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Vedant Ramayan

Gangavishnu, Shrikrishnadas · 2009/10

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श्रीः। वेदान्तरामायण रचनेका कारण वेदांतार्थानि गूढानि शीघ्रं सर्वैर्न ज्ञायते ॥ अतः सर्वार्थमाहृत्य जीवानां मोक्षहेतवे ॥ १ ॥ भाषा-वेदान्तका अर्थ बहुत कठिन है सब जीवोंसे जलदी नहीं मालूम होवेगा जो जीव अनेक जन्मसे अन्यास किया होगा उसको तो किंचित् माल- मनी पडेगा. औरको कुछ नहीं मालूम पडेगा. इस कारणसे सब ग्रंथोंका अर्थ लेके अपनी बुद्धिमाफिक मोक्ष होनेवास्ते ॥ १ ॥ रचितोऽयं मया ग्रंथो रामरावणकारणात् टीकाज्ञानार्णवीयुक्तः सर्वस्मान मुक्तिदायकः ॥२॥ भाषा-राम रावणके कारणसे यह ग्रंथको मने बनाया है और जानार्णवी टीकासे युक्त है इससे यह अन्य सब मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है ॥२॥ अथ मया स्वकुलप्रस्तावः क्रियते। श्रीब्रह्मसरच्युतोत्तरतटे ये सन्ति वे ब्राह्मणास्तेषां पादरजोभि- गाहनरत मेऽभूत्कुलं निर्मलम् । औपाध्यायमितीरितं क्षितितले तस्मिन्प्रजातो बुधो टीकाराम इति प्रवृद्धिविभवस्तस्यात्मजो बुद्धिमान् ॥१॥ भाषा-बहुत सुंदर मानससरोवरसे निकसी जो सरयू नदी तिसके उत्तर- देशम जो द्विज बसते हैं जिन्होंको देशनापामें सरवरिया ब्राह्मण कहते हैं उन सबकी चरणरजकी सेवामें निपुण मेरा कुल होता भया भूमितलमें मेरे कुलको उपाध्याय कहते हैं तिस उपाध्यायकुलमें बड़े पंडित और बड़ा है ऐश्वर्य जिन्होंका ऐसे टीकारामजी जन्मते भये तिनके पुत्र बड़े बुद्धिमान् ॥१॥ इच्छारामेति विख्यातो बुधस्तस्यात्मजः सुधीः॥ होरारामेति मतिमान बुधश्चैव तदात्मजः ॥२॥ - - २ भाषा-इच्छारामजी पंडित ऐसे नामसे विख्यात भये तिसके पुत्र सुंदर है बुद्धि जिन्होंकी बडे ऐश्वर्यमान् पं० हीरारामजी भये तिनके पुत्र ॥२॥ विश्वरामश्च तस्यासन्सुता निर्मलचेतसः ॥ शिवनारायणश्रेष्ठस्वतश्चाहं समानुजः॥ श्रीदत्तश्च त्रयाणां नो षट् पुत्राः पितृवल्लभाः॥३॥ भाषा-पं० विश्वराम भये उनके तीन पुत्र भये बडे पं० शिवनारायणजी तिन्होंका किंकर छोटा भाई मैं हूं मेरा छोटा भाई श्रीदत्त है मेरे तीन भाइयोंके छः पुत्र हैं कैसे पुत्र हैं पिताके प्यारे हैं ॥ ३ ॥ या लक्ष्मणस्य नगरी तत्पूर्वे सुलतापुरम्॥ तस्य दक्षिणदिग्भागे क्रोशे युग्ममिते मम ॥ वासग्रामेति विमलो लोदीपुरमितीरितम् ॥ ४॥ भाषा-लक्ष्मणकी नगरी जिसको लखनौ कहते हैं तिसके पूर्व तरफ सुलता- पुर है तिसके दक्षिणदिशामें दो कोसपर मेरा बास करनेवाला याम है उसका लोदीपुर नाम है ॥४॥ इति मम कुलप्रस्तावः।

श्री।
-www-
अथ वेदान्तरामायण प्रारम्मः।
श्रीचंद्रशेखरं नमः।
सत्रम्य विश्वेशतर्नु स्वमानसे सुखाकरं ज्ञानविवेकसत्तेरुम् ॥
कामादिवेश्वानरशुद्धवारिदं वेदान्तरामायणमादिशास्त्रजम् ॥ १ ॥
भाषा-निर्विघ्नपूर्वक ग्रंथकी समाप्ति होनेवास्ते ग्रन्थकार आदिमें जगदी-
श्वरको नमस्काररूप मंगल करता है. शिवसहाय पंडित मैं जो हौं सो वेदान्त-
रामायणको करता हूं क्या करके जगत्के ईश भगवानकी मर्त्तिको अपने
मनमें नमस्कार करके कैसा वेदान्तरामायण है मोक्षरूप सुखको करनेवाला
ज्ञान विवेकके दुःखको नाश करने में कल्पवृक्ष है काम क्रोध लोन आदि जो
अनि है तिसको बुझानेवास्ते सुन्दर मेघ है आदिशास्त्र जो महासांख्य तिससे
उत्पन्न है ।। १ ॥
कुर्वे जगचेतनकारकं प्रभुं शुद्धं सदानन्दमयं निरंजनम् ॥
यदीहया विश्वमिदं चराचरं प्रफुल्लितं वारिकोम्मिचंचलम् ॥२॥
भापा-जडरूप संसारकू चेतन करनेवाले प्रभुको इंद्रियके रोगोंसे शुद्धको
नित्य आनंदरूपको प्रपंचरहितको नमस्कार करके वेदान्तरामायण करताहूं जिस
जगवान्की छायासे यह संसार प्रफुल्लित होरहा है कैसा संसार है जलबिंदुकी
लहरि सरीखा चंचल है ॥२॥
तं वै नमस्कृत्य विभुं निजाश्रयं सञ्चित्समानन्दमयं गुणारणिम् ॥
गता न चायान्ति पुनर्भवं नरा यत्तत्स्वरूपं पतितावतारकम् ॥३॥
भापा-बहुत शोजायमान अपने आधीन जीव देह दोनोंको संभाल करनेमें
आनंदरूप रजोगुण तमोगुण सत्वगुणको जलाने वास्ते अमिस्वरूप ऐसे भग-
वानको नमस्कार करिके वेदान्तरामायणको करता हूं जिस प्रभुके रूपको
प्राप्त हुआ जो जीव सो संसारको कभी नहीं आता कैसा रूप है पतितजीवोंको
उद्धार करनेवाला ॥३॥

- ६ वेदान्तरामायण बाकां। निर्दन्दमत्यद्भुतमुज्ज्वलं शुभं वेदायगम्यं मुनियोगिभिर्नुतम् ॥ खेच्छारमन्तं तनुभावनिर्गमं स्वानन्दतुष्टं समवारिधि हरिम् ॥ ४॥ भाषा-सुखदुःखसे हील बहुत अद्भुत असंख्य सूर्यसे दीप्तिमार शुजरूप. चारिह वेदोंसे नहीं प्राप्त होनेयोग्य मुनि योगी जनोंसे नमस्कार योग्य अपना इच्छामें रमित देहके लक्षणसे रहित अपने आनंदमें संतोप समको समुद्र जन्म- बाधा हरनेवाला ऐसे भगवान्को नमस्कार करके वेदान्तरामायण करताहूं ॥४॥ विद्वांच्छिवसहायोऽहं सच्चिदानन्दमद्वयम् ॥ निराकारं निराधारं निरुपाधि निराश्रयम् ॥६॥ भाषा-जीवदेहको चैतन्यरूप आनंद देनेवाले आकारसे रहित आधारसे, वर्जित संसारके प्रपंचसे हीन आशासे हीन ऐसे भगवानको नमस्कार है ॥ ५ ॥ पञ्चभिः कुलकम् । इतिहासपुराणानां वेदवेदान्तयोरपि । सर्वशास्त्रमतं गृह्य कुर्वेऽहमिदमुत्तमम् ॥ ६॥ भाषा-इतिहासको पुराणको वेदको वेदान्तको सब शास्त्रको मत ग्रहण करिके यह वेदान्तरामायणको मैं करता हूं ॥६॥ वेदान्तरामायणमेतदुज्ज्वलं संसारतापापहमद्भुतं शिवम् ॥ प्रयान्ति यच्छ्रुत्य सुमुक्षवः पदं तयत्वज्योतिमकल्मपंशुभम् ॥७॥ भाषा-कैसा वेदान्तरामायण है बहुत शोभित संसारके तापको नाश करनेवाला अद्भुत है कल्याणको वृद्धि करता है जिस वेदान्तरामायणको सुनके संसारसे मोक्षकी इच्छा करनेवाले जो जीव हैं सो उस स्वरूपमें मिलेंगे कि जो स्वरूप आपसे प्रकाश होताहै सब पापोंसे रहित है शुभ है ॥ ७ ॥ गत्वा न चायान्ति कदापि योगिनो यद्ध्यानशून्यं गहनं सुदुस्तरम्॥ अनेकजन्मार्जितचिन्तनापरैस्तदप्यगम्यं मुनिवृंदसन्नुतम् ॥ ८ ॥ भाषा-कैसा स्वरूप है कि ध्यानमें नहीं आसक्ता बहुत जन्मसे एकडा किया जो विचार जिसमें चतुर जो प्राणी तिनसेनी नहीं प्राप्त होने योग्य बहुत मुनियों करके नमस्कार किया है ऐसे स्वरूपको गये हुए योगी जन है सो संसारमें कभी नहीं आवेंगे ॥८॥ - भाषादीकासहित । पुनर्भवं मोहजलाभिपूरितं तृष्णोम्मिणा चंचलमूहयान्वितम् ॥ वितर्कयुक्तं बहुमानगर्वितं प्रचंडमायार्णवदुस्तरं धनम् ॥ ९ ॥ भाषा-कैसा संसार है मोहरूप जलसे भरा है तृष्णाकी लहरि करके चला- यमान है तर्क वितर्कसे युक्त है बहुत अभिमान अहंकार करि रहा है बड़ी जबर्दस्त मायाके प्रभाव समुद्र करिके दुःखसे पार जाने जोग्य है वडा कठिन है ॥ ९ ॥ ब्रह्मावर्ते सुरम्ये विधिकृतविभवे ब्रह्मयज्ञो बभूव तत्रागुभूमिसंस्था वितलतलगता नाकलोकाश्रितायाः ॥ ब्रह्माद्या मुनीशाः सुरपतिसहितास्सुज्ञदेवर्पयो वे राजपोशा रमेशो विधिपवनभुजी पार्वतीप्राणलयः ॥ ३० ॥ भापा-बहुत रमणीय ब्रह्मकी बनाये ऐश्वर्य - संयुक्त ऐसे ब्रह्मावर्त क्षेत्रमें सत्संगियोंने ब्रह्म निरूपण यन करते हुए तिस यज्ञमें तनि लोक चौदह भुवनके बसनेवाला जो ब्रह्मऋपि मुनीश बडे बडे जो ज्ञानी देवर्षि राजर्षि इंद्र आदि देवतासहित भगवान् विधि शेष महादेव ये सब आते हुए ॥ १० ॥ एते चान्ये समायाता बहलो धमलिप्सवः ।। पूजिता दानमानाभ्यां सत्कृता ब्रह्मतत्परैः ॥ ११ ॥ भापा-इन सबसे औरभी बहुत धर्मके ग्रहण करनेवाले सज्जन आते हुए ब्रह्मके जाननेवाले मुनियोंने दान मान आदरसे सबका पूजन किया ॥ ११ ॥ ब्रह्मविज्ञानकुशलाः सर्वे भूपाः समाययुः ॥ आजगाम महाबुद्धिविदेहो मिथिलापतिः ॥ १२ ॥ भाषा-जो भूनिवलमें बह्मके जाननेवाले राजा हैं सो भी सब आते हुए बढे बुद्धिमान जनकनी आये कैसे जनक हैं देहके अभिमानसे रहित हैं ॥ १२॥ यथायोग्यं स्थितास्तत्र समाजे ब्रह्मनिमिते ॥ परस्परं कथाश्चार्वविधा धर्मतत्पराः॥ १३॥ भापा-ब्रह्मज्ञानसे बनाई. हुई समाजमें यथायोग्य सब बैठते हुए अपने अपने धर्ममें तत्पर होकरके बहुत प्रकारकी कथा करने लगे ॥ १३ ॥ , . - r . -

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वेदान्तरामायण बालकां।
पौराणिकाः पुराणज्ञा वैदिका वेदपाठिनः ।।
धाम्मिका धर्मशास्त्रज्ञा वेदान्तज्ञाः सदुद्भवाः ॥ १४ ॥
भाषा-पुराणी लोगोंने पुराणकी कथा वेदपाठी वेदकी कथा धर्मशास्त्रवाले
धर्मशास्त्रकी कथा वेदान्तवाले सदज्ञानसे उत्पन्न कथा इस प्रकारसे सब कथा
करते हुए ॥ १४ ॥
एवं समेघमाने तु महानन्दे सुविस्तरे ॥
मुनिः पप्रच्छ सम्वौ वरतन्तुं महामतिम् ॥ १५ ॥
भाषा-इस प्रकारसे बडे आनंदकी वृद्धि होरही है. बहुत प्रकारसे ऐसी
समयमें संवर्त नाम मुनि जो हैं सो बड़ी है बुद्धि जिनकी सो वरतंतु मुनिसे
पूछते हुए ॥१५॥
संवर्त उवाच।
को रावणोऽतिप्रबलोरिहन्ता कः कुम्भकर्णो मदपानमत्तः ॥
किं तन्मदं यस्तु सकृत्प्रपीत्वा भवन्ति मत्ताः खलु ज्ञानवर्जिताः॥१६॥
भाषा-संवर्त मुनि बोलते भये हे गुरुमहाराज ! बडे बलवान् वैरीको
नाश करनेवाला रावण कौन है, मदको पीके रातदिन मत्त रहना ऐसा कुंजकर्ण
कौन है, जिस मदको एकदफे पीकर दैत्यलोग निश्चय करके जानसे रहित और
मत्त होजाते हैं. सो मद क्या है ? सो कहो ॥ १६ ॥
विभीषणः कश्च सुरेशजेता का कैकसी कश्च मुनिर्मरीचिः ॥
को वै पुलस्त्यः समचित्तवर्ती को विश्रवा विश्वसमैकदृष्टिः ॥
खरादयः के च प्रचंडवीर्याः का सूपविशा भुवनत्रयञ्च किम् ॥ १७॥
भाषा-बिभीषण क्या है, इंद्रजित क्या है, कैकसी क्या है, मरीचमुनि
कौल है, सुखदुःखमें बरोबर चित्त जिनको ऐसे पुलस्त्य मुनि कौन हैं, संसारमें
भगवान्को रूप देखनेवाले विश्रवा मुनि कौन हैं, खर आदि करके संसारमें
जितने राक्षस हैं सो कौन हैं, शर्पणखा क्या है, तीन भुवन क्या हैं ॥ १७ ॥

है 1 - - भोपाटीकासहित। मन्दोदरी रावणवल्लभा च का चान्याः प्रियाश्चैव दशाननस्य काः ॥' किन्तच्छिरोयद्दशसंख्ययान्वितम्भुजाश्च के विंशमितास्तु तस्य वै१८ भाषा-रावणकी प्यारी मंदोदरी क्या है, और जो बहुत रावणकी स्त्री हैं सो क्या है, रावणके दश मस्तक क्या हैं, रावणके वीस हाथ क्या हैं ॥ १८ ॥ लंका च का तत्परिखा च सिन्धुः कः को विरचिवरदानदाता ।। कावस्त्रशस्त्रौ विविधौ रथं किं के वाजिनो ह्युत्तमगर्दुभाश्च के ॥१९॥ भाषा-लंका क्या है लंकाकी खाई क्या है समुद्र कौन है रावणको वर- दान देनेवाला ब्रह्मा कौन है, रावणके बहुत प्रकारके अस्त्र शस्त्र क्या है रावणके स्थ घोडे खबर ये सब क्या हैं ॥ १९॥ शक्तिश्च का किं सुमनोविमानं को वै कुबेरो जननी च तस्य का । कः शंकरो यस्य करोति सेवनं दशाननः कानि मुखानि तस्य वै॥२० भापा-रावणकी सांग जिससे लक्ष्मणकू मारा सो क्या है पुष्पकविमान क्या है, कुबेरकी माता क्या है, कुबेर क्या है, शंकर क्या है, जिनका रावण नित्य सेवन करता है, रावणके दस मुख क्या हैं ॥२०॥ का सारथिवा जिविचालनं च किं किं वाजिरंहोतिरजश्च किम्मुने । को दो स्थानोरथकूबरं च किं किं रझिमबद्धं गमनाश्रयञ्च किम् ॥२१ भाषा-रावणका सारथी घोडोंको हांकनेवाला, चाबुक, घोडोंकी दौड और 'धूलि हे मुनिराज ! ये सब क्या हैं, रथके दो पैया रथमें बैठनेकी जगा रथकू बांधनेकी रस्सी, स्थक चलाना ये सब क्या हैं ॥ २१ ॥ के रावणस्यैव सुतास्सुतानां तत्पुत्रपौत्रा गणना न येषाम् ॥ एपां स्त्रियः का भुवनत्रयाका द्वयोरथान्ये भुवि राक्षसाश्च के॥२२॥ भापा-रावणके लडका लडकोंका लडका तिनोंके पोता पडपोता आदि जिनॉकी गिनती नहीं है ये सब क्या हैं. इन सबोंकी निये क्या हैं कुंभकर्णकी 'स्त्री पुत्र क्या हैं और सब राक्षस जो रावणके कुलमें थे इनकी स्त्री पुत्र क्या हैं ॥ २२॥ ५ . . - -

वेदान्तरामायण बाकां।
१०
किमामिपं तद्रुधिरं च तेषां का वारुणी तयजनन कि मुने ।
तेपां गुरुवै भृगुनन्दनश्च को निकुंभिला का हवनस्थलं च किम् ॥२३॥
भाषा-राक्षसोंका भोजन मांस रुधिर क्या है, मदिरा क्या है, रावणका
यज्ञ क्या है राक्षसोंके गुरु शुक्राचार्य कौन हैं, निकुंझिला देवी कौन है, होमका
स्थान क्या है ॥ २३ ॥
कः पावको हव्यविलक्षणाश्च के को दारुमंत्री विजयं च किम्मुने ।
दासीश्वरी का त्रिजटा च वाटिका काशोकवृक्षेः परिवारिता च या२४ ॥
आषा-अग्नि होमकी सामग्री क्या है, लकडी, मंत्र, क्या है, रापणकी
विजय क्या है, दासियोंमें मालिक त्रिजटा क्या है, अशोक नाम बगीचा
अशोक वृक्षासहित क्या है ॥ २४ ॥
सर्वाणि चान्यानि च यानि तेषां द्रव्याणि मे प्रश्नविवर्जितानि ।।
क्दस्व चित्तम्मम कौतुकाकुल श्रुत्वा पुराणानि मुनीश तानि च॥२६॥
भाषा-हे मुनिजी ! जो मैं पूंछाहूं और मेरे पूंछनेसे बाकी जो प्रश्न रह्या
होवे रावणादि राक्षसोंकी वार्ता सो विस्तार करके कहो हे गुरु! पुराणोंमें
रावणका चरित्र सुनके मेरा चित्त घबराय रहा है ॥ २५ ॥
इति श्रीवेदांतरामायणे बालकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवतन्तुसंवादे
रावणविभूतिप्रश्ने प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥ १॥
संवर्त उवाच।
के वेदशास्त्रावलिसंहितादयो ये पीडिता विंशतिबाहुनानिशम् ।।
के ब्राह्मणा ब्रह्मविदां वरिष्ठ गावश्च का वेद मखं च किम्मुने ॥१॥
भाषा-संवर्त मुनि फेर पूछते हैं हे मुनिजी! वेद, शास्त्र, पुराण संहिता
बहुतसे बहुत कौन हैं कि जिनकू वारंवार रावण दुःख देता था हे मुनिजी !
ब्रह्मज्ञानियोंमें आप बडे हो गो ब्राह्मण वेद यज्ञ क्या है जिनको रावण नाश
करता था ॥१॥

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१ भाषादीकासहितम् ।
११
के ते पुराणा हरिकीर्तिवर्धना ये नष्टभावं गमिता निवारिताः ॥
दशानने नातिप्रचंडतेजसा भूमिश्च का के सुरसत्तमाश्च ये ॥२॥
भाषा-भगवान्की कीर्ति बढानेवाले पुराण क्या हैं, जिन्होंको बडा तेजमान.
रावणने नाशको प्राप्त करदिया और भूमिदेवता क्या हैं जिन्होंको रावणने
बहुत दुःख दिया ॥२॥
गंगादयः काः सरितो मुनीश विष्णुश्च को ब्रह्मसुतो वसिष्ठः ।।
पुरी त्वयोध्या रविवंशरक्षिता का सा च के तत्कुलसंभवा नृपाः॥३॥
भाषा-हे मुनिराज ! गंगा आदि लेके नदी, विष्णु ब्रह्माको पुत्र वसिष्ठ सूर्य-
वंशी राजों करके रक्षित अयोध्यापुरी और सूर्यवंशमें जन्मे जो राजा ये सब
कौन हैं ॥३॥
कश्चाजसूनुर्वहुक्कामुको नृपः का कोशला का मगधेशनन्दिनी ॥
का केकयी कश्च विभांडकात्मजो यज्ञश्च कः को हुतभुनीश ॥४॥
भाषा-अजराजाको पुत्र बडा कामी राजा दशरथ क्या है और कौसल्या
सुमित्रा कैकयी और स्त्री दशरथकी क्या हैं और शृंगीऋषि तथा यज्ञकी अग्नि
कौन हैं॥४॥
को दारुमन्त्री हवनस्य द्रव्याः के यज्ञकुण्डं किमु पावकार्चिः ॥
किं पावकेनापि नृपाय दत्तन्तद्भक्षणं दोहदलक्षणञ्च किम् ॥५॥
भाषा-यनकी लकडी, मंत्र होम सामग्री यज्ञको कुंड अग्निज्वाला ये सब
क्या हैं दशरथको अमिन प्रसन्न होके क्या वस्तु दिया उस वस्तुको अक्षण
रानियोंने किया सो क्या है और गर्भका लक्षण क्या है ॥ ५ ॥
का सा प्रसूतिरसुखदायिनी या को रामचन्द्रः खलु लक्ष्मणश्च कः ॥
को भ्रातरौ द्वौ शुभलक्षणान्वितौ शत्रुघ्नकैकेयिसुतौ सुनिर्मलौ ६॥
भाषा-जो सुखको देनेवाला जन्म उत्सव क्या है रामचंद्र अरु लक्ष्मण
क्या है सुंदर लक्षणयुक्त मलसे रहित दोआई शत्रुघ्न और कैकयीका पुत्र भरतः
ये दोनो कौन हैं ॥ ६ ॥

। . . rhce १२ वेदान्तरामायण बा० कां। . रामस्य किं क्रीडनकौतुकम्मुने कश्श्वेतप्रासादखगोऽजिरं च किम् ।। का धूलिराशिः सरयूस रित्का को तीरतोयो पुरवासिनश्च के ॥ ७ ॥ भाषा-हे मुनिजी ! दशरथराजाकी सफेद महल आकाशको मानो छूने चाहती है सो क्या है और रामके वालपनेका खेल तमासा क्या है और धूलिकी समूह सरयनदी तथा तटजल पुरवासी प्रजा ये सब क्या हैं ॥ ७ ॥ किं रामचन्द्रस्य धनुश्च खड्ग के वै शराः काविपुधी सुपूणे ॥ तद्वत्सुमित्रातनयस्य सबै कि शस्त्रबुंदं वद तन्मुने मम ।। ८ ॥ भाषा-राम लक्ष्मणका धनुपवाण तरकस खड्ड और अब क्या मुनिजी कहो ॥ ८॥ संस्कारश्रेष्ठा मुनिना कृताश्च सुनिश्च को गाधिसुतो महामतिः ॥ तस्यापि को यज्ञसमुत्सवो मुने का ताडका यज्ञविनाशकारिणी॥ ९ ॥ भाषा-वसिष्ठजीने राजाके पुत्रोंका संस्कार क्या किया और गाधिपुत्र बड़े बुद्धिमान विश्वामित्र कौन हैं विश्वामित्रकी यज्ञका उत्सव क्या है और यज्ञकी नाश करनेवाली ताडका क्या है ॥ ९ ॥ को राक्षसौ द्वावतिदुर्मती सुने सुबाहुमारीचसमाख्यसंयुतो ॥ विद्या च सा का मुनिना प्रदत्ता या रामचंद्राय प्रसन्नचेतसा ॥१०॥ भाषा-हे मुनिजी ! सुबाहु मारीच बड़े दुष्टमति कौन हैं विश्वामित्र मुनि 'प्रसन्न चिचसे रामचंद्रको विद्या क्या दिया ॥१०॥ को गौतमः का गृहिणी च तस्य वे नानाप्यहल्या सुरनायकश्च कः ॥ को जारिणीजारसमुद्भवो रसो किन्तद्रजो येन विनिर्गता च सा ॥११॥ भाषा-गौतम मुनि अरु उनकी स्त्री जिसका अहल्या नाम ये दोनों कौन है इन्द्र कौन है जारसे उत्पन्न भया जो रस सो क्या है वो धलि क्या है, जिसके छुएसे अहल्या वर गई ॥११॥ का साशिला यन्मिलिताच कामिनी को मेथिलेशो नगरीच तस्य का। स्वयंवरं किं नृवराश्च के ते का जानकी तद्धनुरुत्तमञ्च किम् ॥१२॥ .

भाषाटीकासहिवम ।। भाषा-जिस शिलामें अहल्या मिलगई थी वो शिला क्या है जनक राजा कौन है जनककी नगरी क्या है स्वयंवर क्या है जो राजा स्वयंवरमें आये थे वो सब कौन हैं और जानकी क्या है जो धनुषकी पण जनकने किया सो धनुष. क्या है ॥ १२॥ किं त्रोटनन्तद्धनुषो मुनीन्द्र भो को भार्गवस्तद्धनुरोपणञ्च किम् ॥ को वै विवाहो जनतासमागमं गजाश्वसेनादिसुखासनञ्च किम् ॥१३॥ भाषा-हे मुनीन्द्रजी! धनुष तोडना क्या है, परशुरामजी कौन हैं, परशुराम- जीका धनुष रोपण क्या है और हाथी घोडा पालकी फौज इत्यादि बरात आई सो क्या है ॥ १३॥ काश्चोमिलाद्यास्तनुजा विदेहयोईयोः सुकेत्वोर्जनकस्य चोमिला ॥ विवाहितारामसहोदराणां कास्ताश्शुभानन्दक्षमास्सुलोचनाः ॥११॥ 'भापा-जनक सुकेतु ये दोनों विदेहोंकी उर्मिला आदि कन्या क्या हैं जो रामके भाइयोंको भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न इनके संग विवाह भया ये कौन है शुभ आनन्द क्षमायुक्त॥१४॥ मुनीन्द्र को रामसहोदराणां विदेहजानां च विवाहकौतुकः ॥ रामस्य चैवम्पृथिवीसुताया विवाहहोत्सवमंगलं च किम् ॥१५॥ भाषा-हे मुनि! रामके भाइयों समेत विवाहका तमासा क्या है तथा रामजीके विवाहमें हर्ष उत्सव मंगल भया सो क्या है ॥ १५ ॥ कानि प्रदत्तानि सुताविवाहे राज्ञा विदेहेन विचक्षणेन ॥ किं वै प्रयाणं च क्षितीश्वरस्य संगृह्यपुत्रान्छुभकन्यकाभिः ॥१६॥ भापा-कन्याविवाहमें जनकने दायज दिया सो क्या है, पुत्रसहित तथा जो शुञ्ज पुत्रोंकी स्त्री तिनकू ग्रहण करके दशरथने प्रयाण किया सो क्या है ॥१६॥ ससैन्ययुक्तस्य नृपोत्तमस्य पुनस्स्वभायैस्ससुतैस्सुखान्वितैः । मुनीश्वरैः किं गमनं स्वपुर्याश्चोत्कण्ठभावो मिथिलाधिपस्य कः॥१७॥ - - T -

है
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१४
वेदान्तरामायण वा० का।
आषा-फेर विवाहसे विदा होके सेनासहित राजोंमें उत्तम जो दशरथ सो
अपनी अपनी स्त्रियोंसहित पुत्रोंको सुखयुक्त मुनीश्वर सहित पुरी अयोध्याको
आये सो क्या है और जनक विह्वल हुए सो क्या है ॥ १७ ॥
का सौख्यवासो रघुनन्दनस्य राज्ञो विचारश्च पटाभिपेकः ॥
का मन्थरा तद्विपरीतचारिणी कलंकभावं च विचक्षणञ्च किम् ॥१८॥
भाषा-अयोध्या रामचंद्र सुखसे रहे सो क्या ह. दशरथको विचार तथा
राज्य देना ये दोनों क्या है, रामके राज्यमें विश्न करनेवाली मंथरा क्या
कैकेयीको सिखाया ऐसा कलंक क्या है ॥ १८॥
का क्रूरखुद्धिर्भतरस्य मातुर्विलापसिन्धुपतेर्मुने कः ।।
आज्ञा च का भूपतिसम्प्रदत्ता किं काननं कश्च रथोहयाश्च के॥१९॥
भाषा-भरतकी माताकी खोटी बुद्धि क्या है, दशरथको दुःखसमुद्र सरीके
क्या है, दशरथने रामचंद्रको क्या आज्ञा दिया वन जानेकी जिस वनकू
रामचंद्रजी गये वह वन क्या है रामचंद्रके स्थ घोडा क्या हैं ॥ १९ ॥
को वै सुमंतो रुदनं च कि सुने रथस्य द्रव्याणि च कानिरहः ।।
एतत्समाहि द्विजेन्द्र निश्चितं का वैसरिचा तमसेति शब्दिता॥२०॥
भाषा-हे मुनि! सुमंत सारथी कौन है, रामजीको वन जाते देखके रुदन हुआ
सो क्या है, स्थकी सामग्री क्या है, रथका वेग क्या है, हे मुनिजी! यह संपूर्ण
वार्ता निश्वय करिके कहो तनसा नदी क्या है ॥ २० ॥
तत्तीरवासो रघुनन्दनस्य को हयाशनं किम्पुरवासिनश्च के ॥
का तत्र निद्रा पुरवासिनाञ्च किं रामवाक्यं भ्रमणं रथस्य ॥ २१ ॥
भापा-तमसाके तीर रामचन्द्र बसेथे सो क्या है, घोडौंको क्या चारा
खिलाया, पुरवासी कौन हैं पुरवासियोंके निद्रा आई सो क्या है, रामकी वाक्य
क्या है, स्थानमण किया सो क्या है ।। २१ ॥
भ्रान्त्वा पुनस्तद्गमनं च किम्मुने निवर्तनं किम्पुरवासिनाम्पुनः ।।
पुरी समागम्य विलापकारणं किं वेद दिग्वर्पकृतम्प्रमाणकम् ॥२२॥

-- T भापाटीकासहितम् । भाषा-रथके भमण करके रामजी चलेगये सो क्या है पुरवासीलोग पीछे अयोध्यामें आये सो क्या है पुरवासी लोग अयोध्या में आके विलाप किया सो क्या है और रामजीको वनवास चौदहवर्ष प्रमाण किया सो क्या है॥ २२ ॥ वनेचरः को रघुवीरमित्रः किं शृंगवेरं द्विज शिशिपश्च कः ॥ किमासनं दर्भविनिर्मितम्मुने के ते कुशाः काच गुहस्य भावना२३॥ भाषा-हे ब्राह्मणजी ! वनमें भ्रमण करनेवाले रामजीका मित्र क्या है, शृंगवेरपुर शिशिपा वृक्ष क्या है, गहने रामजीको कुशका आसन बना दिया सो क्या है कुश क्या है, गृहकी शक्ति क्या है ॥ २३ ॥ तिरस्कृतं यत्खलु लक्ष्मणेन वै किम्भूपणम्भूमिनिपातितं तथा ।। के भूपणा वस्त्रसमन्विता मुने त्यक्ताश्च ये राघवसूनुना वै ॥ २४ ॥ मापा-जो गहना लक्ष्मणने अनादर करिके पृथिवीम रखदिया सो क्या है, वो वस्त्र गहना क्या है जिसकूँ दशरथ के पुत्र रामजीने त्याग दिया ॥ २४ ॥ का सा जटायानिववंध रामः का जाह्नवी पातकपुंजहारिणी। कः स्वमभावो रघुनन्दनस्य वा विदेहजायासहितस्य भो सुने ॥२५॥ , भाषा-हे मुनिजी ! वो जटा क्या है जिसको रामजीने शिरपर बांधी बहुत पाप नाश करनेवाली गंगाजी क्या है, जानकीसहित रामजी सोये सो क्या है ॥२५॥ संवादसंजागरणो द्वयोः को बभूवतुर्लक्ष्मणराममित्रयोः । श्रीजाह्नवीतोयतटोमयः के का नौमुहस्यैव च वंशयष्टिः ॥२६॥ भाषा-लक्ष्मण तथा रामजीका मित्र गृह ये दोनों रातको जागे तथा वार्ता किया सो क्या है गङ्गाजी के तीर, जल और लहर क्या है नाव क्या है गुहकी बांस क्या है खेवनेवाले क्या है ॥ २६ ॥ कि तारणं किञ्च प्रयागकाननं का सा त्रिवेणी यमुना सरस्वती ।। एकत्र संगं मिलिता प्रयागे या लोकलोकैः सततं विसेव्यते ॥२७॥ . ।

- १६ वेदान्तरामायण वा. कां। भाषा-रामचंद्रको गुह गंगाके पार लेगया सो क्या है, प्रयागजीका वन क्या है, यमुना सरस्वती गंगा प्रयागमें इकट्ठा भई जिनकू सव लोक सेवन नित्य- प्रति करतेहैं सो त्रिवेणी क्या है ॥ २७ ॥ वटश्च को यः प्रलयेऽपि नाशं न याति कश्चिन्मुनिवर्य मे श्रुतम् ॥ मुने भरद्वाजमुनिश्च को वै संसेवितो येन विदेहनापतिः ॥२८॥ भाषा-हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने ऐसा सुना है कि प्रयागमें एक वटका वृक्ष है उसका नाश प्रलयमेंशी नहीं होता वह वट क्या है, भरद्वाज मुनि कौन हैं जिनांने जानकीपतिका पूजन किया ॥ २८॥ प्रीत्या स्वयं लक्ष्मणजानकीभ्यां युतोऽतिप्रेम्णा मुनिभिस्समाहितः ॥ को वै मुने स्नानविधिस्त्रिवेण्या कृतस्त्रिभी रामप्रियासहोदरः ॥२९॥ भाषा-प्रीतिसे अपने हाथसे प्रेम करके आदरसे मुनियोंको संग लेके लक्ष्मण जानकी सहित रामजीको पूजन किया त्रिवेणीम जानकी लक्ष्मणसहित रामचंद्रने स्नान किया सो स्नानकी विधि क्या है ॥ २९ ॥ वाल्मीकिनामेति मुनिमहामतिर्भविष्यवक्ता मुनिसत्तमश्च कः ॥ मंदाकिनी का सरितां वरा मुने कश्चित्रकूटो मुनयश्च के ते ॥ ३० ॥ भाषा-अगाडी होनेवाली बात कहनेवाले बडे बुद्धिमान् मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे वाल्मीकि मुनि कौन हैं, नदियोंमें बडी मंदाकिनी नदी चित्रकूट पर्वत क्या है मुनिलोग कौन हैं ॥ ३०॥ वनेचराः के रघुनन्दनप्रियाः को तौ कुटीरौ वसतिश्च तत्र का ॥ किन्तत्र सौख्यं रघुनन्दनेन प्राप्तं प्रियाभ्रातृसमन्वितेन ॥ ३१ ॥ भाषा-जो मुनि रामजीके बडे प्यारे वनमें विचरते हैं रामचंद्र लक्ष्मणकी दो पर्णकुटी बनी सो क्या हैं, इन दोनोंकी बात क्या है. लक्ष्मण जानकीसहित चित्रकूटपर वास करनेसे क्या सुख प्राप्त हुआ॥३१॥ पुनस्सुमन्तागमनञ्च किम्प्रभो पुरीमयोध्यां सरयूसमन्विताम् ॥ मृते नृपे का प्रमदाविलाप के दूतवर्या मुनिना सुप्रेरिताः॥३२॥ .

- भाषादीकासहित। भाषा-हे प्रभुजी ! रामजीको विदा करिके सुमंत अयोध्यापुरीको आये सो क्या है, कैसी अयोध्या है सरयू नदी पास बहती है दशरथके मरण हुए पर . स्त्रियोंने रुदन किया सो क्या है, वसिष्ठजीने दूत भेजा सो दूत क्या है ॥ ३२ ॥ सद्योगताः केकयपत्तनं किं कः केकयेशो वचनं किमूचुः ।। द्रुतं गृहीत्वा भरतं सहानुजं तो द्रौ च को राजपुरीम्प्रयातौ ॥ ३३ ॥ भापा-दूत शीघही कश्मीरको गए सो कश्मीरनगर क्या है, कश्मीरका राजा कौन है, राजासे दूत क्या बोले, जलदीसे भरत शत्रुघ्नको लेके अयोध्यामें आये सो जरत शत्रुघ्न कौन हैं ॥ ३३ ॥ आश्वासितो दो मुनिना प्रचक्रतुर्विरोदनं किञ्च किमाश्वसाशनम् ॥ किमूचतुः कोशलनन्दिनीम्प्रति विभसयामास किमुत्स्वमातरम्३४॥ भाषा-वसिष्टजीसे जरत शत्रुघ्नने विश्वास पायके रोते भए सो क्या है, वसिष्टजीने विश्वास दिया सो क्या है, भरत शत्रुघ्न कौशल्यासे क्या बोले और अपनी जो माता कैकेयी उसको त्रास दिया सो क्या है॥ ३४ ॥ किं च प्रयाणं भरतेन वे कृतं ससैन्यमात्रानुजबांधवैस्सह ।। गुहेन संवादनिवासनी च को स्वसैन्यविश्वासनमेव किम्मुने ॥ सुखेन गंगोत्तरणं किमद्भुतं प्रयागराजे मुनिसादरं च किम् ॥ ३९ ॥ भापा-माना गुरु कुटुंब सेनासहित भरत रामके पास चले सो क्या है,गुहके संग भरतका संवाद हुवा तथा गुहने भरतको डेरा दिया और अपनी सब सेनाको विश्वास दिया सुखसे गंगाके पार भये प्रयागमें भरद्वाज मुनिने सेनासहित भरतकी मिहमानी किया ये सब क्या हैं ॥ ३५ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे बालकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतंतुसंवादे भर- तागमने मरद्वाजाश्रमनिवासो नाम द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥२॥ संवर्त उवाच॥ किं चित्रकूटे च समागमम्मुने परस्परं किं वचनं च तेपाम् ॥ के पादुके पादतलावरक्षिते श्रीरामदत्ते भरताय निर्मले ॥१॥ -- 4 ,

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२८
वेदांत रामायण बा० कां।
भाषा-संवर्त मुनि पूंछते भये हे मुनिजी ! चित्रकूमार सब मंडलीको
मिलाप राम आदि लेके भरत वसिष्ठ और जो आये थे जिन्होंने आपुसमें बोले
सो क्या हैं, रामजीने अपनी पादुका भरतकू दिया सो क्या हैं कैसी पादुका है
पगकी रक्षा करनेवाली परम सुंदर हैं ॥ १ ॥
ये धृत्वा शिरसा प्रेम्णा ससैन्यो गुरुणा सह ॥
शत्रुघ्नेन युतश्शीघ्र पुनरायात्पुरीम्प्रति ॥२॥
भाषा-जो पादुका भरतने प्रेमसे अपने शिरपर धरके वसिष्ठ शत्रुन्न फौज
संग लेके फिर अयोध्या पुरीको आये सो क्या है ॥२॥
भरतस्य च का सेना यामादायागतः पुनः॥
नन्दियामञ्च किम्प्रोक्तं पादुकासेवनं च किम् ॥३॥
भाषा-रामजीके पाससे फौज संग लेके भरतजी फिर अयोध्या में आये सो
फौज क्या है, नंदिमाम क्या है, पादुका सेवन भरतने किया सो क्या है॥३॥
किमयोध्यापुरीराज्यं चकार भरतस्सुधीः॥
किम्प्रजारक्षणं विप्र कि मृगाहरणं गिरौ ॥ ४ ॥
भाषा-बड़े बुद्धिमान् भरत अयोध्याका राज किया सो क्या है, हे मुनिजी!
भरतने प्रजाकी रक्षा किया सो क्या है ॥४॥
रामेण लक्ष्मणेनैव चित्रकूटे कृतम्सुने ।
किं जयन्तापराधं च जानकीचरणादनम् ॥५॥
भाषा-राम लक्ष्मण दोनों चित्रकूटपर नित्य मृग मारते रहे सो क्या है,
जानकीके पगमें जयन्तनाम कागने चोंच मारा सो क्या है ॥५॥
रामेण त्यक्तः को बाण किमेकाक्षिनिपातनम् ॥
किं जयंतस्य भ्रमणं राक्षसागमनं च किम् ॥६॥
भाषा-रामजीने जयन्तको मारनेके वास्ते बाण छोडा सो क्या है, जयंतकी
एक आंख काणी कर दिया सो क्या है, काकने सब लोकोंमें फिरता फिरा सो
क्या है, चित्रकूटपर बहुत राक्षस आनेको लगे सो क्या है ॥६॥

+ * ५ भापाटीकासहित । १९ उद्वेगश्च सुनीनां को येन तत्त्याज राघवः॥ चित्रकूटस्य किं त्यागः कोऽत्रिस्तस्याश्रमं च किम् ॥७॥ भाषा-मुनि लोगोंको दुःख भया-सो क्या है, जिस दुःखसे चित्रकूटकू रामजी त्यागते भये सो क्या है, अत्रिमुनि कौन है, अत्रिका आश्रम क्या है ॥ ७ ॥ अनसूया च का देवी जानकी शिक्षिता यया ॥ पूजनं रामचंद्रस्य किमत्रिः कृतवान्सुने ॥ ८ ॥ भाषा-अत्रिकी स्त्री अनुसूयादेवी जिन्होंने जानकीको पतिव्रता धर्म सिखाया सो क्या है, रामजीका पूजन आत्रिमुनिने किया सो क्या है ॥ ८ ॥ को विराधो महाकरो जानकी येन संहता।। शीघ्रं जघान यं रामो बाणेदेहविकृन्तनैः॥९॥ भापा-विराध नाम राक्षस कौन है, जो जानकीको हर लेगया जिसको राम- जीने शीघ्र वाणोंसे शरीर काटके मार डाला ॥ ९ ॥ मोक्ष प्राप तदा रक्षश्शरभङ्गो मुनिश्च कः ॥ किन्ध्यानं स्तवनं का च चिता तस्य स्वमाश्रमे ॥१०॥ भाषा-तब राक्षस मोक्षकू गया सो क्या है, शरभंग मुनिने रामजीका ध्यान स्तुति करके अपने वरपर चिता बनायके स्वर्गको गया सो कौन है ॥ १० ॥ कोऽग्निर्ददाह तं यस्तु कस्सुतीक्ष्णो महामुनिः। तेन संभापणं किञ्च कः कुंभजसहोदरः॥११॥ भापा-शरभंगको जो अग्मिने जलाया सो अनि क्या है सुतीक्ष्णमुनि कौन हैं सुतीक्ष्ण रामजीका संवाद भया सो क्या है, अगस्त्य मुनिके भाई क्या हैं ॥११॥ कोऽगस्त्यः का च तत्पनी लोपामुद्रा मुनीश्वर ॥ कि रामागस्त्यसंवादं धनुरेन्द्रं च किम्मुने ॥१२॥ भाषा-हे मुनिजी! अगस्त्य मुनि कौन हैं, अगस्त्यकी स्त्री लोपामुद्रा - -

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वेदान्त रामायण बा०का।
२०
जिसका नाम सो कौन है, हे मुनिजी ! रामजीको और अगस्त्य मुनिको संवाद
हुवा सो क्या है इंद्रका धनुष क्या है ॥ १२ ॥
प्राप्तं रामेण तत्रैव सरिद्रोदावरी च का॥
के तत्तीरजले शुभे कुटीरो कौ च द्वौ तयोः ॥ १३ ॥
भाषा-जो धनुष रामजीको अगस्त्य मुनिने दिया सो क्या है गोदावरी
नदी क्या है, गोदावरीका तट जल क्या है, रामचंद्र लक्ष्मणकी दो पर्णकुटी ये
क्या हैं ॥१३॥
ज्ञानस्य का कथा तत्र रामचन्द्रेण वर्णिता ॥
लक्ष्मणं प्रति भो देव सुखेन वसतानिशम् ॥१४॥
भाषा हे मुनिजी ! सुखसमेत ठहरे जो राम हैं सो वारंवार लक्ष्मणकू
ज्ञानकथा कही सो क्या है ॥१४॥
दुःखिता केन कामेन रावणस्य सहोदरा ॥
आगता स्वपतिं कर्तु श्रीरामं रतिवल्लभा ॥१५॥
भाषा-रावणकी बहिनी रतिकू प्यारी मानिके रामचंद्रको अपना पति
बनानेके वास्ते कामसे दुःखित होके आई सो काम क्या है ॥ १५ ॥
रामेण भ्रामिता तत्र सा ययौ लक्ष्मणान्तिकम् ।।
का भ्रमिस्तस्य रामेण कृता तस्यातिहास्यतः ॥१६॥
भाषा-रामजीके वचनकू मानके लक्ष्मणके पास गई तिस राक्षसीके संग
हास्य करके इधर उधर नमाते भये सो क्या है ॥ १६ ॥
तस्याः के नासिकाकणे ये च्छिन्ने लक्ष्मणेन वै ॥
किं तद्रुधिरवृन्दं च रक्तांगी येन संकृता ॥१७॥
भाषा-शूर्पणखाके नाक कान लक्ष्मणने काट लिये सो नाक कान क्या हैं,
बहुत रक्त आया जिस रक्तसे शूर्पणखाकी देह लाल होगई ॥ १७ ॥
तरसा गमनं तेषां किन्तयोक्तम्वचश्व किम् ॥
हता रामेण ते सर्वे ससैन्या राघवेण वे ॥१८॥

. - - 7 . भाषाटीकासहित। , २१ भाषा-खर दूषण त्रिशिरा इन्होंकू शूर्पणखा क्या वचन कहती भई राक्षस- लोग बहुत जलदी रामजीसे युद्ध करनेको आये सो क्या है, सेनासहित राम- जीने सब राक्षसोंका नाश किया सो क्या है ॥ १८॥ भयांयां जानकी प्राप्ता सा गुहा का मुनीश्वर । सहोदर्या सभां गत्वा रावणस्य च सन्निधो । यच्चोक्तं वचनं किन्तद्यछुत्वा राक्षसोत्तमः ॥ १९॥ भाषा-हे मुनिजी ! भयसे रामजीने जानकीको गुहामें भेजी सो गुहा क्या है, रावणकी बहिनीने रावणकी सन्नामें जाय रावणके सामने खड़ी होके जो बचन बोली सो क्या है, तिस वचनकू सुनके राक्षसोंमें उत्तम जो रावण है ॥१९॥ कः कामो मोहितो येन मारीचान्तिकमाययौ ॥ का संवादो द्वयोस्तत्र को मृगो यस्य रूपधृक् ॥२०॥ भाषा-तुरंत कामसे मोहित हुवा सो काम क्या है मारीचके सामने रावण गया सो मारीच रावणसंवाद क्या है, और मारीचने मृगको रूप धारण किया सो मृग क्या है ॥ २०॥ कि विचित्रम्हगननौ चंचला का गतिर्मुने । को मोहो रामचन्द्रस्य वैदेहीलोभनं च किम् ॥ २१ ॥ भाषा हे मुनिजी मृगके शरीरपर चित्रविचित्र क्या रहा, मृगका बहुत भागना क्या है मृगको देखके रामजी मोहित भये सो मोह कौन है और जानकीको लोग हुवा सो क्या है ॥ २१ ॥ निवारणं च सौमित्र रामचन्द्रस्य किम्मुने । हतो रामेण तेनोक्तं कि लक्ष्मण इतीरितम् ॥ २२ ॥ भाषा-रामचंद्रको लक्ष्मणने मना किया मत जावो ये मृग नहीं राक्षस है सो • क्या है, रामजीने मारीचको माया सो जमीनमें पड़ते बखत मारीचने हा लक्ष्मण ! ऐसा बोला सो क्या है ॥ २२ ॥ - - 4 - .

. . - t J वेदांत रामायण बा० का। २२ जानकीलक्ष्मणस्यैव किं विवादं च निठुरम् ॥ सौमित्रौ विगते दूरे किं धृतं रावणेन वै ॥ २३ ॥ भाषा-जानकी लक्ष्मणका बहुत बिबाद हुआ सो क्या है, लक्ष्मणको दूर गया जानके रॉवणने रूप धारण किया सो क्या है ॥ २३ ॥ परिव्राजकवेपं च किं तत्साहित्यमंडलम् ॥ वैदेया कानि दत्तानि कंदमूलानि साधये ॥ २४ ॥ भाषा-संन्यासीको क्षेप रावण बनायके जानकीके पास आया गेरुका कपडा विभूति कमंडलु आदि और जो संन्यासीलोग धारण करते हैं सो रावणने क्या धारण किया जानकीने साधु जानके कंद मूल फल दिया सो क्या है ॥२४॥ संवादः क्रूरवचसा कस्तत्र मुनिसत्तम । जानकी स्वरथे स्थाप्य गन्तुकामस्स्वपत्तनम् ॥ २५ ॥ भाषा हे मुनिजी ! जानकीको खोटी बात रावणने कही रावणकू खादी बात जानकीने कही सो क्या है, जानकीको रावणने अपने स्थपर बैठायके लंकाको ले चला सो क्या है ॥ २५ ॥ को गृद्धस्तस्य को तुंडो पक्षौ च रावणार्दितो ॥ पातितो रावणेनैव जानकी हत्य संगतः ॥२६॥ भाषा-जिस गृद्धके पक्ष चोंचको रावणन काटके जमीनमें गिरा दिया जानकीको लेके लंकाकू गया सो गीध कौन है ॥ २६ ॥ का दास्यस्तस्य दुष्टस्य यासाम्मध्ये च जानकी ॥ स्थापिता रक्षणं तत्र किं कृतं राक्षसीगणैः ॥२७॥ भाषा-रावणदुष्टकी दासी क्या हैं, जिन दासियोंके बीच जानकीको बैठाया राक्षसियोंने जानकीकी क्या रक्षा किया ॥२७॥ जानकीहरणं दृष्ट्वा रामलक्ष्मणयोरपि ॥ को विलापो मुनिश्रेष्ठ गृद्धसन्तारणं च किम् ॥२८॥.. - - -- २३ . भाषाटीकासहित। भाषा-हे मुनिराज ! जानकीको हरी देखके राम लक्ष्मणने विलापं किया तथा गीधको संसारसे तारते भये सो क्या है ॥ २८ ॥ का कबंधो भुजौ तस्य यौ रामेण निपातितो ॥ का चिता तस्य को दाहः कबंधवचनं च किम् ॥ २९ ॥ भाषा-कबंध नाम राक्षस कौन है, कबंधकी भुजा क्या है, जिस भुजाकू रामजी काटते भए और कबंधको जलाने वास्ते रामजीने चिता बनाया सो क्या है कबंधने रामजीसे बचन बोला सो क्या है ॥ २९ ॥ येनोक्तो रामचन्द्रस्तु तत्क्षणे शबरीङ्गतः ।। का सा मुनिवरश्रेष्ठ याचित्वा रघुनन्दनम् ॥ कथित्वा कपिसद्धावं कां गतिम्प्रापिता सती ॥३०॥ भाषा-जिस बचनकू मानके रामजी उसी समय शबरीके पास गये हे मुनिजी ! सो शबरी क्या है, जो शबरी रामजीको पूजन करिके तथा रामजी- को कहा आप सुग्रीवकू मिलोगे तो सब काम हो जायगा ऐसा कहिके किस लोककू गई ॥३०॥ का पंपा नलिनीश्रष्ठा कस्सरश्च तदुद्भवः ।। का किष्किन्धा पुरी ख्याता के ते वै कपयस्स्मृताः ॥ ३१ ॥ भाषा-तलाइयोंमें बडी जो पंपानाम तलाई सो क्या है, उसी पंपा तलाईसे निकला जो पैपानाम तलाव सो क्या है, किष्किंधा पुरी क्या है, जो कपियोंने रामजीकी सहायता किया ये सब बंदर कौन हैं सो निश्चय करके कहो ॥३१॥ को वालिः कश्च सुग्रीवो जाम्बवान हनुमांस्तथा। नलनीलादयः सर्वेऽप्यंगदाद्याः कपीश्वराः॥ ३२ ॥ भाषा-वाली सुग्रीव, जाम्बवान, हनुमान्, नल, नील अंगद आदि बडे बडे बलवान् बंदर ये सब कौन हैं ॥ ३२॥ तारारुमे च के ख्याते दुन्दुभिः कश्च राक्षसः ॥ का सा गुहा दुन्दुभेश्च सुग्रीवो यत्र संस्थितः ॥३३॥ ३ ।

२४ - - वेदांत रामायण बा०कां। भाषा-तारा रुमा ये दोनों कौन हैं, दुंदुभी नाम राक्षस कौन है, दुदुनीकी गुफा क्या है, जिसके दरवज्जेपर सुग्रीव खडा रहा ॥ ३३ ॥ को मासश्च कपेवासः किं मृतज्ञानमेव च ॥ का राज्यप्राप्तिस्सुग्रीवे किं सुख प्रापितञ्च तत् ॥ ३४ ॥ भाषा-एक महीना सुग्रीव गुफाके द्वारपर खडा रहा सो महीना क्या है, बालि मरगया ऐसा सुग्रीवने जाना सो क्या है, सुग्रीवको राज मिला तिसका सुख भया सो क्या है ॥ ३४ ॥ को दुन्दुभिवधश्चैव वालिनिर्यापणं च किम् ॥ सुग्रीवस्य प्रवासं च कृतं तद्वालिना च किम् ॥ ३५ ॥ भाषा-दुंदुभीको बालीने मारा मारके अपने घरकू आया ये दोनों क्या हैं, सुग्रीवको वालीने घरसे निकाल दिया सो क्या है ॥ ३५ ॥ किं सुग्रीवस्य भ्रमणं को मातंगो मुनिस्तथा ॥ किं शिरो वालिनाक्षिप्तं सरक्तं मुनिमंडले ॥ ३६ भाषा-सब देश सुग्रीव फिरा सो क्या है, मातंगमुनि कौन हैं, मुनिकी पर्ण- कूटीके सामने बालीने रक्तसहित राक्षसका शिर फेंका वो शिर क्या है ॥ ३६ ॥ को रतो रंजितं येन मुनेराश्रममण्डलम् ॥ कः शापो मुनिना दत्तो भूधरः कः प्रवर्षणः ॥ ३७॥ भाषा-जिस रक्तसे मुनिकी पर्णकुटी नष्ट हुई सो रक्त क्या है मुनिने बालीको शाप दिया सो क्या है, प्रवर्षण नाम पर्वत सो क्या है ॥ ३७॥ . सुग्रीवक्य च को वासो गिरौ मंत्रिगणैः सह॥ रामचन्द्रमिलापः को भूषणं वसनं च किम् ॥ ३८॥ भाषा-अवर्षण ऊपर सुग्रीव बसते थे सो वास क्या है, राम सुग्रीवकी मित्रता हुई सो क्या है, गहना वस्त्र क्या हैं ॥ ३८॥ त्यक्तं मैथिलराजस्य कन्यया कि प्रदर्शितम् ॥ का प्रतिज्ञा वालिवधे रामचंद्रेण वै कृता ॥ ३९ ॥ -

२५
॥
भाषाटीकासहित ।
भाषा-जो जानकीने सुग्रीवकू देखके गहना वस्त्र त्याग दिया वह गहना वस्त्र
सुग्रीवने रामजीको दिखाया सो क्या है, वालीको मारनेवास्ते रामजीने प्रण किया
सो क्या है ॥ ३९ ॥
जानकीशोधने चैव कपिना का कृता मुने ॥
के सप्ततालाः किं शुष्कं दुन्दुभेः शिर एव च ॥ १० ॥
भाषा-हे मुनिजी ! जानकीके शोधनेवास्ते सुयीवने प्रण किया सो क्या है,
सात तालके वृक्ष तथा दुंदुभीका सूखा शिर क्या है ॥ ४० ॥
किमंगुष्ठं किमदृश्यं यमाश्रित्य रघूत्तमः ॥
जघान कपिराजं वै द्वंद्वयुद्धकरं शठम् ॥ ११ ॥
भाषा-रघुवंशमें श्रेष्ठ रामजीने जिस अंगूठेसे दुंदुभीके शिरको उठायके
दूर फेंक दिया सो अंगूठा क्या है जिस वृक्षकी आडमें होकर रामजीने दोके संग
युद्ध करनेवाला शठ ऐसे वालीको मार डाला वो वृक्ष कौन है ॥ ४१ ॥
का पुष्पमाला तबासीत् चिह्नितो विहतो यया ॥
. तारांगदविलापः कः का वालिदहनक्रिया ॥ ४२ ॥
भाषा-जिस फूलको माला सुमीवको पहराया पिछानके वास्ते फिर रामजीने
युद्ध करनेकू भेजा सो माला क्या है तारा अंगदको विलाप तथा वालिकी दाह-
क्रिया क्या है ॥ ४२ ॥
सुग्रीवराज्यप्राप्तिः का तस्य किम्मदवर्द्धनम् ॥
रामस्य गिरिवासः को लक्ष्मणेन युतस्य च ॥ ४३ ॥
भाषा-सुग्रीवको राज मिला सो क्या है, राज मिलनेसे अभिमान भया सी
क्या है, रामजी लक्ष्मणसहित पर्वतपर बसे सो क्या है ॥ ४३ ॥
के चत्वारो गता मासा वार्षिकाः सुमनोहराः ॥
विलापो रामचन्द्रस्य पुनः को जानकीकृते ॥४४॥
भाषा-सुंदर मनको हरण करनेयोग्य ऐसे जो चारमास वर्षा ऋतुके गये
सो क्या हैं फिर जानकीके वास्ते रामचंद्रजीने विलाप किया सो क्या है ॥४४॥

. L २६ वेदांत रामायण बा०कां। सुग्रीवत्रासनं किं च लक्ष्मणेन कृतं तथा ॥ राघवान्तिकमागत्य प्रेरयामास वै कपीन् ॥ ४५ ॥ भाषा-लक्ष्मणजीने सुग्रीवको त्रास दिया सो क्या है सुग्रीवने रामजीके सामने आयके कपियोंको भेजा सो क्या है॥४५॥ चतुर्दिक्षु महावीरान्सुग्रीवस्तच्च किम्मुने ॥ किमंगुलीयकन्दत्तं रामेण वायुजे कपौ ॥ ४६॥ भाषा-बडे बली वानरोंको चारों दिशाको सुग्रीवने भेजा सो क्या है, राम- जीने हनुमाकू सुंदरी दिया सो क्या है ॥ ४६ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे बालकाण्डे शिवसहायबुधविरचिते सीताशोधने तृतीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥३॥ संवर्त उवाच। कावधिर्मासिका दत्ता शोधित्वा च त्रयो दिशः॥ अप्राप्ति पुनराचख्युर्जानक्यास्तच्च किम्मुने ॥१॥ भाषा-सम्वर्तमुनि फिर पूंछते हैं कि सुग्रीवने सब वानरोंको एक मासका प्रमाण करके भेजा सो क्या है, कपियोंने तीन दिशा शोधके आय कहा कि जानकी नहीं मिली सो क्या है ॥ १ ॥ योगिनी का समाख्याता पातालविवरं च किम् ॥ कः सम्पातिः पक्षिराजो यद्वाक्यमनुमान्य च ॥२॥ भाषा-हनुमान आदि वानरोंको योगिनी मिली सो क्या है, पातालका रस्ता देख पडा सो क्या है, संपाति गीध पक्षियोंका राजा क्या है, जिसके वचन हनुमान्जीने माने ॥२॥ यदा सरोह हुनुमान्समुद्रलंघनोद्यतः ॥ सगिरिः को पदापीय पारं गन्तुं मनो दधे ॥३॥ भाषा-जिस परबतको हनुमान चढने भए पगसे दाबिके समुद्रको कूदके उस पार जानेको विचार किया सो पर्बत क्या है ॥ ३॥ -- - २७ , भाषाटीकासहित । सिंहिका का जलचरा छाया का वा हनूमतः ॥ मारिता क्रोधयुक्तेन वीरेण मुष्टिना कथम् ॥ ४॥ भाषा-जलमें रहनेवाली सिंहिका क्या है हनुमानकी छाया क्या है और कोध करके हनुमान् वीरने हाथकी मुष्टी बांधके मारा सो मुष्टी क्या है ॥ ४ ॥ सुरसा का समाख्याता इयोः किम्मुखवर्द्धनम् ॥ किम्प्रविश्य गतः पार विचारं किं हनूमतः ॥५॥ भाषा-सुरसाने मुख बढाया और हनुमानजीने देह बढाया सो दोनों क्या हैं, सुरसाके मुखमें बैठके हनुमान समुद्रके पार गये सो मुख क्या है ॥ हनुमान्ने सिंधुके दक्षिण तीर बैठके विचार किया सो क्या है ॥ ५ ॥ किं धृतं लघुरूपं च का लंका मुष्टिपातनम् ॥ विलोकिता समस्ता पूर्न दृष्टा जानकीति किम् ॥६॥ भापा-हनुमान्ने छोटा रूप धारण किया सो क्या है, हाथकी मुष्टी बांधके लंकानाम राक्षसीको मारा सो क्या है, तमाम लंकापुरीमें हनुमान फिरे जानकाकू नहीं देखे सो क्या है ॥ ६ ॥ पश्चादृष्टा जनकजा किं तरुस्थेन तेन वै ।। किमागमनवेगञ्च रावणस्य तदा मुने ॥ ७ ॥ भाषा-हे मुनिजी ! पीछे वृक्षपर बैठके जानकीकू देखे सो क्या है, तब शीव रावण आया सो क्या है ॥ ७ ॥ गते दुष्टे राक्षसीभिस्तर्जनं किं कृतन्तथा ।। बिजटाश्वासनश्चक्रे जानक्याः किं तदामुने ॥ ८॥ भाषा-हे मुनिजी ! रावण दुष्टके गये पीछे राक्षसियोनें जानकीको डरवाती नई सो क्या है त्रिजटाने जानकीकू विश्वास दिया सो क्या है सो कहो ॥ ८॥ किमूचे रामचरितं हनुमान्तरुसंस्थितः ॥ तेनोक्तं वचनं श्रुत्वा विश्वास प्राप सा च किम् ॥ ९॥ . t मा 1 '.

२८ वेदांत रामायण बा०कां। भाषा-वृक्षपर बैठके रामजीके चरित्रकू हनुमान् कहने लगे तथा कपिकी वाक्य सुनके जानकीके मन विश्वास भया ये दोनों क्या हैं ॥ ९॥ दत्तांगुलीयं संगृह्य संवादमभवत्तयोः ॥ का सा क्षुधा ययातॊऽभूद्धमान्कपिसत्तमः ॥ १० ॥ भाषा-रामजीकी मुंदरी हनुमान्ने जानकीको दिया जानकी लेके खुसी भई दोनों माता पुत्र बात करनेलगे सो क्या है जिस भूखसे हनुमान दुःखी भए वह भूख क्या है ॥१०॥ किं फलन्तरवः के च भक्षित्वोत्पाटितास्तथा ॥ राक्षसीभिः किमुक्तश्च रावणो मानगर्वितः ॥ ११ ॥ भाषा-जो फल हनुमान्ने खाये वृक्षोंको तोडे सो फल और वृक्ष क्या हैं. -रावणको राक्षसियोंने क्या कहा ॥ ११ ॥ प्रेरयामास तनयं स्वस्याक्षं राक्षसोत्तमः॥ हतो हनुमताक्षश्च बद्धश्वेंद्रजिता च कः ॥ १२ ॥ भाषा-राक्षसोंमें उत्तम जो रावण है सो अपने अक्ष नाम पुत्रको जेजता हुआ तिस अक्षको हनुमानजीने मारडाला सो क्या है इन्द्रजीतने हनुमान्के बांधा सो क्या है ॥ १२॥॥ लंकाविदाहनं किञ्च ताडनम्पुच्छबंधनम् ॥ भ्रमणं हसनं चैव किन्तैलं रज्जु किम्मुने ॥ १३ ॥ भाषा-हनुमानकी पूंछ बांधते अये, सारी लंकापुरीमें फिराय हंसी किये और तैल रस्सी कपडा ये सब क्या हैं ॥ १३ ॥ कोक्तिर्दशाननस्यैव वीरस्यैव बभूव ह ॥ राक्षसीनां प्रलापं किं किम्पुच्छशीतलन्तथा ॥ १४ ॥ भाषा-रावणकी हनुमान्की बातें भई सो क्या हैं, लंका जलती देखके राक्षसियोंने विलाप किया सो क्या है, हनुमान्ने पूंछ बुझायके ठंडी किया सो क्या है ॥ १४॥ -- - भाषाटीकासहित । २९ जानक्या या मणिर्दत्ता रामविश्वासकारणे ॥ गृहीता कपिना सा का जानक्याश्वासनञ्च किम् ॥ १५॥ भाषा-रामजीको विश्वास होनेवास्ते हनुमान्कू मणि जानकीने दिया सो क्या है, कपिने मणिलेके जानकीको विश्वास दिया सो क्या है ॥ १५ ॥ किम्पुनलैपनं सिन्धोरङ्गदाश्वासनं च किम् ॥ किं तन्मधुवनं शुद्धं तैः फलं किम्प्रभक्षितम् ॥ १६॥ भाषा-फिर हनुमान् समुद्र कूदके पार उतर आये सो क्या है अंगदको आश्वास किया सो क्या है. सुंदर सुग्रीवके मधुबनमें प्रवेश करके कपियोंने फल खाये सो मधुवन क्या है ॥ १६ ॥ तर्जिता वनपाः के च कपीशाय निवेदनम् ॥ को हर्पः कपिराजस्य रामप्रश्नं च किम्मुने ॥ १७॥ भापा-बनके रखवालोंको मारा वे सुग्रीवसे जा पुकारे सुग्रीवको हर्ष भया सुग्रीवसे रामजीने पूंछा ये सब क्या हैं ॥ १७ ॥ आगत्य हनुमानूचे तस्याप्यादरभावना ॥ सेनासंयोजना का च समुद्रतटसंस्थितिः ॥१८॥ भापा-हनुमान् आयके सब हाल रामजीसे कहे हनुमानका आदर राम- जीने क्या किया फौजको इकही करके चलते हुए सो क्या है, समुद्रके तीर सेनासहित रामजीने डेरा किया सो क्या है ॥ १८ ॥ विभीपणस्य धिक्कारः किं कृतं रावणेन वै ॥ के विभीपणमंत्रज्ञास्तेः साढे रामसन्निधिम् ॥ १९॥ भापा-रावणने बिजीपणको कहा कि तेरेको धिक्कार है ऐसी बानी क्या है बिभीषणका मंत्री कौन है जिनोंको संग लेके रामजीके पास आये ॥ १९ ॥ आययौ कपयश्चक्रुः किन्तस्य विनिवारणम् ॥ विभीषणाय किं दत्तं राज्यं रामेण वै तदा ॥२०॥ 1 न. ३० वेदान्त रामायण वाकां। भाषा-आया जब कपियोंने आने नहीं दिया सो क्या है, तब रामजीने विज्ञपिणको राज दिया सो क्या है ॥२०॥ समुद्रतरणे चैव को विचारश्च तैः कृतः ॥ किं च दर्भासनन्तत्र त्रिदिनं राघवस्य ह ॥ २१ ॥ भाषा-समुद्रके पार जानेके वास्ते विचार किया सो क्या है, हे मुनिजी रामजीका कुश आसन क्या है ॥ २१ ॥ त्यक्ता मूलफले रामो निराहारो बभूव च ।। किम्मूलं किम्फलं चैव किमयाचत सागरम् ॥ २२ ॥ भाषा-मूलफलको रामजीने त्यागिके निराहार रहे सो मल फल क्या हैं, समुद्रसे रामजीने याचना किया सो क्या है ॥ २२ ॥ कः क्रोधो रामचंद्रस्य किं सागरविशोपणम् ॥ के वै जलचराः सर्वे व्यथिताः झरकरणे ॥ २३ ॥ भाषा-रामजीने क्रोध किया सो क्या है, समुद्रकू शोप लेनेकू मन किया सो क्या है, समुद्रशोपणे वास्ते धनुपपर वाण चढायके सेंचा तब जलजीव बहुत दुःख पाये सो क्या है ॥ २३ किं सागरधृतं रूपं ब्राह्मणस्यातिकौतुकम् ॥ का पात्री के च ते रत्नाः समानीताश्च सिन्धुना ॥ २४ ॥ भाषा-समुद्रने तमाशा सरीके ब्राह्मणका रूप धारण किया सो क्या है, सिंधु थालीमें रत्न धरिके रामजीकी विनती किया सो रत्न तथा थाली ये सब क्या हैं ॥ २४ ॥ स्तवनं किञ्चकाराशु रामचंद्रस्य सागरः ॥ कश्चोत्तरतटस्थश्च सिन्धुशडनिपातितः ॥ २५ ॥ भाषा-समुद्रने रामजीकी स्तुति किया सो क्या है, समुद्रके उत्तर तीरमें समुद्रका बैरी सो रामजीने मारा सो क्या है ॥ २५ ॥ - - . भापाटीकासहित । ३१ कः सेतुः कश्च पापाणः के चान्ये सेतुबन्धने ॥ साहित्याश्चैव रामेण दुःखितेन सुखाय च ॥२६॥ भापा-बडे दुःखी रामजीने सुख होनेवास्ते पुल बांधते भए सो पुल क्या है, पुलकी सामग्री क्या है ॥ २६ ॥ कश्च रामेश्वरो देवः स्थापितः पूजितोनिशम् ॥ कि सेन्योत्तारणं तस्य का सेना गणना तथा ॥२७॥ भाषा-रामजीने अपना कुलदेव जानके रामेश्वरजीकी स्थापन किया और वारंवार पूजन किया सो क्या है, फौजकू समुद्रके पार जाना तथा गिनती किया सो क्या है ॥ २७ ॥ कः सुवेलो गिरिब्रह्मन सैन्यानां का स्थितिस्तथा ॥ चतुषु द्वारदेशेषु लंकायाश्च चतुर्दिशः ॥२८॥ भाषा-हे ब्राह्मणजी! सुबेल पर्वत और सुवेलके ऊपर फौज टिकी ये दोनों क्या है, लंकाके चारों तरफ तथा चारों दरवाजोंको रोका सो क्या है ॥ २८॥ रोधनं किम्मुने ब्रूहि कोत्तरे राघवस्थितिः ॥ किं युद्ध रावणादीनां राक्षसानां परस्परम् ॥ २९ ॥ भाषा-हे मुनिजी! चारों दरवाजोंको घेर लेते भए सो क्या हैं, उत्तर दरवाजापर रघुनंदन आप खडे हुए सो क्या हैं, रामजीके तथा रावण आदि गिणती नहीं जिन राक्षसोंकी जिसमें परस्पर युद्ध बहुत भया सो क्या है ॥२९॥ कपीनां रामचंन्द्रेण प्रेरितानां मुहुर्मुहुः ॥ (१) रामस्य लक्ष्मणस्येव राक्षसेश्च महाहवम् ॥ ३० ॥ भाषा-रामजीकी आज्ञा पायके बानरों तथा राक्षसोंका बडा प्रलय युद्ध भया तथा रामलक्ष्मणसे और राक्षसोंसे बडा युद्ध भया सो क्या है ॥ ३० ॥' किं शिरोवर्द्धनं छिन्ने रामेण रावणस्य च ॥ का माया राक्षसेन्द्रेण संग्रामे दर्शिता मुहुः ॥ ३१ ॥ भाषा-वारंवार रामजीने रावणका शिर काटकाटके जमीनमें पट दिया और -

,
-
३२
वेदांतरामायण बाकां।
रावणके शिर फिर दूसरे तैयार होते भए उसीतरह शिरॉकी वृद्धि होती भई सो
क्या है, युद्धमें रावणने बहुत माया दिखाई सो माया क्या है ॥ ३३ ॥
का निद्रा कुंभकर्णस्य किं वै जागरणं तथा ॥
शक्त्या विघातिते तत्र लक्ष्मणे पतिते क्षितो ॥ ३२ ॥
भाषा-कुंभकर्णकी निद्रा क्या है, रावणने कुंभकर्णको जगाया सो क्या है,
इन्द्रजीतने लक्ष्मणको शक्तिसे मारा लक्ष्मण भूमिपर पडगये सो क्या है ॥ ३२॥
को रामस्य विलापश्व कपीनाञ्चैव सर्वशः ॥
कः सुपेणो गिरिद्रोणो को मार्गः कश्च तापसः ॥ ३३ ॥
भाषा-तब रामजीने और सब वानरोंने बडा विलाप किया सो क्या है,
सुषेण तथा द्रोणपर्वत क्या है, जिसके मार्गमें राक्षस कपदमुनि होके हनु-
मानको विश्व करने वास्ते बैठा सो रास्ता और मुनि कौन हैं ॥ ३३॥
किं कमंडलुतोयं च दर्शितस्तेन कः शरः॥
का छाया कपिना मृत्यु प्राप्ता का गुरुदक्षिणा ॥ ३४ ॥
भाषा-दुष्ट मुनिने हनुमानको अपने कमंडलुका जल देने लगा सो जल
तथा कमंडलु क्या है, हनुमान्ने कमंडलुका जल नहीं पिया तो दुष्टने तलाव
बताया सो तलाव क्या है, हनुमान तलावमें जल पीने लगे तो छाया हनुमा-
नके खाने वास्ते आई उसको हनुमान्ने मार डाला सो छाया क्या है, दुष्ट
मुनिने गुरुदक्षिणा मांगी सो गुरुदक्षिणा क्या है ॥ ३४ ॥
वनस्पतेरविज्ञानः को द्रोणोत्पाटनञ्च किम् ॥
किं पुनः स्थापनं तस्य लक्ष्मणोज्जीवनन्तथा ॥३५॥
भाषा-हनुमान्ने औपधी नहीं पिछानी तो द्रोणपर्वतको मूल सहित
उखाडके सेनामें ले आये सो उखाडना क्या है, लक्ष्मणको चैतन्य भए पीछे
पर्वतकू उसी जगहपर रख आये सो क्या है ॥ ३५ ॥
का रात्रिः किं दिनं युद्धं नागपाशविबन्धनम् ॥
रामलक्ष्मणयोः कश्च गरुडागमनञ्च किम् ॥ ३६॥

- ३३ - भाषाटीकासहित । भाषा-रामजीका रावणसे रातदिन युद्ध जया सो रातदिन क्या है, मेघना- दने रामलक्ष्मणको नागपाशमें बांध लिया सो क्या है, गरुडने आयके छुड़ाये सो क्या है ॥ ३६॥ स्वस्त्रियं जानकी कर्क रावणश्च भृशं मुने ॥ लोभादयः के कथिता रावणेन तदन्तिके ॥ ३७॥ भाषा-रावणने जानकीको अपनी स्त्री बनानेके वास्ते वारंवार लोग आदि दिखाता जया सो क्या है ॥ ३७ ॥ को जानकीविलापश्च मासे चैकादशे मुहुः ॥ त्रिजटाश्वसनं किं वै मन्दोदर्याः शुचश्व काः ॥ ३८॥ भाषा-११ मास वारंवार जानकीने विलाप किया सो क्या है, जानकीको त्रिजटाने विश्वास दिया सो क्या है, मंदोदरीको शोच भया सो क्या है॥ ३८ ॥ मेघनादादिसपु हतेषु पुत्रभ्रातृषु ॥ विलापो दशकंठस्य को बभूव मुनीश्वरं ॥ ३९ ॥ भाषा हे मुनियोंके ईश्वर ! मेघनाद आदि लेके गिनती करने योग्य, नहीं जो रावणके पुत्र, प्रपुत्र, भाई, राक्षस इन्होंके मरे पीछे रावणने विलाप किया सो क्या है ॥ ३९॥ यज्ञस्थिते दशग्रीवे को विघ्नो वानरेः कृतः॥ रामरावणयोर्युट्टै ये चान्ये भूरिकौतुकाः ॥ के ते सर्वं यथायोग्यं वदस्ख मुनिसत्तम ॥ ४० ॥ भाषा-रावणने शत्रु जीतनके वास्ते यज्ञ करने• बैठा तव वानरोंने विघ्न किया ये दोनों क्या हैं, रामरावणके युद्ध में और जो बहुत चरित्र भया सो क्या है हे मुनिजी ! ये सब बात यथायोग्य कहो ॥ ४० ॥ रावणे सकुटुंबे च सामात्यपुत्रपौत्रके ॥ इते रामेण कपिभिलक्ष्मणे नावशेषिते ॥ ११ ॥ - ३ । 1 7 - वेदान्त रामायण वाकां। भाषा-रावणके पुत्र पौत्र भाई कुटुंब मंत्री सहित रामने मारे और जो बाकी रहे सो कपि और लक्ष्मणने मारे सो क्या है ॥ ४१ ॥ राक्षसीनां विलापः को लंकाराज्यं विभीपणे ॥ दत्तं किं रामचंद्रेण सैन्यानां जीवनं च किम् ॥ १२ ॥ भाषा-राक्षसियोंका विलाप क्या है. लंकाका राज्य विनीपणकू दिया सो क्या है, और अपनी सेना मरी पडी थी उसको जियाते भये ये सब काम राम: जीने किया सो क्या है ॥४२॥ का स्तुती रामचंद्रस्य कृता सर्वैश्वराचरैः ॥ जानक्या रामचंद्रस्य को मिलापोऽतिसौख्यदः ॥४३॥ भाषा-देवोंसहित तीन लोक चौदह भुवनने रामजीकी स्तुति किया तथा बहुव सुख देनेवाला मिलाप रामचंद्र जानकीका भया सो क्या है ॥ ४३ ॥ पुष्पके च समारुह्य रामः सर्वान्कपीस्तथा ॥ लक्ष्मणं जानकी चैव किं रणस्थलदर्शनम् ॥ ४४ ॥ भाषा-रामजीने पुष्पक विमानमें लक्ष्मण जानकी तथा सब वानरोंको बैठा, धुके अयोध्याकू चले तब ऊपरसे रणभूमि दिखाई सो क्या है ॥ ४४ ॥ यथा यातो वनं रामस्तथा च पुनरागतः। भरद्वाजाश्रमे स्थित्वा हनुमत्प्रेषणं च किम् ॥४५॥ भाषा-जैसा रामजी वनकू गये तैसेही फिर अयोध्याकू चले भरद्वाजमुनिके आश्रममें आयके हनुमानको भरतके पास भेजा सो क्या है ॥ ४५ ॥ हनुमान भरतोक्तिश्च किं पुष्पकसमागमम् ॥ सर्वासां च प्रजानां वै को हर्षः पुरवासिनाम् ॥४६॥ भाषा-हनुमान् और भरतका संवाद जया सो क्या है पुष्पक विमान पर- तके सामने आया सो क्या है पुरवासियों को बडा हर्ष भया सो क्या है।। ४६ ॥ सर्वेषां चैव भ्रातॄणां किं जटाकृतनं मुने ॥ पट्टाभिषेको रामस्य सर्वेषां सुखसंस्थितिः ॥४७॥ - L . - भाषाटीकासहित । ३६ भाषाहे मुनिजी ! सब भाइयोंने जटा उतरायके क्षौर कर्म कराया सो क्या है, रामजीको राज्य प्राप्त हुवा और सबको आनंद भया सो क्या है ॥ ४७ ॥ विसर्जनञ्च सर्वेषां कपीनां मुनिसत्तम । किं राज्यं रामचंद्रस्य किं प्रजानां सुखं तथा ॥४८॥ भाषा-हे मुनिजी रामजीने राज पायके कुछ दिन पीछे सब कपियोंको तथा बिभीपणको बिदा किया सो क्या है, रामजीने राज किया सब प्रजा सुख पाई सो क्या है ॥४८॥ रामेण के कृता यज्ञा जानकीत्यागनं च किम् ॥ कौ रामपुत्रौ संजातौ को दुर्वासा मुनिः प्रभो॥ १९ ॥ भाषा-रामजीने यज्ञ किया तथा जानकीको त्याग दिया, रामजीके दो लड़के हुए, दुर्वासामुनि आये ये सब क्या हैं ॥ ४९ ॥ वियोगो रामचंद्रस्य लक्ष्मणस्य च को मुने । को भूम्या विवरो दत्तो जानकी येन संगता॥५०॥ भापा-लक्ष्मणको रामजीसे वियोग या सो क्या है, जानकीकी सोगन सुनके भूमिने रास्ता दिया, जिस रास्तेसे जानकी जायके ज्योतिमें मिलगई सो क्या है ॥ ५० ॥ सर्वाः प्रजास्समादाय रामः कुत्र गतः प्रभो ॥ एवं चान्यानि रामस्य रावणस्य च भो मुने॥५१॥ भाषा-सब चराचर प्रजाको संग लेके रामजी किस स्थानकू, गये? हे मुनिजी ! सो कहो रामरावणको चरित्र मैंने पूंछा सो कहो ॥ ५१ ॥ अनापृष्टानि च मया वदस्व कृपया मुने । पुराणे रामचरितं श्रुतं न तर्पितं मनः ॥ १२ ॥ भाषा-जो मैंने पूंछा सो भी आप कृपा करके कहो पुराणोंमें रामचरित्र मन सुना परंतु मेरा मन नहीं तृप्तं भया ॥५२॥ ।

. वेदान्त रामायण वा० कां। वेदान्तमार्गेण वदस्व भो सुने सर्व चरित्रं रघुनन्दनस्य वे ॥ श्रुत्वा मनो मे बहुतापतापितं प्रयाति शान्तिञ्च यमाशुनिश्चितम्५३॥ भाषा-हे मुनिजी ! रामजीका सम्पूर्ण चरित्र वेदांतमार्ग करके कहो जिसको सुनके मेरा मन शीघही शांतिको प्राप्त होवे कैसा मन है बहुत भमरूप अमिसे. जलता है ॥५३॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे बालकांटे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसं- वादे सर्वप्रश्नो नाम चतुर्थो मोक्षाख्यः सोपानः ॥४॥ वरतन्तुरुवाच। साधु साधु महाबाहो धन्यो ते पितरो मुने ॥ वर्द्धयन्ति तव प्रश्नाः मम मोदन्तपोधन ॥१॥ भाषा-वरतंतु मुनि बोले हे संवर्त मुनि तुमने ! बहुत अच्छे अच्छे प्रश्न किया तुम्हारे प्रश्नसे हमारे मनके आनंदकी वृद्धि होती है तुमारे माता पीनाको धन्य है ॥१॥ नरामो मानुपो विप्र दशास्यो नच राक्षसः ।। भूर्भुवःस्वरिति ब्रह्मन् न त्रिलोकी निगद्यते ॥२॥ भाषा- हे मुनि ! रामजी मनुष्य नहीं और रावण राक्षस नहीं और आकाश पाताल मृत्युलोक इनकी तीन लोकतक संज्ञा नहीं है ॥२॥ अष्टादशपुराणानां पट्शास्त्राणामिदं मतम् ।। वेदान्तानां विशेषेण सर्वलोकमिदन्तनु ॥३॥ भाषा-अठारा पुराण षट्शास्त्र और विशेप करके वेदान्तका मत यह है के तीन लोक चौदह भुवन ये देहही है ॥ ३॥ वर्णयामि द्विजश्रेष्ठ तव प्रश्नविभूपिताम् ॥ गाथामेतां सुदुर्गम्यामपवमानसैनरैः ॥ ४॥ भाषा-हे द्विजोंमें बड़े मुनि ! तुम्हारे प्रश्न करके शोभित है यह कथा * , 1 । भाषादीकासहित । . ३५. जिसकूँ मैं कहता हूं कैसी है कथा जिन्नरोंके हृदय ज्ञानमें परिपक्व नहीं है उन मनुष्यों करके बहुत दुःखसे प्राप्त होने योग्य है ॥ ४ ॥ यतो भगवतश्चैतज्जगदुत्पद्यते सुने ॥ पाल्यते यत्प्रपद्यते पुनश्चान्ते त्वनेकधा ॥५॥ भाषा-हे मुनिजी ! जिस भगवान्ने यह संसार जो अनेक प्रकारका उत्पन्न किया तथा पालन किया और अंतमें उसी भगवान्में लीन हो जाता है॥५॥ सचिदानन्दरूपस्य निर्गुणस्य जगत्पतेः ॥ जडसंजीवनानन्दकारकस्य महाप्रभोः॥६॥ भाषा-देह जीवके आनंद करनेवाले भगवान के रजोगुण तमोगुण सत्त्व गुण करके रहित संसार पतिको जड संसारको बहुत प्रकारसे जीवनरूप आनंद करनेवालेके महाप्रभूके ॥ ६॥ ध्यानगम्यस्य सततं निराधारस्य निस्तनोः ॥ निर्विकल्पस्य नित्यस्य यत्तेजोऽखिलदुर्गमम् ॥ ७ ॥ भाषा-ध्यानसे प्राप्ति होने योग्य आधारसे रहितके शरीरसे हनिके तर्क वितर्कसे वर्जितके जन्मनारासे रहितके ऐसे भगवान्का यो तेज कैसा तेज है संसारी जीवों करिके बड़े दुःखसे प्राप्त होने योग्य है ॥ ७ ॥ तस्याण्वर्बुदभागेन विस्तृतम्भुवनत्रयम् ॥ ब्रह्मविष्णुमहेशादियुतं सवै चराचरम् ॥ ८॥ भाषा-तिस तेजके अणुके अर्बुदभागसे इस तीन भुवनका विस्तार हो रहा है अणु किसकू कहते हैं कि जो मकानके ऊपर छप्परके छेदमेंसे सूर्यके किरण पढते हैं उन किरणोंके भीतर धूलकी कणिका फिरती दीखती है उस कणिकामेंसे एक कणकी अणु संज्ञा है उस अणुको अर्बुद भाग करना १००००००००० इसमेंसे निन्नानवे कोड निन्नानवे लाख निन्नानवे हजार नवसे निन्नानवे निकारकै बाकी जो रहा १ भाग तिस भागका तीन है "

३८
वेदान्त रामायण वा० कां।
लोक चौदह भुवन चराचरको विस्तार भया है कैसे लोक हैं ब्रह्मा विष्णु महेश
इन्होंको आदि लेके अनेक प्रकारके जीवों करके संयुक्त है ॥ ८॥
उत्पत्य वनसंहारे तस्येच्छा न मुनीश्वर ।।
अणोर्बुदभागस्तु द्विधाभून्मुनिसत्तम ॥९॥
भाषा-हे मुनिजी ! संसारकी उत्पत्ति रक्षा नाश करना ऐसी जगवानकी
इच्छा नहीं है परंतु वो जो अणुका अर्बुद भाग है सो अपनी इच्छासे दो भाग
हो गया हे मुनिजी! ॥९॥
प्रमदापुरुषौ विप्र ताभ्यां विस्तारितं त्विदम् ॥
सुनींद्र प्रमदा यासीत्सा शक्तिबहुरूपिणी ॥१०॥
भाषा हे विष ! एक भाग करके स्त्री हुई दूसरे भाग करके पुरुष भया
इन दोनोंके संयोगसे यह तीन लोक चौदह भुवनका विस्तार भया है, जो बी हुई
सो शक्तिका रूप है ॥ १०॥
पुरुषो भगवान्प्रोक्तो विष्णुनारायणो हरिः ।।
अनेकरूपो गदितो मुनिभियोगतत्परैः ॥ ११ ॥
भाषा-जो पुरुष भया सो भगवान् विष्णु नारायण - हार इस प्रकारके .
बहुत नाम विख्यात भए योगके जाननेवाले मुनियोंने अनेक रूप भगवानके
कहे हैं ॥१३॥
निराकारस्य देवस्य निर्गुणस्य जगत्प्रभोः ॥
तेजसः पश्य सामर्थ्यमणोर्बुदभागिनः ॥ १२ ॥
भाषा-आकारसे रहित, गुणसे हीन, ऐसे भगवान्के तेजके अर्बुदभागकी
सामर्थ्य देखो ॥१२॥
येनेदं विस्तृतं सर्व दृश्यते सुचराचरम् ॥
ज्ञानिनो ध्यानयुक्ताश्च जगच्चैतचराचरम् ॥ १३ ॥
भाषा-जिस अर्बुदभागके तेज करके यह चराचर संसार विस्तार भया है
ज्ञानी और ध्यान करनेवाले जो जीव हैं सो ध्यान कर्के युक्त इस चराचर
।
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जगतको॥ १३॥

. भाषाटीकासहित । ध्यानयोगेन स्वस्यैव पश्यंति हृदयेऽनिशम् ॥ ज्ञानध्यानविहीनाश्च हद्वाह्यमनिशं ध्रुवम् ॥ १४ ॥ भाषा-ध्यान योग करके अपने हृदयमें वारंवार देखते हैं और जो जीव. ज्ञान ध्यानसे रहित हैं सो जीव निश्चय करके वारंवार हृदयके बाहिर॥ १४ ॥ पश्यन्ति चर्मचक्षुभ्यो मोहसंतापतापिताः ॥ बाह्यसृष्टेः प्रभावञ्चेदर्णयामि सविस्तरम् ॥ भविष्यति तदा ग्रंथो महान्सज्जनसौख्यदः ॥ १५ ॥ भाषा-चर्मकी आंख करके देखते हैं कैसे जीव हैं मोहरूप अमिकी ज्वा- लासे जले जाते हैं. बाहिर सृष्टिके प्रभावका विस्तार जों में वर्णन करूं तो सज्जन जीवोंको सुख देनेवाला ग्रंथ बहुत बड़ा होजावेगा ॥ १५ ॥ ग्रंथे महति जाते वे न दोषोऽणुर्विदृश्यते ॥ तथापि मम सामर्थ्य वृद्धस्य नास्ति वर्णने ॥ १६॥ . भाषा-ग्रंथ बडा होने में कुछ दोप अणुमात्र भी नहीं है बडा आनंद है. परंतु मैं वृद्ध होगया विस्तार वर्णन करनेकी मेरी सामर्थ्य नहीं ॥ १६ ॥ शृण्विदानीमतो विप्र चरित्रं शूरवीरयोः॥ रामरावणयोः सम्यामुक्षूणां सदा प्रियम् ॥ १७ ॥ भाषा-हे विष ! इस कारणसे अब राम रावण दोनों शूरवीरोंके चरित्रको सुनो कैसा चरित्र है मोक्षजाननेवाले जीवोंको सदा प्यारा लगेगा ॥ १७ ॥ पुरुषेच्छाप्रसूतस्तु शरीरः सर्वदेहिनाम् ॥ शक्त्यानुमानितं सत्यमसत्यमचलञ्चलम् ॥ १८॥ 'भाषा-सब जीवोंके वास करनेवास्ते वह जो पहिले अणुमात्र तेज अपनी इच्छासे श्रीपुरुप भया उसकी इच्छासे यह देहरूप हवेली बनी है, कैसा शरीर है रूंठी स्थिर नहीं है परंतु स्त्री जो पेस्तर भई सोई माया है तिस करके साथ हुवा जो पुरुष तिसका अंश जो जीव सो सत्य मानता है अचलकी यह मेरी देहरूपी हवेली कभी नष्ट नहीं होगी ॥ १८ ॥ - - . • ४० ४ 1 वेदान्त रामायण बा० कां। पुरुषप्रकृतिसंयोगात्तभूच भवांकुरः स पुलस्त्य इति ख्यातो वितर्कश्च तदुद्भवः ॥ १९ ॥ भाषा-पहले अपनी इच्छासे हुवे जो पुरुष, प्रकृति उन दोनोंके संयोगसे जो वीर्य है तिस वीर्यमें संसारको उत्पन्न करनेवास्ते तक नाम अंकुर जया तर्क उसळू कहते हैं कि एक मिनिटमें इतना विचार करे कि जिसकी गिनती शेष शारदा भी नहीं कर शकें संसारके पहिले भया उस वास्ते तर्ककू पुलस्त्य नाम भया और पुलस्त्यके वितर्क नाम पुत्र भया वितर्क किसकू कहते हैं यह काम होवेगा कि नहीं होवेगा ॥ १९ ॥ समरीचिमुनिः प्रोक्तचोदेगस्तस्य संभवः ॥ सविश्रवासमाख्यातो दुर्मतिस्तस्य गेहिनी ॥ २० ॥ भाषा-वितर्क मरीचि मुनि हैं मरीचि मुनिके उद्देग नाम पुत्र जया उद्देगका क्या अर्थ है एक क्षणमें जीव अनेक चीजमें जाय लगे स्थिर न रहे उसको उद्वेग कहते हैं उद्वेग नाम विश्रवा मुनि हैं दुर्मति कहे खोटे कर्मकी जो इच्छा करना सो विश्रवा मुनिकी स्त्री है ॥२०॥ सा कैकसी द्वितीया तु दीना वै पतिरंजिनी ॥ दीनायास्तनयो जातः कुबेरो धैर्यसंज्ञितः ॥ २१ ॥ भाषा-दुर्मतीका कैकसी नाम है दूसरी स्त्री विश्रवाकी दीनमति है दीन कहे गरीब मति है यह पतिको सुख देनेवाली है दीनमति जो विश्रवाकी स्त्री है तिसके धीरज नाम पुत्र जन्म्यो सो कुबेर है ॥ २१ ॥ विमानन्तस्य पुष्पाख्यमविकम्पनमेव च ॥ बभूवुर्दुतेः पुत्रास्त्रयश्चान्ये सहस्रशः ॥ २२ ॥ भाषा-अनेक दुःख पडे परंतु अपने धर्मको नहीं छोड़ा ऐसी निश्चय सो पुण्यका विमान है और दुर्मति जो विश्रवाकी स्त्री तिसके तीन पुत्र जये और तो दुष्टराक्षस अनेक हैं ॥ २२ ॥ -- १

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भाषाटीकासहित।
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मनोतिप्रबलो जज्ञे स रावण इति स्मृतः ॥
परोपतापनं जारचौर्यमानरवो समम् ॥२३॥
भाषा-प्रथम तो मन जन्म्या सो बडा बलवान् प्रतापी रावण भया दूसरे
जीवोंकू त्रास देना १ भगवान्की प्रीति छोडके अन्य काजमें प्रीति करना २
ईश्वरके जजनमें भंग करना ३ मानकू बटाना ४ जीवमें भेद देखना ५॥ २३ ॥
पानं वेरमविश्वासं चपलं सम्भ्रमं सदा ॥
एतानि दशमूनि मनसो रावणस्य वै ॥२४॥
भाषा-खोटे काजमें सुख देखना सोई मदिरापान ६ सब जीवोंसे वैर
करना ७ किसी जीवका विश्वास नहीं रखना ८ सुंदर कार्य देखके भागना ९
-सब जीवको अनादर करना १० ये दश मस्तक मनरूपी रावणके हैं ॥ २४ ॥
दुःखत्यागस्सुखस्येच्छा वियोगमातुरं तथा ॥
सदा केशं सदा तुष्टिः प्रमादोऽभयमेव च ॥२५॥
भापा-दुःखको त्याग १ सुख होनेकी इच्छा २ जीवोंसे वियोग मानना
३ विना विचार काज करना ४ दुःखमें क्लेश, सुखमें भी क्लेश पाना ५
असंतोप ६ प्रमाद ७ ईश्वरसे डरना नहीं ८ ॥२५॥
निंदा पैशून्यमातंडं वितंडं मानमेव च ।।
ग्लानि हानिमहामोहप्रमादं कौतुकं रतिः ॥
उन्नता बाहवश्चमे विशाः प्रोक्ता मुनीश्वरैः ॥ २६ ॥
भाषा-निंदा करना ९ चुगली करना १० वेदसे रहित कर्म करना ११
अपनी इच्छासे रहना दूसरेका उपदेश नहीं मानना १२ सदा ग्लानि १३
सदा हानि १४ सदा बुरे काममें प्रीति १५ प्रमत्त रहना १६ तमासामें प्रेम १७
खियोंसे प्रेम १८ किसीसे नम्र नहीं रहना १९ सब जीवोंमें अपनाकू बडा मानना
-२० हे मुनिजी! यह मनरूपी रावणकी वीस भुजा हैं ॥ २६ ॥
दुः संगस्तु द्वितीयोभूत्स कुंभश्रोत्र उच्यते ॥
त्रासस्तृतीयः संजातः प्रोक्तश्च स विभीषणः ॥२७॥

1 . ४२ वेदान्त रामायण वा० कां। भाषा-खोटे कर्मकी संगत करना सोई कैकसीका दूसरा पुत्र उसका नाम कुम्भकरण बुरेकर्मको देख बहुत डरगया सो तीसरा पुत्र उसका नाम बिभीषण है ॥२७॥ बभूव दुर्मतेः कन्या दुःसंगेच्छातिरिणी ॥ सा वै शूर्पणखा प्रोक्ता दुष्टकार्याः खरादयः ।। २८ ॥ भाषा-दुर्मति नाम कैकसी जिसको लडकी भई सो खोटी संगत काँकी इच्छा उसका नाम शूर्पणखा है तीन लोकमें जितने बुरे काम हैं चोरी, जारी, जुवारी, चुगुली और जहर देना ये सब खरादिक राक्षस हैं ॥ २८ ॥ मनसस्तनयो जातो दुश्चेष्टित इतीरितः ॥ स मेघनादो विख्यातो मेघवद्र्जते सदा ॥२९॥ भाषा-बुरे काजमें प्रेम करना सोई मनरूपी रावणको पुत्र मेघनाद नाम है जैसे आकाशमें मेघ गर्जते हैं तैसा यह गर्जता है ॥ २९ ॥ दुष्टकर्मरुचिः ख्याता रावणस्य प्रिया शुभा ॥ सैव मंदोदरी चैव चैतादृश्यस्त्वनेकशः॥ दुष्टकायें सदा प्रीत्या संस्थिति(पणात्कृता ॥३०॥ भाषा-बुरे काममें प्रीति सोई मनरूप रावणकी स्त्री है,उसका नाम मंदोदरी ह आर जो बुरे काम अनेक प्रकारके उत्तम मध्यम निकृष्ट इन कर्मोंकी अनेक प्रकारकी प्रीति सोई रावणकी मंदोदरीसरीके बहुत स्त्री हैं दुष्ट कार्यमें प्रीति करके हठसे ठहरना ॥ ३०॥ सा लंका तत्सुखं हेम तद्धर्षों वारिधिस्मृतः ॥ हर्षे तृष्णा च परिखा दुरानन्दो विधिस्मृतः ॥ ३१ ॥ भाषा-सोई लंका पुरी है जिस लंकामें बसकर सुख मानना कि तीन लोकमें कोई ऐसा सुख नहीं सोई सोना है उसी सोनेसे लंका जडी है तिस सोनेके सुखमें हर्ष मानना सोई समुद्र है खोटे काजमें बास करना सो लंकाको सुख सोनेके 1

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भाषाटीकासहित ।
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हर्षकी तृष्णा करना सोई लकाकी चारों तरफ खाई है और बुरे कानोंमें आनंद
मानना सोई ब्रह्मा है॥ ३१॥
तत्सेवनं तपः प्रोक्तं वरं क्रूरनिषेवनम् ॥
मदमज्ञानरूपं च यत्पीत राक्षसैः सदा ॥३२॥
भाषा-उसी बुरे कर्मके आनंदको सेवन करना सोई रावणकी तपस्या है,
खोटे कर्ममें नित्य प्रेम रखना और कभी हम मरेंगे नहीं ऐसा मानना सोई बर- :
दान रावणने ब्रह्मासे लिया अज्ञान है सोई मदिराका रस है जिसकू राक्षसलोग
सदा पीते हैं ॥३२॥
विशेपतश्च मनसा प्रपीतं रावणेन च ॥
शरीरं सर्वजीवानामिदं चैव चराचरम् ॥ ३३ ॥
भाषा-विशेष करके उस मदको मनरूप रावण पीता है सब जीवोंका यह
शरीर जो है चल देह तथा अचल देह ॥ ३३॥
त्रिलोकमिति विख्यातं पीडितं तेन राक्षसाः ॥ .
अनाचारे रथे स्थित्वा तदर्पवाजिसंयुते ॥ ३४ ॥
भाषा-सोई तीन लोक हैं, तिसको मनरूप रावण बहुत पीडा देता आया
आचारोंसे हीन कर्म सोई रथ है तिस स्थमें बैठके उसी स्थळू दरेखके बहुत खुशी
होना सोई अनेक घोडे हैं ॥ ३४ ॥
दुराशासनदुश्चित्तदुरंजनदुरापनम् ॥
एतेश्चक्रवृतो वीरो गर्दभैश्च कुकर्मभिः ॥ ३५ ॥
भाषा-सब जीवोंको दुष्ट कर्म शिखाना १ रातदिन दुष्ट कर्ममें चिच
लगाये रखना २ कोई कोई बुरे कर्मको देखने वास्ते जानके अंधे होजाते हैं
उन जीवाको दुष्ट काजके सुख सुनायके उसी सुखको अंजन उनकी आंखोंमें
लगाना ३.हमेशा बुरे काज प्राप्त होनेका उपाय करना ४ ये चार पहिया है इन
चारों पहियों करके रथ युक्त है, बुरा कर्म करना सोई खच्चर हैं तिस
कर्क युक्त है।॥ ३५॥

वेदान्त रामायण वा० कां । कुकर्मणीच्छाशक्तिश्च मुखानि दश चेन्द्रियाः ॥ आमिष दुष्टकार्याव्यं रक्तं च रागवर्द्धनम् ॥ ३६ ॥ भाषा-अनेक बुरे कर्मकी इच्छा सोई रावणकी सांग है, दश इंद्रिय सोई रावणके दशमुख हैं बुरे कर्मका खजाना भरा है सोई मांस है उस खजाने में स्नेह बढाना सोई रक्त है ॥ ३६॥ मोक्षस्पृहो रावणस्य मनसो मुनिसत्तम ॥ सवै शिव इति ख्यातः सेवनं तद्विचिन्तनम् ॥ ३७॥ भापा-हे मुनिजी ! मनरूप रावणको मोक्ष होनेकी इच्छा रहती है परंतु उपाय नहीं करता सोई शिव है मोक्षकी चिंता करना कि मोक्ष अच्छी वस्तु है -सोई शिवका पूजन है ॥ ३७॥ दुर्बुद्धिः सारथिईयः कुविचारो वितोत्रिकम् ॥ हर्षवृद्धिजिवेगो मदमनं रजस्मृतम् ॥ ३८॥ भाषा-रावणकी दुष्टबाई सोई रावणके रथका सारथी है खोटा विचार करना सोई घोडोंका हांकनेवाला चाबुक है दुष्टकर्ममें हर्षकी वृद्धि करना सोई घोडोंका दौडना है और मद पीके मत्त रहना सोई धलि है ॥ ३८ ॥ दुराचारमहामोहो रथस्य कूबरं मुने है ।। तन्मोहप्रीतिजननं रश्मिबद्धं सुदुच्छिदम् ॥ भ्रमणं दुष्टकार्येषु स्थस्यागमनं मुने ॥ ३९ ॥ भाषा-बुरे कर्मके आचारमें बड़ा मोह करना सोई रथमें बैठनेकी जगा है. उसी बडे मोहमें प्रीति उत्पन्न करना, अनेक दुःख परें तो भी उसकू छोडना नहीं सोई रस्सी है तिन रस्सियोंमें रथ बंधा है उस स्थकी यथिको काटना चाहै तो बडे कष्टसे कटेगा हे मुनिजी! आठ प्रहर चौसट घडी बुरे कर्ममें फिरना सोई रथकी दौड है ॥३९॥ मनः प्रमाथी प्रबलो दशाननो विमर्दयामास सुकर्मतत्परम् ॥ चराचरं विश्वमिदं सहोदरैः सुतैः प्रपौत्रैः सह राक्षसयुतः॥४०॥ L है । । भाषाटीकासहित । . - भाषा-पुत्र पौत्र भाई राक्षसों करके संयुक्त ऐसा जो रावण सो स्नान संध्या देवपून कथाश्रवण और इसी प्रकारके अनेक काजोंमें प्रवीण जीवोंको नाश करता आया।॥४०॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे बालकांडे पं० शिवसहायविरचिते मनोरावणविभूत्यु स्कर्षे पंचभो मोक्षाख्यः सोपानः ॥५॥ . वरतन्तु उवाच। कामः क्रोधश्च लोभश्च मात्सय वंचनौ मुने । तिरस्कारः सतां चैव नैष्टुर्य सुखकर्मणि ॥१॥ भाषा-वरतंतुमुनि फिर बोले हे संवर्त मुनिजी ! काम, क्रोध, लोग, दूसरेका सुख देखके दुःखी होना कपटसे सज्जन जीवोंका अनादर और सुंदर कामोंमें विन्न करना ॥१॥ एतैः पुत्रेयुतो राजा पीडयामास सन्ततम् ॥ भुवनत्रयसंयुक्तं वेदमाग मुहुर्मुहुः ॥२ भाषा-ये सव आदि लेके और अनेक प्रकारके दुष्टकर्म सो रावणके पुत्र हैं इन पुत्रों कारके युक्त रावण नित्यप्रति तीन लोकळू पीडा देता आया और वेदमार्गको तो विशेप करके पीडा देता आया ॥२॥ कामादीनां सुखप्राप्तिः सा तेषां प्रमदा मुने ।। पुत्रपौत्राः प्रपोत्राश्च कामादीनान्त्वनेकशः ॥३॥ भाषा-हे मुनिजी ! काम आदि कोंके सुखमें प्रीति सोई रावणके पुत्रोंकी स्त्री हैं और काम आदि रावणके पुत्रोंके पुत्र पौत्र प्रपौत्र गिनती करने योग्य नहीं है ॥३॥ तेपां वे वर्णने शक्तिः शेपस्यापि सुदुस्तरा ॥ कथं मया ते वयते मनोरावणजाः प्रजाः॥४॥ भापा-मनरूप रावणके पुत्र पौत्र प्रपौत्रोंके पुत्र पुत्रोंकी वथा राक्षसोंकी 1 - - वेदांत रामायण बा० कां। गिणती करनेमें शेषजीकी भी सामर्थ्य नहीं है, और मन रावणसे उत्पन्न हुए परिवारोंकी गिनती में कैसे वर्णन कर सकूँ ॥४॥ मोहजां वारुणीम्पीत्वा राक्षसाः क्रोधजा गणाः ॥ दुश्चेष्टितात्रेमिदाश्छिद्युः सद्धर्मजान्सुरान् ॥५॥ भाषा-क्रोध आदि बड़े बड़े योद्धों कारके उत्पन्न हुये जो राक्षस सो मोहसे उत्पन्न हुई जो दुष्ट चेष्टारूप मदिरा सो पीके मत्त होके बुरे कर्मकी समूह सोई अस्त्र शस्त्र हैं तिस अस्त्र शस्त्र करिके वेदमें लिखा जो धर्म उस धर्म करके उत्पन्न जो यज्ञ दान तप स्नान इन आदि जो गिनतीरहित जो देवता हैं तिनको काटते भये मारते भये ॥५॥ ज्ञानविज्ञानवैराग्यसंन्यासामोक्षदायिनः ॥ त एव वेदाः कथितास्तेषां वाताश्च संहिताः॥६॥ भाषा-ज्ञान विज्ञान वैराग्य संन्यास ये चार वेद हैं मोक्षके देनेवाले हैं, इन चारोंकी कथा सोई संहिता है ॥६॥ विनाशिताश्च ते सर्वे मनोरावणप्रेरितैः ।। राक्षसैनिर्दयः क्रूरैः कामक्रोधादिसंभवः ॥७॥ भाषा-इन वेदोंकी संहितोंको राक्षस नाश करते भये, कैसे राक्षस हैं मन रावणकी आज्ञाको पाये हैं. सुकर्मको नाश करनेवास्ते दयासे हीन राक्षस बड़े दुष्ट हैं काम क्रोध आदि लेके जो खोटा कर्म तिस करिके राक्षस जन्मे हैं ॥७॥ ब्रह्मणः परमेशस्य सच्चिदानन्दरूपिणः ॥ चिंतका भक्षिताः सर्वे सद्धर्मा मोक्षदा नृणाम् ॥८॥ भाषा-परब्रह्मके ब्रह्मा विष्णु महेशके ईशके जीव देह आत्माके रूपके ऐसे भगवान्के चिंता करनेवाले जो सुंदर धर्म जैसे आचार विचार श्रवण कीर्तन विश्वास इनकू आदि लेके और वेदमें लिखे हुए धर्म जीवोंकू मोक्ष देनेवाले हैं, सो इन धाँको राक्षसोने खोए ॥ ८ ॥ . T .

. - भाषादीकासहित । y त एव ब्राह्मणाः सर्वे गावश्च सक्रियाः स्मृताः ॥ ताश्चैवं भक्षितास्सर्वा राक्षसैरतिहिंसनैः ।। नित्याभ्यासो वेदयज्ञस्तेनातीवविनाशितः ॥९॥ भाषा-ये सब सुंदर धर्म ब्राह्मण हैं इन धर्मोकी क्रिया सोई गौ है इन ब्राह्मण गौवीकोनी जीव मारनेमें बडे चतुर जो राक्षस सो खाय लेते भये भगवान्को ध्यान नित्य करना सोई वेदकी यज्ञ है उस यज्ञकोशी राक्षसाने राश किया॥९॥ पुराणपुरुषध्यानकीर्तनं श्रवणादयः ॥ स्मरणं स्मारणं चैव वन्दनं प्रीतिरंजनम् ॥ १० ॥ भाषा-भगवान्को ध्यान कीर्तन कथा श्रवण करना आप स्मरण करना दुसरेकू स्मरण कराना, वंदना करना, भगवान्के पूजनमें प्रीति बढाना ॥ १० ॥ कथनं काथन चैव पूजनं शिरसा नतिः ॥ विनय स्वामिभावश्च नमस्कारप्रदक्षिणे ॥ ११ ॥ भाषा-ईश्वरका चरित्र आप कहना, दूसरेसे कहाना, पूजन करना शिरत- बायके नमस्कार करना बिनय करना मैं ईश्वरका दास हूं ईश्वर मेरे स्वामी हैं ऐसा हृदयमें रखना वारंवार नमस्कार और प्रदक्षिणा करना ॥ ११ ॥ साष्टांग गद्दावाणी रोमहर्पश्च संततम् ॥ पुराणा नाशिताश्वेते ब्रह्मसन्निधिकारकाः ॥ १२ ॥ भाषा-साष्टांग दंडवत करना गद्गदवाणी बोलना. प्रीतिसे रोम खडे होजाना. ये अठारा पुराण हैं जीवोंको ब्रह्मके सामने ले जानेवाले हैं इनकोशी राक्षसोने लाश किया ॥ १२॥ शरीरचेष्टा सा भूमिमहती भारपीडिता ।। करुणा गौः समाख्याता सा भूत्वा शरणा विभोः ।। जगामैतैर्युता पृथ्वी कम्पिता च मुहुर्मुहुः ॥ १३ ॥ - - ४८ F . वेदान्त रामायण बा० कां। भाषा-सब जीवोंके देहकी प्रकृती सोई भूमि है बहुत बड़ी है सो भूमि राक्षसोंके खोटे काजरूप भार करके दुःखी होगई. सोई भूमि दयारूप जो गौ है तिसका रूप धारण करके इन देवतोंको साथ लेके भगवान् के शरणकुं गई ॥१३॥ शरीरशुद्धयः सर्वाः स्नानादिमजनादयः ॥ गंगादिनद्यस्ताः प्रोक्तास्ताभिः सादै च दुःखिता ॥ १४ ॥ भाषा-देहकी जो सब शुद्धता है जैसे स्नान, मज्जन आचारयुक्त कर्म, इन आदि और जो शुद्धता है सोई गंगा आदि नदी हैं तिसको संग लेके ॥ १४ ॥ दुरानन्दो विधिश्चैव कुधर्मः सुरनायकः ॥ तेन साद्ध सुरैश्चैव धर्मजैः सह संगता ॥ १५॥ भाषा-जैसे ब्रह्मा अपनी लडकीके संग भोग करनेकी इच्छा किया इस आदि जो खोटे कर्ममें आनंद मानना सोई ब्रह्मा है औ जैसा इंद्र अपने सुख होने वास्ते अधर्म नहीं देखता ऐसा अधर्म सो इंद्र है. शास्त्रमें इन्द्रको उत्तम संज्ञा है कर्म उसका खराब है इस वास्ते अधर्मरूप इंद्र और सुंदर धर्मसे जन्म जो देवता प्रथम वर्णन है इन सबकों संग लेके भगवान्की शरणकू पृथ्वी गई ॥ १५॥ जगाम प्रार्थितुं विष्णुं पुरुषांशसमुद्भवम् ॥ चेतनं सहसा सुप्तं चेतिन्या निजमायया ॥१६॥ भाषा-भगवान्के अणुसे उत्पन्न जो विष्णु तिनकी प्रार्थना करनेवास्ते पृथ्वी गई कैसे भगवान हैं संसारके चेतन रूप हैं. संसारको चेतन करानेवाली जो आपकी माया तिस करिके सेवित सोते हैं ॥ १६ ॥ धमन्युद्धर्तिनी देहे प्राणिनामास्ति या शुभा ॥ तदास्ये क्षीरसदृशः सिंधुवद्विस्तृतेह्रदः ॥ १७ ॥ भाषा-सब जीवोंकी देहमें एक नाडी है. उस नाडीका उद्वर्तनी नाम नाडी जीवकी रक्षा करनेवाली है. उस नाडीके मुखमें समुद्र सरीके लंबा चौड़ा एक कुंड है उस कुंडका आकार दूध सरीका है ॥ १७ ॥ . the - . १९ - पर . . भाषाटीकासहित। शक्त्या विस्तारितास्तस्मिन्छीलादिसद्गुणास्सदा ॥ हृददीप्त्या विभासन्ते गुणाः क्षीर इव प्रभो ॥ गत्वा तत्र च ते सर्व स्तुतिञ्चकुछ व्याकुलाः ॥ १८॥ भाषा-अभुकी शक्ति करके विस्तार भये जो शील आदि लेके सुंदर गुण' सो सब गुण उस कुंडके ज्योति करके दूध सरीके शोभा कुंडमें दे रहे हैं उस दूषके समुद्रमें सोये जो भगवान् तिनके पास जायके सब भूमि आदि व्याकुल होरहेऔर भगवानकी स्तुति करते भये ॥ १८॥ ब्रह्माउवाच। तुभ्यं नमो भगवते करुणाकराय सद्धर्मभूमिद्विजधेनुमखाव- नाय ॥ स्वच्छाय स्वच्छनिलयाय निराश्रयाय भक्तप्रियाय भवदुःखविभञ्जनाय ॥ १९॥ भाषा-ब्रह्मा स्तुति करते आये हे भगवन् ! ऐश्वर्यरूप आपको मैं नमस्कार करता हूं जीवोंके ऊपर दया करनेवाले आप तिनकू मैं नमस्कार करता हूँ सुंदर धर्म भूमि ब्राह्मण गौ यज्ञ इन सबकी रक्षा करनेवाले तिनकू मैं नमस्कार करता हूं शुद्धप आपको मैं नमस्कार करता हूं शुद्ध है स्थान आपको ऐसे रूपकू मैं नमस्कार करता हूं आश्रयसे हीन जो आप तिनको मैं नमस्कार करता हूं भक्त आपके प्रिय हैं ऐसे स्वरूपकू मैं नमस्कार करता हूं संसारके दुःखकू नाश करनेवाले आपकू में नमस्कार करता हूं ॥ १९ ॥ संसारतापशमनाय मनोहराय योगीन्द्रशेषमुनिमानसहंसकाय ॥ धर्मप्रियाय धरणीवतधारणाय देवाधिदेवपतये च नमस्करोमि॥२०॥ भाषा-संसारके तापको नाश करनेवाले, मनको प्रसन्न करनेवाले बढे योगीजन शेष मुनि इन सबको मन सोई मानस सरोवर है, तिसमें हंसरूप आप ५ वास करते हो और धर्मके प्यारे, क्षमारूप, देवरूप, और देवतोंके पतिरूप ऐसे जो आप परमात्मा उनकू मैं नमस्कार करता हूं ॥२०॥ दीनप्रियाय शरणागतपालनाय प्रोत्फुल्लपंकजमुखाय निरंजनाय । श्रीमन्महापुरुषतेजसचेष्टिताय मायानुवादरहितायनमो नमस्ते॥२१॥ । ४ . ५० वेदांत रामायण बाकां। भाषा-दीन आपकू प्रिय है, शरणागतके पालना करनेवाले कमलके पुष्प सरीखे फुल्लायमान आपका मुख बडा शोभित ऐसा जो ब्रह्म तिसके तेज करिके आप प्रकाशित हो, मायाके विवादसे रहित ऐसे जो आप तिनकू में नमस्कार करता हूं ॥२३॥ इति स्तुतो जगन्नाथो देवैदुःखविमूर्छितः ॥ उवाच विहसन्देवो विपादं सान्त्वयन्निव ॥ २२ ॥ भाषा-दुःख करिके मूर्जाको प्राप्त भये जो देवता तिनों कारके स्तुति किये जो जगतके नाथ सो तिन देवतोंके दुःखको शान्त करने वास्ते हँसके बोलने भये ॥२२॥ ज्ञातं मया सुरगणाः सुनिपीडितं वै सवै चराचरामिदंभुवनत्रयम्भो । सम्प्रेरितेश्च मनसा खलु रावणेन तेनापि राक्षसगणैः सततम्मुहुवै॥२३॥ भाषा-चेतन पुरुष बोले हे देवतालोगो ! यह तीन लोक चराचरका मन रूप रावण तथा रावणकी आज्ञाकू पाये जो राक्षस ये सब बहुत पीडा करते आये ये सब हमकू मालूम है ॥ २३॥ सर्वामरं त्वया दत्तं नरवानरवर्जितम् ॥ अतोहं नररूपस्तु भविष्यामि न संशयः ॥२४॥ भाषा-हे ब्रह्मा ! तुमने रावणको सबसे अमर किया किन्तु किसीके मारे नहीं भरेगा, परंतु कपि, जो किष्किंधाकांडमें वर्णन होगे और मानुप जो उत्तरकांडमें वर्णन होवेंगे, इन दोनोंसे तेरी मृत्यु होगी, इस वास्ते हम मानुष अवतार धरेंगे इसमें संशय नहीं ॥ २४ ॥ चतुर्भिातृभिः साई देव्या सह सुरोत्तमाः ।। पुत्रो दशरथस्यैव साकेताधिपतेर्बुवम् ॥ २५ ॥ भाषा हे देवतालोगो ! हम चार नाता होकरके शक्तिसहित अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र निश्चय करके होवेंगे ॥ २५ ॥ यूयं सर्वे भविष्यध्वं वानराः पृथिवीतले ॥ नाशयिष्याम शीघ्रं वै मनोरावणराक्षसम् ॥२६॥ - - -- भाषाटीकासहित।। ५३ . . भाषा-और तुम सब देवता पृथ्वीमें जायके वानररूप होकर जन्मो, तुमकू संग लेके हम मनरूप रावणको जलदी नाश करेंगे ॥ २६ ॥ इत्युक्तान्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्माश्वास्य क्षितिं तथा ॥ देवानाज्ञाप्य प्रययौ स्वालयं कपिजन्मनि ॥२७॥ भाषा-ऐसा कहिके चेतनरूप भगवान् अंतर्धान होगये और ब्रह्मा भूमिसे कहे कि अब डरो मत थोरेही दिनमें रावणका नाश होगा और देवतोंकू ब्रह्मा बोले कि तुम सब पृथ्वीमै वानररूप धरो ऐसा समझायके ब्रह्मा अपने स्थानको गये ॥२७॥ इति श्रीवेदांतगमायणे बालकांडे शिवसहायबुधविरचिते षष्ठो मोक्षाख्यः सोपार॥६॥ १ वरतन्तुरुवाच। अयोध्या सुमतिः प्रोक्ता सरयूः सा सुवासना ॥ निश्चलत्वतटा प्रोक्ता निर्मानजलपूरिता ॥ १ ॥ भापा-वरतन्तु मुनि बोले हे संवर्त मुनि ! सुनो जीवोंकी सुंदर मति जो है मो अयोध्यापुरी है और जीवोंकी सुंदर वासना सो सरयू नदी है सुंदर वासना कभी अपने स्वभावसे चलायमान नहीं होती सोई सरयूके दो तट हैं और सुंदर वास- नाके अभिमान नहीं है सोई जल है तिस जल कारकै सदा भरी रहती है॥१॥ शक्तिस्वभावजः पुत्रो वसिष्ठ इति कथ्यते ॥ आत्मप्रकाशः सविता विचाराद्याश्च तत्सुताः॥२॥ भाषा-मायाको स्वभाव सो वसिष्ठ मुनि हैं आत्माको तेज सो सूर्य है विचार आदि सुंदर स्वभाव सो सूर्यके पुत्र हैं ॥२॥ विचारतनयो ब्रह्मनात्मज्ञानं सुनिर्मलम् ॥ सवै दशरथः प्रोक्तस्तस्यच्छाया तु कौशला ॥३॥ भापा-विचारको पुत्र आत्माको ज्ञान है कैसा आत्मज्ञान है मलसे रहित है सो दशरथ है तिस आत्मज्ञानकी छाया कौशल्या है ॥ ३ ॥ -- १२ वेदान्त रामायण बा०का। श्रवणं मननं मोनमभ्यासस्तद्विचिन्तनम् ॥ चेष्टनं सत्यता नित्यमविचाल्याप्रकंपनौ ।। एते दशरथाः प्रोक्ता आत्मज्ञानस्य भूपतेः ॥ ४ ॥ भाषा-कथाश्रवण १ कथा सुनके मानना कि जो शास्त्रमें लिखा है सो सत्य है २ खोटे कर्ममें बोलना नहीं ३ भगवान्के रूप जाननेवास्ते नित्य उपाय करना ४ रूपकी चिंतना करना ५ ईश्वरके ध्यानमें आलस्य नहीं करना ६ ईश्वरके रूपको सत्य मानना ७ और सब देहके सुख झूठे मानना ८ किसी दुष्टको संग दैवयोगसे मिल जावे तो ईश्वरके ध्यानको छोडके दूसरेका ध्यान नहीं करना ९ ईश्वरके भजनमें दुख सुःख होवे सो सहि लेना १० आत्मज्ञान जो दशरथ तिसके ये दश रथ हैं ॥४॥ आत्मानस्वच्छप्रकृतिः सा सुमित्रेति कथ्यते । किंचिच्छतौ च या प्रीतिः कैकेयी सा निगद्यते ॥ भूरिशो रुचयस्सत्सु ताश्चान्या नृपवल्लभाः ॥५॥ भाषा-आत्माकी सुंदरी प्रकृति सोई सुमित्रा है मायामें थोरी प्रीति से कैकेयी है सज्जनोंमें बहुत रुचि सो दशरथकी और स्त्रिये हैं ॥५॥ आत्मज्ञानं चिरं कालं न लेभे पुत्रनं सुखम् ।। दुःखमाप तदा वीरे विश्वामिति भार्यया ॥६॥ भाषा-आत्मज्ञान जो राजा दशरथ सो बहुत दिन बीत गये पुत्रको सुख नहीं आया तो संसारके सुख होनेवास्ते स्त्रीसहित दुःखको प्राप्त भए ॥६॥ स्वभावगुरुणा पश्चादसिष्टेनैव बोधितः ॥ ऋष्यशृंगं समाहूय चेतनांशं विचिंतनम् ॥ ७॥ भाषा-कुछ दिन पीछे शक्तिके स्वभावरूप जो वशिष्ठ सो दशरथके गुरु हैं सो बोले कि, हे राजा! शंगीऋषिको बुलायके यज्ञ करावो तुम्हारे पुत्र होंगे ऐसी गुरुकी आज्ञा पायके चेतनको अंश जो विचेतन सो शृंगी ऋषि हैं तिनको बुलायके ॥ ७॥ - - 4 २ . - भाषाटीकासहित। ५३ ध्यानयज्ञं चकाराशु तत्तेजो हुतभुसुने । नृपस्य हृदयं कुंडमस्तिद्रुचिरेव च ॥८॥ भाषा-जलदी ईश्वरको ध्यानरूप यज्ञ करते जये, हे मुनिजी ! ध्यानको तेज सो अनि भया है आत्मज्ञान दशरथका हृदय सो कुंड भया है ध्यानरूप यज्ञमें राजाकी रुचि सो अमिकी ज्वाला भई है॥ ८॥ प्रेमकाष्ठं त्वरो मंत्रो होमद्रव्यं च निश्चयम् ॥ तेजसा पावकेनापि दत्ता सद्भावना नृपे ॥९॥ भापा-आत्मज्ञान राजाको ध्यान यज्ञको प्रेम सो काष्ठ है ध्यानयज्ञ करनेमें जलदी करना सो मंत्र है दशरथको ध्यानयज्ञमें निश्चय सो होमकी सामग्री है ध्यानको तेजरूप अनि सो दशरथको साधुओंमें सुंदर भक्तिरूप हविष्य देते भये ॥ ९ ॥ न तस्याः संप्राशनञ्चहणं राजवल्लभाः ॥ तासां बभूव गौं वै भावनाप्रीतिकारणम् ॥ १० ॥ भाषा-तिस भक्तिरूप हविष्यको राजाकी तीनों स्त्रिय राजासे ग्रहण करती भई सो हविष्यको खाती भई तिन स्त्रियोंके साधुजनोंकी भक्तिमें प्रेम है. सोई गर्भ रहना भया ॥ १० ॥ चैत्रनृपसुखं शुक्कं समुल्लासो निरंतरम् ॥ रतिः प्रीतिगुरोः सेवा सन्नतिर्विमतिः क्षमा ।। ११॥ भाषा-रानियोंके गर्भ देखके दशरथको सुख भया सो सुख चैत्रमास है रोज गर्न देखके राजा खुश भया सो शुक्लपक्ष है धर्ममें राजाकी मति बढि गई गुरुदेवकी सेवा बहुत करने लगे सब जीवोंसे राज्यके मद छोड दिया सब जीवोंको एक सम जानना क्षमा करना ॥ ११ ॥ शुद्धता स्वच्छता कीर्तिनवमीमाः प्रकीर्तिताः॥ मध्याहू समभावं च तस्मिन् जातो रमापतिः ॥ १२ ॥ .

7 - ५४ वेदांत रामायण वा. कां भाषा-ईश्वरके निष्कपट ईश्वरमें प्रेम ईश्वरके नामकी कीर्ति करना ये सब नवमी तिथि हैं संसारमें किसीकी निंदा स्तुति नहीं करना परंतु बुरे कर्मको छोडवा सुंदरकर्मको ग्रहण करना ऐसे स्वभावको दुपहर कहते हैं तिस दुपहरमें भगवान् दशरथके गृहमें जन्मते भये ॥ १२ ॥ कोशल्यायां जगत्स्वामी जगदानंददायकः ॥ विवेकश्चेतनांशश्च पापवारिधिकुम्भजः॥ १३ ॥ भाषा-आत्मज्ञान दशरथकी छाया कौसल्याने जगत्के स्वामी नगदके आनंद देनेवाले पापरूप समुद्रको शोपण करनेमें अगस्त्यरूप चेतनको अंश ऐसे विवेकनाम पुत्र होते भये ॥ १३ ॥ अर्थधर्मादिहस्तायैः सत्यादिमुकुटादिभिः ॥ युतं रूपं दर्शयित्वा पश्चाद्वालो बभूव ह ॥ कैकेय्यां च विवेकस्य चाईभागः प्रजग्मिवान् ॥ अदोशेन च द्वौ जातौ सुमित्रातनयो मुने॥१४॥ भाषा-अर्थ धर्म आदि चार भुजा है, सत्य आदि धर्ममुकुट है इनसे युक्तरूप माता पिताको दिखायक बालक होते भये. विवेकके अख़्श कैकेयी शक्तिमें थोरी प्रीति है जिसमें जन्मता भया और-विवेकके अद्धांशको अद्धाश करके आत्मज्ञानकी सुन्दर प्रकृति जो सुमित्रा तिसके दो पुत्र भये ॥ ३४॥ यो रोम्णि रोम्णि रमते रमणेनैव मोक्षदः ॥ स राम इति विख्यातो विवेको मोक्षदायकः ॥१५॥ भाषा-सब जीवोंके रोमरोममें जो रमित है और रोमरोममें रमण करके सब जीवोंको मोक्ष देनेवाला सोई राम है उस रामको विवेक कहतेहैं वो विवेक जीवोंको मोक्ष देनेवाला है ॥१५॥ निर्मोहो भरते जविान्तस्माद्भरतसंज्ञितः ॥ लक्षणे वै स्वरूपस्य येन विज्ञायते मुने ॥ १६॥ -

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भाषाटीकासहित।
५९
भाषा-हे मुनिजी! और जो जीवोंका पाषण तो करे परंतु किसी जीवमें
मोह न करे उसकुँ निर्मोह कहते हैं सोई भरत है जिस करके ईश्वरके स्वरूपको
लक्षण मालूम पडे ॥१६॥
स लक्ष्मण इति ख्यातः सन्तोषो मोक्षनायकः ॥
यः शत्रून्सततं हन्ति शत्रुघ्नस्तेन कथ्यते ॥
स्वदेहस्थानिन्द्रियजान्सहनः समतागुणः॥१७॥
भाषा-लक्ष्मण है सो संतोष है सोई मोक्षका मित्र है इंद्रियों करके देहमें
रहनेवाले जो इंद्रियोंके सुखरूप शत्रु उनका जो नाश करे तिसका नाम शत्रुघ्न
है न किसीकू स्नेही जानना न किसीकू वैरी जानना ऐसा जो सहन स्वभाव तिसकी
शत्रुन्न संज्ञा है ॥ १७॥ -
हृद्युदासीनवृत्तिश्च विवेककीडनम्मुने ।
स्वरूपस्य सदा चिन्ता सा श्वेतागारसंज्ञिका ॥
तत्प्रीतिरंजनं शुद्धमजिरं कथ्यते मुने ॥१८॥
भाषा-विवेक रामचंद्र अपने हृदयमें नित्य ऐसा मानते हैं कि संसारमें
न कोई मित्र है न कोई वैरी है ऐसा स्वभाव सोई रामजीके चारों भाइयोंका
खेलना भया है ब्रह्ममें मिलनेकी चिंता रामजीको सदा रहती है सोई दशरथकी
सफेद महल है ऐसे महलमें प्रतिसे स्नेह सोई महलकी चौक है ॥ १८॥
इन्द्रियाणां सदा नासो धूलिराशिनिंगद्यते॥
निजानंदस्वरूपस्य चिंतकाः पुरवासिनः ॥ १९॥
भाषा-इंद्रियोंको नित्य विवेकरूप रामजी त्रास करते हैं सोई बहुतसी
धूलि है ऐसे महल चौक धूलमें चारों भाई रामचंद्र उदासीनरूप खेल खेलते हैं
भगवान्के सदा आनंदरूपके चिंता करनेवाले जो जीव हैं सो अयोध्या-
वासी प्रजा हैं ॥ १९ ॥
ज्ञानं खड्गं शरा हर्षास्तूणचापो शमौ स्मृतौ ॥
संस्काराश्चेन्द्रियाणां वै निग्रहा मुनिना कृताः ॥२०॥

1 ५६ वेदांत रामायण वा० कां। भाषा-ज्ञान जो है सो रामकी खड्ग है सत्संगी जीवोंको देखके अनेक प्रकारके हर्ष होना सोई रामके अनेक प्रकारके वाण हैं. समदृष्टि संसारकू देखना सोई तर्कस है रामने इंद्रियोंको जीतना सोई धनुप है रामजीने कभी इंद्रि- योंका विश्वास नहीं करते सोई वसिष्टमुनि रामजीका मुंडन कर्ण छेदन यज्ञोप- वात इन आदि लेके संस्कार करते भये ॥२०॥ एवं क्रीडासमुत्साहे वद्धिते नृपमंदिरे॥ चित्तो गाधिसुतो धीरोऽप्याजगाम क्षणादनु ॥ २१ ॥ भाषा-दशरथके महलमें ऐसा आनंद खेल तमाशा चारों भाई बहुत कर रहे हैं उसी समयमें चिचरूप जो विश्वामित्रमुनि सो आते भये बडे चतुर हैं एक क्षणमें ॥२१॥ पूजितो नृपवीरेण नोदितो वरयाचने ॥ ययाचे चैव मेघावी तत्सुतौ रामलक्ष्मणौ ॥ २२ ॥ भाषा-राजोंमें वीर दशरथने मुनिजीका पूजन करके कहा कि महाराज ! आपकू चाहे सो मुझसे मांगो तब चतुर विश्वामित्र मुनि बोले कि हे राजन् ! तुम आपने दो पुत्र रामलक्ष्मणको हमें देवो ॥ २२ ॥ तमपकहदं ज्ञात्वा राजा नेतीत्युदीरितः ।। बोधितो गुरुणा पश्चाद्ददौ राजा सुहर्षितः ॥ २३ ॥ भाषा-दशरथने विचार किया कि चित्तरूप विश्वामित्र इनके हृदयज्ञानसे पकी नहीं है कच्ची है ऐसा विचार करिके कहे कि मैं पुत्रोंको नहीं देऊंगा. परंतु पीछेसे गुरु वसिष्ठ जो शक्तिके स्वभाव है सो दशरथको समुझायके सब बात कही तो राजा बडे हर्षसे रामलक्ष्मणको विश्वामित्रको दिया ॥ २३ ॥ ' तावादाय गतो धीरः शांतियज्ञमथाकरोत् ॥ तृष्णागाद्यज्ञनाशाय शीघ्रं सा ताडका मुने ॥२४॥ भाषा-चतुर जो विश्वामित्र उन्होंने रामलक्ष्मणकू लेके अपने आश्रमपर .

+ . 1 , r - भाषाटीकासहित । 'जायक मनरूप रावणको शांति होनेवास्ते शांति रूप यज्ञ करते आये सोयज्ञ नाश करनेके वास्ते तृष्णारूप ताडका आती भई ॥ २४ ॥ हता सा रामचन्द्रेण पतिता धरणीतले ॥ मोहाइंकाररूपों द्वौ राक्षसो मखनाशको ॥ २५ ॥ भाषा-तिसको रामजीने मारकर पृथ्वीमें पटक दिया तब मोहरूप सुबाहु अहंकाररूप मारीच ये दोनों आते भये यज्ञ नाश करना ॥ २५॥ मोहः सुबाहुनिहतो रामेण पतितो भुवि ।। क्षिप्तो रामेणाभिमानः पतितः सागरान्तिके ॥ २६ ॥ भापा-मोहरूप सुबाहुको रामजीने मार डाला तब वह भूमिमें पडगय और अहंकाररूप मारीचको बाणसे उठाकर समुद्रके सामने फेंक दिया ॥ २६ ॥ सुखेन कृतवान्यज्ञं मुनिस्तद्तमानसः । राक्षसानां विनाशाय सद्विद्यां दत्तवान्मुनिः ॥२७॥ भापा-विश्वामित्रने रामजीमें चित्त लगायके सुखसे यज्ञ करते अये और राक्षसोंके नाश करनेवास्ते विश्वामित्रने रामजीको सद्विद्या सिखाते भये॥ २७ ॥ गृहीता रामचंद्रेण ताः सर्वा रावणाईने ।। पंचज्ञानेंद्रियाणां च धर्मोऽसौ गौतमो मुनिः ॥२८॥ भाषा-मनरूप रावणको नाश करनेवास्ते रामजी सर्व विद्या सीखते भये पांच ज्ञानइंद्रियोंका सुंदरधर्म सो. गौतममुनि हैं ॥२८॥ अहल्या तद्रुचिः प्रोक्ता कुधर्मः सुरनायकः ॥ . रमिता तेन सा नारी सुखं जारसमुद्भवम् ॥ २९॥ भापा-तिन पाँच ज्ञानेंद्रियोंके धर्ममें रुचि सोई अहल्या है खोटा धर्मसो इन्द्र है पांच ज्ञानेंद्रियोंके धर्ममें जो जीवोंकी रुचि और खोटे धर्म छुड़ा दिया नाय सोई जारका सुख है ॥ २९ ॥ तत्कर्मनाशनं विप्र शापो दुर्वासनं क्षितौ ॥ गंभीररजसा पूता स्वकर्मविस्मृतिः शिला ॥३०॥ । +

वेदांत रामायण वा०कां।
भाषा-
-और खोटे कर्ममें अहल्याको सुकर्म मिल गया तथा देहकी चेष्टा-
रूप भूमिपर सज्जनोंने निंदा किया ये दोनों गौतमकी नारी अहल्याको शाप
तथा अनुग्रह है विवेक रामजीको गंभीर स्वभाव सोई रामजीके पगकी धालि
है. उस धूलि करके अहल्या पवित्र आई और अहल्या अपने कर्मको भूलि
गई सोई शिला है ॥ ३० ॥
शिलायां भिद्यमानायां पुनः प्राप्ता स्वमालयम् ॥
जीवश्च मैथिलो ज्ञेयः सदेहश्च विदेहवान् ॥ ३३ ॥
भाषा-शिला रामजीके पगकी धलि करके फटगई सो अहल्याकी पांच
ज्ञानेंद्रियों में प्रेमरूप अपना घर तिसको गई. जीव जो है सो जनक है. की
देहेमें स्नेह करता है कभी देहसे स्नेह छोड़ देता है ॥ ३१ ॥
नृपस्य मोहिनी भार्या रूपचिन्ता कदा पुरी ॥
जनकस्यानुजो विप्र सदा दुःखं निगद्यते ॥ ३२॥
भाषा-मायाकी दासी जो संसारको मोहती है सो मोहनी रूप जनककी
स्त्री है. जीव कभी कभी भगवान्की चिंता करता रहता है सो जनककी नगरी
है, जीव रोज दुःखी रहता है सो दुःख जनकरूप जीवको सुकेतु नाम
छोटा भाई है॥३२॥
कन्ये द्वे तस्य संजाते हानिग्लानिश्च सत्तम ।
जनकस्य सुता जाता रूपप्रीतिः सुशीतला ॥३३॥
भाषा-सुकेतुके हानिरूप तथा ग्लानि रूप ये दो लडकी गईं, भगवान्के
रूपमें प्रीति बड़ी शीतल ऐसी एक कन्या जनकके होती गई ॥ ३३ ॥
द्वितीया जानकी प्रोक्ता रूपभक्तिश्च शाश्वती ॥
स्वयंवरं विचारश्च धनुरिष्टवियोजनम् ॥ ३४॥
भाषा-भगवान्के रूपकी नित्य जो शक्ति सो जनककी दूसरी कन्या हुई,
उसका नाम जानकी हुआ जीव कभी कभी थोडाविचार करता है सोई स्वयंवर
है, जीवका इष्टदेव भगवान् तिससे जीवको वियोग हुआ सोई स्वयंव-
रमें धनुष है ॥ ३४॥

भाषादीकासहित । बोटनं ज्ञापनं किंचिद्रूपस्य जनकेन वै ॥ सत्वरं रामचन्द्रेण धनुषस्त्रोटनं कृतम् ॥ ३५ ॥ भाषा-जीवरूप जनक थोडा थोडा भगवान्के रूपको जानता है. सोई धनुषका तोडना है सो शीघ्रही रामजी धनुषफू तोडते भये ॥ ३५ ॥ तद्रूपस्मरणं शीघ्र भार्गवोऽप्याजगामह ॥ स्वस्थानसंस्थितिज्ञानं धनुपो रोपणं कृतम् ॥ ३६॥ भाषा-जीवको तथा भगवानका वियोगरूप धनुष टूट गया तब जीव भग- वान्के रूपका स्मरण करता भया सोई परशुराम मुनि आते भये भगवान्के प्रेमरूप वैकुंठ तिसमें टिकनेवाले जीवको ज्ञान भया सोई परशुरामके धनुषको रामने चढाये तब परशुराम रामको दण्डवत् करिके चले गये ॥ ३६॥ सत्कर्माद्यभिसंयुक्तः सेनाश्वरथहस्तिभिः ॥ सुखासनश्च तैः सामाजगाम नृपोत्तमः॥ ३७ ।। भाषा-और ज्ञान ध्यान जप तप आदि लेके सुंदर कर्म सोई रामके घोडा, फौज, गज, पालकी है, इन्होंको संग लेके आत्मज्ञान राजा दशरथ जनकपुरको बरात लेके आते भये ॥ ३७॥ वर्द्धितः सत्समाजश्च विवाहे सततं मुने ॥ जानक्या रघुवीरस्य चान्येषां भ्रातृणां तदा ॥ ३८॥ भापा-सत्संगजिन इकट्ठे होके ईश्वरको भजन करने वास्ते एक सभा बनाये हैं, ये बडी जो सभा है सोई सत्संगी लोगोंकी सभा राम जानकी तथा और तीनों भाइयोंका विवाह गया है ॥ ३८ ॥ विदेहेन तदा दत्तं कन्योराहे नृपाय वै ॥ रूपस्मरणविज्ञानमचलं वित्तसंचयम् ॥ ३९ ॥ भाषा-जीवरूप जनक ईश्वरका स्मरणरूप ज्ञान दशरथको बताते भये, सोई लडकियोंके विवाहमें दायज अचल धन, खजाना भया है ॥ ३९ ॥ - - वेदांत रामायण बा०कां। -- 1 + विस्मृतं पुनराप्तं च तत्प्रयाणं नृपस्य च ॥ पूर्वोक्ता पुत्रपत्नीश्च पुत्रान्वित्तं च भूरिशः॥ पुरोक्त मुनिभिः सार्धमाजगाम नृपोत्तमः ॥ ४० ॥ भाषा-आत्मज्ञानरूप दशरथको भगवान्को स्मरणरूप ज्ञान किंचित भूल गया, सो फिर प्राप्त भया, सोई दशरथको फिर अयोध्या चलनेकी तैयारी भई, पहिले कहे हुए जो पुत्र, पुत्रोंकी स्त्री तथा जनकको दिया जो भगवान्को स्मरणरूप धन बहुत तथा पहिले वर्णन भये जो मुनि इन सबकों संग लेके चलते भये ॥४०॥ समादायागतो राजा स्वपुरी सुमति ततः ॥ पुनरीहक्समाजश्व भविष्यति कदाप्यहो ।। इत्युत्कंठाविदेहस्य बभूव मानसे सदा ॥ ११ ॥ भाषा-पहिले श्लोकमें वर्णन भये जो प्राणी तिन सबकों संग लेक सुमति नाम अयोध्याको प्राप्त भये, बडी भाग्य है कि कभी फिर ऐसी सजा साधु- वोंकी होगी ऐसा विचार करके जनक हर्षमें आनंद माने सोई जानकी आदि कन्याके बिदामें जनककी विह्वलता भई ॥४१॥ यथा पुरेदं परिपीडितं जगन्मनोदशास्येन निरंतरम्मुने । विद्रित दाशरथे तथा सुखं किञ्चित्समावाप नृपात्मजोऽपि सः ॥४२॥ भाषा-हे मुनिजी ! मनरूप रावण पहिले जैसा यह संसारको पीडा करता रहा सोई रामजीकी थोडी वृद्धि भई रहते संसारको थोडे सुखकी वृद्धि होती गई, संसारको किंचित सुखी देखके रामजीमी थोडे सुख… प्राप्त भये, रामजीने विचार किया कि थोडा सुख भया तो अब कुछ दिनमें सब दुःख नाश होवेगा॥४२॥ '. इति श्रीशिवसहायबुधविरचिते वेदातरामायणे बालकांडे संवर्तवरतन्तुसंवादे रामावतारकथने सप्तमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥७॥ समाप्तश्वाय बालकाण्डः । .

- भाषाटीकासहित। ६१ अथ अयोध्याकाण्डम्। . 1 १ वरतन्तुरुवाच। इन्द्रियार्थान्समालोक्य विपरीतानृपोत्तमः ॥ तच्छिक्षार्थ नृपो राममभिषेक्तुं समारभेत् ॥ १॥ भाषा-वरतंतुमुनि बोले हे सम्वर्त मुनि ! सुनो आत्मज्ञानरूप दशरथ राजा इंद्रियोंके अर्थको बहुत प्रष्ट देखके तिन इंद्रियोंको सिखाने वास्ते रामजीको राज्य देनेको प्रारंभ करते भये ॥ १ ॥ भ्रातृत्रयाणां भगिनी दुर्बुद्धिमथरा च सा ॥ शिक्षयामास कैकेयों किंचिच्छक्तिप्रियान्तदा ॥२॥ भापा-काम, क्रोध, लोज इन तीनों भाइयोंकी बहिन जो दुर्बुद्धि सोई मथरानाम कैकेयीकी दासी है, सो मंथरा थोरी जो शक्तिकी प्रीतिरूप कैकेयी तिसकू सिखाती भई ॥२॥ कलंकं तु तया प्राप्तं सजनैर्दूरत्याजनम् ॥ रामस्य वनवासञ्च भरतस्याभिषेचनम् ॥३॥ भाषा-सज्जन लोगोंने दुर्बुद्धिरूप मंथराको त्यागते भये, सो त्यागरूप कलंक मंथराको प्राप्त भया, रामजीकू बन जाने वास्ते और भरतकू राज्य देने वास्ते ॥ ३ ॥ याचयामास कैकेयी पूर्वदत्तवरा हि सा ॥ नृपेण द्वौ वरौ दत्तौ भार्यायाः प्रीतिचेतसा ।। वश्यमेकं द्वितीयन्तु त्वया नित्यम्प्रबद्धितः ॥४॥ भाषा-दशरथने कैकेयीकू पहिले दो वरदान दिये थे, प्रसन्न होकर एक वर तो तुम्हारी वश्य हेम रहेंगे दूसरा वर तुम करिके हम बंधे रहेंगे ॥४॥ तस्मिन्यस्तो तया काले याचितो सत्यभावतः॥४॥ A - । न ६२ वेदांत रामायण अ०कां। भाषा-यह दो वरोंको कैकेयीने दशरथके पास थाती रखदिया था सत्य स्वभाव सोई थाती है ॥५॥ दुःस्वभावः शरीरस्य तदारण्यं निगद्यते ॥ परतापादयो वृक्षा भूरितृष्णादयो लताः ॥६॥ भाषा-देहको खोटा स्वभाव सोई वन है, दूसरे जीवको दुःख आदि अनेक कष्ट देना ये सब बनके वृक्ष हैं, बहुत तृष्णा करना सोई वेलि है ॥६॥ उत्पातकारकाः सर्वे वनजास्तच्चराः स्मृताः ॥ दुःस्वभाववनस्येह विस्तारो यदि वर्ण्यते ॥ ७ ॥ भाषा-उत्पात करनेवाले काम, सोई सब वनके भील भये हैं देहको खोटे स्वभावरूप वन तिसका विस्तार जो वर्णन करो॥७॥ तदायम्बहुभूमा च ग्रन्थो भवति सज्जनाः ॥ ईदृशं काननं दत्तं रामाय नृपभार्यया ॥ ८ ॥ भाषा-तब हे सज्जन मनुष्यो ! ग्रंथ बहुत बड़ा हो जावेगा इसवास्ते बनको विस्तार मैंने नहीं वर्णन किया, दशरथकी प्यारी स्त्री कैकेयी ऐसा वन रामजीकू देती भई ॥ ८॥ आज्ञा नृपतिना दत्ता स्वच्छवृत्तिः सुकोशला ॥ विलापो नृपतेः प्रोक्तो दुःस्वभाववने चलम् ॥ ९ ॥ भाषा-बड़ी चतुर निर्मलवृत्ति दशरथकी सोई राजाने रामजीको वन जानेकी आज्ञा देता भया, वन जानेमें रामजीको चित्त चलायमान नहीं जया, सोई दशरथ आदि सबको विलाप है॥९॥ गमनं रामचन्द्रस्य वर्षाणां च चतुर्दश ॥ पंचकर्मेंद्रिया वर्षास्ताः पंच लोलुपाः ॥ १० ॥ भाषा-पांच कर्मेन्द्रिय और पांच कर्मेंद्रियोंके अर्थ बड़े काम कोष आदि उत्पन्न करनेवाले ॥ १० ॥ - । , ६३ . - भाषाटीकासहित। बालादीनि च चत्वारि शरीरस्य वयांसि च ॥ एते दिग्वेदवांश्च विपरीतेन्द्रियार्थता ॥ ११ ॥ भाषा-और जीवोंकी देहकी अवस्था बाल आदि चार अवस्था जैसे बाल पौगंड युवा वृद्ध ४ ये सब खोटी इन्द्रियोंके अर्थ लेके चौदह १४ वर्ष वनमें रहनेवास्ते हैं ॥ १३ ॥ सा राज्यवृत्तिभरते दत्तवान्नृपसत्तमः॥ पितुर्वाक्यं रथं प्रोक्तं स्वच्छवृत्तिभवा गुणाः ॥ १२ ॥ भापा-और खोटें इंद्रियोंके अर्थको सिखानेवास्ते दशरथने भरतकू राजकी वृत्ति देते भये, और दशरथकी वाक्य रामजीकू बन जाने वास्ते, सो वाक्य रामका रथ है, रामजीकी सुंदरमति तिसके गुण जैसे लोग, मोह, स्नेह, वैर ये रामजीके नहीं हैं ॥ १२॥ हयाश्च तत्सुखा द्रव्या रथस्य तत्स्थितो खः । सुमन्तो निश्चलत्वं च नृपस्य मुनिसत्तम ॥ १३ ॥ भाषा-सोई रामजीके स्थके घोडे हैं उन घोडोंमें सुख मानना सोई स्थकी सब सामग्री है, पिताके वचनरूप स्थमें बैठना सोई रथको दौडना है, हे मुनिजी ! आत्मज्ञान राजाको धर्म सो कभी चित्त चलायमान नहीं होता, सोई सुमंत नाम राजाको मंत्री है ॥ १३॥ विवेकतनयस्यैव वियोगो रुदनम्मुने । तमसाऽचंचला वृत्ती रामस्य मुनिसत्तम ॥१४॥ भापा-ऐसी रथमें बैठके रामजी वनकू चले तो दशरथके विवेकसरीखे पुत्रको वियोग बहुत दिनसे भया सोई राजा आदि रानियोंको तथा पुरवासियोंका , रोना आया है, हे मुनि ! पिताके वचनसे रामजीकी अचलवृत्ति सोई तमसा. नदी है ॥ १४॥ वासञ्चकार भगवान्तत्तीरे ग्लानिवर्जितः ॥ , .

६४ - . वेदान्त रामायण अ०कां। हयसंचारणं धीरः कारयामास सारथिः॥ पितुराज्ञाविचलन हयानामशनं स्मृतम् ॥ १५॥ भाषा-विवेकी रामजीके कभी ग्लानि नहीं होती सोई तमसाके तीर राम-- जीका वास है, धर्म बडे चतुर रामजी सोई सुमंतने घोडोंको फेरते भये, तथा पिताकी आज्ञाको रामजीने मान लिया सोई घोडोंको चारा खिलाने भये॥१५॥ पित्रोविनिन्दनं त्यागं पूर्वोक्ताः पुरवासिनः ॥ चैतन्यस्य सदा चिन्ता कृता रामेण मानसे ॥ १६ ॥ भाषा-तथा रामजीने कभी पिताकी निंदा नहीं किया, सोजी घोडोंका चारा है विवेक रामजी चैतन्यरूप भगवान्की चिंता आपके हृदयमें रोज करते हैं ॥ १६ ॥ सा निद्रा तमसातीरे वाक्यं रामस्य निश्चयम् ॥ पितुर्माहो वने हो रामस्य वर्तते द्रयम् ॥ १७॥ भाषा-सोई तमसाके तीरपर रामजीको निद्रा आती भई निश्चय करिके वन जाना ऐसा रामजीको विचार सोई रामजी सुमंतसे कहे कि, स्थको फिरा- यके ले चलो पुरवासी हमारे संग चलेंगे सो अच्छा नहीं है रामजीको वन जानेमें बडा हर्ष है तथा पिताका मोह है ॥ १७ ॥ एतद्रथस्य भ्रमणं निश्चिता कानने स्थितिः ॥ राक्षसानां विनाशाय भूभारहरणाय च ॥ १८॥ भाषा- ये दोनों स्थको भ्रमण करना है रामजीकी वनमें निश्चय स्थिति करना भूमिको भार नाश करना तथा राक्षसोंको नाश करना ॥ १८ ॥ एतत्पुनस्तद्रमनं तुष्टभावो रघूत्तमे ।। निवर्तनं प्रजानां वै कषाय इव कालनम् ॥ १९ भाषा-ये दोनों प्रसन्न होके तमसाके तीरसे रामजीको फिर वनमें गमन भया जैसा काढा उकलता है तैसे पुरवासी प्रजाओंका पीछा आना भया ॥१९॥ पुरवासिनाम्विलापश्च पुनः प्रोक्तं मुनीश्वर ॥ रामश्च स्वस्वभावेल गुहेनाशु सुतोपितः ॥ २० ॥.. 1 -- - - भाषाटीकासहित । ६५ भाषा-सोई प्रजाको फिर विलाप जया है हे मुनिजी ! रामजीका स्वभाव सोई गुहनाम भील है सो भील रामजीको प्रसन्न करता मया ॥२०॥ स्वभावाचलनं विप्र शृंगवेरपुरः स्मृतः ॥ औदासीन्यं च रामस्य शिशिपातरुसत्तमः ॥ २१ ॥ भापा-रामजी अपने स्वभावसे कजी चलायमान नहीं होते सोई शृंगवेर युर है, रामजीके न कोई मित्र है न कोई वैरी है सोई शिशिपा वृक्ष है तिसके नीचे राम लक्ष्मण जानकी सहित बसते भये ॥ २३ ॥ रूपध्यानं कृतन्तेन रामेण तरुसन्निधौ ॥ तदासनम्माबाहो प्रेमोत्कंठाः कुशाः स्मृताः ॥ २२ ॥ भाषा-रामजी ईश्वरके रूपको ध्यान करते भये सोई आसन गुह बनाता भया रामजी ध्यान करके प्रेमसे गद्गद होगये सोई कुश हैं तिन कुशोंका आसन बनाया ॥ २२॥ कुकर्मणो निवृत्तिश्च सा गृहस्यैव भावना ॥ तः कुशे रामचंद्रस्य गुहेन कृतमासनम् ॥ २३ ॥ भापा-रामजी खोटे कर्मसे चित्तको खेंचे रहते हैं सोई गुहने राम- जीकी भक्ति की तिन कुशों करके गुह रामजीका आसन बनाता भया ॥२३॥ तस्मिन शिप्ये स्वपत्न्या च रामो निद्रां चकार वै ॥ सत्सभा विरहाक्रान्ता बुद्धिनिद्रा स्मृता मुने ॥ २४ ॥ भापा-तिस आसनपर जानकी सहित रामजी सोते भये हे मुनिजी ! राम- जीको साधुओंकी सभाका वियोग होजाता है उस वियोग करके रामजीकी बुद्धि दुःखी होजाती है सोई निद्रा करते भये ॥ २४ ॥ असदातीदयो धर्मा ये वं मायया कृताः॥ ते विभूषणवस्त्राधास्त्यक्ता द्वाभ्यां गुहान्तिके ॥२६॥ - ५ - ६६ वेदांत रामायण अ० कां। भाषा-माया करके रचे जो खोटे खोटे धर्म सोई संसारके गहने तथा. वस्त्र हैं तिन सबको राम लक्ष्मण गुह मित्रके सामने त्यागते भये ॥२५॥ गुहलक्ष्मणयोः सुप्ते सपत्नीके रघूत्तमे ॥ बभूवतुः सत्कथनं सद्धिचिन्तनमेव च ॥२६॥ भाषा-रामजीको तथा जानकीको सोये जानके गुहका लक्ष्मणका संवाद अया दोनों सुंदर धर्म तथा ईश्वरकी चिंता करते भये सोई संवाद है ॥ २६ ॥ संवादजागरौ प्रोक्तो तौ तयोर्जाह्नवीतटे ॥ शरीरशुद्धियोंगेन पूर्वोक्ता जाह्नवी स्मृता ॥ २७ ॥ भाषा-पहिले वर्णन भई जो गंगाजी तिसके तीर गृहका तथा लक्ष्मणका । संवाद तथा जागते भये सुंदर धर्मका कथन सो संवाद भया है. ईश्वरकी चिंता करना सो जागना भया ॥ २७॥ शुद्धमाचरणन्तोयम्बाह्याभ्यंतरयोः शुचिः ।। तटो द्वौ मुनिभिः प्रोक्तो तरंगिण्योऽनुशासिकाः ॥ २८ ॥ भाषा-शुद्ध कर्मका करना सोई गंगाका जल है और देहके बाहर जल- मृत्तिकासे शौच करना, हृदयमें ज्ञानसे शौच करना ये दोनों कर्म गंगाके दो वीर हैं, गुरुकी दीक्षा लेना सोई गंगाकी लहरें हैं ॥ २८ ॥ स्वभावाचरणं वंशं तत्प्रीत्या यष्टिसंज्ञया । योगाचरणया नावा तारणं शुद्धसंस्थितिः ॥२९॥ भाषा-जीवोंके स्वभावका आचरण सोई बांस है उसी स्वभावरूप बांसमें प्रीति करना सोई बांसकी लाठी है. योगका करना सो नांव है शुद्ध कर्ममें टिकना सो गंगाका उतरना है इस प्रकार संयोगसे गुह राम- लक्ष्मण जानकीको गंगाके पार लेगया ॥ २९ ॥ कृतं गुहेन सहसा प्रयागं हृदयस्थलम् ॥ सज्जनैर्भाषणं स्नानं तस्य प्रीतिः सरस्वती ॥३०॥ - ।

। ६७ . 1 नापाटीकासहित । भाषा-गुहने पार उतारे रामजीका हृदय सो प्रयाग है सज्जन-मनुष्योंसे आपण करना सो स्नान है इसी सज्जनोंके भाषणमें प्रीति सो सरस्वती है ॥३०॥ तत्संगतौ च यत्प्रेम तद्रुचिर्यमुना स्मृता ॥ वटः स्वधर्मों विजेंद्र सत्कर्माचरणो मुनिः॥३१॥ भापा-सज्जन जीवोंके मिलापमें प्रेम और उसी प्रेममें रुचि सो यमुना जीवोंका अपना अपना धर्म सो अक्षय वट है सुंदर कर्म करना सो भरद्वाज मुनि है तिनके आश्रमपर रामजी जाते भये ॥३१॥ पूजितो येन रामो बै जानकीलक्ष्मणान्वितः ।। सुखमाप महाराजो रामो राजीवलोचनः ॥ ३२ ॥ भाषा-सो भरद्वाज मुनि राम लक्ष्मण जानकीको पूजन करते भये भरद्वाज मुनिके आश्रमपर एक रात्रि रामजी रहे वहाँ बहुत सुख पाते अये ॥३२॥ उवास रामो मुनिना सुपूजितो विदेहपुच्या च सहानुजो विभुः ।। प्रातः समुत्थाय प्रियासहोदरैःखानं त्रिवेण्यां विधिवञ्चकार वै३३ भापा-मुनि करके पूजित ऐसे रामचंद्र जानकी लक्ष्मण भरद्वाज मुनिके आश्रमपर रात्रि बसके प्रातःकाल उठके पहिले वर्णन हुई जो त्रिवेणी तिसमें विधिपूर्वक शुद्ध आचरण है रामजीका सोई विधि है, और पहिले वर्णन भया जो जल तिसमें डरसे हीन कर्म रूप स्नान राम लक्ष्मण जानकी करते भये ॥ ३३ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे अयोध्याकांडे पं०शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसं- वादे रामचंद्रभारद्वाजानमनिवासे प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥१॥ वरतन्तुरुवाच। आत्मज्ञानस्य स्वपितुः रामेण चिन्तनम्मुने । स वाल्मीकिमुनिः प्रोक्तः शत्रुजेता जयो गिरिः॥१॥ भाषा-वरतन्तु मुनि बोले रामजीने अपने पिता जो आत्मज्ञान विसका चिंतन करते भये सो वाल्मीक मुनि हैं तिनके आश्रमपर रामजी जाते जये। रामजीका पराक्रम कामादि शत्रुओंको जीतने में बड़ा बलवान है, सो चित्रकूट पर्वत है, वाल्मीककी आज्ञा पायके तिस चित्रकूटपर रामजी बसते भये ॥१॥ . - ६८ 11 वेदान्त रामायण अ० कां। रामस्य सततं प्रीतिर्या रूपे सा पयस्विनी ॥ सभयादिगुणास्तत्र मुनयो वनवासिनः ॥२॥ भाषा-भगवान्के रूपकी प्रीति रामजीके हृदयमें नित्य बनी रहती है, सोई मंदाकिनी नदी है, अधर्मके भय आदि गुण रामजीमें हैं सो इस वनके मुनि हैं, अधर्मसे डरे सोई महात्मा है ॥२॥ इंद्रियाणाम्प्रचंडानामविश्वासादयो गुणाः ॥ तैपरण्यचरैनित्यं सेवितो जानकीपतिः ॥३॥ भाषा-बडी जबर्दस्त जो इन्द्रिय हैं तिनका विश्वास रामजी कभी नहीं करते ऐसा गुण सोई वनके रहनेवाले मनुष्य हैं, सो मनुष्य रामजीकी सेवा करते भये ॥३॥ गिरे जयरूपस्य चित्रकूटस्य नित्यशः ॥ अचलत्वं च तत्प्रेम कुटीरो रामसंकृतौ ॥४॥ भाषा-पहिले वर्णन जया जो रामजीका काम आदि जयरूप चित्र- कूट सो अचल है तथा उस अचलमें प्रेम ये दोनों राम लक्ष्मणकी पर्ण- कुटी हैं ॥ ४ ॥ तद्विरौ निश्चला प्रीतिर्वसती राघवस्य वै प्रपंचरहितं सौख्यं प्राप्तं रामेण तव च ॥५॥ भाषा-ऐसे चित्रकूटमें रामचंद्रकी प्रीति निश्चल है सोई चित्रकूटपर रामचंद्रका वास है, रामजी संसारके प्रपंचसे रहित हैं सोई चित्रकूटका सुख है ॥५॥ अयोध्या सुमते रिनिश्चलेनैव संकृता॥ तत्सुमन्तागमः प्रोक्तः पुना रामांतिकान्मुने ॥६॥ भाषा-जिसको चित्त कभी धर्मसे चलायमान नहीं होता सो सुमंतरूप सारथिने सुमतिरूप अयोध्याका प्रेम निश्चल होके किया सोई रामजाके पाससे सुमंतका फिर अयोध्या आना भया है ॥६॥ 4

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1
भाषाटीकासहित ।
६९
सत्समाजे विनष्टोऽभूदात्मज्ञानं निरंतरम् ॥
तदेव मरणम्प्रोक्तमयोध्याधिपतेस्तदा ॥ ७॥
भापा-सत्पुरुषोंकी समाजमें रोज आत्मज्ञान नष्ट होगया सोई दशरथका
मरण है ॥ ७॥
कृतं कोलाहलं सर्वैः सज्जनः सत्सभातले ॥
पूर्वोक्तनृपभायांभिर्युगपत्तद्रिलापनम् ॥ ८ ॥
भाषा-सत्पुरुपोंकी सजामें आत्मनानको नष्ट देखके उसी सभामें बैठके
सज्जनोंने बहुत उच्चस्वरसे रुदन किया सोई पेस्तर वर्णन भई सो राजाकी स्त्री है,
सो सब इकट्ठी होयके विलाप करती गई ॥८॥
निर्दयत्वं सदा शक्तेः तत्केकयपुरं स्मृतम् ॥
धर्माचरणदूतास्ते वसिष्टेनैव प्रेरिताः॥
गतास्ते तत्पुरं प्रोचुः क्रूरं केकयभूपतिम् ॥ ९॥
भाषा-शक्ति निर्दय है जीवको फँसानेमें मोह नहीं करती कि यह गरीब
दुःख पावेगा, ऐसा शक्तिका स्वभाव है सोई कश्मीर नगर है वसिष्ठजीने अपने
धर्मके आचारमें बडे पुष्ट सो सब दूत हैं तिन दूतोंको कश्मीरको भेजते भये,
दूत जायके कश्मीरको केकयीका करत्वज्ञाव सोई कश्मरिका राजा है तिसमें
घोलते आये ॥९॥
नृपस्य मरणं शीघ्रं गृहीत्वा तत्सुतौ तदा ॥
कुमत्या प्राप्तिौ तत्र पूर्वोक्तो तृपनंदनौ ॥ १० ॥
भाषा-जलदी आत्मज्ञान दशरथको मरण कहिके कुमति करके
कश्मीरको लेगये जो राजाके दो पुत्र भरत शत्रुघ्न तिन दोनोंको संग लेके ॥१०॥
आयाता सुमतिन्दूता भरतानादरम्प्रजाः ॥
भगवचिंतकाः सर्वे प्रजाश्च पुरवासिनः ।। ११ ॥
भाषा-दूत सुमतिरूप अयोध्याकू आने अये, तब भगवान्के भजन
करनेवाले रूप जो सब पुरवासी हैं सो भरतके अनादरको ॥ ११ ॥

- वेदान्त रामायण अ० को। चक्रुश्चानादुरन्तस्य हास्यरूपनिरंतरम् ॥ आश्वासितो वसिष्ठेन क्षमामार्गेण रोदलम् ॥ १२ ॥ भाषा-करते अये, क्या अनादर किये रोज भरतकू देखके हँसना सोई अनादर है और वसिष्टजीने क्षमारूप आश्वासन किया सोई भरत शत्रुघ्नका रोना है ॥१२॥ चक्रतुः शपथं वारी कोशल्यां भरतोऽर्जवम् ।। चकार मातुः स्वस्यैव भर्त्सनं धैर्यनाशनम् ॥ १३ ॥ भाषा-भरतका कोमलस्वभाव सोई दोनों भाई सौगंद करते भये रामजी- का वियोग तथा दशरथका मरण सुनिक भरत शत्रुनका धीरज नष्ट होगया सोई केकईको भरत ताडना करते भये ॥ १३ ॥ दाहादीनि समस्तानि कर्माणि मुनिसत्तमः ।। कारयामास भूपस्य शुद्धाचाराणि तेन वे ॥१४॥ भाषा-सब जीवोंका शुद्ध आचार सोई दशरथकी दाहक्रियादि कर्म वासि- छने भरवसे करवाये ॥१४॥ पूर्वोक्तसेना जननी बांधवैः पुरवासिभिः ।। गुरुणा विप्रवर्गश्च संयुतो गमलच सः ॥ १५ ॥ भाषा-पहिले वर्णन भई जो फौज तथा माता माई पुरवासी गुरु ब्राह्मण इन सबों करके संयुक्त होकर भरतने रामजीके पास जानेकी तैयारी की ॥ १५ ॥ परमानंदरूपं हि गुहेन भाषणं कृतम् ॥ रामधैर्यस्वरूपं च तत्प्रतीति निवासनम् ॥१६॥ भाषा-भरत परमरूप आनंदमें लीन भये सोई गुहका तथा भरतका संभा- पण भया रामजीका धीरज स्वभाव सोई गुहका निश्चय है श्रीरामको मिलने वास्ते भरत जातेहैं सोई भरतका गंगा तटपर टिकना भया ॥१६ ॥ सैन्यविश्वासनं चक्रे रामध्यानेन संयुतः॥ भरतस्स्वस्वभावेन ससैन्यमातृबांधवैः ॥ १७॥ ។ . .

५ - भाषाटीकासहित । ७१ भाषा-भरत शत्रुघ्न रामजीका ध्यान करते भये सोई फौजको विश्वास- देना है तथा भरत अपने स्वभावमें दृढ है सोई सेना भाई गुरु माता सहित ॥ १७॥ गंगापार सुखेनाप्तो गुहप्रेरितनौकया ॥ प्रयागस्थो मुनिश्चक्रे सत्कार्य भरतस्य च ॥१८॥ भाषा-गृहसे चलाई नाव करके गंगाके पार गये प्रयागजीमें टिके जो मुनि भरद्वाज पहिले वर्णन हुये सो भरतका सत्कार करते भये ॥१८॥ यमादिभियोगपथैः सन्तुष्टो नृपनन्दनः॥ बभूवाव्यक्तकथनं श्रोतृणां वाचिनां तथा ॥१९॥ भाषा-किस चीजसे सत्कार किया खोटा वचन नहीं बोलना इंद्रियोंको जीतना इन आदि अनेक प्रकारके सुंदर कर्मों करके सत्कार किये तब भरत संतुष्ट होके चित्रकूटको गये तब चित्रकूटपर सुननेवाले जीवोंके तथा कहने- वाले जीवोंके बीचमें ईश्वरका धर्म वर्णन मया ॥ १९ ॥ चतुर्गाश्चैव भ्रावृणामन्येषां च परस्परम् ॥ समागमस्स विख्यातः परमात्मप्रकाशकः ॥२०॥ भाषा-तथा चारों भाई रामजीके और अनेक जीवोंके आपसमें परमात्माके रूपका प्रकाश मालूम पडा सोई सबका चित्रकूटपर आना भया ॥ २० ॥ पादुके रामचन्द्रेण सत्यबुद्धिः सहिष्णुता ॥ स्वानुजाय स्वयन्दत्ते प्रीत्या गृह्यागमत्पुरम् ि॥२१॥ भाषा-सत्य राखना हृदयमें तथा कोई अपनेको दुःख देवै सो उसको दुःख देनेका विचारना नहीं ये दो पादुका हैं सो दोनों पादुका रामजी प्रसन्न होके भरतको देते भये भरत दोनों पादुका अपने स्वभाव रूप शिरपर धरिके अयोध्यापुरीमें आते भये ॥२१॥ भरतो भ्रातृसहितः सेनामातूमुनीश्वरैः॥ वासं चक्रे पुरी बाझे पंचक्रोशमिते शुभे॥२२॥ - । ७२ वेदान्त रामायण अ० कां। भाषा-माई सेना माता मुनीश्वर सहित आयकै आप भरत अकेले पुरीके बाहर पांच कोसपर टिकते भये ॥ २२ ॥ कदापि सुमतिः कुर्यात्कुमतेः संगमद्भुतम् ।। अतो तदूरतः स्थित्वा पंचदुष्टेन्द्रियोज्झिते ॥२३॥ भाषा-भरत विचारते जये कि दैवयोगसे सुमति जो है सो कुमतिकी संगत कर ले तो बडा अश्चर्य हो जावे इसवास्ते पांच दुष्ट इंद्रियों करके त्यागा गया जो सुंदर कर्म उसी पांचकोशमें वास करते जये ॥२३॥ सत्कर्माचरणे वीरो नन्दिग्रामे सुशोभने ॥ तत्प्रीतिरूपिणीम्बद्धा जटां, राम इव स्वयम् ॥ २४ ॥ भापा-सुंदर कर्मका आचरण करना सोई नंदिग्राम है निममें टिकते भये मंदियामकी प्रीतिरूप जदा रामसरीखे भरतभी शिरमें वांधिके ॥ २४ ॥ द्वयोः पादुकयोश्चक्रे रंजनं प्रीतिसेवनम् ॥ शमादीनाम्प्रजानां वै विपरीतोद्भवोद्भवः ।। भरतो रक्षणं चक्रे दुःखितानां मुहुर्मुहुः ॥२५॥ आपा-पेस्तर वर्णन भये जो दोनों पादुका तिनको स्नेहरूप प्रीति सोई सेवन करते अये शम दम यज्ञ आदि और जो सुकर्म सोई सब प्रजा भये तिन सबकी रक्षा करते भये भरत खोटी इंद्रियोंका जो खोटाअर्थ तिन करिके वारंवार दुःखी जो प्रजा तिनकी रक्षा करते आये ॥२५॥ इति श्रावेदान्तरामायणे पं० शिवसहायबुधविरचिते नंदिग्रामे भरतनिवासे द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥२॥ इत्ययोध्याकाड समाप्तम् । .

- 1 '७३ भाषाटीकासहित । अथारण्यकांडः। - अब वरतन्तुरुवाच। कुज्ञानसमुदायाश्च ते मृगाः काननौकसः ।। सलक्ष्मणेन रामेण हता निपतिता क्षितौ ॥१॥ भाषा-वरतन्तुमुनि बोले खोटा खोटा ज्ञान जैसे परखीको भोगना परधन हरना चोरी करना इन आदि बहुत ज्ञान सो सब वनके मृग भये तिन मृगोंको राम लक्ष्मण मारते भये वे मृग भूमिपर पड़गये ॥ १ ज्ञानहर्पशरेस्तीक्ष्णैर्जघानारण्यसंश्रितान् ।। राक्षसानपि पूर्वोक्तान्मनोरावणप्रेरितान् ॥२॥ भाषा-तथा मन रावण करके आज्ञा पायके वनडे फिरते हैं जो राक्षस ति- नको जी रामजी ज्ञानमें हर्ष मानना सोई वाण है तिन बाणों करके मारते भय॥२॥ रूपभक्त्याश्च जानक्या पादो तच्छुतिकीर्तने । आलस्यो निजतुंडेन निजघान सुरेशजः ॥ ३॥ भाषा-विवेकका चरित्र सुनना तथा कीर्तन करना ये दोनों भगवान के रूपकी चक्ति जो जानकी तिसके दो पग हैं तिस पगको आलसरूप जो काग सो जानकी विवेकके चरित्रको सुनती तथा कीर्तन करती गई इन दोनोंको नहीं करने देना सोइ तुंड है तिस तुंड करके जानकीके पगमें घाव करता भया ॥३॥ अप्रीतिकृतहण जानक्याश्चरणांबुजे ॥ पातयामास तस्याक्षि झरेणैकेन राघवः ॥४॥ भापा-आलसरूप काग जानकीको नित्य मना करता भया कि त परमेश्व- एकी प्रीति छोड दे. जानकीने दुष्टका वाक्य नहीं माना इसवास्ते उस आलस्यरूप कागकी प्रीति जानकीमें नहीं है ऐसी अप्रीतिमें जो कागको हर्ष सोई तुंडकी - ७४ । वेदान्त रामायण आ० कां। धार है उसी धार करके जानककि चरणमें मारता मया तव रामजी एक बाण. करके जयंतकी एक आंख काटिके भूमिपर गिराय देते भये ॥४॥ उपदेशशरणैकं क्रोधाकुलितलोचनः ॥ आलस्यो व्याकुलो भूत्वा करवाक्यादिसंगतौ ॥५॥ भाषा-किस बाणसे रामजीने आंख काटे उपदेशरूप वाणकरके क्रोध करके रामजीका नेत्र लाल होगया तब आलस्यरूप काग खोटा वचन बोलना ऐसा अनेक प्रकारका बुरा काम तिसकी सभा ॥५॥ गतवान्प्राणरक्षार्थ न केनापि सुरक्षितः॥ पश्वाच्छरणमायातो रामस्य चरणाब्जयोः ॥६॥ भाषा-अपने प्राणकी रक्षा करने वास्ते जाता भया परंतु किन्हीं दुष्टोंकी सामर्थ्य नहीं भई कि रक्षा कर सके त म रामजीके चरणको शरण आया ॥६॥ शौर्यानयोश्च तन्दृष्ट्वा रक्षित्वा राघवोऽत्यजत् ।। तदा गतः समाजग्मुर्दुष्टकर्मादिराक्षसाः ॥ चित्रकूटस्थितं ज्ञात्वा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ७॥ भाषा-कैसे रामके चरण हैं एक तो गररूप है, दूसरा कोमलतारूप है, रामजी शरण जानके कागके प्राणकी रक्षा करते भये. तब काग चला गया तब दुष्टकर्म पेस्तर वर्णन हुए जो राक्षस सो चित्रकूटपर रामजीकू टिक जानकर रामजीके सामने आते भये॥७॥ आदतुं सहसोद्योगं चक्रुर्मरणकांक्षिणः सद्धर्मा मुनयश्चैव चित्रकूटवनाश्रिताः ॥ ८॥ भाषा-राक्षस जलदी मरणकी इच्छा करके रामजीको दुःख देनेवारते उपाय करते आये तथा चित्रकूटके बनमें रहनेवाले सुंदरधर्मरूप जो मुनि हैं वो.भी॥८॥ तेऽपि प्रापुर्महादुःखं पीडिता राक्षसैस्तथा ।। तान्पीडितान्विलोक्याशु रामस्तत्याज़ तं गिरिम् ॥ ९॥ -- -- . भाषाटीकासहित । ७५ भाषा-राक्षसोंसे पीडा पायके दुःखी होते भये रामजीने विचार किया कि हमारे वास्ते राक्षस आते हैं सो मुनिलोग भी दुःख पाते हैं हम चित्रकूटपर नहीं होते तो राक्षस रोज यहां नहीं आते ऐसा विचारके और मुनियोंको दुःखी देखके चित्रकूट त्यागिके दूसरे वनकू चले ॥९॥ शत्रयाणां विजयं चित्रकूटं रघूत्तमः॥ तत्यांज स्ववशं ज्ञात्वा नेते मां जयितुं क्षमाः॥१०॥ भाषा-काम क्रोध लोभ इन तीनों वैरियोंको जीतनारूप जो चित्रकूट तिसकू अपनी वश जानके रामजी ये वैरी हमें नहीं जीत सकेंगे ऐसा जानिके चित्रकूटको त्यागते भये ॥१०॥ कामादिसारं संगृह्य भूभारहरणाय च ॥ रक्षोविनाशनं चैव तैर्विना न भविष्यति ॥११॥ भाषा-रामजीने विचारा कि कामका सार सुख, लोभका सार संसारमें अपनी स्तुति होना, क्रोधका सार वैरीको मारनेमें दया नहीं करना इन तीनोंका थोरा थोरा सार भूमिके भार नाश करने वास्ते लेते अये इन तीनों सारोंके विना राक्षसोंका नाश नहीं होगा ऐसा विचार करके ॥११॥ एवं विचार्य सहसा जगामारथाश्रमम् ॥ मार्ग रुद्धा विराधस्तु ततस्तस्य पुरः स्थितः ॥ १२ ॥ भाषा-रामजीने ऐसा विचार किया कि अब मुनियोंके पास चलना, प्रथम अत्रिमुनिके आश्रमकू चलते भये, तब रामजीका रस्ता धेरके रामजीके सामने विराधनाम राक्षस खडा होगया ॥ १२ ॥ राधः सदुपदेशश्च तेन यो विगतो भुवि ।। सविराध इति ख्यातो भ्रमो भयविवर्द्धनः ॥ १३ ॥ भाषा सुंदर काजके उपदेशकू राध कहते हैं, शास्त्रमें उसी राधसे दूर होजावे तिसका नाम विराध है, भयको बढानेवाला जो आम है.उसका नाम विराध है ॥ १३॥ तो - ।

. ७६ वेदान्त रामायण अ० कां० । जानकी तेन सन्नीता ब्रह्मभक्तिश्च शाश्वती ॥ अतो रामेण तरसा हतः प्राप्ता च जानकी ॥१४॥ भाषा-सो विराध जानकीको हरि लेगया, इसवास्ते जलदी विराधको मारके रामजी जानकीको ले आये ॥ १४ ॥ तं हत्वा रामचन्द्रश्च जगामात्रेः शुभाश्रमम् ॥ न सन्ति शत्रवो यस्य जन्मतस्त्रय एव ते ॥ १५ ॥ भाषा-रामजीने तिस विराधको मारके सुंदर जो अत्रिमुनिका आश्रम तिसपर जाते भये, जन्मसे काम क्रोध लोग ये तीन शत्रु जिसके नहीं है ॥१५॥ सोऽत्रिमुनिः समाख्यातः शीलो ब्रह्मसखा महान् ॥ निंदा न जन्मतो यस्याः सानसूयेति कथ्यते ॥ १६ ॥ भाषा-तिनको अत्रिमुनि शास्त्रमें कहते हैं, सो अत्रिमुनि शीलका नाम है. शील ब्रह्मका बडा मित्र है जन्मसे जिसकी हृदयमें जीवमात्रकी निंदा नहीं है उसको शास्त्रमें अनसूया कहते हैं ॥ १६ ॥ शीलवृत्तिर्वरा श्रेष्ठा मुनिपत्नी पतिव्रता ॥ सोऽत्रिः संपूजयामास स्वस्वभावोद्भवैगुणैः ॥ १७ ॥ भाषा-शीलकी वृत्तिका अनसूया नाम ह, बडी श्रेष्ठ है, शीलरूप अत्रिमुनि जिनकी स्त्री है, शीलको छोडिके दूसरी जगह अनेक दुःख पावे तो भी नहीं जाती, शीलरूप अत्रिमुनि अपने स्वनावसे उत्पन्न गुण करके रामजीको पूजन करते आये ॥१७॥ जानकी शिक्षयामास स्ववृत्तिं मुनिवल्लभा । सत्सभान्वेषणं प्रेम दुःस्वभाववनेऽभवत् ॥ १८॥ भाषा-अत्रिमुनिकी प्यारी जो शीलकी वृति अनसूया सो अपनी बड़ी उत्तमवृत्ति जानकीको सिखाती भई खोटा स्वभावरूप वनमें जीवको मोक्ष कर- नेवाली सन्जाको प्रेम करके सोच लगाना ॥ १८ ॥ - । ७७. . भाषाटीकासहित । रामचन्द्रस्य भ्रमणं पितृवर्षप्रमाणतः ॥ पत्नीधावसमायुक्तो जन्माग्निवारिदः प्रभुः ॥ शरभंग मुनिन्द्रष्टुं जगाम रघुनन्दनः ॥ १९॥ भाषा-सोई रामजीको वर्ष १४ वनमें भ्रमण करना गया है, कैसे रामजी हैं जानकी लक्ष्मणसंयुक्त हैं. तथा जन्मबाधारूप जो अनि तिसको बुझानेवास्ते मेघरूप है, सो रामजी शरशंगमुनिका दर्शन करने वास्ते शरभंग मुनिके आश्रम- पर गये ॥ १९ ॥ तेजसा शरभंगेन पूजितो जानकीपतिः। शौचाद्याचारसाहित्यैस्सेषां प्रीतिः स्तुतिः कृता ॥ २० ॥ भापा-तपका तेज सोई शरभंग मुनि है सो मुनिने शौच आचार आदि और उत्तम उत्तम कर्म है तिन्हों करके रामजीका पूजन किया, तथा राम लक्ष्मण जानकी उनके चरणमें बडी प्रीति की, सोई शरभंगमुनि रामजीकी स्तुति करते नये ॥२०॥ कौशल्पीतिरचिता चितामी रामसंगतिः॥ दग्ध्वा देहं मुनिःशीघ्र विवेके राघवेऽविशत् ॥ २१ ॥ भाषा-रामजीमें बड़ी चतुर प्रीति उस प्रीतिकी चिता बनाय तथा राम- जीकी संगति सो अग्नि गई है ऐसी सुंदर उत्तम चिता अनिसे भावरूप देहका भस्म करके विवकरूप रामजीम शरसंग मुनि मिल गये ॥ २१ ॥ आविचारसुतीक्ष्णेन कृत्वा संभाषणम्प्रभुः। सन्मार्गमुपदिश्याशु सुतीक्ष्णे मुनिसत्तमे ॥ २२ ॥ भाषा-रामजीके विचारसे रहित कर्म सोई सुतीक्ष्ण मुनि है तिससे संभा- पण करके सुंदर धर्मका रस्ता सुतीक्ष्णको बतायके ॥ २२॥ रामो जगाम वेगेन कुंभजस्यानुजाश्रमम् ॥ मानवृद्धश्च जीवस्य कदापि रघुनदनः ॥२३॥ - . , वेदान्त रामायण आ०कां० । भाषा-जलदी रामजी अगस्त्य मुनिके छोटे भाईके आश्रमपर जाते भये कभी जीवके अभिमानकी वृद्धि होती है सोई अगस्त्यका भाई है ॥२३॥ दीनस्वभावो जीवानां सोऽगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ मानवृद्धिः कदा तस्य सोऽगस्त्यस्यानुजः स्मृतः ॥ २४ ॥ भाषा-जीवोंका स्वभाव बडा गरीब है सोई अगस्त्य मुनि है जीवाके कभी मानकी वृद्धि होती है सो अगस्त्यका छोटा भाई है ॥ २४ ॥ तस्मै सन्मार्गमुद्दिश्य कुंभजाश्रममागतः ॥ पूजितः कुंभजनैव रामो दीनदयागुणैः ॥ २५ ॥ भाषा-तिस अगस्त्यके भाईकू ईश्वरका अजनरूप रस्ता बतायके रामजी अगस्त्य मुनिके आश्रम पर आये, जीवोंका दीन स्वभाव जो अगस्त्य है सो दीनके गुण दया आदि बडे उत्तम धर्म तिस करके रामजीका पूजन करते भये ॥२५॥ अगस्त्य वचनाद्रामो जग्राहेन्द्रं महद्धनुः ।। राक्षसानां विनाशाय समतालक्षणं विभुः ॥२६॥ भाषा-रामजीने अगस्त्यका वचन मानकर राक्षसोंका नाश करनेवास्ते सम्- रूप इन्द्रका धनुष ग्रहण करते भये ॥ २६ ॥ अगस्त्याज्ञा च संगृह्य रामो गोदावरी ययौ ॥ या ददाति स्वयं गां वै निर्मला सततं स्थिताम् ॥ दृष्टिम्ब्रह्मस्वरूपे च सा वै गोदावरी स्मृता ॥ २७ ॥ भाषा-जो कोई वस्तु आपहीसे ब्रह्मके स्वरूपमें नित्य वास करनेवाली और निर्मल दृष्टि देवे उसकू गोदावरी नदी शास्त्रमें कहते हैं सो रामजी अग- स्त्यमुनिकी आज्ञा पायके ऐसी गोदावरी नदीकू जाते भये ॥२७॥ उदासीनमतिब्रह्मन सा वै गोदावरी नदी ॥ विहर्षों मन्दुभावश्च गोदावयास्तटौ स्मृतौ ॥ २८॥ - C ܝ ܢ भाषाटीकासहित । ७९. भाषा-हे जगवन् ! संसारमें उदासीनमति राखना कि संसाररूप बंदीघरसे 'मुझे कब छुडावोगे ऐसी मति जो है सोई गोदावरी नदी है संसारके सुखरूप चरित्रको देखके हर्ष नहीं मानना तथा पशु सरीखे अपने देहमें मंदता हानि मानना ये दोनों गोदारीके तट हैं ॥ २८ ॥ अनुद्वेगजलेनैव पूर्यमाणा दिवानिशम् ॥ क्षमालंयं च रामस्य लक्ष्मणस्य सुकोमलम् ॥ २९ ॥ भाषा-दुःखको पायके जीव उद्देगको न प्राप्त होवे सो गोदावरीका जल है तिस जल करके रातदिन पूर्ण रहती है. क्षमाका आलंब तो रामजीका और कोमलस्वभाव लक्ष्मणका ॥ २९ ॥ सत्संगस्मारिणी बुद्धिः सा बभूव द्वयोस्तदा ।। तत्रानंदयुते वासे संस्थिते रघुनन्दने ॥३०॥ भाषा-इन दोनों लक्षणों करके दोनों भाइयोंकी रातदिन सत्संगके स्मर- णमें बुद्धि होती भई, तिस गोदावरीके तटपर आनंदसे रामजीको स्थित भये संते ॥ ३०॥ किंचित्कालं व्यतीतं च सुखमानंदचिन्तनम् ।। दुर्मतेस्तनया करा दुःसंगेच्छातिकारिणी ॥ ३१ ॥ भाषा-आनंदरूप भगवानको चिंतना करते सन्ते दुर्मति जो, कैकसी तिस- की लडकी खोटे कर्मकी संगति करनेकी इच्छा बडी क्रूर ॥ ३ ॥ आजगामातिवेगेन रावणस्य सहोदरी। रामस्य सन्निधिं दुष्टा दुष्टकामेन तापिता ॥३२॥ भापा-ऐसी रावणकी बहिन शूर्पणखा बडे वेगसे रामजीके सामने आती भई रामजीका सुंदर कर्म देखके उसको दुष्ट कर्म मालूम पडा सो दुष्टकर्म कामदेव करके जलि रही है ॥ ३२ ॥ उवाच वचनं स्निग्धं पति भव राघव ॥ सुखं भोक्ष्यति चात्यन्तं मया नीतं निरंतरम् ॥ ३३ ॥ , - - , ।

वेदान्त रामायण आ० कां।
भाषा-हँसके रामजीसे बोली हे रामजी ! तुम मेरे पति होवो मैं संसारमें
ऐसा सुंदर सुंदर बुरे कर्मका सुख ले आऊंगी उस सुखकू आप
बहुत करके भोगेंगे ॥३३॥
इत्येवमुक्तस्तु तया रघूत्तमः प्रोवाच तामस्मि सपत्निको ह्यहम् ।।
सहोदरोऽयं मम ते पुरः स्थितः करिप्यते ते सकलं विचिंतितम् ॥३॥
भाषा-शूर्पणखा करके ऐसे कहे जो रामजी हैं सो बोलते भये, कि हे
दुःसंगकी इच्छा मेरे तो स्त्री है, तेरे सामने ये हमारा भाई खडा है सो तेरा
सम्पूर्ण विचार सिद्ध करेगा रामजीने विचार किया कि यह दुःसंगसे छूट जावे
तो अच्छा होवे इस वास्ते संतोपरूप लक्ष्मणके पास भेज देते भये कि संतोप-
की संगति पायके इसकी बुद्धि निर्मल हो जावेगी ॥ ३४ ॥
रामेण प्रेरिता बाला सा ययौ लक्ष्मणान्तिकम् ॥
तिरस्कृता लक्ष्मणेन पुनरायात्तदन्तिकम् ॥ ३५ ॥
भाषा-रामजीकी आज्ञा पायके लक्ष्मणके पास गई, लक्ष्मणने विचार
किया कि यह जन्मजन्मांतरकी बिगडी है इसकूँ मैं कुछ शिक्षा भी करूंगा तो
मेरी शिक्षा मानेगी नहीं इसवास्ते पास नहीं आने दी तो फिर रामजीके
सामने गई ॥ ३५॥
भ्रम्या विभ्रामिता तत्र श्रुतवत्या पुनः पुनः॥
प्रदुद्रावातिवेगेन भक्षितुं जनकात्मजाम् ॥ ३६॥
भाषा-राम लक्ष्मणने उसके कर्म मुनियोंसे पहिले सुन रखेथे साई श्रवण-
रूप जो चमी नाम हिंडोला है तिस हिंडोलना करके वारंवार रामजीके पाससे
लक्ष्मणके पास लक्ष्मणके पाससे रामजीके पास फिरती भई, तब परमेश्वरकी
भक्तिरूप जो जानकी तिसकू खानेवास्ते दौडती भई खाना क्या है जानकीका
ईश्वरमें प्रेम है उसको बिगाड देना ॥ ३६ ॥
दुरालापदुराचारौ तच्छ्रोत्री लक्ष्मणस्तथा ॥
चकर्त तत्क्षणे शीघ्रं नासिकां चापि दुर्गमाम् ॥ ३७॥

- 4 1 - 4 + भाषादीकासहित। ८१ भाषा-तब लक्ष्मण कोध करिके जलदी शूर्पणखाके दो कान शुभ कर्ममें जो प्रीति है सोई तरवार है तिस तरवारसे काट लेते गये, कैसे कान हैं दुष्ट- वचन साधुओंको शूर्पणखा बोलती है, एक कान तो खोटा बोल है, दूसरा कान सज्जनोंको अनेक उपाय कारके खोटा आचार सिखानेका विचार करती है।३७॥ दुराश्रवणप्रेमान्यां शुभप्रीत्यासिना सुधीः॥ श्रोत्रादिवासनायुक्त रक्तेश्चैव कुकर्मभिः ॥ ३८ ॥ भाषा-नया बडे दुःखसे भगवान्की चढी वस्तुकी सुगंधि लेना ऐसी नाक- भी काट लेते भये । रातदिन शूर्पणखा खोटे कर्मकी कथा सुनती है सोई कान है दुष्ट संगतसे कान आदि इंद्रिय नष्ट हो गईं उनकी वासनाका अर्थ तथा खोटी इन्द्रियसे खोटा कर्म करना ये दोनों रक्त हैं उसी रक्त करके शूर्पणखा लाल होगई है। इन दो श्लोकोंका अर्थ मिला है इसकू व्याकरणमें युग्म कहते हैं३८ रक्तांगी सा प्रदुद्राव प्राप्ता खरसभास्थलम् ॥ खरस्याग्रे निपतिता रुरोद बहु सुस्वरम् ॥ ३९ ॥ भाषा-शूर्पणखा उस रक्तसे लाल होके पेस्तर वर्णन अये जो खर आदि राक्षस तिन्होंकी कुमतिरूप सभा है तिस सज्ञामें शूर्पणखा गई खरके आगे पडके बडे उच्चस्वरसे रोने लगी ॥ ३९ ॥ खरादिभिश्च संपृष्टा वर्णयामास सर्वशः ॥ रामलक्ष्मणयोः कृत्यं नासिकाकर्णकृन्तनम् ॥ ४० ॥ भाषा-खर आदि राक्षस शूर्पणखासे पूछते भये तब राम लक्ष्मणका कर्म तथा अपनी नाक कानके काटनेका हाल कहती भई ॥४॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे पं०शिवसहायबुधविरचिते आरण्यकाण्डे संवर्त. वरतन्तुसंवादे प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥१॥ संवर्त उवाच। जारद्यूतमदापाना आययुः खररूपिणः॥ चतुर्दशमहासैन्यरेषां प्रीतिसमुद्भवैः ॥३॥ - । ६ J वेदांत रामायण आ०कां। भाषा-वरतन्तु मुनि फिर बोलते पये जार, यूत, मदका पान आदि लेके पहिले वर्णन भये इन सब बुरे कर्मोंका रूप जो खर आदि राक्षस सोई जार द्यूतादि कर्मोंकी अनेक प्रकारकी प्रीतिसे उत्पन्न हुए जो बुरे कर्म बहुत तिनमेंसे १४००० हजार सेना लेके रामजीसे युद्ध करनेको आते भये ॥१॥ जानकी भयसंयुक्ता छायामभ्यासनिर्मिताम् । जगाम लक्ष्मणेनैव सादै सा तरसा गुहाम् ॥२॥ भाषा-इन दुष्टोंको देखके जानकी डरके नित्य भगवान्में मिलनेके वास्ते आयास करती हुई उस आयास करके बनाई जो भगवान्की बहुतही थोडी छायारूप रूपा सोई राहा है तिस गृहामें लक्ष्मणको संग लेके गई ॥२॥ गुहागतां निरीक्ष्यैव रामो जनकनन्दिनीम् ॥ जधान खरसैन्यन्तं क्षणैकेन रघूत्तमः ॥३॥ भाषा-गुहामें प्राप्त हुई जानकीको रामजी देखके एक क्षणमें खरकी सेनाको मारते अये ॥३॥ इतसैन्यास्तु ते दैत्या रामं हन्तुं समुद्यताः ॥ तेऽपि रामेण निहताः पतिताः पृथिवीतले ॥ ४॥ भाषा-अपनी सेनाको मरी देखके राक्षस सब रामजीके मारनेके वास्ते दौडते भये तिन राक्षसोंको रामजीने मार डाला कोई राक्षस भूमिपर मूर्छित हो पंड मये ॥४॥ इतेषु तेषु सर्वेषु राक्षसेषु खरादिषु ॥ तत्सैन्यमपि दृष्ट्वा सा निहतं पतितं भुवि ॥५॥ भाषा-शूर्पणखाने सेना सहित खर आदि सब राक्षसोंको मरा जानके तथा मच्छित पृथ्वीमें पड़ा देखके ॥५॥ दुःखिताश्रु विमुञ्चती पतिता स्खलिता पथि ॥ रुदती लक्ष्मणेनैव छिन्नकर्णान्तनासिका ॥६॥ M 1 भाषाटीकासहित। भापा-तब शूर्पणखा लक्ष्मण करिके नाक कान कटी हुई दुःखित रोती गिरती पडती हुई ॥६॥ जगाम वेगेन सहोदरीदरीदुःकर्मप्रीतिस्थितिमुत्तमाम्पुरीम् ॥ लंकाम्मनोरावणपाणिपालितां सभास्थितं वाक्यमुवाच भ्रातरम् ॥७॥. भापा-दुष्ट कर्ममें हठपूर्वक ठहरनेवाली शूर्पणखा रावण करके पालित ऐसी लंकापुरीमें शीघ्र गई, हठसे दुष्ट कर्ममें चेष्टारूप जो मनरावण आदि राक्ष- सों करिके शोजित रावणकी सजा तिस सभामें बैठा जो रावण तिससे शूर्पणखा बोली ॥ ७ ॥ त्वं क्रूरखुद्धे मदपानमादितो न बुध्यसे शत्रुगणं समागतम् ॥ विकर्तयित्वा मम कर्णनासिका सहानुजेनैव सपनिकः सुखी ॥ ८ ॥ भाषा-हे दुष्ट ! मदिरा पीके तू मत्त होगया है, तेरा नाश करनेवाला वैरि- गण आय गया, परंतु तुझे मालूम नहीं है, तेरा वैरी अपने भाईसे मेरी नाक कान कटायके सुखसे चाता स्त्रीसहित गोदावरीपर बसता है ॥ ८ ॥ पुत्रौ दशरथस्यैव अयोध्याधिपतेः शुभौ ॥ रामलक्ष्मणनामानौ राक्षसान्हंतुमागतो ॥९॥ भाषा-अयोध्याके राजा दशरथ तिसके पुत्र दो हैं राम १ लक्ष्मण २ यह नाम है, राक्षसोंका नाश करनेके वास्ते आये हैं ॥ ९ ॥ ताभ्यां किमर्थ ते नासा कौँ चैव विकर्तितौ ॥ वर्णयामास सर्व सा चरितं तस्य चात्मनः ॥ १० ॥ भापा-मन रावण पूंछता है तेरा कान नाक उन दोनोंने किस वास्ते काटे, सब शुर्पणखा अपना चरित्र तथा रामजीका चरित्र वर्णन करती है ॥१०॥ विचार्य हृदये स्वीये रावणः कूरशासनः ॥ किंचित्संस्मृत्य चात्मानं ज्ञानदृष्टया सुरोत्तमः ॥ ११ ॥ भाषा-शूर्पणखाका वचन सुनके बडे कठिनसे सिखाने योग्य जो रावण असुरोमें उत्तम सो जानदृष्टि करके अपने आत्माको विचारके कि मैं ऐसे सर्वे, श्वरका पार्श्ववती हूं ॥ ११ ॥ - । । - A - - + . 1 - ८४ वेदांत रामायण आ०कां। रूपभक्तेश्च जानक्या सौंदर्य ब्रह्मभावनम् ॥ तेन कामेन संतप्तो ममाप्येवं भवेत्कदा ॥ १२ ॥ भाषा-कैसा रावण है ब्रह्मकी भक्तिरूप जानकी तिसकी सुंदरता जो है सोई ब्रह्ममें भाव है, उस ब्रह्मके भावरूप कामदेव करके बहुत तप्त होरहा है यह विचारता है कि ऐसा ब्रह्मका भाव मेरेभी कमी हो जावे ॥ १२॥ तदाहं भवसंसारान्मुक्तो यास्यामि खां गतिम् ॥ एवं निश्चित्य मनसा हर्तुकामश्च जानकीम् ॥ १३ ॥ भाषा-तब मैंभी संसारसे छूटके अपनी गतिमें चला जाऊं ऐसा अपने मनमें निश्चय करके जानकीको हरण करनेवास्ते गया ॥ १३ ॥ • रथारूढो जगामैको रात्रौ कामविमोहितः ॥ मंदान्धतायां प्रययौ मारीचस्यान्तिकं द्रुतम् ॥ १४ ॥ । भाषा-रात्रिको ब्रह्ममें भावरूप कामसे मोहित मनरूप रावण अभिमान करके अंधकाररूपी रात्रि में स्थमें बैठके अकेला जलदी अहंकाररूप जो मारीच तिसके सामने गया ॥१४॥ मारीचस्तं ददर्शाथ दुराचाररथे स्थितम् ॥ तद्धर्षवाजिभियुक्ते गर्दभैश्च कुकर्मभिः ॥१५॥ भाषा,कुकर्मरूप खच्चर करिके तथा रथके हर्पके बढानेवाले जो बोडे तिन कारले संयुक्त जो रावण भटरूपी आचार रथमें बैठके रावण मारीचके पास गया, तिसकू मारीच देखता आया ॥ १५ ॥ समुत्थायादरं चक्रे पृष्ठोवाच दशाननः ॥ भगिनीदुर्दशां चैव खरादीनां वधं तथा ॥ १६ ॥ भाषा-रावणको देखके मारीचने उठके आदर किया, और आनेका कारण रावणसे पूछा, तब रावण शूर्पणखाकी दुर्गति तथा खर आदि राक्षसोंका मरण सब कहने लगा॥ १६ ॥ -- ४ - - है - भाषादीकासहित । जानकीहरणार्थाय समायातस्तवांतिकम् ॥ विचित्रमृगरूपस्त्वं भव तात मयेरितः ॥ १७ ॥ भाषा-कि जानकीको मैं हरण करूंगा, 'इस वास्ते तुमारे पास मैं आयाहूं, हे भाई! हमारी आज्ञा तुम मानिके चित्रविचित्र मृग बनो ॥ १७ ॥ श्रुत्वा दशाननोक्तिं च मारीचो मानगर्वितः ॥ स्वनाशभयभीतेन कर्मणा तं व्यबोधयत् ॥ १८ ॥ भाषा-बड़ा अभिमानी जो मारीच उसने रावणका वचन सुनके कहा कि हे रावण ! जो खोटेकम तुमने विचारे हैं तिस करके मेरा मरण होगा, और तुम दुःख पावोगे ॥ १८॥ बोधितोऽपि दशग्रीवो न बुबोध महावली ॥ भयाद्रभूवं मारीचः कुविचारो मृगोऽद्भुतः ॥ १९ ॥ भाषा-बड़ा बलवान् जो रावण है सो मारीचके वाक्यको सुनके नहीं माना तब मारीचने जाना कि जो मैं फिर कुछ ज्ञान देऊंगा तो मुझे मार डालेगा, ऐसे यसे खोटा विचाररूप मृग होगया ॥ १९ ॥ कुमार्गतनयैर्युक्तः परपीडादिरोमभिः ॥ भूरिभिर्दुःखदैः पादैः कुवाक्याच्छलवंचनैः ॥२०॥ भाषा-सोटा मार्ग जो है सोई दुष्ट पुरुष है तिसके दूसरे जीवोंको दुःख देनेवाले आदि पुत्र जैसा ईर्पण मत्सरता चुगली इन आदि और जो दुष्ट हैं सोई रोम भये हैं तिन रोमों करके युक्त है, और खोटा बचन बोलना, छल करना, कपट करना, ठगाई करना ये चार पग हैं इन्हों करके युक्त मारीच है॥ २० ॥ कुरावकुशला शोभा कुतृष्णाबिन्दुरंकितः ॥ सत्तिरस्कारपुच्छेन संयुतोऽधर्मचंचलः ॥ २१ ॥ भाषा-खोटा वाक्य बोलनेमें चतुराई सोई मारीचके देहकी शोना है, बुरे कामोंकी बहुत तृष्णा सोई विंदु है तिसका काला पीला सफेद आदि अनेक प्रकार करके चित्र विचित्र होरहा है, सत्पुरुषोंका तिरस्कार सोई पूंछ है 1 ८६ - वेदांत रामायण आ० कां। तिस पूंछ करके युक्त है अधर्म सोई चंचलस्वभाव है तिस करके बहुत चंचलायमान है ॥ २१॥ सदानादरहास्याभ्यां शृंगाभ्यां शोभितः खलः ॥ जगाम रामवसति तन्दृष्ट्वा जनकात्मजा ॥२२॥ भाषा-सुंदर कर्मको जैसा विद्यादान तलाव कूवा धर्मक्षेत्र आदि और कर्म तिनका अनादरं तथा हँसी करना ये दो सींग हैं, ऐसी सींग करके खल मारीच शोभित होरहा है, ऐसा रूप बनायके रामजीको पर्णकुटीके सामने गया,तब तिस मारीचको देखके जानकी ॥ २२ ॥ लुलोभ सहसा देवी स्वकात्किचिदातुरा ।। बभूव प्रेरयामास रामं तद्ब्रहणे सती ॥२३॥ भाषा-अपने काजसे थोरी आतुर होके लोभकू प्राप्त हुई जो जानकी उसने विचार किया कि मन रावणका भेजा आया है अब रामजी रावणको मारेंगे तो घर २.प्राणी २ प्रति हमारी वृद्धि होवैगी सबमें हम बसेंगे, रामजीसे जानकी बोली कि इस मृगको पकडके ले आवो ॥ २३ ॥ करुणापृथिवीदुःखसंहारं रघुनन्दनः ॥ प्राप मोहं विचलितस्तद्धे ग्रहणाय वा ॥२४॥ भाषा-दयारूप जो पृथिवी तिसका दुःख संहार रूप मोहकू रामजी प्राप्त होके मृगको पकडना अथवा मारना इस वास्ते चलते भये ॥ २४ ॥ सन्तोषलक्ष्मणेनैव स्वस्थत्वेन निवारितः ॥ स्वीकृतन्नैव रामेण गत्वा संघातितो मृगः ॥ २५ ॥ भाषा-संतोषरूप लक्ष्मणका संसारमें समस्वभाव है उसी स्वभाव करके रामजीको मना किया, कि आप इस मृगईं मारनेवास्ते मति जावो, लक्ष्मणके विनयको रामजी नहीं मानते हुए और जायके मृगको मारते भये १.२५ ॥ आविर्भावं कदा कुर्वन्कदोन्तानमेव च ।। मानप्रीत्या विप्रीत्या च धावन्वेगतरं हतः ॥२६॥ २ - ।

T . r- . - भाषाटीकासहित। ८७ भाषा-मृग अभिमानकी प्रीति कभी थोडी कभी ज्यादा करके भागता भया सोई मृगका दौडना है तथा सुप्त होना है ॥ २६ ॥ हतो हा लक्ष्मणेतीव प्रोवाच मृगसत्तमः ॥ विवेकं चैव संस्मृत्य तत्तनौ प्रविवेश ह ॥ २७॥ भाषा-मृगने मरते समय हा संतोषरूप लक्ष्मण ! मैंने बहुत पाप किया सो. ; आप क्षमा करो ऐसा शब्द बोलता भया सोई लक्ष्मणका पुकारना है, तथा विवेकका स्मरण करके अभिमानरूप मारीच शरीरको त्यागिके रामजकि शरीरमें मिल गया ॥ २७ ॥ अहंकारसुताः सर्वे न मया वर्णितुं क्षमाः ॥ ते पितुर्मरणं दृष्ट्वा रावणं चैव संश्रिताः॥ चक्रुर्विनाशनं सर्वे सज्जनानां महोयमाः ॥२८॥ भाषा-अभिमानरूप जो मारीच है तिसके पुत्रोंको वर्णन करनेमें मेरा सामर्थ्य नहीं है। मारीचका मरण देखके मारीचके पुत्र जो बुरे काज हैं सब इकडे होके रावणके पास जायके साधुओंका नाश करने लगे ॥ २८ ॥ निहत्य रामो मृगरूपधारिणं त्वचं न लेभे मृगदेहसंश्रिताम् ।। देहं त्यजन्हा खलु लक्ष्मणोति श्रुत्वा वचस्तस्य विसिस्मिये हदि२९॥ भाषा-रामजी अभिमानरूप मारीचको मारके मृगके देहकी खाल नहीं पाये तथा मृग देह त्यागते समय लक्ष्मणको पुकारता भया, उस शब्दकू मुनिके रामजीके मनमें बड़ा विस्मय होगया ॥ २९ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे पंशिवसहायबुधविराचते आरण्यकांडे मारांचवधे द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः ।। २ ॥ . +-- , वरतन्तुरुवाच। हा लक्ष्मणति संश्रुत्य जानकी व्यग्रमानसा ।। दीपाच पवनेनैव बभूव व्यथिता सती ॥१॥ . .

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वेदांत रामायण आ०कां।
भाषा-वरतन्तु मुनि बोले हे संवर्त ! सुनो हा लक्ष्मण ऐसा शब्द सुनके
जानकीने विचार किया कि अभिमान बढा बलवान है, बड़े बड़े योद्धाओं
जीत लिया सो मेरे प्राणनाथ जो विवेकरूप रामजी तिनकोजी जीत लिया सो
दुःखी होके संतोषरूप लक्ष्मणको अपनी रक्षा करनेवास्ते बुलाते हैं ऐसा
विचारसे दुःखी होगई जानकी जैसे हवा करके दीपककी ज्योति कांपती
तैसेही जानकी दुःखी होकर कांपने लगी ॥ १ ॥
उवाच वचनं स्निग्धं किंचिचलितपौरुषम् ॥
गच्छ लक्ष्मण ते भ्राता राक्षसेनैव पीडितः॥२॥
भाषा-थोरा लक्ष्मणकामी पुरुषार्थ चलायमान हो रहा है मारीचका वचन
सुनिके ऐसे जो लक्ष्मण तिनसे जानकी बोली हे लक्ष्मण! जलदी जाओ तुम्हारे
भाईको राक्षस दुःख देता है ॥२॥
त्वां समाह्वयते शीघ्र प्राणं त्यक्षामि तं विना ॥
उवाच लक्ष्मणो देवी नैवं भवति कहिँचित् ॥३॥
भाषा-दुःखी होके वे तुमकू पुकारते हैं रामजी विना मैं मरजाऊंगी
लक्ष्मण बोले हे देवि ! रामजी कभी दुःखी नहीं हेविगे ॥३॥
न हतारं प्रपश्यामि रामस्य भुवनत्रये ॥
तयोक्तो लक्ष्मणस्तूर्णं मां गृहीतुं समागतः ॥ ४॥
भाषा-हे देवि ! तीन लोकमें रामजीकू मारनेवाला कोई मैं नहीं देखता हूं
ऐसा लक्ष्मणका वचन सुनिके जानकीकी बुद्धि मलीन होगई सोई मलीनरूप
ग्रहण करनेको जानकीने कहा कि हे लक्ष्मण ! तुम विचारते हो कि विवेकरूप
रामजीका अंतकाल होजावे तो हम जानकीको लेलेवें सो ऐसा नहीं होगा ॥४॥
एवमुक्ते तु जानक्या गते दूरे च लक्ष्मणे ॥
तिरस्कारकृते दूरे ह्याजगाम दशाननः ॥५॥
भाषा-ऐसा भेद रूप वचन जानकीके कहनेहीसे लक्ष्मण रामजीके पासफू
चले तब जानकीने लक्ष्मणका तिरस्कार किया सोई दूर है तिसी समय लक्ष्म-
गको दूर गये जान तब रावण जानकीके पास आता भया ॥५॥

भाषाटीकासहित। । 1 महाजवं च संन्यासं तद्धृत्वागाद्दशाननः ॥ तत्प्रेमभस्मनाच्छन्नं तद्धनकमंडलुम् ॥६॥ भाषा-बड़ा कोमल स्वभाव सोई संन्यास है तिस संन्यासका रूप धरके जानकीके पास मनरूप रावण आया उस कोमल स्वभावमें प्रेम सोई विभूति है तिस विभूतिको देहमें लगाये है तथा उसी विभूतिमें स्नेह बढाना सोई रावणका कमंडल है॥६॥ शौचं वस्त्रं च संधृत्य शुद्धगैरेयरंजितम् ॥ भिक्षा कपटप्रीतिं च ययाचे जानकीन्तदा ॥ ७ ॥ भाषा-देहमें पवित्रता राखना सोई वस्त्र है शुद्धस्वभाव सो गेरू है उसी गेरूसे शौचरूप कपडा रंगे हैं ऐसा रूप धरके कपटप्रतिरूप शिक्षा जानकीसे मांगता मया ॥७॥ दयावर्दनं निर्दयायाश्च त्यागं ददौ जानकी साधवे कन्दमूलम् ॥ न जग्राह कामातुरो हर्तुकामस्तदा जानकी क्रूरवाक्यं समूचे॥८॥ भाषा-तब जानकी दयाको बढानारूप कंद निर्दयको छोडनारूप मूल साधु जानके रावणकू देने लगी तब पहिले वर्णन हुआ जो काम तिस काम करके आतुर होरहा है रावण सो जानकीको हरण करनेकी इच्छा करके जान- कीकू चिढानेवास्ते खोटी खोटी बातें बोलता भया ॥८॥ किं करिष्यसि रामेण वनस्थेन सुदु:खिना ।। मां भजस्व वरारोहे राक्षसानामधीश्वरम् ॥९॥ भाषा-हे जानकी ! वनमें रहनेवाले रामके संग तुझे कुछ सुख नहीं है राक्षसोंका मालिक जो मैं हूं सो मेरी स्त्री त होना ॥९॥ इत्युक्त्वा दर्शयामास स्वरूपं राक्षसाधिपः॥ पूर्वोक्तं बालकांडे च दशास्यं विंशहस्तकम् ॥१०॥ भाषा-ऐसा कहके जानकीकू रावणने अपना स्वरूप दिखाया कैसा स्वरूप है बालकांडमें पहिले दशमुख बीस भुजाका वर्णन भया है सो स्वरूप ॥ १० ॥ . 1 - . - - । . 1 वेदांत रामायण आकां। तन्दृष्ट्वा जानकी भीता श्रुतपूर्व खलं सती ॥ उवाच धैर्यमालम्ब्य यदि त्वं रावणः खलः ॥११॥ भाषा-पहिले मुनियोंसे जानकीने रावणका रूप सुनाथा उसी रावणकुं देखके बहुत डरगई जानकी धीरज धरके बोली हे दुष्ट! जो तू रावण है ॥११॥ क्षणं तिष्ठात्रं मे भर्ता सत्वरश्चागमिष्यति ॥ नाशयिष्यति ते गमित्युक्तश्च तया तदा ॥ १२ ॥ भाषा-तो एकक्षण हमारे सामने तू यदि खडा रह तो हमारा पति जलदी आय तेरे अभिमानका नाश करेगा ऐसा वचन जानकी रावणको कहती भई ॥१२॥ गृहीत्वा मूर्द्धजा तस्यां रामपादाब्जसन्नतिम् ॥ करणेकेन चोरं च रामरूपनिरीक्षणम् ॥ १३ ॥ भाषा-तब रामजीके. चरणकमलको वारंवार नमस्कारकी प्रीति सोई ईश्वरकी भक्ति जानकीकी चोटी है, तिस चोटीकू एक हाथसे पकडके तथा राम- जीके रूपको वारंवार देखना, सोई जानकीकी जंघा है तिस जंघाको ॥ १३ ॥ द्वितीयेनाशु संगृह्य रथमारोप्य कामतः ययावाकाशमार्गेण ज्ञानशून्यहृदा च सः ॥१४॥ भाषा-तिस जंघाको दूसरे हाथसे पकडके अपने रथमें बैठायके ज्ञानसे हीन जो हृदय सोई आकाश है तिस आकाशमार्ग करके जानकीको ले चला ॥१४॥ हा राम राजीवदलायताक्ष त्वया विहीना विधिना कृता यहम् ॥ वियोगचिंता तव पादपद्मयोश्चिरं सदा तिष्ठति मानसे मम ॥ १५॥ भाषा-जानकी विलाप करती है हे रामजी ! ब्रह्मदेवने आप करके हमकू. हीन करदिया. आपके चरणकमलका वियोग मेरे चित्तमें टिका रहेगा ॥ १५॥ एवमादीनि बहुधा विलापानि च जानकी ॥ कुर्वती रथमध्यस्था रक्षोपतिविमर्दनम् ॥ १६॥ .

J - भाषाटीकासहित । ९१ भाषा-इस प्रकारका बहुत विलाप रावणके रथमें बैठी हुई जानकी करती भई. रावणका तथा दुष्टराक्षसोंका नाश रूप विलाप जानकी करती है ॥ १६ ॥ दुष्टकर्मोद्भवाम्प्रीति हठजां स्वपुरी खलः ॥ सत्वरो गन्तुकामश्च लंकां राक्षससत्तमः ॥ १७॥ भाषा-दुष्ट कर्मसे उत्पन्न जो प्रीतिरूप हठ तिस करके ठहरना ऐसी जो लंकापुरी तिसको जानकीको ले जानेकी इच्छा की ॥ १७ ॥ दुर्लक्षणो जटायुश्च दुर्ज्ञानोद्भवमामिषम् ॥ दुर्वास्यतुंडेन सदा योभुनाक्ति निरंतरम् ॥ १८ ॥ भाषा-तब दुष्ट जीवोंका लक्षण जो है सोई जदायुनाम गधि है तथा दुष्ट ज्ञान जैसे विचारना कि चोरीमें धन कमाना, परखी भोगना इन आदि और अनेक बुरे कर्म है तिन्हों करके उत्पन्न जो कर्म सोई मांस है खोटा वचन बोलना सोई चोंच है, ऐसे चोंच करके उस मांसको रोज जटायु गीध साता है ॥ १८॥ दुश्चेष्टेहाकृतो पक्षी तत्सुतौ चरणो स्मृतो ॥ एतादृशो जटायुश्च कृत्वा तेन सुभाषितम् ॥ १९ ॥ भापा-दुष्ट कर्ममें चेष्टा तथा दुष्ट कर्म करनेकी इच्छा ये दोनों जटायुके पक्ष इन दोनों चेष्टा तथा इच्छाके जो पुत्र नरकमें पडना तथा कुयोनिमें जन्म लेना ये दोनों जदालुके दो पग हैं ऐसा जटायु रावणसे संभापण करके ॥ १९॥ पातितो रावणस्तेन सुवाक्यसंगरे रथात् ॥ पुनश्चोत्थाय वेगेन गृहीत्वा जनकात्मजाम् ॥२०॥ भापा-मुंदर वचन रूप युद्ध कारके रावणको रथसे जमीनमें जटायुने गिरा दिया तब रावण जलदी उठके जानकीको पकडके रथमें बैठायली क्यों- कि जब रावणको जटायुने गिराय दिया तब जानकीमी रथसे पडगयी थी भागने- वास्ते सो फिर पकडलिया ॥ २० ॥ -

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वेदान्त रामायण आ०का।
पक्षों द्वौ तस्य खड्डेन छित्त्वागात्त्वरितः पुरम् ि।।
स्वेश्वये निश्चला बुद्धिमेंने मे कर्हिचित्कदा ॥ २१ ॥
भाषा-रावण तरवारसे जटायुके दोनों पंख काटके लंकाको जाना गया
मनरूप रावण ऐसा विचारता है कि यह मेरा ऐश्वर्य कभी नाशको नहीं प्राप्त
होवेगा ॥२१॥
नाशमेष्यति साशोकवाटिका रावणप्रिया ।
तदुद्भवाः सुखा वृक्षास्तस्यां जनकनंदिनीम् ॥ २२ ॥
भाषा-नाशको नहीं प्राप्त होवैगी ऐसी जो रावणकी बुद्धि सो अशोकबाग
है, रावणकी बडी प्यारी है उस बगीचामें उत्पन्न भये जो सुख सो वृक्ष हैं तिस
बगीचामें जानकीकू ॥२२॥
स्थापयामास दासीमिनिन्देयासहनादिभिः ॥
कारयित्वाऽवनं तस्याश्चतुर्दिा निशाचरः॥ २३ ॥
भाषा-जानकीको अशोकबगीचामें टिकाता भया क्या करके ऐसी राक्षसि-
योसे जानकीकी रक्षा करायके कैसी राक्षसी हैं परजीवकी निंदा जीवको सुखी
देखके अपने हृदयमें दुःखी होना जीवमात्रसें प्रीति नहीं राखना इन आदि और
जो बहुत ऐसी मति सो राक्षसी हैं॥ २३ ॥
निदेया॑सहनासूयादुवौछाद्याश्च कोटयः ॥
दास्यस्तस्य समाख्याता वर्णितुं नैव ताः क्षमाः ॥ २४ ॥
भाषा-दूसरे जीवकी निंदा ईपी असहना अक्षमा जीव उपकार करे तो भी
निंदा करना जीवोंको दुःख देनेकी इच्छा रूप इन्हों आदि गिनती रहित इतनी
रावणकी दासी हैं ॥ २४ ॥
मृग हत्वा रघुश्रेष्ठो निवृत्तः स्वाश्रमं प्रति॥
मार्गे दृष्ट्वा तदायान्तं लक्ष्मणं विह्वलोऽभवत् ॥ २६ ॥
भाषा-आभमानरूप मृगको मारिके रामजी अपने आश्रमको चले तो रस्तामें
लक्ष्मणको आते देखके रामजी विह्वल होगये ॥ २५ ॥

९३ . 1 भाषाटीकासहित। उवाचाधैर्यसंयुक्तं वचनं रघुनंदनः ॥ कस्मात्तात त्वया त्यक्ता जानकी मम वल्लभा॥२६॥ भाषा-अधैर्ययुक्त वचन रामजी लक्ष्मणसे बोले हे भाई ! हमारी माणसे प्यारी जानकीको त्यागिक क्यों आये ॥ २६ ॥ उवाच लक्ष्मणः सर्व कारणं तत्सविस्तरम् ।। सहते नैव संयातो रामः स्वाश्रममंडलम् ॥२७॥ भाषा-लक्ष्मण सब प्रकार कारण विस्तारपूर्वक कहते भये तब रामजी लक्ष्मणसहित अपने आश्रमपर आते भये ॥२७॥ विलोक्य जानकाहीनं विललापाकुलेंद्रियः ।।' गांभीर्यस्थैर्यस्वास्तिक्ये चलत्वं किंचिदात्मनः ॥ २८ ॥ भाषा-रामजी अपने आश्रमपर आये सो जानकी करके हीन देखते भये , तब अपनी शरीरकी स्थिरतासे तथा गंभीर स्वभावसे तथा अपने धर्मसे किंचि- मात्र चलायमान होगये सोई विलाप है ॥२८॥ एवं महाविलापश्च रामलक्ष्मणसंकृतः॥ गृद्धनिपतितन्दृष्ट्वा चक्रे प्रश्नोत्तर हरिः ॥ २९॥ भाषा-ऐसा विलाप राम लक्ष्मण करते भये गीधको भूमिमें पड़ा देखके उससे प्रश्न तथा उत्तर करतें अये ॥ २९॥ अहं दुर्लक्षणो गृद्धः पातितो रावणेन वै ॥ जानकीरक्षणे शक्तस्त्वदर्शनजिजीविषुः ॥३०॥ भाषा-जटायु बोले हे रामजी ! दुष्टोका लक्षणरूप मैं गीध हूं जटायु मेरा नाम है, जानकीकी रक्षा करने में मैंने कुछ पराक्रम किया तब मेरेको रावणने पृथ्वीपर * गिरादिया, आपके दर्शनकी इच्छा करके अबतक मैं जीता रहा हूँ ॥ ३०॥ इत्युक्त्वा तत्यजे प्राणान् गृद्धो रामसमीपतः ॥ रचित्वा प्रेमकाप्टेन चितामास्थाप्य तं प्रभुः ॥ ३१ ॥ भाषा-गधिने ऐसे वचन रामजीसे कहे पीछे प्राण त्यागता भया, तब रामr - वेदांत रामायण आ० का। जीका प्रेम जटायुपर बहुत था तथा उसी प्रेमरूप काष्ठ करके चिता बनायके उसी चितामें जटायुको बैठायके ॥ ३३ ॥ ज्ञानाग्निना च तं दग्ध्वा भोजयामास पक्षिणः ॥ तज्जातिजान्महारान्दुमपोदीन्सहस्रशः ॥ ३२ ॥ भाषा-ज्ञानरूप अग्निसे जटायुको जलायके उसकी जाति जो दुष्ट कर्मकी भावना, तिसमें उत्पन्न भये जो बडे कूर २ दुःख देनेवाले अमर्प कहे दूसरेके सुखको देखके जलना इन आदि लेके इनमें जो सुंदर पक्षी बड़े दुष्टोंमें दुष्ट तिन बहुत हजार पक्षियोंको रामजी भोजन करवाते भये ॥३२॥ सदोपदेशिकधम्मभक्ष्यभोज्यैश्च भूरिशः ॥ प्रेमतुः कानने वारी सीतान्वेषणतत्परो ॥ ३३ ॥ भाषा-रामजी दुष्ट कर्मोंको ईश्वरके भजनरूप उपदेश देते भये, सोई उप- देश अनेक प्रकारके पकवान हैं तिन करके पंक्षियोंको भोजन करायके जान- कोके शोधनेके वास्ते दोनों भाई वनमें भ्रमण करते भये ॥ ३३ ॥ सन्निन्दनकबंधेन वेष्टितो रामलक्ष्मणो । असत्प्रशंसनारागभुजाभ्यां दैवयोगतः ॥ ३४ ॥ : भाषा-सुंदर धर्मकी निंदा करना, ऐसा दुष्ट कर्म सोई कबंध है तथा दुष्ट कर्मकी तारीफ करना और उसी तारीफ स्नेह करना ये दो कबंधकी भुजा हैं सो दैवयोगसे रामलक्ष्मणको कबंधने अपनी दोनों भुजाके बीच बांध लिया ॥ ३४॥ एकं चिच्छेद रामस्तु शिक्षाखड्नेन तद्भुजाम् ॥ सूक्तासिना द्वितीयं च चिच्छेद लक्ष्मणो भुजाम् ॥ ३५ ॥ भाषा-कबंधको रामजी सुंदर धर्म सिखाते भये सोई खड्ग है तिस- खड्ग. करके रामजी एक भुजा काटते भये और सुंदर वचनरूप तरवारसे दूसरी भुजा लक्ष्मण काटते अये ॥ ३५॥ छिनौ भुजो यदा तस्य तदा प्राणं ससर्ज है। हिंसाविरहितैः काष्ठेर्दयालपा चिता कृता ॥३६॥ .

१ आपाटीकासहित । ९५.. भापा-जब कबंधकी दोनों भुजा कटगई तब पहिले कथित जो कंबंध है सो प्राण छोडता आया तब रामजीने कबंधको जलाने वास्ते जीवहिंसासे' हीन जो कर्म जैसे कथाश्रवण मौन रहना दुष्टका संग त्यागना इत्यादि सब काष्ठ हैं. तिस काष्ठसे चिता बनायके कैसी चिता है दयारूप ॥ ३६ ॥ रामेण सह भ्रात्रव कृपाग्निदाहितोऽसुरः॥ सद्रूपधारी विमलो ज्ञानानंदो बभूव है ॥ ३७॥ भाषा-लक्ष्मणसहित रामजी कबंधके ऊपर कपा करते भये उसी रुपारूप अग्निसे कबंधको जलाते अये तब कबंध सुंदर रूप धारण करके ज्ञानमें आनंद भया ॥३७॥ याच वचनं स्निग्धं जानकीप्राप्तिकारणे ॥ अग्रे तिष्ठति राजेन्द्र शवरी भिल्लनंदिनी ॥३८॥ भाषा-जानकीके प्राप्त होनेका उपायरूप वचन बडा कोमल कबंध राम- जीसे बोला कि हे राजीके इंद्ररूप रामचंद्र ! यहांसे अगाडी थोडी दूरपर भीलकी कन्या शबरी रहती है ॥ ३८ ॥ तस्याश्रमं समागच्छ सा ते सर्व वदिष्यति ॥ इत्युक्त्वा स गतः स्वर्ग सुरेंद्रभुजपालितम् ॥३९॥ भापा-तिस शबरीके आश्रमपर आप जावो तब जानकीके मिलनेकी संपूर्ण वाती शबरी आपसे कहेगी ऐसा रामजीसे कहके ईश्वरके शरीरमें जो स्वर्गलोक है इंद्र करके रक्षा हो रही है ऐसे स्वर्गको कबंध गया ॥ ३९ ॥ निशम्य रामोऽपि कबंधभापितं सलक्ष्मणो लक्ष्मणसेवितांत्रिः॥ जगाम शीघं शवरीशुभालयं श्रीजानकी जीवनवल्लभो हरिः॥४०॥ भापा-रामजी कबंधका वचन सुनके शीघही शबरीके आश्रमको जाते भये ॥ ४०॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे मारण्यकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतंतुसंवादे तृतीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥३॥ इत्यारण्यकांड समाप्तम् । 1

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: वेदान्त रामायण कि०कां।
7
अथ किष्किंधाकांडप्रारम्भः।
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वरतन्तुरुवाच।
कबंधवचनं श्रुत्वा रामो लक्ष्मणसंयुतः ॥
पुनरन्वेषमाणश्च जानकी विरहातुरः॥१॥
भाषा-वरतन्तुमुनि बोले लक्ष्मणसहित रामजी कबंधका वचन सुनके
दुःखी होयके फिर खोटे स्वभावरूप वनमें भमण करते भये ॥१॥
महामाहो वनचरः सद्धर्मपशुहिंसकः॥
दुहिता तस्य विप्रेन्द्र चंचला मतिरुत्तमा ॥
शबरी सा समाख्याता सज्जनानाञ्च संगतः॥२॥
भाषा-हे विरेंद्र स्नान ध्यान दान जप पूजा विनय नमस्कार इन आदिऔर
जो अनेक प्रकारके सुंदर धर्म तो सब पशु अये हैं तिनको मारनेवाला जो बडा
मोह सोई भील है जीवोंकी चंचलमति उसकी कन्या है शबरी उसका नाम है
सुंदर २ धर्म सो ब्राह्मण है तिन ब्राह्मणोंकी संगतको शबरी करती आई ॥२॥
चकार रामचंद्रस्य भक्तिं सा शबरात्मजा ॥
तदाश्रमं जगामाशु रामो लक्ष्मणसंयुतः॥४॥
भाषा-उस संगतिके प्रभावसे रामजीको भक्ति शबरी करती आई तिसके
आश्रमपर लक्ष्मणसहित समजी जाते भये ॥ ३ ॥
शुबरी पूजयामास रामं सभ्रातृकं तदा ॥
स्थैर्यस्वभावसाहित्यैः प्रार्थनेन विशेषतः॥४॥
भाषा-शबरीका स्वभाव धर्ममें बहुत स्थिर है अनेक दुःख परे तौजी भगवा-
नका भजनरूप धर्म छोडती नहीं उस धर्मरूप पूजनकी सामग्री करके तथा बहुत
प्रार्थना करके लक्ष्मणसहित रामजीका पूजन करती गई ॥ ४ ॥
शरीरं रामप्रेमानौ दहंन्वाक्यमुवाच सा ॥
रामाये नलिनी पश्य सरश्चैव तदुद्भवम् ॥५॥

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भाषाटीकासहित।
भाषा-रामजीका प्रेम शबरीके हृदयमें बहुत है, उसी प्रेमरूप अग्नि करके
देहे जलायके बोलती भई, हे रामजी ! आपके रस्में एक तलाई है, उसका .
पंपा नाम है, तथा उसी वलाईसे उत्पन्न भया एक तलाव है, उसका पंपासर नाम है
इन दोनोंको आप देखोगे ॥५॥
किष्कियां च पुरी रम्या प्रवर्षणगिरिन्तथा ।।
आस्ते तस्य गिरेमूर्ध्नि सुग्रीवः कपिसत्तमः॥६
भाषा-तथा बडी सुंदर किष्किंधा पुरी तथा प्रवर्षण पर्वत इनकू आप
देखोगे, प्रवर्षण पर्वतके शिखरपर सुग्रीव नाम कपि रहता है ॥ ६ ॥
तं गच्छ जानकीनाथ स ते कार्य करिष्यति ॥
इत्युक्त्वा स्वतनुं दग्ध्वा गता स्वर्ग हृदालये ॥७॥
भाषा-हे जानकीनाथ ! तिस सुग्रीवको दर्शन देनेके वास्ते आप जावोगे तब
सुग्रीव आपका सब काम करेगा, ऐसा रामजीसे कहके शबरी शरीरको भस्म
करके अपने हृदयमें जो स्वर्गपुरी है, उस स्वर्गपुरीको गई ॥ ७ ॥
रामोऽपि त्वरितं प्राप नलिनीम्फुल्लपंकजाम् ॥
शांतिरूपां धैर्यजलां निर्मलज्ञानसन्तटाम् ॥८॥
भाषा-तथा रामजीभी जीवोंकी शांतिरूप पंपानाम तलाईको जाते आये,
कसी तलाई है, धीरजरूप जल करके भरी है, तथा मलरहित जो ज्ञान सोई
तिस तलाईके तट हैं ॥ ८॥
निश्शंकपंकजां स्वच्छां सरश्चैव महासुखम् ॥
न पुनर्जन्मतोयेन संयुतं तच्च राघवः ॥९॥
भाषा-काम आदि राक्षसोंके जयसे हीन जो स्वभाव पंपाको सोई कमल
है, बहुत निर्मल तलाई है, ऐसी जो शांतिरूप तलाईको सुख जो है सोई पंपासर
नाम तलाव है, शांतिको सेवन कियेसे वारंवार जन्म नहीं होता, सोई जल है,
तिस जलसे तलाव भरा है॥९॥

वेदान्त रामायण कि०, कां।
स्नानं चकार तत्तोये लोकविस्तारणं प्रभुः ॥
प्रवर्षणं गुरुध्यानं शिखरं तद्विचिंतनम् ॥ १० ॥
भाषा-तलावके सुयशको लोक २ में विस्तार रामजी करेंगे, सोई यश
विस्ताररूप स्नान उस तलावमें रामजी करते भये, गुरुका रातदिन ध्यान करना
सोई प्रवर्षण नाम पर्वत है, रातदिन गुरुदेवका वचन चितवन करना सोई प्रवर्पण
पर्वतका शिखर है ॥१०॥
गुरूपदेशस्सुग्रीवस्तद्वियोगेन वालिना ॥
त्रासितो दुःखितोऽत्यन्तं सुचिरं तापतापितः ॥११॥
भाषा-गुरुदेवका उपदेश सोई सुग्रीव है, गुरुका वियोग सोई वाली है,
तिस वाली करके सुग्रीव बहुत दुःख तथा त्रासको प्राप्त भयाहै, तथा बहुत दिन-
तक वाली सुग्रीवको अपनी तेजरूप अग्निसे जलाता भया, क्योंकि सब दुःख
साधुलोग सह लेते हैं, परंतु गुरुका वियोग क्षणमात्रभी नहीं सहसक्ते ॥ ११ ॥
निरीक्ष्य वीरावायान्तौ प्रेषयामास सत्वरम् ।।
बलवन्तं महावीर हनुमंतं तदन्तिके ॥ १२ ॥
भाषा-तब प्रवर्षणके शिखरपर बैठा जो सुग्रीव सो राम लक्ष्मणको आवे
देखके शीघही वीरोंमें बड़ा वीर ऐसा जो हनुमान तिसको रामजीके सामने भेजते
भये ॥ १२॥
तृष्णांजनेयं सहसा मोह श्वाससमुद्भवम् ॥
सुखेच्छा हर्षलांगूलं तन्मयादिलसत्तनुम् ॥ १३ ॥
भाषा-कैसे हनुमान हैं तृष्णा तो अंजनी है तथा जीवकी शरीरकी श्वास
सो वायु है इन दोनोंके संयोगसे उत्पन्न भये जो हनुमान इनको मोह नाम
और मोहरूप भी है राम के प्रेमका सुख प्राप्त होनेकी इच्छामें हनुमान्को हर्ष
बहुत होता है सोई हर्ष हनुमान्को पुच्छ आदि सब अंग है तिसके हर्षमें रात-
दिन उन्मत्त रहना आदि जो कर्म है जैसा रामजीकी सेवा इसी प्रकारके 'कर्ममें
मत्त रहना सोई हनुमानके शरीरकी शोना है ॥ १३ ॥

1- । भाषाटीकासहित ।। किंचित्कुशालविप्रस्य धृत्वा रूपमगात्कपिः ॥ रामान्तिकं प्रगच्छन्तं प्रोवाच कपिसत्तमः ॥१४॥ भाषा-थोडा सुख सोई ब्राह्मणका रूप धरके रामजीके पास हनुमान जाने भये रामजीके दर्शनका प्रेम सोई हनुमान्का रामजीके पास जाना है राम- जीके पास जाते जो हनुमान् तिससे सुग्रीव बोले॥ १४ ॥ यदीमा वालिना प्रेष्यौ दुष्टौ सम्भ्रमविभ्रमौ ॥ तदा ते चेतनं प्राप्य त्यक्ष्यामीदमहं गिरिम् ॥ १५ ॥ भापा-जो ये दोनों श्रम तथा विश्वम होवें और वालीके भेजे आवे हो तब तुम्हारी चेतनरूप जो अनुशासन तिसळू पायके मैं इस पर्वतकू छोडके भाग जाऊं ॥ १५॥ इत्युक्तः कपिराजेन सत्वरं हनुमान्कपिः ॥ आजगामातिहर्षेण रामपादाब्जपट्पदः ॥ १६॥ भाषा-ऐसा सुप्रीवने हनुमान्से कहा हनुमान सुनिके रामजीके पद कमल हैं तिसके रस लेनमें चमररूप हनुमान सो बड़े हर्षसे रामजीके पास आते भये॥१६॥ नमस्कृत्य च द्वौ वारी को युवां जगतीपती ॥ मुनिवेषेण पृथिवीं चरन्तो स्वेच्छया बली ॥ १७ ॥ भाषा-राम लक्ष्मणको नमस्कार करके हनुमान् पूंछते भये आप दो जने कौन हो ईश्वरकी प्रीतिके पति हो मुनिको रूप धरिके अपनी इच्छासे पृथ्वीमें भ्रमण कर रहे हो ॥१७॥ हनुमद्वचनं श्रुत्वा वर्णयामास लक्ष्मणः ॥ श्रुत्वा तदाक्यमतुलं शमरूपं कपीश्वरः ॥ १८॥ भापा-हनुमान्के वचन सुनके सब चरित्र लक्ष्मण कहते भये शम दम यम नियम आचार आदि कर्म लक्ष्मण कहता भया तिस शमरूप लक्ष्मणके वचनको हनुमान सुनिके ॥ १८॥ - - 1 1 " -- वेदान्त रामायण कि० का। कथयामास सर्वं हि सुग्रीवापत्तिकारणम् ॥ युवयोर्भविता मेत्री निशंका यदि राघव ॥ १९ ॥ भाषा-गुरु उपदेशरूप सुमीवकी संपूर्ण विपत्ति हनुमान रामजीसे कहते भये । हनुमान बोले कि हे रामजी! आप तो विवेक हो और सुग्रीव गुरुका उप- देश है दोनों जनेकी मिताई जब होवे ॥ १९ ॥ तव तस्य च सर्वं हि कार्य भवति शोभनम् ॥ इत्युक्त्वा तो समारोप्य स्वपृष्टे रघुनंदनो ॥ २० ॥ भाषा-तव सब तुम्हारा तथा सुग्रीवका काज होवे । गुरुके वियोगरूप , वालीको तो आप मारो और मन रावणके मारने में सहाय सुग्रीव करेगा ऐमा हनुमान् कहके रामजीके प्रेमका सुख तिसके हर्परूप हनुमानके शरीरको शोलारूप पीठपर राम लक्ष्मणको बैठायके सुग्रीवके पास चलने गये ॥२०॥ जगाम चंचलमतिमनपृष्टे कपीश्वरः॥ नयित्वा यत्र सुग्रीवस्तत्र वीरायवेशयत् ॥ २१ ॥ भाषा-जिस शिखरपर सुग्रीव विराजे थे उसी स्थानपर राम लक्ष्मणको हनुमान प्राप्त करते भये । इन दो लोकोंका एकान्वय है।॥ २१ ॥ चकार मैत्रीन्दु धान्दुर्जनेरिन्द्रियोद्भवेः ॥ मध्ये कृत्वा गुरोर्भकिमनिन्द्रो गुरुभावनाम् ॥ २२ ॥ भाषा-रामजी तथा सुग्रीव अपनी अपनी गुरुदेवकी भावनारूप मित्रता करते भये, दुष्ट इन्द्रियों करिके उत्पन्न जो बुरे कर्म सो सब दुर्जन हैं तिन्हों कारके दुःखसे काटने योग्य हैं, सहजमें नहीं कट सकेगा गुरुदेवकी भक्तिरूप अमिको रामजी अपने तथा सुमीवके बीचमें रखके मित्रता करते भये, राम मुग्रीवका निश्चय सोई बीच है ॥ २२॥ जीबवान् जहषे तत्र मायाचेष्टोऽतिदुःसहः ॥ तस्यै च्छायास्वभावेन नलनीली महावलौ ।। लघुदीघौ तदाकारी चक्रतुहर्पमुत्तमम् ॥२३॥ .

सम्मान पुस्तकालय श्री -- Race भाषाटीकासहित। १०३ भाषा-मायाका विचार सोई जांबवान है, बडा कठिन है सो राम सुग्रीवकी मित्रता देखके खुशी भया, तथा जांबवानकी छायाका स्वभाव दो प्रकारका एक बडा दूसरा छोटा सो नल नील हैं, सोभी बड़े हर्षको प्राप्त भये ॥ २३ ॥ हिंसापराधं वसनन्द्रिजभावं च रावणे ॥ भूषणं जानकीत्यक्तन्दर्शयामास वानरः ॥ २४ ॥ भापा-रावण ब्राह्मण है तिसमें ब्राह्मणका भाव तथा ब्राह्मण मारनेसे ब्रह्म- हत्या होती है येही दोनों गहना तथा वस्त्र जानकीके भये हैं इन दोनोंको पेस्तर रावणके रथमें बैठी जो जानकी त्यागि गयीथी, कारण रावणको ब्राह्मण नहीं मानना, ये तो चांडाल है, तथा रावणके मारेकी हत्याकोनी नहीं डस्ना-ऐसा वस्त्र भूपण सुग्रीव रामजीको दिखाते अये ॥ २४ ॥ 10,416 छातजानकीवस्त्रं भूपणं रघुनन्दनः ॥ तच्चिंतनविलापं च तत्क्षणे कृतवान्प्रभुः ॥२६० भाषा-पहिले लोकमें वर्णन जया जो गहना वस्त्र जानकीको तिसको रामजीने अपने नेत्रोंसे देखिकै जानकीकी चिंता रामजी रात दिन करते आये सोई रामजीका विलाप है ॥२५॥ पश्चात्पप्रच्छ सुग्रीवं कस्माद्रससि कानने ॥ इति पृष्टः समारंभे स्वकार्यकथनं कपिः ॥२६॥ भाषा-ऐसा विलाप करके पीछे सुग्रीवसे रामजी पूंछते भये कि दुःस्वक्षा- वरूप वनमें तुम क्यों बसते हो, रामजी ऐसा पूछते हुए तब सुग्रीव अपना हाल कहने लगा ॥ २६ ॥ उवाच सर्व कपिसत्तमस्तदा स्वकर्मदुःखं बहुतापवर्द्धनम् ।। चित्तं समाधाय रघूत्तमस्तदा शुश्राव सर्व कपिवयवर्णितम् ॥२७॥ भाषा-बहुत संतापकी वृद्धि करनेवाला जो अपना कर्म है तिस कर्मको. +- -

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१०२
वेदान्त रामायण कि० कां।
गुरुका उपदेशरूप जो सुग्रीव है सो सब चरित्र रामजीसे कहता भया, और
विवेकरूप रामजी भी, चित्तको स्थिर करिके सुग्रीवका हाल सुनते भये ॥२७॥
इति श्रीवेदान्तरामायणे किष्किंधाकांडे पं० शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरन-
न्तुसंवादे सुग्रीवरामचंद्राविलाप प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥ १॥
वरतन्तुरुवाच।
विवेकरामचन्द्रेण पृष्टः प्रोवाच राघवम् ॥
सुग्रीवो दुःखितोऽत्यन्तं रामं सत्यपराक्रमम् ॥१॥
भाषा-वरतन्तुमुनि फिर बोले, रामजीसे पूछा जो सुग्रीव सो बहुत दुश्वी
होके रामजीसे बोलता जया ॥३॥
वालिनश्च ममोत्पत्ति कपीनां चैव विस्तृतम् ॥
अयोध्याप्राप्तराज्याय मुनिस्ते कथयिष्यति ॥२॥
भाषा-हे रामजी ! जब सुमतिरूप अयोध्या आप राजगादी पर बैठोगे.
तब कोई मुनि वालीकी तथा मेरी तथा सब वानरोंके जन्मकी कथा कहेंगे ॥२॥
मम भ्राता रघुश्रेष्ठ वालिय॒ष्टोऽतिबुद्धिमान् ॥
ब्रह्मणा स्थापितो राज्ये कपीनां रघुनंदन ॥ ३ ॥
भाषा-हे रामजी! गुरुका उपदेश रूप तो मै हूं सुग्रीव मेरा नाम है
और मेरा बड़ा भाई गुरुसे वियोग होता है सो वह वालिनाम है, वालिका
कर्म तो मेरे जन्म पीछे होता है परंतु वालि तो मेरे पस्तर जन्मा है, क्योंकि
संयोगसे पहिलेही वियोग जन्मता है सो ऐसे वालीको ब्रह्माने वानरोंका
राजा किया ॥३॥
मनुष्यभावा ये सर्वे गुरो ते कपयः स्मृताः॥
मनुष्यभावकर्माणि चासंख्यानि च चंचलाः॥४॥
भाषा-जो मनुष्यका कर्म अनेक प्रकारका है, जन्म, मरण, हानि, लाभ,
दुःख, सुख आदि और जो बहुत कर्म हैं सो सब गुरुमें देखना, ऐसे अनेक
प्रकारके स्वभाव सोई गिनतीसे हीन वानर हैं ॥ ४ ॥

- - , , भाषाटीकासहित । १०३ गुरौ कुभावनालोकास्ते ऋक्षा हृदिजा मुने । गुरौ दुर्बुद्धिरत्यन्तं सा किष्किंधापुरी प्रभो ॥ ६ ॥ भाषा-और जुवारी, चोर, व्यभिचारी, नसेबाज, परनिंदक, रुपण इन आदि और जो अनेक बुरे कर्म है सो सब ये लक्षण गुरुमें देखना, सोई ऋक्ष हैं तथा गुरुमें बहुत खोटी बुद्धि करना सोई बुद्धि किष्किंधा पुरी है ॥ ५ ॥ तस्यां स्थितो महाबुदिौली विगतकल्मषः ॥ यावत्स्ववलसामथ्र्य तावदुर्मतितां गुरौ ॥ जीवानां कारयामास तचक्षकपिशासनम् ॥ ६ ॥ भाषा-तिस किष्किंधापुरी, टिकके. बडा बुद्धिमान् पापसे रहित ऐसा जो वाली सो वानरोंका राजा होता गया, जहांतक गुरुके वियोगरूप वालीको जोर चला तहांतक जीवोंको गुरुमें खोटी मति करायः दिया, ऐसा वानरोंका तथा मोका राज्य करता भया ॥६॥ तस्य भार्या रघुश्रेष्ट तारानाम्नी शुभावलिः ॥ चिंता गुरुवियोगस्य तस्यां जातोऽगदः सुतः॥७॥ भाषा-हे रामजी ! गुरुके वियोगकी चिंता सोई वालीकी स्त्री है तारा उसका नाम है, तिस तारामें बाल के अंगदनाम पुत्र भया ॥ ७ ॥ उपायो गुरुदेवस्य वियोगशमनस्य च ॥ मम भार्या महाराज रुमा नाम्नति विश्रुता ॥ गुरौ राज्ञा सदा ग्राह्या सा-मम प्राणवल्लभा ॥ ८॥ भाषा-गुरुके वियोगकी शांति करनेका उपाय जो है सोई अंगद है, हे महाराज ! नित्य गुरुकी आज्ञा विना विचारे ग्रहण करना ये नहीं विचारना कि ये आज्ञा गुरु खोटी देते हैं या अली देते हैं ऐसी मति सो मेरी स्त्री रुमा उसका नाम है॥ ८॥ एवं वालिमहावीरश्चकार राज्यमुत्तमम् ॥ कपीनां चिरकालं च ममापि प्रीतिवर्द्धनः ॥ ९॥ - .

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१०४
वेदान्त रामायण कि० का ।
भाषा-इस प्रकारसे वालीने बहुत दिनतक कपियोंका राजा होकर राज्य
किया तथा मेरीभी प्रीति बढाई ॥ ९ ॥
एकदा दुंदुभिर्नाम राक्षसो रघुनंदन ॥
आजगाम निशामध्ये वालिं जेतुन्निशाचरः॥ १० ॥
भाषा-हे रघुनंदन ! एकदिन रात्रिमें वालीको जीतने वास्ते दुंदुभी नाम
राक्षस आता भया ॥१०॥
अभिमानो गुरौ राम दुंदुभिर्बलवत्तरः॥
गुरौ मानस्य वा प्रीतिः सा निशा रघुनंदन ॥११॥
भाषा-जीवोंको गुरुमें अभिमान कि सब संसार छोटा है और हमारे गुरु
बड़े हैं ऐसा मान सोई दुंदुभी है, बडा बली है, और उसी गुरुके अभिमानकी
प्रीति सोई रात्रि है ॥ ११॥
तत्सौख्यांधयुता मध्यं सौख्याचं हर्षकारणम् ॥
दुंदुभिः क्रोधसंयुक्तोऽथाजुहाव कपीश्वरम् ॥ १२ ॥
भाषा-उसी गुरुदेवके अभिमानकी प्रीतिमें सुख मानना सोई अंधकार
है, तिस करके रात्रियुक्त है, उसी प्रीतिके सुखमें बड़ा हर्ष मानना सोई
अर्धरात्रि है, ऐसा जो दुंदुभी राक्षस सो क्रोध करके वालीकू पुकारने लगा
अरे दुष्ट! गुरुके वियोगरूप वाली तूने बहुतसे जीवोंको गुरुसेवासे दूर करके
बैठा है सो तुझको मारके सब जीवोंकी गुरुदेवसे मुलाकात कराऊंगा ॥ १२ ॥
युद्धाथै स्वस्वकार्याथै तच्छ्रुत्वा कपिसत्तमः ॥
आगत्य त्वरितं वीरो जवानकेन मुष्टिना ॥ १३॥
भाषा-ऐसे शब्दको सुनिके वाली तो जीवोंको गुरुसे वियोग करने वास्ते
और दुंदुभी जीवोंको गुरुसे मिलाप कराने वास्ते युद्ध करते भये, वाली एक
हाथकी मुट्ठी करके दुंदुभीको मारने लगा ॥ १३॥ .
ताडितो मूर्खतामुष्टया दुद्रावाहढवेगतः ॥
स्वगुहां गवाई वै आविवेश त्वरान्वितः ॥१४॥

२ भाषाटीकासहित। १०५ भापा-जीवोंकी मूर्खबुद्धि सोई वालीके हाथकी मुष्टि है तिस करके मारा गया जो दुंदुनी है सो बढे वेगसे भागके गुरुके अभिमानरूप दुंदुभीकी बुद्धि जो है सोई दुंदुजीकी गुहा है, तिस गुहामें घुस गया ॥ १४ ॥ वालिविवेश क्रोधेन तं हन्तुं तां गुहां सुधीः ॥ भ्रातृस्नेहपरीतेन मयापि गमनं कृतम् ॥ मां स्थाप्य सा गुहाद्वारे सत्संगतिविवर्जिते ॥ १५ ॥ भापा-दुंदुनीको मारने वास्ते वाली भी उस राहामें प्रवेश करता भया. भाईका स्नेह जो है सोई मेरा गमन है इस प्रकारसे मैं भी वालीके पीछे जाता जया. सत्संगतिसे वर्जित जो कर्म सोई गृहाका दरवाजा हैतिस दरवाजेपर वालीने मुझको टिकायके ॥ १५॥ तत्र युद्धं कृतं तेन वालिना च परस्परम् ॥ स्थित्वाहं मासमेकञ्च भ्रातृस्नेहस्वरूपिणम् ॥ १६ ॥ भापा-गुहाके भीतर गया तब वालीसे तथा दुंदुभीसे युद्ध होता हुआ मेरे ऊपर वालीका स्नेह बहुत रहा सोई एक मास गुहाके दरवाजेपर खडा रहा ॥१६॥ वालिना निहतो रक्षस्तदा द्वारे ववाह च ।। बहुरक्तं मया ज्ञातं स्वभावचलनं सखे ॥ १७ ॥ भापा-वालीने दुंदुनीको मारा तव गुहाके दरवाजेपर मेरे स्वभावका चला- यमान होना सोई रक्त है सो बहुत बहता भया ॥ १७ ॥ हत्या वालिं समायाति मां हन्तुं दुंदुभिः शठः ।। एवं ज्ञात्वा शिलामेकां स्वबुद्धिजडतां नृप ॥ १८ ॥ भाषा-हे मित्र ! मैंने विचार किया कि गुरुदेवमें अभिमानरूप दुंदुभी बड़ा जबर्दस्त है क्योंकि दुंदुशीके ऊपर गुरुकी रूपा है सो वालीकू मारके मुझको मारेगा ऐसा जानके हे राजन् रामचंद्रजी ! मेरी बुद्धिकी जड प्रकृति सोई शिला है ॥ १८॥ F - स ॥ १०६ वेदान्त रामायण कि० कां। गुहादारि समाधाय किष्किधामहमागतः ॥ प्रसाकारात्कपयः पूर्वोक्ता रघुनन्दन ॥ १९ ॥ भाषा-मैंने अपनी जडप्रकृतिरूप शिलासे सत्संगति वर्जित राहाके दरवाजेको ढापिके किष्किंधापुरीको मैं चला आया तब हे रघुनदंन ! पेस्तर वर्णन भये जो कपि हैं सो मुझको जबर्दस्तीसे ॥ १९॥ सखे मामप्यमिच्छन्तमभिपेचुर्मदाकुलाः ।। गुरुदुर्बुद्धिकिष्किंधापुरीराज्ये स्थितो ह्यहम् ॥ २० ॥ भाषा-हे मित्र ! मेरे गुरुदेवमें दुर्बुद्धि रूप जो किष्किंधापुरी तिसका राज्य करनेकी मेरी इच्छा नहीं थी तो भी मुझको अनिमानसे उन्मत्त ऐसे जो कपि हैं सो मेरेको किष्किंधापुरीका राज्य देते भये ॥ २० ॥ गुरूक्तिनिश्चयस्यैव भंग प्राप्तं सुखं मया ॥ तत्रिहत्य समायातो वालिः स्वासनसंस्थितम् ॥ २१ ॥ भाषा-गुरुके वचनका विश्वास मेरा नष्ट होगया यह सुख किष्किंधाके राज्यमें मैं पाया हे रामजी ! दुंदुभीकू मारके गुरुके वियोगरूप वाली आयके आसन पर बैठा ॥ २१ ॥ दृष्ट्वा मां हन्तुकामश्च दुद्राव त्वरितो यदा ॥ तदाहं त्रसितो राम सबै सन्त्यज्य विद्रुतः ॥ २२ ॥ भाषा-मुझको देखके गुरुके वियोगरूप वालि मुझको मारने दाडता जया तब मैंने आपके गुरुदेवमें प्रेमभक्ति अनुरागसे वन आदि सब सुंदर कर्म तथा गुरुदेवकी आज्ञारूप मेरी रुमानाम स्त्री इन सबकू छोडकै व्याकुल होयके भाग गया ॥ २२॥ करुणां पृथिवीं सर्वा बभ्रामाहं सुदुःखितः॥ भ्रमणं दुर्बलत्वं मे स्वात्मनो रक्षणाय वै ॥२३॥ भाषा-करुणारूप संपूर्ण पृथ्वीपै मैंने भ्रमण किया परंतु वालीका द्रोही जानके मुझको किसीने शरण नहीं दिया क्यों कि गुरुका उपदेशरूप जो मैं हूँ

भाषाटीकासहित ।
१०७
सो गरीब और गुरुका वियोगरूप वाली बडा जबरदस्त है इसवास्ते मेरी दुर्ब-
लता सोई पृथ्वीमें मैंने भ्रमण किया है ।। २३ ॥
वियोगवालिनस्वासो वर्तते वसुधातले ॥
अविश्वासेन त्रासेन न लब्धं शरणं मया ॥२४॥
भाषा-गुरु) वालीका विश्वास नहीं है वालीका त्रास सोई है तिसत्रास करके
दयारूप पृथ्वीमें मैंने नमण किया परंतु मुझे कहीं शरण नहीं प्राप्त भई ॥२४॥
स्वस्वभावगुरोश्चाहं शरणं गतवानहम् ॥ .
तेनोपदिष्टः प्राप्तोऽहं गिरिमेनं समाश्रितः ॥२६॥
भापा-पीछेसे मेरा स्वभाव जो है सोई मेरा गुरु है तिसकी शरणकू मैं गया
तव मेरा स्वभावरूप गुरुदेवकी आज्ञा पायके इस पर्वतपर मैं टिका हूं ॥२६॥
राम नात्र समायाति वालिम मूलकृन्तनः ॥
मतंगशापाद्राजेंद्र तस्मादव स्थितो हाहम् ॥२६॥
भाषा-हे रामजी ! मतंग ऋषिके शापसे इस पर्वतपर मेरे मूलको काटने-
वाला वाली नहीं आता इस वास्ते में इस पर्वतपर टिका हूं ॥ २६ ॥
सुखेन मंत्रिभिः सार्द्ध चतुर्भी रघुनदन ॥
सखे ते संगतिं प्राप्य मनोऽहं सुखवारिधी ॥ २७ ॥
भाषा-हे रघुनंदन ! सुख करके चार मंत्री सहित यहां टिकाहूं, परंतु हे
मित्र ! अब आपकी संगति पायके सुखके समुद्रमें मन भया हूं ॥२७॥
गुरूपदेशेन सुकंठनाना विज्ञापितोऽभूदिति रामचन्द्रः ॥
पंप्रच्छ सर्व मुनिवर्यकृत्यं रघूत्तमो वालिविनाशभीतिम् ॥२८॥
भाषा-सुग्रीवनाम जो गुरूपदेश तिस करके कहे हुए जो रामजी हैं सो
मतंगके शापका हाल सुन जिससे वाली त्रास पाता है सो पूंछते भये ॥ २८ ॥
इति श्रीवेदान्तरामायणे किष्किवाकांडे शिवसहायबुधविरचिते सुग्रीव-
रामसंवादे रामप्रश्ने द्वितीयो मोक्षास्यः सोपानः॥२॥

. 7 १०० वेदान्त रामायण कि० कां। १ । वरतन्तुरुवाच। सुग्रीववाक्यावसरे रामः प्रोवाच सादरम् ।। को मतंगो मुनिः शापं यो ददौ कपितत्तमे ॥१॥ भाषा-वरतंतु मुनि बोले सुग्रीव वचन कहचुके तव रामजी सुग्रीवसे Jछते भये, बालीको शाप देनेवाले मतंगपि कौन है ॥१॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा हरिः प्रोवाच राघवम् ।। सखे शृणु कथामेतामेकदा महिषासुरः ॥२॥ भाषा -विवेकरूप रामजीका वचन सुनके गुरुदेवका उपदेशरूप सुग्रीव बोलते भये, हे मित्र ! यह कथा सुनने लायक है सो आप सुनो एक दिन महिषासुर राक्षस ॥२॥ वालिनं त्वसदाचारः स्ववशे करणाय च ॥ किष्किधामाजगामाशु भयवेगकलीर्पणैः ॥३॥ भाषा-हठ करके झूठ कर्मका आचरण करना सोई महिषासुर है, सो महिषासुर वालीको जीतने वास्ते किष्किंधा पुरीको आता भया, जीवोंको जय देना, काम करनेमें जलदी रखना, सब जीवोंसे लड़ाई करना सब जीवोसे ईर्ण करना इन करके ॥३॥ पादैरतैश्च संयुक्तो दुराचर्यादिसम्भवैः ॥ रोमभिर्भूरिभिप्तिन्देहं बिभ्रन्मदाकुलः ॥४॥ भाषा-ये चार महिषासुरके पग हैं, इन चार पगों करके युक्त है, खोटे कर्मसे उत्पन्न जो कर्म सो रोम है, तिस बहुत रोमको धारण करके उन्मत्त होरहा है ॥४॥ दुरुक्तिनिरयाभ्यां वै नेत्राभ्यां रागरंजितः ॥ पैशुन्यपरघाताभ्यां श्रृंगाभ्यां तीक्ष्णनिर्मितः ॥५॥ भाषा-खोटा वाक्य बोलना तथा नरकमें पडने माफिक कर्म करना ये दोनों कर्म दो नेत्र हैं इन दोनों कर्ममें स्नेह सोई लाल रंग है तिस करके दोनों " -- . । १०९ + - - । - भाषाटीकासहित । आंख लाल होरही हैं, चुगली करना तथा दूसरेकू मारना ये दोनों शोग हैं इन कोंमें प्रेम सो शींगकी धार है ऐसे शीग करके युक्त है॥५॥ पैशुन्यसुखपुच्छेन लंबमानेन शोभितः॥ एतादृशो हतो राम वालिना महिषासुरः॥६॥ भाषा-चुगलीमें सुख मानना सोई पूंछ है तिस पुच्छ करके शोभित है ऐसे महिषासुरकू वालीने मारडाला ॥ ६ ॥ हतमुत्थाय तं वीरश्चिक्षेप क्रोधसंकुलः ॥ पपात पर्वतस्यास्य समीपे रघुनन्दन ॥७॥ भाषा-हे रघुनंदन ! महिषासुरको मारके वाली उसकी देहको उठायके फेंकता भया, तब वह देह इस पर्वतके सामने आय पड़ी ॥ ७ ॥ स्वेच्छाचारमतंगस्य चाश्रमे पतितोऽसुरः ॥ दुष्टाचरणरक्तैश्च रंजितोऽभूत्तदाश्रमः ॥८॥ भाषा-वेद शास्त्र लोकको संमत नहीं मानना अपनी इच्छामें आबे सोई करना ऐसे स्वभावको शास्त्रमें मतंग ऋषि कहते हैं ऐसे मतंग मुनिके आश्रमपर मरा हुआ आय पडा, तथा खोटे कर्मका आचरणरूप करके जो रक्त उससे मुनिका आश्रम लाल होगया ॥८॥ गुरुच्यानगिरेरस्य समीपे वानरोत्तम ॥ यद्यागन्तासि वै मृत्युस्तत्क्षणे ते भविष्यति ॥ ९॥ भाषा-तब स्वेच्छाचाररूप मतंगमुनि बोले कि हे कपियोंमें उत्तम वालि । यह जो गुरुदेवको ध्यानरूप प्रवर्षण पर्वत है इसके समीप जो तू आवेगा तो उसी समय मरजावेगा॥९॥ एवं ज्ञात्वा रघुश्रेष्ठ नायात्यत्र कदापि च ।। एवं ज्ञात्वा च मे वासः कृतोत्र रघुनन्दन ॥ १० ॥ भाषा-हे रघुनंदन ! मैंने ऐसा जाना कि वाली यहां नहीं आसक्ता इस वास्ते इस पर्वतपर मैंने वास किया है ॥ १० ॥ , 2 - । - - १५० वेदान्त रामायण कि कां। श्रुत्वा च सुग्रीवसमीरितं वचः प्रोवाच रामः करुणाश्रुपूरितः॥ अहं हनिष्यामि तवाशु द्रोहिणं सखेऽभिषेच्यामि च त्वान्नुपासने ११॥ भाषा-ऐसा सुग्रीवका वाक्य सुनके रामजी बोले कि हे मित्र । तुम्हारे द्रोह करनेवाले वालीकू हम मारेंगे और तुमकू किष्किंधापुरीका राजा करेंगे ॥११॥ रामोक्ति कपिवीरस्तु निशम्योवाच राघवम् ॥ किष्किंधाधिपति मान्त्वं वानराणामधीश्वरम् ॥ १२॥ भाषा-विवेकरूप रामजीका वचन सुनके गुरुका उपदेशरूप सुग्रीव बोले कि हे रामजी ! जो आप मेरे गुरुदेवमें खोटी बुद्धि करना ऐसी किष्किंधा पुरीका राजा ॥१२॥ करिष्यसि यदा वीर तदा ते जानकीमहम् ॥ पुरीमपि शुभां कुय्यो सुबुद्धिं गुरुसत्तमे ॥ सप्तपातालविवरात्सप्तोर्वाद्रघुनन्दन ॥ १३ ॥ भाषा-करोगे तब मैं पुरीकोभी सुंदरबुद्धि शुरुमें कर देऊंगा, तथा जान- कीकोमी सात पाताल नांचे सात ऊपर ॥ १३ ॥ विनाश्य जानकीदुःखदातारं सकुलम्प्रभो ॥ सगुरुं सपुरं दुष्टं समित्रं सहचारिणम् ॥ १४ ॥ भाषा-मैंभी जो जानकीको दुःख देनेवाले दुष्टको परिवार गुरु पुर मित्र संग रहनेवाले इन सबको नाश करके ॥ १४ ॥ दास्यामि तुभ्यं जनकात्मजामहं सखे ध्रुवं प्राप्य कपीश्वरेश- ताम् ॥ हनिष्यसे त्वं कथमय वालिनं वीरं सुवीरार्चितपाद- पल्लवम् ॥ १५॥ भाषा-जानकीको आपकू देऊंगा, परंतु हे मित्र ! जो मुझे किष्किंधाका राज्य मिलेगा तो हे रामजी! बडे बडे वरि जैसे ध्यान ज्ञान उपदेश इन आदि और अनेक सुंदर कर्म वालीके पगका पूजन करतेहैं कि हे गुरुके वियोग दुष्ट वाली! तू जीवोंको गुरुदेवसे वियोग मत कर ऐसे वीर वालीको आप अभी - । । . कैसे मारोगे ॥ १५॥ . -

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भाषाटीकासहित ।
इत्युक्त्वा दर्शयामास सप्ततालान्कपीश्वरः॥
रामचंद्राय त्वरितं शुष्कं च दुंदुभेशिशरः ॥ १६॥
भाषा-रामजीसे सुग्रीव ऐसा कहके रामजीको सात तालके वृक्ष तथा
दुंदुभीका सूखा शिर देखाते भये ॥१६॥
कुतृष्णायास्सुतान्तप्त लंबमाननभश्वरान् ॥
परसौख्यविनाशं च परवित्तकलत्रयोः ॥ १७ ॥
भापा-खोटे कर्ममें तृष्णा करना तिस तृष्णाके सात पुत्र जमीनसे
आकाशतक ऊंचे दूसरे जीवके सुखका नाश करना और दूसरे जीवके धन
तथा स्त्रीको ॥१७॥
हरणं सुज्ञविद्वेषमन्याये वर्तनं सदा॥
स्वस्त्रीनिरादरं नित्यं मरणाचिंतनं तथा ॥ १८ ॥
भापा-हरण करना तथा ईश्वरके गुणको जाननेवाले जीवोंसे वैर रखना
रातिदिन अन्याय कर्ममें रहना अपनी स्त्रीका रोज अनादर करना मरनेकी
चिन्ता नहीं करना ॥ १८॥
एतान्तालान स्वस्वसुखैः पत्रैश्च वदितान्कपिः ॥
प्रोवाच दर्शयित्वेतां धृत्वा कंपयतेऽसकृत् ।। १९ ॥
भाषा-ये सात कर्मरूप सात तालके वृक्ष हैं ये सात तालके वृक्ष अपने
अपने कर्ममें सुख मानना उसी सुखरूप पत्र करके वर्द्धित होरहे हैं, सुग्रीवने ऐसे
सात तालके वृक्ष रामजीको दिखायक रामजीसे बोले कि इन सातों वृक्षोंको
एकही वार वाली पकडके हिलाता है ॥ १९ ॥
तालासोकवाणेन यदि च्छेतुं क्षमः प्रभो ॥
तदा वालिवधे राम विश्वासो मे प्रजायते ॥२०॥
भापाहे रामजी ! जो एक वाण करके आप सात वृक्षोंको काटने में समर्थ
हो तव वालीके मारनमें विश्वास मुझको होवे ॥२०॥
सर्वप्राणोत्तमं ज्ञानं गुरौ यद्रघुनन्दन ।।
तहुंदुभिशिरश्चेदमाट्टै क्षिप्तच वालिना ॥२१॥

- ११२ वेदान्त रामायण कि० कां । भाषा -हे रघुनंदन! सब जीवोंसे अपने गुरुको उत्तम मानना सोई दुंदुभिका शिर है सोई शिर यह आपके सामने पडा है यह गीला रहा था तब वालीने उठायके यहाँपर फेंक दिया ॥२३ ॥ तवास्योत्क्षेपणे राम चेत्पश्यामि पराक्रमम् ।। तदा त्वया हतं मन्ये वालिनं वीरसंमतम् ॥२२॥ भाषा और अब यह शिर सूखा है तो भी आप इसके उठानेकोजी जो समर्थ हो तो मैं जानूं कि आपके मारे वाली मरेगा ॥ २२ ॥ इत्युक्त्वा कपिना रामो विवेको ज्ञानवारिधिः ।। सत्संगार्बुदछायायाः छायाछायादेन वे ॥२३॥ भाषा-ऐसा सुग्रीवका वचन सुनके ज्ञानके समुद्र रामजी विवेकरूप सो सत्संगकी अर्बुदभाग जो छाया तिस छायाकी छायाके अर्बुद भागका एक भाग सोई बाण है तिस एक बाण करके एकही दफेमें सातों वृक्षोंको काट डारे यह युग्म है ॥ २३ ॥ भागनेकेषुणा रामश्चिच्छेद युगपत्तरून् । कदापि रामचंद्रस्य स्वभावोऽभ्यासतश्चलेत् ॥२४॥ भाषा-विवेक रूप रामनीका स्वभाव कमी ईश्वरके ध्यान करनेसे चलाय- मान होता है और कभी चलायमान नहीं होता ऐसा स्वभाव रामजीके दोनों प्रग हैं यह युग्म है ॥ २४ ॥ कदापि न चलेत्तस्मादिमी पादौ प्रकीर्तितौ ॥ अचलो दक्षिणो ज्ञेयश्चलों वाम इतीर्यते ॥२५॥ भाषा-रामजीका यासमें अचल स्वभाव सोई रामजीका दक्षिण पग और चलस्वभाव वाम पग है ॥ २५ ॥ याश्चलाश्चलयोः प्रीत्यस्ताश्चांगुल्यः प्रकीर्तिताः ॥ द्वयोरचलवृत्तं यत्तदंगुष्टं निगद्यते ॥ २६॥ भाषा-चल पगमें तथा अचल पगमें जो बहुत प्रीति सो दोनों पोंकी अंगुली हैं रामजीके दोनों पगोंका अचल स्वभाव सो दानों पोंका अंगूठा है ॥ २६ ॥ gher A

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भाषाटीकासहित ।
तच्छिरश्चाशु चिक्षेप वामांगुष्ठेन राघवः॥
एतत्पराक्रमं दृष्ट्वा रामस्य कपिसत्तमः ॥२७॥
भापा-रामजीने वामपगके अंगूठेसे उठायके जल्दी दुंदुभीका शिर बहुत दूर
फेंकदिया ऐसा रामजीका पराक्रम सुग्रीव देखके ॥ २७ ॥
राज्यस्पृहां परित्यज्य ज्ञानयुक्तो बभूव ह ॥
बद्धा करांजलिं रामम्प्रोवाच विनयान्वितः ॥२८॥
भाषा-राज्यकी इच्छा छोडके ज्ञानको प्राप्त भया जो सुग्रीव है सो हाथ
जोडके रामजीसे बोला ॥२८॥
राज्यं न कांक्षे रघुवीर दुःखदं त्वत्पादसल्लमरजोऽभिवांछकः ॥
भवामि नित्यन्तव दासकिंकरः प्रदेहि राज्यं तव सेवनावधिम् ॥२९॥
भाषा-हे रामजी! जिस किष्किंधापुरीका राज्य पायके गुरुदेवमें दुष्टबुद्धि
होव ऐसा दुःख देनेवाले राज्यको मैं नहीं चाहताहूं आपके चरणकी धूलि
चाहताहूं आप आपके चरणोंकी सेवनरूप राज्य मेरेको देवो ॥ २९ ॥
इति श्रीवेदांतरामायणे किष्कियाकांडे शिवसहायबुधविरचिते
सुग्रविनिश्चय तृतीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥३॥
वरतन्तुरुवाच।
सुग्रीववचनं श्रुत्वा संशिक्ष्य कपिसत्तमम् ॥
प्रेरयामास युद्धाय वालिना रघुनन्दनः ॥ १॥
भाषा-वरतंतु मुनि बोले सुग्रीवका वचन सुनके रामजीने सुग्रीवको सिखाके
वालिके संग युद्ध करनेको भेजा ॥ १ ॥
चतुभिमंत्रिभिस्सादै राघवाभ्यां च संयुतः ॥
क्रोशेके गुरुदुर्बुद्धिकिष्किंधायाश्च निश्चये ॥२॥
भाषा-चार मंत्री सहित तथा रामलक्ष्मण सहित गुरुसे दुष्टबुद्धिरूप जो
किष्किंधा तिसके एक कोशपर ॥२॥

T वेदांत रामायण कि०कां। तहरे लक्ष्मणौ स्थित्वा चत्वारश्चैव मंत्रिणः ॥ सुग्रीवेण तदाहूतो वालिवीरशिरोमणिः ॥३॥ भाषा-सुग्रीव खडा होके गुरुके वियोगरूप वालिको पुकारता भया और सुग्रीवसे कुछ दूरपर राम लक्ष्मण और सुग्रीवके चार मंत्री ये सब खडे रहे ॥३॥ तूर्णमागत्य युयुधे स्वानुजेन कपीश्वरः॥ गुरुवाक्येषु विश्वासस्सुग्रीवपुच्छवर्णनम् ॥४॥ भाषा-गुरुकी वाक्यमें विश्वास मानना सोई सुग्रीवको पुच्छ है कपीश्वर जो वालि है सो जलदी आयकर अपने भाई सुग्रीवसे युद्ध करता भया ॥४॥ तदविश्वासज्ञानं च वालिपुच्छनिगद्यते ॥ ताभ्यां युद्धं च द्वौ चक्रे पुनर्मुष्टया प्रजनतुः ॥५॥ भाषा-उसी गुरुकी वाक्यसे विश्वास नहीं मानना सोई वालिकी पुच्छ है सो पहिले तो दोनों वीर पूंछसे युद्ध करते भये पीछे मुष्टिसे युद्ध करते भये ॥५॥ ब्रह्मसृष्टौ च यद्वस्तु तन्मे सर्व गुरुहरिः ॥ इति बुद्धिः समाख्याता सुग्रीवमुष्टिबंधनम् ॥६॥ भाषा-ब्रह्माके बनाये जो तीन लोक चौदह भुवनमें जो चीज है सो सब चीजरूप मेरा सुरु है ऐसे गुरुको ब्रह्मरूप माननेवाली बुद्धि सो सुग्रीवकी मुष्टिका है ६ बुद्धिस्तदन्या या तस्मिन्सा वाल्यंगुलिवंधना॥ मुष्टया युयुधतुर्वी सुग्रीवो वालिताडितः ॥ ७॥ भाषा-और गुरुमें ऐसी बुद्धिसे हीन जो दूसरी बुद्धि है कि जैसी जुदी जुदी सब वस्तु है तैसेई गुरुजी है ऐसी बुद्धि वालिका मुष्टिबंधन है ऐसी मुष्टिसे वालीको सुग्रीवने मारा सुग्रीवको वालीने मारा । सुग्रीव तो चाहता है कि गुरुकें वियोगरूप वालीको मार डालूं तो जीवोंसे गुरुवियोग नहीं होवे और वाली चाहता है कि गुरुके उपदेशरूप सुग्रीवको मार डालूं तो गुरुको उपदेश संसा- रमें नष्ट होजावे और मेरा राज्य रहे सो वालीने सुग्रीवको मारा तब सुग्रीव दुःखी होगया ॥ ७॥ .

३ -- + 1 भाषाटीकासहित । ११५ पाव्यायाहुःखितो भूत्वा गिरिमूनि स्वमाश्रमम् ॥ स्पृष्टो विवेकरामेण करेण कपिसत्तमः॥८॥ भाषा-तब सुग्रीव दुःखी होके भागके पर्वतपर अपने आश्रमपर आया , तब विवेकरूप रामजी अपना हाथ सुग्रीवके ऊपर फेरते भये कृपा करके देखना सोई हाथ फेरना है ॥ ८॥ गतश्रमः सुखं पदे शौर्येण मांत्रभिः सह ॥ उवाच रामं सुग्रीवः कथं घातयसेरिणा॥९॥ भाषा-तब सुग्रीवके देहकी पीडा नष्ट होगई और सुग्रीव सुखको प्राप्त, अये मंत्रियों सहित बडे मानसे जैसा पुत्र पितासे मान करके बात करे कि मैं तो आपका बालक हूं यह काम आपकू करना पडेगा तैसेई सुग्रीव रामजीसे बोले कि हे रामजी! वैरीसे मेरेकू आप क्यों मराते हो मारना होवे तो आपही मेरेको मार डालो॥९॥ इत्युक्तो राघवः प्राह न ज्ञातस्त्वं मया सखे ॥ एकरूपौ युवां वीक्ष्य न त्यक्तः सायको मया ॥१०॥ भाषा-ऐसे सुग्रीवके वाक्य सुनके रामजी बोले कि हे भाई! तुम दोनों एकरूप रहे थे इसवास्ते मैं नहीं जाना कि कौन वाली है कौन सुग्रीव है इस वास्ते मैंने बाण नहीं छोड़ा ॥ १०॥ वालिनं पुनराहाय हतं पश्यसि भूतले ॥ इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह रामः सत्यपराक्रमः ॥ ११ ॥ भाषा-सो फिर वालीको तुम पुकारो अब कि बालिको मरा देख लेना सुग्रीवसे ऐसा कहके सत्य है पराक्रम जिसका ऐसे रामजी लक्ष्मणसे बोलते आये ॥११॥ मत्प्रीतिरूपां बनीहि मालां कंठेऽस्य धीमतः ॥ ययमं चिह्नितं ज्ञात्वा वालिप्राणं हराम्यहम् ॥ १२ ॥ भाषा-हे लक्ष्मण ! मेरी प्रीति सुप्रीवपर बहुत है उसी प्रीतिरूप मालाको t - . ११६ वेदात रामायण कि० कां। सुग्रीवके गलेमें बांध देओ उस माला करके मैं जानूंगा कि यह सुयवि है ऐसा जानके वालीके प्राणको मैं हरूंगा ॥ १२ ॥ इत्युक्तो लक्ष्मणस्तूर्ण बद्धा मालां दृढां शुभाम् ॥ रामप्रीतिस्वरूपां च तद्वर्षपुष्पपुष्पिताम् ॥ १३ ॥ भाषा-रामजीके ऐसे वाक्य लक्ष्मण सुनके शीघही सुंदर माला सुग्रीवके, गलेमें बांधते भये रामजीकी प्रीतिरूप माला है सुग्रीवका हर्ष सो पुष्प गया है निस पुष्पों करके माला फुल्लायमान हो रही है ॥ १३ ॥ बद्धमालस्तु सुग्रीवः पुनर्गत्वातिशीघ्रतः ।। आह्वयामास प्रोचैस्तं वालिनं निर्भयो युधे ॥१४॥ भाषा-मालाळू गलेमें बाँधके सुग्रीव जलदी बडे जोरसे वालिको युद्ध करने वास्ते निर्भय होके पुकारता भया ॥ १४ ॥ वाली च पुनराहूतः सुग्रीवेणातिकोधितः॥ तारया वारितोऽपीत्थं रामचंद्रगुणम्प्रति ॥ १५॥ भाषा-सुग्रीव करके पुकारा जो वाली है उसने बडा क्रोध करके चलनेका विचार किया तौ ताराने रामजीके सब गुण वालीको सुनायके बोली आप मति जावो, बडे जबरदस्तसे सुग्रीवकी मिताई गई है ॥ १५ ॥ तां तिरस्कृत्य समगात्सुग्रीवं युद्धलालसम् ॥ युद्धं प्रचक्रतुवारौ वालिना विह्वलीकृतम् ॥१६॥ भाषा-चालीने ताराका अनादर करके युद्धकी इच्छा किये जो सुग्रीव है तिसके पास आयके फिर दोनोंसे युद्ध होता गया, तब वालीने सुग्रीवको विह्वल करादिया ॥ १६॥ सुग्रीवं राघवो वीक्ष्य पूर्वोके धनुषि प्रभुः ॥ पुनश्शिक्षोद्भवं ज्ञानं बाणं संयोज्य शीघ्रतः ॥ १७॥ भाषा-सुग्रीवको व्याकुल देखके रामजी पहिले वर्णन भया जो धनुष तिसपर फिर सुंदर कर्मको सिखानारूप बाण जलदी चढायके ॥ १७ ॥' - । - 2 D - A है - भाषाटीकासहित । ११७ वियोगकृतमज्ञानं वृक्षं कृत्वा पुरस्सरम् ॥ आलक्ष्य हृदयं तस्य ससर्ज शरमुग्रिणम् ॥ १८॥ भाषा-गुरुके वियोग करके किया जो अज्ञान सोई वृक्ष है, तिस वृक्षको अपने सामने करके आप वृक्षकी आडमें होयके वालीके हृदयको देखके शिक्षा- रूप बाण बडा कठिन तिसकू छोडते अये ॥ १८॥ तेनाहतः पपाताशु दृष्ट्वा रामं पुरःस्थितम् ।। स्तुत्वा क्षमाप्य स्वाघ च प्राणं तत्याज वानरः॥ १९॥ भाषा-तिस बाण करके मृत्युको प्राप्त भया जो वाली सो शीघही पृथ्वीमें पड़गया, तब रामजीको सामने देखके अपना अपराध रामजीसे क्षमा करायके प्राणोंको छोड देताशया, गुरुदेववियोगका मरण भया सो सब जीव आनंद- युक्त भये ॥ १९ ॥ चकुर्विलापन्ते सर्वे सुग्रीवाद्याः कपीश्वराः ॥ जनिष्यति पुनस्सोऽयमिति शोकम्प्रचक्रिरे ॥२०॥ भाषा-गुरुके वियोगरूप चालकि मरणकू देखिके गुरुके उपदेशरूप सुग्रीव तथा सुग्रीव आदि और जो वानर हैं सो विलाप करते भये, कि यह गुरुका वियोगरूप फिर कभी जन्मेगा ऐसा चिंतनरूप विलाप करते भये ॥ २० ॥ वालिनं निहतं श्रुत्वा ताराद्या वालिवल्लभाः॥ अंगदादिसुताः सर्वे विलापं चक्रिरे तदा ॥ २३ ॥ भापा-बालीके मरणको देखके गुरुके वियोगकी चिंतारूप तारा तिसको आदि लेके और जो वालीकी स्त्री हैं सो सब तथा गुरुके वियोगको शांत करनेका उपायरूप जो अंगद है तिसको आदि लेके सब वालिके पुत्र विलाप करते आये ॥२१॥ शरणं कस्य यास्यामः कोऽस्मान्संगृह्य पालयेत् ॥ एतादृशं विलापं च चक्रुस्सर्वं विमोहिताः॥२२॥ भाषा-अंगदने विचार किया कि जो गुरुका वियोगरूप वाली जीतारहा. . - r . ११८ वेदांत रामायण कि० कां। तब तो उस वालीकी शांति करनेका उपाय जो मैं हूं सो मेरेको सब जीव आदर देते थे, कि इसको आदर करेंगे तो यह गुरुके वियोगरूप वालीको शांति करनेका उपाय है, और अब वाली मरगया, हम किसकी शरणकू जावें कौन हमारा पालन करेगा, ऐसा विलाप करते भये ॥ २२ ॥ निनिंद राघवं तारा पतिप्रेमपरायणा ॥ वियोगादर्शनं जातं तदेव निन्दनं सुने ॥२३॥ भाषा-पतिके प्रेममें कुशल जो नारा है सो गुरुके वियोगकू नहीं देखती भई सोई रामजीकी निंदा करती भई ॥ २३ ॥ बोधिता रामचंद्रेण ज्ञानं प्राप्य तदा सती ॥ गुरूपदेशस्य पतेस्सुखहप जहर्प सा ॥ २४ ॥ भाषा-तब रामजीने ताराकू ज्ञान दिया, तारा जानकू पायके गुरुके उपदेशरूप जो सुग्रीव है तिसके सुखके हपळू पायके बहुत खुशी भई, क्योंकि गुरुके वियोगकी चिंता तारा खुद नित्य विचारती थी कि यह गुरुका वियोग शांत होवे तब जीवोंको सुख होवे, परंतु अज्ञानसे उसी वियोगकी स्त्री भई रही, ज्ञान पायके जान लिया कि मेरा पति गुरुका उपदेशरूप सुग्रीव है ॥ २४ ॥ परस्परं कृता वार्ता वालिनस्तस्य तैस्तदा ।। पराक्रमस्य नित्यस्य सह रामकपीश्वरैः ॥२५॥ भाषा-तब रामजी सहित सब कपि आपसमें वालीके पराक्रमकी वार्ता करते भये, कि देखो भाई वाली कैसा वली था, कि गुरुकी महिमाका वेदशास्त्र पुराण लोक ये सब तारीफ करते हैं तिस गुरुका वियोग जीवोंसे कर देना यह बडा वालकिा कर्म है ॥ २५॥ सा वालिनो दाहक्रिया कृता तेनांगदेन वै ॥ राज्यं ददौ ततस्तूर्ण सुग्रीवाय रघूत्तमः ॥२६॥ है 7 भाषाटीकासहित। ११९ भाषा-ऐसी वार्ता सब करते आये सोई वालीकी दाह आदि क्रिया अंगद करता भया, तब रामजी जलदी किष्किंधा पुरीका राज्य सुग्रीवको. देते नये ॥२६॥ राज्यासनस्थे सुग्रीवे कपीनां राघवप्रिये ॥ पुर्याः पूर्वस्वभावश्च नष्टोऽभून्नैव दृश्यते ॥२७॥ भाषा-रामजीका प्यारा सुग्रीव जब वानरोंका राजा भया तब किष्किंधा पुरीका स्वभाव जो प्रथम था कि गुरुमें खोटी बुद्धि देखना सो स्वभाव नष्ट होगया, कहीं देखने में नहीं आता, किसी स्थानपर गुरुमें किष्किंधापुरीकी सुंदर बुद्धि हो गई ॥ २७ ॥ सा राज्यप्राप्तिस्सुग्रीवे तत्सुखं मदवर्द्धनम् ॥ गुरोवियोगमरणं दृष्ट्वा रामोऽतिहर्षितः ॥२८॥ भाषा-सोई मुग्रीवको राज्य प्राप्त भया है तिस राज्यप्राप्तिमें सुख सोई अभिमानकी वृद्धि है, तथा गुरुके वियोगरूप वालीके मरणकू देखिके रामजी भी खुशी होते भये ॥२८॥ विज्ञापनं च गुरवे चोपदेशाय वालिजम् ॥ दातुं जीवान यौवराज्यं चक्रे रामोऽत्यनुग्रहः ॥२९॥ भाषा-बडे दयाल रामजी अंगदको युवराज करते भये, 'कि जब कोई जीव गुरुसे उपदेश लेनेको जावे तब अंगद गुरुदेवसे अर्ज करे, कि महा- राज! आपसे उपदेश लेने• जीव आया, ऐसा कर्म सोई युवराज है सो युवराज- पंदवी अंगदको रामजी देते भये ॥ २९ ॥ स एव वासो रामस्य प्रवर्षणगिरावभूत् ॥ आत्मज्ञानं स्वपितरनिर्मोहं भरतन्तथा ॥३०॥ भाषा-ऐसा अंगदको युवराजपद देना सोई रामजीका प्रवर्षण पर्वतपर टिकना भया है, तथा रामजीने अपने पिता जो आत्मज्ञान तथा निर्मा- हरूप भरतको ॥३०॥ 7 - . - वेदान्त रामायण कि०का। शक्तिपुत्रं वशिष्टं च जानकीविरहन्तथा ॥ एतेषां चिंतनस्पर्शनमप्रीत्याप्तिहेतवे ॥ ३३ ॥ भाषा-शक्तिके पुत्र जो वसिष्ठ तिनको, जानकीके विरहका चितवन जैसा पिताका चितवन तथा भरतका मिलाप, वसिष्ठको नमस्कार जानकीकी प्रीति इन सब कर्मों में प्रीति होनेको॥३१॥ विचारा वार्षिका मासास्तत्सुखाश्च मनोहराः ॥ संगतिम्प्राप्य दुष्टानां जानकी किं करिष्यति ॥ ३२ ॥ भाषा-विचार करना सोई चार मास वर्षा ऋतुके है उसी चार कम्ममि सुख सोई वर्षा ऋतुकी शोभा है रामजी ऐसे चार मास वर्षामें विचार करते भये कि दुष्ट जीवोंकी संगत पायके जानकी क्या करेगी ॥ ३२ ॥ भविष्यति स्वधर्मादा विच्युता साच्युताऽपि वा ।। ईदृग्विलापो रामेण कृतः संगतिकारणात् ॥ ३३ ॥ भाषा-जानकीका धर्म ईश्वरकी भक्ति उस भक्तिरूप धर्मको छोड देवेगी. कि नहीं छोड़ेगी ऐसा विलाप संगतिके कारणसे रामजी करते आये ॥ ३३ ॥ चतुणी च चतुणी च किंचिन्मासा गताः स्मृताः॥ चत्वारो विगतान्मासानायान्तं कपिसत्तमम् ॥ दृष्ट्वा रामो द्रुतं प्रेम्णा प्रेषयामास लक्ष्मणम् ॥ ३४ ॥ भाषा-पहिले वर्णन भये जो चार महीने सो बीति गये कारण धीरज धरके रामजी पिताका वशिष्ठका भरतका जानकीका चितवन मिलाप नमस्कार : प्रीति इन सबके विचारका थोरा कर्म करते भये सोई चार मासका बीतना भया है परंतु सुग्रीव रामजीके पास नहीं आया तब प्रेम करके लक्ष्मणको भेजते भये ॥ ३४॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे पं०शिवसहायबुधविरचिते किष्किधाकांडे मोक्षाख्यः चतुर्थः सोपानः ॥४॥ । 1 - भाषाटीकासहित । १२१ + वरतन्तुरुवाच। प्रेपणम्प्रेमरूपञ्च गमनं तद्विवर्द्धनम् ॥ क्षुत्तृषा सुखदुःखो च हानिलाभौ प्रियाप्रिये ॥१॥ भाषा-बरतन्तुमुनि बोले । रामजीका प्रेम सुग्रीवके ऊपर बहुत है उसी प्रेमरूप सुग्रीवके पास लक्ष्मणका भेजना भया है प्रेमकी वृद्धि सोई लक्ष्मणका सुग्रीवके पास जाना गया है। क्षुधा, तृषा, सुख, दुःख, हानि, लाज, प्रिय, अप्रिय ॥३॥ जीवनम्मरणं निद्रा यशोऽपयश एव च ॥ इत्यादयश्च ये भावा संख्या येषां न विद्यते ॥२॥ भाषा-जीवन, मरण, निद्रा, यश, अपयश इन आदि जो और सब जीवोंके कर्म हैं जिनकी गिनती नहीं है ॥२॥ सर्वपामंडजातानां नराणां च विशेषतः ॥ एते सर्वे गुरोर्दा मन्तव्याश्च विशेषतः ॥३॥ भाषा-सब जीवोंके ये कर्म हैं परंतु नरस्वरूप जीवोंके तो बहुत हैं ये सब कर्म गुरुमें देखना तथा मानना कि जैसा सब है तैसाही गुरुजी है ॥३॥ त एव कपयः प्रोक्तास्तै रुदो लक्ष्मणस्तथा । गुरौ ये दुष्टभावाश्च तैरपि सर्वशः॥४॥ भाषा-सोई सब कर्म वानर हैं रामकी संगति जिनको भई थी वे तो स्वभा- वको छोडि देते आये और जिनको रामकी संगति नहीं भई सो दुष्ट रहे ऐसे दुष्ट कर्मरूप जो बंदर सो लक्ष्मणको रोकने लगे किष्किंधाके भीतर नहीं जाने दिया 'प्रथम कहे तृपा आदि आठ अवगुण गुरुमें देखना सोई ऋक्ष हैं वे भी लक्ष्मणको रोक लिये हैं॥४॥ तेपा दुर्बुद्धिहरणं क्रोघं चक्रे रघूत्तमः॥ ताराङ्गदाभ्यामानीतो मारुतेन विशेषतः॥५॥ - 1 . + -- १२२ वेदांते रामायण कि०का। भाषा-तिन सब दुष्ट काँकी दुष्टबुद्धिको हरणरूप क्रोध लक्ष्मण करते भये तब कपि लक्ष्मणका क्रोधरूप उपदेश पायके वुद्धिको सुंदर धर्ममें लगाने भये खोटा कर्म छोड देते अये गुरुको ईश्वर मानने लगे, तब तारा अंगद हनुमान ये तीनों लक्ष्मणको आदर कारके सुग्रीवके पास लेगये ॥५॥ क्रोधशान्ति कपीनां वै दृष्ट्वा वुद्धिं सुनिर्मलाम् ॥ अहं गुरूपदेशो वै नान्योऽस्ति पृथिवीतले ॥६॥ भाषा-सुग्रीवने लक्ष्मणको देखिके आदर किया तथा कपियोंके क्रोधको शांति देखके और बुद्धि सुंदर कर्ममें देखिके सुग्रीवने ऐसा विचार किया कि विवे- करूप रामजी सरीखे मेरे मित्र और गुरुको उपदेशमें बडे बंदर कर्म करनेवाले मेरे सब कपि ऋक्ष अब मेरे सरीखा पृथ्वपिर कोई दूसरा नहीं है ऐसा सुग्रीवको अभिमान भया ॥६॥ तन्माननाशनं त्रास कृत्वा रामानुजः कपिम् ।। सर्वैः कपिवरैस्साई युवराजादिमारुतैः ॥ ७॥ भाषा-तब लक्ष्मणके सामने सुग्रीवका अभिमान नाश होता आया सोई सुग्रीवका त्रास करिके सब वानर तथा सुग्रीव अंगदहनुमानसहित ॥ ७ ॥ जांबूवानलनीलाधरानयित्वा त्वरान्वितः॥ प्रवर्षणे निपेतुस्ते रामस्याये च वानराः ॥ ८॥ भाषा-जांबवंत नल नील आदि वानर बहुत देशदेशके गुरुमें दुष्कर्म देखनेवाले जो कर्म सोई वानर हैं तिनको संग लेके प्रवर्पण पर्वतपर रामजीके सामने सब पडते आये ॥८॥ विवेकदर्शनं विप्र तेषां तत्पतनं स्मृतम् ॥ . पृष्टा रामण ते सर्व स्वकर्मकरणं सदा ॥ ९ ॥ भाषा-सब गुरुमें दुष्टबुद्धि करनेवाले कर्म देशदेशसे आयके विवेकरूप राम- जीके दर्शन करते आये सोई सबका पृथ्वीमें पडना है तब रामजी सबके कर्मकी कुशल पूछते भये ॥९॥ . १ ।

- -- भाषाटीकासहित । १२३ चतुर्दिशस्समायाताः कपीनांयूथपास्तदा ॥ असंख्या गणितुं शक्का न शेपेणापि कहिचित् ॥ १० ॥ भाषा-तब चारों दिशासे और बहुत गुरुमें दुष्ट कर्म देखनेवाले जो दुष्ट कर्मरूप वानर सोभी आते भये जिन्होंकी गिनती करनेकी शेषजीको भी सामर्थ्य नहीं है ॥१०॥ पूर्वोक्ताः कपयः सर्वे दृष्ट्वा रामं च तत्यजुः ॥ नमस्कृत्य स्वभावन्ते प्रयाताः सर्वतो दिशम् ॥ ११ ॥ भाषा-सब कपि ऋक्ष रामजीको देखिके नमस्कार करिके अपना स्वभाव जो गुरुमें दुष्टकर्म देखना सो छोड़ देते जये, गुरुको ईश्वर मानते भये ॥ ११ ॥ सुग्रीवप्रेषिताः सर्वं जानकीशोधकारणे ॥ निर्वचनस्वभावश्च वृत्तिासावधिः कृता॥१२॥ भाषा-सुग्रीव करिके भेजे जो सब वानर ऋक्ष जानकीको शोधने वास्ते चारों दिशाको जाते जये कपियोंका अपने स्वामीसे कपट नहीं करना ऐसे स्व- भावकी वृत्ति सोई सुग्रीव एक मासका प्रमाण करते भये । श्लोक म्यारह तथा बारहका अर्थ मिलाहे इसको कुलक कहते हैं ॥ १२॥ जांववन्तं हनूमंतमंगदादीननेकशः ।। दक्षिणं प्रेपयामास सुग्रीवो जानकीकृते ॥ १३॥ भापा-जानकीको शोधने वास्ते सुग्रीव जांबवान्, हनुमान, अंगद आदि बहुत वानरोंको दक्षिणदिशाको भेजते अये ॥१३॥ धर्मादीनां शुभा चिन्ताश्चतस्त्रश्च दिशः स्मृताः ॥ तत्प्राप्तिप्रेषणम्प्रोक्तं गच्छन्तं मारुतिम्प्रभुः ॥ १४ ॥ भाषा-धर्मकी चिंता सो पूर्वदिशा है, अर्थकी चिंता सो दक्षिणदिशा है, कामकी चिंता सो पश्चिम दिशा है, मोक्षकी चिंता सो उत्तरदिशा है, इन चारों अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष प्राप्ति होना सो कपियोंका भेजना भया है, हनुमान जाने लगे तब रामजीने ॥ १४ ॥ - - १२४ वेदांत रामायण कि० का। रामो ददावांगुलेयम्प्रीतिजम्प्रेमनिर्मलम् ॥ हनूमते प्रसन्नश्च प्रोवाच वचनं हरिः ॥ १५ ॥ भाषा-रामजीकी प्रीति जानकीपर बहुत है उसी प्रीति करके उत्पन्न जो, निर्मल प्रेम सोई सुंदरी है उस मुंदरीको रामजी हनुमानको देते भये, तथा प्रसन्न होके हनुमानसे बोले ॥ १५॥ देया जनकजायैषा त्वया तात सुचेतसा ॥ एतां प्राप्य ध्रुवं देवी विश्वास ते करिष्यति ॥ १६॥ भाषा हे सुंदरकर्ममें मोहरूप हनुमान ! यह मुंदरी तुम जानकीको देना. इस मुंदरीको पायके जानकी तुम्हारा विश्वास करेगी. कि यह कोई विवेकरूप रामजीका दास है ॥ १६॥ तामादाय ययुः सर्वे नमस्कृत्य रघूत्तमम् ।। मासे पूर्ण निवृत्तास्तु त्रिदिग्भ्यः कपयः शुभाः॥ १७ ॥ भाषा-तिस मुंदरीको लेके हनुमान् आदि सब कपि चलते भये एक मास बीत गया उसी दिन तीन दिशासे वानर आयके ॥ १७ ॥ समागत्य समाचख्युरप्राप्ति कपिसत्तमाः॥ जानक्याश्श्रुत्य तद्रामो लक्ष्मणश्व कपीश्वरः ॥ त्रयस्ते दुःखमापनारस्वस्वकार्यविनाशनम् ॥ १८॥ भाषा-सुग्रीवसे कहते भये कि हम सब तो जानकीका अपनी २ दिशामें शोधन किया, परंतु जानकी नहीं मिली, ऐसे कपियोंके वचनकू सुनके राम लक्ष्मण सुग्रीव बहुत दुःखी होते अये, रामजीका तो जानकीका वियोगरूप दुःख - भया और लक्ष्मणको रामजीका दुःख देखके दुःख भया, तथा सुग्रीवको राम- जीसे करार किया है, कि जानकीका शोधन मैं लगाऊंगा, सो दुःख भया ॥१८॥ सुबोधितौ रामकपीश्वरौ तदा विमूर्छितो तोषबलेन बन्धुना ॥ दुःख परित्यज्य सुखेन संयुतो बभूवतुधैर्यबलेन तौ तदा ॥ १९॥ .

१२५..
1
भाषादीकासहित ।
भाषा-मूर्जाको प्राप्त भये जो रामजी तथा सुपवि इन दोनोंको संतोषरूप
लक्ष्मण रामजीके भाई उन्होंको ज्ञान देते भयेः तब ज्ञान पायके रामजी तथा
सुग्रीव दुःखको त्यागिके धीरज धरके सुखको प्राप्त होते भये ॥ ॥ १९ ॥
इति श्रीवेदान्तरामायणे किष्किंधाकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसं-,
वादे जानकीशोधने पञ्चमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥५॥
समाप्तश्चायं किष्किंधाकांडः।
अथ सुंदरकांडप्रारंभः।
-
वरतन्तुरुवाच।
युवराजादयस्सर्वे कपयो दाक्षिणान्दिशम् ॥
चक्रुर्विंशोधनं तस्या गिरिदुर्गवनेकशः ॥ १ ॥
भापा-वरतंतु मुनि बोलते भये अंगद आदि सब वानर दक्षिण दिशा में
पर्वतोंकी बडी बडी कठिन गुहा तिनमें शोधते भये ॥१॥
न केपामपि सूक्तं च गृह्यते येन कारणात् ।।
स गिरिःकरताकर्मदुर्गमित्यभिधीयते ॥२॥
भापा-जिस मूर्खपनसे जीवमात्रकी सुंदर वाक्य न सुने तथा बुरी वाक्य
सुने ऐसे स्वभावकी पर्वत संज्ञा है उसी स्वभावरूप पर्वतमें बहुत बुरा कर्म करें
सो पर्वतोंकी कठिन गुहा है ॥२॥
भ्रमतां कपिवीराणां शोधार्थ जानकीकृते ॥
निर्वचनास्वभावस्य गतो मासावधिस्तदा ॥३॥
भाषा-प्रथम वर्णन अये जो कपि तिन्होंमें वीर जो अंगद आदि तिनका
जानकांके वास्ते शोधन करते २ निष्कपटका स्वभावरूप जो मास एकका
प्रमाण सो बीत गया ॥३॥

१२६
वेदात रामायण सुं०का।
तां व्यतीतां समालक्ष्य बभूवुर्दुःखसंयुताः ॥
अंगदस्तु विशेषेण रुरोद पितृवर्जितः ॥ ४ ॥
भाषा-जो प्रमाण सुग्रीवने करदिया था मास १ जानकीका शोधन करके
आना ऐसे प्रमाणको बीतगया देख सब हनुमान् आदि कपि दुःखी होते भये
तथा अंगद तो गुरुवियोगरूप पितासे हीन है इसवास्ते रुदन करता भया ॥ ४॥
जांववान्दुःखितान दृष्ट्वा समस्तान्कपिसत्तमान् ॥
उवाच वचनं वीरो मायाचेष्टोऽतिदुःसह ॥५॥
भाषा-बडा कठिन मायाका विचाररूप जांववान् सो सब वानरोंको दुःखी
देखके सब कपियोंसे बोलता भया ॥५॥
स्वभाववचनां त्यक्त्वा सर्वे जन्मावधिन्हढम् ॥
कुर्वन्त जानकीप्राप्तिधुवनश्च भविष्यति ॥६॥
भाषा-अरे हे वानरो ! सुग्रीवने तौ निष्कपटस्वभावरूप एक मासका प्रमाण
दिया सो तो बीत गया अब जबतक सब जीवै तवतककी प्रतिज्ञा करो विना
जानकीकी शुद्धि लिये सुमीवके पास नहीं जायेंगे ऐसी दृढता करोगे तब निश्चय
जानकी प्राप्त होवेगी ॥६॥
ऋक्षेशवचनं श्रुत्वा तथोक्तं कृत्यसादरम् ॥
जानकीशोधने यत्ताः पुनवीरा ययुस्तदा ॥७॥
भाषा-जांबवान्के वाक्य सुनके कपि फिर जानकीको शोधनेके वास्ते
जाते भये ॥ ७ ॥
मार्ग प्राप्ता तदा तेषां योगिनी योगतत्परा ॥
निर्वचनायास्तनुजाविलं कपटभेदनम् ॥ ८॥
भाषा-तब रस्तेमें एक योगिनी मिली कैसी योगिनी है निष्कपटकी लडकी
कपटको काटनारूप योगिनीका बिल है॥ ८॥
निवृत्तसिद्धिस्साख्याता पातालं तत्सुखं मुने ॥
तया विश्वासमार्गेण सर्वे निष्कासिता बिलात् ॥
अपक्कहृदयाः पूर्व ज्ञानपक्कास्तया कृताः ॥ ९ ॥

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-
भाषाटीकासहित ।
१२७
भाषा-मोक्षकी सिद्धिरुप सो योगिनी है उसी मोक्षकी सिद्धिमें जो सुख
सो पाताल है कपटका नाश करनेवाला जो बिल सो पातालमें मिला है ऐसी
निष्कपटकी लडकी योगिनी मोक्षकी सिद्धिरूप सो विश्वासरूप रस्ता करके
वानरोंको उस बिलसे निकारके बाहेर करदेती भई बाहेर करना यह है कि
प्रथम कपि कुछ ज्ञान नहीं जानते रहे सो योगिनीने कपियोंको ज्ञानमें
पक्का करदिया॥९॥
कपटोन्मूलनं तेषां तन्निःकाशनिगद्यते॥
लंकाकनकहन्धितटे तस्थुश्च वानराः ॥१०॥
भाषा-मोक्षकी सिद्धि रूप योगिनीने पूर्वोक्त जो वानर हैं तिन्होंके कप-
टका मूलसहित नाश किया सोही बिलसे कपियोंका निकसना हुआ, बिलसे
निकसिके लंका सुखका हर्ष सो समुद्र है तिसके तटपर वानर टिकते भये॥१०॥
रामांगुलेयविश्वासदर्भ विस्तीर्यते तदा ॥
पृथिव्यांत उपाविश्य प्राणान्त्यक्तुं समुद्यताः ॥ १३॥
भाषा-रामजीकी मुंदरी पास है इससे सब वानरोंको विश्वास है कि हम
लोगोंको रामजी अपना कार्य सिद्ध विचारके तौ हमारे दलमें मुंदरी दिये हैं
ऐसा विश्वास सोई कुश भया तिस कुशको जमीनमें बिछायके उसी कुश
आसनपर बैठके सब वानर प्राण त्यागनेकी तयारी करते भये ॥ ११ ॥
स्वभावक्रूरताप्राणं त्यजतां वनचारणाम् ॥
दैवयोगात्तदा प्राप्तस्संपातिद्धसत्तमः ॥१२॥
भाषा-वानरोंका स्वभाव बडा क्रूर है तिसको त्यागते जो वानर उसी समयमें
दैवयोगसे संपाति नाम गीध आता भया ॥ १२ ॥
दुर्लक्षणजटायोश्च भ्रातादुर्गतिवर्द्धनः।।
तं दृष्ट्वा कपयः सर्वे स्वात्मानं तेन भक्षितम् ॥ १३ ॥
भापा-खोटा लक्षण जो जटायु तिसका यह भाई खोटी गतिको बढाने-
वाला बडा लोजरूप संपाति गीध है तिस बडे लोजरूप संपातिको वानर देखके
अपनी २ देहका पक्षण ॥ १३ ॥

- --- . १२८ वेदांत रामायण सुं० कां। अमन्यन्त तदोक्तश्च युवराजेन गृद्धराट् ॥ संपातिश्चरितं भ्रातुः श्रुत्वा विह्वलमानसः ॥ १४ ॥ भाषा-मानते भये कि यह दुष्ट हम सब लोगोंको खावेगा तब अंगद संपातिसे पहिलेकी सब बात कहते भये संपाति जटायुका मरण सुनके विह्वल होगया विचार किया कि जीवोंको छोटा लक्षण जटायु बडा लोग जो मैं तिस मेरा आदर करता था अब वह मरगया जीवमात्र सब सुलक्षण होगये मेरेको आदर कौन देवेगा इसवास्ते संपाति दुःखी भया ॥ १४ ॥ कथित्वा सरस्ववृत्तांतं जानक्याश्च कपीन्प्रति ।। प्राप्तपक्षो ययौ पक्षी स्वगतिन्त्वरितं खगः ॥ स्वस्थावासाजवो प्रोक्तौ गृद्धपक्षी शुभाशुभौ ॥ १५ ॥ भाषा-अतिलोअरूप संपाति अपना हाल तथा जानकीका प्राप्त होनेका हाल कहके सुंदर अवस्थामें वास तथा बडे लोभका दुष्टस्वजाव छोडके कोम- लस्वभाव ये दो पक्ष प्राप्त होके चला गया ॥१५॥ कपीनां दर्शनफलादतिलोभं वित्यज्य सः ।। गते गृद्धे निरीक्ष्याथ कपयस्सागरं तदा ॥ १६॥ भाषा-कपियोंके दर्शनके फलसे अति लोभको त्यागके संपाति महात्मा होगया तब गीधके गये पीछे वानर समुद्रको देखके सब ॥ १६ ॥ एनमुल्लंघ्य को वीरो लंकां गत्वा च जानकीम् ॥ दृष्ट्वा ख्यास्यति रामाय जानकीकुशलं सुधीः॥ १७ ॥ भाषा-आपसमें विचारने लगे कि ऐसा वीर कौन है जो वीर इस समु- द्रको कूदिके लंकाको जायके जानकीको देखके जानकीकी कुशल राम- चंद्रसे कहे ॥१७॥ स्वस्ववीय वदन्ति स्म सर्वे कपिवरास्तदा ॥ गुरुमानवभावं वै कार्य कर्तन ते क्षमाः॥१८॥ । - - . - - - भाषाीकासहित। १२९, भाषा-गुरुको मनुष्यसरीखे देखतेथे वानर लोग सो वानरका पराक्रम है उसी अपने २ वार्यको समुद्रके लांघन वास्ते आपसमें सब वानर कहते भये परंतु समुद्रको कूदिके लंकाको जाकर जानकीका हाल रामजीसे कहनेको किसीकी सामर्थ्य नहीं होती भई ॥ १८ ॥ दुःखितान्वानरान्वीक्ष्य प्रेरयामास मारुतिम् ॥ ऋक्षेशो रामचंद्रस्य प्रीतितृष्णासमुद्भवम् ॥ १९ ॥ भाषा-वानरोंको दुखित देखिकै रामजीमें जो प्रीति तिसकी जो तृष्णा तिस तृष्णाके पुत्र जो हनुमान तिसको जांबवंत आज्ञा देतगये ॥ १९ ॥ रामपादरतेोहं हनुमन्तं महाकापिम् ॥ आरुरोह गिरि वारो रामनिन्दनरूपिणम् ॥ २० ॥ भाषा-कैसे हनुमान हैं रामजीके चरणोंकी जो रति तिस रतिमें मोहरूप है ऐसा जो हनुमान है सो दुष्ट जन रामजीकी निंदा करते हैं सोई निंदारूप पर्वतपर चढिगये ॥२०॥ दासाभिमानपादेन तमापीय महागिरिम् ॥ सिन्धूल्लंघनकार्यार्थमारुरोह नभः कपिः ॥ २१ ॥ भाषा-हनुमान्ने विचारा कि मैं रामजीका दास हूं ऐसा दासको अभिमान सोई हनुमानका पग है तिस पग करिके रामनीके निंदनरूप पर्वतको दाबिके समुद्रको कूदने वास्ते हनुमान आकाशको चढिगये ॥ २१ ॥ कार्यसिद्धि स्वतो ज्ञात्वा चिंताशून्यं नमः स्मृतम् पूर्वोक्तसागरे हर्पतोयवृद्धिप्रपूरिते ॥ तिष्ठंती वनिता काचित्कुकमरीतिरद्भुता ॥२२॥ भापा-रामजीके कार्यकी सिद्धि हनुमान्ने आपमें जानिके चिंताको त्याम . दिया सो चिंताहीन हनुमानका चित्त सोई आकाश भया है प्रथम वर्णन गया हर्ष सोई जल है तिस जलकी वृद्धि करिके पूर्ण जो समुद्र तिसमें कुकर्मकी रीति रूप कोई स्त्री वडी अद्भुत ॥ २२॥ - - १

वेदान्त रामायण मुं० का।
सिंहिका सा समाख्याता तया ग्रस्तस्तदा कपिः ॥
छायामार्गेण सा वीरञ्चकर्प स्वान्तिकं हि सा ॥ २३ ॥
भाषा-सिंहिका उसका नाम सो स्त्री हनुमान्की छाया पकरिके अपने सा-
मने हनुमानको खंचि लेती भई ॥ २३ ॥
स्वछायां हनुमान्वीक्ष्य कार्यवृद्धि दृढां कपिः ।।
शीघ्रं गमनक्रोधेन कार्यविनेन मुष्टिना ॥ २४ ॥
भाषा-रामजीके काजमें हनुमानकी बुद्धि बहुत दृढ है सोई हनुमानकी छाया
तिस छायाको असित देखिकै तब रामजीके कान वास्ते जल्दी जाना तिसमें
विघ्न होना सो हनुमानके हाथकी मुष्टि है तिस मुष्टि करिके ॥ २४ ॥
तां हत्वा च पुनर्गतुमारेभे सहसा कपिः॥
सुरैर्जग्राह तं वीरम्प्रेपिता सुरसा सती ॥ २५ ॥
भाषा-सिंहिकाको मारके जल्दी चलते भये तब देवताओं करिके भेजी
जो सुरसा उसने हनुमानको पकडलिया ॥ २५ ॥
सुकार्यभ्रान्तिस्सा ज्ञेया मार्गन्देहीति तां कपिः ।।
प्रोवाच न ददौ मार्ग सुमनस्तञ्च सा यदा ॥२६॥
भाषा-सुंदर काजमें जो भांति होती है साई मुरसा है तब सुरसासे हनुमान
बोले हे सुरसे ! त सुंदर काजकी भांति है सो मेरे सुंदरमनरूप रस्ता दे रामजीके.
काज करनेमें मेरे मनमें भ्रांति रूप तू मति टिक ऐसा हनुमानने कहा तब सुरसा-
ने रस्ता नहीं दिया ॥ २६ ॥
तदा कपिस्तानिर्भय॑ गंतुकामः प्रचक्रमे ॥
गच्छंतं सा कपिन्दृष्ट्वा भक्षितुं समनुद्यता ॥२७॥
भाषा-तब हनुमान उसको त्रास करिके जबरदस्तीसे चलते भये तब
चले जाते हुए जो हनुमान तिनको खानेवास्ते उपाय करती भई ॥२७॥
रामकार्येषु विद्वेषन्तत्तस्या मुखवर्द्धनम् ॥
अहं द्रक्ष्यामि वैदेहीमिति हर्षवन्तनुः ॥२८॥

M जापाटीकासहित । भाषा-रानजीके काजमें चर सोई सुरसाका मुखका बढाना जया तथा हनुमान्जीने विचारा कि में जानकीको देखूगा ऐसे हर्षकी वृद्धि सोई जलदी हनु- मानकाजी देहका बढाना हुआ॥२८॥ कपिना वर्द्धितस्तूर्ण ज्ञात्वा तस्य पराक्रमम् ॥ तदास्यमदनाशश्च तम्प्रविश्य तनुं कपिः ॥२९॥ भाषा-सुरसा हनुमानके पराक्रमको देखिके तब सुरसाके मुख बढानेका अनिमान नष्ट होगया तव हनुमान सुरसाके तनुरूप मुखमें प्रवेश करिके ॥२९॥ गन्तुकामनिरीक्ष्यैव ददावाशिषमुत्तमाम् ॥ निर्मोहताशिपन्दत्त्वा गताकाशं च सा पुनः ॥ ३० ॥ भापा-यह श्लोक युग्म है हनुमानको जाता देखिके निर्मोहरूप आशीर्वाद हनुमानको देती भई कि हे हनुमान् ! रामजीकी चरणके प्रीतिमें तुम्हारा मोह सदा बना रहेगा ऐसा कहिके आकाशको जाती भई ॥ ३० ॥ चिंतापानीयतद्वीय सुरकार्यविवर्जनम् ॥ दुष्टकर्माण्यनेकानि तेषाम्मध्ये शतैस्तदा ॥ ३१ ॥ भाषा-तब हनुमान् समुद्रके पार जाते भये कैसा समुद्र है हनुमानकी चिंतारूप जल सोई समुद्रका पराक्रम है देवतोंके कार्यको करने नहीं देना सोई अनेक दुष्टकर्म हैं तिन दुष्टोंके मध्यमें सैकडों ३०० दुष्ट करिके ॥ ३१ ॥ महाबलेविस्तृतं च दुरीहजन्तुसंकुलम् ॥ ईदृशं सागरन्तीत्वा गतः पारं च दक्षिणम् ॥ ३२ ॥ भाषा-बडे बली कारके विस्तार होरहा है तथा दुष्टोंका रातिदिन खोटें कमें नाव सोई जलके जीव हैं तिन जीवों करिके व्याप्त होरहा है ऐसे समुद्रको पार जायक समुद्रके दक्षिण तटको हनुमान प्राप्त भये तीन श्लोक ३० तथा ३१ तथा ३२ का अर्थ मिला है सो कुलक है ॥ ३२ ॥ मंस्यन्ति मातरं मेऽद्य धन्यामेतचराचरम् ॥ इति हपै कपिमैंने तदक्षिणतटं मुने ॥३३॥ . - .

. १३२ वेदान्त रामायण सुं० कां। भाषा-हनुमान्ने विचार किया कि अभी यह संसार चराचर जीव मेरी माताको धन्य मानेंगे ऐसा हर्ष हनुमान अपने हृदयमें मानते भये सोई समुद्रका दक्षिण तट है ॥ ३३ ॥ संस्मृत्य रामस्य स्वरूपमद्भुत कपीश्वरः सिंधुतटस्थितो बभौ ॥ अहं भविष्यामि द्वयोस्सुवीरयोस्सुकंठसन्तोषनुदोस्सदा प्रियः॥३४॥ भाषा-हनुमान रामचंद्रके अद्भुत स्वरूपको स्मरण करिके खुशी भये सोई समुद्रके तटपर टिके जो हनुमान तिनकी शोभा है. जानकीकू देखिकै रामजीके पास जाऊंगा. तब रामजीको तथा सुग्रीवको बड़ा प्यारा होऊंगा ऐसा आनंद मानते भये ॥ ३४॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे शिवसहायबुधविरचिते सुंदरकांडे प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः॥१॥ वरतन्तुरुवाच। सिंघोस्तटे समासीनो विचारं कृतवान्कपिः ॥ रामचन्द्रपदध्यानन्तद्विचारं हनूमतः ॥१॥ भाषा-बरसंतु मुनि बोले हर्परूप समुद्रके तटपर हनुमान टिकिके राम- जकि चरणका ध्यान करते भये, सोई ध्यान लंकामें प्रवेश करने वास्ते हनु- मानका विचार करना भया ॥१॥ रामचन्द्रपदद्वंद्वप्रीतितृष्णा सुतस्य वै ॥ जगतो लघुज्ञानत्वं लघुरूपं च तद्धृतम् ॥२॥ भाषा-रामजीके चरणमें जो प्रीति उसी प्रीतिकी तृष्णा तिसके पुत्र हनुमान सो अपनी हृदयमें ऐसा विचार करते हैं कि तीन लोक चौदाभुवन विवेक- रूप रामसे थोरा है ये रामजी सबसे बड़े हैं ऐसा विचार सोई छोटा रूप भया है ऐसे रूपको हनुमान धरिके लंकामें प्रवेश करते भये ॥२॥ दुष्टकर्मस्थितिः प्रीत्या हठात्सा रावणालया। प्रविशन्तं कपिन्दृष्ट्वा तर्जयामास सा निजैः॥ चिरसंस्थेश्चरित्रैश्च दुष्टराक्षससंस्थितैः ॥३॥ - - -- ३३३ M - भाषाटीकासहित । भाषा-तब हठसे खोटे कर्ममें प्रीतिसे टिकना ऐसी जो लंकारूप राक्षसी सो लंकामें प्रवेश करते जो हनुमान तिनको अपने चरित्र करके डराती गई, कैसा चरित्र है बहुत दिनोंसे दुष्ट राक्षसोंके संग वासरूप चरित्र ॥ ३ ॥ लंकाप्रवेशहर्पस्य या तृष्णाभूत्कपेस्तदा ॥ तया मुष्टया महावीरो हत्वा ताम्प्राविशत्पुरीम् ॥ ४॥ भापा-हनुमानने लंकामें प्रवेश किया तब बडा हर्ष भया, उस हमें जो तृष्णा सो हनुमान्के हाथकी मूठी भई उसी मूठी करके लंका राक्षसीको मारिके लंकामें प्रवेश करते भये ॥४॥ जानकीशोकसविता जगामास्तन्तदा कपिः॥ कपधैर्य्यमभूत्सायम्यवेशंहर्षवर्द्धनम् ॥५॥ भापा-तब जानकीके शोकरूप सूर्यका अस्त होगया तथा हनुमानकी धीरता सोई मायंफाल होगया, हनुमान अत्यंत खुशी भये सो खुशी होना लंकामें हनुमान्का प्रवेश भया है।५॥ मदांधबुद्धिदैत्यानां रावणादिप्रतापिनाम् ।। सा निशा जानकी द्रष्टुं तस्याम्बश्राम वानरः ॥६॥ भापा-रावण आदि लेके बडे बडे राक्षसोंकी बुद्धि अभिमान करके अन्धी होरही है सोई रात्रि भई तिस रात्रिमें जानकीके देखने वास्ते प्रेमरूप नमण हनुमान करते जये ॥६॥ नापश्यन्जानकी तत्र ब्रह्मभक्ति कपीश्वरः ॥ राक्षसानां दुरावृत्तिस्सा चिन्ताप्यभवत्कः ॥७॥ भापा-ब्रह्मकी भक्तिरूप जानकीको नहीं देखे हनुमान् तब राक्षसोक्ने खोटी वृतिरूप चिन्ताको हनुमान प्राप्त भये ॥ ७ ॥ चिन्ताग्रस्तः कपीशश्च जगामाशोकवाटिकाम् ।। कदापि दैवात्सत्संगो रावणस्यापि संभवेत् ॥८॥ भाषा-उसी चिंता करके ग्रसित जो हनुमान सो अशोकवगीचामें गये, कभी दैवयोगसे रावणको भी सत्संग हो जावेगा ॥८॥ है १३४ वेदान्त रामायण सुं०कां। यत्रकुत्रापि तदर्पस्साऽशोकतरुरुच्यते ॥ तत्प्रीतिवाटिका प्रोक्ता चान्ये वृक्षास्त्वनेकशः ॥९॥ भाषा-जिसी किसी जगहपर ऐसा विचारमें जो हर्प सो अशोक नाम वृक्ष है, उसी हर्षरूप अशोकवृक्षों जो प्रीति सो अशोक बगीचा है तथा दूसरे कामके हर्षरूप वृक्ष तौ अनेक हैं ॥ ९॥ ते सर्वे शाकवृक्षानां सुखाश्वामितशाखिनः ॥ फलिनस्तरवश्चान्ये दुःकामोदरूपिणः ॥ १० ॥ भाषा-और जो वृक्ष अनेक अनेक प्रकारके हैं सो अशोकवृक्षोंके सुखरूप हैं. और खोटे कार्यमें आनंद माने ऐसा रूप वृक्ष फूलवाले भी हैं क्योंके वगीचामें एकही रकमका वृक्ष नहीं रहता बहुत प्रकारके रहते हैं ॥ १० ॥ पूर्वोक्ता वाटिका मुख्या चेयमाभ्यन्तरस्थिता ॥ राक्षसानां विलासाय चान्यास्तासु च भूरिशः ॥ ११ ॥ भाषा-तथा अरण्यकांडमें जानकीके टिकाते समय अशोक वाटिकाका वर्णन भयाहै, असल वह है यह तो बगीचाके भीतर भी बगीचा रहता है सो यह है, राक्षसोंके आनंद करने वास्ते अशोकबगीचामें इससे भी और बहुत बगीचा हैं ॥१३॥ समारुह्य कपिवीरो इढिमानं तरुं सुधीः ॥ ददर्श तदधो वीरो हर्पशोकस्वरूपिणीम् ॥ १२ ॥ भाषा-हनुमानके हृदयमें ऐसी बढता है कि मैं रामजीका कार्य करूंगा, सोई एक वृक्ष है जिसके नीचे जानकी रहती थी, तिसवृक्ष पर हनुमान चढिके कजी हर्ष कजी शोक ऐसा हनुमानके हृदयमें होता है. सोई उस वृक्षका नीच- तल गया है. ऐसे वृक्ष के नीचे जानकीको हनुमान देखते जये ॥ १२ ॥ जानकी ब्रह्मणो भक्तिं जन्ममृत्युविनाशिनीम् ।। एकवेणीधरान्देवी रूपचिन्तास्वरूपिणीम् ॥ १३ ॥ भाषा-कैसी जानकी है ब्रह्मकी भक्ति है. जन्म तथा मरणके बापाकी - । 1 . । भापाटीकासहित । १३५ नाश करनेवाली है। भगवान के रूपकी चिंता जानकी राति दिन करती है सोई शिरमें एक पाटी बनायकै उसी पाटीको शिरमें धारण किये है ॥ १३ ॥ कृशितां राक्षसानां वै मुक्तिदानस्य चिंतया ।। बिभ्रतीम्मलिनं वस्त्रं रामचन्द्रवियोगजम् ॥ दुःखरूपं विलोक्याशु जहर्ष कपिसत्तमः ॥ १४ ॥ भाषा-इन दुष्ट राक्षसोंका मोक्ष कैसा होवेगा ऐसी चिंतारूप सोई जानकी दुर्बल होरही है. रामजीका वियोगरूप मैला वस्त्र जानकीने धारण किया है ऐसा दुःखरूप जानकीका स्वरूप हनुमान जलदी देखिके बहुत खुशी भये कि जानकी दुःखी है परंतु मैंने जानकीका दर्शन पाया. इसवास्ते खुशी भये ॥१४॥ आजगाम तदा वीरो रावणो राक्षसेश्वरः ॥ जानकी स्वास्त्रिय कतु तन्दृष्ट्वा पिहितः कपिः ॥ १५ ॥ भापा-तब उसी समय जानकीको रावण अपनी स्त्री बनाने वास्ते आता भया. तिसको दोखिके हनुमान छिपि गये ॥ १५ ॥ दर्शयित्वा च सामादि रावणो वै पराजितः ॥ न स्वीकृतन्तया सर्वा राक्षसी प्रत्युवाच ह ॥१६॥ भाषा-रावणने साम दान दंड भेद जानकीको देखायके हारि गया, जानकी रावणके वाक्यको नहीं मानती भई, तब रावण बोला हे देवि ! मैंनी भगवानका अश हूं इति साम। हे देवि ! मैं भी तुम्हारा नाम लेऊंगा इति दान । हे देवि ! मेरी विनती नहीं मानो तो मैं तो भ्रष्ट होगया हूं परंतु तुमको भी भ्रष्ट करिदेऊंगा इति दंड। अपनी प्रकृतिरूप राक्षसियोंको भेजिके जानकीके पास चुगली कराया, मेरी मंडलीमें आ जावो यह चार भेद जानकीने नहीं माने तो राक्षसियोंसे रावण वोला ॥ १६॥ द्विमासाभ्यन्तरे सीता न महशमुपैष्यति ॥ तदास्याः कथं चांगानि राक्षसेभ्यः प्रदास्यथ ।। पूर्वोक्ता राक्षसाः प्रोक्तास्त्यागन्तत्तनुकृन्तनम् ॥ १७ ॥ 2 - 4 १३६ वेदान्त रामायण सुं०कां। भाषा-दो महीनेके बीचमें सीता हमारे वशमें नहीं आयेगी तो इस जान- कीकी देहको काटिके राक्षसोंको तुम सब मिलके देदेना, जानकीको लंकासे निकालि देना यही देहका काटना है पहिले कहे हुए राक्षसोंको जानकीके रक्षा वास्ते देना सोई देह काटके देना है ॥ १७ ॥ इंद्रियाणां च द्वे चेष्टे कर्मज्ञानेति सर्वदा ।। इत्युक्त्वा राक्षसी रक्षो जगाम स्वालय शठः ॥१८॥ आषा-दश इंद्रियोंकी दो चेष्टा हैं पांच ज्ञानेंद्रिय स्वभाव पांच कर्मेंद्रिय स्वभाव यह सदा है सोई दो महीने भये हैं ज्ञानसे तथा कर्मसे समझाओ ‘ऐसा राक्षसियोंसे कहिके रावण जो शठ है सो अपने घरकू गया ॥ १८॥ गते दशानने सीतानिदेयाद्यास्त्वनेकशः ॥ राक्षस्यत्रासयामासुत्रासनन्तन्मदक्षयम् ॥ १९ ॥ भाषा-रावणके गये पीछे परनिंदा पराई ईर्ष्या इन्हों आदि लेके गिनती रहित जो राक्षसी हैं सो सब अपना अनेक प्रकारकी मदका क्षयरूप जो त्रास सो जानकीको देनेलगीं ॥ १९ ॥ वर्जयित्वा च तास्सास्त्रिजटा वाक्यमब्रवीत् ।। शत्रुत्रयविनाशाय त्रिधा बुद्धिश्व सा स्मृता ॥२०॥ भाषा-काम क्रोधं लोजका नाश करनेकी बुद्धि जो त्रिजटा है सो राम- जीकी प्यारी है वह सब राक्षसियोंको मना करके बोलती भई ॥२०॥ मा त्रासयथ वैदेही रावणस्य कुलक्षयम् ॥ अचिरेणैव मे दृष्टो राज्याप्तिश्च विभीषणे ॥ २१ ॥ भाषा-अरे दुष्टिनी राक्षसियो ! जनकपुत्रीको त्रास मत करो रावणके कुलका नाश थोडेही दिनों में देखती हूं और लंकाका राज्य बिनषिणका होयेगा यह भी में देखती हूं ॥२१॥ एवमुक्तास्तया सर्वा बभूवुद्रिया युताः ॥ जानक्य शमनीम्बुद्धिन्दत्त्वागात्रिजटा गृहम् ॥ २२ ॥ ६ -- - . - .

१ - भाषाटीकासहित। १३७ भाषा-त्रिजटा करके इस प्रकार कही जो राक्षसी हैं सो संब निदासे , व्याकुल होयके सो गई निजदा जानकी प्रति शांतिबुद्धि देके अपने घरकू गई राक्षसियोंका बुरा कर्म छूटना सो निद्रा सोना है ॥ २२॥ संसारसुखत्यागश्च त्रिजटागेहमुत्तमम् ॥ तदादि सर्व रामस्य चरितं कपिरभाषत ।। २३ ॥ भाषा-संसारके सुखका त्याग सोई त्रिजटाका घर है त्रिजटाके गये पीछे आदिसे रामजीका सब चरित्र हनुमान् कहते भये ॥ २३ ॥ श्रुत्वापि सर्व रामस्य चरितं कपिवर्णितम् ।। स्वपतिप्रीतिसन्त्यागाविश्वासं प्राप जानकी ॥ २४ ॥ भाषा-कपिके मुखसे कहा जो रामजीका चरित्र सो संपूर्ण जानकीने सुना तो भी चित्तमें विचार किया कि मैंने अपने पतिकी प्रीति रक्षा करनेके वास्ते दूस- रेका वचन नहीं सुनती हूं दूसरेका वचन सुननेसे अपने पतिकी प्रीतिका त्याग । होता है ऐसा अविश्वास किया विश्वास नहीं मानती हुई ॥ २४ ॥ जानक्या रामचंद्रस्य प्रीलिरत्यंतवल्लभा ॥ तद्वत्पन्नं च यत्प्रेम ददौ तनुमान कपिः ॥ २६॥ भापा-जानकीके ऊपर रामजीकी बडी प्यारी प्रीति है तिस प्रीतिसे जो उत्पन्न भया प्रेस सो मुद्रिका है उस मुंदरीको हनूमान् जानकीकू देते भये॥२५॥ रामांगुलीयं संगृह्य सुतं मेने कार्य सती ॥ तितिक्षारूपसंवादं चक्रतुः पुत्रमातरो ॥२६॥ भाषा-रामजीकी मुंदरी लेके जानकी हनुमान्कू अपना पुत्र मानती हुई दुष्टके कर्मको देखके क्रोध नहीं करना ऐसी बात पुत्र जो हनुमान् माता जो जानकी ये दोनों करते भये ॥२६॥ क्षुद्रावणमिलापेच्छा तयातौ राजकन्यया ॥ अनुज्ञातो बभक्षाश फलानि निर्भयः कपिः ॥२७॥ भाषा-हनुमानजीकी रावणसे मुलाकात करनेकी इच्छा सोई भूख हैतिस ।

१३८ वेदान्त रामायण सुं० कां। भूखमें बडा दुःखी होके हनुमान जनककी कन्या जो जानकी तिससे आज्ञा मांगके और भय छोडके फल खाने भये ॥ २७ ॥ दुष्टकर्मादितरवः फलं तेषां परार्दनम् ॥ तानुत्पाद्य कपिवीरो भक्षित्वा तत्फलानि च ॥२८॥ भाषा-जुआ चोरी जहर देना आग लगाना इनको आदि लेके और जो बुरे कर्म हैं सो सब वृक्ष भये हैं तिनको हनुमान मूलसे तोडता हुआ इन वृक्षोंका फल क्या है दूसरेळू दुःख देना ऐसे फलोंको भी खाया. त्रेता द्वापर में ये नष्ट होगये. कलियुगमें पुनि भये ॥२८॥ जगन दुष्टनाशं च राक्षसीभिनिवेदितः ।। गर्जन्वीरो मनश्चक्रे रावणं हेतुमुद्यतः॥ २९ ॥ भाषा-बुरे कर्मकानाशरूप हनुमानका गर्जना भया. तथा राक्षसियां रावणसे सब हाल कहती भई गर्जना करते करते हनुमानजी मनरूप रावणको मारनेका विचार करते आये ॥ २९॥ विवेकरूपस्य रघूत्तमस्य तृष्णासुतः प्रेमरसस्य मोहः ॥ गर्जन्कपीशाधिपतेश्चदूतो वितर्कयामास दशास्यमृत्युम् ॥३०॥ भाषा-विवेकरूप रामजीके अजनकी तृष्णाके पुत्र हनुमान तथा रामजाक प्रेमके मोहरूप सुपीवके दूत ऐसे हनुमान् रावणका मरण विचारते हुए ॥३०॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे सुंदरकांडे संवर्तवरतन्तुसंवादे शिवसहायबुधविरचिते अशोकवाटिकानाशे द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः॥२॥ वरतन्तुरुवाच। राक्षसीभिः समाश्रुत्य कपेः कर्म च रावणः॥ स्वपुत्रमक्षनामानं कलि याहीत्यनोदयत् ॥ १॥ भाषा-वरतन्तुमुनि बोलते भये राक्षसियों करके कथित जो हनुमान्का किया कर्म तिसको रावण सुनके अपना पुत्र जो सब जीवोंसे लडाईरूप अक्ष नाम तिसको भेजता हुआ उससे कहा कि त जायके हनुमानको पकड लावो ॥१॥ A - - + भाषाटीकासहित । १३९ पित्राज्ञातो ययौ शीघ्रं कलहो रामपादयोः ॥ तृष्णात्मजं च तन्मोहं ददर्श स्वस्थरूपिणम् ॥२॥ भाषा-पिताकी आज्ञाको पायके जलदी अक्षकुमार गया, जायके बहुत हुशियार होयके टिके जो हनुमान तिसको देखा, कैसे हनुमान हैं रामजीके दोनों चरणोंकी जो तृष्णा तिसका बेटा है, तथा रामजीके पगका जो मोह सोई हनुमान है ॥२॥ सद्रोहो राक्षसेन्द्रस्य प्रासादो वाटिकास्थितः ॥ तमारूढं कपिन्दृष्ट्वा हन्तुं सोऽभिप्रदुद्रुवे ॥३॥ भापा-मनरूप रावणने सुंदर कार्यमें द्रोह किया, सोई द्रोहरूप अशोक- बगीचामें हवेली है अक्षकुमार तिस हवेलीपर बैठा जो हनुमान् तिनको, मारनेके वास्ते दौडता जया ॥३॥ स हतः कपिवीरेण पपात धरणीतले ॥ विरुद्धबुद्धिसम्भूते दुर्वाक्ये रावणात्मजः॥४॥ भापा-रावणका पुत्र हनुमान करके मारा थका सो भूमिमें पड़ गया खोटी बुद्धिसे उत्पन्न जो खोटा वचन सो भूमिका तल कहाता है वहां पडके मर गया॥४॥ किंचित्कलिं स्वतनयं हतं दृष्ट्वा च रावणः॥ दुश्चेष्टितं मेघनादं प्रेरयामास सत्वरः॥५॥ भाषा-रावण थोडा कलहरूप अपना बेटा अक्ष तिसको मरा देखके जलदी खोटे काजकी प्रीति जैसा दूसरेका सुख देखके जलना सोई मेघनाद है तिसको भेजता जया ॥५॥ स तेन कृतवान्युद्धं स्वस्वकर्मप्रशंसनम् ॥ सत्तिरस्कारपाशेन बबंध त्वरितं कपिम् ॥६॥ भापा-मेघनादने अपने कुलकी तारीफ तथा हनुमान्ने रामजीके समाजकी 7 M . ।

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न
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१४०
वेदान्त रामायण मुं० का।
तारीफ की, ऐसा युद्ध दोनों करते भये तिस पीछे साधुलोगोंका जो अनादर
सोई पाश भया है तिस पाश करके हनुमानको बांधता नया॥६॥
रामचन्द्रविरुद्धच्छा सा सभारावणस्य च ॥
कपिर्बद्धो ययौ तां च तेनानीतो दुरात्मना ॥७॥
भाषा-रामजाके संग विरुद्ध करनेकी इच्छा सोई रावणकी सजा है सो
खोटे काजमें प्रेमरूप मेघनाद उसी समामें बंधे हुए हनुमान्डूं लेगया ॥ ७ ॥
मनसा रावणेनैव पृष्टः कस्त्वमिहागतः ।।
किमर्थ काननन्नष्ट कृतं ते मे सुतो इतः ॥ ८ ॥
भाषा-मन रावण हनुमानसे पूछने लगा तू कौन है यहां क्यों आया और .
अशोकवाटिकाका नाश क्यों किया तथा हमारे पुत्रको क्यों मारा॥८॥
इति पृष्टस्तदोवाच निर्भयो हनुमान्कपिः ।।
दूतोऽहं रामचन्द्रस्य निर्मोहो हनुमान्कपिः॥
जानकीदर्शनायात्र प्राप्तस्सुग्रीवप्रेरितः॥९॥
भाषा-मैं विवेकरुप रामजीका दूत हूं हनुमान् मेरा नाम है गुरुका उप-
दशरूप जो सुग्रीव उसने जानकीको देखनेके वास्ते मेरेको लंकामें भेजा है ॥९॥
इत्युक्तस्ताड्यामास रावणो राक्षसैस्तदा ॥
कपि विषयजैस्सौख्यैर्गणनावजितेर्मुहुः ॥१०॥
भाषा-हनुमानका वाक्य सुनके गिनतीसे हीन जो विषयका सुख तिस
करके रावण राक्षसोंसे हनुमानको मराता जया ॥१०॥
रामचन्द्रपदं प्रीतितृष्णापुत्रस्य दाहनम् ॥
विचार्य राक्षसाश्चक्रुस्तत्पुच्छे वस्त्रवेष्टनम् ॥ ११ ॥
भाषा-रामचंद्रके चरणकी तृष्णा तिसके पुत्र हनुमान मोह' नाम ऐसे -
हनुमान्को भस्म करने वास्ते खोटा कर्मरूप वन सब राक्षस हनुमानको पुच्छमें
वख लपेटते भये ॥११॥

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भाषाटीकासहित ।
१४१
रामसेवासुखे हर्ष तल्लांगूलं कपः स्मृतम् ॥
दुष्टकर्मसुखैर्वस्त्रैवेष्टित्वाग्निं समाददुः ॥ १२ ॥
भाषा-रामजीकी सेवामें जो सुख तिस सुखका हर्ष सोई हनुमान्की.
पुच्छ है तिस पुच्छमें खोटे कर्मों में जो सुख सोई कपडा भया है तिस कप-
डेको हनुमान्की पुच्छसे लपेटके अनि लगा देते धये ॥ १२ ॥
स्वशत्यभावः कार्येषु स्रोऽग्निरित्येव कीर्त्यते ।
चिताप्रजागरं तैलं रज्ज्वक्षशोकमुत्तमम् ॥ १३ ॥
भाषा-सोटे काजोंमें राक्षसोंकी शक्ति नष्ट होगई सो अमि भई तथा
राक्षसोंको चिंता करके नींद नहीं आती सो तेल है अक्षकुमारका शोक सो
बडी पुष्ट रस्सी है तिस रसीसे पूंछमें वस्त्रको बांधके अग्नि लगा देते भये ॥१३॥
ग्रहणं हठसंवेगो भ्रमणं च दुरासदम् ॥
हसनं राक्षसानां वै रामचन्द्रपराजयः॥१४॥
भाषा-राक्षसीको हठकी वृद्धि सोई राक्षसों करके हनुमानका पकडना
भया है राक्षस बडे दुःखसे जीतने योग्य हैं ऐसा दुष्टोंका बल सोई लंकामें हनुमा-
न्का भ्रमण करना जया है रामजीको हम जीति लेवेंगे ऐसा राक्षसोका विचार
सोई हास्य भया है ॥ १४ ॥
राक्षसानां कुकर्माद्यास्ते सर्वे न्यायकोशलाः ॥
त एव ताड़ना भूरि कपेहेविवर्द्धनाः ॥ १५ ॥
भाषा-राक्षसोंके खोटे कर्म आदि लेके चतुराई सोई हनुमानका हर्ष
बढानेवाला ताडना भया है ॥ १५॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिश्रीरस्थैश्च राक्षसः ॥
प्रेरितैर्दशभालेन संमोहस्रासितः कपिः ॥ १६ ॥
भाषा-इनसे और भी जो शरीरमें बहुतसे राक्षस टिके हैं सो सब
मनरावणकी आज्ञा पायके रामजीके प्रेमका .मोहरूप जो हनुमान तिसको
त्रास देते भये ॥ १६ ॥

। २४२ वेदान्त रामायण सुं० कां । भ्रामितो हसितश्चैव ताडितोऽपि प्रकुत्सनः ।। संमोहो हनुमानाप शान्ति रामप्रकोपतः ॥ १७ ॥ भाषा-रामके प्रेममें मोहरूप जो हनुमान सो दूसरे जीवोंको दुख देनेगले राक्षसों करके घुमाये गये तथा मारेजाते भये तथा हँसे जाते भये तौमी विवेक- रूप रामजीके क्रोधसे शांतिको प्राप्त भये विचार किये कि लंकामें जो मैं ज्यादा उत्पात करूंगा तो रामजी मेरी दुर्गति करेंगे ॥ १७ ॥ न किंचिद्राक्षसान्सर्वान्मन्यते कपिसत्तमः ॥ लघुना कृतरूपेण पाशानिर्गत्य तत्क्षणे ॥१८॥ भापा-हनुमान् राक्षसोंको कुछनी बलवान नहीं गिनते थे यह जो राक्षसों- की लघुता सो हनुमानका लघुरूप भया है ऐसा लघुरूप धरके हनुमान् उसी समय राक्षसोंके पाशसे निकल गये ॥ १८ ॥ दुष्टकार्यस्थिति प्रीत्या हठजां हनुमान्कपिः॥ ददाह लंकानगरी राक्षसानां प्रपश्यताम् ।। १९ ॥ भाषा-बुरे काजोंमें हठसे प्रीतिसे टिकना ऐसी लंका है तिस लंकाको राक्ष- सोंके देखते २ हनुमान भस्म करदेते भये ॥१९॥ पूर्वबुद्धिपरित्यागस्सैव दाहो विकथ्यते ॥ निन्देा भूरितृष्णाद्या दुष्टकर्मरतिस्सदा ।। परवित्तकलवादिस्पृहा च सततं हृदि ॥ २० ॥ भाषा-हनुमानके त्राससे राक्षसोंकी प्रथमवाली बुद्धिका थोडा थोडा त्यागना सोई लंकाका जलाना गया है तथा परजीवकी निंदा ईर्ष्या बहुत तृष्णा बुरे काजोंमें प्रीति सदा करना दूसरेका धन स्त्री आदि हरण करनेकी सदा इच्छा करना ॥ २० ॥ एवमाद्यास्त्वसंख्याता राक्षस्यो भुवनत्रये ॥ ग्रन्थवृद्धिभयाच्चैव नोक्तास्सर्वा मयाऽधुना ॥ २१ ॥ भाषा-इनको आदि लेके गिनती नहीं जो कुकर्ममें प्रीति सो राक्षसी तीन 1 . . भाषाटीकासहित । - १४३ लोकमें गई हैं सब राक्षसियोंका वर्णन करै तो ग्रंथ बहुत बड़ा होजावेगा इस भयो मैंने वर्णन नहीं किया ॥ २३ ॥ भयं तासां विलापश्च मदहानिश्च रक्षताम् ॥ पुच्छशीतलता सा च लंकादुःखमनेकधा । रूपभक्तेश्च जानक्याः सेवाश्वासनकं पुनः ॥२२॥ भाषा-लंकाको जरती देखके राक्षसी सब बहुत डर गई सोई राक्ष- सियोंका विलाप हुआ तथा राक्षसोंके मदका नाश भया सोई हनुमान् पूंछ बुझायके ठंढी करते भये और जो जीव लंकामें बसेथे सबको बहुत दुःख जया सोई हनुमान फिर जानकीको विश्वास देते भये ॥ २२ ॥ पुत्रप्रीति महावीरेतं मणिं जानकी ददौ ।। तं गृहीत्वा नमस्कृत्य तूर्ण चलितुमुद्यतः ॥ २३ ॥ भापा-जानकी हनुमानमें पुत्रसरीखी प्रीति करती भई सोई चूडामणि है जानकीने तिस मणिको हनुमान्को दिया उस मणिको हनुमान लेके रामके पास चलते आये ॥ २३ ॥ कार्यसिद्धिं स्वतो वीक्ष्य हर्ष चके कपिस्तदा ॥ तदेव लंघनं सिन्धोः पुनराभून्मुनीश्वर ॥२४॥ भापा-हनुमान अपने पराक्रमको देखके खुशी भये सोई फिर समुद्रके पार उत्तर आये ॥२४॥ गुरुदेववियोगस्य शान्त्युपायांगदस्य च ॥ आश्वासनं कपिश्चक्रे स्वचरित्रप्रवर्णनैः ॥२६॥ भाषा-गुरुके वियोग शान्तिका उपाय जो अंगद तिसको हनुमान जे लंका कर्म किया उस कर्म रूप विश्वासको देते भये ॥ २५ ॥ कपेर्गुरूपदेशस्य विशुद्धाचरणं गुरौ।। तत्ख्यातं काननं तस्य कदापि विच्युतं फलम् ॥२६॥ - . + . - ! -- १४४ वेदान्त रामायण मुं० का। भाषा-गुरुका उपदेशरूप सुग्रीव तिसका नित्य गुरुके पूजनमें शुद्ध आचार सोई सुग्रीवका मधुनाम बगीचा है दैवयोगसे सोई आचार कमी क्षण भरको नष्ट हो जाता है सोई फल है ॥ २६ ॥ तस्यैव भक्षणं चक्रुः कपयोंऽगदप्रेरिताः ।। गुरावाचारमननध्यानचिन्तनकीर्तनाः ॥२७॥ भाषा-क्षणभरको आचार नष्ट होजाताहै सोई फलोंको अंगदकी आज्ञा पायके कपि खाते भये गुरुके चरणोंमें आधार मानना ध्यान चिंतन कीर्तन करना ॥ २७ ॥ एते वनेशाः कपिना कृता रक्षापरायणाः ॥ एतेषु च कदालस्यास्ते न्यूनवनपार्दिताः ॥२८॥ भाषा-ध्यान आदि इन्होको सुग्रीवने वनका मालिक किया है ये सब गुरुके आचारके रखनमें बड़े चतुर हैं इनको जो कभी आलस्य होजाता है सो वनके रक्षा करनेमें छोटे मालिक हैं उनको कपिलोग मारते भये ॥२८॥ निपीडितास्ते वनपाः कपीश्वरेविप्लाव्यमानाः स्खलिता मुहुः पथि ॥ सुग्रीवमूचुः करुणापरास्तदा तत्काननस्यैव विनाशनं मुने ॥ २९॥ भाषा-हे मुनिजी ! कपियोंसे पीडित जो प्रथम वर्णन हुए बगीचाकी रक्षा करनेवाले सो सब अपना दुःख तथा बगीचाका नाश सुग्रीवसे कहते भये ॥ २९ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे सुन्दरकाण्डे संवर्तवरतन्तुसंवादे पं० शिवसहायबुध- विरचिते कपिमधुवनफलमक्षणे तृतीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥३॥ वरतन्तुरुवाच । ते न्यूनवनपाः सर्वे प्रेरितैः कपिभिस्तदा ॥ अंगदेन भृशं चैव ताड़िता विप्र दुद्रुवुः । लेषां विस्मरणं नष्टं स्मरणाप्तिश्च ताडना ॥ १ ॥ + A है - . भाषाटीकासहित । १४५ भाषा-वरतंतु मुनि बोले अंगदकी आज्ञाको पायके कपि वनमें जो छोटे २ मालिक तिनको मारते भये, मारना क्या है ये सर्व ध्यान आदि सुंदर कौंको गुरुदेवमें भूलजाते रहे सो भूलना नष्ट होगया, 'अब ध्यान आदिका स्मरण नित्य करेंगे यह मारना हुआ, इस प्रकारसे ताडनाको प्राप्त होकर जो बनके रखवाले सो भागते भये ॥१॥ कम्पनं प्लवनं प्रोक्तं प्लाव्योचुः कपिसत्तमम् ॥ सर्व कपिकृतं श्रुत्वा कपीशो हर्षमाययौ ॥२॥ भाषा-वनके रखवालोंके हृदयमें ध्यान आदिका आलस्य रूप पाप कांपने लगा, सोई तिनका भागना हुआ, इस प्रकारसे भागके सुग्रीवसे सब हाल कहते भये कि हमारी सबकी अब पूर्वदेहका लक्षण नष्ट होगया सोई कहना गया है, वानरोंके कर्मको सुनके सुग्रीवको बडा हर्ष प्राप्त हुआ॥२॥ स्वात्मानमचलं मेने कविस्तदर्पमुच्यते ॥ स्वपक्षवर्द्धनं ज्ञानं तत्प्रश्नं राघवस्य च ॥३॥ भापा-सुग्रीव अपने रूपको अचल मानते भये कि जो दुष्टकर्म गुरुदेवकी 'आज्ञासे मेरेको दूर करते थे सो धीरे २ नाश भये चले जाते हैं यह सुप्रीवका हर्ष है तथा रामजी अपना पक्ष जो ज्ञान, विराग, सत्संग, यम, नियम, इन्होंसे आदि लेके सुंदर कौकी वृद्धि मानते भये सोई सुग्रीवसे रामजीका प्रश्न भया है ॥३॥ एतस्मिन्नंतरे चैव कपयस्ते समागताः॥ स्वस्वभावं परित्यज्य पतिता राधयान्तिके॥४॥ भाषा-ऐसे आनंदसमयमें प्रथम कहे हुए जो वानर सो सब अपने अपने स्वभावको छोडके रामजीके सामने पड जाते भये ॥४॥ पृष्टा रामेण ते सर्वे कुशलं वबिरे तदा ॥ कृपया तव राजेंद्र वयं निमलिनः कृताः॥५॥ - . १० ।

१४६ वेदांत रामायण सुं० कां।
भाषा-विवेकरूप रामजीने वानरोंसे कुशल पूछा तो वानर बोले कि, हे
रामजी! जिस दिन हमारे सबके ऊपर आपकी कृपा भई उसी दिन गुरुमें बुरा
कर्म देखना इससे आदि और जो कर्म ऐसे वानर वृक्ष हम सर्व जो हैं सो अपने
मलरूप स्वभावसे छूट गये ॥५॥
प्रोवाच हनुमान्सर्व लंकावृत्तांतमादितः ।।
स्वस्मिन्तनयप्रीतिं च जानक्या मणिमाददो ॥६॥
भाषा-लंकाका सब समाचार हनुमान् रामजीसे कहते जये, अपनेईं जानकी
लडका मानके पुत्रवाली प्रीति करती हुई सोई पुत्रकी प्रीति मणि भई है, सो
मणि हनुमान्को देती भई, सोई मणि हनुमान्ने रामजीको दिया, रामजी
मणि पायके खुशी भये ॥६॥
जानकीबालकोऽय वै प्रेमरूपः पुनः पुनः॥
उवाच रामस्तं प्रीत्या तत्तदादरमुच्यते॥७॥
भाषा-रामजी वारंवार सबसे कहते भये कि जानकीका ब्रह्ममें जो प्रेम सो
पुत्ररूप हनुमान है, ऐसा रामका वाक्य सो हनुमानका आदर आया है ॥ ७ ॥
गुरौ दुर्भावना त्यक्ता कप्यूक्षैश्च सुभावना ॥
कृता च सैव सेनाया योजना गणना शुभा॥८॥
भापा-जीवोंका गुरुदेवमें दुष्टभाव छूट गया, सुंदर भाव करने लगे कि
हमारे गुरु साक्षात् ईश्वर हैं ऐसी जीवोंकी बुद्धि सोई सेनाकी गिनती तथा
लंकाको जाना भया है॥८॥
दुष्टकर्मस्थितिप्रीतिलंकासौख्यस्य कांचनम् ॥
तद्धर्षवारिधेनाशचिंता सा तत्र संस्थितिः ॥९॥
भाषा-खोटे काजोंमें हठ करके टिकना ऐसी जो लंका तिसका सुख सो
सुवर्ण तिसका हर्ष सो समुद्रके नाश करनेकी चिन्ता सोई समुद्रके तटपर रामः
जीकी फौजका उतरना होता भया ॥९॥

ܢܫ १४७ भाषादीकासहित। कुकर्मत्रासरूपेण बोधितश्च दशाननः ॥ भ्रात्रा विभीपणेनैव तेन निष्कासितो बलः ॥१०॥ भापा-बुरे कार्यमें डरना सो बिभीषण है, सो मनरूप रावणको बिभीषणने जान दिया, कि भाई सुंदर कर्म करो, बुरा कर्म छोड देवो ऐसा वचन सुनके लंकासे विशीषणको रावणने निकाल दिया,बुरा कर्म करनेमें राक्षस भयसे हीन जये सोई बिभीषणका लंकासे निकालना हुआ॥ १० ॥ सत्यार्जवनिरानन्दा हिंसनास्तस्य मंत्रिणः ॥ समायान्मंत्रिभिश्चतैः शरणं राघवस्य वै ॥ ११ ॥ भापा-सत्यवचन, कोमलस्वभाव, अभिमानहीन चित्त, जीवमात्रपर दया यह चार बिजीपणके मंत्री हैं इन चारोंको संग लेके विपिण रामनाकी शरणमें आया ॥ ११ ॥ नाम्नश्वार्थमविज्ञातं कपिभिस्तस्य कहिचित् ॥ त्रासं दास्यत्ययं तस्मानोऽतश्चक्षुर्निवारणम् ॥ १२ ॥ भापा-त्रासरूप विनीपणके नामका अर्थ कपियोंने कभी नहीं जानाथा यह त्रासरूप राक्षस सबको त्रास देता है, ऐसा विचार किया कि, यह आवेगा तो हम सबको त्रास देवेगा, इस वास्ते रामजीके सामने विभीषणको नहीं आने दिया ॥ १२॥ आज्ञप्ता रामचन्द्रेण बोधिताश्चापि वानराः ॥ कपयश्चानयामासुस्तं च राक्षससत्तमम् ॥ १३ ॥ भापा-रामजी वानरोंसे बोले कि यह बिजीपण सबको त्रास नहीं देता यह तो खुद बुरे कार्यसे डरता है इसको लावो, ऐसा रामजीसे ज्ञान पायके विनी- यणको रामजीके पास ले आये ॥ १३ ॥ ईश्वरप्राप्युपायस्य मूलं प्राप्य जहर्ष सः ॥ स एव पातो रामस्य पादाये तस्य वर्णितः ॥१४॥ 7 t - + . १४८ वेदान्त रामायण सुं० का। भाषां-ब्रह्ममें प्राप्त होनेके उपायका मूल रूप विवेकरूप रामजी जिनको पायके विभीषण खुशी भया सोई रामजीके चरणके सामने बिभीषणका पड़ जाना हुआ॥१४॥ लंकायाः शिक्षणार्थाय लंकाराज्यं ददौ हरिः॥ भविष्यति च सा लंका साधूनां प्राणवल्लभा ॥१५॥ भाषा-लंकाको भगवान्का सेवन आदि सुंदरकर्म सिखानेके वास्ते लंकाका राज्य रामजीने बिभीषणको दिया कि लंकाका राजा बिभीषण होवेगा तो यह लंका साधुलोगोंको प्राणसे प्यारी होवेगी ऐसा विचारके ॥ १५ ॥ लंकासुखहिरण्यस्य हर्पवारिधितारणे ॥ ईश्वरप्रार्थनारूपं विचारं कृतवान्प्रभुः ॥ १६॥ भाषा-लंकाका सुख सोई सुवर्ण है तिस करके लंका जडी है, उस सुवर्णमें हर्ष मानना सो समुद्र है जैसा समुद्रका पार नहीं तैसेही हपका पार नहीं ऐसे समुद्रके पार जानेके वास्ते ईश्वरकी विनतीरूप विचार रामजी करते भयो॥१६॥ एतस्मिन्प्रेरितौ शीघ्रमागतो शुकसारणी ।। रामसेनां रावणेन कृतघ्नगुरुद्रोहिणौ ॥ १७ ॥ भाषा-ऐसा विचार रामजी कर रहे हैं कि उसी समय रावणकी आज्ञा पायके जलदी शुक सारण ये दो राक्षस रामजीकी फौजमें आयेशुक तो कतवरूप है जो उपकार करे उसको नहीं माने और सारण गुरुसे द्रोह करता है तिसका रूप है ॥१७॥ दूतौ दशाननस्यैतो कृतघ्नगुरुद्रोहिणौ कपयस्ताडयाञ्चकुत्विा कपिनृपाज्ञया ॥ १८॥ भाषा-ये दोनों कृतघ्न तथा गुरुद्रोहरूप रावणके दूत हैं ऐसा विचारके सुग्रीवकी आज्ञा पायके वानर इनको मारने लगे॥ १८ ॥ स्वकर्मणि द्वयोः प्रीतिा पुरा जन्मतोऽप्यभूत् ॥ - रामदर्शनमात्रेण विनष्टा सा च ताडना ॥ १९॥ - - - .

. - भाषाटीकासहित । १४९ भाषा-कतन्त्र तथा गुरुद्रोहरूप शुक सारणका स्वभाव है कि उपकारको नहीं मानना तथा गुरुका द्रोह करना ऐसी जो दूतोंकी अपने २ कर्ममें प्रीति रही सो प्रीति रामजीके दर्शनसे नष्ट होगई सोई शुक सारणकी ताडना हुई ॥ १९॥ मोचितौ रामचंद्रेण गतौ रावणसनिधिम् ॥ ख्यापयांचक्रतुः सबै रावणाय यथाक्रमम् ॥२०॥ भापा-रामजीने दूतोंको कपियोंके त्राससे छुडा दिया तब दोनों दुष्ट निर्मल होके रावणसे रामजीका हाल जो देख गये सो सब कहते भये॥ २०॥ पूर्वप्रकृतिनिर्मुक्तौ तदेव मोचितौ तदा ॥ तिरस्कृतौ रावणेन कुसंगत्यागकारणात् ॥ २१ ॥ भाषा-पहिलेके दुष्ट स्वभावसे दोनों छट गये सोई कपियोंके त्राससे रामजीका छुडाना हुआ तथा खोटी संगतिसे छूट गये सोई रावणसे अनादर पायक॥२१॥ शरणं रामचन्द्रस्य समायातौ पुनर्दुतम् ॥ रामसंगतिजं सौख्यं प्रापितो मुक्तिकारणम् ॥ २२ ॥ भाषा-शुकसारण जलदी रामजीकी शरणमें आते भये मुक्तिका बीज ऐसा जो रामजीका संग तिसमें उत्पन्न हुआ सुख उस सुखको प्राप्त होते भये॥२२॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे सुंदरकाण्डे संवर्तवरतन्तुसंवादे पं०शिवसहाय- बुधविरचिते शुकमारणमाक्षे चतुर्थो मोक्षाख्यः सोपानः ॥४॥ इति सुंदरकांडः समाप्तः। 4 है अथ युद्धकांडप्रारंभः। वरतन्तुरुवाच । सर्वेषां मतमागृह्य रामः सत्यव्रतसुधीः॥ लंकासुखहिरण्यस्य हर्पपालनहेतवे ॥ १ ॥ भाषा-बरतन्तुमुनि बोलते अये सब वानर तथा ऋक्षोंके मतको लेके - L १५० वेदांत रामायण यु.का। बड़े बुद्धिमान रामजी है सो लंकापुरीका सुखरूप सुवर्ण तिसका हर्ष सोई समुद्र तिसकी रक्षा करनेके वास्ते ॥१॥ प्रेमोत्कंठाः शमादीनां ते कुशा विजयं रिपोः ॥ तद्रूपमासनं कृत्वा व्रतं रामः समादधे ॥२॥ भाषा-शम यम दम दया इन्होंसे आदि लेके और जो ईश्वरके प्यारे कर्म है तिन कर्मोमें प्रेमसे गदगद होना वचन न कहा जाना ऐसा स्वभाव कुश है तथा रावणको जीतके अपना विजय सोई आसन है ऐसा कुशके आसनपर बैटिके जीवमात्रके मोक्ष करनेका विचाररूप बत रामजी धारण करते भये ॥२॥ त्रयः काला दिनाः प्रोक्ताः सर्वानाकृप्य मंडले ॥ सत्सङ्गस्य नयिष्यामि सर्वानीवाञ्चराचरे ॥३॥ भाषा-भूत भविष्यत् वर्तमान ये तीन काल तीन दिन भये हैं रामजीने विचारा कि, मनरूप रावणका नाश करके तिस पीछे सब जीवोंको ज्ञानकी रस्सीसे पकडके सत्संगमें ले आयेंगे मोक्ष होनेके वास्ते ऐसा उत्तम व्रत रामनी धारण करते भये ॥३॥ मूलमालस्यमुक्तं च फलं तत्सुखवर्धनम् ॥ सत्कर्मनाशको ज्ञात्वा तत्त्यजे द्वौ रघूत्तमः ॥ ४ ॥ भाषा-दो प्रकारका आलस्य है एक तो बुरे काममें दूसरा सुंदर कर्ममते ब्रह्ममें प्रीति तिसमें आलस्य करना सोई वनके मूल हैं तिसको रामजी त्याग देते हुए उसी आलस्यमें हर्ष मानना सो फल है उन फलकोनी त्यागके रामजी निराहारव्रत करते भये ॥४॥ लंकासुखहिरण्यस्य हर्षवारिधिमुत्तमम् ॥ हानिरूपं महामार्गमयाचत रघूत्तमः ॥ ५ ॥ भाषा-लंकाका सुख सोई सुवर्ण उसमें हर्ष सोई समुद्र तिस समुद्रका हानिरूप बडा रस्ता रामजी समुद्रसे मांगते भये कि तूं हानि मानके सूख जावो तौ लंकामें हमारा राज्य होजावै ॥ ५॥ - M . - , 4 भाषाटीकासहित । १५१ अदृष्ट्वा हर्षहान वै रावणस्य वधोद्यतः॥ तद्धानिशमनोपायं क्रोधञ्चक्रे च राघवः ॥ ६॥ भाषा-समुद्रकी हानि रामजी नहीं देखते हुए रावणके मारनेके वास्ते उपाय करते हैं ऐसे रामजी तिस हर्षकी शांति होनेके वास्ते उपायरूप क्रोध करते हुए ॥६॥ लंका शुभां पुरीं कतै विचारं प्रकरोति सः ॥ अनेकयत्नं रामश्च तत्सागरविशोषणम् ॥७॥ भाषा-रामजीने लंकापुरीको सुंदर बनाने के वास्ते रोज विचार करते हैं सोई समुद्रका शोपण है ॥ ७॥ धैर्येण विचकर्षाशु तेजोरूपं शरं प्रभुः॥ विकर्पतं शरं दृष्ट्वा रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ८॥ भाषा-धीरज करके तेजरूप जो शर है तिसको रामजी हर्षरूप समुद्रके शोपण करने वास्ते खेचते भये॥८॥ परपीडादयः सर्वे व्यथिता जलजन्तवः ।। अपश्यन्तस्स्वशरणं दुःखिताश्च मुहुर्मुहुः ॥९॥ भाषा-परको दुःख देनेवाले जो खोटे कर्म हैं सोई सब जलजीब हैं सो सब अपनी रक्षा करने वास्ते जीवको नहीं देखे तो वारंवार दुःखी होते भये ॥९॥ नरामो मानवोऽयं वै विवेको मोक्षदायकः ॥ इति ज्ञानं समुद्रस्य द्विजरूपं तदेव च ॥ १० ॥ भाषा-समुद्रको ऐसा ज्ञान हुआ कि रामजी मनुष्य नहीं है ये तो मोक्ष देनेवाले विवेक है ऐसा ज्ञान सोई ब्राह्मणका रूप है ॥ १० ॥ तत्रासो धारणन्तस्य पात्री तत्पीतिरुत्तमा॥ मया संतोपिते रामे पूर्ववन्मे सुखस्थितिः॥ ११ ॥ भाषा-रामजीका त्रास सोई ब्राह्मणके रूपका धारण भया है तिसको धारके ve १५२ वेदांत रामायण यु. कां। उसी ब्राह्मणके रूप धारणमें प्रीति सोई थाली गई है समुद्ने विचार किया कि जो मैं रामजीको प्रसन्न कर लेऊंगा तब प्रथम सरीखी मेरी स्थिति ॥११॥ वत्तिष्यन्ति च सौख्याचा भविष्यति च मे तदा ।। एते चान्ये च तस्यासन्विचारा रत्नसंचयाः॥१२॥ भाषा-बनी रहेगी. तथा बडे बडे सुखजी मेरेको होंगे इस सरीखे और जो अनेक प्रकारके समुद्रके विचार सोई अनेक प्रकारके बहुतसे , रन भये हैं ॥ १२॥ सागरस्तान्समादाय संप्राप राघवान्तिकम् ॥ स्वस्यापि राघवे प्रेमवर्द्धनं स्तवनं कृतम् ॥ १३ ॥ भाषा-पूर्वोक्त ब्राह्मणका रूप धारके तथा पूर्वोक्न थालीम पूर्वोक्त रव धारके समुद्र रामजीके पास आता भया, समुद्रका भी प्रेम रामजीमें बहुत होगया सोई समुद्र रामजीकी स्तुति करता जया ॥ १३ ॥ समुद्रनैव रामस्य कृता या विस्मृतिः पुरा ॥ दिद्युत्तरा च सा ज्ञेया पूर्वमानो रिपुः स्मृतः ॥१४॥ भाषा-समुद्र प्रथम रामजीको भूलि गया था सोई उत्तर दिशा है राम- जीसे प्रथम समुदने अभिमान किया था, सो समुद्रका वैरी है, जिसने समुद्रका ज्ञान हरिलिया था ॥ १४॥ पूजितः संस्तुतो रामः क्षामितः सिंधुना मुहुः तेन संप्रार्थितो रामो जघान तद्रिपुन्तदा ॥ राक्षसानां विनाशाय भूभारहरणाय च ॥ १५ ॥ भाषा-समुद्रने रामजीकी पूजन स्तुति की तथा अपना अपराध रामजीसे क्षमा कराया. वैरीको मारने वास्ते प्रार्थना की, तब रामजी प्रथम वर्णन हुआ जो समुद्रका वैरी तिसको मारते भये राक्षसोंका नाश करने वास्ते तथा पृथ्वीका भार हरने वास्ते ॥ १५॥ - . - '- भाषाटीकासहित। १५३ पणं चके स्वयं रामः सः सेतुस्सागरेऽभवत् ॥ क्षमारूपञ्च पाषाणं रामस्य सेतुबंधने ॥ अन्ये सत्संगवीर्याचास्साहित्यास्तत्प्रबंधने ॥ १६॥ भाषा-रामजी प्रतिज्ञा करते हुए सोई समुद्रमें पुल भयाहै, रामजीके चित्तमें क्षमा बहुत है सो क्षमा पुल बांधने वास्ते पत्थर भयाहै, तथा पुल बांधनेमें और जो अनेक प्रकारकी सामग्री चाहिये सो सत्संगके अनेक प्रकारके सुंदर कर्म हैं सो सब सामग्री भई है ॥ १६॥ बंधनं रामचंद्रस्य दृढत्वं स्वपणेऽभवत् ॥ ईदृशः सागरे सेतुर्बद्धोरामेण वै तदा ॥ १७॥ भाषा-रामजी अपनी प्रतिज्ञासे चलायमान कभी नहीं होते सोई पुलका बांधना भयाहै, तब ऐसा पुल समुद्रमें रामजी बांधते भये ॥१७॥ रावणस्यातिबलिनो युद्धे ज्ञात्वा रघूत्तमः ॥ महादुःखं भवेत्तत्र क्रूरे क्रूरतरेऽपि च ॥ १८ ॥ भाषा-बडा बली रावण तिसके युद्ध में करसे क्रूर युद्धमें बडा दुःख होवैगा ऐसा रामजी जानिके ॥ १८॥ चक्ने संस्थापनं तस्य स्वकर्मशिवरूपिणः ॥ अचलत्वं च विश्वासम्पूजनं तत्र निश्चितम् ॥ १९॥ भाषा-तब अपने स्वजाव अचल विश्वासरूप शिवकी स्थापना करते अये कि या नौ रावणको मारेंगे या हम मरेंगे पण युद्ध नहीं छोड़ेंगे ऐसा स्वभाव 'पुष्ट करते आये अपने स्वभावमें रामजीका निश्चय है कि मैं स्वभावको जैसा राखूगा तैसा रहेगा, ऐसो निश्चय सोई शिवका पूजन भया है ॥ १९ ॥ एवं कृत्वा विधि तत्र विवेको राघवस्तदा ॥ संस्मृत्य च मनोरूपरावणं प्रबलं प्रभुः ॥२०॥ भाषा-विवेकरूप रामजी मनरूप रावणको बडा बली जानिके ऐसा उपाय करते आये ॥२०॥ - - ३ - - १ A १५४ वेदान्त रामायण यु. का। स्वभावन्तत्यजुस्सर्वे पूर्वोक्तं गुरुसत्तमे ॥ पूर्वोक्ताः कपयश्चैव ऋक्षाश्च रामसंश्रयात् ॥ २१ ॥ भाषा-तथा वानर कक्षमी रामजीकी संगति पायकै प्रथम जो गुरुमें दुष्ट- स्वभाव था उसको त्यागदेते भये॥ २१ ॥ गुरौ सद्भावनं चक्रुक्षाश्च कपयोऽनिशम् ॥ तत्सैन्योत्तारणं ब्रह्मन्बभूव राघवस्य च ॥२२॥ भाषा-वानर तथा ऋक्ष गुरुमें सुंदर कर्म देखने लगे रातिदिन सोई राम- जीकी सेनाका समुद्रके दक्षिण पार जाना भया है ॥ २२ ॥ दुष्टे कार्य दशास्यस्य सदा प्रेमाचलम्मुने । सः सुवेलो गिरिः प्रोक्तो युद्धचिंता दशानने ॥२३॥ भाषा-हे मुनि ! खोटे कर्ममें रावणका प्रेम कभी चलायमान नहीं होता सोई सुवेल नाम पर्वत है तथा रावणके भी रामजीके संग युद्ध करनेमें चिंता रहती है ॥ २३ ॥ सा स्थिती रामसैन्यानामभवत्तत्र पर्वते । महानंदयुतो रामो बभूव मुनिसत्तम ॥ २४ ॥ भाषा-सोई सुवेल पर्वतपर रामजीकी सेनाका टिकना गया है. हे मुनिजी! समुद्रके पार जायके सेनाका सुवेलपर वास देखिके रामजीको बहुत आनंद होता भया ॥२४॥ दुःकर्मप्रीतिहटसस्थितिसौख्यहर्षसिंधुं व्यतीर्य कपिसैन्ययुतो विवेकः॥ तस्थौ विभीषणमतेन बिभीषणाढ्योभूमारहारकुशलो रघुवंशकेतुः ॥२६॥ भाषा-प्रथम वर्णन हुआ जो समुद्र तिसके पार जायके बिनीषणके मतसे विवेकरूप रामजी सुवेलपर टिकिके भूमिके भार नाश करनेमें बडे चतुर खुशी होते भये ॥ २५॥ : इति श्रीवेदांतरामायणे युद्धकांडे शिवसहायबुधविरचिते ससैन्यरामस्य सुवेला- द्रिस्थितिवर्णने प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥१॥ - 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भाषाटीकासहित। ११५५५ - वरतन्तुरुवाच। तृष्णा रतिर्मतिभूतिदुष्टकार्येषु सर्वदा ॥ वर्तते मुनिशार्दूल मनसो रावणस्य वै॥१॥ भाषा-वरतंतुमुनि बोले । हे मुनियोंमें श्रेष्ठ! खोटे कर्मोमें सदा तृष्णा प्रीति बुद्धि विभूति ये सब रावणकी बनी रहती है ॥ १ ॥ ताश्चतस्रो दिशः प्रोक्ता लंकाया दुष्टकर्मणि ॥ पणप्रीतिस्थितः पूर्व कथितायाः सविस्तरम् ॥२॥ भाषा-प्रथम वर्णन भई जो लंका तिसकी ये चार चार दिशा - भई हैं॥२॥ सत्संगनिंदनन्नित्यं तद्विनाशाय चिन्तनम् ॥ कचित्कचित्कृतं चापि सतां हासादिताडनम् ॥३॥ भाषा-सत्संगकी निंदा रोज करना सत्संगका नाश करने वास्ते चिंता करना किसी जगह संत्सगका नाशभी कर देना साधु लोगोंको देखिके हसना आदि ताडन करना ॥३॥ एते द्वाराश्च चत्वारो लंकाया मुनिनायक ॥ तेषु तासु च जीवानामकरोन्मतिवारणम् ॥ ४॥ भाषा-ये लंकाके चार दरवाजे हैं इन दरवाजोंमें तथा चारों दिशामें रामजीने दुष्टजीवोंकी बुद्धिका नाश करके सुंदर बुद्धि करदियी है ॥ ४ ॥ तदेव रोधनं विप्र लंकायाश्च चतुर्दिशः॥ चतुर्ष द्वारदेशेषु राघवेण कृतं मुने ॥६॥ भाषा-मो हे मुनिजी ! ऐसा कर्म सुंदर जीवोंको सुख देनेवास्ते रामजीने किये सोई लंकाके चार दरवाजे तथा चारों दिशा रामजी घरिलेते भये॥५॥ सत्संगनाशनं चैव राक्षसैश्च क्वचित् क्वचित् ॥ कृतन्तदेव लंकायाश्चोत्तरं द्वारमुच्यते ॥६॥ - - १५६ । वेदांत रामायण यु.कां। भाषा-राक्षसोंने किसी किसी जगहपर सत्संगका नाश करदिया सोई लंकाका उत्तर तरफ दरवाजा है ॥६॥ विनष्टस्य पुनः कर्तु वर्धनोपायचिंतनम् ॥ सैव स्थितिः समाज्ञेया रामचंद्रस्य चोत्तरे ॥ ७॥ भाषा-नष्ट भया जो सत्संग तिसकी फिर वृद्धि होनेके उपायको चितवन रामजी नित्य करते हैं सोई लंकाके उत्तर दरवाजे पर रामजीका टिकना भया है ॥ ७॥ सज्ज्ञानशिक्षणं राम लक्ष्मणे च कपिप्वपि ॥ ऋक्षेष्वपि विशेषेण संगत्या शोधितेषु च ॥ ८ ॥ भाषा-रामजीमें लक्ष्मणमें तथा वानरोंमें भी तथा रानकी संगतिको पायके शुद्ध भये जो ऋक्ष तिन्होंमेंभी सुंदर ज्ञान सिखानेकी बुद्धि बहुत है ॥८॥ चक्रस्ते शिक्षणं स्वस्वकर्मणो राक्षसेषु च ।। दुष्टकाणि सर्वाणि विधिना निर्मितानि च ॥ ९ ॥ भापा-राम लक्ष्मण वानर ये सब अपने अपने सुंदर कर्मको राक्षसोंको सिखाते भये जैसी जिसकी बुद्धि है तिस माफिक तथा तीन लोक चौदह भुवनमें जो ब्रह्माके बनाये हुए बुरे कर्म जितने हैं ॥९॥ रावणे तानि वर्तते कुम्भकर्णे विशेषतः ।। दुष्टसंगादिकाणि सुरेशविजये तथा ॥ १० ॥ भाषा-सो सब रावणमें वसते हैं कुंभकर्णमें तो विशेषसे वसते हैं तथा मेघनादमें कुंभकर्णसे ज्यादा बुरे काँका वास है ॥ १० ॥ अन्येषु राक्षसेष्वेवमन्यायास्सर्वदा स्थिराः॥ शिक्षणन्ते प्रकुर्वन्ति विवेकादीन्स्वकर्मणः ॥ ११ ॥ भाषा-इसी प्रकारसे और जो राक्षस हैं तिन्होंमेंनी बुरा कर्म रातिदिन, टेका रहता है रावण आदि लेके सब राक्षस जो हैं सो सब विवेकरूप -रामजी आदि लेके जो मोक्षके मित्र हैं तिन्होंको बुरा कर्म सिखाते हैं ॥ ११ ॥ - L - । भापाटीकासहित । १५७. एवं परस्परं युद्धं रामरावणयोर्मुने ॥ संकृत्य जीवन्द्यूतन्दौ रामरावणवेरिणौ ॥ १२ ॥ भाषा-इस प्रकारका अपना अपना कर्म सिखावनरूप युद्ध राम रावणका होता भया राम रावण ये दोनों आपसमें वैर मानिके जीवका जुवा करिके युद्ध करते भये ॥१२॥ सुयोन्यै स्वर्गमोक्षाय महदेश्वर्यभुक्तये ।। सर्वसौख्याय जीवस्य प्राप्तये रघुनंदनः ॥ १३ ॥ भाषा-जीवोंको सुंदर योनिमें जन्म लेनेवास्ते तथा स्वर्गप्राप्ति होने वास्ते तथा बहुत स्वर्ग भोगने वास्ते तथा बहुत सुख भोगने वास्ते तथा 'मोक्ष होने वास्ते रामजी रण करते आये विवेककी इच्छा तो जीवोंको मोक्ष देनेकी है परंतु जो मोक्षकी उपायमें जीव नष्ट होजावे तो संसारको सुख तो होवै ऐसा विचारके रामजी युद्ध करते भये ॥ १३॥ साहित्वानेकदुःखानि युद्धं चक्रे रघूत्तमः ॥ कुयोन्यै नरकायैव रोरवाद्याप्तिहेतवे ॥१४॥ भाषा-अनेक दुःख सहिके रामजी युद्ध करते भये तथा जीवोंको खोटी योनि प्राप्त होने वास्ते तथा रौरव आदि नरक प्राप्त होने वास्ते ॥ १४ ॥ अनेकदुःखभोगाय जन्ममृत्युभवाय च ॥ जीवस्यानेकदुःखात्ये युद्धं चक्रे च रावणः ॥ १९॥ भाषा-गिनतीसे हीन दुःख जीवोंको भोग करने वास्ते तथा वारंवार जीवोंक जन्म लेने वास्ते तथा शरीरको छोड़ने वास्ते और अनेक प्रकारके दुःख जीवोंके देने वास्ते रावण युद्ध करता जया ॥१५॥ परितापान्यनेकानि सहित्वा परतापनः॥ काम-क्रोधश्च लोभश्च मोहमानावहन्तथा ॥ १६॥ भाषा-दूसरे जीवोंको दुःख देनेवाला जो रावण अनेक दुःख सहता है परंतु जीवोंको दुःख देनेवास्ते युद्ध करता जया, तथा काम क्रोध लोग मोह मान अहंकार ॥ १६॥ - १५८ वेदात रामायण यु.का। सदसत्सु प्रवर्तते कर्मस्वेते निरंतरम् ॥ असत्कर्मस्वसत्प्रोक्तास्सत्कर्माणि च सन्जनाः ॥ १७ ॥ भाषा-ये सब सुंदर कामोंमें भी रहते हैं तथा बुरे कामोशी रहते हैं खोटे कर्ममें खोटा कहाते हैं तथा सुंदर कोंमें सज्जन कहातेहैं ॥ १७ ॥ असज्जाः कामवर्गाश्व युद्धचेष्टाश्च सज्जनः ।। कुति राक्षसा भूत्वा सद्धर्मान्पीडयन्ति च ॥१८॥ भाषा-खोटे कर्मों करिके उत्पन्न जो खोटे कर्म जैसा काम क्रोध आदि कर्म सो सब राक्षस होके सज्जन लोगोंसे युद्ध करते हैं तथा सुंदर धर्म जैसा क- थाश्रवण स्नान दान दया जप पूजन इनको आदि लेके और जो सुंदर धर्म तिन्हों- को नाश करते भये उसी वास्ते युद्ध करते भये क्योंकि विवेकरूप रामजी सुंदर धर्मका नाश नहीं करने देते ॥१८॥ एव परस्परं युद्धं बभूवाहनिशम्मुने । रामरावणयोः क्रूरं जन्ममोक्षाप्तिहेतुकम् ॥ १९ ॥ भाषा-इस प्रकारसे जीवको मोक्ष होने वास्ते रामजी युद्ध करते जये तथा जीवको वारंवार जन्म लेने वास्ते मनरावण युद्ध करता जया सुंदर तथा बुरे कर्मका करना यही युद्ध भयाहै ॥ १९ ॥ छिन्नं विवेकेन पुनः पुनरिशरो ज्ञानातिना राघववर्यसूनुना ॥ मनोदशास्यस्य महाहवे मुने तचंचलत्वं च तदेव तच्छिरः२०॥ भाषा-मनकी चंचलता जो है सोई मनरूप रावणका शिर है तिस शिरको रामजी वारंवार काटते भये ॥२०॥ लज्जाश्रमविहीनश्च रावणो राक्षसेश्वरः ।। स एव वर्द्धनस्तस्य शिरसचंचलस्य वै ॥ २१ ॥ भाषा-मनरावण लज्जा तथा श्रमसे हीन है सोई रावणके शिरकी युद्ध में वृद्धि होती भई ॥२१॥ । - - - भापाटीकासहित। १५९ कापथात्तं समाकृष्य सत्पथे चञ्चलं शठम् ॥ रामो निवेशयामास चासकृद्दयया हठात् ॥२२॥ भाषा-रामजी दया करिके रावणको खोटे रस्तासे वंचिके सुंदर रस्तामें हठसे टिकाते नये ॥ २२॥ तदेव छेदनं तस्य कृतं रामेण संगरे । प्रवेशितोऽपि तेनाशु सत्पथे हरिवल्लभे ॥ २३ ॥ भाषा-सोई राम करके शिरका काटना भयाहै युद्धमें मनरूप रावणको रामजी भगवान्का प्यारा रस्ता जो सत्संग तिसमें टिकाते भये तो भी ॥२३॥ तत्परित्यज्य सहसा कापथम्पुनराश्रितः ॥ तत्तस्य भूमिपतनमाकाशे व्याप्तिरेव च ॥ २४ ॥ भाषा-उस रस्ताको त्यागके खोटे रस्तामें फिर टिकता भया सोई शिरका भूमिमें पडना जया तथ आकाशको जाना आया ॥ २४ ॥ कदा तृष्णां कदा निद्रां कदा शान्ति कदा क्षमाम् ।। कदा हानि कदा ग्लानि नीत्यनीती कदा मुने ॥२५॥ भाषा-हे मुनिजी ! मनरूपरावण की तृष्णा कभी निद्रा कमी शान्ति कमी मोक्ष की हानि कमी ग्लानि कभी नीति कभी अनीति ॥२५॥ ज्ञानाज्ञानसुखं दुःखं मूर्खतां सुज्ञतां कदा ॥ एवमादीन्यनेकानि येषां संख्या न विद्यते ॥२६॥ भाषा-कभी ज्ञान कभी अज्ञान कभी सुख कभी दुःखको प्राप्त होता है की मूर्खबुद्धि कभी सुंदर बुद्धि इन्होंका आदि लेके गिनतीसे हीन और जो चीज है ॥२६॥ प्राप्नोत्यज्ञानतो नित्यं कदा राजा कदा ग्रजाः ॥ धनान्यो वित्तहानश्च दानी च कृपणस्तथा ॥ २७॥ भापा-मनरूप जो रावण है सो अज्ञानके वश होके नित्य कभी राज्यको प्राप्त होता है कभी प्रजाकी रीतिको प्राप्त होता है कभी बडा घन- - - + 4- वेदात रामायण यु.कां। वान हो जाता है कभी दरिद्री होजाता है कभी दानी होजाताहै की रुपण हो जाता है कभी ईश्वरसे वैर रखता है इस वैरके प्रतापसे अनेक दुःख सहता है तौभी ईश्वरसे प्रीति नहीं लगाता इस वास्ते दुःख भोगता है ॥ २७ ॥ क्षणे क्षणे भवत्येवं सा माया दर्शिता सुने । संग्रामे रावणेनैव राक्षसेन मुहुर्मुहुः ॥२८॥ भाषा-क्षण क्षणमें अनेक प्रकारका जंजाल मन करता है सोई युद्धमें रावणकी माया देखना हुआ है ॥ २८ ॥ प्राणनाशो भवेन्मे चेत्तथापि न त्यजाम्यहम् ॥ स्वकर्मरक्षसानाश करिष्यामि हठादपि ।। २९ ॥ भाषा-रामजीने ऐसी प्रतिज्ञा की है कि चाहे मेरा पाणरूप सत्संग नाश होजावे परंतु मेरा कर्म जो राक्षसोंका नाश करना है सो वो मैं करूंगा नहीं छोडूंगा ॥ २९॥ रामेणेति प्रतिज्ञातं रावणेनापि तत्तथा ॥ रामादिसर्वसाधूनां कर्ताह मूलकृन्तनम् ॥३०॥ भाषा-तैसेही रावणनभी प्रतिज्ञा की कि चाहे मेरा प्राणरूप खोटा कर्म नाश होवे परन्तु तौशी रामजी आदि लेके जो साधु हैं जैसा विवेक राम संतोष हरिमें प्रेम तीर्थ इन आदिको जडसे उखाड नाश कर देऊंगा ॥ ३० ॥ द्वयोः पणो रामदशास्ययोर्मुने सेवेद्दशः संगरवर्द्धनस्तदा ॥ बभूव पेतुश्च परस्परं हता भूमौ कपीशाः खलु राक्षसा मुने ॥३१॥ भाषा हे मुनिजी ! रामरावणकी ऐसी प्रतिज्ञा सोई युद्धकी वृद्धि भई रामकी सेनासे मारे हुए जो राक्षस तथा रावणकी सेना करके मारे हुए जो वानर भूमिमें पडके मरजाते गये ॥ ३१ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसंवादे द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥२॥ .

- - the - - ॥ भाषाटीकासहित। १६१ वरतन्तुरुवाच। दुस्संगकुम्भकर्णस्य सदा प्रीतिस्स्वकर्माण ॥ सत्संगनाशनं चैवं सा निद्रा तस्य वै मुने ॥१॥ भाषा-वरतन्तुमुनि बोलते भये खोटी संगतिरूप जो कुंभकर्ण है तिसकी बुद्धि खोटे कर्ममें , जो प्रीति रोज लगी रहती है तथा सत्संगका नाश करने में नित्य प्रीति रहती है सोई कुंभकर्णकी निद्रा है ॥ १ ॥ तस्य लोभगृहीस्य स्वप्नो मत्तस्य सः स्मृतः॥ अनिशं न तज्ज्ञातं कदापीत्थम्बभूव ह ॥२॥ भाषा-सत्संगके नाश करनेके लोभसे कुंभकर्ण दुःखी होरहा है सोई उसका शयन करना है, रात दिन कुंभकर्णको मालूम नहीं होता ऐसा सोनेमें मत्त, होरहा है ॥२॥ चिन्तनं च योनित्यं करोति द्विज मानसे ॥ दुःसंगपणवर्षे च द्वाविमौ चिंतनौ मुने ॥३॥ भापा-हे मुनिजी ! कुंभकर्ण जले और बुरे दोनों कर्मका चितवन करना है यही दोनों कोंका चितवन बारह महीने करता रहताहै ॥ ३ ॥ निद्राक्षयदिनी प्रोक्तो कुंभकर्णस्य दुमतेः॥ भविष्यति जयो युद्ध रावणस्योति निश्चितम् ॥ ४॥ भापा-कुंभकर्णके जागनेको दो दिन भये हैं रावणको ऐसा निश्चय है कि युद्धमें मेरा निश्चयसे जय होवेगा॥४॥ कुंभकर्णेन तत्तस्य कारयामास रावणः ॥ प्रोक्तं जागरणं विप्र दुरसंगहर्षगर्जनम् ॥ ५ ॥ भापा-परंतु कुंभकर्ण करके जय होवेगी ऐसा रावणका विचार सोई कुंभकर्णका जगाना गया है, खोटे कर्मरूप कुंभकर्णको खोटे कर्ममें हर्ष है सोई कुंभकर्णका गर्जना भयाहै ॥५॥ - 7 २ ११ - १६२ वेदान्त रामायण यु० कां। सत्कार्यालस्य द्यूतायैः सत्तिरस्कारनिन्दनः ॥ असंख्यविधिना सानिमितश्च कुकर्मभिः ॥६॥ भाषा-ब्रह्मा करके बनाये हुए गिनतीसे हीन कुकर्म जैसा सुंदर काजमें आलस्य तथा जुआ खेलना तथा साधुजनोंका अनादर करना निंदा करना ॥३॥ एतेषां प्रेमसौख्याद्यैः शस्त्रैरस्त्रेश्च भूरिशः ॥ संयुतः सैनिकैरागायुद्धाय रघुनन्दनम् ॥७॥ भाषा-इन कम्मोका प्रेम तथा सुख सोई हथियार जया है. तथा येही दुष्ट- कर्म फौज हुई है. ऐसी फौज तथा हथियार करके युक्त कुंभकर्ण रामजीसे युद्ध करनेको आता भया ॥ ७॥ शीघ्र दुस्संगरूपश्च कुम्भको महावली ॥ तं समायान्तमालोक्य विवेको राघवस्तदा ॥८॥ भाषा-शीघही दुस्संगरूप कुंभकर्ण युद्धमें आता गया. तिसको देखके विवेकरूप रामजी भी॥८॥ कपीनयोजयच्छूरानंगदादींश्च कोटिशः ॥ स्वयं भ्रातृसमायुक्तो युद्धं चक्रे रघूत्तमः ॥९॥ भाषा-अंगद आदि वानरोंको युद्ध करने वास्ते आज्ञा देते भये तथा आप दोनों भाई युद्ध करने वास्ते चलते भये ॥९॥ : पैशुन्यमत्सरशुभाशुभदृष्टिपातैस्तत्सैनिकाः कपिपरान्विभिदुः कुकार्याः ॥ अज्ञानवीर्यमदिरां मदवानी वै पीत्वा च सोऽपि बिभिदे कपिवर्यवीरान् ॥ १०॥ भाषा-चुगली करना, दूसरे जीवोंके सुखको देखके बुरा मानना, सुंदरका जमें खोटा कर्म देखना तथा खोटे काजमें सुंदर काज देखना. ऐसी आंखोंसे खूब तरहसे निशान लगाय लगाय दुष्ट काजरूप प्रथम वर्णन भये जो राक्षस सो सब वानरोंको मारते भये. अभिमानको बढानेवाली जो अज्ञानका पराक्रमरूप मदिरा तिसको पीके कुंकर्णजी वानर ऋक्षोंको मारता भया ॥ १० ॥ . 1 -- भाषाटीकासहित ।' ते वे हताश्च कपयः पतिताः पृथिव्यां सत्संगचिन्तनमयीं गमि- ताश्च सूर्णीम् ॥ तान्यस्य रावणसहोदरनाशनाय प्रोत्थाय सर्वदितिजान्विभिदुर्नखात्रैः ॥ ११॥ भापा-राक्षसों करके मारे गये जो वानर तथा ऋक्ष सोसव पृथ्वीमें पडके सत्संगकी चिन्तारूप मूर्जाको प्राप्त होते भये. क्षणमात्रमें सत्संगकी चिन्तारूप नूळको त्यागके कुंभकर्णके नाश करनेके वास्ते उठके सब राक्षसोंको अपने अपने नखके अग्रभाग करके छेदन भेदन करते हुए ॥ ११ ॥ संचिन्तनं निजगुरोर्वहुधा नखानि तत्पाद्ध्यानबहुप्रेमनखाग्रसु- क्तम् ॥ तन्मानसार्चनमहागिरिभिश्च वृक्षगुरूपवसनामृत- चिन्तनेस्तान् ॥ १२ ॥ भाषा-वानर अपने अपने गुरुका बहुत प्रकारसे ध्यान करते हुए तथा गुरुका ध्यान नखका अग्र भाग आया है, मन करके गुरुका पूजन करना सोई बड़े पर्वत भये हैं, गुरुके सामने टिकनेका चिन्तवन सो वृक्ष जये हैं, ऐसे वृक्ष पर्वत करके वानर राक्षसोंको मारते नये ॥१२॥ तान्स्वानिरीक्ष्य कपिभिर्विगतांश्च प्राणैः सम्यग्द्रुतानिपतिता- न्भुवि सैनिकांश्च ॥ मूगतान्कपिरांश्च मदावलीदान्दुद्राव दुष्टगमनः खलु कुंभकर्णः ॥१३॥ भाषा-कुंभकर्ण अपनी दुष्टकर्मरूपी फौजको वानरोंसे नष्ट भई तथा अगी पतित देखके युद्ध करनेको दौडता आया ॥ १३ सज्जनैस्तत्तिरस्कारो गतिवेगो निगद्यते ॥ तं द्रवन्तं विलोक्याशु कपीन्हंतुं रघूत्तमः ॥ १४॥ भापा-सुंदरकर्म जो साधु है सो कुंभकर्णका अनादर करदिया सोई कुंजकर्णका दौडना गया है, वानरोंको मारने वास्ते दौडते हुए कुंभकर्णको देखके रामजी ॥ १४॥ - - -- । १६४ वेदान्त रामायण यु. कां। सज्जनार्चनद्रावण द्रुत्वा तत्सन्निधिं गतः ।। पूर्वोक्तैरस्त्रशस्त्रैश्च कुंभकर्ण च राघवो ॥ १५ ॥ भाषा-सुंदर कर्मका पूजन करना सोई रामनीका दौडना है इस प्रकार से दौडके कुंभकर्णके सामने आते हुए, कुंभकर्णभी सामने राम लक्ष्मणको देखके प्रथम कहे हुए बाण करके ॥ १५॥ स्वसंगभ्रष्टमतुलं क्रोधं कृत्वा जघान तो ॥ जनतुस्तावपि क्रोधात्तस्य कर्मविचिन्तनात् ॥ १६ ॥ भाषा-कुंभकर्ण अपनी संपूर्ण संगतिको भ्रष्ट देखके सोई वेप्रमाण क्रोध है ऐसे क्रोध करके रामलक्ष्मणको मारता भया, कुंजकर्णके कर्मका चितवन राम लक्ष्मण करते आये कि इस दुष्टने सज्जनोंको खूब दुःख दिया है सोई चिन्तवन राम लक्ष्मणका क्रोध है ऐसा क्रोध करके राम लक्ष्मण कुंभक- र्णको मारते भये ॥ १६॥ सुशिक्षासायकैर्दुष्टं कुभकण मदाकुलम् ॥ तयोर्युद्धं समीक्ष्याथ साधवो दुर्जनास्तदा ।। १७ ॥ भाषा-रामजी दुष्टको सुंदर धर्म सिखाते अये सोई वाण करके दुष्टको मारने अये रामजी और कुंभकर्णके युद्धको देखके साधुजन तथा दुष्टजन ॥ १७ ॥ विस्मयं परमं जग्मुः किन्त्वेतद्वै भविष्यति ॥ पुण्यपापौ च संज्ञातौ तेनापि राघवेण च ॥ १८ ॥ भाषा-बडे विस्मयको प्राप्त भये यह क्या होवेगा, पुण्यको तथा पापको रामजीसी जानते हैं तथा कुंभकर्ण जानता है ॥ १८ ॥ दाविमावीश्वराधीनाविति युद्धं त्रिवासरम् ॥ बभूव च द्वयोर्ब्रह्म वीरयोर्वीरतापनम् ॥ १९ ॥ भाषा-क यह दोनों कर्म भगवान् के अधीन हैं जिससे जो चाहै. सो कर- वावे ऐसा जानना सोई तीन दिन युद्धमें भये हैं ॥१९॥ . , . -- , L 1 भाषाटीकासहित। १६५ चतुर्थदिवसे प्राप्तं द्वयोर्मानविवर्द्धने । कुंभकर्ण महावीर्य्यन्दुस्संगरौरवैधनम् ॥२०॥ भाषा-रामजीको तथा कुंभकर्णको युद्धमें अभिमान बहुत है सोई अभि- भान चौथा दिन भया है तिस चौथे दिन युद्धमें आया जो रौरवनरक सो अमि जया तिसकी वृद्धि करनेवाले खोटी संगरूस कुम्भकर्णको ॥ २० ॥ पूर्वोक्तस्सैनिकैः सर्वैः संयुतं मृतशैपिकैः ॥ युद्धं चक्रे पुनवीरी विवेको रघुनंदनः ॥२१॥ भाषा-मरेसे बची जो फौज तिसकरके संयुक्त कुलकर्णसे रामजी युद्ध करते भये ॥ २१॥ सत्कर्मशिक्षणेणिस्तं जघान रघूत्तमः पेशुन्यावस्त्रशस्त्रेश्च जघान रघुनंदनम् ॥ २२ ॥ भापा-सुंदर कर्मका सिखावनरूप बाण करिके रामजी कुंजकर्णको मारते भये चुगली करना आदि लेके बुरे कर्मरूप बाण करिके रामजीको कुंस- कर्ण मारता जया ॥ २२॥ वभूवतुश्च दो वीरो बाणच्छिन्नकलेवरो॥ स्वस्वकार्यस्य प्राप्त्यर्थचिन्सनं बाणछेदनम् ॥ २३ ॥ भाषा-अपने अपने काजकी प्राप्ति होनेका चितवन सोई बाण करिके देहको काटना दोनॉमी वीरोंका होता भया ॥ २३ ॥ सत्संगवासनासौख्यरक्तांगो रघुनन्दनः ॥ दुस्संगचिन्तनारक्तरंजितो राक्षसोत्तमः ॥ २४ ॥ भापा-सत्संगकी प्रीतिका सुख सोई रक्त भया है तिस रक्त करिके रामजीकी देह लाल होगई है । तथा कुंभकर्णको मालूम पडगया कि, दुःसगका नाश रामजी करेंगे उसी दुःसंगका नाश होनेकी चिंता सो रक्त है तिस रक्त करिके कुम्भकर्णकी देह लाल होगई है ॥ २४ ॥ - 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वेदान्त रामायण यु० कां।
१६६
एवं युद्धे समद्भूते पृथिवी करुणा तदा ॥
स्वधर्मगिरिभिश्चैवं वृक्षेश्चैव चचाल ह ॥ २५ ॥
भाषा-रामजीका तथा कुंजकर्णका ऐसा कठिन युद्ध देखिके जीवमात्र
ऊपर दया राखना सोई पृथ्वी है उस पृथ्वीका धर्म क्षमा आदि सुंदर कर्म मोई
पर्वत तथा वृक्ष है तिन सहित पृथ्वी कांपती भई ॥ २५ ॥
विधूयमानाम्पृथिवीनिरीक्ष्य जघान रामः खलु कुम्भकर्णम् ॥
सदोपदेशेन शरेण दुर्भात पपात सा भूमितले सदालये ॥२६॥
भाषा-दयारूप पृथ्वीको कंपायमान रामजी देखिके सुंदर कर्मका उपदेश-
रूप बाण करिके कुंभकर्णको मारते भये । रामजी करिके मारा जो दुस्संगरूप
कुंभकर्ण सो सुंदरधर्मरूप जो पृथ्वीतल तिसमें पडिके मार गया खोटी संगतिका
नाश भया. सुंदर संगतिकी वृद्धि भई यही कुंजकर्णका मरण भया ॥ २६ ॥
कुंभकर्णे हते दुष्टे दुःसगे साधुदुःखदे ॥
रामेण धर्मजा देवाः पूर्वोक्ताः सज्जनादयः ॥२७॥
भाषा-साधुजनोंको दुःख देनेवाला दुस्संगरूप कुंजकर्णके मरे पीछे प्रथम
वर्णन भये जो धर्मसे उत्पन्न देवता तथा सज्जन ये ॥ २७ ॥
चक्रुर्जयजयारावं ते वै दुदुभयस्तदा ॥
नेदुस्तद्वर्षमतुलं सुमनास्तं निगद्यते ॥ २८॥
भाषा-सब जयजयकार करते भये सोई दुंदुभी वाजती भई तथा इन
साधुजनोंको तथा देवताओंको बहुत हर्ष नया सोई पुष्प भया है ॥ २८ ॥
शंका विरहिता प्रीतिस्सज्जनानामभूत्तदा ॥
सत्संगें मुनिशार्दूलपुष्पवृष्टिश्च साभवत् ॥ २९ ॥
भाषा-हे मुनिजी ! सत्संगमें सज्जनोंकी प्रीति दुष्टोंकी शंकासे हीन होती
भई सो पुष्पवृष्टि होती आई ॥ २९ ॥
दुःसगरूपे खलु रावणानुजे हते च रामेण ससैन्यके खले ।।
सुखं प्रपेदुः खलु सज्जनादयो निश्शंकरागं परमेश्वरेऽचलम् ॥३०॥

-- - , भाषाटीकासहित । १६७ भाषा-खोटी संगतिरूप कुंभकर्ण रावणका छोटा भाई तिसको रामजीने मार डाला तब साधुजनोंको भयरहित भजनमें प्रेम होता है ऐसा सुख साधुओंको होताया तथा शंकारहित प्रेम परमेश्वरमें होताचया ॥३०॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकांडे पं० शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसंवादे कुंभकर्णवधे तृतीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥३॥ वरतन्तुरुवाच। कुंभकर्ण हतन्दृष्ट्वा रामेण रावणस्तदा ॥ स्वसुतं च समाहूय दुश्चेष्टितमथाब्रवीत् ॥१॥ भाषा-वरतन्तुमुनि बोले रावण दुःसंगरूप कुंभकर्णको रामजीसे मरा जानिके खोटे कर्मका प्रेमरूप जो मेघनाद तिसको बुलायके बोलता भया ॥१॥ दुश्चेष्टित महाबाहो याहि युद्धाय सत्वरम् ॥ विवेकेन हतो भ्राता कुम्भकर्णो ममानुजः ॥२॥ भाषा-हे खोटे कर्मके प्रेम मेघनाद ! मेरे भाई कुंभकर्णको विवेकरूप रामजीने मार डाला है सो युद्ध करने वास्ते जलदी जावो ॥२॥ दुष्टकमणि यत्प्रेम तदिंद्रमर्दनस्स्मृतः ॥ स श्रुत्वा स्वपितुर्वाक्यं शीघ्र युद्धाय नियंयो॥३॥ भाषा-खोटे कर्मोमें प्रेमरूप मेघनाद पिताका वाक्य सुनिके उसी समय युद्ध करनेको गया ॥३॥ चकार युद्धमतुलं ताभ्यां च कपिभिः सह ॥ जारद्यूतमहामोहहास्यास्निग्धादिकमभिः॥४॥ भाषा-व्यभिचार जुआ खोटे कर्मोंमें बडा मोह साधुओंकी मस्करी करना इन कोंमें स्नेह आदि लेके बुरे कर्म बाण है इन बाणों करिके राम लक्ष्मण तथा वानरोंसे युद्ध इंद्रजित करता भया ॥४॥ मंदस्मितादिवाक्यैश्च शरैश्चिच्छेद वानरान् ॥ राघवौ च विशेषेण जघानैभिश्शरोत्तमैः ॥५॥ - 1 . - १६८ वेदान्त रामायण यु०का। भाषा-मुसकुरायके बोलना यह बडा खोटा काम है इसीको वाण बना- यके वानरोंको काटता भया इन्हों वाणों करिके राम लक्ष्मणकोनी मारता आया ॥५॥ एषाम्प्रीत्या महाशत्त्या चान्यैश्च विविधैरपि ।। जघान लक्ष्मणन्तोपं राघवं च विशेपतः ॥६॥ भाषा-प्रथम वर्णन भये बुरे कर्मरूप बाण तिन बाणोंमें प्रीति निर्दया सोई सांग है उसी सांग करिके सन्तोषरूप लक्ष्मणको मारा तथा और अनेक बाण हैं तिन्हों करिके विवेकरूप रामजीको तथा और योधोंको मारता जया ॥६॥ कदा स्वकार्ये स्वस्यैव वर्द्धनं न्यूनता कदा ॥ आविर्धानन्तिरोधानन्तस्य तत्कथितम्मुने ॥७॥ भाषा-वीर मेघनाद अपने युद्धमें कजी अपनी जयकी वृद्धि देखता है तथा कभी जयकी हानि देखता है यही युद्धमें मेघनादका प्रगट होना तथा गुप्त होना है ॥ ७ ॥ एवं कृत्वा महायुद्धन्तयोः शोकविवर्द्धनम् ॥ मूर्छितान्कपिवीरांश्व राघवौ चापि दुर्मदः ॥ ८॥ भाषा-इस प्रकारका महायुद्ध करके वानरोंको तथा राम लक्ष्मणको मूर्छित करके ॥ ८॥ जगाम स्वालयं वरिः पिता पितृहर्षविवर्धनः ।। रामेण पातितां सेनां सर्वा स्वस्य निरीक्ष्य वै ॥ ९ ॥ आषा-पिता जो मनरूप रावण तिसके हर्षकी वृद्धि करनेवाला इन्द्रजिद अपने मंदिरको गया, दुष्टोंकी मंडली सो उसका महल है, अपनी फौजको राम करिके नष्ट भई देखके भाग गया ॥९॥ रामबाणैरर्दितश्च जगाम पितुरन्तिकम् ।। तदाभूच द्वयोः सायं संशयं मुनिसत्तम ॥ १० ॥ भाषा-रामजीके बाण करिके मारा मेघनाद भागिके पिताके पास गया तब . -- - . - भाषाटीकासहित। ३६९ राम रावण दोनों शुरवीरोंको संशय है कि हमारा जय होगा कि नहीं ऐसा दोनों बीर विचारते हैं सोई संशयरूप सायंकाल होगया ॥ १० ॥ रामरावणयोरस्तं प्रतापभास्करोगमत् ॥ किं भविष्यति युद्धेऽस्मिचिन्तयेतिविचिंततोः॥ ११ ॥ भाषा-राम रावण ये दोनों अपने अपने चित्तमें चिंतन करते हैं कि, युद्धमें क्या होगा कि हारेंगे ऐसा चिंतनरूप राम रावणका प्रताप भया है सो प्रतापसूर्य सामको अस्त होगया ॥ ११ ॥ सन्तोषम्पतितन्दृष्ट्वा शत्त्या निर्दयया क्षितौ ॥ घातितन्दुष्टकार्यस्य प्रेम्णा रावणसूनुना ॥ . मोक्षप्रेमाकुलत्वेन निरीक्ष्य श्वासवर्जितम् ॥ १२ ॥ भाषा-राम आदि लेके सुग्रीव बिजीपण सुग्रीवसहित सब वानर रोते भये क्यों रोते भये खोटे कर्मोमें प्रेमरूप ऐसा जो रावणका पुत्र मेघनाद तिसकरके लक्ष्मण संतोपरूपको मारा देखिके निर्दयारूप शक्ति करिके दुष्टने लक्ष्मणको मारा तव लक्ष्मण मोक्षके प्रेमसे कुछ थोरा व्याकुल होगये सोई श्वाससे हीन मूर्छाको प्राप्त होगये हैं ॥ १२॥ रामाद्या रुरुदुस्सर्वे सुग्रीवसबिभीषणाः ॥ स्वस्वकार्येष्वधर्यञ्च तदेव रोदनं स्मृतम् ॥ १३ ॥ भाषा-राम आदि अपने २ काजमें धरिजको छोड़ देते अये सो इन सबका रोना भया है। यह श्लोकयुग्म है ॥ १३ ॥ सत्याचलस्वभावश्च रामस्य तेन बोधितः॥ सुषेणेन रघुश्रेष्ठो द्रोण्यानयनहेतवे ॥ १४ ॥ भाषा-द्रोणपर्वतपर संजीवन नाम औषधि लेआने वास्ते रामजीका स्वभाव कमी सत्यसे चलायमान नहीं होता सोई स्वभाव है रामजीने कहा द्रोणगिरिसे सजीवन औषधि मॅगावो ॥ १४॥ ,

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१७०,
वेदान्त रामायण यु. का.!
सन्तापजीवनार्थाय रावणस्य कुलान्तकम् ॥
कर्तुं तेन प्रतिज्ञातं स प्रभातावधिः कृतः॥ १९॥
भाषा-रामजीने प्रतिज्ञा की कि संतोपरूप लक्ष्मणको जिवायके पीछे
रावणके कुलको नाश करूंगा ऐसी रामजीकी प्रतिजा सोई प्रातःकालकी मर्यादा
भई है कि रातिमें लक्ष्मण जिआवै तब तो अच्छा है नहीं तो प्रातःकाल सूर्य
दीखते समय मरजावेंगे राम रावणकी सेनाकी चिंता सोई राति है ॥ १५॥
रामण सच्चिदानंदध्यानं द्रोणाचलः स्मृतः ॥
संजीवनन्तदानन्दमापेधञ्च कृतम्मुने ।। १६॥
भाषा-हे मुनिजी ! रामजी भगवान्का ध्यान करते हैं साई द्रोणनामपर्वत है
तथा ध्यानमें आनंद होताहै सोई संजीवनी नाम औषधी है ॥ १६ ॥
रामेण प्रेपणम्प्रेममोहरूपस्य कथ्यते ॥
गतिवेगो हनुमतो विवेकानुग्रहस्तथा ॥ १७ ॥
भाषा-रामजीके प्रेमके मोहरूप जो हनुमान तिसके ऊपर रामजीका प्रेम
बहुत है सोई औषधि लेने वास्ते हनुमान्को भेजना भया है हनुमानके ऊपर
विवेकरूप रामकी रूपा बहुत है सोई संजीवन औषध लेआने वास्ते हनुमानका ,
दौडना भया है ॥ १७॥
रामध्यानमभूत्पंथा दुष्टार्थों मुनिसत्तमः ॥
भगवद्वाक्यशास्त्रस्य निन्दनं तत्कमंडलुः ॥ १८ ॥
भाषा-हनुमानजी रामजीको ध्यान करते भये सोई औषध लेने वास्ते
जानेका रस्ता है, तथा खोटे कर्मोंके अर्थ जैसा जाते २ अनेक दुःख सहना
सोही विन करनेवास्ते कालनेमि मुनि भया है ईश्वरका वाक्यरूप शास्त्र तिसकी
निंदा करना सोई कालनेमिका कमंडलु है ।। १८॥
ददौ हुनुमते तोयं तत्सुखं बुद्धिनाशनम् ॥
तत्त्यक्त्वा हनुमानूचे विज्ञाय दम्भिनं मुनिम् ॥ १९ ॥

भाषाटीकासहित। भाषा-हनुमानको प्यासा जानिके शास्त्रानंदनरूप कमंडलु है तिस कम- डलुका सुख सोई जल है सज्जनोंकी बुद्धिको नाश करनेवाला जल तथा कमंडल हनुमानको मुनिने दिया, और कहा कि जल पीओ, हनुमान मुनिको चंडाल जानिके कमंडलु त्यागिके दुष्टमुनिसे बोले ॥ १९ ॥ नानेन मे भवेच्छांतिस्तृपस्सा च बलीयसी ॥ चित्तं तदोष, दत्तं तदेव वचनं कपः ॥२०॥ भाषा-हनुमानका चित्त तो औषधिमें लगिरहा सोई हनुमानका बोलना भया, यह बोले कि दुष्टमुनि ! इस जलसे हमारी प्यासकी शान्ति नहीं होगी क्योंकि हमारेको बडी प्यास लगी है ॥ २० ॥ संतोषलक्ष्मणस्येव वर्द्धनेच्छा तृषा स्मृता ।। इत्युक्तो दर्शयामास दुष्टार्थः कपये तदा ॥ २१ ॥ भापा-संतोपरूप लक्ष्मणकी वृद्धि होनेकी इच्छा रामजीके प्रेममें मोहरूप हनुमान्की बनीरहती है सोई हनुमानकी तृषा भई है ऐसा कपिसे कहा जो मुनि सो हनुमानके वास्ते तलाव देखाता भया ॥ २१ ॥ तडागं सज्जनानां वै दुःखरूपं विचिन्तनम् ॥ सदनादरतोयेन पूरितं सर्वदा सरः॥२२॥ भाषा-सज्जनजीवोंको दुःख देनेका चितवन सोई तलाव है साधु लोगोंका अनादर सोई जल है तिस करके हमेशा वह तलाव भरा रहता है ॥२२॥ सदसद्विचारणम्पानन्तायस्याभूत्कपेस्तदा ॥ छायया सज्जनाप्रीत्या प्रस्तस्तव कपिस्तदा ॥२३॥ भाषा-खोटे कर्मका तथा सुंदर कर्मका निर्णय करना सोई हनुमानका जल पीना भया है ऐसा सुंदर कर्म वथा बुरे कर्मका निर्णय करते जो हनुमान तिसको साधु जीवोंमें अप्रीति सोई छाया नाम राक्षसी है सो छायाने हनुमानको खाने वास्ते पकडलिया ॥ २३॥ - , -- । + १७२ वेदान्त रामायण यु. कां । तां हत्वागान्मुनेश्शीघ्रमतिकं गुरुदक्षिणा ।। संतोषचिंतया मुष्टचाहननं सत्सुभावना ।। २४॥ भाषा-राक्षसीको मारिके मुनिके सामने गये तब मुनिने दक्षिणा मांगी तब हनुमानको संतोपकी चिंता बनी रहती है सोई मूठी है उसी मुष्टि करके दुष्टके अर्थरूप मुनिको मारे तथा साधुजीवोंमे प्रीतिरूप दक्षिणा देते भये तब दुष्टोंका अर्थ नष्ट होगया और सज्जनजीव जयसे रहित भये ॥ २४ ॥ संतोषपतनं कप्टमविज्ञानो वनस्पतेः ।। विवेकसंगती हप तद्रोणोत्पाटनं कृतम् ॥२९॥ भापा-युद्धमें संतोषरूप लक्ष्मण बेहोश जये हैं ऐसा कष्ट सोई संजीवन औषधिका नहीं पहिचानना भया सोई विवेकरूप रामकी संगतिने जीवाको बडा हर्ष होताहे सोई द्रोणपर्वतका मूलसे उखाडना गयाहै ॥ २५ ॥ सत्संगवर्द्धनमहासुखमौषधञ्च सत्याचलप्रकृतिजो गदहा सुपेणः॥ तूर्णन्ददौ रघुपते खलु लक्ष्मणाय तज्जीवनं च समभूद्धिमतो वियोमः ॥२६॥ भाषा-तब द्रोणपर्वतको देखके रामजीका सत्यसे अचलस्वभावरूप गदहा कहिये वैद्य सुषेण जो है सो सत्संगकी वृद्धिमें सुख सोई संजीवन औषधको जलदी लक्ष्मणको देते हुए तब तुर्त लक्ष्मणजी जीवते आये खोटी मतिमें वियोग होना सोई लक्ष्मणका जीवन भया है बडे वैद्यको शाखमें गदहा लिखाहै कोई शंका मति करना ॥ २६॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकाण्ड पं० शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवर- तन्तुसंवादे संतोषजीवनविधी चतुर्थो मोक्षाख्यः सोपानः॥४॥ वरतन्तुरुवाच। लक्ष्मण जीवितन्दृष्ट्वा हर्षिता वनचारिणः ॥ रामो बिभीषणश्चैव तद्विरिस्थापनम्युनः॥१॥ भाषा-वरतंतुमुनि बाले लक्ष्मणको संजीवित देखके रामजी सुग्रीव बिभी- १ . -- * भाषादीकासहित । १७३ षण सब कपि ऋक्षोंको बडा हर्ष भया सोई फिर द्रोणपर्वतका द्रोणके स्थानपर टिकाना भयाहै ॥ १॥ वस्वार्थलालसारात्रौ तद्धय चिंतया दयोः ॥ पुनः प्रतापो ववृधे रामरावणयोस्तदा ॥२॥ भाषा-तब अपने अपने जयका विचार सब करते हैं सोई विचारकी इच्छा रात्रि भईहै तिस रात्रि में अपने अपने जयके सुखमें उसी हर्षकी चिंता करके राम रावणका प्रतापरूप सूर्य फिर उदय भया ॥२॥ एतत्प्रभातं संवीक्ष्य द्वयोर्लोभन्दिनन्तथा ॥ युद्धाय पुनराजग्मुः कपयो राक्षसास्तदा ॥३॥ भाषा-ऐसा प्रतापरूप सूर्य उदयरूप प्रजातको देखिके तथा राम रावणकी अपने अपने काजमें लोग सोई दिन भयाहै. ऐसे समयमें युद्ध करने वास्ते वानर राक्षस फिरि रणभूमिमें आते अये. अपने २ काजकी प्रीति सोई रणभूमि है ॥३॥ चेद्विवेको वली रामः सन्तोपो लक्ष्मणोऽपि च ॥ तथापि नागपाशेन पंचेंद्रियगुणेन वै ॥४॥ भाषा-राम लक्ष्मण बडे बलवान हैं क्यों कि विवेक संतोष मोक्षके वढे मित्र है तो भी पांच खोटी इंद्रियोंका गुण जो है सोई नागपाश भया है तिस नागपाश करके ॥४॥ बबंध राघवौ युद्धे मेघनादो महाबली ॥ किंचितस्वकर्मचलनं तहयोधनं मुने ॥५॥ भापा-मेघनाद राम लक्ष्मणको बांधता भया. कुछ थोरा विवेकजी अपने कर्मसे चलायमान होगये हैं और लक्ष्मणभी थोरा चलायमान होगये हैं। क्योंकि मनरूप रावणका युद्ध सहज नहीं है बडे २ ज्ञालियोंको पकडिके मनरावणने नरकनें पटाक दियाहै सोई चलायमान रामलक्ष्मणको नामपाशने बांधना गयाहै ॥५॥ - r 7 १७४ वेदान्त रामायण यु. का। स्ववीर्यस्मरणेनैव गरुडेन विमोचितौ ॥ नागपाशविमुक्तौ द्वौ निरीक्ष्य रावणात्मजः ॥६॥ भाषा-राम लक्ष्मण अपने वीर्यका स्मरण करते भये सोई गरुड भया. है उस गरुडने नागपाशसे छुडाय दिया मेवनादने राम लक्ष्मणको नागपाशसे छुटा देखिके ॥६॥ - प्लान्य युद्धानिराशश्च लवनं स्वजये तथा ।। दुष्टानां संगतिं देवी नामोक्तां च निकुंभिलाम् ॥ ७॥ भाषा-अपनी जय होनेमें मेघनादने आशा छोड दियी सोई मेघनादका जागना गया है सो युद्धमें भागिक दुष्टोंकी संगतिरूप निकुंजिला देवी है तिसके पास गया॥ ७॥ - स्वकर्मप्रेमकुंडं च तत्सुखोऽग्निरितीर्यते ॥ तदुत्साहाश्च साहित्या हवने दारु तत्परम् ॥ ८॥ भाषा -मेघनादका जो कर्म बुरे कर्ममें प्रेम करना सोई होमका कुंड जया है उसी बुरे कर्मके प्रेममें सुख मानना सोई अमि हे. मेघनादका उत्साह कि मैं बहुत, सुखी हूं सोई होमकी सब सामग्री है मेघनादकी प्रतिज्ञा कि राम लक्ष्मणको मार डालूंगा ऐसा पण सोई होमका काष्ठ है ॥ ८॥ मरणे चिंतनं होमं कर्तु तस्थौ च दुर्मतिः॥ शमादिशिक्षाबाणेन लक्ष्मणेन विनाशितः॥९॥ भाषा-मेघनादको निश्चय अपने मरणको होगया कि मैं युद्ध में मर जाऊंगा सोई होमका करना भया है शम, दम, यम आदि सुंदर कर्म लक्ष्मण मेघनादको सिखाते अये सोई सिखाना बाण करिके लक्ष्मण मेघनादके होमको नाश करते आये ॥९॥ किञ्चित्सकाय म्लानत्वं तदेव तद्विनाशनम् ॥ पुनश्चक्रे महायुद्धं लक्ष्मणेन हतो भुवि ॥ स्वभावं पविकं हित्वा सुखभावरतोऽभवत् ॥ १० ॥ - ।

ܢ - - भाषाटीकासहित । १७५ भाषा-थोरा मेघनादका अपने कर्ममें लक्ष्मणकी शिक्षा पायके प्रेम नष्ट होगया. तथा सुंदर काँमें थोरा प्रेम भया सोई होमका नाश होनाहै होमके नाश भये पीछे फिर युद्ध करनेको आता भया तब लक्ष्मणने मारि डाला तब , मेघनाद दयारूप पृथ्वी में पडिगया. दयामें मिलि गया. प्रथमका स्वभाव खोटे कर्ममें प्रेम सो छूटि गया. सुंदर स्वनावमें प्रेम करने लगा यह मेघनादका मरण'. आया है ॥१०॥ तदेव मरणं तस्य पतनं धर्मसंस्थितिः ।। भूमौ सद्भावनायां च मेघनादस्य सक्षयः ॥११॥ भापा-धर्ममें बुद्धि टिक गई सो मेघनादका भूमि पडना है सुंदर कममें प्रीति होगइ साइ भूमि है तिसमें पडिके खोटे कर्ममें प्रेमरूप जो मेघनाद तिसका नाश हुआ. दोनों श्लोकोंका अर्थ मिला है युग्म है ॥ १३ ॥ एवं संतोपरूपस्तु लक्ष्मणो राघवानुजः॥ निहत्य चेन्द्रजेतारं सुखमाप स्वकर्मणः ॥ १२ ॥ भाषा-संतोष लक्ष्मण इस प्रकारसे इन्द्रजितको मारिके अपना कर्म जो संतोप तिसका सुख जो भगवानमें प्रेम तिसको प्राप्त भये ॥ १२ ॥ सिद्धि वीक्ष्य विवेकाया हपै चक्रुश्च भूरिशः ॥ सा पुष्पवृष्टिः खाद्रष्टा द्वयोरुपरि पातिता ॥ १३ ॥ भापा-विवेकरूप रामजी आदि सज्जन अपने काँकी सिद्धि देखिके बहुत हर्ष करते भये. सोई रामलक्ष्मणके ऊपर फलोंकी वर्षा आकाशसे होती गई ॥ १३॥ किंचिकिचित्स्वमरणे कुलानां संक्षये तथा ! वासं प्राप दशग्रीवो विलापस्तस्य स स्मृतः ॥ १४ ॥ भापा-रावण अपने मरणमें तथा कुलके क्षयमें थोरा थोरा डर मानता या सोई रावणका विलाप हुआ है ॥ ३ ॥ हते मेघनादे कुनादे सुवादे गते प्रापिते लक्ष्मणेनैव मृत्युम् ॥ . सुखं साधवस्सज्जनाः पेदिरे वै मही सर्वदानंदयुक्ता बभूव ॥ १५ ॥ ~ ।

1 - . . १७६ वेदान्त रामायण यु. कां। भाषा-लक्ष्मणने मेघनादको मार डाला खोटा बोलना दुष्टजीवोंका नष्ट होगया सब जीवोंमें सुंदर बोलना होता आया साधुजन भगवानके भजनरूप सुखको प्राप्त भये तथा दयारूप पृथ्वी दयाके वृद्धिरूप आनंदको प्राप्त होती गई ॥ १५ ॥ मेघनादं हतं दृष्ट्वा पुत्र प्राणसमं तदा ॥ जीविताशाम्परित्यज्य स्वकर्मप्रीतिभावनाम् ॥ १६॥ भाषा-रावण मेघनादको मरा देखिके अपने कर्ममें प्रीति सोई रावणके जीनेकी आशा उसको छोड़ दिया जाना कि अब मैं नहीं जीऊंगा ॥ १६ ॥ पूर्वोक्तरस्त्रशस्त्रैश्च सनिकैचापि संयुतः ॥ बभूव सुमहद्युद्धं रामरावणयोरपि ॥ १७॥ भाषा-प्रथम वर्णन जई जो सेना तथा अस्त्र शस्त्र तथा तिनको लेके वडा युद्ध राम रावणका होता भया ॥ १७ ॥ असत्यादिशरैर्दुष्टो जघान रामवाहिनीः ॥ राघवौ च विशेषेण सुग्रीवं सबिभीषणम् ॥ १८ ॥ ५ भाषा-झूठ बोलना आदि जो अनेक बुरे कर्म है तिनको बाण बनायके रामजीकी सेना सुंदर कमरूप तिसको काटता जया तथा राम लक्ष्मण सुग्रीव बिज्ञीषण इन चारोंको तो बहुत मारता भया ॥ १८॥ रामोऽपि सत्यादिशरैर्दशाननं विभेद सैन्यानपि तस्य चागतान् ।। हता मृतास्संस्खलिताश्चप्लावितारस्वकर्मभ्रष्टाशुभबुद्धयोऽभवन १९ भाषा-तथा रामजीची सत्यवचन आदि अनेक सुंदर कमरूप वाण करके रावणको मारते भये तथा रावणकी सेना दुष्ट कम्मोंमें प्रीतिरूप तिसको भी मारते भये सेना कोई तो घायल हुई पृथ्वीमें पडी है कोई मरमई कोई जागि गई रावणकी सेना दुष्टकर्म छोडिके सुंदर कर्ममें बुद्धि लगावी भई सोई सेनाका मरना भागना पडना भयाहै ॥ १९॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकांडे शिवसहायबुधविरचित्रे संवर्तवरतन्तुसंवादे रामरावणकल्लोलयुद्धवर्णने पञ्चमी मोक्षाख्यः सोपानः ॥५॥ . .

- - १-७७- भाषाटीकासहित । वरतन्तुरुवाच । युद्धे पराजयं प्राप्य रामेम रावणस्तदा ॥ स्वकर्मनाशचिन्तायां रात्री गत्वा च जानकीम् ॥१॥ भाषा-वरतन्तु मुनि बोले रावण राम करके युद्ध में हानिको पायके अपने कर्मके नाशकी चिंता सोई रात्रि भई है विस रात्रिमें जानकी प्रति जाता भया ॥१॥ उवाच वचनं राजा सामदानादि संयुतम् ॥ अहं चापि जगद्व्याप्तस्तस्यांशःप्राणवल्लभे ॥२॥ भाषा-साम दान भेद दंडरूप वचन बोलता या हे प्राणोंकी प्यारी जानकी ! संसारमें व्याप्त जो भगवान् तिसके अंशमें मैं भी हूँ॥२॥ कृपां करिष्यसे चेत्त्व तदा मुक्तो भवाम्यहम् ॥ अस्मात्कुतर्कनिचयात्रोचेत्वां भ्रष्टभावनाम् ॥ ३॥ भाषा-जो तूं भगवान्की भक्ति मेरेको देगी ऐसी कपा मेरे ऊपर करेगी तौ इस संसारके अनेक प्रकारके कुतर्कके समहसे मैं छुटि जाऊंगा. यह सामवचन, जो नहीं कृपा करैगी, तो मैं तो भ्रष्टही हो रहाहूं पर तेरेकोशी भ्रष्टकी प्रीतिमें ॥३॥ गमयिष्यामि दास्यामि निर्विघ्नं भजनं प्रभोः॥ इत्याद्यनेकावधिना तेनोक्ता जनकात्मजा ॥ ४ ॥ भाषा-प्राप्त कर देऊंगा यह दंड वचन, जो कपा करेगी तो भगवान्का भजन निर्विघ्न देऊंगा तेरे भजनमें विघ्न नहीं होने पावैगा क्योंकि इन्द्रियोंका राजा तो मैं हूं यह दान बचन इन आदि और अनेक प्रकारके वचन जानकीसे रावण कहता भया परंतु जानकीने ॥ ४॥ तिरश्चकार तं दुष्टं ज्ञात्वा पक्कहदंसती ॥ अनेकजन्मभ्रष्टत्त्वं तत्तिरस्कारमुच्यते ॥५॥ भाषा-रावणका अनादर करके जानकीने विचार किया कि यह मन रूप रावण अनेक जन्मका भ्रष्ट है इसका हृदय बहुत ज्ञानसे कच्चा है इसको . - - । १२ + । १७८ वेदान्त रामायण यु० का। जो कुछ उपदेशशी करें तौ सुन लेवेगा पण मानेगा नहीं इसवास्ते अनादर कर दिया मन बहुत जन्मसे विगड रहा ह सोई रावणका अनादर है॥ ५ ॥ आजगाम तदा दुष्टः स्वालयं स्वपराजयम् ॥ ज्ञात्वा रामाधुवं दुष्टस्तत्तस्य गमनालयम् ॥६॥ भाषा-जानकीसे अनादर पायके युद्धमें हार जाना ऐसे अपने घरको रावण चलागया रावणने रामजीसे अपनी हार निश्चयसे जानि लिया सोई रावणका घर जाना हुआ॥६॥ गते दशानने देवी ब्रह्मभक्तिस्वरूपिणी ॥ चक्रे विलापं सुमहदुष्टानां मोक्षहेतुकम् ॥ ७ ॥ भाषा-रावणके गये पीछे ब्रह्मकी भक्ति रूप जानकी दुष्टोंके मोक्ष होनेके वास्ते चिन्तवन करती है सोई विलाप जानकी करती भई ॥ ७ ॥ ज्ञानविज्ञानवैराग्यं मुक्तिदानं चराचरे॥ आचारश्च विचारश्च त्रासो दुष्टस्वभावतः ॥८॥ भाषा-ज्ञान १ विज्ञान २ वैराग्य ३ आचार ४ विचार ५ खोटे स्वभावसे डर राखना ६॥ ८॥ अनाहोलसो नित्यं श्रीमद्भगवदर्चने ॥ कुकर्मनाशने यनं स्वचित्तनियमन्तथा ॥ ९ ॥ भाषा-भगवान्के पूजनमें हर्ष त्यागना नहीं ७ तथा आलस्य करना नहीं खोटे कर्मोंका नाश होनेके वास्ते उपाय करना ९ तथा अपने चित्तको थिर शंखना १० तथा और अनेक विघ्नसे चित्तको बन्दोबस्तसे राखना ११ ॥९॥ एते चैकादशा मासाः प्रोक्ता जनकनंदिनी ॥ स्थित्वा च रावणारामे विललाप भृशं सती ॥ १० ॥ भाषा-येही ग्यारह मास जानकी रावणके बगीचेमें टिकके वारंवार विलाप करती भई ॥१०॥ 1 - - H आपाटीकासहित । १७९ । पूर्वोक्तां रजनीन्दृष्टा व्यतीतां रावणस्तदा ॥ पुनयुद्धं च रामेण कर्तुं प्रायान्महाबली ॥ ११ ॥ भाषा-प्रथम वर्णन भई जो रात्रि तिसको बीती देखके रावण रामसे युद्ध करनेको फिर आता भया ॥११॥ योगध्यानौ शमदमौ जीवानां सद्रिशिक्षणम् ॥ परोपकारो मोक्षस्य चिंतनं सततं हृदि ॥ १२॥ भाषा-योग ध्यान शम दम जीवोंको सुंदरकर्म सिखाना दूसरे जीवका उपकार करना रातदिन मोक्ष होनेका चिंतन करना ॥ १२ ॥ दुष्टचासं सदा मोनी रामस्यैते महागुणाः॥ दुष्टानां कर्मणां भावस्तेषु रागो निरंतरम् ॥ १३ ॥ भाषा-दुष्टजीवोंसे भय मानना खोटे कर्ममें कोई बुलावै तौ बोलना नहीं ये नव गुण रामजीके युद्धमें नौ दिन भये तथा खोटे कर्मोमें प्रेम उसी प्रेममें नित्य स्नेह करना ॥ १३॥ अनृतं चञ्चलत्वं च सत्कर्मनाशचिन्तनम् ॥ सत्कर्मणि महालस्यं वेदनिंदनमेव च ॥ १४ ॥ भापा-झूठ बोलना स्वभावकी चंचलता बहुत राखना सुंदर कर्मका नाश करनेकी चिन्ता सदा राखना सुंदर कोंमें सदा आलस्य करना वेदकी निंदा करना ॥ १४ ॥ जीवानां दुःखदायाशु सदोपायवितर्कनम् ॥ प्रसह्य करणं चैते गुणा रावणदेहजाः ॥ १५ ॥ आपा-जीवोंको दुःख देनेवास्ते सदा उपाय करना सब जीवोंसे जबरदस्ती करना ये नव गुणोंकी उत्पत्ति रावणकी देहसे है सोई युद्धमें नव दिन भये हैं१५ अष्टादशदिनं युद्धं रामरावणयोरभूत् ॥ किंचिच्छेपानिरीक्ष्यैव स्वसेनां राक्षसाधिपः ।। हतपुत्रप्रपात्राञ्च सनातगण सयुताम् ॥ १६ ॥ । 1 4 ܢ܀ 1- . वेदांत रामायण यु० कां। भाषा-इस प्रकार अठारह दिन राम रावणका बुद्ध जया तब रावण अपनी फौजमें देखा तो भाता पुत्र पौत्र संग रहनेवाले सब मरगये अब थोडी फौज रही है॥१६॥ विद्रुत्य संगरान्मूढो व्याकुलत्वं च प्लावनम् ॥ स्वभावं स्वगुरुं शुक्र पृष्ट्वा यज्ञं समारभत् ॥ १७॥ भाषा-ऐसी सेना देखके रावण व्याकुल होगया सोई रावणका संग्रामसे भागना है सो संग्रामसे भागिके रावणका स्वभाव सोई रावणका गुरु शुक्राचार्य तिससे पूछके यज्ञ करनेको प्रारंभ रावण करता जया ॥ १७ ॥ केनोपायेन विजयो मे भवेदिति चिन्तनम् ॥ शोकः कुंडं महामाहो काष्टमग्निर्वितर्कनः ॥ १८॥ भापा-मेरी जय रामसें युद्धमे किस प्रकारसे होवै ऐसा रातदिन रावण चितवन करता है सो चितवनरूप शोक सोई यज्ञमें होम करनेका कुंड जया है खोटे कर्मोमें रावणका बडा मोह है सोई होमकी लकडी गई हैं तथा रानजीको मैं जीतूंगा कि रामजी मेरेको जीत लेवेगे ऐसा रातदिन रावण तर्क करता भया सोई तर्क यज्ञमें अगि भई है ॥ १८॥ पुत्रपौत्रप्रपौत्राणां सेनानामपि घातनम् ॥ एवं विषादा बहवो होमसाहित्यमंडलाः ॥ १९॥ भाषा-पुत्र पौत्र प्रपौत्र भाई फौज इन सबका मरण देखके रावणके हृदयमें बहुत दुःख हुवा सोई दुःख होमकी अनेक प्रकारकी सामग्री भई है ॥ १९ ॥ एवं यज्ञं च संकतु तस्थौ राक्षससत्तमः ।। तदा गत्याशु कपयो भगवदज्ञानमाददुः ॥ २० ॥ भाषा-ऐसी यज्ञ करनेको रावण एकांतमें बैठता या तब वानरोने शीघ्र जायके रावणको भगवान्का ध्यानरूप ज्ञान देते भये ॥२०॥ तदेव यज्ञविघ्नं च कृतं वानरसत्तमैः॥ भगवद् ज्ञानरूपं वै विघ्नं प्राप्य दशाननः ॥२१॥ - , . + । ।

. भोपाटीकासहित। १८१ • भाषा-सोई ज्ञान देना वानरों करके रावणके यज्ञका नाश करना भया, शोकरूप यज्ञ रावणका नाश होगया तव जगवान्का भजनरूप ज्ञान अपनी यज्ञका नाश रावण पायके ॥ २१ ॥ किंचिज्ज्ञानं च संप्राप्य स्वकर्मस्मरणं कृतम् ॥ रायणेन तदेवास्य विलापः प्रोच्यते बुधैः ॥ २२ ॥ भापा-थोडे ज्ञानको प्राप्त होके फिर पीछे अपना जो बुराकर्म तिसका स्मरण किया. तौ पहिले तो अज्ञानसे बुरा कर्म अच्छा लागता रहा. अब थोडा बान प्राप्त जया तो वह बुरा कर्म खोटा मालूम पडा तौ मनरूप रावणने विलाप किया. यह विलाप शोकरूप भया तथा परलोक वास्तेभी भया ॥ २२ ॥ संकृत्वैवं विलापं च रामेण संगरे हतः ।। सच्चिदानंदरूपस्य ध्यानबाणेन तत्क्षणे ॥ २३ ॥ भापा-ऐसा विलाप करके युद्ध करनेको आया तब रामजीने परमेश्वरका ध्यानरूप तिस वाण करके रावणको मारडाला तब मनरूप रावण मरगया॥२३॥ एवं हृतश्च रामेण सामात्यपुत्रपौत्रकः ॥ ससैन्यः सकुटुंबश्च सदा सानुजसंयुतः ॥२४॥ भाषा-इस प्रकारसे मंत्री पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, कुटुंब, सेना, दास, छोटा भाई सहित रावणको रामजीने मार डाला ।। २४ ॥ मंदोदयादिभिः स्त्रीभिस्त्यक्तं कर्म च पौर्विकम् ॥ विलापश्चैव तासाम्भो कथितो मुनिसत्तम ॥ २५ ॥ भाषा-हे मुनिजी ! मंदोदरी आदि रावणकी जो स्त्री हैं सो सब राक्षसियोंने प्रथम खोटाकर्म त्याग देती भई सो राक्षसियोंको रावणके मरे पीछे विलाप करना भया ॥ २५ ॥ जनिष्यति पुनर्दुष्टा दास्यति व्यसनं महत् ॥ जीवानामेतदर्थ हि लंकाराज्यं विभीषणे ॥ २६ ॥ .

१ r -- १८२ वेदांत रामायण यु. कां। भाषा-रामजीने विचार किया कि ये दुष्टलोग फिर उत्पन्न होवेंगे तो जीवोंको दुःख देवेंगे इस वास्ते लंकाका राज्य विपिणको देते भये ।। २६ ॥ ददौ पूर्वोक्तभावं च लंकाराज्यं रघूत्तमः ॥ महानंदयुतो रामस्तदेव सेन्यजीवनम् ॥ २७ ॥ भाषा-प्रथम वर्णन भया जो लंकाका राज्य सो रामजी विनीपणको देते भये. और बहुत भगवान्के रूपका स्मरण करके बड़े आनंदको प्राप्त जये. सोई रामजीका सैन्यको जिआना भया है ॥ २७ ॥ चराचरस्यैव हते रिपो तदा रामेण सत्कर्मविनाशने झठे ॥ प्रापुस्सुखं सर्वचराचरात्मका जीवा मनोरावणपातिते क्षिती ॥२८॥ भापा-रामजीने चराचरका वैरी तथा सुंदर कर्मका नाश करने वाला शठ ऐसा जो मनरूप रावण तिसको मार डाला तब सब चराचर जीव बड़े मुखको प्राप्त होते भये ॥२८॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तबरतन्तुमंबादे रावणमरणरामविजयवर्णने षष्ठो मोक्षास्यः सोपानः॥६॥ . . . - PM- वरतन्तुरुवाच। रामचंद्रेण निहतस्सच्छिक्षासायकेन वै । कुवासनां परित्यज्य संश्रितश्च सुवासनाम् ॥ १॥ भाषा-बरतन्तु मुनि बोले सुंदर भगवान्का कर्म मन रावणको रामजी सिखाते भये उस सिखावनरूप बाण करके रावण मारा गया, रावण खोटे कर्मको प्रीतिको छोडके सुन्दर कर्मोंकी प्रीतिका सेवन करने लगा ॥ १ ॥ तदेव मरणं प्रोक्तं मनसो रावणस्य वै ॥ अन्येषां चैव सर्वेषां राक्षसानामपीदृशम् ॥२॥ भाषा-सोई मनरावणका मरण भया है तथा और जो प्रथम वर्णन हुवा है गिनतीसे हीन खोटे कर्मरूप राक्षस वोजी सब बुरे कर्मको छोडके भगवान में प्रीति करने लगे, सोई सब राक्षसोंका मरण आया है ॥ २॥ . ।

, भापाटीकासहित। १८३. मरणं शुद्धरूपं च बभूव मुनिसत्तम ॥ मनसो रावणस्यैव दृष्ट्वा मरणमद्भुतम् ॥३॥ भापा-तब बुरे कर्मरूप मलसे छूटके शुद्ध रूप होते भए, सोई राक्षसोंका मरण भया है मनरावणका मरण देखके ॥ ३ ॥ वेदशास्त्रपुराणोक्तास्सर्वे धर्मास्सनातनाः ॥ स्वस्वकर्माणि ते सोख्यं प्रापुः सुखमनेकधा ॥४॥ भाषा-वेदशास्त्र पुराणमें कथित जो सनातनधर्म है सो सब अपने २ कर्ममें अनेक प्रकारका सुख पाते नये ॥४॥ तदेव दुंदुभेःशब्दं पुष्पवर्षणमेव च ॥ सत्संगवृद्धिः संजाता सर्वयोनौ चराचरे । सा स्तुती रामचंद्रस्य कृता देवर्मुनीश्वर ॥ ६॥ भापा-मोई दुंदुभीका बाजना तथा फूलोंकी वर्षा होती भई चराचर योनिके जीवाम सत्संगकी वृद्धि होती गई, सोई सब देवता आदि रामजीकी स्तुति करते भए ॥५॥ प्रीतिश्चराचराणां वे सत्संगे निर्भयाभवत् ।। सर्वेषामेव वदेहपुनीरामसमागमः ॥६॥ भापा-सब जीवोंकी प्रीति मलसे हीन सत्संगमें भयरहित होती नई सोई रामजीका तथा जानकीका लंकामें मिलाप होता हुआ॥ ६ ॥ धेयाविचलनं रामस्सर्वेषां वै मुहुर्मुहुः॥ चराचराणां प्रददौ दुःखितानां च भूरिशः ॥ ७॥ भाषा-हे मुनिजी ! अनेक जन्मसे मनरावण करके दुःखी जो चराचर जीव तिन सब जीवोंको रामजीने सुखी किया ॥ ७ ॥ जन्मजन्मान्तरादिन मनरावणतापिनाम् ।। सुखान्वितानां स्वेनैव कृतानां रघुनन्दनः ॥ ८॥ - . । -- १८४ वेदांत रामायण यु.कां. भाषा-धीरजमें स्थिर करके वारंवार वास देते भये कि हे जीव! धीरज हृदयमें धरके ईश्वरको अजन करो यह युग्म है ॥८॥ तदेव कपिवीराणामृक्षाणां च तथैव च ॥ सलक्ष्मणस्य जानक्याः पुष्पकारोहणं स्मृतम् ॥ ९ ॥ भाषा-सोई जीवोंको धीरजमें स्थिरता देना वानरोंका तथा ऋोंका लक्ष्मण- सहित जानकीकों पुष्पक विमानमें बैठना भयाहै ॥ ९ ॥ मृतावशेपिनां चैव राक्षसानां मतिः शुभा ॥ सर्वेषां राक्षसीनां च तद्रणस्थलदर्शनम् ॥ १० ॥ भाषा-युद्धमें मरे नहीं जो राक्षस राक्षसी तिनकीनी सुंदर कर्ममें बुद्धि लगजाती भई सोई रामजीने पुष्पक विमानमें जानकीको ऊपरसे युद्धकी भूमि देखाते भये ॥ १०॥ सत्संगवर्द्धनं दृष्ट्वा दुष्टसंगक्षयं तथा ॥ पुनस्स्वपुर्यागमनमेतद्रामस्य कथ्यते ॥ ११ ॥ भाषा-रामजीने राक्षसोंका नाश करे पीछे सत्संगकी वृद्धि देखे तथा दुष्टोंकी क्षय देखते भये ऐसा देखना रामजीका सोई लंकासे फिर सुमतिरूप अयोध्या पुरीको चलना भया॥११॥ सर्वैपां विमलञ्चित्तं जीवानां सततं हृदि ।। सत्कर्मवर्द्धनं प्रेम तद्रामगमनं पुनः॥ १२ ॥ भाषा-नित्य सब जीवोंका चित्त हृदयमें मलहीन रहता है तथा सुंदर क्रममें सब जीवोंके प्रेमकी वृद्धि भई ये कर्म रामजीका लंकासे नरद्वाज मुनिके आश्रमपर आना भया ॥ १२ स्थितिश्च रामचंद्रस्य भरद्वाजाश्रमेऽभवत् ।। सत्कर्मशत्रुहीनञ्च बभूव मुनिसत्तम् ॥ १३ ॥ भाषा-हे मुनिजी सुंदर कर्म जो है सो वैरीसे हीन होगये सोई भरद्वाज के आश्रमपर रामजीका टिकना भया है ॥ १३ ॥ .

+ , . , भाषाटीकासहित । १८५ तदेव वायुपुत्रस्य प्रेषणं भरतं प्रति ।। राक्षसोद्रेगरहितान्दृष्ट्वाजनकनन्दिनीम् ॥ १४ ॥ भाषा-सो रामजीको भरद्वाजके आश्रम वास करनेको सुख सो भरतके पास रामजी हनुमानको भेजते भये तथा रामजीने परमेश्वरकी भक्तिरूप जानकीको राक्षसोंके दुःखसे रहित देखिके ॥ १४ ॥ इति प्रीतिविवेकस्य द्वयोरुक्तिश्च साभवत् ॥ निमोहवायुसुतयोर्महदानंदमेव च ॥ १५ ॥ भाषा-रामजीकी प्रीति परमेश्वरमें बहुत होती है सोई हनुमान्की तथा भरतजीको वार्ता होती भई निर्माहरूप भरतके आश्रमको देखिके हनुमानको बहुत आनंद जया, तथा हनुमानसे रामनीको कुशल सुनिके भरतको बहुत आनंद जया ॥ १५॥ तत्पुप्पकप्रयाणं च नंदियामे मुनीश्वर ॥ दुःकर्मणां विनाशञ्च मोक्षस्य वदनं तथा ॥ १६ ॥ भापा-हे मुनिजी ! यही जो दोनोंका आनंद है सोई भरद्वाजके आश्रमसे रामका दलसहित पुष्पकविमान नंदिग्राममें आना भया दुष्टकम्मोका नाश तथा सत्संगकी वृद्धि होना ॥ १६॥ एपो हर्पः प्रजानां वै पूर्वोक्तपुरवासिनाम् ॥ राक्षसानां विनाशाय चक्रे रामोऽतिबुद्धिमान् ॥ प्रतिज्ञा सा जटा बद्धा रामेण जाह्नवीतटे ॥ १७ ॥ भाषा-प्रथम वर्णन हुए जो पुरवासी तिनको यही हर्ष नया है राक्षसोंका नाश करनेवास्ते रामजीने प्रथम प्रतिज्ञा किया है सोई प्रतिज्ञारूप जदा गंगाके तटपर रामजी नातासहित बांधेरहे हैं ॥ १७॥ शृंगवेरपुरे ब्रह्मन् लक्ष्मणेनापि तत्तथा ॥ ग्रंथ वृद्धिभयाच्चैवन्न तत्र लिखितं मया ॥ १८॥ - . १८६ वेदान्त रामायण यु. कां। भाषा-शृंगवेरपुरकी एक कथा जो वारंवार लिखिजावेगी तो ग्रंथ बड़ा हो जावेगा इस भयसे मैंने जटा बांधनेकी कथा शंगवेरपुर वर्णनमें नहीं लिखा विचारा कि युद्धकांडके अंतमें तौ जटा उतारनेकी कथा आवेगी. इसवास्ते नहीं लिखा ॥१८॥ रामलक्ष्मणयोर्ब्रह्मजटाया बंधनं शुभम् ॥ रामस्य दुःखवृद्धिस्सा जटा चैव सहोदरैः॥ १९॥ भाषा-हे मुनिजी ! रान लक्ष्मणका जटाबंधन राक्षसोका नाश करनेका सुंदर पण है तथा रामजाक दुःखकी वृद्धि सो भरतकी वा शत्रुमको तथा नाईका पक्ष मानके लक्ष्मणका भी जटाको बांधना है. ॥ १९ ॥ त्रिभिर्बद्धा च सेदानी पूर्णा नष्टा बभूव च ॥ प्रतिज्ञा रामचंद्रस्य दुःखवृद्धिश्च पौर्विका ॥२०॥ भाषा-रावणके मरे पीछे रामजीकी प्रतिज्ञा पूर्ण होगई तथा दुःखकी वृद्धि भी नष्ट होगई ॥ २० ॥ तज्जटाकृन्तनं तत्र भ्रातॄणामभवन्मुने । मोक्षेच्छा सर्वजीवानां वर्तते हृदयेनिशम् ।। तदेव रामचंद्राय दत्तं राज्यं मुनीश्वरैः ॥ २१ ॥ भाषा-हे मुनिजी! सोई रामलक्ष्मण भरत शत्रुघ्नकी जटाओंका उतारना भया, जदा उतारिके राजपुत्रोंका रूप धारण करते भये रातदिन सब जीवोंको मोक्ष होनेकी इच्छा होने लगी, सोई सुमतिरूप अयोध्याका राज्य मुनिलोग रामजीको देते भए ॥२१॥ सत्कर्मचिन्तनसमाधिवनापधेश्व रामस्य चक्रुरतिमोदयुता मुनीशा ॥ राज्याभिषेकमवनेः करुणान्वितायाः संरक्षणे सुमति- भूपशिरोमाणं च ॥२२॥ भाषा-सुंदर कर्मोंका चितवन तथा परमेश्वरका ध्यान आदि और सुंदरकर्म सोई बनकी दवा है तिस दवा करके मुनिजनोंने रामजीको राज्य देनेवास्ते दया- 4 भाषाटीकासहित । १८७ १ रूप भूमिकी रक्षा करनेवास्ते सुमतिरूप अयोध्यापुरीका राजा करने वास्ते राम- जीको औषधिसे स्नान करवायके राजगद्दी पर बैठायके राज देते भए ॥ २२ ॥ रामे भूते सुमतिनृपतौ सच्चिदानंदप्रीति वेजीवे समभवदतिप्रेम- संवृद्धिक: ॥ सवै स्वस्थं सुखमयमहो साघवस्ते बभूवुर्ज्ञाने मनास्सुचरितसुधापूर्णचित्तास्सुचित्ताः ॥२३॥ भाषा-सुमतिरूप अयोध्याके राजा रामजी हुए तब परमेश्वरकी प्रीति जीवजीवमें होती गई तथा भगवान के प्रेमकी वृद्धि करनेवाली प्रीति होते लगी तीन लोक चौदह भुवन भगवान्में चिच लगाते हुए, साधुजन ज्ञानमें मगन " होगये भगवान्का चरित्र सोई अमृत भया है तिसको पीके भगवान के भजनमें आनंद होरहे हैं ॥ २३॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे युद्धकांडे पं० शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतंतुसंवादे विवेकरामराज्याभिषेके सप्तमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥ ७॥ हात युद्धकाण्डम्। अथोत्तरकांडप्रारंभः। 2 वरतन्तुरुवाच। स्वभावनिश्चलत्वं च सैवराज्यासनस्मृतः ।। पुष्टिस्तस्य समाख्याता स्थितिर्राज्यासने मुने ॥१॥ भाषा-वरतंतुमुनि बोले हे मुनिजी! सुंदर कम्मोंमें राम के स्वभावकी वृत्ति निश्चल है सोई राजोंको बैठनेवास्ते समय है तिस निश्चल वृत्तिकी पुष्टाई जैसा कभी निश्चलवृत्ति भ्रष्ट नहीं होवै सो तखतपर बैठना है ॥ ३ ॥ राज्यासनस्थं श्रीरामं पूर्वोक्ता सुनयस्तथा ॥ आजग्मुष्टुकामास्तं पुरस्कृत्य महामुनिम् ॥२॥ भाषा-प्रथम वर्णन भये जो मुनिजन सो सब राज्यासनपर बैठे जो रामजी तिनका दर्शन करनेके वास्ते आते आये ॥२॥ २ 1 , - १८८ वेदांत रामायण इ० कां। जीवस्वभावदीनं वै कुंभज मुनिसत्तमाः ।। ईश्वरे प्रेमनिर्विघ्नं पूजां चक्रे रघूत्तमः ॥ ३ ॥ भाषा-जीवका स्वभाव गरीब है सोई अगस्त्य मुनि हैं भगवानमें जीवोंका प्रेमरावणके मरे पीछे निर्विघ्नसे होता अया, सोई मुनियोंका पूजन करते अये ॥३॥ A पूजिता मुनयः प्रोचुर्वचनं ब्रह्मकीर्तनम् ।। ते प्रापिता वयं धर्म निर्विघ्नं रघुनन्दन ॥४॥ भाषा-हे रामजी ! अब हम सर्व विनमे हीन ऐसा जगवान्का जजनरूप धर्मको प्राप्त करते हुए ऐसी ब्रह्मकी कीर्तिरूप वचन रामजीमे पूजित जो मुनि हैं सो सब रामजीसे बोलते अये ॥ ४ ॥ सुनीनां वचनं श्रुत्वा कीर्तनं परमात्मनः ।। प्रोवाच कुंभज रामो जीवानां सद्विशिक्षणम् ॥ ५॥ भाषा-भगवान् कीर्तनरूप वचन मुनियोंका रामजी सुनिके मनरावणके राज्यमें भटहुये जो जीव तिन जीवोंको भगवान्का जजन सिखावन सोई वचन रामजी अगस्त्य मुनिसे बोलते जये १५ ॥ विदेहजायाश्चोत्पत्ति वालिसुग्रीवयोरपि ॥ वदत्वं श्रोतुमिच्छामि हृदये चिरकालतः ॥ ६॥ भाषा-हे मुनिजी ! जानकीकी उत्पत्ति तथा गाली सुग्रीवकी उत्पत्ति सुन- बेकी इच्छा मेरेको बहुत दिनोंसे लगरही है सो आप कृपा करके कहो ॥६ रामचन्द्रवचः श्रुत्वा कुंभजो वाक्यमत्रवीत् ॥ सन्तोपवर्द्धनं जीवे निर्मोहे कुंभजेरितम् ॥ ७॥ भाषा-जीवोंके हृदयमें संतोपकी वृद्धि करना सोई रामका वचन है तिस वचनको सुनके जीवोंके हृदयमें संसारसे मोह छुडाना सोई वचन अगस्त्य मुनि रामजीसे बोलते भये ॥ ७॥ - 4

भाषाटीकासहित ।
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१८९।
एकदा मनरूपश्च रावणो रघुनंदन ॥
चके विचारं दुष्टात्मा मुनयो दंडवर्जिताः॥८॥
भाषा-अगस्त्यमुनि बोले हे रघुनंदन ! एकदिन मनरूप रावणने विचार
किया कि सब जीवोंको मैंने दंड दिया पर मुनिजन मेरे दंडसे बचे हैं ॥ ८ ॥
चिंतकाः परमेशस्य सद्धर्मा मुनयो मया ॥
त्रासितास्तपसा होना भक्षिताश्वं कृता मया ॥९॥
भाषा-रावणने विचार किया कि भगवानका चितवन करनेवाले सुंदर धर्म-
रूप मुनियों को मैंने त्रास दिया तथा ईश्वरके भजनरूप तपस्यासे हीन कर दिया
तथा ईश्वरके चितवन करनेसे बंद कर दिये सोई बंद करना मुनियोंका हमसे
भक्षण करना या ऐसी दुर्गति मुनिजनोंकी हमने किया ॥ ९ ॥
न द्रव्य दंडितास्ते वै तानय दंडयाम्यहम् ।।
एवं विचार्य दैत्येशः किंचिद्ब्रह्मणि भावनम् ।। १० ।।
भापा-परंतु मुनि लोगोंसे कोई चीज नहीं दंड लिया सो अब कोई चीज
मँगवावेंगे जबरदस्तीसे किसी जन्मके पुण्यसे रावणके चित्तमें उस समय जग--
वान्में थोरा प्रेम भी उत्पन्न भया सोई प्रेम मुनिलोगोंसे कोई चीज मँगानेको.
रावणका विचार आया है।॥ १०॥
राक्षसान्प्रेरयामास मुनीनां दुःखहेतवे ॥
ते गत्वा ब्राह्मणानूचुः किंचित्प्रेमबलं प्रभो ।।
तदेव प्रेषणं तेषां गमनं तद्विवर्द्धनम् ॥ ११ ॥
भाषा-मुनिजनोंको दुःख देनेवास्ते राक्षसोंको रावण भेजता भया राक्षस
जायके मुनियोंसे बोलते भये भगवादके चरणमें थोडा रावणका प्रेम भया
उसी प्रेमके बलसे राक्षसोंको भेजना भया है प्रेमके बलकी वृद्धि जो है सोई
राक्षसोंको मुनि लोगोंके पास जाना भया है ॥ ११ ॥
बलसौख्यमभूत्तत्र राक्षसानां वचस्तदा ।।
युष्माकं चोत्तमं द्रव्यं देयं राक्षससत्तमे ॥ १२ ॥

१९०
वेदांत रामायण उ०कां।
4
भाषा --प्रेमके बलका सुख सोई राक्षसोंका वचन हुआ है मुनियोंसे राक्षस
बोले कि तुम्हारे सबके पास जो उत्तम चीज है मो चीज रावणने मंगाया है
शीघ्र देओ॥१२॥
श्रुत्वा तेषां वचो विप्रा ज्ञानातं चैव रायणे ।।
तदेव वचनं प्रोक्तं तद्धप श्रवणं तथा ॥ १३ ॥
भापा-रावणको कुछ जानकी प्राप्ति भई सोई राक्षमीका वचन है तथा
रावणका थोरा ज्ञान प्रात होने में हर्ष मानना माई राक्षसोंके वचनको मुनियोंसे
सुनना जया ऐसे राक्षसोंके वाक्यको मुनि लोग सुनके ॥ १३ ॥
विचार्य सुनयस्ते तु किं दास्यामोऽध रावणे ॥
रावणाद्यसनं प्राप्तं तन्मुनीनां विचारणम् ॥ १४ ॥
भाषा-मुनिजन आपसमें विचार करने जये कि रावणको अनी श्या वस्तु
देवै हमारे लोगोंके पास तो कुछ वस्तु है नहीं मन रावण मुनिजनाको दुःख
देता भया. सोई मुनिजनोंका विचार आया है ॥ १४ ॥
स्वस्वदेहाद्भगवतो भञ्जनात्प्रीतिनं रसम्
सवैनिकाश्यमुनयस्तदेव रुधिरं स्मृतम् ॥ १५॥
भाषा-ईश्वरका भजन सोई मुनिजनोंकी देह है ऐसा भजनरूप अपना अपना
देह और भगवान्की प्रीतिसे उत्पन्न जो हर्ष सोही शरीरमें प्रेम होना. सो प्रेम-
समूह रक्त नया है ऐसे रक्तको निकालके ॥ १५॥
सर्वेषां प्राणिनां विप्र शरीरं वर्द्धनाकरम् ।।
रुधिरं चेतदर्थ हि दृष्टान्तोऽत्र समीरितः ॥ १६॥
भाषा-सब प्राणियोंक शरीरकी वृद्धि करनेमें रक्त खानि है रक्त सूख गये
पीछे शरीर नष्ट हो जाता है. इसवास्ते सुंदरकर्मोंका रक्तका दृष्टांत वर्णन किया
गया है ॥ १६ ॥
भगवद्भक्तिरूपस्य शरीरस्य विवर्द्धनम् ॥
भवत्यनेन रक्तेन कुंभन्तं निश्चयं सुने ॥ १७ ॥

। - - १९१. " ६ जापाटीकासहित । आच्छाद्याज्ञानवस्त्रेण दूतेभ्यः प्रददुर्घटम् ॥ १७॥ भाषा-भगवानका मजनरूप जो साधुजनोंका देह है तिसकी वृद्धि इसी गद्द आदि प्रेम रक्तसे होती है ऐसा निश्चय सो घडा भया है तिस घडेमें प्रथम वर्णन भया जो रक्त सो राक्षसोंका अज्ञान सो, वस्त्र है तिस वस्त्र करके घडेको ढाँपिके रावणके दूतोंको मुनिजन देते अये ॥ १७ ॥ दूतः पृष्टाः किमस्मिन भो रक्तमस्माकमद्भुतम् ॥ किं भविष्यत्यनेनैव रावणस्य कुलक्षयः ॥ १८॥ भाषा-दूत पूँछते हुए कि हे मुनिजनों ! इस घडेमें क्या चीज है तब मुनि बोले हमारा सबका बडा आश्चर्य रक्त है दूत बोले इस रक्तसे क्या होगा. तब मुनि बोले रावणके कुलका नाश होगा. ॥ १८ ॥ महदेज्ञानहरे च रक्षसां प्रश्नमुच्यते॥ भगवद्भक्तिजं ज्ञानं मुनीनां वचनं च तत् ॥ रक्तांकुरायां द्रोहं च रावणस्य कुलान्तकम् ॥ १९॥ भाषा-राक्षसोंके हृदयमें बड़ा अज्ञान तथा उसी अज्ञानमें हर्ष सोई राक्ष- सोका मुनिजनोंसे पूंछना भया है तथा मुनियोंने विचार किया कि इसी रक्तसे भगवान्की भक्ति उत्पन्न होवेगी. ऐसा विचार सो मुनिजनोंका राक्षसोंसे बोलना अया. तथा रक्तसे उत्पन्न भई जो परमेश्वरकी भक्ति तिसमें ब्रोह करना सो राव- णके कुलका नाश भया है ॥ १९॥ तगृहीत्वा गतास्ते तुं प्रोचुः सर्वं च रावणे॥ त्रासनिश्चयम्लानादि ग्रहणादि निगद्यते ॥२०॥ भाषा-दूतोंने घडेको लेके रावणके सामने जायके सब मुनियोंका चरित्र रावणसे कहते हुए मुनिजनोंके वाक्यको सुनके दूत डर गये सोई घडेको ग्रहण करना भया है दूत निश्चयसे जान लेते गये कि रावणका नाश होगा ऐसा. जानना रावणके पास दूतोंका जाना गया है तथा दूत लोग अपना नाश जानके उदास होगए सोई रावणसे मुनिजनोंके चरित्रको दूत कहते हुए ॥ २९ ॥ , 7 . - . -- -- १९२ वेदात रामायण उ०कां। श्रुत्वा जनक जीवस्य राज्ये दीनस्वभावके दया बुद्धि क्षितो कुंभं खानयित्वा च रावणः ॥ २१ ॥ भाषा-दूतोंके वचनको रावण सुनके जीवरूप जनकराजा तिस जीव राजाका गरीब स्वभाव सोई -जीव जनकका राज्य है तिस राज्यमें दयारूप भूमिको खोदायके ॥२१॥ दयायां स्थापयित्वा तं भूमावूईमृदा धिया ॥ जीवस्य पूरयित्वा च स्वनाशे निर्भयोऽभवत् ॥ २२ ॥ भाषा-तिस घडेको दयारूप भूमिमें धरायके ऊपरसे जीवकी बुद्धि सोई , मृत्तिकासे पूर्ण करायके अपने कुलके नाशका भय छोडके लंकामें रावण आनंद करने लगा इस श्लोकका अर्थ यह है कि घडेको रावण जमीनमें गडाय लेता अया ॥२२॥ जीवस्य जन्ममरणं सुख दुःखाद्यनेकधा ॥ । एतद्रूपे व्यतीते च काले महति चागते ॥ २३ ॥ भाषा-जन्ममरण दुःख सुख आदि लेके अनेक कर्म जीवरूप जनकराजाके होते हैं सोई पल घडी प्रहर दिन राति पक्ष मास वर्ष युग प्रलय काल हुए ऐसे काल बडे बडे आये तथा गये बडा गाडे पाछे बहुत दिन बीतगये ॥ २३ ॥ पंचेन्द्रियकृतं कर्म तथा द्विगुणसंभवम् ।। पंचसु पंच रागाद्याश्चेतद्वादशवार्षिकम् ॥ २४ ॥ भाषा-पांच ज्ञान इंद्रियों करके किये हुए जो पांच खोदे कर्म तथा रजोगुण तमोगुण करके किये हुए दो खोटे कर्म तथा पांच इंद्रियोंके पांच कर्ममें स्नेह आदि करना जैसा वाक्य मानयुक्त बोलना हाथसे खोटा कर्म करना इंद्रियोंसे बुरे कर्म करना पगसे बुरे रस्तेको जाना सुंदर जगहपर मल करदेना ये राग आदि पांच कर्म तथा पांच कर्म इन्द्रियोंका जिसमें राग आदि कर्म करना तथा दोऊ कर्म गुणका येही बारह कर्म बारह वर्ष हुए हैं॥२४॥ एषु प्रीतिरनावृष्टिरभूज्जनकभूपतेः ॥ . राज्ये पूर्वोक्तभावे ते दृष्ट्वाऽभूत्सोऽपि व्याकुलः ॥२५॥ -- .

1 भाषाटीकासहित । १९३ भाषा-इन खोटे कम्मों में जीवकी प्रीति सोई प्रथम वर्णन भया. जो जीव रूप राजा जनकका राज तिसमें बारह वर्ष वर्षा नहीं होती आई ऐसी वर्षाहीन अपने राज्यको जीवरूप राजा जनक देखिके दुःखी होगया ॥ २५ ॥ पूर्वोक्ताह्मणेरुक्तश्चिकीब्रह्मयाजनम् ॥ तद्धर्षलांगलेनैव चकर्ष करुणां महीम् ॥२६॥ , भाषा-प्रथम वर्णन भये जो ब्राह्मण तिन्होंका सुन्दर कर्मरूप वचन मानिके खोटे कोंमें जीवकी प्रीतिरूप अनावृष्टि नाश होने वास्ते भगवानके विनय- रूप यज्ञ करने वास्ते उसी यज्ञमें हर्षरूप सुवर्ण है तिसको हल बनायके. दयारूप भूमिका जीव जनक जोतते भये ॥ २६ ॥ जविस्य यजने प्रेम लांगलं तन्निगद्यते ॥ -फालं च तत्सुखं ज्ञेयं तदयादीनभावनात् ॥ २७ ॥ भाषा-यज्ञमें जीव जनकका प्रेम बहुत है सोई हल गया है, उसी हलमें सुख मानना सोई फाल भया है जीवका सुभाव गरीब है सोई फालका अग्रभाग भया है तिस अशागसे ॥२७॥ पूर्वोक्तं निःसृतं कुंभं तस्माज्जाता च बालिका ॥ ब्रह्मभक्तिः समाख्याता पालिता जनकेन सा ॥ अतः सा जानकी प्रोक्ता तवयं प्राणवल्लभा ॥२८॥ भाषा-प्रथम वर्णन भया जो घडा सो निकसता भया, तिस घडेमेंसे एक लडकी उत्पन्न भई उसको ब्रह्मकी भक्ति सज्जन कहते हैं जीवरूप जनक राजाने उस लडकीकी पालना की, इस वास्ते ब्रह्मकी भक्तिका जानकी नाम हुआ. सो जानकी यह आपकी प्राणप्यारी है ॥ २८ ॥ एतां कथां रघुपतिर्मुनिवर्यगीतां संश्रुत्य हर्षमगमत्ससभसमित्रः ॥ सत्संगरागजननं च तदेव हर्ष पप्रच्छ वालिशुभकण्ठजनेश्वरित्रम् २९ भाषा-मुनिसे वर्णन भई सुंदर कथाको विवेकरूप रामजी सभा मित्रस- हित सुनिके सब जीवोंको सत्संगमें स्नेह बहुत उत्पन्न होता भया, सोई हर्ष १३ ।

N - १९४ वेदान्त रामायण उ० का। भया तिस हर्षको प्राप्त होते भये तथा रामजी बालिमुग्रीवके जन्मका चरित्र पूंछते भये ॥ २९ ॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे उत्तरकांडे शिवसहायवुधविरचित संवर्तवरतन्तुसंवादे जानकीसंभववर्णने प्रथमो मोक्षाख्यः सोपानः ॥१॥ वरतन्तुरुवाच। वालिसुग्रीवयोर्जन्म श्रोतकामं रघूत्तमम् ॥ तयोः स्नेहं च श्रवणं मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥ सत्कर्माणि विवेकस्य संगो मुनिवचस्स्मृतः ॥१॥ भाषा-वरतन्तु मुनि बोले गुरुका वियोगरूप वालि तथा गुरुका उपदेशरूप सुग्रीव इन दोनोंके जन्मकी कथाके सुननेकी इच्छा है जो विवकरूप रामजी तिससे मुनि बोलते अये वालिसुग्रीवमें रामजीका स्नेह है सोई रामजीका श्रवण करना भया, प्रथम वालिसे रामजीका द्रोह था सो महात्मा होगया बालि मरे पछि तब रामजीका वालिसे लेह भया, सुंदर कोंमें रामजीका प्रेम है सोई मुनिका वचन भया ॥१॥ निर्दयायाश्च मायायाः स्वभावो रघुनंदन ॥ सैवराट् समाख्यातो दुरानंदकृतश्शठः ॥२॥ भाषा-मायाका दयासे होनस्वभाव सोई प्रथम वर्णन हुए वानर ऋक्षाका उत्पत्ति करनेवाला राजा है राजाका राजा नाम है तथा गुरुके दादाकानी राजा नाम है ऐसा जो वानर ऋक्षोंका दादा तिसका खोटे काममें आनंद मानना ऐसा जो ब्रह्मा सो रचता भया ॥२॥ बभ्राम स दयाभूमौ भ्रमणं जीवतापनम् ॥ जीवानां तापनोपाये चैकस्मिन् दिवसे च सः ॥३॥ भाषा-हे रामजी ! दयारूप भूमिमें ऋक्षराज भमण करता आया जीवोंको , ताप देना सोई भ्रमण भया जीवोंको संताप देनेका उपाय सोई दिन आया है उसी एक दिन ॥३॥ स्वेच्छाचाराशुभे कूपे जड़भावजलावृते ॥ जीवसंतापनेच्छां च ददर्शाशु महाबली ॥४॥ - . !

, । भापाटीकासहित । भाषा-घडा बलवान् मायाका निर्दय स्वभाव है सो अपनी इच्छामें आने सोई कर्म करिलेना वेद पुराण और सज्जनके वाक्यको नहीं मानना ऐसा जो अशुजकर्म सोई कुआ भया उसी ऋक्षका मूर्ख स्वभाव सो जल है तिस जल करिके कूप या है ऐसे कूएमें अपनी छायाको ऋक्ष देखता भया ॥ ४॥' छायां स्वस्य प्रकुर्वन्तीमृक्षस्य सदशी क्रियाम् ॥ कुकम्मागारनेत्राभ्यां दृष्ट्वा क्रोधसमाकुलः ॥६॥ भापा-कसी छाया है ऋक्षके चित्तमें रातिदिन सब जीवोंको संताप दनेकी इच्छा बरी रहनी है तथा जैसा कर्म कुएके ऊपरसे ऋक्ष करता है तैसे कर्म जलमें छाया करिरही है ऐसी छायाको खोटे कोका संग सोई ऋक्षकी आखि है तिस आंखि करिके देखिकें अज्ञानरूप क्रोधसे व्याकुल होगया. यह दो, श्लोकका अर्थ मिला है इसवास्ते युग्म है ॥ ५ ॥ महामानाभिसंयुक्तो मादशोऽयं च कशटः एवं पपात कूपेऽसो मानान्धम्पतनं प्रभो ॥६॥ भापा-हे प्रभो ! रामजी अक्षगजने बडा अभिमान करके विचार किया कि मेरे सरीखा बलवान मंसारमे दुसरा कोई नहीं है. यह मेरे सरीखा कौन है ऐमा विचारके उसी कुएमें ऋक्ष पढिगया, अनिमानसे अंधा होरहा है ऋक्षराज सोई उसका कुएम पडना भया है ॥ ६ ॥ नापश्यत्तत्र तं चापि व्याकुलत्वमदर्शनम् ।। पश्यनस्त्रियं स्वमात्मानं मायाप्रीतिस्वरूपिणीम् ।। कूपानिर्गत्य स तूर्ण वधाम पूर्ववद्धविः ॥ ७ ॥ भाषा-कुएमें उस अपने शत्रुको नहीं देखा, तब अक्षराज व्याकुल होगया, सोई नहीं देखना भया, तथा अपनी शरीरकी मायामें प्रीतिरूप सोई स्त्री भयहि तिसकू देखिकै जलदी कुएसे निकसिके प्रथम सरीखे दयारूप भूमिमें होके नमण करता या ॥ ७ ॥ भ्रमणन्तस्य क्रूरत्वमविचारो सतां सदा ॥ जीवत्रासे सतां चैव कूपात्स तदिनिर्गमः ॥ ८॥ भाषा-ऋक्षका स्वभाव नूर है सोई ऋक्षका नमण करना भया, तथा - , १९६ वेदान्त रामायण उ० कां। मायाका निर्दयस्वभावरूप जो कक्षराज है तिनको ऐसा विचार नहीं है कि यह जीव खोटा है,इसको त्रास देवे तथा यह जीव साधु है इसको त्रास नहीं देना चाहिये ऐसा विचार नहीं है सोई कुएसे ऋक्षका निकसना भया है ॥ ८॥ नानाकुकर्माचरणास्ते तत्केशाश्च नीलिनः ॥ अविवेकशिरस्थाश्च जडभावजलाणिः ॥ ९ ॥ भाषा-खोटे कर्मोंके आचरणका रूप काला है ऋक्षराज अनेक प्रकारके खोटे कम्मोंके आचरणको करते थे पुरुष रहे तब सोई आचरण नील सरीखे काले केश ऋक्षके होते भये, स्त्रीरूपमें ऋक्षके हृदयमें विवेक नहीं है सोई अवि- वेक ऋक्षका शिर अया, उसी शिरमें केश टिके हैं. ऋषका जडस्वभाव जो जल है तिस जल करिके केश गीले होरहे हैं ॥९॥ केशादरो मज्जनञ्च बालया च तया कृतः ॥ मन्जने पणबुद्धिश्च सा कार्या जानकीपते ॥ १० ॥ भाषा-कक्षराज स्त्री होगया सो स्त्री अपने केशांको आदर बहुत करती है सो बालोंका धोना भया. आदररूप बालके धोनेमें प्रतिज्ञा सोई केशका धोवना करना है इस प्रकारसे केश धायके ॥१०॥ शोषयन्ती च तान्बाला केशानुसज्जनदुःखदान् ॥ सर्वेषां प्राणिनां दुःखं केशशोषणमुच्यते ॥ ११ ॥ भाषा-साधुजनोंको दुःख देनेवाले जो खोटे कर्म आचरण केश तिन्होंके धोये पीछे सो खी सुखाय रही है सब जीवोंको मायाके निर्दयपनसे दुःख होना सोई केशका सुखाना भया है ॥ ११ ॥ कुधर्मस्सुरनाथश्च तान्दृष्ट्वा काममोहितः ॥ । एकत्वं तस्य तस्याश्च कामिनीदर्शनं च तत् ॥ १२ ॥ भाषा-खोटा धर्म इंद्र प्रथम वर्णन भया है सो ऋक्षराज स्त्री होगया तिसको देखिके कामसे मोहित होगया इंद्रका तथा इस स्त्रीका एक लक्षण है जैसा किसी जीवको तप आदि संदरकर्म करते इंद्र देखेगा तो जानेगा कि मेरा राज्य लेनेवास्ते यह तप कर रहा है उसको अनेक यनसे भ्रष्ट करेगा इसी वास्ते इंद्रका खोटा धर्म कहाता है तैसेई उस स्त्रीका लक्षण है सोई इंद्रसें स्त्रीका देखना भया है ॥ १२ ॥ त्र 4 ३ ग भाषाटीकासहितः। १९७ तस्या दुर्भावनं कामस्तेन ग्रस्तश्शचीपतिः ॥ यावदायातिरंतुं ताम्प्रीतिरागं च मैथुनम् ॥ १३ भाषा-तिस स्त्रीका दुष्टकर्ममें स्नेह है सोई कामदेव आया है तिस कामदेव करके इंद्र मोहित होके जबतक उस स्त्रीके संग रमण करनेको आने लगा वीमें इन्द्रकी प्रीतिका मोह बहुत है सोई मैथुन आया है ॥ १३ ॥ तावत्पपात तदीय सुकार्येणाप्रवंचनम् ॥ तत्केशे. पूर्वकथिते तस्माद्वालिः प्रजज्ञिवान् ॥ १४ ॥ भाषा-तबतक इन्द्रका वीर्य उस स्त्रीके प्रथम वर्णन भये केशोंमें पडिगया उस वीर्य तथा केशके संयोगसे वाली होता भया सुंदर काँमें इंद्रकी ईर्षा बनी रही है उसी ईर्ष्या कपट सोई इंद्रका वीर्य होता भयाहै ॥ १४ ॥ मायानिर्दयभावरूपवनिताकेशेषु जातो बली दोकाचरणेषु वीर्यपतनादिंद्रस्य काधामणः ॥ सत्कार्यय॑प्रवंचनात्कपिपतिलिवियोगो बली जीवानां भवतारणस्य च गुरोर्यों वै त्वया पातितः ॥ १५ ॥ भाषा-मायाका दयासे हीन जो स्वभाव सोई स्त्री आई है तिसके खोटे कर्मके आचरणरूप केशमें खोटा कर्मरूप इन्द्रका वीर्य पडनेसे वाली होता' भया कैसा वीर्य है सुन्दर कर्ममें इर्ष्या करके कपट रूप सोई वीर्य है कैसा वाली है जीवोंको संसारसे तारण करनेवाले जो गुरु तिसका वियोग है ॥ १५॥ सतां चैवासतां वापि सततं दुःखदाय च ।। तस्या विचारो जीवानां स द्वितीयो दिनं स्मृतः ॥ १६॥ भाषा-मायाका निर्दयस्वभावरूप स्त्रीका नित्य रातिदिन ऐसा विचारः रहता है कि सुंदर जीवोंको तथा दुष्टजीवोंको भी दुःख देना ऐसा विचार सोई दूसरा दिन भया है ॥ १६ ॥ तदिने पूर्ववत्केशमार्जनं साकरोत्सती ॥ आत्मप्रकाशः सविता दृष्ट्वा तां कामतापितः॥ १७॥ भाषा-तिस दिनमें पहिले वर्णन हुई वी पहिले सरीखे बालोंको धोयके . । म . " --- .

- १९८ वेदान्त रामायण उ० का। सुखाय रही है तिस स्त्रीको आत्मप्रकाशरूप सूर्य देखिके कामदेव से जलने लगे ॥ १७ ॥ सज्ज्ञानशिक्षणं तस्यै दातुं सूर्यमनोरथः॥ तत्तस्या दर्शनं प्रोक्तसुपकारश्च मन्मथः ॥ १८॥ भाषा-सूर्यका ऐसा विचार है कि इस स्त्रीको हम सुंदर ज्ञान सिंसावे कि तू जीवोंके ऊपर निर्दयपन छोडि दे और दया कर ऐसे सूर्यका विचार सोई स्त्रीको सूर्यका देखना भया तथा जो सूर्यके वाक्यको वो स्त्री मानि लेवे और मानिके जीवमात्रपर दया करे तब सब जीव मोक्षको चले जावेंगे और बडा उपकार होवे सोई उपकार रूप काम भया तिस करके सूर्य जलि रहे वह चितवनरूप जलना है कार्य सिद्ध जबतक नहीं होता तवतक मनको ताप होता है काज भये पर आनंद होता है ॥ १८॥ एवं कामादितस्मयों मैथुनं कर्तुमागतः ॥ तया साई च तदर्षों मेथुनं गमनं सुखम् ॥१९॥ भाषा-इस प्रकारसे जीवोंके उपकाररूप कामसे दुःखी होके आत्मप्रकाश- रूप सूर्य तिस वीके संग रममाण होनेके वास्ते आते भये. उपकारमें हर्ष मानना सोई रममाण होना है उस हर्षमें सुख मानना सोई स्त्रीके पास आत्मप्रकाशरूप सूर्यका आना जया है॥ १९॥ यावत्कर्तुं समुद्युक्तो हर्षमैथुनमद्भुतम् ॥ तावत्पपात तदीय भगवत्प्रेमनिमलम् ।। ग्रीवायां स्मृतिरूपायां संस्था भगवतस्तदा ॥२०॥ भाषा-सूर्य जबतक हर्षरूप क्रीडा तिस स्त्रीके संग करनेको तयार भये तबतक भगवानके प्रेमरूप मलसे हीन ऐसा जो सूर्यका वर्यि है सो उस स्त्रीके ग्रीवामें पड गया, तब स्त्रीभी कभी कभी विचारती है कि मैं भगवानकी दासी हूँ ऐसी सुरति सोई स्त्रीकी ग्रीवा भई है. ग्रीवा नाम गला ॥२०॥ ग्रहणं वार्यपतनं तस्माजातो महाबली ॥ गुरूपदेशस्सुग्रीवस्सखायं ते रघूत्तम ॥२१॥ भाषा-हे रघुनंदन ! सूर्यकी शिक्षाको सो स्त्री ग्रहण करती भई सोई ग्रहण - .

- 1 - भाषाटीकासहित । १९९ सूर्यके वर्यिका पडना भयाहै. उसी वीर्यसे गुरुका उपदेशरूप यह आपका मित्र तथा नरकवाधासरीखे अनेक शूरवीरोंको नाश करनेको बडा बलवान ऐसा सुप्रीव जन्मता भया ॥२१॥ कपीशयोर्जन्मकथानकं विदं प्रोक्त्वा च रामाय गता सुनीश्वराः॥ ध्याने सुखं तद्गमनं प्रकीर्तितं बभूव रामोऽपि सदावलीढः ॥२२॥ भाषा-वाली सुग्रीवके जन्मकी कथा रामजीसे मुनिजन वर्णन करके, भगवानके ध्यानके सुखमें मत्त हो गये सोई मुनिजनोंका रामजीके पाससे अपने अपने आश्रमको जानाजया, तथा रामजीमी गुरुके वियोगरूप वालीको तथा गुरुके उपदेशरूप सुग्रीवकी जन्मकथा सुनिके भगवान के रूपमें मत्त होगये सोई श्रवण करना भयाहै ॥ २२॥ इति श्रीवेदांतरामायणे उत्तरकांडे शिवसहायबुधविरचिते संवर्तवरतन्तुसंवाद वालिसुग्रीवजन्मकथने द्वितीयो मोक्षाख्यः सोपानः ॥२॥ वरतन्तुरुवाच । कुधाश्च कुकम्माणि विधिना निमितानि च । नाशमाप्तानि सर्वाणि सुमते राघवे नृपे ॥१॥ भाषा-सुमतिरूप अयोध्याका राजा विवेकरूप रामजी भये तब ब्रह्मा करके रचे जितने खोटे कर्म तथा खोटे धर्म सो सब नाशको प्राप्त भये ॥१॥ सर्वे जीवाः प्रकुर्वन्ति सत्संगादीननेकशः ।। प्राप्तास्ते सच्चिदानंदतेजोरूपमयं वपुः ॥२॥ भापा-विवेकरूप रामजीके राज्यमें सब जीव सत्संग आदि गिनतीहीन सुंदर कर्म करते भये उसी कर्मक प्रभावसे तेजरूप जो ब्रह्मका शरीर तिसको प्राप्त होते भये ॥२॥ न शरीरे भगवतस्तेजश्चापि न ज्ञायते ॥ अनेकजन्मनोऽभ्यासादुर्गमन्तत्तथापि च ॥ ३ ॥ भाषा-न भगवान्के शरीर है तथा तेजनी जीवों करके नहीं मालूम होता है, बडा अद्भुत तेज है, अनेक जन्मतक ईश्वरके तेजको मालूम करनेवाले सत्संग आदि लेके अनेक सुंदर कर्म करे तौभी बडे कठिनतासे ईश्वरका तेज मालूम पडेगा.३॥ + - - प , - 1 ६०० वेदान्त रामायण उ० का। मुमुक्षवो बभूवुस्ते सर्वे जीवाश्चराचरे ॥ तद्विघ्नकारका नष्टाश्चैतद्राज्यं रघूत्तमः ॥ चक्रे प्रेम सदा तेषामीश्वरे तत्प्रजासुखम् ॥ ४॥ भाषा-तीन लोक चौदह भुवनमें सब जीवोंकी मुक्ति होनेकी इच्छा होती भई तथा मोक्षके विघ्न करनेवाले दुष्ट जीव नष्ट होगये, यही राज्य विवेकरूप रामजी करते अये सब जीवोंका प्रेम ईश्वरमें बहुत होताभया सो प्रजाका सुख भया है॥४॥ कामादिशत्रवो नष्टास्ते षण्मासा मुनीश्वर ।। जीवानान्निर्भयन्तेभ्यस्तन्तेपां गमनं स्मृतम् ॥५॥ भाषा-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर ये छः जीवोंके वैरी हैं सो रामजीके राजमें ये छहों नष्ट होगये, सोई छः मास भये, तथा इन छ: वैरियोंसे जीव निर्भय होगया सोई छः मासका बीतना आया है, विवेकरूप रामजीको राज्य करते इस प्रकार छः महीने बीत गये ॥५॥ पूर्वोक्ताः कपयश्चापि भगवत्प्रेमनिर्भराः ॥ बभूवुः कृतवान्रामस्तन्तेषां च विसर्जनम् ॥६॥ भाषा-पहिले वर्णन आये जो कषि ऋक्ष हैं सोनी भगवान के प्रेममें मत्त हो रहे हैं सोई रामजी कपि और सब ऋक्ष उनको विदा करते भये ॥६॥ अनेके तारिता जीवा रामण भुवनत्रये ॥ त एव यज्ञा रामेण कृताश्च सुमतौ मुने ॥ ७॥ भाषा-हे मुनिजी ! तीन लोक चौदह भुवनमें विवेकरूप रामजी गिनतीहीन जीवोंको संसारसे उद्धार करिके मोक्ष करते भये सोई सुमतिरूप अयोध्या में अनेक यज्ञ करते भये ॥ ७॥ जीवे जीवे ददौ भक्तिं चेश्वरस्य रघूत्तमः ।। स्वयं चापि विरक्तोऽभूदेष सत्त्याग उच्यते ॥८॥ भाषा-विवेकरूप रामजीने जीवोंका उद्धार होने वास्ते दया करिके सब जीवोंको परमेश्वरकी भक्तिका दान करते भये दान करना यह है कि सब जीवोंमें भक्तिको टिकाते भये तथा आप भगवानके चरणोंमें रमित भये सोई. जानकीका त्याग रामजी करते भये ॥८॥ 1 - - - 1 - . भाषाटीकासहित हौ पुत्री रामचन्द्रस्य जानक्यां च बभूवतुः ॥ ज्ञानवैराग्यनामानी जीवोत्तारणकारको ॥ ९॥ भापा-विवेकरूप रामजीके ईश्वरकी भक्तिरूप जानकी दो पुत्र होते भये, कैसे पुत्र हैं एक ज्ञान, दूसरा वैराग्य, कैसे हैं जीवोंको संसारसे उद्धार करनेवाले हैं ॥९॥ स्वपदं गन्तुकामस्य भगवद्रूपदर्शनम् ॥ विवेकराघवस्यैव चिंतनो मुनिसत्तमः ।। दुर्वासागमनं तस्य रामोत्साहश्च तत्पदे ॥१०॥ भाषा-परमेश्वरका दर्शनरूप जो विवेकका स्थान है तिसको प्राप्त होनेको रामजी चिंतन करते हैं कि मनरूप रावण आदि राक्षस नष्ट होगये अब अपने स्थान हम जायें ऐसा गमजीका विचार सोई दुर्वासा मुनि आया है ॥ १० ॥ आज्ञप्तो मुनिना तेन तद्रूपल्यावलोकने । गंतुं तल्लक्ष्मणल्येष मुनिवाक्यम्परस्परम् ॥ ११ ॥ भाषा-रामजीके चितवनरूप दुर्वासामुनिने रामजीको भगवान के दर्शनरूप जो स्थान तिसपर जानेकी आज्ञा दी कि रामजी ! राक्षसोंका नाश होगया अब तुम भगवानका दर्शनरूप जो तुम्हारा स्थान तिसको जावो ऐसा मुनिका वाक्य सोई लक्ष्मणका तथा दुर्वातामुनिका संवाद भया है ॥ ११ ॥ स्वस्वकर्मणि सण बभूवुर्लक्ष्मणादयः ॥ भ्रातरो रामचंद्रस्य वियोगस्सोऽयमुच्यते ॥ सर्वेपां लक्ष्मणादीनां भ्रातृणां राघवस्य च ॥ १२ ॥ भापा-विवेकरूप रामके तीनों भाई लक्ष्मण संतोष संतोषकी वृद्धि देखिके हर्ष मानते भये निर्माहरूप भरत निर्माहकी वृद्धि देखिके हर्षित भये सहन- रूप शत्रुघ्न सब जीवोंमें क्षमाकी वृद्धि देखिके खुशी भये रामजीके भाइ- योंका ऐसा हर्प सो रामजीसे तीनों भाइयोंका वियोग होताजया ॥ १२ ॥ जानक्या प्रार्थिता भूमिर्दया रामे च निश्चला ॥ स्थितिददी च जानक्या विवरस्सैव कथ्यते ॥ १३ ॥ - + १४ , + । .

- L । -- - d वेदान्त रामायण उ० कां० । २०२ भापा दयारूप पृथ्वीकी प्रार्थना जानकीने की तव पृथ्वी रामजी में अचलवास जानकीको देतीभई सोई रस्ता आया है ॥ १३ ॥ दयायां सर्वदा प्रीतिनिक्यास्सा च प्रार्थना ॥ दयादतेल मार्गेण वासश्चके च जानकी ।। विवेके निश्चलत्वं च तस्यास्तद्गमनं स्मृतम् ॥ १४॥ भाषा-सदा. दयारूप पृथ्वीमें जानकीकी प्रीति है साई पृथ्वीकी प्रार्थना जानकीने की दयापृथ्वी करिके दीन जो रस्ता सो अचलवास रामजीमें जानकीका है उसी रस्ता करिके विवेक, जानकीने अचल वास किया सोई राम- जीके पाससे जानकीका जानाभया ॥ १४ ॥ सर्वेषालक्ष्मणादीनाम्भ्रातॄणां रघुनंदुनः॥ वियोग हर्षरूपं च जानक्याश्च तथैव च ।। दृष्ट्वा प्रवर्द्धनं तेषां तद्धर्षो दुर्शनं स्मृतम् ॥ १५ ॥ आपा-रामजीने सब लक्ष्मण आदि लेके अपने भाइयोंका हर्षरूप वियोग देखिके तथा जानकीको देखिके अपने सत्संगवाले सब जीवोंको सबके कर्ममें हर्षकी वृद्धि भई सोई रामजीका भाइयोंका वियोग देखना भयाहै ॥ १५ ॥ स्वपदं भगवद्रूपदर्शनं स्वात्मसंस्थितम् ॥ तत्प्रेल प्रापणं तस्य कथ्यते तं समुत्सुकः ॥१६॥ • भाषा-रामजी अपने हृदय में विराजमान जो भगवानका दर्शनरूप स्थान ति- सको जानेके वास्ते आनंद मानते जये सोई रामजीका परंपदको जाना भया।॥१६॥ कौसल्यायाश्च सम्ममा भगवचिंतने सदा ॥ तत्तासां गमनम्प्रोक्तं वैकुंठे भगवत्प्रिये ॥ १७॥ भाषा-कौसल्या आदि लेके रामजीकी सब माता जो हैं सो सब जग- वानके चितवनमें राति दिन मत्त होरही हैं सोही तिन्होंकाक्षी भगवानको प्यारा जो वैकुंठ तिसमें जाना गया है ॥ १७ ॥ ', कुमनिर्भयां चक्के सुमतिं स्वाम्पुरीम्प्रभुः ॥ तदेव रामचंद्रस्य पुरीत्यागोऽभिधीयते ॥ १८ ॥ १ . -- ॥ . सापाटीकासहित । २०३ भापा-खोटी मतिकी त्राससे सुमतिरूप अयोध्याळू रामजी निर्भय करते भये सोई रामजीका अयोध्याका त्यागना भया ॥१८॥ सर्वान्मोक्षस्य साहित्यान्विवेको रघुनन्दनः ॥ चकार स्ववशे नित्यं प्रजानां ग्रहणं-त्विदम् ॥ १९ ॥ भाषा-मोक्षकी संपूर्ण सामग्री ज्ञान ध्यान आदि लेके गिनतीसे हीन तिसको नित्य रामजी अपने वश्य करते ये सोप्रजाका संग लेना भया ॥१९॥ तास्समादाय राजेंद्रो जगाम सरयूतटम् ॥ तत्प्रेम गमनं प्रोक्तं तज्जले निममज्जह ॥२०॥ भाषा-पहिले वर्णन भई प्रजाको रामजी संग लेके भगवानमें निश्चल प्रेम- रूपं सरयूके तट पर जाते जये सुवासनारूप सरयूमें रामजीका प्रेम सोई, रामका सरयूतटपर जाना भया अभिमानसे हीन कर्मरूप सरयूका जल तिसमें प्रजासहित रामजी गोता लगाते गये ॥२०॥ निर्मानभगवद्धयानं राममजनमुच्यते ॥ मजित्वा सर्वजीवेषु चिदेशेषु तदा प्रभुः॥ वासं चक्रे तदेवं वै गमनं सत्पदेऽभवत् ।। २१ ॥ भाषा-विवेकरूप रामजी अभिमानसे हीन होके ईश्वरका ध्यान करते भये सोई रामजीका सरयूके जलमें स्नान करना भया ऐसा ध्यानरूप स्नान करके ईश्वरका अंश जो जीव अनेक प्रकार करिके अनेक शरीरमें दुःख पाय रहा तिस सब जीवोंको मोक्षरूप देनेवास्ते सेब जीवोंमें विवेकलय रामनी टिकते अये सोई प्रजासहित रामजीका परमपदको जाना गयाहै ॥ २१॥ एवं रघूत्तमदशाननयोश्चरित्रं वेदांतसारगदितं च विश्रुत्य जीवः।। सम्यग्विचार्य गुरुणा च विशिक्ष्य नित्यं मोक्षं प्रयातिरघुनंदना- भाववद्धः ॥२२॥ भाषा-इस प्रकारका विवेकरूप रामजीका तथा मनरूप रावणका चरित्र वेदांता सार जो जान है तिसको आदि लेके अनेक प्रकारके जो सुंदर धर्मरूप जो . - - २०४ वेदान्त रामायण ई० कां० शास्त्र हैं तिन्हों कारके कथित हुआहै ऐसे चरित्रको जीव सुनके तथा मन में विचार, करके तथा गुरुके मुखसे ऐसे बहुत प्रकारसे सिखिके विवेकरूप जो रामजी हैं तिस- का भाव जो सत्संग तिसमें बंधनरूप प्रेम लगाके जीव मोक्षको प्रान होवेगा॥२२॥ इति श्रीवेदान्तरामायणे उत्तरकांडे संवर्तवरतन्तुसंवादे पं०शिवनहायचुत्र- विरचिते रामचन्द्रस्वपदप्राप्तिवर्णने तृतीयो मोमाख्यः सोपानः ॥३॥ समाप्तश्चायमुत्तरकाण्डः। श्रीमद्वेदांतरामायणं समाप्तिमगमदिदम् । . बाणा १ ब्धि ४ रंध्र ९ शशि १ वत्सरवैक्रमीये चापाशुकुर- विवासरशम्भुतिथ्याम् ॥ श्रीमन्महेशकृपया दयया च तस्य ग्रंथस्समाप्तिमयमेवमगात्सुपूर्णः ॥ १ ॥ श्रीमच्छंकरापणमस्तु ।। प्रश्न-पप्रच्छुस्सज्जना मां वै जीवश्चैकश्चिदंशवान् । स चराचरवती च त्वयोक्तो भूरिशः कथम् ॥ ३॥ अर्थ-सज्जनलोग हमसे पूंछे कि भगवानका अंश जीव एक है तुमने इस ग्रन्थमें बहुत जीव वर्णन किये हैं इसका कारण क्या है ॥ १ ॥ उत्तर-जलद्रव्यन्यायाजीवाश्चानेकशः ॥ .. अर्थ-जैसा पानीका एक रंग है पर जिस चीजमें मिलावोगे उसी चीजसगरखा पानीका स्वरूप होजावेगा दूधर्मे दूध छाछमें छाछ काजरमें काला पीलेमें पीला शक्करमें मीठा कटु चीजमें कटु इस प्रकार गिनतीसे हीन चीजोंमें मिलके वैसाही होजाता है तैसेही जीव एक है पर जिस योनिमें जन्मेगा उसी प्रकारका होजावेगा यह दृष्टांत महासांख्य आदि शास्त्रोंका है कपोलकल्पित नहीं है। है २०11०1१६. पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास खेमरान श्रीकृष्णदास लक्ष्मीवझेम्बर' स्टीम् प्रेस-कल्याण-मुम्बई. श्रीवेटेवर स्टीम् प्रेस-मुम्बई.. १

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Vedant Ramayan

Author
Gangavishnu, Shrikrishnadas
Title
Vedant Ramayan
File name
Vedant Ramayan
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2009/10
Publisher
Kalyan - Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
204
Library
Sanmati Library
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345688
Barcode
99999990234020.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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