Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Fhir Nirasha Kyo
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Why then Despair.
"राशा हि पर पनर
फिर निराधान्य
.
गुलाबराय, एस० एल-एलबी
mamimaram
तुलसी बिता माल को. तीचन र सुजान !
या तो पल लागि है. मिनि मात्र को वान !
अनन्तकुमार जैन
वीर मन्दिर-धार
द्वितीय संस्कारण
MIN
सं १९६८
सम्पादा
या शिवपूजन सहाय, "हिन्दी भूषण"
(भारा)
Hope, like the glimmering Lapor's light,
Adorns and obeers the way,
And still the darker grows the night,
Emits a brightor ray.
-~-Goldsmith.
"प्राप्तोताष्टमविक्रवण
Our dostiny, our beings heart and home,
18 with infinitude, and only there;
;
With hope it is, hope that can norer dio, ,
Effort, and expectation, and desire,
And something ever more about to bo.
Wordsworth.
मुद्रक
देवेन्द्र किशोर जैन
श्री सरस्वती प्रिन्टिङ्ग वर्कस भारा।
विषय-सूची।
१ विनीत प्रार्थना
२ सम्पादकीय निवेदन
३
२६
माया।
५ लेखक या वक्तव्य ।
६ फिर निराशा स्यों।
• मनुष्य की मुख्यता !
२३
१३.
५५
६०
१ समष्टि व्यष्टि।
१० दमारा मानव्य और हमारी कठिनाइया ।
१३ सौन्दयोपासना।
१२ कुरुपता।
१३ विश्वप्रेम और विश्वसेवा ।
१४ थपूर्ण की पूर्णता!
१५ पुनीत पापी।
१६ स्वयम्भू सुधारकों का सुधार !
१६ हमारा नेता कौन
२० कर्मयोग की मोक्ष
२, चिर-घसंन ।
६३
ज
R-5R-SARLRC 53
आशापञ्चक
FELS
आशा बेलि सुहावनी. शीतल जाको छांहि ।
जिहि प्रिय सुमन सुफलन ते, मधुराई अधिकाहिं ?
प्राशा दीपक करत नीत, जिहि हिरदे में बास
ज्यों ज्यों छाने तिमिर घन, त्यों त्यों बढे मनास २
मानव-जीवन को सुखद, सरस जु देत बनाइ
सो आशा संजीवनी, किहि हत-भाग न भाइ
होहु निरासन हार में, धन्य लन्छ निज मान
तोमे ईश्वर अंश को, देत जु प्रकट प्रमान
मीत न होहु निराश अच, लन्धि समाज को हास
मधुश्ऋतु मागम सूचहीं, पतझड़ फागुन मास
---गुलावाय।
TRESESESSESAMEGESS-Bes-MESTERN
Swave.52 Swachar-SerisinesTSAIRS
३
.
४
Sa-SITES
विनीत प्रार्थना। को करकमलों में इस दुनिया के रूप में एक नया उपहार पाल ने दुर हमें अन्पन्न हग हो रहा है। इस युग्नक के विषय में हम क्या कहें ? जैसी कुछ है. आप के सामने है। हां, इतना कहे विना तो हम रह नहीं सकने कि, इस पुस्तक को प्रमा. शिन करके हमें विशेष सन्तान हुआ है। हम अपना पान संभाग्य समझते हैं। किन्तु इसे हम परमात्मा की दया गई या अपना अनो- भाग्य कई या सम्पादकजी का अनुग्रह करें या लेखक को उदारता कहें, स्या करें-खो तो कुछ समझ में नहीं आता। तोसी इनाना कद देना आवश्यक है कि परमात्मा की दया और हमारा महा- भाग्य तो हई है. सम्पादक जी का प्रश्न प्रोत्साहन और स्नेहपूर्ण साहाय्य भी दस का कारण है। फिर लग्नक-प्रया की कृपा का तो कहनाला है। इन प्रेममंदिर की सनी पुस्तकें प्रकाशित करेगे-~-केवल इस विचार से प्रेरित होकर कि, हिन्दी साहित्योमान मुसिब माली पूज्य बन्धुवर स्वर्गीय शुमार देवेन्द्र प्रसार जैन को स्मृति अमल प्रान का। इस कान में हमार मात्र सहायक है-.-हिन्दी- भूषण' बाबू शिवपूजनतहार' मारवाड़ी-सुधार और आदर्श के सम्पादक जिन के उद्योग से हमें यह उत्तर प्रकाशनायं प्राप्त हो सका है। इस के लिये हम तर ने उन्हें अन्यवाद देते
-
हैं और पाठकों को विश्वास दिलाने है कि, एन्न पुस्तक के लेखक
की अन्यान्य रचनाएँ भी हम यथासाध्य शीघ्र ही प्रकाशित करेंगे।
साथ हो. यहाँ यह भो हम सूचित कर देना उचित समरते हैं कि,
'प्रेम मन्दिर' की प्रसिद्ध पुस्तकों के नये संस्करणों के सिवा हम
अन्यान्य उत्तमोत्तम पुस्तके भी आप की भेंट करेंगे। किन्तु
गह सुब कुछ आप की ऋण और परमात्मा की गणा पर निर्भर
है। आशा है, आप फिर निराशा क्यों ? पढ़ कर हमें की
हताश न होने देंगे।
बीरमंदिर, आरा
.
अनन्त कुनार जैन
1
सम्पादकीय निवेदन
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यह पुस्तक पकन सिद्धहस्त लेखक, की ओजस्विनी लेवनी ले
निकली है जिन्न के विषय में कोई परिचयात्मक अश्या प्रशंसात्मन
शब्द कहना सर्वथा अनावश्यक है । टेवा बाटोदना का गम्भीर
मानानुशीलन पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ ले प्रकट हो रहा है । पिलर,
हाथ कंगन को आरीया' ?
प्रथम बार यह पुग्नयः प्र मन्दिर में निकन्दी, धी । इस-यूसरी
बार यह वीर-मंदिर में निकाल रही है। किसोर लोग की बात
। यह है कि, बीर-मन्दिर द्वारा प्रेममन्दिर के प्रसिद्ध पुजारी की पुज्य स्मृति की रक्षा हो रही है। आरम्भ में इस की हस्तलिखित प्रति मुझे देखने को मिली थी। आद्यन्त पढ़ कर में तो लेखक-महा- शय की मौलिक प्रतिभा के चम काराध हो गया। मैं आशा करता हूँ कि अब भी जो कोई इन पुस्तक को पहेगा वह लेखक की विद्वत्ता, विषय-प्रतिपादन की योग्यता और भाव-प्रकटीकरण की सरल-सरल शैली देखकर प्रसन्न हुए बिना न रहेगा। उदाराशय सहृदय लेखक महोदय की कृपापूर्ण आज्ञा स मैं ने इस बार भी इस पुस्तक को ध्यानपूर्वक दुहराया है। लेखक महा- शब का स्वयंसिद्ध पाडित्य, किसी दशा में, मेरे जैसं तुन्छातितुन्छ व्यक्ति के सम्पादन-कौशल (!) का महाग नहीं हु ढता । एक सुप्र- सिद्ध उद्भट विद्वान् के 'प्राकथन 'की विद्य-मानता में भी मेरे इस साम-होन वक्तव्य की कोई आवश्यकता न थी और न उसके साम इस का कुछ महत्त्व ही हैं। किन्तु प्रकाशक के अनुरोध से मैं ने जो दुस्साहस किया है उस के लिए साकार अलाप्रार्थना करता हूँ। पाशा बलवती कष्ट नैराश्यं परमं सुखम् । आशा निराशाः कृत्वा तु सुन्वं स्वपिति पिंगला,
जो लोग भगवान, न्यार ना या पावर प्रायः रहा है
गे इन पुलिस को अवश्य पढ़ना चाहिये । जिन लोगों ने प्रात:
अपरणीय भगवान शनाचार्य की 'पदांजरिका में
. नी. मार्ग प्रान:
भयो भगवानः
नभन मलारः
aa,
मोर मादक :
मति
- कन्न ।
11
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नयाद पन इन्न भसार पं. आना-पाशा-या मनुष्य को
जोशनि मान कर य दृष्टि से देखते हैं। उनका कहना है कि-
... मायाना
,
महाकवि भतृहरि की यह उक्ति अत्यन्त युक्तियुक्त आर उपयुक्त
है। वे आशाओं से रहित हो जानेवालों को ही तपस्वी मानते है।
जो आशान्वित है, उनके सिद्धान्तानुसार, वे माया के बाज़ार में
भटक रहे है। जिन्हों ने आशाओं का जाल तोड़ कर अपनी मुट्ठी में
समेट लिया है, वे ही, उनकी समझ में, सब से बड़े वीर हैं। वे
कहते भी है कि-
अाशाया ये दासास्ते दासा सवलोकस्य ।
आगा येषां दासी नंयां दामायने लोकः ।।..
किन्तु इस पुस्तक में यह बतलाया गया है कि, "जो हताश हो
जाता है वह कापुरुष हैं और दृढ़ आशा के साथ जो अपने कर्तव्य
-पथ पर अग्रसर होता जाता है वही सफल-मनोरथ होता है।
"देव के भरोसे जीनेवाले अकर्मण्यों एवं आलसियों को इस से
काफी शिक्षा मिल सकती है और पुरुषार्थी कर्मवीरों को तो इस
अपनी चिरसंगिनी बनानी चाहिये किसो नीतिकार का कथन
है कि-
"आशा नाम मनुष्याणां
काविदाश्चर्यजना
यथा बहाः प्रवाति
मुजा स्तिति पगुवत् ।।
यदि इस नीति के अनुसार विचार किया जाय तो विदित
होगा कि,जो लोग आशा-बन्धन से मुक्त हो गये हैं वे ही पंगू
-
अकर्मण्य है। अतरव. जान-पान रेलकर, कार हनेवाले के
लिये यह आवश्यक है कि वह अपने भविष्य पर आशा की उज्ज्वल
किरणों का प्रकाश डाले। क्योंकि जिन्न का कर्तव्य माग अभि-
नव आशा के आलोक ने आलोकिन नहीं है, वह पय-नष्ट हो कर
मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्य से बहुत दूर जा पड़ता है । लत्र
पूछिये ना, इन सागियों के लिये श्राशा हा लव कुछ है । इग्ली में
सञ्जीवनी शनि है। इस के बिना हमलेग निकिय निजीब है।
फलतः, इस मंसार में इन्न कमंत्र में जो लीन सुख और सफलता
पाना चाहता है, ना आई नहीं जो सुखकांक्षा न हो) उनके
लिय ग्रह पुनम अनार उपयोगिनी है। विश्वास है, इस से संसा..
रिया का विशेष उपकार होगा।
आग विहार
भानामी १८०
Daman
A
प्राक्कथन . mum Parma सं -ne सार के विषय में बानिका विमानों की पतः दो सम्मनियाँ है। पया सम्मान तो यह मनार पक, निनाला दुवागार है। यहाँ अनेक व्याधियां, अग्ननीय पीड़ाएं. अगणित सापन्तियां, हृदयदाहिनी चिन्नाएं मनुष्यों को नदेव है। कोई जानोगादि से पीड़ित है. : कोई पुत्र-गोत्रा में विवाद है : कोर्ट सन्ताताभाव-दुःख से दुःवित है : कोई पनामात्र भन्द्रिता पत्रं ऋणाति दुःन्य से व्याकुल है : कोई धनोपार्जन के कामों में अशान्त- चित्त है : कहीं जन्म, कहीं मरण, कहीं न्दन, कहीं कराल, बुभुक्षा, कहीं शरीर-पीड़ा, कहीं पुत्र-कलत्र-शोक-सन्ताप ! तुम्न-शांति कहीं नहीं है। जिस वस्तु को देखो वही परिवर्तनशीन, और नाशवान, है नवयौवना मनोरमा शुन्दरी वृद्धा कुरुपा हो जाती है. अनेक-संग्राम- विजयी वीर जरा और गेग से जर्जर-शरीर हो जाते हैं। आज जो नितान्न दर्शनीय, कलाकौशल-सम्पन्न, सन्दौकिक शोभायुक्त भवन .. ..
दिखाई देते है. कल व काल काल की अनन्तर गति से उलक- नियाल नहटर हो जाने हैं। संसार की क्रीन ऐसी वस्तु है. जो कराट-कान का प्रान्न नहीं बन जातो। समस्त सांसारिक चम्नुओं पर परिवतन और नाश' बड़े मोटे अक्ष में लिाद है। महात्मा भन हरिजी ने सत्य कहा है। प्रायः कमोन गोल कनिश्यदिवमत्यायिनी यौवनश्रीः । अर्थाः मकल्पकलगा धनसमयताडिद्विभ्रमा भोगपुराः।। काटा-माने तो यगृहं तद च न वि यनप्रियानिः प्रणीतम् । अभगवासननिना मत भवभयाम्भोधिपा तरीतुम् ।। .. यता मनः शानिपतनि युगान्तानिन रतः । सनद्राः गुवननि प्रचर-निकर माहनिनाः ।। धरा गन्नत्यन्तं परणिधरपादैरपि धृता। शरीरे का पाना करिकनभकमानिचपले ।। जय संसार की यह दशा है तो फिर यहाँ सुख कैसा? इसी भारता पर विचार कर भारतवर्ष # - अनेक ऐश्वर्य सम्पन्न गृहस्थ पराक्रमी शूरवीर एवं संसार-विजयी सलाद अपने सर
सांसारिक वय तथा राज्याडबर को त्याग वनों को चले गये
और ईश्वरानावना में अपना शेष जीवन को व्यतीत किया। इनके
आनन्द का आदर्या निम्नलिखित श्लोकों से ज्ञात होगा।
समीर हिमगिरिशिला-बद्धपद्मासनस्य
ना जानान्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य ।।
शितभावं नम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशंकाः ।
समान्य में जरटहरिणाः शृंगकरविनोदम् ।।
काली निःस्पृहः शान्तः पाणिपातो दिगम्बरः ।
कना शको भविष्यामि कर्ननिर्मूलनक्षमः ॥
दूसरी सम्मति यह है :-
संसार में दुःख और पीड़ा अवश्य है ; परन्तु लुख और
आनन्द की मात्रा अधिक है। गुलाब के फूल में काँटा अवश्य है,
परन्तु उसकी सुन्दरता, सुगंध एवं उपयोगिता इतनी अधिक
मात्रा में है कि, जो पीड़ा उसके काँटे से होती है वह उनकी अपेक्षा
नहीं की बरावर है। क्या कोई इस पुष्प को उसके काँटे की
पीड़ा के भय से छोड़ देता है ? जब हम नाना प्रकार के रङ्ग-विरंगे
मनोहर पक्षियों को अपनी मधुर और मन-मोहिनी ध्वनियों में
क
.* गान का पुन : जब म हिमालय पर्वत मांगन्य अनु- ‘पम नायन दृष्यों को देगा जब हम पापनागिनी जाहना की पवित्र लमगं को शरद मत के चन्द्रमा को न्योता में कलंन करने देखते है : नय नम नवयौवना सौन्दर्य सम्पन्ना मृग- नयी नियों को अपने मधुर वर्ग में गान बग्ने लुनने और देव है : जय नवविवाहित मालक की डा जीवनानन्द में उन्मादिदे : मवई नग में पान. स्पर्शी कटा कोणालमा भवन-शिवगं पर दृष्टि झालंद जय हम शिमा पद उगान में जाकर उनकी पत्र, सुनीत विचित्र निमान्टियों यग्न उनके नाना प्रकार में प्रालिन र और गांधी पर दृष्टियान बग्ने : जय हम विशाल विद्यालयों में जाकर मरन्धत दवा अनुपम नमन ही देन : नर पया हम कह दकन है : कि. यात. लंबारा निनाल नाकार ? कनापि नहीं। स्या को सीना ची प्रन्नना कर से मनानान न करता मला मनुष्य है. जो पुत्र काटन-पाला के कष्टों को अन्नानाय नमः एन-नन्त को न ना स्या की गला विद्याशी विद्या- माग्न के दावों पर टालमा विद्या का त्याग करने कांचन चा नि:नार बनाद ? या धनोपार्जन में माजी बाटनामा और भापतिमा नाग पर जाकर सामानिनी ..
१६ बेष्टाएँ छोड़ दी जाय ? कठोर तप और अनेक शारीरिक कष्ट सहन करने के पश्चात् ईश्वर-प्राप्ति संभव है। क्या कोई सन्यासो इन प्रारम्भिक आपत्तियों के भय से इस अनुपम सिद्धि को छोड़ देता है ? संसार में दुःख अवश्य है : परन्तु यहाँ पर सुख का आधिपत्य प्रधान है। सुखकी पाप्ति उन्हीं को होती है जो 'दुःखों और आपत्तियों का सामना करके उन पर विजय प्राप्त करते है और अपने अन्तिम लक्ष्य को प्रारम्भिक बाधाओं और कठिनाइयों के भय से नहीं छोड़ देते हैं । संसार एक रणभूमि है। जो बोर सदाचार का कवच पहरे हुये है, चित्त, पुरुषार्थी और. निडर है, उन्हीं के हाथ में सुख की विजय-पताका है-आलसी. हीनोत्साहो, दुराचारी, कुत्सित मनुष्यों को इसमें सफलता नहीं होती है। अस्तु । इन दोनों सम्मतियों में कौनसी ठीक है-यह निश्चय करना बड़ा कठिन है। ये दोनों दृष्टियाँ अत्यन्त प्राचीन काल से चली आयी है। दोनों ही पक्षों में बहुत कुछ कहा जा सकता है: : परन्तु बात तो यह है कि संसार न तो दुःखागार ही है और न सुख का भाण्डार ही। सुख और दुःख की स्थिति हमारे बाहर किसी बाह्य पदार्थ में नहीं है! वरन् हमारे भीतर ही है। इनका उद्गम स्थान हमारा मन है न कि कोई वाहरवाली जड़ वस्तु। शुरन्धर दार्शनिक बिद्वानों का ऐसा मत है कि मन के अतिरिक
भौर कोई बाह्य वस्तु ही नहीं। यह समस्त दृश्यमान संसार
मन के भीतर ही है, याहर नहीं।
संसार-स.चना के तीन अन्तिम सूत्र है, अर्थात् काल, आकारा
और कार्य-कारण-ला। इन तीनों के आधार पर ही सब
संसार की रचना है: और ये तीनों हमारे मन के भीतर हैं बाहर
नहीं। यह सम्मति भूमण्डलके सभी बड़े २ तत्ववेत्ता और
भाचायों की है। भारतवर्ष के महर्पियों ने तो इस सिद्धान्त को
भूर ही पुष्ट किया है।
इस सिलान्त का महत्व उपनिषदों में भली भांति दिलाया
गरा है। जैसा कि निम्नलिखित वास्यों से विदित होगा ।
मन गव जगन सर्व मन एव महारपुः ।
मन एव हि संसारो मन एव जगत्त्रयम् ।।
२
मन एव महद् दुःो मन पद जगदियाम्
मन एव हि कालभ मन पब मलं तथा ।
जन हद हि संकल्पो मन एव हि जीवकः ।
मन एव हि पिर मनोऽहंकार पर
४
मन एव महद्वन्धं मनोऽन्तःकरणं च तत् ।
मन एव हि भूमिश्च मन एव हि तोयकम् ।।
५
मन एव हि तेजश्च मन एवं मरुन्महान् ।
मन एव हि चाकाशं मन एव हि शब्दकम् ।।
'.
स्पर्शः रूपं रसं गन्धं कोशः पञ्च मनोभवाः ।
जाग्रत्स्वप्नसुपुप्तादि मनोमयमितीरितम् ॥
दिक्पाला वसवो रुद्राः आदित्याश्च मनोभवाः।
दृश्यमण्डं द्वन्द्वजातमज्ञानं मानसं रमृतम् ॥
इल उद्धत वाक्योंसे स्पष्ट है कि जो कुछ वस्तु है वह मन के भीतर
ही हैं। मन के बाहर नहीं। इस मन को पाश्चात्य विद्वानों ने
Idealism. के नाम से पुकारा है; परन्तु पाश्चात्य विद्वानों का
Idealism. इतना गम्भोर और स्पष्ट नहीं है जितना कि हमारे
ऋषि महर्षियों का ।
उदाहरणतः उपर्युक्त उपनिषद्वाक्यों
को देखो।
. लारांश यह है कि मुख दुःस्त्र मन के बाहर नहीं है बल्कि वे हार्दिक भाव है, जिनके उद्गम और लयका केन्द्र हमारा मन ही है एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के सुम्ब के लिये विकट संकट पोलता और अनेक दुःश्लों का सामना करना है : परन्तु वह उन्हें दुःख नहीं समझना। इन दोनों व्यक्तियों के मन उन्य और उदार भानों से अर्थात अगाध प्रेम और देवमतिले परिपूर्ण होते हैं। इस कारण जो दूसरों को दुःख मालूम होता है बद इन्हें नहीं। से रिद्ध हुआ कि, मुख दुःख कोई स्वयं सत्ता प्रखने वाले पदार्थ नाही हैं, बल्कि हमारे मन के भाव है, और भावों का अच्छा युग होना उमारे अधिकार के अन्तर्गत है। हम अपने इन अधिकार को बहुत कम काम में लाने हैं। यदि यथोचित रीति से हर अपनी शक्ति को काम में टाव तो हम दुव के भावों का प्रवेना मन में रोक सकते हैं, और नुव की यात्रा चाहे जितनी अधिक कार सकते है अपने आत्म-बल के प्रभाव को नहीं जानते हुए हम अनेक गुन्या । कारण बन जाने हैं और यह समझने लगते हैं कि वे दुःख . बाहर से आये हैं और उनका रोकना अथवा दूर करना हो शनि ने बाहर है। चित्त की वृत्तियों को रोकना गेवशारा का पहला । है, और इसका फल पूर्ण आनन्दप्राटिन है। श्री भगवान ने भी श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है वि. दुःख का कारण हा - चित्तवृत्तियों का प्रभाव ही है। इनको ज्ञानी अपने आत्म-बल- से रोक सकता है। दुःख का उद्गम स्थान इन्द्रियों के विषयों पर ध्यान देना है। इन पर ध्यान देने से उनके साथ सङ्ग उत्पन्न. हो जाता है, सङ्ग से काम उत्पन्न होता है, काम से क्रोध, और क्रोध से मोह। मोह स्मृतिविभ्रम का कारण है, जिससे बुद्धि का नाश होता है। बुद्धि नष्ट होने से सर्वनाश हो जाता है। जो अनुष्य आत्म-बल-द्वारा इन्द्रियों से राग द्वेष दूर करके उनके विषयों को भोगता है, वह शान्ति को प्राप्त करता है। इस शान्ति में सब दुःखों का नाश है। इसे प्राप्त करने वाला प्रसन्न चिस्त होकर स्थिर-बुद्धि हो जाता है। यही भाव गीता के निम्न लिखित श्लोकों का है :- : ध्यायतो विपयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्सञ्जायते कामः कामाक्रोधोऽभिजायते ॥ क्रोधाभवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति-विभ्रमः ॥ स्मृति शाबुद्धि-नाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ राग-द्वेष-वियुक्तस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् । अात्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ प्रसादे सर्पदुखानां हानिरस्योपजायते । प्रसवचेतसो याशु दुद्धिः पर्यवतिष्ठते । , - -
Pr-JSpe
।
वास्तव में सब दुःखों का कारण हमारी चित्तवृनियों का नहीं
रोकना है। यदि पूर्ण जानकी दृष्टि से देखा जाय तो हमारी भाला
अव्यय अनन्त और शुद्ध विज्ञानविग्रह है। उसे अनुग्न दुव कुछ नहीं
होता है। ग्नदृश
हमारा चिन पिशान्त्र के सदृश भ्रमण करता रहता
है। यदि हम गोप को न्याय बार आत्मा की असिन्नता की
देवन लगे, तो हमें परम सुख की प्राप्ति हो जायगी।
अयायो नन्तः शुरु:-नितान-विग्रह:
--
मुलं दुःलं ग नामानि का का िवर्तः ।।
ती दिन अर्थ मान्न थालिपिमान ।
पनि पश्य उत्मा गगत्यागामुखी २ ।।
लाला गुलाब राय, एम. ए. पल-एल. बी. की
फिर निगना गा ; नायक प्रस्तुत पुस्तक उन दार्शनिक और
ननिक विचारों से परिपूर्ण है। लाला लाहब एक उद्धर वानिक
विद्वान है। इनका प्रस्तुत पुग्नक के विचार पूर्वान, मंदार-विक
दो सम्पनियों में पहली ने नहीं मिलते है, बल्कि दूसरी ले और
उन वाक्यों रहे जो उन पर व्याख्यानाप से कहे गये है। दूसर
शब्दों में यह कह सबाने हैं कि इन विचारों के अनुसार संसार
पक नितान्त दुःस्वागार नहीं है, बल्कि उसमें दुःण्य की अशा
रमुख की मात्रा अधिक है और सुख दुःख भी मिनि बायर
में नहीं है, किन्तु हमारे मन के भीतर है। यह हमारे अधिकार में है कि हम दुःख की मात्रा हटा कर सुख एवं आनन्द की वृद्धि करें। इस जगह पुस्तक की विशेषता यह है कि इसके लेखक महाशय ने मनुष्य की अपूर्णता को उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि और विकाश का साधक माना है । इस दृष्टि से अपूर्णता और अनंतता पूर्णता का पाय बन जाती हैं। इस प्रकार मनुष्य की दीन हीन दशा निराशा का विषय नहीं रहती। यह वर्तमान दशा मनुष्य की भन्तिम दशा नहीं। मनुष्य ब्रह्म का अंश होने के कारण अपनी वर्तमान दशा को प्रतीत करता जा रहा है। जब तक मनुष्य अपनी वास्तविक स्थिति को नहीं समझता तभी तक वह नैराश्य के सागर में गोता खाता रहता है। ग्रन्थकार ने मनुष्यजाति की उस स्थिति को बतला कर अपने पाठकों के हृदय में आशा के बीज बोए हैं। यह आशा केवल संसारिक और सामाजिक विषयों के प्रति नहीं है। मनुष्य की बुद्धि को प्रधानता देकर आध्यात्मिक विषयों की बहुत सी उलझनों के सुलझ जाने की भी आशा दिलाई गयी है। लाला साहब की यह पुस्तक अपने ढंग की निराली ही है। हिन्दी-साहित्य में इस प्रकार के बहुत कम ग्रन्थ है, बल्कि यह कहना कि उनका एक तरह से अभाव है, अत्युक्ति नहीं है। लाल साहब ने इस पुस्तक को लिड र हिन्दी साहित्य-भण्डार को वृद्धि ही नहीं की है, वरन् संसार का बड़ा इयकार किया। जिसके लिये हम भी उनके चतन है। जो पुस्तक निल्लाह, हताश और पुनपार्थ-हीन मनुष्यों के दृदय में आत्मगौयर-झान को जागृति कर जो उनके शिथिक शरीरों में नवीन-जीवन-शक्ति का सञ्चार कार, जो विवादित मनों में भाशा को की प्रस्फुटित करके मनुष्यों को पुन्वार्थ करने के लिये प्रोत्साहित कर, जो मनुष्यों को अपने कर्तव्य काय्या में कटिबद्ध होने का उत्तेजना दे और अनिवार्य आपत्तियों नया कठिनाइयों का प्रसन्नता पूर्वक सामना करने को उद्यत कर, जो मनुष्यों को दुःश्य और संशों की नुच्छना यता कर उनके मुख और आनन्द की मात्रा की वृद्धि करे : वह पुग्नक निःसन्देड परमोपयोगी है, और उसके लेखक का परिश्रम सफल ही नहीं बल्शि भति सराहनीय है। आशा है कि इन्न पुग्नक का सर्व- साधारण में, यथोचित आदर होगा. जिससे योग्य लेभक इस प्रकार के अन्य ग्रन्थ लिखने को प्रोत्साहित । मौलपुर १ कन्नोमल, इस एसए
अहो देवि आशे ! प्रशंसा लिहारी,
सक
कह यथावत् न जिहा हमारी
सहामण्डल, व्योम, पाताल माही,
कहाँ शक्ति न व्याप्त तेरी सदा हो
कन्टानाथ तेरी कृपादृष्टि पाई,
कला हीन ह नित्य देवे दिखाई।
ग्रहग्रस्त तेजोनिधी सूर्य, सोई,
प्रकाश प्रभा को तवाधीन होई ।।
।
बिना पर के पंगु पाथोधि पारा,
क्षयकाई में लाँघि ऊंचे पहारा ।
जहां जी चहै, जाय, नाना प्रकारा,
विलोके छटा, पाय तेरो सहारा ||
महा दुःख में, शोक में, रोग माहीं
विपत्काल में, कालडू में सदाहीं ।
फिर निगशा दो?
लान लोग आशेनुलना तिहारी
নি gয়নুল লিলা প্রায় ৫
तुही मोहिनी. हि मायाविनी है,
तिहलोक की नहि सजीवनी है।
है तुम जो, विश्व-जान-प्रशाग
मनै दण्ड में दण्डकारण्य नारा
मारप्रसाद द्विवेदी ।
Antar
।
लेखक का वक्तव्य
ore--
'जारित चात्मसमं बलम्
)
1
Our first duty is not to have ourselves ; because to advance
we must have faith in ourselves tirst. and then in God. He.
who has no faith in himself can never have faith in God.
--Swami Vivekanund.
म
an
सी भाषा में एक लोकोक्ति है कि "तसनीफरा'
मुसन्निफ नेको कुनळ्या" अर्थात् अपने लिखे
हुए को लेखक ही भली भाँति बता सकता है
इसी कथन के आधार पर, ऐसे उत्तम प्राकथन
के वर्तमान होते हुए भी कागज़ और स्याही की
तेज़ी का विचार न कर, मैंने इस पुस्तक में एक भौर भूमिका मोड़
देने का साहस किया है।
फिर निराणा पयों? २७ यदि कोई संक्षेपता-प्रिय पाठक मुझले एक शन्द्र में इन पुस्तक का सारांश पूछना चाहे तो मुझे उनके उत्तर में कहना पड़ेगा कि वह मन्द 'आत्मगौग्य है। भात्मगौरव से पाठकगण शायद कुछ और न लमर जावे, न कारण आत्मगौरव की थोड़ी सी व्याख्या कर देनी आवश्यक है आत्मगौत्र वृथाभिमान नहीं है और न यह ईश्वर से स्वाधीन होना दी है। अपनी शक्तियों औरः खम्भावनाओं को यथावत जानकार अपने में विश्वास गम्युना हो आन्मगौरव है। प्रात्मगौरख ही पुर- पार्य का मूल है और बिना पुलगा के क्रिनी पुकार की उन्नति की सम्भावना नहीं है। गति गुनग हि परिणति गुमना ! आत्मगौरव की दस स्थान पर विशेष व्याख्या करना उचित न होगा ! भूमिका ही पुस्तक बन जायगी। और मुभी गुनक्ति और समय के वृथा व्यय के लिये कोई बहाना भी न मिलेगा किन्तु दो एक सम्भावित आक्षेपों का उत्तर देना बहुत से झगड़ों को बचा देगा और पुस्तक के प्रतिपाद्य विषय पर भी एक नयी मन्टक पड़ जायगी। इस पुस्तक को पढ़कर कुछ लोग यह अवश्य कहेंगे कि भात्म- बल और पुरुषार्थ की डींग मारने से क्या होता है। कितने ही प्रयन्त्र निष्फल होते है और कितनी ही आशाओं पर पानी पर २८. फिर निराा क्यों? जाता है। फिर मनुष्य का गौरव कहाँ ? ठीक है ! किन्तु हमारा वह तो कहना नहीं कि मनुष्य सब कुछ कर ही सकता है। मनुष्य प्राकृतिक नियमों को नहीं बदल सकता। जो प्रकृति के नियम हैं वे अटल हैं। किन्तु उन नियमों को समझ कर मनुष्य उन से अधिक लाभ अवश्य उठा सकता है । प्रवाह के प्रतिकूल जाना कठिन है। किन्तु प्रवाह के बल के साथ अपने बल को लगा देने से मनुष्य अपने अभीष्ट को शीघ्र ही प्राप्त कर सकता है। मनुष्य प्रवाह से बाहर नहीं । प्रवाह की गति को क्षिप्र अथवा मंद बनाने में उसका भी हाथ है। यदि वह प्रवाह के प्रतिकूल चलेगा तो उसके बल का वृथा क्षय होगा और प्रवाह की भी गति किसी न किसी अंश में अवरुद्ध हो जावेगी। यदि वह अनुकूल चलेगा तो उसकी भी शक्ति बढ़ेगी और प्रवाह की भी गति का वेग बढ़ जायगा। इसलिये मनुष्य को प्रवाह की गति का झुकाव भले प्रकार समझकर उसके वेग को बढ़ाने का यत्न करना चाहिये। ऐसा करने से उसकी सब आशा-लतायें हरी भरी हो जावेंगी और उसके मनोरथ फलवान होंगे। जो हमारी इच्छायें ईश्वर की इच्छा . तथा प्राकृतिक नियमों के अनुकूल होती हैं उनका पूरा होना किसी प्रकार से असम्भव नहीं। किन्तु उसमें भी प्रयत्न करने की शर्त लगी हुई है । प्रयत्न के विना कर्य की सिद्धि नहीं होती। निष्क्रिय कोग भी गति के अवरोधक होते हैं। वे लोग दूसरों की शक्ति का फिर निराशा क्यों? में वृथा व्यय कराते हैं। शुभ कामना और सत्सङ्कल्पों का होना अच्छा है। किन्तु मयत के बिना वह सब निपल है। अतः मनुष्य को चाहिये कि वह शुभ कामना बाला होवे और साथही साथ पुस्यार्थी भी बने। शायद कुछ लोगों का यह भी कहना होगा कि इस पुस्तक मनु जाति का गौरव बताते हुए मनुष्य की कमजोरियों की भी बड़ाई की गयी है । इससे लोगों को पाप में प्रवृत्त होने के लिये और भी उत्तंजना मिलेगी। ये कदापि यह अभिप्राय नहीं कि, लोग देख भाटकर भी खाई में गिरें और न मैं सच्चे साधुवृत्ति लोगों के पुण्य-चरित्रों का तिरस्कार कर पापियों के निन्दनीय कर्मी का आदर करना चाहता है। किन्तु यह अवश्य मानता है कि जो लोग गिरे हुए हैं उनको सहायता देना, उनले घृणा न करना, और उनके साथ रहकर उनको उठाना मनुष्य का कर्तव्य है। इसके साथ ही साथ जो लोग पाप से बचे हुए है उनको इस बात पर अभिमान नहीं करना चाहिये कि वह पापी नहीं। अभिमान करना ही स्वयं परा पाप है। जो लोग अभिमान करते हैं वे लोग पाप से स्यालो नहीं हैं ऐसे अभिमानी लोग दूसरे को निरुत्सा कर देते है भार उस गिरे हुए मनुष्य के न उटने का कारण बम आते हैं। स्वयं ही पापियों के दल में मिलकर दलदल में फैल जाते हैं। ऐसे लोगों की भपेभा पापी ही भले है, जो मभिमानी ।
३० फिर निराशा क्यों? नहीं करते। उनके पास बैठकर सदुत्साह की तरङ्ग उठने लगती हैं। मनुष्य को न तो विषयों में ऐसा लिप्त होना चाहिये कि कर्त- व्याकर्त्तव्य को सुध भूल जावे और न ऐसा कर्त्तव्यपरायण ही दनना चाहिये कि सारे संसार को सिर पर उठा रक्खे और लोगों का कर्तव्य से दिल फेर दे। जो कुछ संसार में है उससे किसी प्रकार की इच्छा न रखते हुए, उसो की शोभा में आनन्दित हो ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करनी उचित है और जहाँ तक हो सके श्रेय को ही प्रेय बनाने का यत्न करना चाहिये। कहीं २ पर यह भी कहा जायगा कि प्रयत्न और पुल्पार्थ के साव इस देश के नहीं। इस देश के लोग संसार को दुःखापय मानते आते हैं और संसार को सुखमय लगाना अपने जातीय भावों के प्रतिकूल जाना है। ऐसा कहना अपने पूर्वजों का तिर- स्कार करना है और उनके लिये कृतज्ञता दिखना है। हमारे देश की रीतिरिवाज और आचार-व्यवहारों में ही हमारे जातीय भावों के तन्तु छिपे हुए है। न हमारे यहाँ शैतान ही को मानते हैं कि जो मनुष्य को लदा पाप की ओर घसीटता रहता है और न शोक-सूचक त्योहार ही है। फिर हिन्दू जाति के लोगों को लर्व- दुःखवादी ( Pessimist) कहना भूल है। और देखिये, हमारे देश के लोग दुःखान्त नाटक तक को नहीं पसन्द करते थे। हमारे यहाँ के नाट्यशास्त्र का एक सुविख्यात नियम है कि सब नाटक फिर निराशा क्या! द Mont- सुखान्द होना चाहिये। फिर यह सर नाटकों का मूलाधार संसार-नाटक किस प्रकार दुश्वान होनहना है ? लोग बार्ह हैं कि हमारे देश के लंग माय अथवा अदृष्ट के मानने वाले हैं नाना कि यह मी ठीक है। तो क्या भाग्य के मानने वालों को पुन्माय-हीन होना चाहिये । स भाग्य को माननेवाले लोग भी दुःव को दुःत्व नहीं कर। उसको वह कन्पति अथवा हरि की इच्छा कह देता है। हरि की इच्छा वाहनारे अनलिनिय हो सकती है? मान्य का मानने वाला पुनय भी आस पाली नहीं। यह आन्दना है कि पिछला भार भी मेरे का का है और अगर बनानेनिरे शुभ कार्य करना या । भाग्य को मानने पनी हमारे लिये निना करना था। अनफलता की अवश्य होती है। उसले निजमाह हला चाहि । वरन, हम वह विचार करना चाखिये कि जिवनर में मेसी शुभ याराना, उग आशा और दिशाद न्य उत्पन्न होमकते हैं यह पदकलिन दिन के लिये नहीं। उसकी उय आशायें, उसकी उस प्रकृति की मान्यता और यह अवश्य अपनी प्रकृति के अनुशल उच्च पद को प्राप्नगा। इस पुस्तक में कुछ तत्वमानस्बन्धी विमान उनका, यहाँ पर, समर्थन करने में भूमिका का आकार पुस्तया के गरिमाण से भी बढ़ जानना कि पाटक मन ही अपने रब विकार ३२ फिर निराशा स्मों: द्वारा इन सिद्धान्तों का खल्डन मण्डन कर लेंगे। मैं विवेक-पूर्ण पाठकों की स्वतन्त्रता में बाधा नहीं डालना चाहता । इस स्त्र- तन्त्रता के कारण शायद मेरा भी कुछ लाभ हो जायगा । इसी भाशा से मैं इस पुस्तक को अपने पाठकों के हाथ में सौंपता है मैनपुरी गुलाब राय चैत्र शु. १. १९७५ . A ar
फिर निराशा क्यों?
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"जिन दृढा निन पाडवा. गहरे पानी ।
ददन
गई, किनारे ||"
" Water Clt whya"
ग कहते है 'समकने वाले की मौत है। हा.
लो
सत्र है। जो आंग्यं बन्द किये बैठे रहने है.
उनके वित्त में वृणोत्पादक दृश्य ग्लानि गदा
नहीं करते, किन्तु जो लोग देखते है, उन्हें हर होता है, और
विवाद भी। जो लोग वृणित पदायों के लिये नेत्र नंद बैं
हुए है वे लोग मनोरम दृश्यों के दर्शन-लाभ से भी उचित है
कविगण संसार की विचित्रता से चकित हो, कहने लग जाते
है कि न जाने मला किममृतमयः किंविषमतः "किन्नु जो
लोग विप से भागने है उन को अमृन के दर्शन भी नहीं होते।
३८ फिर निराशा क्यों? शिवा ने कालकूट विष पिया तो उन्हीं के मस्तक को पुण्य-पियू- पत्रावी ग्यांशु ने विभूषित कर उनको द्रशेखर की पदवी दी। यह तो रहा विष से न भागने और कठिनाई सह ने की शन। जान-मंत्राम में बहुन ले लोग कायरता कर जाते हैं। जो लोग जापन-संग्राम में भागते हैं ये लोग विजय के सुख से भी बञ्चित रहते हैं । जीवन-संग्राम की वान तो दूर रही, बहुन से लोग विचार संग्राम में भी आगे नहीं बढ़ते । यह ठीक है कि, गुन्हं की वार्ता से ही अच्छा लगता है। किन्तु जो लोग युद्ध में पड़ते हैं वे लोग युद्ध की कठिनाई के साथ साथ युद्ध का सुख भी अनुभव करते हैं। जानने में दुःख है और सुख भी। बाबा आदमने ज्ञान का फल वाया । यही उनके पतन का कारण हुआ: किन्तु यही उनके उत्थान का भी कारण है। अगर वे बुगई भलाई न जानते तो वे अपने पैर तले की मिट्टी के समान ही बने रहते । यह सब ठीक है । जानने ने जो मानसिक वेदना होती है सो जानने वाले ही जानते हैं। 'जाक पांव न फटा विधाई । सो क्या गने पीर पराई ।' विचार करते ही संशय के मवर में गोते खाने पड़ते हैं; निकलना कठिन हो जाता है, चारो ओर हाथ-पैर पीटते २ हाथ और पैर थक जाते हैं, हाँपने २ सांस फूल जाती है-इम घुट जाता है, अङ्ग प्रत्यङ्ग एकदम शिथिल हो जाते हैं । किन्तु इतने पर भी डूब जाने के डर से हाथ-पैर पीटना बन्द नहीं होता।
फिर निरामा क्यों? - जनक नाँसनब तक आन यदि वहीं इस मैंबर से निकलने में लालना भी मिल गई-किनारे पर भी आ पहुंचे। तो भी क्या ? आने का नाम को दुर्गम है। कहीं से माँद मनुष्य ने इन पंका-कुल बिकट रथ पर दो चार कदम भी परवं नो दलदल में फंस गया ! गाई बलदल में से निकले नोमी आपत्तियां का अन्त न हुआ ! लिई नाबहुलीभवंति, आग बद तो अशान की कठार मिनि में निर टकराया। उनके सामने पाकर नंगश्य और अन्वहायता में महारा लेना पड़ता है। कि नाना प्रकार का अनगल, और अमोच कल्पना कर मन का मनमोना करना होता है। कोई २ नो ऐसा दुर्दशा देखकर कहते है। भारं ! यहाँ न आने को अच्छे रहने । विचार-तरंगिणा में नर का पता राम उठाय- उलटी हानि ही हुई। अब हम को अपनी पूर्वस्थिति पर भी पईचना कठिन है। नदी के उस पार ही त्या त्रुर । अान की बरावर कहीं आनन्द नहीं। कोई यह कहने लगते हैं.नहीं, नहीं. अच्छा हुभा जो हा तक आये। यह तो जान लिया कि जूनी अभेध प्रगाह अन्त्यकार के अतिग्नि आगे कुछ भी नहीं। जो कुछ है, मोदीवार इन्नी पार। भागे तो शून्य ही शन्य है। जितना जाना यही मत-- चाको मन जन्नत है। । ma- फिर निराशा क्यों? कुछ ऐसे भी हैं जो यह कहते है-भाई । ठोक है, तैरने में कट अवश्य हुआ, किन्तु इस से हमार अबाब पुट ही हो गये। हमारी शक्ति बढ़ गई। कदाचित् फिर भबर में पड़ जार्च तो अब डूबेंगे नहीं। अच्छा हुआ जो स्वयं ही जल में घुस पड़े । शायद बढ़ना हुमा जल हर को हमार स्थान से गिरा देता। तो अपने को संभालना ही कठिन हो जाता। यहाँ तक आकर हम यह नमानेंगे कि आने कुछ है ही नहीं। जो कुछ द्रष्टव्य है सो सब दीवार के उसही पार है। और न यही कहेंगे कि इस पार तो केवल धोखा ही धोखा है। यह आलोकित भाग कुछ नहीं ! कोई कहते है-हाँ, वात तो ठीक है किन्तु दीवार अभेद्य है। उसकी दूसरी ओर कुछ है अवश्य । वही सत्य भी है, किन्तु यह नहीं मालूम कि बह क्या है और कैसा है। हमारे पास कोई. अन्धकारभेदी एक्सरन ( X Rays. ) नहीं जो अज्ञान की दीवार को भेदकर पार कर सके और जिन के द्वारा हम उस पार की वस्तु देख सकें। और फिर सच तो यह है कि देखते तो हम अपनो बुद्धि के चश्मे से ही फिर और कुछ जानने योग्य नहीं है. अथवा हपारा ज्ञान सत्य ही कैसे हो सकता है ? एक्सरेज के होने हो से क्या लाभ। संराय के भंवर में पड़ने हो के भर से मानसी गङ्गा के घुग्यसलील में स्नान न करना कायरता है। यही नहीं, वरन् फिर निगशा क्यों? २७ अपने नैसर्गिक अधिकारों को खो बैटना हैभीषण यात्म- हत्या है। "में कुछ नहीं जानता केवल इतना ही जानतेने के कारण शुकरात जानकारों में श्रेष्ठ गिना गया। यह ठीक है, किन्तु इस से यह नहीं लिद होता कि और कुछ जानने योग्य नहीं है अथवा दीवार के आगे कुछ भी नहीं। इससे फेवल यही सिद्ध होता है कि 'खोज करनी चाहिये । पुनः यह कि जिन बातों को हमठीक समझते हैं उनपर बिना विचार किये हमको उन्हें निश्चित विचार कहने का कोई अधिकार नहीं। यह किस प्रकार हो लकता है कि, दीवार के आगे कुछ नहीं है जो स्थान देखा नहीं उसके लिये इसका प्रमाण ही क्या है कि वहाँ पर कुछ भी नहीं। फिर लत्ता की सीमा बाँधने का अधिकार किलको है यह भी शहना युक्तिसङ्गत नहीं कि जो कुछ है सो दीवार के उस पार ही है। इस ओर की सभी बातें भ्रममूलक हैं। क्या हम और हमारे विचार सत्ता की सीमा से बाहर है। यदि ऐसा है तो यह कहना होगा कि सत्ता के बाहर भी कोई ऐसी वस्तु है जो सत्य है, नहीं तो हमें अपने विचार असत्य मानने पड़ेंगे। फिर न तो बह सत्र ही रहेंगे न भूट दी। मूल के नाश होने पर वृक्ष, पन और फल सभी का नाश हो जाता है।
३८ फिर निराशा क्यों: Namo इसका भी क्या प्रमाण है कि हमारी बुद्धि का चश्मा ठीक नहीं। बुद्धि को चश्मा दाहना उसको जान बूझ कर दूषित ठहराना है। बुद्धि चश्मा नहीं मान-सिक नेत्र है। यदि नेत्र का काम देखने का नहीं तो फिर वह नेत्र ही नहीं। और फिर उसके अस्तित्व से ही का? यदि हमारी बुद्धि-द्वारा प्राप्त ज्ञान भ्रमात्मक है तो हम को अपने ज्ञान को भ्रममूलक ठहराने ही का क्या अधिकार ? क्या हमारा एवं भृतज्ञान निदोंग ही रहेगा? सत्ता के महासागर से कुछ भी बाहर नहीं। हमारी बुद्धि भी दूपित नहीं । हम अपनी परिमितता के कारण लव न देख सको, विन्तु जो कुछ हम देखते हैं मिथ्या नहीं। क्या भाग पूर्ण से भिन्न है ? एक चुल्लू भर जल से सारे सागर की जल-राशि की परीक्षा की जाती है। वास्तव में जिस को हम दीवार कहते हैं वह हमारे थके हुए मन की ब्रान्ति है। आगे न चलने की इच्छा ने यह दीवार अपने सुभीते के लिये खड़ी कर ली है। दृश्य पदार्थ को छोड़कर वास्तविक सत्ता का क्या और कोई रुर है ? वास्तविक सत्ता कोई नवोढ़ा स्त्री की भाँती नहीं, जो अपना दिव्य मुख सदा प्रारूप हुश्शों के सधन अवगुण्ठन में छिपाये रखना चाहती हो। वह अपना मुख छिपाये तो किस से ? । स्या उससे कोई बाहर है ? । उसका द्युतिमान आनन ।
फिर निरागा क्यों सदा चन्द्र श्रीर सूर्य की अलौकिक प्रमा में दिखाई पड़ता रहता है हाँ, यदि मान भी लिया कि सब कुछ मम ही भूम है, फिर भूम से लाभ ही क्या ? थोड़ा जानकर बहुत जानना लम्भव है। किन्तु मम में पड़कर निकलना कठिन है। यदि वास्तविक सत्ता अमेय है तो उसके बिना जाने हुए अपने को मम में बताने के लिये कमा प्रमाण भोर ऐले भम की दशा में प्रमाणों की सत्यता का ही क्या प्रमाण ? हमाग ज्ञान परिमिन हो घर भूममूलका नहीं। निसमा निर्मित दीवार भी निश्चल और अमेध नहीं। मान की सीमा दिन मात बढ़ती रहती है। आलोक की वृद्धि हो और अन्धकार का हास न हो? 'स्वर परकाश, तह रन कहाँ पाइये मान बढ़े और अविद्या न जाये? फिर निराशा क्यों? M
मनुष्य की मुख्यता
"ज्ञानं नराणामधिको विशेषः।
भूतानां प्राणिनः श्रेष्टाः प्राणिनां दुद्धिजीविनः
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥
"नरसमान नहिं कवनिहुँ देता।
सुर नर मुनि नत्र बाचा पहा ॥"-तुलसी
The essence of our being, the mystery in us that
calls itself "1",--ah, what words have we for such things ?-
is a breath of Heaven ; the Highest Being reveals himself
in man."
Carlyle.
36
3
"मनुष्य ही प्रकृति का राजा है"
ह वाक्य मनुष्यों का ही है-इसकी सत्यता
का प्रमाण कमा है ? क्या यह अपने मुंह सियां
मिट्ट, बनना नहीं ? हाँ, यह आत्म-प्रशंसा ही
मनुष्य का प्रधान गुण है। इसी के कारण उलको यह राज्याधिकार
फिर निराशा क्यों? प्राप्त हुआ है। अपने ऊपर विचार कर लेना यह थोड़ा गुण नहीं। आत्मश्लाघा में आत्मविचार की शक्ति छिपी हुई है। आत्मविचार ही 'मनुष्य की मुख्यता है। यहो उसको संसार का शिरोमणि बनाता है। अपने ऊपर विचार करना और सारे संसार को भी अपने विचार में उलट पलट डालना बड़ा भारी गुण है सही, किन्त मनुष्य के विचारों की सत्यता का क्या प्रमाण । क्या मनुष्य के अतिरिक्त और कोई जीवधारी उसके कंधन की साखी भरता है? क्या साक्ष्य का न होना दोष नहीं? साक्ष्य का न होना मनुष्य के कथन के गौरव को बढ़ाता ही है। साक्ष्य का न होना मनुष्य की श्रेष्ठता का बड़ा भारी साक्षी है। मनुष्य के कथन को प्रमाणित करने के लिए और किसी गवाह की जरुरत नहीं। ईश्वर भी अपनी आमाओं को मनुष्य ही के द्वारा प्रकाशित करना चाहता है। मनुष्य ही में ईश्वर की माझा प्रहण करने की शक्ति है और वहीं अपने ऊपर शासन कर सकता है। शुद्ध प्रशान्त-चित्त कवियों और पिता महात्माओं की वाणी में ईश्वर के ही भान की झलक होती है। मनुष्य को जो स्फूर्ति द्वारा मान प्राप्त होता है वह ईश्वर के निरपेक्ष एवं निर्विकल्प बानका ही अंश है। मनुष्य की स्फूर्ति ईश्वरीय भान के प्रकाशित होने की माध्यम है। फिर हम पेसे महत्व की यस्तु का बयों तिरस्कार करें।
४२ सनुष्य की मुख्यता। है मनुष्य ही द्वारा लारी सृष्टि मूक से वचाल होती है। मनुष्य ही सारी सृष्टि का मुख है। "ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद" क्या ब्राह्मण मनुष्य में से नहीं ? सारी चराचर सत्ता मनुष्य को अपना मुख बना कर आत्मकथा कहती है। आत्म-कहानी कहने के लिये दूसरे साक्षी की आवश्यकता नहीं । जव डाक्टर पूछता कि आपके पैर में दर्द कैसा है तव पैर का दर्द बतलाने के लिये मुख हो बोलता है। पर अपना हाल नहीं कहता। हाथ भी मुख की गवाही दैने को नहीं आता। पदा मनुष्य भूल नहीं करता ? क्या मनुष्य पाप से बचा हुआ है ? नहीं। मनुष्य भूल अवश्य करता है। किन्तु उसकी भूल भी मतलब से खाली नहीं। भूल ही उसके ज्ञान का मूल है। भूल ही द्वार छिपी हुई सम्भावनाएँ प्रकाशित होती हैं। भूल का संशोधन होने पर सम्भव निश्चय हो जाता है। कल्पना सिद्धान्त की कोटि में आ जाती है। मनुष्य पाप कर सकता है- यही उसकी मुख्यता है, नहीं तो, मनुष्य और पशु में अन्तर ही क्या! यदि पार करने की सम्भावना नहीं तो सत्तार्य करने में भी कोई महत्व नहीं। हमारे दोष भी हमारे गौरव के कारण हैं। फिर निराशा क्यों ?
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-
ह
गा यह
नया इमी पहचान
की पकाना मा गड पर जानी !
मोगमका में नाम निर्मल नियमों के अनुसार ।
को अवश्य ध्यारे जानी माग गन मनाह गार' !
.श्रीधर पाटन
HD
सार के समी महालागर, जिस की एक छोटी
सी लहर है, उसी पना-नागर के हम भी
एक बुदबुद है। हम उस सागर में न भीतर
और न बाहर । उनी महानागर के जलकण हैं। जल-बिन्नु
जलधि से भिन्न नहीं और सिंधु भी बिन्दु से भिन्न नहीं। बिन्दुओं
को छोड़ कर भला मागर कहा?
समस्त दृश्यमान जगत, चराचर सुशि, भिन्न २ सचिवाले
मनुष्य, नाना भाँति के पशु-पक्षी, वन की लहलहाती लोनी
४४ सत्ता सागर । लतिकाएँ 'रंग बिरंगे फूल' निर्मल जल के मनोहर झरने, लहराती हुई सुन्दर नदी, स्वच्छ सलिल से सम्पूर्ण झील, ऊँचे ऊँचे गगनचुम्बी शैल-शिखर, घने और बीहड़ जडलों से आच्छादित पर्वत, सधन श्याम सुहावने मेव तथा अनन्त, शान्त और मनोज- नीलाकाश सबके सब एक ही महती सत्ता के अंग प्रत्यंग है चेतन-संसार अचेतन के ऊपर निर्भर है और अचेतन चेतन के ऊपर । किन्तु दोनों ही एक ही सत्ता के अङ्ग हैं। और वह सत्ता इनसे भिन्न नहीं अथवा न अचेतन चेतन ही से भिन्न है। क्या अचेतन-संसार, जिसकी गोद में चेतन संसार पाला पोसा गया और हष्ट-पुष्ट हुआ, चेतन से भिन्न हो सकता है। चेतन और अचेतन एक दूसरे के सहायक हैं। यही उनकी एकता का मूल है। इनको प्रतिकूल कहना भूल है। दो प्रतिकूल पदाथों में भला सहकारिता केसी!! जड़ न तो चेतन का कर्ता है और न चेतन जड़ का। दोनों एक दूसरे के रूपान्तर हैं। चेतन ने जब मौन व्रत धारण किया तब वह जड़ हो गया और जब जड़ बोलने लगा तब फिर वही चेतनता को प्राप्त हो गया। जड़ चेतन में कुछ भेद नहीं था, भेद केवल धर्म का ही है। धर्म भी ऐसे नहीं जो एक दूसरे के प्रतिकूल हो। सहयोगिता ही उनकी लक्षण है। वे एक दूसरे की पूर्ति करते हैं । स्त्री-पुरुष की भाँति एक दूसरे के ( परस्पर ) फिर निगगा क्यों सहायक है। दो होत हुप भी एक हैं। दोनों ही मिल कर सत्ता को पूर्णाङ्ग बनाते हैं। इस सत्ता-सागर में मनुष्य की क्या स्थिति है ? मनुष्य ही द्वारा जड़ और चेतन की पूरी सहकारिता प्रक्रटित होती है। वएड में पिण्ड का प्रतिविम्ब है। मनुष्य ही सत्ता सागर का छोटा सा चित्र है। मनुष्य क्या इस सत्ता का अंतिम फल है: क्या इससे बद कर कुछ और नहीं? यह महान पुरुर देवों का देव है, जिन्सको तेज से फल और वृक्ष दोनों ही पुष्टि को प्राप्त हो रहे है। दोनों ही जिस के अङ्ग है, इस सत्ता का संचालक और बुनिबल है । उसी के त्रुद्विवल के सहारे हमारा भी त्रुद्विवल काम करता है । हम उसी से अपना आदन पाते हैं। पूर्ण की सत्ता के कारण अपूर्ण के पूर्ण होने की आशा है। नहीं तो अपूर्ण में पूर्ण का भाव कहाँ से आया । मनुष्य में जड़ और, वेतन की एकता है। वह अपूर्ण तो है मतः पूर्णता की ओर दौड़ रहा है। उसी में पूर्णता की अलक मिलती है। उसी के अस्तित्व से जड़ की जड़ता भौर, चेतन की चेतनता का आभास होता है। मनुष्य के शान से ही इस बात का भनुमान होता है कि यह विचित्र संसार प्रत्यक्ष मात्र से सीमा-बद्ध नहीं। चरन इसके आगे भी कुछ है ।
मनुष्य की आशायें और उच्च आदर्श उलको पनिगिन की ओर
से अपरिमित की ओर मोड़ ले जाते है। इनके द्वारा हमको
दीवार के उस पार की झलक मिलनी है।
यदि हम पीछे की ओर देखते हैं तो साहनों वर्ष की रक्षित
सम्पत्ति हमारे लिये रवावी हुई है : केवल उठा लेने भर की दर है।
यदि आगे की ओर दृष्टि डालत है तो अनेकानेक सम्भावना
हमारे लिये विद्यमान है। अपने शरीर द्वारा मारे जड़ जगत से
हमारा सम्बन्ध है। हमारं शान और आदशों द्वारा पूर्ण चंद्र
'परमात्मा से हमारा योग है। इस संसार में हमारी शिति
अपूर्व है । समूची चराचर सृष्टि में सर्वापेक्षा पूज्यतम जो पदार्थ
है उससे हमारा सम्वन्ध हैं।
फिर निराशा क्यों?
~
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mamtari Anema M- Pawanleonander । समष्टि व्यष्टि। गदा मृतपथन्भायमानुपश्यान नन एन व विस्तार कामगादेनदा । श्रीग: गवद-नाना र २ Abr xxxs:-..' A YON : titi thi.! nare the tre C Hotame.xindaiantratims.:.. a -~-Sirhindre T.gam. मैं और यह साक्षात् दृष्टिगोचर संसार क्या एक ही ह । पपा मैं और मेरा पड़ोसी दो व्यक्ति नहीं है उसका धन मेरे लिये वर्जित है और मेरा धन भी उसे प्राप्त नहीं हो सकता मेरे विचार और उसके विचारों में भेद है हम दोनों ४८. समष्टि व्यधि। ? का अनुभव एक नहीं हो सकता। क्या फिर भी हम और वह एक है ? हम और यह दृश्यमान जगत एक नहीं हो सकते। क्यों क्या इस संसार में हमारा पालन पोषण नहीं हुआ है। क्या इस संसार की पृथ्वी से उत्पन्न अन्न हमारे शरीर को पुष्ट नहीं बनाता। हम केवल शरीरी नहीं हम ज्ञान स्वरूप है। विना अय के ज्ञान ही किस प्रकार हो सकता है। भला विना कार्य के कर्ता कहाँ ? 'समूचे संसार की बात जाने दीजिये । हम और हमारे पड़ोसी एक नहीं हो सकते। हमारे शरीर और हमारे विचार भिन्न हैं क्या मेरा व्यक्तित्व मेरे शरीर ही में है?। नहीं, मेरा शरीर पञ्चभूतों से पृथक नहीं। क्या मेरा शरीर मेरे माता पिता के रजोवीर्य से उत्पन्न नहीं हुआ ?। उनका भी शरीर आकाश से नहीं आता। उसकी भी उत्पत्ति इसी प्रकार हुई । इस शृङ्खला में पड़कर मेरे शरीर का व्यक्तित्व कहाँ रहा। मेरे पड़ोसी के भी शरीर का व्यक्तित्व कहाँ ? | क्या पीछे हटते २ हम दोनों के शरीर एक ही मूल-शृङ्खला में बद्ध न हो जायेंगे ? । क्या कोई आदि पुरुष हमारे शरीर को उत्पन्न करने वाला नहीं? क्या हमारे विचारों की भिन्नता हमारे पार्थक्य का कारण है क्या हमारे विचारों का एक कोई मूल कारण नहीं ? । क्या मेरे:
फिर दिनमा सयों
विचार मेरे ही है ? ,पया मन अपने विचारो को अपने समाज
से नहीं पाया है ? क्या हमें और हमारे पड़ोसी को एक ही
प्रकृति की पाठशाला में शिक्षा नहीं मिली है? का मार्ग और
हमारे पड़ली की भाषा एक नहीं ? दिम नो मनार मनात
से बाहर अन्टग २ रख दिये गाने ने मारे विचार यह
धाते ?
फिर क्या भेद की स्थिति संसार में नहीं? ! मैं क्या बन
है।। नहीं। यदि मंद समई को या उलार नीरस है। पेना
कहने में इनकी स्थिति ही अनुम्भव हो जायगी। भेद के बिना
एकता ही भूम है। भेद नहीं तो भला एकता का मान बिल
प्रकार होना सम्भव है।
भेद ही द्वारा बता भी अपनी वास्तविक सत्ता को प्रकट करता
है। 'एकोऽहम्' बहुम्यामि । यही नियम नारी मटि में वर्तमान है।
एक के अनेक और अनेक होपारमी का होना यही उल्ननि या
मून्दमंत्र है।
भन्टा, एक की अनेकना किस प्रकार ? और अदिक धोकर भी
उनकी एकता कहाँ? मारी ग्मृष्टि या क्रम पक की अनेकता ही
से चलता रहता है। एकोऽदा बहुल्यामि' या संकल्प प्रतिक्षा
टुहराया जाता है। विचार में पार्थक्य होना कहिन नहीं प्रार्थन
चहीं बाहर से नहीं आता। कश स्वप्न में एक ही व्यनि, जाना,
?
५० समष्टि व्यष्टि । ज्ञान और नेय में विभक नहीं हो जाता क्या मेरे दो अहंकार नहीं. हो जाते? अहंकार ही भेद का मूल है। किन्तु यह मुझ से बाहर नहीं । इसी मेद के कारण ज्ञान और विचारों में भी भेद हो जाता है। इस भेद का अन्त नहीं। शाखा प्रशाखाएँ बढ़ती जाती हैं। विभागों के भी विभाग होते जाते हैं, किन्तु प्रत्येक विभाग में पूर्णता की झलक वनो रहती है। इसी में भागों की एकता की आशा हैं। भाग जब तक अपने आप को पूर्ण के साथ सम्बन्ध में नहीं देखता तक ही तक भाग है-यही तो माया है। परिमितता ही को माया कहते हैं। भाग जब अपने आप को पूर्ण के साथ. अनिष्ट सम्बन्ध देख लेता है तब सम्पूर्ण हो जाता है। यह सम्बन्ध क्रिया ही में प्रत्यक्ष होता है। पूर्ण का भाग भी पूर्ण होता है। भेद और अहङ्कार संसार की स्थिति के लिये आवश्यक है। भेद ही संसार को सरस बनाता है। भेद से क्रिया की उत्पत्ति होती है। क्रिया में भेद की वृद्धि और क्षय दोनों ही के मूल हैं। अहङ्कार जव भेद की यथोचित सीमा का उल्लंघन कर जाता है तभी निन्द-नीय कहलाता है। अहङ्कार रखते हुए भी हम अपने को पूर्ण के सम्बन्ध में देख सकते है। व्यक्कि होते हुए भी हम और और व्यक्तियों से मेल कर सकते हैं-यही व्यक्ति और समष्टि की एकता है, यहो विन्दु का समुद्र हो जाना है। हम अपने
किर समावमा
५१
२
व्यक्तित्व को गवते हुए भी एक महान व्यक्ति के व्यक्तित्व में
सम्मिलित नह सकते हमारे रुधिर के कीटाणु पृथक २ होते
हुए भी हमारे शरीर के व्यनित्य में एक हो जाते हैं। हमारे
भिन्न र विचार हमार अहार के व्यक्तित्व के अन्तर्गत हैं। व्यष्ठि
मा मिन्न २ होते हुए भी समणिप से एक है। बिना
समष्टि व्यष्टि का अस्तित्व सम्मत्र नहीं और व्यष्टि से बाहर
नमष्टि कोई पदार्थ नहीं। समष्टि व्यष्टि के समूह में अधिक
तो हो, किन्तु इसन भिन्न नहीं। वृद्ध वन में अन्टग नहीं और
जो वन को वृक्षा में बाहर ददता है उसे वन प्राप्त नहीं हो
सकता : अनेक होते हुए भी एक हैं। हमारे मन में ही हमारी
लता की जड़ है।
फिर निराला क्यों?
卐
-
हमारा कर्तव्य
.
។
और
हमारी कठिनाइयाँ
"हारियन हिम्मत बिसारिये न हरिनाम"
Act act in the living present.
Heart within and God o'erhaad.
~~~Longfellow.
"हिम्मतए मरदा मदए खदा ।
य
ह सत्ता-सागर एक रस नहीं। इसमें भेद
अभेद दोनों ही का संयोग है। यह संसार
चित्र विचित्र है, किन्तु, यह एक ओर जाने का
यत्न करता है। यही इसकी एक रस्ता है
चिनता ही इसका गौरव है। इस विलक्षण संसार को मनुष्य
लक्षात नेत्र रूप होकर देखता हैं। देख २ कर सुखित भी होता
है और दुःखित भी
हमारा कर्तव्य । इल सुविस्तृत सागर में एक ही प्रकार की लहरें नहीं उठती कुछ लहरें प्रवाह अथवा धारा के अनुकूल हैं और कुछ प्रतिफल भी। प्रतिकूल तरों लोत के बेग को रोक नहीं सकती, किन्तु उसको सन्द अवश्य कर देती हैं। हम लोग भी इन्हीं लहरों में से है। हम लोग लहरों के ऊपर के तिनसे नहीं वरन, स्वयमेव लहर ही है। सागर का प्रवाह निश्चित करने में हमारा भी कुछ हाथ है। भेद रहते हुए भी अनुशलता और सामञ्जस्य सापित करना हमारा काम है। सत्र लहरों को प्रवाह ला लहों को प्रवाह के अनुकुल बना कर प्रवाह की गति को निश्चित करना हमारे कर्तव्य से बाहर नहीं ! यही है-किया-द्वारा भाग की पूर्ण ले एकता करना। हमारे कर्तव्य ही में हमारी किया और हमारे ज्ञान की भी एकता है। लत्ता-सागर की गति को ठीक ओर चलाने में योग देना हमारा परम पुनीत पार्नव्य है। इसको द्वारा हम अपनी तथा सारे संसार की नियाओं को ईश्वर की इच्छा के अनकृल बनाकर मर्त्यलोक को स्वर्गलोक में परिणत कर सकते हैं। संसार में सामञ्जस्य स्थापित करनेवाली निया की उत्पनि कहाँ से?। प्रेम ने इस निया का जन्म होता है। फिर प्रेम कहाँ से आया ? । समग्र संसार को शोभा सम्पन्न और आत्मरूप करके मानने से प्रेम आविर्भूत हुआ। समस्त संसार को
५४
फिर निराशा क्यों:
शोभामय सानना ही सौन्दर्योपासना है। इसी से विश्वम
का जन्म है और प्रेम ही सारी क्रियायों की सञ्चालन-शक्ति है।
प्रेम ही सञ्चालन-शक्ति-समान है सही पर क्या हम इस
महान कार्य को सम्पादन करने में समर्थ हैं ?।
क्या सुन्दरता-
के साथ ही साथ कुरुपता नहीं लगी हुई है ?, फिर सौन्दर्यो-
पालना कहाँ ?
क्या हम इस संसार के प्रवाह को ठीक २ रीति से चला.
सकते हैं ?। क्या हम अपूर्ण नहीं ? । क्या हम पाप-ताप-तप्त.
नहीं ? । क्या दुःखरूपी प्रतिवाधक शिला इस सागर-तल में
नहीं ?!
इल कर्मयोग ले क्या लाभ ? | क्या इससे हमारी परिमितता.
का नाश हो जायगा ? । फिर हमारा नेता कौन? |
ये सारी कठिनाइयाँ ही हमारे गौवर का कारण हैं। कठिना-
इयाँ ही हमारी गति को आगे बढ़ायेंगी। विशाल शिलाओं और
पर्वतों से लमुद्र का वेग घटता नहीं, वरन् बढ़ता ही है। हम
हिम्मत करेंगे तो ईश्वर भी हमारी मदद करेगा।
फिर निराशा क्यों?
-
.
न - सौन्दर्योपालना। R “) Lariy! We recoire but, whai 10 givo and in our life aiono doul naturo live." .... ODI.' MANA समें सम सुन्दर सबै, म कुन्दप न कोय । जावी नि ती जित, तिन तेती विसोय || - mein T4 MALSwam व गगनारोहो तुपार-मण्डित पर्वत-श्यहो, वर्षा- वानि-विलोड़ित नदियों, लवन-श्याम मेघ- मालाओं, नवकिललय-शोभित वृक्षा, नूतन पल्टन और कोमल फलियों से विभूषित लतिकायों, नीलाकाश के प्रशस्त अञ्चल पर हीरक-बएड से जगमगाते हुए शुन नक्षत्रों और विमल सलिलबाही मधुर निनादी निर्गन को देख- कर हमारा मन-मयूर प्रमोन्मत्त-गुलक-मुकुलित हो-नाचने लगता है, उस समय हम को अपनी ओर दृश्यमान संसार की । ५६, पर निराशा क्यों? एकता का अनुभव होने लगता है। यह शोसामय दृश्यमान जगत् जिसके द्वारा हम अपने सौन्दर्य के आदर्श को प्रत्यक्षी- भूत कर रहे हैं, हम से भिन्न नहीं है। यदि हम से यह वस्तुतः पृथक ही है तो भला किस प्रकार हमारे चित्त को चकित और चलायमान कर सकता है। यह सुन्दर संसार जिल आदर्श का अनुगमन कर रहा है वह आदर्श हमारे आदर्श से भिन्न नहीं। प्राकृतिक दृश्यों द्वारा समष्टि के आदर्श के साथ व्यष्टि के आदर्श की समानता दिखाई पड़ने लगती है। यह दृश्य ही ईश्वर की भापा है। जो लोग इन दृश्यों को देखने से उदासीन रहते हैं वे ईश्वर के साननीय वचनों का निरादर करते है सौन्दय्यों पासना में ही मनुप्य और दृश्यमान जगत की एकता का सच्चा प्रमाण मिलता है। जब हम कोकिल के कल कूजन में, भ्रमरावली के मधुर गुञ्जार में, मछली के स्वच्छ गम्भीर जल में उछल कर विधु लता की ली चपलता दिखाने में, सदोन्मत्त गज- राज की मदभरी चाल में, सिंहनी की क्षीणकटि में, मृगशाचक के तरल और कातर नेत्रों में, काल और शिरीष पुष्पों की कोम- लता में, रस्मास्तम्भों की लक्षणता में, हिम और कपूर की दिव्य धवलता में, पूर्ण शरदिन्दु की सुंधा-सनी शीतलता में, आकाश की निप्कलङ्क नीलिमा में, उष:कालीन नवीन मेघों की मनोरम सौन्दर्योपासना। ५७ लालिमा में, राजहंसों की मन्द गति में, कपोत-कपोती की कीड़ा- कम्पित ग्रीवा में, विद्रुम की विचित्र अरुणाई में, फलभार-नमा रसाल-शाखाओं की नमुना में, करि-कलम के शुत्र शुण्ड के कम- नीय आकार में, निविध समीरः और रजतमची शरमन्द्रिका की मृदुल मन्दमुसकान में, स्त्री और पुरुषों की अलौकिक सुन्दरता को आदर्श उपनान उपमेय-रूप ने स्थिर कर. 4 मास्पद वस्तु के मनो- हर रूप की प्रशंसा करते है, उस समय हम अपनी लौन्दव्यों- पासना में सार संसार की एकता का परिचय देने लग जात सौन्दव्योपासना-द्वारा हुम सुन्दर वस्तु के अस्तित्व को सार्थक कर अपनी और समूचे संसार की एकता की स्थापना करते है। किन्तु हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि, सुन्दर वस्तु तभी तक सुन्दर रहती है जब तक हम उससे किसी प्रकार का लाभ उठाने की चेष्टा नहीं करते है। जहाँ लाभ उठाने की चेष्टा की गयी बस, सीन्दव्योपासना के यत्नास्ति आनन्द का लाभ हाथ से जाता रहा। जो लोग सौन्दव्यं को सौन्दर्य की दृष्टि से देखते हैं उनके हाथ सौन्दर्य नहीं आता और जो लोग सौन्दर्य को निरस्वार्थ दृष्टि से देखते हैं उनके लिये संसार के सारे सुन्दर पदार्थ सुलभ है। स्वामी रामतीर्थ ने क्या हो अच्छा कहा है.-- ५८ फिर निराशा क्यों! "अपने मजे के खातिर, गुल छोड़ ही दिये जब । रूए जमीं के गुलशन, मेरे ही बन गये सब ।। खुद के लिये जो मुझ से दीदों की दीद छूटी । खुद हुस्न के तमाशे मेरे ही बन गये सव ।। एवा मछली पकड़ने वाले शिकारी को मछली उतनी ही सुन्दर प्रतीत होती है जितनी कि वह एक सहृदय सौन्दर्योपासक को ? । फूल को गाँछी से अलग कर लेने पर हमें अनुभव हो जाता है कि, उसका पहले का सा रूप, रंग, सुगन्ध और सौन्दर्य नहीं रहता। सुन्दरवस्तु को अपनी सुन्दरता स्थिर रखने में सहायता देना ही सची सौन्दर्योपासना है। यह उपासना अखिल-विश्व-व्यापिनी है। इसमें कोई साम्प्र- दायिक भेद नहीं। यही सच्चा केथोलिक चर्च ( Catholic church ) है। इस में रोमन और ऐंग्लीकन का भेद नहीं। इस महती उपासना-द्वारा हम उस विश्व-सौन्दर्य की झलक पाजाते हैं। जिससे संसार भर की सुन्दर २ वस्तुओं को अनूठी सुन्दरता मिलती है। वही सच्ची स्वर्गीय सुपमा उच्चादर्श रूप से सदा हमारे मानस-मन्दिर में विराजमान रहती है। समष्टि और व्यष्टि के आदर्शका मेल हो जाता है। खोई हुई वस्तु अपनी गाँठ से छुटी हुई अमूल्य मणि-मिल जाती है। सौन्दर्योपासना द्वारा जड़ चेतन का ही रूपान्तर दिखाई देने लगता है।
मौन्दर्योपासना।
यह शोभामयी दृष्टि हमारे सुन्दर बनों की वास्तविक सूर्ति
बन जाती है। लमटि-व्यष्टि का सास्य सहज ही में बन जाता है।
हमारा तारागार ही हमारा मनोन चिन्लान-भवन बन जाता है
?
फिर निराशा क्यों
-
है
कुरूपता
Har around and beyond whatovor is exceptional
and illustrious in human lifo sirotelies that which is:
average and unpereoivod; all distinctions. all attain.
menus, all signal heauty, skill, wit and whatever a
man Cill oxhibit in himself, swim inel aro lost in
that great ocoa 11."
201lins (ur:SITE.,
"दीने दई गुलाब की इन डारन ये फल"
"गुले नेस्त कि ख्व्वारे न वाशद"
भौंरा काला है कुरूप है, हम है सुन्दर मत समझो ।
उस वसन्त का है वह साथी, जिसके तुम कहलाते हो ।'
'कमलाकर
.
।
.
सौ
न्दर्य की उपासना करनी उचित है सही पर
क्या उसी के साथ साथ कुरूपता घृणास्पद
वा निन्ध है? नहीं, सौन्दर्य का अस्तित्व
फिर निराशा क्यों है? ही कुरूपता के ऊपर निर्भर है । सुन्दर पदार्थ अपनी सुन्दरता पर चाहे जितना मान करे किन्तु असुन्दर पदार्थों की स्थिति में ही वह सुन्दर कहलाता है। अन्यों में काना ही श्रेष्ठ समझा जाता है। कुरूपता के पक्ष में कुछ और भी कहा जा सकता है। रूप- हीन वस्तु ही रूपवान वस्तु का आधारभूत और पालक-पोषक है। कीचड़ से ही कमल की स्थिति है गुलाब भी कटीले वृक्ष में उगता है। मोनी नीपले पैदा होता है। रन क्षार समुद्र से निकलता है। मणि स्वाति से निकलती है। गजमोनिक हस्ती के मस्तक से निकलता है। कीट कीट से रेशम उपजता है। शून्य नीलाम्बर में चन्द्रोदय होता है। दुल्द पर्वतों के अन्धकारमय गहरों में भाँति भाँति की वनौषधियाँ विद्यमान रहती हैं। बड़े बड़े बीहड़ जङ्गलों में सहज सलोने मृगछौने रहने है। इसी प्रकार , पुग्यों का प्रादुर्भाव वृक्षों से और सवन सुन्दर पल्लवों से लुशोभित शाखाओं की स्थिति सुखी और मोटी २ जड़ से है। मनुष्य की स्थिति वनस्पतियों पर और हरी भरी लहलहाती वनस्पतियों की स्थिति जल, वायु और मिट्टी के ढेलों पर निर्भर है। भृली निकल जाने पर चावलों में से अंकुरित होने की प्राक्ति जाती रहती है। आपके सुन्दर वस्त्र, जिनसे आप की सुन्दरता बनी हुई है. कहाँ से आये? चे मिट्टी के देले, जिनसे कपास की उत्पत्ति
१२
कुरूपता।
,
हुई, क्या वे बड़े रूपवान थे ? वह बेचारा श्रमसहिष्णु कृषक,
जिसने दिन रात परिश्रम करके कपास के खेत को उपजाऊ और
हरा भरा बनाया, क्या वह भी आपही की भांति कोमल और
मार था ?। क्या वह लोहे की चखों ( मशीन ), जिसमें कपास
साफ की गई थी और जिसके द्वारा कपास सूत में परणित हो कर
सुन्दर वस्त्र रचने को योग्य हुई, काले २ कोयलों की ढेर से नहीं
'चलाई गई थी? | मिल' में काम करने वाले लोग भी सब के
सव आपही की भाँति सुकुमार और सुभग मुवेश वाले न होंगे।
किन्तु यदि यह सब कुरूप पदार्थ न होते तो आपके सौन्दर्य्य
की वृद्धि करने वाले ये सब पदार्थ कहाँ से सुलभ हो पाते ? ।
सत्तासागर में दोनों ही की स्थिति है। दोनों ही एक तारतम्य
में बँधे हुए हैं। दोनों ही एक दूसरे में परिणत होते रहते हैं।
"फिर कुरूपता घृणा का विषय क्यों?।
रूपहीन वस्तु से तभी तक घृणा है जब तक हम अपनी
आत्मा को संकुचित बनाये हुए बैठे हैं। सुन्दर वस्तु को भी हम
इसीकारण से सुन्दर कहते हैं कि उसमें हम अपने आदी की
झलक देखते हैं
आत्मा के सुविस्तृत और औदार्य पूर्ण हो जाने पर सुन्दर
और असुन्दर दोनों ही समान प्रिय बन जाते हैं। कोई माता
अपने
पुत्र
को कुरूपवान नहीं रहती। इसका यही कारण है कि
फिर निराशा क्यों?
चह अपने पुत्र में अपने आपको ही देखती है। जब हम सारे
संसार से अपने ही आप को देखेंगे तब हमको रूपवान भी
रुपवान दिखाई देगा। यदि चखा न भी हो तो कोई चिन्मय
नहीं पर, रूपहीन वस्तु से घृणा तो अवश्य ही जाती रहेगी। मानव
शरीर के ही अंग प्रत्यंग एक ही समान रननी सुन्दर नहीं होने !
रूपहीन पदार्थ निरादर का विषय नहीं-निरस्कार को पात्र
नहीं। वह भी उली नुविशाल, लात्तालागर का एक कण है,
जिसका नुन्दर पदार्थ। रुपवानों का उदय भी कुपवान
‘पदार्था से ही होना है। मिट्टी और ग्वाद के कण सुन्दर सुरमित
सुमनों में परिणत होते रहते हैं। अतिशय कर्कश, टे और
रुखड़े पत्थरों से ही मनोमुग्ध-कारिणी, हृदयग्राहिणी एवं दृष्टि-
उन्मे पिणी भूर्तियां रची, जाती हैं। जो आज कुलपवान वस्तु है
चही कल सुरूप-वान बन जावेगी।
फिर निराशा क्यों?
-
1
विश्वप्रेम और विश्वसेवा ।
-
बास उसी में है विमुवर का, है वस सच्चा साधु वही।
जिसने दुखियों को अपनाया, बढ़कर उनकी बांह गही ॥
आत्म स्थिति जानी उसने हो, पर हित जिमने व्यथा राही ।
पर हितार्थ जिनका वैभव है, है उनसे यह धन्य मही"।
'मैथिलीशरण "
प्रम-पण्डित ही प्रकृत अद्वैत को है जानता,
ईश को संसार में सर्वत्र सब में मानता।
है न उसके चित में हिंसा-प्रवृत्ति वलीयसी ॥
है उसे सब ही जगत विश्वेश की वाराणसी ॥
--कमलाकर ।
जी से प्यारा जगत-हित औ लोक
सेवा जिसे है
प्यारी! सच्चा अवनितल में आत्मत्यागी वही है
-प्रियप्रवास।
सार के सभी प्राणी-मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट,
पतङ्ग इत्यादि-स्वहित-साधन में तत्पर रहते
हैं। अपने ऊपर प्रम करना किसी से सीखना
नहीं पड़ता। अपने लिए सब के सब उदार ही
स
फिर निराशा क्यों? है। हाँ, यह ठीका है कि मनुष्य स्त्रलावत ही अपने कमर प्रेम करता है। किन्तु ऐसे लोगों की गंन्या बहुत थोड़ी है, जो अपने से अतिरिक्त और किनो व्यक्तियों को प्यार करते हैं। मनुष्य अपने हित-चिन्तनले लाथ दूसरे का भी हित-चिन्तन कर ही लेता है। ऋ का रातिक र सप्य के हृदय-क्षेत्र ले दमा के कोमल चीन नितान्त नष्ट नहीं हो जाते। कसी कमी समय पाकर अंकुरित हो आते हैं। निष्ठुर व्याध दिन भर भीषण हत्या-काएड में प्रवृत्त रहता है-किल अर्थ? अपने और अपने पाल वगों के भरण-पोषण के निमित्त। अपने प्यारे बच्चों के लिए तो निष्काण च्याध का सी हृदय अत्यन्त लुकोसल हो जाता है। ऐसे २ नर-पिशाच, जिनका हृदय कमी किती के लिये दया और प्रेम-प्लावित नहीं हुआ हो, शुपमा बैज्ञानिक अथया अर्थशास्त्र-विशारद पण्डितों के विभी- परापूर्ण मस्तिष्क में घुमते हों तो हों, किन्तु इन प्रत्यक्ष दृश्यमना जगत में तो बस्तुनः वाही ऐले पामरपतित नहीं दीख पड़ते। भयंकर बाघ भी बावनी पर आसत हो उसके लिये अपनी भारी भयंकरता भूल जाता है । कालसाप बर्ष अपनी प्यारी नागिन के लिये अपनी दुर्द मनीय विपली शक्ति भूल कर कोरल कलेवर धारण कर लेता है। ऐसा कोई नहीं जो किसी न किसी काल में 'अपनी व्यक्तिता न छोड़ता हो। जहाँ व्यक्तिता गयी वहीं प्रेम की 1 ६६ विश्वप्रेम और विश्वसेवा । विजय-ध्वनि हुई। बस, सभी विश्वव्यापी पवित्र प्रेस के अधीन हैं। प्रमदेव के वशीभूत होने पर फिर व्यचित्व कहाँ ? प्रेम के प्रज्वलित पुनीत-पावक में पार्थक्ष्य का नाश हो जाता है। जहाँ प्रेम है वहीं व्यक्तित्व का त्याग ( अभाव ) है। प्रेम में ही आत्मा के कोन्द्र का विस्तार दिखाई पड़ता है। जहाँ एक बार व्यक्तिता का त्याग हुआ; बस फिर कोई सीमा वाँधना वृथा है। जब अपने व्यक्तित्व का नाश हो गया. तब सारे भेद भी उसी के साथ छिन्न भिन्न हो गये प्रम का अर्थ ही है-व्यक्तित्व का परित्याग । और फिर, जहाँ यह ज्ञान हो कि लव स्थानो में एक ही पूतात्मा का प्रकाश अथवा विकास है, प्रेस-को हुए जल-सोत की भाँति सारं बन्धनों को तोड़-फोड़कर-चारोओर फोलने लगता है। प्रेम का शुद्ध लोत अथाह है। प्रेम की स्यमाविक वृद्धि विश्वप्रल द्वारा सम्भव है। भौतिक पदायों की सौति प्रेम की परिस्थिति नहीं। व्यापकता के साथ इसकी तीव्रता घटती नहीं वरम् ऊत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है। विश्वप्रम उन्हीं के लिये कठिन एवं दुल्लाध्य है जो अपनी आत्मा को पञ्चमहाभूतों का ही गुण मानते हैं। प्रकृतिवाद व्यक्तित्व से बाहर नहीं जा सकता। किन्तु प्रतिवादी भी व्यकिता. से बाहर जाने का यत्न किया करते हैं। वे भी परहितं.
फिर निगगा क्यों?
६७
साधन के पक्षपाती है। प्रकृतिवादियों की आत्मा हमारी आत्मा
से भिन्न नहीं। जब विन्तार हो आत्मा का गुण है तब फिर
आत्मा के विस्तार को और रोक सकता है। जादु वही है जो
सिर पर चढ़ कर बोले?
क्या हम को प्रतिक्षण इस वान के प्रमाण नहीं मिलत कि हम
इस क्षुद्र शरीर में संकुचित नहीं? हमार आदर्श हमें अपनी परि-
मितता से बाहर ले जाने है। हमारी दह और इन्द्रियाँ परदेशीय
हो कोही सही पर हमारी आत्मा में एक-देशोचना का लेगादात्र
भी नहीं।
अत्याका बिल्ला जितना बढ़ाओ उतना ही पहना जाता है।
जैन्ने हामी औदार्यमा सहृदयता की मात्रा बढ़ती जाती है
बैलही हमारी आत्मा का वृत्त बढ़ता जाता है। साधारण
मनुष्य के लिए उनका बर ही उसकी आत्मा है। जानि-डया-
रक के लिए जानि हो और सनिर्माता कं किए गए ही उनकी
आन्ना है। नाराजी की आन्ना गिज परिका, दुम और
जाति में ही संकुचित नहीं रहनी । उनी न्यायालदिन देत
परत करना है। देश कारेकर उनका है। जिल्ला
बाल ने दिलासा सुन बालंकित हो-उली बाल से उलेमी
दामा दुःला होता है। जिसमें देवानका मुख उसयल हो
लांछन छुः जार-तक उन्नत होनही उन मागक्त को एक
मा
।
Nat
६८ विश्सप्रेम और विश्वसेवा । आत्मा का मानन्द का प्रधान कारण होता है। मनुष्य मात्र की हितकामना करने वाले की आत्मा का विस्तार देशहितपी की आत्मा के विस्तार से भी वृहत् है। फिर तो, प्राणिमात्र से अविरल प्रेम करने वाले महापुरुष की आत्मा का कहना ही क्या है। वह तो समधि की आत्मा से एक हो जाती है। केन्द्रभूत आत्मा के वृत्त का जितना ही वृहत् विस्तार बढ़ता चला जाय उतना ही अमोध आनन्दामृत की वृष्टि होगी-यह मिट्टी की काया कञ्चन की हो जायगी-इसी धरती पर स्वर्ग भी उतर पड़ेगा। विस्तार केवल इस बात को जान लेने ही से नहीं बढ़ता कि हम सब एक ही हैं। मह ज्ञान विश्वग्रेस और विश्वलेवा के लिए परमावश्यक है। किन्तु इनका प्रत्यक्षीकरण अथवा स्पष्टीकरण चिना प्रेम और सेवा के नहीं होता। विश्वप्रम और विश्वसेवा ही द्वारा व्यक्तित्व का जटिल बन्धन छूट सकता है। सेवा ही द्वारा अपनी आत्मा का पूर्ण विस्तार जाना जा सकता है। विश्वप्रेम से ही समष्टि व्यष्टि का एकीक- रण हो सकता है। विश्वलेवा ही द्वारा आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है। प्रेम और सेवा द्वारा व्यक्ति की परिमितता जाती रहती है। संकोच का अकुञ्चित विस्तार हो जाता है-सङ्कीर्णता के स्थान में प्रशस्तता का तज्य हो जाता है। सत्सेवा के सहारे हम सच्चे विजयी बन सकते हैं सारे संसार को अपना बना
फिर निगशा क्यों
सकते हैं- कलियुग को कृतयुग में पलट सकते हैं-
फिर निराशा क्यों ?
अपूर्ण की पूर्णता।
++
अनुगन्तुं सतां वन तर यदि में उसने
स्वसमानुगंतव्यं मार्गस्थोऽवसीदनि ।
What I aspired to the
and was not comforts me.
-~~-ROBERT BRO : I.
तुप्य अपूर्ण है' -या यह उसके लिए लना,
अपमान और निराशा का विषय है ? । प्या
मनुष्य परिमित है ?। और, क्या परिमितता
दोषों की गणना में आने योग्य है ? । मनुष्य
कैले परिमित हो सकता है। यदि मनुष्य
परिमित है तो अखिल विश्व में कोई अपरिमित वस्तु नहीं । कारण.
कि, परिमित परिमित ही से परिमित हो सकता है। माना कि,
मनुष्य परिसित है, अतः अपूर्ण भी है, तो क्या अपूर्णता में कोई.
म
T
1
फिर निरागा क्यों ! विरोयता नहीं ? | हमारी अपूर्णता ही हमारी विपना है। इसी का हमें गर्व है-इली में हमारा गौरव है । अपूर्णता ही में पूर्ण वृद्धि और उन्नति की आशा है। बद्ध होने पर ही मोक्षोनी है। अपूजता ही जाती जागती वस्तु है। अपूर्व की सम्भावनाय अपरिमित है । वे चाहे जो कुछ हो सकती हैं । अपूर्ण की अपरिमित सम्भावनाओं में उसकी पूर्वता है । अपूर्ण हो कर भी जो अपने को सत्कम्मरुद्ध परायण बनाते है उन्हीं का समुचित सम्मान किया जाता है। इसी कारण मनुष्य- योने को सर्वश्रेष्ठ कहा है। उसकी अपूर्णता ही से सत्कम का मूल्य बढ़ जाता है । वह सहज ही में परमगति प्राप्त कर लेता है। इसी कारण देवता लोग भी नर-शरीर धारण करने के लिप लालायित रहा करते हैं। औरों का तो कहना ही क्या ! स्वयं पर- मात्मा भी अपूर्ण का महत्त्व बढ़ाने के अर्थ संसार में अवतीनं होते रहते हैं । भगवान् अपनी नर-लीलाओं द्वारा अपूर्ण की अमित सम्भा वनाओं को संसार पर प्रकट करते रहते हैं । पूर्मा का व्यञ्जन अपूर्ण द्वारा ही हो सकता है । अपूर्ण ही पूर्मा की भाषा है। कालातीत काल में प्रकट हो काल को वास्तविक सत्ता देता है। अपूर्ण पूर्ण का ही रूपान्तर है; अपूर्णता में ही पूर्ण को नित्य नूतन मूर्तियाँ दिखाई पड़ती हैं अपूर्ण अपूर्ण नहीं वरन् पूर्ण का ही चलता हुआ रूप है अपूर्गा की पूर्णता । है शुक्ल पक्ष की द्वितीया का चन्द्रमा अपूर्ण है। उसकी सब वन्दना करते हैं। इसका क्या कारण है । उसकी अपूर्णता ही उसके जगद्वन्दनीय होने का हेतु है। अपूर्णता में उत्तरोत्तर वर्द्धमान होने की सम्भावना है। यह सम्भावना ही अपूर्ण के गौरव को बढ़ाती है। इस गरिमापूर्ण अपूर्णता को प्राप्त कर हम को अपना जीवन धन्य समझना चाहिये । यद्यपि इस जीवन में सुख दुःख सफलता असफलता, हानि लाभ, संयोग वियोग के जोड़े लगे हुए हैं तथापि यह उन्नतोन्मुख होने के कारण सब जीवनों में }ष्ट है। हमारी अपूर्णता में स्थिरता का दोष नहीं । हमारे उन्नति-पथ की ओर-छोर नहीं। इसमें लदा नवीन दृश्य दिखाई पड़ते रहते हैं। इस कारण इस पथ की अनन्तता हमारे उत्साह को घटाने वाली नहीं, हमारे अपूर्ण चन्द्र के लिये कभी पूर्णिमा नहीं आती और न इसको निष्क्रियताका राहु ही ग्रस सकता है। हमारेलिये सदा शुक्लपक्ष है फिर निराशा क्यों?
पुनीत पापी ''Tito sillon :ot the sizler.' जो सदि दुम्ब पर छिद्र दुरावा । बन्दनीय नहि जग उग पावा ।। -तुलसीदास हम पापी नहीं? फिर नो हम से दूसरे की भलाई होने की क्या रम्भावना ? हम किस प्रकार सत्तालागार की गति को सीधी करने में योग दे सकते हैं? A .. वेद, शान्त्र, पुराण, स्मृति आदि सभी मुक्तकण्ट ले जघन्य पापों से बचने की आज्ञा देती है। किन्तु पारी को त्याज्य नहीं चताते। कौन ऐसा है जो पापी नहीं ? | जब भी लोग पाप- पक में फंसे हुआ है तो कौन किसे घृणा कर सकता है। कौन किसको परित्याग कर सकता है।
७४ फिर निराशा क्यों? एक दूसर को घृणा की दृष्टि से देख कर हम इस गाढ़े पाप- पज से बाहर नहीं निकल सकते। घृणा करने से हमारी शक्ति कम होगी। एक दूसरे के साथ सहृदयता में ही हमारे पाप- पडले मुक होने की सम्भावना है। हर पापी हैं। हमें पापियों को नीच न समझना चाहिए । जब हम पाप के तीपतप तीक्ष्ण तार से तप्त होते हुए भी पाप से विमुख नहीं होते तब हम को पापियों से मुख मोड़ने का क्या अधिकार ?। पापी लोग उनकी अपेक्षा अच्छे हैं, जो अपने को पूर्ण सम- झते हैं। ऐसे लोग अपनी उन्नति का द्वार सदा के लिए बन्द कर चुके हैं। उनके जीवन-नाटक के अभिनय में अन्तिम बार यवनिका-पतन हो चुका है। अब उस नाट्यशाला के रङ्ग मञ्च पर कोई मनोज्ञ दृश्य न दिखाये जायेंगे उनकी शिक्षा शेष हो चुकी। वे अपना समावर्तन-संस्कार करा चुके। वे अब पीछे हो हटो आगे न बढ़ेगे। न तो वे अपना सुधार कर सकते हैं और न उनसे दूसरे के सुधार की आशा है । वे लोग हमारे नेता नहीं बन सकते। हमारे नेता हम से बाहर नहीं हो सकता। हम पापी लोग मनुष्य समाज के गौरव हैं। मनुष्य ही एक ऐसा जीवधारी है जो पाप कर सकता है। पशु-समुदाय न पाप ही करता है न पुण्य ही । देवगण केवल पुण्य ही पुण्य । हम लोग
पुनीत पाणी
७५
।
-
पाप और पुरान दोनों ही करते है। पाप करने की अना
होते हुए पुण्य करना ही मनु-जा का कारण है ?
मानव समाज में पापियों की स्थिति बनुन्य को पहनी
स्वतन्नता की सूचक है। ममी ने अपनी बदन्दता का
दुरुपयोग अवश्य किया पर यदि दुरूपयोग की सम्भावना न होनी
तो सदुपयोग ही से या लाभ होता। श्रीर फिर, हमारी
स्वतंत्रता किस बात की। जिन्स वान की भावनासका
होना भी कोई आश्चर्य नहीं । घोडसवार ही गिन्ने है, बुटनों
के बल चलने वाले बच्चे क्या गिरंग ? । सनुर को पार भारत
है। पशु, पक्षी, कीट, पतंग नदी, पर्वत, बृक्ष, लना, र सत्थर
आदि भन्दा पया पाप करेंगे।
वे लोग, जो अपने को पापी समझते हैं और इस कारण
इलर के साथ सदा ननु भाव से वर्तने है, अनन्य पुण्यालयों
से कहीं अच्छे हैं। उनका दर्शन परम पुनीत है। उनको देखने
ही हमारे हृदय में मनुष्यत्व के सदावों का अभ्युदय होता है।
जो लोग अपने को पापी समभान हैं उन्हीं समाज के
' सुधार की पूरी पूरी आशा है। वे ही लोग पापियों से मिल
वार पापियों के पुनस्थान में साहाय्य दे सकेंगे। साल के
दलदल से निकलना एक व्यक्ति का काम नहीं। इसमें सहमा-
रिता की आवश्यकता है। ऊपर की चढ़ाई कठिन है। सर
७६
फिर निराशा क्यों?
को एक साथ लेकर ही चलना श्रेयस्कर है।
हम गिर गये हैं। यह हमारे लिए कोई निराशा का विषय
नहीं। गिर कर अधीर हो पड़े रहना लजा का विषय अवश्य
है। किन्तु न गिरने वाले से गिर कर उठने वाला ही श्रेष्ठ है।
वह एक बार गिर चुका है-जीवनयात्रा के पथ को दुर्गम बनाने
वाले गहरे गढ्ढों और बड़ी २ खाइयों को पहचान चुका है- अत.
एव, सँभाल कर सावधानी से चलेगा।
हमारा पिछला जीवन बुरा है-यह हमारे भय का कारण
नहीं । यदि हम अगले जीवन को सुधार सकते हैं तो हमारा सारा
जीवन सुधर जावेगा। गया वक्त भी फिर हाथ आ जावेगा।
हमारा जीवन बन रहा है। अभी सुधार का सुअवसर
मिला है। अपनी भूल को भूल मानने में अभी बहुत देर नहीं
हुई। यदि हम गिर कर उठेगे-सँभलेंगे-सुधरेंगे तो हमारा
सुधार चिरस्थायी होगा। हमारे अनेक साथी हैं। यदि.
उनको हम अपने साथ ले चलने की कोशिश करेंगे तो दुर्गम मार्ग
भी सुगम बन जावेगा-मार्गस्थ सभी विघ्नबाधाएँ टल जायँगी
हम उनके साथ सुखपूर्वक चले चलेंगे और वे हमारे साथ अग्रसर
होते जायेंगे। हमारी सहायता करने में वे हाथ बँटावेंगे और
उनकी सहायता करने में हम तन,मन और धन समर्पण करेंगे।
हमारा दुर्गम पथ सुगम हो जायगा।
फिर निराशाक्यों ?
स्वयम्भू-सुधारकोंका सुधार
यदा विचिसो द्विप : ।
तदा सर्वोत्यवदनाम:
यदा किचित्ताधिशमसकाशाध्यगर्न ।
तदा गृलोमानियनको नमः ।।
खलः जपनामाणि पर्यावहामि यति ।
थालनी विनमानानि पश्यन पर।
-
दन गाल पर्ने !
नमा नान
यात्मानगर प्रम
पुनीत गुणगुन, ततः
NA
du
r
Ament ल
"Piticianet."
मदन्छिौ। हम धुणित है। म पालियों
हम दुलन की दया के माग गर । स्वाग
हर से बातचीत करना शुपत्र का पालन समझते
-
७८ फिर निराशा करें? ५ है। हमारे सुधार के लिये सभा-सुसाइटी करते हैं । हम किसका सुधार कर सकते हैं। सुधार किसका ?। अपना और अपने सुधारकों का। हम गिरे हुए है। हम अपने सुधारकों से कैसे बढ़ सकते हैं और क्या हमारे सुधारकों में भी सुधार की आवश्यकता है ? । हाँ, हमारे सुधारक हमसे गिरे हुए हैं। वे समझते हैं कि, वही बड़े विचार- वान हैं। वे समाचारपत्रों को पढ़ते हैं और क्लब में बैठकर यूरो- पीय महाभीषण संग्राम और अमेरिका के अन्तर्जातीय व्यवसाय 'पर सम्मति दे सकते हैं और प्राप्त सम्मतियों का समर्थन भी कर सकते हैं। वे लात समुद्र पार की बात जानते हैं। किन्तु उनको यह नहीं मालूम कि उनके नौकर के घर में कितने बच्चे हैं और वे किस प्रकार जीवन-निर्वाह कर रहे हैं। वे यूरोपीय महायुद्ध की रोमाञ्चकारी घटनाओं को सुनते हैं किन्तु एक भूखे कंगाल के साथ दाग्धि दैत्य से घोर युद्ध होने की हृदयद्रावी बात सुनने में उनको सिरदर्द हो जाता है। हमारे सुधारक स्वतन्त्रता की डींग मारते हैं। किन्तु उनमें से बहुतेरे लामजिक जटिल बन्धनों से बाहर होने में सर्वथा अस- मर्थ हैं। गर्मो बरदाश्त करेंगे, कपड़े नहीं उतार सकते । नंगा -नौकर फिरेगा-आप कपड़े पहनेंगे। भूखे दुःखियों को खिलाने के लिए तो नितान्त निर्धन बन जायँगे पर क्लब और पार्टी में खाने व्ययम्भू-भाग्यों वा सुधार खिलानेकी और कुबेरले बड़े भाई बन जाने हैं। अपनी स्वार्थसिद्धि के हेतु नौकरों से स्कुट कुश्शना अधमा अन्याय और कुनीति-पूर्णा बातें कहलाना अत्यन्त लाधारण यात लपते हैं और, जब वह नोकर अपने लिए शूट त्या दुर्गति के काय बोलता है तब दंड देने में तनिक भी लंबरेन्ट नहीं करते। समाजसुधारक बनते हैं। किन्तु एक नीच मनुष्य से बाजार में यह नहीं पूछ सकने थि-'भाई ! आपके घर कुमाल संगल तो है ? । पुण्यात्मा बनते हैं, किन्तु पानी से हवामान्य व्यहार करने में लजित नहीं होते! जाति-पांति का भेद नहीं मानते, 'किन्तु धोबी, श्रीवर और धानुक ने अपशब्द कहे दिन मुख नहीं खोलते। अर्थशास्त्र के पपिड़त बनते हैं, किन्तु कभी खेतों में जाकर नहीं देन्द्रले कि किस तरह के रडेचूर पश्रिम हे अर्थ पना होता है। पूंजीवाले बनते हैं, किन्तु असली पूंजी बनानेवालों का सलाम तक सी नहीं लेते। अंग्रेजी डिलासफी और भारतीय दर्शनो का मनन मथन करके विविध भांति के अनुसंधान करते है, किन्तु एक निपट दरिद्र के शुद्ध अगाध हृदय में बैठ कर वहाँ पर बिखरे हुए मोती के दाने नहीं उठात-उस वित्त-विकार-विगतहदय में पठ कर खोज नहीं करते। दर्शनशास्त्र का पार करते है पर संसार के नश्वर फिर निराशा क्यों ८० पदार्थों में अविनाशी परमात्मा का दिव्य दर्शन नहीं करता चाहते। साहित्य-सुधारक कहलाने के गौरव से गर्वित हैं पर किसी मनुष्य के साथ मधुर मंजुल सम्भाषण कारके उसके कलुपितचित्त में घिरी हुई भीमान्धकार की घटा हटा कार उत्साह और विवेक की विमल ज्योति जगाना नहीं जानते। शायद वे स्वयं अपने हृदय को भी प्रेमप्रदीप से आलोकित पारने का प्रयत्न नहीं करते। बड़े भारी रत्न-परीक्षक बनते हैं, किन्तु जीते जागते जगमगाते हुए रत्तों का दिन रात तिरस्कार करते रहते हैं ।। अहो, इन बड़ों की क्षुद्रता ! 'अहो, धिग्वैषम्यं लोकव्यवहारस्य । क्या हम इनसे अच्छे बन सकते है ? अवश्य। हम में क्या विशेष गुण है ? हमको दुःख और निर्धनता की पुनीत पाठशाला में श्रमशीलता, स्नेह और सहृद्यता की शिक्षा मिल चुकी है। अब हमको जो कुछ शिक्षा मिलेगी उसे हमारी पूर्वाजित शिक्षा पावन बना देगी। हम दुखिये का दुखड़ा समझेगे कभी किसी को नीचा न देखेंगे । हम को अपने सुधार के लिए विशेष धन की दरकार नहीं । हमको नवीन पद्धति की शिक्षा के लिए भव्य भवनों तथा बिजली के पंखों की आवश्यकता नहीं। हमको तो ज़मीन ही पर बैठने का शौक है। पेड़ की डालियों से समता रखने वाली टेढ़ी ।
८?
स्वयम्भू-पुधारकों का सुधार
सीधी कुर्सियों की आवश्यकता नहीं। हमारे वास्ते विजली की
चमकीली रोशनी की भी दरकार नहीं। प्रेम की प्रदीप्त प्रमा
से ही हमारे घरों में प्रकाश छा जायगा । हमको हाथ से काम
करने में कुछ लजा नहीं याती। हमें सेवक की चाद नहीं।
हम स्वयं सेवक बनना परमधर्म समझगे। स्वेच्छासेवक बनकर
अपने को गौरवान्वित समझेगे
हनार सुधार से हमारे सुधारकों का भी नेयोन्मीलन हो
जायगा। हम अपने सुधार द्वारा जब का सुधार कर सकेंगे।
हमार नुधारक भी यदि यह शिक्षा ग्रहण करलें तो देश का
कल्याण होने में बिलम्ब न होगा। हम अपने नुवारकों के
सुधारक बन्न सकते हैं।
फिर निराशा क्यों?
२
IN
ख
'नहि पुरखं दुनिना लभ्यने
कालिदास
विधि प्रपञ्च गुण औगुण साना ।
दुःख सुख पाप पुण्य दिन राता ॥
-तुलसोदास
-
Then welcome evil relatf
That turus earth's sinu Jwless rough
Each suing that bids nor siu nor
stand but go. .
Be our joys threo parts pain !
Strive and bod chea, the strain
Learn, nor account the pang ; dare
20ver grudge the tbrob..
-BROWNING. .
हा
य दुःख !!! तुझ से अभिभूत एवं पीड़िता
होकर हम लोग किस किस को बुरा नहीं
कहते और किस २ के शत्रु नहीं बनते ? | तुझ.
से बचने के लिए किस २ के साथ अनर्थ और
((
; फिर निगया क्यों: . अन्याय नहीं करते ? । दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है। तुझा से दार्शनिक परिडत भी डरते हैं। तेरे अनेक रुप है। प्रत्येक मनुष्य के लिए तुम विशेष रूप धारण कर व्यक्त होत हो। किन्तु ता स्वागत करना विरले ही जन जानते हैं । लोग पूछते हैं कि तुझ ले क्या लाम ? ! तेरा स्वागत क्यों करें ? | तुझा में क्या अनोन्ना गुण है ? । लिन्तु वे लोग इस बात से अनभिज्ञ है कि तू जगत में एक महती लक्षालन-शक्षित है। नर ही साक्षात्कार से इश्वर की अपरोक्षानुभूति होती है। तू धनादान्यां का जानाञ्जन है। अतः तू जगत का परमगुरु है। तेरी मैत्री में सांसारिक सम्बन्ध का सत्यासत्य के निर्णय हो जाता है। देखो, कहा भी है कि-"धीरज धर्म मित्र अत् नारी आपति काल परीखिय चारी ॥” इसलिये तु ही मनुष्यत्व की एक मात्र सनी कसौटी है। तेरी शिक्षा के प्रभाव ले दया, सहिष्णुता, स्नेह सहृदयता एवं वैराग्य आदि सद्गुणों का आवि- भर्भाव होता है। तू कुलिश-कर्कश-हृदय को द्रवीभूत कर के कोमल कमल सरीखा बना देता है। तेरी ही प्रेरणा से निवंय दयालु, असक्त विरता, कायर शूरवीर और अधीर धैर्यवान बन जाता है। करुणारत-पूर्ण काव्य को पढ़ने से दुःख अवश्य होता है, किन्तु कोई उल दुःख से नहीं भागता । उस दुःस्व से जो चित्त की मुनि है बह आँनुओं के मोल में सस्ती है। लोग रुपया खर्च प करते हैं और दुःखान्त नाटक में अश्रुधारा वहाना पसंद करते हैं। किस अर्थ? अपने हृदय के मानुपी भावों की पुष्टि के लिये ही इतना कष्ट उठाया जाता है। वियोग के दुःख में ही प्रेम की पूर्ण प्रतीति होती है। वियोगी लोग संसार भर के सुख के लिये भी अपने वियोग-जन्य दुःख को नहीं छोड़ना चाहते । सुखवादी चाहे जो कुछ कहे, मनुष्य को दुःख से स्वाभाविक वृणा नहीं। हे सर्वगुणशाली दुःखदेव ! हम तेरे शुभागमन से फिश्चितमात्र विचलित नहीं होते। हम तुम से डरते भी नहीं। क्योंकि तू हमारा आत्मज है। तेरे जन्म से भावी सुख की पूर्ण आशा है। दुःख की पवित्र अग्नि में हृदय दौर्बल्य, मनःक्लव्य, राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहंकार और क्रोध आदि विषम दुर्गुणों के दहन हो जाने पर हम तप्त कञ्चन की भाँति देवी-प्रभा से चमकने लगेंगे। दुःख दावानल में दग्ध होकर विकार का बीहड़ वन भस्म हो जायगा और हमारी विशुद्ध आत्मा अमूल्य मणि की भाँति देदीप्यमान हो जायगी। जिससे हम भयभीत होते हैं वही हमारा परमहितेच्छु -प्रिय सखा है। दुःख ही हमारे विकाश का साधक है- हमारे अभ्युदय का बलनाल प्रेरक है। - फिर निराशा क्यों ?
SHETHELTS
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भूल ।
नात्मानमवनन्यंत पूर्वाभिग्यमद्धिभिः
श्रामृत्योः श्रियमन्विच्छन्ननां मन्यत दुर्लभाम् ।
मनुस्मृति ११३७
Ther is m.in."
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• HD
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भूल! मानवजाति से तंग बनिष्ठ सम्बन्ध
है। माधारण मनुष्य अपने छोटे मोटे
कायों में भूल करते है । महान पुल्प भी
अपने महत्कायों के समम्पादन में भूल
कर बैठते हैं। किन्तु भूल से कोई भी
हवाली नहीं। दृष्टि में भूल. सुनने में भूल, विचारने में भूल
८४
फिर निराशा पयों ?
समझने में भूल, फतम्य-पालन में भूल और अनेक साधारण
कायों को सम्पन्न करने में भी भूल। भरी भूल ! भिन्न भिन्न रूप
से तू मानव-समाज में व्याप्त हो रही है। फिर तो मनुष्य का
गौरव कैसा।
"मनुष्य भूल करता है, अतः यह निन्द्य है, नीच है, उसकी
बातों का विश्वास नहीं" ; ऐसा विचार करना बड़ी भूल है।
केवल यही एक ऐसी भयंकर भूल है जो अमार्जनीय है।
भूल ही मनुष्य का गौरव है। भूल भी केवल मनुष्य ही कर
सकता है-मशीन या जानवर नहीं कर सकते, जिनके लिए एक
मार्ग के अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग नहीं। मनुष्य के लिए
अनेक सम्भावनाएं हैं। उनका दृष्टि-क्षेत्र संकुचित नहीं। उसके
लिए सहत्र सहस्त्र मागों के द्वार उन्मुक्त
भूल ही से इन भिन्न २ मार्गों की यथार्थ उपयोगिता का
ज्ञान होता है। भूल ही द्वारा अनिश्चित ज्ञान निश्चित होता है।
सूल ही से स्वप्न मी वास्तविक सत्ता में परिणत होता है।
मनुष्य जाति की उन्नति का विकाश भूल ही के इतिहास में ।
है। भूठ हो द्वारा मानव-जाति की नवी २ सम्भावनाओं की
सूचना मिलती है। भूल ही द्वारा वन्द राहो के फाटक खुल
जाते हैं। भूल अज्ञान नहीं । भूल हो असली ज्ञान की प्रथम
श्रेणी है। भूल अल्प ज्ञान है। हम जान बूझ कर भूल
है
--
मृता नहीं करते। अपनी जानकारी भर में सब ही ठीक किया करते है। केवल भूल इतनी ही है कि, हम थोड़े से ज्ञान के आधार पर ही काम कर बैठते है। किन्तु विना क्रिया के ज्ञान का परि- पक्व होना कठिन है। क्रिया की कुजी से ही ज्ञानकं दुर्भध रहस्य का ताला खुल जाता है। फिर भूल को हम भूल ज्यों कहें। विना धरती पर पर रात्रे उस स्थान की दृढ़ता नहीं मालूम होती। यदि निकल गये तो पार हो गये और यदि गिर पड़े या दलदल में फैल गये तो अपने लिये और दूसरों के लिये शिक्षा हो गयी। जो लोग भूल करके हानि उठाते हैं, वे मनुष्य-समाज के लिए अपने हित का बलिदान करते है और स्वार्थ की तिलाञ्जलि देकर परहित-साधन करते हैं। वे समाज का बड़ा उपकार करते हैं। वे हमारे पूज्य हैं । हम उनके उपकार से कदापि उण नहीं होलकतो एक मनुष्य की बलिसे सारे मानव-समाज का अभ्युदय होता है । भूल करने वाले का जीवन व्यर्थ नहीं जाता। जो लोग अपनी आत्मा का विस्तार भी आत्माओं में निरीक्षण करते हैं उनके लिये परहितार्थ अपना अनहित वा स्वार्थ त्याग श्रेय है। भूल से जो संसार का लाभ होता है उसी की ओर ध्यान दो-भूल करने वाले व्यक्ति की हानि की ओर नहीं। फिर तो भूल सचमुच भूल न बहेगी।
८८
फिर निराशा क्यों :
करने पर
जो लोग
भूल
करते है वे लोग मनुष्य की आवश्यकताओं का
झुकाव समाज पर प्रकाशित कर देते है। भूल ले बढ़ कर मनुष्य
की आवश्यकताओं का और कोई ज्ञापक नहीं है। भूल
ही हमको यह मालूम होता है कि हमें किस बात की खोज थी !
भूल से ही खोज का महत्त्व बढ़ जाता है। भूल करने पर ही यह
मालूम होता है कि, हमारी आवश्यकता इतनी बड़ी हुई थी कि हमे
उसकी पूर्ति के लिये भूल करनी पड़ी ! क्या अपनी आवश्यकताओं
की जानकारी रखना हमारी उन्नति का एक मुख्य साधन नहीं ?
जो लोग अपनी आवश्यकताओं को नहीं जानते थे लोग उनकी
पूत्ति में यत्नवान नहीं हो सकते।
भूल ही हमारी उन्नति का द्वार है। जो लोग भूल नहीं करते
वे लोग अपनी उन्नति का द्वार बन्द किये हुए
बैठे है
यदि भूल करके अपनी भूल के ऊपर विचार करें तो अपनी
स्वल्प हानि से गुरुतर लाभ उठा सकते है। ककड़ों के मोट
मे रत्न स्वरीद कर सकते हैं
फिर निराशा क्यों?
.
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हमारा लेता कौन ?
मन्यामहे नन्दयायदानायेगा
शकील-निन्य-कुटजा अपि चन्दना: न्युः ।।
महरिः ।
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Ti (Rijr,..........ye dirl intry,
.. You 1.0 lot. has me ghori. '}hey
1. in.t; Inty!! Noti. }}} lgi tasie ints tor."
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THE THEN म पाप-पंक में फंसे हुए हैं। हमें इस से
कौन उचारेगा ?। हमाग नायक कौन ?!
हमारा नेता वही हो सकता है जो हमारे साथ
है। जो लोग हमारे साथ नहीं उनको हमारी
, कटिनाइयों का यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता। उनके उपदेश से
हमारे लास की कोई सम्भावना नहीं।
फिर निराशा क्यों: १० लोग कहते हैं कि अन्धा अन्धे को राह नहीं पतला सकता। क्या यह ठीक है?। नेत्रवान लोगों का और अन्धों का अनुभव एक सा नहीं। नेत्रवान के अनुभव से अन्धे लाभ नहीं उठा सकते । "खग जाने खग ही की भापा" | "गजानां पङ्कमग्नानां गजा एव धुरंधराः" जो लोग हम से बाहर हैं वे लोग हमारे साथ ज़ोर नहीं लगा. सकते। ऐने कितने हैं जो हमसे बाहर है। फिर उनका बल ही कितना। हमारे उद्धार के लिये हमारे साथ रह कर ज़ोर लगाने की ज़रूरत है। जो हमारे साथ नहीं, वह हमारा नेता नहीं। हमारे साथ जिसकी सहानुभूति नहीं, हमारी सहकारिता में जो योग नहीं देता-जिसके निर्मल हृदय-दर्पण में हमारे दुःख का सच्चा प्रतिविम्ब नहीं, वह कदापि हमारा उन्नायक नहीं। हमारा सन्चा नेता वही है जो हमारे साथ रहते हुए भी आगो की ओर निगाह डाल सकता है। आगे की ओर देखना ही उन्नति के पथ में पैर रखना है। आगे की ओर देखते ही हमको अपनी स्थिति का ज्ञान होने लगता है। जहाँ अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ वहाँ बस उस स्थिति में रहना कठिन पड़ जाता जो नीचों में रह कर ऊँचे आदर्श रक्खें, वे ही हमारे नेता हैं। संसार में ऐसे नेताओं की कमी नहीं। नेता की पदवी सब को मिल सकती है। किन्तु जो लोग अपने को हमसे आगे बढ़ा हुआ है हमारा नेता कौन ? है? समझते हैं, वे लोग इस गौरव को नहीं प्राप्त कर सकते। नेता बन कर अपने को नेता न समझना, यही नेतृत्व का मुख्य लक्षण है। जो लोग अपने को नेता समझते है वे हम लोगों से बाहर हो जाते हैं न तो वे ही हमारे चल ले लाभ उठा सकने है और न हमी उनके बल से। नेता की सफलता दापने मारियों की सफलता में है। नाम नेता का होता है पर कार्य-सिद्धि साथियों की। फिर नेताओं को अपने साथियों ने बड़ा समझने का क्या अधिकार? नेता की श्रेष्ठता कंवल इस बात में है कि, वह उस भादर्श को पहले देखता है जिसको कि, उसके साथी पीछे से देखेंगे। वह नेता सम्धा नेता नहीं जो अपने साथियों को अपनासा नहीं यानता। लोहे को सोना बनाना कोई दुष्कर कार्य नहीं किन्तु लोहे को पारस बना देना कठिन है। नेता का कार्य्य दूसरों को उनकी संकुचित दृष्टि के कारण अन्धा कहने का नहीं। वह भी कुछ काल पहिले अन्धा ही था। घोड़े ही दिनों के बाद उसके साथी दूर का पदार्थ देखने लग जायो। नेता को चाहिये कि वह अपने अनुभव को दूसरों का अनुभव बनाने का यत्न करे । लोगों के दृष्टिकोण को अपने दृष्टिकोण से मिलाना ही नेता का परम कर्तव्य है। नेता की कमी नहीं। प्रत्येक मानव-समाज में नेता विद्यमान
६२
फिर निराशा क्यों?
हैं
उन में केवल एक बात की आवश्यकता है कि, वे अपना
नेतृत्व भूल जावें। अपने को साधारण लोगों में से समझे ।
समाज में मिल कर सारे समाज को अपने नये रंग में रँग दें।
ऐसा करने से मूर्ख लोग पंडित बन जायेंगे। मूक भी वाचाल
हो जायँगे। पिछड़े हुए लोग अग्रसर हो जायेंगे। साथी
और नेता में कोई भेद न रहेगा। चेला भी गुरु बन जायेंगे।
फिर निराशा क्यों ?
-
.
PANNA
-
"कर्मयांग की मान
कम-ध्यान दिनारि गया
"नयोन्त कर्म मन्यामाद उनयोगी रिबन "
मागवदगीता।
कुवन्नेह यमाग भिमनिकन गमा
शोपनिषद् ।
ord म सत्तासागर के वक्षस्थल के अपर याने चाले
ॐ तृण नहीं। उस सागर की गति का वेग
निश्चित करने में हमारा बहुत बड़ा भाग है।
संसार में सामान्य ग्यापित करना ।
मुख्य उदेश्य है। ईश्वर चाहना है कि, हम नितान्त दूध पीनेवाले
न बने रहें। वह ललार को एक ओर चलाने की शति,
hoi
फिर निराशा पर्यो १४ रखते हुए भी हमारी पुष्टि और वृद्धि के लिये अपनी अपरिमित शक्तियों का संकोचन किये रहता है। हमको कियापरायण और उद्यमशील देख कर वह प्रसन्न होता है। वह कभी नहीं चाहता कि, आथित जीव निरे मिट्टी के पुतले बने रहें। निष्क्रिय मिट्टी के पुतलों का ईश्वर होना कोई गौरव का विषय नहीं। कर्म को छोड़ना ही बन्धन में पड़ना है। कर्म के त्याग से ही पानी के ऊपर बहते हुए क्रियाशून्य तृण की भाँति हमारी दशा हो जाती है। इससे और अधिक बन्धन क्या हो सकता है ? फिर तो क्या कर्म के करने से बन्धनों की रस्सी टूट जाती है १ । ऐसा भी नहीं। चोरी भी तो एक कर्म ही है पर चोर को पाप से छुटकारा नहीं मिलता। जो कर्म संसार में अनेकता का भाव पैदा करते हैं, वे संसार में सामजस्य स्थापित करने में अक्षम रहते हैं। वे व्यष्टि को समष्टि से अलग कर उसे समष्टि के यथेष्ट बल के लाम से वञ्चित कर देते हैं। उसकी सक्तियोंका पूर्ण विकाश नहीं होने पाता । नीच स्वार्थ-साधन के निमित्त किये कर्म-जल-कण को सागर से पृथक करने की चेष्टा करते हैं। सागर से पृथक होकर जल-कण गतिहीन हो जाता है-यही परम बन्धन है, व्यष्टि का समष्टि से अलग होना अलास्यको बढ़ाता है। असास्य द्वारा समष्टि और व्यष्टि दोनों ही का सम्बन्ध-तन्तु क्षीण हो जाता है। शक्तियों का यथेच्छ एवं यथोचित विकाश न होना ही बन्धन है। कर्म में ★ 'कर्मयोग की मानः 41 सोच-द्वारा मोक्ष नहीं मिल सकती। पुनः, मोक्ष किस कम में है; वह मोक्ष किस प्रकार की होगी और कब मिलेगी। जिन कमी का मूल केवल स्वार्थ साधन में नंकुचित नहीं हो सकता-जो कर्म सत्ता-सागर के जल-कणों में सामअन्य स्थापित कर संसार-सागर की उन्नति के विकास में योग दे। है-वही कर्म मोक्ष-प्रद है। समष्टि की उन्नति में ही व्यष्टि की भी उन्नति हैं। व्यष्टि समष्टिले अलग हो आनी स्थिति नहीं रख सकती। समष्टि ही व्यष्टि की समी अन्ना है। समष्टि के लिये जो कम है उसी में सच्चा स्वाथ है। समष्टि के योग स जो व्यष्टि की किया होती है वे ही उसकी शक्तियों को यथोचित रीति में विकसित करने में समर्थ होती है। वही उसकी संकीर्णता और परिमितता को छिन्न- भिन्न कर सकती है। कर्म ही व्यष्टि को समष्टि से मिला देने हैं। वही उसके जटिल बन्धनों को तोड़ने में समयं होते हैं। वहीं कर्म उसको ईश्वर के निकट पहुँचाने में समर्थ होते हैं। वहीं कम ईश्वर और मनुष्य के संकल्यों की एकता की रचना कर मनुष्य की परिमितता को छुड़ा देते है। यह मोक्ष स्वार्थ की मोक्ष नहीं यही मोक्ष समष्टि की मोक्ष है। फिर यह मोक्ष कोई दुरवों मोल नहीं। इन्त मोक्ष का अनुभव प्रत्येक सत्माद के करते समय होता रहता है। यदि नोक्ष
१६
हिर निराशा क्यों
की प्राप्ति करना है तो सत्कार्य की ओर रुचि बढ़ाना चाहिये
यह मोक्ष दुर्लभ नहीं। न इसके लिए बहुत काल नक ठहरना
पड़ेगा। मनुष्य होते हुए भी हम अपनी परिमितता छोड़
सकते हैं। ईश्वर की सन्निधि में पह च सवाने हैं। बिना
सरे ही मोक्ष मिल सकती है।
फिर निराशा क्यों?
1
स
चिर-बसन्त
25E---
Count robe list April is seks.
lilin u r-****** into the llograd ved sing birsti.
hts typt in the best,
April is a video
in unting it. - Riort
FOR.
ili na brwisem vir broni, ind mitte im sirinov in
10t.
Prersititi tits that it?',
ji}h the patitut37 April in: initi.
...!!n
In this.
प्रिय चास्नर बसन्ने"--बग्नन्तनु में सभी
पदार्थ मन मोहिनी शोभा धारण कर ननुन्य के
चित्त को चलायमान कर देते हैं. केवल मनुष्य
का चिन ही चलायमान नहीं होता, किन्तु
सारीचाचर मुष्टि में सतगज के स्वागत के अर्थ निया की
स्कृति होने लगती है। वृक्ष और लनायें हों त्फुल्ल हो अपने
सुन्दर अंगों को नूनन पल्लवों के विकाश से पुलक-पल्लवित
team
--
१८ र निराशा को ? पना लेती हैं। शीतलमन्द सुगन्ध वायु का सुखद सञ्चालन, विविध विचित्र विहगों का सरस कलरव और पशुओं की भांति भौति की केलि यह सब क्रिया-सञ्चार की साक्षी हो रही है। "ऋतूनां कुसुमाकर:"-इन अर्थपूर्ण शब्दों द्वारा श्रीकृष्ण भगवान ने भी इस ललित कलित वसन्त ऋतु की महत्ता और गरिमा बतलाई है। क्या हम इस वसन्त को चिरस्थायी बना सकते हैं ?। हाँ, हम अपने सदावों द्वारा बीत जानेवाली ऋतुओं की गति को फेरे सकते हैं। जिसके हृदय में प्रेम है उसे सब वस्तु ही परम प्रिय दिखाई पड़ती है। उसके लिये काल-विशेष की आवश्यकता नहीं। प्रेमान्ध को श्रावण मास के अन्धे की भाँति दिग्दिगन्त में खाली हरियाली ही दृष्टिगोचर होती है। उसके लिये प्रेमास्पद वस्तु की प्रत्येक वात नवीनता, प्रफुल्लता और सुष्टुता धारण कर लेती है। उसके हृदय-क्षेत्र में उगे हुए उज्ज्वल अंकुर कभी नहीं कुम्भलाते। वे दिन दूना रात चौगुना वृद्धिङ्कत होते रहते हैं। जिस हृदय में प्रेस-वलन्त अपनी बहार दिखा रहा है उसमें से सत्- क्रियाओं के स्रोत निशिवालर बहते रहते हैं। जिसके हृदय में परोपकार करने की लालसा लगी हुई है उसके लिए कोई भी मुहर्त्त बुरा नहीं। क्रियावान के लिए कोई भी विघ्न नहीं।
दिर-बसन्त ?
-
के लिए कण्टक भी कुसुम बन जाते हैं। सारा संसार आशा के
मधुर फलों से सुसज्जित दिखाई पड़ने लगता है। यही है-
चिनवसन्त---मधुरमधुमयमधुमास :
इस चिर-बसन्त में बिहार बारने के लिये हमको कहीं दूर न
जाना पड़ेगा। किन्तु मचिर चिरवसन्त के शुभागमन के पूर्व ही
हमारं हृदयोद्यान में मनम्भ, आलस्य, निराशा. दुर्बलता, क्रोध,
लोभ, भ्रान्नि, दमा, द्रोह, हेप, मात्र्य, अहङ्कार आदि अवगुणो
के पतझड़ की आवश्यकता है। पदा बार यदि आप विश्वम
को अपने हृदय-सिंहासन पर स्थान-प्रदान करने का दृढ़ संकल्प
करने तो भारी शुनना अपने आप ही जाती रहेगी। जन्द न्यो
'पत्तियों का भीतर जोर होने लगता न सुनी हुई पत्तियाँ
आपही आप गिर जाती है। एक बार इन चिर-चार अनन्त को
अपने हृदयोद्यान में बुलाये। फिर भी इसका राज्य अटल हो
जानना। आप में बल का संचार होने लग जायगा। नारी
दृष्टि सुरमामयी बन जायगी । परमानन्द की निविध बारि
आपके उत्पाद और आशा को बढ़ावेगी। आपको चाय ओर से
लफल-मनोग्य होने का आशावाद मिलने लगा।
बनान आ जाने सदन की ओर ध्यान ना नहीं
देता। एक बार सबमल का सपना जाने पर फिर लय
पिछली निमगायनानोप रह जायेगी।
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वीर-मन्दिर पारा
नया सूचीपत्र
।
प्रकाशक
अनन्त कुमार जैन
वीर-मन्दिर, भार
नियम और सूचना १-पुस्तकें उधार, घरपर देखने और वापस लेनेका नियम नहीं है । १) से कमकी वी० पी० नहीं भेजी जाती । इससे कमके लिये टिकट जना चाहिये, टिकट मिलने पर पुस्तक तुरन्त बुक- शोस्ट मे भोज दी जाती है, राह में गुम हो जाने की जिम्मेदारी हमारी नहीं। २-ठिकाना और 'पुस्तकों का नाम बहुत साफ और पूरा लिखा जाना चाहिये। ३---एक हो नाम की कई विषयो की या कई लेखककों की लिखी पुस्तक रहती हैं, इसलिये मांग लिखते समय पुस्तक का विषय या लेखकका नाम अवश्य लिखना चाहिये। ४-सार्वजनिक संस्थाओं तथा थोक खरीदारों को २५) से रूपरकी पुस्तक पर उचित कमिशन दिया जाता है। पुस्तको के होने पर कपीशन की दर बताई जा सकती है ५---डाकव्यय बढ़ जानेसे अधिक पुस्तकें रेलद्वारा मंगाने ही में सुभीता है। अधिक पुस्तकें मंगाते समय कमसे कम १०) पेशगी अवश्य भोजना चाहिये, विना पेशगी के रेल द्वारा कोई पार्सल नहीं पंता-बीरमन्दिर आरा नाम मालूम १
*
मोजा जाता।
६-कई घुम्नक समयपर स्टाकमें नहीं रहती इसलिये जा जा
पुस्तकं रहती हैं भेजी जाती है।
७-पुस्तकों का मूल्य प्रकाशक की अनानुसार घट बढ़ भी
जाया करता है। इसलिये प्रायः छरे दाम से मनाया वशर भी
लिया जाना है। परन्तु लिया जाता है ठीक ही ठीक ।
८-किसी बी पी में भूल जान पड़े तो लौटाना नहीं
चाहिये । लिम्वनपर भूल सुधार. दी जानी है।
*यदि आर्डर भेजे १० दिन हो जाय और पुस्तक अथवा
कोई उत्तर न मिले तो दुसरा आर्डर भेजना चाहिये।
अनन्त कुमार जैन
पारा।
अनन्त पुस्तक माला पारा प्रवेश फी ॥) hu हमारे यहां से इस नामकी एक. प्रथमाला प्रकाशित होती इसका उद्यश्य अच्छे २ साहित्य, गल्प लेख इतिहास उप- न्यास नैतिक सामाजिक तथा रास्ट्रीय पुस्तकों का प्रकाशित करना है स्थायी ग्राहकों को पूर्व प्रकाशित और आगे प्रकाशित होने वाली सभी पुस्त के पानी कीमत में दी जाती है। पूर्व प्रकाशित ग्रन्थों का . लेना न लेना ग्राहकों की इच्छा पर निर्भर : है परन्तु आगे के प्रकाशित ग्रथों में साल मे १०) मूल्य की पुस्तक अवश्य लेनी पड़ती है। नयी पुस्तक प्रकाशित होते ही सूचना दो जा है। ग्राहकों को यदि पुस्तक न लेनी हो तो सूचना पाते ही अस्वीकृति पत्र लिख देना चाहिये। सूचना देने के एक सप्ताह बाद पुस्तक बी० पी० से भेज दी जाती ह । पता-वीरमन्दिर आरा
पुस्तक वापिस आने से डाक पर ग्राहकों को देना पड़ता है
निम्न लिखित पुस्तके प्रकाशित हो चुकी है।
प्रेस पुष्पांजलि )
सेवाधर्मा)
राष्ट्रीय नरंग।)
वित्रेणी !! (प्रेम)
चित्रित्र वीर
फिर निराशा क्यों?
अनन्त कुमार जैन
वीरमन्दिर
MARA
June
mpu
naha
,
हमार रहा हिन्दी की नव नन्द की पुगिनती है, पर में
प्रर्थना है कि वे हमारे गा में गुम्न मैंगने र अन्य आ, हिन्दी
साहित्य की पुस्तकों के प्रभागिता हमारे यहाँ को चुना हिन्दी, उ,
तया अंग्रेजी में भी मिलती हैं। जिनका चित्र नंगा कर वविध ।
SECRETTERTREET
.
-in-mad
५
प्रथमपुष्प
प्रे
卐
卐
मपुष्पांजलि क्या है,प्रेमकी पिटारी है,आनन्दकी
फुलवारी है, स्वर्गीयफूलों की क्यारी है, मधु-
जज)
रता की अटारी है, सौंदर्य की कटारी है, जादू
की सवारी है, मोहनी की पिचकारी है, हृदयों की दुलारी है, दिव्य
ज्वाला की चिनगारी है, अचूक शिकारी है, सहयोगियों की प्यारी
है, अजमण्डल की पनीहारी है, दिल की गिरफ्तारी है, तारूण्यकी
ताजी तरकारी है, तभी तो हिन्दी संसार के विख्यात तथा प्रसिद्ध
महानुभावो' और पत्रिकाओं की प्रशंसा प्राप्त करनेवाली है।
मूल्य केवल ।)
सरस्वती ( प्रयाग )-सम्पादक पूज्य द्विवेदी जी-देखकर
बडी दिव्य है......अच्छी कविताएँ चुनी हैं ।
श्री सारदा (जबलपुर)
प्रेमपुष्पाञ्जलिः -सम्पादक बाबू शिवपूजन सहाय, प्रकाशक
वीरमन्दिर आरा पृष्ट संख्या १०० मूल्य २) हिन्दी के सामयिव
अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित प्रेम सम्बन्धिनी कविताओं क
प्रसन्न.
६
47
,
यह संग्रह है। उद आदिको भी कुछ कविताय है । कुछ गद्यांश
भी हैं, सभी ऋविनायं भाव पूर्ण है। कुछ नो इतनी सरम है
कि, कगठ किये जाने योग्य है। लम्चा संग्रह सम्पादक महान्य
की मुरुचि का परिचायक है । युनिक अमले कागज पर सुन्दर गति
से छापी गयी है।
समाजग्नेबक (नागपूर)
प्रेमपुण्यांजलि :-~~-पुलक का मूल्य विषय की परमाता श्रीर
सम्पादनशैली की उत्तमता र विचार करने से कम ही जनना
है। अंछे २ भावपून पनों का म.मबन्द्र संग्रह है। गद्यांश भी
उत्तम है। कविताप्रेमियों के लिय आनन्द्र बीटिका है। प्रचार
होना चाहिये।
यावू श्यामसुन्दर दान बी० एसपनो मनोहर है ही :
प्रेम की व्याया, उसके गुणों का वर्णन चित्ताकर्षक है।
पं. जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी : परम प्रसन्नता---प्रतिमा
परिधम प्रशंसनीय-प्रमी पाठकों पर प्रेम का प्रचुर प्रभाव
पड़ेगा।
कविवर मैथिलीशरण गुप्न---मेरी सम्मनि में यह क, चीज
है जिसका अन्तरङ्ग बहिरङ्ग मनोमोहक है।
पं० ऋणकान्न मालवीय वीर बहुत ही सुन्दर है । वन
पता-बीरमन्दिर आग
he
*
।
परिश्रम किया है। संग्रह का क्रम भो अनोखा है।
श्रीवङ्कटेश्वर समाचार ( बम्बई )
प्रेमपुष्पांजलि:--यह तुनीय संस्करण :इतना अच्छा हुआ है
कि, पहलेके संस्करणों के पाठको के लिये भी यह विल्कुल नयी सी.
हो गयी है। पद्यों का चुनाव चित्ताकर्णक और श्लाघ्य है । सम्पा-
दकका वक्तव्य बडा मनोहर है। छपाई सफाई एक नम्बर की
है। पुस्तक उपादा अरे संग्रहनीय है।
राजस्थान केशी (वर्धा)
प्रेमपुष्पांजलि-प्रेम सम्बन्धिनी अनूठी कविताओं का अपूर्व
संग्रह वडी सजधजले प्रकाशित हुआ है। सम्पादक और प्रका-
शक धन्यवादके पानी में गाय पय जो कुछ है मनोरञ्जक और तृप्ति-
कर है। चुनावकी प्रतिभा और लजावटका ढङ्ग सराहनीय है।
कुछ घण्टो तक दिल दहलाने का अच्छा सामान
माधुरी कार्यालय (लखनऊ)
प्रभपुषांजलि:-प्रकाशक अनन्त कुमार जैन संग्रहकर्ता स्व.
कुमार देवेन्द्र प्रसाद जी और लम्पादक बाबू शिव पूजन सहाय
जी मूल्य १।)
इस पुस्तक प्रेम सम्बन्धिनी अनेक लेखकों व कवियों की
गद्य पद्यात्मक रचनाओं का अच्छा और अपूर्व संग्रह किया गया
पता-वीरमन्दिर अरा
है
F
८
-
है। प्रेम पुजारी बाबू देवेन्द्र प्रग्नाद जी बा नाम अमर गन्वने के
लिये वही उनकी एक ऋति काफी होगी। गुस्तक पढ़कर मनुष्य
सका उपासक न जायगा : इसमें कोई नन्नेह नहीं।
पुस्तकका कोन्चन श्रादर होत
होना चाहिये।
नृनाय नवनि काण मी अत्र स्वप चन्दा है। शांतता
कीजिये। नहीं नो वचनुन्त्र चन्द्रनाटयगा। मूल्य केवल ।)
M
Asman -
विशेष सूचना
यह है कि हमारे या पुस्तकों में निरिक पारमान की नीज
लालटेन, वियनी, नाला, १ कागज, कलन, नेलने के सामान
होकी, त्रिकंट, टवील इत्यादिनी सा विक्री के लिये तैयार
रहती है। उनके अनिरिक टकड़ी के सामान बेञ्च कुरानी
पेज वेबुल का प्रयत्यमी बड़ी आग्नानी ने लो मनाना है।
-
अनन्त कुमार जल
जन
वीरमन्दिर आरा
है
द्वितीय पुष्प
सेवाधर्म
--
Mon
चाधर्म क्या है, अन्तरात्मा का अमृत-मय व्या-
व्धान है, शान्ति-पूर्ण जीवन का विधामम्यान
है, वर्ग का सोपान है, सुग्लोक का विमान है,
श्रद्धा भक्ति का अमूल्य सामान है, सुधा सक्तियों का कुसुमिन
उद्यान है, देशभक्ति दुर्गपर फहराता हुआ निशान है, उपदेश के
वाक्यों से सुसजित कर्म का कमान है। इसलिये अनेक पत्र
पत्रिकाओं से प्रसंसा प्राप्त है।
प्रभा-( कानपुर ) इसमें आरंडेल माहब की {he ray of
Surnien के भागनुवाद के अतिरिक्त प्राचीन तथा नयी सेवा-
सम्बन्धी सूक्तियों का समावेश किया गया है। सूक्तियाँ इतनी
उत्तम तथा प्रभावोत्पादक हैं कि, वे प्रत्येक नवयुवक और युवती
को कण्ठ कर लेनी चाहिये।
पता-वीरमन्दिर आरा
१०
माधुरी (लावनऊ ) सेवा श्रम:---प्रकाशक, श्रीअनन्न कुमार
जन आरा संग्रहकना और सम्पादक यात्रु, शिवपूजन महाय जी
२०४३०. नारज १२ पृष्ठ है। कागज बढ़िया पेंटिक है।
छपाई सफाई नवरसुन्दर है। मूल्य )
इन पुलकका प्रथम संस्करण हमारे मित्र न्त्र देवेन्द्र प्रसाद
जनन निकाला गा।
यह दूसरा संग्ग्ण है
ही के समान मनोहता लानमा प्रयोग किया गया। सेवा- धर्म
के सम्बन्ध में जाना बातों का इसमें अच्छा मात्रा किया गया
है। आगया है. पहले मनान न करण का भी अच्छा श्रादर
होगा।
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माई न पियू ( गन्दकता ) पुम्नक, बड़ी सुन्दर है ग्वदेशी
भाईयों को मेवा पर उनम विचार प्रविये गये है।
जनाज ( महार वा धर्म मान्नननिका लवांना
साधन
उन्नन्ने चित्ताकर्षिणी शिक्षा मिलनी है.
आरोग अन्वचार--- विश्वनधा.पर गृढ़ विना बड़ी सरल
और ओजस्विनी भाषा में नममाये गये है।
पाटली पुत्र. ( पटना )-देवाधर्म बोगियों के लिये भी आग
म्य है। उम्मीका महत्व दग्नमें विशेष रितीले दिवाया गया है।
इसके पढनेने चित्त शान्त, हद्य प्रफुल्लित और अत्मा तृप्त होनी
वीर मन्दिर आग
१२.
- है। विचार बड़े अनसोल और गम्भीर है। विहारी पटना)-शुद्ध और हृदयग्राही विचारों से भरी हुई यह पुस्तक प्रत्येक स्वयंसेवककी जेवकी शोभा बढानेके योग्य है। सचमुच सेवा समितिका एक भी सदस्य इस पुस्तकके विन अपना कर्तव्य नहीं पहचान:सकता, यह द्वितीय संस्करण बड़ा अपूर्व निकला है। खप चला। शोग्रता कीजिये। T मूल्य १॥) तृतीय पुष्प राष्ट्रीय तरंग राष्ट्रीयता की लहर देश भर में उमड़ रही है। उसी लहर- की वहार इस पद्य संग्रह में देखने योग्य है । . फड़कती हुई दिल चस्प कविताओं को पढ़ कर एक बार हृदयमें देश भक्ति की ऊँची तरंग उठ आती है। इसमें बड़े २ कवियों के कर कमलों से निकली हुई उच भावोत्पादक सुन्दर २ कविताएँ भरी हुई है पुस्तक उपादेय और सराहनीय है। ऐसा राष्ट्रीयपद्य-संग्रह अभी तक नहीं छपा है। चुनी हुई कविताएँ अत्यन्त- मनोमोहक है । पता-वीरमन्दिर आरा
कुछ ही रोजों के भीतर इसकी सैकड़ों प्रतियाँ विक गयी अब
केवल २०० प्रति वाकी रह गयी है शीघ्रता कीजिये पुस्तक का
मूल्य भी इसकी नरसता की ओर ध्यान देने से मुक्त हो जान
पड़ता है। सर्वसाधारण की सुविधा के लिये मूल्य केवल ।) ही
सम्बा भर है
है।
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ANIM
M
M
(३) "विदेशी
संरग्धती-सम्पादयः प्रत्यपाद द्विवेदीजी--
'मानन-मजनता-नि उतारिखको ।
तन्गा समान नेग पुनः निगा ॥
विश्वर पण्डिन याच्या निद उपाध्याय-छोटी ग्नी पुस्तिका में सर्व
तोमुग्बी प्रतिभा का विकाश !
कविवर पगिटन मात्रयशुष्ट-सुन्दर पुस्तिका जैली ही छोटी है वैसी
ही अत्यन्न भावपूर्ण है। लेखनशैली की प्रशंसा करना व्यर्थ है।
फिर निगमा बयों ?" के लेना महोदय लिम्वत है--निद्रा देवी का
आवाहन कर रहा था कि, इतने में आप की मानसिक गंगा की
पता-बीरमन्दिर आरा
0 0 6 8 0 > $ 0 co 0 4: 0 0 5 15. Nyayawatirit 16. Nyayakarnika 17. Science of Thought 18. Almilharma 15. Sanatan Jana Dharma 20. Sacreil Philosophy 21. IVhat is Jainism 22. Boys and Girls Logii 2.3. Pure Thonglies 2+. Poep behind the veil of Kurnia 10 0 0 part 0 ។ 0 0 6 0.2 0 2.0 0 2 To be held ut. Anant Kumar Jain. . VIR MANDIR, Arrah. Apply for Separate Catalague of SCHOOL BOOKS:- to the above Address. - 10 Printed at the Saraswati Printing Works, ARRAH,
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