Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Durgasaptashati
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श्रीः। अथ सप्तशतीस्थविषयानुक्रमणिका। सख्या पृष्ठ ... ... ... ६ . ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... विषय. ३ प्रयोगविधिः १ २ शतचंडीविधिः. ३ संकल्पः ४ सप्तशतीकवचम् ५ अर्गलास्तोत्रम् .. ६ कीलकस्तोत्रम् •१४ शप्तशतीप्रारंभः। ७ अध्याय प्रथम-सुरथराजा और समाधि वेश्यका सुमेधा कपिके आश्रममें समागम. ऋपि और उन्होंका संवाद तहां देवीमाहात्म्य का वर्णन.तिस्में मधुकैटभदैत्यवधवर्णन १ ८ अध्याय दूसरा-महिषासुरके वधार्थ देवीकी सब देवतोंसे उत्पत्ति, देवाने देवीको शस्त्रास्त्रादि देना. महिषासुरके सेनाके साथ देवीका युद्ध ... ... -1 अध्याय तीसरा-देवीका महिषासुरसे तुमुलयुद्ध. महिषासुरवध... २५ • अध्याय चतुर्थ-इंद्रादिदेवकत देवीस्तोत्र. १ अध्याय पांचमा- शुंभनिशुंगसें त्रस्तहुए देवोंकरिकै देवीस्तोत्र, ५ देवीसें शुंभनिशुंभदैत्यदूतसंवाद... १ अध्याय छठमा-देवीकृत धूम्रलोचनवध. अध्याय सावमा-देवीकत चंडमुंडक्ट, ... ... ...
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(२)
अनुक्रमणिका।
१४ अध्याय आठमा-ब्रह्मादिकोंकी शक्तियां देवी के सहायार्थ आई
हैं. महादेवजीको दूत करकै शुंभके पास भेजना. दैत्योंसें युद्ध,
रक्तवीजवध
१५ अध्याय नवमा- देवीकृत निशुनवध
१६ अध्याय दसमा-देवीकत शुंजवधवर्णन
१७ अध्याय ग्यारमा- सर्वदेवकत नारायणीदेवीका स्तोत्र, देवीने दे-
वोंको इष्टवर देना.
१८ अध्याय बारमा- देयोंसें देवीका वाक्य और स्तुतिमाहात्म्य ९२
१९ अध्याय तेरमा-सुरथराजा और समाधि वैश्यनें ऋपिके आज्ञा-
से तपकरना. देवीका प्रादुर्भाव. राजा और वैश्य दोनोंकू वरदान.
राजाको पुनः स्वराज्यपाति,वैश्यको मोक्षलाभ देवीमाहात्म्य संपूर्ण ९९
इत्यनुक्रमणिका समाप्ता।
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पुस्तकमिलनेकाठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास
श्रीवेंकटेश्वर छापाखाना(मुंबई.)
श्रीः। अथ प्रयोगविधिः। श्रीगणेशाय नमः॥अथ प्रयोगान्तराणि कात्यायनीतन्त्री- तानि ॥ प्रतिश्लोकमाघन्तयोः प्रणवंजपेन्मन्त्रसिद्धिः॥१॥ अग्रे सर्वत्र श्लोकपदं मन्त्रोपलक्षणं ॥ सप्रणवमनुलोम- व्याहृतित्रयमादौ अन्तेतुविलोमंतदित्येवं प्रतिश्लोकं कृत्वा शतावृत्तपाठेऽतिशीघ्र सिद्धिः ॥२॥ प्रतिश्लोकमादोजातवे दस इत्यूचंपठेत्सर्वकामसिद्धिः ॥३॥ अपमृत्युवारणाय त्र्यंबकमन्वंपठेत्॥ आदावन्तेचशतमित्यर्थः॥प्रतिश्लोकतन्म- न्त्रजपइत्यन्यत्र ॥४॥ प्रतिश्लोकंशूलेनपाहिनो देवीतिपाठाद पमृत्युनाशः अस्यकेवलस्यापि श्लोकस्यलक्षमयुतंसहस्रशतं वाजपे अपमृत्युवारणम् ॥५॥ श्रीगणेशायनमः ॥ अथ प्रयोगान्तराणाङ्कात्यायनीतत्रोक्तानाम्मापाटीके- यम् ॥ सप्तशतीके पाठ करनेमें मन्त्रमन्त्रके आदि अन्त में जो ॐकार पढे वो जिसमन्त्रकी सिद्धिचाहै उसी मन्त्रको सिद्धिहोय ॥ १ ॥ और जो भूर्भुवः स्वः इसप्रकार सुलटे क्रमसे ॐकारसहित तीन व्याहृति मन्त्रमन्त्रके आदिमें पढे और अन्तमें स्वःभुवः इसप्रकार उलटे क्रमसे पढे ऐसे सप्तशतीके शत १०० पाठ करनेसे तत्काल कार्यकी सिद्धिहोय ॥ २॥ और जो सप्तश- शतीके पाठ करनेमें मन्त्रमन्त्रके आदिअन्तमें जातवेदसे इस ऋचाको पदे तो सब काम सिद्धहोय ॥ ३॥ और अकाल मृत्यु हटाने के लिये सप्तशती पा- ठके आदि अन्तमें त्र्यम्बकंयजामहे इस मन्त्रको शत १०० शत १०० जप करे अथवा मन्त्रमन्त्रके प्रति पढे तो अकालमृत्यु हटे ॥४॥ और जो । सप्तशती पाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति शूलेनपाहिनोदेवि इस मन्त्रको पढे अथवा इस केवल मन्त्रका लक्षु १००००० अथवा दशहजार १०००० अथवा हजार १००० अथवा शत ३०० जपकरे तौमी अकाल मृत्यु हटता ॥५॥ ।
.. (२) प्रयोगविधिः । प्रतिश्लोकं शरणागतदीनात्तैतिश्लोकंपठेत्सर्वकार्यसिद्धिः॥६॥ प्रतिश्लोकंकरोतुसानः शुभेत्यर्द्धपठेत्सर्वकार्यसिद्धिः॥७॥ स्वाभीष्टवरप्राप्तये एवंदेव्यावरंलब्ध्वेतिश्लोकंपठेत् ॥८॥ स- वापत्तिवारणायप्रतिश्चोकंदुर्गेस्मृतेतिपठेत् ॥अस्यकेवलस्या- पिश्लोकस्यकाऱ्यांनुसारेण लक्षमयुतंसहस्रंशतंवाजपः॥९॥ सर्वावाधेत्यस्यलक्षजपेप्रतिश्लोकपाठेवाश्लोकोक्तम्फलम्।।१० टीका-और जो सप्तशतीके पाठ करनेमें मन्त्रमन्त्रके प्रति शरणागत दीनान इस मन्त्रको पढे तो सम्पूर्ण कार्य सिद्धिहोय ॥६॥ और जो करो तुसानःशुभहेतुरीश्वरीशुसानिमदाण्यभिहन्तुचापदः इस अईमन्त्रकों सप्तशा तीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति पढे तो सम्पूर्ण कार्यकी सिद्धिहोय ॥ ७ ॥ और मनोवांछित वरकी प्राप्तिके लिये मन्त्रमन्त्रके प्रति एवं देव्यावरलब्ध्वा इस मन्त्रको पढे ॥ ८॥ और सम्पूर्ण आपत्तिनिवारणके लिये मन्त्रमन्त्रके प्रति दुर्गस्मृता इस मन्त्रको पढे अथवा इस केवल मन्त्रका जैसा कार्य होय तिसके अनुसार लक्ष १००००० अथवा दशहजार १०००० अथवा हजार १०० अथवा शत १०० जपकरना उचितहै ॥ ९ ॥ और सर्वा- वाधाविनिर्मुक्त इस मन्त्रका लक्ष १००००० जप करनेसे अथवा इसकों सप्तशती पाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रति पढनेसे धन धान्य पुत्र इनकरिके युक्त मनुप्य होताहै ॥ ३०॥ इत्थंयदायदाबाधेति प्रतिश्लोकजपेमहामारीशान्तिः ॥११॥ ततोवनेनृपोराज्यमिति मन्त्रस्यजपेपुनःस्वराज्यलाभः॥१२॥ हिनस्तिदैत्यतेजांसि इत्यनेनसदीपवलिदाने घण्टावन्धने च बालग्रहशान्तिः ॥ १३ ॥ आद्यावृत्तिमनुलोमेनपठित्वा ततोविपरीतक्रमेण द्वितीयामनुलोमेन ॥ तृतीयामित्येवमा- वृत्तित्रयेण शीघ्रङ्कायसिद्धिः ॥ १४॥ सर्वापत्तिवारणाय दुर्गेस्मृतेत्यर्द्धततोयदंतियञ्च दूरकेइत्यूचं तदन्तेदारिद्रयदुः खेत्यर्द्धमेवकार्यानुसारेणलक्षमयुतंसहसंशतंवाजपः॥ १५ ॥ • - जापाटीकासमन्वितः। (३) टीका-और सप्तशती पाठमें मन्त्र मन्त्रके प्रति इत्थंयदायदावाधादा- नवोत्थानविष्यति इस मन्त्रको पढनेसे महामारी शांत होय ॥ ११ ॥ और सप्तशतीके पाठमें जो मन्त्र मन्त्रके प्रति 'ततोववेपोराज्यम्' इस मन्त्रको जपे तो गयाहुवा अपना राज्य फिर मिले ॥ १२ ॥ और 'हिनस्तिदैत्यवे- जांसि इस मन्त्रकरिके भगवतीके अर्थ दीपक सहित बलिदान देनेसे और भगवतीके मंदिर में घण्टा बांधनेसे वालग्रहोंकी शांति होय ॥ १३ ॥ और जो पहिले सप्तशतीका सुलदे क्रमसे पाठ करै और दूसरे उलटी रीतिसे फिर तीसरे सुलटे कमसे पाठ करे इस प्रकार तीन पाठ करनेसे तत्काल कार्यकी सिद्धि होय ॥ १४ ॥ सम्पूर्ण आपत्ति निवारणके लिये 'दुर्गस्मृताहरसिनी- तिमशेपजन्तोः' इस अर्द्धमन्त्रको पढकर तिसके अन्तमें 'यदन्तियच्चदूरके' इस ऋचाको पढे फिर तिसके अन्तमें दारियदुःख इस अर्द्धमन्त्रको पढे इस प्रकार जैसा कार्य हो तिसके अनुसार लक्ष १००००० अथवा दशह- जार १०००० अथवा हजार १००० अथवा शत १०० इसका जप करना उचित है ॥ १५ ॥ कांसोस्मीत्यूचं प्रतिश्लोकं पठेल्लक्ष्मीप्राप्तिः ।। १६ ।। प्रति- श्लोकमनृणाअस्मिन्नित्यूचं पठेदृणपरिहारः ॥ १७ ॥ मार- णार्थमेवमुक्त्वासमुत्पत्यतिश्लोकंप्रतिश्लोकंपठेन्मारणोक्तावृत्ति- भिः फलसिद्धिः ॥ १८ ॥ ज्ञानिनामपि चेतांसि इतिश्लो- कजपमात्रेण सद्योमोहनमित्यनुभवसिद्धम् ॥ प्रतिश्लोक तच्छोकपाठेत्ववश्यम् ॥ १९॥ रोगानोपानिति श्लोकस्य प्रतिश्लोकंपाठेसकलरोगनाशः ॥ तन्मात्रजपेपिसः ॥२०॥ टीका-और जो सप्तशतीके पाठमें मन्त्र मन्त्रके प्रति कांसोस्मि' इस चाको पढे तो लक्ष्मीकी प्राप्ति होय ॥ १६ ॥ और जो मन्त्र मन्त्रके प्रति 'अनृणाअस्मिन्' इस ऋचाको पढ़े तो ऋण उतरे ॥ १७ ॥ और मारणके लिये 'एवमुक्त्वासमुत्पत्य इस मन्त्रको मन्त्र मन्त्रके प्रति पढे और मारणमें (१) प्रयोगविधिः। जितनी कात्यायनी आदि तन्त्रोंमें सप्तशतीकी आवृत्ति वर्णन करी हैं तिन आवृत्तियों के करनेसे मारणरूप फलकी सिद्धि होती है ॥ १८॥ और 'ज्ञा- निनामपिचेतांसि' इस मन्त्रके जप मात्र करने करके तत्काल वशीकरण होय यह अनुभव किया हुवा है अथवा मन्त्र मन्त्रके प्रति इस मन्त्रको पढे तोभी वशीकरण सिद्ध होय ॥३९॥ और 'रोगानशेपान' इस मन्त्रको मन्त्र मन्त्रके प्रति पढनेंसे सम्पूर्ण रोगका नाश होय अथवा तिस केवल मन्त्रके जपमात्र- सेभी सम्पूर्ण रोगका नाश होता है ॥ २० ॥ इत्युक्तासातदादेवी गंभीरतिश्लोकस्यप्रतिश्लोकंपाठे पृथग्ज- पेवा विद्याप्राप्तिर्वाग्वैकृतनाशश्च ॥२१॥ भगवत्याकृतं सर्व मित्यादिद्वादशोत्तरशताक्षरोमन्त्रः सर्वकामदः॥ सर्वापत्ति वारणश्च ॥ २२ ॥ देविप्रपन्नातिहरे इतिश्लोकस्ययथाकार्य लक्षायुतसहस्रशतान्यतमसंख्यजपे प्रतिश्लोकं पाठेवासर्वाप- निवृत्तिः सर्वकामाप्तिश्च ॥ एषुप्रयोगेषु प्रतिश्लोकंदीपाकेव- लमेव नमस्करणेऽतिशीघ्रंसिद्धिः॥प्रतिश्लोकंकामबीजसम्पु- टितस्थयैकचत्वारिंशदिनंत्रिरावृत्तौ सर्वकामसिद्धिः॥२३॥ एकविंशतिदिनपर्यन्तमुक्तरीत्याप्रत्यहं द्वादशावृत्तौवशीक णम् ॥२४॥ मायावीजसम्पुटितस्य फपल्लवसहितस्यस तदिनपर्यन्तं त्रयोदशावृत्ताबुच्चाटनसिद्धिः ॥२५॥ टीका-और इत्युक्तासातदेवी इस मन्त्रको मन्त्रमन्त्रकेप्रति पठनकरनेसे अथवा अलग केवलको जपकरनेसे विद्याकी प्राप्तिहोय और वाणीमें जो गद्द- पनाआदि विकार होयतिसको नाशहोय ॥२१॥और भगवत्यारुतं सर्वम् इससे आदिलेकर यह एक सौ १२ बारह अक्षरका मन्त्रहै सो सम्पूर्ण कामना दीनेवालाहै और सम्पूर्ण आपचिका दूर करनेवालाहै इस केवल मन्त्रकों जपे अथवा सप्तशतीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प्रतिपढे ॥ २२॥ और जैसा का- हो तिसमाफिक देविप्रपन्नानिहरेप्रसीद इसमन्त्रको जप लक्ष १००००० भापाटीकासमन्वितः। (५) अथवा दशहजार १०००० अथवा हजार १००० अथवाशत १००इसमे से एकसंख्या जपकरनेसे अथवा इसमन्त्रको सप्तशतीपाठमें मन्त्रमन्त्रके प- ढनेसे सम्पूर्ण आपत्ति दूरहोय और सम्पूर्ण कामना पूर्णहोय और इन प्रयो- गोमें प्रतिमन्त्र दीपके आगे केवल नमस्कार करनेसे अतिशीघ्र फलकी सिद्धि होय और प्रतिमन्त्र काम बीजसम्पुटित अर्थात् क्लीं इस करके सम्पुटित सप्तशतीको इकतालीस दिनतक नित्यप्रति तीन आवृत्तिकरनेसे सम्पूर्ण काम- की सिद्धिहोय ॥२३॥ और जो इक्कीसदिनतक उसी कामबीजसम्पुटित स- प्रशतीकी बारह आवृत्ति नित्यप्रतिकरनेसे वशीकारण सिद्धहोताहै ॥२४॥ और जो ही इस मायावीजकरके प्रतिमन्त्र सम्पुटितफट् पल्लव करके सहित सप्तशती पाठकी सप्तदिनतक नित्यप्रति त्रयोदश आवृत्तिकरनेसे उच्चाटन सिद्धहोय ॥ २५॥ तादृश्यामेव दिनचतुष्टयमेकादशावृत्तौ सर्वोपद्रवनाशः ॥ ॥२६॥ एकोनपञ्चाशदिनपर्यन्तम्प्रतिश्लोकंश्रीबीजसम्पुटि तस्यपञ्चदशावृत्तौलक्ष्मीप्राप्तिः ॥२७॥ प्रतिश्लोकं वाम्बीज सम्पुटितस्यशतावृत्त्याविद्याप्राप्तिः॥२८॥ इति ॥ टीका-और चार दिनतक नित्यप्रति एकादश आवृत्ति करनेसे सम्पूर्ण उपद्रवका नाश होय ॥ २६ ॥ और उणंचास दिनतक प्रति मन्त्र श्रीबीज सम्पुटित सप्तशती पाठकी पंदरह आवृत्तिकरनेसे लक्ष्मीकी प्राप्तिहोय ॥२७॥ और प्रतिमन्त्र ऐं इस वाग्वीजसम्पुटित सप्तशतीकी शत १०० आवृत्ति क- रनेसे विद्याकी प्राप्ति होय ॥२८॥ इति तन्त्रोक्तप्रयोगान्तराणि ॥ इति प्रयोगविधिःसमाप्तः।
शतचण्डीविधिः। (७) अकस्वरूपिणि ॥ पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोऽस्तुते ॥ त्रिपुरां त्रिपु- से परां त्रिवपा ज्ञानरूपिणीम् ।। त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्ति पूजयाम्यहम् ॥ ढनेात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् ॥ कल्याणजननी देवीं क- गोमणी पूजयाम्यहम् ॥ अणिमादिगुणाधारामकाराद्यक्षरात्मिकां ॥ अनन्त होगका लक्ष्मी रोहिणीं पूजयाम्यहम् ॥ कामचारी शुभां कान्तां कालचक्र सनपिणीम् ॥ कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥ चंडवीरां चंडमा- कीवण्डमुण्डप्रजनीम् ॥ पूजयामि सदादेवींचंडिकांचंडविक्रमाम् ॥ सदानंद- प्रशांतांसर्वदेवनमस्रुताम् ॥ सर्वभूतात्मिकांलक्ष्मीशांभवीपूजयाम्यहम् ॥ औमेदुस्तरेकार्येभवदुःखविनाशिनीम् ॥ पूजयामिसदानन्यादुर्गादुर्गातिना- सन्नीम्॥सुन्दरीं स्वर्णवर्णानां सुखसौभाग्यदायिनीम् ॥ सुभद्रजननी देवींसुम- रिपूजयाम्यहम् ॥ एतैमत्रैःपुराणोक्तैस्तांतांकन्यांसमर्चयेत् ॥ इतिपूजनंकु- रिकाणाम् ॥ वेद्यांविरचितेरम्येसर्वतोभद्रमंडले ॥ घटसंस्थाप्यविधिनातत्रा- हार्चयेच्छिवाम् ॥ तदयेकन्यकाश्चापिपूजयेद्राह्मणानपि ॥ उपचारैस्तुवि- निवार्णावरणान्यपि ॥ ॐकारःप्रथमपोठंपूर्णपीठमतःपरम् ॥ तृतीयंकाम- ढंचपूजयेत्संपदायतः ॥ पूर्वादिदिक्षुपीठस्यगणेशादिचतुष्टयम् ॥ गणेशक्षेत्र- हालौचपादुकेबटुकास्त्रयः ॥ आग्नेय्यादिचतुर्दिक्षुपूज्यदेवीचतुष्टयम् ॥ जया चविजयाचैवजयंतीचापराजिता ॥ पूर्वोक्तयःपूर्वकोणेसरस्वतीसहितोब्रह्मा श्रीसहितोविष्णु त्यामुमयाशिवोवायव्यांपट्कोणेचक्रमध्यस्थमध्यबीजेश्री- महालक्ष्मीः ॥ ह्रींमहाकालीमहासरस्वतीदक्षिणयामयोः ॥ उदसिहोदक्षि- महिपः ॥ पट्कोणेषुनंदजा रक्तदंतिका शाकंभरीदुर्गाभीमानामयः ॥ सबिंदुनामादावर्णताराद्याश्यासांनाममंत्राःपूजादौ ॥ तारःप्रणयः ॥ अष्टत्रयेपु ब्रह्माणीमाहेश्वरीकौमारीवैष्णवीवाराहीनारसिंही ऐंद्रीचामुण्डाउक्तरीत्यानाम- मन्त्रैः पूज्याः ततोविष्णुमायादिचतुर्विंशतिदेवताः प्रागादिक्रमेणकेसरेषुपुज्याः प्रतिपत्रंचकेसरत्रयम् ॥ ताश्चविष्णुमाया चेतनारबुद्धिनिद्रा४क्षुधा छाया ६ शक्ति ७ तृष्णा ८ क्षांति ९ जाति १० लज्जा ११ शान्ति १२ श्रद्धा (८) शतचण्डीविधिः। १३ कान्ति १४लक्ष्मी १५धृति १६ वृत्ति १७ स्मृति १८ दया १९ तुष्टि २० पुष्टि २१ मातृ २२.भांति २३ चिति २४ रूपा एतावत्यः सात- शतीस्तवेपंचमेध्यायेआसांचतुर्विंशतीनांनपाठ इतिनामितव्यम् ॥ कात्याय- नीतंत्रविरोधात् ॥ नालमूलेतुसंपूज्यमाधवादिचतुष्टयम् ॥ आधारःकूर्मशे- पौ च चतुर्थीपृथिवीनृप ॥ गृहकोणेपुगणेश क्षेत्रपालोघटुकोयोगिन्यः ॥ - गादिदिक्षुइंद्राद्याथेति ॥ एवंचतुर्दिनेकुर्यात् ॥ तत्रप्रथमेन्हिएकावृत्तिद्वितीये देतृतीयेतिस्रश्चतुर्थचतस्रइति ॥ पंचमेहोमः ॥ होमद्रव्याणि ॥ पायसान्नैश्वि- मध्वकैदक्षिारंभाफलादिभिः ॥ मातुलिंगैरिक्षुखंडैर्नालिकेरयुतैस्तिलैः ॥ जा- तीफलैराम्रफलैरन्यैर्मधुरवस्तुभिरिति ॥ सप्तशत्यादशावृत्त्यापतिमन्त्रंहुतंचरेत्। अयुतंचनवार्णेनस्थापितेऽमौविधानतः ॥ कृत्वावरणदेवानांहोमतन्नाममन्त्र तः ॥ रुत्वापूर्णाहुतिसम्यग्देवममिविसूज्यच ॥ अभिपिंचेच्चयधारविप्रौधर कलशोदकैः ॥ निष्कं सुवर्णमथवाप्रत्येकं दक्षिणांदिशेत् ॥ भोजयेञ्चशतवा- प्रानाक्ष्योज्यैः पृथग्विधैः ॥ तेश्योपिदक्षिणांदत्वागृह्णीयादाशिपस्तथा। एवरुतेजगदश्यंसर्वेनश्यंत्युपद्रवाः ॥इतिशतचण्डीविधिाश्रीजगदंबाप्रसादोस्तु। अथ संकल्पः। अद्यत्यादि. श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं चंडीसप्तशतीपाठाख्यंकर्मकरिष्ये॥तदंगत्वेनादौकवचार्गलाकीलक: पठनमाद्यंतयोरप्टोत्तरशतसंख्यनवार्णजपपूर्वकंक्रमेणरात्रिसूक्तदेवी- सूक्तपठनमंतेरहस्यत्रयपठनंचकरिष्ये ॥ ॥ इतिसंकल्प्य ॥ प्रथम नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततनमः ॥ नमप्रकृत्यैभद्रायैनियता णतास्मतां ।। इतिमंत्रेणपंचोपचारैःपुस्तकपूजांकुर्यात्॥ श्रीरस्तु ।। इतिसंकल्पः।
श्री। अथसप्तशतीकवचं भाषाटीकासमन्वितम्। ॐनमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेयउवाच ॥ यद्यपरमलो. केसर्वरक्षाकरनृणाम् ॥ यन्नकस्यचिदाख्यातंतन्मयूहिपिता- मह ॥ ३॥ ब्रह्मोवाच ॥अस्तिगुह्यतमविप्रसर्वभूतोपकारकम्।। देव्यास्तुकवचंपुण्यंतच्छृणुष्वमहामुने ॥ २॥ प्रथमंश लपुत्रीतिद्वितीयंब्रह्मचारिणी ॥ तृतीयंचन्द्रघण्टेतिकूश्माण्डे- तिचतुर्थकम् ॥ ३॥ पंचमंस्कंदमातेतिपष्टंकात्यायनीति च ॥ सप्तमंकालरात्रीतिमहागौरीतिचाष्टमम् ॥ ४॥ नवम सिद्धिदात्रीचनवदुर्गा:प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानिनामानि ब्रह्मणैवमहात्मना ॥५॥ श्रीगणेशायनमःनित्वाहमीशं जगदेकनाथं वर्गिलाकीलकसंयु: तायाकरोमि भाषामधोपकृत्यै विन्मनिरामःखलु सप्तशत्याः॥ टीका-ॐ नमश्चण्डिकायै । एक समय मार्कण्डेय ऋपि ब्रह्मासे इसमकार प्रश्न कर्ने भये कि हे ब्रह्मन् जो लोकके विषे अत्यंत गुप्त है और सब मनु- प्योंकी रक्षा करनेवाली और किसी अन्यको नहीं उपदेश दईहो सो वस्तु हमको उपदेश करो ॥ १॥ तब ब्रह्माजी बोले कि हे विम हे महामुने सय मनुष्योंका उपकार करनेवाली और अत्यंत गुप्त ऐसा देवीका कवच है ताहि तुम श्रवण करो ॥ २ ॥ प्रथम तो शैलपुत्री और दूसरे ब्रह्मचारिणी तीसरे चन्द्रघण्टा चौथे कुष्मांडा ॥ ३ ॥ पाचवे स्कंदमाता छठे कात्यायनी सातवे कालरात्रि आठवे महागौरी ॥ ४ ॥ नवमें सिद्धिदात्री ये नवदुर्गा वर्णन करी है येनाम ब्रह्मा मैनेही वर्णन किये है ॥५॥ अनिनादखमानस्तुशत्रुमध्येगतोरणे ॥ विषमेदुर्गमेचैवभया (२) सप्तशतीकवचम् । ताशरणंगताः॥६॥ नतेपांजायतेकिंचिदशुभरणसंकटे।। नापदंतस्यपश्यामिशोकदुःखभयंनहि ॥७॥ यैस्तुभक्त्या स्मृतानूनंतेपांसिद्धिःप्रजायते।यित्वांस्मरन्तिदेवेशिरक्षसेतान्न संशयः ॥ ८॥ प्रेतसंस्थातुचामुण्डावाराहीमहिपासना ॥ ऐन्द्रीगजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥ ९ ॥ माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवॉहना ॥ लक्ष्मीःपद्मासनादेवीपद्म- हस्ताहरिप्रिया ॥१०॥ टीका-जो मनुष्य अग्नि करके दग्ध होताहुवा और जो संग्रामके विपे शत्रुओंके मध्यमें रुकाहुवा और जो मनुष्य विकट दुर्गके विपे रुकाहुवा और जे इन आदि भया मनुष्य इन ब्रह्मोक्त दुर्गाके नामोंका उच्चारण कर्ने हैं ॥ ६॥ तिनके रण आदि संकटोंमें कुछभी अशुभ नहीं होता है और शरणागत मनुष्यके मैं आपत्ति और शोक दुःख भय ये नहीं देखता हूं ॥ ७॥ और जिनो करके भक्तिसे दुर्गा स्मरण करी जाती है तिनके निश्चयकरके धन संतान आदि सब वस्तुकी वृद्धि होती है और हे देवेशि जे मनुष्य तुलारा स्मरण कर्ते हैं तिनकी तुम रक्षा करोहो इसमें सं- शय नहीं ॥ ८॥ और प्रेतोंके विपे स्थित ऐसी चामुंडा और महिप है सवारी जिसकी ऐसी वाराही और गजसमारूढ ऐंद्री और गरुड है वाहन जिसका ऐसी वैष्णवी ॥ ९ ॥ और वृषाके ऊपर बैठी हुई माहेश्वरी और मयूर है बाहन जिसका ऐसी कौमारी और कमल है आसन जिसका और कमल हैं हाथोंमें जिसके हरिकी प्रिया ऐसी लक्ष्मी ॥ १०॥ श्वेतरूपधरादेवीईश्वरीवृषवाहनापब्राह्मीहंससमारूढा सर्वाभ- रणभृपिता ॥११॥ इत्येतामातर सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः॥ नानाभरणशोभाव्यानानारत्नोपशोभिताः ॥ १२॥ दृश्य न्तेरथमारूढादेव्याक्रोधसमाकुलाः । शंखचक्रगदाशक्तिहलं चमुसलायुधम् । खेटकंतोमरं चैवपरशुंपाशमेवच ॥ १३ ॥ कुन्तायुधं त्रिशूलंचशार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥ दैत्यानांदेहनाशा. .
भापाटीकासमन्वितम् ।
(३)
यभक्तानामभयायच ॥ १४ ॥धारयन्त्यायुधानीत्थंदेवानांच
हितायवै ॥ नमस्तेस्तु महारोद्रेमहाघोरपराक्रमे।। १५ ।।
टीका-और वृप है वाहन जिसका और श्वेतरूपकों धारण करनेवाली
ऐसी ईश्वरी देवी और हंसके ऊपर बैठीहुई संपूर्ण आभूषणोंकरके
अलरुत ऐसी ब्राह्मी ॥११॥ हेदेखि पूर्वोक्त तुमारी ये शक्ति संपूर्ण जगन्माता
संपूर्ण योग करके युक्तहै और नाना प्रकारके रबजटित आभूपणोकी शो-
जा करके युक्तहैं ॥ १२॥ और क्रोध करके विव्हल रथोंमें बैठीहुई दीख-
तीहैं और शंख चक्र गदा शक्ति हल खेटक तोमर परशु पाश ॥ १३ ॥ कुंत
त्रिशूल शाङ्ग धनुष इन उत्तम आयुधोको दैत्योंके देहके नाशके लिये और
भक्तोंके भयके लिये ॥ १४॥ और देवोंके हित के लिये धारण कियेहैं
हेमहारौद्रे हेमहाघोरपराक्रमे ऐसी तुमकों नमस्कारहो ॥ १५ ॥
महापलेमहोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥ त्राहिमांदेविदुष्प्रेक्ष्ये
शत्रूणांभयवदिनि ॥ १६ ॥ प्राच्यांरक्षतुमामैन्द्री आग्नेय्यां
भयवर्धिनी॥दक्षिणेऽवतुवाराहीनैर्ऋत्यांखड्गधारिणी ॥१७॥
प्रतीच्यांवारुणीरक्षेद्वायव्यांमृगवाहिनी उदीच्यांपातुकौमारी
ईशान्यांशूलधारिणी ॥ १८ ॥ ऊर्ध्वब्रह्माणीमेरक्षेदधस्ताद्वै-
ष्णवीतथा ॥ एवंदशदिशोरक्षेच्चामुण्डाशववाहना ॥ १९ ॥
जयामेचाग्रतःपातुविजयापातुपृष्ठतः ॥ अजितावामपावें
तुदक्षिणेचापराजिता ॥२०॥
टीका-और हेमहाबले हेमहोत्साहे हेमहाभयविनाशिनि हे दुष्प्रेक्ष्ये हे
शत्रुओंके भय बढानेवाली तुम मेरी रक्षा करो ॥ १६ ॥ पूर्वके विषे ऐंद्री
मेरी रक्षा करो और अनिकोणके विपे भयवर्धिनी रक्षा करो और दक्षिणके
धिपे वाराही और नैर्ऋतके विपे खड्डधारिणी मेरी रक्षा करो ॥१७॥ और
पश्चिमके विषे पारुणी और वायु कोणके विपे मृगवाहिनी और उत्तरके
विपे कौमारी और ईशानी के विषे शूलधारिणी मेरी रक्षा करो ॥ १८॥
सप्तशतीकवचम् ।। और मेरे उपर ब्रह्माणी रक्षा करो तिसीप्रकार नीचे वैष्णवी.रक्षा करो ऐसे, शववाहना चामुंडा दशो दिशामें रक्षाकरो ॥ १९॥ और मेरे अगाडी जया रक्षा करो और विजया पीठ पीछेरक्षा करो और अजिता वामपार्थके विष और अपराजिता दक्षिणपार्श्वके विपे.रक्षा करो ॥ २० ॥ शिखामुदयोतिनी रक्षेदुमामा व्यवस्थितामालाधरीलला- टेचनुवौरक्षेद्यशस्विनी ॥२१॥ त्रिनेत्राचवोर्मध्येयमघण्टा चनासिके । शंखिनीचक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोरवासिनी ॥२२॥ कपोलौकालिकारक्षेत्कर्णमूलेतुशांकरी ॥ नासिकायांसुगं- न्धाचउत्तरोष्ठेचचिका ॥ २३ ॥ अधरेचामृतकलाजिह्वायां च सरस्वती ॥दन्तानक्षतुकौमारीकण्ठदेशेतुचण्डिका ॥२४॥ घण्टिकांचित्रघण्टाचमहामायाचतालुके ॥ कामाक्षीचिबुकं . रक्षेद्वाचंमेसर्वमंगला ॥२५॥ टीका-और शिखाकी उद्योतिनी रक्षा करो और उमा मूर्दके विषे स्थित हुई रक्षा करो और मालाधरी ललाटके विषे रक्षा करो और भुकुटिओंकी यशस्विनी रक्षा करो ॥२१॥ और त्रिनेत्रा भुकुटीओके मध्यमें और नासि काकी यमघण्टा रक्षा करो और नेत्रोंके मध्यमें शंखिनी और भोनों के विषे दारवासिनी रक्षा करो ॥ २२॥ और कपोलोंकी कालिका रक्षा करो और कर्णमूलके विषे शांकरी रक्षा करो और नासिकाके विपे सुगंधा और उत्त- रोष्ठके विषे चर्चिका रक्षा करो ॥२३॥ और अधरोष्ठके विपे अमृतकला और जिव्हाके विपे सरस्वती रक्षा करो और दंतोंकी कौमारी रक्षा करो और कंठदेशके विपे चंडिका रक्षा करो ॥२४॥ और घंटिकाकी चित्रघण्टा रक्षा करो और महामाया तालुके विपे रक्षा करो और कामाक्षी ठोडीकी. रक्षा करो और सर्वमङ्गला मेरी वाणीकी रक्षा करो॥ २५॥ ग्रीवायां भद्रकालीचपृष्ठवंशेधनुर्धरी ॥ नीलग्रीवाबहिःकण्ठेन लिकानलकूबरी ॥२६॥ स्कन्धयोः सङ्गिनीरक्षेद्वाहू मेवन
भाषाटीकासमन्वितम्।
(५)
धारिणी॥हस्तयोर्दण्डनीरक्षेदम्बिकाचांगुलीषुच॥२७॥नखा
छूलेश्वरीरक्षेत्कुक्षौरक्षेत्कुलेश्वरी ॥ स्तनौरक्षेन्महादेवी
मनश्शोकविनाशिनी ॥२८॥ हृदयेललितादेवीउदरेशूल
धारिणी ॥ नाभौचकामिनीरक्षेद्वांगुह्येश्वरीतथा ॥२९॥
पूतना कामिकामेंद्गुदेमहिपवाहिनी कन्यांभगवतीरक्षेजा
नुनीविन्ध्यवासिनी ॥३०॥
टीका-और गलेके विपे भद्रकाली और पृष्ठके वंशके विपे धनुर्धरी रक्षा
करो और कंठके बहिःप्रदेशके विपे नीलग्रीवा रक्षा करो और नलिकोंकी
नलकूबरी रक्षा करो ॥ २६ ॥ और कंधूके विपे खगिनी रक्षा करो और
मेरी शुजाकी वज्रधारिणी रक्षा करो और हस्तोंके विपे दंडिनी रक्षा करो
और अंगुलिओंके विपे अंबिका रक्षा करो ॥ २७ ॥ और नसोंकी शूले-
श्वरी रक्षा करो और कुक्षिके विपे कुलेश्वरी रक्षा करो और स्तनोंकी मन-
का शोक दूर करनेवाली महादेवी रक्षा करो ॥ २८ ॥ और हृदयके विपे
ललिता देवी और उदरके विपे शूलधारिणी और नाभिके विपे कामिनी रक्षा
करो तिसीप्रकार गुह्यस्थानकी गुह्येश्वरी रक्षा करो ॥ २९ ॥ और पूतना
कामिका शिश्नकी रक्षा करो और गुदस्थानके विषे महिषवाहिनी और के-
टिदेशके विपेक्षगवती रक्षा करो और गोडोंकी विंध्यवासिनी रक्षा करो ॥३०॥
जंघेमहावलारक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥ गुल्फयोनारसिंहीच
पादपृष्ठेतुतेजसी ॥३१॥ पादांगुलीषु श्रीरक्षेत्पादाधास्थल
वासिनी॥ नखान्दंष्ट्राकरालीच केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी॥ ३२॥
रोमकूपेषुकौमारीत्वचंवागीश्वरीतथा ॥ रक्तमजावसामांसा-
न्यस्थिमेदांसिपार्वती॥३३॥ अन्नाणिकालरात्रीचपित्तंच
मुकुटेश्वरी ॥ पद्मावतीपद्मकोशेकफेचूडामणिस्तथा ॥३॥
ज्वालामुखीनसाजालमभेद्यासर्वसंधिषु ॥ शुक्रब्रह्माणीमरक्षे
च्छायांछनेश्वरीतथा ॥३५॥
सप्तशतीकवचम् ।
टीका-और सर्व मनोरथोकी देनेवाली महावला जंघाओंकी रक्षा करो
और टाँकनाके विपे नारसिंही और पैरोके पृष्टके विषे तैजसी रक्षा करो॥३१॥
और पैरोंकी अंगुलिओंके विपे श्री रक्षा करो और पैरका अधोभागकी
स्थलवासिनी रक्षा करो और नसकी दृष्ट्राकराली और केशोंकी
ऊर्ध्वकेशिनी रक्षा करो ॥ ३२ ॥ और रोमकूपोंके विपे कौमारी रक्षा करो
तिसीप्रकार त्वचाकी वागीश्वरी रक्षा करो और रक्त मज्जा वसा मांस
अस्थि भेद इनकी पार्वती रक्षाकरो ॥ ३३॥ और आतोंकी कालरात्रि
रक्षा करो और, पित्तकी मुकुटेश्वरी रक्षाकरो और तिसीपकार पद्मावती
पनकोशके विपे और कफके विपे चूडामणि रक्षा करो ॥ ३४॥ और ज्वा-
लामुखी नसाजालकी रक्षा करो और अभेद्या सनसंधिओंके विषे रक्षा
करो और वीर्यकी ब्रह्माणी. रक्षा करो तिसीप्रकार छायाकी छत्रेश्वरी
रक्षा करो ॥ ३५ ॥
अहंकारंमनोबुद्धिरक्षेन्मेधर्मधारिणी॥ प्राणापानौतथाव्यानमु
दानंचसमानकम् ॥३६ ॥ वज्रहस्ता चमे रक्षत्प्राणकल्पंच
शोभना ॥रसेरूपेचगन्धे च शब्देस्पर्शचयोगिनी॥३७॥सत्वं
रजस्तमश्चैवरक्षेन्नारायणीसदा ॥आयूरक्षतुवाराहीधर्मरक्षतुवै-
प्णवी ॥३८॥यश कीर्तिचलक्ष्मींचधनंविधांचचक्रिणीगोत्रामि
न्द्राणीमरक्षेत्पशून्मेरक्षचण्डिके ॥३९॥ पुत्रारक्षेन्महालक्ष्मी
र्भायौरक्षतुभैरवी।पन्थानंसुपथारक्षेन्मार्गक्षेमकरीतथा॥४०॥
टीका-और मेरा अहंकार मन और बुद्धि इनकी धर्मधारिणी रक्षा क-
रोतिसीप्रकार मेरा प्राण अपान व्यान उदान समान ॥ ३६॥ इन पंच
प्राणोंकी वजहस्ता रक्षा करो और प्राणकल्पकी शोजना रक्षा करो रसके
विपे रूपके विपे गंधक विषे शब्दके विपे स्पर्शके विपे योगिनी रक्षा करो
॥ ३७ ॥ और सर्वदा सत्वगुण रजोगुण तमोगुण इनकी नारायणी रक्षा
करो और आयुकी वाराही रक्षा करोऔर धर्मकी वैष्णवी रक्षा करो॥३८॥
भाषाटीकासमन्वितम् । (७) यश कीर्ति लक्ष्मी धन विद्या इनकी चक्रिणी रक्षा करो हेइन्द्राणि तुम मेरे गोत्रकी रक्षाकरो और हेचंडिके तुम मेरे पशुओंकी रक्षाकरो ॥३९॥ पुत्रोंकी महालक्ष्मी रक्षाकरो भार्याकी भैरवी रक्षाकरो और पन्थाकी सुपथा और तिसीप्रकार मार्गकी क्षेमकरी रक्षाकरो॥४०॥ राजद्वारेमहालक्ष्मीविजयासर्वतःस्थिता।रक्षाहीनंतुयत्स्थानं- वर्जितंकवचेनतु॥११॥तत्सर्वरक्षमेदेविजयन्तीपापनाशिनी।। पदमेकंनगच्छेत्तुयदीच्छेच्छुभमात्मनः ॥४२॥ कवचेनावृतो नित्यंयत्रयत्रैवगच्छति ॥ तत्रतत्रार्थलाभश्चविजयःसार्वका मिकः ॥ ४३ ॥ यंयंचिंतयतेकामंतंतंप्राप्नोतिनिश्चितम् ॥ परमैश्वर्यमतुलंप्राप्स्यतेभूतलेपुमान् ॥४४॥ निर्भयोजाय- तेमर्त्य संग्रामेष्वपराजितः ॥ त्रैलोक्येतुभवेत्पूज्याकवचेना. तःपुमान् ॥ ४॥ टीका-राजद्दारके विषे महालक्ष्मी रक्षाकरो तिसीप्रकार चौतरफ स्थि- तहुई विजया रक्षाकरो और रक्षा करके रहित और कवच करके वर्जित जो स्थान ॥ ४२ ॥ तिस संपूर्ण मेरे स्थानकी पापोंके नाश करनेवाली ऐसी जयंती हेदेवि तुम रक्षाकरो और जो मनुष्य अपना शुभ चाहैं तो कवचविना एकपैड न चले ॥४२॥ और जो कवच करके युक्तहुवा मनुष्य नित्यप्रति जहां जहां जाताहै वहां तहां उसको लान होताहै और उसका विजय होताहै ॥४३॥ फिर वह मनुष्य जिस जिस कामकी इच्छा कर्चा है लिस तिस कामको निश्चय करि प्राप्त होताहै और पृथ्वीके विपे अतुल उत्तम ऐश्वर्यकों प्राप्तहोताहै ॥४४॥ फिर वह कवच करके आवृत पुरुप संग्रामके विपे निर्भय और अपराजित होताहै और त्रिलोकीके विपे पूज्य होवे ॥४५॥ इदंतुदेव्याकवचं देवानामपिदुर्लभम् ॥ यः पठेत्प्रयतोनित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥ देवीकलाभवेत्तस्यत्रैलोक्ये प्वपराजितः॥ जीवेदर्पशतंसाग्रमपमृत्युविवर्जितः॥१७॥ नश्यन्तिव्याधयःसर्वेलूताविस्फोटकादयः ॥ स्थावरंजंगमं 1 (८) सप्तशतीकवचम् । चैवकृत्रिमंचापियद्विपम् ॥४८॥ अभिचाराणिसर्वाणिम चयंत्राणिभूतले ॥ भूचरा खेचराश्चैवकुलजाश्चोपदेशिकाः ॥ • ॥४९॥ सहजाकुलजामालाडाकिनीशाकिनीतथा ॥ अन्त- .' रिक्षचराघोराडाकिन्यश्चमहाबलाः ॥५०॥ टीका-और यह देवीका कवच देवताओंकोजी दुर्लभहै जो पुरुष श्र. द्धाकरके युक्त और एकाग्रचित्तहुवा इस कवचको नित्यप्रति त्रिकालपढे ॥ ४६ ॥ तो उस पुरुपकी देवीके समान कला हो और वह तीनो लो- कोंके विषे किसी करके पराजित नही होवे और वह अपमृत्युकरके वर्जित- हुवा शतवर्ष जीवे ॥.४७ ॥ और लूता विस्फोटकासे आदिलेकर.जे व्या: धिहै और स्थावर शंखिया आदि जंगम सर्प आदि कृत्रिम बनाहुवा जो तीन प्रकारका विपहै ये संपूर्ण उपद्रव उस पुरुषके नष्ट होजातेहै अर्थात् उस पुरुषको क्लेश नही देशकतेहैं ॥४८॥ और पृथ्वीके विषे मंत्रयंत्ररूपी जे अभिचार, अर्थात् मूठ आदि कर्तवहै और भूचर खेचर 'कुलज उपदेशि- क येमी संपूर्ण उपद्रव उसपुरुषको स्पर्श नहीं कर शकतेहै ।। ४९॥ और. सहजा कुलजा माला तथा डाकिनी शाकिनी और अंतरिक्षमें विचरनेवाली भयंकर और बलवान् जे डाकिनी ॥५०॥ ग्रहभूतपिशाचाश्चयक्षगन्धर्वराक्षसाः ॥ ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूश्माण्डाभैरपादयः॥५१॥ नश्यन्तिदर्शनात्तस्यकवचेह- दिसंस्थिते ॥ मानोन्नतिर्भवेद्राज्यंतेजोवृद्धिकरंपरम् ॥१२॥ यशसावर्धतेसोऽपिकीर्तिमण्डितभूवले ॥ जपेत्सप्तशतींचण्डी कृत्वातुकवचंपुरा ॥५३॥ यावद्भूमंडलंधत्तेसशैलवनकान- नंम् ॥ तावत्तिष्ठतिमेदिन्यांसन्ततिःपुत्रपौत्रिकी ॥५४॥ देहान्तेपरमंस्थानंयत्सुरैरपिदुर्लभम् ॥ प्राप्नोतिपुरुषोनित्यं महामायाप्रसादतः ॥५५॥ लभते परमरूपंशिवेनसहमोदते ॥ ५६ ॥ इतिवाराहपुराणेहरिहरब्रह्मविरचितंदेव्याःकवचं समाप्तम् ॥ श्रीजगदंबार्पणमस्तु ।
भाषाटीकासमन्वितम् । (९), टीका-और ग्रह सूत पिशाच यक्ष गन्धर्व राक्षस ब्रह्मराक्षस वेताल कू- ष्मांड भैरव इन आदि जे उपद्रव है ॥५१॥ वे जिसके हृदयके विषे कवच स्थित हुएसते तिसके दर्शनमात्रसे ये संपूर्ण नष्ट होजाते है अर्थात् स्पर्श नहीं कर सकते है और पृथ्वी के ऊपर इस कवचके प्रतापसे उस पुरुपके मानकी उन्नति होवे और तेजको बढानेवालो उस पुरुषको उत्तम राज्य होवे ॥५२॥ और जो पुरुष पहिले कवचकों करके सप्तशती चण्डीको जपे वह पुरुषभी कीर्ति करके शोशित भूमण्डलके विषे यश करके बढताहै ॥ ५३॥ और जब पर्यंत शेष भूमण्डलको धारण कर्ता है तब पर्यन्त पृथ्वीके विषे उस पुरुषकी पुत्रपौत्रकी संतति स्थित रहती है ॥ ५४ ॥ फिर देहके अंत । समयके विषे वह पुरुष महामायाकी कपासे देवताओं करकेभी जो दुर्लभ स्थान है तिसको निश्चयकर प्राप्त होताहै ॥ ५५ ॥ फिर मनोहर रूपको प्राप्त होताहै और शिवजी के साथ आनंद कर्चा है ॥ ५६ ॥ इति वाराहपुराणे हरिहरब्रह्मविरचितं देव्याः कवचं समानम् ॥ इति देव्याः कवचं समाप्तम् ।
K श्रीः। अथ अर्गलास्तोत्रम् । ॐनमश्चण्डिकाय।।जयन्तीमङ्गलाकालीभद्रकालीकपालिनी॥ दुर्गाक्षमाशिवाधात्रीस्वाहास्वधानमोस्तुते ॥१॥ जयत्वंदेवि चामुण्डेजयभूतातिहारिणी॥जयसर्वगतेदेविकालरात्रिनमोस्तु ते ॥२॥ मधुकैटभविद्राविविधातृवरदेनमः ।। रूपंदेहिजयं देहियशोदेहिद्विषोजहि ॥३॥ महिषासुरनिर्णाशिभक्तानांसुख- देनमः॥ रूपदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि॥रक्तवीजवधे देविचंडमुंडविनाशिनिरूपदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥६॥ टीका-ॐ नमश्चण्डिकायै । जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कंपा- लिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा तुलारेको नमस्कार ॥ १ ॥ हे देवि हे चामुण्डे तुलारा जय हो हे भूतानिहारिणि तुलारा जय हो हे सर्व- गते तुझारा जयहो हे कालरात्रि तुमको नमस्कार ॥ २ ॥ हे मधुकैटभकों मोह प्राप्त करनेवाली हे ब्रह्माको वर देनेवाली हमको.रूप यो जय यो यश यो हमारे शत्रुओंको मारो ॥३॥ हे महिषासुरको मारनेवाली और हे - कोंको सुख देनेवाली तुमको नमस्कार हमको रूप जय यश द्यो और हमारे शत्रुओंको मारो॥४॥ हे रक्तवीजको मारनेवाली हे चण्डमुण्डको विनाश करनेवाली हमको रूप, जय, यश यो और हमारे शत्रुओंको मारो ॥५॥ शुभस्यैवनिशुंभस्य धूम्राक्षस्यचमर्दिनि॥रूपंदेहिजयं देहिय- शोदेहिद्विपोजहि ॥ ६॥ वन्दितांत्रियुगेदेविसर्वसौभाग्यदायि निरूपं देहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥७॥अचिन्त्यरूपचरि तेसर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥८॥ नतेभ्यःसर्वदाभत्त्याचण्डिकेदुरितापहे । रूपंदेहिजयंदेहिय शोदेहिद्विपोजहि ॥९॥ स्तुपयोभक्तिपूर्वत्वांचण्डिकेव्याधिना शिनि ।। रूपंदेहिजयंदेदियशोदेहिद्विपोजहि ॥१०॥ - भापाटीकासमन्वितम्। (११) टीका-हे शुंच और निशुंन और धूम्राक्ष इनका नाश करने वाली हमको रूप, जय, यश यो और हमारे शत्रुओंको मारो॥६॥हे वन्दित, पादयुग्म जिसके ऐसी हे सर्व सोनाग्यकी देनेवाली हमकों रूप,जय, यश यो और हमारे शत्रुओं- को मारो ॥७॥ नहीं चितवन किये जाय रूप और चरित्र जाके ऐसी हे देवि और हे सर्व शत्रुओंका विनाश करनेवाली हमको रूप, जय, यश द्यो और शत्रुओंको मारो ॥ ८ ॥ हे चण्डिके हे पापोंको नाश करनेवाली सर्वकाल भक्ति करके नत जे हम हैं हमको रूप, जय, यश दो और शत्रुओंको मारो ॥९॥हे चण्डिके हे व्याधिनाशिनी भक्तिपूर्वक स्तुति कर्ने हुएको रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १० ॥ चण्डिकेसततयेत्वामर्चयंतीहभक्तितः ॥ रूपदेहिजयदेहिय- शोदेहिद्विपोजहि॥११॥देहिसौभाग्यमारोग्यं देहिमेपरमसुखं ।। रूपंदेहिजयदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥१२॥ विधेहिदिपतांनाशं विधेहिबलमुच्चकैारूपदेहिनयंदेहियशोदेहि द्विषोजहि ॥१३॥ विधेहिदेविकल्याणविधेहिपरमांश्रियं ॥ रूपंदेहिजयंदेहिय. शोदेहिद्विपोजहि ॥११॥ सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके रूपंदेहि जयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥१५॥ टीका-हे चण्डिके इस भूलोकके विषे जे कोई भक्तिसे तुमको पूजते हैं तिनको रूप, जय, यश यो और तिनके शत्रुओंको मारो ॥ १३॥ हे देवि हमको सौभाग्य, आरोग्य, उत्तम सुख यो और रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १२॥ हे देवि शत्रुओंको नाश करो हे देवि वढा पराक्रम करो और रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १३ ॥ और हे देवि कल्याण, उत्कृष्ट लक्ष्मी करो और रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १४॥ और मुर और असुर इनके शिरोरन करके निघृष्ट है चरण जाके ऐसी तुम हे अंधिके रूप, जय, यश यो और शत्रुओंको मारो ॥१५॥ " (१२) अंगला स्तोत्रम् । विद्यावन्तयशस्वन्तलक्ष्मीवंतजनकुरु ॥रूपदेहिजयदेहियशों देहिद्विपोजहि ॥१६॥ प्रचण्डदैत्यदर्पनेचण्डिकेंप्रणताय ॥.. रूपैदेहिजयदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥१७॥ चतुर्भुजेचतुर्वक्रस स्तुतेपरमेश्वरि ।। रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि ॥१८॥ कृष्णेनसंस्तुतेदेविशश्वद्भक्त्यांसदाम्बिके । रूपंदेहिजयदेहि यशोदेहिद्विपोजहि ॥ १९॥ हिमाचलसुतानाथसस्तुतेपरमे- वरि ॥ रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥२०॥ टीका-और विद्यावान् लक्ष्मीवान् और यशस्वी पुरुष मेरेको करो और रूप जय यश यो और शत्रुओंकों मारो ॥ १६॥ और हे प्रचण्ड दै- त्योंका गर्वविध्वंसनकरनेवाली हेचण्डिके भक्तिसे प्रणत जो मेहुँ तिसको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १७ ॥ हे चार मुंजावाली हेब्रह्म- संस्तुते हेपरमेश्वरि हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥ १८॥ और हे कृष्णकरके निरंतर भक्ति से सदा स्तुति किईहुई हे अंबिके हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो॥ १९॥ और हे शिक्करके स्तुति किईहुई हेपरमेश्वरि हमको रूप जय यश यो और शत्रुओंको मारो ॥२०॥ इन्द्राणीपतिसद्भावपूजितेपरमेश्वरि ॥ रूपदेहिजयं देहियशो- देहिद्विपोजहि ॥२१॥ देविप्रचण्डदोर्दडदैत्यदर्पविनाशिनी॥ रूपदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विपोजहि ॥२२॥ देविभक्तजनोद्दा मदत्तानन्दोदयेम्बिके । रूपंदेहिजयदेहियशोदेहिद्विपोजहि॥ ॥२३॥ पत्नीमनोरमांदेहिमनोवृत्तानुसारिणीम् ॥ तारिणी दुर्गसंसारसागरस्यकुलोद्भवाम् ॥२१॥ इदंस्तोत्रंपठित्वातुम हास्तोत्रपठेन्नरः॥सतुसप्तशतीसंख्यावरमाप्नोतिसम्पदाम्॥२५॥ इतिमार्कण्डेयपुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥२॥ टीका-और हेइंशणि हे पतिसदायपूजिते हेपरमेश्वार हमकों रूप जय भाषाटीकासमन्वितम् । (१३) यश यो और शत्रुओंकों मारो ॥ २१ ॥ हेदेवि हेप्रचण्डभुजदण्डों करके दैत्योंका गर्वविध्वंस करनेवाली हमकों रूप जय यश दो और शत्रुओंको मारो ॥ २२॥ हे देवि हातजनोंको अत्यन्त दियोहै आनन्दोदय जाने ऐसी तुम हमको रूप जय यश दो और शत्रुओंकों मारो ॥ २३ ॥ और देवि मनकों रंजन करनेवाली और हमारे मनके वृत्तान्तके अनुकूल चलनेवाली और दुर्गम संसाररूपी सागरके मध्यमें तरानेवाली ऐसी पनी हम कों दो ॥ २४ ॥ और जो मनुष्य इसस्तोत्रकों पढके महास्तोत्र पढे वह मनुष्य संपत्तियोंका सप्तशतीसंख्यावरको प्राप्तहोवे ॥ २५ ॥ इति मार्कण्डेय पुराणे अर्गलास्तोत्रं समाप्तम् ॥ इति अर्गलास्तोत्रम्।
- श्री। अथ कीलकस्तोत्रम् । ॐ नमश्चण्डिकायै ॥ मार्कण्डेय उवाच ।। विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ॥ श्रेय प्राप्तिनिमित्तायनमःसोमार्द्धधारिणे ॥१॥ सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामपिकीलकम्।।सोपिक्षेमम वाप्नोतिसततंजाप्यतत्परः॥ २॥ सिद्धयन्त्युच्चाटनादीनिवस्तू निसकलान्यपि ॥ एतेनस्तुवतादेवीस्तोत्रमात्रेणसिद्धयति३॥ नमंत्रंनौपधंतत्रनकिञ्चिदपिविद्यते ॥ विनाजाप्येनसिद्धये तसर्वमुच्चाटनादिकम् ॥ ४॥ समग्राण्यपिसिद्ध्यंतिलोकशं कामिमांहरः ॥ कृत्वानिमंत्रयामाससर्वमेवमिदंशुभम् ॥५॥ टीका-ॐनमश्चण्डिकायै। मार्कण्डेयपि जैमिनीसे वर्णन करतेनये परंतु प्रथमशिवकों नमस्कार किया कैसै कि विशुद्धज्ञानहै देह जिनका और तीनों वेदह दिव्यनेत्र जिनके और कल्याणप्राप्तिको कारण और अर्द्धचंद्रको मस्तकमें धारणकरनेवाले ऐसे शिवको नमस्कार ॥ १॥ फिर कहनेलगे भ- नुष्य मन्त्रोंकानी यह संपूर्ण कीलक जानों जो निरन्तर इसके जाप्यमें तत्पर रहताहै सो निश्चयकार क्षेमको प्रातहोताहै ॥ २ ॥ और इसके जपमात्रसे उच्चाटन आदि कृत्य सिद्धहोतेहै और यावत्संपूर्ण वस्तुभी सिद्धहोतीहै और इसकरके स्तुति करतेहुओंके देवी स्तोत्रमात्रकरके सिद्धहोतीहै ॥ ३ ॥ और नमन्त्र और न औपध कुछजी तिसके जाप्यके विना सिद्ध नहीं होवे और तिसी प्रकार संपूर्ण उच्चाटनादिक सिद्ध न होवें ॥४॥ फिरइन मन्त्रोंके प्रभावसे निश्च- यकरि संपूर्णपस्तु सिद्धहोतीहै तो लोकमें परस्पर ईर्ष्याकरके अन्याय होजा- यगाइस लोकशंकाकोजानिक शिवजी सामन्त्रसमुदायकों कीलितकिया॥५॥ स्तोत्रवेचण्डिकायास्तुतच्चगुप्तंचकारसः ॥ समाप्नोतिसपुण्ये- नतायथावनियन्त्रणाम् ॥ ६ ॥ सोपिशेममवामोतिसर्वमेवन- भापाटीकासमन्वितम् । (१५) संशयः ॥ कृष्णायांवाचतुर्दश्यामष्टम्यांवासमाहितः ॥७॥ ददातिप्रतिगृह्णातिनान्यथैषाप्रसिद्धयति । इत्थंरूपेणकीलेन महादेवेनकीलितम् ।। ८॥ यो निष्कीलां विधायैनांनित्यंज पतिसंस्फुट । प्रसिद्धःसगणस्सोपिगन्धर्वोजायतेनरः ॥९॥ नचैवाप्यटतस्तस्यभयंकापिहिजायते ॥ नाऽपमृत्युवशंया तिमृतोमोक्षमवाप्नुयात् ॥१०॥ टीका-और चंडिकास्तोत्रकों गुप्तकिया और जो पुण्यवान् मनुष्यहै सो पुण्यके प्रभावकरके उस यथावत् नियंत्रणाको प्रातहोताहै ॥६॥ और जो पुरुष कृष्णपक्षकी अष्टमीके और चतुर्दशीके विपे विधिसे सप्तशतीको उपदेश देताहै अथवा ग्रहणक है वह पुरुष निश्चयकरि क्षेमको प्राप्तहोताहै और प्रकारसे यह भगवती सिद्ध नही होतीहै इस प्रकारके कीलककरके शिवजीने मन्त्रसमूहको कीलितकिया ॥ ७ ॥ ८ ॥ और जो पुरुष उत्की- लितकरके सुंदरप्रकारसे सप्तशतीकों जपताहै सो प्रसिद्ध और गणकरके स- हित गन्धर्व होताहै ॥ ९ ॥ और विचरते हुए उस पुरुषको मार्गमें कहूँ भय उत्पन्न नहीं होताहै और वह मनुष्य अपमृत्युके वश नहीं प्राप्तहोताहै और मरतेही मोक्षको प्राप्तहोताहै ।। १० ॥ ज्ञात्वाप्रारभ्यकुर्वीतनकुर्वाणोविनश्यति ॥ ततोज्ञात्वैवसम्प नमिदम्प्रारभ्यतेबुधैः॥ ११॥ सौभाग्यादिचयत्किश्चिदृश्यते ललनाजने ॥ तत्सर्वतत्प्रसादेनतेनजाप्यमिदंशुभम् ॥१२॥ शनैस्तुजप्यमानेस्मिन्स्तोसम्पत्तिरुच्चकैः॥ भवत्येवसमग्रा पिततःप्रारभ्यमेवतत् ॥ १३॥ ऐश्वर्ययत्प्रसादेनसौभाग्या, रोग्यसम्पदः॥ शत्रुहानिःपरोमोक्षःस्तूयतेसानकिंजनः॥१४॥ इति भगवत्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम् ॥३॥शुभभूयात् ॥ टीका-मनुष्य निश्चयात्मक जानिके भौर विधिसे प्रारंभ करके सप्तश- कीलकस्तोत्रम् । तीको अनुष्ठानकरे और विधिसे अनुष्ठान नहीक हुवा मनुष्य नाशको प्राप्त होताहै तिसकारणसे इसको विधान सहित जानिकेही विद्वान प्रारंभ कर्नेहै ॥११॥और जो कुछ सौभाग्य आदि स्त्रीजनमें दीखताहै वह सब तुहारी रूपा करके है तिसकारणसे तुलारा यह शुभस्तोत्र जपना चहिए ॥ १२ ॥ और धीरेसे यह सप्तशतीस्तोत्र जपे जाते संते अथवा उच्चस्वरसे जपेजाते सन्ते निश्वयकरि मनुष्यके समग्र संपत्ति होतीहै और तबसे लेकरही जिसकी कपासे ऐश्वर्य सौभाग्य आरोग्य संपत्ति ये होतीहै फिर वह भगवती क्या मनुष्यो करके नहीस्तुति किई जाती है किन्तु किईही जातीहै ॥ २४ ॥ इति भगव- त्याः कीलकस्तोत्रं समाप्तम् ॥ ३॥ इति कीलकस्तोत्रं समाप्तम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराजश्रीकृष्णदास श्रीवेङ्कटेश्वर" छापखाना (मुंबई.)
श्रीः।
अथ दुर्गासप्तशती
भापाटीकासमेता।
मार्कण्डेय उवाच।
सावणिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः॥ निशामयतदु-
त्पत्तिविस्तराद्गदतोमम ॥१॥ महामायानुभावेनयथामन्वं-
तराधिपः । सबभूवमहाभागः सावर्णिस्तनयोरवः ॥ २ ॥
स्वारोचितरेपूर्वचैत्रवंशसमुद्भवः ॥ सुरथोनामराजाभूत्सम-
तेक्षितिमण्डले ॥३॥ तस्यपालयतःसम्यक्प्रजाः पुत्रानि-
चौरसान् ॥ वभूवुःशवयोभूपाः कोलाविध्वंसिनस्तदा ॥ ४ ॥
श्रीगणेशाय नमः॥श्रीकृष्णचन्द्रो विजयतेतराम् ॥अथ नापाटीकेयं सप्त-
शत्याः॥ एक समय तपस्या करते हुये महात्मा मुनियोंमें श्रेष्ठ ऐसे जो मार्क-
ण्डेय ऋपि तिनसे बड़े तेजस्वी व्यासजीके शिष्य जैमिनि ऋपि प्रश्न करते पये
हे मार्कण्डेय बुद्धिमानोमें श्रेष्ठ सब शास्त्र में निपुण सब माहात्म्यनमें बड़ा
उत्तम जो देवीका माहात्य है ताहि श्रवण करिवेकी मेरी इच्छा है सो आप
रुपा करि वर्णनकरो तब मार्कण्डेय ऋपि बोले हे जैमिनि तुमसे एक कथा-
प्रसंग ऐसा वर्णन करूंहूँ ताके बीचमें देवीहीको बहुत माहात्म्य है ताहि तुम
श्रवण करो व्यासआदि ऋपियोंने सूर्यका पुत्र सावर्णि नाम आठवाँ मनु
कहा है ताकी उत्पत्ति विस्तारपूर्वक हमसे श्रवण करो॥१॥ वह सूर्यका पुत्र
सावर्णि मनु महामाया भगवतीकी कपासे जैसे आठवाँ मन्वन्तरका स्वामी
होताया तैसे आप चरित्र श्रवण करो ॥ २ ॥ पहिले स्वारोचिप मन्वन्त-
रके मध्यमें चैत्रवंशमें उत्पन्न संपूर्ण भूमण्डलमें चक्रवर्ती सुरथ नाम राजा
होता जया ॥ ३ ॥ कैसा है वह राजा कि प्रजावोंकी पालना पुत्रोकॅीसी तरह
करनेवाला ताकी राजधानी नष्ट करनेके लिये यवन भूप शत्रु बन संग्राम वास्ते
तयार होते भये ॥४॥
(२) सप्तशतीमापाटीका। तस्यतैरभवद्युद्धमतिप्रवलदण्डिनः ॥ न्यूनेरपिसतैर्युद्धको- लाविध्वंसिभिजितः॥६॥ ततःस्वपुरमायातोनिजदेशाधि- पोभवत् ॥ आक्रान्तः समहाभागस्तैस्तदाप्रवलारिभिः॥६॥ अमात्यैर्वलिभिर्दुरैर्दुलस्यदुरात्मभिः ॥ कोशोषलंचापह- तंतत्रापिस्वपुरेततः ॥७॥ ततोमृगयाव्याजेनतस्वाम्यः सभूपतिः॥ एकाकीहयमारुह्यजगामगहनंवनं ॥८॥ टी०- फिर राजाका शत्रुवोंके साथ बड़ा युद्ध हुवा वह राजा महा प्रबल शत्रुवोंको वश करनेवालानी था परन्तु दैवयोगते निर्बलोनेनी राजाको जीत लिया ॥५॥ पीछे संग्रामभूमिमें शत्रुवोंसे हार कर अपनी नगरी में आते भये अपनो देशहीका स्वामी होताया ॥६॥ फिर उस नगरीके विपे दुर्बल वसता हुवा राजा ताका राज्य हरणके लिये दुष्ट मंत्रियोंने फौज खजाना सब अपने वश करलिये ॥ ७ ॥ ऐसे जब राजाका सर्वस्व ले लिया ताके अनन्तर घोड़ापर बैठ शिकारका बहाना लेकर अकेला गंभीर वनको जाता भया ॥८॥ सतत्राश्रममद्राक्षीद्विजवर्यस्यमेधसः ॥ प्रशांतश्चापदाकीर्ण मुनिशिष्योपशोभित ॥९॥ तस्थौकंचित्सकालंचमुनिना तेनसत्कृतः ।। इतश्वेतश्चविचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥१०॥ सोचिंतयत्तदातवममत्त्वाकृष्टमानसः ॥ मत्पूर्व पालितंपूर्वम- याहीनंपुरंहितत् ॥ ममृत्यैस्तैरसदृत्तैर्धर्मतःपाल्यतेनवा ॥ ॥११॥ नजानेसप्रधानोमेशूरहस्तीसदामदः ॥ ममवैरिवशं यातःकान्भोगानुपलप्स्यते ॥१२॥ टी-फिर वा वनके विषे पशुहिंसासे रहित शान्त स्वभाववाले सिंह वगैरह करिके युक्त मुनिकी शिष्यमण्डलीसे शोभित ऐसा सुमेधा ऋपिका आश्रम देखतानया ॥ ९ ॥ ताके अनन्तर जहां तहां विचरताहुवा मुनिके अध्याय (३) आश्रममें पहुँचता जया मुनिने कोमल वचनोंसे राजाका सत्कार किया पश्चात् कुछ काल ता आश्रममें राजा निवासनी करता भया ॥ १० ॥ तब वा आश्रमके विपे ममता करिकै व्याकुल है बुद्धि जिसकी ऐसा जो सुरथ राजा है सो चिन्ता करता भया कि हाय ! जो पुर पहिले मेरे बड़ोंने वसा कर पालन कियाथा सो पुर मेरेसे शत्रुवोंने ले लिया फिर इस प्रकार मनमें विचार करने लगा कि निश्चय करिकै दुष्ट है चरित्र जिनके ऐसे मेरे मंत्रियोंसे आदि लेकर जे नौकर हैं वे मेरे पुरकी धर्मपूर्वक पालना करतेहैं या नहीं॥ ११ ॥ और मेरा शूर हस्ती जो सदा मत्त रहता था वह मेरा शत्रुवोंके वश होकर कौनसे भोग भोगता होगा ॥ १२ ॥ येममानुगतानित्यंप्रसादधनभोजनैः॥ अनुवृत्तिधुवंतेद्यकुर्व- त्यन्यमहीभृताम् ॥ १३ ॥ असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततंव्ययम्। सचिंतःसोतिदुःखेनक्षयंकोशोगमिष्यति॥१४॥ एतच्चान्यच्चसततंचिंतयामासपार्थिवः ॥ तत्रविप्राश्रमाभ्याशे वैश्यमेकंददर्शसः॥ १५ ॥ सपृष्टस्तेनकस्त्वंभोहेतुश्चागम- नेत्रकः ॥ सशोकइवकस्मात्त्वंदुर्मनाइवलक्ष्यसे ॥ १६॥ टीका-और जे मेरे सेवक धन भोजनादिक से संतुष्ट थे वे अनाथ और राजायोंकी निश्चय करिक सेवा करते होंगे ॥ १३॥ और बड़े दुःखसे संचय कियाहुवा जो खजानाहै सो अब बुरीरीतिसें खर्च करनेवाले मंत्रियोंकरिके नष्ट होजायगा ॥ १४ ॥ इन बातोंकों तथा अन्य बातोको शोच करिकै रा- जा शोकयुक्त चिन्ता करताजया ता समय वा आश्रमके समीप राजा एक वेश्यको देखतामया ॥१५॥और पूछने लगा कि हेलाई! तुम कौनहो ? किस- कारणसे इस अश्रममें तुझारा आगमन हुवा ? किसकारणसे तुम शोकयुक्तसे दीखतेहो और विमनसे कैसे दीखवेहो ॥ १६॥ इत्याकर्ण्यवचस्तस्यभूपते प्रणयोदितम् ॥ प्रत्युवाचसतवै- श्यःप्रश्रयावनतोनृपं ॥ १७ ॥ वैश्यउवाच ।। समाधिर्नाम सप्तशतीमापाटीका। वैश्योहमुत्पन्नोपनिनांकुले॥ पुत्रदारैर्निरस्तञ्चधनलोभादसा- धुभिः॥ १८॥ विहीनश्चधनैर्दारैःपुत्रैरादायमेधनम् ॥ वनम- भ्यागतोदुःखीनिरस्तश्चाप्तबन्धुभिः ॥ १९॥ सोहनवेमिपुत्रा- णांकुशलाकुशलात्मिकाम् ।। प्रवृत्तिस्वजनानांचदाराणांचा- संस्थितः॥२०॥ टीका-ऐसे कोमल वचन राजाके श्रवण करिकै वैश्य विनयपूर्वक वो- लतालया॥१७॥वैश्य बोला हे राजन् मैं समाधिनाम वैश्यहूँ और धनवानोंके वंशमें उत्पन्न हुवाहूँ धनलोजसे पुत्र स्त्री स्वजनों करिकै तिरस्कृतहूँ॥१८॥और संपूर्ण खी पुत्र बंधु परिवारने मेरा धन छीनकर तिरस्कार किया सो धनहीन दुःखी होकर दशोंदिशॉमें चमताहुवा वनमें आयाहूँ और पुत्रादिकंनसे वियु- क्तहूं इसकारणसे मैं शोकयुक्तहूँ ॥ १९॥ और मैं या वनके बीचमें स्थित हुवा स्त्री पुत्र मित्रादिकनकी कुशल क्षेमकी वार्ताभी नहीं जानताहूँ॥२०॥ किंनुतेपांगृहेक्षेममक्षेमंकिंनुसांप्रतम् ॥ कथंतेकिंनुसदृत्तादुर्घ- त्ता:किनुमसुताः॥ २१॥ राजोवाच ॥ निरस्तोभवाल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनातेपुकिंभवतः स्नेहमनुवन्नातिमानसम्२२ वैश्यउवाच ॥ एवमेतद्यथाप्राहभवानस्मद्गतंवचः॥ किंकरो मिनबध्नाति ममनिठुरतांमनः॥ २३ ॥ यैःसन्त्यज्यपितृस्ने हंधनलुब्धैनिराकृतः॥पतिस्वजनहादैचहार्दितेष्वेवमेमनः॥२४॥ टीका- और स्त्री पुत्र बंधु जनोंके घरमें कुशलहै या नहीं अब यह वार्ता कैसे निश्चय करूं वे मेरे पुत्र जे हैं ते सुमार्गमे हैं या कुमार्यमें यह दोनो यानी मेरेकों कैसे निश्चय होय ॥ २१ ॥ तब सुरथराजा बोलते ये कि हे वैश्य ! धनके लोमते स्त्री पुत्रादिकोंने तुलारा निरादर किया ऐसे कुटिल स्त्री पुत्रादिकनके विपे तुह्मारा चित्त स्नेह कैसे करताहै ॥ २२ ॥ वैश्यने कहा कि 'हे राजन् ! जैसा आपने कहा वह ऐसाही है परंतु मैं क्या करूं मेरा मन कठोर- ताको नहीं धारणकरता ॥ २३ ॥ धनके लोभी जिन दुष्टोंने पिताका स्नेह अध्याय १ (५) और स्त्रीने पतिका स्नेह छोडकर मुझको निकालदिया फिर जो विनमेंही मेरा मन स्नेहयुक्तहै ॥ २४॥ किमेतन्नाभिजानामिजाननपिमहामते ॥ यत्प्रेमप्रवर्णचित्तवि गुणेष्वपिबंधुषु ॥२५ ।। तेपांकृतेमेनिःश्वासोदोर्मनस्यंचना- यते ॥ करोमिकियनमनस्तेष्वप्रीतिधुनिष्ठुरम् ॥ २६ ॥ मार्कडेयउवाच ॥ ततस्तौसहितौविप्रतमुनिसमुपस्थितौ ॥ समाधिर्नामवैश्योसौसचपार्थिवसत्तमः ॥२७ ॥ कृत्वातुतौ यथान्यायंयहितेनसंविदम् ॥ उपविष्टोकथा-काश्चिचक्रतु श्यपार्थिवौ ॥ २८ ॥ टीका-हेराजन् ! गुण करिके हीन जे मेरे वन्धु हैं तिनके विपेजी मेरा चित्त प्रेमयुक्तहै यह जानताहुवानी में चित्तको रोक नहींसकताहूँ ॥ २५ ॥ हे राजन् और मेरे विपे जिनकी प्रीति नहीं ऐसे जे मेरे पुत्रादिक, तिनके लिये मेरेको शोक और चित्तको ग्लानि में क्याकरूं मेरा चित्त उनके विपे कठोरता धारण नहीं करताहै ॥ २६ ॥ मार्कण्डेयऋपि बोले- हेजैमिनि ता प्रसंगके अनंतर मित्रनावसे समाधिनाम वैश्य और सुरथराजा ये दोनो सुमे धाकपिके समीप जा पहुँचे ॥ २७ ॥ फिर वे दोनोजनोने यथाशास्त्र और यथायोग्य मुनीश्वरसे संतापणादि किया फिर मुनीने कोमलवाणीसे सत्कार पूर्वक बैठालिये फिर ये मुनीश्वरसे अपने स्वार्थको वार्ता पूंछतेपये ॥२८॥ राजोवाच॥भगवस्त्वामहंप्रष्टुमिच्छाम्येकवदस्वतत् ॥ दुःखा- ययन्मेमनसःस्वचित्तायत्ततांविना ॥२९॥ ममत्वंगतराज्य स्यराज्यांगेष्वखिलेष्वपि ॥ जानतोपियथाज्ञस्यकिमतन्मुनि सत्तम ॥ ३० ॥ अयंचनिकृतःपुत्रैर्दारे त्यैस्तथोज्झितः॥ स्वजनेनचसंत्यक्तस्तेषुहार्दीतथाप्यति ॥३३॥ एवमेपतथाहं चढावप्यत्यंतदुखितौष्टिदोपेपिविपयेममत्वाकृष्टमानसौ३२॥ टीका-राजा बोले कि हे भगवन तुलारेसे एक रहस्य पूछनेकी इच्छा.
(६)
सप्तशतीमापाटीका।
कहूं ताहि तुम कहो मेरे चित्तकी अपने निश्चयात्मक स्वरूपके विपे एका-
ग्रता चिना जो अवस्थाहै सो दुःस देरहीहै ॥ २९ ॥ हे मुनिसत्तम । राज्य
मेरा चलागया यह मैं जानतानाहूँ परंतु स्वामी, अमात्य, सुहृत्, कोश, राष्ट्र
दुर्ग बल ये सात राज्यके अंगहे तिनके विपे मेरी अज्ञानीकीसी तरह ममताहै
सो क्या कारणहै ॥ ३० ॥ और यह जो वैश्यहै सो पुत्र कलत्रादिकन क-
रिकै तथा भात्रादिकन करिकै त्यक्तहै तौभी उनके विपे अति स्नेहवान् है.
॥ ३१ ॥ और हेमुनिसत्तम ! ऐसे यह तथा मैं दोनो दुःसी तहाँ देखाहै
दोष जाके विपे ऐसे राज्यादिकनके विपेनी ममत्व कारकै आधीनहै मन
जिनका ऐसे हमहे ॥३२॥
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहोज्ञानिनोरपि ॥ ममास्यचभवत्ये
पाविवेकांधस्यमूढता ॥३३॥ऋपिरुवाच ॥ ज्ञानमस्तिस
मस्तस्यजंतोपियगोचरे ॥ विषयाश्चमहाभागयांतिचैवपृथ-
पृथक् ॥३४॥ दिवांधाप्राणिन केचिद्राबावंधास्तथापरे।।
केचिदिवातथारात्रौप्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ॥३५॥ ज्ञानिनामनु
जासत्यंकिंनुतेनहिकेवलायतोहिज्ञानिनःसर्वेपशुपक्षिमृगादयः।।
टीका-सो हेमहाभाग हे मुने जिस कारणसे हम दोनो ज्ञानवानोंकोंभी
मोहहै यह क्या कारणहै जामोहते यह विवेकरहित मनुष्यके योग्य जो
अज्ञानता सो हमको होरहीहै ॥ ३३ ॥ तब ऋषि बोले कि हेराजन्। समस्त
प्राणियोंकों इंद्रियके विषयमे ज्ञानहै और मोक्षक विपे ज्ञान नहींहै और हे
महानाग इन्द्रियनकी जे वृत्तिहे ते पृथक् पृथक् विषयताको प्राप्त होरहीहैं
॥३४॥ हेराजन् ! कितेक उलूकादिक प्राणी दिन में दृष्टि हीनहैं और कित्तेक
काकादिक प्राणी रात्रिके विपे दृष्टिहीन, और किचेक प्राणी अश्वसे आदि
लेकर रात्रि दिनके विपे तुल्य दृष्टिवालेहैं ॥ ३५ ॥ हेराजन् ! तुमने कहा कि
'मनुप्य ज्ञानी, सो सत्यहै परंतु केवल मनुष्यही ज्ञानी नहींहै किन्तु मनुष्योते
अन्य पशु पक्षी मृगादिक ये सब ज्ञानी हैं ॥ ३६॥
अध्याय १
(७)
ज्ञानंचतन्मनुष्याणांयत्तेपांमृगपक्षिणाम्।।मनुष्याणांचयत्तेपां
तुल्यमन्यत्तथोभयोः॥३७॥ज्ञानेपिसतिपश्यैतान्पतङ्गा छा-
वचंचुपुकणमोक्षाहतान्मोहात्पीड्यमानानपिक्षुषा ॥ ३८॥
मानुपामनुजव्याघ्रसाभिलापा सुतान्प्रति ॥ लोभात्मत्युपका
रायनन्वेतान्किनपश्यसि ॥३९॥ तथापिममतावतैमोहगत
निपातिताः॥ महामायाप्रभावेणसंसारस्थितिकारिणा ॥४०॥
टी०- हे राजन् ! जो स्वभावोत्पन्न ज्ञान मृग पक्षियोंको है वह मनुष्य-
नको नहीं है और मनुष्यनको जो शास्त्रोक्त ज्ञान है सो मृग पक्षियोंको नहीं
है और आहार निद्रा विपयादि ज्ञान मनुष्य मृग पक्षी इत्यादिकनको समान
है॥३७॥ और हे राजन् क्षुधा करिकै पीडित जे पक्षी हैं तिनको यह ज्ञान-
भी है कि जे कण पुत्रोंके मुसमें गेरिवे योग्य हैं ते कण हम भक्षण करितें तो
क्षुधा हमें बाधा नहीं करें तौजी मोहते अपने पुत्रोंके चंचुवोंमें कण गेरदेते हैं
इतें तुम देखो ॥ ३८ ॥ और हे मनुजव्याव वृद्धावस्थामें ये हमारी सेवा
करेंगे इस प्रयोजनके लोभते पुत्रनके विपे मनुष्य कामनासहित व्है रहैं और
इन्हे पशु पक्षी मृगादिक केवल ममतासेही पुत्रनके विषे आदरयुक्त हैं इन्हे तुम
नहीं देखते हो और पुत्र प्रत्युपकारके लिये नहीं होतेहैं यह क्या तुम नहीं
देखते हो ॥ ३९ ॥ हे राजन् ! तौजी संसारकी पालना करनेवाला ऐसा जो
महामायाका प्रभाव ताने या संसार रूपी समुद्रके ममतारूपी भँवर के
मोहरूपी जो खाडा ताके विषे मनुष्यनको पटकरक्खे है ॥ ४० ॥
तन्नात्रविस्मयकार्योयोगनिद्राजगत्पतेः ॥ महामायाहरेश्चै
पातयासंमोह्यतेजगत् ॥४१॥ ज्ञानिनामपिचेतांसिदेवीभग-
वतीहिसा ॥ बलादाकृष्यमोहायमहामायाप्रयच्छति॥४२॥
तयाविसृज्यतेविश्वंजगदेतच्चराचरम् ॥ सैपाप्रसन्नावरदानृणां
भवतिमुक्तये ॥४३॥ साविद्यापरमामुक्तहेतुभूतासनातनी॥
संसारबंधहेतुश्चसैवसर्वेश्वरेश्वरी॥४४॥
(८) सप्तशतीनापाटीका। टी०- सो या चातके विपे आचर्य करना योग्य नहीं क्यों कि जगतके स्वामी विष्णुकी जो योगनिद्रा महामाया है ताने जगतको मोहित कर रासा है ॥ ४ ॥ हे राजन् ! कैसी है वह महामाया कि उपनिपदोंके विपे वर्णन किया जो ज्ञान है ताका अनुभव करनेवाले ऐसे जे ज्ञानवान पुरुप हैं तिन केभी चित्तनको बलसे बैंच कर ममताके आधीन करती है ॥ ४२॥ फिर हे राजन् ! वह भगवती कैसी है कि ता करिकै समस्त चराचर जगत् रचा जाता है सो यह प्रसन्न होनेसे मनुष्यनको वरदान और मोक्ष देतीहै ॥४३॥ परन्तु हे राजन् उस मायाके दो भेद हैं एक तो विद्या और दूसरी अविद्या जो अविद्या रूपा माया है सो संसारके बन्धनमें कारण है और ब्रह्मादिकन कांनी स्वामिनी है और जो सनातनी विद्या रूपा माया है सो मोक्षका कारण है ॥४४॥ राजोवाच ॥ भगवन्काहिसादेवीमहामायेतियांभवान् ॥ त्र- वीतिकथमुत्पन्नासाकर्मास्याश्चकिद्विज ॥ ४५ ॥ यत्प्रभावा चसादेवीयत्स्वरूपायदुद्भवा ॥ तत्सर्वश्रोतुमिच्छामित्वत्तो ब्रह्मविदांवर ॥ १६ ॥ ऋपिरुवाच ॥ नित्यैवसाजगन्मूर्ति- स्तयासर्वमिदंततम् ॥ तथापितत्समुत्पत्तिर्वहुधाश्रूयतांम म ।।.४७ ॥देवानांकार्यसिद्धयर्थमाविर्भवतिसायदा।। उत्प- त्रेतितदालोकसानित्याप्यभिधीयते ॥ १८ ॥ 'टीका- तब राजा बोले हे भगवन् हे द्विज वह कौनसी देवी है जिसको आप महामाया कहतेहैं और कैसे उत्पन्न भई है इसका क्या कर्म है और क्या पराकम है ॥ ४५ ॥ और हे ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ उस देवीका कैसा सामर्थ्य है और कैसा स्वरूप है और कैसा प्रादुर्भाव है ये संपूर्ण बात तुमसे श्रवण करिवेकी मेरी इच्छा है ॥ ४६ ॥ तब कपि बोले संपूर्ण जगत्की आभयन्त शक्ति का कारकै जगत् रचाहुवा है वह किसी करिकै रचित नहीं है तीनी बहुधा लोकके उपकारके वास्ते पाकी उत्तत्ति मेरेसे श्रवण
अध्याय
(९)
करो॥४७॥ हे राजन् ! जब देवतानके कार्यकी सिद्धिके लिये प्रकट होती
तब वह नित्यत्ती है परन्तु लोकमें उत्पन्न भई है यह कहा जाता है ॥४८॥
योगनिद्रायदाविष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते ॥ आस्तीर्यशेपमभ-
जत्कल्पांतेभगवान्प्रभुः॥४९॥ तदादावसुरौ घोरौ विख्या-
तौमधुकैटभौ॥विष्णुकर्णमलोस्तोहंतुंब्रह्माणमुद्यतौ ॥५०॥
सनाभिकमलेविष्णो:स्थितोब्रह्माप्रजापतिः ॥ दृष्ट्वातावसुरौ
चोग्रोप्रसुप्तचजनार्दनम् ॥५१॥ तुष्टावयोगनिद्रांतामेकाय-
हृदयःस्थितः ॥ विवोधनार्थायहरेहरिनेत्रकृतालयां ॥५२ ॥
टीका-हे राजन् ब्रह्माके दिनके अनन्तर जो प्रलय ताकेरिपे जब
सात समुद्र करिके जुदा जुदा स्थापन किया हुवा जगत् एकार्णवताको प्राप्त
हो गया ता समयकवि भगवान् ऐश्वर्यादिकनकरिकै सहित शेपशय्या
बिछाय कर योगनिद्राका सेवन करते भये अर्थात् शयन करते भये ॥१९॥
ता शयनसमयकेविपे विष्णुके कानों के मैलसे मधु और कैटज ये दो दैत्य
उत्पन्न होते भये और ब्रह्माके मारनेको तयारभये ॥ ५० ॥ तब वह ब्रह्मा
विष्णुको नाभिकमलमें स्थित हुवा बड़े भयंकर असुरोंको देखकर और भग-
वान्को योगनिद्रासे शयन करता हुवा देखकर ॥५१॥ एकाय चित्त होयकर
विष्णुके जगानेके लिये हरिके नेत्रोंमें किया है निवास जाने ऐसी जो योग-
निद्रा है ताकी स्तुति करतो भयो ॥ ५२ ॥
विश्वेश्वरीजगद्धात्रीस्थितिसंहारकारिणीम् ॥ निद्राभगवतींवि
ष्णोरतुलांतेजसम्प्रभुः ॥५३॥ ब्रह्मोवाच ॥ त्वंस्वाहात्वं
स्वधात्वंहिवपट्कार स्वरात्मिका ॥ सुधात्वमक्षरेनित्यविधा
मावात्मिकास्थिता ॥ ५४ ॥ अर्धमात्रास्थितानित्यायानु
चार्याविशेपतः त्वमेवसंध्यासावित्रीत्वंदेविजननीपरा।दिद।
त्वयैतद्धार्यतेविश्वत्वयैतत्सृज्यतेजगत् ॥ त्वयैतत्पाल्यतेदे-
वित्वमत्स्यतेचसर्वदा ॥५६॥
(१०) सप्तशतीमापारीका। टीका- ब्रह्मा बोले अनंत है तेज जिनका ऐसे जे विष्णु तिनकी योग- निद्रा जो तुम हो तुह्मारी में स्तुति करता हूँ कैसी हो आप संसारकी रचने- वाली फिर कैसी हो आप जगत्का पोपण करनेवाली फिर कैसी हो आप जगत्का पालन और संहार करनेवाली ॥५३॥ फिर कैसी हो आप देव- तावों को हविनमें स्वाहा मन्त्ररूप हो और पित्रीश्वरोको अन्नदानमें स्वधा मन्त्ररूप हो और वषट्काररूप हो अर्थात् यज्ञरूप हो फिर कैसी हो तुम अकारसे आदि लेकर जे सोलह स्वर हैं तेई हैं स्वरूप जाको ऐसी हो फिर कैसी हो देवतावोंके अन्नस्वरूप हो हे वृद्धि हास करिके रहित हे नित्ये ब्राह्मी वैष्णवी माहेश्वरी ये लोकमाता है स्वरूप.जाको इस तरह तीन प्रका- रसे विराजमान हो ॥ ५४ ॥ हे भगवती फिर तुम कसी हो जागृत्, स्वम , सुषुप्ति इन तीन अवस्थासे जुदी चौथी अवस्थाको प्राप्त ॐकारकेविषे अर्ध- मात्रारूप विराजमान हो और नित्य हो और आप परमात्मस्वरूप हो यति विशेपकरिकै वर्णन नहीं करी जाती हो फिर कैसी हो संध्यारूप हो और सावित्री रूप हो और वेदोंकी माता गायत्रीरूप तुम हो ॥५५॥ फिर कैसी हो संपूर्ण जगत्को धारण करती हो और ब्राह्मी शक्तिरूपकरिके जगत रचती हो और वैष्णवी शक्तिरूपसे पालना करती हो और माहेश्वरी शक्ति रूपसे प्रलयविपे जगत्का संहार करती हो फिर भक्तोंको सर्व वस्तु देतीहो५६॥ विसृष्टौसृष्टिरूपात्वंस्थितिरूपाचपालने ॥ तथासंहतिरूपां- तेजगतोस्यजगन्मये ॥ १७ ॥ महाविद्यामहामायामहामे- धामहास्मृतिः॥ महामोहाचभवत्तीमहादेवीमहेश्वरी।।प्रकृति- स्त्वंचसर्वस्यगुणत्रयविभाविनी।।५८॥कालरात्रिर्महारात्रिों- हरात्रिश्चदारुणा ॥५९ ॥ त्वंश्रीस्त्वमीश्वरीत्वंहीस्त्वं बुद्धि- वोधलक्षणालिज्जापुष्टिस्तथातुष्टिस्त्वंशांतिःक्षातिरेवच ६०॥ टीका-हे जगन्मये फिर कैसी हो विशेषकरिकै जगत्के रचनेमें सृष्टि- रूप तुम हो और पालनेविपे स्थितिरूप हो और संहारकेविप संहतिरूप
अध्याय
(११)
हो ॥ ५७ ॥ और परब्रह्मको जाननेवाला ज्ञानरूप तुम हो और शरीरादि-
कोंके विपे जो आत्मबुद्धि ऐसी महामायारूप तुम हो और ध्यानरूप हो
और महाममतारूप हो ऐश्वर्य युक्त हो और समस्त देवशक्तिरूप हो और
हिरण्याक्षादि शक्तिरूप हो ॥५८ ॥ जाके विपे विश्वको लय होय ऐसी
कालरात्रि रूप तुम हो और जाके विपे ब्रह्माको मोक्ष होय ऐसी महारात्रि
रूप तुम हो और संसारको रचनेवाली मोहरात्रिरूप तुम हो ॥५९॥ फिर कैसी
हो श्री लक्ष्मीबीजरूप हो क्लीं कामवीजरूप तुमहो त्वं हीः अर्थाद तुम भुवनेशी
बीजरूपतुम हो निर्णयात्मक है स्वरूप जाको ऐसा अंतःकरणरूपी तुम हो और
लज्जारूप हो पुष्टिरूप हो संतोप रूप हो शांतिरूप हो अर्थात् विपयोंसे इन्द्रि-
योंका त्यागरूपी तुम हो और शांतिरूप हो अर्थात् सामर्थ्य होता सता अप-
राध सहिष्णुतारूपी तुम हो ॥ ६० ॥
खङ्गिनोशूलिनीपोरागदिनीचक्रिणीतथा ॥ शंखिनीचापिनी-
वाणभुशुंडीपरिघायुधा ॥ ६१ ॥ सौम्यासौम्यतराशेपसौ-
म्येभ्यस्त्वतिसुंदरी॥परापराणांपरमात्वमेवपरमेश्वरी॥६२॥
यचकिंचित्कचिदस्तुसदसदाखिलात्मिके ॥ तस्यसर्वस्यया
शक्ति सात्वकिस्तूयसेमया॥६३||ययात्वयाजगत्स्रष्टाजगत्पा-
त्यत्तियोजगतासोपिनिद्रावशनीतःकस्त्वांस्तोतुमिहेश्वरः ६॥
टीका-खड्ग, त्रिशूल, गदो, चक्र, शंख, धनुष, बाण, भुशुंडी, परिघ इन।
शस्त्रोंको धारण करनेवालीहो और एक शत्रुको मुंड लेराखो याते बडी भयं-
कर रूपहो ॥६१॥ फिर कैसीहो भक्तोंकेविषे सौम्यरूप अर्थात् शांतरूपहे
और दैत्योंके क्रूररूपहो और संपूर्ण सुन्दर वस्तुवोंसे बड़ी सुन्दरहो और
पश्यंती मध्यमा वैखरी इनका बीज रूप हो उल्लष्ट जैहैं तिनमें परमप्रधान
तुमही हो याते तुम परमेश्वराहो ॥६२॥ हे आखिलामिक देवि या जगत्के
विपे जो कुछ कहूँ सत् असद वस्तु प्रतीत होताहै ना संपूर्णकी शक्ति अर्था-
र सामर्थ्य तुमहीं हो पाते अस्मदादिकरिकै कैसे स्तुति कियेजावो ॥ ६३ ॥
" (१२) सप्तशतीजापाटीका। और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्ररूप कारकै जगत्का उत्पत्ति पालन संहार करनेवाला जो भगवान है सोनी तुमने निद्राके वशकरदिया याते तुलारी स्तुति करनेको कौन समर्थहै ।। ६४॥ विष्णुःशरीरग्रहणमहमीशानएवच ॥ कारितास्तेयतोतस्त्वां कास्तोतुं शक्तिमान्भवेत् ॥६५॥ सात्वमित्थंप्रभावःस्वैरु- दारदेविसंस्तुता ॥ मोहयतादुराधावसुरोमधुकैटभो ॥६६॥ प्रबोधचजगत्स्वामीनीयतामच्युतोलघु ॥बोधश्चक्रियतामस्य हंतुमेतौमहासुरौ॥६७॥ ऋपिरुवाच ॥ एवंस्तुतातदादेवी तामसीतत्रवेधसा॥विष्णोः प्रबोधनार्थायनिहंतुंमधुकैटभौ॥६॥ टोका-फिर कैसीहो विष्णु और मै और रुद्र इनकोनी तुमने शरीर धारण करवादिया ऐसी महामाया जो आपहो आपकी स्तुति करनेको कौन समर्थहोय ॥६५॥ ऐसे उदार अपने माहात्म्योंकरिकै स्तुतिकीगई ऐसी जो तुम हो ये बडे भयंकर जे मधुकैटन दैत्य हैं तिनको मोहनकरो ॥६६ ॥ हे देवि जगत्का स्वामी जो विष्णुहै ताको शीध जगावो और मधुकैटभको मारनेको भगवतकी बुद्धिको उत्साह करो ॥६७ ॥ तब ऋषि बोले हे राज- न या रीतिसे जब ब्रह्माने भगवतीकी स्तुति करो तब योगनिद्रा भगवती विष्णुको जगानेके लिये और मधुकैटन दैत्योंको मारनेके लिये ॥६८॥ नेवास्यनासिकाबाहुहृदयेभ्यस्तथोरसः ॥ निर्गम्यदर्शनेत- स्थौब्रह्मणोव्यक्तजन्मनः ॥६९ ॥ उत्तस्थौचजगन्नाथस्तया मुक्तोजनार्दनः।। एकार्णवेहिशयनात्ततः सददृशेचतौ॥७॥ मधुकैटभी दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ ॥ क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणंजनितोद्यमौ ।। ७१ ॥ समुत्थायततस्ताभ्यांयुयुधेभ- गवान्हरिः॥ पंचवर्पसहस्राणिबाहुप्रहरणोविभुः॥ ७२ ।। टीका-विष्णुका नेत्र मुख नासिका तुजा और हृदय पक्षःस्थल इनसे निकसकर बलाके सन्मुख स्थित होतीबई ॥ ६९ ॥ तब वा समुद्रके अध्याय १ (१३) विप योगनिद्राकारकै त्यक्ता विष्णु शेपशय्यासे उठतेगये और मधुकैटन दै- त्योंको देखतेगये ॥ ७०॥ फिर मधु कैटा दैत्य कैसेहैं बड़े पराक्रमी हैं और क्रोधकारिकै लालहें नेत्र जिनोंके ब्रह्माको भक्षण करनेको करराख्योहै उदाम जिनोंने ॥ ७१ ॥ ऐसे मधुकैटन दैत्योंसे उठकारकै जगवान युद्ध करते भये शुजाहीहै शस्त्र जिसके ऐसे भगवान् पांचहजार वर्षे उन दैत्योंके साथ युद्ध करतेनये ॥ ७२॥ तावप्यतिक्लोन्मत्तौमहामायाविमोहितौ ।। उक्तवतोवरोस्म- त्तोत्रियतामितिकेशवं ।। ७३ ।। भगवानुवाच ॥ भवेतामय मे तुष्टौ ममवध्यावुभावपि ॥ किमन्येनवरेणात्रएतावद्धिवृतम- या॥ ७४ ॥ऋषिरुवाच ॥ वंचिताभ्यामितितदासर्वमापोम- यंजगत् ॥ विलोक्यताभ्यांगदितोभगवान्कमलेक्षणः॥७॥ प्रीतीस्वस्तवयुद्धेन श्लाघ्यस्त्वंमृत्युरावयोः।। आवांजहिनय- नोसिलिलेनपरिप्लुता ॥ ६॥ टीका- ताके अनन्तर बलकरिके उन्मत्त और महामायाकारकै मोहित वे दैत्य बोले हे विष्णो तुलारे युद्धसे हम बडे प्रसन्नभये तुम हमसे वर- दान मांगो ॥ ७३ ॥ तव श्रीभगवान् बोले जो तुम मेरे ऊपर प्रसन्नहो तो दोनो मेरेहाथ मृत्युको प्राप्त हो और वरदानोंसे मेरेको कुछ प्रयोजन नहीं यह वरदान में मांगा है ॥ ७४ ॥ तब ऋषि बोले कि हे राजन जब भगवान वर- दान मांगिके दैत्योंको ठगलिया तब संपूर्ण जगत्को जलमयी देखकर भगवा- नसे कहते भये ।। ७५ ॥ कि हे विष्णो वहां हमको मारो जहां जलसे डुबीहुई पृथ्वी नहींहै ।। ७६ ।। ऋपिरुवाच॥ तथेत्युक्त्वाभगवताशंखचक्रगदाभृता ॥ कृत्वा चक्रेणवैछिन्नेजपनेशिरसीतयोः॥ ७७॥ एवमेपासमुत्पन्नात्र- झणासंस्तुतास्वयं ॥ प्रभावमस्यादेव्यास्तुभूयः शृणुवदामिते (१४) सप्तशतीभापाटीका। ऐंॐ ॥७८॥ इतिमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वन्तरेदेवीमा- हात्म्ये मधुकैटभवधोनामप्रथमोध्यायः॥ १॥ टीका-तब ऋषि बोले कि हे राजन् शंख चक गदाको धारण करने वाले तुम कहो जैसेही सही ऐसा दैत्योसे कहकारकै अपनी जंघापर उनका शिर रखके सुदर्शनचकसे काटतेभये ॥ ७७॥ हे राजन् ऐसी रीतिसे भगवती उत्पन्न भईहै जाकी स्तुति करिहै फिर या देवीको माहात्म्य तुझारे अर्थ व- र्णन करूहूं सो श्रवणकरो ॥ ७८ ॥ इति श्रीमार्कंडेयपुराणेदेवीमाहात्म्येमधु- कैटअवधोनामप्रथमोध्यायः॥१॥ ऋषिरुवाच ॥ देवासुरमभूयुद्धंपूर्णमन्दशतंपुरा ॥ महिपे सुराणामधिपेदेवानांचपुरंदरे ॥१॥ तत्रासुरैर्महावीर्यदेवसै: न्यपराजितम् ॥ जित्वाचसकलान्देवानिंद्रोभून्महिपासुरः ।। ॥२॥ ततःपराजितादेवाः पद्मयोनिप्रजापतिम् ॥ पुरस्कृ- त्यगतास्तत्रयत्रेशगरुडध्वजौ ॥३॥ यथावृत्तंतयोस्तद्वन्म- हिपासुरचेष्टितम् ॥ त्रिदशाःकथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम्॥४॥ टीका- तब पहिले सुमेधा ऋषि बोले हे सुरथ राजन् असुरोंका राजा महिषासुर होता भया और देवतावोंका स्वामी इंद्र होता जया देवदानवोंका परस्पर पूर्ण सौ वर्षपर्यन्त युद्ध होता भया ॥ १ ॥ ता युद्धकेंविषे असुरोंकी फौजने देवतावोंकी फौज हरादई पीछे संपूर्ण देवतानको जीतकर महिषासुर इन्द्र होतो भयो ॥ २॥ ताके अनन्तर देवता हार कर ब्रह्माजीको अगाडी करिकै जहां महादेवजी और भगवान थे वहाँ जाते भये ॥३॥ जैसा महि- पासुरका करा हुवा देवोंका तिरस्काररूपी वृत्तान्त था तैसा संपूर्ण वृत्तान्त शिव विष्णुके आगे देवता कहते भये ॥ ४ ॥ सूर्यद्राम्यनिलेंदूनांयमस्यवरुणस्यच ॥अन्येपांचाधिकारा- न्सस्वयमेवाधितिष्ठति ॥५॥ स्वर्गानिराकृताःसर्वेतेनदेव गणाभुवि ॥ विचरंतियथामत्यो महिपेणदुरात्मना ॥६॥ एतद्व कथितंसर्वममरारिविचौटतम् ॥ शरणंव-प्रपन्नाःस्मोव- -- अध्याय २ (१५) धस्तस्यविचिंत्यतां ॥७॥ऋषिरुवाच ॥ इत्थंनिशम्यदेवा- नांवचांसिमधुसूदनः। चकारकोपेशंभुश्चभ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥८॥ टीका-सूर्य इन्द्र अमि वायु चंद्र इनका और यमराज और वरुणका और संपूर्ण देवताका अधिकारकेविपे स्वयं महिपासुर स्थित है ॥ ५ ॥ वा महिपासुर दुष्टने संपूर्ण देवोंको स्वर्गसे निकाल दिया अब सब देवतामनु- प्योंकी तरह पृथ्वीमें विचरते है ॥ ६ ॥ हे महाराज महिषासुरकी जो दुष्ट- चेष्टा है सो आपके आगे हमने कही हम आपकी शरण प्राप्त हैं सो आप इस दुष्टको मारनेको उपाय चितवन करो ॥ ७ ॥ या प्रकारसे देवतोंका वचन श्रवणकरिकै चुकुटी चढाकर टेढा कर लिया है मुख जिनोंने ऐसे जे विष्णु और शिव ते कोप करते भये ॥ ८ ॥ ततोतिकोपपूर्णस्यचक्रिणोवदनात्ततः ॥ निश्चक्राममहत्तेजो ब्रह्मणः शंकरस्यच ॥ ९॥ अन्येपांचैवदेवानांशकादीनांश- रीरतः ॥ निर्गतंसुमहत्तेजस्तच्चैक्यसमगच्छत ॥ १० ॥अ- तीवतेजस कूटज्वलंतमिवपर्वतं ॥ ददृशुस्तेसुरास्तत्रज्वाला व्याप्तदिगंतरं ॥ ११ ॥ अतुलंतत्रतत्तेजःसर्वदेवशरीरज ॥ एकस्थंतदभून्नारीव्याप्तलोकत्रयंत्विषा ॥ १२॥ टीका-ताके अनन्तर अत्यंत कोपकरिकै पूर्ण जो विष्णु और शिव तिनके मुखसे बडा तेज निकलता भया ॥ ९ ॥ फिर इन्द्रादिक देवोंकानी शरीरसे बडा तेज निकला वह सब इकठा होता आया ॥ १० ॥ ताके अनं- तर उस देव सजाके विपे लटॉकरिकै प्रकाशित किया है दशदिशाको मध्य जाने ऐसा अत्यंत जो तेजका समुदाय है ताको इन्द्रादिक देव देखते जये फिर कैसा है वह तेज जानो प्रकाशमान हेमाद्रिपर्वतही विराजमान है ॥११॥ कात्यायन ऋषिके आश्रममें सब देवोंके शरीरसे निकला हुआ जो इकठो अनंत तेज है सो स्त्रीरूप होतामया फिर कैसा है वह तेज अपनी दोप्ति- करिकै प्रकाशित किये है तीनों लोक जाने ॥ १२ ॥ -- (१६) सप्तशतीमापारीका। यदभूच्छांभवतेजस्तेनाजायतत्तन्मुखं ॥ याम्येनचाभवन्के- शावाहवोविष्णुतेजसा ॥ १३॥ सौम्येनस्तनयोर्युग्मंमध्ये चंद्रेणचाभवत्॥वारुणेनचजंघोसानितंबस्तेजसाभुवः ॥१४॥ ब्रह्मणस्तेजसापादौतदंगुल्योर्कतेजसा ॥ वसूनांचकरांगुल्यः कौवरेणचनासिका ।। १५ ।। तस्यास्तुदंता संभूताप्राजाप- त्येनतेजसा ॥ नयनत्रितयंजज्ञेतथापावकतेजसा ।। १६॥ टीका-फिर जो शंभुका तेज था वाते उस स्त्रीका मुख होताया और यमके तेजसे केश होते भये विष्णुके तेजसे सुजा होती भई ॥ १३॥ सोमके तेजसे दोनो स्तन होते भये इन्द्रके तेजसे उदर होता भया वरुणके तेजसे जंघा और पीडी ये होती गई पृथ्वीके तेजसे कटिके पीछेका भाग होता भया ॥ १४ ॥ ब्रह्माके तेजसे पैर होते भये सूर्यके तेजसे पैरोंकी अंगुलियां होती भई वसुदेवताके तेजसे हाथोंकी अंगुलीयां होती भई कुबेरके तेजसे नासिका होती भई ॥ १५ ॥ प्रजापतियों के तेजसे उसके दाँत होते भये अग्निक तेजसे तीन नेत्र उत्पन्न होते जये ॥ १६ ॥ नुवौचसंध्ययोस्तेजःश्रवणावनिलस्यच ॥ अन्येषांचैवदेवानां संभवस्तेजसांशिवा ॥ १७॥ ततस्समस्तदेवानांतेजोरा- शिसमुद्भवाम् ॥ तांविलोक्यमुदंप्रापुरमरामहिपार्दिताः॥१८॥ ततोदेवाददुस्तस्यैस्वानिस्वान्यायुधानिच ॥ ऊचुर्जयजये- त्युच्चैर्जयन्तींतेजयैषिणः ॥ १९॥ शूलंशूलाद्विनिष्कृष्यददौ तस्यैपिनाकधृवाचकंचदत्तवान्कृष्णःसमुत्पाट्यस्वचक्रतः२०॥ टीका- संध्याके तेजसे चुकुटी होती गई वायुके तेजसे दोनो कान होते जये इन देवतोंका और अन्य देवतोंके तेजका एकाकी भाव है सो शिवा नामकारकै प्रसिद्ध भई ॥ १७ ॥ फिर समस्त देवताके तेजसे उत्पन्न भई ऐसी भगवतीको देखकरिकै महिषासुरकरिकै पीडित जे देवता है वे आनं- दको प्राप्त होतेभये ॥ १८॥ ताके अनन्तर जगवतीको देवता अपना अपना अध्याय २ (१७) शस्त्र देते जये और उच्च स्वरसे जयजयकार शब्द करते नये ॥ १९ ॥ महा देवजी भगवतीको त्रिशूलसे त्रिशूल उत्पन्न कर देतेभये कृष्ण सुदर्शन चक्रसे चक्र बैंचकर देते भये ॥ २० ॥ शंखंचवरुण शक्तिददौतस्यैहुताशनः ॥ मारुतोदत्तवांश्चाप वाणपूर्णेतथेषुधी ॥ २१॥ वज्रमिंद्रःसमुत्पाव्यकुलिशादमरा- धिपः॥ ददौतस्येसहस्राक्षोघंटामैरावताद्गजात् ॥२२॥ काल दंडाघमोदंडंपाशंचांबुपतिर्ददौ ॥ प्रजापतिश्चाक्षमालांददौ ब्रह्माकमंडलुम्॥२३॥समस्तरोमकूपेषुनिजरश्मीन्दिवाकरः।। कालश्चदत्तवान्खड्तस्यैचर्मचनिर्मलम् ॥२४॥ टीका- वरुण शंख देते भये अग्नि शक्ति शस्त्र देते भये वायु धनुप और दो बाँणोंके भरे तूणीर देता भया ॥२१॥ अपने वज्रसे वज़ उत्पाटन करिके इन्द्र वज्र देतो भयो और ऐरावत हाथीसे घंटा लेकर देतो भयो ॥ २२ ॥ यम कालदण्डसे दण्ड उत्पन्न करिकै देतो भयो वरुण अपने पाशसे पाश उत्पन्न करिकै देतो भयो और प्रजापति ब्रह्मा जयमाला और कमण्डलु देतो भयो ॥ २३ ॥ वा देवीके संपूर्ण रोम कूप जे हैं तिनके विपे सूर्य अपनी किरण देते भये उस भगवतीको काल सग देतो भयो और श्रेष्ठ ढाल देतो भयो ॥ २४ ॥ क्षीरोदश्चामलंहारमनरेचतथांबरे ॥चूडामणितथादिव्यंकुंडले कटकानिच॥२६॥अर्धचंद्रतथाशुभ्रंकेयूरान्सर्ववाहुषु॥ नूपुरी विमलौतद्वद्गवेयकमनुत्तमम् ॥ अंगुलीयकरत्नानिसमस्ता- स्वंगुलीषुच ॥२६॥ विश्वकर्माददौतस्यैपरशुंचातिनिर्मलं। अस्त्राण्यनेकरूपाणितथाभेचंचदशनम्॥२७॥अम्लानपंकजां मालांशिरस्युरसिचापरां।अददज्जलधिस्तस्यैपंकजंचातिशोभन टीका-क्षीरोद समुद्र निर्मल हार देतोमयो और नवीनवस्त्र देतोजयो ॥ २५॥ दिव्य चुडामणि रत्न तथा कुण्डल और कडा और अर्द्धचंद्र सं. .
(१८) सप्तशतीमापाटीका। पूर्ण शुजामें बाजू और निर्मल बिछिया और गलेमें पहरनेकी रत्नजडित. माला और समस्त अंगुलियोंके विपे छल्ला अंगूठी ये सब आपण भगव- तीको विश्वकर्मा देतोभयो और निर्मल परशी देतो भयो और अनेक तरहके अस्त्र और कवच ये देतोजयो ॥२६॥२७॥ फिर उसदेवीको समुद्र सदा प्रफु- ल्लित रहै ऐसे कमलोंकी माला शिरके विपे धारण करनेकी और कंठमें धारण करनेकी देतोभयो और मनोहर कमल देतोजयो ॥ २८ ॥ हिमवान्वाहनसिंहरत्नानिविविधानिच ॥ ददावशून्यंसुर यापानपात्रंधनाधिपः ॥२९ ॥ शेपश्चसर्वनागेशोमहामणि विभूपितं ।। नागहारंददौतस्यैधत्तेयः पृथिवीमिमाम् ॥३०॥ अन्यैरपिसुरैर्देवीभूषणैरायुधैस्तथा ॥ संमानिताननादोच्चैः साट्टहासंमुहुर्मुहुः॥ ३१ ॥तस्यानादेनघोरेणकृत्स्नमापूरितं नभः॥ अमायतातिमहताप्रतिशब्दोमहानभूत् ॥३२॥ टीका-और हिमवान् पर्वतराज देवीको सिंहवाहन देतोभयो और अनेक तरहके रत्न देतोभयो और कुवेर मदिराकरिकै पूर्णपात्र देतोभयो ॥ २९ ॥ फिर उसदेवीको संपूर्ण नागोंका राजा जो शेषहै सो महामणि क- रिकै शोषित नागरूप हार देतोभयो फिर वह शेप. कौनसाहै जो या पृथ्वी को धारण करताहै ॥ ३०॥ फिर और देवोंनेञी आरूपण और शस्त्रों करि- के देवीका सन्मान किया तब देवी आदरयुक्त होकर वारंवार उच्चस्वर करि- कै अट्टहासपूर्वक नाद, करतीजई ॥ ३३ ॥ उस भगवतीके भयंकर शब्द करिके संपूर्ण आकाश शब्दायमान होतामया.समीप आताहुवा जो बडा शब्द है वा करिक बडा प्रतिध्वनिशब्द होतानया ॥३२॥ चुक्षुभुसकलालोकास्समुद्राश्चचकपिरे॥चचालवसुधाचेलुः सकलाश्चमहीधराः ॥ ३३ ॥.जयेतिदेवाश्चमुदातामूचुःसिंह- वाहिनीं ॥ तुष्टुवुर्मुनयश्चैनांभक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ ३४ ॥ दृष्ट्वासमस्तंसंक्षुब्धत्रैलोक्यममरारयः ॥ सन्नदाखिलसैन्यास्ते -- अध्याय २ (१९) समुत्तस्थुरुदायुधाः॥३६॥ आकिमेतदितिक्रोधादाभाष्यम- हिपासुरः ॥ अभ्यधावततंशब्दमशेपैरसुरैर्वृतः ॥ ३६ ॥ टीका-ता प्रतिध्वनि शब्द कारकै सब लोक चलायमान होगये और समुद्र कांपने लगगये और पृथ्वी पर्वत ये तिससमय सब चलायमान होजाते भये ॥ ३३॥ तासमय देवता आनंदपूर्वक जय जय शब्द करतेभये भक्ति करिकै नम्र है स्वकाय जिनोंका ऐसे मुनि सिंहवाहिनी भगवतीकी स्तु- ति करतेभये ॥ ३४ ॥ फिर उस भगवतीका भयंकर शब्द करिके त्रिलोकी- को चलायमान देखकर युद्धके लिये करी है सेना तयार जिनोंने और उठा- ये हैं शस्त्र जिनोंने ऐसे जे दैत्यहे ते युद्ध करनेको उठतेभये ॥ ३५ ॥ यह क्या है ऐसे क्रोधसे कहकर महिषासुर समस्त असुरोंकरिकै सहित उ- स देवीके शब्दके सन्मुख जातोनयो॥ ३६॥ सददर्शततोदेवींव्याप्तलोकत्रयांत्विषा ॥ पादाक्रांत्यानतभुवं किरीटोल्लिखितांबराम्॥३७॥क्षोभिताशेपपातालांधना- निःस्वनेनतांदिशोभुजसहस्रेणसमंताव्याप्यसंस्थितां३८॥ ततःप्रववृतेयुद्धतयादेव्यासुरद्विषां ॥शस्त्रास्त्रैर्बहुधामुक्तरादी- पितदिगंतरं ॥३९॥ महिपासुरसेनानीश्चिक्षुराख्योमहा- सुरः॥ युयुधेचामरश्चान्यैश्चतुरंगवलान्वितः॥४०॥ टीका-पीछे वहां जाके अपनी कांतिकारकै प्रकाशित कियेहै तीनो लोक जाने पैरके आक्रमणसे नम्र करीई पृथ्वी जाने मुकुट करिके स्पर्शित है आकाश जाने धनुपकी प्रत्यंचाका शब्द कारकै चलायमान कियोहै संपूर्ण रसातल जाने हजार भुजासे दशदिशाको व्याप्त कारकै सम्यक्भकारसे स्थित ऐसी जो भगवती है ताको महिपासुर देखतोभयो ॥ ३७॥३८ ॥ ताके अनंतर देवीके साथ असुरोंका युद्ध होताजया फिर कैसा युद्ध नयाकि बहुत प्रकारसे शस्त्र और अन चलाने करिकै प्रकाशित जयोहै दशदिशाको मध्यनाग जाम॥३९॥ महिषासुरकी सेनाका स्वामी चिक्षुरनामा असुर युद्ध करतोयो और हाथि (२०) सप्तशतीभापाटीका। पॉके सवार घोडोंके सवार रथोंके सवार पियादे ये है चार अंग ज़ामें ऐसी नो चतुरंगिणी सेना तिसकरिके सहित दूसरा चामरनामा असुर देवीके साथ युद्ध करतानया ॥४०॥ स्थानामयुतैः पइभिरुग्राख्योमहासुरः॥ अयुध्यतायुतानां चसहस्रेणमहाहनुः ॥ ४१ ॥ पंचाशद्भिश्चनियुतैरसिलोमा महासुरः ॥ अयुतानांशतैःपनिर्वाप्कलोयुयुधेरणे ॥ ४२ ॥ गजवाजिसहस्रौघैरनेकैरुग्रदर्शनः॥ वृतोरथानांकोव्याचयुद्धे तस्मिन्नयुद्धयत ॥४३॥ विडालाख्योमहादैत्यः पंचाशद्भि स्थायुत्तैः ॥ युयुधेसंयुगेतत्ररथानांपरिवारितः ॥ ४४ ॥ टीका-और साठिहजार रथोंके सवारों करिकै सहित उदग्रनामा अ सुर देवी के साथ युद्ध करताभया और महाहनुनामा असुर कोटि रथोंके सवारों कारकै सहित देवीके साथ युद्ध करतापया ॥४३॥ और असिलो- मा नामा असुर पांचकोटि रथोंके सवारों करिकै सहित देवी के साथ युद्ध करतानया और बाकलनामा असुर रणके विपे साठिलाख रथो सवारों करिकै सहित देवी के साथ युद्ध करता भया॥४२॥और उग्रदर्शन नामा असुर हजारों हाथी घोडोंके सवारों करिकै सहित और एक कोटि रथोंके सवारों करिकै सहित रणमें देवीके साथ युद्ध करता भया ॥४३॥ और बिडालनामा असुर पांचलाख रथोंके सवारों करिकै सहित संग्राममें युद्ध करता भया॥४४॥ वृतः कालोरथानांचरणेपंचाशतायुतैः ॥युयुधेसंयुगेतत्रताव- द्भिःपरिवारितः॥४५॥ अन्येचतवायुतशोरथनागहयैर्वृताः॥ युयुधुस्संयुगेदेव्यासहतत्रमहामुराः॥ ४६॥कोटिकोटिसहस्त्रै- स्तुरथानांदन्तिनांतथा॥ हयानांचवृतोयुद्धतत्राभून्महिषासु- रः ॥१७॥ तोमरैभिदिपालैश्चशक्तिभिर्मुसलैस्तथा ॥ युयु धु-संयुगेदेव्याखङ्गै परशुपहिशैः॥४८॥ टीका- और काल नामा असुर पांचलाख रथोंके सवारों करिकै वेष्टित .
अध्याय २ (२३) रणके विपे देवीके साथ युद्ध करता जया फिर वही असुर पाँचलाख हाथि- योंके सवारों करिकै सहित संग्राममें देवीके साथ युद्ध करतानया ताके अनन्तर वही पाँचलाख घोडोंके सवारों करिकै युक्त युद्ध करता भया फिर ताके अनन्तर वही पांचलाख पयादों करिकै परिवारित देवी के साथ युद्ध करता भया ॥४५॥ तिस रणके विपे दशहजार रथ हाथी घोडोंके सवारों करिकै सहित और जे असुर हैं वे देवी के साथ युद्ध करतेभये ॥४६॥ फिर एक शंख संख्या परिमित रथोंके सवार और एक शंख संख्या परिमित हाथि- योंके सवार और एक शंख संख्या परिमितही घोडोंके सवार इस प्रकारसे तीन शंख सेना करिकै सहित महिषासुर देवी के साथ युद्ध करनेको रणभू- मिमें सावधान होतो भयो ॥४७॥ तिस समय संग्रामके विषे ते संपूर्ण असुर तोमर जे भाला हैं और मिंदिपाल जे गोफिया है और शक्ति जे शांग हैं और मुशल जे हैं और खड्ग जे हैं और फरशी जे हैं और पट्टिश जे हैं इन शस्त्रों करिकै देवीके साथ युद्ध कर्त भये ॥ ४८ ।। केचिच्चचिक्षिपुःशक्ती केचित्पाशांस्तथापरे । देवींखड्गप्रहारै स्तुतेतहिंतुंप्रचक्रमुः॥४९॥ सापिदेवीततस्तानिशस्त्राण्य- स्त्राणिचण्डिकालीलयैवप्रचिच्छेदनिजशस्त्रास्त्रवर्पिणी ५०॥ अनायस्ताननादेवीस्तूयमानासुरर्पिभिः ॥ मुमोचासुरदेहे पुशस्त्राण्यस्त्राणिचेश्वरी ॥ ५५ ॥ सोपिकुद्धोधुतसटोदेव्या वाहनकेसरी ॥ चचारासुरसैन्येषुवनेष्विवहुताशनः॥ १२॥ टीका- उस युद्धमें कितनेही देवीको मारनेको शांग फेंकते जये और कितनेही नागपाश आदि पाश फेंकते जये और कितनेही खनके प्रहारों करिकै देवीको मारनेको उद्योग कर्त्त नये ॥ ४९ ॥ ताके अनन्तर अपने शस्त्र और अघोंकी वर्षा करती हुई भगवती उन दैत्योंके शस्त्र और अस्त्र लीला करिकै सब खंडित करती भई ॥५०॥फिर ग्लानि करिके रहित है मुस जिसका और देव और ऋपि इन कारकै स्तुति करीगई ऐसी ईश्वरी असुरोंके शरीरोंके विपे शव और अन्न छोडतीमई ॥ ५१ ॥ फिर देवीका वाहन
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(२२)
सप्तशतीभाषाटीका।
सिंहमी काँधेके केश कँपाताहुवा और क्रोधयुक्त गर्जताहुवा असुरोंकी
सेनामें चारों तरफ चमता भया कैसे कि जैसे वाँशके वनोंमें चारों तरफ अग्नि
भमे ताकी तुल्य ॥ ५२॥
निःश्वासान्मुमुचेयांश्चयुध्यमानारणेम्बिका ॥ तएवसद्यःसं
भूतागणा शतसहस्रशः॥५३॥ युयुधुस्तेपरशुभिभिदिपा-
लासिपहिशैः।।नाशयंतोसुरगणान्देवीशत्त्युपहिताः॥५४॥
अवादयतपटहानगणा शंखांस्तथापरे ॥ मृदंगांश्चतथैवान्ये
तस्मिन्युद्धमहोत्सवे ॥५६॥ ततोदेवीत्रिशूलेनगदयाशरवृष्टि-
भिः॥ खङ्गादिभिश्चशतशोनिजधानमहासुरान् ॥५६॥
टोका-फिर असुरोंके साथ संग्रामके विपे जितने कोषका निःश्वास
अंबिका छोडती नई फिर वे निःश्वासही उतने लाख भगवतीके गण होजाते
जये ॥ ५३ ॥ फिर वे गण तुम असुरोंके साथ युद्धकरो युद्धको ऐसे देवी
करिकै उत्साह प्रात कियेहुवे फरशी और गोफिया और खड्ग और पट्टिश
इन शस्त्रोंकरिकै असुरगणोंका नाश कर्तेहुवे महाअसुरोंके साथ युद्ध कर्ते-
भये ॥ ५४ ॥ फिर उस युद्ध महोत्सवके विपे देवीके निःश्वाससे उत्पन्नहुवे
पूर्वोक्त गण उनमेंसे कितनेहीं तो नगारा बजाते भये और कितनेही शंख
वजाते भये और कितनेही मृदंग बजातेभये ॥ ५५ ॥ ताके अनंतर त्रिशूल
गदा और खड़ और भाला और मुद्र और मुशल इन आदिले शस्त्रोंके
प्रहार करिक और बाणोंकी वर्षा करिके भगवती एक एक वा शत शत महा
असुर मारती गई ॥ ५६ ॥
पातयामासचैवान्यान्चंटास्वनविमोहितान् ॥असुरान्भुविपा-
शेनबद्धाचान्यानकर्पयत् ॥ ५७॥ ॥ केचिद्विधाकृतास्ती
णेः खड्गपातेस्तथापरे ॥ विपोथितानिपातेनंगदयाभुविशे
रते ॥५८॥ वेमुश्चकेचिद्रुधिरंमुसलेनभृशंहताः।केचिन्निप-
तिताभूमोभिन्नाशूलेनवक्षसि ॥ ५९॥ निरंतरशरोघेणकृताः
केचिद्रणाजिरे सेनानुकारिणः प्राणान्मुमुचुनिदशार्दनाः॥६॥
अध्याय २ (२३) टोका-फिर देवीके घंटाके शब्दसे मूर्छित जे असुर हैं तिनको देवी पाशसे बाँधकर पृथ्वीमें पटकती जई और कितनेही असुरोंको पाशसे बाँध कर बैंचतीई ॥ ५७ ॥ फिर देवी और कितनेही असुरोंका तीखे खड्गके प्रहारों करिके दो टुकड़ा कर्ती भई और कितनेही असुर देवीकी गदाके प्रहार करिकै मृत्युको प्राप्त हुवे पृथ्वीमें सोते भये ॥५८॥ और कितनेही असुर देवीके मुशलके प्रहार करिकै मुखसे रुधिर वमन कर्नेभये फिर और कितनेही असुर देवीके त्रिशूलकरिकै छातीमें विदारित हुवे पृथ्वीमें पडते भये ॥ ५९ ॥ फिर पर्वतके समान है शरीर जिनोंका और देवताको पीडा करनेवाले ऐसे जे असुर ते देवीके निरंतर वाणों के समुदायके प्रहारसे रणमें विधेहुवे प्राणोंको त्यागतेभये ।। ६०॥ केपांचिद्रावश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे॥शिरांसिपेतुरन्ये- षामन्येमध्येविदारिताः॥६१॥ विच्छिन्नजंघास्त्वपरेपेतुरुया महासुराः॥ एकबाह्यक्षिचरणा केचिदेव्याद्विधाकृताः॥२॥ छिन्नपिचान्योशिरसिपतिताःपुनरुत्थिताः॥ कबंधायुयुधुर्दै- व्यागृहीतपरमायुधाः॥६३॥ ननृतुश्चापरतत्रयुद्धेतूर्यलया- श्रिताः॥ कबंधाश्छिन्नशिरसःखगशक्त्यष्टिपाणयः ॥६॥ तिष्ठतिष्टेतिभापंतोदेवीमन्येमहासुराः ॥ रुधिरोपविलुप्ता- गाःसंग्रामेलोमहर्षणे ॥६५॥ टीका-और कितनेही असुरोंकी देवीके शस्त्र प्रहारोंसे खंडितहुई शुजा पृथ्वीमें पडतीलई और कितनेही असुर देवीके शस्त्रमहारोंसे कटी हैं नाही जिनोंकी ऐसे पृथ्वीमें पडतेभये और कितनेही असुरोंका देवीके खङ्ग आदि शस्त्र प्रहारसे शिर कटके गिरतेजये और कितनेही देवीके शस्त्रमहारोंकारक शरीरके विपे हाथ पैरोंसे संडितहुवे पृथ्वी में पड़तेनये ॥६१ ॥ और कित- नेही असुर कटी, जंश जिनोंकी ऐमे पृथ्वीमें पढतेजये और कितनेही अ. सुर देवीके शस्त्रप्रहार करिके खंडित कियेहुये एक अजागले और (२४) सप्तशतीनापाटीका। एक नेत्रवाले और एक चरणवाले होतेहुवे पृथ्वीमें पडते भये॥ ६२॥ और कितनेही असुर शिर कटनेसे पृथ्वीमें पडेभी. फिर शिर धारण कर्तेहुवे उठतेभये ताके अनंतर शस्त्र ग्रहण करिकै देवीके साथ युद्ध क- तेधये ॥ ६३ ॥ फिर उस युद्धकेविष कटे, शिर जिनोंके ऐसे ज़े दैत्यहै ते वीणा मृदंग आदि वादिनाँकै वीरशब्दके आश्रितहुवे अर्थात् वीररसके आ- वेशते चेत कर्तेहुवे फिर शिर धारण कर्ते सते कितनेही तो नृत्य कर्ताये और उनमें से कितनेही खड़ शांग पौलंडी लाठी ये शस्त्रहै हाथमें जिनोके ऐसे भगवती के साथ युद्ध कर्तेभये ॥ ६४ ॥ फिर उस भयंकर संग्रामके विपे,रु- घिर करिके सन्योहै अंग जिनोंका ऐसे और तुम हमारे आगे खडीरहो ख- डीरहो ऐसे कहतेहुवे जे कितनेही और महाअसुर0 ते देवी के साथ युद्ध कर- नेकों आतेनये ॥६५॥ पातितरथनागाश्वैरसुरैश्चवसुंघरा ॥ अगम्यासाभवत्तत्रय- बाभूत्समहारणः ॥ ६६ । शोणितौघामहानद्यस्सयस्तत्र विसुनुवुः॥ मध्येचासुरसैन्यस्यवारणासुरवाजिनाम् ॥६७॥ क्षणेनतन्महासैन्यमसुराणांतथाम्बिका ॥ निन्येक्षयंयथावह्नि स्तृणदारुमहाचयम् ॥६॥सचसिंहोमहानादमुत्सृजन्धुतके- सरः। सोपिद्धोधुतसटोदेव्यावाहनकेसरी॥६९॥शरीरेभ्यो- मरारीणामसूनिवविचिन्वति।दिव्यागणेश्चतैस्तत्रकृतंयुद्धतथा सुरैयथैनांतुष्टुवुर्देवाःपुष्पवृष्टिसुचोदिवि ॥७॥श्रीमार्कण्डे यपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरदेवीमाहात्म्येद्वितीयोऽध्यायः॥२॥ टीका-फिर जहाँ देवी के साथ महिषासुरकी सेनाका, बडा भयंकर युद्ध हुवा वहां देवीने वाण आदि शस्लॉके प्रहारसे पटके जे रथ हाथी घोडे और असुर तिन कारकै आकीर्णभूमि अगम्य होतीभई ॥६६ ॥ फिर उस युद्धके विपे जब देवी के साथ असुरोंका. संयाम प्रारंभ हुवा उसी क्षणमैंही असुरोंकी सेनाके मध्यमें हाथी असुर और घोडे इनके रुधिरके समूहकी म- ..
अध्याय ३ (२५) हानदियाँ वहतीमई ॥ ६७ ॥ फिर जैसे तृण काष्ठके संचयको अनि क्षण- मात्रकरिकै नाशको प्राप्त करदेता है तिसीप्रकारसे देवी क्षणमात्रकरिकै अ- सुरोंकी महासेनाको नाशको प्राप्त करतीभई॥६॥फिर तिसी प्रकारसे वह जो भगवतीवाहन सिंह है सोनी कंठ गर्जना कर्ताहुवा कंपायेहै कंधाके केश ज्या- ने क्रोधयुक्त हुवा नखप्रहारोंकरिकै असुरोंकी सेनाको नाश कनिया ॥६९॥ फिर उस संग्रामकेविषे देवीका क्रोधके निश्वासते उत्पन्नभये ऐसे जेगण जि- नौने तिस प्रकारसे असुरोंकी साथ युद्धकिया और जैसे स्वर्गमें पुष्पोंकी व- पी कर्नेहुए देवता भगवतीकी स्तुति कर्तेनये तिसप्रकारसे अवणकरो ॥७॥ इति श्रीमार्कंडेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥ ॥ऋषिरुवाच॥निहन्यमानंतत्सैन्यमवलोक्यमहासुरः ॥ से- नानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौयोडुमथांविकाम् ॥ १॥ सदेवीशरव- णववर्पसमरेसुरः।।यथामेरुगिरेः शृंगंतोयवर्षेणतोयदः ॥२॥ तस्यच्छित्त्वाततोदेवी लीलयैवशरोत्करान् ॥ जघानतुरगा- वाणैर्यतारंचैववाजिनाम् ॥३॥ चिच्छेदचधनुःसयोध्वज चातिप्तमुच्छ्रितम्॥विव्याधचैवगात्रेषुच्छिन्नधन्वानमाशुगैः। सच्छिन्नधन्वाविरथोहताश्चोहतसारथिः॥ अभ्यधावततादेवी खगचर्मधरोसुरः ॥ ५॥ टीका-ऋपि बोले फिर ताके अनंतर संपूर्ण महिषासुरकी सेनाको देवी करिकै हती हुई देखकर महिपासुरका सेनापति चिक्षुर नामा दैत्य क्रोधसे दौडके युद्ध करनेको देवीके सन्मुख जातोजयो ॥ १॥ ताके अनं- तर चिक्षुर नामा दैत्य संग्राममें वाणोंकी वर्षाकरिकै जगवतीको आच्छा- दित कौनयो कैसेके जैसे मेघ जलकी वर्षाकरिके सुमेरु पर्वतकी शिखरको आच्छादित कर देता है ॥ २ ॥ ताके अनंतर उस संमा- ममें विना परिश्रमके माथ देवी अपने बाणोंकरिकै चिक्षुर नामा देयके बाणोंको काटकर घोडोकों मारती भई और पीछे सारथियोंकोसी (२६) सप्तशतीमापाटीका। मारती भई ॥३॥ फिर उसी क्षणमें बाणों करिकै देवी उस दैत्यका धनुप काटती गई और बड़ी ऊंची जो तिसके रथकी ध्वजा है ताको का. टती भई फिर टूट गयो है धनुप जाको ऐसो जो चिक्षुर नामा दैत्य है ताके समग्र शरीरके अवयवों में बड़े तीखे बाणोंकारिकै छेद कनौ भई ॥४॥ ताके अनंतर दूटो है धनुष और रथ जाको भरे हैं घोडा और सारथी जि- सके ऐसा जो चिक्षुर नामा दैत्य सो तरवार ढाल लेके, देवीके उपर दाउतामया ॥ ५॥ सिंहमाहत्यखङ्गेनतीक्ष्णधारेणमूर्धान ॥ आजघानभुजेसव्ये- देवीमप्यतिवेगवान् ॥६॥ तस्याः खड्गोभुजंप्राप्यपफालन- पनन्दन ।। ततोजग्राहशूलंसकोपादरुणलोचनः ॥ ७॥चि- क्षेपचततस्तत्तुभद्रकाल्यांमहासुरः ॥ जाज्वल्यमानंतेजोभी रविविवमिवांवरात् ॥८॥ दृष्ट्वातदापतच्छूलंदेवीशूलममुञ्चत॥ तेनतच्छतधानीतंशूलंसचमहासुरः॥९॥हतेतस्मिन्महावीर्य महिपस्यचमूपत्तौ ॥ आजगामगजारूढश्चामरविदशार्दनः ।।१० टीका- ताके अनंतर तीखी धारवाले खड्गको सिंहके मामे प्रहारक- रिक बड़ा वेगवाला दैत्य देवीकी बॉई भुजामें प्रहार कजिया ॥ ६ ॥ हे सुरथ वह खड्न भगवतीके भुजाको प्राप्त होकर उसी समय चूर्णीभूत होता भया ताके अनंतर कोधसे लाल नेत्र कर्चा हुवा त्रिशूल ग्रहणका भया । ॥ ७ ॥ फिर वह त्रिशूल भद्रकालीको मारनेकेलिये फेकता भया कैसा है वह त्रिशूल कि जानू आकाशमें चलनेवाला तेजोकरिकै प्रकाशमान सूर्यका विच ॥ ८॥ ताके अनंतर उस त्रिशूलको आता हुवा जगवती देखकर अ- पना त्रिशूल छोडती गई फिर भगवतीके त्रिशूलने असुरके त्रिशूलका चूर्ण करदिया और उस असुरकाजी चूर्ण कर दिया ॥ ९ ॥ फिर जब महिपा- मुस्का सेनापति चिक्षुर नामा दैत्य संग्राममें मारा गया तब हाथीपर बैठा हुवा देवतानको पीडा करनेवाला चामर नामा दैत्य आता भया ॥ ३० ॥.
अध्याय ३. (२७) सोपिशक्तिंमुमोचाथदेव्यास्तामविकाद्रुतम् ।। हुंकाराभिहतां भूमौपातयामासनिष्प्रभां ॥ ११॥ भमांशक्तिनिपतितांदृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः॥चिक्षेपचामरः शूलंबाणैस्तदपिसाच्छिन- त् ॥ १२॥ ततःसिंह-समुत्पत्यगजकुंभांतरेस्थितः। बाहुयु- देनयुयुधेतेनोचैत्रिदशारिणा ॥ १३॥युध्यमानौततस्तोतुत स्मानागान्महींगतौ।युयुधातेतिसंरब्धौप्रहारैरतिदारुणैः॥१४ ततोवेगातखमुत्पत्यनिपत्यचमृगारिणा ॥ करप्रहारेणशिर श्वामरस्यपृथक्कृतं ॥ १५॥ टीका-फिर वहनी देवीको मारनेके लिये शांग शस्त्र फेकता या फिर अंबिका अपना हुंकारकरिकै मलिन हुई शांगको शीघही पृथ्वीमें गिराती भई ॥ ११ ॥ ताके अनंतर देवीकरिकै खंडित हुई और पृथ्वीमें पड़ी हुई अपनी शांगको देखकर क्रोधयुक्त हुवा चामर नामा दत्य देवीके सन्मुख त्रि- शूल फेकता जया उस त्रिशूलकोनी भगवती बाणोंकरिके काटती भई ॥ १२॥ फिर ता समय सिंह उछलकै हाथीके माथेके मध्यमें बैठा हुवा अत्यंत बाहुयुद्धकरिकै देवतोंका शत्रु चामर नामा दैत्यके साथ युद्ध कर्को भयो ॥ १३ ॥ ताके अनंतर सिंह और चामर नामा दैत्य ये दोनों युद्ध कर्ने हुवे हाथीपरसे पृथ्वीमें गिरते भये फिरनी बड़े कठोर प्रहारोंकरिकै अत्यंत कोष युक्त हुवे युद्ध कर्ने भये ॥ १४ ॥ ताके अनंतर सिंहने आकाशमें उछ- लके और पृथ्वीपर पडके नखाहारोंकरिकै चामर दैत्यका शिर काट दिया १५ उदग्रश्चरणेदेच्याशिलावृक्षादिभिर्हतमादतमुष्टितलैय्चैवकराल श्वनिपातितः॥१६॥देवीकुदागदापातैचूर्णयामासचोदतम्॥ वाप्कलंभिदिपालेनवाणैस्तानंतथांधकम् ॥ १७॥ उपास्य- मुग्रवीर्यचत्तथैवचमहाहनु । त्रिनेत्राचत्रिशूलेनजपानपरमेश्व- री॥ १८॥ विडालस्यासिनाकायात्पातयामासशिरः ।। दुर्घरंदुर्मुखंचोभौशरैनिन्येयमक्षयं कालंचकालदण्डनकाल- (२८) सप्तशतीभापाटीका। रात्रिरपातयत् ॥ १९ ॥ उग्रदर्शनमत्युग्रैःखड्गपातैरताड- यत् ॥ असिनवासिलोमानमच्छिदत्सारणोत्सव गणे:सिंहेनदे व्याचजयक्ष्वेडाकृतोत्सवैः॥२०॥ टीका-फिर उस रणकेविषे पापाण और वृक्ष इनके प्रहार करिकै और धनुष आदि शस्त्रोंके प्रहारकरिकै देवीने उपनामदैत्यको मारा और हाथ के दांतकी बनी जो मुष्टिका तिनके प्रहारकरिकै चनपटोकरिकै करालनामा दैत्य को पृथ्वीमें गिरादिया ॥१६॥ फिर उस संग्राममें क्रोधयुक्त होतीहुई भगवती उद्धतनाम दैत्यको गदाके प्रहारोंकरिक चूर्ण कर्तीजई और गोफियाशस्त्रके प्रहारकरिके त्रिनेत्रापरमेश्वरी वाकलंदैत्यकों मारतीमई तिसीप्रकार बाणों- के प्रहारकारकै ताम्रदैत्यको मारतीमई और तैसेही अंधक दैत्यको मारतीमई और तिसीमकार उपास्य और उग्रवीर्य और महाहनु इन दैत्योंकोनी मारती भई और त्रिशूलके प्रहार करिक समग्रसेनाकों मारतीमई ॥ १८॥ और तलवार करिकै बिडालासुरके शिरको शरीरसे अलग गिरातीबई और बाणों के प्रहारकारकै दुर्घर और दुर्मुख इन दोनो दैत्योंको यमराजके लोकमें प्राप्तकत्ती भई और कालरात्रि देवी कालदंडकारकै कालनामदैत्यको पृथ्वीमें गिराती गई ॥ १९॥ और बडेकठोर खड़के प्रहारकरिक भगवती उपदर्शन दैत्यको पृथ्वीमें गिरातीमई और खड़के प्रहारकरिकेही असिलोमा दैत्यको मारतीस- ई फिर उस रणरूपी उत्सवकेविषे भगवतीके गण और सिंह और भगवती इनाने जयसंबंधी सिंहनाद किया ॥२०॥ एवंसंक्षीयमाणेतुस्वसैन्येमहिपासुरः ॥ माहिपेणस्वरूपेणत्रा- सयामासतानगणान् ॥२१॥ कांश्चित्तुंडप्रहारेणक्षुरक्षेपस्त- थापरान् ॥ लांगूलत्ताडितांश्चान्यान् शृंगाभ्यांचविदारिता न् ॥ २२॥ वेगेनकांश्चिदपरानादेनभ्रमणेनच ॥ निःश्वासप वनेनान्यान्पातयामासभूतले ॥ २३ ॥ निपात्यप्रमथानी कमभ्यधावतसोऽसुरः ॥ सिंहहंतुंमहादेव्या कोपंचक्रेततो- अध्याय ३ (२९) म्बिका ॥ २४ ॥ सोपिकोपान्महावीर्य-क्षुरक्षुण्णमहीत- लः॥ शृंगाभ्यांपर्वतानुच्चांश्चिक्षेपचनादच ॥२५॥ टोका- इसप्रकारसे देवीके गणोंकरिकै अपनी सेना नाशमान होतेहुवे देखकर इसवातको नहीं सहताहुवा महिषासुर महिपाकार स्वरूपकरिके भगवतीके गणोंको कंपायमान क:भयो॥ २१॥ वाके अनंतर कितनेही गण तो मुखके प्रहारसे पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गण खुरोंके प्रहारों करिकै पृथ्वीमें गिरातोजयो और कितनेही पुच्छकरिकै ताडित तिनको पृथ्वीमें गिरातो भयो और कितनेही गणोको शृगोंसे वींधकर पृथ्वीमें गिरातो भयो॥ २२ ॥ और कितनेही गणोको वेगकरिक पृथ्वी में गिरातोभयो और कितनेही गणोको गर्जनाकरिके पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गणोको शरीरकी फेटकरिकै पृथ्वीमें गिरातोभयो और कितनेही गणोको अपने श्वासकी पवनकरिकै पृथ्वीमें गिरातोजयो ॥ २३ ॥ फिर वह असुर भगवतीकी पार्षदसेनाको ऐसे गिराकर पीछे भगवतीके सिंहके मारनेको सन्मुख दौडतो भयो ता समय भगवती महिषासुरकेविप अत्यंत क्रोध क नई ॥ २४ ॥ फिर वहनी बडा पराक्रमी दैत्य क्रोधसे खैरू खूदत हुवा पर्वतोंको शृंगोंसे उठाकर भगवतीके मस्तकपर फेकताजया और ऊंचे स्वरसे गर्जना कजियो ॥२५॥ वेगभ्रमणविक्षुण्णामहीतस्यव्यशीर्यत॥लांगूलेनाहतश्चाधिः- पावयामाससर्वतः॥२६॥धुतशंगविभिन्नाश्चसंडखंडंययुर्वनाः। श्वासानिलास्ता शतशोनिपेतुर्नभसोचलाः ॥२७॥ इतिकोष समाध्मातमापतंतमहासुदृष्ट्वासाचंडिकाकोतवधायतदा- करोत्॥२८॥साक्षित्वातस्यवैपाशंतंवधमहासुरं ।तत्याजमा हिपंरूपंसोपिवद्धोमहामृधे।। २९ ।। ततःसिंहोभवत्सद्योयाव- त्तस्याम्बिकाशिरमाछिनत्तितावत्पुरुषःसङ्गपाणिरदृश्यत॥३०॥ टीका-फिर तिस महिपासुरका जो वेगरिकै समण ताकारकै पिसी..
(३०) सप्तशतीमापाटीका। हुई पृथ्वी आपही नम्र होतीभई और उस महिषासुरको पुच्छकरिकै ताडि- तहुवा समुद्र सर्वत्र पृथ्वीकेविपे मनुष्योंको डुबातानया ॥ २६ ॥ फिर कंपित भंगोंकरिकै विदीर्ण किये ऐसे जे मेघ ते खंडखंड होयकर जातेभये और तिस महिपासुरका क्रोधका सेंकडों श्वासके पवनसे फेकेहुवे जे पर्वत वे चूर्णीभूत हुवे आकाशसे पडतेजये ॥ २७ ॥ इस प्रकारसे क्रोधरूपी अनि करिकै संयुक्त और युद्धकेलिये आताहुया महिषासुरको देखकर चंडिका उसके मारनेकेलिये क्रोध क भई ॥ २८ ॥ फिर उस महासंग्राममें महिपासुरके मारनकेलिये भगवती पाश फेकके महिषासुरको बांधतीभई सोनी पाशके बंधसे घबराताहुवा महिपाकार स्वरूपको त्यागताभया ॥ २९ ॥ फिर महिपाकार स्वरूप त्यागके अनंतर भगवतीसे युद्ध करनेको उसीसमय सिंहरूप होतोयो फिर जितने कालकारकै भगवती उसको शिर काटेगी उत- ने कालकेविषे खड्ग है हाथमें जिसके ऐसा पुरुष प्रकट होताहुवा भगवतीको दीखताभया ॥३०॥ ततएवाशुपुरुपंदेवीचिच्छेदसायकैः॥ तंखॉचर्मणासार्धततः सोभून्महागजः॥ ३१.॥ करेणचमहासिंहंतंचकर्षजगर्जच ॥ कर्पतस्तुकरदेवीखङ्गेननिरकुंतत ॥३२॥ ततोमहासुरोभूयो माहिपंवपुराश्रितः।तथैवक्षोभयामासत्रैलोक्यंसचराचरं३३॥ ततक्रुद्धाजगन्माताचण्डिकापानमुत्तमम् ॥ पपौपुनःपुनश्चैव जहासारुणलोचना॥३४॥ननर्दचासुरःसोपिवलवीर्यमदोद्धतः॥ विपाणाभ्यांचचिक्षेपचंडिकांप्रतिभूधरान् ॥३५॥ टीका-फिर पुरुप देखनेके अनंतरही बाणोंकरिकै अगवती पुरुपका कंठ काटती गई और उसकी तलवार ढालभी काटती भई फिर पुरुषरूपके सकाशते गजरूप होतो भयो ॥ ३१॥ फिर शृंड करिकै वह असुर देवीवाहन सिंहको बँचतो भयो और गर्जतो भयो फिर सिंहको बैंचते हुवेकी शृंड देवी खड़ा करिकै काटती गई ॥ ३२॥ ताके अनंतर वह असुर फिर अपने निज अध्याय ३ - (३१) महिपाकार स्वरूप बनाता भया और तिसीप्रकार चराचर त्रिलोकीको दुःख देता भया ॥ ३३ ॥ ताके अनंतर क्रोधयुक्त होती हुई जगतकी माता चंडि- का और लाल हैं नेत्र जाके ऐसी भगवती रणविषे मद्य पीती भई फिर वारंवार हँसतीही गई और युद्धको कुछ नहीं गिनती भई ॥ ३४ ॥ फिर सामर्थ्य और तेज और गर्व इनकरिकै छोडी है मर्यादा जाने ऐसो जो महि- पासुर सोभी रणभूमिकेविषे गर्जतो भयो और शंगोंसे भगवतीपर पर्वत फेकतो भयो ॥ ३५॥ साचतान्प्रहितांस्तेनचूर्णयंतीशरोत्करैः। उवाचतंमदोद्भूतमु- खरागाकुलाक्षरम् ॥३६॥ देव्युवाच।। गर्जग क्षणंमूढमधुयाव त्पिवाम्यहं ।। मयात्वयिहतत्रैवगजिष्यंत्याशुदेवताः ॥३७॥ ॥ऋषिरुवाच ॥ एवमुक्त्वासमुत्पत्यसारूढातंमहासुरं ॥ पादेनाक्रम्यकंठेचशूलेनैनमताडयत् ॥ ३८॥ ततः सोपि- पदाक्रांतस्तयानिजमुखात्ततः ॥ अर्धनिष्क्रान्तएवासीदेव्या- वीर्येणसंवृतः ॥ ३९॥ अर्धनिष्क्रांतएवासौयुध्यमानोमहा- सुरः॥ तयामहासिनादेव्यॉशिरश्छित्त्वानिपातितः॥१०॥ टीका-फिर उस दैत्यके फेंके हुवे पर्वतोंको बाणोंकी वर्षाकरिकै चूर्ण कर्ती हुई जगवती मद्यपानके मदकरिकै उत्पन्न जयो जो मुखकेविप राग ताकारकै अच्छी तरह नहीं समझेन अक्षर जाकेविपे जैसा होय तैसा बो- लती भई ॥ ३६ ॥ देवी बोलती भई कि हे मूढ जितने मैं मधु पीती हूं उतने क्षणभर तू गर्न गर्न ताके अनंवर मेरेसे तेरे मरनेके बाद इस संग्रामकेविपे शीवहीं देवता गजेंगे ॥ ३७॥ ताके अनंतर कपि वोले कि हे राजन् ऐसे भगवतीकहकर और उछलकर असुरके ऊपर बैठती हुई एक पैरसे असु- रको बांधकर पीछे उसके कंठमें त्रिशूल मारती गई ॥ ३८ ॥ ताके अनंतर एक परसे बंधा हुवा महिपासुर अपने मुखसे पुरुषरुप होकर निकसना हुया तिस समय देवीने अपनी सामर्थ्यकरिक रोक दिया पाते भाषा निकलना (३२) सतशतीभाषाटीका। हुवाही रहता भया ॥ ३९ ॥ फिर वह जो आधा निकसा हुवाही देवीके साथ युद्ध कर्ता हुवा महिषासुर दैत्य है सो उसे भगवतीने महा सगसे शिर काटकरिकै पृथ्वीमें गिरा दिया ॥ ४० ॥ एवंसमहिपोनामससैन्यःससुहृद्गणः ॥ त्रैलोक्यमोहयित्वातु- तयादेव्याविनाशितः ॥ ४१ ॥ त्रैलोक्यस्थैस्तदाभूतैमहि- पेविनिपातिते ॥जयेत्युक्तंततःसर्वैःसदेवासुरमानवैः॥४२॥ ततोहाहाकृतंसर्वदैत्यसैन्यंननाशयत् ॥ प्रहपंचपरजग्मुः सकलादेवतागणाः ॥ ४३ ॥ तुष्टुवुस्तांसुरादेवींसहदिव्यैर्मह- . पिभिः ॥ जगुगंधर्वपतयोननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ४ ॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्ये तृती- योध्यायः॥३॥ टीका- इस प्रकारसे अपनी सेनाकरिकै सहित और अपने मित्रादिकन करिकै सहित त्रिलोकीको दुःख देकर युद्ध कर्ता हुवा ऐसा जो महिपासुर उसे संग्रामकेविपे भगवतीने मारा ॥४१॥ तिस समयकेविष त्रिलोकीमें रहनेवाले देव और असुर और मनुष्य अर्थात् स्वर्गमें रहनेवाले इंद्रादिक दे- बता और पाताल में रहनेवाले बलि आदि असुर और पृथ्वी में रहनेवाले ब्रा- ह्मण आदि मनुष्य ये सब जयजयशब्द कर्ने भये ॥ ४२ ॥ ताके अनंतर जो कुछ वाकी रही दैत्योंकी सेना सो हाहाकार कर्ती हुई अदृष्ट होती गई. और संपूर्ण देवता आनंदको प्राप्त होते भये ॥४३॥ फिर स्वर्गमें रहनेवाले महर्षियोंकरिकै सहित देवता भगवतीकी स्तुति कनये और हाहा हूहू आदि गंधर्व गाते भये और उर्वशीसे आदिले अप्सरा नाचती भई॥४४॥ इति माक डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहाल्ये महिषासुरवधोनाम तृतीयो० ॥३॥ ऋपिरुवाच।ततःसुरगणा सर्वदेव्याइन्द्रपुरोगमाः॥स्तुतिमा- रेभिरेकत्तुनिहतेमहिपासुरे ॥ १॥ शकादयःसुरगणानिहते तिवीर्येतस्मिन्दुरात्मनिसुरारिवलेचदेव्या ॥ तांतुष्टुवुःप्रणति अध्याय ४ (३३) नम्रशिरोधरांसावाग्भि प्रहर्पपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥२॥देवा ऊचुः॥ देव्याययाततमिदंजगदात्मशत्त्यानिश्शेपदेवगणश- क्तिसमूहमूर्त्या।।तामविकामखिलदेवमहर्पिपूज्यां भक्त्यानताः स्मविदधातुशुभानिसानः॥३॥ यस्या प्रभावमतुलंभगवाननं तोब्रह्माहरश्चनहिवक्तुमलंबलंच ॥ साचण्डिकाखिलजगत्पार- पालनाय नाशायचाशुभभयस्यमतिंकरोतु ॥४॥ याश्रीः स्वयंसुकृतिनांभवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनांकृतधियांहृदयेषु बुद्धिः॥श्रद्धासतांकुलजनप्रभवस्यलज्जा तांत्वांनता:स्मपरि पालयदेवि विश्वम् ।।५।। टीका- ऋपि बोल कि हे राजन् महिषासुरके मरनेके अनंतर इंद्रादिक देवता भगवतीकी स्तुति करनेको आरंभ कर्तेभये ॥ १ ॥ और जब देवीने उस संग्रामके विषे बडा पराक्रमी और दुरात्मा ऐसे महिषासुरको मारा और दैत्योंकी सेनाको मारी ता समयकेविषे स्नेहकरिकै नम्र है नाडि और कंधे जि- नोके और आनंदकेविषे जे रोमांच तिनका जो ऊठना ताकरिकै मनोहर हे देह जिनोंके ऐसे जे इंद्रादिक देवताते भगवतीकी स्तुति कर्ताये॥२॥ देवता बो- लतेभये कि संपूर्ण देव ओर उनकी शक्ति इनके जे समूह तेही है मूर्ति जिसकी ऐसी जो भगवती ताने अपनी शक्ति करिकै जगत् रच्यो है और संपूर्ण देव और महार्प इन करिके पूज्य ऐसी जो अविका देवी ताको हम भक्ति करि- कै नमस्कार करते हैं हे भगवती हमारा कल्याण करो ॥ ३ ॥ और नहींहै उपमा जाकी ऐसा जो जगवतीका प्रभाव और बल ताको वर्णन कर्नेको विष्णु और ब्रह्मा और शिव येनी समर्थ नहीं वह चंडिका जगत्को पालनेके अर्थ और अशुमनसे जो भय ताके नाशके अर्थ बुद्धि करो ॥ ४ ॥ हेदेवी! पुण्यवानों के घरोंके विपे जो तुम लक्ष्मीरूपहो और पापियोंके घरों के विपे अलक्ष्मी रूपहो और ज्ञानियोंके हृदयकेविषे बुद्धिरूपहो और सज्जनोंके हृदयके विपे श्रद्धारूपहो और श्रेष्टकुलकेविपे उत्पन्न जो मनुप्य ताके हृद- ३ (३४) सप्तशतीनापाटीका। यके विषे लज्जारूपहो ऐसी जो तुमहो सो तुमको हम नमस्कार करते हैं तुम या जगत्को पालनकरो। ५ ।। किंवर्णयामतकरूपमचिंत्यमेतत्किचातिवीर्यमसुरक्षयकारिभू- रि।। किंचाहवेषुचरितानितवातियानिसर्वेषुदेव्यसुरदेवगणा- दिकेषु ॥ ६॥ हेतुःसमस्तजगतांत्रिगुणापिदेवैर्नज्ञायसेहरि- हरादिभिरप्यपारा॥सर्वाश्रयाखिलमिदंजगदंशभूतमव्याकृता हिपरमाप्रकृतिस्त्वमाया॥७॥ यस्याः समस्तसुरतासमुदी- रणेनतृप्तिप्रयातिसकलेपुमखेपुदेवि ॥ स्वाहासिवैपितृगणस्य चतृप्तिहेतुरुच्चार्यसेत्वमतएवजनैः स्वधाच ॥ ८॥ यामुक्ति हेतुरविचित्यमहावतात्वमभ्यस्यसेसुनियतेंद्रियतत्त्वसारैः ॥ मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोपैविद्याऽसिसाभगवतीपरमा हिदेवि ॥ ९ ॥ शब्दात्मिकासुविमलाय॑जुषांनिधानमुद्गी- थरम्यपदपाठवतांचसाम्नाम् ॥ देवीत्रयीभगवतीभवभावनाय वार्तासिसर्वजगतांपरमार्तिहंत्री ॥ १०॥ टीका-हेदेवि! संपूर्ण असुर और देवगण इत्यादिकोंके विषे अत्यंत असुरोंका क्षय करनेवाला और बडा पराक्रमी मन करिकेभी चितवन कर- नेको दुर्लभ ऐसा जो तुमारा यह मनोहररूप ताको हम वाणी करिकै कैसे वर्णन करें और संग्रामोंके विपे मन करिकेभी स्मरण करनेको दुर्लभ ऐसे जे तुमारे चीर कर्महै तिनकेत्ती हम बाणीकरिकै कैसे वर्णन करें।६॥ हे भगवती स्वर्ग और पृथ्वी और पाताल इनका कारण त्रिगुणभी तूहै तौसी हरिहरादिक देवों करिकै नहीं जानीजाताहै फिर कैसीहै अनंतहै और सबका आ- श्रयहै और यह जगत्संपूर्ण तेरा अंशतूतहे फिर तू कैसीहै किसी करिकै प्र- काशित नहीं है फिर कैसीहै उत्कृष्ट लक्ष्मीरूपहै फिर कैसीहै जगत्का मूल सूतहै फिर कैसीहै प्रतिरूपहै ॥७॥ हे भगवती! फ़िर तू कैसीहै स्वाहारूपहै जाका उच्चार करिकै संपूर्ण यज्ञोंके विपे संपूर्ण देवता तृप्तिको प्राप्त होतेहैं
अध्याय ४
इसकारणसे निश्चयकरिके पितृगणकी तृप्तिका हेतु स्वधारूप मनुष्यों करिकै
उच्चारण करीजातीहै ॥८॥हेगवती जो तुम मुक्तिका हेतु चितवन करने-
में नहींआवो और बडे कठिन, व्रत जाकषिपे और संपूर्ण ऐश्वर्य करिकै यु-
त और वेदांतके आयास करिकै उत्पत्ति जाकी ऐसी ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति
रूप जो विद्या सो तुमहो फिर तुम कैसी हो अच्छीतरह विपयोंसे हटाईहै
इद्रियोंकी वृत्ति जिनोंने और तत्वज्ञानहै सार जिनोंके और नष्ट होगयेहैं स-
मस्त कामादि रूप दोप जिनोंके एसे मोक्षकी इच्छा करनेवाले जे मुनि, तिन
करिकै वारंवार आयासकरीजातीहो ॥ ९॥ हेगवति ! फिर तुम कैसीहो
संपूर्ण ऐश्वर्य करिकै युक्तहो और नादरूपहो सुंदर और दोप करिके रहित
ऐसे जे ऋग्वेद तिन करिके सहित जे यजुर्वेद और उच्चस्वरसे गाने करिकै
स्मणीकपदपाठवाले ऐसे जे सामवेद इनकी शिवजीका ध्यानकेअर्थ प्रवत्त
त्रयीरूप तुमहो फिर कैसीहो कपि गोरक्षादि वृत्तिरूप तुमहो फिर कैसीहो
सबजगत्का आधारहो और सबजगत्का दुःख हरनेवालीहो ॥ १० ॥
मेधासिदेविविदिताखिलशास्त्रसारादुर्गाऽसिदुर्गभवसागरनौर-
संगा॥श्री कैटभारिहृदयैककृताधिवासागौरीत्वमेवशशिमौ-
लिकृतप्रतिष्ठा ॥ ११ ॥ ईषत्सहासममलंपरिपूर्णचंद्रबिम्बा-
नुकारिकनकोत्तमकांतिकांतम् ।। अत्यद्भुतंप्रहतमात्तरुपात
थापिवक्रविलोक्यसहसामहिषासुरेण ॥ १२ ॥ दृष्ट्वातुदेवि
कुपितंभृकुटीकरालमुद्यच्छशांकसहशच्छवियन्नसद्यः ॥ प्रा-
णान्मुमोचमहिपस्तदतीवचित्रकै व्यतेहिकुपितांतकदर्शने
न॥ १३ ॥ देविप्रसोदपरमाभवतीभवाय सद्योविनाशयसि
कोपवतीकुलानि ॥ विज्ञातमेतदधुनैवयदुस्तमेतन्नीतंवलंसु-
विपुलंमहिपासुरस्य।।१४॥ तेसंमताजनपदेपुधनानितेपांतेपां
यशांसिनचसीदतिबंधुवर्गाधन्यास्तएवनिभूतात्मजभृत्यदा-
राये पांसदाभ्युदयदाभवतीप्रसन्ना ॥ १५॥
(३६)
सप्तशतीमापारीका।
टीका- हे भगवती! फिर तुम कैसी हो कि जानेंजाय संपूर्ण शास्त्र जा
करिकै ऐसी- बुद्धिरूप हो फिर कैसी हो दुःख करिकै प्राप्त होसकतीहो
फिर कैसी हो अगम्य जो संसार रूपी समुद्र ताके विषे नौका रूप हो फिर
कैसी हो कि संसारके विषय वासना करिकै रहित हो फिर कैसी हो विष्णुके
वक्षस्थलमें निवास करनेवाली लक्ष्मीरूप हो फिर कैसी हो शिवजीने कियो
है सत्कार जाको ऐसी गौरीरूप तुम हो ॥११॥ हे भगवती! मंदहास्य क-
रिक सहित और निर्मल और पूर्णिमाके चंद्रमाके बिंबके सदृश और सुवर्णके
बीचमें जो उत्तम सुवर्ण ताकी शोमाके सदृश है शोभा जाकी याते बडाही
मनोहर ऐसा जो तुह्मारा मुख ताको देखकर तोनी कोषयुक्त महिषासुरने
बलात्कारसे प्रहार किया यह बड़ा अचरज है क्यों कि जगत्को मोहन कर-
नेवाला ऐसा जो तुलारा मुख ताको देखकर महिषासुरको मोहन नहीं हुवा
याते यह अत्यंत भेद भयो ॥ १२॥ हे देवी उस रणके विषे क्रोध करिकै
युक्त
और नुकुटीकरिकै भयंकर और पूर्णिमाके विपे उदयहोताहुवा चं-
द्रमाकी तुल्य है शोना जाकी ऐसा तुलारे मुखको देखकर ता समय महिपा-
सुर प्राण नहीं त्यागता भया यह बड़ा अचरज है क्यों कि क्रोधयुक्त कालके
दर्शन करिकै कौन प्राणी जीवे अर्थात् कोई नहीं जीवे ॥ १३ ॥ हे भगवती
तुम प्रसन्न हो फिर कैसी हो उत्कृष्ट लक्ष्मीरूप हो तुलारेसे युद्ध करनेको
आई ऐसी जो महिपासुरकी सेना है ताको तुमने नाशको प्राप्त करदई यह
क्या बात है इसको अवही हम जानें है कि हे भगवती जब तुम प्रसन्न होती
हो तब शीघही जगदका पालन कर्ती हो और जब क्रोधयुक्त होती हो तब
शीघही असुरोंके वंशका नाश कर्ती हो ॥ १४ ॥ हे भगवती ! तुम मनोरथ
पूर्ण करनेवाली जिनके ऊपर प्रसन्न हों वेही मनुष्य संपूर्ण देशों में प्रतिष्ठा
वाले है और उनके धन है और उनकेही यश है और उनके जाईबंध जे हैं
तेभी दुःख नहीं पाते है और वेही पुण्यवाले हैं फिर वे पुरुप कैसे हैं कि
शिक्षा दियेगयेहैं कुलको आचरणके विपे पुन और नौकर और
लियां जिनोंके ॥ १५॥
अध्याय ४ (३७) धाणिदेविसकलानिसदेवकर्माण्यत्यात प्रतिदिनंस्कृती करोति ॥ स्वर्गप्रयातिचततोभवतीप्रसादालोकत्रयेपिफलदा- ननुदेवितेन ।।१६।। दुर्गेस्मृताहरसिभीतिमशेपजतो स्वस्थैः स्मृतामतिमतीवशुभांददासि ॥ दारिद्यदुःखभयहारिणिका त्वदन्यासर्वोपकारकरणायसदाचित्ता ॥ १७॥ एभिहत - गदुपैतिसुखंतथैतेकुवैतुनामनरकायचिरायपापासंग्राममृत्यु- मधिगम्यदिवंप्रयांतुमत्त्वेतिनूनमहितान्विनिहंसिदेवि॥२८॥ दृष्ट्वर्किनभवतीप्रकरोतिभस्मसर्वासुरानरिषुयत्प्रहिणोपिश- नं ।। लोकान्प्रयान्तुरिपवोपिहिशस्त्रपूता इत्थंमतिर्भवतिते- प्वहितेषुसाध्वी ॥ १९॥ खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलायकांतिनिवहेनदृशोसुराणां ॥ यन्नागताविलयमंशुमदि दुखंडयोग्याननं तवविलोकयतांतदेतत् ॥२०॥ टीका- हे भगवती! तुमारी रुपासे नित्यप्रति सदाही आदरयुक्त होता हुवा जो सुकृति मनुष्य है सो तुलारी प्रसन्नताके अर्थ ज्योतिष्टोमादिक जे कर्म है तिनको कर्चा है फिर ताके अनंतर तुझारी प्रसन्नतासे स्वर्गमें जाता है फिर ताके अनंतर मोक्षको प्राप्त होता है हे देवी! तिस कारण करिकै तीनों लोकोंमें तुमही फल देनेवाली हो ॥ १६ ॥ हे दुर्गे! तुम मन करिकै स्मरण करी हुई सब प्राणीयोंका भय दूर कर्ती हो और स्थिर चित्तवालों करिकै स्मरण करी हुई तुम उनको धर्म अर्थ काम मोक्ष इनका साधनभूत अत्यंत श्रेष्ठ बुद्धि देती हो हे दारिद्य और दुःख और जय इनको दूर करनेवाली! मघका उपकार करनेको सदैव आई है हृदय जाको ऐसी तुझारेसे और दू- सरी कौन है अर्थात कोई नहीं है ॥ १७ ॥ तुमनें मारे जे ये महिषासुरसे आदि लेकरकै दैत्य तिन करिकै जगद सुखको प्राप्त हो और तिस प्रकार ये असुर बहुत काल पर्यंत .नरकके विपे पात होवेको पाप मत करो किंतु ये असुर संयामके विपे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जावो ये निश्चय करिकै तीन (३८) सप्तशतीनापाटीका। कारण मनमें विचार करिकै हे देवी! इन असुरोंको तुम मारती हो ॥१८॥ हे भगवती! सृष्टि करिकेही क्या सब असुरोंको भस्म नहीं करयो अर्थाद करिही यो तौसी शत्रुवोंके विपे जो तुम शस्त्र छोडती हो सो हमारो शत्रुभी शस्त्रोंसे पवित्र होता हुवा यथेच्छ स्वर्गादिक लोकोंके विषे जावो इस प्रका- रसे दुष्ट दैत्योंके विपे तुह्मारी श्रेष्ठ बुद्धि है ॥ १९ ॥ और संग्रामके विपे तु- हारे खड़की जे प्रना. ताके समूहके चौतरफ फैलने करिकै और त्रिशूलकी प्रभाके समूह करिकै असुरोंकी जे दृष्टि ते नाशको प्राप्त न भई सो यह और ही कारण है क्यों कि कैसे हैं वे असुर है अमृतमयी किरण जाकी ऐसा अर्द्धचंद्र करिकै युक्त जो तुह्मारा मुख ताको देखते हुवे ॥ २० ॥ दुर्वृत्तवृत्तशमनतवदेविशीलरूपंतथैतदविचित्यमतुल्यमन्यैः! वीर्यचहंतृहृतदेवपराक्रमाणांवरिष्वपिप्रकटितवदयात्वयेत्थ म् ।।२१।। केनोपमाभवतुतेस्यपराक्रमस्य रूपंचशत्रुभय कार्यतिहारिकुत्र ॥ चित्तेकृपासमरनिदुरताचदृष्टात्वय्येव देवि वरदेभुवनत्रयेपि॥ २२॥ त्रैलोक्यमेतदखिलंरिपुनाशनेनवातं त्वयासमरमूर्धनितेपिहत्वा ॥ नीतादिवरिपुगणाभयमप्यपा स्तमस्माकमुन्मदसुरारिभवनमस्ते ॥ २३ ॥शूलेनपाहि नोदेविपाहिखड्ड्रेनचाम्बिके । घण्टास्वनेननः पाहिचापज्या- निःस्वनेनच॥२४॥प्राच्यांरक्षप्रतीच्यांच चण्डिकेरक्षदक्षिणे।। भ्रामणेनात्मशूलस्यउत्तरस्यांतथेश्वरि ॥ २५ ॥ टीका-फिर हेदेवि! तुम कैसीहो पापियोंके पाप दूर करनेवाला यह तु- सारा स्वाभाविक गुणहै और तिसीप्रकार मन करिकेनी चितवन करनेको दुर्ली और अद्वितीय होनेसे और कोई मनोहर रूपों करिकै समान नहीं ऐसा तुमारा रूपहै और तिसीप्रकार अपने आधीन कियेहैं देव जानें ऐसा है पराक्रम जिनोंका ऐसे दैत्योंको मारनेवाला तुलारा पराक्रमह फिर हेदेवि! वै- रियोंकेविपेनी तुमने ऐसे दयाही प्रगट करी ॥ २१ ॥ हेवरदान देनेवाली!
अध्याय ४ (३९) तुमारा इस पराक्रमकी तीन लोकमनी किसीके साथ उपमा होय अर्थाद किसीके साथ नहीं ऐसा तुझारा पराक्रमहै और शत्रुवोंकों भव करनेवाला औरनको मनोहारी ऐसा रूप कहां ऐसा तुमाराही रूपहै और तुलारा चित्तके विपे रुपा और रणके विपे कठोरता यह तुम्हारे विपेही दे- खीहै ।। २२ ।। हेदेवि! संग्रामके विपे दैत्योंको मारि करिके तुमनें संपूर्ण त्रि- लोकीकी रक्षा करी फिर उन अपने दैत्योंकोजी संग्रामके विपे मारि करिके तुमनें स्वर्गमें पहुँचादिये और दैत्योंसे उत्पन्न जो हमको भय था सो हमारा भयभी तुमने दूरकिया ऐसी जो तुमहो तुलारे अर्थ नमस्कारहै ॥ २३ ॥ हे अधिक त्रिशूल करिके हमारी शत्रुवोंसे रक्षाकरो और खड्ग कारकै रक्षाकरो और हे देवि ! घंटाके शब्द करिकै और धनुपकी टंकार करिके तुम हमारी शत्रुवोंसे और पापोंसे रक्षाकरो ॥ २४ ॥ हेचंडिके त्रिशूलको चारों और घुमाने करिकै पूर्वमें और पश्चिममें और दक्षिणमें हमारी रक्षाकरो और तिसीप्रकार हेईश्वरी उत्तरके विपे रक्षाकरो ॥ २५ ॥ सौम्यानियानिरूपाणित्रैलोक्येविचरंतिते ॥ यानिचात्यंतचो- राणितैरक्षास्मांस्तथाभुवम्।। २६ । खड्गशूलगदादीनियानि चास्त्राणितेम्बिककरपल्लवसंगीनितेरस्मानक्षसर्वतः॥२७॥ ऋपिरुवाच ॥ एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैनंदनोद्भवः अर्चि- ताजगतां धात्रीतत्रगंधानुलेपनैः ।। २८ । भत्त्यासमस्तौस्त्रि- दशैदिव्यधूपैःसुधूपिता ॥ प्राहप्रसादसुमुखीसमस्तान्प्रण- तान्सुरान् ॥२९॥ देव्युवाच ।। त्रियतांत्रिदशाः सर्वेयदस्म- त्तोभिवांछितम्।।ददाम्यहमतिप्रीत्यास्तरोभासुपूजिता॥३०॥ टीका-और हेजगवती ! संसारको रचनवाले और पालना करनेवाले जे तुम्हारे सौम्यरूपहें और संसारके संहार करनेवाले ऐसे जे तुम्हारे अयंकर रूप हैं ते दोनो प्रकारके रूप त्रिलोकीके विपे विचरते हैं तिन दोनों प्रकारके रूपों करिकै हमारी रक्षाकरो और या पृथ्वीकी रक्षा करो और पातालकी राक्ष- सप्तशतीभाषाटीका। करो ॥ २६ ॥ और हेजगवती ! हार्थेमें धारण किये ऐसे जे सड़ और त्रिशूल और गदा इन आदिलेकर शस्त्र तिनकरिके और धनुषआदि जे. अस्त्रह तिन करिके चारों तरफ शत्रुवोंसे और दुःखसे हमारी रक्षाकरो॥२७॥ तवं ऋषि बोले कि हे राजन् ! जब इसप्रकारसे जगत्के पोषण करनेवाली भगव- वती देवता करिकै स्तुति करीहुई और दिव्य नंदन वनमें उत्पन्न होनेवाले पुप्पों कारकै और चंदन श्रीराग इत्यादिकोंकरिके पूजितहुई ॥ २८ ॥ और देवतावों करिकै भक्तिपूर्वक दिव्य धूपसे पूजितहुई ऐसी भगवती प्रसन्न होतीहुई देवतोंके प्रति बोलतीभई ॥ २९ ॥ देवी बोली कि हे देवो! सब तुम मेरेसे मनोवांछित वरदान मांगो तुमने स्तुतिकरी जिसकरिकै मैं बडी प्रसन्नहूं सो जो मांगोगे वही दूंगी॥३०॥ कर्तव्यमपरंयच्चदुष्करंतन्नविद्महे ॥ इत्याकर्ण्यवचोदेव्या प्र- त्यूचुस्तेदिवौकसः॥३१॥देवाउचुः॥ भगवत्या कृतं सर्वनकि- चिदवीशप्यते ॥ यदयंनिहतःशत्रुरस्माकंमहिषासुरः॥३२॥ यदिचापिवरोदेयस्त्वयास्माकंमहेश्वरि ॥ संस्मृतासंस्मृतात्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥३३॥ यश्चमर्त्यःस्तवरेभिस्त्वां स्तोप्यत्यमलानने॥ तस्यवित्तदिविभवैर्धनदारादिसंपदाम् ॥ वृद्धयेस्मत्प्रसन्नात्वंभवेथाः सर्वदाम्बिके ॥३४॥ ऋपिस्वाच।। ॥ इतिप्रसादितादेवैर्जगतोर्थे तथात्मनः ॥ तथेत्युक्त्वाभद्र- कालीवभूवांतर्हितानृप ॥ ३५ ॥ टीका-फिर हेदेवो! और जो तुमको कार्य करणाहोय सो कहो उसको कुछ मुश्किल नहीं जानतीहूं ऐसे भगवतीके कोमल वचन सुन करिके देयता बोलतेये ॥३१॥ देव बोले हेदेवि ! जिस कारणसे तुमने यह हमारा महिपासुर नाम शत्रु मारा याने तुमने सब हमारा प्रयोजन करिही दिया और कुछ काम पाकी न रहा ॥ ३२॥ हेमहेश्वरी ! जो तुमने हमारेको वरदेना पोग्पहीहै तो वही आपनियोंके विपे तुमे पारंवार स्मरण करीहुई हमारी अध्याय ४ (४१) पनि दूरकरो ॥ ३३॥ और हे जगवती हे अमलानने जिन लोकोंकरिके तुलारी हमने स्तुति कही उनश्लोकोकरिके जो कोई मनुष्य तुलारी स्तुति करेगा याते हमारेपर प्रसन्नहुई उस मनुष्यकी अश्वसे आदि लेकर जो धन और ऋदि और ऐश्वर्य इन करिके सहित जे धन और स्त्री पुत्रादिकनकी संपत्ति है तिनकी तुम सदा वृद्धिके अर्थ हो ॥३४॥ तव ऋपि बोले हेसुरथ राजन् इस प्रकारसे जगत्के अर्थ और अपने अर्थ देवोंने प्रसन्नकरी ऐसी जो भद्रकाली सो तेसेही हो ऐसे कहकर अंतर्धान होतीभई ॥ ३५ ॥ इत्येतत्कथितंभूपसंभूतासायथापुरा॥देवीदेवशरीरेभ्योजगत्र यहितैपिणी ॥३६॥ पुनश्चगौरीदेहात्सासमुद्भूतायथाभवत्। वधायदुष्टदैत्यानांतथाशुंभनिशुंभयोः ।। ३७॥ रक्षणायचलो- कानांदेवानामुपकारिणी॥तच्छृणुष्वमयाख्यातंयथावत्कथया मिते ॥ ३८ ॥ इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकमन्वंतरेदे- वीमाहात्म्ये शकादिस्तुति मचतुर्थोध्यायः ॥ ४ ॥ टीका-हे राजन् तीनों लोकका हित चाहनेवाली भगवती महिषासुर आदि दैत्योंके चकेवास्ते पहिले जैसे सब देवोंके शरीरोंसे तेजरूप उत्पन्न होती भई यह वृत्तांत मैंने तुलारेको कहा ॥३६ ॥ फिर दुष्ट दैत्योंके मारनेके वास्ते और शुंभ निशुंजके मारनेकेवास्ते और तीनों लोकोंकी रक्षाकेवास्ते गौरीका देहसे जैसे भगवती उत्पन्न नई सो तुमसे यथार्थ कहता हूं मेरा कहा सुनो ॥३७॥ ३८ ॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे शकादिकत देव्याःस्तुति मचतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ ऋषिरुवाच ॥ पुरा शुंभनिशुंभाभ्यामसुराभ्यांशचीपतेः॥3- 'लोक्यंयज्ञभागाश्चहतामदवलाश्रयात् ॥३॥तावेवसूर्यतांतद दधिकारंत/दवम् ॥ कौबेरमथयाम्यंचचक्रातेवरुणस्यच॥२॥ तावेवपवनचिचक्रतुर्वह्निकर्मच ॥अन्येषांचाधिकारान्सस्व- यमेवाधितिष्ठति।ततोदेवाविनिर्धूताभटराज्या:पराजिताः॥३ :
(४२) सप्तशतीभाषाटीका। हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यांसवेंनिराकृताः॥महासुराभ्यांतां देवीसंस्मरंत्यपराजिताम् ॥ ४॥ तयास्माकंबरोदत्तो यथापत्सु स्मृताखिलाः। भवतांनाशयिष्यामितत्क्षणात्परमापदः ।।५।। टीका-ऋपि बोले पहिले तामसमन्वन्तरकेविषे कश्यपजीके सकाश ते दनु स्त्रीके विष तीन असुर उत्तन्न होते जये जिनोंमें बड़ा तो नमुचि नामा और छोटे शुंभ और निशुंभ तिनमें शुभ और निशुंभ ए दो बडे पराक्रमी भये इन शुंभ निशुन दोनों असुरों ने मद और गर्व और सामर्थ्य इनके शरीरमें हो- नेसे इंद्रका त्रैलोक्य खोस लिया ॥ १ ॥ और वे दोनों शुंज निशुंभही सूर्य- पनाका काम कर्तजये और तिसी प्रकार चंद्रपनाका काम कर्त्त भये और तिसी प्रकार कुबेरपनाका और यमराजपनाका और वरुणपनाका काम कर्ते भये ॥२॥ और वेही पवनके निरंतर गतिरूपी जो ऐश्वर्य हैं सो कर्ते और वेही अमिका काम कर्तजये इसी प्रकार और सब देवतोंकानी अधिकार आपही लेते जये और तिन शुंन निशुंन असुरोसे हारे हुवे यातेही भ्रष्ट हो गयो है राज्य जिनोका ऐसे जे देव ताते शुंभ निशुंन असुरोंने स्वर्गसे निकास दिये ॥ ३ ॥ फिर खुसगया है राज्य जिनोका ऐसे जे तिन दानवोंकारकै स्वर्गसे निकासे हुये संपूर्ण देवता ते नहीं किसी करिकैनी पराजित ऐसी जो भागयती ताको स्मरण करें भये ॥ ४॥ मैं आपतिकालकेरिये स्मरण करी हुई उसी समय तुलारी संपूर्ण आपत्ति जे हैं तिनको नष्ट करूंगी इस प्रकारसे भगवतीने हमारेको वर दिया है ॥५॥ इतिकृत्वामतिदेवाहिमवंतनगेश्वरम् ॥ जग्मुस्तत्रततोदेवीं विष्णुमायांप्रतुष्टुवुः ॥६॥ देवाऊचुः॥ नमोदेव्यैमहादेव्यै शिवाय सततंनमः ॥ नमःप्रकृत्येभद्रायेनियताःप्रणतास्म ताम् ॥ ७॥ रोद्रायनमोनित्यायेगौयंधाव्येनमोनमः॥ नमो जगत्प्रतिष्ठायदेव्यकृत्यैनमोनमः ॥८॥ ज्योत्स्नायचंद्ररूपि- ण्यसुसायसततंनमः ॥ कल्याण्येप्रणतामृद्धय सिद्धयेकम्य
अध्याय ५
(४३)
नमोनमः ॥ नैर्ऋत्यभूभृतालक्ष्म्यैशाण्यतेनमोनमः ॥ ९ ॥
दुर्गायदुर्गपारायसारायेसर्वकारिणि ॥ ख्यात्यतथैवकृष्णाय
धूम्रायसततंनमः ॥ १० ॥
टीका- इस प्रकार मनमें विचार करिकै पूर्वतराज हिमालय पर्वत जो
है तहां जाते आये फिर विष्णुमाया भगवतीकी स्तुति कर्ने भये ॥ ६ ॥ देव
वोले कि देवीक अर्थ नमस्कार है और महादेवीके अर्थ और कल्याणरूपा
भगवतीके अर्थ निरंतर नमस्कार है और प्रकृतिके अर्थ नमस्कार है और
मंगलरूपाके अर्थ नमस्कार है एकाग्र चित्त हुवे तिस भगवतीको हम प्रणाम
कर्ने हैं ॥ ७ ॥ और संहारशक्केि अर्थ नमस्कार है और कालत्रयकारकै
अबाधित ऐसी नित्यरूपा भगवीके अर्थ नमस्कार हो गौरीके अर्थ और
धरणीरूपाके अर्थ नमस्कार ३ और जगतका धारण करनेवालीके अर्थ नम-
स्कार देवी और कतीके अर्थ नमस्कार है॥ ८॥ और चांदिनीरूपाके अर्थ
और चंद्ररूपिणीके अर्थ परमानंदरूपाके अर्थ निरंतर नमस्कार और कल्या-
णीके अर्थ और प्रणाम करनेवाले तिनकी कधिके अर्थ और सिद्धिके अर्थ
और कूर्मसंबंधिनी शक्तिके अर्थ नमस्कार और अलक्ष्मीके अर्थ और राजा-
वोंकी लक्ष्मीके अर्थ और शर्वाणीके अर्थ नमस्कार२॥९॥ और दुःख करिकै
जानी जाय ऐसी दुर्गाके अर्थ और संसारसे दूरके अर्थ और सर्व कारिणीके
अर्थ और विख्यातिरूपाके अर्थ और तिसी प्रकार कृष्णशक्तिके अर्थ और
धूम्रवर्णाके अर्थ निरंतर नमस्कार हो ॥ १० ॥
अतिसौम्यातिरौद्रायैनमस्तस्यैनमोनमः ॥ नमोजगत्प्रति-
टायैदेव्यैकृत्यैनमोनमः॥११॥ यादेवीसर्वभूतेषुविष्णुमाये-
तिशब्दिता नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः।।१२॥
यादेवीसर्वभूतेषुचेतनेत्यभिधीयते ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥ १३ ॥ यादेवीसर्वभूतेषुबुद्धिरूपेणसं-
स्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥१४॥
(४४) सप्तशतीभाषाटीका। यादेवीसर्वभूतेषुनिद्रारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥१५॥ टी और अतिसौम्याके अर्थ अर्थात् अतिसुंदराके अर्थ और अत्यंत ज- चकराके अर्थ नमस्कार नमस्कार नमस्कार और जगत्के उपादान कारणरूपाके अर्थ नमस्कार और देवशक्तिके अर्थ और क्रियारूपाकें अर्थ नमस्कार नमस्कार नमस्कार ॥३१॥ और जो भगवती सब भूतोंकेविषे विष्णुमाया नामकरिक कही है तोके अर्थ काय वाणी और मन इन करिके प्रत्येक नमस्कार नम- स्कार नमस्कार ॥ ३२॥ और जो सब प्राणियोंकेविर्षे चैतन्यशक्ति कही- जातीहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ १३॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियों के विपे बुद्धिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १४ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विषे निद्रारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १५॥ यादेवीसर्वभूतेपुक्षुधारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥१६॥ यादेवीसर्वभूतेषुच्छायारूपेणसं स्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥१७॥ यादेवीसर्वभूतेपुशक्तिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥ १८॥ यादेवीसर्वभूतपुतृष्णारूपे- णसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥ १९॥ यादेवीसर्वभूतेषुक्षांतिरूपेपसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२०॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे क्षुधारूप करिकै स्थित हैं ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १६ ॥ और जो देवी संपूर्णप्राणीयोंकेविपे छाया- रूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ १७ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियों के विषे शक्तिरूप करिके स्थितहैं ताके अर्थ नमस्कार ३॥१८॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे प्णारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ
अध्याय ५
(४५)
नमस्कार ३ ॥ १९ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे सांविरूप करिके
स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ २० ॥
यादेवी सर्वभूतेपुजातिरूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्येनमोनमः ॥२१॥ यादेवीसर्वभूतेपुलजारूपेणसं
स्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥ २२ ॥
यादेवीसर्वभूतेषु शांतिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै न-
मस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः||२३॥ यादेवीसर्वभूतेषुश्रद्धारू-
पेणसंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः
॥२४॥यादेवीसर्वभूतेषुकांतिरूपेणसंस्थिता।नमस्तस्यै नम-
स्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२५॥
टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विपे जातिरूप करिकै स्थित है
ताके अर्थ नमस्कार ३॥२१ । और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके लज्जारूप
करिके स्थित ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥२२॥ और जो देवी संपूर्ण पाणि-
योंकेविपे शांतिरूप कारकै स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ २३ ॥
और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे श्रद्धारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ
नमस्कार ३॥२४॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे कांतिरुप करिके
स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ॥ ३॥ २५ ॥
यादेवीसर्वभूतेषुलक्ष्मीरूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्त-
स्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२६॥ यादेवीसर्वभूतेषुधृतिरूपे-
णसंस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥२७॥
यादेवी सर्वभूतेषुवृत्तिरूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥ २८॥ यादेवीसर्वभूतेषुस्मृतिरूपेणसं-
स्थितनमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः ॥२९॥
यादेवीसर्वभूतेषुदयारूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यैनमोनमः ॥३०॥
(४६) सप्तशतीभापाटीका। टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविषे लक्ष्मीरूप करिकै स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥२६॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे धृति- रूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥२७॥और जो देवी संपूर्ण 'प्राणियोंके विषे वृत्तिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥२८॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विषे स्मृतिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ २९ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंके विपे दयारूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥३०॥ यादेवीसर्वभूतेपुनीतिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः॥३१॥ यादेवी सर्वभूतेषुतुष्टिरूपेणसंस्थि- तानमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमोनमः॥३२॥ यादेवी सर्वभूतेषुपुष्टिरूपेणसंस्थिता ॥ नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्त- स्यैनमोनमः ॥ ३३॥ यादेवीसर्वभूतेषुमातृरूपेणसंस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः॥३४॥ यादेवीसर्व भूतेषु भ्रांतिरूपेणसंस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥३५॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे नीतिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३१॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे तुष्टि- रूप करिकै स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥३२॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे पुष्टिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३ ॥ ३३ ॥ और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे मातृरूकारिक स्थितहै ताके अर्थ न- मस्कार ३॥३४॥और जो देवी संपूर्ण प्राणियोंकेविपे भांतिरूप करिके स्थितहै ताके अर्थ नमस्कार ३॥ ३५ ॥ इंद्रियाणामधिष्टानीभूतानांचाखिलेपुया ॥ भूतेपुसततंव्या- प्त्येतस्यैदेव्यैनमोनमः ॥ ३६॥ चितिरूपेणयाकृत्स्नमेत- द्वयाप्यस्थिताजगत् ॥ नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्ये अध्याय५ (१७) नमोनमः ॥ ३७॥ स्तुतासुरैःपूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथासुरेंद्रे- शदिनेषुसेविता ॥ करोतुसानःशुभहेतुरीश्वरीशुभानिभद्रा- ण्यभिहंतुचापदः॥३८॥ यासांप्रतचोदतदैत्यतापितरस्माभि रीशाचसुरैर्नमस्यते ॥ याचस्मृतातत्क्षणमेवहन्तिनःसर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः॥ ३९॥ऋषिरुवाचाएवंस्तवाभियुक्तानां देवानांतत्रपार्वती॥स्नातुमभ्याययौतोयेजाह्नव्यानृपनंदन॥४०॥ टीका-और जो देवी संपूर्ण पञ्चमहाभूतोंकी आधार शक्ति है और संपूर्ण प्राणियोंकेविप ज्ञानके कारण ऐसीस्थूल सूक्ष्म जे इंद्रिय तिनको प्रेरण करनेवालो ऐसी व्याप्तिरूप तिस देवीके अर्थ निरंतर नमस्कार ३॥३६॥ और जो देवी चैतन्यशक्तिरूपकरिके संपूर्ण जगत्कं व्यात करिके स्थित है नाके अर्थ नमस्कार ३॥ ३७॥ और जो शुजका कारण ईश्वरी अभीष्टवस्तुके कारणसे पहिले ब्रह्मा आदिदेवोंकरिके स्तुतिकरिगई और तिसीप्रकार इंद्र करिके नित्यप्रति सेवितहोतीभई सो भगवती हमारे निर्विघ्रपूर्वक मंगलकरो और आपत्ति जे है तिनको दूर करो ॥ ३८॥ और जो देवी निमर्याद जे शुभनिशुंन असुर तिनकरिके पीडित और भक्तिकारके नम्रहै मूर्ति जि- नोंको ऐसे जे हम तिनकरके स्तुति करीजातीहै और जो देवी स्मरण करीहुई उसीक्षण हमारी संपूर्ण आपत्तियोंको दूरकरती है तो भगवती हमारे निर्विघ्नपूर्व क मंगल करो और आपत्ति जे है तिनकू दूर करो ॥ ३९ ॥ तब ऋषि बोले कि हे राजन् फिर उस हिमाद्रिपर्वतकेविषे इसपकार स्तुतिकेविपे युक्त जे देवता तिनके सन्मुख श्रीमंगाजीके जलमें स्नान करनेकों पार्वती भगवती आतीभई ॥४०॥ सावीत्तान्सुरान्सुधूर्भवद्भिःस्तूयतेत्रका ॥ शरीरकोशत वास्याः समुद्भूतात्रवीच्छिवा ।।४।। स्तोत्रममैतत्कियतेशुंभ दैत्यनिराकृतैःदेिवैःसमस्तैःसमरेनिशुंभेनपराजितैः॥४२॥ शरीरकोशायत्तस्या पार्वत्यानिःसृताम्बिका ॥ कौशिकीतिस (४८) सप्तशतीचापाटीका। मस्तेपुततो लोकेषु गीयते ॥ ४३ ॥ तस्यांविनिर्गतायांतु कृष्णाभूत्सापिपार्वती ॥ कालिकेतिसमाख्याताहिमाचलक- ताश्रया ॥ १४ ॥ ततोम्बिकांपररूपंबिभ्राणांसुमनोहरं ।। ददर्शचण्डोमुण्डश्चभृत्यौशुंभनिशुंभयोः ॥ ४५ ॥ टीका-फिर वह पार्वती देवतासे प्रश्न कर्ती भई के हे देवो तुम मेरेसे अन्य किसकी स्तुति कर्ने हो ताके अनन्तर देवताके उत्तर दीने के पहिलेही पार्वतीके शरीरकोशसे निकसकर प्रकटहुई शिवा नाम भगवती उत्तर देती भई ॥४१॥निशुंभ करिके संयामकेविपे हार हुवे और शुंभ करिकै स्वर्गसे निकासे हुवे ऐसे जे सब देव तिनकरिके यह मेरी स्तुति करी जाती है ॥ ४२॥ जिस कारणसे तिस पार्वतीका शरीरकोशसे निकसी हुई जो अंबिका तिस कारणसे सब लोकोकेविपे कौशिकी इस नाम करिके कही जाती है ॥४३॥ फिर पार्वतीका शरीरकोशसे शिवा निकसाके वाद पार्वती कृष्णवर्ण होती गई हि- माचलकेविषे किया है स्थान जाने ऐसी कालिका नामकरिके विख्यात भई ॥४४॥ ताके अनंतर अत्यंत मनोहर रूपको धारण कर्ती हुई अगव- तीको शुंग और निशुंभ इनके नौकर चंड और मुंड ये देखते भये ॥ ४५ ॥ ताभ्यांशुंभायचाख्याताअतीवसुमनोहरा ॥ काप्यास्ते स्त्रो महाराजभासयंतीहिमाचलम् ॥४६॥ नैवताहक्क्वचिद्रूपंदृष्टं केनचिदुत्तमम् ॥ज्ञायतांकाप्यसौदेवीगृह्यतांचासुरेश्वर।॥४७॥ स्त्रीरत्नमतिचार्वगीद्योत्तयंतीदिशस्त्विपासातुतिष्टतिदैत्येंद्र तांभवान्द्रष्टुमर्हति ॥ १८ ॥यानिरत्नानिमणयोगजाश्चादी- निवप्रभो ॥ त्रैलोक्येतुसमस्तानिसांप्रतानितेगृहे ॥१९॥ ऐरावतःसमानीतोगजरत्नंपुरन्दरात् ॥पारिजाततरुश्चायंत धैवोच्चैःश्रवा हयः॥५०॥ टीका-ताके अनंतर तिनोने जाकर शुमसे कहा के हे महाराज हिमाचल पर्वत अपनी कांतिकरिके शोभायमान कर्ती हुई एक वहां वही मनोहर अध्याय ५ (४९) ी है ॥ १६ ॥ ऐमा उत्तम रूप किसीने कहू नहीं देखा याने यह कोई ऐसी भी देवी है यह आप निश्चय जाणों हे असुरेश्वर आप उसको ग्रहण करो॥४॥ और अत्यंत मनोहर अंगवाली और सब स्त्रियोंकेविपे उत्तम और अपनी कांतिकरिके दशो दिशाकों प्रकाशमान कर्ती हुई हिमालय पर्वतकेविपे स्थित है सो हे दैत्येन्द्र तुम उसको देखने कू योग्य हो ॥ ४८ ॥ और हे प्रभो त्रि- लोकोकेविषे संपूर्ण हाथी और घोडे इनसे आदि लेकर जे रनसदृश है और हे मनो पद्मरागादिक जे मणी है इस समय ये संपूर्ण वस्तु तुलारा घरकेविषे वर्तमान है ॥४९॥ और हे प्रभो ऐरावत हाथीरूपी रन और कल्पवृक्षरूपी रव और उच्चैःश्रया अश्वरूपी रख ये आप इंद्रके पासते लाये ॥ ५० ॥ विमानहंससंयुक्तमेतत्तिष्ठतितेंगणरत्नभूतमिहानीतंयदासी- द्वेधसोद्भुतम् ॥५१॥ निधिरेपमहापद्मासमानीतोधनेश्वरात् ॥ किंजल्किनींददौचाधिर्मालामम्लानपंकजाम् ॥५२॥ छत्रं तेवारुणंगेहेकांचनस्रावितिष्ठति ॥ तथायंस्यंदनवरायःपुरासी त्प्रजापतेः॥ ५३ ॥ मृत्योरुत्क्रांतिदानामशक्तिरीशत्वया हता ॥ पाश-सलिलराजस्यभ्रातुस्तवपरिग्रहे ॥ १४ ॥ निशुभस्याब्धिजाताश्चसमस्तारत्नजातयः ॥ वह्निश्चापिददौ तुभ्यमग्निशीचेचवाससी ॥१५॥ टीका-और हंसों करिके युक्त रवरूपी जो ब्रह्माका अद्भुत विमान था सो यहाँ ल्याया हुवा तुसाराआँगनके विषे स्थित है ॥५१॥ और कुबेरसे ल्याया ऐसा निधिरूपी रन तुह्मारे घरके विषे वर्तमान है और भयसे समुद्र कमलोकी माला देतो भयो ॥ ५२ ॥ और सुवर्णकी वर्षा करनेवाला ऐसा वरुणका छत्र तुझारे घरके विषे स्थित है और किसी प्रकार जो पहिले दक्ष प्रजाप- तिके रथ था सो यहां लाया हुवा तुलारे घरके विपे स्थित है । ५३ ॥ और हे ईश अंतकके सकाशने तुमने प्राणोंको खैचनेवाली शक्ति लई और वरु- मका जो पाश है सो तुलारा भाई निशुनका हाथके विषे है ॥ ५४॥ और
(५०)
सप्तशतीमापाटीका।
जितने प्रकारके समुद्रसे उत्पन्न होनेवाले रन है वे संपूर्ण तुलारा भाईके घरके
विपे हे और हे शुंन अनिमें गेरनेसे पवित्र होय ऐसे सुवर्णमयी दो वस्त्र तुझा-
रेको अनिदेव देतो भयो ॥ ५५ ॥
एवंदैत्येंद्ररत्नानिसमस्तान्याहृतानिते॥ स्त्रीरत्नमेपाकल्या.
णोत्वयाकस्मानगृह्यते ॥५६॥ ऋषिरुवाच ॥ निशम्येतिवचः
शुभासतदाचंडमुंडयोः॥ प्रेपयामाससुग्रीवंदूतदेव्यामहासुरः
..॥२७॥शुभउवाच॥ इतिचेतिचवक्तव्यासागत्वावचनान्मम ॥
यथाचाभ्येतिसंप्रीत्यातथाकार्यत्वयालघु ॥५८॥ सतत्रगत्या
यत्रास्तेशैलोद्देशेतिशोभने ॥ तांचदेवींततःप्राहक्ष्णंमधुर-
यागिरा ॥ ५९॥ दूतउवाच ॥ देविदैत्येश्वरःशुंभत्रैलोक्येप-
रमेश्वरः ॥ दूतोहंप्रेपितस्तेनत्वत्सकाशमिहागतः॥६० ॥
टीका-हे दैत्येंद्र इस प्रकार तुमने पूर्वोक्त सब रन संचय किये फिर शुभ
करनेवाली अंबिका स्त्रीरूपी रत्न तुम क्यों ग्रहण नहीं कर्ते हो ॥ ५६ ॥
तव ऋपि बोले कि हे सुरथ राजन् इस प्रकार चंड और मुंड इनका वचन
सुन,करिके शुभ देवी संदेस लानेवाला ऐसा सुग्रीव नामा दूत ताको देवी पास
भेजताया ॥५७॥ शुंभ-बोला हे सुग्रीव तू वहां जा करिके मेरे वचनसे साम
और भेद इन उपायों करिकै इस प्रकार कहना के जिस तरह प्रीति करिकै
वह शीच हमारे पास आ जाय तिस प्रकार तुमारेको कार्य कर्त्तव्य है।५८॥
ताके अनंतर जहां हिमालय पर्वतका श्रेष्ठ प्रदेशके विषे देवी विराजमान तहां
जा करिके अत्यंत मधुर वाणी करिकै उस देवीको मनोहर वाक्य बोलता
भया.॥ ५९॥ दूत बोला कि हे देवी त्रिलोकीके विपे शुभ नामा दैत्येश्वर
परमेश्वर है ताका भेजाहुवा दूत मैं यहां तुलारे पास आया हूँ ॥६० ॥
अव्याहताज्ञःसर्वासुयःसदादेवयोनिषु॥निर्जिताखिलदैत्यारिः
सयदाहशृणुष्वतत् ॥ ६॥ ममत्रैलोक्यमखिलंममदेवावशा-
नुगाः॥ यज्ञभागानहंसर्वानुपानामिपृथक्पृथक् ॥ ६२ ॥
अध्याय ५ (५१) त्रैलोक्येवररत्नानिममवश्यान्यशेपतः ॥ तथैवगजरत्नंचहतं देवेंद्रवाहनं ॥६३ ॥ क्षीरोदमयनोद्भूतमश्वरत्नंममामरैः।उच्चैः श्रवससंज्ञतत्प्रणिपत्यसमर्पितम् ॥६४॥ यानिचान्यानिदेवे- घुगंधर्वेपूरगेपुच ॥ रत्नभूतानिभूतानितानिमय्येवशोभने ॥६५॥ टीका-सदा देव दानवोंविषे नहीं रुके आज्ञा जाकी और जीतलिये सब देव जाने ऐसा जो शुसासुर ताने जो कहा सो मेरेसे तुम सुनो ।। ६१ ॥ संपूर्ण त्रिलोकी मेरी है और संपूर्ण देव मेरे वशीभूत नौकर है और पृथक् पृथक् इंद्रादि देवोंके निमित्न विधान किये आहुति रूपी जे यज्ञभाग हैं तिन सवको मैंही भोजन का हूँ ॥ ६२ ॥ और जे त्रिलोकीके विषे सुंदर वस्तु है ते संपूर्ण मेरे वश है और तिसी प्रकार इंद्रका वाहन गजरूपी रन हमारे ल्याया हुवा है ।। ६३ ॥ और क्षीर समुद्र मंथनसे उत्पन्न भया ऐसा उच्चैः- श्रवानामा जो अश्व सो देवताओंने प्रणाम करिकै मेरे भेट किया ॥ ६४ ॥ और हे शोभने देवोंके विपे और गंधर्षों के विपे और नागों के विषे जे अन्य मनोहर स्त्रीरूपी रन हैं ते संपूर्ण मेरेही विषे है ॥ ६५ ॥ स्त्रीरत्नभूतात्वांदेविलोकेमन्यामहेवयम् ।। सात्वमस्मानुपाग च्छयतोरत्नभुजोवयम् ॥६६॥ मावाममानुजवापिनिशंभमु- रुविक्रमम् ।। भजत्वचंचलापांगिरत्नभूतासिवयतः ॥६॥ परमैश्वर्यमतुलंप्राप्स्यसेमत्परिग्रहात् ॥ एतबुद्धयासमालोच्य मत्परिग्रहतांबन ॥६८॥ऋषिरुवाच ॥ इत्युक्तासातदादेवी गंभीरांतस्मताजगौ ॥ दुर्गाभगवती भदाययेदंधार्यतेजग- व॥६९॥ देव्युवाच॥ सत्यमुक्तत्वयानाचमिथ्याकिंचित्त्व- योदितम् ॥त्रैलोक्याधिपतिःशुभोनिशुंभश्चापिताशा॥ टीका-हे देवी इसकूलोकके विपे तुमारेको हम उनम स्त्रीरूपीरव जा- नतेहै सो तुम हमारेको प्राप्तहो याने हम उत्तम रनको भोगनेवाले होवे ॥६६॥ हे चालकटासीवाली तुम उनम रत्नरूतीहैं याते मेरेको अथवा मेरा छोटा (५२) सप्तशतीमापारीका। भाई बडापराक्रमी निशंभकू पतिभावसे अंगीकार करो. ॥ ६७ ॥ और मेरा आश्रयसे तुम अत्यंत श्रेष्ठ ऐश्वर्यकी स्वामिनी अर्थात् मालिक होजायोगी हे देवी यह बुद्धिसे विचार करिके मेरे स्त्रीपनाको तुम प्राप्त हो ॥ ६८॥ तब ऋपि बोले कि हे सुरयराजन् जब इस प्रकारसे दूतने भगवतीको शुभका संदेश कहा ताको सुनि हसतीभई भगवती उसदूतको बोलतीभई फिर कैसीहै देवी अगाधहै अभिप्राय जाको फिर कैसी है के दुःखकरिके जानीजाय फिर कैसाहै कल्याणरूप है वह कौन भगवती के जा करिके यह जगत् धारण कियाजाताहै सो ॥६९॥ देवी बोली के हे दूत त्रैलोक्यका राजा शुभहै और निशुंभनी उसीके समानहै.इसमे तुमनें सत्य कहा कुछ मिथ्या नहीं कहा॥७॥ किंवत्रयत्प्रतिज्ञातमिथ्यातक्रियतेकथम् ॥ श्रूयतामल्पवु- दित्वात्प्रतिज्ञायाकृतापुरा ॥७२॥ योमांजयतिसंग्रामेयोमेद पैव्यपोहति ॥ योमेप्रतिबलोलोकेसमेभर्ताभाविष्यति॥७२॥. तदागच्छतुशुंभोत्रनिशुंभोवामहासुरः ॥ मांजित्वाचिरेणा त्रपाणिगृह्णातुमेलघु ॥७३॥ दूतउवाच॥अवलिप्तासमैवत्वं देविब्रूहिममाग्रतः॥ त्रैलोक्येकापुमांस्तिष्ठेदग्रेशुंभनिशुंभयोः ॥५४॥अन्येषामपिदैत्यानांसवे देवानवैयुधि ।। तिष्ठतिसंमुखे देविकिंपुनःस्त्रीत्वमेकिका ॥७५॥ टीका-इस शुंगका आश्रयणके विपे मेरा विचारहै परंतु जो मैने प्रतिज्ञा करी सो मिथ्या कैसे करू जो मने पहिले बाल्यावस्थाके विपे विगर विचारि करिके प्रतिज्ञा करीहै सो तुम सुनो॥७॥जो मेरेको संग्रामके विषे जीते और जो मेरा गर्व दूरकरे और जो लोकके विष मेरेसे बलवान् सो मेरा म होगा ॥७२॥ फिर तिसमतिज्ञा कारणसे यहां मेरी प्रतिज्ञा पालनके विपे शुभ आवों अथवा महासुर निशुंभ आवो फिर देरकरनेकरिके क्या है संयामके विषे मरको जीतकर शाम मेरा पाणियहणकरो ॥७३॥ तक दूत बोला के हे देवी तुम ऐसे गवं मतकरो और तुम मेरे आगे यह कहो के त्रिलोकीक विपे ऐस अध्याय ६ (५३) पुरुप कोनहै जो शुंभनिशुनके आगे युद्ध करनेको सडा होवे अर्थात् कोई नहीं ॥ ७४ ॥ और हेदेवी संग्रामके विषे अन्य दैत्योकेगी सन्मुख संपूर्ण देव नही खडेरहतेहै फिर तु इकल्ली वी युद्ध के विपे दैत्योंके सन्मुख कैसी ख- डी रहसकतीहो अर्थात् सर्वथा नहीं ॥ ५ ॥ इंद्रायास्सकलादेवास्तस्थुर्येपानसंयुगे ॥ शुभादीनांकथतेपां स्त्रीप्रयास्यसिसंमुखम् ॥ ७६ ॥ सात्वंगच्छमयैवोक्तापाचशें- भनिशंभयो। केशाकर्पणनिधूतगौरवामागमिष्यति ॥ ७७ ॥ देव्युवाच ॥ एवमेतद्वलीशुभोनिशुंभश्चातिवीर्यवान् ॥ किंक- रोमिप्रतिज्ञामेयदनालोचितापुरा ॥ ७८॥ सत्संगच्छमयो- कैतेयदेतत्सर्वमाहतः॥तदाचक्ष्वासुरेंद्रायसचयुक्तंकरोतुतत् ॥७९ ॥ मार्कडेयपुराणे सावर्णिकमन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये दे- व्यादूतसंवादोनामपंचमोध्यायः॥५॥ टीका-और संग्रामके विपे जिनके अगाडी युद्धकरनेको इंद्रादिक देव नही सडे रहतेनये तिनशुंभनिशुंभके सन्मुख युद्धकरनेको तू खी कैसी जाय गी॥ ७६ ॥ सो तुम मेरा कहनासे शुंभनिशुंभके पास चलों क्योंके केशाके खैचने करिके दूर होगया बडपन जाका ऐसी तुम शुंभनिशुनके पास मत आवों इस दया करिके मै तुमको कहताहू ॥ ७७ ॥ तब देवी बोली हे दूत शुंभ बडापराक्रमीहै और निशुत बडा पराक्रमीहै यह तुमने कहा सो असेही है प- रंतु क्या करू मेरी यह प्रतिज्ञा है मैने पहिले विचार नहींकिया॥७८॥हे दूत सो तुम जावो और मैने संपूर्ण तुमारेको यह कहा सो जाकर आदरयुक्त हु- वा शुभासुरके अर्थ कहो ताके अनंतर वह शुभासुर उचितहो सो करो॥७९॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये देव्यादूतसंवादोनामपं- चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ ऋषिरुवाच ॥ इत्याकर्ण्यवचोदेव्या सदूतोमर्षपरितः॥ समा- चप्टसमागम्यदैत्यराजायविस्तरात् ॥१॥ तस्यदूतस्यत- (५४) सप्तशतीभापाटीका। द्वाक्यमाकासुरराइततः॥ सक्रोध पाहदैत्यानामधिपंधून- लोचनं ॥ २ ॥ हेधूम्रलोचनाशुत्त्वस्वसैन्यपरिवारितः ॥ तामानयबलाइष्टांकेशाकर्षणविह्वलां ॥ ३ ॥ तत्परित्राण दःकश्चिद्यदिवोत्तिष्ठतेपरः ॥ सहतव्योमरोवापियक्षोगंधर्वए- ववा॥ ४॥ऋषिरुवाच॥ तेनाज्ञप्तस्ततःशीघ्रप्तदैत्योधूम्रलो चनः ॥ वृतः पथ्यासहस्राणामसुराणांद्रुतंययौ ॥ ५॥ टीका-ताके अनंतर ऋषियोले हे सुरथराजन इसप्रकार देवीका वचन श्रवणकरिके वह दूत क्रोधकरिके भराहुवा देवीका पर्वतके सकाशते आक- रिक विस्तारते शुंभासुरके अर्थ कहतामया ॥ १ ॥ तिस दूतका मुखसे देवी का वाक्य श्रवण करिके ताके अनंतर क्रोध युक्तहुवा असुरोका राजा शुं- भासुर दैत्योका मालिक ऐसा जो धूम्रलोचन ताहि कहतासया॥ २॥ हे धूम्र लोचन तुम अपणी सेनाकरिके युक्तहुवा केशोंके खैचनेकरिके व्याकुल ऐ सी जो दुष्टिनी देवी है ताहि बलात्कारसें शीघ ल्यावो मेरेकू प्राप्तकरो ॥३॥ और ताहि ग्रहण करनेको इच्छाकरे ऐसो ताकी रक्षा करनेवालो जो कोई और शत्रुता कारके खडाहोवे सो मारनेके योग्यहै चहिये देव होघे चाहिये यक्ष होवे अथवा गंधर्व होवे ॥ ४ ॥ तब ऋपि बोले हे राजन् ताके अनंतर शुंगकरिके आज्ञादियाहुवा ऐसा वह धूम्रलोचन दैत्य साठिहजार असुरोका समूह करिके युक्तहुवा शीघ जाताभया ॥५॥ सदृष्ट्वातांततोदेवींतुहिनाचलसंस्थिताम् ॥ जगादोच्चैःप्रयाहीति मूलंशुंभनिशुंभयोः ॥ ६ ॥ नचेयीत्याद्यभवतीमद्भारमु- पेप्यति ॥ ततोवलानयाम्येषकेशाकर्षणविह्वलाम् ॥ ७ ॥ देव्युवाच ॥ दैत्येश्वरेणप्रहितोपलवान्वलसंवृतः ॥ बलात्रयसि मामेवंततःकितेकरोम्यहं ॥८॥ऋषिरुवाच।इत्युक्तःसोभ्यधा- पत्तामसुरोधूम्रलोचनः।। हुंकारेणैवतंभस्मसाचकारांविकाततः अध्याय ६ (५५) ॥ ९॥ अथद्धमहासेन्यमसुराणांतथाम्पिका ॥ वर्षसाय कैस्तीक्ष्णैस्तथाशक्तिपरश्वधैः ॥ १०॥ टीका-फिर वह धूम्रलोचन हिमाचलके विपे स्थित ऐसी जो देवी ताहि दे- खकर हे देवि तुम शुंभनिशुंभके पास चलो इस प्रकारसे ऊचेस्वरकरिक बोलताया ॥ ६ ॥ और जो तुम आज अपनी रुची करिके हमारा स्वामी गुंभ जो है वाहि नहीं प्राप्त होगी तो तिसकारणते यह धूम्रलोचननामा जो मै असुर हू सो अवहीं केश के खैचनेकरिके वेवश ऐसी जो तुम हो ताहि बला- त्कार करिके हमारा स्वापी शुभ जो है तिन्हे प्राप्तकरूगा॥णातब देवी बोली के हे धूम्रलोचन तु बलवान् है और सेनाकरिके युक्त है और शुभासुरका भेजाहुवाहै सो तु इस प्रकार पूर्वोक्त केश खैचनेकारके वेवश ऐसी मै जो हूँ ताहि बलात्कारसे प्राप्तकरे तो ताके अनंतर मै तेरा क्या करू अर्थाद कुछनही ॥८॥ तब अपि बोले के देवी करिके ऐसे कहाहुवा धूम्रलोचनअसुर वेग करिके देवी जो है ताहि सन्मुख दौडवालया ताके अनंतर वह अंबिका हुँकार करिकेही ताहि भस्म कीमई ॥ ९ ॥ फिर धूम्रलोचन भस्म होनेके वाद क्रोधयुक्तहुई ऐसी जो असुरोकी सेना है नाहि तीखे बाणों करिके और शाग्य सहित कुठारोके संपात करिके अंबिका आच्छादन कर्तीभई ॥ १० ॥ ततोधुतसटकोपात्कृत्वानादंसुभैरवं ॥ पपातासुरसेनायांसिं- होदेव्यास्तुवाहनः ॥ १३ ॥ कांश्चित्करप्रहारेणदैत्यानास्ये नचापरान् ॥ आक्रम्यचरणेनान्यानिजघानमहासुरान् ॥१२॥ केपांचित्पाटयामास नखै कोष्ठानिकेसरी ॥ तथातलप्रहारेण शिरांसिकृतवान्पृथक्॥ १३ ॥ विच्छिन्नवाहुशिरस कृतास्ते- नतथापरे ॥ पपौचरुधिरकोप्टादन्येपांधुतकेसरः ।। १४ ॥ क्षणेनतलंसर्वक्षयनीतमहात्मना । तेनकेसरिणादेव्यावाहने नातिकोपिना ॥ १५॥ टीका-ताके अनंतर कोधसे कंपाये हैं काँधेके केश जाने ऐसादेवीका सप्तशतीमापाटीका। पाहन सिंह भयंकर गर्जना करिके असुरोंकी सेनाके विषे उछल कर पड़ता भया ॥ १ ॥ फिर कितनेही जे दैत्य है तिन्है करके प्रहार करिकै मारता भया और कितनेही जे है तिन्है मुखके प्रहार करिके मारतानया और कित- नेही जे अन्य है तिन्हें चरणके प्रहार करिके मारता भया ॥ १२ ॥ और कितनेही दैत्योंका नखों करिके पेट फाडताया और तिसी प्रकार कितनेही दैत्योंका शिर जे है तिन्हे चनपटके प्रहार करिके धडसे अलग की भया । ॥ १३ ॥ फिर वा सिंहने और कितनेही हाथ शिर कटेहुवे करिदिये फिर कंपाय है कांधाके केश जाने ऐसा सिंह अन्य कितनेही दैत्योंका पेट फाढ कर उनका पेटसे रुधिर पीतोभयो ॥ १४ ॥ अत्यंत क्रोधवाला ऐसा देवी- वाहन जो सिंह है ताने संपूर्ण धूम्रलोचनकी सेना जो है ताहि क्षणारकरिके नाशको प्राप्त कर दई ॥ १५॥ श्रुत्वातमसुरदेव्यानिहतंधूम्रलोचनं ॥वलंचक्षयितंकृत्स्नं देवीके सरिणाततः॥१६॥चुकोपदैत्याधिपतिः शुंभ-प्रस्फुरिता- ताधरः॥आज्ञापयामासचतौचंडमुंडोमहासुरौ।। १७ ॥ हे चं- डहेमुंडवलैर्वहुभिः परिवारितौगिच्छतंतत्रगत्वाचसासमानी- यतांलघु ।। १८॥ केशेष्वाकृष्य बद्धा वा यदिवः संशयो युधि।तदाशेपायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यतां ॥ १९ ॥ तस्यां हतायांदुष्टायांसिंहेचविनिपातिते । शीघ्रमागम्यविद्यागृही- त्वातामथाधिकाम् ॥ २० ॥ इतिमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये धूम्रलोचनवधानामपष्टोध्यायः ॥६॥ टोका-ताके अनंतर देवीने भस्म किया ऐसा धूम्रलोचन जो असुर है ताहि सुन करके और देवीके सिंहने संपूर्ण धूम्रलोचनका सैन्य नष्ट किया ताहि सुन करिके ॥ १६ ॥ कोधसे कंपाये है होठ जाने ऐसा दैत्येश्वर शंध कामया और चंड और मुंड ये जे महाअसुर है जिन्हे आज्ञा देते अध्याय ७ (५७) भयो ॥१७॥ हे चंड हे मुंड नुम बहुतनी सेना करिके सहित जहां वह देवी विराजमान है वहां जावो वहां जाकर उस देवीको शीघ ल्यावो ॥१८॥हे चंड मुंड सेनाबो तुम केश सैचकर अथवा रस्सीसे बांधकर वा देगको मेरे समीप ल्यायो जो युद्ध प्रवृत्त हो जाय तिसके विपे लाने में संदेह होय तो संप- " शखों के प्रहार करिके ता देवीको सब जने मारो ॥ १९॥ ताकू मारेके बाद और सिंहको मारकर पृथ्वीमें गिरायेके वाद तुम शीघ आवो और जी- वती ल्यानेकी सामर्थ्य होय तो वा अविकाको रस्मीसे बांध और ग्रहणकर शीच आवो ॥ २० ॥ इति मार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वंतरे देवीमाहात्म्ये धूम्रलोचनवधोनाम पष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ ऋषिरुवाच ॥ आज्ञप्तास्तततोदेत्याश्चंडमुंडपुरोगमाः ॥ चतुरंगवलोपेताययुरभ्युद्यतायुधाः ॥ १ ॥ ददृशुस्तेततो देवीमीपद्धासांव्यवस्थिताम् ॥ सिंहस्योपरिशैलेंद्रशृगेमहति कांचने॥२॥ तेदृष्ट्वातांसमादातुमुधमंचकुरुयताः॥ आकृ. पृचापासिथरास्तथान्येतत्समीपगाः ॥ ३ ॥ ततः कोपंच कारोचैरंविकातानरीन्प्रति ॥ कोपेनचास्यावदनमपीवर्ण मभूत्तदा ॥ ४ ॥ध्रुकुटीकुटिलात्तस्याललाटफलकाद्रुतं । कालीकरालवदनाविनिष्क्रांतासिपाशिनी ॥५॥ टीका-ताके अनंतर शुंग करिके आज्ञा दियेहुए और उठाये है शख जिनोने और चतुरंगिणी सेनाकरिके युक्त और चंड मुंड हैं अगाडी चलने वाले जिनोंके ऐमे जे दैत्य ते जगवनी के पास जाते जये ॥ १ ॥ ताके अनंतर हिमालयकी सुवर्णमय शिखरकेविष स्थित जो सिंह वाके ऊपर बैठी हुई और मंद है हास जाको ऐसी जो देवी नाहि ते दैत्य देखते भये ॥ २ ॥ फिर चे देख करिके तोके अनंतर उद्युक्त हुवे वाहि ग्रहण करनेको उद्यम कतलये कैसे है बे दैत्य सैचा है धनुष जिनोने ऐसे और खड्ग धारण करनेवाले ऐसे और तिसी प्रकार अन्य कितनेही जगवतीके पास जाते भये ॥ ३ ॥ ताके . (५८) सप्तशतीजापाटीका। अनंतर अविका तिन शत्रूनके प्रति अत्यंत कोप कर्ती भई तब कोपकरिके याको मुख स्याहीकी समान श्याम होतो भयो ॥ ४ ॥ वा समय अंबिकाको अकुटीके चढानेते वाकों ऐसो जो ललाटरूपी पटल ताके सकाशते भयंकर मुख जाको और सड़ पाश ए है हाथोंकेविषे जाके ऐसी काली नाम कोई अन्य शक्ति निकसती ई अर्थात् प्रकट होती भई ॥५॥ विचित्रखदांगधरानरमालाविभूपणा ॥ द्वीपिचर्मपरीधानाशु- कमांसातिभैरवा ॥६॥ अतिविस्तारवदनाजिह्वाललनभी- पणा ॥ निममारक्तनयनानादापूरितदिङ्मुखा ॥ ७ ॥ सावेगेनाभिपतितापातयन्तीमहासुरान् ॥ सैन्ये तत्रपुरारी णामभक्षयततद्वलम् ॥८॥ पाणिग्राहांकुशग्राहयोधघंटासम वितान्।समादायकहस्तेनमुखेचिक्षेपवारणान् ॥९॥ तथैवयो- धंतुरगैरथंसारथिनासहानिक्षिप्यवक्रेदशनैश्चर्वयंत्यतिभैरवं १०॥ 'टीका-कैसी है वह काली अनेक तरहके हैं चित्राम जाके ऐसा खट्टा- गको धारण करे ऐसी फिर कैसी है प्रेतोंके मुंडोंकी माला है आभूपण जाके ऐसी फिर कैमी है व्याघ्रके चर्मका है वस्न जाके ऐसी फिर कैसी है हाडवर्म मात्र है शरीर जाका ऐसी यावेही अति भयंकर ऐसी ॥६॥ फिर कैसी है अत्यंत है विस्तार जाको ऐसो है मुख जाको फिर कैसी है जिव्हाके आस्वा- दन करनेकी जो इच्छा ताकारकै भयंकर है फिर कैसी है गडे हुये हैं लाल नेत्र जाके फिर कैसी है सिंहनादकरिके पूर्ण किये हैं दशों दिशावों के मध्य जाने ॥ ७॥ फिर वह काली तिस असुरोंकी सेनाकेविपे वेग करिकै पड़ती हुई महा असुर जे हैं तिन्हें मारतीहुई असुरोंकी सेना जो है ताहि भक्षण कर्ती भई ॥ ८॥ और जे भाला लेकरिकै हाथियोंके पीछे चलनेवाले ऐसे जे हाथियों के शिक्षक हैं और जे हाथियोंको चलानेवाले महावत हैं और जे हाथियों के सवार योद्दा हैं और जे हाथियों के गलेमें बँधी हुई घंटा है तिन सय करिक सहित जे हाथी हैं तिन्हें एक हाथ करिक ग्रहण करि काली अध्याय ७ (५९) मुखकेविपे गेरती नई अर्थात् साती गई ॥ ९॥ और तिस प्रकारही घोडो करिकै सहित जे योद्धा तिन्हें और सारथियोंकरिकै सहित जे रथ हैं तिन्हें मुसके विपे गेर करि दातोंकरिकै मृत्यु जो है ताहि चर्वण करवाती भई ॥१०॥ एकंजग्राहकेशेषुग्रीवायामथचापरम् ॥ पादेनाकम्यचैवान्यमु- रसान्यमपोथयत् ॥ ११ ॥ तैर्मुक्तानिचशस्त्राणिमहावाणित- थासुरैः॥ मुखेनजग्राहरुपादशनैर्मथितान्यपि ॥ १२ ॥ ब- लिनांतलंसर्वमसुराणांदुरात्मनां ॥ ममभिक्षयच्चान्यान न्यांश्चाताडयत्तथा॥ १३॥असिनानिहता केचित्केचित्सदां गताडिताः । जग्मुर्विनाशमसुगदंताग्राभिहतारणे ॥ १४ ॥ क्षणेनतन्महारोन्यमसुराणानिपातितं ॥ दृष्ट्वाचंडोभिदुद्रावता कालीमतिभीपणां ।। १५॥ टीका-ताके अनंतर केशोंकेविषे एक दानव जो है ताहि पकडती गई याके अनंतर गलकेविषे अन्य दानव जो है ताहि पकडतीनई और पैर क- रिके पकड एक दानव जो है ताहि मारतीजई और पेट पकडिके एक दानव जोहै ताहि मारतीमई ॥ १३॥ ता समय चंड मुंडसे आदि लेकर ने दानव है तिन्होंने और तिसीपकार अन्य असुरोंने कालीके सन्मुख वाह ऐसे खड्ग भादि लेकर जे शस्त्र और आग्नेयसे आदि लेकर जे बड़े अब तिन्हे कोषसे मुख कारकै काली ग्रहण कीनई और ग्रहण कारकै दातोंसे चूर्णितभी क- जीभई ॥ १२॥ फिर दुष्टहै अंतःकरण जिनोका और बलवान् ऐसे जे चं. इमुंडसे आदि लेकर असुर तिनकी संपूर्ण सेना जो है नाहि काली नष्ट की भई ता सेनाकेविषे कितने जे है तिन्हें भक्षण कर्तीभई और कितनेही जैहैं तिन्हें मारतीमई ॥ १३ ॥ फिर उस रणमें कितनेही असुर कालीने खड्ग के महारकारके मारे हुवे नाराको माप्त होतेनये और कितनेही खाटके पाये कारके ताडन किये हुये विनाशको प्राप्त होताये और तिसी प्रकार दंतके अग्रभाग करिके ताडन कियेहुये विनाशवो प्राव होतेजये ॥ १४॥ किन सप्तशतीचापाटीका। क्षणार करिकै कालीने पृथ्वीमें गिराई ऐसी जो वह असुरोंकी महासेना है ताहि देखकर अतिभयंकर जो काली है ताहि युद्ध करने को चंड सन्मुख दौ- ढतो भयो ॥१५॥ शरवमहाभीमैीमाक्षीतांमहासुरः ॥ छादयामासचक्रैश्चमुं डःक्षिप्तैःसहस्रशः ॥ १६॥ तानिचकाण्यनेकानिविशमाना- नितन्मुखं ॥ बभुर्यथाविधानिसुबहूनिघनोदरम् ॥ १७ ॥ ततोजहासातिरुपाभीमभैरवनादिनी ॥ कालीकरालवक्रां- तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥ १८॥ उत्थायचंमहासिंहदेवीचंडम- धावत ॥ गृहीत्वाचास्यकेशेषुशिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥ ॥ १९॥ छिन्नेशिरसिदैत्येन्द्रश्चक्रेनादंसुभैरवं ॥ तेननादेनम- हताचासितंभुवनत्रयं ॥२०॥ टीका-ताके अनंतर भयंकरहें नेत्र जाके ऐसी जो कालीहै ताहि बा- गोंकी वर्षा करिक और मस्तक काटेहैं जिनो करिके ऐसे जे हजार हजार चक्र, तिनो करिके चंड आच्छादित कोंभयो ॥ १६ ॥ फिर चंड करिके चलायेगये जे अनेकचक ते कालीका मुख जोहै ताहि प्रवेश हुये शोभायमा- न होतेभये कैसे कि जैसे उत्सातकेचिपे बहुत सूर्य के बिंब मेघका उदर जो है ताहि प्रवेश होतेहुवे शोभायमान होतेहैं ॥ १७ ॥ फिर रणके उत्सवते काली अत्यंत क्रोध करिके भयंकर जैसे होय तैसे हँसती भई काली कैसी है भयंकर शब्द करे ऐसी फिर कैसीहै भयंकर जो मुख ताकेविपे दुःख क.. रिक देखीजाय ऐसी जो डाट तिन करिके उज्ज्वल अर्थात् श्वेतयत्ततीयमा- न ऐसी॥ १८॥नाक अनंतर काली महाखड उठायकर रोप करिके चंटके सन्मुख दौडती भई फिर चंडके केश सेंच करि तिस महाखडसे शिर काट- तीमई ॥ १९ ॥ फिर देवी करिके शिर कटेसते तासमयही दैत्येंद्र चंड महानयंकर शब्द कोंभयो तिस बढे भयंकर शब्द करिके तीनों लोक प्रासको प्राप्त किये ॥ २० ॥ -
अध्याय ७
अथमुंडोभ्यधावत्तादृष्ट्वाचंडंनिपातितं ॥ तमप्यपातयभूमी
खदांगाभिहतंरुपा ॥ २१ ॥ हतशेपंततः सैन्यं दृष्ट्वाचंड
निपातितं ॥ मुंडंचसुमहावीर्यदिशोभेजेभयातुरम् ॥ २२॥
शिरश्चंडस्यकालीसागृहीत्वामुण्डमेवच।। प्राहप्रचंडाहासमि
श्रमभ्येत्यचंडिकां ॥ २३॥ मयातवानोपहृतौचण्डमुंडी
महापशु ॥ युद्धयज्ञेस्वयंशुंभनिशुंभचहुनिष्यसि ॥ २४ ॥
ऋपिरुवाच॥ तावानीतौततोदृष्ट्वाचंडमुंडौमहासुरौ ॥ उवाच
कालींकल्याणी ललितंचंडिकावचः॥ २५ ॥
टोका-याके अनंतर कालीने संग्रामकेविष गिराया ऐसा जो चण्डहै
ताहि देखकरिके मुंड कालीके सन्मुख दौडतो भयो फिर खदांग महार करिके
ताडित ऐसा जो मुंडहै ताहिती रोष करिकै पृथ्वीमें गिरातीनई ॥ २१ ॥
फिर मरेहुवे दानवों से बाकी रही ऐसी जो दानवोंकी सेनाहै सो देवीने संग्रामके
चिपे गिराया ऐसा जो चंडहै ताहि और बडापराक्रमी मुंड जोहै ताहि देखकर
भयकरिके विह्वलहुई रणभूमिके सकाशते निकस करिके दौडजातीभई
॥ २२ ॥ ताके अनंतर काली चंडका शिर जोहै ताहि और मुंडका शिर
जोहै ताहि यहण कारकै और चंडिका जोहै लाहि प्राप्त होकर प्रगल्न जो
आधिक हास ताकरिके मिलाहुवा जैसे तैसे बोलतीभई ॥ २३ ॥ हे चंडिके
इस युद्धरूपी यज्ञकेविषे चंड और मुंड ये महापशू मैंने तुम्हारे भेटकियेहैं
और देवगणकी प्रीतिके अर्थ शुंभ और निशुंभ जो दो पहँ तिन्हे तुमही
मारोगी ॥ २४ ॥ तब पि बोले ताके अनंतर कालीकरिके लायेहुये जे
चंड मुंड महाअसुर हैं तिन्हे चंडिका देखकर काली जोहै ताहि मनोहर वचन
वोलती भई ॥ २५ ॥
देव्युवाच ॥ यस्माचंडंचमुंडंचगृहीत्वात्वमुपागता ॥ चामुं.
डेतिततोलोकेख्यातादेवीभविष्यसि ॥२६ ।। इति मार्कण्डे-
यपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्येचण्डमुण्डवधोनाम
सप्तमोध्यायः॥७॥
(६२)
सप्तशतीक्षापाटीका।
टीका-देवी बोली हे काली जिसकारणते चंड और मुंड जोहैं ताहि
ग्रहण करिकै तुम मैं जोहूं नाहि प्रानहुई हो तिसकारणते लोककेविषे तुम
चामुंडा इस नाम करिकै विख्यात देवी होगी ॥ २६ ॥ इति मार्कण्डेय पुराणे
सावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्ये चंडमुंढवधोनामसप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
ऋपिरुवाच॥चंडेचनिहतेदैत्येमुण्डेचविनिपातिते ॥ बहुलेषु
चसैन्येषुक्षायतेष्वसुरेश्वरः ॥ १॥ ततः कोपपराधीनचेताः
शंभः प्रतापवान्।उद्योगसर्वसैन्यानांदैत्यानामादिदेशह ॥२॥
अबसर्ववलदैत्या पडशोतिरुदायुधाः॥ कंधूनांचतुराशीतिनि
योन्तुस्ववलेवृताः॥३॥ कोटिवीर्याणिपंचाशदसुराणांकुला-
निवै ॥ शतंकुलानिधूम्राणांनिर्गच्छन्तुममाज्ञयां ॥ ४ ॥
कालकादौईदामौर्याः कालिकेयास्तथासुराः ॥ युद्धायसन्जा
निर्यातुआज्ञया त्वरितामग ॥५॥
टीका-तब ऋषि बोले कालीकरिकै चंड मारेगये संते और तिसी प्र-
कार मुंड मार पृथ्वीमें गिरायेसंते और ताकरिकेही असंख्यात सेना नष्टहुये
संते ताके अनंतर कोप करिके परवशहै चित्त जाको और प्रतापी ऐसो असु-
रोंको ईश्वर जो शुंनासुर सो दैत्योंकी संपूर्ण सेना जेहै तिनको चंडिकाके पास
जाने रूपी उद्योग आज्ञा. करतो भयो ॥ १॥२॥ आज मेरी आज्ञा क-
रिकै छयासी जे तुम प्रधान दैत्य हो ते उठायेहै शस्त्र जिन्होंने ऐसे संपूर्ण अप-
नी चतुरंगिनी सेना जे हैं तिन करिकै युक्त हुवे देवी के साथ युद्ध करनेको
जावो और कंबुनाम जे दैत्यहँ तिनके चौराशी समूह भेद जे हैं ते अपनी से-
ना कारकै युक्तहुवे देवीके साथ युद्ध करनेको जायों ॥ ३ ॥ और कोटि
वीर्य नाम जे असुरोंके पंचाशकुल ते और धूम्र नाम असुरजे तिनके जे सौ-
कुल ते मेरी आज्ञा करिकै देवीके साथ युद्ध करनेको जावें ॥४॥और कालक
नामा जे असुर और दौ«द नामा जे असुर और मौर्यनामा जे असुर और
तिसीप्रकार कालकेयनामा जे असुर ते संपूर्ण मेरी आज्ञा करिके शीय तैयार
होतेहुये देवीके साथ युद्ध करनेको जावो ॥५॥
अध्याय ८ (६३) इत्याज्ञाप्यासुरपति शुम्भोभैरवशासनः ॥ निर्जगाममहास- न्यसहर्षहुभिर्वृतः ॥६॥ आयातंचण्डिकादृष्ट्वातत्सैन्यम- तिभीपणम् ।। ज्यास्वनःपूरयामासधरणीगगनांतरम् ॥ ७ ॥ साँसंहोमहानादमतीवकृतवानृप ॥ घण्टास्वनेनतन्नाद- मंविकाचाप्ययत् ॥ ८॥ धनुासिंहघण्टानांनादापूरित- दिङ्मुखा ॥ निनादीपणे कालीजिग्यविस्तारितानना ॥ ॥ ९ ॥ तंनिनादमुपश्रुत्गदैत्यसन्यैश्चतुर्दिशम् ॥ देवीसिंह स्तथाकालीशरौंधःपरिवारिताः ॥१०॥ टीका-फिर भयंकर है शिक्षा जाकी ऐसा असुरपति शुंभ इस प्रकार असुर जे हैं तिन्हें आज्ञा देकर बड़ी है सेना हजारों जिनोकेविषे ऐसे बहुत दानवनकरिकै युक्तहुवा देवौके साथ युद्ध करनेको जाना भया ॥ ६ ॥ नाके अनंतर चंडिका आताहुवा जो शुंन है ताहि और बाकी जो भयंकर सेना है ताहि देख कर धनुषको प्रत्यंचाके टंकार शब्दन करिकै आकाश पृथ्वीका मध्य जो है ताहि पूर्ण करतीनई ॥ ७ ॥ ताके अनंतर हे नृप वह भगवतीका सिंहनी बडा शब्द का नया फिर अं- विका घंटाके शब्दकरिके सिंहके शब्दको बढाती भई ॥ ८॥ फिर धनुपर्क प्रत्यंचाके और सिंह और घंटा इन शब्दोंकरिकै पूर्ण किये हैं दिशावोंके मुख जाने और फाडा है मुख जाने ऐसी देवी तिन दैत्यनको जीतती भई॥२॥ ताके अनंतर धनुपकी प्रत्यचा सिंह घंटा इनका चारों दिशामें व्याप्त ऐसा शब्द सुनके दैत्पसेनाने देवी और सिंह और किसी प्रकार काली ये सब बा- गोंके समूह करिक रोक दिये ॥ १० ॥ 'एतस्मिन्नंतरेभूपविनाशायसुरद्विपाम् ॥ भवायामरसिंहानाम- . तिवीर्यबलान्विताः ॥ ११॥ ब्रह्मेशगुहविष्णूनांत/दस्य “च शक्तयः॥ शरीरेभ्योविनिष्क्रम्यतद्रुपैश्चण्डिकाययुः॥१२॥ यस्यदेवस्ययद्रूपंयथाभूषणवाहनम् ॥ पद्रदेवहितच्छक्ति- (६४) सप्तशतीभाषाटीका रसुरान्यो माययौ ॥ १३ ॥ हंसयुक्तविमानस्थासाक्षसूत्र- कमण्डलुः॥ आयाताग्रह्मण शक्तिब्रह्माणीसाभिधीयते॥१४॥ माहेश्वरीव पारूढात्रिशूलवरधारिणी ॥ महाहिवलयाप्राप्ताच न्द्रलेखाविभूषणा ॥ १५ ॥ टीका-और इस देवी दानवोंके संग्रामके होतेसंते मध्यमें दानवोंक विना- शके अर्थ और देवोंकी वृद्धिके अर्थ ब्रह्मा शिव स्वामी कार्तिक विष्णु तथा इंद्र इन सबकी सामर्थ्यरूपी जे शक्ति हैं ते इनके शरीरोंते निकसकर अपने अपने देवोके समान रूपों करिकै चण्डिकाके समीप आतीभई ॥ ११॥ १२॥ फिर जिस देवका जैसा रूप और जैसा भूषण और जैसा वाहन तिसी प्रकार तिस देवकी असुरोंते रणमें युद्ध करनेको देवीके पास आती भई ॥१३॥हंस- युक्त विमानमें बैठी हुई और स्फटिक मणियोंका माला पहरे हुये और कम- डलु लिये हुये ब्रह्माकी शक्ति युद्ध करनेको आती भई सो ब्रह्माणी इस नाम करिके कही जाती है ॥ १४ ॥ और माहेश्वरी शक्ति वृपाके ऊपर बैठीहुई और त्रिशूलको धारण किये हुवे और बडे साँका है कडा जाके अईचंद्र है मस्तकमें आसूपण जाके ऐसी असुरोंके साथ युद्ध करनेको भगवतीके पास आती भई ॥ १५॥ कौमारीशक्तिहस्ताच मयूरवरवाहना योडुमभ्याययोदैत्या नंविकागुहरूपिणी ॥ १६ ॥ तथैववैष्णवीशक्तिर्गरुडोपरि- संस्थिता ॥ शंखचक्रगदाशार्ङ्गखङ्गहस्ताभ्युपाययौ ॥ १७॥ यज्ञेवाराहमतुलंरूपंयाविभ्रतीहरेः ॥ शक्ति साप्याययौतत्रवा- राहीविभ्रतीतनुम्।।१८।नारसिंहीनृसिंहस्यविभ्रतीसदृशंवपुः। प्राप्तातत्रसटाक्षेपक्षिप्तनक्षत्रसंहतिः ॥ १९॥ वज्रहस्तातथैवैद्री गजराजोपरिस्थिता। प्राप्तासहस्रनयनायथाशकस्तथैवसा।.२०॥ टीका-फिर शाग्य है हाथमें जाके और श्रेष्ठ मयूर है वाहन जाके और स्वामीकार्तिकके समानहै रूप जाके ऐसी कौमारी अंविका दैत्योके साथ युद्ध अध्याय ८ (६५) करनेको आतीभई ॥ १६ ॥ और तिसीप्रकार वैष्णवीशक्ति गरुड़के ऊपर बै- हुई और शंख चक्र गदा शाह धनुप सड़ ये शत्रहै हाथोंमे जाके ऐसी विष्णुकी समान वैष्णवीशक्ति उस रणमें असुरोंके साथ युद्ध करनेको आतीलई ॥ १७ ॥ फिर ताके अनंतर उपमा कारकै रहित विष्णुका वरा- हरूप जो है ताहि धारण कर्तीहुई जो प्रकट होतीलई सो शक्तिमी वराहका शरीर धारण कर्तीहुई रणमें आतीमई ॥ १८॥ ताके अनंतर कांधेके केशरो- का जहां तहां ताडन करिकै दूर करें, नक्षत्रोंके समूह जाने ऐसी नृसिंहके समान शरीर धारण कर्तीहुई नारसिंही शक्ति असुरोंते रणमें युद्ध करनेको आतीभई ॥ १९ ॥ फिर तिसीप्रकार वज्रहै हाथमें जाके और ऐरावत हा- थीके ऊपर बैठीहुई और हजार, नेत्र नाके ऐसी ऐंद्री शक्ति रणमें पान होतीभई जैसा इंद्र तैसीही वह ॥ २०॥ ततःपरिवृतस्ताभिरीशानोदेवशक्तिभिः ॥ हन्यतामसुराः शीघ्रममप्रीत्याहचंडिकाम्॥२१॥ ततोदेवीशरीरात्तुविनिष्का तातिभीपणा॥चंडिकाशक्तिरत्युग्राशिवाशतनिनादिनी ॥२२ साचाहधुम्रजटिलमीशानमपराजिता ॥ दूतत्वंगच्छभगव- पाशुंभनिशुभयोः ॥२३॥ बहिशुंभनिशुंमंचदानवावति गर्षितौ ।। येचान्येदानवास्तत्रयुद्धायसमुपस्थिताः॥२४ ॥ त्रैलोक्यमिंद्रोलभतांदेवासंतुहविर्भुजः ॥ यूयंप्रयातपातालं यदिजीवितुमिच्छथ ॥२५॥ टीका-ताके अनंतर तिन देव शक्तियों करिकै युक्त महेश मेरी प्रीति करिकै तुम असुरोंको जलदी मारो इस प्रकार चंडिकाको कहताया ॥ २१ ॥ फिर ताके अनंतर चंडिका देवीके शरीरतेभी अत्यंत भयंकर और अत्यंत उग्र स्वभाववाली और शेकडों गीदडियोंकरिकै सहित शब्द कतीहुई फिर चंडिकाशक्ति निकसतीलई ॥ २२ ॥ फिर शत्रुवों कारकै अपराजित वह भगवती धून जटायाला शिव जोहै नाहि बोलतीभई सप्तशतीनापाटीका। कि हे.दूत तुम शुंम निशुंभके पास जावो ॥२३॥ तीन भुवनको जीतकर अ- त्यंत गर्वयुक्त जे शुंग निशुंभ दानव हैं तिन्हें और जे उनकी तरफ संग्राममें शूरवीरपनाका गर्व करिकै युद्ध करनेकेवास्ते तैयार, तिन्हैं तुम यह हित कारी वचन कहो ॥ २४ ॥ इंद्र त्रिलोकी जोहै ताहि प्राप्तहो और इंद्रादिक देव यज्ञोके विषे यथाभाग हविप जैहैं तिन्हें भोजन करनेवालेहो और हे शुंभा दिक दैत्यो तुम सनही जो जीनेको चाहतेहो तो पाताल जावो ॥ २५॥ बलावलेपादथचेद्भवंतोयुद्धकांक्षिणः॥ तदागच्छत तृप्यतुम च्छिवाःपिशितेनवः ॥ २६ ॥ यतोनियुक्तोदूत्येनतयादेव्या शिवःस्वयम् ॥ शिवदूतीतिलोकेस्मिस्ततः साख्यातिमा गता ॥ २७ ॥ तेपिश्रुत्वावचोदेव्याःशर्वाख्यातमहासुराः॥ अमर्षापूरिताजग्मुर्यत्रकात्यायनीस्थिता ॥२८॥ ततःप्रथ- ममेवाग्रेशरशतगृष्टिवृष्टिभिः॥ववर्षुरुद्धतामास्तांदेवीमम- रारयः॥२९॥ साचतान्प्रहितान्वाणालशक्तिपरश्वधान॥ चिच्छेदलीलयाध्मातधनुर्मुक्तर्महेषुभिः॥३०॥ टीका-और जो बलके गर्वते तुम युद्धकी इच्छा कहो तो मेरे साथ युद्ध करने आवो फिर मेरा परिवार जे शृगालहै ते तुलारे मांस करिकै तृप्तहो ॥२६॥ जिसकारण ते देवीने दूतभाव करिकै शिव भेजाथा तिसकारणते इस लोकके विपे वह देवी शिवदूती इसनामको प्राप्ताई ॥ २७ ॥ फिर शुं- भादिक महाअसुरभी शिव करिकै कहा ऐसा देवीका संदेश सुनकै क्रोध क- रिकै भरेहुवे जहां कात्यायनी भगवती स्थित थी तहां आतेनये ॥ २८ ॥ ताके अनंतर देवताके शत्रु और बढाहै क्रोध जिनोके ऐसे शुजादिक दानव पहिलेही देवीके वक्षस्थलके विपे बाणोंके तथा पोलंडी लाठियोंके और ख- के प्रहारों करिके देवीको आच्छादित कजये ॥ २९ ॥ फिर ताके अ- नंतर शुंसादिक असुरोने चलाये ऐसे जे वाण और त्रिशूल और शक्ति और कुहाडे और जे संपूर्ण शस्त्र तिन्हें चंडिका बिन श्रम कारकै प्रत्यंचाकी
अध्याय ८
(६७)
रंकार करिकै शब्दायमान जो धनुप तासे छोडेहुवे तीखे बाण तिन करिक
काटतीनई ॥३०॥
तस्याग्रतस्तथाकालीशूलपातविदारितान् ॥ खदांगपोथितां
श्रारीन्कुर्वतीव्यचरत्तदा ॥ ३१ ॥ कमंडलुजलाक्षेपहतवीर्या
न्हतोजसः॥ ब्रह्माणीचाऽकरोच्छवून्यनयेनस्मधावति॥३२॥
माहेश्वरीत्रिशूलेनतथाचक्रेणवैष्णवी ॥ दैत्यानपानकौमारी
तथाशत्त्यातिकोपना ॥ ३३ ॥ ऐंद्रीकुलिशपातेनशतशोदे-
त्यदानवाः ॥ पेतुर्विदारिताःपृथ्व्यांरुधिरौघप्रवर्पिणः ॥३॥
॥ तुंडप्रहारविध्वस्तादंष्ट्रायक्षतवक्षसः । वाराहमूान्यपतं
श्चक्रेणचविदारिताः ॥ ३५ ॥
टीका-तब संमामकालके विषे चंडिकाके आगे काली चंडिकाकी तरह
त्रिशूलके प्रहारों करिकै विदारित और खट्टांगके प्रहार करिके असुरोंको नष्ट
कर्ती हुई रणमें विचरती भई ॥ ३१ ॥ और ब्रह्माणी आदि शक्ति जिस
जिस मार्ग करिकै असुरोंको साथ युद्ध करनेको जाती गई तहां तहां मार्गके
विपे कमंडलुके जलका प्रोक्षण करिकै नष्ट पराक्रम और नष्टतेज दैत्योंको
कत्ती भई ॥ ३२ ॥ फिर उस चंडिकाके आगे माहेश्वरी त्रिशूल करिके
वैष्णवी चक्र करिके और अति क्रोधयुक्त कौमारी शांग करिकै दैत्यनको
मारती भई ॥ ३३ ॥ और ऐंद्रीशक्तिके वज्रके प्रहार करिकै विदारित रुधिर
के समूहकी वर्षा कर्ते हुवे सैकडों दैत्य दानव पृथ्वी पडते भये ॥ ३४ ॥
और ता संग्रामके विपे वाराहमूर्ति शक्तिके मुखका प्रहार कारकै और उसकी
डाढोंकी लफनियो करिकै विदीर्ण है छाती जिनोकी और चक्रके महार क-
रिकै बिदारित ऐसे विध्वस्त हुवे दानव पृथ्वीमें पडते नये ॥ ३५ ॥
नविदारितांश्चान्यान्भक्षयंतीमहासुरान् ।। नारसिंहीचचारा
जौनादापूर्णदिगंतरा ॥३६॥ चंडाट्टहासैरसुराः शिवद्वत्यभि
दूपिताः । पेतु पृथिव्यांपतितांस्तांश्वखादाथसातदा ॥३७॥
(६८) सप्तशतीमापाटीका। इंतिमातृगणंक्रुद्धमर्दयंतमहासुरान् ॥ दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्ने शुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३८ ॥ पलायनपरान्दृष्ट्वादैत्यान्मातृग- णार्दितान् ॥ योडुमभ्याययौकुदोरक्तबीजोमहासुरः॥३९॥ रक्तविंदुर्यदाभूमौपतत्यस्यशरीरतः ॥ समुत्पततिमेदिन्यां तत्प्रमाणोमहासुरः॥४०॥ टीका-और सिंहनाद करिकै पूर्ण कियेहै दिशावोंके मध्य जाने ऐसी नारसिंही शक्ति नखों करिकै विदारित जे दानव तिन्है और अन्य जे महा असुर तिन्हें भक्षण कर्ती हुई संग्राममें विचरती गई ॥ ३६ ॥ फिर तासंग्रा- मके विपे शिवदूती शक्तिने भयंकर अट्टहासन करिकै मूर्छाको प्राप्त किये ऐसे जे दैत्य ते पृथ्वीमें पडतेभये ताके अनंतर पृथ्वीमें पडेहुवे जे दैत्यहँ तिहूँ वह शिवदूती अक्षण कीनई ॥ ३७॥ अनेक उपायों करिकै असुरोंको नष्ट क हुवा ऐसा कोधयुक्त हुवा ब्रह्माणी आदि शक्तियोंका जो समूह ताहि देखकर असुर डरपेहुवे भागि जातेभये ॥३८॥ और ब्रह्माणीते आदि ले मा- गण करिकै पीडित और इसकारण तेही डसे हुवे ऐसे जे दैत्य तिन्हें देख कर क्रोधयुक्त हुवा महाअसुर रक्तबीज देवी के साथ युद्ध करनेको आता भया ॥ ३९ ॥ फिर ता रणमें जब रक्तबीजके शरीरते रुधिरकी बिंदु पृथ्वीमें पड़ें तब पृथ्वीमें रक्तबीजके समान महाअसुर उत्पन्न होजाय ॥४०॥ युयुधेसगदापाणिरिंद्रशत्त्यामहासुरः।ततश्चैद्रीस्ववज्रेणरक्तवी जमताडयत् ॥४१॥ कुलिशेनाहतस्याशुबहुसुनावशोणित।। समुत्तस्थुस्ततोयोधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥४२॥ यावंतः पतितास्तस्यशरीराद्रक्तविंदवः ॥ तावंतःपुरुपाजातास्तद्वी यालविक्रमाः॥४३॥ तेचापियुयुधुस्तत्रपुरुपारक्तसंभवाः।। समंमाभिरत्युग्रंशस्त्रपातातिभीपणम् ॥४ा पुनश्चवज्रपाते नक्षतमस्यशिरोयदाविवाहरक्तंपुरुपास्ततोजातास्सहस्रशः४५ अध्याय (६९) टीका-फिर वह महाअसुर रक्तबीज गदा हाथमें लिये हुये ऐंद्रीशक्तिक साथ युद्ध कामया ताके अनंतर ऐंद्रीशक्ति अपने वज्र करिक रक्तवीजको नाडन कीनई ॥४१॥ता समय ऐंद्रीका वजके प्रहार करिकै ताडित जो रक्तवीज ताके शरीरते बहुत रुधिर पृथ्वीमें पडताभया वा रुधिरते रक्तवी- जके समान रूपवाले और समान पराकमवाले कई योधा उत्पन्न होतेजये४२ फिर जितना रुधिरका बिंदु रक्तबीजका शरीर पड़ा उतनाही संख्या रक्त- बीजके समान शूर वीर और पराक्रमी दैत्य उत्सन्न होतेभये ॥ ४३ ॥ फिर वे रक्तवीजके रुधिरते उत्पन्नहुवे जे दैत्यहैं वेशी उस रणके विपे ब्रह्माणीवे आदि ले जो मातृगण है ताके साथ दारुण जैसे होय तैसे और शवोंके प्रहार करिकै भयंकर जैसे होय तैसे युद्ध कर्नेभये ॥ १४ ॥ फिर ऐंद्रीशक्तिने किया जो वज्रमहार ता करिके इस रक्तबीजका शिर विदीर्ण होताचया फिर उस शिरते रुधिर वहता या फिर वा रुधिरके प्रवाहते हजारों दैत्य उत्सन्न होने भये ॥४५॥ वैष्णवीसमरेचैनचक्रेणाभिजधानह॥ गदयाताडयामासऐंद्रीत मसुरेश्वरं ।। ४६ ॥ वैष्णवीचक्रभिन्नस्यरुधिररावसंभवैः ।। सहस्रशोजगद्व्याप्ततत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥ १७॥ शक्त्याजधा- नकौमारीवाराहीचतथासिना ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेनरक्तबीजम- हासुरम् ॥४८॥ सचापिगदयादैत्य सर्वाएवाहनत्पृथक् ॥मातः कोपसमाविष्टोरक्तवीजोमहासुरः।।१९।। तस्याहतस्यवहुधाश- क्तिशूलादिभिर्भुवि ॥ पपातयोवैरक्तोषस्तेनासञ्छतशोसुरामार टीका-फिर उस रणमें वैष्णवीशक्ति रक्तबीजको चक्रके प्रहार करिके मारतीमई और पीछे यही असुर ऐंद्रीशक्तिके साथ युद्ध करनेको पामजया जब वैष्णवीशक्ति इस असुरको गदाके प्रहार करिके ताड़न कीनई॥४६॥ फिर वैष्णवीशक्तिके चक्रप्रहार करिकै विदशरित जो रक्तवीज तिसके रुधि- का प्रवाहते उत्पन्न भये जे रक्तवीजके समानाकार हजारों महासुर तिनक- .
(७०) सप्तशतीमापाटीका। रिके जगत् व्याप्त होतामया ॥४७॥ फिर उस संग्रामके विपे कौमारीशक्ति रक्तबीज जो है ताहि शांगके प्रहार करिके और तिसी प्रकार वाराहीशक्ति खड्गके प्रहार करिके और माहेश्वरी त्रिशूलके प्रहार करिकै ताड़न कत्र्ती आई ॥४८॥ फिर वह महाअसुर रक्तवीज क्रोधयुक्त हुवा ब्रह्माणीते आदि लेकर जे संपूर्ण शक्ति हैं तिन्हें गदाके प्रहार करिके पृथक् पृथक् ताड़न कर्चाया ॥ ४९ ॥ फिर संग्रामके विपे शक्ति त्रिशूल इन आदि शत्रोंके प्रहार करिके ताड़ित हुवा जो रक्तबीज ताके शरीरते निकसा रुधिरका प्रवाह जो पृथ्वी में पडता या ता करिके कोटिन दैत्य उत्पन्न होतेभये ॥५०॥ तैश्वासुरासक्संभूतैरसुरैस्सकलंजगत् ॥ व्याप्तमासीत्ततोदेवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५१॥ तान्विषण्णान्सुरान्दृष्ट्वाचंडिका : प्राहसत्वरा ॥ उवाचकालीचामुंडेविस्तीर्णवदनंकुरु ॥१२॥ मच्छत्रपातसंभूतानक्तबिंदून्महासुरान् ॥ रक्तवीजात्प्रतीच्छ त्वंवक्रेणानेनवेगिना ।। ५३ ॥ भक्षयंतीचररणेतदुत्पन्नान्म हासुरान् ॥ एवमेपक्षयदैत्यक्षीणरक्तोगमिष्यति ॥६४ ।। भक्ष्यमाणास्त्वयाचोयानचोत्पत्स्यतिचापरे॥ऋपिरुवाच ॥ इत्युक्त्वातांततोदेवीशूलेनाभिजधानतम् ॥ मुखेनकालीजगृ हेरक्तबीजस्यशोणितम् ॥ ५५॥ टीका-फिर नाके अनंतर रक्तबीजके रुधिरते उत्पन्न भये जे दैत्य तिन करिक सम्पूर्ण जगत् व्याप्त होताधया तिस कारण ते देवता अधिक भय जो है नाहि.प्राप्त होतेभये ॥५१॥ फिर चंडिका भयभीत जे देव हैं तिन्हें देख कर बोली हे देवो तुम मत डरपो फिर कालीको बोलतीचई कि हे चामुंडे तुम अपना मुख विस्तृत करो ।। ५२ ॥ फिर बोली तुम अत्यंत वेगवाले विस्तृत मुख करिके मेरे शखों के प्रहारों करिके उसन्न जे रुधिरके बिंदु तिन्हें रक्त- चीजके शरीरते पीवो नहीं तो रक्तबिंदु पृथ्वीमें पडताही अन्य असुरनको उत्पन्न करदेगा ।। ५३ ॥ और चामुंडे रक्तबीजका रुचिरते उसन्न भये जे
अध्याय ८
(७१)
महादैत्य तिन्है तुम क्षण कीहुई संग्राममें विचरो इसप्रकार यह दैत्य क्षीण
रक्त हुया नाशको प्राप्त होजायगा और जे रक्तवीजके रुधिरते उत्पन्न भये
भयंकर दैत्य हैं ते तुलारे करिक अक्षण कियेहुये नहीं उत्पन्न होयगे ॥५४॥
तब ऋपि बोले कि हे सुरथराजन इसमकारसे चंडिका कालीके प्रति कह
कर त्रिशूलके प्रहार करिकै तिस रक्तबीजको ताडन कई फिर रक्तबी-
जके रुधिरको काली मुस करिकै पीतीमई ॥ ५५ ॥
ततोसावाजधानाथगदयातनचंडिकाम् ।। नचास्यावेदनांचके
गदापातोल्पिकामपि ॥५६॥ तस्याहतस्यदेहात्तुबहुमुस्राव-
शोणितम् ॥ यतस्ततस्तकेणचामुंडासंप्रतीच्छति ॥६॥
मुखेसमुद्गतायेस्यारक्तपातान्महासुराः ॥ तांश्वखादाथचामुं-
डापपोतस्यचशोणितम् ॥ ५८ ॥ देवीशूलेनचक्रेणवाणैर
सिभिरिधिभिः ॥ जवानरक्तवीजतंचामुंडापीतशोणितम् ॥
॥१९॥सपपातमहीपृष्ठेशस्त्रसंहतितोहतः॥नीरक्तश्चमहीपाल
रक्तवीजोमहासुरः॥६॥
टीका-ताके अनंतर तिस संयाममें यह रक्तबीज दैत्य गदाके प्रहार क-
रिके चंडिका जो है ताहि ताडन काया चंडिका परमानंदस्वरूप है याने
ताको गदाका प्रहार कुछभी वेदना नहीं क भया ॥५६॥ फिर चंडिकाके
शस्त्रों करिकै ताडित जो रक्तबीज ताके शरीरते जो बहुत रुधिर झरतामया
सो चामुंडा अपना मुख करिके पीतीभई ॥५७ ॥ फिर कालीके मुखमें रक्त-
बीजका रुधिर पडनेते उत्सन्न अये जे महाअसुर विन्हें चामुंडा काली भक्षण
कतीभई और रक्तबीजका रुधिर पीतीभई॥५०॥फिर चामुंडाने पियोहै रुधिर
जाको ऐसो जो रक्तबीज ताहि चंडिका त्रिशूलके प्रहार करिकै और चक्रके
प्रहार करिकै और बाणों के प्रहार करिकै और खडोंके प्रहार कारकै और
रिटियोंके प्रहार कारकै ताडन कतीभई॥५९॥फिर हे राजन शखोंकै समूहते
ताडित और रुधिररहित हुवा रक्तबीज मराहुवा पृथ्वीमें पडता मया ॥६॥
(७२) सप्तशतीमापाटीका। ततस्तेहर्पमतुलमवापुस्त्रिदशानृप। तेषांमातृगणोमत्तोनना सृङ्मदोद्धतः॥६॥इतिश्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्येरक्तबीजवधोनामाएमोध्यायः ॥८॥ टीका-हे सुरथ फिर रक्त बीजके वधके अनंतर संपूर्ण देव अपरिमित हर्पको प्राप्त होतेभये और रक्तबीजसे आदिले दैत्योंको रुधिर पानते मदोत्क- ट जो ब्रह्माणी ते आदिले मातृगणहैं सो मदोन्मत्त हुवा नाचतामया ॥६॥ इति श्रीमार्कडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्स्येनापारीकायारक्तवीज- वधोनामअष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ ॥ राजोवाच ॥ विचित्रमिदमाख्यातंभगवन्भवतामम ॥ देव्याश्चरितमाहात्म्यरक्तवीजवधाश्रितम् ॥१॥ भूयश्चेच्छा- च्छाम्यहंश्रोतुंरक्तवीजेनिपातिते ॥ चकारशुंभोयत्कर्मनिशुं भश्चातिकोपनः ॥२॥ ऋषिरुवाच ॥ चकारकोपमतुलंरक्त वीजेनिपातिते ॥ भासुरोनिशुंभश्चहतेष्वन्येषुचाहवे ॥३॥ हन्यमानमहासेन्यविलोक्यामर्पमुदहन् ॥ अभ्यधावनिशुंभो- थमुख्ययासुरसेनया ॥१॥ तस्याग्रतस्तथापृष्ठेपाश्र्वयोश्चम हासुराः ॥ संदष्टौष्टपुटाकुद्धाहंददेवीमुपाययुः॥६॥ टीका-तब सुरथराजा बोलतेभये कि हे भगवन् आपने रक्तबीजके वध विपथक यह देवी के चरित्रोका विचित्र माहात्म्य मेरेसे कहा॥१॥भगवन् देवी ने रक्तबीजको पृथ्वी में डाले सते क्रोधयुक्त हुयेशुन और निशुंभ फिर जो संग्राम लक्षण कर्म कर्ने भये सो आपते अधिक जैसे होय तैसे मै सुना चाहताहूँ॥२ वय ऋपि बोले कि हे राजन् देवीने रक्तबीजको मार पृथ्वी में डालेसते और जे देयह तिनको संग्रामके विपे मारेसले शुंभासुर और निशुं ये बडाकोष कर्ने भये॥३॥ताके अनंतर देवी कारकै हत अपनी सैन्यको देखकर क्रोधयु- क हुवा निशुत अपनी मुरुप असुरोंकी सेनाकार सहित देवीके सन्मुख दो- सतााया ॥ ४ ॥ फिर या निशुंभके अगाडी तथा पिछाडी और दाहिने यामे ।
अध्याय ९
(७३)
वर्तमान ने महाअसुर ते क्रोधयुक्त ओठपुट चावते हुये देवीको मारनेको
समीप प्राप्त होतेभये ॥ ५॥
आजगाममहावीर्य शुंभोपिस्ववलेघृतः॥निहंतुंचंडिकांकोपा-
त्कृत्वायुद्धंतुमातृभिः ॥ ६॥ ततोयुद्धमतीवासीद्देव्याः शुभ
निशुंभयोः ॥ शरवर्पमतीयोगंमेघयोरिववर्यतोः ॥ ७ ॥
चच्छेदाऽस्ताग्छरांस्ताभ्यांचंडिकास्वशरोत्करैः ॥ ताड-
यामासचांगेपुशस्त्रौवेरसुरेश्वरौ ॥८॥ निशुंभोनिशितंखङ्गं
चर्मचादायसुप्रभं । अताडयन्मूर्भिसिंहदेव्यावाहनमुत्तमम्।।
॥ ९॥ ताडितेवाहनेदेवीक्षुरप्रेणासिमुत्तमम् ॥ निशुभस्या
शुचिच्छेदचर्मचाप्यष्टचंद्रकं ॥ १०॥
टीका-फिर ताके अनंतर शुलभी अपनी सेना कारकै युक्तहुवा ब्रह्माणी
भादि शक्तियोंते युद्ध करिके कोधते चंडिकाके मारनेको चंडिकाके समीप
प्राप्त होतानया ॥ ६ ॥ ताके अनंतर अत्यंत भयंकर बाणोंकी मेवीसी
तरह वर्षा कर्नेहुये जे शुंत और निशुंन दैत्यहै तिनका और भगवतीका पर
स्पर बडाही युद्ध होताभया॥ ७॥ फिर तिन शुंभनिशुंभ दैत्योंकरिकै छोडे
हुचे जे वाणहै तिन्हे चंडिका अपने बाणनके समूह करिके काटतीभई याके
अनंतर शुं निशुंभ जे हैं तिन्हे शनोंके समूह करिकै रोम रोमकेविषे ताडन
कौनई ॥ ८॥ फिर निशुज तीखा और प्रकाशमान खड्ग और प्रकाशमा-
नडाल लेकरके देवीवाहनसिंहके मस्तकमें नाइन कमिया ॥ ९॥ फिर
निशुंभने देवीके वाहन सिंहसे ताटन कियेसते चंडिका क्षुरप्रमाण करिकै नि-
शुभका सड़ जोहै ताहि और आठहैं चंदाकार लिखित जाकेविषे ऐसी
दाल जोहै ताहि काटतीमई ॥१०॥
छिन्नेचर्मणिखड्नेचशक्तिचिक्षेपसोसुरः ॥ तामप्यस्यद्विधाच
क्रेचक्रेणाभिमुखागतां ॥ ३१ ॥ कोपाध्मातोनिशुंभोथशूलं
जग्राहदानवः ॥आयातमुष्टिपातेनदेवोतचाप्यचूर्णयत्॥१२॥
(७४)
सप्तशतीनापाटीका।
अथादायगदांसोपिचिक्षेपचंडिकांप्रति ॥ सापिदेव्यास्त्रिशू-
लेनभिन्नाभस्मत्वमागता ॥ १३ ॥ ततःपरशुहस्तंतमायां
तंदैत्यपुंगवं ॥ आहत्यदेवीबाणोधैरपातयतभूतले ॥१४॥
तस्मिन्निपतितेभूमौनिशुभेभीमविक्रमे ॥ भ्रातर्यतीवसंक्रुद्धः
प्रययौहंतुमंबिकाम् ॥ १५॥
टीका-फिर चंडिकाने निशुंजके खड्ग और ढाल काटेसने निशुस देवीके
प्रति शक्ति शस्त्र फेकतामया फिर सन्मुख आवतीहुई याकी शक्तिकाती
चंडिका चक्र करिकै दो टूक कोंभई ॥ ११॥ याके अनंतर अत्यंत को-
धयुक्त हुवा निशुन देवीके प्रति त्रिशूल फेकताजया फिर आतेहवे तिस त्रि-
शूलकानी चंडिका मुष्टिके प्रहार करिकै चूर्ण कर्तीभई ।। १२॥ याके अनं-
तर फिर निशुनजी गदा ग्रहण कारकै चंडिकाके प्रति फेकतामया फिर वह
गदाभी देवीके अग्निबीनगर्न त्रिशूल करिकै खंडितहुई भस्मको पान हो-
तीभई ॥ १३ ॥ नाके अनंतर फरशी है हाथेमें जाके और दैत्योमें श्रेष्ठ ऐसा
आताहुवा निशुंन जोहै ताहि चंडिका बाणोंके समूह कारकै नाइन कर पृ-
ध्वीक विपे गिरातीभई ॥ १४ ॥ फिर घोर है पराक्रम जाके विप ऐसा वह
निशुंन चाता पृथ्वीमें पडेसते अत्यंत क्रोषयुक्त हुवा शुभ विकाको मारने-
को शीघ्र जातोजयो ॥ १५॥
सस्थस्थस्तथात्युच्चैर्ग्रहीतपरमायुधैः ॥ भुजैरष्टाभिरतुला-
प्याशेपंचभौनमः।। १६॥ तमायांतंसमालोक्य देवीशंखमवा.
दयत् ।। ज्याशब्दंचापिधनुपश्चकारातीवदुस्सह ॥ १७ ॥
पूरयामासककुभोनिजघंटास्वनेनच ॥ समस्तदैत्यसैन्यानां
तेजोवधविधायिना ॥ १८॥ ततः सिंहोमहानादेस्त्याजितेभ-
महामदैः ॥ पूरयामासगगनंगांतथैवदिशोदश ॥ १९ ॥
ततःकालीसमुत्पत्यगगनक्ष्मामताडयत् ॥कराभ्यांतन्निनादे-
नमाक्स्वनास्तेतिरोहिताः॥२०॥
अध्याय ९ (७५) टीका-फिर वह शुभ रथमें स्थितहुवा मुद्रिका प्रकारकरिकै ग्रहण कि- यह उत्तम शस्त्र जिनोकेविपे ऐसी जे बडी ऊंचि अतुल आठशुजा तिन करिकै संपूर्ण आकाशको व्याप्त करताता कालकेविषे शोभायमान होतोजयो ॥ १६ ॥ फिर निसको आवाहुवा देखिके देवी शंख बजातीभई और धनुष- की प्रत्यंचाका बडाही दुःसह शब्दभी कौनई ॥ १७ ॥ फिर चंडिका सं- पूर्ण असुरोंके सैन्यका तेजको नष्ट करनेवाला ऐसा अपनी घंटाका जो शब्द ता कारकै दशोदिशाँको संवर्द्धमान कौनई ॥ १८॥ फिर ताके अनंतर दूर कियेहैं हाथियोंके महामद जिनोंने ऐसा जो कंठ गर्जनहै तिन कारकै सिंह आकाश जो है नाहि पूर्ण कोजियो और तिसीप्रकार पृथ्वी और दशोदिशा निन्हे पूर्ण कनियो ॥ १९ ॥ फिर ताके अनंतर चामुंडा काली उछल क- रिक हाथोसे आकाश और पृथ्वी जोहै तिन्हें ताडन कीनई फिर या पृथ्वी और आकाशके ताडनके शब्द कारकै शंख प्रत्यंचा घंटा सिंह इनके जे शब्द थे ते आच्छादित होतेभये ॥ २०॥ अट्टाहासमशिवंशिवदूतीचकारह तैिःशब्दैरसुरास्त्रेसुःशुभः कोपंपरययौ ॥ २१ ॥ दुरात्मंस्तिष्ठतिष्ठेतिव्याजहारांवि- कायदा ।। तदाजयेत्यभिहितदेवैराकाशसंस्थितैः ॥ २२ ॥ शुंभेनागत्ययाशक्तिर्मुक्तावालातिभीपणा ॥ आयांतीवन्हि- कूटाभासानिरस्तामहोल्कया ॥ २३ ॥ सिंहनादेनशुंभस्य व्याप्तंलोकत्रयान्तरम्। निर्घातनिःस्वनोपोरोजितवानवनीपते ॥ २४ ॥ शुंभमुक्ताञ्छरान्देवीशुभस्तत्प्राहिताञ्छरान् ।। चिच्छेदस्वशरैरुप्रैःशतशोथसहस्रशः ॥ २९ ॥ टीका-और शिवदूती तासमय बडा कठोर अट्टाहास कीनई फिर अट्टाहासवे उत्पन्नभये जे शब्दहें विन कारकै असुर त्रासको प्राप्त होते.ये और शुभ अत्यंत कोपको प्राप्त होतोभयो ॥ २३ ॥ फिर हे शेंगदुरात्मन तु खडारहै खडारहै ऐसे संग्रामकेपिपे जब अंबिका कहतीभई तब आका- (७६) सप्तशतीमापाटीका। शमें स्थितहुये देवोंने जय जय शब्द किया अर्थात् हे अंबिके तुम शत्रुवोंका तिरस्कार करो इस प्रकारसे कहा ॥ २२ ॥ फिर शुंभने आकरिकै ज्वाला करिकै बडी भयंकर ऐसी शांग भगवतीके सन्मुख छोडी अनिके तुल्यहै कांति जाकी ऐसी आतीहुई शांगको अंबिका अपनी महोल्का शांग क- रिकै निरस्त कभई ॥ २३ ॥ हे सुरथ तासमय शुभके कंठ गर्जन करिक लोकत्रयका मध्य व्याप्त होता भया तोभी ताहि देवीको मारो मारो यह जो शुंभके सैनिकनका शब्दहै सो शुभका शब्द जोहै ताहि तिरस्कृत कमिया ॥ २४ ॥ फिर ता संग्रामविपे देवी अपने उग्रवाणों करिकै सौ सौ हजार हजार शुरके छोडेहुए जे बाणहैं तिन्हें काटतीजई और शुंभ देवीके छोडेहुये जे वाण, तिन्हें अपने बाणों करिकै काटताभया ॥ २५ ॥ ततःसाचण्डिकाक्रुद्धाशूलेनाभिजधानतम् ॥ सतदाभिहतो भूमौमूच्छितोनिपपातह ॥२६॥ ततोनिशुंभ संप्राप्यचेत नामात्तकार्मुकः|आजधानशरैर्दैवींकालोंकेसरिणतथा ॥२७॥ पुनश्चकृत्वावाहूनामयुतंदनुजेश्वरः ॥ चक्रायुतेनदितिज श्छादयामासचंडिकाम् ॥ २८ ॥ ततोभगवतीकुद्धादुर्गा दुर्गातिनाशिनी ॥ चिच्छेदतानिचक्राणिस्वशरैःसायकांश्च तान् ॥ २९ ॥ ततोनिशुंभोवेगेनगदामादायचंडिकाम् । अभ्यधावतवैहंतुदैत्यसेनासमावृतः॥३०॥ टीका-फिर शुंभको संगाममें अपने समान देखिके वह चंडिका क्रोध युक्त हुई त्रिशूलके प्रहार करिकै तिस दैत्यको ताडन कर्तीचई फिर वह शुभ त्रिशूलके प्रहार करिकै ताडित मूर्छित हुवा पृथ्वीमें पडताभया ॥ २६ ॥ ताके अनंतर पहिले मूर्खाको प्राप्तहुवा निशुंभ चेतना जो है ताहि प्राप्त होकर ग्रहण कियाहै धनुप जाने ऐसा वाणोंके प्रहार करिकै काली देवी जोहै ताहि ताडन कामया और तिसी प्रकार सिंह जो है ताहि ताडन कीजया॥२७॥ और तासमय फिर वह निशुंभ मायावी दशहजार भुजावाला वनिके चक्रके अध्याय ९ (७७) पहार करिकै चंडिका जोहै ताहि बाडन क!जयो ॥ २८॥ वाके अनंतर संकटमें पीडाको नष्ट करनेवाली ऐसी दुर्गा जगवती कोषयुक्त हुई अपने बाणों कारकै वा दैत्यके चक्र और वाण जे हैं तिन्हें काटतीलई ॥ २९ ॥ फिर ताके अनंतर निशुंभ वेग कारकै गदा जो है ताहि ग्रहण करिकै दैत्य- नकी सेना करिकै युक्त हुवा चंडिका जो है ताहि मारनेको दौडतामया॥३०॥ तस्यापततएवाशुगदांचिच्छेदचंडिका । खड्गनशितधारेण सचशूलंसमाददे ॥३१॥ शूलहस्तंसमायांतनिशुंभममराई- नम् ॥ हदिविव्याधशूलेनवेगाविद्वेनचंडिका ॥ ३२ ॥ भिन्न- स्यतस्यशूलेनहृदयानिःसृतोपरः। महावलोमहावीर्यस्तिष्ठे. तिषुरुपोवदन् ॥ ३३॥ तस्यनिष्कामतोदेवीप्रहस्यस्वनव- ततः॥ शिरश्चिच्छेदखगेनततोसावपतद्धवि ॥ ३४ ॥ ततः सिंहश्चखादोगदंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् ॥ असुरांस्तांस्तथाका- लीशिवदूतीतथापरान् ॥ ३५ ॥ टीका-फिर आताहुवाही निथुनकी गदा जो है ताहि चंडिका तीखी धारवाले खड़ करिकै तत्काल काटतीभई फिर वह दानव त्रिशूल ग्रहण कर्ते भयो॥ ३१॥ फिर त्रिशूल है हाथमें जिसके और देवतानको दुःख देनेवाला ऐसा आताहुवा निशुभ जो है वाहि चैडिका वेगते फेकाहुवा जो त्रिशूल है ता करिकै हृदयकेविप वींधती भई ॥ ३२॥ फिर त्रिशूलके प्रहार करिकै भिन्नहुवा जो निशुंभ है ताके हृदयने हे देवि तू कहां जायगी खडी रहै ऐसे कहताहुधा धड़ा पराक्रमी और बड़ा वीर अन्य पुरुष निकसवाचया ॥३३॥ फिर रे रे दुष्ट ! तू खडारह खडारहै मन्मयी मायाको प्राप्त होकर तू फिर मेरे- कोही मारनेको उद्युक्त हो रहाहै यातै मैं तेरेको अवहीं मारूंगी इसमकार हैं- सके निशुभके हृदयते निकलता हुवा जो निशुजका अवतार है वाको देरी ख- हुके प्रहार करिके शिर काटतीमई ताके अनंतर निशुंभ रणमिकेविपे पड़- तामया ॥ ३४ ॥ ताके अनंतर उग्रदंष्ट्रानकरिकै संपिष्ट है श्रीवा निनोकी (७८) सप्तशतीमापाटीका। ऐसे जे असुर हैं तिन्हें सिंह खातामया और सिंह भक्षित असुरोंते अन्य जे असुर हैं तिन्हें काली क्षण कौनई तिनोसेनी अन्य जे हैं तिन्हें शिवदूती भक्षण कर्तीभई ॥ ३५ ॥ कौमारीशक्तिनिभिन्ना केचिन्नेशर्महासुराः॥ ब्रह्माणोमंत्रपूते नतोयनान्यनिराकृताः॥ ३६ ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेनभिन्नाः पेतुस्तथापरे॥ वाराहीतुंडघातेनकेचिचूर्णीकृताभुवि ॥३७॥ खंडखंडचचक्रेणवैष्णव्यादानवाः कृताः॥ वज्रेणचेंद्रीहस्ताय विमुक्तेनतथापरे ॥३८॥ केचिद्विनेशुरसुरा केचित्रष्टामहाह- वात् ॥ भक्षिताश्चापरेकालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥ ३९ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्येनि शंभवधोनामनवमोऽध्यायः ॥९॥ टीकाऔर कितनेही महाअसुर कौमारीकी शक्तिके प्रहार करिकै छि- न्नभिन्न हुवे नाशको प्राप्त होतेभये और कितनेही अन्य असुर ब्रह्माणीके मंत्रते पवित्र जल करिकै नष्ट करिदिये ॥ ३६ ॥ और तिसीप्रकार अन्य कितनेही असुर माहेश्वरीके त्रिशूलके प्रहार करिकै भिन्नहुवे रणभूमिकेविषे पड़तेनये और कितनेही वाराहीशक्तिके मुखके प्रहार करिकै चूर्णितहुवे रण- भूमिकेषिपे पड़तेनये ॥ ३७ ॥ फिर वैष्णवीशक्तिने चक्र प्रहार करिकै खंडपनाको दानव प्राप्त करदिये और तिसीप्रकार कितनेही अन्य दानव ऐंद्री शक्तिके हस्ताय करिकै प्रेरित जो पज ताके प्रहार करिकै खंडितहुये नष्ट होतेभये ॥ ३८ ॥ फिर ता संग्रामकेविपे कितनेही तो असुर नष्ट होतेभये और कितनेही तिस संग्रामते डरपके भागजातेगये और कितनेही असुर काली और शिवदती और सिंह इमोने पक्षण किये ॥ ३९॥ इति मार्क- ण्डेयपुराणे सावर्णिकेमन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुअवधोनाम नवमोध्यायः॥९॥ ऋपिरुवाच ॥निशुंभनिहतंदृष्ट्वाभ्रातरंप्राणसंमितम् ॥ हन्यमा- नंबलंचैवशुंभ-क्रुद्धोत्रवीद्वचः॥१॥ पलावलेपाढुष्टेत्वंमादु- अध्याय १० (७९) गेंगर्वमावह ।। अन्यासांवलमाश्रित्य युध्यसेयातिमानिनी॥२॥ देव्युवाच ॥ एकैवाहजगत्यत्राद्वितीयाकाममापरा ॥ पश्य- तादुष्टमय्येववित्योमद्विभूतयः॥३॥ऋपिरुनाच॥ ततःसम स्तास्तादेव्योब्रह्माणीप्रमुखालयम् ।। तस्यादेव्यास्तनौजग्मुरे कैवासीत्तदाविका । देव्युवाच ।। अहंविभूत्याबहुभिरिहरू- पैर्यदास्थिता ॥ तत्संहतंमयकवतिष्टाम्याजौस्थिरोभव ॥५॥ टीका-तब ऋपि.बोले कि हे सुरथराजन फिर शुंभ प्राणोंक समान देवी करिक माराहुवा ऐसा निशुंन माता जो है ताहि देखकर और अपनी सेना देवी करिके हन्यमान देखकर क्रोधयुक्त हुचा वचन बोलतानया ॥ १ ॥ हे दुर्गे दुष्टनी बलके संबंधसे तू गर्व मतकरे जो तू ब्रह्माणीआदिशक्तियोंका बल जो है ताहि आश्रय करिकै निरंतर अहंकारवाली हुई युद्ध की है सो सर्वथा दूसरेके बलका आश्रय लेकर युद्धकेविषे तेरेको गर्व करना अनु- चित है॥२॥ ताके अनंतर देवी बोलतीनई कि हे दुष्ट शुंन इस जगत्के विपे परमात्मरूप एक मैहाँहूँ मेरेते अन्य दूसरी कौन है अर्थात् कोई नहीं और ये जे ब्रह्माणी आदि लेकर मेरी विभूति हैं तिन्हें मेरे विपेही प्रवेश होतीहुई तू देख ॥३॥ तब ऋपि बोले कि हे सुस्थराजन् वाके अनंतर ब्रह्माणी है मुख्य जिनों के विपे ऐसी जे आठ शक्ति हैं वे सब तिस चंडि- काके शरीरमें ऐक्यको प्राप्त होतीमई अर्थाद लीन होतीभई तव एक अं- विका देवीही अद्वितीय रहतीभई ॥ ४ ॥ फिर देवी बोलती भई हे शुंभ में इस रणभूमिके विपे बहुत रूपों करिकै जो बहुत्व अंगीकार करा सो बहुत्व समेटलिया अब मैं एकही स्थितहूँ तू अव संग्रामकेविषे स्थिरहो ॥५॥ ऋषिरुवाच ॥ ततःप्रववृतेयुद्धदेव्याशुभस्यचोभयोः॥ प- श्यतांसर्वदेवानामसुराणांचदारुणम् ॥ ६॥ शरवःशितैः शस्तैस्तथाखश्चैवभारुणैः॥ तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयंकर ॥७॥दिव्यान्यस्त्राणिशतशोमुमुचेयान्याविका ॥ वभंज (८०) सघशतभापाटीका। तानिदैत्येंद्रस्तत्प्रतीपातकर्तृभिः ॥ ८॥ मुक्तानितेनचास्त्रा- णिदिव्यानिपरमेश्वरी ॥ वभंजलीलयैवोगहुंकारोच्चारणादि- भिः ॥९॥ ततश्शरशतेदेवीमाच्छादयतसोसुरः। सापितत्कु- पितादेवीधनुश्चिच्छेदचेषुभिः ॥ १० ॥ : टीका-तब ऋपि बोले कि हे सुरथराजन् ताके अनंतर देवी और शुभ इन दोनोंका परस्पर युद्ध प्रवृत्त होतातया वह कैसा युदहुवा कि देखतेहुये संपूर्ण देव तिनको जे भयंकर ऐसा ॥ ६॥ फिर बाणोंकी वर्षा करिकै तीखें शत्रों करिक और कठोर अखों करिकै शुभका और देवीका संपूर्ण लोकको भय करनेवाला ऐसा बहुत-युद्ध होताभया ।.७ ॥ याके अनंतर अंबिका शुधकेविपे जे सेंकडों दिव्याऽन छोडे तिन्हैं तिनका विध्वंस करनेवाले अनों करिकै शुभ काटताया॥८॥ फिर शुंभने छोडे जे दिव्य अस्त्र हैं तिन्हें परमेश्वरी हुंकारोच्चारणादि करिकै विनापरिश्रम करिकेही काटतीनई ॥९॥ ताके अनंतर हजारों घाणों करिकै वह भमुर देवी जो है ताहि भाच्छादित कोषयो तिसकारणते वह भगवती कोधयुक्त हुई बाणों करिकै शुनको ध- नुप जो है ताहि काटतीमई ॥ १० ॥ छिन्नेधनुपिदैत्येंद्रस्तथाशक्तिमथाददे॥ चिच्छेददेवीचक्रेणता मध्यस्थकरेस्थिताम् ॥११॥ ततःखगमुपादायशतचंद्रचभा. नुमत् ॥ अभ्यधावतताहंदैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १२ ॥ तस्यापततएवाशुखङ्गचिच्छेदचंडिका ॥ धनुर्मुक्तैशिते - णेश्चर्मचार्ककरामलं ॥१३॥ अश्वांश्चपात्तयामासरथसारथिना सह । हताश्वासतदादेत्यश्छिन्नधन्वाविसारथिः ॥ जग्राहमुद्ग- रंगोरमविकानिधनोचतः।। १४ । चिच्छेदापततस्तस्यमुद्गरं निशितैशरैः । तथापिसोभ्यधावत्तांमुष्टिमुद्यम्यवेगवान।।१५॥ टीका-फिर देवीने शुनका धनुप काटे संत शुंभ.तिसीप्रकार शक्ति शस्त्र ग्रहण कमियो थाके अनंतर देवी शुंचके हाथमें स्थित जो शक्ति नहै अध्याय १० (८१) ताहिरी चक्र करिके काटतीमई ॥११॥ ताके अनंतर दैत्योंके अधिप ने धूम्रलोचनादिक तिनका ईश्वर शुंभ खड्ग जो है ताहि ग्रहण कार- के और सौ है लिखेहुवे चंद्राकार जाके विषे और प्रकाशमान ऐसा जो ढालहै ताहि ग्रहण कारकै ता देवीके मारनेको दौडताजया ॥ १२॥ फिर आता- हुवा ही जो शुंजहै ताका खडू जो है ताहि अत्यंत प्रकाशमान जो ढालहै ताहि चंडिका धनुप कारकै छोडेहुवे जे तीखे बाणहैं तिन करिकै काटती भई ॥ १३॥ और अश्व जे हैं तिन्हैं और सारथि करिकै सहित जो स्थहै ताहि चंडिका बाणों करिकै पृथ्वीमें गिरातीलई फिर मारेगयेहैं अश्व जाके और दूटगयाहै धनुष जाका और विगतहुवाहै सारथि जाका ऐसा वह शुंजदै- त्य अंविकाके मारनेमें उद्युतहुवा भयंकर मुद्र ग्रहण कमिया ॥ १४ ॥ फिर ताके अनंतर प्रहार करनेकी इच्छा कर्ताहुवा जो शुंन है नाका मुद्र जोहै ताहि सो देवी तीखे बाणों करिकै काटतीभई तौभी मूका ऊंचा कार- कै शुज देवीके मारनेको दौडतामया ॥ १५ ॥ समुष्टिंपातयामासहृदयदैत्यपुंगवः ॥ देव्यास्तंचापिसादेवीत लेनोरस्यताडयत् ॥ १६॥ तलपहाराभिहतोनिपपातमही- तले ॥ सदैत्यराज सहसापुनरेवतथोत्थितः॥ १७॥ उत्पत्य चप्रगृह्योञ्चैर्देवींगगनमास्थितः ॥ तवापिसानिराधारायुयुधेते नचंडिका ।। १८॥ नियुद्धखेतदादैत्यश्चंडिकाचपरस्परम् ।। चक्रतुःप्रथमंसिद्धमुनिविस्मयकारकम्।१९।ततोनियुद्धसुचि- रंकृत्वातेनांबिकासह।उत्पात्यभ्रामयामासचिक्षेपधरणीतले २०॥ टीका-फिर वह दैत्यनमें श्रेष्ठ शुंन देवीके हृदयकेविपे मुष्टिका प्रहार कीजया फिर वह शुभ जोहै ताहिती करतल करिके वक्षस्थलकेविये ताडन क नई ॥ १६ ॥ फिर वह दैत्यराज देवीके करतलके प्रहारकारके ताडितहवा महीतलकेविषे पडतानया फिर वह दैत्य अंग- करिके तिसी प्रकार संग्रामतूमिमें सहाहोतानया ॥ १७ ॥ फिर देवी जोहे (८२) सप्तशतीभापाटीका। ताहि ग्रहण करिके महीतलते उड़कर आकाशकेविषे स्थित होतामया वहांधी निराधार हुई भगवती तिस शुंभके साथ युद्धकर्तीचई ॥ १८ ॥ फिर तब आकाशमें आरोहण कालकेविषे शुंभ दैत्य और चंडिका से पहिले सिद्ध और मुनि इनको विस्मय करनेवाला ऐसा परस्पर बाहुयुद्ध कत्तैभये ॥ १९ ॥ फिर अंबिका शुंभके साथ बहुत काल युद्ध करिकै ताके अनंतर शुंजका पैर पकड उठाके मातीभई पीछेत्रमा करिकै भगवती शुंभ जोहै ता- हि पृथ्वीतलकेविपे फेकतीभई . ॥ २० ॥ सक्षिप्तो धरणींप्राप्यमुष्टिमुद्यम्यवेगितः ॥ अभ्यधावतदुष्टा त्माचंडिकानिधनेच्छया ॥ २१ ॥ तमायांतंततोदेवीसर्वदै- त्यजनेश्वरम् ॥ जगत्यांपातयामासभित्त्वाशूलेनवक्षसि ॥२२॥ सगतासुःपपातोया देवीशूलाग्रविक्षतः ॥ चालयन्सकलां पृथ्वींसाधिद्वीपांसपर्वताम् ॥ २३॥ ततःप्रसन्नमखिलंहतेत- स्मिन्दुरात्मनि ॥ जगत्स्वास्थ्यमतीवापनिर्मलंचाभवन्नभः ॥ ॥२४॥उत्पातमेघास्सोल्कायेप्रागासंस्तेशमययुः ॥ सरितोमा र्गवाहिन्यस्तथाशुभेनिपातिते ॥ २५ ॥ टीका-फिर आकाशते देवी करिकै फेकाहुवा दुष्टात्मा शुंजदैत्य पृथ्वी जोहै ताहि प्राप्त होकरिकै मुष्टि उठा करिकै चंडिकाको मारनेकी इच्छा करिके दौडताजया ॥ २१ ॥ फिर ताके अनंतर आताहुवा जो संपूर्ण दैत्यों- का ईश्वर शुभहे ताहि भगवती त्रिशूलके प्रहार करिक वक्षस्थलमें वेधन करि पृथ्वी में गिरातीभई ॥ २२॥ वह दैत्य देवीका त्रिशूलके अयभाग क- रिकै हत और गये प्राण जाके ऐसाहुवा पर्वतों करिक और समुद्र द्वीपों क- रिक सहित जो पृथ्वीहै ताहि चलायमान कर्ताहुया पृथ्वीके विपे पडताया ॥ २३ ॥ फिर देवीने तिस दुरात्मा शुंभको मारे संते ना कारणते संपूर्ण जगत् प्रसन्न होतोभयो और फिर जगत् अत्यंत स्वस्थानाको प्रात होतोभयो और आकाश निर्मल होतोनपो ॥ २४ ॥ और ज्वाला.कारके सहित जे
अध्याय ११
(८३)
शुभ मरे पहिले उत्पातके मेघथे वे शांतिको प्राप्त होतेभये देवीने शुंभको पु-
श्वीमें गिरायेसंते उत्तथते तिसीप्रकार मार्गवाहिनी नदिया होतीभई ॥ २५॥
ततोदेवगणास्सहर्षनिर्भरमानसाः ॥बभूवुनिहतेतस्मिन्गंध-
ललितंजगुः॥२६॥अवादयंस्तथैवान्येननृतुश्चाप्सरोगणाः॥
बवुःपुण्यास्तथावातास्सुप्रभोभूदिवाकरः॥२७॥जज्वलुश्चाग्न-
यःशांता शांतदिग्जनितस्वनाः॥२८॥ इतिश्रीमा पु०साव-
णिकेमन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये शुभवधोनामदशमोऽध्यायः॥१०॥
टीका-और वा दैत्यको देवीने मारेसते तिसकारणते हर्ष करिकै पूर्ण है
मन जिनके ऐसे देवगण होतेभये और गंधर्व मनोहर गातेभये ॥ २६ ॥ और
तासमय कितनेही अन्य गंधर्व वादित्र बजातेभये और अप्सरावोंके गण नृत्य
काये और तासमय शीतल मंद सुगंध पवन चलतेाये और तिसीप्रकार
सूर्य सुमन होतानया ॥ २७ ॥ और आहवनीय अनि यज्ञनके निर्मल
जलती और दिशावोंकेविषे उत्पन्न ऐसे उत्पातको सूचन करनेवाले जे शब्द
ते शांत होतेभये ॥ २८ ॥ इति मार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेवीमाहा-
त्येभापाटीकायांशुंभवधोनामदशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
ऋषिरुवाच ॥ देव्याहतेतत्रमहासुरेंद्रेसेंद्राःसुरावन्दिपुरोगमा-
स्ताम्।। कात्यायनीतुष्टबुरिष्टलाभाद्विकासिवकान्जविकासि-
ताशाः॥१॥देवाउचुः॥देविप्रपन्नार्तिहरेप्रसीदप्रसीदमातर्जगतो
खिलस्याप्रसीदविश्वेश्वरिपाहिविश्वंत्वमीश्वरीदेविचराचरस्य
॥२॥आधारभूताजगतस्त्वमेकामहीस्वरूपेणयतःस्थितासि।
अपांस्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायतेकृत्स्नमलंध्यवायें ॥३॥
त्ववैष्णवोशक्तिरनंतवीर्याविश्वस्यबीनं परमासिमाया ।। संमो
हितदेविसमस्तमेतत्त्ववैप्रसन्ना विमुक्तिहेतुः ॥४॥ विद्याः
समस्तास्तवदेविभेदास्त्रियः समस्ताः सकलंजगच ॥ लये
कयापूरितमंचयतकातेस्तुतिःस्तव्यपरापरोक्तिः॥५॥
(८४) सप्तशतीभाषाटीका। टीका-फिर ऋपि बोले कि हे सुरथराजन् चंडिकाने संग्रामकेविषे शुं- भासुर मारेसंते अपने इष्टके लाजते प्रसन्न है मुख जिनोंका ऐसे इंद्र करिके स- हित अमिते आदि लेकर जे देव ते तिस कात्यायनी भगवतीकी स्तुति कर्ते- भये॥१॥तव देव भगवतीकी स्तुतिके उपयोगी वाक्य बोलतेभये हे शरणागतका दुःख हरनेवाली भगवती तुम प्रसन्नहो हे संपूर्ण जगत्की माता तुम प्रसन्नहो हे विश्वश्वरि तुम प्रसन्नहो हे देवि तुम लक्ष्मीरूप करिकै जगत्की रक्षा करो और हे देवी तुम चराचर जगत्को व्यापकहो॥२॥ और हे देवी जा कार- णते तुम पृथ्वीरूप करिकै स्थितहो ताते जगत्का आधार रूप एक तुमहीहो अन्य नहीं और नहीं उलांच सकाजाय पराक्रम जाका ऐसी जलोंका स्वरूप करिके स्थित जो है भगवती तुमहो सो तुम करिकै संपूर्ण जगत् बढायाजा- ताहै ॥ ३ ॥ हे देवि तुम कैसीहो अनंतहै पराक्रम जाको ऐसीहै और वि- प्रवका कारण माया तुमहीहो और जा करिकै अशेप जगत्की विष्णु पालना कर्ताहै ऐसी विष्णुकी सामर्थ्यलक्षण वैष्णवी शक्ति तुमही हो हे देवि तुलारी मायाने यह सम्पूर्ण जगत् मोहितकिया अर्थात् ममताके वशीभूत किया और तुम प्रसन्नहुई पृथ्वीकेविपे मुक्तिका कारण हो ॥ ४ ॥ और हे देवि श्रुति स्मृति पुराण इनते आदि लेकर जे विद्या, वे तुलाराही अंशहैं और ब्रह्माणीते आदि लेकर जे संपूर्ण शक्तिहैं वे तुझाराही अंशहैं और संपूर्ण यह जगत् तुलारे करिकै पूर्ण है हे भगवति स्तुति और स्तुत्य इनके भेदमें स्तुति होती है हे जगवति एकत्यके विपे तुलारी क्या स्तुति करीजाय ॥५॥ सर्वभूतायदादेवीभुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥ त्वंस्तुतास्तुतयेका वाभवंतिपरमोक्तयः ॥ ६॥ सर्वस्यबुद्धिरूपेणजनस्यह दिसं स्थिते ॥ स्वर्गापवर्गदेदेविनारायणिनमोस्तुते॥७॥ कलाका टादिरूपेण परिणामप्रदायिनी॥ विश्वस्योपरतोशक्ते नाराय- पिनमोस्तुते॥८॥सर्वमंगलमांगल्येशिवेसर्वार्थसाधिकेशरण्ये त्र्यंबकेगोरिनारायणिनमोस्तुते ॥९॥ सृष्टिस्थितिविनाशानां- अध्याय ११ (८५) शक्तिभूतेसनातनि।गुणाश्रयेगुणमयेनारायणिनमोस्तुते ॥१०॥ टीका-फिर हे भगवति भुक्तिमुक्तिकी देनेवाली तुम विश्वरूपहो इस प्रकारसे जब तुम स्तुति कीगई तव तुलारी स्तुतिके अर्थ कौनसी श्रेष्ठ.उ- तियां हैं कि जिन करिकै तुम स्तुति कीजातीहो अर्थात् नहीं ॥ ६ ॥ हे देवि संपूर्ण प्राणियोंके हृदयकेविपे स्थितहै स्वर्ग मोक्षकी देनेवाली हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ ७ ॥ क्षण मुहूर्त अहोरात्र पक्ष मास ऋतु अयन संवत्सर इन आदि कालरूप करिकै मनुष्यादिकनको बाल्य तरुण वृद्ध अ- वस्था देनेवाली तिसी प्रकार संसारके अन्तमें रुद्ररूप ऐसी हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है।॥ ८॥ और हे सर्व मंगलोंका मंगलरूप हे कल्याण करने- वाली हे शरणागतवत्सल हे त्रिनेत्रे हे गौरि हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ ९ ॥ और जगत्का रचनां पालन और संहार इनको करनेवाली हे शक्तिरूप और हे सनातनि हे गुणनका आश्रय हे गुणमयि हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कार है ॥ १० ॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ॥ सर्वस्यातिहरेदेविनारा- यणिनमोस्तुते॥११॥हंसयुक्तविमानस्थेब्रह्माणीरूपधारिणि।। कौशांभाक्षरिकेदेविनारायणिनमोस्तुते॥ १२॥ त्रिशूलचंद्रा- हिधरमहावृपभवाहिनि ॥ माहेश्वरीस्वरूपेणनारायणिनमो- स्तुते ।। १३॥ मयूरकुक्कुटवृत्तेमहाशक्तिधरेनषे ॥ कौमारी रूपसंस्थानेनारायणिनमोस्तुते ॥ १४॥ शंखचक्रगदाशाई- गृहीतपरमायुधे॥ प्रसीदवैष्णवीरूपनारायणिनमोस्तुते ॥१५॥ टीका-हे शरणागत ऐसे गरीब और दुःखीओंको दुःखोते रक्षा करने में तत्पर हे सर्वलोकका दुःख हरनेवाली है नारायणि तेरे अर्थ नमस्का- रहै ॥ ११॥ हे हंसयुक्त विमानमें स्थित ब्रह्माणीका रूप धारण करने चाली और हे कुशोदकका शत्रुवोंपर मेचन करनेवाली हे नारायणि तेरे अर्थ नमस्कारहै ॥ १२ ॥ और माहेश्वरी स्वरूप करिक हे विशूट (८६) सप्तशतीभाषाका । चंद्रको धारण करनेवाली हे महावृपावाहिनि हे नारायणि तेरे अर्थ नम- स्कारहै ॥ १३ ॥ मयूर और कुक्कुट इन करिकै युक्त और महाशक्ति को धारण करनेवाली और पापों करिकै रहित और कुमारशक्तिकासाहै शरीरका अवयव जाके ऐसी जो नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्का- रहै ॥ १४ ॥ और शंख चक्र गदा शाङ्ग धनुप येग्रहण किये हैं परम .आ- युध जाने ऐसी वैष्णवीरूप हे नारायणि तुम प्रसन्नहो तुमारे अर्थ न- मस्कारहै ॥ १५॥ गृहीतोग्रमहाचक्रेदंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे।।वराहरूपिणिशिवेनारायणि नमोस्तुते ॥ १६॥ नृसिंहरूपेणोणहंतुदैत्यान्कृतोद्यमे ॥ त्रैलोक्यवाणसहितेनारायणिनमोस्तुते ॥ १७ ॥ किरीटिनि महावज्रेसहस्रनयनोज्ज्वले ॥ वृत्रमाणहरे चैंद्रिनारायणिनमो- ' • स्तुते।। १८॥ शिवदूतीस्वरूपेणहतदैत्येमहाबले॥ घोररूपे महारावेनारायणिनमोस्तुते ॥ १९ ॥ दंष्ट्राकरालवदनेशिरो "मालाविभूपणे ॥ चामुंडेमुंडमथनेनारायणिनमोस्तुते॥२०॥ टीका-और ग्रहण कियोहै उपचक जाने और दंष्ट्रायों करिकै उठाई है पृथ्वी जाने और वराहके रूपको धारण करनेवाली और कल्याणरूपिणी ऐसी जो हे नारायणि तुमहो तुमारे अर्थ नमस्कारहै ॥ १६ ॥ और उय जो नृसिंह रूपहै ना करिक दैत्य जेहे तिन्हें मारनेको कियोहै उद्यम जाने और त्रैलोक्यकी रक्षा कारकै सहित ऐसी जो हे नारायणि तुमहो तुलारे अर्थ नमस्कारहै ॥ १७ ॥ और मुकुटको धारण करनेवाली और बडाहै वज जिसका और हजार नेत्र जेहैं तिन करिकै प्रकाशमान और वृत्रासुरका प्राण इरनेवाली ऐसी ऐंद्रीशक्तिरूप जो हे नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्कार है ॥ १८॥ और शिवदूती स्वरूप करिकै माराहै दैत्योंका महासैन्य जाने और घोरह रूपनाको और बडाहै शुन्द जाका ऐसी जो हेनारायणि तुमहो तुझारे अर्थ नमस्कारहै ॥ १९॥ और दंष्ट्रावोंकारकै भयंकरहै मुख जाको अध्याय ११ (८७) और नरमुंडोंकी मालाकार आनूपण जिसके ऐसी चंडमुंडको मारनेवाली चामुंडारूप जो हेनारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्कारहै ॥ २० ॥ लक्ष्मिलज्जेमहाविद्येश्रद्धेपुष्टेस्वध्रुवे ॥ महाराजेमहामाये नारायणिनमोस्तुते ॥२१ ॥ मधेसरस्वतिवरेभूतिवाभ्रवि तामसि ॥ नियतत्वंप्रसीदेशेनारायणिनमोस्तुते ॥ २२ ॥ सर्वतःपाणिपादांतेसर्वतोक्षिशिरोमुखे ॥ सर्वतःश्रवणघ्राणे नारायणि नमोस्तुते ॥ २३ ॥ सर्वस्वरूपेसर्वेशेसर्वशक्तिस मन्विते ॥ भयेभ्यस्त्राहिनोदेविदुर्गेदेविनमोस्तुते ।। २४ ॥ एतत्तेवदनसौम्यंलोचनत्रयभूपितम् ॥ पातुनः सर्व भौतिभ्यः कात्यायनि नमोस्तुते ॥ २५ ॥ टीका-और लक्ष्मी लज्जा महाविद्या श्रद्धा पुष्टि स्वथा ध्रुवा महारात्रि महामाया इनरूप जो हे नारायणि तुमहो सो तुह्मारे अर्थ नमस्कार है ॥२१॥ और मेधारूप सरस्वतीरूप और श्रेष्ठ ऐश्वर्यरूप कृष्णकी जनिनीरूप और तामसी शषिरूप और अटप और समर्थ ऐसीजो हे नारायणि तुमहो से प्रसन्नहो तुमारे अर्थ नमस्कारहै ॥ २२ ॥ और चारो तरफ, हाथ पैर अवयव जाके और चौतरफहैं नेत्र और शिर और मुख जाके और चौतरफहै कान और नाक जाके ऐसी जो हे नारायणि तुमहो सो तुलारे अर्थ नमस्का- रहै ॥ २३ ॥ और संपूर्ण जगत है स्वरूप जाको और सबकी स्वामिनी और संपूर्ण शक्तियों करिकै समन्वित ऐसी जो हेदेवि तुमहो सो भयोंने हमारी रक्षा करो हे दुर्गेदेषि तुलारे अर्थ नमस्कारहो ॥२४॥ और तीन नेत्रों कारकै अलंकत जो तल्लारा यह सुंदर मुखहै सो संपूर्ण भयोंते हमारी रक्षाकरो हेकात्यायनि तुझारे अर्थ नमस्कारहो ॥ २५ ॥ ज्वालाकरालमत्युग्रमशेपासुरसूदनम् ॥ त्रिशूलंपातुनाभीते भद्रकालिनमोस्तुते ॥ २६ ॥ हिनस्तिदैत्यतेजांसिस्वनेना- पूर्ययाजगत् ॥ सावंटापातुनोदेविपापेभ्योनःसुतानिय ॥२७॥ ५ (८८) सप्तशतीभाषाटीका। असुरासृग्वसापंकचर्चितस्तेकरोज्ज्वलः ॥ शुभायखगोभवतु चंडिकेत्यांनतावयम् ॥२८॥रोगानशेषानपहंसितुष्टाददासि कामान्सकलानभीष्टान् ॥ त्वामाश्रितानांनविपन्नराणांत्वामा- श्रिताह्याश्रयतांप्रयांति।।२९ ॥ एतत्कृतंयत्कदनंत्वयाद्यधर्म द्विपादेविमहासुराणाम् ॥ रूपैरनेकैर्वहुधात्ममूर्तिकृत्वाऽम्बि- केतत्प्रकरोतिकान्या॥३०॥ टीका और ज्वालावों करिकै उच्च और बड़ा भयंकर और संपूर्ण अ- सुरोंका हिंसक ऐसा जो हे भद्रकालि तुह्मारा त्रिशूलहै सो हमारी भयते रक्षा करो तुझारे अर्थ नमस्कार हो ॥ २६ ॥ और जो तुलारी घंटा अपना शब्द करिकै जगत् जो है ताहि पूर्ण कर दैत्यनके तेज जे हैं तिन्हें नष्ट कौई सो तुलारी घंटा पापोते पुत्रोंकीसी तरह हमारी रक्षा करो ॥ २७ ॥ और असुरोंका रुधिर और मेद रूप जो कीच ता करिकै व्याप्त ऐसे तुलारे हाथमें जो उज्वल खड्ग सो जगत्का और हमारे कल्याणके अर्थहो हे चंडिके हम तुझे प्रणाम कर्ते हैं ॥ २८ ॥ और हे भगवती तुम आराधन करिकै प्रसन्न हुई तुलारे आश्रित जे मनुष्य हैं तिनका संपूर्ण रोग नष्ट कौंहो और ति- नको संपूर्ण मनोवांछित अर्थ देतीहो और हे देवी तुलारे आश्रित जे नर हैं तिनके विपनि नहींहै और तुलारे आश्रित जे नरहैं वे तुलारी रुपाते राजत्व देवत्व पदवीको पाम होते हैं ॥ २९ ॥ फिर हे देवी इससमय ब्रह्माणीने आदि अनेक रूपों करिके बहुत प्रकारकी अपनी मूर्ति जो है ताहि कारकै धर्मके वेपी ऐसे असुर में हैं तिनका जो नाश यह तुमने किया सो यह असु- रोका नाश तुलारेते अन्य स्त्री कौन करनेको समर्थहै अर्थात् कोई नहीं॥३०॥ विद्यासुशास्त्रेपुषिवेकदापेप्वाद्येपुवाक्येपुचकात्वदन्या ॥ मम त्वगतंतिमहांधकारविभ्रामयस्येतदतीवविश्वम्।।३॥रक्षा- सिययोगविपाश्चनागायचारयोदस्युवलानिया ॥ दावानलो यत्रतथाधिमध्येतत्रस्थितात्वंपरिपासिविश्वम् ॥ ३२॥ वि.
अध्याय ११
(८९)
वेश्वरीत्वंपरिपासिविश्वविश्वात्मिकाधारयसीतिविश्वम् ॥
विश्वेशवंद्याभवतीभवंतिविज्ञाश्रयायेत्वयिभक्तिनम्राः ३३दे-
विप्रप्तीदपरिपालयनोऽरिभातेनित्यंयथासुखधादधुनैवसद्यः॥
पापानिसर्वजगताप्रशमनयाशुउत्पातपाकजनितांश्चमहोपस-
गान् ॥ ३४ ॥ प्रणतानांप्रतीदत्वदेविविश्वातिहारिणि ॥
त्रैलोक्यवासिनामीडयेलोकानांवरदाभव ॥ ३५॥
टीका-और हे देवि आन्वीक्षिकाते आदिले चतुर्दश विद्या के होतेसेत
और ज्ञान के प्रकाशक मनुस्मृत्यादिक धर्मशास्त्रोके होतेसंते और आदि वा-
क्योंके होतेसते अर्थाद वैदिक पुराणोंके होतेसंते बढा है अंधकार जाके
विषे ऐसा ममतारूपी जो गर्नहै ताके विषे यह विश्व जो है ताहि तुम भ्रमाती
हो सो तुमते अन्य देवी कौनहै अर्थात् कोई नहीं ॥ ३१ ॥ और हे देवि
जहाँ दैत्यहैं और जहां उग, विष जिनोंमें ऐसे सपहें और जहां शत्रुहैं और
जहां चोरोंके समूह हैं और तिसीमकार जहां समुद्रके विपे दावानल अमिहै
तहां पड़ेहुये जे मनुष्य, तिनकी तुम सर्वत्र स्मरण करीहुई तहां तहां स्थित '
हुई रक्षा काहो ॥३२॥ और हे देवि तुम विश्वेश्वरीहो याते विश्वकी रक्षा
कतीहो और तुम विश्वात्मिकाहो याते विश्वको धारण कर्तीहो और ब्रह्मा-
दिक जे हैं तिन करिकभी तुम स्तुति करने योग्य हो और हे भगवती जे तु-
सारे विपे भक्ति करिकै नम्र हैं वे जगत्के धारण करनेवाले हैं ॥ ३३ ॥ और
हे देवि तुम हमारे ऊपर प्रसन्न होवो जैसे शुसासुरके वधते हमारी पालना करी
तिसीमकार अमाडी होनेराले शत्रुनयते नित्य हमारी रक्षा करो और संपूर्ण
जगत्के पाप जे हैं जिन्हें शीघ्र नाशको प्राप्त करो और उत्सातनका फल दान
काल करिकै उत्पन्न भये जे उपद्रव तिन्हें शीघ्र नाशको प्राप्त करो ॥ ३४ ॥
हे विश्वका दुःस हरनेवाली भक्ति करिकै नम्र जे हैं तिनके ऊपर प्रसन्नहो
हे त्रैलोक्यवासियों करिके स्तुति करने योग्य देवि तुम लोकोंको मनोवांछित
वरदान देनेवाली होवो ॥ ३५ ॥
(९०) सप्तशतीभापारीका।
देव्युवाचें ॥ वरदाहंसुरगणावरंयमनसेच्छथ ॥ तंवृणुध्वप्रय-
च्छामिजगतामुपकारकम् ॥३६॥ देवाउचुः॥ सर्वबाधाप्र-
शमनत्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ॥ एवमेतत्त्वयाकार्यमस्मद्वैरि-
विनाशनम् ॥ ३७॥ देव्युवाच ॥ वैवस्वतंतरे प्राप्तेअष्टाविं-
शतिमयुगे ॥शुभोनिशुंभश्चैवान्यावुत्पत्स्यतेमहासुरौ॥३८॥
नंदगोपगृहेजातायशोदागर्भसंभवा । ततस्तौनाशयिष्यामि
विंध्याचलनिवासिनी ॥ ३९ ॥ पुनरप्यतिरौद्रेणरूपेणपु-
थिवीतले ॥ अवतीर्यहनिष्यामिवैप्रचित्तांश्चदानवान् ॥४॥
टीका-तब देवी बोलतीभई कि हे देवगणो मैं तुझारेको वरदान देनेवाली
हूँ सो जो तुम जगत्का उपकार करनेवाला वर मन करिकै इच्छा कर्ने हो
सो मांगो मैं दूंगी ॥ ३६ ॥ तब देव बोलतेनये हे संपूर्ण त्रैलोक्यकी स्वा-
मिनी तुझें त्रैलोक्यके संपूर्ण दुःखका विनाश करना योग्य है और ऐसेही
जगत्का उपकारक जो हमारे वैरियोंका विनाशहै सो करना योग्यहै ॥ ३७॥
तब देवी बोलतीभई हे देवो तुम श्रवण करो मैंने जगत्के उपकारके अर्थ ये
पराक्रम किये अब फिर वैवस्वत मन्वन्तरके मध्यमें आनेवाली अहाईसवी
युगचौकडी प्राप्त होतेसते अर्थात् द्वापर कलियुगकी संधिके विपे अन्य शुंभ
और निशुंभ ये दो महाअसुर उत्पन्न होंगे ॥ ३८ ॥ ताके अनंतर नंद गो-
पिका गृहके विपे उत्पन्न भई यशोदाके गर्भते है जन्म जाको ऐसी मैं विंध्या.
चलके विपे निवास कर्तीहुई तिन दोनों शुंभ और निशुंभ दैत्योंको नष्ट क-
रुंगी ॥ ३९ ॥ फिर उसी अट्ठाईसवी चौकडीमें दापरके अनन्तर कलियुगके
चिपे बड़ा भयंकर रूप करिके फिरजी पृथ्वीतलमें अवतार लेकर वैप्रवित्ति
नाम जे दानवहे तिन्हें मारूंगी ॥ ४० ॥
भक्षयंत्याश्चतानुग्रान्वैप्रचित्तान्महासुरान् ॥ रक्तादंताभवि-
प्यंतिदाडिमीकुसुमोपमाः॥४१॥ ततोमदिक्ताःस्वर्गमर्त्यलो-
केचमानवास्तुवंतोव्याहरिष्यतिसततंरक्तदंतिकाम् ॥४२॥
अध्याय ११ भूयश्वशतवार्पिक्यामनावृष्टयामनभसि ॥ मुनिभिसंस्तुता भूमोसंभविष्याम्ययोनिजा ॥१३॥ ततःशतेननवाणीनिरो क्षिष्यामियन्मुनीन् ॥ कीर्तयिष्यंतिमनुजा शताक्षीमितिमा ततः॥४४॥ ततोहमखिलंलोकमात्मदेहसमुद्भवः।। भरिया मिसुराःशाकेरावृष्टे-माणधारकैः ॥ ४५ ॥ टीका-और वैप्रचित्तिनाम उप महाअसुर जे हैं तिन्है लक्षण कहुिई का मेरा दाडयूके पुष्पके समान रक्तदांत होयगे ॥ ४१ ॥ ताकारणले स्वर्ग- लोकके विषे देवता और भूलोकके विपे मनुष्य ये मेरी निरंतर स्तुति कर्ते- हुवे मेरेको रक्तदंतिका नाम करिके कहेंगे ॥ ४२ ॥ फिर शतवर्षपर्यन्त वर्षा नहींहोने करिके नदी तडागादिकमेंनी जल नहीं होतेसंते मुनियों कारकै स्तुति करीहुई अयोनिज प्रकट हूँगी ॥४३॥ ताके अनंतर शत नेत्रन कारकै मुनि जेहे तिन्हे में देरलूंगी ताकारणते मनुष्य मेरेको शताक्षी कहेंगे ॥ ४४ ॥ ताके अनंतर संपूर्ण लोक जो है ताहि अपने शरीरते उत्पद्यमान और वृष्टि होनेतक प्राणोंके धारक ऐसे जे शाकहैं तिनकारकै मैं पोपण करुंगी॥४५॥ शाकंभरीतिविख्याति तदायास्याम्यहंभुवि ॥ तत्रैवचवधि- प्यामिदुर्गमाख्यंमहासुरम् ॥४६॥ पुनश्चाईयदाभीमरूपं कृत्वाहिमाचले। रक्षांसिभक्षयिष्यामिमुनीनांचाणकारणात्॥ ॥४७॥तदामांमुनयःसर्वेस्तोष्यंत्यानम्रमूर्तयः॥भीमादेवीति विख्यातंतन्मेनामभविष्यति ॥ १८॥ यदारुणाख्यत्रैलोक्ये महावापांकरिष्यति ॥ तदाहंभ्रामररूपंकृत्वासंख्येयषट्पदम् ॥४९॥ त्रैलोक्यस्यहितार्थायवाधिष्यामिमहासुरम् ॥ भ्रा. मरीतिचालोकास्तदास्तोष्यंतिसर्वतः ॥५०॥ टीका-तब पृथ्वीके सिपे मैं शाकंभरी यह जो संज्ञाहै नाहि प्राप्नहूँगी फिर तहाँही दुर्गनामा जो महाअसुरहै ताहि मारूंगी ॥ ४६ ॥ और हेदेवो फिरभी जब मैं हिमाचलके निपे घोररूप कारकै मुनि जो हैं विनकी रक्षाके (९२) सप्तशतीनापाटीका। कारणते राक्षस जेहैं तिन्हें भक्षण करूंगी ॥ ४७ ॥ तब आसमन्ताद नम्र है मूर्ति जिनोंकी ऐसे वसिष्ठादिक मुनि मेरी स्तुति करेंगे और ताकारणते भीमादेवी यह विख्यात मेरा नाम होगा ॥४८॥ और हे देवो त्रिलोकीके विषे जब अरुणनामा महासुर बडी पीडा करेगो तब मैं असंख्य हैं भ्रमर जाके विपे ऐसो भामररूप जोहै ताहि करिकै त्रिलोकीके हितके अर्थ अ- रुणासुर जोहै ताहि मारूंगी तब लोक सर्वत्र भामरीनाम करिकै मेरी. स्तुति करेंगे ॥ ४९ ॥ ५० ॥ इत्थंयदायदावाधादानवोत्थाभविष्यति ॥ तदातदावतीर्याह करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥५१॥ इतिश्रीमार्कडेयपुराणेसावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये नारायणीस्तुतिन मैकादशोऽध्यायः॥११॥ टीका-और हे देवो जब जब लोकोंको दानवोंते पीडा उत्पन्न होगी तब तब अववार लेकर शत्रुवों का नाश करूंगी ॥ ५१ ॥ इति श्रीमार्कण्डे यपुराणे सावर्णिके मन्वंतरेदेवीमाहात्म्ये टीकायां नारायणीस्तुति मैकादशो ऽध्यायः ॥ ११॥ देव्युवाच ॥ एभिस्तवैश्चमांनित्यस्तोष्यतेयःसमाहितः ॥ तस्याहंसकलांवाधांनाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ १॥ मधुकै- टभनाशंचमहिषासुरपातनम् ॥ कीर्तयिष्यतियेतद्वधंशुभ निशुंभयोः॥२ ॥ अष्टम्यांचचतुर्दश्यांनवम्यांचैकचेतसः॥ स्तोष्यतिचैवयेभत्त्यामममाहात्म्यमुत्तमम् ॥३॥ नतेषांदु- प्कृतंकिंचिदुष्कृतोत्थानचापदः ॥ भविष्यतिनदारिद्रयंनचै- वेष्टवियोजनम् ॥ ४॥ शत्रुतोनभयंतस्यदस्युतोवानराजतः।। नशस्त्रानलतोयोषात्कदाचित्संभविष्यति ॥५॥ टीका-फिरभी देवी बोलतीमई कि हे देवो इन स्तोत्रों कारकै एकाग्र- चित्त हुवा जो कोई नित्य मेरी स्तुति करेगा तिसकी निस्संदेह संपूर्ण वाधा मैं नष्टकरंगी ॥१॥ और मधुकैटजका है नाश जाके विपे और महिपासुर- अध्याय १२ का घात जाके विपे और तिसीप्रकार शुभ निशुमका है वधप्रतिपादन जाके विषे ऐसे जो मेरो उत्तम माहात्म्य ताहि अष्टमी और चतुर्दशी और नवमी इन तिथियोंके विपे जे कोई पुरुप एकाम चित्नहुवे भक्ति कारकै सुनेंगे अथवा पाठ करेंगे तिनका संपूर्ण पाप नष्टहोगा और पापोते उठी जे आपत्ति है वे सब नष्ट होगी और तिनके कमी दरिद्रता नहींहोगी और कभी पुत्र धनादिकाते वियोग नहींहोगा ॥ २॥ ३ ॥ ४ ॥ और तिनको शत्रुते और चोरते और राजते कभी भय नहीं होगा और शत्रते और अमिते और जलके प्रवाहते कमी तिन्होंका घात नहीं होनेका ॥ ५॥ तस्मान्ममैतन्माहात्म्यंपठितव्यसमाहितैः॥ श्रोतव्यंचसदाभ- त्यापरंस्वस्त्ययनंमहत् ॥ ६॥ उपसर्गानशेषांस्तुमहामा- रीसमुद्भवान् । तथात्रिविधमुत्पातमाहात्म्यंशमयेन्मम ॥७॥ यत्रैतत्पठ्यतेसम्यनित्यमायतनेमम ।। सदानतद्विमोक्ष्या- मिसांनिध्यंतरमेस्थितम् ॥ ८॥ बलिप्रदानेपूजायाममिकायें महोत्सवे ।। सर्वममैतचरितमुच्चार्यश्राव्यमेवच ॥ ९ ॥ जा- नताजानतावापिबलिपूजांतथाकृताम् ॥ प्रतीक्षिष्याम्यहंप्री- त्यावह्निहोमंतथाकृतम् ॥ १०॥ टोका-ताकारणते एकाग्रचित्त पुरुषोंको प्रकट कल्याणकारक पूज- नीय ऐसा मेरा माहात्म्य जोहै सो भक्ति करिकै सदा श्रवण करने योग्यहै ॥६॥ और मेरा माहात्य जोहै ताहि श्रवण कर्नेहुये और पठन कहुये जे पुरुषहैं तिनके महामारीते उत्पन्न भये जे संपूर्ण उपद्रव तिन्हें मेरा माहात्म्य दूर करे और विसीप्रकार अध्यात्म अधिसून आधिदैव अर्थात् शरीरोत्पन्न व्याध्यादिक और प्रेतादिजानित जयन्नमादिक और देवकत दारिद्रयादिक ये तीन प्रकारको जो उत्पातहै ताहि मेरा माहात्य दूर करैहै ॥ ७ ॥ और जहां मेरे मंदिरके विषे मेरा माहात्म्य पुरुषों करिके शुधरीविसे पढाजालाई उस स्थानको मैं नहीं छोडोगी और उस गृहके विपे मेरा सांनिध्य
(९४)
समशतीजापाटीका।
स्थितहै॥८॥और महानवमी इत्यादिक तिथियोंके विपे छाग मेपादि पशुवों-
करिकै जो देवनिमित्तक बलिदान तासमयके विपे और हवनकालके विषे
और पुत्रजन्मविवाहादिक महोत्सवोंके विपे संपूर्ण मेरा माहात्म्य
मनुष्योंके पढने योग्यहै और श्रवण करने योग्यहै ॥ ९ ॥ और ता प्रकार
करिकै गुरूपदिष्ट कर्त्तव्यता जोहै ताहि जानता और नहीं जानता जो भक्ति-
मान् पुरुषहै ता करिकै किया जो बलिदान और पूजा और तिसीप्रकार अ-
निके विपे तिलमध्वादिक हवन तिन्हे मैं प्रीतिकारकै स्वीकार करूंगी ॥३०॥
शरत्कालेमहापूजाकियतेयाचवार्षिकी ॥ तस्यांममैतन्माहा-
त्म्यंश्रुत्वाभक्तिसमन्वितः॥ १३॥ सर्ववाधाविनिर्मुक्तोधनधा-
न्यसुतान्वितः॥ मनुष्योमत्प्रसादेनभविष्यतिनसंशयः॥१२॥
श्रुत्वाममैतन्माहात्म्यंतथाचोत्पत्तयःशुभाः॥ पराक्रमंचयुद्धे-
पुजायतेनिर्भयःपुमान्॥ १३॥ रिपवःसंक्षयंयांतिकल्याणचो-
पपद्यते ॥ नंदतेचकुलंपुंसांमाहात्म्यंममशृण्वताम् ॥ १४ ॥
शांतिकर्मणिसर्वत्रतथादुःस्वप्नदर्शने ॥ ग्रहपीडासुचोग्रासु
माहात्म्यंशृणुयान्मम ॥१५॥
टीका-जो आश्विन शुक्लपतिपदाने लेकर शरत्कालके विषे महापूजा क-
रोजाती और जो चैत्रशुक्ल प्रतिपदाते लेकर वार्षिकी पूजा करीजातीहै ताके
विपे मेरा यहजो चरित्रत्रयलक्षणमाहास्यहै ताहि भक्तियुक्त हुवा मनुष्य
'सुनकर मेरी रूपाने संपूर्ण बाधा करिकै विनिर्मुक्त और धन धान्य सुत करिकै
युक्तहोगा इसमें संदेह नहीं ॥ ११॥ १२ ॥ और मेरा यह माहात्म्य जोहै
ताहि गुरुते सुनकर और तिसीप्रकार जगत्का आयुदय करनेवाली ब्रह्माण्या
दिशक्तिरूप जे मेरी उत्सानिन्हें तिन्हें और मेरे वीरपराकम जे हैं तिन्हें
सुनकर पुरुष युद्धनके विपे निर्भय होताहै ॥ १३ ॥ और मेरा माहात्म्य
जोहै ताहि सुनतेहुवे जे पुरुषहैं तिनके शत्रु नाशको शप्त होतेहैं और तिनके
मंगल उत्पन्न होताहै और तिनका कुल समृद्धिको प्राप्त होताहै ॥ १४ ॥
अध्याय १२ (९५) और उपयोका संपूर्ण शांतिकर्मके विपे और तिसीप्रकार दुष्टस्वम दीसनेमें और बहुत अनिष्ट ग्रहों करिके जे पीडाहै तिनमें पुरुष मेरा माहात्म्य जो है ताहि सुनें ॥ १५ ॥ उपसर्गाःशमयांतिग्रहपीडाश्चदारुणाः॥ दुःस्वप्नंचनृभिहएंसु- स्वप्नापजायते ।। १६ ।। बालग्रहाभिभूतानांबालानांशांति- कारकम् ॥ संघातभेदेचनृणांमैत्रीकरणमुत्तमम् ॥ १७॥ दुर्घ- त्तानामशेषाणांवलहानिकरंपरम् ॥ रक्षोमूतपिशाचानांपठना देवनाशनम् ।। १८॥ सर्वममैतन्माहात्म्यममसन्निधिकारकम्।। सर्वकृत्वमेतदादिमध्यावसानलक्षणं ॥ १९ ॥ पशुपुष्पार्घधू- पैश्चगंधदीपस्तथोत्तमैः ॥ विप्राणांभोजनौंमैः प्रेक्षणीयैरह- निशम् ॥२०॥ टीका-फिर मेरे माहात्म्यके श्रवणते उपद्रव शांतिको प्राप्त होताहै और शनि आदि ग्रहों करिकै जे कठोर पीडा हैं ते शांत होतीहैं और मनुष्योंने देखा जो खोटा स्वम है सो श्रेष्ठस्वम होताहै ॥ १६ ॥ और श्मशानमें रहने- वाले ऐसे पूतनाते आदि लेकर जे बालग्रह तिन करिकै पीडित जे बालक तिनके मेरा माहात्म्यश्रवण शांतिका कारणहै और एक कार्य करनेवाले पुरु- पोंके समूहमें भेद होतेसंते मेरा माहात्म्यका अवणही उत्तम मैत्रीका साधन है ॥ १७॥ फिर मेरा माहात्म्य कैसाहै कि संपूर्ण दुष्टोंके बलकी हानि कर- नेवाला और पठनमात्रते रक्षो भूत पिशाच इनको दूर करनेवाला ॥ १८ ॥ और सर्व कृत् एतद इसप्रकार आदि मध्य अंतमें है चिन्ह जाके विपे ऐसा मेरा यह संपूर्ण माहात्म्य मनुष्यको मेरे समीप प्राप्त करनेवालाहै ॥१९॥ और पशु पुष्प अर्घ्य और धूप इन करिकै और गंध दीप इन करिकै और तिसीप्रकार ब्राह्मणोंको तरह तरहके उत्तम जिमानो करिकै और हवनोंक- रिकै और तिसीप्रकार हरबखत नृत्य गीतादिकनकरिकै ॥२०॥ अन्यैश्चविविधैभौगैःप्रदानैर्वत्सरेणया ॥प्रीतिक्रियतेसास्मि- (९६) सप्तशतीवापाटीका। न् सकृदुचरितेश्रुते ॥ २१ ॥ श्रुतंहरतिपापानितथारोग्यं प्रयच्छति ॥ रक्षांकरोतिभूतेभ्योजन्मनांकीर्तनमम ॥२२॥ युद्धेषुचरितंयन्मेदुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥ तस्मिन्छुत्वैरिकृतं भयंपुंसांनजायते ॥२३॥ युष्माभिःस्तुतयोयाश्चयाश्चब्रह्म- र्षिभिः कृताः॥ ब्रह्मणाचकृतायास्ता प्रयच्छंतुशुभांगतिम् ।। ॥२६॥ अरण्येप्रांतरेवापिदावाग्निपरिवारितः ॥दस्युभिर्वा वृतःशून्यगृहीतोवापिशत्रुभिः॥२५॥सिंहव्याघ्रानुयातोवावने वावनहस्तिभिः ॥ राज्ञाकुद्धेनचाज्ञप्तोवध्योवंधगतोपिवा ॥ ॥२६॥ आपूर्णितोवावातेनस्थितःपोतेमहार्णवे। पत्तत्सुचापि शस्त्रेषुसंग्रामेभृशदारुणे॥२७॥ सर्वानाधासुघोरासुवेदनाभ्य दितोपिवा ॥ स्मरन्ममैतच्चरितनरोमुच्येतसंकटात्॥२८॥ टीका-और तिसीप्रकार तरह तरहके अन्य भोगों करिकै और तिसी- प्रकार मेरी प्रीतिके अर्थ दानों करिकै जो संपूर्ण कामनाको देनेवाली प्रीति करी जातीहै सो प्रीति एकवार उच्चारण किया और श्रवण किया जो मेरा माहात्म्य है ताके विपे भक्तिकरिके भक्तोंने करीजाती है ॥ २३ ॥ फिर श्रवण कियाहुवा मेरा माहात्म्य पाप जे हैं तिन्है दूरक है और तिसीप्रकार सेवन करनेवालोंको आरोग्य देताहै और मेरे जे ब्रह्माणी आदि रूप करिके प्रादुर्भाव है तिनका जो कीर्चन सो भक्तोंकी भूत पिशा- चादिकनसे रक्षा कर्ताहै ॥ २२॥ और मेरा जो दुष्ट दैत्यनको हनन करने- वाला चरित्र होतामया ताके श्रवण करेसते श्रवण करनेवाले पुरुषोंको युद्ध- नके विषे वैरि करिके जय नहीं होताहै ॥ २३ ॥ और हे देवो जे तुमने मेरी स्तुति करीहै और ताके पहिले सुमेधा मार्कण्डेय इत्यादि ब्रह्मर्षियोंने जे मेरी स्तुति करीहै और मधु और कैटभ इन दैत्योंके भयते ब्रह्माने जे मेरी स्तुति करी है वे स्तुति मनुष्यों करिके पढीहुई मनुष्य जे हैं तिनके अर्थ शुजगति जो है ताहि देगी ॥ २४॥.अरण्यके विपे जो वर्तमान और तिसीप्रकार म- अध्याय १२ (९७) नुम्योकरिकै शून्य मार्गके विपे वर्तमान और तिसीप्रकार दावाग्नि कारकै चौतरफ रुकाहुवा और तिसीप्रकार चौरों करिके रोकाहुवा और तिसी प्रकार उद्यानमें शत्रुवों करिके ग्रहण कियाहुवा वनमें मारनेको सिंह भगेरो अनुयातहुवा और तिसीप्रकार हाथियों करिकै मारनेको पीछे दौडा गया हुवा और कोधयुक्त राजाने यह मारने योग्यहै इसप्रकार आज्ञा दिया हुवाती और तिसीप्रकार कैदीखानामें प्रातहुया और तिसीप्रकार समुदके विषे नौकामें स्थित पवन करिकै व्याकुल हुवा और बडे जयंकर संग्रामके विषे शस्त्रोंके पडतेसतेजी वर्तमानहुवा और तिसीमकार सम्पूर्ण वेदना जे हैं तिनके विपे तिस दुःखका अनुभवोंके विपे वर्तमान जो मनुष्य सो मेरा यह माहात्म्य जो है ताहि स्मरण करताहुवा संकटते छूटजाय२५।२६।२०१२८॥ ममप्रभावात्सिंहावादस्यकोवैरिणस्तथा ॥ दूरादेवपलायंते स्मरतश्चरितंमम।।२९||ऋषिरुवाच॥ इत्युक्तासाभगवतीचंडि काचंडविक्रमा॥ पश्यतामेवदेवानांतत्रैवांतरधीयत ॥ ३० ॥ टीका-और मेरे प्रभावते सिंह व्याघादिक और चौर और तिसीमकार शत्रु ये सब मेरा चरित्र स्मरण कर्ताहुवा जो पुरुष है ताकेसकासते डरपके भाग जातेहैं ।। २९ ।। तब ऋषि बोले हे सुस्थराजन प्रचंड है पराकम जाको ऐसी चंडिका देवतावोंके प्रति इस प्रकार कहकर देवतावोंके देखतेहुवेही तहां अंतर्धान होतीभई ॥ ३० ॥ तेपिदेव्यानिरातकाः स्वाधिकारान्यथापुरा ॥ यज्ञभागभुजः सर्वेचकुर्विनिहतारयः ॥ ३१ ॥ दैत्याश्चदेव्यानिहतेशुभेदे- वरिपौयुधि॥ जगद्विध्वंसकेतस्मिन्महोतुलविक्रमे।निशुंभे चमहावीर्यशेषाःपातालमाययुः ॥३२॥ एवंभगवतीदेवीसा नित्यापिपुनःपुनः॥संभूयकुरुतेभूपजगतपरिपालनम्॥३३॥ तयैतन्मोह्यतेविश्वसैवविश्वप्रसूयते ॥ सायाचिताचविज्ञानं . तुष्टानदिप्रयच्छति ॥३४॥ व्याप्ततयैतत्सकलंब्रह्मांडमनुजे- ७ (९६) सप्तशतीभापाटीका। न् सकृदुच्चरितेश्रुते ॥ २१ ॥ श्रुतंहरतिपापानितथारोग्यं , प्रयच्छति ॥रक्षांकरोतिभूतेभ्योजन्मनांकीर्तनमम ॥ २२॥ युद्धेषुचरितंयन्मेदुष्टदैत्यनिवर्हणम् ॥ तस्मिञ्छुत्तेवैरिकृतं भयंपुंसांनजायते ॥ २३॥ युष्माभिःस्तुतयोयाश्चयाश्चब्रह्म- र्षिभिः कृताः॥ ब्रह्मणाचकृतायास्ता प्रयच्छंतुशुभांगतिम् ।। ॥२४॥ अरण्येप्रांतरेवापिदावाग्निपरिवारितः ॥दस्युभिर्ना वृत शून्यगृहीतोवापिशत्रुभिः॥२५॥सिंहव्यामानुयातोकावने वावनहस्तिभिः ॥ राज्ञाकुद्धेनचाज्ञप्तोवध्योवंधगतोपिवा ॥ ॥२६॥ आपूर्णितोवावातेनस्थितःपोतेमहार्णवे। पतत्सुचापि शस्त्रेषुसंग्रामेभृशदारुणे॥२७॥ सर्वाबाधासुघोरासुवेदनाभ्य दितोपिवा ॥ स्मरन्ममैतच्चरितनरोमुच्येतसंकटात्॥२८॥ टीका-और तिसीप्रकार तरह तरहके अन्य भोगों करिकै और तिसी- प्रकार मेरी प्रीतिके अर्थ दानों करिकै जो संपूर्ण कामनाको देनेवाली प्रीति करी जातीहै सो प्रीति एकवार उच्चारण किया और श्रवण किया जो मेरा माहात्म्य है ताके विष भक्तिकरिके, भक्तोंने करीनातीहै ॥ २१ ॥ फिर श्रवण कियाहुवा मेरा माहात्म्य पाप जे हैं तिन्है दूरकर्ताहै और तिसीमकार सेवन करनेवालोंको आरोग्य देता है और मेरे जे ब्रह्माणी आदि रूप करिके प्रादुर्भाव है तिनका जो कीर्चन सो भक्तोंकी भूत पिशा- चादिकनसे रक्षा कर्ताहै ॥ २२ ॥ और मेरा जो दुष्ट दैत्यनको हनन करने- वाला चरित्र होतामया ताके श्रवण करेसते श्रवण करनेवाले पुरुपोंको युद्ध- नके विप वैरि करिके भय नहीं होताहै ॥ २३॥ और हे देवो जे तुमने मेरी स्तुति करीहै और ताके पहिले सुमेधा मार्कण्डेय इत्यादि ब्रह्मर्पियोंने जे मेरी स्तुति करीहै और मधु और कैटभ इन दैत्योंके भयते ब्रह्माने जे मेरी स्तुति करी है वे स्तुति मनुष्यों करिके पढीहुई मनुष्य जे हैं तिनके अर्थ शुभगति जो है ताहि देगी ॥ २४॥ अरण्यके विपे जो बर्चमान और तिसीप्रकार म- अध्याय १२ करिके अनुयाताया नुप्पोंकरिकै शून्य मार्गके विपे वर्तमान और तिसीप्रकार दावामि करिकै चौतरफ रुकाढुवा और तिसीप्रकार चौरों करिके रोकाहुवा और तिसी प्रकार उद्यानमें शत्रुवों करिके ग्रहण किया या वनमें मारनेको सिंह भगेरो और तिसीप्रकार हाथियों करिकै मारनेको पीछे दौडा गया हुवा और क्रोधयुक्त राजाने यह मारने योग्यहै इसप्रकार आज्ञा दिया हुवाती और तिसीप्रकार कैदीखानामें पानहुवा और तिसीप्रकार समुद्रके विपे नौकामें स्थित पयन करिकै व्याकुल हुवा और बडे भयंकर संयामके विषे शस्त्रोंके पडतेसंतेनी वर्तमानहुवा और तिसीप्रकार सम्पूर्ण वेदना जे हैं तिनके विपे तिस दुःखका अनुभवोंके विषे वर्तमान जो मनुष्य सो मेरा यह माहात्म्य जो है ताहि स्मरण करताहुवासंकटते छूटजाय२५।२६।२७१२८॥ ममप्रभावासिहाद्यादस्ययोवैरिणस्तथा ॥ दूरादेवपलायंते स्मरतश्चरितमम॥२९॥ऋपिरुवाच॥ इत्युक्त्वासाभगवतीचंडि काचंडविक्रमा॥ पश्यतामेवदेवानांतत्रैवांतरधीयत ॥३०॥ टीका-और मेरे प्रभावते सिंह व्याघ्रादिक और चौर और तिसीपकार शत्रु ये सब मेरा चरित्र स्मरण कर्ताहुवा जो पुरुष है ताकेसकासते डरसके भाग जाते हैं ॥ २९ ॥ तब ऋषि बोले हे सुरथराजन् प्रचंड है पराक्रम जाको ऐसी चंडिका देवतावोंके प्रति इस प्रकार कहकर देवतावोंके देखतेहुवेही तहां अंतर्धान होतीभई ॥ ३० ॥ तेपिदेव्यानिरातका स्वाधिकारान्यथापुरा ॥ यज्ञभागभुजः सर्वेचक्रुर्विनिहतारयः ॥ ३१ ॥ दैत्याश्चदेव्यानिहतेशुभेदे- वरिपोयुाधे॥ जगद्विध्वंसकेतस्मिन्महोयतुलविक्रमे।निशुभे चमहावीर्येशेपाःपातालमाययुः ॥ ३२ ॥ एवंभगवतीदेवीसा नित्यापिपुनःपुनः संभूयकुरुतेभूपजगतःपरिपालनम्॥३३॥ तयैतन्मोह्यतेविश्वसैवविश्वप्रसूयते ॥ सायाचिताचविज्ञान तुष्टाऋद्धिप्रयच्छति ॥३४॥ व्याप्तंतयैतत्सकलंब्रह्मांडमनुजे- (९८) सप्तशतीतापाटीका। श्वर ॥ महाकाल्यामहाकालेमहामारीस्वरूपया ॥ ३५ ॥ टीका-फिर ताके अनंतर देवी करिके मारेगयेहें शत्रु जिनोंके ऐसे वे देवजी जैसे पहिले निर्जयथे तिसीप्रकार निर्भयहुचे यज्ञोंके भाग भोगतेहुये अ. पने जे अधिकार अर्थात् व्यापार तिन्हे कर्तये॥३१॥ फिर हे राजन् देवीने जगत्का विध्वंस करनेवाला देवतावोंके प्रबलशत्रु शुभको युद्धके विषे मारेसं- ते और निशुंभको मारेसते फिर शेपदैत्य भयभीत हो पातालको भागजाते भये ॥ ३२॥ हेराजन् भगवती नित्यमीहै परंतु इसप्रकार वारंवार अवतार लेकर जगत्का परिपालन कर्ताहै ॥ ३३ ॥ और तिसी कारकै यह जगत् रचाजाताह और तिसी करिक मोहाजाताहै सो जगवती भक्तोंकारकै प्रा- र्थितहुई भक्तों के प्रति ज्ञान देतीहै और प्रसन्नहुई संपत्ति देतीहै ॥ ३४ ॥. फिर हेराजन् महामारीस्वरूप जो महाकालीहै ता करिकै प्रलयकालके विषे यह संपूर्ण ब्रह्मांड व्याप्त होताहै ॥ ३५ ॥ सैवकालेमहामारीसैवसृष्टिर्भवत्यजा। स्थितिंकरोतिभूतानांस वकालेसनातनी॥३६॥ भवकालेनृणांसैवलक्ष्मीवृद्धिप्रदागृहे।। सेवाभावेतथालक्ष्मीविनाशायोपजायते ॥ ३७॥ स्तुतासंपू- जितापुष्पैधूपगंधादिभिस्तथा ॥ ददातिवित्तंपुत्रांश्चमतिधर्मे गतिशुभाम्॥३८॥इति मार्कंडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेव्या चरितमाहात्म्यं भगवतीवाक्यंनामद्वादशोध्यायः ॥ १२॥ टीका-और वह नित्य भगवती प्रलयकालके विपे महामारी कहीजा- तीहै और सृष्टिकालमें सर्गशक्ति कही जातीहै और वही जगत्का पालन काहै यात पालनशक्ति कहीजातीहै ॥ ३६ ॥ और वही मनुष्योंके धरी- मे संपचिकालके विपे लक्ष्मीके वृद्धिको देनेवालीहै फिर वही आपत्कालके विपे लक्ष्मीका नाशके अर्थ अलक्ष्मी होजातीहै ॥ ३७ ॥ और हेराजन् वह भगवती मनुष्यों करिकै स्तुति करीहुई और तिसीमकार पुष्प गंध धूप इत्या- देको कारकै पूजितहुई तिन भक्त मनुष्योंके अर्थ धन और पुत्र और धर्म अध्याय १३ (९९) के विपे श्रेष्ठ बुद्धि और शुभगति ये सर्ववस्तु देतीहै ॥ ३० ॥ इति श्रीमा- कंडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरे देवीमाहात्म्ये भापाकायांदादशोध्यायः॥१२॥ ऋपिरुवाच ॥ एतत्तेकथितंभूपदेवीमाहात्म्यमुत्तमम् ॥ एवंप्रभावासादेवीययेदंधार्यतेजगत् ॥ विवातथैवक्रियते भगवद्विष्णुमायया ॥१॥ तयात्वमेपवैश्यश्चतथैवान्येविवे- किनःमोह्यतेमोहिताश्चैवमोहमेष्यतिचापरे ॥२॥ तामुपैहि महाराजशरणंपरमेश्वरीम्।।आराधितासैवनृणांभोगस्वर्गापवर्ग दा ॥६॥ मार्कडेयउवाच ॥ इतितस्यवचःश्रुत्वासुरथः सनराधिपः ॥ प्रणिपत्यमहाभागंतमृपिसंशितव्रतम् ॥ ४ ॥ निर्विण्णोतिममत्वेनराज्यापहरणेनच ॥ जगामसद्यस्तपसे सचवैश्योमहामुने ॥५॥ टीका-फिर ऋपि बोलतेभये हेसुरथराजन् तुलारे अर्थ सर्ववस्तुका साधन देवीका श्रेष्ठ माहात्म्य कहा सो देवी ऐसी है के जा करिकै यथायो- ग्य कालके विपे यह जगत् रचाजाताहै और पालन कियाजाताहै और संहार कियाजाताहै ॥ १॥ और तिस प्रकार भगवद्विष्णुकी माया चंडिका करिकेही ज्ञान उत्पादन कियाजाताहै और ताकरिकै तुम और यह वैश्य और तिसी प्रकार अन्य जे विवेकी, ते सब मोहेजातेहैं और मोहितहैं और मोहकों प्राप्त होंगें ॥ २॥ हेराजन् ऐसी भगवतीकी तुम शरण प्राप्तहो वही भगवती मनुष्यों कारकै आराधन करीहुई मनुष्योंको भोग और स्वर्ग और मोक्ष देनेवालीहै ॥३॥ तब मार्कण्डेयपि बोलतेभये कि हे जैमिने इस प्र- कार सुमेधाऋषिका वचन सुनकर सुरथ राजा संपादन कियोहै व्रत जाने ऐसा महानाग सुमेधाऋपि जोहै ताहि प्रणाम करकै पुत्र मित्र कलवादिनमें अति मोह करिके और शत्रुवों करिके राज्यके हरनेसे दुःखितहुवा तपके अर्थ वनको जाताभया और तिसीप्रकार वह वैश्यनी जाताज्या ॥४॥५॥ संदर्शनार्थमंवायानदीपुलिनमास्थितः ॥ सचदेश्यस्तपस्ते (१००) सप्तशतीभापाटीका। पेदेवीसूक्तं परंजपन् ॥ ६॥ तौतस्मिन्पुलिनेदेव्या कृत्वामू- तिमहीमयीम् ॥ अर्हणांचक्रतुस्तस्याःपुष्पधूपानितर्पणैः॥७॥ निराहारौयताहारीतन्मनस्कौसमाहितौ ॥ ददतुस्तौबलिंचैव निजगात्रामृगुक्षितम् ॥८॥ एवंसमाराधयतोस्त्रिभिर्वर्यतात्म नोः॥परितुष्टाजगद्धात्रीप्रत्यक्षप्राहचंडिका ॥ ९॥ देव्यु- वाच॥यत्प्रार्थ्यतेत्वयाभूपत्वयाचकुलनंदन।।मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वपरितुष्टाददामित्तत् ॥ १०॥ टीका-फिर वहां जाके देवीको प्रत्यक्ष करनेके वास्ते नदी के तटपर सु- स्थराजा और वैश्य देवीसूक्त जपता हुवा, तप कर्तेभये ॥ ६ ॥ फिर वे तिस तटके विषे भगवतीकी मृन्मयी मूर्चि बनाके पुष्प धूप होम तर्पण इन करिकै तिसकी पूजा कर्तेभये ॥ ७॥ फिर हविष्य भोजन करनेवाले और निवृत्त किया है विषयोंते मन जिनोंने और ताके विपेही ध्यान करनेको है मन जि- नोका और सावधान ऐसे जे सुरथराजा और वैश्य वे भगवतीके अर्थ अपने शरीरके मांसकी बलि देतेाये ॥ ८॥ इसप्रकार भगवतीके विपे मन लगाये तीन वर्षांकरिके भगवतीका सम्यक् प्रकार आराधन कर्ते जे सुरथराजा और समाधिनामा वैश्य तिनके तप करिकै प्रसन्न हुई जगतोंका धारण कर- नेवाली चंडिका प्रत्यक्ष होकर बोलतीभई ॥ ९ ॥ देवी बोलतीभई कि हे सुरथराजन और हे समाधि वैश्य जो तुम याचना कर्तेहो सो संपूर्ण वस्तु मे- रेते प्रातहो मैं प्रसन्नहुई सब वस्तु दूंगी ॥ १०॥ मार्कडेयउवाच ॥ ततोवनेनृपोराज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि ॥ अत्रैवचनिजराज्यहत्तशउबलंबलात् ॥ ११ ॥ सोपिवैश्यस्त तोज्ञानंवब्रेनिर्विण्णमानसः ॥ ममेत्यहमितिप्राज्ञ संगविच्युति- कारकम् ॥ १२॥ देव्युवाच ॥ स्वल्परहोभिपत्तेस्वंरा- ज्यंप्राप्स्यतेभवान् ॥ हत्वारिपूनस्त्वलितंतवतत्रभविष्यति॥ ॥ १३॥ मृतश्चभूय संप्राप्यजन्मदेवाद्विवस्वतः ॥ साव अध्याय १३ (१०१) णिको ममनुर्भवानभुविभविष्यति ॥ १४ ॥ वैश्यवर्यत्वया- यश्चवरोस्मत्तोभिवांच्छितः ॥ तंप्रयच्छामिसंसिद्धयैतवज्ञान भविष्यति॥ १५॥ टीका-तब मार्कण्डेय ऋषि बोले हे जैमिने ताके अनंतर सुरथराना अगले जन्मके विष भगवतीके सकाशते अचल राज्य मांगतोभयो और फिर इसी अपने नगरके विपे नष्ट हुवाहै शत्रुबल जाके विषे ऐसो अपनो राज्य मांगतो भयो ॥११॥ ताके अनंतर फिर वह बुद्धिमान् वैश्यनी संसारके दुःखों करिकै उमिचित्तहुवा यह धनादि मेरा है और इनका मैं स्वामी हूँ इसप्रकारके अध्यास करिकै उत्पन्न जो संग है ताको नष्ट करनेवालो ऐसो ज्ञान भगवतीके सकाशते मांगतोभयो ॥ १२॥ फिर देवी बोलनी गई कि हे सुरथ राजन थोडेसे दिनो करिके शत्रुको मार तुम अपने राज्यको प्राप्त होंगे फिर तहां तुलारा अचल राज्य होगा ॥ १३ ॥ और मरता ही फिर सूर्यके सकाशते सवर्णाके विपे जन्म लेकर पृथ्वीके विपे तू सावर्णिनामा मनु होगा ।। १४ ॥ और हे वैश्यवर्य तुमने जो मेरेसे वरदान मांगा तांहि परमरूपकी प्राधिके ।। अर्थ देतीहूं तेरेको ज्ञान होगा ॥ १५ ॥ मार्कडेयउवाच ॥ इतिदत्वातयोर्दैवीयथाभिलपितंवरम् ॥ बभूवांतहितासद्योभत्त्याताभ्यामभिष्टुता ॥ १६॥ एवंदेव्या . ११.. वरंलब्ध्वासुरथ क्षत्रियर्षभः॥ सूर्याजन्मसमासाद्यसावणिर्भवि तामनुः॥ १७॥ इतिश्रीमार्कंडेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरेदेवी माहात्म्ये सुरथवैश्ययोर्वरप्रदानंनामत्रयोदशोध्यायः ॥१३॥ टीका-तब मार्कडेयपि बोलतेभये कि हे जैमिने तिनोकरिके भक्तिते स्तुति किईहुई देवी इसप्रकार सुरथराजाको और समाधिवेश्यको जैसा वां- छितथा वैसा घर देकर उसी वसत अंतर्धान होतीमई ॥ १६ ॥ इसम- कार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ सुरथराजा भगवतीके सकाशते चरको प्राप्तहोकर ताके 21337 SN......
(१०२) सप्तशतीजापाटीका। अनंतर सूर्यके सकाशते सवर्णा में जन्मको प्राप्त होकर सावर्णिनामा मनु होगा ॥ १७॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेसावर्णिकेमन्वंतरदेवीमाहात्म्येभापाटीकायां त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ राठदेशांतर्गतलघुजवणायचाख्यग्रामनिवासिनाश्रीमत्पण्डितवदरीप्रसादा- मजेनपण्डितमनीरामशर्मणामुंबापुर्याम् खशरखगक्ष्मामितेवत्सरेसप्तशत्या भाषाटीकानिर्मिता॥ इदं पुस्तकं श्रीकृष्णदासात्मजखेमराजेन मुंबय्यां स्वकीये श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम् । शके १८१५ संवत् १९५० M पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना- -मुम्बई.