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Chandrakala Natika

Sahityacharya,prabhat Shastri · 2012/08

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कृतिकार एवं कृति . विश्वनाथ का स्थिति-काल संस्कृत साहित्य के इतिहास में कविराज विश्वनाय सम्मान्य प्रालंकारिक और कवि हुए है । उनका साहित्यशास्त्र का लक्षणग्रन्थ 'साहित्यदर्पण' अपनी सुबोध एवं स्पष्ट शैली के लिए अत्यन्त लोक-प्रिय है। उसमें काव्य तया नाट्य दोनो तत्त्वो को प्रामाणिक मीमासा है। विश्वनाथ के पिता, पितामह कवि तो थे ही, उनकी बहुत बडी विद्वद् मण्डली भी थी जो साहित्यविद्या मे निष्णात थी, इसका पता हमे 'साहित्यदर्पण' में उद्धृत छन्दो से चलता है । अत. संस्कृत- साहित्य के पाठको के लिए कविराज विश्वनाथ का नाम और कृतित्व नया नहीं है। उनकी प्रशस्त कृति 'चन्द्रकला नाटिका' जो अब तक उपेक्षित पड़ी थी, उसका सागोपाग प्रकाशन पाठको के लिए नवीनता अवश्य रखता है । मध्यकालीन इतिहास (१२वो शती ई.) के पश्चात् विश्वनाथ की स्थिति है और वे १४वो या १५ वो शती ई० में किसी समय रहे, उत्कल प्रदेश के कलिंग नरेश नरसिंहभानुदेव चतुर्थ की सभा में महासान्धिविग्नहिक के रूप में उनकी प्रतिष्ठा थी। उनकी स्थिति और काल के सम्बन्ध में इतनी सो धारणा सामान्य तया है । किन्तु उनके प्रन्य एव तत्कालीन इतिहास के प्राप्त शिलालेख मादि में कुछ ऐसी सामग्री उपलब्ध होती है जिससे हम उनके काल के सम्बन्च में 'इदमित्थम्' निर्धारण करने के सूत्र भी पाते हैं। यहाँ संक्षेप में उन साक्ष्यो एव प्रमाणो के साथ विश्वनाथ की कालस्थिति पर विचार किया जाता है । 'साहित्यदर्पण' में अलावदीन नृपति (सुलतान अलाउद्दीन १२९५-- १३१६ ई०) का उल्लेख है।' तथा जयदेव के 'गीतगोविन्द पधीमचरित' १ साहित्यदर्पण परिच्छेद ४ : सन्यो सर्वस्वहरणं निग्रहे प्राणविग्रहः॥ प्रसाबुद्दीननपती न सन्धिनं च विप्रहः ॥ २. साहित्यदर्पण परिच्छेद १० । ३. वही परिच्छेद। - ।

कृष्णानन्द कवि कृत 'सहृदयानन्द के छन्द उदाहरण रूप में उद्धृत किये गये है, एव रस के सम्बन्ध में धर्मदत्त के मत का उल्लेख है । इन ग्रन्थकारो का स्थिति-काल (कृष्णानन्द तथा धर्मदत्त को छोडकर ) १२वी शती के मध्य है, यह सर्वविदित इतिहास है । 'कृष्णानन्द' कवि सम्भवत विश्वनाथ के समकालिक एवं उनके तद्देशीय थे । वे भी विश्वनाथ की तरह किसी नृपति की राजसभा मे सान्धिविग्रहिक-पद पर नियुक्त थे, उनके महाकाव्य की पुष्पिका में इसका उल्लेख है-'इति श्री सान्धिविग्रहिक सकलकवि-कुलमौलिमण्डन श्रीकृष्णानन्द- कृत सहृदयानन्द महाकाव्ये ".."। कलिंग नरेश चतुर्थ का एक ताम्रपत्र मिलता है जिसमें 'कृष्णानन्द सान्धिविग्रहिक महापात्र' का उल्लेख है ताम्रपत्र का समय हो सकता है जो नरसिंहदेव चतुर्थ का शासनकाल–१४१४ ई० है । ये कलिंगनरेश नरसिंह चतुर्थ १४वी शती के उत्तरार्द्ध से १५ वो शती के प्रथम शतक में शासनारुढ थे । अत 'सहृदयानन्द' के रचयिता कृष्णानन्द की कलिंग ही स्थिति होने के कारण उनका कविराज विश्वनाथ के समकाल होना बहुत सम्भव है जिसके कारण उन्होने अपने समकालिक परिचित कवि के छन्द को 'साहित्यदर्पण' में उद्धृत किया, क्योकि 'सहृदयानन्द' 'गीतगोविन्द' 'नपधीयचरित' के समान ऐसा प्रथित महाकाव्य नही था कि उसका उल्लेख सामान्यतया लक्षण- ग्रन्थो मे किया जाता । कृष्णानन्द नरसिंह चतुर्थ की सभा में थे, नरसिंह चतुर्थ का समय १४वी शती उत्तरार्द्ध है, अत कृष्णानन्द के कृतित्व का उल्लेख १. यही परिच्छेद । २. तदाह धर्मदत्त स्वग्रन्थे- रसे सारश्चमत्कारः सर्वत्राप्यनुभूयते, तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राप्यद्भुतो रस तस्मादभुतमेवाह कृतो नारायणो रसम्॥ -साहित्यदर्पण परिच्छेद ३ । ३. ...."तत्र विजय समये पावें महापात्र कृष्णानन्द साधिविग्रहिक महागत्र लाण्डरप प्राचार्य, महापात्र गोपीनाथ साधिविप्रहिक...। ४. सिस्क्रिप्टिव कटलाग-संस्कृत मैनुस्क्रिप्ट्स पाफ उडीसा पृ०७४ ।

करनेवाले कविराज विश्वनाथ के स्थिति-काल को पूर्व सीमा १४वी शती का पूर्वाद्ध हुई । अर्थात् इसके पूर्व विश्वनाथ को स्थिति नही होनी चाहिए। अब पर-सीमा पर विचार करें।' प्रतापरुद्रयशो भूपण' के टीकाकार कुमारस्वामी ने टीका में 'साहित्यदर्पण' का उल्लेख किया है।' 'काव्य प्रकाश' के टीकाकार गोविन्दठक्कर ने अपनी प्रदीप-टीका में कविराज विश्वनाथ के मत की आलोचना की है। गोविन्द ठक्कर का उल्लेख काव्यप्रकाश के टीकाकार कमलाकर भट्ट ने क्यिा है, कमलाकर भट्ट की टीका १६१२ ई० में लिखी गयी । अत गोविन्द ठक्कर १६४० ई० के पूर्व रहे होगे। कुमारस्वामी विजय- नगर सम्राट् मल्लिकार्जुन की सभा को अलंकृत करते थे, यह मान्यता है । मल्लिकार्जुन देवराय द्वितीय के पुत्र थे, देवराम द्वितीय की मृत्यु १४४६ ई० में हुई, उसके बाद ही मल्लिकार्जुन सिंहासनारूढ़ हुए। अत १४५० ई० कवि- राज विश्वनाथ के स्थिति-काल की पर-सीमा हुई । ऊपर निर्धारित पूर्व एवं पर-सोमा के अनुसार कविराज विश्वनाथ १४वी शती ई० उत्तरार्द्ध से लेकर १५वी शती ई० पूर्वार्द्ध बीच किसी अवधि में वर्तमान थे। इनके स्थिति-काल के सम्बन्ध में और निकटतम प्रमाण हमें उपलब्ध है । विश्वनाथ के पिता चन्द्रशेखर भी सान्धिविग्रहिक एवं कई भाषानो के कवि थे । - १ सम्मोहानन्द सम्भेदो मदोमद्योपयोगज' इत्यादि साहित्यदर्पणे (परिच्छेद ३।१४६) २ अर्वाचीनास्तु 'ययोक्तस्य काव्य लक्षणत्वे काव्यपर निविषयं प्रविरल विषय वा स्यात ।' (प्रदीप )-अविरलविषयं वा निर्विषय वा स्यात्' ( साहित्यदर्पण । परिच्छेद प्रयम ।) ३ वसुऋतु ऋतुभूमिते गतेऽन्दे नरपतिविक्रमतोऽय याति रोदें। तपसिशिवतियो समापितोऽयं रघुपतिपादसरोरुहेपितश्च ॥ ४. भारतीय इतिहास का उन्मीलन पृ० ४२१ ।

उनका एक छन्द विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण के व्यन्जना प्रकरण म उद्धृत किया है, जिसमे श्लेपसे शिव-भवानी तथा राजा भानुदेव और उनकी रानी उमादेवी का वर्णन है । स्वय विश्वनाथ ने छन्द की टिप्पणी करते हुए इसका स्पष्टीकरण किया है। इससे यह प्रमाणित होता है कि विश्वनाथ के पिता राजा भानुदेव को सभा में सान्धिविग्रहिक थे। भुवनेश्वर के लिंगराज मन्दिर के पार्ववर्ती पार्वती मन्दिर में एक शिलालेख प्राप्त है जिसमें भानुदेव तथा महारानी उमादेवी का नामोल्लेख है। इसी प्रकार विशाखापत्तन के सिंहाचलम मन्दिर के भी एक शिलालेख में उमादेवी का नाम मन्दिर निर्माण के लिए धनदात्री के रूप में उकित है। इस द्वितीय शिलालेख का समय १३७६ ई० है । १३७९ ई० से १४११ ई. तक नरसिंह भानुदेव चतुर्थ ने राज्य किया है जिनके पिता-माता भानुदेव और उमादेवी थे। १३७६ ई० का शिलालेख जिसमें केवल उमादेवी ना ही नाम है, उनके वैधव्य-काल का है उस समय उनके पुत्र नरसिंह भानुदेव चतुर्थ राज्य कर रहे थे। कविराज विश्वनाथ ने अपने पिता चन्द्रशेखर का उल्लेख 'साहित्यदर्पण' में सान्धिविग्रहिक विशेषण के साथ किया है । प्रत ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वनाथ ने जब 'साहित्यदर्पण' लिखा उनके पिता चन्द्रशेखर सान्धिविग्रहिक पद पर थे। और विश्वनाय ने परम्परागत उपाधि के रूप में उक्त विशेषण का उल्लेख किया होगा । अथवा न भी रहे हो तो भी चन्द्रशेखर ने उक्त छन्द भानुदेव को प्रशस्ति में तब लिखा है जब भानुदेव और उमादेवी दोनो जीवित थे, प्रत यह घटना १३७६ ई० विवा १३७३ ई० के पूर्व १ दुर्गालविव विग्रहो मनसिज सम्मोलयस्तेजसा- प्रोधद्राजकुलो गृहीतगरिमा विष्यावतो भोगिभि । नक्षश कृतेमणो गिरिगुरो गाढा च पारयन्, गामाम्य विभूतिभूपिततन राजत्युमावल्लभ ।। २ स्वस्ति श्री भाणु देवस्य प्रवर्द्धमान विजयराज्ये त्रयोदशाभिलिय। माने श्री उमादेश्या.... । ३ सा हिस्दारिपल रिसर्च जरनल भाग ३, पृ० १४६ ।

को है । पिता चन्द्रशखर की मृत्यु के पश्चात् पिता के स्थान पर ही कवि- राज विश्वनाय को नरसिंह भानुदेव चतुर्थ ने अपना सान्धिविग्रहिक नियुक्त किया होगा। भानुदेव तृतीय के पश्चात् कविराज विश्वनाथ का स्थिति-काल नितान्त स्पष्ट है । किन्तु हम इसे बहुत दूर नहीं ले जा सकते । क्योकि सान्धिविग्रहिक का पद अपने पिता के स्थान पर ही कविराज विश्वनाथ को मिला होगा । चन्द्रशेखर को उक्त प्रशस्ति भानुदेव तृतीय के जीवनकाल की है जिसका शिला- लेख पार्वती मन्दिर में है । इन राजाओ का वंशवृक्ष इस प्रकार प्राप्त होता है- कविराज उल्लासदास के आश्रयदाता नरसिंह तृतीय ( १३२८-१३५८) चन्द्रशेखर के आश्रयदाता नरसिंह भानु तृतीय (१३५३-१३७८ ) विश्वनाथ कविराज के आश्रयदाता नरसिंह चतुर्थ या निश्शंक भानुदेव ( १४००-१४२० ) रहे । और इन्ही की सभा में विश्वनाथ जी का लेखन-कार्य प्रारम्भ हुआ। जिस अलावुदीन का उल्लेख विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में किया है वह खिलजीवंश का दिल्ली का सुलतान अलाउद्दीन ही है, दूसरा नही । उसके क्रूर व्यवहार की ही प्रसिद्धि इतिहास में है। एक अलाउद्दीन बहमनी राज्य में भी हुआ है जिसका शासनकाल १४३५-१४५८ ई० तक रहा है । उसके समकाल या बाद में विश्वनाथ की स्थिति नहीं हो सकती । क्योकि विश्वनाथ के पिता चन्द्रशेखर १३७३ ई० के पूर्व भानुदेव को प्रशस्ति लिखते हैं, यदि उस समय भी हम विश्वनाथ का जन्म स्वीकार करें तो १४३५ तक ६० वर्षों से ऊपर का समय बीत जाता है, जिसके बाद हम 'साहित्यदर्पण' की रचना और उसमे बहमनी के अलाउद्दीन शासक का उल्लेख सम्भव नहीं मान सकते । चन्द्रशेखर की उक्ति श्लेपात्मक प्रशस्ति की है, इसलिए वह प्रशस्ति भानुदेव के पुत्र के समय की न होकर भानुदेव के समय की होगी, यतःश्लेप अलंकार में प्रच्छत प्रशस्ति राजा की, की गयी है । जो सामने सुनाये जाने के पौचित्य का संकेत करती है, यदि भानुदेव के पुत्र के समय यह प्रशस्ति लिखो गयी होती तो प्रशस्ति का रूप श्लेप-प्रच्छन्न न होकर और भी प्रकट होता । प्रतः १३७३ ई० मे सान्धिविग्रहिक पद पर विश्वनाथ के पिता चन्द्रशेखर ६ की स्थिति स्वीकार कर लेने पर यह मानना पडेगा कि विश्वनाथ का जन्म उसके पूर्व १३५० ई० के लगभग, अवश्य हो गया रहा होगा। मोर 'साहित्यदर्पण की रचना १३८० से १४४० ई० के बीच कभी हुई होगी । और कविराज विश्वनाथ १४वी शती के उत्तराई तया १५वी शती ई. के पूर्वार्द्ध में विद्यमान थे। 'चन्द्रकला नाटिका' को क्यावस्तु भी उनके माश्रयदाता से सम्बन्धित है. इस नाटिका की रचना भी उन्होने अपने और अपने प्रायदाता के यौवन-वाल के प्रथम चरण में को होगी । अर्थात् १३७५ से १३६० ई० के बीच में । गजपति राजायों के वंशवृत-क्रम में विश्वनाय नरसिंहदेव चतुर्थ के सान्धि-विग्रहिक थे । सिंहाचलम मन्दिर के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि नहसिंहदव ने पष्ठ अभिपेक वर्ष के उपलक्ष्य में एक नयी प्रथा का प्रचलन किया जिसे 'निश्शइ. भानुभोग' की सज्ञा दी गयी । स्पष्ट है कि नरसिंहदेव चतुर्थ 'निश्शक भानुदेव' नाम से भी ख्यात रहे। इन्हीं के दरबारी और अपने समकालिक कवि कृष्णानन्द महापान के काय 'सहृदयानन्द' के छन्द विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में उद्धृत किया है । प्रस्तु | नरसिंहदेव चतुर्थ के पुत्र निश्शकभानु को किसी विजय के उपलक्ष्य में 'चन्द्रक्ला' की रचना का अनुमान करना समोचीन नहीं है। उनकी रचनामो के क्रम में 'चन्द्रकला नाटिका का स्थान प्रथम, 'प्रशस्ति रत्नावली का चतुर्थ और 'साहित्यदर्पण' का सप्तम या अन्तिम होना चाहिए। क्योकि इन अन्यों में उन्होने अपने भापा ज्ञान की ययोत्तर वृद्धि का परिचय दिया है, नाटिका मे १४ भापानी का विद्वान् ‘प्रशस्ति रत्नावली में १६ भाषा का तथा 'साहित्य- दर्पण' में १८ भाषाओं का विद्वान् उन्होने अपने को कहा है। चन्द्रकलानाटिका-स्वरूप और समीक्षा 'चन्द्रकलानाटिका' को प्रस्तावना मे विश्वनाथ ने स्वयं को 'नाट्यवेददीक्षागुरो' सूत्रधारा द्वारा पहलाया है । अर्थात् यह कृति नाट्यशास्त्र के पारगत प्राचार्य और कवि को रचना है । जैसा कि विश्वनाथ ने अपनी प्रात्मप्रशस्ति को है उसके . १ साउथ इण्डियन इन्सक्रिप्सन्स- भाग ६, सस्या ७२० १० १ अनुरूप' इसका निवन्धन भी है। प्रागे इसकी कसौटी की जाती है । सर्वप्रथम नाटिका को परिभाषा पर विचार करें-'नाटिका में स्त्री पात्रो को अधिकता होती है चार अक होते है, ललित अभिनय होता है। इसमे नायिका कामोपचार से और प्रसाधन (शृगार ) तथा क्रोध से युक्त होती है । नायक की दूती का समावेश और सारी घटनाएं नायिका से विशेषत सम्बद्ध होती है (नाट्यशास्त्र)-दशरूपककार पनजय ने नाटिका का लक्षण इस प्रकार किया है२.-नाटिका में रानी ज्येष्ठ और प्रगल्भ होती है, राजवशोद्भूता, गम्भीर, मानिनी होती है । नायक-नायिका का समागम इसी के अधीन अत्यन्त कठिनता से सम्पन्न होता है । ज्येष्ठा के हो समान नायिका भी राजकुलोत्पन्ना एव दिव्या-मुग्धा और सौन्दर्य युक्त होती है । नायिका अन्त पुर में होनेवाले सगीत प्रादि कार्यक्रमो से सम्बद्ध होकर प्राय नायक के लिए ध्रुत और दृष्ट होती रहती है, नायिका के अनुराग में प्राबद्ध होकर नायक रानी के भय से शकित मन प्रवृत्त हुआ करता है।' स्वय विश्वनाथ ने भी साहित्यदर्पण पष्ठ परिच्छेद में नाटिका को परिभाषा करते हुए लिखा है-- नाटिका क्लप्तवृत्ता स्यात् स्त्रीप्राया चतुरधिका । प्रख्यातो धोरललितस्तत्र स्यान्नायको नप ॥ पुरसम्बद्धा सङ्गीतव्याप्तताऽयवा। नवानुरागा फन्यात्र नायिका १. निजजनकसमधिगतनिखिल साहित्यतत्वस्प--(प्रस्तायना) चन्दकला० २ देवी तत्र भवेज्येष्ठा प्रगल्भा नृपयशजा । गम्भौरा मानिनी कृशान्तन्नेतृतशा सगम ।। नायिका सादशी मुग्धा दिच्याऽचाति मनोहरा । अन्त पुरादि सम्बन्धादासन्नाश्रति दर्शनं ।। अनुरागोनयायस्यो नेतुस्तस्या ययोत्तरम् । नेतात प्रावर्तत देवी त्रासेन शति ॥ स्यादन्त नृपवराजा ।। -शहपक ११ प्रगमा सम्प्रवर्तत नेतास्या देप्यास्त्रासेन सद्भुित । देवो पुनभवेज्येष्ठा नपसगा। पदे-पदे मानवतो तश सङ्गमो वयो। वृत्ति स्मात् केशिको स्वल्पयिमः सम्यय पुनः॥- (पठा२८१ (१) उपरिलिखित परिभाषामो के अनुसार नाटिका यह कृति है जिसमें नापक धीरललित, नायिका मुग्या (नवानुरागा) हो, चार भक हो, स्त्रीपात्रो को अधिकता हो । इन स्त्रीमानो में एक ज्येष्ठा रानी का होता अनिवार्य है । नायिका पकुलोत्पन्ना होनी चाहिए । इसमें नापक महारानी से संग्रस्त रहकर ही नायिका से अनुरागवद्ध होता है और उसी की कृपा पर दोनो का समागम सम्भव है । नाट्यशास्त्र प्रणेता भरत ने इसके अतिरिक्त नाटिका में नृत्य, गायन को भी मावश्यक बताया है। और राजोचित ढग का स्वाग भी होना निरूपित किया है। धनञ्जय और विश्वनाय ने 'वैशिको वृत्ति' का होना अनिवार्य कहा जबकि प्राचार्य भरत इस विषय मे मोन है । और दशरूपककार ने नाटिका को 'शृगाररस प्रधान' बताया है। 'नाट्यदेददीचामुष' की कृति होने के कारण इसमें नाट्यशास्त्रीय समस्त लक्षणों का समावेश है । क्योकि साहित्यदर्पण म उदाहरण के लिए इसे विशेष- रूप से रखा गया है । 'नाटिका में कुल चार अक है । सप्त स्त्री पात्र एव अन्य परिचारिकाएं है। नायक, नृप चित्ररषदेव को प्रधान महिषी 'वसन्तलेखा' के ही माध्यम से नायक-नायिका के रागानुरागो को अकुरित, पुष्पित और अन्त मे फलित होने का अवसर मिलता है । नायिका 'चन्द्रकला' नवोढा पाण्ड्यराज की द्वितीया कन्या और वसन्तलेखा की भगिनी है। इसमे विप्रलम्भ शृगार का सफल सयोजन एव संघटन हुआ है ! कैशिकी वृत्ति का सम्यक निर्वाह किया गया है-नाटिका की पूर्ण परिणति चित्ररथदेव और चन्द्रकला के परिणय मे है । ( कशिकी वृत्ति का समग्न क्रिया-कलाप शृगाररस से युग और काम- फल प्राप्ति का आयोजन होना चाहिए)। यह कैशिकी वृत्ति चार प्रकार की होती है~ नर्म, नर्मस्फिञ्ज, नर्मस्फोट और नर्मगर्भ । विदग्ध क्रीडा ही नर्म है १२ जिसमे प्रिय के प्रावर्जन का प्रयास किया गया हो । नर्मस्फिज वह है जहाँ प्रथम समागम में, यदि प्रारम्भिक अवस्था मे सुख परन्तु अन्त में भय होता है । नमस्फोट वह है, जिसमें भावो के कतिपय अशो के माध्यम से कुछ रस को सूचना मिले । और जब किसी प्रयोजनवश नायक प्रच्छन्न रूप में प्रवेश करे, तो उसे नर्मगर्भ कहते है। कैशिकी वृत्ति का प्रयोग भृगाररस में ही किया जाता है ।२ 'चन्द्रकला नाटिका' शृगाररस प्रधात नाटिका है, इसमे 'कैशिको वृत्ति आवश्यक तथा उपयुक्त है। इसके चारो अङ्गो का नियोजन यथास्थान कथा वस्तु के अनुसार यथा साफल्य प्राप्त होता है । वैदर्भी-रीति-विभूपिता, प्रसाद गुण पूर्ण यह नाटिका नाट्यशास्त्रीय समस्त लक्षणो से युक्त सफल रचना है । नाटिका का कथानक रसराज वसन्त के सरस वातावरण चित्रण के साथ प्रारम्भ होता है । ऋतुराज-वसन्त एव रसराज शृगार का पारस्परिक सम्बन्ध कितना समीचीन है । नाटिका का प्रारम्भ ही इस तथ्य का द्योतक है कि नाटिका शृङ्गाररस की अभिव्यक्ति मे सफल है। 'विरचित विरहि कर्णज्वर वसन्त- समयम्' कहकर नाट्यकार ने नाटिका के क्थानक, विषय, फल आदि का सकेत कर दिया है । और- प्रमुञ्चन्नपि निजां तां कुन्दलता सुचिरमुपभुक्ताम् चम्बति रसालवल्ली अभिनघमघुगन्धिका भ्रमर ॥ कहकर विश्वनाथ ने नाटिका को सारी कथावस्तु को सक्षेप में कह डाला -राजा चित्ररथदेव कुन्दलता रूपी अपनी महारानी वसन्तलेखा को बिना वैदग्ध कोडितनम् प्रियोपच्छन्दनात्मकम । नस्फिज सुसारम्भो भयात्तो नवसङ्गमे । नर्मकोटस्तु भावाना सूचितोऽल्परसोलये । धभनेतृ प्रतीचारो नर्मगोऽयंहेतवे । दशरूपक शृङ्गारे केशिको वोरे तात्वत्यारभटोपुन । रसे रोने च वीभत्से यत्ति सर्वत्र भारती ॥ २ त्यागे ही अभिनव-मधुगन्धिका रसालवल्ली रूपी, नवानुरागा चन्द्रकला के प्रणय- पाश में भ्रमर की भांति प्रावद्ध हुए । अर्थात्- शृगार को विनियोजना का ग्राभास प्रारम्भ में ही पाठक के लिए स्पष्ट हो जाता है । विष्कम्भक-योजना द्वारा चन्द्रकला की प्राप्ति की सूचना, माकाश. वाणी का कथन, कि उसका पाणिग्रहण करनेवाला राजा स्वयं लक्ष्मो का कृपा भाजन बनेगा, उससे मत्री सुबुद्धि ने उसे अन्त करण में रख, उस ( कन्या ) को अन्त पुर में गोपनीय ढग से सुरक्षित किया, जिससे राजा के आकर्षण के लिए वह सहज स्थिति प्राप्ति कर सके, और उसका अभिलषित पूर्ण हो, यह सब सफलतापूर्वक प्रस्तुत कर दिया गया है । नाटिका का क्यानक सत्तेप में इस प्रकार है- प्रथन प्रङ्क-चन्द्रकला के अनुराग में आबद्ध राजा चिन्तितावस्था में प्रस्तावना के पश्चात् उपस्थित होता है । उसका हृदय सर्वतोभावेन चन्द्रकला में अनुरक्त होने के कारण उस समय सहसा प्रागत विदूषक का मान न कर सका । परन्तु शीघ्र ही विदूषक अपनी उपस्थिति की सूचना तथा चन्द्रकला के प्रति उसके अनुराग का राजा से कथन कर देता है । अव दोनो-राजा और विदूषक उपवन में टहलते हुए अपनी सखी सुनन्दना के साथ प्रागत चन्द्रकला को लता- कुन्ज में छिपकर देखते हैं। जैसे ही चन्द्रकला माधवीलता के पुष्प तोडने का उपक्रम करती है, राजा स्वय को उन पुष्पो को तोड़ने के लिए सादर प्रक्ट कर देता है । चन्द्रकला शील लज्जा के कारण वहां से जाना चाहती है, तब तक विदूषक-'प्रजा के द्वारा राजा को अर्जित वस्तु का पष्ठाश प्रदान करना धर्म है, प्रत चयन किए हुए पुष्पो का पष्ठाश दिये बिना यह तुम्हारा जाना उचित नहीं है,' कहकर उसे विलम्बित कर देता है । शीघ्रतावश पुन जाती हुई चन्द्रकला के हाथो से पुष्प गिर पडते है, राजा उन्हें उठाकर उसके अनुरागा भिज्ञान स्वरूप अपने हृदय से लगाता है । उसी समय महारानी वसन्तलेखा की विश्वसनीया परिचारिका रतिकला के ग्रागमन से चन्द्रकला सुनन्दना के साथ लता कुज में छिप जाती है। रसिकला राजा को महारानी के प्रामत्रण को सूचना देकर चलने का आग्रह करती है । राजा जाना अनिवार्य समझ प्रस्थान करता ।

१४ है परन्तु रहस्यवाणी द्वारा चन्द्रकला को पुनरागमन के लिए आश्वस्त भी कर जाता है। द्वितीय अङ्क-राजा, महारानी के साथ उपवन में विचरते हुए भी अपने हृदय को चन्द्रकला से दूर करने में सर्वथा असमर्थ है । अचानक एक कोलाहल सुनायी पडता है कि भयानक व्याघ्र उपवन में प्रविष्ट हो गया है। राजा तुस्त महारानी को अन्त पुर में पारिचारिकामो-सहित जाने का निदेश कर स्वयं उस व्याघ्र का वध करने के लिए सन्नद्ध होकर चलता है। परन्तु शोध व्यान विदू- पक के रूप में परिवर्तित हो जाता है । यह रसालक का स्वाग केवल महारानी को हटाने और राजा चन्द्रकला का समागम कराने के लिए जानबूझ कर दिया गया था। वह तुरन्त राजा को चन्द्रक्ला से मिलने के लिए प्रमदोपवन के एकान्त प्रान्त में ले जाता है । वहाँ अपनी सखी सुनन्दना सहित चन्द्रकला पहले से ही उपस्थित थी । सखी उससे राजा के अनुराग को असत्य पहकर उपहास द्वारा उसके विरहताप को उत्तेजित कर रही थी कि राजा प्रकट होकर उसे सान्त्वना देने लगता है । तभी व्याघ्रवध से प्रसन्न महारानी का राजा के पूजनार्थ भाग- मन जानकर चन्द्रकला भयभीत सी शीघ्रता में चली जाती है । जाते हुए उसके हाथ से अंगूठी गिर पडती है । राजा उस अंगूठी को उठाकर विदूपर से इस विचार से दे देता है कि वह इसे अपने वस्त्र में छिपाये रहे । तव सक महारानी वसन्तलेखा वहीं पहुंच जाती है। राजा को पर्चना होती है । विदूषक महारानी से पारितोपिर की याचना करता है । रानी उसे अपना हार दे देती है । यह तुरुत गले में हार भोर मंगुली में चन्द्रकलावाली मंगृटी पहिनकर 'में वितना सुन्दर लग रहा हूँ,' षहता है । अंगूठी को महारानी पहिचान सेठी है । पौर एट होकर पन्त पुर में चली जाती है। विद्रुपत राजा से महारानी से प्रगान परने का वचन देता हुमा अपनी भूस स्योर वरता है। तृतोप मर-विदूपत्र पो जप शात हुमा विपद्रवता महारानी द्वारा सुनन्दना ये घर में पिपा दी गयी है तो यह मुनन्दना से हो गुप्त मंत्रणा पाणे प्रमतवन मे मणि माप में रात्रि में समय रामाया गम्मिन पाने की योजना मनाता है। परन्तु भावपानीवश इस रहस्य मान यह महाग की परि के कारण प्रदान करने का पूर्व से ही निश्चय किया था। मत अब आप मही रानी की सहमति से उसके साथ पाणिग्रहण कर लें। समाचार को सुनकर, तुरन्त मत्री सुनुद्धि को बुलाया जाता है । वह समस्त वृत्तान्त बतलाता है। वह दिव्यवाणी की चर्चा कर अपनी सम्बन्धिनी के रूप में अन्त पुर में सरक्षित पराते का अपना प्रयोजन भी बतला देता है। उसके पश्चात चन्द्रकला उपस्थित की जाती है । पाण्ड्य देश से पाये दोनो वन्दी अपने महाराज को उस द्वितीया कन्या को देखते ही पहचान लेते हैं। महारानी वसन्तलेखा को प्रय अपने कृत्यो पर पश्चात्ताप होता है । प्रस्तु, प्रायश्चित्त सा करती हुई यह स्वय रागा ये साथ उसका पाणिग्रहण सम्पन कराती है । पाणिग्रहण के पश्चात ही वहाँ महालक्ष्मी प्रकट होकर अभीष्ट वरदान देती है और अपने दर्शन से सभी पो मृतार्य करती है । भरतवाक्य ये साथ नाटिका समाप्त होती है । पात्र राजा घिनरयवेय-नाटिया में धीर ललित नायक है । 'साहित्यदर्पण' मोर 'दशरूपय' में निरूपित उन सभी गुणो या समावेश चित्ररथदेय' में है जो नाटिया ये नायय के लिए पावश्यक परिणत किये गये है। ये प्रशस्त पुलोद्भुत हैं, शत्रुवर्ग यो पराजित पर, निश्चित, सगुण राज्य करते हैं । घोल, पोराल, पग, हावग, मोच, पाश्ची, मत्स्य, नेच्छ, नाट, मर्णाट प्रादि पे मारा अपने शौर्य एवं प्रताप या उसरे महाप्रताप में विलया पर गुर थे। राग्य पी प्रादौर सीमा पर उसपा पवलपरा प्रहरी यना रहता, कहीं, पिसी भी प्रगर का राय, द्रोह, मादिगा गय न पा । 'समस्त राम का विमारा गरमे , राप राग्यशागन- संपालमार्य रिपुण मंत्रिगणो यो नियगि पर देन ने मारण, मााािर- मोर पादि ही सियो जीवापा हा, ऐग मापो लिए राग्य-गागायो १. पातो पीरससितात पानापरी नुप ॥ मा../परि-२१ निरिघातो पीरससित RAIE, मुनी गा ।। -r/HIM मात्र चिन्ता नही हो सकती।-प्रथमाक (विदूपक) सम्पूर्ण नाटिका म एक थल ऐसा नहीं है जहाँ यह आभास मिले कि राजा राज्य में शासन, शान्ति को सुदृढ एव स्थापित करने की चर्चा करता हो, वह अपने सुहृद रसालक पक) के साथ सर्वदा आनन्दोल्लास, हास, परिहास एव लास में मग्न है। वह धीर, गम्भीर, कलासक्त मृदु स्वभाव का पुरुष है। सगीत, कला, काव्य, क का प्रेमी होने के कारण राजा ऐसे समस्त कलाकारो को उचित प्रादर सम्मान देता, उनको कलाकृतियो को समादृत कर उसके प्रसार तथा विकास गोगदान देता था। उनके मत्री सुबुद्धि का कथन-'देवो से अभिनन्दित इन्द्र मान, विद्वानो से प्रशसित तथा अभिनन्दित, चन्द्र के समान समग्र क्लायो प्रास्पद, सूर्य के समान अन्यो के प्रताप को निस्तेज करने वाले, शिव-सी ति से प्रलयत महाराज विराजमान है । (अङ्क ४/६) । उसकी कला प्रियता रविचतता तथा परख के भावाभिव्यजना के व स्थल, जहां वह अपनी प्रिया दकला के सौन्दर्य अथवा स्वभाव का कथन करता है निस्सन्देह एक कवि- य या साक्ष्य देते है-'इसके दोनो चरण अहनिशि विकसित कमल के समान, क्दनी-स्तम्भ-सदृश, कटि भाग जैसे लावण्य के समुद्र में निमग्न द्वीप हो, नो उरोज उमत्त गज के जैसे कुम्भ हों मोर रत्न सा ऊपर की ओर उठाये हो । मुख चन्द्रबिम्ब को भौति शोभित हो रहा है।' (अव १/१३) इस लावण्य शि में निमग्न राजा के मनोगत भाव देखिए- पर प्रकाशे कुचकुम्भमूले दूत निपत्य दुतकर्वरामे । सापण्यपूरे विमिमग्नमुच्चन मे पदाचिद बहिरेति चेत । -(प्रथमांक/१५) 'मेरा हृदय उमरे स्तोकोनत, तप्त स्वर्ण-सदृश यामासित उरोजों : मूल प्रान्त के सन्दर सायएयपूर में इस प्रकार निमग्न हो गया है कि उससे नबनना मेर लिए दूभर हो रहा है।' वितना रसिय भाव है। उसको घोरता, गम्भीरता एव कुसीनता या उत्कृष्ट परिचय तो यही है कि पवानुरामा घटना में अनुरक्त मन भी यह मपनी महारानी वसन्तलेयाने प्रति २ . अपने सम्मान, विनम्रता, सहनशीलता, स्नेह प्रादि के भादो में किसी भी में न्यूनता नहीं प्राने देता । यद्यपि वह चन्द्रकला की प्राप्ति में व्यवधान हो रही तथापि वह उसकी आकाशामो पर कभी आघात नही होने देता, भरी महारानी को प्रसन्न करने के भी सारे प्रयास वह करता है । रसालक द्वार मणिमन्दिर में पहुंचने का रानी द्वारा धामरण वह तुरन्त स्वीकार कर वह उपस्थित हो जाने के लिए उसके साथ उपस्थित होता है। दूसरे अंक में वह वसन्त लेखा के साथ रात्रि में स्वच्छ ज्योत्स्ना-स्नात सरोवर-कमल का सौन्दर्य देखता है, उसके कमल-मुख को प्रशसा करता है। यह सब उसके मृदु-स्वभाव का ही परिणाम था। राजा चित्ररथदेव नाटिका के लिए सर्वथा उपयुक्त नायक है । यही कारण है कि नाटिका के अन्त में लक्ष्मी ने उसके दो अभीष्टो के पूरा होने के लिए अपनी स्वीकृति दी है- प्राचन्द्रतारक मातर्मा विमुञ्च कुलं मम । भयादविरत भक्तिस्त्वयि मेऽव्यभिचारिणी ॥ 'जननि । जब तक आकाश में चन्द्र और तारिकाओ का अस्तित्व रहे, तु कुल का त्याग मत करो और मुझे सदा अपना सेवक, दास स्वीकार करो। चन्द्रकला-'मवानुरागा कन्यात नायिका नृपवराजा' (सा. ६० । परि० ६) के अनुसार चन्द्रकला नाटिका की सर्वगुण सम्पन्ना नायिका है । यह पाण्ड्येश्वर को द्वितीया कन्या और महारानी वसन्तलेखा की कनिष्ठाभगिती है ( यत् कित वनविहारावसरे देव्या समानोदरा प्रभा काचित् कुमारिका केनचिदपहत्य नीता अक ४) पाण्डयेश्वर के यहां से पाए वन्दिगणो के यह रहने पर रानी ने प्रांखो में प्राँसू भरकर कहा-बहिणी कुदो उण वठेदि ( भगिनि । तुम अब कहाँ हो ? ) इसके पूर्व प्रथम प्रक प्रस्तावना में मत्री सुवृद्धि की कथन- राजवंशजेयमिति क्ययित्वा मत्परितोषकाक्षिणा मदन्तिक प्रहिता' में उसके नृपकुलोत्पन्न होने की पुष्टि करता है। 'नायिका तादृशी मुग्धा दिव्याचातिमनोहरा' नाटिका को नायिका - मुग्धा, दिव्य और सौन्दर्यवती होना चाहिए । इसके अतिरिक्त अन्त पुर से सम्बद्ध होने के कारण नायर के लिए युत तया दृष्ट होनी चाहिए, साथ ही नायक के ति इसका अनुराग प्रारम्भ होकर उत्तरोत्तर वढते रहना चाहिए । (दशरूपक। काश-३) इस निरूपण के अनुसार 'चन्द्रकला' सर्वथा शास्त्रीय लक्षण से युक्त यिका है। वह सुन्दर है, लज्जावती, मृदुस्वभावा, यौवनमदविकारपूर्ण, रुग्धा है । अन्त पुर से सम्बद्ध है-'सुबुद्धि -मम यशजेय सखीपदे स्थापयित्वा रिपालिनीयति सादर समपिता देव्या' (महारानी के ही अन्त पुर में अपनी सम्बन्धिनी कहकर रखवा दिया है। ) मत्री सुबुद्धि ने रानी के सानिध्य में सप्रयो- जन रखवाया, जिससे राजा की दृष्टि उस पर पडे, दोनो का अनुराग हो, फिर प्रन्त में परिणय सम्भव हो सकेगा। क्योकि- पस्तु भूमिपतिभूमौ पारिणमस्या प्रहीष्यति । लक्ष्मी स्वयमुपागत्य यरमस्मै प्रदास्यति । प्रयमाङ्क/६ उसके रूप लावण्य के सम्बन्ध में भी स्वय मंत्री ने 'निरपम सौन्दर्य- पदमीरिव' कहकर अनिन्द्यसुन्दरी के रूप में स्वीकार किया है । इसके अतिरिक्त पसको सुन्दरता का वर्णन राजा चित्ररथदेव ने, और पाण्ड्येश्वर के यहां से भागत दिगणों ने भी स्पष्टतया किया है-'भुवनो का अलकार, विधाता के निर्माण-कौशल का विकास, युवकों के नेत्रो की मादकस्थली एव समस्त सुन्दर- लक्षणों की भूमि थी (अक ४७) । राजा ने उसके अनुपम सौन्दर्य का क्यन इन शब्दो में क्यिा है- सा दृष्टिनवनीलनीरजमयो वृष्टिस्तबप्यानन हेलामोहनमययत्रजनिताकृप्टिजंगच्चतस । मा भ्रू वल्लिरनङ्गशाङ्ग धनुषो यष्टितयास्यास्त्तन- लावण्यामृतपूरपूरणमयो सृष्टि परा वेघस ॥ -प्रक७ पन्नापुर में रहते के कारण चन्द्रकला से राजा, को., गजा में बनाया को २० नदः सहज अनुराग होता है । और वह अनुराम शनै शनै वद्धित होकर अन्त में दोनो के परिणय-सूत्र-बन्धन के रूप में प्रकट हुआ। नायिका चन्द्रकला नाट्य शास्त्रीय लक्षणो' के अनुसार 'मुग्धा' श्रेणी की नायिका है। 'नवश्या', कामनावती, रतिप्रतिकूला और क्रोध में कोमल (मुग्धानवषय कामा रतौ वाम मृदु ऋधि)-दशरूपक प्रकाश ३ । अर्थात् जिसको यौवनावस्था का प्रथम चरण हो, काम-भावो का प्रथम प्रवेश हो रहा हो, रति में अरुचि सो रखती हो एव क्रूर होने पर सहज में ही प्रसन्न हो जाय उसे मुग्धा कहते हैं । चन्द्रकला, महारान वसन्तलेखा को कनिष्ठा भगिनी होने के कारण नववयस्का तो है ही। प्रथमाई के अब्जद्वन्द्वमहर्निश---शीतयुतेमण्डल ' से उसके नवयौवना होने के पूर्ण लक्षण स्पष्ट है । और राजा के 'निश्चित ही इसके भी अन्त करण में काम भावो का विकार अंकुरित हो रहा है' (नूनमियमन्तनिहित मदनविकारा वर्तते--अक १) कथन से वह नवकामवती है । राजा के प्रथम दर्शन पे पश्चात् ही अनुराग भाव जो उत्पन्न हुआ वह इतना प्रगाड हो गया कि उसे राजा का वियोग असह्य होने लगता है । अननुभूत वियोग-ताप-दुख से वह अत्यन्त ही व्याकुल हो उठती है- 'वियोगावस्था का यह प्रभाव मृगनयनी चन्द्रकला परिपक्व लवली फल के सदृश पीतवर्ण तीण हो रही है, केशराशि उरझ गयो है (क्योंकि प्रसाधन करने का अवसर ही नहीं है) अपने शरीर को कोमल नलिनीपत्र-शय्या पर रखे हुए है-(प्रक २०११)। यह शीलस्वभावा अत्यन्त लज्जावती भी है। अपनी सखी सुनन्दना के साथ विचरती हुई जब भी राजा को वह देखती है, उसका मुख नम्र हो जाता है । स्वय उधर देखना नहीं चाहती और सखी के वातालाप में भी कोई विशेष रुचि नहीं दिखाती वह असगत सा उत्तर देती है- १. प्रथमायतीर्ण योयनमदनविकारा रतौ वामा । फयिता मृतुश्च माने समधिकलग्जावती मुग्धा ।। -सा०६० परि०५ २१ हसति परितोपरहितं निरीक्ष्यमाणापि नेशते रिमपि। सरपामुदाहरन्यामसमन्जसमेपोत्तरं दते ।। पंक ११४ विदूपक रसालक द्वारा चयन किए गपे पुप्पो या पठाश राजा पी सम्पत्ति होने के कारण प्रदान करने की बात कही जाने पर यह वहाँ से तुरन्त हट जाना पाहती है । राजा के सामने वह एकने में असमर्थ थी परन्तु अनुराग भावापिषय बलात् उसके हाथ के पुष्प गिर पडते है । ये सारे क्रिया-कलाप क्या उसके अनु- रागवती, लज्जाशीला होने की पुष्टि नहीं करते । अस्तु । यह मृदुलभाया, कोमल स्वभावा होते हुए भी सगीत एव चित्रकर्म प्रादि में निपुण नहीं है। परन्तु रुप लावण्य को भूमि होने के कारण वह अपने पाणिग्रहण से सनाथ राजा चित्ररथदेव को महालक्ष्मी का कृपापात्र बना देती है। उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि नाटिका की नायिका चन्द्रकला नाट्य- शास्त्रीय लक्षणो से युक्त सर्वगुण सम्पन्ना है। वसन्तलेखा-वह पाण्ड्य नरेश को ज्येष्ठा कन्या, महाराज चित्ररथदेव की प्रधान महिषी है । उसो के अधीन नायक-नायिका (राजा और चन्द्रकला) का पूर्णतया सम्मिलन हुआ । 'तदिद द्विजनिवेदित यदा च वसन्तलेखा अनु- जानाति तदा मदनुमत एवं गृहणातु पाणिमस्या देव' इति । (पारड्याधिपति के घन्दिगणो ने कहा-जिसका समाचार ब्राह्मणो ने भेजा था, उस कन्या के साथ पाप, यदि वसन्तलेखा अनुमति दे तो पाणिग्रहण कर लेने की -मेरी स्वीकृति है।'-अक ४) वस्तुत समस्त कथानक देवो वसन्तलेखा में ही केन्द्रित है, वही नायक-नायिका के पारस्परिक अनुराग के अकुरण, पल्लवन, एव अन्त में फलित कराने का श्रेय धारण करती है ।' नायक एव नायिका दोनो हो इसमें भयभीत, १ सम्प्रवत्तत नेतास्यां देप्यास्त्रासेत गति । पदे पदे मानवतीतद्वश संगमो द्वयो ।। -सा दर्पणापरि०६ स्थिति पी ही मुझे पावश्यकता है।) राजा एक बार उसके मुख-कमल। २२ राशयः रहते हैं । जैगा कि नाट्यशास्त्रीय देवी को होना चाहिए, सभी गुणों यह सम्पन्न है। यह प्रगल्भ, मानवतो, नृपवंशजा है । वह प्रौढ़ा युवती । रागानुराग के भावानुमावो प्रवट गोपन मादि शिया-पलाप में सर्वथा निरा है । रानि पी पन्दमयोत्सना में राजा के साप प्रमदोपवन में विचरती हुई उसा पथन देखिए-एतेन किल अमृतमयूरोन बौधिकाकुमुदिन्याः किसलयको स्वयमे करोऽपितो यतते । सदिवानों एतयोः परिणयार्थ तय सन्निधानमा भो माश्यते-पंक २ (दोधिका में स्थित कुमुदिनी का कर स्वयं ही सुधारश्मियों प्रालिगित हो रहा है, अतः यहाँ तो इनके विवाह के लिए मात्र प्रापकी ज 1 प्रशसा करके छलने का प्रयास करता है परन्तु उसके उलाहना देने पर 'जानामि यथा फिल ते परात्य एय सकलोऽपि प्रस्मास्यनुरागबन्ध -वह इस इच्छा की पूर्ति विवश हो करता ही है । व्याघ्र-जनित कोलाहल से भयभीत होकर 'पाश्चर्य । क्यं ब्यान्न ।' का भालिंगन पर उठती है। राजा 'प्रिये न भेतव्यम्, न भेतव्यम्' कहा उसको अन्त पुर में जाने का आदेश देता है और स्वयं उसका (व्यान) वध की के लिए प्रस्थान करता है। व्याघ्र का स्वाग रसालक को योजना थी। योजना का भेद किसी को मालूम न था । अन्त में कृत्रिम व्याघ्र वध किया हु। बताया गया । व्याघ्र वध से हर्षित महारानी पाकर राजा की अर्चना करती है वही महारानी, जब माविका द्वारा यह जान लेती है कि रसालक, राजा चन्द्रकला से मणिमण्डप में मिलन करायेगा, वह स्वयं भी वहां पहुंच जाती है चन्द्रकला, सुनन्दना, रसालक तीनो को वह बन्दो बनवाकर कारावास का दए देती है (अंक ३) उसे अपने प्रिय का अन्य रमणी के साथ प्रणय-निबन्धन स्वी कार नहीं है। अन्त में इस महारानी वसन्तलेखा का चरित्र कितना उज्जवल होकर प्रका होता है कि वह स्वय चन्द्रकला का राजा के साथ परिणय कराकर परमानन और सन्तोप का अनुभव करती है-'महाराज मेरे माता-पिता की और मेरै अनमति से आप इसका पाणिग्रहण करें। (पार्यपुत्र । माला पियोमर्ममाप्यन मत्या कर इदानी गृहाणनाम' -प ४) । इस प्रकार हम देराते हैं कि यमन्त नेवा नाटिदा यो गर्वगुग्योपेता उपेष्टा नायित है ! माया एवं नापिका पे परचात् वस्तुत इगी या नाटिया में मह य है । रसालक-माला राजा चितरप देव का मुहद-विदूषर है। यह रागा के प्रत्येक वार्ड में (चाहे वह प्रणय-व्यापार हो भपया मनोरजन) सहाया में रूप में माटिया में प्रारम्भ से पन्त तक उपस्थित है । प्रवृत्या यह वाचाल, परिहाग- प्रिय, वाक्पटु एव स्वाभिमानी मुवं है । मममानुगार यथोचित वेशधारण, शरीर प्रदर्शन किया सम्पादन प्रादि मे दक्ष, वलह-रति दोनो में रचि रखने वाला, यथावसर पठिता वाणी-कुशल है । शास्त्रोप नक्षपो एव प्राचार्यों के निर्देशानुसार ही इसका नाम रसातक है । वह ग्राम पे सभी गुण, भोजन, पारितोपित मादि ग्रहण करने में सदा उत्सुप रहने वाला, सुस्वादु, मिष्ठान का अत्यधिक भी है-उसे आम्रप्रसून श्रीखण्ड को भाति और अशोक के गुच्छे मोदप-सदृश प्रतीत होते है । (अङ्क १११२) 1 राजा के साथ विचरते हुए वह प्रकाशित चन्द्रमा के मण्डल और विखरती किरणो की उपमा किस प्रकार नवनीत पिण्ड और • दुग्ध धारा से दे रहा है। । विदूषक राजा का सर्वत्र सहायक है । जव उसने चन्द्रकला से राजा के सम्मिलन का अवसर सहज में प्राप्त होना असम्भव देखा तो सपरिवार महारानी को हटाने का तुरन्त उपाय ढूंढ निकाला, उसने तुरन्त व्याघ का स्वाग निर्मित किया और सफलता भी मिली। वह एक व्युत्पन्नमति भी है । किसी भी बात का अकाट्य उत्तर देने में वह कभी नहीं चूकता ? उसरे प्रत्येक कथन में परिहास का सम्मिश्रण अवश्य रहता है । तदिवानोसेतस्य प्रिय निवेद्य सकलानामपि मनि वराणा शिरसि चरण दास्यामि । (प्रक ३) कितना व्यजनापूर्ण वाक्य है, उसक १. कुसुमवसन्ताभिध कर्मवपुशभाशय । हास्यकर कलहति विदूषक स्यात स्वकर्मन । सादा परिक २ एष शशधरविम्यो दृश्यते हैयङ्गवीनपिण्ड ६२ । एते अस्त्र मयूखा पतन्ति माशासु दुग्धारा इव ॥ प्रकरार २४ दचता का पूर्ण परिचय मिलता है । 'गर्भदास्या सुनन्दनाया. कठोरस्तनभरेणा- पीडन गुरुक मेऽङ्ग बापते (अंक ३) महारानी की परिचारिकामो को वह 'गर्भ दास्या, दुहितर दास्या दुहितर' रहने का अभ्यस्त था । एक कथनोपकथन देखिए- राजा-सखे किमन्यत् । अनया खलु वध्वा निजगुणसघंश समाकृष्ट चेतस प्रसभ हृदये दिवानिश मे भवति मदनानलो ज्वालित । विदूषक-पारचर्यम् । तदबिलम्वित परिसृत्य दीर्घकोदधृतसलिलकुम्भेन निर्वाप्यतामेप वह्नि । रसालक वस्त्र और प्राभूषणो का भी परम प्रेमी है । जब राजा न चन्द्र कला की अंगूठी उसे वस्त्रो मे छिपाने के लिए दी तो उसने रख लिया। फिर जब महारानी । उसके 'किमिति न ददाति मे पारितोषिक देवी' कहने पर हार निकालकर देती है तो वह तुरन्त उसे गले में एव चन्द्रकला की अंगूठी अंगुली में पहिनकर कहता है-'दास्या दुहितर प्रतध्व में सौदर्यम्' । इसके अतिरिक्त नाटिका में अमात्य सुबुद्धि, सुनन्दना, रतिकला, माधविका एव पाण्ड्यदेशागत वन्दियो का नाम उल्लेखनीय है । सुबुद्धि-यह महाराज चित्ररथ देव का मत्री, राज्य शासन का सचालक है ।। नाट्यशास्त्राचार्य के अनुसार, धीरललित नायक की सिद्धि का श्रेय उसके मत्री पर निर्भर करता है। नाटिका का नायक चित्ररथ देव धीरललित नायक है। उसकी सफलता वस्तुत मत्री सुबुद्धि की कार्य कुशलता से हो है । वह नीति पटुता के साथ शासन का सचालन करने वाला है । राज्यपालननियुक्तधी सविध (प्रथमाक) 1 यहो नहीं वह सदा राजा के हितो के चिन्तन एव साधन में रत दिखाई पडता है । यद्यपि उसकी उपस्थिति नाटिका के प्रथम और चतुर्थ प्रक के अतिरिक्त कदापि नहीं हुई है। तथापि उसका महत्त्व नाटिका के समस्त कार्य व्यापार सम्पादन म न्यून नहीं कहा जा सकता । विक्रमाभरण द्वारा प्राप्त कन्या १. मत्रिण ललित शेषा मनिस्वायत्त सिद्धय । -दशरूपक । द्वितीय प्रकाश को देस और दिव्यवाणी, यस्तु भूमि....प्रदास्यति पा प्रपण पर उसने तुरन्त चित्ररपदव पी हित सामना से भी यर जनरी पाणिग्रहीता बन गये, सुरन्त- 'मम वशजेयं समीपदे-समपिता देय्या' रानी के अन्त पुर में गोपनीय रोति से सरक्षित कर दिया । पाण्डयेश्यर के बन्दिगणो के भागमन पर जब उससे पूछा गया तभी उसने इस रहस्य का उद्घाटन किया। सुनन्दना-महामात्य सुवृद्धि को रिश्वसनोया दासी है। रतिक्मा-महारानी वसन्तलेगा को एकमात्र विश्वस्ता दागी है । उसको सारी मास्या रानो में ही है। माधयिका-अन्त'पुर यी एक परिचायिका है। यन्दीगण-पाण्ड्यश्वर के यहां से प्रागत बन्दिगणो का कार्य उनके अनुरूप श्लाघ्य है। साहित्यिक-सौष्ठव 'चन्द्रकला' की नाटयीय-समीक्षा और उसका नाट्य वैशिष्ट्य हम लिख चुके हैं । नाट्य वैशिष्ट्य के ही साय इम कृति में काव्य-सौष्ठव यो भी अस्वीकार नही किया जा सकता। विश्वनाथ जी ने दो कान्यो की भी रचना की थी, इससे उनकी काव्य-प्रतिभा सहज ही सिद्ध है। इसके अतिरिक्त साहित्य- दर्पण के तृतीय, पप्ठ, सप्तम, अष्टम, और दशम परिच्छेदों में इसके कुल तेरह छन्द, रस, ध्वनि, गुण अलशर आदि के विवेचन प्रसङ्ग में उद्धृत किये गए है। प्रत हम कह सकते है कि यह नाट्यकृति साहित्यिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। प्रान्जल भाषा, वैदर्भीरीति और वैशिकी वृत्ति सनाथ इस नाटिका में, प्राकृतिक उपादाना, नायक-नायिका के मनोगत भावो के चित्रण सहन ही हमें एक रस- भाव-सिद्ध कवि का स्मरण कराते है । गद्य और पद्य दोनो में विश्वनाथ जी सफल है। प्राकृतिक चित्रण पढते समय हृदय प्रकृति के साथ तादात्म्य सा स्थापित करने के लिए विवश हो उठता है । प्रथम प्रक का 'लता कुज्ज गजन.. दिशि- दिशि' छन्द पढते समय वसन्तकालीन मलयानिल को मन्द-गति का प्राभास और उसस जनित उन्माद-लास सा प्रक्ट होने लगता । प्रतीत होता है कि मलय-मारुत के सदृश शुभ्र, प्रकाश-सागर का राजहस प्राधि सज्ञाम्रो से अभिहित करण है। एक रस-रसिक की भांति जन-मानस को मधु-मदिर भावों से दमता रहा है। उदीयमान् चन्द्रमा, उसकी ज्योत्स्ना एवं रात्रि के प्रकारका पनि नितान्त मनोरम है। द्वितीय भक में उदय होत हुए चन्द्रमा को सब राजा अपनी महारानी वसन्तलेखा से उसका वर्णन करते हुए उसे कर 'विरहिजनो के लिए कृतान्त के समान, कपूरचूर्ण सदृश श्वैत युवकों का भरनेयाला पामोन्मादक, कुमुदकुल को जाग्रत करनेवाला, पाकाश-सारमेंस हरा पे समान चन्द्रमा उदय हो रहा है।'(२१) ऐसे चन्द्रमा की किरयों प्रसार जय होने लगा तो कमलदल रूपा हृदय खिलने मोर धनतिमिर हो। मारतोय मीलचेलनिष पूरा इवेन्दीवर- हामारोग विगृह्य लोधन पथ भेद्य न धीमुणे- रामारामसा तमालमसिमरदायेन सर्या विश || मापसौन्दर्पयपन एवं उप विरागारगोयगत. सह कुसुमकदम्ब काममुल्लासयन्त सह घनतिमिरोधे घंमुत्सादयन्त । सह सरसिज प स्वान्तमामालयन्त प्रतिविशममृतांशीरशघ सघरन्ति ।। पन्द्रमा उदय हो रहा है उसके प्रभाव से काम भावनाएं उसी प्रय विपरित, उल्लासित हो रही है जैसे पुष्पोम विकास, उसकी किरणो के प्रसार जैसे तिगिर पा नाश हो रहा है, उसी प्रकार रसिक मानस से धैर्य विभारानो रागा है, नमसदलो को भांति हृदय विवचने लगे हैं।' रात्रि को मुवास्था : घमासार इस बार ग्याप्त हो जाता है कि समस्त गतीनी वस्तुएं उस गामवर्ण में रंगी सी अपो पृषक मस्तिस्य को भी राम विलीन कर देता है। इराना थम मपि विश्वाप निाम शब्दो म घर रहे है। समीणा इव पूणितमृगमदं पूर्णा इयान । विचलित होने लगा- - को परसने और उनका प्रवन घर में भी विश्वनाप जी को पाध्य- । प्रत्यन्त ही पर्वतणो होर प्रकट हुई है । और नायर चितरपदेव में भभूत मानस को गति को भी उन्होंने वडी ही सावधानी से पहिचाना है- वरप्रकारे कुचकुम्भमूले इतं निपरय जुताईराभे । लावण्यपूरे विनिमग्नमुच्चनं मे कदाचिद् हिरेति चेत ॥ -प्रथम १५ ' राजा चन्द्रकला को लायएय सम्पदा पर इस प्रकार मुग्ध हो गया है कि नि हृदय को उससे विरत करना उसके लिए नितान्त दूर्भर हो गया । यही 'रण है कि चन्द्रमा की किरणे चसके लिए अग्नि-स्फुलिंग सा बरसा रही है- ६ मृगनयनी से वियुक्त होने के कारण मेरा हृदय प्रत्यन्त ही सतप्त हो उठा है और यह चन्द्रमा अपनी किरणों के व्याज से मेरे ऊपर अग्नि के कणो की बरसा रने लगा है' (अक २२२) । इसके अतिरिक्त तृतीय भक का धन्द १८ और तुर्थीक का प्रथम छन्द भी ( इस विषय का ) काव्य-सोप्टव की दृष्टि से ल्लेखनीम है। चन्द्रकला के सौन्दर्य का जो कथन राजा के द्वारा कवि ने किया है, वह स्तुत साहित्यिक-पाठक के लिए हृदयावर्गक है-- प्रसावन्तश्चञ्चद्विकचनवनीलाजपाल- स्तलस्फूर्जस्कम्बुर्विलसदलिसघात उपरि । विना दोषासङ्ग सततपरिपूर्णाखिलकल कुत प्राप्तश्चन्द्रो विगलितकलडू सुमुखि ते ।। --१७ नायिका के मुख-सौदर्य का वर्णन कवि कितनी तन्मयता के साथ अपनी सूक्ष्म अन्वेपणो दृष्टि से निरखकर कर रहा है हे सुमुखि । यह लोकोत्तर चन्द्रमा तुम्हे कहाँ से प्राप्त हो गया ? इस के मध्य में दो नील कमल (दो नत्र) शोभा पा रहे है उसके नीचे शख और उसके ऊपर भौरो का दल मंडरा रहा है (श्याम वर्ण केशराशि) । और यह चद्रमा रात्रि के बिना ही समस्त क्लाम्रो से पर्या. ज्योतिमान है। इसमे भी मनोहारी वर्णन देखिए---

२८
विम्बस्यासुकृतेन दन्तवसनं मत्तभकुम्भद्वयं-
स्यापुण्येन पयोधरी कुवलयस्याकर्मणा चक्षुषी ।
इन्दोर्भाग्यविपर्यघेण वदनं कुन्दावलेरेनसा--
दन्ताली फदलीतरोश्च दुरितेनोरुद्वय निमितम् ।।
और किस प्रकार सिंह अपनी चीण-कटि को पराजित समझकर क्रोधाभिभूत
हो युवती कुच-कलशो के सदृश गजराज के गण्डस्थलो को विदोर्ण करता
रहता है-
मध्येन मध्यं तनुमध्यमा मे पराजयं नीतवतीति रोपात् ।
कण्ठीरवोऽस्या कुचकुम्भतुल्यं मत्तेभकुम्भद्वितयं भिनत्ति ।
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नाटिका नाट्यशास्त्रीय लक्षणो के अनुसार शृंगाररस प्रधान है । इसमें
विश्वनाथ जी शृंगाररस को निष्पत्ति कराने एव उसके संयोग-वियोग दोनो पक्षी
का सफल चित्रण करने में सिद्ध प्रतीत होते है । नायक-नायिका के हृदयो में
पारस्परिक अनुराग-भावो का अंकुरण, प्रस्फुटन-पल्लवन उचित रीति और
अप्रत्याशित गति में होता है। दोनो ही आतुर होकर निज स्थिति को विस्मृत
करने लगते है । सुधा-शीतल चन्द्र को रश्मियां दोनो के लिए अग्नि-कण की.
बरसा करती प्रतीत होती है । राजा अशोक से निवेदन कर रहा है कि मेरे
परिताप को शान्त करके अपने नाम को सार्थक करो-
त्वमशोक शोकमपहृत्य मामकं
कुरु तावदाशु निजनाम सार्थकम ।
प्रवलोकिताब भवता यदि सा
श्व न विद्यते नन निगद्यतां तदा ।।
इसी प्रकार चन्द्रकला का स्थन देखिए-'सति मलमिदानीमेप्स: । पुनः
पूनरपि मङ्गेप हलाहलं चर्पतोऽमुष्माद-दुष्टरजनोकराव रक्षयितुमशरणाहं प्रिय.
सस्या'-(२ मव) । काव्य सौष्ठव की दृष्टि से द्वितीयाक में ध्यान वर्णन का

२६ मो धन्द कम महत्वपूर्ण नहीं है । वर्णन से ध्यान प्रांगों के समरा हो सारी क्रियानो को सम्पादित सा परता प्रतीत होता है- उदस्यक पाद विटपिपु मुह स्वपपपणात कृतम्पोमाभन शकुनिकुसकोलाहल भरः । परिधामन्नुचं प्रस्टरसनो स्यात्तवदन तर युद्धोऽय क्षिपति मृगपूयानि परित । व्याघ्र ऋद्ध है । अपने एक पैर को उठावर वृक्षो से अपना कन्या बार-बार रगड रहा है, उसके गर्जन, स्वर से प्राकाश फ्ट-सा रहा है। उसकी गर्जना से भयभीत होकर पक्षियो का समूह कोलाहल करने लगा है । और मुंह फाडकर अपने भयकर दातो को दिखाकर भय उत्पन्न करके मृग-समूह को भी वह तितर- वितर कर रहा है। साहित्यिक-सौष्ठव का पुष्ट-प्रमाण यह भी है कि इसके 'लाङ्गुलेनाभिहत्य (अक २) 'वसन्त लेखक (मक १) 'सह कुसुमक्दम्ब (अक २) और मध्येन तनुमध्या मे (अक ३) साहित्यदर्पण दशम परिच्छेद में क्रमश स्वभावोक्ति, दृष्टान्त, श्लेष एव समाधि अलकारो के उदाहरण मे उद्धृत किए गए है । अस्तु । चन्द्रकला नाटिका' नाट्यशास्त्रीय लक्षणो एव साहित्यिक विशिष्ट गुणो से युक्त एक विशिष्ट कृति है । इसके आधार पर हम कह सकते है कि प्राचाय विश्वनाथ जो में साहित्य-शास्त्रीय गुण सैद्धान्तिक एव व्यावहारिक दोनो ही रूपो में विद्य- मान् थे। संस्कृत की नाटिकाओ के सन्दर्भ में- 'चन्द्रकला का मूल्याङ्कन महाकवि भास रचित 'स्वप्नवासवदत्तम्' कालिदास कृत' 'मालविकाग्निमित्र' महाकवि श्रीहर्ष विरचित 'रत्नावली' एवं 'प्रियदर्शिका' कृतियों की कथा-वस्तु, वस्तु-विन्यास, घटना-सयोजन आदि का साम्य 'चन्द्रक्ला नाटिका' पर परिलक्षित होता है । परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहो कि विश्वनाथ जो की दृष्टि माटिका 1 प्रणयन के समय भास-कालिदास के प्रणय-कया प्रधान नाटको के कथानक एवं हर्ष को नाटिकामो को शली का प्रभाव रहा। हम केवल यह मान सकते हैं कि पूर्ववर्ती कृतिकारो की रचना होने के कारण उनका कुछ भादर्श उनके सम्मुख अवश्य रहा और यह स्वाभाविक भी था । प्रस्तु, आगे हम विवेचन द्वारा यह स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे कि किस अंश तक कथित कृतियो का प्रभाव विश्व- नाथ जी की इस नाटिका पर है। माट्शास्त्रीय लक्षणों के अनुसार नाटिका शृंगार रस प्रधान है जैसे रत्ना- वली, प्रियशिका । नाटिका का नाम भी नायिका के नाम पर रखा गया है। यह केवल नायिका की प्रधानता के कारण न कि हर्षदेव को नाटिकामो के मनु- करण पर विश्वनाय जी ने रगा है । नायिका चन्द्रकला, वासवदत्तम की 'बाराय- दत्ता' पोर रलावली की 'रनावली' यो भौति गुप्तरीति से पन्त,पुर में रही मोर वहीं राजा से अनुराग होता है । इसे हम 'रत्नावली' अथवा 'वासवदत्तम्' षा प्रभाव-जनित रायोजन न मानकर नाट्यशास्त्रीय लक्षणानुसारी हो यह तो मसंगत नहीं है-'अन्त.पुरादि सम्वन्यावासनायुति दर्शनः । (शल्पक)। ररनावली में नायिका के लिए मिद्ध पुरुष को घोषणा यो कि इसका पाणिग्रहण परनेवाला पुरुष चक्रवर्ती सम्राट होगा पोर 'चन्द्ररला' को नापिया के लिए 'मारायाणी' यस्तु भूमिपतिर्भूमी....प्रदास्यति' ने ऐसी विलक्षण उक्ति को। यह नायिया महत्व ययन एवं सौन्दर्य-मुलराण-युक्ता होने का प्रमार है, प्रत नारिमा मेष को किमी न किसी प्रकार सयोजन करना चाहिए हो। रत्नायसीमा पारण महगा पाचार्य विश्वनाय जैसे 'नाट्यदिदीसागुरु' के लिए उचित नही प्रतीत होता। नाटिका प्रसारगुणपूर्ण पदों-रोनि में पिगी गयी है। गाररस रे सहायक जानु-परणंन, पढग्योत्स्ना भादि का भी प्रेरन हुमा है । ररनायलो में प्रितीप मक में--गागरिला (रत्नापसी) पपनी साली मुर्गगता रे साप पातालाप में पस्त है तभी राजा पा पासा बन्दर पन्यन तोहार राममयन भी पोर पाता है । उगे देगार वे दोनो कह) से भयभीत र भागती है । उगरे परमान ही विदूपर पोर राजा । प्रदेश होता है। गो मारो पटना चन्द्रकला में भी (द्वितीय मंक) 'तरतु' के प्रागमन से उपस्थित होती है। उस समय वहाँ नामिका (चन्द्रकला) नही बल्कि महारानो वसन्तलेखा अपनी सखियो के साथ हैं। उससे भयभीत महारानी अन्त पुरको चली जाती है, । राजा तरचु को मारने के लिए प्रस्थान करता है । दोनो घटनाएं समान सी प्रतीत होती हैं । परन्तु अनुशीलन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि दोनो नाटि- कामो में उपस्थित 'वन्दर' और 'तरह के कारण कार्य में बहुत ही अन्तर है । रत्नावती में बन्दर को उपस्थिति सहज घटना लगती है परन्तु 'तर' का प्रकट होना रहस्यात्मक है । 'तर' की इस कल्पना से विश्वनाथ जी ने नायक के सुहृद् रसालक के बुद्धि-कोशल का स्पष्ट परिचय दिया है और उसे उनके कार्य- सम्पादन वे सहायक रूप में उपस्थित किया है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि विश्वनाथ ने नाटिका की कथा-अस्तु एवं घटना-संयोजन में नाट्यशास्त्रीय सीमा का पूर्णतया ध्यान रखा है और मौलि- कता के सामंजस्य द्वारा इसे सफल नाट्यकृति का रूप प्रदान कर दिया है । 'तरतु को कल्पना विश्वनाप जो की मौलिक सूझ है, इसे हम रत्नावली के 'बन्दर' का अनुकरण नहीं मान सकते । 'चन्द्रकला नाटिका' साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ को नाट्यकारो को श्रेणी में आबद्ध करने में सर्वथा समर्थ है। नाट्यकार के रूप में सागोपाग मूल्याकन तो उनको अन्य नाट्यकृतियो प्रभावती-परिणय प्रादि के सम्यक् अनुशीलन के पश्चात हो समीचौन होगा। दारागंज, प्रयाग-६ -मनुवादक गुरु पूर्णिमा, संवत् २०२३ पात्रपरिचय: भमुखपात्राणि सूत्रधारः नटी चित्ररथदेवः सुबुद्धिः रसालक: शवरः वन्दिनी चन्द्रकला वसन्तलेखा प्रस्तावकप्रधाननटः सूत्रधारपत्नी मायकः चित्ररथदेवस्यप्रधानामात्यः विदूषकः प्रमदोद्यानपालकः पाण्ड्यनरेशमन्देशवाहो नायिका प्रधानमहिणी वसन्तलेसाविश्वासभाजनदासीयुगलम् नायिकायाः सगी - रतिकला। माधविधा सुनन्दना यिनमाभरणः अन्यपात्राणि पाण्ड्येश्वरः पाग्यनरेशः गियरवदेवम्य मेनापतिः रायरस्वामी शवराधिपः मेदिनी पिपरपदेयम्यागपरनी - श्रीगणेशाय नम. चन्द्रकला-नाटिका प्रथमोऽङ्कः जीयासु शफरायमाणशशभृल्लेखा स्खलत्करव- बातोदभ्रान्तमधुप्रत प्रजामिपादुत्क्षिप्तनीलाशुका । विन्दन्त्यो गिरिजाकटाक्षपतनादादित्यजासङ्गम नृत्य गर्गविरीटकोटिचपला २ स्वर्गापगावीचय ॥१॥ सस्कृतव्याख्या-नृत्यद्धकिरीटकोटिचपला ताण्डवनृत्य कुर्वत शङ्करस्य भुपुटाने चञ्चला , शफरापमाणशशभृल्लेसा -फर-मरस्य श्व आचरन्ती चन्द्रलेखा यासु तादृश्य , स्खलत्करवातोद्धान्तमधुवत वज- मिपात्-कुमुदपुष्पसमूहे पतताम् उन्मत्त भ्रमराणा समूहस्य व्याजात , उत्क्षिप्त- नीलाशुकार --उपरि घृन नीलबस्नमिव याभि तादृश्य , गिरिजाकटाक्षपत- नात्-पार्वतीकटाक्षपातात, आदित्यजासङ्गम-यमुनया सङ्गम, विन्द- न्त्य -प्राप्नुवन्त्य , स्वर्गापगावीचय -मन्दाकिनीतरङ्गा जीयासु - विजयन्ताम ॥१॥ हिन्दी अनुवाद-(ताडव) नृत्य करते समय शकर के मुकुट के अग्रभाग- पर गगा जी की वे लहरें विजयशालिनी हो (विजय प्रदान करें) जिनके बीच पडी (शिव के भाल की) चन्द्रलेखा शफरी (पोठी मछली) की भांति प्रतीत होती है जो (लहरें) दोलायमान कमलिनी दल पर उडते हुए भ्रमर समूह रूनी नीलाशुक से आच्छादित रहती हैं तया जिन पर पार्वती का कटाक्ष पडने के कारण गगा-यमुना के सगम की सृति होती है। (पार्वती-कटाक्ष में यमुना चिभ्रायो इति पाठभेद २ चा इति पाठान्तरम् ।

चन्द्रालानादिरा [नान्दन्ते] सूत्रधार:-अलमतिविस्तरेण । (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) आर्य, इतस्तावत् । (प्रविश्य) नटो-एपास्मि । आज्ञापयत्वार्यः । एसाम्हि । आणबेदु अग्नो। टिप्पणी-नत्यद्भर्गकिरीटकोटिचपला:-नृत्पन, भर्गः (बर्मधारय), तस्य पिरोटम, तात्य कोटि', तस्या चपलाः । शफरायमाणशशभृल्लेखा:- शफर इव आचरन्ती इति आफरायमाणा शफर+क्या, शफराय (नामधातु) +सट् + शानच, मुन् मागम । शश विति इति शशन्त, शश भू+ विवप्, तुक् बागम, शशभृतः लेखा शशभूल्लेखा, शफरायमाणा शशभृल्लेखा यासु तादृश्यः । स्सलत्करवातोद्भान्तमधुव्रतवजमिपात -नैरवाणां प्रात , उद्घान्ताः मधुव्रता , वरवद्रात उद्भ्रान्तमवता. स्खलन्त' करवा- तोद्मान्मघुव्रता', तेपा व्रजः, तस्य मिष, तस्मान् । आदित्यजासङ्गमम - आदित्यात् जायते या सामादित्या आदित्य जन्+-+-टाप. तया सगमः, तम् । संस्कृतम्याख्या-नान्द्या.-पूर्वोक्ताया. स्तुतेः, अन्ते-समाप्तो। सत्रधार:- मटाध्यक्षः मागत्य वदतीति शेषः । अतिविस्तरेण-सुबहुलेन (नान्दी-प्रयोगेण) अलं--व्यर्थम् । नेपथ्याभिमुखम्-नेपथ्यं नाम रङ्गस्थलस्य पश्चात् यव निकान्तरितो वर्णग्रहणादियोग्यकुशीलवकुटुम्बस्यावस्थानदेश. अभिमुख सम्मुखम्, अवलोक्य-दृष्ट्वा । आर्य-पाननीये, इतक्तावत्-इत: के नीले जल और शकर की जटाओ मे श्रीडा करती लहरो मे गणा के पवन जल की कल्पना की गयी है। ) ॥१॥ [नान्दी के पश्चात् हिन्दी० सूत्रधार-बहुत अधिक विस्तार की आवश्यकता नहीं है। (नेपथ्य की ओर देखकर) प्रिये, इधर भागो। - . - 0 (प्रवेश कर) नटी-यह हूँ मैं। आर्य आदेश करें।

प्रथमोऽङ्कः - यस्मिन् स्याने रङ्गमञ्चे इति यावत , तायत् शब्दोवावधारणाय । प्रविश्य-रङ्गभूमो प्रवेश कृरवा, एपास्मि--अत्राह पर्ने । थार्य-पूग्य , याज्ञापयतु-आदिशतु । टिप्पणी नान्यन्ते-नन्दयतीति नन्द नन्द +णिच् + अच् पतरि पचा- दित्वात । नन्द एव नान्द नन्द +अण स्वार्थ प्रशादित्वात, नान्द+छीप = नान्दी। नान्या अन्त नान्द्यन्त (५० त०), तस्मिन । यम्य च मावेन मावलक्षणम इति सूत्रेण मावे सप्तमी । नाटक भारभ करने पहले उसकी निर्विघ्न समाप्ति के लिए देवता आदि की जो स्तुति की जाती है, उसे मान्दी कहते हैं। भरत मुनि ने कहा है कि नाटक में विघ्न-शान्त्यर्थ नान्दी-पाठ अवश्य करना चाहिए-'यद्यप्यङ्गानि भूयासि पूर्वरङ्गस्य नाटके । तथाप्यवश्य कर्तव्या नान्दी विघ्नप्रशान्तये ॥' नान्दी का लक्षण यह है-'आशीर्वचनसयुक्ता स्तुतियस्मात प्रयुज्यते । देवद्विजनृपादीना तस्मानान्दीति सज्ञिता ॥' (साहित्यदर्पण) अर्थात, देवता, ब्राह्मण और राजा आदि वी आशीर्वादयुक्त स्तुति इसके द्वारा की जाती है, अत इसे नान्दी कहते हैं। 'आशीर्नम- स्क्रियात्म श्लोक काव्यार्यसूचक । नान्दीति कथ्यते। (आदिभरत) अर्थात् आशीर्वाद और नमस्कार से युक्त श्लोक नान्दी कहलाता है । उसमे काव्य के कयानक का सकेत भी होना चाहिए । 'देवद्विजनृपादीनामाशीर्वचनपूविका । नन्दन्ति देवता यस्या तस्मानान्दीति कीर्तिता ॥ नन्दन्ति काव्यानि कवी द्रवर्गा कुशीलवा पारिपदाश्च सन्त । यस्मादल सज्जनसिन्धुहसी तस्मादिय सा कथितेह ना दी ॥' (नाट यप्रदीप) नान्दी के विस्तार आदि के विषय मे यह कहा गया है-अष्टाभिर्दशभिर्वापि नादी द्वादशभि पद । आशनमस्क्रियावस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम् ।।, अर्थात् नान्दी मे आठ, दस या वारह पद होने चाहिए। इसम आशीर्वाद नमस्कार या कथावस्तु का निर्देश होना चाहिए । नान्दी के श्लोक एक से चार तक होते हैं । सुत्रधार रग- शाला का व्यवस्थापक । सुत्र धारयति इति सूत्र धृ+णिच् +अण, कर्तरि 'कर्मण्यम्' इत्यनेन, उपपद म० । सूत्रधार का लक्षण-वर्णनीयतया सूत्र प्रथम चन्द्रकला-नाटिका अप, - येन सूच्यते । रङ्गभूमि समाक्रम्य सूत्रधार स उच्यते ।।, (सगीत-सर्वस्व), अथवा 'नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते । सूत्र धारयतीत्यर्थ सूत्रधारो निगद्यते ।।, अथवा 'नाटयस्य यदनुष्ठान तत सूत्र स्यात, सबीजकम् । रङ्गदेवतापूजाकृत, सूत्रधार इति स्मृत' ॥ अलमतिविस्तरेण-विस्तृ+ भावे =विस्तर , अत्या विस्तर अतिविस्तर (प्रादि स०), तेन। अत्र 'गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयोजिका' इति वचनात, साधन- क्रिया प्रति अतिविस्तर करणम, तेन करणे तृतीया । विस्तार शब्द म प्रथने वावशब्दे' सून से धन, प्रत्यय होता है । अतएव 'वाक्यस्य विस्तर और 'पटस्य विस्तार ' इस प्रकार प्रयोग करना चाहिए । नेपथ्याभिमुखम्- नेपथ्य शब्द पर्दा और पर्दे के पीछे रूप वारण-स्थल दोनो को कहते हैं- 'नेपथ्य स्याज्जवनिका रङ्गभूमि प्रसाधनम' इत्यजय । 'आकल्पवेषौ नेपथ्य प्रतिकर्म प्रसाधनम' इत्यमर । नेपथ्य का लक्षण यह है-'कुशीलवकुटुम्बस्य गृह नेपथ्यमुच्यते अर्थात जहाँ अभिनेता अपने को सजाते और अभिनयोचित वेष धारण करते है, उसे नेपथ्य कहते है । नी+विच - ने तस्य पथ्यम, नेपथ्यम् (प० त०)। तस्य अभि मुखम, (५० त०) । अवलोक्य-+अद लोक् + क्त वा ल्यप् । आर्ये-यह आर्या का सम्बोधन है । नाट्यशास्त्र के नियमानुसार सूत्रधार अपनी पली को 'आर्या' कहकर सम्बोधित करता है - 'पत्नी नार्येति सम्भाष्या । और सूत्रधार को पत्नी या नटी उसे 'आर्य' या 'आर्यपुत्र' कहकर सम्बोधित करती है। आर्य --आराद, यात इति आर्य अर्थात् आराद दूरसमीरयो' इत्यनेन आराद, - असभ्यतादुराचारादिदोपेभ्यो दूर गतश्च शियासभ्यताविद्या दिभिश्च देवास्पदत्व प्राप्त इति आर्य पृषोदरादित्वात, सापुत्वम, अथवा अतं, योग्य आर्य ऋ (गतो } + ण्यत, । पसिष्ठ के म से थार्य बालक्षण यह है - 'कर्तव्यमाचरन, पाममवतय्यमनावरन, तिष्ठति प्रवृताचारे स वा अाप इति स्मृत' || पुल शीत दर दान धर्म सत्य तमता । अदोह इति येवतत, तानायान् सम्प्रचाते % 32 नेता। इति भरत ।

५ प्रयमोक्ष सूत्र०-आयें, पश्य पश्य । अयमिदानी यवनपुरपुरन्धीवर्गनिर्गलद- विरलजलपारानिपातगिरिमान्दरो निजमुज' प्रतापतपनरामुत्सादि- तारातितिमिरनिपरश्चोलकोशलवङ्ग' हावङ्ग' पोच काञ्ची- गौडाहाल५ मत्स्य म्लेच्छलाट. कर्णाटप्रमुखराजगजीव. रजनीकर गर नगुणरलरलापगे निमिलानवविद्या- निधिरर्थिकुलकल्पद्रुम समामध्यमघ्याम्ने' गजपतिमहाराधिराज निकलिङ्गभूमण्ड नाखण्डल श्रीमनि शङ्कभानुदेव । सस्कृत० -आय-माननीये पश्य पश्य अवलोक्य अवलोक्य । अय- पुरो दृश्यमान, यवनपुरपुरन्धीवर्गनिर्गलदविरलनयनजलपारानिधीत- गिरिकन्दर -पवनपुरस्य मुहम्मदीयनगरस्य पुरस्त्रीवर्गाणा महिलावृन्दाना निर्मलन्तीभि प्रसवलीभि अविरलामि सान्द्राभि नयनजलधारामि नेत्राम्बुप्रवाई निर्माता प्रक्षालिता गिरिकन्दरा पवंतगुहा येन तादृश , हिन्दी० सूत्रधार-प्रिये, देखो, देसी, इस समय सभा के मध्य विकलिंग भू-मण्डल इन्द्र महाराजाधिराज थीमनि शक भानुदेव विराज- मान हैं। जिन्होंने यवन स्त्रियो के नेत्रो से बहती हुई सतत जलधारा से पर्वत की कन्दराआ को धो डाला है, अपनी भजाओ के बलप्रताप से समस्त शनुओ का समूल नाश कर दिया है, जैसे सूर्य किरणो के प्रकाश से घोर अन्धकार को नष्ट कर देता है, जो चोन, कोशल, बग, हावग, कोच, काची, दाहल मत्स्य, म्लेच्छ लाट तथा कर्णाटक आदि के नरेशो को मोददायक हैं जैसे चन्द्रमा कुमुदिनी-दल को प्रमुदित किया करता है और जो समस्त गुणो से सम्पन गुणसागर, विद्या एव कलाओ के निधान तथा याचको के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं--- १ निजभुज मू० पा० । २ लवङ्ग पाठभेद । ३ टावङ्ग पाठभेद । कोचबिहार । ५ काल पाठभेद । ६ मच्छ पाठभेद । ७ नट पाठभेद । ८ राजीवराज पाठान्तरम। सभामध्यास्ते पाठा- न्तरम् । १० श्रीमान् निश्शङ्कभानुदेव पाठातरम् । के ४ सभवत चन्द्रकला-नाटिका आच्छन्ने धर्मधाम्नि प्रखरहयखुरक्षुण्ण पृथ्वीरजोभिः क्षिप्ते नक्षत्रलो नभसि करिकरो तगङ्गापयोभिः । -- -- निजभुजप्रतापतपनसमुत्सादितारावितिमिरनिकर निजमजप्रतापतपनेन स्वकीयबाहुपराकमरूपसूर्येण समुत्सादित विनाशित अरातितिमिरनिकर शत्रुरूपान्धकारसमूह येन तादृश , चौल-कोशल-बङ्ग-हावङ्ग-कोच-काञ्ची- गौड-डाहाल-मत्स्य-म्लेच्छ-लाट-कर्णाट-प्रमुखराजराजीवरजनीकर - चोल- कोशलादिदेशाना राजान नृपा एव राजीवानि नीलकमलानि तेपा विकासाय रजनीकर चन्द्र सकल-गुणरलरत्नाकर -सकलाना समस्ताना गुणरत्नाना श्रेष्ठगुणाना रलाकर समुद्र इव, निरिवलानवविद्यानिधि निरिवलाना समग्नाणाम, अनवद्यानाम, उत्तमाना विद्याना शास्त्राणा निधि शेवधि इव, बर्थिकुलकलर म -अर्थिकुलाना याचकसमूहाना कल्पद्रुमः कल्पवृक्ष इव, महाराजाधिराज -सम्राट, त्रिकलिङ्गभूमण्डलाखण्डल त्रिकलिङ्गराज्यस्य इन्द्र इव, गजपति , श्रीमनिश्शङ्कभानुदेव , इदानीम - अघुना, समामध्यम् --परिषदो मध्ये, अध्यास्ते-विराजमानोऽस्ति । सस्कृत-यस्य-नि शङ्कभानुदेवस्य, जैवयात्रावकाशे--विजयार्थ प्रयाणे, प्रखरहयख रक्षुण्णपृथ्वीरजोभि -प्रखरा तीक्ष्णा ये हयखुरा अश्वशफा ते क्षुण्ण मदित पृथ्वीरजोभि धराधूलिभि , धर्मधाम्नि-धर्म एव धाम यस्य तादृशे सूर्य, आच्छन्ने-आवृते सति, करिकरो तगङ्गापयोभि " करिणा गजाना रा शुण्डा ते उद्भूत उत्क्षिप्त गङ्गापयोभि गङ्गाजले, नभसिआकाशे, नक्षत्रलक्षे-नक्षत्राणा ताराणा लक्षाणि यत्र तादृशे, क्षिप्ते-जाते, कीतिचन्द्रे-कीति यश चद्र इव इन्दुरिव इति तस्मिन्, हिन्दो०-उप्तकी विजययात्रा के समय तीव्रगामी घोडो के खुरापातो से उडी घुलराशि से सूर्य बिम्ब ढक गया, मतवाले हाथियों ने अपनी सूडो से गगा के जल को भर-भर कर जो ऊपर की ओर फेका उन जल-कणों से १ धर्मधाग्नि पाठभेद । २ क्षणं मू० पा० । ३ करिवरो पाठभेद ।

७ प्रयमोऽः ज्योत्स्नाभिः कौतिचन्द्र घवलयति जगमंयानावकाशे गौडधमापाललदमी' व्यंरचयदचिरादेव यम्याभिसारम, ॥२॥ यदस्मारमिदानी' चतुर्दशमापा' महार विनिमिलानवद्य- विद्यामहोदधिराजहसमहापात्रश्रीचन्द्रशेम रतनूजन्मन श्रीमन्नारा- यणचरणारविन्दमधुकरीमूतचेतस निजजनरसमधिगतनिषिल. ज्योत्स्नाभि -चन्दिवाभि , जगत-समार, धवलयति-उग्ज्वलयति राति, गोडमापाललक्ष्मी-गोडदेशस्य रामो राज्यत्री, अचिरादेव-शीयम् अभिसारम-अभिमरणम् प्रियेण समागन्त सङ्केतस्थलगमन मिति यावत, व्यरचयत --निवर्तयामास । अयापि मार्दूलविक्रीडित छन्द । यत्र उपेक्षा- लद्वार 10 सस्कृत-यत यस्मात इदानीम -अयुना, चतुर्दशभाषामहाकविनिखिला- नवविद्यामहोदधिराजहसमहापाश्रीयन्द्रशेखरतनूजन्मन चतुर्दशमापाणा शौरसेन्यादीना महाश्वे महाकवयितु निखिला समस्ता बनवद्या उत्तमा विद्या शास्नाणि एव महोदघय समुद्रा तेपी राज सस्य इव महापानस्य प्रधानामात्यस्य उत्कृष्टसम्प्रदायब्राह्मगस्य वा श्रीचन्द्रशेखरस्य पुत्रस्य, श्रीमनारायणचरणारविन्दमयुक्रीभूतचेतस -श्रीमतो नारायणस्य चरणमेव अरविन्द पर तस्मिन् मयुकरीमून (सतततत्सेवनात) चेत चित्त यस्य तादृशस्य, निजजनसमधिगतनिखिलसाहित्यतत्त्वस्य-निजजनकात् स्वपितु आकाश मै तारा की छा छा गयी, और फिर इनके बीच उसके कीति-चन्द्र की निर्मल ज्योति उनके इस जगत् विजयी अभियान में चारो ओर प्रकाषित होने लगी। तब उस धवल चादनी मे गोड-नरेश को लक्ष्मी ने विकलिंग-नरेश पर मुग्ध होकर शीघ्र ही उसमे अभिसार क्यिा ॥२॥ हिन्दी- १०-प्रत आज चौदह भाषाओ के महाकवि, सम्पूर्ण उत्तम विद्या- २ तस्मादस्माकमिदानी पाठान्तरम् । १ लक्ष्मि मू० पा० । ३ भाषाविलासिनीमजङ्ग पाठान्तरम ।

चन्द्रकला-नाटिका साहित्यतत्त्वस्य नाट्यवेददीक्षागुरो गौरवैक' बान्धवस्य गजपति- महाराज्यसान्धिविग्रहिकर श्रीविश्वनाथकविराजस्य कृतिमभिनवा चन्द्रकलानाम नाटिकामभिनेतुमुचितोऽय समय । नटो-आज्ञापयत्वार्य । कतम समयमुद्दिश्य गास्यामि । (आणबेदु अज्जो कदम समअ उद्दिसिअ गाइस्सम् ।) सकाशात् समधिगत प्राप्त निखिलसाहित्यस्य सम्पूर्णकाव्यस्य तत्व सारो येन तादृशस्य, नाट्यवेददीक्षागुरो -नाट्यशास्त्रस्योपदेष्टु, गौरवैवयान्धवस्य-- गौरव प्रतिष्ठा एव एक वान्धवो वन्धुर्यस्य तादृशस्य,गजपतिमहाराज्यसान्धि- विग्रहिकश्रीविश्वनायकविराजस्य-गजपतेविशालराज्यस्य सन्धिविग्रहयोर- धिवारे नियुक्तस्य श्रीविश्वनाथकविराजस्य-विश्वनाथनाम्न कविश्रेष्टस्य (कवीना राजा श्रेष्ठ कविराज इति गुणप्रयुक्तो व्यक्तिगत उपाधि कलाप- चन्द्रप्रणेतु सुपेणशर्मण कविराजोपाघिवत्, न तु वैद्यजातिमावायत्त पविराजेत्युपाधि )अभिनवा-नूतना, कृति-रचना, चन्द्रकला नाम नाटिकाम्, अभिनेतु-खेलितुम्, अयम्, उचित समय -उपयुक्त काल अस्तीति शेष । सस्कृत-कतम, समय-ऋतुमिति यावन्, उद्दिश्य-उपलक्ष्य, अह गास्या- मि इति आर्य-पूजनीयो भवान्, आज्ञापयतु । समुद्र के राजहस महापात्र श्री चन्द्रशेखर के पुन कविराज श्री विश्वनाम की नवीन रचना 'चन्द्रकला' नामक नाटिका खेलने के लिए यह उचित समय है । वह व विराज विश्वनाथ श्रीमनारायण के चरणो में हमेशा सीन रहने वाले, (जैसे भौंरा वमल मे लीन रहता है) अपने पिता से जिन्होंने साहित्य के सभी तत्त्वा का ज्ञान प्राप्त किया और जो नाटयवेद के दीक्षागुरु, परमयशस्वी तथा गजपति-साम्राज्य के साधिविग्रहिक (सन्धि और युद्ध का निश्चय करने वाले मत्री) थे। हिन्दी-नटी-आर्य ! आशा दें, वि गीत मे किस पाल (ऋतु) या संकेत हो। १ सौरवर मू० पा० तात्पर्यही । २ सान्धिविग्रहिक महापात्र पाठभेद । .

E प्रथमोऽङ्कः सूत्र-आर्ये । अमुमेवाचिरोपस्थितकेतकीपरिमलमिलितमधुकर- वधूनिकर' शद्वारमुखरितदिशाभोग मलयाचलदरीगलितनिझर- सलिलशीकरशिशिरपीरमारुतच्तकानन दरदलित चूताङ्क रास्वाद- सुन्दरमदकलकलकण्ठकुलकलितकाकलिविरचितविरहिकर्णज्वर वसन्त- समयम् । इह हि- अमुमेव, अचिरोपस्थितकेतकीपरिमलमिलितमधुकरवधूनिकरसङ्कारमुख- रितदिशाभोगम्-अचिरेण अविलम्वेन उपस्थिताया विकसिताया केतक्या परिमलेन मकरन्देन मिलिताना संगताना मधूवरवधूना भ्रमरीणा यो निकर समूह तेन मुखरित गुञ्जित दिशानाम् आभोग विस्तार यस्मिन, तादृश, मलयाचलदरीगलितनिझरसलिलशीकरशिशिरधीरमारुतचूतकानन - मलयाचल- स्य मलयपर्वतस्य दरीभ्य बन्दराभ्य गलिताना नि मृताना निझराणा वारि- प्रवाहाणा सलिलशीकर. अम्बुकण शिशिर शीतल धीर मन्दश्च मारुत वायु बूतकानने आम्रवने यस्मिन् तादृश, दरदलितचूताङ्करास्वादसुन्दरनद- कलक लकण्ठकुलकलितकाकलिविरचितविरहिकर्णज्वरं-दरम् ईषत् यथा स्यात् तथा दलितस्य विकसितस्य चूताङ्करस्य आम्रमजया आस्वादेन सुन्दरा मदक्ला मदमत्ताश्च ये कलकण्ठा कोकिला तेपा कुलानि समूहा तेपा कलितकाकलिभि अव्यक्तमधुरध्वनिभि विरचित उत्पादित विरहिणा कर्ण ज्वरी येन तादृश, वसन्तसमयम्, अभिलक्ष्य गीयताम इति शेप । सूत्रधार-आयें। इसी वसन्तकाल का वर्णन करो-भोर केतकी पुष्प के कर मधुर गुजार करने लगे है, उनको ध्वनि से दिशाएँ मुखरित हो रही हैं, मलयाचल के गुफा-निर्झर के कणो मे वायु शीतल हो गपी है, और उसको मन्द गति के कारण आम्र-वन हिल रहे हैं। अधखिली आम को मजरी के रसास्वाद से कोकिल मत्त हो गए हैं । वे अपने मधुर कल से कूक कर विरहिणियो को विकल करने लगे हैं। यहां तो- परिमल से भाकृष्ट १ मधुकरीर वधूनिकर मू० पा० १ २ दरदलित मू० पा० ।

१० चन्द्रकला-नाटिका लताकुज गुञ्जन्मदवदलिपुञ्ज चपलयन् समालिङ्गन्नङ्ग" " द्रुततरमनङ्ग प्रबलयन्। मरुन्मन्द मन्द दलितमरविन्द तरलयन रजोवृन्द विन्दन् किरति मकरन्द दिशि दिशि ॥३॥' नटी-[ गायति ] अमुञ्चन्नपि निजा ता कुन्दलता सुचिरोपभुक्ताम् । चुन्वति रसालवल्लीम् अभिनवमधुगन्धा अमर ॥४॥ सस्कृत गुञ्जन्मदवदलिपुञ्ज-गुन्जन, रुवन, मदवान, मदमत्तर अलिपुजो भ्रमरसमूहो या तादृर्श, लताकुज, चपलपन्-चपलीयुधन सञ्चालयन , अङ्ग-विहारपरायणाना गात्र, समालिङ्गन्-संस्पृशन अनङ्ग -वाम, द्रुततरम्-अतिशीघ्र, प्रवलयन् प्रवलीकुर्वन. वधंयन -दलितम्-प्रस्फुटितम्, अरविन्द-मल, मन्द मन्द-शने शन, तर जयन्-तरलीकुर्यन, सञ्चालयन , तथा रजोवृन्द-पुष्पाणा परागसमूह विन्दन्-ग्रहुन्, मरुत्-वायु, दिशि दिशि, मकरन्द-पुष्पमध विरति-विक्षिपति । अत्र माथुर्यगुण , शिखरिणीच्छद ॥३|| प्रथमोडूः (अमुमन्तोवि पित' कुन्दरदं सुइरउबहुत्त । चुम्बइ रमालवन्नी अहिणबमहुगन्य भमगे॥४॥) मूत्र-सिशिर कम्पम् ] आर्य, साधु गीतम् । एव बल शिथि- जनपौर कुन्दलतातुरागानिशयमभिनवप्रफुल्लमहकारवल्लीनिषद- रमाण मधुपर वर्णयन्ती सत्यमाह मस्ती । तया हि- चिरादधिगन वस्तु रम्यमप्यवधारयन् । पुर प्रतितव वीक्ष्य मनस्तदनुधावनि ॥५॥ सस्कृत०-शिथिलितपौरबुन्दलतानुरागातिशयम -शियिलिन मन्दीकृत औरकुन्दलताया नगरस्थकुन्दवल्लया अनुरागातिशय दृ प्रेम यन तादृशम , अनिनवप्रपल्लसहमारवयीनिवप्रेमागम-मय पुरिपनायाम आमलताया निबद्ध स्पिरोक्त प्रेम यन तादृश, मधुकर-भ्रमर, वर्गपती भवती-ला, माह-पयार्य वदसि । सस्त०-मन-चित्त, चिरात्-दीयंकालान्, अविगत-प्राप्त, वस्तु, गम्यमपि-गुन्दरमपि, अवधारयत्-जानत्, पुर -अग्रे, प्रतिनव-नूतन (वस्तु), वीक्ष्य-दृष्ट्वा, तत् अनुधावति-नस्य पश्चाद्धावति ॥५॥ हिन्दी०-नटी-(गाती है) अमर नवमयुरन-युक्त बाम की लता का चुम्वन करन लगा परन्तु वह भली भाति उपयोग की गयी कुन्दलता का भी परित्याग नहीं कर पा रहा है । हिदी० सूत्रधार-[सिर हिलाकर] प्रिये, तुमने उचित ही गाया। महल की कुन्दलना में अनुराग म बद्ध भ्रमर का वर्णन बिलकुल सत्य है । वह इस समय नद पुष्पित सुमना से आच्छन्न आनलता मे अनुरक्त हो गया है । कहा गया है- हि दो०-हृदय वा स्वमाव ही है कि वह पूर्वप्राप्त वस्तु को सुन्दरता का अनुभव करन पर भी नवीन वस्तु से आकपित हाकर उघर ही दौडता है ।।५ १ मिनु मू० पा० ।२ शिथिलतप्तौ च मू. पा० । ३ सत्यमा मू० । ४. वस्तु म० पा० । ५ अवाधारयत् ।

चन्द्रकला-नाटिका । [नेपथ्ये] साधु ! शैलूप, साधु ! 'चिरादधिगतमित्यादि'- सूत्र-[ आकण्यं ] आयें, अयमसावितः प्राप्त एव क्षोणीभुज- श्चित्ररथदेस्य सुबुद्धिनामा प्रियामात्यः । तदावामपि समनन्तर- करणाय सज्जीभवाव । [इति निष्कान्तौ] प्रस्तावना [ततः प्रविशति सुबुद्धि. 'साधु शैलूपे' त्यादि नेपथ्योक्त पठित्वा] संस्कृत-शैलूप-नट | साधु-समीचीनम् । खोगीभुज -क्षोगी पृथ्वी मुनक्ति इति क्षोणीभुत्, मजे. कर्तरि विप्, तस्य =राश । प्रियामास्य . प्रियमन्त्री । समनातरकरणाय-सद्य पश्चात्य व्यसम्पादनाय, सजीभवाय - उद्यतो स्याव । निप्यान्तो-निगंतो नटीसूनधाराविति शेष. । संस्कृत-प्रस्तावना--आमुख (समाप्तम् ) । प्रस्तावनालसणं यथा साहित्यदर्पणे-नटी विद्रूपको वापि पारिपार्वर एव या । मूत्रधारेण सहिताः सलापं यन युति । चित्रर्यावयः स्वकार्योत्य. प्रस्तुतापिभिर्मियः । आमुस तसु विज्ञेय नाम्ना प्रस्तावनाऽपि सा ॥ (६-३१-३२) पति। तत्र घ पञ्चविधासु प्रस्तावनासु प्रयोगातिशयास्या प्रस्तावनेयम् । तल्लक्षण यथा-'यदि प्रयोग एकस्मिन् प्रयोगोऽय. प्रयुज्यते। तेन पात्रप्रवेशश्नेत प्रयोगा- तिशयस्तदा । इति। हिन्दी--(नेपथ्यमे) टीक, गूत्रधार ! टी पहले हो । पूर्गप्राप्त वस्तु को सुन्दर मानकर भी...., इत्यादि। सूरपार-(गुनपर) प्रिये महाराज चित्ररप देव ये प्रिय मन्त्री सुबुद्धि मा गये । अत हमें भी निश्चित कार्य भी तयारी गरनी पाहिए। (दोनो या प्रस्थान) प्ररावना समाप्त [ससे याद 'टील मूत्रधार ! टीम' इस्पादि पहले हुए मुर्विमा प्रथेग] प्रपमोऽङ्कः १३ सुबुद्धिः अनेन खलु चन्द्रकलाया भर्तुरनुरागवन्ध स्यानवेति चिन्तयतो मम दत्तमेव प्रतिवचन भवता' । तथा ह्म पा कर्णाटविजयार्थ प्रस्थि- तेन विश्माभरणाख्येन सेनापतिना मध्येमार्ग कुतोऽप्यधिगत्य निरु- नमसौन्दर्यलक्ष्मीरिव विग्रहवतीति राजवशजेयमिति' कथयित्वा मत्प- रितोषकाडि,क्षणा मदन्तिक प्रहिता । मया चात्यन्तसुलक्षणेति निरू- प्यमाणा तत्काले च- अनेन-वाक्येन, चन्द्रकलाया, भतं -स्वामिन अनुरागयन्ध -प्रेमबन्धन, यस्यानवेति, चिन्तयत -विचारयत , मम-मे, भवता, प्रतिवचनम् -उतर, दत्तमेव । कर्णाटविजयार्थ-कर्णाटदेश विजेतु, प्रस्थितेन-चलितेन, विक्रमा- भरणास्येन अधिगत्य-प्राप्य, इय-चन्द्रलेखा, निरुपमसौन्दर्यलक्ष्मीरिव --निरुपमा अद्वितीया सौन्दर्यलक्ष्मी लावण्यश्री इव, विग्रह्वनी-शरीरघारिणी, इति, राजगशजा-राजकुलोत्पना, इति, कयपित्ता, मत्परितोपकाडि क्षगा- मत्सन्तोपामिनापिणा (सेनापतिना), मदन्तिा-मम समीन, प्रहिता- प्रेषिता । मया च, अत्यन्तसुक्षणा-सामुद्रिकत शुभ नक्ष गसम्पना, इति, निरूप्यमाणा-वीक्ष्यमाणा (इयम), तत्काले च-तस्मिनेव अवलोकनसमये, सुबुद्धि-चन्द्रकला के प्रति महाराज का अनुराग है अथवा नही, ऐसा सोचते हुए, मुझे जैसे-यह कर आपने उत्तर ही दे दिया । क्यो कि ऐसा है कि, वर्णाटक-विजय के लिए प्रस्थित विक्रमाभरण नामक सेनापति ने कही मार्ग म इस युवती को प्राप्त किया। लक्ष्मी के समान सौन्दर्यराशि को बिखेरती हुई इसे किसी राजनश की कन्या समझा तथा मेरे सन्ताप के लिए उसने मेरे पास प्रेषित कर दिया। और मैं भी सुन्दर लक्षणो से युक्त युवती का निरीक्षण कर रहा था कि दिव्य वाणी । सुनायी पड़ी- १ भवन्ती मू० पा० । २ राजवशजेयमिति मू० पा० ।

चन्द्रकला-नाटिका अस्या-चा. यस्तु भमिपतिर्भूमी' पाणिमस्या ग्रहीष्यति । लक्ष्मी स्वयमुपागत्य वरमस्मै प्रदास्यति ।।६।। इत्यमानुपी गिरमाकर्ण्य तत्परिणयेन भर्तरुपचय महान्त चिन्त- यता पाण्ड्यराजदुहितुर्महादेव्या भयेन स्वय महाराजेनना परिणाय- यितुमशक्नुवता" न्त पुरचारिणीमिमामवलोक्य स्वयमेव परिग्रही- प्यति स्वामीति विचिन्त्य मम वशजेय सखीपदे स्थापयित्वा परि सस्कृत-भूमौ-पृथिव्या, य, भूमिपति -राजा, पलाया , पाणि-वर ग्रहीप्यति-धारयिष्यति परिणेष्यतीत्यर्थ , लक्ष्मी, स्वय-साक्षात्, उपागत्य-समीपमागत्य, अस्मै-भूमिपतये, वरम- अभीष्ट, प्रदास्यति । अत्र अनुष्टुप् छन्द ॥६॥ इति-इत्थम, अमानुपी गिर-दैवी वाचम् , आकर्ण्य-श्रुत्वा, तत्सरिणयेन- चन्द्रकलाविवाहेन, भर्तु -स्वामिन , महान्तम् उपचयम् -उन्नति, चिन्त- यता-विचारयता, पाण्डयराजदुहितु -पाण्ड्येश्वरस्य पुश्या , महादेव्या- महाराज या , भयेन-भीत्या, स्वय, महाराजेन-निश्शङ्कभानुदेवेन, (सह) एना- चन्द्रकला, परिणाययितु-विवाहयितुम् अशक्नुवता-असमर्थन (मया) अन्त पुरचारिणीम -अवरोधनिवासिनीम, इमा–चन्द्रकलाम, अवलोषय- दृष्ट्वा, स्वामी, स्वयमेव, परिग्रहीप्यति-परिणेष्यति, इति, विचिन्त्य भालोच्य इयं-कन्यका, मम, वशजा-वशोत्पन्ना, सखीपदे-सख्या स्याने, स्थापयित्वा- हिन्दी-पृथ्वी पर जो कोई भी राजा इसका पाणिग्रहण करेगा, उसके पास स्वय लक्ष्मी आकर उसको वरदान देंगी॥६॥ इस दिव्यवाणी को सुनवर स्वामी की समृद्धि के लिए उनका इससे साय परिणय कराने का विचार किया परन्तु पाण्ड्यराजपुत्री महादेवी के भय से मैं स्वय महाराज के साथ इसका परिणय पराने म असमर्थ था । अत मैंने सोचा कि अत पुर में रहती हुई इसकी सुन्दरता का देखकर स्वामी सय १ भूमिपतिभूमौ मू० पा० । २ ग्रहिष्पति मू० पा०॥ ३ लक्ष्मी मू० पान ४ महाजनेना मू० पा० । ५ अशक्नुवानेन मू० पा०। ६ मिमावलोक्य मू० पा०। ७ परिग्रहिप्पति मू० पा।

- , प्रयमोऽङ्कः पालनीयेति सादर समर्पिता' देव्या । [विचिन्त्य] तत कुन पुन- रिदानीम् आकर्णयामो वृत्तान्तमेतस्या। कय चिरादा' हूयमानापि नाभिवर्तते मामन्त पुरचारिणी सुनन्दना। [प्रविश्य] सुनन्दना -आर्य, वन्दे। (अज्ज, वन्दामि ।) सुबुद्धि -सुनन्दने, क्थय चन्द्रकलावृत्तान्तम् । सुनन्दना-आर्य, कथयितु विभेमि । (अज्ज, कधिदु भिएमि।) सुबुद्धि-कथय । न खलु सम्भावय रहस्योद्भदमस्मादृशेषु निधाय, परिपालनीया-पोषणीया, इति, देव्या -महाराज्य, सादरम्-आदरेण सहित यया स्यात् तथा, समपिता-दत्ता । तत, कुत-कस्मात्, पुन , इदानीम्-अघुना, एतस्या -चन्द्रकलाया , वृत्तान्त-समाचारम, आकर्णयाम योप्यामि । क्य, चिरात-वहो कालात्, आहूयमानापि-आकार्यमाणापि, अन्त पुरचारिणी, मुन दना-एतनाम्नी दासी, माम्, न अभिवर्तने-न उपति? सस्कृत-न खलु मत्त रहस्यप्रकटा भविष्यति इति सम्भावना मा कार्की । पूर्व प्रागव भवते मया निवेदितम् । इय-चन्द्रकला, दर्शन- हिन्दी०-(प्रवेशकर) आर्य प्रणाम । सुबुद्धि-सुनन्दने । चन्द्रकला का समाचार बताओ। सुन दना-आर्य बताने से डरती हूँ। सुबुद्धि-वहो, मुझ जैसे व्यक्ति से रहस्योदघाटन कभी भी सम्भव नहीं । ही परिणय कर लेंगे और मैंने यह कह कर वि यह मेरे कृल की कया है आप अपनी सखी के रूप म मान कर इसका पालन करें महारानी को सौंप दिया। [सोचकर] तो इस समय पुन किससे और किस प्रकार इसका समाचार मालूम करूं ? क्या कारण है कि अन्त पुर म काम करने वाली सुनन्दना, जिसको मैंने बहुत देर हुए बुलवाया था या नही रही है ? १ समपिका मू० पा० । २ वाकयामि इति पाठस्तूचित 1 ३ चिराहा मू. पा० । ४ सुनन्दना मू० पा० ।५ विमेम मू० पा० ।

चन्द्रकला नाटिका । सुनन्दना-पूर्व खलु कथितमेव मया आर्याय' इय खलु दर्शनमान 'फेणव महाराजानुरागबन्धन भविष्यतीति आशङ्कयन्त्या आर्यगौर- वनियन्त्रितया देव्या प्रियसखीपदे स्थापिता चर्तते । इदानी च अतिप्रयत्नेन५ गोपाग्यमानापि अतकितेन देवीसमीपमुपगच्छत.' महाराजस्य लोचनगोचरे पतिता। (पुब्ब क्ख कधिद ज्जेब मए अज्ज- स्स । इअ वख दसणमत्तकेणज्जेब महाराआअणुराअबन्धण भविस्स- दित्तिसासङ्घन्तिएवि अज्जगौरवणिअन्तिदाए देबीए' पिअसहिपदे स्थापिता बदइ । दाणी च आदिपउत्तेण गोबिज्जमाणावि अदकिदेण देवीसमीबमुबगच्छत्तस्स'' महाराअस्स लोअणगोअरे पडिता।) मात्रकेणव-दृष्टिपथमवतरन्त्येव, महाराजानुरागबन्धन भविष्यति-स्वामिनः प्रेम स्वस्याम् आधास्पति, इति, आशङ्कयन्त्या-सन्दिहानया, आर्यगौरवनिय- न्धितया-भवत्प्रतिष्ठाभिभूतया, देव्या-महाराज्या, (आत्मन ) प्रियसखीपदे, स्थापिता, वर्तते । च-विन्तु इदानीम् --अधुना, अतिप्रयत्नेन महता यलेन, गोपाप्यमानापि-निभृत रक्ष्यमाणापि, (सा) अतकितेन सहसा, देवीसमीपम्, , महाराजस्य, लोचनगोचरे-दृष्टिपथे, पतिता-समागता । सुनन्दना-पहले ही बता चुकी हूँ कि आपके कुल-गौरव का ध्यान रख कर महादेवी उसे अपनी सखी-पद पर प्रतिष्ठित कर पालन पोषण कर रही हैं । और महादेवी, इस शका के कारण कि इसके दर्शनमात्र से ही महाराज इसके प्रति आसक्त हो जायेंगे इसकी उपस्थिति अत्यन्त ही गोपनीय रखती है । तथापि अचानक देवी के ही पास जाते हुए महाराज की दृष्टि उस पर पड ही तो गयी। १ आन्धस्य मू० पा० । २ दर्शनमात्रयेणापि मू० पा.। ३ आर्य' गौरवनियन्त्रितया मू० पा०। ४ अत्र प्राकृते 'वट्टई' इति पाठ उचित । ५ प्रतिप्रबुत्येन मू० पा० भ्रष्ट । ६ उपगच्छता मू० पा० । ७ दसमत्तण णिअन्तिदादेवीए मू० पा० । १ दिपडित्तेण मू० पा०। १. देवीसमीमवगच्छत्तत्य म० पा० । ११ महाराअस्स इति म पा० नास्ति। उपगच्छत मू० पा०1८ १७ प्रथमोऽङ्कः मुतिः-ततस्ततः। मुनन्दना-तत इय मन्थरतरलतारकमहाराजमा' लोकयन्ती सस- म्भ्रम देवीपरिजनंदूंरतो नीता। (तदोइ मत्यरतरलतारग' महाराअ आलोअन्ती' ममम्भ्रम देवीपरिअगेहि दूरदो णीदा।) सुबुद्धिः-ततस्ततः। मुनन्दना-ततः प्रमृति देवीभयात् याह्यतिरोहितविकारोऽहर्निश मदनानलभावितान्तरों वर्तते महाराजः । (तदो पहदि देवोभयादो चाहिजतिरोहिदविआरो अहणिस मदणाणलभमिदन्तरो वदि महा- राओ। तत -तदनन्तरम्, मन्यरतरलतारमहाराजम्-मन्यस मन्दा निश्चलेति यावत् तथा तरला चचला वा चाकचिक्पपूर्णा तारवा अक्षण. कनीनिका' यस्य तादृश महाराजम् ,आसोकयन्ती-पश्यन्ती, इय-चन्द्रकला, देवीपरिजन:- महाराज्या. दासीभि, ससम्मम हठात्, दूरतो नीता-ततो दूरस्थान प्रापिता। तत. प्रभृति-तदारभ्य, महाराज, देवीभयात्, बाह्यतिरो- हितविपार -बाह्य बहिर्देशे तिरोहित. निगूढ. विकार. कामविकारो यस्य सुबुद्धि-तब क्या हुआ? सुनन्दना--तब चचल और मंदिर नेत्रो से राजा की ओर देखती हुई उसको देवी की सेविकाओ ने शीघ्रतापूर्वक दूर हटा दिया। सुबुद्धि-इसके बाद क्या हुआ सुनन्दना-उस क्षण से महाराज अन्दर ही अन्दर रातदिन शाम से पीडित होने लगे है, लेकिन महारानी के डर से यह विकार बाहर प्रकट नहीं होने देते। 7 मलोकयन्ती मूक पा० । २ इय मू० पा० । ३ समच्छरत- लवारय ४ आलोअन्त । ५ मदनानलभ्रमितान्तरो इति पाठ. समीचीनवरः। फा०२ चन्द्रकला-नाटिका 7 सुबुद्धि --भद्रे । तत् कथ महाराजस्य त्वरितमनया सङ्गमो भवति। सुमन्दना-आर्य, ममोपायेन समुत्पन्न एव । (अज्ज, मम उवायेण समुप्पणो ज्जेव।) सुबुद्धि --क पुनरुपायस्ते सुनन्दमा-आर्य, महाराजनियोगेन चन्द्रकलामनुसतं त्वरिता न शक्नोमि इह चिर स्थातुम् । तत् पश्चात् कथयिष्यामि । (अज्ज, महाराअणिओएणि चन्दअल अण सरिदु तुबरिदा ण सक्कोमि इस चिर ठादु । ता पच्छा किहिस्स ।) [ इति निष्क्रान्ता] तादश , अहर्निश-राविधिव, मदनानलभावितान्तर-मदनानलेन कामाग्निना भावित सन्दीपितम अन्तर हृदय यस्य तादश वर्तते । भद्रे-कल्याणि । तत, क्य महाराजस्य, अनपा-च द्रव लया, त्वरित- शीघ्र , सङ्गम-सम्मेलन, भवति-भविष्यति । अत्र वतमानसामीप्ये भविष्य दर्थे ल । महाराज नियोगेन-महाराजाज्ञया चन्द्रकलाम अनुसतुम-अनुगन्तुम, स्वरिता-शंध्यण युक्ता (अस्मि त ) इह-अन, चिर--बहुकाल यावत, स्थात् न शकनोमि । राज्यानुस घानाय-राज्यकार्यसम्पादनाय । सुबुद्धि-भद्रे । तो महाराज का इसके साथ साम शीघ्र से हो' सुन दना-आर्य | मेरे उपाय से सम्पन्न ही है। सुवृद्धि-अच्छा तो फिर तम्हारा उपाय क्या है ? मुन दना-आर्य । महाराज ने मुझे च द्रवला के प्रति सावधान रहने का आदेश दिया है इस कारण शीघ्रता में हूँ, अधिक देर तक रुक नहीं सकती। फिर बताऊँगी। (चली जाती है) ? १ भवतु मू० पा।

4 प्रथम तुः १९ सुबुद्धिः-[विचिन्त्य] तदहमपोदानी राज्यानुसन्धानाय गच्छामि । [इति निष्मान्तः विष्कम्मरः [ततः प्रविशति मदनावस्या नाटयन् राजा विदूषकश्च] राजा-[मचिन्तम्] सा दृष्टिर्न वनीर' नीरजमयी वृष्टि स्तदप्यानन हेलामोहनमन्नयन्त्रजनिताकृष्टिजंगच्चेतसः । विष्कम्भकः-भूताना भाविना च कथाशाना निदर्शक समाप्त इत्यर्थः । तल्लक्षण यथा 'वृत्तवनिप्यमाणाना कयागाना निदर्शकः । सक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्म आदावतस्य दशित. ॥ इति । तर चास्मिन् प्रबन्ये सह कीर्ण- विष्वम्मक. 1 तस्यापि लक्षग यथा सात्यिदपंगे-'मध्येन मध्यमाभ्या वा पात्राम्या सम्प्रयोजितः । शुद्ध. स्यात, स तु सङ्कीगों नीचमध्यमकल्पित ॥' तया चात्र सुनन्दनासुद्धिरूपान्या नीचमध्यमपात्राभ्या कल्लितत्वात् सङ्कीर्ण- विष्कम्भक इति जेय. । नाटयन्–अभिनयन् । सचिन्तम्-चिन्तया सहित यया स्यात् तथा। सा, दृष्टि.-अवलोक्नं, नवनीरनीरजमयी-स्वच्छगलसम्भूतकमलमयो, वृष्टि: वर्षणं, तदपि, आनन-मुख. जगच्चेतस. .-जगत जगनिवासिना- मित्यर्थः चेतस चितस्य, हेलामोहनमन्त्रयन्त्रजनिताकृष्टि -हेलपा सुद्धि-(सोचकर) तो मैं भी अब राज्य की देख-रेख करने चलें । ( चला जाता है। विष्कम्भक [इसके बाद पीड़ित राजा और विद्रूपक का प्रवेश] राजा-(सोचता हुआ) उसकी आँखो से प्रतीत होता पा जैसे नव जल मे खिलते हुये कमलो को बौछार हो (जैसे निर्मल, स्वच्छ जल मे कमल सिल गये हों उनसे सुगन्धित जलबूंदो को वृष्टि से सुखदायक होती है, १वत्र नवनील' इति पाठगे युक्त.। २ वृष्टि तदप्यानन म. पा० । ३ कृष्टिनगचेतस मू० पा०1 .

चन्द्रकला-नाटिका सा भ्रू वल्लिरनङ्गशाङ्ग धनुषो यष्टिस्तथास्यास्तनु- लावण्यामृतपूरपूरणमयी सृष्टि परा वेधस ॥७॥ विदूषक कथ सुचिरोपस्थित पश्यन्नपि मा न जानाति प्रियव- यस्य । (कध सुइरोबस्थिद पेक्खन्तोबि म अण जाणादि पिअबअस्सो।) राजा-पुन सा दृष्टि इत्यादि पठति)। विदूषक -मो वयस्य, कथमेवमननुभूतपूर्व मधीरत्वमाचरन् मय्यपि गोपयसि चित्तगतम् । (भो वअस्स" कध एव अगणुभ्दपूब चेष्टया मोहनाथ वशीकरणाप प्रयुक्ताभ्या मन्त्रयन्त्राभ्या जनिता उत्पादिता आकृष्टि आकषण सा, 5 वल्लि-भूलता, अनङ्गशाङ्ग धनुष -अनजस्य कामस्य शाङ्गस्य शृङ्गनिर्मितस्य धनुप चापस्य, यष्टि -वश , तथा, अस्या चन्द्रकलाया , तनु -शरीर, लावण्यामृतपूरपूरणमयी लावण्य सौन्दर्यम् एवं अमृत सुधा तत्य पूर प्लाय तेन युक्त पूरण समुद्र तन्मयी, वेधस - '-नष्ट, परा उत्कृष्टा सृष्टि --रचना (वर्तते । अत्र शार्दूलविक्रीडित छद ॥७॥ सुचिरोपस्थित-दीर्घकालाद् विद्यमान, मा-विदूषक, पश्यन्नपि- विलोकयन्नपि, प्रियवयस्य –प्रियमित्र, न जानाति । अननुभूतपूर्व-पूर्व उसी प्रकार उसकी दृष्टि पड़ने के कारण सुख का अनुभव होता है) उसका मुख अलौकिक सौदर्य से ससार को आकृष्ट करने वाला, उसकी रस क्रीडा मानो मोहन मत्र का पत्र है। उसकी भ्रू लता, मानो काम देव के शङ्गपनुष की यष्टि है और सम्पूर्ण शरीर जैसे सौदर्य रूपी अमृत से उफनाता हुआ समुद्र है । प्रतीत होता है यह कया ब्रह्मा को सर्वश्रेष्ठ रचना है ॥७ विदूषक-प्या कारण है, मित्र । कि इतनी देर से यहाँ उपस्थित देखते हुए मुझे पहिचान नहीं रहे हो? -(पुन 'उसकी वही दृष्टि' इत्यादि कहता है) विदूषक-मिन । हृदय की अधीरता मुझसे क्यों छिपा रह हो ? एसी १ पलि मू० पा०१२ शाङ्गों मू० पा० । ३ सृष्टिपरा मूग पा ४ प्रिय प्रियवयस्य मु. पा० । ५ अवस्स मू० पा० ।

प्रथमोऽङ्कः २१ अधीरता आअरन्तो मयिबि गोवेसि चितगद । ) राजा-(पुनस्तदेव पठति)। विषय:-[उच्च-] पद्यह रहस्पोभेदभाजनमपि न ते तदिता गच्छामि। (जइ अह रहस्सभेदवाअण पि ण दे ता इदो गच्छम्मि) -[विलोक्य] कथ समीप एव वर्तते मे प्रियवयस्यो' रसालकः । सखे, मया सलु न विदितोऽसि धरणीचिन्तापरवशेन । कदापि न अनुभवविषयीकृतम्, अधीरत्वम् अधीरताम्, आचरन्-विदधत्, ( उत्साटिताशेषकण्टकस्य-उत्साटितानि निर्मूलीकृतानी अशेषकर कानि निखिल- शत्रवो येन तादृशस्य । मय्यपि, चित्तगत-हुद्गत गाव, गोपयसि-निगूढयसि । रहस्योद्भेदभाजन-~ गुप्तवार्ताकथनपात्रन । रसालव-एतनामा विदूष । विशेषेण दूपयति स्व पर वा इति विदूषक वि+दूप् +णि + बुल-अक । अस्य लक्षणमिदम् - वयस्पश्चाटुपट स एव च विदूषक । अन्त पुरचरो राजा नर्मामात्य प्रकीर्तित ॥ इति सागर । साहित्यदर्पणकारस्थ मते-'कुसुमवसन्ताभिध रुमवपुर्वेषभाषाये । हात्यकर कलहरतिविदूषक स्यात स्वकर्मज्ञ ॥ स्वकर्म-मधुरभोजनम.' । घरणीचिन्तापरवशेन-पृथ्वीपालनचिन्ताधीनतया ! अधीरता इसके पूर्व तो कभी नहीं देखी गयी। राजा-पुन. वही कहता है। विदूषक-(उच्च स्वर से) यदि मैं रहस्य-मद जानने याग्य भी नही हूँ, तो मैं यहां से चला जाता हूँ। राजा -(देखकर) क्या मेरे प्रिय मित्र रसालक मेरे निकट ही उपस्थित हैं ? सखे । राज्य की चिन्ताओ कारण देख नहीं सका । (मन चिन्ताओ के कारण व्यग्र रहा इसी से ध्यान नहीं गया)। १ प्रियवयस्ये मु. पा० ।

चन्द्रकलानाटिका राजा- विदूषक -उत्पाटिताशेपकण्टकस्य राज्यपालननियुक्तधीसचिवस्य लितरतिमानकौतूहलस्य न खलु ते धरणीचिन्ता किन्तु तरुणी- न्तिा । (उद् वाडिदासेसक्ण्टअस्स रजुपालणणिउत्तधीसइवस्स लिदरदिमेतकोदूहलस्स ण क्खु दे धरणीचिन्ता किन्तु तरुणी- न्ता'।) -[सभयम् ] आ , मिथ्यावादिन् । नीच शस। सन्तलेखैकनिबद्धभाव परासु कान्तासु मन कुतो मे। फुल्लमल्लीमधुलम्पट किं मधुव्रत काड क्षति' वल्लिमन्याम् ॥८॥ राज्यपालननियुक्तधीसचिवस्य-राज्यरक्षाया नियुक्तो बुद्धिमान मन्त्री न तादृशस्य, कलितरतिमात्रकौतूहलस्प-कलित चिन्तित रतिमात्रस्य मत्रीडाया एव कौतूहल कौतुक येन तादृशस्य, ते तरुणीचिन्ता, वर्तते, न लु, धरणीचिता । नीचे शस-मन्दस्वरेण वद । वसन्तलेखेकनिबद्धभाव-वसतलेखाया तदाख्ये नायिकाविशेषे एक ज्वल निबद्धो भावाऽनुरागो येन तत्तादृश मे-मम, मन -चित्त, परासु- सितलेखाभिनासु, कान्तासु-सुन्दरीपु, कुत '-कथ गच्छति । अपितु यमपि नेत्यर्थ । तथाहि, प्रफुल्लमल्लीमधुलम्पट - प्रफुल्लाया विदूषक-आपने अपने शत्रुरूपी कण्टको को समूल नष्ट कर डाला है, शासन के लिए योग्य म त्रियो को नियुक्त कर लिया है । आप रतिप्रिय रसिक है, निश्चित ही आपको राज्य की नही, तरूणी की चिता व्याकुल कर रही है। राजा-(भयभीत हो) अरे, असत्यवादी । धीरे धीरे ही बोलो। मेरा हृदय तो वसन्तलेसा मे अनुरक्त रहता है, अन्य रमणियो मे नसे (अनुरक्त) हो सकता है (कदापि नही)। खिली हुई चमेली के मधुरस में आबद्ध भौरा क्या कभी किसी अन्य लता पर जाने की इच्छा करता है (कभी नही) १ तगि चिन्ता मू० पा० । २ मिथ्यावादिने मू० पा० । ३ नीच सशनिच शस मू० पा० । ४ अन इति साहित्यदर्पणे । ५ काक्षति मू० पास 7 , प्रथमोऽ विदूषक -मो वयस्य, सत्य । यदा पुनमल्लिकापि ग्रीष्मकाल. परिणामेनापसरन्मघरसा भवति', तदा घनकालसमागमेनाभि- स्फुरकदम्बवल्ली मोपभिलपति । (भो वअस्स, सच्च । जदा पुण मल्लिआदि गिझालपरिणामेणओसरणन महुरसा भोदि तदा घणकालसमागमेण महिफुरन्त कदम्मवल्लि सोवि अहिलमदि।) राना-सवे, तूष्णीको भव । अलमनेनालीकपरिहासेन । विदूषक -- [सरोपम्] भो वयस्य, यदीदानीम् अह रहस्यमैद- भाजनमपि न ते तत् इतो गच्छामि । (भो वअस्स, ज्जइदाणी अह रहस्मभेदभाषण पि ण दे ता इदो गच्छम्मि1) [इति गन्तुमुपक्रमते] प्रस्फुटिताया मल्ल्या मल्लिकाकुसमस्य मधुलमटो मघुपानलोभी मधुव्रत- भ्रमर , किम्, अन्या, वल्लि लता, काङ्क्षति-कामयते । अपि तु कयमपि नेत्यर्थ । मन श्लोके प्रतिवस्तूपमाऽलङ्कार तया उपेन्द्रवजाच्चद ॥८॥ यदा, मल्लिकापि, ग्रीष्मकातपरिणामेन-प्रीमतौरवसानेन, अपसरल्मधुरसा- यपसरन् विशालन् मधुरसो यस्या तादृशी, भवती तदा, घनकालसमागमेन-- वर्षौरागमनेन अभिस्फुरस्कदम्बवल्ली-प्रस्फुटत्कदम्बलता, सोऽपि-प्रमरोजी, अभिनपति-वाश्यति । तूष्णीको भव-मानमालम्बस्व । अलीकपरिहासेन-- मिथ्यापरिहासेन, अल व्यर्थम् साम्प्रतमित्यथ । विदूपक-सत्य कह रहे हो मित्र । किन्तु जब ग्राष्मकाल बीतने पर मल्लिका (चमेली) मच रस से रहित हो जाती है तब वर्षा के साप फलने वानी कदम्बलता पर भी जाने की इच्छा वह भौरा करता है। राजा-सखे, चुप रहो । घोडो यह व्यर्थ का परिहास । विदूषक-(क्रोधित होकर) यदि मैं रहस्यभेद जानने योग्य भी नहीं हूँ तो मैं जाता हूँ यहाँ से । (जाने लगता है) १ मघुसा भवत म्० पा० १२ कदम्बवल्लि मू० पा० । ३ अहिप्फुपूरन्त मू. पा०1४ हरस्मुभेदभाषण मू० पा० । ५ वे मू० पा० 1 ६ गच्यामि मू०पा।

चन्द्रकला-नाटिका - - राजा- -[करे धृत्वा] सखे, तिष्ठ तिष्ठ । तद् यथा देवी न जानाति, तथा त्वयाचरणीयम् । विदूषक -यदा देवी जानाति तदा एवमेव शपामि । (यदा देवी जाणादि तदा एब ज्जेव सवामि।) [इति यज्ञोपवीत स्पृशति] -सखे, अद्य खलु देवीसमीपमुपगच्छता मयान्त. पुरे काऽपि कन्यका दृष्टा । इय खलु- तारुण्यस्य विलास समधिकलावण्यसम्पदो हास ग धरणितलस्याभरण युवजनमनसो वशीकरणम् ॥६॥ तारुण्यस्य-यौवनस्य, विलास -प्रकाश योवनस्यातिशयप्रकाशस्थानमित्यर्थ , समधिकलावण्यसम्पद -समधिकाया प्रचुराया लावण्यसम्पद सौन्दर्य- सम्पत्ते , हास -विकास अतिशयविकासस्थानमित्यथ , धरणितलस्य- पृथ्वीतलस्य, आभरणम्-अतिशयेन अलवाररूपा, (तथा) युवजनमनस - युवकाना चित्तस्य, वशीकरणम्-अतिशयवशीकरणहेतु । अत्र दीप्तिर- लकार आर्याच्छन्द ॥६ राजा-(हाथ से पकडते हुए) रुको । मित्र । रुको ऐसा करो कि देवी न जानने पायें। विदूषक-देवी, नही जानने पायेंगी, इसके लिए मैं शपथ खाता हूँ। (कहकर यज्ञोपवीत छूता है) राजा-सखे । आज, मैंने अन्त पुर मे देवी के पास जाती हुई एक कन्या को देखा है । यह (कन्या) निश्चय ही- यौवन का विलास, विखरते हुए सौदर्य की सम्पत्ति का हास, परती-सल का मआभूषण तथा युवको के मन के लिए वशीकरण मत्र . 1|| १ एव मे मू० पा० । २ पृशति मू० पा० । ३ समधिकसम्पदा हास. मू०पा०॥

प्रथमोक्षः विदूषकः-ततः किं तया प्रतिपन्नम, । (तदो किं ताए पडिवण्ण?" राजा-अनन्तर च- मुहु. स्मेरापाङ्ग दरविगलिता' कुचितपुट वितन्वाना दृष्टा परिमितनिमेप मयि मनाक् । विदूषक -राशीकृतानि मरुता नवखण्डकूट- तुल्यप्रभाणि सहवारप्रसूनकानि । चित्त हरन्ति गुडलड्डुकस्वच्छभावा- क्रूरपभिभमुकुलाश्च अशोकगुच्छा. ॥१०॥ (रासिक्दाइ मरुताणवखण्डकुड- तुल्लपहावाइ सहआरप्पुसुणआइ चित्त हरन्ति गुडल/असच्छभावा- कूरप्पर भिन्नमउलाम अशोअगुच्छा ।।१०।) तात, तया--कन्यकया, कि प्रतिपन्नम -किकृतम् मुह - भूयो भूप., दरविगलिताकुचितपुट-किश्चित्स्फारितनयन, स्मैरापाङ्ग-स्मितिपूर्वक नेत्रयोरन्त, मयि, मनाक-ईपत्, वितन्वाना-- विस्तारयन्ती, (सा) परिमितनिमेप-क्षण यावत्, दृष्टा-विलोकिता । मरुता-वायुना, राशीकृतानि-सञ्चितानि, नवखण्डकूटतुल्यप्रभाणि- विदूषक-तब उसने क्या किया? राजा-और तब-मैंने कुछ क्षणो तक देखा कि वह मेरी ही ओर अपने अद्ध निमीलित नेत्र-कटाक्षो से मुसकराती हुई देख-सी रही थी। विदूषक-नयी खांड के ढेर की भांति वायु के द्वारा गिराये गये आम के बोरो का समूह और गुड के बने विमल लड्डू की तरह अशोक के फूलो के ये गुच्छ, क्रूर वायु ने जिनके मुकुलो को प्रस्फुटित कर दिया है, अपने. दर्शनमात्र से चित्त को चुरा लेते है ॥१॥ १ दरविलिता मू० पा० । २ कदाइ मू० पा० स्खलित । ३ वेबण्ड मू. पा०।

चद्रकला-नाटिका तित प्रविशति' 'सरिव, पश्य पश्य' इति नाटयन्ती चन्द्रकला सुनन्दना च] चन्द्रकला- 1-[दीर्घ नि श्वस्य स्वगतम्] अपि नाम एष महा- पुनरपि मे लोचनपथा" लकरण भवेत् । (अबि णाम एसो महाराओ पुणोवि मे लोअणपथा अलकरण भवे।) सुनन्दना-अद्य प्रियसखि । (अदि पिअसहिए 1 ) [इत्युभे माधवीलताया कुसुमावचय नाटयत । ] विदूषक - [अग्रत अवलोक्य साश्चर्यम्] आश्चर्य , कथमिह महीतले सुरकन्यका परिभ्रमति 1 (अम्मो, कद इध' महिदले नवीनशकंराराशिसमकान्तीनि, सहकारप्रसूनकानि-आम्रनचर्य , (तया) गुडलडडुकस्वच्छभावाक्रूरप्रभिन्नमुकुला -गुडमोदकवत स्वच्छ भावेन तया मार्दवेन प्रभिन्नानि प्रस्फुटितानि कुडमलानि येषा तथाभूता , अशोकगुच्छा - अशोकस्तबका , च, चित्त, हरन्ति-आकर्षन्ति । अत्र इन्द्रवज्राच्छन्द ॥१०॥ नाटयन्ती-अभिनयन्ती । दीर्घ-दीर्घकाल यावत्, नि श्वस्य- श्वासमाकृष्य, स्वगतम-पररश्रुततया मनस्येव केवल चिन्त्यते-यथा साहित्यदर्पणे-'अश्राव्य खलु यद्वस्तु तदिह स्वगत मतम्' स्वगतम् आत्मगत च पर्यायो । सोचनपथा- लकरणम-दृष्टिपथस्य शोभा दृष्टिगोचर इति यावत् । कुसुमावचय- [इसके पश्चात सखि, देखो देखो कहती हुई चन्द्रकला, और सुनन्दना प्रवेश . - करती है । ] चन्द्रकला-(नि श्वास के साथ स्वय) क्या यह सम्भव है कि महाराज पुरा मेरे दृष्टि पथ वो शोभित कर सकें? सुन दना-आज ही प्रिय सखि। [दोनो माधवीलता का पुष्प-चयन करने का नाटय करती है।] विदूषक-(सामने देखकर आश्चर्य से) आश्चर्य है, क्या देव-कन्या १ अय मू० पा० नास्ति । २ ईय मू० पा० । ३ ना मू० पा०।४ महा- राज मू. पा०। ५ यथा मू० पा०। ६ ईद मू० पा०। + प्रथमोऽद्ध सुरवणआपरिभमदि।) राजा-अधो विन्यस्यन्ती मुखकमलमुद्धिनपुलकम् । कवचित्रीता वाला द्रुतमहह देवीपरिजन ॥११॥ विदूषक -तत कि तया आचरितम् (तदो कि तए आचरिदम् ?) राजा सखे, किमन्यत् ? अनया खलु वध्वा निजगुणसधर्म श समाकृष्टचेतसः प्रसभ हृदये दिवानिग मे भवति मदनानलो ज्वालित ।२ पुष्पोटन, नाटयत -अभिनयत । महोतले-भूतले, सुरकन्यका-देवबाला, परिभ्रमति-इतस्तत सञ्चरति । उद्भिन्नपुलक-रोमाञ्चित, मुखकमलम्, अध -नीचे , विन्यस्यन्ती- चुबन्ती, वाला-सा कन्यका, अहह इति सेदे, द्रुत-शीन, देवीपरिजन महारानीपरिचारिकाभि, क्वचित्-कुचित्, नोता-प्रापिता । अस्य श्लोकस्य पूर्षि ‘मुह स्मेरापागम्' इत्यादि । अत्र शिखरिणीच्चद ॥११॥ यध्वा-स्त्रिया, निजगुणसधै -स्वकीयगुणसमूह , भृशम् -अत्यर्थ, समाकृष्ट- चेतस -अपहृतचित्तस्य, मे-मम, हृदये, दिवानिश-राविन्दिव, प्रसभ बला. मदनानल -कामाग्नि , वालित-सन्दीपित । पृथ्वी-तल पर धूम रही है। राजा-ओह पुलकायमान (रोमाचित) मुख-कमल को नीचे की और किए हुए यह बाला महारानी को परिचारिकाओ द्वारा कहीं दूर हटा - . दी गयी ॥११॥ विदूषक-इसके बाद उसने क्या किया? राजा-सखे । क्या कहूँ? उस बाला ने तो अपने गुणो के द्वारा मेरे चित्त को इस भांति आकृष्ट कर पिया है कि मेरे हृदय मे रात-दिन कामाग्नि जलती रहती है। १ सुरकर्षा मू० पा० । २ सखे किमन्दत् । अनया खलु बब्बा निजगुणसरे मृटीत्समाकृष्टचेतस प्रसभ हृदये दिवानिश मे दोदि मदनानलो जलित मू० पा०!

चन्द्रकला नाटिका २ विदूषकः-आश्चर्यम्, तदविलम्वितं परिसृत्य दीधिकोद्ध तसलिल- कुम्भेन निर्वाप्यतामेष वह्निः। (हिमाणहे, ता अबिलम्बिदै पसिरिज दिहिआश्चिअ सलिलकुम्भेण णिव्वाबअदू एसो बह्निः।) राजा-[ईषद् विहस्य] सखे, परिहाय सुघाधारा तामेव मृगलोचनाम् । याति' निर्वाणतामेष,कथ्यतां कथमन्यथा ॥१२॥ विदूषकः-भो वयस्य, तत् किम् ईदृशावस्थागतेनापि त्वया एता- वन्त कालं तूष्णीकेन वृत्यते ? अथ को वा चिन्तितस्तस्याः तत-तस्मात्, अविलम्बित-शीघ्र', परिसृत्य-गत्वा, दीधिकोद्धृतसलिल- कुम्भेन-वापीतः घटेन जलमुदत्य, एप वह्नि -मदनानलः, निर्वाप्यताम्- प्रशभ्यताम् । मुघाघाराम-अमृतधारामिव, तामेव, मृगलोचना-हरिणाक्षी, परिहाय- त्यक्त वा, अन्यथा-अन्यप्रकारेण, एप. चह्नि , कथ, निर्वाणता- शान्ति, याति-गच्छति, (इति) कथ्यताम्-उच्यताम् ॥१२॥ ईदृशावस्थागतेनापि-इमा दशा प्राप्तेनापि, तूष्णीकेन-मौनिना, वृत्यते- स्थीयते । विदूषकः '-बड़ा ही आश्चर्य है, तब तो आप तुरन्त बिना विलम्ब किए घडा लेकर जाइए और तालाब से जल लाकर इस अग्नि को शान्त कीजिए। -(मुसकराकर) सखे ! यह अग्नि केवल अमृत की धारा के समान उसी मृगनयनी से शान्त हो सकती है, अन्य किसी भी उपाय से असम्भव है ॥१२ विदूषक भो मित्र ! तो ऐसी दशा को प्राप्त हो जाने पर भी इतने समय तक शान्त क्यो हैं ? अथवा उसकी प्राप्ति के लिए कोई उपाय सोचा? राजा- १ यातु मू० पा० । २ चित्तस्तस्या: मू० पा० ।

प्रपोऽङ्कः २६ सङ्गमोपायः ? (भो वअस्स, ता कि ईदिसा अवत्यागदेणावि तए' त्तिकं कालं तुलिकेण वट्टी? अध गेवा चित्तदो तससङ्ग- मोवाओ?) राजा-सखे, अनया वद्धसख्यया सुनन्दनया' कुसुमावचयव्याजा- दिदानीमेव लीलोपवनमानीता तव महाराजनयनफ्यातिथिभं- वस्विति प्रतिताम्य । [सविस्मयम् अङ्गानि निर्दिश्य] कथमत्र- अन्जद्वन्द्वमहिनिशं विकसित सौवर्गमत्राहित रम्भास्तम्भयुगं ततश्च पुलिनं लावण्यवारिप्लुतम् । बद्धसख्यया-बद्धं दृढमूलं सख्यं मैत्री यस्याः तादृश्या, कुसुमावचयन्याजा- पुप्पचयनमिपात्, लोलोपवन-कोडोद्यान, महाराजनयनपयातिथिः- महारागस्य दृष्टिगोचरी भवतु, इति, प्रतिताम्य-विचार्य । अङ्गानि नायिकाया इति शेषः। अहमिश-राविन्दिवं, विकसित, सौवर्ण-स्वर्गनिर्मितम्, अन्जद्वन्दं -- कमलद्वयं (परदद्वयम्) अत्र-नायिकायाः शरीर इत्यर्यः, आहित-स्थित (वर्तते), (तदुपरि) रम्भास्तम्भयुग-कदलीस्तम्भद्वयं (जपाद्वयं), राजा-सखे ! इस समय उसकी सखी सुनन्दना पुष्प चयन के बहाने उसे लीली-उपवन मे इसी विचार से ले आयी है कि वही पर कदाचित् महाराज के नेत्रो की अतिपि यह हो जाय (महाराज का दर्शन हो जाय, अथवा महाराज इसे देख लें।) [विस्मय के साथ अंगों की ओर निर्देश करके] क्या यहां--- रात दिन एक तरह से विकसित रहने वाले दो स्वर्ण कमल (ललाई से भरे चरण) स्थित हैं। उनके उपर कदली के दो सम्म (जाँ) है । उसके बाद सौन्दर्य के जल मे डूबा हुआ (न दिखाई पड़ने वाला) पुलिन (कटि-तट) १ ईदसा अवस्थागदेणास्थितए मू० पा० । २ अनत्या मू० पा । ३ बद्धरामयामनन्दना मू० पा० १ ४ सविस्मयविस्माङ्गानि मू० ९१० ।

चन्द्राला-नाटिका । तस्मिन्नन्मदकुम्भिकुम्भयुगलं रत्नकलेखादृतं राजत्यत्र पुनः कलङ्करहितः शीता तेमंण्डलः ॥१॥ [विचिन्त्य] नूनमियमन्तनिहित प्रमदनविकारा वर्तते, यतः-- हसति परितोपरहितं निरीक्ष्यमाणापि नेक्षते किमपि । सख्यामृदाहरन्त्या' मसमजसमुत्तर दत्त ॥१४॥ ततश्च-तदुपरि च, लावण्यवारिप्लुत-सौन्दर्यजलभरितं, पुलिन-(कटि-) तटं, तस्मिन्-तदुपरि, उन्मदकुम्भिकुम्भयुगल-मत्तगजस्य कुम्भद्वयम् (इव कुचद्वन्द्व), रत्नकलेखादृतं-रलावल्या .... शोभितम्, अन पुनः, कलकरहितः-निष्कलङ्क, शीतद्यु तेर्मण्डल:-चन्द्रमण्डलः (मुख), राजति-शोभते अत्र । शार्दूलविक्रीडित छन्द ॥१३॥ नूनं-निश्चितम इयं-नायिका, अन्तनिहितप्रमदनविकारा- मनसि निहित' आहित प्रमदनविकार कामवेगो यया सा तादशी, . -अन्तः बर्तते। परितोषरहित-सन्तोषवजितं यया, स्यात् तथा हसति, निरीक्ष्यमा- गापि-अवलोक्यमानापि, किमपि, नेक्षते-न पश्यति । सख्याम्- है । उस सौन्दर्यजल के बीच मतवाले हाथी के मस्तक के उभड़े हुए दो माग (जैसें दो स्तन) रत्न (मोती) को एकावली माला से आभूषित हैं। और पुनः इनके ऊपर कलङ्करहित चन्द्र मण्डल (मुख) चांदनी सरसा रहा है ॥१३॥ (सोचकर) निश्चित ही यह भी अन्दर काम से पीडित है, क्योंकि यह हंसती है, पर सन्तोषपूर्वक नहीं (खिलकर नही) वह कुछ देखती भी प्रतीत होती है परन्तु देख कुछ भी नही रही है, उसकी सखी उस से जो कुछ कहती है, उसका भी वह उचित उत्तर नहीं देती ॥१४॥ १ रत्नकलेशोहत मू० पा० । २ अन्तमिहित मू० पा० । ३ राख्यामुदा- हरन्त्यम्... मू० पा०। ............

चन्द्रकला- प्रथमोऽङ्क. दिदूषक -[चन्द्रवला निर्दिश्य] भो वयस्य, तदिदानीम् अमुया सुधाधारया निर्वापयतु ज्वलित मदनानल'। (भोवअस्स, तादाणी ईमाए सुघाधाराए णीव्याविअदु जलिदो मदणाणलो।) राजा-सम्बे, इदमेवोचितमिदानीम् । तथापि क्षणमिहैव लता- न्तरितो रहस्यवृत्तिमालोकयावस्तावदेतस्या । [इत्यभौ लतान्तराले प्रविशत ] -[दीर्घ नि. श्वस्य स्वगतम्] हृदय, हृदय, तादृशदुर्ल- भार्थविहितनिवन्धस्य समुचिता ते ईदृशी अवस्था । { हिअअ, हिअअ, तादिसदुल्लहण्यविहिदणीवद्धस्स सगुइदा अवस्था।) आल्याम, उदाहरन्त्या यत्किञ्चिदवदन्त्या सत्याम्, असम जसम्-अयुक्तम् उत्तर, दत्त-ददाति ॥१४॥ भो वयस्य-हे मित्र | तत्, इदानीम्, अमुया-दृश्यमानया- मुघाधारया-अमृतधारया, ज्वलित-प्रदीप्त, मदनानल-कामाग्नि, निर्वापयतु- प्रशमयत । लतातरितो-लतामध्ये गुप्त स्थित्वेत्यर्थ , एतस्या -वालाया रहस्यवृत्ति--गुप्तचेप्टाम्, आलोक्याव -पश्याव । लतान्तराले-लतामध्ये । तादृशदुर्लभार्थविहितनिबन्धस्य-तादृशे दुर्लभार्ये दुष्प्राप्ये वस्तुनि विहित कृत निबन्ध दुराग्रही येन तादृशस्य, विदपक-(चन्द्रक्ला को निर्देश कर) हे मित्र | तो अब इस अमृत- धारा से, जरती हुई कामाग्नि को बुझायो। राजा-इस समय उचित' यही है मित्र । फिर भी क्षणभर हम दोना लता को बोट मे रक्कर तब तक इसकी गुप्त क्रियाओं को देखें। [रसके बाद दोनो लता की ओट मे प्रवेश करते हैं] १ज्वालितो मदनानल मू० पा० । २ णीव्वाविक्षअदु मू० पा० । ३ इद बौचितमिदानी मू० पा० । ४ लतान्तरितो म्० पा० ५ निवद्धस्य मू० पा॥ ६द्रा हिम ३२ चन्द्रकलानाटिका सनन्दना-सखि चन्द्रकले', इद खलु अत्र स्तोकोन्नताया केशर- लताया शाखाया वर्तते रमणीय कुसुमम् । तदिदानीम् उच्चिनोतु एतत् प्रियसखी । (हला चन्दमले, इद क्खु एथ्य श्योकउन्नदाए केसरलदादाए साहाए बदि रमणिज्ज कुसुम । ता दाणी उच्चिणोदू त पिअसही।) 1- [निशम्य ] शृणु तावत् । चन्द्रकलेति नामास्या । विदूषक - भो वयस्य, त्वमपिं महीमहेश्वर । (भो बस्स' तुमपि महीमहेसरो।) राजा-तत किम् । विदूषक -ता क्त खलु ते शिरसि निघानमेतस्या । (ताज्जुत्त क्खु दे सिरसि णिधाण एदाए ।) स्तोकोनताया-अल्पोच्छितापा । महीमहेश्वर -पृथिव्या प्रभु पक्षे महेश्वर शकर चद्रकला इन्दुकलेति बोध्यम् । एतस्या- चन्द्रकलाया , निधान-रक्षण । सुनन्दना-सखि चन्द्रकले । इसी थोडी सी ऊँची केशरलता की शाखा पर एक अत्यन्त सुन्दर पुष्प है। प्रिय सखी, तुम इसे तोडो। राजा -सुनकर)(मित्र । सुनो, इसका नाम चन्द्र कला है। विदूषक- तुम भी मही (पृथ्वी) के महेश्वर (राजा) हो। (पृथ्वी) के पक्ष मे राजा, चन्द्रकला के पक्ष में शकर 1 ) राजा-तो इससे क्या विदूषक-निश्चय रूप से आपके सिर पर इसे प्रतिष्ठित होना उचित है । (आपके साप इसका परिणय उपयुक्त होगा।) 7 १ इदं सखी चन्द्रकले मूपा०। २ केशरलताया शाखाया मू० पा०। ३ उच्चणे मू० पा० । ४ लमिति म. पा० । ५ बस्स मू०पा० ।

प्रथमोऽङ्कः राजा-[ईपद् विहस्य] ससे, कथमीदृशो मादृशाना भाग्योदय । [चन्द्रकला याहुमुन्नमय्य उन्नतशाखागतकेशरकुसुमावचय नाटयति] -[सस्पृहमालोक्य ] ससे, पश्य सल्विदानी- दरप्रकाशे कुचकुम्भमूले द्रुत निफ्त्य दुतकर्वराभे। लावण्यपूरे विनिमग्नमुच्चन मे पदाचित् वहिरेति चेतः ॥१५॥ विदूषक :-नदविलम्बित कैवर्त प्रवेश्य उतोलयतु । (ताता- विलम्बिद केवट प्यवेशिअ उत्तोलिअदु।) उनतशामागतकेशरकुसुमावचयम् --उनतानु शाखातु स्थिताना देशरकुसुमानाम् अपचय बोटन । मस्पृहम्-स्पृहया अभिलायेग सहित यया, स्यान् नया, जालोक्य दृष्ट्वा । दरप्रकाशे-पषयमान, दुतकर्वराभे-दवीभूतस्वर्णम्य जाभा कान्ति इव आभा यस्य तादृशे, लावण्यपूरे-सौन्दर्यप्रवाहे, कुचकुम्भमूले- स्तनयो मूलदेशे, उच्च -साधनर, विनिमग्न-मानीभूत, मे--मम, चेत -मन , कदाचित्, वहि न, एति प्राप्नोति । अत्र उपजातिच्छन्द ।।१५।। कैवर्त-धीवर, प्रवेश्य, ( स्व चित्तम ) उत्तोलयतु-ततो निष्कासयतु । -(कुछ मुसकरा कर) मिन ! मुस जैसे व्यक्ति का ऐसा भाग्य उन्नमय्य-जत्याप्प, -घटाकार राजा- कहाँ है ? [ चन्द्रकला बाहुओ का उठाकर ऊपर उठी हुई केशरशाखा के पुग्म को तोडने का प्रयाम करती है ] राजा-( लालच के साथ देखकर ) मिन 1 देखा, इस समय- इसके घट सदृश कुपा का मूल भाग जो कुछ-कुछ दिखाई दे रहा है, जिसकी कान्ति पिघले हुए सुवर्ण की-सी है और जो मानो सौन्दर्य की धारा है, मे बुरी तरह डूबा हुआ मेरा चित्त वाहर नहीं निकल रहा है ॥१५॥ विदूषक-विलम्ब न करें । तुरन्त मल्लाह को भेजकर उसे ऊपर बाहर निकलवाइए। १ सल्विदान मू० पा० । २ कर्बुराम्भ मू० पा० ) ३ निमे पू० पा ।

चन्द्रकला-नाटिका , - राजा-अहो सुवुद्धिता प्रियवयस्य । सुनन्दना-सखि, पश्य पश्य, इय सलु उन्मीलत्परिमल सहकार- पादपम् अचिरेणैव आलिङ्गिप्यति नव कुसुमिता वालमाधवीलता'। (हला पेवख, पेक्स, इय वस उन्मीलन्तपरिमल सहआरपादव अइरेणज्जेव आलिनिस्सदि णबकुसुमिदा वालमाहवीलदा।) चन्द्र कला-[सविकारमिव पश्यति] विदूषक -भो वयस्य, शृणु तावत्, साभिप्राय खलु इद वचनम ! (भो बअस्स, शुण दाव साभिप्पाअ पसु ए८ वअण।) राजा-न खलु सम्भाक्यामि मे पुण्यपरिपाकमीदृशम् । सुनन्दना-सखि, अमुष्या नवमालिकाया मया उच्चीयन्ते युसू मानि । त्वया पुनस्तस्या माधवीलताया उच्चीयन्ताम् । सुवृद्धिता-बुद्धिमत्ता ( इय व्यग्योक्तिरत्र ) । नवकुसुमिता-नवपुष्पिा। बालमाधवीलता। उ.मील(परिमलम्-विकिरसौरभ, सहकारपादपम्- बामवृक्षम्, अचिरेणैव-शीघ्रमेव, आलिङ्गिप्यति-परिप्वक्ष्यते, साभि. प्रायम, तात्पर्य सहितम । पुण्यपरिपार-सौभाग्यम युसुमानि-पुष्पाणि उच्चीयन्ते-नोटयन्ते। राजा-मिन तुम्हारी बुद्धि प्रशसनीय है। सुनन्दना-सखि । देखो, देखो, नवपुष्पित वाल माधवी लता शीघ्र ही, सोरभित आम्रवृक्ष का आलिंगन करने वाली है। चन्द्रकला-(याकुल, उन्मादित हृदय से देखने लगती है ) विदूषक-मित्र I अव यह अभिप्राय युक्त वार्तालाप सुनो। राजा-मित्र | अपने पुण्यकर्मो से ऐसी आशा नही करता (हमारे पुण्य- वर्म ऐसे नहीं हैं) सुनन्दना सखि । इस नवमल्लिका ने पुष्पो को मै तोड रही हूँ। तुम उस माधयीलता के फलो को तोडो। -: प्रियवयस्यस्य मू० पा० । २ अत्र बालइति मू० पा० नास्ति । ३ सालमादीलदा ५० पा० । ४ शण तावत् शृण तावत् मू० पा० ।

३१ कथय, - प्रयमोऽङ्कः (हला, इमाइणोमालिआए मए उचिणिअन्ते युसुमाई। तस पुणताए माहवोलदाए उच्चिणीअन्तु।) [ इति राजालकता माधवीलतामङ्ग त्या निर्दिशति ] चन्द्रकला--पद्रोचते प्रियसन्य। (यं रोअदि पिअसहिए।) [ इति गच्छति ] [राजानमवलोक्य सफित ग्रीड मुख' नमयन्ती स्तम्भमभिनीय मानन्द स्वगतम् ] आश्चर्य , कय फलितोऽपि मे अमनोवृत्तिसम्भा- वनीयो मनोरथद्म । ( अम्महे, वर पलिदोवि मे अमणयुत्तिस. म्भावणिजो मणोरयदुमो।) राजा-[ महर्षमुपमृत्य ] प्रिये, [ आत्मान निर्दिश्य ] प्रिये, कथय- अगानि सेदयमि कि शिरीषकुसुमपरिपेलवानि" मुधा राजाराडूना-यनान्तरितो राजा विराजमान आसीत् ताम, । सक्तिनीडम्- आश्चर्यलज्जाभ्या सहितन । स्तम्भ-निश्चलगाम , अभिनीय-नायित्वा । [दस प्रभार बहती हुई, राजा स शोभिन माधवीतता का अंगुलियो रा निर्देश करती है। ] चन्द्रकला-जा मेरी सखी को अच्छा लगे । ( जाती है ) [राजा को देख कर आश्चर्य और लज्जा से सिर नीच किए हुए स्तम्भिा (शियिल ) हो जाती है। फिर सहर्ष और स्वय ] ओह! क्या मेरा मनोरयवृक्ष फलित हो गया ? मैंने तो ऐसी की गम्भावना भी नहीं की थी। 1-(सहर्ष समीप पहुँचकर) प्रिये 1 कहो-कहो शिरीप पुप्प से बोमल अपने इन भगो को यह व्यर्थ में कोश १ मए इति मू० पा० नास्ति । २ चिचिणीअन्त मू० पा० । ३ अ4 'मृत' इति मू० पा० नास्ति । ४ अमणवृत्तिसम्भावण तजा मू० पा० । ५ शिरीपपरिपेनवानि मू० पा० !

w चन्द्रकला-नाटिका राजा- , 2 अयमीहितकुसुमाना सम्पादयिता तवास्ति दासजन ॥१६॥ सुनन्दना-[ जनान्तिकम् ] सखि, कथ त्वया दर्शनमात्रकेणापिर 1 वशीकृतो भर्ता। (हला, क्ध तए दसणमेत्तकैणावि एव बसि- दो भटटा।) चन्द्र कला-सखि, किमिति त्वया वितथपरिहासेन अहमुपहस्ये । हला, किं तए भिदधपरिहासेण अह उवहसीअदि।) -[ चन्द्रकलाया मुख निर्दिश्य ] प्रिये, कथय, कथय, असावन्तश्चञ्चद्विकचनवनीलाब्जयुगल- स्त लस्फूर्जत्कम्बुविलसदलिसघात उपरि । शिरीषकुसुमपरिग्लवानि,-शिरीषपुष्पदत् सर्वथा सुकुमाराणि, अगानि-अवयवानि, किं-कस्मात्, मुधा-अनर्थन, खेदयसि- पुष्पचयनेन परिश्रमयसि ? अयम्-अह, दासजन , तव, ईहितकुसुमाना- घेतुमिष्टाना पुष्पाणा, सम्पादयिता-चयनकर्ता अस्ति अत्र संक्षेपालडार उपगीतिच्छन्द ॥१६॥ जनान्तिकम-एकान्ते अन्यान् वञ्चयित्वा परस्परालापा । यदुक्त सागरे-'वञ्चयित्वैकमन्योन्य द्वाभ्या यत्खलु पठयते । जनान्तित तु तत्कार्य विपताकेन पाणिना ।।' बतयपरिहासेन-अनीकपरिहामेा। अहम् उपहस्ये- मम उपहास परोपीत्यर्थ । सुमुखि-शोभनानने । अन्तश्चञ्चद्विकचनवनीलाब्जयगल ययो दे रही हो ? (स्वग को दिखाकर) तुम्हारे इच्छित (रुचि के) पुष्पो में तोडने के लिए तो तुम्हारा यह सेवक उपस्थित है ।।१६।। सुनन्दना--(एकान्त मै ) सखि । केवल दर्शनमात्र से तुमने महाराज, को अपने वश मे कैसे कर लिया? चन्द्रमता-सखि, तुम व्यर्थ मेरा उगलास क्यों कर रही हो ? - ( चन्द्रकला के मुख की ओर देख कर ) प्रिये ! कहो कहो- हे सुमुखि । यह लोकोत्तर निष्कलङ्क चन्द्रमा तुम्हे कहाँ से प्राप्त हो गया १ साहित्यदर्पणे श्लोकस्य उत्तरार्धात् पूर्वम 'आत्मान निर्दिश्य' इति पाठ । ? - राजा- - ।

प्रथम विना दोपासङ्ग सततपरिपूर्णाखिलफल । कुतः प्राप्तश्चन्द्रो विगलितकलडु' सुमुखि ते ॥१७॥ चन्द्राग-सम्बि, आगच्छ आगच्छ । इत' इदानी गच्छार । देवी खलु आवामनुमरिष्यति । आश्चर्य , कुतो गच्छन्त्या मम चरणौ न गच्छन । (हला, आअच्छ, आमच्छ । इदो दाणी गच्छम्य । देवी बषु अम्भे अगुस रिम्सदि।) [इति गच्छन्तो स्तम्भमभिनीय ] अब्बो, कुदो गच्छलिए मए चरणरण गच्छदि।) मन्नमंन्यभाग चञ्चद् विलसत् विकच प्रस्फुट नव मूतन लीलाब्जयुगलं नयन- द्वयम्प यस्य तादृश , तलस्फूर्जस्कम्बु -तले अधोदेशे स्फूजन शोभमान. कम्यु ग्रीवास्प शङ्ख यस्य तादृश , उपरि-उपरिभागे, विलसदलिसघात विलसन विचरन् बलिसघातो भ्रमरसमूहो यस्य तादृश , सततपरिपूर्णा- खिलक्ल -सतत परिपूर्णा अखिला क्ला यस्य तादृश , (तया) विगलित- कलङ्क-क्लइशून्य , असो मुख त्पश्चन्द्र , दोपासङ्ग-रात्रिसम्पर्क विनापि, ते-तब समीपे, कुत , प्राप्त -उपस्थित ? अत्र उपमाऽलङ्कार , शिखरिणीच्छन्द । १७॥ अनुसरियति-पश्चादामिति । चरणो न गच्छन -पादी न चलत । जिसम दो विकसित नील कमल शोभित हो रहे है, । चन्द्रमा के तल भाग म शाद अपनी छवि विखेर रहा है, और ऊपर भ्रमरावलि नीडा कर रही है । तथा जो विना राधिके ही समस्त कलाओ से पूर्ण होकर उदप हुआ है ॥ १७॥ ( कवि ने चन्द्रकला पे मुख को समानता निष्कलक चन्द्रमा से, नेत्रो की नील कमल से, ग्रौदा की शख से, और केशो की नेत्र-कमल पर विखरे भ्रमरावलि से . चन्द्रकला-सखि । आओ, माओ हम दोना भी इस स्थान से चलें । महारानी हमारा अनुगमन करेंगी ( हम दोनो की खोज करायेंगी ) [ ऐसा कहकर चलती है और स्तम्भित होने का बहाना करने लगती है 1 बडा आश्चर्य है, मैं जब चलना चाहती है तो हमारे पर बढ़ते नहीं। १किल मू० पा० । २ इति मू० पा० । ३ मन्तए मू० पा० ।

चन्द्रकला नाटिका चन्द्रकला- राजा- सुन देना-[ जनान्ति कम ] हला यत चित्त न गच्छति । (हला, जदो चित ण गच्छदि।) -[ सस्मितम ] सखि, सर्वथा न विरमसि परिहासत.। ( हला, सव्वधा ण विरमसि परिहासादो।) सुनन्दना-सखि, प्रथमतोऽपि त्वया पाशककेलौ तव स्वहस्तोच्चे तव्या सहकारपल्लवा मह्य धार्यते , तदुच्चीयन्ता मेते पश्चात्पु- नर्यथासुख गच्छा प्रियमन्यो । हला, पतमदोवि तए पासेअके- लिए तुहि सहथ्थ उचिणिदव्या सहआरपल्लवा मे धारी-अन्ति । ता उच्चिणेदु एदे । पुच्छा पुण जधासुह गच्छदु पिअसहि।) [चन्द्रकला तथा करोति] .[ सस्पृहमालोक्य सस्मितम्-ईपदास्ययुक्त यथा स्यान् तथा । न विरमसि-न विरता भवसि । पाशककलो-अक्षक्रीडाया, त्वया, स्वहस्तोच्चेतव्या -निजहस्ताभ्या बोटनीया सहकारपल्लवा.-आम्रपल्लवा , मह्य धार्यन्ते । अय भाव ग्लहे व मया जिता असि ।अतएव यान् सहकारपल्लवान् त्व मह्य धारयसि तान उच्चीय पूर्व दहि ततो यथेच्छ या ह । अन धारेत्तमर्ण' इति सूत्रेण चतुर्थी । सुनन्दना-( एकान्त मे ) इसलिए कि चित्त यहा स नही हाता। चन्द्र कला-( मुसकरा कर ) तुम परिहास करना नहीं छोडती हो। सुन-दना--सखि | तुम्हारे ऊपर जो हमारे आम्रपल्लव तोडने शेष है, (जो तुम हमारे आम्रपल्लर तोडना धारण करती हो ) पहले अपने हाथा से उन्हे सोडकर मेरा ऋण चुका दो ( मुझसे निवृत्त हो लो ) हे प्रिय सखि | उसके पश्चात् अपनी इच्छानुसार आनन्दपूर्वक जहां चाहो जाओ। ( चन्द्रकला पल्लव तोडने लगती है ) राजा-[अनुराग से देखकर] १ अय मू० पा० नास्ति । २ अयमपि मू० पा० नास्ति । ३ स्वहस्तो घेतव्या. मू० पा० । ४ मयार्यते मू० पा० । ५ तदुच्चीयतामेते मू० पा० । ६ प्रीयसखी मू० पा० । , राना- प्रथमोऽङ्कः चूतपल्लरचय निजकान्त्या सण्डिर प्रयममेव मृगाक्षि । पत्कर कररहेण पुनले साडयन्यनुचित परमेतत् ॥ १८ ॥ चन्द्र फला -[पुलास्त्रेदमभिनीय सखी प्रति] ससि, गृहाणेदम् । अह गच्छामि । (सहि, गेहण एद । अह गच्छम्मि।) [इति गन्तमुपक्रमते] विदूपर -भवति, सकलाना पृथिवीसमुत्पनाना पडेशभागिनो राजानो भवन्ति । तस्मात् कथ त्वन् उच्चितकुसुमपलवाना पाठाश प्रियवयस्यस्यादत्त्वा गन्तुमभिलपसि ? (भोदि, सजलाप पुहवितमगाण सद्दस भाइणो राआगो होअन्ति । ता क्ध तुम उच्चिगिदकुसुमपल्लवाणा सट्टास पिअवअस्सम्स अदाउण गन्तु अहिलसमि?) 10- हे मृगाषि-मृगतोचो , य, ते, करस, प्रथममेव- पूर्वमेव, निजकान्त्या-यद्युत्या, खण्डिन-पराजित, चूतपल्लवचयम, साम्रपल नवममूह पुन -भूप , कररहेग-नखेन, गण्डयति-छिरति. एतल, परम , अनुचितम् । अत्र स्वागताध्यन्द ॥ १८ ॥ पुलर स्वेदम् -आनन्देन रोमाञ्चम भयेन च धर्मम । पृथिवीसमुत्पनाना- पृथिव्याम उत्सनानि यानि वस्तूनि पा, पडशभागिन --पप्ठाशा होतार । उच्चितकुसुमपल्लवानाम्-नोटिताना पुप्पाणा पल्लवाना च । हे मृगाक्षि । ये थाम्रपल्लव तो पहले ही एक बार तुम्हारे हाथों को मृदुल सुन्दरता से पराजित हो चुके है, उन्हे अब पुन नाखूनो से काटना अत्यन्त अनुचित है ॥ १८ । ( चन्द्रकला पे हाय और अगुलियाँ पल्लवा से भी अधिक कोमल और सुन्दर हैं। ) चन्द्रकला ( आनन्दानुभव करती हुई ) सखि | ये लो इन्हें ! मैं जाती हूँ। ( जाने लगती है ) विदूषक-भगवती ! राजा, पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली प्रत्येक वस्तु के पष्ठाश का भागी होता है । फिर तुम तोडे गये पुष्प और पल्लवो का पष्ठाश मेरे प्रिय मित्र ( राजा ) को दिए विना ही, क्यो जाना चाहती हो' - - चन्द्रकला-नाटिका राजा- सुनन्दना-सत्य भणत्यार्यः । ददस्वेदानी भर्तुर्हस्ते उच्चितकुसुम- पल्लवानां पष्ठांशम् । ( सच्चं भणादि अज्जो । तदसुदाणि भट्टीणो हथ्थे उचिणिदकुसुमपल्लवाणां सट्टांसं । ) [ चन्द्रकला सवीडमधोमुखी तिष्ठति ] सुनन्दना-सखि, सर्वत: राज्ञा पडशोऽपि युज्यते व्यवहार एव एष. । तत् कुतोऽनापि ते लज्जा'। (हला, सब्वदो राआण सट्ट- सोविर जुजित्तिः व्यावहारोज्जेय एसो। ता कुदो एत्य वि दे लज्जा ।) चन्द्रकला-यद्रोचते प्रियसख्यै । ( य रोअदि पिअसहिए।) [ इति सवैलक्ष्यं हृदयांशुकावगुण्ठितान् कुसुमपल्लवान् ददाति ] -उपनयतु मे सुकृतपादपस्य परिणत फलमिद प्रेयसि। आर्य:-विदूपक', सत्य-यथार्थ, भणति-कथयति । सग्रीडम,-प्रीडया लज्जया सहित यथा स्यात् तथा । अधोमुखी-नतानना । व्यवहार.-रीति. नियमो वा । जवापि-अस्मिन् विषये अवसरेऽपि वा। रोचते-प्रीतिकर भवति । प्रियसरय इत्यत्र हच्यर्थाना प्रीयमाण इति सूत्रेण चतुर्थी । सर्वलक्ष्यं-लज्जया सहित, हृदयाशुकाव गुण्ठितान्--अञ्चले रक्षितान् । प्रेयसि-परमप्रिये !, सुकृतपादपस्य-पुण्यवृक्षस्य, परिणतं फलं--सुपक्य फ्लम , उपनयत-उपहरतु । सुनन्दना-उचित ही कर रहे है आर्य । तोड़े गये पुष्प और पल्लवो का षष्ठाश महाराज के हाथ मे दो। [चन्द्रकला लज्जा से मुख नीचे कर लेती है] सुनन्दना-सखि ! सर्वत्र, षष्ठाश पर राजा का अधिकार है और यह एक रीति भी है । तब तुम यहा लज्जा क्यो कर रही हो ? चन्द्रकला-जो प्रिय सखी को अच्छा लगे [ कहती हुई वह हृदय पर आवेष्टित वस्न ( आंचल ) मे रखे हुए पुष्प और पल्लवो को दे देती है ] राजा--मेरे सुकर्म वृक्ष के पक्व इस फल को प्रदान करो प्रिये ! १ नायं मू० पा० । २ सट्टसोदि भू० पा० । ३ जुदिति । ~ प्रथमोक्षः [इति करो प्रसारयति ] चन्द्र कला-[ कम्पमभिनयति' । कुसुमपल्लवा भमौ पतन्ति । ], राजा-[ ससम्म्रमम् सर्वथा अनुपेक्षणीयो महाप्रसादः प्रियतमाया:। [ इति भूमौ पतितान् कुसुमपल्लवानाददाति ] विद पका--भो वयस्य, न खलु एपः पल्लवः । मूर्तिमान् खलु ते प्रियतमाया अनुरागः । तदिदानी हृदये गृहाणेदम् । ( भो बस्स, ण कस्नु एसो पल्लवो मूर्तिमन्तो क्खु द पिअदमाए अगुराम । तादाणी हिअए गेल्लुएद ।) राजा-सत्यमाह प्रियवयस्यः । [ इति हृदये विदधाति ] . विदूषकः-[ पुरोऽवलोक्य ] अहो, का गति । कथमिहेदानी ससम्म्रमम्- अधीरतापूर्वक झटिति यया स्यात् तथा। प्रिय-तमाया.-- यस्या , महाप्रसाद.-मली प्रसन्नता कृपा वा । सर्वथा अनुपेक्ष- जीप,- कदापि उपेक्षा यत् न योग्य । भाददाति-गृह,णाति । मूतिमान्–शरीर- धारी, अनुराग -प्रेम । विदधाति-रोति । [ दोना हाथा को फैलाना है ]] चन्द्रकला-( कांपने का बहाना बरती है-पुरुष और मुकोमल पल्लव पृथ्वी पर गिर पडते है ) राग-( शीघ्रता पूर्वक ) प्रियतमा के इस महाप्रसाद की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। (कहता हुआ भूमि पर गिरे पुष्प और सुबोमल पल्लवो को उठा लेता है ) विदूषव-मित्र | यह केवल पल्लव नही, निश्चित ही तुम्हारी प्रियतमा का अनुराग मूर्तिमान हो गया है । इसे हृदय से लगा लो। राजा-सत्य ही कर रहे हो भिन ! ( ऐसा कहकर हृदय से लगाता है ) विदूषक-( सामने देखकर ) अहो ! अब क्या उपाय है । यहां तो १ कम्पमभिनीय मू० पा० । २ महाप्रसाद मू० पा० । ३ पतनान् मू० पा०1४ अस्स भू० पा० ५ अरा मू० पा० ।

सहि।) चद्रकला-नाटिका प्रियवयस्यस्य चन्द्रकलया सह रतिकलासु उद्वर्धितासु अप्रसना अन्यस्थानसन्निवेशमसहमानापि आत्मान गोपयित्वा देवीसहचारिणी रतिकला पुरतो दृश्यते । ( अब्बो, का गदि । कध इधदाणी पिअव- अस्सस्स चन्दअलाए सह रदिअलासु उव्वाढिदासु अप्पसण्णा' अण्णा ण सण्णिवेस असहमानाबि अन्ताण गोवयितुअ देवी सह- आरणी रदिअला पुरो दिमदि। ) सुम-दना-[ विलोक्य ] सखि चन्द्रकले, त्वरितम् एह्योहि । इय खलु देवीसहचारिणी रतिकला इह आगच्छति । तदिह माधवी- लतान्तरे गोपिते भवाव । (हला चन्दोअले, तुरिद एहि एहि । ईअ वखु देवीसहआरिणी रदिअला ईध आगच्छदि । ता ईध माधवी. लदन्तरे गोविदे होम्ह.।) चन्द्र कसा-[सोद्व गम् त्वरितमेतु प्रियमखि । (तुरिद एदु पिअ. रतिकलासु-रतिप्रमसु, उद्वधितासु-वृद्धि गतामु, अप्रसना-खिना, अन्यस्थान सनिवेशम्- [---अन्यन अवस्थितिम , असहमाना-अक्षममाना, देवीसहचारिणी- देवीसेविका, रतियाला-एतनाम्नी, आत्मान-स्व, गोपयित्वा-जन्तरित कृत्वा, पुरत -अने, दृश्यते--अवलोक्यते । त्वरित-शीघ्रम , एह्येहि- अबागच्छ । माधवीलतान्तरे-माधवीलताया मध्ये, गोपिते-प्रच्छने । महारान की सेविका रतिकला छिपी हुई दिखायी पड रही है । यह चन्द्रकला ये प्रति वढते हुए राजा के अनुराग को देखकर उससे अप्रसन्न रहती है और उसके लिए यह असह्य है कि राजा, महारानी से दूर और वही रहें। सुनन्दना-( रतिक्ला को देखकर ) सखी चन्द्रकला | शीघ्रता करा, आओ हम दोनो माधवीलता के पीछे छिप जायें। क्योकि महादेवी की राहचारिणी सखी रतिका इधर आ रही है। चन्द्रकला-( उतावली के साथ ) प्रियम्सी | शीघ्न आओ १ अन्यथानसग्निवेशमहमपि मू० पा० । २ पिअपस्सस्स मू० पा० । ३ अप्पसण्डा मू० पा० । ४ अण्डट्टाण मू० पा० । ५ देवी मू० पा० । ६ देवोसहारण मू० पा० । ७ त्वरितमतत म्० पा० । 1 ] राजा- प्रयमोतः [ इत्युभे माधवी लतान्नर प्रवेश नाटयत ] [ ततः प्रविशति रतिक्ला] रतिरला कुन पुन प्रक्षे महाराजन् । [ परिक्रम्यावलोक्य च क्यमिहेव एप । तापमामि । [इ अमृत ] जयतु जयतु महा- राज । देवी सलु एनाउन कान महाराज प्रवृत्तिमलभमाना सर्वन प्रपितममस्तारिजना पर्यु पुमा वने। तदिदानी त्वरित । महाराजेन तस्या सनिहितेन नविनय । ( काहे उग पेस्वामि महाराअ । कब इथ जेर एमो। ता उरस-मामि। जअदु जअदु महारानी। देवी कालु एन्निा काल महाराआउत्तिमलभमाणा मधदो पेसिसमध्यपरियणा ताज्जुवा वदि । आदाणि तरिद महाराएण तस्म सणीहिदेण होदयम् । ), -[दोर्य नि यस्य स्वगतम् ] हा देव । किमर करणीयम्। प्रे-वामि । परितम्य-वितरित दिशा गना। उपसमामि-मीन गच्छामि । देवी, महाराजयपत्तिम-महाराज समाचारम, अलभमाना- बनान पन्ती, सर्वत-सदिशु, प्रेपितसमनपरितना-पिता अन्वेषणार्थ प्रेरिता समन्ना सरला परिजना मृत्यादयो ययातादृशी, (भूत्वा) उत्साण्ठिता, पर्यत्रा-वर्तते । स्वरिल-गोत्र महाराजेन, तस्या-देव्या , समिहिन-समीर-निना, भवितव्यम् । [ दाना मापनीलना की जार म प्रवेश करती हैं ] (इसके बाद रतिक्ला का प्रवेश } रतिाला-मरान पुन बहा दिखायी पडेंगे ? (घूमकर देवती हुई ) क्या यही है ? ता उनके निवर चढूं। ( पहुँचकर ) महाराज की जय हो, जय हो । देवी इतनी देर से आपका न देने के कारण अत्यन्त ही व्याकुल हो रही हैं। उन्हाने चारा जोर सेवक सविकाना को आपकी खोज म भेज दिया । इलिर महाराज को शीन ही उनके पास पहुँच जाना चाहिए ( बाप तुरन्त उनकी ओर चलें ) । राजा--( लम्बी सांस खीचकर-स्वय ) हा देव । अब क्या करें। 7 ४४ चन्द्रकला नाटिका " विदूषक -[ अपवार्य ] भो वयस्य, इदानी सलु देवीसमाग- मनमेवोचितम् । पश्चात् पुनर्यथा चन्द्रकलासमागमो भवति तथा चिन्तितव्यम् । अन्यथा आयतिशुद्धो न भवत्येप । राजा-सत्य मत्यम् अवितथमाह प्रियवयस्य । [ प्रकाशम् ] रतिकले, मया खलु नवकुसुमितामिमा माधवीलतामाकापरि- मितविस्मयाविप्टेन त्वरितमिह प्रविष्ट केलिवनम् । रतिकला-देव्या. खलु एतावन्त काल महाराजमनवेक्षमाणायाः क्षणोऽपि युगान्तरमाचरति। ( देवीए क्खु एन्तिक काल महाराअ- मणबेवखमाणाए सणोनि जुअन्तर आअरदि।) राजा- -तद्दर्शय पन्थान देवीसमीपगमनाय । अपवार्य-जनान्तियम् । देवीसमागमनम्-देव्या सह समागम । आतिशुद्ध- परिणामे हितकर । अवितथम -युक्तम् । आवयं-श्रुत्वा, अपरिमित- विस्मयाविप्टेन-अपरिमितेन अत्यधिकेन विस्मयेन आश्चर्येण आविप्टेन युक्तन, वेलिवन-क्रीडोपवनम् । अनवेक्षमाणाया-अनवलोकयन्त्या, युगान्तरमाचरति-युगावधिकाल इव प्रतिभाति । विदूषक-मिन' इस समय महादेवी के पास ही जाना उचित है । उसके बाद पुन चन्द्रकला का समागम से हो, सोचा जायेगा। अन्यथा उसका परिणाम भयानक ( अहितकर ) होगा। राजा-(स्वय ) सत्य, सत्य है मित्र ! तुमने बिलकुलठीक कहा। ( प्रक्ट ) रतिकले 1 नवदुसुमित माधवीलता से आकृष्ट हुआ मैं अत्यन्त आश्चर्य मे पडकर शीघ्रतापूर्वक इस ने लिवन ( आनन्दोपवन ) म चला याया था। रतिकला-महादेवी तो इतनी देर तक महाराज को न देखने के कारण एक-एव क्षण एक एक युग के समान बिता रही हैं। राजा-तो देवी के पास पहुँने का मार्ग दिखाओ।

प्रथमोऽङ्कः रतिक्ता-एतु एतु महाराज. । ( एदु एदु महाराओ। ) [ राजा परित्रामति ] विदूषक -[ चन्द्रकलालक,ता माधवीलता दर्शयन् ] भो वयस्य, इस खलु अननुभतपरिमला' अनुरोदितीव त्वा गच्छन्त गलन्मकरन्दा माधवीलता। तद्वचनेनापि सम्भाव्यतामेपा। (भो वअस्स, इस वखु अणणहूदपरिमला अणुरोअदिविज तुम गच्छन्त गलतम प्ररन्दा माहविलदा । तावअणेवि सम्भाविअदु एसा।) राजा-ससे, भद्रम् । [ इति माधवीलतामवलोक्य ] आसादयति न यावन्माधवि भवती मिहव पुन । निवृत्तिमेति न चेत चित्ररथक्षमापतेस्तावत् ॥१६॥ अननुभूतपरिमला-न अनुभूत परिमल मुवासो यया तादशी, गलन्मक- रन्दा-गलन् सघन मकर द पुष्परस यस्या तादृशी च, इय माधवीलता, गच्छ-त, स्वाम्, अनुरोक्तिीव-पश्चादश्रु विमुञ्चतीर । तत्-नस्मात् वचनेनापि-वाचापि, एपा, सम्भाव्यताम्-आद्रियताम् । माधवि ।, यावत, भवतीम् इहव-प्रव, पुन -भूय , न आसादयति- प्राप्नोनि, तावत्, चिवरथदमापने -राज्ञश्चित्ररथस्य, चेल -चित, निवृति- शान्ति, म एति-न गच्छति । अत्र उपगीतिच्छन्द |॥१६॥ रतिकला-इधर से चलें महाराज घर से। ( महाराज चलने का नाट्य करते है ) विदूषक-भी मित्र । ( चन्द्रकला से शोभित माधवीलता को दिखाकर ) माधवीलता जिसका परिमा अनाघ्रात रह गया, आपको जाते हुए देखकर रोती हुई मकरन्द-रस को गिराने लगी। इसलिए कम से कम वचा मे तो इसे सान्त्वना दे दें। (माधवीलता से तात्पर्य, चन्द्रकला की ओर निर्देश से है) राजा-उचित कहा मित्र ( माधवीलता को देखकर ) हे माधवी । जब तक पुन कर तुम्हारा सहचर नहीं बनेगा, तब तक राजा चित्ररथ का हृदय शान्ति नही प्राप्त कर सकता ॥१६॥ १ अनुभूतपरामता मू० पा० । २ रारा मू० पा० } ३ भवत्री मू० पा० ।

चन्द्रकला-नाटिका [इति रतिवलानिदिश्यमानमार्ग विदूध केण समं निष्कान्तः] चन्द्रकला-[ दीर्घ निःश्वस्य स्वगतम् ] हा देव । कथं मयि मन्दभागिन्याम् ईदृशोऽपि व्यर्थवैरानुवन्ध आचरित । ( हा देब्ब क्ध मयि मन्दभाइणा एदिमोवि विअथवेराणुवन्धो आअरिदो।) सुनन्दना-सखि, श्रुत महाराजस्य साभिमाग वचनम् । तत् कल्य एव ते मनोरथाना सम्पादयिता महाराज. । इह स्थानमिदानी न युज्यते । तत् पुरमेव प्रविशाव । (हला, मुद महाराअस्स साभि- प्पा वअण । ता कलज्जेब दे मणोरधाण सम्पादयिदा महाराओ। इध हाण दाणि ण जुजु । ता पुरज्जेय पविसम्ह । ) [ इति निष्कान्ता सर्वे ] इति प्रथमोऽङ्क रतिकलानिदिश्यमानमार्ग-रतिक्लया सत्यमाने पथि । म.दभागिन्या- भाग्यहीनाया, व्यर्थवैरानुवन्ध --निरर्थक्शत्रुतास्पदुराग्रह । भाचरित विहित । साभिप्राय-तात्पर्यसहित । यल्य एव-प्रभाते वा व एध, ते, मनोरथानाम्-अभिलाषाणा सम्पादयिता-पूरयिता । इह स्थानम्-अन अवस्थिति , दानी, न युज्यते-नोचितम् । [ ऐसा कहकर रतिवता द्वारा निर्देशित मार्ग पर विदुपर के साथ चलता है ] चन्द्रकला-[ लग्बो साँस लेकर स्वयं ] हा देव । क्या तुमने मुल मन्द- भागिनी से इस प्रकार अनुरक्त होने या आचरण करवाया । सुनन्दना-सखि, महाराज का अभिप्राययुक्त वचन सुना। इसलिए कल ही महाराज तुम्हारे मनोरथो को पूर्ण करेंग । यहाँ हम दोना वा रुक्ना उचित नहीं है । चलो अन्त पुर में ही प्रवेश करें । [ सभी जाते है ] पहला अकसमाप्त १ ईदृशीऽपि मू० पा० । २ व्यर्थवैरानुवाघमाचरित मू० पा० । ३ मन्य भाइणो मू० पा० । ४ घृत मूल पाए ।

द्वितीयोऽङ्कः [ तन प्रविशति सुनन्दना विदूपफरच ] सुनन्दना-आर्य, महन्, मम प्रियसखी चन्द्रकला तव नियोगेन अद्य निशाया सह सुनन्दनया महाराजममागमम् जनसरनी मन्तर्प- णद्र मितान्तरा (1) वेलिवनदाधिकान्ते वर्तते । कथम् एतावन्त काल विलम्वते कृतसङ्केतो भर्ता' । ( अज्ज मह मम पिअमही चन्द्रअला तह णिओएण अज्जणीसाए' सह मुणन्दणाए महाराअममा- अम अणुमरन्ति सन्दण्णदुमिदान्तरा कलिवणदिहिना अन्ते । बट्टदि । कथ एन्तिक बाल विलम्बेदि विदमकेदो भट्टा ।) विदूषक - भवति, प्रसन्नरूप गृहीत्वा तत्र गन्तुम् उदगमाणो (?) नियोगेन-नाशया, निशाया--रानो, महाराजसमागम-चित्ररथ- सङ्गमम्, अनुसरन्तीअनुगच्छ ती कामयमाननि यावत, लिवनदीधिकान्त- जीटाद्यानस्थितवाप्या अन्ले, सन्तपंणनितान्तग-वृक्षापामावरणे स्थिता वर्तत । कृतराकेत -पृत सङ्केतो यन तादृश , भर्ता-स्वामी, एतावन वालम्-इयत्ममा, क्य, नितम्बते--विलम्ब कुरुते ? भाति-कल्याणि । प्रसनरूप-मुदितनय, गृहीत्वा-सन्नार्य तन-चन्द्रकनारा निपटे, गन्तुम उद्व गमाण (2) व्यानुलीभवन [ इसके बाद सुनन्दन पौर विदूपर का प्रवेश ] सनन्दना-आर्य । मेरी प्रियमखी चन्द्रकला तुम्हारी युक्ति के अनुसार आग रानि मे सुनन्दना के साथ महाराज के समागम को आशा से केलिवन की वाथली के समीप सतर्पण वृक्षा की ओट म स्थित है। क्या कारण है कि महाराज, सकेत देने पर भी इतन समय तक विलम्ब कर रहे है विदूषक-भद्रे । प्रसन मुद्रा म महाराज, उस स्थान पर जाने के लिए १ इयमुक्ति सुनन्दनाया , किन्तु सा क्य कवयेत् च द्रकला सुनन्दनया सह इति । अतोन काचन त्रुटि सम्भाध्यते । २ अह मू० पा० । ३ अज्जगासाए मू० पा ४ ० पा० । ५ एतिक मू० पा० । ? ?

चन्द्रकला नाटिका प्रियवयस्य उपाय. रुध्यमानया देव्या अग्रत अपि इति भणित । अद्य मया रजनीकरस्याशुना विकसन्त्या. केलिवनदीर्घिकाकुमुदिन्या. एतेन परिणयोत्सव. सम्पादितव्य । तत्र आर्यपुत्रण सन्निहितेन भवितव्यमिति' । ( भोदि, पच्छण्ण रुव गेण तुत्य गन्तु उदुबक्क माणो पिअबअस्सो उवाएहिं रम्भि[माणाए देवीए अग्गद एदि भणिदो । अजु मए रअणीअरस्यासुणा विअसतीए केलिवणदीहिआ कृमुदिणोए एदिणा परिणआउसब्बो सपादिदव्बो । तत्थ अजुउत्तण -सणीहिदेण होदव्यत्ति ।) सुनन्दना-किमत्र प्रतिपन्न भर्ना? ( अब्बो, किं एत्य पडिबण्ण' भट्टणा।) विदूषक.- भवति, तर मया अतिशयितसकलमन्त्रिबुद्धिविभवेन' प्रिपवस्य -महाराज , उपाय.-प्रयले , रुध्यमानया-साक गन्तु निवार्य माणया, देव्या-महाराश्या, अग्रत -समक्षे, इति भणित - एव कथित ( यत् ), मद्य, मया, रजनीकरस्य-चन्द्रस्य, अशुना-किरणेन, विकसन्त्या -सस्फुटन्त्या , केलिवनदीपिकाकुमुदिन्या -कीडोद्यानवापीकुमुदिन्या , परिण- योत्सव -विवाहोत्सव , सम्पदितव्य -करणीय । तत्र, आर्यपुत्रेण-भत्री सन्निहितेन-समीपतिना, भवितव्यम् । उतावले हो रहे थे, उस समय ( कपटपूर्ण ) उपायो के द्वारा ( महाराज के साथ जाने से ) रोकी जाती हुई महारानी ने प्रिय मित्र से कहा-'मैं आज केलिवन की बावली मे विकसित कुमुदिनी का चन्द्रकिरण के साथ परिश योत्सव सम्पन करूंगी। वहाँ आर्यपुत्र की उपस्थिति आवश्यक है। सुनन्दना-तव ऐसी परिस्थिति म आपने क्या किया ? विदूषक-भद्रे | तब भी समस्त मग्रियो के बुद्धि ऐश्वयं को पराजित पर १ अय मू० पा० नास्ति । • व मू० पा० । ३ रताणी रताणीअरस्या 77 मू० पा० । ४ दिहीदा मू० पा० 1 ५ पहिवञ्ण मू० पा० । ६ भट्टणी म । बुद्धिभवेग मू० पा०। . , द्वितीयोऽ. ४६ - उपाय चिन्तित एव । तदानी त्व देव्या समीपमेव वर्तमाना चन्द्रकलासमीपगत प्रियवयस्यमेपा यदि अनुसतुं गच्छति तदा त्वरित गत्वा निवेदयस्व एनम् । अहमपि इतो गच्छामि समीहितसम्पादनाय। (भोदि, तत्य मए अदिसइदमकलमन्तिवुद्धिविभवेण उवाओ चिन्ति- दोज्जेव । तादाणि तुम देवीए समी। ज्जेव बटानि चन्दअलास- मिवगद पिअवअस्मम् एमा यदि अणुसरिद गछदि, तदा तरिम गदुअ णिवेदेमु एण । अह पि इदो गच्छामि समिहिदसम्मादणाय ।) [ इति निष्क्रान्तो ] प्रवेशक अतिशयितसकलमन्त्रिबुद्धिविभवेन-अतिशयित अतिप्रान्त सकलाना मन्त्रिणा सचिवाना बुद्धिविभव प्रज्ञासम्पत येन तादृशेन, मया, उपाय , चिन्तित एव-विचारित एव । तदानी-स्मिन् समये, एपा-देवी, अनुसतुम्- अनुगन्तुम, गच्छति, त्वरित-शोध, गत्वा, निवेदयस्व-सूचय, एनम्- प्रियवयस्यम् । समीहित सम्पादनाय-अभीष्टकार्यकरणाय । प्रवेशक प्रवेशयतीति प्रवेशक । पञ्चसु अर्थोपक्षेपकेषु अन्यतमोऽयम् । यदुक्त दपणे- प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त या नीचपान प्रयोजित । अद्वयान्तविज्ञेय शेष विष्कम्भके यया ।।' अस्य प्रवेशस्य प्रथमाकेऽन्त्ये च प्रतिषध । यथा दशरूपटीकाकृत 'नासूचितस्य पारस्य प्रवेश क्वचिदिष्यते। प्रवेश सूचयेत्तस्मादमुख्याक प्रवेशकात् ।। देने वाला मैंने उपाय (युक्ति ) सोच ही लिया । तो तुम अब महारानी के पास ही उपस्थित रहो और देखो, कि चन्द्रकला के पास गये हुए (जाते हुए) मेरे प्रिय मित्र का वह पीछा तो नहीं करती। यदि महारानी उनका अनुगमन करें तो तुम नुरत धीरे स जाकर उन ( महाराज ) वो बताकर सचेत कर देना । मैं भी अब यहां मे अभीष्ट समादन के लिए चल रहा हूँ। [ दोना चले जाते हैं] प्रवेशक समाप्त १ पायश्चन एव । २ समीपे मू० पा० । ३ चन्द्रकलादेव्या समीपा । मू० पा०। ४ णवेदेमु मू० पा० । ।

चन्द्रकला-नाटिका [तत प्रविशति परित परिचारिकाभिश्चामरैरुपवीज्यमाना' राजा देवी च ] राजा-प्रिये, पश्य, पश्य- विरहिकुलकृतान्त क्षुण्णकरकान कृतयुवतिभङ्ग सम्भूतानगरङ्ग । गगनजलधिहस स्थाणुचूडावतस क्षयितकुमुदतन्द्र शोभते शुभ्रचन्द्र ॥१॥ परित --चतुर्दिक्ष, परिचारिकाभि-सेविकामि , चामर -बालव्यजन , उपवीज्यमान । विरहिकुलकृतान्त –वियोगिसमूहाना कृते यमराद ( इव ), क्ष ण्णकर्पूरकान्त -पिष्टकर्पूर इव मनोज्ञ , कृतयुवतिभङ्ग -कृत विहित यूना घृतिभङ्ग धैर्यनाशो येन तादृश , सभृतानगरङ्ग -समृत पोयित अनगरङ्ग कामदेवमोद येन तादृश , गगनजलधिहस -आकाश- रूपसमुद्रस्य हस ( इव ), स्थाणु चूडावतस --शङ्करभालालद्धार , क्षयित- कुमुदतन्द्र क्षयिता विनाशिता कुमुदतन्द्रा कुमुदपुष्पस्य अस्फुटावस्था येन- तादृश , शुभ्रचन्द्र -निमलचन्द्रमा, शोभते-राजते। अत्र मालिनी- च्छन्द ॥१॥ [ इसके बाद चमर डलाती हुई परिचारिकाओ से घिरे हुए राजा और साथ म महारानी प्रवेश करती है ] राजा-प्रिये । देखो, देखो- विरही जनो के लिए यमराज के समान, पीसे हुए कर्पूर के सदृश कान्ति पाला, युवको के धर्य का भग करने वाला, कामदेव के हर्ष को बढाने वाला आकाश रूपी समुद्र का हस, शार के ललाट का आभषण और कुमुदपुष्प का खिलाने वाला निमल चन्द्रमा शोभित हो रहा है ॥१॥ . - १ उपवीय्यमानो मू० पा० । २ सभृतानङ्गरण मू० पा० ।

द्वितीयोऽङ्क देवी-तदिदानी त्वरतामार्यपुन तदस्मालोकमानणापि विह- सन्त्या महादीर्घिकाकुमुदिन्या एन परिगयो सब सम्पादयितुम् । ( तादाणि तुबरदु अजुउत्तो तदस्स आलोअमेत्तकेणावि बिहसन्तिए महदिहिआ कुमुदिणीए' एदिणा परिणउसब्ब सम्पादितुम् । ) राजा-प्रिये, अद्यापि त्वयापि न मुक्तो मुग्धभाव । कथ पुनर- तिदवीयस क्षणदाकरस्य कुमुदत्या. करग्रहनिर्वर्तनमित्यपि यस्या मनसि विवेको न स्फुरति । देवी-आर्यपुत्र, कि मामुपहससि । एतेन किल अमृतमयूखेन दीपि. काकुमुदिन्या किसलयकरे' स्वयमेव करोऽर्पितो वर्तते । अस्य-चन्द्रस्य, आलोकमात्रेणापि-दर्शनमात्रेणापि, विहसन्त्या विकसन्या , महादीर्घिकाकुमुदिन्या -महावापीस्यकुमुदि-या, एतेन-चन्द्रेण, सह, परिणयोत्सव-विवाहोत्सव, सम्पादमितुकारयितुम्, आर्यपुत्र , त्वरताम्- शीघ्रता करोतु । मुग्धभाव -मुग्धता शिशुत्वमिति यावत, न मुक्त - न त्यक्त । अतिदवीयस - अतिदूरवतिन , क्षणदाकरस्य-चन्द्रस्य, कुमुदत्या , करग्रह- निवसनम्-पाणिग्रहणोत्सव । अमृतमयूखेन-अमृतकिरणेन-चन्द्रेण, दीपिकाकुमु- दिन्या, किसलयकरे-नवपल्लवरूपहले, स्वयमेव, कर -पाणि, अपित -दत्त । देधी-आयपुत्र । फिर शीघ्रता करें और चलकर, केवल चन्द्रमा के दर्शनमात्र से विहंसती (खिली ) ईई, वडी बावली की कुमुदिनी का इसके साथ विवाह करा दें। राजा-प्रिये । अभि तुम्हारी मुग्यता ( भोलापन ) दूर नही हुई है। तुम्हारे हृदय म मह विवेक नहीं आ पा रहा है कि अतिदूरवर्ती चन्द्रमा के साथ कुमुदिनी वा विवाह कैसे हो सकता है । देवी-आपपुन । घया उपहास कर रहे हैं ? देखिए, इसने तो अपको अमृतमयी किरणो के द्वारा, यावली की कुमुदिनी के कोमल करो मे जैसे अपना हाय हो अपित कर दिया है। मैं तो इस समय उनके परिणय के १ बुदिणीए मू० पा० १२ सम्पादितं मू० पा० । ३ मुक्त मू० पाः । ४ किशनपकरे मू० पा० । ५ करऽपितो मू. पा० ।

चन्द्रकला-नाटिका तदिदानीम् एतयो. परिणयार्थ तवसन्निधानमात्र मया काड क्ष्यते । (अज्जउत्त, कि म उवहससि ? एदिणा किल अमिअमउहेण दीहि- आकुमुदिणीए किसलअकरे सअज्जेव करेअप्पिदो बटुदि । तादाणि एदाण परिणअथ्य तुह सणिधाणमेत्त मए कखीअदि।) राजा-तथाप्यलमस्येदानी तव वदनाम्भोजविस्पर्धिनो दोपाक- रस्य परिणयोत्सवोपादानेन । देवी-आर्यपुन जानामि यथा किल असत्य एव ते सकलोऽपि मय्यनुरागबन्ध । यस्य मम एतावन्तमपि मनोरथ पूरयितु कदापि चित्तवृत्तिर्न प्रसरति । ( अज्जउत्त, जाणीमि जधा किर असच्चो. ज्जेव दे सअलोबि मयि अणुराअवन्धो जस्स मम एन्तिक वि मणो- रध पुराइदु कदावि चित्तवित्ति ण परिसरदि । ) तत-तस्मान् इदानीम् -अधुना, एतयो -चन्द्रकुमुदिन्यो परिणयार्य- सनिधानमात्र-सामीप्यमात्र, मया,काइ क्ष्यते- वाञ्छ्यते । वदताम्भोजविस्पर्धिन --मुखक मलस्य सर्धितु , दोपाकरस्य-- चन्द्रस्य, परिणयोत्सवोपादानेन-विवाहोत्सवकरणेन । सकलोऽपि-समस्तोऽपि, अनुरागबन्ध -प्रेमबन्ध , मनोयरम्-अभिलाप, पूरयित-सफलयितु, चित्त- वृत्ति न प्रसरति-मन प्रवृत्तिनं भवतीत्यर्थ । अवसर पर आपकी उपस्थिति मान चाहती हूं। राजा-तथापि, प्रिये । तुम्हारे मुखवमल से स्पर्धा करने वाले चन्द्रमा का विवाहोत्सव सम्पन्न करना व्यर्थ ही है । देवी-बार्यपुत्र । जानती हूँ मेरे प्रति आपका यह अनुराग कोरा असत्य है, जो आप मेरी (इस) साधारण सी इच्छा को भी पूरा नहीं करना चाहते । ६ तदिनी मू० पा० । ७ सन्निधाय मात्र मू० पा१८ काक्षते मू० पा० । ६ अमित मचिहेण मू० पा०। १ असत्यतमू० पा० । पूरयित ५० पा० । ३ न इति मू० पा० नास्ति। ४ दे मू० पा० । विवाहार्थ, तव-भवत . . ।

३ द्वितीयोऽद्धः [विचिन्त्य स्वगतम् ] एकतः खलु, व्याममण्डलमिद समाकुले ता चरुमूचललोचना विना । शीतदीधितिमयूखकेतवान्मुञ्चतीव मयि मुर्मुर मुहुः ।।२।। त्यच्च तत्र, अन केलिविपिने निवसन्ती दीर्घिकाकुमुदिनीमभियान्ती। तामिय मयि निवेशितभावा वीक्षते न पुनरित्यपि भीति ॥३॥ इद-दृश्यमान, व्योममण्डलम्-आकाशमण्डल, ता, चमूरुचल- लोचना-मृगस्येव चञ्चलनेत्रा ( चन्द्रकला ), विना-अन्तरा, समाकुले-- विह्वले मयि, शीतदीधितिमयूखकैतवात्-चन्द्रकिरणच्छनात्, मुमुर- तुपाग्नि, मुहुः-असत्, मुञ्चतीव-त्यजतीव । अत्र रथोद्धताच्छन्द. ॥२॥ दीर्घिकाकुमुदिनीम्-वापीस्थकुमुदिनीम्, अभियान्ती-उपगच्छन्ती, इय-महाराज्ञी, अन-अस्मिन्, केलिविपिने-क्रीडाकानने, निवसन्ती- बाम कुवैती, मयि, निवेशितभावा-केन्द्रितचित्तवृत्ति, ता-चन्द्रकला, वीक्षते न पश्येत् न, पुन , इत्यपि, भीति भयम् । अम स्वागता. ~ छन्द ॥३॥ राजा- r-[ सोचकर मन म ] एक और, यह आवाशमडल हरिण की-सी चचल आँखो वाली उस तरुणी के बिना ध्याकुल मुझ पर चन्द्रमा की शीतल किरणो के बहाने बार-बार मानो भूसी की आग बरसा रहा है ।।२।। दूसरी ओर, हृदय को यह आशका और भय लगा हुआ है कि बावली मे सिली कुमुदिनी की ओर जाने वाली यह महारानी वहाँ केलिवन में मेरे कार अपने चित्त को केन्द्रित किये हुए स्थित उस ( चन्द्रकला ) को नहीं देख न लें ॥३॥ १ अभियान्ति मू० पा०।२ भित्ति मू० पा० ।

५४ चन्द्रकला-नाटिका - तकि पुनरत्र करणीयम् ? आ , ग्रहो नाम दुरपनोद प्रायश स्त्रीणाम् । [विचिन्त्य ] तदलमिदानीमनातिनिर्वन्धेन । तावदेव तावत् । [प्रकाशम् ] प्रिये, एह्य हि । अतएव सम्पादयामि दीर्घिका- कुमुदिनी परिणयोत्सवम् । [ इत्युभी सपरिवारौ केलिवनप्रवेश पथ्ये नाटयत ] [ नेपथ्ये कलकल । सर्वे शृण्वन्ति । पुनर्नेपथ्ये ]- रे रे केलिवनरक्षका | पलायध्व पलायध्वम् । इदानी खलु- लाग लेनाभिहत्य क्षितितलमसकृद्दारयन्न' ग्रपदभ्या स्त्रीणा, ग्रह -दुराग्रह हठ इति यावत, प्रायश --बाहुल्येन दुररोद दुखेन निराकर्तुं योग्य । अतिनिर्बन्धेन-दुराग्रहेण, अल-व्यर्थम् । दोषिकाकुमुदिनीपरिणपोत्सवम् --वापीस्यकुमुदिनीविवाहमङ्गलम् । कल -कोलाहल । केलिवनरक्षका-उद्यानपाला । कोपाविष्ट -बुद्ध , ( अतएव ) अरुणोच्छनचक्ष --अरणे रक्तवर्ण उच्छूने स्फीते च चक्ष पी नेने यस्य तादृश , एप , तरक्ष, -~-ध्याघ्रविशेष लागलेन-पुच्छेन, क्षितितल-भूमिम, अभिहत्य-ताडयित्वा, अग्रपद्भ्या-चरणाभ्याम, असकृत-वार वार दारयन-क्षितितलमेव तो अब क्या करना चाहिए? आह । स्त्री हृदय की धारणा को बदलना कठिन है। [ सोचकर ] तो अब इस विषय मै हठ करना उचित नही । और अब वही करना चाहिए जो महारानी चाहें [ प्रकट ] प्रिये ! आओ,आओ। चलकर वावली की कुमुदिनी का परिणयोत्सव सम्पन्न करें। [ ऐसा कहकर दोनो केलिवन मे प्रवेश करते हैं ] [ नेपथ्य मे कोलाहल । सुनें सव । पुन नेपथ्य मे ] अरे केलिवन के पहरेदारो । भागो भागो। इस समय-- अपनी पूंछ को बार बार पटककर, अगले पैरो से धरती को खोदता हुआ, बुछ क्षणो के लिए अपनी देह को सिकोडकर छोटा होकर बडी ही तेजी १ दुरापनोद प्रायस मू. पा० । २ दीपिकामुदिनी मू० पा० 1 ३ धारयन् इति पाठभेद ।

द्वितीयोऽङ्क ५ -स मात्मन्येवावलीय द्रुतमय गगन प्रोत्पतन विक्रमेण । स्त्फुत्कारघोष प्रतिदिशमखिलान् भाययन्नेष जन्तून् कोपाविष्ट प्रविष्ट प्रतिवनम रुणोच्छून' चक्ष स्तरक्ष, ॥४ सर्वा -[ श्रुत्वा सभयम् ] आर्ये भद्विनि इदमेव कैलिव प्रविष्टो दुष्टव्याघ्र । तदित पलायामहे । ( अज्जो भट्टिणि, इ ज्जेब केलिवण पविट्टो दु वघ्यो । ताइदो पलाइअम्ह। ) देवी-मात । कथ व्याघ्र । (अन्वी, कध बध्यो । ) [ इति राजानमालिङ्गति ] विलिखन्, आत्मत्येव अवलीय- सङ्कचितदेहो भूत्वेत्यर्थ अय अनन्त विक्रमेण-शक्त या, द्रुत-शीघ्र , गगनम्-आकाशम्, प्रोत्पतन - उद्गच्छन, स्फर्जन --वर्षमान , फुन्कारघोप --फुत्कारशब्दो यस्य तादृश प्रतिदिश-सर्वातु दिक्ष, अखिलान-समस्तान्, जन्तून- छागकुक्कुरा प्राणिगणान्, भाययन्-भयभीतान् कुन्, प्रतिवन-वने वने, प्रविष्ट अन सम्पराच्छन्द , स्वभावोक्तिरलङ्कार ॥४॥ से आकाश की आर उछलकर गर्जन के साथ धूं धूं का घोप करत हुमा, चारा और वन के समस्त जीव-जन्तुआ को डराता हुआ बर्ड बडी लाल वर्ण को सी असे नचाता जैसे कोष म भरा हो, यह लकडव (घेरा ) वन के एक छोर से दूसरे छोर की ओर बढ़ता हुआ पुस चला आ रहा है ॥४॥ सभी-[भय के साथ सुनकर ] बार्य स्वामिनी । यह दुष्ट बाघ इस केलिवन मे घुस आया। चलो, यहाँ से भाग चलें। देवी-मां। कैसा वाघ [ यह कहार राजा से निपट जाती है । १ वलिय मू० पा० । २ स्फुदफुलारधार मू. पा० । ३ द्रावयप इस पाठान्तरम, । ४ प्रतिवल इति पाठभेद । ५ सूनवक्षुस्तरम मू० पा० ६ मात भगिनी मू० पा 7 ५६ चन्द्रकला-नाटिका राजा-प्रिये, न भेतव्य न भेतव्यम् । अमुना खलूपकृती- ऽहम' याचितभवदीयसरम्भनिर्भरपरिरम्भनिर्भिन्नपुलकाङ्करस्तरक्षणा दुप्टेन । [ प्रविश्यापटीक्षेपेण सम्भ्रान्त शवर. । राजान प्रति दूरत. सप्रणामम् ] शवर.-जयतु जयतु भट्टारक.२। एप खलु कुनोऽपि केलिवन प्रविष्ट इतस्तत कुरङ्गयूथविद्रावकः दृष्टिदिगन्तभयङ्कर दुष्टतर- क्ष वटुक । तदिदानी भानुज्ञात मारपितुमिच्छन्ति केलिवनरक्षका वनचरा । ( जेदु जेद भट्टालके । एसो क्खु कुदोवि केलिवण पविट्ठो इदो तदो कुलङ्गजुघविज्जावरके दिदिदिगन्तभअकुले दुट्टतलक्ष. वडुको । तादाणि भट्टालकेण आणत्ता त मालइदु इछन्ति केलिवणर- क्खका वणचला।) अयाचितभवदीयसरम्भनिर्भरपरिरम्भनिर्मिनपुलकाङ्कर - अयाचितन स्वत प्राप्तेन भवदीयेन त्वदीयेन सरम्भनिभरपरिरम्भेण गाढालिङ्गनेन निर्भिन उद्गन पुलकाङ्कर रोमाञ्च. यस्य तादृश , अहम , अमुना तरक्षणा, उपकृत । सम्भ्रान्त - व्याकुल । भट्टारक -देव । दुरगायूथविद्रावर मृगवृन्दधर्ष । राजा-प्रिय । न डरो, न डरो। इस बाघ ने तो मेरा बड़ा उपकार किया । वयोकि इसी के कारण तुम्हारे गाढालिंगन के अयाचित आनन्द की प्राप्ति हो गई। [परदे को हटाकर हडबडाता हुआ शवर प्रवेश करता है । दूर से ही राजा को प्रणाम परसे] सावर-महाराज की जय हो । जय हो 1। दश दिशाओं में भय व्याप्त परने वाले इस दुष्ट बाप ने कही से इस केलिवन में घुसकर हरिण समूहा को तितर बितर कर डाला है। इसलिए वेलिवन के रक्षकगण, इसे मारन ये लिए आपको आना चाहते हैं १ खलु प्रवृतोन्ह मू० पा० । २ भट्टार. मू० पा० । ३ भतां अनुमान मू० पा । ४ जेदु २ मू० पा० । ५ तरस बहके मू. पा० । - ५७ द्वितीयोऽद्ध राजा-[ श्रुत्वा सकौतकम् ] वनपाल । केलियनमृगवृन्दविद्रा- वकोऽपि तिष्ठतु क्षणमय तरक्ष । वमिदानी खलु तदालोकनकु- तूहलिनो वर्तामहे । देवी-[ सभवम् ] आर्यपुत्र एारयित्वा इत आनीतोऽपि प्रोक्षितव्यः एप । अल ते तत्र गमनपरिश्रमेण । ( अज्ज उत्त एदेहि मारिअ इध आणिदोवि पेक्खिदब्बो एसो । अल दे तथ्य गमणपलिस्समेण ।) राजा-प्रिये, न भेतव्य, न भेतव्यम् । आत्मवाहुवलनिजिताखिलक्षोणिमण्डलसमिद्धतेजसा । ईदृशेष शशिवशजन्मनामस्ति कैव गणना तरक्ष पु ॥५॥ आत्मवाहुवलनिजिताखिलक्षोणिमण्डल समिद्धतेजसा-स्वभुजप्रतापा- जिंतनिखिलभूमण्डलेन समिद्ध प्रदीप्त तेजो येषा तथाभूताना, शशिवश- जन्मना-चन्द्रवशोनायाम , (कृते) ईदृशेषु, तरक्ष पु-व्याघ्रप, गणना, एव, कान कापीत्यर्थ । अन रथोद्धताच्छन्द ॥५॥ राजा-[ सुनकर कोतुकपूर्वक ] वनरक्षक | यपि इसने केलिवन मृगयूथो को भय के कारण तितर-बितर कर दिया है, तथापि कुछ क्षणो के लिए अभी इसे मत मारो। हम इसे देखने का कुतूहल हो रहा है ! देवी-[ भयभीत होकर ] आर्य । इस लक्डबग्घे को उन लोगा के द्वारा मारकर लाये जाने पर भी हम लाग देख सकते हैं। आपका वहाँ जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। राजा-प्रिये ! डरो नही, डरो नही- अपने बाहुवल से समस्त भूमण्डन को जीतकर प्रज्वलित प्रताप वाले हम चन्द्रवशी पोरों के सामने इस लकड़बग्घे की कौन-सी गिनती है ॥५॥ 7 १ विद्राथमोप पा१२ प्रेक्षितम एप २०१० ।

। गन्तव्य, चन्द्रकला-नाटिका त्वमिदानी सपरिवाराऽन्तः पुरमेव प्रविश' । क्षणे नैव निहततर- क्षुक्षयमानयिष्ये भवतीम् । [ इति गन्तुमुपक्रमते ] देवी-[परिष्वज्य । सवाष्पम् ] आर्यपुत्र ! यदि त्वया अवश्य तदा मयापि गन्तव्यम् । ( अज्जत्त ! जदि तए अवस्स • गन्तब्ब तदा मएवि गन्तब्बम् । ) राजा-कातयं हि नाम स्वाभाविको धर्मः स्त्रीणाम् । तत्कथ भवत्या तादृशस्य तरक्षोरभिमुख क्षणमपि वर्तितव्यम् ! किंच त्वयि सन्नि- हिताया त्वद्वदनकपरायणस्य ममापि प्रत्यूहो भवति तरक्ष मारणस्य । तदलमिदानीमत्र महीयसाभिनिवेशेन । सपरिवारान्त पुरमेव प्रविश । सपरिवारा-परिजनसहिता । क्षणेनैव-किञ्चित्क्षणानन्तरमेव झटित्ये- वेत्यर्थः, निहततरक्षक्षयम्-मारितव्याघ्रावशेषम् । परिष्वज्य-आलिइ ग्य। कातयं-भीरुत्वं । अभिमुख-सम्मुखम् । सन्निहितायानमीपस्थिताया, त्वद्वदनकपराधणस्य-त्वन्मुखावलोकनासक्तस्य, प्रत्यूह.-विघ्न । महीयसा- अत्यधिकेन, अभिनिवेशेन-आग्रहेण । सम्प्रति तुम सपरिवार अन्त पुर मे जाओ। क्षण मात्र मे मैं इलकडबग्घे का वध करके उसके अवशेष लेकर तुम्हारे पास उपस्थित कर देता हूँ। [ऐसा कहकर वह जाने लगता है ] देवी-[ आँखो मे आँसू भरकर ] यदि आप जाएँगे ही तो मै भी आपके साथ चलंगी। राजा-भीरता स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है । तुम कैसे क्षणमात्र भी उस लकड़बग्घे के सामने रुक सकोगी (नही रुक सकती हो )। इतना ही नही, यदि तुम उसके पास रहोगी तो उसको मारने मे भी मुझे बाधा पडेगी। क्योकि मेरा ध्यान तुम्हारे मुख पर ही लगा रहेगा । इसलिए अब इस ओर अधिक आग्रह उचित नहीं है । अपनी परिचारिकाओ के साथ तुम अन्तः पुर •को ही प्रस्थान करो। १ प्रविश्य मू० पा० । २ क्षय आनयिध्ये मू० पा० । ३.....मुख मू० पा० । ४ कि च मू० पा० ।

द्वितीयोऽङ्क देवी-[ सवाष्पम् ] प्रतिहतममङ्गन' भवतु आर्यत्रस्य । (पडिहदममङ्गल भोदु अज्उत्तस्म। ) [ इति राजानमालोकयन्ती सपरिवारा निष्क्रान्ता] राजा-वनपाल । तद्दर्शय कुनम्तरक्ष, शवर -एतु एतु स्वामी । ( एदु, एदु सामिके।) [ राजा परिकामति ] शवर – पश्यतु पश्यतु स्वामी । एप सम्मारित कुरङ्गाधिरा-त. जालकरालितनखरो दृटिदिगतमाङ्करस्तरक्ष वटुक । (पेक्वदु, पैक्खदु' सामिके । एस समालिदकुलङ्गलुधिलअन्तजालकलालिदग- हलो दिठिदिगन्नभयक तो तलक्नु वडुको ।) बमङ्गलम्-अरल्याणम्, प्रतिहत-विनष्टम् । सम्मारितकुरङ्गरुधिरान्तजाल- करालितनखर-पम्मारिता व्यापादिता य कुरङ्गा मृगा तेपा रुविरेण शोगिन यन्तजालेन अन्त्रेण च करालिजा भयानका नखरा नखा यस्य तादृश , दृष्टिदिग-नमपङ्कर ~दृष्ट्या दिगनेर दिशाम पु भयङ्कर भयोत्पादक । तरक्ष वदन -दुष्टतरक्ष रित्ययं । देवी-[ आँखा म आँसू भरकर ] आर्यपुत्र के लिए अमगल नष्ट हो जायें। [ एसा कहकर राजा को देखती हुई परिचारिकाओ के साथ अन्न पुर की ओर प्रस्थान करती है ] राजा-वनात । ता दिखाओ, यहां है लकडवाधार शवर-इधर मे आएं स्वामी इघर स । [ राजा चलता है ] शवर-देखिए, देखिए स्वामी। यह है दुष्ट लकडबग्वा । भली भांति मारे हुए हरिणा के रक्त से नखो को लोहित किये हुए, जानी मयावह दक्टि से दिशाओ को भी भयभीत कर रहा है। प्रतिहतमममहान म्० पा० २ स्वायिके मू० पा० । ३ एदु२५० पा० । ४ समारित मू० पा०। ५ ५ ३ २ मू० पा० । ६ ममालिदालिन नुधिलअन्नमालिकलालिवणहलो मू०पा ।

६० चन्द्रकला-नाटिका [ इत्यङ्ग ल्या निर्दिशति - गजा-[ दिलोवय ] आ , कथ ममापि नाम केलिवने- उदस्यक पाद विटपिपु मुहुः स्कन्धकपणात्' वृतव्योमाभङ्गः शकुनिकुलकोलाहलभरैः । परिभ्राम्यन्न नं. प्रकटरसनो ध्यात्तवदन- स्तरक्ष क्रुद्धोध्य क्षिपति मृगयूथानि परितः ।।६।। तदिदानी, वनपाल । त्वरितमानय सशर शरासनम् । शवर – यदाज्ञापयति भट्टारक । ( ज आणवेदि भट्टालके ।) एक, पादम्-चरणम्, उदस्य-उत्यार, चिटपिपु-वक्षेपु, मुह वार वार, स्कन्दपणात्-पर्पणा, शकुनिफुलकोलाहलभर पक्षिसमूहब लयले , कृतव्योमाभङ्ग:-कृत. विहित व्याग्न आशिस्य आभङ्ग ५स येन तादृश पक्षिनिनादरावाशमापूरयनित्यर्थ , परिभ्राम्यन- इस्तततो गच्छन्, उच्च.-अतीव, प्रक्टरसन.-प्रदर्शितजिह्व, व्यातवदनः- व्यात विस्फारित यदन मुख येन तादृश , अय-दृश्यमान , कद्ध.-पिन तरक्ष-व्याघ्र, परित -समसात्, मृगयूथानि-हरिणसमूहान, क्षिपति-विद्रावति । अब शिखरिणीच्छन्द. ॥६॥ (वरित-शीघ्र , सशर-वाणसहित, मरासन--पनु । भट्टारब यह क्या [ अगुलियो से दिमाता है] राग-[ देसार ] आर .? मेर (जमे बोर ) क्रीडावन में- पर द समस्यामा एप पर को उठाये हुए, बार-बार अपने अधी मा वृक्षो म रगह रहा है, जिसमें उन पर गए भपार पक्षियों के कोलाहल से मावाश भर रहा है। मुंह पसागर जीभ सपसपाता हुआ उपल. कर चारों और घर सगाता हुआ, सब और हरिण-गमो मो आप्रान्त पर रहा है ॥६॥ इसलिए, यमपाल ! अब तीन ही धनुष और माग साम्रो। परयामीनी संयना। एस.पणात मू० पा०। २ प्राटरसन 7. पा० । मू. पा० द्वितीयोड्न [इति निष्कम्प राज सशर शरासनमुपनयनि ] [ राजा नाट्येन आदत्ते] शवर -अरे दुष्टतरक्षो' | क्व इदानीम् ? एह्य हि । एप खलु हीतशरामनको भर्ता । ( अले दुद्र तलखु | आदाणी ईहिहि । मो खु गिहिदसलासणको भट्टालको'।) [ तरक्ष, संयुक्तारमभिविक्रम्य सहितवाणशरासन राजानम- नोक्य पलायते । राजा शवरानुगतो धावति ] तरक्षः-[ सर्वत केलिवन विजनमालोक्य ] एषोऽस्मि रसालकः वृत्त । ( एस्सोम्मि रसालओ सवुत्तो।) [ इति व्याघ्रभूमिका परित्यज्य विदूषकरूपस्तिष्ठति ] नियति-समीप प्रापयति । आदत्ते-गृहणाति । गृहीतशरासनक -गृहीतम् पदत्त पारासनक धनु येन तथाभूत । सयुक्तार-सगर्जनम, अभिविक्रम्य- कम्य, सहितवाणशरासन-सधानीकृतवाणेन युक्त शरासन यस्य तादृश, जानम् । शवरानुगत-शवरेण अनुसृतः । विजनम्-एकान्तम् । सवृत्त - ति । व्याप्रमूमिका-तरक्ष कृत्रिमरूपम् । [ यह कहकर जाता है और धनु र बाण लाकर राजा को देता है ] [ राजा अभिनय के साथ ग्रहण करता है ] शवर-अरे दुष्ट लक्डबग्घा | अब कहा हो? इधर सामने आओ। मारे महाराज अब धनुष-बाण हायो में धारण कर चुके हैं । [ लकड़बग्घा धूं धूं शब्द के साथ तीत्र गर्जन करते घूमना हुआ, धनुष Tण लिये हुए राजा को देखकर भागता है । राजा उसके पीछे दौडता है और शवर उसका अनुगमन करता है । ] तरक्ष -[ वेलिवन को सभी मनुष्यो से रहित देखकर ] लकड़बग्घे के "प मे यह स्वय मैं हूँ रसालक । [ ऐसा कहकर लाडवा का देश बदलकर विदूपक के रूप में प्रकट हो हाता है । ] १ तरक्षा, मू० पा० । २ 'क्व' इत्यस्य प्राकृतम पाण्डुलिपो नास्ति । ३ शरासनके मू० पा० । ४ सणके मू० पा०। ५ भट्टालके म० या !

चन्द्रकला नारिका ३ राजा -[ विलोक्य सहर्षम् ] सखे । सदृशमाचरित प्रतिज्ञातस्य प्रतिदिनमुपचीयमानस्य च सौहृदस्य । शवर प्रति ] वनपाल । तदिदानी भवता शिला' तरक्ष मेक मानीय इहैव विशिखजालनिर्भिन्न स्थापितवता तधुष्यतामभितो महाराजेन निहतस्तरक्ष रिति। शवर'-यदाज्ञापयति स्वामी । ( ज आगवेदि सामिके।) [ इति निष्क्रान्त ] राजा-सखे । पश्य, पश्य- सह कुमुदकदम्ब काममुल्लासयन्त सह धनतिमिरोधैर्धेर्यमुत्सादयन्त । सदश-योग्यम, आचरितम-अनुष्ठितम, उपचीयमानस्य--वर्षमानस्य, सौहदस्य बन्यत्वस्य । शिलातरक्ष म-प्रस्थरनिर्मित तरक्षम् । विशिखनाल- निभिग्नम्-बाणे विद्यम्, अभित --चतुर्दिक्ष, धुप्यताम-पोषणा प्रियताम् । कुमुदकदम्ब करवसमूहै, सह-साक, पाम कदम, उल्लासयन्त -प्रकाशयन्त , घनतिमिरोघं-धना निविडा ये तिमिरोधा अघवारसमूहा ते, सह, यं-चित्तस्थिरताम, उत्सादयन्त नाशयन्त , सरसिजपण्ड -पग्रसमूहै , सह, स्वान्त-चित्तम्, आमीलयन्त -कामवेगेन समोच्यत अमृताशो- ---चन्द्रस्य,अशव-विरणा,प्रतिदिश--सर्वासु दिक्ष, राजा- देखकर हर्ष के साप ] मित्र ! प्रति दिन बढ़ने वाली मित्रता की प्रतिज्ञा वे यनुरूप तुमने किया। [ शवर से ] वनपाल ! अब तुम परमार पादक लवस्य पा लाकर यही पर याणो उसके टुकडे टुडे कर डालो और सबर पोषणा कर दो कि महाराज ने लकवा को मार डाला। -महाराज की जसो याता। [ ऐसा महार चला जाता है। रा-मित्र । देखो, देखो- घु मुस्पलों से सम नामाक्ति को जगाती हुई, मिटते हुए अन्धकार सहाय साप ( सुवर-जनो ) यं को तोडती हुई, कमल- १लासरसा मेवमानीय गू० पा० । २६५ सरपृतच्छाया पाटलिप नारित । सारयन्त इति पायातरम् । -- द्वितीयोऽङ्क - सह सरसिजपण्डै स्वान्तमामीलयन्त प्रतिदिशममृताशोरशव ' सञ्चरन्ति ॥७॥ विषक - भो वयस्य । ममापि शृणु कवित्वम्- एष शशधरविम्वो दृश्यते हैयङ्गवीनपिण्ड इव । एते अस्य मयूखा पतन्ति आशासुरे दुग्धधारा इव ॥८॥ ( एसो ससहरविम्वो दीसइ हेअङ्गबीण पिण्डोब्व । एदे अस्स मउहा पडन्ति* आसासु दुद्धधाराब।८।।) राजा-अहो भोजनरसिकता' प्रियवयस्यस्य । सखे तदिदानी दर्शय कुत प्रियतमा मे चन्द्रकला । [तत प्रविशति मदनावस्था नाटयन्ती चन्द्रकला ] सञ्चरन्ति--प्रसरन्ति । अत्र अतिशयोक्तिमूला सहोक्तिरलबार, मालिनी- छद ॥७॥ एप , शशधरविम्ब -च द्रबिम्ब , हैयङ्गवीनपिण्ड इव-पूर्वदिनोत्पन्न दुपनिष्पनघृतपिण्ड इव, दृश्यते अवलोक्यते अस्य-चन्द्रस्य, एते, मयूखा -किरणा , आशासु-दिक्ष, दुग्धधारा इव-क्षीरप्रवाहा इव, पतन्ति-वतीत्यर्थ ॥८॥ समूहा के राकोच के साथ (विरह-ताप से ) मेरे चित्त को सकुचित बनाती हुई चारो ओर च द्रमा की किरणें फैल रही हैं ।।७।। पिदपक-हे मित्र ! अव मेरी भी कवि कल्पना सुनो-चन्द्रमा का यह बिम्ब जैसे मक्खन का गोलाकर पिड है और ये इसकी किरणें दिशाओ म दूध की धारा सी वरस रही हैं ।।८।। राजा वाह रे मित्र की भोजनप्रियता। ता अब हमारी प्रियतमा चन्द्रकला कहां है ? दिखाओ। [ तभी काम-पीडित अवस्था मे चन्द्रकला आती है ] १ रशव मूपा० । २ पत त्याशामु इति पाठान्तरम । ३ हेअङ्गविण पृ० पा० । ४ ए ए अअस्स मोहा इति पाठभेद । ५ पडिति मू० पा। ६ आसासुदधारव्य पाठान्तरम् । ७ रसिकविता मू० पा०८ च कसा भू० पा०।

चन्द्रकला नाटिका चन्द्राला-दोघं निः श्वस्प ] यदि बद्धो निबन्धस्त्वया तादृशे दुर्लभेऽथे। तत्किं हृदय खिद्यसे भुड क्ष्व अविचारितस्य फलम् ॥६॥ (जतिबद्धो निबद्धो तए तारिम दुल्लहै अथ्थे । ताकि हिअअ खिजुसि भुजसु अविभारिअस्स फलं 10) विदूषकः-एतु एतु प्रियवयस्यः । ( एदु, एदु पिअवस्सो।) [ इत्यप्रतो भूत्वा पुरस्तादवलोक्य ] भी वयस्य ! पश्य, पश्य । इत एव सा ते प्रियतमा। (भो बअस्स । पेक्ख, पेक्ख । इधज्जेय सा पिअतमा।) [अगल्या दर्शयति ] । हृदय-चित्त, यदि-घेत, स्वया, ताशे, दुर्लभ-दुष्पापे, अर्थ-वस्तुनि, निबन्धः- प्रेमयन्धनम्, वृद्ध-स्वीच तः, तत्-तर्हि, वि-मयं, सियरो-सिन्न भवति', अविचारितस्य-विवेकमन्त रानुष्टिसस्य पायंस्य, फ-परिणाम, भुद पव- प्राप्नुहि ॥ . १ चन्द्रशसा --[ संबो सांस लेकर हे हृदय ! यदि तुमने उस दुलंम जन में अनुराग बरने का सरकार लिया तो जय गोक क्यों कर रहे हो बिना भागा-पीया गोपे कोई माम परने पानी पर होता है उगे भोगी। बिदूपर - घर आयो, मित्र [ एगा पहार आगे बाता। और सामने देगार ] मित्र | देगो, देगी। यही है तुम्हारी स्तिमा । 1 4 एसी गे पिता पापी मू० पा० । २ भक्ष्य पृ० पा० । पपेर एप .पा. ४ सय प नार सम्यने । २०५०।

- द्वितीयोऽङ्क राजा-[विलोक्य सहर्षम् ] एतद्वदनचन्द्रावलोकनेन क्षणेन क्षयमुपगतो मे सकलोऽपि हृदयसन्ताप । [ पुनरवलोक्य ] क पुनरय मदनशरसम्पातजनितश्चित्तसन्नापोऽस्या ? रहितप्रियप्रयोग निरस्तराग निरुपहारमपि। नर्तयति स्तनयुगल सन्ततमन्तर्गतागत २ श्वास ॥१०॥ किञ्च, जरठलवलीपाण्डुक्षाम' जटालशिरोरुह एसद्वदनचन्द्रायलोकनेन-एतस्या चन्द्रकलाया वदनचन्द्रस्य मुखचन्द्रस्य अवलोकनेन दर्शनेन, क्षय-नाशम्, उपगत -प्राप्त । मदनशरसम्पातजनित - मदनशरस्य कामवाणस्य सम्पातेन पतनेन जनित उत्पादित । सन्तत-सततम्, अन्तर्गतागत -हृदय गच्छति तत आगच्छति च यः तादृश , श्वास -प्राणवायु , रहितप्रियप्रयोग-वल्लभकृतमर्दनादिवजित, निरस्तराग-कस्तूरीचन्दनादिलैपरहित, निष्पहारमपि-आगूषणशून्य मपि, स्तनयुगल-कुचद्वन्द्व, नर्तयति-कम्पयति ॥१०॥ जरठलवलीपाण्डुक्षाग-जीर्णलवलीलतावत् पाण्डु तया दुर्बल, राजा--[ देखकर प्रसनतापूर्वक ] इसके चन्द्रानन के दर्शनमात्र से क्षणभर में मेरे हृदय का सन्ताप नष्ट हो गया। [ पुन देखकर ] कामदेव के तीखे याणो से इसका हृदय ग्यो सतप्त है इसने दोना स्तना पर न तो ( मृगमद की ) रुचिार पत्रकारी है, न पन्दन का लेप है और न हार ही यहाँ शोभित हो रहा है । उसको वेवल ( कामपीडा के वारण ) हृदय से निरन्तर उठने वाला उच्छ्वास अपनी गति के कम्पन से नचा रहा है ॥१०॥ और भी स्तूरी, केशर, चन्दन आदि का लेप न लगने से रूक्ष वसोल यात्री बीर अघखली यांखा वाली यह मृगनयनी अपने शरीर को, जा पुरानी पडी लवली लता की तरह पीना तथा दुर्बल हो गया है ओर १ निरपहारमा मू० पा० । २ अन्तर्गनगगन मू० पा० । ३ जरजलवलीप- हुच्छायो इति पाठान्तरम् । - पा०-५ चद्रकला-नाटिका ललितनलिनीपत्रे गात्र निवेश्य मृगीदृशा । मुकुलितदृशा रागोद्भद' प्रभिन्नकपोलया स्तिमितमनसा धन्य प्रयान् क एष विचिन्त्यते ॥११॥ विदूषक -भो वयस्य | त्वा वर्जयित्वा कोऽन्य ईदृशानुरागबन्ध शङ्कितव्य एतस्या । न खलु कुसुमित सहकार वर्जयित्वा कलकण्ठी अन्यम् अभिलपति । न वा चन्द्र वर्जयित्वा चन्द्रिकाया अन्यत प्रसार । ( भो वअस्स | तुम वज्जिअ को अग्णो इरिसाणुरामणि. वन्धण सकिदब्बो एदाए। ण क्खु कुसुमिद सहआर वज्जिअ कल. कण्ठी अण्ण अहिलसदि। ण वा चन्द वज्जिअ चन्दिआए अण्णदो पसारो।) - जटालशिरोरुहम्-अस्तव्यस्तकेश, गात्र-शरीर, ललितनलिनीपत्र सुदरकमलिनीदले, निवेश्य-स्थापयित्वा, मुकुलितदशा-निमीलितनेत्रया, रागोद्भेदाभिनकपोलया-बुङ्कुमादिलेपाभावादशोभितरपोलवत्या, (यनया) मृगीदृशा-हरिणाक्ष्या, स्तिमितमनसा-क एप , धन्य - भाग्यशाली, प्रेयान्-अतिप्रिय , विचिन्त्यते-घ्यायते । अत्र हरिणीच्छद ॥११॥ वजयित्वा-त्यक्त वा, ईदृशानुरागय घ -ईदृश अनुरागवध प्रेमय धन यस्मिन् तादृश । कुसुमित-पुष्पित, सहकारम, आमवृक्ष , करवठी- कोकिला, अभिलपति-वाञ्चति । चन्द्रिकाया -योमुद्या , प्रसार -गमनम् । जिसके वाल उरझकर जटा बन गये हैं, कमल में कोमल पता की शय्या पर लिटाकर पीडित मन से रिस भाग्यशाली प्रियतम का चिन्तन पर रही है ? ॥११॥ विदूपर -मित्र | तुम्हारे अतिरिक्त और मौत है, ना इससे अनुरागपत हो सकता है ' षया सभव है कि कोयल पुप्पित आग्र वा छोडकर भय पक्ष पो अभि नापा पर बद्रमा में अतिरिक्त क्या अपत्र पत्रिपापा प्रार संभय है ' पदापि नहीं। १ रागानेदी मू० पा०॥

द्वितीयोऽङ्क ६७ राजा-तत्क्षणमत्र व लतान्तरितौ जानीवस्तावत् । [ इत्युभौ लतान्तरितौ पश्यत ] चन्द्रकला-[ पुननि श्वस्य, 'जइ बद्धो' इत्यादि पठित्वा अग्रतोऽ वलोक्य ] -मात | कथमिदानीम् । (अब्बो । कघ दाणि।) एकत्र प्रियविरहोऽन्यत्र एप समुदितश्चन्द्र । घातस्योपरि घातो मय्येकन कृतो विधिना ॥१२॥ (एकत्तो पिअविरहो अण्णतो एस समुइओ चन्दी। पाअस्स उवरि घाओ मइ एकत्तो किदो विहिणा ॥१२ तदिदानीम् अमृतमयूखेन यथा दिक्ष, पुनरपि एव किरणजाल न विस्तार्यते', तथा विनिवेदयामि। ( तादाणि अमिअमउहेण जघा दुसु पुणोवि एद करजाअ ण विस्थारि अदि तधा णिवेदेसि ।) एकत्र-एकत , प्रियविरह -प्रियेण कान्तेन विरह वियोग , अन्यत्र- अन्यत , एप –अय, चन्द्र -चन्द्रमा, समुदित --सम्यक्' उदय प्राप्त, विधिना-देवेन, मयि, एकन, घातस्य-प्रहारस्य, उपरि, घात -प्रहार, कृत-विहित ॥१२॥ अमृतमयूसेन-चन्द्रेण, किरणजाल-किरणसमूह, न विस्तार्यते-न प्रसार्यते, विनिवेदयामि-निवेदन करोमि। राजा-तो क्षण मर सता की ओट में होकर हम दोनो सत्यता का ज्ञान करें। [ दोनो लता की ओट से देखते हैं ] चन्द्रकला-[ सांस लेकर 'यदि दुर्लभ जन मे' इत्यादि कहती हुई सामने देखकर ] मात । इस समय किस प्रकार धर्य रखें- एक ओर तो प्रिय का वियोग पा ही, दूसरी ओर यह चन्द्रमा उदित हो गया । भाग्य एक ही समय चोट पर चोट देकर मुझे दूनी पीहा दे रहा है ॥१२॥ इसलिए अब में अमृतकिरण चन्द्रमा से प्रार्थना करूंगी कि वह किरण-जाल को दिशा में न फैलाए। १ विस्तारपति मू० पा० । २ अमियमचिहेण मू० पा० । ३ करजाण - मू० पा०।

चन्द्रकला-नाटिका [ इति चन्द्र प्रति साञ्जलिबद्धम् ] त्वया सह्रियते तमो गृह्यते सकलस्ते पाद । वससि शिरसि पशुपते व विधो स्त्रीजीवन हसि ॥१३॥ (तए सहरिज्जई तमो गेहई समलेहिं दे पाओ। वससि सिरे पसुबईणो तह विहु इथ्यी जीवण हरसि ॥१३॥ तदिदानी मेघान्तरेऽपि गोपयस्व आत्मानम् । अलमेतेन दुर्जनो- चितेनआचरितेन । [सरोपम] आ , कथम् अतिदीनतया मया एव- मभ्यर्थितोऽपि पुन पुनरपि वर्षसि मयि विपसवलित किरणजालम, । रोह, जाने यत्किल वाह्यदर्शितप्रसादानानपि कलुपितान्तराणा स्वभाव एव एप । (तादाणि मेहन्तरेवि गोतवसुअअन्ताण अलमेदिणा त्वया-चन्द्रेण, तम -अन्धकार , सहियते विनाश्यते, सकले समस्तं ( चराचर ), ते--तव, पाद -विरण , गृह्यते-धार्यते प, विधो- चन्द्र !, त्व, पशुपते -शिवस्य, शिरसि-मूर्ध्नि, वससि–नियास वरोपि, (तहि यथ ) स्त्रीजीवनम् ---अवनाप्राणान्, हरसि-नाशयसि ? ॥१३॥ मेघान्तरेऽपि-मेघमध्येऽपि, आत्मान-स्व, गोपयस्व-आयण। दुर्जनोचितेन-दुष्टयाग्येन, आचरिता-याचरणेन । सरापम्-घोपसहितम्, अभ्यर्थितोऽपि-प्रायितोऽपि, विपसवलित-विपातम् । दिन-प्रसिद्धार्थवमय- [ हाय जोडपर चन्द्रमा के प्रति ] हे पद्रमा । तुम अन्धवार का नाश करते हो, तुम्हारे पिरण रूपी परण पा लता-वनस्पति सभी स्वागत परत हैं । यहाँ तर मि तुम पशुपति शिप ये सिर पर नियारा परते हो। तुम्हारी जहाँ इननी महिमा है यहीं यह सुच्छ पाम पयो परते हो कि मुझ अवता स्त्री के प्राण से रह हो ॥१३॥ तो अब स्वय मो पादता म दिपा सो । दुर्जनो यो नदि यह आपरण थर पद पर दा। [ रोप रो ] यी दीरता के साथ मैंने तुमसे प्रार्थना पी बोभी मुमचार-पार इन विपममी रिणा यो वर्षा गरे पर रही रहे हो!

द्वितीयोऽङ्क दुज्जणोददेण आअरिदेण । [ सरोपम ] आ, कघ अदिदीणदाए मए एव अन्भथ्थिदोवि पुणो पुणोवि वरिससि मयि विससवलिद किरणजालम् । [ विचिल्य ] हु, जाणे जे किल वाहिरदसिदप्य- सादाण वि कलुसिदन्तरण सभाबोज्जेव एसो।) [ आकाशे अञ्जलिं वद्ध वा ] ह हो, कुसुमायुघलीलामानवशीकृताशेपलोकनहाराजचितरथ इव कथमतिदीनाया मयि एव निष्करुणो भूत्वा पुन पुनविक्षिपसि विशि. खजालम् । (ह हो, कुसुमाओहलिलामेत्त वसाकिदासेसलोअमहाराअ चित्तरधो विअ कध अदिदीणाए मइ एव णिक्करिणो भविअ पुणो- पुणो विविखवसि विसिहजालम् ।) विदूषक -भो वयस्य शृणु तावत, शृणु तावत । कथ न सम्भावयसि आत्मनिर्वधमेतस्या अनुरागबन्धम् । ( भो वअस्स, मेतत् । बाह्यदर्शितप्रसादानाम-वाह्यत दर्शित प्रसाद प्रसनता ये तादृशाना, कलुषिता तराणा-मलिनचित्तवृत्तीना ( जनानाम् ) । ह हो-सम्बोधनार्थकम- व्ययमतत, कुसुमायुधलीलामात्रवशीकृताशेपलोकमहाराजचित्ररथ कुसुमायुध कन्दप इव लीलामात्रेण अनायासेन वशीकृत बघीनीकृत अशेषनोक सम्पूर्ण लोक येन तादृशो महाराज चित्ररय , निष्करुण-निदय , विशिखजाल- किरणसमूहम् । एतस्या -चन्द्रकलामा , आत्मनिर्वन्ध-स्वनिष्ठम् , अनुरादन्य- [ सोचकर ] अच्छा मैंने समझा-कलुपित अन्त करण वालो का यह स्वभाव ही है कि वे वाह्य रूप म ही केवल प्रसन्न होते हैं। [ आकाश को और हायो को जोडकर ] अरे, क्यो तुम भी कामदेव की तरह लीलामात्र से सम्पूर्ण लोक को वश में करने वाले महाराज चित्ररप की भांति मुझ असहाय पर निर्दयतापूर्वक बाण मार रहे हो विदूषक-मित्र | सुनो। तुम इसके अनुराग को, जो तुमम अनुरक्त है। १ विक्सवसि मू० पा०। २त्र मू० पा० द्विधा नास्ति । 7 ७० चन्द्रकला-नाटिका सुण दाब, सुण दाब । कथं ण सम्भावेसि अप्पणिबन्धणं एदाए अणुः रामबन्धम् ।) राजा-[ सहर्षम, ] सखे, शृणु तावत,- एकातपत्र वसुधाधिपत्य-२ मैन्द्र' पदं वाऽभरवृन्दवन्द्यम मनोरथोऽध्यासितु मुत्सहेत न चेदृशश्चारुदृशोऽनुरागः ।।१४ चन्द्रकला-[ विचिन्त्य ] कथमेतावन्तं कालं विलम्बते दीपिका- सुनलिनीदलमृणालानि आनेतुं गता मे प्रियसखी सुनन्दना । ( कधं एन्तिकं कालं बिलम्बेदि दीहिआदोणलणीदल' मूणालाई" आणी, गदा मे पिअसहि सुणन्दणा।) एकातपमपम,-एकच्छवं, वसुधाधिपत्यं-पृथ्वीसाम्राज्य, वा- अथवा, अमरवृन्दवन्द्यम.-देवसमूहवन्दनीयम्, ऐन्द्र' पदं-देवराज- पदं, (मे) मनोरथः-अभिलाषः, अध्यासितुम --उपवेष्ट, न उत्सहेत- न उत्साह कुर्यात्, (चेत्) ईदृशः, चारुदृशः-शोमनाक्ष्याः, अनुरागः--प्रेम (सभ्येत ) अत्र उपजातिच्यन्दः ॥१४॥ दीर्घिकासुनलिनीदलमृणालानि-चापीतः कममिनीपत्राणि विसानि ध। पपों नही स्वीकार करते हो? राजा-[ हर्ष के साथ ] मित्र ! तो फिर सुनो-क्यो नही स्वीकार करते हो? एकपन पृथिवी का साम्राज्य, यहाँ तक कि देयसमूहो द्वारा पन्दित इन्द्र-पद पर भी मेरा मनोरय बैठना नहीं चाहता यदि ऐसी मोहक चितवन वाली का ऐसा अनुराग प्राप्त हो सके ॥११॥ धनकता-[ सोचकर] थया कारण है कि सरोवर से कमसिनीपत्र और मृणास माने के लिए गयी हुई मेरी ससी मुनन्दना इतना विसंघ कर रही है ? र सुदाय १ मू० पा० । २ वसुधापिपरव मू० पा० । ३ दोगमणीदमूनालाई मू. पा.. दीहिआगुणमिणिदसमूमाणाई इति पाठस्तूचितः । .

.. द्वितीयोऽङ्कः [प्रविश्य सुनन्दना' ] सुनन्दना-सखि ! एतानि नलिनीदलमृणालानि उपशमयन्तु ते हृदयसन्तापम् । (हला, एदाई गलिगोदल मूणालाई २ उवसमावेदु दे हिअअसंवादम् । ) चन्द्रकला-सखि ! अलमिदानीमेतः । पुनः पुनरपि अङ्गपु हला- हलं वर्पतोऽमुषाद्द,प्टरजनीकरात, रक्षयितुमशरणाह' प्रिय-सखि ! (हला ! अलं दाणि एदेहि । । पुणो पुगोबि अङ्गसु हलाहलं बरि- सन्तो ईमादो दुटुरअणोअरादो रक्खिजुदु' असरणा अह पिअसहिए।) [ इति मूर्छिता पतति ] राना-[ ससम्भ्रममुपसृत्य ] प्रिये ! समाश्वसिहि, समाश्वसिहि । तवाननसुधाधामजितः कलुपितान्तरः । उपशमयन्तु-शान्तं कुर्वन्त । हलाहले-विषम, दुष्टरजनीकरात्- दुष्टचन्द्रात, अशरणा--रक्षितरहिता । देवि-प्रिये !, तवाननसुधापामजितः-तव मुखचन्द्रेण पराजितः कलुपितान्तरः-मलिनचित्तः, एष:-दृश्यमानः, रजनीकर:- चन्द्रः, [ सुनन्दना प्रवेश करके ] सुनन्दना-सखी ! ये कमलिनीपत्र और मृणाल तुम्हारे हृदय के मन्ताप को . शान्त करें। चन्द्रकला-पसि ! अब यह सब व्यर्थ है। यह दुष्ट चन्द्रमा अपनी किरणों से पार-बार जो विप मेरे ऊपर परसा रहा है, उससे मैं रक्षा करने में असमर्थ होकर असहाय हो गई हूं, प्रियससी! । [ कहती हुई मूच्छित होकर गिर पड़ती है ] राना-[ शीघ्रता से समीप पहुंचकर ] प्रिये ! धीरज रखो, धीरज रखो। सुम्हारे मुखचन्द्र से पराजित होने के कारण हृदय में द्वेष भर- १ मुनन्दना मूळ पा. २ मूलाई मू० पा० । ३ फरादरसे हं शरणा मू० पा० । ४ असररिखजुद मू० पा० ।

७२ चन्द्रकला-नाटिका दहत्यतिशय देवि त्वामेप रजनीकर ॥१५॥ सुनन्दना-[ विलोक्य सानन्दम् ] दिष्ट्या वर्धे । भर्त । । इय खलु स्वभावत. नवमालिकाकुसुमपरिपेलवा त्वत् कृतविरहवेदनानि - सहा जन्मत प्रभृति अननुभूत दु खसागरनिमग्ना तपस्विनी मे प्रिय- सखी चन्द्रकला प्रभवति न इदानीम आत्मनोऽङ्गषु । तत्करे गृहीत्वा उत्थापयतु" तावदेनाम् । ( दिट्ठिआ वत्सेमि । भट्ठा । ईअ क्खु सभा. वदो णोमालिाकुसुमपरिपेलवा तुहकिदबिरहवेदणाणीसहा जन्मदो पहुदि अणणुभूददु खसाअरणिमण्णा तबस्सिणी मे पिअसही चन्दअला प्पभवदि ण दाणिअत्तणो अङ्गसु । ता करे गेलिअ उथ्थावेदिक दावण ।) त्वा-भवतीम्, अतिशयम्- -अत्यन्त यया स्यात् तथा, दहति-भस्मोक- रोति ॥१५॥ दिष्ट्या वर्ध-अहो भाग्यमित्यर्थ । इय-पन्द्रकला, स्वभावत प्रकृत्या, नवमालिकाकुसुमपरिपेलवा-नवमल्लिकापुष्पवत, कोमला, स्वरयत- विरहवेदीनि सहा-त्वद्वियोगवेदना सोढुमसमर्था, जन्मत. प्रति-जन्मा. दारभ्य, अननुभूतद् खसागरनिमग्ना-अननुभूतदु खरूपे समुद्रे पतिता, तपस्वि- वनि--यरावी, चन्द्रकला, आत्मनोऽङ्गेपु न प्रभवति-स्वाङ्गानि धारयितुम- क्षमेत्यर्थः। राज कर चन्द्रमा हे देवि । तुम्हें पूरी तरह से जला रहा है ॥१५॥ सुनन्दना-[ देखकर मानन्द के साथ ] मैं वही भाग्यशालिनी है। महा- मेरे ससी यह चन्द्रकला, जो स्वभाव से ही नयमल्लिया र युगुमो की भांति कामल है, आप वियोग-शोक को सहन परने म असमर्थ हो गई है । क्योकि जन्म से अबतक इस प्रकार की वेदना का अनुभव उसने सभी नहीं किया था। इस अननुभूत दुस-सागर में निमग वेपारी मेरी प्रियराती पद्रकला अपने अगो पर भी अधिकार नहीं रख पा रही है । अतएप थाप हाप परहवर उसे उठाइए। १ महूं मू० पा० । २६म मू. पा०। ३ तवरतविरहदनानि सहा मू० पा०1४ तदनुभूत मू० पा०। ५ स्थापय मू० पा। - द्वितीयोऽङ्क ७३ राजा- - 1 '-मम, [इति निष्कान्ता] -इदमेवोचितमिदानीम् । [ इति करे घृत्वा चन्द्रकला- मुत्यापयन स्पर्शसुखमभिनीय ] अहो कथमिदानीम्- करपल्लवसङ्गन सममेव मृगीदृश । निमग्नमिव मे स्वान्तमुदन्वति सुधामये ।।१६।। [प्रविश्यापटीक्षेपेण सम्भ्रान्ता सुनन्दना ] सुनन्दना-ससी चन्द्रकले । त्वरितम् एह्य हि । इस खलु देवी महाराज निहततरावर श्रुत्वा गृहीतार्घा सपरिवारा इत आगच्छति । (हला चन्दअले । तुरिद एहि, एहि। इअ क्खु देवी महाराज णिददरवखुवर सुणिअ गिहिदअण्णा सबरिबारा इध आअच्छदि ।) मृगीदृश --मृगनयनाया ( चन्द्रकलाया ), करपल्लवसङ्गन- विसलयरत मोमलहस्तस्पर्शन, सममेव-साकमेव, सुधामये-अमृतमये, उदन्वति-समुद्र, मे- स्वान्त-हृदय, निमग्नमिव-मग्नमिव ( भाति ) ॥१६॥ निहततरक्ष वरम-निहत व्यापादित तादृश, महाराज, गृहीताC-गृहीत हस्ते घृत वर्ष पूजार्थमाहृत दूर्वादुग्धाशतमिश्रितजल यया तादृशी, सपरिवारा-परिजनसहिना । [ कहकर चली जाती है ] राजा-इस समय यही उचित है। [ बहता हुआ हाय पकडकर चन्द्रकला को उगता है और स्पर्शजनित सुख का अभिनय करके ] महा 1 कैसे इस इस मृगनयनो के कर-पल्लव के स्पर्श के साथ ही ऐसा मालूम पड़ता है कि मेरा हृदय सुधा के समुद्र में डूब गया है ॥१६॥ [ परदा उठाकर सुनन्दना प्रवेश करती है ] सुनन्दना-प्रियससी! शोध चलो। यह जानकर कि महाराज ने लकड. बाप को मार डाला है, उन्हें सम्मान देने के लिए ये महारानी अपनी सभी परिवारिलायो के साथ इयर ही आ रही हैं। तरक्ष वर व्याघ्रश्रेष्ठो येन समय- चन्द्रकला नाटिका [ सर्वाः ससम्भ्रम परिक्रामन्ति' चन्द्रकला कतिचित, पदानि गत्वा सोग दोघ' नि.श्वस्य परावृत्त्यैव राजानमवलोकयन्ती भूमी पतति ] मुनन्दना-[ ससम्भ्रममुत्थाप्य ] सखि! त्वरितमेह्य हि । (हला! तुरिदं एहि, एहि।) [ इति निष्क्रान्ता] राजा-[ अग्नतोऽवलोक्य ससम्भ्रमम् ] सखे ! इयमङ्ग, लिभ्रष्टा चन्द्रकलाया मणिमुद्रिका, तदिदानीमिमामञ्चले बद्धवा' गोपयतु भवान्। [विदूषक तथा करोति ] [ ततः प्रविशति सापंपात्रपरिवारा देवी रतिकला च ] अङ्गुलिभ्रष्टा-बङ्गुलितः च्युता, मणिमुद्रिवा-गणिनिर्मिताझ लीपरम् । [सभी घबडाहट के घूम पाती हैं और चन्द्रकला कुछ पदम पलकर उग से लबी साँस खीचकर, पीछे की ओर लौटती हुई, राजा की ओर दृष्टि लगाये, भूमि पर गिर पडती है।] सुनन्दना-[ शीघ्रता के साथ उसे उठाकर ] सखी ! शीघ्र आओ, शीघ्र । [कहकर चली जाती है] राजा-[ सामने देखकर उतावली में ] मित्र ! यह मणिमुदिक्षा पन्द्र मला को उँगली से निकलकर गिर पड़ी है । तुम उसे अपने वस्त्राचस में बाप- पर विपाये रहो। [विदूपर उसी प्रकार करता है] [ इसके पश्चात् पूजन के लिए अपंपार तथा परिपारितामा को शाप लिए महारानी और रतिकला प्रवेशपरती हैं ] १ परिणामति मू० पा. २ परावायैव मू० पा० । ३ वाया मू० पा० । ४ गोपयितु मू. पा.

द्वितीयोऽङ्क देवी-सखि रतिकले। तादृशोऽपि तरक्ष यमगृह प्रापित आर्य- पुत्रण ! (हला रतिमले। तादिसोवि तरक्खु जमघर पाविदो अज्ज- उत्तण।) रतिकला-सखि | निरुपमधनुर्विद्यालपूकृतभीमानुजस्य तव वल्ल- भस्य पुन कीदृश एप तरक्ष । (हला, णिरुवमधनुविज्जलहुकिद- भीमाणुअस्स तुह वल्लहस्स पुणो कोदिसो एसो तरक्खु ! ) देवी-चेटि माधविके । दर्शय मार्गम् आर्यपुत्रस्य समीपगमनाय । (हजे माघबीए । दसेहि मग अज्जउत्तस्स समीवगमणाअ'।) चेटी-भट्टिनि । यथा एप दक्षिणप्रदेशात निरुपमो मकरन्द- परिमल आगच्छति, तथा तर्कयामि इत एव अदूरस्थिते अशोकमण्डप भविष्यति भर्ता । ( भट्टिणि | जया एसो दविकणएदेसादो णिरुवमो मसरन्दपरिमलो आअच्छदि तथा तक्कमि इधज्जेब अदूरट्ठिदे असो ममण्डवे भविस्सदि भट्टा।) यमगृहप्रापितः -~-यमालय नीत मारित इत्यथ । निरुपमधनुविद्यालपूकृतभी मानुजस्य-धनुविद्याया लघूकृत तुच्छीकृत भीमानुन अजुन येन तादृशस्य अतएव अद्वितीयस्य, तद वल्लभस्य-तव कान्तस्य । मकरन्दपरिमल - सहकारसौरमम् । देवी-सखी रतिकला | उस प्रकार का भी भपकर लकडबग्घा महाराज द्वारा मार डाला गया? रतिकसा-सखी अद्वितीय तथा धनुर्विद्या मे अर्जुन को भी मात करने वाले तुम्हारे स्वामी के लिए यह लकडवाया क्या चीज या कुछ नहीं । बेटी-स्वामिनि । जो यह अनुपम मकरन्द की सुगध दक्षिण प्रदेश से मा रही है, मैं सोचती हूँ कि उधर ही पोडी दूर पर अशोक-मण्डप के तल महाराज होंगे। १ समवगमणाम मू० पा० । २ मकरन्दपरिमलो पू० पा०।

चन्द्रकला-नाटिका देवी-तद्दर्शय मार्गम् । ( ता दसेहि मग । ) घेटी-एतु, एतु, भट्टिनि' 1 ( एदु, एदु, भट्टिणी।) [ इति सर्वा परिकामन्ति ] रतिकला-[ अग्रत. पन्थान निरूप्य साशङ्कम् ] सखि । यथा इह अभिनवसुलक्षणाया. कस्या इव पदपद्धतिर्दृश्यते, तथा तर्कयामि त्वा गोपयन भर्ता कस्या अपि कामिन्या आसक्तो वर्तते । (हला! जघा इह अभिणवसुलक्सणाए का एविन पदपद्धती दोसदि तथा तक मि तुम गोवेत्तो भट्टा का एवि कामिणीए आसत्तो बट्टदि।) देवी-[ सरोपमिव ] सखि ! कथ त्वया ईदृशापि खलवचसा अविचारितेन आचक्ष्यते यया जन्मत प्रभृति अक्ष ण्णतादृशानुरागस्य पन्यान-मार्ग, निरूप्य-सम्यादृष्ट्वा, साशसम्-आशखया सन्देहेन सहितम् । अभिनवसुलक्षणाया - सामुद्रिकशुभलक्षणसम्मनाया नवयुपत्या, पदपद्धति - चरणचिह्नम् । तर्पयामि-अनुमिनोमि, कामिन्या - रमण्या (अम शेषत्वविवक्षया सप्तम्यर्थे पाठी) । खलवचसा-दुष्टवचनेन, आचक्ष्यते-वय्यते, अक्षुण्णतादृशानुरागस्य-अक्ष ण्ण अप्रनिहत तादृश अनुराग प्रेम यस्य तादृशस्य, अमनोवृत्तिसम्भावनीय ---मनसापि एव न देवी-तो मार्ग दिखाओ। चेटी-आइए, बाइए स्वामिनी । [ सभी घूम जाती हैं ] रतिकसा-[ आगे मार्ग को देखकर शकापूर्वर ] सखी । इपर तो विसी नवयुवती के पदाचिस पड रहे हैं । वह युवनी बनेर शुभलसमा से युक्त है। मुझे शका है कि महाराज तुमसे छिपावर उसी प्रकार यी विगी सुन्दर युपती में मासक्त हो गये हैं। देवी-[पोप मै ] तुम इस प्रकार ये दुयंचन विना सोच-थियार के १ भर्ता पू० पा० । २ अभिनयागुलगया मू. पा० । ३ इंगोली पा० । आपाते मू० पा०। ।

७७ द्वितीयोऽङ्क बार्यपुनस्यापि ईदशोऽप्यमनोवृत्तिसम्भावनीयो तिक्रमो मम दुर्घट उत्पाद्यते । (हला | कघ तए ईदिसोबि खलवचसा अविआरिदेण बाचक्खीअदि । जाए जन्मदोपहुदि अबलुचिरतादिसाणुराअस्स अज्ज- उत्तस्सविर ईदिसोवि अमणोवित्तमम्भावणिज्जो अदिक्कमो मुहदुग्घड उप्पडिअदि 1) माधविका-पश्यतु, पश्यत् भट्टिनी । इहैवाशोकमण्डो प्रियवयस्येन सम किमपि किमपि मन्त्रयमाणो वर्तते एप भी। (पेक्वदु, पेक्खदु भट्टिणी । ईधज्जेव असोअमण्डवे रिअवस्सेण सम किंपि किंपि मन्तन्तो वट्टदि एसो भट्टा।) [ इत्यङ्गल्या निर्दिशति ] देवी-[ विलोक्य सानन्दम 1 निहनतादृशतरोरेपोर्ष आर्य- पुत्रस्य । ( णिहृदतादिसतरवावुणों एसो अग्गोअज्ज उत्तस्स । ) सम्भावनीय इति यावन्, अतिकम --उल्ल' पनम, दुवंट -कदापि घटित न योग्य । मन्त्रयमाण ...परामर्श कुर्वाण । पया कह रही हो। ऐसी क्यदायर' सभावना, जो तुम उत्पन्न करना चाहती हो, नितान्त सभव है । क्याकि प्रारभ से ही महाराज का मेरे प्रति अत्यन हो ६ मनुराग रहा है और वह उसी प्रकार का बना हुआ है । उनके अदर ऐमी मनोवृत्ति की समावना मेरे हृदय में हो ही नहीं सकती। मापिका-देसिए स्वामिनी । देखिए-वास्तव में यही यशोष-मण्डप के सले महारात मित्र विदूषर के साथ बुध मगा-जी करते हुए उपस्थित हैं। [ कहती हुई बगुनी से सरेत करती है ] देवी-[ देसवर प्रसन्नतापूर्वक ] लाइवया के सहास आने पति के {लिए यह मध्य है। यायपुत्रस्य मू० पा०। २ अनउत्तस्यवि मू० पा० । ३ एष एव "रिमपि' मू. पा० । ४ मिस मू० पा०। ५ लन्तो मू० पा० ।

७८ - राजा- चन्द्रकला-नाटिका [ इति राज्ञोऽर्थमुपनयति ] -एह्य हि । अत्रोपविश तावत् । देवी-[ उपविशति ] -प्रियेऽपराध्योऽस्मि भवत्याः । यतः- भवती विनापि परितः प्रसरदमलरोहिणीरमणकिरणगणरमणीया। सफुल्लमल्लिकापरिमलमिलदलिकुलमधुरझङ्कारमुखरिताशाम् ॥१७॥ केलिवनीमिमामध्यासीन एतावन्तं कालमनयम्। अपराध्य.-अपराद्ध योग्यः अपराधीति यावत् । भवती -त्वा, विनापि-ऋतेऽपि, परितः समन्तात्, प्रसरद- मलरोहिणी रमणकिरणगणरमणीया-प्रसद्भिः विस्तारमाप्नुवद्भिः रोहि- णीरमणस्य चन्द्रस्य किरणगणः रश्मिसमूहः रमणीया शोभनीया, सफुल्लम- ल्लिकापरिमलमिलदलिकुलमधुरझड्कारमुखरिताशा-संफुल्लायाः विक- सितायाः मल्लिकायाः मालत्याः परिमलेन सुगन्धेन मिलता संगच्छताम् अलि. कुलाना भ्रमरसमूहाना मधुरसङ्कारः हृद्यगुजारवः मुखरिता. शब्दिताः आगाः दिश. यस्या तादृशीम् ॥१७॥ इमा-दृश्यमाना, वेलिवनी-क्रीडोद्यानम्, अध्यासीनः--उपविशन्, एता- यन्त, कालम्, अनयम-व्यत्यापमम् अहमिति शेपः । [पहार राजा को अध्यं देती है ] राजा-याओ, आओ। यहाँ बैठो। [देवी बैठती है ] राजा-प्रिये ! मैं तुम्हारा अपराधी हूँ क्योंकि- मैंने तुम्हारे बिना ही ( अपेले ), पारो और चन्द्रमा मी फैलती हुई निर्मम पिरणों से रमणीय, भली भांति फूली हुई मल्लिका के परिमत से सराबोर भौरों के मधुर गुजार से मुसरित होती हुई दिशाओं वाले ॥१७॥ इरानीरा-उपवन में बैठकर इतना समय व्यतीत कर दिया। १ ने मूपा०1 - - द्वितीयोऽङ्क देवी-आर्यपुत्र न खलुं त्वमपराध्य. किन्त्वह, यया तादृशतर- क्षुमुख गच्छन्त वाम् अननुगम्य अन्त पुर प्रविष्टम् । (अज्जउत्त! ण वखु' तुम अबरद्धो किंतु अह जाए तादिसतरक्खुमुह गछन्द तुम अणणुगदुअ अन्तेउर पविट्ट।) विदूषक -निहततादृशतरक्षु प्रियवयस्य श्रुत्वा किमिति न ददाति मे पारितोषिक देवी। (णिहदतादिसतरवस पिअवअस्स सुगिस किन्ति ण देदि मे पारिदोसिअ देवी। ) देवी-गृह,णातु प्रियवयस्य.। ( गेहदु पिअवअस्सो।) [इति कण्ठतो हार विदूपकाय प्रयच्छति ] विदूषक-[ हारमात्मन कण्ठ निवेश्य सहर्षम् ] आश्चर्यम् अनेन हारेण निरुपम सौभाग्यमधिगतो मे कण्ठ । तदिदानीमिमाम- गलीयकेन अलकरवाणि । ( ही ही भो । ईमिणा हारेण णिउपम तादृशतरसुमुखम-तादृशव्याघ्रमुखम, अननुगम्य-अमनुसृत्य अनुगमन न कृत्वेति यावत् । पारितोषिक पुरस्कारम् । निरुपमम -उपमार- हितम् अद्वितीयमिति यावत, अधिगत -प्राप्त । बलकरवाणि-भूपयाणि । देवी-आप नही, मैं अपराधिनी हूँ, आर्यपुत्र ! जो उस लकडबग्घे के मुख मे जाते हुए आपको छोडकर मै अन्त पुर को चली गई। विदूषक-महारानी जी आपने यह सुनकर भी कि मेरे प्रिय मित्र ने उस लकष्यग्घे को मार डाला, मुझे कुछ पुरस्कार नहीं दे रही हैं । देवी-यह लें प्रिय मित्र । [ कठहार विदूपक को देती है ] विदूषक-[ हार को अपने बैठ मे डालकर प्रसनतापूर्वक ] महा, हा, हो हा इस हार से तो मेरे कठ ने अनुपम सुन्दरता को प्राप्त कर लिया। तो - अब इस अगूठो से अगुलि को अलकृत पर्स। [ कहता हुआ, वस्त्राचल से । चन्द्रकला की अगूठी निकाल कर, अपनी अगुली मे पहन लेता है और अभि- १ समू79 1 गृहणत ० पा० ! ३ निरुपम मू० पा० ।

चन्द्रकला-नाटिका GO ? ( को एथ्य वि ससओ ?) सोहागमधिगदो मे कण्ठो । तादाणि ईम अङ्गलि ईमिणा अङ्गलि- अएण अलकरोम्मि । ) [ इति चेलाञ्चलाच्चन्द्रकलामुद्रिकामादाया. त्मनोऽङ्ग ल्या निवेश्य सगर्वमुरो विस्तीर्य अङ्गलि प्रसारयन् देवी परिवारिका प्रति ] दास्या दुहितर प्रेक्षध्व में सुन्दरम, । ( दासीए दुहिदाए । पेक्सध मे सुन्दरम् ।) रतिकला-[ विलोक्य जनान्तिकम् ] सखि । पूर्व खलु त्वय अहमसत्यभापिणी खलेति बहु जल्पिता । पश्य, इदानी कस्या इद मग लीयकम् । (हला | पुब्ब कावु तए अह असच्चभासिणी खलनि बहु जल्पिता । पेक्ख. दाणि काए इद अङ्ग लिअअ । ) देयी-[ विलोक्य साशनम् ] ननु चन्द्रकलाया. । (र चन्दकलाए । ) रतिकला-कोऽनापि सशय देवी- [ दीर्घमुच्छ्वस्य ]' अहो । सर्वथा अविश्वसनीया ए चेलाचलात --वस्त्रप्रान्तात्, निवेश्य-प्रवेश्य, राग-साभिमानम्, उर -यक्ष विस्तीर्य-प्रसार्य, देवोपरिवारिवा-देव्या परिजनान् । असत्यमापिणी-मिध्यावादिनी, सला-दुष्टा, यहु-अधिक यथा स्या तया, जलिता-उक्ता । अविश्वसनीया -विश्वास गर्नु न योग्या । मशिदुर्मिक मानपूर्वक घाती फुलाकर, अगुली पनावर दिखाता हुआ देवी पी परिचा सामओ से ] दासी की लडकियो । मेरी सुन्दरता देखो। रतिकला-[ देसवर, अलग ] ससी । इसके पहले तुमने असत्यमापि और दुष्टा कहकर मुबै डाटा था। देसो, अब यह विमकी अंगूठी है ? देयो- देसपर शया ये साय ] निश्चम ही यह चद्राला पी है। रतिय सा-इसम भी पोई शशा है। देवी-[लयो सांस कर ] पुरुष सदा ही अविश्यसनीय है। सीर । १ उत्स्वस्य मू०पा०।

चन्द्रकला नाटिका . पुरुषा । सखि रतिकले । त्वरितमेह्य हि । क्षणमपि एतस्यातिदु- विलसितस्यान्तिके स्थातु न युज्यते। (अहो । सब्बधा अविस्सस- गोआ ज्जेव पुरुसा । हला रदिसले । तुरिद एहि, एहि । खण वि एदस्स अदिदुब्बिलसिदस्स अन्तिए द्वादु जुज्जदि ।) [ इति सत्वरमुत्थाय गच्छन्ती] राजा [ ससम्भ्रममुत्यायोपसृत्य करे धृत्वा ] अभिज्ञा नव व शशिमुखि विधातु मयि रुप विना च त्वा काचिनहि मदनुरागस्य विषय । तथापि क्षामाङ्गि स्फुरदधरविम्व सपदि मा- मनामन यव त्व व्रजसि कथमित्य कथय मे ॥१८|| अतिविलसितस्य-उच्छृ खलस्य, अन्तिके-समीपे, स्थातु न युज्यते-- अवस्थानमनुचितमित्यथं । उपसृत्य-समोर गत्वा । शशिमुसि हे चन्द्रमुखि , मयि, रुप-योष, विधातु-कतु, त्व, नंव, अभिज्ञा-ज्ञात्री च, त्वा, विना, काचित, मदनुरागस्य-मत्प्रेम्ण , विपय -इन्द्रियायं , नहि ( वर्तते ), तथापि, क्षामाङ्गि हे कृशाङ्गि', त्व, माम्, अनामन्न यव-अपृष्ट्वैव, सपदि-शीघ्र , स्फुरदघरबिम्ब स्फुरन् अधरविम्ब बोष्ठविम्बो यस्मिन् तत् यया स्यात् तथा, कथम्, इत्य, प्रजसि-च्छसि ? मे-मह्य ,कथय-बहि । अत्र शिरवरिणोच्छन्द ॥१८॥ पुष्प सदा ही अविश्वसनीय है । सखी रतिक्ला । शीघ्र आयो, दाग भर भी अब इस उच्छ खल के पास बैठना उचित नहीं है। [ कहकर शीघ्रता से उठकर जाने लगती है।] -[हडवही से उठकर, पास जाकर रानी का हाथ पकडकर ] हे पाद्रमुखी । तुम मुझ पर क्रोष करना तो जानती ही नहीं हो, और तुम्हारे विना मेरे प्रेम का विषय (प्रेमपात्र ) दूसरी कोई (स्त्री) है नहीं। तो भी हे तन्वगी। बिना मुझसे विदा लिये अघरविम्ब को फड. काठी हुई तुम इस प्रकार वन्त क्यों जा रही हो ? मुझे बतायो । १-पत्र त्वरितम् भू. पा. नास्ति । २-गन्ति.मू. सा... -- - ८२३ राजा- द्वितीयोऽङ्क [ इति राज्ञो हस्तमुक्षिप्य सत्वर सपरिवारा निष्कान्ता ] विदूषक - [ राजानमुपसृत्य ] भो वयस्य । किमिति देवी तवापि कर विक्षिप्य' इत्य शीघ्रगत्या चलिता ? ( भो वअस्स किन्ति देवी तुह वि कर विक्खिविअ इत्य सिग्घगदीए चलिदा? ) -त्वकृतेनैव । विदूषक - [सरोपम्] किम्मया कृतम् ? (किम्मए क्दि ) राजा-यत परमकरणीय नास्ति। विदूषक -अहो । किं तत् (अब्बो । कि त ?) राजा-इदमेव चन्द्रकलाङ्ग लीयकदर्शनम् । विदूषक -[ दन्तै जिह्वामापीड्य ] अपि तावत, कथ ता दासी. दुहितर प्रेक्ष्य इत्यमुपगतो मा चित्तसमोह ! तदिदानीम, एतु एतु- उदिाप्य-दूरे कृत्वा, सत्वर-शीघ्र । विक्षिप्य-पृपयत्य, पलिता- प्रस्थिता। अकरणीयम् -अकर्तव्यन । आपीडय--पीडयित्या । प्रेक्ष्य-- अवलोक्य । चितसमोह -चित्तविह्वलता, उपगत -प्राप्त । [ देवी राजा के हापो को दूर हटाकर शीघ्रता से परिपारिताओं सहित चली जाती है ] विदूषक-[राजा वे पार पहुँचकर ] है मित्र! क्यों देयी तुम्हारे हाथ को भी हटारर, इस प्रकार शीघतापूर्वक चली गई। राजा-येवल तुम्हारे कृत्या रे पारण विदूपक-[ क्रोप ये साय ] मैंन क्या दिया। राजा-जिरासे बहार अनुचित नाम नही होता ( वही तुमो पिय । 7 विपक-ओह ! यह पया? राना-पही पन्द्रमा की अनूठी ना दिखा देना। पिर-[ दांतों से जीम दवार ] रोद है, उन दासी-त्रियों को पर पता नहीं क्यों मेरा पित्त हो पागम-सा हो गया ! मरतु, नियमित्र I माम पिमिमिप्य म.पा०।२ मातु-मूपा. ।

चन्द्रकला-नाटिका
एत प्रियवयस्य । यथा देवी प्रसाद गच्छति', यथा च तव चन्द्र
पुन समागमो भवति तथाऽहमेव सम्पादयिष्यामि अधिदाः
ताओ दासीदुहिदाओ इत्यमुबगदो म चित्तसमोहो | तादाणि
एदु पिअवअस्सो । जधा देवी प्पसाद गच्छदी, जधा अ तह
अलाए पुणोबि समाजमो होदि, तधा अहज्जेव सपादइस्स । )
राजा-तत्किमधुना विधेयम् ?
विद्वपक –भो वयस्य । तदिदानी पुरत देवीमेव प्रसादय
( भो बअस्स | तादाणि पुरदो देवी ज्चेव पसादेम्ब ।)
[ निष्क्रान्ता सर्वे]
इति द्वितीयोऽङ्क
समागम सम्मेलन, सम्पादयिष्यामि-निष्पन्न करिष्यामि । विधेय-क
पुरत-प्रथम, प्रसादयाव-प्रसना परिष्याव ।
मैं ही अब प्रसन्न करूंगा कि देवी प्रसन्न हो जाये और चन्द्र कला से
तु
समागम भी हो।
राजा-अब क्या करना चाहिए
विदूषक-मित्र | सब से पहले देवी को प्रसन्न किया जाय ।
[ सभी चले जाते हैं ]
दूसरा अक समाप्त
१ प्रसाद गच्छन्ति मू० पा । २ अय मू. पा० नास्ति ।
7

अस्या अपराध तृतीयोऽङ्कः [तत प्रविशति विदूषक ] विदूषक -ही-ही भो । अद्य खलु मया तथा वञ्चकत्वेन तथा कृतापराधेऽपि प्रियवयस्ये प्रसाद गमिता प्रकृतिसुकुमारहृदया देवी । तया एव इदानी चन्द्रकला अविदितदोषाया सुनन्दताया गृहे गोपि- तेति कथित मे सुनन्दनया'। [विचिन्त्य ] तदिदानी विरहावस्था- व्याकुलीकृतस्य प्रियवयस्यस्य एतया सङ्गमे महाग्लेशो लघकृतो देव्या । अपि च मन्त्रित च मया सह सुनन्दनया अद्य निशाया चन्द्र- कला प्रच्छन्नरूपा के लिवनमध्ये प्रवेश्य प्रियवयस्येन समम सङ्गमो विधीयते । वञ्चकत्वेन–प्रतारकरवेन कृतापराधेऽपि-कृत येन तादृशेऽपि, प्रसाद-प्रसन्नता, गमिता-प्रापिता, प्रकृतिसुकुमारहृदया-प्रकृत्या स्वभावेन सुकुमार कोमल हृदय यस्या तादृशी । अविदितदोपाया -अविदित अज्ञात दोष अपराधो यस्या तादृश्या , गोपिता-रक्षिता । विरहावस्थाया- कुलीकृतस्य-वियोगावस्यया दुखाकृतस्य, महाक्लेश -महत्कष्ट लघूकृत अल्पीकृत । मन्त्रितम -परामश कृत निशाया रात्री प्रच्छन्नरूपा-गोपि- ताकृति, केलिवनमध्ये बीडोपवने इति यावत, प्रियवयस्येन-प्रियमिग्रेश, सम- साव, सङ्गम-समागम विधीयते-क्रियते । [ इसके बाद विदूषक प्रवेश करता है ] विर पक-अहाहा । आज मेरी चतुरता से, वसा अपराय करने पर भी मेरे मित्र से स्वभावत कोमल हृदय वाली महरानी प्रसन्न हो गई । मुझे सुन दना से मालूम हुआ है कि चन्द्रकला उसी के घर में छिपायी गई है और उसका यह अपराध महारानी नहीं जाती है। [ सोचकर ऐसी स्थिति में तो अब उस घद्रकला के वियोग से व्याकुल मेरे मित्र की आधुलता को स्वय महारानी ने ही अल्प कर दिया । तया मुन दता के साथ मैंने मन्त्रणा भी की है कि आज १ मयं पू० पा० नास्ति । २ देण्या मू० पा०1 ३ केवल 'मध्ये' मू० पा० १४ एपा सङ्गमपितम्या इति मू. पा.!

चन्द्रकला नाटिका ५ तद्यदीदानीम, एन वृत्तान्तं - देवी न जानाति' तत्सफलो भविष्यति मे सकल. प्रयासः। [विचिन्त्य ] अपि तावत, एन वृत्तान्त रक्षता मया कियन्त काल जिह्वायन्त्रणा अनुभूयते । [पुरोऽ वलोक्य ] का एषा ? देवी परिवारिका माधविकेव दृश्यते । (ही-ही भो. । अज्ज क्खु मए तथा वंचअत्तेण तथा किदापरावि पिनवअस्से पसाद गमिदा पउदिसुउमारहिआ देवी । ताएव दाणि चन्दअला अबिदिददोसाए सुणन्दणाए घरे गोबिदत्ति कधिद मे सुणन्दणाए। [ विचिन्त्य ] तादागि बिरहाबस्थाबाउलीकिदस्स पिअवमस्सस्स एदाए सङ्गमे महकिलेसो लहूकिदो देवीए । अविस मन्तिद अ मए सह सुणन्दणाएअजु णिसाए चन्दअला पछन्नरूवा केलि- विण अन्तरे पबिसिअ पिअवअस्सेण सम एसा सङ्गमा विदद्धन्ति । ताजदादाणि एद सुबुत्तन्त देवी ण जाणादि ता सभलो भबिस्सदि में सअलो पासो। [विचिन्त्य ] अबिदाव एद बुत्तन्त रक्सन्तेण मए केन्तिक काल जीहाजत्तणा अणुभवीअदि। [ पुरोऽवलोक्य ] का एसा ? देवी परिवारिआ माविआविअ दीसदि।) वृत्तान्न-समाचार, सकल -सम्पूर्ण , प्रयास -प्रयत्न ।जिह्वायत्रणा-अ. कयनप्रयुक्त जिह्वाकप्टम् । राभि के समय चन्द्रकला को गोपनीय ढग से केलिवन मे उपस्थित करके निपव- यस्य का सगम उसके साथ परा दिया जाय । यदि यह समस्त वृत्तान्त महा- रानी न जान पाएं तभी मेरा प्रयास सफल हो सकेगा। [ सोचकर ] मैं स्वय इस वृत्तान्त को गुप्त रखने के लिए कितने समय से अपनी जवान पर नियन्त्रण रखकर कष्ट का अनुभव कर रहा हूं। [ सामने देखकर ] यह कौन है ? महारानी की परिचारिका माविका प्रतीत हो रही है। १ जाति मू० पा०।२ सेग्ल मू० पा० । ३ सणदणाए मू०पा० । अय पू० पा० नास्ति। ५ अण्भवीप्रदु मू० पा० । 7

द६
तृतीयोऽङ्कः
[ततः प्रविशति माविका ]
[विदूषकः विलोक्य करेण मुखमाच्छादयति']
माविका-[विलोक्य ] मातः ! कुतः एष वृद्धब्राह्मणो मां प्रेक्ष्य
पुनः पुनर्वदनम् आच्छादयति ? तत् पृच्छामि। [ इत्युपसृत्य ]
आर्य ! वन्दे । ( अम्मो, कुदो एसो बुद्धवम्भणो में पेविखअ पुणो पुणों
वदणं ढिक्कदि? ता पुछामि । [ इत्युपसृत्य ] अज्ज ! बन्दामि ।)
[विदूपकः पुनः करोति ]
माधविका-आर्य ! किमेवं वदनम् आच्छाद्यते ? (-अज्ज !
किमेवं बअण ढिक्किादि ? )
[ विदूषकः पुनस्तथा करोति ]
माषयिका-[ अञ्जलिं वद्ध वा ] प्रमीदतु मे आयः । न गोपयतु
करेण-हस्तेन, भाच्छादयति-आवृणोति । प्रेक्ष्य-दृट्वा, वदनम्-
मुखम् । रहस्य-गुप्तभेदं, न गोपयतु-न अन्तहित करोतु । गर्मदास्या-
[ तब माविका प्रवेश करती है ]
[विदूषक उसे देखकर अपने हाथो से मुंह ढक लेता है ]
मापत्रिका -[ देखकर ] अमा ! यह वृद्ध ब्राह्मण मुझे देखकर अपना
मुँह क्यो बार बार ढक रहा है ? अच्छा, मैं पूछती हूँ। [ समीप पहुंचकर ]
भाय ! प्रणाम।
[ विदूषक पुनः अपना मुंह ढकता है ]
माविका प्राय ! इस प्रकार मुंह क्यो ढक रहे हैं ?
[विद्रूपफ पुन उसी प्रकार क्ता है ]
माधिका-[ हाय जोडकर ] यायं मुझ पर प्रसन्न हो । रहस्य न
पिराएँ।
१ माछायनि मू० पा० । २ ढोक्ने मू० पा० । ३ ० पा०।४ ढोरुते
० पा० 1 ५ मन म पा० । ६ वर्ण मू० पा०। ७ विक्षिअदि मू. पा..

चन्द्रकला नाटिका अज्ज रहस्यम् । ( पसीददु मे' अज्जो। ण गोवयद् रहस्सम् ।) विदूषक -भवतु, तत, कोऽपि न जानातु । एवमिव । ( भोदु, ता कोवि ण जाणादु । एव विअ ।) [इति कर्ण कथयति ] माषविका-[ स्वगतम ] अहो, साहसो वृद्धव्राह्मणस्य तया पुनर्गभंदास्या सुनन्दनया कथमेव दुष्करमाचक्ष्यते । तद्देवी निवेद्य प्रसाद लप्स्ये । [प्रकाशम ] आर्य! गच्छामि । स्वामिनी- नियोगम् । अनुचरितम् । (अहो,साहासो बुद्धवम्भणस्स । ताए पुणगभदासीए सुणन्दणाए कघ एव दुक्कर आचक्विअदि । ता देवीस णिबेदिअ पसाद लभिस्स । । गच्छामि सामिणीणिओम अणुचिदिदम् ।) विदूषक -अहमपि इदानी गच्छामि समीहित सम्पादयितुम् । ( अहपि दाणि गछामि समीहिद सम्पादिदुम ।) जन्म: दास्या, दुष्कर-कठिनकृत्यम, बाचक्ष्यते-पच्यते । निवेद्य-विज्ञाप्य, प्रसादम,-अनुग्रह, लप्स्ये--प्राप्स्यामि । स्वामिनोनियोगन -महाराश्या' आदेशम, अनुचरितुम्- पालयितुम । समीहितम-अभिलषित, सम्पादयित- सम्पन्न कर्तुम । विदूपक-अच्छा, बन्य कोई न जाने । [पान म कहता है-ऐसा,ऐसा ] माधविका-[ अपने मन में ] ओह । इस वृद्ध ब्राह्मण का ऐसा साहस । और फिर जन्म की दासी उस सुनन्दना न वैसे यह कठिन वा किया तो यह सब महादेवी को बताकर उनकी कृपा प्राप्त कहें ' [ प्रस्ट रूपम ] आ। में जाती हूँ। महारानी द्वारा निर्दिष्ट कार्य को पूर्ण करूं। १ से मू० पा० । २ समिष्यामि म्० पा० । ३ गच्छामि मू० पा०।४ स्वामिना नियाग मू• पा०। । ន . तृतीयोऽव [ इति निष्क्रान्तौ ] प्रवेशक [ तत प्रविशति मदनावस्था नाटयन, राजा ] राजा-[ सनिर्वेद दीर्घ नि श्वस्य ] आयान्तीमधिगत्य मपरिसर देवी परित्यज्य मा निर्गच्छन्त्यपि सभ्रमेण सुदती किञ्चित परावृत्य सा । दृष्टि यच्छति याप्युदश्रुकलुपामुत्याय ताव-मया तस्यास्तन्मुख मुन्नमय्य' सहसा वि नाम नो चुम्बितम् ॥१॥ मत्परिसर-मत्समीप, आयान्तीम्-आगच्छन्तीम, देवी-राशीम, अधिगत्य-प्राय) मा, परित्यज्य-त्यक्त वा, निर्गच्छन्ती अपि-नि सरन्ती अपि, सुदती–शोभनदन्ता, सा-चन्द्रकला, सभ्रमेण-सत्वर, किञ्चित- ईपत, परावृत्य मदभिमुखी भूत्वा, उदश्रुकलुपा-नेत्रजलाविला, दृष्टिम- ईक्षण, यच्छति-ददाति, तावत, मया, सहसा-झटिति, तस्या-चन्द्र कलाया, तन्मुखम्, उनमय्य-उत्याप्य, कि, नाम, नो-नहि, चुम्वितम - अचुम्बि ? अत्र शार्दूलविक्रीडित छन्द ॥१॥ [ दोनो चले जाते हैं ] प्रवेशक समाप्त [ काम-पीडित अवस्था म राजा का प्रवेश ] राजा-[ वेदनापूर्ण लवी सांस लेकर ] जब वह (चद्रकला ) यह जानकर कि महारानी मेरी ओर आ रही हैं, शीघ्रतापूर्वक जाने लगी और सुदर दतपक्तियो वाले अपने मुस यो पुमार हहयही म उसने मुझ पर दृष्टि-पात दिया, उस समय उसका यह मुख मधुओ यापिठ हो उठा था ! उसी समय उसये मुख से उठाकर मैंने चुम्यन पर्यो महीपर लिया? ॥शा १उनमप्य मू० पा०॥

चन्द्रकला-नाटिका ८६ [ स्मरणमभिनीय ] - श्रयति मयि समीप स्मेरवक्त्रारविन्द स्फुरदधरपुटान्त दर्शितभ्रू विभेदम् । अलसवलिततारं किञ्चिदाकुञ्चिताक्ष कवलयति मनो मे पक्ष्मलाक्ष्याः कटाक्षः ।।२।। तत्पुनरवलोकयामि समदनवेदनान्धकारशमनी' 'प्रियतमामिमां चन्द्रकलाम । [ विचिन्त्य ] मयि समीप-निकद, श्रति सेवमाने ( सति ) स्मेरवक्वार- विन्द-मन्दहास्ययुक्त मुखकमल यस्मिन्, तत् ( यया स्यात, तया), स्फुरदधरपुटान्त--स्फुरन् कम्पमानः अधरपुटान्त ओप्ठप्रान्तो यस्मिन, वत, दर्शित विभेदम-दशित. प्रकटित. भ्रू विभेदः भूभङ्गो यस्मिन. तत, अलसवलिततारम् मलसः भालस्ययुक्त. बलितः वलियुक्तश्च तारः अक्षणः कनोनिका यस्मिन, तत, किञ्चिदाकुञ्चिताक्ष-किञ्चत, ईपत, आकुञ्चितं कुटिलम, अक्षि नेत्र यस्मिन, तत, पक्ष्मलाक्ष्या. पक्षमल सुन्दरपक्ष्मयुक्तम, अक्षि यस्या. तयाभूतायाः सुनयनाया इत्यर्थः, कटाक्ष.- अपाङ्गदर्शन, मे, मन.-चित्त,कवलयति-ग्रासीकरोति । अत्र मालिनी छदः॥२॥ समदनवेदनान्धकारशमनोम-मदनेन कन्दर्पण सहिता या वेदना पीडा सैव अन्धकारः तम तस्य शमनी शमयित्रीम । [स्मरण-सा करता हुआ ] वडी-वही नाही वाली आंखो के वटाक्ष से वह मेरे हृदय को हर लेती है; मन्दहास से पूर्ण अपने कमलानन को मेरी बोर किये हुई है, उसके ओप्ठ हिल रहे हैं। भौहें सिकुडी हुई और आंखें कुछ मद मुंदी-सी तया चम- शीली है 1 11२॥ तो मैं पुन. मदन-जनित वेदना रूपी अन्धकार को दूर करने वाली अपनी प्रियतमा चन्द्रकला को देख रहा हूँ। [ सोचबर] १ गमनं मू०पा..

६० १ तृतीयोऽङ्क तदिश्व तावत -विकसितकुसुमभरशीतलामोदमेदस्विनि निर- तरनवपल्लवप्रताननिवारिततरणिकिरणप्रवेशे रमालतरुतले नीलम- णिशिलामध्यासीनो निर्वापयामि प्रेयसीविरहमन्तप्तमात्मानम । [ इति परिकम्योपविश्य ] अये कथमसौ सहकार समन्तत सफुल्लकुसुमपराग प्रेयसीविरहविघर मामत्यन्त मुद्धजयति [ विचिन्त्य ] एष खलु मयैव चिरपालितो न लद्धयिष्यति मे वचनम् । तदेनमेव सदैन्य निवेदयामि । विकसितकुसुमभरशीतलामोदमेदस्विनि-मञ्जरीसमूहाना शीतलसौरभेण स्थूले, निर तरनवपल्लवप्रताननिवारिततरणिकिरणनवेशे-निरन्तर सततं नवपल्लवाना नवकिसलयाना प्रतानेन विस्तारेण निवारित अवरुद्ध तरणिकिर. णप्रवेश सूर्यकिरणप्रवेश यत्र तादशे, रसालतरुतले अग्रवृक्षस्य अप, नील- मणिशिलामध्यासीन नीलमणे शिलाखण्डोपरि उपविशन , प्रेयसीविरह सतप्तम,-प्रियतमावियोगेन दग्धम, आत्मान, निर्वापयामि-शमयामि । सहकार -आम्र , समन्तत - सर्वत , सफुल्लकुसुमपराग-विकसितपुप्पर. जोभि , प्रेयसीविरहविधुर-प्रेयस्या प्रियतमाया विरहेण वियोगेन विपुर व्याकुल माम् अत्य तम-अत्यधिकम , उजयति-व्याधुलीररोति । एप- आग्र, चिरपारित -बहो वालात सरक्षित , मे वचन न सवपिप्यति-मम थानाभङ्गन वरिष्यति।सदै य-दीनतासहित यथास्यात तया, निवेदयामि प्राय तो मैं अब इसी आम्रवृक्ष के तले जहाँ निरतर नये पल्लयों के विस्तार पे मारण सूर्य की किरणें नहीं पहुचती और जो खिल हुए पुष्पा की शीतल सुगध स परिपुष्ट है, नीलम को शिला पर बैठकर प्रियतमा रे वियोग से रातप्त अपने को शाति प्रदान करे। [ एसा बहता हुआ येठवर ] माह ! यह रसात क्या मुझ प्रिया विरह स पीहित को, पारा ओर फूले हुए पुष्पा य पराग स अत्यात व्यानुस कर रहा है ? [ सोचार ] यह तो मरा ही पिर पाल से पाना-पासा हुआ वृक्ष है । इस कारण भरिया ही मरे पचना पो ही टागा। अतएव इसी से यिनप्रतिवदन भरा। १ पुमपरागं मू० पा।

चन्द्रकला-नाटिका 7 - न-अस्माका [ साञ्जलिबद्धम् ] ह हो चतमहीरह त्वमिह न स्नेहेन वृद्धि गत. स्तत्कि मामभिवर्षसि प्रति मुहु लिच्छला-मुर्मुरैः । [विभाव्य ] कथमित्य प्रार्य मानोऽपि आचरसि मयि तथैव परिपन्थित्वम् [ स्मरणमभिनीय ] आ ज्ञात कुसुमान्यमूनि विशिखान्निर्माय पञ्चायुध पञ्चत्व जगती नयत्यविरत तेनावलेपस्तव ॥३॥ ह हो चूतमहीरह-हे मानवृक्ष ' त्वम, इह- मत्र, स्नेहेन–प्रेम्णा, वृद्धि गत –वर्षित , तत -तस्मात, किं-कथम्, माम, प्रति, मुहु -वार-बार, धूलिच्छलात-परागव्याजात , मुर्मुर -तुपाग्निभिः अभिवर्पसि-वृष्टि करोपि? विभाव्य-विचार्य, प्राय॑मानोऽपि-निवेद्य- मानोऽपि, परिपन्यत्व-शत्रुताम , आ ज्ञातम-अहह अवगतम, पञ्चायुध. काम , अमूनि, कुसुमानि-पुष्पाणि, विशिखान,-बाणान निर्माय- रचयित्वा, अविरत-नित्य, जगती -ससार, पञ्चत्व नयति-विनाशयति, तेन, तव अवलेप -गर्व (जात ) । यत्र शार्दूलविक्रीति छाद ।।३।। [ हाथ जोडकर ] हे मानवृक्ष | तुम तो हमारे ही स्नेह से पले-पोसे और वढे हुए हो, तो फिर क्यो यह वार-बार मेरे ही पर पुष्प धूलि के बहाने तुपाग्नि बरसा . रहे हो? रहे हो। [ सोचकर ] न्यो निवेदन करने पर भी तुम वैसा ही शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते मा [ स्मरण सा करता हुआ ] अच्छा, समझ गया । तुम्हारे इन फूलो को कामदैव अपना (पञ्च ) बाण बनाकर ससार का नित्य विनाश करता है, इसो से तुम्हें गर्व हो गया है ॥३॥ १ मुहद्धूलिछलान्ममरे मू० पा० ।

- :- . ६२ तृतीयोऽङ्कः तदलमिदानीमचेतने भवत्यत्यन्तं कृपणताप्रकाशनेन । पञ्चा. युधमेव तावत्प्रार्थये यत्प्रसादात्तवायमीदृशो गर्वः। [आकाश- लक्ष्यमजलि बद्ध वा ] कि कन्दर्प मुखं विधाय मधुपैः पक्ष नवैः पल्लवै- रेभिश्चतशरैः करोपि जगती जेतुं प्रयास मुधा निद्रातुं शयित प्रयातुमथवा स्थातु क्षमः को भवे- देकोऽसौ कलकण्ठकण्ठकुहरे जागति चेत्पञ्चमः ॥४॥ अचेतने-जडे, भवति-त्वयि, कृपणताप्रकाशनेन-कार्पण्यप्रकटनेन, अलं-व्यर्थम् । पञ्चायुधं-कामम, प्रार्थये-विनिवेदयामि, यत्प्रसादात यस्य कृपातः, गर्व.-अभिमानः । आकाशलक्ष्यम,-आकाशं प्रति दृष्टिं फुत्वेत्यर्थः । कन्दर्प-हे कामदेव !, मधुपैः-भ्रमरैः, मुखम् --आननं, नवैः नूतनः, पल्लवैः-किसलयः, पक्ष-गरुतं, विधाय-कृत्वा, एभिः, चूतशरैः- बामबाणः, जगती-जगत , जेतु-वशीकर्तु, प्रयास-प्रयत्न, मुधा-व्यर्थ करोषि-विदधासि, ( यतो हि ) चेत्-यदि, कलकण्ठकण्ठकुहरे-कोकिल- कण्ठविवरे, एक:-एकाकी, असौ-- -अय, पञ्चमः-पञ्चमस्वरः, जागर्ति, गुञ्जितो भवति, ( तर्हि ) क, निद्रात-निद्रावस्थामा स्यातु, शयित - स्वपितु शयनोपक्रम कमिति यावत, प्रयातु-प्रस्यातुम, अथवा-आहो- स्वित, स्थातु, क्षमः-समर्थः, भवेत ? अब शार्दूलविक्रीडित छन्दः ॥४॥ इसलिए तुम जड के सामने अपनी पीडा का निवेदन करना व्यर्थ है । सच मे तो मुझे उसी पञ्चायुध से प्रार्थना करनी चाहिए, जिसकी कृपा से तुमको ऐसा गर्व हुआ है । [ आकाश को लक्ष्य करके हाथ जोड़कर ] हे कामदेव ! तुम भौरो का मुंह और नव पल्लवो का पंख बनाकर आम्र- मजरी रूपी बाणो द्वारा ससार को जीतने का व्यर्थ प्रयास कर रहे हो सोचो तो यदि इस कोयल के कण्ठ मे पचम स्वर गूंजा तो इस संसार मे भला कोन ऊंपने, सोने, चलने अथवा रुकने में समर्थ हो सकेगा? ॥४॥ १ अत्र 'T' मू० पा० अयुक्तः । २ वध्वा मू० पा० । ३ जगति मू० पा० । ? ४ जागत्ति मू० पा० ।

चन्द्रकलान्नाटिका [विचिन्त्य ] अये, कय त्वमपि नामैव प्राय॑मानोपि निशितशर- निपातेन कृतसि मे हृदयम् । शृणु तावत- शरस्ते दुर्वार स्मरपुरहरस्यान्तभिदुर फल कि नामासावधिकमधिगन्तु तुदति माम । [विचिन्त्य ] अल वा दैन्येन त्वयि यदखिलस्यापि जगतो मनो मथ्नासीति प्रथितिरिह ते मन्मथ इति ॥५॥ [विचिन्त्य ] कथ मयापि दुरवसनार्थप्रार्थनेनात्मा सन्ताप- निशितशरनिपातन-तीक्षणवाणप्रहारेण, कृन्तसि-छिनत्सि? स्मर-है क दर्प ', पुरहरस्य-त्रिपुरारे शिवस्य, अतभिदुर -हृदये वय इव, ते-तब, शर -बाण , दुर्वार –दु सेन वारयितु योग्य -( तहिं ) असो-शर कि नाम, अधिक, फलम , अधिगन्त-प्राप्तुम , माम, तुदति- व्यथयति वा-अथवा, त्वयि, दैन्यन-कातर्येण, बल-व्यर्थम , यत - यस्मात अखिलस्यापि सम्पूर्णस्यापि, जगत –ससारस्य, मन -चित्त, मना- सि-विलोडसि, इति ( हेतो ), इह-लोके, ते, मन्मय , इति प्रथिति प्रसिद्धि (वतंते )। अत्र शिखरिणीच्छद || दरवमनार्थप्रार्थनेन-दुर्लभवस्तुयाचनेन, सन्तापनीय -खेदनीय । सन्त - [ सोचकर ] ओह । क्यों कामदेव । तुम भी मेरी प्रार्थना सुनकर भी (पने तेज वाणा से मेरे हृदय को बेघ रहे हो ? अच्छा तो सुनो--- हे कामदेव । शकर के भी हृदय को वष के समान लगने वाले तुम्हारे । बाण दुनियार हैं , फिर मेरे हृदप को इस प्रकार वैषकर कौन-सा बहा म उठाना चाहते हो [ सोचकर ] अपवा तुमसे दीनता का निवेदन करना व्यर्थ है, क्योकि ससार के मन को मथने से धारण तुम ममय नाम से प्रसिद्ध हो चुके हो ॥१॥ [ सोचकर ] में क्यों व्यर्थ, दुर्लम वस्तु के लिए प्रार्थना कर कर आत्मा से कष्ट पहुँचाऊँ .

तथाह्य व . तृतीयोऽङ्क नीय ! तथाहि । सन्तोऽस्यन्तु' पराड मुवा । [ सो कण्ठम ] सुमुखि ! मा कि नाम नो भाषसे? [पुनर्विचिन्त्य ] आ , कय नाम लोकेषु विवेकितया प्रथितिमासादयता पि मया निष्फलप्नयामोऽ यमनुभूयते। [ विचिन्त्य ] तथाहि । मूढाना वितथप्रयासपरता । [ सदन्यम ] मा मुञ्च वामाक्षि । माम [ पुनर्विचिन्त्य ] अलन कारणमनारत देवीप्रकोप भोतिकातरस्य ममैवमारम्भ सति देवी कुप्यति। [ सोद गम ] कि प्रपृच्छसि परिरम्भ न रम्भोरु मे। [ पुनर्विचिन्य। सधैर्यावष्टम्भम ] चेत | प्रार्थयसे सज्जना , पराड मुखा -विमुखा , अस्यन्तु-क्षिपन्तु । सो कण्ठम - उत्कण्ठया औरसुक्येन सहितम् । सुमुखि-सुन्दरि ।, भापसे-वदसि । लोकेषु--जनेषु, विवेकितया--विवेकशीलतया, प्रथिति-प्रसिद्धिम, आसादयना-प्राप्नुवता। मूढाना-मूर्खागाम, वितयप्रयासपरता-व्यथप्रयासपरायणत्वम, । वामाक्षि- सुनयने ', मा मुञ्च-न त्यज । अनारत-सतत देवीप्रकोपभोतिकातरस्य- देव्या प्रकोपात् क्रोधात, भौति भय तेन कातर भीरु तस्य । परिरम्भम - आलिङ्गनम , रम्भोरु-रम्भा कदलीस्तम्भ इव ऊरू यस्या तादशि । सधर्यावष्टम्भम.-धेयधारणपूर्वकम । क्योकि सज्जन लोग विमुख होते जा रहे हैं । [ उत्सुकता के साथ ] सुन्दर मुख वाली । तुम मुझसे भाषण क्यो नही करती हो ? [ पुन सोचकर ] ओह ! तीनो लोको मे विवेकी रूप से प्रसिद्ध मुझे भी अपने प्रयास मे निष्फलता का क्यो अनुभव हो रहा है ? [ सोचकर क्योकि व्यर्थ प्रयास करना तो मूखों का धर्म है । [ दीनता के साथ ] | सुनयने ! मुझे त्यागो मत । [ फिर सोचकर ] निष्कारण सतत देवी ने प्रकोप के डर से भीरु बने हुए मेरा इस प्रकार का प्रयत्न करना व्यर्थ है भयोकि ऐसा होने से देवी ऋद्ध होगी। [ आकुलतापूर्वक ] हे बदली। स्तम्भ के समान जपो वाली । क्या तुम मेरा आलिंगन नहीं चाहती हो। [फिर सोचकर, धर्य के साथ ] हृदय ! क्या किसी अन्य गुमम वस्तु के सिर १ सन्तोस्यतु मू. पा० । २ विवेकतया मू० पा० । पृच्छसि मू. पा.

चन्द्रकला-नाटिका
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किमन्यसुलभम् । [सौत्सुक्यो गम् । सवाष्पगद्गदम्] हा क्वासि
मे प्रेयसि।
किंवामाक्षि कटाक्षमाचरयसि प्रेम्णा मयि प्रेयसि
[विभाव्य सविषादम् ]
स्मेरे दीवरगर्भत कुत इय निर्याति भृगावलि ।
[ कोकिलध्वनिमनुधय सवितर्कम् ]
सौत्सुक्योद्धगम, उत्कण्ठाव्याकुलतासहितम, सवाष्पगद्गदम्-अधुणा
अवरुद्धकण्टेन । प्रेयसि-प्रियतमे |, क्यासि-कुत्रासि ?
वामाक्षि-सुनयने । प्रेयसि प्रियतमे । कि, मयि, प्रेम्णा, कटाक्षमा
आचरयसि-फरोपि', विभाव्य-विचार्य, सविषाद-सखेद, स्मेरेन्दी-
वरगभंत -विकसितनीलकमलान्तर्भागात , इय, भृङ्गावलि -भ्रमरपदि क्त ,
कुत -कस्मात, निर्याति-निर्गच्छति', कोकिलयनि-कोकिलालापम्,
अनुभूय, सवितर्क-वितर्केण ऊहापोहेन सहितम,
प्रार्थना कर रहे हो? [ उत्सुकता एव उद्धग के साथ आंसू से अवरुद्ध कठ
से] हा प्रियतमै 1 तुम कहाँ हो?
हे सुन्दर नयनों वाली | क्या तुम प्रेम पूर्वक नेत्रो से मेरी ओर कटाक्ष
करती हो' [ सोचकर, दुख से ] नीलकमल के कोप से यह भौरो का
समूह किधर से आ रहा है ? [ कोकिल ध्वनि का अनुभव करके सदेह के
साथ ]
'ऊपर के गद्यो से कुछ पक्तियो को छांट लेने पर यहां एक श्लोक
बन जाता है
[सन्तोऽस्यन्तु पराङ मुसा सुमुखि मा किं नाम नो भाषसे
मूदानां वितपप्रयासपरता मा मुन्ध वामाक्षि माग ।
देवी कुप्पति किं प्रपृच्छसि परीरम्म न रम्भोरु मे
घेत. प्रायसे किमन्यसुलभ हा स्वासि मे प्रेयसि ।।
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१६ . तृतीयोऽडू. किं किं व्यवस्यति कुतोऽस्ति च कीदृशी सा [नि श्वस्य ] हा निर्दय, जानामी युक्तवानपि अकथितप्रिया- वृत्तान्त कथ व्रजसि परिहाय मामशरणम् । [ सरोषम ] अये,कथ नाम केतककण्टकावलिग्रथितविग्रही न मरणमविगच्छ यय पाप [ कोकिलध्वनिमनुभूय निपुण विभाव्य ] अये, सत्यमिदानीम् । कुहूमाकारयत्येष कुहूकण्ठो मुहहु । तत्कथ परिदृश्येत प्रिया चन्द्रकला मम ॥१॥ मे मह्य क्थय-व्र हि, ( मम प्रियतमा) किं किं व्यवस्यति--चेष्टते करातीत्यर्थ , कुत -कुत्र, च, अस्ति, कीदृशी, च, सा ( इति ) । अत्र वस ततिलकच्छ द 10 निर्दय-निष्ठुर, अकथितत्रियावृत्तात -न कथित नोक्त प्रियाया चन्द्र- कलाया वृत्तान्त उदन्त येन तादृश , परिहाय-त्यक्त वा, अशरणम -नि.. सहायम । केतककण्टकावलिन यितविग्रह.-केतककण्टकावलिभि केतकीरण्टम- स है अथित विग्रह शरीर यस्य तादृश., अधिगच्छति-प्राप्नोति । एष , कुहूकण्ठ -कोक्लि , मुंहमुहु -वारवार, कुहूम-कुर इति मधरास्फु-शब्दम, , आकारयति-उच्चारयति, तत-तस्मात, चन्द्रकला, कथ-वेन प्रकारेण, परिदृश्येत-अवलोक्येत ॥१०॥ हो तो शोघ्र बताओ कि वह क्या करना चाहती है, और वंसी दशा मे हैं 10 [ आह भरकर ] हा निया 'मैं जानता हूँ' ऐसा कहकर मो विना प्रिया का वृत्तान्त बताये ही मुझ असहाय को छोडकर कैसे जा रहे हो? [ क्रोध के साथ ] अरे केतकी के कॉटो से विदशरीर होकर यह पापी मर श्यो नहीं जाता । [ कोयल को ध्वनि का अनुभव करपे मलो भॉति सोचकर ] भरे! सचमुच इस समय- यह कोकिल बार-बार 'कुहू कह कर रहा है । इसलिए मेरी प्रिया पन्द्र कला से दिखाई देगी? ॥१०॥ १ कनोस्थि मू० पा० । २ कोशीयम मू० पा० । मम, प्रिया, चन्द्रकला-नाटिका यत्तया नैति - तदेनमेवानुनीय निवारयामि। [ इति कोकिलमुपसृत्य सविस्मयम् ] विश्राम्यतु कुहूकण्ठ कुहूरिति तव ध्वनिः । साम्मुख्य प्रिया चन्द्रकला मम ।।११॥ [ सरोषम ] आ, क्थ प्रार्थ्यमानोऽपि तथव व्याहरसि' [ विचिन्त्य ] भवतु । परव्यसनसन्तृप्त न पुनरेन मलिनात्मान प्रार्थयिष्ये । तदितोऽन्यतो गत्वापि प्रियतमामन्वेपयामि । [ कतिचि- त्पदानि गत्वा मलयानिलस्पर्शमनुभूय सोद्वेगम ] अहो , किमिदानी दरदलितकेतकपरिमलमिलदविरतभ्रमरझड्वारमुखरिताशामुखश्चन्द- नानिलोऽपि मामुत्तापयति । भवतु, तदेनमेवमनुनयामि । कुहूकण्ठ-हे कोक्लि । तव-तं, कुहू , इति ध्वनि शब्दः, विश्रा. म्यत-विरमतु, यत -यस्मात, तया कहवा, प्रिया, चन्द्रकला, मम-मे, साम्मुख्य-समक्ष, नैति-नागच्छति ॥११॥ प्राप्यमामो पि-अभ्यय॑मानोऽपि , व्याहरसि-निगदसि । परव्यसनसन्तु प्तम-अगस्य विपदा सन्तुष्टम, , मलिनात्मान-दूषितान्त. करणम , दरद- तितकेतकपरिमसमिलदविरलभ्रमरशद्वारमुखरिताशामुख:-दरदलितस्य किञ्चि- न्मदितस्य केतकस्य परिमलेन सुवासेन मिलन्त सगच्छन्त. अविरलाः सघनाः प्रमरा तेषा झङ्कारेण मुखरित नादितम, आशामुख दिङ मुख येन तादृशः। चन्दनानिल-मलयमाप्तः। इसलिए इसीको मनाकर रोक देता हूँ। [ यह देखकर कोकिल के पास जाकर आश्चर्य के साप ] हे कोकिन । तुम कूकना बन्द करो; क्योकि इस कारण मेरो प्रिया चन्द्र- कमा ( मेरे ) सामने नहीं आ रही है ॥११॥ [ क्रोष के साथ ] आह! प्रार्थना करने पर भी क्यों ऐसा बोल रहे हो? [ सोचकर ] अच्छा , पर-सन्ताप से सन्तुष्ट होने वाले इस मलिनात्मा से अब फिर प्रापना नहीं करूंगा। यहां से चलकर प्रियतमा को अन्यत्र दूई । [कुछ कदम पलकर मलयानिल के स्पर्श का अनुभव करके उद्वेगपूर्वक ] स्पा, पुष्पित केतकी के पराग से मोहित मोरों के गुजन स्वर से दिसानों को मुखरित - 14 आवारयति-उच्चारयति, तत्-तस्मात, मम, प्रिया, हो तो शोन बताओ कि वह क्या करना चाहती है, और बसी हा १८ तृतीयोऽङ्कः किं किं व्यवस्यति कुतोऽस्ति' च कीदृशी सा 10 [ निःश्वस्य ] हा निर्दय, जानामी-युक्त वानपि अकथितप्रिया- वृत्तान्त कथ व्रजति परिहाय मामशरणम् । [ सरोपम ] अये,कथ नाम केतककण्टकावलिग्रथितविग्रहो न मरणमधिगच्छ'यय पापः [ कोकिलध्वनिमनुभूय निपुण विभाव्य ] अये, सत्यमिदानीम। कुहूमाकारयत्येष कुहूकण्ठो मुहर्मुहु.। तत्स्थ परिदृश्येत प्रिया चन्द्रकला मम ॥१॥ मे मा कथय-हि. ( मम प्रियतमा ) किं कि व्यवस्यति--चेष्टते करातीत्यर्थ , कुत -कुत्र, च, अस्ति, कीदृशी, च, सा ( इति ) 1 अत्र वसन्ततिलकच्छन्द 10 निर्दय-निष्ठुर, अकथितप्रियावृत्तान्त - कथित. नोक्त. प्रियाया. चन्द्र- कलाया. वृत्तान्त. उदन्त येन तादृश., परिहाय-त्यक्त वा, अशरणम -नि- सहायम् । केतककण्टकावलिग्रथितविग्रहः-केतककण्टकावलिभिः केतकीकण्टक- स है: ग्रथितः विग्रह शरीर यस्य तादृशः, अधिगच्छति-प्राप्नोति । एष., बुहूरण्ठ -योक्लिः, मुहुमुहुः वारवार, कुहूम -का इति मघरास्फुटशब्दमा चन्द्रकला, कथ-येन प्रसारण, परिदृश्येत-अवलोक्येत ॥१०॥ १ मे हैं 10 M 7 - चन्द्रकला-नाटिका तदेनमेवानुनीय निवारयामि। [ इति कोकिलमुपसृत्य सविस्मयम् । विश्राम्यतु कुहूकण्ठ कुहूरिति तव ध्वनिः । यत्तया नैति साम्मुख्य प्रिया चन्द्रकला मम ।।११|| [ सरोषम ] आ. , क्य प्रार्य मानोऽपि तथंव व्याहरसि [ विचिन्त्य ] भवतु । परव्यसनसन्तृप्त न पुनरेन मलिनात्मानं प्रार्थयिष्ये । तदितोऽन्यतो गत्वापि प्रियतमामन्वेषयामि । [ कतिचि- त्पदानि गत्वा मलयानिमस्पर्शमनुभ्य सोद्वेगम, ] अहो, किमिदानी दरदलितकेतकपरिमल मिलदविरलभ्रमरझङ्कारमुखरिताशामुखश्चन्द - नानिलोऽपि मामुत्तापयति । भवतु, तदेनमेवमनुनयामि । कुहूकण्ठ-हे कोक्लि । तव-ते, कुहू , इति ध्वनिः-शब्दः, विश्रा- भ्यत-विरमतु, यत-यस्मात, तया- कहवा, प्रिया, चन्द्रकला, मम-मे, साम्मुख्य-समक्ष, नैति-नागच्छति ।।११॥ प्राय॑मानो.पि-अभ्यर्थ्य मानोऽपि , व्याहरसि-निगदसि । परव्यसनसन्तृ- प्तम-अगस्य विपदा सन्तुष्टम् , मलिनारमान-पितान्त. करणम , दरद- नितवेतकपरिमलमिलदविरल भ्रमरझङ्कारमुखरिताशामुख:-दरदलितस्य किञ्चि- न्मर्दितस्य केतकस्य परिमलेन सुवासेन मिलन्तः सगच्छन्त मविरलाः सघनाः भ्रमराः तेषा शङ्कारेण मुसरितं नादितम, आशामुखं दिङ मुख येन तादृशः । चन्दनानिल-मलयमारुतः। इसलिए इसीको मनाकर रोक देता हूँ। [ यह देखकर कोकिल के पास जाकर आश्चर्य के साय ] हे कोकिन ! तुम कूकना बन्द करो; क्योकि इस कारण मेरी प्रिया चन्द्र- कमा ( मेरे ) सामने नही था रही है ॥११॥ [ क्रोप के साथ ] आह! प्रार्थना करने पर भी क्यों ऐसा बोल रहे हो? [ खोपकर ] अच्छा , पर-सन्ताप से सन्तुष्ट होने वाले इस मलिनात्मा से अब फिर प्रार्थना नहीं करूंगा। यहां से पतकर प्रियतमा को अन्यत्र । [कृष करम बसकर मलयानिल के स्पर्ग का अनुभव करके उगपूवंक] पा, पुष्पित केतकी के पराग से मोहित भौरों गुजन स्वर से दिवानों को मुखरित ? - भो . तृतीयोऽद. किं नाम्ना' विदधासि सुन्दर [ निरूप्य ] कथ क्रीडापिकोनि स्वन [ पुनरन्यतो विलोक्य सहर्षम् ] जित मया। किं प्राप्तासि कृशोदरि [ सनैराश्यम 1 दीर्घ नि श्वस्य ] आ , कथ मम भाग्यविपर्ययेण स्तवकिनीवल्लीयमुत्पल्लवा l [ इति मूच्छित ' पतति ] [ समाश्वस्योत्थाय दिशोऽवलोक्य उच्च कारम, ] ननु क्रीडावनविहारिण | तरुमृगविहङ्गमा । जानन्ति भवन्त बुतो मे विदधासि-नामोच्चारण करोपि? निरूप्य वीक्ष्य, कथ, क्रीडापिकीनि स्वन- श्रीडायोकिलशब्द ?, कृशोदरि-क्षीणमध्यमे, कि, प्राप्तासि- लब्यासि', भाग्यविपययेण-भाग्यदीपेण, इय, स्तवकिनी-गुच्छावती वल्ली-लता, उत्पल्लवा-नवविशलया (जाता ) ? अत्र हितं छद ॥७॥ समावस्य-सात्वना प्राप्य, उच्च कारम-उच्च वृत्या, क्रीडावन विहारिण-क्रीडोद्यानविहरणशीला !, तरुमृगविहङ्गमा -युगपशुपक्षिण !, मुदरी ! क्या नाम ले (कर पुकार ) रही हो? [खार या यह पालतू मोयल का शब्द है ? [ पुन दूसरी ओर देसर हर्ष के साप ] मैंने जीत लिया। हे पतनी यमर यासी ! क्या तुम मिल गई हो' [निराश होरर सबी सांस सींचता हा ] माह । मेरे दुर्भाग्य रो, यह क्या पत्नयों प्यासी पुण लता सामने फूती हुई है ॥७॥ [ मूच्छिंत होकर गिर पड़ता है ] [आश्वस्त होर उठतर दिशा की मोर देखता था और ऐJहे कीरोषा मे बिहार सरने पाने ! पुस, पशु तथा परियो! आसोपान १ मामा ०.1 २ सनरास्य मू. पा.३ कार रेसोर का गोपा पण यह है - प्राप्ताहि गोदार स्वास्नीलामीयमुनाममा । * मूपिमा पा.. शार्दूलविक्री - , 7 प्रियतमा को देखा है क्या' [क्षकार सुनकर आनन्द से याहि कह रहे चन्द्रकला-नाटिका । [विभाव्य ] अये, कथमिदानीमिहाहूय मामकथयित्वा प्रिया- वृत्तान्त मोनमवलम्बसे? [ सरोषम ] अये, मृषावश्चक । तदिह न- चिरादेव दावानलस्य विषयीभविष्यति भवानेक । [ पुनरन्यतो गत्वा सवितर्कम् ] नूनमनेन सर्वतश्चरता चञ्चरीकेण विदिता भविष्यति मा । तदेत मेवोपसृत्य गच्छामि । [ इत्युपसृत्य सविनयम ] भ्रातदिरेफ' भवता भ्रमता समन्तात् प्राणाधिका प्रियतमा मम वीक्षिता किम । [ झङ्कारमनुभूय सानन्दम् ] व्र पे किमोमिति सखे क्थयाशु तन्मे इह-अत्र, आहूय-आकारयित्वा, प्रियावृतान्त-प्रिसमाचारम् ।मो7- तूष्णीम्भावम , अवलाबसे-गृह्णासि । मृषावञ्चक मिथ्याप्रतारक |, नचिरा देव-शीघ्रमेव दावानलस्य-दावाग्ने विषयीभविष्यति-लयीभविष्यति । सवत -चतुदिदा चरता-भ्रमता चञ्चरीकेण-भ्रमरेण, विदिता-जाता । उसृत्य-समीप गत्वा । भ्रात , द्विरेफ-भ्रमर | , समन्तात.-सर्वत , भ्रमता-चरता, भवता, मम, प्राणाधिका-प्राणतोऽपि गरीयसी, प्रियतमा-प्रेयसी, कि वीक्षिता- क्यारिदृष्टा ? झङ्कारमनुभूय सानदमिति कविवाक्यम त था चभ्रमरस्य पड्कारमेव ओम शब्द मत्वा नायक पुनराहेत्यर्थ । किम, ओमिति, व्र.पे- कथयसि ?, ओमिति स्वीकाराधमव्ययम् । तथा च 'मया वीक्षिता' इति वि स्वीकरोपोत्यथं । तत-तदा सखे- मित्र | आशु-शीघ्र , [ सोचकर ] अरे । मुझ बुताकर ना मेरी प्रियतमा का वृत्तान्त बिना बताय हो मौन धारण कर रहे हो ? [ क्रोध के साय ] हे मिथ्या वचक । अब से अधिक देर बाद नहीं ( शीघ्र ही ) तुम दावानल से भस्म हो जाओगे। निश्चित ही उसके विषय में जानते होगे। तो उनके पास पहुँचकर पूछु । [ पुन दूसरी ओर जाकर तर्क पूर्वक ] सर्वत्र विचरण करने वाले ये भौरे [ यह कहकर उनके पास जाकर विनय के साथ ] वधु भ्रमर ! तुम चारो और विचरत हो । प्राण से भी बढ़कर मेरी १ द्विरेफमू. पास . - 7 M १" तृतीयोऽङ्कः [ इति सविनयम ] धोरसमीरण दक्षिणसरसिजशीतल किं दहस्येवम, [ सविमर्शम 1 जाने चन्दनशैलद्विजिह्वससर्गदूषितस्त्वमपि ॥१२॥ [नेपथ्ये] अहो, पश्यत, पश्यत- आस्तीर्णा इव नीलचेलनिचयः पूर्णा इवेन्दीयरै- गकीर्णा इव चूर्णितमृगमद पूर्णा इवानवे । रुद्ध यानेन विगृह्य सोचनपथं भेयेन सूचीमुख- धीरसमीरण- हे मन्दपवन ! दक्षिणसरसिजशीतल-दक्षिण वनस्थः सरसिज कमतः शीतल शीतलस्पर्श ! विम , एवम् , दहसि-भस्मीकरोषि, जाने, त्वमपि , चन्दनशैल द्विजिह्वससर्गदूषितः-मलयगिरिवनिसर्गसम्प- ॥ दूषितो जात इति शेषः ।।१२।। नीलचेलनिचयः-नीलाम्यरसमूहः, आस्तीर्णा इव-अच्छादिता इव, इन्दीवर --नीलक्सले , पूर्णा इव-सभुता इव, पूणिते.-पिट, मृग- मदै:- कस्तू रीभिः, आकीर्णा इव-व्याप्ता इय, नवे.-नूतन. अनं:- मेधैः, पूर्णा इव, अनेन, तमालमलिनच्छायेन कृष्णवर्णा छ'या कान्तिः यस्य तादृशेन, सूचीमुखः भन-निविटेन, तमना- करने वाला यह मलयानिन भी मुझे सन्तप्त कर रहा है । अस्तु, इस सेमी निवेदन करता हूँ। ऐसा पहार विनय के साप] है दक्षिण वन वे बममो से शीतल मन्द यापु ! मुझे इस प्रकार यो सन्तप्त करते हो? [विचार करके] मालूम होता है नि मलगिरि के सों के ससा से तुम भी दूपित हो गये हो ॥१२॥ [मपप्प में] महा. देसो, रेखो- तमासवृक्ष की ममिन धाया की भाति प्रपीमेव अपार मे SARI गारों को प्यार मिपा, नयन-पए पर पुणे मी ग मही होगा पाया है rि यम्पूर्ण सिगा मोस पात्रों ने पाया हो गया तमालवृक्षवस, मलिना । - चन्द्रकलानाटिका 15]D १०१ राच्छन्नास्तमसा नमासमलिनच्छायेन' सर्वा दिशः ॥१३॥ राजा-[निशम्य, समन्तादवलोरय] अये, कथमिदानीम्- आलोकाय भवन्ति न प्रततयो नैणा न भूमीरहो नाकाशं न वसुन्धरा न हरितो नाक्षाणि नाङ्गानि वा । रुद्ध वानेत 'कुतश्चि देत्य जगती कस्मादकस्मादहो सर्व क्वापि निरन्तरेण तमसा सहृत्य मीतं बलात् ॥१४॥ अन्धकारेण, विगृह्य-विरोधं कृत्या, लोचनपथ दृष्टिमार्ग, रुद्धवा, सर्वा-समस्ताः, दिशः, आच्छन्नाः -- आवृता. । मत्र पार्दूलविक्रीडितं छन्दः ॥१३॥ न व्रततय सता., न एणा:-न मृगा, न भूमीरह '-न वृक्षात न आकाश, न वसुन्धरा- पृथ्वी, न हरितः- न सिंहाः, न अक्षाणि-- नसर्ग, वा-अपवा, न अङ्गानि-न अवयवा', आलोकाय-दर्शनाप, भवन्ति-जायन्ते । अहो आश्चर्यम, कस्मात-कथम • अकस्मात- अस मावितरूपेण, कुनश्चित कस्मादपि स्थानात्, एत्य आगत्य, जगती - संमार, रुद्ध वा -- अवरुध्य, अनेन, निरन्तरेण - स्पायिना, तमसा-अन्धकारेण . सर्व-निरिवल वस्तुजात, सहत्य-एकीकृत्य, क्यापि-कुमारि, बलात -बलपूर्व, नीत- पापितम । अत्रापि शार्दूलवि- पीडित छन्द. ॥१४॥ सर्वत्र नीलकमल सिल गये हैं अथवा कस्तूरी का चूर्ण सर्वत्र बिखेर दिया गया है या मवीन मेघ छा गये हैं ॥१३॥ -[सुनकर, चारो ओर देखकर] प्रोह, यह क्या ? बताएं, हरिण, वृक्ष, आकाश, पृथ्वी, सिंह, सांप और यहाँ तक कि परीर के अग भी ऑखो दिखाई नही पड़ रहे हैं। बरै, यह तो कहीं से आकर स्थायी अपकार ने अचानक जगतीतल को ढक लिया और सभी वस्तु , एकत्रित करके बमपूर्वक कहीं अन्यत्र उठा ले गया ॥१॥ १ भदायव मू० पा०। - राजा- इतरथा-अन्यथा,जायते? तृतीयोऽङ्कः १०१ विचिन्त्य] दुर्लक्ष्योऽपि भवति नितरा वाणघात. परेषा- मस्यत्वेव कपमितरथा जायते पुष्पकेनो । ध्वान्तच्छन्ने जगति परितश्चापमाकृष्य रोपा- दित्य यस्मादधिकमघुना मामय निर्भिनत्ति ॥१५॥ [विचिन्त्य] कपमिदानीमपि चीयते प्रियवयस्यो मे रसालक सुहृत्प्रकाशित खलु शिथिलोभवति सकलोऽप्यान्तर क्लेश । तत प्रविशति विदूषक ] परेषाम अन्येषा वाणघात -बागप्रहार नितराम - अत्यन्त, दुर्लक्ष्य -अदृश्य ,, भवति, एवम -इत्यम् अस्यति-प्रभिपति, (a) पुष्पकेतो -कामस्य, (वाणयात ) कयम, परित -चतुर्दिक्ष ध्वान्तच्छन्ने-तमसावृते,, जगति-ससारे यस्मात.- यस , अय-काम , रोषात-कोषात्, इत्पम -अमुना प्रकारेण, चाप- धम् , आकृष्य, अघना-इदानीम, माम् , अधिक, निभिनत्ति-छिन. त्ति । अन मन्द्राकानाच्छन्द ॥१५॥ घीयते-दृश्यते, रसालक-एत नामको विदूषक । सुहृत्प्रणाशित मित्राय निवेदित, यान्तर-अन्त वरणस्य , क्लेश-ट, शियितीग- [सोपकर दूसरों के द्वारा छोड़ा गया बाम गठिनता से ही दृष्टिगत होता है । परन्तु आपात करता ही है. पिर कामदेव के छोड़े परे माग से मन्यषा हो सकते हैं ? यही कारण है कि धोर पकार रेवारा पारो ओर से जगतीतल के ढक लिये जाने पर यह कामदेव कोपपूर्वक सपा पनप को सींचकर मुगे पस्यन्त ही पीडित कर रहा है ॥१३॥ [सोचकर मेरे प्रिय मित्र रसामक इस समय भी दिसाई पा रहे हैं। मित्र पर अतर मालेग प्रस्ट पर देने से कम हो जाता है। [इसके बाद विदूषक प्रवेश करता है। दुमक्ये मू. पा.. - चन्द्रकलान्नाटिका विदूषक कुत्रदानी पश्यामि इह घोर अन्धकारे कुत्रापि लुठन्त मदनवेदनोद्विग्न' प्रियवयस्यम् । कथम् इह एव अनावरणाभरण- प्रतापभासुरो दृश्यते वातुल इव परिभ्रमन्नेव । तदिदानीमेतस्य प्रिय निवेद्य सक्लानामपि मन्त्रिवराणा शिरसि चरण दास्यामि । (किदिाणि पेक्खामि इध घोर अन्धआरे कहिपि लुडन्त मदणवेदणा. अविग्न पियवस्स । [अनतोऽवलोक्य] कघ इधज्जेब अणाबरणा- भरणप्पतापभासुरो दोसदि बाचिलोमिअ परिभमन्तो एसो । तादापि एदस्स पिअ णिवेदिन सअलाण बि मन्तिवराण शिरे चलण दइस्स ।) [इत्युपसर्पति] राजा-ससे । एह्य हि । कथम कथ वा मम विनोदनीय मदन. वेदनाविदून हृदयम । न्यूनीभवति । सुठ-सम - इतस्तत पतन्त, मदनवेदनोद्विग्नम-कामपीडया ध्याकुलम । अनावरणाभरणप्रतापमासुर वस्त्राभूषणरहितोऽपि प्रताप मात्रेण गोभमान , वातुल -उन्मत्त 1शिरशि चरण दास्यामि सर्वत श्रेष्ठो भविष्यामि । मदनवेदनाविदूनम, कामपीडाव्यथितम् । विदूषक-इस घोर अन्धकार के मध्य कामवेदना से पीडित अपने प्रिय मित्र को कहाँ देख सकूगा ? [सामने देखता हुमा ] अरे, यही वस्त्राभूषपो से सुसज्जित न होते हुए भी केवल अपने प्रताप से प्रकाशमान ने एक उन्मत की भांति पूमते हुए दिखाई दे रहे हैं । तो अब उनके प्रिय सन्देश का कमन करके मैं समस्त श्रेष्ठ मन्त्रियो के सिर पर चरण रख लगा। [यह कहकर राजा के निकट पहुंचता है ] राजा--मित्र ! माबो, आयो । यह बताओ कि मदनवेदना से पीमित मेरा हृदय कैसे बहलाया माय' १ मदनवेदनोविग्न मू० पा । २ परिसमभेष मू• पापण म. पा०।४ दाम्पासि मु०पा। .

१०४ । १ तृतीयोऽङ्कः:. विदूषकः यस्य तवाहम अतिशयितसकलमन्त्रिबुद्धिविभवः' प्रि- यवयस्यः तस्य कयं मदनवेदनाया अप्यवकाशः । (जस्स दे अह अदिसइदसअलमन्तिवुद्धिविहबो पिअबसस्तो तस्स कवं मदणवेदणा- एबि अवमासो।) राजा-कथय, कथ नाम ? विदूषक.--एषा खलु इदानीमेव अदूरस्थित मणिमण्डपम् आनीता मया सह सुनन्दनया । यदिदानी मतकितमेघमण्डलीव कुतोऽप्यागत्य देवी अन्तराया न भवति तदा उपलब्धव्या त्वया चन्द्रकला । (एसा- क्खु दाणि एदंज्जेब अदूरवट्टिदं मणिमण्डव आणिदा मए सह सुणद- गाए । अजदिदाणि अक्किदमेहमण्डलोविन कुदोवि आअदुअ देवी अन्तरा ण भोदि तदा उबलद्धब्या तए चन्दअला।) [ततः प्रविशति माधविकया निर्दिश्यमानमार्गा देवी रतिकला प] मतिशयितसकलमन्त्रिबुद्धिविभवः-अतिशयितः अतिक्रान्त. सकलाना समस्ताना मन्त्रिां बुद्घिविभवः घीसम्पदा येन तादृशः । अदूरस्पित-समीपवर्तिमम । अतक्तिमेषमण्डली अतकिता असम्भाविता मेपमण्डली जलदपरितः, अन्तराया-विघ्नरूपा, उपलम्पब्या-प्राप्तव्या। निदिश्यमानमार्गा-निदिश्य- विदूषर- समस्त मंत्रियों के बुद्धि-चमद को पराजित कर देनेवाला मुश सा जिसका प्रिय मित्र है. उसको मदनवेदना का असर कहाँ ? रामा-बतायो, किस प्रकार? विदूषा-उसे तो अभी-अभी सुनन्दना के साथ यहाँ से निकट ही माग मण्डप में में ले थापा हूँ। यह यदि, अचानक मेघ मण्डली की भांति देवी कही से पाकर विघ्न न बन जाये तो पन्द्रकला तुम्हें प्राप्त हो जाएगी। । इसके बाद माघविका दारा निर्दिष्ट मार्ग से महारानी धानी रखी रतिहमारे साथ आती है। P? अतिशक्तिसपसमन्विदिपिभयोक मू.पा. २ भुनन्दया { पा. परिदानीम, मु. पा. अन्तरापो मू० पा०॥ ।

॥ राजा- चन्द्रकलान्नाटिका १०५ ' देवी-चेटि । एवमपि नाम भवेत् । (हजे। एवं पि णाम भवे । भाषविका- पश्यतु भट्टिनी। पेक्खदु भट्टिणी । [इत्यङ्ग ल्या निर्दिशति] देवी-[विलोक्य ] सखि रतिकले। किमिदानी कुर्म (हला रदिअले । कि दाणि करम्ह । ) रतिकसा-प्रच्छन्ना एतम् अनुगच्छन्त्य ' सर्व जानीम' (पच्छ• माज्जेव एद अणगच्छन्ति सब्ब जाणम्ह ।) राजा-सखे केन पुनरुपायेन इत आनीताऽप्येषा । विदूषक एवमिव । (एब 1) [ इति कर्णे कथयति ] - [सहर्पम्] सखे । तदेतत्तव पारितोषिकम् । [इति कङ्कण दत्त्वा तदिदानी दर्शय कुन प्रियतमा । [सत प्रविशति सोत्कण्ठा चन्द्रकला सुनन्दना च ] मान उच्यमान मार्ग पत्या यस्य तादृशी। प्रच्छना-गुप्ता। अनु • अनुसरन्त्य । पारितोषिकम् -पुरस्कार । सनिर्वेद . •महता देवी-चेटिके | निश्चित ही यह सभव है । माघविका-देखिए, महारानी! [कहती हुई अगुनी से निर्देग करती। देशी-[देखकर] सखी रतिकला ' इस समय क्या करना चाहिए । रतिकता-छिपकर इसका अनुसरण करती हुई हम लोग सब जान लें। [ वैसा ही करती हैं ] राजा-मित्र! वह यहाँ किस प्रकार लापी गई। विद्र ---इस प्रकार [फान मे कहता है] -[हपित होकर] नित्र ! तो यह रहा तुम्हारा पुरस्कार। [कहते हुये कण देकर] तो प्रितयमा कहाँ है ? दिलामो। - [इसके बाद उत्तायुक्त पदकला और सुनन्दना का प्रवेश!] 11. अनुगस्य मू.पा. गच्छत्य राजा- तृतीयोऽय. चन्द्रकला-[ सनिवेदं दीपं नि:श्वस्य ] सखि! अकारणं किमिति मां पुनः पुनर्वश्चयन्ती' क्लेशयसि ? अहमिदानीमस्यामशोकशाखाया कण्ठे लतापाश बद्ध वा आत्मान व्यापादयामि । मा मामिदानी निवारयस्व । (हला ! अआरण कीसमं पुणो पुणो बच्चअन्ति किलिसा भबेसि । अहं दाणी एमाए असोअमहाए कण्ठे लदापास' उम्बन्धि अत्ताणं बावादेमि । मा मं इदाणी णिबारेसु ।) सुनन्दना-सखि ! मा उत्ताम्य । मम वचनेन क्षणमपि परिसाल- यस्य भर्तृ रागमनम् । (हला ! मा उत्तम्ह । मह वअणेण खणपि पडिबालेसु भट्टिणो आअमणम् ।। विदूषकः-एत् एतु प्रियवयस्य. । (एदु एदु पिअबअसो ।) [इत्युभो परिकामतः - सर्वा अनुक्रामन्ति ] विदूषकः- पश्यतु पश्यत प्रियवयस्य । एषा सा आत्मन एव अङ्गकात्या महान्धकारेऽपि प्रकाशिता ते प्रियतमा। ( पेक्खदु पेक्खदु फष्टेन सहितम् । वञ्चयन्ती प्रतारयन्ती, क्लेश-यसि कष्ट ददास लतापाश-लताया: बन्धनीम, व्यापादयामि-मारयामि । निवारयस्व-नि- पेघ । मा उत्ताम्य-निराशा भूत्वा अलम् निराशा मा भवेति यावत् । परिपालयस्व-प्रतीक्षस्व । अनुक्रामन्ति-पश्चात चलन्ति ।अङ्गकान्त्या- शारीरतेजसा। चन्द्र कला--[लम्बी सांस लेकर] सखी | क्यो मुझे बार-बार धोखा देकर दुःख देती हो ? मैं अब लता-पाश के द्वारा इसी अशोक की डाल मे। अपना गला बांधकर हत्या कर लूंगी। अब मुझे रोकना मन । सुनन्दना-ससी ' हताश न हो । मेरे कहने के अनुसार क्षण भर तो महाराज के आने की प्रतीक्षा करो। विदूषक-आमओ मित्र ! आओ। (दोनो चलते हैं। सभी स्त्रियां अनु- सरण करती हैं।) विदूषक-देखो प्रिय मित्र! देखो तुम्हारी प्रियतमा अपने अगों की कान्ति १ विचयन्तीन-पा० । २. किनिसा भू०पा० । ३. नदापास्य मू.पा.

चन्द्रकला-नाटिका पिअवअस्सो । एसा सा अत्तणोज्जेव अङ्गकन्तिए महअन्धमारेनि पासिदा दे पिअदमा।) राजा [विलोक्य सहर्पम् ] अये, अस्या खलु - विश्वस्यासुकृतेन दन्तवसन मत्त भकुम्भदय- स्यापुण्येन पयोधरौ कुवलयस्याकर्मणा चक्षुषी। इन्दोर्भाग्यविपर्य येण वदन कुन्दावलेरेनसा दन्ताली कदलीतरोश्च दुरितेनोरुद्वय निर्मितम् ॥१६॥ किञ्च, मध्येन मध्य तनुमध्यमा मे पराजय नीतवतीति रोपात् । बिम्बस्य-विम्बफ्लस्य, असुकृतेन-अपुण्येन, दन्तवसनम्-ओष्ठम, मत्तेभकुम्भद्यस्य-मत्तगजस्य शिरस म सिपिण्डद्वयस्य, अपुण्येन-पापेन, पयोघरी - दुचो, कुवलयस्य - नीलकमलस्य, अकर्मणा-निन्दितकर्मणा चक्ष पी-नेत्र, इन्दो चन्द्रस्य, भाग्यविपर्ययेण देवप्रातिकूल्येन, वदन - मुखम, कुन्दावले कुन्दपुष्पाणा पक्त', एनसा पापेन दन्ताली-दन्त, पडित.. कदलीतरोश्च-कदलीवृक्षस्य, दुरितेन-पापेन, अरु- द्वय-जवायुगल, निर्मितम-रचितम (अत्र शार्दूलविक्रीडित छद) ॥१६॥ तन्मध्यमा-कृशतरकटीदेशा, मध्येन-कटीदेशेन, मे -मम तिहस्य, मध्य-कटीदेश, पराजय नीतवती-पराजितवती इति, रोपात्-क्रोधात, से इस अन्धकार में भी प्रकाशित हो रही है । राजा-[ देखकर हर्ष के साप ] वहा | इसके- ओष्ठ कदाचित् विम्बापन के अभाग्य से , दोनों कुच मत्त हापो के गिर के दोनों मास-पिड के दुर्भाग्य से, आखें नीलकमल के पापोदय से, मुख चन्द्रमा के भाग्योदय से, दन्त - पक्ति कुन्द - पुष्पो को पक्ति के पाप से और दोनो जपायें कदलीवृक्ष के पाप के कारण बन पड़े हैं ( ववि का तात्पर्य यह है कि इसके गरीराग-ओष्ठ, कुच, नेत्र, मुख, दन्तावली और जायें क्रमश विम्बाफल, मत्तगम के कुभदप, नीलकमल, चन्द्रमा, कुन्दपुष और कदलीवृक्ष को मुन्दरता को सजाने वाले हैं ॥१६|| और भी, सिंह इस विचार से दि इस क्षीणकटि सुन्दरी ने मेरी की - - तृतीयोऽस... १०८ : किण्ठीरवोऽस्याः कुच कुम्भतुल्यं मत्त भकुम्भद्वितयं भिनति ।।१७।। देवी-[ निःश्वस्य ] अहो, महाभिनिवेशोऽस्यां ,दुष्टकन्यकाया मार्यपुत्रस्य। सखि! तदेहि इह भित्या अन्तरिता उपरिवृत्तान्तं पश्यामः। (अहो महअहिणिबेसो एदाए दुट्ठकाणआए अजउत्तस्य । हला, ता एहि इम भित्तिए अन्तरिदा उवरिवुतन्तं पेवखम्ह । ) [ इति सर्वा' अन्तरिता पश्यन्ति ] रामा-सखे! तदेहि नि पियामो मदनमन्तप्तमात्मानमनया । [ इत्युपसर्पत.] चन्द्रपला-[ विलोक्य सचकितव्रीड सहसोत्याय मुख नमयन्ती कण्ठीरवः-सिंहः, अस्या:-तापिकाया , कुचकुम्भतुल्य-स्तनकुम्भसदृशं, मत • भकुम्भद्वित-मत्तगजकुम्भयुगलं, भिनत्ति-नखराघातेन विदारयति । अत्र प्रत्यनीकमलद्वारः प्रतीपालङ्कारश्चेत्यनयोरेकाथयानुप्रवेशरूपः सङ्करः । उपजातिश्छन्दः ॥१७॥ महाभिनिवेश. महती अनुरक्तिः । भित्त्या - कुड्येन, अन्तरिता:- प्रच्छन्नाः, उपरिवृत्तान्तम्-अग्रिमघटनाम् । निर्वाफ्याम -शमयामः, मदनस- की क्षीणता को पराजित कर दिया, क्रुद्ध होकर इसके कुचकुम्भ की भाँति मंत्त गज के दोनो कुम्भो को विदीर्ण कर रहा है । १७॥ देवी-[ लम्बी साँस लेकर ] आह ! महाराज का इस दृष्ट कन्या के प्रति तो बडा ही अधिक अनुराग है । सखो! तो आओ, दीवास को ओट से क्रिया-कलापो को देखें। [ कहकर सब बोट में चली जाती हैं।] राजा-ससे! चतो, इससे अपने काम-सन्तप्त हृदय को शान्त करूं । [ दोनो समीप जाते हैं 1] पकना-[भाश्चयं से लज्जित-सी होती, सहमा उठकर, अपना मुस नोचे किये, हर्ष से मन ही मन ] आश्चर्य! अभी तक जिस जीवन को मैं विष १.सर्वाः मू०पा२. मदनसम्पप्ठयात्यामनया मू.पा.।। . . H ।

. तृतीयोऽङ्क १०६ सानन्दमात्मगतम् ] आश्चय', यत्किलेद जीवित हलाहलमिति सम्मा- वित तदिदानी कथ महाभागधेयेन अमृतत्वेन परिणतम । (अम्महे, ज किल एद जीविद हलाहलति सम्भाविद तीदाणी कप महाभाअधे- एण अमित्ततोण पणिणद । स राजा- वैलक्ष्यस्य भवत्यसाववसरो नैतावस्तेऽघुना कि नामाननचन्द्रमानमयसि प्राणाधिक प्रेयांस । एभिर्गाढमनङ्गमञ्जुल' गृहैरालिङ्ग य मामङ्गक- रणप्रेक्षणि पञ्चबाणविशिखक्षीण विनिर्वापय ॥१८॥ देवी-[ रतिकला तियंगवलोक्य ] सखि पुनरपि मद्य मालपि- न्तप्तम्-कामपीडितम् । सचकितवीडम्-विस्मयेन सज्जया च सहितम, नम- यती-बध कुवन्ती । जीवित-जीवन, हलाहलम-एतनामक विषम, सम्भा. वित-ज्ञातमित्यर्थ , महामागधे येन-महानुभावेन स्वामिना, अमृतत्वेन परि- गतम्-अमृत निमितम् भाना - इदानीम्, ते-तव, एतावत ---इयत्परिमाणस्य, वैलक्ष्यस्य- लज्जापा, असो, अवसर समय , न भवति - नास्ति, प्राणाधिके- नागेम्योऽपि गरीयसि | प्रेयसि-प्रियतमे | कि नाम - किमर्थम्, आनन- चन्द्र -मुखच द्रम आनमयसि-नोचे करोषि ? एणप्रेक्षणि - मृगनयने । पञ्चबाणविशिखक्षीण-मदनबाणं सन्तप्त, माम् एमि , अनङ्गमन्जुलगहै . मदनसुन्दरनिवासभूत , अङ्गक - अवयव , गाढ - दुइ यथा स्यात् तपा, आलिङ्ग य-परिरभ्य, विनिर्वापय-शमय । बत्र शार्दूलविक्रीडित छद ॥१८॥ तिर्थक्-वक्र यया स्यात तथा अवलोक्य-दृष्टवा । आलपिष्पति- समझ रही थी, वही महाराज के द्वारा अमृत म बदल गया । रामा-लज्जा करने का यह अवसर नहीं है । है प्राणों से भी अधिक प्यारी | अपना चन्द्रानन नत क्यो कर रही हो? हे मृगनयनी। इस समय तो धाहिए कि तुम काम बाण से पीडित मुशको कामदेव के सुन्दर आवास रूप इन बर्गों से आलिंगन करने शान्ति प्रदान रो देवी-[ रतिकसा पर तिरधी चितवन डालती हुई ] सनी १ मील १२ प. पप P .

चन्द्रकला नाटिका ज्यत्यार्यपुत्रः । (हला पुणोबि मं आलविस्सदि अज्ज उत्तो। सुनन्दना-सखि किमेव प्रतिपद्यसे । कुरुष्व तावद्भर्तृवचनम् । (हला कि एवं पडिबज्ज सि । करसु दाब भट्टिणो वअण।) माधयिका-भट्रिनि! शृणुष्व तावत् तव विश्वसनीयाया वचनम " ( मट्टिणि! सुण दाब तह विससणीआए बअण । ) देवी-चेटि ! कालसपी मिल नीलमणिमालारूपेण कण्ठ वसतीति को जानाति । (हजे ! कालसप्पी किअ णीलमणिमालावेण कण्ठे बसदित्ति को जाणादि ? ) चन्द्राला-[ सगद्गदस्वरम ] सखि! देवीप्रकोपभीते महाराजे अस्माक को विश्वासः! (हला, देवीपओवभादे महाराए अम्भाण' को विसहो।) वेधी-( अहो! मम प्रियसख्याः प्रियसखीत्वमेतत् । ) अन्बो, महि पिअसहीए पिअसहीतुअं एद । सम्भाषण करिष्यति । प्रतिपद्यसे-आचरसि । भर्तृवचनम -स्वामिनः आगाम। विश्वसनीयाया'-विश्वासपात्रस्य । कालसी-कालसर्पिणी, नीलमणिमामा. रूपेण-नीलमणि ( नीलम ) -निर्मितमालास्वरूपेण । देवीप्रकोपभीते देमाः महाराज्या प्रोपेन क्रोधेन भीते रस्ते । महाराज मुझसे फिर भी संलाप करेंगे? सुनन्दना-सखी ! यह क्या कह रही हो? स्वामी की आज्ञा का पामन - करो। माधविका-स्वामिनी ! अपनी विश्वासपान का पचन मुनिए । देवी-पेटिके ! कौन जानता है कि नीलमणि की माला के रूप मै गसे मे स्पित यह सालपपिणी है। पत्रकला-[गद्गद स्वर में ] सखी! देवी के प्रोप से भयभीत महाराम पर हमारा क्या विश्वास है ? देवी-घोह ! मेरी प्रिय सखीना यह स्नेहगील चौहाई है? १. विश्वसनीयावंचनं मू. पा० । २. कासगर्षि पू०पा। जानाति मूपा । ४. हवेः.1.1. महामं मूग.।

1 1 तृतीयोऽङ्कः राजा- प्रेमबन्धनिवदा मे न देवी न च मेदिनी इतः प्रमृति तन्वनि त्वमेव मम जीवितम् ॥१६॥ देवी-[ निशम्य सास्रम् ] सखि रतिकले ! इदमपि मया सह्यते! (हजे रदिसले, एव पि मए सहेदि ) रतिकला-सखि ! पुरुपाणा भ्रमराणा स्वभाव एषः, यत्किल नव नवमेव अनुघावन्ति । ( हला, पुरिसभमराणा सुहावो एसोज किर णव णव एव अणुधावदि । ) चन्द्रकला मखि मुनन्दने | देवी प्रेक्ष्य सर्व खलु विस्मरिष्यति महाराज । (सखि, सुगदणे, देई पवित्र सक्नु विस्तमेरिस्पेदि महाराओ।) देवी-सखि शृणु , तावत् शृणु तावत् । आर्यपुत्रस्य दर्शन- मात्रयेणापि एतस्या दुष्टकन्यकायो एंवविधानि आलपितानि । (हना, सुणेहि दाव सुगैहि । अजउत्तस्स दसणमत्तकेण पि एदाए दुकणा- आए एव्व विहाणि आलपिदाणि।) मे -मम, प्रेमबन्वनिवद्धा-प्रेम्ण . बन्धनेन बद्धा, देवी, न नहि, मेदिनी- पृथ्बी, च, न, तन्वङ्गि-क्षीणाङ्गि, इत प्रमृति - इत आरम्य, स्वमेव, मम, ज वितं-जीवनम, (असि) । अत्र अनुष्टुप छन्द ॥१६॥ निशम्य-श्रुत्वा, सासम -अश्रुणा सहितम् । अनुथावन्ति–पश्चाद वे- गेन गच्छन्ति । आलपितानि-भावगानि । व्याहरसि-चदसि । वद्य प्रमृति- राजा-मेरे लिए प्रेम के बन्धन में बंधी हुई न तो देवी है और न पृथ्वी हे सुन्दरी ! आज से तुम ही मेरे प्राण हो ॥१६॥ देवी-[ मुनकर ऑसू के साथ ] सखी रतिकला। यह भी मुझे सहना पडता है। रतिकला-सखी! पुरुषो और मौरों का यह स्वभाव होता है कि ये नये- नये के पीछे दौड़ते रहते हैं। चन्द्रकला-सखी सुनन्दाना ! महारानी को देखकर महारान सब कुछ मल पाएंगे। देवी-सखी! मुनो, सुनो । वायपुत्र के मात्र दमन से भी यह दुष्ट - । Prernmमरी।

चन्द्रकला-नाटिका
रतिफसा-सम्बि । एवमेतत् । ( सहि एव्व एद ।)
राजा-प्रिये । विमेव व्याहरसि' । अद्य प्रभृति निदेशवती'
तवाय जन ।
विदूषक -[ सहर्षम् ] अम्महे , आश्चर्य यदि एतस्या प्रियवयस्य
आजाकर तत सर्वा अप्यन्त पुरिण्य आज्ञाकर्य । ( अच्चरिअ, जइ
एदाए पिअबअस्सो अण्णाकरः ता सध्वा अपि अदेउरिणिओ अण्णा-
कारिणी ओत्ति ।)
देवी-[ सरोयमुपसृत्य ] पा राजवयस्य महीब्राह्मण । अहमपि
एतस्या अज्ञाकरी ? ( आ राअवअस्स महावम्हण अह वि एदाए
अण्णाकारिणी ति।)
[ इति पुन पुनरधिक्षिपति ]
-[ सभयोत्वम्पम ) अहो , अहो । विमिदानीमाप
तितम् । अम्भो, कि दाणि आपदिद?
अद्यारभ्य, निदेशवर्ती-आज्ञावारी । अत पुरिण्य
अत पुरनिय सिन्य ।
राजययस्य-राज्ञ सखे । महोब्राह्मण-भूब्राह्मण । अधमत्राागेति यावत,
अधिक्षिपति-निदति । सभयोत्कम्पम --भयमूलककम्पनन सह । मा मह
रतिकसा-सखी । ऐसा ही होता है।
राजा-प्रिये ! ऐसा क्यों कहती हो' आज से मैं तुम्हारा आशावारी हूँ।
हिंदूपक-हर्ष साथ ] अमों । आश्चर्य है ।। यदि आप इमरे
याज्ञाकारी हुए तो मत पुर की सभी स्त्रियों इसकी आज्ञाकारिणी हुई।
देवी-[ोष के साथ पास जाकर ] ओ राजा या मित्र अधम ब्राह्मण
में भी इसकी आशाकारिणी हुई?
[कहार घार मार घिसारती हैं ]
घरकता-[ भप से बापती हुई ] हाय ! यह क्या था परा'
चन्द्रकला-
१ प्यासि मू० पा. २ निगवति .पा.।

चन्द्रकलान्नाटिका ११३ सुनन्दना-[ सभयोत्कम्पम् ] अहो! किमिदानी करिष्यामि । ( अम्मों कि दाणि करिम्स ? ) विदूषक - [ सोद्वगम ] भवति । मा मह्म कुष्य । ( भौदि, मा अम्हेहि कुप्प।) राजा-[ सनिवेदमात्मगतम, ] इदानी खलु चेतनापि मे नात्मनो वशवदतामवलम्बते। देवी सखि रतिकले । चेटि माधविके । एप खलु दुष्टब्राह्मण इय गर्भदासी सुनन्दना द्वे अपि एकेनैव लतापाशेन एकीकृत्य बद्ध- वा गृह्णाताम् । इय च दुष्टकन्यका आत्मन एवोतरीयेण हस्ते सुदृढम् आपीड्यताम् । (हला रदिअले , हज्जे माहविए , एसो क्खु दुट्ठो वम्हणो एदा गम्भदासी सुणदणा दुवे वि एक्केण एव्व लदापासेन एक्किको कदुअ बडढा गण्हीत । इअ अ दुकण्णा अत्तणो एब्व ओत्तरीएण हत्ये सुदीड्ढ अप्पीड डत ।) [ उभौ तथा कुरुत ] कुप्य-ममोपरि श्रोध मा कुरु । सनिर्वेदम,-दु ससहितम् । चेतना - सज्ञा । वशवदताम-अधीनत्वम नि अवलम्बते-न आश्रयति । उत्तरीयेण-पावा- रेण , आपीडयताम-बध्यताम् । सुनन्दना-[ भय से कांपती हुई ] हाय ! अब क्या कहेंगी? विदूषक-[ व्याकुलता से ] महोदये । मेरे ऊपर क्रोध न करें। राजा-[ दुख के साथ मन में ] इस समय मैरी चेतना भी स्वय मेरे वश म नहीं है। देवी-सखी रतिमला ! दासी माधपिका ' इस दुष्ट ग्राह्मण और दासीपुत्री सुन दना, दोनो को एक ही लडापाश मै बॉयो और इस दुष्ट कन्या के हाप को इसी की मोडनी से कसकर बाँध लो। [दोनो उसी प्रकार करती हैं ] १ महाप्य मू.पा.

तृतीयोऽङ्कः ११४ विदूषकः--आश्चर्यमाश्चर्य, कथ बन्धनात् अपि एतस्या गर्भदा- स्या सुनन्दनाया कठोरस्तनभरेणापीडन गुरुक मे अङ्ग बाधते । ( अच्चरिअ-अच्चरिअ, कह बधणादो वि एदाए गब्भदासीए सुणद. णाए कठोरत्थणभरेण आपीढण गुरुज मह अग बादि।) देवी-सखि रतिकले । चेटि माधविके। एतानि इदानीमात कृत्वा गच्छतम । (हला रदिअले, हज्जे माहवीए, एदाहि दाणि अग दो कदुअ गच्छेहि।) [ इति राजवर्ज निष्क्रान्तों ] राना-[ सनिवेद दीर्घ मुच्छ्वस्य] देव्या प्रेक्ष्य समक्षमन्य' वनितासङ्ग मर्मतादृश मानस्त्याजयितु कथ नु भविता शक्योऽतिभूमि गत । कठोरस्तन भरेण-कठिनयो कुचयो भारेण , मापीठन-पीडा। मम, एतादृशम , अन्यवनितासङ्गम -अन्यरमणीसहवास, समक्ष- सम्मुख , प्रेक्ष्य-दृष्ट्या , देव्या , अतिभूमि-परायष्ठा , गत -प्राप्त । मान - अहकारोत्पन्न प्रोष , त्याजयितु -दूरोक्तु, कय नु-केन प्रकारेण शक्य , भविता--भविष्यति ? मत्कृते-मदर्थ मुधा--व्यर्थ , सुहृदा. विदूषक-पाश्चयं । आश्चर्य ।। इस भदासी के कठोर स्तन मेरी देह को र धन से भी अधिक पीडित मर रहे हैं। देवी-सखी रतिकला । और चेटी माविका | अब इन्हें आगे आगे में- कर चलो। [ राजाको छोड़कर सभी चली जाती है ] मा-[दस के साप सम्बी सांस मेरर ] षय रमणी साप मुझे देखकर महारानी का रोप पराबाष्ठा पर पहुंच गया है । उसको बमे हापा पा सकेगा। ऐसा लगता है कि पिनात स्वप १ उत्स्वस्य मु. पा० । २ भन्दवनिता मु. पा.। -- चन्द्रकला नाटिका बद्ध वा' नीयत वल्लभा च सुहृदा साधं मुधा मत्कृते निर्गच्छन्निव नाशकोऽपि सहसा तकि विधेयं मया ॥२०॥ विचिन्त्य तदलमिदानीमत्र स्थित्वा । पुरमेव प्रविश्योपाय चिन्तयामि । [इति निष्कान्ताः सर्वे [ तृतीयोऽङ्कः मित्रेण , साधं-सह , वल्लभा-प्रिया च , प्राप्यत , नाशकोऽपि--विनाशोऽपि , सहसा हठात्, निर्गच्छनिव-नि- सरमिव ( भाति ) तत्, मया, कि, विधय-कर्तध्यम मन शार्दू- लविक्रीडित छन्दः ॥२०॥ बलं स्थित्वा-अत्र अवस्थान तोचितमित्यर्थः । मत्र स्थाधातोः अलमि- त्यस्य योगे 'पलंखल्वो प्रतिपेघयो प्राचा क्त वा' इति पाणिनिसूत्रेण क्त वा- बद्ध वा, अनीयत-- . प्रत्ययः। 1 कही से आकर अचानक उपस्थित हो गया है। मेरे कारण व्ययं में मेरी प्रिय- तमा मेरे प्रिय मित्र के साथ बॉधकर दूर हटा दी गई है। तो अब सुझे क्या करना चाहिए ? ॥२०॥ [ सोचकर ] तो अब यहाँ रुकना पयं है। महल मे ही चलकर कोई उपाय सोचूं । [ सभी चले जाते हैं ] तोसरा अक समाप्त ॥३॥ १ यध्वा मू०पा०।२ निर्गन्त च मू० पा० । ३ नासबोऽपि मू०पा ।

चतुथोऽङ्कः [ ततः प्रविशति निविण्णो राजा ] राजा-[ दीर्घमुच्छ्वस्य' ] पीतं कर्णपुटद्वयेन गरल भृङ्गीनिनादाभिधं प्रालेयांशुकरच्छलासुरे दहनज्वालासु गात्रं हुतम् । भूयो भूय इति स्वयं विदधता नीता मया यामिनी निर्याता: कथमश्मसारकठिनाः केनापि नैवासवः ॥१॥ आलप्य वञ्चनपरं बहुचाटुगर्भ- भृङ्गीनिनादाभिधं-म्रमरीगुञ्जननामक , गरलं-विप , कर्णपुटद्व- येन-कर्णाभ्यामित्यर्थः, पीतम -अपापि, प्रालेयाशुकरच्छलासु-पालेयाशुकरः चन्द्रकिरणः छलम, मिपः यासा तासु, दहनज्वालासु-अग्निज्वालासु, गात्र- शरीरं, हुतम -अहूयत , स्वयम-प्रात्मनैव , भयोभय--मुहुर्मुहुः, इत्यं , विदधता-बंता, मया, यामिनी-रात्रिः, नीता-व्यतीता , एमसारकठिना:-लौहवत कठोराः, असव.-प्राणाः , कथ , केनापि , नैव , निर्याता:--निर्गताः । अत्र शार्दूलविक्रीडित छन्दः ॥१॥ बहुचाटुगर्भम -अनेकचाटकारिताशब्दपूर्वक , वञ्चनपर-कपटपूर्ण , (वचनम् ) आलप्य-कथयित्वा , चिरं-चिरकाल यावत, ,अंघ्रितले-- [ इसके बाद दु.खी राजा प्रवेश करता है ] राजा-[ लंबी सॉस खीचकर ] मैंने भौरो के गुजन रूप विष को अपने कर्णपुटो से पिया और चन्द्रकिरणो के रूप में धधकती हुई अग्निज्वाला में अपने शरीर को होम किया। इस प्रकार स्वयं बार-बार करते हुए मैंने रान वितायी ; किन्तु लोहे के समान कठोर मेरे प्राण क्यो नहीं किसी प्रकार निकले, , यह माश्चर्य है ॥१॥ कपटपूर्ण, मिथ्या प्रशंसा के शब्द बहार भी मैं कितनी देर से महारानी १ दोषमुरम्यस्य १० पा० । २ नासु मू० पा० । ३ विदहता इति अ. पाठान्तरम ।

चन्द्रकला-नाटिका
मेष स्थितोऽस्मि चिरमंघ्रितले निपत्य ।
आलोजनरभिहितापि
तथा मदर्थ
देवी कथञ्चन पुननं गता प्रसादम, ॥२॥
[विचिन्त्य सकरुण नि श्वस्य आकाशे लक्ष्य बद्ध वा ]
हे दुर्दैव यदा चिरस्य भवतो भूयोमराद्धं मया
तन्मय्येवमनारत प्रहरतो वक्ष्ये न किञ्चित्तव ।
बद्ध वाङ्गपु दृढ शिरोपकुसुमप्रायेषु यत् प्रेयसी
नीता जीवितसर्शय कथय तत्कि वा कृत तेऽनया ॥३॥
पादतले, निपत्य-पतित्वा, एपः- अहम , स्थितोऽस्मि-विद्यमानोऽस्मि,
तथा , मदर्थ-मत्कृते , आलीजन:-सखोजन. , अभिहितापि-निवेदि-
तापि , देवी, पुनः-मूयः , कथञ्चन-केनापि प्रकारेण , प्रसाद-मस-
प्रता, न गता-जाता। यत्र सन्ततिलक छन्दः ॥२॥
हे दुर्दैव-हे दुर्भाग्य !, यदा, चिरस्य-चिराय , मया, भवतःतव ,
भूय.-चार वारम, , अपराधम - अपराधः कृतः , तत्-तस्मात , मयि,
एवम, इत्यम , अनारत-सतत , प्रहरतः प्रहार कुर्वत. , तव न, कि-
श्चित , वक्ष्ये--कथयिष्यामि , (किन्तु ) यत, प्रेयसी-प्रियतमा, शिरीप-
कुसुमप्रायेषु-शिरीपपुष्पवन कोमलेषु , अङ्ग पु-अवयवेषु, दृढ, वद्ध, वा
जीवितसशय-प्राणसन्देह, नीता-प्रापिता, तत, कथय-बहि, अनया-
में प्रेयस्या, ते-तव , किं , वा , कृत-विहिलम । अत्र शार्दूलविक्रीडितं
.
के चरणो मे नत हूँ । इतना ही नहीं , मेरी और से सखियों द्वारा वार-बार
निवेदन करने पर भी महारानी मेरे ऊपर प्रसन्न नहीं हुई ॥२॥
[ सोचकर, दुस को सौस लेकर , आकाश की ओर दृष्टि गडाकर ]
है दुर्भाग्य ! जब चिरकाल से मैंने तुम्हारा दार-व र अपराध किया तव
जो तुम मुझ पर इस प्रकार सतत प्रहार कर रहे हो, इसके लिए मैं तुमसे
कुछ नहीं कहूंगा ; किन्तु मेरो प्रियतमा के शिरीप-पुष्प से कोमल अगो को
दक्षता के साथ बांधकर प्राणी को ही समय में जो डाल दिया सो बताओ,
उसने तुम्हारा क्या बिगाहा ॥३॥

- चतुर्थोऽङ्क [ पुनर्नि श्वस्य सास्रम ] हा वयस्य । त्वमपि मत्कृते जीवित- मपहारयिष्यसि । [ तत. प्रविशति विदूषक ] विदूषक.-[ राजान प्रति ] स्वस्ति भवते प्रिय वयस्याय। (सो. त्थि भोदु पिअवअस्सस्स) राजा-[विलोक्य सहर्षम ] दिष्ट्या जीवति प्रियवयस्यः। विदूषक.-भो वयस्य । देवी विज्ञापयति-मम तातस्य नगरात, इह वन्दिन समागता ।ते इदानीम् आर्य पुत्रसहिताया मम दर्शनसमु- त्सुका वर्तन्ते । अहमपि सुचिरादधिगतबन्धु कुलवृत्तान्ता थोतुमुक- ण्ठिता । तद, यदि रोचते, तदा मया सह अभ्यन्तरस्थानमणिमण्डपे उपविश्य तेपा वन्दिवनानाम् अवकाश ददातु आर्य पुत्र । (भो व. सास्रम -अश्रुणा सहितम् । जीवित -प्राणान् , अपहारयिष्यसि-नाशयि- ध्यसि । स्वस्ति-कल्याणम् । दिष्ट्या-भाग्येन । वन्दिन -स्तुतिपाठका । दर्शनसमुत्सुका ---दर्शनोत्कण्ठा । मुचिरादविगतबन्ध लवृत्ताता-सुचिरात, बहुदिनाना पश्चात अधिगत प्राप्त बन्धुकुलस्य वान्धवाना वृत्तान्न समा. चार यया तादृशी , उत्कण्ठिता - समुत्सुया । अभ्यन्तरस्यानमणिमण्डपे-अ- न्त. पुरस्थितमणिरवचितमण्डपे । अबकाशम् -अवसरम । दुरपनोदामपंवशव- [ फिर आह भरकर आंसुओ के साथ ] हाय मित्र ! तुम भी मेरे कारण अपने प्राण त्याग दोगे? [ इसके बाद विदूषक प्रवेश करता है ] विद्रूपक-[ राजा से ] प्रिय मित्र का कल्याण हो । राजा-[ देखरर हपं के साय ] भाग्य से प्रिय मित्र जीवित है। विदूषर-मित्र । देवी घोषणा कर रही हैं – 'मरे पिता से नगर से ब- दीगण आये हुए हैं। वे आर्यपुत्र के साय मेरे दर्शन के लिए उत्सुक है । मैं भी यापुस का समाचार जानने के लिए बहुत दिनो से सण्टिस। इस- चन्द्रकता नाटिका 7 अस्स देई विण्णावेदि -'मह तादस्त पारादो एत्य पदिणो समाअदो। ते दाणि अज्ज उत्स्सहिदाए मह दस्सण सम्मुस्सुकाओ वहति । अह वि सुइणअहिंगद वधुउन वत्तात सुगिद् उक्कठिा ह्यि । ता जइ रो- अदि तह मए सह अभदरत्यागमणिमडवैहि उवट्ठिदाण ताण वदिज- गाण मोास पदिज्जे अज्जउत्तो ति।) राजा--निशम्य साम, ] सखे तथा दुरसनोदामर्प' वशवदा- या वयमपि मे महाप्रसादो देव्या । तत्कयय का नाम बन्धनान्मुक्तो भवान् । विदूषकः मात्मन एव' सुयाह्मण्यस्य प्रसादेन । ( अतणो एव्व सुवम्हणस्स प्पआदेण ।) राजा-तथापि क्यम, ? विदूषक --कथमिति कथ मन्त्रसिद्धौ (कह ति । अले मतसी- होणा।) दाया-दुरपनोदस्य निवारयितुमशक्यस्य अमषस्य कोषस्य वशवदाया अधी- नाया , महाप्रसाद - महान, अनुग्रह । सुब्राह्मण्यस्य-सतिप्रत्वस्य । स्फुट- लिए यदि उचित समझें तो मरे साथ अन्त पुर के मणि मण्डप में बैठकर आ- संपुर उन बदिषना को दर्शन का अवसर हूँ। राजा-[ सुनकर प्रसनता से ] यह तो महारानी को महती कृपा है , क्योंकि उनके कोष का निवारण बडा कठिन हो गया था। अच्छा, यह बता- ओ कि तुम व धनमुक्त पैसे हुए विदूषक-अपने ही ब्राह्मणत्व के प्रभाव से ! राजा-फिर भी कैसे? विपर -मत्र की सिद्धि होने पर से क्या १ दुरपनोदामार्ग मू° पा० । २ इदमपि मू० पा । ३ ए भूपा। 7 .

चतुर्थोऽङ्कः राना-अल परिहासेन । स्फुटं कथय । विदूषकः-किमन्यत ? बन्धुकुलजनागमनहर्षेण तथा अनुचितति- रस्कृत त्वामेवाद्य आश्वासयितुम् । (कि अण्ण । बन्धुउलजणागम- णहरिसेण तहा अणुइद तुम्ह एव्व अज्ज आसासदु।) राजा-उचितमेवेद तथाभिजात्यस्य देव्याः । कः कोऽत्र भोः? [प्रविश्य कञ्चुकी ] कञ्चकी-आज्ञापयतु देवः । राजा-कञ्चुकिन् ! निवेद्यताममात्य:-सत्वरमभ्यन्तरस्थानम- णिमण्डपसज्जीकरणाय निषेधाय च सकलपुरुषाणाम, । आहूयतां च माधविका। कञ्चको-यदाज्ञापयति देवः ।(यद्आणवेदि देवो)[इति निष्क्रान्तः] स्पष्टम । बन्क्लजनागमनहर्षेण-बान्धवजनानामागमनजन्याह्लादेन , अनुचि- सतिरस्कृतम् -अनुचितप्रकारेण अपमानितम, आश्वासयितुम -सान्त्वयितुम । आभिजात्यस्य-कुलीनतायाः। अमात्य:-मन्त्री, निवेद्यता-कथ्यता , सत्वर-शीतम. , स्थानमणिमण्डपसज्जीकरणाय-अन्त.पुरवर्तिमणिमण्डपालङ्करणाय , सकसपु- राजा-मजाक मत करो, स्पष्ट बताओ। विदूषक-और क्या? बन्युजनो के आगमन से उत्पन्न हर्ष के कारण, उस प्रकार भनुचित ढंग से अपमानित किये गये आप ही को आज आश्वासन देने के लिए। राजा-यह महारानी की कुलीनता के अनुरूप ही है । यहाँ कौन है जो ! [पंचुकी प्रवेश करता है ] कंचुको-आज्ञा दें महाराज । राजा-कंचुको! मत्री से कहो कि अभ्यन्तरस्थानमणिमण्डप को तुरन्त सज- पाएं मोर मन्य समी लोगो का वहां जाना रोक दें। मोर माघ वका को बु. लामो। पंचुकी-महाराज की जो आशा। [कहार जात है ] अभ्यन्तर- चन्द्रकला-नाटिका १२१ [प्रविश्य माधविका] माविका-[सप्रणामम, ] जयतु जयतु मा । (जेदु जेदु भट्टा ।) राजा-माधविकेश्वश्यमिदानी खलु देव्या निदेशेनाभ्यन्तरमणिम- ण्डप प्रसाधयाम । तदाहूयता तन व देवी। माधविका-यदाज्ञापयति भर्ता। (ज आणवेदि भट्टा ।) [ इति निष्क्रान्ता ] राजा-ससे । तदर्शय पन्थान मणिमण्डपस्य । विदूषक -एतु एतं प्रियवयस्य । (एदु एदु पिण्वअस्सो।) [ इन्युमो परिकामत विदूषक -पश्यतु , पश्यतु प्रियवयस्य , एप तेऽभ्यन्तरस्थानमणि- मण्डपालङ्कत सोध । (पेक्खदु पेक्खदु पिअवअस्सो । एसो तुह अ- मदरत्याणमणिमडवालकिदो सोहो।) राजा-[ विलोक्य सहर्षम, ] अये , कथमयम, रुपाणा-समस्तजनाना , निषेधाय-निवारणाय, च । आहूयताम - -माकार्य- वाम । निदेशेन-आशया, प्रसाधयाम विभूषयाम । पन्थान-मार्गम् । सौध -प्रासादा [ माविका प्रवेश करती है ] माधविका-[प्रणाम करके ] महाराज की जय हो। राना-माविका देवी को आता से बभी मैं निश्चित रूप से लभ्यन्त- रमणिमण्डप मे पलूगा । दवी को वही बुलाओ। मापक्किा-वामी जो आज्ञा दें। [ कहकर चली जाती है ] राजा-मित्र । मणिमण्डा का माग बताओ। घिदूपक-इघर से आएँ मित्र | इघर से। [ दोना चलते हैं ] विदूषक-देखो, देखो प्रियमित्र ! यह है आपका सज्जित बात पुर का मणिमण्डप रामा-[ देखकर प्रसन्नता से ] अरे ! कैसे यह - चतुर्थोऽङ्कः १२२ दीप्तोऽनन्तमणिप्रभाभिरभितः पातालशङ्काकरो भास्वत्काञ्चनभूभृदञ्चितरुचिर्भूलोकतुल्याकृतिः । आसीनः सुमनश्चयेन सुरभिः स्वीकजातोपम-- स्त्रलोक्यानुकृति तनोति नितरामास्थानसौधो मम ॥४॥ विदूषकः--तत, त्वमिदानीम, एतमाक्रम्य अनुकुरु महेन्द्रत्वम, (ता तुमं दाणि एदं आम्मिा अणुकरेहि महिंदत्तण । ) [ इत्युभौ आरोहण' नाट्यतः ] ( मम बास्थानसोपः ) अभितः समन्तात,, जनन्तमणिप्रभाभि:- असंख्यमणिकान्तिमिः, पातालशङ्काकर'-पातालभ्रमोत्पादकः (पाताले म. गिभूषिताः अनन्ताः अनन्तादयो वा नागा निवसन्ति इति श्रूयते ), भास्व. काञ्चनभूभृदञ्चितरुचि:-प्रकाशमानस्वर्णगिरेः इव अश्विता महनीया रुचिः कान्तिः यस्य तादृशः (सन, ) , भूलोकतुल्याकृतिः-पृथ्वीलोकसग- रूपवान , सुमनश्चयेन-पुष्पराशिना , सुरभि.-सुगन्धि. , आसीन:- वर्तमानः , मम, आस्थानसौध:-मणिमण्डपप्रासादः, लोक्यानुकृति- त्रिलोक्याः अनुकरण, नितरां-सुतरा , तनोति-विस्तारयति । अत्र शा. र्दूलविक्रीडितं छन्दः ।।४।। आत्रम्य-आरुह्य , महेन्द्रत्वम् -इन्द्रपदवीम् , अनुकुरु-धारयेत्यर्थः । मेरा अन्तःपुर तो पूर्णत. त्रिलोक की समानता धारण कर रहा है--अन- न्त मणियों का प्रकाश चारो ओर छिटक रहा है जैसे पाताल लोक हो (अन- न्त मणियो मे सर्प-मणि की कल्पना है) , भूलोक के समान साकार वाला जैसे सुमेरु पर्वत ही स्वर्ण प्रकाश के बहाने चमक रहा है ( स्वर्ग के असीम प्रकाश मे मुमेरु-गिरि की कल्पना है ) और पुष्पराशि की सुगंध से प्रतीत होता है। जैसे स्वर्गिक वस्तुओं को सुगप विसर रही हो ॥४॥ विदूषक-तो तुम इस पर चढकर इन्द्र को समानता प्राप्त करो। [ कहकर दोनो चड़ने का नाट्य करते हैं । ] १ सारोहगं मू. पा० । .

चन्द्र कला-नाटिका ४२३ विदूषक -एत समणिमण्डपस्तम्भमलकरोत प्रियवयस्य ।(एद स भाणीमड वयव अलकरेदु पिअवअस्सो।) राजा-[ नाट्वेनोपविश्य ] सखे । उपविश तावत । [विदूषक यथोचितमुपविशति ] [तत प्रविशति सपरिवारा देवी] देवी-[ राजान प्रति ] जयतु जयतु आयपुत्र । ( जेदु जेदु अ- व्यउत्तो ।) राजा- -प्रिये । उपविश तावत। देवी-[ यथोचितमुपविश्य ] आज्ञापयत्वार्यपुत्र मम पितुनंगर- वन्दिना समागमनाय । { आणवेदुः अय्यउत्तो मह पिदुणोणअरवदिण समागअणाण) राजा-क कोऽत्र भो ? [प्रविश्य कञ्चुकी ] कञ्चकी-आज्ञापयतु देव । पारोहणम -आक्रमण , नात्यत -अभिनयत । नाटयेन-नाटकीयतापूर्वकम्। विदूषक-प्रियमित्र । अब इस मणिस्तम्भ और मण्डप से युक्त महल को शोमित कीजिए। रजा-[ बैठने का नाटय करता हुआ ] बैठो मित्र । [ विदूषक उचित रीति से बैठना है ] [ इसके बाद परिचारिकाओ समेत महारानी प्रवेश करती है। देवी-[ राजा के प्रति ] जय हो । आयपुत्र को जय हो। राजा-प्रिय । बैठो। देवी-[ उचित रीति से बैठकर ] पितृनगर से पाए हुए दिनों को माने के लिए मायपुत्र प्राज्ञा दें। राजा-कौन है यहाँ [ कचुकी प्रवेश कर ] को-महाराज याज्ञा दें।

- चतुर्थोऽङ्कः १२४ राजा-कञ्चुकिन,' ! त्वरित प्रवेशय पाण्ड्यदेशागतो वन्दिनी । कञ्चको-यदाज्ञापयति देवः । [ इति निष्क्रम्य वन्दिभ्यां सह प्रविशति ] वन्दिनौ-[ राजान प्रति दूरत: सप्रणाम करावुन्नमय्य ] जयतुः जयतु देवः । देव, ब्रह्मायुभव। मूर्द्ध व्याधूयमानध्वनदमरघुनीलोलकल्लोलजालो- भृताम्भः क्षोददम्भात् प्रसभमभिनभःक्षिप्तनक्षत्रलक्षम् । करी-हस्तौ , उन्नमय्य-उपरिकृत्वा । ब्रह्मायु:-ब्रह्मणः सदृशम, वायुः अथवा ब्रह्मदिनपर्यन्तमाकल्पान्तमिति यावत, आयुः वयः यस्य तादृशः । मूद्ध'व्याधूयमानध्वनदमरघुनीलोलकल्लोलजालोद्ध ताम्भःक्षोद- दम्भात -मूर्धनि मस्तके व्याघूयमाना शरीरसञ्चलनेन सञ्चाल्यमाना अतएव ध्वनन्ती शब्दायमाना या अमरघुनी गङ्गा तस्याः लोलात, चञ्चलात, कल्लो. लजालारा महातरङ्गसमूहात, उलू तानामुक्षिप्नानाम, अम्भः लोदानां मल- विन्दूला दम्भात्, छलात , अभिनभः- मति , प्रसभं-हठात , क्षिप्त. नक्षलक्षम -क्षिप्त विकीर्ण नक्षत्राणों तारागा ल समूहो यस्मिन, खा- दृशम, , ऊध्वंन्यस्तानिदण्डभ्रमिभररभसोद्यन्नभस्वत्प्रवेशभ्रान्तब्रह्मा- राना-कंचुकी! पाड्यदेश से आये दोनो बन्दिननी को शीघ्र बुलायी। कंचुकी-महाराज को जो आज्ञा । [कहकर जाता है और फिर दोनो बन्दिजनों के साथ प्रवेश करता है ] दोनों वन्दी-[राजा के प्रति-दूर से ही प्रणाम सहित हापो को उठाकर] जय हो, देव की जय हो !! ब्रह्मा की आयु देव को प्राप्त हो । पहला-गगा को पचल तरगमालाएँ जो सिर के ऊपर पूमती रहती है और उनसे शिते हुए जल-कणों से मालूम पड़ता है, जैसे सागों द्वारे मावाश में फेंके जा रहे हों , ऐसी शोमा से युक्त और ऊपर उठे हुए पैर के घूमने से उत्पन्न प्राण्ड पापु के पार मे जैसे ब्रह्माण्ड हो पूमने सगत है। १ पश्चन् मू. पा०। २ प्रधिपति मू.पा-1 मध्यम मू०पा. - १२५ चन्द्रकला-नाटिका ऊवं 'न्यस्ता निदण्डभ्रमिभर रभसोद्यन्नभस्वत्' प्रवेश-४ । भ्रान्तब्रह्माण्डखण्ड प्रवितरतु शुभं शाम्भवं ताण्डवं ते ॥५॥ विश्वस्ताः कटकच्छन्ना मुक्ताहारविभूषणाः । अरोपेऽपि सरोपेऽपि स्वाय देव रिपुस्त्रियः ॥६॥ अपर:- , अलिकुललुहिलकलाले तुह कलवाले गता पलिभिन्ने कुलति पिअनुगपेस निगपलपति पिम्पकेत पाशुपाले ॥७॥ ( अरिकुलरुधिरकराले तव करवाले कुलस्त्री पाशुपाले ७॥ ण्डखण्डम् -ऊ न्यस्तः उत्तोलिनः यः अडिघ्रदण्डः चरणदण्डः तस्य या भ्रमिः धूगनं तस्याः भरेण आतिशय्येन उत्पन्नो यो रमसः वेगः तेन उद्यत, उत्पद्यमानो यो नभस्वान वायुः तस्य प्रवेशेन प्रान्तं पूणित ब्रह्माण्डखण्ई य- स्मिन, तादृशं . शाम्भव-शम्भुसम्बन्धि , ताण्डवम, उद्घ तनत्यं, ते-भव- 3:, शुभ-मङ्गल , प्रवितरतु-अर्पयतु । अत्र सग्घराच्छन्द, ॥५॥ देव! -महाराज !, त्वयि-भवति , अरोषेपि-अकुपितेऽपि , सरो. पेऽपि-क्रुद्धेऽपि ( सति ) रिपुस्त्रियः-शत्रुनार्यः, कटकच्छन्ना:-क. ऋणावृताः , मुक्ताहारविभपणा-~-मुक्तामालालबुताः (सत्यः) , विश्व-. स्ता:-विधवाः ( भवन्ति ) । अत्र अनुष्टुप्छन्दः ॥६॥ अरिकुलरुधिरकराले - अरिकुलाना शत्रुसमूहानां रुधिरेण रक्तन कराले भयङ्करे , तवते , करवाले-सङ्गे. ऐसी शोभा वाले शकर का ताण्डव नृत्य तुम्हें मगल प्रदान करे ॥५॥ देव! पापके क्रोध और अकोष की ओर विना ध्यान दिये भी स्वर्ण और मुक्ता के आभूषणों से युक्त शत्रुओ की स्त्रियाँ तुमसे विधवा हो गयी हैं ॥६॥ दूसरा-शत्रु-समूह के शोणित से भयकर, आपकी तलवार पर......nn १.उदं मू० पा० । २ भमिभव मू० पा० । ३ भास्वत, मू० पा० । ४ प्रवेशद. मू० पा०। शिवं मू. पा० । +- ............... ...||७॥

1 चतुर्थोऽङ्कः राज्यं मुञ्चति मरहट्ट । कोप कोशलो न पृच्छति । आन्ध्रो' वि- शति गिरिरन्ध्रम् । अङ्गः बङ्गनमपि न पृच्छति । भङ्गः पतति हा- भङ्गः । वङ्गः सप्ताङ्ग न सज्जयति। पञ्चगौडः पञ्चत्व लभते। गुर्जरो न गर्जति । उत्तालतालारवालः परिपन्थिशक्त हस्तात् स्खलति अरिराजमत्तगजसिंहयिन् , पुण्य भवतु हयवरम आरोहतु। राजा वन्दिनी ! कुशल पाण्ड्येश्वरस्य ? धन्दिनौ-देवस्य प्रसादेन कुशलमेव सप्तस्वङ्ग पुनः स्वामिनः । किन्त्वेतदेव दारुणं दु समधिगत्य सकलमेव सुख दुःखमेव मन्यमानो वतंते नो भर्ता। मरहट्ट.-मरहट्टनरेशः । कोशल.-कोशलपति. । आन्ध्र.-आन्ध्रदेशा. धिपतिः, गिरिरन्ध्रम्-गिरिगुहाम । अङ्गः-अङ्गदेशाधिपति', अङ्गनमपि--- राज्यसीमानमपि । हामङ्गः-हावङ्गनरेशः । बङ्गा-वङ्गेश्वरः , सप्ताङ्गं- राज्यस्य सप्ताङ्गानि-राजा , मन्त्री, मित्र, कोश., राष्ट्र, दुर्ग, सेना इत्या- ख्यानि , न सज्जयति-न सज्जीकरोति । पञ्चत्व-मृत्युम । उत्तालवालकर- वाल-भयानकखगः, परिपन्यिशक्तहस्तात, शत्रोः क्षमहस्त त , स्खलति- पतति । अरिराजमतगसिंहजयिन् हे महाशत्रुरूपमत्तगजत्य सिंहरूपेण विजेत.! पुण्यं-कल्याण, हयवरम -अश्वश्रेष्ठम् । दारुणं-भीषणम्, अधिगत्य-प्राप्य । मरहट्टराज अपना राज्य त्याग रहे हैं। कोशलनरेश खजाने की चिन्ता नहीं कर रहे है । बाघनरेश पर्वत की गुफा में प्रदेश कर रहे है । अग-नरेश राज्यसीमा की इच्छा छोड़ रहे है । हावग-नरेश पतित हो रहे है। वगपति अ- पनी सेना के सप्तागो को नहीं सजा रहे है । पञ्चगौड-नरेश मृत हो रहे हैं। गुर्जरपति गरज नही रहे है । शत्रु के शक्तिशाली हाप से भयानक तलवार गिर रही है । हे महाशत्र रूपी गजरान को पछाड़ने वाले सिंह! आपका कल्याण हो और बाप उत्तम अश्व पर मारोहण करें। रामा-बन्दियो ! पाण्ड्येश्वर कुशल हैं ? दोनों वनी-महाराज की पा से स्वामी सब माति कुशल है, किन्तु १ आन्द्रो पू० पा १२ पञ्चगउरमू०पा ।

चन्द्रकलानाटिका १२७ देवो-अहो, किनु मम तातस्य दारुण दुःखम् ? घन्दिनों-यत्किल वनविहारावसरे देव्याः समानोदरप्रभा काचि- कुमारिका केनचिदपहृत्य नीता। भाभरण भवनाना कपण निर्माणनं पुण्यस्य विधेः। मदन युवनयनाना निवासभवन सुलक्षणाना सा ॥८॥ वेवी-[साबम ] भगिनि ! कुतः पुनर्वर्तसे' ? ( भगिणि , कुदो उणव?ौदिर) राजा-वन्दिन् ! तदानीमन्विप्यते नव सा ? वनविहारावसरे-वने विहरणकाले , समानोदरप्रमा-सहोदरा तुल्यकान्ति- मती च , अपहृत्य नीता-अपहरणं कृत्वा अन्यत्र प्रापिता। सा-तव भगिनी , भुवनाना-चतुर्दशलोकानाम् , आमरणम -आ. भूषण , विषैः-विधानुः, निर्माण पुण्यस्य-रचनाकोशलस्य , कपणं- शाण. , युवनयनाना–युवकनेत्राणा, मदनम्-आनन्ददायिका , सुलक्षणा- नाम, उत्तमगुणाना , निवास भवनम -आवासस्थलम, (बासीन ) । पत्र गीतिकाच्छन्दः ॥८॥ भगिनि-है स्वसः! । तदानी-तस्मिन् समये । प्रहिता: -पिताः, यही दारण दु‘स पाकर समस्त मुखो को दुख की भाँति ही हमारे स्वामी मान . , देवी-अहो! पिताजी के लिए कौनता दारुण दुःख है ? दोनों पली-यही कि यन-विहार के समय देवी की पहोदरा प्रमा नामक कुमारी किसी के द्वारा हरण कर ली गई । वह संसार के लिए भूपण , विधाता की रचनानिपुणता की कसौटी, युव- को के नेतो मत करने वाली और सुलक्षणों की खान है | देवी-[ बोसू के बहिन ! अब तुम कहाँ हो। राजा-बदी! क्या वह दूढ़ी नही जा रही है ? १वत्तसे मू.पा.

१२८ चतुर्थोऽङ्कः वन्दिनी-सर्वतः खलु तदन्वेषणाय प्रहिताश्चारद्विजवन्दिनो भर्ना'। राजा-तदेतावन्तं कालम अधिगतो नवाऽनन्तरो वृत्तान्त एतस्याः। वन्दिती-अवधारयतु देवः । अनन्तरमान्ध्रदेशप्रहितः प्रतिनिवृत्या. स्मत्स्वामिपुरतो विप्रवः केथितम् । एषा किल वनविहारक्रीडा- वशेन कुतोऽपि संहतिभ्रष्टा एकाकिनी केनचित्शवरेणाधिगत्यान्ध्रदे- शारण्यवासिने निजस्वामिने समर्पिता। देवी-[ ससंभ्रमम् ] भो भगिनि ! त्वमपि विन्ध्यवासिन्या उप- हारीभविष्यसि ? चारद्विजवन्दिनः-चाराः गुप्तचराः द्विजाः ब्राह्मणाः वन्दिनः स्तुतिपाठकाः भा-स्वामिना । अनन्तरः-पश्चात्कालीनः । अवधारयतु-शृणोतु , आन्ध्रदे- गप्नहित:-आन्ध्रदेशे प्रेषितः , प्रतिनिवृत्त्य-परावृत्त्य , अस्मत्स्वामिपुरतः- अम्माक स्वामिनः अग्रे, विप्रवय:-द्विजवरः । बनविहारक्रीडादशेन-वनवि. हरणक्रीडानिमग्नेन , संहतिभ्रष्टा-समूहात, पृथग्भूता , शवरेण-किरातेन , आ- न्ध्रदेशारण्यवासिने-आन्ध्रदेशस्थवने निवासं कुर्वते । विन्ध्यवासिन्या:-विन्ध्या- रण्यस्थितायाः भगवत्याः , उपहारीमविष्यसि बलिभविष्यसि । शवराधिपेन- धोनों पन्दी-स्वामी ने सर्वत्र गुप्तचर, ब्राह्मण और बदियो को उसको दूं ढने के लिए भेज दिया है। राजा-तो इतने समय में पता नहीं लगा कि उसका क्या हुआ? । रोनों बन्दी-देव! सुनें-बान्ध्रदेश को भेजे गये ब्राह्मणो ने लौटकर स्वामी को बताया है कि वह वन-विहार की क्रीडा मे सीन हो अपने संहतियों से छूट: कर अकेली हो गई और किसी शंबर ( जंगली मनुष्य ) ने लेकर उसे अपने स्वामी को समर्पित कर दिया। देवी-[व्याकुल होकर ] बहिन! क्या तुमभी विन्ध्यवासिनी (देवी) के लिए - उपहार बन जाओगी? १ मत्रा मू० पा०।१ किटावशेन मू०पा० . . .3B चतुयोः १२९ बन्दिनौ-नत शबराधिरेन कृष्णपक्ष चतुर्दशीपूजनीयाया विध्य- वासिन्या समुचितोऽयमुपहार इति सहपमात्मनो निवेश स्थापिता। देवी-[नि श्वस्य सोद गम, ] भो भगिनि त्वमति विन्ध्यवा- सिन्या उपहारीभविष्यसि ? ( भगिणि तुम वि विशवासि गीए उप- हारी हुविस्सेदि) [ इति रोदिति ] राजा-बन्दिन् । कथय ततस्तत । वन्दी-अनन्तर कृष्णपक्षचतुर्दश्यो भगवत्या विन्ध्यवासिन्या पुर- स्तादुपवेश्य उचमितनिशितकरवालककरेण शवरस्वामिना इतरकरण केशेष्वाकाष्य कुररीव मकरुण सोद वेगमुच्चकै रुदन्ती 'कुमारिके ! म्मरेष्टदेवताम इतीय भणिता। किरातपतिना , कृष्णपक्षचतुर्दशीपूजनीयाया -कृष्णपक्षस्य चतुर्दश्या तियो पूना कर्नु योग्याया , उपहार नैवेद्यम , निवेशने-गहे , स्थापिता--रक्षि ता। पुरस्तात. ~अग्रे , उद्यमिननिशितकरवालककरण-उद्यमित उतोलिन . निशित तीक्ष्ण करवाल खड्ग एकस्मिन, करे येन तादृशेन , केशेनाकृष्य- कुमारिकाया केशान गडीवेति यावत , कुररीव-कुररीपक्षिणीव , उच्चक- तारस्वरेण , रुदन्ती-फ्रन्दन्ती , भणिता कथिता। दोनों बन्दी-उस वाद शवर स्वामी ने उसे कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के , अवसर पर पूजनीय विस्यवासिनी के लिए उपयुक्त उपहार के रूप म मानकर हर्ष के साथ अपने घर में रख लिया। देवी-[आह भरकर उद्वग के साय] बहिन । तुम भी विष्यवासिनो के [ कहकर रोने लगती है ] -वदी हो, उसके बाद क्या हुआ बंशे-पश्चात. वृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शवर स्वामी ने एक हाथ से उसो येशों को और दूसरे में नगी तलवार लिए , उसको विन्ध्यवासिनी के सामने उपस्थित दिया । वह व्याकुल होकर जब कुररी पक्षी को तरह करम दिन करने नगी तब उसने उससे कहा-'कुमारी' नपने इष्टदेव का स्मरण - लिए उपहार हो जाओगी। ? फो०-६ चन्दकला-नाटिका देवी-[सोद्धग सास्रम् ] हा भगिनि । अवसानमपि गति । (हा महिणि, ओसाणपि गच्छेसि ।) [इति शिरस्ताडयन्। रच्चकै रोदिति] राजा-प्रिय समाश्वसिहि, तमाश्वसिहि । पृछाम स्तापदुपरि- तनवृत्तान्तम् । देवी-पृच्छत्वार्यपुत्र । अह पुनरात्मनोऽपि न प्रभवामि । (पु. छंदु अय्यउत्तो । अह उण अत्तओ वि ण पहयाम्हि ।) राजा-बन्दिन्। कथय ततस्तत ? मधी-ततो योवाहितस्य तत्र भवतो देवस्य विक्रमाभरणाख्य- स्य सेनापते केनचिद्विन्ध्यबासिनी दर्शनार्थ गतवता खगधारिणा अनुचरपुरुषेण समालोक्य त दुरात्मान शवरस्वामिन देव्या प्रत्युपा. यनीकृत्य समानीय सेनापतये निवेदिता । तेन च श्रीमत साम्राज्या- धिकृतस्य श्रीमदमात्यसुबुद्ध सम्मुख प्रहिरोयमिति कथितमस्मत्स्वा- मिपुरतो विप्रवर्यः अवसानमपि-समाप्तिमपि मृत्युमिति यावत । उपरितनवृत्तान्तम,-अ- प्रिमसमाचारम । यात्मनोऽपि न प्रभवामि-स्थवशे मास्मि । यात्राप्रहितस्य मामाया प्रचलितस्य , प्रत्युपायनीकृत्य हवेति यायत , निवेदिता-समर्पिता। साम्राज्याधिकृतस्य-राज्याधिकारिज , प्रहिता-पिता । कि प्रतिपक्षम- देवी-[व्याकुल होकर अश्रुपूणनयनो से] हाय पहिन तुम मर रही हो। [ सिर पीटती हूई जोर-जोर से रोती है ] रामा-प्रिये धीरज रखो, धीरज । इसके आगे का वृत्तान्त पूछता हूँ। देवी-पूछिए बार्यपुत्र । मैं वास्तव म अपने वश में नहीं हूं। राजा-वदी | आगे क्या हुषा घताओ। दोमो वदी-इसके बाद आपके सेनापति विनमाभरण के एप पचर में जो हाथ मे तलवार लेफर विध्यवासिनी के दर्शनार्थ उधर हो गया हुआ था, उसे देखा और उस दुरात्मा शवर - स्वामी को मारकर राजकुमारी को ला धेनापति को दे दिया । इस सेनापति ने फिर आपके सुबुद्धि नामक ममी को नाकर समर्पित किया, ऐसा ब्राह्मणो ने हमारे स्वामी को बताया है। १ सोरसामुच्चकै मू०पा० । २ पृयाम मू०पा । ३ ससुख पू०पा० । - . । चर्चाङ्क: घेवी-[निःश्वस्य सानन्दम् ] वन्दिवर! गृहाणेदं पारितोषिकम् [इति वन्दिने आभरणानि दत्त्वा] तत् कथय एतं वृत्तान्तं श्रुत्वा किं प्रतिपन्न पित्रा । (वंदीअर , गेह एद पालितोसि । ता कहेहि । एब उत्ततं सुणिअ किं पडिवणं पितृएण।) बन्दी'-शृणोतु भर्तुदारिफा । अनन्तरंचैवं निबेद्य प्रहिता वयं श्रीमतश्चरणसन्निधिं पाण्ड्येश्वरेण । एपा खलु सकलभूपालमौलिमणि- रजितचरणारविन्दस्य मे जामातुश्चित्ररथदेवस्यैवोषिता । तदमा- त्यस्य गोचरेण सुविहित विधिना । तदिदं द्विजनिवेदित यदा च- वसन्तलेखा अनुजानाति तदा मदनुमतमेव गृह्णात पाणिमस्या देवः । किं कृतम । भतृ दारिका-राजकुमारी । सकलभूपासमौलिमणिरञ्जितचर- णारविन्दस्य-सकलाना भूपालाना राज्ञा मौलिमणिभिः मुकुटमणिमिः रञ्जि- सौ रक्तीकृतौ चरणारविन्दौ यस्य तादृशस्य । अमात्यस्य-मन्विणः, गोचरेग- विषयेण संरक्षणेनेति यावत् , विधिना--विधामा , सुविहितं साधु कृतमः । वसन्तलेखा-चित्ररथदेवस्य पली महाराशी , अनजानाति-अनुज्ञां ददाति, मदनुमतम, मया आदिष्टम अस्या' पाणि गृह्णातु-नया विवाहं करोतु । घो- आनन्द की सांस लेकर ] हे श्रेष्ठ वदी ! यह पुरस्कार प्रहग करो। [ कहती हुई बन्दी को आभूषण देकर ] बताओ कि पिताजी ने क्या किया? चंदी-सुनिए राजकुमारीजो ! तव पाण्येश्वर के द्वारा हम लोग आपके परणो मे पह रहकर भेजे गये हैं कि यह कन्या हमारे गामाता चिनरयदेव के ही उपयुक्त है, जिनके चरण-कमल समस्त राजामओ के मुकुट मणियों से शोभित रहते हैं । तो मत्री ( सुबुद्धि ) की देख-रेख में उपस्थित कर विधाता ने ठीक ही रिया । अब यदि ब्राह्मणो के इस निवेदन पर वसन्तलेखा अपनी मनु- मति दे तो मेरी आशा से ही महाराज इससे विवाह कर लें। १ अयं मू० पा० नास्ति 1२ मत पारिका पू०पा० । ३ प मू०पा।

चन्द्रकला-नाटिका १३२ . देवी-आर्यपुत्र! तदिदानीम् अमात्यमेवाकारयित्वा' पृच्चत कुत एपा इति । ( अय्यउत्त, ता दाणी अमच्चंएव्व आकारिअ पु- च्छदु । फुदो एसा ति।) राजा-कञ्चुकिन् ! आहूयताममात्यः । कञ्चुकीयदाज्ञापयति देवः । [इति निष्क्रम्य अमात्येन सह प्रविशति ] अमात्य.-[ राजानमवलोक्य ] अये, कथमिह महाराजः । हरिरिव विबुधाभिनन्दितोऽसो शिशिरमरीचिरिवाश्रयः कलानाम, । तपन इव परा सहप्रतापः शिव इव भूतिविभूपितो विभर्ति ॥६॥ आकारयित्वा-आह्वयित्वा । विवुधाभिनन्दितः-वियुधः पण्डितः (विष्णुपक्षे देवैः ) अभिनन्दितः प्रशसितः, हरिः इव-विष्णः इव, कलानाम -चतु पष्टिकलानाम, (च- पक्ष षोडशकलानाम. ) शिशिरमरीचिः इव--चन्द्रः इव , सहप्रताप:- प्रतापेन तेजसा सहितः , तपन इव-सूर्य इव , भूतिविभूषितः-भूत्या ऐ. श्वर्येण (शिवपक्ष भस्मना ) विभूषितः अलङ्गतः , शिव इव-शङ्कर इद, असो-र -राजा परा प्राधान्य शोमा वा, बिभर्ति-धारयति ।।. वी-आर्यपुत्र ! मंत्री को बुलाकर पूछिए कि इस समय वह कुमारी - कहाँ है ? राजा-कचुकी ! मत्री को बुलाओ। पाचुकी-महाराज की जैसी आशा । [ ऐसा कहकर चला जाता है और पुनः मत्री के साप प्रवेश करता है] मंत्री-राजा को देखकर ] अहो, महाराज यहाँ फ्यो ? ये तो विबुधो ( विद्वानो) द्वारा अभिनन्दित विश्णु के समान, कलाओं (गुणो ) के आश्रय शीतरश्मि चन्द्रमा के समान, प्रताप (शौर्य-प्रताप) से युक्त सूर्य के समान तथा भूति ( ऐश्वयं ) से विभूषित शिव के समान शोमा को धारण कर रहे है १ अमात्य एवाकारयित्वा मू० पा. २ पृछा मू० पा० । ३ देव मू.

तत्काले ठ, - तृतीयोऽङ्कः [दूरतः सप्रणायम ] जयतु जयतु देवः । राजा- सुबुद्ध । अलमनेन अन्तरङ्गस्य भूतस्य भवतोऽपसरणेन । तदेह हि । इत एवोपविश तावत् । अमार - [ सविनयमुपसृत्य यथोचितमुपविशति ] राजा--सुबुद्ध ! कथयत कुत एपा कन्यका या खलु विक्रमाभर. न ते प्रेषिता? अमात्य --देव ! क्थ नाम स्वामिनोऽपि सम्मुखे वितथालाप ! तदवधारयत. देव.। इस त गुणाधिकारलक्षणैरनन्यरूपेत्याकलय्य मस्त भूमिपति भी पाणिमस्या ग्रहीष्यति । लक्ष्मीः स्वयमुपागत्य वरमस्मै प्रदास्यति । इत्यमानुपा गिरमाकर्ण्य स्वामिने देया परिणायनीयेत्याकाड६- यन्तरङ्गस्य मतस्य-अतिनिकटवर्तिन परमात्मीयस्थेत्यर्थः, अपसरणेन-- दूरोपवेशनेनेत्यर्थः । वितयालाप -असत्यभायम । अवधारयतु-शृणोतु । गु- पाधिकारलारणे अनन्यस्पा-सर्वगुणसम्पना सुलक्षणा अनुपमसुन्दरी च भाकमय्य-विचार्य । अमानुपा गिरम -आकाशवाणीम् , प्राकण्यं -युवा [दूर से प्रणाम सहित , देव की नय हो , जय हो राजा-नुयुद्धि । तुम हमारे परम अन्तरग हो, इसलिए दूर जारर बैठना ठीक नहीं । आनो , यही बैठो। मंत्री-नम्रता पूर्वक निकट माकर बैटता है ] राणा-सुवुद्धि । बतायो, वह कन्या कहाँ है , जिसे विक्रमाभरण ने तुम्हारे पास भेजा था। मंत्री-देव ! स्वामी से असत्य वयो कहूँ? देव ! यह अलौकिक गुणो से युक्त अनुपम सुन्दर है -ऐसा सोचवर बौर उसी समय- पृथ्वी पर का जो भी राजा इसका पाणिग्रहण करेगा उसके लिए लक्ष्मी स्वय प्राकर वर प्रदान करेंगी। -यह आकाशवाणी सुनकर' स्वामी को दे दू और उनसे विवाह करार १ महिपति मू. पा०। २ प्रदास्यतीरयमानुपा मू० पा० ३ देखें . . . भू० पा०।

- - चन्द्रकला-नाटिका पमाणेम' देवी प्रकोपभीरुणा च स्वयमशक्नुवता च मया मम वशः नेय सखीपदे स्थापनीयेति देव्या समपिता, तथा चान्त पुरचारिणी मिमामवलोक्य स्वयमेव परिणेष्यति महाराज इति । [ राजा देव्या मुखमवलोकयति ] देवी-आर्यपुत्र | या किल एतेन समर्पिता संवैपा। पृच्छ ता. वत् वन्दिन किनामधेया सा मे भगिनीति । ( अय्यउत्त, जाकिर एदेण समप्पिदा सा एव्व एसेति पुच्छ दाव व दिण किं गामवेआ एसा मह भहिणि ति।) राजा-वन्दिन् । किनामधेया सा पाण्ड्येश्वरस्य दुहिता वन्दी-देव । चन्द्रकलेति । राजा-[ निशम्य सानन्द स्वतगम् ] मम प्रियामा चन्द्रकलेव । - [विचिन्त्य ] सत्यमेतत् । परिणायनोया-विवाहयितव्या , देवीप्रकोपभीरुणा-देव्या । महाराज्या प्रको. पात, कोषात् भोरणा बिभ्यता , वशजा -कुलोत्पन्ना, देव्या समर्पिता-देव्य दत्ता । अत्र सम्बन्धमात्रविवक्षया षष्ठी । अन्त पुरचारिणीम् -अन्त पुरे -- तस्ततो गच्छतीम , परिपेयति-विवाह करिष्यति । इस इच्छा से , देवी के भय स भीरु स्वय को असमर्थ जानकर मेरे वश की है कहकर सखी रूप में प्रतिष्ठित करके रखने के लिए देवी को सौंप दिया, जिस से अन्त पुर में रहते हुए इसे देखकर महाराज स्वय ही परिणय फर लेगें । [ राजा देवी का मुख देखता है ] देवी-आर्यपुत्र | जो इन्होंने समर्पित की थी, वही यह कन्या है । वदी से पूछे कि मेरी बहिन का क्या नाम है । राजा-वदोपाण्ड्येश्वर को उस पुत्री का क्या नाम है ? वन्दी-महाराज | चन्द्रकला ( नाम है)। राजा-[ सुनकर आनन्द के साथ अपने मन में ] मेरी प्रियतमा ही पाद्रफमा है । [ सोचकर ] यह सत्य है कि १माणे मू०पा०।२ स्वयमशवबुवानेन मू० पा० । ३ पृछ मू. पा.। . .

. N चतुर्थोऽङ्कः कनक मणिगणखचित घनसारो वासित कुसुमै । द्राक्षामृतेन सिक्ता चन्द्रकलाया कुले जनिर्महति ॥१०॥ देवी-[निशम्य स्वगतम, ] अहो, कि खलु भणिष्यति मे तथा निघृणानि आचरितानि श्रुत्वा मातापितरौ । [ प्रकाशम ] आर्य- पुत्र तदिदानीम् एतयो पुरो दर्शयित्वा ज्ञातव्य या मम अमात्येन समपिता एपा सा नवेति । ( अहो, कि क्खु भणिस्सदि मह तहा णि. ग्घिणापि आअरिदाई सुणिय जणआ। अय्यउत्त, ता दाणि एदयो पुरो दसिअ जाणव्व जा मह अमच्चेण समप्पिदा एसा सा ण वेत्ति ।) राजा -यद्रोचते भवत्ये। कनक-सुवर्ण , मणिगणखचित-मणिगण रलसमूहै खचित जटित ( सत् अधिक शोभते ) , धनसार-कर्पूरः , कुसुम-पुष्पं . वासित सुगन्धित ( सन अधिक शोभते ) , द्राक्षा-मृद्वीका , अमृतेन-सुघया, सिक्ता-क्षरिता ( सती अधिक शोभते ) , चन्द्रकलाया , जनि -जन्म महति कुले-उच्चवशे ( अधिक शोभते ) ॥१०॥ निशम्य-श्रुत्वा । भणिष्यति-कयिध्यति । निणानि-निर्दयानि , मा. परितानि-आचरणानि । एतयो-वदिनो , पुर - अग्रे । यद्रोचते भवत्य- भवती यया प्रसीदतीत्यर्थ । अन 'हच्यर्याना प्रीयमाण' इति सूत्रेण चतुर्थी । जैसे सोना मणियो से जडा जाने पर, कर्पूर पुष्पो से सुवासित किया जाने पर और द्राक्षा (अगर ) अमृत से सिक्त होने पर अधिक घोभित होती है इसी तरह चन्द्रकला उच्च कुल म जन्म पाकर अधिक शामित हुई।॥१०॥ देवी-[ सुनकर मन मे ] हाय ! मेरे निर्दयतापूर्ण कार्यों को सुनकर माता पिता क्या कहेंगे ? [ प्रकट ] आर्यपुत्र तो अब इन दोनो के सामने ससे उपस्थित करके जान देना चाहिए कि मत्री द्वारा समर्पित की गई युवती यही है मयवा नहीं। राजा--जो आपको हो। . , - चन्द्रकला-नाटिका राजा- देखो-[ जनान्तिकम् ] सखि रनिकले। तदिदानी त्वं त्वरित गत्वा बन्धनान्मोचयित्वा सज्जीकृत्वा सह सुनन्दनया अन आनय चन्द्रकलाम । (हला, रदिबले, ता दाणि तुम तुवरिद गदुअ व धणा- दो मुक्किय सजिम सह सुणदणाए एस्थ आणेहि चदअला।) रतिकता-यदाज्ञापयति प्रियसखी। ( ज आणवेदि पिअसही।) [इति निष्क्रम्य समलङ्गता सुनन्दनाद्वितीया चन्द्रकलामादाय प्रविशति] -[ विलोक्य सानन्द सस्पृह स्वगतम, ] पश्चबाणविजयाधिदेवता लोकलोचनचकोरचन्द्रिका । सृष्टिरद्भुतकरीयमीदृशी निर्मिता कथमिव प्रजासृजा ॥११॥ सज्जीकृत्वा-विभूष्य । सुनन्दनाद्वितीया-सह सुनन्दनयेत्यर्थः । पञ्चवायविजयाधिदेवता-मामदेव विजेत्री देवी इव, लोवलोचनचको रचन्द्रिका-लोकाना जनाना लोचनानि नेत्राणि एव चकोराः चकोरपक्षिणः तंषा कृते चन्द्रिका ज्योत्स्ना ( इव ), इय-चन्द्रकला , ईदृशी , अद्भुत- करी-आश्चर्यकरी , सृष्टि.- रचना , प्रजासृजा - विधात्रा , कथमिव , निर्मिता-रचिता । अब रथोडताच्छन्द. ॥११॥ देवी-[ कान मे ] सखी रतिक्ला ! सुम शीघ्र जाओ और बन्धन से मुक्त करके समाकर मुनन्दना के साथ चन्द्रकला को ले आओ। रतिफला-नियससी की जंसी बाशा। [ कहकर चली जाती है , पुन सज्जित चन्द्रकला को सुनन्दना ये साफ संकर प्रवेश करती है।] राजा-[ देसर आनन्दित हो उत्सुक्ता पूर्वक मन मे ] इस युवती को ब्रह्मा ने किस प्रकार रचा-यह सो कामदेव की विजय की अधिष्ठात्री देवी सी, लोगो के नेत्र घरोर में लिए चन्द्रमा की भांति मोर धरती की मद्भत रचना सी है ॥११॥ .

पीरिदस्सि।) चतुर्थोऽङ्क. 17 धन्दिनौ-[ विलोक्य सानन्द सासम ] सान्तः पुरस्य पाण्ड्येश्व- रस्य भाग्योदयेन समागतासि नौ नयनगोचरम् । चन्द्रका सा-[ विलोक्य वाष्पमुत्सृजति ] देवी-[ उत्थाय निविड परिष्वज्य ] समाश्वसिहि भगिनि , स- माश्वसिहि । अतिनिघणया मया अकारण परिपीडितासि । ( समा- स्ससिहि भगिणि समास्ससिहि । अदिणिग्घिणाए मए अकालण पलि- [ इत्युभे वाष्पमुत्सृजत ] वेथी-[ स्वगतम् । अलमिदानो मम पुनरपि तथा कठोरेण व्यव- सितेन । स्वयमेव मया आर्यपुत्राय मपंयितव्या एपा । एव खलु यास्मनो महत्त्वसम्पादन मातापिनोरपि काडि क्षतसाधनम् । तथा कर्षिताया भगिन्या आश्वासन , भर्तुर्जीवितसशयात्परिरक्षण, परम- सान्त पुरस्य- अन्त पुरनिवासिनीसहितस्य, नयनगोचरम -दृष्टिपथम् । पापमुत्सृजति-रोदिति । निविड-गाढम , परिष्वज्य-आलिङ्ग य । अति. निमया-अतिनियया, परिपीडितासि-क्लेशितासि । व्यवसितेन--का- यण । महत्वसम्पादन-गोरखवधनं , काहि क्षतसाधनम् --इच्छापूर्ति । कद- बिताया-परिपीडिताया , आश्वासन-सान्त्वनम , जीवितसशयात धोनो वन्दी-[ देखकर आनन्दात्रु सहित ] अन्त पुरवासियो तथा पाण्ड्येश्वर के भाग्य से तुम हम दोनो को दृष्टिगत हुई । चन्द्रकला-[ देखकर आंसू बहाती है ] देवी-[ उठकर उसका गाढ आलिंगन करके ] धीरज रखो बहिन । धीरन रखो । अत्यन्त निर्दया मैंने अकारण तुम्हें पीडित किया। [ कहकर दोनो आँसू बहाती हैं ] देवी-[मन मे ] अब मुझे पुन. वैसा कठोर व्यवहार नहीं करना चा- हिए । बल्कि मुझे स्वय ही इसे आर्यपुत्र को समर्पित कर देना चाहिए । इस प्रकार मेरा महत्त्व बढेगा और माता-पिता की इच्छा पूर्ण होगी। उस प्रकार पीडित की गई बहिन को सान्त्वना मिलेगी, स्वामी के प्रागो की रक्षा होगी ।

राजा- चन्द्रकला-नादिका ११- लक्ष्मीसम्पादन च भवन्ति । [ इति चन्द्रकला करे गृहीत्वा प्रकाशम. ] आयपुत्र ! श्वशुरयोर्ममापि अनुमत्या कर इदानों गृहाण एनाम । (अल दाणि मह पुणोब्बि तहा कठोरण वासिदेण ता सुअ एव्व मए अय्यपुत्तस्स समप्पिदब्वा एसा । एव्व क्खु अत्तणो मह- तणसंवादण मादापिदराण कविखदसाण ताए कदत्थिदाए भगिणीए आसासण भत्त णो जी इदससआदो पलिरक्खण परमलच्छी सादण अ होन्ति । अय्यउत्त , मादापिदरा मह पि अणुमदीए करे दाणि गेण्ह एदा।) [ इति राशे समर्पयति ] -[ सहर्षम् ] अहो महाप्रसादो देव्याः। [इति चन्द्रकला करे गृहीत्वा स्पर्श नाटयति ] [ नेपथ्ये शवध्वनिः, सर्वतो दुन्दुभिशब्दः ] वन्दिनी-जयतु जयत् देवः । दिष्ट्या चन्द्रकलापाणिग्रहणेन स.. पंथाऽनुगृहीतः पाण्ड्येश्वरी देवेन । राणा-[ सर्वतो विभाव्य साश्चर्यम् ] अये , कर्यामदानीम- प्राणसन्देहात , परमलक्ष्मीसम्पादनम, महालक्ष्मीप्राप्तिः । अनुमत्या-अनुरो घेन • एना-चन्द्रकला , गृहाण--स्वीकुरु । महाप्रसाद.-महाननुग्रहः । गोर महालक्ष्मी प्राप्त होगी। [चन्द्रकला को हाथ से पकडकर प्रकट रूप से ] - मार्यपुत्र ! पाप अपने सास-ससुर तथा मेरी अनुमति से इसको स्वीकार की निए। [ कहकर राजा को समर्पित करती है ] रामा-[ हर्ष के साथ ] अहा । देवी को बडी कृपा है [ कहता हुआ शाद्रकला को हाय से पकडकर स्पर्श करने का नाट्य करता है ! नेपप्प मे शंखध्वनि होती है और चारो ओर नगाडे का शब्द सुनाई पडता है] रोनों वन्दी-जय हो, महाराज की जय हो । माग्य से आपने चन्द्रकला या पाणिग्रहण करके पाण्ड्येश्वर को अनुगृहीत कर दिया। रामा-[सब मोर आश्चर्यपूर्वक देखकर ] अरे ! इस समय से .

- पतुः दृश्यन्ते द्युतयोऽपि विद्युत इत्र भूयन्त एतानि च भ्राम्यद भगरतानि कगागकारेण मिथायहो । अभ्येनि द्विपगण्डमग्लगलदानामुपल्लालिनी-- गन्धेन द्विगुणीत परिमल पायोगहागामपि ॥१२॥ अमात्य देवदेव । अहमेव मन्ये इदानी मनु समकारिकुलक- लिनकनककनमगमुपविगतपिरीयाराभिरामिच्यमाना कर- द्युतयोऽपि-प्रमाणा अपि, विद्युत इन-डिन इन , दृश्यन्ने-प्राली. पयन्ते , एतानि कङ्कगत ग कारेग-गगन , मियागि-गिरितानि, माभ्यद्भगकानि-ग्राम्यता मञ्चरता मङ्गागा घमरागा तानि नामा, अहो आश्चर्य , धूपते-पाक रे , दिपाइसाइनानानाम्वुक ल्लोलिनीगन्धेन-द्विपाना गजाना गण्डमण्डसात गाउम्पलार गा भरतो दानाम्बूना मदाना कल्लोलिया नया: ग-पेर दिपगुगीन पायोरहाणा- मपि-मलानामरि, परिमल - पुगन्ध , अभ्येति-पर्वत प्रसरति । मन शार्दूलविक्रीहिः छद ॥१२॥ देवदेव-राजाधिरते. ममदारकुलकलित कनककनशमुखविगलदविरल. पीयूषधारामि -ममईः मदरत करिकुल हस्तिवृन्द कलिनाना धारिताना पानाकल गाना स्वर्ण घटाना मुखै विगलतीभि क्षरलीभिः अविरमाभि' सा- द्रामि. पीयूपधाराभि अमाप्रवाहे . ग्रामिधमाना-पथमाना , करक- प्रकाश भी बिजली की तरह दिखाई दे रहा है , अहो । यह ककों की मनकार से मिश्रित होकर विवरणगील मोरों का गुजन सुनाई पड़ रहा है। (फिर) हायियो के गडस्पल से बहते हुए मद की नदियो से द्विगुणित होकर कमल की सुगध बिखर रही है ॥१२॥ मंत्री देवदेव ( सम्राट ) | मुझको प्रतीत होता है कि त्रिलोक-सा. म्राज्य को लक्ष्मी स्वय, सुलयणो से युक्त चन्द्रकला का पाणिग्रहण करने के कारण आपके पास, हर्षित होकर, मदयुक्त हाथिया द्वारा पकडे गये सुन्दर- स्वर्णकलश के मुख से सतत प्रवाहित सुघाधार से अभिषिक्त होती , सुन्दर .

.. चन्द्रकला-नाटिका १४. कमितकमलपरिमलमिलदलिपटल्झकारमुसरिताशान्तरा प्रणयप्रण. सनिखिलमुरासुरमुकुटतट घटितमपिगणकिरणश्मिीरितचरणनखरा भ- गवन्मुकुन्दहृदयानन्दसन्दोहकन्दलीकन्दभूता दस्तिकमलदललोचना अपाङ्गतरङ्गविश्राणनाय' त्रिभूवनसाम्राज्यलक्ष्मीः साक्षाद-युपैति भवन्तमस्याः सुलक्षणायाः परिग्रहानन्दवशवदेति । - नितकमलपरिमलमिलद लिपटला कारमुखरिताशान्तरा-वरे हरे मलितस्य, घृतस्य कमलस्य परिमलेन सुगन्धेन मिलतः सगतस्य मलिपटलस्य भ्रमरसमूह स्य प्रकारेण गुञ्जनेन मुखरित निनादितम, आशा.तर दिशामध्य यया सा- दशी, प्रणयप्रणतनिखिलसुरासुरमुनु स्तचरितमणिगणकिरणकि ीरितचरण- नखरा-प्रणयेन प्रेरणा प्रताना नतामा निसिलसुरासुराणा समस्तदेवदाम- पाना मुफुटतर किरीप्रातिषु घटिताना जाताना मणिगर ना रत्नसमूहामा किरणः कातिभिः किसरित. चरणनखर: स्थुरितः चरणनखरः पादनखः यस्याः तादृशी , भगवामु बुदहयान.दस.दोह व सीमदभूता-भगवतः मुकु- न्दस्य विष्णाः हृदये चित्त ये मानन्धाः प्रमोदा: तपा सन्दोह: समूहः एव क- ग्दसी क्ष पविशेषः तस्याः कदभूता मूलभूता , दलिसकमलदललोचना-दलित- कमलदले विष सिंतकमल पत्र व लोचने यया. तादृशी . स.मात , त्रिभु- दम मामलक्ष्मी:-दिलोषासामाग्यश्रीः , स्याः, सुलक्षणाया:-शुभलक्षण सम्पाया., परिहामा ६शवदा-विजयान दाधीना (भूरवा)प्रपाङ्गकरण- विश्राणनाय-पाटाक्षानीय, मदत-वाम , अन्युति-प्रागरसति । हाथो में धारण किये हुए कमल की सुगधि से प्रावृष्ट भ्रम रदल के गुजार से दिशामो को मुखरित करती , सकल सुरासुर के मुकुट सचित मणियो के प्रकाश से शोभित चरणोवाली , जो भगवान विष्णु के हृदय मे सनिहित था- नन्द रूपी वृक्ष की मधुरता के समान है , हम सब को आनन्द वितरित करने के लिए पसीमा रही हैं। १ आपाहपतरड गणविश्राणनाय मू०पा। .

राजा- चतुर्योधः १४१ [ सर्वे निगम्प सन्वरमुत्तिष्ठन्ति। ततः प्रविशति परितश्वामर- रूपवीज्य माना ययानिर्दिष्टा लक्ष्मीः ] -[ विलोक्य सानन्दम् ] भगवति! कृतार्थोऽस्मि । [इति' पादयोः पतति ] लम्मी - उत्तिष्ठ वत्स ! चन्द्रकलापरिग्रहेण प्रसमाहमिह ते साक्षाकार तदभिमतमात्मनो वर वृणीव । रामा-[ उत्थाय साञ्जलिबद्धम ] माक्षात्कारफल तद प्रणिगदेको वा मुकुन्दप्रिये मातयेपु कृपामयो निस्तनि कोडाकटाक्षोऽपिते । परित-सन , चामरे चालमरत , अबीयमाना-वियूयमाना , पयानिर्दिष्टा-उपरिवर्णिता । कृतार्य -कृतात्य । साक्षात्कारम-दर्शनम, :, पमिममम अभीष्टम । मुकुन्दप्रिये-हरिपलि ! , तव-भव याः , साक्षात्कारफर-दर्शन- फरं, को वा-जन , प्रगिगदेव-कययेत. ? मात -जननि , येपु- भनेषु , ते, कृपामय -दयातु , कोडाकटासोऽपि - क्रीडापाङ्गवीक्षणमपि । निपतात, तेपा, भवनद वाराङ्गगोणय -गृहद्वाराङ्गणमय , क्षणेन-तर कालम, उन्मददिड मतङ्गानघटाघण्टारवाडम्बर -उन्मदाना मत्ताना दि- [ समो सुनकर शीन उड़ जाते हैं । तब ऊपर वर्णित रूप में लक्ष्मी, जिन पर चारो ओर स चंबर डुनाया जा रहा हो , प्रवेश करती हैं ] राजा--[ देखकर प्रसनता से ] भगवती ! कृतार्थ हूँ। [ कहकर चरणो पर गिरता है ] लक्ष्मी-उठो वस ! उठो। चन्द्रकला के पाणिग्रहण से मै प्रसन्न हूँ और तुमको दर्शन दे रही हूं। अभीष्ट वर मांगो। राजा-[ उठकर हायो को जोडे हुए ] है विग पनी । तुम्हारे सामरिकार के फल-लाम को कौन कह सकता १ कृतास्मिीति मू. पा० । - चन्द्रकला-नाटिका तेषामुन्मददिह मतङ्गजघटाघण्टारवाडम्बर- जर्जायन्ते मुखरा क्षणेन भवनद्वाराङ्गणक्षोणयः ॥१३॥ तपापि किश्चित ब्रवीमि--- आचन्द्रतारक मात- मा विमुञ्च कुलं मम । भूयादविरत भक्ति- स्त्वयि मेऽप्यभिचारिणी ॥१४॥ लक्ष्मी:-एवमस्तु । किं ते भूयः प्रियमुपहरामि ? राजा--भगवति, नमसजाना दिग्गजाना घटाना समूहाना घण्टारवाणा घण्टाशब्दानाम मा. सम्बर. भाटोप, मुखरा.-दाय माना:, जायते भवन्ति । मन शार्दूल- विकास्ति छन्दः ॥१३॥ मात:-जननि ! , मम-मे , कुल ~ देशम, , आचन्द्रतारक- यांबच्चन्द्रो नक्षत्राणि च व्योम्नि तिष्ठेयुस्तावकालपर्यन्तमित्यपं. , महि , विमुञ्च-त्यज । त्वयि भवत्या , मे~मम , अध्यभिचारिणी- ऐकान्तिको , भक्ति:-श्रद्धाभावः , अविरत-निरन्तर , भूयात- छतु । मन मनुष्टुप छन्दः ।।१४।। हैं ? माता! तुम्हारी पामयी दुष्टि जिनके ऊपर पट जाती हैं, उनके भवनो के द्वार और मांगन की भूमि तत्काल मदमत्त दिग्गजो के घटा- शब्दो के विस्तार से मुसरित हो उठती हैं ॥१३॥ छो भी कुछ निवेदन कर रहा हूँ माता ! जन तक चन्द्रमा और तारे (आकाश मे ) रहें तम तक मेरे कुल को न छोडना और तुममे मेरी अविचल भक्ति सदा बनी . -म- . रहे ॥१४॥ समी-ऐधा ही हो। और कौन सा तुम्हारा पिप शर्य कसे? राजा--भगवती!

. . चतुर्थोऽद्ध देधीयमेव गदिता प्रसादमासादिता प्राणसमा प्रिया मे। स्वमिन्दिरै मन्दिरसश्रितासि प्रिय पुनम किमत पर स्यात् ।।१५।। तथापीदमस्तु राजान सुतनिर्विशेषमखिला पश्यन्तु नित्य प्रजा जीयासु सदसद्विवेकपटव सन्तो गुणग्राहिण ! शस्यस्वर्ण समय समधिका सन्तु स्थिरामण्डले भूयादव्यभिचारिणी विजगतो भक्तिश्च नारायणे ॥१६॥ इय, देवी-महाराशी , एवम -इत्य ,प्रसाद-प्रसन्नता, गदिता-गता मे , प्राणसमा-प्राणतुल्या, प्रिया-कान्ता, आसादिता--प्राप्ता , त्वम् , मन्दिरसश्रितासि-मदिरे भवने सथितामि विराजमानासि, इन्दिरे-लदिम, मत परम-अस्मात अधिक , पुन -भूय , मे कि प्रियम-अभीष्ट स्यात -भवेत् 'अब उपजातिच्छद ॥१५॥ अखिला --समस्ता , राजान --भूपा , नित्य-सवदेव प्रजा - अनान , सुतनिर्विशेष पश्यन्तु-पुत्रवत, पालयस्वित्ययं । सदसद्विवेकप- टव -सदसद्विवेके पटव समर्या गुणग्राहिणश्च सन्न (जना ) जीयासु - सर्वोत्कर्षेण यत ताम । स्थिरामण्डले-भूमण्डले समधिका -अतिशया शस्यस्वर्णसमृद्धय-शस्याना पायाना स्वर्णाना धनानाञ्च समृद्धप वृद्धय, सन्त-भवतु । निजगत-विजगद्वासिनो जनस्य, नारायण-विष्णो, अन्य भिचारिणी -चिरस्थायिनी , भक्तिश्च , भूयात, अत्र शादूलविक्रीडित पद ॥१६॥ ये महारानी प्रसन हो गई , प्राणो के समान प्रिया मुझ मिल गई और आप स्वय मेरे महल म विराजमान हैं । इदिरे ! इससे बढकर और कौन सा मेरा प्रिय हो सकता है ? ॥१५॥ सभीराजा पुत्रवत प्रजाओ का नित्य पालन करें। प्रजायें सत कौर असत का विवेक करने म पटु तथा गुणग्राही होते हुए उत्कप के साथ रह । भू मण्डल म धन पाय की प्रचुर समृद्धि हो। और तीनो लोक (के निवासियो) की नारा- यण म चिरस्थायिनी भक्ति हो ॥१६॥ तो भी यह हो- - " अत्र-अमिन, प्रसादगुणयामनि-प्रचारमत्व निवातसून इद, नीति- रम्ये-नाल्या नर्दन रम्ये विभूपिते , माधुर्यज्ञालिनि-मधुरिमपुरले । निरस्तसमतदोपे निरस्ता. ममता. समस्ताः सकला. दोषाः बुटयो य. स्मात पत्र वा ताशे, श्रीविश्वनायकविवागन्तप्रवाहे-धीविश्वनाप- फवे: वचनामृतयारया , धीय.-सज्जनाः, मत्सरम - अन्यसुभदेवन, अपास्य-विहाय , चिरस्य-चिराप , मज्जन्तु-लान्तु सकं इन्द. ॥१७॥ प्रसादगुण से पूर्ग , नीति-विभूषित , माधुर्य सम्पन्न तथा समस्त दोनों से रहित , श्री विश्वनाय कवि की इस वाणी रूमो अमापारा मे , घोर पुरुष मत्सर ( हाह) का त्यागकर चिरकाल तक स्नान करें। [ सभी चले जाते हैं ] । সব বাবা- -- -- यह ग्रन्य समाप्त -::- ? 7 शुद्धि-पत्र [ हिन्दी-अनुवाद मे कुछ छुटे हुए अश को यहां देखें ] पृष्ठ १४ अनुवाद पक्ति ६ वे वाद- ही परिणय कर लेंगे और मैंने यह कह कर दि यह मेरे कुल की कन्या है, अाप अपनी सम्बी के रूप में मान कर इसका पालन करें, महारानी को सौंप दिया। [ सोच कर ] तो इस समय पुन किससे और किस प्रकार इसका ममाचार मालूम करूं? क्या कारण है कि अन्तपुर म रहनवाली सुनन्दना, जिमका मैंने बहुत देर हुई वुलवाया था आ नहीं रही है पृष्ठ ३१, अनुवाद पक्ति ५ के बाद- चन्द्रकला-[ दीर्घ नि स्वास छोड कर स्वय ] हृदय । दुष्प्राप्य की ओर अनुरक्त तुम्हारी दशा ऐसी ही होनी चाहिए। के पृष्ठ ८०, अनुवाद पक्ति ७ बाद- 'सखी' रति-पुरुप सदा ही अविश्वसनीय हैं' यह अश दुहरा उठा है, इसे न पढा जाय। पृष्ठ ८७, अनुवाद-पक्ति ५ के वाद- विदूपक-मैं मी अब (अपने) अभीष्ट-सम्पादन के लिए जा रहा हूँ।

TIDYA
BOMBAY-7)
BAAD
VAN

Chandrakala Natika

Author
Sahityacharya,prabhat Shastri
Title
Chandrakala Natika
File name
Chandrakala Natika
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2012/08
Publisher
Allahabad.,devabhasha Prakashan Daraganj
Language
Sanskrit
Pages
177
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312933
Barcode
99999990321671.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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LQpNv58hAPw
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