा, अरणा, चशा, अमरा, मार्गणप्रिया, अम्पा, सुभगा, और रक्षिना, रम्भा, मनोरमा, केशिनी, सुवाहु, मुरता, भामी यह प्राधा की मतान है । सिद्ध, पूर्ण, यहि मुरजा, और मुप्रिय नाम की अप्सराओं को और पूीयु, ब्रममारी, रनिगुण. मुपर्ण, विश्वावसु, मुचद्र अतिबाह, हाहा, हह और तुयुरु इन चार गन्धर्वा और भान या इनन देवनाआके गन्धर्व प्राधा की को उत्पन्न क्यिा ॥४॥२॥ - Awa अध्याय .. ] महाभारत भुजङ्गानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा । गवां च ब्राह्मणानां च श्रीमतां पुण्यकर्मणाम् ॥ ५४ ॥ आयुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः । श्रोतव्यञ्चैव सततं श्राव्यञ्चैवानसूयता ॥ ५५ ॥ इमं तु वशं नियमेन यः पठेन्महात्मनां ब्राह्मणदेवसन्निधौ । अपत्यलाभ लभतेस पुष्कलं श्रियं यशः प्रेत्य च शोभनांगतिम् ॥ ५६ ॥ इति श्रामन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपणि आदित्यादिवशकथने पञ्चपष्टितमोऽध्याय ॥ ५ ॥ पुराणों में कहा है कि, कपिला के गाय, ब्राह्मण सुख पहुचानेवाला होने के कारण सदा पवित्र अमृत आर अन्यान्य गन्धर्व तथा अप्सराएँ पेढा हृदय से सुनाने और सुनने के योग्य है । जो मनुष्य हुई । मैने आपके आगे यह गन्धर्व, अप्सरा, नाग, देवता ओर ब्राह्मणों के आगे इस महात्मा महपियों गरुड, रुद्र, मरुद्गण, गाय, ब्राह्मण आदि सबकी की वशावली का नियम से पाठ करता है, उसको उत्पत्ति का वृत्तान्त वर्णन कर दिया है। यह आस्यान पुत्र, धन, कीत्त और अन्त को उत्तम गति प्राप्त आयु को बढाने वाले, पुण्यदायक धन्य, कानों को होती हे ॥५३॥ ६॥ आदिपर्व का पैंमठवा अध्याय ममाप्त हुआ । अथ पत्पष्टितमोऽध्याय || || वैशम्पायन ग्वार ब्रह्मणो मानसाः पुत्राविदिताः पण्महर्पयः । एकादश सुता स्थाणोः ग्याताः परमतेजसः ॥ १ ॥ मृगव्याधश्च सर्पञ्च निर्गतिश्च महायशाः । अजेकपादर्बुिध्न्यः पिनाकी च परंतपः ॥ २ ॥ दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः । स्थाणुर्भगउच भगवान्द्रा एकादश स्मृताः ॥ ३ मरीचिरविरा अत्रि. पुलस्त्यः पुलह. क्रतुः । पडेते ब्रह्मणः पुत्रा वीर्यवन्तो महर्षय. ॥ ४ ॥ ॥ ठामठा अध्याय ६६॥ सम्पायन ने कहा है राना ननमेनय ब्रमा इश्वर, कपाली, म्याणु मग, यह महातनम्बी ग्यारह के पूर्वाक्त छ मानमी पुत्रों के मिपाय स्थाणु नाम न्द्र उत्पन्न हुए । ममा के मरीचि, अत्रि, अग्निग, एक आर पुत्र थे । म्याणु के मगव्याध, माप पुलम्त्य, पुरह आर मतु ये छ मानमी पुत्र उत्पा निति अनकान, महिवत्र्य, पिनाकी, दहन, हुए ॥१४॥ ॥

महाभारत [ आदिपर्व : त्रयस्त्वगिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः । बृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः ॥ ५ ॥ अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्रूयन्ते मनुजाधिप । सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्षयः ॥ ६ ॥ राक्षसाउच पुलस्त्यस्य वानराः किन्नरास्तथा । यक्षाश्च मनुजव्याघ्र पुत्रास्तस्य च धीमतः ॥ ७ ॥ पुलहस्य सुता राजन्शलभाश्च प्रकीर्तिताः । सिंहाः किंपुरुषा व्याघ्रा यक्षा ईहामृगाम्तथा ॥ ८ ॥ क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः । विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः ॥ ९ ॥ दक्षस्त्वजायतागुष्ठाइक्षिणाद्भगवानृषिः ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः ॥ १० ॥ वामादजायतागुष्ठाद्भार्या तस्य महात्मनः । तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः ॥ ११ ॥ ताः सर्वास्त्वनवद्यांग्यः कन्याः कमललोचनाः । पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः ॥ १२ ॥ ददो स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे । दिव्येन विधिना राजन्कश्यपाय त्रयोदश ॥ १३ ॥ अङ्गिरा के वृहम्पति, उतथ्य और सरर्त यह साठ हजार बालखिल्य मषि उत्पन्न हुए ॥५२॥ तीन त्रिरोष प्रसिद्ध पुन हुए । अनि के कई पुत्र ब्रह्मा के दाहने अगूठे से महातपम्वी शान्त हुए । वे सब वेदों के मर्म को जाननेवाले, सिद्ध, चित्त दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए । इसके पश्चात् वाय धमाशीर और महातपम्ची थे । हे राजन 'पुरत्म्य अगुठे से एक कन्या उत्पन्न हुई । ब्रहमा ने उस यापिके वश में राक्षम, वानर, मिनर और यक्ष कन्या से दक्ष प्रजापति का विवाह कर दिया । दक्ष उसन हुए । पुरह के गरम, सिंह, विपुम्प, बाघ, के उस स्त्रा में पञ्चास मुन्दरी कन्याएँ उत्पन्न हुई । छ, मटिये आदि पाणा उत्पन्न हुए | प्रतु के रे मर कन्या उत्तम अग और कमल के सदृश मा-गहश पवित्र, मयंक में प्रमिद्ध, मत्यवादी, नेवारी थीं और दक्ष प्रजापति के पुनसन्तान मना में नग, गर्य जांग नरने वाले, महातनम्धी न होने में उमने उनको पुत्रिका बनाया । उस - - 1 अध्याय महाभारत . नामतो.धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निवोध मे । कीर्तिलक्ष्मीधृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा ॥ १४ ॥ बुद्धिलजा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य तादश । द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयंभुवा ॥ १५ ॥ सप्तविंशतिः सोमस्य पल्यो लोकस्य विश्रुताः । कालस्य नयने युक्ताः सोमपत्न्यः शुचित्रताः ॥ १६ ॥ सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः । पैतामहो मुनिवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः । तस्याप्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम् ॥ १७ ॥ धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूपश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १८ ॥ धूम्रायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा । चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा ॥ १९ ॥ रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शांडिल्याश्च हुताशनः । प्रत्यूपश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ ॥ २० ॥ धरस्य पुत्रो द्रविणो हुनहव्यवहस्तथा । ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः ॥ २१ ॥ सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जायते । महात्मा ने दस कन्याएँ तो धर्म को, मत्ताईस कन्याएँ थी । उमसे घर, ध्रुव, सोम, अह , अनिल, अनल, चन्द्रमा को और तेरह कन्याएँ कश्यप को दी। प्रत्यूप और प्रभास यह आठ वसु उत्पन्न हुए । नया कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, के मनु और मनु के प्रजापति हुए । प्रजापति के लजा और मति-यह धर्म की दस स्त्रिया है । ब्रह्मा घूम्रा नाम घी में घर और ब्रह्मवेता ध्रुव, मनम्विनी ने यह धर्म के द्वार बनाये हैं ।।१०।१५|| में सौम, श्वासा में अनिल, रता में अह., शाण्डिल्या चन्द्रमा की सत्ताईस स्त्रिया काल निरपण वरती में अनल और प्रभाता, प्रत्यूप और प्रभास इस प्रकार हुई संसार का काम चलाने के लिये अश्विनी, भरणी आठ वसु उत्पन्न हुए ॥१६॥२०॥ आदि नक्षत्रों के नाम में प्रसिद्ध है । दक्ष के वसु घर के पुत्र द्रवण और हुतहव्य हुए। व नाम की एक और कन्या थी, वह भी धर्म को व्याही का पुत्र सब समार का प्रलय करनेवाला भगवान् SAREsss ३ महाभारत [जापा मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा ॥ २२ ॥ अहः सुतस्तथाज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः । अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्च्छरवणालयः ॥ २३ ॥ तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः । कृत्तिकाऽभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः ॥ २४ ॥ अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः । अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु ॥ २५ ॥ प्रत्यूपस्य विदुः पुत्रमृपि नाम्नाऽथ देवलम् । द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीपिणौ । वृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी ॥ २६ ॥ योगसक्ता जगत्कृत्स्नमसक्ता विचचार ह । प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह ॥ २७ ॥ विश्वकर्मा महाभागो जने शिल्पप्रजापति । कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशाना च वर्धकिः ॥ २८॥ भूपणाना च सर्वेषां कर्ता शिल्पवता वर । यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह ॥ २९ ॥ मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्प महात्मनः । पूजयन्ति च य नित्य विश्वकर्माणमव्ययम् ॥ ३० ॥ कार हुआ। सोम का पुत्र वर्चा हुभा । मनोहरा जातगति नाम के दो पुत्र उत्सन हुए । प्रन्युष के के तीन पुत्र शिशिर, प्राण और रमण हुए । अहन् दवल नाम मपि उत्पन्न हुए । रेवल के दयावान् के ज्योति, गम, शाति, मुनि, यह चार पुत्र रत्पन्न और बुद्धिमान् दो पुत्र उत्पन्न हुए । ब्रह्मा का कहन हुए । गोभायुक्त गरा के वन में मारदा अग्नि थाली आर स्त्रिया म उत्तम हम्पति की बहिन का पुत्र हुआ। उसके पश्चात् शाख, विशाख और ब्रह्मनान प्राप्तकर योगाभ्यास से मिद्धावस्था को पहुच नगमेय उत्पन्न हुए । छ वृत्तिकाओं न माता वन कर निर्लिप्तभार म मर जगह विचरा करती थी, वह कर कुमार देवश पाल क्यिार, दसम उन्हें जाति आठ यमु प्रभास की भार्या थी । शिल्पविद्या का य भी करते है ||१|| प्रजापति बड़े भाग्याला विश्वकर्मा मिसे उत्पन्न वायु के निया नाम मा में मनोजव और अनि हुआ जो हजारों प्रकार की गिर विद्या को प्रकाश . Awareasna अध्याय महाभारन A स्तनं तु दक्षिणं भित्वा ब्रह्मणो नरविग्रहः । निःसृतो भगवान्धर्मः भगवान्धर्मः सर्बलोकसुखावहः ॥ ३१ ॥ त्रयस्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः । शमः कामश्च हर्पश्च तेजसा लोकधारिणः ॥ ३२ ॥ कामस्य तु रतिर्भार्या शमस्य प्राप्तिरङ्गना । नन्दा तु भार्या हर्पस्य यासु लोकाः प्रतिष्टिताः ॥ ३ ॥ मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः । जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥ ३४ ॥ त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या बडवारूपधारिणी । असूयत महाभागा साऽन्तरिक्षेऽश्विनावुभौ ॥ ३५॥ द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्यानराधिप । तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्टिताः ॥ ३६ ॥ त्रयस्त्रिंशत इत्यते देवास्तेपामहं तत्र । अन्वयं संप्रवक्ष्यामि पक्षश्च कुलतो गणान् ॥ ३७॥ रुद्राणामपरः पक्षऽसाध्यानां मरुतां तथा । विद्याद्विश्वेदेवांस्तथैव च ॥ ३८॥ करनेवाला और देवताओं का शिल्पी था। वह था और कठ्यप के हे जनमेजय ' मुर और असुर सब प्रकार के आभूषणों का बनानवाला और शिल्प- दो पुत्र उत्पन्न हुए । वहीं मवक आदि-पुरुष है । विद्या में श्रेष्ठ था, जिसने देवताओं के दिव्य विमानों इसके पश्चात् मूर्य के न्वष्टा नामक बी में दोनों को बनाया । उस महात्मा के निकाले कार्यों में मत्र अश्विनीकुमार आकाग में उत्पन्न हुए । कश्यप की मनुष्य अपनी जीविका चलाते हैं । इमीमे विश्व- बी अदिति के बारह पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें इन्द्र कर्मा मब पूजनीय है ॥२५/३०]] मर मे बहे और विष्णु मब में छोटे थे । विष्णु इसके अनन्तर ब्रह्माजी के दहिन स्तन को ही मन ममा के आधार हैं ॥३॥३॥ फोड़कर निररूपधारी भगवान् धर्म उत्पन्न हुए । आठ वमु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापनि उनके शम, काग और हर्प नामी तीन पुत्र बड़े और वषट्कार यह तेतीम देवना है । इनके वंग, मुन्दर और तेजम्बी हुए । इन तीनों का विवाह पक्ष, कुन और गणों का वर्णन करना हूं । म्द्र, प्राप्ति, रनि और नन्दा नाम नियों में हुआ । इन्हीं माध्य, माल, यमु, विश्वदेवा और मार्गव- यह पृथक, मे यह मार लोकधित है । मगच का पुत्र कश्यप पृथर देवताओं के पक्ष है ! विनता का पुत्र गम् वसूनां भार्गवं । क ३१८ महाभारत [ आदिपव वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा । बृहस्पतिश्च भगवानादित्यप्वेव गण्यते ॥ ३९ ॥ अश्विनी गुह्यकान्विद्धि सर्वोषध्यस्तथा पशून् । एते देवगणा राजन्कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः ॥ १० ॥ यान् कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते । ब्रह्मणो हृदयं भित्वा निःमृतो भगवान्भृगुः ॥ ४१ ॥ भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्च्छुकः कविसुतो ग्रहः । त्रैलोक्यप्राणयात्रा) वर्षाव भयाभये । स्वयंभुवा नियुक्तः सन्भुवनं परिधावति ॥ ४२ ॥ योगाचार्यों महाबुद्धिदैत्यानामभवद् गुरुः । सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः ॥ ४३ ॥ तस्मिन्नियुक्त विधिना योगक्षेमाय भार्गवे । अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम् ॥ ४४ ॥ च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम् । यः स रोपाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत ॥ ४५ ॥ आरुपी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः । आर्वस्तस्यां समभवदूर भित्त्वा महायशाः ॥ ४६ ॥ अरण भगवान वृदम्पति यह देवताओं में गिने जाते को करता है ॥३७॥४२॥ हैं। अश्विनीकुमार, यक्ष, मप औषधिया और पशु वह योगाचारी होता हुआ बड़ा बुद्धिमान, आदि की मन्या भी देवताओं में ही है । हे राजन् ! ब्रह्मचारी और व्रतों में तत्पर दैत्यों का गुरु और गा, देवना-गण प्रम में तुमको वह दिये हैं। मनुष्य वृहम्पतिरूप बनाकर देवताओं का भी गुरु रहा । उन देवनाओं का बनिन करके सब पापों में घट ब्रह्माजी की आजा मे समार के कल्याण करने में जान है । भगवान भृगु ग्राषि ब्रह्मा के हृदय को उम शुक्र के नियुक्त होने पर भृगु ने निन्दा रहित भदका उत्पन्न हुए। उसका पुत्र विद्वान कवि और प्रकाशमान्, तपम्वी, यशम्बी, धर्मात्मा, यवन माजी भिगक्य की रक्षा के रिय वर्षा नामक दृमेरे पुत्र को उत्पन्न किया । सक्षम के द्वारा पादाना न होना, भय पाना न होना, इन माना काहग जाना देवकर उगी रक्षा के रिये, पा में प्रभा में निपुत किया हुआ अपने कार्य शोध के मांर गर्भ में पहले ही निकल आने के " www.ka.

1 अध्याय ६६ )
महाभारत
महातेजा महाबीर्यो वाल एव गुणैर्युतः ।
ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत् ॥ ४७ ॥
जमदग्नेस्तु चत्वार आसन्पुत्रा महात्मनः ।
रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः ।
सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी ॥ १८ ॥
और्वस्यासीत्पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम् ।
तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः ॥ ४९ ॥
द्वौ पुत्री ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम् ।
लोके धाता विधाता च यो स्थिती मनुना सह ॥ ५० ॥
तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा ।
तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः ॥ ५१ ॥
वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद्देवी व्यजायत ।
तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम् ॥ ५२ ॥
प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात्
अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः ॥ ५३॥
तस्यापि निऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः ।
घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्रा
पापकर्मरताः सदा ॥ ५४ ॥
कारण ये च्यवन कहलाये। मनु की कन्या आस्पी
के माथ उसका विाह किया । उस आस्पीम और्व रषि क मी पुत्र रसन्न हुए । जमनामि
च्यवन में उसकी जघा को फाड औ नाम आदि उनके हजारों पुत्र हुए, निनका विस्तार इम
पुन उत्पन्न हुआ । आर मपि रडा नम्बी पृथ्वी में फैला हुआ है । इसके उपरान्त ब्रह्माना
बलवान् और बाल कपन ही म सम्पूर्ण गुणों से युक्त के दो पुत्र धाना आर विधाता नाम से उत्पन्न हुए,
था । उसका पुत्र ऋचा हुआ । मचीक का पुत्र तो दानों मनु के साथ रहत है । उनकी रहिन
जमदग्नि हुआ। उस पहात्मा नमामि के चार पुत्र कमर में रनेवाली रन्मा है। आकागचारा पाई
हुए ! उन चारों में परशुगम सब में छाग था । रक्ष्मी के मन मे तन्न पुत्र है। रुण के वीर्य
वह मर गुणा में परिपूण, मत्र ग्रामों म कुशल, से वरण की ज्येष्ठा भार्या में वन नाम पुत्र और
अत्रियों का नाश करनेवाय और निद्रि था मुग नाम कन्या मुरा को आनद देनेवाली हुई।
॥४३॥४८॥

३२० महाभारत { आदिपर amarrior भयो महाभयश्चैव मृत्युभूतान्तकस्तथा । न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः ॥ ५५ ॥ काकी श्येनी तथा भासी धृतराष्ट्रीं तथा शुंकीम् । ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः ॥ ५६ ॥ उलूकान्सुपुवे काकी श्येनी येनान्व्यजायत । भासी भासानजनयद गृश्चैिव जनाधिप ॥ ५७।। धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः । चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु ॥ ५८ ॥ शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी । कल्याणगुणसंपन्ना सर्वलक्षणपूजिता ॥ ५९ ॥ नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञे क्रोधसंभवाः । मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि ॥ ६० ॥ मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वता सुरभिरेव च । चैव भामिनी ॥ ६१ ॥ अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम । ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः स्मृमराश्च परंतप ॥६२ ॥ ततस्वैरावतं नागं जजे भद्रमनाः सुतम् । ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः ॥ ६३ ॥ हमके पश्चात जय प्रजा भूस्व मे व्याकुल परम्पर एक शुकी-यह पांच कन्याएँ उत्पन्न हुई ॥१९५६।। दूसरे को मारकर भक्षण करने लगी, तब उमसे सब काकी के उलूक पुत्र हुए और श्वनी ने बाजी प्राणियों का नाश करने वाले. अधर्म की उत्पत्ति का उत्पन्न किया । भामी ने भास और गृद्धों को हुई। अधर्म की निर्मनि भायर्या ने राक्षमी को उत्पन्न उत्पन्न किया । धृतराष्ट्री के गर्भ में कलहंस दिया। अधर्म पंप और पाप कर्म का मान. और चकया पक्षी और शुकी के गर्भ में तोते पैदा चार भय, महामय और मय प्राणियों का अन्त करने एए । कश्यप की दुसरी भार्या से क्रोधा के मृगी, याग मन्यु । मृत्यु का न कोई मारे और न पुत्र । मृगमन्दा, हर्ग, भद्रमना, मातही, शादी, धना, माण यह मावा अन्न व नवान्गाश्यप मुरभि ार मुरमा-यह नी कन्याएं उतन्न हुई। कामी नापाक की नीभामा नगष्टा और गजाओं में श्रेष्ठ जनगंजय : मृगी, पुन मम्पूर्ण सर्वलक्षणसंपन्ना सुरमा हस, अध्याय ६६] महा मारने ३ anmidianawowwwmarwarentrwsawrawwwdwon । हर्याश्च हरयोऽपत्वं वानराश्च तरस्विनः । गोलायूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान्प्रचक्षते ॥ ६ ॥ प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान्व्याघ्राननेकशः । द्वीपिनश्च, महासत्त्वान्सर्वानेव न संशयः ॥ ६५ ॥ मातङ्ग्यपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप । दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वताऽजनयदाशुगम् ॥ ६६ ।। तथा दुहितरौ राजन्सुरभिर्वे व्यजायत । रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी ॥ ६७ ॥ विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत । रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धा वाजिनः सुताः ॥ ६८ ।। मप्त पिण्डफलान्वृक्षाननलाऽपि व्यजायत । अनलायाः शुकी पुत्री कङ्कस्तु सुरसासुतः अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महावलौ ॥ ६ ॥ संपार्ति जनयामास वीर्यवन्तं जटायुपम् । सुरसाऽजनयन्नागान्कः पुत्रांस्तु पन्नगान् ॥ ७० ॥ द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यात्तो गरुडारुणौ । इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप । प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतांवरः ॥ ७१ ।। मृग हुए। हे शत्रुओ को नाप देनेवाले जनमजय ! चार कन्याएँ उत्पन्न हुई । रोहिणी के गर्भ से गायें मृगमन्दा के गर्म मे गछ और छोटी जाति के हरिण और गन्धर्वी के गर्भ मे घोडे उत्पन्न हुए । अनला हुए । भद्रमना के गर्भ से गवत हाथी उत्पन्न हुआ। के गर्भ मे खजूर, ताल, हिन्ताल, ताली, खजूरिका, हरी के गर्भ मे वानर और बड़े बंगवाले लगृर सुपारी और नारियल के सात पिण्ट-फल वृक्ष उत्पन्न पुत्र उत्पन्न हुए । माली के गर्भ मे मिह, व्याघ्र, हुए । अनला की पुत्री शुकी और मुरमा का पुत्र द्वीप, यह बडे बलवान पुत्र उत्पन्न हुए ॥५७६६|| कंक हुआ । अरुण की बी श्रेनी के बड़े बलवान मानगी के गर्भ मे हाथी उसन्न हुए । ध्येता सम्पाती और जटायु दो पुत्र उत्पन्न हुए । इमके के गर्भ मे श्वेत नाम दिग्गज और सुरभि के गर्भ पश्चात् सुरसा के नाग, कट्ट मे मर्प और विनता से मे रोहिणी, गन्धवी, विमला और अनला नाम की गह और अरुण उत्पन्न हुए । हे राजन् जनमेजय महाभारत [ রাখি। यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः । सर्वज्ञतां च लभते गतिमग्न्यां च विन्दति ॥ ७२ ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि पट्पष्टितमोऽध्याय || ६६ ॥ यह सब बड़े बड़े प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और मैंने अच्छी प्रकार तुम्हारे आगे कह दिया है। इमको सर्वज्ञता प्राप्त कर उत्तम गति को जाता है ॥६७/७२॥ आदिपर्व का छामठवां अध्याय समाप्त हुआ । अथ मतपष्टितमोऽध्याय ॥ ६ ॥ जनमेजय उवाच-देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् । सिंहव्याघमृगाणां च पन्नगानां पतत्रिणाम् ॥ १ ॥ सर्वेषां चैव भूतानां संभवं भगवन्नहम् । श्रोतुमिच्छामि तत्वेन मानुषेषु महात्मनाम् । जन्म कर्म भूतानामेतेषामनुपूर्वशः ॥ २ ॥ वैशंपायन याच मानुपेषु मनुष्येन्द्र संभूता ये दिवौकसः । प्रथमं दानवांश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः ॥ ३ ॥ विप्रचित्तिरिति ग्यातो य आसीहानवर्षभः । जरासन्ध इनि ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः ॥ ४ ॥ दितेः पुत्रस्तु यो राजन्हिरण्यकशिपुः स्मृतः । म जजे मानुपे लोके शिशुपालो नरर्षभः ॥ ५ ॥ महाद इति विग्यातः प्रहादस्यानुजस्तु यः स शल्य इति विग्यानो जज्ञे वाहीकपुङ्गवः ॥ ६ ॥ . - । मगटया अध्याय ६७ || नमंजय बोरे कि, देवता, दानय गन्धर्व, ने कागजा जनमेजय ' मनुष्यों में जो देवता स, सक्षम, मिह, व्याघ्र, मृग, पन्नग, पक्षी और और दाना पैदा हुए, उनम प्रथम दानवों की उत्पति भी मब प्राणियों की मनुष्य जाति में उत्पन्न होने माना। दत्यराज प्रिनिति जगस.ध नाम का समान यथार्थ गनि में और उनर जन्म भार गजाआ । दिति का पुत्र हिरण्यकशिपु निशुगर पाया प्रम में मनना चाहता पायन गजा हुआ । प्रहाद का छोटा भाई मदाद नाम• । अ याय ६७ महाभारत ३२३ अनुहादस्तु तेजस्वी योऽभूत्ख्यातो जघन्यजः । धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः ॥ ७ ॥ यस्तु राजञ्च्छिवि म दैतेयः परिकीर्तितः । द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद्भुवि पार्थिवः ॥ ८ ॥ वाकलो नाम यस्तेपामासीदसुरसत्तमः । भगदत्त इति ख्यातः स जजे पुरुषर्षभः ॥ ९ ॥ अयःशिरा अश्वशिरा अयः शड्कुश्च वीर्यवान् । तथा गगनमूर्धा च वेगवांश्चात्र पञ्चमः ॥ १० ॥ पञ्चैते जज्ञिरे राजवीर्यवन्तो महासुराः । केकयेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः । केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यः प्रतापवान् ॥ ११ ॥ अमितौजा इति ग्व्यातः सोग्रकर्मा नराधिपः । स्वर्भानुरिति विग्न्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः ॥ १२ ॥ उग्रसेन इति ग्यात उग्रकर्मा नराधिपः । यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः ॥ १३ ॥ अशोको नाम राजाऽभून्महावीर्योऽपराजितः । तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः ॥ १४ ॥ दैतेयः सोऽभवदाजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः । वृपपति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः ॥ १५ ॥ वाला पाहिकों म श्रेष्ठ राना गाय हुआ ॥२॥ म्वानु असुर उग्र कम मग्नंगला उप्रेमन नाम का उमी का छोटा भाइ अनुद्दाद धृष्टकेतु नाम राना हुआ । अश्व नाम का असुर अपरानित महा का राजा हुआ। शिविदैत्य दुम नाम का गजा हुआ । पराक्रमी अशोक नाम का गना हुआ। अश्व का चाकर अमुर श्रेष्ठ भगदत्त राना के नाम से प्रसिद्ध छोटा भाइ अश्वपति हार्दिक्य राना हुआ । वृपपी हुआ । अय गिरा, अश्वगिरा, वीर्य गन् अश्वगा, असुर दीर्घप्रज नाम का राना हुआ । वृपपा का गगनमूर्धा, वेगवान ये पान महावरी असर छोटा भाई अजक नामवाला गाल्व नाम में पृथ्वी क्यंदा में टं गना हुए । रेतुमा में प्रसिद्ध हुआ। अश्वीर अमर रोचमान नाम महाप्रतापी अमुर उग्रकमा नामवालग राजा हुआ। का राजा हुआ । वहा बुद्धिमान् और काचिमाम् नाम का महाभारत [ आदिपर्व दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । अजकस्त्ववरो राजन्य आसीवृषपर्वणः ॥ १६ ॥ स शाल्व इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः । अश्वग्रीव इति ख्यातः सत्त्ववान्यो महासुरः ॥ १७ ॥ रोचमान इति ग्ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । सूक्ष्मस्तु मतिमान्राजन्कीर्तिमान्यः प्रकीर्तितः ॥ १८ ॥ बृहद्रथ इति ख्यातः क्षितावासीत्स पार्थिवः । तुहुण्ड इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः ॥ १९ ॥ सेनाविन्दुरिति ख्यातः स बभूव नराधिपः । इपुपान्नाम यस्तेपामसुराणां बलाधिकः ॥ २० ॥ नग्नजिन्नाम राजाऽऽसीद्भुवि विख्यातविक्रमः । एकचक्र इति ख्यात आसीद्यस्तु महासुरः ॥ २१ ॥ प्रतिविन्ध्य इति ख्यातो बभूव प्रथितः क्षितौ । विरूपाक्षस्तु दैतेयश्चित्रयोधी महासुरः ॥ २२ ॥ चित्रधति विग्व्यातः क्षितावासीत्स पार्थिवः । हरस्त्वरिहेरा वीर आसीद्यो दानवोत्तमः ॥ २३ ॥ सुबाहुरिति विख्यातः श्रीमानासीत्स पार्थिवः । अहरस्तु महातेजाः शत्रुपक्षक्षयंकरः ॥ २४ ॥ बाह्रीको नाम राजा म बभूव प्रथितः क्षितौ । आसीदसुरोत्तमः ॥ २५॥ महम अमर पादय गजा तुआ। अमुंगे में उत्तम शत्रुओं के नाम करनेवाला हरनाम का असर हुण्ट अमर मेनारिंदु गजा हुआ । यड़ा बयान पश्चर्ययुक्त मुबाहु नाम से प्रसिद्ध हुआ । शत्रुनाशी असर पुगन नागिन नामवारा गजा हुआ । आर नामबाग नेजम्बी असुर प्रवी में प्रसिद्ध नाम का अगर प्रनिपिन्य नामगा। वाहीक राजा हुआ । निचन्द्र नाम का असुर ऐश्वर्य- पिट गजा मा। किंचित्र युद्ध करनेवाग युक्त पुजा गया हुआ । अजित अमुर नियुम्भ र विकास विधाता नाम में मिटाआ। नामवार। प्रमिद्ध राजा हुआ । गरम नाम का अमुग : निचन्द्रश्चन्द्रवक्त्रस्तु simirchi अध्याय ६७ ] महाभारत : संख्ये कुपटस्तु महावीर्यः aacaancameoneanse .. मुझकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत्स पार्थिवः । निकुम्भस्त्वजितः महामतिरजायत ॥ २६ ॥ भूमौ भूमिपतिश्रेष्टो देवाधिप इति स्मृतः । शरभो नाम यस्तेषां देतेयानां महासुरः ॥ २७॥ पौरवो नाम राजर्पिः स बभूव नरोत्तमः । श्रीमान्राजन्महासुरः ॥ २८ ॥ सुपार्श्व इति विख्यातः क्षितौ जने महीपतिः । कपटस्तु राजनराजर्षिः क्षितौ जने महसुराः ॥ २९ ॥ पार्वतय इति ख्यातः काञ्चनाचलसन्निभः । द्वितीयः शलभस्तेपामसुराणां वभूव ह ॥३०॥ प्रह्लादो नाम बाह्रीकः स बभूव नराधिपः । चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः ॥ ३१ ॥ चन्द्रवर्मेति विख्यातः काम्बोजानां नराधिपः । अर्क इत्यभिविन्यातो यस्तु दानवपुङ्गवः ॥ ३२ ॥ ऋपिको राजर्षिर्वभूव नृपसत्तमः । मृतपा इति विग्यातो य आसीढसुरोत्तमः ॥ ३३ ।। पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम । गविष्टस्तु महातेजा यः प्रग्व्यातो महासुरः ॥ ३४ ॥ द्रुमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । मयूर इति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः ॥ ३५ ॥ पौरय नाम का राजा हुआ । कुपट नाम का असुर दानवों में श्रेष्ठ अर्ब राजाओं में ऋषिक हुआ । मुपार्य नाम का प्रसिद्ध राजा हुआ । कपट नाम मृतपा नाम दैत्य पश्चिम अनुपदेश का राजा हुआ। वाला अमुर सुमेरुपर्वत के समान कान्तिवारा महासुर तेजम्बी गविष्ठ द्रुममेन राजा हुआ । मय- पार्वतेय नाम का राजा हुआ । गरम नाम का असुर रासुर विश्व नामवारा राजा हुआ । मयूर का मार्ट बाहोरदेश का राजा प्रहाद नामराला हुआ॥७॥३१॥ सुपर्ण दैत्य कारफीति नाम +! गजा हुआ । नन्द्रमा के तुल्य दिति का पुत्र चन्द्र नाम अमरों में श्रेष्ठ चन्द्रहन्ता मनुष्यों में श्रेष्ठ शुनक अमुर कम्बोजदेश का राजा चन्द्रवर्मा हुआ। नामयाला राजर्षि हुआ। महा अमुर चंद्र विनागर नाम ३०१ महाभारत { आविषय स विश्व इति विख्यातो बभूव पृथिवीपतिः । सुपर्ण इति विख्यातस्तस्मादवरजस्तु यः ॥ ३६ ।। कालकीतिरिति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः । चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः ।। ३७ ॥ शुनको नाम राजर्पिः स वभृव नराधिपः । विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः ।। ३८ ।। जानकिर्नाम विख्यातः सोऽभवन्मनुजाधिपः । दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः ॥ ३९ ।। काशिराजः स विग्यातः पृथिव्यां पृथिवीपते । ग्रहं तु सुषुवे यं तु सिंहिकाऽन्दुमर्दनम् । स क्राथ इति विख्यातो वभूव मनुजाधिपः ॥ ४० ॥ दनायुपस्तु पुत्राणां चतुर्णा प्रवरोऽसुरः । विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रो नृपः स्मृता ॥ ११ ॥ द्वितीयो विक्षराद्यस्तु नराधिप महासुरः । पाण्ड्यराष्ट्राधिप इति विख्यातः सोऽभवन्नृपः ॥ ४२ ॥ वली वीर इति ग्व्यातो यस्त्वासीदसुरोत्तमः । पौण्डूमात्स्यक इत्येवं बभूव स नराधिपः ॥ १३ ॥ वृत्र इत्यभिविग्न्यातो यस्तु राजन्महासुरः । मणिमान्नाम गजर्पिः स बभूव नराधिपः ॥ ४४ ॥ क्रोधहन्तति यस्तस्य वभूवावरजोऽसुरः । दण्ड इत्यभिविग्व्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ ॥ ४५ ॥ जानकि नामक प्रसिद्ध हुआ। दीर्घजिद नाम का का भाई पाण्ड्यदेश का राजा हुआ ॥३२॥४२॥ दत्य कामिगज हुआ। सिंह का पुत्र मूर्य-चढ़ का बरीचीर असुर पीड्रमत्म्य देश का हुआ । युर मर्दन करनेवाला विगन नामक राजा हुआ। नामक महा असुर मणिमान् नामवाला राजा हुआ। दनायु के नार पुत्रों में सबसे बड़ा विक्षर नामक माधहन्ता नाम का अमर दण्ट नाम का राजा हुआ। जम्मा अापुर यमुभित्र नाम का राजा हुआ । विक्षर माधवर्धन असुर टण्टधार नामक राजा हुआ। कालय अध्याय ६७ ] महाभारत क्रोधवर्धन इत्येवं यस्त्वन्यः परिकीर्तितः । दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजर्पभः ॥ १६ ॥ कालेयानां तु ये पुत्रास्तेपामष्टो नराधिपाः । जज्ञिरे । राजशार्दूल शार्दूलसमविक्रमाः ॥ १७ ॥ मगधेपु जयत्सेनस्तपामासीत्स पार्थिवः । अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेयानां महासुरः ॥ १८ ॥ द्वितीयस्तु ततस्तेषां श्रीमान्हरिहयोपमः । अपराजित इत्येवं स वभूव नराधिपः ॥ १९ ॥ तृतीयस्तु महातेजा महामायो महासुरः । निपादाधिपतिर्जन भुवि भीमपराक्रमः ॥ ५० ॥ तेपामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः । श्रेणिमानिति विख्यातः क्षितो राजर्पिसत्तमः ।। ५१ ।। पञ्चमस्त्व भवत्तेषां प्रवरो यो महासुरः । महोजा इति विग्यातो बभूवह परंतपः ॥ ५२ ॥ पष्टस्तु मतिमान्यो वें तेषामासीन्महासुरः । अभीरुरिति विग्यातः क्षितो राजर्पिसत्तमः ॥ ५३ ॥ समुद्रसेनस्तु नृपस्तेपा मेवाभवद्गणात । विश्रुतः सागरान्तायां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित् ॥ ५४ ॥ वृहन्नामाष्टमस्तपां कालेयानां नराधिप । बभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः ॥ ५५ ॥ नाम दैत्यों के आठ पुत्र मार्दन के ममान विक्रमी चीया श्रेणिमान नाम श्रेष्ट राजपि हुआ । पानया गजे हुए ॥१३॥४७॥ श्रेष्ठ महापुर महीजा नामक प्रसिद्ध गजा हुआ। छटा उनमें मबमे वडा मगधग का जयन्मन मा अनुर राजपियों में श्रेष्ट अमीर नामबाग गा नामा राजा हुआ । उममे छोटा इन्द्र के समान हुआ। मातया अनुर ममुहान पनी में प्रमिट अपगजिन राजा हुआनीमरावडी माया का जानन· धर्मतत्व का जानने वाग ममुद्रमन गता हुआ। वाग, बहा पराक्रमी, निपाटी का राजा हुआ । आटया काय धरमा और मर प्रानियों ३२८ हाभारत [ आदिपर्व chasamastasiaimursana कुक्षिस्तु राजन्विख्यातो दानवानां महाबलः । पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसन्निभः ॥ ५६ ॥ ऋथनश्च महावीर्यः श्रीमान्राजा महासुरः । सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः ॥ ५७ ॥ असुराणां तु यः सूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः । दरदो नाम वाह्रीको वरः सर्वमहीक्षिताम् ॥ ५८ ॥ गणःक्रोधवशो नाम यस्ते राजन्प्रकीर्तितः । ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः ।।.५९ ।। मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थः कटिकस्तथा । सुवीरश्च सुवाहुश्च महावीरोऽथ वाह्निकः ॥ ६० ॥ क्रयो विचित्रः सुरथः श्रीमान्नीलश्च भूमिपः । चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः ॥ ६१ ।। दन्तवक्त्रश्च नामासीदुर्जयश्चैव दानवः । रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः ॥ ६२ ॥ आपादो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः ॥ ६३ ॥ कारूपकाश्व राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च । श्रुतायुम्दहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च ॥६४ ॥ क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिपु नराधिपः । मतिमांश्च मनुप्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः ॥ ६५ ॥ हित नाहनेवाला समुद्र वृहत् नामक राजा हुआ। हे राजा जनमजय ! मैंने जिस क्रोधवश नामक पक्षि नाम का दानय पार्यनीय नाम में प्रसिद्ध गजा अमुरगण का नाम रिया था, उम गण में से पृष्पी भा॥४८॥५६॥ में बड़े बड़े वीर राज उत्पन्न हुए । मद्रक, कर्णवेष्ट, प्रथनु नामक बड़ा पराक्रमी महा अमर पृथ्वी मिद्धार्थ, कीटक, मुवीर, मुबाहु, महावीर, वाहिक, में मूभि नामक प्रमिद गनाआ। मयं नाम का कध,विचित्र, मुरथ, श्रीमान्, नील, चरियासा, कारल्य, अगर दाद नामक बाहादेश का गजा हुआ। भमिपाल, दन्नयात्र, दुर्जय, राजाओं में श्रेष्ठ रुक्मी AM अध्याय ६७ ] म हा भारत C गणात्क्रोधवशादेप राजपूगोऽभवक्षितौ । जातः पुरा महाभागे महाकीर्तिमहावल ॥ ६६ ॥ कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महावलः । स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो वली ॥ ६७ ॥ यस्त्वासीद्देवको नाम देवराजसमद्युतिः । स गन्धर्बपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः ॥ ६८ ॥ बृहस्पतेवृहत्कोतर्देवर्षेर्विद्धि भारत । अंशाद् द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम् ॥ ६९ ।। धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः । महाकीर्तिमहातेजाः स जज्ञे मनुजेश्वर ॥ ७० ।। धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः । वरिष्टं चित्रकर्माणं द्रोणं खकुलवर्धनम् ॥ ७१ ॥ महादेवान्तकाभ्यां च कामात्क्रोधाच्च भारत । एकत्वमुपपन्नानां जज्ञे शूरः परंतपः ॥७२॥ अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः । वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिपः ॥ ७३ ।। जज्ञिरे वसवस्त्वष्टौ गङ्गायां शान्तनोः सुताः । वसिष्ठस्य च शापेन नियोगाद्वासवस्य च ॥ ७४ ॥ जनमेजय, आपाद, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, समान सुन्दर देवक नामवाला असुर गन्धर्वपत्ति मुमित्र, बाटधान, गोमुख, कारुषक राजे, क्षेमधूर्ति, नाम का राजा हुआ। अयोनिज भारद्वाज-पुत्र द्रोणा- श्रुतायु, उद्वह, वृहदैन, क्षेम, उग्रतीर्थ, कलिगदश चार्य देवर्षि वृहम्पति के अंश से उत्पन्न हुआ । है का राजा कुहर, मतिमान और ईश्वर आदि नामवाले राजाओं में श्रेष्ठ जनमेजय ! वह द्रोणाचार्य धनुष- राजे हुए ॥५७६५|| विद्या और अस्त्रविद्या के जाननेवालों में श्रेष्ठ था। क्रोधवश नाम गण से पृथ्वी में वह राजाओं वह बड़ी कीर्तिवाला और तेजम्बी था । उम द्रोणा- का गण उत्पन्न हुआ जो बड़े बडे भागवाला, कीर्ति- चार्य को वेद के जाननेवाले, धनुर्वेद और बेदविया मान और बलवान् था। महापराक्रमी कालनेमि में श्रेष्ठ और चित्रकर्म करनेवाला और अपने पक्ष असुर राजा उग्रसेन का पुत्र केस हुआ । इन्द्र के का बढ़ानेवाला मानते थे । महादेवअन्तक काम -~- महाभारत { आदिपय तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभयंकरः । मतिमान्वेदविद्वाग्मी शत्रुपक्षक्षयंकरः ॥ ७५॥ जामदग्न्येन रामेण सर्वास्त्रविदुपां वरः । योऽयुध्यत महातेजा भार्गवेण महात्मना ॥ ७६ ॥ यस्तु राजन्कृपो नाम ब्रह्मर्पिरभवक्षितौ । रुद्राणां तु गणाद्विद्धि संतभूमतिपौरुषम् ॥ ७७॥ शकुनि म यस्त्वासीद्राजा लोके महारथः । द्वापरं विद्धि तं राजन्संभूतमरिमर्दनम् ॥ ७८ ॥ सात्यकिः सत्यसन्धश्च योऽसौ वृष्णिकुलोद्वहः । पक्षात्स जज्ञे मरुतां देवानामरिमर्दनः ॥ ७९ ॥ द्रुपदश्चैव गजर्पिस्तत एवाभवद्गणात् । मानुपे नृप लोकेऽस्मिन्सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ८० ॥ ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम् । तमप्रतिमकर्माणं क्षत्रियर्षभसत्तमम् ॥ ८१ ॥ मरुतां तु गणाद्विद्धि संजातमरिमर्दनम् । विराटं नाम राजानं परराष्ट्रप्रतापनम् ॥ ८२ ॥ अरिष्टायास्तु यः पुत्रो हम इत्यभिविश्रुतः । स गन्धर्वपतिर्ज कुरुवंशविवर्धनः ॥ ८३ ॥ और क्रोध इन चारों देवताओं के अश से सम्पूर्ण का नाश करने वाले और अस्त्रविद्या के जाननेवाली वेदशाम और अरविद्या के जाननेवाले द्रोणा में श्रेष्ठ भीष्म ने भृगुवशि महात्मा जमदग्नि के पुत्र चार्य के महावीर और बडा तजम्बी, कमलनयन परशुराम के साथ युद्ध किया। महापराक्रमी बपि अश्वत्थामा नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ । आठा वसु कृपाचार्य रुढगण के अश से उत्पन्न हुआ। शत्रु यशिष्ठ के शाप और इन्द्र की आजा मे, गड़ा के मर्दन महावीर राजा शकुनि का जन्म द्वापर में अश गर्भ मे राना गान्तनु के यहा उत्पन हु" ||६६१७४|| से हुआ। सत्यप्रतिज्ञ यादर सात्यकि ने मरुदण भान्ननु का आटगा पुत्र सबमे छोरा प्रताप के पक्ष में जन्म लिया । राजर्पियों में श्रेष्ठ द्रुपद भीष्म हुआ । उम कुरुवागियों के भय का दूर करने भी मम्दगण के ही अश से उत्पन्न हुआ |७५/८०॥ वार, बुद्धिमान्, वेदश, बोरने में चतुर, गनुपक्ष है राजा जनमेजय । अजित क्षत्रिय राजाओं A-A--- अभ्याय ६७ महाभारत ३३१ धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपायनात्मजः । दीर्घवाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः । मातुर्दोपाहपेः कोपाढन्ध एव व्यजायत ॥ ८ ॥ तस्यैवावरजो भ्राता महासत्त्वो महाबलः । स पाण्डुरिति विख्यातः सत्यधर्मरतः शुचिः ॥ ८५ ॥ अत्रेस्तु सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम् । विदुरं विद्धि तं लोके जातं बुद्धिमतां वरम् ॥ ८६ ॥ कलेरंशस्तु संजने भुवि दुर्योधनो नृपः । दुर्बुद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामयशस्करः ॥ ८७॥ जगतो यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपूरुषः । यः सर्वां घातयामास पृथिवीं पृथिवीपते ॥ ८८ ।। उद्दीपितं येन वैरं भूतान्तकरणं महत । पौलस्त्या भ्रातरश्चास्य जनिरे मनुजेष्विह ॥ ८९ ॥ शतं दुःशासनादीनां सर्वेषां क्रूरकर्मणाम् । दुर्मुखो दुःमहश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ९ ॥ दुर्योधनसहायास्ते पौलस्त्या भरतर्षभ । वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः ॥ ९१ ॥ जनमेजय उवाच-ज्येष्ठानुज्येष्टतामेषां नामधेयानि वा विभो में श्रेष्ठ कृतवर्मा भी उमी अग में उत्पन्न हुआ । ओर बुद्धिमान् विदुर का जन्म हुआ। दुर्बुद्धि दुर्मनि शत्रुओं के राज्य को ताप देनेवाला कार के समान ओर कारववश के रिय कला का टीका गजा राजा विराट भी मरुद्गण के अग में उत्पन्न हुआ। दुर्योधन कलियुग के अध में उत्पन्न हुआ। हे यामनी का पुत्र प्रज्ञाचक्षु महातेजम्बी राजा धृतराष्ट्र राजन् ' वह दुर्योधन सर जगन का द्वषी और मारी अरिष्टा के पुत्र हस नाम गन्धपति के अग मे पृथ्वी के नाश का हेतु हुआ । अत्यन्त दूर कर्म उत्पन्न हुआ। वह अपनी माता के दोष और मपि करनेवारे दुशासन, दुर्मुम्ब, दुम्मह आदि दुर्योधन के कोप मे अन्धा उत्पन्न हुआ । उमा छोटा भाई आदि के मौ माई पारम्य नाम के दानों के अश अति बुद्धिमान् और बलवान् सत्यधर्म में रत, राजा मे उसन्न हुए । धृतराष्ट्र के वैश्या के गर्भ मे युयुत पाण्डु उत्पन्न हुआ । मूर्य के पुत्र धर्मराज से श्रेष्ठ नाम का एक और पुत्र उत्पन्न हुआ ||८१०१॥ .. - ३३० महाभारत [ आदिपर्व धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्येण कीर्तय ॥ ९२ ॥ वैशम्पायन उवाच -दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन्दुःशासनस्तथा । दुःसहो दुःशलश्चैव दुर्मुखश्च तथा परः ॥ ९३ ।। विविंशतिर्विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः । विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुवाहुर्दुष्प्रधर्षणः ॥ ९४ ॥ दुर्मर्पणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च । चित्रोपचित्री चित्राक्षश्चारुचित्राङ्गदश्च ह ॥ ९५ ।। दुर्मदो दुष्प्रहर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः । ऊर्णनाभः पद्मनाभस्तथा नन्दोपनन्दको ॥ ९६ ॥ सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौं । चित्रबाहुश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ॥ ९७ ।। अयोवाहुमहावाहुश्वित्रचापसकुण्डलो भीमवेगो भीमवलो वलाकी भीमविक्रमः ॥ ९८ ॥ उग्रायुधो भीमशरः कनकायुदृढायुधः । दृढवर्मा दृढभत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ॥ ९९ ॥ जरासन्धो दृढसन्धः सत्यसन्धः सहस्त्रवाक् । उग्रश्रवा उग्रसेनः क्षेममूर्तिस्तथैव च ॥ १०० ॥ अपराजितः पण्डितो विशालाक्षो दुराधनः ॥ १०१ ॥ दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगमुवर्चसौ । आदित्यकेतुर्वह्वाशी नागदत्तानुयायिनी ॥ १०२ ॥ जनमेजय ने कहा है वशम्पायन ' इन धृतराष्ट्र विन्सु, विक्ट, मम, ऊर्णनाम, पद्मनाभ, नद, के पुत्रों के नाम प्रम में मुझ सुनाओ । वैशम्पायन उपनन्द, मेनापति, सुपण, कुण्डोदर, महोदर, चित्र ने कहा नगष्ट के गान्धारी में दुर्योधन, युयुत्सु, बाहु, चित्रयमा, मुर्मा, दुविरोचन, अयोबाहु, महा द गामन, दु महादु गर, दुर्गुग्ग, विपिंगनि, विषण, बाहु, चित्रचाप, मुकुण्दर, भीमवेग, भीमवर, रमन्ध, मुन्रोचन, विद, अनुविंद, टुर्धर्ष, मुबाहु, भीम, निम, उग्रायुध, भीमशर, कनकायु, दृढायुध, समान, दुमपन, दुर्भुग, दुरण, कर्ण, चित्र, हापमा, दक्षत्र, सोमाति, अनुदर, जरामन्ध, पवित्र, चित्राक्ष, चार, चिनागद दुर्मद, दुप्पटपं ददम-ध, मत्यमय, महलवार, उग्रश्रया, उग्रसेन, - . बरामी W अध्याय ६७ ] महाभारत ३३३ कवची निपङ्गी दण्डी दण्डधारो धनुग्रहः । उग्रो भीमरथो वीरो वीरवाहुरलोलुपः ॥ १०३ ॥ अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथश्च यः अनाधृष्यः कुण्डभेदी विराबी दीर्घलोचनः ॥ १० ॥ दीर्घवाहुमहावाहुयूंढोरुः कनकानन्दः । कुण्डजश्चित्रकश्चैव दुःशला च शताधिका ॥ १०५॥ वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः । एतदेकशतं राजन्कन्या चैका प्रकीर्तिता ॥ १०६ ॥ नामधेयानुपूर्व्या च ज्येष्ठानुज्येष्टतां विदुः । सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १०७ ॥ सर्वे वेदविदश्चैव राजश्छास्त्रे च पारगाः । सर्वे संग्रामविद्यासु विद्याभिजनशोभिनः ॥ १०२ ॥ सर्वेपामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते । दुःशलां समये राजन्सिन्धुराजाय कौरवः ॥ १०९ ॥ जयद्रथाय प्रददौ सौवलानुमते सौबलानुमते तदा । धर्मस्यां तु राजानं विद्धि राजन्युधिष्ठिरम् ॥ ११० ॥ भीमसेनं तु वातस्य देवराजस्य चार्जुनम् । अश्विनोस्तु तथैवांशो रूपेणाप्रतिमौ भुवि ॥ १११ ॥ क्षेममूर्ति, अपगाजित, पण्डित, विशालाक्ष, दुराधन, नाम के क्रमानुसार इसमें बडे छोटे जानो । है दृढहम्त, सुहम्त, वातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, जनमेजय ! धृतराष्ट्र के ये मब पुत्र बहे शूरवीर, वद्वानी, नागदत्त, अनुयायी, कवी, निपगी, दण्डी, युद्ध, अख, शस्त्रविद्या के जाननेवाले और वंद- दण्डधार, धनुर्गह, उग्र, भीमरथ, वीर, वीरवाहु, शाम्र में निपुण थे । इन मबका विवाह इनके अनु- अलोलुप, अभय, रौद्रकी, दृढरथ, अनाधृष्य, रूप स्त्रियों से किया गया । दुगरा नाम धृतराष्ट्र कुण्डभेदी, विराबी, दीर्घरोचन, दीर्घबाहु, महाबाहु, की पुत्री का विवाह शकुनि की मम्मत्ति मे मिंधु- ब्यूटोरु, कनाद, कुण्डज और चित्रक यह मौ देश के राजा जयद्रय के साथ किया गया ॥११॥ पुत्र और एक दुगरा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। धर्म के अंग मे राजा युधिष्ठिर का जन्म हुआ। वैश्या के गर्भ मे उसन्न एक और पुत्र युयुत्सु था। वायु के अग मे भीममेन, इन्द्र के अश में अर्जुन ।

[ आदिपव ३३४ म हा भारत नकुलः सहदेवश्च सर्वभूतमनोहरौ । यस्तु वर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान् ॥ ११२ ॥ सोऽभिमन्युबृहत्कीर्तिरर्जुनस्य सुतोऽभवत् । यस्यावतरणे राजन्सुरान्सोमोऽब्रवीदिदम् ॥ ११३ ॥ नाऽहं दद्यां प्रियं पुत्रं मम प्राणैर्गरीयसम् । समयः क्रियतामेप न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ ११४ ॥ सुरकार्य हि नः कार्यमसुराणां क्षितौ वधः । तत्र यास्यत्ययं वर्चा न च स्थास्यति वै चिरम् ॥ ११५ ॥ ऐन्द्रिनरस्तु भविता यस्य नारायणः सखा । सोर्जुनेत्यभिविख्यातः पाण्डोः पुत्रः प्रतापवान् ॥ ११६ ॥ तस्यायं भविता पुत्रो वालो भुवि महारथः । ततः पोडश वर्षाणि स्थास्यत्यमरसत्तमाः ।। ११७ ॥ अस्य पोडशवर्पस्य स सड़ग्रामो भविष्यति । यत्रांशा वः करिष्यन्ति कर्म वीरनिसूदनम् ॥ ११८ ॥ नरनारायणाभ्यां तु स संग्रामो विनाकृतः । चक्रव्यूह समास्थाय योधयिष्यन्ति वः सुराः ॥ ११९ ॥ विमुग्वाञ्च्छात्रवान्सर्वान्कारयिष्यति मे सुतः । वालः प्रविश्य च व्यूहमभेद्यं विचरिष्यति ॥ १२० ॥ महारथानां वीराणां कदनं च करिष्यति । सर्वपामेव शत्रूणां चतुर्थांशं नयिष्यति ॥ १२१ ॥ और अश्विनीकुमार के अग में नकल और महदेव अप्रतार लेकर अर्जुन का पुत्र होगा परन्तु वह बहुत जो बड़े रूपवान् थे, उत्सन हुए | चन्द्रमा का पुत्र दिना तक यहा न रहेगा । सोलह वर्ष की आयु में मनारी वर्ची पट्टी बीनिवारा अर्जुन का पुत्र अभि युद्ध के प्राप्त होने पर नररूप अर्जुन अपने पिता न्युआ। उमर नन्म रे ममय चन्द्रमा न और नारायणरुप श्रीकृष्ण के न होने के कारण बनाआ में कहा था कि, या मेग पुत्र प्राण में भी में यह महाअभय यह को तोड़कर भीतर प्रदेश अधिर प्यार में गया प्रथा नी का गाना। हो जायेगा और वहा जाकर बड़े बड़े शूरवीरों को देवनानी का कार्य करने के यि यह ही पर यमपुरी पहुनारंगा । उस दिन सम गेना की चीयाई ------RANASNA अन्याय ६७ पहाभारने दिनार्धन महावाहुः प्रेतराजपुरं प्रति । ततो महारथैवारैः समेत्य बहुशो रणे ॥ १२२ ॥ दिनक्षये महाबाहुर्मया भूयः समेष्यति । एकं. वंशकरं पुत्रं वीरं वै जनयिष्यति ॥ १२३ ॥ प्रनष्टं भारतं वंशं स भूयो धारयिष्यति । एतत्सोमवचः श्रुत्वा तथास्त्विति दिवौकसः ॥ १२४ ॥ प्रत्यूचुः सहिताः सर्वे ताराधिपमपूजयन् । एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितुः ॥ १२५ ॥ अग्नेर्भागं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम् । शिखण्डिनमथो राजेस्त्रीपूर्व विद्धि राक्षसम् ॥ १२६ ॥ द्रौपदेयाश्च ये पञ्च वभूवुर्भरतर्षभ । विश्वान्देवगणान्विद्धि संजातान्भरतर्षभ ॥ १२७ ॥ प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः श्रुतकीर्तिस्तथापरः । नाकुलिस्तु शतानीकः श्रुतसेनश्च वीर्यवान् ॥ १२८ ॥ शूरो नाम यदुश्रेष्ठो यदुश्रेयो वसुदेवपिताऽभवत् । तस्य कन्या पृथा भाम रूपेणासदृशी भुवि ॥ १२९ ॥ पितुः स्वस्त्रीयपुत्राय सोऽनपत्याय वीर्यवान् । अग्रमग्रे प्रतिनाय स्वस्यापत्यस्य वै तदा ॥ १३० ॥ अग्रजातेति तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाझ्या । सेना को अकेला मारकर स-या होने पर मेरे पास शिखण्डी पहल स्त्री था । द्रौपदी के प्रतिविम्य, चला आवेगा । पाण्डयों को वश चलाने के लिये मुतसोम, श्रुतकीर्ति, मतानीक ओर श्रुत्तमेन नाम इमसे एक पुत्र भी उत्पन्न होगा । यह सुनकर के पाचों पुत्र विश्वेटेवाओं के अश से उत्पन्न हुए। देवताओं ने तारागणों के ईश्वर चन्द्रमा की पूजा की वसुदेव के पिता मूरमैन के एक पुत्री पृथा नाम की और कहा कि, ऐमा ही हो । हे जनमेजय इस ऐमी म्वरूपवान् उत्पन्न हुई कि, उसकी सदृश पकार तेरे पितामह का जन्म हुआ ॥१११११२५|| पृथ्वी पर कोई कन्या न थी । मूरसेन की बुआ के हे राजन् । अमि के अश से धृष्टद्युम्न का जन्म पोते कुन्तिभोज के कोई लडका लडकी नहीं थी। हुआ । राक्षस के अश से शिखण्डी का जन्म हुआ। सूरसेन उनसे यह कह चुके थे कि, मेरे सबसे - महाभारत | आदिपर्व अददकुन्तिभोजाय स तां दुहितरं तदा ॥ १३१ ॥ सा नियुक्ता पितुर्गेहे पितुगेंहे ब्राह्मणातिथिपूजने । उग्रं पर्यचरदोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १३२ ॥ निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससंविदुः । तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नरतोपयत् ॥ १३३ ॥ तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि । उवाच चैनां भगवान्प्रीतोऽस्मि सुभगे तव ॥ १३४ ॥ यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यासि । तस्य तस्य प्रसादात्त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि ॥ १३५ ॥ एवमुक्ता च सा वाला तदा कौतूहलान्विता । कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी ॥ १३६ ॥ प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भ दधौ तदा । अजीजनत्सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ १३७ ॥ सकुण्डलं सकवचं देवगर्भश्रियाऽन्वितम् । दिवाकरसमं दीप्त्या दीप्त्या चारुसङ्गभूपितम् ॥ १३८ ॥ निगृहमाना जातं वै वै वन्धुपक्षभयात्तदा उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम् ॥ १३९ ।। पहले जो सन्तान होगी वह मै तुमको दे दूगा । सुभगे । इस मत्र से तू जिस देवता को पुत्र की इस प्रतिजा के अनुमार उन्होंने वह कन्या कुन्ती कामना से चुरागी, वह आकर तेरी इच्छा को भोज को दे दी ॥१२६।१३१॥ पूर्ण करेगा । दुवांसा तो चले गये और युन्ती ने या कन्या अपने पिता के घर मदा आये उम मत्र से सूर्य का आवाहन किया । अंधकार के हुप. अभ्यागत वाग्मणों की मेवा किया करती थी। नाश करनेवाले उस भगवान सूर्य ने उममें गर्म एक ममय उनम्बभाय, मनपरायण, धर्म के गूद धारण किया । इसके पश्चात् उन्ती के यथासमय नल को जाननेवाले, पवित्रामा दुर्वामा यहा आये। सूर्य के मगान तेजम्बी, क्यच और कुण्डल पहिरे उम कन्या ने उनकी बहुत अच्छी तरह मेया काके हुए, गम्बधारियों में श्रेष्ठ, सुन्दर बालक उत्तम उन मन्तुष्ट किया । दुर्यामा ने प्रसन्न होकर पृथा दुा । उन्नी ने पान्धगे के भय में उस यशची की दवारण मन्त्र बनाया और कहा कि, है वार को नल में फेंक दिया ॥१३२।१३।। Mahar अध्याय ८७) महाभारत तमुत्सृष्टं जले गर्भ राधाभर्ता महायशाः । राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा ॥ १४० ॥ चक्रतुर्नामधेयं च तस्य वालस्य तावुभौ । दम्पती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम् ॥ १११ ॥ संवर्धमानो बलवान्सर्वास्त्रपूत्तमोऽभवत् । वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जयतां वरः ॥ १२ ॥ यस्मिन्काले जपन्नास्ते धीमान्सत्यपराकमः । नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्तस्मिन्काले महात्मनः ॥ १४३ ॥ तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः । ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाजम् ॥ १४४ ।। उत्कृत्य कर्णो ह्यददत्कवचं कुण्डले तथा । शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥ देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोग्गरक्षसाम् । यस्मिन्क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष म एको न भविष्यति ॥ १४६ ॥ पुरा नाम च तस्यासीद्वसुपेण इति क्षिती । ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत् ॥१२७ ।। आमुक्तकवचो वीरो यस्तु जजे महायशाः । स कर्ण इति विग्यातः पृथायाः प्रथम. सुनः ॥ १८ ॥ “बडे यशवी राधा के पति ने जल मे निकाल बनकर अपने पुत्र के कारण उसके माथ पदा हुए कर पुत्र कलना से अपनी स्त्री को वह बालक दे क्यच ओर कुण्टों का वरपण से मागा । वमुषण दिया । उन दोनों ने उसका नाम पमुषण रक्खा। ने उसी समय इन्द्र को क्वच और कण्टर दे दिये। वसुपेण दिन दिन बढकर महावल्वान् हो गया । इन्द्र ने बहुत हेरान आर प्रसन्न होकर उमको एक उस प्रतापी डारक ने कुछ ही समय म वेद-वेदाङ्ग गक्ति नाम का शत्र दिया और कहा देवना, असुर, और धनुर्विद्या को भर्गमानि माग लिया। विद्या मनुष्य, गर्व सर्प, गलम, इनमें से निम पक के ध्ययन के समय यमुषेण की यह प्रतिज्ञा थी कि, ऊपर यह शक्ति छोडेगा घर मृत्यु को प्राप्त होगा। ब्राह्मण जो कुछ मागेगा उसको वही दूगा । सम्पूर्ण पहिने उसका नाम पृथ्वी में यमुपेण प्रसिद्ध था। प्राणियों की रक्षा करनवारे इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप इम कठिन कर्म के करने में उमका नाम वचन - 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[ आदिपर्व
महाभारत
स तु सूतकुले वीरो ववृधे राजसत्तम ।
कर्ण नरवरश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां
वरम् ।। १४९ ॥
दुर्योधनस्य सचिवं मित्रं
मित्रं शत्रुविनाशनम् ।
दिवाकरस्य तं विद्धि राजन्नशमनुत्तमम् ॥ १५० ॥
यस्तु नारायणो नाम देवदेवः सनातनः ।
तस्यांशो मानुपेष्वासीद्वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १५१ ॥
शेपस्यांशश्च नागस्य बलदेवो महाबलः ।
सनत्कुमारं प्रद्युम्नं विद्धि राजन्महौजसम् ॥ १५२ ॥
एवमन्ये मनुष्येन्द्रा बहवोंऽशा दिवौकसाम् ।
जज्ञिरे वसुदेवस्य कुले कुलविवर्धनाः ॥ १५३ ॥
गणस्त्वप्सरसां यो वै मया राजन्प्रकीर्तितः ।
तस्य भागः क्षितौ जज्ञे नियोगाद्वासवस्य ह ॥ १५४ ॥
तानि पोडश देवीनां सहस्राणि नराधिप ।
बभूवुर्मानुपे लोके वासुदेवपरिग्रहः ॥ १५५ ॥
श्रियस्तु भागः संजज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले ।
भीष्मकम्य कुले साध्वी रुक्मिणी नाम नामतः ॥ १५६ ॥
द्रौपदी त्वथ संजज्ञे शचीभागादनिन्दिता ।
द्रुपदस्य कुले कन्या वेदिमध्यादनिन्दिता ॥ १५७ ॥
और करण हुआ। जो चीर, यशवी, कवच धारण बलवान् बलदेव शेषनाग के अंश से उत्पन्न हुआ।
किये हुए उत्पन्न हुआ था, यह पृथा का पुत्र कर्ण महापराक्रमी प्रद्युम्न सनत्कुमार के अश से उत्पन
नाम में प्रसिद्ध हुआ। हे राजाओं में श्रेष्ठ जनमेजय ! हुआ । इसी प्रकार और बहुत से मनुष्यों में श्रेष्ठ
वर वर्ण मून के कुल में पृद्धि को प्राप्त हुआ राजाओं देवताओं के अशी से वसुदेव के कुल के बढानेवाले
में श्रेष्ठ, मर गवधारियों में उत्तम, दुर्योधन का मंत्रि उत्पन्न हुए । हे जनमेजय ! जो मेने अप्सराओं
और मित्र, शओं के नाम करनेवाग फर्ण मूर्य के का गण पहिले तुमसे कहा था, उसका अंश इन्द्र
'अंग में उत्सर हुआ ॥१४०।१५०॥
की आना में पृथ्वी में उत्पन्न हुआ ! हे राजन् !
मनातनदेव नारायण नाम से प्रमिद वादय उम अग से श्रीकृष्ण की मारह हजार बिय उत्पन्न
41 पुत्र प्रनायण पृथ्वी में उत्पन्न हुआ। यह दुई ॥१५१११५५॥

। अध्याय ६७ ] महाभारत नातिह्रस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी । पद्मायताक्षी सुश्रोणी स्वसिताश्चितमूर्धजा ॥ १५८ ॥ सर्वलक्षणसंपूर्णा वैदूर्यमणिसन्निभा । पञ्चानां पुरुपेन्द्राणां चित्तप्रमथनी रहः ॥ १५९ ॥ सिद्धिधृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते । कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु सुवलात्मजा ॥ १६० ॥ इति देवासुराणां ते गन्धर्वाप्सरसां तथा । अंशावतरणं राजन्राक्षसानां च कीर्तितम् ॥ १६१ ।। ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्धदुर्मदाः । महात्मानो यदूनां च ये जाता विपुले कुले ॥ १६२ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मया ते परिकीर्तिताः । धन्यं यशस्यं पुत्रीयमायुष्यं विजयावहम् । इदमंशावतरणं श्रोतव्यमनसूयता ॥ १६३ ॥ अंशावतरणं श्रुत्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् । प्रभवाप्ययवित्प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति ॥ १६४ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि मंभवपर्वण्यंगावतरण ममाप्ती मप्तपष्टितमोऽध्याय ॥ ६ ॥ कृष्ण की प्राप्ति के लिये पृथ्वी में लक्ष्मी के देवियों के अग मे पाण्टु की स्त्री कुन्नी और मादी अंश से भीष्मक राजा के कुल में रुक्मिणी नाम का जन्म हुआ । मतिदेवी अपने अंश से गाभारी पतिव्रता म्त्री उत्पन्न हुई। इन्द्राणि के अंश से नाम मे प्रगट हुई । हे जनमजय : ब्राह्मण, क्षत्रिय, सर्वोत्तम द्रौपदी वेदी के मध्य से उत्पन्न हुई । वह वैश्य आदि के घरानों में और यादवों के प्रसिद्ध द्रौपदी न बहुत छोटी और न लम्बी थी। उनके कुल में जिन-जिन देवता, दैत्य, गन्धर्व, अमरा, अङ्गो से नील कमल की सुगन्ध आती थी । वह राक्षय आदि का जिस-जिस नाम से अंगावनार हुआ, कमल-सदृश नेत्रवाली, सुंदर कमरवाली, काले शोभित वह सब मैने तुमको मुना दिया । यह अंगावतरण केशोंवाली, स्त्रियों के मम्पूर्ण उत्तम लक्षणों से युक्त, कथा धन, यश, पुत्र, आयु और विजय की वढान- वैदूर्यमणि के सदृश कान्तिवाली, पुरुषों में श्रेष्ठ, पांचों वाली है। इसको जो मन लगाकर श्रद्धापूर्वक मनता पाण्डवों के चित को एकान्त में वश करनेवाली है, वह ब्रमजानी होजाता है और किमी प्रकार के थी। हे महाराज ! सिद्धि और धृति नाम की दोनों आपति काल में क्ट नहीं पाना ॥१५६१६५ आदिपर्व का सतासठवां अध्याय ममाप्त हुआ । ।

| आदिपर्व म हा भारत ॥ ५ ॥ अथ अष्टपष्टितमोऽध्याय ६८ ॥ जनमेजय उवाच-स्वत्तः श्रुतमिदं ब्रह्मन्देवदानवरक्षसाम् । अशावतरणं सम्यग्गन्धर्वाप्सरसा तथा ॥ १ ॥ इमं तु भूय इच्छामि कुरूणां वंशमादितः । कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसन्निधौ ॥ २ ॥ वैशपायन उवाच--पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान् । पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम ॥ ३ ॥ चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुक्ते मनुजेश्वरः । समुद्रावरणांश्चापि देशान्स समितिंजयः ॥ ४ ॥ आम्लेच्छावधिकान्सर्वान्स भुक्ते रिपुमर्दनः । रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृताम् न वर्णसंकरकरो कृष्याकरकृज्जनः । पापकृत्कश्चिदासीत्तस्मिन्नाजनि शासति ॥ ६ ॥ धर्म रति सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे । तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ७ ॥ नासीचौरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि । नासीदव्याधिभयं चापि तम्मिञ्जनपदेश्वरे ॥ ८ ॥ ॥ अदमठवा अध्याय ६८ ॥ जनमेजय ने कहा हे ब्राह्मन' देर, दानव, राक्षम जीतकर अपने वश में किया और उसका राज्य अप्मरा और गन्धरों अभावतरण की कथा अच्छी अनेक भोगों से युक्त था । उमरे राज्य में न वर्ण नग मैन नापमं मुनी। अब आप में कुरका की क्या मकर उत्पन्न होता था, न ग्वती होती थी और न प्रादि मे पिम्तारपूर्वक मुनना चाहता है । यह मुन ही पाप होता था । हे जनमेजय । राजा दुप्यन्त कर सम्पायन ने कहा है भरतवशिया में श्रेष्ठ के शामन माय में सर मनुष्य धर्म में प्रीति रखते नमय 'पुरा का यहांन गा नागें और समुद्र थे नार धम, अर्थ को पाते थे ||१|| पयन यो का सर पड़ा पगमग दुप्यान उमा गज्य में चोरी नहीं होती थी। मनुष्यों नामदाप गाया। उसने मरी ममुद्र का क्षुधा और याधि का भय नही होता था। की मामा आरोहों देश की अवधि नक चाग वर्ण अपना अपना कार्य करते थे। इन्द्र समय - AA-AvartaM अध्याय ६२ ] महाभारत ३४६ .. स्वधर्म रोमरे वर्णा देवे कर्मणि निस्पृहाः । तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः ॥ १ कालवी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च । सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा ॥ १० ॥ स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते । स चाद्भुतमहावीर्यो बज्रसंहननो युवा ॥ ११ ॥ उद्यम्य मन्दरं दो| बहेत्सवनकाननम् । चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेपु च ॥ १२ ॥ नागपृष्ठेऽश्वपृष्टे च बभूव परिनिष्टितः । वले विष्णुसमश्चासीत्तेजसा भास्करोपमः ॥ १३ ॥ अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः । समतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान् ॥ १४ ॥ भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत् ॥ १५ ॥ इति श्रीमन्महाभारने आदिपर्वणि मंभवपर्वणि शाकुंतलोपास्याने अष्टपष्टितमोऽध्याय ।। ६८ ॥ पर वर्षा करता था और पृथ्वी पर धान्य और पशु गदायुद्ध, सब गात्रों के चलाने और हाथी और अच्छीतरह उत्पन्न होते थे । ब्राह्मण लोग अपना घोडे की मवारी में बड़ा चतुर था । वह राजा पेल कर्म ठीक करते थे और मिथ्या कमी नहीं बोलने में विष्णु और तेज मूर्य के समान था और गीरत्ता थे। वह तरुण राना दुप्यन्त ऐसा पराक्रमी और में समुद्र के समान और क्षमा में पृा के ममान दृढ़ था कि, जल और वनों महित मद्गचलपर्वत था । प्रजा उसको बहुत चाहती थी और वह प्रजा को उठाने का माहस रखता था। चार प्रकार के का पालन धर्म में करता था ॥८॥१५॥ आदिपर्व का अदमठवां अध्याय ममाम हुआ । । अथ एकोनमातितमोऽध्याय. ॥ १५ ॥ जनमेजय श्याच संभवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः । शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः ॥ १ ॥ । उनहत्तरवां अध्याय ६९ ॥ यह मुनकर राजा जनमेजय योग कि, मैं भरत वृत्तान्न विम्नारपूर्वक सुनना नाहना ह । वीर दप्यम जी के जन्म, चरित्र और शकुनला की उत्पत्ति का को जैसे गन्ना माप्त हुई, पुम्ममिह की उप महाभारत [ आदिपर्व दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुंतला । तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन्विस्तरं त्वहम् ॥ २ ॥ श्रोतुमिच्छामि तत्वज्ञ सर्व मतिमतां वर । वैशम्पायन उवाच-स कदाचिन्महावाहुः प्रभूतवलवाहनः ॥ ३ ॥ वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः । वलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना ॥ ४ ॥ खड्गशक्तिधेरैवीरेंगदामुसलपाणिभिः प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतेवृतः ॥ ५ ॥ सिंहनादैश्च योधानां शंखदुन्दुभिनिःस्वनैः । रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरहितैः ॥ ६ ॥ नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा । हेपितस्वनमित्रैश्च श्वेडितास्फोटितस्वनैः ।। ७ ।। आसीरिकलकिलाशब्दस्तस्मिन्गच्छति पार्थिवे । प्रासादवरशृङ्गास्थाः परया नृपशोभया ।। ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् । शकोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥ ९ ॥ पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र बज्रपाणिं स्म मेनिरे । पुरुषव्याघ्रो रणे वसुपराक्रमः ॥ १० ।। कथा को भी विस्तार से मुनना चाहता ह । और अनक प्रकार के प धारण किये हुए वीरों बदाम्पायन ने कहा एक ममय वह वही भुजावाला के ग्वड्ग ठोकने और गर्जना के शब्द घोड़ों की गजा दुप्यन्न बहुन मी चतुरिणी सेना और बड़े आवाज़ से मिल हुए बड़े भारी किनकिलाहर शब्द चंड गावीर जो बदग, गति आदि अनेक नाम हुए बड़े बड़े महलों के ऊपर चढ़ी हुई स्त्रियों ने रिये हुए थे, स्मथ लेकर वनमें अहर ग्बर ने गया। उत्तम राजशोभा से युक्त अपन यश के बढानेवाले टम गजा के वन को जाने ममय माग में मिंह- इन्द्र के सदृश शनाशी, संग्राम से शत्र के हाधियों नाद और नार मारने फे. शब्द. मग और नगाडों को हटानबाल, टम नम्बार राजा दुप्यान को मनि, हाथियों किंधार और ग्यों की स. नाट, गना प्रबार आयुधों को धारण क्यि उम राजा पर फूलों की वर्षा की और स्त्रिया ।। अयं म दमा 100 अध्याय ६९] महाभारन ३४३ यस्य वाहुवलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः इति वाचो त्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपम् ॥ ११ ॥ तुष्टुवुः पुष्पवृष्टीश्च सस्जुस्तस्य मूर्धनि । तत्र तत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः ॥ १२ ॥ निर्ययो परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । तं देवराजप्रतिम मत्तवारणधूर्गतम् ॥ १३ ॥ द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च ॥ १४ ॥ सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा । न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह ॥ १५ ॥ सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिपः । महीमापूरयामास घोपेण त्रिदिवं तथा ॥ १६ ॥ स गच्छन्ददृशे धीमान्नन्दनप्रतिमं वनम् । विल्वार्कखदिराकीर्ण कपित्थधवसंकुलम् ॥ १७ ॥ विपमं पर्वतस्त्रस्तरश्मभिश्च समावृतम् । निर्जलं. निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम् ॥ १८ ॥ मृगसिहैतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः । तद्वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यवलवाहनः ॥ १९ ॥ आपग में कहने लगी कि, यह इन्द्र के समान वही और आकाशमण्डल पूरित हो गया ॥१०॥१६॥ राजा दुप्यन्त है जिमका पराक्रम संग्राम में वसुदेवता बुद्धिमान राजा दुप्यन्त ने जाते हुए नन्दन- के समान है और जिसके सन्मुम्ब कोई शत्रु नहीं वन के समान विल्य, अर्क, खदिर, कथा, यी आदि ठहर सकता । राजा उन स्त्रियों की प्रगंमा से प्रसन्न अनेक उत्तम उत्तम वृक्ष लगे हुए थे जहां तहा ऊचे होता हुआ और ब्राह्मणों से स्तुति सुनता हुआ नीचे पत्थरों के देंगे से पृथ्वी वहां की विषम हो हाथी पर सवार वन को चला । राजा के पीछे पीछे रही थी न वहां जल था न मनुष्य, मृग और सिंह, जो पुरवासी लोग आगीवाद देने और जय वालने आदि अनेक वन के जीव फिरते थे, देखा । मेना जाते थे वह राजा की आजा पाकर लौट गये और वाहन मे युक्त पुरुषों में व्याघ्र गना दुप्यन्त राजा के.गरुड़ के वेग सदृश रथ के शब्द से पृथ्वी ने अनेक प्रकार के मृगों को मारकर वन को व्याकुल ३४४ महाभारत { आदिपर दूरस्थान्सायकैः लोडयामास दुष्यन्तः सूदयन्विविधान्मृगान् । वाणगोचरसंप्राप्तांस्तत्र व्याघ्रगणान्बहून् ॥ २०॥ पातयामास दुष्यन्तो निर्विभेद च सायकैः । कांश्चिदभिनत्स नराधिपः ॥ २१ ॥ अभ्याशमागतांश्चान्यान्खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान्समाजघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः ॥ २२ ॥ गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः तोमरैरसिभिश्चापि गदामुसलकम्पनैः ॥ २३ ॥ चचार स विनिमन्वै वन्यास्तत्र मृगद्विजान् । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियः ॥ २४ ॥ लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च ॥ २५ ॥ मृगयूथान्योत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः । शुष्काश्चापि नदीगत्वा जलनैराश्यकर्शिताः ॥ २६ ॥ व्यायामलान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः । क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि ॥ २७॥ केचित्तत्र नरव्याघेरभक्ष्यन्त बुभुक्षितैः । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च संसाध्य च वनेचराः ॥ २८ ॥ कर दिया और वाण के सम्मुग्व आये हुए व्याघों पराक्रमपाले राजा और समाम में प्रेमी योघाओं को छेदकर गिरा दिया और दरवर्ती मृगों को वाणों से व्याकुल हुए वनको शेरों ने छोड दिया । मृगौ से मारा । समीपरी मृगों को तलवार से काटा । के के झुद अपने म्वामी के नष्ट होने पर इधर बवानों में श्रेष्ठ राजा दुप्यन्त ने किसी किमी को उधर गन्द करने लगे। जलरहित नदियों में जाकर गानि मे मारा ॥१७॥२२॥ जल से निराश होकर परिश्रम से घबराये हुए मृग गहायुद्ध के तल जाननेवाले अनुपम पराक्रम अचेत होकर गिरने लगे। भूग्व और प्यास वारे राजा ने बनमें हम प्रकार गमन क्यिा । तोमर, व्याकुल मृग पृथ्वी पर गिर गये । कोई कोई मृग नयार, मदा और मूग के घुमाने में उस वनम भृगे करवान् पुरुषों ने ग्वालिये और किसी किसी अमेष प्रकार के मृग और पक्षियों को मारा। अदभुत ने माम को अमि पर पकाकर खाया। कोई जगरी अध्याय ३० महा मारन ३४. भक्षयन्ति स्म मांसानि प्रकुन्य विधिवत्तदा । तत्र केचिद्गजा मत्ता वलिनः शस्त्रविक्षताः ॥ २९ ॥ संकोच्याग्रकरान्भीताः प्राद्रवन्ति स्म वेगिताः । शवन्मृत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु ॥ ३० ॥ वन्या गजबरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्बहुन् । तद्वनं बलमेघेन शरधारण संवृतम् । व्यरोचत मृगाकीर्ण राजा हतमृगाधिपम् ॥ ३१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि शकुन्तलोपास्यान एमोनवप्नतितमोऽध्याय ।। ६५ ॥ हाथी गबों से घायल मुड को मकोडकर भय मे वह वन मेनारूपी मेघ की वाणरूपी जलधार। से मूत्र-विष्टा और रुधिर गिराते हुए भागे । जगली युक्त राजा मे मारे हुए मृग और गगे में गोभित हाथियों ने बहुत लोगों को पगों मे कुचल डाग । हुआ ॥२३,३॥ आदिपर्व का उनहत्तरवां अध्याय ममान हुआ । अथ मानितमोऽध्याय ।। ७० ।। वैशम्पायन उवाच-ततो मृगसहस्राणि हत्वा सवलवाहनः । राजा मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद्विवेश ह ॥ १ ॥ एक एवोत्तमवलः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः । स बनस्यान्तमासाद्य महच्छ्न्यं समासदत् ॥ २ ॥ तचाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंयुतम् । मनः प्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च ॥ ३ ॥ शीतमारूतसंयुक्तं जगामान्यन्महद्वनम् । पुष्पितेः पादः कीर्णमतीव सुखशावलम् ॥ ४ ॥ विपुलं मधुरारावैर्नादितं विहगेस्तथा । पुस्कोकिलनिनादेश्च झिटीकगणनादितम् ॥ ५ ॥ मनरवा अध्याय ७० ॥ चमम्पायन बोले-राजा दुप्यन्न दम प्रकार में आगे को नग । वन अन्न में एक बड़ा अन्य हमागे मृगों को उस वनमें मारकर और अहर कन्न म्यान देखा । गजा वहा में भी आगे को चना की इच्छा मे भूना प्यामा उम वनको छोडकर गया और फिर एक दृमेरे वन में पहुचा जहा गीतल and- । आदिश्य ३४६ महाभारत AWAR प्रवृद्धविटपैवृक्षः सुखच्छायः समावृतम् । पट्पदापूर्णिततलं लक्ष्म्या परमया युतम् ॥ ६ ॥ नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कण्टकी । पट्पदै प्यपाकीर्णस्तस्मिन्वै काननेऽभवत् ॥ ७ ॥ विगैर्नादित पुष्पैरलंकृतमतीव सर्वतुकुसुमैवृक्षः सुखच्छायैः समावृतम् ॥ ८ ॥ मनोरमं महेष्वासो विवेश वनमुत्तमम् । मारुताकलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशाखिनः ॥ ९ ॥ पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु व्यसृजस्ते पुनः पुनः । दिवस्पृशोऽथ संघुष्टाः पक्षिभिर्मधुरस्वनैः ॥ १० ॥ विरेजुः पादपास्तत्र विचित्रकुसुमाम्बराः । तेषां तत्र प्रवालेपु पुष्पभारावनामिषु ॥ ११ ॥ रुवन्ति रावान्मधुरान्षट्पदा मधुलिप्सवः । तत्र प्रदेशांश्च बहून्कुसुमोत्करमण्डितान् ॥ १२ ॥ लतागृहपरिक्षिप्तान्मनसः प्रीतिवर्धनान् । संपश्यन्सुमहातेजा वभूव मुदितस्तदा ॥ १३ ॥ परस्पराश्लिष्टशाखैः पादपैः कुसुमान्वितैः । अशोभत महेन्द्रध्वजसन्निभैः : ॥१४॥ मन्द मुगन्ध वायु चल रही थी, अनेक रङ्गों के मानों वृक्ष गजा पर फरी की वर्षा कर रहे है । पल खिल रहे थे । कोक्लिा आदि बहुत से पक्षी राजा पक्षियों के चहचहाट को मुनता, वृक्षा की मधुर मधुर बोलिया बोल रहे थे । वृक्षों की छाया झुकी हुई डालियों पर गूजते हुए भौरों की शोभा अत्यन्न मपनी थी। भारे इधर उधर गृज रहे थे । को देवता हुआ फूलरूपी वों को पहिरे हुए वृक्षा एसा कोई वृक्ष न था, जिसपर फल फूल और भौरे की सुगधि को पता हुआ, इन्द्र की ध्वजा के समान नथे ॥१७॥ ऊंचे वृक्षा की दालियों के आपस में मिलने की गजा उम वन की अति अद्भुन गोभा को शोभा को निरग्यता हुआ और बहुत से स्थानों में दमना हुआ वनमें चल। । उमके जाने में वृक्षी सिद्ध चरणों का समूह, अप्सराओं के गण, गधर्व पर में पल हर-हटकर राजा के ऊपर गिरने रगे, और किन्नर आदिकों को दृष्टि करता हुआ वनमें वनं तत्तु A अध्याय ७० ] म हा मारत गणेः । नृपः । सिद्धचारणसंधैश्व गन्धर्वाप्सरसा सेवितं वनमत्यर्थ मत्तवानरकिन्नरम् ॥ १५॥ सुखः शीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः । परिक्रामन्वने वृक्षानुपेतीव रिरंसया ॥ १६ ॥ एवंगुणसमायुक्तं ददर्श ददर्श म वनं नदीकच्छोद्भवं कान्तमुच्छ्रितध्वजसन्निभम् ॥ १७ ॥ प्रेक्षमाणो वनं तत्तु सुप्रहृष्टविहङ्गमम् । आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम् ॥ १८ ॥ नानावृक्षसमाकीर्ण संप्रज्वलितपावकम् । तं तदाऽप्रतिमं श्रीमानाश्रमं प्रत्यपूजयत् ॥ १९ ॥ यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम् । अग्न्यगारैश्च बहुभिः पुप्पसंस्तरसंस्तृतम् ॥ २० ॥ महाकच्छैहद्भिश्च विभ्राजितमतीव मालिनीमभितो राजन्नदी पुण्यां सुखोदकाम् ॥ २१ ॥ नेकपक्षिगणाकी तपोवनमनोरमाम् । नत्र व्यालमृगान्सौम्यान्पश्यन्प्रीतिमबाप सः ॥ २२ ॥ तं चाप्रतिरथः श्रीमानाश्रम प्रत्यपद्यत । देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम् ॥ २३ ॥ नदी चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः । सर्वषाणभृतां तत्र जननीमिव धिष्टिताम् ॥ २४ ॥ उत्तम चलनी हुई वायु को खाता हुआ और उस थे और अमिकुण्डों में अग्नि जल रही थी, देखा । नदी के किनारे के ऊंच वृक्षों की शोभा को देखता उम गजा ने उस अनुपम आश्रम को देखकर बड़ी हुआ उस बनमें चला जाता था ॥८.१६॥ म्तुनि की। वह आश्रम जो मालनी नदी के किनारे थोड़ी दूर जाकर राजा ने उम वनमें एक पर वालविल्य ऋपियों और बहुत में मन्यासियों आश्रम अनिश्रेष्ट जहां मुन्दर सुन्दर नाना प्रकार के गणों मे युक्त था और उम नदी के वृक्ष, पक्षी हुपथ, थे, पक्षी मधुर बोलियां बोन रह और मृग आदि की गोभा मे प्रसन्न होता हुआ के वृक्ष लगे ३९८ {धादिषय महाभारत . सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम् । • सकिन्नरगणावासां वानरक्षनिषेविताम् ॥ २५ ॥ पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टां पुलिनरुपशोभिताम् । मत्तवारणशार्दूलभुजगेंद्रनिषेविताम् ॥ २६ ॥ तस्यास्तीरे भगवतः काश्यपस्य महात्मनः । आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम् ॥ २७ ।। नदीमाश्रमसंवद्धां दृष्ट्वाऽऽश्रमपदं तथा । चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा ॥ २८ ॥ अलंकृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया । नरनारायणस्थानं गंगयेवोपशोभितम् ॥ २९ ॥ मत्तवहिणसंधुष्टं प्रविवेश महद्वनम् । तत्स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभः ॥ ३० ॥ अतीवगुणसंपन्नमनिर्देश्य वर्चसा । महर्षि काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम् ॥ ३१ ॥ ध्वजिनीमश्वसंवाधा पदातिगजसंकुलाम् । अवस्थाप्य वनहारि सेनामिदमुवाच सः ॥ ३२ ॥ मुनि विरजसं द्रष्टुं गमिष्यामि तपोधनम् । काश्यपं स्थीयतामत्र याबदागमनं मम ॥ ३३ ॥ वह राजा उम मुन्दर और देवलोक के तुल्य आश्रम कश्यपजी के श्रेष्ठ, मनोहर, महर्षियों मे सेवित में गया ॥१७॥२३॥ आश्रम और निकटवर्ती नदी को देखकर उसमें जब राजा उम आश्रम के पाम पहुचा तब जाने का निश्चय किया। उस आश्रम की शोभा देखता क्या है कि, वह नदी उम आश्रम के किनार नदी के होने से प्रेमी थी, जैसे बदरिकाश्रम की शोभा में लगी हुई गल करती हुई वह रही है । चक्र गगा में है। राजा ने उस आश्रम में कश्यपजी वाक आदि जलपक्षी और जल के जीव कोल कर के दर्शन करने को जाने की अभिलाषा से अपनी ग। और वागर, रीछ, किन्नर, गादर, मराज सेना के मनुष्यों में कहा कि, तुम रोग यहां ठहरो, और मनवान हाथी कीड़ा कर रहे है । तब गजा हम पश्यपजी के दर्शनों को जाते है जबतक हम दुप्यन्न ने उस नदी के किनार महात्मा भगवान् न आवे, नबतक ही न जाना । आप राजचिही DHAMATLAntar.ndtv अध्याय ७० ] महाभारत तद्वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः । क्षुत्पिपासे जहाँ राजा मुदं चावाप पुष्कलाम् ॥ ३१ ॥ सामात्यो राजलिङ्गानि सोऽपनीय नराधिपः । पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुत्तमम् ॥ ३५॥ दिदृक्षुस्तत्र तमृषि तपोराशिमथाव्ययम् । . ब्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रम सोऽभिवीक्ष्य ह । पट्पदोद्गीतसंघुष्टं नानाद्विजगणायुतम् ॥ ३६ ॥ ऋचो बचमुस्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमः । शुश्राव मनुजव्याम्रो विततेष्विह कर्मसु ॥ ३७ ॥ यज्ञविद्याङ्गविद्भिश्च यजुर्विद्भिश्च शोभितम् । मधुरैः सामगीतैश्च ऋषिभिनियतव्रतैः ॥ ३८ ॥ भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोद्नेः यतात्मभिः सुनियतैः शुशुभे स तदाऽऽश्रमः ।। ३९ ॥ अथर्ववेदप्रवराः पूगयज्ञियसामगाः । संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते ॥ ४० ॥ शब्दसंस्कारसंयुक्तैर्बुवद्भिश्चापर्द्विजैः नादितः स वो श्रीमान्ब्रह्मलोक इवापरः ॥ ११ ॥ यज्ञसंस्तरविद्भिश्च क्रमशिक्षाविशारदः । न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसंपन्नवेदपारगैः ॥ ४२ ॥ को करके अपने माथ मत्री और पुरोहित को बहुत मे ऋपिलोग जो यज्ञों की क्रिया में निपुण, रेकर उम आश्रम में गया । गजा वहा की शोभा न्यायतत्त्व आर आत्म-विज्ञान में सम्पन्न, ममाहार को देखकर भूख-प्यास सर भूल गया ॥२५॥३४॥ में विशारद थे और मोक्षधर्म अपनी बात को स्थापन जब राजा आश्रम के भीतर पहुचा तब देखता करना, दूसरे के मत को खडन करना और सिद्धान क्या है कि, वहा यज्ञ हो रहा है 1 ऋषि और मत को सहना, इनके परमन्नाता शब्द और छह ब्रामणरोग सामवेद, ऋचंद यजुर्वेद आर अथ की निरक्ति को जाननवार कार का ज्ञान करनेवाले र्वण वेदों के मत्रा को पद क्रम धन आदि अरकारों इत्य, कर्म, गुण और वानर वा पक्षियों की बाना से पढ़ रहे है । कोई महिता का पाट कर रहा है। समझनेवाले और बड़े बड़े प्रयों का विचार काने- ३५० मदा भारत । आरिपर गतः । नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदैः विशेपकार्यविद्भिश्च मोक्षधर्मपरायणः ॥ ४३ ।। स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां शब्दच्छन्दोनिरुक्तः कालज्ञानविशारदैः ॥ ४४ ॥ द्रव्यकमैगुणज्ञैश्चकार्यकारणवेदिभिः कपिपक्षिरुतज्ञैश्च व्यासग्रन्थसमाश्रितः ॥ ४५ ॥ नानाशास्त्रेषु मुख्यैश्च शुश्राव स्वनमीरितम् । लोकायतिकमुख्यैश्च समन्तादनुनादितम् ॥ ४६ ॥ तत्र तत्र च विप्रेन्द्रा न्नियतान्संशितव्रतान् । जपहोमपरान्विप्रान्ददर्श परवीरहा ॥४७॥ आसनानि विचित्राणि रुचिराणि महीपतिः । प्रयत्नोपहितानि स्म दृष्ट्वा विस्मयमागमत् ॥ ४८ ।। देवतायतनानां च प्रेक्ष्य पूजां कृतां द्विजैः । ब्रह्मलोकस्थमात्मानं मेने स नृपसत्तमः ॥४९॥ काश्यपतपोगुप्तमाश्रमप्रवर शुभम् । नातृप्यत्प्रेक्षमाणो वै तपोवनगुणैर्युतम् ॥ ५० ॥ स काश्यपस्यायतनं महाव्रतवृतं समन्तादृषिभिस्तपोधनैः । विवेश सामात्यपुरोहितोऽरिहा विविक्तमत्यर्थमनोहरं शुभम् ॥ ५११ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने सप्ततितमोऽध्याय ॥ ७० ॥ वाले थे आपस में वार्तालाप कर रहे थे । राजा ने समय ब्रह्मरोक मे ह ॥३५॥४०॥ उनकी वाणी को सुनकर और शासितत्रत अनेक राजा उस आश्रम की शोभा को देखकर तृप्त .माधणों को उत्तम उत्तम आसनों पर बैठे हुए जप नहीं होता था। इसके उपरान्त उस आश्रम में और होम में परायण और देवमदिरों में ब्राह्मणों की राजमत्री और पुरोहित के साथ किसी एकान्त और की हुई स्तुनि को देखकर यह समझा कि, मैं इस अत्यन्त सुन्दर स्थान के ममीप पहुचा ॥५॥ आदिपर्व का मत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ। .. स ...anALAAJNAARAL

अध्याय ७
म हा भारत
1
अथ एकमप्ततितमोऽध्याय || ७१ ॥
वैशम्पायन उवाच--ततोऽगच्छन्महावाहुरेकोऽमात्यान्विस्सृज्यतान् ।
नाऽपश्यञ्चाऽऽश्रमे तस्मिंस्तमृपि संशितव्रतम् ॥ १ ॥
सोऽपश्यमानस्तमृर्षि शून्यं दृष्ट्वा तथाऽऽश्रमम् ।
उवाच क इत्युच्चैनं सन्नादयन्निव ॥ २ ॥
श्रुत्वाऽथ तस्य तं शब्दं कन्या श्रीरिव रूपिणी ।
निश्चकामाऽऽश्रमात्तस्मात्तापसीवेषधारिणी
सा तं दृष्ट्वैव राजानं दुष्यन्तमसितेक्षणा ।
खागतं त इति क्षिप्रमुवाच प्रतिपूज्य च ॥ ४ ॥
आसनेनार्चयित्वा च पायेनार्येण चैव हि ।
पप्रच्छानामयं राजन्कुशलं च नराधिपम् ॥ ५ ॥
यथावदर्चयित्वाऽथ पृष्ट्वा चानामयं तदा ।
उवाच स्मयमानेव किं कार्य क्रियतामिति ॥ ६ ॥
तामब्रवीत्ततो राजा कन्यां मधुरभापिणीम् ।
दृष्ट्वा चैत्रानवद्याङ्गी यथावत्प्रतिपूजितः ॥ ७ ॥
आगतोऽहं महाभागमृर्षि कण्वमुपासितुम् ।
क गतो भगवान्भद्रे तन्ममाचक्ष्व शोभने ॥ ८ ॥
शकुन्तलोवाच-गतः पिता मे भगवान्फलान्याहर्तुमाश्रमात् ।
मुहर्त संप्रतीक्षस्व द्रष्टास्येनमुपागतम् ॥ ९ ॥
॥ टकहत्तरवा अध्याय ७१॥
वैशम्पायन ने कहा-इसके पश्चात उम वही गळ बोरी। आमन, पाद्य, ओर अर्थ में गना का
मुजावाल राजा दुप्यन्त ने आश्रम में जाकर उस पूजनकर उमके गज्य की कुशल पूछी। इमरे
उत्तम प्रतवाले ऋपि को न देखा । उस राजा ने उपरान्त मुसकराते हुए बोली कि, आपका क्या
ऊंचे म्बर मे कहा यहा कोन हे । इस शब्द को कार्य किया जावे । कन्या मे यथार्थ रीति से मत्कार
सुनकर रक्ष्मी के ममान रूपवाली तपम्वी के वेप किये हुए राजाने उम मधुर गळ घोल्नेवारी कन्या मे
में एक कन्या निकली। वह उत्तम नेत्रवारी कन्या कहा-में बड़े भागवाले कण्वऋपि के दर्शनों को यहा
राजा दुप्यन्त को देखते ही मत्कार करके म्वागत आया था । हे मद्र वह ऋषि कहा है ॥१८॥

म हा भारत । आदिपत्र वैशम्पायन उवाच-अपश्यमानस्तमृषि तथा चोक्तस्तया च सः । तां दृष्ट्वा च वरारोहां श्रीमती चारुहासिनीम् ॥ १० ॥ विभ्राजमानां वपुपा तपसा च दमेन च । रुपयौवनसंपन्नामित्युवाच महीपतिः ॥ ११ ॥ का त्वं कस्याऽसि सुश्रोणि किमर्थं चागता वनम् । एवंरूपगुणोपेता कुतस्त्वमसि शोभने ॥ १२ ॥ दर्शनादेव हि शुभे त्वया मेऽपहृतं मनः । इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने , १३ ॥ एवमुक्ता तु सा कन्या तेन राज्ञा तमाश्रमे । उवाच हसती वाक्यमिदं सुमधुराक्षरम् ॥ १४ ।। कण्वस्याऽहं भगवतो दुष्यन्त दुहिता मता । तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य महात्मनः ।। १५॥ दुप्यन्त उवाच -उर्ध्वरेता महाभागे भगवाँल्लोकपूजितः । चलेद्धि वृत्ताद्धर्मोऽपि न चलेत्संशितव्रतः ॥ १६ ॥ कथं त्वं तस्य दुहिता संभूना वरवर्णिनी । संशयो मे महानत्र तन्मे छेत्तुमिहार्हसि ॥ १७ ।। गयुन्तलोवाच-यथाऽयमागमो मां यथा चेदमभूत्पुरा । शृणु राजन्यथातत्त्वं यथाऽस्मि दुहिता मुनेः ॥ १८ ॥ यह सुनकर उस शकुन्तला ने कहा कि, मेरा तूने अपने दर्शनमात्र ही से मेरे मन को हर लिया पिता भगवान् ऋपि फल लेने को आश्रम से गया है, इस कारण मे मै तुझको जानना चाहता है है। थोड़ी देर टहरने में उस कपि का दर्शन होगा। ॥१३॥ मपि को न देखकर और उस शकुन्तला से यह यह सुनकर वह कन्या हँसती हुई मधुर बाली मुनकर राजा ने मुन्दर जघावाली, हाम्ययुक्तदेह, से बोली-मै धैर्यवान, धर्मज्ञ, तपम्वी कण्यऋषि की नप आर जिनेन्द्रियता से प्रकाशमान, रूप और पुत्री हू । राजा दुप्यन्त ने कहा-हे महाभागे ! यौवन अवस्था को देखकर कहा है सुन्दर कमर ससार मे पूजित भगवान् कण्यापि नित्यब्रह्मचारी वारी : न कौन है । किमकी बेटी है । और कहा है, चाहे धर्म अपनी मर्यादा से पृथक् हो जाये में मार दिम लिय इस वनमें आई है ! हे शुभे ! परन्तु वह उत्तम व्रत रखनेवाला ब्रह्मचर्य से पृथर अ याय ७१ । महाभारत ३५३ ऋपिः कश्चिदिहागम्य मम जन्माभ्यचोदयत् । तस्मै प्रोवाच भगवान्यथा तच्छृणु पार्थिव ॥ १९ ॥ कण्य उवाच-तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत्तपः । सुभृशं तापयामास शक्रं सुरगणेश्वरम् ॥ २० ॥ तपसा दीप्तवीर्योऽयं स्थानान्मां च्यावयेदिति । भीतः पुरंदरस्तस्मान्मेनकामिदमब्रवीत् ॥ २१ ।। गुणैरप्सरसां दिव्यैर्मेनके त्वं विशिष्यसे । श्रेयो में कुरु कल्याणि यत्त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २२ ।। असावादित्यसंकाशो विश्वामित्रो महानपाः । तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पयते मनः ॥ २३ ॥ मेनके तव भारोऽयं विश्वामित्रः सुमध्यमे । शंसितात्मा सुदुर्धर्ष उग्रे तपसि वर्तते ॥ २४ ॥ स मां न च्यावयेत्स्थानात्तन्वै गत्वा प्रलोभय । चर तस्य नपोविघ्न कुरु मेऽविघ्नमुत्तमम् ॥ २५ ॥ रूपयौवनमाधुर्यचप्टितस्मितभाषणैः लोभयित्वा वरारोहे तपसस्तं निवर्तय ॥ २६ ॥ मनोवाच-महातेजाः स भगवांस्तथैव च महातपाः । कोपनश्च तथा ह्येनं जानाति भगवानपि ॥ २७ ।। नहीं हो सकता । हे मधुरभाषिणी ' तू किमप्रकार हुआ और उमने इम भय से मेनका अप्सरा उसकी कन्या हुई, मेरे इस सन्देह को दूर कर । को बुलाकर कहा कि, हम तुझको सर अप्मगओं शकुन्तला न कहा-मै अपने जन्म और ऋषि की से गुण में विशेष समझते है । हे कल्याणि 'हमारा पुत्री होने का वृत्तान्त वर्णन करती ह ॥१४॥१८॥ एक कार्य है उसको तू सुन । यह मूर्य के ममान एक ममय एक कपि यहा आये थे, उन्होंने प्रकाशमान, बड़ा तपम्बी विश्वामित्र घोर तप करता कण्यापि से मेरे नन्म का हाल सुना था, वही हुआ मेरे मन को कॅपाता है । है मेनका ' यो मै तुमसे कहती हू । पहिरे किसी समय में विश्वा विश्वामित्र तर वा का हे और पवित्रामा किमी मित्र ने बड़ा उपतप किया था, उनके तप को देस से न तिरस्कार क्येि नानेवारा उग्रनप कर रह। कर इन्द्र को अपने इन्द्रासन के छिन नाने का ह, वह मुझको म्बर्ग से न भ्रष्ट करे, इस कारण भय ।

( आदित्य ३५४ महाभारत तेजसस्तपसश्चैव कोपस्य च महात्मनः । त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेयमहं नोद्विजेयमहं कथम् ।। २८ ।। महाभागं वसिष्टं यः पुत्रेरिटैर्व्ययोजयत् । क्षत्रजातश्च यः पूर्वमभवब्राह्मणो वलात् ॥ २९ ।। शौचार्थं यो नदी चक्रे दुर्गमां बहुभिर्जलैः । यां तां पुण्यतमां लोके कौशिकीति विदुर्जनाः ॥ ३० ॥ बभार यत्रास्य पुरा काले दुर्गे महात्मनः । दारान्मतङ्गो धर्मात्मा राजर्षिाधतां गतः ॥ ३१ ॥ अतीतकाले दुर्भिक्षे अभ्येत्य पुनराश्रमम् । मुनिः पारेति नद्या वै नाम चक्रे तदा प्रभुः ॥ ३२॥ मतङ्गं याजयाञ्चके यत्र प्रीतमनाः स्वयम् । त्वं च सोमं भयाद्यस्य गतः पातुं सुरेश्वर ॥ ३३ ॥ चकारान्यञ्च लोकं वै क्रुछो नक्षत्रसम्पदा । प्रतिश्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि चकार यः । गुरुशापहतस्यापि त्रिशङ्कोः शरणं ददौ ॥ ३४ ॥ एतानि यस्य कर्माणि तम्याहं भृशमुद्विजे । यथाऽसौ न दहेक्रुद्धस्तथाज्ञापय मां विभो ॥ ३५ ॥ उसको लोभ दे और उसके तप में विघ्न डालकर अपने तप के प्रभाव से बहुत जलवाली दुर्गम नदी को मुझको निश्चिन्त कर । हे उत्तम जघावाली ' तू रूप, उत्पन्न किया, जिस पवित्र नदी को सासारिक मनुप्य यायन अवस्था, मधुरता, चेष्टा, हाम्य, भापणादि से कौशिकी कहते है। जिसके किनारे पर किसी समय उस मुनि को लोभ देकर तप से भ्रष्ट कर । मेनका अकाल पडन पर राजर्षि मतङ्ग ने उनके कुटुम्ब को अप्मा ने कहा वह भगवान् विश्वामित्र ऋषि बड़ा त्रियों का पालन किया था, जोकि व्याघ्र हो गया नपची, मोधी और तंजम्बी है, आप भी उनमे डरत था। दुर्भिक्ष के व्यतीत होने पर फिर आश्रम में है फिर मेरे दान में क्या संदेह है ॥१६॥२८॥ कौगिकी नदी के पार आकर दम महात्मा ने उन्हीं महागज' यह विश्वामित्र ऋपि वही हैं जिन्होंने का नाम कौशिकी कमा ॥२०१३२॥ चमिनी के मय पुत्र माग्दारे और नए के बन में उसी स्थान पर प्रसन्नचित्त होकर मत को भप्रिय में ब्राह्मण हुए । इन्हीन है। गांच के कारण या कराया । है इन्द्र ! उस यन में आप सोम - ...

अध्याय .
महाभारत
पदा ।
तेजसा निर्दहल्लोकान्कम्पयेद्धरणी
सक्षिपञ्च महामेर तूर्णमावर्तयदिशः ॥ ३ ॥
तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम् ।
कथमस्मद्विधा नारी जितेन्द्रियमभिम्पृशेत् ॥ ३७॥
हुताशनमुखं दीप्नं सूर्यचन्द्राक्षितारकम् ।
कालजिह्व सुरश्रेष्ट कथमस्मद्विधा स्पृशेत ॥ ३८ ॥
यमश्च सोमश्च महर्षयश्च साध्या विश्व वालखिल्याश्च मर्ने ।
एतेपि यस्योद्विजन्ते प्रभावात्तस्मात्कस्मान्मादृशी नोजित ॥ ३९ ॥
त्वयैवमुक्ता च कथं समीपमृपर्न गच्छेयमह मुरेन्द्र ।
रक्षा तु मे चिन्तय देवराज यथा त्वदर्थ रक्षिताऽहं चरबम ॥ १० ॥
कामं तु मे मारुतस्तत्र बामः प्रक्रीडिताया विवृणोतु देव ।
भवेच्च मे मन्मथस्तत्र कार्ये महायभूतस्तु नत्र प्रसादात ॥ ११ ॥
बनाच्च वायुः सुरभिः प्रवायात्तस्मिन्काले नमृपि लोभयन्त्याः ।
तथेत्युक्त्वा विहिते चैव नम्मिस्ततो ययो साथम काशिकस्य ॥ १२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि यभवपर्वणि शकुन्तलोपान्याने पक्मप्ननितमाऽध्यार
पीने को भयभीत हो गये थे । टन्ही विश्वामित्र ताग जिवा कार के समान ह । मंग नामय उमरी
ने क्रोधित होकर मर रोक की रचना करने को इन की नहीं है । तुम मी ही विचार को कि,
नक्षत्रों को बनाया था । ऐसे कर्मवाले विश्वामित्र निमा प्रभाव में यमगन चन्द्रमा महर्षि विश्वदेवा
में मुझे बड़ा भय है । है दन्द्र आप एमा उपाय आर वालविल्य पि डग्त है उन मम्मुख मुझ-
करो जिममे वह क्रुद्ध होकर मुझको भन्न न थे। मी बी की क्या मामथ्य है। उममे आप मेरी
वह अपने तेज मे तीनों रोकाको मम्म कर मरना महायता के लिय वायु आर बामटव की मी में
है, पृश्वी को अपने पों मे हिला नक्ना ह, मुमेरु माथ कर दीजिये जिनमें बाउ रे यमों को रहा
पर्वत को फैज माना है और दिगाओं को गीघ्र कर मुझो नग्न करदे इन्द्र ने
आयु
और कामदेव
ही एक कर मम्ना हे | ऐसे नपम्बी जिनेन्द्रिय, शमनका की महायना कर आना दी और
अमिक ममान प्रवरिन का में मिनार पर्म वह महायका काका इन्द्र का काम करने के
का मसगी ||३३७॥
लिय वहा में विश्वामित्र अपने आश्रम की गई
जिमा नुम्ब अग्नि, नेत्र. मूर्य, चन्द्रमा और
आदिपर्व का एकहत्तरवा अभ्यार ममाम हुथा ।
san
.
॥८॥

महाभारत । आदिपर अथ द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥ कण्य उवाच-एवमुक्तस्तया शक्रः संदिदेश सदागतिम् । प्रातिष्ठत तदा काले मेनका वायुना सह ॥ १ ॥ अथापश्यद्वरारोहा तपसा दग्धकिल्विपम् । विश्वामित्रं तप्यमानं मेनका भीरुराश्रमे ॥ भीसराश्रमे ॥ २ ॥ अभिवाद्य ततः सा तं प्राक्रीडपिसंनिधौं । अपोवाह च वासोऽस्या मारुतः शशिसन्निभम् ॥ ३ ॥ साऽगच्छत्त्वरिता भूमि वासस्तदभिलिप्सती । स्मयमानेव सत्रीडं मारुतं वरवर्णिनी ॥ ४ पश्यतस्तस्त्र तत्ररप्यग्निसमतेजसः । विश्वामित्रस्ततस्तां तु विषमस्थामनिन्दिताम् ॥ ५ ॥ गृद्धा वाससि संभ्रान्तां मेनकां मुनिसत्तमः । अनिर्देश्यवयोरूपामपश्यद्विवृतां तदा ॥ ६ ॥ तस्या रूपगुणान्दृष्ट्वा स तु विप्रर्पभस्तदा । चकार भावं संसर्गात्तया कामवशं गतः ॥ ७ ॥ न्यमन्त्रयत चाप्येनां सा चाप्यैच्छदनिन्दिता । तौ तत्र सुचिरं कालमुभौ व्यहरतां तदा ॥ ८ ॥ रममाणो यथाकाम यथैकदिवसं तथा । जनयामास स मुनिर्मेनकायां शकुन्तलाम् ॥ ९ ॥ ॥ बहत्तरवा अध्याय ७२ ।। कण्यऋषि ने कहा- इस प्रकार मेनका के चन्द्रमा के समान प्रकाशमान् वमों को उड़ा दिया कहने पर इन्द्र ने वायु को आजा दी और वायु के और वह नगी होकर बम्त्र पकडने को लज्जा से माघ मेनका गई । उम उचम जघावाली उरती वायु पर हमती ओर दौडती हुई विश्वामित्र जी के दुई मनका ने आश्रम में उम ऋषि को जिमके मम्मुख गई 1 अग्नि के समान तेजम्बी विश्वामित्र पाप नपम्या के बल म नष्ट हो गये थे, नर करते उसके वयाप अनिन्दित और नगे शरीर को देख- हुए देखा । नराधान यह अमग ऋषि को प्रणाम का कामदेव की महायता में काम के वश में हुए। का उसके माप क्रीड़ा करने लगी। वायु ने उमक विश्वामित्रजी ने उसको अपने समीप बुलाया और अभ्याय ७२ प्रस्थे हिमवतो रम्ये मालिनीमभितो नदीम् । जातमुत्सृज्य तं गर्भ मेनका मालिनीमनु ॥ १० ॥ कृतकार्या ततस्तूर्णमगच्छच्छक्रसंसदम् । तं बने विजने गर्भ सिंहव्याघ्रसमाकुले ॥ ११ ॥ दृष्ट्वा शयानं शकुनाः समन्तात्पर्यवारयन् । नेमां हिंस्युर्वने वालां क्रव्यादा मांसगृद्धिनः ॥ १२ ॥ पर्यरक्षन्त तां तत्र शकुन्ता मेनकात्मजाम् । उपस्प्रष्टुं गतश्चाहमपश्यं शयितामिमाम् ॥ ३ ॥ निर्जने विपिने रम्ये शकुन्तः परिवारिताम् । आनयित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्यवेशयम् ॥ १४ ॥ शरीरकृत्प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जने । क्रमेणेते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने ॥ १५ ॥ निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिचारिता । शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मया ॥ १६ ॥ एवं दुहितरं विद्धि मम विप्र शकुन्तलाम् । शकुन्तला च पितरं मन्यते मामनिन्दिता ॥ १७ ॥ वह उत्तम म्वरूपवाली भी अपनी इच्छा प्रकट करने व्याघ्र से भरे निर्जन वनमें सोये हुए देखकर पक्षियों रगी । उन दोनों ने बहुत काल तक विहार क्यिा ने उस चारों ओर से घेर लिया और मामाहारी जीवा ॥१८॥ मे उसकी रक्षा की। उमी ममय म क्यम्प मी वह अप्सरा उनके पास बहुत दिन तक रही वहा मन्यांपामन करने के निमित्त नदी के किनार और उन दोनों ने आपम में एमा विहार टर्घिकाल आये । उम कन्या को पक्षियों में रक्षित देसका तक क्यिा । एक वर्ष एक एक दिन के ममान अपने आश्रम मरे आये और पुत्रीभार मानका प्रतीन होता था। थोड दिनी के पीछे हिमालय के उमका पालन किया ॥१४॥ निखर पर मालनी नदी के पाम उम मेनका ने मगर मा उत्पन्न करनेगला. प्रामी का रस शकुन्ना नाम की कन्या का उत्तम क्यिा । वह और अन्न देनवाग यह तीन पिना घमासको अमग देवताओं का कार्य मिद्ध जानकर उम कन्या है । इस कारण मे राजा 'क्वापि पिना को मारनी नदी के किनार छोडकर वहा मे इन्द्र है और मुझमें पुत्रीमार और में उनमें पिनाभाय । रोक को चरी गई । उम धारक को सिंह और मानती । मेरा नाम शापि ने गन्नग हम कारण -+-26-EASd

म हा भारत
| आदिपर्व
,
शकुन्तलोवाच-एतदाचष्ट
सन्मम
जन्म महर्षये ।
सुतां कण्वस्य मोमव विद्धि त्वं मनुजाधिप ॥ १८ ॥
कवं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती ।
इति ते कथितं राजन्यथावृत्तं श्रुतं मया ॥ १९ ॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि शकुंतलोपाख्याने द्विमप्ततितमोऽध्याय ॥ ७२ ।।
से रक्खा था कि, वनमें शकुंत अर्थात् पक्षियों ने तुमसे कहा । मुझको तुम कण्वऋषि ही की पुत्री
मेरी रक्षा की थी। यह कहकर शकुतला बोली-हे जानो क्योंकि मै उन्हीं को अपना पिता जानती है
राजन् ! मैंने अपने जन्म का हाल जैसा सुना था ॥१५॥१९॥
आदिपर्व का बहत्तरवां अध्याय ममाप्त हुआ ।।
अथ त्रिमप्ततितमोऽध्यायः ।। ३ ।।
दुप्यन्त उवाच-सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे ।
भार्या मे भव सुश्रोणि ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १ ॥
सुवर्णमाला वासांसि कुण्डले परिहाटके ।
नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्ने च शोभते ॥ २ ॥
आहरामि तवाद्याहं निकादीन्यजिनानि च ।
सर्वराज्यं तवाद्यास्तु भार्या में भव शोभने ॥ ३ ॥
गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुंदरि ।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ४ ॥
शकुन्तलोवाय-फलाहारो गतो गजन्पिता मे इत आश्रमात् ।
मुहर्त संप्रतीक्षख स मां तुभ्यं प्रदास्यति ॥ ५ ॥
॥ निहत्तरयां अध्याय ७३ ॥
राजा दुप्मान योग ल्याणि । तर जन्म तुझको चाहिये सो ले परन्तु मेरी भार्या होना म्बी-
का दाल, मुनने में मुझको या, निश्चय प्रतीत होता
कार कर। हे भीरु मुन्दरी ! विवाहों में गाधविवाह
१ कि, तु गजपुरी इममें में चाहता है कि न श्रेष्ठ कहा हे इस कारण से तृ अब गान्धर्वधियाह
मामी होजा और कार में तेग यया प्रिय कार्य के द्वारा मुझको विवाह ले । शकुन्तला ने कहा-
करा मानकीमाग, समयम मान व
दर गन् ! हम आश्चम में मेरा पिता फल राने गया
भारदमा में उत्पमा गोमागमान मणि और ग्न ४ आया ही चाहता है यह निश्चय मेरा विवार
गरे ३ गषण, उगम मृगनर्म, सम्पूर्ण राज्य जो पष्ट तुम्हारे माथ कर देगा ॥१५॥

अध्या महाभारत टु यन्त उवाच-- इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते । त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वगतं हि मनो मम ॥ ६ ॥ आत्मनो वन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः । आत्मनेवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः ॥ ७ ॥ अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः । ब्राह्मो देवस्तथैवार्पः प्राजापत्यस्तथासुरः ॥ ८॥ गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः । नेपां धान्यथापूर्व मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥ ९ ॥ प्रशस्तांश्चतुरः . पूर्वान्याह्मणस्योपधारय । पडानुपूर्व्या क्षत्रस्य विद्धि धाननिन्दिने !॥ १० ॥ राज्ञां तु राक्षसोऽप्युक्तो विशुद्रेवासुरः स्मृतः । पञ्चानां तु त्रयो धा अधम्या द्वौ स्मृताविह ॥ ११ ॥ पैशाच आसुरश्चैव न कर्त्तव्यो कदाचन । अनेन विधिना कार्यों धर्मस्येपा गतिः स्मृता ॥ १२ ॥ गान्धर्वराक्षसौ भने धयों तो मा विशङ्किथाः । पृथवा यदि वा मिश्रो कर्तव्यो नात्र संशयः ॥ १३ ।। सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवर्णिनी । गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि ॥ १४ ॥ दुप्पन्न न कहा-हे उत्तम जंयायाली अनिन्दित । ब्राझण के लिये उत्तम हैं । हे अनिन्दित ' पहिले तू अभी मेरी इच्छा पूर्ण कर । मैं तेरे लिये यहा छै विवाह क्षत्रिय के लिये है ॥१०॥ टहरा हुआ हूं और मेरा चित्त तुझमें ही लगा हुआ गजाओं को राशमविवाह भी कहा है, वैश्य है | अपना बन्धु और अपनी गनि अपना आत्मा और गृह के लिये आनुरविवाह भी कहा है । है। अपने शरीर का दान धर्म में करना चाहिये । पहले पानी में तीन विवाह धर्मस और दो विवाह मंझेर से धर्मानुसार आठ प्रकार के विवाह कह हैं अधर्मरूप है। पेशाब और अमुरविवाह कदापि ब्राय, देव, आर्य, प्राजापत्य, आसुर, गांधर्व, गक्षम न कर, इस विधि में विवाह करना धर्म और पैगाच । इन आठों विवाहों को म्वायम्भुवमनु गति है। शत्रियों को गान्धर्व और सक्षमविवाह ने धर्म में कहा है । टनमें में पहले चार विवाह करना धर्मन्य है, इसमे में कान के बा में हो रहा wwwLARSecruwautectomotion । - पाम- । ।

महा भारत । आदिपर्व शकुन्तलोवाच-यदि धर्मपथस्त्वेष यदि चात्मा प्रभुर्मम । प्रदाने पौरवश्रेष्ठ शृणु मे समयं प्रभो ॥१५॥ सत्यं मे प्रतिजानीहि यथा वक्ष्याम्यहं रहः । मयि जायेत यः पुत्रः स भवेत्त्वदनन्तरः ॥ १६ ॥ युवराजो महाराज सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । यद्येतदेवं दुष्यन्त अस्तु मे संगमस्त्वया ॥ १७ ॥ वैशपायन उवाच--एवमस्त्विति तां राजा प्रत्युवाचाविचारयन् । अपि च त्वां हि नेष्यामि नगरं त्वं शुचिस्मिते ॥ १८ ॥ यथा स्वमीं सुश्रोणि सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । • एवमुक्त्वा स राजर्पिस्तामनिन्दितगामिनीम् ॥ १९ ॥ जग्राह विधिवत्पाणावुवास च तया सह । विश्वास्य चैनां स प्रायाबवीच पुनः पुनः ॥ २० ॥ प्रेपयिष्ये तवार्थाय वाहिनी चतुरङ्गिणीम् । तया त्वानाययिष्यामि निवासं स्वं शुचिस्मिते ॥ २१ ॥ वैशम्पायन उवाच इति तस्याः प्रतिश्रुत्य म नृपो जनमेजय । मनसा चिन्तयन्प्रायात्काउयपं प्रति पार्थिवः ॥ २२ ॥ भगवांस्तपसा युक्तः श्रुत्वा किं नु करिष्यति । एवं स चिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम् ॥ २३ ॥ है और तू भी कामदेव के वश में है हमार तरे युक्त ' मैं तुझसे सत्य कहता है कि, तेरा सम्मान गान्धर्व विवाह होने में कुछ दोष नहा, तू इमको नग योग्यतानुसार करके नगर में रक्सूगा । यह अाकारका । यह मुनकर मकुन्नर ने कि कह उस राजर्षि ने विधिपूर्वक शकुन्तला का पाणि जो नुमा वान धर्मयुन और हमम कुछ अधी ग्रहण किया। इसके पश्चात् राना शान्तनग को नहीर, नी में अपनी आत्मा का दान इम नियम बार बार यह विश्वाम देकर कि, मैं तुझको चतुर पर मरना , जो मंग पुत्र उत्तर हव हिना मना मंजस अपने राजमन्दिर में बुराऊगा, ॥ नई पी गजाहीull नग गया 1 सम्पायन ने कहा- अनमेनय' गायन ने हा विना विचार गना ने इस प्रकार मान्नग में प्रतिज्ञा कर मनंग कममपि माम मा हो । यहा। मुदामाम्य विचारनामा गला दृप्यन्त नग गया। १८॥२२॥ - ........"

अन्याय ७३ ] म हा भारत ३१० मुहूर्तयाते तस्मिंस्तु कण्वोऽप्याश्रममागमत् । शकुन्तला च पितरं हियानोपजगाम तम् ॥ २४ ॥ विज्ञायाथ च तां कण्वो दिव्यज्ञानो महातपाः । उवाच भगवान्प्रीतः पश्यन्दिव्येन चक्षुषा ॥ २५ ॥ त्वयाऽद्य भद्रे रहसि मामनादृत्य यः कृतः । पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः ॥ २६ ॥ क्षत्रियस्य हि गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते । सकामायाः सकामेन निमन्त्री रहसि स्मृतः ॥ २७ ॥ • धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः । अभ्यगच्छः पतिं यत्त्वं भजमानं शकुन्तले ॥ २८ ॥ महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महाबलः । य इमां सागरापांगी कृत्स्ना भोक्ष्यनि मेदिनीम् ॥ २९ ॥ परं चाभिप्रयातस्य चक्र तस्य महात्मनः । भविष्यत्यप्रतिहतं सततं चक्रवर्तिनः ॥ ३० ॥ ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्वान्तं मुनिमब्रवीत् । विनिधाय ततो भारं सन्निधाय फलानि च ॥ ३१ ।। शकुन्तलोवाच--मया पतिवृतो राजा दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः । तस्मै ससचिवाय त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ३२ ।। भगवान् कण्यऋषि तपस्या से युक्त है । वह इस है । सकाम क्षत्रिय स्त्री पुरुषा का गान्धर्व विवाह मेरे वृत्तान्त को सुनकर न जाने क्या करे । इस प्रकार एकान्त में बिना मन्त्रोच्चारण के श्रेष्ठ कहा है। सोचते हुए, राजा ने अपने नगर प्रवेश किया । धर्मात्मा और महात्मा पुम्पों में श्रेष्ठ राजा दुप्यन्त ने राजा के चले जाने पर कण्वमापि अपने आश्रम में इच्छा से तुझको प्राप्त किया । इस कारण लोक आये और शकुन्तला लज्जा के मारे पिता के समीप में महाबली और महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा और न गई । बड़े तपम्बी कण्यऋषि ने दिव्यदृष्टि से समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी पर राज्य करेगा । उसकी सेना उस विषय को जान लिया और प्रसन्नतापूर्वक कहा संदव जय प्राप्त करेगी इस कारण वह चक्रवर्ती हे मद्रे ! तूने मेरा निरादर करके एकात में पुरुष कहलवेगा ॥२३॥३०॥ के माय भोग किया है परन्तु वह धर्मनामक नहीं इसके पश्चात् शरन्तला ने मुनि से फार आदि महाभारत [ आदिपर्व ने कण्य उवाच-प्रमन्न एव तस्याहं त्वत्कृते वरवर्णिनि । गृहाण च वरं मत्तस्त्वं शुभे यदभीप्सितम् ॥ ३३ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो धर्मिष्ठतां वने राज्याच्चास्खलनं तथा । शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया ॥ ३४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ।। ले लिये और रखकर उनके चरण धोये । जब ऋषि तेरे कारण मै राजा दुष्यन्त से प्रसन्न ही हू । हे अपने आसन पर बेठ गये, तब शकुन्तला ने कहा शुभे ! जो तेरी इच्छा हो सो मुझसे माग । कि, पुरुषों में श्रेष्ठ राजा दुप्यन्त को मैने अपना वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय । शकुन्तला पति बनाया है, आप मत्रियों सहित राजा पर कृपा दुझ्यन्त के हित की इच्छा से पुरुवंशियों के राज्य कीजिये । कण्वऋषि ने कहा हे मधुरभापिणी और धर्म की स्थिति का वर माँगा ॥३१॥३४॥ आदिपर्व का तेहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ। अथ चतु माततितमोऽध्याय ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच-प्रतिज्ञाय तु दुष्यन्ते प्रतियाते शकुन्तला । गर्भ सुपाव वामोरुः कुमारमतितौजसम् ॥ १ ॥ त्रिपु वर्षेषु पूर्णेषु दीप्तानलसमद्युतिम् । पौदार्यगुणोपेतं दौप्यन्ति जनमेजय ॥ २ ॥ जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यकृतां वरः । विधिवत्कारयामास वर्धमानस्य घीमतः ॥ ३ ॥ दन्तेः शुक्लः शिवगिभिः सिंहसंहननो महान् । चक्रांकितकरः, श्रीमान्महामृर्धा महावलः ॥ ४ ॥ कुमागे देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत । पवर्प एव वालः म कण्वाश्रमपदं प्रति ॥ ५ ॥ । चानावा अध्याय 500 सम्पायन ने कहा दुप्यन्न * पनिता कर में श्रेष्ठ कण्यापि ने उसके जातकर्म आदि सम्बार जाननान वर्ष पार प्रदीप अनि ममान पहा विधिपूर्वक क्यि । उम यार के दात उजले और नजाची पुत्र गजा दुप्यन्न ६ बाय मुर्ग चाकने हुए थे । गति सिंह के समान, हाथ में गपुनरागर्म में उत्पन्न हुआ। उम पुण्यात्माश्री भय, चक्र, गदा और मत्स्य रंग्या पड़ी थी, शोभा- ।

अन्याय ७४ महाभारत ३६३ 3-~~ सिंहव्याघ्रान्वराहांश्च महिपांश्च गजांस्तथा । ववन्ध वृक्षे बलवानाश्रमस्य ममीपतः ॥ ६ ॥ आरोहन्दमयंश्चैव क्रीडश्च परिधावति । नतोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः ॥ ७ ॥ अस्त्वयं सर्वदमनः म हि दमयत्यसौ । स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत ॥ ८ ॥ विक्रमेणौजमा चैव वलेन च समन्वितः । तं कुमारमृपिदृष्ट्वा कर्म चास्यानिमानुपम् ॥ ९ ॥ समयो यौवराज्यायेत्यत्रबीच शकुन्तलाम् । तस्य तदलमानाय कण्वः शिष्यानुवाच ह ॥ १० ॥ शकुन्तलामिमां शीघ्र सहपुत्रामितो गृहात् । भर्तुः प्रापयतागारं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ ११ ॥ नारीणां चिम्बासो हि बान्धवेषु न रोचते । कीर्तिचारित्रधर्मघ्नस्तस्मान्नयत मा चिरम् ॥ १२ ॥ तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे प्रातिष्ठन्त महौजसः । शकुन्तलां पुरस्कृत्य सपुत्रां गजसाह्वयम् ॥ १३ ॥ गृहीत्वामरगर्भाभ पुत्रं कमललोचनम् । आजगाम नतः सुभ्रूर्दुप्यन्तं विदिनादनात ॥ ११ ॥ युक्त, रवान, देवताओं के गंभ के समान कान्ति अवमपि ने विक्रम, तन और चरयुक्त गति से वाला उस आश्रम में शीघ्र बढ़ने लगा। छ वर्ष वाहिर काम को देखकर मकन्तला में कहा कि, की उमर में वह मिंह, व्याघ्र, वागह, यह वल् अव युवरान होने के योग्य है और हाथियों को परका मुनि के आश्रम के पाम वृक्षों उसके पगम को देखकर ऋषि ने अपने शिष्यों में बाघता था ॥१६॥ वह चालक किमी पर चढता. किमी को दण्ड सम्पूर्ण स्पणों से युक्त गानरा को पुत्र देता, क्मिी के माय खन्ना हुआ आश्रम में फिरता सहित मेरे आश्रम से रे जाकर शीघ्र हमके पनि था । आश्रमवामियों ने उसका नाम सर्वदमन रक्ता के पास पहुँचाओ । स्त्रियों का भाई-बाधवों के घर क्योंकि वह मवका वर मे दमन करता था । में रहना कीच, धर्म आर मार का नाम करना भम आर ३६४ महाभारत | आदिप ADS अभिसृत्य च राजानं विदिता च प्रवेशिता । सह तेनैव पुत्रेण बालार्कसमतेजसा ॥ १५ ॥ निवेदयित्वा ते सर्वे आश्रमं पुनरागताः । पूजयित्वा यथान्यायमब्रवीच शकुन्तला ॥ १६ ॥ अयं पुत्रस्त्वया राजन्यौवराज्येऽभिषिच्यताम् । त्वया ह्ययं सुतो राजन्मय्युत्पन्नः सुरोपमः । यथासमयमेतस्मिन्वतस्व पुरुषोत्तम ॥ १७॥ यथा मत्सङ्गमे पूर्व यः कृतः समयस्तथा । त स्मरख महाभाग कण्वाश्रमपदं प्रति ॥ १८ ॥ सोऽथ श्रुत्वैव तद्वाक्यं तस्या राजा स्मरन्नपि । अब्रवीन्न स्मरामीति कस्य त्वं दुष्टतापसी ॥ १९ धर्मकामार्थसंवन्धं न स्मरामि त्वया सह । गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद्वापीच्छसि तत्कुरु ॥ २० ॥ सेवमुक्ता वरारोहा ब्रीडितेव तपस्विनी । निःमज्ञेव च दुःखेन तस्थौ स्थूणेव निश्चला ॥ २१ ॥ संरम्भामर्पताम्राक्षी स्फुरमाणोप्टसंपुटा । कटाक्षर्निर्दहन्तीव तिर्यग्राजानमैक्षत ॥ २२ ॥ है, इस कारण इसे गीघ्र रे जाओ। शिष्यों ने 'ऐसा आपके वीर्य से यह मेरा पुन उत्पन्न हुआ ही हो परकर गान्तरा को पुर सहित स्तिनापुर रे पुम्पा म श्रेष्ठ । अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार इस रे गये । देवताओं के महश कान्तिवार कमलरोचन पुत्र म बर्ताव करो । हे महाभाग ' ण्यापि के पुन कोरेकर यन में मिरे हुए राजा दुष्यन्त के पास आश्रम में मेरा आपका सगम हुआ था और आपने कुन्तरा गई । राजा को खबर कराकर प्रह में उम समय यह प्रतिज्ञा की थी, उस प्रतिज्ञा की भवता कराई हुई उदय होते हुए सूर्य के ममान याद करो । प्रतिज्ञा याद दिलाने पर भी राजा ने पुत्रवारी इन्न। म पाम गई। मपि कहा कि, मुझको कुछ स्मरण नहीं है । हे दुष्ट शिष्य गा दप्यान में कार का दापम आश्रम को नपम्बिनी ' तू किसकी कन्या है । मुझे तेरे साथ पर गये. गपुनम ने यथायोग्य मरकर हर कोई धर्म, अर्थ या काम का सम्बन्ध नहीं हुआ • गन 'इम पुत्र को युवराज धनाभा ।।तृ अपनी इच्छानुसार यहा २६ या चरी जाय।

अध्याय ७४ । महा मारत आकारं गृहमाना च मन्युना च समीरिता । तपसा संभृतं तेजो धारयामास वै तदा ॥ २३ ॥ सा मुहूर्त्तमिव ध्यात्वा दुःखामर्पसमन्विता । भारमभिसंप्रेक्ष्य ऋद्धा वचनमब्रवीत् ॥ २४ ।। जानन्नपि महाराज कस्मादेवं प्रभापसे । न जानामीति निःशकं यथाऽन्यः प्राकृतो जनः ॥ २५ ॥ अन ते हृदयं वेद सत्यस्यैवानृतस्य च । कल्याणं वद साक्ष्येण माऽऽत्मानमवमन्यथाः ॥ २६ ॥ योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा ॥ २७ ॥ एकोऽहमस्मीति च मन्यसे त्वं न हृच्छयं वेत्सि मुनि पुराणम् । यो वेदिता कर्मणः पापकस्य तस्यान्तिके त्वं वृजिनं करोपि ॥ २८ ॥ मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद्वेत्ति मामिति । विदन्ति चैनं देवाश्च यश्चैवान्तरपूरुपः ॥ २९ ॥ आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्योभूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ३० ॥ यमो वैवस्वतस्तस्य निर्यातयति दुष्कृतम् । हृदि स्थितः कर्मसाक्षी क्षेत्रको यस्य तुष्यति ॥ ३१ ॥ जो चाहे सो कर ॥११॥२०॥ सोचकर कोध में पति की ओर देवकर यह कहा- वह उत्तम जयावाग नपम्बिनी इस प्रकार है महाराज ' आपन मब वृत्तान्त जानते हुए भी राजा के कहने पर लजा में मंचन हो म्वों के माधारण मनुप्य के ममान यह कम कहा कि, ममान निश्चल बडी रह गई । क्रोध में नेत्र राल मुझको कुछ याद नहीं । आपका हृदय मत्य और हो गये, होठ फडान लंग और राजा की ओर अमत्य को जानना है । जो मनुष्य चमत्य व्यवहार निरठी दृष्टि में देखने रगी, मानो उमको भम्म का करना है वह मब पापों के कग्ने ग भागी होता देगी । क्रोध के प्राप्त आकार को छिपाती हुई है। हे राजन् ! आप यह जानत हो कि, में अकेला तपम्या मे मचिन तेजका उमने प्रकार किया । था मेरे मुख मे निरे हुए वननों को कोई नही दुम्म और क्रोध में व्यारल शान्तला न कुछ जानता है, परन्तु यह नदी ममनने किया मन- । । . 20s-case । आदिपर्व म दा भारत न तु तुष्यति यस्यैप पुरुषस्य दुरात्मनः । तं यमः पापकर्माणं वियातयति दुष्कृतम् ॥ ३२ ॥ योवमन्यात्मनात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते । . न तस्य देवाः श्रेयांसो यस्यात्माऽपि न कारणम् ॥ ३३ ॥ स्वयं प्राप्तति मामेवं मावर्मस्थाः पतिव्रताम् । 'अर्चाहीं नार्चयसि मां स्वयं भार्यामुपस्थिताम् ॥ ३४ ॥ किमर्थं मां प्राकृतवदुपप्रेक्षसि संसदि । न खल्वहमिदं शून्ये रौमि किं न शृणोपि मे ॥ ३५ ॥ यदि मे याचमानाया वचनं न करिष्यसि । दुष्यन्त शतधा मूर्धा ततस्तेद्य स्फुटिप्यति ॥ ३६ ॥ भार्या पतिः संप्रविश्य स यस्माज्जायते पुनः । जायायास्तद्धि जायात्वं पौराणाः कवयो विदुः ॥ ३७॥ यदागमवतः पुंसस्तदपत्यं प्रजायते । तत्तारयति संतत्या पूर्वप्रेतान्पितामहान् ॥ ३८ ॥ पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्रायते सुतः । तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ॥ ३९ ॥ यामी परमारमा जो सबके हृदय में विराजमान है, राजन् ! मैं आपकी पतिव्रता स्त्री आपके पास आई मब जानता है और सब कर्मों का माक्षी है । इसके हुई है। आप मेरा सपके सम्मुख तिरस्कार करते हैं सिवाय सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अमि, पृथ्वी, आकाश, और मेरे कहने पर कुछ ध्यान नहीं करते इसका जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, दोनों सन्ध्या और क्या कारण है। क्या आप सुनते नहीं है ॥३१॥३५॥ मनुष्यों के कृत्य को जानते हैं ॥२१॥३०॥ हे राजा दुप्यन्त ' यदि इतने पर भी आप जिमका हृदय में स्थित कामी कामाक्षी मतुष्ट मेरे कहे पर ध्यान न देंगे तो याद रखिए आपक होता है, उसके पापों को यमराज दूर कर देते है मिर के सौ टुकड हो जायेंगे । वेदशास्त्र के जानन- और जिमका यह कामों का साक्षी संतुष्ट नहीं वालों ने पाटरूप से कहा है कि, पति भार्या के होना उमको यमराज दण्ड देने है। आप जो अपने उदर में प्रवेश करके आपही पुत्ररूप से उत्पन्न यि हुए कर्म को न मानकर अपना अपमान करते होता है इमोसे नी को जाया करते हैं। धर्मपती में आपका देवना भाग नही करेंगे। हम कारण में जो पुत्र उत्पन्न होता है वह वंश बढ़ाकर पूर्व आपका आमामी श्रेष्ठकारक नहीं होगा। है. पुरुषों का उद्धार करता है। यह पुत्र पिता और ।

-- अध्याय ७४) महा मारत पुत्रेण लोकाञ्जयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पौत्रस्य पुत्रेण मोदन्ते प्रपितामहाः ॥ ४०॥ सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती । सा भार्या या पतिप्राणा साभार्या या पतिव्रता ॥ ११ ॥ अर्ध भार्या मनुष्यस्य भार्या श्रेष्ठतमः सखा । भार्या मूलं त्रिवर्गस्य भार्या मूलं तरिष्यतः ॥ १२ ॥ भार्यावन्तः क्रियावन्तः सभार्या गृहमधिनः । भार्यावन्तः प्रमोदन्तेभार्यावन्नः श्रियाऽन्विताः ॥ ४३ ॥ सखायः प्रविविक्तेषु भवन्त्येताः प्रियंवदाः । पितगे धर्मकार्येषु भवन्त्यानस्य मातरः ॥ ४४ ॥ कान्तारेवपि विश्रामो जनस्याध्वनिकस्य वे । यः सदारः स विश्वास्वस्तस्माददाराः परा गतिः ॥ ४५ ॥ संसरन्तमपि प्रेतं विषमेवेकपानिनम् । भार्यवान्वेति भर्तारं सनतं या पनित्रता ॥ ४६॥ प्रथम संस्थिता भार्या पति प्रेत्य प्रतीक्षते । पूर्व मृतं च भर्तारं पश्चात्साध्यनुगच्छनि ॥ १७॥ सब पितरों को पुन्नाम नरक में रक्षा करता है। लगाती है और दुम्स आदि के ममय माना की इस कारण से उसको पुत्र कहते हैं । भार्या वास्तव तरह मवा करती है । ची साथ में रहने से मनुष्य में वहीं है, जो चतुर पुत्रवाली और पतिव्रता हो जङ्गल में मी मुम्ब में रह सकता है। बी के न और पति को प्राणों के ममान चाहे । माया पुरुष होने में उम पर कोर्ट विश्वास नहीं करता । इसलिये का आधा अङ्ग है । भार्या में ही धर्म, अर्थ और ना ही मनुष्य की परमगति है ॥१२॥४४॥ काम की सिद्धि होती है। मार्या ही ममार से ताग्न विपत्तिकाल में और माने पर पतिबना माया ही की मूल हे ॥३६॥४१॥ पुस्य का माथ देती है। प्रथम पालोक की गई पुरुष भार्या के बिना धर्म-कर्म नहीं कर सकता हुई मार्या पनि की प्रतीक्षा करती है; किन्तु पनि । मायां के होने में ही पुरुष गृहम्थी कहलाता जो पहिले मर जाना है तो वह उनी ममय उम है । भार्या में ही पुरुष आनन्दित और लक्ष्मीयुक्त माथ परन्गक मिधारती है। गजन : पनि का होता है । प्रिय बालनवाली बी एकान्त में मित्र मायां इम लोक और परलोक में प्रान ही की तरह मुख देती है। धर्म मं में पिता की तरह कारण विवाह की इच्छा को नानीमानी - Mc महाभारत । आदिपत्र एतस्मात्कारणाद्राजन्पाणिग्रहणमिप्यते यदाप्नोति पतिर्भार्यामिहलोके परन च ॥१८॥ आत्मात्मनैव जनितः पुत्र इत्युच्यते बुधैः । तस्माद्भायाँ नरः पश्येन्मातृवत्पुत्रमातरम् ॥ १९ ॥ भार्यायां जनितं पुत्रमादर्शष्विव चाननम् । ह्लादते जनिता प्रेक्ष्य स्वर्ग प्राप्येव पुण्यकृत् ॥ ५० ॥ दह्यमाना मनोदुःखैर्व्याधिभिश्चातुरा नराः । हादन्ते स्वेषु दारेषु धर्मार्ताः सलिलेष्विव ॥ ५१ ।। सुसंरब्धोऽपि रामाणां न कुर्यादप्रियं नरः । रति प्रीतिं च धर्म च तास्वायत्तमवेक्ष्य हि ॥ ५२ ॥ आत्मनो जन्मनः क्षेत्रं पुण्यं रामाः सनातनम् । ऋषीणामपि का शक्तिः स्रष्टुं रामामृते प्रजाम् ॥ ५३ ।। प्रतिपद्य यदा सूनुर्धरणीरेणुगुण्ठितः । पितुगश्लिप्यतेऽङ्गानि किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥ ५४ ॥ स त्वं स्वयमभिप्राप्त साभिलाषमिमं सुतम् । प्रेक्ष्यमाणं कटाक्षेण किमर्थमवमन्यसे ।। ५५ ।। अण्डानि विभ्रति स्वानि न भिन्दन्ति पिपीलिकाः । न भरेथाः कथं नु त्वं धर्मज्ञः सन्स्वमात्मजम् ॥ ५६ ॥ का यह कथन है कि, पुरुष पुत्रमा मे आप ही शान्ति पाता है । सुख, प्रमन्नता और धर्म को बी में उत्पन्न होता है, इस कारण पुत्रवनी स्त्री मियों के अधीन देखकर क्रोध के वशीभूत होकर का माता के समान आदर करना चाहिये । जैसे भो पुम्प स्त्रियों मा अप्रिय न करे । त्रियों से ही म्बर्ग को पार पुम्प को प्रमन्नता होती है, वैसे पुरष पैदा होते है-वे ही पुरुषा की उत्पत्ति का पिता अपने पुत्र को दर्पण में अपने मुग्य की तरह पवित्र और नित्य स्थान है। स्त्रिया के बिना बड़े देमार आनन्दित होना है ||१५|| अंडे ऋपि भी प्रजा उत्पन्न नहीं कर सकते ॥५०॥५२॥ जमे धूप में जगहुआ मनुष्य जल मिल्ने पृथ्वी की धूल से लिपटा हुआ बालक दौड़ ग प्रसन्न होता है, वम ही शरीर की पीड़ा और कर पिता मे मिरता है, तब उससे अधिक क्या मन मन्नार में न्यायल, पुस्प मी के मग में मुम्ब है । फिर क्या कारण है, जो आप अपने इम - -- अन्याय ७८) महा मारत ३१० न बाससां न रामाणां नापां स्पर्शस्तथाविधः । शिशोरालिङ्ग-यमानस्य स्पर्शः सूनोर्यथा सुखः ॥ ५७ ॥ ब्राह्मणो द्विपढां श्रेष्टो गौर्वरिष्टा चतुष्पदाम् । गुरुगरीयसां श्रेष्ठः पुत्रः स्पर्शवतां वरः ॥ ५८॥ स्पृशतु त्वां समाश्लिष्य पुत्रोऽयं प्रियदर्शनः । पुत्रस्पर्शात्सुखतरः स्पर्शी लोके न विद्यते ॥ ५९॥ त्रिषु वर्षेषु पूर्णेपु प्रजाताहमरिंदम । इमं कुमारं राजेन्द्र तव शोकविनाशनम् ॥ ६ ॥ आहर्ता वाजिमेधस्य शतसह्यस्य पौरव । इति वागंतरिक्षे मां सूतकेऽभ्यवदत्पुरा ॥ ६१ ॥ ननु नामाङ्कमारोप्य स्नेहाद ग्रामान्तरं गताः । मूर्ध्नि पुत्रानुपाघ्राय प्रतिनंदान्ति मानवाः ॥६२ ।। वेटेवपि वदंतीमं मंत्रग्राम द्विजातयः । जातकर्मणि पुत्राणां तवापि विदितं तथा ॥ ६३ ॥ अकादगात्संभवसि हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ॥ ६४ ॥ पुत्र का निरादर करते हो ? हे महाराज । चीटिया पर मैंने आपके गोक को दूर करनेवारे इस पुत्र भी अपने अडों की रक्षा करती हैं आर कुसमय को उत्पन्न किया है । हे पुरुवशी । इसके प्रमर नहीं फोड़ती । आप धर्मज्ञ और समर्थवान् होते होने पर आकाशवाणी हुई थी कि, यह रड़का हुए भी पुत्र का अनादर कर रहे है। मनुष्य को मो अश्वमेधयन करेगा ।। - ८६०॥ वन, स्त्री और जल को हृदय में लगाने से ऐसा परदेश जाते हुए पुम्प पुत्र को गोद में बिठाने आनद नहीं होता, जैसा पुत्र को गोद में लेने से होता और उसका माथा मघर आनन्दित होते हैं। है ॥५३१५७॥ आप जानते हैं कि, ब्राह्मण पुत्रों के जानकम ममार जैसे मनुप्यों में ब्राह्मण, चौपायों में गाय और मे वेद के मत्रों को पढ़ते हैं। हे पुन ' तुम केवर पुरुषों में गुरु श्रेष्ठ है, वेमे ही म्पर्ग वस्तुओं में पुत्र नाम मात्र को मुझमे अरग हो। तुम मेरे आत्मा श्रेष्ठ है । इसमे आप अपने दम पुत्र को छाती से ही हो। तुम्हारी पूरे मा वर्ष की आयु हो। पुत्र रगा रोगिये । इस ममार में पुत्र-म्पर्श में पदार मेग जीवन और वम तुम्हारे अधीन है। तुम मुम्ब मुख नहीं है । है शत्रुनामी ' तीन वर्ष पूर्ण होने से पूर मौ वर्ष तक जीवित रहे। हे राजन् ' यह - - . । SMARAN [ आदिपर्य ३७० मद्दा भार जीवितं त्वदधीनं मे संतानमपि चाक्षयम् । तस्मात्त्वं जीव मे पुत्र सुसुखी शरदां शतम् ॥ ६५ ॥ त्वदङ्गेभ्यः प्रसूतोऽयं पुरुषात्पुरुषोऽपरः । सरसीवामले त्मानं द्वितीयं पश्य वै सुतम् ।। ६६ ॥ यथा ह्याहवनीयोऽग्निर्हपत्यात्प्रणीयते । तथा त्वत्तः प्रसूतोऽयं त्वमेकः सन्द्विधाकृतः ॥ ६७ ॥ मृगावकृष्टेन पुरा मृगयां परिधावता । अहमासादिता राजन्कुमारी पितुराश्रमे ॥ ६८ ॥ उर्वशी पूर्वचित्तिश्च सहजन्या च मेनका । विश्वाची च घृताची च षडेवाप्सरसां वराः ॥ ६९ ।। तासां सा मेनका नाम ब्रह्मयोनिर्वराप्सराः । दिवः संप्राप्य जगतीं विश्वामित्रादजीजनत् ॥ ७० ।। सा मां हिमवतः प्रस्थे सुषुवे मेनकाप्सराः । अवकीर्य च मां याना परात्मजमिवासती ॥ ७१ ॥ किं नु कर्माशुभं पूर्व कृतवत्यन्यजन्मनि । यदहं वान्धवैस्त्यक्ता वाल्ये संप्रति च त्वया ॥ ७२ ॥ कामं त्वया परित्यक्ता गमिष्यामि स्वमाश्रमम् । इमं तु वालं सत्यक्तुं नाहस्यात्मजमात्मनः ॥ ७३ ॥ आपकी दूसरी देह अर्थात् पुत्र आपके सब अङ्गों कण्वऋषि के आश्रम में हुआ था। उर्वशी, पूर्व- मे उत्पन्न हुआ है । आपको इसे जल में प्रतिबिम्ब चिति, सहजन्या, मेनका, विश्वाची, घृताची, यह के समान समझना चाहिये । यह पुत्र तुमसे ऐसे छ अप्सराओं में श्रेष्ठ हैं । उन छ में ब्रह्मयोनि उत्पन्न हुआ है, जैसे गार्हपत्य नाग अमि से आहब मेनका ने म्बर्ग से आकर विश्वामित्र के वीर्य से नीय अमि उत्पन्न की जाती है अर्थात् आपके एक हिमाचल के शिखर में मुझको उत्पन्न किया और म्यरूप के इस पुत्र के होने में दो म्यरूप हो गयें मुझको वह स्नेह-रहित दूसरे की सन्तान के सदृश छोड़कर चली गई । मैं नहीं जानती हूं कि, हं राजन् ! थोड़े दिन हुए, आप शिकार खलने पूर्वजन्म में क्या पाप किये है, जिसके कारण से की वन में गये थे। उस ममय मेग आपका संगम बाल्यावस्था में मुझ मेरी माता ने छोड़ दिया - मैंने an अन्याय ७४) महाभारत .. NANA arcasmamiauwaive टुप्यन्त उवाच-न पुत्रमभिजानामि त्वयि जातं शकुन्तले । असत्यवचना नार्यः कस्ते श्रद्धास्यते वचः ॥ ७ ॥ मेनका निरनुकोशा बन्धकी जननी तव । यया हिमवतः पृष्ठे निर्माल्यमिव चोज्झिता ॥७५॥ स चापि निरनुक्रोशः अत्रयोनिः पिता नव । विश्वामित्रो ब्राह्मणत्वे लुब्धः कामवशं गतः ॥ ७६ ॥ मेनकाऽप्सरसां श्रेष्ठा महर्षीणां पिता च ते । नयोरपत्यं कम्मात्वं पुंश्चलीव प्रभाषसे ॥७७ ।। अश्रद्धेयमिदं वाक्यं कथयन्ती न लजसे । विशेषतो मत्सका दुष्टतापसि गम्यताम् ॥ ७८ ॥ क्व महर्षिःम चेवाग्न्यः साऽप्सरा क्व च मेनका । क्व च त्वमेवं कृपणा तापसीवेषधारिणी ॥ ७९ ॥ अतिकायश्च ते पुत्रो वालोऽतिबलवानयम् । कथमल्पेन कालेन शालस्तम्भ इबोद्गतः ॥ ८ ॥ सुनिकृष्टा च ते योनिः पुंश्चलीव प्रभापमे । यदृच्छया कामरागाजाता मेनकया ह्मसि ॥ ८१ ॥ ओर अब इस अवम्या में आप छोडते है ।। ७७१॥ हैं। उनकी कन्या होकर तुम कुल्टा स्त्रियों की हे राजन् ' मुझको आप भले ही छोह दीजिये, तरह ऐमी बातें करक मेरे गले क्यों मैं अपने आश्रम को चली जाऊगी परन्तु आपको हे दुष्टतपम्बिनी ' तुम मेरे मामने ये अमत्य वचन अपने पुत्र का त्याग करना उचित नहीं ह । राना कह रही हो, टममें तुमको रजा नहीं माती दुप्यन्न ने कहा-हे शकुन्तरा ' में तेरे पुत्र को मला कहा तो वह महपि विश्वामित्र, कहा वह मेनका कुछ नहीं जानता ह। बिया मदेव झूट बोलग करती अप्सरा और कहा तृ दीन तपबीन् । तुम्हारा या हैं। तेरी वान पर कौन विश्वाम करेगा । ममताहीन पुत्र जो बड़ा वन्वान और बड़ा मगर सम्बनवाया वेश्या मेनका तुम्हारी माता है, जो निर्माल्य की ह, थोडे ही दिनों में क्योंकर इतना बड़ा हो गया तरह हिमालय पर तुमको डकर चरी गई । क्षत्रिय तरी योनि निकृष्ट है और पुश्चर्ग के मुमान बोन्नी होकर ब्रामण होने की इन्या रम्बनवाने गमातुर है । तू क्वल दैवटच्छा और कामराग में मेनका निर्दय विश्वामित्र तुम्हारे पिना है । अप्मराओं में अप्मरा के उत्पन्न हुई होगी । तेरी सर याने निघ्या है मेनका और ऋपियों में विश्वामित्र श्रेष्ठ ममने जाते हैं। मैं तुमको नहीं पहचानता, जहा तुम्हागजी रही हो। . . - ------ । आदिपर्व म हा भारत सर्वमेतत्परोक्षं मे यत्वं वदसि तापसि । नाहं त्वामभिजानामि यथेष्टं गम्यतां त्वया ॥ ८२॥ शकुन्तलोवाच-राजन्सर्पपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि । आत्मनो बिल्बमात्राणि पश्यन्नपि न पश्यसि ॥ ८३ ॥ मेनका त्रिदशेष्वेव त्रिदशाश्चानुमेनकाम् । ममैवोद्रिच्यते जन्म दुष्यन्त तव जन्मनः ॥ ८४ ॥ क्षितावटसि राजेन्द्र अन्तरिक्षे चराम्यहम् । आवयोरन्तरं पश्य मेरुसर्पपयोरिव ॥ ८५॥ महेन्द्रस्य कुवेरस्य यमस्य वरुणस्य च । भवनान्यनुसंयामि प्रभावं पश्य मे नृप ॥ ८६ ॥ सत्यश्चापि प्रवादोऽयं यं प्रवक्ष्यामि तेऽनघ । निदर्शनार्थं न द्वेषाच्छ्रुत्वा तं क्षन्तुमर्हसि ॥ ८७ ॥ विरूपो यावदादर्श नात्मनः पश्यते मुखम् । मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम् ॥ ८८॥ यदा स्वमुखमादर्श विकृतं सोऽभिवीक्षते । तदाऽन्तरं विजानीत आत्मानं चेतरं जनम् ॥ ८९ ॥ अतीव रूपसम्पन्नो कंचिदवमन्यते । अतीव जल्पन्दुर्वाचो भवनीह विहेठकः ॥ ९० ।। चा, चरी जाओ 11७२१८॥ ममान समझें । इन्द्र, कुवेर, यम और वरुण के मायुन्तरा ने कहा है राजन् ! आप राई के म्थान को में जा सकती हू । हे राजन् ! इसीस दाने के परायर पराये छिद्रों को देखने है, परन्तु आप मेरे प्रभाव को अच्छी तरह जान ले ।।८२।८५॥ अपने बारे ममान हन्दी देबर भी उम पर यह बात मत्य है, तो मै आपको दृष्टात ध्यान नहीं देन । मेनका की गिणती देवताओं में तौर पर करती हैं, क्षमा कीजियगा । जो मनुष्य और दयना म माधन है। मेरा जन्म दुरुप होता है, यह अपना गुख जस्ता दर्पण में आप घंटा? गजेन्द्र । आर वी में नहीं देग्य रेता तबतक यह अपने आपको रुपवान सिनी भीरम भाकाम में जामरती है। मेरे मममना है। परन्तु जब कभी वह दर्पण में अपने भार भने अन्ना को आप मुमेर और सम्मा ६ मुम्प को देख रेता है, नर उमे मादम पड़ता . ।

अध्याय ७४॥ मदा मान मूर्यो हि जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः । अशुभं वाक्यमादत्ते वाक्यमादत्ते पुरीपमिव सूकरः ॥ ९१ ।। प्राज्ञस्तु जल्पता पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः । गुणवद्वाक्यमादत्ते हंसः क्षीरमिवाम्भसः ॥ ९२ ॥ अन्यान्परिवदन्साधुर्यथा हि हि परितप्यते । तथा-परिवदन्नन्यांस्तुष्टो भवति दुर्जनः ॥ ९३ ॥ अभिवाद्य यथा वृद्धान्सन्तो गच्छन्ति निर्वृतिम् । एवं सज्जनमाक्रुश्य मूर्यो भवति निर्वृतः ॥ ९ ॥ सुखं जीवन्त्यदोपज्ञा मूर्खा दोपानुदर्शिनः । यत्र वाच्याः परैः सन्तः परानाहुस्तथाविधान् ॥ ९५ ॥ अनो हास्यतरं लोके किंचिदन्यन्न विद्यते । यत्र दुर्जनमित्याह दुर्जनः सज्जनं स्वयम् ॥ ९६ ॥ सत्यधर्मच्युतात्पुंसः क्रुद्धादाशीविषादिव । अनास्तिकोऽप्युद्विजते जनः किंपुनरास्तिकः ॥ ९७ ॥ म्वयमुत्पाद्य वे पुत्रं सदृशं यो न मन्यते । तस्य देवाः श्रियं प्रन्ति न च लोकानुपाउनुते ॥ ९८ ॥ कि, दूसरे का रूप उसके रूप से कितना अच्छा करके हर्षित होता है, वैसे ही दुर्जन गाली देकर है । म्यरूपवान् मनुष्य दूसरे का निरादर कभी नहीं प्रसन्न होता है । जो पुरुप औरों के दोष नहीं देखना, करता है । दुर्वचन कहनेवाले मनुष्य निन्दक और वह बडे मुख मे जीवन व्यतीत करता है । मूर्य दूसरों को पीड़ा पहुचानेवाले होते हैं । जैसे शूकर की आयु औरों के दोष देखने में ही व्यतीत होना मय पदार्थों को छोड़कर विष्ठा ग्वाता है, उसे ही है। जिन कारणों में साधुनन दुष्टों को बुरा कहने मूर्ख पुरुप दूसरे की पढाई और निन्दा में निन्दा है, उन्हीं कारणों में दुष्ट गंग भी साधुओं की निन्दा को ही ग्रहण करता है ।।८६।९०॥ करते हैं । हे गजन् ' इमसे बहकर समा में हसी बुद्धिमान् पुरुप शुभ और अशुभ वचन सुनकर की बान और क्या हो सकता है कि, दुर्जन रोग शुभ को ऐसे ग्रहण करता है, जैसे पानी में मेहम सजनों को दुर्जन कहने ।। नास्तिक पुरुष भी दूध को। जैस सजन पुरुष दुर्वचन बोलकर पश्चा धर्म और सत्य को छोड़नेवाले मनुष्य से मर्म की ताप करता है, वमे ही दुर्जन दुर्वनन चोर कर हपित नाई डरते है, आम्नी का नो कहना ही क्या? होता है । जैम मजन पुरुष वृद्धों को नमस्कार ॥११.७॥ - 2- मद्द। भारत । आदिपर्व ३७४ कुलवंशप्रतिष्ठां हि पितरः पुत्रमब्रुवन् । उत्तम सर्वधर्माणां तस्मात्पुत्रं न सत्यजेत् ॥ ९९ ॥ स्वपत्नीप्रभवान्पञ्च लब्धान्क्रीतान्त्रिवर्धितान् ।।.. कृतानन्यासु चोत्पन्नान्पुत्रान्वै मुनुरनेवीत् ॥ १० ॥ धर्मकीर्त्यावहा नृणां मनसः प्रीतिवर्धनाः । त्रायन्ते नरकाज्जाताः पुत्रा धर्मप्लवाः पितृन् ॥ १०१ ॥ स त्वं नृपतिशार्दूल पुत्रं न त्यक्तुमर्हसि ॥ १०२ ॥ आत्मानं सत्यधर्मों च पालयन्पृथिवीपते । नरेन्द्रसिंह कपटं न वोढुं त्वमिहार्हसि ॥ १०३ ॥ बरं कूपशताद्वापी वरं वापीशतात्क्रतुः । वरं क्रतुशतात्पुत्रः सत्यं पुत्रशताद्वरम् ॥ १०४ ।। अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥ १०५ ॥ सर्ववेदाधिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । सत्यं च वचनं राजन्समं वा स्यान्नवा समम् ॥ १०६ ॥ जो पुरष आप पैदा करके पुत्र को अपना नहीं त्याग करना आपके लिये उचित नहीं है। अपनी म्वीकार करता, उसकी रक्ष्मी को देवता नाश कर आत्मा की रक्षा के कारण सत्य और धर्म का पालन देते हैं और वह उत्तम रोक को नहीं जाता । पितरों करते हुए आपको कपट न करना चाहिये । देखिए, ने वश की वृद्धि और सब धर्मों में पुर सौ कुएँ बनाने में एक बावली श्रेष्ठ है । सौ को उत्तम कहा है। इसरिये पुत्र को कदाचित् यावरियों से एक यज्ञ करना श्रेष्ठ है। एक त्याग न करे । मनु ने पान प्रकार के पुत्र कह है यन करने की अपेक्षा एक पुत्र उत्पन्न करना श्रेष्ठ पर अपनी स्वी मे उसन, दुमरा अन्य से है। सौ पुत्र उत्पन्न करने की अपेक्षा सत्यवादी नासरा मोर रिया हुआ, चाया पारा हुआ और होना श्रेष्ठ है । एक और सत्य और दुमरी और पाचवा मार दिया हुआ । यह पुत्र मनुप्या में नार अश्वमेध यज्ञा का पर रखकर देखरो, सत्य धर्म और हानिक पानगार, मन को प्रमय करने का पाला ही भारी रहेगा । हे जन् । सम्पूर्ण वेदों यार और निरों को नरा में रक्षा करने के हेतु का पदना और तीनान सत्य के बराबर नहीं है धर्मदानावहान ०८11०॥ 11१०11०७॥ ६ गजानी मष्ट । इस कारण पुत्र का सत्य के ममान दमरा धर्म नहीं है । सत्य में - सो प्राप्त, । Amr.mahaka -- अन्याय ७. म हा भारत नास्ति सत्यसमो धर्मों न मत्याद्विद्यते परम् । न हि तीवतरं किंचिदनृतादिह विद्यते ॥ १०७ ।। राजन्सत्यं परं ब्रह्म सत्यं । समयः परः । मा त्यानीः समयं राजन्सत्यं संगतमस्तु ते ॥ १०८ ॥ अनृते चेत्प्रसङ्गस्ते श्रदृधासि न चेत्स्वयम् । आत्मना हन्त गच्छामि त्वादृशे नास्ति संगतम् ॥ १०९ ॥ त्वामृतेऽपि च दुप्यन्त शैलराजावतमकाम् । चतुरंतामिमामुर्वी पुत्रो मे पालयि यति ॥ ११० ॥ वैशपायन उवाच-एतावदुक्त्वा राजानं प्रातिष्टत शकुन्तला । अथांतरिक्षादृदुष्यंत बागुवाचाशरीरिणी ॥ १११ ॥ ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमन्त्रिभिश्च वृतं तदा । भस्रा माता पितुः पुत्रो येन जानः स एव सः ॥ ११२ ॥ भरस्त्र पुत्रं दुष्यंत मावसंस्थाः शकुंतलाम् । तोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ॥ ११३ ॥ त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला । जाया जनयते पुत्रमात्मनोऽहं द्विधाकृतम् ॥ ११ ॥ श्रेष्ठ मी और कुछ नहीं है । अठ से बढ़कर कोई आचार्य, मन्त्री आर पुरोहित सहित राना दुप्यन्न पाप भी नहीं है। हे सत्य ही परब्रह्म है। मे कहा कि, माता चर्म का पात्र ह और पुत्र इस मत्य ही सत्र वनों में उत्तम है । इमरिये मत्य को पिता का है निमा वीर्य मे यह उत्पन्न हुआ है। छोड करके धर्म का नाम न कीनिये 1 हं रानन् । हे दुप्यन्त ' आप अपने पुत्र का पालन को और यदि आपको मेरी मब बातें अटी प्रतीत होती है शकुन्तला का अपमान करना आपके लिये उचिन और मेरे कहे पर विश्वास नहीं होना, तो मैं आप नहीं क्योंकि अपन वीर्य में सन्न हुआ पुत्र अपने वन को चली जाती है । क्योंकि आप मे पुरष पितरों को यमरो मे छुड़ाता है। यह पुत्र आपका के पाप रहना ठीक नहीं जान पडता । है राना है। शकुन्नरा का कहना मत्य है। आमा के दूसरे दुप्यन्न । आपके पश्चात् रिमाचल में ममुद्र-पर्यन्त रूप पुत्र कोम्बात्सत करती है । हे रान आप यह वारक पृथ्वी का पालन करेगा1१०1100|| गकुन्तग मे उत्सत इम पुत्र का पालन करें। जीदिन १ वैशम्पायन ने कहा-गना में यह कहकर रहकर भी अपने पुत्र को छोड़कर मम अग गन्नरा चरी। इसके उपरान्त देववाणी ने मालिक, रहना अत्यन्त दुर्भाग्य की बात है ॥१॥११॥ Aucomusmansace रानन -- । आदिपर्व ३७६ म हा भारत तस्माद्भरस्व दुष्यंत पुत्रं शाकुन्तलं नृप । अभूतिरेषा यत्त्यक्त्वा 'जीवेजीवंतमात्मजम् ॥.११५ ॥ शाकुन्तलं महात्मानं दौष्यन्ति भरः पौरख ।. भर्तव्योऽयं त्वया यस्मादस्माक वचनादपि ॥ ११६ ॥ तस्माद्भवत्वयं नाम्ना भरतो नाम ते सुतः । तच्छ्रुत्वा पौरवो राजा व्याहृतं त्रिदिवौकसाम् ॥ ११७ ॥ पुरोहितममात्यांश्च संप्रहृष्टो ब्रवीदिदम् । शृण्वन्त्वेतद्भवन्तोऽस्य देवदूतस्य भापितम् ॥ ११८ ॥ अहं चाप्येवमेवैनं जानामि स्वयमात्मजम् । यद्यहं वचनादेव गृह्णीयामि स्वमात्मजम् । भवेद्धि शङ्कयो लोकस्य नैव शुद्धो भवेदयम् ॥ ११९ ॥ वैशम्पायनउवाच--तं विशोध्य तदा राजा देवदूतेन भारत । दृष्टः प्रमुदितश्चापि प्रतिजग्राह तं सुतम् ॥ १२० ॥ ततस्तस्य तदा राजा पितृकर्माणि सर्वशः । कारयामास मुदिताः प्रीतिमानात्मजस्य ह ॥ १२१ ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघाय चैनमुपाघ्राय मस्नेहं परिषस्वजे । सभाज्यमानो विप्रैश्च स्तूयमानश्च बन्दिभिः ॥ १२२ ॥ स मुदं परमां लेभे पुत्रसंस्पर्शजां नृपः ॥ १२३ ॥ इसलिये आप हमका पालन कीजिये और हमने यह मेरी सन्तान लोगों की दृष्टि में पवित्र न समझी इमक पालने की आज्ञा दी, इस कारण यह बालक जाती । वैशम्पायन ने कहा-हे जनमजय ! इस •भरन' नाम मे पमिद होगा। यह देववाणी मुन प्रकार राजा दुप्यन्त ने देववाणी से पुत्र को शुद्ध- कर गजा दुप्यन ने प्रमन्ननारीक अपने मन्त्रियों कर प्रसन्ननित में उमको ग्रहण किया। इसके पश्चात् और पुगदिनों में कहा-आप लोग भी या प्राकान गजा ने प्रमन्नचित्त से पिना के करने योग्य कार्य वाणी गुन गजिये । मैं इस यारक की या तरह मय करवाए । राजा ने पुत्र का मानक सूंघकर अपना पुत्र जानना किन्तु यदि में फेवल मन्नग मको हुदय में लगाया। उस समय राजा को नगरम पानी अपना पुत्र मान ना पाम आनन्द हुआ। नव ब्राह्मण और पन्दीजनों ने 3 ममा में गक नाहनाक मन्देह, करन और मना की स्तुति की। इसके पधान राजा ने मानी अध्याय 2J मद्दा मारत ३35 तां चैव भार्या दुष्यन्तः पूजयामास धर्मतः । अब्रवीचव तां राजा सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥ १२४ ॥ कृतो लोकपरोक्षोऽयं सम्बन्धोऽयं त्वया सह । तस्मादेतन्मया देवि तन्छुद्धयर्थ विचारितम् ॥ १२५ ।। मन्यते चैव लोकस्ते ब्रीभावान्मयि संगतम् । पुत्रश्वाऽयं वृतो राज्ये मया तस्माद्विचारितम् ॥ १२६ ॥ यच्च कोपितयाऽत्सर्थ त्वयोक्तोऽस्म्यप्रियं प्रिये । प्रणयिन्या विशालाक्षि तत्क्षान्तं ते मया शुभे ॥ १२७ ।। तामेवमुक्ता राजर्पिर्दुप्यन्तो महिषी प्रियाम् । वासोभिरन्नपानश्च पूजयामास भारत ॥ १२८ २८॥ दुप्यन्तस्तु ततो गजा पुत्रं शाकुन्नलं तदा । भरतं नामनः कृत्वा यौवराज्येऽभ्यपेचयत् ॥ १२९ ॥ नस्य तत्प्रथिनं चक्र प्राबर्तन महात्मनः । भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् ॥ १३० ।। स विजित्य महीपालांचकार वशवर्तिनः । बचार च सतां धर्म प्राप बानुत्तमं यशः ॥ १३१ ॥ स राजा चक्रवामीत्सार्वभौमः प्रतापवान् । ईजे च बहुभिर्यज्ञर्यथा. शक्रो मरुत्पतिः ॥ १३२ ॥ माया मकुन्ता का आदर किया और बहुन मानि मे मकार दिया। इसके पश्चान राजा दुप्पन्न ने माथ यह वचन योग ।।११३१२था अपनी प्रतिमा पूर्ण करने के लिये मान काराव्या- हे देवी ! भेग सम्बन्ध टम लोक में तुम्हारे पिक च्यिा ॥१२५१२०॥ माय पंगा में हुआ था। इस कारण मैंने तुन्द्रार्ग मग्न म मापन गेम में प्राममान् . दिल, शुद्धि के अर्थ, लोक के मय में तुमको अनुचित अदित् और भयदायक हुआ। मान ने मार्ग पृथ्वी कहा. उसकी क्षमा मगे और डी क्रोध में मुझमे में गवाओं की बीना अपने काम किया और अनुचित बाते न्द्री है उनमे मना करता हूं। वहा या पाया ! गडा मान सम्पूर्ण पृथ्वी का हे जनमेजय : इस प्रकार गना टुप्यन ने अपनी म्दानी नकवी और प्रनानी हुआ और इन्द्र प्यार्ग और मुखिया स्त्री का वन्त्र, नपा. अन्नादि मनान उसनं बहुन में यह यि । क्वीन मद्दा भारत 1 आदिपर्व ANAND याजयामास तं कण्वो विधिवद्भरिदक्षिणम् । श्रीमान्गोविततं नाम बाजिमधमवाप सः ॥ १३३ ॥ यस्मिन्सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ । भरताद्भारती कीर्तियेनेदं भारतं कुलम् ॥ १३४ ॥ अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः । भरतस्यान्ववाये हि देवकल्पा महौजसः ॥ १३५ ॥ वभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः । येपामपरिमेयानि नामधेयानि सर्वशः ॥ १३६ ॥ तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तयिष्यामि भारत । महाभागान्देवकल्पान्सत्याजवपरायणान् ॥ १३७॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने चतु सप्ततितमोऽध्याय ॥ ७४ ।। मरत को गोवितत और अश्वमेघ यज्ञ कराये और और ब्राह्मणों के सदृश बडे-बडे पराक्रमी राजा भरत ने उन यनों में कण्वऋषि को सहस पद्म उत्पन्न हुए, उनके नाम मै कहता है । परन्तु उनमें धन दिया । भरत से वश की कीर्ति हुई और भारत मे जो मुख्य-मुख्य वश के चलानेवाले हुए उनका कुल प्रसिद्ध हुआ । इम भरतवश में बहुत मे देवता वर्णन करता ह ॥१३०।१३७॥ आदिपर्व ा चाहत्तरवा अध्याय समाप्त हुआ । अथ पत्रमप्ततितमोऽध्याय ।। ७५ ॥ वैचाम्पायन उवाच प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनावैवस्वतस्य च । भरतस्य कुगः पूरोराजमीढस्य चानघ ॥ १ ॥ यादवानामिमं बंशं कौरवाणां च सर्वशः । नथव भग्नानां च पुण्यं म्बस्त्ययनं महत् ॥ धन्यं यशम्यमायुप्यं कीनयिष्यामि तेऽनघ । नेजाभिमदिनाः सवें महर्पिममतेजसः ॥ ३ ॥ २ ॥ : 11 पनानग्या अध्याय ७ ॥ गायन का दक्षप्रजापति, यम्बन मुगाना है । यह कथा पुण्य, कल्याण, धन, यम, ३. भात, ना. पर, आसमांड, यादव आदि अायु को बहानवाली हैं। ये सब महिपों के ममान । और भानी के 4 का गन्न में नुक्षक नेम्वी एए । प्रचितम के महात्मा, तपम्वी, पुण्य ~~.....

अन्याय ७. म हा भार न दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः । मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्व दग्धा महौजसः ॥ ४ ॥ तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः । संभूताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ॥ ५ ॥ वीरिण्या सह संगम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः । आत्मतुल्यानजनयत्सहस्रं संशितव्रतान् ॥ ६ ॥ सहस्रसंख्यान्संभूतान्दक्षपुत्रांश्च नारदः । मोक्षमध्यापयामास सांस्यज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥ ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसंदधे । प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिस्मृक्षुर्जनमेजय ॥ ददौ दश स धर्माय कश्यपाय त्रयोदश । कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशनिमिन्दवे ॥ ९ ॥ त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा । मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान्समजीजनत ॥ १० ॥ इन्द्रादीन्वीर्यसंपन्नान्विवस्वन्तमथापि विवखतः सुतो जने यमो वैवस्वनः प्रभुः ॥ ११ ॥ मार्तण्डस्य मनु(मानजायत सुनः प्रभुः । यमचापि सुतो जने म्यातस्तस्यानुजः प्रभुः ॥ १२ ॥ धर्मात्मा स मनु/मान्यत्र वंशः प्रतिष्ठितः । करनेवाले दस पुत्र उत्पन्न हुए, जिन्होंने मुख से देकर मोक्ष का मार्ग बनाया । प्रजा के उत्पन्न करने उत्पन्न हुई अग्नि से वृक्ष ओर ओषधियों को मम्म की इन्छा मे दक्ष प्रजापति ने पचास कन्याएँ उत्पन्न किया । उनसे दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए । दक्ष में की। प्रजापति दक्ष ने दम कन्याएँ धर्म को, तरह ही मब प्रजा उत्पन्न हुई । इममे दक्ष को मर्वक कन्याएँ कश्यप को और सचाईस नक्षत्र रुपिणी का पितामह कहते हैं ॥१५|| कन्याएँ चन्द्रमा को दी। मरीचि के पुत्र कश्यप ने दक्ष मुनि ने वीरिणी नाम की स्त्री में अपने दक्ष की बडी कन्या अदिति के गर्भ मे इन्द्र आदि तुल्य पराक्रमी एक हनार पुत्र उतन्न किये । नारद पगक्रमी देवताओं को और सूर्य को उत्पन्न क्यिा । ने उन हजार दक्ष पुत्रों को साम्ययात्र की शिक्षा मू के मनु और यम नाम के दो पुत्र हुण् । इन

३८०
म हा भारत
[ आदिपर्य
FAA
मनोवंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥ १३ ॥
ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ।
ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥ १४ ॥'
ब्राह्मणा मानवास्तेषां साझं वेदमधारयन् ।
वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ॥ १५ ॥
कारूपमथ शर्याति तथा चैवाष्ठमीमिलाम् ।
पृपधं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ॥ १६ ॥
नाभागारिष्टदशमान्मनोः पुत्रान्प्रचक्षते ।
पञ्चाशत्तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन्क्षितौ ॥ १७ ॥
अन्योन्यभेदात्ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् ।
पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ॥ १८ ॥
सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् ।
त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपानश्नन्पुरूरवाः ।
अमानुपेर्वृतः सत्वैर्मानुपः सन्महायशाः ॥ १९ ॥
विप्रेः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ।
जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि ॥ २० ॥
सनत्कुमारस्तं राजन्ब्रह्मलोकादुपेत्य
अनुदर्श नतश्चके प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ॥ २१ ॥
दोनों में यम छोटा था॥६॥१२॥
और नाभागारिष्ट ये नौ पुत्र और एक कन्या इला नाम
मनु धर्मात्मा, बुद्धिमान् और वा नलानेवाले की उत्पन्न हुई । इनके मिवाय मनुजी के पनाम
एए । मब प्रामण, क्षत्रिय आदि मनु के वंग में पुत्र और हुए परन्तु वे सब आपस में लड़कर नष्ट
उत्तर होने में लोग मानव कहलाते हैं। इन्हीं मनु हो गये । पुरावा की उराति इला में हुई । सुना है.
मे ब्रामण और क्षत्रिय उतराम हुए। इसी कारण कि, इलाही उमकी माता और पिता थी । पुरुरवा
प्रामपुर और भत्रियल का महम हुआ है। ने नेह द्वीपों का राज्य किया। यह बड़े यश वाला
मनु के चंग में जो प्रामण हुए, उन्होंने वदों को मनुष्य होकर अमानुप गुणों से युक्त था । उभ
अगा मदिन परा और यम्बन गनु के वेनु. धृणु, पुरुरवा ने यल के गर्व गे अन्धा होकर ब्राह्मणों में
मध्यन्न, नाभाग, वा, कारण, नगर्यानि, पभ विंगप दिया ||१३॥२०॥

अन्याय ७५ म हा मारत ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत । लोभान्वितो वलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः ॥ २२ ॥ स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् । आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन्यथावद्विहितान्त्रिधा ॥ २३ ॥ पट् सुतां जज्ञिरे चैलादायु/मानमावसुः । दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुनाः ॥ २४ ॥ नहुपं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् । खर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान्प्रचक्षते ॥ २५ ॥ आयुषो नहुपः पुत्रो धीमान्सत्यपराक्रमः । राज्यं शशास सुमहद्धर्मेण पृथिवीपते ॥ २६ ॥ पितॄन्देवानृपीन्विप्रान्गंधर्वोरगराक्षसान् नहुपः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः ॥ २७ ॥ हत्वा दस्युसङ्घातानृपीन्करमदापयत् । पशुवञ्चैव तान्पृष्टे वाहयामास वीर्यवान् ॥ २८ ॥ कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः । तेजसा तपसा चैत्र विक्रमेणोजसा तथा ॥ २९ ॥ यति ययातिं मयातिमायातिमयति ध्रुवम् । नहुपो जनयामास पट् सुनान्प्रियवादिनः ॥ ३० ॥ ब्राह्मणों की प्रार्थना और आर्तनाद पर ध्यान समागम हुआ । पुम्ग्वा के वंशी में आयु, धीमान् न देकर उनके रन छीन लिये । मनत्वमार ऋषि अमावस, दृढायु, वनायु. और शतायु, ये छ पुत्र ने ब्रह्मक से आकर पुरूग्या को बहुन समझाया उत्पन्न हुए । आयु के वर्भानु की कन्या के गर्भ ओर उपदेश क्यिा । इनने पर भी उन्होंने कुछ, में नहुप, वृद्धगर्मा, गनि, गय और अनेना, यह भ्यान नहीं दिया। अन्त में ऋषियों ने क्रोध में पाच पुत्र उन्नत हुए । आयु के पुत्र बुद्धिमान् मन्य. आकर उनको शार देकर नष्ट कर दिया । पराक्रमी नटुप ने धर्मपूर्व राज्यानुमामन क्यिा । यह वही पुरग्या है, जो गन्धगक में अग्नि को उन्गेन निर, देवता, ऋषि, विटन गन्धर्व, मां, लाया और तीन प्रकार के यनों के लिये उम्की गलम, नमन, अत्रिय, पंश्यों का पालन दिया। स्थापना की और उर्वगी अप्पग में भी उसका चोगे को मार ऋषियों में कर लिया २८॥ AAAA । आदिपर्व महाभारत यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३१ ॥ ययाति हुपः मम्राडासीत्सत्यपराक्रमः । स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः ॥ ३२ ॥ अतिभवत्या पितॄनर्चन्देवांश्च प्रयतः सदा । अन्वगृह्णात्प्रजाः सर्वा ययातिरपगजितः ॥ ३३ ॥ तस्य पुत्रा महेष्वासाः सर्वैः समुदिता गुणैः । देवयान्यां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३४ ॥ देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३५ ॥ स शाश्वतीः समा राजन्प्रजा धर्मेण पालयन् । जरामार्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम् ॥ ३६॥ जराभिभूनः पुत्रान्स राजा वचनमब्रवीत् । यदुं पूर्वं तुर्वसुं च द्रुह्यं चानुं च भारत ॥३७॥ यौवनेन चरन्कामान्युवा युवतिभिः सह । विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रकाः ॥ ३८ ॥. तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो वाक्यमब्रवीत । दम वीर्यवान् ने उन ऋपियों को अपने यान ययाति के दो स्त्रियां देवयानी और शर्मिष्ठा नाम में पशुओं की तरह जोना । देवनाओं का तिरस्कार वाली थीं। इन दोनों स्त्रियों के गर्भ से बडे गुणवान् घरके तेज, तप, पराक्रम, बुद्धि और इन्द्रियों के पुत्र उत्पन्न हुए । देवयानी के गर्भ से यदु और बल म इन्द्रपदवी को प्राप्त कर लिया था । नरप तुर्वसु, और गमिष्ठा के गर्भ से दुयु, अनु, और के यनि, ययाति, मंयाति, आयानि, अयनि और परु नाम के पुत्र हुए । हे जनमेजय ! इस प्रकार भूर, यह रस प्रियवादी पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें यनि नहुप का पुत्र ययाति बहुत चपों तक धर्म से प्रजा योगाभ्याम कर ग्रामप हो गया । नहुप का पुत्र का पालन परत करत रुप के नाश करने बानी वृद्धा. म परमकमी ययानि च मानी हुआ । ययानि ने यम्या को प्राप्त हुआ । युदार मे इग्विन राजा ने धर्म में पृनी का पालन कम हुप अनेक बह-यई यद, पूर, तुर्वमु, अनु और दूध अपने पुत्रों में किया या भनिएक देवनाओं और पिनगे यहा में जवान अयम्या में जवानी से कामों को भोगना 41 भान पाने में । म प्रकार अजित ययानि मा यानियों के माध विहार करना नाहना है । का पान किया। तुम गरी महायना रंगे ॥३॥३८॥ , . Aune ---.....

अध्याय 1 मद्दा मारत . ArchanaKumarAAJAawarana किं कार्य भवतः कार्यमन्माकं यौबनेन ते ॥ ३९ ॥ ययातिरत्रवीतं वे जरा में प्रनिगृह्यताम् । यांचनेन त्वदीयेन चयं विषयानहम ॥१०॥ यजतो दीर्घसत्रमें शापाचोगनमो मुनेः । कामार्थः परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रकाः ॥ ११ ॥ मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः । अहं नन्वाभिनवया युवा काममवाप्नुयाम् ॥ १२ ॥ ते न नम्य प्रत्यगृहन्यदुप्रभृतयो जराम् । तमत्रवीत्ततः पुनः कनीयान्मत्यविक्रमः ॥ १३ ॥ गजश्चगभिनवया योवनगोचरः । अहं जरां समादाय राज्ये म्यास्यामि तेऽऽनया ॥११॥ एवमुक्त म गर्पिस्तपोवीर्यममाश्रयात् । मंचाग्यामाम जरां नढा पुत्रे महात्मनि ॥ ४५ ॥ पारवेणाथ वयमा गजा यावनमास्थितः । यायानेनापि वयमा राज्यं पृमकारयत ॥ १६ ॥ तनो वर्यसहस्रान्ने ययानिरपराजितः । स्थितः स नृपशार्दूलः शार्दूलममविक्रमः ॥ ४७ ।। यह सनार गवा ने देवयानी के बड़े पुत्र में कर यानि नान पहननीन अपनी जवानी कहा--म आपकी क्या महायना का मान देने में मार दिया। तब मबम छोटे पुत्र पूर ने क्या आप हमारी जवानी बाग्नहै । ययानि ने कहा में पिता 'आरग जवानी लेकर अपनी तुममें से कोई मेरे वुढाप गे प्रपोजन पुत्र हम पूरी भीषिण् । आपकी वृद्धावस्था पार की जवानी लेक विषयभाग नंगा में बहुत आपण आज में गर नगा ॥३:१८४॥ यन करने के कारण म मुये गुरु ने यर मार दिया इमा मात्र यानि ने अपने नाबर कि तुम कानवम गंगे। दम अग्ण चंग' में पुत्र को वृद्ध बना दिया। यय नि की अवस्था में मुझे बड़ा एट और मन्नाप है। में नये नगर में पर गरजग्ने ना और पूरा अगम्या में नात्रियों में भाग करना चाहता है। उनमें में ययानि 7 मंगने नम इस पान नर ई गया अवस्था कर रोया मन नागना स्यानिके सिर में आग - ट महाभारत । आदिपर्व . ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च । विश्वाच्या सहितो - रेमे पुनश्चैत्ररथे वने ॥ १८ ॥ नाध्यगच्छत्तदा तृप्ति कामानां स महायशाः । अवेत्य मनसा राजन्निमा गाथां तदा जगौ ॥ १९ ॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविपा कृष्णवत्मैव भूय एवाभिवर्धते ॥ ५० ॥ पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ ५१ ॥ यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कहिचित् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ५२ ॥ यदा चायं न विभेति यदा चास्मान्न विभ्यति । यदा नेच्छति न दृष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ५३ ॥ इत्यवेक्ष्य महाप्राज्ञः कामानां फल्गुतां नृप । समाधाय मनो बुद्धया प्रत्यगृह्णाजरां सुतात् ॥ ५४ ॥ दत्त्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिषिच्य च । अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥ ५५ ॥ पराक्रम बना रहा और इतने दिनों तक दोनों स्त्रियों मे कभी भी किसी प्राणी को दु ख नहीं देता तब से विषयभोग करके भी यह तृप्त न हुआ। चैत्ररथ ब्रह्मको पाप्त होता है । जब उसे किसी का भय नहीं नाम क्नमें विश्वम्बी अप्सरा से भी भोग क्यिा, परन्तु रहता और उमसे कोई नहीं डरता और जब वह उमका कामदेव तृप्त नहीं हुआ। बड़ा यशवार। न इच्छा करता है और न द्रोह करता है, तब ययाति जय काम से तृप्त न हुआ तब एक दिन साक्षात् ब्रह्मरूप हो जाता हे । हे जनमेजय ! उस आप ही आप विचार करके उन्हाने कहा कि, काम- बड़े बुद्धिमान् ययाति ने इस प्रकार कामा की भोग करने से कामना कभी शान्त नहीं होती। तुच्छना देगार, मनको स्थिरकर, पुत्र से अपनी घोटालने से अगि और बदनी है । रलो से भरी वृद्धावस्था फिर ले ली ॥५१॥५४॥ पृथ्वी मुवर्ण, पशु, बिये, यह सब अकेले भोगार राजा ययाति ने काम से तृप्त न होकर अपने भी कोई उनमे तृम नहीं हो मकना 12५.५०॥ पुत्र को तरुण अवस्था दे दी आर उसका राज्या- इमम मुहाको भी अपना चित्त विषय की इच्छा भिषक करके बोला-हे पुत्र ! तुम्हीं मेरे सचे पुत्र में भरण करना चाहिय । जप कर्म मन, वाणी और वन चलाने वाले हो । इसलिये मेरा वंश तुम्हारे - ७ अध्याय ७) महा भारत त्वया दायादवानस्मि वं मे वंशकरः सुतः । पौरवो वंश इति ते ख्याति लोके गमिप्यति ॥ ५६ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततः स नृपशार्दूल पूरूं राज्येऽभिपिच्य च । ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुझे महातपाः ॥ ५७ ॥ कालेन महता पश्चात्कालधर्ममुपेयिवान् । कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान् ॥ ५८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि ययात्युपारयाने पञ्चसप्ततितमोऽध्याय ॥ ४५ ॥ ही नाम से पौरवश कहलावेगा । वैशम्पायन ने कर वहुत दिन पीछे स्त्री सहित भन्नादिक त्याग कहा-तत्पश्चात् बडे तपम्बी राजाओं में श्रेष्ठ ययाति कर म्वर्ग को गया ॥५५/५८॥ ने पूरु को राज्य देकर भृगुतुगपर्वत म अच्छे कर्म आदिपर्व का पचहत्तरवा अध्याय समान हुआ । - अथ पदमाप्ततितमोऽध्याय ॥ ७६ ॥ जनमेजय उवाच-ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः । कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम् ॥ १ ॥ एनदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन । आनुपूर्व्या च मे शंस राज्ञो वंशकरान्पृथक् ॥ २ ॥ वैशम्पायन याच-ययातिरासीन्नृपतिर्देवराजसमद्युति. न शुक्रवृषपर्वाणी बनाते वै यथा पुग ॥ ३ ॥ नत्तेऽह सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छते जनमेजय । देवयान्याश्च संयोगं ययाते हुषस्य च सुराणामसुराणां च समज़ायत वै मिथः । ऐश्वर्य प्रति संघर्षस्त्रैलोक्ये मचगचरे ॥ ५॥ ॥ छियत्तग्गा अध्याय ७६ ॥ जनमेाय ने कहा-प्रनापति में लेकर दमनी नाहता हु । वा चगनवार राजाओ के चरित्र भी पीडी में उत्पन्न हमारे पूर्वन ययाति ने परम दुरीम क्रमानुसार अलग अलग कहिए । वैशम्पायन ने शुन की कन्या को किम प्रकार में प्राप्त क्यिा । महा-इन्द्र के ममान कान्निवार राना ययानि की है तपोधन ' हम कथा की मै विस्तार से मुनना शुम और दत्यराज वृषपर्वा न कन्याओं विधा AAAAA----- । आदिप महाभारत न जिगीषया ततो देवा बबिरेऽगिरसं मुनिम् । पौरोहित्येन याज्यार्थे काव्यं तूशनसं परे ॥ ६ ॥ ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योऽन्यस्पर्धिनी भृशम् । तत्र देवा निजघ्नुर्यान्दानवान्युधि संगतान् ॥ ७ ॥ तान्पुनर्जीवयामास काव्यो विद्यावलाश्रयात् । ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाञ्चक्रिरेसुरान् ॥ ८ ॥ असुरास्तु निजघ्नुर्यान्सुरान्समरमूर्धनि । तान्संजीवयामास वृहस्पतिरुदारधीः ॥ ९ ॥ न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेत्ति वीर्यवान् । संजीविनी ततो देवा विषादमगमन्परम् ॥ १० ॥ ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा । ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्टं पुत्रं बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ भजमानान्भजस्वास्मान्कुरु नः साह्यमुत्तमम् । या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि ॥ १२ ॥ शुके तामाहर क्षिप्रं भागभाङ् नो भविष्यसि । वृपपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः ॥ १३ ॥ हार्य जिस प्रकार पहिले. वरा उस देवयानी और सग्राम में जिन देवताओं को असुर मारते थे, नहुष के पुत्र ययाति के सयोग का वृत्तान्त मै कहता उनको श्रेष्ठ बुद्धिवाले बृहम्पति नहीं जिला मकते हं, मुनो ॥११॥ थे । जिम मजीविनी विद्या को शुक्र जानता था, देवता और असुरों का आपस में त्रैलोक्य के उमको वृहम्पति नहीं जानताया। इस कारण देवताओं राज्य के लिये घोर युद्ध हुआ। उम समय देवताओ को बडा दुख हुआ । शुक्र के भय से डरे और ने जीतने की इच्छा से हम्पति मुनि को और घबराये हुए देवताओं ने बृहम्पति के बड़े पुत्र कच असुरों ने शुक्र को या आदि करने के लिये अपना के पास जाकर कहा-हे कच ! हम तुम्हारे हित- आचार्य बनाया। ये दोनों बायण आपम में नित्य चिन्तक है । तुम हमारे गुरु-पुत्र हो । तुम हमारी अत्यन्त विरोध करते थे और युद्ध में देवना जिन इस समय कुछ महायता करी। महातेजम्वी शुक्रा- दन्यों को मारत थे, उन शुक्र. अपनी विद्या के बल, चार्य के पास जाकर तुम उनसे मृतसञ्जीविनी में फिर जिला देत ध; जिसमें वे फिर देवताओं में विद्या मीरव आओ। हम तुमको अपने साथ यज युट करने लगते थे ||५1८॥ में भाग देंगे । वह शुक्राचार्य तुमको पृषपर्वा दानव .....

अध्याय ७६ । महा भारत ३८७ रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् । तमाराधयितुं शक्तो भवान्पूर्ववयाः कविम् ॥ १४ ॥ देवयानी च दयितां सुतां तस्य महात्मनः । -त्वमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते ॥ १५ ॥ शीलदाक्षिण्यमाधुराचारेण दमेन देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥ १६ ॥ तथेत्युक्त्वा ततः प्रायाद बृहस्पतिसुतः कचः । तदाऽभिपूजितो देवैः समीपे वृषपर्वणः ॥ १७ ॥ स गत्वा त्वरितो राजन्देवैः सम्प्रेषितः कचः । असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह ॥ १८ ॥ ऋषेरगिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् वृहम्पतेः । नाम्ना कचमिति ख्यातं शिप्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ १९ ॥ ब्रह्मचर्य चरिष्यामि खय्यहं परमं गुरौ । अनुमन्यस्त्र मां ब्रह्मन्सहस्रं परिवत्सरान् ॥ २० ।। शुक उवाच-कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः । अर्चयिष्येऽहमय॑ त्वामर्चितोऽस्तु वृहस्पतिः ॥ २१ ॥ वैशंपायन उवाच-कवस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तनम् । आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २२ ॥ के यहा मिलेंगे ।।१३॥ पर्वा के पाम गया । हे जनमेजय ! देवताओं का वे दानवों की ही रक्षा करते हैं, देवताओं की मेजा हुआ कच गीध असुरों के स्वामी दृषपवा नहीं। तुम जवान हो और शुक्र की सेवा कर के नगर में पहुचकर आचार्य शुक्र को देखकर सकते हो । महात्मा शुक्र अपनी कन्या देवयानी बोला-म अहिरा का पोता और यहम्पनि का पुत्र को बहुत चाहते है । नीलम्वभाव, चतुगई, मधुर कर आपका शिष्य होना चाहता है। आप कृपा बोली और धर्म से शुक्र और उनकी पुत्री देवयानी करने मेरी इच्छा पूर्ण करें । मैं आपको गुरु मान को प्रसन्न करके मंजीविनी विद्या मीस्व आओगे । करके हज़ार वर्ष तक ब्रह्मचर्य धारण करूंगा इसके पश्चात् देवताओं में मत्कार किया हुआ ||१४|२०|| वृहम्पति का पुत्र कच गोमा ही होगा कहकर, वृष शुक्र ने कहा-हे क्च ! तुम्हाग आना शुभ 1 महाभारत [ आदिपर BRANARAARAKAmawar व्रतस्य प्राप्तकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत । आराधयन्नुपाध्यायं देवयानी च भारत ॥ २३ ॥ नित्यमाराधयिष्यस्तो युवा यौवनगोचरे । गायन्नृत्यन्वादयश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २४ ॥ स शीलयन्देवयानी कन्यां संप्राप्तयौवनाम् । पुष्पैः फलैः प्रेपणैश्च तोपयामास भारत ॥ २५॥ देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतधारिणम् । गायन्ती च ललन्ती च रहः पर्यचरत्तथा ॥ २६ ॥ पञ्च वर्षशतान्येवं कचस्य कचस्य चरतो व्रतम् । तत्रातीयुरथो बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ २७ ॥ गा रक्षन्तं बने दृष्ट्वा रहस्येकममर्पिताः । जघ्नुर्वृहस्पतेद्वेषाद्विद्यारक्षार्थमेव हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छेल्लवशः कृतम् । ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् ॥ २९ ॥ सा दृष्ट्वा रहिता गाश्च कचेनाभ्यागता वनात् । उवाच वचनं काले देवयान्यथ भारत ॥ ३० ॥ वयान्युषाच-आहुतं चाग्निहोत्र ते सूर्यश्चास्तं गनः प्रभो । अगोपाचागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३१ ॥ हो । में नुमको शिष्य बनाना म्याकार करता है। देवयानी मी नियम और व्रतधारी ब्राह्मण को उसी मै वृदम्पनि दी प्रमन्नता के लिये तुम्हारा मत्कार प्रकार प्रमन्न रखने की चेष्टा करती थी ।।२११२६॥ कानावगम्पायन ने कहा कच ने शुक्राचार्य इस प्रकार मच ने पाच सौ वर्ष तक प्रमचर्य की भासा अनुमार यथाममय ब्रह्मचर्य प्रन की धन का पालन क्यिा । एक दिन कच वन में अरे प्रहण किया और वहीं मकर व आचार्य और गायें ना रहे थे । दानों ने कच को देखकर शोध भानार्य की कन्या देवयानी की मया कान नंग। म विद्या की रक्षा के लिये और दम्पति के द्वेष मे या ना न गुर को प्रसन्न रम्यक नाच, गाने उमको मार डाग। दानवों ने उनके टुकड़े टु वान, परगन और मेवा की नम्ह आना कर भेड़ियों को मिला दिया। सध्या को सम गाय पानद्वारा पानी को मतप करने रगा। अपन म्यान को वापस आई। भारत गायों के ...--- अध्याय ७६ ] महाभारत व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३२ ॥ शुक्र उवाच-अयमेहीति मंगव्द्य मृतं मंजीवयाम्यहम् । ततः संजीविनी विद्यां प्रयुज्य कचमाह्वयत ॥ ३३ ॥ भित्त्वा भित्वा शरीराणि वृकाणां स विनिर्गतः । आहूतः प्रादुरभवत्कचो हष्टोऽथ विद्यया ॥ ३४ ॥ कस्माञ्चिरायितोऽसीति पृष्टस्तामाह भार्गवीम् । समिधश्च कुशादीनि काष्ठभारं च भाविनि ॥ ३५ ॥ गृहीत्वाऽऽश्रममारात्तं वटवृक्षं समाश्रितः । गावश्च महिताः सर्वा वृक्षच्छायामुपाश्रिताः ॥ ३६ ।। असुरास्तत्र मां दृष्ट्वा कस्त्वमित्यभ्यचोदयन् । बृहस्पतिसुतश्चाई इत्यभिविश्रुतः ॥ ३७॥ इत्युक्तमात्रे मां हत्वा पेपीकृत्वा तु दानवाः । दत्त्वा शालाकेभ्यस्तु सुग्न जग्मुः स्वमालयम् ॥ ३८ ॥ आहृतो विद्यया भद्रे भार्गवेण महात्मना । त्वत्ममीपमिहायातः कथंचिल्ममजीवितः ॥ ३९ ॥ माथ कच को न आये देवकर देवयानी ने कहा हा सगाई । क्च ने कहा-हे शुद्ध माववाली । है पिता ' आप अग्निहोत्र भी कर चुके, मूर्य अम्न में समिधा, कुगादिक और काट के मार को रेकर हो गया गायें भी रोट आई परन्तु क्च का अभी चला आरहा था । गह में थक्का आश्रम के पाम तर पना नहीं लगता है पिना-किमी ने मे बरगद ३ पंह की छाया में बंट गया, वहीं गाय मी मारडाला ह या मर गया होगा। में आपस मत्य वटी विश्राम कर रही थीं ॥३३॥३६॥ कहनी ह कि, कच के बिना मैं नरी जी मनी टनने में असुगे ने मुझ दबकर पृछा कि, तुम न हो मैन का मैं वृम्पति का पुत्र कच शुक्र ने कहा-डम शळ को कहकर भरे हुए हैं। यह कहते ही दानवों ने मुझे मारकर मेरे को मैं दिलाता हू, तब मृतमजीविनी विद्या का टुक्र टुक्ड कर मंडियों को निरा दिया कि प्रयोगकर कच को पुकारा । विद्या के प्रयोग मे व मुस में अपने अपने स्थान को चरे गये । हे मारा हुआ कच भेडियों के गरीर को पोहक मंद्र ' महाला भर में सपनी विद्यादर में मुझे बाहर आया । देवयानी ने पूछा--तुमने इतनी देर बुराया और में दिनी प्रकार चंदन पार तुम्हां ॥२७॥३२॥ - { आदिपक ३९० मद्दा भारत हतोऽहमिति चाचख्यो पृष्टो ब्राह्मणकन्यया । स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारो यदृच्छया ॥ ४० ॥ वनं ययौ कचो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम् । पुनस्तं पेपयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन् ॥ ११ ॥ चिरं गतं पुनः कन्या पित्रे तं संन्यवेदयत् । विप्रेण पुनराहतो विद्यया गुरुदेहजः पुनरावृत्य तदृवृत्तं न्यवेदयत तद्यथा ॥ ४२ ॥ ततस्तृतीयं हत्वा तं दग्ध्वा कृत्वा च चूर्णशः । प्रायच्छन्त्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तथा ॥ ४३ ॥ देवयान्यथ भूयोऽपि पितर वाक्यमब्रवीत् । पुष्पाहारः प्रेपणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४ ॥ व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते ॥४५॥ शुम ग्याच-बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः । विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाम किम् ॥ ४६ ।। मेवं शुची मा रुद देवयानि न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते यम्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च सेन्द्रा देवा वसवोऽथाश्विनौ च ॥ ४७ ॥ पास आया । । देवयानी के पिर कच में पूछने तरह जीकर देवयानी को सब वृत्तान्त कह सुनाया। पा उमन वैमा ही उत्तर दिया। कुछ समय व्यतीत इसके पश्चात् तीसरी बार असुरों ने उसे मारा और होने पर पिर देवयानी ने कच को पृ रेने के जगकर उसकी राख मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य रिय वन को भेजा । फिर दानवों ने उम देम्बर को ही पिरा दी। फिर देर तक कच के न आने उमंद सरीरकोपामा ममुद्र जर में मिला पर देवयानी ने शुक्र से कहा- पिता 'कन मेरे तयार आप अपने अपने धान की नरं गये रिये पर रेन गया था। बहुत देर हो गई अभी ना नहीं आया। अवश्य उस देत्या ने मार डाग जब रमको गये बहन कार हो गया, नय होगा। आप मत्य समझ कि, उस पिना में जीविन वयानी ने अपने पिता मे उमः। वृत्तान्न । नही २१ मनी । शुम ने कहा है पुत्री ' यह गगन मसन हादिया। टमा पनि का पुत्र च मा गया। 1 मैं विधान बर । 11-७॥ - अध्याय ७६) महाभारन सुरद्विपश्चैव जगञ्च मर्वमुपस्थाने सन्नमन्ति प्रभावात् । अशक्योऽसौ जीवयितुं द्विजातिः संजीवितो वध्यने चैव भूयः ॥ १८ ॥ देवयान्युवाच यस्याऽगिरा वृद्धतमः पितामहो बृहस्पतिश्चापि पिना तपोनिधिः । ऋपेः पुत्रं तमथो वापि पौत्रं कथं नु शोचेयमहं न स्याम् ॥ १९ ॥ स ब्रह्मचारी च नपोधनश्च सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः । कचस्य मार्ग प्रनिपत्स्ये न भोध्ये प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः ॥ ५० ॥ शम्पायन उवाच-स पीडितो देवयान्या महर्पिः समाह्वयत्मरम्भाञ्चैव काव्यः। असंशयं मामसुरा द्विपन्ति ये मे शिप्यानागनान्सूदयन्ति ॥ ५१ ॥ अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्नि गेंद्रास्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम् । अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ॥ ५२ ।। गुरोहि भीतो विद्यया चोपहृतः शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार । वैशम्पायन उवाच-तमब्रवीत्केन पथोपनीतस्त्वं चोदरं तिष्ठसि बृहि विप्र ॥ ५३ ॥ क्च उवाच-तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः स्मगमि मर्व यच्च यथा च वृत्तम् । न वेवं म्यात्तपमः संक्षयो मे तनः क्ले घोगमिमं महामि ॥ ५४ ॥ अमुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य । ब्राझी मायां चासुरीं विप्र मायां त्वयि स्थिते कथमेवातिवतेत ॥ ५५ ॥ मे उमे जिराता है और दैत्य उमे मार टारन है। घंटा है। उन ऋषिपुत्र और पात्र का कैमे सोच न कर और न गेऊ॥12॥ हे देवयानी ! इस प्रकार तुमको गना और वह ब्रह्मचार्ग, तपम्बी चतुर, मवंदा आना- गोर ग्ना उचिन नहीं है । तेग सदृश को मग्न- भारी है । व मुग बहुत प्याग लगता है। उसके वाले का सोच नहीं करना चाहिये । मेरे कारण बिना मै जापित नही रह मानी। अन्नादि का त्याग वेद, ब्राह्मण. इन्द्र महिन देवना, अश्विनीकुमार और कर प्राण दे दूगी । वैशम्पायन ने कहा देवयानी सारे जगत के प्राणी माया ममय तुम्हारी आग मे पीडित महपि शुरु ने क्रोध मे पुकार का क्या धना करते हैं । मैं क्च को बार बार जिगना हु। अवश्य ही असुर में माथ द्वेष करके मेरे गये परन्तु अर मार टारने है । अतएव अब मै टमको हुए शिष्य को मार टारने है । वे मेरे निदोष बिग नहीं माना है। देवयानी ने कहा-क्च गिन्य को बार बार मारकर मंपिष्ट आचरण करने माधारण पुरुष नहीं है ! वर ब्रह्मा के पुत्र अत्यन्त है। वर दुष्ट अमर मुझे मी रम ब्रह्मात्या के पाप में वृद्ध अगिग मापाता और तनिधि वृम्पति का माना चाहते है । इम पाप का परिणाम अवश्य क्या करू २६॥ - । आदिपर्व महाभारत . शुक्रवाच-किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से वधेन मे जीवितं स्यात्कचस्य । नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनेन दृश्येत्कचो मद्तो देवयानि ॥ ५६ ॥ देवयान्युवाच दौमांशोकावग्निकल्पो दहेतां कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः । कचस्य नाशे मम शर्म नास्ति तवोपघाते जीवितुं नास्मि शक्का ॥ ५७ ॥ शुक्र उवाच-संसिद्धरूपोऽसि वृहस्पतेः सुत यत्त्वां भक्तं भजते देवयानि । विद्यामिमां प्राप्नुहि जीवनीं त्वं न चेदिन्द्रः कचरूपी त्वमद्य ॥ ५८ ॥ न निवर्तेत्पुनर्जीवन्कश्चिदन्यो ममोदरात् । ब्राह्मणं वर्जयित्वेक तस्माद्विद्यामवाप्नुहि ॥ ५९॥ पुत्रो भूत्वा भावये भावितो मामस्मद्देहादुपनिष्क्रम्य तात । समीक्षेथा धर्मवतीमवेक्षां गुरोः सकाशात्प्राप्य विद्यां सविद्यः ॥ ६० ॥ वैशम्पायन उवाच-गुरोः सकाशात्समवाप्य विद्यां भित्त्वा कुझिं निर्विचक्रामविप्रः । कचोऽभिरूपस्तरक्षणाब्राह्मणस्य शुक्लात्यये पौर्णमास्यामिवेन्दुः ॥ ६१ ॥ दृष्ट्वा च तं पतितं ब्रह्मराशिमुत्थापयामास मृतं कचोऽपि । विद्या सिद्धां तामवाप्याभिवाद्य ततः कचस्तं गुरुमित्युवाच ॥ ६२ ॥ होगा । ब्रह्महत्या का पाप इन्द्र को भी जला सकता ! आप ब्राह्मी, आसुरी ओर देवी तीनों मायाओं को है ॥५०॥५२॥ अच्छी तरह जानते है । अतएव आपके पेट को इसके पश्चात जब शुक्रजी ने विद्या के बल से फोडकर बाहर निकलना मेरे लिये सब तरह कठिन कच को पुकारा, तब वह अपने गुरु का शब्द सुनते है। तव शुक्र ने कहा-हे पुत्री ! मै तेरा क्या प्रिय ही डरकर घारे मे गुरु जी के पेट में बोला । कच करू ? मेरे मरने से कच का जीवन हो सकता को अपने पेट के भीतर बोलते देख शुक्र ने पूछा- ॥५३॥५६॥ है. कच ! तुम मेरे पेट के भीतर किम राह मे देवयानी ने कहा कच का नाश और आपकी पहुंच गये हो। यह मुनकर कच बोला आपकी मृत्यु ये दोनों गोक अमि के सदृश मेरे हृदय को कृषा मे मेरी स्मृति मी ही है। मुझको सब वृत्तान्त जलाते है । कच की मृत्यु मे मेरे मुख का नाश याद है, परन्तु उदर में निकलने में आप के मग्ने और आपके मरने से मेरे प्राणों का नाम होगा। और तप के क्षय होने का भय है । इस कारण में है वृहम्पति के पुत्र कच ! तुम्हारा अभिप्राय सिद्ध इम पोर अंग को मह रहा ह । है शुक्र. : असुरों हुआ क्योंकि देवयानी तुमसे प्रेम करती है । यदि ने मुझे मारकर जला दिया, फिर मर भरीर की तुम कच के रूप में इन्द्र नहीं हो तो मैं तुमको यह गम्म मदिग में मिलाकर आपको पिला दी है। मजीविनी विद्या देता है । इन्द्र का मन्देह करना - 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अन्याय ७५
म हा भारत
यः प्रोत्रयोरमृतं संनिपिञ्चेद्यो मे नविद्यस्य यथा ममायम् ।
तं मन्येऽहं पितरं मातरं च तस्मै न दुह्येत्कृतमस्य जानन् ॥ ६३ ॥
ऋतस्य
दातारमनुत्तमस्य निधि निधीनामपि लब्धविद्याः ।
ये नाद्रियन्ते गुरुमर्चनीयं
गुरुमर्चनीयं पापॉल्लोकांस्ते
पापॉल्लोकांस्ते वजन्त्यप्रतिष्ठाः ॥ ६४ ॥
वंशम्पायन उवाच-सुरापानाद्वञ्चनां प्राप्य विद्वान्संज्ञानाशं चव महातिघोरम् ।
दृष्टा कचं चापि तथाभिरूपं पीतं तदा सुरया मोहितेन ॥६॥
समन्युरुत्थाय महानुभावस्तदोशना विप्रहितं चिकीर्षुः ।
सुरापानं प्रति संजातमन्युः काव्यः स्वयं वाक्यमिदं जगाद ॥ ६६ ॥
यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चिन्मोहात्सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः ।
अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्यादस्मिल्लोके गर्हितः स्यात्परे च ॥ ६७ ॥
मया चैतां विप्रधर्मोक्तिसीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके ।
सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरुणां देवा लोकाश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६८ ॥
इतीदमुक्त्वा स महानुभावस्तपोनिधीनां निधिरप्रमेयः ।
तान्दानवान्दैवविमूढवुद्धीनिदं समाहृय कचोऽभ्युवाच ॥ ६९ ॥
वृथा है। ब्राह्मण के मिवाय और कोई मेरे पेट में कम्मा । जो मनुष्य विद्या के देनेवारे परम पूजनीय
जीता नहीं रह सकता । मैं तुमको जिलाता हूँ । गुरु का आदर नहीं करते हैं, वे इस लोक में अप
तुम विद्या पाकर मेरे शरीर में निकलकर मुझको यश पाकर परलोक में दुर्गति भोगते हैं। वैशम्पायन
भी जिला देना । तुम आन से मेरे पुत्र के समान ने कहा है जनमेनय ' इसके उपरान्त शुक्राचार्य
हुए | गुरु से विद्या पाकर धर्म के अनुसार वर्ताव ने मदिरापान करना म्मरण करके जिसके कारण मे
उनका ज्ञान नष्ट हो गया था और जान नष्ट होने
वैशम्पायन ने कहा-वह धेष्ठ ब्राह्मण क्च गुरु से ऐम धोम्ब में आगये थे, वहा क्रोध किया ।
से विद्या पाकर उसके पेट से पूर्णमासी के चन्द्रमा ब्राह्मणों की मलाई के हेतु मदिरापान की निन्दा
की नाई बाहर निकला । वेसे ही ब्रह्मनेज के ढेर करते हुए शुक्र चार्य ने कहा-जो कोई मन्दबुद्धि
के ममान मरे हुए शुक्राचार्य को कच ने उसी विद्या ब्राह्मण आन मे मोहवश होकर मदिरापान करेगा,
के दर मे निला दिया ! टस प्रकार सिद्ध हुई विद्या वह धर्मरहित होकर इस लोक में निन्दित किया
को पार मच गुर से बोला-हे महाराज ' आपने नागा और उसको ब्रह्महत्या का पाप लगेगा।
मुझको सजीविनी विद्या दी है। आप मेरे माता और माधु, गुरु की मेवा करनेबारे ब्रह्मचारी, ब्रामण,
पिना के ममान हैं। मैं आपमे कभी द्रोह नहीं देवता और मब ससार के रोगों को मुनाकर भाज
करना ॥५७१६०॥

। आदिपय म हा भारत एतावदुक्त्वा वचनं आचक्षे वो दानवा वालिशाः स्थसिद्धः कचो वत्स्यति मत्सकाशे । संजीविनीं प्राप्य विद्यां महात्मा तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ७० ॥ विरराम स भार्गवः । दानवा विस्मयाविष्टाः प्रययुः स्वं निवेशनम् ॥ ७१ ॥ गुरोरुष्य सकाशे तु दश वर्षशतानि सः । अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ७२ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि ययात्युपाख्याने पट्सप्ततितमोऽध्याय ॥ ७६ ॥ से मैं ब्राह्मणों के धर्म की यह मर्यादा बाघता हु कर साक्षात् ब्रह्मा के और मेरे समान प्रभावशारी ॥६१६८॥ हो गया है। यह अब मेरे पास ही रहेगा । शुक्रा तपोनिधियों के निधि, प्रतापी, महानुभाव शुक्र ने चार्य की यह बात सुनकर दानों को बड़ा आश्चर्य यह कहकर प्रारब्ध मे नष्ट हुए हुए बुद्धिवाले दानवों हुआ। वे चुपचाप अपने अपने स्थान को चले को पुराया और उनसे कहा-हे दानवो ' तुम गये । कच ने एक हजार वर्ष तक गुरु के पास मूर्ख हो । यह कच मुझसे सजीविनी विद्या प्राप्त रहकर स्वर्ग को जाने की इच्छा प्रकट की ॥६९/७२॥ आदिपर्व का छिहत्तरवा अध्याय ममाम हुआ ।। अथ मप्रमप्ततितमोऽध्याय ।। ७ ।। पैशम्पायन याच समावृतव्रतं तं तु विस्मृष्टं गुरुणा तदा । प्रस्थित त्रिदशावासं देवयान्यत्रवीदिदम् ॥ १ ॥ ऋपेरगिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन भ्राजले विद्यया चैव तपसा च दमेन च ॥ २ ॥ प्रपिर्यथाऽगिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः । तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः ॥ ३ ॥ एवं ज्ञात्वा विजानीहि यब्रवीमि तपोधन । ग्रतस्थ नियमापने यथा वाम्यहं त्वयि ॥ ४ ॥ 11 मनानग्या अध्याय ७॥ बाम्पायन ने कहा । जनमजय 'ममात प्रत और जितेन्द्रिय हो । अमे महर्षि अहिरा र पिता दार, गुग में माना पाये हुए, यग की जाने हुए मान्य है, येमे ही वृहस्पति मेरे मी मान्य और • मेवयानी रहा है पर ' तुम महदि पूजनीय ।। नपाधन । यह विच अगिर पनि, पुरीन, मणि, विद्वान नपायी मग दहा मानी । तुम जानते हो कि, जब तुम ।

अध्याय ७७ म हा भारत कच उवाच- स समावृतविद्यो मां भक्तां भजितुमर्हसि । गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ५ ॥ -पूज्यो मान्यश्च भगवान्यथा तब पिता मम । तथा त्वमनवद्यांगि पूजनीयतरा मम ॥ ६ ॥ प्राणेभ्योऽपि प्रियतरा भार्गवस्य महात्मनः । वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम ॥ ७ ॥ यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव । देवयानि तथैव वं नैवं मां वक्तुमर्हसि ॥ देवयान्युवाच-गुरुपुत्रस्य पुत्रो वै न त्वं पुत्रश्च मे पितुः । तस्मात्पूज्यश्च मान्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥ असुरैर्हन्यमाने च कच त्वयि पुनः पुनः । तदा प्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमद्य स्मरस्त्र मे ॥ १० ॥ सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम् । न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम् ॥ ११ ॥ कच उवाच--अनियोज्ये नियोगे मां नियुननि शुभवते । प्रसीद मुभ्रु त्वं मह्यं गुगेर्गुरुतरा शुभे ॥ १२ ॥ । ब्रह्मचर्य पालन करते हुए विद्या पढ़ रहे थे, तब मैंने तुम हो । तुम मेरी धर्म की यहिन हो। तुम ऐसी तुम्हारे साथ कैसा बर्ताव किया था । किमतरह अनुचित बात मत कहो ॥१८॥ यार बार प्रार्थना करके पिता से तुम्हारे जीवन की देवयानी ने कहा है कच ! तुम मर पिना रक्षा करवाई थी। अब तुम ब्रह्मचर्य व्रत समाप्त कर के पुत्र नहीं है।। म पिता के गुरु-पुत्र वृदम्पनि चुके हो । मैं तुमको चाहती हू । तुम विधिपूर्वक के घटे हो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! हम कारण तुम मेरे साथ विवाह कर लो। कच ने कहा-जिस भी मेरे मान्य और पूजनीय हो । है कच ! याद तरह तुम्हार पिता मेरे मान्य और पूजनीय है, उमी- करो, जब असुरों ने तुमको बार-बार मारडाला, तर तरह मैं तुमको भी समझता हू । जमे महात्मा शुक्र मने ही पिता से कहकर तुम्हें निन्दा कगया है। का तुम प्राणों में अधिक प्यारी हो, मे ही गुरु- तब ही में तुममे प्रानि हो गई है। मित्रता और प्रेम कन्या होने के कारण धर्म की दृष्टि में मेरे लिय में मेरी उत्तम भक्ति को नुम जानने हो। हे धर्मश: पूजनीय हो । जम मेरा गुरु तुम्हारा पिता गुम मुझको छोडना तुम्हें योग्य नहीं है। कच ने कहा- मुझको नित्य माननीय है, है देवयानी : वैसे ही हे उत्तम ग्रनवाली देवयानी : न करने मान्य कार्य - । आदिपर्व म द्दा भारत -amre यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने । तत्राहमुपितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भाविनि ॥ १३ ॥ भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः सुमध्यमे । सुखमसम्युपितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम ॥ १४ ॥ आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमाशंस मे पथि । अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे । अप्रमत्तोत्थिता नित्यमाराधय गुरुं मम ॥ १५॥ देवयान्युवाच-यदि मां धर्मकामार्थे प्रत्याख्यास्यसि याचितः । ततः कच न ते विद्या सिद्धिमेषा गमिष्यति ॥ १६ ॥ वच उवाच --गुरुपुत्रीति कृत्वाऽहं प्रत्याचक्षे न दोपतः । गुरुणा चाननुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ॥ १७॥ आपं धर्म त्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया । शप्तो ना)ऽम्मि शापस्य कामतोऽद्य न धर्मतः ॥ १८ ॥ तस्माद्भवत्या य. कामो न तथा स भविष्यति । ऋषिपुत्रो न ते कश्चिजातु पाणिं ग्रहीप्यति ॥ १९ ॥ में तुम मुझको नियुक्त करती हो । हे शुभे ' में हो, इससे तुम्हारी कामना सफल न होगी ॥१३॥१६॥ तुम्हें गुर से भी अधिक हृदय मे मानता हू क्च ने कहा-गुरु कन्या समझकर ही मैंने 1०1१२॥ तुम्हारा फहना नहीं माना। तुममें कोई दोष समझ है बड़े नेत्रवारी चन्द्रमुखी ' जिस शुक्र की कर मैने यह काम नहीं किया। गुरु ने भी इस बारे कास्व में तुम रही हो, उसी में भी निवास कर में मुझे कुछ नहीं कहा । इस पर भी यदि तुम्हारी शा। इस कारण से नुम भी मेरी बहिन हो। यही इच्छा है, तो मैं तुम्हारा माप म्वीकार करने तुम प्रेमी पान न कही। मैं तुममे किमी प्रकार में को तय्यार है । हे देवयानी । मैने सपिया के धर्म अमन्तुष्ट नहीं है । अब में तुममे जाने की आशा को मान कर तुम्हारी प्रार्थना म्वीकार नहीं की। मागता ।। मार्ग में मर परयाण होने का आगी तुमने धर्म का विचार न करते हुए काम के यशा बांट दी । धर्ममार्ग में मुन्न कभी कभी याद दिया भन होकर शाप दिया है। मै शाप के योग्य नहीं करना । निन्य मावधानी में मेरे गुर की सेवा है। इस कारण तुम्हारी इच्छा पूर्ण न होगी और मना । देवयानी ने हाच 'तुम मुन्नको कोई अपि तुम्हारा पनि न होगा। तुमने जो मुझे पम श्री नामा मागी दुई को त्याग करने भार दिया है उसमे गरी कुछ हानि नहीं। में वह - अध्याय ७८J महाभारत ३०७ फलिप्यति न ते विद्या यत्वं मामात्य तत्तथा । अध्यापयिष्यामि तु यं तस्य विद्या फलिप्यति ॥ २० ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा द्विजश्रेष्ठो देवयानी कवस्तदा । त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ २१ ॥ तमागतमभिप्रेक्ष्य देवा इन्द्रपुरोगमाः । बृहस्पति सभाज्येदं कचं वचनमब्रुवन् ॥ २२ ॥ देवा ऊचु-यत्त्वयास्मद्धितं कर्म कृतं वै परमाद्भुतम् । न ते यशः प्रणशिता भागभाक्त्वं भविष्यसि ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि ययात्युपास्याने मप्तमप्ननिनमोऽध्याय ॥ ७० ॥ विद्या जिसको पढ़ाऊँगा, उसको फरीभूत होगी। मे बोले-हे च ' तुमने हमार दिन के लिये यह वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ' ब्राह्मणों में श्रेष्ठ अदभुत काम किया है, उसमे तुम्हाग या कमी नष्ट मच देवयानी से यह कहकर गीघ्र देवलोक को न होगा और तुमको हमारे माय यन में माग मिलेगा चला गया । इन्द्रादि देवताओं ने कच को आया ॥१७॥२३॥ हुआ देखकर वृहस्पति का सत्कार किया आर कच आदिपर्व का मनहत्तरवा अध्याय ममाप्त हुआ । २ ॥ अध अष्टमप्रतिनमोऽध्याय ॥ ८ ।। थगंपायन उवाच-कृतविये कचे प्राप्त हृष्टरुपा दिवौकसः । कवादधीत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ ॥ १ ॥ मर्व एव समागम्य शतक्रतुमथावन् । कालम्ते विक्रमम्याद्य जहि झवृन्पुग्न्दर ॥ एवमुक्तस्तु सहितत्रिदशर्मघवांस्तदा । तथेत्युक्त्वा प्रचक्राम सोऽपउयत बने वियः ॥ ३ ॥ 11 अठत्तग्या अध्याय ७८ !! वसम्पायन ने न्हा जनमेजय 'सब देवनाओं है इन्द्र अब एम ममय अगर अपना पराम ने च मे वह मृतमहं बिनी विद्या मीम्बकर मर शत्रुओं को दिन माने हैं । दत्त्या पर रहाई दवना अपने को कृतार्थ मम्झम बहुत प्रसन्न हुए, कीजिय । इन्द्र ने देवताओं का करना ENT तरथात मय देवना एकत्रित होकर इन्द्र में वर दैत्यों पर चढ़ाई कर दी। रह में रनोंने 6 । आदि A हा मारत क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे । वायुभूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत् ॥ ४ ॥ ततो जलात्समुत्तीर्य कन्यास्ताः सहितास्तदा । वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथासन्नान्यनेकशः ॥ ५ ॥ तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा । व्यतिमिश्रमजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः ॥ ६ ॥ ततस्तयोमिथस्तत्र विरोधः समजायत । देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते ॥ ७ ॥ देवयान्युवाच-कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि । .समुदाचारहीनाया न ते साधु भविष्यति ॥ ८ ॥ गर्मिष्ठोवाच-आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम । स्तौति वन्दीव चाभीक्ष्णं नीचैः स्थित्वा विनीतवत् ॥ ९ ॥ याचतस्त्वं हि दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः । सुताऽहं स्तूयमानस्य ददतेऽप्रतिगृह्णतः ॥ १० ॥ आदुन्वस्व विदुन्वस्त्र द्रुह्य कुप्यम्ब याचकि । अनायुधा सायुधाया रिक्ता क्षुभ्यसि भिक्षुकि । लप्स्यसे प्रतियोद्वारं न हि त्वां गणयाम्यहम् ॥ ११ ॥ मरोवर में कुछ नियों को म्नान करते देखा । उम को क्यों पहिन लिया। मदाचार हीन होने से ममय इन्द्र ने वायु होकर उन रियों के यम्मा को तुम्हाग भग न होगा । यह सुनकर शर्मिष्ठा ने रहावर मिरा दिया। जब पंबिया मान करके है। तुम्हारा बाप नीचे खड़ा होकर मेरे पिता की बहर आई, नर उन्होंने जन्दी में जमा यस चन्दीननों के ममा स्तुनि किया करता है। मेरे निगराध आया, उसने उमी का पहिय लिया । और तुम्हार म बड़ा अन्नर । तुम भिग्वारी, दान म ममय देवयानी के घर शाममा नाम पायर्या नारी और स्तुति करनेगा की पुत्री हो और दय की कन्या ने नरम पनि निय। इस सारण में स्तुति विय जानेवार, दान देने पार और म्य न दोनों में गड़ा होने पर जा न लेनेयार की पुत्री । तुम नाहे गी, चाहे छाती दया। में | अमुररमार्ग ' तुमने पागे, नाग, चार पुलिग रेटी, ना है यकी का मेरे यो काम बदलने की चटा वगे, तुमको १७ । .

अध्याय ७८ । महाभारत स नाहुपः वैशम्पायन उवाच-समुच्छ्रयं देवयानी गतां सतां च वाससि । शर्मिष्ठा प्राक्षिपत्कूपे तत. स्वपुरमागमत् ॥ १२ ॥ हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्टा पापनिश्चया । अनवेक्ष्य ययौ वेठम क्रोधवेगपरायणा ॥ १३ ॥ अथ तं देशमभ्यागाद्ययातिनहुपात्मजः । श्रान्तयुग्यः श्रान्तहयो मृगलिप्सुः पिपासितः ॥ १४ ॥ प्रेक्षमाण उदपानं गतोदकम् । ददर्श राजा तां तत्र कन्यामग्निशिखामिव ॥ १५ ॥ तामपृच्छत्स दृष्टूव कन्याममरवर्णिनीम् । सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्टाः साम्ना परमवल्गुना ॥ १६ ॥ का त्वं ताम्रनखी ग्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला । दीर्घ ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छोचसि चातुरा ॥ १७ ॥ कथ च पतिताऽस्यस्मिन्कूपे वीरुत्तृणावृने । दुहिता चैव कस्य त्वं वद सत्यं सुमध्यमे ॥ १८ ॥ देवयान्युवाच-योऽसौ देवैर्हतान्दैत्यानुत्थापयति विद्यया । तस्य शुक्रस्य कन्याऽहं स मां नृन न बुध्यते ॥ १९ ॥ एप मे दक्षिणो राजन्पाणिस्ताननखाड्गुलिः । ममुद्धर गृहीत्वा मां कुलिनस्त्वं हि मे मतः ॥ २० ॥ नहीं गिनती हू । हे भिखारी ' तुम मम्ररहित आर थक गये थे, मृगों का पीछा करता हुआ, प्याम निर्धन होकर मुझ मायुध पर क्रोध करती हो ओर से व्याकुर, जर की तालाश में कुएं में पड़ी हुई मुझसे शटता करती हो, मैं तुमको पु नहीं समझती अमि के ममान तेनम्पिनी देवयानी को देखा और है । गमिष्ठा ने ऐसा कहकर देवयानी को जाँ में उम देवकन्या के समान रूपवानरी में पूछा । रानामा डार दिया आर ऋध के आवेग में यर पापिनी में श्रेष्ठ ययाति में मीट वचनों में ममनाने हुए यह समझकर कि, या मर गई है, हा में बिना देश्यानी मे पूर! हे लार नववारी मुन्दरी' विचारे घर को चरी आई ॥८.१|| तुम कान हो ' तुम मणिकुण्डन धारण यि हुए अम्मात् उसी देश म नहुष का पुत्र राना गहरे विचार में पड़ी हुई क्या मानकर सीहो। ययानि गया। ययानि निमके स्था के घोड़े आदि स्ता और घास आदि में मरे हुए इस कुएं में २४ [ आवपर्य महामार ४०० जानामि हत्वामहं शान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम् । तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि ॥ २१ ॥ वैशम्पायन उवाच-तामथो ब्राह्मणी राजा विज्ञाय नहुपात्मजः । गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुजहार ततोऽवटात् ॥ २२ ॥ उद्धृत्य चैनां तरसा तस्म्गस्कूपान्नराधिपः । आमन्त्रयित्वा सुश्रोणी ययातिः स्त्रपुरं ययौ ॥ २३ ॥ गते तु नाहुषे तस्मिन्देवयान्यप्यनिन्दिता । उवाच शोकसंतप्ता धूर्णिकामागतां पुरः ॥ २४ ॥ देवयान्युवाच-त्वरितं घूर्णिके गच्छ शीघ्रमाचक्ष्व मे पितुः । नेदानीं संप्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः ॥ २५ ॥ वैशम्पायन उवाच-सा तत्र त्वरितं गत्वा घूर्णिकाऽसुरमन्दिरम् । दृष्ट्वा काव्यमुवाचेद सम्भ्रमाविष्टचेतना ॥ २६ ॥ आचचक्षे महाप्राज्ञं देवयानी बने हताम् । शर्मिष्ठया महाभाग दुहित्रा वृषपर्वणः ॥ २७॥ श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तत्र शर्मिष्ठया हताम् । त्वरया निर्ययो दुःखान्मार्गमाण सुतां वने ॥ २८ ॥ गिर पड़ी हो ॥१४॥१८॥ उसके दाहिने हाथ को पकडकर कुएँ के खड्डु में हे सुमध्यमे तुम किसकी कन्या हो ? सत्य से निकाल दिया। उस उत्तम कमरवाली कन्या से सत्य हो । देवयानी ने कहा जो देवताओं से आशा लेकर राजा अपने नगर को चला गया । मार हुए दैत्या को अपनी मृतसजीविनी विद्या से ययाति के चले जाने पर रोक से दुखी देवयानी जिाता है, उस शुत्र की मैं कन्या हू । उनको मेरे ने सामने से आती हुई अपनी दामी से फ्राध से या गिरने की खबर नहीं मिली हे गजन् ' मै रहा हे दामी ' तुम जल्दी जाकर मेर पिता से आपको दुरीन समझती है । आप मरा यह दाहिन। सर वृत्तान्त कह दो ॥१०॥ २॥ हाथ पकड़कर ऊपर निकार सीनिय । म आपको मै अब वृपये के नगर म प्राश नहीं करूगी। जानती है। आप गान्नचित्त, पराममी और यशम्पी वशम्पायन ने कहा हे जनमे नय हैं। इस कारण आप मेरा हाथ पकड़ार इम उप दासी देश्यानी की आज्ञा पाकर घबराई हुई, शुद्ध मे निशाने योग्य हो । वैशम्पायन ने कल इमर के पास आई और यन में देवयानी और शर्मिष्ठा की पनि गमा ययानि न उमे घायण कन्या जानार रड़ाई होने का मत्र वृत्तान्त कह सुनाया। यह वह धूर्णिका AAVAAAAA -- अध्याय 3८1 महाभारत दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानी ततो बने । बाहुभ्यां संपरिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत् ॥ २९ ॥ आत्मदोर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः । मन्ये दुश्चरितं तेऽस्ति यस्येयं निष्कृतिः कृता ॥ ३० ॥ दंबान्वुवा -निप्कृतिमऽस्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम । शर्मिष्टया यदुक्ताऽस्मि दुहित्रा वृषपर्वणाः ॥ ३१ ॥ सत्यं किलतत्सा प्राह देत्यानामसि गायनः ॥ ३२ ॥ एवं हि मे कथयति शर्मिष्टा वार्षपर्वणी । वचनं तीक्ष्णपरुपं क्रोधरक्तक्षणा भृगम् ॥ ३३ ॥ स्तुवतो दुहिता नित्यं याचतः प्रतिगृहतः । अहं तु स्तूयमानस्य ददनोऽप्रतिगृहतः ॥ ३४ ॥ इदं मामाह शर्मिष्टा दुहिता वृषपर्वणः । क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णा पुनः पुनः ॥ ३५॥ यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृहनः । प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता तु साबी मया ॥ ३६ ॥ शुत्र ग्वाच-स्तुवतो दुहिता न त्वं याचनः प्रतिगृहतः । अस्तोतुः स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि ॥ ३७॥ मुनका घबराये हुए शुक्र देवयानी को हँढने में ही कहा था कि तुम दैत्यों की गवैया हो । अत्यन्त लिये नन्दी में वन को दाडे । वा देवयानी को क्रोध में राल नेत्र का वृषपर्वा की पुत्री गर्मिष्ठा दम्बार दोनों हाथों में अपने हृदय मे रगाया। ने मुगम यह कठोर वचन कहा-म्नुति करनेवाले, उन्होंने द बिन होकर अदा कि, मनुष्य अपने सदा भिन्वाग, दान देनेबारे की तुम पुत्री हो आर मों के अनुसार मुख आप दुम भोगना हे | मैं में म्नुनि गानेवाले, दान देनेवाले और म्बय दान ममता हु कि, तुमने नई प्रमा काम किया होगा, न लेनेवाने की पुत्री हु । घमण्ट आर बाघ मे जिमका फर यह तुमको मिग ह । देवयानी ने सर नेत्र चि हुए यर्मिष्टा ने मुयमे यह वचन ग-मुझे चाटे निप दोष काफर मिग हो, परन्तु वार गा म्दा । हे तान ! यदि मैं नुनि कन्वार मावधानी मे तुम मेरे वचन मे मर्ने ॥२३॥ और दान लेनेवार भी पुत्री हु, तो मै अवस्य मन्दिा क्या वृषपर्वा भी पुत्री शामष्ठा ने मुझमे मत्य को प्रमन्न कर लगी आर एमा ही मन अपनी मस्त्री । आदिपर्व म हा भारत ४०२ । यम में बनेवाला ही मचा सवारदा देवयानी वृषपर्वैव तद्वेदशको राजा च नाहुपः । अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम ॥ ३८ ॥ यच्च किंचित्सर्वगतं भूमौ वा यदि वा दिवि । तस्याहमीश्वरो नित्यं तुष्टेनोक्तः स्वयंभुवा ॥ ३९ ॥ अहं जलं विमुश्चामि प्रजानां हितकाम्यया । पुष्णाम्यौषधयः सर्वा इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४० ॥ पैशम्पायन उवाच एवं विषादमापन्नां मन्युना संप्रपीडिताम् । वचनैर्मधुरैः श्लक्ष्णः सान्त्वयामास तां पिता ॥ ४१ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि ययात्युपाख्याने अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७८ ॥ से भी कहा है ॥३२॥३६॥ होकर मुझे पृथ्वी और स्वर्ग के सब पदार्थों का शुक्र ने कहा-हे देवयानी ! तुम स्तुति करने- म्वामी बनाया है। मैं ही प्रजा के हित के लिये वाले, दान लेनेवाले और भिखारी की पुत्री नहीं हो जल वर्षाता हू । मै ही वृष्टि से सब अन्नों और किन्तु दान न लेनेवाले और स्तुति करानवाले की औषधियों को पुष्ट करता हूं । मै सत्य कहता हूं। तुम पुत्री हो । नहुष के पुत्र राजा ययाति और वैशम्पायन ने कहा-इस प्रकार शोक और विपाद इन्द्र इस बात को जानते है और म्वय वृषपर्वा से से पीड़ित देवयानी को मधुर और शातिदायक भी यह बात छिपी नहीं है। मेरा यह ईश्वरसम्बन्धी वचनों से शुक्र ने समझाया ॥३७॥४१॥ प्रभवल अचिन्त्य और अद्वितीय है। ब्रह्मा ने प्रसन्न आदिपर्व का अठहत्तरवा अध्याय ममान हुआ । अथ एकोनागीतितमोऽध्याय ॥ ७ ॥ शुभ पाप-यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षते । देवयानि विजानीहि नेन मर्वमिदं जितम् ॥ १ ॥ यः ममुत्पनिनं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा । म यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रहिमषु लम्बते ॥ २ ॥ ॥ उमामीनां अध्याय ७५ ॥ गुमने ॥ देवयानी 'जी का नित्य मचा जिनन्द्रिय है । कयल घोड़े की लगाम पर- अपनी निन्दा मनका महना है, उसने माना या। मवार नहीं कहा जा सकता, घोड़े को अपने म. जीन पिया। जो कई दिगई प ममान प्रोपग गया, यही जी पुरुष शोध का त्याग करता यह निश्चय सब । । पा + अन्याय ७१। पदा मान ४३ यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन निरस्यति । देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिद जितम् ॥ ६ ॥ यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयेह निरस्यति । यथोरगस्त्वचं जीर्णा स वै पुरुष उच्यते ॥ १ ॥ यः संधारयते मन्युं योऽतिवादांस्तितिक्षते । यश्च ततो न तपति दृढं सोऽर्थस्य भाजनम् ॥ ५ ॥ यो यजेदपरिश्रान्तो मासि मासि शतं समाः । न मुख्यद्यश्च सर्वस्य तयोरकोधनोऽधिकः ॥ ६ ॥ यत्कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः । न तत्प्राज्ञोऽनुकुर्वीत न विदुस्ते बलाबलम् ॥ ७ ॥ देवयान्युवाप-वेदाहं तात बालापि धर्माणां यदिहान्तरम् । अक्रोधे चापिवादे च वेद चापि बलाबलम् ॥ ८ ॥ शिष्यस्याशिष्यवृत्तेस्तु न क्षन्तव्यं बुभूषता । तस्मात्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९ ॥ पुमांसो ये हि निन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च । न तेषु निवसेत्याज्ञः श्रेयोर्थी पापवुद्धिषु ॥ १० ॥ ससार को जीतता है । जो उत्पन्न हुए क्रोध को मान् ऐसा कार्य नहीं करते । देवयानी ने कहा -हे शाति से सर्प की कैचुली (कुज) के समान दूर कर तात ' मैं बालिका होने पर भी धर्म के अन्तर को देता है, वही ससार में पुरुष है। जो क्रोध को रोक जानती हू आर क्रोध झगडे की बुराई भी मुझे सकता है, जो दूसरे की की हुई निन्दा को सह विदित है । परन्तु ससार में प्रतिष्ठा की इच्छा लेता है, जो औरों से सताये जाने पर भी उसे कष्ट करनेवाले मनुष्य को अन्यथा वर्ताव करनेवाले शिप्य देना नहीं चाहता वही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को क्षमा करना योग्य नहीं । इन आप के शिष्य पाने का अधिकारी हे ॥११॥ असुरों का व्यवहार हमारे साथ अच्छा नहीं देख जो सौ वर्ष तक हर महीन आनन्दपूर्वक पड़ता। इसीम मैं अब इनके यहा रहना नहीं श्राद्ध करता हुआ क्रोध नहीं करता, इन दोनों में चाहती । जो पुरुष अपने चालचलन और कुटुम्ब कभी क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ ममझा जायगा। के अभिमान से दूसरों की निन्दा करते है, उनके जो पुत्र वा कन्या बुद्धिरहित होकर विरोध करते पास बुद्धिवाला में कल्याण का चाहनेवारा कदापि हैं, वे बल और दीनता का ज्ञान नहीं रखत । बुद्धि न रहे । जो अपने से दूसरों को अच्छा समझते है, - । -

महाभारत
। आदिपर
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ये वेनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन वा ।।
तेपु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११ ॥ .
वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुवृषपर्वणः ।
ममः मनाति
हृदयमग्निकाम इवारणिम् ।
न ह्यतो दुष्करतरं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु ॥-१२ ॥
यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ।
मरणं शोभनं तस्य इति विद्वज्जना विदुः ॥ १३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ययात्युपाख्याने एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥
ऐसे महात्माओं में वास करना श्रेष्ठ कहलाता है किसी प्रकार से अच्छा नहीं है । तीनों लोकों में
वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा के वाक्य मेरे हृदय को इससे बढकर कोई बुराई नहीं है और इससे मरना
अभी तक अरणी काष्ठ को अग्नि के समान जला श्रेष्ठ है ॥६॥१३॥
रहे हैं । निर्धनी को धनवान् शत्रु की सेवा करना
आदिपर्व का उन्नामीयां अध्याय समाप्त हुआ |
अथ अगीतितमोऽध्याय ॥ ८० ॥
वैशम्पायन उवाच-ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह ।
वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन्
नाधर्मश्चरितो राजन्सद्यः फलति गौरिव ।
शनैरावय॑मानो हि कर्तुमूलानि कृन्तति ॥ २ ॥
पुत्रपु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति ।
फलत्येव ध्रुव
पापं
गुरुभुक्तमिवोदरे ॥ ३ ॥
यदघातयिथा विप्रं कचमांगिरसं तदा ।
अपापशीलं धर्मजं शुश्रू' मदगृहे
॥ अम्मीयां अध्याय ८० ।।
दाम्पायन ने कहा है जनमेजय : भृगुवगियों अधर्म माग का भी फल जल्टी नहीं मिलता है।
गोष्ट पुत्र को भी प्रोध हो आया। उन्होंने उमा किन्तु यह अधर्म करने वाले की जड़ को धार-धार
समय पारी के पास जाकाहादानवराज: काटना जाना है। यदि अधर्म का फल मागे
तुग न जाननेही मिनीतीक समान को नहीं गिना है, तो उसके पुत्र और पाना की
रतम् ॥ ४ ॥

अध्याय ८० महाभारत बधादनहतस्तस्य बधाच दुहितुर्मम । वृषपर्वन्निवोधेदं त्यक्ष्यामि त्वां. सवान्धवम् । स्थातुं त्वद्विषये राजन्न शक्ष्यामि त्वया सह ॥ ५ ॥ अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम् । यथेममात्मनो दोपं न नियच्छस्युपेक्षसे ॥ ६ ॥ वृपपर्योवाच-नाधर्म न मृपा वादं त्वयि जानामि भार्गव । त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत्प्रसीदतु मे भवान् ॥ ७ ॥ यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव । समुद्रं संप्रवेक्ष्यामो नान्यदस्ति परायणम् ॥ ८ ॥ शुक्र उवाच -समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः । दुहितु प्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे ॥ ९ ॥ प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम् । योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव वृहस्पतिः ॥१०॥ वृषपर्योषाच-यत्किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव । भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः ॥ ११ ॥ शुक उवाच - यत्किचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर । तस्येश्वरोऽस्मि योषा देवयानी प्रसाद्यताम् ॥ १२ ॥ भोगना पड़ता है। जैसे भारी भोजन नहीं पचता, आपको अधर्मी और झूठा कभी नही समझता है । वैमे अधर्म मी फल दिखाये बिना नहीं रहता । आप तो धर्मात्मा और सत्यवादी है। आप मुझमे तुमने धर्मशील, धर्मन, गुरु की सेवा करनेवाले, प्रसन्न रहें । हे भार्गव : यदि आप हम लोगों को मेरे घर में ठहरे हुए अङ्गिरा के पोते कच को कई छोड़कर चले जायेंगे, तो मैं आप के पहिले ही अपने बार मारडाला ॥१४॥ बन्धु बान्धवों के साथ समुद्र में चला जाऊँगा । हे वृषपर्वा । उम अवध्य के मारने और मेरी शुक्र ने कहा-हे असुरी : चाहे तुम समुद्र में प्रवेश कन्या देवयानी के पीडा देने में मैं तुमको भाइयों करो, या कहीं और चले जाओ; मै यहा नहीं रहूगा । महित छोडकर चला जाऊगा । हे देत्य ! तुम मुझे देवयानी मुझे प्राणों मे भी अधिक प्यारी है । उसके झूठा समझ रहे हो और अपने किये हुए दोप को दु.ख को मैं देख नहीं सकता | तुम देवयानी को नहीं मानते हो । वृषपर्या ने कहा-हे मार्गर : मै प्रसन्न कर लो । मेरा जीवन उसी के अधीन है। - ya म हा भारत ( आदिषद " । वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविः । देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गवः ॥ १३ ॥ 'देवयान्युवाच-यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव । नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम् ॥ १४ ॥ यूपपर्वोवाच-यं काममभिकामासि देवयानि शुचिस्मिते तत्तेऽहं संप्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम् ॥ १५॥ देवयान्युवाच दासी कन्यासहस्त्रेण शर्मिष्ठामभिकामये । अनु मां तत्र गच्छेत्सा यत्र दद्याञ्च मे पिता ॥ १६ ॥ पृपपापाच-उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघमानय । 'यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम् ॥ १७ ॥ वैशम्पायन उवाच-ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत् । उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्टे ज्ञातीनां सुखमावह ॥ १८ ॥ त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान्देवयान्या प्रचोदितः । सा यं कामयते कामं स कार्योद्य त्वयानघे ॥ १९ ॥ शर्मिष्ठोयाच यं सा कामयते कामं करवायह्मद्य तम् । यद्येवमाह्वयेच्छुको देवयानीकृते हि माम् । महोपान्मागमच्छको देवयानी च मत्कृते ॥ २० ॥ इन्द्र का निर्वाह जमे हम्पति करते हैं, इसी प्रकार चार्य ने देवयानी के पास जाकर उसी वृत्तान्त को तुम्हारा करता॥10॥ कहा । देवयानी ने कहा-हे तात मार्गय ! जो आप वृषपर्वा ने कहा है भार्गव । नो कण पृथ्वी सचमुच राजा वृषपर्वा की सारी सम्पत्ति के मालिक पर अमुरी का धन, हाथी, घोड़े, गाय आदि है. हैं, तो इस बात को वा म्वय मेरे आगे आर उनर और मेरे भी आप मालिक हैं 1 शुज ने अपने मुख में कहें । तर अपने बन्धु बान्धवों सहित वहारे महापुर 'जा कुछ अमर गजाओं का पृष्पगने आप देवयानी के पास आकर कहा है धन , यदि मका में ईश्वर ह. नो देवयानी को मनोहर होम्ययुक्त देवयानी । जो तुम्हारी या गया पूरी की प्रमन्न व गायन हो मो मुझमे मागो दुर्लभ होने पर भी मैं तुमको 17 राजा मेजय । या मुनकर यर वा दगा ॥१७॥ विद्याप पर नागा सनर गुवा देवयानी ने कहा अच्छा, हमार न्याओं मे - अध्यायं 01 महा भारत वैशम्पायन उवाच-ततः कन्यासहस्त्रेण वृता शिविकया तदा । पितुर्नियोगात्त्वरिता निश्चक्राम. पुरोत्तमात् ॥ २१ ॥ शर्मिनोवाच-अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका । अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ॥ २२ ॥ देवयान्युवाच-स्तुबतो दुहिताऽहं ते याचतः प्रनिगृह्णतः । स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि ॥ २३ ॥ गर्मिष्ठोवाच-येन केनचिदा नां जातीनां सुखमावहेत । अतस्त्वामनुयास्यामि यत्र दास्यति ने पिता ॥ २४ ॥ वैशम्पायन उवाच- प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृपपर्वणः । देवयानी नृपश्रेष्ट पितरं वाक्यमब्रवीत ॥ २५ ॥ देवयान्युवाच-प्रविशामि पुरं तात तुष्टाऽस्मि द्विजसत्तम । अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्यावलं च ते ॥ २६ ॥ वैटाम्पायन उवाच-एवमुक्तो दुहित्रा ल द्विजश्रेष्टो महायशाः । प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवेः ॥ २७ ॥ प्रति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वाण ययात्युपाग्यांनऽशीतितमोऽभ्याय ॥ ८ ॥ माहित मार्मिष्ठा मेरी दामी होकर रह और मेरे पिता मे देवयानी और शुक्र दैत्यों को छोडकर न जावें जहां मेरा विवाद करें यहा मेरे माथ जाये । वृषपर्या ॥१६॥२०॥ ने कहा-हे दाई ! तुम शर्मिष्ठा को शीघ्र यहा ले वैशम्पायन ने कहा-इसके पश्चात हजार आओ । जो देवयानी चाहती है उसे शर्मिष्ठा कन्याओं महिन गर्मिष्ठा पालकी में बैठकर नगर से म्वीकार कर । वैशम्पायन ने कहा-राजा की आज्ञा बाहर गई और देवयानी के पास जाकर पाती है से दाई ने शर्मिष्ठा से जाकर कहा-डे मद्रे गमिष्टे : देवयानी : मैं हमार दामियों महित तुम्हारी दामी उठो और अपने वाधवों की महायना करो । देवयानी हू । जो तुम कहोगी मो में करूंगी और जहा के कहने से ब्राह्मण शुक्राचार्य अपने शिन्य दैत्यों तुम्हाग पिना तुमको दंगा मैं वहीं तुम्हारे माथ को छोडकर आना चाहते है । इम कारण हैं पाप जाऊंगी। देवयानी ने कहा- स्तुति करनेवाले रहित : तुमको देवयानी की इहानुपार उसे प्रसन्न भिखारी की पुत्री हु । तुम स्मृति किये जानेवार करना होगा। शर्मिष्ठा ने कहा-जो देवयानी का .राजा की कन्या होकर भग किस प्रकार मेरी दामी प्रिय करने के लिये मुझको बुलाया है. तो मैं अमीर बनोगी। गर्मिष्ठा ने कहा- मेरे दुम्बित बान्धवों चलकर देवयानी की इच्छा पूर्ण कागी मेरे दोष को मुम्ब हो. इस कारण जहां तुम्हारा रिना तुझे 4 ।

। आतिपर ५०८ महामार । = देगा, वहा मै दासी होकर जाऊगी ॥२१॥२४॥ हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ । मै अब प्रसन्न होकर नगर में वैशम्पायन ने कहा-इस प्रकार जब शर्मिष्ठा जाती है । वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय | इस- F ने दासी होकर रहना म्वीकार कर लिया, तब प्रकार पुत्री की बात सुनकर बड़े यशवाला सब देवयानी ने अपने पिता से कहा-हे पिताजी । दानवों से पूजित शुक्र प्रसन्न होकर नगर में गया आपका विद्यावल और विज्ञान निश्चय सफल है । ॥२५॥२७॥ आदिपर्व का अस्मीवा अध्याय ममाप्त हुआ। अथ एकाशीतितमोऽध्याय ।। ८१ ।। वैशम्पायन उवाच-अथ दीर्घस्य कालस्य देवयानी नृपोत्तम । वनं तदेव निर्याता क्रीडार्थ वरवर्णिनी ॥ १॥ तेन दासीसहस्रण साधु शर्मिष्ठया तदा । तमेव देशं संप्राप्ता यथाकामं चचार सा ॥ २ ॥ नाभिः सखीभिः महिता सर्वाभिमुदिता भृशम् । क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधुमाधवीम् ॥ ३ ॥ खादन्त्यो विविधान्भक्ष्यान्विदशन्त्यः फलानि च । पुनश्च नाहुपो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया ॥ ४ ॥ तमेव देशं संप्राप्तो जलार्थी श्रमकर्शितः । ददृशे देवयानी म शर्मिष्ठां ताश्च योपितः ॥ ५ ॥ पिवन्नीललमानाच दिव्याभरणभूपिताः । उपविष्टां च ददृशे देवयानी शुचिम्मिनाम ॥ ६ ॥ ॥ इक्यामीवा अध्याय (१॥ यसम्पायन ने कहा राजाओं में श्रेष्ठ जनमेजय' मे घबगया हुआ, जल की इच्छा से फिर उसी पाहुन ममय व्यतीत होने पर एक दिन देवयानी म्थान पर पहुंचा । राजा ययाति ने देवयानी और पिा मारा करने के लिये उमी वन म गई । अपनी शर्मिला को मय दासियांसहित मदिरा पी रही, हमार दामी पन्याओं के माथ मिटा भी वहा प्राडा कर रही, दिव्य आभूषणों से भूषित देखा। गई। मरन्याप अपनी इन्छा अनुसार मदिरा उम ममय देवयानी परमसुन्दर रूप धारण किय पन, अनेक प्रकार भानन मग्न और पागं हुए. मुसकराती हुई हमार दासियों के मध्य म न। उनका माद ने नगी । देवयोग में नाप बेटी या और गर्मिष्ठा उमकी भया कर रही थी। TE पहा ययानि रिपरने, परिश्रम नब ययाति ने गठिा और देवयानी से कहा दी .......... ~~ अध्याय ८१ महामारन रूपेणाप्रतिमां तासां श्रीणां मध्ये बराङ्गनाम् । शर्मिष्टया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ ॥ ययाविम्वाच-द्वाभ्यां कन्यामहनाभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते । गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यहं शुभे ॥ देवयान्युवाच-आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नगधिप । शुक्रो नामासुग्गुरुः मुतां जानीहि तम्य माम् ॥ ९ ॥ इयं च मे मग्बी दासी यत्राहं तत्र गामिनी । दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा पपर्वणः ॥१०॥ ययातिरुवाच कथं तु ने मखी दामी कन्येयं वरवर्णिनी । असुरेन्द्रसुना सुभ्रः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ ॥ देवयान्युबाच-सर्व नरश्रेष्ट विधानमनुवर्त्तने । विधानविहितं मत्वा मा विचित्राः कथाः कृथा ॥ १२ ॥ गजवदृपवेषों ते ब्राह्मीं वाचं विभर्पि च । को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च स मे ॥ १३ ॥ ययानिम्बार-ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृस्नः श्रुनिपथं गतः । गजाहं राजपुत्रश्च ययानिरिति विश्रुतः ॥ १४ ॥ देवयान्युवाच केनात्यर्थेन नृपने इम देशमुपागतः । जिघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५॥ हनार कन्या तुम्हारी मेवा में लगी हुई है। तुम दामीभाव को कम प्राप्त हुई । मुझमे कही। दोनों कौन हो? तुम्हाग नाम और गोत्र क्या यह जानने के लिये मुझे बड़ा कानूहल हो रहा इमपा देवयानी ने कहा-डे महागज : निण । है। देवयानी ने कहा-हे मनुष्यों में श्रेष्ट ! मब में असुगे के गुरु शुक्राचार्य की कन्या देवयानी कुछ मान्य के अनुसार देव की इच्छा में होना। है । यह दूसरी मेरी मम्दी और दामी मेरे माथ रहने अतएव आपका देव के गानों में विसम्य न होना वारी, दानवों के गला दृषवा की कन्या गमिष्टा चाहिये । आपका का और देष गजाओं वमा बान पडना है और वाणी वामगा जमी है । आपका ययाति ने कहा-अडंग में गवा वृषवा में क्या नाम है । आर कहा में आये हैं। आमिर यह परम सुन्दरी क्न्या तुम्हारी मी होकर मी पुत्र है ! ययानि ने न्द्रा-मचर्य मन पार कर है ||212.|| ... । आदिपर्व महाभारत ४१० बहुधाऽप्यनुयुक्तोऽस्मि - - ययातिरुवाच-मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागतः । तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ ॥ देवयान्युयाच-द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह । त्वदधीनाऽम्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव ॥ १७॥ ययातिरुवाच-विद्धयोशनसि भद्रं ते न त्वामोऽस्मि भाविनि । अविवाह्या हि राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८ ॥ देवयान्युवाच-संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म सहितम् । ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुपाङ्ग वहस्व माम् ॥ १९ ॥ ययातिरुयाच-एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वराङ्गने । पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां तु ब्राह्मणो वरः ॥ २० ॥ देवयान्युवाच-पाणिधर्मो नाहुपाऽयं न पुभिः सेवितः पुरा । तं मे त्वमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१ ॥ कथं नु मेमनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान्स्पृशेत् । गृहीतमृपिपुत्रेण स्वयं वाप्यपिणा त्वया ॥ २२ ॥ ययातिरुवाच -क्रुद्धादाशीविषात्सोज्ज्वलनात्सर्वतोमुखात् दुराधर्पतरो विप्रो ज्ञेयः पुंसा विजानता ॥ २३ ॥ मने सब वेदों को पढ़ा है । मैं राजा का पुत्र और कल्याण हो । आप मेरे सखा और स्वामी बनें । म्वय राजा ह । मेरा नाम ययाति है ॥११११४|| ययाति ने कहा है देवयानी ! तुम शुक्राचार्य की देवयानी ने कहा आप यहा क्मिलिए आये कन्या हो। मैं तुम्हारे माथ विवाह करने के योग्य है। आप जल में उत्पन्न पदार्थ को लेने आये हैं नहीं है । हे देवयानी ! तुम्हारे पिता क्षत्रिय राजाओं या कमल के पल ने ' या मृग की इच्छा से को अपनी कन्या नहीं दे सकते । यह सुनकर आपका यहा आना हुआ है ' ययानि ने कहा है देवयानी ने कहा- हे गजन् ! क्षत्रियों और ब्राह्मणों भद्र : म मृग का शिकार करने का बन में आया का परम्पर मेल हो चुका है या। जल की बाज में इधा निकल आया हं राजा नहुष के पुत्र किमी प्रापि या अपिपुत्र से मग का पीछा करने में मैं बहुन थक गया है । कम नहीं है। मेरे कहने में आप मुझ भ्यीकार अव मुंन आमा दीजिय दिवयानी ने कहा है गजन :मनदोहामार कन्याओं में माथ और गजा ययाति ने कहा है मुन्दरी : नारों वर्ष मटा दामीमदिन आप प्रधान है। आपका एक ब्रह्मा के ही गरीर में उत्पन्न हुए है. किन्त । आप बड़े प्रतापी - को ॥१५॥१०॥ 7...AAN अभ्याय८ । म हा मारी मतो मम । देवयान्युवाच कथमाशीविषात्मज्ज्वलनात्सर्वतोमुखात् दुराधर्पतरो वित्र इत्यास्थ पुरुपर्पभ ॥ २४ ॥ ययातिवाद-एकमाशीविपो हन्ति शस्त्रेणकश्च वध्यते । हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २९॥ दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद्री अतोऽदत्तांच पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६ ॥ देवयान्युवाच-दत्तां बहस्व तन्मां त्वं पित्रा राजन्वृतो मया । अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७ ॥ वैशम्पायन उवाच-त्वरितं देवयान्याऽथ संदिष्टं पितुगत्मनः । सर्व निवेदयामास धात्री तस्मै यथानथम् ॥ २८ ॥ श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः । दृष्टुव चागतं शुक्र ययातिः पृथिवीपतिः । ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥ २९ ॥ देवयान्युवाच-राजाऽयं नाहुपस्तान दुर्गमे पाणिमग्रहीत । नमस्ते देहि मामस्मै लोक नान्यं पतिं वृणे ॥ ३० ॥ मव के धर्म और कर्म पृथक-पृथक हैं । ब्राह्मण । परन्नु क्रोधित ब्राह्मण नगगेसहित बडे उनमें श्रेष्ठ है । देवयानी ने कहा-हे नहुपपुत्र रडे राज्यों को नष्ट कर देता है । हे मीरु ' इमी ययाति । पहिले मेरा हाथ किसी ने नहीं पकहा कारण में ब्राह्मण को बलवान् समाना हु । तुम्हारे था । उस दिन कुएं से निकाल्ते ममय पहिले- पिता के दिय विना मैं तुम्हारे माथ विवा” नहीं कर पहिर आपने ही मग हाय पकडा था। इमीसे में माना हूँ ॥२०॥६॥ आपको अपना म्वामी वनाती है । हे रानन् । मैं देण्यानी ने कहा बहुत अच्ग, पिना के देने तपम्बिनी हु । मेरा हाथ अब दूमरा नहीं पकड पर आप मुझ म्वीकार करना । वर न मागनेवार सकता । ययाति ने कहा-क्रोधित विपैरे मपं और का और दी हुई वस्तु के रेनेवाले को भय नही चारों ओर फैर रही जरती हुई अमि मे भी बढ़कर है । वैशम्यायन ने कहा- जनभनय देवयानी ने वाषण का क्रोध भयकर है, ऐमा ज्ञानवान पुरुषों ने उमी ममय दाई को भेजकर अपने पिता गुर की कहा है। देवयानी ने कहा-मर्प और अग्नि मे ब्रामण बुन्यया । इम वृतान्न को सुनमा मपि शुज मी को यन्मान् कैम का' ययाति ने कहा-मर्प जिमको ममय देवयानी के पाम आये । शुभ का आयाम काटता है वहीं मरता है। मन में भी एक ही मारा कर राजा हाथ जोड़कर उनके आगे मरा हो गया। जाता -1 आदिपव म हा मारत a शुक्र उवाच-वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया । गृहाणेमां मया दत्तां महिषी नहुपात्मज ॥ ३१ ॥ ययातिनाच-अधर्मों न स्पृशेदेष महान्मामिह भार्गव । वर्णसंकरजो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३२ ॥ शुक्र उवाच-अधर्मात्त्वां विमुश्चामि वृणु त्वं वरमीप्सितम् । अस्मिन्विवाहे मा ग्लासीरहं पापं नुदामि ते ॥ ३३ ॥ वहस्व भायां धर्मेण देवयानी सुमध्यमाम् । अनया सह संप्रीतिमतुला समवाप्नुहि ॥ ३४ ॥ इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । संपूज्या सततं राजन्मा चैनां शयने द्वयः ॥ ३५॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम् । शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम् ॥ ३६ ॥ लब्ध्वा शुक्रान्महद्वित्तं देवयानीं तदोत्तमाम् । द्विसहस्रेण कन्यानां तथा शर्मिष्ठया सह ॥ ३७ ।। संपृजिनश्च शुक्रेण दैत्यैश्च नृपसत्तमः । जगाम स्वपुरं हपोऽनुजातोऽथ महात्मना ॥ ३८ ॥ इनि श्रीमन्महाभारने आदिपीण मभरपर्वणि ययात्युपाख्यान एकातितमाऽध्याय ॥ ८१ ॥ तब देवयानी ने शुक्र में कहा-हे तात ' यह नहुप के होनेवारे पाप को मैं मिटा दूगा । आप धर्मानुसार पुत्र गजा ययानि । इन्हीने मफट के ममय मेरा देवयानी के माथ विवाह करी । मे आशीर्वाद देता हाथ पकड़ा था। मैं अपना थियार इनके मिवाये हूँ कि, इसके साथ आपको परम प्रसन्नता प्राप्त हो । दमा में नहीं करना चाहती है । मैं आपको प्रणाम पानी है। आप मुग्न इन्। को दे दीजिये ।।२७३०॥ युपपरी की पुत्री शर्मिष्ठा सत्कार करने के योग्य है, यह मनका शुम ने गता ययानि में कहा है परन्तु कभा इसको अपने साथ शय्या पर न सुलाना। पारस अनी प्याग कन्या को आपको देता गम्पायन ने कहा-यह मुनकर राजा ययाति ने है। बार हमी प्रमाण । ययानि ने कहा है शुक्र की प्रदिक्षणा कर विधिपूर्वक देवयानी के साथ भागव । मनमा दीपन, यह म भाप विद्या क्यिा । ययानि शुक में यहुत मा धन और TAIT 1 में आपको अधर्म में दो हमार पन्याएं और शर्मिष्ठा महित उत्तम देवयानी हाना न्याय माय विवाह करने में सो रेकर नगर को परे । चरतं ममय - हे राजन् 1 यह उत्तम वचन बोलनेवाली गुपाचार्य अध्याय ८२ मद्दामा और सब दैत्यों ने गजाका योचित सत्कार किया ॥३१॥३८॥ आदिपर्व का इक्यामीवां अध्याय ममाम हुमा।। अथ व्यगीतितमोऽध्याय ! ८२ ॥ वैशम्पायन उवाच-ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसन्निभम् । प्रविश्यान्तः पुरं तत्र देवयानी न्यवेशयत् ॥ १ ॥ देवयान्याश्चानुमते सुतां तां तां वृषपर्वणः । अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत् ॥ २ ॥ वृतां दास सहस्त्रेण शर्मिष्ठां वार्पपर्वणी । वासोभिग्न्नपानश्च संविभज्य सुसत्कृताम् ॥ ३ ॥ देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः । बिजहार बहनव्दान्देववन्मुदितः सुखी ॥ ४ ॥ ऋतुकाले तु संप्राप्ते देवयानी वराङ्गना । लेभे गर्भ प्रथमनः कुमारं व व्यजायत ॥ ५ ॥ गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्टा वार्षपर्वणी । ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा चान्यचिन्तयत् ॥ ६ ॥ ऋतुकालश्च संप्राप्तो न च मेऽस्ति पतिवृतः । किं प्राप्तं किं नु कर्तव्यं किंवा कृत्वा कृतं भवेत् ॥ ७ ॥ ॥ वयानीयां अध्याय ८२" वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय : गजा माथ देवताओं के समान प्रसन्नता में मुख भागने ययाति ने इन्द्रपुरी के समान अपने नगर में पहुंच- लगा। त्रियों में श्रेष्ठ देवयानी ने ऋतु-मान के का देवयानी को अन्तःपुर में ग्क्वा । देवयानी उपरान्त गर्म धारण करके एक मृन्दा पुत्र को भी आज्ञा के अनुमार अगाकवन के पास घर उत्तन्न किया ॥१॥५॥ बनवाकर उमी शर्मिष्ठा के रहने का प्रबन्ध किया महस वर्ष व्यनीन होने पर युवती गर्मिष्टाने गया । शर्मिष्ठा के पाम हजार दामियां भी रहती ऋतु-म्नान होने पर विचार किया कि, मग विवाद थी। राजा ययाति ने शर्मिष्ठा और उसकी दामियों अमी तक नहीं हुआ और अतुकान का ममय के म्वान-पान और पहिनने का यथोचित प्रबन्ध कर आगया है। अब मुंग क्या करना नाहिये ! क्या दिया । अब नहुप का पुत्र ययाति देवयानी के करने में मुझे मुम मिलंगा : देवयानी के भी [ आदिपर ४१४ महाभारत देवयानी प्रजाताऽसौ वृथाऽहं प्राप्तयौवना । यथा तया वृतो भर्ता तथैवाऽहं वृणोमि तम् ॥ ८॥ राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः । अपीदानी स धर्मात्मा इयान्मे दर्शनं रहः ॥ ९ ॥ अथनिष्क्रम्य राजाऽसौ तस्मिन्काले यदृच्छया । अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्रेक्ष्य धिष्ठितः ॥ १० ॥ तमेकं रहिते दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी । प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत् ॥ ११ ॥ शर्मिष्टोवाच-सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य च । तव वा नाहुप गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति ॥ १२ ॥ रूपाभिजनशीलैहि त्वं गजन्वेत्थ मां सदा । सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप ॥ १३ ॥ ययातिश्याच वेद्मि त्वां शीलसंपन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम् । रूपं च ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम् ॥ १४ ॥ अब्रवीदुशना काव्यो देवयानीं यदाऽवहम् । नेयमावयितव्या ते शयने वापपर्वणी ॥ १५॥ शामिनावाच-न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले । प्राणात्यये सर्वधनापहारे मर्वधनापहारे पश्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६ ॥ हो चुका है और मेग तरुण अवस्था पति के बिना हाथ जोड़ कर कहा-ह नहुषपुत्र ! चन्द्रमा, इन्द्र वृथा। जिमनाह देवयानी ने राजा ययाति को विष्णु, यम, वरुण आदि देवताओं के और आपके अपना पनि बनाया है, दीपकार में भी कम । अन्न पुर की त्रियों को कोई नहीं देख मस्ता गजा ययानि दी मुन पुत्र फर दे मन । यदि एकान में धर्मामा गजा के दीन हो, ना मेरा आप मेरे भी रूप, कुल और बाय मिट हो म है । नत्सवात अचानक गीरम्यभाव को जानन है। इस कारण मैं आप अपनी इडा में रहने हुए गा गौरवन में में प्रातकाल में गर्भाधान की प्रार्थना करती हूं । anा थी, वहा पहुँच गये । शर्मिष्ठा ने एशन ययानि ने कहा-मैं तुम्हार गारम्बमार को अशी में पाम आय ए गजा की बार दम नाम जानना । तुम नाम भी रिसी प्रकार म .....anamamimawaamananer-renuntments csevanivieocusEver- ॥२॥ ई राजन् .

अभ्याय ८२ मदा मारत पृष्टं तु साध्ये प्रवदंतमन्यथा वदन्ति मिथ्या पतितं नरेन्द्र । एकार्थतायां तु समाहितायां मिथ्या वदन्तं त्वनृतं हिनस्ति ॥ १७ ॥ ययातिरुवाच राजा प्रमाणं भूतानां स नश्येत मृपा वदन् । अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥ १८ ॥ गर्मिप्ठोवाच-समावेतौ मतौ राजन्पतिः सख्याश्च यः पतिः । समं विवाहमित्याहुः सख्या मेऽसि वृतः पतिः ।। १९ ॥ ययातिरुवाच-दातव्यं याचमानेभ्य इति मे व्रतमाहितम् । स्वं च याचसि मां कामं ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ २० ॥ दशर्मिष्ठोवाच -अधर्मात्पाहि मां राजन्धर्म च प्रतिपादय । त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम् ॥ २१ ॥ त्रय एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुनः । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २२ ।। देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी । सा चाहं च त्वया राजन्भजनीये भजस्व माम् ॥ २३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु राजा स तथ्यमित्यभिजजिवान् । पूजयामास गर्मिष्टां धर्म व प्रत्यपादयतु ॥ २४ ॥ कम नहीं हो । देवयानी के विवाह के समय शुक्रा- गर्मिष्ठा ने कहा-हे राजन अपना और सी चार्य ने मुझसे कह दिया था कि, तुम शर्मिष्ठा को का पति एक ममान है । इस प्रकार एक का विवाह की अपनी शय्या पर न बुलाना । गर्मिष्ठा ने होने से उमी के माथ दूसरी का भी विवाह होना कहा-हे राजन् ! हमी में, सी विषय में, विवाह शावमिद्ध है । जर मेरी मम्मी देवयानी ने आपको काल में, प्राणों पर मंकट आ पड़ने में और मय पति बना लिया था, तब उसी ममय मैंने भी मन के नाश होते ममय झूठ बोलनेवाले को पाप में आपको पनि बना लिया था। ययाति ने 7/- नहीं होता। हे राजन ' साक्षी में, प्रश्नोत्तर में, गऊ, मैग यह व्रत है कि, मुझसे जो कोई मनुष्य जी घी, ब्राह्मणादि के लिय मिथ्या बालनवाला महा कुछ मागता है. म उसको वही देता है । गर्मिष्टा पातकि होता है । ययाति न कहा राजा प्रजा को न कहा-मैं चाहती हू कि, अधर्म में बनाकर शिक्षा देनेवाय होता है । मिथ्या कहनवारा गजा धर्म की रक्षा कीजिये । आपमे पुर पाकर म धर्म अवन्य नाग को प्राप्त होता है। इस कारम में का पालन कर मकगी। राजन ! बी, पुर और मंकट पड़ने पर भी झूठ न बोलूगा ॥१३॥१८॥ नौकर, इन तीनों का अपनी मम्मत्ति पर कुछ अधि- धन 1 महामार [ आदिपर्व । स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च । अन्योन्यं चाभिसंपूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम् ॥ २५ ॥ तस्मिन्समागमे सुभ्रः शर्मिष्ठा चारुहासिनी । लेभे गर्भ प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात् ॥ २६ ॥ प्रजज्ञे च ततः काले राजनराजीवलोचना । कुमारं देवगर्भाभं राजीवनिमलोचनम् ॥ २७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ययात्युपाख्याने द्न्यगीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥ कार नहीं रहता। वह सम्पत्ति उनके स्वामी की इस प्रकार शर्मिष्ठा को प्रसन्न करके राजा अपने ही होती है । हे राजन् ! देवयानी और मैं दोनों म्थान को गये । सुन्दर हास्ययुक्त, अच्छी भौंवाली आपके अधीन हैं, इस कारण आप मेरा मनोरथ शर्मिष्ठा ने राजाओं में श्रेष्ठ ययाति से गर्भ धारण पूरा करें। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! शर्मिष्ठा किया । इसके पीछे ठीक समय पर उस कमल के के ऐसा कहने पर उसके वचन को सत्य माना सदृश लोचनवाली शर्मिष्ठा ने देवताओं के तुल्य और उसका आदर करके धर्म का प्रतिपादन किया पुत्र उत्पन्न किया ॥२५॥२७॥ ॥१९॥२४॥ आदिपर्व का ययामीवां अध्याय समाप्त हुआ। अथ व्यशीतितमोऽध्याय ॥ ८३ ॥ वैभम्पायन लषाध-श्रुत्वा कुमारं जातं तु देवयानी शुचिस्मिता । चिन्तयामास दुःस्वार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत ॥ १ ॥ अभिगम्य च शर्मिष्ठां देवयान्यत्रवीदिदम् । देवयान्युषाच किमिदं वृजिनं सुभ्र कृतं वै कामलुब्धया ॥ २ ॥ मर्मिष्टायाध-प्रापिरभ्यागतः कश्चिद्धर्मात्मा वेदपारगः । म मया वग्दः कामं याचितो धर्मसंहितम् ॥ ३ ॥ नाहमन्यायतः काममाचगमि शुचिस्मिते । तम्मापर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥ । निगमाया अध्याय ८३ ।। वयन नं . गजा जनमेजय : में पनाह मा तुमने काम के यम में होकर माया पत्राने ! पर मुना देवयानी की यह क्या अधर्म क्या है : गर्मिष्ठा ने कहा भने हामाभा म शान देवयानी न गमिष्टा कार अधर्म नहीं किया। यह पुत्र मेरे एवं .

अध्याय ८.J म हा मारत देवयान्युवाच-शोभनं भीरु यद्येवमथ स ज्ञायते द्विजः । गोत्रनामाभिजनतो वेत्तुमिच्छामि तं द्विजम् ॥ ५ ॥ गर्मिष्टोवाच-तपसा तेजसा चैव दीप्यमानं यथा रविम् । तं दृष्ट्वा मम संप्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छचिस्मिते ॥ ६ ॥ देवयान्युवाच-यद्येतदेवं शर्मिष्टे न मन्युर्विद्यते मम । अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात् ॥ ७ ॥ पैशंपायन उवाच---अन्योन्यमेवमुक्त्वा तु संप्रहस्य च ते मिथः । जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यवजग्मुपी ॥ ८ ॥ ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः । यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरो ॥ ९ ॥ तस्मादेव तु राजर्षेः शर्मिष्टा वार्षपर्वणी । द्रुह्यं चानुं च पूलं च त्रीन्कुमारानजीजनत् ॥ १० ॥ ततः काले तु कस्मिंश्चिदेवयानी शुचिस्मिता । ययातिसहिता राजञ्जगाम रहितं वनम् ॥ ११ ॥ ददर्श च तदा तत्र कुमारान्देवरूपिणः । क्रीडमानान्सुविश्रब्धान्विस्मिता चेदमब्रवीत् ॥ १२ ॥ महात्मा वेद के जाननेवाले ऋपि से उत्पन्न हुआ कहा-शर्मिष्ठा की बात को मच जानकर देवयानी है। मैंने उससे धर्म की रीति से काम की याचना मुसकराकर अपने घर चली गई। इसके उपरान्त की थी। देवयानी ने कहा-हे मखी ! यदि तुम्हारी गजर्षि ययाति के वीर्य और देवयानी के गर्भ से चात सत्य है, तो तुमने अच्छा ही किया । परन्तु इन्द्र और उपेन्द्र के समान दो पुत्र यदु और तुर्वमु मैं उस ब्राह्मण का नाम, कुल और गोत्र जानना नाम के और वृषपर्वा री कन्या शर्मिष्ठा से दूध, अनु और पूर नाम के तीन पुत्र उत्पन्न हुए । कुछ शर्मिष्ठा ने कहा-उस ब्राह्मण का तप और ममय के व्यतीत होने पर देश्यानी अपन पनि तेज से मूर्य के समान प्रकाश था। उसको देखकर ययाति के साथ निर्जन वन को गई ॥६॥१०॥ में कुछ पूछ ही नहीं सकी । देवयानी ने कहा-हे वहा देवताओं के समान रूपवान् तीन कुमार गर्मिष्ठा : यदि ऐमी वात है, तो मुझे तुमपर कुछ खलने देखे । देवयानी ने अचरज मानकर गजा से मी क्रोध नहीं । तुमने किसी श्रेष्ठ बामण को अपना पूछा-यह तीनों कुमार किमक है। जो स्प और पान सो अच्छा ही दिया । वैशम्पायन ने तेज में आप ही समान दिखाई देते है। वाम्पायन । चाहती हू ॥१५॥ बनाया, [ आदिपध देवयान्युवाच-कस्यैते दारका राजन्देव पुत्रोपमाः शुभाः । वर्चसा रूपतश्चैव सदृशा में मतास्तव ॥ १३ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान्पर्यपृच्छत । देवयान्युवाच-किं नामधेयं वंशो वः पुत्रकाः कश्च वः पिता । प्रचूत मे यथातथ्यं श्रोतुमिच्छामि तं ह्यहम् ॥ १४ ॥ तेऽदर्शयन्प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम् । शर्मिष्ठां मातरं चैव तथाऽऽचख्युश्च दारकाः ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच- -इत्युक्त्वा सहितास्ते तु राजान्मुपचक्रमुः । नाभ्यनन्दत तान्गजा देवयान्यास्तदान्तिके ॥ १६ ॥ रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्वालकास्ततः । श्रुत्वा तु तेपां बालानां सबीड इव पार्थिवः ॥ १७ ॥ दृष्ट्वा तु तेषां चालानां प्रणय पार्थिवं प्रति । बुद्ध्वा च तत्वं सा देवी शर्मिष्ठामिदमत्रवीत् ॥ १८ ॥ देवयान्युपाच-मदीना सती कस्मादकार्विप्रियं मम । तमेवासुरधर्म स्वमास्थिता न विभषि मे ॥ १९ ॥ शर्मिष्ठावाच-यदुक्तमृपिरित्येव नत्सत्यं चारुहासिनि । न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न विभेमि ते ॥ २० ॥ यदा त्वया वृतो भी वृत एव तदा मया । मपीभर्ना हि धर्मेण भी भवति शोभने ॥ २१ ॥ ने कहा है जनमेजय ' देवयानी ने गजा मे यह नहीं क्यिा न उनका आदर किया । तीनों बालक पहार पारशे में पूछ। तुम्हारा क्या नाम है । और रोते हुए अपनी माता शर्मिष्ठा के पास गये । राजा तुमरमर वा में उत्पन हुए होठी टीम बनाना, देवयानी और धार्मिष्ठा से बहुत ही राजित हुए तुम्हारे पिता का नाम क्या है । नब उन पारकों देश्यानी गजा पर सड़कों की प्रीति देखकर सब बात नगरी मगजा की हिम्पाया और कहा गमिष्टा समझ गई और शामिष्ठा से कहा-तुमने मेरे अधीन हमार्गगता 1 वा मायन ने कहा कि, नहरे ने पा मुझमे निडर होकर मेरी हला के विपरीत ५६ पान र जापाम गये । म राजा ऐसा कार्य क्यों दिया । ॥११॥२०॥ ५५ देवयानी ६ मामने कुरा आनन्द प्रकाश शर्मिष्टा ने कहा-2 मधुहासिनी देवयानी' -- ४. अध्याय ८३ । महाभा- पूज्याऽसि मम मान्या च ज्येष्ठा च ब्राह्मणी ह्यसि । त्वत्तोऽपि मे पूज्यतमो राजर्षिः किं न वेत्थ तत् ॥ २२ ॥ वैशम्पायन उवाच-श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यत्रवीदिदम् । राजन्नाह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया ॥ २३ ॥ सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम । तूर्णं मकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४ ॥ अनुवबाज संभ्रान्तः पृष्ठतः सान्त्वयन्नृपः । न्यवर्तत न चैव म्म क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५॥ अविब्रुवन्ती किंचित्सा राजानं साश्रुलोचना । अचिरादेव संप्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६ ॥ सा तु दृष्ट्रेव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता । अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ ॥ देवयान्युषाच---अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् । शर्मिष्ठयाऽतिवृत्ताऽस्मि दुहित्रा वृपपर्वणः ॥ २८ ॥ त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञा तेन ययातिना । दुर्भगाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥ मैंने तुमसे ऋपि का नाम लिया था सो सत्य है । यहा नहीं रहगा । तुमने मेरे अप्रिय कार्य को इसमें तुमसे डरने का कोई कारण नहीं, क्योंकि मैंने क्यिा है । राजा यह देखकर कि, मुन्दरी देवयानी न्याय और धर्म के अनुसार यह काम किया है । रोती हुई शुक्राचार्य के पास चली। राजा मी जब तुमने राजा को अपना पति बनाया, तभी मैंने घबराकर विनयपूर्वक देवयानी को शात करने का भी अपने मन में उन्हें अपना पति माना था । हे उपाय करते हुए उसके पीछे पीछे चले । देवयानी सखी ! बुद्धिमानों का यह कहना है कि, सखी का की आखे क्रोध के मारे लाल हो रही थी। वह पति धर्म से पति के तुल्य होता है । तुम ब्राह्मण- किमी प्रकार से भी मान्न न हुई और नीघ्र अपन कन्या होने के कारण मुझमे श्रेष्ठ और पूजा तथा पिता शुक्राचार्य के पास पहुनी । पिना को प्रणाम मान पान की अधिकारिणी हो । क्या तुम यह करके सामने सड़ी हुई, वैसे ही राजा ययाति मी नहीं जानती कि, यह राजर्षि तुममे भी अधिक मेरे वहा पहुँचे । ययाति भी शुक्राचार्य को प्रणाम करके पूजनीय और माननीय हैं । देवयानी शर्मिष्टा की मामने खड़े हो गये ॥२१॥२७॥ यह बात सुनकर राजा मे बोली-मैं अब तुम्हारे देवयानी ने कहा- पिनानी : अधर्म में द Socio-can- +333333 । आदिप महाभारत ४-० AAAARAN . । धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह । अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत्कथयामि ते ॥ ३० ॥ शुक्र उवाच-धर्मज्ञः सन्महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् । तस्माजरा त्वामचिराद्धपयिष्यति दुर्जया ॥ ३१ ॥ ययातिरुवाच-ऋतुं वै याचमानाया भगवन्नान्यचेतसा । दुहितुर्दानवेन्द्रस्य धर्म्यमेतत्कृत मया ॥ ३२ ॥ ऋतुं वै याचमानाया न ददाति पुमानृतुम् । भ्रणहेत्युच्यते ब्रह्मन्स इह ब्रह्मवादिभिः ॥ ३३ ॥ अभिकामां त्रियं यश्चा गम्यां रहसि याचितः । नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते भ्रूणहेत्युच्यते बुधैः ॥ ३४ ॥ इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह । अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् ॥ ३५॥ शुक्र उवाच-नन्वह प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव । मिश्याचारस्य धर्मेपु चौर्य भवति नाहुप वैशम्पायन उवाच- -क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययाति हुपस्तदा । परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत ॥३७॥ ययानिम्याच-अतृप्तो योवनस्याहं योवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह । प्रसादं कुरु मे ब्रह्मअरेयं न विशेच्च माम् ॥ ३८ ॥ धर्म हार गया । नीचे दरनेवाला ऊंचे दरजे पर मतुम्नान करके धर्म की रक्षा के लिये मुझस हो गया है । देखिए, या राना धर्माना कियात प्रार्थना की थी। मैने धर्म कार्य जानकर ऐसा किया। है परन्तु इमने मर्यादा को नोरा नमिष्ठा में काम के यम में होकर कुछ नहीं किया है । माम रिया और उमा नान पुत्र मान हुए और वामन ' किमी कामिनी के मातम्नान कर चुक्ने रे मुझ अभागी कर दी है। पुत्र अभी तक हुए पश्चात धर्म की रक्षा के लिय प्रार्थना करने पर सो पुष्प है। तुम ने ययानि म कहा, मान धर्म मम्मा नहीं करता, उसको विद्वान् रोग बदा की जाने हुए भी मुमन अधर्म पियार, इगरिये हत्या का पापी बात है भार्गव ' इन्हीं कारणों नमा म प पटारा व्यामोगा । ययाति में अधर्म में टरकर मी शर्मिष्ठा की इच्छा पूर्ण ने कहा भगवा गनगना की पुर्पी ने की दा॥ ॥ ३६ ॥ पूर्व वयः - 1 अध्याय ४ महाभारत J: AA शुक्र उवाच नाह मृपा ब्रवीम्येतजरां प्राप्तोऽसि भूमिप । जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन्संक्रामय यदीच्छसि ॥ ३९ ॥ ययातिरुवाच-राज्यभाक्म भवेद्ब्रह्मन्पुण्यभावीर्तिभाक्तथा । यो मे दद्याद्वयः पुत्रस्तद्भवाननुमन्यताम् ॥ ४० ॥ • शुक्र उवाच-संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुपात्मज । मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि ॥ ४१ ॥ वयो दास्यति ते पुत्रो यः स-राजा भविष्यति । आयुष्मान्कीर्तिमांश्चैव वह्वपत्यस्तथैव च ॥ ४२ ॥ इति श्रीमन्महाभारत आदिपर्वणि मभवपर्वणि ययात्युपारयान यगीतितमाऽध्याय ॥ ८३ ॥ शुक्र ने कहा-राजा नहुष । तुम मेरे आधीन जिसे देकर उसकी यौवन अवस्था को ले सक्ते हो, इस कारण तुमने इस बारे में मुझसे आज्ञा ले हो । ययाति ने कहा--बहुत अच्छा, मैं अपने पुत्रों लेनी थी । धर्म विषय में असत्य व्यवहार करने से को ऐसा करने के लिये कहूगा । जो मेरा पुत्र मेरा चौरी के दोप के भागी बनना पडता है । वैशम्पायन वुढापा लेकर अपनी जवानी दे देगा, वही मेरे राज्य ने कहा-शुक्र के क्रोघयुक्त होकर शाप देने पर का अधिकारी होगा । वह पुण्य और कीति का ययाति उसी क्षण बूटे हो गये । तब उन्होंने शुक्रा भागी होगा । शुक्रजी ने कहा-हे नहुषपुत्र चार्य से कहा-हे भार्गव । मैं योवन अवस्था में देव मुझे याद करके तुम दूसरे के शरीर में अपना यानी से तृप्त नहीं हुआ है । इस कारण आप बुढापा पहुचा सकोगे और अपने शरीर में दूसरे ऐसा उपाय सोचें कि, जिससे यह वृद्धावस्था मुझको की जवानी ले सकोगे । ऐसा करने मे तुमको पाप व्याप्त न हो । शुक्र ने कहा-हे राजन् ' मेरा कहना न होगा । जो पुत्र तुमको अपनी अवस्था देगा कभी झूठा नहीं हो सकता । तुमको वुढापा तो वह आयुवान् , कीर्तिवान, राज्याधिकारी और आ ही गया है परन्तु तुम इस वुढापे को चाहे अनेक सन्तानयुक्त होगा ॥३६॥४२॥ आदिपर्व का तिरामीवा अध्याय ममाप्त हुआ ! - अथ चतुरशीतितमोऽध्याय ॥ ८४ ॥ वैशम्पायन उवाच-जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि । पुत्र ज्येष्टं वरिष्ट यदुमित्यत्रवीद्वचः ॥ १ ॥ ययातिरुवाच-जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगु. । काव्यस्योशनसःशापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने ॥ २ ॥ acci म हा मारत । आदिपर ... त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयानहम् ॥ ३ ॥ पूर्णे वर्षसहस्रे तु पुनस्ते यौवनं त्वहम् । दत्त्वा स्वं प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ ४ ॥ यदुरुवाच-जरायां वहवो दोषाः पानभोजनकारिताः । तस्माजरा न ते राजन्ग्रहीष्य इति मे मतिः ॥ ५ ॥ सितश्मश्रुनिरानन्दो जरया शिथिलीकृतः । वलीसंगतगात्रस्तु दुर्दों दुर्वलः कृशः ॥ ६ ॥ अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवनैः । सहोपजीविभिश्चैव तां जरां नाभिकामये ॥ ७ ॥ सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप । जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ तस्मादन्यं वृणीप्य वै ॥ ययातिकराच-यत्वं मे हृदयाज्जातो क्यः स्वं न प्रयच्छसि । तम्मादराज्यभाक्तात प्रजा तव भविष्यति ॥ ९ ॥ तुर्वसो प्रतिपद्यम्ब पाप्मानं जग्या सह । यौवनेन चरेय वै विषयांस्तव पुत्रकः ॥ १० ॥ ॥ चौगमीया अध्याय ११॥ वापरायन ने 1 जनमेजय गजा ययाति न वाया जाना है और न पिया जाता है । खाने बुढाप में अमित अपने नगर म जाकर अपने पड़ पीने पर मी वह भोजन पचता नहीं, जिससे अनेक और श्रेष्ठ पुत्र यदु मे बार। पुन ' शुक्राचार्य रोग मताते हैं । इस कारण में आपका वुढापारमा नाम में वृद्ध हो गया है। मेरे यार स्वत नही चाहता। वुढाप से बाल वत हो जाते है और देशी पर पिया पढ़ गई है। परन्तु म योवन आनन्द जाता रहता है, माम ढीला पड़ जाता है, अाया मे नृमना हुआ है । नुम अग्नी यावन मगर दुर्वर और असमर्थ हो जाता है, इष्ट मित्रों प्रया दे दी और मा चुना। नमन। और माथिया का साथ भी छूट जाता है । इस ॥ दन। वर्ष पनि होने पानुपाय योयन याण में पेमे बुढाप या रेना नहीं चाहता है नमी देव मानी टासाधा। रे गा ॥११॥ १ जा ' आप मुझमे भी अधिक प्योर पुत्र या गुनहरा मदने । मन वृदोष है। भार उनमे यापन कर अपना उहापादे दीजिये ने दो टालनना 11 ... ~ अन्याय ८४ महाभारत पूणे वर्षसहस्त्रे तु पुनस्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ ११ ॥ तुबसुरुवाच-न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम् । बलरूपान्तकरणी वुद्धिप्राणप्रणाशिनीम् ॥ १२ ॥ ययातिरुवाच-यत्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्मात्प्रजा समुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति ॥,१३ ॥ संकीर्णाचारधर्मपु प्रतिलोमचरेषु च । पिशिताशिपु चान्त्येषु मूढ राजा भविष्यसि ॥ १४ ॥ गुरुदारप्रसक्तपु तिर्यग्योनिगतेषु पशुधर्मेपु पापेषु म्लेच्छेषु त्वं भविष्यसि ॥ १५ ॥ वैदाम्पायन उवाच-एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः । शर्मिष्ठायाः सुतं द्रुह्युमिदं वचनमब्रवीत ॥ १६ ॥ ययाविरुवाच-दुरुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरुपविनाशिनीम् । जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं ददस्व च ॥ १७ ॥ पृणे वर्षसहस्रे तु पुनस्यामि यौवनम् । स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह ॥ १८ ॥ ययाति ने कहा-मेरे हृदय में उत्पन्न होकर मेरा कहना नहीं मानते हो, इसलिये तुम्हारी प्रजा भी तुम मुझे अपनी अवस्था नहीं देते, इससे तुम्हारी नष्ट हो जायगी । उनके आचार और धर्म बिगड़ सन्तान राजा नहीं होगी। फिर तुर्वसु से कहा-हे जायंगे । लामी, मासाहारी, नीच और गुरु-पत्नी से पुत्र ! मेरे बुढ़ापे को लेकर अपना यौवन मुझे दे आसक्त पक्षियों की भाति आचरनवाले पापी म्हच्छ दो । मैं तुम्हारे यौवन से विषय-भोग करूंगा । मैं तुम्हारी प्रजा होंगे । वैशम्पायन ने कहा हं गजन् ! एक हजार वर्ष पछि तुम्हारा यौवन तुमको लौटा ययाति ने अपने पुत्र तुर्वसु को ऐमा शाप देकर दूंगा । तुर्वसु ने उत्तर दिया कि, बुढापे में मनमाने शर्मिष्ठा के पुत्र द्रुतु मे कहा-टे द्रा ! जिार वर्ष मोग से हाथ धोना पड़ता है, बल और रूप नहीं के लिये रंग रूप को नाश करनेवाले इस बुढ़ाप को रहता, बुद्धि जाती रहती हैं, पाण नष्ट होने का तुम ले लो और अपना यावन मुझको दे दो। मय होता है, इसलिय में बुटापा लेना नहीं चाहता हजार वर्ष पूर्ण होने पर मैं तुम्हारा यौवन तुमको ॥९॥१२॥ देकर फिर अपना बुढ़ापा ले लंगा । दुधु ने ही ययाति ने कहा- हं तुर्वसु ! तुम मेरे पुत्र होकर बूढ मनुष्य दुर्वल शरीरवाल होकर घोड़े, रथ, हाथी, %3D महाभारत | आदिपर ४२४ . द्रद्युम्वाचन गजं न रथं नावं जीणों भुक्ते न च स्त्रियम् । वाक्सगश्चास्य भवति तां जरां नाभिकामये ॥ १९ ॥ ययाविरुवाच-यत्त्वं मे हृदयाजातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्माद् द्रुह्यो प्रियः कामो न ते संपत्स्यते क्वचित् ॥ २० ॥ यत्राश्वरथमुख्यानामश्वानां स्याद्गतं न च । हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च ॥ २१ ॥ वस्तानां च गवां चैव शिविकायास्तथैव च । उडुपप्लवसंतारो यत्र नित्यं भविष्यति । अराजा भोजशब्दं वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः ॥ २२ ॥ ययातिरुवाच-अनो स्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । एक वर्पसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते ॥ २३ ॥ अनुरुवाच-जीर्णः शिशुवदादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा । न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये ॥ २४ ॥ यमाविरुपाच-यत्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । जरादोपस्त्वया प्रोक्तस्तस्मात्त्वं प्रतिलप्स्यसे ॥ २५ ॥ प्रजाश्च यौवन प्राप्ता बिनशिष्यन्त्यनो तव । अग्निप्रस्कन्दनपरस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि ॥ २६ ॥ सी आदि को नहीं भोग सकते, इसरिय मैं वुढाप हे अनु । तुम पापसहित मेरा बुपा ले रो और में नहीं लगा ॥१३॥१०॥ एक हजार वर्ष पर्यन्त तुम्हारे यौवन मे विषय ययाति ने कहा है दूध ' तुमने मेरे पुत्र भागृगः । अनु ने कहा-ढा मनुष्य बच्चे की तरह होकर गुसकी अपनी अपम्या नहीं दी, उमरिय भूख नहीं मद मक्ता, सदा अपवित्र ही बना रहता तुम्हारी हया कभी पूरी न होगी । जहा घोड़, रथ, है और टीक समय पर अमिहोत्र आदि धर्म के हाथी, गजाओं के योग्य मार्ग, गा, गधे. परे कर्म भी नही कर माता । इस कारण मे या आदि नही आ मरने हैं, जहा बड़े पा और युद्धापा रेने के लिए तय्यार नहीं ॥२०॥२४॥ हार जाना भाना पहना, जहां गजा गद ययानि ने शोध में आकर कहा तुम मेरे हृदय नही जानना. तुम यसमरिन उम देश में उत्पन्न कर भी मेरा युद्धापा नहीं देना चाहते, दाग हो भन अनु नाम पुत्र | इसमे बुढापा न आने पर भी बुदापे सर दोप मै -deo अन्याय ८४ । म हा मारन ययातिरुवाच–पूरो त्वं मे प्रियः पुत्रस्त्वं वरीयान्भविष्यति । जरा वली च मां तात पलितानि च पर्यगुः ॥ २७ ॥ काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने । पूरा त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । कंचित्कालं चरेयं वै विषयान्वयसा तव ॥ २८ ॥ पूर्णे वर्पसहत्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम् । स्वं चैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह ॥ २९ ॥ वैशम्पायन उवाच- -एवमुक्तः प्रत्युवाच पुरुः पितरमञ्जसा । यथाऽऽत्थ मां महाराज तत्करिष्यामि ते वचः ॥ ३० ॥ प्रतिपस्यामि ते राजन्पाप्मानं जरया सह । गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान्यथेप्सितान् ॥ ३१ ॥ जरयाऽहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव । यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथाऽऽत्थ माम् ॥ ३२ ॥ ययातिवाच परो प्रीतोऽस्मि ते वत्स प्रीतश्चेदं ददामि ते । सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति ॥ ३३ ॥ एवमुक्त्वा ययातिस्तु स्मृत्वा काव्यं महातपाः । संक्रामयामास जरां नदा पगै महात्मनि ॥ ३५॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ययात्युपास्त्याने चतुरगीनितमोऽध्याय ॥ तुम्हारे शरीर में व्याप्त होंगे ! हे अनु ' तुम्हारी तुम्हारा योवन तुमको देकर अपना बुढ़ापा ले दगा । सन्तान भी जीवित न रहेगी । तुम श्रुनि और स्मृति इससे तुम मब भाईयों में श्रेष्ठ समझे जाओगे के अनुसार अग्निकार्य मे वर्जित होगे। फिर पूर २५/२९॥ से कहा-हे पूरु ! तुम मुझे बहुत प्यार हो ! शुक्रा वेगगयन ने कहा-ई जनमेजय ' पिता के चार्य के शाप से मुझको बुढ़ापा आ गया है । वचन सुनकर पूर ने कहा-ई महाराज में आपकी यावन अवम्या में अच्छी प्रकार तृप्त नहीं हुआ आजा का गरन करता है । मैं आपका बुढापा हु । है पूरु ! तुम मेरे पापमहित इम बढाप को लेने के लिए तय्यार हु ! आप मेरी यौवन अवस्था लो और में तुम्हारे यौवन से कुछ दिन तक लेकर मनमाना विषय-भोग करें। में आपकानुढापा विषय-भोग मगा ! हजार वर्ष के व्यतीत होने पर लेकर आपकी मानानुमार काम कमगा। ययानि - महामारत { आदिपर्व ने कहा -हे पूरु ! मैं तुमपर वहुत प्रसन्न हू । तुम्हारे राज्य में प्रजा अति प्रसन्न रहेगी । ययाति तुमको आशीर्वाद देता हूं कि, तुम्हारे सब मनोरथ ने यह कहकर शुक्र का स्मरण किया और अपना सिद्ध होंगे और तुम्हारा वंश पृथ्वी पर फैलेगा। बुढ़ापा पूरु को दे दिया ॥३०॥३४॥ आदिपर्व का चौरासीवां अध्याय समान हुआ ॥ : .. अथ पञ्चाशीतितमोऽध्याय ॥ ८५ ॥ पैशम्पायन उवाच -पौरवेणाथ वयसा ययातिनहुपात्मजः । प्रीतियुक्तो नृपश्रेष्ठश्चचार विषयान्प्रियान् ॥ १ ॥ यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् । धर्माविरुद्धं राजेन्द्र यथाऽर्हति स एव हि ॥ २ ॥ देवानतर्पयद्यज्ञैः श्राद्धस्तद्वत्पितॄनपि दीनाननुग्रहैरिटेंः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥ ३ ॥ अतिथीनन्नपानश्च विशश्च परिपालनेः । आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून्सन्निग्रहेण च ॥ ४ धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् । ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ ५ ॥ स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विपयगोचरः । अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥ ६ ॥ स संप्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः । कालं वर्पसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥ ७ ॥ पनामीया अध्याय ८५ ॥ याम्पायन ने कहा नहुपपुत्र ययाति पुरु और दया से शूद्रों को, अच्छी प्रकार तृप्त करता यापन । अपनी इच्छा के अनुसार पिय भागने था। उसने नांगे को दण्ड देकर अपने वश में गा। अपनी कामना और इमार के अनुकृत, क्यिा । यह माक्षात् इन्द्र की तरह धर्म से प्रजा यथायोग्य नापूर्वक गुम्न मांगोगा । वा यनी का पालन करते हुए पृथ्वी का राज्य करने लगा। में देवों को बाद में पितरों को, उदाना में दोनों मिड के ममान विकमयाला वह गजा विषय में गे, ना ग कसने में प्राह्मणों को, अप पान आमक्त होकर भी धर्मानुमा भनी प्रकार भोग आदि भनिधियों की, प्रजाशलन में श्यों भोगन रगा। वह अच्छी कामना की सागमा अध्याय ८१ महाभारत प्राप्य राजर्षिः परिसंख्याय कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् । यौवनं सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ८ ॥ विश्वाच्या सहितो रेमे व्यभ्राजन्नन्दने वने । अलकायां स कालं तु मेरुशृङ्ख तथोत्तरे ॥ ९ ॥ यदा स पश्यते कालं धर्मात्मा तं महीपतिः । मत्वा ततः कालं पूर पुत्रमुवाच ह ॥ १० ॥ यथाकाम यथोत्साह यथाकालमरिंदम । सविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव ॥ ११ ॥ न जातु कामः , कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्मेव कृष्णवर्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १२ ॥ यत्पृथिव्यां ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः । एकस्यापि न पर्याप्तं तस्मात्तृष्णां परित्यजेत् ॥ १३ ॥ या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत । योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ १४ ॥ पूर्ण वर्षसहस्र मे विषयासक्तचेतसः । तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ॥ १५ ॥ तस्मादेनामहं त्यक्त्वा ब्रह्मण्याधाय मानसम् । निन्द्रो निर्ममो भूत्वा चरिप्यामि मृगैः सह ॥ १६ ॥ पाकर हर्षित हुआ, परन्तु यह स्मरण करके कि, ' मैं तुम्हार यौवन से अमिरापा और यौवन अवस्था हनार वर्ष तक रहेगी, दुखित भी उत्साहपूर्वक विषय भाग चुका है । जैस आग में हुआ। वह वीर्यवान् कालज्ञ राजर्षि योबन पाकर घृत छोडने से और भी महक उठती है, इसी प्रकार हजार वर्ष तक विश्वाची अप्सरा के साथ कभी नन्दन विषय मांग से काम की निवृत्ति की नहीं होती। यन में, कभी अलकापुरी में और कभी मुमेरुपर्वत पृथ्वी में धन, धान्य, स्त्री, यह सब एक पुरुष के के सुन्दर शिखर पर विहार करता रहा । अनन्तर भाग जाने पर भी तृप्ति नहीं होती इमरिये मोग नव उम धर्मात्मा ने देसा कि, हजार वर्ष हो की तृष्णा को छोड़ देना ही टीम है । इम इच्छ गये, तर अपने प्यार पुत्र पूर को बुलाकर कहा को दुर्मति पुरुष नहीं त्याग सस्ते । बुढापा आगने ॥१.१०॥ से मी इच्छा का नाम नहीं होता । इस रोग का है पुत्र म हा भारत । आदिपर ARAN RRARRRRE पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम् । राज्यं चेदं गृहाण त्वं त्वं हि मे प्रियकृत्सुतः ॥ १७ ॥ पैशम्पायन पधाप- प्रतिपेदे जरा राजा ययाति हुषस्तदा । यौवनं प्रतिपेदे च पूरुः स्वं पुनरात्मनः ॥ १८ ॥ अभिषक्तुकामं नृपति पूरुं पुत्रं कनीयसम् । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन ॥ १९ ॥ कथं शुकस्य नप्तारं देवयान्याः सुतं प्रभो । ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरेः प्रयच्छसि ॥ २० ॥ यदुर्येष्ठस्तव सुतो जातस्तमनु जातस्तमनु तुर्वसुः । शर्मिष्टायाः सुतो द्रुह्युस्ततोऽनुः पुरुरेव च ॥ २१ ॥ कथं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयान्राज्यमर्हति । एवं संवोधयामस्त्वां धर्म त्वं प्रतिपालय ॥ २२ ॥ ययातिश्याय-ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः । ज्येष्टं प्रति यथा राज्यं न देयं मे कथंचन ॥ २३ ॥ मम ज्येप्टेन यदुना नियोगो नानुपालितः । प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥ २४ ॥ छोड़ने के मियाये और कोई उपाय नहीं है । विषय रडके यदु को छोड़कर आप सबसे छोटे भोग में मेरे हमार वर्ष व्यतीत हो गये परन्तु इच्छा क्यों राज्य दे रहे है ॥११॥२०॥ प्रवर होती नानी है । इसरिये मैं इसको छोड़कर चड़ों को छोड़कर सबसे घाटा रहका कैसे पग्नम में चित्त गाकर निर्द्वन्द्व वन में मृगा व राज्य का अधिकारी हो सकता है । आपने जो कार्य माय राहगा । है पूर ' तुम मेरे प्यार पुत्र हो । करना हो उमको धर्म के अनुमार करें। ययाति तुमपा प्रममा । तुम्हारा मगर । । यह ने कहा है ब्राणादि वर्गों के लोगो पड़े पुत्रों अपना पावन और राज्य र गावगम्पायन ने को साड़कर घाट को गज्य देने का कारण मुनो। म जनमेजय ' अप ययानि न पाको पानी में बड़ पुत्र यदु को राज्य नहीं दे सकता है, क्योंकि देकर अपना पुढापा र रिया । 111 ययाति न उगने मेरी आजा का पालन नहीं किया है । जो अब पुरर को गज्य देगा नारा नब ग्रायण पुत्र पिना से अनुवृत कार्य को नह। परता, अहमजा न आकाहाने सगी महा यह पुन हगने का अधिकारी की है। जो पुन शुभ नानी आप दवयाना के पुत्र पर माता पिता की आता अनुार बनयारा को । - । .AAPAN 169 ----- AAALON- अन्याय ८.1 महाभारत मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः । स पुत्रः पुत्रवद्यश्च वर्त्तते पितृमातृषु ॥ २५ ॥ यदुनाऽहमवज्ञानस्तथा तुर्वसुनाऽपि च । द्रुाना चानुना चैत्र मय्यवना कृता भृशम् ॥ २६ ॥ पूरुणा तु कृनं वाक्यं मानिनं च विशेषतः । कनीयान्मम दायादो धृता येन जग मम ॥ २७ ॥ मम कामः स च कृतः पूरुणा मित्ररूपिणा । शुक्रेण च वरो दत्तो काव्येनोशनसास्वयम् ॥ २८ ॥ पुत्रो यस्त्वाऽनुवर्त्तत म गजा पृथिवीपतिः । भवनोऽनुनयाम्येवं पूरे राज्येऽभिषिच्यताम् ॥ २ ॥ प्रकृतय ऊचु -यः पुत्रो गुणसंपन्नो मातापित्रोर्हितः सदा । सर्वमहति कल्याणं कनीयानपि सत्तमः ॥ ३० ॥ अर्हः पूरुरिदं राज्यं यः सुतः प्रियकृत्तव । बरदानन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम् ॥ ३१ ॥ वैशम्पायन रचाच-पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुपस्तदा । अभ्यपिञ्चत्ततः परं राज्ये स्वे सुतमात्मनः ॥ ३२ ॥ दत्त्वा व पूग्वे राज्यं वनवासाय दीक्षितः । पुरात्स निर्ययो राजा ब्राह्मणेस्तापसैः सह ॥ ३३ ॥ हितकारी और नम्र होता है वही मच्चा पुत्र कहलान आप सब से प्रार्थना करता इमि, पूरु का अधिकारी है २१॥२५॥ का ही राज्याभिषेक दिया जाये । यह सुनकर प्रजा यदु, तुर्वसु, अनु, दुह्य इन मब ने मेग अनादर ने कहा-हे महाराज ' जो पुत्र गुणवान और माता- किया, मेरा कहना नहीं माना बिल पूर ने ही मेरा पिना की आज्ञा का पालन करनेवाला होता है, वह कहना मानकर मेरे मान की रक्षा की। इस पूस छोटा होने पा भी सब मुसों और भगदयों का ने मेरा वुढ़ापा लेकर जवानी दी, दमनिय यह मेरी अधिकारी हो सकता है। आपके छोटे पुत्र पूर ने सम्पत्ति का मालिक है । शुक्राचार्य ने भी मुझसे आपका हित क्यिा है और शुक्रजी ने भी उसकी यह दा दिया था कि, तुम्हारा आना का पालन राज्य देने का वादान दिया है, तो आप निम्मंदेह करनेवाला पुत्र ही राज्य का अधिकारी होगा । इन उसको राज्य दीजिये । वैशम्पायन ने कहा- 1 आदिप महा मान aamanANORARY यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः स्मृताः । द्रुह्योः सुतास्तु वै भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः ॥ ३४ ॥ पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव । इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी ॥ ३५ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि ययात्युपाख्याने पश्चाशीतितमोऽध्याय ॥ ८५ ॥ जनमेजय ! पुरवासियों की इस बात को सुनकर उपरान्त यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, दुयु से राजा ने अपने छोटे पुत्र पूरु का राज्याभिषेक कराया। भोज और अनु से म्लेच्छ उत्पन्न हुए । राजा पूरु उसको राज्य देकर आप तपम्या करने के लिये से पौरववश चरा । आप इस वश में हजार वर्ष तपस्वी ब्राह्मणों के साथ वन को चले गये। इसके गज्य करने के लिये उत्पन्न हुए हो ॥२६॥३५।। आदिपर्व का पचामीवा अध्याय ममाप्त हुआ। अथ पशीतितमोऽध्याय ॥ ८६ ।। वैशम्पायन उवाच-एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सिनम् । राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः ॥ १ ॥ उपित्वा च वने वासं ब्राह्मणः शंसितव्रतः । फलमूलाशनो दान्तस्ततः स्वर्गमितो गतः ॥ २ ॥ स गतः स्वर्निवासं तं निवसन्मुदितः सुखी । कालेन नातिमहता पुनः शक्रेण पातितः ॥ ३ ॥ निपतन्प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम् । स्थित आसीदन्तरिक्ष स नदेति श्रुतं मया ॥ ४ ॥ तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतम राजा वसुमना साधमष्टकेन च वीर्यवान ॥ ५ ॥ ॥ छियामीना अध्याय ८६ ॥ वैशम्पायन ने कहा है जनमेजय ' नहुपपुत्र होकर म्वर्गगासी हुए । वर्ग में जाकर राजा ययाति राजा ययाति इस प्रकार प्यारे पुत्र को राज्य देकर पहुत काल तक वहा का सुख नहीं भोग सके । इन्द्र प्रमलतापूर्वर वानप्रस्थ आश्रम धारण कर मुनि हो ने गाम ही उनको स्वर्ग से गिरा दिया । जनमेजय ने गये । कन्द मर फार मादि का भोजन करके सर्शित कहा है भगवन् ' मैन मुना है कि, महाराज ययाति मन जिनन्द्रिय रहकर धोई काल में मृत्यु को प्राप्त । पृथ्वी पर नहीं गिरे, परन्तु वे आकाश में ही ठहर - अध्याय ८६] महा मारत anvrxYAAAARRARY वैशंपायन उवाच- - प्रतर्दनन शिबिना समेत्य किल संसदि । जनमेजय उवाच-कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्नो महीपतिः ॥ ६ ॥ सर्वमेतदशेपेण श्रोतुमिच्छामि तत्वतः । कथ्यमानं त्वया वित्र विप्रर्पिगणसन्निधो ॥ ७ ॥ देवराजसमो ह्यासीद्ययानिः पृथिवीपतिः । वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः ॥ ८ ॥ तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तमहात्मनः । बग्निं श्रोतुमिच्छामि दिवि चेह च सर्वशः ॥ ९ ॥ -हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम् । दिवि चेह व पुण्यार्थी सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ १० ॥ ययाति हुपो राजा पूरं पुत्रं कनीयमम् । गज्येऽभिपिच्य मुदितः प्रवत्राज वनं तदा ॥ ११ ॥ अन्त्येषु स विनिक्षिप्य पुत्रान्यदुपुरोगमान । फलमूलाशनो राजा बने स न्यबमच्चिरम् ॥ १२ ॥ शंसितात्मा जिनक्रोधस्तर्पयन्पितृदेवताः । अग्नीश्च विधिवज्जुह्वन्वानप्रस्थविधानतः ॥ १३ ॥ रहे । यह भी सुना है कि, वे फिर वसुमान, अष्टक, पापों को नाश करनेवाग राजा ययाति की सम्पूर्ण पतर्दन और गिवि के माय म्वर्गलोक को गये कया को कहता है । गजा ययाति यदु आदि पुत्रों ॥१५॥ को धर्म-प्रष्ट म्लेच्छ होने का शाप और छोटे पुत्र आप इम कथा को विस्तारपूर्वक इन ऋषियों पूरु को राज्य देकर वन को चले गये । वन में और ब्राधणों के मामन कहें कि, राजा ययाति फिर क्रोध को जीतकर, दाणप्रम्य किम प्रकार म्वर्ग में पहुँचे । वह राजा ययाति आश्रम की विधि के अनुसार पितरों और देवताओं कुरुवंश का बढ़ानेवाला, सत्य, कीर्तियुक्त, मूर्य के को सन्तुष्ट करते हुए राजा ययाति तपस्या करने ममान तेजवाला, देवराज के सदृश था । उसका लगे । वे वहा विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते थे। जो यश सारे संसार में फैला हुआ है। उम महात्मा कोई अभ्यागत-अतिथि आता था, उसका वन के की इस लोक और पग्लोक की सम्पूर्ण कथा मुनना फल-मूल और घृत आदि में वे सत्कार करते थे। चाहता हूं। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! म्वर्ग वे राजा ययाति कटे हुए खन में गिर हुए अन्न के में और इस लोक में पुश्य वटानेवाली और सब दानों को वीन लाकर अपने आप मूखकर गिरे हुए फल-मूल स्वाकर, ।

महाभारत 1 आदिपक : अतिथीन्पूजयामास वन्येन हविषा विभुः । शिलोग्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः ॥ १४ ॥ -' पूर्ण वर्षसहस्र च एवंवृत्तिरभून्नृपः । अभक्षः शरद स्त्रिंशदासीन्नियतवाड्मनाः ॥ १५ ॥ ततश्च वायुभक्षोऽभूत्संवत्सरमतन्द्रितः । तथा पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे स वत्सरम् ॥ १६ ॥ एकपादःस्थितश्वासीत्पण्मासाननिलाशनः पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्ग जगामावृत्य रोदसी ॥ १७ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपर्वणि ययात्युपाख्यान पड्शीतितमाऽध्याय ॥ ८६ ॥ फर उठा लाकर अपना निर्वाह करते थे। इस रहे । इसके पश्चात् एक वर्ष तक पञ्चामि तापकर प्रकार हजार वर्ष व्यतीत हो गये । फिर एकाग्र उन्होंने तप किया। अन्त में छ महीने वायु भक्षण चित्त होकर उन्होंने तीस वर्ष तक केवर जर पीकर कर एक पाव से खड़े रहकर, पुण्यात्मा नहुषपुत्र निर्वाह किया, फिर एक वर्ष तक केवल वायुभक्षी ययाति स्वर्ग को गये ॥६॥१७॥ आदिपर्व का छियासीवा अध्याय ममात हुआ। अथ माशीतितमोयाय ॥ ८७ । वैशम्पायन उवाच स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन्देववेश्मनि । पूजितस्त्रिदशै. साध्यैमरुद्भिर्वसुभिस्तथा ॥ १ ॥ देवलोक ब्रह्मलोकं मंचरन्पुण्यकृतशी । अवसत्पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः ॥ स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययाति शक्रमागमत् । कथान्ते तत्र शक्रेण स पृष्टः पृथिवीपतिः ॥ ३ ॥ । मनामीना अध्याय ७ ॥ वाम्पायन ने कहा है जनमनय हमने मना बहुत दिनों त+ म्पर्ग म रहे । एक दिन राजा 1. वर्ग में नान पर मय दवनाओं न गना ययाति इन्द्र क पास गय । इन्द्र ने पूछा ह राजन् । ययानि बार आदा किया। कभी देवनगर में २३ पूरु ने तुम्हारा बुढापा र लिया और अपना मरहम, यमुमण आदि देवनाओं के साथ रहते थे यापन तुमको दे दिया, नय पूरु को तुमने राज्य और भी ब्रहरीर में विचरते थे। इस तरह ये देकर क्या रहा था । ययाति ने कहा मैने स पूर अध्याय ८७) म हा भारत शुक्र उवाच-यदा स पृरुस्तव रूपेण राजञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ । तदा च राज्यं संप्रदायैव तस्मै स्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम् ॥ ४ ॥ ययातिरुवाच-गगायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव । मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्त्याधिपास्तव ॥ ५ ॥ अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्टस्तथा तितिक्षुरतितिक्षोविशिष्टः । अमानुपेभ्यो मानुपाश्च प्रधाना विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः ॥ ६ ॥ आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥ ७ ॥ नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत् । ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत न तां बदेदुपती पापलोक्याम् ॥ ८ ॥ अरुन्तुदं पुरुषं तीक्ष्णवाचं वाकण्टकवितुदन्तं मनुष्यान् । विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निवद्धां निक्रति वहन्तम् ॥ ९ ॥ सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात्सद्भिस्तथा पृष्टतो रक्षितः स्यात् । सदा सतामतिवादांस्तितिक्षेत्तता वृत्तं चाददीतायवृत्तः ॥ १० ॥ बाक्सायका बदनान्निप्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ॥ ११ ॥ यह कहा था कि, गंगा और यमुना के मध्य में जो हीन पुरुष हैं उनकी सहायता से शत्रु के जीतने जितने देश हैं वह सब तुम्होर अधिकार में रहेंगे। की इच्छा कमी न करना और ऐसी बात न कहना भारत-खण्ड के बीच में तुम्ही राजा हो । तुम्हारे जिससे मनुष्यों को दुःख पहुँचे । जो मनुष्य दुःख- माई प्रांतदेशों में राज्य करेंगे। इसके सिवाये मैंने दायी, कवी, तीक्ष्ण और कांटों के समान दुःस्व कहा कि, क्रोधी मे क्रोध करनेवाला, अक्षमावान् देनेवाली बात किसी को कहता है, उसका कर्मा से क्षमा करनेवाला, पशु-पक्षी आदि सब प्राणियों कल्याण नहीं होता है। तुमको चाहिये कि, सर्वदा मे मनुष्य और मूसों से विद्वान् सदैव श्रेष्ठ होता सत्पुरुषों की संगति में रहो और उनकी चाल पर है । इससे तुमको चाहिये कि, यदि कोई पुरुष चलो और जो उनके मुख से कोई मर्यादारहित - तुमको गाली मी दे, तुम उसको क्षमा करो । क्षमा वात निकल जाये तो उसको क्षमा करी । जो करने से क्रोधी का महार हो जाता है और उसके आदमी साधु होता है, वह मूर्ख के वाणरूपी वचनों पुण्य को क्षमावान् पाता है। दुखिया को कभी को सहकर उससे बदला लेने का विचार नहीं करता दुःख न देना, न कमी किमी से कठोर वचन कहना। है। मनुष्यों पर दया करना, दान देना और मीठे ..

। आदिपर्व महाभारत PAL च न हीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते । दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १२ ॥ तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुपं क्वचित् । पूज्यान्संपूजयेद्दद्यान्न याचेत्कदाचन ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि ययात्युपाख्याने मनशीतितमोऽध्याय || ८७ ॥ वचन बोलना, इनके समान तीनों लोकों में ईश्वर ' के योग्य हैं उनका पूजन करना चाहिये और दान की भक्ति नहीं है । इस कारण से तुमको चाहिये ' देना और कभी किसी से कुछ न मागना यह कि, कभी कठोर वचन न बोलो। जो मनुष्य पूजने तुम्हारा धर्म है ।।१।१३॥ आदिपर्व का सत्तासीवा अध्याय समाप्त हुआ । ॥ अथ अष्टशीतिनमोऽध्याय ॥ ८८ ॥ इन्द्र उवाच-सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन्गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि । नत्त्वां पृच्छामि नहुपस्य पुत्र केनासि तुल्यस्तपसा ययाते ॥ १ ॥ ययातिरुवाप-नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्पिषु । आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित्पश्यामि वासव ॥ इन्द्र उपाच-यदाऽवमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च अल्पीयसश्चाविदितप्रभावः । तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवेमे क्षीणे पुण्ये पतिताऽस्यद्य गजन् ॥ ३ ॥ ययातिरुवाच-सुर्पिगन्धर्वनरावमानात्मयं गता मे यदि शक लोकाः । इच्छाम्यहं सुरलोकाद्विहीनः सतां मध्ये पतितुं देवराज ॥ ४ ॥ ! अहामीवा अध्याय ८ ॥ इन्द्र ने कहा है राजन् ' जब तुमने सब और अधम सबका अपमान क्यिा, इसरिय तुम्हारा पव्यों को पूरा करके घर छोड़कर तपम्या की, पुण्य क्षीण होगया और स्वर्ग के भोगों का भी अन्त तुम अपनी तपस्या को किसकी नम्या के बराबर हो गया । आज तुम म्वर्ग से नीचे गिराये जाआगे। जानते हो यह मुन कर नहुपपुत्र ययाति ने ययाति ने कहा है इन्द्र । देवता, ऋषि गन्धर्व, १८ देवना, मनुष्य, गन्धय, महर्षि आदि म में मनुष्य आदि का अपमान करने से यदि मेरा पुण्य किमी पीनाम्या का अपनी तपस्या बराबर क्षीण हो गया है, तो मैं यहा से सजना के बीच नही जानना है । इन्द्र ने कहा है राजन ' तुमने 'म गिरना चाहता हू । इन्द्र ने कहा है राजन भी 1 मभाव बिना जान अपने से श्रेष्ठ, नुत्य तुम यहा में सजनों की मडरी में ही गिरोगे । वहा 1 अध्याय ८८1 महाभारत इन्द्र उवाच-सतां सकाशे पतिताऽसि राजश्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धाऽसि भूयः । एतद्विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं माऽवमंस्थाः सदृशःश्रेयसश्च ।। ५ ।। वशम्पायन उवाच-ततः प्रहायामरगजजुष्टान्पुण्याँल्लोकान्पनमानं ययातिम् । संप्रेक्ष्य राजर्पिवरोऽष्टकस्तमुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता ॥ ६ ॥ अष्टक उवाच -कस्त्वं युवा वामवतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाऽग्निः । पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारात्वाखेचराणां प्रवरो यथाऽर्कः ॥ ७॥ दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात्पतन्तं वैश्वानराकानिमप्रमेयम् । किं नु स्विदेतत्पततीति सर्वे विनर्कयन्तः परिमोहिताः न्मः ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम् । अभ्युद्वतास्त्वां वयमद्य सर्वे नत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः ॥ ९ ॥ न चापि त्वांधृष्णुमः प्रष्टुमग्रेन च त्वमस्मान्पृच्छसि ये वयं स्मः । तत्त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः ॥ १० ॥ भयं तु ने व्येतु विषादमोहाँ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव। त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहाऽपि शक्रः ॥ ११ ॥ सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सवामरराजकल्प । ते संगताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु मत्यु ॥ १२ ॥ तुम्हें फिर अच्छी गति और प्रतिष्ठा प्रप्त होगी समान मुन्दर, अग्नि और सूर्य के समान तेजी है ययाति ! नुमका अब धर्म का मर्म विदित हुआ तुमको सूर्य के गम्ने मे गिरत देन मद लोग मोहिन फिर कमी श्रेष्ट और बगबग्दालों का अपमान न हो यह कह रहे हैं कि, यह कोन गिर रहा करना ॥१.५ हम मव तुमका उपेन्द्र, इन्द्र और सूर्य के ममान वैशम्पायन ने कहा हे जनमेजय : राजा ययाति तेजवाला और देवमार्ग में ठहरे हुए देखकर तुम्हारे देवरात्र में शोभित पुग्यलोक को छेड़ गिर रहे थे गिरने का भरण जानना चाहते हैं । हे रूपवान् : कि, ऐसे समय में माधु और धर्मात्मा राजर्षि अष्टक पहिले हम तुम्मे कुछ पूछने का माहम नहीं कर ने उनको देखकर कहा-अपने तेज से अग्नि के मकै । तुमने मी हममें हमारे बारे में कुछ नहीं समान मनलित, इन्द्र के मदृश रूप और यौवन- पूछ । इमलिय हम तुममे पूछते हैं कि. नुन कोन वाला और आकाश में विचरने वालों में श्रेष्ठ, सूर्य हो ! किमक पुत्र हो । स्वर्गलोक में तुम क्यों आ के ममान नेघरूपी अँधियारे को हटाते हुम तुम रहे हो ' है इन्द्र के मदृश प्रभाववान : अब तुम्हें मौन आकाश से गिर रहे हो ! हे युवक ! इन्द के कुछ डर नहीं है । सेद और मोह में छेड़ दी। है - महाभारत । आदिपर्व -- AMANARARAGAR । प्रभुरग्निः प्रतपने , भूमिरावपने भूमिरावपने प्रभुः । प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतःप्रभुः ॥ १३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ययात्युपाख्याने अष्टाशीतितमोऽध्याय ॥ ८८ ।। साधुओं के पास ठहरने से बल का नाश करनेवाला सज्जनों के पास आ गये हो । जिस प्रकार अनि इन्द्र भी तुमको नहीं सता सकेगा। हे देव ! साधु ताप देता है और सूर्य अन्धेरे को दूर करता है, जन ही दुःख में पड़े हुए सज्जनों के लिये आश्रम इसी प्रकार साधुओं के पास आया हुआ अभ्यागत स्वरूप हैं । इस समय तुम अपने समान पुण्यात्मा भी समर्थवान् हो जाता है ॥८॥१३॥ आदिपर्व का अट्ठासीवा अध्याय ममाम हुआ !! अथ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८॥ यथातिरुवाच--अहं ययातिनहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सर्वभूतावमानात् । प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोकात्परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः ॥ १ ॥ अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भयस्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्ज । यो विद्यया तपसा जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ २ ॥ अष्टक उवाच-अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धः स वै राजन्नाभ्यधिकः कथ्यते च । यो विद्यया तपसा संप्रवृद्धः स एव पूज्यो भवति द्विजानाम् ॥ ३ ॥ ययातिण्याच-प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहुस्तद्वर्त्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम् । सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैतद्यथा चैपामनुकूलास्तथाऽऽसन् ॥ ४ ॥ अभूद्धनं में विपुलं गतं तद्विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि । एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्त्तते स विजानाति धीरः ॥ ५ ॥ ॥ नवामीवा अध्याय ८९ ॥ ययाति ने कहा में नहुष का पुत्र और पू हे राजा ययाति ! आप ने कहा कि, अवस्था में का पिता ययाति ह । सब प्राणियों का निरादर जो बड़ा है वह श्रेष्ठ है किन्तु जो विद्या और तप करने में मेरा पुण्य घट गया है । इसीम अब देवता, में बड़ा है वहीं द्विजों में सबसे अधिक पूज्य समझा सिद्ध और पापियों के लोक में भ्रष्ट होकर नीचे जाता है । आप अवस्था में ही नहीं, विद्या और गिर रहा है । में तुम मब से अवस्था में पड़ा है। तप में भी पड़े है । ययाति ने कहा कि, विधा भीम मैंने तुमको प्रणाम नहीं किया । जो विद्या, और तपम्या आदि कर्म के अहंकार को पण्डिती सपण्या अथवा अवस्था में पड़ा होता है, वह द्विज न नरक उपजानयाला पाप कहा है । यह अहकार वों में पूज्य ममझा जाना है । अष्टक ने कहा म्वतत्र जन में ही रहता है । साधु लोग उन स्वतंत्र ।

अध्याय ८९ । महाभारत महाधनो यो यजते सुयज्ञैर्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः । वेदानधीत्य तपसा योज्य देहं दिवं समायात्पुरुपो वीतमोहः ॥ ६ ॥ न जातु हृष्येन्महता धनेन वेदानधीयीतानहंकृतः स्यात् । नानाभावा बहवो जीवलोके देवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः । तत्तत्प्राप्य न विहन्येत धीरो दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मवुद्धथा ॥ ७ ॥ सुखं हि जन्तुर्यदि वाऽपि दुःखं दैवाधीनं विन्दने नात्मशक्त्या । तस्माद्दिष्टं वलवन्मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत्कथंचित ॥ ८ ॥ दुःखैन तप्येन्न सुखैः प्रहृष्येत्समेन न वर्तेत सदैव धीरः । दिष्टं बलीय इति मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत्कथंचित् ॥ ९ ॥ भये न मुह्याम्यप्टकाहं कदाचित्संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित् । धाता यथा मां विदधीत लोके ध्रुव तथाऽहं भवितेति मत्वा ॥ १० ॥ संस्वेदजा अण्डजा उद्भिदश्च सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः । तथाश्मानस्तृणकाष्टं च सर्वे दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति ॥ ११ ॥ अमाधुओं के समान अहकार के वश में नहीं होते। आर कोई अधर्मी होते है क्योंकि सबी जीव देव पहिले के लोग भी ऐसे थे और में ऐमा करने से के अधीन है । देव के विरुद्ध उनकी योग्यता और ही म्वर्ग से गिग हूँ। मैने पुण्यरूपी धन सञ्चय चेष्टा नष्ट हो जाती है । इसलिये देव को ही प्रबल किया था। इस समय अहकार से वह सब नष्ट जानकर अपने कर्म के फर म्वरूप मुख-दु स्व को हो गया । बहुत श्रम करने पर भी वह अब मुझ पाकर हर्ष शो में अपने को नष्ट न करना चाहिये। नहीं मिल सकता । जो मेरी ऐसी गति देखकर बहुत पुण्यरूपी धन इकट्टा करके भी प्रसन्न होना अपना हित माधन म प्रस्तुत होंगे, वही बुद्धिमान ठीक नहीं । अहकार को छोड़कर वेदा को पढना चाहिये । यत्न करने पर भी कोई अपनी इच्छा से जो मनुष्य धनपान होकर अन्नं यज्ञ करते सुन्वी या दु ग्वी नहीं हो सकना । इस कारण यदि है और मर विद्याजा को जानकर नियशील होते देव की प्रबलता है और सम्पूर्ण वेढा का पाठ करके तपस्या में को ही प्रथर मानकर न तो प्रसन्न ही होना चाहिये अपने शरीर को छांटने है, वही अन्त का माह आर न दुखी होना । देव को प्रवर मानकर एक रहित हो म्वर्ग को जाते है । वहुत पुण्यसञ्चय ही भाव मे रहना चाहिये । हे अष्टक ' विधाना ने करके भी संतुष्टचित्त न होना, वेदी को पढकर जो रिख दिया है वह कभी मिट नहीं मकता या भी अकार न करना, इम जीवीक में कोई धर्मात्मा | जानकर न मुझे डर है और न मेरे मन में इस । और धीर है ॥१॥५॥ मुम्ब या दुख आ पड़े तो दव AvataeN...-

। आदिपर्व
महाभारत
अनित्यतां सुखदुःखस्य बुध्वा कस्मात्संतापमप्टकाहं भजेयम् ।
किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये तस्मात्संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच-एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययातिमथाप्टकः पुनरेवान्वपृच्छत् ।
मातामहं सर्वगुणोपपन्नं तत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत् ॥ १३ ॥
अष्टक उवाच-ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधानास्त्वथा भुक्तायं च कालं यथावत् ।
तान्मे राजन्ब्रूहि सर्वान्यथावत्क्षेत्रज्ञवद्भापसे त्वं हि धर्मान् ॥१४॥
ययातिरुवाच-राजाऽहमासमिह सार्वभौमस्ततो लोकान्महतश्चाजयं वै ।
तत्रावसं वर्षसहस्रमानं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १५ ॥
ततः पुरी पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारा शतयोजनायताम् !
अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ॥ १६ ॥
ततो दिव्यमजरें प्राप्य लोकं प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।
तत्रावसं वर्षसहस्रमात्र ततो लोकं परमसम्यभ्युपेतः ॥ १७ ॥
स देवदेवस्य निवेशने च विहृत्य लोकानवसं यथेष्टम्
संपूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैस्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम् ॥ १८ ॥
तथावसनन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं
शतानाम् ।
सहाप्सरोभिर्विहरन्पुण्यगन्धान्पश्यन्नगान्पुष्पितांश्चारुरूपान्
गति से कुछ सन्ताप ही है ॥६॥१०॥
धर्म की कथा कह रहे हैं इसलिये आपने जितने
देखो सर्प, बिच्छू, सूर्य, मछली आदि जल अम्थल काल तक और जिस प्रकार जिन जिन प्रधान लोकों
के कीड़े, पत्थर, तृण, काष्ठादि, जितने स्वेदज, का भोग किया है वह सब मेरे आगे कहो ॥११॥१४॥
अण्डज, उद्भिज पदार्थ हैं सभी अत में अपनी
ययाति ने कहा- मै इस लोक में सार्वभौम
अपनी प्रकृति में लीन होते हैं । हे अटक ! सुख राजा था और सब को जय करके हज़ार वर्ष पर्यन्त
और दुस अनित्य है इसलिये मैं उनम क्यों तापित
यहा रहा । तत्पश्चात् परमलोक प्राप्तकरके हजार
गा । यह विचार कर कि, क्या कर आर क्या द्वारबाली सौ योजन फैली हुई सुन्दर इन्द्रपुरी में
काने मे सन्ताप जाता रहेगा, प्रवृत्त होकर सन्ताप बास किया। इसके पश्चात् उससे भी श्रेष्ठ, दिव्य,
छोड़ दिया। वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय । अजर लोकपति प्रजापति लोक को प्राप्तकर वहा भी
यहा टहरे हुए. सर्व गुणों से युक्त राजा ययाति के
सहस वर्ष तक वास किया। फिर उससे भी परमलोक
पेमा रहने पर भष्टक ने फिर म्वर्गवास की कथा
को पाकर देव देव के स्थान में विहारकर देवों से
पूड़ी। रामन ! भाप क्षेत्रन नारदादि के समान
पूजा हुआ देवताओं के समान प्रभाव और पुति-
:
॥ १९ ॥

अध्याय ९० महाभारत - तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं कालेऽतीते महनि ततोऽतिमात्रम् । दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो ध्वंसत्युच्चस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण ॥ २० ॥ एतावन्मे विदितं राजसिंह ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनाक्षीणपुण्यः । वाचोऽऔषं चान्तरिक्षे सुराणां सानुक्रोशः शोचतां मां नरेन्द्र ॥ २१ ।। अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसों पुण्यकृत्पुण्यकीर्तिः । तानबुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु ॥ २२ ॥ तैराख्याता भवतां यंनभूमिः समीक्ष्य चेमा त्वरितमुपागतोऽस्मि । हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमेधूमापाई प्रतिगृह्य प्रतीतः ॥ २३ ।। इति श्रीमन्महा मारते आदिपर्वगि मंभवपगि ययात्युपाख्यान फोननवतितमोऽधाय ॥ ८९ ।। वाला होकर मनमाने लोक में वास किया ॥१५॥१८॥ मुझे मुन पहीं । वे कह रहे थे-हा ' कैमे शोक अन्त में कामरूपी होकर दश लाख वर्ष नन्दन- की बात है कि, पुण्यकर्म करनेवाले पवित्र-कीर्ति वन में वामकर सुगन्धित फूलबाले मनोहर वृक्षों को राजा ययाति, पुण्य क्षीण होने मे, म्वर्ग मे भ्रष्ट देखता हुआ अप्सराओं के साथ विहार करन होकर गिर रहे है । मैंने गिरते हुए उनसे कहा- लगा। इस प्रकार मुख से बहुत समय म्वर्ग में आप लोग ऐमा उपाय करें कि, मैं माधु ममाज में व्यतीत हुआ। तत्पश्चात् उग्रम्हशी देव-दूत ने मुझमे जाकर गिम् । उन्होंने तुम्हारी यह यज्ञभूमी दिन्व- तीन बार च्युत ही यह शब्द कहा-हे राजमिह ! लाई । उमी के अनुमा हवि की गन्ध सूचकर और मैं इतना ही जानता हू । पुण्य श्रीण होने पर नन्दन अग्नि का धुआ देखकर मैं तुम्हारी इम यजमामि वन से जब मैं गिरा, तब मार्ग में अन्तरिक्ष में करुण में आ पहुँचा ह ॥१९॥२३॥ म्बर से मेरे लिये शोक कर रहे देवताओं की बातें आदिपर्व का नवामीवां अध्याय ममाप्त हुआ। अय नवतितमोऽध्याय ॥ ५० ॥ अपर उवाच-यदाऽवसो नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम् । किं कारणं कार्तयुगप्रधान हित्वा च वं वसुधामन्वपद्यः ॥ १ ॥ ययाविरवाच-जातिः सुहृत्स्वजनोवा यथह क्षीण वित्तेत्यज्यते मानवैर्हि । तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं त्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवमङ्घाः ॥ २ ॥ ॥ नवेवां अध्याय ९० ॥ अष्टक ने कहा-हे निप्पाप पुरषों में श्रेष्ठ वन में रहकर फिर किम कारण पृथ्वी पर आये, आप कामरूपी होकर दा राव वर्ष तक नन्दन सो हममे कहो । ययाति ने कहा-निम प्रकार इन - । MASS- { आदिपघ ४४० महामान .. अष्टक उपाय-तम्मिन्कथं क्षीणपुण्या भवन्ति संगुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम् । किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तद्वै बृहि क्षेत्रवित्त्वं मतो मे ॥ ३ ॥ ययातिरुवाच-इमं भौमं नरकं ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव सर्वे । ये कङ्कगोमायुवलाशनार्थे क्षीणा विवृद्धिं बहुधा व्रजन्ति ॥ ४ ॥ तस्मादेतद्वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म । आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि ॥ ५ ॥ अष्टक उथाच-यदातु तान्वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः। कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि ॥ ६ ॥ ययातिगघाच-ऊर्ध्व देहात्कर्मणा जृम्भमाणाव्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति । इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान् ॥ ७ ॥ पष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योन्नि तथा अशांति परिवत्सराण । तान्वै तुदन्ति पतत. प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदष्ट्राः ॥ ८ ॥ अटक 'वाच-यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः । कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति ॥ ९ ॥ लोक में म्वल्प आयु होने पर अपन जाति, मित्र पृ० पीनाथ । तुमने जो छि पूछा था सो मैने कह और म्बजनी को छोड़ना पड़ता है उसी प्रकार वहा दिया । अब तुम क्या सुनना चाहते हो । अष्टक ने मनुप्यों के पुण्य क्षीण होने पर ऐश्वर्यचन्त देवता कहा-जब मनुष्यों के शरीर को गिद्ध मयार आदि उनको त्याग देते है । अष्टक ने कहा कि, देवलोक ग्वा लेते हैं, तब उन्हें दूसरा शरीर से मिलता है। के रहनेवाले क्षीणपुण्य केसे हो जाते है । कान आप टस पृथ्वी को नरक क्यों कहते हैं ? भीम कर्म करके मनुष्य किम रोक में जाता है । इस नरक क्या है ॥१६॥ विषय में मुझे बड़ी का है । आप सब कुछ जानते ययाति ने कहा-मर जीप कर्मानुसार देर । यह मब मुझम कहिए । ययानि ने कहा डने के पीछ माता की कोख से जन्म लेकर और नदेव ' जो रोग अपनी प्रगमा अपने में उम स्थान म सम्पूर्ण अंगयुक्त देह की उत्पत्ति होने भग्न, वे क्षीणपुश्य होकर पृ. वीर नरक में पर पदा हाते है और पृत्नी में चरने फिरते है । गिरकर भोग की अभिन्नगपा मेघा नान दृमीमे इम पृ.पी को भामनरक कहा है । इस सभी मयार आदि नाना प्रकार व कष्टदाई गरीर प्रकार वा गिरने म उमकी अगम्या की वृद्धि नहीं धारण का है। नरेन्द्र । इस कारण दोपयुक्त होनी और अज्ञान के वश म होकर विषय भोग में भीर रोगनिदिन म त्याग देना चाहिये ।' वर्ष यतीत हो जाने है। कोई कोई जीव अपने है - मुख अध्याय ९० । महाभारत ययातिरुवाच-अस्त्रं रेतः पुष्पफलानुपृक्तमन्वेति तद्वै पुरुपेण सृष्टम् । स वे तस्या रज आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र ॥ १० ॥ वनस्पतीनोषधींश्चाविशन्ति अपो वायु पृथिवीं चान्तरिक्षम् । चतुष्पदं द्विपदं चाति सर्वमेवं भूता गर्भभूता भवन्ति ।। ११ ।। अप्टक उवाच-अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भमुताहोस्वित्स्वेन कायेन याति । आपद्यमानो नरयोनिमेतामाचक्ष्व मे सशयात्प्रत्रवीमि ॥ १२ ॥ शरीरभेदादिसमुच्छ्रयं च चक्षु श्रोत्रे लभते केन सज्ञाम् । एतत्तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः क्षेत्रज्ञ वा तात मन्याम सर्वे ॥ १३ ॥ ययातिरपाच-वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनिमृतौ रेतः पुप्परसानुपृक्तम् । स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम् ॥ १४ ॥ स जायमानो विगृहीतमात्रः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः । स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं स वै रूपं पश्यति चक्षुपा च ॥ १५ ॥ कर्मानुसार वर्ग के गिरने के पश्चात् साठ या अम्सी श्रोणित का म्वरूप पाकर गर्भ से दो पाये, चार पाये हजार वर्ष तक आकाश में रहकर कष्ट भोगते हैं। आदि का शरीर धारण करता है ॥७॥११॥ उन गिरनेवाले जीवों को बड़े बड़े दातवाले भयंकर अप्टक ने पूछा कि, जर नीव नर योनि को हाथी, मैंसे और पुरुषशरीरधारी भौम राक्षस लोग प्राप्त करता है तब अपने शरीर को लेकर माता की हिंसा करते हैं । अष्टक ने कहा तो रोग पाप के काल में घुमता है या कोई दूसरा भौतिक शरीर हेतु स्वर्ग से गिराये नाते हैं, वह भौम राक्षमों से | धाकर । जीवों में शरीर भेट क्यों होते है । उनको हिंसा किये जाकर कैसे बने रहते हैं। उनकी इन्द्रिया । आख, कान आदि मब इन्द्रियों और रूप. शब्द आदि से रहती हैं। वे गर्भ में नाकर कैमे जन्म आदि का ज्ञान कम होता है । कृपाकर मेरी इस देते हैं ? ययाति ने का कि, मूल्म मून मे घिरा गका का ममाधान कीनिय । हे पिता' आप मप हुआ जीन जलयुक्त गरार धरकर वीर्यरूप हो कुरा जानते है, इसलिये हममे टीम ठीक कहिए । जाता है और पुम्प मे गिराये नाकर म्री के श्रोणित ययानि ने कहा-मतुकार में एक प्रकार का यायु १ से मिलने पर फूल फर के समान रज बन जाता स्त्री के रस म. घन पर की तरह मिश्रित, पुरुप के है । ऐसा जिस स्त्री के पेट में गर्भम्वरूप उत्पन्न वीर्य को गागय के भीतर पहुंचाना है। प्राणी होता है जीव पहिले जल, वायु, आकाश और तेज । सूक्ष्मरूप से इसी प्रकार गर्भाशय के भीतर पहुँनाना पाच महामनों से मिलता है पिर बनम्पति और है। गर्भाशय में वही वायु प्रमश उस गर्भ की औषधि बन जाता है । इसके पश्च त् शुभ और । रहाता है। पहिरे ही से सूक्ष्म वामनानय शरीर , । 1 re- आदिपर्व मदा मारन - घाणेन गन्धं जिह्वयाऽथोरसंच त्वचा स्पर्श मनसावेद भावम् । इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनः प्राणभृतः शरीरे ॥ १६ ॥ अष्टक उयाच यः संस्थितः पुरुपो दह्यते वा निखन्यते वाऽपि निकृप्यते वा। अभावभूतः स विनाशमेत्य केनाऽत्मना चेतयते परस्तात् ॥ १७ ॥ ययातिरुवाच हित्वा सोऽसून्सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा । अन्यां योनि पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह ॥ १८ ॥ पुण्यां योनि पुण्यकृतो ब्रजन्ति पापां योनि पापकृतो व्रजन्ति । कीटाः पतगाश्च भवन्ति पापा न मे विवक्षाऽस्ति महानुभाव ॥ १९ ॥ चतुष्पदा द्विपदा पट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति । आख्यातमेतन्निखिलेन सर्व भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ॥ २० ॥ अष्टक उवाच-किंस्वित्कृत्वा लभते तात लोकान्मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया वा । तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथावच्छु भॉल्लोकान्येन गच्छेत्क्रमेण ॥ २१ ॥ ययातिरुवाच-तपश्च दानं च शमो दमश्च हीरार्जव सर्वभूतानुकम्पा स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तव महान्ति पुसाम् । नश्यन्ति मानेन तमोभिभूताः पुंसः मदेवेति वदन्ति सन्तः ॥ २२ ॥ को धारण किये हुए जीव गर्म में क्रमश अङ्ग- पहुँचे हुए अपने को किम तरह जानता है ? ययाति प्रत्या, इन्द्रिय और चेतन्य से युक्त होकर गर्भ से ने कहा हे राजमिह । यह जीव प्राण निकल जाने मादर निकलता है। मनुष्य योनि में उत्पन्न होते पर म्थूल शरीर को जब छोड़ता है, तब स्वप्न देख ही प्राणी जीवमना पाकर कानों में शब्द सुनता रहे पुरुष की तरह, अपने पुण्य या पाप को आगे है, आम्बा से रूप देखना है, नाक से गन्ध सूचना रखकर, आतावाहिक पवन के साथ, वासनामय है. निद्वा मे रम का म्वाद लेना है, त्वचा सम्पर्श सूक्ष्म शरीर के द्वारा दूसरी योनि में जाता है । का अनुभव करता है और मन म मब भाषा को पुण्यात्मा पुस्प श्रेष्ठ योनि में और पापी निकृष्ट योनि जानता है । अष्टक' जीप के शरीर में ये इन्द्रिया अर्थात कीड़े मकोडे आदि में जन्म देता है । हे इनर की दी है ॥१२॥१६॥ रानेन्द्र ' जिम प्रकार दो पाये, चार पाये और छ, अष्टक ने करा-मनुप्य जब मृत्यु को प्राप्त पाये प्राणी गर्भाशय में पहुँचकर पिर पृथ्वी पर होना, नर गेग उसके शरीर को नराम, गाड़ प्रगट होते है, सो सब मैंने तुमको सुना दिया । था या रिमी प्रकार में नष्ट कर देते हैं। इस अब क्या मुनना चाहते हो । अष्टक ने कहा-है मा नष्ट हो जाने पर जीव दिर दम गरीर में तात ! तप या और ज्ञान दोनों में किसके करने से ----- As.

अध्याय ९० महाभारत PAR अधीयमानः पण्डितं मन्यमानोयो विद्यया हन्ति यशः परेषाम् । तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद्ब्रह्म फलं ददाति ॥ २३ ॥ चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुन मानयज्ञः ॥ २४ ॥ न मानमान्यो मुदमाददीत न संतापं प्राप्नुयाचाधमानात् । संत. सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुवुद्धिं लभन्ते ॥ २५ ॥ इति दद्यामिति यज इत्यधीय व्रतम् । इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वानि सर्वशः ॥ २६ ॥ ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम् । तहः श्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्ति प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह ॥ २७ ।। इति श्रामन्महाभारत आदिपर्वणि मभवपर्वणि ययात्युपाख्याने नवतितमाऽध्याय ॥ ५० ॥ श्रेष्ठ लोक मिलता है । जिसके करने में श्रेष्ठ लोक परन्तु अभिमान के साथ वे मव कर्म अनुचितम्प मिलता हो, वह सब ठीक ठीक कनिए ॥१७॥२१॥ में क्येि जाकर भयदाई होत है । मनुष्य को चाहिये ययाति ने कहा-साधु पुरुषों का यह कहना कि, अधिक मम्मान मिलने पर प्रसन्न न हो और है कि, मनुष्य के जाने के लिये तपम्या, दान, शम अपमान होने पर दु खिन न हो । इस लोक में (गान्ति), दम (इन्द्रिय-सहित मन का दमन), लज्जा, साधु पुम्प ही माधुजनों का मम्मान करते है । सरलता और सब जीवों पर दया करना, ये ही असाधु पुरुषों की बुद्धि कमी माधुओं की ऐमी बर्गलोक के सात बड़े बड़े द्वार कहे हैं । जो रोग नहीं होती । अहकार से सबके आगे यह कहना तमोगुण के वश होकर अपने श्रेष्ठ होने का अहकार ही डर का कारण है कि, मैंने इतना दान दिया, करते हैं, उनके ये मातों गुण मिट्टा में मिल जाते इतने यज्ञ किये, इतने ग्राम्य पटे, इतने वन किये । हैं और इस प्रकार उनके रोक और परलोक विगढ़ इम कारण अपने मुस से अपने कामों की बड़ाई जाते है । जो मनुष्य पढकर अपने को पण्डित मान न करनी चाग्यि । विद्वान् साधुजन पुराणपुरप कर, अभिमान करके, अपनी विद्या के द्वारा औरों परब्रह्म को अपना आश्रय मानकर समाधिमम हो के यश को मिटाना चाहता है, उमको वर्गलोक अपने हृदय में उसी का ध्यान करते हैं । यही एक प्राप्त नहीं होगा। आप इस प्रकार उसकी वह विद्या उत्तम अक्षय मुम्ब का माधन है। ऐसा करनवारे सफर नहीं होती । वेद शास्त्र का पन्ना, मोननत, पुरुष इम रोक में शानि मे जीवन बिताकर परीक अमिहोत्र और यज्ञ, ये चारों में श्रेष्ठ रहे हैं। में मुक्ति पाते हैं ॥२२॥२०॥ आदिपर्व का नम्वेवा अध्याय समाम हुआ ! - । mo- ----- ४५५ मा मारत । आदिपय अथ एकनवतितमोऽध्याय ॥ ९१ ॥ अष्टक लवाच चरन्गृहस्थः कथमेति धर्मात्कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा । वानप्रस्थः सत्पथे संनिविष्टो बहून्यस्मिन्संप्रति वेदयति ॥ १ ॥ ययातिरबाच-आहृताध्यायी गुरुकर्मस्वचोद्यःपूर्वोत्थायी चरमं चोपशायी । मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी ॥ २ ॥ धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत दद्यात्सदेवातिथीन्भोजयेच्च । अनाददानश्च परैरदत्तं सैपा गृहस्थोपनिषत्पुराणी ॥ ३ ॥ स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो दाता परेभ्यो न परोपतापी । ताङ् मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां वसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः ॥ ४ ॥ अशिल्पजीवी गुणवांश्चैव नित्यं जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रयुक्तः । अनोकशायी लघुरल्पप्रचारश्चरन्देशानेकचरः स भिक्षुः ॥ ५ ॥ राव्या यया वाभिजिताश्च लोका भवंति कामाभिजिताः सुखाश्च । तामेव रात्रिं प्रयतत विद्वानरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा ॥ ६ ॥ ॥ इक्यानवा अध्याय ९१ ।। अष्ट ने कहा-गृहस्थी, सन्यामी, आचार्य अपनी जीविका चलाना, कभी पाप कर्म न करना, और वानमन्थ के कौन कौन से धर्म हैं, जिनके दूसरों को देना, किसी दूसरे को कष्ट न पहुँचाना, करने से मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति होती है। यह वन में रहना और अपने आहार तथा इन्द्रियों की मुनकर ययाति ने कहा- आचार्य अर्थात् ब्रह्मचारी चेष्टाओं को वश में रखना, ये छ कर्म वानप्रस्थ * ये धर्म है-गुरपुर में रहने के ममय गुर के गुनियों के हैं । उद्यम करके न खाना, गुणवान् बरत ही पढने के लिये जावे, गुर के काम में होना, जिनेन्द्रिय रहना, विरक्तभाव होना, गृहस्थ मदा तत्पर रहे, प्रान कार को गुरु के उठने मे में दूर रहना, देवालय आदि म्यानों में सोना और पार घटे, गुरु म पनि मोवे, जिनेन्द्रिय, धैर्ययुक्त, देशान्तरों में अग घूमना, ये सन्यासी के कर्म अतुन नपोरनवाल, माधान, बहुन पदोगामही ना उगापरय मिद होना है। प्राचीन उपनिषदों मनुष्य को उचित कि, जिस ममय यश ARIEN, धमाय धन मार यज्ञ प्रभृति पुण्य को मे मग श्रादि रोकी को पाने यो *ना, मदाकि अनुमार दान देना, अनिधियों अधिकार मारे और ममार के सुम भागकर की यादिना रम जी मरजाय, तो उसी समय वन में जाने का प्रयल दिय न २२१, गृहामी २ कम है। समका कोपमा पाने से उम मनुष्य की पहिरे की और रहे है ॥१५॥ माना अध्याय ९१ । महाभारत -Coa25A दशैव पूर्वान्दश चापरांश्च ज्ञातीनथात्मानमर्थकविंशम् । अरण्यवासी सुकृते दधाति विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून् ॥ ७ ॥ अष्टक उवाच-कतिस्विदेव मुनयः कति मौनानि चाप्युत । भवंतीति तदाचस्व श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ ८ ॥ ययातिरुवाच-अरण्ये बसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्टतः । ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याजनाधिप ॥ ९ ॥ अष्टक उवाच-कथंस्विद्वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्टतः । ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः ॥ १० ॥ ययातिरुवाच-न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत् । तथाऽस्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः ॥ ११ ॥ अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः । कौपीनाच्छादनं यावत्तावदिच्छेच्च चीवरम् ॥ १२ ॥ यावत्प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम् । तथाऽस्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्टतः ॥ १३ ॥ यस्तु कामान्परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः । आतिप्टेच्च मुनिर्मोनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात् ॥ १४ ॥ भागे की दस पीढ़ियां मुक्ति पाती हैं । अष्टक ने | पदार्थ अपनेआप से निकट आजाते हैं । यह विवेक मे कहा-मुनि कितने प्रकार के होते हैं? और मौनव्रत , सन्यासी गृहम्धवर्जित और परमहम होता है । कितने प्रकार के है ? यह हम सुनना चाहते है । वह मुनि थोड़े वत्र अपने पास रखता है और 'ययाति ने कहा-मुनि दो प्रकार के होते हैं-एक ' केवल प्राणों की रक्षा के लिये भोजन करता है। तो वह जो ग्राम को पीठ देकर वन में वास करते वन को पीट देकर ग्राम में बसनवाला मुनि वह है, हैं और दूसरे वह जो वन को पीठ देकर ग्राम में , जिसके पास वन के मब पदार्थ अपने आप में आजाते रहते है । अष्टक ने कहा कि, उन दोनों के क्या हैं । जो मनुष्य सब कर्म और कामना त्यागकर लक्षण हैं ! वन में रहनेवाला ग्राम को और ग्राम जितन्द्रिय होकर माननत धारण करता है, वह सिदि का वसनवाला वन को क्यों कर पीठ देता है ॥६॥१०॥ को प्राप्त होता है । जो नित्य शुद्धचित और ययाति ने कहा कि, ग्राम को पीठ देनवाला आकांक्षा से रहित होकर हिंसा को त्याग देता है, मुनि वह है, जो वन में रहता है और ग्राम की जो शुद्ध भोजन करता है, अहिंसा करनेवाले नमों को वस्तुओं को नहीं खाता है। उसके योगबल से सम्पूर्ण : काट डालता है, ऐसा मुनि सबका पूजनीय होता ।

अन्याय ९५] महा मारन . पापानां कर्मणां नित्यं विभृयाद्यस्तु मानवः । सुखमप्याचरन्नित्यं सोऽत्यन्तं सुखमेधते ॥ ४ ॥ तद्वै नृशंसं तदसत्यमाहुर्यः सेवते धर्ममनर्धबुद्धिः । अर्थोऽप्यनीशस्य तथैव राजस्तदार्जवं स समाधिस्तदार्थम् ॥ ५॥ अप्टक उवाच-केनासि हृतः प्रहितोऽसि राजन्युवा स्रग्बी दर्शनीयः सुवर्चाः। कुत आयातः कतरस्यां दिशि स्वमुताहोस्वित्पार्थिवं स्थानमस्ति ॥ ६ ॥ ययाविरुवाच-इमं भॊमं नरकं क्षीणपुण्यः प्रवेष्टमुर्वी गगनाद्विप्रहीणः । उक्त्वाऽहं वःप्रपतिष्याम्यनन्तरं त्वरन्ति मां लोकपा ब्रह्मणो ये ॥ ७ ॥ सतां सकाशे तु वृतः प्रपातस्ते संगता गुणवंतस्तु सर्वे । शकाच लब्धो हि वरो मयैप पतिष्यता भूमितलं नरेंद्र ॥ ८ ॥ अष्टक उवाच-पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव संति मेऽत्र । यद्यंतरिक्षे यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥९॥ ययाविरुवाच-यावत्पृथिव्यां विहितं गवाश्व महारण्यैः पशुभिः पार्वतैश्च । तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ॥१०॥ मादि देह के धर्म से यदि तपम्या के विपरीत पाप तेजस्वी देख पड़ते है । आपके गले में दिव्य फूलों हो जाये, तो वह थोडे काल में पूरी होनेवाली की मारा पड़ी हुई हैं । आप कहा से आये हैं। तपम्या करे । इससे वह उस पाप से छूटकर नफर क्सिने आप को भेना है । आप का म्यान कहा मनोरथ हो सकते हैं। जो ज्ञानी पुस्प अविनाशी ह' ययाति ने कहा-मै क्षीण पुण्य होने के कारण अझ का ध्यान करता है, वह सदा इच्छानुमार पाप | स्वर्ग से गिरकर मामनरक में जाने के निय करने से भी अति सुम्वरूप मुक्ति को पाता ह । पृथ्वी पर जा रहा हू | आप रोगा से जबतक बात हे राजन् ! मोक्ष की तराश न करके अनित्य म्वर्ग कर रहा हू, तबतक यहा टहरा हुआ है । इसके भोगने के लिये जो धर्म क्यिा जाता है उसको । पश्चात् पृथ्वी पर चरा जाऊगा । नीचे गिरने के पण्डिन रोग अजितद्रिय मनुष्य के धन के सदृश लिय लोपाल मुझे जल्दी करने को कह है। *प्टदाई और असत्य कहते हैं। निस निष्काम है नरद्र । गिरते समय मैंने इन्द्र से यह पर माग कर्म से मोक्ष की गति होती है, उसीको उचित लिया था कि, में साधु रोगों के मर्माप जाकर गिर । पथ और समाधि कहते हैं, जिसपर चलना योग्य अष्टक ने कहा-हे पृथ्वीनाय ! मुझको मागम होना है कि, आप धर्मपल के सब ग्थानों को जानने अटक ने कहा है रान्न् ' आप मनोहर हैं, इमरिये मैं पूटना हु कि, म्वरोक या नमन है ॥१५॥ - ४४६ मदा मारत धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलंकृतम् । असितं सितकर्माणं कस्तमर्हति नाचितुम् ॥ १५ ॥ तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः । सच लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ॥ १६ ॥ यदा भवति निन्दो मुनिर्मोन समास्थितः । अथ लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम् ॥ १७ ॥ आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः । अथास्य लोकः सर्वोऽयं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि उत्तरयायाते एकनवतितमोऽध्याय ॥ ९१ ॥ है । जो क्षमा, शील, तपस्या से दुबला और जिस- | में पहुँचा हुआ मुनि, पशुओं की तरह, मुख से ही का मांस, हड्डी और रक्त पतला हो गया है, आहार करता है-हाथ-पैर नहीं चलाता और रसके इस लोक और परलोक को जीतता है । जब मुनि स्वाद को न जानकर प्राणरक्षा के हेतु जो मिल मौनव्रत धारण किये हुए अद्वैतभाव के अवलम्बन जाय वही खा लेता है, ऐसी अवस्था होने से उसके से द्वन्द्व भावों से रहित होता है, तब वह इस लोक सामने सम्पूर्ण लोक अमृतस्वरूप होता है ।।११।१८॥ और परलोक को जीतता है । जब परमहंस अवस्था आदिपर्व का इक्यानवेवां अध्याय समान हुआ । । वह - अथ द्विनवतितमोऽध्याय ।। ५२ ।। अष्टक उवाच-कतरस्त्वनयोः पूर्वं देवानामेति सात्मताम् । उभयोर्धावतो राजन्सूर्याचन्द्रमसोरिव ॥ १ ॥ ययातिरुनाच-अनिकेतो गृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः । ग्राम एव वसन्भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः ॥ अप्राप्य दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृति चरेत् । तप्यते यदि तत्कृत्वा चरेत्सोऽन्यत्तपस्ततः ॥ ३ ॥ ॥ घानवेवां अध्याय ९२ ॥ अष्टक ने कहा कि, सूर्य और चन्द्रमा के । इन दोनों में से ज्ञानी मुनी संयत रहकर इच्छा- ममान इन योगी और नानी दोनों प्रकार के मुनि- नुमार गृहस्थों में रहकर भी पहिले देवताओं का यों में पीन पहिले मुक्ति पाता है ! ययाति ने कहा म्वरूप पा सकते है परन्तु योगि जनों से क्रोध द्वेष ४४७ अन्याय ९५ महा मारन morx पापानां कर्मणां नित्यं विभृयाद्यस्तु मानवः । सुखमप्याचरन्नित्यं सोऽत्यन्तं सुखमेधते ॥ ४ ॥ तद्वै नृशंसं तदसत्यमाहुर्यः सेवते धर्ममनर्धबुद्धिः । अर्थोऽप्यनीशस्य तथैव राजस्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम् ॥ ५ ॥ अष्टक उवाच-केनासि हुनः प्रहितोऽसि राजन्युवा त्रग्वी दर्शनीयः सुबर्चाः । कुत आयातः कतरस्यां दिशि त्वमुताहोस्वित्पार्थिवं स्थानमस्ति ॥ ६ ॥ ययाविश्वाच-इमं भोमं नरकं क्षीणपुण्यः प्रवेष्टुमुर्ती गगनाद्विप्रहीणः । उक्त्वाऽहं वःप्रपतिप्याम्यनन्तरं त्वरन्ति मां लोकपा ब्रह्मणो ये ॥ ७ ॥ सतां सकाशे तु वृतः प्रपातस्ते संगता गुणवंतस्तु सर्वे । शक्राञ्च लब्धो हि वरो मयैप पतिप्यता भूमितलं नरेंद्र ॥ ८ ॥ अप्टक उवाच-पृच्छामित्वां माप्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव संति मेऽत्र । ययंतरिक्ष यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रनं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ ९ ॥ ययातिरुवाच-यावत्पृथिव्यां विहितं गवाश्वं महारण्यैः पशुभिः पार्वतेश्च । तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वे तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह ॥१०॥ आदि देह के धर्म से यदि तपस्या के विपरीत पाप तेजवी देख पड़ने है । आपके गले में दिव्य पूनों हो जाये, तो वह थोडे काल में पूर्ण होनेवारी की मारा पही हुई है । आप वहा से आये है। तपम्या करे । इसमे वह उस पाप से हटकर नफर रिमने आप को भेजा है। आप का म्यान कहा मनोरय हो मक्ते हैं। जो ज्ञानी पुरुष अविनाशी है' ययानि ने क्या-में झोप-पुण्य होने के कारण ब्रह्म का ध्यान करता है, वह सदा इच्छानुसार पाप म्वर्ग से गिरकर मामनरक में जाने के लिये करने मे भी अति मुम्बस मुक्ति को पाता है । पृथ्वी पर जा रहा हू । भाप रोगों से जबतक वात है राजन् ! मोक्ष की तगमन करके अनित्य म्वर्ग कर रहा हू, तातक यहा टहरा हुआ है । इसके भोगने के लिये जो धर्म किया जाता है उसको पश्चात् पृथ्वी पर चरा जाल्पा । नीचे गिरने के पण्डिन रोग अजिनेन्द्रिय मनुष्य के धन के सदृश प्रिलोकपाल मुझे जल्दी करने को कहा है। कष्टदाई और असत्य कहते हैं। जिम निष्काम है नरेंद्र ! गिरते समय मैंने इन्द्र मे यह वर माग कर्म से मोक्ष की ति होती है, उमीको टचिन रिया या कि, म साधु रोगों के मनीष गर गिन्छ । पय और समाधि कहते हैं, बिमपर चलना योग्य । अष्टक ने कहा-हे पृथ्वीनाथ ! मुझको मारन होना है कि, आप घर के स्वपनों को जानने अष्टक ने कहा है राजन् ! आप मनोहर ! हैं, इमान्य में पूजा हू कि, म्वर्गीक वा नक्षत्र- ॥१॥५॥ -- | आदिपष महाभारत .. अप्टक उवाच-तांस्ते ददामिमा प्रपत प्रपातं ये मेलोका दिवि राजेंद्र संति । यद्यतरिक्षे यदि वा दिवि श्रितास्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ॥ ११ ॥ ययानिरुवाच नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य । यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्यस्तथाऽददं पूर्वमहं नरेन्द्र ॥ १२ ॥ नाब्राह्मणः कृपणो जातु जीवेद्यां चापि स्यादब्राह्मणी वीरपत्नी । . सोऽहं नैवाकृतपूर्व चरेयं विधिसमानः किमु तत्र साधु ॥ १३ ॥ प्रतर्दन उपाच-पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप प्रतर्दनोऽहं यदि मे संति लोकाः । यद्यन्तरिक्ष यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १४ ॥ ययातिरुवाच -संति लोका बहवस्ते नरेन्द्र अप्येकैकः सप्तसप्ताप्यहानि । मधुच्युतो घृनपृक्ता विशोकास्ते नान्तवंतः प्रतिपालयंति ॥ १५ ॥ प्रतर्दन भवाच-तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु । यद्यन्तरिक्ष यदि वा दिवि श्रितास्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ॥ १६ ॥ यथातिरुवाच -न तुल्यतेजाः सुकृतं कामयेत योगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन् । दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वांश्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा ॥ १७ ॥ रोक में मेरे पुण्य से भोगने योग्य कोई स्थान है | पुण्य को नहीं ले सकता है । तब उस साधुमण्डली या नहीं : ययाति ने कहा-हे नरेंद्र ! पृथ्वी पर | में से प्रतर्दन नाम के एक राजा ने कहा-मैं आपसे गाय-घोड़े आदि वन और पर्वत के जितने पशु है, पूछता है कि, वर्ग और आकाश में मेरे कितने उतने ही देवलोक में तुम्हारे पुण्य से पाये हुए , लोक है ? ययाति ने कहा-हे प्रतर्दन ! स्वर्ग में म्थान हैं । अष्टक ने कहा-हे राजेंद्र । यदि मेरु तुम्हारे बहुत से रोक है । वह सब सुख के देने- की पीठ पर वा नक्षत्रलोक में मेरे पुण्य से उपार्जन वाले, तेजयुक्त और शोक के दूर करनेवाले हैं । किये हुए म्यान हैं, तो यह सब मैं आपको देता भै एक एक में सात सात दिन भी रहकर उनका है। आप नीचे न गिरिए । आप महि-रहित होकर पार नहीं पासकता हू ॥६॥१५॥ उनके अधिकारी बनें। ययाति ने कहा-हे राजेन्द्र प्रतर्दन ने कहा-यदि नक्षत्रलोक या स्वर्गलोक बंद के जाननेवाले ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण ही दान ले म मेरे पुण्य से उपार्जन किये स्थान हैं, तो वह माने है। मेरे जैसे क्षत्रिय नहीं देते । मैने पहिले स्थ आपको देता है । आप न गिरें । आप मोह- विधि के अनुमार याचितम्प से ब्राह्मणों को दान रहित होकर शीघ्र वहा चढ़जावें । ययाति ने कहा- दिये हैं। मेरा धर्म दान लेना नहीं है यह केवल हे राजन् ! यराबर तेजवाला होकर कोई दूसरे राजा मामण का धर्म है। इससे में आप के दिये हुए । से पुण्य की प्रार्थना नहीं करता । ज्ञानी राजा दैव । । - अन्याय ९३ । महाभारम ४४. W-RArmom MAAmarne धर्म्य मार्ग यतमानो यशस्यं कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः । न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजानन्कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽऽध ॥ १८ ॥ कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यविधित्समानः किमु तत्र साधु । ब्रुवाणमेवं नृपति ययाति नृपोत्तमो वसुमानववीत्तम् ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि सभवपणि उत्तरयायाते द्विनवतितमोऽध्याय ॥ ९२ ।। के वशीभूत विश्त में पडकर भी विपरीत न्यवहार काम जानकर क्षत्रिय राजा कभी नहीं कर सकता। नहीं करते । इस कारण मैं किस प्रकार म्वीकार पहिले किसी राजा ने ऐसा नहीं किया है । ऐसे कर । राजा को धर्म की ओर दृष्टि रखकर धर्म- करके मै साधु नहीं कह सकता हू । राजा ययाति युक्त और यश के देनेवाला कार्य करना चाहिये । के इन वाक्यों को सुनकर वसुमान् नामक एक तुमने जो करने के लिये मुझमे कहा, उमे नीच राना ने कहा ॥१६॥१०॥ आदिपर्व का वानववा अध्याय समान हुआ। अथ निनवतितमोऽध्याय ॥ ९३ ।। वसुमानुवाच-पृच्छामि त्वां वसुमानौपदश्विर्यद्यस्ति लोको दिवि में नरेन्द्र । यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १ ॥ ययातिरुवाच--यद्यन्तरिक्षे पृथिवी दिशश्च यत्तेजसा तपने भानुमश्चि । लोकास्तावतो दिवि संस्थिता वै ते नान्तवंतः प्रतिपालयन्ति ॥ २ ॥ वसुमानुपाच-तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वैभवन्तु । कीणीप्तांस्तृणकेनापि राजन्प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन्प्रदुष्टः ॥ ३ ॥ ययातिरुवाच-न मिथ्याऽहं विक्रयं वै स्मरामि वृथागृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः । कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यैर्विधित्लमानः किमु तत्र साधु ॥ ४ ॥ ॥ तिरानया अध्याय ९३ ।। मुमान् ने कहा-हे राजन् ' आप मब कुछ ने कहा है रानन् । ये मप लोक मैं आपको देता जानते हैं, इसलिये आपमे पूछना हु कि, नक्षत्रलोक ह । आप इन म्यानों में मुख से रहें । यदि आप और स्वर्गलोक में मेरे पुण्य से उपार्जन किये हुए दान लेना स्वीकार नहीं करते, तो एक तृगमात्र हो कुछ स्थान हैं या नहीं। ययाति ने कहा कि, मूर्यदेव देकर इनको मोल ले लीजिये । ययाति ने कहा कि, आकाशमहल, पृथ्वी ओर दिशाओं में जिन में ऐसा झूठा लेन देन नहीं कर सकता ह, निमको जिन म्यानों को प्रकागित करते हैं, देवरोक में आजतक किमी ने नहीं किया है । यमुमान इतना अनन्त पुण्यलोक.तुम्हारे लिये है । वमुमान् बोला-हे राजन् ! यदि आपको मोल रैना म्बीशार - दिपक महा मारत वसुमानुवार-तांस्त्वं लोकान्प्रतिपद्यस्व राजन्मया दत्तान्यदि नेष्टः क्रयस्ते । अहं न तान्वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ॥ ५ ॥ शिविरुवाच-पृच्छामि त्वां शिविरौशीनरोऽहं ममापि लोका यदि सन्तीह तात् । यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥६॥ ययातिरुवाच-यत्त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्परीप्समानान्नावमंस्था नरेन्द्र । तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्ते विद्युदूपाः स्वनवंतो महांतः ॥७॥ शिविश्वाच-तांस्त्वं लोकान्प्रतिपद्यस्व राजन्मया दत्तान्यदि नेष्टः क्रयस्ते। न चाहं तान्प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वा यत्र गत्वा नानुशोचंति धीराः ।। ८ ॥ ययातिरुवाच-यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभावस्ते चाप्यनंता नरदेव लोकाः । तथाऽद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते तस्माच्छिवे नाभिनंदामि देयम् ॥ ९ ॥ अष्टक उवाच-न चेदेकैकशो राजलोकान्नः प्रतिनंदसि । सर्वे प्रदाय भवते गंतारो नरकं वयम् ॥ १० ॥ ययातिरपाच-यदोंऽहं तद्यतध्वं संतः सत्याभिनंदिनः । अहं तन्नाभिजानामि यत्कृतं न मया पुरा ॥ ११ ॥ न हो, तो भी मेरे दिये हुए सब पुण्यरोक ले रो। से पीछा छूट जाता है। ययाति ने कहा-हे राजन् । में उन रोकों में नहीं जाऊगा । तत्पश्चात् शिवि तुम इन्द्र के समान प्रभावशाली हो और राजा ने कहा-मैं उशीमर का पुत्र शिवि है । मैं | प्राप्त तुम्हारे लोक भी अनन्त हैं । हे शिवि ! मै आपको सर्वज्ञ समझकर पूछता ह कि, नक्षत्ररोक दूसरे के दिये हुए पुण्यलोक में नहीं जाऊगा । वा देवरोक में मेरे पुण्य से उपार्जन किये हुए कुछ इसीसे तुम्हारे दिये हुए दान को मैं स्वीकार नहीं है या नहीं। ॥१६॥ ययाति ने कहा-हे राजन् । तुमने कभी वाक्य इसके पश्चात् अष्टक ने कहा-हे राजा ययाति । और मन मे मागनेवारे साधु का अनादर नहीं हम मब ने अपने अपने पुण्यलोक आपको दान कर रिया, इमरिय देवरोष में विजरी के समान जग दिये । यदि आपको रेना स्वीकार न हो, तो हम सर समागष्ठ अनन्तरीक तुम्हा प्रतीक्षा कर रह पकर होकर अपन सारे रोक आपको देकर भीमनरक । शिवि ने रहा- राजा ययाति ' यदि आप में जाते हैं। ययाति ने कहा-हे सत्यप्रिय साधुओं की नापीकार नहीं करते, तो ये मय पुण्य म्यान मैंने जो पहिले कभी नहीं किया है. यह स्वीकार नही दान देता है। उन्हें देर पिर यापम नहीं कागा । अतएव में जिसके योग्य हैं, उसी रिय दगा। उन शानों में जाने में चार पुरषों का शोष | यम करो। अप्टक ने कहा-जिन पर घटकर मनुष्य पुण्य से म्थान कर सकता ॥७॥९॥ H Sevenda मध्याय ९३ । महाभारत अष्टक स्वाध-कस्यैते प्रतिदृश्यंते रथाः पञ्च हिरण्मयाः । यानारुह्य नरो लोकानभिवाञ्छति शाश्वतान् ॥ १२ ॥ ययाविरुषाच-युष्मानेते वहिप्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मयाः । उच्चैः सन्तः प्रकाशते ज्वलंतोऽग्निशिखा इव ॥ १३ ॥ अष्टक उवाच-आतिष्ठस्व रथानराजन्विक्रमस्व विहायसम् । वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ॥ १४ ॥ ययातिरुषाच-सर्वेरिदानी गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् । एप नो विरजः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच-तेऽधिरुह्य रथान्सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः । आक्रमन्तो दिवं भाभिधर्मेणावृत्य रोदसी ॥ १६ ॥ अष्टक उवाच-अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा । कम्मादेवं शिविरौशीनरोऽयमेकोऽत्यगात्सर्ववेगेन वाहान् ॥१७॥ ययातिरुवाच-अददद्देवयाना ययावद्वित्तमविन्दत । उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेटो हि वः शिविः ॥ १८ ।। दानं तपः सत्यमथाऽपि धर्मों हीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा । राजन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः शिवः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्धया ॥ १९ ॥ अक्षय लोगों को जाता है वे ये पाच स्वर्णमय प्रकाश इसके पश्चात् वे सब नरेश धर्म के प्रभाव से आकाश- मान् रथ क्सिके हैं ? ययाति ने कहा-जो आमि की मदल में रथों पर चढ़कर गये । अष्टक ने कहा-मैंने शिखा के सदृश चमक रहे, ये ऊच सोने के पाच सोचा था कि, महात्मा देवराज मेरे बड़े मित्र हैं, रथ तुम लोगों के लिये आये हैं । वे तुम लोगों को । इसलिये मैं ही सब से पहिले म्वर्ग में जाऊगा । किन्तु म्वर्ग में ले जायेंगे ॥१०॥१३॥ यहा उशीनर का पुत्र शिपि किस पुण्य के प्रभाव अष्टक ने कहा- हे राजन् । आप ही इन रथों से हम सब के आगे म्वर्गीक को जा रहा है। पर बैठकर आकाशमार्ग से स्वर्ग को जाइये । जय । ॥१४॥१७॥ समय आवेगा, तब हम लोग भी आपके पीछे ययाति ने कहा कि, इस उशीनर के पुत्र आगे । ययाति ने कहा-इसी क्षण हम सब निप्पाप शिवि ने म्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये सर्वम्ब दान और स्वर्ग के जीतनेवाले हुए हैं, इसलिये हमको | किया था, इसलिये यह तुमसे भी श्रेष्ठ है । है राजन् । साथ ही स्वर्ग को चलना पड़ेगा । वह देखो, स्वर्ग , दान, तपम्या, सत्य और धर्म का पालन, रज्जा, का शुद्ध मार्ग देख पड़ता है। वैशम्पायन ने कहा श्री, क्षमा, कुटिलता से रहित और श्रेष्ठ कामों में 1 1 । आदिपक्ष महा मारन वैशम्पायन उवाच-एवंवृत्तो हीनिपेवश्च यस्मात्तस्माच्छिविरत्यगाद्वै रथेन । अथाष्टकः पुनरेवान्वच्छन्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ॥ २० ॥ पृच्छामित्वांनृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कश्चाऽसि सुतश्च कस्य । कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता लोके त्वदन्यःक्षत्रियो ब्राह्मणो वा ॥ २१ ॥ ययातिकवाच-ययातिरस्मि नहुपस्य पुत्रः पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् । गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहोहं भवतां प्रकाशम् ॥ २२॥ सर्वामिमां पृथिवी निर्जिगाय प्रादामहं छादनं ब्राह्मणेभ्यः । मेध्यानश्वानेकशतान्सुरूपांस्तदा देवा पुण्यभाजो भवति ॥ २३ ॥ अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णामिमामाखिलां वाहनेन । गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यैस्तदाऽददं गाः शतमवुदानि ॥ २४ ॥ सत्येन मे द्योश्च वसुंधरा च तथैवाग्निज्वलते मानुषेषु । न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ॥ २५ ॥ यदष्टक प्रववीमीह सत्यं प्रतर्दनं चौपदश्विं तथैव 1 सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ॥ २६ ॥ अनुराग आदि सब गुण गिवि में हैं । मनुष्य बुद्धि नाना हू । मैने सव पृथ्वी को जीतकर राज्य किया से उनके नाम नहीं रिये जा सक्त । राजा गिवि मैने ब्राह्मणों को सब पृथ्वी का दान भी दिया है । इतना गुणशारी और रजा के भार से नम्र है कि, मैने देवताओं की प्रसनता के लिये एकसौ मुदर घोड़ों उमका रथ हम सबको छोड़कर वर्ग में पहुँच का महादान भी किया है । इन दानों के करने से गया । वैशम्पायन ने कहा-हमके पश्चात अटक पुण्यात्मा रोग देवतुल्य हो जाते हैं। मैंने वाहन, में कौनूहर युक्त इन्द्र महश अपने नाना ययाति से गौ, मोना, रस धन आदि से युक्त यह पृथ्वी और पछा-हे राजन् ' आर कौन है । किसके पुत्र है। मौ अरब गायें ब्रामणों को दान में दी थीं । मेरा का में आ गइममें मदेश नहीं कि, इस कहा कमी झूठ नहीं हुआ । मेरे सत्य से ही जगत में आपने जो कर्म क्यि, उन्हें मसार मर आकाशमण्डल और बने हैं। इसी सत्य के में आ मियाप और की ब्राण या क्षत्रिय प्रताप से हा अमिदय भूमदर में जरते है । इसी ही साधु रोग सत्य का आदर करते है ॥२२॥२५॥ ययानि नहा-म नदुप का पुन आर 1 मैं जो तुमसे कर रहा , यह fa प्रापयानि । मैं पृथ्वी में मारंभाम सब सत्य है । सप देव, गुनि आदि सत्य की निष्ठा गा या दो गुन या यह है कि मैं तुम्हारा मे ही पूननीय होते हैं। जो कोई शुद्धपित होकर 1 नाकामना ॥२१॥ दे अष्टम अध्याय ९१ ॥ माभारत यो नः स्वर्गजितः ,सर्वान्यथावृत्तं निवेदयेत् । अनसूयुर्द्विजाग्न्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् || २७ ।। वैशम्पायन उवाच-एवं राजा स महात्मा ह्यतीव स्पैदाहिनस्तारितो मित्रसाहः । त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा स्वर्ग गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि उत्तरयायातममानो विनवतितमोऽध्याय ॥ ९३ ।। ब्राह्मणों को हम पांचों के वर्गलाम का यह वृत्तात ने कहा-हे जनमेजय महाला राजा ययानि गनियों सुनावेगा,वह भी हमारे लोक को पहुँचेगा । वैशम्पायन से तारे हुए मित्रांसहित म्बर्ग को गये ॥२६॥२८॥ आदिपर्व का तिरानववा अध्याय ममाम हुआ । अथ चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९५ ॥ जनमेजय उवाच--भगवश्छ्रोतुमिच्छामि पुरोवंशकरान्नृपान् । यद्वीर्याच्यादृशांश्चापि यावतो यत्पराक्रमान् ॥ १ ॥ न मम्मिञ्च्छीलहीनो वा निर्वीयों वा नराधिपः । प्रजाविरहितो वाऽपि भूतपूर्वः कथंचन ॥ तेषां प्रथितवृत्तानां राज्ञां विज्ञानशालिनाम् । चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरण तपोधन ॥ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच-हंत ते कथयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि पूर्वोवंशधसन्वीराञ्च्छकप्रतिमतेजसः भूरिद्रविणविक्रान्तान्सर्वलक्षणपूजितान् प्रवीरेश्वररौद्राश्वात्रयः पुत्रा महारथाः । पुरोः पोष्टयामजायंत प्रवीरो बंशकृत्तनः ॥ ५ ॥ ॥ चांगनवा अध्याय ९४ ॥ उनमेजय ने कहा हे भगान ' पूनवमी राजाओं कहा-हे राजन् ! पूवश या वृत्तान्त जी आपन में जिमका जमा विक्रम और वीर्य श्री. बद्र बनना मुअसे पूछा. उम वग के इन्द्र के समान जम्बी चाहता है । इस वश में कोई गजा कमी दुचरित्र, वीरविक्रमी सर्व लक्षणों से युक्त अगनिन गडा हुए। चार्य वर्जिन अथवा प्रवाहित नहीं हुआ । हे उनका वृतान्त आरम कहना है, मुनिः । पर तपोधन : मैं उन राजाओं के जगत विम्यान चरित्र पाटिनानी ही में प्रवीर, ईश्वर और सेंद्राश्च नगन पिग्नापूर्वक सुनना चाहता ह । वैशम्पायन ने महाग्यी पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें में प्रदीर वाय .

आदिपक्ष महाभारत marwara प्रभुः । मनस्युरभवत्तस्माच्छ्रसेनीसुतः पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोता राजीवलोचनः ॥ ६ ॥ शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः । मनस्योरभवन्पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः ॥ ७ ॥ अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः । रोद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः ॥ यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावंतो बहुश्रुताः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसः सर्वे धर्मपरायणाः ॥ ९॥ ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान् । स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः ॥ १० ॥ तेजेयुर्वलवान्धीमान्सत्येयुश्चेन्द्रविक्रमः धर्मयुः संनतेयुश्च दशमो देवविक्रमः ॥ ११ ॥ अनाधृष्टिरभूत्तेपां विद्वान्भुवि विद्वान्भुवि तथैकराट् । ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः ॥ १२ ॥ अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद्राजसूयाश्वमेधकृत् मतिनार इति ख्यातो गजा परमधार्मिकः ॥ १३ ॥ मतिनारसुता राजश्चत्वारोऽमितविक्रमाः । नंसुमहानतिरथो Pाशाप्रतिमद्युतिः ॥ १४ ॥ और दासनी के गर्भ में मनम्यु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। कक्षेयु, वीर्यवान् कृकणेयु, स्थण्डिले यु, घनेयु और उमन मगद-पर्यन्नवी का शासन किया ॥१६॥ यशरान् जरेयु, तेजेयु, सत्ययु, इन्द्र के समान मनायु के वीर्य और मौकरी के गर्भ मे शन, विक्रमवार। धर्मेयु, और देवता के समान परामम महन्न और यामी, ये तीन पुत्र उत्सान हुए । वे याला सनतेयु, ये दश पुत्र उसन्न हुए Hamar ARAN : दाध के वार्य से देताओं में इन्द्र विक्रमी और विद्वान् हैं, ऐमें मरनी अध्याद गर्भ में अन्धग, भानु आदि ह। भूमण्डल में अद्वितीय राजा होकर अनावृष्टि पुत्रा ने जन्म रिया। ये सभी मर गानों में नाम से प्रसिद्ध हुए। राजसूय और अश्वोपयश (पुमा पारयो भनुपधारी, योगीर, प्रज्ञापार करनेदार परमधार्मिक प्रख्यात राजा मतिनार न भीर म भागेर जाननेवार हुए । उनम यात्रेय, मनापृष्टि से जन्म लिया । मतिनार में तमु, महान, .

मावाय ९४ ॥ महा मान AMART HONIONARY - रथन्तर्यां सुतान्पश्च तेषां तंसुमहावीर्यः पारवं वंशमुद्वहन् । आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुन्धराम् ॥ १५ ॥ ईलिनं तु सुतं तंसुजनयामास वीर्यवान् । सोऽपि कृत्नामिमां भूमि विजिग्ये जयतां वरः ॥ १६ ॥ पञ्चभूतोपमांस्ततः । ईलिनो जनयामास दुप्यन्तप्रभृतीन्नृपान् ॥ १७ ॥ दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च । तेषां श्रेष्टोभवद्राजा दुप्यन्तो जनमेजय ॥ १८ ॥ दुष्यन्ताद्भरतो जज्ञे विद्वाञ्च्छाकुन्नलो नृपः । तस्माद्भरतवंशस्य विप्रनस्थे महद्यशः ॥ १९ ॥ भरतस्तिसृषु स्त्रीपु नवपुत्रानजीजनत् । नाभ्यनन्दत ताराजा नानुरूपा ममेत्युत ॥ २० ॥ ततस्तान्मातरः क्रुद्धाः पुत्रान्निन्युर्यमक्षयम् । ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत् ॥ २१ ॥ ततो महद्भिः क्रतुभिगेजानो भग्नस्तदा । लेभे पुत्रं भरद्वाजाद्भुमन्यु नाम भारत ॥ २२ ॥ ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः । भुमन्युं भरतश्रेष्ट यौवराज्येऽभ्यपेचयत ॥ २३ ॥ अतिरथ और द्युतिवान् द्रुधु ये चार पुत्र उत्पन्न | प्रमु और वम थे । हे जनमेजय ! टनमें से श्रेष्ट हुए । ये मव बड़े विक्रमी ये ॥७॥१४॥ दुप्यन्त राजा हुए । दुप्यन्न मे गकुंनगा के गर्म उनमें तंसु अनि वीर्यवन्त और वंशघर थे । मे विद्वान मरत ने जन्म लिया। उनमे ही मरतवंश उन्होंने भूमण्डल को जीनकर वहा या पाया । का महान् या फैर गया . राजा मात के तीन वीर्यवन्त तंमु ने इलिन नामक पुत्र को जन्म दिया। रानियों में नौ पुत्रों ने जन्म लिया । वे राजा के जयचील इम नंम के पुत्र ने भी मपूर्ण घग्नीनल योग्य पुत्र नहीं हुए थे, उमरिय राजा टनपर को जीत लिया। इसके पश्चात् स्यन्नग के गर्भ असंतुष्ट थे ॥१५॥२०॥ और राजा इलिन के वीर्य में पंचमूनों के ममान यह देखकर पुत्रों की माताओं ने शोध के पाच पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम दुप्यन्न, यूर, मोम, वश में होकर अपने अपने पुत्रों को मारदाग। amam ।

महाभारत | आदिपर्व vartamaanwaceecrscrea राजसूयाश्वमेधाद्यैः .. च ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत्सुतः सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा ॥ २४ ॥ पुष्करिण्यामृचीकश्च । भुमन्योरभवन्सुताः ।। तेषां ज्येष्ठः सुहोवस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् ॥ २५ ॥ सोऽयजद्बहुभिर्मखैः । सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्ना बुभुजे सागराम्बराम् ॥ २६ ॥ पूर्णां हस्तिगजाश्चैश्च बहुरत्नसमाकुलाम । ममन्नेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता ॥ २७॥ हस्त्यश्वरथसंपूर्णा मनुष्यकलिला भृशम् । सुहोने राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः ॥ २८ ॥ चैत्ययूपाकिता चाऽसीमिः शतसहस्रशः । प्रवृद्धजनसस्या सर्वदेव व्यरोचत ॥ २९ ॥ ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात्पृथिवीपतेः । अजमीढं सुमीदं च पुरुमीदं च भारत ॥ ३० ॥ अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन्वंशः प्रतिष्ठितः । पट् पुत्रान्सोऽप्यजनयत्तिसृषु स्त्रीषु भारत ॥ ३१ ॥ इससे मनुप्यों में श्रेष्ठ राजा भरत के पुत्रों की उत्पत्ति कार में लाया । तब भूमण्डल, , हाथी, घोड़े, रथों व्यर्थ हुई । इसके पश्चात् राजा भरत ने महायज्ञ से पूरित और अगणित मनुष्यों से विकल होकर का अनुष्ठान करके भरद्वाज से भुमन्यु नाम पुत्र अति भार से पीड़ित होने के कारण इबने लगा पाया। हे भरतश्रेष्ठ । उस पारवनन्दन भरत ने ॥२१॥२७॥ अपने को पुत्रवान् जानकर उम भुमन्यु नामक पुत्र राजा सुहोत्र के धर्मानुसार प्रजा शासन करने को यौवराज्य पर अभिषिक्त किया । इसके पश्चात् से सारी पृथ्वी हजारों स्थानों में देवालय और यज्ञ भुमन्यु के वीर्य और पुष्करणी के गर्भ मे सुहौत्र, के यूपों में विचित्र हुई । हे भारत ! राजा सुहोत्र के महोना, मोहवि , मुयजु, ऋनीक और दिविरथ, ये पेक्षाकी स्त्री मे अजमीढ़, सुमीढ़, पुरुमीद, ये तीन मर पुत्र उन्न हुए । इनमें मुहोत्र सबसे बड़े थे । पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें से अजमीट ज्येष्ठ पुत्र मारण उन्हान राज्य पाया। वह गजम्य उनसे ही वंश प्रतिष्ठिन हुआ। हे भारत ! अजमीढ़ आज और अश्वमेध आदि यज्ञ करके हाधी और ने तीन रानियों से : पुत्र उत्पन्न किये । उनमें पाड़ी में भी मारा गया ममुद्र-पर्यन्त अपने अधि• धूमिनि के गर्भ से प्रस, नीली के गर्भ में दुप्यन्त, ध ।

अभ्याय ९४ । महाभारत ४-3 - ऋक्षं धूमिन्यथा नीली नीली दुप्यन्तपरमेष्टिनों केशिन्यजनयजन्हुँ सुतो जनरूपिणों ॥ ३२॥ तथेमे सर्वपञ्चाला दुप्यन्तपरमेष्टिनोः । अन्वयाः कुशिका राजाहोरमिततेजसः ॥ ३३ ॥ जनरूपिणयोज्येष्टमृक्षमाहुर्जनाधिपम् ऋक्षासंवरणो जजे राजन्वशकरः सुतः ॥ ३४ ॥ आः संवरणे राजन्प्रशासति वसुंधराम् । संक्षयः सुमहानासीत्प्रजानामिति नः श्रुतम् ॥ ३५ ॥ व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा । क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्टया व्याधिभिश्च समाहतम् ॥ ३६ ॥ अभ्यन्नन्भारतांश्चैव सपत्नानां वलानि च ! चालयन्वसुधां चमा बलेन चतुहिणा ॥ ३७ ।। अभ्ययात्तं च पाञ्चाल्यो विजित्य तग्मा महीम् । अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेजयत ॥ ३८ ॥ ततः सदारः सामात्यः सुपुत्रः सरहजनः । राजा संवरणस्तस्मात्पलायत महाभयात ॥ ३९ ॥ सिन्धोनदस्य महतो निकुञ्ज न्यवसत्तदा । नदीविषयपर्यंते पर्वतस्य समीपतः ॥ १० ॥ और परमेष्ठी और केमिनी के गर्भ मे जन्हु, नजन प्रजा नष्ट होने लगी । दुधा, मृत्यु, अनावृष्टि और और रूपिण, ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए । दुप्यन्त न्याधि आदि नाना कारणों में प्रजा रेप होने पर और परमष्टी के वश से ये मय पाचाल राजा उत्पन्न राज्य एक बार हा नष्ट हो गया । अत्रुपक्ष की सेना हुए । तेजम्वी जन्दु के वश मे कुशिक उत्तन्न हुए। मारत की आग्वार योद्धाओं को मारने और घायर राजा कक्ष, वजन और पिण से बहे थे। ऋत करने रगी। पाचार के राजा विक्रम से मनन्दन मे राजवा बटानेवारा मवरण नाम पुत्र उत्पन्न को जीतकर चतुरहिणी सेना मे वी को हिराते हुआ ॥२८॥३४॥ हुए. राजा मवरण के समीर आ पहुंचे और युदस्य। दे हम सुनते हैं कि. जब मास के में दश महिनी मैना मे गडा मदग्न को परा. पुत्र सवरण ने पृथ्वी पर राज्य क्यिा, तर बहुत जय किया । तब वह बहुत मय सामसी, पुत्र, राजन् । acco-22sss- आदिपष महाभारत तत्रावसन्बहून्कालान्भारता दुर्गमाश्रिताः । तेषां निवसतां तत्र सहस्त्रं परिवत्सरान् ॥ ४१ ॥ अथाभ्यगच्छद्भरतान्वसिष्ठो भगवानृषिः । तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ॥ ४२ ॥ अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा । निवेद्य सर्वमृपये सत्कारेण सुवर्चसे ॥ ४३ ॥ तमासने चोपविष्टं राजा ववे स्वयं तदा । पुरोहितो भवान्नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि ॥ ४४ ॥ ओमित्यवं वसिष्ठोऽपि भारतान्प्रत्यपद्यत । अथाभ्यषिञ्चत्साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम् ॥ ४५ ॥ विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नःश्रुतम् । भारताध्युषितं पूर्व सोऽध्यतिष्ठत्पुरोत्तमम् ॥ ४६ ॥ पुनर्वलिभृतश्चैव चके सर्वमहीक्षितः । ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महावलः ॥ ४७ ॥ आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः । ततः संवरणात्सौरी तपती सुषुवे कुरुम् ॥ ४८ ॥ राजत्वे नं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वत्रिरे । तस्य नाम्नाभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलम् ॥ ४९ ॥ मन्त्री और मित्रोंसहित भागकर मिंधुनदी के किनारे पर राजा ने अपनेआप उनका सत्कार करके सम्पूर्ण मे पर्वत तक फैली हुई एक फुलवाडी में टिका वृत्तान्त कह सुनाया। उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि, आप हमारे पुरोहित होवें । इसके पश्चात भारतगण उस जाने के अयोग्य वन में बहुत हम राज्य पान का यन कर सकते है । वसिष्ठजी ने दिन नक वसन रहे। धीर धीरे उनको मौ वर्ष भारतों का कहना म्वीकार किया और सम्पूर्ण व्यनीनही गये । अनन्तर एक ममय भगवान ऋषि भूमण्टल की चोटी के ममान श्रेष्ठ पौरव सवरण को वसिष्ठ उनके यहा आ पहुँचे । मारत रोगों ने उनको क्षत्रियों के अधिपतिरूपी राज्य पर स्थापित किया । आया हुआ देखकर विधिपूर्वक प्रणाम का अर्घ राजा सवरण भरत के पहिले बसाये हुए सुन्दर दिया । उस यजम्बी पापि के आसन पर बैठने नगर में आकर मत्र राजाओं से कर देने लगा। रहा ।।३५/४०॥ - अध्याय १४) मदा मारन १०० Acaderation कुतक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः । अश्ववंतमभिप्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम् ॥ ५० ॥ जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्यानुशुश्रुम् । पञ्चैतान्बाहिनी पुत्रान्व्यजायत मनस्विनी ॥ ५१ ॥ अविक्षितः परिक्षित्तुः शवलाश्वस्तु वीर्यवान् । आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः ॥ ५२ ॥ उच्चैःश्रवा भङ्गाकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः । एतेपामत्वबाये तु स्यातास्ते कर्मजैर्गुणः ॥ ५३॥ जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः । परीक्षितोऽभवन्पुत्राः सर्व धर्मार्थकोविदाः ॥ ५४ ।। कक्षसेनोग्रसेनों तु चित्रसेनश्च वीर्यवान् । इन्द्रसेनः सुपेणश्च भीमसेनश्च नामतः ॥ २५॥ जनमेजयस्य ननया भुवि ख्याता महाबलाः । धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्वाहीक एव च ॥ ५६ ॥ निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली । कुण्डोदरः पदातिश्च वसानिश्चाष्टमः स्मृतः ॥ ५७ ॥ सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहितेरताः । धृतराष्ट्रोऽथ राजाऽऽसीत्तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः ॥ ५८ ॥ अवमीद का पुत्र महापरी मंचरण कि पृथ्वी में सित, अभियंत, चत्रग्य. मुनि और प्रन्यात जन- पार बहुत दक्षिगायुक्त यन्न करने लगा । अनन्तर जय. ये पाच पुत्र उत्पन्न हुए । नविक्षित से परीक्षित सूर्यपुत्रा तपनी ने राजाओं में भ्रष्ट मंव में कुछ नय, वीर्यवन्त आदिगन. विराज, महाददी मा. नामक पुत्र उत्सन्न क्यिा ॥४॥४८॥ स्मरी, उच्च प्रवा,मगार और जितारी. यह आठ पुत्र हे गजन ! मारी प्रजा ने कुरु को धन देव उत्पन्न हुए । इनके वंग में कर्म के हेतु गुण में कर अपना राजा बनाया। महान् कुरु की तरन्या प्रधान जनदय आदि मान और दुमेर अनेक कुम्बाल नामक म्यान पवित्र और उनके निज महारथियों ने उन्न गिया । जनमेजय. समन, अनुसार कुरक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ। उग्रमेन, वीर्यवन्त चित्रमेन, इन्द्रमंन पर औग्मी- वाहिनी नामदार्ग उनकी मनन्दिनी रानी में अवि- ममेन, ये सब पुत्र पर मन से उत्पन्न हुए ॥४१॥५५॥ नाम - । आदिपष महा मारत WomchanRRRRRRANARPRARARAMAN AAAA - हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः । हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ॥ ५९॥ धृतराष्ट्रसुतानांतुत्रीनेतान्प्रथितान्भुवि प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत । प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ॥ ६ ॥ प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ । देवापिः शान्तनुश्चैव वाह्लीकश्च महारथः ॥ ६१ ॥ देवापिश्च प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया । शान्तनुश्च महीं लेभे बाहीकश्च महारथः ॥ ६२ ॥ भरतस्यान्वये जाताः सत्त्ववन्तो नराधिपाः । देवपिकल्पा नृपते' वहयो राजसत्तमाः ॥६३ ॥ एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा महारथाः । जाता मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ॥ ६४ ॥ इति भीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि पूवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्याय ॥ ९४॥ ये सब बड़े वीर और धर्मात्मा थे। जनम जय से और अद्वितीय हैं । हे भरतश्रेष्ठ ! देवापि, शान्तनु महारलवान् पृथ्वी में प्रग्न्यात, धर्मार्थयुक्त, सब और याहाक, ये तीन पुत्र प्रतीप से उत्पन्न हुए पाणियों का हित चाहनेवाले आठ पुत्र उत्पन्न हुए। ॥५६॥६॥ उनमें सबसे बड़ा धृतराष्ट्र फिर पाण्टु, बाहीक, इनमें से देवापि ने धर्म की इच्छा से वनवास निषध, बलवान् जाम्बुनद, कुण्डोदर, पदाति और किया और महारथी शान्तनु और बाहीक पृथ्वी के घमाति हुए । इनमें धृतराष्ट्र राजा हुआ । कुण्डिक, राजा हुए । हे राजन् ! देवर्षि सदृश सत्ययुक्त बहुत हम्नी, वितक, काथ, कुण्डिन, हवि श्रवा, इन्द्राम से राजाओं ने भरतवंश में जन्म लिया । ऐसे देवर्षि और जम्बी भुमन्यु. ये नाराष्ट्र के पुत्र हैं। हे सब प्रापि सत्यवान् बहुत स महारथियों ने ऐलवश भारत : प्रताप, धर्मप्र और मुनेत्र, ये तीन प्रसिद्ध की वृद्धि करके मनु वश में जन्म लिया था।॥६२।६५|| गजमार पुनराष्ट्र के योग है। इनमें प्रतीप प्राठ्यात भारिप वा घोगनया अध्याय ममान हुआ । अथ पनवतितमोऽध्याय ।। ५५ ।। kiमय साथ - श्रुनम्वत्तो मया ब्राह्मन्पूर्वेषां मभवो महान । उदाराश्चापि यंशेऽस्मिन्गजानो मे परिश्रुताः ॥ १ ॥ । AAP --- अध्याय ९५) महाभारत ४६. - लाई लाली LARRY किं तु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति । प्रीणात्यतो भवान्भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ॥ २ ॥ एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः । तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ॥ ३ ॥ सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेपां यशः स्फीतमवस्थितम् ॥ १ ॥ गुणप्रभाववीर्योजः सत्त्वोत्साहवतामहम् । न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसंमिताम् ॥ ५ ॥ वैशम्पायन उवाच-शृणु राजन्पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्तम् । प्रोच्यमानं मया कृत्स्नं म्बवंशजननं शुभम् ॥ ६ ॥ दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान्विवस्तो मनुमनोरिलाईलायाः पुरूरवाः । पुरूरवस आयुरायुषो नहुपो नहुपाद्ययातिर्ययाते₹ भार्ये वभूवतुः ॥ ७ ॥ उशनसो दुहिता देवयानी वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्टा नाम अत्रानुवंश- श्लोको भवति ॥ ८ ॥ यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत । द्रुह्यं चानुं च पूरुंच शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९॥ तत्र यदोर्यादवाः पुरोः पौरवाः ॥१०॥ पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम यस्त्रीन- ॥ पंचानवेवां अध्याय ९५ ॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मन् ! आपसे पूर्व स बढा हुआ यश तीनों लोकों में आजतक फैला पुरुषों का वृत्तान्त सुनकर भरतवंश के राजाओं का : हुआ है । उनकी अमृत-सदृश कथा सक्षेप से सुन- उदार चरित्र विदित हुआः किन्तु यह परमप्रिय कर मेरा मन तृप्त नहीं होता है ||५|| उपाख्यान सक्षेप से कहा गया है । इस कारण वैशम्पायन ने कहा--हे राजन् ! मैंने त्यासजी अभी तृप्ति नहीं हुई । इमलिये इसे .कृपा करके के मुख से आपके शुभ वश का वृतान्त जिस प्रकार आप फिर विस्तृतरूप से कहें । प्रजापति मनु से सुना है, उसी प्रकार कहता हू, मुनिए । दक्ष से लेकर सब पवित्र राजाओं के जन्म-वृत्तान्त की अदिति, अदिति से विनम्वान् , विवम्बान से मनु, पचित्र कथा सुनने में किस आनन्द न होगा ! वे मनु से इला, इटा मे पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, दानशीलता आदि गुण, असाधारण शक्ति, शारी- आयु से नहुष और नहुष से ययाति ने जन्म लिया। रिक वल, मानसिक सामर्थ्य, अदीनता और उत्साह ययाति की दो स्त्रियां थी। एक शुक्र की कन्या “युक्त थे । उनके अच्छे कर्म, गुण और महात्मय देवयानी, दूसरी वृषपर्वा की कन्या शर्मिष्ठा । देवयानी । . ४.र

महा मारत
| आदिपर्व
MAAAAMRRARRARA
RAPAAAPNN
हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः ।
हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ॥ ५९॥
धृतराष्ट्रसुतानांतुत्रीनेतान्प्रथितान्भुवि
प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत ।
प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ॥ ६ ॥
प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ ।
देवापिः शान्तनुश्चैव वाह्रीकश्च महारथः ॥ ६१ ॥
देवापिश्च प्रववाज
तेषां धर्महितेप्सया ।
शान्तनुश्च महीं लेभे वाहीकश्च महारथः ॥ ६२ ॥
भरतस्यान्वये जाताः सत्त्ववन्तो नराधिपाः ।
देवर्पिकल्पा नृपते' वहवो राजसत्तमाः ॥ ६३ ॥
एवंविधाश्चाप्यपरे देवकल्पा
महारथाः ।
जाता
मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ॥ ६४ ॥
इति भीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि पूमवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्याय ॥ ९४ ॥
ये सब बड़े वीर और धर्मात्मा थे। जनमेजय से और अद्वितीय हैं । हे भरतश्रेष्ठ ! देवापि, शान्तनु
महायलवान् पृथ्वी में प्रख्यात, धर्मार्थयुक्त, सय और बाहीक, ये तीन पुत्र प्रतीप से उत्पन्न हुए
प्राणियों का हित चाहनेवाल आठ पुत्र उत्पन्न हुए। ॥५६॥६॥
टनमें सबसे बड़ा धृतराष्ट्र फिर पाण्डु, वाहीक, इनमें से देवापि ने धर्म की इच्छा से वनवास
निपध, बलवान् जाम्बुनद्र, कुण्डोदर, पदाति और किया और महारथी शान्तनु और वाहीक पृथ्वी के
वमानि हुए । इनमें धृतराष्ट्र राजा हुआ । कुण्डिक, राजा हुए । हे राजन् ! देवर्षि सदृश सत्ययुक्त बहुत
हम्नी, विन, साथ, कुण्डिन, हवि श्रवा, इन्द्राम से राजाओं ने भरतवंश में जन्म लिया । ऐसे देवर्षि
और तेजबी मुमन्यु. ये पृतराष्ट्र के पुत्र है । हे
सय ऋषि सत्यवान् बहुत से महारथियों ने ऐलवश
भारत ' प्रताप, धर्मनत्र और मुनेत्र, ये तीन प्रसिद्ध की यदि करके मनु वंश में जन्म लिया था ।।६२।६५।।
गमगार पुनराष्ट्र के पात्र हैं। इनमें प्रतीप प्रख्यात
बारिपर्व का पोगनवेयां अध्याय ममान हुआ ।
अध पक्षनवतिनमाऽध्याय ॥ ५५ ॥
समय मा -श्रुतम्त्वनो मया ब्रह्मन्पूर्वेषां मंभवो महान ।
उदागथापि वंशेऽस्मिनराजानो मे परिश्रुताः ॥ १ ॥

महामारत मादिप awrnNKA देवकल्पा हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः । हविःश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः ॥ ५९॥ धृतराष्ट्रसुतानांतुीनेतान्प्रथितान्भुवि प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत । प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि ॥ ६० ॥ प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ । देवापिः शान्तनुश्चैव वाहीकश्च महारथः ॥ ६१ ॥ देवापिश्च प्रवत्राज तेपां धर्महितेप्सया । शान्तनुश्च महीं लेभे बाह्रीकश्च महारथः ॥ ६२ ॥ भरतस्यान्वये जाताः सत्ववन्तो नराधिपाः । देवर्पिकल्पा नृपते बहवो राजसत्तमाः ॥६३ ॥ एवंविधाश्चाप्यपरे महारथाः । जाता मनोरन्ववाये ऐलवंशविवर्धनाः ॥ ६४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मभवपर्वणि पूरवशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्याय ॥ ९४ ॥ ये सब बड़े वीर और धर्मात्मा थे। जनमेजय से और अद्वितीय हैं। हे भरतश्रेष्ठ । देवापि, शान्तनु महाबलवान् पृथ्वी में प्रख्यात, धर्मार्थयुक्त, सब और बाहाक, ये तीन पुन प्रतीप से उत्पन्न हुए प्राणियों का हित चाहनवाल आठ पुत्र उत्पन्न हुए । ॥५६॥६॥ उनमें सब से बड़ा धृतराष्ट्र फिर पाण्डु, बाहीक, इनमें से देवापि ने धर्म की इच्छा से वनवास निषध, बलवान् जाम्बुनद, कुण्डोदर, पदाति और किया और महारथी शान्तनु और बाहीक पृथ्वी के वसाति हुए। इनमें धृतराष्ट्र राजा हुआ । कुण्डिक, राजा हुए । हे राजन् ! देवर्षि सदृश सत्ययुक्त बहुत हम्ती, वितर्क, काथ, कुण्डिन, हवि श्रवा, इन्द्राभ से राजाओं ने भरतवश में जन्म लिया । ऐसे देवर्षि और तेजवी भुमन्यु ये घृतराष्ट्र के पुत्र हैं । हे सब ऋषि सत्यवान् बहुत से महारथियों ने एलवश भारत ' प्रतीप, धर्मनत्र और सुनेत्र, ये तीन प्रसिद्ध की वृद्धि करक मनु वश में जन्म रिया था ॥६॥६५॥ राजकुमार धृतराष्ट्र के पात्र हैं। इनमें प्रताप प्रख्यात आदिपर्वा चौरानवेवा अध्याय समान हुआ । अथ पश्चनवतितमाऽध्याय ॥ ९५ ॥ -श्रुतम्त्वत्तो मया ब्रह्मन्पूर्वेषां संभवो महान् । उदाराश्चापि बंशेऽस्मिन्गजानो मे परिश्रुताः ॥ . w . अनमय उवाच How-tul अध्याय ९५ महाभारत किं तु लवर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति । प्रीणात्यतो भवान्भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ॥ २ ॥ एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः । तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ॥ ३ ॥ सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेपां यशः स्फीतमवस्थितम् ॥ ४ ॥ गुणप्रभाववीर्योजः सत्त्वोत्साहवतामहम् । न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसंमिताम् ॥ ५ ॥ पैशम्पायन उवाच-शृणु राजन्पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छ्तम् । प्रोच्यमानं मया कृत्स्नं म्ववंशजननं शुभम् ॥ ६ ॥ दक्षाददितिरदितर्विवस्वान्विवस्तो मनुमनोरिला ईलायाः पुरूरवाः । पुरूरवस आयुरायुषो नहुपो नहुपाद्ययातियातेद्वे भार्ये वभूवतुः ॥ - उशनसो दुहिता देवयानी वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्टा नाम अत्रानुवंश- श्लोको भवति ॥ ८॥ यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत । द्रुघु चानुं च पूरुच शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ९॥ तत्र यदोर्यादवाः पुरोः पौरवाः ॥१०॥ पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम यस्त्रीन- " पंचानवेवां अध्याय ९५ ॥ जनमेजय ने कहा-हे ब्रह्मन् ! आपसे पूर्व स बढ़ा हुआ यश तीनों लोकों में आजतक फैला पुरुषों का वृत्तान्त सुनकर मरतवंश के राजाओं का हुआ है। उनकी अमृत-सदृश कथा सक्षेप से सुन- उदार चरित्र विदित हुआ: किन्तु यह परमप्रिय कर मेरा मन तृप्त नहीं होता है ॥१५॥ उपाख्यान सक्षेप से कहा गया है । इस कारण वैशम्पायन ने कहा- हे राजन् । मैंने व्यासजी अभी तृप्ति नहीं हुई । इसलिये इस .कृपा करके के मुख से आपके शुभ वश का वृतान्त जिस प्रकार आप फिर विस्तृतम्प से क्हें । प्रजापति मनु से सुना है, उसी प्रकार कहता है, मुनिए ! दक्ष से लेकर सब पवित्र राजाओं के जन्म-वृत्तान्त की अदिति, अदिति से विवम्वान् , विवम्बान से मनु, पवित्र कथा सुनन में किस आनन्द न होगा ! वे से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, दानशीलता आदि गुण, असाधारण शक्ति, शारी आयु से नहुष और नहुष से ययाति ने जन्म लिया। रिक बल, मानसिक सामर्थ्य, अदीनता और उत्साह ययाति की दो स्त्रिया थी। एक शुक्र की कन्या “युक्त थे । उनके अच्छे कर्म, गुण और महात्मय । देवयानी, दूसरी वृषपर्वा की कन्या शर्मिष्ठा । देवयानी . मनु इला, इला' में . - । आदिपर्य ४६२ महा भारत श्वमेधानाजहार विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ॥ ११॥ जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीं तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्यः प्राची दिशं जिगाय यावत्सूर्योदयात्ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ॥ १२ ॥ प्राचिन्वान्खल्वश्मकीमुप- येमे यादवीं तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ॥ १३ ॥ संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गी नामोपयेमे तस्यामस्य जज्ञेऽहंयातिः ॥ १४ ॥ अहंयातिः खल्लु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमती नाम तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः ॥ १५ ॥ सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दा नाम तामुपयेमे तस्यामस्य जज्ञे जयत्सेनो नाम ॥ १६ ॥ जयत्सेनः खलु वैदर्भामुपयेमे सुश्रवां नाम तस्यामस्य जज्ञेऽवाचीनः ॥ १७ ॥ अवाचीनोऽपि वैदर्भीम- परामेवोपयेमे मर्यादां नाम तस्यामस्य जज्ञेऽरिहः ॥ १८ ।' अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे तस्यामस्य जज्ञे महाभामः ॥ १९ ॥ महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञां नाम तस्यामस्य जज्ञेऽयुतनायी यः पुरुपमेधा- नामयुतमानयत्तेनास्यायुतनायित्वम् ॥ २० ॥ अयुतनायी खल्ल पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम तस्यामस्य जज्ञेऽक्रोधनः ॥ २१ ॥ के गर्भ से यदु, तुर्वसु दो पुत्र हुए और वृपपर्या अहं जाति ने कृतवार्य की कन्या भानुमती से पाणि- की कन्या गर्मिष्ठा से द्रुध, अनु और पूर, ये तीन ग्रहण किया। उसके गर्भ से सार्वभौम का जन्म पुत्र उत्पन्न हुप । आगे यदु मे यादववश और पूरु हुआ ॥११॥१५॥ मे पौरववश उत्पन्न हुआ ॥६॥१०॥ सार्वभौम ने कैकेय राज को जीतकर उसकी पूरु की भार्या कौशल्या में जनमेजय का जन्म पन्या सुनन्दा को हर लिया। उसके साथ विवाह हुआ। उन्होंने तीन अश्वमेध और एक विश्वजित् - करने पर जयस्मन उत्पन्न हुआ। जयत्सेन ने विदर्भ मन करके मन में प्रवेश किया। उन्होंने माघरकीगना की कन्या मुश्रया से विवाह किया। उससे अनन्ना नामी भन्या में विवाह किया था । उममे अवानीन । जग हुआ । अयाचीन ने दूसरी प्राचिन्नान नामक पुत्र मन हुआ । मर्योदय तक बंदभी मर्यादा नामबागी मन्या में विवाह दिया । भाचादिमा तिने पर उसका नाम मानिन्यान् हुआ उसके गर्भ से अरिह का जन्म हुआ । अरिह ने आई। मा । प्राधिन्वान ने अव नामवारी माधवी नाप्नी कन्या से विवाह करके महाभीम पुत्र उसस पन्या में विवाद किया। उससे यानि की गति किया। महाभीम ने प्रासन जित की कन्या मुया यानि न हमवन कीन्या रात्री में विवाद मे दियार किया। उसके गर्भ से अयुतनायी का जन्म frel मा गर्म में महान ने जन्म लिया। हुमा । अयुत अश्वमेघ यज्ञ करने के कारण उसका । +-- अध्याय ९५ महा मान स खलु कालिङ्गीं करम्भा नामोपयेसे तस्यामस्य जने देवातिथिः ॥ २२ ॥ देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम तस्यामन्य जलेऽरिहो नाम ॥ २३ ।। अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम तस्यां पुत्रमजीजनदृक्षम् ॥ २४ ॥ ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादयामास ॥ २५ ॥ मतिनारः खल्ट सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिक सत्रमाहरत् । समाप्ते च सत्रे सरस्वत्यभिगम्य तं भर्तारं वरयामास । तस्यां पुत्रमजीजनतंतुं नाम ॥ २६ ॥ अत्रानुवंशश्लोको भवति । तंतुं सरस्वतीपुत्रं मतिनारादजीजनत् । ईलिनं जनयामास कालिङ्गयां तंसुरात्मजम् ॥ २७ ॥ ईलिनस्तु रथन्तयाँ दुष्यन्ताद्यान्पश्च पुत्रानजीजनत् ॥ २८ ॥ दुष्यन्तः खल्लु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे तस्यामम्य जजे भरतः ॥२९॥ अत्रानुवंशश्लोको भवतः ।- भन्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः । भरस्व पुत्रं दुष्यन्तं माऽवमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥ ३० ॥ नाम अयुतनायी पड़ा ॥१६॥२०॥ अनुष्ठान किया था। उस महायज्ञ के समाप्त होने अयुतनायी ने पृथुश्रवा की कन्या कामा से पर सरम्यती ने उसको अपना पति बनाया। सरम्बनी विवाह किया । उमसे अक्रोधन उत्पन्न हुआ। अक्रो- के गर्म से तमु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । तमु ने धन ने कलिंग राजा की कन्या करम्मा से विवाह । कारिङ्गी से ईरिन नामक पुत्र उत्पन्न किया । राजा किया । उससे देवातिथि उत्पन्न हुआ। देवातिथि ईलिन के वीर्य और ग्यन्तरी के गर्भ से दुष्यन्त आदि ने विदेह राजा की कन्या मर्यादा में विवाह किया। पांच पुत्र उसन्न हुए । राजा दुप्यन्त ने विश्वामित्र मर्यादा के गर्म से अरिह ने जन्म लिया । अरिह की कन्या शकुन्तला से विवाह किया । शकुन्तरा ने अगराज की पुत्री सुदंवा से विवाह किया । सुदेवा के गर्भ से मात का जन्म हुआ। हे दुप्यन्त । ने ऋक्ष नामक पुत्र उत्पन्न किया । माल ने तक्षक माता चमड़े की कोप के समान है । इममें पिता की क्न्या ज्वाला के माथ विवाह किया। उसका आप ही पुत्र के म्वरूप में जन्म लेना है, उमलिण पुत्र मतिनार नाम राजा हुआ ॥२१॥२५॥ आप पुत्र को पारें । आप शकुन्तरा का अनादर मतिनार ने सरम्बती नदी के तटपर बारह वर्ष न करें । हे राजन् ! अपने वीर्य मे उन्न हुई में अनुष्ठान होनेवाले, अनन्त गुणयुक्त यज्ञ का सन्तान यमराज से उद्धार करती है । आप ही ने eater- आदिपर्व ४६४ महामार रतोधाः पुत्र उन्नयति ,नरदेव यमक्षयात् । वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ ३१ ॥ ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतः खल्लु काशेयीमुपयेमे सार्वसनीं सुनन्दा नाम तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ॥ ३२ ॥ भुमन्युः खलु दाशाहीमुपयेमे विजयां नाम तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ॥ ३३ ॥ सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णा नाम तस्यामस्य जले हस्ती य इदं हास्तिनपुरं स्थापयामास । एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ॥ ३४ ॥ हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयमे यशोधरां नाम तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ॥ ३५ ॥ विकुण्ठनः खलु दाशाही- मुपयेमे सुदेवां नाम तस्यामस्य जनेऽजमीढो नाम ॥ ३६ ॥ अजमीढस्य चतुर्विशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यो गान्धार्यां विशालायामृक्षायां चेति पृथक्पृथग्वंशधरा नृपतयः तत्र वंशकरः संवरणः ॥ ३७॥ संवरणः खल्ल वैवस्वतीं तपती नामोपयेमे तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ॥ ३८ ॥ कुरुः खल्लु दाशाहीमुपयेमे शुभाङ्गी नाम तस्यामस्य जज्ञे विदूरथः ॥ ३९ ॥ विदूरथस्तु माधवीमुपयेमे संप्रियां नाम तस्यामस्य जज्ञेऽनश्वा नाम ॥४०॥ अनश्वा खलु मागधीमुपयेमेऽमृतां नाम तस्यामस्य जज्ञे परीक्षित् ॥ ४१ ॥ यह गर्भ धारण किया है । जो शकुन्तला कह रही यशोधरा से विवाह किया। उससे वैकुण्ठन पुत्र है, वह मब सत्य है । इसरिये है पौरव । का जन्म हुआ । वैकुण्ठन ने दशाई की कन्या शकुन्तरा के गर्भ में उत्पन्न इस महात्मा पुत्र को मुदेवा से विवाह किया। जिसके गर्भ मे अजमीद पारें । हमारे कहने से इस पुत्र का पारन आपको • ने जन्म लिया ॥३२॥३६॥ अवश्य करना होगा। इस कारण दुप्यन्त के पुत्रः अजमीढ ने कैकेयी, विशाल, गाघारी और का नाम भरत दुबा ॥२६॥३१॥ मक्षा इन चार पत्नियों मे चौवीस सौ पुत्र उत्पन्न भरत ने काशिरान मर्वमन की कन्या मुनन्दा किये । वे सब राजा अलग अलग वशवाले हुए। में विवाह क्या । उसमभुमन्यु उत्पन्न हुआ। उनमें से सवरण के पुत्र से ही यश प्रतिष्ठित हुआ। भमन्यु ने दमाई दीपन्या विजया से विवाह किया। सवरण ने मूर्य की कन्या तपती से विवाद किया। म मुहार उपस हुआ। मुहान ने इक्ष्या की उस तपती के गर्भ में युग का जन्म हुआ ! कुर कन्या मुर्गा में विवाह भया । उममे हम्ती नामक ने दागाही की कन्या शुभाही से विवाह दिया। पुत्र में जन्म भा । जिम नाम में इम्तिनापुर शुभाही में गर्भ से विदुरथ का जन्म हुआ। विदुर्थ दिस्यान मा । हानी ने निगर्न राजादी कन्या माघर की कन्या गमिया विवाह किया। उसरे । आप ३ -प.

अध्याय ९..] महा मारत PAN Horosco. परीक्षित्खलु वाहुदामुपयेमे सुयशां नाम तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ॥ १२ ॥ भीमसेनः खलु कैकेयीमुपयेमे कुमारी नाम तस्यामस्य जज्ञे प्रतिनवा नाम ॥ ४३ ॥ प्रतिश्रवसः प्रतीपः । प्रतीपः खलु शैव्यामुपयेमे सुनन्दां नाम तस्यां पुत्रानुत्पादयामास देवापिं शान्तनुं वाह्नीकं चेति ॥ १४ ॥ देवापिः खलु वाल एवारण्यं विवेश शान्तनुस्तु महीपालो बभूव ॥ ४५ ॥ अत्रानुवंशश्लोको भवति । यं यं कराभ्यां स्पृशति जीणं स सुखमश्नुते । पुनर्युवा च भवति तस्मान्तं शान्तनुं विदुरिति तदस्य शान्तनुत्वम् ॥ ४६ ॥ शान्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे तस्यामस्य जले देवव्रतो नाम यमाहुर्भीष्ममिति ॥ ४७॥ भीष्मः खलु पितुः प्रियचिकीर्पया सत्यवती मातरमुदवाहयद्यामाहुर्गन्ध- कालीमिति ॥ ४८ ॥ तस्यां पूर्व कानीनो गर्भः पराशराद् द्वैपायनोऽभवत् । नस्यामेव शान्तनोरन्यो द्वौ पुत्रौ वभूवतुः ॥ १९॥ विचित्रवीर्यश्चित्राङ्गदश्च । तयोरप्राप्तयौवन एव चित्राङ्गन्दो गन्धर्वेण हतो विचित्रवीर्यस्तु राजासीत् ॥ ५० ॥ विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजे अम्बिकाम्बालिके काशिराजदुहितरावुपयेमे ॥ ५१ ॥ विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं गर्भ से अनश्वा उत्पन्न हुआ । अनश्वा ने मगधराज था, वह फिर जवान होकर सुख भोगता था। इस की कन्या अमृता से विवाह किया। उसके गर्म कारण उसका नाम शान्तनु हुआ) ॥४॥४६॥ से परीक्षित का जन्म हुआ ॥३७॥११॥ शान्तनु ने गगा से विवाह किया । गगा के परीक्षित ने बाहुद की कन्या सुयशा में विवाह गर्म से देवनन उत्पन्न हुआ। जिसको सब भीष्म किया । मुयशा के गर्भ से भीमसेन नामक पुत्र कहते हैं । भीष्म ने पिता का प्रिय कार्य करने की है उत्पन्न हुआ। मीममेन ने कियगर की कन्या इच्छा से सत्यवती का विवाह उसके साथ कर दिया। कुमारी से विवाह किया । कुमारी के गर्म में प्रति सत्यवती का दूसरा नाम गघकाली था । पहिले या नामक पुत्र का जन्म हुआ । प्रतिश्रवा के पुत्र सत्यवती की कन्या-दशा में पराशर में गर्म होने में प्रतीप ने गैवराज की कन्या में विवाह किया। द्वैपायन का जन्म हुआ। शान्तनु के वीर्य मे टसके उसके गर्भ से देवारि, शान्तनु और वाहीक तीन दो पुत्र विचित्रवीर्य और चित्रागद हुए । चित्रागद पुत्र उत्पन्न हुए । देवापि ने वारकपन में ही वान यौवन को प्राप्त करने के पहिरे ही गर्व मे माग प्रम्य धारण किया था।शान्तनु राजा हुआ ।(यह गया था। विचित्रवीर्य ने काशिराज की कन्या राजा अपनी भुजा से जिस जुटे को म्पर्श करता अम्बिका और अम्बालिका से विवाह दिया, परन्तु --- POScanada । आदिपर्व ४६६ महामारम NAMAMM से प्राप्तस्ततः सत्यवत्यचिन्तयन्मा दौष्यन्तो वंश उच्छेदं ब्रजेदिति ॥ ५२ ॥ सा द्वैपायनमृपि मनसा चिन्तयामास । स तस्याः पुरतः स्थितः किं करवा- णीति ॥ ५३ ।। सा तमुवाच भ्राता तवानपत्य एव स्वर्यातो विचित्रवीर्यः साध्वपत्यं तस्योत्पादयेति । ५४ ॥ स तथेत्युक्त्वा त्रीन्पुत्रानुत्पादयामास धृतराष्ट्रं पाण्डं विदुरं चेति ॥ ५५ ॥ तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं वभृक्गांधार्यां वरदानाद् द्वैपायनस्य ॥ ५६ ॥ तेषां धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां चत्वारः प्रधाना बभूवुर्दुर्योधनो दुःशासनो विकर्णश्चित्रसेनश्चेति ॥ ५७ ।। पाण्डोस्तु द्वे भायें वभूवतुः कुन्ती पृथा नाम माद्री चेत्युभे स्त्रीरत्ने ॥ ५८ ॥ अथ पाण्डुमंगयां चरन्मैथुनगतमृषिमपश्यन्मृग्यां वर्तमानं तथै- वाद्भुतमनासादितकामरसमतृप्तं च वाणेनाजघान ॥ ५९ ॥ स वाण- विद्ध उवाच पाण्डं चरता धर्ममिमं येन त्वयाऽभिज्ञेन कामरसस्याहमन- वाप्तकामरसो निहतस्तस्मात्वमप्यतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति स विवर्णरूपस्तथा पाण्डुः शापं परिहरमाणो नोपासर्पत भायें वाक्यं चोवाच ॥ ६० ॥ स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहं सन्तान उत्पन्न होने से पहिले ही परलोक को ॥५३।५७॥ पारा । इसलिये कि, दुष्यन्त का वा नष्ट न हो पाण्ट की दो स्त्रिय कुन्ती और माद्री थीं । जावे, मत्यवती ने अपने पुत्र द्वैपायन ऋपि को कुन्ती का दूसरा नाम पृथा था । इसके पश्चात् एक म्मरण किया ॥४७॥५२॥ ममय पाण्ड मृगया के निमित्त वन में गये थे। वहां इसके उपरान्न द्वैपायन ने उसके सम्मुख देखा कि, एक ऋषि मृगी से मैथुन कर रहा उपस्थित होकर पूछा हे माता' कहो, क्या आशा नबतक कामरस के पूर्ण न होने के हेतु भले प्रकार है। मत्यवती ने कहा कि तुम्हारा भाई विचित्र. तृप्त नहीं हुआ था । उस अदभुत मृगरूपी प्रापि वीर्य पिना सन्तान पाक की मिधार गया है। पर राजा ने वाण मारा । अपि ने वाण से विद्ध तुम पुत्र उत्पन्न करने की चेष्टा कंगे। उपायन ने होकर पाण्ड से कहा कि, तुमने धर्म और कामरस म्वीकार कर लिया। अनन्नर उन्होंने उचित काल में के अभिश होकर, मुतकी अपूर्ण मनोरथ देखने पुनराष्ट्र, पाराष्ट्र और विदुर तीन पुत्र उत्पन्न किये। पर भी मारडाला, इसलिये तुम भी कामरस में अतृप्त म. पचान पायन पादान में गाधारी के गर्म रहकर उस दशा में ही सीन परलोक को सिधारोगे। मम पुत्र हुए। नगर के पुत्रों में दुर्योधन यह माप के मुनते ही पाण्टु का र# उसी क्षण दुमन, विकर्ण और चित्रमन, ये पार प्रपान पदर गया और शाप से बचने के रिये स्वी से है ।

अध्याय ९ । .महाभारत ४१६ शृणोमि च नानपत्यस्य लोकाः सन्तीति सा वं मदर्थे पुत्रानुत्पादयेत्ति कुन्तीमुवाच सा तथोक्ता पुत्रानुत्पादयामास धर्माद्युधिष्टिरं मारुताद्रीमसेनं शक्रादर्जुनमिति ॥ ६१ ॥ तां संहृष्टः पाण्डुरुवाचेयं ते -सपन्यनपत्या साध्वस्या अपत्यमुत्पाद्यतामिति । एवमस्त्विति कुन्ती तां विद्यां माद्रयाः प्रायच्छत् ॥ ६२ ॥ माद्यामश्विभ्यां नकुलसहदेवावुत्पादितो ॥ ६३ ॥ माद्री खल्बलंकृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे स तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वं प्राप्तः ॥ ६४ ॥ तत्रेनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारोहोवाच कुन्तीं यमयोरप्रमत्तया वया भवितव्यमिति ॥ ६५ ॥ ततस्ते पाण्डवाः कुन्त्या सहिता हास्तिन- पुरमानीय तापसीप्मस्य विदुरस्य च निवेदिताः सर्ववर्णानां च निवे- द्याऽन्तर्हितास्तापसा बभूवुः प्रेक्षमाणानां तेपाम् ॥ ६६ ॥ तच्च वाक्य. मुपश्रुत्य भगवतामन्तरिक्षात्पुष्पवृष्टिः पपात देवदुन्दुभयश्च प्रणेदुः॥६७॥ प्रतिगृहीताश्च पाण्डवाः पितुर्निधनमावेदयन्तस्तस्योर्ध्वदेहिकं न्यायतश्च कृतवन्तस्तांस्तत्र निवसतः पाण्डवान्वाल्यात्प्रभृति दुर्योधनो नामर्पयत् ॥ ६८ ॥ पापाचारो राक्षसी बुद्धिमाश्रितोऽनकैरुपायैरुद्धर्तुं च व्यवसितो मिलना छोड़ दिया । इसके उपरान्त पाण्टु नै कुन्ती से नकुल और सहदेव उत्पन्न हुए । एक दिन पाण्टु और माद्री से कहा- 1-अपने दोप में ही मुझे ऐसा माद्री को गहनों से सजी हुई देखकर कामवश हो गार मिला है। मैंने शाम्रों में सुना है कि, पुत्र गये । मादी के म्पर्श करते ही उनकी मृत्यु हो उत्पन्न हुम बिना पुरुष को स्वर्ग नहीं मिलता । इस गई । पाण्टु की देह में आग लगाने पर माद्री भी कारण तुम मेरे लिये पुत्र उत्पन्न करने का राज उसके साथ सती हुई। मनी होते समय वह अपने करो। कुन्ती ने पति की आज्ञा पाकर धर्म मे युधिष्ठिर दोनों पुत्र कुन्ती के हवाले कर गई । इसके पश्चात को, वायु मे मीममेन का और इन्द्र में अर्जुन को तपम्बी लोग कुत्रीमहित पाण्डवों को हस्तिनापुर उत्पन्न किया ॥५८१६१|| से आये । वहा तपम्बियों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि तब प्रसन्न होकर पाण्डु ने कुन्ती से कहा मय के मामने मीम और विदुर से पाण्ट के मरन तुम्हारी सौत माद्री के पुत्र नहीं हैं। इनके मी का मत्र हाल कहा । वहा में तपस्वियों के अन्न- इमीतरह पुत्र उत्पन्न कराओ 1 कुन्ती ने पति की द्वान होने पर उनकी गत का अनुमोदन करने को आजा मान ली और जिस विद्या के वल से उन्होंने आकाश में छटों की वर्षा हुई और नगाहों का धर्म, वायु और इन्द्र को बुलाया था, वही विद्या शब्द होने लगा ॥६२।६७॥ माद्री को भी बना दी। माद्री के अश्विनीकुमार भीम आदि ने पाण्टु पुत्रों की म्बाकार का ४६८ म दामारत. । आदिपर्व भावित्वाचार्थस्य न शकितास्ते समुद्धर्तुम् ॥ ६९ ॥ ततश्च धृतराष्ट्रेण व्याजेन वारणावतमनुप्रेपिता गमनमरोचयन् ॥ ७० ॥ तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारब्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेनेति ॥ ७१ ॥ तस्माच्च हिडिम्ब- मन्तरा हत्वैकचक्रां गताः ॥७२॥ तस्यामप्येकचक्रायां बकं नाम राक्षस हत्वा पाञ्चालनगरमधिगताः ॥ ७३ ॥ तत्र द्रौपदी भार्यामविन्दनस्वविषयं चाभिजग्मुः ॥ ७४ ॥ कुशलिनः पुत्रांश्चोत्पादयामासुः प्रतिविन्ध्यं युधि- ष्ठिरः सुतसोम वृकोदरः श्रुतकीर्तिमर्जुनः शतानीकं नकुलः श्रुतकर्माणं सहदेव इति ॥ ७५ ॥ युधिष्ठिरस्तु गोवासनस्य शैव्यस्य देविकां नाम कन्यां स्वयंवराल्लेभे तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ॥ ७६ ॥ भीम- सेनोऽपि काश्यां बलन्धरां नामोपयेमे वीर्यशुल्का तस्यां पुत्रं सर्वगं नामो- 'त्पादयामास ॥ ७७ ॥ अर्जुनः खलु द्वारवती गत्वा भगिनी वासुदेवस्य सुभद्रां भद्र भाषिणी भार्यामुदावहत् । स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीव गुणसंपन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ॥७८॥ लिया । उस समय पाचों पाण्डवों ने अपने पिता में पहुँचे । वहा उन्होंने वक नामक राक्षस को की मृत्यु का वृत्तान्त कहकर विधिपूर्वक उनकी मारा । वहा से पाञ्चालदेश में जाकर म्वयवर में आर्वदेहिक क्रिया की । दुर्योधन उनमे लड़कपन द्रौपदी को प्राप्त किया। इसके पश्चात् आधा राज्य में ही झगहने लगा। उस दुरात्मा ने अपनी राक्षसी. पाकर पाचों पाण्डव इन्द्रप्रस्थ में रहने लगे। पानों वृद्धि मे अनेक प्रकार के उपाय कर पाण्डवों को पाण्डवों से द्रौपदी के पाच पुत्र उत्पन्न हुए । उनमें यहां म उस्वारने की चेष्टा की। परन्तु जो कार्य युधिष्ठिर के वीर्य से प्रतिविन्ध्य, भीम के वीर्य से होनहार है यह अवश्य होता है. इसरिय उमका सुतसोम, अर्जुन के वीर्य से श्रुतकीर्ति, नकुल के मनोरथ मफल नही दो मका । इसके पश्चात धृतराष्ट्र वीर्य से शतानीक और सहदेव के वीर्य से श्रुतकर्मा ने पर्या उनकी वारणावत नगर में भेजा। का जन्म हुआ [.२७५॥ वा कुन्तीमहिन पाण्डवों को जतुमट में जलगन युधिष्ठिर ने देवराज की कन्या देयिका को घेरा दी। विदुर समावपानी में कुन्ती और म्वयया में प्राप्त किया। उस देयिका के गर्भ से १ प रम मार में बच गये ॥ ६८1७१ ॥ योधय नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। भीमसेन ने आंग वारणायत में एक या नगरी में गये। काशी के राजा की कन्या वरन्धरा से विवाह किया। भीम पन में लिदान को मारा 1 इसके उमरे गर्भ से सर्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। । पचान पागे पाण्डव काल-पूर्वक एक बा नगरी भजुन ने द्वारका में आर कृष्ण की बहन मधुर अध्याय ५५ महामारी नकुलस्तु चैद्यां करेणुमती नाम भार्यामुदावहत्तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाज- नयत् ।। ७९ ॥ सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयमे मद्ररा- जस्य द्युतिमतो दुहितरं तस्यां पुत्रमजनयत्सुहोनं नाम ॥ ८ ॥ भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिभ्वायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ॥८॥ इत्येते एकादश पाण्डवानां पुत्रास्तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ॥ ८२ ॥ स विराटस्य दुहितरमुपयमे उत्तरां नाम तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत्तमुत्सद्लेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात्पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य पाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवयिप्यामीति ॥ ८३ ॥ स भगवता वासुदेवेनासंजातबलवीर्यपराक्रमो- ऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितो जीवयित्वा चैनमुवाच परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परीक्षिन्नामेति ॥ ८४ ॥ परीक्षित्खलु माद्रवती नामोपयमे वन्मातरं तस्यां भवाञ्जनमेजयः ॥ ८५ ॥ भवतो वपुष्टमायर्या द्वो पुत्रों जज्ञाते शतानीकः शकुकर्णश्च शतानीकस्य वैदेह्यां पुत्र उत्पन्नो- ऽश्वमेधदत्त इनि ॥ ८६ ॥ एष पूरोवंशः पाण्डवानां च कीर्तितो धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्यो ब्राह्मणेनियमवद्भिरनन्तरं क्षत्रियः मापिणी मुभद्रा को हर कर उसम विवाह किया। हुआ पुत्र पृथ्वी पर गिरा । कृष्ण मी आज्ञा मे निर्षिन अपने नगर में रौटकर अति गुणवान् वसुदेव उम बालक को कुनी ने गोट में रे पिया । पुरुषो के प्यारे अभिमन्यु नामक पुत्र को रसन्न क्यिा । तम वासुदेव ने कहा-'अब के तेज से नष्ट इम नकुर ने चेदि देश के राजा की कन्या करेणुमती छ मरीने के गर्भ को में अभी अपने तंज मे जिला से विवाह किया। उममे नरमित्र नाम का पुत्र दूगा । मगवान् वासुदेव ने उम अनार उत्पन्न उत्पन्न हुआ। सहदेव ने म्वयवर के समय में द्युति- वार्य, पराक्रमयुक्त, अस्वामि से जरे हुए बालम मान् मद्रगज की कन्या विजया से विराह किया। को अग्ने तंज में जिलाया। उस बालक का नाम विजया के गर्भ से मुहोत्र नाम पुत्र का जन्म हुआ। परीक्षित रक्या गया । कुरवा क्षीण होने पर उत्तन्न भीममेन ने पहिले ही हिदिम्बा मे घटोत्कच राक्षस होने के कारण ही उचरा के पुत्र का नाम पसिन उत्पन्न किया था । पाण्डवों के ये ग्यारह पुत्र थे, पड़ा। हे महाराज ' परीक्षित ने माद्रवनी आपकी किन्तु अभिमन्यु ही मे वय की रक्षा हुई ।।७६॥८॥ माता ने विवाह किया। टमसे आपने जन्म दिया अभिमन्यु ने विराट् देश के राजा की कन्या है । आपने वपुष्टना रानी मे मतानी और शर- उत्तग में विवाह क्यिा । उन वीर्य और उत्तरा कर्ण नाम के दो पुत्र उत्सन्न यि । मनाना के गर्भ मे छ महीने पीछे अम्बामि के द्वारा जग वीर्य और वैदेही गर्म में अश्वमेषदत न म एक . v -- आदिपर्व ४७० मदा मारत स्वधर्मनिरतः प्रजापालनतत्परैवैश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्वैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति ॥ ८७ ॥ इतिहासमिमं पुण्यम- शेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराःश्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेदपरास्तेऽपि स्वर्गजितः पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः संपूज्याश्च ॥ ८८ ॥ परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधाना अमत्सरा मैत्रा वेदसंपन्नाः श्रोप्यन्ति तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृते भवन्ति ॥ ८९ ॥ भवति चात्र श्लोकः ॥ इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ॥ ९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने पञ्चनवतितमोऽध्याय ॥ ९५ ॥ पुत्र उत्पन्न हुआ है ॥८३॥८६॥ और शूद्र कृतार्थ हो जाते हैं । इसको पढ़ने-सुनने- हे राजन् ! यह मैंने आपके आगे पूरु और / वाले लोग वर्ग को जाते है और इस लोक में भी पाण्डवों के वंश का वर्णन किया। यश को बढ़ानेवाली सम्मान पाते हैं ॥८७१९.०॥ यह पवित्र कथा पढ-सुनकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदिपर्व का पञ्चानवेवां अध्याय समाप्त हुआ । अध पण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ 11 वैशम्पायन उवाच-इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत्पृथिवीपतिः । महाभिप इति ख्यातः सत्यवाक्सत्यविक्रमः ॥ १ ॥ मोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन नोपयामास देवेशं स्वर्ग लेभे ततः प्रभुः ॥ २ ॥ ततः कदाचिब्रह्माणमुपासाश्चक्रिरे तत्र राजपयो ग्यासन्स च राजा महाभिषः ॥ ३.। ॥ प्रयानछा अभ्याय ५६॥ बापायन ने कहा कि, इक्ष्वाकु के वन में करके देवराज को मंतुष्ट किया और मत्यवादी और मत्यपरान भी महाभिप नाम के राजा पहुँने । एक समय मम देवता और राजर्षि देवराज । हीन दनार अश्वमेध और सी गजमय यम की मभा में पेटे हुए थे । महाभिष राजा भी वहां -- सुराः । अन्त को स्वर्ग अध्याय ६॥ मदा मान YA NA अथ गढ़ा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायापितामहम् । तस्यावासः समुद्भुतं मारुतेन मारुतेन शशिप्रभम् ॥ १ ॥ ततोऽभवन्सुरगणाः सहसाऽवाड्मुखास्तदा । महाभियस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान्नदीम् ॥ ५ ॥ सोपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः । उक्तश्च जातो मत्र्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ॥ ६ ॥ यया हृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते । सा ते वै मानुपे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ॥ ७ ॥ वैशम्पायन उवाच-यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद्विमोक्ष्यसे । स चिन्तयित्वा नृपतिर्नुपानन्यांस्तपोधनान् ॥ ८ ॥ प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् । महाभिपं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ॥ ९ ॥ तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्त्तत्सरिद्वरा । सा तु विध्वस्तवपुषः कमलाभिहतान्नृप ॥ १० ॥ ददर्श पथि गच्छन्ती बसून्देवान्दिवौकसः । तथारूपांश्च तान्दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितांवरा ॥ ११ ॥ पर थे । इसके पश्चात् नदियों में प्रधान गङ्गा पिता करती हुई गहा भी ब्रह्मरोफ से चली। राह मह के मामने उपस्थित हुई, उसका चन्द्र प्रकाश जाते समय उसने देखा कि, आठों वम दुखित सदश वर वायु से उडता देखकर देवताओं ने आर अचेत होकर म्वर्ग से पृथ्वी पर गिर रहे हैं। मुख नीचे कर स्यि किन्तु राजर्षि महाभिष बिना गगा ने उनसे पूछा तुम लोग किस कारण पृथ्वी पर 1 किमी शिक्षक के उसकी और देखते रहे । भगवान जा रहे हो ? देवलोक में कुशर तो है ' बमुआ ब्रह्मा ने यह देखकर राना को शाप दिया कि, तुम ने कहा-है महानदी। थोड़े ही अपराध के कारण यहा से जाकर पृथ्वी पर जन्म रोगे। यहा कुछ दिन महात्मा वशिष्ठ ने क्रोध करके हमको शाप दे दिया रहकर फिर इम रोक में आओगे ॥1॥ है। हमसे यह अपराध हुआ था कि, गुप्तरूप उस समय महाभिप न पृथ्वी के सब धर्मात्मा मे सभ्यारन्दन कर रहे थे। उन्हें न पहचानने में राजाओं का स्मरण कर अपना जन्म राजा प्रतीप में कारण प्रणाम किये बिना ही हम आगे चले गये। यहा रेना विचार कर उसके घर जन्म रिया । राना इस अपराध को अपमान जानकर वसिष्टनी नेमकी के चित को चलायमान देखकर उन्हीं का ध्यान शाप दे दिया है कि, तुम मनुष्य-योनि में उत्पन्न व हाभारत आदिपर्व PR किमिदं नष्टरूपाःस्थ कञ्चित्क्षेमं दिवौकसाम् । तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ॥ १२ ॥ अल्पेऽपराधे सरम्भाद्वसिष्ठेन महात्मना । विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ॥ १३ ॥ सन्ध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिस्मृताः पुरा । तेन कोपाद्वयं शप्ता योनौ संभवतेति ह ॥ १४ ॥ न तच्छवयं निवर्तयितुं यदुक्तं ब्रह्मवादिना । त्वमस्मान्मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्वसून्भुवि ॥ १५ ॥ न मानुपीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे । इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाऽब्रवीदिदम् ॥ १६ ॥ गगावाच-मत्र्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्त्ता भविष्यति । वसब उचु-प्रतीपस्य मुतो राजा शान्तनुलॊकविश्रुतः । भविता मानुपे लोके स नः कर्त्ता भविष्यति ॥ १७ ॥ गोपाच- ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः । प्रियं तस्य करिष्यामि युप्माक चैतदीप्सितम् ॥ १८ ॥ वप्तय उधु-जातान्कुमारान्स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि । यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात्रिलोकगे ॥ १९ ॥ गावाप-एवमेतत्करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम । नाम्य मोघः संगमः स्यात्पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥ र नरदेह धारण कर ॥१२॥ नीय महाराज शान्तनु के द्वारा हम जन्म लेंगे। माशानी महार का कहा कभी मृट नहीं गगा ने कहा हे निष्पाप देवताओ। मैं अवश्य । माना । इमग तुग मानुपा कर हमें पुत्ररूप उस राजा का प्रिय और तुम रोगा के मन की में उत्पन्न बगे । म 'हमको ममारी बियों के इच्छा पूर्ण करगी । रसुओं ने कहा-जो पारक उदर में शाम करना अच्छा नहीं प्रतीत होता। उत्पन्न हो, उसे तुम अपने जल मक देना। गगा ने चमुआ की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए ऐमा करने से शीघ्र नरदेह से हमारा छुटकारा ॥ मनुष्यों में तुम्हारा लिा कौन होगा । वमुओं जारंगा ॥१५॥१०॥ ५ गजा प्रती पुत्र तीनों रोग में प्रथम गगा ने कहा-तुम जैसा कहते हो यही होगा, परन्तु до таке» аrексаа. ।

अध्याय २) महा मारत वसव ऊचुः तुरीयाध प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् । तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥ न संपत्स्यति मर्येषु पुनस्तस्य तु संततिः । तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥ एवं ते समयं कृत्वा गङ्गाया वसवः सह । यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वगि मंभवपर्वणि महाभिपापान्याने पनवतितमोऽध्याय ॥५६॥ ऐसा टपाय करो, जिसमें मेरे गर्म से महाराज शान्तनु राजा का एक पुत्र होकर जीता रहेगा, जो बड़ा का पुत्र उत्पन्न करना वृथा न हो । वमुओं ने पराक्रमी नि मतान होगा। वनुगन गगा से ऐसा कहा-हम अपने अपने तेज का आठवा अंश देकर कहकर प्रसन्नचित में मनमान म्यान को गये तुम्हारी और उसकी अभिनाषा पूर्ण करेंगे । उस ॥२०॥२३॥ यादिपर्व का छियानववा अध्याय समान हुआ। जग्मुः संहृष्टमनसो अथ मननवतितमोऽध्याय ॥ ५ ॥ वैशम्पायन बार-ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत्सर्वभूतहितः सदा । निपसाद समा बढीगङ्गाद्वारगतो जपन् ॥ १ ॥ तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी । उत्तीर्य सलिलात्तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ॥ २ ॥ अधीयानस्य राजर्दिव्यरूपा मनस्विनी । दक्षिणं शालसङ्काशमूरुं भेजे शुभानना ॥ ३॥ प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् । करोमि किंते कल्याणि प्रियं यत्तेऽभिकांक्षितम् ॥ ४ ॥ ग्युवाच-त्वामहं कामये राजन्भजमानां भजख माम् । त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिगिर्हितः ॥ ५ ॥ ॥ मत्तानवेवां अध्याय ९७॥ वैशम्पायन ने कहा कि, मव प्राणियों का हित गुण मे पुत, मी कास रक्ने हुए, जस चाहने वाले राजा प्रतीप गगा के तटपर बहुत दिनों में निकहर, राजर्षि पनीर की दाहिनी बंपा पर से तप कर रहे थे । एक दिन गगाजी उमानवारे बैठ गयी। राजा ने उसे देखकर कहा- त्यानी रूस मौर .

अध्याय ९७ ॥
महामारत
(RKARIRONTRomen
कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुस्वमथोत्तमम् ।
समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद्विभो ॥ १४ ॥
तत्सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् ।
एवं वसन्ती पुढे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ॥ १५ ॥
पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्ग प्राप्स्यति ते सुतः ।
वैशम्पायन उवाच-तथेत्युक्त्वा तु सा रास्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १६ ॥
पुत्रजन्म प्रतीक्षन्वै स राजा तदधारयत् ।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ॥ १७ ॥
तपस्तेपे सुतस्यार्थे स भार्यः कुरुनन्दनः ।
तयोः समभवत्पुत्रो वृद्धयोः स महाभिपः ॥ १८ ॥
शान्तस्य जज्ञे सन्तानस्तस्मादासीत्स शान्तनुः ।
संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान्विजातान्स्वेन कर्मणा ॥ १९॥
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।
प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥ २० ॥
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तब ।
स्वामात्रजेद्यादि रहः सा पत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ॥

मदा मारत । आदिपर्य ४७४ प्रतीप उवाच-नाहं परस्त्रियं- कामाद्गच्छेयं वरवर्णिनि । न चासवां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ॥ ६ ॥ स्त्र्युषाच-नाश्रेयस्यऽस्मिनागम्या न वक्तव्या च कहिचित् । भजन्तीं भज मां राजन्दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ॥ ७ ॥ प्रतीप उवाच-खया निवृत्तमेतत्तु यन्मां चोदयसि प्रियम् । अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद्धर्मविप्लवः ॥ ८ ॥ प्राप्य दक्षिणमूरूं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने । अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्धयेतदासनम् ॥ ९ ॥ सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः । तग्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वरागाने ॥ १० ॥ स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् । स्नुपापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ॥ ११ ॥ स्म्युवाच-एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुनेन · ते । त्वद्भक्त्यातु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ॥ १२ ॥ पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम् । गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ १३ ॥ तुम क्या चाहती हो ।' मैं तुम्हारा क्या प्रिय कार्य मुझे प्रवृत्ति दिलाती हो, मै उससे निवृत्त हूं । यदि कर! स्त्री ने कहा-हे महाराज ! में काम के वश इस समय उसके विरुद्ध आचरण करूं, तो यह में होकर आपके पास आई हु । आप मेरी इच्छा अधर्म मुझको नष्ट करेगा । विशेष करके तुम मेरी पूरी करें। मत्पुरुषों को कामवती बी का त्याग दाहिनी जया पर बैठी हुई हो । हे सुन्दरी ! पुरुष करना अन्छा नहीं कहा है । प्रतीप ने कहा कि, की दाहिनी जंघा पुत्र, कन्या और पुत्रवधू के मे पगई मी या दूसरे वर्ण की बी को कामवश बैठने की जगह है । नी के बैठने का म्धान तो होकर स्वीकार नहीं कर माता । मेरा यही व्रत है। बाई जंघा है । इसलिये तुमको मैं अपनी पुत्रवधू गंगा नदिर पहा हे महाराज 'म युरक्षणा, न चना मकता हूं-बी नहीं बना सकता ॥८॥११॥ मिन्ने के योग्य और निदिन मी नहीं है। मैं अनु- गगा ने कहा हे धर्मज्ञ ! आप अपने पुत्र म होकर प्रार्थना करनी हं । आप मेरी इच्छा पूरी मेरा विवाद करना चाहने हो, यह मुझको म्वीकार है। आपकी भक्ति के कारण से मैं भरतकुल में म ने कहा-मजिम प्रिय कार्य के लिये रहगी। पाप गय राजाओं में श्रेष्ठ हो और आप । से ॥१ अध्याय ९७। मा भारत कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् । समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च - यद्विभो ॥ १४ ॥ तत्सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् । एवं वसन्ती पुढे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ॥ १५ ॥ पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्ग प्राप्स्यति ते सुतः । वैशम्पायन उवाच-तथेत्युक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १६ ॥ पुत्रजन्म प्रतीक्षन्वै स राजा तदधारयत् । एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः ॥ १७ ॥ तपस्तेपे सुतस्यार्थे स भार्यः कुरुनन्दनः । तयोः समभवत्पुत्रो वृद्धयोः स महाभिपः ॥ १८ ॥ शान्तस्य जज्ञे सन्तानस्तस्मादासीत्स शान्तनुः । संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान्त्रिजातान्स्वेन कर्मणा ॥ १९ ॥ पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः । प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥ २० ॥ पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव । त्वामाबजेद्यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ॥ के गुणों को सौ वर्ष तक कहकर मी समाप्त नहीं सन्तान की इच्छा से तप करने लगे । बुढ़ापे की कर सकती हूं। ऋपिवंश में जो प्रश्न्यात थे, उनकी अवस्था में प्रतीप के महाभिषक नाम का पुत्र उत्पन्न साधुता और श्रेष्टता कहीं नहीं जा सकती । हे हुआ 1 वृढे राजा के शान्तचित्त होने पर उत्पन्न धर्मज्ञ ! मैं इस प्रतिज्ञा से आपकी पुत्रवधू होना होने के कारण महाभिषक् का दूसरा नाम शान्तनु म्वीकार करती हूं कि, जो मै कुछ कलंगी उसके पड़ा । महाराज शान्तनु पिछले वर्ग के मुम्ब को सम्बन्ध में आपके पुत्र को कुछ कहने का अधिकार याद करके शुभ कर्मों को करने लगे ॥१२॥१०॥ न होगा। इस प्रतिज्ञा के अनुसार आपके पुत्र चलेंगे, थोड़े दिनों में जब शान्तनु युवा हुए, तर तो मैं सदा उनसे प्रेम करूंगी । श्रेष्ठ सुकृती-प्रिय प्रतीप ने उनसे कहा है यान्तनु ! जब तुम उत्पन्न पुत्रों से तुम्हारे पुत्र को म्वर्ग प्राप्त होगा । वैशम्पायन नहीं हुए थे, तर एक दिन एक मुन्दरी मेरे पाम ने कहा-है गजन् ! इतना कहकर गंगा वहीं अन्त आई थी । यदि वह अनुपम रूपवाली कामिनी दीन हो गई । इधर राजा पुत्र के जन्म की गह पुत्र की कामना से, एकान्त में तुम्हारे पाम आये, देखने लगे। अव राजा प्रतीप अपनी मीमाहित तुम मेरी आना मे उमकी इच्छा पूरी करना । । Occcccccerosaceae महा मारत । आदिपर्व गहामनु चचारैकः कामयानाऽभिरूपाढ्या दिव्यस्त्री पुत्रकाम्यया । सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ॥२२॥ यच्च कुर्यान्न तत्कर्म सा प्रष्टव्या त्वयाऽनघ । मन्नियोगाद्भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ॥ २३ ॥ पैशम्पायन उवाच-एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा । स्त्रे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ॥ २४ ॥ राजा शान्तनुर्धीमान्देवराजसमद्युतिः । वभूव मृगयाशीलः सततं वनगोचरः ॥ २५॥ स मृगान्महिपांश्चैव विनिघ्नराजसत्तमः । सिद्धचारणसेविताम् ॥ २६ ॥ स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् । जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्यिमिवापराम् ॥ २७॥ सर्वानवद्या सुदती दिव्याभरणभूपिताम् । सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ॥ २८ ॥ तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाऽभूद्विस्मितो रूपसंपदा । पिवन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ॥ २९ ॥ सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् । नहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ॥ ३०॥ उममे पद सभी न पूछना कि तुम कौन हो, किसकी गगा के किनारे पर पहुँचे । वहा साक्षात् सभी ५.यादा ८ को उस विषय में भी उमस के ममान कान्तिवारी, सयांगसुन्दरी, दिव्य आभूण। ५० प0-15 न करना । वाम्मायन ने मे भूपिन, गोमा देनेवारी, दातों से शोभित एक II मन मान्ननु को यह आता देकर परम मुन्दरीसी को दमा । राजा गान्तनु ने पोदर- भरने ॥ पा अभिपिन वन पर गये । मरस मुन्दरी मणी को पनरा वस्त्र पहने हुए इन्द्र नारामा माननु पाय पनी दमा उमा भाव माना । उन शीर { में in २६ प्रापा ||| में गमाप हो आया 1 ये दोनों एक दूसरे को दमन दिन नरिने । न उमग्रीसीमामा को देखाराम 4. हा न २ माघारी हुए हनीपान यही उमजा की हदय । उसस अध्याय ९८ महामात ४७७ तामुवाच ततो राजा सान्वयञ्च्छ्लक्ष्णया गिरा । देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी वाऽथवाऽप्सराः ॥ ३१ ॥ यक्षी वा पन्नगी वापि मानुपी वा सुमध्यमे । याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥ ३२ ॥ इति भीमन्महाभारते आदिपर्वणि मंभवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽभ्ययाः ॥ ९७ ॥ हुई प्रीति के कारण से अपनी दृष्टि से दूर करती मनुष्य, किसकी कन्या हो ? तुम कोई भी हो, मैं थी। अन्त में राजा शान्तनु ने बड़ी मधुर वाणी चाहता हु कि, तुम मेरी स्त्री होना स्वीकार करो मे उस स्त्री से कहा-हे सुन्दरी ! तुम कौन हो ? ॥२५॥३२॥ तुम देवता, दानव, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, नाग या आदिपर्व का मत्तानवेवां अध्याय ममाप्त हुआ। वैशम्पायन उवाच- अथ अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥ -एतच्छ्त्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च । वसूनां समयं स्मृत्वाऽथाऽभ्यगच्छदनिन्दिता ॥ १ ॥ उवाच चैव राज्ञः सा हादयन्ती मनो गिरा । भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ॥ २ ॥ यत्तु कुर्यामहं राजञ्च्छुभं वा यदि वाऽशुभम् । न तद्वारयितव्याऽस्मि न वक्तव्या तथाऽप्रियम् ॥ ३ ॥ एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव । वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ॥ १॥ यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम । प्रहर्पमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ॥ ५ ॥ ॥ अट्टानवेवां अध्याय ९८ ।। वैशम्पायन ने कहा-हे जनमेजय ! मधुर । किन्तु इस शर्त पर कि, यदि मैं आपका प्रिय या मन्द मुमकान के साथ राजा के कहं हुए इन अप्रिय चाहे जो कुछ कर, आप न तो मुनरोक वचनों को मुनकर और वसुओं से की हुई अपनी मकेंगे और न कुछ अप्रिय वचन ही कह सकेंगे। प्रतिज्ञा को म्मरण करके मुन्दरी गंगा मे कहा-हे जबतक आप इस प्रतिज्ञा का पालन करेंगे, तब- राजन् ! मैं ग़नी होकर आपकी इच्छा पूरी करंगी, तक में आपके पाम रहूंगी। यदि आपने मुझे रोका तथेति सा आविषष ४७८ महाभारत .. आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी । न प्रष्टव्यति मन्यानो न स तां किंचिदूचिवान् ॥ ६ ॥ स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च । उपचारेण रहस्तुतोष जगतीपतिः ॥ ७ ॥ दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी । मानुपं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ॥ ८ ॥ भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताऽभवत् । शान्तनोनृपसिंहस्य देवराजसमातेः ॥ ९ ॥ संभोगस्नेहचातुर्येहविलास्यमनोहरैः राजानं रमयामास यथा रेमे तथैव सः ॥ १० ॥ राजा रतिसक्तत्वादुत्तमस्त्रीगुणैर्वृतः । संवत्सरानृतून्मासान्वुवुधे न बहुगतान् ॥ ११ ॥ रममाणस्तया साधं यथाकामं नरेश्वरः अष्टावजनयत्पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत । प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमजयत् ॥ १३ ।। या अप्रिय वचन कदे, तो निश्चय आपको त्यागकर और मनोहर हाव-भाव से उसका मन बहलाने लगी। चरी जाऊंगी। गजा के स्वीकार करने पर गंगा शान्तनु भी उत्तम स्त्री के गुणों पर मोहित होकर उम धीर प्रतापी और मुन्दा राजपि को पाकर बहुत उसके साथ क्रीडा में आसक्त हो गये । इस तरह प्रमन्न हुई। उसके माथ पंह मुग मे गजा शान्तनु अनेक ऋतुएं और वर्ष व्यतीत हो गया किन्तु 41 ममय व्यतीत होने लगा । न पूछने की प्रतिमा राजा को कुछ भी विचार न था कि, कितना समय कांना टममे उमक पारे में कुछ भी व्यनीन हो गया ||८.११॥ पचन मंक। उसक चरित्र, मानाण, उदाता और राजा ने उसके माथ क्रीडा करते हुए समय मेवा मे गजाननु पंड प्रमान ने २ ॥१७॥ ममय पर देवताओं के समान आट पुत्र उसस दिया-विमी, विमिनी, गमाया दम किये, परन्तु जो पुन उत्पस होता था, उसको यह नार यंदर पास इन्द्र ममान गजा तुरन जन में हाल देती थी और यह कहकर उसकी नमुपामगर, उनी आशा का पान पानमा किमैं आपको प्रमन करने के लिय का माभाग, नेर, पमुगई, अन नाप एमा कानी ह । रामा RE 414 पाम बहुत . -------------- अध्याय ९८J महाभारत PRATARAMMARG तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत्तदा । न च तां किंचनोवाच त्यागाद्भीतो महीपतिः ॥ १४ ॥ अथैनामष्टमे · पुत्रे जाते प्रहसतीमिव । उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन्पुत्रमात्मनः ॥ १५ ॥ मा वधीः कस्य काऽसीति किं हिनत्सि सुतानिति । पुत्रप्नि सुमहत्पापं संप्राप्तं ते सुगर्हितम् ॥ १६ ॥ स्त्र्युवाच-पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर । जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ॥ १७ ॥ अहं - गङ्गा जन्हुसुता महर्पिगणसेविता । देवकार्यार्थसिद्धयर्थमुपिताऽहं त्वया सह ॥ १८॥ इमेऽष्टी वसवो देवा महाभागा महौजसः । वसिष्टशापदोषेण मातुपत्वमुपागताः ॥ १९ ॥ तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते । मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ॥ २० ॥ तस्मात्तजननीहेनोर्मानुषत्वमुपागता जनयित्वा वसूनप्टौ जिता लोकास्त्वयाऽक्षयाः ॥ २१ ॥ ही अप्रिय था, परन्तु इस डर से कि, वह छोड़कर करनेवाले पुरुषों में श्रेष्ठ समझे जाओगे । अब आपके चली न जाय, कुछ नहीं कह सकते थे। इस प्रकार पाम रहने की मेरी अवधि बीत गई । प्रतिज्ञा के समशः गंगा ने सात पुत्रों को जल में फेंक दिया। अनुसार अब मैं नहीं रही। मैं जनु की कन्या यथासमय आठवां बालक उत्पन्न हुआ। हमनी हूं । मेरा नाम गंगा है । महर्षिगण मदा मेरी सेवा हुई गहा मे राजा ने अति दुःखी होकर अपने पुत्र क्यिा करने हैं । देवताओं का कार्य सिद्ध करने के की रक्षा के लिये उमस कहा-तुम इस बालक को लिये मैं आपके पास रही। ये आपके आट पुत्र न मारो । तुम किसकी कन्या हो। तुम्हारा क्या महातेजाबी आठी वमु थे । वनिष्ट ऋषि के शाप नाम है ! तुम क्यों इन पुत्रों की हत्या कर डालनी से उन्हें मनुष्ययोनि में जन्म लेना पड़ा। इस हो !हे पुत्रों की हत्या करनेवाली ! तुमको पुत्र वध पृथ्वी पर आपके समान पिता और मेरे ममान का महापाप हुआ ॥१२॥१६॥ माना उन्हें नहीं मिल मकती थी । हमरिय उन गहा ने कहा-ई पुत्रकामी ! मै इम आपके माना होने के लिये मैंने मानवी गरीर धारण किया पुत्र को न मागी । इस पुत्र से आप पुत्र उरान था । आपन आठों यमुओं के स्निा टोकर अक्षय. - ४८० महा मारत । आदिपर्व - देवानां समयस्त्वेप वसूनां संश्रुतो मया । जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ॥ २२ ॥ तत्ते शापाद्विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ॥ २३ ॥ एप पर्यायवासो मे वसूनां संनिधौ कृतः । मत्प्रसूर्ति विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ॥ २४ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि भीष्मोत्पत्तावष्टनवतितमोऽध्याय ॥ ९८ ॥ लोक जीत लिया। मैंने वसुओं से यह नियम किया पुत्र मांगा था, इससे हर एक वसु ने आठवें भाग से था कि, जन्म लेते ही मै उनको मानवी शरीर से इस पुत्र को उत्पन्न किया है। मेरे उत्पन्न किये मुक्त करूंगी। मैंने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली हुए इस पुत्र को गंगादत्त अर्थात् गंगा का दिया थी। अब आठौं वसु आपव ऋषि के शाप से छुट- । हुआ जानना ॥१७॥२४॥ कारा पा गये हैं। मैने आपके लिये वसुओं से एक आदिपर्व का अट्ठानवेवां अध्याय समान हुआ । अथ नवनवतितमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥ शान्तनुरुषाच-आपवो नाम को न्वेप वसूनां किं च दुष्कृतम् । यस्याभिशापात्ते सर्वे मानुपी योनिमागताः ॥ १ ॥ अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् । यस्य चैव कृतेनायं मानुपेषु निवत्स्यति ॥ २ ॥ ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम्. । मानुषेपूदपद्यन्त तन्ममानव जाहदि ॥ ३ ॥ वैटापागनवाच एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् । भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥ ॥ निम्नानयेया अध्याय ९५ ॥ मान्ननु ने गगा मे कहा आपब ऋषि कौन मा कर्म किया, जिममे यह मनुष्य-लोक में रहेगा ! ८. यमुओं ने उनका क्या अपराध रिया या किहे जानी ! बमु सब लोकों के ईश्वर होकर क्यों आम ने मपि नाप में मनुष्य-गरीर धारण इम पृथ्वी में उत्पन्न हुए, यह गुझमे कहो । रिया ! मुझे दिय दुप. भाप दम पुत्र ने कौन बसणायन ने कहा कि, देवी जादयी गंगा ने पुरुषों Ans.ww अध्याय ९० महाभारत ४८१ ८ गङ्गोवाच-यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम । वशिष्टनामा स मुनिः ख्यात आपत्र इत्युत ॥ ५ ॥ तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् । मेरोः पावें नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥ ६ ॥ वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन्भरतसत्तम । वने पुण्यकृतां श्रेष्टः स्वादुमूलफलोदके ॥ ७ ॥ दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता । गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपादरतर्षभ । अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥ ९ ॥ सा तस्मितापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥ १०॥ अथ तद्वनमाजग्मुः कदाचिद्भरतर्षभ । पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्पिसेवितम् ॥ ११ ॥ ते सदारा वनं तन्त्र व्यचरन्त समन्ततः । रोमिरे रमणीयेषु पर्वतेपु बनेपु च ॥ १२ ॥ तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती बने तस्मिन्यां ददर्श सुमध्यमा ॥ १३ ॥ में श्रेष्ठ पति राजा शान्तनु मे यह कहा-हे भारत एक ममय मुरमि नामवाली देवी दक्ष की जो पहिले वरुणदेव के पुत्र हुए, उन्हीं वशिष्ठ मुनि कन्या ने जगत के उपचार के लिय कश्यप में का नाम आपत्र है । आपब ऋषि का पवित्र आश्रम नन्दिनी नाम की कामधेनु गी उत्पन्न की थी, वही सुमेरुपर्वत के पास है । वहां मृा आदि अनेक उन मुनि को हवन-सामग्री देनेवाली गाय थी। प्रकार के पशु-पक्षी रहा करते है । मब ऋतुओं मुनियों के निवामम्यान उम पवित्र आश्रम में मम के फूल मदा खिल रहने है। वह म्यान सदा अनेक जगह वह नन्दिनी गाय निर्मय विनरनी थी। प्रकार के फलों से परिपूर्ण रहता है । हे मरतश्रेष्ट! मरतश्रेष्ठ ! एक ममय पृथु आदि वसुगम देवर्षि वही पुण्यवान् वरणपुत्र मोटे फल-मूल जलयुक्त से मेविन उम वन में आप अपनी मियों माय उम वन के आश्रम में तपम्या क्यिा करते थे ॥१७जिरने रगे और रमणीय पर्यन और निकुंज में घर. - ४८२ महा मारत । आदिपष AARAF मा नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसंपदा ॥ १४ ॥ द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृपभेक्षण । आपीनां च सुदोग्ध्री च सुवालधिखुरां शुभाम् ॥ १५ ॥ उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च । एवं गुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी ॥ १६ ॥ दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन । द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम ॥ १७ ॥ उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान्वदन् । गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितक्षणा ॥ १८ ॥ ऋपेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम् । अस्याः क्षीरं पिवेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे ॥ १९ ॥ दशवर्षसहस्राणि जीवेत्स्थिरयौवनः । गतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा ॥ २० ॥ तमुवाचानवद्यागी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी ॥ २१ ॥ नाम्ना जितवती नाम रुपयौवनशालिनी । उशीनरम्य गजः सत्यसन्धस्य धीमतः ॥ २२ ॥ उघर काटा परना है इन्द्र के ममान विक्रम देवी से उसका रूप और गुण बतलाकर कहा-हे थान.! उनमें मे एक वमु की मुन्दरी स्त्री ने उस मुन्दरी ! जिम ऋषि का यह उत्तम तपोवन है, वन में विचरती हुई मुरभि की कन्या नन्दिनी को उसी वरणपुत्र ऋषि के हवन की गौ यह काले दम्बा । हे राजेन्द्र पर कामधेनुओं में श्रेष्ठ, शील नेत्रवाली देवी सुरभि की पुत्री है । हे सुन्दरी ! मगति मे युक्त, बंटे पड़े धनोंवाली, पहुत दृध जो मनुष्य इस नन्दिनी का मीठा दूध पियेगा, वर देनयारी, गुन्दर पंग और पुरोवाली, शुभरक्षण, धिर-योयन पाकर दस हमार वर्ष तक जीता रहेगा। म और मय गुणों से युक्त को देपार आश्चर्य- हे नृपोराम ! उम महिमुन्दरी या पत्री ने या ! गुद अपने पनि सो नामबाल. वम को शिवराई । मगकर अपने नेजम्बी पनि से कहा ॥८॥२०॥ या ने गुनि पुओ को देगार अपनी प्रिय- मनुष्य-रोक में रप यायनवासी भूदय की anatanne........................... स अध्याय .. महाभारत - ६८३ AAAAAAAMRAPARAN दुहिता प्रथिता लोके मानुपे रूपसंपदा । तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम् ॥ २३ ॥ आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन । यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद ॥ २४ ॥ मानुपेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता । एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित ॥ २५॥ प्रियं प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत्कथंचन । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्पया ॥ २६ ॥ पृश्वायैतृभिः सार्धंद्यौस्तदा ता जहार गाम् । तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप ॥ २७ ॥ ऋपेस्तस्य तपस्तीनं न शशाक निरीक्षितुम् । हृता गौः सा तदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः ॥ २८ ॥ अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः । न चापश्यत्स गां तत्र सवत्मां काननोत्तमे ॥ २९ ॥ ततः स मृगयामास बने तस्मिंस्तपोधनः । नाध्यागमच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः ॥ ३०॥ कन्या मेरी सहेली है। वह बुद्धिमान् , सत्यवादी, में आकर, अनुराग से अन्धे हो रहे, वसु ने मुनि राजर्षि उशीनर की पुत्री नितवती रूप और जवानी के तप के प्रभाव का विचार नहीं किया। उन्होंने से मनोहर है। महाभाग ! उसके लिये मुझे यह नहीं सोचा कि, यह काम करने से मुनि भार पछडेसहित इस गा के रेने की अभिलाषा है। देदेंगे और उससे मेरा अध पात हो जायगा । इसके दे देवताओं में श्रेष्ट । आप यह मेरा प्रियकार्य पश्चात् वम्णपुत्र मपि फर रेकर अपन आश्रम में अवश्य कीजिये । मेरी सहेली इस गौ का दृध आये, परन्तु बडेसहित उस गी को न देखा, पीकर मनुप्य रोक में सदा युवा और रोग से वर्जित तब वह बुद्धिमान् तपोधन उस गौ को वन में इधर- रहेगी ॥२१॥२५॥ उधर हँढने लगे । बहुन देर तक तराश करने पर यो नामबार यमु ने यह बात सुनकर अपनी भी उसका पता न लगा। अन्त को उन्होंने दिय प्रिय देवी का कार्य करने के लिये पृथु आदि अपने दृष्टि से देखा कि, वमुगण उनकी गाय को हर भाइयों के साथ उस कामधेनु को हर ले गये । रे गये हैं। उन्होंने क्रोध में होकर उमीक्षण वह म माय अपनी कमर नेत्रबाली बी के कहने वसुओं को यह गाप दिया कि, पिन वमुओं ने - -- - AAG-35AMMONS Sccc AAN ४८४ महामारत । आदिपर्व kawwwnweatuwwewwwwxinsaacseemand ज्ञात्वा तथाऽपनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः । ययो क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा ॥ ३१ ॥ यस्मान्मे वसवो जहाँ वै दोग्ध्रीं सुवालधिम् । तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः ॥ ३२ ॥ एवं शशाप भगवान्वसूस्तान्भरतर्षभ । वशं क्रोधस्य संप्राप्त आपवो मुनिसत्तमः ॥ ३३ ॥ शप्त्वा च तान्महाभागस्तपस्येव मनो दधे । एवं स शप्तवान्राजन्वसूनष्टौ तपोधनः ॥ ३४ ॥ महाप्रभावो ब्रह्मर्पिर्देवान्क्रोधसमन्वितः । अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः ॥ ३५ ॥ शप्ताः स्म इति जानन्त ऋर्षि तमुपचक्रमुः प्रसादयन्तस्तमृर्षि वसवः पार्थिवर्षभ ॥ ३६ ॥ लेभिरे न च तस्मात्ते प्रसादमृपिसत्तमात् । आपवात्पुरुपव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात् ॥ ३७ ॥ उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः । अनुसंवत्सरात्सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ ॥ ३८ ॥ अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति । द्योस्तदा मानुपे लोके दीर्घकालं स्त्रकर्मणः ॥ ३९ ॥ मेरी मुलक्षणा, मुन्दर वाली दुधारी कामधेनु हर धर्मों के ज्ञाता ऋषिश्रेष्ठ वरुण के पुत्र ने किसी गई वह निश्चय मर के मर मनुष्य योनि में जन्म तरह क्षमा न करके कहा-मैंने पृथु आदि तुम सब रंग ॥२६॥३१॥ यमुभी को शाप दिया है, किन्तु तुम सब लोग एक है भरनष्ट! मुनियों में श्रेष्ठ आपय प्रांध ही वर्ष के भीतर इस शाप मे छुटकारा पा जाओगे । प, यमुओं को शाप देकर फिर तप करने रंग। परन्तु ये द्या, जिनके कारण तुम सब को शाप मिला था वायुओं को जब यशिष्ठ के शाप देने का हाल. १, रहुन दिनों तक पृची पर रहकर अपने कर्म मामा, नव वे फिर यशिष्ट के आश्रम में फर. भोगेंगे । धयोंकि यही असल में अपराधी हैं। बाप और प्रसार मे याषि को मनाने लगे। मैने प्रोध के यश होकर जो कर दिया है, यह घट पातु गावि विमा नाद मन्तुष्ट नहीं हुए। मय नहीं माना। इमक मिवाय धोका वंश वी --.-territate अध्याय ९०J मदा मारत नानृतं तच्चिकीमि क्रुद्धो युष्मान्यदब्रुवम् । न प्रजास्यति चाप्येप मानुषेषु महामनाः ॥ १० ॥ भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः । पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान्वर्जयिष्यति ॥ ११ ॥ एवमुक्त्वा वसून्सर्वान्स जगाम महानृषिः । ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा ॥ १२ ॥ अयाचन्त च मां राजन्वरं तच्च मया कृतम् । जाताजातान्प्रक्षिपास्मान्स्वयं गङ्गे स्वमम्भसि ॥ ४३ ॥ एवं तेपामहं सम्यकशतानां राजसत्तम । मोक्षार्थ मानुपाल्लोकायथावत्कृतवत्यहम् ॥ ४ ॥ अयं शापादृपेस्तस्य एक एव नृपोत्तम । द्यौ राजन्मानुपे लोके चिरं वत्स्यति भारत ॥ १५ ॥ वैशम्पायन उवाच एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम् ॥ १६ ॥ स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत् । युनामा शांतनोः पुत्रः शांतनोरधिको गुणैः ॥ १७॥ शांतनुश्चापि शोकातों जगाम स्वपुरं ततः । तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान्गुणान् ॥ ४८ ॥ पर नहीं चलेगा। ये धर्मात्मा और धर्मशास्त्र के को डुबोया है । अब ऋषि के शाप के कारण पूरे पण्डित होकर, बी-भाग त्याग करके, पिता केवल ये द्यो नामक वसु बहुत दिनों तक पृथ्वी का प्रिय और हित करेंगे ॥३२॥४०॥ पर रहेंगे । वैशम्पायन ने कहा-ई राजन् ! इतना वसुओं मे यह कहकर महात्मा वशिष्ठ चले कहकर और आटो कुमार को रेकर गंगादेवी गये । इसके उपरान्न सब वसुओं ने मेरे आंग अन्तद्धान हो गई । वही घी नाम के वसु मान्ननु प्रार्थना की। हे गगादेवी ! हमारे जन्म लेते ही के पुत्र होकर देवान और गाझेय नाम में प्रसिद्ध तुम हमें जल में दुवा देना। मैंने उनसे ऐमा करना हुए । रोग उन्हें पिता में भी अधिक गुणी ममन- म्वीकार कर लिया । हे राजन् ! हम प्रकार वसुओं पर उनकी प्रशमा करते थे । राजा माननु अन्न की माप से छुड़ाने के स्यि ही मैने इन बारकों को दुसित होकर अपनी नगरी को रने आये । AAAd-21 मामात आदिपष KERARMA महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः । यस्येतिहासो द्युतिमान्महाभारतमुच्यते ॥ १९ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वण्यापवोपाख्याने नवनवतितमोऽध्याय ॥ ९९ ।। उन्हीं भारतवंश में उत्पन्न शान्तनु राजा के गुणों । हूं, जिनका यह इतिहास महामारत नाम से प्रसिद्ध का और उनके भाग्यशाली होने का वर्णन करता है ॥४१॥४९॥ आदिपर्व का निन्नानवेवां अध्याय समाप्त हुआ। 1 OHOUDHA vidoessoesdewwcoarsencotersect अथ शप्ततितमोऽध्यायः ॥ १०॥ वैशम्पायन उवाच-स राजा शान्तनुर्धीमान्देवराजर्पिसत्कृतः ।। धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ॥ १ ॥ दमो दानं क्षमा बुद्धिहीं तिस्तेज उत्तमम् । नित्यान्यामन्महासत्त्वे शान्तनौ पुरुपर्पभे ॥ २ ॥ एवं स गुणसंपन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः । आसीन्द्भरतवंशस्य गोता सर्वजनस्य च ॥ ३ ॥ कम्युग्रीवः पृथुव्यसो मत्तवारणविक्रमः । अन्वितः परिपूर्णाथैः सबै पतिलक्षणैः ॥ ४ ॥ तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्य सततं नराः । धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥ एतान्यासन्महासत्त्वे शांतनौ पुरुपर्षभे । न चास्य सदृशः कश्चिद्धर्मतः पार्थिवोऽभवत् ॥ ६ ॥ ॥ सारा अध्याय १०० ।। शम्पायन ने कहा है राजा जनमेजय ' महात्मा के रक्षक थे । उनकी गर्दन शह के समान, परामम गजा माननु यई धमामा और मत्यवादी प्रसिद्ध मम्त हाथी के समान और दोनों कय कर की दुए । देवना और गर्षि उनकी सरकार करते थे। तरह ऊचे थे। ये सम्पूर्ण अर्थ और राजरक्षण से जितेन्द्रियता, दान, दया, बुद्धि, रोक रचा, धर्य गपिन थे । उन यशस्वी महाराज के चरित्र को और प्रभाव, ये मध गुम राजा शान्तनु में घिरम्प देखकर मयको निश्चय हो गया कि, धर्म ही अर्थ विमान थे । भरतपुर दीपक राजा मान्ननु और याम से घ87 11११५॥ पामिर, मणमामा और भरतका नया मजा राजा शान्तनु के समान धार्मिक और कोई ।

अध्याय १५० महा मारत ४८७ वर्तमानं हि धर्मेषु सर्वधर्मभृतां वरम् । तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यपेचयन् ॥ ७ ॥ वीतशोकभ्यावाधाः सुखस्वप्ननिवोधनाः । पतिं भारतगोतारं समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ८ ॥ तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा । यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः ॥ ९ ॥ शान्तनुप्रमुखैगुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा । नियमात्सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत ॥१०॥ ब्रह्म पर्यचरत्क्षत्रं विशः अत्रमनुनताः । ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शुद्राः पर्यचरन्विशः ॥ ११ ॥ स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने । वसन्सागरपर्यन्तामन्वशासवसुंधराम् ॥ १२ ॥ स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवायजुः । दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत्प्रियदर्शनः । तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद्वायुवेगसमो अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः ॥ १४ ॥ राजा नहीं हुअा । उनको धर्मात्माओं में श्रेष्ठ देख- क्षत्रिय, और वैदय तीनों वर्गों की मेवा में तत्पर कर मर राजाओं ने महाराज की पदवी दी। उनके रहते थे ॥६॥११॥ शासन के समय में किसी को गोक, भय और राजा गान्तनु कुरुवंशियों की राजधानी हस्तिना- चिन्ता नहीं थी। सब मदा मुख मे सोते और पुर में रहकर समुद्र-पर्यन्त सारी पृवी का शासन जागने थे । इन्द्र के समान तेजम्बी और कीर्तिमान करते थे । घर्मन, सत्यवादी और सरल म्वभाववाला उस राजा के शासन-समय में मय राजा यज और राजा शान्तनु दान, धर्म और तपस्या के बल से दान करते थे। शान्तनु आदि भरतवंशी राजाओं इन्द्र के समान था। राग और द्वेष न होने के में चारों वर्षों का धर्म बढ़ने लगा। कारण बढ़ चन्द्रमा के ममान मुभोमित, सूर्य के क्षत्रियलोग बामणों की सेवा करते थे, वैश्यलोग सदृश तेजम्ची, वायु के ममान बल तथा विक्रम क्षत्रियों के भाज्ञाकारी य और गहलोग बामण, वाला, कुपित होने पर साक्षात् काल के समान और युतः ॥ १३ ॥ . जवे । Awari राज्य-काल ४८८ महा मारत । आदिपर्व वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् । शान्तनौ. पृथिवीपाले नावर्तित तथा नृप ।। १५ ।। ब्रह्मधर्मोत्तरे राज्ये शान्तनुर्विनयात्मवान् । समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः ॥ १६ ॥ देवर्षिपितृयज्ञार्थमारभ्यन्त तदा क्रियाः । न चाधर्मेण केप चित्प्राणिनामभवद्वधः ॥ १७ ॥ असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्त्तताम् । स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत्पिता ॥ १८ ॥ तस्मिन्कुरुपतिश्रेष्टे राजराजेश्वरे सति । श्रिता वागभवत्सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ॥ १९ ॥ स समाः पोडशाष्टौ च चतस्रोऽष्टौ तथाऽपराः । रतिमप्राप्नुवन्स्त्रीपु वभूब वनगोचरः ॥ २० ॥ तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः गाङ्गेयस्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च । महावलो महासत्त्वो महावीर्यों महारथः ॥ २२ ॥ स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा गङ्गामनुसरन्नदीम् । भागीरथीमल्पजला शान्तनुदृष्टवान्नृपः ॥ २३ ॥ क्षमा में पृथ्वी के समान था। हे राजन् ! उसके राजा और पिता था । सब लोग सत्य बोलनेवाले, गज्य में मृग, बाराह, पशु पक्षी आदि जीव नहीं दानी और धर्मात्मा थे । छत्तीस वर्ष तक गृहस्था. मार जाने गरे राज्य में अहिंमारप ब्राह्मणों श्रम का मुख भोगर शान्तनु वन को चले गये । का धर्मही प्रधान धर्म माना जाता था। राजा उनका पुत्र पी नाम वसु का अवतार, गगा के गर्म वय कामोध मे गरिन नम्रता माथ समान में उत्पन्न, मदारमा देवयनका, आचार, चरित्र और भाव में मय प्राणियों की रक्षा करने दक्या विधा आदि में उनके सहा था |॥१२॥२०॥ पापिया और पिम्प काही शिया हाती भी। यह बल और पार्यवाला, महासत्यवान् , महा। का अपम मेदिमा नीव की नहीं मारता था। रथी और गदा आदि सर अम्यों चगंन में या शादी, अनाथ, पा, पी आदि मब । निपुण राजा शान्तनु एक दिन गग की याण में वसुः ॥ २१ ॥ 1 M ~ ...- अध्याय १००। मा मारत तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनुः पुरुपर्पभः । स्यन्दते किं त्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्टा यथा पुरा ॥ २४ ॥ ततो निमित्तमन्विच्छन्ददर्श स महामनाः । कुमारं रूपसंपन्नं ' वृहन्तं चारुदर्शनम् ॥ २५ ॥ दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् । कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णेरवस्थितम् ॥ २६ ॥ तां शरैराचितां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्तिके । अभवद्विस्मितो राजा दृष्ट्वा कर्मातिमानुपम् ॥ २७ ॥ जातमात्रं पुरा दृष्ट्वा तं पुत्रं शान्तनुस्तदा । नोपलेभे स्मृति धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम् ॥ २८ ॥ स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहयामास मायया । संमोह्य तु ततः क्षिप्रं तत्रैवांतरधीयत ॥ २९ ॥ तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शांतनुः । शेकमानः सुतं गङ्गामब्रवीदर्शयेति ह ॥ ३० ॥ दर्शयामास तं गंगा विभ्रती रूपमुत्तमम् । गृहीत्वा दक्षिणे पाणी ते कुमारमलंकृतम् ॥ ३१ ।। घायल करके उसके पीछे जाते हुए, निकटवर्ती गगा था, इस कारण यह नहीं जान सका कि, वह उसी तट पर पहुँचे । वहा उन्होंने देखा, नदी का जल का पुत्र है । अपने पिता शान्तनु को अचम्भे में बहुत घट गया है । ये देखकर राजा शान्तनु छोड़, यह वारक वहीं पर अन्तद्धीन हो गया। सोचने रंग कि, आज पहिले की तरह गगा की शान्तनु ने उस अद्भुन कार्य को देखार अन्त को वडी धारा नहीं दीख पडती,क्या कारण है ॥२१॥२४॥ गगा से कहा-हे गगादेयी ! यह चारक, जो अभी पता रगाने पर उन्ह दीख पड़ा कि, वडा मारी अन्तर्धान हो गया है, क्मिका है । मुझे फिर उसे देखने में सुन्दर रूपवाला देवराज क समान सुन्दर दिखलाओ । नदियों में श्रेष्ठ गगा पड़े-गहन पदिन- एक कुमार जर के प्रवाह को वाणों से रोके हुए, पर उस अनेक आभूषणों से अरकृत युमार का दिव्य मन्त्रों का प्रयोग कर रहा है। गना ने गगा ! दाहिना हाथ पकड़े हुए राजा के आगे आई। के पानी को वाणों से ढका हुआ देखकर, उम बालक निर्मल पात्र पहिने हुए नाना प्रकार के आभूषणों के विचित्र कार्य को देखकर आश्चर्य माना । बुद्धि- से सजी हुई गगा को पहिरे देख चुक्ने पर भी मान् शान्तनु ने जन्म लेते ही उस पुत्र को देखा ! टमने नहीं पहिचाना । तर गगा ने कहा- पुरष . wedda2-2Case ४९० हा मारत । आदिपय स चायं अलंकृतामाभरणैर्विरजोम्बरसंवृताम् दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात्स शांतनुः ॥ ३२ ॥ गङ्गोयाच- यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः । पुरुषव्याघ सर्वास्त्रविदनुत्तमः ॥ ३३ ॥ गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् । आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥ ३४ ॥ वेदानधिजगे साड्गान्वसिष्ठादेष वीर्यवान् । कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ॥ ३५ ॥ सुराणां समतो नित्यमसुराणां च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद्वेद सर्वशः ॥ ३६ ॥ तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः । यद्वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन्प्रतिष्ठितम् । तव पुत्रे महावाही सांगोपांग महात्मनि ॥ ३७ ॥ प्रपिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् । यदस्त्रं रामश्च तदेस्मिन्प्रतिष्टितम् ॥ ३८ ।। महेवासमिमं राजनराजधर्मार्थकोविदम् । मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय ॥ ३९ वैशम्पायन ग्याप तयेवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शांतनुः । भ्राजमान यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति ॥४०॥ अब मे पदिरे आपने मेरे गर्भ मे जो मुर और असुर दोनों को प्यारा है । असुरों के राटया पालक उसन दिया था, यद यही है गुर शुशचार्य जिन जिन मात्रों को जानते हैं यद आपका पुत्र सम्पूर्ण अत्र विद्या माम्बार अन्छी और देवता दैत्य सप जिनकी वन्दना करते हैं, तह निपुग हो गया है ॥२५१३॥ हम्पनि जो कुछ जानते हैं, सो सब इस पारक ने दारान इमा। मामा पोई माम्ब रिया है। प्रतापी कटोर परपि जामदगि । वा नदी का मरना । इस बार और विमम पुत्र परशुराम जिस मात्र विद्या को जानता दे में भनि। आप इम पुग ने पशिष्ट प्रापि से मर अत्र इमोद दियवीर रानन्' मदिराकी पाहै। भारत ! यह अब मैं धर्म अध वा जाननवाला महापामारी summero Accusarcoewwwcourseowesonaswamorce व्याम दे .

अध्याय १००J महा मारत HAVE पौरवस्तु पुरी पुरीं गवा पुरन्दरपुरोपमाम् । सर्वकामसमृद्धार्थ मेने सोऽऽत्मानमात्मना ॥ ११ ॥ पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् । गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यपेचयत् ॥ ४२ ॥ पौरवाञ्च्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः । राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ ॥४३॥ स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः । वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः ॥ ४४ ॥ स कदाचिद्वनं यातो यमुनामभितो नदीम् । महीपतिरनिर्टिश्यमाजिघ्रद्गन्धमुत्तमम् ॥ ४५॥ तस्य प्रभवमन्विच्छन्विचचार समन्ततः । स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् ॥ १६ ॥ तामपृच्छत्स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् । कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्पसि ॥४७॥ साऽब्रवीद्दाशकन्याऽस्मि धर्मार्थ वाहये तरीम् । पितुर्नियोगाद्भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः ॥ १८ ॥ आपका यह पुत्र आपको देती हूं। इसको घर ले राजा शान्तनु ने बड़े मुख के साथ चार वर्ष व्यतीत जावें । वैशम्पायन ने कहा-राजा शान्तनु गंगा की किये । इसके पश्चात् एक दिन राजा गान्तनु यमुना आज्ञा से सूर्य-सदृश पुत्र को लेकर अपने नगर में । के किनारे के वन में पहुँच गये । वहां एक अद्भुन, आये ॥३४॥४०॥ अपूर्व सुगन्धि को मूंघकर यह देखने लगे कि, यह उस पुत्र को पाकर राजा शान्तनु ने अपने सुगन्धि कहां से आती है । थोड़ी देर इधर-उधर को कृतार्थ समझा । उन्होंने मन में सोचा कि, इतने घूमने के उपरान्त उन्होंने देवरूपिणी एक कन्या दिनों के पश्चात् अब मैं सचमुच समृद्धिशाली हुआ । को देखा । राजा ने उस काली आंम्बवाली कन्या अब पुरु-वंश के राज्य की रक्षा के लिये शान्तनु ने से पूछा-तुम कौन हो ! किसकी कन्या हो ! इस गुणवान् महात्मा पुत्र को युवराज बनाया । हे भरत वन में किसलिये आई हो ! कन्या ने कहा-तुम्हारा श्रेष्ठ ! महायशम्बी शान्तनु के पुत्र ने अपने सच्चरित्र कल्याण हो, मैं दाशराज की पुत्री हूं। उन्दी की और सद्गुणों के कारण पिता को, पुरवासियों को आना से धर्म के लिये नाव चलाती है । राजा और सारी प्रजा को प्रेमी बनाया । बड़े विक्रमवाले शान्तनु ने उम दाग-कन्या को रुपवती, मुगन्धवती, 1 । आदिपय ४९२ महाभारत रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् । समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शांतनुः ॥ ४९ ॥ स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा । पर्यपृच्छत्ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् ॥ ५० ॥ स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ॥ ५१ ॥ जातमात्रैव मेदेया वराय वरवर्णिनी । हृदि कामस्तु मे कश्चित्तं निवोध जनेश्वर ॥ ५२ ॥ यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ । सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ॥ ५३ ।। समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप । न हि मे त्वत्समः कश्चिद्वरो जातु भविष्यति ॥ ५४॥ शान्तनुरुवाच-श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्ययमहं तव । दातव्यं चेत्प्रदास्यामि न स्वदेयं कथंचन ॥ ५५ ॥ दादा उवाच-अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते । स्वदूर्ध्वमभिपेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ॥ ५६ ॥ वैशम्पायन उवाच-नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शांतनुः । शरीरजेन तीवेण दह्यमानोऽपि भारत ॥ ५७ ॥ मधुरमोदिनी और देवरूपिणी देखकर मन में उसकी राजा ने कहा-आपका क्या कार्य है ! स्पष्ट- इच्छा की । उस कन्या के पिता के पास जाकर म्पष्ट कहो । दाशराज ने कहा-हे पृथ्वीनाथ ! अपनी इचा प्रगट की और पूछा कि, तुम मेरे इसके गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो, वह आपके पीछ माथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिये प्रसन्न राजा हो । तुम किसी दूमरे पुत्र को अभिषिक्त या नहीं। दाशराज ने कहा-ई नरेगकन्या नहीं कर सकोगे । वैशम्पायन ने कहा है भारत ! के जन्म के समय ही मने निधय कर लिया या राजा शान्तनु यद्यपि उस समय कामामि से उस कि यह कन्या रिमा या को दी जायगी। इसके कन्या पर मोदित हो रहे थे, परन्तु उसने उस दो में मेरी एक प्रार्थना, यदि आप उमको धीमरों के राजा को यह वर नहीं दिया और उस वीकार करनी में यह कन्या आरशे दे माना कन्या का अपने हृदय में ध्यान करते हुए हस्तिना- पुर को चले गये । राजा शान्तनु शोक से बिल . tra ANAM अध्याय १००। मामा रत ४१३ Prasunaukansasues स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः । प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ॥ ५८ ॥ ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् । पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमत्रवीत् ॥ ५९ ॥ सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः । तकिमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ॥ ६० ॥ ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन । न चाश्वन विनिर्वासि विवों हरिणः कृशः ॥ ६१ ।। व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्या हि तत्र वै । एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभापत ॥ ६२ ।। असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु । अपत्यं नस्त्वमेवेकः कुले महति भारत ॥ ६३ ॥ शम्बनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः । अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ॥ ६ ॥ कथंचित्तव गाड्य विपत्तो नास्ति नः कुलम् । असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ॥६५॥ होकर सोच ही रहा था कि, इनन में उसके पुत्र पहुंच रही है । मैं उसको दूर करने का उपाय देववत ने आकर कहा-हे पिताजी ! आपका सव वगा । यह बात सुनकर शान्तनु ने कहा-हे प्रकार से कुगर देखता हू । ममी राजा आपकी पुत्र ! इसमें सदेह नहीं कि, मुझको इन दिनों मोच आना मानते हैं । फिर आप क्यों ऐसे शोकाकुर, हो रहा है । उसका कारण मी रहता है, मुनो। दुखिन और चिन्तित दीन्न पड़न है। मालूम होता है पुत्र । भारतकुन-दीपक मेरे केवर एक तुम्ही है, आप मेरे ही विषय में कुछ मोच रहे हैं पुत्र हो । तुम मदा अम चगने में नियुक्त और ॥५२॥६॥ या की इच्छा में रंग रहते हो । हे पुत्र ! में हे राजन् ! मुझमे आप कुछ नहीं करते हैं। मनुप्य की अनित्यता समझकर बोर में पड़ा हुआ में देवना हु कि, आर दिन दिन पारे पड़ने जाते हैं। १ । यदि किमी तरह तुमरर कोई विरच आपरे, आपका गरीर भी निधिर हुआ जाना है। आप तो हमारा वश ही नही रहेगा। इसमें कोई मदा घोड़े पर चटार घूमने के रिच भी नहीं जाने में नहीं कि, तुम एक ही पुत्र मो पुत्रों में प्रेम हो, जानना चाहता हूँ कि, आपको कौनमी पीड़ा इसी कारण मेरि विवाह करने की सभी .. ar महाभारत [ आदिपर्व ४९४ : न चाप्यहं वृथा भूयो दारान्कर्तुमिहोत्सहे । सन्तानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ॥ ६६ ॥ अनपत्यं त्यैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । अग्निहोत्रं त्रयीविद्या सन्तानमपि चाक्षयम् ॥ ६७ ॥ सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नाहन्ति पोडशीम् । एवमेतन्मनुष्येषु तच सर्व प्रजाखिति ॥ ६८ ॥ यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः । एपा त्रयी पुराणानां देवतानां च शाश्वती ॥ ६९ ॥ त्वं च शूरः सदामी शस्त्रनित्यश्च भारत । नान्यत्र युद्धात्तस्मात्ते निधनं विद्यते क्वचित् ॥ ७० ॥ सोऽम्मि संशयमापन्नस्त्वयि शांते कथं भवेत् । इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ॥ ७१ ॥ वैशम्पायन उवाच- -ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः । देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ॥ ७२ ॥ अभ्यगच्छत्तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् । तमपृच्छत्तदाऽभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ॥ ७३ ।। नहीं करना । यश की रक्षा के लिये केवल यही के नष्ट होने पर मनुष्य का जीवन व्यर्थ हो जाता इच्छा किया करता है कि, तुम सदा युगल से है । हे भारत ! तुम शूर और शस्त्र चलाने में सदा रही । धर्ममा का यह कहना है कि, जिसके एक नियुक्त रहते हो, इससे युद्ध में ही तुम्होर नष्ट होने दीपुर है, वह पुत्र होन के बराबर है। अमिहोत्र, की सम्भावना है । इसी कारण मैं चिन्ता में पड़ा वेद पाट और शिष्यों में विद्या के प्रचार आदि से रहता है । हे पुत्र ! इसके सिवाय और कुछ मेरी अक्षय फर मिरनाद, परन्तु पुन के स्नेह के परापर चिन्ता का कारण नहीं है । वैशम्पायन ने कहा- राई नहीं होना । दल मनुष्य ही नहीं, पशु और है राजन् ! बुद्धिमान् देवव्रत ने राजा से यह सब पक्षी भी पुत्र का मंगल का मूल समझने है ॥६१.६८॥ मुनकर युछ देर तक सोचा । फिर हितचिन्तक हममें गई मदद नहीं जिम मनुष्य के बूढ़े मन्त्री के पास जाकर पिता की चिन्ता का मनार सतीद, उमरही कभी भय नहीं रहता कारण पूछा । ६ भारतश्रेष्ठ ! उमके पूछने पर और उरी मुनि होती है । इमी यात उम गपवती कन्या के लिये दाशराज ने जो यर भी बंद, पुरान और देवना भी वहन है । मनान मागा था, यह सर मन्त्री ने कह सुनाया। इसके Www--- अध्याय 1००1 महा मारत तम्मे स कुरुमुग्न्याय यथावत्परिपृच्छते । वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ॥ ७ ॥ ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रियः सहितस्तदा । अभिगम्य दाशराज कन्यां वने पितुः स्वयम् ॥ ७५ ॥ तं दागः प्रतिजग्राह विधिवत्प्रतिपूज्य च । अब्रवीचनमासीन राजसंसदि भारत ॥ ७६ ॥ त्वमेव नाथः पर्याप्तः शांतनोभरतर्षभ । पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ७७ ॥ को हि संबन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं योवनमीदृशम् । अतिझामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ७८॥ अपत्यं चैतदार्यस्य यो युप्माकं समोगुणः । यस्य शुक्रात्सत्यवती संभृता वरवर्णिनी ॥ ७९ ॥ तेन मे बास्तात पिता ते परिकीर्तितः । अर्हः सत्यवतीं वोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ॥ ८० ॥ अमितो ह्यपि देवर्षिः प्रत्याग्यातः पुरा मया । सत्यवत्या भृगं चार्थी स आसीदृषिसत्तमः ॥ ८१ ।। कन्यापितृत्वात्किंचित्तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप । बलवत्सपत्ननामत्र दोपं पश्यामि केवलम् ॥ ८२ ॥ पश्चात् बूढे क्षत्रियों को माध लेकर देववन म इन्द्र को भी मताप होगा। यह मन्यवनी कन्या दाशराज के पास गये । वहा जकर उन्होंने पिना जिम मनुष्य के वीर्य से उत्पन्न हुई है, वह पुरण करिये दाशरान में टयकी कन्या मागी ॥६०१७-॥ आपके ही ममान गुणवान् है । उन्होंने कई बार दाशराज ने उसका विधिपूर्वक मत्कार क्यिा मुझम आपके पिता का नाम रेकर कहा था कि, और कहा- भरतवगियों में श्रेष्ठ आर मत्र गब वह धर्मन राना, सत्यवती मे विवाह करने योग्य धारियों में श्रेष्ठ और महाराजा मान्तनु के क्रीन है । देवर्षि अमित ने भी यह कन्या मुनम मानी बेटे है । आप म्वय मर विषयों के का है, परन्तु थी, परन्तु मैंने उनको देना सचिन नही ममता । आम्मे कुछ कहता ह । एमे प्रगमनीय और प्रार्थ हे नृतन ! मैं इन कन्या का पिता ह, इमान्य नाय सम्बन्ध को अम्बीकार कर देने में साक्षात् आपमे कुछ कहता हु । इम कन्या के देने में मुझे otomomaccouveworrowavesLLGIRL-tworce - merous r आदिप ४९६ महाभारत यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा । न स जातु चिरं जीवेत्त्वयि क्रुद्धे परंतप ॥ ८३ ॥ एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने .परंतप ॥ ८४ ॥ वैशम्पायन उवाच-एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तयुक्तं प्रत्यभापत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ॥ ८५॥ इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतांवर । नैव जातो न वाऽजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ॥ ८६ ॥ एवमेतत्करिप्यामि यथा त्वमनुभाषसे । योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नोराजा भविष्यति ॥ ८७।। इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत । चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ॥ ८८ ॥ संप्राप्तः शान्तनोरमितद्युतेः । कन्यायाश्चैव धर्मात्मन्प्रभुर्दानाय चेश्वरः ॥ ८९ ॥ इदं तु वचनं सौम्य कार्य चैव निवोध मे । कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिंदम ॥ ९० ।। यत्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण । राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ॥ ९१ ॥ 'बलवान् से शत्रुता' का दोष दीख पड़ता है ॥७६६८२ इच्छा है उसे मैं पिता की भलाई के लिये अवश्य इसके पुत्रों की तो किन में गिणती है यदि पूरी करूंगा। मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूं कि, इस आप देवता या किसी गंधर्व के भी विरोधी हो, तुम्हारी कन्या के जो पुत्र होगा उसी को राज्य मो आप के क्रोध करने पर वह भी जीता नहीं रह दंगा। ऐसी प्रतिज्ञा आज तक न किसी ने की माता। आपके पिता को कन्या देने में मुझे इस और न करेगा। यह बात सुनकर दाशराज ने राज्य धान के मियाय और कोई सोच नहीं है । वैशम्पायन के लिये पूरा काम करने के लिये फिर कहा-हे ने कहा- हे राजन ! गा के पुत्र महात्मा देयमन धर्मात्मा ! आप शान्तनु के पुल को बढ़ाने के लिये में दागगज से यह पनि मुनकर मय क्षत्रियों के आय हैं। इस कन्यादान के आप भी फर्ता हायें । आंग मनितापूर्वक कहा-है दासराज ! जो तुम्हारी शांतशील ! मैं आपसे कुछ और भी कहना त्वमेव नाथः - अध्याय १००1 म हा मारत वैशम्पायन उवाच- नान्यथा तन्महावाहो संशयोऽन न कश्चन । तवापत्यं भवेद्यत्तु तत्र नः संशयो महान् ॥ ९२ ॥ -तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः । प्रत्यजानात्तदा राजन्पितुः प्रियचिकीर्षया ॥ ९३ ॥ गाड्नेय उवाच-दाशराज नियोधेदं वचनं मे नृपोत्तम । शृण्वतां भूमिपालानां यब्रवीमि पितुः कृते ॥ ९४ ॥ राज्यं तावत्पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः । अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ॥ ९५ ।। अद्य प्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्य भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविप्यन्त्यक्षया दिवि ॥ ९६ ॥ वैशम्पायन उवाच-तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संप्रहृष्टतनूरुहः । ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ।। ९७ ॥ ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा । अभ्यवर्पन्त कुसुमै प्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ ९८ ॥ ततः स पितुराय तामुवाच यशस्विनीम् । अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ॥ ९९ ॥ चाहता हूं; कन्या के ऊपर स्नेह होने के कारण यह भी प्रतिज्ञा करता हूं, मुनो । हे गजवृन्द ! में उसकी भलाई के लिये और कुछ कहता हूं, वह भी राज्य छोड़ने की प्रतिज्ञा पहिले ही कर चुका हूं। सुनिए । हे सत्यधर्मशील ! आपने सत्यवती के पुत्र पुत्र के राज्य पाने में जो सन्देह हुमा के लिये इन राजाओं के सामने जो प्रतिज्ञा की है, है, उसके दूर करने के लिये भी में प्रतिज्ञा करता वह आप जैसे महानुभावों से ही हो सकती है. हंकि, मैं आज से जन्म-पर्यन्त ब्रमचारी रहेगा। ॥८३१९१॥ इससे मेरे निःसंतान होने पर भी मुझं अक्षय म्यग- है महामाहु ! इसमें मुझे कुछ भी संदेह नहीं लोग मिलेगा । वैशम्पायन ने कहा है राजन् ! इस है, किन्तु आपकी जो सन्तान होगी उसकी ओर से बात को सुनकर दाशराज बहुत प्रसन्न हुआ और मुझ पड़ा संदेह है। वैशम्पायन ने कहा-हे राजन् ! देवनत को कन्या लाकर दे दी। उस समय देवनामों दाशराज का अभिप्राय समनकर पिता का प्रिय ने देववत पर आकाश मे फूलों की वर्षा की और करने के लिये सत्यधर्मवाले गला के पुत्र दवात कहा कि, इसने भीष्मयत किया है। इससे उमा ने कहा-हे दाशराज ! मैं इन राजाओं के सम्मुख नाम भीम होगा। इसके पश्चान भीम ने पश- अब - । आदिपर्य ४९८ महामार वैशम्पायन उवाच-एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम् । आगम्य हास्तिनपुरं शांतनोः सन्यवेदयत् ॥ १०० ॥ तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः । समेताश्च पृथक्चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ १०१ ॥ तच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शांतनुः । स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने ॥ १०२ ॥ न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि । त्वत्तो ह्यनुज्ञां संप्राप्य मृत्युः प्रभविताऽनघ ॥ १०३ ॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने शततमोऽध्याय ।। १०० ॥ म्विनी, योजनगंधा सत्यवती से कहा-हे माता ! राजाओं ने भीष्म की उस प्रतिज्ञा को जानकर रथ पर सवार होकर अपने घर को चलो। वैशम्पायन प्रशंसा की । राजा शान्तनु ने अत्यंत प्रसन्न ने कहा-हे राजन् ! यह कहकर भीष्म ने उसको होकर यह वरदान दिया कि, जब तुम चाहोगे, रथ पर स्वार कर लिया और हस्तिनापुर में लाकर तभी तुम्हारी मृत्यु होगी ॥९२११०३।। अपने पिता को सब वृत्तान्त कह सुनाया । सब आदिपर्व का सौवां अध्याय समाप्त हुआ ।। अथ एकाधिकशततमोऽध्याय ॥ १०१ ॥ वैशम्पायन उयाच-ततो विवाहे निवृत्ते स राजा शांतनुर्नृपः । तां कन्यां रूपसंपन्नां स्वगृहे सन्यवेशयत् ॥ १ ॥ ततः शान्तनवो धीमान्सत्यवत्यामजायत । वीरश्चित्राङ्गदो वीर्यवान्पुरुषेश्वरः ॥ २॥ अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः । विचित्रवीर्य राजानं जनयामास वीर्यवान् ॥ ३ ॥ अप्राप्तवति तम्मिस्तु यौवनं पुरुषर्षभे । स राजा शान्तनुर्धीमान्कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४ ॥ ". मी तक, अध्याय १०१ ।। वगायन ने पहा- राजन् ! विवाह हो अपन अन्त पुर में रम्या । कुछ दिनों के पश्चात् । जाने पर गजा माननु ने सवती, मत्यवती को गत्यवती के गर्भ स, पुरुषों में श्रेष्ठ, पराक्रमी चित्रा- AUBERO- अध्याय १०१॥ महाभारत ४९० Vinocumesonew स्वर्गते शान्तनी भीमश्चित्राङ्गदमरिंदमम् । स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः ॥ ५ ॥ स तु चित्राङ्गदः शौर्यात्सर्वाश्चिक्षेप पार्थिवान् । मनुष्यं न हि मेने स कंचित्सदृशमात्मनः ॥ ६ ॥ तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा । गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाऽभ्ययात्तदा ॥ ७ ॥ तेनास्य सुमहद्युद्धं कुरुक्षेत्रे वभूव ह । तयोर्वलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुरत्ययोः । नद्यास्तीरे सरस्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद्रणः ॥ ८ ॥ तस्मिन्विमर्दै तुमुले शस्त्रवर्पसमाकुले । मायाधिकोऽवधीद्वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ॥ ९ ॥ स हत्वा तु नरश्रेष्टं चित्राङ्गदमरिन्दमम् । अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ॥ १० ॥ तस्मिन्पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि । भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ११ ॥ विचित्रवीर्यं च तदा वालमप्राप्तयौवनम् । कुरुराज्ये महावाहुरभ्यपिञ्चदनन्तरम् ॥ १२ ॥ द और विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुए । उससे युद्ध करने को आया । कुरुक्षेत्र में सरस्वती पुरुषा में श्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी युवा भी न हुए थे नदी के किनारे उन महावर्ग, उत्साही, दोनों वीरों कि, महाराज गान्तनु की मृत्यु हो गई । इसके का आपस में घोर युद्ध होता रहा । अन्त में वही पश्चात् भीष्म ने सत्यवती की आज्ञा से चित्राङ्गद मायावाले गन्धर्वराज ने वीर कुरुनदन को युद्धभूमी को राज्य पर अभिषिक्त किया ॥११५|| में गिराया । मनुप्यों में श्रेष्ठ राजा चित्रागद माया चित्राङ्गद ने अपने घर से सब राजाओं को न जानते थे, इसी कारण वे गन्धर्वराज के हाथों जीतकर अपने वश में किया । वे किसी मनुष्य मारे गये । वीर चित्राङ्गद को मारकर वह गन्धर्व को अपने बराबर नहीं समझते थे । सुर, असुर, म्वर्गलोक को चरा गया ॥६॥१०॥ मनुप्य आदि सब ने चित्राङ्गद से हार मान री। महातेजम्बी चित्राङ्गद के मारे जाने पर भीम उसी अवसर में एक चित्रामद नामवाला गर्व ने विधिपूर्वक उनका दिया कर्म कराया । तत्पश्चात् -ano मदा मारत । आदिपर्य विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः । अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ॥ १३ ॥ स धर्मशास्त्रकुशलं भीम शान्तनवं नृपः । पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत् ॥ १४ ॥ निमामामारते आदिपपगि मभयपषीण विधानदीपाख्यान एकाधिकशततमोभ्याय ॥ १०१ ।। मा. मन्दमताल भरने नाबारिंग विचित्र• करने लगा। वह धर्मशास्त्र का शाता जिस प्रकार रागार में अभिपित किया। विचिनचार्य भीष्म की प्रतिष्ठा करता था, उसी प्रकार भीम ने भामा निराग्य का सामन भी धर्मानुमार वैसा ही उसका पालन किया ॥११॥१५ धादिषपापमो एप अभ्याए समान हुभा ।।

८०० महा मारन । आदिपर्व विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः । अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ॥ १३ ॥ धर्मशास्त्रकुशलं भीष्म शान्तनवं नृपः । पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत् ॥ १४ ॥ इति श्रीमन्महामारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चित्राङ्गदोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्याय ॥ १०१ ।। महाबाहु, सत्यनतवाले भीम ने नाबालिग विचित्र- करने लगा। वह धर्मशास्त्र का ज्ञाता जिस प्रकार वीर्य को कुरुराज में अभिषिक्त किया। विचित्रवीर्य । भीष्म की प्रतिष्ठा करता था, उसी प्रकार भीष्म ने भीष्म की आज्ञानुसार पिता के राज्य का शासन भी धर्मानुसार वैसा ही उसका पालन किया ॥११॥१४ आदिपर्ष का एक सौ एक अध्याय समाप्त हुआ । प्रथम अङ्क समाप्त हुआ। श

Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-i

Author
Maharishi,vedvyas
Title
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-i
File name
Sachitra Mahabharat Bhasha Tika Ank-i
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2012/08
Publisher
Lahore.,laxmandas Pyarelal Jain Sanskrit Pustakalaya
Language
Sanskrit
Pages
518
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312689
Barcode
99999990321452.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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LPG5cfRs3Mn
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