Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Pratap Charitamrth
Front matter
महाराणा प्रतापसिंह
1
१
ओंकार आदर्श चरित माला का ६ वा पुष्प
प्रताप चरितामृत
संक्षिप्त चरित और विचारों का निदर्शन)
.
।
वतन पर हम फिदा होंगे,
वतन प्यारा हमारा है
यही महबूब है अपना
हम इसके यह हमारा है।
-
०
लेसक
पं० नन्दकुमार देव शर्मा
[ भूतपूर्व प्रधान सम्पादक "विहार यन्धु" भार्य मित्र" संयुक
सम्पादक सद्धर्म प्रचारक, सहायक मन्त्री हिन्दी.
साहित्य सम्मेलन आदि
सम्पादक
स्वर्गीय पण्डित ओंकारनाथ वाजपेयी
प्रकाशक
याप्यतीर्थ पं० विश्वम्भरगाय घाजपेयी एस० आर०पी०
अध्यक्ष
ओंकार मेस एवं ऑफार गुफडिपो प्रयाग !
'पण्टिस विश्यम्भरताय पापेयीये प्रबन्ध से भोफार प्रेस प्रयाग में या
तृतीयघार २०००] मन् १६२३ I.मूल्य
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प्रकाशक की भूमिका । अाज हम अपने प्रिय पाठकों के समक्ष महाराणा प्रताप सिंट को जीवनी तृतीयवार प्रकाशित करते हैं इसमें सन्देह नहीं, कि जनता ने हमें पूर्ण रूप से उत्साहित किया है क्यों कि इस आदर्श चरित माला में कई पुस्तके तो आठ वार तक प्रकाशित हुई और वह हाथों हाथ विक गई वास्तव में जनता के अन्दर आदर्श एवं महा पुरुषों की जीवनी पढने का जितना अचार और उत्साह होगा देश में तथा जाति में उतनी ही जागृति होगी । यों तो आगाल वृद्ध वनिता को आदर्श जीवनिया का स्वाध्याय करना चाहिये परन्तु उन नन युवको के लिये कि जो अभी नवीन कोमल पौधों की तरह है, कि उन्हें जिधर चाही मोड सक हो, ये आदर्श जीवनियां प्रकाश-स्तम्भ का काम देती हैं जिनके सहारे ये संसार-सागर की उत्ताल तरगो के बीच में मी अपनी जीरन नौका सरलता एव शान्ति पूर्वक खे सक्त हैं। यस प्रकाशक तथा लेखक के उद्देश्य और उद्योग उसी दिन सफल होंगे जय कि जाति और देश इन नर रतों के मूल्य को समझे गा और नव युवक-दल इन के जीवन को अपना लक्ष्य मान कर जीवनोद्यान में प्रवेश करेगा । लेखफ की लेसनी के विषय में कुछ भी लिखना ऐसा हो व्यर्थ है जैसे गुलाब पर गुलाबी रंग चढाना ययोंकि लेसनी स्वर ही अपने चमत्कारिक अन्तर्भावों को एक बार पढने से जागृत कर देती है-रहा पूजनीय पं० नन्द कुमार देव शर्मा जी के 'विषय में, ये तो साहित्य-सरोवर के पुराने विहार करने वाले में है और वृद्ध साहित्य सेवी हैं इन्हों ने ही अपनी लेखनी से वर्गीय पूज्य पिता प० ओडारनाथ वाजपेयी जी के समय में इस आदर्श जीवन चरित माला को गू थना आरम्भ किया था । पूज्य पितृ देव के दिवं गत होते हो यह माला काटों में उलझ गई थी पर उस ईश्वर की दया से कि जिस के चुटकी
८.४ )
-
,
पजाते ही राई का पर्वत खडा हो जाता है जिसकी लीला को
निहार कर जवान में लगाम लगानी पड़ती है, उसी को असीम
अनुग्रह से आदर्श जीवन चरित माला का हार फिर तरयार
होने लगा है
*: बंस यह चारित माला के हार का उपहार उन्हीं सजनों
के भंट है कि जिनकी कृपा के हम अब तक ऋणी हैं
.
1
,
रे
निवेदन लो।प्यारे पाठफो! आज आप की सेवामें महाराणा प्रताप सिंह का जीवन चरित समर्पित है। यह ओंकर आदर्श-चरित माला की छटवीं संख्या, और उस माला में मेरी यह पाचवी भेट है। जिस तरह से आप लोगों ने "आदर्शचरितमाला" में मेरी पूर्व पुस्तके स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, महात्मा गोयले और स्वामी रामतीर्थ को अपनाया है, वैसे ही मुझे आशा है कि यह मेरी लघु पुस्तक भी आपके पसन्द आवेगी। सन् १९१३ में, जय मैं दिल्ली से “ सद्धर्मप्रचारक" की सेवा परित्याग करके, अपनी जन्मभूमि मयुरा में आया था तव मेरे अनुरोध से, मथुरा की आर्यमित्र समा ने अपने यहा संसार के कतिपय महापुरुषों के जोनन पर कुछ व्याख्यान रक्से थे उनमें से महाराणा प्रतापसिंह और छत्रपति शिवाजी के जोवन चरित पर मेरे व्यारयान हुये थे, तब से कई मित्रों का उक्त दोनों व्याख्यानो को छपा देने का अनुरोध हो रहा था इधर ओंकार प्रेस के स्वामी और मेरे प्रिय मित्र पण्डित ओंकार नाथ याजपेयी का आग्रह-महाराणा प्रताप का जीवन- चरित लिसाने का होरहा था, अतएव मैंने यह छोटा सा जीवन चरित लिख दिया है, हिन्दी में कई जीवन चरित महाराणा प्रताप के नाटक उपन्यासो के रूप में हैं, दो एक ऐतिहासिक रोति पर भी लिखे गये हैं। इस जीवन चरित तथा अन्य जीवन चरितों में क्या अन्तर हैं, इसकी छान वीन करनेवाले पाठकों को दूसरे चरितों से इस चरित को मिला कर पहना चाहिये तब उन्हें इस जीवन चरित तथा अन्य जीवन चरित का कुछ भेद मालूम होगा।
यह जीवन चरित टाड साहब कृत राजस्थान के इतिहास
के आधार पर लिखा गया है पर जिन ऐतिहासिक पण्डितों
का टाड साहबसे मतभेद है, उनकी सम्मति भी मैंने फुटनोट
{ पाद टिप्पणियों) में दे दी है । यदि कुछ भूल चूक हुई हो,
अथवा कोई नयी वात सूझे तो पाठक सूचित करने की कृपा
करें। यथा सम्भव, उस पर ध्यान दिया जायगा।
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ادب
-- प्रस्तावना पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च - महात्मानां च चरित श्रोतव्यं नित्यमेव च, (महाभारत) *" There is not petty state in Rajasathan that has not had it's Thermopyloe and scarcly a city that no produced its Leonidas -"Tod's Rajasahtan एक सहृदय बङ्गाली लेखक ने क्या ही अच्छा कहा है कि राजपूताना भारतवर्ष का हृदय है। जैसे मनुष्य का प्रधान पल हदय में रहता है और हृदय के बल से जैसे प्राकृत महत्व सूचित होता है वैसे ही भारतवर्ष की प्रधान शक्ति राजपूताने में है । एक समय राजपूनाने की महाशक्ति से ही भारतवर्ष का गौरव सुप्रतिष्ठित हुआ था। इस समय भारतवर्ष की महाशक्ति राजपूताने में हो या न हो, परन्तु आज भी इस गई बीती दशा में इस मध पतन के समय में मेवाड समस्त राज- पूताने का, नहीं नहीं समस्त भारत का शिरोमणि है। आज भी चित्तौड़ का किला राजपूताने की तथा भारतवर्ष के हिन्दुओं की वर्तमान दशा पर धाड मार कर रो रहा है कौन ऐसा हिन्दू सन्तान और सहदय व्यक्ति है जिसका फलेजा पुराण, इतिहास साक्ष्यायिकायें तथा महात्मानों के चरित्रों को नित्य सुनना चाहिये। राजस्थान में ऐसी कोई छोटी सी भी रियासत महीं है, जिसमें कभी थमा पुलो की भाति युह न हुमा हो और कोई ऐतो छोटी मगरी नहीं है, जिस में लियोनिहाल की भाति पोर पुरुष मे जन्म म जिया हो। लेखक । ।
प्रस्तावना 4 - चित्तौड का दुर्ग देख कर न फटता हो। चाहे जैसे पत्थर क हृदय का मनुष्य क्यों न हो पर ,चित्तौड के किले को देखकर उसकी रुलाई आये विना नहीं रहती है। यदि कोई मुझसे पूछे कि हिन्दुओं का सञ्चा तीर्थ कौन सा है तो मैं बिना किसी संकोच और बिना प्रतिवाद के भय के, यही उत्तर दूगा कि हिन्दुओं का सच्चा तीर्थ चित्तौडगढ और पञ्जाब की पवित्र भूमि चिलियानवाला है। इन दोनों स्थानों से बढकर भारत घर्ष में तो क्या ससार में भी और कोई स्थान है या नहीं इस. में संदेह है । इतिहास लेखकों ने ग्रीस के लियोनिडाज और मिलताइडिस की प्रशसा, के घडे २ पुल बाधे हैं पर सच पूछिये तो इस भारतमाता की गोद में अनेक लियोनिडाज और मिलताइडिस खेले हैं। अरे-प्राचीन सभ्यताभिमानी और तीर्थयात्रा के अनुरागी हिन्दुओ! एकवार आखे खोलकर देखो तो सही कि 'तुम्हारी प्राचीन सभ्यता की गवाही चित्तौड़गढ़ दे रहा है। उसकी एक२ दीवाल पर तुम्हारी प्राचीन सभ्यता के निशान बने हुए हैं।, चित्तौडगढ का एक २ कोना एक एक ईट तुम्हारी प्राचीन सभ्यता का पता दे रही है। तीर्थयात्रा के प्रेमियो! एक बार चित्तौडगढ की यात्रा करो तो सही उसकी दीवालों पर तुम्हें साक्षात् धर्म के दर्शन होंगे, जिस शान्ति को खोज करते २ तुम बावले हो रहे हो वह सच्ची शान्ति चित्तौडगढ़ के भीतर पैर रखते ही प्राप्त होती है। क्या देखते नहीं हो कि कौन सा ऐसा देश है जहाँ की अबलाओं ने भी प्रवल अत्रुओं के दात खट्टे किये हैं जहाँ की स्त्रियों ने अग्नि में कूदकर अपने अपने धर्म की रक्षा करके आन्मिक वल का परिचय दिया है, जहर के सुकुमार कोमल बालकों ने भी अपने देश की रक्षा के निमित्त अपने प्राणों की आहुति दे दी है। यदि इस ससार में - - प्रस्तावना । ऐसा कोई पवित्र स्थान समझा जा सकता है तो वह पवित्र स्थान भारतवर्ष का मुकुटमणि मेवाड है जहा के निवासियों ने स्वतन्त्रता देवी की प्रसन्नता के लिये अपने सून की नदी यहाई थी। जहा की राजपूत सन्तान के जीवन का मूलमन्त्र भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का यह चाक्य "हतो घा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्" रहा था । क्या उसी पवित्र भूमि मेवाट और उसके नायक महाराणा प्रतापसिह की कथा सुनना हिन्दू मान , पवित्र कर्तव्य नहीं है ? आओ पाठक ! आओ! बाज उसी पवित्र भूमि और उसके नायक प्रात स्मरणीय महाराणा प्रतापसिंह की आलोचना करके अपने दृदय को पवित्र करें। मेवाड का इतिहास आदि से लेकर अन्त तक आत्मोत्सर्ग का इतिहास है। मेवाड के इतिहास में आत्मोसर्ग के जैसे ज्वलन्त और आदर्श दृष्टान्त मिलते हैं वैसे दुनिया के दूसरे देशों के इतिहास में मिलने असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हैं। मेवाड के आत्मोत्सग का इतिहास ऐसा पैसा नहीं है वह मुर्दादिलों को जिन्दा फरनेवाला इतिहास है। सूपी हड़ियों में गून उवालने वाला है निराशा रूपी सागर में गोते साने. वालों को चित्तौड का इतिहास आशा रूपी वल्ली है । इयती हुई जातियों को चित्तौड का इतिहास तीनके का सहारा है । अधिक क्या कहें मत्यु रूपी शय्या पर पडे हुये राष्ट्रों को सजीवनी बूटी है पर दुस है कि हमारी हिन्दी भाषा में मेगाड के कितने ही इतिहास बन जाने पर भी राष्ट्रीय दृष्टि से मेवाड के इतिहास की किसी ने आलोचना नहीं की है। जिस देश के निवासियों का यह कथन था कि महात्माओं के चरित तथा इतिहासों का नित्य पाठ होना चाहिये उस देश में वर्तमान समय में इतिहास की आलोचना न होना अत्यत ९ । .
१०
प्रस्तावना
है। भारतामाता के प्रत्येक आत्मगौरव प्रिय स्वाभिमानी पुत्र
को विशेषत हिन्दुओं को मेवाड का इतिहास और उस के
ध्रव तारा महाराणा प्रतापसिह का चरित नित्य-प्रति पढना
और सुनना चाहिये।
1
पहलापरिच्छेद)
मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्व वृत्तान्त
जय जय जय चित्तोर दुर्ग,
जय गढ सिर रत्न जगत विख्यात ।
जिसने धर्म प्रेम के कारण,
सहे शत्रु ओं के आघात ।
जिसके पत्थर कह तक पर,
लिसा हिन्दुओं का इतिहास ।
जिसको देस हमें हो सकता,
अपनी दृढता का आमास ॥
श्रीचर
।
पाठक महाशय ! हम घडे असमञ्जस में पडे हुये हैं कि
आप को मेवाड और उसकी राजधानी चित्तौड का क्या परि-
चय दें भला कभी कोई उङ्गली के इशारे से भुवनभास्कर का
परिचय दे सकता है ? हमारी भी इस समय ऐसी ही दशा
हो रही है कवि लोग अपनी कल्पना शक्ति के सहारे छोटी २
घटनाओं की बडी २ महिमा वर्णन करते हैं। छोटी घटनाओं
को पढा चढा कर वर्णन करने में पाठकों को आश्चर्य मे डाल
देते हैं पर हम न तो कवि हैं न हम में करपना शक्ति है न
हमारे मेवाड की ऐतिहासिक घटनाए ऐसी छोटी है जिनका
चढा वढा कर वर्णन किया जाय।न मेवाड की घटनायें किसी
.
महाराणा प्रताप पुत्र हुथा उसका नामवाप्पारावल पडी।वाप्पा बडे प्रतापी थे उन्होंने केवल अपना सोयाहुआ राज्य ही प्राप्त नहीं किया बल्कि अतुलनीय पराक्रम से बड़े बडे वीरों के दांत खट्टे कर दिये थे। विजय में ही लोकप्रियता निवास करती है जो लोग अपने बाहुवल से यश सौरभ के शिखर पर चढना चाहते हैं विजया देवी उनको जयमाल पहनाये विना नहीं रहती है। अतएवं शनैः शनै विजयादेवी धीर वर वाप्पा से भी प्रसन्न हुई अपने अनन्त पराक्रम के बल से वाप्पा ने चित्तौड पर अधिकार प्राप्त कर लिया। वाप्पा केवल चितौड पर ही अपनी ध्वजा पताका फहरा कर शान्त नहीं हुए थे किन्तु उन्होंने इंस्पहान कन्दहार काश्मीर इराक ईरान तृरान : आदि पश्चिम देशों के बादशाहों को भी परास्त किया था। वाप्पा को अवस्था चितौड के राजसिहासन पर विराजते समय केवल १४ या १५ वर्ष की थी । सन् ७२८ ई० में उन्होंने चितौड का राजकाय ग्रहण किया था और ईरान तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया था । उन्हीं वाप्पा- रावल के वशधरों के हाथ में आज तक मेवाड़ चला आता है। केशवादिस बडे प्रतापी थे, ईडर के भीर राजा ने उनको अपना उत्तराधिकारी बनाया, ईडर तथा उसके आस पास के स्थानों में केशवादित्य के वंशधर नागादित्य तक राज करते रहे। नागादित्य की मृत्यु के समय वाप्पा की अवस्था केवल तीन वर्ष की थी, जिस लक्ष्मणावती ने केशवा- दित्य की रक्षा की थी, उसके वंशधरों ने वाप्पाकी रक्षा की थी। वाप्पा परम प्रतापी था, उसका नाम फालभोज था, परन्तु प्रजा-प्रियताके कारण उसका नाम वाप्पा पडा । यदि हमारे पाठकों की इच्छा हुई तो इस जीवनी का लेखक यहुत शीघ्र वाप्पारावल की जीवनी पाठको की सेवा में उपस्थित करेगा। लेखक * देखो-Anuals and Antiquities' of Rajasthan - . - मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्व वृत्तान्त १५ DA चितौड के राजपूतगण आज भी वाप्पारावल को अपना आदि पुरुष कहकर देवतुल्य पूजा करते हैं । वाप्पारावल के बहुत से पुत्र हुये थे जिन्होंने अपने भुजा चल से दूर दूर तक अपना अनन्त वैभत्र चढाया था। इस समय उनके वंशधरों के अधिकार में उदयपुर इङ्गरपुर प्रताप गढ़ और और पासवाड ये चार रियासतें हैं। नेपाल का खतराज भी सीसोदिया वश के राजपूतों का बतलाया जाता है औरङ्गजेच के दात सट्टे करनेवाले प्रात स्मरणीय शिवाजी महाराज भी सीसोदिया घश के ही कहे जाते हैं । अस्तु हम मेवाड की इस समय स्वतन्त्र इतिहास लिखने नहीं बैठे हैं इस लिये कालक्रम की घटनाओं को छोडकर केवल यही कहना है कि वाप्पारावल की नवीं पीढी में रावल खुमान बहुत प्रसिद्ध हुये थे उन्होंने एक भोपण युद्ध में * खुरासान के एक आक्रमणकारी के दात सट्टे किये थे उस समय भारतवर्ष का विशेष अघ पतन नहीं हुआ था आज कल की भाति उस समय भारतवर्ष के हिन्दू अपने आत्मसम्मान को तिलाञ्जलि नहीं दे चुके थे, उस समय तक हिन्दू नरेश साधीनता और एकता. देवी की उपासना से मुह नहीं मोड़ चुके थे। एक हिन्दू नरेश की विपत्ति में सब हिन्दू नरेश सम्मिलित होते थे अतएव रावल खुमासिह की सहायता के लिये बड़ी बड़ी दूर से हिन्दू खुराणान के आक्रमणकारी से लडने के लिये इकठे हुये अपने सहायक हिन्दू नरेशों की सम्मिलित चेष्टा से सुमानसिंह जी ने विजय लाभ की थी। खुमानसिंह जी घडे प्रतापी थे रावल कई प्राचीन पुस्तकों में महमूद खुरासानी लिखा है, परतु कर्नल । दाद का अनुमान है कि यह खलीफा माम् या। जिसको अपने बाप सलीफा हारू से मुरासान, जालिस्तान, काबुल सिन्ध और हिन्दुस्तान वे इलाके जो उसके भाधीन थे, मिले थे । (लेसक) ।
, महाराणा प्रताप - 1 खुमानसिंह जी से रावल समरसिंह जी तक कितने ही राजा गद्दी पर बैठे परन्तु समरसिह जी चड़े शूरवीर हुए थे जिस समय पारस्परिक फूट से क्षत्रियकुलकलंक भारतमाता को पराधीनता की येड़ी में जकड़ने वाले कन्नौज के जयचन्द्र से इशारा पाकर शहाबुद्दीन गोरी ने अन्तिम हिन्दू नरेश पृथ्वीराज की राजधानी दिल्लीपर आक्रमण किया था उस समय *समरसिह जी अनुपम वीरता का परिचय देकर समर में वीर गति को प्राप्त हुये थे। समरसिह जी के समान ही मेवाड़ के अनेक अगणितवीरों ने समय समय पर अद्भुत परिचय देकर ससार को चकित और स्तभित कर दिया था। समरसिह जी के पश्चात् कितने ही राणा गद्दी पर बैठे थे परन्तु स बत् १३३१ (सन् १२७५ ई०) में राणा लखमसी या लक्ष्मणसिह जी गद्दी पर बैठे थे। राण जी के समर्थ न होने तक उनके काका भीमसिंह राजकार्य फरते रहे । भीमसिह की महारानी पद्मावती को हरण करने के लिये दिल्लीश्वर अलाउद्दीन खिलजी ने मेवाड पर चढाई की थी। राजपूत ' वीरो ने उस समय अलाउद्दीन खिलजी के खूब दात खट्टे किये थे, परन्तु अगणित मुसलमान ® समरसिह जी ने युद्ध में यडी वीरता पूकट की थी। उनके पुत्र कल्याण मुसलमानों से युद्ध करते हुए मारे गये तब भी उनको कुछ शोक न हुआ। +जिस समय युद्ध कर रहे थे उससमय उन्हें पृथ्वीराज के मरनेका समाचार मिला। पर समाचार सुनकर भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं हुए। काई कोई इतिहास लेखक कहते हैं कि पृथ्वीराज, मारे नहीं गये थे। उनको शहाबुद्दीन गोरी ने जीता हुआ पकढा था । स्वर्गीय कविराज श्यामलदास जी कामत है कि समरसिंह जी पृथ्वीराज के समकालीन नही थे परन्तु मथुरा । के स्वर्गीय पं० मोहनपान विष्णुलाल पंड्या ने इसका संढन एक शिला लेख 도 " -- मेवाड़ का सक्षिप्त परिचय और पूर्ववृत्तान्त सैनिको के सामने राजपूत वीर कय तक ठहर सकते थे, अत पव चितोड का भाग्य फट गया, महाराणी पद्मावती तथा अन्य राजपूत महिलाओं ने अग्नि में फूदकर अपने फोमल प्राणो को अग्निदेव की आहुति में देकर धर्म की रक्षा की थी । राजपूत वीरगण छै मास तक लगातार लटते रहे थे। , । । मेवाड की स्वाधीनता नष्ट हो जाने पर भी, मेवाड मुसल माना के हाथों में बहुत दिन नहीं रहा । अपनी मातृभूमि की दुर्दशा देगकर मेवाड के क्षनियवीरों की हहियों में स्वाधी नता के लिये सून उपल उठा। उन्होंने थोड़े दिन पीछे ही अपनी मातृभूमि मेवाड में स्वाधीनता को ध्वजा पताका फहरा दी। महाराणा हम्मीरसिंह जी के समय में जो लक्ष्मण सिह जी से पीछे कई पीढियो में हुए हैं, मेगाड पूरी ओज पर था। उसके पीछे कितने हो, महाराणा चित्तीट की गद्दी पर बैठे उन्होंने अनेक सर्टी का सामना करते हुए, मेवाड की, स्वाधीनता की तथा चित्तौडगढ के गौरव की पूर्ण रक्षा के आधार पर किया है। विरान श्यामलदास जी का यह भी मत है कि चन्द्रकविकृत जो "पृथ्वीराज रासो" वित्यात है, यह अपनी रासो ना है। स्वर्गीय पहित मोहनलार विष्णुलाल पंट्या स्वर्गीय कविराज श्यामत दास जी के इस मत के प्रतिकूर थे। मेवाड के स्वर्गीय महाराणां सर फतेहसिंह जी के समय कविराज श्यामबदास जी में मेवाड को वृहत् इति- दास “वीर विनोद" लिखा था, जिसका कुछ अंश यहा के सजन कीर्ति सुमारक यन्त्रालय में छपा भी था, परंतु न मालूम इम इतिहास का अपना पचों बन्द कर दिया गया, छपा हुआ अंश भी प्रकाशित नहीं होने पाया हमारे मेवाड के वतमान अधीघर महाराणा साहेब से माथना है कि वे इतिहास को प्रकाशित करके इतिहास प्रेमियों के कौतूहल को निवारण करने की कृपा करें। रेयक - महाराणा प्रताप -- की थी। अनेक विपदों से घिरने पर भी वे अपने कर्तव्य से च्युत नही हुए थे। महावीर हम्मीर के सौ वर्ष पीछे राणा कुम्भाजी ने मेवाड की विशेष उन्नति की । पराजित शत्रु पददलित करना ही वीरों को शोभा नहीं देता है, मरे को मारने से फ्मा बहादुरी है । हारे हुए शत्रु के साथ दयापूर्ण व्यव. हार करना भी सच बोर का फतव्य है । राणा कुम्भाजी का चरित्र भी ऐसे देव भाव से भरा हुआ है। उन्होंने कितनी ही बार अपने बैरियों के छक्के छुडादिये ये, गुजरात और मालवा देश के मुसलमानो को रणक्षेत्र में से भगा दिया था । परन्तु फिर भी उन्होंने अपनी शरण में आये हुये वैरियों के साथ अच्छा व्यवहार किया। राणा कुम्भाजी के सामान देवभाव से भरा हुआ चरित्र बहुत ही कम मिलता है। यह बात नहीं है कि चिचौड में अन्यान्य देशों और भारत- वर्ष के अन्य प्रान्तों के समान कुल कलङ्क और कुलागार उत्पन्न न हुए हो। चितौड में भी समय समय पर कुलाङ्गार और कपूत सन्ताने हुई हैं, उनके खोटे कार्यों को देखकर कहना पड़ता है कि परत्मात्मा की भी ऐसी इच्छा थी कि चित्तौड के गौरव की रक्षा हो । क्योंकि मेवाड के इतिहास के मनन करने से पता लगता है कि जब कभी चित्तौड में एकाध कुल कलङ्क और देशद्रोही उत्पन्न हो, भी गया है तव चित्तौड से अधिकांश राजपूत चोरों के हृदय में अपने , के गौरव को रक्षा का ही भाव रहा है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक दो कुल कलङ्क के पीछे, चित्तौड के सबके ही सब लोग अपने देश से शत्रुता कर बैठे हों अथवा सोने के लालच में अपनी मातृभूमि को परधीनता को येडी में जकड़वा दिया हो। महाराणा कुम्भा जो के ही कुलाबार, कुल कलङ्क पुत्र उदय-- सिह जी हुये थे। कुलकलंक उदयसिह जी ने अपने पिता, . -- ।
मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्ववृत्तान्त १६ - | महाराणा कुम्भा जी को विप दे दिया था। जिससे कुम्भा जी का देहान्त हुआ। पितृघातक उदयसिंह ने कुछ काल तक मेवाड की राजगद्दी को तथा वाप्पारावल के पवित्र सिहासन को कुछ दिन तक कलंकित अवश्य किया था, उदयसिह के समय में मेवाड़ को राणा कुम्भा जी के परिश्रम, वीरता और धुद्धिवल से जो गौरव -माप्त हुआ था, उसका बहुत ही ह्रास हुआ। पर चित्तौड के राजपूत मुसलमानेर के समान न थे, जिन्होंने अपने पिता को कैद करनेवाले और भाइयों की हत्या करनेवाले औरङ्गजेब का साथ दिया था। राजपूतगण अपनी मातृभूमि की दशा देखकर विहल हो गये, महाराणा कुम्भा जी के जेठे कुमार रायमल जी ने उदयसिह से चित्तौड को अपने हस्तगत कर लिया। उदयसिंह मुसलमान बादशाह से सहायता के लिये प्रार्थना करने को दिल्ली गये और बादशाह को सहायता के उपलक्ष्य में अपनी बेटी व्याहने का प्रण भी किया। परन्तु गजाओं के 'राजा, महाराजाओं के महाराज, सम्राटों के सम्राट जगदीश्वर को मंजूर न था कि सिसोदिया वश को 'कलंक लगे। बाप्पारावल का पवित्र वश अपवित्र हो, चित्तौड को मान मर्यादा नष्ट हो जाने । यस उदयसिंह ज्योंही वादशाह से अपनी बेटो देने की प्रतिज्ञा कर के बला, त्योंही उस पर विजली गिरी । मानों परमात्मा ने मेराद के राणाओं की इस प्रतिज्ञा की रक्षा का कि "हम कर्म आरी येटी मुसलमान बादशाहों को नहीं देगा मवाड के, इतिहास में ऐसी ऐसी घटनाओं को देख कर ही कहना पडता कि यह कहावत ठीक हो है कि जो धर्म की रक्षा करता की ओर भगवान भी होते हैं। 'राणा रायमल में भी पचाड अपनी 1 महाराणा प्रताप । - - पर था। पर भारतवर्ष के आदर्श, उच्च आदर्श बहुत कुछ चदल चुके थे। महाभारत के महासग्राम के पीछे, भाई भाई में जो चाण्डालिनी ,फूट प्रचलित होगई थी। उस चाण्डालिनी फूट ने *राणा रायमल के. तीन पुत्रों के हृदय में भी स्थान प्राप्त -कर लिया था। जिसके कारण उस समय मेवाड. की विशेष उन्नति नहीं हो सकी। ।। राणा रायमल जी के तीन पुत्र थे ज्येष्ठ पुन बार के साथ लडनेवाले 'सागा या समाममिह थे दूसरे पृथ्वीराज तीसरे जयमल । सग्रामसिह वीर शान्त, और गम्भीर स्वभाव के थे। पृथ्वीराज यडे पराक्रमी, साथ ही उत्पाती थे। ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण समामसिह राजमिहासन के उत्तरा- "धिकारी थे। पृथ्वीराज और सम्रामसिंह में पारस्परिक झगडा राज्य के लिये हुआ था, जिससे संप्रमसिंह भाग गये थे । इसपर कुद्ध होकर राय- मर ने पृथ्वीराज को अपने राज्य से निकाल दिया था। पृथ्वीराज की वीरता के सम्बन्ध में इतिहास में बहुत सी आश्चर्यजनक घटनायें मिलती है। कहते है, एक बार चित्तौड़ के दरबार में मालवा देश के बादशाह का एक सेवक आया था राणा रायमल उससे बड़ी सादगी से बातचीत कर रहे थे । पृथ्वीराज को सेवक के प्रति अपने पिता रायमल का यह बर्ताव उरा लगा। वे सोचने लगे कि जिन रायमल जी के पिता राणा कुम्भा ने मालवा के बादशाह को छ, महीने तक कैद में रसकर छोड दिया था, उन्हों के पुत्र रायमल बादशाह के सेवक से इस तरह नम्रता से बातें कर रहे हैं। यह विचार कर अपने पिता से वादशाह के सेवक से बातचीत करने की मनाई की, जिसपर रायमल जी ने कहा- पृथ्वीराज ' भाई त उडे चादशाहों को कैद करनेवाला होगा पर मुझे तो अपना राज्य बचाना है। बस इसी पर पृथ्वीराज दरयार से उठा दिये । 'अपनी सेना इक्ट्ठी करके मालपा पर चढाई करदी और बादशाह को कैद कर के अपने पिता के चरणों में रस दिया और कहा "पिता जी इस मारपीदास से पूछो कि यह कौन है । इस भाति अपने पिता की है ।
मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्ववृतान्त २१ कितने ही इतिहास लेगकों ने प्रोस देश की कतिपय महत्वपूर्ण घटनाओं को लेकर आकाश पाताल एक कर दिया है। परन्तु पोज और तलाश की जाय तो भारतवर्ष के इति- हास में एक से एक यढकर महत्वपूर्ण घटनाए हुई हैं। यदि रोम को पूतस के कारण अभिमान है तो इस गये योते समय में आज भी भारतमाता का राणा रायमल के कारण मस्तक ऊचा है । यदि घू तस ने अपने पुरा को न्याय की रक्षा के लिये कर फिर उसे मादर पूर्वक जोड दिया, जिस समय का हम यह वृत्तान्त रिस रहे हैं उस समय भारतवर्ष अपने प्राची आदरों से बहुत कुछ गिर चुका था। परन्तु इस सिंगटी दराम मी राजपूतों में मापस में जो बसाई । झगडे होते थे । के मृतान्त सुनने से ज्ञात होता था। कि यह मारवर्ष के लिये सुवण युग या । पृथ्वीराग और वाघाचा सरगमलजी के पार- गरिक युद्ध का हाल पढकर चकित भौर स्तम्भित होना परता है। सूरज- मर और पृथ्वीराज में चितौट की गही के लिये माग होगया था। दिन मर पृप्योराप और सूरजमल दोनों में खूब युद्ध हुआ, एक इसरे की सेना की मुठभे हुई । भन्न में दोनों की सेनाओं ने राशि होजाने के कारण युद्ध बन्द किया और विश्राम करने खगे । उस समय पृथ्वीरान । भोर सूरम मल में जो पावालाप और मिलन हुआ था वैसा शायद अन्य किमी देशी इतिहास में देखो मैं नहीं आता है। स्वाई हो चुकने के पीछे पृथ्वीराज अपने काझा सूरजमल जी के पास गये । और पूग -काकाजी अय आपके धार कैसे है "सूरजमर, उस समय धाव सिलवा रहे थे। सूरजमल "बेय! तुमको देखकर मुझे-यडी सुशी हुई।इसलिये घार सब गये है। इसके पीछे पृथ्वीराज ने भोजन मांगााकाका भतीजे दोनों ने साथ भोजन किया। चलते समय पृथ्वीराज ने अपने काका का दिया हुआ पान भी स्वर लिया और कुछ श का भी नही की। इसरे रोज सुबह अपने काका से युद्ध करने और उसी दिन युद्ध समाप्त करने की प्रतिज्ञा करके चले गये। दूपरे दिन फिर युद्ध हुआ और युद्ध हो चुकने के पीछे चाचा भतीजे - -- महाराणा प्रताप । .. . A r प्राणों का * दण्ड दिया तो राणा रायमल ने, न्याय और धर्म की रक्षा के लिये अपने पुत्र के प्राणघातक को मोने के कडे और बरनौर का राज्य पारितोपिक स्वरूप दिया । इङ्ग- लेण्ड के एक राजकुमार को पक जज के जेल दण्ड देने पर अगरेजी इतिहास लेखकों ने इङ्गलेण्ड के उस समय के अधी- फिर चैमे ही मिले कि मानो युद्ध हुआ ही नहीं था ! अहा घर भारत चर्ष का कैसा सुन्दर सुहावना समय था । पर टाट ने इस घटना को अपने इतिहास में उल्लंय करके निम्न टिप्पणी लिखी हैं - * It will show the manners and customs so peculiar to the 'Rajputs, to describe the meeting between the fival uncle" and nephell ---- Unique' in the details of strife, perhaps, since the origin of man-Col - Todd धक जय रोम में प्रजातन्त्र राज्य की स्थापना हुई थी तव कलेतिनियस का भतीजा और घ टस का पुन प्रजातन्त्र राज्य के नष्ट करने में अभियुक्त हुये थे। कलेतिनियस ने अपने भतीजे को उचित दर से कुछ कम र देना चाहा पर घ टस ने अपने पुत्र को शणदद की आज्ञा दी । लेखक लीला नामक र एक पठान ने राव सुरतान का राज्य टाकाटोड छीन किया था। सुरंतान की पुत्री ताराबती बडी रूपवती और वीरागना थी। उसने अपने पिता की राज्य छुड़ाने की कठोर प्रतिज्ञा की । राणा रोपमर का पुन 'जयमल तारावती के गुणों और रूप की प्रशंसा सुनकर उससे विवाह करने को तयार हुमा । राव सुरतान ने जयमल का यह प्रस्ताव स्वीकार किया पर कहा कि पहले हमारी राज्य मुसलमानों के हाथ से छुदा दो सद हम तारा तुमको देगे। जयमल ने भी पिठानों के हाथ से राव सुरतान के राज्य छुद्धाने की प्रतिमा की । परन्तुः अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के पहरे ही, सारा को लेना चाहा था, बस इसी पर कुछ होकर सुरतान ने जयमल को मार डाला था। उस समय राणा रायमर के जेठे थेटे संग्रामसिह का कही पता न था. इसरे बेटे पृथ्वीराज को राज से निकाल दिया था। 1 मेवाड का स क्षिप्त परिचय और पूर्ववृत्तान्त २३ । श्वर का मुक्कठ से प्रशसा की । परन्तु हाय ! अपने प्यारे पुत्र फेबध पर राणा रायमल ने अपना कलेजा पत्थर से भी भारी और कडा करके, पुत्र के घातक के प्रति जो असीम उदारता प्रकट की थी,उसकी बहुत से इतिहासों में नाममान को भी चर्चा नहीं है। राणा रायमल के पीछे सग्रामसिंह जी ने चित्तौड के राज सिहासन को सुशोभित किया था ! "यथा नामस्तथा गुण "-जैसे सप्रामसिंह जी का नाम था, वैसे ही वे गुणों में अलौकिक थे । वास्तव में सग्रामसिह सग्रामसिह ही थे। उन्होंने समरक्षेत्र में समय समय पर अपनी अलौकिक बोरता का परिचय देकर राजस्थान भर को मुग्ध कर लिया केवल एक जयमल ही उन का पुत्र मोजूद था । परन्तु अपने पुत्र के घातक से यहला नहीं लिया । जयमल के मरने पर उन्होंने धैर्य धरकर गम्भीर भाव से यही कहा, "जिसने लडकी के बाप की इज्जत रेनी चाही, सो भी उमझो आपति दगमें, उसे जो प्राणदण्ड दिया गया है वह उचित ही है।-रेखक इगरेट के इतिहास की घटना यह है -"इगर का एक बादशाह स्यात् जिसका नाम (Henry v) पाचवा हैनरी था, ठीक २ इस समय याद नही आता, युवराज रहते समय बडा उत्पाती था। एकयार युवराज रहते समय, जज गोसाहन ने उसके एक साथी को किसी अपराध में जेल का दंड दिया। इस पर गुस्से में आकर युवराज ने अज के मुह पर एक थप्पट मारा । जज ने इसका विचार न करके कि वह युवराज है उसको भी जेल की सजा दी । जब बादशाह ने इस घटना को सुना तो जज और युवराज दोनों की प्रशसा की। कहते हैं जब युवराम पाचवें हैनरी के नाम से बादशाह -हुमा तय यह उप जज से जिसने उसकी युवराज रहते समय सजा दी थी कुछ भी नाराज नही हुआ, किन्तु इसके साथ न्यायशील होने के कारण किया। .
महाराणा प्रताप था। उनके समय में समस्त राजपूत सामन्तगण पक हो विजय-वैजयन्ती के तले इकट्ठे हुये थे। भारत के लिये वह विलक्षण समय था । 'हथिनी सी लक्ष्मी विचल इत उत झोंका खाय"--कवि के उपयुक्त शब्दों के अनुसार-दिल्ली के राजसिंहासन के लिये मुसलमानों के कितने ही यशों में पारस्परिक झगडे होचुके थे और हो रहे थे तुग़लक, सय्यद पिलजी, लोदी और अनेक मुसलमानी वश, महाराज युधि' ष्ठिर तथा महाराज पृथ्वीराज, राजधानी इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) में अपनी लीला दिखा चुके थे। उस समय तक राजपूतों ने राष्ट्रविप्लव का साथ नहीं दिया था, उन्होंने दिल्ली के वाद- शाह की आधीनता स्वीकार नहीं की थी। उस समय तक राजपूतगण सोने चांदी के लोभ में अपनी प्राण प्यारी जन्म भूमि की स्वतन्त्रता बेचने के लिये तैयार नहीं हुये थे । उस समय तक राजपूताने के क्षत्रिय वीरों ने देश द्रोहिता का टीका अपने माथे पर नहीं लगाया था। सोलहवीं शताब्दी के आरम में जिस समय स ग्रामसिंह मेवाड के राजसिंहासन पर विराजे थे, उस समय इब्राहीम लोदी, दिल्ली का बादशाह था। उसी समय मुगलराज्य की जड़ जमाने वाले वावर ने भारत पर आक्रमण किया था। वावर अन्यान्य आक्रमणकारियों के समान केवल धन दौलत के लूटने की ही इच्छा नहीं रखता था। किन्तु उसकी महत्वाकाक्षा अपने राज्य को जड जमाने और उसके विस्तार करने की थी। लोदीवंश का सौभाग्य सितारा उस समय डूब चुका था । पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी और चावर में युद्ध उन गया । विजय लक्ष्मो इनाहीम लोदी से रूठ गई और बावर पर प्रसन्न होकर उसको जयमाला पहि- नाई । बाबर ने लोदी वंशपर विजय प्राप्त करते ही अपने राज - - मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्ववृतान्त के विस्तार करने की चेष्टा आरभ की इधर राणा सग्रामसिंह जी भी बावर की करतूतों से गाफिल न थे। उन्होंने देखा कि इस समय तनिक भी निश्चिन्त रहने से समस्त हिन्दू राज्य यवनों के पदाक्रान्त होगा, यावर से लड़ने के लिये तैयारियां करने लगे। प्रथम युद्ध में बाबर * राणा सागा जी से परा- जित हुआ पहले युद्ध मुगल सेना के धुएँ उड गये थे । राजपूत सेना की वीरता देखकर मुगल सेना वडो हताश हुई । पर यावर उन माई के लालों में से न था जो असफ- लता प्राप्त होने पर निराशा के सागर में गोते खाने लगते हैं। अथवा हतबुद्धि होकर अपने उद्देश्य से मुह फेर लेते हैं । पहिली वारे युद्ध में सफलता प्राप्त न होने पर उसने फिर युद्ध -का ठानी राणा सागाजी भी सच्चे क्षत्रिय चोर की भाति यावर से मुकाबले को आगे बढे । प्यारे पाठको जानते हा कि इस देश का भाग्य क्यों फूटा है । अनेक वीर लालों के होते हुये भी हमारी भारत माता ॐ राणा संग्रामसिंह जी का मरा नाम राणा सागा था-लेखक "साधु सराहें साधुता, जती जोखिता ज्ञान, रहिमन साचे सर की बैरी करे बसान,,-ठीक ही है वावर ने अपने जीवन चरित में राणा सांगा को पदी सारीफ़ लिखी है। राणा सांगा ने माखा गुजरात तथा श्रय स्थानों के मुसल- मानों से अठारह बार युद्ध किया था । समा युद्धों में राणा सागा को जप प्राप्त हुई थी । उना समन्स बीवन वीर पर्म पालन करने ही में पीता था। वीरबत पालन करने ही में उनकी एक श्राप, एक हाथ और एक पेर नष्ट होगये थे, परन्तु सब भी वे अपने प्रत से टले नहीं। हहोंने प्रतिमा की थी कि चादशाही सेना पर विजय प्राप्त किये बिना कभी अपनी राजधानी चित्तोड में मही प्रसंगा। यह प्रतिज्ञा करके ये पहाड़ों में चले गये थे। परन्तु स पतिशा के थोड़े दिन पीछे ही उनका देहान्त हो गया, जिससे उनकी यह मनोसामना पूर्ण नहीं हो सकी-लेखा।
7. महाराणा प्रताप . के पैरों में पराधीनता की चेडा कैसे जकडे दी गई थी? इस देश के अनेक कलकलंक और भारत माता के अपने कपूतों के कारण ही न ? जिस समय राणा सांगा बाबर के मुकाबले के लिये आगे बढे उस समय बाबर ने सन्धि का, प्रस्ताव उप- स्थित किया। राणा सांगा जी की ओर से रायसेन का राजा सलहदी तोघर सन्धि की बात चीत करने लगा और वह विश्वासघाती देशद्रोही सलहदी तोवर यावर से मिल गया जिससे दूसरे युद्ध में राणा जी हार गये। अरे कुलकलको नराधम !! सलहदी तोवर ।" तुझ जैसा कपूत भारत माता की कोख में उत्पन्न न हुआ होता । तो इस देशका इतिहास ही पलटा खा जाता । परन्तु विधि के विधान को कौन रोक सकता है । इस युद्ध के थोडे दिन पीछे ही महाराणा सग्रामसिंह उपनाम सागा जी परलोक को सिधार गये जिससे हिन्दू जाति की विशेषत राजपूतों की, मेवाड के क्षत्रिय वीरों की सव आशाए मिट्टो मे मिल गई । राजपूत जाति और मेवाड भूमि अनाथ हो गई। सग्रामसिंह की मृत्यु के पीछे मेवाड राज्य में बहुत कुछ उलट फेर हुए । जिनको यहा लिखने की आवश्यकता नहीं है केवल इतना ही कहना पर्याप्त है कि सागा जी के पीछे उनके दो चेटे रत्नसिह और विक्रमादित्य ने चारी बारी से कुछ वर्ष तक राज्य किया था। रत्नसि ह वीर थे अपने पिता के राज्य में से एक अंगुल जमीन भी यावर अथवा, मालवा के बाद शाह के हाथ में नहीं जाने दी किन्तु चीर होने के साथ ही साथ रत्नसिह कुछ उजह और क्रोधी भी थे। इसी से पूदी के । दो के राव सूरजमल जी सेरत्नसिंह जी के झगडे का कारण यह या- 'श्रीगर के प्रधान राना सारंगदेव के दो पुशिया, थी. एक रनहि जी को प्याही थी। इसरी – दी के राव सरगमल को। इस लिये दोनों में 1 1 मेवाड का संक्षिप्त परिचय और पूर्ववृत्तान्त " . 1, राव सूरजमल को एक घरू झगडे के कारण मारकर आप भी . उन्ही के हाथ से मारे गये। विकामादित्य में वीरों के योग्य कोई गुण न थे। गुजरात के बादशाह ने दूसरी यार चित्तौड़ को विध्वस किया था। पारस्परिक अत्यन्त प्रीति थी। परन्तु वहीं प्रीति दोनों के लिये विषमय फल उत्पन्न करनेवाली हुई। कहते हैं एक समय वू दी के राव सूरजमर जो चितौड में सो रहे थे, वहा पुरबिया सरदार ने हंसी में एक तिनका से राव का कान गुदगुदा दिया। राव जी अचेत सो रहे थे, चौंककर उठ बैठे और अपने साडे से पुरविया को वहीं मार डाला। पुररिया का लडका पूरणमल अपने पिता का बदला लेने का अवसर हूढने लगा भोर राणानी. के कान राव जी के विरुद्ध भरने लगा। एक समय सरजमल जी अपनी ससुराल गये थे, वहा यदी साली-राणा जी की रानी भी मौजद थी राणा जो की रानी के अनुरोध से तीर से एक पालतू सिंह को मार गिराया। इस पर रावर्जी की साली को वडा अचंभा हुआ । चितौद पहुंच कर रावजी ' को साली ने अपने पति राणा जी से कहा । राणाजी ने समस्त वृत्तान्त' । अपने पुरविया सरदार पूरनमल से कहा । भवसर पाकर पूरणमल ने यह पही पढा दी कि रावजी ने आपकी रानी जी से मिनता गाठली है। इस वहम में आकर राणा जी रावजी के प्राण लेने को उतारू होगये । वे सरज- मल जी के मारन के विचार मे दी आये और उनसे शिकार खेलने के लिये फहा। दूसरे दिन राणा और राम दोनों शिकार खेलने गए वहां राणा और निक साधियों ने गव पर धावा किया जिसम राय मारे गये पर राव ने मरते मरते राणा और उसके पाच साधियों की जान ले ली। कहते है जय एक नौकर ने राध सूरजमल की माता से उनकी मृत्यु समाचार पदा तप राबकी माताले बडे जोश से कहा कि मेरा पेट अकला ही मारा गया है? कोई पुत्र जिसने मेरा दूध पिया है अकेला नहीं मारा जा सकता है। जैसे ही राव माता ने कहा वैसे ही स्तनों में से एसे जोर से दूध की धार निकलो कि जिस पत्थर पर दूध की पार टपकी वह पत्थर हो गया। इसने में ही राम की माता को समाचार मिस्सा कि राव मे मरते मरते ना सहिस पान आदमियों को मार दिया है खेखक। -- महाराणा प्रताप -- उस समय राजपूतगण भोग विलासी और डरपोक राजा की आधीनता के अभ्यासो न थे। विक्रमादित्य अपने क्षत्रिय वीरों को किसी तरह से प्रसन्न नहीं कर सके । प्रसन्न करना तो दूर रहा उलटा अपने कर्मों से अपने राजपूत सरदारों को नाराज़ कर दिया। जिससे मेवाड के सरदारों में अनयन हो गयी थी। इसमें सन्देह नहीं किघर की फूट जगत में बहुत बुरी होती है वैरियो को घर की फूट से लाभ उठाने का अवसर मिल जाता है घस इस फूट से चित्तौड़े को सदैव के लिये, अपने आधीन करने से मालवा और गुजरात के मुसलमानबादशाहपों चूकने लगे दोनों ने मिलकर मेवाड को वाट लेना चाहा था। परन्तु विक्रमादित्य से लाय अप्रसन्न रहने पर भी राजपूत वीरों ने चित्तौड़गढ़ की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दी और चितौड में दूसरा शाका * हुआ । 7 - 1" ~ . 1 शाका उसे कहते हैं कि जन राजपूत लोग निराश होकर केसरिया पाना पहन कर शत्रु से लड़ने जाते हैं । इस दशा में राजपूत ललनाएँ अग्नि में क्द कर प्राणों की आहुति दे देती है। इस भाति पहला शाका, अलाउद्दीन निखजी के समय में हुआ था । दूसरा शाका यह हुआ, इस शाके में घारह हजार ललनाओं ने श्रग्नि में कूद कर अपने धर्म की रक्षा की थी। राजमाता जवाहरवाई ने इस युद्ध में बड़ी वोरता दिखलाई थी, यह कवच पहन फर युद्ध स्थल में पहुंच गई में तलवार लेकर मुसलमानों से स्वय युद्ध करने लगी और राजपूत वीरों का करने लगी। मुसलमानों की तोप का गोला राजमाता जवाहिर नाई के में लगा जिससे युद्ध में उसका देहान्त हो गया। इस युद्ध में ३२ इजार मारे गये। यह शाका सन् १५३० ही में हुआ था। जब उदयसिह की माता कर्णवती ने देखा कि युद्ध में जवाहिर याई मारी गई तब यह विचार कर कि कहीं यान लोग राजपूत लखनाओं को स्पर्श न करें अग्नि में कूद कर धर्म को रक्षा करने के लिये राजपत त्रियों को उत्साहित किया था। दो राजाओं ने इस युद्ध में अच्छी वीरता दिसलाइ थी। लेखक । त 4 - " मेवाड का स क्षिप्त परिचय और पूर्ववृत्तान्त २६ कुछ दिनों के लिये चितौडगढ उस समय मुसलमानों के हाथ मे चला गया था । परन्तु राजपूत वीरों ने किसी न किसी तरह से उसका फिर उद्धार किया। राणा विक्रमादित्य को राजगद्दी से हटाकर घनघोर को गद्दी पर विठलाया और यह सलाह ठहरी कि जब तक उदयसिंह बडे न हों तब तक धनवीर राज्य करें। वनवीर पृथ्वीराज का दासी पुत्र था। उसकी इच्छा हुई कि उसके रहते हुए चितोड की राजगद्दी पर कोई न बैठे। अतएव पहले उसने विक्रमादित्य की हत्या ‘की पीछे उसने बालक उदयसिह को भी मार डालना चाहा। बनवीर के पैसे खोटे विचार को देख कर उदयसिह ,की धाय ने, जिसका नाम पन्नादासी था, अपने स्वामी पुन, राज पुन, चितौड के उत्तराधिकारी, भावी राजा की रक्षा करने की ठानी । पन्ना ने उदयसि ह जी की रक्षा के लिये जो कुछ किया था, उसने उसका नाम चित्तौड़ के इतिहास में भारत- वर्ष के इतिहास में, नहीं नहीं ससार के इतिहास में सदैर के लिये सुनहले अक्षरों में अद्भित कर दिया । कहों। जानते हो !! अपने स्वामी और राजपुत्र की रक्षा के लिये, उस अपला ने अपने किस आत्मिक बल का परिचय दिया था ? उस अक्ला ने जिस भाति सबल हृदय होकर आत्मोत्सर्ग का जलन्त उदाहरण उपस्थित किया था, वैसा उदाहरण ससार की उन्नतिशील जाति के इतिहास मे बहुत कम देखने में आवेगा। पन्ना ने राजपुर उदयसिह को एक टोकरी में सुलाकर फूल पत्तों से ढककर एक नाई से कहा कि इसे अमुक स्थान में ले जाओ और उदयसिंह के स्थान में प्राणों से प्यारे अपने पुत्र को सुला दिया। जब धनवीर आया तय अगुली का इशारा अपने बेटे की ओर कर दिया। वनवीर ने पन्ना दासी के पुन को, उद्यसिह समझकर वध कर डाला। पन्ना की आँन elama ch
महाराणा प्रताप
पन में भी दूर नहीं होते हैं। कौन नहीं जानता कि कौरव
पाएडवों की बाल्यावस्था की विवाग्नि ने ही महाभारत
का महासंग्राम मचवाया था। कौन नहीं जानता कि भीम
और दुर्योधन की बचपन की लागडांट ने कुरक्षेत्र में कुहराम
मचा दिया था । कौन नहीं जानता कि कर्ण और अर्जुन के
लडकपन के द्वेष भाव ने महाभारत को महासमगग्नि में
घी की आहुती छोड़ने का काम किया था । उसी विद्वे पानि
से प्रताप और शक का हदय एक दुसरे के प्रति जल रहा था
जिसके विषय में हम आगे लिखेंगे । परन्तु उस समय का
भारतवर्ष आज कल का सा भारतवर्ष न था उस समय भारत
वर्ष से क्षत्रियत्व मिट नहीं गया था । आजकल की भाति मेज
पर रक्खे हुये चाकू से क्षत्रिय डरते नहीं थे आज कल की
भांति उस समय कर्मयोगियों का कर्मयोग प्लेटफार्म पर
वक्तता झाडने अथवा अखबारो में लेस लिसने में ही समाप्त
नहीं होता था और बहुत हुआ तो किसी सभा सोसाइटी
का सगठन कर लेना ही क्रिया शीलता की सीमा नहीं थी।उस
समय की शूर वीरता केवल गले के फाडने अथवा लेसनी के
घिसने में ही समाप्त नही होती थी। उस समय सच्चे वीरो का
खेल तलवार था । बालक प्रताप और शक्त भी तलवार से ही
गेलते थे। उस समय के इतिहास की यहां पर एक साधा
रण सी घटना उद्ध त करनी है जो असाधारण प्रतीत होगी।
जिसको सुनते ही इस समय भी प्राण थर्रा उठते हैं। घटना
यह है कि एक दिन एक तलवार नयी बनकर आई थी प्रताप
और शक्त के पिता एक मोटी,रस्सी मगाकर उसकी धार
की परीक्षा करने के लिये कह रहे थे । पर पाच वर्ष के बाद
शकसिह से न देखा गया कि मोटी रस्सी पर तलवार की।
'की जांच की जाय । चालक शक्त सोचने लगा कि जी तो
।
जन्म और मेवाट फी परिस्थिति गुद क्षेत्र में अगणित नरमुण्डों के तन से जुदा करने के लिये मंगायी गई है या उसकी जाच फच्चे सूत के धागे पर की जायगी? यस एदय में यह विचार उठते ही यालक शक्तसिह ने उस तलवार का अपनी उङ्गली पर माघात किया । तलवार के आघात से पालक शक फी उगलो में से रक्त का फ़वारा स्टने लगा। पर यालक के मुय पर नाममात्र को भी शोक का लक्षण प्रतीत नहीं हुमा यह प्रसन्न मुष होत्फुल्ल नेत्रो से रता की धार देराने लगा। मारी चोट के लगने पर भी उसकी आग्वों में से भासू की एक पूद भी नहीं टपकी । पास में मडे हुये मभी लोग चकित और स्तम्मित होकर बालक के मुग की ओर देखने लगे । मरे ' यह क्या पाच वप का यालक और यह दारुण साहस ! परन्तु महाराणा उदयसिह को चालक शक्तमिह के इस साहस पर अत्यन्त प्राध हुआ। उन्होंने कोधित हार माशा दा कि इस कुलकलङ्क चालक का 'सिर अमानन से जुदा कर दिया जाय परन्तु पास में खडे हुये सरदारो ने जैसे तैसे समझा बुझाकर महाराणा उदयसिंह जी का झोध शान्त किया। परन्तु उदयसिह जी को भविष्य याणी सत्य हुई, प्रतापसिंह जैसे मेवाड के नहीं नहीं भारत के मुग्गोचलकारी हुए, वैसे ही शकसिंह मेवाड के फुल- कला देशद्रोही और जातिद्रोही हुए। कोई कोई इतिहास लेखक यह भी कहते हैं कि शक्तसिंह की जन्म पनी से यह 'निर्धारित हुआ था कि यह मेवाड के लिये फल स्वरूप होंगे, इसी के उदयसिंह उन से विरक रहते थे। इस कारण ही उन्होंने शक्तसिंह के सिर उतारने की उस समय आज्ञा दी थी। जो कुछ हो उस समय शक्तसिंह के जीवन की रक्षा हुई। जिस समय प्रताप और शक्त दोनों राजकुमार इस तरह आमोद' प्रमोद में जीवन व्यतीत कर रहे थे, उस समय । महाराणा प्रताप देखना चाहिये कि : मेवाड की क्या दशा थी ? आइये पाठक ! आइये !!! उस समय बाप्पारावल की गद्दी पर राणा उदयसिह जी विराजमान थे, पर उदयसिह जी। मेवाड़ के राणा होने योग्य कोई गुण न थे । वे चीर धर्म के भूलकर विलासिता में फसे हुए थे वे एक, वेश्या के प्रेम में फसकर अपनी वंश परम्परागत मर्यादा को लात मार चुके थे। उनको अपने राज्य की सुध बुध कुछ भी नई रही थी। इतिहास के पाटकों से यह अविदित नहीं है, कि राणा सांगा की मृत्यु के थोडे दिन पीछे ही उनका प्रतिद्वन्दी बाबर भी इस लोक से चल बसा था । वायर के उत्तराधिकारी हुमायूको शेरशाह के कारण अपनो सत्तनत तक से हाथ घोना पड़ा था। बड़े बड़े सङ्कटों का सामना करके हुमायूने अपना खोया हुआ राज्य पाया था। उस समय राणा सागा के समान कोई चतुर वीर मेवाड की गद्दी पर होता तो समस्त भारतवर्ष में अपना असण्ड राज्य स्थापित कर लेता परन्तु मेवाड़ क्या समस्त राजपूताना नहीं नहीं समस्त,भारतवर्ष में उस समय ऐसा कोई दूरदर्शी मनुष्य नहीं रहा था । इसी से मुगलो की उन्नति का मार्ग परिप्त होगया था । हुमायूके पीछे अपचर भी १२ वर्ष में ही अपने बाप के राजसिहासन पर बैठा यदि अवघर और उदयसिह की पारस्परिक तुलन की जाय तो बहुत सी बातों में समता मिलेगी। अकबर ने भी बालपन में उदयसिह जी के समान अनेक सङ्कटो का सामना किया था । अनेक रिपदों में फंसा था, परन्तु सङ्कट और यन्त्रणाओं से उसका हृदय मजबूत होगया । उसने अनेक आपत्तियों और फ्लेशों में पड़कर धीरता और सहिष्णुता का पाठ पढ़ा था। इधर उदयसिंहजी विलासिता प्रिय हो गये थे, - ।
जन्म और मेवाड के परिस्थिति
इसलिये अकयर अपने पाप के राज्य को बढानेवाला हुमा
और उदयसिह मेवाड को डुबोने वाले हुए।
'जिस समय हुमायू विपत्ति का मारा मेवाड में पहुंचा
वहा आश्रय चाहा तो मेवाड़ के राजा मल्लदेव ने उसको
आश्रय देना तो दूर रहा उसको उलटा गिरहार करना चाहा
था। इसका कारण यह कहा जाता है कि मुगलों के एकयुद्धमें
मल्लदेव का ज्येष्ठ पुन राममल मारा गया था। मल्लदेव ने
इस अवसर पर हुमायू से वह यदला चुकाना चाहा था।
हुमायू उस समय मल्लदेव के हाथ न आया, परन्तु साथ ही
वह उस समय की अपने अपमान की बात भूला नहीं । दूसरी
यार राज्य प्राप्त करने पर हुमायू थोडे दिन के पीछे ही इस
संसार से चल बसा था सो वह स्वय तो मल्लदेव से बदला
ले नहीं सका पर उसके बेटे अकबर ने बदला लेने की ठानी।
अकबर की मा ने उसको और भी मल्लदेव से बदला लेने के
लिये उत्साहित किया । अकवर अपने बाप का अपमान भूलने
चाला न था बस अपनी सेना लेकर मेवाड पर चढ दौडा।
अजमेर में उसने अपनी सेना का पडाव डाला। उसने सन्
१५६२ मे मारता किले पर अधिकार कर लिया। सबसे पहले
जयपुर के महाराज विहारीमल और उनके पुत्र भगवानदास
ने अकबर की दासता स्वीकार करके पवित्र राजपूत कुल में
कलङ्क
लगाया था । केवल अकवर की अधीनता स्वीकार कर
के जयपुर नरेश बिहारीलाल चुप नहीं हुये थे किन्तु *उन्होंने
बिन्द्र नरेशों ने अपने यहां की लडकियां मुसलमान बादशाह को क्यों
दे दी और उनकी लडकियों को अपने यहा क्यों नहीं लिया इस विषय को लेकर
बहुत से हिन्दुओं के पक्षपाती और विपक्षी लेखकों ने खिल्लियां बढाई
है। किमी विज युद्धिमान ने यह भी भटकर लगाया है कि मुसलमान
बादशाहों के डरके कारण हिन्द राजाओं ने खुशी से अपनी & कियां दे टा
महाराणा प्रताप अपनी एक कन्या का विवाह भी अकबर से कर दिया था इस माति विहारीलाल ने राजपूताने का गौरव धूल मट्टी में मिला दिया । वश्यता स्वीकार करने और लडकी देने के कारण बिहारीलाल के पुत्र भगवानदास और भगवानदास के दत्तक पुत्र मानसिह ने अकबर के राज्य में उच्चपद प्राप्त किये। अस्तु पहली बार राजधानी में विप्लव मचने से अफवर मेवाड के चिना हस्तगत किये ही लौट आया। परन्तु वह चुप होने वाला नहीं था,धीरे धीरे अपनी शक्ति पुष्ट करके पांच वर्ष पीछे उसने मेवाड पर फिर चढाई की, इस बार उसको सफलता भी प्राप्त हुई। जोधपुर, बीकानेर आदि राज्यों ने . थी । परन्तु मेरी समझ में इसका कारण यह प्रतीत होती है कि हिन्दुओं ने समझा कि मुसलमानों की लड़की अपने यहा आने से धर्म भूट होगा। छूतधात , का उस समय भारतवर्ष में बहुत प्रचार हो चला था। हिन्दू राजाओं ने समझा कि मुसरमानों की लडकिया अपने यहा आने से सच एकामयी हो जायगी, इसलिये अपनी लडकिया देकर बला टाली। इसके अतिरिक्त एक प्रश्न यह भी है कि क्या माराम राज महिपिया ही पादशाही घराने में गई थी। किसी रनवासिनी दाप्सी की पुत्रिया राजमहिपी की पुनी यह कर ब्याह दी हों । अस्तु जो कुछ हो जयपुर, जोधपुरादि हिन्दू नरशों का यह काम निन्दनीय हुआ इसमें सन्देह नही जर तक इतिहास है यह करडईर नहीं हो सकता। एदी के हाताओं ने भी मेवाड के राणाओं ये समान अपनी लडकी कभी बादशाहों को नही च्याही । उन्होंने अकवर से यह सन्धि कर ली थी कि हम यादशाह को कभी टोला नही ३गे -रेखक + मागवानदास की बेटी अवघर के थेटे, सलीम को जो पीछे जहांगीर के नाम से दादशाह हुमा, व्याही थी। कहते है, अकबर खुद परात लेकर भगवानदास मकान पर गया था और वहां हिन्दुओं की रीति के अनुसार चारों ओर अग्नि के फेरे पड़े तब विवाह किया। सलाम की बहू अर्थात .
जन्म और मेवाड की परिस्थिति अफयर फी अधीनता स्वीकार की, इतना ही नहीं जोधपुर के मन्न देव के लडके उदयसिह ने अपनी जोधाई फा प्रकार से विवाह कर दिया। मालवा के राजा ने मेवाड के महाराणा उदयसिंह के यहा आश्रय लिया इसलिये अफवर को इष्टि चित्तौड पर पड़ी। चित्तौड भूमि जैसी योरों की पान है, वैसे ही प्रति पोरीला निकेतन है। चित्तोड एक प्राचीन नगर हे छोटी सी बनास नदी के पितार पहाड पर बसा हुआ है। चीन की दीपाल से पढकर इसके चारों ओर दुर्भद्य प्राचीर है। आजकल भी चित्तोड की शोभा देखने योग्य होती है । शहर- पनाह की दीवालमो चारों ओर पर्वत के समान दिखायी पड़ती है। प्रधान द्वार "सुरमपोल" या सूयतोरण है। इस तोरण की रक्षा का भार सालुम्न दुर्गेश्वर चन्द्रावत सरदार पर था। अकबर ने चित्तीट पर प्रथमवार आक्रमण किया तो यह सफल मोरथ न हो सका। क्योकि बादशाह अकवर की, उदयसिंह जी की प्रियपात्रिणी स्त्री के सामने दाल नहीं गल सकी। यह स्त्री क्षत्रियवीरों को साथ लेकर बादशाह की भगवानदास की येटी के दोरे पर मशरफिया लुटाता भाया । भगवानदास ने सौ हाथी, कई सयले घोडे, यदुतेरी लौंडी गुलाम सोने चादी के जवाहिर से अमयाय, हथियार पनि दहेज में दिये अमीरों को जो घराती थे, इराकी, तुर्की ताजी सोने रूपे के साज समेत घोडे दिये । पाठकों ने इस विवाह के हास को पढकर समझ लिया होगा कि भकयर कितना चाराक और कुटिल नीतिज्ञ था वह समझ गया था कि जब तक हिन्दू राजाओं से मेल नही किया जायगा, तब तक भारतवर्ष में मुगलों का राज्य नही जमेगा इसलिये वह यह सय चाकी चलता था। लेखक *जोधवाई के गर्भ से ही भकबर के ज्येष्ट पुत्र सलीम का जन्म हमा महाराणा प्रताप J छावनी तक ही नहीं किन्तु बादशाह के तम्बू तक आक्रमण करती हुई चली गई । राजपूतों की मार के सामने मुसलमान ठहर न सके । राणा उदयसिंह ने इस विजय का यश स्त्री को ही देना चाहा । इस पर राजपूत सरदारों ने क्रोधित हो कर उस स्त्री को ही मार डाला। हमारे देश में घर की बाहर के शत्रुओं ने वडा लाम उठाया है। अकबर ने भी घर की अनचन से लाभ उठाने का सहज उपाय सोचा। उसने राजपूतों के घर की अनबन सुनते ही चित्तौड़ पर सम्वत् १६२० (सन् १५६८-) में फिर धावा किया। इस बार अक- वर अपने साथ बहुत सो फौज लेकर आया। और चित्तौड फेो घेर लिया। किसी किसी इतिहास लेखक का कथन है कि अकबर की सेना इतनी थी कि दस दस मील, तक लम्बी उसकी छावनी पड़ी हुई थी। राणा उदयसिह ने इस समय बडी कायरता दिखलायी, वह चित्तौडगढ छोड कर भागा पर राजपूत वीर कायर नहीं थे। उनकी विलास प्रिय महाराणा की ओर लाख अमक्ति हो, परन्तु चित्तौड की ओर उनकी गुढ भक्किा थी। चितौड उनको अपने प्राणों से भी प्यारा था। चित्तौड के गौरव में प्रत्येक राजपूत अपना गौरव समझता था। चित्तौड़ को अप्रतिष्ठा होना प्रत्येक राजपूत अपनी अप्रतिष्ठा समझता था अतएव महाराणा के भाग जाने पर अनेक राजपूत-"एक लिंगेश्वर की जय" "बाप्पा. रावल को जय आदिआकाश गुजाने वाली ध्वनि करते हुये चित्तौडगढ की रक्षा के लिये एकत्रित हुये।अगणित राजपून धीर सूर्यतोरण की रक्षा के लिये आये । बदनोर के जयमल राठौर और केलना के पत्ता जो, ('पूत्त या पतू भी कहते हैं) आये । जयमल राठौर मेडता के राव थे। परन्तु घरेलू झगडे के कारण उद्यसिंह उनको उदयपुर ले आये थे।। जयमल 1 -
जन्म और मेगाह की परिस्थिति
।
और पत्ता का नाम बाल भी इतनी शताब्दियों के बीत जाने पर
• राजस्थान के बालक, यूटे भी बडे आदर के साथ लेते हैं।
धास्तव में इस युद्ध में मेयाड के चोरों ने अपनी स्वाधीनता
और चित्तोड के किले के गौरव की रक्षा के लिये अपने
प्राणों की याजी लगा दी थी। इस युद्ध में घहा की सुकोमल
अबलायों ने भी अपने अपूर्व साहस से यादशाह अकबर तक
फे दात सट्टे कर दिये थे। जिस समय सूयतोरण के पास
सलूबर के राय मा गये तव राजपूत सेना की सरदारी
केलमा के पत्ता जी को सौंपी गयो । पत्ता जी की अवस्था
केवल सोलह वर्ष की थी। उनके पिता इससे पहले एक
युद्ध में मारे गये थे। अपने माता पिता के इकलौते पुत्र थे।
परन्तु जिस समय उनको सेना का भार सौंपा गया था तब
उनकी माता तनिक भी विचलित नहीं हुई। पहले समय में
राजपूत मातायें देश और धर्म के लिये मरना अपना सौभाग्य
समझती थी। भारतवप का रह समय ऐसा ही था कि जब
राजपूत माता अपने पुत्र को युद्धस्थल में विदा करते समय
यह उत्साह पूर्ण वचन कहती थीं कि जाओ। बेटा। जाओ!
जीते रहोगेन्तो साथीनता भोगोगे और मर गये तो सीधे
स्वग को जाओगे" राजपूत माताओं के अपनी सन्तानों के
प्रति देश और धर्म की रक्षा के लिये ऐसे उत्तेजना पूर्ण शब्द
रोते थे। पता जी की माता भी उन राजपून रमणियों में से
थों अपने देश और धर्म की रक्षा के लिये सर्वस्व न्यौछावर
करने को तय्यार रहती थीं । उन्होंने अपने प्यारे पुन को वीरधर्म
पालन करने के लिये सहर्ष आज्ञा दी थी। केवल इतना ही
नहीं वह वीरयाला अपनी पुना और पुत्रवधू पत्ता जो की
स्त्री को साथ लेकर स्वयं बादशाह अकबर के मुकाविले के
लिये युद्धस्थल में आई । सुनते हैं जिस समय
न
महाराणा प्रताप म - सेना चित्तौड़ के निकट पहुचने लगी, उस समय इन तीनों अबलाओं ने अपने अचूक निशानों से मुगल सेना के धुरै उडा दिये थे। बादशाह अकवर उक्त तीनों वोराङ्गनाओं की बहादुरी पर इतने प्रसन्न हुये ये कि उन्होंने आशा दी थी कि जो कोई इन तीनों वीराङ्गनाओं को पकडकर लावेगा वह मुह मागा ईनाम पावेगा परन्तु उस हुल्लड में कौन सुनता था एक एक करके तीनों चीर रमणियां भूतल' शायी हुई और इस लोक में अपनी अनन्त और अक्षय कीर्ति छोड गई। तीनों चीराङ्गनाओ की वीरता देखकर चित्तौड के वीर और भी दृने उत्साह से शत्रुओं का मुकाबला करने लगे। अगणित शत्रुओं के सामने मुट्ठी भर राजपूत कब तक लड़ सकते थे, भासिर प्रचण्ड अग्नि के समान अपनी तेज. स्विता दिखलाकर धीरे धीरे भूतलशायी होने लगे । सोलह वर्ष के बालक अभिमन्यु ने महाभारत के महा सग्राम में कौग्चों के चक्रव्यूह में अनुपम वीरता का परिचय दे अपने येरियो के कलेजे दहला दिये थे । वीर वर अभिमन्यु के ममान ही पत्ता जी ने अपने साहस और पराक्रम से मुसल- मानी सेना के बडे बडे वीरों के हृदय कंपा दिये थे। जिस तरह से प्रचण्ड आधी बड़े पेड़ों को उखाड कर थम जाती है । उसी तरह से महावीर पत्ता जी अपनी तलवार से मुग़ल सेना के अनेक बहादुरों के सिर गाजल मूली की भाति काट कर अन्त में मारे गये। पर राजपूत वीरों ने अपना साहस नहीं छोडा "कार्य चा साधेयम् शरीर वा पातेयम्" मृत्यु फा देखना अथवा कार्य का साधन इस सिद्धान्त को ग्रहण कर के लडने लगे। जयमल राठौर ने दुर्ग की रक्षाफा भार अपने ऊपर लिया। इस मीपण संग्राम में हमारे चरितनायक भारत के पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप- जन्म और मेवाड की परिस्थिति ४२ सिंह ने जयमल गठौर की अधीनता मे अपूर्व साहस और धीग्ना में युद्ध किया था जिससे राजपूतगण उनके पिता फा कुत्सित व्यवहार भूल गये। इस युद्ध की आदि से अन्त तक आलोचना करते हुये फहना पडेगा किचित्तोड सभाग्य विधाता रूठा था यदि ऐसा न होता तो क्या मेवाड का पतन होता। नीर जयमल ने भी अपनी धीरतामें फसग्नहीं को अपने जीते जी चित्तोड का किला दुश्मन के हाथ में नहीं लगने दिया। पर होगी को कौन टाल सफता था। एक दिन रात को जयमल मशाल के उजाले से दुर्ग को बुजों की मरम्मत करा रहे थे कि अफवर ने जो किला धेरै पडा था, उन्हें पहचान लिया, ताक कर ऐसा निशाना मारा कि जयमल उसी जगह लोट गये । दूरदर्शी जयमल ने देखा कि अब मेरा अन्तिम समय है, बच नहीं सफ्ताह, फाल के गाल में जा रहा है और अय चित्तौड भी- धेरी के हाथ से यच नहीं सकता है । तब उन्होंने बचे हुए, अपने माठ सहन योद्धाओं को केसरिया थाना पहिनने और द्वार सोलने की भाशा दी । आज्ञा देते ही किले का दरवाजा खुल गया और राजपूतगण यादशाहो सेना पर टूट पडे और सेना लड फर चोरगति को प्राप्त हुई।* नौ रानिया, पाच राज फुमारिया, दो छोटे राजकुमार और बहुत से सरदारो की सय खिया उस समय जय राजपूत लोग फेसरिया बाना पहन, फिले का फाटक सोलकर बाहर निकले थे, अग्नि में जलकर भस्म होगई । चित्तौडगढ में यह तीसरा शाफा हुआ। सरदारों के अनुरोध से चित्तोड के पतन के पूर्व ही प्रतापसिंह तथा कुल भादमी युद्धक्षेप से उदयपुर चले गये ये यदि प्रतापसिह उस समय- उदयपुर न जाते तो राजस्थान का कमर सिरने से पहिरे हो मुरमा- जाता । -ऐसक J महाराणा प्रताप यह युद्ध कैसा भयानक हुआ होगा, उसका केवल टा साहब के फथन से ही पता लग सकता है कि जय मरे हुए चोरों के यज्ञोपवीत तोले गये, तब तौल में ७ (साढे चौहत्तर) मन हुए । किसी किसी का अनुमान है कि उस समय मन चार सेर का होता था ।खर चार सेर का ही सही। पर एक जनेऊ एक तोले का भी रक्सा जाये तो लगभग पच्चीस हज़ार से अधिक आदमी इस युद्ध में काल के गाल में गये। इस घटना को सदैव स्मरण रखने के लिये अकबर की आशा से ७४॥ चिट्ठियों के लिफाके पर लिया जाने लगा। इसका तापर्य यही है कि जो कोई किसी दूसरे को चिट्ठी पढेगा उसको चित्तौडध्वंस का पाप लगेगा । भारत के 'ग्रान्तों में थोडी बहुत अभी तक यह प्रथा जारी । अकबर को चिर अभिलाषा पूर्ण हुई, वित्तौडगढ उसके हस्तगत हुआ। पर उस समय चित्तौड मे रक्या ही क्या था? चित्तौड नगरी श्मशान पुरी बनी हुई थी, जनशून्य थी। चादशाह अकबर ने ऐसे जनशून्य श्मशान चित्तौड नगरी पर अधिकार प्राप्त किया । चाहे चित्तोड श्मशान पुरी हो चाहे जनशून्य नगरी हो पर बादशाह की बहुत दिनों की लालसा चित्तौड गढ को हस्तगत करने की पूर्ण हुई। पञ्जाव के प्रसिद्ध विद्वान, डाक्टर गोकुरचन्द्र एम० ० पी० एच० डी० के"The Transformation of Sikhism" नामक 'ज्ञात होता है कि अकबर-चित्तौड़ दुर्ग को जीतने के लिये इतना उत्सुक था, कि उसने सरहिन्द के भगवानदास मन्त्री नामक अपने एक विश्वास- पात्र कर्मचारी को सिक्खों के गुरु अङ्गद के पास यह प्रार्थना करना के लिये भेजा कि चित्तौडगढ अकयर के हस्तगत हो। गुरु उस समय यावती "अनवाने में लगे हुये थे, उन्होंने कहा -योहा कुए का चक्र अपने स्थान पर बैठ जायगा त्योंहो चितौडाइ विजय हो जावेगा" शायद गुरु चिौर के । पुस्तक से जन्म और मेवाड की परिस्थिति ४५ जिस अकवर की प्रशसा में इतिहासकारों ने आकाश या पाताल के पुल चाध दिये हैं। उस अकवर ने चित्तौड पर विजय प्राप्त करके अपने पापाण दृदय और नृशस स्वभाव का परिचय दिया। उसने चित्तोड नगरी पर बडे बडे अत्या- चार किये । नराधम, पापी अलाउद्दीन खिलजी और मालवा के बादशाह बहादुर के हाथ से जो राजकीय चिन्ह बच गये उन सबका मटियामेट अकवर ने किया। देवालय और मन्द्रिों के कलश और शिखर यवनों के पैर तले रौंदे गये। चित्तोड की सुन्दर अट्टालिकाए और पवित्र मन्दिर गिराकर जमीन के बराबर किये गये। जिन नगाड़ों की ध्वनि कोसों तक पहुचकर गिहलोर नरेशो की महिमा-प्रगट करती थी जिनकी ध्वनि से मेवाड के वैरियों का फलेजा धडकता था। जो बहुमूल्य दीपवृक्ष अपने विमल प्रकाश से भगरती चतु- झुंजा के मन्दिर की शोभा बढाते थे और जिन सुन्दर किवाडी इतिहास को नहीं जानते थे, तब ही उन्होंन ऐसी बात कही थी। इसमें सन्देह नही कि भकयर एक दूरदर्शी और बुद्धिमान बादशाह था तथापि यह कतिपय मूढ विश्वासों से नही बचा हुआ था । यद्यपि वह अपने सिर लुई ११वें के समा भपनी टोपी में समस्त ईसाई सेण्टो की तमवीरें लेकर न चलता था, परन्तु इसमें किसी प्रकार का सदेह नहीं कि वह आपति के समय में सहायता की याचना के लिये साधुओं तथा पविन मन्दिरों तक पहुचा करता था। यह हो सकता है कि उसने ज्वालामुखी के मन्दिर के हिन्दुओं को प्रसन्न करने तथा अपनी ओर मिलाने के लिये मरम्मत की हो परन्तु यह यात असन्दिग्ध है कि दरवेशोतथा दरगाहों में यह समयोपयोगी राजनीति के कारण ही श्रद्धा नहीं दिखाया करता था। दसो तवारीख फरिश्ता का ४९० पेज जिसमें ज्ञात होता है कि वह अनेकगार निजा- मुद्दीन भौरिया तथा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाहाँ तक पैदर यना करके गया था।
४६ महाराणा प्रताप से चित्तौड के बड़े बडे द्वार चमक दमक रहे थे। उन सबको अकवर अपने नवीन नगर अकबराबाद को सजाने के लिये ले गया था परन्तु इस तरह से राजकीय चिन्हों का मटिया- मेट करने पर भी अकवर जयमल और पत्ता की वीरता को नहीं भूला । उसने दिल्ली में अपने राजमहल के सामने जयमल और पत्ता की हाथी पर चढी हुई पत्थर की दो मूर्तियां बना रसी थी ।ठीक ही है सच्च शूरमा की कौन प्रशंसा नही करता है। सच्चे शूरवीर के सामने उनके शत्रुओं को भी अपना मस्तक झुकाना पड़ता है । आइये । पाठक !! आइये !!! अकबर की करतूत तो देख चुके ,अव उदयसिह जी की भी सुध लेनी चाहिये । जब अकवर चित्तौडगढ धेरै पड़े हुये थे, दोनों ओर से रणचण्डी का लास्य नृत्य हो रहा था। तब उदयसिह ने देखा कि अभी युद्ध की समाप्ति नहीं है न मालूम अभी कितने दिन और युद्ध हो। यह विचार कर उन्होंने चित्तौड छोड़ दिया, पहले उन्होंने राजाधिपाल नामक स्थान में गौहलों के यहा 'आश्रय लिया। .फिर और भी दक्षिण अरावली पर्वत श्रेणी के मध्य में बढ़े। वहा उन्होने कई वर्ष पहले एक सरावर और सुन्दर भवन वाया या उस सरोवर का नाम पडा था-उदयसागर और उस महल का नाम नचौकी । उस जगह जाकर उदय- सिंह ने आश्रय लिया था इसी लिये यह स्थान समस्त मेवाड की राजधानी हुई, पीछे उसका नाम उदयपुर पड़ा। उपर्युक्त घटना अर्थात् चिसोड पतन के पीछे उदयसिंह जो चार वप और जिये चित्तौड़ में उनका राजदय, राज सम्मान और राजवैभव था पर यह सब कुछ होने पर भी गजगौरव न था। वीर केसरी प्रतापसिंह उदयपुर में न रह 'कर कमलमीर में रहना पसन्द करते थे। उदयसिह जी का जन्म और मेयाड की परिस्थिति ४७ प्रतापसि ह की ओर स्नेह भी न था । स सार भी कैसी अदभुत घटनाओ मे भरा हुआ है, प्राय इतिहास में देखने में आया है कि जिन राजकुमारों को उनके पिता राजाओं ने स्नेह की दृष्टि से नहीं देगा है, उन्हें समस्त स सार ने आदर और स्नेह फी दृष्टि से अपनाया है। फोन नहीं जानता कि प्रहाद को उसके याप राजा, हिरण्यकश्यप ने क्या क्या यन्त्रणायें पहुंचाने की चेटायें नहीं की थीं। पर आज प्रहाद के नाम पर स सार माहित है । ध्रुवजी के पिता ने उनको फय आदर की दृष्टि से देना था, पर आज स सार के बहुत से मनुष्य उनके नाम की माला जपते हैं। शिवाजी महाराज अपने पिता के कव लाडले, दुलारे थे? पर अपने पिता के ललकारे दुतकारे शिवाजी महाराष्ट्र देश में से यवनों के राज्य को उनाड पछाड के हिन्दुओं की ध्वजा पताका फहरा कर संमार में अपना नाम अमर कर गये।। यही दशा महाराणा प्रतापसिंह की हुई, जो अपने पिता के स्नेह भाजन न थे, वे हो अपनी अलौकिक वीरता से आज भी समस्त मेवाड के नहीं नहीं समस्त भारतवर्ष के पूजनीय देव होगये हैं । कहिये पाठक | प्रताप अपने किन गुणों से इतना उच्च स्थान प्राप्त कर गये हैं ? यदि उन कारणों के ढूंढने की इच्छा हो तो आइये अगले परिच्छेदों में देखें। जिससे पता लगे कि आज भी, रतनी शताब्दिया बीत जाने पर भी प्रतापसि ह क्यों पूजनीय है ? भारतमाता के एक से एक योग्य पुत्र होने पर भी प्रताप सिह और गुरु गोविन्दति ह आदि महापुरुषों के नाम पर आनन्द से हदय नृत्य क्यों करने लगता है ? इस यात को जानते हो न नही जानते हो तो एकवार सेोचो । अपने हृदय से इस प्रश्न का उत्तर पूछो ? कि प्रतापसिह का नाम मोहित करने वाला क्यों है। - + + तीसरा परिच्छता । राय माप्ति "हे कुवर तुम को राज दै, सिर अचल छत्र फिराई है। (हरिश्चन्द्र) सन् १५७२ में गोलकुण्डा नामक स्थान में ४२ वर्षकी अवस्था में मेवाड़ के अधीश्वर महाराणा उदयसिंह का देहान्त हुआ । उस समय मेवाड की कैसी दशा थी, सो ऊपर लिसा जा चुका है। वास्तव में उदयसिह नाम में ही कुछ दोष मालूम होता है । वादशाह अकबर के समय में राजस्थान में दो उदयसिह हुये, पर दोनों ही कुल कलङ्क हुये। महाराणा उदयसिंह के समय में मेवाड का पतन हुआ और मारवाड के “मोटे राजा" उद्यसिह ने अकवर की दासता स्वीकार करके और उसको अपनी बहिन जोधवाई को व्याह करके बाद- के साले बनने के कलड का टीका अपने मत्थे लगवाया। , उदयसिह मरते समय एक और भी राजपूत वश लोकाचार और शास्त्र विरुद्ध कार्य करा गये । सदा उत्तराधिकारी विधि को टालकर, पुरानी शुद्ध सनातन को मेट कर अपनी छोटी प्यारी रानी के कुमार जगमल उत्तराधिकारी बना गये, उदयसिहजी के चौवीस लडके थे। चौबीसों लडकों में से जगमल सच में छोटे थे और महा- राणा प्रतापसिह सब से बड़े थे। इस विचार से चित्तौड़ का राज्य प्राप्ति ४६ . , राजसिहासन और राजमुकुट प्रतापसिह का था । परन्तु नहीं, उदयसिंह ने इसका कुछ विचार नहीं किया। वे अपनी प्यारी छोटी रानी के प्रेमपाश में बंधे रहने के कारण कुल मर्यादा, विवेक, बुद्धि, लोकाचार और शास्त्रों के विधान आदि सभी को विसर्जन कर चुके थे। उन्होंने जगमल को उत्तरा- विकारी बनाकर अपने पुत्रों में नया झगडा खडा कर दिया। मेवाड में भी यह रीति है कि एक राजा के मरने पर दूसरे को गद्दी हो जाती है । एक ओर तो राज परिवार के लोग कुल पुरोहितों के साथ शोक मनाते हैं। दूसरी ओर प्रजावर्ग अपने मकानों की सफाई करती हैं, अपने घरों को सजाती है और दूसरी ओर नये राजा का अभिषेक होता है। King is dead, Long live the King"- अर्थात् “राजा.मर गया पर राजा युग युग जियो" इस कहावत के अनुसार मेवाड का राजसिहासन भी राजा बिना खाली नहीं रहता है । बस इस नियम के अनुसार ही जव उदयसिह जी का अन्त्येष्टि संस्कार होरहा था। तब कुमार जगमल गद्दी पर बैठे । जगमल को क्या मालूम था -" Man Proposes but God disposes मनुष्य अपने विचारों के पुल याँधता है पर परमेश्वर ढाह देता है। "मेरे मन में और कर्ता के मन और" येचारे जगमल को क्या खबर थी कि इस उपर्युक्त कहावत के अनुसार उसके भाग्य में राजसिंहासन का सुरा यदा ही नहीं है । जिस समय नगमल राजगद्दी पर बैठकर अपनी चपलता की सीमा प्रकट कर रहे थे उस समय स्मशान भूमि में कुछ और ही प्रस्ताव हो रहा था। उदयसिह चाहे अपनी वश परम्परा को भूर गये, चाहे के लोफाचार और शास्त्र विरुद्ध काय कर गये हैं पर राजपूत सरदार वंश परम्परा की रीति को लोकाचार और धर्म को - महाराणा प्रताप भूले नहीं थे। राजपूतगण 'मुसललानों के समान नहीं थे कि शाहजहा के सच्चे उत्तराधिकारी दाराऔर शिकोह को मारकर उसका छोटा भाई औरङ्गजेय दिल्ली के तन पर बैठ गया और किसी ने चू तक नहीं की । राजपूत सरदारों को उदयसिह जी का यह काय पसन्द नहीं आया। झालाराधिपति मणिगुरु सरदार को उदयसिंह जी का यह अनुचित कार्य बहुत ही खटका वह अपने भाजे प्रताप को ही गद्दी पर विठलाने के लिये ध्यन थे और मेवाड़ के प्रधानमन्त्री चूडायत कृष्णसिह से पूछने लगे कहिये आप बडे पुत्र प्रताप के होते हुये छोटे पुत्र जगमल को गद्दी दिलाने के लिये कैसे सहमत होगये आपके रहते हुये यह कुमन्त्रणा कैसे हुई. आपके रहते हुये यह कुविचार कैसे हुआ ? आपने इस न्याय विरुद्ध कार्य का क्यों अनुमोदन कर लिया । रावने झालाराधिपति शोणिगुरु के प्रश्न का हंसकर उत्तर दिया । यदि अन्तिम समय में रोगी को कुपथ्य सेवन की इच्छा हो तो उसे कौन रोक सकता है। यदि अन्तकाल में रोगी दूध मागे तो उसे देने में हानि ही क्या है ? इतना कहकर राव थोड़ी देर के लिये चुप हो गये पीछे कहने लगे कि चित्तौड़ के गज सिहासन के लिये मैंने आपके भाई प्रताप को ही चुना है निश्चय 'मानिये गा कि प्रताप के रहते हुये मैं मेवाड़ का राजमुकुट किसी दूसरे के सिर पर नहीं देख सकूँगा मैं प्रताप के पास ही खडा होऊंगा। इधर यह बात चीत हो ही रही थी, उधर जगमल राजा जी को गद्दी पर बैठा हुआ था । प्रतापसिंह अपने पिता के व्यवहार से दुखित होकर घोडा कस कर मेवाड छोडने की सम्यारी कर रहे थे। इस बीच में सरदारों ने प्रतापसिंह को जाने से रोका और ग्वालियर के राजष्युत राजा के साथ रावत कम्पसिंह जगमल के पास पहुचे जगमल ने उनके पद के
राज्य प्राप्ति
मनुसार , उन को मा फो सही पर उन दोनों ने यहां पहुंच
फर जगमल की पक एफ पांह पकड फर नीचे एक आसन पर
विठला दिया और उससे फदा.-कुमार! आपने छोला साया
है इस गद्दी पर पोबल पुतापमिह फै अतिरिक्त और किसी को
बैठने का अधिकार नहीं है। ऐसा कह फर उन्होंने प्रतापसिंह
के नलयार या दो, मालाम्ना अधिकारी ने प्रतापसिंह को
राजसीपन्न पहिनाये और फिर गजसिंहासन पर बिठला दिया।
यह सब हो चुफने के पाद मेगाड को पृथा के अनुसार प्रताप ने
जमीन तक झक फर तीन घार पुणाम किया । चारों ओर से
आकाश को गुंजानेवाली घ्यनि महाराणा प्रतापसिंह की जय
होने लगी। यह सब कृत्य होते देख कर जगमल चुप हो गया,
उसने चूं तक नहीं फी । परमेश्वर की भी मामाया है थोडा देर
पहले जो मेवाड़ के राज सिहासन फी आशा लगाये हुए था यह
जमोन पर बैठाया गया, जो निराश होकर अपनी जन्मभूमि को
को अन्तिम प्रणाम करहा था।यह मेवाड का अधीश्वर हुमा।
जमी तो फयिकहता है कि"रीते भरे टरफाने महर करें तो फेर
भरें" ।
বিঃ)
है
प्रहेरिया का उत्सव
बन्धु यह मलिन वेप तजि डारो।
आलस बन्द तोड अव या छन याको बेग उतागे ॥
तम फारन नालनत,अवहिं लौं अब होगयो उजारो वन्धु०-
को कट फटो. वस्त्र केवल पै हृदय न मलिन तुम्हारो॥
तासे तजि ऊपरो मलिनता यह कलंक को टारो।।
बन्धु अब चूकन को समय रह्यो,नहिं बैठे काह विचारो।
माधव,, अवसर गये न मिलि हैं लापाजतन कर हारो।
बन्धु अब मलिन वेप सजि हारो॥
*-१० माघव शुक्ल
बसन्त ऋतु के समय में महाराणा प्रतापसिंह ने मेवाड
का राज मुकुट अपने मस्तक पर रखा था। उन दिनों अहेरिया
का उत्सव निकट था । महाराणा प्रतापसिह ने आज्ञा दी कि
सब लोग शिफार खेलने के लिये जङ्गल में चलें । और भगवती
गौरी के सामने बाराह-बलि देकर आगामी वर्ष का फल देखें।
और आने वाले वर्ष का फलाफल आज के दिन निश्चय करें।
सरदार महाराणा की इस आशा को शिरोधार्य करके
घोडे, हथियारों को सुसजित करके जङ्गल में शिकार
बेलने के लिये चले । महाराणा भी अपने सामन्त सरदारों
के साथ चलें । मानन्द में भरे सब शिकार खेलने लगे।
समी उपस्थित जन माखेट के फल पर मेवाड के भविष्य
शुभारभ का विचार करने लगे । महाराणा भी अपने
सरदारों को इस अवसर पर उस्माहित और उत्तेजित करने
गे। अपने सरदारों को पढे गम्भीर और और उत्मा
.
अहेरिया का उत्सव
पूर्ण शब्दों में कहने लगे-सरदारगण ! मेवाड के पीरो ! स्मरण
रयचो कि आज याराह के शिकार पर ही मेवाड माग्य की
परीक्षा निर्भर है। मत समझो कि केवल शान्ति समय में
पोडशोपचार सहित घन घोर घंटा ध्वनि फरके ही भगवती के
सामने याराह की यलि देने से ही कार्य की सिद्धि हो जायगी।
माता के सामने यन सूअरों को बलि देते हो तो भले ही दो,
लेकिन अच्छी तरह से याद रक्सो कि हमारा महावत जो
चित्तोड को स्वाधीन करने का है वह केवल बन-बारहों के
बलिदान करने से नहीं हो सकता है । देखते नहीं हो कि
समस्त राजपूताना पापी नराधम मुगलों से प्रस्त हो रहा
है । मेवाड की, राजपूताने की राजपूत जाति की स्वाधीनता
हरण हो गई है । माता भगवती की परम पवित्र मूर्ति
यवनों द्वारा पदोमान्त हुई है। भगरती चतुर्भुजी की मूति
यवनों को ठोकरों से टकराई गई है । इस महोत्सव
करने का प्रयोजन यही है कि हम सब रोजपूताने से मुगलो
को खंदेडने की, अपनी प्यारी जन्मभूमि चित्तौडे को मुगलों
के हाथ से उद्धार करने की अटेल प्रतिक्षा करें । जिस
तरह से आज हम बने बारहों का शिकार करते हैं, वैसे ही
राजपूत जाति के शत्रुओं का शिकार करे । महाराणा के
मुखारविन्द से ऐसे उत्साहपूर्ण शब्द सुन कर उपस्थित
सेमस्त सरदार मण्डलो ने आकाशे गूजर्ने वाली यह भनि
की कि महाराणा प्रतापसिंह की जय" "मेवाडाधिपति को
जय" "भगवान एक लिङ्ग की जय" । तदनन्तर सभी लोग
आग्वेंट में प्रवृत्त हुये असंरय योराहों का शिकार हुआ उस दिन
के आखेट में सफलता प्राप्त करके समस्त राजपूतों ने -
लिया कि भविष्य में कुछ अच्छी हो पात होने वाली
प्रसन्नता पूर्वक आखेट से लौट आये।
।
-
चियापारिकदी
प्रहेरिया का उत्सव
पन्धु यह मलिन वेप तजि डारो।
आलस बन्द तोड अप या छन याको वेग उतागे।
तम फारन न लखत भयहि लौं अब हगयो उजारो ॥बन्धु
को कट फटो, वन केवल पै हदय न मलिन तुम्हारो॥
तासे तजि ऊपरो मलिनता यह कलक को टारो।।
बन्धु अब चूफन को समय रह्योनिहिं बैठे 'काह
विचारो
"माधव, अवसर गये न मिलि, हैं लास जतन कर हारो।
बन्धु अब मलिन वेष तजि डारो॥
" -प० माघ शुक्ल
बसन्त ऋतु के समय में महाराणा प्रतापसिंह ने मेवाड
का राज मुकुट अपने मस्तक पर रखा था। उन दिनों अहेरिया
का उत्सव निकट था । महाराणा प्रतापसिह ने आशा दी कि
सब लोग शिकार खेलने के लिये जाल में चलें । और भगवती
गौरी के सामने बाराह-पलि देकर आगामी वर्ष का फल देखें ।
और आने वाले वर्ष का फलाफल आज के दिन निश्चय करें।
सामन्त सरदार महाराणा की इस आज्ञा को शिरोधार्य करके
अपने घोड़े, हथियारों को सुसजित करके जङ्गल में शिकार
खेलने के लिये चले । महाराणा भी अपने सामन्त सरदारों
के साथ चलें । आनन्द में भरे सब शिकार खेलने लगे।
समी उपस्थित जन आखेट के फल पर मेवाड के भविष्य
शुभाशुभ का विचार करने लगे । महाराणा भी अपने
सरदारों को इस अवसर पर उत्साहित और उत्तेजित करने
रंगे । अपने सरदारों को बड़े गम्भीर और और उत्साह
महेरिया फा उत्सय पूर्ण शब्दों में फाइने लगे-सरदारगण ! मेवाड के थोरो ॥ स्मरण रमनो कि भाजपागद के शिकार पर ही मेवाड भाग्य की परीक्षा निर्भर है। मत समझो कि केवल शान्ति समय में पोडशोपचार सहित धन घोर घंटा पनि फरके ही भगवती के सामने पाराह की यलि देने से ही कार्य की सिद्धि हो जायगी। माता के सामने यन सूअरों को पलि देते हो तो भले ही दो, लेकिन अच्छी तरह से याद रफ्नो कि हमारा महाप्रत जो चित्तोड फोम्याधीन करने का है यह केवल वन-यारहो के बलिदान करने से नहीं हो सकता है । देखते नहीं हो कि समस्त राजपूताना 'पापी नराधम मुगलों से प्रस्त हो रहा है । मेवाड को, राजपूताने फी राजपूत जाति की स्वाधीनता हरण हो गई है। माता भगवती की परम पवित्र मूर्ति यानों द्वारा पदामान्त हुई है । भगरती चतुर्भुजा की भूति यवनों की ठोकरों से टकराई गई है । इस महोत्सव करने की प्रयोजन यही है कि हम सबै राजपूताने से मुगलों को संदेड़ने को, अपनी प्यारी जन्मभूमि चित्तौड को मुगलों के हाथ से उद्धार करने की अंटले प्रतिज्ञा करें । जिस तरह से माजे हम धेन-यारहों की शिकार करते हैं, वैसे ही राजपूत जाति के शत्रुओं का शिकार करे । महाराणा के मुगारनिन्द से ऐसे उत्साह पूर्ण शब्द सुन कर उपस्थित समस्त सरदार मण्टली ने आकाश गूजने वाली यह पनि को कि महाराणा प्रतापसिंह को जय" "मेवॉडाधिपति को जय" "भगवान एक लिङ्ग की जय" । तदनन्तर सभी लोग आपेट में प्रवृत्त हुये असंख्य याराही को शिकार हुआ उस दिन के आरोट में सफलता प्राप्त करके समस्त राजपूतों ने समझ- लिया कि भविष्य में ही बात होने प्रसन्नता पूर्वक . - 7 ।।
पाँचता परिन्ट
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.
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रङ्ग में भङ्ग
*सौहृदेन परित्यक्तं नि स्नेह खलमुत्सृजेत् ।
सौदर्यः भातरमपि किमुतान्ये प्रथग्जनम् ।।
दूजे के हित प्राण दे, करे धर्म प्रतिपाल ।
को सो शिवि के बिना, दूजर है या काल॥
-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
हम पहले कह आये हैं कि प्रतापसिंह और शकसिंह,
दोनों भाई थे । बाल्यावस्था में दोनों का लालन पालन, खेल
फूद, शिक्षा दीक्षा, एक ही साथ हुई थी। प्रायः बालकों में ''
एक दूसरे से खेल कूट में वैमनस्य भाव हो जाता है। वैसे ही
बचपन में प्रताप और शक्ति दोनों में हो गया। धीरे धीरे इस
द्वेष भाव ने दोनों भाइयों के ऊपर विशेष रूप से अधिकार प्राम
कर लिया। आगे चल कर इस द्वेषभाव के कारण दोनों भाई
एक दूसरे के शत्रु बन-बैठे।
अहेरिया उत्सव के दिन अनेक राजपूत वीरों ने घने
जगलों में घुस कर बहुत से वाराहों का शिकार कर के आहे.
रिया उत्सव मनाया । देवी के सामने अनेक-वाराहों का बलि-
दान दिया और महोत्सव से उस वर्ष का फल भी अच्छा
प्रतीत हुआ सब की आशायें महाराणा प्रतापसिंह पर बधी
ऐसे दुष्ट सगे भाई को भी त्याग करना चाहिये जिसने मित्रता छोर
दी है और जिसके स्नेह नहीं है और की तो बात ही क्या है -- लेखक
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परन्तु हाय ! इस महोत्सव के समय पर ऐसी दुर्घटना हो गई
जिस से सभी के प्राण थर्रा उठे और चित्तौड के शत्रुओं को,
प्रतापसिह के चैरियों को वह घटना एक प्रकार से सहायता
पहुंचाने वाली हुई। किसी अंश में यह भी कहा जा सकता है
कि वह घटना मेनाड के इतिहास को ही पलटने वाली हुई।
अहेर के उत्सव के दिन जिम समय समस्त राजपूत वीर
मण्डली चारों ओर वाराही के शिकार करने में लगी हुई थी
सभी लोग प्राणपण से यह चेष्टा कर रहे थे कि धोरता
में कौन श्रेष्ठ है अथवा यों कहियेगा कि सभी लोग अपनी
अपनी श्रेष्ठता दिखलाने की चेष्टा कर रहे थे। उसी समय
यह घटना हुई।
उसी समय दोनों वीर भाता प्रतापसिंह और शकसिंह
में पिछला विद्वेष भाव जागृत हो उठा । दोनो के बीच में
भयङ्कर विवाद उपस्थित हुआ। विवाद का कारण यह था कि
सभी के हृदय में आखेट करने की लौ लगी हुई थी सभी
को अपनी वीरता दिखाने और यश प्राप्त करने को लालमा
यह रही थी। किसी को किसी की सुध न रही छोटे घडे या
कुछ भेद भाव नही रहा । प्रताप और शक्क दोनो भाई एक साथ
ही शिकार के लिये चले उन दोना के पास ही एक यन धाराए
दिखाई दिया। वे दोनो भाई धाराह की ओर लपके येचारा
वाराह भी अपने प्राणों के मोह से कठिन जञ्जाल से बचकर
भागने लगा पर वह भाग कर जाता ही कहा ? दो महापराक्रमी
वीरों के बीच से वाराह का बवकर जाना असम्भर था ।
बस दोनो भाइयों ने एक साथ एक हो समय ठीक एक ही
स्थान पर दो कठिन तीर बाराह की ओर ताक कर छोडे एक
तोर बराह के मस्तक को पार कर गया । उस तीर फी घेदना
को जङ्गली सुअर सम्हाले न सका । उस तीर के
महाराणा प्रताप धरती पर लेट गया। हाय ! धुरी सायत में इस जङ्गली सूअर का आघात हुआ था। घस इसी लक्ष्य येध पर दोनों भाइय' में खूध तर्क वितर्फ होने लगा। दोनों आपस में इसी यात पर झगडने लगे कि मेरे तीर से याराह मारा गया, अन्त में यह तर्क वितर्फ बहुत बढ़ गया। उस समय प्रताप अपने घोड़े को चक्राकार फेर रहे थे। उनके हाथ में शानदार वी चमक रहा था। दोनों भाइयों के हृदय की दवी' हुई विद्धशाग्नि भभव उठी दोनों एक दूसरे को ललकार कर द्वन्द्वयुद्ध करने के तैयार हो गये दोनों एक दूसरे को ललकार कर कहने लगे "खबरदार, पीछे मत हटना आओ अभी हम तुम फैसला करे कि किसके तीर से बाराह मारा गया है।" बस इस तरह से कहकर एक दूसरे के प्राणों के ग्राहक बन बैठे दोनों भाइयों का आपस में यह झगडा देसकर समस्त वीर मण्डली चकित और स्तम्भित हो गई वह यन्त्रमुग्ध सांप के समान वीर मण्डली चुप चाप दोनों भाइयों की ओर देखने लगी। चारों ओर सन्नाटा छा गया, हाय । अव कौन दोनों भाइयों का झगडा मिटावे ? कोन दोनों भाइयो के अशान्त महासागर के समान हृदयों को शान्त करे । हाय ! अब मेवाड का सर्व नाश उपस्थित हुआ। इस तरह से सभी बीरों के हृदय कापने लगे, सभी अपने अपने इष्ट देवों से इस झगड़े के शान्त हो जाने की प्रार्थना करने लगे। पर प्रताप और अपने सङ्कल्प से विचलित नहीं हुये । वे एक दुसरे के प्राणों के ग्राहक बने हुये थे। वे अपने विचारों पर अटल पर्वत के समान डटे हुए थे। वे अपनी अपनी धुन में लगे हुए थे। परन्तु जब सारी बोर मण्डली मन्त्र मुग्ध सांप के समान चुपचाप खड़ी हुई थी। जव प्रताप और शक्त भी भावी भले चुरे का विचार न करके एक दूसरे के प्राणों के शक्त अपने
रग में भङ्ग
लेने की तैयारी कर रदे थे। तव प्रताप थोर शक की रक्षा
के लिये फोन आगे आया पाठक ! उसी ब्राह्मण जाति की
एक सन्तान जिसको पा लोग इस देश को चौपट करने.
वाली जाति फाहते हैं अगुभा हुआ यह राज्य पुल पुरोहित
मामण था। वह प्रताप और शक के इस भयानक युद्ध को
मिटाने के लिये चोर मण्डली में से अगुआ बना । उसका
कोमल एदय सहन नहीं कर सका कि उसके होते हुये
मेवाड का सर्वनाश हो जाय । यह दोनों भाइयों के बीच में
खडा होगया और कहने लगा-हे महाराणा जी !!
कुमार । शान्त हो, इस व्यर्थ के झगडे में कुछ नही रक्खा है।
पर किसी ने उसकी यात नहीं सुनी, दोनों मस्त हाथी के
समान एक दूसरे पर माला चलाने लगे। इस भयङ्कर दृश्य
को देखकर राजपुरोहित ब्राह्मण ने फिर उधखर से महाराणा
प्रतापसिंह को सम्बोधन करके फहा-दुहाई, महाराणा जी
अरे भाई जरा तो धीरज धरो। थोड़ी देर ठहरो तो सही,
मेरी थोडी सी विनती तो सुनो पर महाराणा ने फुलपुरोहित
की इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया । कुल पुरोहित ने देखा
कि उसकी प्रार्थना का पुछ असर नहीं हुआ तब उसने शक्त
सिंह को सम्योधन करके कहा-हे गजकुमार ! जरा
ठहर जाओ? तुम मरीखे घोर पुरुपों को आपस में इस तरह
से लडना शोभा नहीं देता है । बडे भाई से लडना क्या
बुद्धिमत्ता है। पर नहीं सुनता कौन था ? एक दूसरे पर
चमकदार भाले चलने लगे, कुल पुरोहित ने देखा कि उस
की आवाज पहरे कानों पर पड़ी है । तब तो उसने दूसरा
ही उपाय सोचा, यह दोनो भाइयों के बीच में जाफर खडा
हो गया । वह पागल के समान मेघ गर्जना की भांति उच्च
स्वर से कहने लगा-"खैर तुम दोनो भाइयों ने
महाराणा प्रताप रक्षा माना, न सही। पर मैं अपने कर्तव्य से पीछे हटने वाला नहीं हू । स्वर्गीय देव गण ! दोनो भाइयों की रक्षा करना। राजकुल को सकुशल रसना वाप्पारावल की राजगद्दी का गौरव बनाये रखना ! सिसोदिया वंश के राजमुकुट की मान मर्यादा रखना । इनके जीवित रहने से ही मेवाड की होगी, मुगलों के हाथों में से चित्तौड का उद्धार होगा। नहीं भात विद्वपानि का परिणाम बडा ही शोचनीय होगा। अरे विद्वे. पानि बुझ, तू अव बुझे विना नहीं रहेगी, तू रक्त की प्यासी है, तो मेवाड के राजकुमारों का रक्त न चूस कर ले इस ब्राह्मण क रक्क पी। बस यह कह कर ब्राह्मण ने अपने पेट में कटार घुसेड ली रक्त का फवारा छूटने लगा । उष्ण रक्त की धारा ने द्वन्द युद करने वाले दोनो भाइयों को होली के लाल रङ्ग के समान रङ्ग दिया। . अरे ! यह क्या!! कुलपुरोहित ने हमारे ही लिये तो अपने प्यारे कोमल प्राणों का विसर्जन किया। अब दोनों भाई अपने भाले थाम थाम कर पश्चाताप करने लगे। दोनों को अपनी भूल भात हुई । साप के काटे के समान दोनों ही धीर गम्भीर स्थिर बडे हो गये। दोनों के हृदय में अशान्त महासागर के समान जो क्रोध उठ रहा था, वह शान्त हो गया। दोनों को अपनी अपनी करनी पर पछतावा होने लगा, पर जो हो चुका, उसके दूर करने के लिये उनके हाथ में कोई उपाय नथा । यथा समय प्रतापसिह ने कुल देवता का अन्त्येष्टी संस्कार कराया, उनके वंश में लोगों को यथेष्ट भूमिवृति नियत कर दो । कहते हैं, आज तफ ब्राह्मण के वंशधर राजवृत्ति पाते चले जाते हैं। इसके पश्चात् प्रतापसिंह ने अपने सहोदर शकसिंह को अपने राज्य से निकल जाने की आशा दी। शक ने
अपने बड़े भाई की माशा को शिरोधार्य किय
अपनी जन्मभूमि को छोड फर चल तो दिये, पर
का फ्रोध शान्त नहीं हुआ। उनको अपने बड़े
अपमान का बदला लेने की धुनि सवार हुई। यद
नियत से उन्होंने मेवाड के सदैव के बैरी मुगल स
की शरण ली।
कोई सामग्री न थी। धनयल, जनबल उस समय मेवाड
हिंद्रा
परिच्छेद
।
- भीष्म प्रतिज्ञा और सर्व प्राहुति'
*"क्वचिद्भूमी शैय्या क्वचिदपि च पर्यङ्कशयन
'क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च
शाल्योदनरुचि
क्वचित्कन्याधारी क्वचिदपि विचित्राम्बरधरो
मनस्वीकार्यार्थी गणयति न दुःखं न च सुखम्"
प्राताप मेवाड के राजसिंहासन पर सुशोभित हुये, विशाल
मेवाड के स्वामी हुये, अगणित नरनारियोंके दुःख सुख का भार
उनके हाथ में आया पर प्रताप के पास उस समय राज योग्य
कुछ भी नहीं था। स्वर्ग तुल्य मेवाड उस समय श्मशान भूमि
धनी हुई थी। उस समय मेवाड जनशून्य था । मेवाड के
राजधानी चित्तौड-मुगलों के हाथ में थी, मेवाड
ओर उस समय अन्धकार छा रहा था।
।
.
লম্বা
)
पुप्पी पर सो रहते हैं कमी उत्तम पलङ्ग पर
" पात याकर रह जाते है, और कभी चोवलादि
हैं कमी गदढी मोढते हैं और कमी अच्छे वख
काम करने वाले मनु'य कमी दुर सुख का
"भूमि शय्या कहुं पलंग पे
मिर पांव कहुं भी मुम्ब दुग्ध
मोम प्रतिष्ठा और सघं भानुति ६१ पदय में से आशा फी ज्योति बुझ चुकी थी। निराशा रूपी महासागर में राजपूतगण गाते मा रहे थे, फेवल मेवाड में ही नहीं धारों ओर राजस्थान में से प्रतापसिंह को कहीं से भी सहायता फो कुछ भाशा नहीं थी । राजपूत घोर अपनी स्वामायिक धोरता को भूल कर मुगल दरबार के फ्रीतदास बन चुके थे। उस समय चित्तौड् फी कैसी दशा थी इसका अनुमान पाठक केवल इसी से करलें कि धारण, भाटों ने उस समय चित्तौड़ को उपमा विधवा स्त्री से दी है। महाराणा प्रताप ऐसे ही राज के खामी हुये, उनके पास धन बल, जन पल फुछ न था परन्तु सबसे बढ़ कर हृदय का उत्साह था। ये जानते थे, जैसा उनका हृदय है, वैसी राज पूताने की, मेवाड की परिस्थिति नहीं है । परन्तु धीरवर प्रताप के हदय पर पालक प्रताप रहते हुये जो सस्कार जम गये थे ये फी दूर नहुये # अपने यहा के स्वदेशी चारण भाटों के मुप से अपने पूत्रों के पूर्व गौरव का वृत्तान्त सुनते २ मताप के हृदय में चित्तीद उधार का उत्साह दूना होगया। यपि अकयर की नीतिनिपुणता से समस्त राजपूताना अपनी मान मर्यादा पर लात मार कर पराधीनता की जञ्जीर में जकडा हुआ था। जो राजपूत किसी समय मेयाड की छाया तले में रहते थे उनमें से अधिकाश अफयर के बिना मोल- के चेरे बन गये । जो राजपूनगण एक समय चित्तौड की शिक्षा के लिये अपना खून बहाते ये वे ही अक्चर की नीति परायणता 29 वास्तव में दुल हदयों को यल्पान करो के लिये महापुरपा के जीवन चरित और वृतान्त स बटवर और कोई पाय नहीं है। महाराज शिवा जी के ददग में भी स्वदेश भक्ति रामायण और महामारतको कथाओं --
1
शाल्योदनरुचि
.
उनके हाथ में आया पर प्रताप के पास उस समय राज योग्य
पनी हुई थी। उस समय मेवाड जनशून्य था । मेवाड की
छिटो परिच्छेद
। भीष्म प्रतिज्ञा और सर्व आहुति
*"क्वचिद्भूमी शैय्या क्वचिदपि च पर्यशयन
क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च
क्वचित्कन्याधारी क्वचिदपि विचित्राम्बरधरो
मनस्वीकार्यार्थी गणयति न दुःखं न च
प्राताप मेवाड के राजसिंहासन पर सुशोभित हुये, विशाल
मेवाड के स्वामी हुये, अगणित नरनारियोंके दुःसे सुख का भार
कोई सामग्री न थी। धनबल, जनवल उस समय मेवाड में
कुछ भी नहीं था। वर्ग तुल्य मेवाड उस समय श्मशान भूमि
राजधानी चित्तौड-मुगलों के हाथ में थी, मेवाड भूमि में
चारों ओर उस समय अन्धकार छा रहा था। राजपूत वीरों के
कभी पृथ्वी पर सो रहते हैं कमी उत्तम पलङ्ग पर रायन करते हैं
कभी साग पात ग्याकर रह जाते हैं, और कभी चावलदि का उसम भोज
करते हैं कमी गददी भोडते है और कमी भजे वन पहिनते हैं कार्या
भयान काम करने वाले मनुष्य को दुप सुध का अनुमान नहीं करते हैं
"भूमि राम्या कहु पलंग पे शाकहार कहुमिष्ट,
कई कथा मिर पाव कहु भी मुख दुग्न इट"--सेना ।
दुःखं न च मुखम्"
.
--
. भीम प्रतिक्षा और सर्प दुति रदय, में से आशा की ज्योति वुझ चुकी थी। निराशा रूपी महासागर में राजपूतगण गाते खा रहे थे, फेवल मेवाड में ही नहीं चारों ओर राजस्थान, में से प्रतापसिंह को कहीं से भी सहायता को कुछ भाशा नहीं थी । राजपूत घोर अपनी म्वामाविक वीरता को भूल कर मुग़ल दरवार के फ्रोतदास बन चुके थे। उस समय चित्तौड की कैसी दशा थी इसका अनुमान पाठक केवल इसी से करलें कि चारण, भाटी ने उस समय, चित्तौड़ को उपमा विधवा स्त्री से दी है। महाराणा प्रताप ऐसे ही राज के स्वामी हुये, उनके पास धन पल, जन पल कुछ न था परन्तु सबसे पढ कर हृदय का उत्साह था। वे जानते थे, जैसा उनका हदय है।वैसी राज एताने की, मेवाड की परिस्थिति नहीं है । परन्तु योरयर ताप.के हृदय पर पालक प्रताप रहते हुये जो संस्कार जम- पये थे वे कभी दूर न हुये * अपने यहा के स्वदेशी चारण माटों प्रताप के हृदय में चित्तोड उद्धार का उत्साह दूना होगया यपि सकयर की नीतिनिपुणता से समस्त राजपूताना अपने मान मर्यादा पर लात मार पर पराधीनता की जजी में जकडा हुआ था। जो राजपूत फिसी समय मेवाड छायाँ तले मैं रहते थे उनमें से अधिकाश अफयर के पिना मो के मुख से अपने पूर्वजों के पूर्व गौरव का वृत्तान्त सुनते केरे मन गये। जो राजपूतगण एक समय चित्तौड़ की शि- के लिये अपना खून वहाते थे ये ही अकबर की नीति परायण वास्तव में दुल हदयों को परवान करने के लिये महापुरुषा चीवन चरित और वृत्तान्त से बढ़कर भोर कोई उपाय नही है।म शिया जी के हृदय में भी स्वदेशामधिरामायण भार महाभारत की से हुई। " . न महाराणा प्रताप - - के कारण चित्तौड की, मेवाड की, स्वधीनता को मिटाने के लिये तैयार हो रहे थे। जो राजपूत एक दिन मेवाडाधिपति के पसीने की जगह अपना खून बहना अपना परम सौभाग्य समझते थे घे ही अकबर की नीति पाश में फंसकर महा राणा के खून के गाहक बन बैठे थे। मारवाड के उदयसिंह, अकवर के गुलाम बने हुये थे। जयपुर के मानसिंह अकबर के सेनापति थे उन्होंने अपना हृदय तक अकवर को बेच दिया। बूंदी के हाडा जो महाराणा के परम मित्र थे समय समय पर महाराणा को सहायता देते रहते थे वे भी अकबर के हाथ की कठपुतली बन चुके थे । कहने का सारांश यह है कि उस समय राजपूतों के हृदयों से स्वदेश और स्वजातीयता का भाव एक दम दूर हो चुका था। राजपूत राजपूत का खून चूसना चाहता था यहा तक कि प्रताप को भाईसागर जो और शक्तसिंह भी माई चारे और जननी जन्मभूमि के नाते को * सागर गो भी प्रतापसिंह के द्वेमासृज भाई थे। हम के सगे भाई जग- मल को सिरोही के राय सुलतान ने मारडाला था परन्तु इसका बदला प्रतापसिह ने कुछ म लिया क्योंकि राय सुलतान राणा का दामाद था। रसी से गिड़ कर सागर जी प्रकार से ना मिले थे। प्रकार ने उन्हों. राणा की पदवी और चित्तोड़ दिया कुछ इतिहास लेखकों का मत कि सब जहांगीर के समय में प्रतपसिंह के पुत्र अमरसिह की सन्धि हुई तब जहांगीर ने उनसे राणा को पदयी और चितौड छीन कर अमर सिह को दिया था। कुछ इतिहास खेचक कहते है कि सागर जी को अपनी करमी पर बहुत पश्चात्ताप हुमा था इस खिये बद अपने मतिमै अमरतिर कोधितोड़ देकर चले गये थे। महागीर ने उन्हें गणा की उपाधि दी थी सागर जी ने अममेर में बात रुपया मगर बाराह जी का मन्दिर बनवास स। उसे भी जहांगीर ने खरमा रामा या। इस कारण अपवा अन्य किसी भार से मांगीर माग तिरस्कृत होने पर दरवार में अपनी बाती पर 'PAINT करके भारमघात किया । सागर जी के एक पुत्र मुसलमानी से है -
भीष्म प्रतिझा और सर्व माहुति
भूलकर अरुयर की ओर जा मिले थे। पर इन सब बातों से
प्रतापसिंद निराश और निरुत्साहित नहीं हुये । राजपूतों की
यह दुर्दशा देख कर ये दुपित होते, पर अपने भाइयों की ऐसी
म्पिति देखकर वे और भी दुखित होते थे। परन्तु इन सर
अडचलों के आ जाने पर भी प्रत मे डिगे नहीं उन्होंने अपने
अत को पूरा करने के लिये कठिन मोम प्रतिक्षा धारण की।
ससार के यदुत से देशों में अपनी जन्मभूमि के उद्धार
करने के लिये अनेक व्यक्तिओं ने फठोर प्रतिज्ञाएं धारण
की हैं। परन्तु प्रताप को भाति पिरले ही लोगों ने देशोद्धार
का कठिन प्रत ग्रहण किया होगा । जानते हो, प्रताप का
कठोर व्रत क्या था ? अरे! दुयल हृदय उस कठोर प्रत को
कल्पना भी नहीं कर सकता है। प्रताप की उस असाधारण
प्रतिक्षा, भीष्म प्रतिज्ञा की बात सुनते ही, रोंगटे खड़े होजाते
है, मानों में से पानी मेह की झडी के समान गिरने लगता
है। अरे विलासिता के प्रेमियो और दासो! तुम भोगविलास
में पड़े हुए देशोदार को डीग हाकते हो। तुम अपने कान
के पर्दे खोल कर उस राजपुत्र फी, उस नरनाथ को प्रतिक्षा
सुनो, केवल सुन कर ही धुप मत हो जाओ, अपने हृदय के
कपाटों को खोलकर उस प्रतिक्षा को धारण करो। तय देखो तो
प्रभा पा साहब ने का नाम महायत & रिखा किसी किसी
इतिहास लेखक काम है कि सागर जी फ पुत्र म मुसलमानी धर्म ग्रहण
करके अपना नाम महावस ar या कोई कोई रतिहास लेखक कहते
है कि महायतमा सागर को मुसलमानो बो का पेटा नहीं था पर काम
से भाया था पहिखHATHHTHHTगया। यह नाम Meri ने रक्या
भाकोष हो जहाँगीर समय में महावत को जैसा योगा और सेना
पति पावैसा कमारी के विकार
-
J
महाराणा प्रताप सही कि प्रताप की प्रतिज्ञा कैसी थी वह यज्ञ से और पत्थर से भी कड़ी थी या नही । परन्तु नही, तुम लोगों को प्रताप की प्रतिज्ञा पर ध्यान देने का समय ही कहां है ? तुम्हारे पापाण हृदय पर प्रताप की वह प्रतिज्ञा अपना प्रभाव कैसे जमा सकती है। जानते हो कि जननी से बढकर जन्मभूमि का सिद्धान्त प्रचलित है पर कितने लोगों ने अपने व्यावहारिक जीवन -"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"-इस वाक्य को कार्य में परिणत करके दिखलाया है। प्रताप इस वाक्य को केवल अपनी वाणी से रट कर ही शान्त नहीं हुए उन्होंने अपने इस वाक्य को कार्य में परिणित करके दिख- लाया था। प्रताप सच्चे क्रियाशीलाथे, उनके हृदय में अपनी जन्मभूमि की दशा पर शोक सागर उमड रहा था। जननी की मृत्यु पर बहुत आदमियों को शोक मनाते देखा है परन्तु प्रताप ने अपनी जन्मभूमि के लिये जो शोक किया था, वह उनकी इस प्रतिशा से ही प्रकट होता है कि जब तक चित्तौड उद्धार न होगा। तब तक हम और, हमारे चंशधर बाल नहीं बनवायेगे सोने चांदी के पानों में भोजन नहीं करेंगे पलङ्ग पर कोमल शय्या पर शयन नहीं करेंगे इस प्रतिक्षा के अनुसार कार्य किया गया। सभी सोने चादी के वर्तन फोडे गये सुख, की सामग्री नष्ट की गई, राज परिवार ने कोमल पल की शयया परित्याग करके तृण को, घास की, शव्या ग्रहण की। स्वदेश भका प्रताप फेवल इतना ही कर के शान्त नहीं हुये। उन्होंने एक ऐसा उपाय फिया जिससे यह शोक- पट मेवाड के सामने सदैव के लिये रह जाये। चित्तौड़ की भारत के दुमय से चिशोरको पूर्व गौरव फिर माह नहीं मा। .
भौम प्रतिक्षा और सर्प आहुति - खाधीनता नष्ट होने से पहले चित्तोड के टङ्क (नगाडे) सेना के सामने रहते थे। परन्तु जन्मभूमि के उद्धार करने का प्रत स्मरण कराने के लिये धीरवर प्रताप ने आशा दी कि "यह नगाहे मेघाट की सेना के भागेन यजकर पीछे, यजा करें। प्रताप ने कठोर प्रतिमा की कि प्राण रदते मेवाड का गौरव नष्ट नहीं होने देंगे, जन्मभूमि की मान मर्यादा की रक्षा के लिये कुछ पचा नहीं रक्पेगे, माता के दूध पर कमी नहीं आच बाने देंगे।" यस इस भाति प्रताप ने फठोर देशोद्धार का फटिन ध्रत,उठाया जिस प्रकार माता के परलोक पास करने से उसको वियोग घेटना में शोकाकुल होकर पुत्र कुछ दिनों के लिये एष मुन सामग्रियों का परित्याग कर देता है। वैसे ही प्रताप ने जन्मभूमि के शोक में मय सुख चैन पर लात मार दी। . राजर्षि प्रताप केवल स्वदेश के लिये स्वय ही सन्यासी नहीं हुये किन्तु उन्होंने समस्त देशों को संन्यासी बना डाला उन्होंने आशा दी “समस्त प्रजा राज्य को छोडकर पहाडी पर रहे। राज में कोई महोत्सवादि न हो । सय घर जला दिये जाय वहाँ कोई वाणिज्य कृषि आदि करने न पाये । कोई भी ऐमो चम्तु न रहे जिससे मुसलमान बैरियों का आकर्षण होने पाये। जो कोई राज आज्ञा मन करेगा उसे प्राण दण्ड होगा।" ऐसी आज्ञा पीरवर प्रताप ने अपने राज्य में प्रचलित करा दो । हंसने पालो । भले ही इसो और कहो कि प्रताप की यह पागलपन की प्रतिक्षा थी। ससार में किसी को किमी कार्य करने की सभी लौ लगी हुई होती है उसी को पागल जिसके कारण मवाइके राणा अाज तक रूपान्तर में सभामा का पालन करते पाते है। शयन करते समय शारया के नीचे घास रख दी माती है, सोने चांदी के यनों में पत्तों पर भोजन रक्खा जाता है। अब भी की सेना का रण हा पाछे रक्सा माता है-सफ। - --
+:
महाराणा प्रताप
कहते हैं। प्रेम में सभी पागल हो जाते हैं, 'प्रेम में मनुष्य अपना
सर्वस्व खो बैठता है। वह प्रेम चाहे जैसा क्यों न हो? मजनू
ने लैला के प्रेम में अपने प्राण तक गंवा दिये थे। प्रताप
का प्रेम लैला मजनू का सा नः था। उनका प्रेम देश प्रेम
योगी जनों की भाति था जो ईश्वरीय प्रेम में सर्वस्व त्यागकर
एकान्त सेवन करते हैं। उन्होंने अपने राष्ट्रीय यक्ष को पूर्ण
करने के लिये सर्वख खाहा कर दिया। अपनी प्रजा के हृदय
में देश की शोचनीय स्थिति को बनाये रखने और देश की
शोचनीय दशा सुधारने के लिये उन्होने इस कठोर व्रत का
अवलम्यन किया था।
प्रजा ने सहर्ष अपने नरनाथ को इस आशा के सामने
मस्तक झुकाया। थडे' सरदारों से लेकर साधारण श्रेणी की
प्रजा तक प्रताप के इस कठिन व्रत में सहायता करने को
उद्यत हुई। अपनी प्रजावर्ग की सहायता से प्रताप ने देशो
द्वार का शुम अनुष्ठान आरम्भ किया।
-
-
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A
F
(सातवां परिच्छेद
रानाजा भङ्ग का दण्ड
"अहो, जिनको विधि सय जीव सों घढि दोनों जग काज।
मरे, दान सलिल वारे सदा जे जीतहिं गजराज ।
अहो, मुक्यो न जिनको मान ते नृपवर जग सिरताज।
अरे सहहिं न माझा भङ्ग जिमि दन्त पात मृगराज ॥
यरे, केवल यहु गहिना पहिरि राजा होई न कोय ।
'अहो, जाकी नहि माझा टरै सो नृप तुम सम होय ।।
-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
महाराणा प्रताप फेवल देशोसार के कठोर त पालन
करने की मासा देकर ही निश्चिन्त नहीं हुए। ये घोडे पर
सवार होकर अकेले अपने राज्य में घूमते थे और छिप छिप
कर देखते थे कि उनकी आज्ञा पालन होती है या नहीं।
जो कोई उनको मात्रा मन करता था वह पकड़ा जाता था
और फोर दण्ड पाता था। थोडे ही दिनों में मेवाड के
अधिकाश खान उजडे हुये दिखाई देने लगे। यहा तक कि
राजपयों पर उसाठस मोड लगी रहती थी, जिन पर
रास्ता मिलना कठिन हो जाता था, तिल रखने को भी
पान नहीं मिलता था, वे सुनसान दिसलायी पडते थे ।
जिन बड़ी घडी अट्टालिकाओं में कोलाहल के कारण
पद भी सुनना मुश्किल हो जाता था, ये उजडी हुई
उनमें पशु पति ने अपने घोंसले बना लिये
महाराणा प्रताप महलों में रोशनी के कारण आंखें चकाचौंध हो जाती थीं उनमें अन्धेरा छाया हुआ था। जिन स्थानों में हाथियों की विग्घाड और घोड़ो की हिनहिनाइट रात्रि दिन सुनाई पडती थी उन स्थानों को जङ्गली पशुओं ने अपना अहा बना लिया था। जिन स्थानों में सुन्दर पुष्प वाटिकायें बनी हुई थी जहां पुप्पों की.. सुगन्धि से मस्तक में तरावट हो जाती थी अब वे स्थान कटीले बन हो गये थे। फूलों के स्थान में बहुत से काटे उग आये थे। जिन सेती में हरी भरी फसल लहराती थी यहा लम्बी लम्बी घास उग आई, थी। बहुत से रास्ते जङ्गली कटीले वृक्षों और झांडियों से रुक गये थे। जिन बडे २ महर्लो में अप्सराओं सी रूपवती कमलनयनी सुन्दरियां रहती थीं चहा अब भयङ्कर जगली जन्तुओं का बास था। कहा तक कहें स्वर्ग तुल्य मेवाड की श्मशान भूमि से भी गई 'बीती दशा हो गई थी। एक दिन प्रताप अपने साथियों के साथ बनास नदी के किनारे अनतत्ला नामक स्थान में घूम रहे थे । इतने में क्या देखते हैं कि एक गडेरिया छिपकर अपनी भेड बना नदी के किनारे उगी हुई बडी बडी घास पर चराने । लिये लाया था कि दैव संयोग से राणा जी की उस पर निगा हुई । उस बेचारे को क्या मालूम था कि 'महाराणा खोज खोजते यहा तक आ जायेंगे वह समझे हुये था कि इस निज स्थान में उसे कोई देख नहीं सकेगा।.परन्तु नहीं उसका मान मिथ्या निकला । महाराणा यहा पहुच ही तो गये महाराणा को सामने देखते ही बेचारे गड़ेरिये के होश फार हो गये, महाराणा ने उसे आज्ञा मन के लिये कठोर दण्ड व्यवस्था दी और गडेरिया को प्राण दण्ड मिला। उसकी ल एक पेड पर लटका दी गई जिससे दूसरे लोगों को मा 1 7 ।
६६ राजाहा.मा का दण्ड मङ्ग फरने की शिक्षा मिलती रहे । बस इसतरह से उस श्यामल सस्यपूर्ण स्वाभाविक सुन्दरता को सानि समतल मेवाड की अवस्था. उस अवला को समान हो गयो जो विधवा होते हो अपना सब गृङ्गार गहने कपडे उतार, मलिन, होन भिषा रिणी के समान हो जाती है । शस्यशालिनी मेवाड भूमि मर- पली बन गई। मेवाड को उजाड़ कर राजर्षि प्रतापसिंह ने अपनी राज धानी कुम्भलमेर में बनाई तथा गोगू दा आदि पहाडी किलो को दृढ किया। मुसलमानों से लड़ने की तैयारी करने लगे। 'परन्तु उस समय उनके परिवार की दशा और भी भयानक यो कि जो मदा राजोचित भोग विलास करते आये येथे दीन भाव से भिखारी के समान कन्दराओं में गुफाओं मे भटक रहे थे। राज महिपी को अपने हाथ से रसोई यनाकर पेड़ो के नीचे घास के बिछोने पर सोना पड़ता था। इस मांति प्रताप का राज परिवार भी अपना समय बिताने लगा। प्रताप ने जिस कुम्भलमेर में अपनी सेना इकट्ठी को थो वह मेवाड के पहाडी प्रदेश के बीच में है । उस प्रदेश में जाने के लिये एक दो से अधिक पहाडी रास्ता नहीं है। मुगल सेना उस प्रदेश से बाहर इकट्ठी हो रही थी। पहाडी प्रदेश का उसे कुछ भी पता न था। मेवाड के उजड जाने से बादशाही सेना को पाने पीने की सामग्री का अभाव था। इस लिये वादशाही सेना का मेजिन की यथेष्ट सामग्री और सैन्यवल विना उस प्रदेश में घुसना असम्भव था । राजपूत वीर अपने प्रदेश के सभी रास्ते घाटी नाले जानते थे । वे लोग बीच बीच में मुगल सेना पर आक्रमण करके उसके छक्के छुडा देते थे। उस समय उत्तर भारत से वाणिज्य कोजा चीज यूरोप को जानी थी, वह अरवली के पास होकर सूरत
महाराणा प्रातप
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जाने पर जहाज पर लादी जाती थी। राजपूत लोग इन वस्तुओं
को लूटने लगे। इस तरह से धीरे धीरे उस रास्ते से
यात्रियों को चलना भी मुश्किल हो गया था। मुगल सेना धीरे
धीरे यह रही थी, वीर प्रताप उन्हें रोकने के लिये उत्तर भाग
की पहाड़ी गुफा की ओर पढ रहे थे इस स्थान का नाम
एल्दीघाटी है।
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हीती पनि
भाठवा परियोद
मकबर की कपट लीला
"मधुर पचन न जास मिट, उत्तम जन भभिमान ।
सनक शीत जर सा मिटे, जैसे दूध उफान "पृन्द ।
"जाकी धन धरती हरी ताहि न खोजे संग।
जो संग राखे ही बने तो करि राखु अपंग ।।
तो फरि रात अपंग फेरि फरकै सुन कीजे ।
कपट रूप यसराय ताहि को मन हरि रोजे
-गिरधर कविराय
माइये । पाठक || आइये !!! थोडी देर परम पुनीत
प्रताप-चरित को आलोचना न करके उनक प्रतिद्वन्द्वो अकयर
को नीति कुशलता पर भी विचार करे । हम लोगों को
इतिहास में पढ़ाया गया है कि अकयर हिन्दुओं के यडे
मैत्र थे । हिन्दुओ से यडा प्रेम करते थे हिन्दुओं के साथ
मकबर का व्यवहार बहुत ही अच्छा था। कोई कोई इतिहास
पक अफयर के गुणों पर फल कर कुप्पा हो गये हैं । याहुत
ने लोगों ने "दिल्लीश्वरो घा जगदीश्वरो वा"--यह उपाधि
कवर को देकर अपनी उदारता की हद्द कर दी है। स्कूलों
कोमल मति के पालकों को पढाया जाता है कि अकयर
बढकर मुसलमानों में कोई बादशाह नहीं हुआ। हिन्दू
ससे प्रसन्न रहते थे और मुसलमान सदा उससे नाराज
ते थे। यह मुसलमानों के नाराजी को कुछ भी
महाराणा प्रताप 1 न करके सदैव हिन्दुओं का पक्ष करता रहा । आज कल के मदरसों में हमारे जिन पाठकों ने इतिहास का अध्ययन किया है अथवा जो कोमल मति के यालक और नवयुवक पढ़ रहे हैं, वे हमारे उपयुक्त कथन से सहमत होंगे कि वास्तव में स्कूलों में पढाये जाने वाले इतिहासों में बादशाह अकवर की ऐसी ही प्रशसा-चल्कि इससे भी पढकर लिखी हुई है। कवि की कल्पना नहीं है लेखक का वाक्य आदम्बर शब्द रचना भी नहीं है । वस्तुत. इतिहास में अकवर को हिन्दुओं का मित्र ही कह कर सम्बोधन किया गया है। कहा गया है कि अकवर के दरबार में गगाजल पिया जाता था, उसने अपने राज्य में गो वध की मनाई करा दी थी और साल भर में छ. महीने से ऊपर अकवर मास भक्षण भी नहीं करता था। हिन्दुओं की तरह अपना लिवास रखता था । तब कहो क्यों न अकयर को हिन्दुओं का मित्र और पक्षपाती कहा जाय ! और अकबर के प्रपौत्र- औरगजेब को जानते हो न ! चह कैसा था ? वह हिन्दुओं को बादशाह विद्वपी था, उसने हिन्दुओं के मन्दिर तोडे, बहुत से हिन्दुओ को मुसलमान बनाया । इतिहास कहती है कि वह हिन्दुओं से घृणा करता था। उसने कितनी हो धार हिन्दुओं को कतल कराया था। कहो तो सही अकबर और औरङ्गजब के आचरणों, से' तुम लोगों ने क्या परिणाम निकाला है और क्या समझते हो ? अरे । तुम क्या उस समय के हिन्दु भी, राजपूत भी बादशाह अकबर की हलाहल विप भरी नीति को नहीं समझ थे। यदि राजपूत वीर गण अकवर की इस जहरीली, नीति को-समझ गये होते तो क्या आज हमारी वृद्धा माता भारत के पैर पराधीनता की, कठोर येडी N
भकयर फी फपट लोला
से जकडे जाते। समझते हो न ! अकयर का इस आडम्बर
मूल सिद्धान्त क्या था ? अरे ! अकयर की कुटिल नीति
चाणक्य पण्डित और जर्मनी के विस्मार्क से भी कठोर थी।
चाणक्य ने फेवल नन्द वंश का नाश करके चन्द्रगुप्त का राज्य
यसाया था। विस्माकं ने फास को नीचा दिसा कर तथा जर्मनी
के भीतरी विष्टगों को शान्त करके-जर्मन राज्य की पुन
स्थापना की थी। पर अकयर की नीति का पता लगाना टेढी
खीर है । अफयर का हिन्दूपन का ढींग क्या था? हम साफ
और खुले शब्दों में करेंगे कि यह अकबर की कपट नीति थी
और कपट नीति भी कैसी-धिपस्य विषमौषधम्, अर्थात्
विष की औषधि विप है । जहर से ही जहर शान्त होता है।
लोहा लोहे से ही काटा जाता है । यस, अकबर की यही
नौति थी कि हिन्दू जाति का हिन्दुओं द्वारा ही नाश किया
जा सकता है। राजपूत वीर राजपूतों द्वारा ही वश में किये
जा सकते हैं । यही तो अकबर का हिन्दूपन था। इस लिये वह
हिन्दुओं से प्रेम करता था। यदि अफवर Divide and
rutc की अर्थात् भेदभाव और शासन करने की नीति का
भचार न करता तो नहीं कह सकते कि सब से बड़े मुगल सम्राट
नहीं नहीं मुसलमान सम्राट का राज्य उस समय अटल रहता
या नहीं। चतुर चूडामणि अकयर देग चुका था कि उसके
दादा पितामह घावर को राणा साया की अधीनता में
राजपूतों से कैसा कैसा सामना करना पटता था । अकबर
जानता था कि यहा वालों के कारण उसके बाप हुमायू का
दिल्ली का तस तक छोडना पड़ा था। इस लिये दूरदर्शी
अकबर ने सोचा कि पाव में गडे हुए काटे को हाथ के काटे से
निकालते हैं, वैसे ही अन्दर से अपने वश में किये हुए शत्रु से
शत्रु को नाश करना चाहिये । मिश्री देने से ही किसी का
५
७४
" महाराणा प्रतापा.
प्राण नाश होता हो चहा विष देने की जरूरत ही क्या है ?
घस, अकबर का यही सिद्धान्त था, सिद्धान्त क्या था? कपट
जाल था । बस, उसके इस कंपट जाल में भाले राजपूत फंस
गये। जिस तरह से मछली थोडे से आटे के लालच में आकर,
अपने प्राण घातक की बंसी में फंस जाती है, अथवा यो कहिये
थोडी सी मधुर तान की लालच में दौड़ता हुआ हरिण, ठहर
फर शिकारी का निशाना बन जाता है, वही दशा इस नीति के
कारण राजपूत जाति के हुई।
शत्रु की अपेक्षा मित्रों से भारतवर्ष का विशेषत. राज
पूताने का सत्यानाश हुआ है । यह सच है कि औरङ्गजेब
हिन्दुओं का विद्वेषी था, परन्तु हिन्दु भी उसके विद्वेष से
चिडकर उससे मुकाबिला करने को तय्यार हुये थे, और
सेव के विद्वेष भाव ने हिन्दुओं को अपने भूले हुये स्वरूप का
शान कराया । औरगज के विद्वेष भाव के कारण ही दिल्ली
की बादशाही खाक में मिल गई। पर अकबर का हिन्दुओं की
मित्रता के कारण राज्य जम गया । इस समय जो मुसलमान
अक्यर की कुटिल नीति के मर्म को न समझ कर उस पर
नाफ भी सिकोडते थे, चिढते थे, वे भूलते थे। अकबर ने हिन्दू
माचरण को ग्रहण करके, राजपूतों के विशुद्ध रक तक को
कलङ्कित करने की चेष्टा की थी। औरङ्गजेब निष्ठुर शासक
हो सकता है, माना उसने हिन्दुओं पर बहुत से अत्या
चार किये थे पर अकयर ने हिन्दुओं का विशेषत: राजपूतों
फा पून सटमल अथवा जुए की तरह से पीने की कोशिश की
थी वैसा औरङ्गजेय ने नहीं किया * औरङ्गजेब में हजार दोष
औरङ्गजेब और बादशाहों की तरह भोग विलासी न था। मरते समय
ससने लिखा कि टोपियां सोकर जो मैं बेचता था, उसका साढ़े चार
अकघर की कपट लोला हों, परबह अकबर के समान विलासी और इन्द्रिय निरत न या। अकयर की तरह औरङ्गजेब न तो नाच गान पसन्द करता था और न अकबर की भांति हिन्दुओं की स्त्रियों के सतीत्व रत्न को हरण करना चाहता था। अकयर हिदुओं पर प्रीति दिखाते थे सही, परन्तु उनका भीतरी अभिप्राय हिन्दुओं को बलहीन, धर्महीन और जातिहीन करने का था और यह फैसे अपने इस मनोरथ को सफल करते थे, सो आगे पढियेगा। रूपया माफी है, यही मेरे कफन में खर्च किया जाने और मैंने कुरान लिखकर १०५ रूपया जमा किया है उसे फकीरों में बांट देना। इससे मलूम होता है कि शिल्पकार्य और साहित्य-सेवा द्वारा औरङ्गजेब अपना निज का सर्व चलाता था । नासिरूद्दीन मुहम्मद-जो शमसुद्दीन अल तिमश का बेटा था, हिन्दुस्तान का आदशाह होने पर भी बडे सादे स्वभाव का रहा। उसने सिर्फ अपनी एक ही शादी की, अपनी बेगम से ही खाना पकवाता था--कोई लोदी पा मजइरिन उसके पास नहीं रहने देता था जो गरीब मुहताजों के खाने में माता है वही आप शाता था। साहित्य-सेवा करके अपना गुजारा करता या। एक दिन किताय नकल की और एक मुल्ला को दिखाई, मुलाने उसमें कुछ भूरे रतलाई जो उसके सामने तो उसके कहने के मुताविक ठीक अदा पर पीछे फिर पहले की भांति बना दिया। एक आदमी के पूछने पर कहा -मैं जानता है कि जो कुछ मैंने लिखा है, सही है, पर उसके सामने न करता तो उसका जी दुखता । रेखक
नवां परिच्छेद
"नौरोजा" और अबला का आत्मिक बल
"
.
,
-
M
धनि धनि भारत की छन्नाणी।
वीर कन्या का वीर प्रसविनी वीरवधू जगजाणी।।
मती शिरोमणि धर्म धुरन्धरि घुधि बल धीरज सानी
इनके जस की तिहू लोक में अमल ध्वाजा फहरानी ।
हरिशचन्द्र
सरीदवार रमणी जहा, रमणी चेचनहार ।
रमणीगण के रूप का, लगा अनूपं यज.ार ॥
हमारे बहुत से पाठकों ने नौरोजे. के मेले का नाम सुना
होगा। इस नौरोजे के मेले के चलानेवाले, हिन्दुओं को लाड
प्यार करनेवाले वादशाह अकबर ही ये । अकबर से पहले और
उसके पीछे भी किसी की बुद्धि में "नौरोजे" जैसे मेले के प्रच
लित करने की नहीं समाई । इस नौरोजे में होता क्या था
मजी कुछ भी नही, होता क्या था-साफ बादशाह अपने
राज्य की भीतरी अवस्था जानने के लिये नौरोजे का मेला
किया करते थे अकवर के लाडले दुलारे वजीर अब्गुलफजल
ऐसा ही कहते हैं । अधुलफजल को हम कुछ दोष नहीं देते।
झोक ही है, 'समरथ को नहि दोपगुसाई यदि अकबर के
समय में कोई दूसरा नौरोज के मेले का अकवर के समा-
हो आडम्बर रचता तो अगुलफजल इतने उदार हो जाते मि
घे अपनी सारी पुस्तक में नौगेजे का मेला करनेवाले को
-
"नौरोजा" और अबला का आत्मिक पल - लानत मलामत देते । स्वयं अफयर ही ऐसे मेले करने वालों की साल ही उघडया डालते पर नहीं अकबर और अनुलफजल दोनों ही इस मेले में कोई बुराई नहीं समझते थे । अभ्युलफजल ने इस नौरोजे के मेले को लेकर अकबर की खूब ही वकालत '. की है। अकयर को नाराज के मेले से मुक्त करने के लिये उदार हृदय से स्याही सर्न की है। चतुर चूडामणि अब्दुल फजल ने नौरोजे शब्द के अर्थ की सूय ही हत्या की है । भला कहीं सत्य भी डिपाये से छिप सकता है । अबुलफजल अफचर के माथे से बहुत कुछ हटाने की चेष्टा करने पर भी झूठ, छिपाने में समर्थ नहीं हो सके हैं। अमुलफजल के शन्दों में ही सुनिये गा प्रति मास के बड़े बडे त्यौहारों के बदले में इसी नौरोजे के नौ दिन माने गये थे । नयी साल के नौ दिन नहीं थे। नौरोजे, के नौ दिनों में सब मुसलमान आनन्द मनाते थे 'नौरोज़ के नौ दिनों में से एक दिन बादशाह स्त्रियों के लिये मेला करते थे। स्त्रियों के इस मेले में बडे बडे सौदागरों की स्त्रिया अपने अपने यहा का माल येचने लाती थी बादशाह की धेगम शाहजादिया, अमीर उमराव, रईस, राजा लोग जो पादशाह अक्चर के आश्रित में रहते थे उनकी स्त्रिया समी अपनी जरूरत की चीजें सरोदती थी इस तरह से नौरीने मीना बाजार राजधानी दिल्ली के महलों में रूप को हाट लगती यो । और बादशाह र क्या करते थे? पक्षपाती और खुशामदी इतिहास लेखकों की फपाल क्रिया, क्योंकि अबुल, फजल जैसे खुशामदी इतिहास लेखक कहते हैं कि अकया अपने राज्य की भीतरी अवस्था जानने के लिये मेला करते थे। वाह क्या सूब अच्छा गज्य की भीतरी अवस्था में - उपाय सोचा। न यह कहना क्यों
महाराणा प्रताप
.
फर कहा.-'अरे । नराधम !! पापिष्ट ॥ ईश्वर की शपथ
खाओ कि फिर कभी राजपूत कुल कलङ्कित करने की चेधा
नहीं करोगे। नहीं तो अभी तुमको इस छुरी से यमलोक लो
पहुंचाती हूँ। कहावत है कि चोर के कभी पैर नहीं होते, अन्याय
के कटीले वृक्ष और पर्वत के समान बडे पापियों के कलेजे भी
जरा से न्याय के पत्ते हिलने पर दहल जाते हैं। वो ही दशा
पादशाह अकबर की हुई अफवर भारतवर्ष के लाख सम्राट
भले ही रहे पर पृथ्वीराज की वीरवाला के साहस को देखकर
उनका भी कलेजा दहल गया और चिना किसी संकोच के
रानी के कथन के सामने मस्तक झुकाया । धन्य मातृभूमि है,
जहां किसी समय ऐसी धीरललगाए हुई थी। आज इस
गई बीती दशा में भी भारतमाता का ऐसी पुत्रियों के कारण
हो मस्तक ऊचा है परन्तु हाय ! आज ऐसी स्त्रियां होना तो
दूर रहा, पुरुष भी नहीं हैं । अस्तु, पाठक ! जब राजपूत जाति
अफवर की कुटिल नीति की इस बात में फंसकर अपनी वंश
मर्यादा मान और प्रतिष्ठा तक भूल चुकी थी तब केवल
राजस्थान के ब्रुगतारा प्रतापसिंह ने अकबर का मुकाबला करने
कोनानी ।।
मानसिह की कीर्ति में पड़ी पड़ी ओजस्विनी फविताए
1-
कर धर्म रक्षक, पुरुपोत्तम श्रीरामचन्द्र जी ने जिस सूर्यकुल की
शोमा चढाई, थी, उसी सूर्यकुल की सन्तान जयपुर नरेश
अकबर के सबसे पहले दास बने थे। जयपुर के राजा मान
सिंह अकवर के दाहिने हाथ-थे । कई मुसलमानी-इतिहास
लेवकों ने लिखा है कि जयपुर, जोधपुर आदि के राजा
में यह ठोक ही है यदि राजपूतगण अरूबर के साथ न होते
तो कदापि अकबर निष्कण्टक राज्य न कर सकते । जिन
राजपूत-नरेशों ने अकबर की घश्यता, स्वीकार की थी
मानमें से मुगल राज्य में जयपुर नरेशराजा मानसिंह
का बड़ा मान था। कछवाओ के माटों और चारणों ने राजा
दशवां परिच्छेद
मान का अपमान
“निज कुल की मरजाद लोभवस दूर यहाई ।
जीवन भय जिन खोइ दई ,आपुनी बडाई ।
जिन जग सुप हितकरी जाति की जगत हँसाई ।
लसि जिनको मुख धीर सवै सिर रहे नवाई ॥
तिनके सँग सानौ कहा मुस देखतह पाप है।
-जआइ सीस वरु धर्म हित यह सिसोदिया थाप है।
श्रीराधाकृष्णदास
सर्वग्रासी अकबर ने एक एक करके सब देशी रजवाड़ों
को हडप लिया था, सभी उनके मन वल से मुग्ध हो गये
थे। आर्य जाति के एकमात्र आराधनीय रघुकुल कमल दिवा
TH
-
गण उस समय पादशाही सलतनत के ग्वम्भे थे । वास्तव
।
महाराणा प्रताप हैं। कहा जाता है कि अकयर का आधे से अधिक राज्य राजा मानसिंह द्वारा ही विजय किया हुआ था । चारणों की कविता में लिखा हुआ है कि पश्चिम में ईरान के पर्वत पेरो पामीशस तक और पूर्व में अराकान (ब्रह्मा ) तक देश इस राजपूत राजा ने राजपूत सेना की सहायता से जीतकर अकबर के अधीन कर दिये थे। इस प्रकार राजा मानसिंह के सम्बन्ध में बहुत सी बातें चारणों और माटों ने लिखी हैं । जो कुछ हो राजा मानसिंह ने अकयर के राज्य की उन्नति करने मे कुछ कसर नहीं छोड़ी थी । मुग़ल साम्राज्य की उन्नति करने में राजा मानसिंह जाति द्रोह, देश द्रोह तक करने में नहीं हिचके । अकवर की दाहिनी भुजा इन्हीं राजा मानसिह के कारण, राजस्थान के ध्रुवतारा हिन्दूपति मही महेन्द्र यादवार्य-कुल कमल-दिवाकर महाराणा प्रतापसिंह को अनेक कष्ट सहन करने पड़े थे। प्रतापसिह के साथ अकबर के युद्ध के कारण यही राजा मानसिह हुए । मानसिंह दक्षिण में शोलापुर को विजय करके दिल्ली जा रहे थे, राह में मानसिह जी उनकी राजधानी कुम्भलमेर में आये । प्रतापसिंह हृदय से चाहे जो कुछ थे, परन्तु अपने या - कुल के अनुसार उन्होंने राजा मानसिंह का आदर सत्कार किया। स्वय उदयसागर तक जाकर स्वागत किया और बडे आदर सत्कार के साथ उनकी । उहराया । उसी नव प्रतिष्ठित राजधानी में, उदय के तट पर मानसिंह के भोजन का प्रबन्ध किया गया। तो राजा के अतिथि, दूसरे मुंह मांगे मेहमानी, तीसरे के चिर शत्रु सम्राट अकवर के प्रधान युद्ध मत्री, तिस पर को आज्ञा, इन कारणों से भोजन का प्रबन्ध यथा अच्छा किया गया। 1 T a
मान का अपमान
राणा प्रताप उम समय प्रतधारी थे सोने चादी के
वनादि सभी उन्होंने छोड रपणे थे। परन्तु उन्होंने मान
मिह के आतिथ्य सरकार में किसी प्रकार फो भुटि नाहों को।
अपने जेष्ठ पुत्र युवराज अमरसिंह को मातिपय का भार
सौंपा । मानसिंह भी युवराज अमरसिह को अभ्यर्था से
सन्तुष्ट हुये।
मगमरमर पापाण तिर्मिति सुन्दर सरोवर के तीर भोजन का
प्रबन्ध किया गया, भोजन के लिये, स्थान सजाया गया।
भोजन को सामग्री धीरे धीरे आने लगी, ठीक समय पर राजा
मानसिंद को भोजन के लिये बुलावा भेजा। मानसिंह माये
और भोजन करने के लिये यासन पर यैठ गये, भोजन करने
से पहले तीक्ष्ण बुद्धि मानसिह समझ गये कि महाराणा
प्रतापसिंह क्यों नहीं आये ? उन्होंने भोजन करने से पूर्ष
पूछा कि महाराणा कहा हैं अमरसिंह ने विनीत भाव से
उत्तर दिया-"महाराणा के सिर में दर्द है, इसलिये घे नहीं
या मक है, आप भोजन करें इस यात का कुछ गयाल न
करें” । मानसिह महाराणा के न आने का उद्देश्य समझ गये
और उत्तर दिया-राणाजी से कहो, हम उनके सिर की
पीडा का मर्म अच्छी तरह से जानते है जो होना था सो
हो चुका अब उसके दूर करने का कोई उपाय नहीं है । यदि
राणा जी ही हमारे साथ भोजन नहीं करेंगे तो और कौन
करेगा ? तत्काल मानसिंह का यह सन्देश-प्रतापसिंह को
पहुचाया गया वे अनेक प्रकार से यहां आने के लिये टाल याजी
करने लगे, पर कुर फल न हुआ । मानसिह इसी बात पर
अडे रहे कि जब तक राणा प्रताप मेरे साथ भोजन करने नहीं
बैठेंगे तब तक मैं भोजन नहीं करूगा।
उन्होंने भोजन फरों का कारण छिपाना उचित नही
-
. 3 समझा। उन्होंने स्पष्टं पहला मेजा :-"जिस राजपूत - "अपनी बहिन को तुर्क के हाथ बंच दिया है सम्भवत जिय अब तो मानसिह को अपनी भूल शात'हुई कि 'मान मान मैं तेरा मेहमान, अपने मन से मेहमानी ग्रहण कर अच्छी नहीं किया। वे सोचने लगे कि अपमान का का हम स्वयम् ही बने थे। उन्होंने ग्रास (कौर नहीं उठाया लिये और चलते समय राणा प्रताप से कहा -"आपके म आप को मेवाड सदैव के लिये छोडना पडेगा, अब आप मेवाड में चगुल भर जमीन भी नहीं मिलेगी।" इतना कह मानसिंह घोड़े पर सवार होने ही कोथे कि प्रताप आ' पर कर ही हम प्रसन्न होंगे । पास खडे हुए प्रताप के कि सरदार ने यह कटाक्ष करते हुए कहा-"अपने- महाराणा प्रताप का मुसलमानों के साथ खान-पान होता है उनके साथ राण भोजन नहीं कर सकते।" केवल कुछ दाने अन्नदेव के नाम से उठाकर पंगडी में । मर्यादा की रक्षा के ही लिये हमने अपनी सब प्रतिष्ठो गौरव धूल में मिला दिया है यदि आपको इच्छा स दु सःसागर में पड़े रहने की है तो भले ही पडे रहिये । 1 4 उस समय मानसिह ने बड़े अभिमान से कहा- यदि आप दर्प दमन न कर सका तो हमारा नाम मानसिह नही, प्र ने शान्त भाव से उत्तर दिया कि आप को युद्ध क्षेत्र में फफा अक्चर को भी लेते आना , मानसिंह ने पर सारा क्रोध रतारा, उस घेचारे घोडे के जोर से घोडा भी हवा से बात करता हुआ, अपने स्वामी लेकर नौ दो ग्यारह हुआ। जहा मानसिंह के भोजन की सामग्री हुई थी वह भगवती भागीरथी के पवित्र, पुनीत जल से धोया ग ।
मान का अपमान जस जगह मानसिंह ने भोजन किया वह स्थान भी धोया या । राजपूत कुल कलङ्क मानसिंह का जिन्होंने मुंह देखा, उन सबों ने स्नान किया, जनेऊ बदले । स्वयं महाराणा प्रताप- सिंह ने मानसिंह का मुख देखने के कारण स्नान कर अपने को शुद्ध किया। उदयसागर पर जो बातें राजा मानसिंह के चले जाने पर हुई उनकी खवर मानसिंह के कान तक पहुची और धीरे चोरे अकवर के कानों तक भी पहुची, राजा मान ने अपनी हीन भाषा में अपनी ओर से नोन मिर्च लगा कर बादशाह नकवर के कान खूब भरे । अकवर की फ्रोधाग्नि मान के नपमान को सुनकर भडक उठी । जो*अकवर एक समय जा मानसिंह को जहरीले लड्डू खिला के मारना चाहते थे। वह आज मान के मान की मरम्मत करने के लिये प्रताप पर नाक्रमण करने की तैयारी करने लगे। दूदी के फागज पत्रों से पता लगता है कि जय मानसिंह अपने भाज इसर को दिल्ली के राज सिंहासन पर पिठचाना चाहते थे तर उस समय कबर ने उनको मारने के लिये विषैले सङ्क, वैयार कराये ये Tod Raja - Fhan Vol II-लेखक । r ,
na
.
ग्यारहवाँ परिच्छेद
रणचण्डी' का नाच
अरे अरे। सिन्दूरायजाओ बजाओ, नगारे पैचोंवेलगाओलगाओ।
चतुवर्णसेनाबुलाओ धुलाओ,ध्वजा और पताका उडाओ उडाभी।
ग्थी सारथी वीरधामो सिधाओ,चकावू रचो शीघ्र सेना सजाओ
अभी मोरचेजा जमांओजमाओ, जवरे सिताची चलामो चलाओ॥
निशाने पैतोपें लगाओ लगाओ, गनीमों के धुरै उडागो उडाओ।
करावीनले वागदागी दगाओ, उखाडीपुग्वाडो गिराओ भगाओ।
कटारी छुरी चणि वी सम्हारो भरे रक्त का सिंधुसांडापसारो।
जहा शत्रु पाओतहा पीस डारो, पुकागे महाराज की जै पुकारो॥
ला. श्रीनिवास दास
अकयर का उस समय सौभाग्य सितारा वुलन्दी पर था
एक से एक बढकर धीर पुरुष उसके दरबार में थे भगवान
रामचन्द्र जी के साथ केवल एक विभीषण लङ्का, की साधी
मता नष्ट कराने वाला था,। अकबर के दरबार में घर का भेदी
लङ्का ढाचे बहुत से विभीपण इकडे हो गये थे। बाहर के
'वैरी की अपेक्षा घर की फूट बहुत बुरी होती है । जिस जगह
पैशाचिनी फूट पहुचाती है। उसी का सत्यानाश करके
छोडती है। पाठक ! हृदय थाम कर कडा कलेजा करके सुनो,
इसचाण्डालिनी फूट ने क्या नहीं कराया है। चाण्डालिनी व
पैशाचिनी फूट ! तुझे हम क्या कह कर सम्बोधन करें ? तू ने
इस संसार में क्या नहीं कराया है । मन्थरा धन कर तू ने रानी
कैकेयो को बहकाया जिससे बेचारे राजकुमार राजचन्द्र को
पत्र में महाराज के स्थान में पृथ्वीराज शब्द है। लेखक
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रणचंडी का नाच
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पन में कठोर फ्लेश सहन करने पडे, विभीषण बनकर तु ने
सुवर्णपुरी लड़ा को मिट्टी में मिला दिया, दुप्प दुर्योधन
बनकर तूने इस वर्ग तुल्य भारत भूमि को श्मशान भूमि
बना दिया । पामर जयचन्द्र बनकर रत गर्मा भारत माता
के हाथ पैर पराधीनता की जमीर में जकडवा दिये अय तू
शक्तसिह, सागर जी आदि के रूप में दिल्लीश्वर के दर
धार में पहुच गई जिससे मेवाड का सत्यानाश हुमा इस
लिये फहते हैं कि तुझे किस नाम से सम्बोधन करें ।
पिशाचिनी तेरी कपट नीति से कोई नहीं बच सकता है । जो
एक बार तेरे विपकुम्भ मुसोपम फल को चख लेता है ।
वह फिर तुझसे कभी प्रीति नहीं छोडता है । तू उसे सापिनी
की तरह डस जाती है। अरे चाण्डालिनी । अब तो इस वृद्धा
भारत माता पर से अज्ञानता के भयानक और डरावने बादल
हटाले । यस, बहुत हो चुका अब तो इससे दूर रह ।
राजा मानमिह का अपमान अकबर के लिये अच्छा ही
हुआ। मानो भभकती हुई अग्नि में घी की एक आहुति छोडी
गई । अकबर पहले से ही प्रताप को अपने अधीन करना
चाहते थे मानसिह के अपमान का उन्हें एक और बहाना
मिला । अपने दुलारे युद्ध मन्त्री मानसिंह का अपमान उन्होंने
अपना ही अपमान समझा। जैसे क्रोधित सर्प फुफकार मारने
लगता है वैसे ही वे भी मानसिंह के अपमान के कारण अपने
लोगों को मेवाड परवाई करने के लिये उत्तेजित करने लगे।
'अभाग्य वश अकवर के दरबार में महाराणा प्रतापसिह के
छोटे भाई शासिहये। प्रतापसिंह के पैमातृज भाइ सागर
मी शाही दरवार में थे उन सब से बादशाह ने अपने मोहिनी
मन्त्र के वल से प्रताप के यहा की एक एक करके सभी बातें
जान ली। अपने प्रतिद्वन्दी प्रताप के सभी भेद
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महाराणा प्रताप
मेचाड पर चढाई करने का प्रवन्ध सोचने लगे । अकबर
को इस बात को बहुत चिन्ता थी कि सभी राजपूनो ने मेरे
सामने सिर नवा दिया है पर अभी तक प्रतापसिंह अपनी टेक
क्यों रखे हुये हैं।
अकबर के पास प्रतापसिह की स्वाधीनता नष्ट करने के
सभी साधन उपस्थित थे। पर बेचारे प्रताप के पास अपनी
स्वाधीनता को रखने के लिये क्या था १ प्रताप के पास
न तो मुग़ल सेना के समान विशाल सेना थी, न धन बल
था और न उनके पास राजपूत कुल कलडों की भांति घर के
भेदी लङ्का ढाहने वाले विभीषण मुगल थे। पर था उनके पास
मातृभूमि के उद्धार करने का उत्साह, देशभक्ति और धर्म । प्रेम
बश अपने इस हृदय के बल के कारण ही प्रताप अपनी मुट्ठी
भर सेना के साथ समुद्रवत् वादशाही सेना का सामना
करने
को तैयार हुये। जिस दिन मानसिंह अभिमान पूर्वक भोजन
के थाल पर से उठ गये थे उसी दिन प्रताप ने समझ लिया
था किसी न किसी दिन रणचण्डी का नाच • हुये बिना
नहीं रहेगा। वे निश्चिन्त नहीं थे। उन्होंने अपने सरदारों
और चीर राजपूतों से परामर्श लिया तब सब ने एक स्वर से
कहा कि प्राण रहते हम कभी आपका साथ नहीं छोड़ेंगे।
महाराणा अपने इन सरदारों और राजपूत वीरों के भरोसे।
ही अपनी जन्मभूमि की स्वाधीनता को रक्षा करने के लिये
तैयार हुये जिसके कारण यह अमर हो गये। जब तक संसार है
राय तक बड़े भादर के साथ प्रताप का नाम लिया जायगा।
प्रताप अपनी कुछ राजपूत सेना के साथ पहाडी प्रदेश में
रहते थे। उनकी राजधानी कुम्मलमेर उदयपुर के पश्चिम
ओर थी, उसकी लम्याई चोड़ाई दोनों ओर चालीस कोस था
चारों ओर यह स्थान पर्वत से परिवेष्टित था । पर्वतमाला
गाकर उनके देश पर थाधिपत्य जमा लिया है। सब से रणचंडीकानाच ८६ शहर पनाह का फाम दे रही थी । यीच बीच में फही छोटे Jछोटे पानी के झरने अपनी अनुपम शोमा को दिसला रहे थे। कहीं कहीं पीच में पर्वत और घना जङ्गल उस शोभा को और भी बढा रहे थे। उस स्थान की यह प्राकृतिक शोभा देसने, योग्य ही थी। उदयपुर को इस दुगम पहाडी प्रदेश का मध्य स्थल कहते हैं। उदयपुर के जिस ओर होकर यहा जाना पटना है वह बहुत दुर्गम और तग पहाडी रास्ता है । उस दुर्गम स्थान पर राडे होगर जिधर निगाह डालिये गा, उस तरफ ही पर्वत श्रेणी और हरे हरे वृक्षों के सिवाय और कुछ दिख- लायी नहीं पड़ता है। कुम्भलमेर के इस निकटवर्ती स्थान को हो एल्दी घाटी कहते हैं। अजमेर प्रभृति स्थानो से मुगल मेना इस मार्ग से पहाडी प्रदेश में आवेगी, यह विचार कर -उसे रोकने के लिये प्रताप अपनी सेना को हल्दीघाटी की ओर ले चले । हल्दीघाटी के आस पास के स्थानों में से प्रताप के वाईस हजार बहादुर अपनी मातृभूमि के लिये शोणित तर्पण राजपूनाने के उस कठिन पहाडी प्रदेश में भील आदि कई हाडी असभ्य जातियां रहती है। भील राजपूताने के आदि बवासी हैं । मेवाड प्रदेश के पहाडी स्थानों में भील राजपूताने रसे अधिक मिलते हैं । राजपूतों ने भीलों को पहाडी में मढ, जिन्हें नव्या जगतगति' भील लोग अवश्य हो हैं परन्तु चाहे वे असभ्य हो, पर उनकी अपने महाराणा प्रति अटल भक्ति होती है । अवश्य ही वे प्लेटफार्म पर होकर गला फार थवा अखबारों में कलम कुठार किर ही अपनी राजभक्ति की सीमा समाप्त नहीं कर देते पर वे महाराणा पर विपत्ति आते ही अपनी राज करने के लिये इकट्ठे हुये। - .
महाराणा प्रताप
श्रावण मास के सातवें दिन रणचण्डी का बिकट नत्य
भारम्भ हुआ। हल्दी घाटी के पवित्र क्षेत्र में स्वदेश की
स्वाधीनता के निमित्त अगणित राजपूतों के खून की नदी
घहने लगी। राजपूत लोग जन्मभूमि की रक्षा के लिये अपना
खून यहाकर ही चुप नही हुए किन्तु उन्होने मुगल सेना के
अनेक चीरों का सिर तन से जुदा कर दिया हल्दीघाटी का
युद्ध सामान्य नहीं था यह युद्ध वडा विकट था। स्वदेश
रक्षा के निमित्त एक ग्रीस देश को छोड़कर और कहीं भी
ऐसा युद्ध हुआ है या नहीं इसमें सन्देह है । एक ओर प्रचंड
मुगल सेना समुद्र के समान आगे बढ़ने लगी। दूसरी ओर
से महाचली राजपूत उस सेना की गति रोकने के लिये आगे
चढे । मानों दो मत्त हाथियों का मल्लयुद्ध होने लगा। उसी
तङ्ग घाटी में जहा आदमियों को मार्ग मिलना कठिन होता था,
वहा अगणित हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को मारने फाइने
चीरने के लिये छाती फैलाकर खड़े हुये थे । जहा तक दृष्टि
पहुचती थी वहा तक नरमुण्ड ही नरमुण्ड दिखलायी पडते थे।
पाठक ! एक बार अपनी कपना शक्ति से देखो कि कैसा
भयर युद्ध था। तूफान उठने से पहले समुद्र निश्चल शान्त
धौर गम्भीर होता है, परन्तु तूफान के आते ही समुद्र की
ला भयङ्कर रूप धारण कर लेती हैं समुद्र की लहरें कूदती
। हुई आकाश से बाते करना चाहती हैं. ठीक
दोनों ओर की सेना को हुई । क्षण भर के लिये
ओके वीरों ने एक-दूसरे को थिर निश्चले और
भाव, से देखा । परन्तु बीणा बजने की उन्मादिनी
पहाड, बन, पशु, पक्षी सभी कोधित हो उठे। बाजे की
उन्मादिनी ध्वनि से हाथी घोड़े पैदल सय ही युद्ध
हो गये। दोनों दल एक दुसरे पर पड़े।
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रणचण्डी का नाच । टल की ओर से "दीन, दीन जहाद" नाद सुनाई पडने लगा। राजपूत-सेना के "हर हर महादेव" शब्द की धनि से. माकाश प्रति ध्वनित होने लगा । राजपूत वीर मुगल सेना पर जैसे भूसा सिह हरिणों के झुण्ड पर झपटता है । चैसे ही हट पडे । मुगल सेना राजपूतों का साहस यल और धात्म त्याग देख कर चकित और स्तम्भित हुई। मेगाड भूमि को स्वाधी नता को बचाने के लिये राजपूतों ने अपने प्राण प्रण से युद्ध किया । वीरवर प्रतापसिंह भी निश्चिन्त नहीं थे। निडर होकर सबके आगे थे और शनुओं का सैनिक बल नष्ट कर देना चाहते थे। उन्हें इसमें सफलता मो हुई। उन्होंने अपने , असा धारण साहस से मुगल सेना का चक्रन्यूह तोड़ दिया। प्राताप का साहस और युद्ध कौशल देखकर राजपूत और भी उत्साह के साथ लड़ने लगे। जिस तरह भूखा व्याघ्र बड़े य:- हाथियों को क्षण भर में चीर डालता है, वैसे ही अकेले प्रताप ने असंख्य मुगलवीरों को तलवार से काट डाला। राजा मानसिंह से कहा था कि मैं युद्ध में पापको देखकर प्रसन्न होऊंगा । थस, घे इस युद्ध स्थल में मानसिह को ढने लगे पर फही मानसिह का पता न लगा। वेदो चार वैरियों की सेना में पहुच गये पर कहीं भी मानसिह फा पता न लगा। मानसिंह प्रताप की रुद्रमूर्ति से, भयभीत होकर नौकरों की भीड में अपनी रक्षा कर रहे थे। दूसरी यार प्रताप मानमिद को दूढते ढूंढते बहुत सी मुगल सेना के बीच में पहुंच गये। किन्तु राजपूत वीरगण भी निधिन्त नहीं थे। उन्होंने प्राणों का याजी लगाकर अपने महाराणा की रक्षा की। सैकड़ों राजपूतो ने अपने महाराणा की जीवन रक्षा के लिये सहर्ष प्राणी का विसजी कर दिया। भील लोग भी शान्त नहीं थे। उन्होंनेपक्षों की ओट में से तीरों से, पत्थरो से मुगल सेना के मैफड़ोपीरोये चकनाचूर कर दिये। दोनो मार से घमासान युद्ध हुआ। - A बारहवाँ परिच्छेद झाला सरदार का मात्मत्याग मिनपरीच्छह मैं किया सरनागत प्रतिपाल । निरमल जस शिवि सो लियो तुम या काल कराल | हरिश्चन्द्र दो घार मुगल सेना के बीच में पहुच कर और मानसिंह को न पाकर प्रताप निश्चिन्त नहीं हुये उनकी अन्तर्यापिनी प्रचण्ड अग्नि अभी नहीं बुझी थी चे देश द्रोही कुलकलङ्क मान सिंह को इस समय भी मत्तसिंह की तरह खोजते थे । नर फेसरी प्रताप युद्धक्षेत्र में चारों ओर आखें गडाये हुए देख रहे थे कि देश द्रोही भीषण बैरी मानसिंह कहाँ है ? उस समय प्रताप अपने चेतक घोडे पर सवार थे, वास्तव में चेतक घोड़ा प्रताप के योग्य ही था जैसे प्रताप वीर थे, वैसा ही उनका घोडा भी वीर था । प्रताप रण निपुण थे, वैसा ही चेतक भी रण निपुण था । उसी चेतक पर सवार निडर घर प्रताप राजा मानसिंह की खोज में घूम रहे थे। जैसे खेल में मट्टी के खिलौनों को उसाड पछाड़ कर देते हैं, वैसे ही मानसिह की खोज में प्रताप मुगल- । के अनेक, वीरों के टुकडे टुकड़े कर रहे थे , उनकी रण देखकर मुगल सेना आवाक रह गई, किन्तु प्रताप को P भी मानसिंह दिसलाई न पडे। अपने बीच में मुगल- धीर प्रताप को देख कर उन्हे मार डालने की चेष्टा करने लगे."प्रताप एक पोटी पर .
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सलोम के लोहे के हादे से टकरा कर पथ हुआ। तव प्रताप
उच्चैधवा की भांति चेतक का पैर शोभायमान होने लगा
चोरमपटली आपाक रह गई उनके शत्रु भी उनके इस साहस
झाला सरदार का आत्म त्याग
' प्रताप को इसकी कुछ परवाह न हुई, अकेले ही मुगल
वीरों का सामना करते हुये, देशद्रोही मानसिह को ढूंढने
मानसिंह का तो कहीं पता नहीं लगा, पर सामने ही वे
क्या देनते हैं कि अफयर फा युवराज सलीम हाथी पर सेना
के बीच में है। मानसिंह सही सलीम ही सहो यह सोच
कर अपने घोड़े के पड लगाई घोड़ा भी अपने स्वामी के
रशारे से आगे बढाउनको मागे वढते देख कर चारों ओर
मुगल सिपाही युगराज की रक्षा के लिये जमा होने लगे और
उन्होंने मिलकर प्रताप पर आक्रमण किया, परन्तु प्रताप की
चोरता के सामने मुगल सैनिकों का आक्रमण व्यर्थ हुआ।
किन्तु प्रताप ने इसका कुछ ख्याल नहीं किया। स्वदेश के
लिये उस युद्ध में प्राण त्याग मानों उनका सिद्धान्त था !
उन्होंने पुर से सलीम पर तेज चलाया दैवयोग से यह पर्छ
ने सलीम को और अप घोडा चढाया अपने स्वामी फा
अभिशाय समझ कर चेतक एक छलाड मार कर सलीम के
हाथी के निकट पहुच गया। तेजस्वी चेतक ने हाथी के माथे
पर दाप जमा दी । ऐरावत के समान उस महागज के माथे पर
अनाप की इस रण निपुणता को देखकर थोड़ी देर के लिये
को प्रशसा करने लगे। इस अवसर पर प्रतापसिंह एक क्षण
के लिये भी नहीं ठहरे उन्होंने मुहूर्त मात्र का विलय करना भी
उचित नहीं माउन्होंने सलीम को मारने के लिये तल.
धार चला यह तलवार सलीम के हादे से फिर टकराई पर इस
चार स से उछल कर महाचत
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महाराणा प्रताप 1 तलवार के आघात से बेचारा महावत पृथ्वी पर 'आगया। विना महावत का हाथी युवराज सलीम को लेकर भाग गया, यदि हाथी न भागता तो अकबर की आँपों का प्रदीप वहीं 'वुझ जाता । दैव कृपा से ही अकवर के युवराज सलीम की रक्षा हुई। 1 - M - v युवराज, सलीम को इस तरह से विपत्ति में फंसा देख कर मुगल सेना पागल हो उठी सव की सब सेना चीर-प्रताप के । प्राणों की ग्राहक बन बैठी मुग़ल सेना चारों ओर से प्रताप को घेर लिया। प्रताप ने भीम विक्रम से अनेक शत्रुओं को मार गिराया। पर -अकेले प्रताप को देख कर मुगल सेना का जोश ठंडा नहीं पडा । जिस तरह से समुद्र की तरङ्ग, पहाड से पहली बार टक्कर खा कर दूसरी, वार और भी जोर से टक्कर साती हैं उसी तरह से मुगल-सेना पहिले से अधिक जोर के साथ प्रतापसिंह पर हटी । अकेले प्रताप और मुगल सेना के असख्य वीर, कैसा भयङ्कर युद्ध है। अब प्रताप की कोन रक्षा करेगा। अकेला चीर इतनी विशाल सेना से कर तक लड़ेगा? यह चिन्ता सबके चित्त को डावाँडोल करने लगी। सभी को प्रतापसिह के जीवन की चिन्ता हुई असख्य मुगल वीरों से घिरने-के अतिरिक्त उनके शरीर पर तीन बी के तीन तलवार के और एक गोली का आघात लग चुका था इतने में ही "जय प्रताप की जय" शब्द सुनाई पडा। यह शब्द सुनते ही प्रताप पहले से और भी अधिक उत्साह के साथ लइने लगे। इतने में ही सावटी के झाला सरदार मन्ना प्रताप सिह जी के पास पहुच गये । उनके ऊपर से राजछन्न चघर हटवाकर अपने ऊपर लगवा लिया। मुगल सेना ने झाला सर दार मन्ना को ही महाराणा प्रताप समझा यह प्रताप को छोर ।
8 मारतवप के इतिहास में और भी इस प्रकार के अनेक उदाहरण
मिलते है एक युद्ध में बाजीराव प्रमु पांडे ने शिवाजी की भी इस तरह स
रक्षा की थी। जय तक शिवाजी दूसरे दुर्ग में नहीं पहंच गये तब तक बह
बराबर रणक्ष ध्र में बता रहा और अन्त में शिवाजी की रक्षा के लिये अपा
माला सरदार का प्रारम त्याग
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कर चारों भोर से* झाला सरदार मन्ना पर टूट पडी । झाला
सरदार मन्ना अनेक मुग़ल सैनिकों को 'यमलोक पहुचा कर
मुगल सेना के हाथ से मारा गया जिससे महाराणा प्रताप
के जीवन की रक्षा हुई । धन्य ! झाला सरदार ॥ धन्य !!
तुम्हारे जैसे मामत्यागियों के कारण ही मेवाड के गौरव की
रक्षा उस फठिन फाल में हुई थी।
प्रताप झाला मन्ना के आत्मत्याग को भूले नहीं। उसी
दिन भाला मन्ना के वशधरों को राज चिन्ह सहित, महाराणा
को वाहिनी और पैठने तथा महलों तक नकारा बजाते हुये
माने और राजकीय झण्डा अपने साथ रखने का अधिकार
मिला। उन्हें सद्रिदेश में ज़मीन दी गई ।
1
S
प्राणों की माहुति दी
ta
, तेरहवाँ परिच्छेद r विजय या पराजय , । “मरना भला है उसका जो जीता है अपने लिये जीता है वह जो मर चुका खदेश के लिये।" ।। "हल्दीघाटी के महासंग्राम में वाइस हजार राजपूत वीरों में से चौदह हजार वीरों ने मातृ-भूमि के गौरव की रक्षा के लिये हंसते हंसते प्राण प्यारी के समान मृत्यु का आलिङ्गन किया। प्रताप के आत्मीय जन ही 'लगभग पाच सौ थे । ग्वालियर के राज्यच्युत राजा सहाय भी महाराणा के आश्रय में मेवाड में रहते थे, वे अपने लडके खण्डेराव और तुमार- घंशीय कोई साढ़े तीन सौ गेओं के सहित मारे गये थे । झाला सरदार मानसिह अपने डेढ़ सौ आदमियों सहित प्रताप के जीवन की रक्षा करते समय मारे गये । प्रताप ने देखा कि इस तरह से और भी राजपूत मारे गये । सन्ध्या हो चली थी, तब वे युद्ध सम्बन्धी कई प्रयोजनीय आशाप देकर दुखित मन से रणस्थल से हटे । हल्दीघाटी युद्ध समाप्त हुमा, मानसिंह की मनोकामना पूर्ण हुई । सोचो । पाठक !! सोचो!!! इस युद्ध में प्रतापसिह की हुई अथवा पराजय, यह सच कि प्रताप के असंख्य धीर गये । मुगल सेना युद्धस्थल से हटी नहीं । प्रताप रण- से चले आये। परन्तु हमारी समझ में इतने पर भी का पराजय नहीं हुई, उनकी चिरस्मरणीय विजय हुई, याप कहेंगे सो कैसे ? सुनो! मुगल सम्राट और मुगल सेना अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिये लड रहे थे, राणा प्रताप और राजपूत जाति अपने देश के गौरव को रक्षा के लिये 1 ऐसा न होता तो यूनान देश थापली की सङ्कीर्ण पार्वतीय बल्दीघाटी में चौदह हजार राजपूत देश के लिये मेर फर -अपनी कीर्ति अमर कर गये तब कैसे कहें, कि इस विजय या पराजय राजपूत जाति की राधीनता के लिये लड रहे थे । राजपूत जाति की लडाई सिद्धान्त विषयक थी, मुगलों की अपने मार्य की थी । जो लोग सिद्धान्त विषयक देश की मान मयांदा मोर गौरव को रक्षा के लिये लडते हैं घे कमी हार जीत का विचार नहीं करते हैं । उनको हार भी लाख जीतों से बढकर होती है। यदि उनकी हार जीत से घट फर न होती नो माज ऐसे लोगों को फोन स्मरण करता? उनकी हार जीत में यह फर मनुष्यों के एदयों पर मानसिक प्रभाव डालने पाली न होती तो कौन उनके नाम की पूजा करता । जय ऐसी हार में जीत से कहीं अधिक शक्ति है, तब हम कैसे इस को पराजय कहें। हल्दीघाटी के महासंग्राम में मुग़ल सेना सैं राजपून अपनी भतुलनीय धीरता का परिचय देकर क्षण- मार के लिये इट अरण्य गये, जय तक संसार है ये देश भक्तों के हृदय मन्दिर से हट नहीं सकते, उनका नाम सदैव को यार होगया है। स्मरण रक्यो । यदि गोरखवृद्धि और अमरनत्व लोम ही विजय के चिन्ह है, तो जिपूत पराजित नहीं हुए। राजपूतों की विजय हुई। संसार के किसी इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध के समान पराजय, पराजय नही गिनी गई है, वह पराजय विजयकर समझी गई है। यह घाटी में महावीर लिलोनिडाज के अधीन, जिन थोडे से योद्धाओं ने फारस के बादशाह शाल सेना के प्रवेशप में पहुँच कर मात्मयलि दी थो, उनको कीर्ति कथा का कदापि इतिहास देखक वसान न करतापली के युद्ध के ममान हो 7 । राजपूतों की पराजय हुई। - चौदहवां-परिच्छेद बन्धु मिलन , 11 + । + - कि मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः। यत्र ते मम स स्वर्गों नाय स्वर्गापमो मम" ॥ .., "राजीवलोचन लवन जल तनु ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हदय लगाई अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुवन धनी ॥ प्रभु मिलत अनुजहि सोह,मो पहें जाति नहिं उपमा कही। प्रेम अरु श्रृङ्गार तनु धरि मिलत वर सुखमा लही।" गो. तुलसीदास महाभारत में एक कथा है कि महाभारत के युद्ध के पीछे जिस समय धर्मराज युधिष्ठिर स्वर्ग, में पहुचे, उस समय वे यहां अपने भाइयों और द्रौपदी को न पाकर, कहने लगे कि मुझे ऐसा स्वर्ग न चाहिये, जहा मेरे भाई और द्रोपदी न हों, भाइयों और द्रोपदी से शून्य- स्वर्ग भी मेरे लिये नरक है, और वह नर्क, जहां मेरे- भाई हैं स्वर्ग से भी बढकर है । चास्तव में भ्रातृ प्रेम ऐसा ही होता है। भारतवर्ष के -दुर्भाग्य चश आज भाई, भाई में प्रेम को पारस्परिक, निर्मल, शुद्ध धारा नहीं यह रही है, यदि भाई, माई का प्रेम प्रवाह न सूखता तो कदापि इस देश की ऐसी अधोगति न हाती एक दिन भारतवर्ष में,-भाइयों में प्रेम का अखण्ड राज्य, परन्तु वह बात ही आज नहीं । पर यह देखने में आया है, चाहे माई माई में प्रेम भाव न हो पर जब कभी किसी पर आपत्ति माइयों से विहीन इस स्वर्ग को लेकर मैं क्या करू ऐसा स्वर्ग मुभ रही चाहिये वे जहाँ होंगे, यही मेरा स्वर्ग वन्धु मिलन 10 . का - माती है तो खून का असर दूसरे भाई पर भी हुए बिना नहीं रहता है । नित्य प्रति ऐसी घटनाएं देखने में आती हैं । इस हल्दीघाटी के युद्ध में भी ऐसी ही एक घटना हुई । रणभूमि से निकल कर प्रताप अपने चेतक घोडे पर अकेले ही चले । उस समय वे यहुत थके हुए थे उनका शरीर क्षत विक्षत हो रहा था, उनके प्यारे घोडे चैन की मी ऐसी हो दशा हो रही थी परन्तु उस दशा में भी चेतर अपने खामी को लेकर बडे बैग से जा रहा था। प्रताप को जावे देख कर उनके पीछे दो मुगल सिराहो भी दोडे जिसमें एक नाम खुरासानी और दूसरे का नाव मुलतानी था। प्रताप मथमाता समस्त दिन युद्ध में व्यस्त रहने के कारण ही थके हुए थे, दूसरे युद्ध का फल और स्वदेश की चिन्ता के कारण दुख सागर में हुये हुये थे। उन्हें अपने पीछे मुगल समारों के आने की कुछ खबर नहीं हुई। जिस मार्ग से प्रताप जा रहे थे उस मार्ग के बीच में नाला था, चेतक छलाग 'भर कर नाले को पार कर गया, परन्तु उन देॉनों मुगल सवारों का घोडा नाला पार नहीं कर सका । कुछ आगे बढने पर प्रताप ने अपनी सदेशी भाषा में एक आवाज-सुनी "हो नीला घोडारा सवार हो"। इस आवाज़ के सुनते हो प्रताप ने पोछे की ओर फिर कर देखा तो मालूम हुआ कि दोनों मुसलमान सवारों को मारकर, तीर को भाति उनका भाई शकसिंह पीछे लपक रही है। प्रताप, धीर गम्भीर पिर मात्र से खडे होगये, सोचने लगे कि मुझे मारकर शक्तसिंह अपनी पूषप्रतिज्ञा को पूर्ण किया चाहता है, नहीं तो उन दोनों मुगल सवारों के मारने को क्या आवश्यकता थी मन ही मने कह ।। आओ!! मुझे मारकर अपनी . . लगे-आओ।
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याघु मिलन ने सजल नयन से भाई को गले लगाया। उस समय प्रताप हल्दीघाटी की पराजय भूल गये मुगलों ने हल्दीघाटी पर विजय लाम पिया था, प्रताप ने अपने भाई के दृश्य साम्राज्य पर अधिकार प्राप्त किया। उस समय उनके हृदय में अद्भुत भानन्द मा सञ्चार हुमा। मानो राम और भरत यहुत , दिन पीछे मिले।। - T परन्तु हाय ! यद आनन्द दायक समय, अपूर्व सम्मिलन भाइयों का मिलान पहुत देर तक न रह सका । क्योंकि महा- राणा प्रतापसिंह का घोडा-चेतक उस दिन युद्धस्थल में बहुत धक गया था। उसके शरीर पर कई घाव भी पाये थे। जिस समय दोनी भाई भ्रातृ सम्मिलन का अपूर्व मानन्द-अनुभव कर रहे थे। उस समय प्रताप का घोडा, चेतक अपने स्वामी फा साथ छोर कर इस लोफ से सिधार गया। घोडे की मृत्यु देस कर प्रताप.मे.रहा न गया । चे फट फूटकर धाड मार फर रंसे रोने लगे, जैसे कोई अपने सजन फी मृत्यु पर रोता हो। इत्तमान जारोली के निकट जहा चेतक की मृत्यु हुई थी, वहा तक के स्मारक स्वरूप में एक यदिफा बनाई गई थी, उसको तक का चबूतरा फाहते है। कहते हैं, मेवाड के जिस घर में नाप का चित्र है, उस घर में चेतक का भी चित्र है। इस घटना के पीछे शक्क वहा बहुत देर नहीं ठहरे, उन्होंने पना घोड़ा जिसका नाम अडारों था प्रताप को दे दिया नाप उस पर सवार हो कर चल दिये और शकसिंह उनको इ कह फर कि सुविधा होने पर फिर मिलूंगा। मुगल शिविर शकसिंह ने जिन दो सवारों को मारा था, उनमें से ये रासानी के घोडे पर सवार हो कर वापिस आये। युवराज टीम ने उनसे खुरासानी घोडे पर आने का कारण पूछा, 11 ओर लौट दिये।
१०४ महाराणा प्रताप - , पहले शक्तसिह ने असली भेद को छिपाना चाहा, परन्तु सलीम ने समस्त अपराधों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की और असली हाल कहने के लिये शक्तसिंह से आग्रह किया। तब तो उन्होंने व्यौरेवार सय हाल कह । सुनाया और कहा:- “युवराज | विशाल राज्य का भार मेरे बड़े भाई पर है, उन पर विपत्ति आवे और मैं चुप बैठा रहूं, यह कैसे. हो सकता है ? खुरासानी और मुलतानी दोनों को मैंने ही मारा है" भाई के घोड़े के मरने पर अपना घोड़ा, मैंने उन्हें दे दिया, और खुरासानी के घोडे पर मैं आया है। यह सुनकर सलीम थोडी देर चुप रहा पीछे उसने अपनी प्रतिज्ञा स्मरण करके कहा-“अच्छा । आप का सब अपराध क्षमा किया, पर आज मुगल सेना को छोड़ जाइयेगा। यह सुनकर शक्तसिंह बड़े प्रसन्न हुये, उन्होंने तत्काल ही सुगल शिविर का परित्याग किया। भाई से अनबन होने के कारण उन्हें देशद्रोहिता का कलङ्क अपने मत्ये लेना पड़ा था बहुत दिन पीछे उनका उस कलङ्क से छुटकारा हुआ। मिलते समय भाई को कुछ नजर देने की इच्छा से मैसरौर गढ पर आक्रमण किया, और जीत कर अपने भाई की भेट कर दिया। मैंसरौर गढ बहुत दिन तक शक्तवों का स्थान रहा है। प्रताप ने भाई के इस व्यवहार से सन्तुष्ट हो कर वह स्थान पारम्वार के लिये उन्हें दे दिया। राजमाता पुत्र शक्तसिंह को ही बहुत प्यार करती थी। इस लिये घे भी वहीं जाकर रहीं। इसलिये अब भी शकसिंह के वंशधरों की माताएँ "वाई जी महाराज" कहलाती हैं | शक- सिंह के आ जाने से प्रतापसिंह का और भी बल बढा चन्द्रा. वतों की भाँति शक्तवतों की भी वीरेन्द्र समाज में परिगणना + बन्धु मिलन १०५ हुई। शकसिंह ने खुरासानी और मुलतानी सिपाहियों को मार कर प्रताप की रक्षा की थी, इसलिये उनके वंशधर अब तक खुरासानी, मुलतानी के आर्गल अर्थात् खुरासानी मुल- तानी को रोकने वाले कहलाते हैं। 4
१०४
महाराणा प्रताप
पहले शक्तसिह ने असली भेद को छिपाना चाहा,,परन्तु
सलीम ने समस्त अपराधों को.क्षमा करने की प्रतिज्ञा की,
और
असली हाल कहने के लिये शक्तसिंह से आग्रह किया। तब तो
उन्होंने व्यौरेचार सय हाल कह सुनाया और कहा.
“युवराज । विशाल राज्य का भार मेरे बड़े भाई पर है, उन
पर विपत्ति भावे और मैं चुप बैठा रह, यह कैसे हो सकता
है ? खुरासानी और मुलतानी दोनों को मैंने ही मारा है" भाई
के घोड़े के मरने पर अपना घोडा, मैंने उन्हें दे दिया और
खुरासानी के घोडे पर मैं आया "
यह सुनकर सलीम थोड़ी देर चुप रहा पीछे उसने अपनी
प्रतिज्ञा स्मरण करके कहा.-"अच्छा! आप का सब अपराध
क्षमा किया, पर आज मुगल सेना को छोड़ जाइयेगा।
यह सुनकर शक्तसिंह बड़े प्रसन्न हुये, उन्होंने तत्काल ही
भुगल शिविर का परित्याग किया। भाई से अनबन होने के
कारण उन्हें देशद्रोहिता का कलङ्क अपने मत्ये लेना पड़ा था।
बहुत दिन पीछे उनका उस कलङ्क से छुटकारा हुआ।' मिलते
समय भाई को कुछ नजर देने की इच्छा से मैसरौर गढ पर
आक्रमण किया, और जीत कर अपने भाई को भेट कर दिया ।
मैंसरौर गढ यहुत दिन तक शकवतों का स्थान रहा है । प्रताप ने
भाई के इस व्यवहार से सन्तुष्ट हो कर वह स्थान बारम्बार के
उन्हें दे दिया।
राजमाता पुत्र शकसिह को ही बहुत प्यार करती थीं। इस
लिये वे भी यहीं जाकर रहीं। इसलिये अयं भी. शक्तसिंह के
चंशधरों की माताएं "थाई जो महाराज" कहलाती हैं। शक
सिंह के आ जाने से प्रतापसिह का और भी चल बढ़ा। चन्द्रा
वतों की मांति शक्तवतों की भी वीरेन्द्र समाज में परिगणना
.
बन्धु मिलन
१०५
हुई । शक्तसिंह ने खुरासानी और मुलतानी सिपाहियों को
मार कर प्रताप की रक्षा की थी, इसलिये उनके वंशधर अब
तक खुरासानी, मुलतानी के आर्गल अर्थात् खुरासानी मुल.
तानी को रोकने वाले कहलाते हैं।
१०४ महाराणा प्रताप - . पहले शक्तसिंह ने असली भेद को छिपाना चाहा, परन्तु सलीम ने समस्त अपराधी को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की और असली हाल कहने के लिये शक्तसिह से आग्रह किया। तब तो उन्होंने व्योरेवार सब ,हाल फह , सुनाया और कहा. “युवराज ! विशाल राज्य का भार मेरे बडे भाई पर है, उन पर विपत्ति आवे और मैं चुप बैठा रहू, यह कैसे हो सकता है ? खुरासानी और मुलतानी दोनों को मैंने ही मारा है" भाई के घोड़े के मरने पर अपना घोडा, मैंने उन्हें दे दिया और खुरासानी के घोड़े पर मैं आया हू" । यह सुनकर सलीम थोडी देर चुप रहा पोछे उसने अपनी प्रतिज्ञा स्मरण करके कहा-"अच्छा! आप का सब अपराध क्षमा किया, पर आज मुगल सेना को छोड जाइयेगा। यह सुनकर शकसिंह घडे प्रसन्न हुये, उन्होंने तत्काल ही मुगल शिविर का परित्याग किया। भाई से अनबन होने के कारण उन्हें देशद्रोहिता का कलङ्क अपने मत्ये लेना पड़ा था। बहुत दिन पीछे उनका उस कलङ्क से छुटकारा हुआ। मिलते समय भाई को कुछ नज़र देने की इच्छा से 'मैसरौर गढ पर आक्रमण किया, और जीत कर अपने भाई की भेट कर दिया। मैंसरौर गढ बहुत दिन तक शकवतों का स्थान रहा है। प्रताप ने भाई के इस व्यवहार से सन्तुष्ट हो कर वह स्थान बारम्बार के लिये उन्हें दे दिया। राजमाता पुत्र शक्तसिंह को ही बहुत प्यार करती थीं। इस लिये घे भी वहीं जाकर रहीं। इसलिये अब भी शक्तसिंह के वंशधरों को मानाएं “याई जी महाराज" कहलाती हैं । शक- सिंह के आ जाने से प्रतापसिंह का और भी बल बढा। चन्द्रा. वतों की भांति शकयतों को भी वीरेन्द्र, समाज में परिगणना । --
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पन्द्रहवाँ परिच्छेद
।
F
।
'महासङ्कट
"बडे लहत सुख सम्पदा, बडे सहत दुःख इन्द।
उडुगण घटत न बढत कहु, बढत घटत नित चन्द ॥"
"बड़े तजत नहि नीति पथ, यदपि प्राण तजि देत ।
भूखा रहत मृगेन्द्र तउ, तृण न कर हु मुख लेत"
हल्दीघाटी के युद्ध की समाप्ति हो चुकी चौदह हजार
राजपूत वीर हल्दीघाटी की रक्षा के लिये प्रसन्न मुख किसी
प्रकार का सङ्कोच न करके अपने जीवन को न्यौछावर करके
स्वर्ग को सिधार गये । हल्दीघाटी राजपूत वीरों के रुधिर के
सोतों से धुल गई । हल्दीघाटी युद्ध का परम पवित्र क्षेत्र ।
इस युद्ध की कथा कवियों की रसमयी कविता द्वारा चिर
स्मरणीयरहेगी। इतिहास लिखनेवालों की पक्षपात रहित पविः
लेखनी सुवर्ण अक्षरों में इस कथा को लिखेगी अन्तकाल तक
धीरेन्द्र समाज में महाराणा प्रतापसिंह का नाम उच्च रहेगा
परन्तु हाय । वीरेन्द्र प्रताप के कष्टों का ठिकाना न था । मान
बादशाह के साथ ही साथ ससार की सुख सम्पदा सभ
उनसे रूठ गई । उस समय वीर शिरोमणि प्रताप के दुख छ
ठिकाना न रहा।
वर्षाऋतु के आरम्भ में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था
वर्षा ने अपना भयङ्कर रूप धारण किया। लगातार को घर
ने बादशाही सेना का नाकों दम कर दिया पर्वत के आ
पास नदी नाले भरने लगे, बादशाही लश्कर में बहुत से लो
बीमार पड़ने लगे। विजयोन्मच मुगल सेना का सारा उन्म
।
है
सेना फिर आ पहुची। प्रतापसिह ने फिर अपने वीरों को
इकट्ठा किया। माघ दी ७ सम्बत् १६३३ को मेवाड़ की
साधीनता का पुनः युद्ध हुआ असख्य मुगल सनिक सब प्रकार
को तैयारी करके राजपूत जाति की मान मर्यादा और गौरव
तरह से तैयार थी उनके पास किसी प्रकार के सामान की कमी
- थोडे से वीरों को लेकर प्रताप मुगल सेना से भिड ही गये,
परन्तु थोडे से राजपूत अपनी तलवारों के बल से कहा तक
विशाल मुगल सेना का सामना करते । बहुत धीरता दिखलाने
पर भी विजय लक्ष्मी राजपूतों से प्रसन्न नहीं हुई राजपूत वोरत
ने कुम्भलमेर के किले में जाकर आश्रय लिया।
के सेनापति शहवाज खा ने उस फिले को घेर लिया ।
प्रताप ने बहुत कुछ आत्मरक्षा की, परन्तु भाग्य देवता सरः
तरह से उनके प्रतिकुल थे। गर्मी के दिन थे। राजपूत पीर
किले में घिरे हुयेथे रसद की कमी थो पानी फा अत्यन्त फष्ट
पाऊंची जगह होने से घड़ा पानी का अमाप था गर्मी के दिनों
पानी का अभाव असहनीय हो जाता है। मम पानी फी
1- महासङ्कट
बतर गया। सलीम ने यहा की ऐसी स्थिति देखकर वहा से
अपना डेरा हटा लिया। प्रताप को कुछ दिनों के लिये अय.
काश मिला। परन्तु वसन्तऋतु आते ही सब रास्ते साफ
हो गये। मार्ग में किसी प्रकार की रुकावट न देसकर मुगल
को धूल मिट्टी में मिलाने के लिये इकट्ठे हुए । मुगल सेना सब
नहीं थी। परन्तु वेचारे राजपूतों के पास क्या था, केवल उनके
माण हार्दिक उत्साह अथवा आत्मिकथल था इने गिने अपने
“मुगल सेना ने भी राजपूतों का पीछा किया, मुगल सेना
जपूत, वीरों को असहनीय "येदना हो रही थी। कुम्भलमेर
में निगुण" नाम कमाया राजपूत पौर चल
स कुए के जल से ही प्यास युझाते थे।
महाराणा प्रताप -- समय ऐसे देशद्रोही कुलागारों की कमी नहीं थी जो अपने राजपूत भाइयों के खून को चूसने में ही अपना बड़प्पन समझते थे। ऐसे ही जातिद्रोही देश विद्वेपियों में आबू के देवर अधिकारी थे। इस देश द्रोही आवू के अधिकारी को धूषित कार्रवाई के कारण राजपूत वीरो को भयङ्कर सङ्कट का सामना करना पड़ा। "मावू के देवर के अधिकारी को जब देश द्रोहिता के लिये और कुछ न सूझ'पडा तो उसने प्रताप के वैरी मुग़लों को कुए' का हाल बतलाया मुगलों ने किसी ढङ्ग से कुए' का जल ही खराव कर दिया। जल के खराब और जहरीले होने के कारण प्रताप और उनके साथियों को विशेष फष्ट होने लगा। बहुत से जहरीले जल के पीने के कारण मृत्यु के ग्रास होने लगे। अव प्रताप को किले के खाली करने के अतिरिक्त और कुछ उपाय नहीं रहा उन्होंने शोणिगुरु सरदार को दुर्ग की रक्षा का भार सौंपा। बहुत से राजपूत वीरों के साथ उन्होंने उस किले को खाली कर दिया। वहा से प्रताप चौद नामक पहाडी किले में गये। शोणिगुरु सरदार ने अभूत पूर्व साहस से मुगल सेना क सामना किया। उसने इसकी बहुत चेष्टा की कि मुगल सेन चौद तक पहुचने न पावे, परन्तु उस वीर की चेष्टा सफल नह हुई और वह युद्ध में भूतलशायी हुआ । शोणिगुरु सरदार मरने से.मेवाड़ का एक प्रधान महाकवि उठ गया। जिसके फ़रिता कामिनी ने मेवाड में विद्युत्शक्ति का प्रादुर्भाव क जिसकी कविता के सुनते ही मेवाड की लियां भी 7 तक को नसों में संदेश रक्षा का खून बहने लग गर था। जिसकोगीत सुनकर मेवाड के घीर विशाल मुगल सेन का कुछ भी विचार न करके अपने देश की रक्षा के लिये प्रा देने को तैयार हुए थे। शोक! वही शोणिगुरू इस युद्ध में अप . दिया था.
महासङ्कट १०६ देशवासियों को रुलाकर चलते बने। किन्तु इतने पर भी मेवाड की चीर मण्डली का उत्साह नहीं घटा । राजपूतों का प्रधान अश्रयस्थल कुम्मलमेरु मुगलों के हाथ में चला गया सही परन्तु पौर वीर प्रतापसिंह आश्रय हीन नहीं हुये। वे अपने व्रत से टले नहीं। ऊपर कहा जा चुका है। कि कुम्भलमेरु छोडने पर प्रताप ने वाद नामक स्थान में आश्रय लिया था। मेवाड के दक्षिण पश्चिम भाग में चम्पन नामक प्रदेश हे। उस स्थान में बहुत से पहाड हैं, उसमें कोई साढे तीन सौ छोटी छोटी बस्तिया हैं। इन सब मस्तियों में भील यसते हैं उस प्रदेश में ही चौद नामक वस्ती पहाड पर है । प्रताप वहीं रहने लगे। प्रताप की प्रतिक्षा थी कि चाहे जो कुछ हो पर मुगल सम्राट अकबर के सामने अपना माथा नहीं झुकाऊंगा। उधर यकयर भी इस कठोर प्रतिज्ञा को धारण किये हुये था कि चाहे जो कुछ हो प्रताप को अपनी भ्यता स्वीकार फराके राहगा। अकबर अपनी इस प्रतिशा को पूरी करने के लिये अनेक सेनापतियों के अधीन दल की दल फौज भेजने लगा यह फौज मेवाड के अनेक स्थानों में फैल गई। पहले युद्धों में ही प्रताप का धन वल जनरल सब कुछ नष्ट हो चुका या। परन्तु प्रताप अपनी प्रतिज्ञा नहीं भूले । वे मुट्ठी भर राज पूतों को लेकर मुगल सेना का सामना करते थे। जय प्रताप एक स्थान की रक्षा करते थे। तब दूसरा स्थान मुगलों के हाथ में चला जाता था । मुगलों की ओर से राजा मानसिह ने घरमेति और रोटा Hiranate पर अधिकार कर लिया
महाराणा प्रताप
FAM
।
अमीशाह नामक व्यक्ति ने चौंद और अगुण पानेर के भीलों और
प्रताप के बीच में जो सम्बन्ध था वह तोड दिया ।। वहां से।
प्रताप को जो रसद आती थी, वह भी चन्द होगई। ऐसे महा-
सड्डट के समय में 'फरीदसां नामक एक मुगल सेना-
पति ने चम्पन पर आक्रमण किया और दक्षिण की ओर सेक्रमश.
चौन्द की ओर कूच करने लगा। प्रताप को वह स्थान -मो
छोडना पडा। मानसिंह मुहब्वत खां, फरीट खाँ और शहबाज,
खां प्रमति प्रधान २ मुगल सेनापतियों ने मेवाड भूमि को चारों
ओर से घेर लिया।
इस प्रकार चारों ओर से घिरने पर प्रताप बिलकुल निस्सा
हाय होगये । उनको अपनी मातृभूमि मेवाड में वाधीनता
'पूर्वक विचरण करना भी असम्भव होगया । मेवाड़ेश्वर प्रताप
की दशा दीन, हीन, मलीन भिसारी से गई बीती होगई ।
कहीं भी वे निश्चित रूप से नहीं बैठने पाते थे। वह अपनी
सेना सहित कुछ राजपूत वीरों के साथ एक स्थान से
दूसरे स्थान में भटकते फिरते थे। उस समय उनके परिवार
की रक्षा का भार भीलों ने लिया । कैसा कठिन समय था,
'कि महाराणा की महाराणी तथा उनकी सन्तान के लालन
"पालन का भार भीलों पर था। भील ही उनके भोजन को,
सामग्री लाते थे। दिन रात उनकी रक्षा (मुगलों के हाथ कहीं
महाराणां का कुटुम्ब न पड जाय) करते थे । दुश्मनों के पास
'आ जाने के भय से मोल लोग महाराणा के परिवार को झालियों
ले जाकर गुफाओं में छिपाते थे कभी कभी लगातार
10 आठ दिन तक महाराणा प्रताप का अपने परिवार के
कई इतिहास लेखकों ने अमीशाह को मुसलमान लिखा है और कुछ
लेखक उस राजपूत यवलाते हैं। -लेखक
-
।
प्राणा प्रतापसिंह ने फरीदखा के साथ जो व्यवहार किया
से व्यवहार के उदाहरण भारतवर्षको छोड फरससार,के
पद अन्य देश के किसी इतिहास में मिले, महाराणा ने उसके
'महासकर
लोगों से मिलना नहीं होता था। परन्तु फिर भी देशभक्त
मताप अपनी प्रतिमा पर अटल थे। प्रताप को ऐसी दशा
देखकर मुगल सेना को आनन्द को सीमान रहो।
देखें मनेक सङ्कटों के माजाने पर भी प्रताप निश्चिन्तः
नहीं थे। उनके राजपूत-पोरों को जय कमी मौका मिलता था
ही मुग़ल सेना पर टूट पडते थे। जिससे मुगल सेना
विशेष हानि होती थी। राजपूत घोर अचानक मुगल शिविर
माक्रमण करके पादशाही सेना को छिन्न भिर कर
रते थे मुगल सेना के योद्धाओं को रक्तधारा से अपनी
मातृभूमि मेवाड़ का शरीर रह कर रहाडी कन्दराओं में
हो जाते थे। जिससे मुगल सेना को भी कुछ न कुछ
मिति कासामना करना पडता था। इस तरह से मुग़ल सेना
सदों से सामना करना पडा । उसके एक सेनापति फरीद
ने नको की फसम, प्रतापसिंह को जोषित पकडने अथवा
भूमपने हाथ से मार डालने की प्राई "चोये जी छध्ये होने गरे
जीप पर रह गये दुपहा फरीदसा की हुई उसे पोडे
पनी भूल सात हुई, उसे मालूम हुआ कि नर केसरी प्रताप
को पकड़ना का लाह नहीं है प्रताप के कौशल से फरीद
जो एक पहाड़ी में घिर गया | राजपूत धीरों ने उसकी सारी
जना को काट डोलावल एक आदमी फरीद खा के पास
र रहा । उस समय महाराणा प्रताप चाहते तो फरीद खाँ
द कर लेने मार डालते परन्तु उदार हृदय महा-
-
धियार लेकर उसको छोड़ दिया।
वळ सेता इस प्रकार पक्षों में निपुण न थी, राजपूतों
महाराणा प्रताप
के सामने वह निस्तेज और उत्साह हीन हुई, मुग़ल सेना की
सब चालाकी और वीरता निष्फल हुई, प्रताप पकड़ने में नहीं
आये। इतने में वर्षा ऋतु फिर भारम्भ हो गई, नदी नाले
बहने लगे इस कारण मुगल सेना अपनी छावनी को लौट गई,
चीरेन्द्र प्रताप को वर्षा ऋतु आने के कारण फिर अवकाश का.
समय मिला।
इसी तरह से वर्षों बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप
में लडाई होती रही । हर वर्ष वर्षाऋतु में बादशाह की फौज
लौट जाती थी और वसन्त में नये दल बल से आक्रमण
करती थी। पर प्रताप का कठोर व्रत नहीं टूटा, उनकी
प्रतिज्ञा अटल पर्वत के समान स्थिर रही। भीलों ने प्रताप के
इस सङ्कद के समय 'स्वामिभक्ति का अपूर्व परिचय दिया।
एक समय मुगलों के हाथ में प्रताप का परिवार पंडा ही
होता, परन्तु उनके सदा के विश्वासी मित्र भीलों ने रक्षा
की उस बार कावा निवासी भीलों ने उनके परिवार के लोगो
को यांस की टोकरियों में रखकर जावरा की टिन की खानि'
में छिपाया था, प्रभुभक्त भील स्वयं भूखे रहते थे पर प्रताप
के परिवार के लोगों को भूखा नहीं रहने देते थे, और रात
दिन उनकी रक्षा किया करते थे। कई शताब्दियों के बीत जाने।
पर भो जावरा और चौंद के घने जगलों में मीलों के उपकारों
के चिन्ह आज भी मिलते हैं आज भी उन जगलों में बडे बडे
वृक्षों में लोहे के कडे 'और असंख्य कोल दिखलायी पडतीर
हैं । मोल गण राजपुत्र, राजकुमारियों को उन कील और
फडी पर बनेले पशु जन्तुओं से रक्षा करने के लिये रखा
देते थे। जिस राज परिवार को एक दिन सुन्दर राजमहल
में भी तृप्ति नहीं होती थी, उस राज परिवार को अनाथों की
तरह जंगलों में भीलों के बाश्रय अपना जीवन व्यतीत करना."
।
महा सार । पड़ा। परन्तु यह सय रिपत्तियों के होते हुये भी पताप अपनी कटोर पतिशा से टले नहीं । उनको पुतिला थी कि चाहे जो कुछ हो पर मुगल सम्राट अकयर के सामने अपना मस्तक नहीं मुकाऊँगा। अकयर मी निश्चिन्त नहीं था, वह छुपे छुपे प्रताप की टोह लेता था। यह प्रताप की यह दशा देख कर चकित और स्तम्भित हुआ। यह पताप के ऐसे असाधारण स्वार्थत्याग और परम फर में धीर भाव को देखकर अकबर का हृदय भी पिघल गया। वह छिपे छिपे पुतापसिह की दशा जानने की चेष्टा करता था । जब उनके यह सुना कि पुताप केसरदारों को खाने के लिये थोडे से फल फूल मिलते हैं, परन्तु उनका भी मोजन ये राजसी ठाट से करते हैं। ऐसे घोर सङ्कट में भी वे उसी मर्यादा का पालन करते हैं, जो वे सुख के समय करते थे जगली फलों के दोने उनके हाथ से सहर्ष सरदार गोग लेते हैं। अफयर ने जिस समय यह हाल सुना, उस समय उसकी प्रताप पर अत्यन्त भक्ति हो गई । जो राजपूत गण प्रताप से शत्रुता फरके अकबर के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे, चे भी महाराणा जी की सहायता करने लगे और चपने जी में अपने को धिक्कारने लगे। हिन्दू ही नहीं, के मुसलमान दरवारी भी महाराणा प्रतापसिंह को मुक्तसारठ से प्रशसा करते थे। और तो और मुगल सेना के सेनापति मिरजा सामान्साना ने प्रतापसिह के पास यह कविता "भ्रम रहसा रहसी धरा, खिस जासे खुरसाणा। -अप दादशाह मिजासखे गोगा में छोट गये थे तय इमार यकयर भेजी थी:- मेयार की राज मशम्ति में रिहा है. ---- मिजा सकी।
११४
महाराणा प्रताप
अमर विश्वम्भर ऊपरे, रपियो न हचोरणा"
इसका माधय यह है.-" राणा जी! उस अमर' जग
दीश्वर पर विश्वास रखियेगा, माप का धर्म और धरती दोनों
ही बने रहेंगे और वादशाह लजित होगा।"
-
.
थे, परन्तु महाराणा जी ने उनको प्रतिष्ठा के साथ मिर्जा घर के पास
दिया था, बहुत सम्भव है, उसी पर प्रसन्न होकर उसने महाराणा के
उपयुक कविता भेजी हो।।
सोलहवाँ परिच्छेद
कठोर परीक्षा
"सहे सरे दुप नेकु न अपने प्रण ते भटके ।
राज गयो धन गयो फिर यन यन में भटके ।
पैहाय सही जाती नहीं जीवत इन नयनन निरख ।
इन दूध पोवते यालक,
रोटी हित रोयते पिलखा
श्रीराधाकृष्णदास
पाठक सुन चुके हैं कि उस समय प्रताप की दशा एक
साधारण गृहस्थी से भी गयो योती थी । साधारण से
साधारण गृहस्थ के पास जो कुछ होता है, यह भी प्रताप के
नहीं था। चाहे जैसा विपत्ति ग्रस्त क्यों न हो, उसके पास
मी थोडा यात क्षुधा निवृत्ति के लिये होता है। पर प्रताप
पास कुछ नहीं था। गृहस्थ को रात्रि में सोने का फहीं तो
मी ठिकाना होता है, पर प्रताप के पास वह भी नहीं था राह.
चलता हुआ एक भिसारी किसी पेड़ के तले निश्चिन्त होकर
रात को सो तो भी लेता है, परन्तु प्रताप को फहीं सोने का
मी ठिकाना नहीं था। न मालूम फिस समय शत्रु आ जाय
यह मय प्रताप को रात्रि दिन लगा रहता था। जब मुगल
सैनिक गण किसी तरह भी प्रताप को नहीं पक्कड करके, सब
रकार की चेटाये करके हार गये, पर प्रताप ने मुग़ल सम्राट
अकरर की अधीनता स्वीकार नहीं की तब उन्होंने प्रताप
के परिवार में से ही किसी को पकड कर उसको अपमानित
कलेजा ठंडा करने की ठानी। इस लिये
कमी अवसर देखते थे तय ही प्रताप के
पहुंचा दिया था, बहुत सम्मद है, उसी पर प्रसन्न होकर उसने महाराणा
महाराणा प्रताप
११४
अमर विश्वम्मर ऊपरे, रवियोन हवी रणा",
इसका याश्रय यह है- राणा जी! उस अमर अग
दीश्वर पर विश्वास रखियेगा, आप का धर्म और धरती दोनों
ही बने रहेंगे और पादशाह लजित होगा।"
साथ मिर्जा वो कप
लाये थे, परन्तु महाराणा जी ने उनको प्रतिष्ठा
4
रास उपयुक कविता भेजी हो।
।
+
--
सोलहवाँ परिच्छेद
.
मुगल सैनिक जब कमी अवसर देखते थे तय ही.
कठोर परीक्षा
“सहे सर्व दुस नेकु न अपने प्रण ते भटके ।
राज गयो धन गयो फिरे बन पन में भटके ॥
पे हाय सही जाती नहीं जीवत इन नयनन निरख ।
इन दूध पीवते बालक, रोटी हित रोवते पिलख ॥
श्रीराधाकृष्णदास
पाठक सुन चुके हैं कि उस समय प्रताप की दशा एक
साधारण गृहस्थी से भी गयी योती थी । साधारण से
साधारण गृहस्थ के पास जो कुछ होता है, वह भी प्रताप के
नहीं था। चाहे जैसा विपत्ति प्रस्त पों न हो, उसके पास
भी थोडा बहुत क्षुधा निवृत्ति के लिये होता है। पर प्रताप
पास कुछ नहीं था। गृहस्थ को रात्रि में सोने का कहीं तो
मी ठिकाना होता है, पर प्रताप के पास वह भी नहीं था राह.
चलता हुआ एक भिखारी किसी पेड के तले निश्चिन्त होकर
रात को सो तो भी लेता है, परन्तु प्रताप को कहीं सोने का
मो ठिकाना नहीं था। न मालूम फिस समय शत्रु आ जाय
यह भय प्रताप को रात्रि दिन लगा रहता था। जब मुगल
सैनिक गण किसी तरह भो प्रताप को नहीं पतड करके, सय
प्रकार को चेतायें करके हार गये, पर प्रताप ने मुगल सम्राट
मकार की अधीनता स्वीकार नहीं की तब उन्होंने प्रताप
के परिवार में से ही किसी को पकड कर उसको अपमानित
करके ही अपना कलेजा ठंडा करने की ठानी । इस लिये
महाराणा प्रताप परिवार को पकडने की चेष्टा करते थे, परन्तु प्रभु-भक भील किसी न किसी प्रकार प्रताप के परिवार की रक्षा करते थे। इस प्रकार प्रताप को प्राणों से अधिक प्यारे, स्त्री पुत्र आदि परिचार का कष्ट उनको कितनी ही चार प्राणान्त पीडा देने लगा पर उन्होने अपने कठोर प्रण के सामने इस प्राणान्त पीडा की कुछ परवाह नहीं की। एक दिन 'प्रतापसिह की राजमहिषी ने पांच बार भोजन प्रस्तुत किया, परन्तु पांचों बार राजपरिवार को मुंगल सैनिकों के कारण भोजन छोड़कर भागना पड़ा था। एक बार भी मजन करने का समय नहीं मिला । पाचों चार प्रस्तुत किये हुए भोजन को छोड कर उन्हें पहाडो के दुर्गम स्थानों में जाना पड़ा 'किसी न किसी तरह से उस दिन मुगल सैनिकों से प्रताप के परिवार की रक्षा हुई । परन्तु तिस पर भी प्रताप अपने प्रेत से डिगे नही ।। मनुष्य 'सब कुछ सह सकता है। परन्तु सन्तान का कष्ट सहना कठिन है। दुधमुहे कॉमला अमान बच्चों की चिल्लाहट कठोर 'सेपठोर हृदय वाले व्यक्तिओं के कलेजे को पिघला देती है । संसार में ऐसे कितने माता पिता हैं जिनके बज से कठोर हृदय को भी अपनी सन्तान के दुस को देखकर न रोना 'पडा हो वीरेन्द्र प्रतापसिंह को भी ऐसीही कठोर परीक्षा को अवसर उपस्थित ६मा । कई दिन के घोर सङ्कुट के पीछे एक दिन महाराणा प्रतापसिंह को राजमहिपी और पुत्र यधूने "ल" नामक घास चीजों की रोटिया बनाई थीं । रोटिया तैयार होने पर उपस्थित बालक, बालिकाओं को एक एक 'रोटी यार दी गई थी उस दिन और कुछ भोजन न था, सिर्फ उन्हीं एक एक रोटी को सघ को सहारा था, जहा यह रोटियां घर रही थी, वही पास ही प्रतापटे हुए, अपनी 6
प्रताप
लेकर क्या करूगा यही विचार उनके हृदय के अन्दर उठने
कठोर परीक्षा
दशा और मेवाड के भाग्य के सम्बन्ध में विचार रहे थे।
जिस समय इस तरह के विचार सागर में मग्न थे, कि यशा-
यक अपनी छोटी लडकी के रोने की आवाज सुनकर चौक
पड़े देखा कि एफ जङ्गली पिल्ली यकायक टूटकर लडकी
। की गोद से आधी रोटी छीन कर भाग गई इसी से वालिका
हृदय विदारी रोदन कर रही है। वीरेन्द्र प्रताप इस दृश्य को
देखकर काप उठे। प्रतापसिह ने प्रसन्नमुख से हल्दी घाटो
रणस्थल में अपने देशवासियों की रुधिर की नदी बहती हुई
देखी थी, उन्होंने प्रसममन से देश के गौरव को बनाये रखने
के लिये अपने भाइयों को उत्तेजित किया था।
यालिफा को रोते देखकर कांप उठे, जो प्रताप अपने वीरव्रत
पालन के लिये सहर्ष राजपाट, धन दौलत सभी की राष्ट्रीय
यज्ञ में पूर्णाहुति देकर भी तनिक विचलित नहीं हुए, उन्हीं
प्रताप का वालिका के रोने से कलेजा फटने लगा। जो प्रताप
अनेक आपत्तियों के आने पर भी अपने कठोर व्रत से नहीं
हटे थे, वे ही प्रताप आज अपनी एक छोटी कन्या के रोने
कारण प्रतिज्ञा भङ्ग फरने को तैयार हुये । कन्या के रोने के
साथ ही साथ महाराणा की आखों से भो अश्रुधारा यहने लगी,
प्रशान्त सागर में अशान्ति कपोलहरें उठने लगीं। भागवान सूर्य
की गति बदल गई गिरराज, हिमालय फन्दरा में धंस गया।
प्रतापसिंह आखिर मनुष्य ही तो थे उनका हृदय कोमल
पालिका के दुख को सहन नहीं कर सका, "हाय ! छोटे २
बच्चे तक मेरे कारण इतना दुख पायें। फिर इस प्रतिमा को
जाता यथेष्ट हुआ।" यह कह कर वे अकबर से सन्धि
को तैयार हुये। सरदारों ने हाथ जोड़कर महारणा से
११८ महाराणा प्रताप . प्रस्ताव के विरुद्ध प्रर्थना की, राजमहिषी ने प्राणेश्वर को इस प्रस्ताव के विपरीत बहुत कुछ समझाया, घुझाया पर कोई भी तर्क, कोई भी युक्ति महाराणा के हृदय समुद्र की गति रोकने के लिये तैयार नहीं हुई। उन्होंने अकबर से सब लोगों के मने करने पर भी सन्धि की प्रार्थना कर ही तो दी। पत्र देकर दूत को अकपर के पास रवाना कर दिया । । अनेक विक्ष, विचार शील सज्जन कह उठेंगे कि प्रताप के चरित में यह दुर्बलता थी वे लोग भले ही इस घटना को लेकर प्रताप के चरित्र में दुबलता का कलङ्क थोपा करें परन्तु यह दुर्बलता नही है प्रताप लाख वीर होने पर भी मनुष्य ही तो ये ना मनुष्य होने के कारण घे मनुष्य स्वभाव से कैसे बच सकते थे? फिर प्रताप के चरित्र में दुर्बलता क्यों बतलाई जाय ? इस घटना को क्यों दोप दिया जाय? कौन सा माई का लाल ऐसा है जिसका पत्थर का फलेजा ऐसे अवसर पर न पसीजता यह मनुष्य मनुष्य नहीं है, वह देवता है अथवा राक्षस, या दानव है। हम तो समझते हैं कि ऐसे अवसर पर देवगण भी धैर्य और कर्तव्य से च्युत हो जाते हैं, बड़े प्राण संहारी राक्षसों को भी देखा गया है कि उन्हें बड़े बड़े हत्या कांड करने पर भी दया नहीं आई पर सन्तान की थोडे से दुस को देखकर उनका हृदय भी पसीज गया । सन्तान की दारण वेदना देखकर कौन ऐसा व्यक्ति है जिसके हृदय में करुणा उत्पन्न न होती हो ? कठोरता और कोमलता दोनों ही इदय के महत्व के सूचक हैं। कर्तव्य पालन करने में प्रताप का हदय जितना कठोर था, उतना ही दूसरों की धिपत्ति में कोमल था । यही कारण था कि बड़े बड़े सङ्कट में फंस फर अनेक यन्त्रणायें झेल फर भी जो प्रताप अपने घ्रत पालन से हटे नहीं ये। ये ही प्रताप एफ मालिका के दारुण रुदन को सहन करने में 1
अधीनता के पाश में जिन मताप फो जफटने के लिये पये
ईही कठोर प्रती प्रताप आज एफ पालिका साधारण विला
कारण अपनी स्वतन्त्रता येचने को तैयार हुये है। अपने सर
दारों के, गजमंत्रियों के माम्मीय जनों के प्राण पार शाम
समासिंह फे, यहा तफ फि अपनी दृदयेश्वरी के मामले
न किया। पपा ससार में कोई ऐसी शक्ति नहीं है. जी एम
मे मी अफयर फी अधीनता स्वीकार करने का सङ्कल्प परित्याग
'झमधार में से कौन सा सेवट प्रताप की नैया को उदारता ६१
महासरूट
।
समय प्रताप की ड्रयती हुई नैया को पार लगाये देखें, याम
सत्रहवाँ परिच्छेद
पृथ्वीराज का पत्र
चुप रहन नहिं जोग जय देश हित विपत्ति प्रताप परयो।
तासों चचावन प्रियहि अब हम देह निज विक्रम करयो ।
प्रताप की अधीनता का समाचार लेकर दूत अकवर के
दरवार में पहुचा । दूत के आते ही अकवर की प्रसन्नता का
ठिकाना न रहा । लगातार कई वर्ष से जिस प्रताप के कारण
अकवर का नाकों दम था। जिस प्रताप को अधीन करने में
अकवर को धन और जन दोनों की बहुत सी क्षति झेलनी.
पडी थी, वही प्रताप बिना किसी दिक्कत के अकयर के अधीन
होना चाहता है । तब क्यों न खुशी हो ? प्रताप के सन्धि
आधीनता विषयक प्रस्ताव के कारण सारा शाही दरबार
आनन्द में गूंज उठा । सम्राट अकबर के आनन्द का' तो
पूछना ही क्या था ? अकयर मेवाड का राज वा राजछा नहीं
चाहता था, वह चहता था कि एक बार प्रताप सिर झुकादे
तो सब काम बन जाये। बस प्रताप के दूत के आने से अकबर
की वह हार्दिक लालमा पूर्ण हुई। प्रताप के सन्धि विषयक
प्रस्ताव के पदुचते ही राजधानी में चारों ओर भानन्दोत्सव
होने लगा, पर यह किसी ने नहीं सोचा कि परमेश्वर को
यह मजूर नहीं है फि प्रताप भी अन्य राजपूतों की तरह
-मूल कविता यह है-
उप रहन हूँ नहि जोग भव मम हित विपति चन्दन परयो।
वालों मचावन प्रियहि, अब हम देह निज विक्रय करयो ।
(मुद्राराक्षस)
पृश्वीराज का पत्र
१२१
अफसर के चरणों में मस्तफ मुकाकर इस संसार से राजपूत
जाति का नाम निशान मिटा दे। आनन्द का यह स्रोत बहुत
दिन तक ठहरने वाला नहीं है। मझधार में प्रताप की भटकी
नार को उयारने घाला भी कोई इस राजधानी में, नहीं नहीं
मास शाही दरयार में ही कोई है ?
प्रताप के पत्र फो पाफर अकयर पहुत ही प्रसन्न हुये,
उन्होंने वारी यारी से यह पत्र अपने सब ही दरयारियों को
दिखलाया । अफयर ने यह पत्र यीकानेर के राजा के छोटे
भाई पृथ्वीराज को भी दिपलाया। यह हम पहले कह चुके
हैं कि पृथ्वीराज अफयर के यहा राजनैतिक यन्दी अवश्य थे,
पर उन्होंने अपना हृदय अफपर को नही घेचा था । अफयर
के दरबार में उनके समान कोई भी स्वदेश भक और स्वजाति
हितैपी नहीं था। प्रताप फा पर अकयर के दिखलाने पर
उन्हें आन्तरिक घेदना हुई यह महाराणा प्रताप में यडी श्रद्धा
और भकिरपते थे, इससे उन्हें महाराणा का पत्र देखकर
अत्यन्त दुख हुआ। प्रथम तो उन्होंने प्रतापसिह के पत्र का
विश्वास ही नही किया फिर विश्वास हो जाने पर उन्होंने
बादशाह से फहा-जहां पनाह ! यह पत्र जाली है, मैं
पुताप को भली भाति जानता हूये कमी भी अधीनता स्वी-
कार करने वाले नहा है । वे आपका राजमुकुट पा जाने पर
मी आपके मन मुताबिक सन्धि मानने को तैयार नहीं होंगे,
सम्भव है, प्रताप के किसी शत्रु ने यह पन भेजा है" । इसके
पोछे उन्होंने अकबर से अनुमति लेकर प्रताप के पास एक
चिट्ठी भेजी, उन्होंने अफवर से चिट्ठी भेजने का कारण,
असली घटना का पता लगाने का यतलाया था किन्तु उनका
भीतरी अभिप्राय यही था कि किसी तरह से पुताप अफवर
की अधीनता स्वीकार न करें। पृथ्वीराज जैसे देशमक थे
१२२ महाराणा प्रताप चैसे ही बड़े भारी कवि थे उन्होंने महाराणा प्रताप के पास भाषा में ओजस्विनी नस २ फड़काने वाली कविता भेजी, जिसका आशय यह है हिन्दुओं का आशा भरोसा सब कुछ हिन्दू जाति पर ही है महाराणा इस समय उस सयको त्यांग देते हैं। राजपूत जाति आज रसातल को जा चुकी है हमारे राजपूत वीरों में आज वीरता नहीं रही। हमारी देवियों में सतीत्व का भाव नही रहा । राजपूत जाति का समी सम्मान आज समाप्त हो चुका । यदि प्रतापसिंह न होते तो आज अकबर धी गुड़ सभी को एक मात्र परीद लेते । यदि पुतापसिंह प्पीराज के पत्र की असली नकल इस समय मिलती नहीं है कई ग्रंथ कारों ने चेष्टा की परन्तु किसी को उपलब्ध नहीं हो सकी हैं जो कुछ पच प्रचलित है उसकी नकल नीचे दी जाती है। सोरठा-अकबर घोर अधार धाण हिन्द भर, जागे जगदातार पोहरे राणा प्रताप सी ॥२॥ अकवारिये हणवार दागिर की, सरी इनी क्षण दागिल असवार गेतक राणा प्रताप मी। अकयर समद भयाह सूरायण मरियो सुजल। मेवाडोतिणमाह पोयण फूल प्रताप सी ॥३॥ भाजही अकबर याही तेजो तिहारों सुरकहा । नमि नमि नसिर याह राण बिना सहराजवी ॥ चौथो चौथो डाह बारी पाजती तणू । दीले मेवाडाह मोशिर राणा प्रताप सी ॥५॥ दोहा--जननीसुत महदाजणे जहडों राणा प्रताप । अकबर श्रुती ही आधक जागा शिराण साप ॥६॥ सोरठा-पाताख पाच प्रमाण साची सांगा हरतणी। रही भमोगत राण भकवर स्वामी मणी ॥७॥ सोचे सह संसार भर पलोले सपरे । जागेतु तिणवार पीहर राणा प्रताप सी141- । य . -
पृथ्वीराज का पत्र
१२३
नाहोते तो वफघर सभी पो एफ पथ के पथिक यना डालते
हमारी जाति में अफपर एफ व्यापारी है, उन्होंने सब को ही
सरोद लिया है. फेवल अमूल्य रत्न उदयकुमार ( प्रतापसिंह)
राफी है। पर केवल उदयसिंह के शूरवीर पुत्र का मूल्य
नहीं चुफा सफे है । मेवाड की गोद में प्रताप फा सा शूरवीर
पुष न होने से आज मुगल समाद अफसर की कुटिल नीति
से सर राजपूत एफ हो जायेंगे । सयों ने ही धीग्ज खाफर *
मोरोजे के बाजार में अपना अपमान देखा है । फेवल हमीर
के पराघरों फोही आज तक यह अपमान नहीं देखना पड़ा
है।या कभी हार के पशधर भी अपने जातीय मान को
इस बाजार में येचेंगे। राणा का रस्य राजधानी तथा सय
कुछ नष्ट हो चुका है परन्तु उनके पास केवल ममूल्य रत्न
माकी है । यह अमूल्य धन उनका जातीय मान और धर्म है
जगत यही पूछता है कि पताप के पास धर्म रक्षा का कौन सा
सहारा है ? किसका भरोसा है यही उत्तर मिलाता है कि
"पुरपार्य और तलवार का" । महाराणा फेवल अपनी तलवार
के सहारे से ही क्षत्रियों के गौरव की रक्षा कर रहे हैं धाजार
का यह परीदार कुछ सदा जीतान रहेगा। एक दिन अपश्य
जाति बाजार के इस खरीदार को ठगा जाना पडेगा । एक
दिन अवश्य ही वह इस लोक से चल बसेगा । उस दिन सब
दो, छुटी हुई जन्मभूमि में राजपूत वीज योने के लिये महाराणा
के पास पाचेगे। तब ही इस पोज की रक्षा होगी। तब ही
राजपूतों की चोरता दूसरी पार उज्ज्वल होगी। इस लिये सय
ही महाराणा की थोर टकटकी लगाये ताक रहे हैं।
मोरोज या रहस्य नयां परिख्छेद में नौरोजा और अपरा के
शीर्षक में देखोखिक
१२४ महाराणा प्रातप पृथ्वीराज के उपर्युक उत्साह जनक वामों से राजपूत जाति में एक विजली सी दौड़ गई, प्रताप और उनके साथियों में नये सिरे से दुगना यल आया । बादशाह को सन्धि विषयक पत्र लिखकर प्रताप को कठोर मानसिक वेदना हुई थी, पृथ्वी- राज के पत्र से उनकी वही दारुण वेदना दुर हुई। वे फिर वीर प्रत पालन करने को समर्थ हुए । पृथ्वीराज के पत्र ने मझधार में पहुची हुई, महाराणा प्रतापसिंह की -नाव को, किनारे लगाया । धन्य है यह देश जहा पृथ्वीराज सरीये फवि हों, “यदि पृथ्वीराज न होते तो न मालूम उस समय राणा प्रताप की कौन गति होती राजपूत जाति के इतिहास में, भारतवर्ष के "राष्ट्रीय इतिहास में पृथ्वीराज का पत्र सदैव स्मरणीय रहेगा । जिस कविता कामिनी ने प्रतापसिह जैसे वीरेन्द्र के हृदय को सान्त्वना और शान्ति दी, वह- कविता कामिनी सदैव भारतवष के इतिहास में स्मरणीय रहेगी पृथ्वीराज जैसे कवियों का जीवन सफल है। वह कवि ही क्या, जो अपने इधते हुए देश और जाति को उठा न सकता हो, तभी तो विलायत के प्रसिद्ध विद्वान् कारलाईल को अपने “हीरोएण्ड हीरो घरशिप" ( वीर और वीरपूजा ) नामक ग्रंथ में कहना पडा है कि इटली डान्टे जैसे कवियों के होने से रूस अपेक्षा विशेष सौभाग्यशाली है, जिस के पास फज्जाक ।९ हैं। एक कविता में एक सेना से कहीं अधिक पल होता पर वह कविता हो, तब न १,स्मरण रक्खो! किसी अगरेज एकाघ, दो कितावों के अनुवाद, करने से ही कोई नहीं हो सकता है। जिसके हृदय है, वही कवि- है हिन्दी र में आज कितने कवि हैं, जिनके हृदय हो। वे एकाध, पो अगरेजी की पुस्तक का अनुवाद करके ही अपने को कवि अमझ फर फूल उठते हैं। उनसे हमारा कहना है कि वे एक . N - - IF
पृथ्वीराज फा पत्र
१२५
बार यूनान के होमर फरिफी पात विचार तो सही, यूनान
का कवि होमर था तो अघा पर अन्धे होने पर भी उसके हृदय
के कपाट खुले हुये थे तव तो यह अन्धा होने पर भी यूनान में
घर घर भीम मागता हुआ अपनी कविता से अपने स्वदेश
माइयों में जागृति फैलाता था। कहो तो सही ? तुममें ऐसे
कितने कवि है ? प्रतिध्वनि फिर पूछती है कि आज होमर जैसे
हिन्दी संसार में कितने कवि हैं? किसी अगरेजी कवि के
पकाघ ग्रथ का टूटा फूटा अनुवाद भले ही कर लो पर भाई !
सथा कवि होना बहुत दूर है ।
महाराणा प्रातप १२४ - पृथ्वीराज के उपर्युक्त उत्साह जनक धामों से राजपूत जाति में एक विजली सी दौड गई, प्रताप और उनके साथियों में नये सिरे से दुगना बल आया। बादशाह को सन्धि विषयक पत्र लिखकर प्रताप को कठोर मानसिक वेदना हुई थी, पृथ्वी- राज के पत्र से उनकी वही दारुण वेदना दूर हुई। वे फिर वीर प्रत पालन करने को समर्थ हुए । पृथ्वीराज के पत्र ने मझधार में पहुची हुई, महाराणा प्रतापसिंह की नाय को, किनारे लगाया । धन्य है वह देश जहा पृथ्वीराज सरीखे , कवि हों, यदि पृथ्वीराज न होते तो न मालूम उस समय राणा प्रताप की कौन गति होती राजपूत जाति के इतिहास में, भारतवर्ष के राष्ट्रीय इतिहास में पृथ्वीराज का पत्र सदैव स्मरणीय रहेगा । जिस कविता कामिनी ने प्रतापसिंह जैसे वीरेन्द्र के हृदय को सान्त्वना और शान्ति दी, वह कविता कामिनी सदैव भारतवर्ष के इतिहास में स्मरणीय रहेगी पृथ्वीराज जैसे कवियों का जीवन सफल है। वह कवि ही क्या, जो अपने इयते हुए देश और जाति को उठा न सकता हो, तभी तो विलायत के प्रसिद्ध विद्वान् कारलाईल को अपने “हीरोएण्ड हीरो वरशिप" ( वीर और वीरपूजा ) नामक प्रय में कहना पडा है कि इटली डान्टे जैसे कवियों के होने से रूस की अपेक्षा विशेष सौभाग्यशाली है, जिस के पास कज्जाक सवार हैं । एक कविता में एक सेना से कहीं अधिक बल होता है, पर वह कविता हो, तव न १ स्मरण रक्खो। किसी अङ्गरेज कवि की एकाध, दो किताबों के अनुवाद करने से ही कोई कवि नही हो सकता है। जिसके हृदय है, वही कवि है हिन्दी संसार में आज कितने कवि हैं, जिनके हृदय हो । वे एकाथ, पो अगरेजी की पुस्तक का अनुवाद करके ही अपने को कवि समझ कर फूल उठते हैं। उनसे हमारा कहना है कि वे एक
बार यूनान
पृथ्वीराज फा पत्र
के होमर फवि फी घात विचार तो सही, यूनान
का कवि होमर था तो अधा पर अन्धे होने पर भी उसके हृदय
के कपाट खुले हुये थे तब तो वह अन्धा होने पर भी यूनान में
घर घर भीख मांगता हुआ अपनी कविता से अपने स्वदेश
माइयों में जागृति फैलाता था। कही तो सही? तुममें ऐसे
कितने कवि है । प्रतिध्वनि फिर पूछती है कि आज होमर जैसे
हिन्दी संसार में कितने कवि हैं? किसी अगरेजी कवि के
एकाध ग्रंथ का टूटा फूटा अनुवाद भले ही कर लो पर भाई:
सथा कवि होना बहुत दूर है।
अठारहवा परिच्छोद भामासाह की अपूर्व सहायता "जो धन के हित नारि त , पति पूत तजै पितु सोलहिं सोई। माई से भाई लरें रिपु से पुनि मित्रता मित्र तजै दुख जोई। ता धन को यनिया है, गिन्यौ न दियो दुख देश से भारत होई। खारय अर्थ तुम्हारोई है, तुमरे सम और न या जग सोई"। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पृथ्वीराज के पत्र को पाकर प्रताप उत्साहित हुये, चे दुगने उत्साह से अपनी पूर्व प्रतिक्षा को स्थिर रखने के लिये उद्यत हुये । उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार न करने के लिये पुनः प्रतिज्ञा की परन्तु यह सब कुछ होने पर भी प्रताप के पास उस समय अपनी प्रतिक्षा को पूर्ण करने को यया रक्या हुआ था ? लगातार अठारह वर्ष के युद्ध के कारण चे धन बल, जन वल सब तरह से क्षीण हो चुके थे? प्रवल शत्रु, मुगल सम्राट अकबर से लड़ते लडते उनकी सारी शक्ति नष्ट हो चुकी थी, अकबर को भी इन लगातार युद्धों में थोडी, बहुत अवश्य हानि सहन करनी पड़ी परन्तु फिर भी अकबर को बहुत सा सहारा था। उसका राज्य धन धान्य परिपूर्ण था, उसके राजकोप में उनका अभाव न था, अकबर की सेना को चित्तौड़ पहुचते समय जो हानि सहन करनी पडती थी वह राजधानी दिल्ली पहुच जाने पर पूर्ण हो जाती थी, परन्तु प्रताप के पास कुछ नहीं था, उनकी अकयर से भिन्न दशा थी। मेवाड के वे राजराजेश्वर, नरनाथ, दीन हीन पथ के मिसारी @ मूळ कविता में देश के स्थान में "मीत शब्द है। ।
भामाशाह को अपूर्व सहायता यने हुये थे। उनको दोनों समय सूखी रोटी साने को और रात्रि में आराम से सोने को भी कहीं ठिकाना न था, बहुत से उनके साथी वीर रणस्थल में मेवाड की रक्षा के लिये सदैव को सो गये । बहुत से सैनिक साथ छोड कर चलते बने, उनके साथ केवल रेइने गिने चीर थे, जिन्होंने चित्तौड के उद्धार की महाराणा के साथ कठोर प्रतिज्ञा की थी । धन हीन जनक्षीण प्रतापसिंह अपने घेरी का मुकाबिला किस तरह से कर सकते थे? महाराणा अपनी जन्मभूमि की दुर्दशा के कारण दुगी ही थे यहुन सोच विचार के पीछे उन्होंने निश्चय किया कि जब राजधानी चित्तोड का परित्याग कर दिया, तव जन्म भर के लिये मेवाड भूमि को ही छोड देना चाहिये । निश्चय हुआ कि अर्यली पर्यत पार करके सिन्ध नदी के किनारे सोगदी राज्य में जाकर यसे । वहा मेवाड का झण्डा गाडें । बस यह निश्चय करते ही उन्होंने अपने गुप्तचरों द्वारा यास मास सरदारों को यर भेज दी, इस खबर को पाते ही दूर दूर से राजपूत गण प्रतापसिंह की रक पताका के नीचे इकट्ठे होने लगे। यात्रा को सवही आवश्यक तैयारिया हो चुकी, मातृभूमि को अन्तिम प्रणाम करने का समय आ पहुचा। प्रतापसिंह अपनी स्रो, पुत्र, पुत्रिया और कुछ सरदारों साथ अवली पर्वत की चोटी पर चढ़े, वहा से उन्होंने नपने प्यारे चित्तौड का दर्शन किया, चित्तौड को देखते हो उनके हृदय में अनेक प्रकार की भावनाएं उठने लगी। उदय से शोकमरी लम्बी स्वासे सींचने लगे, उस समय उनके दय में निगशा की तरङ्ग उठ रही थी ये सोचने लगे कि इस न्म में मातृभूमि मेवाड का उद्धार न हो सकेगा। इस तरह वे निराशा और निन्ना से व्यथित हृदय होकर के - भ महाराणा प्रताप पर्वत से पार होकर माडवाह भूमि में पहुंचे और अपनी जन्मभूमि को सदैव के लिये प्रणाम किया। किन्तु ईश्वर की भाया अपरम्पार है, मर्नुप्य का चाहा हुमा कुछ नहीं होता। उसकी गति कौन रोक सकता है, प्रताप को जो कुछ दुःख था, वह मेवाड भर के सच ही मनुष्यों को था। प्रताप अपनी मातृभूमि को केवल परमात्मा से मुक्त न कराने के कारण हो छोड़ने को तैयार हुए थे, तब कौन ऐसा। अमांगा था जो इस प्रत में सहायता न देता ? मातृभूमि-किस को प्यारी नहीं होती। छोटी सी बनास नदी ने जिस प्रकार नाचते, कूदत,. लुढ़कते पुढकते अर्चलो के पहाडी भाग की शोभा बढा रक्खी है, चैसेही मात्मोत्सर्ग रूपी क्षीर धारा ने भी मेवाड के, वीरों के कठोर व्रत को अमृतमय बना दिया है । आत्मोत्सर्ग करने घाले जिन महापुरुषों का नाम मेवाड़ के इतिहास में आना, है, उनमें से एक मामासाह भो हैं । भामासाह प्रताप के मंत्री थे। जिस समय प्रताप तथा उनके कुछ साथी स्वजन तथा इष्ट मित्रों से मिलकर चलने लगे उस समय मेवाड के प्राचीन मन्त्री भामासाह भी उनसे मिलने आये उस समय दीनभाव से प्रताप को स्वदेश परित्याग, करते देखकर ,मामासाह का द्य भर आया वह मन्त्री प्रवर अपने स्वामी की हीन देगा देखकर रोने लगा उसने अपने स्वामी को मेवाड के राज- सिहासन पर पुन प्रतिष्ठित करने के लिये अलौकिक आत्मा- सर्ग का परिचय दिया । उसने न केवल अपने समय का ही उपार्जित धन फिन्तु अपने पूर्व पुरसो का समस्त सञ्चित धन अपने स्वामी मेवाडेश्वर के पद पङ्कज पर रख दिया । और विनती की शिनाथ आप इस देशको छोडकर न जाय, इस देश का उद्धार कीजिये। मताप और उनके परिवार वर्ग ,
मामासाए को मपूपं सहायता
१२६
मामासाह का यह एत्य देगफर चकित और स्तम्भित हो गये,
पनाप के साथियों के उदास चेहरे पर हसी को रेसा दिस
लाई पड़ने लगी । प्रताप यो शिविर में से "जयमामासाह फी
अप" ध्यान से चारों दिशा गूजने लगीं। उसी दिन से मामा.
साइ मेयाड फे उमार पास कहलाये जाने लगे।
पृश्योराज 'फे पर और मामासाह के अलौफिक आत्मो
मग ने मरी हुई राजपूत जाति के लिये सम्जीवनी शक्ति का
कार्य किया । जो राजपूत वीर निराश हो चुके थे। उनके
हृदय में आशा कात्रीत यहने लगा । धीरेन्द्र प्रताप का साहस
पहले से और भी धुगा हो गया। कहते हैं कि भामासाह का
इतना धन या फि उससे पच्चीस हजार धीरों का बारह वर्ष
तक निर्वाह अच्छी तरह से हो सकता था। भामाशाह से
धन को सहायता पाकर वीरेन्द्र प्रताप फिर अपनी पतिक्षा
पूरी करने की चेष्टा करने लगे। धन के अभायें से जो
सिपाही विदाफर दिये गये थे। उनकी फिर लगाया गया
युर के लिये हथियार वगैर सामग्री इकट्ठी की गई । राजपूत
सेना के लिये नये घोडो सरोदे गये । सेना की यह सबै
नस्यारी इतनी छिपाकर की गई कि मुगल सम्राट अफवर और
उनकी सेना को इसका कुछ पता भी नहीं लगी।
૧૨૮ महाराणा प्रताप । पर्वत से, पार होकर माडवाड भूमि में पहुचे और अपनी जन्मभूमि को सदैव के लिये प्रणाम किया। किन्तु ईश्वर की माया अपरम्पार है, मनुष्य का चाहा हुआ कुछ नहीं होता। उसको गति कौन रोक सकता है, प्रताप को जो कुछ दुःख था; वह मेवाड भर के सव ही मनुष्यों को था । प्रताप अपनी मातृभूमि को केवल परमात्मा से मुक्त न कराने के कारण ही छोडने को तैयार हुए थे, तब कौन ऐसा अभागा था जो इस प्रत में सहायता न देता? मातृभूमि-किस फो प्यारी नहीं होती। छोटी सी बनास नदी ने जिस प्रकार नाचते, कूदते, लुढकते पुढकते अर्वलो के पहाडी भाग की शोभा बढा रक्खी है, वैसेही आत्मोत्सर्ग रूपी क्षीर धारा ने भी, मेवाड के वीरों के कठोर व्रत को अमृतमय बना दिया है। आत्मोत्सर्ग करने घाले जिन महापुरुपो का नाम मेवाड के इतिहास में आता. है, उनमें से एक भामासाह भो हैं । भामासाह प्रताप मंत्री थे। जिस समय प्रताप तथा उनके कुछ साथी वजन तथा इष्ट मित्रों से मिलकर चलने लगे उस समय मेवाड के प्राचीन मन्त्री मामासाह भी उनसे मिलने आये उस समय दीनभाव से प्रताप को स्वदेश परित्याग , करते देखकर भामासाह का हृदय भर आया वह मन्त्री प्रवर अपने स्वामी की हीन दशा देखकर रोने लगा उसने अपने स्वामी को मेनाड, के राज- सिहासन पर पुन प्रतिष्ठित करने के लिये अलौकिक आत्मो- त्सर्ग का परिचय दिना । उसने न केवल अपने समय का हो उपार्जित धन फिन्तु अपने पूर्व पुरखों का समस्त सहित धन अपने खामी. मेवाडेश्वर के पद पङ्कज पर रख दिया । यौर विशवी की शिनाथ ' माप इस देशको छोड़फर न जाय, इस देश फाउझार कीजिये। प्रताप और उनके परिवार वर्ग - 4 44
मामासाह को अपूर्व सहायता
१२६
मामासाह का यह एज्य देखकर चकित भोर स्तम्भित हो गये,
पताप के साथियों के उदास चेहरे पर हसी को रेगा दिस.
लाई पड़ने लगी। पताप के शिविर में से "जयमामासाह की
उप" भनि से चारों दिशा गूजने लगीं। उसी दिन से भामा.
साह मेवाड के उदार फर्ता फहलाये जाने लगे।
पृथ्वीराज के पत्र और मामासाह के अलौकिक आत्मो
रसर्ग ने मरी हुई राजपूत जाति के लिये सन्जीवनी शक्ति का
कार्य किया । जो राजपूत घोर निराश हो चुके थे। उनके
दय में भाशा फा नोत यहने लगा। घोरेन्द्र प्रताप का साहस
पाले से और भी दुगना हो गया। कहते हैं कि भामोसाह का
इतना धन था फि उससे पच्चीस हजार धीरों का यारह वर्ष
तक निर्याह अच्छी तरह से हो सकता था। भामासाह से
धन की सहायता पाकर धीरेन्द्र प्रताप फिर अपनी पतिशा
"पूरी करने की चेष्टा करने लगे | धन के अभाव से जो
'सिपाही चिदाफर दिये गये थे। उनको फिर घुलवाया गया
'युद्ध के लिये हथियार बगैर सामग्री इकट्ठी की गई । राजपूत
सेना के लिये नये घाँडो सरीदें गये । सेना की यह सब
तग्यारी इतनी छिपाकर की गई कि मुगल सम्राट अवर और
'उनकी सेना को इसका कुछ पता भी नहीं लगा।
+
-
.
.
.
उन्नासवा पारच्छद
मेवाड़ विजय
"चली चलौ सब धीर आजु मेवार उमारें।
महेो आज या पुण्य भूमि से शत्रु 'निकारें।
चिर स्वतन्त्र यह भूमि यवन कर सो उद्धार ।
हिन्दू नामहि थापि,धर्म परिगनहि पछारें।
नम मेदि आजु मेवाड पै उडै शिशोदिया कुल ध्वजा ।
जा शीतल छाया तरे रहे सदा सुख सो पुजा ।
श्री राधाकृष्णदास
सेना का सब सामान इकट्ठा करके प्रताप स्वदेश उद्धार
के लिये चले । इस वार वीरेन्द्र प्रताप ने एक और भी कठोर
पुतिहा की। उनकी प्रतिक्षा थी कि,यदि देश का उद्धार नहीं
कर सकेंगे तो आत्मघात, करके अपनी जीवन लीला समाप्त
कर देंगे। इधर पुताप की ऐसी कठोर पतिशा थी उधर मुगल
शाहबाज खा देवीर नामक स्थान में पडाच डाले हुए था। वह
राजपूतों की ओर से बिलकुल निश्चिन्त था । वह महाराणा
का मेवाड छोड़ कर जाना सुनकर अनेक प्रकार के मनमोदक
बांध रहा था । वह समझे हुये था कि उसका मार्ग बिलकुल
काटो से साफ होजावेगा। परन्तुथोडेही दिनों पीछे शाहबाज खा
को अपनी भूल भात हुई। एक दिन पुताप की सेना ने अकस्मात्
शाहबाज खाँ की सेना पर आक्रमण किया। मुगल सेना पुताप
के आकस्मिक आक्रमण को सहन करने में समर्थ नहीं हो
सकी, यह मैदान छोड़कर भाग गई। जिस तरह से हिमालय
के शिखर से निकलती गंगाजी का ऊपर ले जाना असम्भव है
मेवाड विजय से ही उस समय राजपूत वीरों का उत्साह रोकना असम्भव धा। राजपूत धीरों ने भागते हुए मुगल सैनिकों का पीछा किया और मुगल सेना को बिलकुल नष्ट कर दिया मुगल सेना प्रताप को दल यल सहित कैद करने की चेष्टा करने लगी - पर प्रताप के सामने मुगल सेना की कुछ न चलो । उनकी सेना ने मुसलमानों का पीछा मामेट तक किया राजपूत धोरों ने आमेट के मुसलमान गढ रक्षकों को काट डाला। पीछे कुम्म- लमेर पर धावा मारा मुगल सेना यहाँ हार गई विजय लक्ष्मी ने राजपूत चारों को वरमाल पहनाई । कुम्भलमेर किले का मुसलमान किलेदार अबदुल्लासा भो मारा गया उसकी समस्त सेना मारी गई। सफलता उद्योग की दासी है। परमात्मा भी उसो की सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करते हैं। राणा प्रताप का उद्योग सफल हुआ। थोड़े ही दिनों में ३२ किले उन्होंने मुसलमानों से छीन लिये एक वर्ष अर्थात्, सन् १५८६६० के भीतर ही भीतर उन्होंने चिचौड उदयपुर और मोडलगढ को छोड.सारा मेवाड़ अपने हस्तगत कर लिया। आवेर (जयपुर) के मानसिह के वाणिज्य स्थल मालपुर को टूटकर उन्होंने मानसिह को भी शिक्षा दी थी। एफ समय प्रताप ने चित्तौड़ के उद्धार करने के कठिन व्रत में अपने देश भाइयों की बस्ती उजाड़ डाली थी, दूसरी बार अपने प्रबल शत्रुओं के खून में तलयार रख कर मेवाड़ भूमि एमशान भूमि चना दी। राजपूत वीरों के साहस और पराक्रम से घयदा फर सलमान सेना ने उदयपुर छोड देना ही गनीमत समझा। ससे उदयपुर भी प्रताप के हाथ लग गया । वादशाह अफयर को इस तरह अपने हाथ से मेवाड निकल जाने पर अत्यन्त शोक कुमा। फिर उसने मेघाड़ लेने की भाशा नहीं की .
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ܙ
उन्नीसवां परिच्छेद
मेवाड़ विजय
"चलो चलो सब वीर आजु मेवार उबारें।
महो आज या पुण्य भूमि से शत्रु निकाएँ।
चिर खतन्त्र यह भूमि यवन कर,सों उधारें।
हिन्दू नामहि थापि,धर्म अरिगनहि पछारें।
नम मेदि आजु मेवाड पै उडै शिशोदिया कुल ध्वजा.।
जा शीतल छाया तरे,रहै सदा सुख सो पुजा ।
श्री राधाकृषपदास
सेना का सब सामान इकट्ठा करके पुताप खदेश उद्धार
के लिये चले। इस चार वीरेन्द्र प्रताप ने एक और भी कठोर
पुतिक्षा की । उनकी प्रतिक्षा थी कि यदि देश का उद्धार नहीं
कर सकेंगे तो आत्मघात, करके अपनी जीवन लीला समास
कर देंगे। इधर पुताप की ऐसी कठोर पूतिशा थी उधर मुग़ल
शाहबाज खा देवीर नामक स्थान में पडाव डाले हुए था। वह
राजपूतों की ओर से विलकुल निश्चिन्त था । वह महाराणा
का मेवाड छोड कर जाना सुनकर अनेक प्रकार के मनमोदक
बांध रहा था। वह समझे हुये था कि उसका मार्ग बिलकुल
कांटो से साफ होजावेगा । परन्तुथोडेही दिनोंपीछे शाहबाज खा
को अपनी भूल ज्ञात हुई। एक दिन पुताप की सेना ने अकस्मात्
शाहबाज़ खाँ की सेना पर आक्रमण किया। मुगल सेना प्रताप
के आकस्मिक आक्रमण को सहन करने में समर्थ नहीं हो।
सकी, वह मैदान छोड़कर भाग गई। जिस तरह से हिमालय ।
के शिखर से निकलती गंगा जी का ऊपर ले जाना असम्भव है।
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मेवार विजय ३ पैसे ही उस समय राजपूत वीरों का उत्साह रोकना असम्भव था ।राजपूत चोरों ने भागते हुए मुगल सैनिकों का पीछा किया और मुगल सेना को बिलकुल नष्ट कर दिया मुगल सेना प्रताप का दल पल सहित फैद करने की चेष्टा करने लगी पर प्रताप के सामने मुगल सेना फी कुछ न वली । उनकी सेना ने मुसलमानों का पीछा आमेट तक किया राजपूत धीरों मे आमेट के मुसलमान गद रक्षकों को काट डाला। पीछे कुम्मा लमेर पर धावा मारा मुगल सेना यहाँ हार गई विजय लक्ष्मी में राजपूत धारों को परमाल पहनाई । कुम्भलमेर किले का मुसलमान फिलेदार अयदुखापा भो मारा गया उसको समस्त सेना मारी गई। सफलता उद्योग की दासी है। परमात्मा भी उसो को सहायता करते हैं जो अपनी सहायता भाप करते हैं। राणा प्रताप का उद्योग सफल हुआ। थोड़े ही दिनों में ३२ फिले उन्होंने मुसलमानों से छोन लिये यक धष अर्थात् सन् १५८६ ६० के भीतर ही भीतर उन्होंने चित्तौड उदयपुर और मोदलगढ़ को छोड सारा मेवाड़ अपने हस्तगत कर लिया। मायर (जयपुर) के मानसिह के वाणिज्य स्थल मालपुर को लूटकर उन्होंने मानसिंह को भी शिक्षा दी थी। एक समय प्रताप ने चित्तौड़ के उमार करने के कठिन प्रत में अपने देश भाइयों को यस्तो उजाड डाली थी, दूसरी बार अपने प्रान- शत्रुओं के खून में तलवार रङ्ग कर मेराड़ भूमि शमशान चना दी। राजपूत धीरों के साहस और पराक्रम से मुसलमान सेना ने उदयपुर छोड देना ही गनी इससे उदयपुर भी प्रताप के हाथ लग गया। को इस तरद अपने हाथ से शोकमा। फिर उसने । : निकल जाने। प्रांगा
महाराणा प्रताप
कि उसाको मेवाड की पहली विजय ही बहुत महंगी पड़ी थी।
कार:कोई इतिहास लेखक काहते हैं कि,प्रताप का, साहस
वारत्व और उद्योग देख कर अकवर का मन पिघल गया भोर
भाक,में डूबकर यह उनको अधिक कष्ट न दे सका। हम एस
कहने वालों के साथ कदापि सहमत नहा हा सकते है । मला
जिस अकवर, का हल्दीघाटी म चौदह हजार राजपूतों का
रक यह देखकर हृदय नहा पिघला उसका अब हृदय क्यों
पिघलने लगा है। कोई भी विचारशील मनुष्य अकबर के
हदय पिघलन पर नहा विश्वास कर सकता है। अकबर
के हृदय पिघलने के विषय में कहना, चण्डू खाने की गप्पासे
कुछ कम नहीं है । यदि थोड़ी दर क, लिये मान, भी लंक
अकबर का हृदय पिघल भा गया था, ता अकबर का यह
पिघलना वैसा ही था, जैसा इस यूरापायन, महाभारताम रूस
का पोलेण्ड को स्वराज्य दना है जब बड़े बड़े राष्ट्रों का कुछ।
घश नही चलता है तब व अपनो इजत आवरू.,रखने कालय
ऐसी ही लाचारी उदारता दिखलात ह, जसी,इस समयास ने
पोलण्ड क पोत दिसलाया ह । सम्भव है, अकबर का भा
कुछ एसी हो नीति दूसरा वार में मवाड़ पर आक्रमण करन,
म हो, कम से कम यह तो हातहास के प्रत्येक निष्पक्षपातो.
मकवर का हृदय पिघलना असम्भव था क्योंकि Badount, Val,
11.p 240 में "सपकाते अरुयरी" के आधार पर लिया हुआ है। "वस
समय मानसिद के अधीन, मुगल सेना प्रताप, का राज्य सूटना चाहता था
पर मानसिंह ने मने कर दिया। इस पर अकबर ने कुछ दिना क लिय दरार
दारी रोक दी थी,, Illiots History of india vol. 2 40 म Mar
भा है कि मुसलमान सेनापति,भामफखा को मो इस तरह संबादसारका
सोपान बनना पड़ामा)
मेवाड विजय
विद्यार्थी को मानना पडेगा कि लगातार के चाईस वर्ष के यु
है अकवर की भासे खोल दी थी कि मेवाड के राजपूत वी
हज में ही मरने वाले नही है । मेयाड को निजय में उसके
कि बहुत नष्ट होनी है।
1
बीसवाँ परिच्छेद
जीवन सन्ध्या और अन्तिम शन्देश
"रामराम कहि राम कह, राम राम कहि राम ।
राम, राम रामहिं रटत, राव गये सुरधाम"
तुलसीदास
।
"जननी अब जन्मभूमि को बढ़ प्राणहु ते देख ।
इनकी रक्षा के लिये प्राण न कछु अवरेस" ।
मेवाड का उद्धार हुआ उदयपुर भी हाथ में आगया पर
चित्तौड का उद्धार न हो सका जिस चित्तौडगढ़ उद्धार के लिये
कठिन प्रतिक्षा की थी उस चित्तौड़गढ़ से अभी तक मुसलमान
दूर नहीं हुये । हाय ! जन्मभूमि चित्तौड अभी तक मुगलों के
हस्तगत है । यह दारुण-वेदना महाराणा प्रतापसिद को दूर न
हुई । चित्तौड़ की दुर्दशा देखकर और उसके पूर्व गौरव को
स्मरण करके, प्रताप का मानसिक कष्ट दूर नहीं हुआ । अनेक
मापदा, विपदाओं के झेलने और रातदिन चिन्ता रूपी
सर्पिणी के उसने से उनका अन्तिम समय मान पहुचा संघद
१६५३ में प्रताप का अपूर्ण चय में ही देहान्त हो गया।
इस संसार से चलते समय भी प्रताप के हृदय से
चित्तौडगढ़ की दुर्दशा दूर नहीं हुई उस समय उनके
माण पखेरु को बडी फोर वेदना हुई । उस समय राजर्षि
प्रतापसिंह तृण की शय्या पर अपना कुटी में लेटे हुये थे
उनके चारों मोर नामी नामी सरदार जमा थे, सब चुपचाप
थे, किसी के मुंह से एक मक्षर भी नहीं निकलता था,
जीवन सन्ध्या और अन्तिम सन्देश
सभी व्यथित हृदय होकर महाराणा के अन्तिम वर्शन कर
रहे थे। महाराणा का अन्तिम कष्ट देखकर चन्द्रावत् सरदार
ने बडे कोमल शब्दों में पूछा- अन्नदाता जी। इस समय
ऐसा कौन सा फष्ट है, जो श्रीमान को विश्राम नहीं करने
देता। इस पर वीरेन्द्र प्रताप ने सदैव की मांति उत्तर
दिया:-मुगलों के हाथ में मेवाड भूमि न जाने पावेगी, यह
प्रतिक्षा सुनने पर ही शान्ति के साथ प्राणत्याग करूगा ।
इसके कुछ देर पीछे महाराणा प्रतापसिंह ने कहा -पीछोला
तालाब के किनारे पर विपत्ति के समय वर्षा और धूप से
धचने के लिये कुछ झोपड़ियां धनाई गई थीं उनमें से एक
दिन अमरसिंह बाहर निकल रहा था कि छप्पर के यास में
उसकी पगडी उलझ गई, इससे वह दुखित और कोधित
दुआ, इस यात को देखकर मैंने निश्चय कर लिया कि जन्म
भूमि की रक्षा के लिये, स्वदेश के गौरव को खिर रखने के
लिये जो जो कष्ट सहन करने होते हैं उन्हें अमरसिंह
सहन नहीं कर सकेगा। इसके रहने के लिये सुन्दर बडे बड़े
महल चाहिये जब सुख पाने की इच्छा हुई, तय सुप में
पडकर कौन स्वदेश रक्षा कर सकता है । जिस मातृभूमि के
गौरव की रक्षा के लिये, हमारे हजारों राजपूत चोरों ने रक
बहाया था, वह मातृभूमि का गोर यों ही विलीन हो जायगा।
उस समय हाय ! तुम लोग भी प्रण को भूलकर भोग बिला
सता में फंस जाओगे तब कैसे शान्ति पूर्वक प्राणों
विसर्जन करू।
यह कहकर राजर्षि प्रताप क्रोध और 'आवेश में
शय्या से उठ बैठे सरदारों ने विनय पूर्षक शैय्या पर
सलूम्रा राव तथा सव सरदारों ने प्रतक्षिा को
बाप्पारावल के राजसिंहासन को छकर प्रतिहा।
-
।
बीसवाँ परिच्छेद
जीवन सन्ध्या और अन्तिम सन्देश
"राम राम कहि राम कह, राम राम कहि राम ।
राम, राम रामहिं रेटत, राच गये सुरधाम
-
तुलसीदास
1
।
"जननी अर जन्मभूमि को बढ प्राणहु ते देख |
इनकी रक्षा के लिये प्राण न कछु अवरेख"।
"मेवाड का उद्धार हुआ उदयपुर भी हाथ में आगया पर
चित्तौड का उद्धार न हो सका जिस चित्तौडगढ उद्धार के लिये
फठिन प्रतिक्षा की थी उस चित्तौड़गढ से अभी तक मुसलमान
दूर नहीं हुये । हाय । जन्मभूमि चित्तौड अभी तक मुगलों के
हस्तगत है । यह दारुण-वेदना महाराणा प्रतापसिह को दूर न
हुई। चितौड़ की दुर्दशा देखकर और उसके पूर्व गौरव को
स्मरण करके, प्रताप का मानसिक कष्ट दूर नहीं हुमा । अनेक
आपदा, विपदाओं के झेलने और रातदिन चिन्ता रूपी
सर्पिणो के डसने से उनका अन्तिम समय आन पहुचा संवत्
१६५३ में प्रताप का अपूर्ण वय में ही देहान्त हो गया।
इस संसार से चलते समय भी 'प्रताप के हदय से
चित्तौडगढ़ की दुर्दशा दूर नहीं हुई उस समय उनके
प्राण पखेरू को बड़ी कठोर वेदना हुई। उस समय राजर्षि
प्रतापसिंह तृण की शय्या पर, अपना कुटी में लेटे हुये थे
उनके चारों मोर नामी नामी सरदार जमा थे, सब चुपचाप
थे, किसी के मुंद से एक अक्षर भी नहीं निकलता था,
जीवन सन्ध्या और अन्तिम सन्देश । समी व्यथित हृदय होकर महाराणा के अन्तिम दर्शन कर रहे थे। महाराणा का अन्तिम कष्ट देखकर चन्द्रावत् सरदार ने बडे कोमल शब्दों में पूछा'-अन्नदाता जी! इस समय ऐसा कौन सा कष्ट है, जो श्रीमान को विश्राम नहीं करने देता । इस पर वीरेन्द्र प्रताप ने सदैव की भांति, उत्तर दिया:-मुग़लों के हाथ में मेवाड भूमि न जाने पावेगी, यह प्रतिक्षा सुनने पर ही शान्ति के साथ प्राणत्याग, फरूगा। इसके कुछ देर पीछे महाराणा प्रतापसिंह ने कहा -पीछोला तालाब के किनारे पर विपत्ति के समय वर्षा और धूप से, बचने के लिये कुछ झोपडियां धनाई गई थीं उनमें से एक दिन अमरसिंह थाहर निकल रहा था कि छप्पर के बास में उसकी पगड़ी उलझ गई, इससे यह दुखित और कोधित हुमा, इस यात को देखकर मैंने निश्चय कर लिया कि जन्म भूमि की रक्षा के लिये, स्वदेश के गौरव को खिर रखने के लिये जो जो कष्ट सहन करने होते हैं उन्हें अमरसिंह सहन नहीं कर सकेगा। इसके रहने के लिये सुन्दर बडे बडे महल चाहिये जय सुस पाने की इच्छा हुई, तब सुख में पडकर कोन स्वदेश रक्षा कर सकता है । जिस मातृभूमि के गौरव को रक्षा के लिये, हमारे हजारों राजपूत वीरों ने रत बहाया था, वह मातृभूमि का गौरव यो हो विलीन हो जायगा। उस समय हाय ! तुम लोग भी प्रण को भूलकर भोग विला. सता में फस जाओगे तब कैसे शान्ति पूर्वक, प्रोणों का यह कहकर राजर्षि प्रताप क्रोध और आवेश में आकर शय्या से उठ बैठे सरदारों ने विनय पूर्वक संलूंगा राव तथा सब सरदारों ने प्रतक्षिा पाप्पारावल के राजसिंहासन को इकर विसर्जन करू । - -
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बीसवाँ परिच्छेद
जीवन सन्ध्या और अन्तिम सन्देश
"रामराम कहि राम कह, राम राम कहि राम ।
राम, राम रामहिं रटत, राव गये सुरधाम"।
तुलसीदास
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"जननी अरु जन्मभूमि को बढ़ प्राणहु ते देख ।
इनकी रक्षा के लिये प्राण न कछु अवरेख" ।
मेवाड का उद्धार हुआ उदयपुर भी हाथ में आगया पर
चित्तौड का उद्धार न हो सका जिस चित्तौडगढ उद्धार के लिये
कठिन प्रतिज्ञा की थी उस चित्तौडगढ से अभी तक मुसलमान
दूर नहीं हुये । हाय ! जन्मभूमि चित्तौड अभी तक मुगलों के
हस्तंगत है । यह दारुण-वेदना महाराणा प्रतापसिह को दूरन
हुई। चित्तौड़ की दुर्दशा देखकर और उसके पूर्व गौरव को
स्मरण करके, प्रताप का मानसिक कए दूर नहीं हुआ। अनेक
आपदा, विपदाओं के झेलने और रातदिन चिन्ता केपी
सर्पिणी के डसने से उनका अन्तिम समय आन पहुंचा सवद
१६५३ में प्रताप का अपूर्ण वय में ही देहान्त हो गया।
इस संसार से चलते समय भी प्रताप के हृदय से
चित्तौड़गढ़ की दुर्दशा दूर नहीं हुई उस समय उनके
प्राण पखेरू को बडी कठोर वेदना हुई। उस समय राजर्षि
प्रतापसिंह तृण की शय्या पर, अपनो कुटी में लेटे हुये थे
उनके चारों ओर नामी नामी सरदार जमा थे, सब चुपचाप
थे, किसी के मन से एफ अक्षर भी नहीं निकलतामा
र
जीवन सन्ध्या और अन्तिम सन्देश समी व्यथित हृदय होकर महाराणा के अन्तिम दर्शन कर रहे थे। महाराणा का अन्तिम कष्ट देखकर चन्द्रावत् सरदार ने पड़े कोमल शब्दों में पूछा'-अन्नदाता जी! इस समय ऐसा कौन सा कष्ट है, जो श्रीमान को विश्राम नहीं करने देवा । इस पर वीरेन्द्र प्रताप ने सदैव की भांति, दिया:-मुगलों के हाथ में मेवाड भूमि न जाने पावेगी, यह प्रतिहा सुनने पर ही शान्ति के साथ प्राणत्याग करूंगा। इसके कुछ देर पोछे महाराणा प्रतापसिंह ने कहा:-पीछोला तालाब के किनारे पर विपत्ति के समय वर्षा और धूप बचने के लिये कुछ झोपड़ियाँ बनाई गई थीं उनमें से एक दिन अमरसिंह बाहर निकल रहा था कि छप्पर. के.वास में उसको पगडी उलझ गई, इससे वह दुखित और क्रोधित इमा, इस बात को देखकर मैंने निश्चय कर लिया कि जन्म- भूमि की रक्षा के लिये, स्वदेश के गौरव को सिर रखने के लिये जो जो कष्ट सहन करने होते हैं उन्हें अमरसिंह सहन नहीं कर सकेगा। इसके रहने के लिये सुन्दर बड़े बड़े महल चाहिये जब सुख पाने की इच्छा हुई, तय सुख में पढ़कर कौन स्वदेश रक्षा कर सकता है । जिस मातृभूमि के . . गौरव की रक्षा के लिये, हमारे हजारों राजपूत चोरों ने रक्त महाया था, वह मादभूमि का गोरख यो हो पिलीन हो जायगा। सर समय हाय ! नम लोग मी प्रण को भूलकर भोग बिला. मला में फस जामोगे ता कैसे शान्ति पूर्वक प्राणों, पह कहकर राजर्षि प्रताप क्रोध और आवेश में राणा से उठ बैठे सरदारों ने बिनय पूर्वक अग्यो महाराष तपा सष सरदारों में प्रतक्षिा की भार के सिंहासन को छूकर प्रनिता विमर्जन करून पर
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