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Rajasthan Ke Kahanikar
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राजस्थान के कहानीकार (हिन्दी) दूसरा भाग
राजस्थान साहित्य परिचय मालान्तर्गत
प्रकाशक
राजस्थान माहित्य अकादमी, उदयपुर
मुद्रक
: श्री महावीर प्रिन्टिग प्रेम, हापीपोल बाहर, उदयपुर
प्रथम संस्करण : दिसम्बर 1977 ई०
.
मूल्प
: बारह रूपये
BAJASTIAN KE KAISANIKAR ( Illodi) Part II
ENT:Dr.AIsshah Khan
राजस्थान के कहानीकार (हिन्दी)
दुसरा भाग
.
मम्पादक-डॉ० मालमशाह खान
यादवेन्द्र शर्मा 're' / आलमशाह खान / हेतु भारद्वाज /
रामदेव आचार्य / भर मेवाड़ी / राजानन्द |
योगेन्द्र किसलय / शशिकांत गोस्वामी।
राम जैसवाल । ३२वरचन्दर ।
हबीब काफी । शचीन्द्र उपाध्याय । स्वयंप्रकाश /
भागि मधुकर
0.
राजस्थान - साहित्य • अकादमी, उदयपुर
प्रकाशकीय
सन् १९६१ में राजस्थान के ३६ कहानीकारों
की कहानियों का सकलन अकादमी ने प्रकाशित
किया था।
तव से प्रवतक जिन्दगी में कितने बदलाव-ठहराव
प्राए है, मानवीय मूल्यों में कैसे क्रान्तिकारी
परिवर्तन हुए हैं, यह सब कुछ साहित्य-निधि मे
लिपिबद्ध है।
इस दौरान के १४ कहानीकारों की कहानियाँ
इस संकलन मे प्रस्तुत हैं। मुझे विश्वास है
कि ये कहानियाँ जीवन के विविध आयामों का
परिचय तो देंगी ही साथ ही कहानी की अधुना-
तन स्थिति का भी बोध करायेंगी।
उदयपुर
दिनांक 1977 ई.
राजेन्द्र शर्मा
निदेशक
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औपचारिकता के बहाने कहानी. पर बातचीत : एक अधूरा सिलसिला राजस्थान के कहानीकारो को एकदम अलग पहचान बनाने की गरज से यह संकलन सामने नहीं लाया जा रहा बल्कि महज यह जांचने परखने के लिए कि एक घर-परिवार के लोग हिन्दी-कहानी के विराट व्यक्तित्व के अंकन मे किस रेख रंग के पालोक को उजागर किया नाहते है ? क्या उनके संवेदन-सवेग, शिल्प- संकेत और वैचारिक ऊर्जा के अनुभव स्रोत वे ही है जो समूचे साहित्य जगत में पाज मूर्त हो रहे हैं या फिर वे किसी दूसरी ही जमीन को काट रहे हैं ? वस्तुत. समान राष्ट्रीय फलक पर बीने वाले साहित्यकार की सवेदना को मूर्त, करने वाले रग-रेख तो भिन्न हो सकते हैं किन्तु उनका यथार्थ, यथार्थ से पाया गया अर्थ-बोध, अर्थ-बांध से बने विचार विचार से बने निर्णय, निर्णय से जनमो मानसिकता, और मानसिकता के प्राग्रह से उपजी क्रान्तिमिता भिन्न नहीं हो सकती। आज भारत के विभिन्न अंचलों मे बसने वाले जन के दुःख-सुख के धारे एक हैं-~-व्यवस्था की मार जितनी राजस्थानी को लगती है वैसा ही अनुभव उससे तमिलियन को होना है। व्यवस्थागत दुर्नीति का दंश जितना केरलवासी को सालता है उतना ही कश्मीरी को भी। इसी प्रकार खुशहाली की लहरीली झकार माज देश के एक छोर से दूसरे छोर तक बसे लोगो को एक ही राग में शराबोर करती है । माज से कोई पन्द्रह बरस पहले, सन् १९६१ में, 'राजस्थान के कहानी- कार' शोषक से डॉ० रामचरण 'महेन्द्र' एवं यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' के सम्पादन मे एक कहानी संग्रह अकादमी ने प्रकाशित किया था। इसलिए देखना यह भी है कि माज इस अंचल का कहानीकार पहले जिस जमीन पर खड़ा था उमसे कितना कुछ मागे बढा है ? कहीं उसमे ठहराव या कि दोहराव तो नही पा गया? यदि ठहराव नही, उसकी गति में नरन्तयं है तो; हम जानना चाहेगे कि उसकी गति किस पोर है ? उसको मजिल कहां और कैसी है ? उम मंजिल के रास्ते किधर को हैं ? पौर उस मजिल को पाकर वह कैसे मानम और किम माहौल को बनाया चाहता है ? प्रादिर तो कहानी अब मान कहानी नही रही वह जीवन और जीवन २ - की ज्वलन समस्यामों में पंहार जीवन्त बन गई है। उमकी जिजीविषा की यह दरकार है कि वह उससे उसके होने और बने रहने की प्रावश्यक ता-उमकी सार्थकता के लिए सफाई चाहे। इतिहास की ऊहापोह ने इस देश को इतने झटके दिये हैं कि उनकी झनझनाहट न केवल उसकी रीढ़ में सनसनाती रही है अपितु उमके मानस को भी दीघकाल तक सुन्न किये रही है। यही कारण रहा कि प्रारमिक हिन्दी. कहानी चमत्कार को चुहल और मनोरजन साधरु वैतालिक मुद्राप्रो मे एक भुलावे ( Diversion ) का काम करती रही-इतिहास के गम को गल्त करने के हल्के नुस्खं के रूप में इस्तेमाल होती रही। जब यह सनसनाहट कम हुई तो लगा कि कहानी हमे बहलाती-बहलाती बहकाने लगी है तभी उसकी भूमिका को बदल दिया गया । अव उसने व्यष्टि-समष्टि को सुधारने सवारने, उमे नैतिक प्रोर प्रादर्श बनाने का बीड़ा उठाया : प्रादमी को खूब से खूबतर बनाते बनाते जब कहानी मात्र कहानी बनकर प्राचार-साहिता के नियम दुहराने लगी तो फिर अनुभव हा कि इससे तो हम निरे भले और भोले बनकर रह गये हैं । जड व्यवस्था के विरुद्ध एक लडाई लडकर भी पराजय भोर पिछडापन ही हमारे पल्ले पडा है; तो कहानी को अब गम्भीर सामाजिकता से जोड़ा गया । दम क्रम पे उमे ठडे प्रादशं के अवगुण्ठन, योथे सावरण की घेगबन्दी और मृत-मूल्य अवधारणा से अलग करके यथार्थ की खुरदरी और खरी जमीन पर खड़ा किया गया। अपने युग के यथार्थ और मत्य से जुड़कर कहानी किन्ही दायित्वो से जा मिली। अव न केवल वनाने जगाने का काम उसके जिम्मे पाया अपितु एक लम्बी और कठिन लड़ाई लड़ने के लिये मानसिकता या कि हौसले को साधने मंजोने का दायित्व भी उस पर प्रायद हुमा । यह लडाई उन मूर्त-अमूर्त शक्तियो के खिलाफ लडी जा रही है जिसने इस देश की चेतना को कुन्द करके प्रवूझ प्राधिक हथकण्डो के तहत छलने की साजिश कर रखी है-- यथास्थिति को बनाये रखने मे जिमका हित है और जो जन विक्षोभ को सास्कृतिक आदर्श और मानवतावादी भुलावे देकर निरंतर ठगती चली जा रही है । हिन्दी कहानी की विकास यात्रा में राजस्थान का कहानीकार सदैव कदम से कदम मिला कर चला है और उसने राग-रग, उपदेश-सिक्षावन और संगीन साफ-बयानी से लेकर लडाकू तेवर तक की कहानियां लिखी हैं ऐसे कहानीकारो को परम्परा गुलेरी से लेकर मोहनसिंह मेंगर, डॉ० रागेय राघव से लेकर यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' और फिर आगे मणि मधुकर तक चली आई है- आगे चल रही है । कहानीकार के नाम पर किस्मा-गो और कहानी के भेम मे किस्सों की ३ दरकार आज किसे है ? अाजादी के बाद वन माया चौफेर का उत्पीड़न-उच्छेदन इस देश को एक यातना-शिविर के रूप में बदलता हुआ कैसे-कैमे दर्दीले दौर से गुजारता नला गया-यह किमी में छिपा नहीं । परायों मे जूझते-जूझते हम जीत गये पर अपनो से निबटते-निबटते तो देश टूटने के कगार पर जा ठग। इस देश को जुए की विसात नमझ कर देशी-विदेशो थलीशाहो ने न केवल प्रार्थिक राजनैतिक मोवों पर ठगैतं पामे फेंके अपितु सास्कृतिक आसनों और धर्म की पेदियो पर भी ऐसे एजेट बैठा दिये हैं जो दर्शन और नीति को माला जपते हुए इहलोक और परलोक का जजाल फैलाकर ऐमी बारीक मार करते रहे हैं जिससे इस देश का मानस लहू-लोहान हो गया। आजादो के दो युगों के बीतते न बीतते यह नौबत पा गई कि पुरानी पीढी तो भौचक रह गई और बीच की पीढी भ्रष्ट होकर नई पीढी को प्रम, दिशाहीनता और प्रधा भविष्य देकर चुक गई । इस विरासत को झेलता हुमा आज का आदमी आस्थाहीन होकर भटकने लगा। वह और उसकी सतति अपने खेतो-खलिहानो, प्रॉफिम-दुकानो, कॉलेज-कारखानो, रेलो मकानो,पुलो- बाधो को जलाती-दाहती घर फूक तमाशा देखने मे उलझ गई। उसके विपन्नता- कारी विक्षोभ, निरीहता एव अकर्मण्यता को मन् साठ के बाद की कहानी ने सार्थक स्वर दिया । यथार्थ के परिप्रेक्ष्य मे इतिहास की प्रक्रिया के प्राग्रह और वैज्ञानिक समझ के साथ अब कथा-कर्मी आगे आये । यही कहानी ने सवालिया तेवर अख्तियार किये और युग से सीधे माक्षात्कार में उसने अपनी नियति को पहचाना। वस्तुन. साहित्यकार की मुद्रा सदैव प्रश्नकर्ता की मुद्रा रही है । वह अपने युग और उसे सचालित करने वाली व्यवस्था-शक्ति से मवाल करता रहा है इस क्रम मे सीता भी सवाल थी और राधा भी, शकुन्तला भी और धनिया भी- सूबेदारनी भी और गदल भी। सीता जहा रावण के लिए प्रश्न है वही प्रागे वह राम के सामने भी एक सवाल के रूप में ही उपस्थित है। - । व्यवस्था और विधायिनी-मत्ता, शासक या सत्ताधारी के जब दस मुंह और बीस हाथ निकल आयें तब क्या वह दो दुर्वल हाथो को अपनी मृटी में बाध ले और अपने दम मुखों की गर्जना में एक कमजोर पावाज को अनसुना कर दे? मोता इसी रूप में रावण के सामने मवाल है। राम जो उद्धारक है सीता का उद्धार करके उसे फिर दूमरी व्यवस्था और जइ प्राचार-गहिता के तहत निर्वासित कर दे-क्या उन्हे यह अधिकार है ? सीता फिर एक मवाल है, राम के सामने । मीता समथ थो इमलिए धरती को कोख में समाकर पाने वाले सारे सकटो से मुक्त हो गई। पर आज की सीता और उसकी समूची सतति में:
इतनी सामर्थ्य कहा ? और सामथ्यं हो तब भी वह घरती में समाना नहीं चाहती है- वह धरती पर जीना चाहती है। इतिहास की लम्बी परपरा ने उसे जीने के लिये लडना सिखा दिया है । और माज उसकी ज़िद है कि वह जियेगी एक बराबरी का जीवन और जीने के लिए शर्ते रखने वाली ताकतों से वह लड़ेगी- जीत में जाकर रुकने वाली अनधक लडाई। प्रनियंता प्रादमी का यही जूमारू रूप प्राज कहानी में अभिध्यक्त हो रहा है। 1. सवाल यह है कि उसकी लड़ाई किससे है ? क्यों है ? किसके लिए है ? ये सवालात वेमानी है। क्योंकि जिन लोगो ने इन मवालात को उछाला है वे इसका उत्तर भली भांति ममझते हैं। महज उन्होने सवालो के तुक्के इस गरज से फेंक है कि साहित्यकार एक निरर्थक बहस में उलझ जाय और वैमा कुछ न कहे- रचे जिससे उम व्यवस्था-विधान को ठेस पहुँचे जिससे उनके निहित स्वार्थ बंधे हैं। नव जागरण, सांस्कृतिक धरोहर एवं सौंदर्य-बोध के नाम पर पढ़े गये पुनरुत्थानवादी मंत्र कितने कारगर मिड हुए यह हिन्दी कथा यात्रा के विभिन्न पडावो मे समय समय पर खड़े किये गये शिविरों से प्रकट है । हिन्दी कहानी के लेखक महत और मालोचक पडे इसे कभी पान्दोलनो के माध्यम से तो कमी पीढ़ियो की खानावन्दी से, कभी कुछ तो कभी कुछ मभिधान देते रहे हैं । प्रगतिशील धडे ने कहानी को प्राका अनुमोदित राजनीति से बांध कर फार्मूले को बैसाखियो पर खडा पिया तो व्यक्तिवादियो ने उमे 'नदी के द्वीपो' मे निर्वासित कर दिया। उधर नई कहानी के शिल्प-साधको ने उसके साथ क्या-क्या न प्रयोग किये ? कभी कहानी को सेक्स की सुई पर नचाया गया तो कभी उसका भोग हुएँ यथार्थ के साथ भोग किया गया। अच्छा हुआ फार्मूला-बद्ध प्राइडियावाद, कुंठाग्रस्त यक्तिगद और प्रयोगधर्मी यौन-प्राणायाम कहानी में लम्बे समय तक नहीं चले एवं कहानी सम्बन्ध- हीनता की तलाश में भटकने से बच गई । माज पुरजोर शब्दो में कहा जा सकता है कि दिशा हीनता या कि भटकन के दौर से निकलकर-स्वप्निल संत्रास, अतीत के प्रति वायवी रागात्मकता एव तटस्थ वैयक्तिकता को झटक कर कहानी जड़ मूल्यो घोर मान्यताप्रो पर प्राधात करती हुई अपने युग की ऐतिहासिक सच्चाई से मा मिली है। जमा कि समेत किया गया है, अपने युग को प्रतिगामी एवं प्रतिक्रांति पॉपक शक्तिया न केवल पार्थिक राजनीतिक सीमान्तों पर अपने तरफदार खडे किये रहती है बल्कि वह सांस्कृतिक मार्च पर भी तथाकथित चितक-दार्शनिक .
५ पहरुए तैनात किये रहती है-जो माहित्य की रूपवादी सौदर्यवादी व्याख्याएँ प्रस्तुत करके साहित्यकार के हौसले को तोड़ने का काम बड़ी शालीनता से करते हैं। स्वार्थ-साधक, शोषण केन्द्रित माथिक शक्ति मदेव राजनीतिक शक्तियों से गठ-जोड़ करके चलती है। उसके नतीजे में प्रातकित जन ठगा जाता है छला जाता है । इसी क्रम में वह इस कार टूट जाता है कि उसमें कारखानों-सड़कों-खेतों बाजारों में खटने भर की सांस बच रहती है। अपने असतोप को उघाड़कर लड़ने, अपने अधिकार की आवाज़ को उठाने की उसमें होस नही रहती। शासन-तंत्र के पुरोहित और अर्थ तन के पैगम्बर बाह्य-संकट और प्रांतरिक कलह की पाड़ लेते हुए रोटी के सवाल को इतना बड़ा सवाल बना कर उसके सामने रखते हैं कि दूमरे मब सवाल उसकी सोच से परे हो जाते है । यह बहकावा-छलावा इतनी सुनियोजित और सुव्यवस्थित 'इकोनोमिक सट्रेटेजी' के तहत होता है कि सामान्य- जनता को उमका भान ही नहीं होता । यही प्रतिबद्ध एवं सबद्ध साहित्यकार के सामने एक चुनौती पाती है और वह उस चुनौती को जन-पाकाक्षा की ढाल पर झेलता है। वह जन-जीवन के व्यापक जीवन्त ससार से जुड़कर अपने अनुभव-अनुभूति से सृजन के बीज ग्रहण करता है। उसकी अपनी जीवन-दृष्टि उसे फिर यथास्थिति से टकराने के लिए बडावा देती है और वह परिवर्तनकामी साहित्य-सृजन के लिए जुट जाता है। यहाँ फिर राजनीति और अर्थतंत्र की दोगली ताकतें उसे रोकती है--सास्कृतिक प्रगति को नवोत्थान और किन्ही अमूर्त साधनामों से जोड़ कर उसे अपने तयशुदा रास्ते से भटकाने के मनसूबे साधती है। आजादी के बाद भारत में बन पाई दोहरी अर्थ-व्यवस्था ने यही सब कुछ किया है । यही पर साहित्य को 'अधेरे मे चीख' का अभिधान देने वाले जनमते हैं। पर अब माहित्य की रूपवादी एवं शोषण समर्थक व्याख्याएँ निरर्थक करार दे दी गई हैं । प्राज माहित्य ने और खास तौर से कहानी ने फिर अपना सवालिया तेवर अभिनयार किया है। उत्पीडित प्रादमी की दबी हुई आवाज को बुलन्द कर व्यवस्था-विधायिनी एवं अर्थ-नियत्रक एजेन्सियों और उनके बिचौलियों से पूछा है "बतायो, प्राजादी को पूरी एक पीढी तक भोग कर उसे असमय बुढा देने वाले इन्सान दुश्मन लोगों ! तुमने स्वत्वहीन पीडा-पोषित भादमी को क्या दिया है ? अट्ठाईस बरस तक बनने उभरने और लागू होने वाली विकास योजनामों के रसीले फल तुमने किस किस फोज़ मे कंद कर रखे हैं ? सन् ४८, सन् ६२, मन् ६५ प्रोर प्रव मन् ७१ के युद्धों और उनसे बन आई विपदानो, वेदनानो को हो हमें थमाते रहोगे या फिर आजादी के दौर मे बन.आई थोड़ी बहुत खुशहाली में भी हमें कभी भागीदार बनायोगे ? राष्ट्रीय-सुरक्षा, जनता का उत्तरदायित्व और ६ अाजाद पादमी की नैतिकता के उपदेश झाडने वाले पोरों ! तुम बडे किसान कैसे बन गये और मैं भूमि-हीन किसान कैसे बन गया ? मैं ! बंधुप्रा मजूर और तुम शेषनाग को नेति धारे विष्णु के अवतार क्यों कर बन गये ? समुद्र मयन मुझे सौप कर लक्ष्मी को तुम हर ले गये और गरल मेरे गले में उडेल दिया....... पर अब यह सब सहन नहीं किया जायेगा । जरा सोचो तो सही मैं जहर खाकर तो जी सकता हूँ पर कटोरी भर दाल पीकर क्यो मर जाता है ? है इम सवाल का कोई जवाब ?" और जब नियति-निरस्त व्यक्ति को इन प्रश्नों के संतोषप्रद उत्तर नही मिलते तो कहानी में उसकी लड़ाकू मुद्रा की अभिव्यक्ति होती है- पोर जब साहित्य प्रयवा उसकी विधा सघर्ष की मुद्रा धारण करती है- लड़ाई की भूमिका का निर्वाह करती है तब न केवल उसका रूप-शिल्प बदलता है अपितु उसका समूचा 'डिक्शन' तब्दील हो जाता है। रूप-शिल्प और 'डिक्सन' को तब्दीली इमलिए भी जरूरी हो जाती है कि जिसकी पीड़ा को उकेरा जा रहा है वह भी उसे समझ सके- उसका भागीदार बन सके। अब कहानी का कथ्य कोण, परिवेश-प्रसंग, संदर्भ-संकेत और विचार- विज़न इतने बदल गये हैं कि परम्परा से चला आता वाक्-संभार उसे सहेज नही पाता- उसे जो इष्ट है या जिसकी वह निघ्पत्ति चाहती है उसके लिये रूढ शब्द और मुहावरे प्रोछे पहने लगे हैं- लफ्ज़ प्राखिर लफ्ज हैं अफमाने सुना सकते हैं । हकीकत तो अदा कर नहीं सकते ए ! दोस्त ॥ - कहानी जब उबलते जीवन की धघाती समस्याओं को अपने में समेट रही है तो उसे उस कोमल-कांत पदावली को झटक देना पड़ा है जो निगाह नीची किये पग-मख से धरा कुरेदती अपने आंचल के छोर मे बल डालती चुप-चुप नायिका' के चित्रण में खर्च होती थी। ठीक भी है भाग को गिलाफ कैसे पहनाया जा सकता हैं ? कहानी के पात्र पहले कहानीकार को अपनी विचारणा कल्पना की उपज होते थे और वह उन्हें गढी हुई भाषा मे ढाल कर प्रस्तुत करता था। पर अब स्थिति पौर हो गई है। माज कहानी में उभरने वाले चरित्र रचनाकार को मानसी संतान न होकर मामने मे गुजरते हुए इतिहाम-चक्र से उभरकर पायित होने वाले मानव है- मानवतावादी ममून प्रास्था और विश्वाम से परे जिनकी दरकार और पाप कागज पर दलील है । उन्हें ढली हुई शब्दावली में ढाला नहीं जा सकता। वे तो अपने परिवेश पौर सस्कार की वाणी में मूर्त होते हैं- फिर चाहे यह वाणी वैदग्ध्य-विहीन होकर सीधी-सादी ही क्यों न हो । यो कहानी पर प्राज दोहरा दायित्व आ गया है- उसे जहां हकीकत को अदा करना या यथार्थ का निर्वाह करना है वही सृजनात्मकता को बरकरार रखना है । पर एक बात साफ़ है कि वह यथार्थ-निर्वाह अथवा युग सत्य की कीमत पर कला को तरजीह नहीं देती। ऐसा करने से जो कहानी चूकती है वह 'कलात्मक' बन जाती है और 'कलात्मकता' जब आदमी की बुनियादी दरकार पर हावी हो जाती है तब 'कलाबाजी' के नजदीक आ जाती है और कलाबाजी जैसे शगल मे उलझने की फुर्मत अाज किसे है ? भागीदारी की भी बात आई है। कहानी या कि साहित्य की किसी विधा की चेतना-चाहना मे अौसत या औसत से भी नीचे के प्रादमी को कैसे भागीदार बनाया जाय ? अपने देश के प्रसग में तो यह और भी टेढा सवाल है । जहां लगभग अस्सी फी-सदी लोग अपढ़ हों वहां जनवादी प्रतिबद्ध साहित्य कोन भाड फोड लेगा ? सुनाने वाले और भी खरा-खरा मुनाते हैं क्रांति करते रहे और अपने ही जैसे लेखकों के सामने खम ठोकते रहिये, क्योंकि हिन्दी में प्राज भी लेखक हो पाठक है और पाठक ही लेखक । यह शंका भी वे ही लोग खड़ी करते है जिन्हें भारतीय जनता के विवेक पर विश्वास नहीं है । कूट-पदों और उलटबासियो पर सधी राजनीति के मारक यकडे और मुविचारित रण-नीति के अधीन अपने खिलाफ़ रची जाने वाली आर्थिक-दुरभिसंधि को तो प्राज का प्रोसत प्रादमी भांप जाय किंतु अपनी बोली- भाषा से सम्बद्ध कवियों-कथाकारों के गीतो और कथा-स्वरों से बिल्कुल बेखबर रह जाय, यह कैसे मुमकिन है ? अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपने चौफेर बनने घटने वाले तव से अनजान है । शंका करने वाले जीव यह क्यो भूल जाते हैं कि आज देश में गरबराबरी के खिलाफ जो समाजवादी लड़ाई लड़ी जा रही है उसमें ढाल बन कर तो ये ही अपह-प्रवझ कहे जाने वाले लोग खडे है। एक सवाल यह भी है कि अनियंता म्वत्वहीन और अधिकार-वंचित का पक्ष-धर साहित्य क्या क्रान्ति ले भायेगा ? साहित्य कभी क्रान्ति नहीं लाता, वह तो क्रान्ति लाने वाला मानस बनाता है। बनी हुई व्यवस्था के विरुद्ध निरन्तर विरोध की स्थिति में रह कर प्रादमी और प्रादमजाद के हक में कुछ मुद्दे उठाता है। मुद्दे व्यवस्था के हाथों हल कर लिये जाय तो ठीक अन्यथा साहित्य प्रादमी के हौसले को ललकारता हुमा जन-विरोधी. प्रतित्रांति-पोषक मत्ता के विरुद्ध खड्डा होने का माह्वान करता है । साहित्य संगीने नही तानता पर हाँ तनी हुई संगीनों के निशाने शोपण-वारी शक्ति शिविरो की तरफ़ साधने मोर अंत में दिगर दबाने का चेत प्रादमी को देता है। सवालों के सिलसिले में पाखरी एक मवाल और-- जब तमाम प्रादमजाद एक ही ढव मे पैदा होते और मरते हैं- गंगू तेली का बेटा नंग-धडंग और रागा भोज का दुलारा मुकुट धारे नही पैदा होता। दोनो का जीना-मरना एक ढव मे होता है तो फिर प्रादमी पादमी मे फ़र्क क्यों किया जाय ? यो साहित्य मे प्राम और खास की चर्चा बेकार है ना ? दर्द को चुभन भौर पीडा की कराह सब ठोर एक-सी है तो फिर आदमी के दर्द और गम को अलग-प्रलग खानो में क्यो सकसीम किया जाय? ठीक है लहू का रंग एक है पर खून वेच कर पानी खरीदने वाले आदमी और खून खरीदकर गालों की सुी साधने वाले प्रादमी में तो फर्क किया ही जायगा ना ? गंगू के बेटे पर राजा भोज का कुमार पवार होकर मन बहलाये तब तो दोनों में फर्क करेंगे ना ! शराब से लवरेज जाम के छलक जाने का गम मौर कमजोर मा के लरजते हाथ से तल छूते दूध के प्याले के उलट जाने को पीडा में तो अंतर करेंगे ना? - वस्तुत. जैविक या प्राकृतिक दृष्टि से 'विशिष्ट' कृतिमता का द्योतक है और 'सामान्य' सहज और. स्वाभाविकता का । इसीलिये वैशिष्ट्य का नकार और सामान्य का समाहार साहित्य का अभीष्ट रहा है । भारतीय दर्शन मे अवतारवाद की अवधारणा इस बात का पुष्ट प्रमाण है। माहित्यकार ने सदा 'विशिष्ट' पर 'सामान्य' और 'सहज' पर 'सहज' को वरीयता दी है । श्रीराम का धनुभंग चमत्कार की सृष्टि करता है- उनके रामत्व को इंगित करता है । किन्तु सीता हरण की वेला में राम का व्यथा-प्रातुर-स्वरूप उनमे मनुजस्व का मंप्रेषण करता है और सामाजिक का उनसे तुरत तादात्म्य स्थापित हो जाता है। यही तथ्य गोवर्धनधारी कृष्ण और "कधो मोहि प्रज विमरत नाहि" की मवेदना से प्रापूर कृष्ण की छवि मे उजागर है । इमी को माहित्य-मनीषियों ने साधारणीकरण- जिसे मामान्यीकरण कहा जा सकता है-कहा है । तो स्पष्ट है साहित्य अपने प्रकृत स्वरूप मे 'सामान्य' के प्रति ही निष्ठावान रहा है। इस देश में सन् 76-77 में लडी जा रही लडाई सन 47-48 मे लड़ी 'गई लड़ाई से निश्चित ही भिन्न है। पिछली लड़ाई, विदेशी दासता मे मुक्ति के नाम 'पर 'कुछ राजनेताओं को प्रोछी महत्वाकाक्षानों तथा हठी राजनीति से बन माए देश के बटवारे की मार में उजडे घरों को फिर से बसाने-जमाने की लहाई थी। पर आज यहां मानव की चौमुखी मुक्ति के लिए एक बडी लड़ाई लड़ी जा रही है । इस लड़ाई के मंसूबे और निशाने ( टारगेट्स ) एक हैं और इसमें शामिल जूझारू जनों की नीयत और नियति भी एक है। इसलिए देश के किसी भी अचल में लिखे जा रहे साहित्य का मन-मानसिकता, उसकी प्रकृति-प्रवृत्ति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हो सकता। बस कुछ हथियार या लडाई की बुनावट, व्यूह-रचना, अलग हो मकती है। वह भी इसलिये कि अपने 'लोकेल' (Locale) या परिवेश, जो उनकी अपनी बोली, रीति-रिवाज, परम्परा-प्राप्त अवधारणाओं आदि से बना है, मे सरलता से रमकर ज्यादा से ज्यादा लोग इस लड़ाई में भागीदार बन मकें । लोकेल या परिवेश की पहचान की शर्त कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। यही कारण है कि अचल विशेष का कहानीकार अपनी सभी कहानियों में इसका उपयोग नहीं करता। यह तथ्य 'मणि मधुकर' की कहानियों मे उजागर है । 'मणि' ने जहां अपनी कहानियों में रेत की रूखी रागिनी में रेगिस्तानी राजस्थान के सूखे राग बिखेरे हैं-- सांडनियो को पीठ पर पार किये जाने वाले लम्बे रेतीले सिल- सिले या जल-खोजी लोग-लुगाइयो के रेत-अटे गैल-गुहार की बात करते हुए ढाणी- दूह, छाण छापर, प्यास-पार, और जोग-जीवट को उकेरा है वहीं अपनी एकाधिक कहानियों में उसने ऐसा कुछ भी नहीं संजोया है । यही बात यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' की कहानियो के विषय मे कही जा सकती है। सही भी है, समूचा राजस्थान रेत का मागर ही तो नही । फिर जेठ के अंगार-अंधड़ से उड़ी रेत के प्रांखो मे भर जाने की पीड़ा और दिन भर आग उगलते सूरज की धाम में हाड़-तोड़ मजूरी करने के बाद दो रोटियो को तरस जाने वाली कसक मे अतर ही क्या है ? राजस्थान की पिछली पीढी के कहानीकारो की कहानियों की "मित्ति स्वस्थ विचार-धारा और नैतिक नवनिर्माण पर खड़ी थो" जो "दर्शन और कौतूहल से प्रापूरित" होकर "ज्ञान, कला और पाठक को मोह लेने वाले जादू" से बननी थी तथा "भारतीय सभ्यता और संस्कृति की सजीव पृष्ठभूमि" होकर "मानवता के विराट सत्य की रक्षा" मै अपनी विशेषता देखती हुई "अपराधी का"""सद् प्रायश्चित और हृदय-परिवर्तन ही सच्चा दण्ड है" की स्थापना करती थी। ऐसी कहानिया "प्रगतिवादी नही प्रगतिशील" लोग लिखते थे। कभी-कभी तो "प्रेतात्मा उनसे अपनी कहानी लिखा जाती थी।" "उन्होंने ऐसी कहानियां भी लिखी जो उन्हें स्वप्न में पाई यौं।" उद्धरण-चिह्नो के मध्य अंकित शब्द 'राजस्थान के कहानीकार (हिन्दी- भाग पहला) के विद्वान् सपादक ने संकलित कहानीकारों का परिचय, जो बहुत कुछ कहानीकारों के प्रात्मकथन पर माधारित है, प्रस्तुत करते हुए लिखे हैं ।
१० प्रतएव उनकी सत्यता संदेह से परे है। पिछली पीढ़ी के रांगेय राघव जमे कुछ कहानीकार निश्चित ही उपयुक्त विचार परिधि से परे होगे किन्तु पिछले दौर में लिखी गई अधिकांश कहानियो को देखते हुए उपर्युक्त कथन एकदम निराधार नही कहे जा सकते। इधर माजादी के लगभग एक दशक बाद उभरने वाले राजस्थान के कहानीकार 'माज' और 'अब' की चुनौतियों में जीते हुए धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक खेले खेलने वाले बटमारों की बुरी नीयत को अपनी नियति मानने से इनकार करने वाले लोगो को कहानियां लिख रहे हैं। उनकी कलम को प्रेतात्मा तो क्या कोई महात्मा तक नियनित नही कर सकता। कलावादी जादू जगाने वाली, हृदय परिवर्तनकारी दर्शन-कोतूहल से प्रापूर, कोरे नैतिक नव-निर्माण में समर्थ और अमूर्त मानवतावादी अवधारणामो की पुष्टि में चुकने वाली कहानियां लिखने से वह गुरेज करता है । वह तो ग्राज मानव को सबसे ऊपर-साहित्य से भी ऊपर मानकर उसके भौतिक-अस्तित्व को सरक्षा एवं वरावरी के मम्मानीय जीवन के लिए समय सापेक्ष कहानियां लिखने में जुटा है। प्रस्तुत कहानियो के साथ ही राजस्थान के कहानीकारों के अन्य संकलन, 'पावाजों का जंगल', 'दुकड़े-देकडे जिंदगी' और 'रेखान्तर', कमोवेश मूरत में इसी तथ्य को रेखांकित करते हैं। सामाजिक पुननिर्माण के स्वर से प्रेरित बदले हुए मिजाज की परिवर्तन- कामी कहानियां लिखने वाले कहानीकारों को पात राजस्थान में बहुत बड़ी है । नामो की पूरी-पूरी गिनती मे चूक जाने का ख़तरा उठा कर ही नाम गिनाये जा सकते हैं। पानू खोलिमा, अशोक प्रात्रेय, किशन शर्मा, मगल सक्सेना, जगदीश वोरा, मनोहर वर्मा, राजानन्द, प्रेमचद्र गोस्वामी, मुकुट सक्सेना, विशन सिन्हा, धर्मेश शर्मा, तारादत निविरोध, भगवतीलाल व्यास, श्रीगोपाल कावरा, मुरेश शर्मा आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो सहज ही याद हो पाते हैं। नामो की इस शृंखला में संकलित कहानीकारों के नाम तो जुडे हुए है ही। कहानीकारो की इतना बडी जमात में से सकलन के लिये कुछेक का चयन करना वडा वेढव योर जोखिम का काम है। प्रस्तुत सकलन में कहानीकारों का चयन उनको या उनकी कहानियो को अन्य की तुलना में बड़ा या बेहतर दिखाने के उद्देश्य मे नही किया गया है। उसके पीछे तो एक ही लक्ष्य है कि इन संचयन के माध्यम मे राजस्थान में इधर लिखी जाने वाली कहानी की प्रकृति- प्रवृत्ति मोर उमके स्वरूप-माध को ठीक-ठीक पह्वान हो जाय । बानगी या नमूना पूरे को पहचान करवाता है तो वह स्वयं उस पूरे में सम्मिलित होता है। नमूना हो जाने से वह विशिष्ट नहीं हो जाता। इसी भावना से यहा कहानियां जुटाई गई है। यदि पृष्ठो की सीमा निर्धारित नहीं होती तो कुछ और भी कहानियां प्रस्तुत संग्रह को व्यापक स्तर पर सार्थकता दे सकती थी। जहाँ कहानी को पृष्ठ की सीमा बनाना चाहिये वही यहां पृष्ठ कहानी की सीमा बाध रहे हैं इसे विडम्बना ही तो कहेगे। कहानी की इस बातचीत को 'अधूरा सिलसिला' इसीलिये कहा गया है। ००० कहानीकार साथियों की ओर से जो सहयोग मिला है। उसके लिये किसी औपचारिकता को न प्रोढते हुए मैं उनके प्रति अपने मन मौन नमन का भाव धारे हूँ। राजस्थान साहित्य अकादमी के सृजनात्मक-विभाग के मान्य-सदस्यो ने इस संकलन के संचयन-संपादन का जो दायित्व मुझे दिया है उसके लिये मैं उनके प्रति आभारी हूँ। अकादमी अध्यक्ष पं० विष्णुदत्तजी शर्मा एवं निदेशक डा. राजेन्द्र शर्मा ने तत्परता पूर्वक इस संकलन के प्रस्तुतीकरण में जो स्नेहमय सहयोग दिया है, उसके लिये मैं उनके प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ। -पालमशाह खान अक्टूबर, १९७७ हिन्दी-विभाग उदयपुर विश्वविद्यालय, उदयपुर
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आत्म बोध ekt.keralia
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आत्मबोध उसने बम्बई नगरी की सबसे बड़ी विशेषता यही पायी कि यहां कुछ भी काम न हो पर आदमी अपने आपको व्यस्त महसूस करता है। उसे अपना एक-एक पल अत्यन्त व्यस्तता से दवा हुअा लगता है। वह समन्दर के किनारे बैठा हुआ यह अनुभव करता है कि वह भाग रहा है, यन्त्र की तरह चल रहा है। इसलिए उसने दस वर्षों के अनुभवों के निचोड के रूप में यह जान लिया है कि किसी को भूखों ही मरना है, वह भी बेकार रहकर, तो उसे बम्बई में रहना चाहिए । वैसे वह एक साहित्यिक मासिक पत्र के एक दफ्तर में पार्ट टाइम काम करता है और अपने को 'दिगम्बरो पीढी' का एक सशक्त लेखक व कवि मानता है। अश्लील से अश्लील अभिव्यक्ति को वह साहस के साथ प्रकट करता है, प्रकाशन के प्रभाव में स्वयं एक-एक फार्म के पेम्फलेट छाप लेता है। मुफ्त में बाटना उसे सैद्धान्तिक रूप से गलत लगता है, इसलिए वह उनकी कीमत पहले लेता है। अभी वह चर्चगेट के मुख्य दरवाजे के बीचोबीच खंडा था। छोटे-छोटे बाल, छोटी-छोटी धनी काली दाढी-मूछ, जिसे वह इमलिए रखता है कि उसके चेहरे पर दो तीन सफेद दाग हैं जो दिखायी न पडे। अपने से जुड़े हुए परिवेश को देख-देख कर वह सोच रहा था कि वह दरवाजे के बीच खड़ा हुआ नहीं है बल्कि दरवाजे के दोनों ऊपरी कोनो से उसके हाथ चिपके हुए है और वह घडी के पेंडुलम की तरह झूल रहा है। लोग उसके नीचे से गुजर रहे हैं। लम्बे कद वाले उससे टकरा कर जा रहे हैं। इस विचार ने उसे बडी देर तक बुत की तरह बनाये रखा। एक व्यक्ति ने उसे टक्कर मार कर यह बताया कि वह बुत नही, एक आदमी है, नितान्त कमजोर आदमो ! जो एक धक्के से गिर सकता है। उसका बण्डल नीचे गिर गया था। धक्का मारने वाला ध्यक्ति अत्यात ही व्यथित स्वर में बोला, 'माइ एम वैरी सॉरी... सॉरी प्लीज ! वह अपने बण्डल को संभाले इसके पहले ही वह व्यक्ति भोड में खो गया ।
राजस्थान के कहानीकार वह याने दिनेश बण्डल दवाकर खड़ा हो गया। सामने एक छोकरा नवभारत टाइम्स लिये जोर-जोर से चिल्ला रहा था- 'जगतगुरु शंकराचार्य की स्थिति विगडी, संत फतेहसिंह प्रात्मदाह करेंगे हनोई को प्रावादी वाले क्षेत्र पर बम वर्षा वह सब सुनता रहा फिर हंसा। इस बौद्धिक युग में जब समस्त मानवीयता को एक सूत्र में पिरोने की बात चल रही है- लोग जानवर व दाढी- मूछो के अस्तित्व हेतु लड़ रहे हैं। यह हिन्दुस्तान ! सचमुच अजब राष्ट्र है ! यहा किसी को कोई स्वतन्त्रता नहीं। न खाने को और न . ........ ! उसने एक प्रश्लील शब्द का प्रयोग किया पर वह अपने मासपास की भीड़ की वजह से चाह कर भी उस शब्द को अपनी जिह्वा पर नहीं ला सका। उसने घड़ी की पोर देखा। पांच बज गये थे। दफ्तरों की भीड़ तेज़ी से चर्चगेट में घुस रही थी। अनेक अजीव प्राकृतिया। सबके मब अजनवी ! इन अजनबियो मे उसे अपना एक परिचित चेहरा चाहिए। मिस नर्गिस का ! पता नही नर्गिस के नाम के माथ उसके मन में एक चिकनाई का फर्श जम जाता है और उसकी इच्छा दिगम्बर होकर उस पर फिसलने की हो जाती है। वह भीड़ मे नगिस को ढूढने लगा। हूंढ़ने-ढूंढते उसे अपने बण्डल का ख्याल प्राया जो वगल के नीचे खिसक गया या। उसने उसे वापस ठूसा, ठीक मिस नगिस के हाथ की तरह जिसे वह प्राय: जुहू को रेत में पड़े-पड़े दबा बैठता है। पहले हाथ दवाता है और बाद में उसकी वह छाती जिमका मांस बकौन नर्गिस के किसी रोग ने खा लिया है। दिनेश को उसकी इस बात पर अक्सर गुस्सा आ जाया करता था । 'यह साली मुझमे भी झूठ बोल है। मेरी छाती को कोई रोग खा गया ।'- किसी और को बनाया करो डालिंग, दम वर्षों से मैं साहित्य-मृजन करता हूँ, भोगे हुए जीवन पर लिखता हूँ, नारी-मनोविज्ञान पर तो अपनी मास्टरी है। मास्टरी है, इसलिए कह सकता हूँ कि यह रोग कौन सा है ? उमके किटाणु कहां रेंगते हैं ? इस बीच कितने चेहरे गुजर गये, उसे नहीं मालूम ! "हलो दिनेश' 'हलो।' फिर वह चौका । आगन्तुक से हाथ मिला कर बोला 'कहो डियर गणेश ! बड़े दिनो से मिले ।' वह गर्दन को झंझलाहट से हिला कर बोला, 'दोस्त ! यह बम्बई है प्रात्मबोध ७ न, यह किसी को यार नहीं । बोरीवली रहता हूँ, मिलने-जुलने का समय ट्रैन मे कट जाता है।' - 'प्राजकल क्या लिख रहे हो? मेरा नया संकलन पढा न नहीं। अरे चुगद, नौकरी के लिए अपनी प्रबुद्ध प्रतिभा को मत मारो। आजकल साहित्य में बडे-बड़े मोड़ आ रहे हैं। बंगाल में भूखी-पीढो ने तूफान मचा रखा है, दिल्ली के सचेतन कहानी के अान्दोलन ने भी अपने अस्तित्व को एक सीमा तक स्थापित कर लिया है, सम्प्रति तेलगु साहित्य में 'दिगम्बरो' का दल पा रहा है। मैं इसे हिन्दी में स्थापित करके ही रहूंगा। सत्य को उगलना ही युग बोध का सच्चा प्रतिनिधित्व है।' गणेश ने घडी की तरफ देखा। फास्ट ट्रेन में सिर्फ पांच मिनट बाकी थे। उसने विवशता से दवे स्वर में कहा, 'इन ट्रेनों की टाइमो ने साहित्य से अलग कर दिया है। यार ! तू ठहरा कुंवारा, फक्कड, अक्खड़ । न दिन की चिन्ता और न रात का फिक्र । जहाँ मिल गया. वहाँ खा लिया और जहाँ बिस्तर बिछ गया वहां सो लिया। हम तो शादी करके अब पछता रहे हैं।' 'पछता रहे हो, छि• मेरे ख्याल से बोर हो रहे हो ? यह ऊब, उकताहट, अकेलापन और रिक्तता का बोध मेरे विचार से शादीशुदा व्यक्तियो को अधिक है । यार ! तुम एक औरत से बोर नहीं होते ?' 'नहीं तो।' 'लगता है, तुम अठारहवीं मदी के आदमी हो।' 'प्रच्छा मैं चला। 'ठहर न यार !' 'भाई, मुझे सब्जी रोकर जाना है।' वह उसकी थोड़ी भी चिन्ता किये बिना भाग कर भीड़ में खो गया । दिनेश मन ही मन बड़बड़ाता रहा, 'ये लोग इसी तरह मरेंगे। मरने दो सालो को; जब शादी करेंगे तो उस मगल त्यौहार पर उपस्थित होने की सादर प्रार्थना करेंगे बाद में सब्जी, आटे, नमक तेल और लकड़ी के लिए प्राधुनिकता मे वैचित होकर दडवे सियार की तरह अपने अपको वना लेंगे। ये बैचारे चूहे ! उसका मन अपने हर मित्र को देख कर जिस तरह सदा वितृष्णा से भर पाता है, प्राज भी उसी तरह भर आया। फिर उसकी दृष्टि उस भीड पर जम गयी जो दफ्तरों से पा रही थी। आखिर अजनवी चेहरो में उमे अपना पर्गिचत चेहरा नजर आ ही राजस्थान के कहानीकार । गया। पिस नगिस उदास-उदास सी पा रही थी। उसने तुरन्त मोचा- ये टूटे लोग ! चलती फिरती लाशें ! ऐसे आ रही है जैसे किसी ने उसके जिस्म से खून निचोड लिया है। 'नगिस !' नगिस उसके पास पायी। 'क्या प्राज वीमार हो?' हाँ बीमार है। तुम मुझे बीस रुपये दे सकते हो !' नंगा 'बोस क्यो ? आज तुम्हें पचास रुपये तक दे सकता हूँ। पर तुम मुझे पहले समन्दर के किनारे ले जानोगी । हम जुहू के तट पर बैठेंगे। प्राज मुझे कुछ नया भोगना है । क्यो नही हम एकदम नंगे होकर पानी में भागे? पानी तुम्हारी जाघों के बीच से फिमल कर. और मैं एक कविता लिखू गा~ ११- दो इक्के आमने सामने और उस पर लिखूगा- नगा नंगा। कविता का शीर्षक होगा- नंगा ! अच्छा प्रयोग होगा।' 'मैं प्राज तुम्हे कम्पनी नहीं दे सकूगी। डियर ! मेरी वहिन बीमार है, उसके लिए बीस रुपये चाहिए। तुम दे सकते हो तो जल्दी से दो मुझे अगली फास्ट ट्रेन पकड़नी है।' टसे अप्रत्याशित इतना गुस्सा पाया कि वह अपनी बगल का बडल खोलकर जमीन पर पटक दे और लोगों की भीड इस तरह इकट्ठा कर ले जैसे कोई मजमे वाला करता है। फिर एक-एक परत खोले और लोगो को बताये कि मसार मे लोग किस तरह दूमरो के सपनो को रौंदते हैं। सच ये औरत अाजकल त्याग की जगह स्वार्थ को होठो पर बिठाये रखती है, परेशानी के शब्द उसकी चेतना में हरदम तयार बैठे मिलते हैं। के की तरह उगल देती है वे शब्द ! 'मैं तुम्हें प्राज नहीं जाने दूंगा।' दिनेश ने जैसे निर्णय लिया। 'क्यों 'क्योकि प्राज मुझे तुम्हारी दरकार है। दिमाग कह रहा है । जब मेरे मस्तिष्क की नसे फटती है तब मुझे तुम्हारे जस्म की जरूरत पड़ती है, हाय तुम्हारे .........!' 'तुम पागल हो गये हो। मुझे लगता है कि इन्सानी जज्बातों से कट से रहे हो। मैं जाती हूँ। ऐसी स्थिति में जब कि दर्द ही दर्द मेरे दिल में हो, में प्यार-मुहलत को कोई बात नहीं कर सकती।'
प्रात्मवोध ૧૯ 'जा सकती हो। खड़ी क्यों हो ? मैं व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का हामी हूँ। जबरदस्ती करना मेरे सिद्धान्तो के खिलाफ है।' नर्गिस चली गयी। वह चर्चगेट से समन्दर की ओर चला। अपने आप में लीन और डूबा हुआ। 'हलो दिनेश !' दिनेश ने गर्दन उठायी। देखा- संतोष था। किसी अच्छे साप्ताहिक में सह-सम्पादक था वह । 'कहां से आ रहे हो' ? सन्तोष ने उसे देखते ही पुकारा। 'जहन्नुम से। बहुत जल्दी आ गये। क्या वहा भी अन्डर ग्राउण्ड सडक बन गयी हैं ? इतनी भीड़ में इतनी जल्दी !' 'तुम चुप रहो। तुम्हे मालूम ही है कि मुझे लोकप्रिय लेखक पसन्द नही । गुलशन नन्दा के तुम परिमार्जित रूप हो।' ... ....... -- संतोप जरा मुहफट था। उसकी बात से चिढ गया। कठोर स्वर में बोला, 'यो उल्लू के पढ़ें, हमारे जीवन का ध्रुव सत्य खालीपन, नगे होकर भागने की इच्छा और ऊब ही नहीं है । तुम्हारी अ-कहानी पढी थी। रिश्ते !' उसने अपने बैग मे से एक पत्रिका निकाली। उसका हाथ पकड़ कर बोला, "जरा एक किनारे प्रायो, तुम्हे अपनी ही कहानी सुनाऊँ।" उसी समय तीन साहित्यकार और आ गये। बहस शुरू हो गयी। सस्ते पारसी रेस्त्रां की तलाश हुई। राइट हैड के लास्ट कॉर्नर के रेस्त्रां में वे घुसे । सतोप ने कहा 'आप मुझे समझा दीजिए इस कहानी के सारे सन्दर्भ !' 'तुम म-कहानी को क्या समझते हो?' संतोष गंभोर होकर तेज स्वर में बोला, "मैं यदि नही समझूगा तो तेरा वाप भी नहीं समझेगा और यदि तेरा जायज या नाजायज बच्चा इस पृथ्वी पर है या होगा तो वह भी नहीं समझेगा। ....... बोलते क्यो नही वर्मा ?" ? 'पहले चाय का प्रार्डर दो।' 'प्राडर देगा यह पत्थर ।' 'कौन पत्थर ?' मनुज ने बालों को कधी में बनाते हुए पूछा। वह सलवार कट मूछे भी रखता था ।
२० राजधान में कहानीकार 'मिस्टर दिनेश ! दायित्वरीन पोर एकान्तिक पीडा यहन करने वाला, युग-बोध, प्रति प्राधुनिकता का पारणी, भोगे हर क्षणों की जीयत प्रतिमा यह पत्थर !" 'मैं क्यो?' दिनेश ने प्रश्न किया। ....... .... वह नैवला "इसलिए कि तुम्हारी प्र-कहानी को समझने के लिए पाय निहायत सहरी है वर्ना अ-कहानी के तत्वों, परिवेश, गहराई, शिल्प और तोडफोड को कौन ममझेगा। यम पाईर दे दो। भाई ! तेरी तरह प्रकले और समस्त प्रायिक जिम्मेदारियो से मुक्त होने तो हमारी मौर मे माय की जगह कॉफी के दौर चलने ।' सतोप ने कहा। मवकै दवाव की वजह से दिनेश ने मार दिया। मंतीप ने नाटकीय अन्दाज में कहा, "हे कथा श्रवण करने वालो ! ध्यान में मुनो, पोर न समझ आये तो हुँकार भरो। कहानी की शुरुवात होती है- उमने अपने बिस्तर पर सोपी पत्नी के जिस्म पर हाथ फेरना चाहा, पर मलमे सितारो से जड़े ब्लाउज पर हाथ चला गया, इम स्पर्श ने नमै उम नेवले को याद दिला दी जिमको छूते ही उसे काटो की चुभन हुई थी।" मेत मे दौड़ रहा था। दौडता ही जा रहा था। उसके पीछे भाग रहा था वह ! काश ! वह अपनी मूर्खता पर तरस खाता मोर उसकी जगह वह किसी हिरोइन के पीछे भागता" खट् ! अरे बच्चू की मौ, यह बिच्छू कहा से निकल गया उठा और उसने पकड के कहां वहा से जस्म ! जन्म उम शब्द ने उसे कितनी ही औरतो का स्मरण करा दिया और वह चचंगेट.... ... वर्मा ने बीच में ही कहा, "भाई दिनेश एक चाय और चाहिए। कहानी ज्यादा भारी है। नही ! तो कहानी यानी तुम्हारी अ-कहानी फिर सुनेंगे । जाने मन ! अटपटाग लिखना ही प्र-कहानी नहीं है। मान गये, माज के युग- बोध के ज्ञाता विख्यात लेखको के पास 'बोध' की 'शोध' में मेहनत पड़ती है इसलिए उनके पास सिर्फ भोग रह गया है।' दे उठ गये । हमो के फव्वारे से रेस्त्रां भर गया। पास पास के लोग उनके ठहाका मार कर हमने पर विस्मित हुए । उनकी नजरें उनके चारों ओर प्राकर टंग गयी जैसे वे पूछ रही हो कि इस बम्बई में लोग ऐसे सुलकर भी हंस सकते है। वे बाहर आ गये। समन्दर में एक लहर हहराती हुई पा रही थी। ठंडी हवा के झोके तट ? यह गुस्से में भर ... जगह रह गया है। शोध आत्मबोध २१ को दीवार पर बैठे लोग ले रहे थे । अपनी दृष्टि सागर में जाते हुए सूर्य पर जमा कर दिनेश ने सोचा कि प्राज इन लोगों ने उसे ठग लिया है. उल्लू बना दिया है। ये थर्ड रेट के लेखक-पवकार ! दिन भर पूजीपतियों के 'मस्का' लगायेंगे और मांझ को व्यक्ति स्वतन्त्रता व इकाई-मत्ता की बात करेंगे। साले तली के बैल ! सहसा उसे मुनायी पड़ा कि सभी साथी उससे विदा ले रहे हैं । उसने हाथ मिलाते हुए सोचा कि सबके हाथ खीच-खींच कर अलग कर दूं। समुद्र में फेंक दूं। वे सभी चले गये। वह समुद्र के किनारे बैठ गया। फिर परसियन डेरी फार्म की अोर माया । एक प्राख के प्रागे पट्टी बाधे हुए औरतो के दलाल ने कहा, 'कोई चीज दिखाऊ बाबूजी ! विहार से प्रायी है, एक दम ताजो चीज़ । बिहार की भूख ने अपनी परियां लुटा दी।' उमने कोई जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप खड़ा रहा। एक बार 'क' पत्न के प्रधान सम्पादक ने उस पर व्यंग्ग कस कर उसकी कहानी लौटा दी थी, 'भाई दिनेशजी ! हम आपकी कहानी छापने मे अममर्थ हैं। कब-खालीपन, उदासी की परछाइया आदि शब्दों के प्रयोग से हम भी ऊब गये हैं। क्या प्राप चुक गये हैं ! क्या प्रापने दिमागी जीवन का ही भोग किया है । जरा जीवन को रेस्त्रो, पड़ोसी की लड़की, मास्टरनियो, नसों में ही न भोगिये जीवन और भी है !' वैसे वह कई बार वैश्यापो के यहा जा चुका है। कांग्रेस हाऊस की पेशेवर वेश्याओं के यहां तवायफों की महफिल में गाना भी सुन चुका है। लेकिन यह विहार की छोकरी है । रंडी नहीं है, इसे भूख ले प्रायी है । यह भूख ! छि यह भी कोई बात हुई। भूख ! आज यहां की सारी बुद्धिजीवी पीढी यौनाक्रांत है, कुठानो से ग्रस्त है, अजीब सी ग्रन्थियों के बीच आज का जीवन झूल रहा है, यहा भूख-भूख भूख गेहूं की भूख, अमरीका, आस्ट्रेलिया, रूस के गेहूं की भूख ! पर मुझे एक ही भूख है ! उसने एक टैक्सी ली। टैक्सी पर बैठते हुए उसने ड्राईवर से कहा, 'भाई, जरा धोवी तालाब !' वह धोबी तालाब के मेट्रो सिनेमा के पास एक मकान में घुसा। क्रिश्चियन का एक मकान ! ढका-ढका । घुटनदार । एक ब्लेक रंग की लड़की ने उसे 'हलो' किया। दिनेश उसे बहुत पहचानता था। मिस्टर ब्लेक की इस बेटी को जिसका नाम 'ब्यूटी' था, वह 'ग्लेकी' कहता था । 'हलो ब्लेकी, क्या हाल चाल है ?" "अच्छा है। तुम हमको उस दिन खालो पीली बूम मार गया। हम सुमारा रोगल के आगे वेट करता रहा।'
२२ राजस्थान के कहानीकार वह हमा। हंसकर बोला, 'डालिंग, तुम हमारा उदर बेट करता रहा और हम तुम्हारा एम्पायर मे वेट करता रहा। क्या करें, हम अपनी पादत से बड़ा मजबूर है । भूल जाता है। साली यह 'कट्री' है न, एकदम रही शराब है, मैमोरी को कमजोर करती है। किस देगा?' 'नो ! बाबा इज कमिंग। वह भाग गयी। दिनेश एक मस्ती में झूल गया। उसने उत्साह से आवाज लगायी, 'मिस्टर स्लैक !' मिस्टर लेक बहुत खामोश रहने वाला जीव था। सिर्फ काम की बात करता था। बोला, 'कितना पैग मागता है।' 'दो।' फिर वह धीरे धीरे चार पंग चढा गया। बाहर निकला । सदा की तरह अपने भय को भगाने के लिए उमने मोरारजी भाई को गाली दी कि कम्बख्त ने नशा बन्दी कर दी। फिर उसने सदा की तरह यह भी निर्णय लिया कि वह अपना एक 'परमिट' बनाएगा। वह फुटपाथ पर जल्दी-जल्दी चलने लगा। उसे पुलिम का भय लग रहा था। तभी उसे टैक्सी मिल गयी। वह उस पर चढकर पान वाले के पास पाया । इलायची के दो पान खाये ताकि पासपास वाला इलायची की सुगन्ध में मस्त रहे। बाद में वह परसियन डेरी फार्म के उसी नुक्कड के पास खडा हो गया । वही दलाल फिर उसके पास पाया, 'दिखाऊ माल बाबूजी, कोलाबा में है। खालिस बिहार का।' विहार ! दस वर्ष पहले जब वह अपने घर 'छपरा' को छोड कर पाया था तब कितना अच्छा था। दिनेश उर्फ दयाराम बी. ए.। विगत को उसने एकदम दफना दिया था मा, बाप, भाई, बहिनें और अपनी भोली-भाली ग्रामीण पत्नी को! इस बड़े शहर में आकर वह दिनेश बन गया। नाम, पता, गाम-धाम, परिचय समी बदल गये। जैसे वह झूठ बन गया है। सच्चा झूठ ! और चेहरा, चेहरा छोटी-छोटी दादी से बदल गया, वह भी झूठ बन गया है। पता नही, दयाराम उर्फ "दिनेश' किस उपलब्धि की खोज में अपने को झूठ बनाये हुए इस महानगर की भीड़ में खो गया है । दिनेश को लगा कि उसके भीतर इस बिहार के सन्दर्भ नै हाहाकार मचा दिया । स्मृतियों को नंगा कर दिया है। इम भूमे विहार ने। वह कांप 'गया। वहां इन्सान मर रहा है, अनाज के एक एक दाने के लिए तरस रहा है। उसे अपने चारों मोर इन्सानों के काल नजर पाये और उसे अपने आप से भय सताने .
मात्मबोध लगा। अपने अन्तस के भय से पलायन के लिए उसने दलाल को कृत्रिम रोवाली पावाज में कहा, 'कहा है, दिखायो ?' दलाल ने एक टैक्सी मंगवायी। दोनो वंठ गये। उसे रह रहकर प्रतीत हो रहा था कि वह अभी खालीपन से नही. ज्वलत प्रश्नो से भर गया है । पीड़ादायक-भूखे प्रश्नों से। वह उद्विग्न हो उठा । टैक्सी रुकी। उसने पाच का नोट दिया। दलाल ने बाकी पैसे लेकर अपनी जेब में डाल लिये। हालाकि उसका यह व्यवहार रुचिकर नहीं लग रहा था पर अभी किसी ने उसका गला दबा रखा था। वह कुछ नहीं बोला। कोलाबा की कौनमी स्ट्रीट है, उसे मालूम नही। वह उसके साथ चोर की तरह एक मकान में घुसा । बडा हॉल था । उममें अलग अलग केबिन थे। ने उसे एक केविन में बिठाया । थोड़ी देर मे वह एक लड़की जो वस्तुत: औरत थी, को लाया । बोला, 'एकदम फेस माल बाबूजी !' दलाल ... ... दिनेश ने देखा-वाब्ड हेयर, स्लीवलेस ब्लाउज, रेशमी साड़ी, आकर्षक मेकअप ! वह उसके सामने खड़ी रही । नुमाइश की चीज़ की तरह । फिर बोली, 'क्यो ?' दिनेश ने दलाल को प्रोर मुखातिब होकर पूछा, 'क्यो, ये बिहार की है ?' ? 'क्या प्रमाण यह तो भूखे बिहार की नही लगती ।' 'लडकी झल्लाकर बोली, 'क्या विहार-फिहार लगा रखा है।' दलाल ने कहा, 'वाईजी, यह असली बिहार !' 'मैं असली बिहार की हूं। गाव वाप का नाम""""", ससुर का पति का नाम ." साला कविता करता था, कहीं करता होगा, और बीबी.......!' ...... दिनेश को लगा कि कोई उसे चाबुक से सटासट पीट रहा है। यह उसकी बीबी है। उसकी गर्दन नीचे झुक गयी। उसको पत्नी कह रही थी, 'यह साला क्या बठेगा, तुझे 'हरजाई हजार बार कह रखा है, ऐरे-गेरे को मत लाया कर, पहले कह दिया कर, मैं पचास से कम नहीं लेती हूं। ले जा इसे फॉकलैंड रोड पर छोडमाबपनी-पठन्नी साडियार यही अण्डा बाहर चली गयी। लाल ने उसका हाथ पकड़ कर कहा, 'यहाँ इतनी देर नहीं राजस्थान के कहानीकार लगानी वाहिए, यहां सब काम तुरन्त होता है, चलो, मुझे पाच रुपये देकर छोडी। सारा समय खराब कर दिया। कोई और ग्राहक पाहता तो ज्यादा रुपये मिलते।' वह उमे खीचता हुअा नीचे ले आया। दिनेश ने उसे पाच रुपये दिये । वह चला गया। वह चौराहे पर पाकर खड़ा हो गया। घंटों सोचता रहा-पहली बार उसे प्रात्म-बोध हा कि सत्य यही है कि मुझे यस के नीचे पाकर मर जाना चाहिए। विशाल बस अजगर सी भा रही थी और वह उसकी पोर बड रहा' ... ।
एक और मौत लेंभ शाह खान
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एक और मौत कल जोर का पानी बरमा था। एकाएक ही उमस उठी, बढ़ी और फिर गहरा कर घनी हो गयी थी। कही हवा नही, उजास नही-बस धुंधलका और घुटन । उसे लगा था, जैसे किसी ने सारी बस्ती की डिबिया में बंद करके उमस और धुंधलके में छोड़ दिया है । ठीक उसी तरह जैसे वह दूध और चीनी के घोल को डिबिया में ढाल कर, कुल्फी बनाने के लिए घडे में छोड़ देता है। - बिजली-घर के पहले भोपू के साथ वह उठा था। नीम चबाते-चबाते उसने दूध, चीनी और बर्फ के लिए सत्ती से पैसे मागे थे तभी छातो चिचोड़ते टेऊ को परे धकेल कर वह भन्नाती हुई उठी थी और पैसे धरने की कुलिया को प्रौधी करके उसके सामने फेंक दिया था-बजाय मिक्को के उसके सामने काली ठीकरियां बिखर गयी थी। उसकी आखो के गड्ढो में सूरज की लाल भाई भभक उठी थी पर दूसरे ही पल लुगी की गाठ ठीक करता हुआ वह घर से बाहर हो गया था। नौ बजते-बजते जब वह लौटा, तब तक उसने उधारी पर सब जुटा लिया था। बिना मुंह खोले वह फेरी की तैयारी में जुट गया थ और कोई घटे भर बाद ही कुल ही . मलाई, की टेर बुलद करता हुआ कधे पर घड़ा चढाये वह घर से निकल पड़ा था। 'खास बाजार' से हो कर स्कूल जाने वाली सड़क पर जब वह पहुँचा तव सूरज तपने लगा था । अब उसे अपने कधे पर घड़े के साथ ही झुलसा देने वाली किरनो का बोझ भी महसूम होने लगा । पीठ पर पसीने से चिपके गाढ़े की फटी कमीज पर किरने कोडे की तरह लग रही थी । मोटर-टायर के उधडे हुए चप्पल से बाहर निकली अंगुलियो कोलतार को नंगी मडक मे जब-जब छू जाती थी, उसे लगता था, जैसे उसका पैर ताते तवे से छू गया हो । पर उमसे उसे एक अजीब राहत महसूम हुई थो । 'ऐमी तपन में ठंडो कुल्फी भला कौन नही खाना चाहेगा?' इस खयाल की कौंध के साथ ही उसने टेर लगायी थी-'कुल-ही मलाई' जो सुनसान सड़क के किनारों पर खडे बिजली के खंभों मे टकरा कर फिर उसके कठ में प्रा कर बंठ गयी थी।
२८ राजस्थान के कहानीकार छोटे मदरमे मे बड़े मदरसे तक ढेर सारी कुल्फियां निकल जायेंगी.... उसने सोचा था और उसके कदमो में अपने आप ही तेजी आ गयी थी। मामने गली के नुक्कड पर खेलते बच्चो को देख कर उसने फिर हांक लगायो । 'ए कुल्फी' को अावाज के लगर के साथ वह गली की मोर मुडा ही था कि उसकी आंखे बंद हो गयीं । कुछ पल बाद उसने धूल भरी अखि मलते हुए गली की तरफ देखा तो पायो, बच्चे घरो की ओर भाग रहे हैं । एकाएक ही जोर का अंधड़ आया था और आकाश में धूल धुमड़ने लगी थी। भासपाय की दुकानों और कच्चे मकानों के टीन टप्पर उडने लगे थे। मदिर के प्रांगन में खड़े पीपल के पते सिक्की की तरह बज रहे थे । थोड़ी ही देर में चारों ओर धुध भर गयी और बड़ी-बड़ी बूदें गिरने लगी। फिर जो पानी बरसा तो लगा जैसे प्रकाश को माज विसी ने बीध हाला है। मंदिर के छज्ने के नीचे घड़ा रख कर उसने प्रकाश को पोरं देखा । प्राधे आसमान पर चढ़ कर तपने वाला सूरज गल-गल कर वह निकला था.. तो माज उसको कुल्किया भी इसी तरह गल-गल कर यह जायेंगी इस प्राशंका के साथ ही उसकी माखों के कोर भीग गये थे और जल डवो पुतलियो से यह भीगे भाकाश सूरज को ढूंढने लगा था। में 4 ००० . बिन मौसम की बरसात में भीगा प्रकाश प्राज दूसरे दिन भी एकदम साफ नहीं था फिर भी हवा म्वुक थी-उममें एक तरह की खनक आ गयी थी। कल उसको बड़ा नुकसान हो गया था । माझ घिरते-घिरते पानी या था 1ब वहं भीगे तन और भारी मन से घर पहुंचा था। सत्ती ने फुरती से कुल्फी' को डिबिया भगोने में औंधा कर उसे चूल्हे पर चढा' दिया था। सोचा था, कुल्फी के घोल को पिला कर ही बच्चो की भूख को बहला दिया जायेगा। पर थोडी-सी पांच लगते ही दूध फट गया था और वे दोनो फटी-फटी ग्राखो से प्रकाश में फटते हुए मादलो को देखते रह गये थे। चूल्हा गरम करने की जुगत आज पी नही.. मुह मे अपनी ढलको छाती को ठूस कर उसे घास को पूली की तरह बगल में लटकाये प्राज सत्ती तड़के ही रिफ्यूजी कालोनी के उस नुक्कड़ को मोर चल पड़ी थी, जहा एक.मघवना टोन से ढका मकान अकेला खड़ा था । -बुधो थो .. टोपन को हालत अच्छी नही . वही जा रही हूँ। पार करती हुई सत्तो की आवाज उमने सुनी थी। पहले तो उमे गुस्सा आया। -~चार पड्डियां और दो बड़े श्रले जो कल सिलने पाये थे वही निकाल देती.... उसने उसे टोकना चाहा पर उसके मुह में नीम का दातून या । कड़वा मुह पहले ....री करते देऊ के देहरी एक और मौत ही था । कडवी वात कह कर सुबह-ही सुबह, जब वह रोजी पर निकलने का मन सूबा बना रहा था, उसने टंटा करना ठीक नही समझा। फिर यह खयाल भी तो था कि चोय की बेला है, अंजब' नहीं टेऊ को वही एक कप मिल जाये बीमारी का घर होने से भला कोई खाना-पीना बंद होता है ? जब वह भागा के नन्हे से पैर में से घुघरू फदा चादी का तार निकाल रहा था; वह मुबह की मीठी नीद में मगन थी। एक बार यह तनिक कुनमुनायी पर मंद ब्यार के रेशमी वालो में मुंह छिपा कर फिर मो गयी । सामने खडी निहंग पहाड़ी से मूरज के सरकने के साथ ही उसने अाज फिर कुल्फी का सामान जुटा लिया था। चीनी, दूध, बर्फ और नमक तो चांदी का तार रखने से मिल गये थे-- जलाऊ लकड़ी की फिर उधार करनी पड़ी थी । दूध तो गरम करना ही है ..चूल्हे के मरभुक्खे मुह में लकॉडमा ठूस कर उसने नमक की हंडिया से ले कर आटे के रीते कनस्तर तक सब देख डाला पर माचिस न मिली । मिली तो ग्लेक्सो के उम डिब्बे में, जो वह पिछले महीने किसी तरह टेऊ के लिए लाया था और जो अब खाली होने पर तेल लाने के काम प्राता था । माचिस का एक हिस्सा तेल मे सन गया था--फिर भी उसने अंगूठे और उंगली को चिमटी से पकड कर उसे निकाला। खोल कर जो देखा तो उसमें दो तीलिया थी पर मसाला एक के मुह पर न था । झल्ला कर उसने खोखे को चूल्हे में डाल दिया। दुलाना को देहरी चढ़ उसने अंगारो के लिए ठिकरी आगे बढायो तो दो हाथ के दुपट्टे को ठोढी तक खीचते हुए एक थकी हुई मावाज ने सवाल किया- फेरी पर निकल रहे हो ? टोपन की सांस भटक गयी है। हालत अच्छी नहीं । प्रगारे को ठिकरी थामे एक मुरझाया हुआ गोरा हाय प्रागे बढा । उस पर उभरी नीली रगो से उसकी निगाह उलझ गयी फिर कार उठी और गदे दुपट्टे की बारीक जाली के पाश में तैरती मरीमरी-सी मछलियो से जा टकरायी। उन्हें देख कर उसे लगा कि 'टोपन अगर दम भी तोड़ दे तो अजब नही।' अपने घर की धौखट तक पहुँचते-पहुंचते उसे कई वार चयाल माया-ऐसा हो गया तो? ऐसा हो सकता है ? बेचारी बूढी लीला, का रेला बेटा... वह तो ठीक है....पर मैं जो यह सब जुटा चुका हूं. चीनी तो पानी में घोल भी दी है....टोपन गुजर गया तो....महीनही टोपन बा जवान है यूं नही जाने का । दो दिन पहले तो ठीक था हो। उसने प्रगारो के साथ ही नुकसान की भाशका को भी चूल्हे में झोक दिया । सिलाई मशीन के प्रासपास पड़ी चिदियो को लपेट कर अंगारो पर घर दिया और फिर बुक्के-सा मुंह फुला कर भूल्हा फूकने लगा। थोड़ी ही देर में धुमां बल खाता हुमा दीवार पर टिके टीन की मोर बढ़ने लगा। जोर को एक फूक और राजस्थान के कहानीकार मारी तो सारे घर में धुप्रा भर गया। उसने मागें बंद कर सी। माम जी पोलो तो चूल्हे में से एक हलको लपट उठनी हुई दिवायो दी, यमी ही उदास और मरी-मरी, जमी गदै दुपट्टे की जाली मे उलझी मर्यालयों-सी प्रांगो में उसने देखी थी। उसने फिर जोर मे चूल्हा फूका। पय सपट ची पोर तेज थी। दूध वा भगोना चढाते हुए अपने गाठ बाध ली थी कि दो मुल्लू दूध टेक के लिए बचा कर रचना है। तभी उसे पिपलते हुए बर्फ का ध्यान पाया। अब वह उमे तपड में सहेज कर कूटने लगा। न जाने में पाज यह जोर-जोर में सट्ठा चला रहा था, जैसे फल कुल्फो के गल जाने को जोखिम इमी वर्फ ने दी थी। वह उठा, मिट्टी के घडे को अच्छी तरह धो कर साफ किया, फिर गीला करके लाल कपडा उस पर चढ़ा दिया। ई में भरे हे पानी में नमक की डलियां छोड़ कर चूल्हे पर से दूध उतार लिया भोर ठंडा होने के लिए अलग घर दिया। अब वह पहले से ही धो कर प्रौधी रखी छोटी-बड़ी टीन की डिब्बियो को सीधी करके लाइन में जमाने लगा। पाच पैमें वाली, दम वाली, बीस वाली, पचाम वाली...? वह है कहा ? उसने साम के लिए सवा पयं तक की रेट टीन की पट्टी पर लिखवा रखी है। वैसे भी प्राज तक किमी ने उममे बीम पेमे से अधिक की कुल्फी मागी भी कब ? ००० दूध ठंडा हो चुका था। उसने चीनी का घोल उममें मिला दिया। धुटनो पर हाथ रख कर चट् की पावाज के साथ उठा। ममाले को हंडिया में रखी इलायची के बूरे को पुडिया से कर उसने घोल में उलट दी। मव लाइन में रखी डिब्बियो में वह जल्दी-जल्दी घोल ढालने लगा। जब मब पूर गयो तब उसे याद पाया, वारका खीर ?... वीसरी वयो । उसके साथ प्राखो मे भूसे 'टेऊ' की दुधमु ही सूरत तैर गयी। प्रौधा हत्थड सर पर मार कर पास धरे माइकिल के ट्यूब के छल्ले डिब्धियो के सिरो पर चढाने लगा। सब पर छल्ले चढ़ गये तो लाल-काली पट्टिया धारे डिब्बियो के जमाव को देख कर उसे ऐसा लगा, जैसे टोपन के घर के बाहर भर पर गमछे पारे कालोनी के लोग जमा हैं। मुंह बाधे इन्ही की तरह । उमने अपने सर को झटक दिया। जैसे इम विचार को अपने से झाट कर अलग कर दिया कि टोपन मर भी सकता है। फिर एक-एक करके डिब्बियो को घडे के पानी में छोड़ने लगा। हिन्दी के पानी में पंठने के साथ ही वह हिमाव लगाता जा रहा था कि कितने का माल बन गया है। माथे पर चहचहाये पसीने की बू दों को उसने मुडी हुई तर्जनौ पर समेट कर छिटक दिया। -~अगर शाम तक सब कुफिया निकल जाये तो भागा का तार छुड़ा एक और मौत लेने के बाद भी इतना बच रहेगा कि वह दो जून का घाटा-चावल जुटा सकेगा और गुजर जैसी लगडाती चली आ रही है चलती रहेगी। कुल्फी के घोल-सा सोंधा और इलायची की खुशबू में लिपटा एक सलोना विचार महक उठा 'मजा तब है जब सत्ती को खबर तक न हो और चांदी का तार भागां के पैर मे फिर आ जाये। फिर उसकी आडू-मी ठोड़ी पर उभरे तिल को सहलाते हए बताये कि " इसके साथ ही सत्ती के चिट्टे बदन की लुनाई उसको पाखो में उभर पायी और एक फुरहरी-सी उसके सूखे शरीर में लहरा गयी । कान मे खुसी अधजली बीड़ी को निकाल कर अोठों में दबाया फिर चिमटी में पकड़ी चिनगारी से उसे छुपा कर उसने जोर का कश खीचा । दो-एक सुट्टे और मारे और कंधे पर रखे गमछे पर कुल्फी के घड़े को जमा कर वह उठने ही वाला था कि कालोनी के नुक्कड़ से बिलखता हुआ स्वर उठा और उसे छेदता हुआ पार निकल गया । कापते हुए पगो पर खड़े हो कर उसन वाहर झांका तो पूरी कालोनी उसे धुध के कफन में लिपटी हुई दिखायी दो . तो टोपन गुजर गया । सामने वाली दीवार पर टंगा हथेली पर पहाड़ टिकाये हनुमानजी का चित्र कापने लगा। उसे लगा, पहाड़ का सारा बोझ उसके कधे पर प्रा पड़ा है । अजब नहीं कि आगे बढ़ने पर वह जमीन से सट जाये । फिर भी बजरंगबली को याद करके एक झटके से उठा और देहरी पार कर गया। 'कु-लही....मलाई' एकाएक ही उसके मुंह से निकल पड़ा। उसने जीभ काटी । लानत है ऐसी पादत पर । वह कुढ रहा था, मन-ही-मन । -साई जेठू....ो जेठू मल । एकः पहचानी हुई अावाज ने उसके बढते हुए पैर को जकड़ लिया। - टोपन गुजरी वयो...सुरतो वजगो मा है । साइकिल पर पैर मारता हुआ भट्ट कह रहा था-दाह में जाना है दूर होती हुई आवाज ने फिर कहा- फेरी छोडो। कालोनी के नुक्कड़ से रोती हुई प्रावाज के धुएं का पहला गुवार उठा था तभी वह समझ गया था कि 'टोपन' नही रहा । • तुरंत घर से निकल जाना चाहिए, किसी ने देखा तो है नहीं यही सोच कर वह निकल पड़ा था, चुपचाप । यह बात और है कि पादतन उसके मुंह से टेर फूट पडी थी. पर अब तो भट्ट ने भी कह दिया है .. बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। जात-बिरादरी का मामला ठहरा । इस विचार ने उसे घर को मोर वरवम मोड दिया। उसे लगा, जैसे उमके पैर वर्फ में धस कर जम गये हैं। घर के कोने में घहा टिका कर वह उठा तो लगा, उसका अंग-प्रग टूट कर गिरने लगा है-जैसे कल उसकी जमी जमाई कुल्फी गल कर बिखर गयी थी।
३२ राजस्थान के बहानीकार ००० टोपन के घर के बाहर लोग जमा थे। माज कोई माम-धंधे पर नही निकला था। सबके चेहरे मौत को मार मे सटके हुए थे । चारों तरफ घुप्पी चिपकी हुई थी। इशारो से काम हो रह पे । मामने उनूमल गहा था-पिटा-पिटा-सा, जिसे उसने मुबह मालू-घोले उबालते हुए देखा था। उसके माथे पर उनके दिन भर पटे रह जाने की फिकर धूल को तरह जमी हुई थी। बगल मे दुलाना टूट कर टांगों पर बैठ गया था। उमका वासी सब्जी, पिलपिले टमाटर और मरे-मरे प्रमरूदी से पटा टेला उमक दरवाजे पर यहा था। स्कूली बच्चों के टिफिन पहुंनाने याला मूरजा बार्य यड़ा घुल रहा था। उसे लगा, जैसे मौत का दरिया 'टोन' के बांध को तोड़ कर कालोनी में घुस पाया है, जिसमें मव लोग डिब्धियों में बंद करके छोड़ दिये गये हैं । थोड़ी देर में सब जम जायेंगे और फिर गलगल कर रह जायेंगे हमेशा-हमेशा के लिए। हाथ धाधे सामने पढे जूमरमल की घड़ी पर उनकी निगाह गयी पाया सुई साढे दम से आगे निकल गयी थी। मगर बारह-एक बजे तक भी निपट जाये तो • मैंने बेकार ही फेरी पर निकलने की ठानी "सुमर जा पुट उसे भी माज और इमी वेला मरना था । मरे हुए को गाली देने पर उसने कान पकडा । वह इसी उौह बुन मे था कि....'या को राम संग है' के भरे हुए स्वर ने से प्ररथी की पोर धकेल दिया। प्ररथी उठ चुकी थी। रोने-पीटने को अावाज उमका पीछा कर रही थी। लोगो के कंधों पर चढा जवान टोपन आगे बढ़ रहा था। जब प्ररथी उसके घर के पास से गुजरी; उसकी आंखों में कुल्फी का घड़ा तैर गया। वह पके पैरो से पोछे चलने लगा। चलते-चलते उसे अपना कंधा हलका लगा, आगे चलने वाले लोगों को छितरा कर उमने प्ररथी को कधा लगा दिया। अब शव स्कूल के करीब सा गया था। 'या को राम संग है । सत बोलो संग है। राम नाम संग है ।' के समवेत स्वर को चीरती हुई मचानक ही एक टेर उठी-'कु लहो "मला"लोग चौंके । पीछे चलते हुए एक भादमी ने प्रागे बढ़ कर प्ररथी से उसके हाथ को झटक कर उसे पीछे धकेल दिया और बोला- लख लानत भेणा सब उसे घूरकर देख रहे थे । on
जमीन से हटकर
ন
সাহাগ
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जमीन से हटकर गंगाधर अपने छोटे भाई विद्याधर की चिट्ठी को कई बार पढ़ चुका है। पत्र बहुत छोटा था, मगर उसका एक-एक शब्द उसे भीतर तक कचोट रहा था। विद्याधर ने लिया था, "भैया, यदि उचित समझो तो कुछ पैसे भेज ताकि मां को एक बार जयपुर दिखा पाऊ। मरना तो उसे है ही, मगर अपना कुछ फर्ज है, इसीलिए पापको लिख रहा है।' दसवीं पास विद्याधर ने कितना गहरा, तीखा व्यंग्य उसके प्रति किया है। वह जानता है इन शब्दो को लिखने में विद्याधर को ज्यादा वक्त नहीं लगा होगा। उसने गंगाधर से रुपए भेजने की प्रार्थना नही की, प्रत्युत उसे कठघरे में खड़ा कर दिया है ! उसे लगा, वह वाकई अपराधी है और विद्याधर के समक्ष बहुत-बहुत छोटा हो गया है। क्या वाकई उसने अपने फर्ज की अोर कभी ध्यान नहीं दिया ? उसकी प्रांखो के सामने बूढी मां का झुरियों से भरा चेहरा धूम गया मोर साकार हो गया एक परिवेश- फूस का टापरा, ढीली-दौली खाट पर गन्दी गूदडी में लिपटा दुबला पतला बूढ़ा शरीर! टापरे में बेतरतीब संवरे माटी के छोटे-बड़े पड़े। के पास बरोसी में सुलगती आग से उठता धुमां । टापरे के सामने बाड़े मे रम्भाती हल जोतकर लौटा विद्याधर । गाय और जोर से रम्भाने लगती है । भाया बिदिया ?' टापरे से मा को क्षीण मावाज । 'बार भायो मां,' विद्याधर का मा की खाट के पास पहुंचना, 'काई बाद गाय। 'कुण? हाल छ?' 'के हाल हो स्सो, इब तो रामजी बम उठा....' ..'कराहती मां, 'तेरो ब्या हो जातो मां की तेज खांसी . एक क्षण की 'प्र म्हारो ई पेट कोनी भरं व्या कर कुण सो सुख !' शान्ति भंग करती कहती, 'भाईजी ने कागद् घाल्यो छ ! किम भेग देते तन जैपर दिखा ल्याऊ।'
राजस्थान के कहानीकार 'इब तो मनै रामजी टेर सी.' मा कोधित हो उठतो। 'मरगो तेरो भायो ! के भेजमी सित्यानासी ? जोरु रो गुलाम !' यूढे क्रोध पर खांसी का दवाव ! बाडे मे गाय का और ज़ोर से रम्भाना ! मा खांसते-खांसते गालियां देती चली जाती...। ००० 'कोई प्रेजेण्ट खरीद लाते, शाम को शर्माजी के यहां चलना है,' पत्नी के स्वर ने उस परिवेश को बिखेर दिया । . भेज ऐं हां-' गंगाधर ने जैसे सुना ही नही । 'शर्मानी के बच्चे को बर्थ-डे पार्टी है न ! कुछ खरीद लामो', पत्नी ने जैसे उसे जगाया। 'क्या वहां चलना जरूरी है ?' उसने धीरे-से पूछा । 'क्या तुम्हें उन्होंने इन्वाइट नहीं किया ?' पत्नी ने गुस्से में पूछा । 'सो तो ठीक है मगर उनसे अपने सम्बन्ध... ?' 'सम्बन्ध ? वो तो बनाने से बनते हैं। प्राने-जाने से बनते हैं। थोड़ा कोन बहुन खचं तो करना ही पड़ता है। तुम अपनी खोली में बैठे रहो, पूछेगा ?' पत्नी ने तुनककर कहा । 'वो कोई बात नही.......। मैं सोच रहा था, मा बीमार है, कुछ देता, गंगाधर का स्वर क्षीण था। पत्नी भभक पड़ी, 'मरे, तो बाबा, मना किया ? भेज दो। चाहे अपना खर्च न चले, पर उनको भेजो।' गंगाधर सहम गया। पत्नी रसोई में चली गई। वह यों ही पका-सा पहा रहा........ दरमसल गलती उसी की रही, वर्ना विद्याधर दसवीं पास करने के बाद सेती के काम में ही न सटता। सेतो भी क्या? बस नाम भर को। वह तो पुराना कुप्रा है, जिसके सहारे कुछ पैदा हो जाता है। विद्याधर ने उससे कई बार कहा कि कुएं की मरम्मत करा दे और उस पर बिजली लगवा विद्याधर की कोई सहायता नहीं की है। उसने मा और विद्याधर को असहाय अवस्था में छोड दिया । पिता पोस्टमैन थे, जो कुछ उन्हे मिलता था, उसको पढाई में खर्च हो जाता था। बीमा-वगैरह मे कर्ज लेकर उसका विवाह किया । पिता सोचते थे कि उसे नौकरी मिलते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा, घर में पैसो की वर्षा किसने मगर उसने जमीन से हटकर होने लगेगी, नया मकान बन जाएगा, खेत पर कुएं की मरम्मत हो जाएगी और......... पिता के जीते जी उसे नौकरी तो मिल गई थी, मगर शेष साधो को अधूरी लेकर बेचारे असमय ही चल बसे थे। वह आर. ए. एस. प्रतियोगिता में चुना गया, इसलिए नौकरी तो उसे बढ़िया ही मिली । मगर सारी दिक्कतें भी यही से शुरू हुई। अफसर बनते ही उसे 'विशिष्ट-वर्ग के लोगों के साथ रहने का हक हासिल हुआ। इससे पूर्व तो पेट भरने, तन ढकने की सुविधाएं ही उसे मिल सको थी। मगर अफसर बनने पर उसने अनुभव किया कि बिना 'स्टैण्डर्ड मेण्टेन' किए वह अपना 'स्टेटस' कायम नहीं रख सकता। जब वह प्रो. टी. एस. के प्रशिक्षण में प्राबू गया था तो उसके पास न तो ढंग का सूटकेस था और न बिस्तर हो। कपड़े भी बस जैसे-तैसे थे। यद्यपि इस प्रतियोगिता में योग्यता-सूची में उसका प्रथम स्थान रहा था, मगर उसके रहन-सहन के साधनों ने उसे सबसे नीचे धकेल दिया था। वह सभी प्रशिक्षार्थियों के उपहास का साधन बन गया था, उसका नाम 'कूडीवर' रख लिपा गया था। वह प्रशिक्षण के दौरान सहमा सहमा-सा रहा था । वहीं उसके मन में यह बात जम गई थी कि बाहरी टोम-टाम की ही कीमत है। उसके बिना प्रादमी की अन्य योग्यताओं की भी वकत नहीं हो पाती। इसलिए उसने तय कर लिया कि सबसे पहले वह अपने रहन-सहन के स्तर को ऊंचा उठाएगा। और वह भूल गया कि उसके पिता ने उससे कुछ माशाएं लगा रखी है, उसकी बूढी मां सपने देखती है कि 'गगाधर की नौकरी लगने के बाद वैने टापरो गोवर माटी सूलीपणो कोनी पड़सी', और विद्याधर भी एक अफसर के भाई की तरह आगे बढ़ने की योजनाएं बना रहा है । . - उसने पिता को पहला झटका तब दिया, जब उसने अपनी पसन्द की लड़की से शादी करने का निर्णय लिया। प्रशिक्षण के पश्चात उसकी पहली नियुक्ति बीकानेर हुई और वही उसने एक लड़की को पसन्द कर लिया था। जाहिरा. तौर पर इस सिलसिले में न तो मा ने कुछ कहा था, न पिता ने। इसके विपरीत उन्होंने तो गांववालो से रोब के साथ कहा था, 'भई, म्हारो जमानो तो गियो। हाकम री भू गावड़ ली छोरी कोई ठीक रती।' मगर उसे स्पष्ट हो गया था कि उसके निर्णय से भीतर-ही-भीतर दोनो दुखी थे । वे और ज्यादा दुखो तो इसलिए हुए थे कि उसने शादी गांव से नहीं की थी। वह मा-पिता पोर विद्याधर को बीकानेर ले गया था। गांव के कुछ लोगों को उन्होने निमन्त्रण अवश्य दिया था, मगर उस निमन्त्रण का कोई प्रय ..... ३८ राजस्थान के कहानीकार नहीं था। जैसे पिता का सारा उत्साह ठण्डा पड़ गया था। शादी के लिए बीमे मादि में कर्ज ली रकम उन्होने उसे ही सौप दी थी, और वह शादी का सारा सामान खुद ही खरीद कर लाया था। जब उसने अपनी पत्नी के लिए लाई साड़ियां मा-बाप को दिवाई थी, तो दोनो ने ही उनकी खूब तारीफ की थी। मा ने दबी जबान ने कहा था, 'भाया काम करयोडो चूनड़ो एको कोनी ल्याभो । सूण को एक लुगड़ो तो चाइज । पर के चूडलो.... ।' तो पिता ने मा को झिडक दिया था, 'के वावड़ी बात कर छ. इब तूगहो कुण पणे छ ।' और कढी हुई चूनडी वह नही ही लाया था। उमी दौरान एक दिन पिता ने उसमे कहा था, 'प्रादमी कठे बी पूग जा पण बने प्रापणी जमीन 4 पैर रिखणो नी भूलणो चाइजे... । तन तो वेरो अंक गान्दीजी रॉण्ड-टेबिल के टेम इंगलिस्तान रा राजा सूधोती ई पण मिल्या। वां वठेवी अपनी जमीन नई छोड़ी।' उस वक्त उसने पिता की इस बात को कुढकर टाल दिया था मगर आज इन बातो का गहरा अर्थ उसकी समझ में आने लगा है। उसे पाश्चर्य होता है कि गांव के सीधे-सादे पोस्टमैन में तीखा व्यंग्य करने का कितना मादा था। उसकी शादी के कुछ दिन बाद ही उसके पिता गुजर गए थे। शादी के मारे माहोल के दौरान वह बहुत उदास थे। आज वह स्वीकार करता है कि उसके व्यवहार और जिन्दगी के प्रति उसके खोखले रवैये ने पिता को भीतर से आहत कर दिया था। इसलिए वह असमय ही चल बसे थे। उसने तो जिन्दगी एक अलग ही दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की जहां 'स्टेटस 'स्टैण्डर्ड' 'कटिसी-जमे कुन शब्दो की भीड़ मे जीवा बंध जाता। इन्ही मे बंधकर वह अपनी जमीन छोड चुका था। जब वह पार. ए. एम. मे चुना गया था तब सारे गाव के लोगों ने खुशी भनाई थी कि गाव का एक प्रादमी तो 'बड़ा' बना, भव गोव को दिक्कतें मिट जाएगी। मगर उसने तो गाव की ओर मुड कर भी नहीं देखा । जब भी गांव गया लोगो में बहुत कम बातचीत करता। उसने जान बूझ कर अपने को गांव वातो से अलग कर लिया था। उसे याद है कि एक बार होली पर वह गांव में था। उमके हम उम्र लोग उससे होली खेलने पाए थे, उसके लिए खास तौर से रंग-गुलाल लार थे। मगर उमने मयको बुरी तरह फटकार दिया था। लौटते लोगो में से एक ने पवती कमी थी, 'चालो रे, होली तो मिनया रो त्योहार में। पठे तो हाफम रो ठिकाणों ।' वह चुप रहा था, पूरे गुस्से मे । इसीलिए गांव पानी ने उमै कोई सम्मान नहीं दिया । वह भी तो उनसे घृणा ही करता था, क्योकि उसके पैरों में तो विशिष्ट-वर्ग' के पंख लग गए थे। विवाह के बाद जमीन से हटकर ३९ उड़ने वाले दो हो गए थे और दोनों ने ही पीछे और नीचे की ओर देखना छोड़ दिया था। उनके लिए तो बस क्लब था, पाटियां थीं, पिकनिक पार्टियां थी, शिष्यवार के नए तौर तरीके थे और ! विज, तथा 'हाउजी' जैसे खेल थे। इसी उड़ान में उनके घर नई क्राकरी, रेडियोग्राम, कुकर, सोफा, कुलर-जैसी चीजे बढ़ती जा रही थी। पिछले माह ही उसने डाइनिंग-टेबिल और कुसियों का सैट बनवाया था। घर में फर्नीचर तो पहले से ही काकी था, मगर इनका प्रभाव खटकता था, क्योकि उसके 'सकिल' में सभी के घर इनसे सजे थे। अब उनकी नजर फ्रिज पर थी। उसकी पत्नी को फ्रिज के मामले में कई बार अपमानित होना पड़ा है। स्कूटर बुक करा रखा है. चाहता है, उसे जल्दी ही मिल जाए ! साइकिल पर जाते हुए उसे बड़ा बुरा लगता है। प्राज अतिरिक्त-जिलाधीश शर्मा के लड़के का जन्म-दिन है। पार्टी तो बहाना है । वहां उपहारों की प्रतियोगिता होगी। कल सारे अफसर सपरिवार पिकनिक पर जाएंगे -राजसमन्द । वहा साड़ियों की नुमाइश होगी। और इसी जिन्दगी के अनुरूप स्वयं को ढालने के चक्कर में वह भूल गया कि वह एक गाव में जन्मा है, फूम के टापरे मे काला धुमा फेंकती ढिबरी की रोशनी में पढा है, रेत के धोरे पर रातों को सोया है, लम्बे असे तक उसने रोज सुबह छाछ और सूखी रोटी का नाश्ता किया है । जब भी विद्याधर का पन प्राता है, उसे अहसास होता है कि उसकी बूढी मा और विद्याधर उसी टापरे में दिन काट रहे हैं, ढिवरी की कालिख अब भी उस झोपड़ी में फैल रही है, विद्याधर अब भी छाछ और ठण्डी सूखी रोटी का नाश्ता कर रहा है, धूल भरी गर्म लू वे लोग अंव भी उसी टापरे में झेल रहे हैं । जव भी उससे उसके निवास का नाम पूछा जाता है. वह कहता है- काछेरा । मगर मानसिक रूप से वह कमी का काछेरा से अलग हो चुका है। उसे यह भी अहसास होता है कि अब वह कही का नहीं रह गया। उमको गलती यही रही कि उसने अपने मस्तिष्क में एक अलग दुनिया का नक्शा बना लिया। इसी नक्शे में रंग भरने के फेर में वह अपनी जमीन छोड़ता चला गया। नई दुनिया के नक्शे में रंग भरते समय वह अनेक मूर्खतामों का शिकार हुआ है। अब तो इन मूर्खतामों को याद कर उसे खुद से ग्लानि होने लगती है। उसे याद है कि एक दिन क्लब में वह साथी-अफसरों के साथ बैठा था। तब उसने अफसरी नई-नई प्रोढ़ी थी। सौन्दर्य प्रसाधनों की कीमतों पर बातें - 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राजस्थान के कहानी कार चल रही थी। उसके मुह से निकल गया था, 'टेल्कम पाउडर जैसी जरूरी अावश्यकता की चीज भी कितनी महंगी हो गई है !' 'तो क्या आप पाउडर को निसेसिटी मानते हैं मिस्टर गंगधर ।' एक साथी प्रफमर ने व्यग्य के साथ पूछा था । 'और नही तो क्या ?' उसने दृढ़ता से कह दिया था। उसकी इस धारणा का लोगों ने खूब मजाक उड़ाया था। बात बहुत छोटी थी, मगर उसकी मूर्खता को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त थी। उसकी इस रंगीन दुनिया का इतिहास ऐमी ही मूर्खतानो का इतिहास है, क्योकि उसके पैरों के नीचे कोई जमीन नहीं रह गई है । वह बहुत चाहता है कि अपनी जिन्दगी नएं सिरे से शुरू करे । मगर कुछ तो पत्नी का दवाव और ज्यादा उसकी खुद की कमजोरी। वह उन चीजो के पीछे भटकता रहता है, जिनका जीवन की उप- लब्धियों से दूर का भी रिश्ता नहीं। 'तो बाजार कव जा रह हो ?' पत्नी ने उसका स्वर भंग कर दिया। 'हाँ .. S....मभी जाता हूँ। क्या ले आऊँ ?' 'बीम पच्चीस की कोई अच्छी-सी चीज देख लाना ।' 'ठीक है ले पाता हूं, वह कपड़े पहनने लगा, 'लामो कुछ पैसे दे दो।' रुपए देते हुए पत्नी बोली, 'पौर ऐसा करना, 'सपना वस्त्र भण्डार' जा कर एक शाल लेते ग्राना 1 कलेजी रंग का है। मैं उसे अलग रखा माई थी।' 'शालें तुम्हारे पास नहीं हैं क्या ?" हैं तो, पर कल पिकनिक पर चलना है। पौर शालें तो सबकी देखी हुई हैं । पत्नी ने समझाया । वह कुछ नही बोला, 'तुम ले प्राना पसन्द न माए तो वापस लौटा देंगे।' पत्नी ने उसका वजन हल्का करना चाहा। मगर वह जानता है कि पसन्द न माने पर लौटा देने की शर्त पर अनेक वस्तुएं पाई हैं। मगर लोटी भाज तक एक भी नहीं। वह चला गया मगर उसकी चेतना में विद्याधर का पन घूम रहा था।'
जमीन से हटकर
०००
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बाजार से लौटा तो क्वार्टर के बाहर ही तार वाला डाकिया मिल गया।
उसने रसीद पर हस्ताक्षर कर तार ले लिया । खोल कर पढ़ा- 'मदर एक्सपायर्ड,
विद्याधर ।'
गंगाधर की आखों के मामने अंधेरा छा गया। पत्नी ने दरवाजा खोला।
उसके हाथ से शाल और उपहार के पॉकेट नीचे गिर पड़े। उसने तार पत्नी की
ओर बढा दिया। उसे लगा, उसके पैरो के नीचे जमीन नहीं है, वह हवा में झूल
रहा है।
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प्रतिक्रियाएं
D
रामदेव आचार्य
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प्रतिक्रियाएं साधारण तथ्य यह है कि इकतालिस वर्ष की प्रायु वाले अध्यापक रामभरोसे की, बीमारी के बाद, मृत्यु हो गई । उसकी मौत पर कुछ प्रतिक्रियाएं हुई जो इस प्रकार हैं:- लक्ष्मी : पत्नी : उम्र छत्तीस वर्ष समझ में नहीं पाता, घरवालों ने क्या सोचकर मेरा नाम लक्ष्मी रखा। न मैं मां-बाप के घर लक्ष्मी सिद्ध हुई, न ससुराल में । कितना अच्छा होता, यदि मेरा नाम विपदा या प्रमागिन होता । सही नाम रखने की इस समाज में प्रथा नहीं है । यहा झूठ सच्चाई है, सच्चाई झूठ है । पैदा होने के दो वर्ष बाद मां चल बगी। किसी प्राचल में मुंह ढंककर चुपचाप मन हल्का कर लेने का सहारा भी नही रहा । पिता मुझे अपना दुर्भाग्य मानते रहे, और दुर्भाग्य की तरह ही मेरे साथ व्यवहार करते रहे । उनको नफरत माज भी मेरे मन में कांटे को तरह चुभी हुई है । कभी-कभी पिताजी खीझ कर कह भी देते लक्ष्मी! और सरस्वती गयी। सरस्वती मेरी मां का नाम था । लक्ष्मी और सरस्वती का वैर वैसे भी प्रसिद्ध ही है । पिताजी के ऐसे वाक्य बिजली की तरंग की तरह मेरे शरीर में सिहरन छोड देते । सोचती- लक्ष्मी ! तू सरस्वती को खा गयी । बाप को यह मुख दिया तूने ! तू पायी इसी हीन भावना के साथ बचपन बीता। बापू चाय-बीड़ी-सिगरेट रेवते थे। फिर मी दसवी क्लास तक पढ़ा दिया। बड़ा भाई तनू गहर छोड़कर गया तो आज तक नहीं लौटा । एक दिन सोरी करने पर बापू ने उसे बुरी तरह पीटा था। फिर बापू रामू के गम में घुलते-घुलते चल बसे । रहा सहा सहारा भी टूट गया ! एक दिन पाकर एक दूर के चाचा मुझे ले गये । चाची नोक- रानी की तरह काम, करवाती रही। दो जून ठण्डा-चासो खाकर काया को किराया चुकाती रही । एक दिन चाची के बाहर जाने पर चाचा ने मुझे कमरे मे बुलाया पौर हड़प लिया। मैं चीखती रही, पर चाचा पर भूत सवार था ।उस दिन राजस्थान के कहानीकार के बाद चाना मेरा याम ययाल पते रहे। मेरे कपड़े बदल गये । छोटी-मोटी फरमाइशें पूरी होती रही। मौके मौके जिस्म कलंक्ति होता रहा । चाची अनुभवी प्रौरत थी । हकीकत को ताई गयी । एक दिन अकेले में मेरा गला दबोच लिया। राड-मृडल की भाषा में मुझे गालियां दी। चाची के भय से मैं सच्चाई नहीं छिपा सको। उस दिन से ही चाचा चाची के बीच प्रनयन हो गयी । तनाव बढ़ने लगे । टूटने की नौबत प्रा गयी । चाची मुझे अपना दुर्भाग्य मानने लगी। उसका मुहाग उजड़ रहा था। चाची को कैसे समझाती कि अप राधी मैं नहीं हूँ । गतत समय है, जिसने मुझे लाज बचाने का मौका भी नहीं दिया । अत्र चाचा भी मुझसे दूर भागते रहे । मेरे जिस्म मे भाग लगाकर उन्होंने भी किनारा कर लिया। गम में घुलती रही । न दिन में चैन रहा, न रात में। जिस्म सग पाने को तड़पने लगा, देह प्राधो भूख सहकर भुलसती रही। गदे मैले कपड़े मग ढंकते रहे। माखिर चाची ने ही मेरी मुधि ली वे मुझे अपने घर के लिये अभिशाप मानसी थी । सौत की तरह मुझसे जहरीला व्यवहार करती थी। आखिर एक दिन उन्होंने मुझे हमेशा के लिए विदा कर दिया । पता नहीं, कैसे उन्होंने मेरी शादी की घात तय कर ली । जब विदाई हुई तो चाची ने केवल एक बात कही 'अपनी नीच सूरत फिर मुझे मत दिखाना' ! मैं क्या कहती । माखों में कुछ पिघल गया। आकाश को ताकने लगी। चाचा आखिरी मौके पर भाये । मेरे मिर पर हाथ फेग और गरदन का ली। उनकी प्रांतों में अपराधी-भाव था। संयम रखने की कोशिश की, पर ढह पड़े । मेरा बांध भी टूट गया । हिचक-हिचक कर रो पड़ी। चाचा ने भी फेवल एक ही बात कही बेटी ! इस बूढे के कमीनेपन को माफ कर देना । मेरी मत मारी गयी थी। चाची हम दोनो को खूनी भाखों से घूरती रही। बारात वाले इसे विदा के सच्चे प्रांमू समझ रहे थे। उन्है हकीकतो का क्या पता था। वे इसे विदाई की करुणा समझ रहे थे। मसुराल में प्राकर मैंने चैन की सांस ली। मोचा अब गम की यात्रा समाप्त हुई । अब तो सांस लेने का अवसर मिलेगा। पर दुर्भाग्य अभी भी पर्दै मै खडा मुझ पर मुस्कुरा रहा था । श्वसुर मुझे वेटी का दर्जा देना चाहते थे, पर एक दृक-दुर्घटना में शादी के तीमरे दिन ही चल बसे । घर में कुहराम मच गया । मास की प्यार भरी नजरों में जहर फैल गया। लक्ष्मी एक बार फिर दुर्भाग्य घोषित कर दी गयी। घर में पाव रखने ही श्वसुर को खा गयो ।
प्रतिक्रियाए ४७ सास ने फिर कभी मुझे पन्छी नजरों से नही देगा। जब-जब मैंने उनकी सेवा करनी चाही, उन्होंने मुझे भरने पाम मे भगा दिया । उधर पीहर मे एक ही सहारा पा चाचा का । मेरी शादी के बाद पाची उन्हें हमेशा के लिए छोड़ गयी । ये एक मन्दिर में जाकर विधवा की तरह रहने लगी । उन्होंने जिन्दगी में पापा को कभी माफ़ नहीं किया। - - समझा सारा रोज ताने देती रहती । मायके वालों को भिखमंगा कहती । वे सन्नी थी मेरे पीहर नाम की कोई जगह ही नहीं थी। तीज त्यौहार पर भी कोई याद करने वाला नहीं था। रागी के धागे पहले ही टूट चुके थे। सोचती हूं भगवान ने मुझे क्यो पैदा किया । क्या मेग जन्म मौत तक दुर्घटना ही बना रहेगा ? थोड़ा-बहुत प्यार दिया इन्होने पर वाप की मौत का मजाम भी मुझे ही मानते रहे । घर की बहू होकर भी रहम पर पलने वाली मैं एक नौकरानी रही । जीभ से कभी बोल नहीं फूटा । त्योहार में कभी उमंग नही देखी । जो पाने मोढ़ने को मिलता, उसे विधाता का प्रसाद मानकर शरीर को पालती रही। भाखिर मेरी कोख से भी प्रकुर फूटा 1 सास की नजरें फिरी । मैंने अब तो जिन्दगी में कुछ नया मोड पायेगा। पर मेरा जन्म तो एक दुर्घटना था, जिसे विधाता ने गलती से मौरत का नाम दे दिया था। मैंने मरे हुए बेटे को जन्म दिया । सास ने क्रोध भरी फटकार साथ मुझे 'डाइन' कहा । तब से आज तक कह रही है । इसके बाद एक के बाद एक चार संतान हुई । एक मरा लड़का, एक लड़की एक वर्ष की होकर मरी, फिर एक मरा लडका, और फिर एक लड़की, जो पाच महीनों तक जिन्दा रही। हर बार शरीर से टूट कर मैं सास के ताने सुनती रही । जली-कटी सुनने की प्रव प्रादत हो गयी थी। ये भी मेरे प्रति उदासीन हो रहे । बच्ची की मौत का दायित्व मुझ पर ही लादा जाता रहा। इधर इन्होने स्कूल में अध्यापकी कर ली थी । श्वसुरजी, जो थोडा बहुत छोड़ गए थे, अब खत्म हो चला था। नौकरी पाकर इन्होने थोड़ा प्यार दिया । मैं जन्म-जन्म को प्यामी थोड़े से प्यार से भी लहलहा उठी । मेरे दिन फिरे । मन्दिर में जाकर प्रभु के सामने साष्टांग लेट गयी । पाखें रोती रहीं, मन हंसता रहा । का जन्म हुअा । उस समय मैं सत्ताइस की हो चली थी । भगवान की कृपा से रेणु जिन्दा रही। ये भी रेणु से खेलने लगे। मैं सुबह शाम मन्दिर जाने लगी । रेगु के बाद राकेश भी आ गया । इस बार जिन्दा बेटा हुमा । भगवान अाखिर रेणु ४८ राजस्थान के कहानीकार करे, प्रभागिन का बेटा जुग-जुग जिये । बेटे के जन्म से मेरी कद्र और भी बढ़ गयी । इनको नौकरी में भी तरक्की मिली। सास अब मुझसे सेवा भी कराने लगी। और जब मेरा सितारा बुलन्दी पर प्राने लगा, तो वाम विधाता को मेरा सुख खलने लगा। ३५ वर्ष की उम्र में मैंने पाया कि मेरा एक मात्र सहारा, मेरा सुहाग खतरे में है। परिवार का भार सभालने में ये जी-तोड परिश्रम कर रहे थे । मुझे पता नही था कि इनका शरीर भीतर ही भीतर टूट रहा है । ये इतने चुप रहते थे कि इनके मन का कुछ भी पता नहीं चलता था । ये घुलते गये, घुलते गये। माखिर जब बीमारी कावू से बाहर हो गयी तो वह इनके मन की दीवारो को तोड़ कर शरीर पर फैल गयी । एक दिन बेहोशी की हालत में इन्हे स्कूल से अस्पताल पहुंचा दिया गया । सूचना मिलने पर भागी-भागी अस्प- ताल गयी । भगवान के भी कई चक्कर लगाये । हर पवित्र स्थान पर जाकर अपने सुहाग को भीख मागी । पर विधाता मेरी भीख पर नहीं पसीजे । मे जिन्दगी को वाजी हारते गये । मेरे मन पर पत्थर गिरते रहे । मोर आखिर वह भाखिरी मुकाम भी आ पहुचा । है भगवान ! कैसे कहूं वह सब कुछ --.-। इतना ही काफी है कि मैंने अपने आप को एक जिन्दा लाश पाया। समझ मे नही माता यह सब क्या हो गया । सास पचहत्तर की हो गयी हैं। रेणु नौ को है, राकेश भी सात वर्ष का हो रहा है। क्या जवाब दूं इन सब को ? मा मुझमे अपना बेटा मागती है। बच्चे पापा मांगते हैं। मैं किसी से क्यों मांगू ? इस विधवा शरीर को लेकर कही जाऊ । हे भगवान ! तूने जन्म-जन्म के पोप मेरे ही माथे क्यो मढ़ दिये ? इतनी बडो दुनिया में मेरे अलावा क्या तुझे कोई पापी नजर नहीं पाया ? जानकी : मां : उम्र पचहत्तर वर्ष देवी-देवताओं की लारा मनौतियां की, तय जिया मेरा लाल। कितने लाइ-प्यार से इमे पाला-पोसा ! इसकी हर बाते को अपने रंगत से सीची। बाप तो वेटे पर जान ही छिड़के था। खून-पसीना एक किया' भरोसे के भरोसें। पढाया-लिखाया मोर सोचा कि बड़ा होकर सुध लेगा हमारी । बुढापे को लकड़ी होगा, हारे-धके बदन का हकदारं । इसने जो खाया, खिलायां; जो पिया पिलाया। एक बार तो पपनी माइकिल बेचकर भरोमे को घड़ी लाकर दो बाप ने । वेटा भड़ गया जिद पर । पहनू तो घड़ी पहनूं नही तो खाना-पीना बन्द । भूख हड़ताल । भरोसे बाप को माध का नूर। जी-जान से प्यारा । खुद तीन मोल पंदल दतर जाना मजूर, पर भरोसे का हठ पूरा किया यो भी क्या जमाना था। छोटी-सी गिरस्ती, सारे मुघ । वैटा चन्दरमा की ?
प्रतिक्रियाएं ४६ कला तरह बढ़े था। भगवान से कहती-जैसे हमारी सुनी, सवको सुनना परभूजी। इमतिहान तो पास करता ही गया भगेसे । मैंने थाल भर-भर मिठाइया बाटी हर वार । त्यौहार की तरह मनायी इसकी सालगिरे। मुझे क्या पता था कि भरोसे भूढापे में धोखा देगा। भरोसे षया भसम हुआ, मेरा तो ऐसा ही भसम हो गया। । । क्या करता बिचारा ! कुलच्छनी जो पल्ले बंध गयी। सत्यानास जाय खसमखानी इसकी चाची का। यह ढोल मेरे गले बांध गयो। जब से घर में पग रखा, मेरी बगिया ही उजाड़ दी। पग धरते ही खाया ससुर को। अंगारा रख दिया मेरे सीने पर । घाव डाल दिया भरोसे के जिगर मे | फिर औलाद जनी तो ऐसी कि या तो जनना और मरना साथ-साथ होने या मौत जनम के पीछे भागे । बिचारा भरोसे तरम-तरस गया पोलाद का मुख देखने । यहां तो दाई और अरथी साथ-साथ पावें । पाखर मैने ही परसाद बोला बाताजी के । गुरु मराज की भसम लगाई रेणु के वदन में । पचास जतर-मंतर किया। भाडा टोटका किया। सब जाकर जीवी मेरी रेणू । इस कुलच्छनी का तो साया ही भक्सक । और जब बेटा औलाद की खुसी मे रमा तो यह चुडल खसम पर ही भ.पट्टा मार गयी। हे परभू ! यह धरती क्यों नहीं फटी उस दिन । ऐसा तेरा क्या बिगाडा था दीनानाथ के यह दिन दिखाया । भरोसे की जगे मुझे ही बुला लेना था मेरे अतर्जामी। नाम तो लिछमी, चाल कुचाल । कहाँ जावेगी यह। इसके कोई प्रागे न पीछे । परभू ! ऐसे-ऐसे पिराणी क्यों पैदा किये। ये न तो खुद सुख से जीवे, न दूसरो को जीने दें। पर यह भी क्या करे विचारी। विधाता ने इसकी किसमत पर काली स्याही ही पोत दी है। बाप न मां न भाई। न यहां गत, न वहां गत । धरम-करम भी किया श्राफत की मारी ने, पर इसके तो भाग में भरा था गोबर ही गोवर। इसे कैसे मिलता सुख । प्रौलाद जीवी, तो धनी मर गया । धनी जिया तो पोलाद ना रही। यह तो रही बंजर की वजर। अब कैसे पालेगी मेरी रेणी को ? कैसे बढेगा मेरा मोती- मूगा राकेस ? हे परभू ! इम दुखियारी की भी सुन लेता तो तेरा क्या घट जाता ! अव मेरी भी प्रांख पसीज गयो। प्राखिर तो मां का मन है मेरा। संतान का दुख कैसे देखा जाय । अब भरोसे के कागद- पतर खोजती फिर है । मैं पूछ क्या बनेगा हजार-डेढ हजार से । अरे तू अपनी उमर कैसे गुजारेगी इन ५० राजस्थान के कहानीकार कागदी से । मैं तो पका आम है। प्राज नहीं तो कल मिट्टी में मिल जाऊँगी। तू इस विधवा रूप को लेकर कहा- कहां होलेगी। कैसे पालेगी मेरे लाड़लो को- इन चाद तारों को। अब मेरी तो यही विनती है परभू कि अब तो इस दुखियारी की भी सुन । भरोसे तो गया सो गया । उस देम जो गया वो क्या लौटेगा? मेरी भी सुध ले मेरे स्वामी। अब तो जी भर गया तेरे जगत से । रहना नहीं देस विराना है मेरे परभू । अगर कही तैरा दरबार है तो मेरी इत्ती बिनती तो सुन कि मेरी रेणी और मेरा राकेस जुग जुग जोवें और इस जनम-दुखियारी का कलेजा ठण्डा करें। अब भूढापे मे क्या कोसू इस परजाई को। भगवान तेरा सताप हरे बहू । मेरी तो यही प्रासोस-यही विनती । रेणु : बेटी : उम्र नौ वर्ष सब कहते हैं कि बापू पराये देश चले गये है, जहा से कभी नही लौटेंगे। तो फिर मुझे टाफिया, कितावे और कॉपिया कोन दिलायेगा ? सुबह-सुबह बाजार कोन ले जायगा ? जग्गू की जलेबियाँ कौन दिलायेगा? अम्मी से पूछती हूँ, तो जवाब ही नही देती । अम्मी बोलती क्यो नहीं। आंखे सूनी-सूनी दिखती है। अच्छे कपडे भी नही पहनती। प्राजकत मन्दिर भी नहीं जाती। मेरे कपड़े भी समय पर नहीं धोती। बहनजी स्कूल मे डांटती हैं। अम्मी ध्यान ही नहीं देती। कितनी बार भगवान से कहा- हमारे बापू को क्यों बुला लिया, पर कोई जवाब नहीं। फिर भगवान बालकों के कैसे हुए। हिन्दी-टीचर एकदम गलत पढ़ाती हैं। दादी सुबह-शाम-दोपहर रोती रहती है। पाखें है कि झरने । हरदम परभू-परभू करती रहती हैं। मुझे जोर से छाती से चिपटा लेती हैं। इतना भीचती हैं कि मेरी तो जान निकल जाती है। और लोग कहते है कि बूढो मे ताकत नहीं होती। तो क्या सचमुच बापू अब नहीं मायेगे। फिर हमें कपड़े कौन दिलायेगा? गुही कौन खिलायेगा। नीलम कैसे कैसे चमकोले कपडे पहनकर पाती है। मेरे कपड़ों पर हंमती है । अम्मी को कहती हैं तो होठ काटने लगती हैं। बापू तो फौरन दुकान पर ले जाते थे। यह ले लो रेगु, यह ले लो वेटी ! कितना प्यार करते थे। मान में हैड-बहन जी से पूछूगी- क्या मेरे बापू सचमुच नही पायेंगे ? बापू । तुम इतने नाराज क्यो हो गये। मच्छा, अब तुम प्रा जामो मैं कुछ भी नही मागूगी। तुम्हें कभी परेशान नहीं करगी ! भइया से भी नही झगड़गी।
प्रतिक्रियाएं ५१ - भइया पोटेगा तो भी नही बोलू गी । तुम तो कितने अच्छे थे बापू । हमसे इतने क्यों रूठ गये? हैड-बहिन जी आजकल सिर पर हाथ क्यो फेरती हैं ? पहले तो नही फेरती थीं। बात भी नहीं करती थीं। - पता नहीं- मभी लोग क्यों बदल गये ! बापू भी बदल गये। एक दिन भी प्यार किये बिना नही रहते थे। अब इतने दिन हुए, हमें याद भी नहीं करते। चिट्ठी भी नहीं लिखते ! जब मैंने अम्मी से कहा- मैं भी बापू के देश जाऊंगी। उन्हें मनाकर लाऊंगी। अम्मी ने मेरा मुह बन्द कर दिया। मेरे मुह पर हाथ रख दिया । वह कितना ही मना करें, मैं जाऊंगी जरूर। यह भी कोई बात हुई कि रूठ गये और कोई मनाये भी नही । बापू तो सबको मनाते थे। सबको राजी रखते थे। मैं अभी दादी से जाकर कहती हूँ। मैं अब जरूर बापू को मनाने जाऊंगी। देखें, कैसे कोई रोकता है। मैं दादी की परवाह ही नही करू गी। मन्दिर के बाबा से बापू के देश का पता पूछ लूंगी। हा, यह ठीक है। बाबा सब जानते हैं । सभी लोग बाबा से ही पूछते हैं। मैं भी बाबा के पास ही जाऊँगी। वे सब बता देंगे। बस ठीक है। मैं बाबा से ही पूछ लेती हूं। राकेश : बेटा : उम्र सात वर्ष आखिर पापा कहां गये? अम्मी कहती है तेरे लिए छोटी साइकिल लेने गये हैं। साइकिल लाने में इतनी देरी थोड़े ही करते हैं। अम्मी हमको बुद बनाती हैं। भाजकल दूध भी नहीं देती । यह अम्मी को क्या हो गया है । हर वक्त उदास रहती हैं। कभी हंसती भी नहीं। पहले तो हंमती थी। रोज कंधो करती थीं। अब मैले कपडे ही रखती हैं। धोती भी नहीं । मीनू कहती थो, तेरे पापा मर गये। झूठी कहीं की। दादी कहती है पापा भगवान के देस गये हैं। अम्मी कहती हैं- तेरी साइकिल लेने गये हैं। सब हमे बुद्ध -- बनाते हैं। जब पापा घोड़ा बनते थे, मैं सवार, तो कितना मजा पाता था। अब तो वह मजा ही नहीं रहा । जाने पापा कब पायेंगे। दादी हर वक्त रोती क्यो है ? मम्मी चुपचाप क्यों रहने लगी? आखिर इनको क्या हो गया ? माजकल कोई पैसे भी नहीं देता। पापा तो रोज देते थे। ये सब राजस्थान के बहानीकार : .. .. लोग कंजूस हैं। मेरे लिए बिस्किट भी नहीं लाते । मैं भी बड़ा होकर इनको कुछ नही दूगा। केवल पापा को अच्छी-अच्छी चीजे दूंगा ! पाने दो पापा को- इन सबकी शिकायत करूगा। पापा नाराज होगे। तब पता चलेगा इनको। चर्चे, अभी तो बाहर चलूं । लड़के राजा-चोर-सिपाही गेल रहे हैं। हम भी खेलेंगे । माज मैं मिपाही बनूगा। चद आवाजें : हम उम्र-दोस्त एक प्रावाज यार रामभरोसे भी क्या प्रादमी था ! दूमरी प्रावाज शात मोर गम्भीर। तीसरी प्रावाज भीतर-भीतर टूटता गया, पर जुबान से 'उफ भी नहीं किया। चौथी आवाज किसको कहता वेचारा ? यहां सुनता ही कोन है ? लोग खिल्ली उडाते हैं। पहली प्रावाज दो छोटे-छोटे बच्चे हैं विचारे के। दूसरी अावाज कितनी मुश्किल से जिये थे ! तीसरी अावाज कौन परवरिश करेगा इनकी ? चौथी पावाज सुना है पत्नी पढ़ी-लिखी है। दूसरी आवाज पार, एक बात कहूं। विधवा है तो दमदार । तीसरी आवाज क्या मतलब? पहली प्रावाज इसको नजर तो शरीर पर ही फिसलती रहती है। चोयो अावाज अरे शर्म कर यार। दर्द के साथ दिल्लगी अच्छी नहीं। दुमरी आवाज मेरा मतलब यह नहीं था। पहली प्रावाज अब रहने भी दे अपना मतलव । तामरी अावाज टापिक बदलो, वोर हो गये। चौथी ग्रावाज मजाज की वह नक्ष्म याद माती है- जैसे बेवा का .. .. .. शबाब"... तीमरी प्रावाज दूसरी आवाज पहली अावाज चौयी अावाज यार बन्द कर यह बकवास । ये तो गांधी बाबा है, न बुरी कहे, न सुनें, न देखें। सुना है रामभरोसे कवि भी था। हिन्दुस्तान को एक चौथाई प्रावादी कवियो की है।
प्रतिक्रियाए
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पहली आवाज
तीसरी आवाज
चौथी आवाज
दूमरी आवाज
[ एक ठहाका । जोरदार हंसी ]
सुना है विधवा नौकरी करेगी।
कौन देगा इस उम्र में नौकरी ।
ये दे देते, अगर ये अफसर होते ।
देख, मुझे ऐसी मजाक पसंद नहीं।
दिमाग को गिरवी मत रख ।
अरे हंसी -मजाक में गर्म क्यों होता है
लोगों की इज्जत तुम्हारे लिए हंसी-मजाक है।
जान, आपको बुरा लगा तो मुझे खेद
बोर हो गये यार। टापिक बदलो ।
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तीसरी आवाज़
दूमरी आवाज
चौथी आवाज
पहली प्रावाज
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फैसला
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कमर भेवाड़ी
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फैसला गांव में चहल-पहल शुरू हो गयी थी। सवेरे का सुख सूरज पूरव दिशा को बड़ी पहाड़ी की चोटी पर मा टिका था। नुक्कड़ की दो-चार दुकानो के साथ-साथ जग्गू की होटल के भी पट खुल चुके थे। वैसे पौ फटने के बहुत पहले ही जग्गू को होटल पर जमावढा शुरू हो जाता है । पर आज बहुत देर बाद जग्गू ने दुकान खोली यो। नित्य की तरह जगू का चेहरा माज खिला हुमा नही था। शायद रात की घटना का प्रभाव अभी तक उसके मन मस्तिष्क पर शेष था। फिर भी वह अपने ग्राहकों का पूरा ध्यान रख रहा था और माने जाने वालों के सवालों के जवाब दे रहा था। इस बार बारिश बहुत अच्छी हुई थी। मकई की फसल पूरे उठान पर यी। अभी फसल के कटने मे देर थी। इसलिये जग्गू की होटल गांव वालों का खास अड्डा बनी हुई थी। इस वक्त भी दस-बारह ग्राहक जमे हुए थे। जिनमें सात-पाठ दुकान के अन्दर बैठे चाय सुडक रहे थे। शेष बाहर की टूटी बॅचो पर डटे थे। ये लोग चाय-वाय पो चुके थे और अब बैठे-बैठे गप्पबाजी करते हुए वीडो फूक रहे थे। जग्गू की यह होटल गांव की आबादी के पिछड़े इलाके में स्थित थी। जहाँ अधिकतर गरीव लोगो के घर थे, जिनमें चमार, रेगर और बुनकर लोम रहते थे। ये सभी लोग खेतीहर मजदूर थे और ठाकुरो की भूमि पर मजदूरी करके अपना पेट पालते थे। यहां की आवादी पूरे गाव की प्राबादी का एक तिहाई भाग था। और पिछड़े लोगों का यह इलाका चमार टोला के नाम से मशहूर था। - नन्दू काका को इधर आते देख कर जग्गू ने छोटी केतली मे पानी उबलने के लिये रखा और उसमें दो चम्मच चाय और शक्कर मिला कर बिना दूध की एक गिलास कड़क चाय तैयार की। नन्दू काका इस इलाके के मुखिया थे और पूरा चमरोटा उनका मादर करता था।
राजस्यान के रहानीगार जागू के हाथ में चाय का गिनाग यामते हुए नन्द काका ने पूध ही निया "यो रे जगुवा कल गध्या को मारा मोरगुल हवा तेरे हिया ।" बात पूछ कर कामा ने नग्गू के चेहरे पर अपनी निगाह टिसा दी। जगुभ सुन मुन । यह कुछ बोने उमर पहने दो वान 31 किमना रेगर- "काया ठाकुर गावीर के लोई-सपाटे न पाये थे जगुवा पर मोर बहत रहे कि- माले होटल चलानी है तो गोधी तरह पता नहीं तो एक दिन बाग में भुभम देंगे । यह सब देव मुन जगुया को जरो शह मार गया। एक बार तक नहीं पूटा मुंह मे तव शेला रधिया-"काहे हो या माश्य यो धमकाय रहे हो हम विचार को। इसका दोम तो बताओ।" इस पर बिफर उठा पा ठाकुर का बड़का लोडा "मालो अब दीम भी हमों को बनाना पडेगा यया? तुम सय मादर... हो। मैं तुमसे एक-एक मे निपट लूगा । दिन गत इम होटल में इकट्टे होर पालोटिरसम मेलते हो मोर हममें पूछने हो कि दोग क्या है ? "मला काका प्रय तुम ही बनायो यया हम चाय भी नही पियें। ये ठाकुर लोग तो दा को बोतलें को खोत खाली कर दें और हम माय पीने इकट्ठे हों तो वह इन पोपीटिकाम . कुछ क्षण मौन छाया रहता है फिर इस दुप्पी को तोड़ा जग्गू के छोटे भाई रामेश्वर ने । निमे गांव वाले प्यार से रामसर वहते है । रामेमर हष्ट-पुष्ट और एक गुस्सैल नवयुवक है । यह माजकल शहर के पलिज में पढ़ रहा है। यह कहता है--- "काका, भइया वा कमर ही क्या है ? यम उन्होने यही तो कहा था कि इस बार सरपच चमार टोला मा प्रादमी बनना चाहिये । बस, इत्ती मी बात पर ठाकुर टोले में भाग लग गई । तुम्ही बतायो काका, गया चमार टोले का प्रादमी सरपच नहीं बन सकता?" "क्यो नही बन सके रे रामसरवा ! जहर बन सके है। पर ठाकुर लोगन में वैर दोन मोल ले ?" शुढे कासा ने अपने अनुभव के माधार पर कहा जग्गू की होटल के ग्राम-पास भीड़ इकट्ठी हो गई थी। कुछ लोग बैठे खडे थे। दो-चार औरतें भी जो शायद खेती की ओर जा रही थी, एक कर वातचीत सुनने लग गयी थी। एक मीटिंग या दृश्य उपस्थित हो गया था। "इममे वैर मान लेने की क्या बात है काका।" जस्से सुधार ने बात वो आगे बढाया। यह तो अपने अधिकार की बात है। कानून कहता है कि हमारे देश माय लोकतन्तर है। हर प्रादमी मरपत्र का वोट लेने खडा हो सकता है। फिर चमार टोने का प्रादमी क्यू नही खडा हो सकता ? - थे फैसला । "तुम्हारी बात ठीक है । देस मांय कानून है, लोकतन्तर है।" काका ने कहा- "पर तुम नहीं जानते इस गाव तक देश का कानून नहीं पहुंचा । हियां तो अभी तक ठाकुरों का ही राज है । हमषं उनकी मरजी के हिसाब से चलना पड़ता है। अगर हम अपनी मरजी से चलेंगे तो वे इस गांव मे हमारा रहना दुर्भर कर देगे। वे कहते हैं कि हमने सरपंच के चुनाव में अपना प्रादमी खडा किया तो वे अपने कुत्रों से पानी भरना बन्द कर देंगे। अब तक यही हुआ है ।" "अव यह नहीं होगा काका। अगर ये हमें पानी नहीं देंगे तो फिर इस माल फमल का बटवारा भी नही होगा। ये हमें पानी नहीं देंगे हम उन्हें अनाज नहीं देंगे।" एक और कालेजियट लडका भीड़ में से बोल उठा। "तुम अनाज कइसे नही दोगे । जमीन तो ठाकुरों की है।" काका ने कहा। "जमीन ठाकुरों को नहीं काका । जमीन हमारी है, क्योकि वरसो से हम उस पर अपना खून-पसीना एक करते आ रहे हैं।" रामेमर चीख उठा। "यह झगडा बढ़ाने वाली बात है रे रामेसर इससे टटा बढ़ेगा।" काका ने कहा। "इस बार सरपंच हमारे टोले का प्रादमी बनेगा काका, चाहे संघर्ष बढे या घटे।" एक साथ कई युवकों की अावाज गूंज उठी। "अच्छी बात है रे भइया ! अगर तुम लोगन ने यही सोच लिया है तो ठीक है । तुम चाहते हो कि धमार टोले के लोगन को ठाकुर के प्रादमी लाठियो रो पीदें तो मैं भला इसमें क्या कर सकता है।" बड़े निराश स्वर में काका ने कहा । “काका लाठियों और बन्दूकों से कायर लोग डरते हैं । फिर हमारे हाथ में कोई चूड़ियां नहीं है। यह फैमला तो एक दिन होना ही है, फिर वह आज ही क्यो न हो जाय । प्राखिर कब तक कुछ मुट्ठी भर लोग हमे लाठियो और बन्दूकों के बल पर अपनी मर्जी के अनुसार हांकते रहेगे । अब हम ईट का जवाव पत्थर से देंगे।" रामेसर ने दहाड़ते हुए कहा । "हां हम ईट का जवाब पत्थर से देंगे।" वातावरण में एक साथ कई स्वर फूट पड़े। मूरज का लाल-लाल गोला आकाश के मध्य प्रा कर रुक गया था और उसकी तेज किरणें धरती पर सीधी पड़ रही थी। सूर्य के तेज प्रकाश में चमार टोला के लोगो के चेहरे दमक रहे थे। उनके अन्दर एक नये संकल्प के उत्साह का समदर ठाठे मार रहा था। उधर ठाकुरो के शान्त साम्राज्य में प्राग लग गयी थी। ठाकुरो के हौसले पस्त थे। ठाकुर टोला ईर्ष्या और बैमनस्य की प्राग में जल रहा था और वहां से भाग को भयानक लपटें उठ रही थी।
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बरना योगेन्द्र किसलय
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बरना गज्जू ने अपनी जात में अनेक शादी-विवाह देने थे। बारातों में भी गया था। पीले कुर्ते में, गले में मोने की चमकती हमुली पहने, माथे पर तिलक लगाए, आंखों में गहरा काजल सोचे, पावो में एडीदार पर चरं.... ... वाले शहरी जूते पहने हर ढय से सयरे संवराए बरने देखे थे । लपटना कैमा लगता था वरने के भेप मे । काला, ताड मा लम्बा लेकिन दुल्हे की पोशाक में जंचता था मेरा यार । उनकी बारात में वह गया था। गररोसा भी इसी तरह सजा था और रामभरोसे की शादी में तो क्या प्रातिशवाजी छूटी थी । शोले प्रासमान से जा जा के टकराते थे। आसपास के दम गांवों में उजाला हो गया था। और अब भागनगा ये लपटना भी ब्याह लाया । ऐसी यात नहीं कि गज्जू का मन हिरण या हरे-भरे खेतों की फुलक- फुलक को चर जाने वाली नील गाय की तरह छलांगे न भरता हो, लेकिन वह सोचता था कि उसका दादा भी एक दिन उसे बरना बना कर ले जायेगा। और फिर उसके बाप और चाचा के पास तो बीम दोश जमीन भी है। बड़े घर के ठाकुरो के पुरखों ने मोहसी दी थी, तभी से चली आ रही है । गाव में और पाम खूट भर जमीन भी नहीं है । गग का यह सोचना विलकुल मही था कि सारे चमारो में उसके पर की इजत है और उसको या उसके चाचा के लड़के धीरा की शादी सबसे धूम- किसी भी चमार धाम में होगी। . इसी सोच मोच में दो वर्ष बीत गए । गज्जू अब सोलह का हो गया था। धीरा और वह सारे दिन खेत के काम में लगे रहते। वीस बीधा अपनी जमीन थी और पचास बीघा बटाई की खेती थी । धीरा उससे दो वर्ष छोटा होगा। दोनो मे सगे भाइयो का सा व्यवहार था और वास्तव में दोनो बहुत वर्षों तक यही समझते रहे थे कि वे एक ही बाप की औलाद । धीग गज में दादा तोता को दादा ही बोलता और धीरा के वाप छिद्दा को वे दोनों ही चाचा कह कर पुकारते।
राजस्थान के कहानीकार नोता और छिटा के घ र उन दोनो की बहनों के पलावा थो नत्यो। नत्यो ने पाठ वर्ष इसी उम्मीद मे काट दिए थे कि कय गज्जू बड़ा हो । तोता का बडा लडका विवाह के दस महीने बाद ही मर गया था। नत्यो की उम्र उस समय पन्द्रह के करीव रही होगी। तोता ने तो नत्यो के बाप से कहा था लडको है। कहीं और ब्याह दे इसे ।" मगर नत्यो का बाप ही मुकर गया था। वोला "मुझे ऐसा घर कहा मिलेगा। उमने सुझाया कि नत्यो गज्जू की हो जायेगी। गज्जू जवान हो तब तक यही पडी रहेगी।" तोता भी इस पर राजी हो गया था । नत्थो भी जान गयी थी, और तब से वह पीपल वाली शीतला मैया से यही विनती करती रही है कि गज्जू वेग से बड़ा हो । वड़ा मातवर जवान निकले।" और नत्यो प्यार से गज्ज को खाना परोमती । गेंचती की रोटी गुह साथ मठे मे मोड़ मीह कर खिलाती । मलाई से तर दूध का गिलाम पिलाती मोर खोयी-खोयो प्यासी पानी से जव तव गज्जू को ताकती। अच्छे नैन नक्श हैं । देह का भी भरा पूरा निकलेगा । वह पूछतो आज के हाथ ठेका मारे ? मट् में कौन जीती ?' और कभी-कभी क्या रोज ही शाम को झुटपुटे मे धो या प्रचार निकालते समय भीतर की कोठरी में, दुपारी में जब कभी भी एकान्त मिलता तो वह गज्जू को थाम लेतो, उसे अपनी बाहो में खीचकर अपनी छातियों से लगा लेती, जगह-जगह कटखने चुम्बन लेती और इससे पहले कि उसके शरीर को गर्मी बाहर निकल पड़े गज्जू घबरा कर, शरमा कर किमी तरह अपने को छुड़ा भाग जाता। अकेली सडी या लेटी नत्थो थोड़ी देर खोयो मी रहती फिर मुस्कराकर घर के कामकाज में लग जाती। - गज्जू सोलह बरस का हो गया, कोई बच्चा नहीं रहा। नत्थो की कोड़ानों से उसका शरीर झनझना उठता और उसकी गिरफ्त से दूर निकल कर उसके अोठों से निकल पडता था 'ससुरी'। उसके चेहरे पर मम्से निकल पाए थे। 'जवानी फूट रपी है मेरे राजा को' नत्थो कहती थी। नारी-स्पर्श से उसका शरीर विचलित होने लगा था । पोखरे पर समरथा को जवान लौडिया विदिया को कपड़ा कूटते और नहाते मे उसने नितंग मंगा देखा था और छुप-छुपाकर ऐमे दृश्य देखने को उसका जो चाहने लगा था। रेवती को अट्ठनी के कलाकन्द के लोभ में पयामू, धोरा और वह कई बार सेतो में ले गए थे। गज्जू से वह कहती "दायरी के तुम मोप मार के मानोगे।" इन दिनो रेवती ससुराल चली गई थी। पर न जाने क्यो नत्यो के बाइपाश में गज्जू को सांस फूलने लगती थी ?
बरना ६५ कई बार उसने सोचा कि धीरा या श्यामू से पूछे लेकिन मन मारकर रह जाता। सोचता नत्थो अपने घर की लुगाई है । औरो से उसकी चर्चा नहीं करनी चाहिए । नत्थो देखने में अच्छी खासी थी । रग में जरा सावली मगर नैन नक्श तीखे और बदन अाकर्षक था ! शरीर को काठी मजबूत थी। पांवों में पड़ी इक्तडी झांझर घर प्रांगन में झनझनाती रहती। कमर में पड़ी चादी की भारी करधनी से चलने पर नितम्बो में लचक पैदा होती थी। पाखो मे पतला काजल पुता रहता; कलाइयो मे मोटे कांच की चूडिया। बहुत पहले विधवा हो गयी थी लेकिन उसका साज मिगार सब सघवानो जैमा था। विधवा हुई अवश्य थी लेकिन फिर से सघना बना दी गयी। जैसे-जैसे गज्जू का सीना और लम्बाई बढती गयी वैसे ही नत्थो के भीतर गुदगुदी होती गई। मन के मीठे कम्पन का अर्थ बह क्या ममझे ! लेकिन उम्र की कोयल अपने आप कुहुकने लगती है। शहर को नीली, फिरोजी आंखो वाली कोमलागी मेम हो अथवा गांव की रग चढी गवारिन, सपने दोनों की प्राखो मे तैरते हैं, बाहो को खोलकर किसी को उसमे भर लेने की ललक दोनो के मन में समान रूप से होती है। और नत्थो के मन में यह ललक उफनते सागर की प्रबल तरगो की तरह उठती और असहायता के उदासीन किनारो से टकरा कर बिन्द्र र जाती। गज्जू उसका एक मात्र किनारा था। वह चाहती थी कि उसका मर्वस्व गज्जू के अस्तित्व से टकराये और इस टकराहट में वह बिलकुल खुल जाए, खिल जाए, अग-अंग से बिखर जाए । वह सब कुछ जानती थी। उसने हिलती हुई चारपाइयो का शोर सुना था, एक पिछोरे में दो देहे असफल रूप से दुबकी हुई देखी भी। वह जानती थी सन, वायदे और छेडछाड का क्या मतलब होता है ? भूमती हुई अरहर के खेतो मे घास खोदते मे पकड ली जाने वाली कुवारियो और जवान बहू-औरतो की चाही-अनचाही मस्तियों से वह वाकिफ़ थी। वह भी वेदाग नहीं रही है, यह वह जानती है । रामपियारा लटू की तरह उसके चक्कर काटने काटते स्वर्ग ही चल बसा । बडा गन्दा वक्ता था कमीना । लखना जाट ने भुट्टो से पदरायी ज्वार के खेत मे उसे नीचे डाल लिया था। कितना डर रहा था उसे पूरे माह - तक मोर जब फिर से उसकी धोती में दाग पड़े थे तब पीठ और पेट में जानलेवा दर्द होते हुए भी उसने राहत की सांस ली थी और कम्बस्न रुक्मिनी ! उसे तो मर्द होना चाहिए था। ऐमी मसमसाकर छातिया दबाकर भाग जानी कि कई दिनों तक दर्द बना रहता। पास सोती तो चिपक जाती, काटती, रिरियाती। प्रागदयी मर्द होती तो महरिया की जान ही ले लेती। जितनी दबंग और तन्दुरस्त वह खुद थी उतना ही झपू और तिनके से शरीर का सका .
राजस्थान के कहानीकार ख़सम था । प्रौरने हमी • हिओनी करतो तो बेझिझा कहती- "जार मुवावनी हूँ वाय।" दृश्य पर दृश्य, मपनों पर गपने नत्यो की ग्रोमो में पिछले मात-पाठ वर्षों से घूमते-तैरते रहे हैं । वह कभी भी नहीं । उसने अपने शरीर को बोला नही होने दिया । चमटो को चिकनाहट घिग्घी छूट जाई और शरीर तिरा देने वाली धूप में भी बनी रही। उम्मीद बहन मशक्त वस्तु है। और अब उसके दिन पाए हैं। गज्जू मोलहवा पार कर चुका है। उसका मीना यहत गौड़ा फैला है । बह बडा रूबीला, मातवर मर्द हुमा है। बिलकुल जैमा वह चाहती थी। गज्जू को भी नत्थो के माथ अपने सम्बन्ध का पता लग चुका था। पहले वह कभी नहीं जानता या और नत्थो की शरारती और चेष्टाम्रो मे धवडा कर वह दूर भागता रहता, परन्तु अब वह मन ही मन जान गया था कि वह नत्यो के लिए क्या है ' मरजू पडित जब तब उसमे परिहाम करते : 'तेरे बाप ने तो पैले से ई वाध रखी है।" एक दिन हीरा कुम्हार अपनी लुगइया के मामने ही पूछ बैठा, "क्योजी अब तो चढाई सर कर दयी होगी।" "हट ममुरे भगो"-गज्ज भैम हांकता हुमा मागे बढ़ गया। शमं में उसके कान लाल पड़ गए। नत्यो को लेकर जमे कोई मजाक अच्छी नहीं लगती। न जाने क्यो ? उमने गुस्से में भैम के पुट्टे पर अरहर की लकडी खीचकर मारी और उसके पीछे-पीछे तेज कदमरे से चलने लगा। - गज्जू ने नत्यो के सम्बन्ध में प्रत्र अधिक गहराई के माथ मौचना प्रारम्भ किया । उसे नत्थो का अपने प्रति प्रेम और अपनत्व का दृष्टिकोण ममझने में कोई विशेष कठिनाई नहीं हुई । वह प्राखिर अब सव कुछ समझता था। ऐमी बात नहीं कि वह खुद ही नत्यों की चेप्टामो तथा फोडापो से दूर भागता रहा हो बल्कि वह प्रारम्भ में इस सम्बन्ध को गलत समझे बैठा था और अब इस सम्बन्ध की प्याख्या हो चुकी थी। "अरे तेरे लिये तो बैठी रई है हाथ से हाथ धरे ।" यह वह बहुतो के मुखों में मुन चुका था। सो नत्यो को नहीं स्वीकारने जैसी कोई बात नही थी। घर मे उठते चरते वह नत्थों को चोरी-चोरी अयं भरी नजरो मे देखता था और देख कर हाम्बी सांस भी भरता था। लेकिन जब-जब भी वह उमके प्रति अग्रसर होती, जब-जब भी उमकी दैहिक मोरत जागती और वह गज्जू को अपनी मासल परिधि में वेष्टित करने की चेप्टा करती तब गज्जू अनाडी को भाति पयगकर नत्थो को पकड मे दूर भागता। रह जाती केवल नत्यो रात के अंधियारे में दुपारी मे खडी या खाट पर टागे फैलाए पडी~विवश परन्तु बलवती उम्मीद की चमकदार रेखा को अपनी मांखों में भर पाने वाले कल की .
बरना प्रतीक्षा मे । वास्तव मे अब वह और अधिक बाट देखना नहीं चाहती थी। लुब्ध यौवन का लगभग एक दशक उसने बिना रति-मुख के काटा था। यब वह थक गयी थी, या कहिए ऊब गयी थी। अब अवसर वेअवमर शरीर मे उठने वाली सिंहरन में वह तग आ गयी थी। अव काम उद्दीपन को दवाग रखना उसके वश की बात नहीं थी, विशेषकर जब उसके सामने भरी पूरी देह वाला उमका गज्जू इस निमित्त पा गया हो। वह स्वयं मे ही वह उठती 'रे, और वित्ती वाट बरवावेगो हरजई ।" शीघ्र ही मब कुछ नत्थो जैमा चाहती थी बैमा उमे मिल गया । गज्ज उसके पास जाने लगा था। रातों को अब वह मीधा उसके कोटरे में या जाता। कुछ ही महीनों में उसके गाल पिचक गए और चेहरे की हडिया उभर प्रायो । औरतें नत्थो को छेउती निगोड़ी, छोरे पे जरा मिहरवानी रख । सारी निचोड़ के रख दयो है तेने' । गज्जू के साथी सगाती कहते . 'हद कर दई या भृक्खा ने बिलकुल कुत्तं की सी गति कर रक्खी है।' गज्जू मन में अब कोई भ्रम नहीं रह गया था। नत्थो खुले प्राम उमे 'श्रो जी' कह कर पुकारती । अमके कपटें लत्तं सब नत्यों की कुरिया में आ गए थे । नत्थी उस पर अपना रग जमाने में सफल हुई थी। उसका मवूत पा कि कोई भी रात खाली नहीं जाती थी, और गज्जू खुद पहल करने लगा था। लेकिन शायद नत्थो गलत थी । गज्जू की हालत उम शगयी थी तरह थी जो नशे में चूर रहता और होश आने पर ग्लानि और क्षोभ की भार से परेशान रहता । इसके अलावा क्लोदा ने उसका दिमाग खराब परने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उमर में कसौदा उसके बाप के बराबर था पर उससे ऐ में बतियाता जमे उसकी उम्र का हो। गज्जू एवान्त में कलौदा की बातें सोचता और उसकी सच्चाई का अनुभव करता । "अधेड़ थमा दगी है तेरे बाप ने । परे तो का कमी थी। ढग शादी विवाह करतो । तीय वरना बना के ले जाते । दत्त दिया रिश्ते बताए तेरे बाप कु मगर वा कान पे तो जू भी ना रंगी। जरा मोच उमर मे के साल वडी तोमू ?" कलौदा के चगुल में गज्जू धीरे धीरे फमता चला गया। सविन थाप से मागे वोतने की हिम्मत नहीं पड़ती। नत्थो में बैमना बतियाता, लेकिन रात में नयी उमे जैसे सब कुछ भुला देती। वह खुद भी न समझ पाता कि उमे नयों की बाजू म माने ही न जाने क्या हो जाता है । गर्ने प्रानन्द की थकान में योझ्नि एक झपकी में गुजर जाती । फिर दिन प्राता पीर फिर वह अपने राजस्थान के कहानीकार । मन में विद्रोह का साहम एकत्रित करता रहता । साल भर भोर गुजर गया । तोता और नत्यो दोनों ने गग्जू के मन को भाष लिया था । गज्ज़ ने घर मे रार मचाना शुरू कर दिया था । दिन भर घर मे बाहर रहता । रातो को भी मेत पर सो रहता या कलोदी के चबू- तरे पर पड़ा रहता। दोनो माई मलाह करते । तोता कहता- "माले कलोदी को शरारत है।' फिर चिलम का कश भरता हुमा कहना 'या गजुमा को मति मारी गयो है. सिगरे दिन भन्नायो मा फिन है । अपने प्राप ठिकाने पे प्रा जावंगो।' मगर गज्जू ठिकाने पर नहीं पाया। वह और भी भन्नाया फिरता । अब तो घर में खुला कहने लगा 'दादा ने मेरे मंग जादती करी हैं।' वह चाहता था कि उसके शब्द हूबहू बाप तक पहुँच जायें। वह तरह तरह की कोशिशें करके रह गया लेकिन तोता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नस्थो इसी बीच एक तनाव में जीती रही । वह यह सोचकर रह जातीकि बिरादरी वालों ने गज्जू का दिमाग खराव कर दिया है। इस कलोदा ने अपने लडके के लिए उसकी वात चलायी थी लेकिन उसके दद्दा ने घर पसन्द किया तोता का । अव उसे मौका मिल गया था गज्जू को बरगलाने का। गर्मियों में प्रा गयी धीरा की शादी । धीरा के विवाह के पाच दिन रह गए थे। उसके बदन पर रोज हल्दी चढती और वह औरतों लड़कियों के बीच में घिरा रहता। गाव को पोखर तक उसे गीत गाती औरतों, के झुंड के पागे सूप पूजने को ले जाया जाता । खेती-बारी के कामो में वह पूर्णतया मुक्त था। गज्जू धीरा के मुकद्दर से डाह करता और सारा दिन इधर उधर घूम भटक कर काटता । उसके बाप ने जब उससे एक दो नए कुरते बनवाने को कहा तो वह उबत पडा । "मोपना चाहिए तुम्हारे कुरता-धुरता । जो कछु करनी है तुमें सो धीरा के लें करो।" धीरा की शादी होकर प्रा गयी। घर में नयी बहू ही बहू दीखती। बड़ी हवेली ठाकुरों के यहां गयी तो वहा से पंद्रह रुपये मुंह दिखरौनी में मिले । उममे मे पाच धीरा ने मार लिए । गज्जू के साथ कलाई जाकर तीन रुपये का कलाकन्द खरीदा। खुद खाया मोर एक दोने मे अपनी बहू के लिए रख लिया। गग्जू के सामने जब भी धीरा की बहू पड़ती तो वह ठगा सा उसे बरना देखता रह जाता। लाल, पोलो साड़ी में वह बड़ी लुभावनी लगती। नत्यो को सारे दिन जिया-जिया कहती और उसका दिन का अधिकांश समय उसी के साथ बीतता। यह कोठरी के बाहर खड़ा था। खेत से लोटकर आया था। कोठरी के किवाड़ भिड़े थे और अन्दर नत्थो नयी बहू से मजाक कर रही थी। "अरी कछु बताय के तो दे। तू तो ऐसी भोली बन रई है जैसे कछु जानता ही नाय । सिगरी रात छत पे चरसइया चरमरायी है। माज मूं नीचे लगइये बिस्तर।" गज्जू की खंखार से धीरा की बहू कोठरी मे निकल कर उससे विलकुल सटती हुई सपाक से निकल गयी । महक रही थी । जरूर कछु खशुबोई लगा रक्खी होगी। इतनी नजदीक से गयी कि उसका सारा शरीर कांप उट्ठा । अन्दर पाकर बह चारपाई पर लेट गया। नत्यो रोटी लेने चली गयो। उसे कमरे में भी खुशबू आ रही थी। उसने चारों ओर नजर दौड़ायो। नयी बहू का कुछ भी तो नही था उनके कोठे मे। वह पडा-पड़ा मोचता रहा। उसने क्या कुसूर किया है। दादा ने उसके साथ ये नाइन्साफी क्यो की है । उसे बरना क्यों नहीं बनाया ? उसकी दुलहिन भी लाल, पीले चमकदार कपड़े पहन कर घूमती, उसके शरीर से खशबू छूटती और उसके लिए वह रोज कलाई से कलाकन्द और खोये की गुझिया लाता। नत्थो गॅचनी की रोटी, ग्राम का अचार और एक लम्बे गिलास में मट्ठा लेकर पायी । गज्जू अनमना सा उठ रोटी खाने लगा। नत्यो पंखा झलने लगी। "अाज काय को परेवट ही।" गज्जू चुप रहा। वह नत्यो से बचना चाहता है लेकिन नत्थो चतूर शिकारी की तरह उसे दबोच ही लेती है । जब-जब भी वह उसकी प्रोखों की तरफ देखता है तब वह इस तरह मुस्कराती नज़र प्राती है और उसका समूचा जिस्म इस तरह हिलता सा लगता है कि यह अपनी समस्त उपेक्षा के बावजूद भी उसके आगे साचार हो जाता है। नत्यो में माकर्षण अधिक चातुर्य है, अनुभव है। वह गज्जू की मनस्थिति भले ही पूर्णतः न समझती हो लेकिन यह अवश्य जानती है कि घोड़े को दाना पानी मच्छा मिलना चाहिये । रिझाने लुभाने की कला वह जानती है। यही कारण है कि अपना क्रोध बनाए रखने के लिए वह बाहर रहता है तो ठीक है लेकिन घर के अन्दर, नत्यो के साहचर्य में प्राते ही वह बदल जाता है- अपनी इच्छा के प्रतिकूल भी। रोटी खाने के बाद उसने एक लोटा पानी पिया और वही चारपायी राजस्थान के कहानीकार पर बैठे-बैठे ही एक कोने में कुल्ला किया और हाथ धोकर उठने लगा तो वरतन समेट कर ले जाती नत्थो ने कहा : "को जानोगे । भरी धोपरी है। तनिक सुरता लेउ ! मैं गुड की डली ले प्रवई पाई।" वह गयी और पायी। हाथ में पानी का लोटा और गुड का डेला । गुड़ के साथ पानी पीकर गज्जू जाने लगा तो वह उमका कंधा थान कर बोली- 'लू वू लग जायेगी । नेक माराम कसे चल जहयो।' और उसने गज्जू को ग्रीन कर लिटा दिया। खुद झाक गे उमये पास लेट गयी और गरजू के गाल पर हल्की सी बट्टी लेती हुई बोली- 'त्ति तो उनन ने घेर रस्त्री है । मारी रात इनी है । धौपरी मे तो हम कट्ट अपनी माचें ।' लेकिन नत्यो अपनी ममस्त मतकता और समर्पण के बावजूद भी गग्नू को बाध कर नहीं रख पायी । चतुर मे चतुर शिकारी भी जगल खाली हाथ लौटता है । यही हाल नत्यों का प्रा । यह गज्जू को मब कुछ दे मकी लेकिन गज्जू के मस्तिष्क में दूल्हा बनने की जो तस्वीर थी उमे वह छिन्न-भिन्न नहीं कर मको । गज्जू को उममे कोई शिकायत नहीं थी, न ही यह उससे ऊल-जलूल बाते ही करता । मगर उसके भीतर नत्थो के प्रति कोई उत्माह नहीं रह गया था । कलोदा के भड़काने लोगो के हेडने व इन दोनों में भी अधिक उसकी दिली इच्छा यह थी कि जो उमके अन्य साथियों को प्राप्त हमा, जो धीरा को प्राप्त हुअा वह उसे भी मिलना चाहिए। और नत्थो का इममें क्या बिगडना है ? उसे घर से बाहर तो निकाल नहीं रहा । शरीर पर हादी का उबटन..... आतिशवाजी, चूंघट खींचे लजायो दुलहिन रहता। और एक दिन बहुत दिनों से मन में अटकी बात उसने अपने दादा से कह दी। साफ, साफ । यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह घर से भाग जायेगा। उमे नही चाहिए जमीन जायदाद । कही मजूरी करने पेट भर लेगा । इस घर मे तो उमके साथ दुर्भात हुई है। उसे समझाना बुभाना बेकार रहा । तीन दिन घर में ही नही घुमा। नत्थो बड़ी हवेली चावल कूटने गयी तो पूछने पर छोटी बहमनी को उमने बताया "जिद्द पकरे बैठे हैं। अब तो मौत लायक ही मानिग्गे। नाश जाय उस कलोदी को। गुई जड है या सबकी । रोज बुलाय बुलाय के पट्टी पढायी है मरे नै।" वही हुआ जिसकी अभिलाषा भव तत्र गज्जू को उदलित किए हुए थी। गाव से, पन्द्रह कोस दूर उसका ध्याह पका हुआ । 'चट मगनी, पट ब्याह ।' ....... वह अक्सर यही सोचता एक रथ जायेगा, चार मारकस, दो तीन फिरक और लेहडियां ! सवारियो को खोज होने लगी। प्रातिशबाजी की पेशगी दे दी गयी ।गज्जू के हल्दी पुती । घर मे फिर वही गीत गूंज उठे जमे धोरा की शादी के वक्त मे गूजे थे । खुद धीरा की बहू रात भर ढोलक पीटती रहती । वाहर चबूतरे पर चारपायी पर लेटा गज्जू ढोलक की थापों पर रोमांचित होता आगे की सोचकर हुलम हुलस जाता । इस सारे क्रम में जितना ही खुश गज्जू था उतना ही दुखी नत्थो थी। इसलिए नहीं कि वह लुट रही थी बल्कि इसलिए कि वह हार गयी थी । गज्जू की मनोदशा से अनभिज्ञ वह यही सोचती कि उसमे शायद कुछ रह ही नही गया है कि वह अब किमी मर्द को रिझाने की उम्र में नहीं रही, मगर जब वह अपने को देखती और पाती कि उमको मामल देह मे अभी वह सब कुछ शेप है जो एक जवान औरत मे होना चाहिए तो वह कलोदी को गालिया देने लगती, उसकी सात पीढियो को कोमती और अपने प्रारब्ध के साथ समझौता करने का यत्न करती। उस रात गज्जू को अकेला पा उसे दूध का गिलाम देने पहुँनी तो गज्ज सकपका कर खाट से उठ बैठा । पोले कुरते पाजामें में वह अजीव लग रहा था। नत्यो टकटकी लगाए उमे देखनी रही । बहुत कुछ वह अपने बड़े भाई की तरह लग रहा था। थोडी देर वह खोयी रही, फिर बोती- "लो, दूध पी लेउ।" गज्जू ने उसकी ओर देखा । वह हस रही थी। 'लेउ नए बरना। दूध पिनो माउर सेहत बनानो । दोउ दाउ सभालनी परेगी अब । समझे।" हंसी मे कह तो गयी वह लेकिन अन्दर से कलेजा जल रहा था उमका । गज्जू ने दूध पीकर उसे गिलास थमा दिया । वह अन्दर चली प्रायो । भीतर प्रागन में गीत चल रहे थे। "मेरे बरना के सर पे मुकट सजो । होय मेरो बरना करे कमाल रे।" थोडी देर बाद ढोलक पर नत्थो की आवाज़ सुनायी दी। उमको प्रावाज तीखी और बुलन्द है । वह गा रही थी। 'जेवर गढाप दे रे कंजूस बलमा । हसुली गढाय दे टिकुली गढाय दे रे........ ने कुछ देर नत्थो के बारे में मोचा फिर परसो भोर की कल्पना करने लगा जब मारकमो मे प्रलम सुवह धारात रवाना हो जायेगी और उमी रात उसके फेरे भी पड जायेंगे । भौचने - " गज्जू मोचते उमे झपको प्रा गयी। बारात निकलते निकलते धूप चढ़ ग्रायो। दुमा पूजने जाने से पहले पज्जू ने नत्थो मे बीस रुपये मागे । उमने कुछ रुपये अपने पास जमा कर छोडे थे । नत्यो ने बक्से को चादी उसे यमा दो। गज्जू बोला । "तू ही निकाल ना।"
७२ राजस्थान के कहानीकार - नत्यो ने एक दस का और बाकी एक एक के खुले उसके हाथ में थमा दिए मौर फिर टुकर टुकर कर उसे देखने लगी। "वडे नीक लग रये हो वरता के भैप में। आखिर मन को करि के ही माने ।" गज्जू बाहर निकलने लगा तो उसका हार पकड कर बोली । "कहे देत हूँ मैं भी उठाईगिरी ना हूं। व्याहिता हूँ या पर की जित्तो हक नई को होयेगो उत्तो हो मेरो । निगोड़े, मैं तो तेरे ही कुप्रा को पिऊंगी। पियासी रक्खेगो तो गारी दूंगी, हा।" फिर हंस कर बोली, "डा ! अच्छी तर ब्याह के लइयो । प्ररे अब तो मुंह सीधो कर ले । तेरे जी की है रयी है।" और जब वह चलने लगा तो उसे अपने पाम खींचकर बड़े दुलार से बोली, "अरे एक चुम्मी तो देतो जा।" कुप्रा पूजन में चचिया सास और गनपता की बहू के साथ नत्थो सबमे आगे गीत गाती चल रही थी। गज्जू की चाल मे रोब था । उसके चेहरे पर चमक । उसकी नोकदार जूतियां चरमरा रही थीं। पांवो के लाल मोजे दूर ही से नजर आते थे। पीले कुरते और पाजामे में वह अपने आप को दुनिया का सब भाग्यशाली प्रादमी ममझ रहा था । दुर्जन काका चिल्ला कर कह रहे थे, "भरे मेहरवानो नेक जल्दी करो। का खन है गो। सारी धोपरी सर प है के गुजरेगी।" गज्जू अपने मारकस मे बैठ गया था। साथ में धौरा और उसके दो दोस्त भी थे। नत्थो अभी भी उसकी तरफ देख रही थी मगर उसका ध्यान कही और था। 00
मर्दानगी
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হালান
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मर्दानगी : उसे मामूली घटना कहकर दरगुज़र किया जा सकता है । और वास्तव में मैंने उस घटना को अहमियत दी भी नहीं थी। कल सम्पादक महोदय फा अपनेपन से भरा खत पाया । तिखा था- ख़ास तेवर की कोई तीखी और तत्ख कहानी भेजें। उन्हें मेरी दार्शनिक मुद्रा जंची नही। हालाकि मुद्राओं को अपनाना या प्रोढ़ना या नकाब चढाना मेरे बस का नहीं है। फिर भी अपनो के दिये विशेषण भले लगते हैं । वह मामूली घटना 'इस रिपोर्ट में कहानी की शक्ल ले ही ले, यह नहीं कह सकता।' तीखा, तल्ख क्या होता है, जायका लेने वाले जानें। उन दिनों का माहौल ही ऐसा था। मजिस्ट्रेट, अफसर और सिपाही खास बाजारों मोर खास सड़कों पर कहर ढहा रहे थे। किसी को क्या हिम्मत होती कि ख़िलाफत कर पाता । 'चूं' करने के मतलब, शामत बुलाना ।, जो पाती, नादिरशाही हुक्म सुनाती हुई निकलती-दूकानदार दूकानों के उन हिस्सों को तुड़वा दें जो फुटपाथ पर हैं। सात दिन. के बाद प्रशासन इन नाजायज कब्ज़ो को हटवा देगा। एमर्जन्सी। शहर का खूबसूरतीकरण । अातंक । शहर खूबसूरत बनाया जा रहा है,, ठेलों पर सब्जी, फल, चप्पलें, पेन बेचने वाले खदेड़े जा रहे हैं । लकड़ी की दुकानें मजबूत हैं, इसलिये एक दल उन्हें धराशाही करने के लिये साथ है। साइकिले फुटपाथ पर खड़ी हैं, या नीचे सड़क पर . हैं ! बटोर लो ! । खबर के सुनते ही भगदड़ मचती है। वह ठेला उस गली में घुस रहा है, वह उस गली मे। भागते-भागते भी दो चार दबीच में मा जाते हैं। सामान या तो ट्रक में जाता है या सड़क पर सुढको हाल दो में रहा लगता है।
राजस्थान के कहानीकार गाली पड़ती है- उल्लू के पट्टे डंडे के बगर नहीं मान सकते । जोशीने सिपाही एक दो बैत सड़कर देते हैं। जैसे स्कूल की यूनीफॉमें जिसका नुकसान होता है, चुप खड़ा देखता रहता है । जिसकी दूकान का हिस्सा तोड़ा जाता है, यह मलवा उठवाता फिरता है- तोड़ने वालों का काम सिर्फ बहाना है । सड़कें चौड़ी होनी चाहिए -- शहर सुंदर लगता है । कोई मुरा- पका नही कि दूसरो का पेट सिकुड़ता है। दूकानों के बोर्ड एक रंग के होने चाहिए होती है। शहर का रंग तय हो चुका है-दूकानें उसी रंग की होनी चाहिए । समाज- बाद में लाल-पीली-हरी-नीली क्यों ? अाजादी के मतलब यह थोड़े ही है कि मर्जी माए वहीं बेचना शुरू कर दो। पीछे तांगे वाला चिल्ला रहा है. आगे मोटर हॉनं दे रही है। नो ! नो ! दिस इज अनार्की, यह अव्यवस्थावाद है। नहीं चलने दिया जा सकता। अफ़सर जीप में बैठा हुमा चिल्लाता है-- व्हाट इज देट । उसकी खोखियाती प्रावाज़ और मेढकमी बाहर निकली प्रांघो का तर्जुमा बज्जरजट्ट सिपाही फौरन कर लेता है। मानन-फानन में ठेले को उलट देता है । सामान सड़क पर लुढक रहा है। वह टेले का मालिक मिन्नत के लिये हाथ उठाने का वक्त नहीं पाता। दांत नही निपोर पाता। व्यवस्था, व्यवस्था है । कब सलीके से , खूबसूरती से जीना सीखेंगे मह बेहूदे ! सरकार के आला अफसर और खुद सरकार, इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि प्रकार तो गवार है ही, शहरी तबका भी तरीके से जीना नहीं जानता। सिखाना होगा। स्टेशन रोड के फुटपाथ पर चार-पांच मारतें जमीन पर दूकान विधा. कर मामान यंचती हैं -- विदी , टिकुली, सुई, ताचोज का काला होरा, कंधा, छोटा शीशा, कैचो, दांत खोदनी । . । लहगा और चूनरी । चिकने पटियादार बाल । अधेड, जवान ।
मर्दानगी गांव के गंवार मोल-भाव के चक्कर में फंसते हैं । मच्छी दूकानों पर जाने को न उनमें ताव है, न इतनी प्रटी भरी है । 10 विषयांतर । मेरा एक दोस्त उस बीच वाली जवान लड़की की बनावट का कापत है । क्या ठोस जिस्म पाया है ! यह कहता है। कभी-कभी उससे बिला- जरूरत का सामान खरीद लेता है ताकि उसको नजदीक से देख सके । घटना यहां घटी थी। मजिस्ट्रेट साहब को जीप पाई । उसके साथ सिपाहियों की जीप । मोरतों को फुटपाथ पर माल बेचते देखा तो तेवर पढ़ गए। रुको ! - वह चिल्लाए । जीप एक गई। पोछे वाली जीप के ब्रेक लगा। सिपाही निकल पाए । देवने वालियों ने जीप रुकी देखी तो भागी सामान समेट कर । वह जवान लडकी जैसी बैठी थी, वैठी रही। चल ! साथी औरत ने कहा । उसने अनसुना कर दिया । उठ,यहाँ से ! सिपाही अफसर साहब को सुनाता हुमा जोर से बोला। काहे को? उसने सिपाही को तेज नजर से देखा। तेरे बाप का फुटपाथ है ? दूसरे सिपाही ने डांटा। तेरे बाप का है ? वह उसके बराबर तेज़ बोली। ज्यादा चर्बी चढ़ गई है ? मार-मार के हड्डी के जोड़ खोल देंगे। तीसरे मिपाही ने धमकी दी। वह तमतमाती हुई खडी हो गई। - साली होगी तेरी मां- बहिन । सामान के हाथ लगाया तो पत्थर से सिर फोड़ दूंगी.! एक सिपाही उसके विछे सामान को फेंकने के लिये झुका । उस पर जैसे म्यून सवार हो गया। उसने जोर से धक्का देकर उसे ठेल , दिया । भीड़ तमाशा देखने के लिए इकट्ठी हो गई। सिपाहियो का सामना करते देख कर लोग हम रहे थे । उसे किसी की परवाह नहीं थी। साहब पास चल ! पहले सिपाही ने कहा । उसने पकड़ने के लिये हाथ बढाया, लेकिन डर के मारे हाथ गिरा लिया । चल, चढवा दे फांसी पर । वह तनी हुई जीप के पास पहुंच गई। भीड़ 1 - के उधर हो ली। -- राजस्थान के बहानीकार -सामान हटा लो ! कल से घर मद बैठना। मजिस्ट्रेट ने जीप में बैठे-बैठे कहा । वह लड़की की हिम्मत देत चुका था। किधर 43, माप बता दो। दूकान नहीं लगेगी तो पेट कैसे भरेगा । उसने जवाब दिया। फुटपाथ पर बैठने का कानून नहीं है । यक यक मत करो। अपने हाथ के इंडे को अफमर ने जीप की दीवार पर बजाया। 'पार साल से इसी जगह वैटते हैं । अब कानून बन गया। गोत्रों के लिये कानून हैं, वस । जहर की पुड़िया बटवा दो साहय ! माहब सिटपिटा गए । भीड़ हो-हो करके हंस पड़ी । साहब मौर सिपाहियो को मिट्टी पराव हो रही थी, लोगों को मजा मा रहा था। फेंक दो सामान इसका । साहव 1ड़क कर बोले । सिपाही जैसे उस तरफ मुड़े, वह दौड़ कर सामान के पास पहुंच गई। -रुपया धर दो, और फेंक दो। माल किसी के बाप का नहीं है। निकालो रुपया ! जानो साहब से लामो ! सिपाही खडे रह गए । मजिस्ट्रेट 'साहब की हालत देखने लायक थी। कुछ लोग औरत कह कर साहब से माफ करने के लिये कह रहे थे । दूसरे ताली बजा रहे थे। मजिस्ट्रेट साहब ने इज्जत बचाने के लिये सिपाहियों को प्राज्ञा दी- कल फिर माना। नहीं माने तो थाने पहुंचा देना । सिपाही मन मसोम कर रह गए । जीप में भाकर बैठ गए। दोनों जी चल दी। भीड लड़की को घेरे रही। -क्यों खडे हो ? जाते क्यों नहीं ! खेल हो रहा था यहाँ ? जैसे उमने भीड़ के नामर्दपने को फटकारा हो । यह सामान ममेटने लगी। दूसरी औरतें, जो सामान उठा कर गली में भाग गई थी, लौट आई। क्या कह रहे थे री? एक ने पूछा। अपनी मां को जेल ले जा रहे थे। उसने उसी लहजे में कहा । सामान बाध कर बोली- चलो ! भीड़ तितर-बितर हो गई। IT ... न The Deelle Pelle delle मेहनताना
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मेहनताना तीम पैसे से ज्यादा मैं तुम्हें कुछ भी नहीं दे सकता । मेरी बात पर उसने अपने सर पर टोपी के नाम पर रखे काले से चिथड़े को कुछ ठीक करते हुए गम्भीरता से सोचा । तीस पैसे की अधिकतम सीमा मैंने खपच्चियो के पुतले जैसे उसके शरीर को मद्दे नजर रखते हुए तय की थी और मैं अपने निश्चय पर अटल था । उसने दयनीय तरीके से मुझसे नजरें हटा कर अासपास देखा । मुझे लगा जैसे वह नपी तुली भीड वाले उस चौराहे मे ऐसे किसी प्रादमी को तलाश कर रहा है जो उसके हित में तय पैमों को बदलवा सके। उसकी नजरें चौगह के सन्तरी साइकिलिया क्लर्को, ठेलेवालो और दूकानो के काउन्टरो को टटोल, लोट आयी। मुझे अच्छा लगा। उसके चेहरे में हा फेल कर चौडी हो रही थी- धीरे-धीरे। -चलिये आप भी क्या याद रखेंगे। उसने अाखिर बात मान ली। मुझे उसकी स्वीकृति से उतना ही मुख मिला जितना किमी अऊत वेटे के परेशान बाप को शादी के लिये किसी भली लड़की के बाप द्वारा वेशर्त हां कर दिये जाने पर मिल सकता हो। अचाहे मेरे कदम तेज चलने लगे। रविवार की धूप फैली थी-- फुटपाथो पर । दूकानों पर । चेहरो पर । वह कमर पर हाथ धरे एक पाव मागे चल रहा था। अपनी लय मे । मैंने अपनी गति कुछ मन्द कर दी । फासला थोड़ा और बढ़ गया । कमर पर उसका हाथ जोर लगा रहा था। सूखा और झुर्गभर हाथ । घुटने कागज से कमजोर उमकी तंग पैन्ट मे बाहर दिखाई दे रहे थे। ग्रामपास के तमाम नज़ारों को नजरअन्दाज करता, वह चल रहा था- किसी को भी विना परवाह किये । अपने में लीन । चुपचाप । हम अभी सिर्फ दस बारह पांव ही चले थे कि उसकी सास फूलने लगी।
ती। मेरा दम भी फूलने लगा था। फाटक अन्दर को मोर सरका उसने एकखामोश राजस्थान के कहानीकार वह उसी तरह चल रहा था। दो रंग के धमके जूतों से पसीने के कारण लाया हूँ मगर में भी मजबूर था । हट्टा-कट्टा कोई भी मजदूर बसेर साठ सत्तर पर भी लगा। जितनी इसके शरीर मे ताकत नही है उससे कही बढकर जरूरत जरू दिशग हटाकर मैने उसके चेहरे को देखा- ढीला झरीदार। उगे हुए मनियमित ८२ पेट फैरने सिकुडने लगा । खुदबखुद उसकी गति धीमी हो गई । उसने पीछे देवा । मैं दूसरी तरफ देखने लगा। न जाने क्यों। हवा गर्म गर्म वह रही थी । खाली सड़को पर । शरीरो, घरों, दीवारों को छूती हुई। मन्द-मन्द । उसकी कनपटी पर पसीना चिपचिपाने लगा। मैला मौर बदबूदार । एक हलकी सो गन्ध पीछे चल रहे मुझ तक पाने लगी। मैं अपने हिसाब के बारे में सोचने लगा। तीस पैसे दे देने के बाद पह रुपये और बीस पैसे मेरे पास वाको वच रहेंगे । लगभग दस लम्बे मोर कठिनतम दिनो के साथ । ऐसी हालत मे मैं खुद मजदूरी के तीस पैसे देने के बजाय लोहे का वह पुराना ट्रक उठा कर ऊपर वाले कमरे में घर सकता था पर बुखार से ३ मुझे अभी दो दिन भी पूरे नहीं हुए थे। अत: मेहनत करना मैंने उचित नहीं समझा और उसे बुला लाया। तीस पैसों में किसी तरह राजी कर। पिचपिच की अावाज फूट रही थी। उसने पीछे देखा । जवाब में मैंने सामने वाले घर को और सकेत कर दिया । एक चमक उसकी छोटी और मिचमिची प्रायों के मासपास जगमगाने लगी। जेब के पैसो को छू कर एकबारगी मैंने जोरदार साल इजाजत दरवाजे के बाहर खडे मुझ से मागी और जवाब पा वह मन्दर दाखिल हो गया। सुखद सन्तोष के माथ । मैंने उसे जगह बता दी। धूल जमी ट्रक एक तरफ रखी थी। उसी तरह । उमने हाथ कार से हटा लिये। एक क्षण को मुझे वह कुछ अस्वाभाविक लगा। वह तेज तेज सांस ले रहा था । लगातार । उसके शक्तिहीन से शरीर को देख कर मैंने सोचा, इसे मैं गलत बुत के तो बात भी नहीं करता । साथ-साथ इसके मुझे एक तरह से इसे काम देना ठी होगी। मैंने महसूम किया मोर बुला लाया। इम तमाम बात की गणित से, पपने नाम के प्रौचित्य पनौचित्य है। भाल । मा और समय को हालिये। थोडी मोती जाने कहां से उसm मेहनताना आ गई थी इस वक्त। उसने तेज सांस ली। मुझे लगा जैसे सारे कमरे की हवा खत्म हो गई है। -तो ये है वो दंक जिसे ऊपर के कमरे में रखना है। किसी रहस्योद्घाटन की तरह मैंने अपनी बात उसके सामने रखी । उसने बात उठाकर हूं भर दी। सन्तोषपूर्ण 'हूं' वह अपने हाथो को तोलने लगा। उसने बाहें ऊपर चढ़ाने के लिये हाथ एक दूसरे पर फिसलाए जब कि उसकी कमीज को बाहें पहले ही से फट फटाकर आधी रह गई थी। उसने हाथों को पूरे मर्दाने तरीक से ट्रक की ओर बढ़ाया । मैं उन निर्णायक क्षणो को एकदम करीब से देखने लगा। क्षण बीते । ट्रक के उठने के बजाय एक मरी हुई आवाज उठी। उसकी जवान से । दम फूलने लगा । सामो का सिलसिला तेज हो गया । - है भारी-वायूजी- वह बड़बड़ाया। इस बार उसने टांगों को कुछ चौड़ा कर लिया । अबकी बार मैंने नोट किया कि उसकी और मेरी पेन्ट का कपड़ा चन्द बाहरी फरकों के अलावा मूलत: एक ही था। उसने हाथ फिर ट्रक के दोनों सिरो पर टिका दिये । अगले ही पल उसने ट्रंक को उठा दिया । मैं एक टक देखने लगा । खुशी से । सन्तोप से और थोड़े प्राश्वयं से जैसे वह कोई जादूगर हो और कोई करतब दिखा रहा हो। -चलिए-- उसके गले के काफी नीचे से आवाज़ पाई। बोझ-ग्रस्त आवाज । हम चलने लगे। मैं आगे-आगे और वह मय ट्रक पीछे-पीछे। कुछ निर्णायक और संकटपूर्ण क्षण फिर पाए । सीढ़ियां चढ कर वह उन क्षणों को पार कर गया। तकरीबन चार बड़ी-बड़ी शावाशियां मैंने उसकी पीठ पर चिपका दी। उसकी सांस इस बार खूब तेज हो गई थी। चेहरे का रग माहिस्ते-प्राहिस्ते बदलने लगा था । -यहां रख दो। जगह बताते हुए बडी आजीजी से मैंने कहा । जैसे कोई पिता लाड़ले वैदे को कांच का बड़ा सा बरतन सावधानी से रखने को कहता है। उसने बताई जगह पर पूरे प्रात्मविश्वास से ट्रैक रख दिया। मैंने एक बार फिर काफी सन्तोष अनुभव करते हुए मौखिक शाबाशी दी। एक-दो-तीन-चार-क्षण गुजरने लगे। । 1 ८४ राजस्थान के कहानीकार मागे - वह यथावत् था। ट्रक पर झका । जह हालत में 1 में स्थिति समझने की कोशिन करने लगा। उसके करीब गया। छूता, इसके पहले ही वह दंक के एन धम्म को एक ध्यानाकर्षक आवाज के साथ लुढ़क गया। टोपी के नाम पर पहना हुआ काता सा कपडा एक ओर गिर पड़ा और उनके शरीर से हलनल जैसे कही गायब हो गई। प्रवन । एकदम सब को मानिन्द यह पड़ा या । मैं समझ नही पाया क्या करू पाखिर । झट से मैंने उसके हाथ को अपने हाथो में लेकर हिताया। कुछ नही हुना। उसके चेहरे को हलके हलके दुलाया तो भी कोई फर्क नहीं पडा- उसको स्थिति में। वह निश्चल पड़ा था। पूरे कमरे का रस्य मेरे आगे था। मैं अमहाय और अजीव हालत में खुद को महसूस करने लगा। भाग कर नीचे गया और एक गिलास ठण्डा पानी लाया। उमके चेहरे पर पूरे विश्वास के साथ छोटे दिए लेकिन कोई बदलाव नहीं पाया । वह ज्यो का त्यो था ! मैंने फिर उसके चेहरे पर युछ तेज गति से छोटे दिए। गालो पर । प्रति पर। माथे पर ! कोई खाम फर्क नहीं पडा- मामूली सी एक दो शिकों के बनने विगडने के अलावा । क्षण भर के सोच विचार के बाद प्रांगन में खेल रहे मुन्ने को प्रावाज देकर मैंने बुलाया और चार पाने देकर बर्फ लाने को कहा धर्फ आ गई तो मैन उसके हाथों और तलुवो पर मली। माथे पर मली। वह था कि ठीक हो ही नहीं रहा था। क्षण गुजरते गये और मेरी चिन्ता क्षण दर क्षण बढने लगी। पाखिरयार दूसरा बोई उपाय न देख, फीस के तौर पर दी का एक नोट दे, मुन्ने को भेज मैंने नुक्कड वाली प्राइवेट डिस्पेन्सरी के पच्चीम साल पुराने डाक्टर । बुलवाया। जानता था, बगैर दो रुपए फोस के वह अपने बाप के घर भी दो देने नहीं जाता। उस मरीज, मेहमान, मजदूर को उठाकर मैंने एक दरी में कुछ करीने से लिटाया और पूगे प्रात्मीयता से उसको पखा करने लगा। जैसे तैसे डाक्टर पाया । नटज, धड़कन देखकर मुआयना किया और मिलिए पर डाक्टर ने कुछ लिखा । बताया कि इन्जेक्शन लगाना पडेगा। जेक्शन दूवान पर ही मिल जाएगा। दो रुपये में । मैंने मुन्ने को एक बार फिर एक और दो या नोट देकर दौहाया। तीसरी या चौथी बार। मैं अपने इस एक और दो के नोट के बारे में सोचने लगा। पर डाक्टर का नेहरा दो रपा के नोट में ज्यादा गम्भीर था पोर उम मजदूर की हालत नोट के महत्व से ज्यादा महत्वपूर्ण घो। मैं इस तमाम को स्वीकारने के सिवा कुछ नही कर सकता था और मैंने वही किया गे मैं कर साता था। को मेहनताना ८५ मुन्ना परचे में लिखा हुआ-ले माया । डाक्टर ने सामान तैयार किया पौर इन्जेक्शन लगा दिया । मुझे लगा जैसे कोई सूब तीखी चीज़ मेरे शरीर में भी चुभ रही है । बर्फ को हल्की मालिश का बोल कर और सारी स्थिति की ब्योरे- वार जानकारी लेकर डॉक्टर चला गया । डॉक्टर को देखकर अासपास के दो चार लोग वाक्यात की पूरी खबर लेने चले पाए थे। मैं जहां तक बन पडा, जवाब देने की कोशिश करने लगा। उनके प्रश्न बढते जा रहे थे और मेरी मुश्किले । लगता था जैसे कोई जांच आयोग घटना स्थल पर ही गठित हो गया है। आखिर लोग चले गए। मैं तमाम स्थिति के बारे में सोचने लगा। अब तक मेरे छह मात रुपये खर्च हो गए थे। इतने धन से तो मैं ट क दूसरे कमरे के बजाय, दूसरे शहर अासानी से भेज सकता था। देर गुजरी। मैं सेवा कर रहा था। लगातार । फिर देर गुजरी। उसने मन्द मन्द प्रांखें खोली। मेरे मन में शान्ति जगने लगी। उसने अपनी छोटी और मिचमिची प्रांखे पूरी खोल दी। थोड़ी ही देर में वह उठ बैठा । थोड़े से सम्वाद हमारे वीच जनमे । जाहिर था कमजोरी की वजह से सव हुआ। मुझे यह भी पता चला कि वह कल ही बुखार से उठा था। खैर सब ठीक हो गया। कहा और राहत की माम ली । उसका चेहरा किसी नासमझ बच्चे की तरह भावहीन था। हवा बह रही थी और धूप खूब चमकदार हो गई थी। वह उठा और थोड़ी ही देर मे विदा हुआ । अचानक उसके पांव दह- लोज से बाहर होते होते रुके। मेरी तमाम चेतना उस पर केन्द्रित हो गई । दो पल वह खामोश रहा । मेरो जिज्ञासा वढने लगी। -चावूजी-को तीस पैसे- उसने एकदम सरल और स्वाभाविक तरीके से कहा । मै उसे ऊपर से नीचे तक देखने लगा। वह अभी भी पूरी सरलता से घडा था और अगले ही क्षण मेरे हाथ जेब मे तीम पैसे तलाशने लगे। -
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elkam beled व्यूह
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'व्यूह मांग ठोक छन बजे ही गुल गई थी, फिर भी रजाई प्रोढ़े बिस्तर में पड़ा रहा । लेटे लेटे ही मरक कर रेडियो प्रॉन कर दिया । सोलोन मुनता रहा । बच्चे पाकर उसके ही पाम रजाई मे घुम पाये थे। प्रोगन मे सामने की दीवार पर प्रायताकार मसमती धूप का टुकड़ा चमकने लगा. तो वह समझ गया कि साढ़े सात या पौने पाठ का समय हो गया होगा, मो उठ पड़ा। इस घर में बम पही पहली पौर आखिरी धूप पाती है । चाय पीकर उठा, तो नौ बज रहे थे । 'कुछ मंगना तो नहीं है बाजार से।' 'पहले शेव नही करेंगे ?' प्रश्न सुन कर एक बार चेहरे पर हाथ फिराया । शेव बढ़ पायी है. फिर भी कहा- नही, सुट्टी है, कर लूगा ।' छुट्टियों का इतना लाभ तो होता ही है कि सभी काम पाराम-आराम में मन के अनुसार निपटा सकते हैं । अखबार पा गया है, लेकर बाहर धूप में, गली में आ बैठता है । यद्यपि म्युनिमिपेलिटी की नालियों से माउंटेड गली सदेव गंधाती रहती है, पर अब वह गध सहज हो गयी है। धूप भी वही पाती है। धूप में प्राकर अखवार ले कर बैठ गया । हैड लाइन्स पढ कर फिर फिल्मी पन्ना देखता है। किस किस टॉकीज मे कौन-कौन फिल्म लगी है । वहाँ से भी मन हट जाता है. तो धूप की तेजी से पाखे छोटी करके गली में मामने देखने लगता है। गली प्रागे चल कर करीब पचास गज पर बांहें फैलाती है। यही चौराहे पर सेठ धीमूलाल का नया मकान बन रहा है । उसके देखते देखते सारे मोहल्ले में नये नये मकान बन गये हैं, जो एक मंजिल थे. वे दुमजिले हो गये। लोगों ने पलश लेदिस लगवा ली है पर वह जहा है, उसी पुराने किराये के मकान में है। बिना छज्जो का मकान, टूटी किवाड़ों की लैट्रिन । मकान तिमजिला, नीचे के कमरे अधेरे सीलन भरे । पिछली बार जीजी प्रायी थी बड़ी वाली । एक दिन खूब लड़ी थी- 'तुम तो जिन्दगी भर ऐसे ही रहोगे बुक्ख, तनखा मिली, बीस दिन में उडायो बाटी, पैट से हाथ पौछ लिये, ऐसे ही किराये के सड़े टूटे मकानो मे जिन्दगी राजस्थान के कहानीकार - काटो। उसे देखो रोशन लाल को, तुममे कम तनखा को नौकरी, और मकान बनवा लिया कि नहीं । तुम लोग तो बम फैशन में मरे जाते हो।' फाशन के नाम पर वह अपनी कमीज, पैट देखने लगता है । कमीज का कालर कट गया है और पेट पर धुलते धुलते धागे सफेद पड गये हैं, सारी सिलाई चमकने लगी है। जेब मे से सिगरेट निकाल कर पीने लगता है। छोटा पाकर मुड्डे के पास खड़ा हो गया है। फिल्म वाले पेज पर किसी एक्ट्रेस के चेहरे पर उंगली रख कर पूछ रहा है- 'ये बुना है पापा जी, ऐ पापा जी। ये बुना है प्राप कब बुलायेंगे इन्हें अपने घन ।' वह चुप उसे देखता है । अक्सर ही जब पत्नी पास खड़ी या बैठो होती है और कही पत्रिका या अखबार मे किसी एक्ट्रेस का फोटू निकल आता है तो वह छोट से कहती है- देखो छोटे, तुम्हारी बुया जो। वह कहा करता है ऐ, नही ये गलत बताती है, ये मोमो है, मोसी तब से छोटा मुझसे कहेगा- ये वुमा जी है, पत्नी से कहेगा- मौमी मे खाना बन गया है। अंदर से आवाज लग गई है । वह मुड्डे को अपने पीछे चिपकाये अदर चल देता है । छोटा भी साथ खाने को गोद में बैठ गया है। ऋपि प्रागन में लटू नचा रहा है । पाठ दम माल का हो गया, पर पढने की मन नही होता इसका। दशो स्कूल भो यो ही है बम । 'मुनिए जी।' 'क्या' 'दाल में घी थोडा डाले देती हूं, रोटी नही सुपडती । खत्म हो माया है, अभी तनया मिलने में तो दस पन्द्रह दिन है और ऋषि बिना घी के मन नहीं खा पाता । बम चुपचाप उठ जायेगा।' छोटा प्रखबार लिये गोद में बैठा है । कह रहा है --, ये वुमा, ये मौसी, ये धुग्रा, ये मोयो । 'देखो, बड़ी जीजी पायी नही टाल दिया-फिर पाऊँगी।' छोटे के होने में पायी थी । और छोटा पाच साल का हो गया । पाच साल का हो जायेगा, तो कथा कराउँगा तभी बोला था। तमो जोजी एक दिन गुम्मा हुई थी-ऐसे ही रहोगे, तो कौन मायेगा तुम्हारे यहा, अपने किराये से पानी हैं अपने किराये मे जाती हूं, वो तो मेरा ही मन नहीं मानता, सो पनी माती है।
- खाना खा कर उठ पड़ता है, कुल्ला करके दात कुरेदता रहता है । उसके उठते ही रेखा और मधु दोनो लडकिया प्रासन पर टूट पड़ी है, जैसे उसके उठने को कव से ताक लगाये थी। रेखा बडी है पर हर बात में नकल करेगी छोटे की। अब तुतला कर बोल रही है। छोटे की तरह गोद में बैठना चाहेगी। जीजी कहती थी-तेरी ये दोनो छोरी तो यो ही हैं, भुस बिलकुल । इस बार जीजी को किराया भेज दिया था। लिख दिया था कि मैं मा नहीं पा रहा हूँ, चालीस रुपये किराये के भेज रहा हूँ। जीजा जी को माथ लेकर आ जायें । पर वे आयी नही, चिट्ठी भेज दी थी। लिखा था- तेरे जीजाजी की तबियत ठीक नहीं है, फिर कभी आ जाऊंगी। न होगा तो दिसम्बर मे आ जाऊँगी, तब तेरी भी दो चार दिन की छुट्टियां होती हैं और किराया काहे को भेज दिया, मैं वैसे नही प्राथी क्या कभी, कल चिट्ठी प्रायो। लिखा है- अभी भी नहीं आ पा रही हूँ। तेरे जीजा जी विजनिस के सिलसिले मे बाहर जा रहे है । आ जाती तो छुट्टियां थी इस बार शहर ठीक से घुमा देता। पिछली बार वे यो हो खिसियायी सी लौट गयी थी कि इतना पैसा तोड़ कर तो पाती हूँ और तुम ठीक से शहर की दो चार मशहूर जगह भी नहीं दिखा सकते । पर क्या करता, तब छुट्टिया ही बाकी नहीं बची थी। पडोम के घर से तेज आवाज मे फौजी भाइयों के लिए फिल्मी गाने प्रा रहे हैं। कोई एक्ट्रेम बड़े फिदा होने के लिहजे मे एनाउस कर रही है। गाने देर से चल रहे हैं, लगता है, तीन तो बज ही गया होगा। तैयार होने लगता है। 'कही जा रहे है क्या ?' 'यो ही स्टेशन की ओर जा रहा हूं।' साइकिल उठाता है तो पत्नी कहती है-- बडे बाजार से सब्जी लेते आइएगा, यहाँ तो ये ठेले वाले एक ही किलो पर चवन्नी ले लेते हैं, दूसरे ताजी नहीं मिलती है। वह माइकिल पर थेला टांग देती है। मोहल्ला पार करके चौड़ी सड़क मे मिल गयी है गली। सड़क के दोनों भोर बंगले बने हैं। एक बंगले में, बाहर लॉन में कुछ बच्चे कैरम सेल रहे हैं । स्कूल मे वह कैरम का चैपियन रहा है, पर वह चंपियनशिप कही काम नही प्रायी। शहर शुरू हो रहा है। एक दुकान पर सौ डेढ़ सौ आदमियो, बच्चों, राजस्थान के कहानीकार मे औरतो की लाइन लगी है। गौर से देखता है, तो पाता है - मिट्टी का तेल बिक रहा है। स्माला, अपने देश में वह कमी नही होगा कि चीज़ हो तो मंकट के ममय मे तो लोग प्रासानी मे दे या ले लें। सुनने हैं, चीनी भी राशन मिलेगी- एक आदमो को ढाई मो ग्राम । मडक पर भीड बढ़ने लग गयी है। पिछले पांच साल मैं इस शहर ने भीड बढाने में कमाल किया है । वम बढ़ती हुई भीड़ और मकान किराया दोनों ही इम शहर के तरक्की करने के ठोस सबूत हैं । 'मार्टिन-ब्रिज' के पराम वह साइकिल से उतर कर खड़ा हो जाता है। अब किधर जाये। दाहिने हाय पर सडक द्वाल पर चली गयी है। टॉकीज दिखाई पड़ रहा है, अजता टॉकीज ! वह सिगरेट निकाल कर सुलगाता है। 'जीय वगला देश' फिल्म के पोटो लगे हैं। भीड लाइन मे, लॉन में इकट्ठी है । शेखर की बात याद माती है. इण्डिया में दो ही तबके के लोग रहते है। एक जो पैसे को मिट्टी बनाते हैं, दूसरे जो मिट्टी से पैसा बनाते है। एक परेशान, एक बेहद संपन्न । अब देखो सेना के लोग शहीद हुये, लोगों को जाने गयी. फिल्म वालो ने 'जोप बांगला देश' तमाशा बना कर दिखा दिया । भीड टूटी पड़ रही है । माइकिल लेकर पैदल ही वह मडक पर भीड़ के बीच चल पड़ता है । यो ही उद्देश्यहीन दूकानो पर टगी चीजो को देखता है, होटली के पास गुजरता है। सोचता है, कही बैठ कर एक चाय पी लें। पैट की जेब में हाथ डाल कर अन्दर ही अन्दर हर मिको की बनावट पर हाथ फिराता रहता है, और मनजाने ही मुड़ कर सब्जी खरीदने लगता है। चाहता है, कुछ हरी सब्जी ले ले, पर एक किलो पालू एक कितो प्याज खरीदने के बाद धनिया या हरी मिर्च को भी पैसे नही वचते । चुप, साइकिल से घर लौट पडता है । फुटपाथ पर दर विधाये कप प्लेट वेचने वाले बैठे हैं। पर पर अब सावुत तीन कप प्लेट भी एक में नहीं हैं. पर यह बात कोशिश करके दिमाग से झाड़ देता है। और लाटरी एजेंट की दूकान पर कम रहे लाउडस्पीकर के शोर को सुनने लगता है। घर लौट आया है । दरवाजे से आगन में दाखिल होकर देता है। वराहे में सब बच्चे वही पुरानो दरी बिछाये बैठे पढ रहे है। और उसे देख कर टंबन्म, स्पेलिम्म और जोर-जोर से रटना शुरू कर देते हैं। 'खाना प्रभो बायेंगे या....... ?" 'लगा दो' वह कपड़े नहीं उतारता और मुहढा खीच कर यो ही बैंक जाता है। -
६३
मल्लाना सुनती रही थी। बाबू जी तब रिटायर हो गये थे, और वह भैया उमी
'सब्ज़ी क्या बनायी है ?
'मालू, आप कुछ ले कर दे गये थे क्या ?'
चुपचाप खाता रहता है।
'सब्जी कैसी बनी है ?'
'ठीक है।'
'अच्छी नहीं है ?'
'अच्छी है'।
'मेरे कहने से कहा
कहां घूम आये प्राप?'
'कही नहीं बस यो हो।
'देखिये, चार दिन की तो कुल छुट्टियां हैं एक दिन यों ही गवां दिया
पापने । कहीं चलेंगे नहीं घूमने' ।
'कहां चलोगी?'
'कही भी- पुष्कर, माहीसागर, या किशनगढ'
'चले चलेंगे।'
चारपाइयां विछ गयी हैं और वह रजाई में पैर देकर बैठ गया है ।
बच्चे अभी भी एक दूसरे की गलतियों को लेकर बहस कर रहे है ।
'क्या सोच रहे है प्राप?'
'कुछ तो नहीं पर वह पाता है कि वह कुछ सोच तो रहा है। कुछ समझ
नहीं पाता । वस लगता है, जैसे सारे दिन भर किसी से कुछ मागना या मिलना
था और जिससे मिलना था, वह चेहरा याद नही आ रहा है. भूल गया है ।
अम्मा या वावू जी जैसे बहुत हल्के, भूले सपने से याद आते हैं। हल्का मा
याद आता है- एक वार अम्मा से खुब लड़ा था, इस बात पर कि छोटी जीजी
को इस यार सावन में क्यो नही बुलाया । अम्मा चुप सब मेरा झुंझलाना
वर्ष भाभी को लेकर सर्विस पर गये थे। अम्मा ने धीरे से कहा था- 'अव जब हम
नहीं होगे, तू नौकरी करे, तब बुला लिया करना', और सच हो तो छह वर्ष हो गये
बाबूजी की मृत्यु को। तभी बरसी पर मिली थी। छोटी जीजी कह रही थी,
'पब तो तेरी तनया बढ़ गयी होगी।'
Ex
राजस्थान के कहानीकार
'सुनिए ।'
'क्या।'
मधु की भी बन
'क्या मोच रहे हैं पाप, ये देखिए, ये छोट खरीद ली आज फेरीवाले से
मैंने, सस्ता पीस है।
'कितने का है ?'
'साढे चार रुपये का है, डेढ मोटर । रेखा को कुर्ती सब फट गयी थी।
गली मोहल्ले में निकलते, घूमते बुरी लगती थी, पाप तो पता नहीं कब ला
पाते पत्नी सहमी मी उमे देखती है।
'ठीक है अच्छा है।'
'एक पीस है और उसके पास, कहिए तो ले लूं
जायेगी।' उसके ठीक कहने से पत्नी को जैसे शह मिल गयी है। उसे
फिर चिट होती है, पर यस चुप रहता है। यह नहीं चाहता क्या कि बच्चों को
अच्छा पहनाये, खिलाये, पर चार सौ रुपल्ली में क्या होता है ? अस्सी रुपये तो
मकान किराया हो खा जाता है, और कितनी बार कहा है इससे कि ये गली में
वेचने वाले क्या बेवकूफ है, जो फेरी भी लगायेंगे और बाजार से सस्ता भी देंगे।
पर वह कहता कुछ नहीं है। उसके चुप रहने से ही पत्नी के चेहरे पर उभरा
उत्साह फिर बैठ गया है। वह बार-बार कपडे को उगलियो से खीच खीच कर
देख रही है।
वह चुपचाप अखभर उठा कर खबरें पढ़ने लगता है। बच्चे मो गये हैं।
वह बिस्तर में पूरे पैर फैलाता है और पत्नी से कहता है- 'सोमो तब ये बड़ी
लाइट ऑफ कर देना।'
सवेरे उसे लगा, जैसे वह रात भर सो नहीं पाया है। पलकें सूजी सूजी
सी हैं और एक प्रकारण का भारीपन सर पर है।
चाय पीकर उठने लगा, तो पत्नी ने कहा, 'देख रहे हैं सबेरे से छोटे को
छींक मा रही हैं।
जो रजाई प्रोढती हूं वह जगह-जगह से टूट गयी है, रुई के गोले
कुत्त पिल्ले मे बन गये हैं।'
'अच्छा!' वह चुपचाप उठता है मोर मपनी रुचि को सग्रह को हुई पुस्तकों परे' यो ही उंगली फिराता है। 'देखती हो क्तिनी धूल हो गयी है इन पर, पर तुम्हें इससे क्या, इतनी कीमती कितावें, सत्यानाश हुमा जा रहा है।' किताव खोल कर भाडता है। बारीक मिट्टी सास के साथ मुंह में पा जाती है । किताबें एक एक करके झाडता रहता है। बच्चे उसके पाम पा कर इकट्ठे हो गये हैं । एक किताब में कुछ पुरानी चिट्ठिया निकल मायी हैं- पोस्टकार्ड, लिफाफे । थोड़ी देर उन्हे पढता रहता है । एक बडा पुराना पत्र संतोष का है, संतोष माथुर का । 'शेली' की पत्तियां लिखी हैं- 'यो विड । लिपट मी एज ए वैव, ए लीफ, ए क्लाउड, प्राई फॉल अपॉन ६ थॉर्नम् ऑफ लाइफ, आई प्लीड; फिर लिखा है- प्रापको पता है, डेडी परसों किन्ही मुल्तानपुर वालो से बात कर रहे थे । मैं दो दिन से दम बजे से ही वरांडे के सामने इजीचेयर डाल कर वैठे-बैठे चार बजा देती हूँ! क्या किसी तरह से न पाने के दो अक्षर लिख कर नही भिजवा सकते थे। अनिश्चितता की उदासी कितनी भारी होती है, समझ सकेंगे भाप ? और.... वह पत्र वद कर देता है। । सतोप को उन दिनो वह हिन्दी पढाने जाता था। दोनो ने साथ-साथ ही अग्रेजी में एम. ए. किया था। उसकी खुद की डिवीजन मामूली गिनती से रह गयी थी। उसने फिर हिन्दी से एम. ए. कर लिया था। वर्ष बाद सतोप मिली थी। कहा था, 'पाप मा जाया करे, तो मैं डेडी से कह कर आपको ट्यूटर रख लू। बैठी-बैठी क्या करूं, मैं भी हिन्दी से एम. ए. कर डालू। वह जाने लगा था। दो वर्ष लगातार ट्यूटर भी रहा है, रेजीडेंसी और बॉटनिकल गार्डन मे मूखे मेजेंटा के फूलो के आसपास घूप में बहुत घूमे हैं । घटो किसी पेड के तने से सटे खडे-खडे बातें की हैं। पर क्या हुअा वह मव । तव सोचा था, कही लेक्चरर हो गया, तो डेडी से बात करेगा। बाबूजी और अम्मा को तो मना ही लेगा, पर वह लेक्चररशिप महत्वाकांक्षा हो रही। शहर बदलते, इन्टरव्यू देते-देते कई बार डिग्रिया फाड डालने को मन हुआ था। जितनी बार वह कॉपीज अटेस्ट कराने जाता डाक्टर साहब साइन करते-करते पूछते, 'क्यो वहा कुछ नही हुआ क्या प्रतापगढ, और वहा हरदोई भी नहीं, कोई बात नहीं, वन शुद्ध नॉट वी पेसिमिस्टिक, विश यू बेस्ट....
राजस्थान के कहानीकार
पर मिलनी थी यह पोस्ट, इस ऑफिस में ट्रासलेटर को, इस प्राइवेट
ऑफिस मे। वह सब चिट्ठियां समेट कर रख देता है।
'सुनिए । खाना बन गया है।'
'अच्छा पाता हूँ।'
खाना खा कर वह तैयार हो रहा है । पत्नी ने पाकर सोफ दी है।
'ओ हो, आज तो याद आ गयी तुम्हें ।'
'हमे कही घुमाने नहीं ले जायेंगे ?'
'प्रटेची मे कुछ नोट बचे हैं ?'
'पाच - छह होंगे।
'चलो ऐसा करें, दोनों दोनों धूप मे इम इस गली में पाच छ. चक्कर
काटे लेते हैं।'
'बस रहने दो, यो ही उडा देते हो, दोनो हंसते हैं । वह साइकिल ले कर
बाहर आकर सोचता है, कहा जाये फिर, चारों ओर बांझ पहाड़ियां, बीच में बसा
ये छोटा सा नगर ।
'कब तक लौटेंगे?'
'जल्दी ही पाऊंगा, देखो वो किताव लगवा देना अल्मारी मे ।'
प्रॉफिस पा गया है। सब कमरे बन्द, उसका खुद का कमरा भी बन्द है
अन्दर झोकता है, अन्दर मेज, कुमियां, घुप अधेरे मे रक्खी हैं । वराडे में एक
बिडकी पर दो कबूतर घूम घूम कर गू55 गू ss, कर रहे हैं । लॉन मे डेलिया
के फूल दमक रहे हैं और दूव वडी सुनहरी तग रही है ।
'सलाम साहेब ! प्राज तो हुजूर ......?'
'हा छुट्टी है, यो हो पा गया वस ।'
घूमते घूमते साइकल पर बैठ कर फिर सडक पर मा जाता है । वागार
में भीड है। चौराहे पर वाये हाथ को परघर लगा है- 'जयपुर रोह' । सडक
पर मुह लेता है । इधर भीड कम है। यही एक गली मे मुड़ कर मौहल्ले में मा
जाता है । नेम-प्लेट लगी है- 'वैरोचन मिना,' फाटक पोल कर अन्दर प्राता है।
साला बन्द है । विमसे पूधे बरोचन उमके कस्बे का ही है । यहां मेमो कॉलेज में
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६७ लेक्चरर हो गया है । प्रतिष्ठित परिवार से है । उसकी बेसिक एजुकेशन भी यही, हुई थी। 'ए ! मुनों लड़ो, ये लोग कहां गये हैं ?' 'ये बंगाली शाब ।' 'हां, हा, ये हो।' 'शाव पहाड़ पर गये हैं, जाड़े की छुट्टिया है ना।' विंटर-बैक्स में भी पहाड पर । एक ठंडी सांस छोड़ता है। उसे धूप फिर उदास लगने लगी है । साइकल लेकर आगे सड़क पर पा गया है । पार. पी. एम. सी. का प्रॉफिस है और प्रागे बायें हाथ को सेंट्रल बैंक है। कुछ ठेले वाले खड़े हैं। मूगफलियो के ढेर पर काली हंडिया धुना देती रक्खी है। उसके नीचे की मूगफली गरम होगी। अपनी जेब टटोलता है और सौ ग्राम मूगफली ले लेता है । छील छील कर खाने लगता है । 'ये बैंक के मैदान मे क्या खुदाई हो रही है " 'ये साव और कमरे वनेंगे, जगा कम पड़ती थी। 'अच्छा 55।' वह खड़ा खडा मूंगफली खाता रहता है और काम करने वाले मजदूरों को-पौरत-मजदूरों- को देखता रहता है । कसे हुए जिस्म और फटे हुये कपड़े। वो झोपडिया यहां से हट गयी ?' 'हां साब' उमे लगता है, बड़े नोट रक्खे हैं, हर अलमारी में गड्डियों की गड्डिया, और कोई उन पर डाके डाल रहा है । वह झटका देकर स्वय को सामान्य करता है और दूसरी ओर चल देता है । एक पोस्टर लगा है- 'सारा प्राकाश'। कोई सोसायटी है- 'कला योग,' उसने ऐरेज किया है। लिखा है-मात्र परिवारों के लिए। कृपया छोटे बच्चो को साय न लाये । सोसायटी ने एरेन्ज कर दिया सो ठीक, वरना इस शहर में ऐसे टेस्ट के लोग कहाँ, कि टाकीज वारो 'सारा आकाश' मंगवायें। 'दस्तक' की ही लोग कितनी बुराई करते है । यदि उसमें पति-पत्नी का इतना रोमास न होता, तो शायद टूटेट्स भी न देखते । 'मारा प्राकाश' वह नही देख पायेगा । हालांकि छुट्टी है, पर एक तो पर्म खाली, दूसरे पत्नी के नखरे । अभी राजेश खन्ना या देवानन्द की कोई स्टट फिल्म होती, तो कटौती करके छुपाये गये पैसे तुरंत निकल पाते।
राजस्थान के कहानीकार घर वाली गली मा गई। यह गली में मुड़ लेता है। मोर कहां किमके यहां जाये। सभी कोई कही न कही गये हैं। चार दिन की छुट्टियां एक साथ कहा मिलती है । पत्नी दरवाजे पर फिर किसी फेरी वाले से कुछ त कर रही है, और भी स्त्रिया हैं उसे दूर से ही पत्नी ने देख लिया है और धीरे से उस ग्रुप से अलग हो गयी है। 'पा गये।' 'क्या खरीद कर रही थी ?' 'कुछ नही, मैं तो यो ही देख रही थी।' अच्छा 'देखो।' अदर वे कितावें सब ज्यो को त्यो पड़ी हैं, जिन्हें वह रखने को कह गया पा। बाहर प्रांगन में रेखा और मधु कोयले से लाइने खीच कर इकटगी खेल रही हैं। वह रेडियो छूता है, बारीक धूल उसको उगलियो में लग गयी है। छोटा प्रा कर उससे लिपट गया है। सव धूल मिट्टी में हो रहा है । 'सुनो ।' 'हां, क्या चाय बना हूँ?" 'क्या वजा है अब ?' वह घडी देखती है, 'चार बजे हैं।' 'ये बच्चे सारे दिन 'अभी ठीक कर रही हूं।' 'पौर वे क्तिाबें ?' 'अभी रखवाये देती हूं।' 'अब नो रख लूंगा मैं तुमने क्या किया ?' गुस्से में किताबो को जोर से पटकता झाडता है। पत्नी चुपचाप पास खडी है। 'जामो न । अब यहाँ क्या मेरी शक्ल देख रही हो।' 'लामी में रख दूंगी।' 'जाती हो कि नहीं।' उसे बहुत गुस्मा मा गया है । पत्नी चली गयी है। रेखा पौर मधु पागन मे चुपचाप खड़ी हो गयी हैं। किताबें लगा कर वह चुपचाप ।' .
BE बाहर चबूतरे पर पा कर खड़ा हो गया है । लग रहा है, उसे तो आखिर तक यों ही रहना है- अपरिचित और बेमेल स्थितियों के बीच । 'चाय ले लीजिए। 'नही पीनी मुझे।' पत्नी चाय लेकर खड़ी है । 'कहा न नहीं पीनी।' 'ठंडी हो जायेगी फिर।' 'मैं फेंक दूंगा कप अभी सड़क पर ।' चुपचाप पत्नी चली गयी है । वह रुपासे गले से अन्दर मुड्डे पर बैठ जाता है । वालों पर हाय फैरता रहता है। फिर उठ कर गली में पा जाता है । सामने गली के आखिर में दिखाई पड़ते पहाड के उपरी हिस्से पर किसी पुराने किने की टूटी दीवारें मासमान में टेडी मेड़ी लाइन बना रही है और उडती धूल उम पर लग रही है। वापम वहीं कमरे में लौट पाया है। प्रांगन में पत्नी कोयले के चूरे के लड्डू बना रही है । लगता है, फिर कोयले खत्म होने को आये हैं वह चुपचाप अल्मारी में से उपन्यास निकाल कर पढ़ने बैठ जाता हैं । मन नहीं लगता, उठ कर पान खाने पल देता है । लोट कर पाया है, तो पत्नी ने चिट्ठी दी है, 'माज को डाक में ये जेठ जी का पन पाया था।' चिट्ठी पढता है। बड़े भैया ने लिखा है- छुट्टियो मे यहा धूम जानो, पढ़ कर चुप बैठा रहता है । लखनऊ और यह शहर चालीस घण्टे का रन और एक तरफ से बहत्तर रुपये किराया। वह चुपचाप कोट उतार कर हेंगर पर टांग देता है। पैन्ट उतारता है । इन छुट्टियो में ही यह कोट वह दर्जी को दे देगा, पलटवा लेगा। पुराना और घिसा दिखाई पड़ने लगा है सूट । रात को सोया, तो जाने कब से ऐसा लगता रहा कि कोई लगातार घुटनों और हथेलियों के बल भगा रहा है। हथेलिया और घुटने छिल गये हैं । खून झलक पाया है, सर उठाता है, तो किसी भारी चीज से टकरा जाता है फिर पाता है, जहां उसे रोका गया है वह स्टेशन है। बहुत सी गाडियां तेजी से आ जा रही हैं। छिने हुए हाथों से वह गाडी पकड़ने का साहस नही कर पा रहा है. पर इस भय से कि गाडी छूट न जाये, झटके के साथ वह एक कंपार्टमेंट मे गिरते बचते चढ़ गया है। गाडी तेज़ चल रही है । सारा कंपार्टमैंट खचाखच भरा हुआ। उसे इन लोगों को देखकर बड़ी अरुचि होती है।
राजस्थान के कहानीकार
'कहां जायेंगे आप?'
'जलालाबाद।'
'वहा तो यह गाड़ी नहीं रुकती।'
'तब?'
'यह तो अव शाहजहांपुर ही रुकेगी।'
बाहर खिड़की से झाकता है, कोहरा धुप्रां-धुप्रां सा छाया है ! बोली
हवा से लगता है, उसका चेहरा छिल जायेगा।
'अरे। स्यूसाइड करेंगे क्या ?'
'सुनते नहीं हैं, सुनते हैं, सुन नही रहे हैं ...।'
'अरे क्या है ।' पत्नी जगा रही है उसे ।
'क्या है ?'
'कहां क्या है ?
'क्या कह रहे थे ?'
'कह रहा था...., क्या कह रहा था ?' जीरो का बल्ब रोशनी दे रहा है।
बच्चे सो रहे हैं. छोटा पत्नी को रजाई में 'उ' बना पड़ा है। पत्नी की मौखें
भारी और लाल हो रही हैं।
'क्यों जगाया मुझे' वह उसे अर्थपूर्ण दृष्टि से देखता है ।
'नही वो बात नही, पाप कुछ सपना देख रहे थे क्या ?'
ऐ .. , हां.... 55 । परसो आफिस खुल जायेगा । कल चलना
पार्क में, बच्चो को ले चलेगे।'
'नहीं
यह पत्नी को धीरे से अपने विस्तर पर खीच लेता है।
'मरे ये मेज़ पर कप में क्या ढका रखा है ?'
'वही भापकी चाय रखी है।'
'मच्छा सवेरे गरम कर देना।'
'मम्छा कभी दो मिनट रक्सी चाय पी है ?"
वह चुपचाप पांघों में मुस्कराता है, और दोनो रजाई भो
लेते हैं।
शराबघर ฐ ซิก
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शराबघर मैंने माहौल का जायजा लिया। मुझ से थोड़े फासले पर एक शख्स अपनी धुन में पी रहा था। मेरे सामने खस्ता-सी टेबल पर सोडे की बोतल 'गुलाब' और गिलास के अलावा सिगरेट का पैकेट और माचिस रखी थी। नियमित ग्राहको के माने का वक्त करीब था । काऊंटर पर कलाल का नौकर अगरबत्ती जलाने के बाद तन्मय-सा होकर बैठ गया था। परिचित-सा तेरह- चौदह साल का छोकरा सिके हुए पापड़ की टोकरी लिये हुए एक तरफ़ खड़ा था। बरसो पहले मैंने एक लड़की से रोमांस लड़ाया था। वह अच्छी थी। मैं उमो को अपने तसव्वुर मे ले पाने की कोशिश कर रहा था। लेकिन बात बरसों पुरानी होने के कारण उसकी शक्ल मेरे जोहन में नही उभर रही थी। अपनी कोशिश नाकाम होती देख मैं झुंझलाने लगा था। इसी पालम मे बाकी बची हुई 'गुलाब' बिना सोहे के मैं एक ही घूट में पी गया। मुह का जायका अजीब-सा हो पाया तो उस छोकरे को करीब बुला कर मैंने एक पापड़ ले लिया । मेरा दिमाग अब बड़ी तेजी के साथ काम करने लगा था। रोमांस वाली वह लडकी भव स्वतः ही मेरी कल्पना के घोडे पर सवार हो गयी थी। मैं खुश था। खुशी के मारे मैंने पापड़ वाले छोकरे को करीव बुला कर दस पैसे का एक सिक्का उसकी तरफ़ बड़ा दिया । 'पापड़ के पैसे प्राप दे चुके हैं, बाबूजी !' उसने कहा । मैंने खुद को संभाला। मुड़ कर मैंने उस दूसरे पीने वाले की तरफ़ देखा। वह शायद मुस्करा रहा था। 'रख ले.... एक और दे दे।' खिसियाहट मिटाने की गरज से मैंने कहा। टेबल पर मेरे प्रागे एक और सिका हुआ पापड रखने के बाद वह टोकरी समेत पहले की तरह अपनी जगह पर जाकर खड़ा हो गया। ऐसा नहीं होना चाहिये--- मैंने खुद से कहा। पीने के लिए बैठने से १०४ राजस्थान के कहानीकार - पहले किया गया वादा तुम क्यों भूल जाते हो? और फिर यह एक ग्राम जगह ही तो है। 'अच्छा-अच्छा।' मैंने धीरे से कहा तो पापड़ वाले ने मेरी तरफ़ देखा। वह समझ गया था कि मैं तरंग मे हूँ। इस वार मैंने उम प्रजनबी पीने वाले की तरफ देखना मुनासिब नहीं समझा। मैं सिगरेट जला कर लम्बे कश लेने लगा। गले मे खरखराहट-सी होने लगी थी। मुझे अपनी खिसियाहट से उबरने का मौका जल्दी ही मिल गया। मेरा एक परिचित वहा आ गया था। उसने मुझे अभिवादन किया । मैंने मुस्करा उसे उत्तर दिया। वह काऊंटर पर शराब लेने लगा था। इस वक्त तक खुद को मैंने अपने वादे के मुताविक बना लिया था। रोमास वाली वह लड़की अब मेरे जेहन में नहीं थी। मेरा वह परिचित सोडे को वोतल, गिलास और 'हरी' का लीटर लेकर मेरे सामने ही जम गया था। - 'पापड खायो।' मैंने उससे कहा । 'आपके गिलास में थोडी चलेगी?' उसने पूछा । जवाब न देकर मैंने सिगरेट का कश लेना ही उचित समझा । 'देवो' के नाम पर शराव के कुछ कतरे गिराने के बाद उसने थोड़ी सी मेरी गिलाम में ढाल दी। इसके बाद उसने अपना पेग बना कर 'चीयज" कहा तो मै हंसते-हंसते रुक गया। अपने उस परिचित की इनायत की हुई शराव एक ही घूट में पी लेने के बाद मैंने उसकी तरफ देखा । वह सहज-सा था। मैं निरन्तर उसकी ओर देखने लगा। 'कभी-कभार थोडी-सी ले लेता हूँ।' उसके लिए कुछ बोलना जरूरी हो गया था। वह कहने लगा, 'वरना मुझे पीने को प्रादत नहीं है।' 'होना भी नहीं चाहिये।' मैंने कहा, 'मुझे भी सिर्फ शौक है पियक्कड़ मे भी नहीं हूं।' मैंने झूठ बोला। संभवत: उमने भी मेरी तरह ........' कहा था। "मुझे भी है।' फामले पर बैठा वह अजनवी अचानक चहका। हम दोनो ने उसकी तरफ़ देखा । वह अपने स्थान से उठ कर गिलास समेत हमारे शराबघर १०५ नज़दीक आ गया था । वह कहने लगा, 'हम पीने वालो को दरअस्ल बहकने वाले बदनाम करते हैं।' वह हंसने लगा था। मेग वह परिचित उसे इस तरह चहकते देख मुस्कराने लगा। मैं भी उसका साथ देने की कोशिश करने लगा था । मेरी निगाह उमकी शराब पर थी। 'क्या बताऊँ साहव । औरत का कोई भरोमा नही ..।' हम उमकी तरफ नहीं देख रहे थे । मैं समझ नही पा रहा था कि वह अजनवी किस से मुखातिब है। 'लेकिन शायद मै गलत कह गया । हुमा यू कि लड़की का बाप पाडे या गया। और ।' 'पौर देवदाम बनने के लिए तुम्हे छोड दिया।' काऊंटर पर नये आये एक खुशपोश ने जुमला पूरा कर दिया तो वह 'हो-हो' कर हँसने लगा। मैं थोड़ी देर बाद अपने सामने जमे हुए परिचित की शराव की तरफ देख लेता था। वह खामोश था। हमारे नजदीक खिसक पाया वह दुबला-पतला अजनबी अब चुप था। शराब लेकर वह खुशपोश हमारे करीब पा गया । शिष्टतावश मैने उसके लिए बैच पर थोडी जगह छोड़ दी थी। 'यह फ़र्जी किस्मा तुम यहा कितनी बार किस-किस को सुनानोगे ?' खुशपोश ने बैठते हुए बम दुबले-पतले व्यक्ति को मुखातिब किया। उसके सबोधन में स्पष्ट था कि वे एक-दूसरे को जानते हैं । 'तुम्हें यह फर्जी किस्सा लगता है ?' अजीव तरह से हाथ लहरा कर उसने खुगपोश से कहा । उसे नशा हो चला था। 'बिलकुल ।' जल्दी से पेग बना कर शराव गटकने के बाद खुशपोश ने बीडी जलाते हुए कहा । 'कैसे?' 'तुम पीकर वहक रहे हो ! ... बरसो में तुम्हारी यही पुकार में रोज शाम यहा सुन रहा हूँ।' उमने शराब का एक चूंट पोर लिया। 'मैं बहक रहा हूँ? लो सुनो।' उसने रिसे मुखातिब किया, यह मैंने नही देखा । मेरी निगाह मेरे राजस्थान के कहानीकार परिचित की शराब पर जमी थी। बाद में मंभवत: वह मेरी नीयत भांप गया, प्रत वाकी बची हई शराब एक ही चूंट में पीकर वह जाने के लिए उठ गया। यह देख कर मुझे एक अजीब-मा धक्का लगा। 'पापड खा लो मह कडुवा हो गया होगा।' मैंने कहा । उमने अजीव निगाहों मे मेरी तरफ देखा और शुक्रिया कह कर तेज तेज कदमो में चला गया। पांच-सात मिनट बाद मुझे जब इस बात का इमिनान हो गया कि वह परिचित लोट कर इस बात नहीं पायेगा, मैंने 33 कर काऊंटर से ढाई रुपये की शराब और ले ली । मेरी जेब मे प्रब मात रुपये और कुछ छोटे मिक्के रह गये थे। से युगपोश और वह दुबला-पतला व्यक्ति बातें कर रहे थे। मैं उन दोनों से निरपेक्ष-सा फिर पीने लगा था। बरसो पहले के रोपांस वाली वह लड़की फिर मेरे तसचुर में पाना चाहती थी लेकिन ऐमा नहीं हुमा । मेरे सामने एक मडक छाप गवैया अपने हार- मोनियम महित पाकर बैठ गया था । दारू का गिलास उमने हारमोनियम के पास रख लिया था। उसके चीकट लम्बे-लम्बे बालो में दाहिनी तरफ एक छोटी-मी काली देशी कंघी फसी हुई थी। उसकी पाखें मेली और बुझी हुई-सी थी। उसके बैठे हुए गाल खसखसी दाढ़ी से सटे हुए थे, जिन पर उसको अजीब तरह इतराती हुई मूछे थी। उसकी मूछो पर नकली होने का गुमान होता था। वह कुर्ता और धोती पहने हुए था। उसकी उगलियो मे तावे और अन्य धातुमो की छल्लेनुमा अंगूठियां फंसी हुई थी। वह तीस का रहा होगा। कुल मिला कर वह ठेठ गवार और उज्जड्ड लग रहा था। उसे देख कर मुझे लगा कि मेरा सुहर उतर रहा है। मुझे उबकाई-सी प्राने लगी थी। सिगरेट जला कर मैं खुशपोश और उस दुबले-पतले व्यक्ति की तरफ ध्यान देने लगा था। वे बातें कर रहे थे। खुद को मैं उनमें शरीक कर लेने की तरकीब सोचने लगा था। इतने मे खुशपोश ने गवैये को मुखातिब किया । 'सुना भई, कोई चीज़।' 'जो हुक्म, अन्नदाता।' गवया शिष्टता से बोला, 'क्य' सुनाऊँ ?' बाद में उसने हंस कर मुझे मुखातिब किया तो मेरी निगाह उसके पीले दातों पर जम गई । मेरा मन मजीव सा हो पाया था। मैंने उत्तर नहीं दिया।
शरावधर १०७ 'थारे हिवडे जच्चे जिको ईज सुणा दे। पण हुवे तबीयत री चीज ।' (तेरे जो जी मे माये सुना दे, लेकिन तबीयत को चीज हो) खुशपोश ने तरग में माकर राजस्थानी में उससे कहा। ? 'यह क्या सुनाएगी पाक ?' दित ही दिल कहने के बाद मैंने शराब का एक पूंट लिया। बोड़ो के दो-चार लम्बे लम्बे मुट खीचने के बाद गवैये ने खगार कर प्रलापना शुरू किया। लय मिलते ही वह गाने लगा-- फूल खिलने के महीने पा गए, ये सुना तो हम भी पीने प्रा गए । गजल ! मैंने चौंक कर उसकी तरफ देखा । उसके प्रति मेरे मन में जो नफरत सी पैदा हो गयी थी, एक ही झटके में खत्म हो गई । मैं गौर से सुनने लगा। मेरे नजदीक अब उसके लिये का कोई महत्व नही रह गया था। उसकी आवाज़ मे मिठास थी । उसका उच्चारण एकदम सही था । यह देख कर मुझे खशी हुई । अनायास मेरे मुंह से 'वाह' निकल गई। खुशपोश अपने तरीके से गवैये को दाद दे रहा था । उसका साथी वह दुबला-पतला भी लहराता हुअा अानन्दित हो उठा था । वे दोनो उस से बार-बार यह शेर गाने के लिए कह रहे थे। और गया कृतज्ञ-सा पूरी तन्मयता से ग़ज़ल गा रहा था । वह आगे बढा तखिए अय्याम तेरा शुक्रिया हम को जीने के करीने आ गए। । इम शेर की पहली पक्ति का अयं सभवतः वे दोनो नही समझ सके थे, फिर भी वे उसी तरह 'वाह-वाह' और 'जिगो' कह रहे थे । गवैये को मैं तारीफी निगाहो से देख रहा था। वह पूर्ववत् गा रहा था- देख कर तुझ को चमन मे गुलवदन एक-इक गुल को पनीने पा गए नाखुदा सोए रहे गफलत मे और जद मे तूफा को सफ़ीने पा गए । मैं भावुक हो पाया था। फिर मैंने महसूस किया कि शोर बढ गया है। माहौल का जायजा लेने पर पता चला कि वहां पीने वालो की तादाद काफ़ी बढ़ गई है । मैं इस कदर खो गया था ?.... कई । मेरी शराब ख़त्म हो गई ...
१०८ राजस्थान के कहानीकार थी कैसे । सन्देह से मैने अाने करीब बैठे खुशपोश की ओर देखा । क्या मेरी शराव इसने भी पी है ? वह अचानक उठ गया । उमने दुबले-पतले पीय- यकड का हाथ मजबूती से पकड रखा था जो लडखडाने के बावजूद वहां बैठकर और पीने का इरादा रखता था । लेकिन खुशपोश ने उसे प्रधिकार जता कर पूरी ताकत मे कदरे धनीट ही लिया था। .. 'खुश रहो जियो ।' जाते समय खुशपोश ने गवैये की तरफ चवन्नी फैक कर कहा । वह अपने साथ दुवते-पतले पियाड को भी ले गया। गवैये ने उसे अदब से सलाम मारा था। पौर में तरंग में सोचने लगा था कि इतनी देर तक की गई इसके गले की कसरत की कीमत क्या सिर्फ चवन्नी जाने कितनी प्रतिभाए इसी तरह इस मुल्क में रुल रही होगी ? जोश मे आकर मैंने जेब से निकाल कर गवैये को एक रुपया दे दिया। रुपया लेकर गवैये ने मुझे भी उसी तरह सलाम मारा, जमे उम खुशपोश से चवन्नी पाकर उमने शुकिये का मलाम किया था। इसकी निगाह को क्या हो गया है ? सोचने का समय नहीं था। गजल खत्म हो चुकी थी । गवैया अव बीड़ी सुलगा कर अपनी बची हुई शराब पीने लगा था। मुझे खुमार पूरी तरह हो चुका था, और मेरी हालत नशे से एकदम पहले की थी। 'दारू लाख बुरी सही, लेकिन हम जैसे लोगो के लिए इसका एक बहुत बड़ा फायदा है ।' टेवल पर जमे हुए एक व्यक्ति ने अपने साथियों से कहा । संख्या मे वे कुत चार थे । हुनिये से वे सब मजदूर पेशा लग रहे थे। उनके बोच 'हरी' को एक पूरी बोतल रखी थी, जिसमे वे बारी-बारी मुंह लगाकर दारू के चूंट भर रहे थे। उन चारो के बीच टेवल पर पापड और दाल-सेव व बीड़ियों के बडल पड़े थे । उनको वातो मे गाली-गलोज की अधिकता थी। 'क्या ?' चुटकी भर सिवइयां मुंह में रख कर एक मे पूछा 'भई, दिनभर हाड तांड मेहनत करने के बाद यह दार हमारे जोड-जोड को पाराम पहुँचाती है !" 'जरूर ।" मोर वक्त मे पहले ऊपर पहुंचाने में भी मदद करती है। उँगली मे ऊपर की ओर इशारा करता हुआ उनमें से एक अन्य बोल पड़ा। वाको लोग हंसने लगे थे। मैं मुस्कराया।
शरावधर १०६ 'यह 'गुलाब' नही, मेरे बच्चों का लहू है, जिसे मै पी रहा है।' मरियल मे फटेहाल एक पीने वाले ने लाल शराब का गिलास उठाकर गुलूगोर आवाज़ में कहा तो वहां हर कोई उसे देखने लगा। 'ज्यादा पी गया है ।' चार की टोली में से एक बोल पड़ा। . 'बहुत थोडी पी है, भई।' उसने सुन लिया था। सारी शराब एक ही घूट में गुटकने के बाद वह बोला- 'आज फिर खामखाह चालान ठुक गया घोड़ा मर जाए तो पिंड छुटे ! 'बाहर कोई सवारी पुकार लगा रही है !' एक अन्य ने मजा लेते हुए कहा । 'लगाने दो ... हम तो पिएगे ही। ... वीडी पागे पैसे में दो पाती थी, अब दो पैसे मे एक होने वाली है।' मैं तय नहीं कर पा रहा था कि वह हंस रहा था अथवा उसकी आँखे नम थी। 'इतना मत सोचो, अल्लाह का नाम लेकर पी डालो । 'गुनाह नहीं होगा!' 'छोडो भी यार ! क्यो मजा किरकिरा कर रहे हो ?' उसके एक साथी ने उसे टोका। । । गवैये को मैंने एक नजर देखा। उसे संभवतः सुरूर प्रा चला था । चीडी के मुट खीचता हुआ वह राजस्थानी लोकगीत की एक धुन होठों-होठों में गुनगुना रहा था। मैं उठकर काऊंटर से दारू लेने लगा। दो रुपये की 'गुलाब' लेकर लौटा। इतने मे गवैये ने राजस्थानी का प्रमिद्ध लोकगीत 'कुरजां' अलापना शुरू कर दिया था। पीने वाले वातें कर रहे थे । बीच-बीच मे वे उसे दाद भी देते जा रहे थे। चार की टोली वाले मजदूरों की ओर मेरे समेत वहाँ लगभग सब का ध्यान चला गया। किमी वात को लेकर गरम हो उठे थे। गवैया गा रहा था, - लेकिन अब उसका स्वर धीमा हो गया था। 'मेरा कोई बाप लगता है जो मैं कम पैमे ठहराता ?' एक मे सफाई दो। 'एक मुफ्के में बत्तीसी बाहर हो जाएगी। स्साला !' उमर ऐन राजस्थान के कहानीकार सामने बैठे एक बलिष्ठ-म दियाई देने वाले ने कहा, 'हम तेरे पर शक कर रहे पैसे तो रगवा लेता उस टोदार को पोलादसे।' .. 'परे पड जाते तो माज ही देने पड़ते उसे !..... लेकिन एक दिन का काम तो है नहीं। ठीक है।' 'ठीक है .... एक बोतल मोर चलेगी।' 'हां, दादा भाई ! ठोक। छोडो। पीने के बाद तेश में माना मोठी बात है। पोर पीने वाले तो बहुत दिलदार होते हैं . कह कर वह अपनी दिलदारी का मत देने के लिए शराय लेने की गरज से काउंटर पर चला गया उन चारो ने अब तक पूरी बोतल खाली कर दी थी। 'ठेकेदारनी में लजीज है !' पाप का एक टुकडा मुह में रखते हुए एक बोला । वह जैसे ठेकेदारनी हो को नय रहा था। 'तूने चखी है ?' उसके एक साथी ने पूछा 'घर की जोर को गुलामी मे तो फुर्मत नही मोर ठेकेदारनी पर पिन पड़ने की बात करता है। एक अन्य ने कहा । 'मैं सच्ची कहता हूँ, भई !' 'एक वाल तक नहीं दिखाने वाली है वह।' 'परे यह दारू बोल रही है।' उनका माथी नयी बोतल लाकर उनके बीच जम गया था। वे मब पुन: सहज से हो गये थे। की लम्बे बालो वाला गवैया प्रब पूरी मस्ती में 'कुरजी' गा रहा था। मैं धीरे-धीरे अपनी 'गुलाब' खत्म कर रहा था। मुझे अब नशा होने लगा था। 'छोकरे !' कर्कश स्वर मे एक बीमार से अधेड़ ने पापड़ वाले को पुकारा । यह जाने कब से कोने मे दुवा हुआ पी रहा था। दरवाजे के पाम टोकरी निये हुए पापड़ वाले ने अधेड़ की पुकार तरफ तवज्जो नहीं दी । अधेड़ ने कुछ पल बाद उसे फिर पुकारा । मैंने उसकी पार देखा । वह मेरी निगाह में तैरने लगा था । यह नशे का मसर पा । मैं समझ नहीं पा रहा था कि वह अधेड़ की पुकार की अवहेलना क्यो कर रहा है ? मेरे कानो मे 'कुरजा' को स्वरलहरिया गूंज रही थी । लोग ठहाको और बातो के बीच पी रहे थे।
शरावघर 'रामूडा ! सुनता नही है रे ?' अधेड़ ने फिर पुकार लगाई। इस बार उमको आवाज जरा बुलन्द थी । लड़के ने उमकी तरफ़ तवरजो दी । लेकिन वह अपने स्थान से नहीं हिला । 'क्या ?' उसने वही से कहा । 'पापड़ तो दे दे ?' अधेड़ ने अपने बेतरतीव खिचड़ी बालो में हाथ फेरते हुए कहा। उसके पागे खाली गिलास रखा था । वह बीड़ी पी रहा था। लडका अनमने पन से अधेड के नजदीक गया । टोकरी से निकाल कर उमने एक पापड़ उस के आगे किया तो मैंने अपनी रान पर एक चिकोटी काटी। खुद को मैं होश में लाने की कोशिश करने लगा । लेकिन नहीं, मैं होश में ही था। मैंने मही देवा-अधेड पापड़ वाले का कान उमेठने लगा था और लडका दर्द से कराह उठा था। उमका फीका चेहरा सुर्ख हो चला था। यह क्या वहशीपन है ? अन्य पीने वाले क्यो इस जुन्म की तरफ़ तवज्जो नही दे रहे हैं ? 'कब से बुला रहा हूँ ? सुनता ही नही लाट साहब ।........' कान छोडने के बाद उसने पापड लेते हुए कहा । मैंने साफ़-साफ देखा, लड़के की प्रांखों में प्रांसू थे, लेकिन वह रो नह रहा या । मैं उस अधेड़ के प्रति गुस्से से भर गया । लड़का मुड़ने को हुमा तो उसे रोक लिया। "कितने पैसे हैं तेरी जेब में ?' अधेड ने लडके से पूछा तो उसने दूसरा खाली हाथ दिल पर बनी जेब पर रख लिया, जिसमे निश्चय ही कुछ छोटे सिक्के थे। वह महम गया था। उस मरियल दारूड़िये को यह मजाल ? दादागिरी कर रहा है क्ममिन पर? मैंने खुद से कहा। लड़के को मैं उसके चगुल से मुक्त कराने की गरज से उठने का विचार करने लगा था। 'नही है !' डरे हुए रामूड़े ने कहा। "झूठ बोलता है !' वह घुडका । 'पोय खूसट !' मजदूरो की टोली के पास बैठे पी रहे एक तगड़े-मे युवक ने अधेड को टोका । 'यह क्या बकवास है ?' 'मुंह मम्माल कर बोलना, बाबू !' अधेड़ ने उसकी पोर मुखं पायो मे देखते हुए कहा । 'मैं अभी तेरी गरदन मम्भाल लूगा !..... क्यों इसे तग कर रहा है ?
११२ राजस्थान के कहानीकार ! मैं खुश हुग्रा कि चलो कोई तो माई का लाल सामने पाया। रामूड़े को अव निजात मिल जाएगी, मैंने सोचा । अन्य पीने वालो ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया । गर्वया 'कुरजा' समाप्त कर फिर पीने लगा था । मैंने भी अपनी दारू की सुध ली। 'तेरी मा ने कितना दूध पिलाया है तेरे को ?.... , टेंट्या दवा दूंगा। ममझा ?' फटे बास-सी लेकिन बुलन्द आवाज में वह अधेड अजीव तरह से हाथ लहरा कर बोला। उसका ध्यान इस वक्त तक रामूड़े की तरफ़ से हट चुका था। जबाव मे वह तगडा-सा व्यक्ति बिजली की फुर्ती से उठ कर अधेड़ के सामने चला गया। अब सब पीने वाले उधर ही देखने लगे थे । 'बावू लोगो! झगड़ा मत करो।..... पुलिस प्रा. जाएगी अभी।' काऊंटर से पावाज पायी । दारू बेचने वाले ने प्रागाह किया । 'क्या कहता है ? बोल !'अधेड की नाक के ग्रागे तगडे से व्यक्ति ने धूसा तानते हुए कहा । लड़का बहा खडा कॉपने लगा था। अधेड ने भी जवाब में उसका गिरहवान पकड लेना चाहा। मगर उम मे यह नहीं हो सका । उसने अपने दोनो हाथ इधर उधर चलाने शुरू कर दिये थे । वह अपना सतुलन बनाये न रण मका । वेबमी में वह गिरहवान पकडने वाले को फोहश गालिया बबने लगा था । इम पर उसने अघेड की खमखसी दाढी वाले गालो पर कम कर तीन-चार चाटे जमा दिये । गिरहवान पर उस की गिरफ्त पहले से मजबूत हो गयी थी । 'मत मारो, मत मारो !' लड़के ने कहा । उसने टोकरी एक ओर रख दी थी, जिसमे प्रव एक ही पापड शेप रह गया था। मार खाया हुअा अधेड तेजी मे गालियां अकने लगा या । उसके मुंह से झाग निकलने लगा था। उसका चेहरा विद्रूप हो उठा था । .. तगडे से व्यक्ति ने पेंट को पिछली जेब से 'एक बडा मा नाकू निकाल कर एक झटके से खोल लिया । चार का चमकता हुप्रा फल अपनी नगी प्रांखो सामने देश अधेड़ क्षण भर के लिए हतप्रभ हो कर चुप हो गया। मैंने अपने जिस्म मे झरझरी महसूस की। अन्य लोगो को कैफियत का जायजा लेने की स्थिति में मैं नही रह गया था । इतने में ...
शराबघर मैंने देखा रामूडा तगड़े-से व्यक्ति के चाकू वाले हाथ को अपने हाथो से पकड़ कर अल-सा गया है। चाकू का फल रोक कर उस युवक ने क्षण भर प्रश्नवाचक दृष्टि से लड़के की तरफ देखा । लड़का बेहद घबरा गया था। अधेड़ उसी तरह नशे मे झूमता हुआ गालियां बके जा रहा था। 'हाँ इन्हें छोड़ दो ।........ यह हमारे बाबा हैं !' उसने स्पष्ट किया, 'बाप ! मैं आपके पैर छूता हूँ, आप मुझे मार डालिये, लेकिन इन्हे छोड़ दीजिये !' कहता हुआ वह उसके कहता मे झुक गया था। मुझे एक जोरदार धक्का लगा। युवक का चेहरा अजीब-सा हो पाया । अधेड़ के गिरहबान पर उस की गिरपत ढीली पड गयी । बाद में उसने गिरहवान छोड दिया । अधेड़ हालाकि अभी भी अनाप-शनाप बक रहा था, लेकिन युवक चाकू बन्द कर जेब में रख चुका था । फिर वह तेज-तेज कदमों से वहां से चला गया । आधा भरा हुमा शराब का उसका गिलास उसी तरह मेज पर पड़ा था, जिसे वह अधेड़ गटक गया। मेरा नशा टूटने लगा था। मेरे पागे खाली गिलास थे, जिन्हें मैं बर- दाश्त नहीं कर पा रहा था । ..... और शराबघर से चलते समय मैंने कुछ छोटे सिक्कों की खनखनाहट सुनी, जिन्हें पापड़ वाला रामूडा जेब से निकाल कर अधेड़ को दे रहा था ।
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सख्त चेहरे वाला आदमी ईश्वरचन्दर
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सख्त चेहरे वाला आदमी
पहले तो एक क्षण को वह डर गया था।
थका-मांदा, पसीने में तर, बरामदे मे सायकिल रखकर, जैसे ही वह
अन्दर धूसा, तो देखा, सफेद दाढ़ी वाला एक बूढा सा प्रादमी, उसके कमरे में,
आँखे मूंदे ईजी चेयर पर पडे-पड़े वीड़ी पी रहा था।
वह डर गया, कि यह कौन आदमी है, जो उसके घर मे ऐसी लापरवाही
के साथ प्राकर बैठ गया है, और पड़ा-पड़ा मो से बीड़ी फूक रहा है।
हाथ वाले एक-दो थैले उसने मूळे पर रख दिये। उसके कमरे मे
घुसने, और थैलों को मुद्दे पर रखने से जो थोडी बहुत प्राहट हुई थी, उससे भी
सफ़ेद दाढी वाले उस यूढे की आंग्वें खुली। लेकिन उसके दो उँगलियो के
चीच पकडी हुई बौड़ी बराबर धुनां फेंक रही थी ।
तब
वह
आगे बढ गया, और बड़े गौर से उमने बूढे के चेहरे की तरफ
देखा। प्रय
वह पहचान
गया अरे, यह तो उसका बाप था। दाढी
बढा ली थी, या बूढ़ा हो गया था, तो क्या हुआ ! अपने ही बाप को पहचानने
मैं क्या देर लगती है ?
बूढा जब अव भी आंखें मूंदे पड़ा रहा, तो उमने पूछ ही लिया--
'क्यों आए हो?'
बड़े आराम से धीरे धीरे वाप ने पलकें उठाई। बीडी का एक तम्बा
कश लिया। और फिर बहुत ही संयम भरी धीमी आवाज में बोला-
'तुमने कुछ पूछा?
वेटे को गुस्सा भी प्राया,
और साथ के साथ वह हैरान भी रह गया, कि
उसका बाप कितने माराम मे भाकर उसके घर मे बैठ गया है. और फिल्मो में जैसे
खलनायक पूछा करते हैं, वैसे पूछ रहा है - तुमने कुछ पूधा
?
राजस्थान के कहानीकार -- पूछ रहा है, क्यो पाए हो ?'- बेटे ने फिर कहा। वैसी ही धीमी प्राधान में याप फिर बोला- 'तुम शायद गलत साल कर बैठे हो ! पूछना शायद तुम्हें यह है कि कब पाए हो ?' 'नही !.. मैं यही पूछ रहा है कि क्यों पाए हो ?' 'क्यो? इस घर में ऐसा कोई भी नहीं रहता, जिसे में अपना कह " सक 'नही ! ऐसा कोई नहीं है।' बेटे ने तल्ली से कहा। वेटे के मुह से ऐमो बात सुनते ही, कोई भी वाप चौक सकता है। लेकिन सफ़ेद दाढी वाला वह बूढा नही चौंका । म उसके चेहरे में कोई परिवर्तन पाया। उसने तो बम, बीड़ी का एक कश लिया, भौर एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ फिर बोला- 'थोडा बैठो ! .... तुम पसीने में तर हो रहे हो। पसीना सूखते ही तुम ठीक से बात करने लायक हो जानोगे।' बेटे को तब लगा, जैसे बाप की ऐमी बात से, उसके शरीर से और पसीना बह निकला था। लेकिन फिर भी वह बोला हो- 'नहीं, नहीं ! इस पसीने वमोने को बीच में न लायो। बात करने लायक तो मैं अब भी हूँ।" बोलो !' बाप वैसे ही ईजी चेयर पर प्रधलेटा-सा पड़ा रहा । बोला, 'चलो, यही सही ! तो फिर ऐसा करो ! .. मै तुम्हारे थैले, जो तुमने मूडे पर लाकर रख दिये हैं. चौके में रख प्रायो। और बहू से भी मिल मानो। तब तक तुम्हारा पसीना भी सूख जाएगा, और हम बात भी कर लेंगे।' एक बार बेटे की इच्छा तो हुई, कि वह यहां भी बूढ़े की बात को कार्ट। लेकिन फिर जैसे यंत्र-चलित सा वह उठा । मुद्दे पर से उसने थैले उठाए, और चौके की तरफ चला गया। चौके में प्राकर उसने वीवी से पूछा, कि बूढा कव पाया है, और उसने उसे क्यों घर में बैठने दिया ? के सामने बीवी बोली कि वह से मना कैसे कर सकती थी ! ससुर उसने माज तक कभी एक बार भी मुंह नही खोला था, सो प्रब कैसे खोलती ! .
सख्त चेहरे वाला आदमी बीवी मागे बोली कि इतना अवश्य हुआ था कि दाढ़ी वाले किसी अजनबी को अपने दरवाजे पर खड़ा पाकर, पहले तो वह चौंक गई थी। चौंक भी गई थी, मोर साथ के साथ पहचान भी नहीं पाई थी, कि वह कौन है ! तभी बूढे ने आगे होकर उसे अपना परिचय दिया। परिचय पर भी वह विश्वास न करती । लेकिन पहले तो उसने ससुर को आवाज पहवान ली, और फिर बूढ़े की दाढी में छिपे चेहरे की धुंधली आकृति से उसे स्पष्ट लगा, कि उस अजनवी को पहचानने में वह गलती नहीं कर रही है। वह तो उसका ससुर ही है। जसने फिर बीवी से पूछा कि बूढ़े ने कुछ बताया होगा कि इतने वर्षों वह कहां रहा और अब ही क्यों पाया है, जब कि हम लोगों ने तो जैसे उसे मरा हुप्रा ही मान लिया है। धोवी बोली, कि न तो उसके बाद उसने ससुर से कोई बात ही की है, और न उसने खुद नै हो, ऐसी कोई कोशिश की, कि घर वालों के हाल चाल ही पूछ लेता। वह तो बस, दरवाजा खुलने के बाद, अन्दर पाराम-कुर्सी पर आ कर बैठ गया है। तब से लगातार बीड़ी का धुआँ कमरे से उठ रहा है या रह रह कर उसे जोर की खांसी उठती है। लेकिन पिछले दो तीन घंटों के दौरान न तो उसने कुछ मांगा है और न झांककर ही देखा है कि घर मे और कौन-कौन लोग हैं । उल्टे वह खुद ही एक दो बार चुपके से उस कमरे में झांकने गई थी कि देख पाए कि वहां बैठा-बैठा बुढा क्या कर रहा है । तो उसने देखा कि बूढ़ा बीड़ी तो पी हो रहा था और साथ मे उसने अलमारी में से कोई एक किताब उठा ली थी जिसे वह बडे ध्यान से काफी देर तक पढ़ता रहा था। वैसे जाने को बच्चे भी एक दो बार कमरे में झांकने गये थे। लेकिन बूढे को धनी सफ़ेद दाढ़ी को देखकर शायद वे डर गये थे और उनकी उस कमरे में जाने की फिर हिम्मत ही नहीं हुई थी। बेटे को तब लगा, कि उसकी वीवी ने सच में ही अपने ससुर से कोई बात नहीं की है, और ना ही बच्चे बात करने की हिम्मत कर पाए हैं । ० वह नहाने चला गया । रोज ही वह ऐसा करता है । ग्राफिम से पका मांदा-सा, पसीने मे तर, घर लौटता है। पाच-मात मिनिट तक पंखे के नीचे बैठता है, डाक देखता है और फिर नहाने चला जाता है। नहा लेने के बाद, वह वापिस कमरे में पाया । बूढा अब भी पहले की १२० राजस्थान के कहानीकार से तरह आखें बन्द किये ईजी चेयर पर पड़ा रहा। बीड़ी अब भी पहले ही की तरह उसकी दो उंगलियो के बीच धुम्रा उगल रही थी। बेटे ने बड़ी लापरवाही से एक बार बूढ़े की तरफ़ देखा। फिर उसने पास पडे टेवुल पर नजर घुमाई, जहाँ एक धार्मिक पुस्तक पड़ी हुई थी। उसे इस बात पर कोई आश्चर्य नही लगा। बीवी ने उसे प्रभी बता ही दिया था, कि बूढा अलमारी में से एक किताब उठाकर काफी देर तक पडता रहा था। किताब उसने एक जगह उठाकर, दूसरी जगह पर रख दी। पाहट तो हुई थी। लेकिन बूढा अब भी पहले की तरह आखें बन्द किये हुए पड़ा था। वेटे को वडा गुस्सा आया, कि देखो, उसने जानबूझ कर कुछ माहट पैदा करने के लिये, किताब एक जगह से उठाकर दूमरी जगह रख ली थी। लेकिन बूढे पर उसका जैसे कोई असर ही नहीं हुआ था। तभी उसने पूछ ही लिया-- 'कहा थे अाप इतने साल ?' बूढा बिल्कुल नहीं चाका । जैसे उसने पहले ही जान लिया था, कि कोई उस कमरे में पाया है । धीमे से उसने पलकें उठाई- 'प्रासाम में था।' तब वेटे को यह बात कहते हुए थोडी भी झिझक नहीं हुई, कि उन लोगों ने तो उसे मरा हुमा ही मान लिया था। भला जिस वाप ने इतने वर्षों तक अपने घर की खबर न ली हो, उसके लिये और सोच भी क्या सकता था ! इसलिये उन्होने बूढे को मरा हुआ ही मान लिया था। इस बात पर भी बूढा नही चौका । बोला. 'हां ! सही है । तुम लोगों ने जो मुझे मरा हुप्रा मान लिया, अच्छा ही किया । वरना मेरे पाने की प्रतीक्षा तुम लोग कुछ कर नहीं पाते ।' वेटा बोला -- 'करने को तो अब भी क्या कर पाए है ! जिस घर में कमाने वाला बाप हो वहाँ बच्चो का अपना कोई भविष्य भी होता है कोई सपने होते हैं । लेकिन हम लोगो ने तो अपना भविष्य और अपने सपने, यह सोचकर न्योछावर कर दिये, या समझ लो त्याग दिये, कि बेबाप की प्रौलाद का तो ऐसा ही भविष्य होता है। बाप बोला- 'मैं सब समझता हूं. कि तुम क्या कहना चाहते हो । लेकिन अब न तो मेरे बीते दिन वापस पा सकते हैं और न ही तुम्हारा कोई भविष्य रह गया है। एक दो दक्षण को चुप रह कर यूढा फिर वोला - 'मालती भी मर गई होगी ?" - .
सरत चेहरे याना पादमी १२१ उसके तुरस्त बेटा योला- 'हो मा तो मापके चले जाने के दो-तीन पं बाद ही चल वसी । बसे, मर सो वह उमो दिन ही गई थी जिस दिन काफी कोशिशो बाव- जूद हम भापका पता नहीं लगा पाए थे। लेकिन उसके बाद भी दो तीन साल उसने यों ही जी कर निकाल लिये। ग्राप ये चले जाने से, मो वे मरने तक, हम लोग मा को मुस्कान देयने को तरसते रहे। लेपिन एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद, हम मा को मुस्कान वे पल तब ही देश पाए, जब वह मर रही थी, और हम उसके पास बैठे रो रहे थे। केवल तब ही मुरकराकर उसने हम लोगों को ढाढग दिया था, किया रो रहे हो, कोई मर यांचे ही रही हू । बस, वाद मा हमें छोड़ गई। यह कहते-बहते बेटे को पायें भर भाई। लेकिन उगने देखा. कि बाप के चेहरे पर म बात का थोड़ा भी दुप उभर कर नहीं माया, कि अर उमको बीवी मर गई है या यह नहीं रही। बूढा ने वन इतना बोला-'हां, मैंने भी यही अनुमान लगाया कि, मालती शायद नहीं रहो' वरना मुझे प्राए हुए तीन घटे हुए हैं । वह अगर जिंदा होती सो जरूर भागी-भागो मुझमें मिलने पाती । चलो अब मर गई, तो ठीक है। अब क्या हो मकता है । और बैगे मौन है भी यया, जीवन प्रक्रिया का अंत है, सो मालती का हो गया तो मैरा भी हो जाएगा।' बेटे को यडा अजीब सा लगा, कि देखो कैसी होती है यह बुढापे की उम्र, कि बीवी की मौत को कितनी प्रासानी से, बूढे में स्वीकार कर लिया, और कैसे बूढ़े को खुद को भी, इस बात का अब डर नहीं रहा, कि मौत एक भयानक चीज होती है, जिसे हर कोई इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, जिस मासानी में उसका यूढा बाप उसे स्वीकार कर रहा है । याप को तब अपनी लड़की को याद पाई-'वसुधा नहीं है ?' 'मा को मृत्यु के दो-एक साल बाद उसको मैंने शादी करवा दी।' बेटे - ने कहा। बाप ने केवल गर्दन हिलाई, कि जैसे सतुष्ट था, कि चलो अच्छा किया। वैसे, येटे ने, उसी दाण मन ही मन यह सोच लिया था, कि वाप ने अगर वसुधा के प्रति और कुछ पूछ लिया, तो यह बूढे को एक दो और भली बुरी बाते सुना देगा, कि वसुधा की शादी की जिम्मेदारी तो आपकी ही थी। व्यर्थ ही वह मन 'जो कि आपको करना था-और वसुधा की शादी के लिये, तभी के लिये हुए वजे में अाज तक ठीक से नहीं चुका पाया हूँ। मुझे करना पड़ गया था, १२२ राजस्थान के कहानीकार लेकिन बाप ने उस सम्बन्ध में मागे कोई यात नहीं की। तब फिर वेटे को लगा, कि जैसे अपने पहले वाले परिवेश से हट कर वह बातो के या मावुकता के बहाव में बह गया था। उसे बाप में जो कुछ विशेष पूछना था, वह पूछ ही नही पाया है इसलिये वेटे ने फिर बूढ़े से पूछा- 'क्या करते रहे प्राप प्रासाम में?... और वह भी इसने वर्षों तक ?' 'कुछ नहीं ! वहां एक औरत के चक्कर में फंस गया था। कुछ मैं फा गया था, कुछ वह फंस गई थी। और फिर मैं उसके जाल में ऐसा उलझ गया था, कि पहले का सब कुछ भूल-भाल मा गया । मालती को भी, तुम लोगो को भी।' वेटे को इस बात पर यहुत गुस्सा माया, कि यूढा तिमी लापरवाही और बेशर्मी से वह सब बता गया, जो एक बाप को अपने बेटे को नहीं बताना चाहिये । . तभी फिर बेटे को अपने मां के सोचने पर दया सी माने लगी, कि कसे उसे ख़राब खराब से विचार माते रहे, कि पता नही कोई दुर्घटना हो गई, या किमी ने, दुश्मनी मे, उसे कही कुछ ऐमा वैसा कर दिया। और उधर बाप था, जो घर पर तो कह गया था, कि दिल्ली जा रहा है । और न जाने कैसे-कैसे या कहा कहा से भटकता हुमा, वह प्रासाम निकल गया था। और वहां एय्याशी में जवानी गुजार दी। ० ० वैसे पिता को ढूढने की कोशिश तो उन लोगो ने बहुत की थी, लेकिन कही पता नहीं चला । तब एक हल्का सा सदेह उठा था सबों के मन में कि शायद प्रार्थिक संकट के कारण पैदा हुई परिस्थितियों के दायित्व से मुंह मोड कर पिता कही भाग गया है । और इधर मां थी, कि उसके मन में अपने पति के प्रति, बडे प्रजोव से संदेह उठ रहे थे, कि कहीं कोई दुर्घटना न हो गई हो, या किसी दुश्मन ने उनके साथ कुछ ऐसा वैसा न कर दिया हो। तब फिर बेटे को याद आया कि उनकी मां को मृत्यु के बाद एक दिन, उमका एक पड़ोमी भासाम गया था, और उमी ने ही प्राकर इन लोगो को बताया था कि उनके बाप जैसा एक प्रादमी उसे एक शहर में मिला था। उसने उससे बात करने की कोशिश भी की थी, लेकिन उनके बाप जैसा वह मादमी नकार गया था कि उसने गलत आदमी से बात कर ली है।
सख्त चेहरे वाला आदमी १२३ तभी मे बेटे को भी एक हल्का मा विश्वास हो गया था कि हां, बाप जिंदा है और शायद अपनी जिम्मेदारियो से मुंह मोड कर दिल्ली जाने के बहाने, घर छोड़कर कहीं चता गया है। !' अब जब बाप सामने था तो बेटे ने पूछ ही लिया- 'अपने एक पडोसी एक बार मापको प्रासाम में मिले थे उसकी बात को बीच ही में काटकर बूढा वोता- 'हां, मिला था। लेकिन मैंने ही उसे कह दिया कि तुम गलत आदमी से बात कर बैठे हो !' एक क्षण को बेटे को यह अच्छा लगा कि चलो जवानी में बोले हुए किसी झूठ के प्रति बाप अब मच बोल रहा है। तब बेटा फिर बोला- 'फिर अचानक ही आज कैसे हम लोगो की याद मा गई?' बाप बोला-'हो ! अचानक ही समझ लो ! अचानक ही याद मा गई । हुप्रा ऐसा था कि वहां अासाम मे उस औरत से मैने शादी कर ली थी। बहुत खूबसूरत औरत थी। • यहाँ बाप ने देखा कि बेटे के चेहरे पर शिकन मा गई थी। शायद इमलिये कि उसकी मां मे बढकर बूढा किसी अन्य औरत की खूबसूरती की बात कह रहा था। इसका मतलब कि यहाँ वह खुद ही अपनी मालती के प्रति एक हीन सी राय बना रहा था। लेकिन बूटा बेटे के चेहरे में पाए परिवर्तन या उसकी भावनामो की तनिक भी परवाह किये बगैर भागे बोलता रहा- 'फिर हम दोनों वरसों साथ रहे । उस पोरत के पास बहुत पैसा था। वह मेरे पीछे जैसे पागल हो गई थी। उसने मुझे ढेर-मा पैसा दिया कि वही आसाम में ही कोई धंधा पानी कर लूं। लेकिन वापस अपनो के पास न जाऊ। मकान-वकान सब उसने मेरे नाम कर दिये थे। और मैं भी लालच में..." तभी बाप की बात को वीच ही में काट कर बेटा बोला- 'अपनों से बढ कर आपको वे मकान-वकान और वह खूबसूरत औरत अच्छी लगी?'- बाप को लगा कि बेटे ने व्यंग से वहाँ 'खूबसूरत' शब्द पर अधिक जोर दिया। वह बोला- 'हो, ऐसा ही कुछ हो गया। मैंने कहा ना कि मैं जैसे उसके चक्कर में फस गया था.... उसके जाल मे उलझ गया था। बेटे को भी लगा कि हो सच होगा। उसका बाप किसी के पपकर में फस गया होगा। वैसे भी . जवानी में उसका वाप काफी खूबसूरत लगता था। - १२४ राजस्थान के कहानीकार तभी बेटा फिर बोला-- 'चलो छोड़ो ! जो हुआ, सो हुआ !.... अब आप हमसे क्या लेने आये है ?' उमी ही शून्य भाव से बूढा बोला- 'लेने नही, देने आया हूं। अपनी पूरी जायदाद तुम्हारे या तुम्हारे बच्चों के नाम कर देना चाहता हूँ। मेरी प्रामाम वाली बीवी से अगर कोई बच्चा हुआ होता तो शायद उस जायदाद पर, तुम्हारा या तुम्हारे बच्चो का अधिकार न रहा होता। और न मैं तुम्हें कहता ही। क्योकि वह सभी कुछ मेरी उम बीवी का ही दिया हुप्रा है । लेकिन अब तो वह खुद भी मर गई। और हम दोनो के कोई बच्चा हुआ ही नहीं । बच्चा होता भी कैसे ! तब भी हम दोनों कोई वहुत जवान तो थे नहीं । यो ही बस थोडा एक दूसरे के चक्कर में आ गये थे। इतना कह कर वाप नै एक यार दिल पर हाथ रख दिया। कुछ क्षणो की चुप्पी के बाद बाप फिर बोला- 'और फिर जब वहां कोई बच्चा नही था तो मुझे याद आया कि 'तुम लोग तो अभी हो। ... वैसे मैंने सोचा यह भी था कि मालती अभी जिंदा होगी। वह नहीं रही। चलो छोडो तुम हो, तुम भी तो उसकी निशानी हो !' वेटा बोला- 'नही ! हमें आपकी जायदाद-वायदाद से कोई मोह-वोह नहीं है। आपके मन मे पाए जिसे दे दो !' इतना कहते हुए बेटे को लगा कि देखो बाप कितना निर्मोही या कठोर हो गया है कि उसने इतना तक भी नहीं पूछा है कि अब मेरे कितने बच्चे हैं ? या बच्चे कहाँ हैं ... एक नजर में उन्हें देख तो लू। बाकी कहने को वह कितनी प्रासानी से कह गया कि जायदाद वह उसके या उसके बच्चों के नाम कर देना चाहता है। बेटे को याद पाया कि जब पिताजी घर छोड कर चले गये थे तब उसके एक भी बच्चा नहीं था। बम उसकी शादी हुई ही थी कि कुछ महीनों बाद, उसका बाप फरार हो गया था। तब के बाद अब जाकर उसे अपने घर वालों की याद प्राई है। तभी फिर गुस्से ही गुस्से में बेटे ने बाप को अच्छा बुरा सब कह डाला कि जब उनका अपने घर वालों के प्रति कोई कर्तव्य या तव तो वे इश्क-विश्क के चक्कर में फमै रहे। और अब जब कि वे जैसे-तैसे दात रोटी कमाने या अपने पैरो पर बड़े होने लायक हुए हैं तो उन्हें अब याद पाई है कि हम लोग जैसे अभी तक इनके सहारे बैठे हैं। या जैसे हम बाट जोह रहे थे कि कय पिताजी ढेर सारा धन कमाकर हमारे लिये ले पाते हैं।
सदा चेहरे वाला मादमी चता चूहा सब गुनता रहा । उसने देखा उसन: घोड़ी बुझ गई थी। एक बार पुन बोडी मुलगाकर वाप बोला- 'जब तुम इतना कुछ कह गये हो तो एक बात तुम्हें बता देता हूं। प्रपनो जायदाद वगं रह से मैं शायद तुम लोगो को नही भी देता। वे मा नो मेरे बुडापे का सहारा थी । और फिर यह भी सिमाज ये मादमी को जितना स्वार्थी होना चाहिये, उतना में भी लेकिन सच तो यह है, कि मुझे एक माय दो-दो बीमारिया लग गई हैं। एक नो कैसर है। दूसरे. रह रह कर मुझे दिल का दौरा पड़ता है। कई चार ऐमा हुमा है किजमे पय गा तब गया। लेकिन फिर न जाने क्या बात है कि मैं मर नही पाता । अब नो र डाक्टरों की बातों मे भी मुझे लग गया है, कि मैं कुछ ही दिनो का मेहमान और हूं। मैं नहीं जानता कि मेरी मौत कैसर से होगी या दिल के टूटने में । लेकिन होगी जल्दी यह तो करीब-करीब निश्चित ... बेटे को लगा, कि बूढा बहुत माफ़ या सपाट ढंग मे अपनी बात कह रहा था । उसके चेहरे पर ऐसी कोई रेखाएं नहीं थी, जो कि एक साधारण प्रादमी के चेहरे पर हो, जिसे यह पता चल गया हो, कि वह अब कुछ ही दिनो का मेहमान और है। तभी बेटे ने बड़े ध्यान मे, धाप के चेहरे और शरीर को बारीकी मे देखा। हालांकि बाप पहले दाढी नही रखता था। लेकिन फिर भी बाप की दाढी में ३का, बाप का चेहरा उसे बहुत कमजोर लगा। बेटे को लगा, कि बाप की बाहो और शरीर में कैसो मलवटें पड़ गई थीं। उनकी पहले वाली खूबसूरती भी न जाने पर कहाँ उड़ गई थी। ० ० ० मे नफरत तो धाप मे उसे तभी हो गई थी, जब बाप के चले जाने के कुछ वर्षों बाद, उनके पडोस के एक आदमी ने ग्राकर उन लोगो को बताया था, कि प्रासाम के एक उपनगर में, उमने, उनके वाप जैसे एक प्रादमी को देखा था। उस आदमी से बात भी करनी चाही थी, लेकिन बूढ़े ने तब उस आदमी का पह- चानने से इन्कार कर दिया, कि उमने किसी गलत आदमी से बात करती है । .तो, नफरत तो बाप से वह उसी दिन से ही करता पा रहा है, कि देखो, उसका बाप कैसे अपने ही दायित्व से पलायन कर गया था। लेकिन उसे दया मिर्फ इस बात पर पा रही थी, कि बूढा वितनी आशाएं लेकर प्राया होगा, कि उसकी बीवी उसे वापिस माया देख कितनी गद् गद् होगी-और कैसे राजस्थान के कहानीकार प्रा कर उसके गले मिलेगी। या सुद बैटो हो कैसे, पैर कर बाप की इपद्धत करेगा । लेकिन न तो उस बूढे की मालती जिंदा है, और इधर उसका बेटा, पर छूना तो दूर, उसकी औपचारिक इजत भी नहीं कर पा रहा है। तब फिर बेटे ने पूछ ही लिया-~-'कुछ खाया पोया है आपने ?' 'नहीं !' बाप ने एक शब्दीय संक्षिप्त सा उत्तर दिया । 'खाप्रोगे ?' 'हो, खा लूंगा । भूख भी लगी है । पहले सोचा, कि बहू से मांग लेता हूँ। लेकिन फिर लगा, कि तुम्हारे पाने का भी शायद वक्त हो गया बैठ कर खा लेंगे।' 'हूं !' कह कर बेटा चुप हो गया। साथ ०००तब अनायास ही बेटे को लगा, कि न जाने क्यो बाप के प्रति उसके मन मे थोडी नर्मी पाती जा रही है। वेटे को तब कुछ सूझ ही नहीं रहा था, कि बाप के साथ वह और कैसी या क्या-क्या बातें करे। तभी ऐसे ही उसने पूछ लिया-'ये दाढ़ी-वाढ़ी क्यो बढा सी है पापने ?' पहले जैसी ही गौर मुद्रा में बूढा बोला- 'अब किस के लिये बनाता? जवानी में तुम्हारा यह बूढा वाप अच्छा खासा खूबसूरत था। रोज शेव बनाता था... अब तो बस.... !'-वाक्य को प्रधूरा छोड कर ही बाप धुप हो गया। बेटे को भी और कुछ बोलने को नहीं सूझा, तो पंह नठ कर दूसरे कमरे में चला गया। तभी तुरन्त ही बाप ने उसे फिर बुला लिया, और बेटे को एक गिलास पानी भर लाने को कहा । बेटा पानी भर साया तो बाप फिर बोला- 'मुझे भाज फिर दिल की तकलीफ हो रही है । कहीं ऐसा न हो कि मैं यही मर जाऊँ, पोर जायदाद वर्ग रह की वसीयत होने से पहले ही सब कुछ चौपट हो जाए।' .
सल चेहरे वाला प्रादमी १२७ बेटा बोला- 'अगर बहुत ज्यादा तकलीफ हो रही हो, तो डाक्टर को बुला लूं।' बेटे को फिर भी लगा, कि यह उसे क्या हो रहा है। पिता के प्रति उपका व्यवहार इतना नरम क्यों होता जा रहा है । लकिन बाप बोला- 'नही, नहीं ! मेरी जेब में गोलियां है। तुम तो गिलास मुझे दो !' बूढ़े ने अलग-अलग प्रकार की दो तीन गोलियां पानी के ली। गोलिया निगलते हुए बूढ़े को जब गर्दन उठी, तो उमकी दृष्टि दीवार पर लगी, अपनी मालती की तस्वीर पर उठ गई। वह कुछ देर को एकटक तस्वीर की तरफ देखता ही रहा । देखा तो यह सब बेटे ने भी, लेकिन वह इसे अनदेखा कर दूसरे कमरे में चला गया। साथ निगल - इसके बाद चौके में जाकर उसने बीवी को खाना बनाने के लिये कहा । साथ में यह भी कह दिया कि उसके पिताजी के लिये परहेज का खाना बनाए, क्योकि उसे कैसर के रोग के साथ-साथ दिल के दौरे भो पड़ते हैं। हालाकि बूढे ने बेटे से ऐमा कुछ भी नहीं कहा था , लेकिन उसने ही बीवी से ऐसा कह दिया कि बूढे के लिये परहेज का खाना बना और वही फिर बेटे ने अपनी बीवी को बता दिया, कि कैसे उसका वाप प्रामाम को किसी पोरस के चकार मे फंप गया था। और कैसे उम औरत ने अपने मकान व कान पिता जी के नाम कर दिये थे। अब वह औरत भी मर गई है। और बूढ़े को भी डाक्टरो की बातों से लग रहा है, कि वह अब कुछ ही दिनो फा मेहमान और है। फिर अन्त मे जैसे कोई रहस्य भरी बात सुनाने के अंदाज मे बीवी को उसने बताया, कि कैसे उमका बाप, अब अपनी पूरी जायदाद उसके या उसके बच्चो के नाम कर देना चाहता है । योवी सब सुनती रही। लेकिन उसने अपनी तरफ से कोई गय नही सुझाई । केवल हल्की मो मुस्कान उसके होठो पर पाई और फिसल गई । बेटा फिर उस कमरे में चला गया, जहाँ बाप बैठा था । बाप फिर बीड़ी . १२८ राजस्थान के कहानीकार पी रहा था । बेटे को लगा कि देखो, बाप वीडी का कितना शादी हो गया है, कि एक के बाद एक बोडी पिये ही जा रहा है । तब उसने बाप से कहा – 'कैसर-वैमर मे डाक्टर लोग बीड़ी के लिये मना नहीं करते ? हमने तो सुना है कि तम्बाकू कैसर के लिये बहुत हानिकारक चीज है । तो, डाक्टर लोग मना तो करते होगे।' वाप वोला- हां, करते है । लेकिन अब क्या है, जब मरना निश्चित ही है, तो मौत दो दिन पहले ग्राए, या दो दिन बाद में क्या फ़र्क पड़ता है।' बाप के ऐसे उत्तर पर वेटे को गुस्मा तो पाया, लेकिन उसने फिर मन ही मन मे कुढते हुए सोचा-मग्ने दो ! जब कोई खुद ही अपनी जान को फिक न करे, तो वह हमारा ही सिर दर्द क्यों हो?-मरने दो ! तभी बेटे को एक अजीब सी बात खटकी, कि पूरी बात-चीत के दौगन बाप के चेहरे पर कभी एक बार भी मुस्कान नहीं पाई थी। केवल वार्तालाप के बीच में रह रह कर वह खांसा जरूर था। कभी कभी तो लगातार और वही फिर वेट को मन ही मन यह भी लगा, कि वह वाप से और क्या कहे ! अब उसे लगने लगा, कि जैसे वाप वाली जायदाद आदि की वात की तरफ शायद उसका झुकाव बढता जा रहा है। तभी फिर उसे मां को याद आई, तो उसे फिर लगा- नहीं । ऐसे वाप से कैसा समझोता, जो उसकी मां की भावनाओं की फिक्र किये बिना ही, घर से मुंह मोड का कहीं चला गया था। मा बेचारी मरते दम तक पति के देखने को तरसती रही ! उसने सोचा -- नहीं ! तब बाप की तरफ देख कर थोडा कठोर भाव से वेटा फिर बोला- 'देखिये, साना हम माथ खा लेते है। उसके बाद आप भले ही कही भी चले जाएं हमे अापकी जायदाद-वायदाद से कुछ लेना देना नहीं है। प्रापकी इच्छा है, किसी की भी दे दें । वैमे, प्रापका दिया हुया यह पुश्तैनी मकान ही हम लोगों के लिये बहुत है। . बूढे के चेहरे मे लगा, कि जमे बेटे को इस बात से उसके लिये कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। वह बोला केवल इतना ही- 'देखो ! सोच लो ! खुद मः बाद दुनियां मर जाती है । मेरे लिये कुछ फर्क नहीं पड़ेगा । कुछ होगा भी, तो तु' लोगो के लिये। और एक तरह से मेरा घोड़ा कर्जा भी चुक जाएगा, कि जवानी सख्त चेहरे वाला मादमी १२६ " मैं जब तुम लोगों के प्रति मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाया था, तो उसको ऐसे ही कुछ पूर्ति हो जाए । रही मालती की बात । उससे तो मैं......' आगे बूढ़ा कुछ बोला नहीं । लेकिन उसने अपना वाक्य अधूरा छोड़कर ऊपर आसमान की तरफ़ देखा, जैसे कह रहा हो कि मालती से तो मैं ऊपर ही माफी मांग लूंगा । इस बीच बेटे को ध्यान माया कि शायद खाना तैयार हो गया होगा। यह पूछने के लिये उठ कर वह फिर चौके की तरफ चला गया । खाना लगभग तैयार हो गया था। बस थोड़ी सी देर थी। बीवी जब तक पाना परंसे, तब तक उसने पानी-वानी भर कर वाप के सामने रख दिया । वह फिर चौके में बीवी के पास जाकर बैठ गया ! खाना परसा जा रहा था कि उसने फिर बीवी को बूढ़े के साथ हुए उसके प्रागे के वार्तालाप का सार बता दिया कि कैसे उसने अपने याप को कह दिया है, कि हमें आपकी जायदाद से कुछ भी लेना-देना नहीं है, कि पाना या लेने के बाद प्राप कहीं भी चले जाएं। कुछ सोच कर बीवी ने बस इतना ही सुझाया कि पाप की यात को टाल कर वे अच्छा नहीं कर रहे हैं। उन्हें बाप की बात मान सेगी गोहिमे । बीवी आगे वोली-कि उसे अपने पिता के साथ ऐसा रूखा व्यवहार भी नही करना चाहिये कि खाना खा लेने के याद वह कहीं भी चला जाए । मादि-प्रादि । एक क्षण को फिर बेटे का मन पसीज गया- तो फिर से ही लें। तभी फिर बेटे को लगा कि हो, वह शायद कुछ गलत सोच बैठा है । या गलत कर बैठा है। ०० गया, ० खाना-वाना लेकर वह कमरे में तो देखा, बूढा वैसे ही प्रौखें बंद किये ईजी चेयर पर अघलेटा-सा पडाहमा था। वैसे ही जैसे शुरू-शुरू में घर में घुसने से बेटे ने उसे देखा था। बीड़ी उसकी दो उंगलियों के बीच जैसे विपक सो गई थी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब बूढ़े के होठो पर एक स्थिर मुस्कान थी।
१३० राजस्थान के कहानीकार तव बेटे ने देखा कि बाप को दी गलियों के बीच चिपकी हुई बीड़ी बुझ गई थी। जल्दी-जल्दी में खाना टेवुल पर रखकर वह बीवी को चौके से बुला लाया। बूढ़ा अब भी पत्थर के किसी चुत की तरह मांखें मूंदे पड़ा हुआ था। कुछ देर वे दोनों घर-पूर कर बूढ़े को देखते रहे, देखते रहे । फिर वे एक दूसरे को ही देखने लगे। असल में दाढी से ढके बूढ़े के सख्त चेहरे के हाव भाव से, वे लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि बूढ़ा जिंदा है या मर गया है। बेटे को तव कुछ देर पहले का संजोया हुमा भपना कोई सपना बिखरता हुप्रा सा लगा। उसकी इच्छा हुई कि टेवुल पर पड़े बाप के लाइटर से वह उसके हाथ वाली बीडी सुलगा दे और वाप के कंधों को हिलाकर उसे जगा दे और कहे- कि उठो, मैं खाना ले माया हूँ । बूढ़े के सख्त चेहरे पर भव भी मुस्कान बिखरी हुई थो और बेटे को हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि बाप को जगाए या लाइटर से उसकी बीड़ी सुलगा दे। ....और इधर उसकी बीवी ने तो रोना ही शुरू कर दिया या। 00 सलीब पर टंगे लोग शचीन्द्र उपाध्याय
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सलीब पर टगे लोग . प्लेटफार्म से लग कर शेड में करती हुई दूधिया लाइटों की रोशनी वनी लाइनों पर सू सू करते इंजन " । यह शेड नया बना था। देखने पर जलती हुई ट्यूब को पक्ति बड़ी प्रच्छी लगती। शाम होते ही शेड के नीचे रात काटने के लिए बेघरवार लोग चले माते थे। जब कभी पुलिम माती, अपना अपना सामान उठाकर वे भाग खडे होते और पुलिस के जाते ही सहमे हुए फिर लौट पाते। अपने पुराने स्थान पाने के लिए कभी कभी वे बुरी तरह झगड़ पड़ते। लेकिन शेड के पिछले कोने की और कोई नहीं पाता था। । वह स्थान झुरियों पड़ी बुढ़िया और उसके अधे बेटे के लिए छोड दिया गया था। प्रासपास के आवारा कुत्ते, दूध दुहने के बाद निर्देयता पूर्वक भगा दी गई गायें बारिश से बचने के लिए इस कोने में प्रा खड़ी होती। दो दिन से वर्षा तेंज हो रही थी। वे दोनों शेड के नीचे पड़े थे 7 फटी हुई गुदड़ो, घास काटने का हँसिया, एक लकड़ी और टायरो की टूटी चप्पलें बस, यही उनकी जायदाद थी। लड़का बिल्कुल अन्धा था और अक्सर बीमार रहता था। जबें भी वे दोनो-बाहर जाते, गुदड़ी वही पड़ी रहती और उसमे कुत्ते भाकर बैठते । उस दिन बुढिया को शायद बुखार था। पानी और वर्षा के कारण उड बढ़ गई थी मौर शेड के चारों मोर हया के थपेड़े टक्कर मार रहे थे । बुढ़िया गुदडी में लिपटी हुई पड़ी थी और लडका अपना घुटना उससे टिकाये दोनो हाथो से सिर थाम कर बैठा था। रात के दक्ष बज रहे थे और उधर दो-चार प्रावारा पशुमओ, पानी में भीगे कुत्तो के अलावा कोई नहीं था । शेड का ऊपर वाला हिस्सा भिखारियों से भरता जा रहा था । 'मोत्या माज भी वांगा नही लाया। लडका अपने आप ही बुदबुदाया। उसके हाथ एक बार फिर गुदड़ी मे लिपटी गठडी बनी बुढिया पर जा टिके । * राजस्थान के कहानीकार बुढिया ने बड़े कप्ट के साथ मुह पोला मोर उसकी निगाह लड़के से फिमलती हुई उसकी बगल में पडे कुत्ते पर टिक गई। कुता पानी में भीगा था। भीगने से उसके शरीर के बालो के गुच्छे बन गये पे जिनसे पानी घू रहा था और रेला बनकर बुढ़िया को गुदडी तक पा रहा था। उसकी देह से भयंकर बदयू मा रही थी। 'दुर ""' बुढ़िया ने धीरे से ही कुत्ते को दुतकारा। लड़के की बात शायद उसने नही मुनो थी । वह कुत्ते पर निगाह टिकाये कांपते हाथों से कुछ टटोलती रही । अचानक ही उसके हाथ में लड़के का हाथ मा गया। लड़के का हाथ ठण्डा था और उसकी सारी देह हवा मे हिलते मूसे पत्ते को तरह काँप रही यो । दुत कारने पर कुत्ते ने अपनी पूछ हिलाई मौर पिछले पैरों के सहारे यहीं बैठ गया। 'तुझे ठंड लग रही है ?' बुढिया ने चितित होते हुए लड़के से प्रश्न किया । अंधेरे कोने में उसका प्रश्न एक गर्म सांस के साथ शेड में दुवक गमा मोर लड़का उसके और पास खिसक माया । अबकी बार बुढ़िया ने लड़के की सारी देह हाय से टटोल हाली । लड़के का सिर पानी में भीगा था और उसकी नीली कमीज से पानी टपक रहा था। यह कमीज किसी रेलवे पेटमेन की थी जो छार-बार होने के कारण फेंक दी गई थी और जिसे बुढिया लड़के के लिए उठा लायी थी । 'तू कहां भीग माया ?' 'तेरे लिए गया था, मोत्या की तलाश करने । बीड़ी भी नहीं थी।' 'फिर ?' 'मोत्या का तांगा अाज भी नहीं पाया। घास वैसी ही पड़ी है।' उन दोनो को बीड़ी की आदत थी। दो दिन से लगातार बारिश होने के कारण के कही नही जा पा रहे थे। वैसे रोजाना सुबह वे घास काटने जाते थे। दिन भर घास काटने और शाम को घास का गट्ठर लेकर तांगा स्टेण्ड पर मा जाते । मोत्या उनका स्थायी ग्राहक था। जब-तक उससे पेशगी भी ले पाते थे। बुढिया ने एक प्राख से कोने मे एक मोर ढेर हुई घास को मोर देखा । सचमुच घास वैसी ही पडी थी। घास से रिसते पानी से वहां की जमीन गीली हो गई थी। पानी का एक छोटा-सा रेला धीमी गति से चलता हुआ लड़के की मोर भा रहा था।
सलीय पर टंगे सोग "जीजी।' महके ने अपना मुंह पोला । वह मा को इसी नाम से पुकारता था । सहो के मावाज देने पर बुड़िया कुछ नही बोली। उसने अपनी दोनों पघ-मुदी मां सड़के की देह पर टिका दीं। 'मभी गोपाल इधर माया था।' 'तुझे कैसे मालूम हुमा । 'यहां पड़ा हो गया और मुझसे पैसे मांगने सगा। लड़के ने अपनी यात समाप्त कर खीमें निपोर दो पौर हमने की कोशिश की। लेकिन गोपाल का नाम सुनकर बुढ़िया के भीतर जैसे बारुद सुलग उठी हो। यह भीतर ही भीतर कुद गयी मोर उसने एक भद्दी-सी गाली हवा में फेंक दी। बाद में उसने अपने धार धार हुए पापरे के नैफे को टटोला। थोड़े बहुत पैसे जो पास वेचने से जोड़े गये थे, बुढ़िया के पास सुरक्षित थे। अभी भी बुढिया को महसूस हुमा, जैसे शराब का एक तीखा भभका उसके मुंह के पास माकर ठहर गया हो । 'वह हरामजादा इघर क्यों पाता है।' बुढ़िया अंधेरे में देखती हुई बडबडायो । गोपाल उसका सबसे बड़ा लड़का था जो लोको में काम करता था। उसकी बहू ने अंधे देवर और बुढ़िया सास को घर से भगा दिया था। बुढ़िया उसके विषय में जरा भी कुछ सुनने को तैयार नहीं होती। गोपाल और उसकी बहू दोनों से उसे नफरत थी। इसी कारण बात को बदलती हुई वह बोली- 'मोत्या शायद बीमार हो। पिछली बार जब मिला था तो कह रहा था कि पेट में दर्द है।" 'पेट में दर्द तो होता रहता है। लड़के ने इसे बेहद महज होकर लिया। उसके खुद के पेट में जब-तब दर्द हो जाया करता था मौर अब वह इसका अभ्यस्त हो गया था लड़के से शायद बैठा नहीं जा रहा था। उसने एक बार अपने भीगे बालों को सहलाया उनका पानी निचोड़ और बुढिया का महारा लेकर लेट गया। लडके के पेट में परसो सुबह दर्द था । फिर भी वह दिन भर बुढिया के साथ पास काटता रहा पा । शाम होते होते बुढ़िया को भयंकर जाडा लग पाया या और वह जल्दी से प्राकर गीले और नगे फर्श पर पड़ गयी थी। 'कोई बाबू-वावू ही घास लेने या जाता।' बुदिया ने आशान्वित होते हुए कहा । 'मोत्या तो क्या पता, कितने दिनों से आये।'
राजस्थान के कहानीकार 'हो । तू जब सो रही थी तो एक आदमी प्राया था।' 'कितना दे रहा था। 'पाठ पाने ।' लड़के ने व्यंग से मुंह टेढा कर कहा। 'सब हरामजादे हैं । तीन रुपये की घास के पाठ पाने .....' बुढिया ने इस वार दात पीसे और बाद में लड़के की पीठ पर अंगुलिया फिराने लगी। 'आज तूने कुछ खाया ?' उसने लड़के से जानना चाहा । 'क्या खाता ? घास ।' लड़के ने कहा और वह हंस दिया। हालाकि उसे जोरो को भूख लग रही थी, लेकिन उसे अपनी मां की विवशता ज्ञात थी। बुढ़िया ने घास की मोर देखा- वह अभी भी वैसी ही पड़ी थी। बुढ़िया इस बार खीझ पड़ी। 'उसके सिर पर घास पटक देता। पाठ पाने ही सही, लेकिन देच देता। वैसे भी घास बासी थी।' 'क्यो ? दिन भर की मेहनत के प्राठ माने । दो प्रादमियो की मेहनत कितनी होती है ?' 'तू तो पागल है । सब हराम की खाना चाहते हैं। ये नहीं जानते, घुटने भुटने कीचड़-पानी में घास किस तरह काटी जाती है।' बुढिया ने कहा पोर चुप हो गई। शेड के पश्चिमी सिरे से शोर उभरता आ रहा था। कुछ गायें तेजी से इधर भागती भा रही थी। 'जल्दी से लेट जा। वरना कोई पुलिस वाला पाएगा भौर भगाने लगेगा । इस बरसात मे कहां जाएगे।' बुढ़िया ने अपनी देह को गुदड़ी से लपेट लिया और माधी गुदड़ी लड़के के ऊपर डाल दी। लड़का झटपट जमीन पर पसर गया और सांस रोक कर भोर को पास पाता हमा. महसूस करता ?हा ) लेकिन ये सिनेमा देखकर लौटते हुए कालोनी के मजदूर थे जो माज को दिनों दिन बढ़ती महंगाई और पे कमीशन की रिपोर्ट पर जोर जोर से बहस कर रहे थे। भीड़ जब उनके पास से गुजर गयी तो बुढिया ने लेटे लेटे ही कहा- 'मुन तो। लेकिन लड़के ने उसकी बात शायद नहीं सुनी । उसने अपना मुंह बोला सतीब पर टंगे सोग पोर युनिया के पास अपना मुंह ले जाकर गोला- 'मब को सदियो में मैं अंगरखी बनवाऊंगा।" उसे शायद ठंड लग रही थी। लेकिन बुढ़िया ने उसकी बात नहीं सुनी और भपनी ही यात जारी रपी- 'मेरे पैरों में सूजन मा गई है। कपड़ो में जुएं पड़ गयो है। 'जुमो का क्या । जुएं तो मेरे भी पड़ रही हैं । लेकिन परों को सूजन पराब रहती है। 'मुझे तेरो फिकर है । मेरे मरने के बाद तेरा क्या होगा ?' बुढ़िया के स्वर में दर्द था । उसको मांयें शायद भोग माई थी। लहका यह सब नही जान सका । लेकिन बुढ़िया पात से समझ गया कि वह रोने लगी है। वह उसके नजदीक खिसक माया पौर बुढ़िया के हाप को अपनी पांखो पर फिराता हुमा बोला- 'रोती क्यों है ? तेरे बाद में भी मर जाऊंगा।' इम पर युढिया कुछ नहीं बोली । उमने समझ लिया कि लड़के की अावाज कांप रही है । बुढ़िया के हाप में अभी तक लडके का हाथ था। लड़के की देह सचमुच काप रही थी। 'तुझे भी ठंड लग रही है ?' बुढिया ने द्रवित होते हुए योड़ी देर बाद पूछा। 'हो । जोरो की।' लड़के ने धीरे से ही कह दिया । 'मरा तुझे भी बुखार पाएगा।' बुढिया फुसफुसायो । उसके सूजे हुए परों में रात सरकने के साथ साथ ददं बढता जा रहा था । वह प्रभी शेड के बाहर गिरते हुए पानी की बूदो को देख रही थी। बारिश के साथ हवा तेज हो गई थी और उसके थपेड़े उन दोनो को झिझोड़ रहे थे। लडका उसी तरह काप रहा था और गठडी बना हुमा शेड के खभे की जड़ में घुसता जा रहा था। अचानक ही खंभे से चिपका हुआ एक बडा-मा पोस्टर उनके पाम पा गिरा । बुढ़िया ने उसे देखा और अपनी पाखे लडके पर टिका दी। धीरे से ही उसने लड़के की देह को छुप्रा । लडके को जोरों से बुखार चढ पाया था । ठड के कारण लड़के की देह दुहरी हुई जा रही थी। उसने विवशता के साथ अपने आस पास देखा । लड़के को उठाने लायक उसके पास कुछ भी नहीं था । एक क्षण के लिए वह कसमसायी और धीरे धीरे राजस्थान के कहानीकार उधर घिसटने लगो, जहाँ पोस्टर पाकर पड़ा या । उसने पोस्टर का मोटा कागज उठा लिया और उसी तरह घिसटती हुई लड़के तक चली पाई। 'कैसा जी है, वेटा ?' उसने लड़के के माथे को सहलाते हुए पूछा। 'मुझे ठंड लग रही है।' लड़का चोखते हुए बोला। बुढिया कुछ नहीं बोली और पोस्टर वाले मोटे कागज से लड़के को देह ढंकने लगी। देह ढंकते समय उसने एक पल के लिए पोस्टर को देखा- गरीबी हटाये जाने वाला पोस्टर का कागज फर्श के पानी से भीग गया था और लड़के की देह ढकने के प्रयास मे टुकड़े-टुकडे हो गया था। कागज के ऊपर बाद मे बुढ़िया ने अपनी गीली गुदड़ी डाल दी और वह लडके को देह थपथपाने लगी। लडका कुछ बड़बड़ा रहा था और बुढिया खुद का दर्द भूली हुई कांपते हाथों से उसकी देह सहला रही थी। 00
सूरज कब निकलेगा
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स्वयं प्रकाश
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सूरज कब निकलेगा भैराराम भोंपड़ी मे बाहर मा गया। मासमान में घिरे घटाटोप यादलो में कही कोई तिरेड तक नही पडी यो । मि.मिर-भिमिर बरसात चालू ही यो पर इसे बन्द ही समझो। और बन्द भी कैसा? जैसे कोई मापको जमीन पर पटककर मापके ऊपर चढ़ बैठने के बाद दो पल सांस लेने के वास्ते रुक जाये । उफ ! भैरागम ने कान खड़े किये । कहीं से किसी पक्षी तक की कोई आवाज नही। कानों पर ठडे और कर्कश थपेड़े मारती सिर्फ एक ही प्रावाज . नदी के पानी को हरहाहट । बालू टूटकर गिरते समय भी प्रावाज नहीं करती। पाहिस्ता माहिस्ता कटती जाती है । एकदम पता नही चलता कितनी जमीन कम हो गयी । यह भैराराम का नया अनुभव है । झुरझुरी-मी महसूस हुई। फिर अन्दर मा गया । फर्श पर कीचड ही फीचड़ है । सुगनी दोनो टाबरों को गोद में लिये किनारे पड़े माथे पर गुममुम बैठी है । कुतूहल का भाव बच्चो को प्रांखों से कभी का गायब हो चुका है । अब वहां एक प्रातंक है, और कुछ नहीं। उधर देखने से भैराराम बेचैन हो जाना है। और फिर बाहर झांक प्राता है। अन्दर-बाहर के अलावा प्रभी और किया भी पया जा सकता है? उसने अन्दाजा लगाया कि शाम हो गयी होगी। फिर बाहर भाया । खतरा सामने था। उसका भूपा अपेक्षाकृत ऊंची जमीन पर है, पर नदी का पानी मुश्किल तीन बास रह गया है। रात तक ज़रूर उसका झूपा यह जाएगा। ज़िन्दगी का पहिया बस समझो कि किनोर पर भाग रहा है, कभी भी उतर जाएगा। नहीं, ऐसे कैसे काम चलेगा । कुछ तो करना ही पड़ेगा। वह सुबह ही निकल भागता । कल-परसो ही चला जाता। या कम से कम लुगाई-टावर को छोड़ पाता। लेकिन सुगनी की बात उसने नहीं मानी। सुगाई की अक्कल ! भाखिर ठाकर-सा का नमक खाया है उसने । ऐसे वक्त काश!
। राजस्थान के कहानीकार खडीना छोड कर भाग जाये ? और जब कि ठाकर सा होठ दबाकर मुस्कराते हुए उसे ललकार चुके हो- क्यो रे भैरा? कुछ मर्दपना बाकी है या नहीं ? पीठ दिखाकर भाग तो नही जायेगा ? लेकिन अब ? सुगनी की बात .. लेकिन उसे क्या पता था कि पानी रुकने की बजाय बढ़ता ही जाएगा और चारो तरफ़ से उसे घेरकर निकल भागने की गुंजाइश ही खत्म कर देगा ! उसके बाप ने नहीं देखा कभी इतना पानी ! खैर, जो हो गया उसे छोड़ो। अब क्या करना है यह सोचो। भैराराम ने अपनी गिरस्ती दुनिया के तामझाम पर नजर दौड़ायो। पानी से मोर्चा लेना है तो अपनी ताकत तो तौल ले। नही, डरने की कोई बात नही। अभी बहुत कुछ है। यह टूटी धुरियो वाला गाड़ा है। वह मजबूत मूज की रस्सी है। यह पक्की जड़ों वाला गोदी का पेड़ है। अ॒पा न भी मही अभी बहुत कुछ है। उसके बदन मे फुर्ती मा गयो। मन को जैसे किसी ने डंक मार दिया। धोती मोडकर कमर में खोंमी और खडे गाड़े को धम्म से पटक्कर खीचता-खाँचता पेड तक ले आया। टाबर भागकर बाहर मा गये । सुगनी अन्दर से बोल पडी- काऊ करो हो हम्मै ! ! यानी अब क्या करने लग गये ? यानी इतनी मुसीवत से मन नहीं भरा क्या। यानी वही लुगाई की अक्कल ! खर, उस पर वाद मे झुझला लेगा। अभी फुर्मत नहीं है। मुस्कुराया। उसका जीव भी बड़ा मजेदार आदमी है। पेड पौर ऊ ची जगह पर पा । तने के बिल्कुल पहलू में पड़ाकर उसने गाडा छोड़ दिया और भागकर रस्मा ले प्राया। तव बडे इत्मीनान से एक-एक गाठ को जांच जाच कर पूरा रस्सा खर्च करते हुए गाड़ा पेड़ के तने से बांध दिया । अब कहा जाएगा साला ! दो हाथ ! यहां तक पायेगा पानी ? अन्दर गया और खटिया उठाकर ले प्राया। खटिया को गाडे पर रख दिया। उस पर घर भर के गाभे-गूदड़े लाकर डाल दिये और कार टावरों को चढ़ा दिया। उन्हें तो मजा मा गया। पानी थम चुका था। यह रात को तैयारी थी। चारों प्राणी इसी तरह रात भर पटिया पर बैठे रहेगे। थोड़ी-पानी-भूख-नींद का नाम मत सेना । सुबह देखेंगे क्या हालत रहती है । नहीं चाहते हुए भी दीठ खेतो की तरफ़ गयी प्रौर पमर गयो । सब उजड़ गया। सारा वरवाद हो गया ! जैसे किसी ने दाल का सीरा मुह तक लाकर हटा लिया हो और जबड़ो मे घोचा ह्म दिया हो ! भैराराम उदास हो गमा, सूरज कब निकलेगा १४३ मासपास के सारे खड़ीनो में भरा काला-मटमैला पानी उसे मनहूसियत से भर गया ! सब चले गये। कुछ धर्मशालामो में पड़े हैं। कुछ शहर जाकर हम्माली करने लगे हैं। कुछ को अब भी उम्मीद है ! कितनी उम्मीदो से लोग आये थे। पानी की खबर सुनते ही कैसे टूट-टूटकर लोग अपनी घर-जमीन सम्हालने लौट आये थे। कैसी भावादी हो गयी थी ! और वह गोम्या भावी का लडका ? कहता था, महमदाबाद में हथठेला चलाकर पाया हूँ। पतलून पहनता था और हिन्दी बोलता था। साला! कहता था एक मिल मे चर्सी भी चलायी बदली । कुछ दिन और रहता तो पक्की में नाम आ जाता- पर नहीं भाई, घर घर होता है । ऐसी आजादी वहां कहां पडी है ? वहां तो वस भागो-लामो-खायो, भागो-लामो खाम्रो ! कहा गया होगा गोम्या भावी का लड़का ? और दूसरे सब ? और वह भी क्यों नहीं चला गया सबके माथ ? कैमा लगता होगा महमदाबाद में? बाजरी के टूठ पीले मुरझाए हुए और जले हुए , झंड के झुंड .. पानी में खडे हैं बेदम, पर जो टूट नहीं सके। भगवान ! भगवान कितना कर है ! ! ००० बीसियों साल बाद मुलक मारवाड़ मे ऐसा पानी बरसा है | वाजरी की इकलौती फ़मल लहलहा उठी है । मिट्टे फूटने लगे हैं। मन को उमंग प्रासमान खू रही है । कभी नहीं देखा उसने ऐसा जमाना। इस बार अपनी जमीन लेगा । सुगनी के लिए अस्सल चांदी के दो-चार दागीने करवाएगा। बस अब खुल जाये ! वरसा और बरसा.... और बरसा। बाजरी सिर से ऊपर निकल गयी। देता है जब छप्पर फाड़कर ही देता है। देर है पर अंधेर नहीं। भैराराम को लोगों की ये वार्ते सच-सी लगीं। वह शहर जाकर पाया। सब जगह यही आलम था। किसान के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। ट्रक खड़ी कर दो खेत में ! मजाल है किसी को नजरमा जाये ! कहो जो हार जायें ! खूब . लेकिन और बरसा । हंसी थम गयी । थिरक रेत मे धंसने लगी। मुस्कान मिमट गयी। नहीं, अब और नहीं चाहिए । अब धूप चाहिए । दाणा पडेगा कब? दाणा पकेगा कब? इस धारे का हम क्या करेंगे अगर धूप नहीं मिली ? धूप ... धूप.... ! वह फिर शहर गया। सब जगह यही हाल है। सव” निगाहे ऊपर उठी हैं। सबकी भौहों पर बल पड़ना शुरू हो गये है । सबने उगलिया ऊँची कर दी हैं। सबकी आँखो की चमक माशंका का जल छुकर छन्न छन्न बुझने लगी हैं। फिर और बरसा....मौर बरसा.... भोर सब मटियामेट हो गया। जो - १४४ राजस्थान के कहानीकार भो है वह, यह सब करने वाला... या तो राकस है या मूर्य ! साले को इतना पता नहीं कि अब हमे धूप चाहिये, पानी नही ? नहीं देगा तो प्यासा मार डालेगा, देगा तो नाक पकड़कर पानी में गरदन दाब देगा । पर अब क्या कहें ! कोई आदमी होता तो बीस-पच्चीस गाव के लोग भेले होकर जाते, समझाते. बुझाते, पैर मे पोतिये डाल देते, लेकिन भगवान ! उसे किसने देखा ? उसने तो लिख दी किस्मत और मो गया। भरी-पूरी फ़सल का तबाह हो जाना किसान के लिए बेटे की मौत से छोटा गम नहीं होता ! तव वह पाखरी बार शहर गया था। पाटा लेने। पोर उसे वहा कोई ऐसा मिनख नहीं मिला था जिससे अपना सुख-दुख पूछा-बताया जा सके । ठाकर सा बाहर गमे थे। संगी-बेली पता नहीं कहां चले गये थे। शहरातियों की और भी ममस्याएं थी। पतलूनों में कीचड लग रहा था । बसें-गाडिगा अस्त: व्यस्त हो रही थीं । कच्चे मकान धप-धप गिर रहे थे भौर चर्चा का विषय बन रहे थे । ठेकेदारों की दारू का मोल देश उन ढहे-गिरे पुलो, टूटी सड़कों से चुका रहा था जहा राख और गोबर के साय इन्सानियत को भी धर दबाया गया था । शहरानी इमी इन्सानियत को रो रहे थे। रोनेवालो में पी. डब्ल्यू डी. के प्रोवर- सियर भी शामिल थे। अखबार-डाक वगैरह बन्द होने से दफ्तरों पर मुर्दनी छायी हुई थी । कये हुए लोग दारू पी रहे थे, भजन-कीर्तन के कार्यक्रम कर रहे थे, या ताश खेल रहे थे। उन्हे भाकाशवाणी दिन मे कुछ खास बार तबाही के समाचार सुना-सुनाकर प्रमुदित और उत्तेजित कर रही थी। ऐसे में भैराराम की बात कौन सुनता ? एक भाईजी थे उसकी जान- पहचान के, जो दीपक वाला झंडा अपने घर पर दागे रखते थे और हर पाने. जाने वाले का स्वागत लगर छाप बीडी से किया करते थे-वे अपनी मंडली के साथ वाढ पीडितो की सहायतार्थ सास्कृतिक कार्यक्रम की तैयारियो में अभी से ही व्यस्त हो गये थे । जैसे कोई बीमार को देखते ही क्रिया करम की तैयारिया को नगे । बाकी कौन था ? कोई नहीं । चुनाव के दिन भी नही ये जो कोई भैराराम का दुखड़ा सुनने लायक समय निकाल लेता । हताश भैराराम जैसे अकेले गया था वैसे ही अकेला लौट आया। लौट पाया और घिर गया। , आस अंधी काया नहीं छोड़ती। शायद पानी रुक जाये। शायद रूप निकल जाये । शायद जमीन सूख जाये । शायद फिर बीज डाला जा सके। शायद भुखमरी से बचा जा सकने लायक पैदा हो जाये । शायद महाजन की देहरी पर सूरज कब निकलेगा मत्या रगड़ने से बचा जा सके । शायद सुगनी को मीन मजूरी में न भेजना पड़े । शायद ...... उफ ! बारिश फिर शुरू हो गयी । घटाटोप अधेरा। पता नहीं सूरज कहां मर गया। नदी का वेग तेज़ है । पानी फैल रहा है । जाने रात तक कहां पहुंचे । क्या खा जाये, क्या छोड़े ! ० ० ० फटी तिरपाल में दुबके-चिपटे वे चारो भीगते-भीगते भी ऊंघ लिए । नीद अपना धरम.नहीं छोडनी। अचानक भैराराम को ऐसा लगा जैसे कोई कुत्ता बिल्कुल उसकी खाट के नीचे चप्-चप् पानी पी रहा है। या जैसे कुत्ते एक नहीं अनेक है। फिर लगा जैसे जमीकंप जैसा कुछ उसने अभी-अभी महसूस किया है । हड़बड़ा कर भैराराम ने तिरपाल से सर निकाला और गरम हो चले शरीर पर बौछारों की ठडी मार का अनुभव किया। अपनी स्थिति का चेत होने में भी उसे कुछ पल लग गये । अरे ! अच्छा ! हो ! वह गाड़े पर जमी खटिया पर है। पेड़ सलामत है । पर वे कुत्ते ? कुत्ते कहा गये ? अचानक भैराराम को सब कुछ समझ में आ गया और वह धम्म से कूद पड़ा । कूदा था जमीन समझ कर, पैर पडे पानी में ! छपाक की अावाज हुई। सुगनी भी जाग पडी। अच्छा तो पानी यहां तक आ गया ? पाव घसीटते हुए गाड़े के पीछे की वाजू गया और रस्सी का इत्मीनान किया कि हां पेड से बंधी हुई है। कुछ जान में जान पायी। वापस प्राकर गाड़े पर बैठ गया । बीड़ी की याद आयो । अब कहा पडी है चोडी ! आ- खरी बीडी उसने आज सुबह पी डाली थी। ठुड्डा जरूर घर के किसी कोने-कचुले ..... ...पर वहां तो पानी भरा होगा। छोड़ो ! पानी तेज हो गया। तिरछी बौछार ने तिरपाल के नीचे के विछावन को भी भिगोना शुरू कर दिया । अचानक बिजली चमकी । भासपास का सबकुछ पल भर को उजागर होकर वुझ गया । लेकिन कसा था वह एक पल ? भैराराम को शुतरमुर्गी सुरक्षा पर ठठाकर उसकी सारी सूझ का मखौल उड़ा गया । वह एक पल । चारों ओर जल ही जल पानी का समदर । तेज बहता-डराता-चकराता- उफनता-शोर मचाता पानी का परलय और बीच में कमजोर नन्हा टापू . जिस पर घिरे बैठे थे चार नन्हे जीव....जैसे अपने-अपने में मनु या नुह के अभि- नय का पूर्वाभ्यास कर रहे हों । अब वातावरण शोर से भर गया था। बादलो की गड़गड़ाहट, बोछारों की तड़तड़ाहट, पानी की हरहाहट । कही किमी कटती जमीन से पानी में.भाटे गिरने की मावा और बीच-बीच में किसी किसी पेड़ ...
राजस्थान के कहानीकार टूट कर गिरने की प्रातं अहिट ? भैराराम का दिल बैठने लगा । हाथ-पैर कापने लगे । मांखें दिल्ली हो गयी। मन भगवान,भगवान रटने लगा। मगर गाड़ा उलट जाये तो ? अगर रस्सा टूट जाये तो? अगर जमीन घसक जाये तो ? भगर हम सब अलग-मलग बह जायें तो? कुशंकाम्रो से दिल भर उठा। उसे लगा वह थपेडो पे बेकावू वहा जा रहा है । सुगनी दूर पानी में डूब उतरा रही है । बच्चे वापू-यापू चीख रहे हैं । पर वह रुक नहीं पा रहा है। रुक सकता ही नही । उन तक पहुंच सकता ही नहीं । पानी प्रवल वेग से उसे मागे की तरफ़ धकेले जा रहा है । नही सुवह हो गयी है चारो तरफ़ धूप खिली हुई है । पनी उतर चुका है । यह किनारे को एक चट्टान पर खड़ा है। सामने सुगनी की लाश पड़ी है । क्षत-विक्षत कपड़े फटे हुए, जाल और सिवार हाथ-पाव मे उलझे हुए चेहरा पानी के जानवरो द्वारा नौचा-पाया हुमा मांस फूला हुमा.... हड्डिया जगह-जगह से झाकती हुई मौर सारी देह भयंकर दुर्गन्ध मारती हुई....। नही !! वह घबरा गया। कांखो मै पसीना महसूस करने लगा और घबराकर सुगनी से लिपट गया। बच्चों को टटोला। कैसे निश्चिन्त सो रहे हैं। सुबह कब होगी ? सूरज कब निकलेगा ?? अचानक प्राकाश मे तेज गड़गड़ाहट हुई मौर बिजली फिर चमकी। पहिये पूरे डूब चुके थे । बच्चे सो रहे थे। सुगनी के हाथ उसकी गरदन टटोल रहे थे। -डर लग रहा है ? "घबराते क्यों हो ? मर ही जायेंगे न कुछ ' साथ मरेंगे तो सात जनम मैं तुमसे हो ब्याह करूंगी। अंधेरे में बिल्कुल पास सुगनी की कापती अावाज सुनाई दी। उसका रोम-रोम सिंहर गया । लुगाई ? सुगनी !! --सुगनी. तुझे और बच्चों को कुछ न हो वस । मैं वावा रामदेव पीर को नयो चादर चढाऊंगा । इक्यावन रुपये का परसाद चढाऊंगा । नाक रगड़ता हुमा उनके दरबार तक जाऊंगा। सारी जिन्दगी उनके गीत गाऊंगा मैं ... लुगाई दो पल चुप रही, फिर बोली-मैं बताऊं? कुछ नहीं होगा। हिम्मत रखो। इसी समय दो बार जोर से विजली चमकी। पानी का प्रवाह बहुत तेज था । जैसे उधर कोई बाध-बंधा टूट गया हो। सिंचाई विभाग के दूरदर्शी इंजीनियरो ने उधर कच्चे बदे बाघ रखे हैं। सीमित वर्षा जल को रोकने मौर उपयोगी जमीन में फैलाने के लिए । पानी बन्द होने के बाद इस तरफ की उथली पर लम्बी चौड़ी नदी की जमीन में लोगो ने खेत बना लिये। पर उन्होंने अपनी या और सूरज कय निकलेगा १४७ उमर में कभी उस नदी को चलते हुए तक नहीं देखा पा, पूर की तो बात ही घोडो । अव पोड़ा-सा पाट यदल गया है तो कहो भैराराम का परिवार जिन्दा है, वरना तो "पर अब इतना सारा पानी एक साथ पा रहा है तो उसका यही मतलब है कि जरूर छोट्योड़ा बन्दा टूट गया है। और जग-सा यादल फिर गरजने लगे। बारिश तेज हो गयी। सांय-सांय करती हुई, तूफानी ठंडी हवा भी बहने लगी। अचानक गाड़ा हचमचाया धूमकर एक फुट भागे चला गया....फिर पीछे मा गया और घूमने लगा। दोनों बच्चे हड़बडा कर जाग गये और डर के मारे चीखने लगे । भैराराम ने हाथ झुनाकर देखना चाहा कि पानी कहां तक पहुँचा है, पर उसकी उम्मीद से बहुत ही कार उसके हाप ने पानी छू लिया । पानी गाड़े की सतह तक पहुंच गया था....यानी गाड़ा मय लगभग तैर रहा था। खटिया कभी भी गिर-ढह-सरक या वह सकती थी। दोनो ने एक एक बच्चा गोद में उठा लिया और सोचने लगे कि क्या किया जाये ? बच्चों को डरी हुई चीख-पुकार ने उन्हें और ज्यादा घबरा दिया था । वे कभी ऊपर पासमान की तरफ देखते, कभी एक-दूसरे की तरफ । दोनों जगह कोई उम्मीद नज़र नहीं पाती। यह तय था कि अब इस खटिया पर बैठे रहना अकलमंदी नहीं है, तत्काल कोई और पाश्रय लेना चाहिए लेकिन कौनसा और माधय? अचानक भैराराम को चेत हुआ कि यह गोंदी का मजदूत पेड़ साला कब काम आयेगा ? वह पुलक उठा, और हालांकि यह भी खतरे से खाली नहीं था, क्योकि एक तो टिक पाने और काफी देर टिके रह सकने लायक जगह उस अधेरे में खोज पाना, दूसरे बच्चों का साथ प्रोर तीसरे सापों का डर । पर तब भी वह खटिया के मुकाबले निश्चित रूप से ज्यादा भरोसे का मासरा था । यह तजवीज भराराम ने सुगनी को बतायी । उसे बात जंची। दोनों खड़े हुए। पहले खुद चढ़ा । एक जगह तलाशी। पहले सोचा खटिया उठा कर किसी तरह यहां गालो में फांस फूस ले तो बच्चे तो पाराम से बैठ ही जायेगे। फिर लगा यह इस अधेरे में संभव नहीं है । पोखें बहुत मुस्तैदी से काम कर रही थों हालांकि । हाथ भी। एक बच्चे को ऊपर लिया, फिर दूसरे को, फिर सुगनी ऊपर आ गयी। चारों चुप थे । डर के मारे । ऊपर से पानी का तेज बहाव चारों तरफ घेराव अपेक्षया साफ दिखाई दे रहा था। अब बिजली चमकती थी तो पानी में कुछ छोटी-बड़ी चीजें तैरती-दूबती नजर माती थीं। किसी भेड़-बकरी की १४८ राजस्थान के कहानीकार फूली हुई लाश, कोई फूस का चक्कर खाता हुआ छप्पर, कभी कुछ और समझ में नही आने वाली चीज। फिर पता नहीं क्या हुआ कि एकदम छोटा बच्चा जोर से चीया और दहाड़े मार-मार कर रोने लगा। वे दोनों घबरा गये । छोटा बच्चा सुगनी की गोद मे था। उसको देखा-देखी वडा बच्चा भी रोने लगा और उसने भैराराम की गरदन में अपनी वाहे इम बुरी तरह कम ली कि भैराराम को सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी। लुगाई रूलाई की कगार पर पहुँच गयी थी । बच्चा कुछ बता नहीं रहा था, बस रोये जा रहा था। भैराराम ने बुरी तरह झूझल महसूस की । लेगा सब सालो को नीचे पानी मे धक्का दे दे और फिर खुद भी कूद पडे। पर डाटने मारने या धक्का देने का मौका नहीं था। जो था, बरदाश्त तो करना ही था। लाचारी में उसे भी रूलाई फूटने लगी। हिम्मत साथ छोडने लगी। बच्चे के पैर मे किमी ने काट लिया था। जब यह बात पता चली दोनों घणी-लुगाई सन्न रह गये । दिल की धड़कन जैसे कक गयी। क्या माप ? और कौन हो सकता है ? बारिश अब टूटकर बरस रही थी और पानी जैसे जादू के शोर से बढ़ता जा रहा था । बच्चा रोते-रोने चुप हुआ और ऐसा लगा जमे उस पर मूर्धामा रही है कि लुगाई ने रोना शुरू कर दिया। अव भैगराम उसे धीरज बंधा रहा था और अपनी जान की कसमें दे-देकर, अपनी मोहब्बत के वास्ते दे-देकर उससे हिम्मत रखने को गिडगिडा रहा था। इधर बच्चे को किसी तरह जगाये रखने की कोशिश चल रही थी उधर भैराराम के देखते ही देखते उसकी खटिया मय कपडो-लत्तो के चक्कर खाती और गोते लगाती तेजी से बह चली और दो ही पल मे प्रांखो मे प्रोझल हो गयी। मूरज !! सुरज कंब निकलेगा ?? दोनों ने ऊंची आवाज में भगवान को पुकारना शुरू कर दिया और इसके कुछ देर बाद भैराराम ने भगवान को धमकियां देना चालू कर दिया। यही भैराराम जो कुछ देर पहले तक भगवान को तरह-तरह के लालच देना चाह रहा था, अब उमे धमकिया दे रहा था और धमकियां ही नहीं, बुरी-बुरी गालियां भी है रहा था- और सुगनी इसका जरा भी विरोध नहीं कर रही थी। अन्त मे वे भगवान मे मौत मांगने लगे। चारो कीनकाल मौत। मगर हुमा यह कि विजली और जोर से चमकी, पानी और तेजी से ऊपर पढ़ा, बारिश और बेरहमी से बरमी, बादल और बेदिली से गरजे, साहू सूरज कब निकलेगा १४६ और खौफ़नाक तरीके से बह-बहकर आयी और सुगनी-भैराराम के दिल और जोर-जोर से,धड़के। पर इतने पर ही उनकी तकलीफों का अन्त नहीं था। अन्त में एक तीखी और डरावनी पहिट-गुर्राहट के साथ पेड़ भी गिर गया। -- पेड़ हिला, पेड़ कांपा, पेड की जडें उखड़ी टूटी.... और पेड गिर गया। भैराराम और सुगनी ने जिन्दगी मे कभी इतनी सख्ती से कुछ नही पकड़ा होगा जितनी सख्ती से इस समय एक हाथ से पेड़ की डाल, दूसरे से बच्चों को छाती से चिपटाकर उन्होने पकड़ा-भीचा-गड़ गये एक हो गये । और उन्हे आश्चर्य हुआ कि पेड़ के पानी में गिर पड़ने के बाद भी वे चारों सलामत थे, जिन्दा थे। क्योंकि पेड जमीन पर नहीं, गोड पर गिरा था जो पानी में डूब गया था पर वहा नही था। अब वे पानी की सतह पर लटके हुए, बच्चो को थामे हुए.... जिन्दा थे.... और यह ज़िन्दगी मौत से भी बदतर थी... मौत का भी कलेजा दहला देने वाली थी। इसका एक-एक पल बेइ तिहा तवील और दहशतजदा था। इसके बाद वे दोनों निरंतर भगवान को गालिया बकते रहे और उससे अपने और अपने बच्चो के लिए मौत मागते रहे.. और सुबह को प्रतीक्षा करते रहे । लुगाई सुगनी को चक्कर पा रहे थे, जी मितला रहा था, एक-दो बार उसने उल्टी भी की . . पर वह मरी नहीं और उमने बच्चे को भी नहीं छोडा । घोर निराशा, हताशा और प्रासन्न मृत्यु के जबडों मे फंसे हुए भी यदि वे जिन्दा थे तो सिर्फ इसलिए कि मन के बहुत भीतर उन्हे पक्का भरोसा था कि भगवान चाहे या न चाहे, वे तब तक झेल पाये या न झेल पायें, जिन्दा रह सकें या नहीं.. सूरज जरूर निकलेगा। और सूरज जरूर निकला। ००० दोस्तो,आगे की कहानी में नहीं सुनाऊ गा । उसमे दुःख-तकलीफ़-निराशा भूख-भाग्यहीनता और लाचारी के अलावा कुछ नहीं है । और उसका वर्णन करने में मैं भेराराम और सुगनी के साथ न्याय भी नहीं कर पाऊंगा। एक कहानीकार एक भैराराम की पीडा का, एक सुगनी के दर्द का, महज एक छोटा सा हिस्सा ही पभिव्यक्त कर सकता है । कहिए एक सौवा हिस्सा । या शायद वह भी नहीं। - अपने यहां प्रकृति की पूजा की गयी है, उसकी नाक मै नल नहीं डाली राजस्थान के कहानीकार गयो है । अपने भैराराम का छोटा बच्चा दूसरे दिन दोपहर बाद मर गया। तीसरे दिन उन लोगों को हेलीकॉप्टर से निकाला गया। उसके बाद पुनर्वास की लंबी यातना उन्हें सहनी पड़ी । भैराराम जिसका हाली था, उस ठाकुर ने भी कोई खास मदद नही की, उल्टे डोटा कि साला उल्लू पहले क्यो नही चला आया, वहीं क्यों फंसा रहा ! मूरख ! मोर उसी तरह उसे बहुत कुछ सहना पड़ा। सूरज निकल गया था। कुछ और उससे हुआ हो या नही हुप्रा हो-एक अंधकार जरूर उससे कट गया था। मैं तब से अब तक भेराराम को देख रहा हूँ .. देखता आ रहा हूँ . प्रादतन भगवान का नाम ले ले ये और बात है, पर उसे अव किसी भगवान-वगवान का भरोसा नहीं रहा ।
हवा में अकेले भगिमधुकर
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हवा में अकेले एक कठिन चुप्पी में सब कुछ निरीह ढंग से शात था। हवा सामने की थी और सिर के बालो को खडा करती हुई पीछे धकेल रही थी, पर एक दहशा से भरा उनीदापन हमे जबरन प्रागे की तरफ घसीट रहा था। आगे कुछ नहीं पा- मिट्टी के पोले हहों पर टिके हुए एक कमजोर प्राकाश के सिवा । पकान से पाव तंगड़ाने लगे थे। सीधी धूप शरीर के खुले हिस्सो में गुदने खोद रही थी माह । मैंने एक जलती सास बाहर फेकी और गर्दन की खाल में चुभते हुए काटो को सहलाने लगा। होठ बिलकुल खुश्क हो गये थे । एक निर्जीव सतह उन पर सख्ती से उभर पायी थी । जीभ के चिपचिपे थूक से मैंने उस सतह को तर किया। पपडी पर जमे रेतकणो का स्वाद मुह मे फैल गया। किरकिराहट दातो में बजने लगा, जैसे अचानक कोई तार टूट गया है और सारगो की कातरता में फंसी हुई धुन विचलित हो उठी है ! फिर ... फिर वह किसी दुबंल पीड़ा-स्वर की तरह थरथेराती हुई मेरे खून गे घुल गई और बेहोश होने लगी क्या यह मुक्ति का क्षण है ? मेरी आँखो में तरल सा कुछ तर पाया । -~-कितनी दूर है ? जोना का स्वर मूखे. उदास पत्तो को गूंज बनकर ऊपर उठा; क्षण भर बाद जाने किस गड्हे मे गिरकर गुम हो गया । वह हांफ रही थी। उसके छोटे-छोटे नथुने अधीरता से फड़क रहे थे। फूला हुआ पैट गठरी की तरह घुटनो पर झुक भाया था और वह उसे मभाल नहीं पा रही थी। ज्यादा दूर नहीं । एक डेढ कोस और... बूढे दुवो ने फुसफुमाकर कहा । वह तीन बार कैप मा चुका था, इमलिए उसके बारे में ठीक-ठीक जानकारी रखता था। यम। 1 राजस्थान के कहानीकार -~-या वहा बहुत से लोग हैं ? मैंने दुवो की तरफ देखा। उसकी वगलो से पसीना चु रहा था। कुर्ती पर गोली पट्टिया बन गई थी। हा करीब छह सात सौ । दुवो ने कहा और माथे पर लटक प्रायो चिथड़ा-सी टोपी को सिर में धनाने लगा- लेकिन तुम फिकर मत करो ... वे तुम्हे जरूर रख लेंगे। उन्हे पढे-लिसे लोगो को जरूरत है, हिसाव वगरह देखने के लिए। और मुझे भी भर्ती कर लेंगे न ? जोना ने वेचनी से पूछा। चील को भाति पख फड़फड़ाती हुई हवा उसकी प्रोढनी मे घुम गई थी। एक फूतदार छाता उमक पूरे कधों पर लहरा रहा था। वह शर्म से लाल पड़ती हुई उस छाते को पकड़ने की कोशिश कर रही थी। दुवो चुपचाप चल रहा था। मैं उसके दमाग्रस्त फेफड़ो की उखड़ी हुई आवाज साफ-साफ सुन सकता था। हर साम मानो एक फासला तय कर रही थी और अपने अतिम सिरे पर मोमबत्ती की लो की तरह कांपने लगती थी। मैंने उस लो की प्राध को महसूस किया । एक निष्कलुप मद्धिम लो। अपने पायुहीन ससार को बार-बार दुहराती हुई । -~-तुमने बताया नही, वे मुझे रख लेंगे? जोना ने फिर सवाल किया तो बूढ़ा हडबड़ा उठा । उसको दाढी अनिश्चित ढग से इधर-उधर हिली और धुंधले शीशे की तरह चमकने लगी। उस शीशे के पार दुवो का चेहरा पके फोड़ें की भाति पिलपिला दिखाई देने लगा। -~~जोना, वे तुम्हें रख लेंगे। मैंने एक कठिन क्षण को सहते हुए कहा । मुझे स्वयं अपनी मावाज अविश्वसनीय और दूर से पाती हुई लग रही थी। ---तुम मां बनने वाली हो.... वे तुम्हारी हालत पर जरूर रहम करेंगे। दुवो ने अस्थिरता से हाय मलते हुए कहा। वह उस अदृश्य चीज़ को पकडना चाहता था, जो उसकी गिरफ्त से छूटती जा रही थी। जेब से मटमैले कागज को पुडिया निकालकर उसने वायी और देखा। एक नंगा पेड कुल्हाड़े को हवा में पोले तरह तनकर गड़ा पापौर उमरे तने में गई संबी घोग-याला पापी छेद कर रहा पानसवार चंगुली पर सगाकर दुयो ने नाय मे पढाई, फिर भौहें ऐंटता हुपा पोपने की कोशिश करने लगा। छोक पाते ही उसकी दाढ़ी गंदगी गे सन गई। यह उसे नीमनीषकर साफ करने लगा। पूप सेटने सगी यी पौर उममे फोकापन मा गया था। गोटियो की एक कतार बहुत मधे हा डंग में वायद करती रास्ते के पार जा रही थी। -- पोज में जाना चाहता पा I-महसा रगा का अबह-यावर स्वर मुनाई दिया। उमका पुता हा नेहरा मुंहामो मोर कीलो मे स्याह नजर मा रहा था- गला जाता तो प्तने कष्ट नहीं देयने परते लेकिन इसने नहीं जाने दिया ।- उमने जोना की तरफ इशारा किया । हवा घमो मार रही थी। ऐसा लग रहा था जमे बह टीलो में गहरे मुराख करती हुई नल रही है। -मैं जानती थी कि तुम ज्यादा दिन फोन में नहीं रह सकते और मौका मिलने हो वहा से भागने की सोचोगे। जोना के शब्दो में तीमा पारोप था, मानो वह अपने पति की नस नस को पहनानती हो। --तुम्हारा भेजा खराय है । तुम हमेशा इमी तरह की बातें करती हो। रंगा गुस्से में जलता हुप्रा हिनहिनाया और चुभती निगाह से जोना को घूरने लगा। उसकी टुड्डी के घाव का निशान एकदम सुषं और चौड़ा हो पाया था। वह उसे लापरवाही से सहलाने लगा। ---तुम डरपोक हो ।, पिछले साल जब पट्टे का झगड़ा हुआ था, तुम घाडे में जाफर छुप गये थे। ऐमा प्रादमी फौजी नही बन सकता । जोना के पीले होठों पर कडवी मुस्कराहट थी। रेत मे फम कर उसको चप्पले छप-छप कर रही थी, मानो वह कीचड पानी मे चल रही हो। वेवकूफ औरत। रंगा बड़बडाया । जुकाम के मरीज की तरह उसको अावाज भारी और बेडौल थी। वह गाल पर चिपकी हुई एक सफेद फुसी को फोडने लगा।
राजम्याग के कहानीकार मैं पाली-गाली मा हो गया। येतरतीब ढंग से मुझे ये दिन याद भाने लगे. जब मैं जोधपुर को एक कचहरी के गाने गटाई विधाकर पुरानी पविकाए वैवा करता था। नाई की दुकान तक जाने के लिए पैसे नहीं होते थे, इसलिए महीनो हजामत नहीं बनवाता था वह शुरु गर्दियों की भोर थी। कटे हुए बालो वाली एक सुन्दर स्त्री माहिस्ता-माहिस्ता पदम रखती मेरे पाम प्रायो। उगने 'तुमन एण्ड होम' का कोई वागी प्रा. परीदा। जब तक यह सही रही, मैं उसके पांवो यो कच्ची, नाल अगुलियो को देवता रहा। वे भूरे रंग के स्लीपरों में जमे सो रही पी। स्त्री की यगन में एक मात-पाठ माल का बच्चा था। मम्मी, इगा गवल प्रवाहम लिंकन मे मिलती है। म्वी ने मुडकर एक मोठे यिम्मय से मुझे देगा और हम पही। जाने कितनी देर तक उसकी हमी मेरे रक्त मे गूंजनी रही । जोना हैम रही थी। एक रोएँदार हमी। मेरे शरीर में मुरमुरी सी दौड गई। दुबो कह रहा था-बड़ी लडाकू मोरत हो तुम । रंगा को वगाय तुम्हें फौज में भर्ती होना चाहिए था। जीना . लगातार जीना और अपने को जिंदा महसूम करना कितना मुश्किल है। एक बोझिल उच्छवास के संग कुछ लपज मेरे भीतर प्यासे हिरनो की भाति उछले और किन्ही कंटीली झाड़ियों में गायब हो गये। मुझे लगा, मैं अपने प्रति दया दिखाता रहा हूं अपने प्रति नहीं, अपने शरीर के एक व्यर्थ हिस्से के प्रति । वह हिस्मा कौन सा है ? क्या उमे देखा जा सकता है ? कितना वेदनामय होता है वह क्षण जब किमी को अचानक यह पता लगता है कि उसका शरीर एक धूसर पहचान मे खो गया है और वह खुद उममे एक पराये आदमी की तरह रह रहा है-उसका मास लेना भी "निजी' नही है । जो कुछ व्यक्तिगत है, वह इच्छानों के ताप से परे...मृत्यु का अनुभव क्या इस यातना से अलग होता है ? रेत की स्वच्छता मोर निष्प्राणता मुझमें भर गई । लगा जैमे मे जमीन के अन्दर चल रहा हूं। एक अभेद्य सन्नाटे से घिरा । दुबो, रंगा और जोना के दुखो को सूखे गोश्त के टुकड़ों की तरह मुंह में क्यों चबा रहा हूँ? जोना मेरे माथ चल रही थी। शाम के अधमरे उजाले में उसका चेहरा नारियल सा लटक प्राया था। मुझे उसकी मुस्कान छीलने लगी। -कुछ नहीं। मैंने हकलाहट पर कठिनाई से काबू पाते हुए कहा-मुंह हवा में अकेले १५७ तुमने कहीं नौकरी की है? उसने मंगूठे को इस तरह गले पर रंगहा जैसे यह साबुन की बट्टी हो । मेल की एक लट छूटकर नीचे गिर पड़ी। -जोधपुर में मैंने एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था। यह तीन साल पहले की बात है। -~-तुमने शहर क्यों छोड़ दिया ? -वहां बमबारी हो रही थी। -क्यो? पाकिस्तान से लड़ाई चल रही थी न । दुश्मन के हवाई जहाज रात को गोले गिराते थे। काफी नुक्सान हुमा । -तो तुम हर कर गांव भाग माये ? जोना ने हंसते हुए अपने बालो को थपथपाया। मैं में गया । लेकिन, वह जो कुछ कह रही थी-सच कह रही थी। डरकर ही मैं मैकडों मील दूर भाग पाया था। इस प्रयाह रेगिस्तान में । कुछ दिन मैंने एक स्कूल चलाने की कोशिश की, पर असफल रहा। चार साल से अकाल पडा हुमा था। एक भुतली छाया सब पोर डोल रही थी। अन्न और पानी के सिवा किमी को किसी चीज की खोज नही थी। इस वार हालत और भी बदतर हो गई थी, गांव खाली पड़ा था। तालाब सूखकर अरियों से भर गया था। शेष रह गये लोग जाने किमका इन्तजार कर रहे थे। एक भयावह अंत धीरे-धीरे 'शक्ल' ग्रहण कर रहा था। दरवाओं पर उसी की दवी दबी पाहटें सुनाई पड़ती यो । कभी कभी सरकारी गाड़ी मामूली अनाज पानी बांटने पाती थी। इसलिए जब दुवो ने कैम्प खुलने की खबर दी, तो रोहित का सा एहसाम हुंगा। कैम्प गावं से माठ मील दूर था और वहां सड़क बन रही थी। -अगर उन्होने प्राज हमें नहीं लिया तो ? रंगा ने शुष्क स्वर में कहा । वह शंकित था। तो क्या ? हम फिर विंगे। काम पाने के लिए चक्कर तो लगाने हो पड़ते हैं । जोना ने तल्खी से जवाब दिया। उसके दांतों में एक तिनका फंसा मह उसे कुतर रही थी।
राजस्थान के कहानीकार दुवो की आवाज उबल रही थी। शायद वह कुछ तय करचुका था। मैं मिहर गया। रगो मे बुखार की मी लहर उठी। नहीं आने से क्या होगा? रगा ने मजाक बनाते हुए कहा। उमका निचला होंठ उसके चेहरे की वक्ता से अलग होकर भद्दे ढग से झूल रहा था । कुछ नही होगा। मैं सिर्फ इन्तजार करूगा . ....मौत का । मुझमे सब वर्दाश्त नहीं होता, काफी बूढा हो गया हूँ। दुबो का चेहरा निर्विकार और माफ था । एक ठहराव, एक भभक मैं टिका हुआ। जोना ने घबराकर मेरी प्रोर देखा। वह दुबो के कथन को झुठलाना चाहती थी। लेकिन.... एक कातर लघुता से उसकी प्रांखें छलछला पायो । वह मुंह मोडकर रगा की तरफ झुक गई। दुबो खामोशी से प्रागे बढ रहा था। काठ के पुतले की तरह दोनों हाथो को पीठ पर वाधे हुए। जोना. उधर देखो, कैम्प के तंबू रिखलाई दे रहे हैं। रगा ने उत्माहित होकर कहा । जोना की प्रांखें हल्के पाश्चर्य और खुशी से फैल गई। पाखो के नीचे नामालूम से धब्बे थे। धब्बो पर भूरज का अतिम उजास झिलमिला रहा था। दुबो किसी जिद्दी बच्चे की तरह अपनी सूखी अगुली चूस रहा था। जबड़ो के साथ उसके गुच्छदार कान भी हरकत कर रहे थे। वह जैसे कोई दुस्वप्न देखता हुआ बोला- मैंने तीन रोज से कुछ नही खाया । सुनकर भी उसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी.... वह आवाज नहीं थी। निधूम अग्नि थी, जो सबके भीतर निरतर जल रही थी। कैप में अच्छी खासी भीड़ थी। एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी पैट घुटनों पर से फटी हुई थी, लाइन लगानो को हाक लगा रहा था और काफी देर बाद मुंशी प्राया। उसने मोटे फ्रेम का चश्मा लगा रखा था और बार-बार नाक मिकोडकर ऊपर देखता था। उसने पाते ही भीड़ पर सरसरी निगाह डाली, फिर हाप रावे कर अपना वुर्ता उत्तर दिया।
हवा में अकेले १५६ -कितनी उमस है। कहकर उसने मूडे पर कुर्ता फेंक दिया और तीन टांग वाली मेज पर झुककर रजिस्टर उलटनं-पुलटने लगा। उसकी बनियान जगह-जगह से पीली पड़ चुकी थी और झरोया बाने जा रही थी। वह संजीदगी से सबके नाम लिखने लगा। उसके चेहरे पर अस्पष्ट सा कोमल भाव था, जिसमें एक क्षीण मुस्कराहट दरार सी झांक रही थी। माथे पर बारीक और घनी शिकनें उभरती तो लगता, जैमे वह कोई जाल रच रहा है। --एक मो बत्तीस उसने गिनती करने के बाद जोर से कहा और पचियां बनाने लगा। वह ढेले के नीचे दवी पचियों में से एक को खीचता, ( कभी-कभी उसे इस निया में अंगुली पर थूक भी लगाना पडता ) और पेसिल की नोक पर जोर देकर खाली खाने भरने लगता था। आज सव ते लिये जायेंगे। इंतजाम हो गया है । मुंशी की इम घोषणा से भीड में सनसनी फैल गई। मुरझाते हुए चेहरो पर से भाप का उफान उठा और हवा मे घुल गया। कितनी ही आवाजें एक साथ चहने लगी- लहरों की तरह परस्पर उलझती हुई । सब में पचियां बाट दी गई । -तुम स्टोर की देखभाल करोगे । कोई चीज इधर-उधर न होने पाये, अच्छी तरह निगरानी रखना। मैंने सिर हिलाया। मड़क बनाने वाले काम पर से लौट रहे थे। वह उनके पास चला गया और चिल्ला-चिल्ला कर बोलने लगा। शाम चीख पुकारो के ढेर पर से गुजरकर काली पड़ चुकी थी। हवा करारी थी और मुट्ठियां भर भरकर अधेरा फेंक रही थी। रंगा चार जनो के हिस्मे का दाखिला डिपो से लेकर पाया। मैं चूल्हे के पत्थर जमा रहा था। -जोना कहा है ? रगा ने पाजू-बाजू देखते हुए पूछा । मैदान में स्त्री पुरुष का मेला लगा हुअा था। सब खाने पकाने मे मशगूल थे - -लकड़ियां बटोरने गई है।
मैंने अंगडाई लेकर बदन को झटकते हुए कहा। तबीयत ठीक नही -तुम नहीं जा सकते थे लकड़ियाँ लाने ? उसकरही थी। मुझे मपनी है। मैं सकोच में ड्य गया । रगा के स्वर में नफरत छलक उपस्थिति काटने तगी। है। सबसे पहले मेरी तभी जोना प्रकट हुई. अंधेरे का एक दायरा तोड़का टिका हुआ था, पर निगाह उसके पेट पर गई । वह यौधे घड़े की तरह जांघो पाकर बैठ गई। पेट जोना उसकी तरफ से बेपरवाह थी। वह चूल्हे के पास वातावरण की तरह एकदम पागे पा गया मुझे उसका फैलाव एक खौफनाक लगा। मैने अांखें मूर ली। पत्थर की तरह ठोम रात को अचानक नोद खुली तो मैंने अपने को बेखबर होकर सो रह पाया । सन्नाटे की राख झर रही थी। मुर्दो की तरह लोग थे । युद्ध के मैदान का सा दृश्य था । वचकाना और दूषित ।, एक गुलथुल कंपन मेरी कनपटियो मे खून की सुरसुरी तेज हो उठी त होकर सोना और शोध की तरह जन्म ले रहा था ... यह क्या है ? मैंने मा ए मेरे लघु इत्मीनान हाथ को लपेटकर टागो के बीच दबा लिया। कुछ पलो के लि जल्दी पलकें झपकने ने मुझे ढक लिया। झीगुर कही बोल, वोल रहा भा। जल्दी से गुंथा हुआ मैं अपने लपटों की तरह लाल की सी आवाज क्या वह जीवित है, वह अभिमान ? तद्रा अस्तित्व की एक नौरव उलझन में शामिल हो रहा था। वह थी और हर चीज को खत्म कर रही थी। -अभी नहीं यहां नही । । सिर घुमाकर पंपाखें फेर ली। योडी यह जोना को मुलायम आवाज । देखा, रगा का चौकोर चेहरा जोना पर झुका हुआ था। मैंने धते हुए वे टोले को देर बाद जोना और रगा उठे। विखरी हुई लाशो को प्रोट मे गुम हो गये। उसके अनन्त सुख तारी गरा भासमान सपने की तरह झूल रहा था । था। कुछ खर्टि को अकेले सतोष मे मुस्कराते हुए अपलक देखा जा सक, फिर थपकियो के के थोक को ढो रहे थे ! एक बच्चा कुनमुना नीचे चुप हो गया। या और मैं चौंक कर अधेि पकड़े। वह बुरी हरु बदबू का एक रेला मुझ तक उठ बैठा । बूढा दुवो के कर रहा था। मैं उछलकर उसके । मैंने मुना, मिलकर हवा हमा में पोले तरह माप रहा था। जितना लिया उसने खाया था, वह बाहर आ पड़ा था। मैं पाने को पिनाने मे नही रोगका, पर मैंने होठ कम लिये और हथेली से दुवो का मुंह पोछने लगा। एक दानदार चिपचिपा पदार्थ उसकी दादी मे फस गया था। पानी लाने के लिए मैं ज्यों ही पोपे के पास गया, दुयो ने दुवारा उल्टी को मोर जमीन पर चित्त पर गया । मैं दौड़ा। यह अचेत था। नब्ज का कुछ पता नहीं चल रहा था। मैंने हतागा में पुकारा दुबो .. -~-इमको मांत फट चुकी हैं । यहा पई लोग दम बीमारी मे मर चुके हैं । यह कैप का मौकीदार था। उनके हाथ में पीतल के तारों वाली लाठी थी और वह उसमे ठक-ठक रहा था। दुबो का शरीर बिलकुल प्रकर गया। फिर यह बर्फ के डले की मानिंद झंडा हो गया । उसके मुंह मे हरे नीले झाग छूटे प्रौर रेंगने लगे। चौकीदार ने दुवो का माथा ट्रा- यह तो गया। इमे नटाफर अलग रख दो, सुबह जला देंगे। मैं मु शी जी को खबर किये देता है। वह चला गया। उसकी कटोर पदचाप मेरे भौर दुवो के वीच धुंधली होती चली गई । दुर्गन्ध से मेरे नथुने मुलग रहे थे। पावो की तरफ मे खीचकर मैंने दुबो को दूर हटाया और गंदगी को मिट्टी से बूरने लगा। । तब जोना मायी, उसके पीछे-पीछे रंगा । • क्या हुमा ? ग्गा ने पूछा । उसकी मावाज में पीज भरा बिचाव था । -दुबो मर गया है। -- सचमुच ? जोना ने चिहुंककर कहा। फिर वह दुवो के नजदीक खडी होकर उसे घूरने लगी। ---सो जानो। तडके जल्दी उठना होगा। कैप का मामला है । रगा ने जमुहाई मे अंघते हुए कहा । जोना दवे पैरो उसके पास प्राकर लैट गई। मेरे हाथ कुहनियो तक गदे हो गये थे। कपड़ो पर भी के गीले राजस्थान के कहानीकार दाग थे। उन्हें धोने के लिए मैं पानी की टंकी को तरफ चल दिया। पीछे से मुझे जोना को सिमकिया सुनाई दी। अधेरै की गाढी दीवार को तोड़कर चलता हुआ मैं अपने आपको पिशाच लग रहा था । एक फफोला मेरे भीतर जोर से फटा और फल गया। वह एक पिशाच की खोखली हंसी थी। उस वक्त उसे रोक पाना मेरे लिए कठिन था। हवा किनारे खड़े तबुप्रों में घुमड रही थी। मैं अपनी लोलुप हंसी को हथेली से पोछकर आश्वस्त हो गया ।