Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Tar Saptak

Agya · 2010/12

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तार सप्तक
सक्लनकर्ता और सम्पादक
'अज्ञेय

همه عمه م العامه والمسلسل ملكة الإغتسلط
مکالمه کلمه را مطا لما حلويخلط للد
لمسه راه اعل مع امامه لعله لهداية العالم |
المتمسكله لسه مهد لها والله ما طلط ملطما
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(۸۰)
باولاد
نوع الغلاء طال للغلط ملل
معتاد طی درمطلع اللطمه خبر مطاعطالما hطعام
• دما شد

तार सप्तक
गजानन माधव मुक्तिबोध
नेमिचन्द्र जैन
भारतभूपग अग्रवाल
प्रभाकर माचदे
गिरिजाकुमार माथुर
रामविलास शर्मा
अज्ञेय'
कलनकर्ता एव सम्पादक
'प्रज्ञेय'
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशान

मानपीठ लोकोदय ग्रयमाला ग्रयांक-२२६
Ea निमा
हमाचल जैन
.
पीराइट १९९०
मरासियाममारकका भारसे
मारय पान रापुरपित
Lokadayasries Tu 10.0
TAAR SAPTAI
(Pocus)
Ltdat mp led By
AJNLY 4
Bharatiya Jnanpith
Publication
Sca! Idit n1966
Tice Rs 8 00
271723
कारन
"नापानय
बन गरमा-10
रन नद
गगगनमी।
ཤ ས་ངན ན་

परिदृष्टि प्रतिदृष्टि
[ दूसरे सस्करणको भूमिका ]
-
'तार सप्तक' का प्रकाशन सन् १०४३ में हुआ था। दूसर
सस्करणका यह भूमिका सन् १९६३ में लिखा जा रहा है।
यास वपका एक पोती मानी जाती है। वयमा याताक
अनिवाय नियमक अधीन सप्तक' के सहयोगा जो १९१९
प्रयोगा थ, सन् १९६३ के सदम हो गय है। दिक्कार
जाबीको इसे नियति मानकर ग्रहण करना चाहिए, पर प्रयाग
शार कविक बुनियादी पैंतर हा कुछ पमा बात या कि अपन
को इस नय रूपम स्वीकार करना उसक लिए कठिन हो।
चूट सभा होत है लकिन धुढापा सिपर मा बठता है यह
इसपर निमर रहता ह कि उसका अपन जापनस, अपन बतात
भार वतमानस ( भार अपन भविष्यस मा क्यों नहीं ?) कैमा
सम्बन्ध रहता है। हमारा धारणा कि तार सप्तक न पिन
विविध नया प्रवृत्तियोंको सतिस किया था उनम एक यह
भा रहा कि कविका युग सम्य ध सदाक लिप बदर गया था।
इस पातका ठाक प्रम हा सय कवियोन सचत रुपम अनुभव
किया था, यह कहना मठ होगा यत्कि अधिक मम्भव यहा
ह कि एक स्पष्ट, सुचिन्तित विचारक रूपम यह बात किसी
मा कविक सामन न आया ह।। रकिन हाना अमन्दिग्ध ह
कि समा कति अपनका अपन समयस एक नय ढगस पाँध
रह य । 'उत्परस्यत तु मम काऽपि समानधमा वाला पतरा
न क्सिा कविक लिए सम्मव रहा था 7 विसाका स्त्रीकाय
था। समा सयम पहर समानावा मानव प्राणीथ आर
समानधर्मा' का भय उनके लिए 'कवि धर्मा स पहल मानव
धमा था। यह भद किया जा सकता है कि कुलक हि
भाधुनिक धर्मा हानका आग्रह पहले था और अपना मानव
तारमप्तक

ज्ञानपीठ लोकोदय प्रथमाला प्रथांक-२२६
सम्पादक रागनियामक
लक्ष्माषद जैन
.
कॉपीराइट १९६६
सकलिन कविया तथा मम्पारका भारसे
भारतीय पानपोट-रामुरक्षित
Lokodaya Seri , Tatl No 26
TAAR SAPTAL
Poms)
Ldit d & Compiled By
AJNEYA
Bharatiya Jnanpith
Publication
Second Editu21966
Pt ce Rs 8 00
भारतीय ज्ञानयोउ
प्रकारात
प्रधान कार्यालय
६,अनारपाक प्लम बलरचा-२०
प्रकाशन वार्यालय
दुर्गाकुण्ड माग हाराणसी-५
वित्रय केन्द्र
२६२ २१, नताना मुभाष माग, निमो
रितीय मस्करण १९६६
मूल्य ८.
ममति मरणान्य वाराणसा-५

परिदृष्टि प्रतिदृष्टि
[दूमरे सरवरएको भूमिका ]
तार सप्तक का प्रकाशन सन् १९२३ में हुआ था। दूसर
सस्करणकी यह भूमिका मन् ११३ में रिखा जा रहा है।
यास वषका एक पादा मानी जाता है । चयमब याताक
भनिवाय नियमक अधीन मतक' के सहयागा जा .९४५ क
प्रयोगा थ, सन् १९६३ के सदम हो गय है। दिक्कार
जावाको इस नियति मानकर ग्रहण करना चाहिए पर प्रयाग
शार कविक दुनियादी पैतरमें हो कुछ घमा बात था कि भएन
का इस नय सपम म्वाकार करना उस रिए कठिन हो।
जूर सभा होत है लक्नि थुनापा सिपर कैमा ररता है यह
इसपर निमर रहता ह कि उसका अपन नारनम अपन जतात
और पत्तमानस ( भार अपन भविष्यम मा क्यों नहीं ? ) कमा
सम्यक रहता है। हमारा धारणा ह कि तार सप्तक न सिन
विविध नया प्रवृत्तियोंको सातित क्यिा था उनमें एक यह
भा रहा कि कविका युग सम्म मदाक लिएर गया था ।
इस यातकासक यम हा सय कवियोंन सचत रुपम अनुभव
क्यिा था, यह कहना मूठ हागा यत्ति अधिक सम्भा यहा
ह कि एक स्पष्ट सुचिन्तित विचारक स्पमें यह बात क्सिा
मा विक सामान आया हा। किन इतना अमदिग्ध ह
कि समाकर अपनका भपन समयस पक भय गस बॉध
रह य । 'उत्पश्यत तु मम काऽपि समानधमा वाला पतरा
न किसाकविक लिए मम्मच रहा था न विसाका स्वाकाय
था। समा सयम पह समाननाचा मानय प्राणी थ और
समानधमा' का अथ उनके लिए कचि धमा म पहल मानव
धमा था। यह भद दिया जा सकता है कि कुक रिप
भाधुनिक धमा हानका आग्रह पहल था और भग्ना मानन
तारमप्राक

धमिताका वह अाधुनिकताम अरग नहा दस सकत थे, भार दृमरे कुछ म + पिनक लिए आधुनिस्ता मानव धमिताका एक आनुपगिक पहल अथरा परिणाम था। सप्तक क कवियोंश विकास अपना अपना अलग दिशाम हुआ है। सननशाल प्रतिभाका धम है कि वह यतिर ओढता है। सृष्टियाँ जितना मिन होता है व उसस कुछ कम विशिष्ट नहीं होत बल्कि उनके यति वा विशिश्ता हो उनका रचनाम प्रतिविम्बित हाना ह । यह बात उनपर मा रागू हाती ह निरा रचना प्रबल बचारिक आग्रह लिप रहता है जबतक कि वह रचना निरा बचारिक आग्रह नहीं है। कार वेवारिक आग्रहम अवश्य पसा एकरुपता हा सकता है कि उसमें यक्तित्वका पहचानना कठिन हो जाये। जैस शिरपाश्रया का यपर शति हावा हा सकता है बस हा मताग्रह पर भा राति हापा हो सकता है। सप्तक क कपियाक साथ मा नहा हुआ सम्पादरकी दृमि यह उनका अलग अलग सफरता ( या कि सस्थता) का प्रमाण है । म्यय करियोंका राय सस भित मा हो सकता ह-वे जाने । इन बास याम साना काक्योंका परस्पर अवस्थितिम गिप भ तर नहा आया है। तबका सम्मागा' अब उपराधियों में परिणत हा गया ह-ममा वाम व अत्र बुद्ध गय ह। पर इन सात नय ध्याना उद्वार परस्पर स व बॉम विशप भ पर मनसाया है। अब भा उनक पारमें उतना ही सच्चाइक साथ कहा ना सताकि उनम मतस्य हाह समा म पूण विषयोंगर उन राय अलग अलग ह-नापना विषय में ममान आर धम आर राजनातिक विषयम मा य वस्तु और लाक द आर नुस्म करिक दायिनों-प्र" विषयम उनका आपसमें मतभर है। आर यह बात भी उतना हो सथ है कि 'वसर परस्पर एक-दूसरपर, दूमरका रचियों पृतिया भार आशाओं विग्यायॉपर आर यनिक किफ दुमरक मित्रों भार कुत्तारमा हसत है। (सिग इमक कि इन पत्तियों का रिपत ममय ममाझा गॅतक पान ह कुत्ता किसा कविक तारसप्तक " पास नहा है और हमाका पहरेकी महजतामें कमी कुछ ध्यग्य या विद्रुपका भाव मी आ जाता होगा। )। पमा परिस्थितिम एसा बहुत कम है तो निरपवाद म्पस समा कवियोंक यारमें कहा ना मकना है। य मनक इता मित्र है कि सरको किया एक सूत्रम गूंथनका प्रयास “यथ हा होगा। कदाचित् एक वात-मात्रा भटका गुनाइश रयकर-सरक वारमें कहा ना माना है ममा चक्ति है कि तार सप्तक'न समकालान काय तिहासमें अपना म्यान ना रिया है। प्राय समान यह स्वाकार मा कर लिया है। अपन कायका या प्रगविका मूयाक्न नो भा जमा भी कर रहा हा, निसका वसमान प्रवृत्ति ना हा, सम न यह स्थिति गमग स्थाकार कर ली है कि उसे नगरक चौकम खम्भम या मारक पथरस, बाँधार नमूना बनाया जाय यह नया आर इसम गिना ग्रहपर करा क्मय कम पर कविका सुपर माव ण्मा है और कदाचित् दुसरॉक मनम मा भयत म्पम हो, कि अच्छा होता अगर मान पिया ना सका कि वह तार सप्तर म मप्रगत थाहा नहीं। इनिहाम अपन चरितों या करपुलका इसका स्वतन्त्रता नहा दता कि यह स्वय अपनका 'न दुआ' 7 । फिर मा मनका ण्या मार लक्ष्य करन लायक और नहा तो इमरिभाह कि परपता साहित्यपर एक म तय माना है हा-समूच माहियपर नहीं तो मम क्म 'मता'क अन्य कपियोंक' कृतियापर ( और उपम प्रभावित मर सावन पर ) ता अवश्य हा। असम्भव नहा कि मारित रवियोशी अब इस प्रकार एक रमरम मम होमर रोगोंक मामन उप स्थित होना कुछ अनय या समसामकारा रगता हो। सरिन ण्या ह भा तो उम असम सर यावजूद व एम मम्परको सह नको तैयार हो गय ४ इम मम्मादर अपना सामाग्य मानना है। अपना औरस वह यह मा कहना चाहता है कि स्वय उस इस मनिम काइ सकोच नहीं है। परयता कुठ प्रवृत्तियाँ उम हान अथवा आपतिननक मा जान पड़ता है, और निम्मरह इनमें म कुरुका म्य 'तार मप्त स नादा बा मक्या मान वारसक ७ है या जोड़ दिया जायगा तथापि सम्पादकका धारणा है कि नार मतान अपन प्रकाशनका आग्यि प्रमाणित कर लिया। उसका पुनमुद्रण क्वर एक एतिहासिक दस्तावना उपरम्य बनानक लिए नहीं बल्कि इसरि मी सगत: कि परवता काय प्रगतिका समानक लिए "सका पाना आवश्यक है। रन मात कवियोंका पत्रित हाना अगर कवर मयांग मा था मा वह एपा पतिहासिक सयोग हुआ रिमका प्रमाव परवता काय विकापमें दूर तक याप्त है। एसी समकालान अथवत्ताको पुष्टिक लिए प्रस्तुत सस्करणको क्वल पुनमुद्रण ता सामित न रखकर नया सवदित स्प दनका प्रयत्न किया गया है। तार मप्त' गतिहासिक रुपका रक्षा करत हुए नहाँ पालका सब मामग्रा--काय आर वाय-अधिक्र रूपस पा रहा है वहाँ प्रयक कविम उसका परवता प्रवृत्तियोंपर मा कुछ विचार प्राप्त क्यि गय हैं। सम्पादकका विश्वास है कि यह प्रयवान प्रत्यक कविके कृतित्वका समझनके लिए उपयोगा होगा और साथ हा तार सप्ताक पहले प्रकाशनस अबतकके काय विकासपर मा नया प्रकाश डालेगा। एक पीटाका अ तरार पार करनक लिए प्रत्यक कविका क्मस कम एक एक नयी रचना भाददा गया है। इमा नया सामग्राको प्राप्त करनके प्रयानमें मप्तक इतन वर्षा नक अनुपलभ्य रहा किनक दर वरनका दर या उनस सहयोग तुरत मिरा निनका अनुकूलताका भरोसा था उगेन हा मयम दर का-आलभ्य या उदासीनताक कारण भा असम नमक कारण मा आर गायद अनमिप्यत आक्रोशक कारण मा 'ना पाम रह व हा ता सत्रम दूर रह सम्पादकन यह हन्धमिना (कि वहयाइ। ) आग हाता पा पत्रकारिता (भार सम्मान ) धमा अंग ह ता सप्ता का पुनमुद्रण कमा न हा पाता यह हाँ अपन परिमका नाम है वहाँ अपना हानतर स्थितिका ग्वाकार माह। पुग्नक बहिरगक पारमें अधिक का कहना भारश्यक नहीं १। पर सम्करणमा भादशवागिता झलकता था उसका सारसप्तक

छाया कमम कम सम्पारकपर अत्र मा है, मिनु काय
प्रकाशन यावहारिक पहलूपर नया रिचार करनके रिप
अनुमरन समाको गाय क्यिा है । पहर मम्मरणम 'उपरधि'
के नामपर कवियोंको केवल पुस्तकका कुछ प्रनियाँ हा मिरी
याका ना कुछ उपरचि सुबह मौतिक नहीं थी । 'सम्भाष्य
आयको इमा प्रकारके दूसर मकानमें उगान'का विचार मा
उत्तम होत हुए मा पत्तमान परिस्थिनिमें अनावश्यक हो गया
है। स्प मजाके पारमें मा स्वीकार करना हागा कि नय
सम्बरणपर परयता 'मतकों का प्रभार पड़ा है। ना जनान
का अनुस्पतारे प्रति विद्रोह करन है, व प्राय पात है कि
उन्होंन मावामा अनुरुपता पहरम स्वीकार कर रा था।
विद्रोहमा ण्मा विनम्मना कर मरना रनिहासके उन बुनियादा
अधिकारोंम स ह जिसका वह वह निममस्त्रस उपयाग करना
ह। नय सस्करणम उपलधि कुता हागा एमा आगा का
जा सकता। उसका उपयाग कौन कम करगा यह यानना
धान न हार करियॉर विकल्पपर छाट दिया गया। व चाहें
तो उस तार सप्तका प्रमान मिगनमें या उमक समगमा
छाप धा डार नमें भा रगा सक्त है।
-'अनेय'
सारसम्म

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विवृति और पुरावृत्ति प्रथम सस्करणका भूमिका ] तार सप्तक में सात युवक कविया (अयवा कवि-युवका) को रचनाएँ है । ये रचनाए बस एक जगह सग्रहात हुई, इसका एक इतिहास ह । पविता या सग्रहह विषयमें कुछ कह्न से पहल उस इतिहास विषयमें जान रेना उपयागी हागा। दो वप हुए जब दिलाम अखिल भारतीय रेखर सम्मलन को आयाजना की गयी थी। उस समय कुछ उत्साही व घुआन विचार किया कि छाटे-छोट फुटकर सग्रह छापनेका बजाय एक सयुक्त सग्रह छापा जाय पयाकि छोट छोर संग्रहाका पले ता छपाई एक ममस्या हाती है फिर छपकर भी व सागरमें एक चूद-म खा जात ह । इन पक्तियाका रखक 'याजना विश्वासा व नामस पहर ही बदनाम था अत यह नयी याजना तत्कार उस पाम पहुंची और उसन अपन नाम ( 'बदनाम हाग ता क्या नाम न हागा । ) अनुमार उस स्वाकार पर लिया। थारम्भम याजनामा क्या रूपया, और किन किन पवियाका बात उस समय साचा गया थी यह अब प्ररागका बात नहा रही। किंतु यह सिद्धात रूपस मान लिया गया था कि याजनाका मूल आधार सहयाग हागा अयाउममें भाग एनवाला प्रत्यय कवि पुस्तववा साना होगा। पदा पर इतना धन उगाहा जायगा कि कागजका मूल्य चुकाया जा सरे छपाईन रिए क्सिी प्रेमया सह्याग मांगा जायगा जा विक्राका प्रतीमा पर या चुकाईम छपी हुई प्रतियां र र ! दूसरा मूल सिदात यह था कि सगृहात कवि सभा एस हाग जा कविता प्रयागका विषय मानत -जा यह दावा नहा करते कि कायका सत्य उहान पा लिया ह, का अवपा हा अपनवा मानत ह । इस नागारपर समहतो म्यानहारिक रूप दनका दायित्व मर सिरपर हाला गया। तार सप्नव वा पास्तविन इतिहास पहास आरम्भ हाता है किंतु तार सप्तक जव कह चुत्रा हू नि इसमा वनिया- सह्यागपर मना हुइ तर उसको कमाका शिकायत करना उचित नगे लागा। वह हम सागाका आपसकी बात ह-पाठक लिए सत्यागका इतना प्रमाण काफी है कि पुस्तक छपकर उमके सामन ह जना परिवतना बाट जिन सात कवियाको रचनाए दनवा निश्चय हुना उनस हस्त लिपिया प्राप्त करत करत साल भर बीत गया फिर पस्तक्के प्रसम लिय जानपर प्रसम गडबड हुई और मुद्रक महोदय कागज भी हजम कर गय । माय हा साधा पाण्-लिपि रलगानीम खा गयी और सकाचवश इमको सूचना भी क्सिाका नहीं दा जा सकी। कुछ महाना बाट जन कागउ खरीना साधा फिर जटनका आगा हुई तब फिर हस्त लिपियाका सग्र करनवे प्रयत्न आरम्भ हुए और छह महानाका गोर यूपक वाद पस्तक फिर प्रसम गया। जव छाकर वह पाठवक सामन आ रही ह । टमका विक्रास जा आमरनी होगी वह पुन टमा प्रकार किसा प्रकाशनम लगायी जायगा यही सहयाग याजनाना उद्देश्य था-वन प्रयागन चा वाय हा चाह और कुछ। पुस्तकका दाम भा रतना रमा गया है कि विश्राम लगभग उतनी ही आय हा जितना कि पूजा उमम गी है ताकि मर ग्रथका ज्यवस्था हो सके । यह ता हुमा प्रकाराना रतिगम । जब कुछ उसक अतरगत विपयम भा वह। तार सप्तक म गात कवि मगरात है । साता एक सरक परिचित ह-पिना इमर एस ढगका सत्याग र हाता? कितु इसस यह परिणाम न निकाला जाय कि व कविताक क्मिा एक स्कूल के कवि ह पारि साहित्य-जगत विमा गट जयवा दक मत्स्य या ममयर है। कि उन ता एकत्र नानका कारण ना यग हमिव क्सिा एक स्कूलम नहीह रिमा मजिपर परच हा ना भा राहा न-राही नहीं गहां अवपा । उनमें मतका नगर सभा महत्त्वपूर्ण विषयापर उनकी राम जग- जगन-जावना विपयमें समाज और धम और राजनातिक विध में पा-वस्नु और गाय और तुक्क रिस गयित्वाक--- प्रसर विषय उनका आपमत मनभट - । यगतर दि हमार जगतर एम मुदमाय और म्व-मिद्ध मोनित सयावा भा व ममान रूपम स्वावार १२ तासनक नहीं करत जम रास्ता आवश्यकता उद्यागाका समाजावरण यात्रिक युद्धका उपयागिता वनस्पति घाना बुग, अथवा वाननवाग और मुगलक गानाका उत्कृष्टता यादि । व सब परम्पर एक सरपर एक दूसरवा चिया-वृतिया और आगाजा विश्वासापर एक-दूसरवा जीवन परिपाटापर और यहानक दि एक-दूसरव मिला और वृत्तापर ना सते ह । तार सप्तक का यह सम्बरण बन्त बना नहाह बन आगा की जा मकना ह कि उमर पाटव सनी यूनाधिक मात्रा एकारिक कविम परिचित हाग, तब व तानेंग दि तार सप्तक विमा गुटका प्रकाशन नहा ह क्याकि सग्गत सात करिया मार-मात मग अलग ट ह उनक साले सात पक्तित्व-सारे सात या कि एक्का अपने पवि व्यक्तित्वक ऊपर सकरनकत्तावा भाषा छय-व्यक्तिव और रादना पनाह । ऐमा गत हुए मा व एक्न सगहात ह सका कारण पहर बताया जा चुका ह । कान्य प्रति एष अवपाका दष्टिकाण उन्हें समानताक सूत्र बांधता है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि प्रस्तुत मग्रता सव रचनाएं प्रयागगारताने नमून ह या रि इन कवियाकी रचनाए रतिम अछूता ह या वि क्वर यही कवि प्रयोग गार ह और बाकी सब घास छाग्नेवार, वमा दाश यहा कलापि नहा दावा कवर रतना ह कि ये माता यवपा ह । टार यहा सप्तन क्या एका हुआ "मुवा उत्तर यह ह विपरिचित और सन्गर-याजनान इस मम्भव बनाया। इस नात तीन चार और नाम मा सामन आये थ पर उनम वर प्रयागशारता नही था जिस क्सोग मान रिया गया था, यद्यपि सग्रसर उनरा भा नाम हानस समयी प्रतिष्ठा बता हा घरता नहीं। मगहात कवियाम-स एमा वाई भा नहा- जिसका कविता व उसके नाम सनारे खडा हा सक। गमा इस लिए तयार है कि अभी कमोराहा क्वादि सभा सभा उस परमतत्ववी गोधर्म हा रग हैं जिम पा रनपर क्मोगका जरत नहीं रहती, बलि जा वमोटारा हा मोटो हो जाता है । - मग्र वहिगा वारम भी कुछ कहना आवश्यक ह । “घर पविता प्राय चारा और वरवर हागिय दवर सुटर सजावटव साय छपती रही है । अगर वविताना गाना मीनावारा ना मान रिया जाय तब यह मगत मोह। तार मप्तवत्री कविता वमो जहाऊ बविता नहा ह वह पारसप्तक । यमी हो भी नहीं सकती। ज़माना या जब तरवार और तो मो जडाऊ हाती थी पर अब गहन भी धानुको साचाम ढारकर बनाय जात ह और हीर भा तप्त धातुका सिकुडनक दवावस बय हुए मणाम ! तार सप्तक में रूप सज्जाको गौण मानकर रिक्स अधिक सामग्री दना उद्याग क्यिा गया है । इस पाठक्के प्रति ही नहीं लपकक प्रति भा पत्तय समझा गया है क्यापि जो भाई भी जनताक सामन आता है वह जन्तत दावदार ह और जव दावार ह ता अपने पक्ष लिए उस पयाप्त सामग्रा लवर थाना चाहिए। योजना था कि प्रत्यक कवि साधारण छापका एक शाम द (अयवा ) लेगा इम व आकारमें जितनी सामग्ना प्रत्यक्का है वह एक पामसे कम नही ह । टन वाताको ध्यानम रसत हुए मानना पगा कि तार सप्तकम उतन हा दामाका तान पुस्तकोंका सामना सस्त और सुलभ रूपम दी जा रही है। और यदि पाठक साच पिएमा प्रचार प्रकाचित ह सम्पाटको चित नहो ता उसका उत्तर स्पष्ट ह कि दम सहाद्यागी याजनामें तार सप्तको रया हा उमा प्रकार और सम्पादक भा और अपन-अपन जीवनाकार भा और प्ररवता भी। और ( यह धृष्टता नही ह कवर अपन रमवा फ” भागनमा तत्परता है 1 ) व सभा इस लिए भी तयार ह कि तार सप्तकर पाटर व हा रह जायें । क्याकि जा प्रयाग करता है उम अवपित विषयमा मार नहीं हारा चाहिए । पवियाना अनक्रम सिमा हद तर आवस्मिन है जग वह इति ह यही उमरा उद्देश्य यहा रटा ह नि कुल सामनाका गारिक प्रभावा साव ढगम उपस्थित किया जाय । सारनपत्ता मतम आता ह क्याधि यह सरनार्ता ह । अनुश्म मात्रम पवियाक पर-गौग्या बारम काइ परिणाम निशाना या उस विषयम सकरनकत्तामा गम्मतिका खाज एगाना मूखना होगा। - अनेय' तारसप्तक तार सप्तक १ गजानन मुक्तिबाध जीवन-सध्य स्तव्य आमा के मित्र मर दर तारा बोल ऑग्में अशक्त ४५ ४८ मेर मतर ५४ ५६ मृत्युभोर कवि नूतन मह 1 ૬૨ विहार पूजापाठा समान प्रति नाश देवता मृजन क्षण अतनशन भाग्म सवाद प्यमित्व और सदर म उनका दीदाता ६७ है। ७० ७३ ६ महान् । ७५ ७७ पुनश्च एकभाश्म या य २ नेमिचद्र जैन जावन-तथ्य यमप्य कवि गाता है ३ १ बार मतक १५ १२ १८ बता सया भनजान चुपचाप इस क्षण में धूल भरा दापही आग गहन अंधेरा क्या भाया। २२ जिटगा की राह यथा उमुन पुन आन फिर सब तुमस सामना हुभा ८५ ३ भारतभूपण अग्रवाल पीवन-तथ्य वाय अपन विस जावन धारा सामाएँ आत्म-स्वीकृति ९२ मसूराक प्रति ९९ १०२ १०५ १.५ महिंसा गप्रमान प्रग्यावत्तन मिरन यिन वा चरत चलत प्रत्यूष-वरा गत रहा। पथहान पुन मानवागेम एक मवाल म भार मरा रिट १.८ १०१ तरसप्तक १२३ १२४ १२७ १२८ १२९ १३० १३४ १४० १४२ १४६ १०८ ४ गिरिजाकुमार माथुर जीवन तथ्य वाम्य भाज है कसर रग रंग वन रककर जाती हुई गत चूड़ीका टुक्डा- रडियमका छाया- कुतुब सँडहर- पानी भर हुए बादल क्वॉर का दोपहरी भीगा दिन एसोसिएशन विजय दशमा अधूरा गात घुद्ध पुन नया कवि दह का दूरियों घरकुर दो पाटा को दुनिया असिद्ध का यथा 'पृथ्वा कल्प' गातिका छाया मत छूना निवासन ५ प्रभाकर माचवे जावन-तथ्य घमग्य वम तागम मध-मस्तार सॉनट १६. १६. १७५ १८१ १८. १८८ ११२ तारसप्तक १९३ १९३ १९४ ११५ ११८ २० यहाँ मुक्ति की प्रबल चार चार पत्तियों चार और पत्तियों राहा स प्रेम : एक परिभाषा गहूँ का सोच वृष्टि रखा चित्र दशोद्वारकों स वह एक निम्न मध्य वग द्रा द्रास्त युते सोविरस्का सोयूज । कविता क्या है? छलना बादल बरसे मूसलधार काशक घाटपर अवस्थ मैं भार वाली चा को प्याठा २०१ २२ २०४ २०७ २०८ २" २१२ वीसवी सदा २१४ कापारिक २२१ २२२ २२५ पारत माता का मृत्यु पर दरू सस्कृति ६ रामविलास गर्मा जावन-राध्य वक्तव्य कायक्षत्र कवि चाँदना प्ररपूर पूर्व २२९ २३० २३२ तारसप्तक २८ २३९ २१० २४३ क्तकी शारदीया सिलहार दिवा स्वप्न दाराशिकोह गुरुदेव का पुण्यभूमि जरलादकी मौत सत्य शिव सुदरम हहियोंका ताप किमान-कवि और उसका पुत्र २४७ २५२ २६० ममुहक किनारे २६२ २६४ २६५ २६७ २६९ २०३ विश्व शान्ति कलियुग परिणति तूफानके समय पुनश्च करदय ७ 'अनेय' जावन-तथ्य धवतव्य जनाद्वान सावन मघ उप कार का माय गान्ति निशिर की राका निशा रात होत नात होते जेम तुझे स्वाकार हो नयतु इकटक चिरन्तन । चार का गनर वग मावना-मटीक मादों का उमस चहरा उदास २८० २८२ २८६ २८८ २६३ २९८ द्वार सप्तक १९ यहाँ मुनि को प्रबर चार चार पहिया चार और पनियों १९३ ११४ ११८ २. २०१ प्रेम एक परिभाषा गहूँ का साच वृष्टि रसा चित्र दशोद्वारकों स वह पक निम्न मध्य वग दा ज्दास्त युते साविरस्का सोयूज । कविता क्या है? उलना मूसलधार काशी के घाटपर अग्याय मैं और खाली चा का प्याली २०१ २६ २०७ २०७ बादल बरसे २८ २०५ २११ यामवीं सा २१२ २१४ २२१ २२२ कापारिक पुनश्च पारद माता की मृत्यु पर दरू सरपति ६ रामविलास गर्मा जीवन-तथ्य वनग्य कायक्षेत्र कवि २२९ पांना प्ररपूष क पूर्व वार सप्तक २३९ ३१० २११ २४३ कनकी गारगया मिटहार दिवा-म्वप्न राशिकोह गुग्गव का पुण्यभूमि अस्माकी मौत मय शिव मुन्दरम हड़ियाँका ताप किमान-कवि और टमका पुत्र ૨૪ २५० २५२ ममुद्रक किनार ०१५ विश्व-गान्ति कलियुग परिणति तूपानकममय पुनश्च करल पकण्य ७ 'अनेय' २५० ०६९ पवन-तप्य वक्तव्य २८२ २८2 २८६ ૨૮૮ बनावान मावन मय उपकारका मन्य जाति निशिर का राका-निशा रात होत मान होत नम तुझ स्वीकार हा यह करक चिरन्तन । चार का गजर वग मादना-पगक मादों का उमस चहा उदाम २८३ २११ २९८ पार मप्पक

३०१
चरण पर धर चरण
मुक्ति
आज मैं पहचानता हूँ
बाहु मर रक रह
किपन दसा चॉद
बदलाक बाद
पुनश्च
उपादान
में वहाँहूँ
सवर उठाता
२.
ताराप्त

नैमिचन्द्र

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[ नमिचन्द्र जम आगरमें अगस्त १९१८ म हुआ वहा निभा पाया और मन १९८१ म एम० ए० पास रिया। उमद वान एक वप तब गुजालपुरम तिपक्का काम किया अब करक्त्तम ह । १९४२ म क्रयत्ता एक मारवाटा दफ्तरमें गिना आगका राम जाने। विवाहित । रिवना सातवा क्यास प्रारम्भ किया। कहानियों और गटाकाय भी लिखा पर मुख्यतया कविता हा रिवा पिछर ना चार मारम आगव नामा निवध भा। रिवना मूड पर आत्रित ह बत बहुत अधिक नही रिवा ह। पत्र-पत्रिकाआमें रचनाए छपना रहा ह पुस्ताकार अभी नहीं। परनम विशप टिचस्पा ह। राजनातिमें भा-क्रियात्मा म्पस । मावमवाटा और कम्युनिम्ट भा । मगाम मा चि है। वदूक्म निगाना रगान और घोडपर मवारा बग्नमें बडा आनद आता ह पर बरसतिया सिराना इम पयाप्त साधन नहीं पाता अन भ्रमगन रिए उत्सुवना बना रहता है। जब भा वक़्त मिर और मापन हा ता घूमना पसन्द करता है। इस अवधिम जीवनम वा उथल-पुथर रहा। सन १९४८-४७ बम्वदम पाप स थियेटर एमागिए गन (इपा) का नृत्य- मगर साथ और १९४७-५४ तर इशहागनम तरह-तरह पाप घर। (प्रनार का सहायर मम्पा कत्ल इमामग एक तरह है।) मुन १९५४ स हिराम सगात नारर अवारमाम सम्बद्ध ह १०५० म अवामार अपान राष्ट्रीय नाटप विद्यालय, नाटय-मागिय पात ह । सिवना अभा तर वमा ग नियमित ह । वामार अनुवाट पायर अनिग्विन म बाच थाना-बग्न पविता और बल्ल-बुछ आगचना रिचा हो जाता रही। अभी तर पुनाकार मौयि कुरा ना यद्यपि अब कुछ रिनाग इमवा आपका बहुत घर गया है। ममिचद्र ३

रचि भा बदरी ह। सगीत नत्य और नाटक्का गौक हावी रहा
और ह। राजनाति छर हा नहीं गयो उम क्षत्रक सवयापा हान सिद्धात
और जाहानताय वारण उसम रचि हा गयो। अब न माक्मवाना
है न कभ्य निम्ट क्यादि नायद वयस्क हा गय ह और हर प्रकारका
वादितार दमघार प्रभावका पहचानन लग है।]
१
तार सप्तक

वक्तव्य कुछ कविताए पाठक सामन प्रस्तुत है । उनव नय म्प और स्वरवा कामक मूयाक्न पाठक स्वय करगा। टेमरिए उनक वारम कुट भा कहना यहा मय इष्ट नहीं । चिन्नु ताबनम मघषक टम युगम अनक वाहरा दवाववि कारण जब यति टुक्रनुक्ड हाकर वट जाता है जब बुद्धि और हृदय आग और यवहार विवा और कम क्मिा परम्पर मामजम्य नहा वचता तब चार-छह कवितााव महार कविक व्यक्तित्वका मा उपलधि असम्भव नहा ता कग्नि अवश्य हाना ह । और मरा विग्वाम ह कि क्राका पतिम मारनार कगारक यक्तिवर महार ही रिया जा मकना ह मुरिए पवित्र भावना जगतका अनकानक विविधताआमे म एक्मूत्रता यति सम्भव हा ता पारक रिए सुग्भ कर मकना हा इस वक्त यवा माथवना ना सकता ह । प्रस्नुन कविताआम-म अधिकारीका मानमित्र पठभूमिमें मुनातिक रगा का हा प्रधानता है। मुस्वार और विवकमा गमका चनना हा इन कवितामारा विषय हा मनवा वाहरो जगतका अना वातास सताप नहा है उमक मम्कार पग-पगपर विमा दावारस टकरा जान ह। किन्तु जब इंग टकराहम वचनका माग वह खाजन चरना ह ता वपन आपका और भा अबरा बना रता ह । तात्र श्रम विभाजनक फरम्वाप आज हर-एक आत्माना जिन्गा एक झाद बन गया ह जिस माधारणत ऊपरम दरखनपर भ्रम हाता हरि वह नपन आपमें मम्पण ह जबकि मय यहा ह कि उमा विभाजनर परम्वम्प परम्पर मह्यागिता और निभरता अमाधारण रूपम बन गया ह । विन्नु विवर वाह जितना प्य मया सामन रख बाजा पयिका मन प्रया समस्याका मामन पाकर जस किमावा गा में मुह दुवकारना चाहता है अपन भातर हा या मम्य हा रहना चाहता ह । प्रस्तुत पवितानवि पाट विवा गरा इस यात्मम्याना चाहता परसून या प्रवत्ति हो कपिकाह। अपन सम्पारा और भावनाआ जाता यह ममम्याआना मुग्याना सहा मागपर-अयान एक मामूहिक प्रयन बारा उनका समायान पानर मागपरानमें अपनी मममयताको नमियद १ बार-बार अपन विवाद भरा चौर-चार दाना चाहता ह। उसक मनसरा मारा मधप इगा पिपर कग्नि हा उग है। एमा जनिरिक्त कुछ कवितामा जम जनजान चुपचाप या दूबना गघ्या म क्वर मौन्यानभूतिको टा अभि परित ह । व उन क्षणारा मनिह जब मन मनपस मागा नहा है। पर ता भा सघपक अतिरिक्त जोरनम भय और जानन्याया भी जा कुछ ह उसमें कविका मन अभि मूतहा उठा है। मग विग्वाम है कि मौन्यका आपण परायन का हा प्रबत्तिका मूवर मवा नी नगना । मानियिक जागचनाम आज-कर यह गर जना प्रबारव वार्गचाका विषय बन गया है। किन्तु मोदयकी जनु भनि ता जानततामा जावनका स्वीकृतिरा एक अत्यत महत्त्वपण चिह्न ह । जिम यक्तिम मौल्यवार अत्यत क्षाण ह उस किस हदतक जावित पहा नायगा यह करना कग्नि । । मौन्या जनति ता यस्तित्वा और ना ममिटिर और मवनगार बना दता है। परायनगर साहित्य वाहागा निमम मानि यार एप प्रसारक मौन्याभामा कल्पना जाम अपन दायिवम भागता है जा मौदया प्रति सचमच जाकृष्ट नाह वि जामोपवा जपना दाविहानताना मजा वनाना चारताह। यहा कारण - मिरवानाय जप पक्ति गचमचम मौन्यपूजा हानर पारण आजब पिता प्रगतिगाराम जति ईमानदार जोर जावनथ। मारियम प्रनिगाग्वाम मग विश्वास और उगा गिा एव गचष्ट प्रनका मा म पपाता हूँ । किनु कयरा म चा प्रगति गाना बगार पत्तिवरा गामाजिरनाम ह व्यक्तिनाननाम नहीं । आज पार जारम प्रानका पार करना आवश्यकता टमाम भागया है कि हावितवमानमार | चरा । जनाना मामाजिर राजनतिर वापान जान जनजान बरकार दम वात्रमा गितार हाता । रमणि वर अन दिन का विशिष्टताका मामा जिस्ता गा चुना है। वन गमाहिर बम्पार मायारा भ्रमम वर मक्त नग हा पाता। पिन्त माणि या बात गर है frकविम प्रगनिगार हानका का साह विव' जावना जार जन सारा घटा। जपन हा मामात्र और मान । यति सान सभा मामा सिमराय। तार सप्तक यद वान टहरानेका आवग्याता नागना चाहिए कि विपर भी अय पक्रियाका भाति एक नागरिक और मामाजिक दायित्व है। वह मवना दी राह और कवि मवना हा एक मन्दपूण मामाजिक कनन्य पूग करता आया है। पर आज या महलपण मर विक मनम श्रम विभाजन वाण निगया ह। और वह अधिकम जधिक आमद्रा और जहाग बनता जा रगह। वास्तविकता चाम वह ना बच पाना ह ता वर और भा पन आपम मिकुन रहना चाहता ह । परम्बम्प उमका अपना आन्तरिक और मा पट जाता है मका जनुग्चननामें दरार पट जाती ह जिमा यात्रा उमर कवितापर पन्ना नाह। मारिए बाजव रिटीक पिता कायम पाना उच्छवाम हया पिर परन । दूमर गाम या ता व्यक्तिका उपनम अवाग नग या वर वद्धिक जार में स्नना उग्या ह कि भीतर मनमा रमनका ममता नहीं । नाना ना राम्नास पविनाता हत्या हाती ह। समस्या टमाम यहा ह मि विना मचष्ट नागग्वि वास्तवती दुए कवि लयिक कार तक कवि नहा रह माता। राजननिक सामाजिव गक्तियां वह चाहे या न चाहे मे जाकर बग 7 जागी। किन्तु यनि वह विवकपूर पाम्नवरा मामना करना ह ता पर अपने काका न स्वर मचा बना मरगा यत्रि म मानवताको मस्तिर गिा एक बग भारा अस्त्र बना सक्गा कानि स्वभावमा कय मानव मक्तिमा आग माम जाज निग कवि काद वगवार नहा । गम स्थापनारी मचाई एक और वरम मा परया जा सकता है। ज्या या श्रम-विभाजनर फरम्बम्प पवित्र मनरा निधा और विषमना यन्ती गया ह त्या-त्या कविता विरोपवर कविता अपना महत्त्व पाता चगह। और याज परिस्थिति यह ह नियन्त- मग कविताचे भविष्यक गाग्में बग्न मन्धि ह । विन्नु म मन्त्री जल ही कविरे व्यक्तित्व मामाजिर अपरान ममय पानमे जमनाह। यदि स्तिवमें धारपार पन्ना जानाग इन रागरा सामाजिक वि मामन रह ना कविता 4 भत्रिका र दूमग हा चित्र उपरहागा । जिम दिन व्यरित कवि मनष्ट भावम 7 युगा पुगन ममारगत आन्तरिय गियया मुग्यार अपना चनाारा पूपर गामाजिक वना मवगा उन दिन कविता पिर अपन प्रत म्पम गिर -ठमा। वरियत रिना या फिर उमा दिन मचा पविता गम्मरमा। नमिव + + का मागिय कविता वारम इन मव रवी चोरी बानाका आप दन प्रनत कविताआम गाजें या तापय मरा नही ह । मक्कात्तिचाय रपिसा परिना या वहत - | अपना माग पहचानन गिए और फिर उमी पर वन रहन गिा मध्यमवर्गीय प्राणा कविका निरतर बद्धिका ही मह तारना पटता है। गायन मारिए म यगम गठ कविता अभी हिटीने निशा मम्भव नहीं है । अधिक्मे अधिक जगर कवि अपन मनकी बईमानीको भी मानारीमे देवर नुनियाने आग रग सबै तो वह बहुत ह । क्याषि म तरन्मे न देवर वह अपन “यक्तित्वके विरोधरो मिटानके मधपका आरम मचष्ट रटता है माय हा वह आनवाग पीलियाके लिए एक नया पगडा तयार करता चरता है जिसे यूट-पीटकर दिगो दिन गायत माम्न राजमाग निर्मित हो म । मिचन्द्र ---

कवि गाता है
कवि गाता है-
सक्राति काल का कलाकार कवि-गाता है।
देख चांदनी रातें कवि का नाच उठा उर,
स्वप्नदेश को परियो के गायन से उमका गूज उठा म्वर,
आधी मुंदी हुई पलका में
मदिरा सा किस छवि का मीठा भार लिये,
वह बेसुध-मा है,
उसके नयनो म झूल रही किस स्प-पगे की सघन याद,
उसके मन में कितनी पीडा, उसके मन में कितना विपाद ।
और तभी वह गा उठता है
गोले गाने,
असफलता के, प्यार प्रीति के, अपो
दुख
के-
कुछ बेमाने, कुछ अनजाने ।
फूट उठा है उसका उर,
वह गाता है
सक्रान्ति काल का
पीडित मानवता के युग वा पलाकार रवि
.
गाता है।
कभी यहां आते हैं कोई बडे राज्य के राजा साहा,
क्तिने दानी।
फभी प्रात वे आते हैं सरखारो अफगर,
या कोई जनता के 'लीडर'
जो होते हैं सभी पला-कविता के प्रेमो-
मिषद्र
२
९

--
कितने ज्ञानी।
उन सबके स्वागत में
जब-तब किसी सेठ के घर होती ही रहती है
दावत मेहमानी।
कवि भी आमत्रित होता है,
वह भी आये,
राजा साहब अफसर, या जनता के 'लीडर'--
(या वह जो हा ।)-
के स्वागत म गीत बना कर लाये गाये,
और काव्य के चमत्कार से महमानो का दिल बहलाये ।
आम त्रण को गुस्ता से हो
सहज गव से फूल फूल उठती है तब उस कवि की छाती
-गद्गद हा कर गा उठता है कवि
तब राजा और सेठ की स्तुति के गायन ।
गाता है वह कलाकार
जर वाहर दुनिया में फैली घनघोर विषमता,
निशि निशि से उठ रहा भयानक चीत्कार
उसको तो है बस अपने सपना से ममता-
वह कलाकार।
क्या परवा उमका एक ओर भूखे मरते लासो प्राणी,
वह दिय दृष्टि से देख रहा उसकी तो युग युग की वाणी,
उमवे स्वर म है वाल रही देवी सरस्वती कल्याणी ।
कवि द्रष्टा है
जोवन के पोछ डिप हुए अनात तत्त्व का।
मानवता अमर चिरतन नियमा का
ववि मण है।
वह क्रा गाये
एम वतमान के अति कुमित वामम अधेरै के
तारसप्तक

जडता के,
काले-काले क्रुद्ध गीत,
जब देख रहे उस वे अधमूंदे नयन,
क्षितिजके पार दूर गरिमा के गौरव से मण्डित स्वणिम अतीत
वह गाता है-
पोडशवर्षीया सुकुमारी,
बडे-बडे महलो मे रहनेवाली सुदर राजकुमारी को प्रशस्ति म
( राजमहल वे,
जिनकी गहरी नीवा पर बलिदान हो गये
भूखे, नर क्काल अस्थि-पजर से वे लाखा मजूर,
जिनके गरम रक्त से सिंचित
राजमहल या छाती ताने आज खडे है।)
रूप और वैभव की मदिरा म विभोर
कवि गाता है
अतृप्त यौवन के, लिप्सा के
गीले गीले गलित गीत
मृत्युशीत ।
कवि गाता है,
वह कलाकार है।
व्याकुल मानवता की सस्कृति को रक्षा का
उसके ऊपर आज भार है
भूत भविष्यत्-वतमान को देख रहा वह आर पार है ।
वह ईश्वर है,
वह ज्ञाता है,
दानवता से रादे जाते मनुष्यत्व का प्रतिनिधि है
वह कलाकार जो गाता है,
जो केवल गाता है-
ममिचद्र
"

डूबतो सध्या टूबतो निस्तब्ध सध्या, ग्रीष्म की तपती दुपहरी प्रबल झझावात के पश्चात्, सुनसान शात उनास स या। विरल सरि का चिर अनावृत गात जो किसी की आख क अभिराम जादू के परस स हो उठा है लाल एसा गात विस अनागत की प्रतीक्षा म खुला है ? दो किनार व्ययित व्याकुल- बाहु-वधन म विमोको बाधने का नित्य आकुल, व्यथ ही तो है युगा स इस अनावृत मुग्ध योवन का उपक्षित दह का आह्वान छवि का गान । वक्ष पर पो सुनली अल्म मन अभिराम, सिक्ता , तन बिछाय चिर-ममर्पित जो छिपाय युगा स चुपचाप-रिक्ता। अम्न हात अरण रवि वा स्नह-वभव इम चरम अवमान पर म तारसप्तक

बिखेरा चाहता है
विश्व पर अपनी प्रभा का दान
इसोसे प्रत्येक पल,
मानो किसी अतिरेक का हो घनीभूत स्वस्प,
पलक म बुझ जायगा ऐस प्रकम्पित दीप के
स्नेहिल हृदय का रूप ।
थकी किरणा का जगत् को प्रीति का उपहार---
मन की कालिमा काप्यारसे धो डालने का चिरन्तन व्यापार,
जो कि पल भर मे अभी हा जायगा नि शप,
हो उठा है
इसोसे अपनी क्षणिकता मे मधुर छविमान ।
दूर जीवन के थपेडा से परे
सूने गगन म आख फाडे
कल्पना प्रिय युवक-कवि-सी सहज निष्प्रभ
खडी हैं वैभव विहीन पहाडिया।
इस विभा के मधुर पल मे भी नही है
पत्यरा के
इन पहाडी पत्यरा के हृदय मे कुछ स्नेह कम्पन
प्राण का संचार
व खडे हैं अचल चिर अविकार ।
वह विचित्र कुरूपता उनको
विभा के पाश्व म
है हो उठी कुछ और भी असमान ।
ग्यूब तन कर या अक्ल खडे रहने का
अमगत दप,
उच्चता का गव,
अपनी पूर्णता का वह निर र भान,
माछा अविचन अभिमान,
ममिचन्द्र

लगता है निरथक।
इस उँचाई का नहीं है
भूमि के रसमय प्रणय म योग,
इस लिए
हलको प्रलम्बित मौन छायाए गिराता
छिप गया सूरज कही पर दूर,
और थक कर चूर
दिन सान लगा है साय की गहरी उदासी म ।
सारसप्तक

अनजाने चुपचाप
अनजाने चुपचाप यधपुरे वातायन मे
आती हुई जुन्हाई सा ही
तेरी उवि का मुधि-सम्मान
आज पिस्तर पर सिमट चला है मेरे मन म ।
टरक उठा है उर का सागर
किमी एक अनात ज्वार से,
पिन सपनो के मदिर भार से,
किन किरनो के परस-प्यार से,
पल भर म यों यान यचानक ।
यह क्सि म्प-परी विरहिन के उर की पीडा
मेरे जी म भी चुपके मे निर यायो है
यो अनजाने ।
गेंज उठा है अतर-जीवन
क्सि फेनिर अम्णाम राग से,
किन फ़्ग के मधु पराग मे
पुलक्ति हा साया है,
आकुल मधु-ममोर ।
जी के इस कानन में भी परी है सरमा,
इम वन या भी कोना-काना
है भर उठा अक्य हक्न से ,
प्राणा के वन-वन मे
मरता मोरमिरी के फूल-मा
अमरान म्नेह ।
ममिपत्र

तुम हो मुझमे दूर कही पर
यौवन के प्रभात म विवमित,
डाली पर झुक युक
वल खाती,
सहज मरल निज क्रोडा मे रत
कुन्दक्लो-सो।
यह मधुमास सजीला चुप चुप
तरे उर के आगन को
गोला कर-वर जाता होगा री,
परिमल के मिठास से भाराकुल,
यह वासन्ती बयार
उलझ उलझ कर खोल-खोल देता होगा
तेरा कच-सम्भार सुरभिमय ।
कुछ अनमनी उदासी से तुम
.
महज भाव से,
अपने विषच लाचनो के ऊपर से-
वोचन जिनम प्रतिपल म
हम उरक आतो है बरबस
उनी हुइ करणाद्र मधुरिमा,
जिनम हा वर सुमुखि
तुम्हारे महज स्नेह का मब गोलापन
विमर विम्बर आता है-
सिम रजनीगाथा ये मर म सा ल्यालय
भरे हुए उन चचल नना वे पर म
हा-हा दता हासी वाहठील ।
यह चांगनी निहार अचानक
उन जनार की अविश्च करिया-म हाग से,
तमो तुम्हार मन का मर अनजाना उमन प्यार लजीला
तारसप्तक

हागा राना,
स्वर धाराम।
पवन गुजरण से भी कोमल, अति कोमर वह,
-
निविड गूय म
तेरी वाणी का स्वर
भरभर
गूज
उठता हागा,
अग जग में!
गज
म एकाकी,
मेर आगे टेटा मेढा विखरा पा है
अनत पथ अब भी बाकी ।
बिना तुम्हार,
इस वमत रजनी को दूध भरी छाया म
चरा जा रहा हू में पग-पग
पिना विचारे, पिना सहारे ।
देवल रानी,
यह मदिरा-सी तरल जुहाइ,
-किसी रूपसी सुरवाला के तन को आमा-सो यह छायो-
भर जाती है मेरे मन म तेरी छवि का सुधि सम्मोहन,
और प्यार से पिघल पिघल कर
मेरा दुख हो आता पानी।
मिबद्र
३

इस क्षण म
आज उचना मा हृदय
माइरन ज जाय उमके वाद
निजन गूप मडमा सा निभत निम्सग साली
व्ययता को म्याह-सो बेमाप चादर से
अभी ज्या ढर गया हो गूय जी का प्रात ।
हो गया है आज इस क्षण म
न जाने किस लिए उत्साह निर्वासित
भयानक गीत के, हिम वे अचानक
गये हैं द्वार
कब-बब के स्वे,
जी पड गया फोका विरस निस्सार
मर कुछ-मरण, जीवन अव हुत्वम्पन !
अमम्बद्ध अन तागे से
हत्य स निकल कर
हात चल है नि प्रयाजन ही किसी मुनसान-मे म लोन
और बद्रविहीन-मा मन
चक्ति है
कुछ था-मा भा है
न पा कर दम विरमता का कहा भी याह,
इम अरमित अनमा कार का
अब दोन मा है ?
आपिर कौन-मा है चार ?
एक बम तुम हो
उगमो का अमा म किरण रवा-मो
तारमप्तर

वही से
दूर हो से घाउ दती हो विभा के रंग,
ग्लानि की इस घटाटोप अमेद बदली म
तुम्हारी याद हो
बस काप उठनी है चमक-मी।
हलिया को मेद कर परंपी जा उत्पन कर द,
उम भयानक शीत वेला म
तुम्हारी याद, प्रिय,
पत्तियो पर बस गयी हिम की सतह-सी
मरल पावन और चिर अविकार,
जिम अवल्पित दियता को मुरभि से,
सौन्दय से,
मन का सभी व्यापार ही थम जाय,
पर भी हो जायें स्थिर निम्पन्द,-
उस परम आनन्द सी,
निगलप सौदय व मागे उमहतो विवशता सी
पूर्ण, व्यापक, मधुर
इम तुम्हार मुधि-परसस
सर ग्लानि, पडवाहट हृदय को दूर
बुर रहे हा वन्द वातायन विजय प्राण व इम कप के।
आज हो प्रिय,
इस लिए हो आज पहली बार हो,
में पा गया है तुम्ह पूग्म्पुर
चौह पाया हूँ
मि इतनी दूर से,
इस अगम व्यवधान मा भो चार कर
ममियन

आकुल तुम्हारे स्नेह के आलाक का सस्पश
मेरे अनमने सतप्त प्राणा को
सदा भरता रहेगा
चेत की पूना,
शरद को चाटनी क गीत क बेहाश स्वर आराह से
रात रानी के नश स,
सुरभि से ।
१.
तारसप्तक

धूल भरी दोपहरी
धूल भरी दोपहरी
जगती के कण कण मे मूजी आमुल सी स्वर लहरी
सरल पल आत-जाते
करुण सिक्ता भर लाते
एक मूच्छना सो प्राणा पर वेमाने वरसाते
अलसता होती गहरी
मधुर अनमनो उदासी
एक धूमिल रेखा सो-
छायो है, बहता जाता है पवन अरव स यासी
कौन दश को ठहरी?
आयर या चल दिय रहा ओ जग व चचल प्रहरी ।
ममिव
२॥

जागे
गहन
अँधेरा है
आग गहन अधेरा है मन एक एक जाता है एकाकी,
अर भी है टूटे प्राणा म किम छवि का आक्पण वाको?
चाह रहा है अप भी यह पापी निल पीछ का मुड जाना,
एक बार फिर से दो ननाव नीलम नभ म उड जाना
उभर उभर आत ह मन म वे पिछल स्वर सम्माहन के
गज गय थ पल भर का बस प्रथम प्रहर म जो जोवन के,
मितु जरा है यह म ह मुझ को ता है आग पाना-
जाना हो है-पहन लिया है मैंने मुसाफिरी का वाना।
आज माग म मर अटक न जाओ या आ मुधि को छलना
है निस्सीम डगर मगे मुझका तो मदा जाल चलना
इम दुर्भद्य अधर क उम पार मिलगा मन का जालम
रक न जाय मुधि क बापा स प्राणा को यमुना का संगम
सा न जाय द्रुत स द्रततर बहत रहने को साथ निरन्तर
मर उसर बाच कती रुकन स बट न जाय यह अतर ।
-
U
तारमप्तक

क्या भाया?
क्या भाया?
अनजाने मन क्या इस कालाहल म विच कर यह आया ?
वे वन को स"याएं निजन
मदिर अरुण, पीलो,
भाली-सी नोलो
सूना निझर-तीर
-
कही से मौलसिरी का परिमल उ मन
लाया मिहराता समीर,-
भर लाया।
नही चिडियो का कलरव सुन
पूछ पूछ उठना था मन,
यह क्या गाया,
भोली चिडिया ने क्या गाया ?
ये उल्झे आवरण यहा के,
बधन की छाया
यूटी जीवन की परिभाषा
रोन से आडम्बर की ओछी मी भिरापा
इस कोलाहर व अचल म आ कर क्या पाया?
क्या पाया?
पया मत पिच पर वह आया?
नमिचद्र

जिदगी की राह यह ज़िदगो की राह है क्व चुकी चिर विक्ल मानव के अधूरे-मे बने उन स्वप्नलोका को, अस्क यह गीत रहरी कब रुको, है क्व चुकी, एक स्वर से एक लप से चल रही है युगा से जिसके सहारे त्रस्त मानव के हृदय की धुकधुकी जो कर चुकी है क्ब रुको। है निर तर हो प्रगति की, पर गति से दौडने की छिपी मन म चाह, मेघ माला सरते कचे वरफ के अनुन्लघ्य अगम्य पक्त कापत तूफान के विक्षोभ स चचल अछोर तरग मंकुल सवमा सागर शरीट जाने गंघ जाने का अर्थ उसाह ऐमो वाह- राह पहा मन का न कुछ अवकाण मौन म मा तत गनि म चल रहा है आज जीवन बिनु ता भा है न मजिल पाम- है एमा विचित्र प्रवाम। यह है जिन्दगी को तारसप्तक

इस निरतर भागने मे हार कर ग्क भी गये
क्या यहा तुम दस डगर म विमा मे दा यात कर के
कहोगे अपने हृदय का दद?
इस अमेरी यात्रा म कही मे पर भर अटर वर
जो सुनहो गहन-पोडा का मधुर सम्भार
लाये हो पथिक
आकुल क्सिी का प्यार,
आतुर भोगत-मे रोचना मे परमता कुछ नेह का ममार
उमे कह दागे मिमी मे?
और पागेगे
सरस मुकुमार
अपने व्यथित प्राणा म घुमडतो आह ?
वितु यह तो पत्यरों की राह ।
दूर तक सूनी मोगे पत्यग को राह,
वे कठिन पत्थर
तुम्हारी क्या मुन जा दे सगे एक हो,
बम व्यग्य की तीमी हमी या एक ही उपहार ।
सुख-दुग्वो के करपना कामल मिरीने
वच निमम पयरा पर पडे,
पर म टूट जायेंगे,
नहीं है दह बुट परवाह
ऐमा पत्यरा का प्यार
यह है पत्यरा की राह !
यहां बने या नही असा,
मंजिल दूर हा या पाम,
हा उपुर, मधु स मिान, छपन से भर
ममिपद्र

जिदगी की राह यह ज़िदगो की राह है क्व चुकी, चिर विक्र मानव के अधूरे-मे बने उन स्वप्नलोको को, अरुक यह गीत लहरी कब की, है रव चुकी एक स्वर से एक लप से चल रही है युगा से जिसके सहार अस्त मानव के हृदय की धुक्धुको जो कर चुकी है कव को? है निर तर ही प्रगति को, एक गति से दौडने की छिपी मन म चाह मघ माला से लटे कचे बरफ के अनुन्लघ्य अगम्य पवत काँपन तूफान के विशाभ स चचल अठोर तरग मंकुल, समभी सागरा का रौं जाने रोष जान का अयव उमाह एमी चाह-- यह है जिलगी की राह । यहां मन का न कुछ अवका मौतम भी तज गति म चर रहा है आज जीवन विता भा है न मजिर पाम- है एमा विचित्र प्रवाम। तारमा इस निर तर भागने से हार कर रुक भो गये क्या यहा तुम इस डगर म क्सिो से दो बात कर के कहोगे अपन हृदय का दद? इस अकेली यात्रा म कही से पल भर अटक कर जो सुनहलो गहन पोडा का मधुर सम्भार लाये हो पथिक । आकुल किसी का प्यार, आतुर भीगत-मे लोचना से बरमता कुछ नेह का समार उसे कह दोगे क्मिी से? और बोलोगे सरस सुकुमार अपने व्यथित प्राणा म घुमडती आह ? किन्तु यह तो पत्थरा को राह । दूर तक सूनी मेलो पत्थरो को राह, वे कठिन पत्थर तुम्हारी कथा सुन जो दे सकेंगे एक हो, बम व्यग्य की तीवी हंसी का एक ही उपहार । सुख-दुवा के कल्पना कामल सिलौने वज निमम पथरा पर पडे, पर म टूट जायेंगे, नही है इह कुछ परवाह ऐसा पत्यरा का प्यार। यह है पत्थरो की राह यहाँ कने का नही जयवास, मजिल दूर हो या पास, हा उत्पुर, मधु से मिस्त, छरपन से भर ममिचन्द्र २१ ४ ये प्राण, या हा चिर निराश उनास- नही अवकाश जिदगी को राह के कुछ दूसरे ही हैं नियम कुछ दूसरे ही ढग। सामने जिसके प्रखरतम ज्याति का नव ज्याल को भीषण प्रभा का लाल पावन रग- तडपता विद्राह से अस्थिर सितारा । आज पथदा वही है चल आओ उसी आभा के सहारे, यथ मत खोजो क्सिी छवि के, क्सिो मघु-आह्वान म खोये हुए कवि के रगील वरपना के परो-लावों के किनार । सब भटक्ना छोड पथा आज आओ साधना की राह जोवन एक एमी राह । मवहारा प्रगति व उद्दाम नव उमाट से बेचैन आकुल एक धारा एक मनत प्रवाह- एमी जिन्गी की राह जीवन एक रम्बी राह तारमप्तक

व्यर्थ
मागदशक बोल दो-
हो रही हैं पुतलियाँ धुंधली अनवरत चेष्टा स
दखने की
गहन की अस्पष्टता को चोर कर अपना विलम्बित लक्ष्य,
जो कि मानो व्यग्य से
उपहास से,
निमम,
सरक्ता जा रहा है
दूर,
दूग्तर,
अनुल्लध्य अभेद तम मस
अचानक ही डरी-सो बापती धीमी किसी आवाज सा हो
दूरतम
कि तु में हारा नहीं हूं,
पडफडाती ह अभी बांह
कि अपने माग के अवरोध सारे तोड दूं-
पपडा म रक्त बहता है अभी इतना
वि वसलू
उस निखरती अथिर छलनामयी का
आपलप मे,
जो तोड दे व्यवधान
कर दे एक, एकम-एक,
दो इन दूर पर चलते सितारों को।
ममिषद्र
2

रितु पथ दाक, विवश म हार जाता हूँ भयकर मौन से बेमाप अपने प्राण म छाय हुए एकात से, सतत निर्वासित हृदय से। तिरस्कृत व्यक्तित्व के थोथे असगत दप नं मन की सहज जनजान स्वाभाविक जनावत धार का कर दिया है कुण्ठित- सहज अगारे कि मानो दर गय हो वुझ-स जस कि ठण्डी राख-स । जल रह है मात्र छून स लगा द प्रज्वलित कर द रिपन ज्वार मालाए- एमा ताह भी है, है नहीं बस शक्ति ही सहयाग का सब तरफ पर हुए उन विविध गतिमय प्राणमय सचलित तत्त्वा स क्सिा मम्मघ को कुट स्वन स्पून सजाव विनिमय का। इम लिए आ माग-दान आज में म व्यय हूँ सुनसान म निजन खट ऊच महर सा | तारसप्तक उमुक्त हो गया आज उमुक्त विहग पल म जाध छुट गये वासना के नाते सव माह अव । खुल गये पलक म ममता के सब नाग-पाश, कारा-तम के वासी ने देखा उपा-हास, उड चला गगन म अपने आतुर पख खोल । भर गयो मुक्ति मन म कुछ वह मस्तो अमाल । उद्दाम वग स उडा चला मानो अशात- हो नभ की सीमा ही छू लने का नितात, उड जायेगा माना अग-जग के आर पार, उसके अतर म आया है वह रक्त ज्वार । है आज न उसक प्राणा का कोई विराम, वह छोड चरा रुकने के सार सरजाम उसके आगे क्या ठहरेगा कोई विराध ? हो गया उसे अपनी क्षमता का पूण वाघ । चिर दिन वन्दी आकुल-सा वाई प्रवाह पा जाय अचानक ही अपनी अवरद्ध राह, उसके आगे तव ठहर सका है कोन कूल -जव हो पडती है प्राणा को गगा अकूल । वह आज चीर देगा अम्बर का उर अनत, युग-युग को जडता का वर देगा आज अन्त, वैषम्य शृसलाएं होंगो सव चूर-चूर, उग रही स्वण रेखाएं समता को सुदूर । वह आज मिटा दगा जीवन से वृथा दम्भ, ? ममिद्र १९ होगा उस पल म हो नवयुग का समारम्भ । धीरे धीरे कलियो के खुलने के समान उस गहन वेदना का रहस्य वह गया जान, है कांप रहा जिससे संसति का वक्ष-देश है कण्ठ रुघा-सा, पर अविवल निनिमेष । उस चिर-असीम के आगे निज सीमित कुरूप अपने मन का पहचान गया है वह स्वरूप, लगता है कितना ओछा अपना क्षुद्र प्यार, कितना दुवल है बौना अपना अहकार पर आज धुल गया है सारा वह छमवेश पहवान गया है वह सपनो लघुता जशप, व धार अपावन छलना के पल गये बीत- यह आज विसर्जित है प्रभु चरणा म पुनीत । ममता धन बधन की ममता समस्त अर टूट चुरी उसरा पय फ्ला है प्रशस्त । . तारसप्तक पुनश्च तार मप्तर को प्रमाणित हुए अब लगभग वीस मार हा गये । स्पष्ट ह दि इस बीच म मग्रहले प्रत्यर कविको मामाय कविता सम्बधी, और स्वयं अपनी काव्य प्रक्रिया मम्बधा धारणामाम बहुत-कुछ विवाम या परिवत्तन हुआ ही होगा। पर उसकी चर्चा लिए यह उपयुक्त स्थान नहीं। बलि अब मामा यतया और तार मुप्तक वे अनुभवके कारण विप पसे मुझे लगता है कि कविका अपनी कविता मम्बधम चाहे मफाईके तौरपर चाहे व्याम्याचे स्पम कुछ भी कहना कविता और पाठक दानावे बीच दीवार सरी करना ह। उममे लगभग अनिवाय रूपमे पाटव का ध्यान कवितामे अधिक पवित्र वक्तव्यपर चला जाता है जिसमे उस पापको अनुभूनिया ग्रहण अप्रामगिक और कवि मिदा ताकी चर्चा मुख्य हो जाती है । स्वय तार सप्तक को परवर्ती आगवनाएं इस बातका सबसे वडा प्रमाण ह । कुछ तो तार सप्तक ये पविया और विशेषकर मम्पारक महो यो धुनौती भर स्वर तथा सिद्धातबाजीचे कारण और कुछ हिन्दी आगेचकामी मूनारे कारण उन कवियाके काल्पनिक प्रयोगवाट की हा चर्चा अधिक हुई उनकी पविताना उचित आकरन या मूल्यावन नहीं हो सका। दुर्भाग्यवा 'तार मप्नक एक अप भ्रमवा भी शिकार हुआ। माधारणत यी माना और ममझा जाता ह कि तार सप्तक रिसी मुधितित काम्य-आवारनमा अग्रदल या जिमवे शावादार और मता उगरे मम्पार महोत्प ५। परम्बम्प मम्मार महो यम गम्बधित विभिन्न माहित्यिक और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहातरी तीमी आगवनाका बशुमार बोझ भी तार सुप्तव ने रविया और उनके निमित्तमे मार देती हुई नया पाव्पन्धतनाको उगना पन। तपारपिन प्रयागवार तथा ममम्न नवान पारको मागेपरवर्ती आगवना मूलत उमर ममारको मत सी माहिय पार और पवि 'अगया मागचना हाती रही और इन पवियोवा आना व्यक्ति व उपमित भा हुआ और गुल्न मा ममा गया। इमन ममिषद किमी ह तब उन कवियारे भावो विकासको और हिली कान्यकी परबी दिला नया गनिका हिनकर पम प्रभावित किया और मूल्या कनक मान-पगमें भा विकृति उत्पन्न की। "म भ्रमका निराकरण गायट म अवमरपर ममचित हो। वास्तवमें तार गप्ता व मम्पाय मगेन्या हाय उमर प्रकाशनमें चार जितना रहा हा पर उसका परिवल्पना उनकी नहीं थी और न उसम मग्रहीत कवि ही मरत उनको पमत्वे कारण एकत्र हुए थ । बल्कि मम्पादक मोन्य स्वर ही उम मनमें गायट इम कारण ही अधिक थ कि वह उमरे प्रकाशनम प्रमय स्पम महायर हो रह थ। साथ ही मप्रीत पनि स्वय भा तिमी मामा य माहियिक या अय मा यताआने पारण नौं वरि नितात यक्तिगत कारणामे विगद्ध परिस्थिति और मयोगदा एक साथ थ। नार मप्तक किमी भीए या अथम मिमी मारिरिप आलोग्न या प्रवृतिम प्रेरित न था। उमवे कपि प्रयोगवाटा नहीं थ पाय- उम अयमें भा नहा जो मम्पायन पहले अपनी भूमिका उनपर आरापित किया और जिमें फिर बादमें मद्धान्तिक आधार दे दिया गया । उनकी जनुभति और अभिव्यक्ति नाना तत्कालीन सामाजिर और मारिरिया परिग्थितियावी म्वाभाविक और गभग अनिकाय परिणति थी। पता भी नायर थितिमें कहीं काइ समग नरी ह यद्यपि तार मनर का मम्पावाय भमिका उममें मप्रगत कविया माहित्यिक स्थिति वेलिा बन अम नगै मिद्ध हा मका। किन्तु स्वाधीनता वार जब नार मता का ओर पारवा आलाचकाका ध्यान आकर्षित हुआ और उमरा मम्भावनाका परवान वर मम्पादक मनायन वम ही और भा म निकासाजना दनाना म्यितिन एक नया हा मा, ति। दूसरा मना और नामग मन्ना के प्रागनम आवारा परम परी तर वाचा तिष्टित गया कि सम्पाय मरोग्य मनमच बार नाम रिमा नप कारागनो प्रदता है। 'नार मना का माय भमिका कुष्ठ महानिर उक्तियार बयर मग्न उन मन पत्र हानर वारणाश विवरणमात्र था। "रदरगना मनका का भमिनायाम नियमित मिशान विवचन मा और न T घारावासा धारण कर पिया। नार नाममा पवियारी प्रामारावा तारमा - तो तार मता दैववि मे कवि थे जिनक वाग्में कम-म-बम सम्पादकी यह धारणा थी कि उनमें दुध और उ पाठक मामन राय जान पात्रह तामरा मप्नर की भूमिका मनका को याजना के आधारभूत वि वाम की चरचा माथ उन्हान का नि तार मप्तक एक नयी प्रवत्तिवा परवीगार मागता था ममे अपित्र और कुछ नहीं । तार मप्तर के कवियाका एकत्र करन और पान ममझार उन्हें पारवाके मामने लानका यह मिय्या नावातम्भ न भा हो पर इन कवियर माय मगमर अयाय तो नही। पर यह पान उम ममय इमगिा विश्वमनीय गो कि दूसरा और नामग मना मचमच मम्यूणत भम्पायव प्रयान मयोजन और उनकी मगटना भव मामथ्य और पहले फर थे। यह बात तब म्यष्ट न हो मी नि जग मूरत तार मप्तक व पवियान अपना सम्पादक या कि वह प्रवान चना था वहाँ वानवे दाना मनका के पवियाँका मम्पाटपने चना था। रन गाना मग्रहामें कुछ-क मवया स्वतत्र ममय और पूर विमिन कवि व्यक्ति व मम्मिरित हानेरे वारजूट इन मग्र पौछ मूरत उना सम्पापी माहित्य और काव्य-मम्बधा मायनापानी प्रेरणा और अभि पकिन थी। बहाने न कवर पर नवीन काया प्रमान किया वकि ममकारान पायक परो एक विशेष निगाम मोग। उनके कारण और परिणाम-बाप हुन-ग नम्ण दवि जान अनजाने एक मामाय दिन्नु अस्पष्ट और अम्फुट कान्य पारणारे इ. गि- एक हार अयमानामि व्यक्तियावा विरोध जथवा उनम अपनी भिन्नता प्रकट करन्सी हिंगामें प्रवत्त हुए । मन १९५० १ बाय नवीन हिला का रे एक विगप गिा में मुहकर गुम्बी और मकोणता पर जानम मप्तको व प्रशासनका भी बरतनुए हाय है। गन् १०५४-५५ २ आमपाम ना ताण परिया र बीच चचाका मरमे वय विषय ही यर हा गया था कि दोन सिम 'गप्ता में रिया जायगा अथवा नहीं ही पिया जायगा । कवि-गण अपनी और दूसराका आधनिकना गायवना और मफलता करि हाना या न हाना मभी कुछ गप्ना में शामिर हान-न हानम आँक्ने ग य । यह परिस्थिति यायगत मूया और चिया पर पिचित्र प्रकारका भ्रष्टना और मवीणतावा गान था। गप्तर' एक बड अवाछनीय प्रशाग्य मापिरियय मग्मण (पटना) माधन और प्रसार ग्न रह थ । दुमारसा तार मप्ना' भी माया पली बारमा जान मिच ५ पडता था और निरनर पता रहा है। उमके नय सस्करणके प्रकाशनपर यह कहना मवथा अप्रामगिक नी है कि वास्तविकता यह नहीं थी। तार मप्नक की स्थिति वाटवे दोना सप्तका से मौरिक रूपम भिन थी और वन क्मिी आन्नाल्न या साहित्यिक मरक्षण वत्तिकी उपज नही था। नार मप्ता के पवि न तो म्वय ही विभी भी रूपम क्मिी भी अग तक एसी किमा प्रवत्तिम परिचारित हुए य न व किमी भी प्रकारमे सम्पाटकके ही वारिक मालिक जथवा मगानात्मक प्रयत्नाके अगथ चाह फिर यक्ति गत स्नग्पर उनमे कवियानी कितनी ही घनिष्टता क्या न रही हो । महत्त्व पण बात यह ना कि तार सप्तक वे प्राय सभी कवि एक दूसराके कुत्ता और मित्रापर मत थ बल्कि यह कि उनका काई दर नहीं था काई गरनी था-और आज भी नती है। उनकी उपलरि चाह जो हा पर व म्वतत्र रूपम ही अपन काव्यका पथ खोजत और वनात रह है। य मब करना आज इमलिए और भी आवश्यक तथा महत्त्वपूर्ण हो गया ह क्यापि हिलामें मरक्षण विपकर साहित्यिक मरक्षाण का बाजार बड़ा गरम है-गुगनी पीनामें भा और नयाम भी। मरा विश्वास है कि यह हमार माहित्यिर जीवनो गि गम और स्वस्थ नहीं है। यह न केवल नितान्न भ्यक्तिगत स्तरकी दलबन्दी और गरबाजाको उक्माता ह बकि उमरे वारण तरण रचनाकार प्रतिभावान हार भी जीवनको सोध सेवन भागन और उम अनुभतिका अपन प्रति निमम ईमानदारीमे वाणी दनवे बजार स्मिा-न-विमी मरमणी तया वरन गताह-राजनीतिक दल का माहिया नताको अयवा प्रकाशकीय पारी : या स्थिति रचना कारका सभा वयम्ब नही गनता । मैं मानता हूँ कि करिका अपन मिवाय रिमोरावस्ता नग हाना चाहिए । प्रशानकी प्रामाकी अथवा अय रिमा भा पराकी मविधान गिा उम अपना वफादारीवा मोगनी करना चागिा। पर अपन प्रति मन्चा करनी मम्भव है कि विमा भणम वर विमानर मयम मागापार कम उमका प्रवक्ता भी वन मा । अपा "चार और विनापनका प्रधानता "म यगमें मम्भारना मा वाना अधिक हविदह बिन्नमिनीं प्रकट या अप्रकरक्तिया या रामान मात्र बना र जाप और दुमगका जूरनका ही मौरिक नति मापार और मानिमातिम मजा-मवारका पाकरता । मिन्दर नगर कविताहा न" ममम मजनामा काया पर एक भगव-निमशाना मिडगमकताह। -मिचद्र जैन तारमा

आज फिर जव तुमसे सामना हुआ
कितने दिना बाद आज फिर जब
तुम से सामना हुआ
उस भीड मे अकस्मात्,
जहा इसकी कोई माशका न थी,
तो में कैसा अचकचा गया
रंग हाथ पक्डे गये चार की भांति ।
तुरत अपनी घोर अकृतज्ञता का
भान हुआ
लज्जा से मस्तक झुक गया अपने-आप ।
याद पडा तुमने ही दिया था
वह बोध,
जो प्यार के उलझ हुए धागा को
धोरज और ममता स संवारता है,
दो थी वह करुणा
जिसके सहारे
आत्मीयो के असह्य आपात सहे जाते हैं,
सह्य हो जाते हैं-,
और वह अकुण्ठित विश्वास
कि जीवन म केवल प्रवंचना ही नही है
अन्तर की अकिंचनताएं प्रतिष्टित
सहयोगिया की कुटिरता ही नहीं है,
क्सिो क्षणिक सिद्धि के दम्भ म
शिखर को छाती कुचलने का उद्यत
मियद

बोनो का अहकार ही नहा है- जीवन म आर भी कुछ है। तुम्हारी ही दी हुई थी वह अनय अनुभूति विवपा को पहली बार स सिर चटी धूल के दबत हो मुली निसरने वाली आकार की नातिनायिनी अगाध नीलिमा, वर्षा बाट अचानक अपारण हो मिला मिमी की अम्लान मित्रता पा साग, दूर रह पर भी माय माय एक हो दिशा म चरत हुए मह मिया का आश्वासन- य मर भा तो जीवन म है तुमने कहा था। यह मर नजान आर क्या क्या मुर याद आया और एक अपूर्व गानिस परिपूत हा गया म जन आज अचाना हा भाह म एनन रिनारा तुमन पा सामना हा गया आमरवाना 1 तारमन्ना गजानन मुक्तिबोध बौना का जहकार ही नहीं है- जीवन म जार भो कुछ है। तुम्हारी ही दो हुइ थी वह अनय अनुभूति कि बपा की पहली वाठार स सिर चढो धूल दवत हो खुली निखरने वारी आवारा की शातिदायिनी अगाध नीलिमा वपा बाद अचानक अकारण हो मिला किसी की अम्मान मित्रता पा सदश, दूर रह कर भी साथ साथ एक हो दिशा म चरत हुए सहकर्मिया का आश्वासन- य सब भा तो जीवन म हैं तुमन कहा था। यह सब, न जाने आर क्या क्या मुब याद आया और एक अपूर्व शान्ति से परिपूण हो गया म जब आज अचानक हो भीड म इतने दिना बाद तुमस या सामना हो गया आ भर एकात . ३ तारसप्तक गजानन मुक्तिबोध

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जीवन-तथ्य मुक्तिबोध, गजानन माधव-जम नवम्बर १०१७ में ग्वालि परवे एक मवेम हुआ जहा मौ मार पहले कविरे पूर्वज ना बमे थे । पिताके पुलिस मव नस्पकर हानक कारण और बार-बार वाला हानके कारण मक्तिवाधको पटाका मिलमिल टूटता जटता रहा फ्रन १९३० में उज्जनमें मिनिल परीक्षाम अमफलता मिला जिम कवि अपन जीवनकी पणे महत्त्वपूर्ण घटना' मानता है । उम वाट पाका मिरमिग ठीक चला और साथ ही जीवन के प्रति नयी मवेदना और जागक्ता बन्न रगी। सन १०३५ में (माधव कॉटेज उजनम ) माहित्य लेखन आरम्भ हुआ। सन १९३८ में वी० ए० पाम पिया १९.९ में विवाह उमरे वाट 'निम्न-मध्यवर्गीय निष्क्रिय माम्टरी जा अर तक ह। 'मालववे एक औद्यागिक वे में जिममें बने गहरा गुणाका छाड पर उमकी सव विशेषताएं ह यह बन्ना रोज जिला रहना ह । नियमा नुवूर बारह बजे दोपहर म्यूर जाता है लौटती बार अपने परासे अपनी मिगरेटपर प्यारा भरोमा रमता हुआ घरकी ओर चल पटता है। सांय मात बजे पानवारेवी दूवानपर नित्य मिलता है । उन्जनये प्रोगजम रही भी इस व्यक्तिरा मरगती करते हुए आप पा मक्ने ह ।' - * नौवरियों पर ता-ठोरता रहा। शिE पत्रकार पुन शिक्षक मरवारी और गर-गरवारी नौकरियां । निम्न मन्यवर्गीय जीपन, बाल- बच्चे दवा र जम-मृत्यु । जीवनकी स्मरणीय घटनामा विशेष उरेयनीय है भारत इतिहाम और मम्मृति नायर पुस्तक का शान और उमर परिणाम । यह पुस्तर मध्यप्रग सरखार ाि विभाग गरा पारय-युम्नर भी स्वीकार हुई और उमी मरवारनाग रोग मुरला पानूना अधीन अश्य भी घोषित हुई । उमर शिरोधम आदोलन हुए परचेगाजी हुई कुछ नगरामें पुम्नक गमानन मुनियोध को हाय जगया गयी सम्प्रदायवाटी तत्त्वान उग्र पिपरिया। गिा रेखव गिए उमका पुस्तकका गैरकानूना वगर रिया जाना एक वियाग अनुभव होता है-प्रेमा अनुभर जमा ही तोव और अविम्मरणाय । कामायनी एव पुनर्विचार प्रागिन हा चाह। नपा रिनाला आम-मघप नामक निवध मग्रह प्रकार पाम है। मरा मन नव-वरामिवार की तरफ दौर रहा ह अर्यात् एमी काव्य रचनाको आर जिमरा पथ्य व्यापर हा जिमम जावना विपिन तथ्या और उनक मन्लिए निप्वाँरा चित्रण हा । पता नग यह मुझग यहाँ तक मरगा। ११ मितम्बर १९६४ को रम्बी बीमारीव पाट मक्तिवापरा निधन हो गया। वविता-मग्रह चाल्या मह रवाह निबध माह एक मानि त्यिकवी गयरा मरणोत्तर प्रकाशित हुए । ४. तारसप्तक वक्तव्य मारव विस्तोण मनाहर मगनाम-म घूमती हुई शिप्राकी ग्क्त भय मांझें और विविध-म्प वभाकी छायाए मेर विगोर कवित्री आय सोदय प्रेरणा थी। उजन नगरक वाहका यह विस्तीण निमगक उम व्यक्तिक लिए जिमकी मनारचनाम रगीन आवग ही प्राथमिर ह अत्यात जामीय था। उमके वार स्टोरमें प्रथमन ही मझ अनुभव हुआ कि यह मौल्य ही मर वायरा विषय हा मक्ता ह। टमरे पहिर उजनमें म्ब० रमावर गुल्य सूश्वी कविताएँ-जा माखनला म्फू'की निकरी हुई गाया थी-मुझे प्रभारित करती रहीं, जिनकी विशेषता थी वातको मोधा न रबार उस वेवर मूचिन परना। तक यह था कि उममे वह अधिक प्रवर होकर जाता है। परिणाम यह था कि अभिव्यजना उत्थी हुई प्रतात हाती यो। कायका विषय मा मूरत विरह-जय काणा और जीवन-गान हा था। मित्र कहते ह कि उनका प्रभाव मुथपर-स अबतक नही गया है। दोरम मित्राने महयाग और सहायनाम म अपने आ तरिक क्षत्रम प्रविष्ट हुआ और पुगना उरमन भरी अभियक्ति और अमूत करणा छापर नवीन मौन्य-भव प्रति जागरूष हुआ। यह मेरी प्रयम आ म चतना था। उन गिना भा एक मानमिव मघष था। एक ओर पिटाका या नवीन मौनय-काव्य था, ता दूसरी आर मर वार-मनार मगरी माहिय ये अपिर मानवतामय उप यास-गाया भा मुकुमार परन्तु तीन प्रभाव था। तोस्तॉयव मानवीय समस्या-सम्पपा उपयास-या महात्मा वमा ? समयका प्रभाव पहिए या वयको माग या दाना मने गिर गोन्य तो ही अपना क्षत्र चुना और मनही दूसरी मांग वस हा पीछ रह गयी जम अपन आमाय रामे रहबर भी साथ चर चरत ह मर यार-मनरी पनी भूग मौज्य और दूगरी विश्व-मानवता मुण-टम इन मारा मयप मर साहित्यिक जावनको पण उग्न गजानन मुनियाध यो । इसका स्पष्ट यज्ञानिक समाधान मुझ किसीसे न मिग। परिणाम था कि इन अना आतरिव दुगरे कारण एक ही काप विषय नहीं र सका। जीवनवे एक ही वाजूका रेकर में कोई सपो दानती मीनार वडीन पर सका। साथ ही जिमासाने विस्तारके कारण पथाकी ओर मरी प्रवृत्ति वा गयी । इमका द्वन्द मनमें पहले हीन्मे था। कहानी-रेयन आरम्भ करते ही मझ अनभव हआ कि क्या-नत्व मर उतना ही ममीप ह जितना काम। परन्तु कहानियाँ म बहुत ही पाडा लिपता था अब मा कम रिखता हूँ। परिणामत पान्यको मैं उतना ही समीप रखने लगा जितना कि स्पन्न मीलिए काव्यरो व्यापक क नरी अपनी जीवन-सीमामे उसकी सामाको मिग देनकी चाह दुनिवार हान लगी। और मरे कान्यका प्रवाह बन्ला । दूसरी ओर दानिक प्रवृत्ति--जीवन और जगतके द्वन-जीवनके आन्तरिक द्वन्द-इन सबको सुलझानको और एक अनुभव मिद ग्यवस्थित तत्व प्रणा अथवा जीवन-दान आत्ममात कर लेनको दुनम प्यास मनमें हमेगा रहा करती। आगे चलकर मरी काश्यको गतिको निश्चित करने पाला साक्त कारण यही प्रवृत्ति थी। सन् १९३५ में काय आरम्भ क्यिा था सन १९३६ मे १९३८ तक काव्य पाछ कहानी चरती रही। १९३८ से १९४२ तक्के पांच साल मानमिन सघप और बगमोनीय व्यक्तिवावे यप थ। आतरिक विनष्ट गाति और शारीरिक घ्वसमे इस समयमें मरा यक्तिवाट वचकी भांति काम करता था। बगसोकी स्वतत्र क्रियमाण जीवन-शक्ति (elan tital ) के प्रति मरी आस्था बट गयी थी। परिणामत काव्य और कहानी नय रूप प्राप्त करते हुए भी अपन ही आसपास घूमते थे उनकी गनि ऊध्वमखी न थी। सन १९४२ के प्रथम और अन्तिम चरणमें मैं एक एसी विरोधी क्निके सम्मष आया जिसकी प्रतिकूल आलोचनामे मझ बहुत कुछ सौखना या। जालपुरका अद्ध-नागरिक रम्य एक्स्वरताके वातावरणमें मरा वातावरण भी-जो मरी आतरिव चीज है-पनपता था। यहाँ लगभग एक साल्में मन पांच सालका पुराना जडत्व निकालनको सफल अमफल कोशिश की। इस उद्योगके लिए प्ररणा विवक और गाति मन एक एमी जगहसे पायी जिसे पहले म विरोधो गनि मानता था । क्रमा मरा झुकाव माक्मवान्की ओर हुआ। अधिक वज्ञानिक अधिक मूत और अधिक तजस्वी दृष्टिकोण मझ प्राप्त हुआ। गुजालपुरमें पहले तार सप्तक पहल मन क्थातत्त्व सम्ब घम आत्म विश्वास पाया। दूसरे अपन वाव्यकी अस्पष्टतापर मेरी दृष्टि गयी, तोसर नये विकास-पथकी तलाश हुई। यहाँ यह स्वीकार करनेमें मुझे सकाच नहा कि मरी हर विकास स्थितिम मुझे घोर अस ताप रहा और है। मानसिर द्वन्द्व मरे व्यक्तित्वम बदमूल ह । यह म निकटतासे अनुभव करता आ रहा है कि जिम भी क्षेत्रमा म हूँ वह स्वय अपूण ह और उसका ठीक-ठोक प्रक्टोवरण भा नही हा रहा है । पलत गुप्त अशाति मनके अन्दर घर क्यि रहता है । लेखनके विषयमें म कलाकार को स्थाना तरगामी प्रवृत्ति (माइग्रेशन इस्टिक्ट ) पर बहुत जोर देना हूँ। आजके वविध्यमय उलझनसे भरे रंग बिरगे जीवन को यदि देखना ह तो अपन वयक्तिक क्षत्रसे एक बार तो उडकर बाहर जाना ही होगा। विना उसके इस विशाल जीवन-समुद्रकी परिमीमा, उसने तट प्रशाक भूसण्ट, आंखामे ओट ही रह जायेंग। क्लाका कद्र यक्ति ह पर उसी वेद्रका अब दिशा-व्यापी करनेकी भावग्यता है । फिर युगधि-बारम कायवर्ता उत्पन्न हात ह कलाकार नही इस धारणा को वास्तविक्ताके द्वारा गलत साबित करना ही पड़ेगा। मरी वविताआये प्रात-परिवतनका कारण ह यही आन्तरित जिज्ञासा । परन्तु इम जितासु-वृत्तिका वास्तव (ऑ जक्टिव ) रूप अभी तर क्लाम नही पा सका हूँ। अनुभव पर रहा है कि वह उप यामद्वारा हा प्राप्त हो सबगा। यस पायमें जावनवे चिनवी-यया वनानिव टाइप की- उद्भावनवी अथवा तात्र विधारी, अयवा शुद्ध शब्द चित्रात्मक कविता हो सकती ह । इहार प्रमाग म करना चाहता हूँ। पुरानी परम्परा घिरकुल छूटती नहीं है पर यह परम्परा है मेरी ही और उसका प्रसार अव य हाना चाहिए । जीवनर इस विध्यमय विवास सोतरा दसनके लिए इन भिम मिल पाव्य-रूपाको यहाँ तक कि नाटप-तत्वरा, पवितामें स्थान दना आव प्पवता है । म चाहता हूँ कि इमी निमें भर प्रमाग हो । मरी म कविताएँ अपना पथ दृट्नवाले बचन मनवा हा अभिव्यक्ति ह । उनका सप और मूल्य उसी जीवन-स्थितिमें छिपा है । - मा. मुक्तिबोध गगानन मुनिपोध

आत्मा के मिन मेर
वह मित्र का मुख
ज्यो अतल आत्मा हमारा बन गयो साभात् निज मुख ।
वह मधुरतम हास
जसे आत्म परिचय सामन ही आ रहा है मूत हो कर ।
जो सदा हा मम हृदय अतगत छिप थ
व सभी जालोर खुलने जिस सुमुख पर ।
वह हमारा मित्र है,
आत्मीयता के केद्र पर एकन सौरभ । वह वना
मेरे हृदय का चित्र है
जो हृदय-सागर युगो स लहरता,
आन द म याकुल चला आता
कि नोला गाल क्षण-क्षण गूजता है
उस जलधि की श्याम लहरा पर जुडा आता
सघनतम श्वेत, स्वर्गिक फेन, चचल पेन ।
जिसको नित लगाने निज मुखो पर स्वप्न की मदु मूर्तिया सो
अप्सराए साझ प्रात
मदु हवा की लहर पर स सिधु पर रख अरण तलुए
उतर आती, कातिमय नव हास ल कर ।
लधि को युग-युगा को अमल लहरो पर
उस
जुडा जो फेन,
अतर के अतल हिल्लाल का जो बाह्य है सौन्दय----
कोमल पेन।
जिसके आत्म मदिरम समर्पित,
सार सप्तक

दुख-सुखो को साझ प्रात जो अकेला
याद आता मुख हमे नित ।
काल की, परिवतना की तीव्र धारा मे वहा जाता
मधुरतम साथ जिसका,
प्राण की उत्थान गति की तीव्रता म
वह रहा उच्छवास जिसका,
जो हमारी प्यास मे नित पास है-
व्यक्तित्व का सौरभ लिये, व्याकुल निशा सा
निकटता के निज क्षणी म
जो कि उर की बालिका का मौनतम विश्वास है।
जो झेलता मेरे हृदय को निज हृदय पर
आत्म-उ मुक्तीकरण की सुली वेला म कि जब
दो आत्माएँ
वालको मी नग्न हो कर खडी रहती
दिव्य नयना म सहजतम-बोध नीलालोक ल कर ।
वह परस्पर की मृदुल पहचान, जैसे पूण
चन्दा खोजता हो
उमडता नि सीम निस्तल
कूल होना श्यामला जल राशि म प्रतिविम्व अपना,
हास अपना,
वह परस्पर की मृदुर पहचान जैस
अतर गर्भा भव्य धरतो हृदय के निज कूल पर
मदु स्पा कर पहिचान करता, गूढ तम उस विशद
दीपच्छाय श्यामल-वाय बरगद वृक्ष की,
जिसके तले आश्रित अनेकों प्राण,
जिसरे मूल पृथ्वी के हृदय मे टहल याये, उलझ आये ।
गजानन मुनियोध
४५

मित्र मरे, आत्मा के एकाकीपने के अयतम प्रतिरूप । जिससे अधिक एकाको हृदय । कमजोरिया के एकमेव दुरार भिनता म विक्स र वह तुम अभिन विचार बुद्धि को मेरी गलाका अरणतम नग्न जलत तेज कम के चिर वेग म उर वग व उमप । पित मन की स्नह सीमा का जहा है जन्त, छल छल मात उर व क्षम-गान परे जो लोक, पत्नी के समपण देश को गालि गध्या क भितिज क पार, जो विस्तत बिछा है प्रात त मय तिमिर छाया है जा हिरडार से भी दूर, है केवल अक्ला याम ऊपर श्याम नीचे तिमिरगायो अचर धरती भी अक्ली एक तर के तल भी क्वल अक्ला मौन जिसकी दोघ शाखाए पिछी निस्सग जस लटकती है एक स्मृति पवान मन वे तिमिर कोने म त्यजित, पत्त भी खड़े चुपचाप सोने तान- अपनी यक्तिमता के सहारे जो चल हे प्राण, उनको कौन दता है चल विश्वास का वरदान । उनको कौन देता है प्रसर आलोक खुद ही जल कि जस सूय अपने ही हृदय व रक्त को ऊपा तार सप्तक

पथिक के क्षितिज पर विछ जाय,
जिससे यह अकेला प्रात भी नि मोम परिचय की मधुर
संवेदना से
आत्मवत् हो जाय
ऐसी जिस मनस्वी की मनीपा,
वह हमारा मित्र है
माता पिता-पत्नी मुहद पीछे रहे हैं छूट
उन सबके अकेले मग्र म जो चल रहा है
ज्वलत् तारक-सा,
वही तो आत्मा का मित्र है।
मेरे हृदय का चित्र है।
.
गमानन मुनियोध
१०

दर तारा
तीन गति
अति दूर तारा
वह हमारा
गूय के विस्तार नील म चला है ।
और नीचे लोग
उसको देखते हैं, नापते हैं गति उदय ओ अस्त का
इतिहास।
कि तु इतनी दोध दूरी,
शू य के उस कुछ-न होने से बना जो नौल का आकाण
वह एक उत्तर
दूरबीना की सतत आलोचनाओ वो,
नयन-आवत के सीमित निदान या कि दान-यत्न को।
दे नापने वाल लिखें उसके उदय ओ अस्त को गाथा,
सदा ही ग्रहण का विवरण ।
किन्तु वह तो चला जाता
ध्योम का राहो,
भले ही दृष्टि के बाहर रहे-उसका विपथ ही
बना जाता।
और जाने क्यो,
मुझे लगता कि ऐसा ही अकेला नील तारा,
तीव्र-गति
जो गूप म निस्सग
सार सप्तक

जिसका पथ विराट- वह छिपा प्रत्येक उर म, प्रति हृदय के करमपा के बाद जैसे वादो के बाद भी है शूय नीलाकाश ! उसम भागता है एक तारा, जो कि अपने ही प्रगति पथ का सहारा, जो कि अपना ही स्वयं वन चला चित्र, भीतिहीन विराट पुर। इसलिए प्रत्येक मनु के पुत्र पर विश्वास करना चाहता हूँ । गमानन मुनियोध खोल आँखे जिस देश प्राणो को जलन म एक नूतन स्वप्न का सचार हो, जो हृदय मेरे उस ज्वलन को भूमि म बिउ जा स्वय हो, औ तडप कर उस निराल देश म तू पोल आँखें । देव-जलन म्पदनो म क्या उलयता हो गया है, जो नयी चिागारियां नव स्वप्न का आलोक ले उत्पन होती जा रही हैं उन सबलतम, तीव्र, कोमल देश की चिनगारिया म जो खिले हैं स्वप्न रक्तिम, देख ल जी भर उहे तू । उस असीम विक्ल रस को पी स्वय भी। वह महा याकुल अनावृत ज्ञान लिप्सा रख रही निज म अनावृत एक सपना- सहसो स्वर्गीय स्वप्ना से बहत्तर स्वप्न का वह व्योम नीला प्राण पथ्वी पर झुका है। उस महा याकुल अनावृत ज्ञानलिप्सा के क्षितिज पर जो खिचा है स्व- श्रावण-सांझ के वितरित घनो पर अमित नोला जामुनी, अति लाल मुदर Y. तार सप्तक

दिवस की बरसात को सूर्यास्त का चुम्बन
कि ऐसा अद्वितीय
मधुरतम
आश्चयमय।
वह ज्ञान लिप्सा क्षितिज सपना
रे, वही तुझम अनेका स्वप्न देगा।
ओ' अनेका सत्य के शिशु
नव हृदय के गभ म द्रुत
आ चलेंगे।
जात्मा मेरो-
उस ज्वलन को भूमि म तू स्वय विछ ल
देस, जलते स्पदना म क्या उलझता हो गया है ।
.
गपानन मुसियोध
५१

अशक्त
क्या हमारे भाव शब्दातीत हैं ?
या तुम्हारा रूप भावातीत है ?
हम न गा सकते तुम्हारा गोत हैं
वह हृदय गम्भीर, नौरव सिरत है ।
यह विशद जोवन कि जो आकाश सा
या कि निझर सा चपल रघु तीव्र है
वया पूण है ? क्या तृप्ति पाता शोघ्र है
वह ग्रीष्म सा है या मदिर मधुमास सा?
हम लिख कविता विरह पर दुख पर
या मधुर आराधना पर, युद्ध पर
या रच विज्ञान जीवन के बने--
प्रग्नमय जो अग सतत बुद्ध पर।
खीच लें हम चित्र जीवन में बहे
रम्य मिश्रित रग धारा के नवल
चक्ति हो लें उल्लसित हो लें कभी
दुख ढा लें तत्त्व चिता कर सकल ।
किंतु यह सब तो सतह को चोज़ है,
भार वन मेरे हृदय पर छा रही।
या कि वहत सरित के ऊपर तह
वफ को जमती चली ही जा रही ।
५२
सार सप्तक

पाय है प्यासा, थका-सा धूप म
पोठ पर है नान को गठरी बटो,
युक रही है पीठ, बढता वाय है
यह रही वेगार की याना कडी।
अथ खोजी प्राण ये उद्दाम हैं,
अथ क्या । य प्रश्न जीवन का अमर ।
क्या तपा मरी बुझेगी इस तरह
7
अथ रया ? ललकार मेरा है प्रखर ।
जव वि एमा नान मर प्राण म
तप्नि मधु उत्पन करता हो नही,
जर कि जीवन म मधुर सम्प नता,
ताजगी, विश्वास आता ही नहीं,
जन वि माकुर तपित मन खोजता
वाही मरु म अमर जल-मोन है,
क्या न विद्राही बनें य प्राण जा
सतत म वेपो सदा प्रद्योत हैं
जा मि मदर खावलापन कोट-मा
है सतत घर कर रहा आराम म,
क्या न जीवन का वहद अश्वत्य यह
डर चरे तूफान के ही नाम से ।
7
.
गजानन मुमिपाध

मेरे अन्तर
मेरे अतर, मर जीवन के सरल यान,
तू जवसे चला रहा बेघर,
तन गह म हो पर मन वाहर
आलोक तिमिर मरिता पवत कर रहा पार ।
वह सहज उठा र चला सुदृढ तपत जीवन का महा ज्वार,
उसके द्रुत गति प्रति पदक्षप स यात हा उठ रहा गान,
जो न य तज का भव्य भान ।
घर को स्नेहल कोमल छाया म रहा महा चचल अधीर ।
व मदुल थपक्यिा स्नेह भरी
व गशि मुसकाने शुभवरी
मवको थला पर स्वय अकेला बढा धीर ।
जीवन-तम का सगीत मधुर करता उर सरि का वय नोर
एसा प्रमत्त जिमका गरीर उमत्त प्राण मन विगत पीर ।
सबको पाया,
यह नहीं कि वह था तुग पुरुप
जा स्वय पूण गत दु स हप
पर ल उसके धन ज्यातिष्कण जो वटा माग पर अति अजान ।
उसके पथ पर पहरा दत ईसा महान् व स्नेहवान् ।
छाया वनवर फिरते रहते व शुद्ध बुद्ध सम्बुद्ध प्राण
यह नहीं कि करता गया पुण्य
उसका अतर था सरल वय
तम म घुसकर चक्कर साकर वह करता गया अवाध पाप ।
अपनी अक्षमता म लिपटी यह मुक्नि हा गयी स्वय शाप ।
11
तार सप्तक

पर उसके मन में बैठा वह भी मायौता कर मका नही,
जो हार गया, यद्यपि अपने मे लडन-लहत या नहीं,
उसने ईश्वर-महार किया, पर निज ईश्वर पर स्नेह क्यिा।
म्पुग्णा के लिए स्वय को हो नव म्फूति मोतका ध्येय किया
वह आज पुन ज्योतिषण हित
धन पर विरत करती प्रहार,
उठने म्फुलिंग
गिरते स्फुलिंग
उन ज्योति क्षणा म दम्ब लिया
करता वह मय महदाकार ।
सनद्ध हुआ वह ज्वाल विद्ध करने को सारा तम प्रसार,
वह जन है जिसके उच्च माल पर
विश्व भार औं अन्तर म
नि सोम प्यार"
गानन मुनियोध

मृत्यु और कव
.
धनी गत वादल रिमझिम हैं दिशा मूक निम्त र वना तर
व्यापक अधकार म मिडी सोयी नर की वस्तो, भयपर
है निस्तब्य गगन रातो सो सरिता धार चली घहराती
जीवन लीला को समाप्त कर मरण मज पर है कोई नर ।
बहुत सयुचित छोटा घर है दीपालाक्ति फिर भी धुधला,
वयू मूच्छिता, पिता अद्ध मत दुसिता माता स्पदन हीना ।
धनी रात, बादल रिमयिम है, दिशा मूक, कवि का मन गोला ।
यह सब क्षणिक क्षणिक जीवन है मानव जीवन है
क्षण भगुर
ऐसा मत कह मेरे कवि इस क्षण सवेदन से हो आतुर
जीवन चितन म निणय पर अक्स्मात् मत आ, ओ निमल ।
इस बीभत्स प्रसग म रहो तुम जत्य त स्वतन निराकुल
भ्रप्ट न होने दो युग युग की सतत साधना महाराधना,
इस क्षण भर के दुस भार से रहा अविचलित, रहो अचचल ।
अतर्दीपक के प्रकाश म विनत प्रगत जात्मस्थ रहो तुम
जीवन के इस गहन अतल के लिए मत्यु का अथ कहो तुम ।
क्षण भगुरता के इस क्षण म जीवन की गति, जीवन का स्वर
दो सौ वप आयु यदि होतो तो क्या अधिक सुखी होता नर
इसी अमर धारा के आगे बहने के हित यह सब नश्वर,
सजनगील जीवन के स्वर म गाओ मरण गीत तुम सुदर ।
तुम कवि हो य फल चल मदु गीत निपर मानव के घर घर
ज्योतित हा मुख नव आगास जोवन की गति जीवन का स्वर ।
?
तारसप्तक

नूतन अह
कर सको घृणा
क्या इतना
रखने हो आवण्ड तुम प्रेम?
जितनी असण्ड हो सके घृणा
उतना प्रचण्ड
रयते क्या जीवन का व्रत-नेम ?
प्रेम करोगे सतत ? कि जिसमे
उसमे उठ ऊपर वह लो
ज्यो जल पृथ्वी के अन्तरग
म घूम निक्ल झरता निमल वैसे तुम कपर वह लो?
पया रखते अन्तर में तुम इतनी ग्लानि
कि जिससे मरने और मारने को रह गे तुम तत्पर
7
क्या कभी उदासो गहिर रहो
सपना पर, जीवन पर छायो
जो पहना दे एकाकीपन का लौह वस्त्र, आत्मा के तन पर
है म्वत्म हो चुका स्नेह-कोप सम तेरा
जो रखता या मन म कुछ गोरापन
और रिक्त हो चुका सव रोप
जो चिर विरोध में रखता था आत्मा म गर्मी, महज भन्यता
मधुर आत्म विश्वास।
है सूख चुकी वह ग्रानि
जो आत्मा का बेचैन क्येि रपती थी अहोरान
कि जिसमे देह सटा अस्थिर थी, आय लाल, भार पर
गानन मुनियोध
7
८

तीन उन रखाएं अरि वे उर म तीन शलाका सुतीक्ष्ण,
किन्तु आज लघु स्वार्थो म धुल, मदन विहुल,
अन्तमन यह टार रोड के अदर नोचे वहने वाली गटरासे भी
है अस्वच्छ अधिक,
यह तेरी लघु विजय और लघु हार ।
तेरी इस दयनीय दशा का लघुतामय संसार
अहभाव उत्तुग हुआ है तेरे मन मे
जैसे धूरे पर उट्ठा है
धृष्ट कुकुरमुत्ता उमत्त ।
तार सप्तक

विहार रविका प्रकाश, - शशि का विकास- पुसत्वहीन नर का विलास । ये सूय-चद्र, नम-वक्ष रब्ध, व अमित वासना के शिकार । वे गगन दोन वे रसिक रुग्ण, पुसत्वहीन वेश्या विहार । इनका प्रकाश जग के विशाल शव का सफेट परिधान साफ। है त्यक्त गेह आत्मा अदेह उड चली गटर स बनी साफ । [२] दिन के बुखार रात्रि को मृत्यु के बाद हृदय पुसत्वहीन, अन्तमनुष्य रिक्त-सा गेह दो राल्टेन-से नयन दीन, निष्प्राण स्तम्भ गजानन मुनियोध दो खडे पांव लकडी का खोखा वक्ष रिक्त, मस्तिष्क तेल को है मशीन ससार क्षेत्र है तल सिक्त । दिन के बुखार गत्रि को मत्यु ६ बाद हृदय दुख का नरक रामि के गूथ दो देह युक्त- दो रिक्त प्राण व्यग्य म गक 1 १ . तार सप्तक पूजीवादी समाज के प्रति इतने प्राण, इतन हाथ, इतनी बुद्धि, इतना ज्ञान, संस्कृति और अत गुद्धि इतना दिव्य, इतना भन्य, इतनी शक्ति यह सौदय, वह वैचित्र्य, ईश्वर भक्ति, इतना काव्य, इतन शर इतने रन्द- जितना ढोग, जितना भोग है निव च, इतना गूढ, इतना गाढ, सुदर जार- केवल एक जरता सय दन टार । छोडा हाय, यवर घृणा यो द्वार तेरी रेशमी वह अन्द-सस्कृति याय दतो मोघ मुझका, खूब जरता प्रार तरे रक्त म भी सय का बवराम तर रवन स भी घृणा याता तोत्र तुझको दन्न मितरी उमड वाती गान तर हास म भी राग-वृमि हैं उन तरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र । मेरो ज्वाल, जन को ज्वाल होकर एक अपनी उष्णता से घो चरें अविवेक तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यथ तेरा ध्वस केवल एक तेरा अथ । गजानन मुनिवाघ

नाश देवता
घोर धनुधर, बाण तुम्हारा सम प्राणा को पार करेगा,
तेरो प्रत्यंचा का कम्पन सूनेपन का भार हरगा।
हिमवत् जड नि स्पद हृदय के अधिकार म जीवन भय है।
तेर तीक्ष्ण वाण को नोका पर जीवन-सचार करेगा।
तेरे क्रुद्ध वचन वाणा की गति से अतर म उतरेंगे
तेर क्षुब्ध हृदय के शोर उर को पीडा म ठहरग ।
कोपित तरा अधर सस्फुरण उर म होगा जीवन-वदन
रुष्ट दृगा की चमक बनेगो आत्म-ज्याति को किरण सचेतन।
सभी उरो के अधकार म एक तडित् वदना उठगी
तभी सजन की बीज वद्धि हित जडावरण को मही फटेगी।
गत शत बाणो से घायल हो बढा चलगा जीवन-अकुर ।
दशन को चेतन किरणा के द्वारा कालो अमा हटेगी।
हे रहस्यमय, ध्वस महाप्रभु जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणो स जावन तीक्ष्ण बाण से नूतन सजन ।
हम घुटने पर नाग-दवता | बठ तुझ करते हैं वदन,
मेर सिरपर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।
।
-
१२
तार सप्तक

सृजन क्षण
जो कि तुम्हारे गत वने हैं अक्षमता के,
उन पर लहराकर भरता में एक अवना ।
वही गभीर अतल होते हैं,
वे ही सदा अमल होते हैं,
फिर जातो जिन पर वया सी मेरी प्रना।
जब कि स्वय में सुन बना हूँ
अज्ञा का अतर पावर ही,
सदा रहूँ उनका चाकर हो
वे कि जिन्होंने आत्मरक्त से मुझको सोचा।
वैसे हंस सकता हूँ में उन पर ही।
उनको मर्यादाएं पाकर
दरिया अमर्याद लहराया,
अपने स्वर मे स्वरातीत गीता दुलराता
मैंने अरे उसोको पाया।
व अपूर्णताएं, ईर्ष्याएं
मुझम घुल कर धुलकर बनती सूय सनातन,
यह टिउलापन रघु अन्तर का
क्षण क्षण नूतन को करता है शीघ्र पुरातन ।
यों नूतन की विजय चिरतन,
महामरण पर महाजम का उदय क्षिप्रतर,
महाभयंकर से बढ़ता है परम शुभवर ।
जो सण्डित औ' भान रहे हैं,
নিন গলিঘা

वे अखण्ड देवता उही के
मुझम आकर मग्न हुए हैं।
ये आंसू ये चिता के क्षण
मुझम आकर, पा परिवतन
जग के सम्मुख नग्न हुए हैं।
ओ रे भग्न नग्न मलिनो के
खण्डित उग्न विक्ल के सागर,
ओ कुरूप वीभत्स सनातन
की प्रतिनिधि प्रतिभा के आगर
अरे अशिव बौने मस्तक के
चिरविद्रूप स्वप्न आत्मा तक
अरे अमगल हास, घृणित आनंद,
मरण के सदा उपासक,
भय मत खाओ, अरे पिशाचो
जब कि सत्य तुम बने हुए हो।
अधकार मे, किसी आड में,
किसी झाड को छाया में तुम
क्या छिपते हो ? अरे भयकर
व्रण से जग की काया में तुम
मैं स्वागत करता हूँ सब का
क्योकि प्रकृति से सूय-सत्य हूँ।
और जब कि तुम भय तने हो
मुझम जलते स्वण बनोगे
ज्वालाओ का नग्न नत्य हूँ,
नभ को पष्ठभूमि पर मेरो ज्वाला की छाया फिरती है
काल झुलसता है, मुझसे सब तस्वीरें बनती गिरती हैं।
पर यह कैसे ? जब कि तुम्हारे
लिए बना हूँ में प्रखर प्रभ
तार सप्ता

मेरे स्वण-स्पश से आकुल
होता है अपार जीवन नभ ।
मै उत्साह अनत, और तुम क्या उदास अति अक्षम ?
मेरी ममता हो जाती है पर कठोर औ' निमम ।
गवशोल मुझको मत समझो,
कि तु भार गुरु पाकर मैं भी
निज नयनो म हुआ भय हूँ उत्साहित हूं।
यह उत्साह सफद ज्वाल हैं
जो कि करप का महाकाल है,
इसम पडकर तुम भी श्वेत बनोगे तपकर ।
नाप कौन पायेगा तुमको
आओगे जब इससे नपकर ।
में केवल तुम पर जीवित हूँ
मेरी सास, वितु तेरा तन,
मेरी आस और तेरा मन,
तू है हृदय और में लोचन
महू पूण, अपूर्ण झेल कर।
में अखण्ड, खण्डित प्रतिभा पर।
में मैली आँखा के अदर ज्योति गुप्त हूँ।
में मैल अतर के तल म
धन सुपुप्त आत्मा प्रतप्त हूँ
में हूँ नम्र धूलि के कण-सा
में मजस पृथ्वी के मन-सा,
धन मृत्कण म सृजन-क्षण में,
मलिना म रह अग्नि विदु हूँ,
जीवन को सौन्दय शान्ति म
नभोविहारी रद इदु हूँ।
নন যদি
११

-
शुभ्रारुण किरणो से विम्बित
रजत नील सर उत्कट उज्ज्वल
जिसम अनलोमिल, अनिलोमिल
कमल खिले हैं वे रक्तोत्पल ।
मनामूर्ति यह चिरप्रतीक है
ध्येय धष्ट उर की ज्वालामय ।
मेरो प्रज्ञा का सृजन क्षण
ऐसा ऊष्ण गुभकर त मय ।
तार सप्तक

अन्तदर्शन
में अपने से ही सम्मोहित, मन मेरा डूबा निज मे हो ।
मेरा ज्ञान उठा निज म मे, माग निकाला अपने स हो ।।
में अपने में ही जब खोया तो अपने से ही कुछ पाया।
निज का उदासीन विश्लेपण आखो म आसू भर लाया ॥
मेरा जग से द्रोह हुआ पर में अपने से ही विद्रोही ।
गहरे मस तोप की ज्वाला सुरग जलाती है मुझको हो ।
आत्मवचना पीडित मेरा तिमिर मगन उर विम्बित मुख पर।
सिहर उठा मैं अश्रु-मरिन मुख, अपने अतर के दशन कर ॥
मैंने मरण चितना की, जव जोवन का था दद बढ चला।
मानवता का कटु आरोचक अपने को ही दण्ड द चला ।।
मेरा मन गल्ता निज म जब अपने से ही हार खा चुका।
दारण भोभ अग्नि म अपना प्रायश्चित्त प्रमाद पा चुका ॥
रक्त-सोत अतर से फूटा लाल-लाल फव्वारा दुख का।
आत्म-दाह की ज्वलित पिपासाके युग म आया क्षण सुख का।।
रक्त-सोत अतर से फूटा, मेरा गात शिथिल हिम शीतल ।
मैंने साक्षात् मृत्यु देख लो एक रात सपने म उज्वल ।।
मेंने यह जय बहा क्सिो से तो कहलाया अपना सूनी।
जीवन-दाह-शाति हित किसकी गाद अपक्षित कनी-ऊनी ।।
गजानन मुश्तियाध

आत्म सवाद
।
[ यह एक नाटवाय आत्म-गवाह जियम प्रकाराम बालनर वाश्य
काकाम नहा है। जो काष्ठकम ह व यथाय आमम्वाकृतियां ह और जा
उमक बाहर हद उसक यथाय रानलाइन ह । बाहा लिगामें य
रगान लाइजगन कामम आत है किन्तु कुछ क्षणाम भनका यथाय जवस्था
एकाएक खिंच आती ह। तब इन दाना विराध मनम चित्र-रूप-सा
सामन जाता ह । उसोको नाटकीय ढगम पर किया गया है।]
आज छदो म उमडती आ रही है बात
जा कि सादे गद्य म खुलती रही
जा कि साधारण सडक चलती रही
आज छाती म घुमडती आ रही है बात
रास्ता है पर है औ धैय चलता जा रहा है
(वितु उर म क्या उदासी शाप सी
प्रत्यक चेहरे पर लिपो जो राख सो)
प्राण है औ बुद्धि का भी काय चलता जा रहा है
वक्ष है, बल है हृदय म ओज भी तो कम नहीं है
(किं तु उर म अश्रु हैं अति म्लान भी
विवशता का है सहज अनुमान भी)
स्नेह है आदा है, औ तेज भी तो कम नही है
तक है औ तक का राक्षस हमारे बाहु म है ।
(किन्तु चिता गुनगुनाती असगुनी
मौन ल वठी व्यथा बनकर मुनी)
चद्र का माधुय उर के राहु म है।
चुप रहा तुम तार-सा आगे चला जाता सदा में ।
(भुनभुनाता यह हृदय चुपचाप है,
15
ठार सप्तक

गुनगुनाता जो मनुज का शाप है)
निझरा सा में चपल बहता चला गाता सदा म ।
मूर्ति में भव्योच्च, मदु-गम्भीर, तमय, पूजनीया
(कितु उर है हिम कठिन नि सज्ञ भी
हृदय म शका भरी है अज्ञ सो)
सत्य को व्यारया स्वय हू ।। (जो सदा है शोधनीया)
सफल हूँ (पथभ्रष्ट हूँ) अविजेय हूं (आधोन हूँ म)
हृदय मे घुन सा लगा रहता
(पाप यह दारण जगा रहता)
मै महाशोधक महाशय सत्य जल का मौन हूँ म
सत्य का मैं ईश में स्वप्न का हू परम सप्टा
(कि तु सपने ? प्राण को है बुरी हालत
और जजर दह , यह है खरी हालत)
उग्न द्रष्टा में स्वयं हूँ जब कि दुनिया माग भ्रष्टा ।
गजानन मुक्ति

व्यक्तित्व और खंडहर
[यक्तित्व विन्हा मी वारणाम विकद्रित हा परतु उमा लिए पुकार
अवचतनसे जा कि जीवन शक्तिका रूप ह निक्ट सम्बध रसती है। वह
समग्रताची जोर मनस्मगठनकी ओरका प्रयत्न केवर बुद्धिगत ही नहा गुद्ध
जीवनगत है । परन्तु यह विवे द्रीकरण अतर्गह्य विराध परिस्थिति विरोध
जात्मविरोधा के द्वारा शुरू होता है।
यह विवेद्रित व्यक्तित्व यानी व्यक्तित्वका खरहर किसी अबूझ
समयमें अपन गत वभवपर रा उटना ह। उसीका वल्पनात्मक चित्रण
निम्न कविता ह ।]
खडहरो के मूक ओ निस्पन्द से
उमडे अकेल गीत।
ये भूत से निर्देह भयकर
बेचन काले व्यथित गातुर
तिमिर नूपुर के अक्ल स्वर,
उमडे अकेल गीत।
हुए चचल भयद श्यामल
भूत सम आकुल अवेल गोत
रात म जब छा चुका खंडहर तिमिर म
तिमिर खडहर म,
घूमते उस कापती-सी वायु के स्वर म
अकेल गीत।
तम आवरण में लुप्त झरती धार के तट पर
रागिनी म म्लान तन-मन करण रोदन गीत
भर चला जाता विपिन के पात पुष्पा म प्रकम्पन
मिथिल उर गम्भीर सिहरन ।
७.
सारसप्तक

ये अकेले गीत
दव चुको जो मर चुकी है आत्मा,
खत्म जो हो हो गयी आकाक्षा,
व्यक्ति म व्यक्तित्व के खंडहर
गान कर उठने उमी के गोत ।
ये अकेले गीत, म्बरलयहीन गीत
मीन से बेचैन, लोचन-होन गीत ।
-
शोत रजनी कांप उठती
भर विजन के गीत, खंडहर गोत
से अकेले गीत, पत्थर गोत, हिम के गीत
अधी गुफा के गीत
वेचन भूतो से, व्यथित के स्वप्न से वे गोत ।
वे
ओ' दयनीय गोत,
कमजोर औ' कमनीय गोत,
उमाद को तृष्णा सरीखे गीत।
स्वप्न को विक्षुब्ध सरिता के भयानक गोत ।
निशि के अकेले औ' अचानक गीत ।
विपिन औ' नियर,
तिमिर के धन आवरण म, भावना के इस मरण में
हैं हुए भय स्तब्ध, तन निस्पन्द, दिग् रव-हीन
क्योकि आलोडित हुमा विक्षुब्ध गीतो का महा तूफ़ान,
ले तीक्षण स्वर-सागर-उफान ।
तम य म नम के प्रवाहित हो चला भूचार-सा यह गान
इस शोत स्वर ये
षष्टदायो स्पन-शर निपर प्रखर से
हुया आप्तावित दित बन वा सतत पमझोर प्रातर प्राण
गगनन गुनियोध

कष पुषा ,पुष ९नामा,
खत्म जो हो गयी, आकाक्षा ।
आज चढ वठी अचानक भूत सी इस बापत नर पर
विक्षुप कम्पन बन चढी जाती सरल स्वर पर
प्रश्न एकर कठिन उत्तर साथ लकर
रात के सिर पर चढी है, नाश का यह गीत वनकर ।
हस पडगो कर सहज प्रकाश का यह गीत बनकर ।
.
૦૨
तार सप्तक

में उनका ही होता
में उनका ही होता, जिनसे मेंने रूप भाव पाये हैं।
दे मेरे ही हिये बंधे हैं जो मर्यादाएं लाये हैं।
मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा,
मेरा अत और अथ मेरा,
ऐसे वितु चाव उनके हैं
में ऊंचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर गिर,
उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
में गहरा होता चलता हूं।
गजानन मुनियोध

हे महान् !
हे महान् । तर विस्तृत उर से
दृढ परिरम्भण यो क्षमता दो,
तर स्नेहाप्ण हदय का स्पदन
मुन पाने को आवुलता दो।
जिमम शिवा रहस्य सोर दे
सत्य कि विद्युत् विहलता दा।
जो तुझसे सघप कर सके
ऐसी उर म कामलता दो।
तुझसे कर सघप, स्पा से
तेरे नव चेतनता आये,
तुमसे करके युद्ध क्रुद्ध हो
जीवन यह ऊचा उठ जाये।
तेरे तन के अणु अणु से तव
निरावरण हो अतर्वाला,
एक एक अणु सत्य खोल दे
ऐसी सतह स्वय चल आये ।
तेरे उर की मम-ज्वाल का
मुक्त खोलने की ममता दो,
हे महान् । तव विस्तृत उर से
दढ परिरम्भण की क्षमता दा
७४
तारसप्तक

पुनश्च -- पिछी वास वर्षोम न मालूम कितनी बातें घटित हुइ ह । व सबके सामन ह । मेरो अपना जिन्गा जिन तग गलियाम चरसर काटती रहा उन्हें देखते हुए यही मानना परता है कि माधारण शेणाम रहनेवाल हम रागाना अस्तित्त्व-सघपके प्रयासा हा ममाप्त हाना है। मरा अपना प्रतीष अनुभव बताता ह कि व्यक्ति-स्वान व्यका वास्तविक स्थिति कवर उना लिए ह ना उस स्वातन्त्र्यका प्रयाग करना रिए सुपष्ट आर्थिक अधिकार रखते हा जिमस वि व परिवार-महिन मानवाचित जीवन यतात कर सकें और साथ ही व्यक्ति-स्वातत्र्यका एमा प्रयोग भी कर सकें जा विवपूण हा और रज्या मुख हा । अपन जोबना आर्थिक आधार का दर और मुपष्ट करनके लिए व्यक्निक व्यवमायावरणका माग भा मामने भाता ह । मर गमे यह अयन्त अनुचित माग ह और कम-म-बम म उस भा स्वावार नहीं कर पाया लेकिन वह माग ता सामने आता हा ह और व्यवसायावरण-व्यापारावरणका दवाव ता तीनतर हाता जाता है। सच ता यह है कि यक्तिका मच्ची आम-पराक्षा उमा आध्यात्मिक गक्तिका परीक्षा सवम प्रधान समय, उस इम्तिहानका सवम नाजुष' और यहा बाजवा युग है। जावन और परिवाका विपमनाया यह स्थिति आभ्यलर राकम भा दुस्थिति उत्पन्न करतो ह यह एक दााण सत्य है । म कहू कि यह मरा अपना भा सत्य है । परिणामन स्वाधानतावं इम युगम मरा कविता सघन बिम्ब-मारियायाम अधिकापित प्रकट हान रगी। अचानक अतरमुत्र दाए और मा दीप और गहन हाती गया। किन्तु यह भी एक तथ्य है वि इग आमप्रस्तताक वावजूद और नायर उमा माय ग्यि ग्यि मरा आम मादन समाज व्यापर तर हार ठून -गा। पविनाराब'वर भी दीपतर होता गया। परिणामत मेरो पविताग बाचित मार्मिक पत्र पत्रिकामा प्रशासन याप्प भी नगे रर गया। महो जा नया पविता दाना रही ह और जा सन् १०६३ को हा गजानन मुश्क्षिवाय ७५

रचना ह अपनात घाटी है। इमम और घाटी रचनाएं शाप म अर
लिख नहीं सकता। भाव प्रकृनिया सयालम या कविता मरा प्राय
सर्वांगीण प्रतिनिधिव वरती है। जमा वि मापनम हो सरह वह मरी
इस टिप्पणीका और आग बनाती ह और काचित उमा वा यह रिपणा
भो अनावश्यक हो जाती है।
-गजानन मुक्तिबोध
तार सप्तक

एक प्रात्म-वक्तव्य
और, जव
मेरा सिर दुखने लगता है,
धुंधले धुंधरे अकेले म, मालोचना शील
अपने म से उठे धुएं को ही चक्करदार
सीढिया पर चढने लगता हूँ।
-
और हर सीढी पर शुढकी पडी एक-एक देह
आलोचन-हत मेरे पुराने व्यक्तित्व,
भूतपूर्व, भुगते हुए, अनगिनत में।
उनके शवा, अध शवा पर ही रख कर
निज सव-स्पश पर,
मेरे साथ चरने लगता भावो-कर-बद्ध
मेरा वतमान ।
विन्तु, पुन पुन,
,
उन्ही सीढिया पर नये-नये आरोचक नेत्र,
( तेज नाक वाले तमतमाये-से मित्र )
खूर काट छाट और गहरी छोर-छार,
रदा और वसूली से मेरी देख भाल,
मेरा अभिनव सगोधन अधिरत
क्रमागत ।
अभी तक
सिर में जो तडफडाता रहा ब्रह्माण्ड,
गजानन मुक्तिबोध

लसडाती दुनिया का भूरा मान चित्र चमकता है दद भर अधेरे म वह क्रमागतकाण्ड। उसम नये-नये सवाला को थखमार, थके हुए गिरते पडते, बढने का दौर, मार काट करती हुई सदियों को चोस, मुठभेड करत हुए स्वार्थों व वीच भोल भाल लागा के माथा पर घाव । कुचल गये इरादो के बाको वचे धड अधक्टे परा हो से लात मार कर अपने जस दूसरे के लिए सन करते हैं दरवाजे वाद- उल्टे दिल दिमागो में गुस्स को धु ध। अधियाली गलियो म घूमता है, तड ही रोज़ कोई मौत या पठान मागता है जिन्दगी जीने का ब्याज, अनजाना कज़ मागता है चुकार म, प्राणो का मास । हताहत स्वय को हो दर्दीली रात- जोड तोड वरती हुई गहरो काट छाट, रोज नयो आफन, काई नयो वारदात । पूरे नही हो सके है मानवीय योग हर एक के पास अपने अपने गुप्त रोग। (परशान चितका को दागनिक योख ) उजली उजली सपदी म कोखा की शम, ( अधबने समाधानो) तारसप्तक - भ्रूणो का, अघरे म, क्रमागत जम, सजन-मान उद्गार धम । सताग्रही, अथाकाक्षी शक्ति के कृत्य, और, मेरे प्राणा म सत्यो के भयानक केवल व्यग्य नत्य, व्यग्य-नत्य !! - उसी विश्व यात्रा म, चटटानो बोच, किसी झुवी संवलायो सांझ मुझे मिला (हृदय प्रकाश सा ) अकेले मे बिजली से जगमगाता घर, जिस के इद गिद कुछ अधियाले पेड़ मानो सधे हुए, घने बहुत घने, बडे बडे दद। अचानक घर मे से निकल आया एक चौडे माथे वाला, भोला, प्रतिभा का पुन दुबला वाल मुख । पहचाना मुझे, और हंस चुप चाप, मेरे साली हाथो मे रख गया दीप्तिमान रल- भयानक वीरानो म घूम कर खोजा था जो सार सत्य आरमधन छटपटाती किरनो का पारदर्गा मबाट ज, गजानन मुनिपाप किरनें कि जालोचनाशील, धारदार उपादान जिन की तेजनाका असम्मात् मरो काट डाट छोल डाल लगातार। इसी लिए, मेरी मूर्ति अनबनी अधबनी अभी तक जिस लिये कहा जाऊ, सना हो का प्रश्न । अपने इस जघबने पने का गरीब यह दृश्य पा न जाय, सभाआ म, कहो तिरस्कार, अथहीन समर्थों के द्वारा कहीं वह निकाला न जाय । इसी लिए मुझे प्रिय अपना अधिकार गठरी म छिपा रखा निजी रेडियम, टोकरी मे छिपाया है मैं ने कोई यीशु, अपना कोई शिशु । सिर पर, - परतु मैं किसी पेड-पोछे से झाक लाख-ताख आखो से देखता हूं दृश्य, पूरे बने हुओ हो के ठाठदार अक्स, ऐसा कुछ ठाठ- मुमे गहरी उचाट, लगता है व मेरे राष्ट्र के नही है। उचटता ही रहता है दिल नही ठहरता कही, ८० तार सप्तक

जरा भी।
यही मेरी बुनियादी बराबी।
और, अब नये-नये मेर मिन-गण
मेरे पीछे आये हुए युवा-बाल-जन,
धरितो के धन,
खोजता हूं उनम हो
छटपटाती हुइ मेरो अह,
क्या कही वहा मेरा पक उपमान,
छिपी हुई कही कोई गहरी पहचान,
समशील, समवर्मा कही कोई है ?
अच्छा है कि मटाल म फ्का गया में
एक प्रेम पत्र,
क्तिावा मे डाल, बद कर दी गयी अग्ल,
काली-काली गलिया म
फिरती हुई आदमी की शक्ल,
अच्छा है कि अंघरे मे इलाका-बदर
में है जवावी गदर,
जिससे कि और ज्यादा तैयारिया कर
आज नही क्ल फूट पड़ गा जरर,
जहर।
असायक इत्यादि जना का में भाग
इमोलिए, अनदिने,
सुनगाता धीरे-मे आग,
जिमो प्रकाश म, तरियाये चेहग पर आप
संवदित पान को यापनी हो
गतामा गुणियाध

उठती है भाफ तुप चाप सच्चा है जहाँ अस तोप, मेरा यहाँ परिपोप। वहाँ निवाला पर टंगत हैं भिन मान चित्र, चिनगियो वरमाते लगातार विचारा व मत्र, मेरे पाम चरिमा की आमा को अंगारी ज्योति रहम पर पढ़ती है मेरा प्रेम-पत्र । यांपता है वग मूल अय भरा राशिवी पोई स्मित स्निग्ध । यथार्थों से चला हुआ स्वर्गों तक पहुंचता है गणितो का विरणीला सेतु पृथ्वी के हेतु। लकिन हो, उसी के लिए दिन रात नये नये र दो और बसूलो से लगातार लगातार मेरी काट छांट उनकी छोल छाल अनिवार । ऐसी उन भयानक क्रियाओ मे रम क्टे पिटे चेहरो के दागदार हम बनाते हैं अपना कोई अलग निक काल, पथक आत्म देश- दृष्टि आवेश! क्षमा करें, अय मति अय मुख मेरे परिजन ! २ तार सप्तक भारतभूषण अग्रवाल

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।
[ अग्रवाल, मारतभूषण जम अगस्त १९१९ में मथुरामें गिना
मयुरा, चौमी और आगरामें पाया । सन् १९४१ में एम० ए० पाम
क्यिा । गन् १९४५ में विवाह हुआ। सन १९४१ में अचानक रक्त्ते
या टपका और तवम इस महानगराके विशार जाल्में फ्मा हू-नौकराके
चकारमें।
कविता वहाना नाटय व्यग्य लिखन ह । प्रकाशित रचनाआम दा
कपिता-मग्रह और एक एका ह । 'तुव चमकारन मुझे कविताका आर
आवर्पित किया और गुरुम गुणा भागकी तरह कविता लिखा-गिन गिन
पर। इस बार भा लिखत रहे इस साहबतका असर बतात हे जा
वि अब दूर हाता जा रहा है ।
'गोर दा ही चाजाका-मिनमा और मिगरट । आजवर राजनाति
पा अध्ययन मटा एगता है। माक्सवादका आजब समाजव लिए रामबाण
मानता हूँ। कम्युनिस्ट हूँ।'
१९४३-
अब कम्युनिस्ट नहीं है। यही नहीं पर ता रगता ह कि जब
बहता था तब भी नहा था। महानगग विगार जालमें एक फांक
पार जा भागा ता हाथरसी तरयामें जा पडा । मिल्में काम उसाम
रहना निम मिर-मारिया हुकुम बजाना और रातम साम्यवाटा साहित्य
रिपना-गना। तान माल मिलका नौतरीके बाद प्रतीर म इलाहाबाद
पिर आवाणा में । ' कहावती बारह वप वातन वाट यहाँस मुक्ति
पावर साहित्य अकामाम सहायक मात्रा है ।
'गिवनमें सावतका अमर सा रग राता रहा। मिलम रहत च्याह
मारिया गीत भी रिस थे, ता रडियाम रटत नात्य और पर भी ।
तुक्ता या प्रारम्भ भा मिरमें ही हुआ था। वामा में रहत हुए
पहरा उपनाम 'सैरती रहरवा कांसुरी लिया।
कविता-मग्रह जागते रहा ये या परबत्ता छाडा था (१९४५)
'मुक्ति माग के घाट हाथरम ( १९४८) और 'ओ अप्रस्तुत मन में या
.
मारतभूपण अग्रवार

आकाशवाणी ( १९६०)।' नया कविता-सग्रह छपात डर रहा हूँ कि कहा
अकादेमी न छूट जाय । पर वचनक डरूगा । (यह सग्रह भी छप गया
ह- अनुपस्थित लोग।)
.
तार सप्तक

वक्तव्य सूल्की प्रारम्भिक भाआमें दूसरा पद्याको कण्ठस्थ कर उनकी आवृत्ति करनेन ही सम्भवत मुझे कविताको ओर प्रेरित किया और क्योकि तुक' के कारण कण्ठम्य करनमें सुविधा होती थी इसलिए अनजानमें हा तुक्को म महत्त्वपूर्ण मानने ग गया। फल यह हुआ कि कुछ ही दिनाम म तुकादा करन लग गया जिनमें जो यूनाधिक भाव होते थे वे सब उधार सात वि याम मेरा अपना । और गलत तुक या कमजोर तुकको कविताको रद्दी कविता माननेका मेरी आरत तो बहुत दिना तक बनी रही। सूरको मीटिंगामें और उत्मव-आयोजनादिमें मुये पद्य-आवृत्तिका जो यह पाय करना पड़ा उसीने मुझसे कविता लिखायी। "यह मेरा लिखी नहीं ह कहते कहते म इतना तग या गया कि मरे अचेतनने निश्चय ही अपनेको इस गुण-गौरवसे विभूपित करना चाहा । इसीलिए मने प्रारम्भमें केवल सामयिर अवमर त्यौहार-पव आरिवे उपयुक्न पविताएँ हो लियो । और दूमराकी प्रासाका रोभ ही मेर काव्यको आदि प्ररणा थी। तब कविता लिखने में जो तकलीफ मुथे होती थी उमको कुछ-कुछ इम्तहानमें प्रश्नोत्तर लिसनेको तकलीफ्को तरह म रेता था जिसका फल मीठा और शानदायक होता है । मेरी शुस्की इन रचनाआम जिन्हें आज पढ़नेपर हमी आती ह मथिलीशरण गुप्तकी उपदेशात्मक परीका प्रभाव बहुत ह । क्यावि एव ओर उसका अनुकरण जितना आमान है दूसरी ओर श्रोतामाको अनायास समयना भी उतना ही। इस प्रकार अभ्याम करते-करते तु और पन्नोंपर वा प्राप्त कर ऐनर वार जव म वारेजम पहुँचा तभी धीरे धीरे मेरी पविताओंमें अपनी बात आन रगी। दूसराकी चार कविताए पर रेनेके चार अपनी एर लिग ऐनाी रोतियो छोट अब में उन याताका बढेरी क्षमता और माहस पा सका जिन्हें में स्वय अनुभव करता था। और फिर एक और अपनी अति भावुत प्रातिके दूमरी ओर हिन्दी सारित्यने विशेष मारसमूपण अप्रयार माह तोमरी आर कति हानकी अपनी विशपता गौरव और नामक और चौथो आर कवितामें एक अजाव पति पानवे कारण मन नारी कविताए लिखी जिनमें से अधिकाग खिनके पिही लिखी गयी थी और आज जब भरा कान्य-लेखन काफी कम हो गया है और म क्ला क लिए को प्रवचना मूल कारणको समझ पाया हूँ साय ही उमर उचित उपयोगको भा तब पर बात स्वीकार क्यि बिना म नहीं रह सकता कि मरा य कविताएँ मर रिएक्वट एव पगयन हा नग वरन् एक स्वप्नलाक भी थी जहाँ मन अपनी ममस्याआमे भागकर कवर गरण ही नहीं रा वरन् साथ हा अमामाजिक नाले पक्तित्व-गरा उत्पन अपनी असम्भव इच्छाआवो पूति भी दखी । इमालिए मुय अपनी कवितापर इननी मोह-ममता रही और इमालिए म उनको अपना सम्पत्ति मानता रहा। आजकी सामाजिक यवस्था और उसकी आरगत आर्थिक व्यवस्था एक माय-वगक नवयुवकको अप्राकृतिक पस महत्त्वाकाभी और स्वप्ना भिलापी बना देती ह क्यापि एक ओर तो वह अपने स्कूल और कालेज में पाई जानवालो पाठच-पस्तकासे अपन-आपको महान यक्ति ( इपिवि जुअल ) बनान की सोचता ह और दूसरी ओर ऊपरक वगको ए वय गालीनता उसे सहज हा आकर्षित करती है। और जो अतिभावुक होता ह वह अभिलापाआका शिरार होकर सोदयवा भूमा पनार रण्ड खानवाग रगीन कवि हुए बिना नहीं रह सकता । अपन अनुभवमे म इमौलिए यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि कम-से-बम मझ मरा कवितान भावाका उत्थान (सरिमेन) नहीं दिया न उसन मरे हृत्यका परिष्कार किया। दूषित समाजो मुझ जो असामाजिर कमजोरियां और गलित स्वाय दानमें रिय मेरी कवितान उन्हीकी पीठ ठोकी। समारको सन्चा मानकर उसमें नम करना क्याकि वास्तविक क्षमता और सामथ्यको अपना रखता है इसीलिए मन कविताए लिबार मानो स्वप्नमें अपनी अभिलापाए पूरा की और ससारको मिय्या सिद्ध दिया। वर्भसे पलायन हा भरी पविताआरा सन्न रहा। यक्तित्वा व सार डव जो दूसराको काटन दौडते ह, समाजम रहने-सह) से टूट जात ह रेक्नि इम पलायनका पल यह हुआ कि मन उहोक विषको अमृत समझा। आजका हिलो रवि इतना दम्भी अबमण्य और C तार सप्तक बमामाजिक “यक्ति क्या होता ह यह मुझे अच्छी तरह मालम हा गया है। और इमोरिए यदि कविताका उद्देश्य यक्तिको कार्ड और समाजको यवस्था बीचके मम्बधको स्वर देना और उमको शुभ बनानेमें सहायता करना ह तो हिटोके कविको समाजसे नाराज़ होकर भागनकी बजाय समाजकी उस गोपण-सत्तासे रना होगा जिसने उसको कारा स्वप्ना भिलापो और कल्पना विलामो बना छाना ह और जिमने उसको अपनी कविताका ही एकमात्र सम्पत्ति माननके भ्रममें डागह। इम सघपके पथपर-वे अपन अनुभवाको यरि वह पद्य-वद्ध करेगा ता पायगा कि उमरी कविता केवल मम-स्पी और साक्न हो नही वरन माथ ही उमको अधिक नानी और सामाजिक बनानवागे भी ह । तर कविता उसके हाथमें एक मूयवान अस्त्रका भाति होगी आजकी तरह अपार्थिव अस्ति त्वहान फूगकी सेज नही। -भारतभूषण अग्रवाल भारतभूपण अप्रगर "

अपने कवि से
१
कितनो सचित जीण, वृद्धा हो गयी आज कवि की भाषा।
कितने प्रत्यावतन जोवन म चचल लहरा के समान
आये वह गये काल वुवुद सा उठा मिटा पर परम्परा-
अभिभुवन अभा परिवर्तित हुई न परिभापा
रूप की “यक्ति की । नव विचार, नव ज्ञान रीति,
नित नित नवीन जीवन के स्वर पर प्राचीना
अव भी है वाणो की वीणा । कुछ अनुभव करते प्राण
कि तु अभिव्यक्ति अय ही कुछ देती है उसे गिरा ।
इस भाति आज कवि के अतिशय उत्कट विचार, सुग्व
दुख प्रतीति
रह जात हैं कल्पना मात्र । सब बधन से दुप्चर ब धन
है शब्दो का जो नहीं निकट आने देता कवि एव उसकी
आत्मपूर्ति
को जग के भौतिक सत्यो के, छाया के सदृश अथहीना
करता है उसकी वाणी को। कैसी विडम्बना स्थिर साधन
यद्यपि चिर गतिमय साध्य देवता बदल गये बदली
न मूर्ति ।
२
कवि। तोडो अपना र जाल जो आज खोखला शूय हुआ
यह है अपने पुरुखो को वभव भागमयो कलुपित वाणी,
मन्मत्त विलासिनि । त्याग इसे । बनना है तुझको तो
अगुआ
१०
तारसप्तक

-
युग का, युग की भूखो, कमजार हडिडया का, जिनका पानी
है उठा खोल, घिर रहा विश्व पर घटाटाप वादल बन कर ।
बज नहीं सकेगा तेरो इस मधु की वशी पर इनवा स्वर
गजना भरा। सड गयो आज यह गिरा अवल, घिस गयो व्यक्ति
छवि कनक प्रवाला के जाला म खो वठी यह आत्म शक्ति
युग के मानव के सुख-दुख, आशा प्रत्याशा वा प्रतिनिधित्व
इसके कण्ठ से नही सम्भव । यह सदा स्वग-वामिनी रही
अप्सरा वनी। जाने दे इसको स्वग, खोज ले आज मही
अपनी मिट्टी के पुतला के शब्दा म हो अपना कवित्व ,
हमको न जस्रत आज देव वाणी को, हम खुद ढालेंगे
जीवन की भटठी म भाषा, जी चाहा स्प बना लेंगे ।
३
इस छायामय भापा ने कर डाला असत्य, अपदाय, हीन,
तर रघु जीवन का था जो एकात सत्य-तेर विचार
म केवल जो था सार -वही तरा प्रेयसि के लिए प्यार ।
तू भूल गया, अनान ! रूप है मास, रक्त, मत्तिकाधीन
शब्दाडम्बर चक्र म भात । अप्सरा बना डालो तूने
पोडा-वर्षीया स्पयती वह पढी लिखी लडकी । पागल !
तू सुनता रहा मधुर नूपुर ध्वनि यद्यपि बजती थी चप्पल ।
तू साचा किया भाव-वाचक है तत्त्व-गूय, जिसको छूने
को भी चेप्टा है व्यथ । दूर या भाग गया तू जोवन से
तू सदा साचता रहा 'मुक्त हो जाऊ जग के वचन से
उह कर दिगत के पार' । सृष्टि का पाया तूने क्षण भगुर
निज दिव्य-दृष्टि से । रे । तेरी यह भापा तो है मात्र मुकुर,
उस दान का जिसने देखा बस जासमान थोथा-नीला
नश्वरता से डर कर जिमने दसो न प्रति चिर गतिशीला।
मारतभूषण अप्रयार

जीवन धारा सघन बफ की कडी पत सी एक-एक कर अमित रूढिया सदियों से जमती जाती हैं तह पर तह मानव-जीवन पर। तह पर तह- ये आज ठोस दीवार बनी हैं रोक रही जीवन की गति मन की उनति । अवरुद्ध आज जीवन धारा- युग-युग से प्रचलित भय निर्मित इन अमित रुढिया की कारा ने बाध लिया मानव का मन, जग का जोवन । आगे बढने म विफल व्यथ असमथ आज जग जीवन की सरिता का जल हो कर बेक्ल है फोड फाड निकला बाहर दोना कूला के इधर उधर रसमय वसुधा के अचल को कर के दलदल। अवरद्ध माज जीवन प्रवाह । तार सप्तक निष्प्राण मोन, जडता की जजीरा म जकडा भीत हृदय हिम शीत मत्यु के क्षुण्ण-स्पश से आज बना निर्जीव, न उसम शक्ति कि कर भी ल वह कुछ चीत्कार-आह । सब आर आज गतिहीन शाति, अस्वस्थ धरा, अवरुद्ध वायु, निस्तेज गगन गंदला, अशुद्ध जग का जोवन । जग की रग रग म जमा हुआ हम त शीत, पतझार पीत। पर भय क्या है ।-अव दर नहीं हम अग्नि शिसा प्रज्वलित करेंगे जिसके सम्मुख एक बार ही गर गल पिघल जायगे सार हिम के प्रस्तर । एक बार फिर जीवन पायगा अपनी उ मुक्त धार, निच र प्रगति टूटेंगे गति के पथ म आये ढिग्रस्त मानव के मन के भाव- बध फिर से समस्त जग म छायगा नव प्रकाग नव-नवोत्लास, नव गीत उद । फिर एक बार, हिम की धारा को ताड फाड । अक्षय, प्रशस्त, जीवन धारा वसुधा का चौडी छाती पर सवर, अमद, यह पायेगी मग सरसाती पल-पल गातो। फिर मय क्या है |अब देर नहीं हम लाते हैं वह वह्नि-तज भारतभूषण अप्रवाल ९३ जिसक स्फुलिंग की ज्योति विदु स मिट जायेगा हेमत शोत मिट जायेगी इस कडवी जडता की सहाध हम दख रह टक्टको बाध- उग रहा पूर्व म नवालोक अभिनव वसत। अब देर नही- विकसित होकर जग का शतदल खाल्गा अपनो मुदी जाख । जागति की किरणास ज्यातित होगा अशप जग का प्रागण , सौरभ स पूरित निग गित । तारसप्तक

सीमाएँ आत्म स्वीकृति
है श्रात तन, है क्ला त मन, मैं आज हूं निष्प्राण ।
आगे विठो है राह
जानता हूँ यही है वह पथ कि जिस पर मिल सकेगी मुक्ति
मेरी और सब की मुक्ति,
जानता हूं यही है वह पथ कि जिस तक पहुंचने की
थी हृदय म चाह
जो म था अतुल उत्साह ।
फडा करके जी, कमर क्स, चल पडा था उस दिवस अम्लान
वचितो के स्वत्व-सगर म चढाने एक निज का दान
सोचता था अब हुआ जीवन सफल, अब मिट गया अधियार
छूटे भर हमारे वध
तन के और मन के वध
सोचता था क्षुद्र मन के स्वाथ पर ही था विगत आगार
में था मूढ, में था अच।
या तोड नाते, छोड चिन्ता, एक निश्चय की संभाले टेक
मैं चला बनने अनेका सैनिका म एक ।
तव नही में जान पाया था -~कठिन है राह यह क्तिनो,
तय नही में जान पाया था-क्षणिक है म्फति यह इतनी।
आज है अचरज यही अत्यत
उस महा आरम्भ का हा। क्षुद्र ऐसा अत
दूर है, मजिल अभी मेरी बडी ही दूर
किन्तु में तो बीच म ही आज या कर चूर
मारतभूषण भप्रयास
९५

गिर पडा हू राह पर ।
जा रहे हैं माथ क वर वीर पम उमर
वितु मैं अपने निजी कुछ माह म, कुछ मूग आग में
इस अपूण अगस्त मन की स्वाभिरापा म
अटक करके रह गया हू स्वय अपने जाल म
वगवानी हृदय व क्टु व्यूह अति विकराल म
आज पहली बार मुथको मिल सका है नान मन को परिधि वा
असहाय सीमावद्ध अपना गनि का।
गक्ति जा या चाहता है पर जाय विश्व भर को सवना
अपहरण को नाव पर
वितु सोमा म बघो, आकुल घिरी पथ-हारिणी बन कर
फूट पाती है नहीं
ढूढ पाती है नहो निज राह ।।
मानता हूँ-सभी सीमाएँ सदा मन जात
वितु मन क्या मुक्त है, उस पर नही क्या अपर व धन
जम जिस परिवार म मैंन लिया है
जिस तरह की परिस्थितियो से यहा तक आ सकी है
ज़िदगी की सडक मेरी
घूमती फिरती, अनेको माड पर से काटती चक्कर
.
उन
परिस्थितिया का पिता है वग और समाज पूंजी का
और, मेरे विक्ल मन की सभी सीमाए
वही स नि सत हुई हैं।
तार सप्तक

मसूरीके प्रति
१
माना असत्य, कपना मात्र परलोक , रितु री ममूरी !
तू सय स्वग इस वमुधा पर । तरे अचल की छाह तल
पलने हैं देव-तुत्य नर-गण । विमला की पुरी अये विमा
कर ताप सरा यह पापो, काला नर-समाज तेरी दूरी?
तेरा पथ है अत्यन्त अगम । विरल ही जन जा पाते हैं
स्वण की सीढियो पर चढकर । वह देख उधर, वे आत हैं
दो चार कुली-पथ्वी की हत मागिनि निरीह स तान-~-
अवल कचा पर भार वहन करते । ये ही हैं वे सोपान
सपर जिन पर पग घर, वैभव के मद में झूम, चढे
तुझ तक माया करते हैं तरे वरद पुत्र, तव वन्दनाथ
तल प्रान्ता को उनप्त यातना से बचकर । केमे वे चाटी
के टुक्डे ।
जो दुस को अपने परस मात्र से सुम्ब म करते परिवर्तित,
जिनका अभाव इन मत्य-लोर के वासी दीना को वशात
रसता है रौरव की लू म, जीवन भर ज्वाला म पोहित ।
२
मैंने अपनी आँखा दर हैं व वादल जो चरणो म
आनत, प्रतिपल गीतल परते रहते हैं तेरे प्रागण को
जब पुरुस रहा होता है निधन जग प्रयकर स्पटों म,
जो तल ये नद-सागर के जर के वणवण का गोषण करने
तुझ पटरानो वा करते हैं अभिपेर । रम्य रम-वमना उस
रमणी-गण को
माराभूएणभप्रवास

मैंने देखा है, जो गाती रहती हैं कल-कल निझर के
स्वर में अपना स्वर डुबा, हुरास विलामो म भर भर मस्ता,
जब चीसा करती है क्षुधात नोचे मैदाना को वस्ती ।
हा, मैने अपनी आँखो देखा है विभेद यह, यह विरोध
जो साधारण घटना है अपनी पूजीवाद प्रणाली को,
जो है तेरा आधार-स्तम्भ, जिसका विनाश दो दिन ही को
है बात यातना ने जिसको विश्व को दिया है नया बोध ।
आज के मदिर सुख म, रगीनी मे भूली ओ री अलका।
कुछ तुझ ध्यान भो है कल का, शोपित दल के उठते बल का?
९८
सारसप्तक

अहिंसा
1
खाना खा कर कमरे म बिस्तर पर लेटा
साच रहा था मैं मन हो मन 'हिटलर बेटा
बडा मूख है, जो लडता है तुच्छ-क्षुद्र मिट्टी के कारण
क्षणभगुर ही तो है रे । यह सब वैभव धन ।
मत लगेगा हाथ न कुछ, दो दिन का मेला ।
लिखू एक खत, हो जा गा धीजो का चेला
वे तुझको बतलायेंगे आत्मा की सत्ता
होगी प्रकट अहिंसा की तब पूण महता।
कुछ भी ता है नही घरा दुनिया के अन्दर ।'
छत पर से पत्नी चिरलायो "दोडो, बदर।"
भारतभूषण अप्रवाल
९९

फूटा प्रमात
फूटा प्रभात, फूटा विहान,
वह चले रश्मि के प्राण विग के गान, मधुर नियर के स्वर
झर झर पर झर।
प्राची का यह अरुणाभ क्षितिज
मानो अम्बर की सरसी म
फूलरा कोई रक्तिम गुलाब रक्तिम सरसिज ।
धार धार
लो फ्ल चरी आलाक रेख
धुल गया तिमिर, वह गयी निशा ,
चहु आर दख
धुल रही विभा विमलाभ काति।
अब दिशा दिशा
सम्मित
विस्मित
खुल गये द्वार हस रही उपा।
सुल गये द्वार दग, खुल कण्ठ,
सुल गये मुकुल ।
शतदल के गोतल कोपो से निकला मधुवर गुजार लिये
खुल गय बघ छवि के बधन ।
जागा जगती के सुप्त वाल ।
पलका की पखुरियां खोलो, खोलो मधुकर के अल्स वध
१००
तार सप्तक

दृग भर
समेट तो लो यह श्री, यह काति
वहीं आती दिगत से यह छवि को सरिता अमद
झर झर झर झर।
फूटा प्रभात, फूटा विहान,
छूटे दिनकर के शर ज्यो छवि के वह्नि-वाण
(केशर फूलो के प्रखर बाण)
भालोक्ति जिनसे धरा
प्रस्फुटित पुष्पो के प्रज्वलित दोप,
लोभरे सीप।
फूटी किरणें ज्यों वह्नि वाण, ज्यो ज्योति शल्य,
तरु-बन म जिनसे लगी आग।
लहरो के गोल गाल, चमक्ते ज्या प्रवाल,
अनुराग-लाल ।
भारतभूपण अप्रवास

प्रत्यावर्तन
सचमुच मेरे मन म है यह विस्मय अपार ।
किस भाति लौट कर आ जाती हो बार बार
तुम मेरे जीवन म, ओ गीतो की प्रतिमे ।
म खो खो कर भी पा जाता हू प्रति दिशि म
तेरे चरणो की चपल चाप । जब-जब कठोर
हाने का निश्चय कर में बरबस मुसका कर
तुमसे कहता हूँ आज विदा आखिरो, प्राण ।
तुम व्यथाशूय अपने नयनो की सजल कार
से जैसे लिख देती हो अपना प्यार अमर
तुम जैसे कह देतो हो ओ । मेर अजान ।।
यह सब किससे, जिसका है तेरे सपनो पर
चिर आधिपत्य मै आज समझ पाया हूँ यह
जिस सहज भाव से अनायास ही तुम प्रत्यह
मुझको करने देती हो अपना मुक्तियास
उसम रहता है निहित तुम्हारा अविश्वास
मेरी क्षमता पर, मेरे प्राणा के बल पर ।
है आज भरा मरे मन म सचमुच विस्मय ।
क्या तेरा सम्मोहन है इतना ही अटूट ?
क्या मेर जो म है इतना ही प्रबल प्रणय ?
क्या सचमुच ही तेरी आभा के क्षुद्र विन्दु
म व दो है मधु का समुद्र, स्नेह का सिंधु
जो मेरे अनजाने में ही प्राण म फूट
लाता है मुझका बहा-बहा तरे तट तक ?
तार सप्तक

में विस्मित हूँ भाषण का वह लघु अकुर
क्सि भाति अचानक आज बन गया अमरलता
आच्छादित कर के प्राणो को बतलाओ मेरी निबलता।
किस पावक से जल उठते हैं वे आद्र-पलक
जब डूबा रहता है सुधि तम मे अत पुर
किस देवयोग के मधु विधान सी तुम पथ म
चौका देती हो मुझको फिर फिर,
भर भर?
री वोलो किस स्वर्गीय गान के मधुमय स्वर
ने गूंथ लिया है अनायास लय बना हमे ?
7
R
मागभूषण अप्रगट

मिलन छलक कर आयो न पलका पर विगत पहचान, मुस्करा पाया न ओठो पर प्रणय का गान , ज्या जुडा आँख, मुडी तुम, चल पडा में मूक- इस मिलन स और भो पोडित हुए ये प्राण । - तारसप्तक

विदा वेला
पाया सनेह पा मरीन पर तुम जभी विदा रीति का मान
पगली । विछोह को बरा म जिन मांगे ही प्रोति का दान
दो मुथ । वहा इस अतिम पर म एक वार प्रियतम' धोम
पूछो पर लौटोग वम त म वपा मशारद श्री म?
ात की शवगे म मरल मित रह जाआ नतमुख उदास
राज म दबो। पर जर यह पल हागा अतीत, तब अनायास
मुसरित हागी यह नौरवता वन यया, वियोगी प्राणा म
साचोगा वार बार 'क्यो । म, मुम्कानो म
दुप-मुप पी उस अद्वितीय घडो का दिया न मैंने अमर"
प्रिया
यह कमा तुम्कलपायगी
क्या मेंन प्रिय को अश्रुपिये
नयनो स नहरा रिया न, सचित किया न क्यों कुछ
आश्वामन
इग विरह-वाल के लिए हाय भर आलिंगन पाकर चुम्बन ।
तर
.
"
माराभूपण भरार

चलते चलते
।
में चाह रहा हूं गाऊ केवल एक गान आसिरी समय
पर जो म गीतो की भीड़ लगी
में चाह रहा हूँ, बस, बुझ जायें यही प्राण रुक जाय हृदय
पर सासोम तेरी प्रीति जगी
इसलिए मौन हो जाता है स्वीकार करो यह बिदा
आज आखिरी बार
मत समझो मेरी नीरवता को यथा जात
या मेरा निज पर अनाचार ।
म आज बिछुड कर भी सचमुच ही सुखी हुआ मेरी रानी ।
इतना विश्वास करो मुझ पर
मैं सुखी हूँ कि तुमने अपनी नारी-जन-सुलभ चातुरी से
बिखरा दी मेरी नादानी
पानी पानी कर के सत्वर
मैं सुखी हूं कि इस विदा समय भी नही नयन गोल तेरे,
में सुखी हूँ कि तुमने न वटाये कभी अलभ्य स्वप्न मेरे,
मैं सुखी हू कि कर सकी मुनो तुम निर्वासित या अनायास
में सुखी हू कि मेरा प्रमा- बन सका नहीं तेरा विलास ।
में सुखी हू कि-पर रहने दो तुम बस इतना ही जानो
में हूं आज सुखी,
अतिम बिछोह दो विदा आज आखिरी बार ओ इदुमुखी ।
तारसप्तक

प्रत्यूप वेला
प्रात को प्रत्यूप वला--
रात के धनघोर, काले क्षणा के उपरान्त की यह शान्त वेला
अभी मीठो नीद को सुधि शप है मेरे दृगा म
और सपना को मधुरिमा से रंगा है फूल-सा मन
सहज, हलका।
कवि प्रिया का सलज अचल ज्या बिछा है प्राण पर अब भी
दूर जिसके दश म अटके हुए हैं आज भी जा भाव मेरे
तिमिर के मान-अमयम म लगाते ह विकल फेरे
जिस प्रतनु व अल्क के चहुँ आर
जिस सलानी कामिनो के पलर म बस बुला दते हैं विसुध तदा
सुला दत ह पिया सो पिया से गुथ, एक होने की
पिया के साथ साने की
सुनहला चाह।
यहो कविता कल्पना चिर साध जावन की
वही अचल परस जिसका वरद पारस-सा
आर व हा मधु मरे लघु भाव
जो रहे हैं ज्या अभी मेरी अताविक दृष्टि म ।
सृष्टि म
इसो से तो अभी कोलाहल नही रवमान
अभी जसे वम वा आह्वान
अरुण पी नवजात किरण द न पायो हो जगत् को
क्षणिक, मोठी अपटो यह सुसद वेला
रात पे उन दोष, पम्पित, भय भरे कबे पला से
है नितान्त विभिन्न
माणगAne

जागते रहो। डूबता दिन भोगती सी नाम बद कर दो काम लो विश्राम। यह तिमिर को शाल मोढ लो वसुधे । न सिमुड गति स यह लार जग का बाल । वलय की खनकार दीप बालो रो सुहागिन । जग उठ ग द्वार बदनवार। दिनु साथी । दख हम न सायगे हमारा काय है जवशिष्ट अपनी प्रगति का अब भोजपरा रस । जागरण चिर जागरण हो है हमारा इष्ट । ला क्षितिज के पास- वह उठा तारा, अरे वह गाल तारा नयन का तारा हमार। सबहारा का सहारा विजय का विश्वास। तार सप्तर

पथ हीन
7
कौन-सा पथ है
माग म आकुल अधीरातुर बटोही या पुकारा
'कौन सा पथ है ?
'महाजन जिस ओर जायें-शास्त्र हुकारा
अतरात्मा ले चले जिस ओर' बोला “पाय पण्डित
'साथ आआ सव-साधारण जनो के-क्राति-वाणी।
पर महाजन माग-गमनोचित न सम्बल है, न रय है,
सतरात्मा अनिश्चय-सशय-प्रसित,
क्राति गति-अनुसरण-योग्या है न पद-सामथ्य ।
कोर सा पथ है
माग म आकुर अधीरातुर वटोही या पुकारा
'कौन-सा पथ है"
7
मारतभूपण भप्रयास

पुनश्च पर नहा कविता अस्त्र नही ह - न मूयवान न अमूल्य । कविताका अस्त्र मानकर चला हा था ( जागत रहा ) कि म स्वय अस्त्र बन गया और मरा कविता एमी यन लिपि कि उसमें अपन मनका स्पन्न सुनाई हा नहीं पता था। आज यह बात कह्नम वो हल्का और आसान लगती ह पर जिन प्रतिश्रुतियाको माया पाकर म इस अगतिका ( या दुगतिका ) प्राप्त हुआ था व इतनी विक्ट थी और एक बार उस डगरपर दा क्दम चल पडनवे बाट पाछ गोटनम यथताका एसा विचित्र भाव जगमा था कि एक प्रकारसे मरी कविताका सात ही मूख चला। फिर माहस कर विसा तरह उस जुटूसमें अपनको अग क्यिा रास्तका एक पलियापर बठार दयका सर्वेषण क्यिा (मुक्तिमाग) और अपनी एक निराग पगडग निकायकर कायवे प्रशस्त पथपर आनकी चष्टा करता रहा ( आ अप्रस्तुत मन । ) अब लगता ता ह कि वह प्रास्त पथ निखाइ पन लग गया है और जगर हिम्मतन साथ दिया तो एक दिन उसपर पहुंच जाऊगा पर भविष्य-वथनम सकोच हाना स्वाभावित है। नहीं जानता मरा यह अनभव निता त मरा हा ह अथवा अय सम वयमा कवियाका भा ( सप्तक व जयवा सप्तक से भिन्न ) पर मय एसा वातपर बम सताप और हप नहा ह कि म रतना भटक्कर भा रास्तपर आ लगा हू और चाह इस प्रक्रियाम हा जघड हा गया हू भी मनन उत्साहम काई क्मा नहीं पाया है। वा अगर फूट न द ता साधा रण दाक्का निराश होना स्वाभाविक ह पर अपन-आपको सूसन और टूट हा जानका नियतिस बचानम वका कितना सतक यत्न करना पड़ा ह यह कमम पम वनस्पति शास्त्राका ता पहचानना ही चाहिए। २ एस वाच कवि-कम निर तर करिन हाता चल गया है । तार सप्तर व प्रथम प्रकाराना समय विश्व अपन रतिहासा सबम अधिक भीषण युद्धमें प्रस्न था और दा जपनी मक्तिव द्वारपर थरथरा रहा था। जम-नम यद्ध समाप्त हुआ और देशका मक्ति मिग पर जावन एव तार सप्तक - जगतका जाटता निरन्तर यता हा पका ह यदि एक योर विश्व पहली बार एक होता रोखता है तो दूसरा आर यात्रिम पद्धतिको जरमें व्यक्ति अब पता जा रहा न | भारतीय कवि रिशा एक यतिरिक्त करिना यह है कि जनतवर मागेवर ही माथ व विभाजन गादया मा रियाई पने ग गया ह जो नगर और ग्रामव वीच प्राचीन और नवान बीच और दशी और विणीचे वाच म्बुटी हुइ ह-बन्धि कुछ साइयो ता निरन्तर वरती चली जा रहा ह । दन सरपर अपनी मामित मध्यवर्गीय अनुभूतिक बम्पर वह मवदनापा मतु बम वाघ? और जवनर यह मनु बध तबतर उमरा कवि-बम बमें चरिताथ हो? ३ और माना यह कठिना' हा कुछ कम हो कि बाजरे विवे मामने एक और भयकर समस्या माहोगपी ह उमा करि-वम अतिरिक्त कमी हो माता र एक मात्र बम नहीं । जो विद्वान नये कविस व्यापक दृष्टि गगन अनुभूति और समथ अभिन्यक्तिकी मांग करत नही थरते व इस बानपर एर क्षण मा विचार नहा करते वि साजरी जीवन-पद्धति कविको अपनी का मांगन-मधाग्ने और पाने गोमनका काई अचार नहा रेती। एक तो माजो जीवनकी गति यों ही तनी तीव्र हो गयी हरि उगरे माय km मिना 'तरवारको घोर पे पावनो हो गया है। नयी परिस्थितिम मदनारा मूत्र मिगन-न मिगते परिस्थिति व जाना ह-निरपर निर जीवनकी मांग पवि और 'अ-विरा भर नहीं मानती और पवित्रा अधिकार जावन पितार चरणाम नही परिताका तयाराने धरणाम निवरित हो जाता है । वम ता आमा साहित्यकार मात्र ही अपना धमतारा दुरपयाग करनेो वायन पर कवि तो भरम अधिक मापारि ग मवापिस प्राचीन और भव्ये मारित्य विधाका व्यावसायिर मूय मग रम है। मान मथितारा माय पर प्रदर ही दिया जा सपनाह पर. 'पा पुराना एबीररी गमयमै मरे हो ध्यावहारिव विप र आज तापनि नह। ४ में पानी विदेशमग गया पर पद-मुनकर जाना है कि कवि-समरा पहल निगमें ही नहीं पार भारत में ही मी मय दामें गुन एर-गौ है। जनता ने जन गिगिन तो लिया है पर पर मामा मारतभूपग परान हो त । पात आजका जनमाधारण मनोरजन रिए ता कविता मांग करता है पर कवितामे मनारजन नहीं करता। और इस प्रकार अनुपयोगी क्लाको साधनाम रत कविका जीवन-यापन लिए तरह-तरहा क्याजियो करनी पडती ह किम कारण उमको अनुभूति सामिन और उसका व्यक्तित्व विभक्त हो जाता है। इस मौमा और विभक्तिको नया कवि भरसक वाणी देता ह ( मैं तो आजको कविताको विमति-युगकी कविता कहता हू भक्ति-युग ढगपर ) पर काम्य उसका भी ममग्र और मम्पूण ही है। जो कविसे महाकाव्यमी अपना वरत ह व उसे महाराव्य की परिस्थितियों पानम सह्योग क्या नहीं देत यह प्रन मर मनम बरावर उठता रहता है। ५ अतमें एक बात भापाने सम्बध । 'तार सप्तक के छायावागे पूवजाको एक एतिहासिक भुविधा मिली थी कि जिस भापाम व अपनी अभियक्ति पर रह थे उस भाषाका दे साथ-ही-साथ विकास और रूपायन भी कर रह थ । उनके पहले तो कविता अवधी ब्रज भाषा आदि बोलियामें लिखी जाती यो । यही कारण ह कि उनके लिए काव्य भापाका निमाण एक कठिनाई न होकर अन रूंधे पथपर धरनका गौरवो लाम बन गया था। यही नही जनतात्रिक सिद्धान्त उनके आदा तो थे यवहार नही बन थे और इसी कारण जहाँ सस्कृतका मन त भागर उन्हें नवीन अथ प्राप्तिके लिए उपर घ पा वही उसे लोर-मानस तक सनकी उन्हें कोई बाध्यता न थी ( छायावादो कवितामें लोकोक्तियां और महावरे मरमें माद्यानकी ही भांति मिलते ह) पर नये कविको यह सुविधा प्राप्त नही है। उसे प्रवरित भाषामें ही नया अथ भरना ह नयी अभिव्यक्ति का माध्यम पाना है। यही नहीं उसके आस-पास एक विदेगी भापाका एमा घडलेसे व्यवहार होता है नि सही भावाभिव्यक्तिके लिए उसके गब्दाका सम्पूण बहिष्कार करनेका स्थितिमें वह नही ह । परिशद्धतावादी उसे चाहै क्तिना ही क्यानकोसें, दनन्दिन बोल-बालम प्रचलित इन अगरजी गटोंके स्यानपर हिंदी न बठाना कृत्रिम ही कहा जायेगा और एसे शब्द भाव की व्यजना नही कर सकेंग। यपायकी भूमिपर जो काव्य सा ह उसका माध्यम ययाय भाषा ही हो मरती है -गर-मोगको भाषा नहीं। मारतभूषण अग्रवाल तार सप्तक

आनेवालों से एक सवाल
तुम, जो आज से पूरे सौ वप बाद
मेरी कविताए पढागे
तुम, मेरी धरती को नयो पौध के फल
तुम, जिन के लिए मेरा तन मन साद बनेगा
तुम, जर मेरी इन रचनाआ को पगगे
तो
तुम्ह
इसका मरे मन म वडा कौतूहल है।
केमा रगंगा
बचपन म तुम्हें हिटलर और गाधी को कहानिया
मुनायी जायेंगी
उम एक व्यक्ति की
जिमने अपते देशवामिया को मोह की नौद सुला कर
सार ससार म आग लगा दी,
और जन लपटें उमरे पास पहुंची
तो जिसने डर कर आत्महत्या कर ली
ताकि उनका माह न टूटे
और फिर उस व्यक्ति की
जिसने अपने देशवामिया का गान से जगा वर
सारे मसार यो ति का गाता तापा,
और जप ममार उमरे चरणा पर पुक रहा था
तर जिमर दावासी ने ही उसने प्राण ल लिय
नि यहा माय को प्रतिष्ठान हा जाय ।
तुम्ह स्थग म पाया जायगा
दिसौप पहर

इनसानो ताक्तो के दो बड़े राज्य थे
जो दोनो शाति चाहते थे
और इसीलिए दोनो दिन रात युद्ध की तैयारी म लगे
रहते थे,
जो दोना ससार को सुखी दसना चाहते थे
इसीलिए सारे संसार पर कब्जा करने की सोचते थे,
और यह भी पढाया जायेगा
कि एक और राज्य था
जो सार भर मे शान्ति का मात्र फूंकता रहा
पर जिसे अपने ही घर म
भाई भाई के बीच दीवार खडी करनी पड़ी
जो हर पराधीन देश की मुक्ति मे लगा रहता था
पर जिसके अपने ही अग पराये बधन मे जकडे रहे।
तुम्हे विश्वविद्यालयो में बताया जायगा
कि इनसान का डर दूर करने के लिए
सौ साल पहल वेनानिको ने कुछ ऐसे आविष्कार किये
जिनसे इनसान का डर और भी बढ़ गया,
और यह भी
कि उसने चाद सितारो मे भी पहुंचने के सपने देखे
जब कि उसके सारे सपने चकनाचूर हो गये थे ।
और तभी किसी दिन
क्सिी प्राचीन काय सग्रह मे
तुम मेरी कविताए पढोगे
और उह पढ वर तुम्ह कैसा लगेगा
यह जानने का मेरे मन म वडा कौतूहल है ।
.
तुम जो आज से सो साल बाद मेरी कविताएं पढोगे
तुम क्या यह न जान सकोगे
११
तार सप्तक

कि सौ साल पहले
जिन्होने त मयता से विभोर होकर
आत्मा के मुक्त आरोहण के
या समवेत जीवन की जय के गीत गाये
वे आखें वन्द किये सपनो म डवे थे ,
और में जिसका स्वर सदा दद से गोला रहा,
जिसके भराये गले से कुछ चीखें ही निकल सकी,
में सारा वल लगा कर
आँखें खोलें
यथाथ को देख रहा था।
मारवभूषण भप्रवाल

मैं, और मेरा पितृ
देह से जला हो पर भी
म दो हू
मेर पेट म पिटठू है।
जब मे दफ्तर में
साहब को घण्टी पर उठना वठता हू
मरा पिटटू
नदी किनारे दगी बजाता रहता है ।
जब मेरी नाटिंग क्ट कुट कर रिटाइप हाती है
तत्र साप्ताहिक के मुख पष्ठ पर
मेरे पिटटू की तसवीर छपतो है ।
शाम को जब म
वस के फुर वाड पर टगा टंगा घर आता हू
तब मरा पिठ
चादनी की बाहो म बांह डाल
मुगल गाडन म टहलता रहता है।
और जव में
बच्चे की दवा के लिए
आउटडोर वाड की क्यू म सडा रहता हू
तब मेरा पिठ
कवि सम्मेलन में मच पर पुष्प मालाए पहनता हाता है
इन सरगमिया स तग जा कर
में अपने पिन्टू स रहता हू
-
तार सप्तक

भइ, यह ठीक नहीं
एक म्यान में दो तलवारें नही रहती,
तो मेरा पिटळू हंस कर कहता है
पर एक जब में दो क्लमें तो सभी रखते हैं।
अपने पिटठू
-
तय में झरला वर आस्तीनें चढा कर
का सरकारता हूँ
तो फिर जा, भाग जा, मेरा पिण्ड छाड
मात्र बलम बन कर रह
और यह सुन कर वह चुपके से
मरे सामने गीता की कापी रख देता है।
और जव में
हिम्मत वांध कर
आंखें मीच कर, मुटिठयां भीच कर
तय करता हूँ कि अपनी दह उसोका द दूंगा
तव मरा पिटळू
मुय पाझार कर
'एफिशिए
सो वार' को याद दिला देता है ।
एक दीपनेवाली मरी इस देह म
दा 'में हैं।
एक में
और एक मरा पिटठू ।
में ता, सैर, मामूली-सा क्रप हूँ
पर, मरा पिटटू ?
वह जीनियस है।
भारतभूषण भप्रयार

दूंगा मैं
दूगा में।
नही नहीं हिचकुंगा
कि मेरी अकिंचनता अनय है
कि में ऐसा हूँ कि मानो हूँ ही नही,
हा, नहीं हिचकूगा
कि तुम्ह तप्त कर पाऊ मुझ म सामथ्य कहा
कि अपने को नि स्व कर के भी
तुम्ह बाध नही पाऊगा,
और नही सोचूगा यह भी
कि आखिर तो तुम मुझे छोड चल जाओगे
जसे नदी का जल
ढूहो को ताड कर
छोड चला जाता है
सोच छोड
हिचक छोड
दूगा में।
देता हूँ।
लो
यह लो
ओ तुम अनजाने अतिथि आज भर के ।
लो यह पराग
जा अपनी अगक्ति में मात्र गुनगुनाहट है
तारसप्तक

पर जिसे दे कर
ये मेरे ओठ समाधि वन जायेंगे,
लो यह आग
जिसकी चिनगी में जलन तो क्या
ताप भी नहीं
पर जिसे दे कर
यह मेरो अस्थि विभूति बन जायेगो,
में देता हूं
अपना पराग राग
आग यह अपनी
जो में हूँ,
जो मेरा सवस्व है
(पर जो नगण्य है)
चेहिचक देता हूं
मुट्ठी पर मुट्ठी भर अपने को रीता कर देता है-
लो तुम
ओ अतिथि।
यह सेवा स्वीकार करो
भूल कर कि इससे तुम्हारा काम नही चलने का।
देता हूँ
पयादि तुम मेरे द्वार आये हो
और मेरे पास है दने को अपनापन,
देता हूँ
पयामि में जानता हूँ
कि तुम मुंह-अंधेरे में
इस गली में घर पर पे द्वार पर
मारवभूषण भाप्रवाड

दस्तक दे-दे कर थर गये हो-
भीतर थी चहल पहल राग रंग गज समाराह की
पर किसी ने सुनी नही तुम्हारी वह खटखटाहर
क्यापि सर ने सोचा कि तुम ता भिसारी हा
दीन हीन याचन
परोपजीवी,
पर म पहचानता हूँ
कि तुम अतिथि हो
तिथि से परे हो
इतिहास हो।
दूंगा में।
१२.
तारसप्तक

गिरिजाकुमार माथुर

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[माथुर, गिरिजाकुमार जम १९१८ में मध्यप्रान्तने एक स्वमें
हुआ। रखनऊ विश्वविद्यालयस अगरजी साहित्यम एम० ए० तथा
एल-एल० वी० पास किया । कुछ समय तक वकारत की उसके बाद नयी
दिलाम सटरियटम काम किया अव आल इण्डिया रडियामें ह।
कविताव अतिरिक्त एकारी नाटक मालाचना ऑपरा तथा
नास्त्रीय विपया पर लिखन रहत ह । अय क्लाआमें सगीतका विरोप
अध्ययन किया है। मदार नामका एक कविता-मग्रह प्रकाशित हा
चुका ह]
'मजोर , 'नाग और निमाण धूपके धान गिरापय चमा
यादि और मविता संग्रह प्रकागित हा चुक है और एक खण्ड काय
'पृथ्वी कल्प और एक कविता-मग्रह अमिद्धवा यया' प्रकाशित होनेवारा
है। घाचमें आवागवाणा छाडकर सयुक्त राष्ट्र रडियामें अमरामा घर
गय थ जहाँ दो वप रह अब फिर आरावाणी में अधिकारी है।
गिरिजाकुमार मापुर

वक्तव्य विषय और टेक्नीक-वविताम विषयम अधिक टक्नीकपर ध्यान दिया है। विषयको मौरिस्ताका पक्षपाता हात हुए भी मरा विग्वाम है किटकनीक्वे अभावम कविता अधूरी रह जाता है । ८मा कारण चित्रको अधिक स्पष्ट करनके लिए म वातावरण रग उसमें भरता रहा हूँ । वही कही केवर वातावरण चित्रणम हा विषय इगित किया है। जमे कुतुब के सहर अथवा रक्कर जाती हुई रात नामक कविताआमें देवल वहाका वातावरण चिनित किया है। प्रत्यर कवितामें प्रथम उसका आधार भूमि निमाण करना जाव या समयता हूँ जमे रडियमका छाया क्वारकी दोपहरा अथवा विजय-गमा नामक कविता प्रथम बद है । वातावरण चित्रण रिटर में मन रगाका आधार विगप रूपम रखा है किन्तु म चित्रको सदा हल्क रगाको छांहाव आवरणमें लिपटा पसद करता है। क्यापि यथाय चित्रवे सभा डिटल म कलाको दूरास दसता रहा हू। मरा यह वि वाम है कि जयधिक गहर रंगाका प्रयोग काम प्राचानता ( मडोवल टट) का द्यातक है। क्लासिकल विषयापर गम्भीर गली (ग्रण्ड स्टल) म लिखी कविताआम मन गहर रग प्राची नता लानके लिए ही रक्व है । यहाँ मन आधारभूमि विशालकाय कर दा ह और डिटर कम । डिग्ल मन रोमानी कविताआम हो अधिक भर ह । इसन अतिरिक्त म चित्रकलाको तान दूरियां चित्ररे पणत्व ( राउन्गि अप) के लिए यत्र-तत्र लाया हूँ भापा और यजना-रामाना वविताआम मन छोटो और माठा ध्वनिवाल बालचाक द प्रयक्त क्यि ह । रामानी कविताए म हिंदुस्ताना भाषाम हा लिखना पसद करता है। पासिरल कविताआम आय-गण गन लिए बडा लम्बा और गम्भीर ध्वनिदाद रस ह । अभि जनात्मा गत वियाम वातावरण रूप भावा अनकूल नय बनाय ह-जम पतग नभ मिमा पिरन आदिम छांहें घूमन स्वर आदि। क्यानि म यजनाका वातावरणव लय चित्र अथवा प्रतावका पद दना हूँ। वहां-वहा नप र वातावरणका नि भाव लकर बनाय ह जम । तारसप्तक सूनसान, राहरा मानि। उदाहरणाय 'सूनसान गळा लीजिए । 'शूयता', 'मूनापन , सुनसान सभा गद उस घनिभावर साथ निबर प्रतात हुए। पूप में एक ग्यापलापत ह, 'सूनापन म दा स्वर ध्वनियाकी तजीक वाद हा अतको दायजन ध्वनियों गतिका समाप्त कर दता है राज दती ह । 'सुनमान सवम निबर है, क्यानि इसमें क्वल एक स्वर ध्वनि ह, और आरम्भका दा जन ध्वनियामे गर निगति है। सनमान' में 2 की ध्वनि लम्बाई और दूरी यक्त करती बा की ध्वनि विस्तार । वौचमें न का ध्वनि सनसनाट्ट और गहराई व्यक्त करती है। इस प्रकार सूनमान का ध्वनि भाव आ ऊ हा जाता ह जा गहर सुनसानका यथाय रूप ह । इमा प्रकार अय पर भी ह । विस्तार पवारण प्रत्यक नमगरवा अर्थ नहीं दे सकता। पद तथा प्वनि विधान~वविता मुक्तछ द हा पसद करता हूँ। मुक्तछ में अधिकतर मन विरामात (एएर स्टॉप ) पक्तियां नहीं रखा। पारावाहिद ( रन ऑन ) हो रखी ह । आगत पनि आरम्भम विगन पवितकी ध्वनि मम सगीत उत्पन्न बरन पिए क्त्तमान रहन दाह। क्यानि बिना इसब ध्वनि-सामजस्य (मिम्पयन्ति वात्रेगन) उत्पन नहा हो पाता। इसी कारण म मुक्तछ दम सगात प्रधान गीत मम्भव पर समाह जिहें गात समय तुक्की आवश्यक्ता प्रतात हा ना हाता। जम रहियमका छाया वमत-पचमा मादि ह । मनयन्दका मन सम्पूण विधान रचा ह। मुक्तछका दो भागाम विभक्त किया है वणिम और मात्रिक तथा इनर स्पातर। वणिक में म पवित्त विरामाका उनके पातर-महित एपर चला है । यह आव यर नहा रपा वि कविनर पूण विरामापर हा पनि समाप्त हा रिन्तु अब विराम भी शुद्ध मान र जवतव व मनुचरित ( अन-एक्सपरत ) वणपर समाप्त न हार उच्चरित ( एक्मण्ड) पर ममाप्त हात हा । इम भांति कविता विरामावो रवर क्तिन हा प्रकारका मक्तछन्न-पक्तियाँ निर्मित को ह । सवमा विरामापर स्थित एर नये प्रकारका बटन सगीत भय मुक्तछ दरिया ह ( आज ह कसर रंग रग ) कविताम एव हो प्रभारवा मुक्तछद प्रयुक्त हाना आवयर समयता हूँ। यति उच्चरित या-वि मारा (सिविल) पनि आरम्भ हु हो ता समस्त पक्तियां उचरितम का प्रारम्भ हानी चाहिए। विरामात पक्लियामें यह नियम अनिवार सर रिया ह । धारावाहिना पक्तियामें भा प्रथम पविता गिरिजाकुमार माथुर १२५ अध विराम रितीय पक्तिम स्नमा नियम ग्या ह। पक्तियार विरामाकी ध्वनि-मात्राए पूर्णत सम एव गद हाना अयन्त आवया ममता हूँ। इन नियमाव विरुद्ध गिया गया मवतन माद मानता हूँ। ध्वनि विधानम मर प्रयोग मध्यन सर ध्वनियार ह। व्यजन ध्वनियास उत्पादित सगीतवा म कविताम सगीत नहीं मानता। प्रत्यत रोति-कालीन भरि समझताहूँ। छायावाटी पवियाम मा कारण म काई सगीत नहीं देखता क्यानि उनका सगीत व्यजन ध्वनियामे निर्मित ह । और यजन ध्वनियाका सगात वाह्य अस्थायी एव मृत ह । वह आकार वा सगीत ह गदको जात्माका सगात नहा । यी आत्मा स्वर ध्वनि ह इसी कारण उसपर अवलम्बित सगोत आतरिक गम्भार और स्थाया है। वह आका। तत्त्वका सगोत ह। वातावरण निमाणम मन इमीको सबसे अधिक सहायता री ह। मक्तउन्दके अन्त मगौतम इन्हीं ध्वनियाका गजें बुनी है । इसी नियमको रेकर मन स्वर ध्वनियाका मल्याक्न क्यिा ह। मन छहा स्वरा सम्पूर्ण प्रभावाको स्वर उनका निश्चित रूप एव आकार निर्धारित किया है । आ ध्वनिका स्पह विस्तार इ ध्वनिका रूप ह आनत ऊचाइ ऊ ध्वनिम दूरा ए ध्वनिम ऊम्वगति आ ध्वनिम वस्तुका याम तथा भीम प्रवाह और ऊ म गहराई और गाम्भीय ह । इस मूयाक्नवे वरपर मन विभिन वातावरण निर्माण क्यि ह । जहाँ जिस वस्तुका इगित करना होता ह वहा उस ध्वनिका उतना हो प्रयाग है । इस प्रकार न केवल वणनसे ही दश्य स्पष्ट किया है किन्तु ध्वनियांसे भी उमका चित्र स्त्रीचा है। इन स्वराकी शक्ति, स्वरूप और ग तथा उसका प्रभाव गण स्थापित किया है। प्रत्यक स्वरके स्वरूपपर कविताए लिखी ह । क्याबि मरा विश्वास ह कि स्वर ध्वनिया आकाण तत्त्वक विभिन रूपान्तर है। -गिरिजाक मार माथुर । १२१ तार सप्तक

आज हैं केसर रा रंगे वन
आज हैं केसर रंग रंगे वन
रजित शाम भी फागुन की खिली पीली कलो सो
केसर के सना म छिपा तत
सोने की छाह सा
वोलती आखो म
पहिल वसत के फूल का रंग है।
गोरे पोला पै होल से आ जाती
पहिरे ही पहिले के
रंगीन चुम्बन की-सी ललाई।
आज हे केसर रंग रंगे
गृह, द्वार, नगर, वन
जिनके विभिन्न रंगा म है रग गया
पूनो को पदन चाँदनो।
जोवन म फिर लौटी मिठास है
गीत की आखिरी मोठो स्कोर-सो
प्यार भी डूबेगा गोरी-सी वाहा म
ओठा म, आँखाम
फूलो म डू ज्या
फूल की रेशमी रेशमी छोह ।
आज है पेसर रंग रंगे वन ।
.
निरिसारमार माथुर

रुक कर जाती हुई रात
स्क कर जाती हुई रात का
अतिम छाहा भरा प्रहर है
श्वेत धुएं से पतल नभ म
दूर झावरे पडे हुए सोने से तारे
जगी हुई भारी पलका से पहरा देत
नीट भरी मादी बयार चलतो है
वर्षा भोगा नगर
भार के सपने देख रहा है अब भा
लम्बे-लम्बे धुंधल राजपथो म
निशि भर जली रोशनी को
कुछ थको उदासी मंडराती है।
पानी रगे हुए बंगलो के वातायन से
थको हुई रगीनी म डूबा प्रकारा अब भी दिख जाता
रेशम पर्दो, सेजो, निद्रा भरे ब धना को छाया सा ।
बुझी रात का अभी अखीरी पहर नहीं उतरा है,
दूरी के रेखा अहा से पेडा ऊपर
ठण्डा-ठण्डा बाद ठिठक कर मदा होता
नभ की लम्बी साया दूरी तक पडती है ।
१२८
तार सातक

चूडी का टुकडा-
आज अचानक सूनी सी सध्या मे
जन में या ही मैले कपडे देख रहा था
किसी काम म जो बहलाने
एक सित्व के कुर्ते को सिलवट म रिपटा
गिरा रेशमी चूडी का छोटा सा टुकडा
उन गोरी कलाइया मे जो तुम पहिने था
रग भरी उस मिलन रात म।
में वैसा का वैसा ही रह गया सोचता
पिछली बातें
दूज पोर से उम टुकडे पर
तिरने लगी तुम्हारी सब लज्जित तसवीरें
सेज सुनहली
से हुए व धन म चूडी का झर जाना।
निरल गयी सपने जैसी व रातें
याद दिलाने रहा सुहाग भरा यह टुक्डा ।
गिरितामार मापुर

रेडियम की छाया-
सूनी जाधी रात
चाद-बटारे की सिकुडी कारा से
मद चादनी पोता लम्बा कुहरा
सिमट लिपट कर।
दूर दूर के छाह भरे मुनसान पया म
चलने की आहट ओल सो जमी पडी थी
भूरे पेडा का कम्पन भी ठिठुर गया था
कभी भी बस
पतझर का सूखा पता गिर कर उड जाता
मरे स्वरो से खर सर करता।
प्रथम मिलन के उस ठण्ड कमरे म
छत के वातायनम
नीद भरी मदो मी एक किरन भी
थक कर लोट-लोट जाती थी
आलस भरे अधेरे म
दो काली आखा सी चमकीलो
एक रेडियम घडी सुप्त कोने म चलती
सूनेपन के हल्के स्वर सो।
उही रेडियम + अका को रघु छाया पर
दो डाहो का वह चुपचाप मिल्न था
उमो रडियम की हकी छाया म
चुपके का वह स्ता हुआ चुम्बन अक्ति था
तारसप्तक

कमरे की सारो छाहो के हल्के स्वर-सा
पडती थी जो एक दूसरे म मिल-गुंथकर ।
सूनी सी उस आधी रात ।
गिरिमार माथुर

कुतुव के खडहर- समल को गरमोरी हत्वी रई समान जाहा की धूप सिली नार आसमान म बाडी-पुरमुटा स उठे लम्बे मदान म । रूखे पतझर भरे जगल के टोली पर पवर चलती समोर हेमत को रम्त्री लहर सी। दूरी के ठिठुरे-से भूरे भूरे पडा पर ठण्ड क्वूल बना धूल छा जाती थी- रतोल परो से धोरे ही दाब कर काई से काल पडे ध्वस राजमहलो को पत्थर के ढर बने मदिर मजारो को जिन से अब रोज साय कुहरा निकलता था प्यासे सपना सी मँडराती हुई छाह सा । गूजता था सूनसान-- ऊजड खण्डरोम गिरत थे पत्ते, वन पछी नही बोलत थे, नाल को धार किनारे से लगी जाती थी। . तार सप्तक १६२

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क्वाँर को दोपहरो
क्वार की सूनी दुपहरी,
श्वत गरमीले रुएन्स बादलो म,
तेज सूरज निकलना फिर डूब जाता।
घरा म सुनसान आलस ऊघता है
थकी राह ठहर कर विश्राम करती
दूर सूनी गली के उस छोर पर से
नीम नीचे खेलत कुछ वालको की
मिली-सी आवाज आती
,
रिक्त कमरे की उदासी बढ रही है
दूर के आत स्वरा से।
दूर होता जा रहा हू म स्वय ही-
पास की दीवाल पर क चिन सारे
गूय द्वारा पर पडे रगीन पर्दै
वायु को सासा भरी एकात खिडकी
वह अक्ली सी घडी
वह दीप ठण्डा
और राता जगा वह मूना पलंग भी
दूर होता जा रहा है दूर वित्तना ।
रग सका है कुछ न अपना
ज़िदगो भर दूर ही रहना पड़ा है,
प्यार क सारे जगत स।
१३५
तारसप्तक

थक रही है क्वार को सूनो दुपहरा,
श्वेत ह के वादलो म सूय टवा
नीम-नीचे वालका का स्वर मिला सा छा रहा है
धूल पैरा मे हवा म उड रही है ।
वारका सा खेरता में जिंदगी म
किन्तु सायो दूर पर पिछुडा हमारा
गिरिपामार माथुर

भीगा दिन
भीगा दिन पश्चिमी तटो मे उतर चुका है,
वाटल-ढकी रात आती है
धूल भरो दोपन को लो पर मदे पग घर ।
गीलो राह धीरे धीरे सूनी होती
जिन पर बोझल पहिया के लम्बे निशान हैं
माथे पर की सोच भरी रेखाआ जैसे ।
पानी रगो दिवाली पर मूने राही की छाया पडतो
पैग के धीमे स्वर मर जात हैं
अनजानो उदास दूरी मे।
सील भरो पुहार-डूबो चलती पुरवाई
बिछुडन को रातो को ठण्डो ठण्डी करती
साये सोये लुटे हुए खाली कमरे म
गज रही पिटर रंगीन मिलन की याद
नीट भरे आलिंगन म चूडी को खिसलन
मीठ अधरा की व धीमी धोमी बातें।
ओर मी ठण्डी बरसात अकेली जाती
दूर-दूर तक भीगी रात घनी होतो है
पय की म्लान रालटेना पर
पानी को बूदें लम्बी लकीर बन चू चलती है
जिनके वोयर उजियाल क आस-पास
मिमट मिमट पर मूनापन है गहरा पडता,
तार सप्ता

-दूर देश का आसू धुला उदास वह मुखडा-
याद भरा मन स्त्रो जाता है
चरने की दूरी तक बातो हुई थी आहट म मिल कर ।
गिरिजाकुमार माथुर
१८

एसोसिएशन
कुछ सुनसान दिनो को,
और चादनी से ठण्डो-ठण्डी राता को
पना को दुनिया से भी हम दूर हुए थे
आज तुम्हारा सूना-सा सदेश मिला है,
प्यार दूर का।
मान गव के दो दिन अभी पिताये मैंने
गीतो के उस मेल में।
मेल मुझ ल कर उडती जाती थी,
रंग भरे पानी से चलते उन डिब्बा की एक कोच पर,
सनसन-सनसन वायु वेग से
धनी वय नदिया से छन म पार उतर कर
पीछे छोड नगर ग्रामा को
कितनी ही पवन माला की घूमो म से।
एक सीध म वनी खिडक्यिा म से हो कर
कमरो का विद्युत् प्रकार बाहर पडता था
तेजी से चलती लम्बो रकोर बन-बन कर
मून-मून करते उन पीछे उडते मदाना म,
हल्के चाद भरे जा अनजानी दूरी तक
वन-पूला को माघी सी सुगघ में टूवे ।
रविन में जाने कितने पोछ चलता था,
एक वरस पहिल को इन ठण्डी आखा म--
इसी तरह का वह रगीन दुमरा दर्जा
वायु-वेग स चलता जाता।
१३८
तार सप्तक

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जब दूरी तक फले-फेले,
वन, पवत, मैदान उतर कर,
लम्बी, लम्बी सी तेजी से-
तुम उस रेशम-सज-योच पर,
दख रही उडती पहाडिया खिडकी म से
एक हाथ पर चिवुक टिकाये ,
साथ-साथ ही,
वह पहले पियार की यात्रा।
आज दूर हो,
प्राणा स, तन से पोडित हो-
मेरी सूना-सी आंसें हैं,
सूना सा मेरा घर, आगन ।
चहल पहल है नगर बीच,
दूर तुम्हारे दश यही सप होता होगा-
यही धूप, उजरी कुआर को यही धूप भी
पछी, वायु, यहा नभ, वादल ।
-मून-सून करत मदानो म-स हो कर,
मेल जायगो निज लम्बी-रम्पी तजी स
प्रतिदिन को ही भौति आज भी।
गिरिजाउमार माथुर

विजय दशमी
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आसमान की आदिम छायाआ के नीचे
दक्षिण का वह महासिधु अब भी टकराता
सेतुराध की श्यामल बहती चट्टानो से ।
आखा म वह अतरीप के मदिर की चोटी उठती है,
जिस पर रोज साझ छा जात
युग युग रजित लाल सुनहल पोल बादल
एक पुरातन तूफानी सी याद दिला कर,
जव, अविलम्ब अग्नि शर चाप उठात ही म
नभ चुम्बी काल यवत सा ज्वार मिटा था ।
सस्कृतिया पर सस्कृतिया के महल मिट गये,
लोह नीव पर खडे हुए गढ दुग मिनार
दढ स्तम्भ आधार भग हो
गिरे विभिन्न निशान गास्ति के केतन डूवे ।
महागल फ भारो पावो से न मिट सके,
चिनमूट विकिपा नालगिरी के जगल,
पचवटो की गुंथी हुइ अलसायी छाह
वारमीकि क मत्युजय स्वर ल अपने पर
सरयू गोदावरी नील कृष्णा की धारा ।
प्रत भर इम यनवाल म
जाज कोटि युग को दूरी स यादें आती
गम्भु चाप स अविटिन इतिहास पुराने
और वज्र विद्युत् से पूरित अग्नि-नयन वे
जिनम भम्म हुए लका-स पाप हजारा ।
१५.
सारसप्तक

Tar Saptak

Author
Agya
Title
Tar Saptak
File name
Tar Saptak
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2010/12
Publisher
Bharatiy Gyanpith Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
514995
Barcode
4990010022658.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
LqKCi7UokZy
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Tar Saptak