Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Tarun Bharat Granthawali
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* भारतीय उपयुवको द्वारा सचालित तरुण-भारत-ग्रन्थावली-सं०६ । दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। "I'mpires and nationa'flonrial and decay By tarrin command and in tiroir torns obey । - - लेखक, श्रीयुत दत्तात्रेय बलवन्त पारसनीस । अनुवादक, श्रीयुत रामचन्द्र रघुनाथ सर्वरे । , memadeoJAam- प्रकाशक, तरुण भारत-अन्थावली-कार्यालय, दारागज, प्रयाग। स १९७५ व धमावृत्ति .] : मूत्य ॥) आने ।' Nat -
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1 तरुण-मारत ग्रन्थावली। भारतीय तरंगों में नवर्जावन का संचार करने के लिए इस ग्रन्थावली में ऐति- हासिक, नैतिक और जीवनचरितसम्बन्धी उत्तमोत्तम अन्य निकलते हैं। प्रन्या पलीके स्थायी प्राहकोंको सव अन्य पौने मूल्य पर मिलते रहते हैं । प्रवेश फीस, भाठ आना, पहले वी० पी० के साथ लगा ली जाती है । इस प्रन्यावलीके प्रन्योंका प्रचार करके, इसके स्थायी प्राहक बढाकर, हमारे इस ' पवित्र साहित्यकार्यमें सहायता करना प्रत्येक मातृभाषा हितैषीका कर्तव्य है । इस लिए कृपया आप स्वय स्थायी ग्राहक बनें, और अपने अन्य मिनोंको भी बनावें । यह आवश्यक नहीं है कि, स्थायी ग्राहक सव पिछली पुस्तकें लेवे-जोउनको पसन्द हो, पही लेवें-अथवा सव लेवे यह उनकी इच्छा पर निर्भर है। अभी तक निम्नलिखित ग्रन्थ निकल चुके हैं। अपना सुधार--इस पुस्तकमें शारीरिक, मानसिक और आचरणसम्बन्धी मुधारके अनुभवजन्य उपाय बतलाये गये है। जान स्टुअर्ट ब्लैकीके प्रसिद्ध ग्रन्थ सेल्फकलवर " के आधार पर इसकी रचना हुई है । पुस्तक नवयुवकांक लिए पहुत ही उपयोगी है । मूल्य छै आने । मांस की राज्यकान्ति-अठारहवीं शताब्दीमें राजकीय अत्याचारी से प्रस्त होकर मांसकी प्रजा ने जो राज्याति की थी, उसीका मनोरंजक वर्णन इस पुस्तकमें दिया हुआ है । सचा इतिहास होने पर भी इसके पढ़ने में उपन्यास का सा आनन्द भाता है । राजनैतिक और ऐतिहासिक अन्योंमे, ऐसी पुस्तक हिन्दीमें अभी तक नहीं निकली है । मूल्य ॥ महादेव गोविन्द रानाडे राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक और औद्योगिक चारो विषयोंमें भारतकी उनतिके लिए पूर्ण प्रयल करनेवाले देश भक महात्मा रानाडेका यह सुविस्तृत चरित्र पड़ीही मार्मिक भाषामें लिखा गया है । इसके पढनेसे पाठकोंके हृदयमें स्वदेशाभिमान और स्वदेशभक्तिी ज्योति जागृत हुए विना नहीं रहती। महात्मा रानाडे और 'उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रमायाई रानाडेके दो चित्र भी पुस्तक्में यथास्थान दिये हुए हैं। मूल्य ')भाने . , - ॥ ।
. एव्राहम लिंकन-जिस महात्माने एक झोपड़ीमें जन्म लेकर अपने उद्योग, साहस, परोपकार और सदाचारके यल पर अमेरिकाके राष्ट्रपति (प्रेसिडेट) की पदवी प्राप्त की, उसी महात्माका यह स्फूर्तिदायक चरित्र है। इसी महात्माने अमे रिकासे गुलामीकी घृणित प्रथाका सदैवके लिए निर्मूलन किया। अपने देशके लिए अन्तमे अपने प्राण तक दे दिये ऐसे स्वदेशहितैपी महात्माका चरित्र प्रत्येक भारतीय नवयुवकको अवश्य पढना चाहिए, पुस्तक सचित्र है । मूल्य सिर्फ 1) ग्रीसका इतिहास-यूरपमें रोम और ग्रीसकी सभ्यता अत्यन्त प्राचीन समझी जाती है । ग्रीसकी सभ्यता तो भारतकी प्राचीन सभ्यतासे बहुत कुछ मेल रसती है । उसी ग्रीस देशकी राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक क्रान्तियोंका मनोरजक तथा उपदेशप्रद वर्णन इस इतिहास ग्रन्थमें दिया गया है । ग्रीस देशके उत्थान और पतनसे उपदेश लेकर हमें अपने देशको पतनसे बचाते हुए, वडी युक्तिसे, उत्थानके मार्ग पर ले जाना चाहिए । पुस्तक ऐतिहासिक ससारमे विलकुल नवीन है । मूल्य १०) आने । रोमका इतिहास-लेखक-प्रोफेसर ज्वालाप्रसाद एम० ए० । यह महत्वपूर्ण इतिहास भी तैयार हो रहा है। अन्य पुस्तकें । ईश्वरीय बोध-महात्मा रामकृष्ण परमहसके उपदेशोंका सग्रह । मू०१) सफलताकी कुंजी स्वामी रामतीर्थजीके एक उत्तम उपदेशप्रद व्याख्यान का अनुवाद । मूल्य।) आने । हिन्दू जातिका हास-विषय नामहीसे प्रकट है । मूल्य -) आना। इटलीकी स्वाधीनता--मेजिनी, ग्यारीबाल्डी, इत्यादि ज्वलत देशभक्तोंने अपनी मातृभूमि इटलीको परकीय शासनसे मुक्त करके स्वतन कैसे बना दिया, इसका विस्तृत, उपदेशप्रद, और मनोरजक इतिहास इस पुस्तकमें मिलेगा। पुस्तक भारतीय नवयुवकोंको अध्ययन करने योग्य है । मूल्य छै आने । स्वदेशाभिमान-अपनी मातृभूमिपर वलिदान होनेवाले अनेक वीरोंकी छोटी छोटी कहानिया । यह पुस्तक भारतमाताके प्रत्येक वचेके हाथमें होनी 1)आने । व्यवस्थापक, तरुण-भारत-ग्रन्थावली-कार्यालय, दारागंज, इलाहावाद।। चाहिए । मूल्य निवेदन । Page तरुण भारत प्रन्थावलीकी यह छठवीं सख्या हिन्दी प्रेमियों की सेवामें उपस्थित की जाती है । यह पुस्तक मराठीके प्रसिद्ध ऐतिहासिक लेसफ राववहादुर श्रीयुत दसाय बलवन्त पारसनीसकी लिखी हुई पुस्तकका अनुवाद है। पारसनीस महारायने मूल पुस्तक स्वतन रीतिसे तो लिखी ही है, फितु साथ ही साथ अनेक इतिहास-अन्वेषक देशी तथा विदेशी विद्वानोंकी सहायता भी ली है, अतएव पुस्तक, छोटी होनेपर भी, साहित्यकी दृष्टिसे, बहुत उपयोगी हुई है। यह हमारी भारतभूमि पवित्र और ऐतिहासिक स्थानोंका भांडार है । जिस प्रकार धार्मिक तीर्थस्थलों और प्राकृतिक रमणीय स्थानोंकी यहां कमी नहीं है, उसी प्रकार ऐतिहासिक और राष्ट्रीय दृष्टिसे भी हमारे देशके अनेक नगर बहुत ही महत्त्वके हैं। उन सब नगरोंमें “ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ " का दर्जा बहुत ही वटा हुआ है । इस नगरने जितने राजकीय परिवर्तन देखे हैं, उतने शायद ही- और किमी नगरने इस पृथ्वीतल पर देखे हों । और इसी लिए इस नगरीका इतिहास हमारे लिए बहुत ही मनोरंजक और बोधप्रद है,- यही नहीं, किन्तु एक भारतीय सन्तानके लिए वह अत्यन्त विचारणीय और गम्भीर विषय है। भारतीय साम्राज्य और सभ्यताका वह पूर्व गौरव, किन किन परिवर्तनों देसता हुमा, और भाज किस स्वरूपमें भा पहुँचा है-इसका मूर्तिमान चित्र यदि आँखों- के सामने आपको लाना है, तो अनेक राज्यफ्रांतियोंसे पूर्ण दिलीका इतिहास आपको पढना चाहिए । वह सारा इतिहास विस्तृतरूपसे यद्यपि इस छोटीसी पुस्तकमें भापको नहीं मिलेगा, फिर भी जो कुछ इसमें आपको मिलेगा, उसे पढ़कर आपके हृदय में, अपनी इस सनातन और पुरातन राजधानीके विषय में, एक प्रकारकी सहानुभूतिपूर्ण श्रद्धा अवश्य जागृत होगी । यह श्रद्धा जागृत -- ।
होरर यदि भाप दयमें कोई सवेदना उसन परेगी, तो हम इस प्रपा
प्रकाशन सापक रामगे। परमात्मा ऐसा ही फरे।
बना हम अपने प्रेमी श्रीयुत रामचन्द्र एनाप सटे महासयको पहुत बहुत
धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने हमारी प्रार्थना पर, पर उत्साहसे, तपग-गारत प्रन्या
पलीके लिए, यह अन्य हिन्दी में प्रस्तुत कर दिया । आप एक उत्साही मययुक्त
दिन्दानगी है। परमारमा भापको भारांक्षाएं पूर्ण करे।
पम्पई,
पोप उस ११,
लक्ष्मीधर याजपेयी।
सं १९७५ वि०॥
M
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अनुक्रमणिका ।
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१
२५
६२
प्रकरण
१ प्राचीन और अर्वाचीन वृत्तान्त
२ दिल्लीका किला और मुख्य राजप्रासाद
३ दिल्लीकी जुम्मा मसजिद
४ इन्द्रप्रस्थ
५ दिल्लीके आसपासके स्थान
६ हिन्दूराजाओंके प्राचीन स्मारक
७ कुतुबमीनार
परिशिष्ट (क)
दिष्ठीके प्राचीन राजा
परिशिष्ट (ख)
दिष्ठीके बादशाह
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८७
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२ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । + मूर्तिमत प्राचीन और अर्वाचीन इतिहास बतलानेवाला नगर सिर्फ दिल्ली ही है । तीन हजार वर्ष तक कालचक्रकी अनन्त लीलाओंको देखकर, फिर भी सब लोगोंके अन्त करणोंको अपनी ओर खींच लेनेकी सामर्थ्य इस नगरीमें सचमुच बडी विलक्षण है । पाडर, कौरव, अशोक, जैन, विक्रम, चौहान, पठान, मुगल और मराठे आदि सबको सार्वभौमिकता प्राप्त करा देनेका मान इसी नगरने प्राप्त किया था, और उन सबको अपने पदोंमें लीन कर छोडा था । केवल यही नहीं, किन्तु सारी पृथ्वीपर अपनी राजसत्ता जमानेवाले अग्रेज लोगोंको भी इस नगरने मोहित कर लिया है। पौराणिक कालके इन्द्रप्रस्थको मुसलमानी राजत्वकालमें जितनी महत्ता प्राप्त थी, उतनी ही महत्ता उसे मराठोंके शासन-कालमें प्राप्त थी, और ब्रिटिश शासन-कालमें भी यह नगर उतना ही महत्त्व- शाली बना हुआ है । पाण्डवोंका राजसूय यज्ञ, मयासुरकी अपूर्व मय- सभा, शाहजहाँ बादशाहके बहुमूल्य और रत्नजटित मयूरसिहासनके सामनेवाला आम दरबार, चक्रवर्तिनी देवी विक्टोरियाका ‘कैसरे हिन्द' पदका बृहद् दरवार, अथवा भारतके वाइसराय लार्ड कर्जनके द्वारा किया गया राजाधिराज सप्तम एडवर्ड बादशाहके राज्यारोहणका दरवार, चक्रवर्ती सम्राट् पचम जार्जके राज्यारोहणका अनुपम दरबार, आदिके समान दुर्लभ और प्रेक्षणीय महोत्सव इसी नगरमें हुए हैं ! ऐसे विशिष्ट स्थलका वर्णन कौन नहीं सुनना चाहेगा? दिल्ली शहरके दो प्राचीन नाम, हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ, और एक अर्वाचीन नाम, शाहजहानावाद, प्रसिद्ध है । साधारणतया प्राचीन ग्रन्थों और कागजोंमें दिल्लीके लिए उपर्युक्त नामोंका ही प्रयोग किया जाता है । परन्तु आज-कल ये स्थान भिन्न भिन्न है, और उनमेंसे कुछका नई दिल्ली और कुछका 'पुरानी दिल्ली में समावेश होता है। इन्द्रप्रस्थ नामका स्थान 'पुराने किले' के नामसे प्रसिद्ध है। हस्तिना- .
पहला प्रकरण। ३ ३ ~ युर नामक स्थान दिल्लीसे अलग है । और, शाहजहानाबाद दिल्ली शहर में शामिल है । कहते है कि, पहले दिल्ली बडा विस्तीर्ण नगर था । उसकी परिधि ४५ मीलकी थी। इस नगरको इन्द्रप्रस्थका नाम अत्यन्त प्राचीन कालसे मिला है । जनरल कनिगहमका यह अनुमान हे कि, 'ईस्वी सदीके पन्द्रह सौ वर्ष पहले उत्तरसे आनेवाले आर्य लोगोंने यमुना नदीके सुन्दर प्रवाहको देसकर उसके तटपर इस नगरकी रचना की "होगी। महाभारतसे यह मालूम होता है कि, धर्मराज युधिष्ठिरने इस नगरकी सृष्टि की है । इससे यह अनुमान होता है कि, इस नगरकी सृष्टि आजसे ७००० वर्ष पहले हुई होगी। आजकलके ज्योतिप-शास्त्र-रिशा- रदोंके मतानुसार भारतीय युद्धका समय आजसे ७११४ वर्ष पहलेका है। इससे स्पष्ट है कि, इस कालके पहलेसे ही इस नगरका अस्तित्व रहा होगा । कुछ लोगोका यह मत है कि, जिस समय इन्द्रप्रस्थ नामक नगरी प्रस्थापित की गई थी, उस समय यमुनाका प्रवाह उसके वर्तमान 'प्रवाहसे भिन्न था । अस्तु, जन कि महाभारतके पहलेकी देश-दशाका "विचार करनेके लिए कोई अच्छा साधन उपलब्ध नहीं है, तब फिर यह माननेमें कोई आपत्ति नहीं है कि, इन्द्रप्रस्थकी नगरी पाडबाँके कालसे ही अस्तित्वमें आई। इन्द्रप्रस्थका राज्य पाडमोंके वशमें तीस पीढियों तक, यानी लगभग .१८५४ वर्ष रहा । * इसके बाद, तीसवीं पीढीके राजा क्षेमक अथवा लखमीदेवके प्रधान वीरसेन अथवा विसर्वने इस राज्यको छीन लिया। उसने तथा उसके वंशजोंने ३४७ वर्ष तक राज्य क्यिा । इसके बाद, दिहीके राजाओंकी सम्पूर्ण नामावली इस पुस्तकके अन्तमें परिशिष्टरूपसे दी गई है। उसमें पाइयोंमे लेकर मुगल बादशाहोंक अन्त तक समस्त राजाओंक नाम और उनके शासनके समय दिये हैं।
दिल्ली अग्रवा इन्द्रप्रस्था उसके वशके अन्तिम राजा पृथ्वीपालसे नरहरिनाथ नामक उसके दीवान- ने यह राज्य छीन लिया । इसका राजवश गौतमके नामसे प्रसिद्ध हुआ । इस वशके राजाओंके हाथमें यह राज्य ३८९ साल तक रहा । इसके बाद मयूरोंका राज्य हुआ । इस वशके अन्तिम राजाको मारकर शकादित्यने राज्य छीन लिया । इसके बाद राजपूत लोग राजा हुए। इस प्रकार अनेक वर्षों तक इन्द्रप्रस्थ हिन्दू राजाआके हाथमें रहा। इसके पश्चात् क्रमशः पठान, मुगल, मराठों और अन्तमें अग्रेज लोगों- के हाथमें यहाकी सत्ता चली गई । जनरल कनिगहमका मत है कि, इन्द्रमस्थको दिल्ली अथवा दिलीपुर नाम ईस्वी सनके एक शताब्दी पहले प्राप्त हुआ होगा। उन्होंने मुसलमान इतिहास-लेखक फरिस्ताके आधार पर यह प्रतिपादन किया है कि, पहलेका दिल्ली शहर आज कलकी दिल्लीसे ५ मीलकी दूरी पर, जमुना नदीके तट पर, बसा था, और मयूर वशके दिलू नामक राजासे उसे 'दिल्ली' नाम प्राप्त हुआ । परन्तु इससे भी अधिक विश्वसनीय वृत्तान्त ईसवी सनकी तीसरी अथवा चोथी शताब्दीसे प्राप्त हो सकता है । दिल्ली में जो एक प्रख्यात लोहस्तभ है उसपर एक सस्कृत लेस सुदा है । उससे जान पड़ता है कि, धव नामक राजाने अपना प्रताप ससारमें प्रकट करनेके लिए यह लोहस्तम्भ खडा किया । जनरल कनिगहमके मतसे इस लोह- स्तम्भका समय सन् ३१९ ईसवी है । उन्होंने यह अनुमान निकाला है कि, इस समयमें चूकि कन्नौजका गुप्त नामक राजघराना सत्ताहीन हुआ, अतएव उस समय उपर्युक्त राजाने अपने पराक्रमको व्यक्त करके विजयानन्दसे इस लोहस्तभको खडा किया होगा। परन्तु, फिर पीछेसे इस लोहस्तम्भके सस्कृत लेखका आधार भी रद होगया, और परम्परासे चली आई हुई दन्तकथाओंने, आठौं शताब्दीके तुम्बर अथरा तोमर घरानेके प्रस्थापक राजा बिल्हणदेव उर्फ अनगपालको, इस लोहस्तम्भका ~ पहला प्रकरण। aN VVU wwwwwww और आपका 'जनकत्व दिया। दिल्लीमें इस विषयकी अनेक दन्तकथाए प्रचलित है । उनमें एक दन्तकथा इस प्रकार है एक दिन किसी ब्राह्मणने राजासे आकर कहा कि, आपने जो यह स्तम्भ स्थापित किया है उसका सिरा धरतीके भीतर शेषनागजीके मस्तकमें जा लगा है, यह स्तम्भ खूब दृढ हो गया है-अतएव आपका राज्य भी इसी प्रकार दृढ रहेगा । जब तक यह स्तम्भ यहा रहेगा तब तक आपका राज्य अबाधित रहेगा, और आपहीके वशमें बना रहेगा ।" राजाको ब्राह्मण- का कथन सच मालूम हुआ, और उसके कथनकी परीक्षा लेनेके लिए उसने उस लोहस्तम्भको उसाडकर देखनेकी आज्ञा दी । जब वह स्तम्भ उसाड कर देखा गया तब उसके निचले सिरेमें सचमुचही पून लगा हुआ दिखाई दिया, क्योंकि स्तम्भ शेषनागके मस्तकमें । घुस गया था। यह देखकर राजाको ब्राह्मणके कथनकी सत्यता पर विश्वास होगया । राजाने उस स्तम्भको फिर गाडनेकी कोशिश की, परन्तु वह पहलेके समान हड़तापूर्वक नहीं गडा, किन्तु कुछ ढीला रह गया । वह लोहेकी लाट चूकि 'ढीली' रही, और इसी लिए उस स्थानको “ दिल्ली" या " दिल्ली" कहने लगे । इसके सिवा और भी कई किवदन्तिया प्रचलित हैं । 'टालेमीके ग्रथमें “देदल" ओर इन्द्रवर" नामके जिन दो पास-पासवाले शहरोंका उल्लेख किया गया है, उनसे " दिल्ली" और " इन्द्रप्रस्थ " के नामोंकी बहुत कुछ समानता है । इसलिए स्पष्ट है कि, ये दो नाम बहुत प्राचीन हैं । कई एक प्राकालीन इतिहास-अन्वेषकोंका मत है कि, दिल अथवा धिलू नामके राजासे ही “ दिल्ली" नाम पडा है, और विक्रमीय शताब्दीके पहले, यानी ईसवी सनके ५७ वर्ष पहलेके लगभग इस नामका प्रचार हुआ। विम्म राजाके विषयमें हिन्दी भाषामें जो कपित्त प्रचलित है। उनमें यह उल्लेख है कि, "दिलीपति कह्यो "-यानी विक्रमको दिल्लीपति " , दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। vvvv V~~ ~~ vvv NWARA कहने लगे । साराश यह है कि, इस शहरका “ दिल्ली" नाम बहुत पुराना है। सन् ७३६ ईस्वीसे दिल्लीके राजाओंका विश्वसनीय हाल मालूम होता है। अनगपाल तुम्बर वशका मूल सस्थापक है । सन् ७३६ ईस्वीमें, इसका राज्याभिषेक हुआ । उसने पहले पहल दिल्लीमें राज्य किया । इसके बाद उसके वशज कन्नौजमे गये । वहासे उन्हें राठोडोंके मूल पुरुष चन्द्रदेवने भगा दिया । इसके बाद दूसरा अनंगपाल दिल्ली में आया, और वहां उसने अपनी राजधानी बनाई । वहा उसने नया शहर वसाया, और उसके आसपास एक भारी कोट 'बनवाया । कुतुबमीनारके आस- पासके हिस्सेमें प्राचीन इमारतोंके जो चिन्ह देख पडते है वेराजा अनग- पालकी राजधानीके चिन्ह माने जाते है। अनगपालके दिल्लीमें राज्य करनेका समय उपर्युक्त प्राचीन लोहस्तम पर इस प्रकार दिया है- सवत् दिहली ११०९ अगपाल वही।" इससे यह सिद्ध होता है कि, सन १०५२ ईस्वीमें राजा अनगपाल दिल्ली में राज्य करता था । इसके एक शताब्दीके बाद, यानी तुम्बर घरानेके अन्तिम राजा-तीसरे अनग- पाल-के शासनकालमे, अजमेरके राजा विशालदेव चौहानने दिल्ली जीत ली । इस विजयी राजाने अनगपालका सर्वथा नाश नहीं किया किन्तु उसे एक छोटासा राज्य देकर अपना माण्डलिक बना लिया, और उसके घरानेसे वेटीव्यवहार किया । इन दो घरानोंके विवाहसम्बन्धका फल पृथ्वीराज चौहान है । पृथ्वीराजे भारतकी हिन्दू स्वतत्रताका अभि- मानी तथा उसकी रक्षाके लिए लडनेवाला अन्तिम राजा है। उसने दिल्ली में “ रायपिथोरा " नामका एक किला बनवाया, और अनगपालके बनवाये हुए कोटके आसपास एक और भारी कोट बनवाया, तथा ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि, जिससे कोई भी शत्रु दिल्ली शहर. को न जीत सके । परन्तु भारतवर्षकी स्वतत्रता पर कर कालकी वक्र ।
७ पहला प्रकरण। ... दृष्टि हुई, और पृथ्वीराजका अजेय क्लिा एव सुदृढ कोट कुछ मी काम न दे सका, तथा भारतवर्षकी स्वतंत्रता पृथ्वीराजके शासनकालमें ही रसातलको पहुँच गई! सन् ११९१ ईस्वीमें शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरीने हिंदुस्तानपर अपना पहला आक्रमण किया। पृथ्वीराजने बड़ी वीरताके साथ उसका सामना किया । यहा तक कि, पृथ्वीराजने उसे थानेश्वरकी लडाईम अच्छी तरह हरा दिया । पृथ्वीराजने शहाबुद्दीनकी सेनाका ४० मील तक पीछा किया, और उसकी नाकमें दम कर दिया । परन्तु दो सालके बाद यह मुसलमानी आफत फिर आई, और उसने पृथ्वी- राजका परामव करके उनका वध किया, और दिल्लीका साम्राज्य अपने अधीन कर लिया! इस प्रकार -मुहम्मद गोरीके सेनापति कुतबुद्दीनने दिल्लीको जीता और वहा मुसलमानी सत्ताका हरा झंडा खडा कर दिया । सन १२०६ ईस्वीमें जब मुहम्मद गोरीका देहान्त हुआ, कुतुबुद्दीन स्वय दिल्लीके सिहासनका अधिपति बन बैठा, जोकि भारतके इतिहासमे गुलाम घराने के प्रस्थापकके नामसे प्रसिद्ध है। आजकल पुरानी दिल्लीके नामसे बस्तीका जो भाग प्रसिद्ध है, वहीं इस बादशाहकी राज- धानी, थी जिसके कुछ चिन्ह अभी तक कायम है । वहा कुतुबुद्दीनकी एक मसजिद है। उसके प्रवेशद्वार पर जो शिलालेख है उससे यह मालूम होता है कि, सन् ११९३ इस्वीमें इस विजयशाली बादशाहने दिल्लीमें स्वधर्म स्थापन करनेके उद्देशसे यह मसजिद बननाई । अस्तु । इसी वादशाहने अपने प्रताप-सूर्यको निरतर लोगोंझी दृष्टिके सामने रखने के लिए अपने नामपर “कुतुबमीनार " नामका एक प्रचड विजयस्तम्भ खडा किया । यह इमारत इतनी अपूर्व और भव्य है कि, समस्त पृथ्वीके लोकोत्तर चमत्कारों से एक चमत्कार मानी जाती है । अस्तु । जिस समय दिल्लीमें गुलामोंका घराना राज्य कर रहा था, उस समय .
८ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । 1 इसी घरानेमें एक राजनीतिज्ञ स्त्री पैदा हुई, जो कि दिल्लीके इतिहासमें पहली राज्यकर्वी स्त्रीके नामसे मशहूर है । इसका नाम रजिया बेगम था। जिस तरह हगरीके देशभक्तोंने यूरुपकी प्रसिद्ध रानी मेरिया थेरिसा का जयजयकार किया, उसी तरह रजिया बेगमकी प्रजाने भी उसका जयजयकार करके उसे “सुल्ताना" की बादशाही पदवी प्रदान की। सन १२९० ईस्वी तक दिल्लीका राज्य गुलाम वशके अधीन रहा । इसके बाद जलालुद्दीन सिलजीने अपनी राज्यसत्ता दिल्लीपर प्रस्थापित की । जलालुद्दीनके बाद उसका भतीजा अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्लीके तख्त पर बैठा । इसके शासनकालमे मध्य एशियाके मुगल लोगोंने दो बार दिल्लीपर चढाइयों कीं, परन्तु उन्हें हार खाकर वापिस लौट जाना पडा। . सन् १३२१ ईस्वीमें पुन दिल्लीमें राज्य-कान्ति हो गई, और वहॉक राज्यसूत्र तुगलक घरानेके हाथमें चले गये । इस घरानेके मूलपुरुप गया- सुद्दीन तुगलकने दिल्लीके पूर्वकी ओर, चार मीलके अन्तर पर, एक उच्च स्थान पर तुगलकाबाद नामकी एक स्वतत्र राजधानी बनाई । इस तुग- लक नगरीके कोट, और उसके उध्वस्त मार्ग अभी तक दृग्गोचर होते है । परन्तु आज-कल उस स्थान पर मनुष्योंकी बस्ती बिलकुल नहीं है । सन् १३२५ ईस्वीमें गयासुद्दीनका देहान्त हो गया, और उसके पश्चात् मुहम्मद तुगलक सिहासन पर बैठा । इसने अपनी राजधानी दिल्लीसे उठाकर देवगिर अथवा दौलताबाद ले जानेका तीन बार प्रयन किया । सन १३४१ ईस्वीमें इसब दुटा नामका तुर्किस्तानका एक प्रवासी इस बादशाहके दरबारमें आया था । उसने इस बादशाहकी राजधानी का ठीक ठीक वर्णन किया है । उसमें उसने उस नगरकी निर्जन दशा, वहॉकी भव्य इमारतों तथा अन्य कलाकौशलके कार्योंका अच्छा चित्र खींचा है। फीरोजशाह तुगलकने फिर एक बार दिल्लीसे अपनी ! पहला प्रकरण। राजधानी उठाई, और फीरोजाबाद नामका एक शहर बसाया । आज- कल जहाँ पर हुमायूँ वादशाहकी क्बर स्थित है, वहीं यह शहर था, और वहाँ पर अभी तक उसके राज-प्रासादके शेप चिन्ह दृष्टिगोचर होते हैं। इस राज-प्रासादके दक्षिणी-द्वारके समीप चक्रवर्ती राजा अशोकका विजयस्तम्भ दीख पडता है, जो कि सन् ईसवीके तीन सो वर्ष पहलेका है । इस स्तम्भकी उँचाई ४२ फीट है, और लोग इसे 'फीरोजशाह- की लाट ' कहते है । इस पर पाली भाषामें लिखा हुआ राजा अशोकका शिला-लेख है। फीरोजशाहने इस स्तम्मको यमुना नदीके तीर पर खिज- राबाद नामक स्थानसे लाकर यहाँ सडा किया । इस विजयस्तम्मसे 'फीरोजशाहकी राजधानीके स्थलका ठीक ठीक पता चल जाता है। सन् १३९८ ईस्वीमें, महमूद तुगलकके शासनकालमें तैमूरलगने दिल्लीपर आक्रमण किया। उस समय यह महमूद तुगलक गुजरातमें भाग गया, और उसकी सेनाने बे-तरह हार साई। समस्त दिल्ली नगर द्रव्यलोभी तैमूरके भयकर पोंमें फंस गया उस समय लगातार पन्द्रह दिनों तक दिल्ली में लूटमार और मारकाट होती रही । इसके बाद उस नराधम नर-पिशाचकी तृषा शान्त हुई, और वह असख्य द्रव्य तथा करोडो गुलाम साथ लेकर स्वदेशको लौट गया। तेमूरके दिल्लीसे लौट जाने के बाद दो महीने तक वहाँ राजसत्ताका नाम तक न रहा था। सारा नगर उध्वस्त होकर बेचिराग हो गया था । महमूद तुगलक पुन वहाँ आया, और उसने अपनी राजधानीके गत वैभवको फिरसे स्थापित करनेका थोडासा प्रयत्न किया । परन्तु सन् १४१२ ईस्वीमें उसकी मृत्यु हो गई, और उसके साथ तुगलक धरानेका भी अन्त हो गया। आगे चलकर कुछ समय तक, यानी सन १४४४ ईस्वी तक, दिल्लीमें सैयद घराने ने राज्य किया । इसके बाद लोदी परानेका राज्य आया । उन्होंने दिल्लीसे अपनी राजधानी उठाकर आगरे . - १० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्था . में प्रस्थापित की, और उसीको अपना निवासस्थान बनाया । इस धराने के अन्तिम बादशाह इब्राहीम लोदी पर सब १५२६ ईस्वीमें तैमूर के छठवें वशज बाबरने आक्रमण किया । पानीपतके विख्यात रण- स्थल पर दोनोंमें घनघोर सग्राम हुआ। परिणाम यह हुआ कि, बाबरने इब्राहीमको हटा दिया। उसने दिल्लीको जीत लिया, और वहाँ मुगल बादशाहतकी नीव डाली । यह बादशाहत सन् १५२६ ईस्वीसे लेकर अन्त तक कायम थी। यद्यपि बाबर बादशाहने दिल्लीको जीतकर वहाँ अपना राज्य प्रस्था- पित कर दिया था, तथापि उसने वहाँ अपनी राजधानी न बनाई । वह सदा आगरेमें रहा करता था, और वहीं सन् १५३० ई० में उसका देहान्त हुआ। यह वादशाह बडा विद्वान एव उत्तम कवि था। उसने तुर्की भाषामें स्वयं अपना मनोरजक " आत्मचरित "लिस रक्खा है । मुगल बादशाहत तो लुप्त होगई, परन्तु बाबरका लिखा हुआ आत्म- चरित अभी तक ' कायम है, और उसकी कीर्तिगाथा गा रहा है । मि० विवरीज नामके एक अग्रेज महाशयने इस प्रथके बारेमें लिखा है कि वावरका आत्मचरित उन अमूल्य ग्रन्थोमेंसे है, जिनकी महत्ता सर्व- काल अवाधित रहेगी, और. उसकी योग्यता सेन्ट आगस्टाइन तथा रूसोके आत्मचरितों अथवा गिवन और न्यूटनके चरितलेखोंके समान ही है । एशियाखडमें इसके समान ग्रन्थ केवल यही एक है ।"* इन शब्दोंसे बाबरके आत्मचरितका महत्त्व प्रकट हो जाता है । इस लिए इस ग्रन्थके सम्बन्धमें रसिक अग्रेज विद्वानोंका यह कौतुकपूर्ण * H18 autobiography is one of those priceless records which are for all time, and is fit to rank with the confessions of St Augustine and Rousseau, and the memoirs of Gibbon and Newton In Asia at stands almost alone -Calcutla Review, 1897- । " पहला प्रकरण। , कथन बिलकुल सच है कि, " बाबरके घरानेकी राजसत्ताका नाश होने पर भी, कालकी वक्रदृष्टिकी तनिक भी परवा न करते हुए, बढ़े गर्वसे यह कहते हुए, कि 'देखो, मै ज्यों का त्यों अभी तक कायम हूँ, मानो यह अन्य कालका ही उपहास कर रहा है ! 1 * बाबरकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हुमायूं मुगल बादशाहतका अधि- पति हुआ। उसने दिल्लीम पुन राजधानी बनाई, और इन्द्रप्रस्थकी प्राचीन भूमि पर एक किला निर्माण किया । वह अभी तक 'पुराना' किला' के नामसे प्रसिद्ध है । सन् १५४० ईस्वीमें अफगान मत्री शेर- शाहने हुमायूको भगा दिया, ओर स्वय दिल्लीका बादशाह बन बैठा । उसने दिल्लीके चारों ओर फिर एक भारी शहरपनाह बनवाया । इस" प्रचड किलेबन्दीका ' लालदरवाजा' नामक एक चिन्ह अभी तक शेप रह गया है । शेरशाहकी मृत्युके बाद उसका बेटा सलीम गद्दी पर बैठा। उसने सलीमगढ नामक एक किला बनवाकर अपना नाम अजरामर कर लिया है । सन् १५५५ ई० में हुमायूँ बादशाहने फिर दिल्ली पर चढाई करके अपना राज्य वापिस ले लिया । परन्तु छ- महीनेके भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई । दिल्लीमें उसकी कवर बढ़ी प्रसिद्ध है, और वह उत्तम कलाकौशलका दर्शनीय स्थान है । हुमायूँ बादशाहके पश्चात् उसका पुत्र अकबर दिल्लीके सिहासन पर आरूढ हुआ। अकबर दिल्लीके समस्त वादशाहोंमें उत्तम था । उसकी गणना बहुत अच्छे राजाओंमें की जा सकती है । उसकी उत्तम राज्यव्यवस्था, न्याय-निपुणता, प्रजाहितदक्षता, आदि बातें प्रसिद्ध ही है । परन्तु इन * The power and pomp of Babar's dynasty are gone, the record of his life-the Inttera Scripta that. mocks at time-remains unaltered and imperishable” -S Lane-poole , दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। N - गुणोंके अतिरिक्त, उसमें सब प्रकारके धोके साथ सहिष्णुता ( Tolera tion ) रखनेका गुण अत्यन्त प्रशसनीय था। उसने सब धर्मके लोगोंके साथ समभावसे वर्ताव किया । इसलिए सब जाति और धर्मके लोग उसका धन्यवाद गाते रहे । इस बादशाहको विद्वानोंसे बड़ा प्रेम था । उसके दरबारमें फैजी, अबुल फजल, आदि बड़े नामी पडित थे। अक- बरने इन विद्वानोंसे महाभारत, रामायण, इत्यादि पौराणिक ग्रन्थोंका तथा बीजगणित, लीलावती, इत्यादि गणितशास्त्रके ग्रन्थोंका फारसी भाषामें अनुवाद कराया । इसके अतिरिक्त, उसकी सभामें ब्राह्मण, यहूदी, 'पारसी और ईसाई आदि धर्मोंके विद्वान पडित थे । इन सब धर्मोंके तत्त्वोंको जानकर उसने यह धर्मसिद्वान्त निश्चित किया था कि. There was no god but God, and that Akbar was his Calif. अर्थात ससारमें एक परमेश्वरके सिवा दूसरा जगनियन्ता नहीं, और उस परमेश्वरके धर्मका शासन करनेवाला सिर्फ अकबर है। उसने गौहत्या बन्द कर दी, हिन्दू और मुसलमानोंको एकताके सूत्रमें बद्ध क्यिा, और स्वय जोधपुर तथा जयपुरके राजपूत राजाओंकी कन्या- ओंसे ब्याह करके उनके अन्त क्रणमें अपने प्रति प्रेम-भाव उत्पन्न कर दिया । उसके शासनकालका आदर्शरूप अन्य “आईने अकबरी” बहुत प्रसिद्ध है। इस ग्रन्यसे यह अच्छी तरह मालूम हो जाता है कि, अकबरके शासन-कालमें कौन कौनसे सुधार हुए थे। उसके शासन कालमें दिल्लीके सिहासनको जो महत्त्व प्राप्त हुआ था वह दूसरे किसी भी बादशाहके' शासन-कालमें प्राप्त नहीं हुआ। दिल्लीके बादशाह के लिए, पूज्यभाव और आदरका दर्शानेवाला 'दिल्लीश्वर' नामक जो विशेषण प्राप्त हुआ है, उसका आरम्भ इसी सर्वश्रेष्ठ सद्गुणसम्पन्न नृपतिसे हुआ । वर्नियर और 'परचास नामक यूरोपियन प्रवासियोंने अपने प्रवास-वृत्तान्तोमें अकबरके ।
पहला भकरण। 4 वारेमें बहुत प्रशसापूर्ण लेस लिसे हैं । उनका आशय यह है कि, अकबर बादशाह अत्यन्त सुस्वभावी था । उसका राजतेज बढा विलक्षण था । उसके शत्रु उसके प्रतापके आगे भयभीत होते थे, परन्तु दीनजनोंके लिए उसके अन्तःकरणमें दयाका भारी स्रोत वहता था, और उनके लिए वह एक सुगम आश्रयस्थान था । कलाकौशलकी ओर उसका बडा ध्यान रहता था, और वह प्रजा पालनको ही अपना एक मात्र कर्तव्य समझता था। इस प्रकार विदेशियों तक ने जब उस नृपतिकी इतनी प्रशसा गायी है, तब यदि वह हमारे संस्कृत कवियोंके वर्णनका भी एक प्यारा विषय बन गया, तो इसमे कोई आश्चर्यकी बात नहीं । अकबरके बारेमें सस्कृत कवियोंका इस प्रकार वर्णन पाया जाता है हस्ताम्मोजमाला नखशशिरुचिरश्यामलच्छायवीचि । तेजोमेधूमधारा वितरणकरिणो गण्डदानप्रणाली ॥ चैरिश्रीवेणिदण्डो लवणिमसरसी बालशैवालकही। वेलत्यम्मोधरश्रीरकबरधरणीपालपाणी कृपाण' ॥१॥ चीर व कार्मुक चेदकबर क्लयस्युग्रटकारपोप । दूरे सद्य कलका इव धरणिभृतो यान्ति ककालशेषा.॥ शकापन्नश्च कि फारणमिति मनसा भ्रातिपकायितेन । त्यक्त्वाहकारमकादिराजति गृहिणी पिं च लकाधिनाथ ॥२॥ कर्णाट देहि वर्णाधिकविधिविहितत्याग लाट ललाट- प्रोत्तुग द्राविड वा प्रचलभुजवलमौढिमागाढराढम्॥ प्रस्फूर्जगुर्जर वा दलितरिपुवधूगर्भवैदर्भक वा। गाजी राजीवटे कुशशतमथवा शाहजलालुदीन ॥३॥ गाजीजलालुदी क्षितिपकुलमणे द्राक्प्रयाणे प्रतीते। प्रेयस्य प्रारमन्ते तरलतरगतिाकुला मगलानि ।। नेत्राम्भ पूर पूर्णस्तनकलशमुखन्यस्तबालप्रमालाः । स्च्युट्यन्मुक्ताकलापच्युतकुचकुसुमच्छानाकीर्णलाजा 3 .
१४ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्था wwwwww . इस वर्णनसे अकबरकी योग्यता व्यक्त होती है । सन् १६०५ ईस्वीमें, अक्बरकी मृत्युके बाद, उसका पुत्र 'जग- ज्जेता' जहाँगीर दिल्लीके सिंहासन पर आरूढ हुआ । अक्बर बादशाह और जहाँगीर, दिल्लीमें अधिक न रहकर, मुख्यत आगरा, अजमेर और लाहोरमें रहा करते थे। इस लिए उनके शासन-कालमें दिल्लीकी महत्ता वर्णन करने योग्य न बढी । परन्तु सन् १६२७ ई० के बाद जब जहाँ- गीरका बेटा शाहजहाँ दिल्लीके तख्त पर बैठा, तब उसने दिल्लीको अपूर्व शोभा प्राप्त कराई-उसने उसे एक अद्वितीय नगर बना दिया। इस वादशाहको भव्य और सुन्दर इमारतोंका बेहद शौक था। इस लिए इसने दिल्लीमें 'शाहजहानाबाद ' नामक एक नया शहर बसाया । आजकल जिसे ' नई दिल्ली' कहते हैं, वह इस बादशाहके लहरी स्वभावका दर्शक है । दिल्लीका किला, उसके भव्य, रमणीय तथा नेवानन्ददायक राज-प्रासाद, वहॉकी जुम्मा मसजिद और जमनाकी नहर, इत्यादि अनेक काम इसी बादशाहके शासन-समयमें हुए है । इन सुन्दर और दर्शनीय इमारतोके अतिरिक्त इस बादशाहने आगरेमें अपनी प्राणप्रिय रानीके स्मरणार्थ जो अपूर्व इमारत खडी की है, उसकी बराबरी संसारकी एक भी इमारत न कर सकेगी। आगरेके 'ताजमहल' का सिर्फ नामो- च्चार करते ही ऐसा मालूम होने लगता है, मानो सारी कुशलताकी परमावधि करके ससारकी अखिल सुन्दरता यहाँ भर दी है । इसी बाद- शाहने रत्ननंटित मयूरसिहासन वनवाकर अपने अपार वैभवसे समस्त राष्ट्रोंके नेत्रोंको चकाचौधमें डाल दिया था । इस बादशाहके पश्चात् ओरंगजेब दिल्लीका अधिपति हुआ । यह वडा धर्म-विक्षिप्त मनुष्य था, और इसे समस्त भारतवर्षमें मुसलमानी धर्मके प्रचार करनेकी महत्वाकाक्षा बहुत ही सताती रहती थी। इसके धार्मिक अत्याचार और अत्यन्त लोभके कारण सारी प्रजा त्रस्त होगई । ३ पहला प्रकरण । MANMAA इसीके शासन-कालमें हिन्दू-धर्माभिमानी छत्रपति श्रीशिवाजीमहाराज महाराष्ट्रमें उदय हुए, और उन्होंने एक स्वतत्र राज्यकी स्थापना की। औरंगजेबका सारा जीवन मुख्यत दक्षिणमें मराठों तथा बीजापुर और गोलकुडाके बादशाहोंसे लडने-झगडनमें ही व्यतीत हुआ, जिससे वह दिल्लीके वैभवको विशेष रूपमें नहीं बढा सका । औरगजेब बादशाहने छत्रपति शिवाजी महाराजको एक्बार दिल्लीमें लाकर कैद किया, जहॉसे उन्होंने बढी युक्तिके साथ अपना छुटकारा कर लिया । इस इतिहास- प्रसिद्ध घटनासे मराठोंकी दिल्लीसे विशेष पहचान होगई । सन् १७०७ ईस्वीमें औरगजेब हताश होकर मर गया, और उसके पश्चात् मुगल बाद- शाहतका सूर्य अस्त होने लगा। औरगजेनके बाद जो जो बादशाह दिल्लीके सिहासन पर अधिष्ठित हए, उनमें समस्त साम्राज्यको अपने अधीन रखनेका पराक्रम न था, अतएव दिल्लीपतिकी सत्ता विगलित होगई, और " जिसकी लाठी उसकी भैस" की कहावतके अनुसार सरदार लोग सर्वसत्ताधारी बनकर राज्यकार्य करने लगे। दिल्लीके दरबारमें परस्पर मत्सर, राज्यतृष्णा और अधिकारलालसाका साम्राज्य फैल जानेसे अन्य लोगोंको वहाँ 'प्रवेश करनेका अवसर मिल गया। मराठोंके मुख्य प्रधान बालाजी विश्व- नाथ और उनके पुन बाजीराव पेशवाने दिल्ली पर चढाइयॉ की, और वहाँके नामधारी बादशाहोंसे मराठोंके लिए "चौथ " तथा सरदेश- मुखी" की सनदें प्राप्त कर ली । सन् १७३९ ईस्वीमें दिल्लीकी सम्पत्ति पर जलनेवाला ईरानका बादशाह नादिरशाह दिल्ली पर चढ आया । उसने बडे विजयानन्दसे मुगल राजधानीमें प्रवेश किया, और तीन सदियोंके पहले तैमूरलगने जो लूटमार और मार-काट की थी, उसका स्मरण मानो फिरसे जागृत करनेके लिए नादिरशाहने दिल्लीमें वही दृश्य आरम्भ कर दिया । लगभग ५८ दिनों तक दिल्लीमें अमीर और गरीब - दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। wwwvvwww wwwwwv. rvwwwwwwwwwww ~ ~ इम वर्णनसे अकबरकी योग्यता व्यक्त होती है। सन् १६०५ ईस्वीमें, अक्बरकी मृत्युके बाद, उसका पुत्र' जग- ज्जेता' जहाँगीर दिल्लीके सिंहासन पर आरूढ हुआ। अकबर बादशाह ओर जहाँगीर, दिल्लीमें अधिक न रहकर, मुख्यत आगरा, अजमेर और लाहोरमें रहा करते थे। इस लिए उनके शासन कालमें दिल्लीकी महत्ता वर्णन करने योग्य न बढी । परन्तु सन् १६२७ ई० के बाद जब जहाँ- गीरका बेटा शाहजहाँ दिल्लीके तस्त पर बैठा, तब उसने दिल्लीको अपूर्व शोभा प्राप्त कराई-उसने उसे एक अद्वितीय नगर बना दिया । इस बादशाहको भव्य और सुन्दर इमारतोंका बेहद शौक था। इस लिए इसने दिल्लीमें 'शाहजहानाबाद ' नामक एक नया शहर बसाया । आजकल जिसे 'नई दिल्ली' कहते है, वह इस बादशाहके लहरी स्वभावका दर्शक है। दिल्लीका क्लिा, उसके भव्य, रमणीय तथा नेत्रानन्ददायक गज-प्रासाद, वहाँकी जुम्मा मसजिद और जमनाकी नहर, इत्यादि अनेक काम इसी बादशाहके शासन-समयमें हुए है । इन सुन्दर और दर्शनीय इमारतोंके अतिरिक्त इस बादशाहने आगरेमें अपनी प्राणप्रिय रानीके स्मरणार्थ जो अपूर्व इमारत खडी की है, उसकी बराबरी ससारकी एक भी इमारत न कर सकेगी। आगरेके 'ताजमहल' का सिर्फ नामो- च्चार करते ही ऐसा मालूम होने लगता है, मानो सारी कुशलताकी परमावधि करके ससारकी असिल सुन्दरता यहाँ भर दी है । इसी वाद- शाहने रत्नजटित मयूरसिहासन बनवाकर अपने अपार वैभवसे समस्त राष्ट्रोंके नेत्रोंको चकाचौधमें डाल दिया था । इस बादशाहके पश्चात् औरगजेब दिल्लीका अधिपति हुआ । यह बडा धर्म-विक्षिप्त मनुष्य था, और इसे समस्त भारतवर्षमें मुसलमानी धर्मके प्रचार करनेकी महत्वाकाक्षा बहुत ही सताती रहती थी। इसके धार्मिक अत्याचार और अत्यन्त लोभके कारण सारी प्रजा त्रस्त होगई। - पहला प्रकरण। १७ ANATANAM और स्वय अपने लिए आलीजाह बहादुरकी पदवी प्राप्त कर ली । इस समयसे दिल्लीमें मराठोंकी पूर्ण सत्ता जम गई, ओर दिल्लीकी रक्षाके लिए वहाँ मराठोंकी एक सेना रहने लगी । महादजी सेंधियाके दामाद लाडोजी शितोले देशमुस कुछ काल तक स्वय दिल्ली सूबेदार थे। ग्वालियरमें शितोलोंको 'राजराजेन्द्र रुस्तमे जग वहादुर' की जो पदवी चली आरही है, वह दिल्ली-विषयक मराठोंकी प्रभुता बतलाती है। निस्सन्देह महादजी सेंधियाके जमानेमें दिल्लीके पदपर मराठोंका पूर्ण अधिकार होगया, परन्तु इसके बाद बहुत जल्द मराठोंकी सत्ताका ह्रास होने लगा, और आगे चलकर शीघ्र ही अंग्रेजोंकी प्रबलता वढ गई । उनकी सेनाने दिल्लीमें दौलतराव सेधियाका पूर्ण पराभव कर दिया, और सन् १८०३ ईस्वीके मार्च महीनेकी चौदहवीं तारीखको लार्ड लेकने दिल्लीपर अपना अधिकार जमाकर वहाँके वादशाहको अपने आश्रयमें लेलिया । आगामी वर्ष (यानी सन् १८०४ ई० में) यशवन्तराव होल्करने दिल्लीपर चढाई करके वहॉके अगरेज रेजीडेंट कर्नल (आगे चलकर सर डेविड) आक्टरलोनीसे टक्कर दी, और उससे दिल्ली छीन लेनेका प्रयत्न किया । परन्तु उस समय लार्ड लेककी सहा- यता उसे तत्काल प्राप्त हो जानेके कारण वहाँसे अंग्रेजोंकी सत्चाका नाश नहीं हुआ । उस समयसे अंग्रेजोंने दिलीके बादशाहके नाम पर राज-कारबार चलाना आरम्भ कर दिया। सन् १८०४ ईस्वीमे दिल्ली में अंग्रेजोंकी राजसत्ताके आरम्भ हो जानेके बाद दिल्लीका बादशाह सिर्फ नामधारी-बादशाह रह गया, वह अॅग- रेजोंके हाथका कठपुतला बन गया, और दिल्लीके किलेमें तथा वहाँके राज- प्रासादोंमें ही उसकी सत्ता चरने लगी । सन् १८०६ ईस्वी में दूसरे शाह- आलमका शरीरान्त हुआ, और उनके अनन्तर अकरशाह दिल्लीके नामधारी सिंहासनका अधिष्ठाता हुआ। इसे अंग्रेजोंसे १५ लाख रुपये 4 - १ 1 दिल्ली अयवा इन्द्रप्रस्था दोनों बराबर लूटे, जा रहे थे । अन्तमे जब दिल्ली के लोग बिलकुल निर्धन और त्रस्त होगये, तब नादिरशाहने लूट-मार बन्द की । एक मुसलमान इतिहासकारका अनुमान है कि, जिस समय नादिरशाह स्वदेशको लौटा, उस समय वह अपने साथ नौ करोडकी सम्पत्ति लेगया था। दिल्ली की बादशाहतके निलकुल कमजोर हो जानेके कारण, उस पर आक्रमण करके उसे हस्तगत करने, और पूर्व-कालके इन्द्रप्रस्थका जीर्णोद्धार करके, उस पवित्र स्थान पर हिन्दू राज्यकी पुन. स्थापना करनेके उद्देश्य से मराठोंने शीघ्र ही अपना ध्यान दिल्लीकी ओर आकृष्ट किया। परन्तु मराठोंसे हार साकर अपनी बादशाहत गमाना दिल्लीके नामधारी बादशाह तथा उसके सूत्रधारी राजनीतिज्ञोंको इट नहीं था, अतएव उन्होंने अहमदशाह दुर्रानीकी सहायता लेकर पानीपतके रण-स्थलमें मराठोंसे भयकर लडाई छेड दी । दुर्भाग्यवश इस लडाईमें मराठोका पूर्ण पराभव होगया, और उनके समस्त रथी और महारथी नष्ट होगये। इन्द्रप्रस्थके राज्यकेलिए कोरवों और पाण्डवोंका जिस तरह भारतीय युद्ध हुआ, उसी तरह दिल्लीके तरतके लिए यह पानीपतका सग्राम है । इस युद्धमें अपरिमित हानि होनेके कारण मराठोंका राष्ट्र कुछ कालके लिए उत्साहशून्य होगया । परन्तु क्सिी कविकी इस उक्तिके अनुसार, कि “ काटा हुआ वृक्ष और भी जोरसे उठता है, वह राष्ट्र फिर उत्साहपूर्वक उन्नतावस्थाको प्राप्त होगया, ओर महादजी सेंबिया इत्यादि महाराष्ट्र वीरोंने मुगल और रुहेलोंसे बदला लेकर, दिल्लीके बादशाह शाहआलमको अपने अधीन कर लिया, और सन् १७७१ ई० में इन्द्र- प्रस्थपर हिन्दू साम्राज्यका झडा फिर एक बार फहराकर, अपने हाथसे उस वादशाहको सिहासन पर बैठाया । सन १७८९ ईस्वीमें गुलाम कादिर और महादजी सेंचियाका युद्ध हुआ, जिसमें महादजीने दिल्लीपतिको सुश कर दिया, और उससे पेशवाओंके लिए एक बहुत बडा अधिकार " .
. पहला प्रकरण। “देते है । किलेमें एक बडा बाग है, जिसमें बादशाहके रहने के महल तथा उसका जनानखाना है। इन इमारतोंको छोडकर बाकी स्थान देखनेकी जिन्हें इच्छा हो, वे वहॉकी आज्ञा लेकर उनको देख सकते है। शहरके रास्ते अच्छे है, और उनके दोनों ओर उत्तम इमारतें बनी हुई "है । वहाँ अनेकों जातिके व्यापारी रहते है, और उनका व्यापार भी - खूब चलता है । शहरसे जमनाकी नहर बह रही है। उसपर कहीं कहीं घाट बंधे हैं, और इधरसे उघर जानेके लिए थोडे थोडे अन्तर पर पुल बने हैं। इस सारी शोभाका अवलोकन कर मनुष्य चकित हो जाता है। शहरमें अनेक प्रकारकी तारकशी और नकाशीकी कई अच्छी अच्छी चीजें मिलती है । शहरमें जुम्मा मसजिद नामका मुख्य स्थान है । इस स्थानपर जानेके लिए हिन्दुओंको मनाही है । मसजिदके बाहर साय- कालको उत्तम प्रकारके कपडोंका व्यापार होता है, और अनेक प्रकारके पक्षी बिकनेके लिए आते है । वहाँ चाँदनी चौक नामक एक स्थान है, जहाँ जवाहिरॉका सौदा होता है। शहरमें प्राय मुसलमान ही अधिक है। सिर्फ किलेमें ही बादशाह की हुकूमत उस समय चलती थी, आर "बादशाहके द्वारा नियुक्त किये गये कर्मचारी वहाँके झगडाका निबटेरा किया करते थे।" इस वर्णनसे जान पडता है कि, बहादुरशाहके जगने तक दिल्ली शहरका व्यापार और वैभव पूर्णरूपसे नष्ट नहीं हो पाया था, किन्तु थोडाबहुत अवश्य कायम था। कम्पनी-सरकारने दिल्लीपर अपना अधिकार जमाकर वहाँके बाद- शाहको अपने अधीन कर लिया था, तथापि बादशाहकी इज्जत और प्रतिष्ठामें उसने कुछ भी न्यूनता नहीं होने दी थी। सारे हिन्दुस्थानका राज्य- -प्रबन्ध दिल्लीके बादशाह बहादुरशाहके मातहत रहकर किया जाता था। इस पादशाहका बढप्पन कैसा रखा गया था-इसका वर्णन एक ग्रन्य- कारने बहुतही अच्छा किया है । वह कहता है - -- ।
दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । - प्रेम चार्पिक 'पेन्शन मिलती थी। इसके शासन कालमें बिशप 'हिबर नामक 'एक यात्री दिल्ली आया था । उसने उस समय बादशाहसे भेट की थी। उसने बादशाहके बारेमें इस प्रकार उल्लेख किया है:-" अकबरशाहके चेहरेसे उसकी अवस्था लगभग ७४७५ वर्षकी मालूम होती थी। 'परन्तु उसकी यथार्थ उम्र ६३ वर्षकी होगी । परन्तु हिन्दुस्थानमें इतनी उम्र बहुत समझी जाती है । उसका स्वभाव बडा अच्छा था, और उसकी वृत्ति बिलकुल शान्त रहती थी । उसकी बुद्धि, साधारण थी, 'परन्तु उसमें शिष्टाचार और आदर-कुशलता विशेष थी।" यह बाद- शाह सन् १८३७ ईस्वी में परलोक सिधारा, और उसके बाद उसका वेटा बहादुरशाह सिहासनारूढ हुआ । उसे कवितासे बडा, था और वह स्वय कवि था। उसकी कितनीही कविताएँ अभी तक प्रसिद्ध है। इसके शासन-समयमें दक्षिणके सरदार रघुनाथराव विचूरकर दिल्ली गये थे। उनके प्रवास-वृत्तान्तमें दिल्लीसे सम्बन्ध रखनेवाला यह उल्लेख है--" दिल्ली बहुत बडा और विस्तीर्ण शहर है-। सारे- शहरके चारों ओर भारी कोट है, और यमुना नदीके किनारे बादशाही किला बना हुआ है । वहाँ बहादुरशाह नामका एक बादशाह रहता था। किलेके 'बाहरी दरवाजे पर यूरोपियन लोग रहते थे और उन्हींके हाथमें उस दरवाजेका सारा प्रबन्ध था । किलेमें बादशाही महल है। उन सब पर गुम्बज है, और उनपर सुवर्णके पत्र जडे हुए है । क्लेिमें बहुत बढिया इमारतें हैं, और बादशाहके दरवार के लिए एक बृहत् स्थान है। वहाँ पर तख्न रखने के चबूतरे पर एक पत्थर का सिंहासन था-1 वहाँके लोग कहते है कि, पहले इस चबूतरे पर रत्नजटित सिंहासन रहता था । यह स्थान सगमर्मर पत्थरसे अत्यन्त ही सुशोभित निर्माण किया गया है। वहाँकी दीवारों पर 'सुनहली बेलबूटे निकाले गये हैं। यहाँ पर पहले ठौर ठौर पर रत्न जड़े थे, जिनके चिन्ह अभी तक दिखाई . .
पहला प्रकरण। देते है । किलेमें एक बडा वांग है, जिसमें बादशाहके रहने महल तथा उसका जनानखाना है। इन इमारतोंको छोडकर बाकी स्थान "देखनेकी जिन्हें इच्छा हो, वे वहाँकी आज्ञा लेकर उनको देख सकते है। शहरके रास्ते अच्छे है, और उनके दोनों ओर उत्तम इमारतें बनी हुई "हैं । वहाँ अनेकों जातिके व्यापारी रहते है, और उनका व्यापार भी खूब चलता है। शहरसे जमनाकी नहर बह रही है। उसपर कहीं कही घाट बॅध है, और इधरसे उधर जानेके लिए थोडे थोडे अन्तर पर पुल बने हैं। इस सारी शोभाका अवलोकन कर मनुष्य चकित हो जाता है। शहरमें अनेक प्रकारकी तारकशी ओर नक्काशीफी कई अच्छी अच्छी चीजें मिलती है । शहरमें जुम्मा मसजिद नामका मुख्य स्थान है । इस -स्थानपर जानेके लिए हिन्दुओंको मनाही है । मसजिदके बाहर साय- कालको उत्तम प्रकारके कपडोंका व्यापार होता है, और अनेक प्रकारके पक्षी विकनेके लिए आते है। वहाँ चाँदनी चौक नामक एक स्थान है, जहाँ जवाहिरोंका सौदा होता है । शहरमें प्राय' मुसलमान ही अधिक है। सिर्फ किलेमें ही बादशाह की हुकूमत उस समय चलती थी, और "बादशाहके द्वारा नियुक्त किये गये कर्मचारी वहाँके झगडोंका निबटेरा किया करते थे।" इस वर्णनसे जान पडता है कि, वहादुरशाहके जगने "तक दिल्ली शहरका व्यापार और वैभव पूर्णरूपसे नष्ट नहीं हो पाया था, किन्तु थोडाबहुत अवश्य कायम था। कम्पनी-सरकारने दिल्लीपर अपना अधिकार जमाकर वहाँके वाद- शाहको अपने अधीन कर लिया था, तथापि बादशाहकी इज्जत और प्रतिष्ठामें उसने कुछ भीन्यूनता नहीं होने दी थी। सारे हिन्दुस्थानका राज्य. प्रबन्ध दिल्हीके बादशाह बहादुरशाहके मातहत रहकर किया जाता था। इस बादशाहका बढप्पन कैसा रखा गया था-इसका वर्णन एक अन्य- कारने बहुतही अच्छा किया है। वह कहता है - 20 दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । CAM "Babadur Shah is really a king, not merely by consent of the Houourable Company, but actually created such by their peculiar letters patent Lord Lake found the grandfather of the 'present sovereign and Emperor, in rags, ponerless, eyeless, and wanting the means of sustaining existence The firmans of the Padshahah made the General an Indian noble, the sworch of the latter made the descendant of Tamerlane & Company's King, the least dignified, but the most secure of eastern dominations in public and private, Bahadur Shah receives the signs of homage which are considered to belong to his pre-eminent station The representative of the Governor-General, when admitted to the honour of an audience addresses bim with folded hands in the attitude of supplication He never recieves letters, only petitions and confers an exalted favou on the Government of the British India by accept-- ing & monthly present of 80,000 Rupees In return he tacitly sanctions all our acts, withdraws his royal approbation from each and all our native enemies, and fires salutes upon every occasion of a victory achieved. our troops Though he may not have been served with all the zeal 108pired by thắt line of Sadı,--should the prince of noonday say, it is night, declare that you : behold the moon and stars, he was suffered, hovyever to believe that he was, the lord, of the world, master of the universe, and of the Honourable East India Company, King of India and of the infidels, the supe पहला प्रकरण । २१ chlor of the Govenor-General, and proprietor from sea to sea."-Travels of a Hindoo-Page 343 इसका आशय यह है कि, “बहादुरशाह यथार्थमें राजा है । वह कम्प- नीकी आज्ञानुसार राज्य नहीं करता, किन्तु कम्पनीकी सनदोके कारण वह उसके अधीनसा प्रतीत होता है । लार्ड लेकने वर्तमान राजाके पितामह को अशक्त, निर्वन, नेत्र-हीन और निराश्रित पाया था । बादशाहके फरमानके कारण ही जनरल लेक हिन्दुस्थानी उमरावॉमें शामिल किया गया । इधर जनरल लेककी तलवारने तैमूरलगके वशज बहादुरशाहको कम्पनीका राजा बनाया । भारतका राज्य प्रतिभा-शून्य, परन्तु सुदृढ और सुरक्षित है । सर्वत्र हाट और ग्यासमें बहादुरशार इज्जतका पात्र है । गवर्नर जनरलका प्रतिनिधि उसके सामने हाथ जोडकर नम्रता- पूर्वक खडा होता है। उसकी सेवामे जो कागजात पेश किये जाते है वे दरस्वास्त के बतौर ही दिये जाते है । अंग्रेजी राज्यमें उसको एक महीने में चालीस हजार रुपयेका नजराना मिलता है । उसके एवजमें बादशाहकी सदा कृपा-दृष्टि रहती है । कम्पनीके जितने कानून उसके सामने आते है उन्हें वह पास कर देता है । वह सदा कम्पनीका पक्ष लेता है । बादशाह सदा हमारे देशी-शत्रुओंसे भी नाराज रहता है । हमारी सेनाकी विजय पर वह आनन्द मानता है । यद्यपि सादी की यह उक्ति कि-अगर राजकुमार दिनको गत कहे तो तुम्हारा कर्तव्य है कि, तुम भी कह दो, हॉ, हुजूर रात जरूर है, यही नहीं किन्तु चन्द्रमा और तारागण भी दृष्टिगोचर हो रहे हैं-वहादुरशाहके लिए अक्षरश चरितार्थ नहीं होती, तो भी अशत वह उसपर अवश्य घटाई जा सकती है । उसको यह विश्वास दिलाया गया था कि, वह सार्वभौम पृथ्वीपति है, और ईस्ट इंडिया कम्पनीका स्वामी तथा समुद्रके एक सिरेसे दूसरे सिरे तकका अधिपति है।
૨૨ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । . - तात्पर्य यह कि, ईस्ट इण्डिया कम्पनीने पहलेसेही दिल्लीके बादशाहसे जो बर्ताव रखा था, उससे उसके अन्त'करणमें कोरी बडाईका यह व्यर्थ विचार समा गया था कि, मैं सार्वभौम चक्रवर्ती राजा हूँ, और ईस्ट इडिया कम्पनी मेरी नौकर है । अतएव उसे यदि यह इच्छा हुई कि, सार्वमोमत्व स्थिर रहे, और मेरी इज्जत इसी तरह सतत बनी रहे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। दिल्लीके प्रजाजनोंकी दृष्टिमें-यही नहीं, किन्तु हिन्दु- स्थानके समस्त लोगोंकी दृष्टिमें-दिल्लीपति सर्वश्रेष्ठ, दूसरा परमेश्वर, माना जाता था । इसलिए अवश्यही उनके अन्त करणमें उसके प्रति पूज्यभाव ओर अभिमान होगा । परन्तु आगे चलकर जैसे जैसे कम्पनी सरकारकी प्रबलता अधिक होती गई, और वास्तविक सार्वभौमिकता उसके हाथमें आती गई, वैसे वैसे इस नामधारी कठपुतलेको चक्रवर्ती राजा मानकर उसके पादपोंमें लीन होनेका विचार कम्पनी सरकारके अधिकारियोंको अप्रयोजक मालूम होने लगा। दिल्लीका पहला रेजीडेन्ट सर चार्ल्स मेटकॉफ बडा राजनीति-कुशल था । वह बादशाहके आदर-- सत्कारमें कुछ भी कमी न पडने देता था। परन्तु लार्ड एमहर्ट इत्यादि अभिमानी पुरुष बादशाहको इतना सम्मान देना पसन्द नहीं करते थे।। उन्हाने अपनेको बादशाहकी बराबरीका समझ कर दरबारमें जूते निकाल कर जाना, तथा बादशाहके चरणोंके निकट बेठना, आदि बातोंको स्वीकार नहीं किया । प्रत्युत, उन्होंने बादशाहके निकट दरबारी मच पर बैठनेका अपना स्वत्व प्रस्थापित किया । आगे चलकर लार्ड बेटिकने नजरानोंके बारेमें काटकसर की । इसके बाद लार्ड एलिनबरोने इसके भी आगे एक कदम और बढाया । उन्होंने स्वय एक छत्रपति राजाके समान बादशाहसे भेट की, और बादशाहको वार्षिक नजराना देनेकी जो प्रथा थी, उसे बन्द कर दिया, इस कारण बादशाहको विष- मता मालूम हुई, और उसका मन उदास हो गया । लार्ड एलिनबरोके बाद लार्ड डलहोमी हिन्दुस्थानके गवर्नर-जनरल हुए । उन्होंने दिल्लीके पहला प्रकरण बादशाहके व्यर्थ आटम्बरको सदाके लिए तोड डालनेका प्रयत्न किया। बादशाहका औरस पुत्र शाहजादा सन् १८२९ ईसवी में मर गया । उस समय लार्ड साहबने मृत शाहजादेके पुत्रसे सिंहासन-त्यागका पत्र पहले ही से लिखा लिया, जिससे बहादुरशाह बादशाहके बाद दिल्लीके तरत पर उसे बैठानेका मौकाही न आवे । इन समस्त अपमानोंके कारण बादशाहको विशेष कष्ट हुआ, और इस दुखदायक विचारसे उसका अन्तःकरण क्षुब्ध हो गया कि, उसके बाद मुगल बादशाहत बिलकुल रसातलको चली जायगी । उसी दशामें सन् १८५७ का साल आया, जिसने बाहादुरशाह जैसे हताश और सन्तप्त राजवशीय लोगोंको बलवा मचानेका अवसर प्राप्त करा दिया । उसका भयकर परिणाम दिल्ली के इतिहासमें लिखा है। सन् १८५७ ईसवीमें दिल्लीमें जो भयकर बलवा मचा, उसमें बहा- दुरशाह शामिल हो गया । इस बलवेसे उसे लाभ तो कुछ न हुआ, परन्तु उसके पुत्र मेजर हडसनकी बन्दूकों द्वारा मारे गये, और स्वयं वह भी अंग्रेजों द्वारा पकड लिया गया । अंग्रेजोंने फौजी अदालतके सामने उसकी तहकीकात की, और उसे सदाके लिए काले पानीको भेज दिया । फल यह हुआ कि, दिल्ली में रहते हुए उसे जो कुछ थोडा-बहुत वैभव प्राप्त था, वह भी अब बिलकुल जाता रहा, और रगूनमें सन १८६२ ईसवीके अक्टूबर महीनेकी सातवीं तारीखको, अत्यन्त विपदावस्था, दिल्ली- का यह अन्तिम बादशाह काल-कवलित हुआ! इस प्रकार मुगल बादशाहत का समूल नाश हो गया, और वह कालके-विश्व भक्षक जबडे में फंस गई ! दिल्लीके सार्वभौमिक पदका भोग करनेवाले अनेकों अच्छे और बुरे राजा- ओंके केवल नाम तथा उनके सुकर्म और कुकर्म मात्र दिल्लीके इतिहासमें दर्ज है, और दिल्ली नगरी आजकल उन राजाओंके भव्य महलों, उनके विशाल मीनारों, उनके अत्युच्च जयस्तम्भों और उनकी भारी मसजिदोंका - ।
दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ।
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प्रदर्शन करती हुई, दर्शकोंके अन्त'करणमें आश्चर्य और खेद उत्पन्न
करा रही है। मार्स आन्टोनियसने क्या ही ठीक कहा है-
"O! Vighty Sovereigns I do ye lie so losy?
Are all thy conquests, glories, trumphs, spouis
Shrunk to this little measure? Fiar thee well I's
अर्थात् हे श्रेष्ठ राजाओ। आज तुम किस गिरी हुई दशामें वर्तमान
हो ! क्या तुम्हारे विजय, प्रभुत्व, शान-शौकत और लूटमारका यही
अन्त है ? तुम्हें अन्तिम नमस्कार है !
राजर्षि भर्तृहरिने भी ऐसी ही उक्ति की है। वे कहते है -
सा रम्या नगरी महान् स नृपति सामन्तचक्र च तत् ।
पाश्च तस्य च सा विदग्धपरिपत्ताश्चन्द्रनिग्वानना ॥
उन्मत्तः स च राजपुत्रनिवहस्ते बन्दिनस्ताः कथा.।
सर्व यस्य वशादगात् स्मृतिपथ कालाय तस्मै नमः ।।
अर्थात् वह रमणीय नगरी, वह बडा राजा, राजाका वह मडल, उसक
पाश्र्व भागमें रहनेवाली वह विद्वानोंकी सभा, वे चन्द्रमुखी सुन्दर स्त्रियों,
वह बलशाली राजपुत्रोंका समुदाय, तथा वे स्तुति करनेवाले भाट और
वे अनेक प्रकारकी अच्छी बातें आदि सब जिसकी सामर्थ्यसे लुप्त होकर
स्मृतिशेष मात्र रह गयी है, उस कालको नमस्कार है !
- दूसरा प्रकरण। re दिल्लीका किला और मुख्य राजप्रासाद । दीवान ए-आम और दीवान-ए-खास । जो लोग दिल्ली देखने जाते है, उन्हें वहाँके मुरय मुख्य स्थानोंको देसनेके लिए कमसे कम तीन दिन तो अवश्य ही लग जाते है। इन तीन दिनोंमें एक दिन दिल्लीका प्रसिद्ध किला तथा उसके मुख्य राज. महल और उसके निकटवर्ती अन्य इतिहास-प्रसिद्ध स्थानोंको देखने एव *फीरोजाबाद और इन्द्रप्रस्थ के दर्शन करनेमें व्यतीत होता है। कोई भी नया मनुष्य जो दिल्ली जाता है, वहाँके राजमहल ही पहले उसके चित्त- को मोहित कर लेते है । उनकी सुन्दरता, उनकी भव्यता, उनका तेज, उनकी नक्काशी और उनकी रचना कुछ ऐसी मनोरम है कि, उनकी ओर -देख कर, शायद ही कोई मनुष्य हो, जिसमा अन्त करण आनन्द और आश्चर्य से न फूल उठे । इन राजमहलोंका वर्णन करनेके पहले उनका थोडासा इतिहास दे देना आवश्यक है। दिछीका किला तथा उसके राजमहल शाहजहाँ बादशाहने बनवाये हैं। एक ऐतिहासिक ग्रन्थसे मालूम होता है कि, उनके बननेमें बीस साल लगे, और उस समयके हिसाबसे पन्द्रह लाख रुपये खर्च हुए । इस किलेका घेरा एक, मील है, और उसमें पहले दस-बारह राजमहल थे। परन्तु इस समय उनमेंसे सिर्फ मुग्न्य मुख्य महल ही कायम हैं, और शेष नष्ट हो गये है । इस किलेमें शहरकी ओरसे दो द्वार है । उनमेसे “एक द्वार पर जयमल और फतहसिह नामक विजयी राजपूत वीरोंकी, -दो मूर्तियाँ थीं, जो हाथीपर सवार थीं । ये मूर्तियाँ भारतके शिल्पकारोंने दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । बनाई थीं । इनके विषयमे यह आख्यायिका प्रसिद्ध है कि, ये दोनों वीर चित्तोडमें अकबरसे बडी शरताके साथ लडे, और अपनी मातृभूमिके लिए धारातीर्थमें पतन हुए, इस लिए अकबरने उनके स्मरणार्थ इन मूर्तियोंको बनवाया, और उन्हें अपने राज-द्वार पर खडा किया । कोई कहते हैं कि, जहाँगीर बादशाहने ये मूर्तियाँ बनवाई थीं। खैर, किसी भी बादशाहने उन्हें क्यों न बनवाया हो, परन्तु वर्नियर नामक यात्रीने प्रत्यक्ष देखा था कि, वे शाहजहाँके राज-द्वार पर खडी थीं। उसने अपनी भारतीय यात्राके वर्णनमें उन मूर्तियोंकी सुन्दरताकी बडी प्रशसा की है, और कहा है कि, हिन्दुस्थानमें मनुष्योंकी पहली मूर्तियाँ यही है । उसने अपनी यात्रामें लिखा है कि, “जयमल और फत्ताकी मूर्तियाँ कला- कौशलकी दृष्टिसे बडी मूल्यवान है । वे लाल रेतीले पत्थरकी बनी थीं, और उनका आकार मनुष्यके आकारके बराबर था । जिन बडे बडे हाथियोंपर ये मूर्तियाँ रखी थीं, वे काले सगमरमरके बने थे । और हौंदे सफेद और पीले सगमरमरोंसे अलकृत किये गए थे। " *अस्तु ! किलेका दूसरा दरवाजा 'लाहोर दरवाजे' के नामसे प्रसिद्ध है, और वहॉकी खाईका काम अत्यन्त ही दर्शनीय है । स्वय दरवाजा ही बडा मजबूत तथा अभेद्य है, और उसके ऊपरसे अत्यन्त ही रमणीय दृश्य दिखाई देता है । उसके पश्चिममें जुम्मा मसजिद The statues of Jaymal and Patta are simply valuable as works of art, as they are, perhaps, the only portrait statues that have been erected in India for many centuries They are made of red sand-stono, and are of life-size, while the huge elephants on which they sit are of black marble, and the hinsings are decorated with white and yellow marbles. "Bernier's Travels ~ M दूसरा प्रकरण। २७ गौर पूर्वमें शहर तथा मन्दिर देख पडते है । इस लाहोर दरवाजेसे. दनी चौक तक बिलकुल सीधा रास्ता जाता है । इस दरवाजेसे केलेमें प्रवेश करते ही प्रथम नक्कारखाने अथवा नौबतसानेकी इमारत प्टिगोचर होती है । इसके वाद 'दीवान-ए-आम' और 'दीवान ए- रास' नामके दो मुख्य राजमहल देख पढते है । ये ही दिल्लीपतियोंके कोकोत्तर प्रासाद है। दिल्लीमें जो अनेक प्रेक्षणीय स्थल है, उनमें 'दीवान-ए-आम' और दीवान-ए-सास' नामके ये दो बादशाही दरवार मुख्य हैं । ये प्रासाद देल्लीके किलेके भीतर है । शाहजहाँ बादशाहने यह किला बनवाया या । यह अत्यन्त भव्य और प्रचड है । यह आगरेके किलेकी नाई सुन्दर है, और सारा किला लाल पत्थरका बना है। यह किला जमना नदीके तीर पर स्थित है, और इसका घेरा डेढ मील है । इसके आस- पास एक बृहत् कोट है, जो लगभग चालीस फीट ऊँचा है । इस किलेके मुरयद्वारको ‘लाहोरगेट' कहते थे, परन्तु अब वह उसका नाम नष्ट होकर 'विक्टोरियागेट' हो गया है । उस द्वारके शिरोभाग पर नील-रक्त-शुभ्र-वर्णत्रयमिश्रित-एक छोटीसी ध्वजा फहराती रहती है । कहनेकी आवश्यकता नहीं कि, यह ध्वजा हमारी उस दयालु सर- कारकी है, जिसकी बान है कि, हम सब वर्गों की प्रजाके साथ समान बर्ताव करते है । इस प्रवेश-द्वारके भीतर जाते ही पहले अनेक बढी बढी मेहरावें मिलबी है, और वहाँसे किलेका सारा भवशून्य दृश्य दिखाई पड़ने लगता है । सन् १८५७ के सिपाहीविद्रोहके समय यहॉकी अनेकों सुन्दर इमारतोंके घस हो जानेके कारण सारा किला उजाड हो गया है । तथापि उसकी दीनावस्थाको छिपाकर - उसे हराभरा दिखलानेके लिए ही ,मानो वहाँकी जमीन साफ करके, रास्ते आदि व्यवस्थित करके, थोडेसे वृक्ष लगा दिये हैं, और कई एकर दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । स्थानोंपर छोटे छोटे बगीचे लगा दिये हैं। राजमहलका सिर्फ दर्शनीय भाग ही सुरक्षित रक्खा है, और शेष कई महलोंका नाश कर दिया -गया है। सिर्फ वे ही राजमहल कायम रखे गये हैं जिन्हें। स्वाभाविक रीतिसे फौजी आधिकारी काममें ला सके । उनका मिश्र स्वरूप अवलो- कन करके दर्शकोंको खेद उत्पन्न हुए बिना नहीं रह सकता। जिन राजमहलोंमें सगमरमरके पत्यरोंका शुभ्र तेज चमकता था, वहाँ सर- कारके पब्लिक वर्क्स विभागने अंग्रेजी तरहकी जो मरमम्मतकी है, वह अत्यन्त ही विसगत मालूम होती है ! जिन राजमहलोंके प्रवेश-द्वारा में अनेकों द्वारपाल सशस्त्र इँटे रहते थे, उनके सामने आज वृक्षोंके गमलोंके सिवा और कुछ नहीं दीख पडता! अस्तु । इस प्रकार समस्त किलेका तेजहीन दृश्य देखकर काल-चक्रकी कुटिल गतिका बारम्बार स्मरण होने लगता है कि, इतनेमे हमारे सामने नेत्राकर्षक, लाल रंगकी, खुली हुई, परन्तु अत्यन्त भव्य, इमारत उपस्थित होती है । यही है इतिहास-प्रसिद्ध 'दीवाने आम' नामका दिल्लीपतिका मुख्य दरबार ! यह सुप्रसिद्ध दीवानखाना सुनहले रगके बेल-बूटोंसे सुशोभित किया हुआ पहले अपार वैभवका वासस्थान था । इस दीवान-ए-आमकी सारी छत चॉदी की बनी थी, और उसपर कलाकोशलका बहुत बढ़िया काम किया हुआ था । यहाँके प्रत्येक स्तम्भपर आसमानी रगका चमक- दार मुलम्मा चढ़ा हुआ था, और उसमें ठौर ठौर पर सुन्दर पुष्प खुदे हुए थे। इस इमारतकी कुल नक्काशी वहुतही अप्रतिम थी-केवल यही नहीं, किन्तु उसमें कई एक इतिहासप्रसिद्ध घटनाओंके चित्र, अत्यन्त -मार्मिक रीतिसे, चित्रित किये हुए थे। जिस समय शाहजहाँ बादशाहने आगरेका ताजमहल बनवाया, उस समय उसने शीराजके प्रसिद्ध कारीगर अमानतखा को उसपर अपना नाम लिखने की आज्ञा दी थी, .इसलिए उसने ताजमहलमें एक जगह पर " शीराजका नम्र फकीर ~ दूसरा प्रकरण। भ , अमानतखा" के शब्द चित्रित करके हिजरी सन् १०४८लिस दिया है। इसी प्रकार, शाहजहाँ बादशाहने एक यूरोपवासी चित्रकलाविशारद को भी यह आज्ञा दे दी थी कि, इस महत्वकी चित्र-मालामें वह अपनी स्पेन की पोशाकमें एक तसबीर सींच ले । इस मनुष्यका नाम 'आस्टिन डी बोर्टो' था। इस कुशल कलमवहादुरने हिन्दुस्तानके सब प्रकारके सुन्दर पक्षियोंकी प्रतिकृतियाँ इस दीवानखानेमें चित्रित की थीं। इसके अतिरिक्त, उसमें एक जगह पर एक अत्यन्त तेजस्वी तलवारका चित्र भी सींचा था । इस चित्रका इतिहास यह था कि, एक बार चित्तोडका एक राजपुत्र दरबार में बैठा था कि, बादशाह के किसी प्यारे मुसलमानने उसका थोडासा अपमान कर दिया । उसी समय उस तेज पूर्ण राजपूत छौनेने अपना सङ्ग निकालकर भरे दरवारमें बादशाहके सामने उसका - बदला लिया, और जब बादशाहने उससे इसका उत्तर पूंछा, तब उसने 'लेडी आफ दी लेक' काव्यके 'रॉडरिक दू' की नाई यह तेजस्विता-- पूर्ण उत्तर दिया कि प - "I right my wlongs there they are given Though it were in the court of Heaven" अर्थात् मे अपनी भूलोको भी सत्य सिद्ध कर सकता हूँ-चाहे न्यायालय स्वर्गका क्या न हो ! इस उत्तरको सुनकर दरबारके सारे लोग आश्चर्यमें आगये। अस्तु । इस महलकी सौन्दर्य-मर्यादा यहीं पर समाप्त नहीं होगई । इस महलके मध्यमें दस फुट ऊँचा, सगमरमर पत्थरका, एक चबूतरा है, जिसपर " एक बहुतही सुन्दर शिसराकार शिरोभाग बना है । वह स्फटिकके सदृश शुभ्र है, और उसमें शिल्पकारके कलाकौशलकी परमावधि ही.- होगई है। इस सुन्दर स्थलके मध्यमें दिल्लीपतिका तरत-जगत्मसिद्ध ३० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । - - मयूरसिहासन-रसा जाता था । मुसलमानी इतिहासमें इस सिहासनको 'तस्ते ताऊस' कहा है। इस तख्तका वर्णन जितना किया जाय, उतना थोडा है। दिल्लीके अनेक बादशाहोंने अनेक सिहासन निर्माण कराये होंगे, परन्तु ऐसा अद्वितीय सिहासन किसीने भी नहीं बनवाया। यह सिहासन दीर्घवृत्ता- कार था, और उसकी लम्बाई छै फुट तथा चौडाई ४ फुट की थी। इसका सारा ऊपरी भाग हीरा, माणिक, नीलम, पन्ना, पुखराज, इत्यादि अमूल्य रत्नोंका बना हुआ था, और नीचेका भाग सुवर्णका बना था, जिसके दर्शनीय भाग पर हीरे जड़े थे। उसमें जो माणिक जड़े थे, सिर्फ उन्हींकी सख्या १०८ थी । इसके सिवा जगह जगह पर नील मणि और पुसराजका भी उपयोग किया गया था । उस सिहासन पर एक सुवर्णवृक्ष बनाकर उस पर एक मोर बैठाया गया था, और ऐसी योजना की गई थी कि, जिससे उसके रत्नजटित डेने अनायास ही सिहास- नासीन बादशाहके ऊपर उडते रहें । मोरके डैनोंकी कारीगरी अत्यन्त अप्रतिम थी। उनपर विविध रंगोंको यथोचित रूपसे दर्शानेके लिए नाना प्रकारके रत्न जडे थे । वादशाहके शिरोभागका छत्र भी हीरे-मोतियों का था, और उसमें बकुलपुष्पके समान, अत्यन्त तेजस्वी, मोतियोंकी झालर लगी थी । इस मयूरासनके समस्त हीरे गोलकुडाकी सानके थे, और वे तारकापुजकी नाई चमकते थे। इस मयूरासन पर पीछेके द्वारसे आफर बादशाहकी सवारी बडी सज-धजके साथ विराजमान होती थी। इस अद्वितीय मयूर-सिहासनके कारण दरवारको अप्रतिम शोभा प्राप्त हुई थी । टावर्नियर नामके एक फरासीसी यात्री ने इस सिहासनका मूल्य लगभग डेढ करोड रुपयेका अनुमान किया है ! अस्तु । दिल्लीपति' । पर कुटिल कालकी वक्रदृष्टि हुई, और सन १७३९ ईसवीमें ईरानके प्रबल बादशाह नादिरशाहने इस मयूरासनको हस्तगत किया। तथापि , । दूसरा प्रकरण। -- यह दीवान-ए-आम दरबार, उसके बाद भी, बहुत दिनों तक कायम था। परन्तु सन् १७६० ईसवीमें पुण्यपत्तनस्थ, (पूनेके ) पेशवा सदाशिवराव भाऊने, पानीपतके युद्धके समय, जोशमें आकर इस पर आक्रमण किया, और सूरजमल जाटके सदुपदेश पर तनिक भी ध्यान न देकर-पहले मुगलोंने जो रायगढके नूतनसस्थापित हिन्दू साम्राज्यके सिंहासनका भग किया था, उसका बदला चकाने के उद्देशसे- इस मन्य महलकी सारी चॉदीकी सुन्दर छत तोड डाली, और उसके सिक्के बनाकर सैनिकोंको बाट दिये ! एक स्थानपर लिखा है कि, इस उतकी कीमत सत्रह लाख रुपये आई थी । इस वैभवालकृत महलके वर्तमान दीन स्वरूपका अवलोकन करतेही किमकी ऑखोंसे दु'साश्रु न टपक पड़ेंगे ? आजकल वहाँ वह सुवर्णजटित नक्काशी नहीं रही है, और न वहाँ वह मयूरासन ही कहीं दीख पडता है, जिसे देखकर बडे बढे पृथ्वीपति भी दिल्लीपतिके वैभवकी ईर्षानलमें जल मरते थे। जिस संगमरमरके चबूतरे पर यह रत्नासन रखा जाता था, वह निस्सन्देह अभी तक स्थिर है; और अपनी विपदावस्था जतला रहा है | इस पूज्य स्थलके चारों ओर लोहेकी छड़ें लगा दी गई है, कि जिससे नाना प्रकारके, सभी दर्शकोंका उसमें हस्तस्पर्श न हो सके। अस्तु । इस दुर्दैव-मस्त 'दीवान-ए-आम' का दर्शन करके दर्श- कोंके अन्त करणमें वैभव की क्षणभगुरताके विषयमें अनन्त कल्पनातरगें' उठने लगती है, और उनका मन किचित् अस्वस्थ हो जाता है, कि इतनेहीमें उन्हें 'दीवान-ए-खास' नामकी एक दूसरी मनोरम इमारत देस पड़ने लगती है । इस इमारतकी स्फटिकतुल्य शुभ्र प्रभा दर्शकोंके नेत्रोंको ऐसा आकृष्ट कर लेती है कि, उन्हें अपनी पूर्व-अवस्थाका सहसा विस्मरण हो जाता है । यथार्थमें, 'इससे यह सहजहीमें मालूम हो जाता है कि, संसार-चत्रमें फंसे हुए मानव प्राणीको मायापाश किस " , - .
. ३२ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । M vvv4 vvvvv -vvv votow । प्रकार बारम्बार बद्ध करता रहता है । अस्तु । इस विख्यात 'दीवान- ए-दास' नामक भवनमे जानेकेलिए दर्शकोंको प्रथम एक सुन्दर पुष्प- बाटिकामें प्रवेश करना पडता है। वहाँ जाकर सामने खड़े होनेपर यह भास होता है कि, हमारे सामने कोई अत्यन्त धवल, तेज पुज और अपूर्व वस्तु खडी है । इस खास महलका सारा काम अत्यन्त शुद्ध और स्वच्छ एव अति उत्तम सगमरमरके पत्थरका बना है । उसमें भॉति भौतिके अनेकों रत्न जडे है, और ठौर ठौर पर सुवर्णकी अद्वितीय नक्काशी होनेके कारण, महलको अप्रतिम शोभा प्राप्त होगई है । इस महलके एक ओर जमनानदीका दृश्य दिखाई देता है । एक ओर बागकी शोभा देस पडती है । एक ओर इसका प्रवेश द्वार चमकता है कि, जिस पर सुवर्णाक्ति न्यायतुलाका चित्र खींचा हुआ है । सायकालके समय इस महलपर जब कभी कोमल, परन्तु आरक्त,सूर्यकिरणोंकी प्रकाश-लहरें परावर्तन पाकर चमकने लगती है, उससमय यहाँ जो तेजोमय दृश्य दृग्गोचर होता है, वह सिर्फ देखते ही बनता है। सचमुच सोचनेकी बात है कि, 'जिस समय यहाँ सच्चे रत्न विराजते होंगे, उस समय यहाँ कैसी अप्रतिम शोभा दिस पडती होगी । वास्तवमें उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। इस महलके पूर्वाभिमुस द्वारके शिरोभाग पर फारसी जवानमें यह पद्य लिखा है:- अगर फिदीस वर-वए जमीनस्त- हमीनस्तो हमीनस्तो हमीनस्त । "If on the earth be an Eden of bliss, It is this, it is this, none but this!" अर्थात् यदि 'पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है! यहाँ पर हमें पं० श्रीधर पाठक्की इस कविताका स्मरण होता है ३ . , - दूसरा प्रकरण ३३ " । यही स्वर्ग सुरलोक यही सुरकानन सुन्दर । यहिं अमरनको ओक-यहीं कहुँ बसत पुरन्दर ।" -काश्मीर-सुसमा। - इस सौन्दर्य-मन्दिरमे अनेकों अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घटित हुई है। इससे जान पड़ता है कि, मानों राजकीय परिवर्तनोंका अवलोकन करनेके लिए ही यह महल निर्माण किया गया है । इसी महलमें शाहजहाँ बाद- शाहने बढी सजधजके साथ सिहासनारूढ़ होकर दिल्लीका शासन किया था। इसी महलमें ईस्ट इडिया कम्पन के हेमिल्टन साहबको, बादशाहका स्वास्थ्य ठीक कर देनेके उपलक्ष्यमें सैतीस ग्राम पारितोपिकमें दिये गये; और कम्पनीके मालपर कर माफ करनेकी आज्ञा दी गई थी। इसी महल में बैठकर औरगजेब बादशाहने अपने दोनो भाइयों, दारा और मुरादका शिरच्छेद किया था। इसी महलमें नादिरशाहने दिल्लीपति महमूदशाह तुगलकको अपने वश किया था। इसी महलमें गुलाम कादिरने शाह- आलम बादशाहकी ऑखें निकलवा कर उसके बेटेका सून किया था। इसी महलमें महादजी सेंधियाने गुलाम कादिरको कैद करके नेत्रहीन घादशाहके सामने पेश किया था, और अपनी बहादुरीके उपलक्षमें दिल्लीपतिसे कई सनदें हासिल की थीं ! यही नहीं, किन्तु गोरक्षाकी सनद भी इसी दीवान-ए-खास महलमें प्राप्त हुई थी ! बगाल, बिहार और उडीसाके प्रान्तोंकी सनद, यानी सुप्रसिद्व 'दीवानी" नामका फरमान, इसी महलमें ईस्टइडिया कम्पनीको दिया गया था ! सचमुचही 'इस महलमें न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण और राज्यक्रातिकी घटनाएँ घटित हुई । सन् १७७३ ईसवीसे लेकर सन् १८०३ ईसवी तक दिल्लीका बादशाह मराठोंके बिलकुल, हाथमें था, यही नहीं, किन्तु उस ,प्रान्त पर सञ्चा अमल भी उन्हींका था। ईस्ट इंडिया कम्पनीको यह बात सहन नहीं हुई । उसने बादशाहको स्वतत्र करनेका P ३४ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। प्रयत्न किया । उस समय लार्ड लेक साहबको “ सुमसन-उद्दौला अश गार-उलमुल्क खान-दौरान-खान जनरल लेक बहादुर' फतेहसिह " नामका जो खिताब प्राप्त हुआ था, वह भी इसी दीवान-ए-खास महल में प्रदान किया गया था ! हा हा ! कैसे खेदकी बात है कि, जिस जगह अनेक बादशाहोंका राज्याभिषेक हो, उसी जगह उनका पद- च्युत होना भी बदा हो ! जिस राज-महलमें दिल्ली-पतियोंके वैभवको अत्युच्च स्थान प्राप्त हुआ, क्या वहीं उनके राज-वैभवका अन्त भी हो ! प्यारे पाठको तनिक सोचिए तो सही, कैसी परितापजनक कहानी है । कैसा हृदयविदारक दृश्य है। अगरेजी सरकारकी स्वाभाविक दयालुता से मिली हुई पेंशनपर गुजारा न होनेके कारण मृत्युकी मार्गप्रतीक्षा करनेवाले बेचारे वृद्ध बहादुरशाह दिल्लीके अन्तिम बादशाह-पर जो सन ५७ के बलवेमें शामिल होनेका अभियोग लगाया गया, और उसकी जॉचके लिए कर्नल डावेस, मेजर पामर, मेजर रेडमंड, मेजर सायर्स और कैप्टन रोडनेका जो कमीशन बैठाया गया,सो भी इसी “दीवान-ए- खास" महलमें ! जिस सार्वभौम नृपतिको दूसरे लोगोंका न्याय करना चाहिए, दूसरे यदि उसीके सिहानसन पर बैठकर उसीका न्याय करें, तो बतलाइये इससे अधिक दुर्भाग्यकी वात और कौनसी हो सकती है? हम ऊपर कह चुके है कि, इस महलकी एक ओर मुगल बादशाहोंने । न्याय-तुलाका एक चित्र बनाया है, सो उसका केवल यही उद्देश्य है कि, यहॉ जो न्याय दिया जायगा वह बावन तोला पाव रत्ती बिलकुल ठीक ही होगा । इसी न्यायकी तुलाके सामने बैठकर हमारी दयाल अंग्रेज सरकारके उपर्युक्त अधिकारियोंने बादशाहको जो न्याय दिया, वह बिलकुल ठीक होना ही चाहिए । बादशाह पर जो अभियोग लगाये गये थे, उनमें एक यह था कि, इसवे. अपनेको दिल्लीका बादशाह जत- लाते हुए दौडी पिटवाई। इस, तथा इसी प्रकारके दूसरे अभियोगोंके , दूसरा प्रकरण। wwwwwwmom है कारण, नियमानुसार उसकी जॉच हुई, और उस बेचारेको काले पानीकी सजा दी गई ! सन् १८५८ ईसवीके मई महीनेकी ग्यारहवीं - तारीस्त्रको, लन्दनके सेन्ट जेम्स हॉलमें, आइल्सबरीके एक पार्लमेंटके १ सभासदने, इस वादशाहकी उस समयकी दशाका, अपनी आखोंसे देखा - वर्णन किया है । यह कहता है - "I saw that broken down old man, not in a foom, but in a miserable hole of his palace, lying on a bedstead with nothing to cover bim, but a miserable tattered Coverlet As I beheld fum, some remembrance of luis former greatness seemed to arise in his mind. He rose with difficulty from his couch, showed me his arms, which were eaten into by disease and hy flies, and Partly from want of water, and he said in a lamentable voile that he had nothing to eat! I will not give any opinion as to whether the manner in which we are trea- The strug Zum is worthy of a great nation, but is this a way pia wluchi,'as christians, we ought to treat a king अर्थात् “ मैं उस जर्जर और अशक्त वृद्ध बादशाहसे मिला "या । वह अपने राजमहलमें नहीं, बल्कि एक रद्दी कोठरीमें, एक बिस्तर पर पड़ा था। उसके पास ओढनेके लिए एक फटी-पुरानी गुदडीके १ सिवा और कुछ भी नहीं था । ज्यों ही मैने उसकी ओर देखा, त्यों ही : मुझे ऐसा जान पडा कि, उसे अपने प्राचीन वैभवका स्मरण हो आया ६ है। वह बडे प्रयत्नसे अपनी जगहसे उठा, और उसने मुझे अपने हाथ दिसलाये। वे व्याधिसे ग्रस्त हो रहे थे, और मक्खियांने उन्हें ब्वा डाला था। इसका एक कारण यह था कि,उसे पानी न मिलता था १ हे करुणस्वरसे उसने कहा कि, मुझे खानेके लिए कुछ भी नहीं ने है , -- दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्था मिलता !! इस रीतिसे जो हम लोग ( अग्रेज) उसके साथ बर्ताव करते है, वह रीति हमारे बृहद् राष्ट्रके लिए उचित है अथवा नहीं-इस पर मै अपनी राय प्रकट नहीं करूँगा । हा, एक ईसाईकी हैसियतसे मै यह पूछता हूँ कि, क्या किसी भी राजाके साथ ऐसा बर्ताव करना उचित है? अस्तु, इस प्रकार, इस बादशाहकी दीन दशाके बारेमें, बहुत कुछ ची होती रही, ओर अन्तमें वह रगून भेज दिया गया ! सचमुच ही इस दीवान-ए-खासकी अन्य महत्त्वपूर्ण विशेष बाते कोन कौनसी बतलाई जॉय ? इस स्थानको देखकर क्सिके हृदयमें शोक की लहरे न उठने लगेंगी? " दीवान-ए-खास" के एक ओर जो 'एक सुवर्णाकित न्याय तुलाका चित्र बना है, उसका इतिहास भी बडा मनोरंजक है । शाह- जहा बादशाह इस महलमें बैठकर जब कि न्याय किया करता था, तब यह दिखलानके लिए कि, वह न्याय सदैव मानो तराजूमें तुला हुआ होगा, उसने यह न्यायकी तराजू तैयार की । इस न्यायतुलाके निकट एक घटा था इस घटेको बजाकर प्रजाजन बादशाहके यहा अपनी अपनी अर्जिय दिया करते थे। कहते है कि, शाहजहोंने यह प्रणाली अपने पिता अहण की। जहाँगीर बादशाहकी न्याय प्रणालीसे सम्बन्ध रखनेवाली दे आख्यायिकाएँ प्रसिद्ध है। उनसे मुगल बादशाहोंकी मनोरजक न्याय प्रणालीका अच्छा पता चलता है । वे आख्यायिकाएँ इस प्रकार है। , अकबर बादशाहके पुत्र जहागीरको अपने इन्साफका बडा अभिमान था। गरीब-गुरवे भी बराबर बादशाह तक पहुँच सकें-इस.लिए उसने अपने महलमें एक घटा बाँध दिया था। उसमें एक रस्सी बॉवकर उस रस्सीका अन्तिम सिरा किलेके बाहर एक सभेमें बाँध दिया था। जब किसी मनुष्यको खास बादशाहकी सेवामें अपनी अर्जी पेश करनी होती - दूसरा प्रकरण . " तब वह उस रस्सीको खींच देता, जिससे महलमें घटा बज जाया करता था । ज्योंही घंटा बजता, त्योंही बादशाह घटा बजानेवालेको बुलाता, और उसे उचित न्याय प्रदान करता था । एक बार एक बैल, जिसकी पीठपर पानीसे भरा मशक लदा था, इस रस्सी बंधे हुए सभेके पाससे • जा रहा था। न जाने उसके मनमें क्या लहर आई कि, उसने अपनी गर्दन समेार रगड़ दी। फल यह हुआ कि, महलमें घटा बज -गया। जाच करनेपर मालूम हुआ कि, घटेका बजानेवाला एक बैल है । तन दरबारके लोगोंने हाथ जोड कर बादशाहसे निवेदन किया कि, खुदावन्द, यह एक गूंगा जानवर है । गर्दन रगड दी । कृपा करके छोड़ दीजिएगा"। बादशाहने कहा, " नही, इस बैलपर कुछ न कुछ अत्याचार अवश्य हुआ है, इसकी पीठपर पानीसे भरा हुआ जो मशक लदा है उसको तौलना चाहिए । उसको तौलने पर मालूम हुआ कि, मशकमें पाच मन पानी भरा है ! इस पर बादशाहने यह आज्ञा दी कि, यह पानी बहुत जियादा है, साढ़े तीन मनसे अधिक पानी मशकमें न भरा जाय । जो कोई भरेया उसे सजा मिलेगी।" अब दुमरी आख्यायिका सुनिए । जहाँगीर बादशाह नूरजहाँपर अपने प्राणोंसे भी अधिक म्यार करता था । वह बडी बुद्धिमती, शूर- वीर और राजकाजमें भी चतुर थी। शिकार खेलनेका उसे बड़ा शौक -या। जब उसे अपने ' कामोंसे छुट्टी मिलती, तब सुबह और शाम दोनों पहर वह निशानेबाजीका अभ्यास किया करती थी। दिल्लीका किला जमना नदी के किनारे बना है । उसमें जनानखाना और उसका महल दोनों जमना की ही ओर थे । एक दिन नदीके उस पार चाद लगाकर बेगम साहना निशाना मार रही थीं । दुर्भाग्यवश उनकी एक गोली चूककर एक धोबीके लग गई, और वह बेचारा अपनी जानसे हाथ धो बैठा । धोनित रोती-चिटाती किलेके दरवाजेके पास आई, और। V - ३८ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्था उसने रस्सी खींचकर घटा बजाया । थोडीही देरके बाद पहरेवालोंने, उसको बादशाहके सामने लाकर खडा किया। वहाँ पहुँचतेही घोबिनने हाथ जोड़कर निवेदन किया, महाराज, आपके जनानसानेसे एक गोली आई, और वह मेरे पतिके बदनमें घुस गई, जिससे वह मर गया है । कृपा कर इसका न्याय कीजिए।" जॉच करने पर मालूम हुआ कि, स्वय नूरजहाकी गोलीसे ही धोबीके प्राण गये है । यह जानकर. बादशाहका चेहरा फीका पड गया। दरबारके सारे लोग एकटक बाद- शाहके मुंहकी ओर देखने लगे । उनको दिलमें यह जाननेकी बडी मारी इच्छा हुई कि, देखें बादशाह इस धोबिनके साथ क्या न्याय करते है । बादशाहने अत्यन्त शान्तिके साथ एक बन्दुक, बारूद, गोली इत्यादि सामान मॅगाया, और बदूकमें गोली-बारूद आदि. भरकर उस बदूकको धोबिनके हाथमें दे दिया, और कहा, "हमारे. मुसलमानी न्यायशास्त्रके अनुसार तुझे खूनके बदले सूखना ही मिलनाः चाहिए। नूरजहोंने तेरे पतिको मारकर तुझे विधवा कर दिया है इसलिए तू भी उसके पतिको मारकर उसे विधवा बना दे। तेरे हाथमें भरी हुई बन्दूक मौजूद है, और नूरजहाँका पति स्वय मै तेरे सामने उपस्थित हूँ। अतएव बदूक चलाकर मेरेः प्राण हरण कर ले !" बादशाहके इस भाषणको सुनते ही दरबारके समस्त लोग चकितः हो गये । योबिनने हाथ जोडकर प्रार्थना की कि, महाराज, इस न्यायसे मुझे सतोप है, परतु मैने खून माफ कर दिया ।" इस पर बादशाहने उस घोबिनको नूरजहाँसे कई गांव इनाममें दिलवाये, वे गाँव अभी तक उस धोबिनके वशमें बने है । इस घटेको बजाकरे न्याय-याचना करनेकी प्रणाली उस न्यायतुला- वाले मन्दिरमें बराबर जारी थी। वहाँ बैठकर शाहजहाँ बादशाहने " दूसरा प्रकरण। समय समय पर जो न्याय किये थे उनकी भी अनेक आख्यायिकाएं. प्रसिद्ध है, जिनमें से यहा पर एक नमूनेके तौर पर दी जाती है । एक बार एक मनुष्यने बादशाहकी सेवामें यह अर्जी पेश की कि, मेरे पिताकी दो लाखकी सम्पत्ति मेरी माताके पास है, और वह मुझे दुराचारी समझ कर उसका कुछ भी हिस्सा नहीं देती । कृपा कर मुझे कुछ दिलवाइए।" बादशाहने उस मनुष्यकी माताको बुलवा भेजा, और उसे अपने पुत्रकोपचास हजार रुपये देने तथा सरकारी कोषमें एक हजार रुपये दाखिल करनेकी आज्ञा दी । इस पर उस स्त्रीने निवेदन किया कि, “ हुज़र, आपके दर्वारमें न्यायकी तराजू है। इस लिए यहा जो न्याय मिलता है उसके ठीक होनेमें तिलमात्र भी सन्देह नहीं हो सकता । आप महाराजाधिराज है, आपने मुझे अपने पुत्रको पचास हजार रुपये देनेका जो हुक्म दिया है, सो ठीक ही है, क्योंकि वह मेरे पतिका औरस पुत्र है । परतु हुजूरने मुझे सरकारी कोषमें - एक हजार रुपये जमा करनेकी जो आज्ञा प्रदान की है, उसके लिए मेरा सिर्फ यही निवेदन है कि, मुझे कृपापूर्वक यह बतला दिया जावे कि, सरकारसे मेरे पतिका कौनसा नाता है !" उस स्त्रीका यह मार्मिक भाषण सुनकर बादशाहने उसके वे हजार रुपये माफ कर दिये। इस आख्यायिकासे इस न्याय-तुलाका उद्देश्य और वहॉके कार्यका आदर्श समझमें आ सकता है। अब भी इस न्यायतुलाका सुवर्णांकित चित्र देखनेसे उपर्युक्त आरयायिकाओंका स्मरण हो आता है। रंगमहल अथवा मोतीमहल । यह महल 'दीवान-ए-खास ' के नजदीक है । यहाँ पहले शाही जनानखाना था। दिलीपतिकी पटरानिया जहा निवास करती थीं , वह स्थान यदि अत्यन्त सुन्दर हो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं । इस महलमें बेल-बूटोंकी सुन्दर नकाशी की हुई है । आगरेके ताजमहल.
दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। " की तरह यहाँ भी विविध रगोंके पत्थर सगमरमरके पत्थरमें जड़े हुए है। इससे महलको अद्वितीय शोभा प्राप्त हो गई है । कहते है कि, पहले यहॉका सारा काम रत्नजटित था। उस समय इस महलकी सुन्दरता अपूर्व होगी, इसमें सन्देह नहीं । उस समय, समस्त महलमें ठौर ठौर जड हुए विविध रगोंके बहुमूल्य रन, अपनी उज्ज्वल प्रभासे, वहाँके मूर्तिमान सुरुचिर स्त्रीरत्नोंके दिव्य तेजको लज्जित करनेका प्रयन अवश्य करते थे, इस कार्यमें वे कभी भी सफल-मनोरथ नहीं हुए, प्रत्युत उन्हींको स्त्रीरनोंके अनुपम लावण्यसे हार खाकर बिलकुल स्तब्ध और निश्चल होना पडता था ! इस तेजोमय रंगमहलके आसपास अनेको आल्हाददायक, सहस्र धारावाले फुहारे, सुन्दर पुष्पवाटिका', रमणीय लताकुज, और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायुके 'सेवनार्थ विश्रान्ति-स्थान, इत्यादि बड़े ही रमणीय बने थे, जो उस स्थलकी सुन्दरता बढाते हुए ट्दयको अत्यन्त ही आह्लादित करते थे। आजकल तो इनमेंसे कुछ भी वहाँ नहीं रहा है, सिर्फ यह 'रंगमहल ' मात्र खडा है । रसिक पाठकोंको यहा पर यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं कि, 'मुमताज. महल,' 'जिन्नतमहल' इत्यादि इस महलकी सौन्दर्य-लतिकाओं के नामशेष हो जानेके कारण आज यह रंगमहल केवल नामधारी 'महल' रह गया है। हमामखाने अथवा स्नानगृह । दीवान-ए-खासके उत्तरकी ओर शाही हमामखाने अथवा खानागार बने है। इन्हें 'आकाब' कहते है । इन स्नानागारोंके तीन कमरे है । हरएक कमरेकी धरती पर सगमरमरकी फर्शबन्दी है, जिसके मध्यमें मुख्य स्नानगृह है । इसके आसपासकी नक्काशी' अत्यन्त ही सुन्दर है । इस स्नानागारमें पृथ्वी से पानीकी अनेकों नलिया लाई गई है, और उनमें उष्णोदक तथा शीतोदककी उत्तम योजना की गई है । स्नानगृह- पा - दूसरा प्रकरण। ४१ wwww । . में चारों ओरसे पडदेका प्रबन्ध है। उजेलेके लिए दीवारमें ऊपर कॉच. की खिडिकियॉ बनी हैं। ये कॉच : धुंधले है, और उनमें से सिर्फ प्रकाश आता है, परन्तु भीतरका स्नानविलास बाहरसे किसीको नहीं दिख पडता । इस रम्य स्थान पर जाते ही दिल्लीपतिके विलासोंकी अस्पष्ट कल्पना नेत्रों के सामने खड़ी हो जाती है, और. उन विलासोंका प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करनेकी लालसा उत्साही अन्त'करणमें उत्पन्न होती है। दीवान-ए-आमके मयूरासनका वर्णन सुनकर, अथवा उसके स्थानको देखकर, कभी किसीको भी, अरबी कथाओंके अबू हुसेनकी तरह, एक दिनके लिए भी, बादशाह बननेकी इच्छा उत्पन्न नहीं होती, अथवा मोतीमहल या रगमहलको देखकर भी, सौन्दर्य-लतिकाओंके साथ नाना प्रकारकी क्रीडा करनेवाले दिल्लीपतिके वैभवसे ईर्षा नहीं होती, परन्तु इन सुन्दर और मनोवेधक स्नानगृहों तथा उनकी उत्तम रचना और योजनाको देखकर शायद ही कोई रगीला दर्शक ऐसा हो जिसके मनमें मुगल बादशाहोंके विलासोंका अनुभव प्राप्त करनेकी इच्छा न होती हो। वहाँके स्वच्छ और दुग्ध-धवल सगमरमरका सौन्दर्य और प्रशस्त तथा प्रगमनशील स्नानागार-रचना शायद ही और कहीं देसनेको 'मिलेगी ! सच है, अपूर्व अपूर्व ही है ।। शाहवाग और शाहबुर्ज। इन राजमहलोंमें शाहबाग और शाहबुर्ज नामक दो स्थान अत्यन्त ही दर्शनीय थे। इनमेंसे शाहबागके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेके कारण उसका पूर्व-रूप अब नहीं रहा है। परन्तु शाहबुर्ज अभी तक कायम है । बनियर नामके फरासीसी यात्रीने इस बागको स्वय देखा था । इस बागके नाना प्रकारके सगमरमरके फौवारों और भाँति भॉतिके सगमरमरी जलाशयोंकी अप्रतिम शोभाको देखकर वह विदेशी यात्री आश्चर्य्यसे चकित हो गया था। इस वागमें शाहबुर्ज नामक एक अठपहलू मण्डप -- ४२ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। 0 ~ था। उससे कालिन्दी नदीके रमणीय तटका सुन्दर दृश्य दिखाई पडता था। इस स्थलपर स्वय बादशाह विराजमान होते थे, इसलिए उसके बाहरी और भीतरी दोनों हिस्से सुवर्णके बने थे । सुन्दर तसबीरों और बडे बडे दर्पणोंसे वह सजाया गया था । सन १७९३ ईसवीमें फाकलिन साहबने इस स्थलका दर्शन किया था, जिन्होंने इस तरह उसका वर्णन किया है - " शाहबाग नामक नृपोद्यानमें एक अठपहलू बेंगला है। उसके ऊपरसे जमनाका दृश्य दिखाई देता है । इस मन्दिरका नाम शाहबुर्ज अथवा बादशाही महल है । इसका भीतरी भाग सगमरमरका बना हुआ है। सन १७८४ ईसवीमें राजपुत्र जवानबख्त इसी महलकी खिडकीसे कूद, कर लखनऊको भाग गया था । इस मन्दिर पर मराठोंके आक्रमण हुए थे, अतएव वह बहुत नष्ट हो गया है। " इसके इकतीस साल बाद हीवर नामके एक यात्रीने इसी स्थलको देख कर इस प्रकार लिखा है - "मैने यहॉका बाग देखा, वह बहुत बड़ा नहीं था । परन्तु किसी समय यह अत्यन्त सुन्दर और रमणीय रहा होगा । यहाँ पर सन्तरेके पुराने वृक्ष दिखाई पड़ते थे। गुलाबके गमले और अन्य पुष्प-लतिकाएँ भी यहाँ कई थीं। स्वच्छ सगमरमरकी नालिया बना कर उनके द्वारा सत्र ओर पानी ले जाते थे। बागमें एक अष्टकोणाकृति सुन्दर मण्डप अथवा उद्यानगृह था । वह बहुत ऊँचा था,और उसकी खिडिकियोंसे नगर तथा सरिताका उत्कृष्ट दृश्य दृष्टिगोचर होता था। परन्तु जिस समय हम वहाँ गयै थे, उस समय वह सब अस्वच्छ और अव्यवस्थित दशामें था । स्नान- गृह और फोवारे जलरहित अर्थात् बिलकुल शुष्क हो गये थे । उद्यान- मन्दिरकी फर्शबन्दी पर कूड़ा-कचरा जमा हो जानेके कारण वहॉकी नक्काशी लुप्त हो गई थी, और आसपासकी दीवारोंमें पक्षियोंने अपने घोंसले बना लिये थे।" अस्तु । अब तो यह वाग बिलकुल ही नष्ट हो गया दूसरा प्रकरण। ४३ है। हा, सिर्फ यह 'शाहबुर्ज' नामका स्थल बुरी दशामें मौजूद है। जिस स्थान पर स्वयं दिल्लीपति वायुसेवनके लिए विराजमान होते थे, वहाँ पर अब चमगीदडॉका निवास देख कर अवश्य ही उस स्थानको अपने दुर्भाग्य पर खेद होता होगा। मोती मसजिद । यह इमारत स्वय बादशाहकी ईश्वर-प्रार्थनाके लिए थी । इसको सन् १६३५ ईसवीमें औरगजेब बादशाहने बनवाया था, और इसके बनवानेमें १६,००,००० रुपये खर्च हुए थे। यह इमारत है तो छोटी, पर अत्यन्त सुन्दर है। मुख्य इमारत तीन कमानियोंकी बनी है, इन कमानियों और दीवारों पर जो नक्काशी की हुई है, वह बहुत सादी होने पर भी अत्यन्त मनोरम है। इसको देखकर नडे बडे शिल्प-कला-विशारद आनन्दसे टोलने लगते है। उनका कथन है कि, यह मसजिद शिल्प-कलाका एक अद्वितीय रत्न है। इस मसजिदका द्वार पाँच धातुओंके मेलसे बना है, और उसपर अत्यन्त ही कमनीय नक्काशी की हुई है । सन् ५७ के सिपाही-विद्रोहके समय इस मसजिद पर गोलोंकी वर्षा हुई थी, जिससे इसे बहुत बडा धक्का पहुंचा है। बहुत दिनों तक किसी ने इसकी ओर ध्यान नहीं दिया था, इस लिए इसकी दीवारों पर पीपलके कोमल पत्ते दिसाई देने लगे थे। परन्तु अब उसका रूप पलट गया है, और वह फिर परले जैसी नई दिखने लगी है । इस मसजिदको बनवानेके वाद स्वय औरगजेब बादशाहने ही इसकी प्राणप्रतिष्ठा की, और उसमें निमाज पढना आरम्भ किया। जब वह इस राजप्रासादमें रहता था, तम सास तौर पर, शुभ्र वस्त्र पहिन कर, वह इस मसजिदमें ईश्वर-- प्रार्थना किया करता था। इससे जान पडता है कि,दारा नामका उसके भाईने जो उसे "निमाजी" नाम दिया था, सो रिलकुल उचित था । अब इस मसजिदकी अन्छी मरम्मत हो गई है। -- / ४२ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। । था। उससे कालिन्दी नदीके रमणीय तटका सुन्दर दृश्य दिखाई पडता था। इस स्थलपर स्वय बादशाह विराजमान होते थे, इसलिए उसके बाहरी और भीतरी दोनों हिस्से सुवर्णके बने थे। सुन्दर तसबीरों और बडे बड़े दर्पणोंसे वह सजाया गया था । सन् १७९३ ईसवीमें फ्राकलिन साहबने इस स्थलका दर्शन किया था, जिन्होंने इस तरह उसका वर्णन किया है. शाहबाग नामक नृपोद्यानमें एक अठपहलू बंगला है। उसके ऊपरसे जमनाका दृश्य दिखाई देता है । इस मन्दिरका नाम शाहबुर्ज अथवा बादशाही महल है । इसका भीतरी भाग सगमरमरका बना हुआ है। सन् १७८४ ईसवीमें राजपुत्र जवानवख्त इसी महलकी खिडकीसे कूद कर लखनऊको भाग गया था। इस मन्दिर पर मराठोंके आक्रमण हुए थे, अतएव वह बहुत नष्ट हो गया है। " इसके इकतीस साल बाद हीबर नामके एक यात्रीने इसी स्थलको देख कर इस प्रकार लिखा है " मैने यहाँका बाग देसा, वह बहुत बड़ा नहीं था । परन्तु किसी समय यह अत्यन्त सुन्दर और रमणीय रहा होगा । यहाँ पर सन्तरेके पुराने वृक्ष दिखाई पडते थे। गुलाबके गमले और अन्य पुष्प-लतिकाएँ भी यहाँ कई थी। स्वच्छ सगमरमरकी नालिया बना कर उनके द्वारा सब ओर पानी ले जाते थे। बागमें एक अष्टकोणाकृति सुन्दर मण्डप अथवा उद्यानगृह था। वह बहुत ऊँचा था,और उसकी खिडिकियोंसे नगर तथा सरिताका उत्कृष्ट दृश्य दृष्टिगोचर होता था। परन्तु जिस समय हम वहाँ गये थे, उस समय वह सब अस्वच्छ और अव्यवस्थित दशामें था। स्नान गृह और फौवारे जलरहित अर्थात् बिलकुल शुष्क हो गये थे । उद्यान- मन्दिरकी फर्शबन्दी पर कूडा-कचरा जमा हो जानेके कारण वहॉकी नक्काशी लुप्त हो गई थी, और 'आसपासकी दीवारोंमें पक्षियोंने अपने घोंसले बना लिये थे।" अस्तु । अब तो यह बाग बिलकुल ही नष्ट हो गया दूसरा प्रकरण। . एक विख्यात किला है, उसी तरह इसे यदि 'टॉवर आफ देहली' कहें, तो कुछ हर्ज नहीं । 'टॉवर आफ लन्डन' नामक किलेमें जिस तरह अनेक राजा और राजनीतिज्ञ लोग कैद थे, उसी तरह देहलीके इस टॉवरमें भी दिल्लीके राजघरानेके बहुतसे राजपुरुष और दिल्ली के दरबारके अनेक सरदार कैदमें रक्खे गये थे । शाहजादा मुराद जब कि शराब- के नशेमें चूर था, एक हाथीपर बिठाकर इसी क्लेिमें लाकर कैद किया गया था। दाराके छोटे लडके शेखूको, औरगजेबकी बेटीसे विवाह करके, इसी किलेमें कैद किया था । औरंगजबके ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद सुलतानको भी पन्द्रह वर्ष तक इसी दुर्गमें पराधीनताका दुख सहन करना पड़ा था। इनके सिवा, अन्य कितने चतुर और महत्त्वा- कांक्षी राजनीतिज्ञ यहा आये होंगे, तथा कैदमें पच पच कर मरे होंगे, इसका कुछ पता नहीं । इंग्लैंडके 'टॉवर आफ लन्डन' नामक किलेके कृष्णकृत्योंका वर्णन पढकर जिस तरह पाठकोंकी देह पर रोमाच खडे हो जाते हैं, उसी तरह सलीमगढके किलेका वर्णन पढकर भी पाठकोंको दुःख हुए बिना नहीं रहता । राज्य-लोम अथवा अधिकारलोभकी प्रबलता के कारण जो अत्याचार हुए है, उनका प्रदर्शन करनेके लिए ही मानो 'सलीमगढ' अथवा 'टॉवर आफ लन्डन' अथवा 'बैस्टिली' जैसे उग्र एंव भयानक क्लेि अभी तक विद्यमान है । अहा ! जिस भीम- 'रूपी सलीमगढ की किसी समय वह धाक थी, आज वही बिलकुल दीनावस्थामें दिखाई दे रहा है । , ४४ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । । ऊपर जिन स्थानोंका वर्णन किया गया वहीं दिल्लीके किलेमें मुख्य स्थान हैं। इनके अतिरिक्त वहाँ और भी कई राजमहल थे, परन्तु वे सब आज- कल नष्ट-भ्रष्ट हो गये है, और उनकी जगह पर अंग्रेजी पल्टनोंके निवास स्थान बन गये हैं। दिल्लीके किलेका प्राचीन और भव्य स्वरूप, जितना उसके बाहरके लालरगके कोटसे और बडी खाईसे, व्यक्त होता है उतना उसके अन्त स्वरूपसे नहीं व्यक्त होता, क्योंकि जबसे वहाँ अँगरेजी राज्यकी स्थापना हुई है तबसे उसमें अनेकों नई इमारतें बन गई हैं, और पुरानी गिरा दी गई है । इतना होने पर भी हमने जिन मुगल इमारतोंका ऊपर वर्णन किया है, वे अभी तक मुगलोंके वैभवकी गवाही दे रही है । अवश्य ही वे दर्शकोंके अन्तःकरणको प्रसन्न किये बिना नहीं रहतीं। सलीमगढ़ । शाहजहाँ बादशाहके महल और जमना नदीके पुलके दरमियानम सलीमगढ नामका एक अत्यन्त प्राचीन किला है।शेरशाहके पुत्र सलीमने इस किलेको बनवाया था, इस लिए इसे सलीमगढ नाम प्राप्त हो गया है । जब हुमायूं बादशाह पुन दिल्लीको वापिस आया, तब उसे अपने शत्रुके पुत्रका नाम कायम रखना उचित न मालूम हुआ। इसलिए उसने, उस नामको बदल कर, उसका नाम 'नाहरगढ' रक्खा । यह किला मिट्टीका बना है, और अत्यन्त ही बेडौल है । तो भी इसका बाहरी दृश्य अत्यन्त भव्य है । यह किला जमना नदीके प्रवाहमें बना है, इसलिए वह किसी द्वीपके समान दिखाई देता है । इस किलेसे नदीको सरलतापूर्वक पार करनेके लिए जहाँगीर बादशाहने पॉच कमा- नियोंका एक पुल बनवाया था ! वह अभी तक कायम है । सलीमगढका किला यद्यपि विशेष दर्शनीय स्थान नहीं है, तथापि उसका इतिहास बड़ा महत्त्वपूर्ण है । लन्दनमें जिस तरह 'टॉवर आफ लन्डन ' नामका तीसरा प्रकरण। द्वार सुले हुए है । पश्चिमकी ओर बिलकुल द्वार नहीं है । वहाँ सिर्फ पत्थरकी एक ऊंची दीवार ही बना दी गई है । जो मुख्य तीन दरवाजे "है, उनके तीनों ओर नदीके घाटकी सीढियोंके समान सीधी खुली सीढियाँ है । मुख्य प्रवेश-द्वार पीतलके ढले हुए है, और बहुत भारी तथा मजबूत है। इनमें पूर्वीय द्वार बहुत बडा और अत्यन्त सुन्दर है । इसे हम महा द्वार कह सकते है । इस द्वारसे भीतर जाने पर एक बडा भारी ऑगन मिलता है। ऑगनका विस्तार १४०० धन- गज है । इसमें एक प्रकारके लाल पत्थरकी फर्शबन्दी की हुई है। इस ऑगनके बीचोंबीच सुन्दर, सगमरमरका एक बडा हौज है। उसमें चट्टानके प्राकृतिक झरनेका पानी लाया गया है । इस चौरस आँगनमें ५००० मुसलमान प्रार्थनाके लिए एकत्रित हो सकते है । इस इमारतकी मुख्य मसजिद इस मुख्य ऑगनके पश्चिममें है । मक्का चूकि पश्चिममें है, इसलिए, उसकी दिशाका बोध होने के लिए, ऐसी रचना की गई है। यह मुख्य मसजिद आयताकार है, जिसकी लम्बाई २०१ फीट और चौडाई १२० फीट है । उसके शिरोभाग पर सुन्दर सगमर- मरकी तीन मेहराबें है, जिन पर सोनेका मुलम्मा चढाकर बहुतही बढिया नकाशी की गई है । इसके दोनों ओर दो मीनारें है । वे १३० फीट ऊँची है, और उन पर छोटेसे, अत्यन्त कमनीय गुम्बज बने है । मसजिदके अग्रभागमे दस दालानें है, और उनपर जो ऊँची तथा अर्थ- वृत्ताकार कमानिया है, वे अत्यन्त सुन्दर है । इस इमारतके शीपभागपर, बढिया सगमरमरपर, काले रंगके पत्थरसे, नस्की भाषाके अक्षर बने हैं। उनमें इस मसजिदके बननेका काल और खर्च लिसा है । उससे यह मालूम होता है कि, इस इमारतके बनानेका काम सन् १६४४ ईसवीसे आरम्भ होकर सन् १६५० ईसीमें समाप्त हुआ है। इस इमारतके लिए लगभग छे वर्ष तक ५००० लोग काम करते .
तीसरा प्रकरण । '- दिल्लीकी जुम्मा मसजिद । . दिष्टीके राजप्रासादकोदेखनेके बाद नगरमें प्रवेश करतेही, पहले पहल यह भारी मसजिद दिखाई पड़ती है । हिन्दुस्तानकी बदिया इमारतोंमेंसे यह भी एक है । ईसाइयोंके लिए जिस तरह सेंटपीटर्सका गिरजाघर है, अथवा हिन्दुओंका जैसे जगन्नाथजीका मन्दिर है, वैसीही मुसलमानोंकी यह जुम्मा मसजिद है। आगरेका 'ताजमहल' सबसे श्रेष्ठ है । उसके बाद यदि इस मसजिदकी गणना की जाय, तो कुछ अनुचित नहीं । यह सारी इमारत लाल रगके पत्थरसे बनी है, और बीच बीचमें उसपर संगमरमरकी कारीगरी की गई है, अतएव ऐसी भली मालूम होती है, मानो लाल रगके दुशाले पर सुन्दर बेल-बेटे कटे हों । यह सारी इमारत यदि बढिया सगमरमरकी बनी होती, तो आगरेके 'ताज' के समान यह भी अपनी धवल प्रभासे लोगोंको वैसाही मोहित कर सकती थी । अस्तु । यह सारी इमारत यद्यपि सगमरमरकी नहीं बनी है, तो भी इससे यह न समझना चाहिए कि, इसकी बनावट सौन्दर्यमें कुछ न्यून है । यही नहीं, किन्तु समस्त दिल्ली नगरमें सबसे ऊँची इमारत केवल यही एक है, और यह कहना भी अत्युक्ति न होगा कि, यह इमारत अपनी भव्यता और अपनी आरक्त प्रभासे शेष सब इमारतोंको लज्जित कर रही है। यह मसजिद एक ऊँची चट्टान पर बनी है, और इसके लिए वह चट्टान तोडकर साफ की गयी है । इस मसजिदके चारों ओर चार मार्ग है। परन्तु इसमें प्रवेश करने के लिए सिर्फ उचर, दक्षिण और पूर्वकी ओरसे - तीसरा प्रकरण। ४९ . आया करते थे। उस समय यहाँका दृश्य बहुत ही विचित्र देख पडता था। प्रति शुक्रवारको यहाँ पर ईश्वरकी प्रार्थना हुआ करती थी। मुसलमान लोग चूकि धर्मके लिए पागल होते है, इस लिए इस मसजिदमें एकत्रित होने पर, यह मसजिद उनमे चाहे जैसी उत्तेजना उत्पन्न कर' देनेका सामर्थ्य रखती थी। सन् ५७ के बलवेके समय, सितम्बर महीनेके एक शुक्रवारको यहाँ 'खुतबा ' पढा गया, और दिल्लीके सब मुसलमानोंने उस समय यह घोषणा कर दी कि, 'खल्क सुदाका, मल्क -वादशाहका, अमल बहादुरशाहका मतलब यह कि, उस भयकर प्रसग में यह मसजिद स्वधर्माभिमान तथा स्वदेशाभिमानकी प्रेरणा करनेवाली एक मुख्य जगह बन गई थी। परन्तु वह प्रेरणा क्षणभगुर हुई; और राज-द्रोही बलवाइयोंका शीघ्र ही अन्त हो गया । बलवेके बाद यह चर्चा उिडी कि, यह मसजिद बिलकुल गिरा दी जावे । परन्तु सरकार- ने मुगल रियासतकी इस बडी इमारतको नष्ट करके ससारमें अपनी अपकीर्ति नहीं कराई । यह बहुत अच्छा हुआ। बिशप हीबर नामक यानीने जुम्मा मसजिदकी अलौकिक रचना देखकर बहुत ही आनन्द प्रकट किया है- उसने कहा है कि, “ इस मसजिदका आकार, उसकी दृढता और उसकी बनावटकी उत्तमताको देखकर मेरे मन पर जैसा प्रभाव हुआ, वैसा हिन्दुस्तानकी दूसरी इमारतोंके देसनेसे नहीं हुआ। रसेल नामके एक दूसरे यूरोपीय महाशयने लिसा है कि, इस इमारतकी विशुद्ध शोभा, उसकी रचनाका परिमाण-सौन्दर्य, और भवनसम्बन्धी ऊची कल्पनाशक्तिकी, यदि हमारे ईसाई प्रार्थना-मन्दिरके क्षुद्र और दरिद्री भवनसे तुलना की जाय, तो दुःखसे हमे अपना सिर नीचा *" The size, the solidity, and rich materials of the Jumma Blusjeed impressed mi niore than anything of the sort which I have been in India"-Bishop Beber.
४८ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। + रहे ! उस समयके हिसाबसे इस इमारतके बनानेमें दस लाख रुपया खर्च हुआ था। इस मसजिदकी सारी फर्शवन्दी सगमरमर की है। उस पर क्रमश तीन फुट लम्बी और डेढ फुट चौडी क्यारिया कटी हुई है। कुल क्यारिया ९०० है । इनमें निमाज पढते समय बादशाह , और अमीर-उमराव लोग बेठा करते थे। किबलेके निकट, यानी मध्यभागके अर्धगोलाकृति शिरोभागके नीचे, जो नक्काशी की गई है, वह सर्वोत्कृष्ट है । इसके सामने धर्माध्यक्षका मुख्य पीठ है, जो एक अखण्ड सगमरमरके पत्थरका बना है । यहाँ की एक दीवालपर शाहजहाँ और बहादुरशाहके हस्ताक्षर दिसलाये है । इस मसजिदके एक दालानमें एक कोठरी है । वहाँका जालीका काम अत्यन्त दर्शनीय है । इस कोठरीमें मुसलमान लोगोंकी दृष्टिसे अत्यन्त प्रिय, तथा मुहम्मद साहबके समयकी, पुरानी वस्तुएँ रखी है। उनमें सातवीं शताब्दीकी प्राचीन कुरानकी एक हस्तलिखित प्रति है। इसके सिवाय, इमाम हुसेन तथा इमाम हसनके द्वारा लिखी हुई कुरान- की भी दो प्रतियाँ है । यहा पर 'कप्प-ए-मुबारक' यानी हजरत मुह- म्मदकी चर्मपादुकाएँ भी सुगधित द्रव्योंमें डालकर रखी गई है। 'कदम- उल-मुबारक' यानी उनके पैरकी छाप, और 'मुइ-ए-मुबारक' यांनी उनकी दाढीके बाल, भी वहाँ पर रखे हुए है । इसी तरह वहाँ पर उनकी कबरके आच्छादनका थोडासा शेष भाग भी सुरक्षित रूपसे रखा गया है । जिन महाशयोंको ये चीजें देखनेकी लालसा हो, वे वहॉके काजीको कुछ दक्षिणा देकर उनको अवश्य देख सकते है । कहते है कि, शाहजहा बादशाहने इन वस्तुओंको लाकर यहाँ बडी भक्तिके साथ रखा है। मुगल बादशाहोंके जमानेमें जुम्मा मसजिदकी वडी इज्जत थी। ईदके दिन यहाँ पर बादशाह और उसके अमीर-उमरा बड़े ठाट बाटके साथ । तीसरा प्रकरण। आया करते थे। उस समय यहाँका दृश्य बहुत ही विचित्र देस पडता या। प्रति शुक्रवारको यहाँ पर ईश्वरकी प्रार्थना हुआ करती थी। मुसलमान लोग चूकि धर्मके लिए पागल होते हैं, इस लिए इस मसजिदमें एकत्रित होने पर, यह मसजिद उनमें चाहे जैसी उत्तेजना उत्पन्न कर देनेका सामर्थ्य रखती थी। सन् ५७ के बलवेके समय, सितम्बर महीनेके एक शुक्रवारको यहाँ 'सुतबा' पढा गया, और दिल्लीके सब गुसलमानोंने उस समय यह घोषणा कर दी कि, 'खल्क खदाका, मल्क बादशाहका, अमल वहादुरशाहका'। मतलब यह कि, उस भयकर प्रसग में यह मसजिद स्वधर्माभिमान तथा स्वदेशाभिमानकी प्रेरणा करनेवाली एक मुख्य जगह बन गई थी। परन्तु वह प्रेरणा क्षणभगुर हुई, और राज-द्रोही बलवाइयोंका शीघ्र ही अन्त हो गया । बलवेके बाद यह चर्चा छिडी कि, यह मसजिद बिलकुल गिरा दी जावे । परन्तु सरकार- ने मुग़ल रियासतकी इस बडी इमारतको नष्ट करके ससारमें अपनी अपकीर्ति नहीं कराई । यह बहुत अच्छा हुआ । बिशप हीवर नामक यात्रीने जुम्मा मसजिदकी अलौकिक रचना देसकर बहुत ही आनन्द प्रकट किया है-उसने कहा है कि, “ इस मसजिदका आकार, उसकी दृढता और उसकी बनावटकी उत्तमताको देखकर मेरे मन पर जैसा प्रभाव हुआ, वेसा हिन्दुस्तानकी दूसरी इमारतोंके देसनेसे नहीं हुआ* |" रसेल नामके एक दूसरे यूरोपीय महाशयने लिखा है कि, “इस इमारतकी विशुद्ध शोभा, उसकी रचनाका परिमाण-सौन्दर्य, और भवनसम्बन्धी ऊची कल्पनाशक्तिकी, यदि हमारे ईसाई प्रार्थना-मन्दिरके क्षुद्र और दरिद्री भवनसे तुलना की जाय, तो दुखसे हमे अपना सिर नीचा . "*" The size, the solidity, and rich materials of the Junama Musjeed: impressed m more than anything of the sort which I hare seen in India " --Bishor Heber. ४ । ५० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । करना पडेगा । " 7 * साराश यह कि, जिस इमारतके रचना-चातुर्य पर विदेशियोंको भी इतना आश्चर्य होता है, वह इमारत, -सिर्फ दिल्ली शहरके लिए ही नहीं, किन्तु यदि समस्त भारतवर्षके लिए भी भूषण हो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं । दिल्ली शहर। दिल्लीका किला, जुम्मा मसजिद और वर्तमान दिल्ली शहर-ये तीन हिस्से मिलकर नई दिल्ली अथवा शाहजहानाबाद शहर बनता है । इस शहरके चारों ओर एक बडा शहरपनाह है, जिसका घेरा साढे पाच मील है, और उसके क्लेिका कोट डेढ मील है । किलेमें दो दरवाजे है। उनका नाम क्रमश 'लाहोर गेट' और 'देहली गेट' है। कुल शहरमें दस दरवाजे है । उनके नाम इस प्रकार है.- 'कलकत्ता गेट'-यह राजमहलके पास है । यहाँसे रेल्वे स्टेशन की ओर रास्ता जाता है। २ 'काश्मीर गेट-यह उत्तरमें है। चर्च और कचहरियाँ इसके नजदीक हैं। 'मोरीगेट-यह भी उत्तरमें ही है।' ४ 'काबुल गेट'-यह पश्चिममें है । इसके आगे सदर बाजार १ 1 ३ लगता है - ५ 'लाहोर गेट'-यह पश्चिममें है, और यहाँसे चाँदनी चौकको रास्ता जाता है। ६ 'फर्राशसाना गेट -यह नम्त्यमें है। * There is a chaste richness, and elegance of proportion, and a grandeur of design in all its parts, which are punfull contrast to the mesquin and prltry archritecture of our christian churches " -Russell तीसरा प्रकरण। . । अजमेर गेट' यह भी नैर्ऋत्यमें ही है। ८ 'तुर्कमान गेट'-यह दक्षिणमें है। ९ 'देहली गेट'-यह भी दक्षिणमें ही है । १. 'राजघाट गेट'-यह पूर्वमें है । यहाँसे जमनाजीके घाटकी ओर रास्ता जाता है। किलेसे चलकर दिल्ली शहरमें प्रवेश करनेके लिए लाहोर दरवाजेसे आना पड़ता है । लाहोर दरवाजेके भीतर आतेही एक बडा चौडा रास्ता मिलता है । यह रास्ता सीधा चाँदनी चौक की ओर जाता है । दिल्ली शहरका नामी चौक यही है । यहाँ धनशाली व्यापारियों और जौहरियों की दूकानें है । यहाँका बादशाही जमानेका वैभव अब नष्ट हो गया है, और फिरसे उसके प्राप्त होनेकी बहुत कम सम्भावना है । इस चौककी दूकानें बाहरसे बडी भडकीली दिखती है । परन्तु इस रास्ते पर पहले जैसे मुल्यवान वस्त्र परिधान किये अमीर उनके कीमती सामान और सोने-चाँदीसे अलकृत अच्छे अच्छे घोडे, उनके नाना प्रकारसे शृगारित हाथी, तथा विविध रनके मियानोंके झुट दिखाई देते थे, उनका अब कहीं पता नहीं है उनकी जगह पर अब यहाँ अर्वाचीन इक्के और घोडे गाडिया बहुत हैं। रास्तेसे गुजरते हुए चारों ओर नेचेदार हुकोकी धूम खूब दिखाई देती है । हरएक दूकानमें हुक्का अवश्य होता है । पहले मुसलमानोंको ऐशो-आरामकी जो आदत थी उसका यहाँ मूर्तिमान स्वरूप दिखाई देता है। ये लोग सदैव व्यसनासक्त रहकर विलासितामें मग्न रहते थे । हा, अब अगरेजी राज्यमें विद्याका प्रचार बहुत कुछ हो चुका है, अतएव इन लोगोंका ऐशोआराम भी अब बहुत कुछ कम हो रहा है, और ये लोग भी अब उन्नतिके मार्गपर अग्रसर हो रहे है । यहाँके सुशिक्षित लोग वढे सभ्य हैं, और बाहरवालोंको वे वही आदरकी दृष्टि से देखते हैं । तथापि, मुसलमानोंकी रीतिके अनुसार, र-उमराव, दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । औपचारिक वर्ताव ओर व्यर्थका आदरसत्कार यहाँ पर बहुत है। इसके सिवाय, यहाँ पर व्यर्थ की बडाई मारनेवालोंकी भी कमी नहीं है । दिल्लीके चाँदनी चौकमें सडे होनेपर 'दिल्ली इन्स्टीट्यूट' नामकी एक बडी इमारत दिसाई देती है । इस इमारत की बनावट यूरोपियन ढगकी है, और इससे दिल्लीको एक नये प्रकारकी शोभा प्राप्त हो गई है। यहाँ वाचनालय, अजायबघर, म्यूनिसिपालिटी, इत्यादि सार्वजनिक संस्थाएँ है । ग्रामसस्थाने इस इमारतको १,३५,४५७ रु व्यय करके निर्माण किया है। "दिल्ली इन्स्टीटयूट" के सामने चाँदनी चौकके एक ओर १२८ फुट ऊँचा एक सुदर और दर्शनीय मीनार है । इस मीनारका-नाम क्लाक टावर' है, और दिल्लीकी म्यूनीसिपालटीने २५,५०० रुपये खर्च करके उसको बनवाया है। इस मीनारसे चाँदनी-चौकको यद्यपि बहुत कुछ शोभा प्राप्त हुई है, तथापि मुगल बादशाहोंके प्राचीन मीनारोंकी बराबरी यह नहीं कर सकता। इस मीनारके शीर्पभागपर चारों ओर बडी बडी घड़ियाँ है । वे प्रत्येक पलमें, समर्थ रामदास स्वामीके शब्दोंमें; मानो दर्शकोंसे कह रही है कि, " भाइयो, घटिकाए निकल गई, पल निकल गये, और घंटा टन टन बजता है । इसी तरहसे तुम्हारे जीवनका भी नाश हो रहा है। इस लिए इस ससारमें आकर परमात्माका नाम लो, और कुछ परोपकारका कार्य कर जाओ।" चाँदनी-चौकमें प्राचीन ऐतिहासिक स्थानों से दो स्थान देखने लायक है ! एक रोशनुद्दौला की मसजिद, और दूसरा कोतवाली। रोशनुहोला की मसजिद सन् १७२१ ईसवीमें, मुहम्मदशाह बादशाहके जमानेमें, रोशनुहोला जफरखानने बनवाई थी। यह मसजिद है तो छोटीही, परन्तु अत्यन्त कमनीय है । इसके गुम्बजपर सोनेके मुलम्नेका काम किया गया है, इसलिए इस मसजिदको सोनेकी मसजिद भी कहते है । नादिर- । - तीसरा प्रकरण। MAAN m Aw N शाहने जिस समय दिल्लीपर आक्रमण करके वहॉके लोगोंको क्तल किया, उस समय उसने इसी मसजिदकी गच्चीपर खडे होकर वहॉकी कतलका अवलोकन किया था ! दीन प्रजाजनाका करुणा-पूर्ण क्रन्दन सुनकर उसके हृदयमें रत्तीभर भी दया उत्पन्न न हुई ! प्रत्युत, उनके रुधिरप्रवाहके, साथही साथ उस नराधम नरपिशाचके हृदयमें आनन्दकी तरहें उमडने लगी थीं! | ऐसे पुरुषोंके लिए 'मानवसृष्टिके राक्षस' से अधिक और क्या उपमा दी जा सकती है ? इस स्थानके पास ही कोत- वाली की इमारत है । हडसन साहरने सन् १८५७ ईसवी के बलवेके समय, बादशाहके पुत्रोंको मारकर, उनकी लाशें लोगोंको दिखलानेके लिए -यहीं पर लाकर रक्खी थीं !! बलवेके समय यद्यपि यह स्थान रक्तकी बूंदोंसे कलङ्कित हो गया था, तथापि आजकल वहाँ शान्ति देवीका 'पूर्ण साम्राज्य है। दिल्लीके चाँदनी-चौकका अवलोकन करनेवालोंके मनमें वहॉके 'विस्टोरियावाग' को देसनेकी इच्छा उत्पन्न होती है । यह वागअंग्रेजी ढंगपर लगाया गया है, और नगरनिवासियोंके विश्रामका वहा पूरा पृग सुभीता दिया गया है । इस उद्यानमें नेत्रोंका रजन बहुत अच्छी तरह होता है । कर्णांका रजन होनेके लिए भी यहॉ पासही एक 'बैंडस्टैन्ड' की योजना की गई है । वहॉ हफ्तेमें नियत दिनोंपर सुन्दर वाघ सुनाई देते है, जिन्हें सुनकर रजनप्रिय जनसमुदायको बढा सतोष होता है। इस बागसे अलीमर्दानकी नहर बह रही है। इस जलाशयसे वागको विशेष शोभा प्राप्त हुई है । सुन्दर सरिता अथवा रमणीय सरोवर उद्यानश्रीके प्यारे क्रीडा-भवन हैं। इनके बिना उसके विलास पूरे नहीं होते । अस्तु । । इस बागमें पत्थरका एक हाथी है । उसके पैरोंके पास यह लेस खुदा है कि, शाहजहाँ बादशाह सन् १६४५ ईसवीमें ग्वालियरसे यह ।
। चौथा प्रकरण । . । इन्द्रप्रस्थ । 'महाभारतकी कौरव-पाडवोंकी क्याओंने जिस इन्द्रप्रस्थका नाम अजर-अमर कर दिया है, और जिसका नाम हिन्दुओंने अनेक बार सुना है, वह सुप्रसिद्ध नगर दिल्लीके दक्षिणमें दो मीलकी दूरी पर, है। यहाँ पाडवोंके समयकी धन सम्पन्न नगरी अब नहीं है। सिर्फ मुस- लमानी फिलेका कुछ जीर्ण भाग और उसमें कुछ प्राचीन ,मसजिदें है। आजकल यहा पर न तो वे उत्तुग देवालय है, और न वे रमणीय उद्यान । यहाकी निर्जन तथा उध्वस्त दशाको प्राप्त,-परत इतिहासकी दृष्टिसे अत्यत पवित्र एव महत्वपूर्ण भूमिका अवलोकन करने पर प्रत्येक हिंदू दर्शकका हृदय गद्गद हो जाता है। यह सोच कर, कि हम पाडवोंके इन्द्रप्रस्थम सडे है, उसे बड़ा गौरव मालूम होता है, ओर उस सुदर नगरीकी विपदावस्थाको देखकर उसे अत्यत खेद होता है। पाटवोंकी पुण्यभूमि अवलोकन करनेकी उत्सुकतासे हृदयमें उठी हुई आनद-तरगें.क्षणभरमें विलीन हो जाती है, और वहा जाते ही शोकका साम्राज्य हृदयमें छा जाता है । अस्तु । मनकी यह हालत हो जाती है, तथापि दर्शकोंको इस स्थानके देखनेकी जिज्ञासा विशेष रहती है, और दिल्ली जाने पर उसका अवलोकन किये बिना वे कदापि नहीं रहते। इन्द्रप्रस्थ नगरका विस्तारपूर्वक वर्णन महाभारतमें दिया ही है । तो भी उसका थोडासा वृत्तात यहा पर दे देना आवश्यक जान पडता है। इस नगरकी कथा इस प्रकार है द्रौपदीका स्वयवर होनेके बाद, उसके साथ पाडव हस्तिनापुरको रवाना हुए। तब कौरव राज धृतराष्ट्रके मनने यह डर पैदा हुआ कि - चौथा भकरण। - - ज्योंही ये हस्तिनापुरमे आयेंगे त्योंही राज्यके बटवारेके लिए मेरे । पुत्रोंमें और इनमें झगडा शुरू हो जायगा । इसका प्रतिबन्ध करनेके लिए उन्होंने विदुरके द्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको यह सदेशा भेजा कि,. तुम लोग हस्तिनापुरको न आकर वहाँसे थोटी ही दूर पर जो खाढव- वन अथवा इन्द्रवन नामक भारी जगल है, उसको साफ करके वहाँ पर एक नया शहर बसाओ, और वहीं पर तुम अपने भाइयोके साथ राज्य करो। धर्मराज धर्मराज ही थे । उन्होंने इस बातको एक्दम स्वीकार कर लिया, ओर इद्रवनको जला कर, तथा साफ करके, वहाँ पर एक बडा भारी नगर बसाया । इसीको इन्द्रप्रस्थ अथवा खाडवप्रस्थ नाम दिया गया। महाभारतमें आदिपर्वके २०७ वें अध्यायमें इस नगरका बहुत ही सुदर वर्णन किया गया है। उससे जान पडता है कि, यह नगरी पृथ्वी पर मानो एक इन्द्रनगरीके ही समान थी। उसमें बडे बडे मनोहर उद्यान, जलाशय, इत्यादि बने थे। भवनोंकी शोभा अत्यन्त निराली थी । हाट, बाट, बाजार, चौक, इत्यादि अपनी सम्पत्ति और वैभवमें कुबेरपुरीको भी मात करते थे। साराश यह है कि, यह नगरी ऐसी सुदर और विलक्षण थी कि,. कौरवोंसे पाडया द्वारा मागे गये ग्रामोंमें उसको अग्रस्थान प्राप्त हुआ था। पाडवाने कौरवोंको यह समाचार भेजा था इन्द्रप्रस्थ वृषप्रस्थ जपन्त वारणावतम् । देहि मे चतुरो ग्रामात् पचम किंचिदेव तु ॥ अर्थात् इन्द्रप्रस्थ, पुनप्रस्थ, जयन्त, वारणावत-ये चार गाव तो हमें अवश्य दो, फिर पाँचवाँ चारे जौनसा दे दो। आखिर कौरवोंने पाहवाको ये गांव न दिये । या नाग, फिन्तु यहा तक कह दिया कि, हम तो तुम उतनी मिट्टी भी न उगे जितनी सुईकी नोक पर भी आ सके । उसका परिणाम भारतीय युद्ध । " १ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । इसी शहरमें पाढवोंने राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया, और मयासुरकी बनाई हुई विचित्र सभा इसी शहरमें थी। इस नगरीका नाम · महा- भारतमें अनेकों बार आया है। इसके अतिरिक्त अन्य चार प्रस्थ भी सिर्फ नाम मात्रके लिए मौजूद है। उनके स्थान दर्शकोंको दिखलाये जाते है । इन प्रस्थों अथवा पतोंके नाम। इस प्रकार है. पानीपत, सोन- पत, तिलपत और वाधपत । ये सब दिल्लीके मैदानमें जमनाके पश्चिमी किनारे पर बसे हुए थे। इन्द्रप्रस्थमें पाडवोंके समयकी नगरीका अब कुछ भी अश शेष नहीं रहा है । तथापि इस स्थानकी पवित्रता अभी तक कायम है, और श्रद्धालु हिन्दू जनोंकी दृष्टि से जो अत्यन्त पूज्य क्षेत्र है उनमें वह अभी तक गिना जाता है । पद्मपुराणमें इन्द्रप्रस्थकी महिमाका वर्णन करते हुए कहा है - . यमुना सर्वसुलभा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा । इन्द्रप्रस्थे प्रयागे च सागरस्य च सगमे ॥१॥ अर्थात् “ यमुना सर्वत्र सुलभ है, परन्तु इन्द्रप्रस्थ, प्रयाग और समुद्र- सगम, इन तीन स्थलोंमें दुर्लभ है । " वहाँ पर यमुनाके किनारे 'निग- मोदोघ' नामक तीर्थ तो बहुत प्रसिद्ध है, और वहाँ यात्रीगण जाया करते है। इस तीर्थक अतिरिक्त यहाँ पर छोटे छोटे तीर्थ और देवता अनेक है। दिल्ली शहरसे जब हम इन्द्रप्रस्थ देखनेके लिए जाते है, तब पहले हमें 'लाल दरवाजा' नामक एक बहुत बडा प्राचीन दरवाजा मिलता है । यह शेरशाहकी राजधानीका एक प्रसिद्ध दरवाजा था। इस दरवाजे के सामनेकी ओर हुमायू बादशाहका बनवाया हुआ 'पुराना किला देख पडता है। यही प्राचीन इन्द्रप्रस्थ है । इस किलेको हुमायूँ बादशाह. ने"दीने पनाह नाम दिया था । हुमाय जब इस किलेसे, भाग चौथा प्रकरण। गया, तब उसके प्रतिपक्षी शेरशाहने इस किलेका नाम शेरगढ अथवा शाहगढ रखा था। प्रथमत' सन १५३३ ईसवीमें हुमायूने इस किलेको बनवाना शुरू किया, और फिर इसके सात वर्ष बाद शेरशाहने उसके आसपास उत्तम कोट बनवाकर उसको सुशोभित कर दिया। इस कोटका घेरा लगभग एक मीलका है । इस किलेके मध्यभागमें, यानी इन्द्रप्रस्थी भूमिपर, अब राजमन्दिरोंके सुवर्ण-कलश नहीं चमकते, बल्कि उस पुण्यभूमि पर आज अकिचन जनोंकी पर्णकुटिकाएँ मात्र दृग्गोचर होती है! इस किलेमें 'किलाकोना मसजिद' और 'शेरमन्दिल' नामकी दो प्राचीन दर्शनीय इमारतें है । इनमें पहली इमारत लाल रंग और संगमरमरके पत्यरकी बनी हुई है, और उसकी रचना बडे कौशलकी है । यह पठान बादशाहके शासनकालमें, सन् १५४० ईसवीमें तैयार हुई । शिल्प-कला-विशारदोंकी दृष्टिसे इसकी रचना बहुतही श्रेष्ठ है, और हिन्दुस्तानकी शिल्पकलाके इतिहासके रचयिता मिस्टर फर्ग्युसनने । इसकी मुक्तकठसे प्रशसा की है। उन्होंने लिखा है कि, इटलीके निवासी, जिस तरह वेनिसके 'कॅपनाइल' नामक अच्युच्च राजमहलको । अपनी राजसत्ता तथा विजयवैभवका दर्शक समझते थे, उसी प्रकार पंठान लोग इस मसजिदके अत्युच्च मीनारको, प्रार्थनामन्दिरका सिर्फ एक भाग ही न मानकर, अपने अभ्युदय और राजसत्ताका कीर्तिस्तम मानते थे । उनका धर्मोपदेशक इस मीनार परसे सब लोगोंको, प्रार्थनामें सम्मिलित होने के लिए, बड़े ताल-सुरसे, पुकारा करता था। उस समय । बादशाहको भी अपना काम-काज छोडकर महलोंसे शीघ्र ही वहाँ जाना पड़ता था । हुमायूँ बादशाह इस मसजिदके निकट शेरमान्दल नामक गज-प्रासादमें रहा करता था । एक दिन नियमानुसार काजी- इस मीनार पर चढकर बादशाहको प्रार्थनाके लिए बुलाया । बाद- ६० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्था T । शाह उसी समय जल्दी जल्दीमें उठकर दौडा, जिससे जीनेकी एक सीढीसे उसका पैर फिसल पडा, उसे भयङ्कर चोट आई, और उसीमें सन् १५५६ ईसवीके जनवरी महीनेकी २६ वीं तारीखको उसका अन्त होगया! इन्द्रप्रस्थमें दिखाई देनेवाले उपर्युक्त मुसलमानी ऐतिहासिक स्थानोको अवलोक्न करनेसे दर्शकोंको एक प्रकारका उद्वेगजनक दृश्य दिखाई देता है । जहाँ खडे होकर अर्जुनने अपने गाण्डीव धनुपसे 'इन्द्रप्रस्य नगरीके कोटकी रक्षा की, वहाँ अब 'किलाकोना मसजिद' खडी हुई है ! जिस महलमें भगवान श्रीकृष्ण और पाडवोंकी कल्याणकारी मन्त्र- णाए हुआ करती थीं, उस महलके ठौर पर अब शेरमन्दिल अथवा शेरशाहका महल खडा है । इस महलके सामने आजक्ल जो गिरी हुई जगह दिखाई दे रही है, उसी जगह राजसूय यज्ञका महोत्सव हुआ था, जिसका वृत्तान्त वहॉके लोग अब तक बतलाया करते है। निस्स न्देह, विचारशील पुरुषके लिए इन्द्रप्रस्थका यह घोर परिवर्तन अत्यन्त विलक्षण है ! अहा | कालचक्रकी महिमा कितनी अगाध है, सो हमें इन्द्रप्रस्थ नगरीके इस विपर्याससे अच्छी तरह मालूम होती है । 'जहाँ अनेक प्रकारकी राजनैतिक मत्रणाए हुई, जहाँ अनेकों राज्य-क्रान्तियाँ हुई, जहाँ लक्ष्मी मूर्तिमान वास करती थी, जहाँके विषयमें कहा गया है कि- रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यावनावृता । तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च ॥१॥ जहाँ रत्नोंका तेज चमकता था, और शस्त्रोंकी दिव्य ज्योति चम- चमाती थी, वहाँ अब दो यवन मन्दिर अपने गतवैभव पर शोक करते हुए खडे है,! दिल्लीका 'पुराना क्लिा,' अपने नामके अनुसार, पुराना होकर शने शने. विनाशको प्राप्त हो रहा है, और वहाँका सारा भूप्रदेश " -
चौथा प्रकरण।
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र्जन होकर भयानक बन रहा है! अहा उसकी यह दशा देखकर
सका हृदय दु ससे न भर जायगा ?- अहा! किसी सहृदय आग्ल
दिने क्या ही अच्छा कहा है।
'The Niobe of nations! There she stands,
Childless and crownless, in her voiceless woe,
An enmpty urn within her wither'd hands,
Whose holy dust was scatter'd long ago,
The Pandawa's tomb contains no ashes now,
The very scpulchres lie tenentless,
Of their heroic dss ellers dost thon flow,
Old Jumna' through a marble wilderness?
Rise, with thy rasure waves, and mantle her distress"
अर्थात हे दुखी राष्ट्र | आज तू पुत्रहीन और राज्य-श्री-हीन वर्तमान
। आज तेरे अधिकार में कोई भी वस्तु नहीं है। तेरी पवित्र सम्पत्ति
ताब्दियों पूर्व नष्ट हो चुकी । पाडवोंकी समाधिकी राख भी बाकी नहीं
। उनका अपना भवन निर्जन पड़ा है। वहॉके शरवीर निवासियोंका
संता भी नहीं है। हे बूढी जमना ! क्या आज तू जनशून्य सगमरमर की
रहाडियोमें बहती है ? उठ, सढी हो, और इसके दुखोंको दूर कर !
पांचवां प्रकरण। दिल्लीके आसपासके स्थान । हुमायूँका मकबरा। इन्द्रप्रस्थ नगरी अथवा पुराने किलेका अवलोकन करनेके वाद यात्री गण बहुधा हुमायूँ बादशाहकी कबर देखने के लिए आते है। उस स्थलसे यह एक मीलके अन्तर पर है । वहाँसे इधर आते हुए बीच में लाल बगला' नामकी एक इमारत मिलती है। यहाँ पर हुमायूँ और शाहआलम बादशाहकी रानियोंकी कवरें है। यहाँसे 'अरबकी सराय' नामकी एक छोटीसी वस्ती है । इसके दो दरवाजे दर्शनीय है । इस गावको हुमायूँ बादशाहकी पत्नीने बसाया था । यहाँ पर अरब लोग रहा करते थे। इसी लिए इस स्थानका 'अरबकी सराय ' नाम पडा है । यहाँसे हुमायूँ बादशाहकी कबर बिलकुल समीप है।" इस मकबरेमें प्रवेश करते समय दूसरे दरवाजेके पास एक लेख देख पडता है । उससे यह मालूम होता है कि, इस इमारतको हमीदा वानू बेगम, उर्फ हाजी बेगम, नामक हुमायूँ बादशाहकी रानीने, अपने पति के स्मारकमें वनवाया । इस इमारतका काम सोलह वर्ष तक जारी रहा, और इसके बनवानेमें पन्द्रह लास रुपया खर्च हुआ । स्वय हमीदा बानू बेगम और राजघरानेके अन्य कई एक पुरुषोंकी कबरें भी यहीं पर है। यह इमारत मुगल बादशाहतकी विलकुल प्रारम्भिक शिल्प-कलाका नमूना है। यह इमारत चौकोन है, और इसके चारों ओर अठपहल कोने है। इसका मध्यभाग अठपहलू है, और उस पर एक अर्धगोलाकृति शिखर, अथवा गुम्बज है। उसके चारों ओर चार अठपहलू मीनार है । इस . का Nuwww . पाचवां प्रकरण। ma इमारतका ढाचा अत्यन्त उत्तम है, और इसीके नमूने पर आगरेका ताज- महल बना है । इस इमारतमें और ताजमहलमें इतना अन्तर है, जितना एक ग्रामीण स्त्री और एक राजकुलकी रूप-ऐश्वर्य्य-सपन्न भुवनसुन्दरी में होता है । ताजमहलमें जो कल्पनाशक्ति; कवित्व और 'प्रतिभा है, वह इसमें बिलकुल ही नहीं है । तो भी यह कबर बहुत अच्छी है, और अपनी सादगीसे ही दर्शकोंके चित्तको आकर्षित करती है। , हुमायूँ वादशाहकी कबरकी सादगीमें भी एक प्रकारका कौतुक है। अर्थात् वह सादगी अत्यन्त मनोरम और दर्शनीय है । सिकन्दरामे अकबरकी क्वर और शहादरामें जहाँगीरकी कबर भी सादगीमें प्रसिद्ध है । परन्तु उनकी सादगीकी अपेक्षा इस इमारतकी सादगी अधिक मनोहारी है । इस इमारतमें ठौर ठौर पर सगमरमरका जो काम किया गया है, उससे इमारतकी शोभा और भी बढ़ गई है। पठान बाद- शाहोंने जो इमारतें बनवाई, उनमेंसे कुतुब मीनारको छोडकर, बाकी सब इमारतें, इस मुगल शिल्पकलाके पहले कामके आगे, रद हो जाती है । कनिगहम साहबका कथन है कि, इस इमारतके शिल्प-कार्यमें प्राचीन शिल्प कार्यकी अपेक्षा कुछ अधिक नवीन सुधार हुए है । वे सुधार ये है कि मुख्य इमारतके चारों कोनों पर चार सुन्दर मीनारोंकी इसमें कल्पना की गई है, और इमारतके गुम्बजोंकी वेठक चौडी नहीं की गई है । यह इमारत बहुत साफ और बडी है, अतएव दूरसे बहुत सुन्दर दिसाई देती है, परन्तु ताजमहल जैसा साफ और हवादार है, वैसी यह नहीं है। ऊपर कहा जा चुका है कि, हुमायू, बादशाहकी प्रिय पत्नी, प्रतापी अकबर बादशाहकी माता, हमीदा बानू बेगमने इस कबरको बन- वाया, सो उसकी कबर भी इसी इमारतमें है। इस बेगमका अपने पति पर बड़ा प्रेम था, और इस लिए दर्शकोंकी दृष्टि में वह यहा अपने पतिके सचिव बरावर निवास करती है ! - महा- - ६४ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। -- - इसी इमारत में दारा, फर्रुखशियर, रफीउद्दौला, दूसरे आलमगीर, इत्यादि बादशाहोंकी। क्बरें है । इन सबमें सिर्फ हुमायूँ बादशाहकी कबर ही विशेप हृदयावर्षक दिखाई देती है। शेष कबरें उन बादशाहों- की योग्यताको देखते हुए बिलकुल ही साधारण है। सच है, जिन्होंने कुछ भी सुकर्म नहीं किये, जिनके शासनसे प्रजाका फ्ल्याण नहीं हुआ, अथवा जिन्होंने दूसरोंके साथ थोडा भी उपकार नहीं किया, उनका स्मारक यदि धुंपला हो, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। शेख निजामुद्दीन औलियाकी दरगाह ।.. दिल्लीमें शेख निजामुद्दीन औलियाकी दरगाह बहुत प्रसिद्ध है । शेख निजामुद्दीन औलिया मुहम्मद तुगलकके जमानेमें, सन् १३२१ ईसवीके लगभग, एक नामी साधु पुरुप हो गया है । यह महापुरुष अपने ' महान साधुत्व के लिए प्रसिद्ध है । यह फरीदुद्दीन गुजशकर नामक एक सुप्र. सिद्ध औलियाका चेला था । गुजशक्कर औलिया बड़ा, अलौकिक पुरुष था। कहते है कि, यह साधु मत्रके जोर पर मिट्टीके ढेलेकी शक्कर बना देता था । इस की गुरु परम्परा अजमेरके : भुईनुद्दीन चिश्ती नामक प्रसिद्ध साधु तक पहुँचती है । भुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरमें मुसलमानोंका अत्यन्त वद्य और परमपूज्य साधु था। यह परम्परासे निजमुद्दीनका चेला था । इस लिए लोगोको इसमें बडी. श्रद्वा थी। यह महा. पुरुष बडा दानशूर था, और उसका खर्च किसी राजासे भी अधिक रहा करता था । चाहे इस कारणसे हो कि, लोगों पर इसका बड़ा प्रभाव था, और चाहे अन्य किन्हीं कारणोंसे हो, तुगलक बद- शाह इससे बहुत देप करता था। इसलिए दिल्ली जाकर इस अपलियाके महत्त्वको सदाके लिए नष्ट कर देनेका उसने मनसूबा बॉधा । औलियाके शिष्योंको जब यह मालूम हुआ कि, वादशाह अपनी बडी मार सेनाके साथ हमारे गुरुजी पर आक्रमण करनेके लिए आ रहा है, तब - ८ .
. पाचवा प्रकरण। fonen वे गुरुजीके पास गये, और हाथ जोडकर बोले, “ महाराज, बादशाह आपसे नाराज है, और वह आप पर चढाई करनेके लिए आ रहा है, अतएव आप शीन ही दिल्लीको छोड़ दीजिए 1 इस पर इस ओलियाने अत्यन्त शान्तिके साथ उत्तर दिया कि, “ दिल्ली दूर अस्त "- यानी दिल्ली अभी बहुत दूर है । जब बादशाह दिल्ली आ जायगा, तक देसा जायगा । चमत्कार यह हुआ कि, बादशाह दिल्ली आ ही न पाया । उसके दिल्ली आनेके पहले ही उसके पुत्रने उसका वध कर डाला !! भाविक और श्रद्वाल जनोंकी समझ है कि, बादशाह इस साध पुरुपके प्राण हरण करनेकी दुष्ट बुद्धिसे आ रहा था, इसी लिए उसको यह प्रायश्चित्त मिला । स्लीमन साहबकी राय है कि, यह साधु ठगोंका नेता था, और उसीकी सम्मतिसे वादशाहका खून हुआ । जो हो, इसमें सन्देह नहीं कि, अन तक इस साधुके विषयमें लोगोंकी असीम श्रद्धा है, और उनकी दृष्टि से वह बडा पूज्य है । इस साधुके कहे हुए 'दिल्ली दूर अस्त' ये शब्द आजकल इस कहावतके रूपमें बदल गये है कि, “ दिल्ली दूर है।" अँगरेजीमें भी इसी अर्थकी एक कहारत है। वह यह है:- * There is many a slip between the cup and the lip ' अस्तु । यह साधु सन् १३२४ ईसवीमें, लगभग ब्यानवे वर्षका होकर, परलोक सिधारा । इस साधुकी कार पर यह दरगाह बनी हुई है, इसी लिए इसको निजामुद्दीन ओलियाकी दरगाह कहते हैं। यह दरगाह भी दिल्लीमें एक दर्शनीय स्थान है। निजामुद्दीन औलियाकी दरगाहके पास एक छोटासा गार बसा हुआ है, जहा प्रति वर्ष एक वडा भारी मेला हुआ करता है। दरगाहके प्रवेश-द्वार पर सन् १३७८ का सन् खुदा हुआ है 1,इसको फीरोज- शाह तुगलकने बनाया । इसके पास एक छोटासा तालान है, जो , दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । - बहुत पुराना है । लोगोंका कहना है कि इस औलियाके शापसे उसका पानी खारा हो गया है। मुरय दरवाजेसे अन्दर जानेपर कुछ छोटी छोटी कवर और मस- जिदे मिलती है। वहीं पर शाहजहाँ बादशाहकी पटरानी कोकिला- देवी (वाई) की क्वर है । यह कबर बढी सुन्दर है । यहाँ पर पास ही एक बावढी है। उसका नाम 'चश्मे-दिलखुश है। , इस बावडी पर हिजरी सन् ७१३, यानी ईसवी सन १३१२ सुदा है । यहाँ पानीमे एक मेहराव है । कहते है कि, उसके द्वारा मुँहारेके अन्दर पानी ले गये है । अस्तु । वहाँसे फिर दो दरवाजे मिलते है। उनसे जाने के बाद भीतर मुख्य दरवाजा मिलता है । यह इमारत दूरसे बहुतही सुन्दर दिखाई देती है। इसकी कमानियों, उनकी नक्काशी और मुख्य गुम्बज, सभी बहुत उत्तम है । यह इमारत बिलकुल मुसल- मानोंके ताजियोंके समान है । इसके बीचोंबीच निजामुद्दीन औलियाकी मुख्य क्बर है । यह कबर बहुत पुरानी है, और उसकी इमारत कुछ अक्बरके जमानेमें और कुछ शाहजहाँके जमानेमें बनाई गई । यहाँकी मुख्य कबर पर जरीके कीमती वस्त्र और पुष्पमालाए चढाते है और बहुतसे मुसलमान भक्तिपूर्वक वहाँ पर दान-धर्म करते हैं । यहाँपर ओर- गजेब बादशाहने मजलिसखाना नामका एक महल बनाया है । इस इमारत पर कोई विशेष लेस खुदा हुआ नजर नहीं आता । परन्तु दो स्थानों पर “किल्लेगाह-ए-सास-ओ-आम" (सब लोगोंके लिए प्रार्थनाका स्थान ) और "कबर-ए-शेस" (साधुकी कवर) लिखा है। यहाँका वार्षिक उत्सव देखने लायक होता है। निजामुद्दीन औलियाकी दरगाहके पास ही जमातखाना मसजिद नामकी एक दूसरी इमारत है । यह भी बडी सुन्दर और दर्शनीय है। कहते है कि, इसको खिजरसाने बनवाया था। यहॉकी कारीगरी भी .
1 पाची प्रकरण।. ६७ बहुत उत्तम है । इस इमारतके दरवाजे पर हिन्दू देवताओंकी भी मूर्तियाँ है । इमारतके मध्यभागमें एक सोनेका प्याला टॅगा हुआ है । कहते हैं कि, यह बहुत पुराना है। जहानारा बेगमकी कबर। 'शेस निजामुद्दीन औलियाकी दरगाहके दक्षिणमें कई बड़े बड़े लोगा तथा राजकुलके नरनारियोंको कबरें है । इन कारोंमें शाहजहाँ बाद- 'शाहकी प्यारी बेटी जहानारा बेगम की कबर है । यह बडी पितृ-भक्त थी, और शाहजहाँके केदमें रहते समय वरावर अन्त तक उसकी मेवामें रही 1 इसकी कवर विलकुल सादी है, और उसपर कोई आच्छादन नहीं है, प्रत्युत, उसके मध्य-भागमें दूध लगानेके लिए जगह छोड़ दी गई है । इस कवरका मुख्य पत्थर छै फुट लम्बा है, और उसके ऊपर अरबी भाषामें “परमेश्वर ही जीवन और परमेश्वर ही पुनर्जन्म लिग है। उसके नीचे कुरानका साडेतिक अक्षर 'मिम्' लिखा है । उसके नीचे फारसी भाषामें निम्नलिखित अर्थका मजमून है Save the green herb, place naught above my head, Such pall alone befits the lowly dend, The fleeting poor Jehanarah lies here Her sire was Shah Jahan and Chist her Pir, My God the Ghazı monarch's proof make clear" अर्थात् "सिवा हरी दुवके मेरे ऊपर-अर्थात् मेरी समाधि पर और कुछ न रसना । खाकसारके लिए यही काफी है । नम्वर और गरीब जहानारा यहाँ निवास करती है। उसके पितृ शाहजहाँ और गुरु चिश्ती थे। परमात्मा राजाके प्रमाणको और भी सिद्ध करे।" इस राजकन्याकी यह लीनता और रसिकता देखकर दर्शकोंको 'विनयो हि सतिनतम्' बाली उक्तिका स्मरण हो आता है, और वे क्षणभरके लिए कौतूहल- । . + दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । - कबर है . सागरमें निमग्न होजाते है । इस कवरपर दिये गये सनसे जान पडता है कि, यह सन १६८१ ईसवीमें बनाई गई। जहानाराकी कबरके बाई ओर शाहआलम बादशाहके लडके मिर्जा अलीगोर, और दाहनी ओर अकबरशाहकी दूसरी बेटी जमीलुन्निसा की कबर है । इन कबरोंके पास, पूर्व ओर मुहम्मदशाह बादशाहकी । यह अभागी बादशाह सन् १७४८ ईसवीमें मृत्युको प्राप्त हुआ । मयूरसिहासन पर बैठनेवाला अन्तिम बादशाह यही था । इसकी कबरके पास उसकी वेटीकी क्बर है, जो नादिरशाहके बेटेको ब्याही थी । इस कवरका प्रवेशद्वार संगमरमर का बना है, और उसपर बेल बूटोका काम बहुत बढिया किया गया है । इसके नजदीक एक तीसरी क्बर है, जो दूसरे अकबरशाहके लडके शाहजादा जहाँगीर की है। यह लडका पागल था । इसने दिल्लीके रेजीडेन्ट मिस्टर सेटन पर गोली चलाई थी, जिससे इसको इलाहाबादमें लाकर कैद क्यिा था । खुसरो कविकी कबर । इन स्थानोंको देखनेके बाद, मुख्य ऑगनमे आने पर, 'चबूतरा- यारानी' और खुसरो कविकी कबर, ये दो, रमणीय स्थल दृष्टि पडते है। इनके सिवा, वहाँ पर और भी अनेक साधु-सन्तोकी कवरे है । “चबूतरा- यारानी पर निजामुद्दीन ओलिया और उसके मित्र लोग घठा करते थे । इसी लिए उसको 'मित्रोंका चबूतरा' नाम प्राप्त हो गया है। अमीर सुसरो हिन्दुस्तानका एक विख्यात कवि था। उसकी मधुर कविता- के कारण उसे “ मधुरभाषी तोता" नाम प्राप्त हुआ था । उसकी कवर पर ' अदीम-उल-मिसल' यानी ' अद्वितीय पुरुष' ये शब्द भी लिखे है । इस नामसे फारसी भाषामें हिजरी सन् ७२५ सिद्ध होता है। यह उसकी मृत्युका सन ( १३२४ ईसवी ) है । अमीर सुसरो निजा- मुद्दीनका प्रिय मित्र था। इसने मुहम्मद तुगलक्के राजमहलमे चारों ओर - - - पाचवा प्रकरण 1 भ्रमण करके अनेकों प्रासादिक पद्य तैयार किये है । कवितादेवी उस पर पूर्ण प्रसन्न थी । तुगलक बादशाहके रानमहलमें गुजरातके राजाकी देवलदेवी नामझी एक लावण्यवती कन्या थी । कहते है कि, यही इस कविकी कवित्व-स्फूर्तिका मुख्य कारण है। कहते है कि, इस सौन्दर्य-लतिका पर उसने बहुत सुन्दर कविताएँ बनाई हैं। इसकी कविताएँ बहुत प्रेमपूर्ण और मधुर है, और अब तक लोगोंके मुंहसे सुनी जाती है । हिन्दुस्तानमें अनेकों कवि हो गये हैं, और उनके काव्योंने उनकी कीर्तिको अमर कर दिया है, परन्तु उनकी कवरें या समाधियाँ बहुत ही कम दिसाई देती है । गीतगोविन्दके रच- यिता कवि जयदेवकी समाधि पूर्व-प्रान्तमें सुनी जाती है, और कवि खुसरोकी कबर दिल्लीमे प्रत्यक्ष देसी जाती है । इनके सिवाय हिंदुस्तान के कवियोंके स्मारक-मन्दिर और कहीं भी नहीं पाये जाते । एक सस्कृत ऋविका सुभाषित है - जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धा क्वीश्वरा । नास्ति येपा यश काये जरामरणज भयम् ॥ अर्थात् उन रससिद्ध सुकृती कवीश्वरोंकी जय हो, कि जिनके यश- रूपी शरीरके लिए जरा ओर मरणका कभी भय नहीं है। परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता कि, हमारे कवियोंके लिए किसी प्रकार के स्मारककी आवश्यकता नहीं है । सस्कृत कवि कालिदास, मरभूति, दढी, बाण अथवा हिन्दी कवि तुलसीदास, सूरदास, केशवदास, बिहारी, इत्यादिके नाम पर यदि आज कोई स्मारक होते, तो उनसे दर्शकोंको निस्सन्देह बहुत आनन्द हुआ होता! आज भी दिल्लीमें अमीर खुसरोकी मनोरम कवर देखनेसे जान पड़ता है कि, जैसे उसकी सुन्दरता दर्शकोंको, इस कविके काव्य-माधुर्यका स्मरण दिलानेके लिए, चुला रही है, और स्वय कबरके भीतरी मडपमें जाने पर ऐसा भास .
७० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । NAARAA - होता है कि, मानो उससे निकलनेवाली मजल प्रतिध्वनि किसी संस्कृत कविकी वाणीमें यह कह रही है कि.- वाणी ममैव सरमा यदि रजयित्री न प्रार्थये रसविदामवधानदानम् । सायतनीए मकरन्दवतीपु भृगा कि मल्लिकास परमत्रणमारभन्ते ॥१॥ अर्थात् मेरी कवितामें यदि रस है, और पढनेवालेको यदि उससे आनन्द होता है, तो मै रसिक लोगोंसे उसकी तरफ ध्यान देनेकी, प्रार्थना नहीं करता । सायकालको मौरा पुष्परससे भरी हुई मलिकाकी तरफ आनेके लिए क्या किसीकी सलाह लेता है ? अस्तु । कवि सुसरोकी कवरका दर्शन करके बाहर आनेके बाद थोडी ही दूर पर दौरानसा और आजमखा नामक दो प्रसिद्ध पुरुषोंकी क्बरें है। इनके बाद वहाँ दो फुटके अन्तर पर 'चौसठ खम्भा' नामक एक दरगाह मिलती है । इस इमारतमें चौंसठ खम्भे हैं । इसीलिए इसको 'चौसठ खभा' नाम प्राप्त हुआ है । इसकी वनावट और रचना शाहजहाँके समयकी इमारतोंके समान सुन्दर और मनोहारी है । इसे देखनेसे जान पडता है कि, मानो यह इमारत 'दीवान-ए सास' नामक सौन्दर्य्य-मन्दिरका पहलेका नमूना ही है । इस इमारतमें सब जगह बढिया सगमरमरका काम किया हुआ है । इसका आकार चौरस है । इस इमारतमें अकवर वादशाहके सेनापतिके लडके- अजीमसाकी कबर है। यह अजीमरसा गुजरातका गवर्नर था। यह प्राचीन धर्मका कट्टर. अभिमानी था, अतएव इसको अकबर बादशाहका नवीन धार्मिक सुधार. पसन्द नहीं था। परन्तु अक्बरने कभी उससे किसी प्रकारका आग्रह नहीं किया, और उसको उसके ही मतानुसार चलने दिया । यह मनुष्य वड़ा धर्मात्मा था, और गरीब-गुरबोंको सर्वदा अन्नदान किया करता, तथा मुहरें बॉटा करता था। इस लिए उसके विषयमें दिल्लीके गांव । पांचवा प्रकरण। ७१ - " परोपकारी लोगोंमें इस अर्थकी एक कहावत प्रचलित हो रही है कि, अजीमखां गरीबोंको सिर्फ भोजन ही नहीं देता, किन्तु साथही दक्षिणा भी देता है। निस्सन्देह, जो सज्जन अपने धनका उपयोग परोपकारमें करते हैं, उनकी कीर्ति अजरामर हो जाती है । • सफदर-जंगका मकबरा। हुमायूं बादशाहकी कबरसे अन्त तक जो रास्ता जाता है, उसके सिरे पर नवाब मनसूरखा उर्फ सफदरजगकी कबर हे । नवाब सफदरजङ्ग दिल्लीकी राजनीतिका एक प्रसिद्ध सूत्रधार था, और अयोध्याके पहले नवाब सआदतखाके वाद उसकी गद्दीका स्वामी हुआ। यह दिल्ली के बाद- शाह अहमदशाहका प्रधान मत्री था, अतएव दिल्ली के राजनैतिक मामलों में इसका मुरय हाथ रहता था। सन् १७५३ इसवीमें दिल्लीमें इसकी मृत्यु हुई। उसकी यह कबर उसके पुत्र, अयोध्याके तीसरे नबाब सुजाउद्दीलाने, तीन लास रुपये सर्च करके, बनवाई है । इस इमारतमें सफदरजगके साथ उसकी बेगमकी भी कार है । इस कवरकी रचना ताजमहल के नमूने पर की गई है, और इसके मध्य भागमें सगमरमरका काम, तथा उसमे लालरगकी कारीगरी बहुत शोभायमान देस पडती है । इस इमा- रतके चारों कोने जितने सुन्दर होने चाहिए, उतने सुन्दर नहीं है- नोभी, इसमें सन्देह नहीं, कुल मसजिद दर्शनीय है । इस इमारतके ऊपर चढकर देसनेसे आसपासका दृश्य बहुत ' ही मनोहर दिखाई देता । यह इमारत ९९ फीट ऊँची है। सफदरजगके मकबरेसे कुछ अन्तर पर एक मार्ग जाता है । वहाँ 'होज ए-सास' नामका एक स्थान है। यहाँ पर पहले सुलतान अला-- उद्दीन खिलजीके समयका एक प्राचीन तालाब थां । यहाँ फीरोजशाह तुगलकने सन् १३५४ ईसवी में एक विद्या-मन्दिर बनवाया था, जिसमें यूसुफ पिन-फजल हुसेनी नामके एक विद्वान् पुरुषको अयापक ग्यित - है 1 ७० दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। - होता हे कि, मानो उससे निकलनेवाली मजल प्रतिध्वनि किसी संस्कृत कविकी वाणीमें यह कह रही है कि. वाणी ममेव सरमा यदि रजयित्री न प्रार्थये रसविदामवधानदानम् । सायतनीधु मकरन्दवत्तीधु भृगा कि मल्लिका परमंत्रणमारभन्ते ॥१॥ अर्थात् मेरी कवितामें यदि रस है, और पढ़नेवालेको यदि उससे आनन्द होता है, तो मै रसिक लोगोंसे उसकी तरफ ध्यान देनेकी, प्रार्थना नहीं करता । सायकालको भौरा पुष्परससे भरी हुई मल्लिकाकी तरफ आनेके लिए क्या किसीकी सलाह लेता है ? अस्तु । कवि खसरोकी कबरका दर्शन करके बाहर आनेके बाद थोडी ही दूर पर दौरानखा और आजमखा नामक दो प्रसिद्ध पुरुषोंकी कबरें है । इनके बाद वहाँ दो फुटके अन्तर पर 'चौसठ खम्भा' नामक एक दरगाह मिलती है । इस इमारतमें चौंसठ खम्भे हैं । इसी लिए. इसको 'चौसठ सभा' नाम प्राप्त हुआ है । इसकी बनावट और रचना शाहजहॉके समयकी इमारतोंके समान सुन्दर और मनोहारी है । इसे देखनेसे जान पडता है कि, मानो यह इमारत 'दीवान-ए खास' नामक सोन्दर्य-मन्दिरका पहलेका नमूना ही है । इस इमारतमें सब जगह वढिया सगमरमरका काम किया हुआ है । इसका आकार चौरस है । इस इमारतमें अकबर बादशाहके सेनापतिके लडके अजीमसाकी कबर है । यह अजीमखा गुजरातका गवर्नर था। यह प्राचीन धर्मका कट्टर अभिमानी था, अतएव इसको अकबर बादशाहका नवीन धार्मिक सुधार. पसन्द नहीं था। परन्तु अक्बरने कभी उससे किसी प्रकारका आग्रह नहीं किया, और उसको उसके ही मतानुसार चलने दिया । यह मनुष्य वडा वर्मात्मा था, और गरीब-गुरबोंको सर्वदा अन्नदान किया करता, तथा मुहरें बॉटा करता था। इस लिए उसके विषयमें दिल्ली के गीय पांचया प्रकरण ७१ - - लोगोंमें इस अर्थकी एक कहावत प्रचलित हो रही है कि, "परोपकारी अजीमखा गरीबोंको सिर्फ भोजन ही नहीं देता, किन्तु साथही दक्षिणा भी देता है। निस्सन्देह, जो सज्जन अपने धनका उपयोग परोपकारमें करते है, उनकी कीर्ति अजरामर हो जाती है । सफदर-जंगका मकबरा। हुमायूँ बादशाहकी कवरसे अन्त तक जो रास्ता जाता है, उसके सिरे पर नवाब मनसूरखा उर्फ सफदरजगकी कवर है । नवाब सफदरजङ्ग दिल्लीकी राजनीतिका एक प्रसिद्ध सूत्रधार था, और अयोध्याके पहले नवाब सआदतसाके बाद उसकी गद्दीका स्वामी हुआ। यह दिल्लीके बाद- शाह अहमदशाहका प्रधान मनी था, अतएव दिल्ली के राजनैतिक मामलोंमें इसका मुख्य हाथ रहता था। सन् १७५३ इसवीमें दिल्ली में इसकी मृत्यु हुई। उसकी यह कबर उसके पुत्र, अयोध्याके तीसरे नबाब सुजाउद्दौलाने, तीन लारस रुपये खर्च करके, वनवाई है । इस इमारतमें सफदरजगके साथ उसकी बेगमकी भी कवर है । इस कवरकी रचना ताजमहलके नमूने पर की गई है, और इसके मध्य-भागमें सगमरमरका काम, तथा उसमे लालरंगकी कारीगरी बहुत शोभायमान देस पडती है । इस इमा- रतके चारों कोने जितने सुन्दर होने चाहिए, उतने सुन्दर नहीं है- तोमी, इसमें सन्देह नहीं, कुल मसजिद दर्शनीय है । इस इमारतके ऊपर चढकर देखनेसे आसपासका दृश्य बहुत ही मनोहर दिखाई देता है । यह इमारत ९९ फीट ऊँची है। सफदरजगके मकबरेसे कुछ अन्तर पर एक मार्ग जाता है । वहाँ "होज ए-खास' नामका एक स्थान है। यहाँ पर पहले सुलतान अला- उद्दीन खिलजीके समयका एक प्राचीन तालाब था । वहाँ फीरोजशाह तुगलकने सन १३५४ ईसवी में एक विद्या मन्दिर बनवाया था, जिसमें यूसुफ-बिन-फजल हुसेनी नामके एक विद्वान पुरुषको अयापक लियत ७३ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । किया था। उसकी कबर अभी तक वहॉपर मौजूद है। उसके पास ही फीरोजशाहका मकबरा है । यह बादशाह सन् १३८८ ईसवीमें मृत्युको प्राप्त हुआ। अपश्य ही, यह कवर उसके बाद बनाई गई है। राजा जयसिंहकी वेधशाला । सफदरजगके मकनरेसे पाँच मीलकी दूरीपर कुतुबमीनारकी इमारत है । यहाँसे 'अजमेरगेट' की ओर दूसरी सडक जाती है ।, उसके दरमियानमें जयपुरके राजा जयसिहकी वेधशाला है । यह अत्यन्त दर्शनीय है, और उस विद्वान तथा ज्योतिष शास्त्र-विशारद राजाका, एक उत्तम स्मारक है। राजा, सवाई जयसिह हिंदुस्तानके इतिहासमें एक अद्वितीय रत्न था। यह राजा राजनीति, रणभूमि और 'पडितोंकी सभामें एकसा चमकता था । वर्तमान, जयपुर नगर इसी राजाने बनवाया और वहॉपर अपनी राजधानी नियत की । दिल्लीके दरबारमें 'इसका अच्छा प्रभार था, और मराठोंको “ चौथ " तथा "सरदेशमुखी" की -नदें दिलाने तथा उनके हितसाधन करनेका अधिकाश श्रेय इसीको है । बडे बाजीराव पेशवाको मालवेकी सूबेदारी इसीने प्राप्त करा दी थी। इसने ज्योतिप-शास्त्रका अच्छा अध्ययन किया था, ओर उसके लिए उसने दिल्ली, उज्जैन, काशी, इत्यादि स्थानोंपर वेधशालाएँ बनाई है । 'कल्पद्रुम' इत्यादि इसके कुछ ग्रन्थ भी प्रसिद्ध है । ऐसे बहुगुण- सम्पन्न राजाकी इस वेधशालाको देख कर प्रत्येक दर्शकके हृदयमें आनन्दकी लहरें उमडने लगती है, और उसकी गुणग्राहक्ता पर बड़ा कौतूहल होता है। दिल्लीकी यह वेधशाला अभी तक अस्तित्वमें है । उसका असली नाम 'सम्राट्-यन्त्र' ' है। परन्तु यह नाम उच्चार करनेमें कठिन मालूम होता है, इसलिए आजकल इसको, "जतर-मतर" कहते है । यह वेधशाला “सन १७२४ ईसवीमें बनवाई गई । ग्रहोंका वेध लेनेके लिए जो शकुयत्र , पाचवा प्रकरण। ७३ तैयार किया गया है, वह जीनेके आकारका है। उसका कर्ण ११८ फुट ५ इच है। आधार उसका १०४ फुट और लम्ब ५६ फुट ७ इच है । परन्तु अब यह इमारत बहत खराब हो गई है। इस इमारतके पास एक छायायत्र बनाया गया है। यह इमारत रोमन लोगोंके नाटकगृहके समान वृत्ताकार है, और उसके बीचमें एक जीना है, जो बरावर छत तक चला गया है चारों ओर, क्षितिजसे एक बिन्दुमें आनेवाली, अर्धवृत्ताकार कमानियाँ बनी हुई है । वे वेधशालाकी याम्योत्तर रेषामें एक विशिष्ट अन्तर पर हैं, और बगलकी याम्योत्तर रेषा दिसलाती है । ज्योतिष शास्त्रज्ञोंको वेध लेने के लिए जिन जिन शास्त्रीय साधनोंकी आवश्यकता होती है, उन सबका यहा अच्छी तरह प्रबन्ध किया गया है । यहाँ पर त्रिकोण और उसके अश बहुत अच्छी तरह लगा रसे है, जिनसे दिनका काल मापन ठीक ठीक होता है, और घटिकाओं तथा पलोंका भी ठीक ठीक बोध होता जाता है । इस प्रकारके दो छायायत्र पास ही पास है, इससे जान पडता है कि, एकके मापनकी परीक्षा दूसरेमें की जाती होगी। इस वेघ-शालासे, उसके रचयिताकी विशाल बुद्धि और ज्योतिषशास्त्र- पारगतताका अच्छा अनुमान होता है । राजा जयसिहके बाद इस बेध- शालाका वैसा उपयोग करनेवाला और कोई मनुष्य नहीं निकला, ओर इसी कारण इस वेधशालाकी बड़ी दुर्दशा हो रही है । तथापि जो जो विद्वान पुरुष दिल्ली में जाते है और इस छायाचित्र तथा वेधशाला- का दर्शन करते है, वे राजा सवाई जयसिहकी तारीफ किये बिना नहीं रहते । वर्तमान समयमें यह इमारत, और उसके पासका मायरगन नामक गाव, सवाई जयसिहके वशज, जयपुर, रियासतके वर्तमान अधि- पति, महाराजाधिराज सर साई माधवसिंहके अधिकारमें है । आशा है, आप अपने पूर्वजोंके इस अत्युत्तम स्मारकको सुरक्षित रसेंगे। क्योंकि अपने पूर्वजोंकी कृतिकी रक्षा करना भी एक पवित्र कार्य है।
छठा प्रकरण । - हिन्दू राजाओंके प्राचीन स्मारक । - लोहस्तम्भ । जब हम कुतुबमीनार देखनेके लिए जाते हैं, तब वहाँके विस्तीर्ण भूप्रदेश पर हमें अनेक प्राचीन और जीर्ण किले, कोट और इमारतें दिखाई देने लगती है। ये सब उस समयके प्राचीन स्मारक- चिन्ह है, जब कि दिल्लीमें हिन्दू राजाओंकी स्वतंत्र राज्यसत्ता और राज्यवैभव मौजूद था। अब इसमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा है कि, यहाँ पर उन शक राजाओंकी बृहत् राजधानी थी, कि जिनको ईसवी सनके ७८ वें वर्ष में राजा विक्रम ने जीता था। यहाँके लोहस्तम्भसे मालूम होता है कि, सन ३१९ ईसवीमें यदॉ गुप्त राजाओंकी राज- धानी होगी । परन्तु इसके बाद, आठवीं शताब्दीके मध्य तक, अर्थात तुबरवशीय , राजा अनगपाल तक, यहाँ राजधानी थी, अथवा नहीं- यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । कनिगहम साहबके लेससे यह जान पडता है कि, राजा अनगपाल जब तक अवतर्णि नहीं हुआ था, तब तक यह राजधानी विध्वसावस्थामें थी । इससे जान पड़ता है, अनगपालने इसे फिर बसाया। हा, प्राचीन ऐतिहासिक सामग्रीसे इतना अवश्य सिद्ध होता है कि, दिल्लीमें तुम्बर घरानेके राजाओंका राज्य अनेक वर्षों तक था । यहा तक कि, उनकी सत्ता हिमालयसे लेकर विंध्याचल पर्वत तक फैली हुई थी। इस समय जहा कुतुबमीनार और उसके आसपासका प्रदेश है, वहीं इन राजाओंकी नगरी थी । उन्होंने जो नगरी बसाई, और बादमें चौहान वंशके राजाओंने उसमें जो सुधार किये, उनका सम्पूर्ण स्वरूप आज दिखाई नहीं देता, परन्तु उनके जमानेके , छठा प्रकरण। -- ७५ कुछ स्मारक अब तक दिसाई पड़ते है, उनका सक्षिप्त वृत्तान्त यहाँ दिया जाता है। यह लोहस्तम्भ भारतकी अपूर्व और अलौलिक वस्तुओं से एक है। हिन्दुस्तानमें आज तक पीतलकी बडी बडी मूर्तियों, और पचधातुके छोटे-बडे, सब प्रकारके, पुतले बहुतसे बने थे, परन्तु लोहरसका इतना बृहत् स्तम्भ अब तक किसने तैयार नहीं किया था। वैज्ञानिक उन्नतिके वर्तमान युगमें ऐसे अद्भुत कार्य चाहे सहजहीमें हो जाये, परन्तु आश्चर्य इस बातका है कि, इतने पुरातन कालमें हमारे भारत- वर्षमें ऐसे ऐसे अलौकिक कार्य हुए है | यह स्तम्भ अखड है, और विल- कुल लोहरसका बना हुआ है। इसकी कुल उँचाई २५ फुट है, और धरतीसे वह २२ फुट ऊँचा है । पहले लोग समझते थे कि, यह धरतीमें बहुत नीचे तक गडा है। परन्तु सन् १८७२ ईसवीमें प्राचीन वस्तु- अन्वेषकोंने इसकी गहराईका, बडी सूक्ष्म दृष्टिसे, निरीक्षण करके यह निश्चित किया कि, इसकी गहराई सिर्फ तीन फुट है । उनका मत यह है कि, धरती के भीतर, वृक्षोंकी जड़ें, जिस तरह नीचे नीचे जाकर वृक्षके तनेको मजबूत बनाती है, उसी तरह इस स्तभके नीचे लोहेकी रूपच्चिया लगाकर उसे पक्का बनाया है । इस स्तम्भका व्यास १६इच है। कुछ अन्वेषकोंका अनुमान है कि, इस स्तमका वजन साढे सत्रह टनसे भी अधिक है । यह स्तम्म शुद्ध लोहेका है, और उसका विशिष्ट- गुरुत्व ७६६ है। इस स्तम्भका मध्य भाग चिकना है, और उसपर निम्नलिखित सरत लेख खुदा है.- यस्पोर्तयत. प्रतीपमुरसा शत्रून्समेत्यागतान् । वर्गवाहववर्तिनोभिलिखिता खड्रेन कीर्ति जे ॥ तीनो सप्तमुखानि येन समरे सिंधोजिता बारिहका । यस्यायाप्यधिवास्यते जलनिधिायोनिलदक्षिण ॥१॥ ~ - . छठा प्रकरण । mmOAPOOM हिन्दू राजाओंके प्राचीन स्मारक । लोहस्तम्भ। जब हम कुतुबमीनार देखनेके लिए जाते हैं, तब वहाँके विस्तीर्ण भूप्रदेश पर हमें अनेक प्राचीन और जीर्ण किले, कोट और इमारतें दिखाई देने लगती है। ये सब उस समयके प्राचीन स्मारक- चिन्ह है, जब कि दिल्लीमें हिन्दू राजाओंकी स्वतत्र राज्यसत्ता और राज्यवैभव मौजूद था। अब इसमें कुछ भी सन्देह नहीं रहा है कि, यहाँ पर उन शक राजाओंकी बृहत् राजधानी थी, कि जिनको ईसवी सनके ७८ वें वर्ष में राजा विक्रम ने जीता था। यहाँके लोहस्तम्भसे मालूम होता है कि, सन ३१९ ईसवीमें यदॉ गुप्त राजाओंकी राज- धानी होगी । परन्तु इसके बाद, आठवीं शताब्दीके मध्य तक, अर्थात तुबरवशीय ,राजा अनगपाल तक, यहाँ राजधानी थी, अथवा नहीं- यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता । कनिगहम साहबके लेखसे यह जान पडता है कि, राजा अनगपाल जब तक अवतर्णि नहीं हुआ था, तब तक यह राजधानी विध्वसावस्थामें थी । इससे जान पडता है, अनगपालने इसे फिर बसाया। हा, प्राचीन ऐतिहासिक सामग्रीसे इतना अवश्य सिद्ध होता है कि, दिल्लीमें तुम्बर घरानेके राजाओंका राज्य अनेक वर्षों तक था । यहा तक कि, उनकी सत्ता हिमालयसे लेकर विध्याचल पर्वत तक फैली हुई थी। इस समय जहां कुतुबमीनार और उसके आसपासका प्रदेश है, वहीं इन राजाओंकी नगरी थी। उन्होंने जो नगरी वसाई, और बादमें चौहान वंशके राजाओंने उसमें जो सुधार किये, उनका सम्पूर्ण स्वरूप आज दिखाई नहीं देता, परन्तु उनके जमानेके , छठा प्रकरण। कुछ स्मारक अब तक दिखाई पड़ते है, उनका सक्षिप्त वृत्तान्त यहाँ दिया जाता है। यह लोहस्तम्भ भारतकी अपूर्व और अलोलिक वस्तुओं से एक है। हिन्दुस्तानमें आज तक पीतलकी बडी बडी मूर्तियाँ, और पचधातुके छोटे-बडे, सब प्रकारके, पुतले बहुतसे बने थे, परन्तु लोहरसका इतना बृहत् स्तम्म अब तक किसीने तैयार नहीं किया था। वैज्ञानिक उन्नतिके वर्तमान युगमें ऐसे अद्भुत कार्य चाहे सहजहीमें हो जाये, परन्तु आश्चर्य इस बातका है कि, इतने पुरातन कालमें हमारे भारत- वर्षमें ऐसे ऐसे अलौकिक कार्य हुए है । यह स्तम्भ अखंड है, और बिल- कुल लोहरसका बना हुआ है। इसकी कुल उँचाई २५ फुट है, और 'घरतीसे वह २२ फुट ऊँचा है । पहले लोग समझते थे कि, यह धरतीमें बहुत नीचे तक गडा है। परन्तु सन् १८७२ ईसवीमें प्राचीन वस्तु- अन्वेषकोंने इसकी गहराईका, बडी सूक्ष्म दृष्टिसे, निरीक्षण करके यह निश्चित किया कि, इसकी गहराई सिर्फ तीन फुट है । उनका मत यह है कि, धरतीके भीतर, वृक्षोंकी जड़ें, जिस तरह नीचे नीचे जाकर वृक्षके तनेको मजबूत बनाती है, उसी तरह इस स्तभके नीचे लोहेकी खपच्चिया लगाकर उसे पका बनाया है । इस स्तम्भका व्यास १६ इच है। कुछ अन्वेषकोंका अनुमान है कि, इस स्तभका वजन साढे सत्रह टनसे भी अधिक है। यह स्तम्भ शुद्ध लोहेका है, और उसका विशिष्ट- गुरुत्व ७६६ है। इस स्तम्भका मध्य भाग चिकना है, और उसपर निम्नलिसित संस्कृत लेख खुदा है यस्योदर्तयत. प्रतीपमुरसा शत्रून्समेत्यागतान् । वगैप्वाहववतिनोभिलिखिता खङ्गेन कीर्ति ने n तीव सातमुखानि येन समरे सिंधोर्जिता बाल्लिका। यस्यायाप्यधिवास्यते जलनिधियिनिलदक्षिण ॥१॥ . ३ ७६ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । 1 . खिन्नस्येव विसृज्य मा नरपतेर्गामाश्रितस्येतराम् । मूर्त्या कर्मजितावनि गतवत कीा स्थितस्य क्षिती ।। । शान्तस्येव महावने हुतभुजो यस्य प्रलापो महान् । अद्याप्युत्सृजति प्रणाशितरिपोर्यत्नस्य शेष क्षितिम् ॥२॥ पातेन स्वभुजार्जितं च सुचिर चैकाधिराज्य क्षिती। चन्द्राह्वेन समग्रचन्द्रसदृशी वक्त्रश्रिय विभ्रता॥ तेनाय प्रणिधाय भूमिपतिना धावेन विष्णौ मति । प्राशुर्विष्णुपदे गिरी भगवतो विष्णोर्ध्वजः स्थापित ॥३॥ ये तीन श्लोक, प्रत्येक पक्तिमें दो चरणोंके क्रमसे, छै पक्तियोंमें खुदे हैं । ऊपर लिखे हुए श्लोकोंका भावार्थ यह है कि, "यह स्तम्भ मानो उस चन्द्र नामके राजाका भुजही है कि, जिसने, वग देशमें ऐक्य करके आक्रमण करनेवाले शत्रुओंकी, नाकमें दम करके, खड़गसे अपनी कीर्ति लिख रखी है। उस राजाने सिन्धु नदीके सप्तमुसोंको पार करके बाल्हिक लोगोंको जीता, दक्षिणीसमुद्र तो उसकी प्रताप-वायुसे अभी तक सुग. न्धित हो रहा है। जैसे किसी बडे भारी जगलमें प्रज्ज्वलित प्रचड बडवानल, प्राय समस्त जगलको भस्मीभूत करके शान्त हो जाने पर भी, कुछ अवशिष्ट अवश्य रहता ही है, उसी प्रकार शत्रुओंकी चेष्टाओं- को पूर्ण रीतिसे विफल करके, यद्यपि यह राजा खिन्नतासे इस पृथ्वी- को छोड कर, मूर्तिमात्रसे, स्वपुण्यार्जित स्वर्गलोकको चला गया है, तथापि कीर्तिरूपमे वह यहाँ अपश्य वर्तमान है। अपने भुजाओं के पराकमसे प्राप्त किया हुआ चक्रवर्तित्व जिसने चिरकाल तक भोगा, जिसके मुखकी कान्ति पौर्णिमाके चन्द्रके समान है, उस चन्द्रराजने, भगवान् विष्णुके प्रति अपने चित्तको भक्तिपूर्वक अर्पण करके, विष्णुपद नामक गिरि पर, भगवान विष्णका यह उच्च ध्वज स्थापित किया है।" यह राजा चन्द्र कौन है, अथवा कब हुआ इसका अभी तक निर्णय नहीं हुआ है। इन श्लोकों से अन्तिम श्लोकके तीसरे चरणमे 'धावेन' - छठा प्रकरण। ७७ - शब्द है । उसके अर्थक विषयमें मतभेद है । कई लोगोंने धान' का अर्थ किया है-" धाव' नामक, राजाने", और कई लोगोंका मत है कि, 'धावेन' शब्दकी जगह 'भावेन' शब्द हो सकता है, जिसका अर्थ "भक्तिसे" होता है। ऐसी दशामें यही कहना पटता है कि, राजाके नामका निर्णय अभी सन्देहावस्थामें ही है। इस लोहस्तस्मके विषयमें एक दन्तकथा पहले प्रकरणमें दी जा चुकी है। उसी तरहकी एक दन्तकथा और है । यह दतकथा शाहजहाँ बादशाहके यहा रहनेवाले किसी खगराय नामक कविने लिखी है। उसका साराश यह है कि, व्यास नामक किसी ऋपि, अथवा ब्राह्मणने, तोमर राजाको पच्चीस अगुल लम्बी सोनेकी एक सलाई दी, और उसको, अच्छे मुहूर्त पर, जमीनमें गाड देनेके लिए कहा । तदनुसार उसने सम्वत् ७९२ (सन ७३६ ईसवीमें ) वैशाख वद्य १३ को, अभिजित नक्षत्रमें चन्द्र के रहते समय, उसको जमीनमें गाड दिया। उस समय व्यासने उसको यह आशीर्वाद दिया कि, तुमसे राज्य कभी नहीं जायगा, यह सुटी वासुकी के मस्तक पर गडी है।" परन्तु राजाने व्यासके इन वचनोंकी प्रतीति लेनेके लिए उस सलाईको उसाडकर देसा, तो वह रक्तसे भरी. हुई निकली ! इस पर राजाने अत्यन्त भयभीत होकर उस ब्राह्मणको फिर बुलाया, और सारा समाचार प्रस्ट किया । उस समय ब्राह्मणने राजाको फिर उस सलाईको गाड़नेकी आज्ञा दी । तदनुसार राजाने, उसको गाडनेका प्रयत्न किया, परन्तु १९ अगुलसे अधिक वह नहीं गढ सकी । इस पर उम ब्राह्मणने कहा, राजा, अब तुम्हारा राज्य वहत दिन न टिकेगा । इस सलाईकी तरह वह अब ढीला हो गया । वह सिर्फ १९ वर्ष और टिकेगा । इसके बाद चौहान राजा होगे, और फिर, तुर्क लोग राज्य करेगे।" ब्राह्मणका यह भाषण सुनकर राजा वडा सतप्त हुआ, और उस ब्राह्मणको विदा किया। इसी प्रकारकी .
७८.. विल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । दन्तकथाए दिल्लीमें लोहस्तम्भ देखते समय सुननेमें आती है, जिनको सुन कर दर्शकोंको अत्यन्त कौतूहल मालूम होता है। लालकोट और रायपिथौरा। राजा अनगपालके नामसे प्रसिद्ध होनेवाला उपर्युक्त लोहस्तम्भ देख- कर दर्शकगण आश्चर्यचकित होते है कि, इतनेमें उनको चौहान राजाके समयके लालकोट ओर रायपिथौरा नामक प्राचीन किले दिखाई देने । लगते है। ये दोनों इमारतें यद्यपि आज गिरी दशामें है, तथापि इनको देसकर चौहान राज्यसत्ताका अब भी स्मरण हो आता है । अहा ! कालकी क्या ही अतयं लीला है ! इन किलोंमें आजकल वस्ती विल- कुलही नहीं है, अतएव नितान्त निर्जन और उदास दिखाई देते है। इनमें- से लालकोटका किला पृथ्वीराजने बनवाया है । इस कोटके एक कोनेसे रायपिथौरा नामक किलेकी दीवारें स्पष्ट दिखाई देती है । लालकोट पृथ्वीराजकी राजधानीका कोट था, और उसको मजबूत बनानेके लिए फिरसे यह दूसरा किला बनाया गया था। लालकोट और रायपिथौरा- का विस्तार शाहजहानाबाद (नई दिल्ली) से करीब आधेसे अधिक था। लालकोटका घेरा सवा दो मील है, और उसकी दीवारें ऊँची तथा भारी है । उसका कोट तीस फुट ऊँचा है, ओर दीवारोंकी उँचाई कमसे कम साठ फुट थी । इस किलेका आधा भाग अब तक मौजूद है, और उसका खदक तथा मारकेकी जगहें अच्छी दिखाई देती है। उसके बुर्ज प्राय नष्ट हो गये है, तो भी कुछ बुजोंके चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते है। पश्चिम ओर तीन दरवाजे तो अच्छी तरह पहचाने जा सकते है, और जान पड़ता है, उनकी चौडाई १७ फुट होगी। कहते है कि, रायपिथौरा नामक किला मुसलमानोंकी पहली चढाई. के बाद पृथ्वीराजने वनवाया। इस किलेका घेरा साढे चार मील था। परन्तु यह इमारत चूकि कुछ जल्दी-जल्दीमें वनवाई गई, अतएव, , छठा भकरण। ७९ जितनी चाहिए, उतनी मजबूत यह नहीं बन सकी, तथापि कहते हैं कि, यह किला बहुत भारी था, और उसमें दस दरवाजे थे। उनमेसे आठ दरवाजोंका अब भी पता लगता है। इस किलेमें हिन्दुओं और बौद्धोंके मिलाकर कुल सत्ताईस मन्दिर थे। उनके हजारों खम्भे ओर कलश हिन्दू धर्मका द्वेप करनेवाले यवन बादशाहोंने छिन्नविन्छिन्न कर दिये ! हा, उनका दीन स्वरूप अब भी अपने दुर्भाग्यके लिए रो रहा है। दिल्लीके लालकोटकी तैयारीके विषयमें एक स्थानपर सवत् १११७ का उल्लेस है, जिससे जान पड़ता है कि, यह सन् १०६० ईसवीमें बनवाया गया । इसके बाद रायपिथौरा क्लिा बनाया गया । राजा पृथ्वीराज प्राचीन हिन्दू राजाओंमें श्रेष्ठ थे ओर भाट लोगोंने उनके पराक्रमका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । इस विषयमें चन्द नामक राजपूत भाट (कवि) का 'पृथ्वीराजरासो' बहुत प्रसिद्ध है। - -- + सातवाँ प्रकरण। कुतुबमीनार। भारतमें जो अलौकिक और विचित्र इमारतें पाई जाती है, 'उन्हीमे कुतुबमीनार भी एक है। यह गगनचुम्बित 'अत्युत्तम इमारत दिल्लीसे ग्यारह मील दूर है। इस इमारतको भूकम्प और विद्युत्-- आघातसे यद्यपि थोडासा बक्का पहुंचा है, तथापि उन आघातोंसे भी सुरक्षित रहकर वह अब तक अपनी अपूर्वतासे समस्त ससारको चकित कर रही है। यदि पेरिसका 'एफेल टावर' नामक लोहेका मीनार, जो पेरिस-प्रदर्शनीके समय हालहीमें बनाया गया है, छोड़ दिया जाय, तो सारे ससारमें इस मीनारके बराबर ऊँचा मीनार नहीं है। यह इमारत जमीनसे २३८ फुट १ इञ्च ऊँची है। उसके निचले भागका व्यास ४७ फुट २ इच और शीर्षभागका व्यास ९ फुट है । इस मीनारका बिलकुल निचला खड २ फुट ऊँची कुर्सी पर है, बीचकी इमारत २३४ फुट १ इच ऊँची है, और अन्तिम गुम्बजकी उंचाई २ फुट है । इस प्रकार कुल मिलाकर उपर्युक्त २३८फीट १ इचकी उंचाई होती है 1 कहते है कि, पहले यह मीनार ३०० फुट ऊँचा था, और कुल सात खडका था । परन्तु आजक्ल, उसके बिलकुल अन्तिम खड सहित, उसमें केवल पाच ही खड है। कुतुबमीनारकी इमारत मुसलमान बादशाहोंने बनवाई है, परन्तु यह बृहत् कार्य मुसलमान कारीगरोने क्यिा, अथवा हिंदू कारीगरोने किया, यह एक बढा भारी प्रश्न है। गजनीके महमूदने जिस तरह मथुराके राजमहलका सामान और सोमनाथके मन्दिरके दरवाजे गजनी ले जाकर अपना महल सुशोभित किया, उसी तरह सभव है कि, इस । , सातवाँ,प्रकरण मीनारका बहुत सा नक्काशीका काम हिन्दू देवालयोंसे लिया गया हो। यदि यह बात सच है, तो इस इमारतके शिल्पकौशलका बहुतसा श्रेय हिन्दू कारीगरोंको भी देना होगा। कलकत्तेके प्रसिद्ध प्राकालीन-वस्तु- अन्वेषक डा. राजेन्द्रलाल मित्रने पिछले दिनों इस विषयमें वाद उप- स्थित किया था, और उन्होंने यह सिद्ध किया था कि, यह अलौकिक इमारत हिन्दुओंके कलाकौशलका ही स्मारक है । इस मीनार पर कुछ नागरी अक्षर, खुदे हुए है, इससे भी इस -वातकी पुष्टि होती है कि, इसकी रचनामें हिन्दू शिल्पकारोंका हाथ था । अस्तु । इसकी रचनाके विषयमें कुछ भी मतभेद क्यों न हो, परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि, यह इमारत भारतके लिए अवश्य ही एक गौरव का कारण है। , कुतुबमीनार सन् १३२५ ईसवीमें पूरा हुआ । इससे मालूम होता है कि, यह इमारत लगभग छै सो वर्षसे दिल्लीकी राज्यकान्तियों और उथला-पथलोंका अवलोकन कर रही है। अतएव इस 'इतिहासप्रसिद्ध इमारतको देखकर प्रत्येक मनुष्यको, उसके विषयमें अभिमान और आदर- भाव मालूम होता है। कुतुबमीनारकी अत्युच्च इमारत पर खडे होकर, आसपास दृष्टि डालनेसे, दस कोस विस्तारवाले प्राचीन दिल्ली शहरकी सेकडों विधसित इमारतें दृष्टिगोचर होती है, जिनको देखनेसे यह मालूम होता है कि, मानो यह कुतुबमीनार, यह दिखलानेके लिए, कि देसो मै कैसा सबमें श्रेष्ठ हूँ, बडी शानके साथ सडा है। उसकी विशाल रचना, उसकी सुन्दर नक्काशी, उसका भव्य स्वरूप, और उसकी कायदेकी उँचाई, देखकर दर्शकोंको आनन्द और आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता । सारे ससारकी क्वरोंमें जिस तरह आगरेका ताजमहल श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सारे मीनारों- में दिल्लीका कुतुबमीनार श्रेष्ठ है । जिस तरह ताजमहलका अप्रतिम सोन्दर्य्य देखकर रसिक दर्शकोंको अन्यन्त हर्ष होता है, और M ६ दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। - - - आश्चर्यके कारण वे यह नहीं सोच सकते कि, "ताजमहल हृदयमें रखें, अथवा हृदय ही ताजमहलमें रख दें"-बस यही हाल यहा भी ‘दर्शकोंका होता है । कुतुबमीनारकी इमारत एक बार देस लेने पर फिर हमें कभी उसका विस्मरण नहीं हो सकता | मतलब यह है कि, यह इमारत ससारमें एक अपूर्व वस्तु है। पेरिसका 'एफेल टावर' नामक मीनार लोहेका है, अतएव उसकी बात हम नहीं कहते, किन्तु अलेक्जें- न्ड्रियाका पाम्पीका जयस्तम्भ, केरोकी हसनकी मसजिदका मीनार, अथवा सेंटपीटर्सवर्ग (वर्तमान पेट्रोमाह) का 'अलेक्जेन्ड्राइन कालम इत्यादि सब अत्यन्त ऊची ऊची इमारतोंको कुतुबमीनारके आगे अपना मस्तक झुकाना पड़ेगा। यह मीनार यद्यपि इतना ऊँचा है, , तथापि “उसके भीतरका जीना बहुत अच्छा है ! पाँचों खडोंमें सब : मिलाकर कुल ३७६ सीढिया है,। भीतरकी-ओर वायु और प्रकाशकी यथायोग्य सुविधा है, और प्रत्येक खडा पर गैलरियाँ बनी हुई है, अतएव 'दर्शकोंको बडा आराम रहता है । प्रत्येक खंड पर गैलरी होनेके कारण ऐसा जान पडता है कि, मानों इस इमारतमें ठौर ठौर पर कमरबन्द कसे है।। इससे इमा- रतको विशेष शोभा प्राप्त हुई है । इसके अतिरिक्त इस इमारत पर अनेक शिल्प-लेख भी हैं, जिनमें कुरानके वाक्य और परमेश्वरकी, नाम मालिका दी हुई है, इससे इस', इमारतके बनानेवालोंकी, ईश्वरभक्तिका अच्छा परिचय मिलता है। कुतुबुद्दीनकी मसजिद । कुतुबमीनारके पास कुतुबुद्दीन बादशाहकी बनवाई हुई एक पुरानी मसजिद है । यह मसजिद उसे' समयका बिलकुल पहला स्मारक है, जव कि मुसलमानी धर्मको मारतवर्षमें प्रवेश हुआ । यह मसजिद, तथा इसके आसपासकी इमारतें, कुतुबुद्दीन, शमसुद्दीन अल्तमर्श और - . . -- .
सातवाँ प्रकरण। अलाउद्दीन खिलजी नामक तीन बादशाहोंके शासन-कालमें मनाई गई है । कुतुबुद्दीनकी मसजिदका नाम 'कुवत-उल-इसलाम' है, जिसका अर्थ " इस्लाम धर्मकी शक्ति है । इस मसजिदकी लम्बाई १५० फुट ओर चौडाई ७५ फुट है । इसके पूर्व और उत्तरके दरवाजे अभी तक कायम है, और उनके शिलालेख स्पष्ट दिखाई देते है । यह इमारत, हिन्दू तथा जैनमन्दिरोंको तोड़ कर, उन्हींकी सामग्रीसे बनाई गई है। इस लिए यह स्पष्ट जान पडता है कि, इसके प्रत्येक खम्भे पर जो मक्काशी है, वह हिन्दुओंकी है । इन खम्भोंके बेलबूटे, पुष्पमालाएँ, और नाना प्रकारकी सुन्दर आकृतियॉ देखने लायक है । विशेषत', इस मसजिदके उत्तरकी ओरकी 'दालानमें बहुत ही बढिया नक्काशी की हुई है। इस सम्पूर्ण हिन्दू शिल्पकार्यके वर्तमान स्वरूपको देखकर अत्यन्त खेद होता है । इस सम्पूर्ण इमारतको एक बार देसनेसे ऐसा भास होता है कि, इसके सब सम्भे और बेलबूटेदार पत्थर, जो पहले हिन्दू मन्दिरों- में रामकृष्णका भजन-पूजन -देखते हुए आनन्दसे' वास करते थे, वे यहाँ पर अत्याचारपूर्वक लाये जाने तथा मुसलमानी धर्मकी दीक्षा दिये जानेके कारण, मानो शोक सा कर रहे हैं । हिन्दुओं तथा जैनियो- की मूर्तिया। इस इमारतमें न देख, पडें--इस लिए उन पर चूनेका बदिया मुलम्मा चढाकर उनका स्वरूप बिलकुल बदल दिया गया था, परन्तु काल-गतिसे वह चुनेका पलास्तर जीर्ण हो गया, मूर्तिया अब धीरे धीरे दिखाई देने लगी है ! यहा पर यह बात ध्यानमें रखनी चाहिए कि, हिन्दुओंकी मूर्तियों पर आये हुए पटल कालान्तरसे आप ही आप नष्ट होगये, और उनका पहलेका स्वरूप व्यक्त हो गया ! क्योंकि, हमारे हिन्दू धर्मका यह विशेष गुण ही है कि, उस पर चाहे जितने सङ्कट आवें, पर-धर्मके कितने ही पटल उस पर आकर क्यों न जम जाय, तथापि उसका असली उज्वल स्वरूप कभी नष्ट नहीं हो - और वे अदृश्य " दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। , Its " सकता । इसी अद्वितीय गुणके कारण, हमारा हिन्दू धर्म, मुसलमानोंके धर्मोन्मादकी कुछ भी परवा न करते हुए, वरावर टिका रहा । अस्तु । इस मसजिदमें एक स्थान पर कृष्णजन्मका भी एक चित्र है, और सबत्सा धेनुका चित्र है । ये दोनों चित्र भी देखने लायक है। इस मसजिदके प्रति मुसलमानोंका पहले ही से बड़ा पूज्य-भाव है। कई मुसलमान इतिहासकारों और प्रवासियोंने इसका वर्णन किया है। और उसमें यह भी स्पष्टतापूर्वक स्वीकार किया है कि, यहॉ पर पहले हिन्दुओंका देवालय था। इब्नबटुटा नामक प्रवासीने इसके विपयमें यह लिखा है- mosque is very large, and in 'beauty and extent has no equal Before the taking of 'Delhi it had , been a Hindu temple. अर्थात् “ यह मसजिद बहुत बड़ी है, और सौन्दर्य तथा विस्तारमें अपना सानी नहीं रखती । दिल्लीके हस्तगत करनेके पहले यहा हिन्दुओं का मन्दिर था। खुसरो कविने इस मसजिद का इस प्रकार वर्णन किया है. "The mosque of it is the despository of the grace of god. The music of the prayer of it reaches to the sky, अर्थात् मसजिद क्या है, परमात्माके अनुग्रहका निवासस्थान है। वहॉकी प्रार्थना स्वर्ग तक जाती है। अस्तु । इस स्थानके पास सुल्तान शमसुद्दीन अल्तमशकी कबर है । वह बडी सुन्दर है, और उसका प्राचीन हिन्दू-शिल्पकार्य अत्यन्त दर्शनीय है । इसके विषयमें मि. फर्ग्युसनने लिखा है कि, “यह इमा- रत यद्यपि छोटी है, तथापि हिन्दू कारीगरोंके कौशलका यह अप्रतिम नमूना है, और पाचीन दिछीकी दर्शनीय इमारतोंमें भी यह अग्रगण्य " -- 1 है .
सातवां प्रकरण।' . - . . इस कबरके अतिरिक्त यहाँ, 'अलाई दरवाजा' नामक 'एक सुन्दर दरवाजा भी है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त प्रशसनीय है। कुतुब मीनार, कुतुबुद्दीनकी मसजिद, अल्तमशकी फबर और अलाई दरवाजा, ये सब इमारतें पठान राजाओंके समयकी है, और निस्सन्देह प्रशसनीय है। विशप हीबर नामक कुतूहलंप्रिय , प्रवासीने पठानोंकी उपर्युक्त इमारतोंको देखकर कहा है कि, “इन पठान राजाओंने राक्षसके समान इमारतें बनाई है, और उनकी नकाशी' रत्नकारके समान सुन्दर की है।" यह कथन यहाँ अक्षरश सत्य प्रतीत होता है। 'उपर्युक्त इमारतोंके अतिरिक्त दिल्ली में फीरोजाबाद, तुगलकाबाद, बेगमपुर, आदि अनेक प्राचीन और इतिहासप्रसिद्ध स्थान हैं । वहाँ पर भी मसजिदें और कबरें बहुत है । इनके सिवाय, सन् १८५७ के चलवेमें जिन अॅमेज वीरोंने शूरता दिसलाकर रणमूमिमें अपने प्राण दिये, "उनकी कबरें, स्मारकस्तम्भ, इत्यादि अनेक अर्वाचीन बातें भी देखने -योग्य हैं । इन सभीका वर्णन इस छोटीसी पुस्तकमें नहीं दिया जा सकता । तथापि, ये सभी स्थल दिल्ली जानेवाले दर्शकोंके देसने योग्य हैं। अस्तु । इसमें सन्देह नहीं कि, दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थका यह पुराण- प्रसिद्ध और इतिहास-प्रसिद्ध स्थल देखकर यह अच्छी तरह मालूम हो जाता है कि, काल-चक्रकी गति कितनी विचित्र है । जहाँ हिन्दू राजाओं- की स्वतनता और राज्यसत्ता चमक रही थी, वहाँ काल-चक्रकी गतिसे मुसलमानोंका राज्य आया, वादको जब मुसल्मानी राज्यसत्ताका वैभव भी अपनी चरम सीमा तक पहुंच चुका, तब मराठोंका प्रभुत्वं प्रस्थापित हुआ। इसके बाद मराठोंकी सत्ता भी न रही, और ब्रिटिश राज्यसत्ता यहा आकर सस्थापित हुई ! इससे साफ मालूम होता है कि, राष्ट्र के उत्थान और पतनका चक्र बराबर जारी है ! जो हो, दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ नगरका जब हम ऐतिहासिक दृष्टिसे अवलोकन करते है तब . , दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ। - -- प हमें कविकुलगुरु कालिदासके इस कथनकी सत्यता भली भाति प्रतीत हो जाती है कि- " नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चकनेमिक्रमेण ।" एक प्राचीन आग्ल कविने भी राष्ट्रोंके उत्थान और पतन, विषयमें ऐसा ही कहा है। वह कहता है.- "Empires and nations flourish and decay, By turns command and in their tums obey" अर्थात् “ससारका नियम है कि, बारी बारीसे सब राष्ट्रों और साम्राज्यों- का उत्थान तथा पतन होता रहता है। क्रमश' वे दूसरों पर शासन करते, और फिर दूसरोंका शासन माननेके लिए बाध्य होते हैं।" अस्तु । अगरेजी राज्यमें भी हमारी इस बृद्धा दिल्ली माताने पूरा पूरा गौरव प्राप्त किया है। महारानी विक्टोरिया और महाराज सातम एडवर्डके राज्यारोहणसम्बन्धी महोत्सव इस दिल्टीमें ही बडी घूमधामसे सुसम्पन्न हुए । बादको सन् १९१२ ई० में सम्राट पचम जार्जने, स्वक इस पवित्र भूमिमें पधार कर, इसे फिरसे इसका गौरवपूर्ण राजधानी-पद प्रदान किया, और अपने राज्यारोहणका अपूर्व उत्सव यहा सुशोभित' कराके भारतवासियोंको आनन्दित किया । तबसे दिल्ली राजधानीका राजनैतिक महत्व, वर्तमान समयमें मी, दिन पर दिन बढ ही रहा है, और आशा है कि, स्वातत्र्यप्रिय ब्रिटिश साम्राज्यके द्वारा, दिल्ली राजधानीको एक बार फिर स्वराज्यशासनका गोख प्राप्त होगा। । , - . : 1- -- , 41 परिशिष्ट (क) M न दिल्लीके प्राचीन राजा। शासनकी अवधि वर्ष दिन मास । ८ ० ६० १ ४८-१५ २७ T- . ८८ २ ११ १० १ ७७ २४ राजाका नाम - १ राजा युधिष्ठिर २ राजा परीक्षित ३ राजा जन्मेजय ४ राजा अश्वमेध ५ राजा धर्म ६ राजा मनजित “७ राजा जसरथ ८राजा दीपपाल ९ राजा उग्रसेन १० राजा सूरसेन ११ राजा भूपति १२ राजा रणजित १३ राजा वीरजित १४ राजा भीमसेन १५ राजा शुकमलदेव. .१६ राजा नरहरिदेव १७ राजा सुजितरथ . १८ राजा-शूर 7 ७९ ८ - .. ६४ ७. - २ २९ ३ २९ ३ .. -० -१० - ७२ -११।। ३ ८ ।
दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ । । वर्ष मास दिन २१ ८ ... ७ ४ १० ४८ २९ ... । - ४७ राजाका नाम १९ राजा पर्वत २० राजा मधुकरशाह २१ राजा टोडरमल २२ राजा भीष्मदेव २३ राजा नरहरिरथ २४ राजा पूर्णमल. २५ राजा सारगदेव २६ राजा रूप २७ राजा अभिमन्यु २८ राजा धनपाल २९ राजा भीम ३० राजा लखमीदेव . ११ . ४८ । ४ - २१ . - - - . . कुल १८५३ इसके बाद लखमीदेवके प्रधान वीरसेनने लखमीदेवको मारकर राज्य ले लिया। उसके वशज:- १ राजा वीरसेन 10.5 २ राजा सूरसेन . ३२ Cr. ३ राजा अनन्तशाह २३ ४ राजा वीरशाह ३२ १० ५ राजा हरिरूप ३५-९, १७ ६ राजा'सुलोचन ४३.१ ७ राजा'पर्वत ४२॥ ९, २४ ८ राजा सुरपाल " "शा । ५ 11 1 . .
1-परिशिष्ट (क) 1- राजाका नाम ९राजा कृप वर्ष मास । दिन ३५ १४. ३१ 7 १० राजा पृथ्वीपाल २६ १५ ८ ? कुल ३४७, ९, इसके बाद 'पृथ्वीपालके मत्री नरहरिनाथने पृथ्वीपालको मारकर राज्य ले लिया । उसके वशज'- राजा नरहरिनाथ २ राजा जेतसिह २ २७ १५ ३ राजा बरामगत २१ १३ ४ राजा दीपपाल ५ राजा महाबल ३५ ६ राजा अमृतपाल २८ ७ राजा जेतपाल २८ १० ८ राजा माणिकचन्द ९ राजा कामचन्द १० राजा हरगौण १७ ११ राजा जीवनगौण २३ '२७ ..१२ राजा रीभ्यवग २१३ राजा त्रिविक्रम १४ राजा भारमल २३ २४ १५ राजा भूपति १६ राजा उदितकठ 4 । J । .... ३५ कुल ३८९---, 1107 - परिशिष्ट (ख) 1 दिल्लीके बादशाह । ८ " . . . " ४ सुलताना रजिया " गोरी घराना। २ शहाबुद्दीन मुहम्मद ई० स० ११८६-१२०६ गुलाम घराना। २ कुतुबुद्दीन १२०६-१२१० ३. शमसुद्दीन अल्तमश. १२१०-१२३५ १२३६-१२३९ • १५ मोहजुद्दीन बहराम ". १२३९-१२४१ ६ अलाउद्दीन मसऊद . १२४१-१२४३ ७ नासिरुद्दीन महमूद १२४३-१२६६ १८ बबन १२६६-१२८६. ९ कैकुबाद १२८६-१२८८ खिलजी घराना। १. जलालुद्दीन १२८९-१२९५ ११ अलाउद्दीन १२९६-१३१६ १२ मुबारिक १३१६-१३२० . " .. " . तुगलक घराना। .. " १३ गयासुद्दीन १३२०-१३२६ १३२६-१३५१ १४ मुहम्मद । १२५१-१३८८ १३८८-१३८९ १३८९-१३९० १३९०-१३९४ १३९४- १३९४-१४१४ . . " परिशिष्ट (ख) ............. १५ फीरोजशाह १६ गयासुद्दीन (दूसरा) १७ अन्वर १८ मुहम्मद १९ हुमायू २० महमूद सैयद घराना। २१ सिजरा (तैमूरलगका दीवान) २२ मुबारिक २२ मुहम्मद २४ अलाउद्दीन लोदी घराना। २५ बहलोलखा २६ सिकन्दर २७ इवाहीम मुगल घराना। २८ बावर " . १४१४-१४२७ १४२७-१४३५ १४३५-१४४५ १४४५-१४५० . .. . " - " १४५०-१४८८ १४८८-१५१७ १५१७-१५२५ . २९ हुमायू १५२६-१५३०" १५३०-१५४० फिर १५५५-१५५६ १५५६-१६०५ १६०५-१६२७ १६२७-१६५८ १६५८-१७०७ १७०७-१७१२ 30 अस्बर ३१ जहांगीर ३२ शाहजहा ३३ औरगजेब ३४ वहादुरशार । . - *
दिल्ली अथवा इन्द्रमस्थ।
३५जहादारशाह
...
.
.. २६ फसशियर
...
मे १७१२-१७१३
१७१३-१७१९ ॥
१७१९-१७४८
१७४८-१७५४
१७५४-१७५९
१७५९-१८०६५
१८०६-१८३७
१८३७-१८५७.
.
.
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३७ मुहम्मदशाह
। ३८ अहमदशाह
३९ आलमगीर (दूसरा)
४० शाह आलम
४१ अकवरशाह
४२ वहादुरशाह
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