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Hafiz Ki Ghazalein
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हाफ़िज़ की ग़ज़लें
(काव्यानुवाद)
शंकर माहेश्वरी
हाफ़िज़ की ग़ज़लें (काव्यानुवाद)
शंकर माहेश्वरी लेखकाधीन
प्रकाशक:
माहेश्वरी पुस्तकालय
4, शोभाराम वैशाख स्ट्रीट
कोलकाता - 700 007
प्रथम संस्करण : जुलआई 2002
मूल्य : डेढ़ सौ रुपये
210.00
आवरण चित : विक्रम नेवर
मुद्रक :
छपते छपते प्रकाशन प्रा. लि.
26 सी, क्रीक रो, कोलकाता-14
दूरभाष : 246 1488/8374
Hafiz ki Ghazalein, transcreation of Poetries from persion to Hinc
Shankar Maheshwari
Published by Maheshwari Pustakalaya, 4, Sovaram Basak Sts
Kolkata-700007
First Edition 777/2002
Price:Rs.1
समर्पण
तेरा तुझको सौंपिया
क्या लागै है मोर
इन शब्दों के साथ
मित्रवर श्री रेवतीलाल शाह को
-शंकर माहेश्वरी
- . - भूमिका बादशाहों के फर्मान और हुक्मरानों के हुक्म वक्त के रेगिस्तान में गायब हो जाते हैं लेकिन कवियों की वाणी दिलों की धड़कन बन कर सदियों सीनों में गूंजती रहती है। फ़ारसी भाषा संसार की मधुरतम भाषाओं में मानी जाती है। पाश्चात्य जगत् में आज भी इस भाषा की कविताओं पर सैकड़ों विद्वान काम कर रहे हैं। भारत वर्ष में सदियों तक यह भाषा बुद्धिजीवियों की भाषा रही। मुसलमानों के शासनकाल में इस्लाम की धार्मिक भाषा अरबी दरवारी भाषा नहीं थी बल्कि फारसी थी। भारतवर्ष के कुछ फ़ारसी शाइरों हज़त अमीर खुसरो और बेदिल आदि पर इरान को गर्व है। फ़ारसी भाषा के प्रथम पंक्ति के चार शाइर हैं 'फ़िदौसी, मौलाना जलाल- उद-दीन 'रूमी', 'शैख़ सादी और 'हाफ़िज़ शीराज़ी। और उनकी पुस्तकें हैं 'शाहनामा', 'मसनवी', 'गुलिस्ताँ, बोस्तों' और दीवान-ए-हाफ़िज क्रमशः। उमर खय्याम को ख्याति का कारण उनका अंग्रेजी अनुवाद है वरना यूँ समझिये कि ख़य्याम रसखान हैं तो हाफ़िज़ तुलसीदास। कुछ दशकों पहले इंग्लैंड के फ़ारसी विद्वानों में यह बहस छिड़ी कि फ़ारसी का शीर्षस्थ शाइर कौन है, स्वाभविक था उपरोक्त चार नाम सामने आये और फ़ैसला मुश्किल में पड़ गया। एक विद्वान ने कहा-अगर हाइड पार्क में किसी एक फ़ारसी शाइर की मूर्ति लगायें तो किसकी मूर्ति होनी चाहिए और सब एक जुबाँ होकर पुकार उठे 'ख्वाजः हाफ़िज़ शीराजी'। अब फैसला आप लोगों के हाथ में है। 'फ़िदौसी' का 'शाहनाम' बादशाहों की कहानी पर आधारित है लेकिन काव्यात्मकता का उत्कर्ष देखते बनता है। इस्लाम के प्रभाव के कारण फ़ारसी में बहुत से अरबी के शब्द प्रचलन में आ गये और करीब क़रीब सभी शाइरों के यहाँ उनका प्रयोग है परन्तु शाहनामा शुद्ध फारसी में है। (पाठकों की जानकारी के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत है-सितम और जुल्म-इनमें 'सितम' फ़ारसी है और 'जुल्म' अरबी। फ़ारसी में कर्ता और कर्म बनते हैं सितमगर और सितमजदा जबकि अरबी में 'जालिम' और 'मज़लूम' हो जाते हैं । (अव्यय और प्रत्यय की आवश्यकता नहीं होती।) फ़िदौसी की शायरी की कसावट का अन्दाज लगाने के लिए-एक घटना के वर्णन में कहते हैं (4) "निशस्तन्द, गुफ़तन्द, वर्खास्तन्द' (बैठे, बातचीत की, विसर्जित हो गए) ईरान के शहर शीराज का यह सौभाग्य है कि प्रथम पंक्ति के दो ग़जलगो शाइर शैख़ सा दी और हाफ़िज़ शीराजी वहाँ पैदा हुए। सा'दी के बाद ग़जल की ऊंचाई लांघना जरा मुश्किल था मगर बुलबुल-ए-शीराज 'हाफ़िज़ शीराजी' ने नई ऊंचाईयों को छुआ। मौलाना जलाल-उद-दीन रूमी की मसनको पर लिखा होता है 'हस्त कुआन दर जुबान-ए-पहलवी (यह फ़ारसी भाषा में कुआन है) और दीवान-ए-हाफ़िज़ से फलादेश निकाला जाता है। आम आदमी की क्या क्षमता है कि तुलना करे। परन्तु एक बात साफ़ है कि मौलाना 'रूमी' के यहाँ 'सत्य' की प्राथमिकता है तो ख्वाजा 'हाफ़िज़' के यहाँ 'सौन्दर्य की। उदाहरण के लिए मौलाना 'रूमी' का शेर मुलाहिजा हो। हर लहजा बशक्ले बुत-ए-अय्यार बरामद दिलबुर्द व निहाँशुद हर दम ब लिबास-ए-दिगर आँ यार बरामद गह पीर-ओ-जवाँ शुद (हर तरह किसी न किसी शक्ल में वह चालाक मूरत आई, दिल लिया और ओझल हो गई। हर पल भिन्न भिन्न परिधान में वह दोस्त आया कभी बूढ़ा और कभी जवान बन कर) इसमें दिल छीनने की और यार की चर्चा है परन्तु यहाँ सत्य की अभिव्यक्ति ही ध्वनित होती है। ऊपर दीवान-ए-हाफ़िज़ का ज़िक्र आया है तो दीवान का अर्थ समझ लेना अनुचित न होगा। हर शाइर का दीवान नहीं बन सकता-दीवान की शर्त यह है कि शाइर ने उस लिपि के अधिकांश अक्षरों को अन्त्यानुप्रास के रूप में प्रयोग किया हो। उर्दू में इक़बाल, फिराक़ या जोश के कुलियात हो सकते हैं दीवान नहीं जबकि मीर और ग़ालिब के दीवान हैं। बाबा तुलसीदास की रामचरित मानस से फलादेश निकाले जाते हैं यह परम्परा भारतवर्ष में नहीं थी। हाफ़िज़ शीराजी, बाबा से दो सौ अढ़ाई सौ साल पहले थे और तब तक भारत का साहित्यिक जगत सभी सूफ़ी कवियों से बखूबी परिचित हो चुका था। बाबा को जहाँ भी कोई खूबी मिली उसे रामचरित मानस में समाहित करने की चेष्टा की। मुझे लगता है बाबा तुलसीदास को यह खयाल वहीं से आया। दीवान-ए-हाफ़िज़ से फ़लादेश निकालने की परम्परा बड़ी पुरानी रही - (5) है। ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी में दीवान-ए-हाफ़िज़ की वह प्रति सुरक्षित है जिससे सभी मुगल बादशाहों ने फ़ाल (फलादेश) निकाली है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता हाफ़िज़ शीराजी की ग़ज़ल का पाठ प्रार्थना की तरह करते थे। रवि बाबू ख्वाजा हाफ़िज़ की कन्न पर श्रद्धांजलि अर्पित करने शीराज गए थे, उन्हें कहा गया कि आप कोई प्रश्न अपने आप में सोच लें और इस तालिका के एक अक्षर पर अंगुली रख दें। जब फाल निकाली गई तो रवि बाबू ने कहा कि मुझे उत्तर मिल गया। फ़ाल का शेर था चिन्ता मत करो खोया यूसुफ़ वापस आ जाएगा' रवि बाबू का प्रश्न था क्या भारत को आजादी मिल जाएगी?' यूँ भी ख्वाजा हाफ़िज़ शीराजी का रिश्ता भारतवर्ष से बड़ा गहरा है। हाफ़िज़ के समय में बंगाल के गवर्नर थे गियास-उद-दीन (आज़म शाह), फ़ारसी में एक मतले का मिस्रा कह कर ग़ज़ल पूरी करने के लिए हाफ़िज़ को भेज दी थी और हाफ़िज़ ने ग़ज़ल पूरी करके बंगाल भिजवाई थी। इस ग़ज़ल के तीन शे'रों का (शंकर बाबू का अनुवाद प्रस्तुत करता हूं) पारस की यह मीठी मिसरी जाती है देखो बंगाल इससे भारत के सब तोते हो जायेंगे शक्करख़ोर - देश काल का अतिक्रमण करती कविता की गति देखो एक रात का शिशु चलता ज्यों एक साल के रस्ते पर नृपति गियास-उद-दीन सभा का जो पूरा करना है शौक़ तो फिर चुप मत रह तू हाफ़िज रुदन करेगा तुझे सकाम शाह गियास-उद-दीन बंगाल की गद्दी पर ईसवी सन् 1389-1410 तक रहते हैं और हाफ़िज़ शीराजी का देहान्त 1389 में होता है, लगता है सिंहासनारूढ़ होते ही उन्होंने इस ग़जल के लिए निवेदन किया था और ख्वाजा हाफ़िज़ की आखरी ग़ज़लों में से एक थी। यह बात शिष्टावार के विरुद्ध है किन्तु मानव स्वभाव है,अंग्रेज, गोरे का, गोरा अंग्रेज का पर्याय बन गए हैं इसी तरह कलुआ नीग्रो का और नीग्रो काले का। 'हिन्दू' शब्द निश्चय ही 'सिन्धु' से बना और 'हिन्दू' उस वक्त ईरानियों में भारतवासियों के लिए प्रयुक्त था।ईरानी अपेक्षाकृत सुन्दर थे और उनको अपेक्षा में तुर्क सुन्दरतर थे। उस वक्त की फ़ारसी में तुर्क' शब्द का प्रयोग सुन्दर के लिए (6) और हिन्दू काले के लिए होता था। हाफ़िज़ शीराजी के एक शेर में दोनों शब्द प्रयुक्त है। अगर आँतुर्क-ए-शीराज़ी बदस्त आरद दिल-ए-मारा बखाल-ए-हिन्दूश बख़्शम समरकंद-ओ -बुखारारा। अनुवाद- वह शीराज सुन्दरी मेरा हृदय थाम ले अपने हाथ समरकन्द भी और बुखारा तो उसके तिल पर वारूं। अनुवाद में छंद के लिहाज से शंकर बाबू ने तिल का विशेषण प्रयोग नहीं किया जो कि मूल में है (ख़ाल-ए-हिन्दूश-उसका काला तिल) इस शेर से जुड़ी हुई एक दिलचस्प घटना है। 'समरकन्द' और 'बुखारा' उजबैकिस्तान के शहर हैं जो अपनी खूबसूरती और विकास के आधार पर उस वक्त विश्व-विख्यात थे। उन दिनों वहाँ का शासक था तैमूर लंग (यह शब्द तिमुर है) जिसने भारतवर्ष पर हमला किया था और ईरान पर भी। कहते हैं जब वह शीराज़ पहुंचा तो उसने ख्वाजा हाफ़िज़ शीराज़ी को मिलने के लिए बुलवाया और कहा कि हम इतनी मेहनत से अपने शहर विकसित करते हैं और आप किसी सुन्दरी के तिल पर मोहित हो कर वश देते हैं। तैमुर जैसे जालिम बादशाह के सामने उस महाकवि की हाजिर जवाबी ने रक्षा की। हाफ़िज़ का जवाब था 'हुजूर इस औदार्य के कारण ही अभावग्रस्त हूँ' बादशाह को हँसी आ गई और कवि पुरस्कृत हुआ। भारतवर्ष में कश्मीरी सुन्दर थे, एक शे'र में ख्वाजा साहब कहते हैं ज शेर-ए-हाफ़िज़-ए-शीराजी मीगोयन्द व मीरपसंद सियाह चश्मान-ए-कश्मीरी व तुर्कान-ए-समरक़न्दी हाफ़िज़ के शेर को पढ़ती हैं और नाचती हैं कश्मीर की श्यामाख्यायें एवं समरकंद की सुन्दरियां। (उर्दू एवं फ़ारसी में 'काली आंखों वाली' सुन्दरी का पर्याय है।) 'हाफ़िज़ का अर्थ रक्षक भी है और वह व्यक्ति जिसे कुआन शरीफ़ मुखस्त हो। महाकवि को कुआन मुखस्त थी। वैसे इनका नाम मुहम्मद शम्स-उद-दीन था। एक तरफ हाफ़िज़ थे और दूसरी तरफ़ सुरा प्रेमी (ग़ालिब की तरह आधा मुसलमान कहिए)! प्रसादजी के शब्दों में था एक हाथ में कर्मकलश वसुधा जीवन रस सार लिए दूसरा विचारों के नभ को था मधुर अभय अवलम्ब दिए (7) - सुरा प्रेम में कहते हैं पूजा का पाटम्बर बंधक रख कर मधु को पाना अच्छा है, पोथियां निरर्थक यह जायें मदिरा में (अनुवाद) हाफ़िज शोराजी की करीब-करीब इन्हीं पचास ग़जलों का अनुवाद पहले 1980 में बंगला भाषा में शीर्षस्थ कवि सुभाष मुखोपाध्याय ने किया था जिन्हें उन्हीं सालों 'देश' पतिका में धारावाहिक स्व. सागरमय घोप ने प्रकाशित किया। किताब की शक्ल में आनन्द पब्लीसर ने 'हाफ़िज़ेर कविता' शीर्षक से प्रकाशित किया जिसके तीन चार संस्करण छप चुके हैं और दस हज़ार से ऊपर प्रतियां विक चुकी हैं। पुरातन साहित्य के क्षेत्र में प्रामाणिकता बड़ा जटिल और श्रम साध्य काम है, क्षेपक छाँट पाना हर एक के बूते का काम नहीं है। कई बार शिष्यगण अपने गुरु का भोग लगा कर लिख देते हैं और संकलन कर्ता को असावधानी से वह मूल में सम्मिलित कर लिया जाता है। अगर स्तर की तुला पर परीक्षा की जाए तो सबसे बड़ा ख़तरा यह होता है कि रचनाकार के आरम्भिक काल की रचना अलग कर दी जाती हैं और यह बहुत बड़ा अनर्थ है। सुभाष बाबू और शंकर बाबू वाले चयन में काफ़ी हद तक हम आश्वस्त हो सकते हैं कि इनमें क्षेपक नहीं हैं। फ़ारसी या उर्दू साहित्य में क़सीदा (प्रशस्ति) एक अलग और पूर्णतः विकसित काव्य शैली है। (यदि यह प्रशस्ति ख़ुदा की शान में हो तो हम्द और पैग़म्बर की शान में हो तो नात कहलाती है)। ख्वाजा हाफ़िज़ शीराजी ने बहुत से कसीदे भी कहे हैं और उनके दीवान के कुछ नुस्खों में एक क़सीदा हनत अली पर मिलता है, उसमें प्रशंसा करते हुए 'सरदार' शब्द का प्रयोग भी है। तीन बार अली सरदार शब्द आता है। अली सरदार जाफ़री फ़ारसी भाषा के भी बहुत बड़े विद्वान थे और उनका अध्ययन बहुत गहरा था। एक बार कहने लगे 'भई! हाफ़िज़ ने उस क़सीदे में तीन बार हमारा नाम लिया है और फ़ौरन कहा 'लेकिन वह क़सीदा क्षेपक है'। ईसवी 1982 में सलिल चौधरी द्वारा आयोजित एक मुशायरे में अली सरदार जा'फ़री भी आये और मजरूह सुल्तानपुरी भी। दुपहर को सरदार जाफ़री को शंकर बाबू का अनुवाद सुनाया तो इस क़दर प्रभावित हुए कि शाम की बैठक में (8) मजरूह की मौजूदगी में दोबारा सुनाने के लिए कहा। अनुवाद सुन कर मजरूह ने कहा कि इसमें हाफ़िज़ का सौती आहंग (संगीतात्मकता) कायम है। दो इतने बड़े काव्य और संगीत के मर्मज्ञों की ऐसी दाद से बढ़ कर और प्रमाण पत क्या होगा। शंकर वावू के अनुवाद पर मोहित होकर जगन्नाथ 'आज़ाद' साहब ने उस पर भूमिका लिखी है जो इस संग्रह में शामिल की गई है। (जगन्नाथ आजाद बहुत बड़े शाइर भी हैं, विद्वान भी। इनके पिता तिलोक चंद 'महरूम' भी विख्यात शाइर थे।) पाकिस्तान का पहला राष्ट्रीय गीत इनसे लिखवाया गया था जिसे मुहम्मद अली जिन्हा के बाद खारिज कर दिया गया था-पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में अल्लामा इकबाल पर इनसे बड़ा विद्वान कोई नहीं है। इन्होंने फ़ारसी भाषा और साहित्य पर लाहौर से एम.ए. किया था अतः ये ख़्वाजा हाफ़िज़ शीराज़ी के काव्य के मर्मज्ञ हैं। अनुवाद बड़ा मुश्किल काम है, मूल का 20-25 फ़ीसदी ही शायद सम्प्रेषित हो पाता है परन्तु अतिरिक्त इसके दूसरी भापाओं के साहित्य से परिचित होने का कोई रास्ता भी नहीं है। किसी भी भापा को विकसित विशेषण प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें विश्वभर की अधिकांश कृतियों के अनुवाद उपलब्ध हों। हिन्दी भाषा के विकास की गति में शंकर माहेश्वरी का यह अनुवाद एक संग मील रहेगा। यह विचारधारा सही लगती है कि श्रृंगार से पहले अद्भुत आता है। किसी छवि को देख कर हम विस्मित होते हैं और फिर, आकर्षण प्यार का केन्द्र बिन्दु बनता है जिसके गिर्द संयोग वियोग हर्ष और विषाद रात-दिन की तरह घूमते रहते हैं। यह विस्मय सुन्दर से सुन्दरतर और सुन्दरतम की तलाश में मनुष्य को ज्ञान की राह पर आगे बढ़ाता है। हाफ़िज़ शीरानी ने अनेक स्थान पर विस्मय की स्थिति का वर्णन किया है। मन्सूर सूफी संत थे जो अनल हक़ (अहम ब्रह्मास्मि) कहा करते थे और द्वैत के पक्षधरों ने उन्हें दोषी ठहरा कर सूली पर चढ़ा दिया था। इस पर अलग-अलग कवियों ने अलग-अलग तरह से विचार किया है, मौलाना जलाल- उद-दीन रूमी का कथन है वह मन्सूर नहीं था जो सूली पर था ना समझों को भ्रम हुआ था।' (इसका आशय यह है कि पार्थव शरीर मन्सूर नहीं था) जबकि हाफ़िज़ शीराजी कहते हैं कि अद्वैत के पथ पर मन्सूर का कथन खता (भूल) है क्योंकि उस (विस्मय की स्थिति में होंट कैसे खुले और जीभ कैसे हिली)। विस्मय और आश्चर्य पर्याय कहे जा सकते हैं परन्तु वण्डर के अनुवाद के रूप में आश्चर्य शब्द सीमित हो गया है। हम भौतिक जगत की कुछ वस्तुओं तक ही (9) - आश्चर्य समझ पाते हैं। सुभाष बाबू को आश्चों' के अर्थ तक पहुंचने में कुछ देर लगी तो उन्होंने कहा था 'अंग्रेजी कोतो खोति (क्षति) कोरेचे'। एक मजल में हाफ़िज़ कहते हैं 'तेरा प्यार विस्मय का वृक्ष है और तेरा मिलन विस्मय की पराकाष्ठा जिस दिशा में भी कान लगाते हैं विस्मय की ध्वनि आती है।' फ़ारसी शायरी तीन बिन्दुओं के गिर्द घूमती है। प्यार, मदिरा और दर्शन (सूफीवाद) किसी भी शाइर की प्रेम कविता से उसके प्रियतम का अन्दाज़ा लग जाता है, कुछ लोगों का प्यार मांसल से ऊपर नहीं उठ पाता है। हाफ़िज़ का प्रियतम विराट है । एक शेर में कहते हैं उस असीम रूप के समक्ष मेरा प्यार अकिंचन है।रूप रंग तिल और रोम जैसे अलंकारों की उस आभा को आवश्यकता नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण आपको मिलेंगे।हर भाषा की कविता में प्रियतम के मुख को उपमा अलग अलग तरह से चन्द्रमा के साथ दी गई है। हाफ़िज़ के एक शेर की कल्पना अछूती है। कहते हैं एक रात को चन्दरमा ने की बरावरी उन गालों से दूजी रात से देखा उसको शर्म के मारे सिकुड़ रहा था। ख्वाजा हाफ़िज़ शीराजी को शिल्प में भी दक्षता प्राप्त थी। कई मुश्किल रदीफ़ हैं 'नेस्त कि नेस्त' (नहीं है कि नहीं है। इसी तरह एक मुश्किल रदीफ़ है 'हस्त कि बूद' (है कि जो था, उर्दू में पहली रदीफ तो कहीं नज़र से गुजरी ही नहीं दूसरी भी विरल है जिसमें फ़िराक साहब ने एक लम्बी और खूबसूरत ग़ज़ल कही है। नमूने के तौर पर मक्ता पेश कर रहा हूं तीरा बख्ती (1)दिल-ए-सोजा (2) की मिटती ही नहीं फ़िराक शम्अ के सर पर आज वही धुओं है कि जो था। (1) अंधेरी किस्मत (2) जलता हुआ दिल दीवान में लगभग सभी अक्षर अन्त्यानुप्रास के रूप में प्रयुक्त होते हैं। 'जाद' अक्षर से बनने वाले 'आ ज' शब्द विरल हैं (बियाज, मिक्राज, मामाज़ आदि) हाफ़िज़ के पुष्ट ज्ञान ने इन काफ़ियों का निर्वाह बखूबी किया है और गर्वोक्ति के अन्तर्गत कहते हैं मुश्किल बहुत 'प्ताद' को तुक है इससे ग़ज़ल नहीं बनती लेकिन शायद तुझसे हाफ़िज़ होवे भावों का विस्तार। (10) - हाफ़िज़ शीराप्ती को जन्म तिथि या वर्ष प्रामाणिक रूप से पता नहीं है परन्तु उन्होंने दीर्घायु तक सर्जनात्मक कार्य किया। उनके पिता ही 'शीरात' शहर में आये, उनके दो भाई जीविकोपार्जन हेतु शीराज छोड़कर चले गये। उनके दो बेटों का देहान्त उनके जीवनकाल में ही हो गया। एक तो भारत भूमि में ही दिवंगत हुए। उनके जीवनकाल में बादशाहत बदलती रही और अशान्ति का युग रहा। एक बादशाह ने जब शराब वन्दी की तो ख्वाजा साहब ने शराब की मौत पर एक मर्सिया भी कहा था और दूसरे पाबन्दी हटा देने की खुशी में एक क़सीदा भी कहा।ई 1389 में वह शाहबाज सिदानशीं इस खरावाबाद को छोड़ कर चला गया। कविता का उच्चतम उद्देश्य है सौन्दर्य बोध एवं प्रज्ञानुभूति को जगाना। इस महाकवि की हर पंक्ति से इस उद्देश्य की पूर्ति होती है। दुनिया के श्रेष्ठतम कवियों में इनकी गणना है। ऐसे कवि का अनुवाद बड़ा कठिन कार्य है और शंकर बाबू ने इस काम को बखूबी निवाहा है। फैसला पाठकों के हाथ है। लिप्यन्तर अनुवाद के साथ फ़ारसी मूल भी देवनागरी लिपि में प्रस्तुत किया गया है। वैसे तो लिप्यन्तर का एक अन्तरराष्ट्रीय मानक है परन्तु सुविधा के चलते उसका अनुकरण नहीं किया गया है। फ़ारसी में 'क''ख''ग' फ और ज की दो ध्वनियाँ होती हैं (ज की तीन होती हैं) हिन्दी उच्चारण से भिन्न ध्वनि को अलगाने के लिए अक्षर के नीचे (०) बिन्दी लगा दी गई है। 'आ' को भी दो ध्वनियाँ हैं एक हस्व है जैसे ज़माना की बजाए जमानः लिखा गया है। इसमें ना का उच्चारण हस्व है अतः 'आ' की माता के स्थान पर विसर्ग संकेत प्रयुक्त है। दीवाने हाफ़िज़ की बजाए दीवान-ए-हाफ़िज़ लिखा गया है। पहली बात तो यह है 'दीवाने'लिखने से शलिष्ट होकर हाफ़िज़ का विशेषण भी हो सकता है जो कि अनर्थ होगा-दूसरे फारसी भाषा में 'ए' की माता लगने से एक हो जाता है, जैसे बुलबुले का अर्थ एक बुलबुल हो जाता है। रेवती लाल शाह (11) .. संस्तुति मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि ख्वाजा हाफ़िज़ शीराजी का काव्यात्मक हिन्दी अनुवाद किसी कवि ने किया है : अतः मैंने शंकर माहेश्वरीजी का किया हुआ अनुवाद अद्योपान्त बड़े गौर से सुना और मुझे इस बात पर आश्चर्यजनक प्रसन्नता हुई कि शंकर माहेश्वरीजी ने जो अनुवाद किया है वह केवल यही नहीं कि मूल का सही रूप है, बल्कि इतना खूबसूरत है, इतनी रवानी के साथ है कि उसे देख कर मूल का भ्रम होता है: एक भापा की कविता का अनुवाद दूसरी भाषा की कविता में करना बड़ा कठिन काम है : इसके लिए पहली बात तो यह है कि चिन्तन की दृष्टि से भी और काव्यानुभूति को दृष्टि से भी अनुवाद करने वाला कवि उस कवि के साथ, जिसका वह अनुवाद कर रहा है, एक भावनात्मक सादृश्य पैदा करे, और मैंने देखा कि शंकर माहेश्वरीजी ने हाफ़िज़ शीराजी के साथ ऐसा सादृश्य पैदा कर लिया है कि अनूदित शेर और हाफ़िज़ के मूल शेर को अलग-अलग खानों में नहीं रख सकते : यह जानते हुए भी कि हिन्दी का शेर फारसी के शेर का अनुवाद है, हमें इस तरह की आनन्दानुभूति होती है कि जैसे अनुवाद नहीं सुन रहे हों या पढ़ रहे हों। स्वतंत्र रचना का आस्वाद ले रहे हों। ख़्वाजा हाफ़िज़ का अनुवाद करते समय अनुवाद की कठिनाइयाँ इसलिए भी बढ़ जाती हैं कि हाफ़िज़ बहुत बड़े शाइर हैं। ईरान के चार बड़े कवियों में उनका नाम लिया जाता है अर्थात् रूमी, फिदौसी और सादी के साथ। यहाँ मुझे अल्लामा इकबाल का एक वाक्य याद आता है, और उस वाक्य का साहित्यिक महत्व और बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि इकबाल ने हाफ़िज़ के जीवन दर्शन की आलोचना की है। लेकिन हाफ़िज़ की शाइरी का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि जब मैं शेर कहने के मूड में होता हूँ तो मुझे महसूस होता है कि हाफ़िज़ की रूह मेरी रूह में शामिल हो गई है। यही वात मुझे शंकरजी के अनुवाद में नज़र आई है। हाफ़िज़ की व्यापक दृष्टि और औदार्य काव्य जगत् में अपनी मिसाल आप हैं। हालांकि उनसे पहले सादी ने ग़ज़ल को बड़ी ऊंचाइयों तक पहुँचाया था, लेकिन ग़ज़ल में हाफ़िज सादी से कहीं आगे निकल गये थे। और ख्वाजा किरमानी और जहीर फारियाबी की ग़जल तो हाफ़िज़ की तुलना में कोई वैशिष्ट्य नहीं रखती। इसके बावजूद हाफ़िज़ इन सबका आदर करते हैं और एक शेर में कहते हैं- सबसे पहले ग़ज़ल में उस्ताद सादी हैं लेकिन हाफ़िज़ ग़जल में ख्वाजा किरमानी की पैरवी करता है। इसी तरह एक और शेर का उर्दू तर्जुमा देखिए- (12) ख़्वाजा और सलमान के शेर का क्या कहना (यानी उनका रुतवा तो बहुत बलन्द है) हाँ, हाफ़िज़ के शेर जहीर फारियाबी से बेहतर हैं। हाफ़िज़ का यह मिजाज उनकी शायरी का एक हिस्सा है और इस मिजाज को समझे बिना हाफ़िज़ की शायरी का रसास्वादन बहुत मुश्किल है। माहेश्वरीजी का अनुवाद बताता है कि हाफ़िज़ के काव्य की बारीकियों पर नजर रखने के साथ ही साथ उनके मिजाज को भी उन्होंने समझा है। ख्वाजा हाफ़िज़ के काव्य का तर्जुमा इसलिए भी मुश्किल है कि जब वे किसी दूसरे शायरों के किसी शेर से प्रभावित होते हैं तो उसके कथ्य अपने शेर में ऐसी ऊंचाई लिए अभिव्यक्त करते हैं कि वह शेर पहले शायर के शेर से बिल्कुल अलग हो जाता है। कहीं-कहीं इस शेर में वह बात भी झलकती है जो उस शायर के शेर में मौजूद होती है जिसके शेर से हाफ़िज़ प्रभावित होते हैं, लेकिन दूसरी बात जो हाफ़िज़ खुद पसंद करते हैं, वह बहुत गहरी और सूक्ष्म होती है। शेर में यह विशेषता सनअत-ए-ईहाम कहलाती है और इसमें कमाल हासिल करना हर शायर के वश का काम नहीं है। काव्यात्मक अनुवाद को इस स्तर पर पहुंचाना समय साध्य है। लेकिन शंकर माहेश्वरी के अनुवाद को गहरी दृष्टि से देखने पर पाठक इस नतीजे पर पहुंचता है कि शंकर माहेश्वरी ने यह मंजिल बड़ी कामयाबी से तय की है। ओज हाफ़िज़ के शब्दों की एक अन्य विशेषता है-ख्वाजा हाफ़िज़ के इस काव्य वैशिष्ट्य का जिक्र करते हुए अल्लामा शिब्लीनोमानी लिखते हैं-हजारों गुणों के बावजूद फारसी शायरी में ओज का अभाव है। फिरदौसी और निजामी के यहाँ खास-खास मौकों पर पर्याप्त ओज है लेकिन वह उनके चरित्रों की विशेषता है, खुद शायर को प्रस्तुति नहीं है। इसके विपरीत ख्वाजा हाफ़िज के शब्द में जो भावना है, वह ख़ुद उन्हीं के जीवन की घटनाएं और उनकी संवेदना से जुड़ी हैं। इसलिए उनको वे इस ओज के साथ अभिव्यक्त करते हैं कि एक आलम छा जाता है। माहेश्वरीजी के अनुवाद में ख्वाजा हाफ़िज का यह ओज जिस काव्यात्मक ढंग से आया है वह प्रशंसनीय है। इसी तरह ख्वाजा साहब की रिन्दी और मस्ती शंकर माहेश्वरी के तर्जुमे में छुप नहीं जाती बल्कि अपने पूरे सौंदर्य के साथ प्रकट होती है। मैं इस तरह की मिसालें देकर शायरी और पाठक के बीच आना ठीक नहीं समझता बल्कि यह चाहता हूँ कि पाठक मेरे कथन से नहीं, खुद तर्जुमे से आनन्द उठायें। जो ज्ञान की वारुणी ख्वाजा हाफ़िज़ शीराजी ने शंकर माहेश्वरी के प्याले में ढाली है उससे बिना किसी बाधा के पाठक तृप्त हों। प्रो. जगन्नाथ आजाद (13) विज्ञप्ति आज से करीब बीस-इक्कीस साल पहले मेरे मित्र श्री रेवतीलाल शाह ने एक विचित प्रस्ताव रखा कि मैं फारसी भाषा के विख्यात कवि हाफ़िज़ की कुछ ग़ज़लों का अनुवाद करूँ। विचित्र इसलिए कि मैं फारसी भाषा का अलिफ-बे भी नहीं जानता। हाफ़िज़ का नाम तो सुना था पर उसके काव्य का परिचय नहीं था। रेवतीलालजी उत्साह में थे। उन्होंने मुझे एक-एक शब्द का अर्थ बताने का आश्वासन दिया। तथापि मेरा संकोच गहरा था। उनके आग्रह के कारण मैंने कहा कि एक रचना का अनुवाद कर देखता हूँ। तभी निर्णय कर सकूँगा। एक ग़ज़ल का काव्यानुवाद कर रेवतीलालजी को दिखाया। उन्हें जंच गया। तब पचास ग़जलों का रूपान्तर करना तय हुआ। रेवतीलालजी ने एक-एक शब्द का अर्थ बताया, छन्दों के अर्थ भी। शब्दार्थ के सहारे मैं उन अर्थों पर विचार करता और मुझे कोई भिन्न या अतिरिक्त अर्थ सूझता तो उस पर परस्पर विचार कर लिया जाता। इस प्रकार कहा जा सकता है कि फारसी न जानते हुए भी यह मूल का भी रूपांतर है। पचास ग़जलों के रूपान्दर का लक्ष्य छ: सात महीने में पूरा हो गया। श्री रेवतीलालजी ने मूल का देवनागरी में लिप्यन्तर तथा प्रासंगिक शब्दों को टिप्पणियाँ भी लिख दी, जिससे पाठकों को सुविधा होगी। केवल शब्दानुवाद के बजाय मैंने रचना की संवेदना के करीब रहने का प्रयास किया है। इसलिए इसे काव्यानुवाद कहना ज्यादा उचित लगा। छन्दों में कुछ स्वतंत्रता बरती गई है। कहीं-कहीं अनावश्यक विस्तार से बचने के लिए एक ही रचना में छन्द परिवर्तन हुआ है। दो पंक्तियों वाले एक छन्द में एक माता न्यूनाधिक है। हिन्दी कविता में एक ही क्रम में प्रयुक्त इस छन्द में किसी में एक मात्रा कम और किसी में एक मात्रा ज्यादा का प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए कामायनी और आशा सर्ग के लगातार दो छन्द इस प्रकार है:- (14) इन्द्रनील मणि महा चषक था सोम रहित उलटा लटका आज पवन मृदु साँस ले रहा जैसे बीत गया खटका। वह विराट था हेम घोलता नया रंग भरने को आज कौन? हुआ यह प्रश्न अचानक और कुतूहल का था राज। प्रथम छन्द में तीस और द्वितीय में इकतीस माताएं हैं। पंक्ति का अंतिम वर्ण दीर्घ होने पर तीस और हस्व होने पर इकतीस माताएं होती हैं। इस छन्द की चाल ऐसी है कि इसकी गूंज बत्तीस माला तक बनी रहती है। इसलिए एक माता न्यूनाधिक होने पर भी संगीत की क्षति नहीं होती जो छन्दों का आवश्यक गुण है। इसी कारण मैंने एक ही छन्द की दो पंक्तियों में यह स्वतंत्रता ली है। फारसी भाषा के विद्वान और उर्दू के मूर्धन्य कवि श्री जगन्नाथ आजाद का हृदय से आभारी हूँ कि उन्होंने पुस्तक की भूमिका लिखने की कृपा की। इस समय मेरे मानस के सामने ललित निबन्धकार डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र, कवि श्री नवल, कथा लेखिका स्व. शारदा अग्रवाल तथा अनेक मित्र उपस्थित हैं जिनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन से यह काम सुगम हो सका। बीस बरस से जाड्यान्धकार में पड़े इस काव्यान्तर को प्रकाश पथ दिखलाने वाले मेरे शायर मित्र श्री चम्पालाल मोहता अनोखा के लिए मेरे मन में जो भाव है उसके लिए मेरा निवेदन है कि वे स्यं उपयुक्त शब्द चुन कर मेरा भार कुछ हलका कर दें। राष्ट्रीय-सामाजिक कार्य में उत्साह एवं समर्पण भाव से संलग्न श्री मुकुन्द राठी जिनको आत्मीयता मुझे सदा सुलभ रही है, आज उन्हीं के प्रयास से यह प्रकाशन-कार्य संभव हो सका। अपने इन स्नेही बन्धुओं के प्रति आभार प्रकट कर इनकी भावना का मोल घटाना शोभनीय नहीं लगता। श्री संजय बिन्नाणी की मेरे प्रति आत्मीयता, बावजूद अतिव्यस्तता के, सदाबहार है। इस कार्य में उसका भरपूर सहयोग रहा है। शंकर माहेश्वरी (1)
1.
अलाया अय्य हस्साक़ी इदर कासन ब हमफ़िलहा
कि इश्क आसाँ नमूद अव्वल वले उफ्ताद मुश्किलहा
ब बू-ए-नाफ़: कि आख़िर सबा ज़ आँ तुर्रः बिकुशायद
ज ताब-ए-जा'द-ए-मुश्कीनश चिलूँ उफ़्ताद दर दिलहा
..
ब मय सज्जादः रंगी कुन गरत पी-ए-मुगां गोयद
कि सालिक बेख़बर न बुवद ज राह-ओ-रस्म-ए-मंजिलहा
मरा दर मंज़िल-ए-जानाँ चि अम्न-ओ-ऐ'श चूँ हरदम
जरस फ़रियाद मोदारद कि बर बन्दीद म मिलहा
शब-ए-तारीक-ओ बीम-ए-मौज-ओ-गिर्दाबे चुर्नी हाइल
कुजा दानन्द हाल-ए-मा सुबुक सारान-ए-साहिल हा
हमः कारम ज़ ख़ुदकामी बदनामी कशीद आखिर
निहाँ के मानद आँ राजे कजू साजन्द मफिलहा
हुजूरी गर हमी ख्वाही अजू ग़ायब मशव हाफ़िज़
मिता मा तलके मन तहवा दउल दुनिया ब अमहिलहा
(16)
1.
मुझको अब देती रह साक़ी मद के प्याले पर प्याले
वही प्रेम, जो सहज लगा था, विषम बन गया जीवन में।
हवा खोल देगी जब वेणी में उलझी मृगमद की गन्ध
उन घूघर वाली अलकों से होगा लहू हृदय का स्तब्य
मदिरा से रंग लो तुम आसन पीरेमुगा जो तुम्हें कहे
तौर तरीकों से मंजिल के पथदर्शक अनभिज्ञ नहीं
प्रिय को इस पथ शाला में मुझको क्यों कर सुख शान्ति मिले
हरदम घंटी बज कर कहती जीन कसो तुम जीन कसो
ये भीषण लहरें, भंवरों के चक्कर और अंधेरी रात
वे क्या जानें हाल हमारा तट पर जो निश्चिन्त पड़े
कब तक छिप कर रह सकते हैं महफ़िल के गोपन आनन्द
अपयश के कारण बन बैठे स्वारथ के अपने सब काम
यदि तुम दर्शन चाहो हाफ़िज़ तो प्रिय से
यदि तुम दर्शन पाओ तो विस्मृत कर जग से मुह मोड़ो
मुख मोड़
(17)
2.
अगर आँ तुर्क-ए-शोराजी बदस्त आरद दिल-ए-मारा
व ख़ाल-ए-हिन्दवश बख्शम समरकन्द-ओ-बुखारा रा
विदह साक़ी मय-ए-बाक़ी कि दर जन्नत न ख्वाहोयाप्त
कनार-ए-आव-ए रुक्नावाद व गुलगश्त-ए-मुसलारा
फुगाँ कि ई लूलियान-ए-शोख़ शीरौंकार शहर आशोब
चुनाँ बुर्दन्द सब अल दिल की तुकाख्वान-ए-यामारा
ज इश्क-ए-नातमाम-ए-मा जमाल-ए-यार मुस्तानीस्त
ब आब-ओ-रंग-ओ-खाल-ओ -ख़त चि हाजत रू-ए-जेबारा
मन अज़ आँ हुस्न-ए-रोज अफ़जूं कि यूसुफ़ दाश्त दानस्तम
कि इ'शकं अज पर्द:-ए-इ'स्मत बैरू आवर्द जुलेखा रा
हदीस अज़ मुतिव-ओ-मय गोई व राजे दहर कमतर जू
कि कस नकशूद-ओ-न कशायद बहिकमत ई मुअम्मा रा
नसीहत गोश कुन जाना कि अज जाँ दोस्ततर दारंद
जवानान-ए-सआ'दतमन्द मन्द-ए-पीर-ए-दाना रा
बदम गुफ्ती व खुर्सन्दम अफ़ाकु लाह नकू गु.फ्ती
जवाब-ए-तल्ख मी जेबद लब-ए लाल-ए-शकर खारा
मजल गुफ़्ती ब दुर सुफ्ती बिया-ओ-खुश बि ख्वा हाफ़िज़
कि बर नज्म-ए-तू अपशानद फ़लक उ'क्द-ए-सुरय्यारा
(18)
2.
वह शीराज सुन्दरी मेरा हृदय थाम ले अपने हाथ
बुखारा
तो उसके तिल पर वारूँ।
समरकन्द भी और
रुक्नाबाद नहर का तट भी और मुसल्ला का कानन
तुझे स्वर्ग में नहीं मिलेंगे, साकी दे तू बची शराब।
मधुर अदाओं से वह नटखट सारा शहर दुर्ग में डाल
मन का सुख यों लूट ले गया, तुर्क यूथपति जैसे माल।
मेरा प्रेम अधूरा, उससे उस सुषमाकर का क्या काम
सुन्दर मुख को कहाँ जरूरत बाहर के उपकरणों की।
मुझे पता था, लख कर यूसुफ का दिन-प्रतिदिन बढ़ता रूप
सती जुलेखा को परदे के बाहर ले आयेगा प्रेम।
करो बात संगीत सुरा की, विश्व पहेली को छोड़ो
बुद्धि न सुलझा पाई इसको, और न सुलझा पायेगी।
प्रिये सुनो उपदेश ध्यान से प्राणों से भी प्रियतर जान
भाग्यवान युवजन सुनते हैं अनुभव परिपक्कों की बात।
तूने बुरा कहा, अच्छा है, खुश हूं, ईश्वर क्षमा करे
मीठे लाल होंठ के कडुए उत्तर भी प्यारे लगते ।
रची ग़ज़ल ज्यों मोती पोए अब इसको पढ़ दे स्वर से
हाफ़िज़ तेरी कृति पर देता व्योम कृत्तिका का उपहार।
(19)
3.
दोश अज़ मस्जिद सू-ए-मयख़ानः आमद पीर-ए-मा
चीस्त यारान-ए-तरीक़त बा'द अजी तबीर-ए-मा
दर खराबात-ए-मुगाँ मा नेज़ हम मंजिल शवेम
कि ई चुनर्नी रफ्तस्त दर अह्द-ए-अज़ल तक़दीर-मा
मा मुरीदा रू व सू-ए-का'ब: चूं आरेम यूँ
रू व सू-ए-खान: ए-खुम्मार दारद पीर-ए-मा
अक्ल अगर दानद कि दिल दर बन्द-ए जुल्फश यूँ ख़ुशस्त
आ'किला दीवान: गर्दन्द अज़ पये-जंजीर-ए-मा
रू-ए-खूबत आयते अन लुत्फ़ बर मा कश्फ़ कर्द
ज औं सबब जुज लुत्फ़-ओ-खूबी नेस्त दर तासीर-ए-मा
तीर-ए-आह-ए-मा ज़ गईं बिगुज़रद जान-ए-अ'जीज
रहम कुन बर जान-ए-ख़ुद परहेज़ कुन अज़ तीर-ए-मा
बर दर-ए-मयखानः ख्वाहम गश्त यूँ हाफ़िज़ मुक़ीम
चूँ ख़राबाता शुद अय यार-ए-तरीक़त पीर-ए-मा
(20)
3.
पीर हमारा मन्दिर से मधुशाला में आया कल रात
इससे बढ़ कर कहो शास्त्रियों, होगा कौन हमारा यत्न!
पीरे मुगाँ की मधुशाला में हम भी सहयात्री होवें
आदिकाल में हमलोगों को ऐसी ही तकदीर मिली।
क्योंकर बोलो करें शिष्य हम अपना मुख काबा की ओर
पीर हमारा किये हुए जब अपना मुख मधु-घर की ओर ।
बुद्धि जान ले जो, हमको सुख उन अलकों की कारा में
तो पागल हो गिरें हमारी बेड़ी के पगतल मतिमान।
प्रिय के मुख ने खोल दिया है मुझ पर कृपा-मंत्र का अर्थ
अब आनन्द गान को तज कर कुछ भी नहीं हमारे पास।
कर जाते हैं पार व्योम को प्रिय, मेरी आहों के वाण
करो दयां अपने प्राणों पर बचो हमारे तीरों से।
मैं भी कर लूँगा हाफ़िज़ सा मधुशाला का द्वार निवास
और शास्त्रघर हुआ पीर जब खुद ही मधु-घर का वासी।
(21)
4.
रौनक-ए-अहद-ए-शबाबस्त दिगर बुस्तारा
मी रसद मुन्दः-ए-गुल बुलबुल-ए-खुश इल्हाँ रा
अय सबा गर ब जवानान-ए-चमन बाज़ रसी
ख़िदमत-ए-मा बिरसा सर्व ओ गुल-ओ रीहाँ रा
तरसम आँ कौम कि बर दुर्दकशा मी खंदंद
दर सर-ए-कार-ए-खराबात कु नन्द ईमारा
यार-ए-मर्दान-ए-ख़ुदा बाश कि दर कश्ती-ए-नूह
हस्त खाके कि ब आबे न खिर्द तूफ़ाँ रा
बिरौ अज ख़ान:-ए-गर्दू बदर व ना मतलब
की' सियह कासः दर आख़िर बिकुशद मेहमाँ रा
गर चुनी जल्व: कुनद मुग़बच्चः बादः फरोश
खाकरोब-ए-दर-एमयख़ानः कुनम मिगा रा
नशवी वाक़िफ़-ए-यक-नुक्तः ज अस्त्रार-ए-वजूद
गर तू सरगश्तः शवी दायर:-ए-इम्का रा
हरकरा ख्वाबगह-ए-आखिर बदो मुश्ते ख़ाकमस्त
गो चि हाजत कि बर अफ़लाक कशी ईवारा
दर सर-ए-शुल्फ़ नदानम कि चि सौदादारी
कि बहम बरजदः ए गेसू-ए-मुश्क अफ्शां रा
मुल्क-ए-आजादगी व कुंज-ए-कनाअ'त गंजेस्त
कि ब शमशीर मयस्सर न शबद सुल्ताँ रा
हाफ़िज़ मय खुर व रिन्दी कुन व खुश बाश वले
दाम-ए-तस्वीर मकुन चूं दिगरी कुआँ रा
(22)
4. बगिया में आ गई बहार, जगा पुष्प में नया उभार, मधुकंठी बुलबुल तक पहुंची यौवन के आगम की बात। उपवन के तरुणों के पास जो तुम जाओ अरी बतास, तो उन तृण-तरु को गुलाब को मेरा नमस्कार कहना। तलछट पीने वालों पर हंसते जो अवहेला कर मधुशाला के धर्म कर्म से, डर है, वे न विचल जायें। ईश जनों से करो मिताई क्योंकि नूह को नौका में वह मिट्टी है, जो न समझती कुछ भी प्रलय प्रभंजन को। रोटी की आशा मत रख, आकाश भवन से जल्दी भाग यह खुदगरजी कर देता है मेहमानों का काम तमाम। पलक- यदि किशोर वय मधु विक्रेता दिखलाये निज रूप प्रकाश -झाडुओं से बुहार दूं तो मैं मधुशाला का द्वार। केवल पंचभूत जगती तक जो तुम काटोगे चक्कर तो अस्तित्व-रहस्य कभी भी जान नहीं तुम पाओगे। स्वप्न जगत में जब हरेक को होना है दो मुट्ठी राख तब क्यों लोग चिनाया करते महल गगन छूने वाले। अहा, तुम्हारी जिन अलकों से उठती कस्तूरी की गन्ध उन्हें सदा बिखराये रखना, कैसा है यह पागलपन। स्वतंत्रता का राज्य और संतोष प्रान्त ऐसी निधि है मिल सकती जो नहीं नृपतियों को उनकी तलवारों से हाफ़िज़ मधु का पान करो, मन मस्ती से सदा भरो औरों जैसे तुम कुरान को मत प्रपंच में उलझाओ। (23) 5. सुलाह-ए-कार कुजा व मन खराव कुजा बिबों तफावुत-ए-रह अत कुजास्त ता व कुजा चि निस्बतस्त बरिन्दी सुलाह-ओ-त. वा रा सुमाअ'-ए-वा'ज कुजा नाम:-ए-रबाब कुजा दिलम ज सूमिआ' बिगिरफ़्त व खिर्क :-ए-सालूस कुजास्त दैर-ए-मुगाँ व शराब-ए-नाब कु जा बिशुद ज याद-ए-ख़ुशश याद-ए-रोजगार-ए-विसाल ख़ुद आँ करिश्मा कुजा रफ़्त व औं इ'ताब कुजा श रू-ए-दोस्त दिल-ए-दुश्मनां चि दर याबद चिराग़-ए-मुर्द: कुजा शम्अ'-ए-आफ़ताब कुजा .. बिबी ब सेब-ए-जनख़दा कि चाह दर राहस्त कुजा हमीरबी अय दिल बदी शिताव कुजा चूकुल-ए-बीनश-ए-माखाक-ए-आस्तान-ए-शुमास्त कुजा रवेम बिफ़ा अजी जनाब कुजा क़रार- -ओ-र -ख़्वाब ज हाफ़िज़ तम्अ मदार अय दोस्त करार चीस्त सबूरी कुदाम व ख्वाब कु जा (24)
5.
कहाँ पुण्य के कार्य और मैं कहाँ इधर मद पायी
देखो तो कितना अन्तर है इन दोनों राहों में।
पीने से क्या रिश्ता-नाता संयम और नियम का
कहाँ शुष्क उपदेश, कहाँ तो तंत्री की स्वर लहरी।
छल के चोगों से, मठ-मस्जिद से मन हुआ विरागी
मैं तो खोज रहा वह मन्दिर जहाँ वारुणी पावन।
उसकी स्मृति से चली गई वे मधुर मिलन की बातें
अब वे कहाँ कटाक्ष, कहाँ वे मानवती के ताने।
दुश्मन का दिल और मित्र के चेहरे में समता क्या
कहाँ बुझा वह दीप, कहाँ यह जगमग करता सूरज।
.
देख प्रिया को चिबुक सेव सी, जहाँ कूप गहरा है
कहाँ जा रहे हो यों ऐ दिल, इस पथ पर द्रुत गति से।
तेरो ड्योढ़ी की मिट्टी, मेरी आँखों का काजल
तब फिर यह दरबार छोड़ कर बता कहाँ मैं जाऊँ।
हाफ़िज़ से मत रखना प्यारे सुख-सपनों की आशा
यहाँ कहाँ का चैन, कहाँ विश्राम, कहाँ को निद्रा।
25)
6.
सबा ब लुत्फ़ बिगो आ ग़जाल-ए-रा'ना रा
कि सर ब कोह-ओ-बियाबाँ तू दादः मा रा
ब शुक्र-ए-आँ कि तू ई बादशाह-ए-किश्वर-ए-हुस्न
ब याद आर गरीवान-ए-दश्त-ओ-सहरा रा
गरूर-ए-हुस्न इजाजत मगर न दाद अय गुल
कि पुर्सिशे नकुनी अन्दलीब-ए-शैदा रा
व हुस्न-ए-ख़ुल्क तवा कर्द सैद अल-ए-नजर
ब दाम-ओ-दानः नगीरन्द मुर्ग-ए-दाना रा
चू बा हबीब नशीनी व बादः पैमाई
ब याद आर हरीफ़ान-ए-बादः पैमा रा
शकर फ़रोश कि उ'म्रश दराज़ बाद चिरा
त.फक कुदे न कुनद तूती-ए-शकर खारा
न दानम अज़ चि सबब रंग-ए-आश्नाई नेस्त
सही क़दान-ए-सियह चश्म व माह सीमा रा
जुज ई कद्र न तवाँ गुफ़्त दर जमाल-ए-तू ऐब
कि खाल-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नेस्त रू-ए-जेबा रा
दर आस्मा चि अ'जब गर ल गुप्तः-ए-हाफिस
सुरूद-ए-जुह : ब रक्स आवर्द मसीहा रा
(26)
6.
अरी हवा, जा उस सुन्दर हिरणो से कह दे मेरी बात
'अरी मृगी, तूने सौंपा है मुझको वन-पर्वत के हाथ।'
अपनी विरुदावलि की खातिर रूप नगर के ऐ सम्राट
इस मरुवन वासी परदेसी को कुछ किया करो तुम याद।
रूप गर्व ऐसा जो शायद अनुमति देता नहीं तुम्हें
इसीलिए ऐ कुसुम, न लेते खबर बावरी बुलबुल की।
शिष्ट आचरण करे भले ही भ्रमित, ज्ञानियों के मन को,
दाने के लालच में फंसते नहीं जाल में विहग सुजान।
जब तुम संग रहो प्रियतम के और करो मदिरा का पान
अपने प्रतिद्वंद्वी पियक्कड़ों की तब किया करो तुम याद।
ईश कृपा से मिले दीर्घ जीवन मधु के सौदागर को
जिसने खबर नहीं ली शुक की जो सच्चा मधु का गाहक।
कजरारी आंखें हैं जिनकी, ललित देह, मुख चन्द्र समान
पता नहीं किस कारण उनमें सहदयता का रंग नहीं।
तेरे मुख की सुषमा ऐसी, कुछ भी कसर नहीं दिखती
सिर्फ एक कोमल करुणा की वहाँ न दिखती छाप कहीं।
आसमान में जब शुक तारा गाये हाफ़िज़ की ग़ज़लें
नाच उठे जिनको सुन ईसा तो इसमें क्या विस्मय है।
(27)
7.
अय हुदहु द-ए-सवा ब सवा मीफ़िरिस्तमत
बिनिगर कि अज्ञ कुजा व कुजा मीफ़िरिस्तमत
है फस्त ताइरे चू तू दर खाक दान-ए-दह र
पर ईजा बाशियान-ए-वफ़ा मीफ़िरिस्तमस्त
दर राह-ए-इश्क महल:-ए-कुर्व-ओ-बुअंदनेस्त
मी बीनमत अयाँ व दुआ' मोफिरिस्तमत
हर सुब्ह-ओ-शाम क़ाफ़िल: अज़ दुआ'-ए-खैर
दर सुह बत-ए-शुमाल-ओ-सवा मीफ़िरिस्तमत
दर रू-ए-ख़ुद तफ़र्रुज-ए-सन्म-ए-ख़ुदा विकुन
कि आइना-ए-खुदा-ए-नुमा मी फ़िरिस्तमत
ता लश्कर-ए-गमत नकुनद मुल्क-ए-दिल ख़राब
जान-ए-अ'जीज़-ए-खुद ब नवा मीफ़िरिस्तमत
हर दम गमे फ़िरस्त मरा व बिगो ब नाज़ा
कि ई तुह फ़; अज़ बराए ख़ुदा मीफ़िरिस्तमत
अय गायब अज नजर कि शुदी हमनशीन-ए-दिल
मी गोयमत दुआ' व
सना मीफरिस्ततम
ता मुनिबाँ ज़ शौक़-ए-मनत आगही दहन्द
क़ौल-ओ-ग़ज़ल ब साज़-ओ-नवा मोफ़िरिस्तमत
साक़ी बिया कि हातिफ़-ए-गैबम ब मुज्दः गुफ्त
बा दर्द सब कुन व दवा मीफ़िरिस्तमत
हाफ़िज़ सुरूद-ए-मजलिस-ए-मा जिक्र-ए-खैर-ए-तुस्त
बि शिताब हाँ कि अस्प-ओ-कबा मोफिरिस्तमत
(28)
7.
ऐ हुदहुदे विहग मैं तुझको भेज रहा हूँ सवा प्रदेश
वहाँ प्रिया रहती है मेरी पथ का रखना ध्यान विशेष।
अरे विहग इस चंचल जग में अत्याचार घनेरा है
जहाँ वफ़ा का नीड़ बसा है भेजूं मैं तुझको उस देश।
अजब प्रेम की राह, वहाँ पर दूरी क्या नजदीकी क्या
मुझको तो तू ही तू दिखता वारूं तुझ पर शुभ संदेश।
हवा संग उत्तर-पूरव को, नित्य प्रात औ' सन्ध्या को
तेरे निकट भेजता हूँ मैं आत्मा के आशीप अशेष।
अपने चेहरे में देखो उस स्रष्टा का रचना कौशल
इसीलिए मैं भेज रहा हूँ तुझको वह दर्पण सविशेप।
यही समझ कर भेज रहा मैं तुझको अपने प्यारे प्राण
उजड़ न जाये दुःख-दलों से तेरे मृदु मानस का देश।
व्यथा भेजता रह तू मुझको और सदा यों कहता रह
यह उपहार ख़ुदा के खातिर पास तुम्हारे भेज रहा।
दूर नजर से रहता फिर भी दिल में किया बसेरा है
मुद-मंगल की दुआ-प्रार्थना पास तुम्हारे भेज रहा।
मेरे मन की अभिलापाएँ गायक तुम तक पहुंचायें
इसीलिए ये गीत, साज, स्वर पास तुम्हारे भेज रहा।
साक़ी आ, अब देवदूत ने मुझको यह पैगाम दिया
दर्द सहन करने की औषधि पास तुम्हारे भेज रहा।
मजलिस में सब करते रहते तेरी ही बातें हाफिज
जल्दी कर ये अश्व-वस्त मैं पास तुम्हारे भेज रहा।
(29)
8.
बिया कि कस्र-ए-अ'मल सख्त सुस्त बुनियादस्त
बियार बादः कि बुनियाद-ए-3' बर बादस्त
गुलाम-ए-हिम्मत-ए-आनम कि जेर-ए-चर्ख-ए-क़बूद
रा हर चि रंग-ए-तआ'लुक पनीरद आजादस्त
गोयमत कि बमय.खानः दोश मस्त-ओ-खराब
सुरोश-ए-आ'लम-ए-गैबम चि मुज्दःहा दादस्त
:
कि अय बलन्द नज़र शाहबाज़-ए-सिद्रः नशी
नशेमन-ए-तू न ई कुंज-ए-मेहनताबादस्त
तुरा त कुं ग्रा-ए-अ'र्श मी जानन्द सफ़ीर
नदानमत किं दरी दामगाह चि उ.फ्तादस्त
नसीह ते कु नमत यादगीर व दर अमल आर
कि ई हदीसे ज़ पीर-ए तरीक़तम यादस्त
रिज़ा बदादः बिदह व ज जबीं गिरह बिकुशाई
कि बर मन-ओ-तू दर-ए-इख्तियार न कुशादस्त
ग़म-ए-जहाँ मखुर व पन्द-ए-मन मबर अज़ याद
कि ई लतीफ़:-ए-इश्कम त रहरवे यादस्त
मजौ दुरुस्ती-ए-अहद अज जहान-ए-सुस्त निहाद
कि ई अ'जूज: अ'रूस-ए-हजार दामादस्त
निशान-ए-अ'हद-ओ-वफ़ा नेस्त दर तबस्सुम-ए-गुल
बिनाल बुलबुल-ए-बेदिल कि जा-ए-फ़रियादस्त
हसद चि मीबरी अय सुस्त नत्म बर हाफ़िा
कबूल-ए-खातिर व लुत्फ़-ए-सुख़न खुदा दादस्त
(30)
8.
अभिलापा की नींव रेत पर, आ तू मुझ तक जल्दी आ,
जीवन का आधार हवा पर, ला, झट मुझको मदिरा दे।
नील गगन के नीचे जो उलझे ममता की माया में
उनसे मुक्त हुए जो, उनके साहस का मैं सदा गुलाम।
कल जब मैं मद में विभोर था रजनी में मधुशाला में
देवदूत ने दिया संदेशा कैसे उसे बताऊँ मैं।
ऊंचे स्वर्ग लोक के वासी दिव्य दृष्टि वाले ऐ बाज
कर्मलोक का कोई कोना तुझ शाही का नीड़ नहीं।
नभ के कंगूरे से आकर एक रहस्यमयी आवाज
कहती है, जाने क्यों तेरा बन्दी गृह में हुआ पड़ाव।
एक तत्वज्ञानी ने मुझको कही बात जो याद मुझे
वही सीख मैं तुझको देता उसे याद रख अमल करो।
मन का क्षोभ मिटा कर जो कुछ मिला उसे स्वीकार करो
नहीं खुला हम तुम जैसों के लिए द्वार अधिकारों का।
लोक रीति से दुखी न हो तू, मेरी कही बात मत भूल
मुझे याद है एक पथिक की प्रेम मर्मवाली यह बात।
इस दुर्बल दुनिया से मत कर वचन पालने की आशा
यह बुढ़िया रह चुकी अभी तक अनगिन लोगों की बीवी।
यह जो है मुस्कान फूल में, नहीं वफा का वहाँ निशान,
आहे भर दिलभग्ना बुलबुल, यह दुखड़ा रोने का ठाँव।
ऐ निष्प्रभ पद रचने वाले हाफ़िज़ से क्यों करते डाह?
मन की मौज, काव्य का रस तो ईश कृपा से मिलता है।
(31)
9.
बुलबुले वर्ग-ए-गुले खुश रंग दर मिन्कार दाश्त
वन्दरों वर्ग-ओ-नवा खुश नाल हा-ए-ज़ार दाश्त
गुफ्तमश दर ऐन-ए-फ़स्ल ई नाल:-ओ-फ़रियाद चोस्त
गुफ्त मारा जल्व:-ए-मा'शूक दरों कार दाश्त
यार अगर न निशस्त वा मा चौस्त जा-ए-ए'तराज
बादशाह-ए-कामरा बूद अज़ गदायाँ आर दाश्त
आरि.फे कू सैर कर्द अन्दर मकाम-ए-नेस्ती
मस्त शुद चूँ मस्ती अज़ आ'लम-ए-असार दाश्त
दर नमी गीरद नियाज़-ओ-इज्ज-ए-मा बा हुस्न-ए-दोस्त
खुर्रम आँ कल नाज़नीनों बहन-बरखुरदार दाश्त
खेज ता बर किल्क-ए-आँ नकाश जो अपशाँ कुनेम
की हमः नक़्श-ए-अजब दर गर्दिश-ए-परकार दाश्त
गर मुरीद-ए-राह-ए-इश्क़ी फ़िक्र-ए-बदनामी मकुन
शैख़-ए-सनओं खिर्क : रेहन खान:-ए-चुम्मार दाश्त
वक्त-ए-औं शोरों कलन्दर खुश कि दर अत्वार-ए-सैर
ज़िक्र-ए-तस्बीह-ए-मलक दर हल्कः-ए-जुन्नार दाश्त
चश्म-ए-हाफ़िज़ शेर-ए-बाम-ए-कस-ए-आँ हूरी शिरश्त
शेव:-ए-जन्नात-ए-तजरी तहतहा-उल अन्हार दाश्त
(32)
9.
हेम वर्ण पाँखुरी फूल को लिये चोंच में चुलबुल एक
पंखुरी भीतर, और रुदन में प्रकट विरह का हाहाकार।
इस वसन्त ऋतु में तू यह क्या करती है रोदन-फरियाद
उसने कहा, मुझे प्रिय की सुंदरता ने सौंपा यह भार।
प्रियतम मेरे पास न बैठा तो इसमें है क्या एतराज
लजा गया भिक्षुक से देखो, है जो सफलकाम सम्राट।
चक्कर काट चुका जब ज्ञानी इस मायावी दुनिया का
तब लवलीन हो गया वह पाकर रहस्य जग की मस्ती।
प्रिय के रूप-गर्व पर मेरे विनय-दैन्य का असर नहीं
हैं प्रसन्न वे, सुन्दरियों के प्रति प्रसन्न है जिनका भाग्य।
उठ तू, प्राण निछावर कर उस चित्रकार की तूली पर
वर्तुल गति में आँक दिया है जिसने ऐसा चित्र-विचित्र ।
प्रेम पंथ का पथिक अगर तू तो मत डर बदनामी से
शेख सनाअ रख गए बन्धक चोले को मधुशाला में।
उस सुकुमार सन्त का वह पर्यटन काल क्या सुंदर था
घिरा जनेऊ में भी वह सुरमाला की बातें करता।
वह सुन्दरी परी सी जिसके महल तले की नहरों में
जल तरंग स्वर्गीय भरेंगी हाफ़िज़ की गीली आँखें।
(33)
10.
रौशन अज पतौं-ए-रूयत नजरे-नेस्त कि नेस्त
मिन्नत-ए-खाक-ए-दरत वर बसरे नेस्त कि नेस्त
नाजिर-ए-रू-ए-तू साहिब-ए-नजरानन्द वले
सर-ए-गेसू-ए-तू दर हेच सरे नेस्त कि नेस्त
अश्क-ए-गम्माज-ए-मन अर सुर्ख बरामद चि अजब
खजल अज़ कर्द:-ए-ख़ुद पर्दः दरे नेस्त कि नेस्त
ता ब दामन नमशीनद ज नसीमत गर्दै
सैल-ए-अश्क अज़ नजरम वर गुज़रे नेस्त कि नेस्त
तू खुद अय शोल:-ए-रखिान्दः चि दारी दर सर
कि कबाब अज हरकातत जिगरे नेस्त कि नेस्त
मस्लिहत नेस्त कि अज पर्दः बैसँ उपतद राज
वर्नः दर मज्लिस-ए-रिन्दाँ खबरे नेस्त कि नेस्त
बजुजई नुक्तः कि हाफ़िज़ जतू नाखुशनूदस्त
दर सरापा-ए-वजूदत हुनरे नेस्त कि नेस्त
(34)
10.
ऐसी कोई दृष्टि नहीं, जो नहीं व्यक्त तेरे प्रतिबिम्ब
तेरी द्वार धूलि का न हो अनुग्रह, ऐसी आँख नहीं।
तेरे मुख का दर्शन तो वे करते हैं जो प्रज्ञाचक्षु
पर कोई मन नहीं, नहीं जिसको तेरी अलकों का ध्यान।
मेरे चुगलखोर आंसू जो लाल हुए तो क्या आश्चर्य
भेद खोल दे और न लज्जित हो, ऐसा कोई न यहाँ।
.
तेरा आँचल धूल धूसरित न हो हवा के झोंकों से
अतः न कोई पन्थ, जहाँ मेरे आँसू की बाढ़ नहीं।
अरी अग्नि की शिखा, तुम्हारे मन की कैसी कथा बता,
कोई जिगर नहीं जो उससे भुन कर बना कबाब नहीं।
परदे के बाहर रहस्य को किया जाय, यह उचित नहीं
वरना कोई खबर नहीं, जो न हो माधवी मजलिस में।
प्रेम पन्थ की याता करना है निषिद्ध सुकुमारों को
क्योंकि विपद क्या नहीं, नहीं जो पग-पग पर इस रस्ते में
ऐसी कोई कला नहीं, जो नहीं तुम्हारी सत्ता को-
पूरनिमा में, सिर्फ एक बस हाफ़िज़ तुम से है नाराज ।
(35)
11.
जुल्फ़ आशुफ्तः व ख़ी कर्दा व खंदा लब व मस्त
पैरहन चाक व ग़जल ख्वा व सुराही दर दस्त
नर्गिसश अर्वदःखी व लवश अफ़सोस कुनां
नीमशबदोश ब बालीन-ए-मन आमद वि निशस्त
सर फ़रागोश-ए-मन आवर्द व बआवाज़-ए-हतों
गुफ्त कि अय आशिक़-ए-शोरिदः-ए-मन ख़्वाबत हस्त
आ'शि.के रा कि चुनी बाद:-ए-शबगीर दहन्द
काफ़िर-ए-इश्क बूद गर नबूद बादः परस्त
बिरौ अय जाहिद व बर दुर्दकशां खुर्दा मगीर
कि नदानन्द जुजी तुफ़ा बमा रोज़-ए-अलस्त
आँचि ऊ रेख्त ब पैमानः-ए-मा नोशीदेम
अगर अज खुमर-ए-बिहिश्तस्त वर अज बादः-ए-मस्त
खंदः-ए-जाम-ए-मय व जुल्फ़-ए-गिरहगीर-ए-निगार
अय बसा तौबः कि चूं तौबः-ए-हाफ़िज़ बिशिकस्त
..
(36)
11.
विखरी लटें, श्वेदकण झलमल, हंसी होंठ पर मतवाली
लिये हाथ मद भरी सुराही, लटपट वेश, में।
गीत मुख
वे ललकार भरे मादक दृग और अधर में व्याकुल भाव
मेरे सिरहाने आकर वह बैठ गई कल आधी रात।
दर्द भरे स्वर में यों बोली कानों तक लाकर मुंह को
ऐ मेरे पगले प्रेमी, क्यों पड़े हुए हो यों चुपचाप?
प्रिय को यों दी जाये मदिरा जो कर दे मतवाली रात
उसको जो न झपट कर पी ले प्रेम धर्म का वह काफिर।
चल हट पूजक, दोष न दे तू तलछट पीने वालों को
जिस दिन भाग्य बँटा था, इनके हक़ कुछ और नहीं आया।
हम तो पी लेते हैं, जो भी प्याले में वह भर देता
चाहे वह स्वर्गीय सोम हो या फिर मस्ती की हाला।
प्याले की स्मिति और
उलझन वाली अलकों ने
मिटा दिये सारे पछतावे ज्यों हाफ़िज़ के पश्चाताप।
(37)
12. शिगुफ्तः शुद गुल-ए-हम्रा व गश्त बुलबुल मस्त सदा-ए-सरखुशी अय आशिक़ान-ए-बादः परस्त असास-ए-तौबः कि दर मुहकमी यूँ संग नमूद बिबीं कि जाम-ए-जजाजी चिगूनः अश बिशिकस्त ब बाल-ओ- -पर मरौ अज़ रह कि तौर-ए-पुरताबे हवा गिरफ़्त ज़माने वले ब.खाक निशस्त अज़ी रबात-ए-दोदर चूं ज़रूरतस्त रहील रवाक-ए-ताक-ए-मई शत चि सरबलन्द व चि पस्त ब हस्त-ओ-नेस्त मरंजा ज़मीर व खुश मीबाश कि नेस्त हस्त सरंजाम-ए-हर कमाल कि हस्त शिकोह-ए-आसिफ़ी व अस्प-ए-बाद व मंतक़-ए-तय्यर ब बाद रफ्त व अजाँ ख्वाजः हेच तरफ़ न बस्त बियार बादः कि दर बारगाह-ए-इस्तग्ना चि पासवाँ व चि सुल्ताँ चि हुशियार व चि मस्त जबान-ए-किल्क-ए-तू हाफ़िज़ चि शुक्र-ए-आँ गोयद कि तुह्फ:-ए-सुख़नश मी बुरन्द दस्त व दस्त (38)
12.
लाल फूल खिल गये, बुलबुलों में आई आनन्द हिलोर
मदिरा के साधक प्रेमी जन गाओ खुशियों के गाने।
पत्थर सी जो नीव कठिन थी सद्-आचरण प्रतिज्ञा की
क्या कमाल है, उसे तोड़ डाला शीशे के प्याले ने।
पंखों के बल पर इतरा कर छोड़ न देना अपनी राह
सिर्फ जोश का तीर तनिक फर फर कर रज में मिल जाता।
इस दो द्वारों की पथशाला से जब सबको जाना है
तब क्या धरा कि जीवन मण्डप ऊंचा हो या नीचा हो।
'है' या'नहीं सोच कर मन को दुखी न कर खुश रह जग में
जितने भी कौशल हैं उनका अन्त 'नहीं' में होना है।
वह आसिफ का तेज, पवन का अश्व, पक्षियों से बातें
सभी हो गये लीन हवा में, नृप को कुछ भी नहीं मिला।
यह दरबार उपेक्षाओं का, यहाँ नृपति क्या, प्रहरी क्या,
बुद्धिमान हो या रसज्ञ हो सबको तू बस मदिरा दे।
झट ले लेते हैं जो हाफ़िज़, जिसकी कविता का उपहार,
वही कलम की वाणी तेरी क्या उनका लेगी आभार।
(39)
13.
सवा अगर गुजरे उ.फ्तदत व किश्वर-ए-दोस्त
बियार नफाह :-ए-अज़ गेसू-ए-मुअम्बर-ए-दोस्त
व जान-ए-ऊ कि बशुक्रानः जाँ बर अफ्शानम्
अगर ब सू-ए-मन आरी पयामे अज बर-ए-दोस्त
व गर चुनाँचि दरों हशरतत नवाशद बार
बराए दीदः बिआवर गुबारे अज दर-ए-दोस्त
मन गदा व तमन्ना-ए-वस्ल-ए-ऊ है हात
मगर बख्वाब बिबीनम जमाल-ओ-मंजरे -दोस्त
दिल-ए-सनोबरेम
हमचू बंद लनिस्त
ज़ हसत-ए-क़द-ओ-बाला-एचूँ-सनोवर-ए-दोस्त
अगरच: दोस्त ब चीज़ो नमी खिरद मारा
व आ'लमे न फ़रोशेम मू-ए-अज़ सर-ए-दोस्त
अ
द
चि बाशद अर शवद अज कैद-ए-ग़म दिल
चू हस्त हाफ़िज़-ए-मिस्की गुलाम-ओ-चाकर-ए-दोस्त
(40)
13.
अरी हवा जो जाओ होकर मेरे प्राण सखा के देश
उसके अम्बरवासित केशों की सुगन्ध तो ले आना।
अगर अनुग्रह करके मुझ तक ला दोगी उसका सन्देश
तो इस कारण, शपथ बन्धु की प्राण छिड़क दूंगा अपने।
अगर मीत को राज सभा के भीतर तुम न पहुँच पाओ
तो इन आँखों के अंजन को द्वार धूलि ही ले आना।
हूँ भिखमंगा, पर उससे मिलने की इच्छा, क्या कहना!
स्वप्न लोक में पाऊँ शायद प्राण सखा की रूप झलक।
चीड़ समान मीत के तन को पाने की अभिलाषा में
मेरा हृदय सनोबर देखो काँप रहा है बेंत समान।
किसी वस्तु के तुल्य न समझे बन्धु भले ही मेरा मूल्य
उसका एक केश भी दूंगा नहीं विश्व भर के बदले।
क्या होगा यदि दुख-कारा से हो ले मुक्त हृदय उसका
जबकि दीन हाफ़िज मितवा का बिना दाम का चाकर है।
(41)
14.
सुव्हदम मुर्ग-ए-चमन वा गुल-ए-नौ खास्तः गुप्त
नाज कम कुन कि दरों बाग बसे चूं तू शिगुफ़्त
गुल बिखंदीद कि अस रास्त न रंजेम वले
हेच आशिक सुखन-ए-तल्ख व मा'शूक न गुप्त
गर तम्अ' दारी अज़ ऑ जाम-ए-मुरस्सा मय-ए-ला'ल
दुर्र-ओ याकूत व नोक-ए-मिताअत बायद सुफ्त
दर गुलिस्तान-ए-इरम दोश चू अज़ लुत्फ़-ए-हवा
जुल्फ-ए-सम्बुल ज नसीम-ए-सहरी मी आशुफ़्त
गुप्तम अय मसनद-ए-जम जाम-ए-जहाँ बीनत कू
गुफ्त अफ़सोस कि आँ दौलत-ए-बेदार बिखुफ्त
सुख़न-ए-इश्क़ न आनस्त कि आयद बजुबाँ
साक़िया मय दह व कोताह कुन ई गुफ़्त-ओ-शनुफ़्त
अश्क-ए-हाफ़िज़ खिरद-ओ-सब्र ब दरिया अन्दाश्त
चि कुनद सोज़-ए-गम-ए-इश्क न आरस्त निहुफ्त
(42)
14.
अभी खिला जो फूल बाग में, बुलबुल यों बोली उससे,
इतना मत इतरा, तुम जैसे यहाँ अनेकों फूल खिले।
हंस कर बोला फूल कि सच का दुःख नहीं हमको लेकिन
ऐसी कड़वी बात प्रिया ने कभी किसी प्रिय को न कही।
अगर जड़ाऊ प्याले में तू चाहे अरुणासव पीना
तुझे पिरोने होंगे मानिक मुक्ता अपनी पलकों से।
पिछली रात इरम कानन में हुई पवन की जो क्रीड़ा
वही सुबह के झोंको से सहलाती सम्बुल की अलकें।
"ऐ जम के आसन, वह तेरा कहाँ विश्वदर्शी प्याला?'
'वह जाग्रत-ऐश्वर्य खो गया', बोला वह सखेद मुझसे।-
.
वाणी जिसको कहती फिरती वह तो नहीं प्रेम की बात,
कहना सुनना सीमित कर तू साक़ी मुझको मदिरा दे।
रख न सका मन में संवार कर प्रेम वेदना की ज्वाला
हाफ़िज़ ने तब धैर्य बुद्धि को अश्रु जलधि में बहा दिया।
(43)
15.
गुल दर बर व मय दर कफ व माशूक वकामस्त
सुल्तान-ए-जहानम व चुनीं रोश गुलामस्त
गो शम्अ' मयारद दरी वम कि इम्शय
दर मजलिस-ए-मा माह-ए-रुख-ए दोस्त तमामस्त
दर मजहब-ए-मा वादः हलालस्त व लेकिन
चे रुख-ए-तू अय सर्व-ए-गुल अंदाम हरामस्त
गोशम हमः वर कौल-ए-नै व नाम:-ए-चंग अस्त
चश्मम हमः वर लाल-ए-लव-ओ-गर्दिश-ए-जामस्त
दर मजलिस-ए-मा इंत मयामेश कि जो रा
हर लहजः गेसू-ए-तू खुशबू-ए-मशामस्त
अज चाश्नी-ए-कन्द मगो हेच व शकर
जाँ रौ कि मरा बा लब-ए-शीरीन-ए-तू कामस्त
अस नंगे चि गोई कि मरा नाम ज़ नंगस्त
वज नाम चि पुर्सी कि मरा नंग ल नामस्त
मयख्वारः व सरगश्तः व रिन्देम व नजरबाज
वा कस कि चू मा नेस्त दरी शहर कुदामस्त
बा मुह तसिवम ऐ 'ब मगोयद कि ऊ नेज
पैवस्त: चू मा दर तलब-ए-ऐ 'श-ए-मुदामस्त
ता गंज-ए-ग़मत दर दिल-ए-वीराना मु.कीमस्त
पैवस्तः मरा कुंज-ए-खराबात म.कामस्त
:
हाफ़िज़ मनशी बे मय-ओ-मा'शूक : जमाने
कि अय्याम-ए-गुल-ओ-यासमन व ईद-ए-सियामस्त
(44)
15.
जब फूलों का हार गले में, हाथों में मधु का प्याला,
मनवांछित प्रेयसी पास हो तो भूपति भी मेरा दास।
आज घोषणा करो कि कोई दीप न लाये महफिल में
प्रिय के पूर्ण चन्द्र मुख को छवि आज यहाँ पर छाई है।
मदिरा पीना विधि सम्मत है मेरे मजहब में लेकिन
तेरे बिना अधर्म वही बन जाता है ऐ गुल-वदनी।
मुरली की धुन और मृदंगम की ध्वनि को सुनते हैं कान
मैंडराती प्याली, अधरों की लाली पर अटकी है आँख।
आज हमारी इस मजलिस में इत छिड़कने का क्या काम
तेरे केशों की सुगन्ध से गमक रहे हैं मेरे प्राण।
चीनी और चासनी की बातों में क्या है धरा कहो
मेरा तो उद्देश्य, तुम्हारी अधर माधुरी को पाना।
अपमानों को क्या कहते हो, यही ख्याति के कारण हैं
और ख्याति का भी क्या कहना, उससे मैं अपमानित हूँ।
मैं तो मद्यप हूँ, सनकी हूँ, आँख लड़ाने वाला हूँ
लेकिन ऐसा कौन शहर में जो मुझ जैसा नहीं यहाँ।
धर्मादेशक के सम्मुख तुम करो न हम पर दोषारोप
वे भी तो हम जैसे, देखो खोज रहे हैं परमानन्द।
इस एकान्त हदय में जब से हुआ दुःखनिधियों का वास
तब से मधुशाला का प्रान्तर बना हुआ मेरा आवास।
समय गुलाब चमेली का है, आई है रोजों की ईद
ऐसे में तू मत रह हाफ़िज़ बिना प्रिया के, आसव के।
(45)
16.
दोश दीदम कि मलाइक दर-ए-मयख़ान: जदन्द
गिल-ए-आदम बि सिरिश्तंद व व पैमानः जदन्द
साकिनान-ए-हरम-ए-सिर-ए-अफ़ाफ़-ए-मलकूत
बा मन-ए-राह नशी बादः-ए मस्तान: ज़दन्द
आसमान बार-ए-अमानत न तवानस्त कशीद
कुर्रा'-ए-फ़ाल बनाम-ए-मन-ए-दीवान: जदन्द
मा बसद खिमन-ए-पिन्दार श रह चूंन रवेम
चूं रह-ए-आदम-ए-खाको बयक दानः जदन्द
आतिश ओं नेस्त कि बर शो'ल:-ए-ऊ खंदद शम्अ'
आतिश आनस्त कि दर खिमन-ए-पर्वानः शदन्द
जंग-ए-हप्ताद-ओ-दो व मिल्लत हमः रा उ बिनह
चूँ नदीदन्द हकीकत रह-ए-अफ़सानः जादन्द
शुक्र-ए-एजद कि मियान-ए-मन-ओ-ऊ सुलहफ़्ताद
हूरियाँ र.क्सकु ना सागर-ए-शुक्रानः जदन्द
कसबू हाफ़िज़ नकशीद अज रुख-ए-अंदेशा नकाब
ता सर-ए-जुल्फ़-ए-अरूसान-ए-सुखन शानः जदन्द
(46)
16.
मधुशाला में दस्तक देकर पिछली रात फरिश्तों ने
आदम की मिट्टी को मथ कर बना दिया रस का प्याला।
उस रहस्यमय देवलोक के महलों के बाशिन्दों ने
मुझ जैसे पथवासी जन को दिया मस्त मद का प्याला।
आसमान भी झेल न पाया बोझ, प्रेम की थाती का
पासा जब फेंका तो उसमें मुझ पगले का भाग्य जगा।
एक अन्न के दाने पर जब फिसल गए आदम के पैर
दंभों के खलिहान बीच रह कर हम क्यों न भटक जायें।
जिसको लौ पर इतराता है दीपक, वह तो आग नहीं
आग वही है जो पतंग के अन्तस्तल में जलती है।
सत्तर पर दो और बहत्तर जाति पाँति के झगड़े हैं,
और करें क्या, दूर सत्य से और रूढ़ि के जकड़े हैं।
सुलह हो गई मुझमें उसमें, धन्यवाद है ईश्वर का
इसी खुशी में मदिरा पीकर लगी नाचने अप्सरियाँ।
काव्य-सुन्दरी लगी संवरने जिस दिन से इस जगती में
हाफ़िज़ जैसा उठा न पाया कोई भी बूंघट उसका।
(47)
17.
दमे बा ग़म बसर बुर्दन जहाँ यकसर नमी अर्जद
ब मय बिफ़रोश दिलक़-ए-मा कज़ी बेहतर नमी अर्जद
व कू-ए-मय.फ़रोशानश ब जामे वर नमीगीरंद
ज़हे सज्जादः-ए-तक्वा कि यक सागर नमी अर्जद
शकोह-ए-ताज-ए-सुल्तानी कि बीम-ए-जाँ दरू दर्ज अस्त
कुलाहे दिलकशस्त अमा बदर्द-ए-सर नमी अर्जद
रक़ीवम सर जनशहा कर्द कज़ ई बाब सर बरताब
चि उफ़्ताद ई सर-ए-मारा कि ख़ाक-ए-दर नमी अर्जद
तुरा आँ बे कि रू-ए-ख़ुद ज मुश्ताक़ाँ बिपोशानी
कि सौदः-ए-जहाँदारी ग़म-ए-लश्कर नमी अर्जद
बिशौ ई नक्श-ए-दिलतंगी कि दर बाज़ार-ए-यक रंगी
ब ने 'मतहा-ए-गूनायूँ मय-ए-अहमर नमी अर्जद
दयार-ओ-यार मर्दुम रा मुक़य्यद मीकुनद वरन:
चि जा-ए-पारस कि ई मेह्नत जहाँ यकसर नमी अर्जद
बस आसाँ मीनमूद अव्वल ग़म-ए-दरिया ब बू-ए सूद
ग़लत गुफ़्तम कि हर मौजश बसद गौहर नमी अर्जद
बिरौ गंज-ए-कनाअ'त जू व कुंज-ए-आ'फ़ियत बिनशी
कि यकदम तंगदिल बूदन ब बहर-ओ-बर नमी अर्जद
चूहाफ़िज़ दर कनाअत कोश व अज दुनिया-ए-दूं बिगुजर
कि यक जौ मिन्नत-ए-दू ना बसदमन ज़र नमी अर्जद
(48)
17. सारी दुनिया की कीमत भी कर न सकेगी समता क्षण भर के दुख की मेरी कंथा बेच खरीदो मदिरा इससे बढ़ कर मूल्य नहीं इसका। लेता कोई नहीं एक प्याला भी देकर इसे हाट में मदिरा के वाह ! धन्य! संयम का चोला जिसकी कीमत नहीं एक प्याले की भी। सम्राटों के मुकुट रोब वाले हैं लेकिन उनमें प्राणों का भय है मन लुभावने हों किरीट लेकिन माथे की पीड़ा के वे कारण हैं। प्रतिद्वंद्वी ने मुझको यों धिक्कारा चल तू हटा द्वार से सिर अपना मेरे सिर को हुआ भला क्या जो कि द्वार की धूलि तलक के योग्य नहीं। तेरे लिए यही अच्छा है आसक्तों से अपना वदन छिपा लेना नृप होने का नशा भला पर आसक्तों की सेना तो दुखदाई है। अपने मन से. हीन भाव के दाग मिटा तू यह है एक रंग की हाट रंग-बिरंगी चीजों का तो यहाँ एक मधु का प्याला भी मूल्य नहीं। मुझको तो बस मातृभूमि के और मित्रजन के बन्धन ने बाँधा है और नहीं तो पारस की धरती तो क्या जग का प्रपंच बेकार मुझे। लाभ-गन्ध के कारण मुझको पहले तो आसान लगे सागर के कष्ट भूल हुई थी, एक लहर भी नहीं काम की सौ मोती के विनिमय में। जा तू खोज तोष की निधि को और शान्ति-सुख के कोने में रह निश्चिन्त क्षण भर भी लघुता में जीना उचित नहीं है पूरे जल थल के बदले। छोड़ो तुच्छ जगत की माया हाफ़िज़ की ही तरह करो संतोष सदा सौ मन सोना भी मिल जाये, थोड़ा भी अहसान दुष्ट का उचित नहीं। (49)
18.
दस्त अत तलव नदारमता काम ए-मन वर आयद
या जा रसद व जाना या जो रातन पर आयद
विकुशाये तुर्वतम रा वा'द अत वफात व विनिगर
कज़ आतिश-ए-दरुनम दूद अप कफ़न बर आयद
बिनुमाय रुख कि खल्के वाल: शवन्द व हैरा
विकुशाय लय कि फ़रियाद अल मर्द-ओ-ज़न यर आयद
जाँ वर लवस्त व हस्रत दर दिल कि अज़ लबानश
न गिरफ्त: हेच कामे व जाँ अल बदन वर आयद
गुफ्तम बखेश करवे बरगोर दिल दिलम गुफ्त
कार-ए-कसेस्त ई कू बा खेशतन बर आयद
हर यक शिकन ज जुल्फत पंजाह शस्त दारद्
यूँ ई दिल-ए-शिकस्तः वा औं शिकन बर आयद
..
बर बू-ए-आँ कि दर बाग़ आयद गुले चू रूयत
आमद नसीम व हरदम गिर्द-ए-चमन बर आयद
हरदम चू बेवफ़ायाँ न तवाँ गिरफ्त यारे
मायेम व आस्तानश ता जाँ जतन बर आयद
गोयन्द ज़िक्र-ए-खैरश दर खैल-ए-इश्क बाजां
हर जा कि नाम-ए-हाफ़िज़ दर अंजुमन बर आयद
(50)
18.
जब तक ईप्सित नहीं मिलेगा, नहीं तनँगा अभिलाषा
या तो प्रियतम तक पहुंचेंगे या निकलेंगे मेरे प्राण!
मरने के उपरान्त खोद कर कब्र देखना मेरी
मेरे अन्तस् की ज्वाला से कफन धुआँता होगा।
अपना मुख दिखला कि विश्व हो जाये चकित और तल्लीन
खोलो अधर कि जन-जन के मुख खुलें प्रार्थना के स्वर में।
हो न सका गठ बन्ध कामना का उनके अधरों से
और इधर ये प्राण पखेरू मचल उठे उड़ने को।
मैंने खुद से कहा कि प्यारे उससे अपना मन फेरो
मन बोला, यह वह कर सकता खुद जो अपने वश में है।
एक-एक लट में अनेक बल, अजब तुम्हारा जाल
मेरा टूटा हुआ हृदय फिर क्यों कर निकले इससे !
तेरे चेहरे जैसा सुन्दर-सुरभित कोई फूल खिले,
इस आशा में हवा लगाती पल-पल उपवन के फेरे।
हम तो उसकी ड्योढ़ी पर हैं जब तक तन में प्राण
मिल बदलते रहना, यह तो व्यभिचारी का काम।
जब भी जहाँ कहीं मजलिस में आता है हाफ़िज़ का नाम
उसकी गणना होती केवल अमर प्रेमियों के दल में।
(51)
19.
जाहिद-ए-खल्वत नशों दोश व मयखान: शुद
अज सर-ए-पैमाँ गुज़श्त बर सर-ए-पैमानः शुद
शाहिद-ए-अ'ह्द-ए-शवाव आमद: बूदश ब ख्वाव
बाज व पीरानः सर आ'शिक-ओ-दीवान: शुद
मुगबच्च: मी गुलश्त राहजन-ए-अ'क्ल-ओ-दी
दर पये आँ आश्ना अज हमः बेगानः शुद
..
आतिश-ए-रुखमार-ए-गुल खिमन-ए-बुलबुल चि सोख्त
चेहर:-ए-खंदान-ए-शम्अ' आफ़त-ए-पर्वानः शुद
सूफ़ी-ए-मग्लिस कि दी जाम-ओ-क़दह भी शिकस्त
दोश बयक जुआ'-ए-मय आ'किल-ओ-फ़र्जानः शुद
नर्गिस-ए-सा.की विख्वानद आयत-ए-अफ्सूगरी
हल्क:-ए-औराद-ए-मा गर्दिश-ए-पैमानः शुद
मंजिल-ए-हाफ़िज़ कनें बारगह-ए-किब्रियास्त
दिलबर-ए-दिलदार रफ़्त जो बर-ए-जानान: शुद
(52)
19.
मधुशाला में हुआ उपस्थित वनवासी तापस कल रात
तोड़ दिये संकल्प और यों प्याले के तट पर आया।
युवा काल का मनभाया जब उसके सपने में आया
तो फिर बढ़ी उमर में भी वह बना प्रेम का दीवाना।
बुद्धि-धर्म पर डाका डाले चलता था जब नवल किशोर
झुक जाते थे सभी अपरिचित उस परिचित के चरणों पर।
कुसुम कपोलों की ज्वाला से बुलबुल का खलिहान जला,
बन बैठा पतंग का संकट दीपक का हँसता चेहरा।
अब तक तोड़ चुका जो सूफी प्याले और सुराही को
वही घूट भर मदिरा पी कल रात हो गया चतुर सुजान।
साक़ी के मद भरे नयन यों पढ़ते हैं जादू के मंत्र
प्याले की गति पर चलते हैं धर्म कर्म के सभी नियम।
अब तो हाफ़िज़ का पड़ाव है केवल ईश्वर का दरबार
हृदय गया अब हृदयेश्वर को, प्राण गये प्राणेश्वर पास।
(53)
20.
सालहा दिल तलय-ए-जाम-ए-जम अज मा मीकर्द
आँचि खुद दाश्त पा वेगान: तमत्रा मोकर्द
गौहरे कज़ सदफ़-ए-कौन-ओ-मका बैरून चूद
हलय अज्ञ गुमशुदगान-ए-लय-ए-दरिया मीकर्द
मुश्किल-ए-खेश बर पीर-ए-मुगा बुर्दम दोश
कूब ताईद-ए-नजर-हल्ल-ए-मुअम्मा मोकर्द
दीदमश खुर्रम-ओ-खंदा कदह-ए-वादः बदस्त
व अंदरा आईनः सदगून: तमाशा मीकर्द
गुप्तम ई जाम-ए-जहाँ बी बतू के दाद हकीम
गुफ्त ऑ रोज कि ई गुम्बद-ए-मीना मीकर्द
फैज़-ए-रुहुलकुद्स अर बाज़ मदद फ़रमायद
दीगरौं हम बिकु नन्द आँचि मसीहा मीकर्द
गुफ्त आँ यार कजू गश्त सर-ए-दार बलन्द
जुर्मश आँ बूद कि असार हुवैदा भीकर्द
आँ हमः शो'वदः हा अक्ल कि मीकर्द आँजा
सामरी पेश-ए-अ'सा-ओ यद-ए-बैजा मीकर्द
गुप्तमश सिलसिला-ए-जुल्फ-ए-बुता दानी चोस्त
गुफ्त हाफ़िज़ गिल: अज़ शब-ए-यल्दा मीकर्द
(54)
20.
वर्षों से अभिलाषा मन की 'जम' का प्याला पाने की
दर-दर मांग रहा क्या पगले वह तो पास तुम्हारे है।
देश-काल की सीपी के जो बाहर है, उस मोती को
तट पर बैठा चाह रहा तू उनसे, जो खुद भरमे हैं।
कल जब अपनी उलझन लेकर पीरे मुगाँ के पास गया
एक नजर क्या देखा उसने, सुलझ गये सब उलझे तार।
लिये हाथ में मधु का प्याला, मुख पर हँसी और उल्लास
विविध रंग में परम सत्य को देख रहा वह दर्पण में।
मैंने पूछा, 'यह सबदरसी प्याला तूने कब पाया?'
कहा देव ने,'उस दिन, जिस दिन नील गगन था रचा गया।'
.
एक बार उस कारुणीक की कृपा दृष्टि जो मिल जाये
तो फिर कोई भी कर लेगा ईसा जो कर गये यहाँ।
मृत्यु वरण कर बढ़ा दिया था जिसने शूली का गौरव
छिपा रहस्य बताया उसने, यह उसका अपराध हुआ।
.
विफल सामरी के जादू सब जैसे मूसा के सम्मुख
उसी तरह यह बुद्धि यहाँ पर अपना कौशल दिखलाती।
मैंने
पूछा, 'बता भला ये केशों की लड़ायाँ क्या हैं?'
'यह तो उपालंभ है हाफ़िज़ अमानिशा के नाम यहाँ।'
(55)
21.
साकी हदीस-ए-सर्व-ओ-गुल-ओ-ला'ल: मौरवद
वों बहस या सलास: गस्साल: मीरवद
मय दह कि नौ अरुस-ए-चमन हद्द-ए-हुस्न याप्त
कार-ए-ई जमा त सन 'त-ए-दलाल: मीरवद
शकर शिकन शवन्द हमः तूतीयान-ए-हिन्द
जी कन्द-ए-पारसी कि ब चंगाल: मीरवद
तय-ए-मको विधी व जमाँ दर सलूक-ए-शेर
कि ई तिफ्ल-ए-यकशब: रह-ए-यकसाल: मोरवद
बाद-ए-बहार मीवराद अज़ बुस्तान-ए-शाह
वजा जाल: बादः दर कदह-ए-लाल: मीरवद
आँ चश्म-ए-जादुआन: आबिद फ़रेब बीं
कश काबनि-ए-सहर बदुम्बाल: मीरवद
खीं करदः खिरामद ओ बर आ'रिज-ए-समन
अज़ शर्म-ए-रू-ए-ऊ अर्क अज़ जाल: मीरवद
एमन मशव ज ३'श्व:-ए-दुनिया कि ई अजून
मकार; मीनशीनद व मुह तालः मीरवद
चूं सामरी मबाश कि तर दाद अल खरे
मूसा बिहुस्त व अज़ पय-ए-गोसाला मीरवद
हाफ़िज़ ज शौक़-ए-मज्लिस-ए-सुल्तां गयास-उद्-दोन
खामश मशव कि कार-ए-तू-अज़ नाल: मीरवद
(56)
21.
साक़ी सुनो, चल रही है यह सरौ, गुलौ, लाला की बात
यह आलाप हो रहा तीनों स्नान सेविकाओं के साथ।
मदिरा दे कि रूप की हद हो गई बाग की दुलहन में
ऐसे समय कुशल बिचबोलों से ही काम निकलता है।
पारस की यह. मीठी मिसरी जाती है देखो बंगाल
इससे भारत के सब तोते हो जायेंगे शक्करखोर।
देश-काल का अतिक्रमण करती कविता को गति देखो
एक रात का शिशु चलता ज्यों एक साल के रस्ते पर।
राजा की बगिया से होकर हवा चल रही वासन्ती
और ओस से मदिरा भरती रक्त कुसुम के प्याले में।
अनासक्त जन को भटकाती वे जादूगरनी आँखें
उनके पीछे-पीछे देखो चलती टोने की टोली।
श्रमकण से भीगा वह चलता है तो उसके मुख की लाज
देख, चमेली के गालों पर ओस बिन्दु बन जाता श्वेद।
इस दुनिया के हाव भाव से कहीं न हो जाना आश्वस्त
यह बुढ़िया छल भरी यहाँ पर नित्य बहाने करती है।
मत बन तू सामरी कि जिसने छोड़ा स्वर्ण गधा लेकर
मूसा को तज भ्रमा किया जो बछड़े के पीछे पीछे।
नृपति गयासुद्दीन सभा का जो पूरा करना है शौक
तो फिर चुप मत रह तू हाफ़िज, रुदन करेगा तुझे सकाम।
(57)
22.
इश्क़-ए-तू निहाल-ए-हैरत आमद
वस्ल-ए-तू कमाल-ए-हैरत आमद
बस गर्क-ए-हाल-ए-वस्ल कि आखिर
हम वा सर-ए-हाले हैरत आमद
न वस्ल विमानद वन वासिल
आं जा कि ख़याल-ए-हैरत आमद
अरा हर तरफ़े कि गोश कर्दम
आवाज़-ए-सवाल-ए-हैरत आमद
आं दिल बिनुमा कि दर रह-ए-क
बर चेहरः न खाल-ए-हैरत आमद
शुद मुहतरम अज कमाल-ए-इज्जत
आँ जा कि जलाल-ए--
1-ए-हैरत आमद
सर ता कदम वजूद-ए-हाफ़िज़ा
दर इश्क निहाल-ए-हैरत आमद
(58)
22.
तेरा प्रेम हुआ है अद्भुत का पौधा,
तेरा मिलन अचंभे को परिसीमा है।
मिलन समाधि लीन जो जन बहुतेरे हैं
हैं वे भी आश्चर्यचकित इस हालत में।
वहाँ न होगा मिलन न तो मिलने वाले
आयेगा जब जहाँ कहीं अद्भुत का ध्यान।
जहाँ जिधर भी कान लगाया सुनने को
केवल अद्भुत के प्रश्रों की ध्वनि आई।
उसके पथ पर कोई हदय बताओ तो
जिसके मुख पर लगा न हो तिल अद्भुत का।
हुआ चरम उत्कर्ष मान-मर्यादा का
जहाँ जिधर भी पहुँचा अद्भुत का आलोक।
चोटी से एड़ी तक हाफ़िज़ का अस्तित्व
प्रेम मग्न हो निकला अद्भुत का पौधा।
(59)
23.
गुलाम-ए-नर्गिस-ए-मस्त-ए-तू ताजदारानन्द
खराब-ए-बादः-ए-ला'ल-ए-तू हुशियारानन्द
तुरा हया व मरा आब-ए-दीदा शुद ग़म्माजा
वगरन : आ'शिक-ओ-मा'शूक राजदारानन्द
ब जेर-ए-जुल्फ़-ए-दोता चूं गुजर कुनी बिनिगर
कि अज यमीन-ओ-यसारत चि बेक़रारानन्द
नसीब-ए-मास्त बिहिश्त अय खुदा शनास बिरौ
कि मुस्तह क-ए-करामत गुनाह गारानन्द
न मन बराँ गुल-ए-आरिज़ ग़ज़ल सरायेम व बस
कि अन्दलीब-ए-तू अज हर तरफ़ हजारानन्द
तू दस्तगीर शव अय ख़िज-ए-पय ख़जस्तः कि मन
पियादा मीरवम व हमरहाँ सवारानन्द
बिआ ब मयकदः व चेह :: अर्गवानी कुन
मरौ ब सूमिआ' कि आँजा सियाहकारानन्द
खलास-ए-हाफ़िज़ अज़ाँ जुल्फ-ए-ताबदार मबाद
कि बस्तगान-ए-कमन्द-ए-तू रुस्तगारानन्द
(60)
23.
जो तेरी मादक आँखों के दास वही सच्चे सम्राट
जो तेरो रक्तिम मदिरा के पागल वे हो चतुर सुजान।
लाज तुम्हारी आँसू मेरे चुगलखोर निकले देखो
और नहीं तो कैसे खुलते राज़ प्रिया के प्रेमी के।
तेरी सघन लटों के बन्दी इधर उधर जो पड़े हुए
उनकी व्यथा देखते जाना, जब तुम इस पथ से गुजरो।
अरे पुजारी, भाग, स्वर्ग पर केवल स्वत्व हमारा है
ईश-कृपा के वे अधिकारी जो हैं पतित, अपावन हैं।
तेरे कुसुम-कपोलों का बस मैं ही नहीं एक स्वरकार
दिशा-दिशा अनगिनत बुलबुलें लगी हुई स्तुति में सोच्चार।
पथ दर्शक शुभ चरण खिन तू जरा थाम ले मेरा हाथ
सहयाती तो घुड़सवार हैं, मैं ही केवल पैदल हूँ।
.
मधुशाला में आ अपने चेहरे को कर मदिरा से लाल
पूजा घर मत जा कि वहाँ हैं काली करतूतों वाले।
कभी न छूटे बन्धन, हाफ़िज़ का धुंघराली अलकों से
हैं सच्चे स्वाधीन यहाँ पर जो जो तेरे बन्दी हैं।
भी जुबली नागरी लण्या
24. कनूं कि दर चमन आमद गुल अज़ अ'दम ववुजूद बन.पशः दर कदम-ए-ऊ निहाद सर व सुजूद बिनोश जाम- -ए-सुव्ही व नाल:-ए-दफ़-ओ-चंग विवोस सवाब-ए-साक़ी व नामः-ए-नै-ओ-ऊ'द व बाग तालः कुन आईन-ए-दीन-ए-शरदुश्ती कनूं कि लालः बर अफ्रोख्त आतिश-ए-नुमूद ज दस्त-ए-शाहिद-ए-सीमों इ'ज़ार ई'सा दम शराब नोश व रिहा कुन हदीस-ए-आ'द-ओ सुमूद जहाँ चू खुल्द-ए-बरौं शुद बदौर-ए-सोसन-ओ-गुल वले चि सूद कि दर वे न मुमकिनस्त खुलूद शुद अज फ़रोग़-ए-रियाही चू आस्माँ गुलशन ज युमन-ए-अख़्तर-ए-मैमून व ताले 'मस्ऊ'द चू गुल सवार शुद बर हवा सुलेमाँवार सहरगह मुर्ग दर आयद व नग्म:-ए-दाऊद ब दौर-ए-गुल मनशीं बे शराब-ओ-शाहिद-ओ-चंग कि हमचू दौर-ए-बका हफ़्त: बूद मा 'दूद बियार जाम-ए-लबालब ब याद-ए-आसिफ-ए-अद ब शेर-ए-मुल्क-ए-सुलेमाँ इमादुद्दीन महमूद बूद कि मजलिस-ए-हाफ़िजा ब एमुने तर्बियश हर आँचि मीतलबद जुम्ल: बाशदश मौजूद (62) 24. कानन में साकार हो गया जब अमूर्त जग का यह फूल हुई प्रार्थना निरत बनाफ्शा सिर रख उसके चरणों पर। आ कि भोरिया प्याला पी तू डफ-मृदंग की तालों पर वेणु और तंती की लय पर चूम चिबुक मधुबाला का। उपवन में पारसी धर्म के नियमों को फिर करो नवीन रक्त कुसुम ने खिल, नमूद-अग्नि को प्रकट किया अब तो। जिसके गोरे गाल रजत से, जीवन प्रद ईसा सी साँस उस प्रिय के कर से मदिरा पी, आद-समूद कथा को छोड़! सोसन और गुलाबों की मधु ऋतु में स्वर्ग हुआ संसार किन्तु भला क्या लाभ कि जब संभव न हुआ अमरत्व यहाँ। आसमान सी हुई वाटिका गमकीली हरियाली से हुआ आगमन शुभ तारे का, जागा जीवन का सौभाग्य। सुलेमान की तरह फूल जब पवन-अश्व पर हुआ सवार गाने लगे विहग प्रात: यों जैसे दाऊदी संगीत। मधु ऋतु में मत रहो, सुरा, सुन्दरी और संगीत बिना जीवन की ही तरह स्वल्प है अवधि यहाँ इन घड़ियों की। है आसिफ, महमूद इमादुद्दीन आज का, देश-अमात्य- सुलेमान का, उसको स्मृति में भरा लबालब प्याला ला। उसकी छत छोह में शायद हो हाफ़िज़ की महफिल में वे सारी वस्तुएँ उपस्थित, इच्छा जिनकी मन में है। (63)
25.
गु.फ्तम के म दहान-ओ-लयत कामरा कुनन्द
गुफ्ता व चश्म हर चि तू गोई हमाँ कुनन्द
गुफ़्तम खिराज-ए-मिस्र तलब मी कुनद लयत
गुफ्ता दरों मुआ'मल: कमतर जियाँ कु नन्द
गुफ्तम ब नुक्त:-ए-दहनत खुद कि बुर्द राह
गुफ्ता ई हिकायतेस्त कि या नुक्तः दाँ कु नन्द
गुफ्तम सनम परस्त मशव बा समदनशीं
गुफ्ता व कू-ए-इश्क हम ईन-ओ-हम आँ कुनन्द
गुफ्तम हवा-ए-मयकद: ग़म मीबुर्द दिल
गुफ्ता खुश आँ कशा कि दिले शादमा कुनन्द
:
गुफ्तम शराब-ओ-ख़िर्क : न आईन-ए-मजहबस्त
गुप्त ई अमल ब मज्हब-ए-पीर-ए-मुगाँ कुनन्द
गुफ्तम ज़ ला'ल-ए-नोश लबा पीर रा चि सूद
गु.फ्ता ब बोस:-ए-शक्करीनश जवाँ कुनन्द
गुफ्तम कि ख्वाजः के बसर-ए-हजल: मीरवद
गुफ़्त आँ ज़माँ कि गुश्तरी-ओ-महकिराँ कुनन्द
गुफ़्तम दुआ'-ए-दौलत-ए-तू विर्द-ए-हाफ़िज़स्त
गुफ्त ई दुआ' मलाइक-ए-हफ़्त आस्मा कुनन्द
(64)
25.
मैंने पूछा, सफल करेंगे कब तेरे मुख-अधर मुझे
वह बोला, वे वही करेंगे जो कुछ तू फरमायेगा।
मैं बोला, उपहार चाहते मिश्र देश ये तेरे होंठ
उसने कहा कि इसमें तो थोड़े ही होंगे घाटे में।
मैंने पूछा, तेरे मुख की बिन्दु राह किसने पाई
उसने कहा कि ये बातें तो मर्मज्ञों से होती हैं।
मैं बोला, मत बनो मूर्ति पूजक, बैठो ईश्वर के पास
उसने कहा, प्रेम पथ में तो यह भी वह भी चलता है।
मैंने कहा, चाह मधुशाला की मन के दुख हरती है
वह बोला, वे कितने अच्छे जो मन को खुश करते हैं।
मैं बोला, मदिरा पाटम्बर का मजहब में मेल नहीं
उसने कहा कि पीरे मुगाँ के मजहब में यह चलता है।
मैंने कहा, वृद्ध को तेरे मधुर अधर से क्या मिलना
वह बोला, मधु चुम्बन से बूढ़े जवान हो जाते हैं।
मैंने पूछा, राजन तू कब दुल्हन के घर जायेगा
वह बोला, जब चन्द्रकला से सुर गुरु का होगा संयोग।
मैंने कहा, तुम्हारी दौलत का हाफ़िज़ शुभकामी है
वह बोला, यह दुआ सप्त अम्बर के सुर गण करते हैं।
(65)
26.
गौहर-ए-महान-ए-असार हमानस्त कि चूद
हुक:-ए-मेहर चदा मुह-ओ-निशानस्त कि चूद
अज सवा पुर्स कि मारा हमः शव ता दम-ए-सुव्ह
बू-ए-जुल्फ़-ए-तू हमाँ भूनिस-ए-जानस्त कि बूद
तालिव-ए-लाल-ओ-गुहर नेस्त वगनः खुर्शीद
हम चुना दर अमल-ए-मादन-ओ कानस्त कि चूद
रंग-ए-खून-ए-दिल-ए-मारा कि निहाँ कर्द खतत
हम चुना अज लब-ए-लाल-ए-तू अयानस्त कि बूद
आ'शिका महरम-ए-असार-ए-अमानत वाशन्द
लाजरम चश्म-ए-गुहर बार हमारस्त कि बूद
कुश्तः-ए-गम्ज:-ए-खुद रा बजियारत मी आई
ज़आँ कि बेचारः हमाँ दिल निगरानस्त कि बूद
जुल्फ़-ए-हिन्दू-ए-तू गुप्तमकिदिगर रह नजनद
सालहा रफ्त व बदाँ सोरत-ओ-शानस्त कि बूद
हाफ़िज़ बाल नुमा किस्स:-ए-खूनाब:-ए-चश्म
कि दरी चश्मः हमाँ आब रवानस्त कि बूद
(66)
26.
देख रहस्य कोश का मोती वैसा ही है जैसा था
मुद्रा युक्त प्रेम मंजूषा वैसी ही है जैसी थी।
निशारंभ से भोर तलक तेरे केशों की मधुर सुगन्ध
पूछ पवन से, मेरे मन यों बसी कि जैसे पहले थी।
,
मणि मानिक मुक्ता के सन्धानी ही नहीं रहे वरना
कर्मनिरत सूरज खानों में वैसा ही है जैसा था।
आवृत जो तेरे रोमों से मेरे हृदय रक्त का रंग
तेरे अधर-लाल से वह यों प्रकट कि जैसे पहले था।
प्रेमी जन तो गोपन रखने वाले हैं थाती का मर्म
पर मोती ढलकाने वाली आँखें वैसी ही, ज्यों थीं।
निज कटाक्ष से मारा, उसकी पूछताछ करने तू आ
क्योंकि बिचारा हृदय प्रतीक्षा में वैसा ही, जैसा था।
सोचा, तेरी कुटिल अलक अब और न डाका डालेगी
वर्षों गये, स्वभाव-गर्व पर वही रहा जो पहले था।
हाफ़िज़ पुनः दिखा आँखों का रक्त बहाने वाला दृश्य
क्योंकि आँख में जल प्रवाह अब भी वैसा ज्यों पहले था।
(67)
27.
गर जुल्फ-ए-परीशानत दर दस्त-ए-सबा उफ़्तद
हर जा कि दिले बाशद बरवाद-ए-हवा उ.मतद
मा किश्ती-ए-सन्न-ए-ख़ुद दर बह्र-ए-गम अफ़गंदेम
ता आखिर अजी तूफ़ाँ हर तख्तः कुजः उ.फ्तद
हर कस ब तमन्ना-ए-फ़ाल अज रुख-ए-ऊ गीरद
त.ख्त:-ए-फीरोजी करा उ.फ्तद
आँ बादः कि दिलहारा अल ग़म दहद आजादी
पुर खून-ए-जिगर गर्दद ता जाम ब मा उ.फ्तद
गर जुल्फ़-ए-सियाहतरा मन मुश्क-ए-खुतन गुफ्तम
दर ताब मशौ जाना दर गुफ्तः सता उ.फ्तद
हाल-ए-दिल-ए-हाफिज शुद अज दस्त-ए-गम-ए-हिज्रत
चूँ आशिक़-ए-सरगर्दा का दोस्त जुदा उ.माद
(68)
27.
अगर विथुरे तुम्हारे केश लग जाएँ हवा के हाथ
जहाँ भी है हृदय, हो जाय वह तो हवा में बरबाद।
व्यथा के सिन्धु में मैंने बहा दी धैर्य की नैया
कि देखू आँधियों में पटरियाँ इसकी कहाँ पहुँचे।
सुमुख की चाह में हर एक करता भाग्य की गणना
विजय के तख्त पर देखें गिरे किस सुभग का पासा!
.
हृदय दुख मुक्त जो करती, जिगर के लहू से भरती
वही मदिरा कि जब प्याला हमारे पास आता है।
अगर मैंने तुम्हारे केश को कह दिया कस्तूरी
न कर तू रोप प्यारे, हो गई कुछ भूल कहने में।
तुम्हारे विरह-दुख के हाथ हाफ़िज़ का हुआ यों हाल
बिछुड़ प्रिय से कि कोई सिरफिरा हो जाय ज्यों बेहाल।
Hal
(69)
28.
मुज्दः अय दिल कि मसीहा नफसे मीआयद
किज अनफ़ास-ए-खुशश बू-ए-कसे मीआयद
अज ग़म-ओ-दर्द मकुन नाल:-ओ-फ़रियाद कि दोश
जादः अम फाले व फ़रियाद रसे मीआयद
ज़ आतिश-ए-वादी-ए-ऐमन न मनम खुर्रम व बस
मूसा ईजा ब उम्मीद-ए-कबसे मी आयद
हेचकस नेस्त कि दर कू-ए-त् अश कारे नेस्त
हर कस ईजा बा उम्मीद-ए-हवसे मी आयद
ख़बरम नेस्त कि मंजिलगह-ए-मकसूद कुजास्त
ई क़दर हस्त कि बांग-ए-जरसे मी आयद
जुरआ'दह कि बमयखान:-ए-अर्बाब-ए-करम
हर हरी.फे ज पय-ए-मुल्तमिसे मी आयद
खबर-ए-बुलबुल-ए-ई बाग मपुर्सीद कि मन
नाल: मीशनूम कज़ कफ़से मी आयद
दोस्त रा गर सर-ए-पुर्सीदन-ए-बीमार-ए-ग़मस्त
गो बिया खुश कि हनोज़श नफ़से मी आयद
थार दारद सर-ए-सैद-ए-दिल-ए-हाफ़िज़ यारा
शाह बारो बशिकार-ए-मगसे मी आयद
(70)
28.
खुशखबरी है मन, कि आ रहा ईसा सी साँसों वाला
उसकी मधुमय निश्वासों से गन्ध किसी की आती है।
रुदन और फरियाद न कर तू व्यथा-वेदना के कारण
फलादेश देखा यों कल, दुख हर्ता आने वाला है।
ऐमन घाटी के प्रकाश से मैं ही केवल मुदित नहीं
यहाँ अग्निकण को आशा में मूसा भी आया करते।
ऐसा कोई नहीं जिसे तेरे पथ से हो नहीं लगाव
किसी कामना की आशा में आता है हर व्यक्ति यहाँ।
कुछ भी ज्ञात नहीं है मुझको अभिलापा का कहाँ पड़ाव
ऐसी है कुछ बात कि आती रहती घंटे की आवाज ।
एक घुट दे क्योंकि यहाँ इस दाता की मधुशाला में
आता है हर एक बन्धु अपने मन में लेकर आशा ।
इस बगिया की बुलबुल की कैसी है हालत, मत पूछो
क्योंकि सुन रहा हूँ मैं रोदन जो कि पोंजड़े से आता!
अगर दोस्त की मंसा, दुख-पीड़ित का हाल पूछने की
तो कह दो कि खुशी से आये, साँस अभी तक चलती है।
हाफ़िज़ के दिल के शिकार का अभिप्राय है प्रियतम का!
मक्खी के शिकार को मिलो, शाही बाज आ रहा है!
(71)
29.
दीगर श शाख़-ए-सर्व-ए-सही बुलबुल-ए-सबूर
गुलबाग जद कि चश्म-ए-बद अल रू-ए-गुल बदूर
अय गुल बशुक्र-ए-आं कि शिगुफ़्ती बकाम-ए-दिल
बा चुलबुलान-ए-बेदिल-ए शैदा मकुन सरूर
अन दस्त-ए-ौबत-ए-तू शिकायत नमीकु नम
ता नेस्त शैवते नदहद लजत-ए-हजूर
गर दीगरों व ऐश-ओ-तरब खुर्रमन्द-ओ-शाद
मारा ग़म-ए-निगार यूद पाया-ए-सुरूर
जाहिद अगर ब हूर-ओ-कुसूरस्त उम्मीदवार
मारा शराबखाना कुसूरत व यार हूर
मय खुर व बांग-ए-चंग-ओ-मखुर गुस्सः वर कसे
गोयद तुरा कि बादः मखुर गो हू-उल-गफूर
हाफ़िज़ शिकायत अज गम-ए-हिना चि मी कुनी
दर हिज़ वस्ल बाशद-ओ-दर जुल्मतस्त नूर
(72)
29.
वन झाऊ की डाली से फिर आई वुलबुल को आवाज
बुरी नजर से दूर रखे ईश्वर गुलाब के मुखड़े को।
मनचाहा तू खिला पुष्प तो यह कृतज्ञता को है बात
पर इस कारण इतरा मत प्रेमाकुल बुलबुल के सम्मुख।
तू जो कहता है अदृश्य तो इसको नहीं शिकायत है
जब वियोग ही नहीं हुआ तो मिलने में फिर क्या आनन्द।
यदि औरों ने सुख-साधन के कारण पाई हँसी-खुशी
हमने प्राण-प्रिया के दुख की तन्मयता की निधि पाई।
अगर स्वर्ग की परियों का, मधुशाला का अभिलाषी भक्त
तो मेरी प्रियतमा परी है, मदशाला ही मधुशाला।
गुस्सा मत कर और पिये जा मदिरा तू डंके की चोट
कोई मना करे तो कहना क्षमाशील वह मालिक है।
विरह वेदना को तू हाफ़िज़ क्यों उलाहने देता है
रहता मिलन विरह के अन्दर अन्धकार में ज्यों आलोक।
(73)
30.
खुशा शीरात-ओ-वजुअ'-ए-वेमीसालश
खुदा वन्दा निगह दार अस वालश
जा रुक्नाबाद-ए-मा सद लौहश उल्लाह
कि उ'म-ए-ख़िज़ मीवाद जुलालश
मियान-ए-जा'फराबाद-ओ-मुसल्ल
अ'बीर
आमेज मीआयद शुमालश
ब शीरात आई व फ़ैज़-ए-रूह-ए-कुद्स
ब ख़्वाह अज मर्दुम-ए-साहिब कमालश
कि नाम-ए-कन्द-ए-मिस्री बुर्द आँजा
कि शीरीना नदादन्द
इन्फआ'लश
सबा ज़आँ लूली-ए-शंगूल-ए-सर मस्त
चि दारी आगही चूनस्त
हालश
मकुन बेदार अज़ ई ख़्वाबम ख़ुदारा
कि दारम इश्रत-ए-खुश बाख़यालश
गर आँ शीरी पिसर खूनम बिरे जद
दिला चूँ शीर-ए-मादर कुन हलालश
चिरा हाफ़िज़ चू मीतर सीदी अज हि ज़
न की शुक्र-ए-अय्याम-ए-विसालश
(74)
30.
प्यारा है शीराज, यहाँ की वास्तुकला भी अनुपम
नष्ट न होने पाये भगवन, इनकी रक्षा करना।
रुक्माबाद नहर चिरजीवी होवे ईश कृपा से
उसका पावन नीर खिज्र का जीवन देने वाला।
अहा जाफराबाद-मुसल्ला कानन बीच विहरती
मृगमद की मादक सुगन्ध से भरी हवा उत्तर की।
इस शीराज नगर में आकर कलाविदों संग बैठो
मनवांछा जिबील संग की कर लो यों तुम पूरी।
कौन भला, जिसको न लजाये मधुर-अधर बालाएँ
मिस्त्र देश की मिसरी का जिसने बस नाम लिया हो।
वह जो मद से भरी चंचला मधुर स्वरों की गायक
तुझे पता क्या पवन, बता तो कैसी उसकी हालत?
ईश्वर की खातिर मुझको तू जगा
उसके ध्यान लग्न मेरा मन डूबा सुख-सागर में।
इस सपने से
ऐ मन, यदि मधुमय किशोर वह लहू बहाये मेरा
माँ के दूध समान इसे तू पावन धर्म समझना।
इस वियोग से प्यारे हाफ़िज़ क्यों तू है भयभीत
उन संयोग दिनों का तूने कब माना आभार।
(75)
31.
हाति.फे अन गोश:-ए-मय.खानः दोश
गु.फ्त वि यस्शन्द गुनह मय विनोश
ई खिरद-ए-खाम घ मयखान: बर
ता मय-ए-ला'ल आवर्दश खूब जोश
अ'फ़्व-ए-खुदः बेशतर अल जुर्म-ए-मास्त
नुक्त:-ए-सरवस्तः चि गोई खमोश
गर चः विसालशन व कोशिश दहन्द
हर कदर अय दिल कि तवानी चिकोश
गोश-ए-मन-ओ-हल्क:-ए-गेसू-ए-यार
रू-ए-मन-ओ-खाक-ए-दर-ए मयफ़रोश
रिन्दी-ए-हाफ़िज़ न गुनाहे स्त सा'ब
करम-ए-बादशाह-ए-ऐ'ब पोश
(76)
31.
देवदूत बोला यों कल मधुशाला के कोने से
वह अपराध क्षमा कर देता है, तुम मदिरा पीओ।
अपनी इस कमजोर समझ को ले चल मधुशाला में
नया जोश भर देगी इसके रक्तकणों में मदिरा।
प्रभु की क्षमाशीलता मेरे अपराधों से बढ़ कर
चुप रह, फिर क्यों बता रहा तू गोपन बात हमारी।
यद्यपि कोशिश करके उसका मिलन नहीं होता है
फिर भी ऐ मेरे मन, सब विधि करता रह तू उद्यम।
मेरे कान और प्रियतम की अलकों की जंजीर
मेरा मुख औ' मधुवितरक के दरवाजे की धूल।
हाफ़िज़ का मधुपान नहीं है बहुत बड़ा अपराध
दोष पराये ढकने वाले नृप की परम कृपा से।
(77)
32.
सवाद-ए-दीदः-ए-मन शुद त आव-ए-चश्म बयाज
हनोज चन्द निगारा ज मन कु नी ए'राज
बिया कनार बिगीरेम व आश्ती बिकु नेम
गुजश्तः याद चि आरी मजा मला मामाज
चि तेजीस्त बमिज़गान-ए-चश्म:-ए-ऊ यारब
बुरीद जामः-ए-तचा बग़म्नः यूँ मिळाज़
चूअ'क्स-ए-जुल्फ-ओ-रुखत दर मियान-ए-चश्म उप्ताद
गिर.फ्त दीद:-ए-मर्दुम अजों सवाद-ओ-बयाज़
गजल ब काफ़िय:-ए-ज़ाद नायद अय हाफिज
मगर हम अज तू बिआयद तबीय'त-ए फ़ैयाज़
(78)
32.
मेरी आंखों को श्यामलता आँसू से हो गई सफेद
कब तक और करोगी यों तुम प्रिये हमारी अवहेला।
आओ तो मेरे करीव, हम मिल कर झगड़े सुलझा लें
बीत गई सो गई, याद क्या करती है तू बीती बात।
भगवन उसकी आँखों की पलकों का कैसा तीक्ष्ण कटाक्ष
कतर दिया जिसने कैंची सा मेरे संयम का चोला।
तेरे केश और मुख का जब नयनों में प्रतिबिम्ब पड़ा
श्वेत-श्यामता उससे पाई तब मनुष्य की आँखों ने।
मुश्किल बहुत 'जाद' को तुक है इससे ग़ज़ल नहीं बनती
लेकिन शायद तुझसे हाफ़िज़ होवे भावों का विस्तार।
(79)
33.
सहर चू बुलबुल-ए-बेदिल दमे शुदम दर बार
किता चू बुलबुल-ए-बेदिल कुनमा इलाज-ए-दिमा
ब चेहर:-ए-गुल-ए-सूरी निगाह मोकदम
कि बूद दर शब-ए-तारे ब रौशनी चू चिराटा
चुनाँ ब हुस्न-ओ-जवानी-ए-खेशतन मगरूर
कि दाश्त अज दिल-ए-बुलबुल हज़ार गुनः फ़राग़
कुशादः नर्गिस-ए-रा'ना बहसत आब अज़ चश्म
निहादः लाल:-ए-हम्रा बजान-ओ-दिल सद दाग
जुबाँ कुशीदः चू ते गे बसर तनश सोसन
दहाँ कुशादः सकायकचू मर्दुम-ए-ऐ.फाग
यके चूं बादः परस्तां सुराही अन्दर दस्त
यके चू साको-ए-मस्ताँ बकफ़ गिरफ्तः अयाग
निशात-ओ-ऐश-ए-जवानी चू गनीमत दाँ
कि हाफ़िज़ मबूद बर रसूल गैर बलाग़
(80)
33.
प्रात काल इसलिए गया पुष्प
वाटिका में कुछ देर
व्याकुल बुलबुल सा मैं भी अपने मन का कर लूँ उपचार।
लाल रंग वाले प्रसून के मुख को यों देखा मैंने
दीपक ज्यों प्रकाश करता है रजनी के अंधियारे में।
अपने रूप और यौवन के मद में वह यों खोया है
करे हजारों तरह उपेक्षा दुखी बिचारी बुलबुल की।
रूपवती नरगिस अभिलाषा में दृग-जल ढलकाती है
रक्त कुसुम की छाती में भी पड़े हुए हैं सौ-सौ दाग।
सिर उतारने को प्रस्तुत तलवार सदृश सोसन की जीभ
और शकायक यों मुंह खोले जैसे कोई चुगलीखोर ।
मदपायी की तरह एक तो लिये सुराही अपने हाथ
और एक अलमस्त पिलानेवाली ज्यों प्याला थामे।
यौवन-सुख-विलास को हाफ़िज़ समझ फूल की तरह विभूति
पैगम्बर का काम सिर्फ सन्देशा पहुँचाने तक है।
(81)
34.
मुवाद कस चू मन-ए-खस्तः मुतला-ए-फ़िराक
कि उ'म-ए-मन हमः विगुजरत दर बला-ए-फ़िराक
गरीब-ओ-आशिक़-ओ-बेदिल फकीर-ओ-सरगदाँ
कशोदः-ए-मेह्नत-ए-अय्याम-ओ-दर्दहा-ए-फ़िराक़
अगर बदस्त-ए-मन उफ्तद फिराक रा बिकुशम
ब आब-ए-दीदः दहम बाज खू बहा-ए-फ़िराक
कुजा रवम चि कुनम हाल-ए-दिल किरा गोयम
कि दाद-ए-मन विसितानद-दहद जज़ा-ए-फ़िराक
फिराक रा ब फिराक-ए-तू मुन्तला साजाम
चुन कि खू विचिकानम दीदहा-ए-फिराक
मन ज कुजा-ओ-फ़िराक़ अज कुजा-ओ-गम ज कुजा
मगर कि बाद मरा मादर अज बरा-ए-फिराक
ब दाग-ए-इश्क-ए-तू हाफ़िज़ चू बुलबुल-ए-सहरी
जनद व रोज़-ओ-शबाँ खूफ़िशॉ नवा-ए-फिराक
(82)
34.
ईश्वर करे, न हो कोई मुझसा वियोग का मारा
विरह-वेदना में मेरा तो बीत गया सब जीवन।
हूँ निराश, पागल फ़कीर मैं तो परदेसी प्रेमी
ढोता हूँ दुर्दिन के संकट और विरह की पीड़ा।
यदि वियोग लग जाय हाथ तो उसकी हत्या कर दूं
फिर अपने आँसू से उस हत्या का मूल्य चुका हूँ।
जाऊँ कहाँ, करूँ क्या, मन का हाल किसे बतलाऊँ
मुझ पर करके न्याय, करे जो इस वियोग को दण्डित।
इस वियोग को कर दूं मैं इस तरह विरह से पीड़ित
जैसे मैं अपनी आँखों से शोणित बहा रहा हूँ।
भला कहाँ मैं, विरह कहाँ है और कहाँ यह पीड़ा
इस वियोग के लिए कदाचित् माँ ने मुझे जना है।
तेरे प्रणय चिह्न के कारण हाफ़िज विरह व्यथा में
रक्त बरसता रोदन करता सदा प्रात बुलबुल सा।
(83)
35.
मकाम-ए-अम्न-ओ-मय-ए-बेग़श-ओ-रफ़ीक-ए-शफ़ीक़
गरत मुदाम मयस्सर
शवद जहे-तौफीक
जहान-ओ-कार-ए-जहाँ जुम्ल: हेच दर हेचस्त
हजार बार मन ई नुक्तः कर्दाअम तह कीक
..
दरे ग-ओ-दर्द कि ताई ज़माँ नदानस्तम
कि कीमिया-ए-सआदत रफीक बूद रफीक
ब अम्ने रो-ओ-फुर्सत शुमुर गनीमत-ए-वक्त
कि दर कमी गह-ए-3'मन्द कातआ'न-ए-तरीक़
कुजास्त अहल-ए-दिले ता कुनद दलालत-ए-खैर
कि माबदोस्त न बुम रह बहे च तरीक
फ़िदा-ए-गम्ज:-ए-साकी हजार जाँ आँदम
कि तर कुनद लब-ए-ला'ल अज शराब हम चू अक्रीक
हलावते कि तुरा दर
चह-ए-जान.खदानस्त
बकना-ए-ऊ नरसद सद हजार फ़िक्र-ए-अमीक
अज औं व रंग-ए-अकीक़स्त अश्क-ए-मन हमः वक्त
कि मुह-ए-खातिम-ए-चश्म-ए-मनत हम चू अकीक
बिया कि तौब: जलाल-ए-निगार-ओ-खंदः-ए-जाम
तसब्बुरे स्त कि अ'क्लश नमी कुनद तस्दीक
वखंदा गुफ्त कि हाफिज गुलाम-ए-तब्अ-ए-तूअम तू
बिवी कि ता बचि हद्दम हमी कुनद तहमीक
(84)
शान्ति का घर शुद्ध मदिरा, या वाले मित
थाई सदा झापलें नबीकानेर
जगत और प्रपंच जग के तुच्छ हैं अदि तुच्छ
परख कर देखा इन्हें मैंने हजारों बार।
दुःख है, समझो न मैंने अब तलक यह बात
औषधी कल्याण की है मित केवल मित।
शुभ समझ, जो मिला अवसर, जा सुरक्षित ठौर,
घात में हैं आयु की ये पन्थ के बटमार।
कहाँ है सहदय कि जो शुभ का दिखा दे पन्थ
क्योंकि ऐसे मित्त की मैंने न पायी राह ।
त सा.की को अदा पर मैं हजारों प्राण
करे सिक्त अकीक मद से अधर मेरे लाल !
कूप में तेरी चिबुक के हैं मधुर जो स्वाद
उस गहन तक पहुंच पाते नहीं लाख विचार ।
अश्रु कश हर वल मेरे इसलिए हैं लाल
छाप मेरी नेल-मुंदरी की अकीक समान!
प्रेयसी के अधर, प्याले की हंसो का त्याग
बात ऐसी है, नहीं जो बुद्धि को स्वीकार।
हूँ सदा हाफिज तुम्हारी कामना का दास
देख, क्या बुद्ध बनाता मुझे, यह परिहास
(85)
36.
हतार दुश्मनम अर मीकुनन्द कस्द-ए-हलाक
गर म तू दोस्तो अज़ दुश्मनों न दारम वाक
मरा उम्मीद-ए-विसाल-ए-तू जिन्दा मीदारद
वगर्नः हरदमम अज हिज-ए-तुस्त बीम-ए-हलाक
..
नफ़स नफ़स अगर अज बाद न शुनूम बूयत
ज़माँ जमाँ कुनम अज गम
गुल गिरेवा चाक
रवद व ख्वाब दो चश्म अज़ खयाल-ए-तू हैहात
बूद सबूर-ए-दिल अन्दर फ़िराक़-ए-तू हाशाक
अगर तू जख्म जानी बेकि दीगरे महम
व गर तू जहर दिही बे कि दीगरे तिर्याक
तुरा चुना कि तू ई हर नजर कुजा बीनद
ब कद्र-ए-बीनश-ए-ख़ुद हरकसे कुनद इद्राक
इनों न पेचम अगर मीलनी ब शम्शीरम
सुपुर कुनम सर-ओ-दस्त नदारम अज़ फ़िताक
ब चश्म-ए-खल्क अजीज़ ऑगहे शवी हाफिज
कि बर दरश बिनिही रू-ए-म'स्कनत बर खाक
(86)
36.
अगर हजारों दुश्मन मेरा वध करने का करें विचार
दुश्मन से मैं नहीं डरूंगा जो तू सखा रहे मेरा।
तेरे मधुर मिलन की आशा मुझको जीवित रखती है
वरना तेरा विरह मुझे तो सदा मृत्यु भय दिखलाता।
साँस-सांस में पवन सहारे तेरी गन्ध न जो पाऊँ
तो फिर दुख से मैं भी क्षण-क्षण फाडूं वस्त्र फूल जैसे।
तज कर तेरा ध्यान, नींद तक आँखें पहुँचे! ना ना ना
तेरी विरह घड़ी में मन को धीरज आये! ना ना ना।
जो तू घायल करे, सुखद है मुझे अन्य के मरहम से
जो तू विष दे, मीठा मुझको किसी और के अमृत से।
जैसा तू है, कहाँ देख पाता तुझको हर कोई
जैसी जिनकी दृष्टि, तुझे वे वैसा ही देखा करते।
जो तू मारेगा कटार से, मोडूंगा मैं नहीं लगाम
सिर सौंपूँगा, हाथ न खींचूँगा शिकार के झोले से।
जब अपना विनम्न मुख उसकी द्वार धूलि पर रख दोगे
तब तुम हो जाओगे हाफ़िज़ जग की आँखों के प्यारे।
(87)
37.
अय खत चूँ खुल्द-ओ-लाल'त सल्सबील
सल्सबीलत कर्द जान-ओ-दिल सवील
सब्ज़ पोशान-ए-खतत बर गिर्द-ए-लब
हमयूँ हरानन्द गिर्द-ए-सल्सबील
..
नावक-ए-चश्म-ए-तू दर हर गोशः
हम चू मन उफ्तादः दारद सद कतील
यारबई आतिश कि दर जान-ए-मनस्त
सर्द कुन जाँसाँ कि कर्दी बर खलील
मन नमीयावम मजाल
अय दोस्ताँ
गरचः ऊ दारद जमाले बस जमील
पाये मा लंगस्त-ओ-मंज़िल बस दराज
दस्त-ए-मा कोताह ओ खुमा बर नखील
हुस्न-ए-ई नाम अज बयाँ मुस्तानी अस्त
बर फ़रोग़-ए-खुर कसे जोयद दलील
आफ़रीन बर किल्क-ए-नक्काशे कि दाद
वक्र-ए-मा'नी रा चुनी हुस्न-ए-जमील
मौ'जजास्त ईशे'र या सहर-ए-हलाल
हाति.फ आवद ई सुखन या जिबील
कस नदानद गुफ्त शे'रे जी' नमत
कस न आरद सु.फ्त दुरे शो कबील
हाफ़िश
मा'ने दारी बिआर
वर्न: दावा नेस्त गैर अल काल-ओ-कील
(88)
37.
अरी स्वर्ग है तेरा मुख, ये अधर स्वर्ग के निर्झर
आर्द्र किया है इन दोनों ने हृदय और प्राणों को।
तेरे अधरों के समीप अंकुरी श्यामल रोमाली
मानो स्वर्ग प्रपातों को घेरे बैठी श्यामाएं।
कैसी है करतूत भला यह तेरे नेत-शरों की
मुझ जैसे शत-शत निहतों से भर रखते हर कोना।
यह जो मेरे प्राणों में बैठी भीषण दाहकता
इसको शीतल कर दे प्रभु ज्यों की खलील की ज्वाला।
ऐ मेरे मित्रो, मुझमें ही शक्ति नहीं है ऐसी
यद्यपि उसकी सुपमा तो सुंदरतम से भी सुन्दर।
'लँगड़े मेरे पैर और लम्बी है मेरी मंजिल
ओछे मेरे हाथ, छुहारा है दरख्त पर ऊँचा।
अभिव्यंजन से है स्वतंत इस कविता की सुन्दरता
सूर्यप्रभा के लिए खोजता है प्रमाण कब कोई।
धन्यवाद है चित्रकार की उस अद्भुत तूली को
रूप राशि से सजा दिया जिसने कि अर्थ-क्वाँरी को।
चमत्कार है काव्य चरण ये या विधिसम्मत जादू
ऐसी बातें तो संभव जिब्रील याकि हातिफ से।
इस प्रकार से कविता कहना नहीं जानता कोई
इस प्रकार मोती को पोना नहीं जानता कोई।
हाफ़िज़ अगर जानता है तो अर्थ बता तू इसका
और नहीं तो सिवा तर्क कुछ धरा न इन दावों में।
(89)
38
अगर बरखेजद अल दस्तम कि बा दिलदार विनशीनम
ज जाम-ए-वस्ल मय नोशम ज़ बाग़-ए-खुल्द गुल चीनम
शराब-ए-तल्ख-ए-सूफी सोज़ बुनियादम न ज्वाहद बुर्द
लबम बर लब निह अय साक़ी व बिसिता जान-ए-शोरीनम
लबत शकर व मस्ता दाद व चश्मत मय बमयज्वारों
मनम कज गायत-ए-हिर्मान वा आगमन बा ईनम
चू हर खाके कि बाद आवर्द फैजे बूद व इनआ'मे
ज हाल-ए-बन्दः याद आवर कि खिदमतगार-ए-देरीनम
भगर दीवानः स्वाहम शुद दरों सौदा कि शब तारोज़
सुःखन बा माह मीगोयम परी दर ख्वाब मोबीनम
न हर कू नकश-ए-नज्मे ज़द कलामश दिल पनीर आमद
तद-ए-तु.फा मीगोरम कि चालाक स्त शाहीनम
रमूल-ए-इश्क-ओ-सरमस्ती ज़मन बिश्नौ' अज हाफ़िज़
कि बाजाम-ओ-कदह हर शव हरीफ़-ए-माह -ओ-पर्वीनम
(90)
38.
अगर कभी संभव हो मुझको, बैठ सकूँ प्रियतम के पास
तो संयोग चषक से मद पी नन्दन वन के फूल चुनें।
सूफी की दाहक मदिरा से हिल न सकेगी मेरी नींव
साक़ी रख दे अधर अधर पर ले ले मेरे मोठे प्राण।
मस्तों को देती अधरामृत, मद्यप जन को नयन-सुरा
मैं तेरी विभूति से वंचित यह भी वह भी कुछ न हुआ।
लेकर आई हवा जिसे वह हर रजकण है कृपा-प्रसाद
मुझ सेवक की भी सुधि लेना, मैं हूँ एक पुरातन भृत्य।
शायद मैं होऊँ दीवाना क्योंकि रात से भोर तलक
करता हूँ बतकही चाँद से, सपने में देखू परियाँ।
ऐसा नहीं कि जो भी लिख दे कविता, वह मन भाये ही
अजव चकोर पकड़ लाता मैं क्योंकि चतुर है मेरा बाज।
हाफ़िज़ से क्या, मुझ से सुन तू प्रेम और मस्ती का मर्म
चन्द्र कृत्तिका का हर निशि में सुरा-पात का मैं साथी।
(91)
39.
खराबात-ए-मुगां नूर-ए-खुदा मीबीनम
वी अ'जब वी कि चि नूरे ज कुजा मीचीनम
के स्त दुर्दै कश 1-ए-ई मयकदः यारब कि दरश
किब्ल:-ए-हाजत-ओ मह राव-ए-दुआ' मोवीनम
जल्व: बर मन मफ़रोश अय मलिक-उल-हाज कि तू
खान: मीबीनी व मन ख़ान:-ए-ख़ुदा मोवीनम
सोज़-ए-दिल अश्क-ए-रवा आह-ए-सहर नाल:-ए-शव
ई हमः अज़ असर-ए-लुत्फ-ए-शुमा मोबीनम
हर दम अज रू-ए-तू नशे जनदम राह-ए-ख़याल
बा कि गोयम कि दरी पर्द चिहा मोबीनम
कस नदीदस्त ज मुश्क-ए-ख़ुतन ओ-नाफ: :-ए -ची
आँ चि मन हर-सहर अज बाद-ए-सबा मोबीनम
नेस्त दर दायरः यक नुक़्तः खिलाफ़ अज़ कम-ओ-वेश
कि मन ई मस्अलः बे चून-ओ-चिरा मौबीनम
मनसब-ए-आशिकी-ओ-रिन्दी-ओ-शाहिद बाजी
हमः अज तर्बियत-ए-लुत्फ़-ए-शुमा मीबीनम
दोस्तों ऐ'ब-ए-नज़रबाज़ी-ए-हाफ़िज़ मकु नीद
कि मन करा ज मुहब्बान-ए-खुदा मीबीनम
(92)
39.
पोरे मुगाँ की मधुशाला में मैंने देखा ईश प्रकाश
और अचंभा तो यह देखो, देख रहा मैं कहाँ प्रकाश!
भगवन इस मधुशाला में तलछट पीने वाला यह कौन
उसके दर हाजत का किब्ला और दुआओं का मेहराब।
अपना गौरव मत बतला तू मुझको ऐ हाजी सरदार
तूने तो केवल घर देखा, मैं देखू घर का भगवान ।
दिल की जलन, दुलकते आँसू, प्रातकाल के ये उच्छवास
और रात का रोदन, ये सब मुझको तेरे कृपा प्रसाद।
सदा डालती तेरी मुख-छवि मेरे मन-पथ पर डाके
किससे कहूँ, यहाँ मैं क्या-क्या देख रहा इस परदे में।
खुतन-चीन की कस्तूरी में नहीं किसी ने वह देखा
मैं जो देखा करता प्रतिदिन प्रात पवन के झोंको में।
इस परिसीमा में न कहीं भी एक बूंद कम या ज्यादा
इस प्रसंग को देख रहा मैं बिना किसी क्या या क्यों के।
प्रिय बनने की ललक, पियक्कड़न भी और प्रिया की चाह
इन सबके पालन पोषण में कृपा तुम्हारी देख रहा।
ऐ मेरे मिलो, हाफ़िज़ को न दो नजरबाजी का दोष
मैं तो उसको देख रहा हूँ परमेश्वर के प्यारों में।
(93)
40.
इश्कवाली-ओ-जवानी-ओ-शराब-ए-ला'ल फाम
मजलिस-ए-इंस-ओ-हरीफ़-ए-हमदम-ओ-शुर्व-ए-मुदाम
साकी-ए-शकर दहान-ओ-मुलिव-ए-शोरी सु.खन
हमनशीन-ए-नेक किदार-ओ-हरी.फ़-ए-नेक नाम
शाहिदे दर लुत्फ-ओ-पाकी रश्क-ए-आब-ए-जिन्दगी
दिलबरे दर हुस्न-ओ-खूयी औरत-ए-माह-ए-तमाम
वादः-ए-गुलरंग-ओ-तल्ख-ओ-अजर खुशख्वार-ओ-सुबुक
नुक्ले अज़ लाल-ए-निगार-ओ-नुल्ले अज याकूत-ए-जाम
बज्म गाहे दिलनशी चूं कर-ए-1
-फ़िदौस-ए-बरी
गुलशने पैरामनश चूँ रोत:-ए-दार-उस-सलाम
स.फनशीना नेक.ख्वाह-ओ-पेशकारों बाअदब
दोस्तदारा साहिब-ए-सिर्र-ओ-हरीफ़ा दोस्तकाम
'ग
गम्ज:-ए-साकी बयामा-ए-खिरद आहि:
जुल्फ-ए-दिलवर अज बराए सैद-ए-दिल गुस्तदःदाम
हर कि ई सुबत बिजोयद खुशदिली ब रू-ए-हलाल
व औं कि ई इथत नख्वाहद जिन्दगी ब रू-ए-हराम
(94)
40.
यौवन हो भरपूर, प्रेम हो और रंगीली मदिरा
मन के मीत, प्रेम की मजलिस और निरन्तर पीना।
पिकबयनी मधुबाला होवे और सुरीले गायक
हों चरित के धनी सखा सब, हों सब मिल सुनामी।
.
हो ऐसी प्रियतमा, अमृत भी ईर्ष्या से घुट जाये
उस कोमल का रूप देख कर पूर्ण चन्द्र लज जाये।
फूलों के रंग भीनी, सुखदा मदिरा ऐसी तीखी
एक घुट प्याले का ले तो दूजा प्रिया अधर का!
इन्द्रलोक से भी ऊँचे पर महफिल जमे हमारी
नन्दन वन हो चकित, हमारे उपवन की रचना पर।
सदा रहे साथी शुभ चिन्तक, मित्र मर्म के ज्ञाता
एक लक्ष्य के सहकर्मी हों, विनयशील हों सेवक।
बुद्धि लूटने, असि खींचे हों हाव भाव साक़ी के
मन-मृगया के लिए बिछे हों अलक जाल प्रियतम के।
उनका जीवन शुभ प्रमोदमय जो इनको अपनाते
अनुचित दूषित उनका जीवन जो इनसे कतराते ।
(95)
41.
मुन्दः-ए-वस्ल-एतू कू कश सर-ए-जाँ बर खेलम
ताइर-ए-कुद्सम व अस दाम-ए-जहाँ वरखेजम
व विला-ए-तू कि गर बंदः-ए-खेशम ख़्वानी
अज सर-ए-ख्खाजगी-ए-कौन-ओ-मका वर खेजम
वर सर-ए-तुर्वत-ए-मन वे मय-ओ-मुतिब मनशीं
ता व बूयत ज लहद रक्स कुनों पर खेतम
खेज व बाला नुमा अय बुत-ए-शीरों हरकात
कज़ सर-ए-जान-ओ-जहाँ दस्त फ़शाँ बर रोज़म
गरचे पीरम तू शबे तंग दर आगोशम गीर
ता सहर गह ज किनार-ए-तू जवा बर रोजम
रोज-ए-मर्गम नफसे मुहलत-ए-दीदार बिदह
ता यूँ हाफ़िज़ पा सर-ए-जान-ओ जहाँ बर रोज़म
(96)
41.
कहाँ तुम्हारी मिलन पुकार, कैसे खुले मुक्ति का द्वार
स्वर्गलोक का पंछी मैं कैसे तोडूं भव बन्धन जाला
मेरे मन में एक हुलास जो तू माने मुझको दास
शपथ प्यार की, तज दूंगा मैं देश -काल के सब अधिकार।
गायक और सुरा लेकर बैठो तो इस चौखट पर
नाच उतूंगा कब्र भेद कर सौरभ से व्याकुल होकर।
मधुर चाल वाली मूरत मुझे दिखा अपनी सूरत
इस मायावी जग से भी जीवन से भी पा लूं छुट्टी।
बूढ़ा हूँ पर बनूं जवान, सुबह हँसे जब भर कर तान
एक रात जो आलिंगन में भर लो तुम मेरा अस्तित्व।
अन्तकाल की यही ललक पाऊँ तेरी एक झलक
तो फिर हफ़िज़ जैसे मैं भी तज दूं जगत और ये प्राण।
(97)
42.
शाह - ए-शामशाद कदाँ खुसो-ए-शोरों दहना
कि बमिज़गाँ शिकन्द कल्ब-ए-हमः सफ़ शिकनाँ
मस्त बिगुलश्त व नज़र बर मन-ए-दरवेश अन्दालत
गुफ्त कि अय चश्म-ओ-चिराग-ए-हमः शीरों सुखना
ता के अज़ सोम-ओ-ज़रत कोसः तिही स्वाहद बूद
बन्दा-ए-मन शव व बरखुर ज हमः सीम तनाँ
कमतर अज जरी : न पस्त मशव मेहर बिवर्ज
ता ब खिल्वतगह-ए-ख़ुर्शीद रसी चर्ख जाना
पीर-ए-पैमान:कश-ए-मा कि रवानश खुश बाद
गुफ्त परहेज़ कुन अल सुबत-ए-पैमाँ शिकना
दामन-ए-दोस्त बदस्त आर व ज दुश्मन बिगुसल
मर्द-ए-यज़दौ शव व एमन गुजर अज अहरमना
बर जहाँ तकिया मकुन वर क़दह-ए-मय दारी
शादी-ए-जुहा जबीना खुर व नाजुक बदनाँ
बा सबा दर चमन-ए-लाल: सहर मीगुफ्तम
कि शहीदान-ए-कि अन्द ई हमः खूनी कफ़ना
गुफ्त हाफ़िश मन-ओ-तू महरम-ए-ई राज नयेम
अज़ भय-ए-लाल हिकायत कुन व शीरौं दहनां
(98)
42.
मिष्ट भाषियों का जो अधिपति शमशादों का जो सिरताज
हृदय तोड़ देता पलकों से रथियों के सिरमौरों का।
मस्ती से चलते जब उसकी इस फकीर पर नजर पड़ी
"ऐ मिठबोलों के दृगतारे मुझको यों सम्बोध गया।"
कब तक और रहोगे वंचित स्वर्ण-रजत के वैभव से
मेरा सेवक बन कर चख तू फल जो उजले तन का है।
अपने को लघु-हीन न समझो, हदय प्रेम से भर लो जो
तो उस निर्जन व्रती सूर्य तक चक्र-चक्र बढ़ तुम पहुँचो।
वयःप्रास उस मदपायी की आत्मा को सुख-शान्ति मिले
वह उनसे बचने को कहता वचन तोड़ देते हैं जो।
रहो मौत के साथ हाथ गह, रिपु से कोसों दूर रहो
परम पुरुष से जुड़ो और शैतानों से नाता तोड़ो।
जो तुम जग का छोड़ भरोसा मदिरा के आनन्द जिओ
उज्ज्वल भाल सुकोमलांगियों के सुख से तुम सुखी रहो।
लोहित सजल कुसुम कानन में मैंने यों पूछा प्रातः
अरी हवा, तू बता कि ये रक्ताक्त कफनवाले हैं कौन?
इस पर बोली हवा कि हाफ़िज़ हम तुम क्या जानें यह राज
यह तो अमृतभाषियों से या लोहित मदिरा से पूछो।
(99)
43.
सुब्हस्त साकिया कदहे पुर शराव कुन
दौर-ए-फ़लक दरंग नदारद शिताव कुन
ज औं पेशतर कि आ'लम-ए-फानी शवद खराब
मारा ज जाम-ए-बादः-ए-गुलरों ख़राब कुन
खुर्शीद-ए-मय स मश्रिक-ए-सागर तुलूअ'कर्द
गर बर्ग-ए-ऐश मी तलबी तर्क-ए-ख्वाब कुन
रोजे कि चर्ख अल गिल-ए-मा कूजहा कुनद
जिन्हार कास:-ए-सर-ए-मा पुर शराब कुन
मा मर्द-ए-जुहद-ओ-तौब:-ओ-तामात नेस्तेम
बा मा ब जाम-ए-बादः-ए-साफी खिताब कुन
कार-ए-सवाब बादः परस्तीस्त हाफ़िश
बर खेज व रू-ए-अ'तम् ब कार-ए-सवाब कुन
(100)
43.
हुई भोर, झट भरदे प्याला आसव से मधुबाले,
यह आकाश महा गतिशाली, समय नहीं रुकने का।
यह नश्वर जग मिटे कि इससे पहले मुझे पिला कर
गुलरंगी मदिरा का प्याला, मुझसे मुझे मिटा दे।
प्याले के पूरब से देखो उगा सूर्य मदिरा का
जीवन की मस्ती जो चाहो तो निद्रालस त्यागो।
जिस दिन गढ़ दे गगन हमारी मिट्टी लेकर प्याला
तभी हमारी सिर की लुटिया मदिरा से भर देना।
संयम नियम और बढ़ चढ़ की बातों से हमको क्या
हमको तो सम्बोधन कर तू पावन मधु प्याले का।
इस जगती में है पवित्र कर्त्तव्य सुरा की पूजा
उठो उठो हाफ़िज़ इस पथ का हो संकल्प तुम्हारा।
(101)
44. मजा'-ए-सब्ज-ए-फ़लक दीदम-ओ-दास-ए-मह-ए-नौ यादम अज़ किश्तः-ए-खेश आमद ओ हंगाम-ए-दि रौ गुफ्तम अय बख्त ब खुप्सीदी-ओ-ख़ुर्शीद दमीद गु.फ्त बा ई हमः अज़ साबिक़ : नौमीद भशौ .. तकियः बर अख़्तर-ए-शबगर्द मकुन की अय्यार ताज-ए-काऊस रबूद ओ कमर-ए-कै खुसौ गर रवी पाक-ओ-मुजर्रद चू मसीहा ब फ़लक अल फ़रोग़-ए-तू ब खुर्शीद रसद सद पती आस्माँ गो म.फ़रोश ई अ'ज्मत कि अन्दर इश्क खिमन-ए-मह ब जौए खोश:-ए-पर्वी ब दो जौ गोशवार-ए-दुर्र-ओ-ला'ल अर चः गरी दारद गोश दौर-ए-खूबी गुजरानस्त नसीहत बिश्नौ चश्म-ए-बदूर ज्ञ ख़ाल-ए-तू क दर अस:-ए-हुस्न बैजके रानद कि बुर्द अज़ मह-ओ-खुर्शीद गिरौ हर कि दर मजा'-ए-दिल तुम-ए-वफ़ा सब्त नकद -रू-ए-कसद अल हासिल-ए-ख़ुदगाह-ए-दिरौ जर्द- आतिश-ए-ज़र्क-ओ-रिया खिमन-ए-दी ख़्वाहद सोख्त हाफ़िज ई खिर्क:-ए-पशमीनः बि अन्दाज-ओ-बिरौ (102)
44.
नभ को हरी फसल जब देखी और अर्ध विधु का हँसिया
अपनी खेती और उसे कर्तन का समय याद आया।
मैंने कहा, सूर्य उग आया, अरे भाग्य तू सोया है
वह बोला, तू मत निराश होना इन सारी बातों से।
.
निशिचारी इस छली सितारे पर तू मत करना विश्वास
कै खुसरो का कमरबन्द, काऊस-ताज का यह हो ।
ब्रह्मचर्य रत और शुद्ध ईसा ज्यों तू पहुँचे नभ पर
तो तेरी द्युति से सूरज तक सौ-सौ किरणें पहुंचेंगी।
नभ से कह दो डींग न हाँके क्योंकि प्रेम में शशि-खलिहान
केवल जौ भर, और कृत्तिका की बाली दो जौ जितनी।
पहन लाल-मोती की बाली, भले लगे कानों को भार
बीत रहा सुन्दरता का युग, मेरी सम्मति को तू मान ।
,
रूप-बिसात बिछा कर, तिल-प्यादे की कुछ यों चाल चली,
बुरी नजर से ईश बचाए, चन्द्र-सूर्य भी मात हुए।
मन की खेती में जिसने भी बोया नहीं वफा का बीज
प्राप्ति देख मुख मलिन हुआ, जब आया समय कटाई का।
छल छन्दों की आग, भस्म कर देगी मजहब का खलिहान
हाफ़िज़ जल्दी भाग, फेंक कर यह पश्मीने का चोला।
(103)
45.
दोश रफ़्तम व दर-ए-मयकद: ख्वाब आलूद:
खिर्क: तर दामन व सज्जादः शराब आलूद:
आमद अफसोस कुना मुगवच्चः बादः फ़रोश
गुफ्त बेदार शव अय रहरव-ए-ख्वाब आलूदः
शुस्त-ओ-शवी कुन व ऑगह व ख़राबात खिराम
ता न गर्दद स तू ई दैर खराब आलूदः
बह वा-ए-लब-ए-शीरौं दहना चन्द कुनी
जौहर-ए-रूह व याकूत-ए-मुजाब आलूदः
बतहारत गुज़रों मंजिल-ए-पीरी व मकुन
खल्अ'त-ए-रौब ब तशी.फ़-ए-शबाब आलूदः
पाक-ओ-साफ़ी शव व अज चाह-ए-तबीअत बंदर आई
कि सफाये नदहद आव-ए-तराब आलूदः
गुफ़्तम अय जान-ए-जहाँ दफ़्तर-ए-गुल ऐ 'बे नीस्त
कि शवद वक्त-ए-बहार अज मय नाब आलूदः
आश्नायान-ए-रह-ए-इश्क दरी बहर-ए-अ'मीक
गर्क: गश्तन्द व न गश्तन्द ब आब आलूदः
गुफ्त हाफ़िज़ बिरौ व नुक्त : व यारों म.फ़रोश
आह अनों लुत्फ ब नवा-ए-इताब आलूदः
(104)
45.
के द्वार
तन्द्रा में कल रात गया मधुशाला
आसन और गूदड़ी दोनों भोगे थे मदिरा से।
नव किशोर वय मधु विक्रेता खेद भरी वाणी में
मुझसे बोला, चेतो राही, तुम तो पंक सने हो।
होओ स्वच्छ नहा धोकर, स्वच्छन्द यहाँ फिर घूमो
ताकि न हो मलीन तुझसे पावन मन्दिर मदिरा का।
मधुर अधर वाले मुख की अभिलाषा में तू कब तक
सिक्त करेगा पिघले मानिक से आत्मा का हीरा।
हों वार्धक्य काल में तेरे सब आचरण पुनीत
यौवन का मत लगा मुखौटा चेहरे पर, इस वय में।
बाहर आ वासना कूप से, स्वच्छ और शुचि होले
क्योंकि तुझे यह गंदला पानी कर न सकेगा निर्मल।
यदि वसन्त ऋतु में फूलों की पुस्तक मधु से भीगे
तो कुछ दोप नहीं है इसमें, ऐ जगती के प्यारे।
प्रेम पंथ से परिचित जन तो इस गहरे सागर में
डुबकी देते हैं फिर भी वे नहीं भीगते जल में।
इस पर वह बोला, बाहर जा, बात बना मत हाफ़िज़
अहा क्रोध की इस वाणी में भरा अनुग्रह उसका।
(105)
46.
अय कि दायम बखेश मगरूरी
अगर तुरा इश्क नेस्त मा'जूरी
गिद-ए-दीवानगान-ए-इश्क मगर्द
कि व अ'क्ल अ'कील; मशहूरी
:
मस्ती-ए-इश्क नेस्त दर सर-ए-तू
रौ कि तू मस्त-ए-आव-ए-अंगूरी
रू-ए-सर्दस्त ओ आह-ए-दर्द आलूद
आ'शिकारा गवाह-ए-रंजूरी
बिगुज़र अज़ नंग-ओ-नाम-ए-खुद हाफ़िज़
सागर-ए-मय तलब कि मसूरी
(106)
46.
अरे सदा तू अपने ही घमण्ड में है
तुझे प्यार जो नहीं मिला तो मजदूरी।
प्रेम दिवानों के दिग तू मत चक्कर काट
क्योंकि तुम्हारा नाम बुद्धिमानों में है।
तेरे मन में नहीं प्रेम का है उल्लास
चल हट तू तो केवल अंगूरी का मस्त ।
पीला मुख हो याकि वेदना की आहे
प्रेमी जन के दुखड़ों के ये साक्षी हैं।
तज दे मान और मर्यादाएं हाफ़िश
तू खुमार में है, मदिरा के प्याले मांग।
(107)
47.
:
ई खिर्क: कि मन दारम दर रहन-ए-शराव औला
वी दफ्तर-ए-वेमा'नी ग़र्क-ए-मय-नाब औला
चूँ उ 'म तवाह कर्दम चन्दा कि निगाह कर्दम
दर कुंज-ए-खराबाते उफ़्तादः खराव औला
मन हाल-ए-लि-ए-शैदा वा खल्क न ख्वाहम गुफ़्त
कई किस्सा अगर गोयम बा चंग-ओ-रवाव औला
ता चे सर-ओ-पा बाशद औजाअ'-ए-फ़लक जीसाँ
दर सर हवस-ए-साक़ी दर दस्त शराब औला
चूँ मस्लिह त अंदेशी दूरस्त पा दरवेशी
हम सीनः पुर आतिश चे हम दीदः पुर आब औला
चूँ पीर शुदी हाफ़िज़ अज मयकदः बैरूं शव
रिन्दी व हवस नाकी दर अ'हद-ए-शबाब औला
(108)
47.
पूजा का पाटम्बर बन्धक रख कर मधु को पाना
अच्छा है, पोथियाँ निरर्थक बह जायें मदिरा में।
सोच समझ कर देखा मैंने वृथा गंवाया जीवन
अच्छा है, मधुशाला में पी पड़ा रहूँ कोने में।
नहीं कहूँगा दुनिया को मन की मस्ती की बातें
और अगर बतलाऊँगा तो चंग रवाब बजा कर।
जब ऐसी हालत है नभ की बेसिर पैर
पड़ा
इससे तो अच्छा, मन में साक़ी हो कर में प्याला।
दुनियादारी से रहती है सदा साधुता दूर
इसीलिए शोभन है दिल में आग, आँख में पानी।
अब तो बुढ़ा गये हो हाफ़िज़ छोड़ो भी मधुशाला
तृष्णा और कामना लगती युवाकाल में अच्छी।
(109)
48.
रफ्तम ब वाग ता कि विचुनेम सहर गुले
आमद बगोश नागहम आवाज़-ए-बुलबुले
मिस्की चू मन ब इश्क़-ए-गुले गश्तः मुब्तला
व अन्दर चमन फगन्दः ब फ़रियाद गुलगुले
मोगश्तम अन्दर आँचमन-ओ-बाग दमबदम
मोकर्दम अन्दर आँ गुल-ओ-बुलबुल ताम्मुले
चूँ कर्द दर दिलम असर आवाज़-ए-अंदलीब
गश्तम चुना कि हेच न मानदम तहम्मुले
:
बस गुल शिगुफ्त: मीशवद ई बागरा वले
कस बे ज.फा-ए-खार नचीदस्त अश गुले
गुल यार-ए-ख़ार गश्तः व बुलबुल क़रीन-ए-इश्क
औरा तगव्युरे व न ई रा तबदुले
हाफ़िज़ मदार उम्मीद-ए-फरह अल मदार-ए-चार्च
दारद हज़ार ऐ'ब व न दारद तफरजुले
(110)
48.
एक गुलाव चुनूं इस खातिर गया बाग में प्रातः
वहाँ सुनाई पड़ी अचानक बुलवुल की आवाज।
मुझ जैसी वह भी गुलाब के प्यार पगी दुखियारी
उसके करुण स्वरों से भर कर उपवन काँप रहा था।
पुष्पवाटिका में फिरता मैं सोच रहा था मन में
कैसा है सम्बन्ध हृदय का इस गुलाब-बुलबुल का।
बुलबुल के वे व्यथा विकल स्वर मुझमें यों घिर आये
भूल गया सुघ बुध मैं अपनी, धीरज छूट गया था।
उपवन में खिलते ही रहते हैं गुलाब बहु तेरे
लेकिन काँटों से बच कर कब किसने इनको पाया।
गुल के संग शूल रहते हैं, बुलबुल के सँग प्यार
न तो शूल को तजता है गुल और न बुलबुल प्यार।
यह आकाश शून्य है हाफ़िज़, मत कर सुख की आशा
इसमें केवल दोष भरे हैं, यहाँ नहीं है करुणा।
(111)
49. नसीम-ए-सुव्ह सआदत बदा निशाँ कि तू दानी खबर व कू-ए-मुला बर बदा जुवाँ कि तू दानी तू पैक- -ए-हज़त-ए-शाही मरा दो दीदः वराहस्त करम नुमा व विफ़ा खबर चुना कि तू दानी विगोकि जान-ए-खाई'फ़म ज दस्त रयत खुदारा जला'ल-ए-रूह फ़िज्ञायत बिबखा अजां कि तू दानी मन ई दो हर्फ नविश्तम चुनों कि गैर न दानस्त तू हम ज रू-ए-करामत चुना बिख्खा कि तू दानी -ओ आवस्त खयाल-ए-तेग़-ए-तू वा मन हदीस-ए-तश्न:- असीर-ए-इश्क़-चूकी बिकुश चुना कि तू दानी उम्मीद दर कमर-ए-जर कशत चिगूना विबन्दम दकीक :ऐस्त निगारां दरों मियाँ कि तू दानी यके स्त तुर्की व ताजी दरों मुआ'मल: हाफ़िश हदीस-ए-इश्क बयाँ कुन, बहर-जुबाँ कि तू दानी (112)
49.
अरी सुबह की हवा शुभे, उस पुष्प गली का पता तुझे
ले जा मेरी खबर वहाँ उस भाषा में जो तुझको ज्ञात।
राजसभा की तू सांवादिक, मेरे नयन प्रतीक्षा में
मुझ पर करके दया सुना तू समाचार जो तुझको ज्ञात।
कृपया कह तू उसे, हाथ से गये हमारे दुर्बल प्राण
आत्मतुष्टिदायक अधरों से अब वह सुना तुझे जो ज्ञात।
मैंने ये दो हरफ लिखे यों जिसे न कोई समझ सके
तू भी कृपया इनको यों पढ़ हों ये केवल तुझको ज्ञात।
मेरे लिए तुम्हारी असि का ख्याल प्यास-जल की गाथा
किया प्रेम का बंदी तो फिर मुझे मार ज्यों तुमको ज्ञात ।
तेरी स्वर्ण मेखला से कैसे बांधू अपनी आशा
इसके बीच बात कुछ ऐसी जो ऐ प्रियतम तुझको ज्ञात।
इस प्रसंग में तो है हाफ़िज़ तुर्की अरबी एक समान
प्रेम कहानी हर भाषा में कह तू जो है तुझको ज्ञात।
(113)
50.
गुफ़्तम कि ख़ता कर्दी व तदबीर न ई वूद
गुफ़्तः चि तवा कर्द कि तक़दीर चुनी बूद
गुफ्तम कि खुदा दाद मुरादत व विसालश
गुफ्त: कि मुरादम ब विसालश न हमी वूद
गुफ़्तम कि करीन-ए-बदत अफ़गन्द बर्दी रोज
गुफ़्तः कि मरा बखत-ए-बद-ए-खेश करौं बूद
गुफ्तम ज़ मन अय माह चिरा मेहर बुरीदी
गुफ़्तः कि फ़लक वा मन-ए-बद मेहर बकी बूद
गुफ्तम कि बसे जाम-ए-तरब खुर्दी अर्जी पेश
गुफ्तः कि शिफ़ा दर कदह-ए-बाज़ पसी बूद
गुप्तम कि तू-अय उम्र चिरा जूद बिरफ़्ती
गुफ्तः कि फुलाने चिकुनम उ'म्र हमी वूद
गुफ्तम कि बसे ख़त-ए-जफ़ा बर तू कशीदन्द
गुफ्तः हमः औं बूद कि बर लौह-ए-जबीं बूद
गुफ़्तम कि न वक्त-ए-सफ़रत बूद चुनों जूद
गुफ्तः कि मगर मस्लिहत-ए-वक्त चुनी वूद
गुफ़्तम कि ज हाफ़िज़ ब चि इ'लत शुदः दूर
गुफ्तः कि हमः वक्त मुरादाइ'मा ई बूद
(114)
50.
मैंने कहा, भूल को तूने, ठीक नहीं थी तेरी राह
वह बोली, क्या करती, मुझको ऐसा ही कुछ भाग्य मिला।
+
मैंने कहा, मिलन की तेरी इच्छा प्रभु ने की पूरी
वह बोली कामना मिलन की सिर्फ न इतनी थी उससे।
.
मैंने कहा, तुझे दुर्दिन में बुरे संग ने डाला है
वह बोली, मेरा तो केवल बुरा भाग्य ही साथी था।
मैंने कहा, चन्द्रिमे, मुझसे प्रेम बन्ध क्यों तोड़ चली
वह बोली, इसलिए क्योंकि हो गया व्योम मेरा वैरी।
मैंने कहा, पिये तूने बहु मोद पात्र इससे पहले
वह बोली, मेरा केवल अन्तिम प्याले में था उपचार।
मैंने कहा, आयु, तू क्यों चल पड़ी भला इतनी जल्दी
वह बोली, क्या करूँ, मुझे तो इतनी ही बस आयु मिली।
मैंने कहा, उन्होंने तुझ पर खींची जुल्मी रेखाएँ
वह बोली, वे वे ही थीं जो भाग्य शिला पर अंकित थीं।
मैंने कहा, गमन का तेरा समय न इतनी जल्दी था
वह बोली, काल का कदाचित् ऐसा ही कुछ निश्चय था।
मैंने कहा,
बता हाफ़िज़ से किस कारण तू दूर हुई
वह बोली, मेरी इच्छा तो सदा-सर्वदा यही रही।
(115)
जाद की तुक समरकन्द-बुखारा रुक्नाबाद नहर मुसल्ला का कानन यूसुफ-जुलेखा नूह की नौका जाद, उर्दू फारसी का एक अक्षर जिसके वर्ण साम्य के शब्द दुर्लभ हैं। तुर्किस्तान के पुराने विख्यात नगर (अब उजबेकिस्तान में है। ख्वाजः हाफ़िज़ के शहर शीराज़ की नहर जिसका पानी नीला था। शीराज़ के बगीचे जहाँ गुलाब खिलते थे। कुनि शरीफ के अनुसार हज्जत यूसुफ़ एक पैगम्बर थे (हज्रत याकूब के पुत्र) । फारसी एवं उर्दू काव्य में इन्हें सौन्दर्य का प्रतीक माना जाता है। मिस्त्र प्रदेश की रानी जुलेखा इन पर आसक्त हो गई थी। कुआन शरीफ के अनुसार खंड प्रलय के बाद हनत नूह बच गये थे। उन्होंने अपनी नौका में हर प्राणी का एक जोड़ा सुरक्षित रख लिया था जिससे पुनः सृष्टि आरंभ हुई। हज़त दाऊद के पुत्र हज्रत सुलेमान का शुमार पैगम्बरों में है। अपनी प्रियतमा बिलकीस के पास अपना संदेश जिस पक्षी के द्वारा भेजते थे उसका नाम हुदहुद है। बिलकीस सबा प्रदेश की रानी थी। फ़रीदउद्दीन अत्तारी के मुरशिद थे। ये एक लड़की. पर आसक्त हो गए थे। ये हज्रत सुलेमान के वजीर थे। हज्रत सुलेमान के लिए कहा जता है कि वे हवा की सवारी करते थे और पक्षियों से बातें किया करते। कुआन शरीफ के मुताबिक अदन के पास शहाक नामक राजा ने मरुस्थल में एक उद्यान बनाया था सबा प्रदेश शेख सनाअ आसिफ इरम कानन (116) सम्बुल जम का विश्वदर्शी प्याला अन्न का दाना सरी-गुलौ-लाला जो ईश कोप से वहां के बाशिंदों सहित नष्ट हो गया। फारसी-उर्दू कविता में सुन्दर केशों का उपमान मानी जाने वाली एक सुगंधित घास। कहते हैं कि फारस के बादशाह जमशेद के पास एक ऐसा प्याला था जिसमें वह विश्व-दर्शन कर लेता था। बाइविल और कुआन के अनुसार ईश्वर ने माटी से पहला मानव आदम को बनाया और एक फल विशेष को खाने से मना किया। जब ईश आज्ञा का उल्लंघन कर उसने फल खा लिया तो उसे स्वर्ग से निकलना पड़ा। कुआन के अनुसार वह फल गेहूँ था। यहाँ उसी घटना की ओर संकेत है। हाफ़िज़ के समय में बंगाल के गवर्नर गयास- उद-दीन की सर्व, गुल और लाला नाम की तीन सेविकाएं थीं। सर्व एक वृक्ष का भी नाम है जिसकी उपमा प्रियतम के कद से दी जाती है। गुल गुलाब के लिए प्रयुक्त होता है और लाला (टुलिप) एक फूल है जिसमें बहुत से चिह्न होते हैं। इस ग़जल का पहला मिसरा बंगाल के गवर्नर गयास-उद-दीन ने कह कर ग़जल की पूर्ति के लिए ख्वाजा हाफ़िज़ शीराज़ी के पास भेजा तो उसे पूर्ण करके उन्होंने वापस बंगाल भिजवाया। इसमें एक शेर में कहा गया है कि एक रात का बच्चा एक साल के सफर पर जा रहा है। शायद इस ग़जल की रचना एक रात में हुई हो और वहाँ से बंगाल पहुंचने में एक साल लगता हो। हज्रत मूसा के समय का एक जादूगर जो एक (117) बंगाल सामरी खिन बनपशा आद-समूद ईसाई साँस सोसन दाऊदी संगीत बछड़े में आसक्त था और उसको पूजा करता। औरों को भी उसकी पूजा करने को कहता था। एक पैगम्बर जिन्हें पथ-प्रदर्शक कहा जाता है। कहते हैं कि सिकन्दर के साथ वे अमृत की तलाश में निकले थे। खिज्न को अमृत मिल गया और वे अमर हो गये। औपधि के काम आने वाला एक पौधा कुनि के अनुसार वे नास्तिक जिन्होंने ईश-आज्ञा को ठुकराया और अन्त में वे नाश को प्राप्त हुए। कुनि शरीफ के मुताबिक हात ईसा की फूंक से मुर्दे जी जाते थे। फारसी कविता में जबान का उपमान एक फूल जो लालिमा युक्त है। एक पैग़म्बर संगीतकार जिसके संगीत में दैविक शक्ति थी। ये हाफिज के समय में बादशाह शेख आबू इसहाक के वजीर थे और खाजा हाफ़िज़ की बड़ी इज्जत करते थे। उन्हें हाफ़िज़ ने युग का आसिफ़ कहा है। इस घाटी में तूर की पहाड़ी पर हन्नत भूसा को ईश्वरीय प्रकाश दिखाई दिया था। शीराज़ का एक इलाका देखें टिप्पणी-2 ईश्वर का प्रिय फरिश्ता जो पैगम्बरों के पास ईश्वर का पैगाम लाता है। लाल रंग का एक कीमती पत्थर (118) इमाम-उद-दीन महमूद ऐमन घाटी जाफराबाद मुसला जिबील अकोक
शमशाद
उर्दू-फारसी कविता में नायिका के कद का उपमान
एक लम्बा सुंदर पेड़।
एक पुष्प (टुलिप)
हज्रत इब्राहिम की उपाधि
शक़ायक
खलील
हातिफ़
एक फरिश्ता
हाजत का किल्ला
खुतन चीन की कस्तूरी
आशा का केन्द्र
खुतन चीन का एक प्रान्त है जहाँ कस्तूरी मृग पाए
जाते हैं।
इरान के बादशाह
कैखुसरो, काऊस
(119)
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