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Ek Neech Tragedi

Mrinal Panday · 2011/03

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एक नीच ट्रैजेडी
।
मृणाल पाण्डे
राजकमल प्रकाशन
नयी दिल्ली पटना

मूल्य रु 1800
©मणाल पाण्डे
प्रथम सस्करण 1981
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन प्राइवट लिमिटेड,
४, नेताजी सुभाप माग, नयी दिल्ली 110002
मुद्रक् रुचिका प्रिंटस द्वारा मॉटन प्रिंटम, दिल्ली 110032
यावरण रामकुमार
EK NEECH TRAGEDI
Short Stories by Miriaal Pardey

पिस गया वह भीतरी
औ' बाहरी दो कठिन पाटो वीच
ऐसी ट्रेजेडी है नीच ।।
- मा मुक्तिबोध

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प्रम
9
15
26
36
बफ
अंधेरे से अंधेरे तर
दोपहर में मौत
यानी कि एक बात थी
दिव्यो
पितृदाय
कुत्ते की मौत
ময়িীদ
एक नीच ट्रेजेडी
56
73
80
93

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वर्फ नौकर लालटेन जलायर तिपाई पर रस गया या। हल्ली भूरी-नारगी रोशनी म ठण्ड स उपड़ बैठे व तीना और भी सियुड़े सियु डाये लग रह पे, एक्दम कुबडे बौना-जैसे । पर पीछे दीवार पर पड़ती ही थी परछाइयां न मालूम क्तिनी बड़ी होकर रोशी मे पूम रही थी, जैस उह बडे-बडे तीन राक्षस दबोचने आ रहे हा सहमर वह अंगीठी वे और पास सिसय आयी विजली की लाइन इस इलाके में टूटी तो हफ्ते भर की छुट्टी अंगीठी के कोयले जल-जलकर एपदम ही राख हुए जा रहे थे। उसका मन हुआ नोकर यो पुकारकर वह कि थाडा सुलगा लाय, पर चुप्पी तोडने की करपना ही इतनी भयावह थी कि वह चुपचाप बुझते टुनडे तिनये से कुरेदने लगी। अहं धुआं आता है,' छोट ने आँखें सिकोडी,पीछे परछाईमा हण्डा- सा सिर हिला-मत कर ना उसने तिनका कोने की ठण्डो राख मे गाड दिया और फिर चुप बैठ गयो । घुटनो पर ठोडी टिकाये टिकाये उसकी छाया भी चुप। पैसा आश्चय है, उसने सोचा,जितनी कम रोशनी होती है उतनी ही बडी छाया, और अगर वह लालटेन भी न हो तो? तब तो शायद उनकी एक्सार होती परछा यां ही परछाइया बच रहगी, खुद वह तो गायव ही हो जायेंगे। उठकर उसने चुपचाप वत्ती कुछ उक्सा दी बडा कुछ बुदबुदाया कुढ- पर उसने बत्ती फिर कम कर दी और बैठ गयो कोयलों मे तो शायद कुछ वफ12 . बचा नहीं था 'जरा देखकर आ ना उधर " वडा मनुहार भरे स्वर मे फुसफुसाया। 'तू ही क्यो नही चला जाता?" 'हिंस्र स्वर मे वह फुसफुसायी। 'तुझे तो कुछ नही कहेंगे भाई।" "तो तुझे ही कौन चीरकर खा जायेंगे।" "प्लीज" स्वार्थी हो तुम दोनो।" डर और गुस्से से फुसफुसाहट कुछ ऊँची हो गयी। 'इश प्लीज"छोटे ने आस पर से बाल हटाये। धाय । कुछ टूटा शायद। तीनो चौक्कर स्तब्ध हो गये, परछाइयो के सिर छत पर एक दूसरे से जुड़े थे। 'चाय की केतली है शायद ।" उसने बताया। "उहुँक, कोई किताब है 1" बडे ने खुद तिनके से भाग कुरेदना चालू कर दिया। "मा ने फेंगी होगी।" छोटे की बडी-बडी गोल-गोल आखो मे कौतू हल था। "तो क्या?" उसने बडप्पन से कहा, "पिछली बार तो तकिय को चीरकर सारे कमरे मे पर ही-पर फैला दिये थे। हो सकता है वावा ने फेंका हो, वे भी तो भूल जाते हैं कि मा का दिमाग गुस्मे मे बडा उसकी तरेरी आँखो की घुडकी से सहमकर चुप हो गया। मा का दिमाग क्या ए? क्या ?" छोटे ने कोतूहल से राख फूंकी। 'कुछ नही, तेरा सिर।' उसन उहती राख से परेशान होकर दुपट्टा झटकाया--'जा, तू ही देख आ ना जाकर धीरे-से जाना समझा भीतर मत घुसना । दूर कमरे म लडाई की ऊंची बेसुरी आवाजें फिर आ रही थी छोटे ने बडे को ताका- 'चला जा यार" बडे ने ठोडी खुजायी। ? 2 10/एक नीच ट्रेजेडी छोटे के जाते ही दोनो पास पास सिमट आय । हद कर देती है कभी-य भी मा भी, समय नहीं आता इसे सीधे बोलना भी नहीं भाता क्या ?" उसकी तल्ख आवाज आंसुओ मे फंस गयी। 'उसका ही कसूर पोडी है, बावा भी तो "हो, सो तो है ही," वह कुछ देर चुप रही "कोयले भी बुझ गये " "दातादीन को पुकारो, दूसरे डाल लायगा।" 'नही याबा, पुकारने की हिम्मत मेरी नहीं है, फिर कही नये कोयले देखवर पाड पड़ी फिजूलखर्ची पर, तो?" बाहर बफ की खूब तेज आंधी चल रही थी एकदम घुप्प अंधेरा था, कभी-कभी बिजली चमक्ती, तो चारा ओर आशवास सडे काले-काले देव- दार कुछ क्षण को चमककर बुझ जाते सिहरकर उसने शाल और भीच लिया-चार दिन से यही हाल है।" "तिस पर बिजली भी ठप्प "बडे ने हाँ मे-हां मिलायी। फिरवाफी देर कमरे मे चुप्पीरही सिफ कभी-कभार तेज झोको मे लालटेन कांपती, तो परछाइयाँ फडफडाने लगती। "यह छोटा कहाँ रह गया ?" उसे अचानक छोटे की फिक्र हुई, उसकी परछाइ का कोला खाली था, कभी बहे का हाथ कबूतर के आकार मे उधर मंडरा जाता, या उसके शाल का कोना "कही बेवकूफ भीतर तो नहीं चला गया कमरे के ?" "तमाचा खायेगा गधा " बडे ने सिर झुका लिया। "तुझे क्या, उसे चाहे वे दोनो नोच डालें।" बडे के अनमनेपन से यह चिढ़ गयी। "मेजा तो तूने ही, बडे ने बड़ी आसानी से सारा दारोमदार उसी पर डाल दिया। "हां-हाँ, जैसे तुझे तो उपर से कोई मतलब ही नहीं । यूठा । बेईमान।" उसकी आंखें भर आयी। "अब उनका गुस्सा हम पर क्यो उतारती है बेवकूफ बड़ा कुछ खिसिया-सा भी गया--"आ जायेगा लें, आ ही गया।"

" उसने - छोटा भुका झुका दवे पाव गैलरी से आ रहा था चोरा की तरह 'क्या क्या हाल है ?" उत्सुक्ता और उत्तेजना से वह हलाने लगी। "अरे छोड ना" आनिजी से छोटे ने हाथ छुड़ा लिया, "वस क्या होगा। मा बैठी रो रही है और बाबा ऐसा मुह बनाये लेट है कुप्पा सा मुंह फुलाया। 'कर क्या रहे है ?" बडा युका। "करेंगे क्या । लेटे हैं।" छोटा अपनी विशिष्टता का एहसास पाकर अकड रहा था, 'छत ताक रहे है भकुओ की तरह।" "एइ हिष्ट |" उसने धमकाया, पर छोटे की उपमा स वडा और वह हँसने लगे। "लग तो रह हैं वैस ही," छोटा हँसी का समथन पाकर कुछ-कुछ उद्दण्ड हो चला था "शायद सोचते है कि कि वो बडे ग्रेट लग रहे हैं।' 'हिटलर जैस" खि खि खि-तीनो हंसने लगे दवे दये। -फिर आवाज आयी ज्या कुछ गिरा हो। उमने कातर होकर बडे को ताका, वडे ने आखें झुका ली। "फिर?" "शायद कोई टहनी टूटी हो।' छोटे ने सात्वना दी। फौरन तीनो ने यही कारण स्वीकार कर लिया। "सो तो है ही" उसने सिर हिलाया, "ऐसी बफ, रामसिंह चौकीदार पहता था बहुत कम पडती है। बडे बडे पेड तक उखड जाते है आधी मे। घरो के टीन उड उड़कर राह चलता को घायल कर दते हैं भयानक चित्र से आकात तीनो कुछ देर चुप रह । छोटे ने मौत तोडा, 'दातादीन कहता या अब कुहरा छंट रहा है कल तक गिरनारक जायगा।" "शायद " बडे ने याग कुरेदने की व्यथता से विन होकर तिनका दूर फेंक दिया ' इससे ज्यादा पडेगी भी क्या चार दिन तो हो गये रव 12/एक नीच ट्रेजेडी स्कार गिरत।" "एकदम सब ढक गया है, सीढिया तक "उसने सिनता से शाल झटकारा। "अच्छा तो अगर कल तक वफ गिरना रुक जाये, तो सूब धूप आयेगी ना?" छोटे ने एक शोले को कुरेदा । बडे ने उँगलियो की राख फुकी, "पर गधे, तू उस धूप मे ।" 71 करेगा क्या "क्यो S 'छोटा चमका ! लगता था वह वडे को नोच लेगा, उसकी छाया भी तैश म डोलकर घूमी। हह, पैर तो वफ मे घुस जायेंगे, खेनेगा क्या बाहर, खार ।" बडे को तिल तिलकर छोटे से धूप भरे कल्पना महल तोडना अच्छा लग रहा था। "जो भी है, कम से कम धूप से कुछ गरमाहट तो होगी ही।" छोटा हार मानने को क्तई तयार न था। उसने एक बार मोचा कि झगडे मे हस्तक्षेप करे, पर जान कैसी अवश- सो करनेवाली थकान बदन मे भर गयी थी। उसने दुखता सिर घुटनो मे छिपा लिया । वफ खूब गिर रही थी। बडे ने टार्गे पसारकर पीठ के पीछे कुशन लगा लिया। "उस धूप से गर्मी थोडे ही आयेगी पागल । एक तो वफ ऊपर से गिरेगा पाला बस ऐसी कडाके की सर्दी पडेगी कि धूप मे बैठना क्या, सूरज स भी चिपक जायेगा तो भी गरमाहट नहीं भायेगी, समझा बर्फ गिरपर भूप निक्ल भी आये, तो कुछ फक नही पडता । सब वैसा ही ठण्डा और जमा हुआ रहेगा।" नापती लौ मे बड़े की कुबडी परछाई और भी दैत्याकार लग रही "और उस पर कही फिर वफ पड गयी ता बस छुट्टी।" बडा क्रूरता से हंसा। छोटा रुआंसा होकर चुप हो गया। दूसरे कमरे मे अब बिल्कुल शाति थी कल तक शायद कुछ कुछ वफ/13 ठीक-ठार भी उँह । उपताकर उसने फिर सिर घुटना में दे दिया। "अब चुपचाप हैं !" बहा भेदभरे स्वर मे फमफुमाया। "उह, हागे।" उसने उपेक्षा स फुह फेर लिया मन तो करता था कि उस कमरे मे आँधी की तरह धुसरर उन्हें उन्हें उह उस उनमे गया करना, पते भरेप के बाद तो स्कूल सुल ही जायेंगे। यहा बुध अप्रतिभ-सा हो गया था। अब वह छोट की ओर मुडा-"क्ल को शायद फिर स मुर्गा पवेगा।" बडे और छोटे ने भेदभरी हंसी से उसे ताका-वह प्रतिमा सी निश्चल बैठी रही। हालांकि उसे पता था कि उसे हँसना चाहिए था यह उनका पुराना विद्रूप था। एसे भारी साप्ताहिक पगडा के बाद जब उनके मां-बाप म सुलह होती, तो निशानी यही थी। मां खुद बैठकर उम्दा मुगा पपाती, पापा का ग्लास भी खुद ही भरती और एक हिस्टीरिवल डर से मुक्त तीना भाई-बहन पुराने पारिवारिक मजाको पर बेवजह जोरासे ठहाके लगात पर बडे का विद्रूप उसे आज पता नही क्या नहीं गुदगुदा पा रहा था जाने लालटेन की पीली रोशनी मे ही कुछ था या छाटेको दुबली कलाई की भद्दी परछाइ कि वह न हँसी, न मुसकरायी। यस चुपचाप घुटना में सिर दिये रही, जस जम गयी हो। 14/एक नीष ट्रेजेडी अँधेरे से अँधेरे तक चश्मा मेज पर रखकर मनोहर ने आखें वद कर ली। खदकते पतीले के ढकने की तरह कमरा उबलती चुप्पी म घीम धीमे कांप रहा था। मनोहर ने थके हुए बदन को ढीला छोड दिया। कमरा अव उसे लिये दिये चुपचाप रेंगने लगा था। अण्डे सती मुर्गी की तरह तनिक हिलवर उसने अपने बदन का आकार विस्तरे की नमाई मे फिट किया, जैसे लम्बी यात्रा की शुरआत मे सीट पर जम रहा हो। कमरे की गति धीरे- धीरे बढने लगी थी। रेलगाडी वे वरावर चलते जगल की तरह अंधेरा कुछ देर उसकी बगल-बगल दोडता रहा, फिर वह जगल सुल गया और उसने एक भूरी फुओं से ऊपर नीचे होती एक चिटखी मूखी जमीन को साथ चलते पाया। खेतो पर की फसल कब की कट चुकी थी। बस जडात दुवले बदन पर खडे रोगटो की तरह छोटे छोटे सूखे डण्ठल भर सडे थे । घरो के पिघलाते से ढूहनुमा आकार, दुबली विवकतो पगडण्डिया, नील धुए मे तरते-से मानव-आकार मनोहर ने झटके से सिर उठाया। अंधेरे के जाल को काटती-पाटती फोन की किरांती घण्टी वही बजन लगी थी। एक उसास से वह उठेग गया। बत्ती जला ले क्या? दीवार व परे बुढिया मिली स्मिथ फोन पर विसी से ऊंची आवाज मे बतियाने लगी थी। अच्छा, क्या बहरे लोग सचमुच दूसरो को भी बहरा ही समझते होगे। वह हंसने लगा। यही तो उसकी कमजोरी 1 अंधेरे से अधेरै ता/15 है। ऐन मौरे पर कोई अप्रासगिर वान पाली बिल्ली की तरह सामने छूट भागती है । उसका पट गुडगुडाने लगा था । अवाना उस याद आया कि आफ्मि म लोटरर उसने कुछ माया नर नहीं है । भूमे पेट में गैसें उपल पुथल हाने लगी थी। बत्ती जलापर यह कुछ-कुछ लंगडाता हुआ रमोईम घुस गया। घटने का पुराना पंक्चर फिर परेशान करा लगा है । उम्र का तकाजा, वाबूजी रहते। उम्र की एक सीमा पार कर लेने के बाद दूसरा को उनकी ढलती उम का रायाल दिलाना शायद कुछ विचित-सी तसल्ली देता है। मनोहर न कलाई पर नजर डाली। वुल साढे सात बजे थे, पर बाहर अंधेरा देखकर लगता था कि दसक बजे होगे। बाहर तीवी हवा विल्डिंग की पुग्ना दीवारा से टकराती, पेडा-पत्तो यो चीयती हुहुआय जा रही थी। बिरिडग की सव खिडक्यिों क्सकर बद थी, पर्दै सिचे हुए। वही-कही सधिया से छनकर भीतर रोशनी की एक महीन कोर-सी मलर जाती थी बस । बाहर वर्फीली हवा की निपट शब्दहीन अमानुपित सीत्कार । कितने तीखेपन से जाडे की राता म ढलती उम्र का खयाल आता-जाता है। पार्को, सडको, वसा पर रोज देखे हारा चेहरे । बूढे जाकार, पुरानी बेंचा पर हताश भीगे कौआ की तरह पात म बैठे हुए ।अधेरी खिडकियो से दृष्टिहीन सूनेपन मे ताक्ते झुरींदार चेहरे, कापती चाभिया से धुपले ताले तलाशत दुवले निस्सहाय हाथ । जितनी वार वह कूडे का लिफाफा फेंकने जाता है बुढिया स्मिथ को छिपकर ताक्त पाता है। पहले पर्दे के पोछे से एक झुर्रादार हाथ गोजर की तरह रेंगता आता है, फिर मोटे चश्मे के पीछे और भी बडौल और निष्प्रभ लगती मोतियाविदी आखें। क्या करती होगी वह सारे दिन ? तीन साल से वह यहा रह रहा है । और तीन साल से वह उसे इसी तरह देख रहा है। सिफ एक बार उस रोज उसकी आवाज सुनी थी, जब वह डस्क्लक से अपना अखबार लेने खड़ा था और अपनी पतली थोक्ती बुढाई आवाज मे मिली स्मिथ भीतर के कमरे म मनेजर से कुछ शिकायत कर रही थी। शायद वह अपने फ्लैट के ऊपर रहनेवाले इतालवी परिवार के बारे म कुछ कह रही थी-रात भर धमाधम, बच्चो की भाग दौड, कोई सोये भी तो कैसा हमन भी पूरा किराया दिया है है कि 16/एक नीच ट्रेजेडी नही " वह अखबार लेकर मुड ही रहा था कि अपनी लाठी टेकती बुढिया भी मैनेजर के कमरे से निक्ली। मनोहर को दसकर साप की तरह वह फुफकारी थी-"दोज डर्टी फोरेनस ।" मनोहर का मन हुआ था कि उसकी लाठी छीनकर छितरे सफेद वालो से दीखती उसकी गुलावी गजी चाद पर दे मारे। पर फिर दुमक्टो छिपकली की तरह लाठी के बल रेंगती बुढिया लिपट म बुदबुदाती घुस गयी थी और दरवाजा बंद हो गया था--भव । डबलरोटी के दो टुकडो के बीच खीरे की कतली दबाता मनोहर फिर हंसने लगा। अब सोचता है, तो लगता है कि उस पर गुस्सा करा में कोई तुक ही नहीं थी। पर फिर भी। सडविच कुतरते कुतरते वह मय जूतो के पलग पर लेट गया । वहुत दिन से उसके बाप की चिटठी भी नही जायी। बैर आयेगी, जरूर आयगी। अढाई सौ पेंशन पर रिटायर हुए अपने बाप की वामनु जो है वह । उसे नही, तो क्या अपनी तीन ठो बेटियो को लिखेंगे, जि होने पहले अपने दहेज और फिर अपनी सालाना जचगियो की माफन उहे गाय की तरह दुह लिया था । चिटठी की वात से याद आया, इस पार उहोने कुछ ब्लेड मैंगवाये हैं । अब अगले पासल में भेज देगा, हालांकि पिछली बार उनका वह पाइप का पारमादमी तम्बाकू और गम मोजो भेजे थे, उनकी पहुंच अभी तक नही आयो । मालूम नही, मिले भी मि रास्ते में ही वही क्या ठिकाना। उसके वापिस वे एकमात्र हिंदुस्तानी कारिदे सरदार हरविन्दर की सरदारनी का कहना है कि यहाँ का कुछ टिकाना नहीं। "क्तई नही जी, जिस मुला मे आदमी आदमी से बात ना रे, उसकी भली चलायी। ते खरीद फरोख्त परन जाओ, तो चुपचाप गापिंग बाट म सामान रखो, चुपचाप पैसा दे वे वाहर चले आओ। छुट्टी हुई। अपने मुलक मे, पाई जी, फजई धनिये से तकरार हो चाहे होती हो, बात तो हो जाती मो, है कि नहीं 'है कि नहीं ?" मनोहर ने अंधेरे से पूछा। पर अंधेरा योदी चुप्पी मे स्थिर बैठा रहा । इधर अक्सर वह अपने को अंधेरे में अपने आपसे बोलता पाता है। गुरू-शुरू म पार्क में बैठी चुदबुदाती थुडिया या अवेले कार चलाते . अंधेरे से अंधेरे तर/17 लोगो को अपने-आपसे बोलते देखकर उसे वडा कौतुप होता था, पता नहीं कब उसने खुद भी सरदारनी का यूढा अरौंदार चेहरा डवडवा आया था-"दिन भर अपारटमेण्ट की खिडक्यिा पर बैठे बैठे अतजार करो कि दार जीनाये कि नही। कभी बरफ पडन लगी, तो धुर धुक होनी की ट्रैफिक नाल तो कुछ नही हो गया। सात साल हो गय जी इत्ये रहते रहते, पर पडोसियो नाल हलो शलो छड के बात ही नी होणी। उहें आफ्सि जाणा ते बच्चे येवीसिटर के घर। ते जैसे यहा के अमरीकी तैस अपने हि दोस्तानी । मैं तो क्हँदी कि चलो जो बहुत हुआ अब, लौट चलो "लौट तो चलेंगे," सरदारजी अपना मजबूत स्याह पजा चिमगादड के परो की तरह फैलाते हैं ते कल ही चलो, मैं भी दखुशी लौट चलू पर बच्चो का भी सोचा है? जापानी नायलोन की साडी की कोर से आंसू का कतरा पाछपर मरदारनीजी गहरी उसास लेती हैं-' रब्ब दी मरजी अब पडे हैं मो पडे " "पाई जी, ये बात ये लेडीज समझती नही, पर आप ही कहो मनोहर दे चेहरे से फिक्सा और लहसुन की ग घ टकराती है-"पहले पहल आये थे, तो सोचा, चलो लडकियो की शादी लैक पैसा हो जाये, तो लोट चलेंगे। फैर उनकी शादिया कर दो, त सोचा कि दिल्ली मे पर वणवा लें, सिर छिपाने का आसरा तो हो जाय सो भी वणवाया। अब जाने की सोचने लगे थे, वे वहा से बच्चे हमे लिखते हैं, हम तुम वहा अपने पास बुला लो हमारे इस गरीब देश म तो न तरक्की वाचानस है न पसा । अब आप ही बोलो जी के हम उत्थे जायें, कि यह एदर लगवा दें? जपणा क्या है पांच दसेच साल की बात है, सो क्ट हो जायेंगे, पर उनकी तो लाइफ का स्वाल है।" बोलो ।' मनोहर ने अंधेरे से पहा । अंधेरा नहीं बोला । बोलना भी गया था। 18/एक नीच ट्रेजेडी मनोहर ने आँखें खोल ली। हाथ मे बचा सैण्डविच का टुकडा यसझसा गया था। उठकर उसने वह टुक्डा कूडेदानी मे फेंक दिया और हाथ धोन लगा। शुरू-शुरू म कुछ दिन बहुत चाव से उसने भी इधर-उधर से हिंदुस्तानी मसाले खरीदे थे-~-तल भूनकर अदाजन खाना भी अपनी तरह का पकाने की कोशिश की थी पर अब उसमे भी कोई तुक नहीं मालूम पडती। तुक मालूम ही किसम पडती है ? उसने बाथरूम के शीशे में अपना अधेड होता चेहरा देखा। खरियत है, इस हफ्ते विसी पार्टी मे नही जाना है, वरना शाम को भी दाढी बनानी पडती। यू वह खास क्सिी मे मिलता- जुलता भी नहीं । जब बहुत ही जरूरी हो जाये, तभी जाता है, पर एक बार जाकर दो हफ्ते को साला मुह बदजायका हो जाता है। रेशमी सोफे, रेशमी पर्दे, हि दुस्तानी तसवीरें, फूलदान, वातिव, मधुबनी जैसे साले घर नही, म्यूजियम हैं । मद्रासी सिल्क और चमकीले स्याह भारी जूडावाली गदराई सम्पन गहिणिया पके केले के गुब्छे की तरह सटी सटी बैठी हुई। लगता है, पुतला के महल मे घुस आय हा। पार्टी हुँह । काख के अधपके फोडे की तरह मनोहर का अकेलापन फिर टीसता है । वह गदन इधर-उधर घुमाकर तलाग रहा है। बमन और वैस्टन क्रोडो डालर की क्सिी हिदुस्तानी प्रोजेक्ट की चचा म सहज व्यस्त है । अपर्णा गिल हल्गा का हाथ से मुर्गा खाना सिखा रही है, नर मेहता क्सिी को यूया की उस दूकान का पता दे रही है, जहा से वह हिंदुस्तान जाकर इस्तेमाल करने के लिए बिजली के उपकरण सस्ते दामा पर खरीदती है--- 'वक्यूम क्लीनर जरूर ले जाना भाई, उसपे बिना वाट साफ नहीं होते । और बुकिंग रेंज गैस की बेहतर " अनतराशी दाढी की तरह व्हिस्की और फ्रेंच इत्र की गध मनोहर का चेहरा छूती है-"क्या हाल है ?" अपना लम्बा सलीकेदार गाउन और मोतिया की माला संभालती फैनी उसके बगल मे फ्श पर बैठ गयी है। मनोहर बुदबुदाकर शिष्टाचार की बातें करता है, पर फैनी अपनी रो मे बोलती ही जा रही है-"फिर वहां से हम गये खजुराहो । ऐसा युरा सफार अंधेरे से अपरे।

कभी नहा दिया, पर आऽह मन्दिर जो देगे, तो आँस खुल गयो । मानना पडगा तुम लागा मे पुरसे काफी गुरु लोग थे, हर मुआमले म, ही ही हो।' ना भरी हमी म जेली की तरह थल-यल होती हुई फैनी। 'क्या बक रही है ?" मेजवान की सुदर पत्नी उसस धीरे स पूछती 'आजक्ल बहुत पीने लगी है। क्या करे, न घर न परिवार, उस पर उम्र भी ढल चली है । क्ल पोन पर रो रोगर मापी मोगगी।" लो थोडापुलाव और लो, सास हमार हिंदुस्तानी पटना के बासमती मनोहर आनाकारिता से प्लेट भर लता है। ऊपर के फ्लैट मे किसी ने जोरा से नीग्रो सोल म्यूजिक का रेवाह लगा रखा है-'ओऽ कऽह माह बहबीह 'छटपटाती घुटी आवाज अंधेर को और भी कातर और असह्य बनाती हुई । क्ल बलचे से वफ हटाकर कार निकालनी पडेगी-मनोहर ने उक्तावर सोचा । यफ | वफ। बफ साला मौसम है कि अचानक वह रुक गया। उसे याद आया, गमियो भूज के पलग से पीठ पी घमोरियां खुजाते बाबूजी भी रात भर बडबडाते रहत भे-फिर वही लू, लू, लू साली गर्मी है कि 'किससे लडता होगा आदमी ? युद से, कि मौसम से? क्या करे फिर वह ? चित लेटपर मनाहर ने अंधेरी छत पर आँखें टिका दी। क्या करे फिर वह ? क्या वापस लौट जाय? पर वहाँ ? उस घर मे, जहाँ एक बरसाती पर का अपना कमरा और गुमल छोडकर सारा घर बाबूजी ने किराये पर उठा रखा है ? परिवार? उसकी सदा सहमी घबरायी थकी भाइदार शादीशुदा बहनें, जिनके बाबूजी से लेकर ससुराल तक फैने अस्तित्व में कही बहुत सहज भाव स एक आदर भरा कोना उसके लिए सुरक्षित था, जो उतना ही चुप्पा और मनहूस था जितना उसका यह अंधेरा कमरा । बंधे दस्तूर वी तरह हर बार उस देश लौटन पर सकी बहनें अपनी रक्सीन मढी मटचिया से निकाल निकालकर मुमकराती पोगिया की तसबीरें गुलदस्ते की तरह चुपचाप उसके आग फैला देती हैं। और उसके बाबूजी अपने हर पेंशनयाफ्ता मित्र को उसकी तनख्वाह साढे 20/एक नीच ट्रैजिडी सात रुपये से गुणा करखे वताने को निकल जाते हैं और वह चुपचाप माथ लायी कोई पेपरबैक क्तिाब पढने का नाटय करता पर्दै दीवारो के पीछे की फुसफुसाढे सुनता-अनसुनता लेटा रह जाता है । जवेले। चुप । उसकी बहना के बच्चे नये सिलौने एक-दूसरे को दिसा रहे हैं वहनें अपनी साडिया--"बहुत देता है भाग्य है, सोने के मुलक की नौकरी यहा क्या मन लगगा हो, दाने दाने को तो अव तोड मर डालना भी लड लड के म, फिर मामाजी अगले साल नही तायेगे समझे 'फाटो दिखायी ? कुछ कहा क्या पता, वही कोई कर ली दबी हंसी फिर बाबूजी के जूतो की आवाज आती है और बातचीत दब जाती है। "चाय बनाकर दी उसको? महाराजिा से कहना मुझसे टीन की पत्ती ले जायेगी, चूरावाली ने बनाये ढलती शाम नश्तर की तरह दुखते अकेलेपन को छू रही है। ? " -- मनोहर खिडकी के बाहर झाँक्ता है। परिचित खुशबुएँ आकार, ध्वनिया, गली म खेलते बच्चो की क्लिक्ती चीखें। गजक का एक ठेला गुजरता है। मभक्ती फिरासन की धुएंदार कुप्पी। उसके गले मे मछली का काटा सा कुछ फंसता जाता है। बाबूजी बार-बार उसे आगाह कर गये है कि वह कतई यह सब 'डर्टी स्ट्रीट फूड' न चखे। वहाँ के साफ-सुथरे कीटाणु रहित खाने के बाद इसे खाना तो हैपेटाइटिस योतना है। सक्सेना बाबू बता रहे थे कि अक्सर ये लोग सड़क पर गिरी गजक भी बीनकर बेच देते है। वहा से हिदुस्तान आते वक्त गामा ग्लोब्यूलीन का इजेक्शन तो मनोहर ने ले ही लिया होगा। अपनी हैल्य का खयाल करना अमरीकी ही जानता है कुछ देर दोनो चुप बठे रहते हैं। उसकी बहन दो प्यालो मे चाय रख- कर चुपचाप चली गयी है। 'पी लो पी ला ठण्डी हो जायगी।" बाबूजी कहते हैं और अपने प्याले से चुस्पी लेते हैं-'अच्छी चाय बहत महंगी होती जा रही है।" वे बतात हैं फिर कुछ रुक्कर जोडते हैं-'क्या नही महंगा हो रहा है ! लूट - -- । अंधेरे से अंधेरे तक/21 मवी है लूट 'वह सहमति म सिर हिलाता है । कुछ कहना भी है शायद । भीतर ऐसा खालीपन भर गया है कि लगता है, किसी ने छुरी से छील छील कर चेतना का आखिरी टुक्डा त निकाल लिया हो। हमन सोचा है वाबूजी जुमले यो वजनदार बनाने के लिए क्षण भरको सतह जब भी उह कोई सास अनाउसमेण्ट करना होता है व यही टकनीक इस्तेमाल करते है। बचपन से उसे याद है । विषय चाहे उसकी पढाई हो या उसकी बहनो की शादी। 'हमने सोचा है व कहते हैं, "कि घर म एर विंग और निश्लवा लेते हैं । घोपाल वार का कहना है कि एरिया म किराये भी बढ़ रहे हैं, और किरायदारा की तो कोई कमी नहीं । फिर परिवार की चीज है, अन्त म परिवार से ही काम आयगी कभी न-कभी।" कभी न कभी-वह चुपचाप मन मे दुहराता है। प्याले म उसकी चाय ठण्डी हो गयी है । वह एक सास मे निगल जाता है। "ठण्डी हो गयी होगी, दूसरा प्याला मंगवाऊँ ?" बाबूजी पूछते हैं । वह मना कर देता है और फिर बाबूजी उस एस्टीमेट का ब्यौरा दन लगते हैं। उठकर जाते हुए वाबजी क्षण भर को दहलीज पर रुकते हैं-"हो, तुम्हारी एक चिट्ठी आयी है।" एक क्षण लिफाफा उसके पोरी के पास रुका रहता है फिर वह थाम लेता है। बाबूजी के चेहरे पर एक बहुत थियेटरी समझदारीका 'हम मालूम है-चटा पर-खैर' वाला भाव है। उसका मन होता है कि वह लिफाफा खोलकर फटी पोती की तरह उनके सामने फैला दे कि देख लो, क्या लिखा है, पर इससे पेश्तर वे मुड चुके होते हैं। "प्रायवसी बहुत बड़ी चीज है नमदा बाबू " दे पाइप जलाकर छत पर बैठे अपने दोस्तों के समूह मे कहते हैं । जब से वह विदेश गया है उहोंने पान सिगरेट छोडकर विदेशी तम्बाकू पाइप मे भरकर पीना चालू कर दिया है। "वडी डर्टी नटिव हैबिट है पान खाना व उसकी बड़ी बहन से कहा- 'वस बबरे की तरह चाया और पिच्च से यू दिया।" और उसकी वल बच्चे का चूल्हा यपाती सहमति मे सर हिला देगी-"सो तो है।' 22/एक नौव ट्रेजेडी -- MOH रिन कहती थी कि उसके मनोविश्लेषक की राय मे उसका अंधेरे से लगाव उसके डरावने और अकेले वचपन की निशानी है। उजाला होना शुरू हुआ नहीं कि वह पर्दे खीचने लगती है। उसका कहना था कि उजाले मे वह बेहद उघडा और असहाय महसूस करती है। "तुम और तुम्हारी अमरीकी पेचीदगियां ।" वह उसे चिढाता था- "तुम साले बस चले, नो मनोविश्लेषक के सोफे पर ही जागा, सोओ और उम्र पिकाल दो।" कैरिन कुछ नहीं कहती। चुपचाप मुसकराती सिगरेट पीती रहती है। उसका पियाड बाप वह सात साल की थी, तभी घर छोडकर निकल गया था और फिर लोटा नहीं। "जानते हो, मैंने और मेरे भाई ने क्या किया? मैं तब सात की थी, टामी छह का। हम दोना चुपचाप पिछवाडे से बगल के ड्रग स्टोर में गये और अपनी जमा-पूजी खच कर दो बडे बडे आइसक्रीम मंगवाये, उस पियक्कड स छुटकारा पाने की खुशी में । कमीना सूरज जगने के साथ पीना चालू कर देता था, फिर नाली मे गिरने तक वही। मेरी मां अपने आशिको के समूह मे मस्त रहती थी। डेरीवाला, लाण्डोवाला, कचडा जमा करने- वाली ट्रक का ड्राइवर--सभी। टामी और मैं गली से गुजरते, तो बुढिये हमे देतकर ऐसे जुबान चटखारती, जैसे हम राक्षसा की औलाद हो। यू हमे अपनी मा के इन मिलनेवालो से कोई गिला नही था, क्याकि हर बार वे हम मुटठी-भर रजगारी दकर आइसक्रीम खाने भेज देते। लाण्ड्रीवाला तो अपन कान हिलाकर हमे खूब हंसाता भी था।" बाद को उसकी मां ने उन्ही में से किसी एक से शादी भी कर ली थी और अपने झबरे कुत्ते को जडाऊ चेन थामे सुनहरे बालो का विग लगाये कभी-कभार आकर करिन को देख जाती थी। उसके जाते ही करिन उसके अपाटमेण्ट मे तूफान की तरह आ घुसती-"आज धुढिया का कुत्ता फिर मेरे पाम पर पेशाब कर गया । जगली बार कमबख्त ने टांग उठायी, तो उसे खिडकी से बाहर फेंक दूगी।" मनोहर की अधुपियी-मिगरट वह गहरा-कालेती- क्या कहने आयी थी वही शवासेना गाना मेरा सौतेला बाप एक ट्रेस के पीछे भाग रहा है.--टाभी के डाक्टर का कहना है कि अभी दो साल उपचार अंधर से अधेरे तक/-23 . -------- और चलेगा-~-उसने सेल म आधे दाम में पर या पोट परीदा है-उमरे गुर्दे या दद पिर बढ गया है। यमबस्त, मुह वदनायया यर जाती है । फिर भी में कुछ महती यया नहीं? सच पूछा मनाहर, ता उसम बालन की भी इच्छा नहीं होती। पिन इमोस माल हम दोना वनरह जूझे हैं, पर जव पता नहीं क्या गुस्सा भी मुझे उसस जुड़ा नहीं पाता । एप उत्र पर पहुंचकर न चोट पहुचान की इच्छा रह जाती है न चोट गाने को। शायद बुटाप की पहली निशानी है, क्या" वह मुमाराती है। शायद राणी, तो मनाहर इतना असहज नहीं महमूम करता। करिन की चिटठी मरी चिडिया की तरह उमकी विताब क नीचे हवा मे फडफडाती है। उसके मौतले बाप न पान किया था कि उसकी मां को मानसिक अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा है। रेजर स कान तक गला चीर पर आत्महत्या की कोशिश की थी उसने । “उसने सोचा शिायद मैं उमे जाकर देखना चाहूँगी, इसलिए यह रहा था अभी कुछ दिन न जाऊँ, अभी बहुत बुरी हालत मे है पाव मै छप्पन टाक लगे हैं। पर में तो खुद ही नही जानती कि मैं जाना भी चाहती हूं या नहीं। क्या पूछूगी उसस वहाँ जारर कि क्तिना खून निक्ला मुये तो लगता है कि उसने गला इतना ही काटा होगा कि शोहरत हो जाये, पर दम न निक्ले तवीयत काफी उक्ता गयी है इस सबसे । सोच रही हूँ, नौररी छोडकर कुछ महीन यूरोप चली जाऊँ । हैजा-चेचर और गर्मी का डर न होता, तो शायद एक चक्कर हि दुस्तान का भी लगा लेती। तुमने क्या निश्चय किया? वापस लौट रहे हो कि वही घर-गहस्थी जमावर एकदम से फमिली मैन ?" बाबूजी इधर बीच-बीच मे विलायत देख सकने की अपनी इच्छा की चर्चा कर देते है । निमला जिज्जी सकुचाते हुए फिर जिन छेडती है-- त्रिपाठीजी पिर आये थे पूउन को। बडी अच्छी लडकी है। खूब गोरी लम्बी मोटर भी चला लेती है। अंग्रेजी स्कूल की पढी है। वहाँ काम आयगा यह सब। उसके तो भाग खुल जायेंगे। तुम्हारे ही जवाब को रके हैं।' मनोहर ने आंखें खोल ली। नल का वाशर सराव हो गया है शायद । टप । 24/एक नीच ट्रेजेडी टप । टप । लगातार पानी गिर रहा है। हर रोज सोचता है, डेस्स क्लम से पहेगा, पर फिर एपदम दिमाग से उतर जाता है। परिन होनी तो पहता- याद दिला द। परिन ये जान के बाद से विल्डिग भी ताजान पया अपरिचित-सी लगने लगी है। पना नही रही होगी आजकल । बीच- बीच में एक ग्गीन पोस्टमाइ नर नेज देती है। उस दिन सोफे के पीछे उमया एप पुराना स्थाप पड़ा मिला, तो पापी दर अजीव साली माली- मा लगता रहा । मजीच पात है। परिन को वह ऐसे मिस कर रहा है। भरिन । क्या पता नहीं । यह यह आखिरी बेवकूफी नही परगा। वैस ही क्या कम परेशानियां है रि ऊपर स यह भावक्ता और अधेरा पमरा फिर धीरे धीरे हिलने लगा है। कुछ ही देर मे जन्नाटे से उसे लिय दिय फिर उसी परिचित दिशा को बल देगा। जाने क्या यह अंधरा कमरा फिर फिर उसे अपने परे महर की टिमटिमाती वत्तिया के बीच खडा कर देता है और शहर हाथ खीचकर उसे उसके बाप के हवाले पर देता है। बरसाती के उस छोटे-से कमरे मे वह परिचित गधी-आवाजा से बिधा खडा है। शहर अपन तमाम पहवेपन और मुतहा रगा के साथ जाद की धूप की तरह धीर धीर उसनी दुसती मज्जा म घंसता जा रहा है। खिडकी पे पाहर से वकील साहब की हडिडहा गाय उसे पूरे वी तरह निर्विकार भाव से परखती है । यह गला संकारता है बाबूजी से कहने पे लिए वि मकान का नया विग किराये पर उठाने की जरूरत नही जब वह लौटेगा तो कम-से-कम रहते को एक हिस्सा तो यावूजी वजिनिया तम्बार का खुशबूभरा वश लेते हुए कुर्सी पर पसर चुवे हैं--"दरअसल अमरीकी काम भी जम वर करता है और रिलैक्स भी। जभी तो उसका मुल्क इतनी तरक्की पर है। अब हम सोचते हैं कि तुम वहाँ एक घर भी खरीद लो। धीरे धीरे कभी भगवान की इच्छा हुई, तो एक चक्कर हम भी उधर हो आयेंगे।" अंधेरे से अंधेरे तक/ 25 दोपहर में मौत भिरभरा पहले कुछ देर तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि घण्टीवाला बटन कौन सा होगा? तीना बटन एक सही आकार के और एक मे ही चीक्ट थे। धूप से तपी आखें सिकोडत वह तनिक छाँव मे सरक आया और फिर उसने बटना को दोबारा गौर से देखा। मैल की पर्तो के नीचे एक बटन पर घण्टी का आकार बना था। दबाने से वही एक कक्श ध्वनि गूजी टर कर गिरता एक नल बाद हुमा-कौन ? दूर दरवाजे के पीछे मे एक नारी कण्ठ । वह कुछ चिढ सा गया । बद दरवाजे के परे क्या हर किसी को अपना नाम भर कहकर परिचय दिया जा सकता है ? वह कह भी दे कि उसका नाम जनादन है तो फिर पूछेग-कौन जनादन ? अजब बेवकूफी भरा सवाल है। वह कोई फेरीवाला भी तो नहीं कि धधे का नाम ही बताकर ले चिलकती धूप थी। इधर लम्बी बीमारी से उठने के बाद से धूप मे थोडा चलन से भी सिर चकराने लगता है। उसने स्माल मे माथा पाछा । वसे सोचो तो घर के बागिदा का क्या दोष ? ग्यारह बजे दुपहर का पुमती वस्त था । इस समय पडोसिया या फेरीवाला के अलावा इन धुघले उनीदे माना म झोक्ने आता ही कौन होगा ? गनीमत है इस समय घर मे कोई था, वर्ना यह ता वह वक्त है जब जलम घरनियां अक्सर दरवाजे पर ताला मारपर घर यो धुली धोतिया और घिसी चप्पला से लम हो बाहर मिलने 26/एक नीच ट्रजेडी जवाव पा मिलाने चल देती है। उसने आस पडोस के मकाना पर नजर फिरायी। कामकाजी लोगा के परे होने पर रोज धीमे धीमे यह गहन मायावी लोक इन गलिया, अहाता मे स्वयमेव उग आता है-अलस बुदबुदाती मांओ, धूप में पुराने ऊन की उघडी लच्छिया की तरह पडी बिल्लियो, और मुनगे से भिनफ्ते छोटे छोटे बच्चा का रहस्यमय लोक, जिसे उसने अपनी लम्बी बीमारी के दौरान की पहली मत जान पाया था, उन लम्बे छह महीनो के दौरान जब वह अपने नीम अंधेरे कमर मे बगल की गलियो, कमराऔर अहाता से उठनी इन अजीव ध्वनियो को सुनता पड़ा रहता था। दवाई के नशे और बीमारी की कमजोरी के दरम्यान एक वेनाम भ्रूण की तरह तिरता हुआ। न स्त्री न पुरप, बस एक थकी घिसी देह भर । रोज का वही प्रम था। खसर खसर थके बिवाईदार पैरा को घिसटाती पुरानी चप्पलें, उठती या बठनी नेहा के उच्छवास जो चटवते जोडा और पुरान अनबूझ दो स फूटते हैं-हाय मरी अम्माs | फिर बतरहियाँ जिनके सुर पानी म ऊभचूभ होती बतखा की तरह ऊँचे नीचे होते रहते रहस्यमय स्त्री रोग, अफवाहे, अटकलें फिर कराहसियाँ जिनका क्रूर नपुसक आनोश उसके लहू को स्याह कर दता था स खै खै जैसे लकडवग्धे हमत हैं । तक्यि के सहारे उठेंगा या दद त फटता माथा गंधात लिहाफ में गुडुप विय वह इस दुनिया को अपनी नाडिया मे निर तर रिसता हुआ पाता था। कभी उसे अचरज भी होता था अपनी श्लथ देह के बावजूद रह आये अपने दिमाग के चौकन्नेपन पर। खै से खै । एक विकराल हँसी जिसके पीछे कोई आनद या उछाह नहा एक पूरी की पूरी प्रवचित जाति का इतिहास एक शिरा की तरह धडकता है-नीला गेंदला चैत य । धप, धप धप। यही कुछ क्षण हान हैं शायद, जब एक औरत पूरी तरह एक जीव होती है। चत य अ तमुवी, लापरवाह । वह रेवडी या मूगफली या सिफ धक्का दकर भी अपने मिनमिनाते बच्चा को इस दम अलग हकाल सकती है। वह इस वक्त किसी की जिम्मेदार नहीं-न उल्ट सीधे पडे जूता को न जूठे बता की न मुसे हुए विस्तरा की। इस वक्त यह मिफ टूमरी औरत की आखो म सीधा देखती है, उन अतल गहराइया मे, जहा 'मसी अपनी तकलीफ अपने अपमान और अपना नामोश व्याकुल गेरको दहाडी गूजते । दोपहर 27 पिरत हैं। धीमे धीमे सर से सर जोडे वे अपनी-अपनी नीली गुम चोटा पर से आवरण हटाती हैं। बहुत धीम घोमे, अपनी जीम से अपनी पीडाको चाटते, चूमत हुए--एक उत्स्ट क्रोध, एक उसट मानद म, जसे घायल जानवर करते हैं। उस पार बीमारी से ठीक होन पर जब उसके परिचिता ने कहा था कि उसका पुनज म हुआ है, तो उसे लगा था कि वे पूरी तरह से गलत नहा थे। पूरे छह महीने उस पाताल नगरी म वितान के बाद अब वह सिर से पर तक अपने आपको पतई बदला हुआ पाता था। हालांकि ऊपर स मृब वैसा-वा-वैसा ही था, और अव तो मदन भरते जाने से कपडे भी उतने झूलते-से नही प्रतीत होते थे। उसने घडी देखी, पांच मिनट गुजर चुप। क्या करे ? घण्टी फिर बजाय क्या ? नम्बर तो यही था, पर नाम की प्लेट कही नहीं थी। इस तिमजिले मकान मे यहाँ होगा रघु का घर? काफी पहले एक बार आया था तो शायद नीचे की ही मजिल मे ये व लोग। उसे अपनी याददाश्त की कमजारी पर खीझ हुई। उसने नम्बर फिर पढा- नम्बर तो ठीक ही था। उसने फिर बटन पर उंगली रखी। इस बार दरवाजा जल्दी सुल गया। एक तरुणी मां एक हाथ से बच्चे को सटाये खड़ी थी। साडी की टेढी मेढी सलोस लगता था कि जल्दी जल्दी ही लपेटी गयी होगी। बच्चा तौलिये मे लिपटा ठिठुर रहा था। वह अच कचा गया-"माफ कीजियेगा, आपको तकलीफ दी मैं गधव शर्मा का घर दूढ रहा था।" 'नम्बर नम्बर तो यही है, वो लोग ऊपर की मजिल मे हैं क्या नाम बताया आपने?" 'मेरा? जी जनादन मैं राघव का सहपाठी था इधर म जा रहा या तो सोचा-~-अभी पिछले महीने उसकी चिट्ठी आयी थो दि वह जाडो में हिंदुस्तान आ रहा है, यही मिलेगा--पहले तो नीचे की ही मजिल मथे स्त्री के चेहरे पर जडी आंखें कुछ देर उस निनिमेप ताक्ती रही जसे कुछ पढ रही हो। उसे अजब सा लगा, गला खंखारकर उसने बुगट का परी बटन वेवजह बद क्यिा- सॉरी, आपको काम के बीच से 28/एक नीच ट्रजेडी न?" "" " उतरे हाय न बच्चे की दिशा में एक शिथिल इगित पिया-"पर राघव तो नहीं रहे "स्त्री जैसे उमये पीछे सहे विसी से यह रही थी। बच्चा डोसा, एप सिहरन उसे पंपा गयी- पवसे?" स्त्री ने एक व्यस्त अनमनेपन स बच्चे मेघे पर तौलिया रगडा- "अभी पदह एक दिन हुए। हिंदुस्तान आने वो बात तो थी, पर उसस हफ्ता भर पहले ही पार या एक्सीडेण्ट हो गया "राम राम ।" 'हो, बुरा तो सभी को लगा, पर क्या किया जाय । पर ही हैं चाचीजी चल जाइये । पाडा कम देखती हैं ये । चाचाजी भी आत ही होंगे, गीता मुनन गप थे।' वह फिर बच्चे को रगडन लगी थी, बच्चा चोर नगरा म आग तुर को दसता हुया अपन नगपन यीशम और मां वे आपातो के बीच होले होले हिल रहा था। उस अपनी बीमारी के दौरान पर्दो से उझर पर मापते चेहरे याद आये । कुतूल, डर, ममखरी। फिर बच्चे वा चेहरा धुप गया। वह उमपी दुनिया का वाशिदा नहीं था वह जान गया था। धीमे हाया स दरवाजा मिहार वह सोठिया की तरफ मुडा । लम्बा जीना बल साता ऊपर तक चला गया था। सीदिया म महीना स झाड नहीं सगी धो-धूल भर बाला मे गुच्छे जैस रामी आकार जाला में लटके थे, दीवारें हाथा का सहारा लेते लेते चीक्ट हो चली थी. पूरी ऊंचाई में एक भुरभुरी ग घ व्याप्त थी, उस तकलीफ और हताशा की गधो न तो फूट पर बहती है, न ही पथराकर विलाती है, पर धीमे धीमे नीया को गलाती रहती है । लगातार। एक क्षण वह हाठ भीचे अनिश्चय में नीचे सडा रहा, फिर ऊपर चढने लगा। दरवाजा तो खुला हुआ था। छोटा-सा दीवानखाना था, बमुश्किल उन तमाम सस्ते रेक्सीन के सोफो,तिपाइयो, प्लास्टिक के माढो, फूलो, तसवीरा, पुरान कलेण्डरा को समोता हुआ । कमरे मे भी वही शरयुरी धूलिहा गन्ध थी। उसने धीमे से दरवाजे को हाथ से टकोरा । "कौन?" चप्पल की समर खसर के साथ घिसटती सी एक महिला भीतर आयी। मोटे चश्मे के पीछे उनकी आँखें विकृत और बेडोल लगती थी, ज्या किसी ने गला दाब दिपा हो और आँखें बाहर को उछल पडी हो। उसने अप्रतिभ हो पैर पर दोपहर में मौत /29 १ " यजन बदला-राघव नही रह- "आप कौन ?" महिला मी गदन शिथिलता से टेढ़ी हुई जैस कि उन्हें तरलीफ होती हो किसी भी मानवीय हरवत से। उनके प्रश्न म जिनासा नहीं, एक उलझन सी थी-अव क्सिलिए "जी, मेरा नाम जनादन है। राधव और मैं होस्टल में "हाँ, बैठिय, य आत होगे।' उहाने कुर्सी की तरफ इशारा दिया। वह बैठ गया। सोफे का स्प्रिंग भयावह रूप से पुराना था--बठन ही मानो पीठ जमीन से सट गयी हो। उसी रीढ मे पुरानी टीस उठी, पर इस समय उसको लेकर कुछ करना बिलावजह अभद्रता होती । नही? ' मैं, मुझे तो कुछ पता ही नही पा अभी नीचे उहाँने बताया--- क्व, कैसे ? रघु और पेसव तो आनेवाले थेन?" "हाँs, भाग्य है और क्या 1" महिला की मोटी चिवुर मानोगले म और गहरी होकर धंस गयी। जनादन ने पहली बार गौर किया कि शरीर के मोटापे के बावजूद महिला के चेहरे पर बीमारी की अस्वास्थ्यकर यांइयां थी। दोनो आँखा के नीचे स्याह दायरे ये जो चश्मे से नीचे तर उतर आय ये। वे बोली तो उसने देखा सामने के तीन चार दांत भी गायव थे, मुस हुए कपडे, बिवाईदार पुरदरे पांव, हाय। क्लाइयो में पिसी हुई-मी कांच की चूडियां, खुश्क हताश नगी दष्टि जिसम कोई अपेक्षा नहीं कोई प्राथना नहीं। वह सिहर गया।- 'आनेवाले तो सभी थे। जेनी भी बच्चे भी, हवाई जहाज मे सीट पीट सब्ब पूरी तैयारी थी-बीच ही मे रही-"एक्सीडेण्ट हुआ था न?" उसे अपनी ही आवाज अजीव भाडे ढग से बेसुरी लगी—'हां इशोरेंस कम्पनी मे थान! दिन रात दौरे करने पडते थे-इधर मुना कोई पुल बन रहा था-डाइभरसन था सडक पर- उसने दूसरी सडक ले लो, वही पिसी बस या ट्रक से टक्कर हो गयी-ऐन सामने–बस उसी दम राम-राम-' वह सिहर गया।' फिर आपको खबर दी होगी-' जनी काही फोन आया था'--निष्प्राण आवाज टेपरिवार की तरह खवर भर दे रही थी, बगैर उतार चढाव के-- कहने लगी आप आयेंगे क्या? वा तो नहीं कुछ भी-फिर हमने कहा क्या करेंगे जाके-पसा 30/एक नीच ट्रेजेडी "कुछ देर चुप्पी क्या।" " भी तो चाहिए जाने आने को- "सो तो है उसने कहा। 'वैसे तो रघु ने इस बार लिखा था कि अबके आके हमे भी कुछ दिन वा साथ ही ले जायेगा वहा, पर उसकी बात, उसी के साथ गयी। अऽऽब एक शात शिथिलता से मोटे बेडौल हाय घुटना पर टिक गये- 'जब अपना लडना ही नही रहा तो अग्रेजा के मुलर में वेगाना की तरह क्याऽऽजाना- पर जेनी? बच्चे?" जेनी का तो पीहर वही का ठरा। उसके मां-बाप, सग सँगाती तो सब वही के हुए 'आवाज कहती जा रही थी-"रह गये यहाँ हम जटायु जैसे पबहीन । क्सि आसरे किसलिए होता है ये सब ऐमा हैं ? कभी सोचती हूँ जब उसने जेनी के साथ शादी करने की लिखी तो मैंने ही कहा था इससे तो तू पहने ही मर जाता–पर मेरा ये मतलब थोडी ही था- अरे आशीर्वाद भी तो इसी चमडे की जीभ से दिये थे उसे, वो क्या नहीं फले । एक कोसना ही क्याकर पल गया । क्या पूजा, क्या पाठ सब्ब बेकार है-" सर दीवार पर टॅगी एक स्विस घडी से एक बेडोल कोयल का सिर निकला-कुक्कू कुक्कू कोयल ने ग्यारह बार कुहुक्कर ग्यारह बजाय- घडी समय से पीछे थी। "पिछली दफे आया तो ये घडी और जाने क्या क्या लाया था-अरे ये घडी-वडो क्या मैं तेरी जगह रखूगी बगलवाली कहतो थी बड़ी महंगी चीजें हैं-मैंन कही अरे हमार लिए महंगा क्या, सस्ता क्या -अरे जवान बेटे का आँख के सामने होना क्या कम बडी चीज होती पर हर बार वो जेई वह कि अम्मा, ह्या जित्ती कुल तनखा पाऊँगा उससे चारगुनी तो मैं और जेनी बेबी सिट्टर को देते हैं हर माह । पालेंगी, अब वेई वेबी सिट्टर पालेंगी रोजी और राजेस को। जेनी तो नौकरी से ई फुरसत नई । जब तब नई छोडी नोकरी, तो अब क्या छोडेगी?" "बच्चे आ चुके हैं कभी यहाँ ?" 'यहाँ ?" उह कुछ समय लगा प्रश्न को उत्तर से जोडन मे-'आये . दोपहर म मौत /31 " थे दो साल पैले~राजेश तो बहुत ही हिल गया था--जाने को कतई राजी नहीं था-रयु चोला कि इमे रख लो, यही पढा दो-हम भी आसानी, तुम्हारा भी दिल लगा रहेगा, पर मैंनेई मना कर दिया- 'क्यो?" संभलने से पहले ही उमयी जिनासा छूट भागी थी। 'जरे, बाहर के पले बच्चो को य जगह रास आती क्या ? तुम्ही कही मा बाप सामने हा तो और ही यात है- -पर मे कच्चा पानी वो ना पियें, मसाला वो ना सायें, मेरी भापा वो ना समझें-जाने। मान लो इधर महतारी वाप यहीं छोडके चले जाते और इधर ये बीमार हो जाता तो सब येई पहते कि दादी ने देखभाल नहीं की।" महिला के हाठ कुछ दर अपने से ही कुछ बुदबुदाते रहे। वह चुप रहा । अव चलना चाहिए उने। उसने गला संपारा । “अच्छा अब चलू " वृद्ध अपेक्षाकृत चुस्त और 'जात है ?" महिला को निमाण आवाज ने प्रश्न दोहराया। 'ये आतेई हाग। तभी जीने पर से आवाज आयो । दरवाजा खुला । 'कौन ?" दरवाजे के पीछे से एक बद्ध सज्जन भीतर आये । हाथ में झाला लिय। पहले मुह बिगाडार उहाने दो-तीन डकार लिये, फिर योता दरवाजे से टिकाकर मुडने को उद्यत हुए। वह उठकर सडा हो गया-- नमस्कार।" 'नमस्ते । बैठिये, आपका गुड नम?" छरहरे बदन के थे-~-उनकी गोरी रगत छोटी छोटी भाइया आखो और वाचाल दीखते लम्बे पतले हाठा म राघव की स्पष्ट छवि थी। लम्बे अर्स से कामकानी दुनिया से कटवर घर की चारदीवारी म दोपहर काटोवाले पुस्पा की निगाही, मुद्राओं और भापा म एव सास स्निमोचित कटाव आ जाता है, उसे उसने महसूस किया- 'जी, मैं जनादन हूँ-राधव और मैं होस्टल म एक साथ 'हाँ हा हो। आपकोस । वैठिय--अरे भाई चाय वाय कुछ- बैठिये न ।" उनने वातून लहजे म लम्द असें तर अकेले रहे आय रिटायड आदमी का उत्साह था जो कोई भी पुरुप धाता मिलने पर उससे चिपक चिपर जाना चाहता है। उसने अयवस्थित महसूस क्यिा-महिला अपनी 32/एर नीच ट्रेजेडी " धीमी धीमी रेंगती गति से भीतर चल दी थी । खाने पीने ये स्मरण मात्र से जमे लगा जैसे उसे उबकाई आ जायगी-"जी, चाय वगैरा नहीं।" उसने बेक्लीस प्रतिवाद दिया। "अरे हम भी इसी बहाने दो चुस्ती ले लँग जी। वैठिये-' बद्ध आराम से सोफे पर पसर चुवे द । वह सकुचित हो अपने को कोसता गया -~-यया नही पहले निकल भागा था? कुछ देर चुप्पी रही। उसी न क्स- मसापर मौन तोडा--"मुझे राघव के बारे में पता नहीं या--आज ही यही आवर मालूम हुआ। मुपे ता पिछले महीने ही उसकी चिटठी मिली थी दि वे भव आनेवाले हैं-इसी बीच में 'क्या पहा जाय 'वद्ध ने आंखें मूदकर पपोट सहलाये और लम्ब सुपद वातालाप की अपेक्षा में चश्मा गोद म डाल दिया- 'यहाँ तो हम सब क्या नाम, इतजारी म थे कि मय फैमिली के यहाँ आयेगा-रहेगा-- इधर ये सवर आ गयी-मैन प्रपोजेज गाड डिस्पोजेज-" अशुद्ध उच्चारण मेहाने जाडा । फिर पुराने फैशन की किताबी अग्रेजी म उमे बताने लगे कि राघव वहाँ कितना अधिक कमा रहा था और इस कम उम्र में ही कितनी सम्पत्ति जोड चुना था जो मकान उसने बनाया था क्या नाम, उम बीस हजार डालर मे तो आस्टेिक्ट से लैण्डस्केप ही कराया-नायाब पेड पना और फूला के पौधे लगवार-या नाम, तीन तीन तो कारें ही थी-फिर जेनी के मां-बाप भी कई चीजें दत रहते थे, कभी कार, कभी सोने चादी के तोहफै। वह भी अच्छी तनखाह पाती थी। ठाठ थे। एण्ड बैस्ट आफ आल,' उहाने गदेली पर मुका मारा, 'दिल से रघु तब भी एक सरल हिंदोस्तानी हो रहा आया। पिछली बार आया तो वाइफ से बोला~~बस अम्मा मेरे लिए तो इण्डियन स्टारल खाना ही बनाओ। जेनी-बच्चा का बहुत होगा तो बाहर खिला लाऊंगा-कददू पूरी कढी, अनरसे । बस यही सब साने भाते थे उसे-संकडा जलेबी, बडे और इडली डोसा ने मिक्स के पैकेट साथ ले गया-बाय एयर (हवाई जहाज से)," उहोने कुछ रुककर जोडा। फिर बताने लगे कि वैसे उनका दूसरा लडका माधव भी लायक है-अभी इजीनियर हुआ है और वे तो उससे बहने हैं कि गो वैस्ट यगमैन । (नौजवान ! पश्चिम जाओ।) ये लाइफ भी कोई दोपहर में मौत 133 - दम-- लाइफ है, क्या नाम, रोते सिसरते मताराम पिसटत हुए दिन पाटना । यहाँ दो हजार पारर भी अधपेट रहोगे-पिर यहन को भी तो शादी परनी है- भदरग टेढ़ा देंगा पदा हटारर हतारी पास से सरपती-सी महिला हाय मे दोछसक्त गिलास पयो चाम से आयी थी। वापीसीएर प्रचलित प्रवार को सीरिया से बने पार ये गिलारा थे। उसने घुस्वी सी। चाय में मानो इस पूरी दुपहरी पा निचोड पा-सुनगुना, भदरग और यस्थाद। भूरा पानी भर जिसमे शयार यस छुला दी गयी थी। "क्या 5 s! अरे ट्रेम लाती यो याहरयाली-"फिर ये उम बताने लगे कि यह उम्दा है और मिक्सी, रापय पिछली बार क्स साया था- सस्टम को चकमा देवर । पन्द्रह तो पहियां ही ले आया था। जानत हो कसे ?' उहाने पतलून उक्सारर अपने पतले रबिदार टपने थपथपाय-- "यहाँ बापकर । उह बेच वाचर माधव को स्कूटर सरीदया गया जाते --ऐसी जुगत-सूबी पी उसमे। अरे कुछ पाने वाले को नहीं है क्या अपनी ही पुरुष जात को सहभागी पाकर वृद्ध की आवाज मे फिर एक क्रूर हिकारत आ चली थी। या शायद रोज पा ही ढर्रा होगा। निविकार चेहरे से महिला फिर लाकर एक तस्तरी रख गयी जिसमे चार छ वेडौल वर्षा के टुकडे पडे थे। अचान उसे लगा कि यदि गिलास उसने दोबारा हाठा से छुलाया भी तो उसे के आ जायेगी । वह वेक्ता से उठ खड़ा हुआ--- 'जी, अब मैं च। दरअसल कही जाना भी है वृद्ध कुछ अप्रतिभ हुए--- 'अरे पर चाय तो तुमने पी नहीं | अच्छा चलो, एक वडा मिठाई तो ले लो । ' उन्होंने तस्तरी उठायी। उसने मिठाई या एक टुकड़ा उठा लिया और घडाघड सीढ़ियां उतर आया-पीछे पीछे वृद्ध धीमे धीम उतर रहे थे। उस अचानक शम उमड पडी-सी अभद्रता से वह उठ भागा, वह भी ऐसी मुलाकात के बाद-माफ करें, मैं हडबडी मे उठ गया--दरअसल कहीं अपाइण्टमेण्ट है फिर 'अरे ठीक है भाई । 'बद्ध ने उसके व घे थपथपाय-"इस शहर में काम-ही-काम है। तुम चले आये यही बहुत हुआ।हाँ एक काम अगर हमारा सको तो~' उ हाने कुछ स्कवर भेद भरे ढग स जाडा। जी?" अपनी कुछ देर पूर्व की अभद्रता को धापाछने को वह दूनी 34/एक नीच ट्रेजेडी 1 " " तत्परता मे मुडा। "पिछली बार रघु आया था तो एम हाउसिंग सोसायटी में कुछ रुपये डाल गया था अपने नाम एष फ्लैट के लिए हम सोच रहे थे कि जेनी से लिखवा लें कि वह प्लाट अब माधय के नाम ट्रासपर कर दे। उसे यहाँ के पलट से क्या करना, रघु होता ता वात और थी-अब तो क्या ही आयेंगे वो लोग इधर-~ -यहाँ तो उनका घर है ही- जी-" 'तो जरा मालूम कर लेना कि क्या कारवाई करनी होगी उसके लिए। ये काम अभी ही हो जाये तो ठीक है। एक बार फ्लैट बनने लगे तो पिर हजार उच्च उठ खडे होंगे-वैसे जेनी के पास तो भारतीय नागरिकता है भी नहीं।" "जी, मैं पता करूंगा।" 'हो, बस तो दो तीन औरो से भी कहा है--पर तुम भी जरा, क्या " नाम,-" "जी, मच्छा।"वृद्ध के पीछे होते ही दूर कही नारी कण्ठ की खिल- खिलाट्ट गूजी से खै खै । उसने पाया वह कांप रहा था । दद हुआ तो उसने मुटठी खोली। उसपे दायें हाथ की मुट्ठी जाने पवमे क्सकर मिची हुई थी उसने धीमे से हाथ पसारा । बर्फी का एक वेआकार लादा उसके पैरो के पास मिट्टी पर गिरा-लदद । रूमाल निकालकर वह देर तक हथेली पाछता रहा, पर हैण्डिल पर धरे हाथ की चिपचिपाहट गयी नहीं। दोपहर में मौत/35 यानी कि एक बात थी । जो होते होते रह गयो । और वैसे देखा जाये तो अब वह बात पुरानी हुई भी। पर तभी मुये मालूम हुआ कि सूखी जाती नदियो की तलहट्टी की तरह हम गोगा मे भी शायद नमी का काई कतरा वही वचा रह जाता है, शायद उम धार का एक हल्का नम लहरिया जाभास, जो कभी इस जगह वहती थी। क्योकि सब कहती हूँ कि जब पहले पहल पूरे पन्द्रह साल बाद मैंने उस फिर दरवाजे से भीतर आते देखा, तो क्षण भर को चौदह सौ वोल्ट के करट की तरह मेरे भीतर एक ऐसी घटदार भक्त !' हो उठी कि मैं भी चार गयी । कमाल है | अपने सारे के नीचे मन अपनी टागो को एवा एक कुकुरमुत्ते की डण्डिया की तरह एस हास्यास्पद रूप से लापौर लुज हाता महसूस क्यिा, मानो में कोई सत्रह वरस की सिलखिल छोरी होऊँ । गनीमत यही थी कि मैं बैठी थी और इससे बात के जाहिर होने का कोई खतरा नहीं था। शायद उसके भीतर भी ऐना ही बुलबुलेदार कुछ घट रहा था, क्योकि नीद म चलता हुआ सा वह सीधा दरवाजे से उस जगह पर आया, जहाँ मैं बैठी थी और मेरे पास थमककर कुछ दर चुपचाप मुझे ताक्ता रहा। अब हम दोना चुपचाप अपने यकी कोतोल रह थे, जसा कि प्यार करने से पहले चिड़ियां करती हैं। धीरे धीरे एक-दूसरे ये चारा ओर मंडराती हुइ । जोहा रहा है उसे टोहप के लिए पुतलियां चौडाये हल्के-हल्के 36/एक नीर ट्रेजेडी नामालूम तरीके से चहचहाती हुई। वाहर सडर का कुतूहलहीन पीला कोलाहल ज्यादा क्लफदार कालर की तरह निरतर झिर रहा था। कभी कोई चिचियावर लगाया ब्रेक किसी सम्भाव्य हादसे की चौधभरी फांक अंधेरे में डाल जाता था। वूस । चिह चिह विह अतत उसी ने गला खंसारा, कैसी हो?" उसका परिचित सुदर, चेहरा उत्तेजना और सकोच से हल्का सुनहरा हो आया था। ताजे सिके टोस्ट की तरह जायकेदार जौर कुरकुरा । वह इन पद्रह साता के बाद भी तकरीवन वैसा ही रह गया था, जैसा कि हुआ करता था। अपन भरे भरे, कतिपय उत्तेजित लगते हाठा और हड्डिहा कुहनियो समेत । ववकूफ- बेवकूफ और प्यारा प्यारा। "वैठो," मैंने साधिकार कुर्सी उसकी ओर खिसकायी। पहले पहुँचने के कारण उस नीम अंधेरे पर ज्यादह हक मेरा ही था। शायद, बावजूद इसके कि कुर्सी मेज न मेरे थे और न उसके। उनका असली मासिक कोन मे बैठा, हर असली मालिक की तरह बेहद उक्ताया और उनीदा दीखता हुआ दात में फंसा कोई जर्रा जीभ से टटोलता बाहर ताक रहा था। फिर उसने एक अपचभरी डकार ली और उठकर घर चल दिया, जिधर रसाईधर पडता था। वह मोटा था, और उसकी टार्गे छोटी और पतली थी। पीछे से वह कुछ-कुछ गजा भी हो चला था। 'बहुत अर्से से तुमसे " उसने कहना शुरू किया। मुझे वीरान खण्डहरों की तरह रहस्यमय बनाती मेरी चुप्पी उसे भी औरा की ही तरह आतक्ति करती है, बहुत असें से " वह कह रहा था। । जानती हूँ।" मैंने टोक दिया। वह चुप हो गया। शायद मुझे ऐसे नही टोकना चाहिए था। या शायद उसे ऐसे चुप नहीं होना चाहिए था। या शायद मुझे भी कुछ बोलना चाहिए था। शायद बहुत कुछ नहीं होना चाहिए था, मायद बहुत कुछ पेट पर हाथ फेरता मालिक तभी झूलने- वाले क्विाड धकेलता प्रकट होता है, उसकी छोटी छोटी आखें परिचय और जिज्ञासा से कतई खाली हैं। हम दोना मानो उसके लिए दो भिनभिनाती मक्खियां हो। यानी कि एक बात थी/37 अब मैं पाती हूँ कि में बोल रही हूँ। मेरभीतर खिचे उम वीरान सन्नाटे मे मरी अपनी आवाज घुग्घुआ के स्वर की सी मनहूसियत से गूज रही है 'कितने साल' या कुछ ऐसा ही, और वह मेरा चेहरा, मेरा जिस्म, बस आँखाम टोहे जा रहा है । बाल माया-गाल होठ गला सोना पट-पर-टसने मरा सब कुछ वह जो पद्रह साल के बवाहिक अनुभव से समद और प्यार करने की दक्षता स पके आइ की तरह गदराया हुआ है। मेरे भीतर की गूज इतनी बढ गयी है कि मुझे अपनी बात ही नहीं सुनायी दे रही है। साफ है कि इस जिम्म के सुकून भरे परिचित फलाव के परे फैला वह गूजता मनहूम बीहड उसकी नजरा स भी कतई ओझल है जहां हर औरत की तरह लास पोचे, घवेले और खटि जान के बाद भी मैं फिर फिर लौट जाती हूँ, अपने प्यार का क्वच महामत्र की तरह जपती हुई। सूरज का नाभि की तरह एक भयावह आरपण भरा वह पूय विदुजहाँ उगई. बठी मैं मदरम के बच्चे की तरह हिल हिलवर दिन रात रटती रहती हूं- है सब चलता है सब चलता है। पुरपा की पगत से हरदम एक् दना नाच बैठने की तकलीफ पतली फांस की तरह एक चीख बनकर भीतर गड गयी है। ननिरलती है न दिखती है । पर है। इस निकालो। इसे निकालो भरा पूरा भीतरी वियापान गूज रहा है पर मैं सिर्फ बुदबुदाती भर हूँ। पनीम साल या निर तर अपमान, राम के आतक स आतषित होना बराबी --सब चलता मिपाता है। मो वापी सजीदा चहा यनाय अब मैं उसमे उसके माता पिता, उगने गहामिया उराको नौरी और पीर छूटे शहर मी परिचित हस्तिया को पुगत पूरन सगती हूँ। वह भी बडे ध्यान स मुद्दा-ब मुहा मर हर मवान या जयार द रहा है। गोहम दोनो यपूची जानते हैं कि यह सारी बात पीन उग अगली बात ग मतगना है जा पालतू कुत्ते से भागामारी गुनावी नानप ग जुयान मयाय बारी-बारी हम दोना या मुह जोह रही है । मागि पुती समर मेल मा आमत्रण स्वीकार ही नहीं लिया नि उगम या पार पतरयाजी भी दिशाने लगा है पर रहीं मुझे हता। भरना राता। गुप्पी में सौट गयी है। वापस । और वही यात्रा 1 AT IT यागा पासा मिनार बीपमा 38/Mनी दी जिसमे बचा-बचाकर वह तीर चलाता है और लिस्ट से मिलान कर अपना क्त टोटल गिनता है। पर मूसं। वह विदु फैलता जा रहा है। फैलता जा हडाप् वह उन सब परिधिया को ढर लेता है जिन पर वह अपना तपससाधा और अब? मैं खिलखिलाती हूँ, अब तू क्या करेगा प्यार बोल । वह अचानव चुम होकर मुझे देखने लगा है। घेवकूफ सदा का हो नही तो उसकी आंखा मे अपरिचय है या दुःख ? मुझे बेहोशी में डूबत आदमी की तरह रगना आकार कुछ नहीं दीखते । सिफ वह, सिफ 7 - वह। ढाई रुपया|"मस्ती तेलिहा वर्दीवाला वेटर हमारे सामन प्याले रखता हमारी नाल एक-दूसरे स वाटता है । मैं अपना बटुआ संभालती हूँ, वह अपना । वह मुस्तैदी से मुझे छक्कर स्पया दे देता है, सलाम ले लेता है और फिर इत्मीनान स पसरवर ऊपर नीचे, दायें पायें दुबारा मेरा चालू मुआयना करत हुए कहता है "और सुनाओ।" मार मामने धीमे धीमे भपाते हुए दो प्याले हैं। दीवार के पास्टर मे झाक्ती एक गदरायी अभिनत्री उनककर अपना प्याला बढाये कह रही है-~लीजिए न । मैं अचानक प्याने अपनी तरफ खिसकार दूध-धीनी वगैरह मिलाने की घोर घरेलू व्यस्तता में सीग-पूछ छिपाने लगती है। पनीम सान औरत की जिदगी काटन के बाद यह क्ला मेरी सा मे नीले गोदन की बुकियो की तरह गहर से खुव गयी है। इसके दो फायदे भी हैं। एक तो यह कि आप अपने कांपते हाथो का कांपना बखूबी ढक लेती हैं, दूसरे इस अदा की आत्मीय वा मल्य भरी गध, सगय की सडाघ को तुरत दवाचवर मौरे को एक पृथुल नितम्बिनी दयागुता के हवाले कर देती है। दयालुता, जो हर वक्त मेर आगे पीछे मंडराती है। गाय की सी फली फैली औखावाली बड़ी बड़ी मातृत्वपूण ढलवी छातिमावाली मैद की लाई सी लोचदार और नम दयालुता । वहुन बम बोलनेवाली, बहुत गम सानेवाली, मेरी वह अभिन परछाइ जा गुम्म चोटो पर पुल्टिस रखती, घाबा पर मर- हम लगाती मेरे द्वारा हर तोडे फेंके और चौथे गये की कि चिन्यिो को घर में पिछवाडे पावर फिर हाथ बांधे मेरी बुर्सी के पीछे आ खडी मुये पापा झलने लगती है । वह मेरी हर चीख, हर कोसने, हर पिडकी के परे यानी कि एक बात थी/39 है ।हापास्त्र ही ऐन्त । म आग नही जमातीनपत ह पनाने पारीरे । मरी सात जय पूरी तौर म ठण्डी हो चुपी हागी, मर लहू का हर पतरा जव पयरा पुरा होगा, तब भी यह ही गुपचाप अपन उबल अण्डे से भायहीन घेहर को पि मेर पायतान बैठी रहगी। माप नसिदगा तो सही। मेरी सौन ! मेरी यह दयानुना, मेरी परहार "आज दिन भर चीनी ही मिनाओगी?" यह पूछ रहा है। मेरी हमी छूट जाती है। मेरी हंसा उग आश्वस्त परती है। हंसता चेहरा सब लोगा फो सुहाना है । दसो पो उन सतत प्रसन, सतत पुत्रगुजार मुहिपिया यो जो पारियारिस पत्रियाआ पे भद्र सनरगपन म पति और बच्चा का मोन इतजार करती हैं । एर मीठी मनुहार, एय पपटपट मनोवल म भल- पूरी सी सीझती हुई। मेरी नरनीयत सौत, मेरी यह दयालु चावदारनी मेरी परछाइ, तजनी टढ़ी पर उनसे उस विह्वल नप म मुझे पतीस साला से शामिल होने पो योत रही है। जहाँ य सब मिलकर मेरी जम्बर हडिया का सयभरा क्रोध चूस डालेंगी और उनके पोलेपन म एक लहलहाता प्रश्नहीन अपार पारिवारिय प्यार ऐसे भर देंगी जसे कि भरवा करले में मसाला भरा जाता है । ठसाठस । "क्या बात है, दुबली लग रही हो, काम ज्यादा पड जाता है क्या?" मेरी रुनाई छूटने छूटने को हो जाती है। वह अपने जिमासाहीन प्यार से मुझे कुरेद रहा है। धीर धीरे। मेरे पोलेपन को उजागर करते हए । वह मुझे भहराना चाहता है ताकि इट दर इंट मुझे फिर से सिरजगर वह एक नयी बुलद इमारत खडी कर सके । वह इमारत जिसका नमूना उसकी बांस मे दबा है । वह याकई मेरे बारे मे कुछ नही जानना पाहता, वह मिफ दरार डालना जानता है । मेरे बारे मे अपने पुसती क्षणा म बैठकर व मव गढते हैं—अपने अपने साके, जिनम मेरा दुबलापन है, मेरी तुनकमिजाजी और मेरी आकस्मिक हंसी है। इसी को वे सव अलग-अलग ढग से जोडते गुनते रहे हैं। पर यह जो मैं ठीक सामने बैठी हूँ अपने इस अनमापे भूरे बजर विस्तार के समेत अपनी चिपकू दयालुता की वेडौल परछाई से घिरी हुई, इससे उहे उसे, कोई सरोकार नही । न तब था न अव है। मैं भरी मुटठी पीठ के पीछे लुका लेती हूँ खाली टेली सामने फैला 40/एक नीच ट्रजेडी देती हूँ, "कुछ-न-कुछ तो चलता रहता है । घर-परिवार का काम है, कॉलेज के इम्तिहान-" मैं गलती से एम उसांस ले लेती हूँ। अचानक मुझे लगता है कि इस उसांस का मतलब वह कुछ और ही गुनेगा। गुनता भी है। - बचारी । उसके चेहरे पर मेरी दयालुता की गऊ-आँखें कौडियो सी जडी हुई हैं, 'बहुत सहा है तुमने !" वह सिर हिलाता है दायें से बायें, भकुए सरीवा। उसे इस वक्त पक्का यकीन हो गया है कि मेरा अपने-आपको उससे काटकर अपना रास्ता अलग चुनने का निणय क्तई गलत था। बेचारी | गुमराह, असहाय लडकी । अपने पुसतीक्षणो मे वह मेरी क्तिनी मसीहाई कर चुका होगा। मेरे दुख से अपने आपका दोगुना चौगुना गुनते हुए । यह बात वह कभी नही समय पायेगा कि एक लम्बे भिन के जटिल प्रश्न की तरह जोष्ट घटाना गुणा भाग की अन त प्रक्रियाओ से गुजरती हुई मैं जब तक उसके पास पहुंचती हूँ, वितनी सूक्ष्म, क्तिनी सरल और क्तिनी बुनियादी रह जाती हूँ वह मुयमे से गुजरकर उन सब चक्करदार प्रक्रियाओस मेरे साथ- साथ घटित होने के बजाय हर बार मेरी बुनियादी सरलता पर विमुग्ध मेरे चहुंओर चकराता रह जाता है, मेरे उस नदी के से शतधा रूप से कराई नावाविप, जव एक विराट घिरी स छिलती मिल की तरह झन्नाते पतीला, मुन्नात बूढो और बदहवास बच्चा के हजूम को भिगोती, अपनी छूटती बस पकडती में कालेज के हाते मे ठीक टाइम पर पहुँच जाती हूँ। जिम वक्त पहली घण्टी बज हो रही होती है उस वक्त मौके पर आ पहुँचने की खुशी मेरे ऊपर जो धनपना बरसा जाती है वही भर उसकी पकड़ में भाता है, खीसे निपोरता मग वह फा फों तृप्त क्षणिक म्वरूप, जब में और मेरी परछाई अपनी तृप्ति भरी शुक्रगुजारी मे यकायक एवाकार हो उठती हैं। अगर बार-बार जनता की भारी माग पर हफ्तो रोकी गयी फिल्म की तरह इसी तप्ति मे मैं न छेको जाके तो शायद सोच सकूगी कि इस मोटी सनस्वाहवाली नौसरी और सदा सुहागिन गहस्यो के परेकोई तोसरा रास्ता भी खुलता है क्या? खुलता होगा। जरूर। एक घुकधुकी भरी शका, एक नीली अतृप्ति अलस्सुबह की ठण्डी घडिया मे आवारा बिल्ली की तरह कूद- पर मेरी छाती पर आ बैठती है। मेरे भीतर दो विराट भूर डने फडफडाते यानी कि एक बात थी/41 हैं । एक तीवी नोक्दार चोच पर मेरा प्रश्न छटपटाते चूहे की तरह टंगा है। कौन कौन? कहाँ ? पर जब तर मैं कुछ सोचू सोचू, दयालुता लपककर मेरे हाथ स माचिम लेकर गैस जला दती है, पानी चढाकर विस्तरे तहा दती है, और दिन फिर से गुरू हो जाता है। एक विराट पारिवारिक हडवडी मे सारी नो ढापता हुआ। मेरी सौत । मेरी दयालु परछाई फिर वही खडी है । "कही बाहर चलें तो?" मेर वाक्य से वह कुछ चौंकता सा है। पर फिर तत्परता स खडा हो जाता है । हां हां, चलो !" शायद उसकी तत्परता मुझे सुहानी चाहिए थी, पर अब गैरजरूरी लगती है अब एक काला सशय धुएँ का तरह स हर चीज़ को भयावना और बेखौफ बनाता चलता है। यहां तक कि मेरी विद्राहभरी आक्रामक्ता भी वही उसके बनाये मेरे वजूद से मेल खाती है । लगता है कि मैं बस एक रोल बखूबी अदा कर रही है जो उसने मेरे लिए लिखा है, जिसम मेरी तकलीफ उसे नही दीखती, उसे अपनी कारगुजारी दीखती है जभी वह इतना सुश है। सुश होकर वह मुझ पर वेतरह दयालु हो गया है। उसका हाथ मेरी पीठ पर पितत्वभरा स्पश बनाता है, फिर हम बाहर हैं। पास मे 20 'इस शहर को तो तुम ही ज्यादा अच्छी तरह जानती हो। कोई पाक है वह पूछता है । गैरशहरी होते हुए भी इस वक्त उसके जहन मे गुलमोहर अमलतास का ठण्डा छाँवभरा, पुरसुकून कोई एकात है जहाँ मेरे बच्चो की तरह छोटे और नम हाथ थमाकर वह मुझे अपनी शर्तों पर खेल खिलायगा। कभी हरा देगा कभी जितायेगा। हर हाल मे अपनी ताकत मे सराबोर । चित भी उसकी, पट भी उसकी और अण्टा उसके बाप के बाप के वाप का। चलो' मैं अब उसे पास के एक पाक की तरफ ले जा रही हूँ यह भली तरह जानते हुए कि उम चिलक भरे विस्तार में न कोई ठण्डा छांव है, और न ही लहलह क्यारियां । वहाँ बम ठप ठप हिलती एकाध बेचे हैं और 42/एक नीच ट्रेजेडी - - उही म से एक पर उसे बिठाकर मेरे भीतर की सतत भीरु दयालुता गोल- मोल चारो मे दौडती मूक प्रतिवाद में छटपटाती है । वह मुझसे डरती है। वह डर से मरती है । चल भाग हम दोनो हिलती हुई बेंच पर बैठ जाते है। वह चारा तरफ एक उडती- सी नजर डालता है, पर कुछ कहता नहीं । अमलतास गुलमोहर ? मैं हंसने को होती हूँ पर वह फिर मुझ तक लौट आया है। टकाटक । मेरे टुच्चेपन को उसने एमें औदाय से वस्श दिया है कि मैं एक्दम बौनी हो गयी हूँ। अपनी परछाइ से भी छोटी। और इस वक्त वह बेसास्ता मुझसे प्यार कर रहा है । मेर सार जिद्दी वजूद को अपने वजूद से टटोलते, मेरे घावो, मेरी दुखती चोटो को अपने प्यार की असहाय ताकत से पूरने को, मेरे भीतर- बाहर, ऊपर नीचे, घूमते मँडराते, ऐसे कि मैं यककर अतत पूरी की पूरी सो जाऊँ और वह मुझे उठाकर एक सुरक्षित किले में ले जाय जिसके बाहर घूमते दैत्यो के आतनाद से डरकर मैं उससे लिपट पडू गी और तब वह कहेगा कि आओ, और मैं कहूंगी कि आती है, और झरने की तरह उफनाती हुई मैं आऊँगी और उसे सराबोर कर दूगी। नही । "मैं चलती हूँ अब !" अपने सुर की रुवाई मे मैं शमिन्दा होती हूँ। अनसीझे चमरोंघे की तरह एक लस्तपना मेरे भीतर चरमराता है । मैं जानती हूँ कि वह मुझे वाकई सराबोर करने की हद तक प्यार कर सकता है, इस वक्त । अभी । पर इसके बाद जब मैं अपनी ओखा मे उस अपनी ही पीठ थपथपाता पाऊंगी तो मुझसे सहन नहीं होगा। क्षण की क्षणिक सुदरता का भरपूर मजा लूटकर एक दयालु अनन्तता में वह मुझे सदा की तरह फील जायेगा, पर अब मैं उतनी भोली नही जितनी पद्रह वरस पहले थी। न ही इतनी भली । इस नेकनीयत अनत को लेकर मुझे क्या करना जो मुझे जरी का हार बनाकर मेरी ही मूरत पर चढा जाये पर अगर मैं उससे कहूँ कि में इस क्षण को उसकी सारी क्षणिकता और भगुरपने के साय उसके साथ बाँटना चाहूंगी तो उसे बर्दाश्त नहीं होगा। है कि नहीं? 'क्या हो गया अब 'वह लाडमरे पुरमजाक सुर मे पूछता है, "तुम्हारी सुनकमिजाजी गयी नहीं, देखता हूँ।" उसकी प्यारभरी भूरी आँखो मे करुणा का उहहह सम दर है, उस वारण के लिए जिसका सिरजनहार वह खुद है। यानी कि एक बात थी/43 वह इसे मानेगा क्या? एक लम्बी चौडी रेशमी दुलाई पी तरह उसका प्यार मैं जब चाहूं मुझे पूरा-का पूरा दाप सकता है, वैसे ही जैस कि किसी भी लुन्ने का फिकरा मुझे पूरे-का पूरा उघाड सरता है। पर मैं न तो ढांपी जाना चाहती हूँ, न उघाडी जाना । में अपनी उम बडोल सतत धंयवान, सतत क्षतिज परछाई समेत सोधी सतरगरदन उठाय सडर इस पारस उस पार तक जाना चाहती हूँ। तव ? तब मैं यहां कर क्या रही हूँ अपन को हरी घास के मैदान की तरह उसकी करुणा को टापो-तले खूद जाने का बिछाती "अच्छा चल, फिर अंधेरा हो जायेगा । तुमसे मिलकर वाकई-' बात अपूरी ही रह जाती है। अपने असहाय प्रेम मे सराबोर वह अभी तक ताके जा रहा है, और इस वक्त भी वह उतना ही सुटर और स्पृहणीय है जितना कि पहले था। और इस क्षण भी अगर मैं एकदम से रुस बदलकर कहूं कि 'रुको' तो वह तुरत रुक जायेगा, इस इतज़ार म कि मैं कहूँगो 'रेडी, गो "और हम एक नमी पारी शुरू कर सकेंगे। पर इतनी नफ- रत में उससे कभी नही कर सकती कि उसी का खेल फिर से चालू कर दू। और न ही इतना भरोसा रह गया है मुझमें कि इस मूर्य पाक के बजर विस्तार के बीच रखी हिलती डुलती इस हरी बेंच पर विठार उसे पूछू विमरे इन सरेआम अपमाना, इस अकारण भय और शर्मिदगी का जवाब मुये कहाँ मिलेगा 'हालाकि सिफ उसने मुझे यह नहीं दिय, पर क्या नही अपने रशमी प्यार के सारे इद्रजाल समेत वह मुझे बगैर पालतू बनाये इनतै उबार सरता? • अकेली कैसे जाओगी ?" वह पूछ रहा है। उसकी चिन्तातुरता में भी उसकी ताक्त का भरपूर अहसास है। "जैसे रोज़ जाती हूँ," इस क्षण में भी एक छोटा-सा ओछापन दिखाने से बाज नही आती। शम । शम चुप ! "उधर स छ सौ दो मिल जाती है, घर के ऐन पास छोड देगी।" "अच्छा फिर-" हाथ हिलाता वह छिप गया है। दिन भी ढल चला है और एक सारा तरह का शहरी अपरा दाढी की खूट की तरह सडको पर उग आया है, 44/एक नीच ट्रेजेडी स्याह । शका । दुविधा । फिक्र । जभी मैं उसे आता महसूस करती हूँ, नीली पतलून और कुछ-कुछ तेलोंस कालरवाला सांवला चूहे-सा आदमी, कनखियो से अकेलेपन का जायजा लेता, सांप-सा सरपट सरकता, आडे-टेढे वह मेरे साथ सडक का अतिम अकेला कोना पार करने लगता है। शका । भय । शका। वह एक्दम पास आगया है, इतने पास कि भिचे दांतो के पीछे मैं उसकी हिंस्र फुसफुसाहट साफ सुन सकती हूँ "कुतिया ले जायेगी? ले जा जा" उसका भद्दा इशारा उस भर्रायी आवाज की कायर प्रतिहिंसा मुझे ऐन चौराहे पर सनीमा के पोस्टर की तरह गेंठ देते है। और इस अपमान से निष्कृति विघर है । एक तो वह खोह है प्यार की, जिसमे अपने को पूरा-का- पूरा मैं अभी उल्टे पैरी जाकर ऐसा गुडप कर सकती हूँ कि चांद और सूरज भी मेरी परछाई नहीं छू सकेंगे, या फिर यह कर सकती हूं कि निरन्तर अपना आचल खीच रही अपनी दयालु परछाइ के अक्षुण्ण हरियाले विस्तार मे दूब की तरह ऐसी बिला जाऊँ कि मुझे खोजना भूसे म सुई दूढने के बराबर हो जाये ! क्यो ? क्या इरादा है ? मैं अपने-आपसे पूछती हूँ। सामने बस स्टॉप दीख रहा है जहाँ एक पसीजती कतार बस के इन्तजार में ऊँघती खडी है। मेरे जीवन के इस क्षण की प्रकाण्डता का उह तनिक भी भान नहीं। उसे कोई सरोकार हो भी क्यो? आखिर मैं चाहे इधर जाऊँ, चाह उधर, और चाहे अपने निजी भाड मे, इससे न तो उनकी बस ही जल्दी आयमी, और न ही देरी से जायेगी। है कि नहीं? रही जवाब की बात- यानी कि एक बात थी यानी कि एक बात थो/45 विवो फैशन के लिहाज से यह यूढो का वप था। खूब क्सकर, तकरीवन माथे के ऊपर ही मरोडकर वाधे गये जूडे, नोच नोचकर वेहद पतली बना ली गयी बेचारी भौहा, और सुनहरी दमानी के गोल चश्मो का वप । कपडे भी बीहड हो चले थे। बेमेल हथकरघे की साडिया और छीटदार ढीले ब्लाउज चादी वे पाले पड़े हुए मैले भाभूषण या झब्बानुमा कुर्ते जोर तग मोहरी के पजामे। आंखो मे सुरमा फिर फशन मे जा गया था, या फिर काजल। पिछले सालो के नीले बगनी लिपस्टिक और पपोटो के ऊपर लगाये जानेवाली सुनहरी घानी शैडो नक्ली पलको समेत न जाने कब अपने आप गायब हो गय थे। यह फैशन का क्षेत्र भी एक बडा रहस्यमय इलाका है जनाब | यहा बिना हल्ले, बिना हडबाग के अचानक रातो रात सब बदल जाता है । ऐसे, कि पहले-पहल तो आपको यकीन ही न हो, कि यह भी भला कोई फशन है क्या पर धीरे धीरे लगने लगता है कि भई वाह असल फशन ता यही है बाकी हम सब तो क्या नाम पख मार रहे थे। है कि नहीं? तो उस छोटे-से निदियाये शहर में भी जहां हर चीज़ साल दर साल समुद्रतल की काई की तरह धीमे धीमे लहराफर तिरती झूमती ऊंघती रहती थी ऊंचा फान आ सा । एकाएक, यानी जिस अग्रेजो पत्रिकाओ की भाषा मे कहते हैं हाई फैगन।' पहले दो-तीन ट्रकोम बम्बार लगा हुआ सामान आया, फिर गमले 46/एक नीच ट्रेजेडी ? ASHA - आये, फूलो और विचित्र रगोवाले पत्तो से चकाचक, फिर कुत्ता, फिर काका तुआ फिर वे दोनो, और सबसे अन्त मे विब्बो। पति ऊँचे, लम्बे रद का हंसमुख दोस्तबाश इनसान लगता था। कीमती गम कपडे का ढीला कुर्ता वह एक सामती लापरवाही से धारण किये हुए । हा, हां, वे लाग कपडे पहनते नहीं थे, वैसे जैसे कि बाबुओ, व्यापारिया के चुस्तकाट लडवे-लडकियां पहने रहते हैं अपने वदन वे बेडौलपने और अपने सस्कारो के भायरेपन को और ज्यादा उभारते हुए। वे लोग अपने वस्त्र धारण करते थे, जैसे कि पारम्प- रिक प्रस्तर मूर्तियां मदिरो म करती हैं। पति के गले मे उत्तरीय नर नहीं था, पर तब भी कल्पना की जा सकती थी कि वह किस प्रकार उसकी तही को बायें हाथ पर झेले हुए विराट हस्तमुद्राआ से एक क्लात्मक पौरषमय अतरिक्ष रचता यदि वैसे परिप्रेक्ष्य मे उसकी कल्पना करो तो। पली मुनने से जिस्म को सुदर लडकी थी। लड़की बहना ही पडेगा, बावजूद उसके क्से जूडे, नुची भवो और सुनहरी कमानी के गोल चश्म के । उसका जबडा कुछ-कुछ चौकोर था, और एक ऐसी खानदानी जिद से भरा हुआ भी, जो पीढियो से अपना हुक्म वाअदब बजवाती रही हो । वैमे उसकी आवाज वहद नरम और हलीम थी, और उनका उच्चारण गुनगुनी अग्रेजी ध्वनियो से पगा हुआ था। आ' की मात्रा को वह हलर मे घुमार बालती थी, और 'र को एक बेहद प्यारेपन से 'ड और 'र' के बीच का हाफ बना- पर रहती। एक हल्का पजाबी कटाव उसकी अग्रेजी के सारे परदेसीपने को पाडकर उसे एक प्यारी प्यारी सम्भ्रात आचलिवता के घेरे मे ले जाता था। वह कुछ कुछ रुककर झटके से बोलती थी, जैसे कि सामगान किया जा रहा होगा। उसके नहेन हे गुडिया हाथ, उस वक्त एक कमनीय अन्तरिक्ष रचते होते, हालांकि उसकी अंगुलियां लम्बी, कलात्मक नहीं, बल्कि छोटी, चौकोर, पुष्ट और दुनियादार थी। विश्वो की बात और थी। वह उस नहीं गुडिया पत्नी को निजी नौकरानी के बतौर आयी या लायी गयी थी। और उसके नाम के अनुरूप ही उसका जिस्म और उसकी पूरी शस्सियत एक निहायत सुखद व मासल किस्म से विन्बो/47 एक पजाबी, कतई भौतिक चाक्षुष उपस्थिति थी । वह अपनी मालकिन की विगत फैशनवर्षों की वे उतरनें पहने रहती थी, जो लगभग कोरी ही होती, पर उनमे उसके अपने खास निजी स्पश थे। सब कुतों के गले उसने नीचे तक काट डाले थे और उसका विराट वक्ष उसके बीच सुगधित जेली की तरह निर तर कांपता रहता था। उसकी कमर चौडी, पर सुडौल, कूल्हे भर और तनिक उठे हुए थे। उसकी आँखें वीरान और चेहरा भावहीन होने के बाव जूद नमकी चाल जवानी के खुमार से बोझल और लडखडाती हुई थी- ऐसी कि हर किसी को लगता था कि उसके सहारा दिये बगैर वह चल नहीं पायेगी। चूकि घर के सारे वाथरुम सगमरमरी फ्श क थे, चुनांच वह कपडे बाहर लान के नल पर धोती थी। दुपटटा याडी मे टाग अपनी शलवार टखना तक चढाये, आस्तीन समेटे वह जब झपार झपार की ध्वनि से भूगरी चलाती तब मुहल्ले के सारे नौकर घर के पतीले गैस पर जलते छोडकर निकल आते थे। वह न उसमे से किसी से बोलती, न चालती । एक मस्तानी अदा से अतिम कपडे को पछोर, फीच और झटकारकर वह प्लास्टिक की बाल्टी मे डालती और हाय वढावर दुपटटा उठा खरामा-खरामा घर के भीतर दाखिल हो जाती। मुहल्ले की फुमती दोपहर देर तक उसके नितम्बो से सटी पेण्डुलम सी डोलायमान होती रहती। हर रोज । हर रोज ठीक ग्यारह बजे पति अपनी गाडी मे काम पर रवाना होता और पत्नी उसे दरवाजे तक छोडने आती। वे अग्रेजो की तरह चुम्मी लेकर 'अलविदा कहते थे और फिर पत्नी अपनी अटकती सी जुबान मे बिब्बो को पुकारती आदेश देती, भीतर चली जाती-बडा बंधा-बंधाया दैनिक दस्तूर या। ठीक साढे ग्यारह बजे एक सुदर प्लास्टिक का झोला टोंगे बिब्बो दरवाजे पर नमूदार होती और अपनी लडखडाती मदमस्त चाल मे बाजार की ओर निकल जाती । नुक्कड पर कपडो पर प्रेस करता रामनरेश धोबी अपने विविध भारती कायक्रम का वाल्यूम ज्या ही बढाता, तो पता चल जाता कि वह ढाल पर उतर रही है। फिर चौरसिया पान भण्डार' के ठहावे अचानक ऊँचे हो जाते, पाकेटा से कधिया निक्ल आती फुग्गे संवरने लगते -यराज्जा, धीरे धीरे उन लोगा के मित्र भी बनने लगथे।यह शहर का सम्भ्राततम 48/एक नीच ट्रेजेडी पुराना इलाका था और यहा के सब बाशिन्दे बडे बापा की औलादे और बडे दादाओ, पर-दादाओ के पोते पोतियां ये, नौकरी करना जिनके लिए एक शुगल था। उनके पास इतना था कि बताना गरलाजिमी हो चुका था। इन बगलो की अपनी दुनिया थी, अपने जश्नो-सैर-सपाटे और अपने खफीफ से मजाक या बदगुमानियां थी। नयी या चकाचौध करनेवाली चीजा से उहे सख्त परहेज था। इन बगलो के आरामगाहो मे पुरानी धूसर मूर्तियां, नायाब प्रोकेड के पुराने सोफे, शिपेनडेल का प्राचीन फर्नीचर और अलकरण एक समझदार उक्ताहट स बिखरे रहते । उनके फ्रिज रसोईघरो मे थे और बडे नामोदामी स्टीरियो यूनिट भीतर को किसी कुठरिया मे। वे सब धीमे बोलते, धीमे चलते और धीमे धीमे खाते थे। उनका सब कुछ एक अलस अनौत्सुक्य मे भीगा भीगा और एक बालसुलभ विश्वास मे मढा हुआ था। ऐसा बालसुलभ विश्वास, जो सिफ उही लोगो मे होता है जिनका बचपन सतरगी परीक्थाओ की झाग मे से सीधा निकला हो-दूधिया, बच्चा, पुरतासीर । पत्नी अपनी भोली भाली आवाज मे मिनो को प्राप बताती थी कि बिब्बी घर के क्षेत्र में उनका एक प्रजातानिक प्रयोग थी। अगर आप इनसानो की तरह उनसे पेश आयें तो कोई कारण नहीं कि नौकर हमदद मनुष्यो की तरह थापके घर मे काम न करें, उनकी भी 'वाइन्स' हैं, उनकी भी 'एम्बियासेज' हैं, नहीं? बियो वही खाती थी जो वे खाते थे-यानी मक्खन, अण्डा, फल, दूध, पनीर सब । वह हर महीने अच्छे कपडो से लैस करायी जाती, उसे हर पत- वारे अच्छा सावुन, शैम्पू और टैलकम पाउडर लेकर दिया जाता। "उनसे वह जो करे उसका अपना सिरदद है, हम उससे एष इनसानी परातल पर पेरा माना चाहते हैं, मालिव-नोरर के स्तर पर नहीं, बरादरी के स्तर पर।" फिर मालकिन अपनी मृदुआवाज और भी मृदुल सगीतमय बनावर कहती, "बिम्बो-दो निम्बू पानी और प्लीज।' बिन्नो रानी एर सक्सी रोबोट की तरह हिलती-इलती निविरार चेहरा लिये कुछ देर बाद नमूदार होती, विन्यो/49 हाय मे एक साली चादीको पुतनी दे दिमाता, निन्ना दन्ना के, चीन्नी वाल्ला" 'स्मा म्वर का चेहर की तरह नावहीन होने पर मा, उसके जिस्म की तरह गए फटा-पटा पाप हगरा प्टिोके आरपर पापिनी तुरन विनाविसित हो महमानों नेमामांतरपनी कि व नमरवाना लेंगे या चीनीवाला । वह तो नरस्ती है पर जमाव चाहें। पिर बाहर ददिया जाता, और हिलती-रोसनी विमो पद पर गमी चांना की पुरानी पष्टिया पारकर भीतर पती बाली । भी पति-पली ने तागेका यह भी बताया पारिन्होंने पिछले शहर में दिव्या को एक म्यूटीशियन में ट्रेनिंग भी दिलवायी थी, तारि ने एक और हुनर वा जाय । पढने पाटाइपिंग सीखने में उससे रवि नहीं दी मो, "अब वह एमा फेगिपत देती है वि त्वचा का पोर-पोर बाग ठे। मेरे बाहों दे बालो की पेटिंग भी वही करती है, पली अपनी रोमहीन सुठोत गोरी मजा लाती। क्या मिर्फ स्त्रियों को ही देती है फैमियत' "नहीं, नहीं। 'क्या मुदरता बोरता का हो हह है " "बाप चाहें तो- हा-हा-हा-मजार छिड गरे-पहले तुम पहले तुम । फिर एक जना मजाको स विधा आधा मगन आधा छगन होता चिम्चो के साप नीतर की कुठरिया में चला गया और आधे-पौन पष्टे बाद चमता चेहरा लिये नमूदार हुआ, 'मानना पडेगा है तुम्हारी मुदल्ली ये हप्प मे जादू • यही तो मुझे भी अचरज होता है' पत्नी चहकी, "पर से काम मे तो ऐमो द्वार है कि यदि यु न होता तो हमे शायद समय से साना भी नहीं मिलता इतने ग्लास और प्पाले तोडती है रि भावान बचाये, पर इस वाम में हुनर हासिल है।' 'अपन-अपन हुनर हैं-हा हा हा हा ।" फिर अचानर उनके घर लोगा की बावत-जावत बढने लगी। इस मोहल्ले रे पुरष यू भी नौ ते पाच दफ्तर जानेवालो मे नहीं थे। दपतर तो उनके अपने ही जिन बिल्डिगा में दपनर थे, वे विल्डिगें भी उनकी ही थी। अक्सर पति सच-टाइम पर 50/एए नीच दुजेडी - आता तो पली मुनाती रहती, "लच अधूरा वना पड़ा है और बिब्बो फिर किसी को 'फेशियल' दे रही है पगेस का मामला था अपने जाजाद खयालो और वक्तव्यो से भर तने जमावडा के बाद गली कूचे की औरतो की तरह टोकाटाकी करना भी उनके लिए सम्भव न था। भलमसी की मार । वे लोग बडे पशोपेश में थे। धर बिब्बो की भूख का मानो अन्त हो न था। सुबह वह छह टोस्ट नौर दो तले अण्डे डकार जाती-साथ म एक गिलास दूध । जबकि देह की तराश को लेकर मजग पति पली कुढत हुए सिफ काली कॉफी और टोस्ट भर लेते और जब वह आकर लचककर वहती, "जी, कल का सालन पडा है, मैं ले रही हूँ टोस्ट दे नाल अच्छा?" तो वे बगलें झांकने लगते । दूध भी वह दिन भर पीती रहती । पत्नी को लगने लगा था कि वह फ्रिज मे ताला लगा दे, तो ठीक रहे । गुच्छा-भर पुष्ट केला चांदी के भू-बोल' मे सुबह रखा होता, शाम तर एक काला-सा सुकडा वेला उत्तम पड़ा रह जाता। अचार की शीशिया की शोशियां साफ हो जाती। जम वे भी वही हाल । पत्नी के मायके स मव के थैल आते, उनका माल भी दवत-दसते जाधा रह जाता। फिर खरबूजे को देवकर खरबूजा रग पर डना है ही। बिब्चो की देख्या देखी खानसामा की भूख भी चमन उठी थी। जितनी दर पत्नी कुठरिया मे शास्त्रीय सगीत के 'स्टीरियो रेकाड' लगाकर पडी पडी अग्रेजी किताबें पढती, उमके विदेश ने आयातित ट्राजिस्टर म तेज फिल्मी गाने लगाकर वे दोना रमोई में ठिल- ठिलाते रहत । “आदिम भावनाएं हैं, लव, हा, हा, हा ।" पति ने मित्रा के बीच पत्नी को फिर समझाया, "वे लोग अपने को नहीं रोस सकते। कुत्ता बिल्लिया की तरह उहे मजा करने दो, शाम को साना और उम्दा मिलेगा- [हा हा हा।" "उम्दा तो क्या, चार गिलास और दोनो तोड डालेंगे" पत्नी न समक पर वहा । उसका धैर्य कोनो से पटने लगा था, "उसे मालूम है कि सुबह ठीक आठ बजे मुझे पलग मे कॉफी चाहिए। उसके विना मेरा जह्न काम नहीं करता । आज नौ बजे तक नहीं आयो। देवने गयी तोखानमामा कहता है-वह अभी सो रही है । सानमामा, आफ आल द पीपुल । मुस । वह भी उसका लेकर " - बिन्दो/51 "तो तुमने क्या क्यिा?" यह शायद उस दिलजली ने पूछा, जिसका पति उस वक्त विब्बो से मालिश करवा रहा था। "मैंने वही खडे-खडे लताडा उमे कि ऐसे बात करते हैं क्या? तभी देखती हूँ कि मलाजी आखें मलती आ रही हैं- क्या वजा है बीजी?' आय टैल यू-मैं तो गुस्से के मारे उल्ट पांव लौट आयी।" 'मेरी मानो तो इसे चलता करो।" किसी ने सलाह दी। 'वहीं सोचती हूँ पर आजकल फिर नौकर मिलते कहा हैं । उनके विना भी तो " "यह तो है ।" गर्मिया बीती, जाडे आये पर बिब्बो के मारक जिस्म ने शालें नहीं ओढी। हालाकि उसकी मालकिन छह हजार रुपये का पुराना पश्मीना ओढे हीटर के पास बैठी हू हूँ' करती रहती। मक्दन, मेवे घी की लुनाईस चिक्ना अपना उवले अण्डे-सा भावहीन चेहरा लिये विवो उसके गुडिया हाथो-पैरो चेहरे की उबटना से मालिश करती कील मुहासे निकालती मवें संवारती और टांगो पैरो को रोमहीन बनाती रही । जाडे-गर्मी-बरसात क्सिी मौसम का उस पर कोई असर नहीं था। उसका समदार बदन वैसा ही मस्त रहा आया और रगीन पटियालवी फूदने से सजी उसकी लम्बी गुत उसके विराट कूल्हो पर डोलती एक बडे समुदाय का तन मन डोलाती रही। ' आजकल मैं कोशिश कर रही हूं कि वह कुछ बुनाई-कढाई सीख जाये, पढाई लिखाई न सही।" अपनी रोयमैस सिगरेट का कश लेकर पत्नी ने कहा। वह एक ढीला पढा हुआ यन्मा पहने हुए थी जो उसकी क्सिी पूजा के पिसी याव कश्मीरी पाल को काटकर सिला गया था। सिखायेगा कौन?" किसी ने जिनासा व्यक्त की। उन लोगा को इस तरह वी चीजें आती ही कहाँ थी? काढना बुनना, पकाना-पर जरूरत थी भी नहीं। उनके लिए ही तो यह काम पिये जाते थे, सारी दुनिया मे। अगर वे लोग भी अपने कपडे सुद सोने काहो सगते तो उन भव्य सिताई की दुकानो का क्या होता? पली। उसी मिस्म की एक दुकान का नाम लिया, जहां शाम को मध्यवित गरिणियो और उनकी विवाहयोग्या 52/एक नीच ट्रेजेडी लडक्यिो के लिए सिलाई कटाई की क्लासे होती थी। ड्राइवर शाम को अपने घर जाता हुआ उसे छोड आयगा और वापसी में वह बस ले लेगी। बस इतनी ही-सी तो वात थी पति पली अपने औदाय और अपनी स्कीम के चौकसपने पर बडे खुश थे। "उसकी 'साइको' (अतरात्मा) को कुछ तो रचनात्मक सतोप मिलना चाहिए," पत्नी ने अपना गुडिया हाय लहरा- कर कहा, "वर्ना औसत हि दोस्तानी लिबिडा (अस्मिता) छोटे शहर मे ऐसी कुचली रहती है कि सिवा सम्म व दिमाग मे कुछ आता नहीं।' फिर कुछ देर वे सब बेहद सुथरी और विद्वत्तापूर्ण अग्रेजी मे आम भारतीय और सैक्स पर खुली बातचीत करते रहे । वे लोग खुली बातचीतो और खुली बहसो के आदी थे, इतने कि वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि वे विब्बो का उस दबूपने और सकोणता म बांधकर रखेंगे, जिसमे आम भारतीय औरत खासकर नौकरानी को रहना पड़ता है। पर इस सब सौहार्द्रपूर्ण खुली बातचीत के बाद जब बिब्बो को इसकी सूचना दी गयी तो उसा अपने नितात भावहीन तरीके से साफ मना कर दिया, "नही ज्जी, क्या करना "पर तब तुम कपडे सिल सकोगी।" उहान सुपाया। "बहोत है जी फिर दर्जी ता है ही…" 'घर मे हमारा थोडा मरम्मत रफू का काम कर तेना।" "सो माप दर्जी से परानो बहतर करेगा।' इतना कहकर वह कुछ हँसी की। "तुझे मशीन ले दंगे-दोन मी है डालिंग, वो हि दोस्तानीवाली जो मिडल ईष्ट को भी एक्सपोट होती है "हा हाँ, निगा वाली, फिर तू कपडे सीना मजे में।" "क्या करना जी," विबो ने बातचीत को पत्रमा पूर्ण विराम दते हुए पहा और नल के नीचे सलाद धोने लगी। उनकी पूरी योजना गडबहा गयी थो। "पर तू दिन भर तो साली रहती है फिर क्या परेगी!" "सोऊंगी जी" उसने उसी ऐतिह सिर भोलेपन से कहा जैम भी नूरजहाँ ने कबूतर उहाये थे, और खानसामा को देखकर हँस पड़ी। दिन्यो/53 " विव्यो एक सरदद होती जा रही थी। वह देर र तम सौती, ढेरा-ढेर साना साती और वक्त वेवक्त चीजा की फरियां मारती रहती। दो एक बार मालविन न उस अपना शैम्पू और टैलवन चुराते रंगे हाथा पाडा भी । सानसामा भी उसकी सोहबत म ढीला और ढीठ होता जा रहा था, वह ता थी ही। उधर से इधर और भाव बतान लगी थी। जब उनका कोई मित्र आकर “फेशियत' को वहता तो उम वुलाय जाने पर वह एक ढीठपने से उने ऊपर स नीचे तक घूरकर सिर यो भीतरी ममरे की तरफ झटका देती, "चलिए' और कूल्हे मटकाती जात्मविश्वास के साथ बगर पाछे दसे भीतर चल देती कि वह आ भी रहा है या नही । यह बात और थी कि वह अवश्य आता । 'ले देकर एक शाम का समय होता है, उस वक्त ये लोग आ जात हैं-" होठ चबाती पत्नी बहती। उस वक्त उसका जबड़ा कुछ चौकोर और चेहरा तना-तना हो जाता। फिर एक दिन विब्बा के घर से खत जाया, जो किसी गांव के पढे लिखे ने बिब्बो के बाप की तरफ स लिसा था, कि विमो के लिए उहें एक लडका मिल गया है जो फौज मे है और शक्लो-सूरत का भी ठीक ठाक है। विब्बो की छोटी बहन कुक्कू सवा मे आन को तैयार है उसकी तो जिंदगी बन जायेगी वगरह, वगरह । "न कुक्कू, न पुक्कू बस इसी को भेज दो वापस । अच्छा बहाना भी है इस वक्त। पत्नी ने सतरा चूसते हुए कहा। बिब्वो उस समय बाहर कपडे धो रही थी और पत्तिया की मैड के आसपास दजनो नौकर पतगा की तरह मंडरा रहे थे। 'पर फिर तुम्हारा काम कौन करगा?" पति ने एक खरख्वाह मित्र की नरमाहट भरी दृष्टि स पत्नी का नाजुर जिस्म निहारा । "कोई यही की बूढी बाई मिल जायगी ज्यादा पैसा देकर | तुम चिता न करो। सिफ इस भर पैक ऑफ कर दो, वर्ना सानसामा इमे लवर विसी भी दिन छोडकर चल देगा, फिर क्या होगा?" 'सो तो है" पत्ति ने सोचते हुए कहा। तो एक दिन बिम्बो का विस्तरा बंध गया। उसके दो टीन के ट्रक कार म रग दिय गये, दरी मे बघा एक अदद विस्तरा भी। पत्नी ने उसे एक 54/एक नीच ट्रेजेडी ।

घण्टा जीवन, आदर्श, विवाह की जरूरत और नारी स्वतत्रता के बारे में समझाया, जिसके दौरान वह सिफ हन्जी', हजी' करती या उबासियां लेती रही। उसे और उसके फौजी को इस सबसे करना भी क्या था? न एक बार उसन पति-पत्नी को धयवाद दिया, न ही हप या शोक जैसा कुछ व्यक्त क्यिा । कुछ लोगो का कहना है कि टैक्सी के चलते-चलते उसने पूरे पडोस की खिडक्यिो को हाथ हिलाया और कुछ मुसकरायी सी थी-पर हो सकता है यह उनकी कल्पना भर हो। कुछ दिन वे लोग बिब्बो को याद कर परस्पर हंसी मजाक करते रहे--फिर उसे भूल-सा गये । विन्यो/55 पितृदाय दो हफ्ता से लगातार अस्पताल वे जीने चढते उतरते नसों डाक्टरो के पीछे लपक्ते, दवाइया की दुकान के चक्कर लगाते, उमेश अब कतई पस्त हो गया था। यू पस्त तो आदमी दिन भर कालेज मे पढाकर भी हो ही जाता है, पर यह पस्ती उस पस्ती जैसी न थी। लाख उबाल हो या खीज उठे, फिर भी उसमे कुछ दर के लिए एक ऐंची-तानी खुशी तो मिल ही जाती है, जब भी पानवाला प्रोफेसर सा'ब कहर कम से कम एक पान खाते जाने का अनु- राध करता है, या वि वह्न की चिटठी आती है जिसमे कहा गया हाता है कि जनी काम हर किसी के बूते का नही और इसे करनेवाले को अच्छी गिजा लेनी ही चाहिए। इस पस्ती का ता ओर छोर ही नही था । मतर को पार की हुई बाबू की उम्र, पद्रह साल पुराना ब्लडप्रेशर मधुमेह और अब फालिज का यह जोरदार हमला। किसी भी डॉक्टर ने उनके ठीक होने की पपती आशा नहीं बंधायी थी। उसने भी नही, जो बहन का मेडिक्ल काज मे सहपाठी रह चुका था और इस नाते हर राउण्ड पर एक बार झाक जाया परता था । सिक दूर के रिश्ते की एक बुआ ने, जो शुरू में खबर पाकर मरी दुपहरी मै यस से अस्पताल आयी थी पहा था कि कही मे शेरनी चर्बी मिल जाय, तो सुरत है सुन्न अगोम उमपी मालिश से शर्तिया लाम बहन को उसन चिट्ठी में सब हाल लिख दिया था। छुपाने-जैसा उनके 56/एप नीष देवही चीच कुछ था भी नहीं और उसके पत्र पार बहन के तडप उठने या क्लपने- जैसा भी कुछ रह कहा गया था। कम से कम अब इस वक्त, जवकि वह अपने पेचीदा तलाक के मसले स उलझती, दूर फिलाडेल्फिया की परदेसी कचहरियो वटवटा रही थी। उसका नीग्रो पति, जो सिफ वेवारो का मर- कारी मेहनताना खा रहा था, अपनी डॉक्टर पत्नी स तलाक के एवज म भरपूर हरजाना ऐंठने पर उतारू था और वहन कुछ अपने चुप्पेपन और कुछ पति के कांइया पेंचा के मारे जरूरी हमदर्दी का वातावरण नहीं बना पा रही थी। वैसे लिखा था विचारी ने कि कुछ खर्चा भेजेगी, पर उस सास उम्मीद न थी। क्या हाल हैं अब ?" कालेज में उसे देखत ही सब हमदर्दी से पूछते तो वह सुकडता हुआ बुदबुदा देता कि वमे ही ह । इतनी नम, दयालु हम- दर्दी और कुतूहल अभी तक उसने अपने ऊपर कभी नही येले थे। एमे क्षणों मे उसे अपना दो कमरे का घर बहुत याद आया करता। घर, जैसाकि वह माँ के जाने और बाबू के वापस आन के दरम्यान था । अपन सार पपडियाये रागन और मक्डो के जालों के बावजूद । चुप्पा, प्रश्नहीन आकाक्षाहीन अपक्षाहीन-जपने नम्बर ग्यारह वे चश्मे और पीठ के हल्के वूवड कोलिये- दिय जिसकी ठण्डी हरी चूनदार गहराइया म गुडप होने को वह कतई आजाद था । आह । क्व जा पायेगा वह वापस रहन को उस घर म को वह करवट लेता ता अस्पताल की चारपाई पसलियो की तरह चुभती थी। और सुबह ठीक साढे पांच बजे जमादार जगा जाता था-'टटटी- पसाव का वतन निकालना, साव।" उसके नौकरी मे लगन के बाद यह पहली बार बाबू घर आये थे। और बस दो दिन बाद ही यह हो गया। "आखिरी सम की मिट्टी अपने ही वहाँ " 'वगरह लोगा ने कहा था । पर उसे खास यकीन वकीन नहीं हुआ। अगर बाबू बोल सक्ते तो अपने सूखी तरोई-से झूल आये जिस्म के बादजद शायद बहन के पास वापस अमरीका जाने को कहने लगते। अव तो उनका ग्रीन काड भी बन गया था न ! फिर अमरीका घूम आने के बाद हिदुस्तानी अस्पताला पर उनका विश्वास कतई नहीं रहा था। वैसे अस्पताल ही क्या, किसी भी हिन्दुस्तानी चीज पर उनका विश्वास नही था, शुरू से ही। पितृदाय /57 रात "मुक चलाना जानता है तो बस अप्रेज," अपनी अग्रेजी स्कूल की हेडमास्टरी वे दिना की याद करते हुए वे मही कहते । "हिंदुस्तानी की तो नस नस में जाहिलपना और कमीनगी होती है।" अपने दोना मातृहीन बच्चों को उहान इसीलिए जग्रेजी स्कूल में पढाया था कि उनके यहां से छूट भागने का माग पैत्रस्त हो पाय। बहन हमेशा से जहीन थी। जहीन सुदर, मुहफट, दवग । उसबै वाल मेमो जैस भूर, और रगत वावू-जैसी यक्क सफेद थी। वह खुद माँ पर पड़ा था। संवलाया, मुनहना सा जिस्म, पतली आवाज, जिसको जग्रेजी पर बर्दिया स्कूल भी वह डैल कार्नेगीदार सान नहीं चढा पाया था जो लोगों को प्रभावित करती है, दोस्त जीतती है। बाबू को उसस काइ आशा नही थी वह जानता था। इसी से बह्न के बुलाने स जब तुरत अमरीका चले दिये तो उसे अचरज, खुगी या शोर जैसा कुछ भी नहीं हुआ था। शायद वह जानता भी रहा हो कि एक दिन ऐसा ही होगा। घर का एक हिस्सा उसके लिए खाली था ही। खर्च के लिए बाकी घर का किराया था, उसको रिसच की ग्राण्ट थी। सबके जाने के बाद वह अपनी किनावा मे चैन स गुडप हो गया था। पर रह कहाँ पाया ? तारी उसने आजिजी से ऊपर तारा। रमाकान्तजी प्रश्नमूचक निगाहो से उस देख रहे थे। वे सीनियर प्राध्यापक थे और सस्कृत पढाते थे। हर तरह का निजी सवाल पूछ पाने लायक भारतीय बुजुगियत उन पर हरदम रहती थी। कैसे हैं पिताजी।' उन्होन रजिस्टर रखा और तजनी के ऊपर का दाद होले होल खुजलाने लगे। प्रश्न उसकी चुप्पी के बावजूद जवाब की प्रतीज्ञा मे टेंगा रहा। "वैसे ही हैं," वह देर बाद जैम कुएं के भीतर स बोला । एक गुगुनी पस्ती अचानक उसके टखना स दिमाग त छा गयी थी। खिडकी के बाहर धूप कैसी भली लगती थी। वहां एक चिडिया चहलहायी फिर चुप हुई। कांच पर एक मक्वी फिसल रही थी बज लो तो यांसो में पानी आ गया। उसे अपने घर का पुराना पलग याद माया, जिसके गिलाफ सनलाइट साबुन की महत लिय हाते थे, जिस दिन ज। उसन जम्हाई 58/एक नीच ट्रेजडी " वह उन्ह बदलता था। 'आप ज्योतिषशास्त्र मानते हैं " रमाका तजी पूछ रहे थे। उसने कहा कि वह इस बारे म जानना-बानता नहीं ज्याद सो 'पई बार ग्रह शाति करा लेन से भी कष्ट निवारण हाता है," शायद ऐसा नीद और हल्वे पसे वे दरम्यान रमाकान्तजी ने कहा । और यह भी कहा कि "वैसे तो सब ऊपरवाले के हाथ म है, पर अपना क्तव्य तो करना ही हुआ, है कि नहीं ? पितृदाय जो हुआ-वैस अग्रेजीवाले ये सब मानते- ऊनते तो नहीं "नहीं ऐसा तो नहीं।' उसने हल्ले से प्रतिवाद क्यिा, "सिफ यह कि उमे जानकारी नहीं इन सब चीजों की।" 'तो क्या नाम, हम देंगे?' रमाकान्तजी ने तुरत एक कागज झपट लिया और उस पर मनोयोग से अपनी मोटी मोटी लिखाई मे नाम पता लिखकर उसकी ओर बढ़ा दिया-"ये हमारे पुराने परिचित हैं । ज्योतिष तो जानते ही हैं-भृगुसहिता भी बहुत बढिया बांचते है। पुराने आदमी हैं, पूछने पर कोई भी गली मे पता बता देगा।" काम खास था नही, पर्ची जेव मे उडमकर वह उठ खडा हुआ । जाये, एक दफा घर मे भी झांक आये। घर वह आजकल सिफ पतलून कमोज बदलने और डाक देखने जाता था। क्लास परीक्षा की तैयारी के लिए बन्द कर दी गयी थी, सो वह सब काम भी नहीं था, घुले कपडा की नम तह खोलते हुए उस हल्का-सा दुख हुआ। कभी कैसे फुरसत से वह कपडे बदलता, या छुट्टी के रोज देर तक उठना टालता जाता था, कसे देर तक मल मलकर नहाते हुए मुंह से पानी की पिचकारियां छोडता फोक्ट में मुदित होता रहता था । ठण्डे और बडे-मे नहानघर मे अम्मा की शादी के पीतल के दो बडे गगाला मे ठण्डा पानी भरा रहता । लोटा पुराना, बडा और मुरादाबादी था। खूब नहाकर खूब चूनेदार दो पान, फिर क्या था | चटपट दो चार लोटे डालकर उसने इस वक्त काम पूरा किया। एक बटन टूटा था, टांककर कपडे पहनना खत्म ही कर रहा था कि कुण्डी खडकी।पीछेवाले किरायेदार के पिता थे। कैस हैं ?" उहाँने बाबूजी के लिए पूछा । उसन दैनिक स्वास्थ्य बुलेटिन दिया। पेशाव उतर रहा है, जानकर वे निद्वन्द्व हुए। देर तक सिर हिलाकर कहते पितृदाय /59 रहे "बम पेशाव तो नियमित रूप स उतरना ही चाहिए, गुर्दे चलते रह, तो आस बंधी रहती है । आस बडी चीज है बेटा।" उन्होन उसकै क बड़ी वुजुगियत से थपथपाये, "गावाशी है तुम्हें, पितदार निभा रहे हा । वरना आजकल के जमाने मे " उसे हल्की सीज-सी हुई। इतना तत्त्वनान करने लायक आत्मीयता तो उनसे थी नहीं, आज मौका पाकर चढ दौडे । वह लायरी से दो चार हल्वे पयास लाया था और साच रहा था कि अस्पताल जाकर पढ़ेगा। अगर वावू ठीक ठाक रहे तो। "अच्छा चलू," उसने हाथ जोड दिये । व शायद और मागदशन करना चाह रह थे उपका, पर उह जाना ही पड़ा। उसन कितावें हाथ मे ली और ताला लगान लगा। चाबी घिस गयी थी और ताला बद होने में हमेशा देर लगती यो। जव चावी जेब मे डाली, तो कुछ सरसराया। उसने देखा, रमाका तजी वाला कागज था। वह सडक अस्पताल के रास्ते मे पडती थी, बस पर्लाग भर भीतर को मुडना होता। क्या करे? इहें भी आजमा ले क्या ? स्कूटर को झट से स्टार करते हुए उसने सोचा, चलो यही सही। पद्रह दिना में दवाइयां तो मब आजमा ली गयी थी, अब तो पीठ और दूल्हा पर रुपये बराबर पाव भी पड चले थे, जिह लेकर डॉक्टर और परशान थे। पितृदाय । रमाकातजी भी करत थे इसे, चलो ठीन है। । अभी एक दम गर्मी तो नहीं आयी थी, पर आ ही चली थी, ऐमा पहा जा सकता था। पानी की उम्मीद थी नहीं। कमर के वाचाम कागज चिप पाना होगा, उमने एए साइकिल से स्तरात, उनीटे आलम स सोचा। पर यह तो तब जयवि पर लौटना हो। वह पिर उदाम हो गया। गली पाउण्टैन- पन की एक दुकान के सामने से मुख्य सहब को छोहार भीतर मुहती थी। दुशान से ऊपर एक विराट पेन लगाया, टीन का बना हुआ। स्याही से सिपडे कपडे की एव सीर माउण्टर पर पड़ी पी और दुकानदार कैघ रहा था। स्यूटर मी आवाज से भी उसने पोई उत्तेजना या उस्मानी व्यात रिया | बगल में एक छोटी सस्तीपर गलीमा नम्बर पाताईस । यही गमी पी। नीचे उपर बैठा एक आदमी पेशाब कर रहा था। वह यमल की 60/एप नीष देरी परचून की दुकान के पास रुका। स्कूटर शायद भीतर जाये नही, उसने उसे दुकान के सामने रखकर ताला लगाया और काउण्टर के सामने जा खडा हुआ। उस पुरानी और अंधेरी दुकान मे कई चीजा की महक भरी थी। धूप- भरी आखो की चौध उतरने से पहले गध चीजा का अता पता दे जाती सुतली के छीक्दार बोरे, सूसी धनिया, मिर्च, चावल, चाय और सौंफ। दुकानदार बूढा था और उसके मोटे चश्म के पीछे उसकी मोतियाबि दी निगाह बेडौल और धुंपली थी। उसके सिर के पीछे के कैलण्डर म एक गदरायी लक्ष्मीजी रपया की अथाह वर्षा करती मुतकरा रही यो, पर यहाँ ऐसा कुछ भी न था। जो भी था, हाथी या कमल या रुपया, वह उस छापे म ही सीमित था। तराजू सीधा करत दुवानदार ने ठोढी से भीतर को इशारा क्यिा, "भीतर को जाकर वम्बे के पास से बायें मुड जाना-सैन बोरड लगा है।" 'इधर ही से ?" 'और नही तो विधर से?" दुकानदार गद्दी उठाकर रेजगारी गिनने लगा । उसका मन हुआ कि दे कमबख्त कोएक झापड और सीधा वापस चला जाये। जाा कहां फंसा दिया रमाकान्तजी ने, बात का सीधा जवाब नहीं दे सस्ता था क्या? पर वह बाहर ही निकल रहा था कि दुकानदार ने कफ से घरघराती आवाज लगायी- 'ऐऽ मुनीऽऽ!" खम्भे के पास एक ढीठ आंखोवाली लड़की एक तेलिहा कागज मे कुछ लिये चपर चपर खा रही थी। वही मे चीखी-'क्या है ?" उसकी आवाज खूब ऊँची और कुछ-कुछ फटी हुई थी। "जा जरा इह अपने यो पोंचाई आ।" दुकानदार ने कहा। 'जाओ ये पोंचा देगी," उसने उमेश से कहा । अब कोई चारा न था। मन मारे वह लड़की के पीछे हो लिया। लड़की कम से कम तीन साल पुराना उटग झाक पहने थी। उसके पैरो मे मैल और चोटा की पत सी जमी थी। पहल उसने कागज गुडी मुडी करके नाली मे फेंका, फिर हथेली के पीछे से मुह पाछा फिर बोली, "चलो।" वे दोनो चल पडे। 'जरा स्कूटर का उसने दुकानदार से कहा। उसने सिर हिला दिया, या शायद नहीं। मली के भीतर दोनो तरफ खुली नालियां थी और उनसे बीभत्स सडाँप उठ रही थी। जगह जगह पाखाने को ढेरियां थी, एकाघ दरवाजे की ओट से पितृदाय /61 . ध्यान सांवले निष्प्रभ चेहरे अनिच्छा से झाव भी, फिर सिमट गये। धूप तज पी। वह पायचे बचाता चलने लगा । बम्चे के पास से वे लोग मु. । पुराना, खप रेल की छत का चूने से पुता मकान था। दरवाजे गहरे पीरोजी रग से पुते थे। "येई है," लडकी ने कहा और एक टांग पर चूदती हुई वापस जाने लगी। दरवाजा बद था। उसने कुण्डी खडकायो। कुछ देर बाद भीतर स क्सिी में भारी पैर रगडते हुए चलने की आवाज उभरी। उसने दोबारा कुण्डी खडखडायो । “खोल रहे हैं।"भीतर रिसीने धौम धीमे दो-तीन चटखनिया खोली, दरवाजा पांक-भर खुला। "आप कौन?" दरवाजा खोलनेवाला साठे साल का झुराया हुआ वद्ध था। नगे बदन, बस धोती पहने, घे पर यनोपवीत, दरवाजे पर रखे हाथ पर एक चमकती हुई अंगूठी। उसने रमावातजी का नाम लेकर बताया। इस बार दरवाजा पूरा खुला। "आइए, भीतर आ जाइए।" स्वर अचानव मुलायम हो गया था। 'आजक्ल दरअसल होली का चदा मागनेवाले बहुत आ रहे है। एक ही मुहल्ले मे सात होली कमेटियाँ | कभी देखा, न सुना। म दो तो गाली- गलौज पर आमादा हो जाते हैं । आप बैठिए, मैं अभी आया। वद्ध भीतर गये। वह अपने को सहेजता हुआ कमरे की उन दो जजर कुसियो मे से एक मे बैठ गया। दीवारा पर जगह जगह ज्योतिषाचाय में सर्टिफिकेट टेंगे थे, एक आले मे कुछ पुरानी प्लास्टर की मूर्तिया थी कुछ मिट्टी के खिलौने-सेठ-सेठानी, बूढा-बुढिया, बैण्डवाले किसी का हाथ क्सिी का मुह । कमरे पर भरसक यल से ढके हुए दारिद्रय की छाप साफ थी। उसे खूब प्यास लग रही थी, क्या करे ? वह उनसे पानी मांगे ' उसने ससकोच सोचा। खिड़कियां बन्द होने से कमरे में एक धूलिहा गध भरी थी, जिसमे कई पुरानी बासें मिल गयी थी-छितराय बिस्तरे, पसीने, धूप बत्ती, चाय और चमडे के जूता की। भीतर एक नल खुला, बद हुआ। उसकी प्यास पानी की आवाज पावर और भी तज हुई । 'जयन्ती मगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा पात्रा स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते " हाथ में चार घुआती अगरबत्तियां लिय वृद्ध फिर कमरे मे आये । उहोने घर की घुली कमीज ऊपर स और पहन ती थी-मत्र नदारद था, 62/एक नीच ट्रजेठी बुदबुदाते हुए उहोने कमरे के चार वेदो मे अगरबत्तियां ढूंसी और हाथ काना पर लगारर आँखें मृद विसी अदृश्य शक्ति को प्रणाम बरा लगे। उसे खीग हुई। ऐसे लटके उसे हमेशा उबाते रहे हैं। सामा य ग्राहा का प्रभावित करने से इनके आजमूदा नुस्खे होते होंगे। पर वह यूं ठगे जाने से रहा । उसने अचामर अपने को आश्वस्त और मजबूत महसूस किया। पहले ठोर-बजाकर इनको जांच ते, फिर पाम बतायेगा।कोई पिसी का एहसान थोडे ही है, अरे होने पहा तो चले आय, पर खुद परसे विना थोडे ही "पहिए, क्या सेवा व आपको?' वृद्ध दूसरी कुर्सी पर बैठकर उसे ताक रहे थे। बूढो की अपेक्षा भरी यह कुरेदती दृष्टि उसे हमेशा हक्बका जाती है, यानी भीतर से लाख गुस्सा वक्बका रहा हो, उसके मुह स दीन गुसाइ बोल ही फूटेंगे । उसे अचानक अपनी बेवकूफी पर गुस्सा आने लगा। पढ़ा लिखा होकर भी इस सबमे फंसने आ गया, क्या जरूरत थी? "जरा पानी मिलेगा?" उसकी आवाज कुछ ज्यादा ही रखी थी शायद, "जरा चलते चलते गर्मी "हा-हो, अभी लीजिए. 'वद्ध कुर्सी से उठे-धीमे-धीमे जैस बदन जवड गया हो। बाबूजी भी ऐसे ही उठते थे, जोह ब-जोड बदन को सीधा करते हुए, "माफ वीजिएगा, आते ही तरलीफ दी।" उसने मुलामियत से कहा । वृद्ध ने शायद सुना नही। वे तब तक पर्दा उठाकर भीतर जा चुके ये उसने पाया कि वह अपने अंगूठे का नासून कुतर रहा है । यह उमकी पुरानी आदत थी। " " - " पानी ठण्डा था और सुराही की महक लिये । बडा सा गिलास पीतल का था और घिसते घिसते उसक किनारे चाकू की धार की नाइ पतले हो चुके थे। एक सांस मे पानी पीकर उसने गिलास रख दिया । 'मेरे पिताजी बीमार हैं दरअसल । उनके ही बारे मे प्रश्न नाम राशि?' "उनका तो पता नही।" 'उनका नहीं, आपका।" . पितृदाय /63 " "राशि मबर लग्न ।" 'हुम्म टाइम दखिए जरा। अभी का।" उसने टाइम बताया। "जरा वो दवात दीजिएगा।" वृद्ध न एक कागज ग्बोच लिया और रोगनाई मे डुबोकर पुराने बलम मे उस पर कुछ रसाएँ खीची, गुना, फिर लिखा। फिर उसे रखकर पीले वस्त्र म बघा एर यस्ता सा उठाया और गठिय में सूजी उँगलिया से उसकी गांठ सोलने लग धीमे धीमे । कमरे का घुधला पन अगरबत्ती की गध, पुराने धूलिया कागजा यो सरसराहट । उसे लगने लगा, जसे वह जमीन के नीचे विसी तलघर मे धैठा हो। फिर उस बतरतीय खयाल भाने लगे-'पिताजी को वद्ध ने हाय उठाकर बोलने को मना किया और आंख बद क्येि कुछ बुदबुदापर पोथी मे धंधे ग्रथ का पना सिर पर छुश्राने लग । वह हाठ भीचे चुप रहा, पर उसके भीतर एक चिडचिडाहट फ्रि पनपने लगी थी। साला बताने नहीं देगा कि मज क्या है तो दवा क्या खाक 'आजकल शुन और राहु दोना ही लग्न स आठवें हैं, यह अतर शुभ नहीं।" बद्ध ने अपना लिसा कागज उठाया और चुधियायी आँखो से कुछ पढा । "वतमान में गोचर मे इसी स्थान पर शनि और राहु भी सन्धि मे चल रहे हैं और मगल चतुथ दष्टि से शनि को दख रहा है, जो उसका नैसर्गिक शत्रु है । अत मानसिक और शारीरिक पीडा सम्भव है। पिताजी का स्वास्थ्य तो नम चलेगा ही, साम्पत्तिक हानि भी सम्भव है।" दखिए जाहिर है कि तकलीफ है जभी आपरे पास आय हैं। मेरा सवाल यह नहीं था 'डॉक्टर पुलिस और ज्यातिपो के पास अच्छे दिनो मे कौन आता है। क्या ?' वद्ध हमे तो उसने देखा कि उनके अधिकाश दांत गायव हैं और जो बचे हैं वे भी अप-तय की हालत मे हैं । हंसी के वेग से बद्ध खांसने लगे। फेफ्डो से उठती हुई बलगमी खांसी। उस घिन-सी आन लगी। कार इनकी ले द में पड़ा है यह तो उसे खुद ही मालूम है । है कि नहीं? आप कहे तो मैं मृगुसहिता की प्रश्न कुण्डली के आधार पर व्याख्या शुरू करूं' वृद्ध फुसफुसाय । सांसी का वेग रुकने के बाद भी आवाज अभी मद्धिम थी। - " 64 / एक नीच ट्रेजेडी ? उसने अपने को सयन कर स्थिति की बागडोर हाथ म ली-देखिए, पहले मुझे बता दें कि आप पीस कितनी लेंगे, क्या-क्या बतायेंग? और इस पूरे, अम्म विधि विधान में कितना समय लगेगा? में नौकरीपशा आदमी हूँ, हर बार हट्टी लेकर यहाँ आना मेरे लिए सम्भव नहीं। मेरा घर भी दूर पड़ता है । आप कुल एक मुश्त रकम बता दें, तो मैं सोच लू ।" इतना कहकर उसने एक खिसियाई राहत महसूम की। इन लोगा से पहले ही माफ बात कर लेना ठीक रहता है, वरना अच्छे कपडे दखें तो लगते है चौगुने दाम कूतने । वह पल का जाया नही है, जो इनकी नस न पकड सके । वाबू भले ही उसे बोदा ममझते रह 'सो तो है।" बद्ध न एफ घरघराती उसांस ली, "समय कम है, काम सभी का जरूरी होता है।" उसने घट से सिर उठाया, पर वृद्ध के चेहरे पर व्यग्य- जैसा कुछ भी नहीं था। वे आंखें बद क्यि बोल रहे थे 'ससार म लोग जो क्प्ट भोगते हैं न, वह देशा अपने ही लिए नही भोगते। समथे आप अपने मित्रो और शत्रुआ दोनो के लिए हम भोगते हैं-इसी से आप जो साधना या अनुष्ठान हमारी माफत करायेंगे, वह आपकी इच्छा से युक्त होकर आपके पिताजी को प्रभावित करेंगे ही--इसमे शक नहीं।" 'वह सब नो ठीक मैंने आपसे रेट पूछा था।" "देखिए " वृद्ध भेद भरे ढग से आगे झुके, · समय का आप लोगो के पास अभाव है। जो भी करना है, जल्दी ही करना होगा। है कि नहीं तो महाबी शानि के लिए जो अनुष्ठान वैसे एक हफ्ते या दस दिन तक करना होता है, उस मुझे चौबीस घण्टो मे ही करना होगा।" "यानी आप फीस ज्यादा लेंग, यही न?" उमश ने रुखाई मे जोड़ा। च्च, आप पीस की ही क्यो सोच रहे हैं ? मैं तो आपको बता रहा है कि क्या क्या करना होगा, फिर आप सोच लें चर-दरवाजा एक पाक खुला। उसके पीछे से एक जोडा काश्यां आखा ने कमरे वा मुलाहिजा लिया। यह वही छोरी थी, जो उसे यहाँ ? गच्च " लायी थी। - "जा सुरमती, अभी भाग जा, ही तो भड से दरवाजा भेडार शक्ल मोगल हुई। वह वृद्ध की लपेट भरी बाता से उकता चला था। उमे पितृदाय/65

गहा सशय होने लगा कि वह जानता वानता भी होगा या महज
वृद्ध ने शायद इसे भापा, "देखिए, आपके मन में अभी काफी सराय है।
है कि नहीं? चलिए मैं आपको दिखाता हूँ कि इस शास्त्र की महिमा क्या
है। ठीक फिर आप जैसा समझें।"
उसने सिर हिला दिया। वृद्ध ने कुछ बुदबुदाते हुए धीमे धीमे भगु-
सहिता के जजर पने खोल लिमे और संस्कृत का उल्था कर बनाने
लगे-उनकी उँगलिया गठिय से सूजी थी और आँखें बार-बार पानी से भर
माती-~शायद रोहो की तकलीफ रही हो।
"जाति के ब्राह्मण हैं ?"
'जी हाँ।"
पतक व्यवसाय-अध्यापन
"जी हाँ।
"माता का असमय निधन पिता के प्रति मन में एक भय का भाव
"ग्यारह वर्ष की अवस्था मे धातु के वाहन से टकराकर चेहरे के बायें
भाग पर व्रण है?'
उसने बायी कनपटी के उस लम्बे घाव पर उंगली फिरायी। वह ग्यारह
वप का पा और स्कूल की सीढिया से फिसलकर नीचे पडी क्सिी साइक्ति
पर गिरा था, पांच टांके आय थे।
वद्ध कुछ अटके, "वडी अजाय बात लिखी है, यदि
आप बुरा न मानें तो पढ़।'
उसके माथे पर पसीना चुचुहा आया था, "पढिए न |" उसकी आवाज
भिची हुई थी।
'भगिनी म्लेच्छ कुल म विवाहित होगी और उसका पति, पानी
आपका जामाता गूद्र मरत, महाव्यभिचारी और पत्नी विमुख
। भगिनी तु
"
"
उसकी आँखों के सामने सुमति या उदास चेहरा तैर गया। उस हराममोर
जेफरी ने अपनी डॉक्टर पत्नी से भरण पोषण पाने की दरख्वास्त ही नहीं दी
66/एवं नीच जेडी

- थी, यह भी कहा था कि नशीले द्रव्यो का चस्का उसको उसकी डॉक्टर पत्नी ने ही लगाया था और अब वह किसी काम के लायक न रहा था। 'सोचती हूं सब छोडकर वापस हिंदुस्तान लौट आऊँ।" सुमति ने लिखा था, 'प्रैक्टिस का क्या है, कही भी चल जायेगी।" पर बाबूजी भभक उठे थे, "इस दलिद्री देश मे आकर क्या अपना सिर खाती ? कहाँ तुम्हे वहां आने को लिखती, खुद लौटकर इस नरक म आने को तैयार थी। मैंने मना कर दिया एक- दम । फूलिश सेण्टिमेण्टल गल । आय सैड नो।" सो बाबू ने मना कर दिया और सुमित नहीं आयी। क्या पता, कही उसे खुद भी नशीले द्रव्या की लत न पड गयी हो "एक गिलास पानी और मिल सकेगा?" उसके कानो को अपनी ही आवाज अजीब कनसुरी और रिरियायी हुई लगी। वृद्ध फिर उठे और बाहर गये। घर मे शायद उनके अलावा और कोई नही रहता था। वही कोई आहट, फुसफुसाहट, कुछ नहीं। हो सकता है, घर के लोग दोपहरभर को कहीं बाहर गये हो। उसने पानी का गिलास थाम लिया और सहरा सहराकर पीने लगा, जैसे उसकी जान का एकमात्र सहारा वही हो। पोकर उसने गदेली से मुह पोछा, तो उसे वह छोटी सी लडकी याद आयी। क्या नाम था उसका 7 7 हो, सुरसती। 'वह छोटी बच्ची ?" उसने बाहर इशारा दिया। 'हाँ, मेरी धेवती है," वृद्ध ने कहा । वे तावे की दन्त-खोदनी से अपनी दन्तपक्ति का रहा सहा भाग खोद रहे थे, ‘बताइए, क्या निश्चय किया आपने ॥ उसका मन एक अजीब तरह से निश्चित सा हुआ-चतो कोई ता है इनकी देख भाल को। 'ठीक है, पूजा आप कर डालिए। पर क्तिना हुआ, ठीक-ठीक बताइएगा?" उसने अपने पस की ओर हाथ बढाया। क्षण भर को हाथ बढाते बढाते उसया सशय फिर उभरा, फांस लिया न बूढे न जाल म? संर, पर्स निकालकर उसने हाथ में लिया। "क्तिना?" वदको आसे पस पर निनिमेप जडी थी- पूजा-सकल्प का इक्यावन हा, सामग्री और दक्षिणा का तीन सौ। एक लाख जप होगा, सौ और- पितृदाय/67 " . . कुन बार नौ इक्यावन होगा क्या उसका मुह खुला रह गया। "तीन सौ की सामग्री | क्या क्या लेंगे आप?" "पिए पूजा तो आपको ही करानी है। है कि नहीं?" वद्ध ने मुह विगाडर खट्टी सी डकार ली और सीना मलन लग । वानी अब उनके हाथ म घी और उ हे यह अच्छी तरह मालूम भी था। "आपके हमारे काम में मामग्री थाडी घटायो या हटायी जा सकती है, पर पूजा सामग्री तो एक उहान हाथ से कमल का आकार बनाया, "सम्पूण होनी ही चाहिए, वरना क्या फायना ? गरज तो हमी को है। है वि नही?" पोरोस पोरो को टिवापर व भेद भरे सहयोगी भाव से उसे तारने लगे, "मज तो बडा है ही। उम्र भी हुई-सामग्री मे सभी होगा-घृत, केसर, कस्तूरी अगुरु, चदन वैम आपकी इच्छा।' व तोते की तरह आखें पलटकर छत को ताक्ने लगे। उनने पस से सौ-सौ के चार नोट निकाले, एक पचास का और एक चाँदी के रुपये का सिक्का, और सामने रखकर उठ खडा हुआ। तो उसकी रसीद या कुछ उसन हाथ सेवा मे रसीद लिखन की मुद्रा बनायो। रसीद क्या करोगे?" वद्ध क्लान भाव से हंसे, "मरीज का ठीक हाना ही रसीद नहीं होगा क्या ? आज फाल्गुन को द्वादशी है-आज ही से जप सामग्री जमा करके 'क्या मैं आकर देस षया करेंगे? वैसे भी न तो मात्र आपको समय आयेंगे और न ही 'विधि, क्या ?' बद्ध उठ खडे हुए, ' ऊपरवाले का भरोसा रखिए, सब ठीक हो जायगा।' " वह बाहर निकला तो दिन ढल चुका था पायचे बचाता वह दुकान तक पहुंचा। उसके स्कूटर के पास कुछ बच्चे कचे खेल रह । उही म बह उटग मॉक्वाली झवरी लडकी भी थी। उसे देखकर वह भेद भरे ढग स मुस्करायी और फिर अपने दोस्त से सुसर-पुसुर कर कुछ कहने लगी। वे 68/एक नीच ट्रेजेडी - दोना उसे विलौटो की तरह घूर घूरकर हंस रहे थे। हाठ भीचे मीच उसने स्कूटर स्टाट क्यिा और बाहर जा गया। उस संकरी तग गली में अभी जो घटा था, बाहर चौडी सडक में आवर एक दु स्वप्न सा लग रहा था। मिवा इमो कि वह चार सौ इक्यावन रुपये गिन आया मूनों सरीया, न कोई रसीद, न पता। बूढा मुकर जाये, तो वह क्या करेगा? लानत है उस पने लिखे होने को सर-आम मूडा गया और जानते-बूझते भी पमा उगल पाया। ठीक कहते थे बाबूजी, "कोच्छ नहीं होन दा उसस।" बाबूजी की बीस साल की पैनाई हेडमास्टरी निगाह ने तभी उसकी वक्त कूत ली थी, जब वह नाई ए एस की परीक्षा के ख्वाब देख रहा था। "अपनी औकात और दिमागी कूवत देखकर ही रवाब पालन चाहिए," वे प्राय उसे सुनाकर क्त थे। वही हुआ। उसे आँखों की वजह से अनफिट करार दे दिया गया। जिस दिन आई ए एस की परीक्षा का नतीजा आया वह मुंह छिपाये पड़ा रहा, फिर प्राध्यापकी के लिए छोटे मोटे कस्बई कॉलेजो मे आवेदन पत्र भेजने लगा। तो फिर क्यो चले आये उसके पास बाबूजी ? रहते वही अमरीका की चकमक बस्तियो मे, अपनी चहली बेटी के साथ । पर शायद व बेटी का तलाक बागडबडझाला खत्म होने पर ही लौटना चाहते थे। छोग शहर था, जपरी ने अपनी करुणा गाथा को एकाध अखबारो मे छपा दिया था। गरीब के लिए करुणा वहां बडी जल्द उमडती है न । गुस्सा भीचत हुए उसने लिपट का बटन दबाया। इतने दिना मे लिपटवाला भी उसे पहचानन लगा था-उसे देखकर चुपचाप पांचवी मजिल का बटन दबा देता। बाबूजी वैसे ही थे। स्थिर टक्टको बांधे सामने तारते। प्राग्वेट नस एक अनावश्यक चहक से उनका मुह पाछ रही थी- 'देखिए, आज पिताजी ने आधा कटोरी दलिया लिया--एक औंस सूप भी। ऐसे ही गुड बॉय बने रहे तो बस हफ्ते भर मे छुट्टी ।" फिर सूई मे दवा भरकर उसने सूखी चीमड बांह मे भोक दी और स्प्रिट से मलकर यह जा, वह जा। 'पेपर | 'बाहर ईवनिंग पेपरवाला लडका खडा था। उसने अखबार लेकर पैसा दिया और भीतर आया । बाबूजी कुछ उक्-उक्-सा कह रहे थे। "क्या है बाजी?" उसने नरमाई से पूछा । घडी देखी, शाम के पांच पितृदाय 169 ।

" क्या " कुन बार मी इक्यावन होगा उसका मुह खुला रह गया। "तीन सौ की सामग्री । क्या क्या लेगे आप?" "दखिए पूजा तो आपको ही करानी है। है कि नहीं?" बद्ध ने मुह बिगाडपर एक सट्टी सी डकार ली और सीना मलन लगे। बाजी अब उनके हाथ म थी और उ है यह अच्छी तरह मालूम भी था। "आपरे हमारे काम म सामग्री थाडी घटायी या हटायी जा सकती है पर पूजा-सामग्री तो एक दम' हान हाथ म कमल का आकार बनाया, ' सम्पूण होनी ही चाहिए वरना क्या फायदा? गरज तो हमी को है। है कि नही?" पोरोस पोरो को टिकावर वे भेद भरे सहयोगी भाव से उसे ताक्नै लगे, 'मज तो कडा है ही। उम्र भी हुई-सामग्री मे सभी होगा-~-घृत वे सर कस्तूरी अगुरु, वम आपकी इच्छा।" वे तोत की तरह आँखें पलटकर छत को ताकन लगे । उमन पस से सौ-सौ के चार नाट निकाले, एक पचास का और एक चाँी के पये का सिक्का, और सामने रखकर उठ खडा हुआ। तो उसको रसीद मा कुछ 'उसने हाथ से हवा में रसोद लिखन की मुद्रा बनायो। :-आज "रसीद क्या करोगे?" वद्ध क्लात भाव से हैंस, "मरीज का ठीक हाना ही रसीद नहीं होगा क्या? आज फाल्गुन की द्वादगी है होस जप मामग्री जमा करके क्या मैं आकर देस • क्या करेंगे? वैस भी न तो मत्र आपको समय आयेंगे और न ही विधि क्यो' वर उठ खड़े हुए, "ऊपरवाले का भरोसा रखिए, सब ठीक हो जायेगा। वह बाहर निरला तो दिन ढल चुका था, पायचे बचाता वह दुकान तक पहुंचा। उस स्कूटर के पास कुछ बच्चे कवे सेल रहे थे। उन्ही में वह उटग मॉक्वाली झवरी लडकी भी थी। उम दखबर वह भेद भरे दाम मुसरायी और फिर अपने दोस्त से सुमर-पुमुर कर कुछ पहने लगी। व 68/एक नीच देनी दोना उसे विलौटा की तरह पूर धूसर हंस रह थे। हाठ भीचे भीचे उमने स्कूटर स्टाट किया और बाहर आ गया। उस संपरी तग गली में भी जो घटा था, बाहर चौडी सडक मे आवर एक दुस्वप्न सा लग रहा था। मिवा इसके कि वह चार सौ इक्यावन रुपये गिन आमा मूखों सरीसा, न कोई रसाद, न पता। बूढा मुकर जाये, तो वह क्या करेगा ? लानत है उसके पहे. लिखे होने को सरे-आम मूडा गया और जानते-बूयते भी पमा उगल राया। ठीक कहते थे बाबूजी, "कोच्छ नी होने वा उससे। 'बाबूजी की बीम साल की पैनाई हडमास्टरी निगाह ने तभी उसकी वक्त कूत ली थी जब वह आई ए एस की परीक्षा के स्वाब देख रहा था। "अपनी औकात और दिमागी कूवत देखकर ही रखाव पालन चाहिए," वे प्राय उस सुनाकर कहत थे। वही हुआ। उसे आँखो की वजह से अनफिट करार दे दिया गया। जिस दिन आई ए एस की परीक्षा वा नतीजा आया, वह मुह छिपाये पडा रहा, फिर प्राध्यापकी के लिए छोटे मोटे कस्बई कॉलेजो मे आवेदन पत्र भेजने लगा। तो फिर क्यो चले आये उसके पास बाबूजी रहते वही अमरीका की चकमक बस्तियो मे, अपनी चहेती बटी के साथ। पर शायद वे बेटी का तलाक बागडबडझाला खत्म होने पर ही लौटना चाहते थे। छोटा गहर था, जैफरी ने अपनी करुणा गाथा को एकाघ अखबारो म छपा दिया था। गरीब के लिए करुणा वहां बडी जल्द उमडती है न | गुस्सा भीचते हुए उसने लिपट का बटन दबाया। इतने दिनो मे लिपटवाला भी उसे पहचानने लगा था--उसे देखकर चुपचाप पांचवी मजिल का बटन दबा देता। बाबूजी वैमे ही थे। स्थिर टक्टकी बाधे सामने ताकते। प्रा वेट नस एक अनावश्यक चहक से उनका मुह पाछ रही थी- देखिए आज पिताजी ने आपा कटोरी दलिया लिया-एक औंस सूप भी। ऐसे ही गुड वॉय बने रहे तो बस हफ्ते भर मे छुट्टी ।" फिर सूई मे दवा भरकर उसने सूखी धीमड वाह मे भोक दी और स्प्रिट से मलकर यह जा, वह जा। "पर!" बाहर ईवनिंग पेपरवाला लडका खडा था। उसने अखबार लेकर पैसा दिया और भीतर आया । बाबूजी चुछ उक-उन सा मह रहे थे। "क्या है वा'जी" उसने नरमाई से पूछा । घडी देखी, शाम के पांच पित्तदाय 169 " बजे थे । "अपवार सुनेंगे?" व बार वार गरीर का अशक्त भाग उठाने की चप्टा कर रह थे, "पहला पना?" उसने जेब स चश्मा निकालकर लगाया और पढने लगा-"अफ्गानिस्तान को चेतावनी चार प्रसिद्ध सटोरिय गिरफ्तार तथाकथित अचानक वही जोर के उबाल के साथ उल्टी का एक रेला बाबूजी के नाक-मुह से निकला और चादर पर दूर दूर तक जा फैला। उनकी आंखें कुछ अजीब ढग स टंग सी गयी, और गले से गा गा होने लगी। उसने अखबार दूर फेंका और घण्टी जोरो से दबा दी, फिर तौलिया लेकर साफ करने मे जुट गया । पूरा कमरा सट्टी महक से भर गया था। नस आयो दोनो ने कपड़े बदले। तमाम जी धिना गया था। चादर बदलकर, खराव हुई चादर उठा ही रहे थे कि डॉक्टर लोग राउण्ड पर आ निक्ल । इनम एक वह हंसमुख गुदाज बदन का अधेड उम्र डॉक्टर भी था, जो मुमति का सहपाठी हाने से बाजी के प्रति अधिर सदयता वरतता था । उसके पास से हमेशा हमेशा आफ्टर शेव की बढिया खुशबू आती थी और नों से उसके रम भीने मजाक चलते रहते। वा'जी को चैक कर तकिया थपथपाकर वह बाहर निकल आया। पीछे-पीद वह भी आया। "देखिए, आपसे छिपाना क्या ? अव तब का ही हिसाब है। आपके घर में कोई है नही । जाप दिन भर बाहर रहते हैं पीठ पर विस्तर से तमाम घाव बन गय हैं, उनसे और भी खतरा है इफ य् लाया कुछ दिन यही रहने दीजिए- आई नो इट इज एक्सपेंसिव क्या ?" "ठीक है"--वह लौट आया। बा जी नोद और बेहोशी के दरम्यान की झूम म डूब गये थे। वह बाहर वाल्कनी मे निकल आया। इतने दिनो के ही कुल पांचेक हजार के करीब हो गये होंगे। खबर पाते ही सुमति ने डॉलर भेजने के लिए लिखा था, पर सुमति अगर न भेजे तो वह मांगन थोडे हो जायेगा? वह भी इस वक्त जबकि वह धेचारी सुद इतनी दिक्ाता से जूझ रही है। ऊपर से गधा सरीखा वह चार सौ इक्यावन रुपये उस पण्डित को दे आया। न रसीद, न कुछ। अचानक उसने तय किया कि वह जाकर उस रुपया वापस ले आयगा। वही सर मस्तूरी के हवन से खून के जमे यक्के पिघलेंगे भला उसी की अक्ल मे पत्थर पड गये थे पर मान लो अगर बूढा मुकर गया तो ? स्कूटर पर एड लगाते उसने सोचा तब तब देखी जायेगी। 70/एक नीच टैजेडी रात उतर चुकी थी, गली में मुडते समय उसने घडी पर नजर डाली- साडे-आठ । गली में वत्तियां भी नही थी,पर चांदनी थी। कुछ कुत्ते खूख्वार ढग से भूके। उसे चौदह सुदयो का खयाल आया -लो, कोढ पर खाज। शनि मगल को देख रहा है-उसे बूढे की बात याद आयी। क्रोध ने ठिठकते पैरा मे अचानक तेजी भर दी। चोर कही का स्कूटर को वही आड में खडा पर उसने ताला लगाया और आगे बढा। वम्बे से वहां तक चुप्पी थी- कही किसी न घी म तडका लगाया । एक छोऽ की आवाज के साथ गली की बदबू को काटती एक मोठी घरेलू गध उठो, फिर बिला गयी। अरसा हो गया अच्छा खाना खाये, नहीं ? वह दरवाजे के आगे थमक गया । वहाँ बडा- मा ताला पडा था। अव ? गये उसके रुपये । उसने हताशा से सोचा । क्या करे वह ? लौट जाय ? नही लौटे, क्यो? कम नहीं होते चार सौ इक्यावन रुपय । पेट्रोल जो फुका मो अलग क्या वर?कही पास में पूछे हो सकता है पूजा की सामग्री लेने बाजार गये हा । उसने बगल की कुण्डी खडखडायी। "क्या है ?" एक भयातुर नारी-कण्ठ भीतर से कौंधा। एक बच्चा कहीं रोनलगा- "चुप कर ।" नारी कण्ठ बच्चे पर बरस पडा । रोना और तेज हुआ, 'कहा न, कौन है ?" फिर वही भयपूण स्वर। "बगलवाले पण्डितजी कही गये हैं क्या ?" उसने स्वर ऊंचा क्यिा। ‘गये होग, हम पता नही ।" स्वर बच्चे को चुपाने लगा। वह इधर-से- उधर निरुद्देश्य घूमने लगा। अच्छा फंसाया रमाकान्तजी ने उसे । सोचते होंगे कि छडा है, इसे पैसे की क्या कमी | फिर बहन अमरीका मे है, जहाँ रुपया बरसता है। क्या पता पण्डित से वे कमीशन खाते हो क्या ठिकाना? नही, आजकल किसी का ठिकाना नही । उसी जैसे मूस होत है जो उल्लू बन जाते हैं। ये रमाकात टाइप के लोग अपना अधेला भी फिजूल खच नही करेंगे-दूसरों से कहेंग भृगुमहिता बंचयाओ। वाह बेटा ! क्या कहने । गुस्स से फनफनाते हुए उसने ठोक्रस ककड दूर फेंक दिया। तड से जाकर वह फिर उसी दरवाजे पर लगा। इस बार चदक्षणो मे ही धडाक से दरवाजा खुल गया। ' क्या है बे ? गरीफा का मुहल्ला है य गत गये यहाँ क्या हल्ला गुल्ला कर रहा है ऐ?" एक तगडे गठीले जिस्म का गुण्डा- पितृदाय/71 ।

। - टाइप आदमी दरवाजे पर सडा या। पण्डितजी से काम था। वो मृगुसहितावाने।" "पण्डितजी से माऽम था।" युवक ने उसकी नकल उतारी 'रात सारे आठ बजे साले मां के खसम भगुसहिता बचवान आयेंगे । पण्डितजी गय काशीवास वरन को।ज फूट।" "क्व जायेंग?" "हमे लिखवे नहीं देगये। अब चलो 'आदमी ने एक बदम आग बढाया। वह डरता ठोकर साता खोसियाता वापस हो लिया। उसकी मुटिठयां भिची हुई थी और आँखा मे अपमान के आंसू थे-देख लेगा सब साला को, सब उसको धोखा देते है, एक एक को गिन लेगा यह । "टेम से आया नरो, बाबूजी-वसे नाप तो पहचान के हो, पर सिस्टर हमको डांटती है।' चौकीदार ने भलमनसाहत स लिफ्ट का बटन दबाते हुए कहा । वह होठ चवाता रहा। कमरे मे सब वैसा ही था । गान्त करुणा। दवा म गंधाता। उसने ऊंघती नस को विदा दिया। नाइट लाइट जल रही थी और बाजी चुपचाप टकटकी लगाये सामने तार रहे थे, उसी तरह जस वह लिटा गया था। बस सीना भर उठता गिरता। नस की पदचाप दूर होती गयी। सब तुम्हारे कारण हुआ,' वह कमरे का दरवाजा बद कर दर स्वर म फूट पडा, "सात सम दर पार से मरने को यहा आना था तुम्ह ? ज म भर मुझे नफरत से देखा, फिर मेरे ही मत्ये मरने आय । ठण्डा हुआ जी तुम्हारा मेरा अपमान कराने' उसके आसू बह चले थे, उसने सुरसती की तरह हाथ से उह पोछा पहले अपनी ऐंठ से घुला घुलाकर मां को मारा फिर लडकी की गहस्थी घूस खायी, अब मुझे खा लो। भरते भी नहीं कि पिण्ड छूटे हमारा। अचानक उसने जवान रोक ली और हक्का बक्का ताक्ने मगा । यह गुवार उसी के मुह से निकला या क्या? और यह क्या? वाजी हंसे क्या? या कि फालिज से टेढा पहा मुह कांपा ? उसके देखते-ही-देखते बस एक हिचकी आयी और बाजी खत्म हो गये ! 72/एक नीच ट्रेजेडी कुत्ते की मौत । जब वे उस लाये थे तो उसकी आँखें बम खुली ही थी। धुनकी रुई के फाहे सा गदवदा ललछौंहा पिल्ला, जिसका अपना बदन खुद उसके लिए भी एक अजूबा था। हर एक-एक पदम वह लडखडा लडखडावर बढाता था, जपने पजा की लचर स अपनी देह का भार टोहते हुए । फिर जब कुछ कुछ यूलते हुए, रेंगते हुए वह हर हथेली म थूयन घुसाकर मां वा स्तन ढूढन लगा तो अचानक मां को लगा कि वे लोग उसे जल्दबाजी म ही उठा लाय थे। यह बडी सराव आदत थी उन लोगा की। मौरे की मुलायमियत स अभिभूत होकर बात की औकात और अपनी जिम्मदारी की गम्भीरता भुला बैठना। आखिर पिल्ले को वे देखने भर ही तो गये थे ।कोई स्टाम्प लगाके दरख्वास्त तो नहीं दी थी कि वे ही गे पर जब देख लिया तो कहने म जजीब झेप सी लगने लगी कि नही लेंगे। हालाकि वे पिरले काफी भद्दे थे सभी। देसी कुतिया के भोडे पिल्ला का घर ले जाने को जान-बूझकर लाश उही सरीखे मूखों को बुलाते होगे। मां मन ही मन अपने को कोसने लगी, पिता भी। उही के से लोगो के सहारे तो माया ससार वो बस म क्यि रहती है है कि नहीं? जो हर वार जिदगी के सुथरेपने मे अपन आप वेवजह एक बेहूदी खलबली मचावर निरीहता से वह बस एक मुहलत और मागने लगते हैं, प्यार करने की, तरने की। "अव क्या खिलाना है इसे?" गाल पर हाथ रखकर वह बोली। पिता कुत्ते की मौत/73 बच्चा के माथ घुटना के वा बैठा निहाल हो रहा था। अपनी सारी पुयलाहट के बावजूद उसने भी अपन नापको धीमे धीमे निहाल होता पाया। यहां तक कि अत मे वह भी फ्श पर उपड़, बैठकर उसे आ आ करन लगी। उस सारी रात पिल्ला न खुद सोया नही उसने क्मिी को सोन दिया। जाड के दिन थे। टोकरी मे विछे शाल के बावजूद उसे अपनी मां की बदन की गर्माई नहीं मिल पा रही थी। एक पतली आवाज मे देर ता कणक्ट १ क करता रहा जैस खूब जग-साय पहियोवाली गाडी खेंची जा रही हो और वे सब बारी-बारी से बल्लाते और उसे बुपाने के उपाय सोचते रहे। तभी विमी को याद आया कि उसने पता था कि अलाम घडी कैटिक टिक से पिल्ले चुप हो सकते हैं। जला' घडी लायी गयी। ले-रेवर पूर घर म यही तो एक अलाम घडी थी। मां हर बार यह वात दुहराती थी जब भी बच्चे उसके करीब से दहलानेवाली तजी से खेल मे भगन गुजरते या पिता उसे चाभी दना भूल जाता। इस बार भी उसने वही बात दुहरायी। तब एक छोटे अंगोछे मे लपेटकर घडी पिल्ले को बगल मे रख दी गयी। कुछ पल वह चुप रहा। शायद घडी की टिक टिक से नहीं, बल्कि उनके सजग सानिन्य स पर फिर यकायक रो पड़ा । कीऽऽ उसके हिलने स अलाम की कोई कल भी हिल पडी शायद और क्षण भर को उसकी 'की की' के ऊपर घनघनाता क्रश जलाम भी बज उठा। तब कुछ हंसते, कुछ सीपते कुछ झंपने पिता ने घडीट्टा ली। इन सारी नकनीयत पर वेहूदा और नाकाम याब प्रक्रियाआ से गुजरते गुजरते सडक पर दूधवाला की सायक्लिो की खटर पटर भी चालू हो गयी थी। उफ देखो तो सवेरा हो गया है, अब इस बेहूदा बला को हटा ही दना है-माता पिता ने एलान किया। बच्चे चुप रहे । फिर खेलने चल दिये, समझदारी से। खेत म घर आते ही बच्चा न गोली सा प्रश्न दागा, 'इसकी जात क्या होगीमा?" 74/एक नीच ट्रेजडी शिमन पूछा ? पता चला कि इती की मोपी ने। इत्तीका घर उनके घर से सटा हुआ था। भरी भरी छातियावाली औरता का एक झुण्ड सना नसकी बाल्कनी पर मुझे सलवार कुर्ते म, बगैर दुपटटे के सहा-सडा पडोम पर गीध सी खुदवीनी नजर गाहे रमता था। वे इत्ती की मौसियाँ या या बुझाएँ भी हो सकती थी, क्योरि इन समो वह आण्टी बुलाती थी। एक पद’ मा भी थी शायद, फ्यापि कभी मम्मी की गुहार भी लगती थी। इत्ती व पिता कनखजूरे सो पनली मूछावाले एक अधगजे और वेवजह पुलकित रहनेवाले इनसान थे, जो सिजाव के बल से जाती जवानी की दुम परडे अभी तक लटके हुए थे। हमेशा स्कूटर से उतरकर वे अग्रेजी धुन गाते हुए सीढी चढते थे। उनसे नमस्ते कहो तो हल्लो कहते थे और मां को देख- कर वड अदब से गुडमानिग वगैरह भी। माता पिता को ये फूटी आँखा नहीं सुहाते थे, वे भी और चपाती सी छातियावाला उनके धर को वे औरतें भी, जो निर तर बुनाई के चीर सहराती हर फेरीवाले कश स्वर मे मजाक और तक्रार करती थी, पर इसके वावजूद दोना परिवारो म एक सभ्य दुमा मलाम का नाता वर- करार था। 'जात' अरे कुछ भी होगी," मान विचित् तल्खी ने कहा, 'कह दो कि देसी है। इसकी मो मायुर साहब के घर मे परच गयी थी, सा उठा लाये। और फिर उमने यह भी कुछ रुककर कहा, 'दुनिया-भर का पिल्ले की जात-पात की खबर करना भी ऐमा क्या जरूरी है जिह जरूरत हो सो बडिया नस्लवाले छांटके ले आयें, हांड नही तो । अर, जब लाये हैं तो पालेंगे ही। गृहस्थ के घर मे हर किसिम के जीव पलते है कि नहीं ?" सो देखते दखते पिरला पल भी गया, नामकरण हो गया, लालू। लालू उस्ताद । अपनी छोटी छोटी भूरी आँख सिकोडकर यह जब देखता तो सच म गुण्डा लगता था। 'क्या वे, जेल जायेगा?" बच्चे एक लम्बी सुतली फहरा रहे थे। वह भी उसे नाच-नोचकर खेलने लगा, जमे ह्याडी छुडा रहा हो। मां ने कहा वि पता नहीं ऐसी भाषा वे वहाँ से सीख आते हैं। खवरदार, पर लालू उस्ताद चोर चोर खेलते रहे । पिल्ला हिल गया था। और फिर से एक बार उनका निणय भी। कुत्ते की मौत/75 ? - - ज्या ज्यो लालू बढ़ रहा था, उसकी देसी नस्ल भी स्पष्ट होती जा रही थी। गुलाबी और लम्बा यूयन, कुछ-कुछ लोमडी का मा चेहरा, झम्बदार पूछ, और नीचे को दवे कान । पहले बच्चो ने कहा कि उसके कान खडे होने लगे हैं, अल्मेशियन की तरह पर कुछ शोध के बाद पता चला कि वह चौवना होने पर काना को खडे करन का आभास भर दता था। दुम तो देती रहनी ही थी, रही। एक बात थी, जो कतई छुप नही सक्ती थी और वह था उसका सोरहापन। या तो कभी उसे किसी सायक्लि सवार न टक्कर मारी थी या फिर किसी ने डण्डे से मारा था, क्यारि एक बार वह लँगडाता- सा घर में आया और कई दिना की दवाई सिंकाई के बाद ठीक हो पाया। और इसके बाद वह हर सायक्लि सवार या डण्डा पकडे आदमी का पक्का दुश्मन हो गया था। एक बार मां घर मे नही थी तो एक आदमी दरी तक सडक से उनकी खिडकी को तार-ताक्कर चिल्लाता रहा कि इस कुत्ते ची खातिर उहें कभी जुरमाना दना होगा, वे समझ लें, राह चलना साले नै मुहाल कर रखा है, वगरह । अब घर के अदर लालू सिफ रात गय भाता था और अपना खानाखाकर अपनी एक निश्चित जगह पर बैठकर गम्भीरता से सो जाता था। और कुत्तो की तरह उमसे तुतलाकर वचकाने खेल भरो तो वह अपनी पीली आँखें सिकोडकर हिवारत से हट जाता । खुग होने पर वह खडा होकर दुम हिलाता था और कभी कभार मां का हाथ चाट भी लेता था, पर उसके सिर के पास लाल सुनहरे बालो का जो भंवर था वहाँ वह किसी को हाथ न रखन देता था। कभी भी। मा को भी रही। बैठक्खाने मे भी खास दाहिने कोने मे एक जगह उसने अपन सास अडियल ढग से हथिया ली थी, मां के प्रतिवादा की ऐसी की तैसी करत हुए। एक दो बार उन लोगा ने उसे वहा से हटाना चाहा, पर गुर्राहट स डवर हिम्मत नहीं हुई। छोडो भी, उन लोगाने आजिजी से कहा जो भय से उपजती है। मां और बच्चे धीमे धीमे उससे काफी डरने लग थे पर जब हर सुवह वह कुछ देर बारी बारी से सबके कमरों म जा जाकर और दुम हिलाकर अपनी पारिवारिक सदस्यता का भावभीना सबूत दे जाता था तो उनकी कमजोरी को यही बहुत होता। है तो वफादार," हर सुबह, उसे दखकर वे कहते और हर सुबह पिछले दिन का पूरा मनोमालिय न जाने 76/एक नीच ट्रेजेडी कहाँ गायब हो जाता। प्यार मे हार मानने मे आदमी से बढकर नाकामयाब कोई प्राणी नहीं होते होते घर का कोई सदस्य ऐसा न बचा, जिस पर वह खोखियाया न हो। इसके सदा तीन-चार बंधे-बंधाये कारण होत थे-एक तो उसकी नीद म खलल पडना, दूसरा, उसके हड्डी चयाते वक्त क्सिी का पास खडे रहना और तीसरा, अगर वह सोफे या तखत पर अपना कोना छांटकर बैठा हो तो उस वहाँ से उठाने की किसी तरह की अधिकृत अनधि कृत चप्टा। तव एक छन म उसका रुख बदल जाता था-स्प भी। और वह अपने पूर्वज भेडिया से हूबहू मिलने लगता था। उसके जबडे ऊपर सिमटयर तोसे मासखोरे दान बाहर आ जाते, आँखो के पपोटे चढने से आँखें सफेट और पुतलियां स्याह हो जाती और गले से एक भीषण पुरघुराहट निकलती वच्चे तो उसके क्रोध के लक्षणा स इतने वाकिफ हो चले थे कि उसका ऊपरी हाठ सिमटत ही तितर-बितर हो जाते, पर अगर कोई नया बाहरी व्यक्ति घर में आया हो तो जोखिम खडा हो जाता था। शम आती थी, सा अलग। कई लोग जो साफ सीधी बात कह डालने के अपने ठेठ हिन्गस्तानो गुण म अभिभूत थे, साफ सीधे ढग से कह जाते कि ऐसे कुत्ते का बच्चों के घर मे पलना ठीक नहीं । कमाल है, पढे लिखे होकर भी-पर इसी भी पर दो साल गाडी अटकी रही। मा उसकी गुर्राहट सुनकर भी हर राज नियमित समय पर रातब देती रही, पिता अखबार पढनेवाली अपनी नम धूपभरी कुर्सी का मोह त्यागकर बगल की चौकी पर बठ तकलीफ- देह कोणा मे अखबार और चाय की प्याली हां हां करता संभालता रहा, और बच्चे हर मित्र को लालू के सौरहेपन से आगाह कर, चोरी छिपे अपने हिस्सक विस्कुट और मक्खन लगी डबलरोटी उसे खिलाते रहे। लालू अब एक भरपूर कद्दावर कुत्ता था । स्पष्ट और निखालिस रूप से देसी और एक मेयोल ढग स गठे कडियल बदन काऐंठभरा मालिक । प्राय गलिया मे वह देसी कुतियों के साथ घूमना दीसता था और कभी दो दो तीन-तीन रात तक गायव भी रहना, पर घर के बिगडैल नशाखोर निखटटू सदस्य की तरह तब भी उसका आवादाना घर क कोने मे पडा ही रहता । नाराजगी, डर और प्यार वे गड्डमगड्डपने म। कुत्ते की मौन/77 तभी एय दिन लालू ने मां यो वाट पाया और सब कुछ ज नाटे स हिल गया । समय आ गया था कि चीजा के गड्डमड्डपन को दुनियादारी से साफ पर निश्चित किया जाता कि घर म लाल का बग्ना गया है ? हुआ मह पि बरसात के दिन थे और मां अक्मर लालू पे पान और गदन पे पाम 'टिक' चिपये देखती थी। छाट छोटे पटमल स पोडे जो कि सून पीरर अगूर से गोल और नरम होकर पड जात और एप पुष्टिया पीछे छोड जात । हिम्मत पर उस दिन मा एप टूटी प्याली म मिट्टी का तल लेकर बैठी और हाथ से चुन चुनपर उन्हें निकालती प्याल म डालन लगी। छह-सान तब तो मामला ठीर रहा और मां जानवरा की दखभाल और घर की सफाई से अपने को जोडकर कोई गर्वभरी बात कहने ही जा रही थी कि तभी लालू खोखियापर उठ सडा हुआ और मां के हाथ म काटकर चारपाई के नीचे घुस गया। पाय इतना गहरा नहीं था, जितना कि घटना को जास्मिर रता मा धया। थोडी दर मां बैठी रह गयी, पिर दया की तलाश होने लगी और हाथ धोया जाने लगा। इस सारी हडबष्टी के बीच पूर दिनभर लालू उस्ताद गायव रह और दूसर दिन सुवह सिर झुकाये घर के भीतर आये और चुपचाप जाकर कोने म पहुंड रहे। मां उसके पास स गुजरी तो पूछ आदतन दो तीन बार सलूट महिली और भूरी पुतलिया म मैत्रीभाव सा कुछ कापा पर दिलो महोल बैठ गया था।फल विसी बच्चे को या पड़ोसी को किया तो? उस शानदार पशुचिकित्सालय का डॉक्टर झुयलायी भवावाला एवं मोटा-सा शख्म था। उसने पूरा ब्यौरा सुनकर उँगलिया से भीतर को इशारा किया ' मेरी राय मे आप इसे खतम करवा दें तो ठीक रहेगा। स्वभाव तो अब इसका दवा दारू, विटामिन विसी से बदलेगा नही । बच्चा का क्या है । बढिया नस्ल का दूसरा ला दीजिए दो दिन मे पूछगे भी नहीं कि कहां गया। देगी कुत्ता ही तो है। किसी को काटा तो नहीं इधर इसने ?' को स्वीकार करना पड़ा। हाथ मे अभी भी पट्टी बंधी थी। छुपाती तो कस डाक्टर का चेहरा और भी गम्भीर हुआ तब तो हफ्ताभर इस दखना पहेगा। कही 'रेवीन न हो, वर्ना आपको चौदह सुइयां लेनी होगी। हफ्ते- भर बाद आप फोन करके पूछ लें, अगर रदीज हुआ तो गतिया खुद-ब खुद 78/एक नीच ट्रजेडी मा ?

मर चुका होगा, अगर नहीं हुआ तो फिर आपकी मर्जी, वैस पद्रह रुपये मे इजेक्शन आता है-एकदम विना तकलीफ के जानवर को मारता है-आप फोन पर बता दें तो बस ।' उहोन हाथ से खलास का इशारा क्यिा, वीस रपये इन आठ दिना उसके अस्पताल मे रहने-खाने के हाग । आपका फान नही आया तो हफ्ते भर बाद हम खुद इन खम करा देंगे । ठीक ?" पतीस रुपये भरपर वे जब घर लौटे तो एक दूसरे से आँखें चुरा रह थे। हफ्ते भर के दाद मां न पिता से पूछा, 'क्या फोन क्यिा था उह?". हा, किया था", पिता ने कहा, "वह जिदा है, जाहिर है कि उस रबीज' नही "तब?" "तब? तब ? तब क्या," पिता ने झल्लाकर कहा । मां ने सोलह साल की गाहस्थिक समयदारी समुह सी लिया और नल के नीचे साग धोन लगी, चुपचाप । उसने अपनी पराजय स्वीकार कर यू मूक सहमति दे दी तो पिता अपनी इच्छा से मां की सहमति आ जुड़ने की शम से बौसला गया था। अब वे मुहलत भी नही माग सकते थे। मरना तो उसे या ही मरवा दिया, सो ठीक किया। बाल्कनी की औरता म से किसी एक ने कहा, "अरे कुत्ता हो तो कुत्ते की औकात मे रहे । कुत्ता भी आदमी जैसा तुनकमिजाज हो जाये तो हम लोग पालतू बनाकर विस रखेंगे है कि नहीं मुत्ते की मौत/79 प्रतिशोध मधुमूदन बाद ने उस्तरा मेज पर रखा और ठोडी पर फिटकरी मलने लग । उस्तरे की धार तेज थी और जरा सा हाथ चूक्ते ही सून उतर आता। उस जमाने की चीजा की बात हो और थी, उहाने उस्तरे को सभालकर धोते हुए सोचा । उस्तरे की तहकी हुई बेंट पर लिखा था, मेड इन जमनी' पीढिया तर इस्तेमाल हो सक्नबाली चीजें तो बस वही वनती थी। उहांने गमछे पर हौले हौले थपकार उस्तरा सुवाया और बडे एह तियात मे उसे वद करके पुराने डिब्बे मे रख दिया। अब हारमोनियम की ही बात लो-पहले कसी बढिया तावे की रीडस जौर क्या पर्दे होते थे और क्या लाजवाब टयूनिंग। पर्दे पर उंगली छुई नही कि सुर गा उठता था- ताउम्र वाल बरोबर भी श्रुतिया में घट बढ नही । अब तो जो बनाते हैं, सो सतरग पिलास्टिक के चमकीले पर्दे, ज्या वह साज नही, पतुरिया की घघ. रिया हो । भीतर से रीडगोद स जिपका भर देंगे एक बरसात हुई नहीं कि साज खलास । वही हाल तानपूरो का है। पहले असल हाथीदांत की नमागी होती थी, और जवारी ऐसी कि तार छिडते ही गूज से पता चल कि जैमे लगातार मेघ गरज रहे हैं-अव उस पर भी गोद से वही सस्ती पिलास्टिक की पट्टी चिपका देंगे । वेडौल तूवे अनघड खूटियो । साज को हाथ लगाने को मन नहीं करता। उहान फिटकरी की डली उस नन्ही बटुवी म रखी, जिसम पिछले पच्चीस सालो से फिटकरी रखी जा रही थी। 80/एक नीच ट्रेजेडी 1 और हजामत वा सामान संभालने उठ गये। दलिद्दर छा गया है, दलिद्दर जमाने मे। चीजो पर ही नहीं, बल्कि आदमी की आत्मा पर भी । कहाँ वह हाड तोडकर रियाज करना, सूरज उगने से पहले उठकर ढाई-ढाई घण्टे एक एक सुर को परडकर चिपके रहना । मेरुखण्ड के वे हजारो पलट कण्ठस्थ करना । कौन करना चाहता है अब ? अब तो चारेक अलकार रट लिय, दसेक अप्रचलित रागा के नाम सीस लिये-कुछेक लोगो की मनचीती रगमच की अदाएँ सीख ली और साल भर की तालीम के बूते पर बन बैठे घरानेदार गुणी सगीतज्ञ । साले दरबारी काहडा के सुर लगायेंगे एस कि लगे जौनपुरी गा रहे हैं। और सुननेवाले लोग हैं कि मारे उत्साह के तालियो का दौर नही खतम हो रहा है। सच पूछो तो य ही मूरख श्रोता इनका दिमाग चढा देते हैं । कोई समा- रोह हुआ नहीं कि ठट्ट के ठट्ट सुनने को चल आते है, ज्यो लगर खुला हो । अर, कोई पूछे तुम जानते क्या हो ? 'अल्प विद्या प्रलयकरी', उनके उस्ताद कहते थे। उहोने कान की ल छूकर उस्ताद को याद किया। अहा हा, क्या नूर था चेहरे पे, क्या रुआब था अपने फन का, सिद्धि कहो जी सिद्धि। श्री का रिषभ लगाते थे, तो सुर छाती के ऐन बीचोबीच खुभ जाता था। खटाक । ज्या शब्दवेधी बाण हो । सात साल एक कनफडिया बाबा से गुफा मे बैठकर प्राणायाम सीखे थे उस्तादजी, श्वास प्रक्रिया नियमन । तीन-तीन सप्तको की रफत में गला यो फिरता, ज्यो मछली पानी मे तर रही हो। तोडी गाते सुनो तो दिल मक्खन की माफिक पिघल जाता था । अजी, हिचरियां बंध जाती थी हिचकिया। सामने श्री सारस्वत सगीत महा विद्यालय से महा ककश नक्की सुर उभरा-पीया को नजरिया। इमन की टांग ताड रहे है साले । न शुद्ध सुर, न शुद्ध उच्चारण । कला की हत्या है, हत्या । उहाने घाड से खिडकी बदकी और झोला लेकर धीमे धीम सीढियां उतरने लगे। इधर सधिवात जोडा मे धीरे धीरे व्यापने लगा था, और दीवार का सहारा लेकर ही उनम उतरा जाता था। फश पर बैठकर रियाज क्यि बरसा बीत गये थे। वडी लम्बी दौड है जिदगानी भी । बस अकेल दौडते चले जाओ, जब तक ऊपर से पुकार न आ जाये। मां-बाप तो थे सो बचपन प्रतिशोध/81 1 मे साथ छोड गये, कैसे घोर दारिद्रय मे मामा के घर रहकर जमे-तसे एण्टेंस करके ट्रासपोट कम्पनी की नौकरी पायी। सामने मुह वाय खडा भविष्य, और सहारा एक नही। पर जव एक रोज उस्तादजी का गाना जो एक महफिल मे सुना तो लगा वि हा, इही सुरा वा दास बना जाय । तो दिन- भर नोक्रो, शाम को उस्ताद की सेवा । अजी सताईस साल का यही ढग रहा, और आखिरी दम तक उन्ही के चरणा पे डले रहे। उस्ताद क्या, वालिद की ही जगह ता थे। उनकी आत्मा मे जो यह सुरा का रस या मो उही का भरा हुआ था। "अवे मदसूदन, वे कहते थे, ' सीख ले गधे की औलाद | हम गये तो ये फन भी गया। हुआ भी सच म यही। इधर उस्ताद गये, उधर उनकी पत्निया भी अपने अपने बच्चे लेकर इधर उधर चली गयी । रह गये बस व, और पेट काटकर जतन से जोडे ये नायाब साज-जमनी की रीडवाला हारमोनियम, मीरज का बना अफ्रीकी तूब- वाला तम्बूरा, पुणे के तबलो की जोडी । अव तो खोल चढा तानपूरा महीनो कोने मे टिका रहता है। श्रद्धा से वे हर पूर्णिमा को उसकी पूरी सफाई. भर जरूर करते है। तबल को जोडी भी ब द पड़ी है। हारमोनियम अलबत्ता मेज पर रखकर वे भी कभी बजा लेते हैं पर अब अगुलिया मे वो रफ्त नही रही । मे पेटी अभी भी चकाचक है। वो तो उस जमाने की चीज थी जब बाजे की एयरफिटिंग जमभर को हो जाती थी। आजक्ल की तरह थोडे ही कि स्टिकिंग प्लास्टर चिपका चिपकाकर लोहार की भाथी की तरह घोक्ते रहो, जस सामने के स्कूल म होता है। एक बार कुछ छोकरमरस्वती पूजा के उत्सव के लिए उनका बाजा मांगने आय थे । उहाने गुर्रावर भगा दिया। साज कोई शादी की गैसवत्ती है जो मुहल्ले भर मे घूमता फिरे है ? फिर अपनी चीज-बस्त बाटना बूटना उह कतई नही मुहाता । न किसी से कभी मागा न ही दिया । अपना हिसाव साफ रखा। उहोने इतमीनान स खेंखारकर यूका । उह अपनी कृपणता पर कोई ग्लानि न थी। सडक पर पहुंचकर मधुसूदनजी ने धोती कुछ ऊपर उक्साई और पटरी- पटरी चलने लगे । सडक पर गद पानी का परनाला बह रहा था। नीचे की मजिल मे एक परिवार रहता है । गदगी मे जवाब नहीं किराये का सवाल न होता तोक्व का इस विल्डिग को छोड़ चुके होते। पर अब उन छाडत 82 / एक नीच ट्रेजेडी । - ही किराया छह गुना कर दिया जायेगा, यही खयाल उन्हें छोडने नहीं देता। बीस साल से यही रहते आय है और अब तो आखें बद करके भी पूरे घर मे फिर सकते हैं। सो यथासम्भव इद्रिया को भीतर भूदे पड़े रहत हैं । शुरू- शुरू मे कुछ लोगो ने मुहल्लाना दोस्ती गाठने की चेप्टाएँ की कुछ बच्चे पूजा होली वगैरा का चदा मागने झियक्ते हुए चढ़ आये या कि भेजे गये। पर उनकी एक याड से पतयड के पते जैसे छितरा भी गये। जब वे एक वेहद भुनास और नकचढे बूटे पै सप मे मशहूर है। न कोई उनसे मतलब रखता है न वे किसी स । नही व खुश हैं कोई तकलीफ नही उहें । अपनी पतली सतर देह को सँभाले मधुसूदन बाबू दाहिनी तरफ मुडे । सामने बाजार था। दुकानदार स फोक्ट मे जगत-व्यापार के चर्चे करना, लौक्यिा मे नाखून सोवना या वैवजह मटर छीलकर ग्वाना और बाजार भावा को लेकर दूसरे ग्राहका से बतकही करना उनका स्वभाव नही । न ही कभी जो सामान न खरीदना हो, उसे देखने दाखने मे वे व्यथ समय गंवाते हैं । अपना मोघे आय, सामान मोलाया और वापस । एक गड्डी मूली, पाव भर लोकी । एक बट्टी चांदनी साबुन और एक पाविट ईसबगोल की भूसी । इतना कुछ मालाकर उहान बटुवा पाकेट मे डाला और भारी झोले को दूसरे हाथ म अदल-बदलकर वे वापस लौट चले। बच्चो का एक गोल मोटरो, साइक्लिा और ट्रफा की परवाह न करता, लग्गी लिय किसी पतग की टोह मे डोल रहा था। मधुसूदन बाबू ने आजिजी से पटरी बदली। औरतें और बच्चे न हो तो ससार स्वग बन जाये वस | दुनिया के बटराग इस स्त्री जाति को लेकर होत हैं । उह अपने उस्तादजी की तीन पत्नियां याद आयी--दिन रात की चख चख दजना बच्चे, थीका याकी, मारामारी और इस सारे नक के बीच बेखबर परितप्त बठे सुर की साधना करते हुए उनके उस्ताद । ज्यो कीचड के बीच सुशोभित कोमल बमल का एक पता हो। पर अभावो स व भी क्व तक जूझते। अन्तिम समय घुल घुलकर टी बी हो गयी थी। न ठीक दवा दारू,न फ्ल-दूध। उनस जितना हो सका, क्यिा। पर एक अनार सौ बीमार। अवेले वे गाडी कहाँ तब खेचत ? प्रतिशोप/83 खून की उल्टियां करते, एक श्वास में चार चार आवतन की तानें लेनेवाले उस्ताद के फेफडे अन्त समय एव एव सोम को तरसकर रह गये । उहोंने तभी से तय कर लिया था कि वे परिवार वगरा नहीं वसायेंगे। सरकारी ट्रासपोट कम्पनी की गुमास्तागिरी अपने गुजारे लायव द ही देती थी। कुछ जोडा जमाया, कुछ पेंशन । कण्ट्रोल किराये का मकान था। वस आनद स है । न लडकी की शादी की चिता, न लडवे की नौकरी की हाय हाय। भोला रखवर मधुसूदन बाबू ने धोम धीमे कपडे बदले, स्टोव मुलगा कर वेतली चढायो और सब्जी काटन लग । नाम को एक टाइम खिचही सब्जी। सुबह रोटी दाल । बस इतन ही मे वे तप्त रहते हैं। न अचार, न चटनी। अलबत्ता च्यवनप्राश और दूध व जरूर लेत हैं। रसोई मे रसद में सब डिव्ये भी करीने से लगे थे, लेबल समेत । अव्यवस्था से उह सख्त नफरत है। उहोने चाय वनायी, और सब्जी का पतीला चढावर खिडकी पर जा बैठे । सगीत महाविद्यालय की क्लासें खत्म हो गयी थी और ठी ठी करती लडक्यिा का एक हुजूम सडक पर उतर आया था। मधुसूदन बाबू ने नाव मिकाडी, औरतो की बिलावजह ठिलठिलान की आदत, वे सह नहीं सरते। उनकी राय मे स्त्री को गम्भीर और मितभाषी होना चाहिए। जो पृछा जाये बस, सो ही बतलाय और अपन नाम-स काम। ये तो आजकल व चाचले हैं कि लडकियो को सिर पर चढाकर रवा। और तो और, अब तो ये लोग पतलून भी पहन लें तो मां वाप राजी। शिव शिव" गिय II तुलसीदास ने कलिकाल वी जो भविष्यवाणी की थी, गलत नही थाक्त। नडरिया अब एक चाट के ठेले के पास खडी वहा रही थी। मधुसूदन बाबू उठकर सब्जी म क्लछी चलाने लगे। अब पैसे उडायेंगी, इसी सब वाहियात पाने पर । अरे, दाल रोटी का सात्विक खाना खाओ और उनकी तरह सत्तावन साल की उमर मे भी टिच रहो। पर नहीं। अभी ये सब अण्ट-सण्ट खा खाकर जब तक तीस की होयेंगी तो मैदा ऐसा हो चुवेगा कि चालीस की लगेंगी। और खाओताममि भोजन, और लगाओ किरीम- पोडर एव हिंस टनटनाहट से उन्होंने सब्जी का पतीला उतारा और 84/एक नीच ट्रेजेडी खिचडी चढाकर आच धिमा दी। ये हिन हिन घोडिया सगीत सीखेंगी। हुँह ! 'नारी की झाई परे अधा होत भुजग।' ठीक कह गय कबीरदास । बलिहारी उनके उस्तादजी की, जो इस माया से उह उबार गय । साँझ उतरा रही थी। मधुसूदन वाबू ने बत्ती जलाकर दवस्थान में पहले दीया जलाया, फिर एक अगरबत्ती, और श्रद्धाभाव स भगवान को प्रणाम क्यिा, 'ओ भूवुव स्व तभी दरवाजा खडका । उह अवरज हुआ। कौन ? उनके यहा तो काई भाता जाता नहीं । शायद कोई गुजरता बच्चा भडभडा गया हो लिहाज तोपर कोई था । दरवाजा फिर खडका । आजिजी से उहोन चटक्नी खोली । उनका पतला मुनहना जिस्म कोडे की-सी तीखी क्रुद्ध जिनासा से भरा सतर हुआ और छोटी छोटी आंखें शका से शरीफे के बीजा-सी चमकने लगी। दरवाजे पर एक अधेड आदमी खडा था, 'माफ करगे, श्री मधुसूदन पार्मा "मैं ही हूँ, कहिए?' उहान अपनी नमगिर रुखाई से पूछा। "जी आपसे एक काम था-दरअसल मेरे पास मेरे पिताजी का एक हारमोनियम है--यानी काफी पुराना "तो?" वे अभद्रता से दात कुरेदने लगे। व्यक्ति कुछ सकपका गया, "जी उसके कुछ पर्दे जरा फैस रह थे। मैं इस शहर में नया हूँ | सामने कॉलेज मे पूछने गया था, पर वह बद हो गया है । सुना आप संगीत के जानवार हैं । क्सिी साज सुधारनेवाले का पता शायद आप बता सके, ऐसा "क्सिने कहा था?" उन्होंने तकरीबन गुर्राते हुए अपनी धनी भवें सिकोडी। "जी, वहीं कुछ लोगो ने। दरअसल पुराना जमनी का बना हुआ बाजा है जिस तिस के हाथ देना नही चाहता । अच्छे साज क्तिने नाजुक होते हैं, आपको तो मालूम होगा।" 'हूँ।" वे कुछ क्षण पूरते रहे। 'अच्छा चलिए, बाजा देस लेता हूँ। " प्रतिशोघ/ 85.

" " यही पाम म रहत हैं?' जी आपको तकलीफ तो पांच मिनट सना होगा।" रुपाई उस बटन पाइशारा कर, व खूटी म कुरता उतारन लग, लापको सगीत या शोर है?" 'जी, योग बहुत । मर पिताजी अच्छे जानकार 4 । उही स पाडा कुछ रिसम ताजीम पायी थी।" उहान मिचहा म पलछी चलायी। व्यक्ति ने नाम बताया। उन्हें अचरज हुआ। इस साले पाहर म एम पनवार म तालीम पाया परम पिचही पिर बन जायगी। उहाने पतीली नीचे रपपर चप्पला म पर डाले, "चलिए।' घर सचमुच पास म ही था। रास्ते म ही व्यक्ति ने बताया, उसका नाम दामोदर है। दामोदर पाण्डेय । पिता गय साल नही रहे। बस, घर पर एक बूढी अपग मी थी, और इधर उनकी दम रख यो विधवा बहन मा गयी थी जो पहले पास के शहर में पढाती थी। यह स्वय व म मुलाजिम था। पर छोटा, पर चकाचक साफ था। पदों से लेकर गाव-तक्यि के लिहाफ तक हर चीज जोण पर धुली हुई और करीने स लगी थी। बहोने चप्पलें दहलीज पर उतार दी और चौदनी पर बैठ गये । दामोदर भीतर चला गया। भीतर से कुछ दर स्वर उभरे,फिर वह एक पेटी उठाये वापस आया। कुछ कुछ हॉफ्ते हुए उसन पेटी उनके आगे भक्तिभाव स ऐसे रखी जैसे दवप्रतिमा हो । उहांने देखा, पेटी पर शकरपारदार सिलाई का नरम खोल था। वे प्रसन हुए। साज का सही रख रखाव, सुर की तमीज से हमेशा जुड़ा रहता है ऐसा उनके उस्ताद कहते थे। दामोदर ने क्वर हटाया। अहाहा, आखें जुडा गयी । लाजवाब कारीगरी । रोजवुड का ढांचा, चमकते आवनूस व हाथीदात के पर्दे उहीन भाथी सोलकर उंगली रखी, करुण, मीठा सच्चा सुर। वाह !" उहान प्रशसा से उंगलियां फिरायो ‘बेहतरीन बाजा है। दामोदर के पोल चेहर पर मद स्मित उभर आयी। आज तक एयर- फिटिंग नही बदली, न ही पर्दे घिस हैं उहोने सिर हिला हिलाकर दाद 86/एक नीच ट्रजेडी । दी, फिर सराबी टटोलने लग 'रेती या रेगमाल होगा आप पे और थोडा मशीन का तल भी?" उहान मुलायम सुर मे पूछा। उनकी आशा के अनुकूल घर म सब था। निरतर इस्तेमाल स शीण, पर कायदे स महफूज रमा हुआ। वे हारमोनियम जांच रह थे, तभी दरवाजे से एक साफ फूल की थाली म दो गिलास चाय के लिए एक युवती नमूदार हुई । यह दामादर की बह्न दमय ती थी। दामादर न परिचय वराया। एक सात्विक प्रौढता से भरा व्यक्तित्व । गेहुआ लम्व्तरा चेहरा । पुरान ढग के साफ-सुथरे, सलीके से पहन गय कपडे । परिचय मे स्मित न कम, न अधिक । मधुसूदन बाबू बहुत स तुष्ट हुए । "खुश रहो।' उहान कई सालो बाद कहा। साज मे खास गडबडी न थी। कम इस्तेमाल होने से पर्दे कुछ जबह गय थे, उहोने मिनटा में सुधार दिया। उनकी अभ्यस्त उंगलियां पर्दे पर दौडी, "वाह ।" दोनो के मुह स निकला। उसके बाद न जाने कब रात के दस भी बज गये, पता ही न चला। दामोदर के पास उन्ही की तरह घराना की पुरानी यादो, बदिशा और नामा का अदभुत सिलसिला था। खुद उसका गला मीठा न था, इससे पिता ने गाना नहीं सिखाया, पर सुना उसने बहुत था । देर तक मधुसुदन बाबू वह और दमय ती सगीत चर्चा करते रहे । मधुसूदन बाबू ने कुछ पुरानी चीजें उह सुनायीं । गला उम्र के भार से थका हुआ था दम भी उगड उसड जाता, पर अभी भी उनकी बाबत एसी कटती थी कि चतुर पारखी भाप सरते थे कि उहान एम वैस से तालीम नहीं पायो । दामोदर ने वाहवाही की पडी लगा दी । दमय तो ने भी ससकोच एक दो भार सिर हिलाया। मधुसूदन बाबू के भीतर सगीत का जमा हुआ अथाह वारिधि एकाएक पिघलकर मौजे लेने लगा था। वो वो बदिशें याद आ रही थी, जो उहें खुद भी याद नही था कि उह याद थी। पन की अद्भुत गहरी समझ दाना भाई-बह्निा में थी मानना होगा। दमय ती स्वल्पभापी थी और बीच बीच मे उठवर भीतर जाती रहती। शायद मां की दखभाल को, पर उमके उठने बैठन और आनेजाने मे भी एक सहज सलीका था। लगता नहीं था कि उक्तावर उठी हो । चुपचाप उठनी, फिर वैसी ही आकर तमीज से बैठ जाती। दस बजे मधुसूदन बावू जाने को उठे, तो दमयन्ती ने ससकोच कहा प्रतिशोध/87 कि उनकी मां का आग्रह है, वे खाकर ही जायें। मधुसूदन वाबू जान सरे । खाते-खाते भी चर्चा होती रही । खाना सात्विक और सुधराई स परसा गया या। बगल के कमरे म ही मां का विछौना लगा था, वे वही से आग्रह करती रही, "अचार दना इहे बेटी, बेरवाला| वल वा मुरब्वा भी देना। जरा पुराना बेल है भाई जी, मगज को तर करेगा । आप तो फनकार ठहर बाता, जज्वातो का बफ जो पिघला तो मघुमूदन बावू का उस घर म आना-जाना प्राय रोज ही होने लगा। घर ने भी बढे तपाक से उह एमे ग्रहण कर लिया जैसे पुराने बिछुडे हुए सदम्य हा। मधुसूदन बाबू के रूपे उजाड अतमन के भीतर धीरे धीरे कोमल अखुए पनपने लगे थे। रात वे लेटते तो दर तक काना मे विस्मस बदिशें घुर्ने गूंजती रहती। बीच बीच मे दमय ती की मृदुमद आवाज आती, 'एक पुलका और दू दही खट्टा तो नहीं? शकर दू शिव | शिव ।। गिव || पर वे जितना ही ध्यान सगीत और शिव की तरफ मोडना चाहते, मन सालो बाद खूटे से छूटे जानवर की तरह बगटुट उतनी ही तजी से उसी घर की तरफ भाग भाग निकलता। दमय ती दमयती नाम ही जस दमकता हुआ हीरा हो । अदभुत गरिमा से मण्डित, स्वर्गीय द्युति से भरपूर । उसके चिवुक का कुछ कुछ हठीला मोड उसकी रोटी बेलती पुष्ट वांहा के नम कोण, चूल्हे के नम उजास में दमक्त उसके कपोल। मधुसूदन वाबू अपने ममरे मे अक्सर हारमोनियम पर रात गये ठुमरिया गाते रहते--'पिया मत जइयो रे अवेली डर लागे।' उनका हृदय जो एक भिंचकर व द की गयी कुठरिया सा सकुचित और अंधेरे की सूनी बामदार पतों से भरा हुआ था, अचानक खुला-खुला सुहावना और उजेला हो आया था। उन्होंने साला के बाद दो नयी क्मीले सिलवायी, एक जोडी नयी चप्पलें भी मोला ली। नाई से जव उहोने क्लमें ठीक से कतरने को कहा तो वह कुछ हक्का बक्का- सा देखने लगा। एक बार उहोंने उसे चवनी ज्यादा देने की सोची भी फिर सोचा, बेवार क्यो रेट बिगाडना? दमयन्ती की मां को भी उनका आना खूब अच्छा लगता ! पडी पडीवे 88/एक नीच ट्रजेही उनसे अपने पति के संगीत प्रेम और गुजरे जमाने के चर्चे करती रहती। दामोदर भी तो उन्ही की तरह अधपगला है संगीत के पीछे वे लाड से पहती। पिछले साल ऑफिस मे कुछ दोस्तो से सगीत पर चर्चा करते-करते मारने पीटने पर आमादा हो आया था। "क्या करता?"दामोदर सिसिया- कर प्रतिवाद करता, "जिद बांधे चले जा रहे हैं कि सूहा और सुधराई अलग-अलग चीजें हैं । अब आप ही पहिए, सूहा-सुघराई यानी कमज-मम सुघराई आपने अकेली गायी जाती सुनी है महफिलो मे ? यानी सचमुच की पुरानी महफिलो मे?" मधुसूदन बाबू ने मुदित हो समथन किया। लोण्डा जहीन दिमाग रखता है, शक नहीं । "अब मधुसूदनजी चार सगीत सभाएं सुन ली, जरा सुबह- शाम आधा घण्टा रेडियो सुन लिया, तो आजकल सभी शास्त्रज्ञ बन बैठते हैं। न कान मे सुर, न गले मे रफ्त, न तबले पर ठीक बाबत कटती है । बस शोर शराबा किया, चद अखबारों मे नाम छपवा लिया और नामी घराने- दार सगीतज्ञ बन गये । लगे अला की फलां की शागिर्दी का झूठा प्रचार परने।" मधुसूदन बाबू का मन क्यिा यि उसे गले लगा लें। हू-ब-हू उही के मन की बातें। दमय ती का प्रसग उठने पर वडा मो की रुलाई छूट जाती। "अभागी है, और क्या ऐसा देख-सुनकर इसके पिताजी ने ब्याह किया।धर, सानदान, लडका सब ठीक ठाक था । पर भाग्म का लेख कोन जाने । ठीन छह महीने बाद एक्सीडेण्ट मे जाता रहा । इक्लोता था। साल भर मे सदमे से सास- ससुर भी चल बसे । और बस इसने स यास जैसा ले लिया। पहले ही कम बोलती थी, जब से नौकरी शुरू की, बस हो हूँ से आगे नहीं। गाय है भाई साहब, मेरी गरीव लहकी, गाय "वे कहती और फिर रो रोरर अपनी जीण देह को कोसने लगती जिसके बधन से बेटा बेटी दोनों पराधीन हो गये हैं। अच्छी-खासी नौकरी उनमें खातिर छोड आयो पगनी। और उहें भगवान मांगे से मौत भी नहीं देता, कैसी विडम्बना है? वो तो मधुसूदन बाबू आ जाते हैं, तो कुछ देर को चरा रोनक हो जाती है। दोनो बच्चे भी जरा बोल-बतिया लेते हैं, वरना वे तीनो हैं और ये घर की दीवारें। न बोलना, न चालना, जैसे मकबरा हो । क्याड, परिवार का सुख ही नहीं प्रतिशोष/89 था नसीब मे, वरना इस घर मे कितने प्राणी डोलते। एक उसास लेकर तकिये से उठ जाती। तभी दमय ती चुपचाप दलिया या खिचडी लाकर उह खिलाने लगती। छोटे बच्चे की तरह बहुत अहतियात से खिलाकर वह उनका मुह धुलाकर कुल्ला कराती, फिर आंचल की खूट से निकालकर इलायची के दाने उनके पोपले मुह मे भर देती, "अब सो जाओ, बहुत हुआ, फिर बुसार बढ जायेगा।' मधुसूदन वायू को नहीं लगता था कि वृद्धा ज्यादा चल पायेंगी। इधर दामोदर ने भी चितातुर स्वर मे उह बताया था कि मा की हालत गिरती जा रही है । डाक्टर का कहना है कि बमुश्किल चद महीने और । मैं तो दमय ती से कह रहा हूँ कि वह अपने पुराने कॉलेज मे नौकरी के लिए फिर एप्लाई कर दे । सोलह साल वहां पढाया है, जरूर फिर वे ले लेंगे। यहां रहकर क्या करेगी। मैं भी सोचता हूं, मां के बाद मैं हरद्वार चला जाऊं। मेरे एक गुरु वहाँ हैं। आश्रम मे रन की पूरी व्यवस्था है। मधुम्दन बाबू के गले म जैसे सीस का गोला अटक गया हो। छाती में हवा घुटने लगी, वमुश्किल बोल पाये- । "तो" नही" "वह कहती है, एक तो स्कूल की कमेटी मे वेहद सकीण विचारावाले दक्यिानूसी लोग हैं । सासकर महिला लेक्चरारो को लेकर। इससे उसे यहा वडी घुटन होती है। 'फिर?" "फिर पता नही तीन चार साल से छूटा सब फिर से शुरू हो पाय या यह तो है।' "क्या है ? पागल है यह तो।" दामोदर झुझलाया। 'इस गहर मे तो थोई सोप है नहीं । वहाँ जरा पहचान वे लोग हैं । पुराने सम्बघ हैं, और अब मुझे भी इम पारिवारिस दाय से मुक्ति चाहिए।माँ नही होती तो मैं तो पर का चला गया होता। स्वामीजी क्व स बुला रहे हैं। 'उसे भवेला नहीं लगगा "अवेलेपन का क्या है ?" दामोदर तल्सी से हंसता है, तो उसके चेहरे 90/एक नीच ट्रेनेडी पिता हात । से हू व-हू दमयन्ती का चेहरा सकता है, "यहां कोई कम अकेली है वह 'पौर में ?" मधुसूदन बावू पूछना चाहते थे, पर फिर जाने को उठ खडे हुए । उनके भीतर मानो एक प्रचण्ड वात्याचक्र घूम रहा था। 'ता दमय ती चली जायेगी तकिये पर सिरटिकारर उहोने सोचा। सुबह की रागिनी सा वरुण कोमल दमय ती का लम्बूतरा चेहरा उनके जागे तर आया। इतने बडे शहर मे उसके लिए कही साथ नही, कि इच्छा के विरुद्ध वह इतनी दूर फिर से क्या वे जुबान खोलकर कभी कह पायेंगे कि वह चाहे तो शिव शिव । उहोने बेहद क्रोध न करवट बदल ली। दिमाग तो मही है उन उम्र में कम से-कम योस साल का अंतर होगा। अगर उसके पर दमय ती थी कि उनने ख्याला से चुपचाप टिककर खडी थी जैसे अक्सर दीवानखाने के दरवाजे से वह टिक्कर खडी रहती है उनके उठकर चौके म आने के इतजार मे । निनिमेप उन दोनो को ताकती हुई। कमकर बांधी गयी वेणी, उनके आगे चलती उसके व पुष्ट नितम्ब, सुडौल जधाएं शिव । शिव मधुसूदन बाबू उठकर देर तक ठण्डे पानी से मुह घोते रहे फिर देर तक तानपूरे पर रगडवर पालिश क्यिा किये। और फिर महीने भर बाद दामोदरवी मां भी चल ही बसी। वे भी घाट गये थ। रोज हो जाते थे वैसे भी। दोना भाई बहनो न पना दुख भीतर ही थिरा लिया था। हाहाकार करने को या भी क्या । वे तीनो दर तक चुपचाप बैठे रहते । फिर एकाघ हफ्ते बाद दामोदर ने उहें बताया कि बडी अच्छी खबर है। दमय ती का आज उसकी एक पुरानी सहकर्मी सहेली ने लिखा है कि उसके पुराने डिपाटमेण्ट में एक जगह खाली है, यदि वह आना चाहे तो मधुसूदन बाबू घर को लौट रहे थे तो पैर जमे मन मन भर के हो गये थे। रात देर गये तक वे सोचते रहे फिर एक निवप पर पहुँच ही गये। अगने रोज सुबह बक जाकर पहले उहोने कुछ रुपया निकाला, फिर पचासेक रुपया किराया भरकर हफ्ते भर का चोक को एक दुकान से, जहा उहें काई न जानता था, हिदी का एक टाइपराइटर किराये पर ले आये। डेढ सौ रुपये उसने सिक्योरिटी के रख लिये थे, वाद को लौटा देगा। चलो ठीक है। रास्ते से उहाने कागज और कावन मोलाया और एक प्रतिशोध/91 लिफाफा भी। 'टप-टप टप अनभ्यस्त जबडी उँगलियो को टाइप करने में समय लग रहा था, पर वाक्य उनके भीतर अपने आप बने जा रहे थे। मधुसूदन बाबू दमयती के कॉलेज के चेयरमैन को टाइपराइटर पर गुमनाम खत लिख रहे थे। एक निहायत कडवा, अश्लील खत, जिसमें दमयन्ती के साथ उनका अपना नाम जोडकरहर सम्भव तरीके की भद्दी परिकल्पनाएं गूंथी गयी थी और अन्त मे यह सविनय निवेदन किया गया था कि ऐसी पतिता, कुलटा, दुश्चरिना स्त्री को, जो अपने बाप की उम्र के बुजुग के साथ छिनाली करती है, कतई उनके जैसे सम्भ्रान्त कॉलेज मे पुन स्थान न दिया जाये। आगे आप स्वय समझदार हैं-आपका एक हितचि तक। पत्र पूरा कर मधुसूदन बाबू ने लिफाफे मे डाला, और पता टाइप किया, फिर मनोयोग से अपने घर की सफाई की, और रिक्शा लेकर सालो बाद रेलवे स्टेशन को चल दिये। वहां जाकर उन्होंने पहले इधर-उधर देखा। नही, कोई परिचित चेहरा न था। चेहरा परे किये उन्होने अगले स्टेशन का टिकट कटाया और एक अखबार की ओट किये तब तक बैठे रहे जब तक वह स्टेशन मा न गया। स्टेशन पर पहुंचकर उन्होंने खत स्टेशन के बाहर ही पोस्ट क्यिा और वापसी का टिकट कटाकर तुरन्त लौट आये। इसके बाद वे महीनो बाद मन्दिर गये भौर देर तक भक्ति भाव से वहाँ बैठा किये। 92/एम नीच ट्रेजेरी एक नीच ट्रेजेडी दरवाजा खोला । भीतर एक चिट्ठी पड़ी हुई थी। अतर्देशीय । बाहर तक महीन मकडिया इबारतो से भरा हुआ। लिखाई मां की ही हो सकती थी ! मां के पत्र का आखिरी हिस्सा हमेशा चिटठी से उमगकर बाहर उस जगह तक उफना आता है जहाँ लिखा होता है कृपया पत्र के भीतर कुछ न डालें। । मैंने एक विराट झटके से किताबें मेज पर फेंकी और सद्द-से कटे पेड की तरह तखत पर गिर पड़ी । नाटकीयता मे कोई तत्त्व जरूर है जो तकलीफो को काटता है । चाहे कुछ देर को ही हो । एक तो यह वकीलो और प्रोफेसरो का थका बुसा शहर, तिस पर धूल भरे फरवरी मार्च के महीने, जब युनि- वर्सिटी मे चिन्ता और डर सूखी पत्तियो से मंडराते फिरते हैं। हाये इम्तहान इम्तहाऽऽन । मैंने कवायदी सुरा मे गाया। खिडकी के बाहर गुलमोहर और सेमल सारी धूल और खुश्की के बावजूद रगा से ऐसे फटे पड रहे थे कि सारे डर के बावजूद एक नजर भी उधर बहक जाये तो पैर कही जाते हैं, मन कही। मैंने तुक मिलाया, हाये नौजवान नौजवान नौजवाऽन । मेरा मूड कुछ अच्छा हो गया। मैंने टाँगें ऊपर दीवार पर टिका दी और अपने सुदर खुरदुरे टखने हिलाते हुए अपनी तुक्बदी का मत्रपाठ करते-करते चिट्ठी खोल ली। मां की चिरपरिचित हांफती भटक्ती शैली मे खबरें थी। इघर की, उधर की, और फिर धूम-फिरकर बात वही आ टिकी थी-आशा है एक नीच ट्रेजेडी/93 छुट्टियो मे घर आने के लिए रिजर्वेशन करा लिया होगा। आशा है खाना वगैरह ठीक से खा रही होगी। आशा है पढाई का ध्यान इस बार तो- आशा है | आशा है । आशा है। चिटठी का गोला बनाकर मैंन उछाल दिया और पास पडाशीशा उठा लिया। आशा है | जब मूड खराब हो तो अपना चेहरा आईने मे सहृदयता से देखने में बढा सकून मिलता है। सच मे । तुम्हारे अपने चेहरे मे कुछ जरूर होता है जो दुनिया की हिकारत के बावजूद तुम्ह हमेशा अपने प्रति बेतरह प्रेम और क्षमाशीलता स भरा दीखता है और वही तुम्हे अपने प्रति हर बार नये सिरे से आश्वस्त करता है-बावजूद इसके कि-बावजूद इसके कि- टग टग टग | खाने की घण्टी बज रही है । हरी कासई आवाज । जहाँ घन घण्टे को निरतर पीटता है वहाँ कई छोटे-छोटे काले गढे पड गय हैं, मुहासो की तरह । आओ आओ ! आओ! युनिवर्सिटी की इमारत के ऐन तसे बैठे हुए भी जो घबराहट इस दम महसूस नहीं हो रही है वह घर जाते ही आ चिपटेगी। बावजूद इसके कि वहाँ सब कुछ इतना परिचित, फुसती और आराम करने के आग्रहो से भरा हुआ होगा। कुछ जरूर होता है घर मे जिसके कारण हर बात जो यहां कतई निजी और सीमित लगती है, वहा जाते ही सावजनिक बनकर धुएं सी पसरने लग जाती है, चारा ओर से घेरते हुए। क्या है ? क्या है ? कसे है ? अपनी शानदार कुर्वानियो के नइतर से निरन्तर तुम्हारी चमठी छील छीलकर मां बाप मानो भीतर तक पैठ जाना चाहते हैं, तुम्ह फिर से अपने भीतर समो लेने को आतुर, कि तुम्हारा कुछ भी उनसे छुपान रह जाये । आशा है । आशा है । आशा है। और तो और, मनश्चिकित्सको की तरह वे तुम्हारे सपनो को भी अपनी मिल्कियत बना लेना चाहते हैं। मैंने सुराही से एक गिलास पानी भर लिया और उसे हवा में लहराया। एक जाम ससार के सारे विगत आशावादियो के नाम | मैंने गाने की भी कोशिशती परमेरी आवाज मुझी तक नही पहुंची। प्यारेभाइयोऔर बहनो, सारी चेष्टाओ के बावजूद मेरी ताक्त एक खतरनाक ढग से छोज रही है । गिलास का पानी खिडकी के बाहर कुछ देर अफ्रीका के नक्शे के आकार मे पडा रहा, फिर धीमे धीम सूख गया। खाने की दूसरी घण्टी बज रही है। 94/एक नीच ट्रजेडी सामने टंगा कैलेण्डर हवा मे धीमे धीमे डोले जा रहा है। जहाँ वह रोज रगड खाता है वहाँ उसके पीछे दीवार पर एक अद्धच द्राकार निशान सा बन गया है। जैसे छिली हुई कुहनी हो। मुझे अपनी मां की याद नायी। शुरू-शुरू में जब हमारे टकराव शुरू हुए थे तो सबसे पहले मा हो यो जो कि वेतरह हिल गयी थी। बाबू से भी ज्यादा। जाने कब धीमे धीमे हल्के मजाको की तुर्शी जाती रही और प्रत्यारोपो की गम्भीरता बढने के साथ-साथ प्रतिवादो की कडवाहट भी बढती चली गयी थी। 'खरबूजे को देखकर खरबूजा रग पक्डता है,' बाबू कहते थे। छोटा और मैं मुहावरो के वे सरबूजे ये जा खुद छुरी पर गिरें या छुरी उन पर, कटते वे खुद ही हैं । कालिदी मीना-स्वप्ना वास ती, एक झुण्ड-का झुण्ड बेवजह ठहाके लगाता डायनिंग हॉल को जा रहा है। ये वे हर्राफा चिक्ने घडे, वे काली कामलियां, वे औघड वीतराग दिव्यात्माएँ हैं जिनकी भूख पर भावनाओ का कभी असर नहीं होता । कडवी से कडवी राजनीतिक झडप या इम्तहानों में खराब से-खराब पर्चे के बाद भी वे हँस हँसकर भूख भरे धौर निगल सक्ती हैं दही पर चीनी डलवान और दाल को दुबारा गम कराकर उस पर मिच की बुकनी डाली जाने की इच्छा व्यक्त कर सकती हैं। गुलदाज,हंसमुख, निर्विकार भेडे। मां-बाप की प्यारी, सासो की दुलारी, बच्चा की महतारी। भडास निकालकर मेरा जी फिर खुश हो गया था। मैंने लेटे-लेटे गुन- गुनाना चालू कर दिया। "बडी खुश लग रही हो, बात क्या है ?" विशवर दरवाजे से टिक्कर खडी थी। मौत और किशवर हमेशा बिना दरवाजा खटखटाये आते हैं, ऐसा मशहूर था। मुझे आश्चय नहीं हुआ। फूलदार छापे का हाउसकोट अपने विपुल उरोजा पर लपेटे, सिर पर रगीन तौलिए रास्तूप उठाये प्रश्न- चिह्न-सी वह खड़ी रही-कोई खास खबर ?" उसने आँख मारी। विशवर उन बेवजह बदनाम लडकियो में से है जो बात-बेबात सबको आख मारकर उनसे भद्दे राज उगलवाने वे समेत देती हैं । वसे दिल की वह साफ है और मुये उससे कोई गिला नहीं। सिवा इसके कि वह अपनी निजी आदतो मे चेहद गदी है। उसके कमरे की खिड़की पर अचार और जैम की सैकडो बोतलें बगैर ढक्कन के सदा पडी रहती हैं, फफूद से भरी हुई । उसके एवं नीच ट्रेजेडी/95 टूथब्रश को देखकर लगता है कि उससे शायद जूते की पालिश की गयी होगी, उसकी ग्रेजियर का फीता कभी ब्लाउज से झाये तो तुम्हें उबकाई मैंने अपने खयाला को तमीज़ से लपेटकर भीतर रस दिया और कुहनी के बल उठेग गयी-"कुछ नहीं, यूं ही।" पर वह गयी नही, वही सही अपनी बिलौटे सी आंखो से कमरे का जायजा लेती रही। में अपने-आपसे शत वदन लगी कि अब यह कुछ-न-कुछ मांगेगी जरूर। वह होस्टल मे उधार न लौटानेवाली मंगती के रूप मे मशहूर है। "यह चप्पल नयी है ?" उसने बेमुरोग्वती से मेरी नयी चप्पल मे अपने वे खुर घसा दिये जिन पर कालिदी से मांगी नेलपालिश लगी थी। 'हो।" मैंने अपना स्वर भरसक सपाट रखा। 'अच्छी है ।" उसने अपनी उंगलियां कुछ अदर-वाहर लपलपायी, फिर चप्पल ठेल दी-"हम पिक्चर जा रहे हैं, चलोगी?' कोर से दांत कुरदने लगी-"तुम तो छुटिटया मे घर जा रही हो ना?" 'हो।" "तो चलो फिर, वहाँ तो यह फिल्म अगले साल आयेगी।" देखूगी।' मैंने सुर मे भरपूर उक्ताहट लाने की असफल चेप्टा की, 'कौन-सी है उमने सस्पेंस और मारघाड से भरपूर एक अंग्रेजी पिक्चर का नाम लिया जिसके शहर में काफी चर्चे थे। वह ककी " "टिक्ट?" 'मिल जायेंगे।" उसने कन्धे उचकाये, उसके पिता पुलिस की कोई बडी तोप थे, और कभी ऊंचे ओहदे पर इस शहर में गद्दीनशीन रह चुकै थे अत उनकी एक सूक्ष्म सी तूती यहां अभी भी बोलती थी-खास नही, पर सिनेमाघरो, परचून की बड़ी दूकानो वगैरा मे। शहर के सबसे बढिया सिनेमा हाल का बूढा बदमिजाज गेटकीपर उसे बेबी वहता था और देरी से पहुंचने पर भी बगैर झुझलाये टाच चमकाता हमे सीटो तक पहुंचा जाता था। 'वारह तब बता देना साढे-बारह जायेंगे।" वह मुड गमी। मैं उसे जाते देखती रही। मेरा मन हो रहा था कि उससे पुकारकर कहूं--प्यारी 96/एक नीच ट्रेजेडी विशवर, कुछ देर यही बैठ जाओ, कुछ देर बात करो, कुछ भी, कही की भी, मुझे इस अकेलाहट से, मुझे अपने-आपसे बचा लो मेरी दोस्त । मुझे लगा कि मेरे मुह से पेपरबैक उप यास बोल रहे हैं, और मेरी हंसी छूट गयी । मैंने उठकर चप्पलें पहनी, फिर उतार दी और लेट गयी। पिक्चर देखने मैं नही जाऊंगी, यह मुझे मालूम था, उहे भी। बेकार की तकरार क्यो? - छत के कोने पर मकडी फुर्ती से जाला बुन रही थी-अपनी असह्य पतली टांगो से इधर-उधर भागती, कातती, चिपकाती। मैं नाखून चबाने लगी। पिछले साल पर्चे बावजूद मेरे मा-बाप के मुगालते के, कतई सामाय हुए थे, खामकर वल्ड हिस्ट्री का तो एकदम गोडकर रख आयी थी। दरअसल वल्ड हिस्ट्री का सक्सेना मुझे फूटी आखो नहीं सुहाता था। अपने जमाने का अच्छा विद्यार्थी रहा होगा पर एक चपरक्ताती भावुकता मे वह प्राध्यापकी मे आ घुसा था। उसके साथ के और जहीन विद्यार्थी आज सरकारी प्रशासक के लिबास मे ऊंचे क्ल पुर्जे बिठा रहे थे, बडी प्राइवेट सेक्टरवाली फर्मों की वातानुकूलित गाडियां दौडाते हवाना की सिगारें पी रहे थे, और वह नपोलियन की लडाइयावे मुझये लेखे जोखे कांख मचापे गजा और बदमिजाज होता चला जा रहा था । मुझसे वह पहले ही दिन से कुछ उखड गया था। या शायद मैं ही उससे । दरअसल अब आपसे क्या छुपाना, वह मुझे अपने माता पिता के अभिन मित्र 'क' चाचा की याद दिलाता था। वही पतली तोते की चाच-सी नाक और चौकोर जबडा,वही नकली अलमस्ती से उचक- पर चलने की आदत और नक्की आवाज़ । रेडियो मे जो बच्चो की फुलवाडी- नुमा प्रोग्राम आते हैं ना उनमे एक शरस जो बड़े भैया कहलाता है और हर अहम मोने पर बच्चो को टरकाकर तोतली आवाज मे खुद ही मजाक सुना वर उहें सविस्तार समयाने बैठ जाता है, कुछ कुछ वैसे ही 'क' चाचा को समझ लीजिए। 'आखिर हम लोग हैं पुरानी पीढी के,' उहोने यह वाक्य कहा नहीं, कि हम लोगो के कोट खडे हो जाते थे । अम्मा के वे बेहद चहेते थे, क्योकि उनके पारिवारिक नैतिक उपाख्यानों की वे वेचून दाद देते रहते एक नीच ट्रेजेडी/97 . थे। फिर साने के मामने । उनकी जुबान मे सुनते थे कि बहुत रस या, यानी जिसे अग्रेजी में महते हैं 'डिसप्रिमिनेशन'। वे तुरत भाप लेते हैं कि कब घाय नौकरो ने बनायी है और क्व अम्मा ने। 'पर पा रस तो बस गृहिणी वे ही हाथ में होता है', वे यहते और तुरत प्रस्ताव करते वि अम्मा मुषे भी अपनी यह सिद्ध पलाएं सिखा दें वर्ना सिफ बर्नाड शा और टी यस इलियट पढकर गहस्थी नही बनती-लडक्यिा से । समझी बाया वे भी ये परम चहते थे क्यापि राजनीति और समाज में नैतिर अवमूल्यन पर वे बखूबी उनकी बातचीत की गाडी टेल ले जा सकते थे, बीच-बीच म गाधीवाद की घंपी देते हुए। इस त्रिकोणी नाटकीयता में हर बार हम भाई-बहना की उपस्थिति सापेक्ष हो जाती है । कतई । "अब आप लोग मुझे चाहे रूढिवादी कहें"-अम्मा के शुरू होत ही वे लहक्कर बढावा देते, "भाभी, आप तो शब्दों का गलत इस्तेमाल करती हैं, आप कहती हैं रूढिवादी, पर मैं कहूंगा भद्र, शालीन । अब भद्रता कोई बदलनेवाली चीज तो है नही बेसिकली, कि कोई कहे कि हम नयी पीढी के हैं इसलिए आपके अदव-कायदे हमारे लिए बैमानी हैं। क्यो भाई, यग रिबेल्स ?" उनकी मुह खोले एडिनायडल जिज्ञासा जाक की तरह हमारी उपस्थिति से चिपककर फूलने लगती, "साबित कीजिए कि मैंने गलत महा है।" वे बाबा को आख मारकर हिंस्र हंसी हंसते, "जरा इधर हम लोगा के साथ तो बठो हम लोग भी जरा सुनें कि क्या नाम यगर पीढी आजकल क्या राय रखती है ? सुना है बडी महसें करने लगे हो वर्सरदार !' मैं भैया का भिचता जबडा देखती और मेरी नाभि मे कुछ कुलबुलाने लगता। यू हमारी पूरी कोशिश यही रहती थी कि चाचा या मासियो के आते ही हम तीनो घर के गृह्यतम कोना मे कही दिला जायें, पर हमे पूरी तौर से मालूम था कि तब भी नेपथ्य से घरवालो की ऊंची आवाजें जीवन और त्याग, ससार और समाज जैसे ऊँचे विषयो पर अपने सहज छिछलेपन के साथ बुलकारती रहेंगी । अपने ही मां-बाप हडकाने को क्या कम थे कि ऊपर से ये रिश्तेदार भी केची वाडी कब और अनमण्य चारो से भरे हमारे शहर के विराट उजडै बगीचो और भूरे फाटक्वाले उन पुराने बगलो मे से एक में मालिनी 98/एक नीच द्रजेडी ।

। मौसी रहती थी। उनके घर के भीतर नीम-अंधेरे मे घुसते ही धुधलाये रोगन, धीमे धीमे घुलती लक्डी और धूल की गघ नथुनो मे ऐसी भर जाती थी कि पूरे वक्त लगता रहता जैसे किसी तलघर मे घुसे बैठे हो । स्वय वे तीखा बोलनेवाली और निरन्तर एक कडवा दुख भीतर पीसनेवाली सतत शकालु जीव थी। हमारी सरल, धमभीरु और हंसमुख मा से कतई भिन। उनके बोलने, उनके झुपलाने और उनकी धीमे धीमे रुक रुकवर बननेवाली भगिमाओ मे एक पूरी स्त्री जाति के प्रचित रक्त का इतिहास था, जिसमे दिन ब दिन उनकी पूरी ताक्त निचुडती जाती थी-अपने विगत सुनले रूप और लक्दक डिग्रियो के बावजूद या शायद उही के कारण। हम सबको उनके उस धूमकेतु से उज्ज्वल विगत की घटनाएं कमजकम सौ बार तो सुनायी ही गयी होगी जो कि एक कृपण कठोर परिवार को चाकरी मे इस छोटे शहर मे घुल घुलकर नष्ट हो गया था। कैसे पद्रह मिनट तक क वो- केशन मे उनके नाम पर तालिया बजती रही थी, कैसे उनके परिचिता या कहना था कि उनकी-सी रूपवती पर अब क्या' जबसे हमने होश संभाला, वे एक सर वद हुए दरवाजे की तरह थीं जो एक चिडचिडायी चरमराहट के साथ सिफ उन्ही को भीतर आने देता पा जो उनका अपना रक्त मास हा। हमारी नेक्नीयत और सतत उत्साही मां उनमे से एक थी, पर उनके घर आफर मनहूसियत और पछतावे की एव परछाइ उन पर भी आ पडती थी। "कैसी थी, और कैसी हो गयी बेचारी |"वे कहती और दुखी हो जाती । एक कडियल सास के तले मालिनी मौसी के जीवन की जो पुरु- आत विगही तो सास के मरने के बाद भी संभली नही। या शायद सास तो एक बहाना भर पी। त्रासदी की रानी मालिनी मौसी का रहस्यमय रूप से ट्रेजिक स्त्रीत्व ही एक ऐसी शिला थी, जिसके तले उनका व्यक्तित्व कतई भिचकर रह गया था। उनके पर जाने पर, या जब-जब वे हमारे पर आती, हम उहें अपनी तीखी आवाज मे शिकायतें ही करते सुनते थे। अपने स्त्रीत्व से उलट घृणा और मारम-दया के बीच उनकी हर बात सदा झूलती रहती। मदपने की गप भर, चाहे वह तम्बाकू का धुआं हो या अश्लील मजाक या ऊँचे ठहाके, उन्हें एक उलट उत्तेजना से भर जाते पे और वे घण्टा अपनी पूणा में पुरानी पडी-सी टिमटिकाती रहती। बटोको खर्चीली वरुखी से एक नीच ट्रेजेडी/99 लेकर, पति की छोटे शहर की स्थायी नौकरी और पुराने नौकरो की ढीठ चतुराई तक, शिकायतें उनके हर वार्तालाप की टेक होती। हमारी मां के पुराने अल्बमो मे वे बेहद पीली, कमनीय और रूपवती दिखायी पडती थी, पर अब तक वह रूप एक विराट मोटापे मे फंस चुका था। हां हां, हमारी सतत प्रफुरिलत मां भी तो ऐसी घान-पान न थी, पर उसके फैलाव मे एक चैन भरा वात्सल्यमय गद्गदपना था जिससे दूधभरी गोदें बनती हैं। मालिनी मौसी का मोटापा एक ऐसा सट्टा खमीरी उफान था जो चीजो के निरतर ढंककर भीतर बद रहने से आ उठता है । तुरा, अस्वास्थ्यकर और 'पोला । अनेकानेक रहस्यमय स्त्री रोग हमेशा उनकी विराट् कमर तोडते और सिर को दद से फटता हुआ बनाये रखते थे। और उनके आलिंगनो से सदा दवाइयो और अकेलेपन की उत्कट गध आती थी। पर इस सबके चावजूद इस सारी त्रासदी मे कुछ या जो बेहद कारुणिक और मानवीय भी था। मोसी का दुख उस जीव का शब्दहीन दुख था जो प्रकृति के अयाय और स्थितियो के घटियापने के विरुद्ध अकेलेपन और शू यता के छोरो पर विना हथियार डाले जूझ रहा है। अपनी तरह से । लगातार । और उनकी हार मे कही हम सब भी शामिल थे। छोटी मौसी का वजूद उनकी तुलना मे कतई सहज और सरल था। जिस जगह मालिनी मौसी ने स्थितियो से टकराकर जूझने की कडवी चुनौती कमकर उठा ली थी, उसी बिदु पर शालिनी मौसी ने हथियार डालकर आज म वालिका-वधू बनी रहने की स्थिति प्रेमपूर्वक ग्रहण कर ली थी। उनका रीझना खीझना, बोलना--सभी बाल्योचित और अस्थायी था। अपने छोटे-से पुत्र से वे हमेशा अग्रेजी मे बहस करती, रोती या रीझती रहती थी। उनकी भोली आकाक्षाओ की परिधि विदेशी सामान से लकदक गहस्थी जोड पाने से लेकर अपने नहे बेटे को आला अफसर बना पाने तक ही फैली हुई थी। इसी से उनके दुख भी छोटे छोटे और अस्थायी थे- महरी या न आना, अचार म फ्फूद पडना या बच्चे का इम्तहान मे कम नम्बर पा जाना । सतत भीष और सतत शुक्रगुजार, वे हमारी मां के रूमानी जीवन के उस शूय को बखूबी भरती थी जो उनके अपने बच्चो के छिटक जाने से उपजा था। मां के भग्न हुए जाते स्वप्नो की दीवार को 100/एक नीच ट्रेजेडी उनरा बचकाना सहारा भी बहुत था । या शायद अपने स्वाथ से हम ही यह विश्वास करना चाहते थे। . मुह कहवा हो गया था। मैंने उसककर चप्पलो मे पैर धुसेडे और पुसी के कमरे को चल दी। पुसी, माने पुष्पिदर । मस्ती और मसखरी से भरपूर सरदारनी, पुसी ग्रेवाल | वह कुछ-कुछ नाक से बोलती थी और उसकी बचकानी अग्रेजी मे हि दुस्तानी अग्रेजी स्कूलोवाला एक खास कटाव था। उसकी पंचहीन दिमागी दुनिया हरी घास का वह अनहद विस्तार थी जहाँ दूर-दूर तक सपाटपने का गुदगुदा नमदिल सन्नाटा होता है। हर सामाय चीज मे वह असामाय रुचि लेती थी। खाने मे खूब मिच और गम मसाले- वाली चाट, या फिर धीमे तर सालन, गाने में लता मगेशकर, किताबा मे रोमास और जासूसी के चचें, और एक्टरा मे अमिताभ बच्चन । इन सब पर वह सौ जान से मरती थी। यू उसके कद्दावर जिस्म और कडकदार आवाज के परिप्रेक्ष्य में इससे हल्के भावनात्मक आवेग की कल्पना हा ही नही सक्ती थी। "ओये पुसी "मैंने नक्की स्वर मे बुलकारा और सीढियो के छोर से आधा धड लटका दिया। कोई जवाब नही। मैंने अगल बगल ताका। पुसी के कमरे के बगल मे ही सुरुचि अस्थाना का पका-बुसा कमरा था, जहां हर चीज मालकिन की ही तरह दुबली, व्यवस्थित और शहीदाना ढग से मुआयी हुई थी। "बाहर गयो है," सुरुचि की पतली यही आवाज आयो । सुरुचि को सुरुचिपूर्णता मे कोई चीज थी जो रहस्यमय रूप से मेरे भीतर अश्लीलता को जन्म देती जाती थी। मेरे भट्टै व्यथा भाव प्रदशन से सुरुचि के सुरुचिपूर्ण नयनो का अलकृत आभिजात्य कुछ सिकुडा, फिर वह अपनी धूसर भलमन- साहत से ईषत् मुसकरायी-"आज कुछ देर यही वह लो।" बैठना पड़ा, सुरुचि हमारो शालिनी मौसी की तरह सारे भारत की औसत मध्यवर्गीय माताओ का कमसिन मिनियेचर है। शिथिल मर्यादापूण, सतत शुक्रगुजार वह हरसाल सामा य सेकण्ड डिवीजन मे पास होती है और एक नीच ट्रेजेडी | 101 T लेकर, पति भी छोटे शहर की स्थायी नौकरी चतुराई तर, शिकायतें उनके हर वाता? पुराने अल्बमा मे वे बेहद पोती, कमनीय पर अव तर यह स्प एक विराट मोटापे में सतत प्रफुल्लित मां भी तो ऐसी घान-पान चैन भरा वारसल्यमय गद्गदपना था जि मालिनी मौसी का मोटापा एक ऐसा पट्टा निरतर पर भीतर याद रहने से या उर पोता । अनेकानेक रहस्यमय स्त्री रोग हम और मिर मोदद से फटता हुआ बनाये रग' सदा दयाइयो और अकेलेपन यी उत्सट भावजूद इस सारी नामदी में पुछ पा जोकर पा। मौगीमा दुग उम जीय का दादहीद और स्थितिया में पटियापन रे विष्ट असे दिनापियार गले जूग रहा है। अपनी तर" हार मे पही हम गर भी शामिल थे। घाटी मोगीमा पजूद उसी तुलना मय जिम जगह मामिनी मोगी ने स्थितिया से मग पगार उठा सी पी उसी पिपर पासिती आरम यासिरा-यपू यनी रहो की स्थिति में नराशा मीना, बोला--सभी या अरन छोटे-ग पुगये हम अप्रेजी में माम गी। उपभोसी आrieीपति गोगमार मान गदे बेटे को। nkar दी। गीग उनी दुग भी जार मनीराम मा अपार म प पम्ना दा पर पानागा भीरमौरमा पुगुनार गारको गरी मागी पी जो formगगा नगरे 100/ ru - (पेट पकडकर मतली की मुद्रा, जीभ निकालकर पुतलियां घुमाना), खाते ही मारा गैस बाय जाग जाता है, आऽऽह निमलाजी की भूरी अनझिप पुतलियो मे हंसी सा कुछ कंपता है, "देखो सुधा, मसखरी छोडो, जो पका है सो खाना होगा । समझो? मैं देस रही हूँ कि जब जब इम्तहाना का वक्त शुरू होता है, तब तब तुम गडबड करती हो । बस, दिन भर लटर सटर घूमना और झीकना । क्या शक्ल बन गयी है। चलो, उठो।" वे चली जाती है, जीसस की ताई, दधीचि की हड्डी, गाधी की चेली | मातम है कि अब मैं जाऊंगी हो । एक हम ही साले है, घर से बाहर तक सब बडो की हुकुमबरदारी करने का | मैं घिसटती हुई डाय- निंग हॉल के दरवाजे पर सडी होती हूँ। गर्मी और खाने की गध से भरे बातीत के रेले चहुँदिश उमडे पड रहे हैं। ज्यादातर लोग त मयता से खा रहे हैं, लगातार बोलते हुए। हर मेज पर दाल और दही के धब्ध है। रोटिया चीमड हैं, दाल ठण्डी । "गरम पर दें।" परसनेवाली नेवनीयती से पूछती है। 'नही "मैं कहती हूँ। मुझे मालूम है कि एक कटोरी दाल गम करने वह रसोई जायेगी और अय महाराजिना की डांट खाती हुई फूहडपने से राख भरी कटोरी मे तनिक गरम दाल आधे घण्टे बाद ले आयेगी। लोकी के टुक्डे मुटठी बरावर हैं, मिच म सरायार । आखिरी निवाला लेकर मैं धाली सरका देती हूँ। पर तब भी यह साना उतना खराब मालूम नही देता, घर का साना चाहे लाख बेहतर हो, पर जहां मां हमारी कुसिया के चारो ओर व्यय फटफटाते हुए हम साना खिलाना चालू करती हैं सारा स्वाद काफूर हो जाता है। कई बार तो लगता है कि हमारे-जैसे परिवारामे खाना ही दिमागी उलपना अचूक घरेलू इलाज बनकर रहगया है। चेहरा थका है ? जरूर विटामिन 'बी' की कमी है लो थोडा दही और लो, एक रोटी जरा ज्यादा धो के साथ । रात नौद ठीक से नहीं आयो? साना भारी हो गया होगा, आज हल्का बनवा देंगे। पढने का जो नहीं करता जरा लेना। कोई नही पूछता जो कि पूछना चाहिए, और वो नहीं पूछना चाहिए उसके भार म हजार सताहे। हॉस्टल का लॉन पागुन की अपरिहार्य मोसमी मासलता से गददग हैं। फूल ही फूल । लाख हटाने पर भी पालें चिपक-सी जाती हैं। धूल और एक नीच ट्रेजेडी/103 १ - च्यवनप्राग उसकी आत्मारी हमेशा करीने से लगी रहती है, उसके कपडे हमेशा इस्तरी• दार और उसके बाल हमेशा तेल से चमकदार होते हैं। वह धार्मिक भी है। जहाँ उसमी सजिल्द किताबो की लाइन खतम होती है, वहा सदा एक शेर या हस पर सवार देवी की फोटू या पालथीदार प्रतिमा स्थापित रहत हैं- चरणा पर एक अदद फूल या अगरबत्ती के भग्न ठूठ समेत, आशीवचन, अभयहस्त। दरअसल यह लडकी इतनी पार और पारदर्शी है कि उसको देखकर मुझे हमेशा उसके परे उसका भविष्य दीखने लगता है और यकीन मानें वह भी उतना ही सपाट और स्थिर है जितना कि उसका वतमान । मैं आज से दस साल बाद क्सिी दूर वे क्स्व या शहर मे अपने इजीनियर/ डाक्टर/अफसर पति के साथ बसी उसकी उस सपाट गहस्थी की कल्पना करती हूं जहां झक्क साफ उजाम के बीच उसपे जहज को फरनीचर, वासो से चमवायी पीतल की मूर्तिया और इकेवाना के मृण्मय पाना के परे एक कोने मे नहे दीपक से प्रकाशमान उसके पुस्तैनी देवता बैठे ऊँघ रहे होंगे। मैं मदुल स्वर मे उसकी उनीदी जिज्ञासाएं टालती, टोहती कुछ देर बाद लौट पाती हूँ। 'पैकिंग करनी है न । अच्छा | कुछ चाहिए तो नही हमार शहर से ? सोच लेना | वाध्य । ' स्टेज से नेपथ्य को रुखसती मेकअप सुधारना । उम्दा पाट अदा करती है लडकी ! थक्यू । थक्यू । थक्यू 'खाना खाया? निमलाजी सीढिया पर रुक कर पूछती हैं। वहॉस्टल की सबसे बुजुग रिसच स्कॉलर हैं । वे विधवा हैं । कम उम्र विधवा । पर यहा उम्र मे वे वाकी सबसे काफी बडी है-शान, गम्भीर अनमुवी। उनका यह अनमुखपना मालिनी मौसी की तरह एक चिडचिडाहटभरी अमहिष्णुता पर नहीं टिका है। उनमे एक ठहराव है जो बाधता है। हालाकि उनके चेहर या शरीर म ऐसी कोई पागल कर दनेवाली बात नहीं। पर व अपनी जगह हैं और अगर 'इज्जत' शब्त को इलास्टिक की तरह फलापर हमारे परिवार न उममे उन तमाम चुगदा को लपेटकर न रस लिया होता तो शायद मैं कहती कि मैं उनसरी इज्जत करती हूँ। "साना साया ?' वे फिर पूछती हैं। उनकी स्थिर जिमासा के आगे मेरे जसे शातिर खिलाडी भी टालमटोल नही कर पात। "नहीं, 'मैं रहती हूँ। फिर जचानक मुझ पर नाटर हावी हो जाता है, 'आज लौजी बनी है 102/एवं नीच ट्रेजेडी । (पेट पकडकर मतली की मुद्रा, जीम निकालकर पुतलिया घुमाना), खाने ही हमारा गैस बाय जाग जाता है आऽऽह |" निमलाजी की भूरी अनझिप पुतलियो मे हंसी-सा कुछ कंपता है "देखो सुधा, मसखरी छोडो, जो पका है सो खाना होगा। समझी ? मैं देख रही हूँ वि जब जब इम्तहाना का वक्त शुरू होता है तब-तब तुम गडबड करती हो । बस, दिन भर लटर मटर घूमना और झीकना। क्या शक्न बन गयी है। चलो, उठो'" वे चली जाती हैं, जीसस की ताई, दधीचि की हड्डी, गाधी की चेली ! मालम है कि अब मैं जाऊँगी हो । एक हम ही साले हैं, घर से बाहर तक सब बडो को हुकुमबरदारी करने को | मैं घिसटती हुई डाय- निंग हॉल के दरवाजे पर खडी होती हूँ। गर्मी और खाने की ग घ से भरे बातीत के रेले चहुँदिश उमडे पड रहे हैं। ज्यादातर लोग त मयता से सा रह हैं लगातार बोलते हुए। हर मेज पर दाल और दही के धब्बे है। रेटियां चीमड हैं, दाल ठण्डी। "गरम कर दें" परसनेवाली नेकनीयती स पूछती है । "नही "मैं कहती हूँ। मुझे मालूम है कि एक कटोरी दाल गम करन वह रसोई जायेगी और जय महाराजिनो की डांट खाती हुई फूहडपने से रास-भरीक्टोरी मे तनिक गरम दाल जाधे घण्टे बाद ल आयेगी। लोको ये टुकडे मुटठी बराबर है, मिच म सरावोर । आखिरी निवाला लेकर मैं थाली सरवा देती हूँ। पर तब भी यह खाना उतना खराव मालूम नहीं देता, घर का साना चाहे लाख वेहतर हो, पर जहां मां हमारी मुसियो के चारो आर व्यथ फटफ्टाते हुए हम साना खिलाना चालू करती हैं सारा स्वाद काफूर हो जाता है। कई बार तो लगता है कि हमारे-जैसे परिवारों में खाना ही दिमागी उलपना का अचूक घरलू इलाज बनकर रह गया है। चेहरा थका है ? जरूर विटामिन बी' की कमी है, लो थोडा दही और लो, एक राटी जरा ज्यादा घी के साथ । रात नीद ठीक से नहीं आयी? साना भारी हो गया होगा, भाज हला बनवा देंगे। पढने का जी नही करता जरा च्यवनप्राश ले लेना । कोई नहीं पूछना जो कि पूछना चाहिए, और जो नहीं पूछना चाहिए उसके बारे मे हजार सलाहे । हॉस्टल का लॉन फागुन वो अपरिहाय मौनमी मासलता से गददग हैं। फूल ही फूल । लाल हटाने पर भी आसे चिपन-सी जाती हैं। पून और एर नीच ट्रेजेडी/103 खुराकी से बैलून-सा फूला धूल का चेदोवा ऊपर गुम्म तना है। और नीचे लहलह फूलो की क्यारियां। पीछे डायनिंग हॉल मे खाने-पीने का मध्यवर्गीय उत्सव जोर शोर से निबटाया जा रहा है। सालन गम करवाया जा रहा है, कमरो से अचार और धोनी घर से लायी छलाछल क्टोरियां आ रही है, मंडराते कुत्तो को चपातियां फेंकी जा रही हैं, अचार की फाडियां चूसी जा रही हैं, बढते वजन पर शोक और सहानुभूति व्यक्त हो रहे हैं । पास, पत्थर, खाना, और कीचड-सा चुहचुहाता प्यार। हाय रे बिना आसमान की दुनिया कुछ साला तुक नही जिदगानी मे, तुक है ही क्सिमे ? "क्या सोचा, चलोगी" विशवर तमीज़ से कपड़े पहने धूप मे खडी अपने घने केश सुखा रही है। "कहाँ ?" क्षण भर को मैं सदम नही समझती। मेरी आँखो मे धूप पी चिलक है, और फूलो के तीसे रग दूध की तरह उफना उफनाकर मेरे गालो पर टपक रहे हैं। "यार, पिक्चर, और कहाँ ।" बह भेद-भरे ढग से सुर नीचा करती है, "या कोई और प्रोग्राम था?" उसकी भद्दी जिज्ञासा का ठण्डा छोटा मेरा उफान विठाता है। "नही, बाज नही।" "आज नही तो फिर नही, समझ लीजिए जानेमन, कल तो फिर वह गुनगुनाती हुई मुड जाती है। यू उसे मुझसे हामी की आशा होगी भी नही। मैं उन पुट घुटकर राजदाराना दोस्ती करनेवाली भली लड- क्यिो मे स हूँ भी नहीं जिनसे उसकी पटती है, और जो हर साल हॉस्टल से घर जाते वक्त ऐसे वात्सल्यपूण आसू रोकर विदा होती हैं जैसे डोली मे घंठ रही हो । मेरे भीतर उहें देख देखकर शायद कही कुछ सख्त हुआ जाता है, ठोस गुठली का-सा कडा एक आकार जो भावुक चपलता के इस विराट सावजनिक सोस्ते मे सोसे जाने से बेतरह कतराता है। "अरे हाँ," किशवर पसटती है तुम्हारी नयीवाली चप्पलें में पहने से जा रही हूँ, तुमको तो कही नही जाना है न?" 104, एक नीच ट्रेजेडी घर 1 मैंने फिर माँ की चिटठी उठा ली। बाहर लिखा वाक्य पहती दफा पढना ही भूल गयी थी- मुना चाचा से एक बार जरूर मिल लेना। उनको तबीयत, सुना, इधर फिर सराव थी। बहना, मो ने याद किया है।" हुँह । याद किया है । याद किया है | मैंन विवराल मुद्रा बनायो। दुनिया भर में अहसानो के टोकरे-डालियां घर घर पहुंचाने वो मैं ही हूँ। धूप मे पिटीशक्ल यनाये दुनिया भर में यहाँ जा बैठो और सजीदा चेहरा धनाये हुए उन्हें गम्भीर आवाज मे बतात सुनो कि कैम इस महीने के अत म जब मगल शुक्र को गोद म जा बैठेगा, उनया उदर विचार खत्म होगा और वैस जब उसके अगले महीन चन्द्रमा राहु वे पट म धुस आयगा तो उहें कफ-पित्त विचार सताने लगेंगे। तभी धाड ! जैसे पिन्मो मे होता है, दरवाजा सुला । अचानक जैसे नेपथ्य से इगित मिला हो। यह पुसी थी। दरवाजा उसने लात मारकर खोला था क्योकि हाय खाली नही थे, फिर भडाभड उसने कई पैकेट मेरी तरफ उछाल दिये, मेरी हृदय दहलानेवाली चीसो पर कान न धरते हुए। "ओम खोत्ती देख क्या-क्या उठा लाये हम लोग ।" फिर हम लोग उसकी खरीददारी देखने में व्यस्त हो गये। पुसी उन सदाबहार लोगो में से है जिनके लिए जिदगी मे दो ही रग हैं-~या तो सफेद और या काला । और दोनो के बारे में उसकी राय दोटूक होती है । लिबलिबाहट का नाम नहीं। चाहे विषय उसका बॉयफ्रेण्ड हो या ब्लाउज की सिलाई उसकी बातचीत एक ही खुशमिजाज ढग से दोनो की बखिया तुरत टटोल डालती पी। आज यह अपनी खरीदी एक नयी चप्पल पर लहालोट थी। पहनकर, उँगलियाँ सिकोडकर, टखने घुमा फिराकर वह अपने पैरो पर बेतरह रोयी जा रही थी। उसके बॉयफ्रेण्ड ने कभी उसके पैरों को लेकर कुछ तारीफभरे वाक्य यह डाले थे। तबसे वह अपने पैरावी हिफाजत अपने कुंआरेपन भी तरह अटूट भक्ति भाव से किया करती थी। आत्मलिप्त लोग अपनी चरम मुग्धता के क्षण में कैसे साफ और पारदर्शी हो जाते हैं, सोते हुए बच्चो की तरह जभी मुझे लम्बे बाला पर क्यो करती अधेड औरतें, कचे खेलते बच्चे और पनवाडी की दुकान में शीशा देखवर सिगरेट सुलगाते पुरुष हमेशा अपनी एकाग्र स्थिरता से खीचते हैं। पर बाहर / 105 पुमी की गाडी आज ही रात जाती थी। मजे की बात ता यह थी कि उसका बॉयफ्रेण्ड भी उसी गाडी से जा रहा था। ट्रेन उसके शहर भी जाती है कि नहीं?" विशवर क्धे से दांत खोटती दरवाजे से टिक्कर खडी थी। पुसी ठहाका मारकर हंस पड़ी, "आगरे से दूसरा कनेक्शन ले लेगा। कुछ ही घण्टे का पर तो है।" घर ले जा न उसे," विशवर हेंसन लगी। पापा से कहना-पापा, देखो आपके वास्ते क्या सौगात लायी हूँ! आप जगल ममगल कर देगा।" पुसी के पिता का तराई के रिसी हिस्से म एक विराट फाम था। बैंगरजी का वाक्य उधार लें तो ये लोग पैस म लोटत थे, पर पुसी की बातो मे लगता था कि शहरी अंगरेजियत से अलग-थलग उनकी दुनिया अन्तत एक वनमानुसी रूप से जिस्मानी और मर्दो की थी। आय दिन उसके पिता या चाचा क्सिी-न किसी नौकर या कमचारी का बवात धुन डालते थे या उनकी बीवियों पर हाथ डाल दते थे। तराई के निपट अवेले मे सारी आबादी से कटे छटे साल के छ महीन बनले जानवरा और पहाडी मजदूरी के बीच काटने के उनके पास दो ही बैचूक इलाज थे। अंग्रेजी शराब और देसी औरत । पुसी की मां जब-जब मदों पर 'फितूर' सवार होता तो फाम से दूर शहर के बंगले मे शिफ्ट कर जपजी साहिब का अखण्ड पाठ, गलीयो की सफाई-सुफाई वगरा कुछ करवा लेती। इधर 'फितूर' फाम से विदा होता, उधर वे वापस पहुंच जाती। "औरत हमारे घर मे जूती तो है, पर जरा पालिश-पूलिशवाली।" पुसी ठहाका मारकर हंस पडती। सबको मालूम था कि अतत उसके वॉयफ ण्ड से उसकी शादी नहीं होगी क्याकि वह जात का बनिया और औकात का थोडा कम था। पर पुसी को जाहिर ही इस बात को लेकर कोई महीन विस्म के दुख नही थे। उसने किसी अपने घर के ही से आदिम ख्यालातवाले मरद को तिल्लेदार जूती बनकर चटखने की भवितव्यता मो मे स्वीकार कर ली थी, और इस वक्त वह हंस हंसकर हमे बता रही थी कि से हर फितूर के उतरने के बाद उसके पापा उसकी मम्मा के लिए नये गहने गढात नये कपडे वनवात मम्मा को समझदारी पर पानी-पानी हुए जाते हैं। मजाल है कि उन लोगो की 106/एक नीच जेडी रचलें पर की व्याहताना ये तनिर भी मुह लग जायें । पुसी वा चेहरा विहल दामत्य में रूमान में मेरी मां की तरह चमक उटठा था और मैंन अचानय अपन भीतर उन तुरत मेरे पमरे से निकल जाने की घनघोर सामना पा घुमात पाया। पुमी ये जान के बाद यमरे मे पसीने और रिश्चियन डियार के सेण्ट (यूयार वाले फूफा | यूयाय वाले पूपा) की खुशबू भटकी भटवी-सी आती रही। वद दरवाजे की फांव रे नीचे पून की-सी गाढी माच की हवा भीतर आने वो छटपटाती रही थी। भटवे हुए कुत्ते की तरह दरवाजा कुरेदती हुई । क्या है जा हम हरदम अपने भीतर टटालते रहते हैं पर जिसे शर नहा परड पात, सिप उसकी आहट भर सुन पाते हैं। दुध दिल? दिमाग' दद ' दुमदन । मरी फेंकी चप्पल उस बेहद लम्बी टांगवाली मरडी को न लगवर कुछ नीचे लगी और लदद से औंधी हो लुढक गयी। माडी पुर्नी से ऊपर चढन लगी जहां वह नया जाल कातेगी। धत तेरी अच्छा, इस सबकी शुरभात पब हुई होगी? यानि कि सच मे सोचो तो। "आ गया, बाबू को आवाज । "आ गया" अम्मा, नाजुक्जमुहाई लेकर रूमानी किताब तिपाई पर रखती है। भैया । भय । भूप। भुरुकुस । छोटे और मेरा शतरज थम गया है। रसोई म कोई कम्बस्त कुछ गिराता है, झन | 'चुछ सानोगे, या कही 'मां के सुर मे एक-बटा चार शहीदाना- पन, एक वटा चार वराग्य, एक-बटा दोगूढ अभियोग। "ये कोई तमीज है?" बाबू वा तनिक तीखा सुर। तिलमिलाहट । तीर। तेजी। "सारे लोग तुम्हे वधाई देने आये और आप दिन भर घर से लापता यानि कि घर कोई-कोई क्या कहते है तुम्हारे लिए हो हो होटल है ?' छोटा हँसन जा रहा है। मैं चूरता से चिकोटी देती हूँ। 'देरी हो गयी।" भैया कुर्सी में फंसकर भोलेपन से रिसाला उठा लेते एक नीच ट्रेजेडी/107 हैं। याहयावावा । मैन बताया न पि हम लाग एर बेहद नाटीय परिवार हैं। हर अदा वेचूम। 'कुछ ता पा लेते तुम्हारी ही पसाद "मास्टनी है। 'यह ता दिया कि नहीं।' आग्नय दृष्टिमा भूप प्राध का विनिमय । माता पिता का नपथ्य म प्रस्थान । टिक टिव टिक पडी की तरह टिवटिराता डर, नाभि के नीचा । बीच। - टिर टिक टिव, प्यारे दो- 'तुम्हारे पास एर अतर्देशीय होगा" सुरुचि बिल्ली-बदमा मन जान पत्र दरवाजे के पास आ खड़ी हुई थी। मैं उछलकर उठ बैठी। वाई की भवराहट म (वसम ले ला)। पर पिर नाटकीयता हावी हो जाती है, सीना पाडे में मुरती हूँ। 'माइसन उरात हो बूढ मनई का? मान लेव मुदा हारट फेल हुई जात, तो" अतर्देशीय लेकर सुरचि हसती हुई चली जाती है। मैं चप्पल घसीटती हुई दफ्तर की ओर चल देती हूँ, रजिस्टर म दस्तखत करने । मुना चाचा ये ही घरम पैठा जाय । जरा चिमगोइयां ही कर लें पिइम्तहाना से पहले हडतालमा नक्षत्र-योग बनता है कि नहीं? वर्ना टायनवी को अगले हफ्ते इशू करायें। पिछले साल भी जब मकर म शुक्र या शनि जैसा काई खुड- पेंची ग्रह आ भुसा या ता यूनिवर्सिटी म साठीचाज हो गया था। "वकीलों ने घर से वकालत टपकती है। भया ने एक बार कहा था। और 'जाहिली के घर से जहालत।' यह छोटके था, और हम लोग देर तक लोट-लोटकर हंसते रहे थे। मुना चाचा बाबू के किसी दूर अगम्य रिश्ते से भाई लगते थे और हॉस्टल रजिस्टर मे मेरे अभिभावक के रूप म दज थे। यू उनका एक पुश्तैनी मकान और कुछ दुकाने हमारे शहर में भी पडती थी जिनकी दीवानी फौजदारी के सिलसिले मे व हमारे घर प्राय आ टपाते थे। उनके आते ही से वस तुरत हमारा घर भगु महाराज की पणकुटी मे तील हो जाता। चाय की प्यालियां लपालप लपकने लगती। अखबारो के पन्ने खुल खुल जाते। राजनीति और भविष्यवाणिया का 108 / एक नीव ट्रेजेडी चहचहाता मीना-बाजार रोशनी। चहलपहल । चुहलें। चिमगाइयो । बाहर कठपरा म बंधे कुत्ते गुरति रह्त, अंधेरे मे यौजियाये थूथन उठाये हुए। कौन है ? कौन है? कौन है ?-- एक नक्षत्र उगता है, एक नक्ष डूबता है। फिर फिर उसी धुरी पर घूमता है मेरा प्रायद्वीप। सुवह शाम। सुवह शाम। चिडियां पागल हो गयी है । खौरी कुतिया भी। "दूद देखो इसके, सात-मात जनकर आयी है कूलर के पीछे," नौकरानिया का झुण्ड खिल- खिलाता है। 1 " 7 "ख खै 1 में इन चिडिया की गदन मरोड दूगी इस कुतिया को भी, किसन कहा था इससे कि कि "वहन से क्या होता है, आजकल इनवे चद्रमा पर राहु की छाया है मुना कहत है । मां रेशमी नाटकीयता से चश्मा उतारकर आँखा के पपाट सहलाती है। तुमने कभी किसी के हाथो पर तरस खाया है क्या मुडर पर दुवको ख ना साहब को विल्ली तुरई के फूलो के बीच हँसती है। कुछ देर बाद उसकी हसी भर रह जायेगी और वह लुप्प । मो की बोहा के नीचे पसीन के अद्ध च द्राकार निशान है। कनपटियां कुछ-कुछ सफेद हो रही है। मालिनी मौसी कहती है कि जीजी, तुम अपने बच्चा को ज्यादह ही मोह करती हो। वे खुद मोह करन की बजाय पेट घटाने को हर सुबह यौगिक व्यायाम करती हैं। नाश्ते मे सूखा टोस्ट और काली काफी लेती है। एक हफ्ते तक । उस एक हफ्ते वे बच्चो, मियां और नौकरा पर झल्ला-झल्ला कर घर को लस्त बना देती है। फिर एक दिन वे कहती है कि टु हैल विद इट ! और आलू के पराठे और चाकलेट आइसत्रीम दावकर खाने लगती हैं । उहाने हर चीज मे हाथ आजमाया है। उहोने एक हप्ता टाइपिंग, एक महीना शास्त्रीय गायन एक साल पेण्टिग और डेढ साल मच सीखी है। पर हर चीज को उठाते ही उह लगता है कि अब उसमै तुक नही रहा और यहाँ से वे वैराग्य पर आ जाती हैं । वाहरी दुनिया से कहती हुई कितू मेरे ठेग पर। एक नीच ट्रेजेडी / 109 मालिनी मौसी मेरी तरफ अयमय ढग से देयवरकहती हैं विनाधिर बार संसार में कोई अपना नही होता । शालिनी मौसी बचकानी अग्रेजी में घहती हैं कि मां से ऐसे नहीं बोलते-मैं तो समझदार लड़की हूँ न' हर बार तीना स्त्रियां अतत मिलकर पूछना चाहती है कि यह भी नहीं, यह भी नही ता तुम्ह चाहिए क्या क्या चाहिए तुम लोगा का? कुतूहल, असमजस और हताश प्यार से उनके चेहरे क्टोरा की तरह छलकत हैं। मैं अब प्राय अखबारो मे घर से दूर मिलनेवाली नौकरिया के इश्तहार पढती हूँ, विशेषताओ का मिलान करते हुए। जैस आंखें वद कर राम शलाका प्रश्नावली निकाली जाती है। लेक्चरार' यानि तमौजदार धोतियां, चॉक की गध और दहियल सहकर्मी, जो बहुत वालत, बहुत चाय पीते और बहुत टार्गे हिलाते हैं। रिसेप्शनिस्ट-यानी एक इच मुस्कान, पिन से अटवाई महाती साडी, रटे हुए कटाक्ष, दुहरे अर्थोंवाले वाक्या की चतुर काट, जब फासीसी मर्दानै इससे महफ्ते बिजनस एक्जीक्यूटिव जरूरत से ज्यादा पास आकर बातें करने लगते है । रगर्मों ? यानि हथकरघे की धोतियां, एक छटांक सुरमा, चांदी के गहने, मूजी-मूजी कोवड भरी आँखो- वाले पुरुष मित्र जो ऊँचे ऊँचे ठहाके लगाते हैं। एक रूमानी समय था जब मैं सोचती थी कि कुछ होना ही है तो द्रौपदी-सा कुछ बना जाये। नही । यानि आओ, रहो और अब जाओ-कोई भलाल नही कोई शत्रुता नही जो भी प्यारसे मिला हम उसी के~पर पापे चल नही सक्ता, जो पुरुष मैंने देखे हैं न, बसा मे, घरो मे ट्रेनो मे-सब के सब जक्डनेवाली जात के हैं। वे धरोहर नही स्थावर सम्पत्ति चाहते हैं जिसके चारा तरफ कांटेदार बाढ खीचपर वे वोड टांग दें-आम रास्ता नहीं उहुक, कुछ और ही तरकीय तलाशनी होगी। मैं विना दस्तखत क्येि लोट आती हूँ। नही जाऊँगी। मां पूछेगी तो हजार तरीके हैं टालने के। हुँ । मेरी ठोकर खाकर पत्थर गाली-सा उछलता है । कुछ नही तो एक अभद्र विस्म का अजूवा तो बना ही जा सकता है न? अठिन तो जरूर है यह हो जाना पर साफ-शपफाफ और अतिम हल भी तो यही है । बस। विशवर सजी धजी बीच रास्ते पर थी। साथ म पांच छ और। 110/एक नोच जडी "सोच लो अभी भी, चलोगी?" मैंने सिर हिला दिया। फिर विशवर मेरी चप्पले पहनकर चली गयी, फदर फदर। टन | गजर कुछ बजाता है । समय, भय? कबूतरो का एक जोडा पर फटफटाकर उडता है, तिनके, गद तिनके। मैं अपना ही हाथ कुमार पक्डती हूँ। हवा में अचानक धूल घनी हो गयी है । सास भी नहीं ली जा सके, इतनी । कलेजे पर सफेट-सा कुछ शिक्जा-सा कुछ, कसता है । डर का रग काला नही, सफेद होता है। होस्टल सुपरिण्टेण्डेण्ट लीला मित्रा मेरी हितचितिका है। मेरे कई हितचि तक है।थे। लागो का मुझपर से विश्वास उठ रहा है। प्यारे भाइयो और बहना मैं कहती हूँ यकीन मानिय चि में इस सबके काबिल कतई नहीं, वस जैसी आपकी श्रद्धा "कसी तैयारी चल रही है ?" वे पूछती है। मेरी तलबी हुई है । पशी। अभियोग। लीला मिना, तुझे पता है कि तेरे चेहरे पर हल्की मूछे हैं प्यारी। इतनी लम्बी कि तू उहे चूस सकती है। "हंसा मत " लीला मिश्रा की आवाज नुकीली लाल पेंसिल है। मने जो पूछा है उसका जबाव दो ' इस साल पर्चे कुछ बेहतर करने का इरादा है या पिछले साल की तरह तुझे मतलब? यानी कि म साली कोई इसान नही, टेलीफून की डायरेक्टरी बन गयी हूँ? ऐं? कि पना खोलो और नम्बर पता मब तुरत मिल जावे । क्यू गिव मी वन रीजन । 'इतनी आशाएँ थी हमे तुमसे" लीला मित्रा की मूछदार आवाज भर्रा जाती है, "यूनिवर्सिटी मे आयी थी तो हम सब तुम्ह दिखाकर कहते थे कि यह लडकी बडी दूर जायगी। पहले साल अच्छा भी क्यिा पर पिछले साल । उफ ! उफ् ! मुझे क्तिना धक्का लगा, बता नहीं सकती।" लीला मिश्रा के चौकोर चेहरे पर अध्यापकीय विपाद की थरथराहट है। पर मेरा वच कठिन वक्ष पता क्यू नही? कांप रे मन मूढ मेर। "तबियत-ववियत तो ठीक है न?" वडे लोगों की आवाज पूछताछ के बीच यकायक नम पडे तो मरे भीतर की खतरे की सुइ पागल होकर बचने का लाल सकेत देने लगती है । चेता चेतो रे नौजवान । " एक नीच ट्रेजेडी/111 घर को चिटठी विटठी तियती हो?' जी" ममी ठीक हैं " "जी" 'मेरी तरफ से याद कर देना। इतनी भली, इतनी मेरे दिमाग न रिसीवर उठाकर रख दिया है, लीला मित्रा की चह- क्ती मैत्री भरी आवाज मेरी पारिवारिक पप्ठभूमि वे चाद-तारे टूगती रह जाती है। इतना गच्चा खापर भी तुम परिवार मे सुख खाजती हो लीला मिना यह भुलाकर कि तुम्हारे मा-बाप न तुम्ह अपन विजातीय प्रेमी के साथ शादी करने की अनुमति मरते दम तक न दी, और जब तक उनका अपना पटाक्षेप हुआ तो मेनोपॉज के साथ तुम्हारे होठो पर मूछ उग आमो थी और उसके माथे पर से बाल उड चुके थे, और यद्यपि तुम्हारे साथ के लोग तुम्हारे अखण्ड व सच्चे प्रेम की दुहाई देते रहे, सच बताओ इस उमर मे बात कभी वही रह सकती है ? यानि सच मे प्लेटफाम पर बहुत भीड थी। छुटिटयां उमस, आधी तपन आधी खुनक । सामान रखकर मै खिडकी के पास जा बैठी। धडधडाता क्तिाबी ठेला आ पहुँचा--इगलिश मैगजीन यू मैगजीन । मिल्स एण्ड बूस, पेरी भैसन । 'ये लीजिए वेबी नया करेवन । ढेरी टटोलत उसके उत्तेजित हाथ कापते हैं । ये युरौंदार है, उसकी कमीज के फ्टे वफ भौडेपन से रफू किये गय है और नाखून बेतरतीबी से कटे हैं। रुआंसी होकर मैं अपना जोश पन ढापत हुए अम्मा के लिए तीन चारेक स्मान, छोटने के लिए दो खूरेज रोमाचक उपयास ले लेती हूँ जिह प्रवट मे उपेक्षित दिखाते हुए अतत हम मब रस ले-लेकर पढेंगे। मैंने कहा न कि हम सब एव खासे डामाई परिवार के सदस्य हैं । अपनी-अपनी नाटकीयता से वाकिफ पर आदतो से लाचार । सब । सिवाय हमारी मां के 1 यह नहीं कि मां नाटकीय नहीं हैं। हैं और शायद हम सबसे दसेक डिग्री ज्यादे ही। पर व उन निया- लिस नाटकीय लोगाम से हैं जिनकी नाटकीयता म सशय और हँसी की 112/एक नीच द जेडी कोइ एसी गद्दार फाक नहीं है, जिससे कभी भी अपनी सकुचाई पडताल का डरपठ पाये। उल्ट उनकी अपन और अपन नाटकीय मूल्याम अटूट आस्था देखकर मेरी सास कभी-कभी अचरज से थमी-की थमी रह जाती है। पचीस सालो से व बाबू के साथ यह गृहस्थ धम निवाह रही हैं और हर महायुद्ध, महामारी, आमचुनाव और जचगी के बावजूद हर साल उसी तम- यता से खाने-पीने, कपडे और बच्चो की चर्चा करती पायी जाती हैं हर जाडे मे गाजर का हलुआ, पानी का अचार और हर गर्मी मे आम का पना और नीबू की शिक जिया वनवाती हैं । हर विगत शादी म दिये गये दहेज और तीयल के कपडो, गहनो के सैटो के नमूने और माडल याद रखती है, और घर की हर शादी और जचगी की सालगिरह उनके पोरो पर टिकी हुई है। उनसे आप पूछिए कि फला आमचुनाव क्सि माल हुए थे वे तुरत अलों के बड़े या फलां की मझली की जमतिथि स जोड या घटाकर सही तिथि आपका बता देंगी। आप पूछिये कि चुनाव में कौन-कौन पार्टिया थी, यह उहे याद नहीं होगा, पर वही उस साल हुए बच्चे का वजन और उस जचगी के अय सारे ब्योरे व आपको कम्प्यूटर की मुस्तैदी से बता जायेंगी। पति से बच्चो तक एक काल्पनिक चौक पूरकर वे उसके भीतर मजे से आन वठी है और उनके ऊपर उही के चेहरे से मिलती जुलती एक पूजनीय तस्वीर टंगी है, उनके देवी अध्यात्म की। मा बस एक झटका भर देती कि हम सब नाच उठते हैं... नगिन गिन गिन, तनक धिन धिन । हैं नही, थे-याकि जिस दिन से हम यह भाप पाये, उसी दिन से वह बात नहीं रही। बावजूद मुना चाचा के सारे ज्योतिषीय लेखे-जोखे के । सुना है भृगु- सहिता बनानेवाले भृगु महाराज की फलित ज्योतिप भी कभी-कभी गड बडा जाया करती थी। तो हम तीनो भाईबहन व ही गडबडाये ग्रह फल हैं, घुरी से छिटके नक्षत्र । जनाटेदार धूमकेतु । अग्निमुख उत्काएँ । अव तो बार-बार खदेडे जान, धक्यिार अभियुक्त के कठघर मे बोले जाने और टेंटुवा देववावर बुलवाय जाने की नाजायज प्रत्रियाआ से गुजरते-गुजरते हम इतनी खतरनाक तौर स नाजायज हो चुके है कि हमारा दिमाग दरांती हो गया है और हाथ हथौडा । बावजूद इसके वि अकेले कम्पाट- मेण्ट में बठन म मेरी टांगें अभी भी हल्के से थरथराती हैं और बाहर प्लेट एक नीच ट्रजेडी/113 फाम पर हलकती, हँसती, हलबलाती भीड को देखकर मेरे गले मे मछली के काटे की तरह कुछ अटक-अटक जाता है। मुझे पूरी तरह मालूम हो चुका है कि इन हसीनाओ, और साड-सी चक्ली छातीवाले नौजवानो की तुलना मे मेरा दिमाग क्सिी कदर वजनी और तर्रार है, कि जब परम्पर व्याहे जाने और प्रजनन क्रिया म लीन हाने के वीच वे अपन को एक-दूसरे की छाया से भी घिनातापायेगे मेरा जहन जगलीखरगोश की तरह फुटकता भेडो के आस-पास थूथनी उठाये ताजा हवाएं सूध रहा होगा। पर तब तक उनके पास अपनी वशुमार चीजें हागी उनको पाटिया, उनके घर, उनके फूलदान, उनकी वासो से चमकाई बुद्ध की मूर्तियां और आल्मारी में थाड पाछकर सजायी पेंगुइन मॉडन पोएट्स सीरिज की विता, उनके बच्चो के चमवीले स्कूलोकी चमकीली रपटें और उनके अख- वारो की सुखिया, और साल दर साल उनकी टक लेकर वे मेरी माँ की तरह हर रात दस बजे एक प्याला दूध के साथ एक चम्मच च्यवनप्राश खाकर तृप्ति से भरे हुए सा जायेंग जवकि अधेड हाती हुई मैं सफण्ड स्लीपर के ठण्डे काले जंगला पर अपना खिचडी वाला और अस तोप से भरा जिद्दी मिर टिकाये रहूंगी निद्राहीन अक्ली और दूर-लोहा मेरी उँगलियों के नीचे ठण्डा और सख्त है। पर लोहे पर मेरी उँगलियों गम और कोमल हैं । बम- से-कम अभी तक । पर क्व तक नही, उधर नही, विंग लियर अपने बूढे विदूपर से कहता है, 'उस दिशा मे सिप पागलपन वा फ्लाव है।' "आ सकती हूँ?' मेरी मारे-म अवाटय भानेपन मे वह हममुप आवाज पूछनी है।' मैं मिडकर जगह परती हूँ। होल्टॉल, टोकरियाँ मूटक्स । अटैचीक्स, थमस सुराही (अर रे रे रे लुढकी ' सुटली ) "बच्चे उप बहुत गर्मी है नहीं' आवाज पयें से जूझती है । हिलती-डोलती ट्रेन चलादी है। मेर भीनर माछे ययात पाख्नाआ की तरह परपडपटात हैं। मैं गलीन या हूँ। उमस पया मीधा नहा रहा है। वह हम छोडवर कम्पाटमण्ड को हर दूसरी निशा को हवा थूब रहा है। माना शायद मुझे भी बग्नी पाहिए यो पर एम समाज्ञापयागी मोगा पर अवानर में टाग पर - 114/परमीपदही जाती हूं। मुझे मालूम है—मालूम है-मालूम है, कि यह गलत और खतरनाक ढग से समाज विरोधी बात है और यह भी मालूम है कि अगर मेरी मां यहां होती तो अपनी अदश्य डोरियो मे एक का झटका दती और मैं तुरत खडी होकर डगमगाती ट्रेन मे अपने को संभालती रथ की धुरी मे अपनी उँगली फैमा दती। पर जनाब, आप मुये यू जपदस्थ नहीं करेंगे । मै पीछे की ओर पसरती ही नहीं, पर भी ऊपर कर लेती हूँ । जो औरते उमस के मौसम मे जरी की तिल्लेदार नायलोन की नीली साडी और लाल चप्पल पहने पाच से कम उम्र के दो बच्चा को लिये अकेले सेकण्ड स्लीपर क डब्बे में सफर करने का वीभत्स शौक पालती हो, पालें, मुझे उनम कुछ नही करना। पखे को तनिक तिरछा कर वह अतत मुडती है । हवा के बहाव म तो कोई फक नही हुआ पर पखा तो हिल गया। तेली रे तेली, तर मिर पर कोल्हू | तुक नही मिली तो क्या हुआ, तेरा सिर तो थक गया। उसका चेहरा विजयगव स चमक रहा है-वह मुस्कराती है, मैं भी मुस्कराती हूँ, फिर मैं आँखें बद करने का नाट्य करती हूँ। मुझे नहीं करनी पसीजते बहनापे की व्यवस्था । वह कुछ-कुछ तुतलाते हुए अपने छाट वच्चे से खेलने लगी है। जी हां, मुझे मालूम है कि इस दश्य की घरेलू स्निग्धता को देखते हुए हमारी पारिवारिक अपेक्षा क्या होती ।-"वहाँ जा रही हो?' वह पूछती है। उसका चेहरा अभी भी वात्सल्य से भीगा भीगा है। मैं शहर का नाम लेती हूँ। 'तब तो हम लोग आपसे पहले ही उतर जायेंगे।" वह मेरे बिना पूछे बताती है । फिर उसी सांस मे यह पूछकर कि क्या मैं यहां पढती हूँ वह यह भी बताती है कि उसके पति भी यही पोस्टेड हैं और यह कि अरे, तब तो तुम्ह यहां कभी नहीं देखा | जस कि उनके दसे बिना मेरा अस्तित्व ही सदिग्ध है। सिडी फ्ही के 1 पर मरा मोना इतना गुदगुदा व सुखद है और इतनी जोरा से नीद आ है कि गुस्सा भी नहीं आता। अब वह एक सडबिल्ली-मी लडको प्रभा के वार में पूछ रही है जो कि हमारे ही हास्टल मे रहती है। तुम जानती हा उसे" "हाँ मैं जानती हूँ" मैं कहती हूँ, अपनी वाचालता पर विमुग्ध । अचानक एक ज नाटेदारनाटकीय झूठ बोलने की एव वेपनाह उतावलो चोल एक नीच ट्र जडी/115 " की नाह मर भीतर डेन फैलाये छा जाती है । "अरे प्रभावह तोमरी पक्की सलो है, मैं बहती हूँ "और पढने म तो इतनी तन है वि बम जना उनका स्वर संशय भरा है, पर यश-गुग । उसी गादी उनव चचर देवर से हानवाली है न । 'दयन म अच्छी है य ता मुना था, पर पढाईम--" जरे लीजिए, इस बात को यौन नहीं जानता" मर भीतर या लवार वगटुट भाग निकला है, फिर मैं एक लम्बी सोदाहरण व्याख्या से समसाती हूँ वि दो तरह के विद्यार्थी होत हैं, एक तो रटत विद्यावाले तात जा दिन रात वितावा म मुह डुनाये अपना रग रूप तबाह करते रहते हैं आर इम्तहान के दिनाम यूं लगते हैं-~मैं एव चूम दशहरी आम की गुठली मा चेहरा बनाव र मखें भंगी र सेती हूँ। मरी श्रोता उठावर हसती है- "आप ता एकदम कार्टून सेंच देती है।' अव मैं अपनी वक्तता के सम्मोहन म पूरी तौर से सराबोर हूँ 'एक वे विद्यार्थी होते है जो कि हंसते-खेलते इम्तहान से कुल दो महीने पहले इत्मीनान से सब पढ-पहार इम्तहान दे आते हैं । बस, धमाधम मस्तक्ल दर । अव प्रभा म यही तो खासियत है । नता वह रटटू है, और न ही फ्सिडडी । और फिर वेहद शालीन लडकी है। छिछोरापन ता विल्कुल छू भी नहीं गया।' मैं मां की आवाज म बात को परत भावुकता का आवश्यक पुट देती हूँ। मामला जम रिया है। हा, यही तो बडी चीज है" व कहती है, वरना उह घडे शहर की पडी लडकी लाने म यही डर लगता है कि कही बहुत तेज-तर्रार न निकल आये । जा प्यार क्या नस पक्डी है आसामी की। हो हो हो, मैं मन ही मन लाट रही हूँ। घर जाकर भया और छोटे या बताऊँगी कि ट्रेन म एक ठो शादी भी त करा आयी हूँ तो एक्दम मर जायेंगे। यानि कि मैं और नाऊगिरी । वह भी उस सडबिल्ली प्रभारानी में लिए जो दुपटटे से पन की रोशनाई पाछती हरवार नोटस डिक्टेट करत प्राध्यापका को अपनी एडीनायडल आवाज से टोक्ती रहती है--- व्हाट सर कुडण्ड फालो" फिर वह मुझे बहुत सारी और स्वणिम खबरें द डालती है कि किस तरह उनके दवर के लिए क्तिने रितने रिश्ते आय थे मोदीनगरवाला ने तो हिण्ट भी डाली थी कि पूरी मिल उनके नाम कर देंग, उनके और है ही 116/एक नीच ट्रेजेडी .

- कौन' पर देवर को एक ही 'कण्डीमन थी कि लडकी गोरी हो और अग्रेजी स्कूल की पढी हो । सो फिर यही हा कर दी। यू उनका देवर है भी बहुत कारिदा लडका । "घर गहस्थी की तो ऐसी उस जानकारी है कि हम-तुम्ह न हो। अभी कम्पनी की तरफ स महीने भर को जापान गया ता एक तो लाया मिक्सी, एक पूरा डिनरसेट प्लास्टिक का, एक इम्पोर्टेड टेलीविजन, और सब भाभियो के लिय वूली जाजेंट की साडियां और भतीजिया को सण्ट लिपस्टिक । अब बताओ आज के जमाने में इतना कौन मानता है "सही है । कोई नही ।" मैं गम्भीरता से बत्ती उकसाती हूँ। पर वसे काई समझ ले कि उसे भले-बुरे की परख नहीं, ऐसा नही । वह बताती है, उसका तो कहना है कि शादी के बाद लड़की को कतई बाहर काम नहीं करन देगा। घर से बाहर लडकी निकली नही कि बिगड गयी | मैं पढनेवालियो की नहीं, काम करनेवालियो की कह रही हूँ।" वे पुचारा देती है, और हिलती ट्रेन मे आश्चयजनक मुद्राओ म तिरछी-सीधी होती होती अतत आठ औंस दूध घोलकर छोटवाले के मुह म बोतल खास देती हैं- जल्दी पी ले, पद्रह मिनट मे स्टेशन आता होगा।" सचमुच ट्रेन कुछ देर बाद धीमी होन लगी है और मैं पाती हूँ कि मैं उनके बच्चे, टोकरियां दूध की बोतलें, चम्मचें और स्टील की गिनसिया बटोरवा रही हूँ। 'अच्छा नमस्त, बडी खुशी-खुशी वक्त कट गया, नही?" मैं उनके बच्चे का गाल थपथपाती हूं, कुछ कहती नहीं । उहें काई लेने आया है वे चली जाती है। फिर गाडी चलने से पहले दो मोटी खमीरी पजाबनें मलमली दुपटटा और चैनदार जडाऊ क्णफूला समेत आवर धंस गयी थी। कपडे की खाल- दार अटचियां, माटे होल्डान। पीतल का क्टोरदान, जिसने उपर खुरपे जितनी चम्मच खुसी है। मुझे उनमे कोई रुचि पैदा नहीं होती। अब मैं बहरी गूगी हूँ। या रब्बा । तू ही पालनहार " एक कहती है, दूसरी ओऽम । ओऽम् | करतीन चार डकारें लेती है, "तूने इनें प्राण्ठे नई खिलाने थे," वे अपनी साथिन से कहती हैं। "मेरा बायगोता जाग गया।" मुझे अपनी दादी याद आती हैं, उह भी इसी तरह के तिलिस्मेहोशरुवाई मज हुआ करते थे-गोला उठना, चिलर पटना, दिल धडकना वगैरह-वगरह । और उसके उतने ही गूढ इलाज थे--सतवासे बच्चे को पीठ पर चलवाना एक नीच ट्रेजेडी/117 मात्तिकी नीवू का अचार चाटना, बासी मुह ताजी मूली याना । ऐसे रोग और उनक उपचार सुनकर कई बार एक्दम परामनावनानिक शक्तिया और उड़नतश्तरिया म आम्या होनी शुरू हो जाती है नहीं ? व मुपसे कुछ पूछ रही है शायद यह वि मैं वहाँ तक जाऊंगी। पर मैंन अभी बताया न कि मैं गूगी-बहरी हूँ। कनखिया से मुझे गरियात व फिर एक-दूसरी म तल्लीन हो जाती है-फिर एक पाठ छेड दती है- तार माता तारनी, सव दुख निवारनी। पहली सज्ञा तारनी, तार माता तारनी। मेरी आंख लग जाती है। एक जमाना था जवकि हम लोग घर पहुंचने की सही तारीख और रेलगाडी का सम्भाव्य समय आने से हफ्ता भर पहले लिख भेजत थे, वैस ही जैसे कि एक वह जमाना था जबकि गुप्तकाल था और स्वणयुग था और लोग घरा के दरवाजे नही भेडते थे और बक्सामताले नही लगाते थे। फिर धीरे धीरे समय का मुहावरेदार चक्का घूमता गया और देखते-देखते लोग बक्सा व घरो मे ताले और सिटकनियां तगाने लग और हमने चिट्ठिया में व्यक्ति गत मामलो के चचे लिखना छोड दिया। एक वे दिन थे, एक ये दिन हैं" बाबू नाटकीय सास लेकर कहते हैं । 'क' चाचा तुरत समयानुकूल दाद देते अपनी प्याली थाम लेते हैं । वे अभी अपन आध्यात्मिक गुरजी । चमकीले आश्रम से महीने भर में अपनी अदरूनी बैटरी चाज कराकर लौटे हैं और गहन आत्मिक गुणा से रेडियम की सुई से चमक रहे हैं। 'भीतर शाति हो तो बाहर की अशाति विच लित नहीं करती।' उनकी नाभि से एक कमल फूटता है कमल पर उनके गुरु वठे हैं जिनके आश्रम म आस्ट्रेलियाई सकरसाड से उत्पन गायें गोरस की गगा वहाये है, सांड का भारत लान की सरकारी आना + चाचा ने अपन सरकारी बल प्रताप से चांदी के थाल पर घरखर उहे हमारे सामने दी थी। 'मेरे दो जमन ट्रेक्टर वम्बई म याड पररुवे पडे हैं 'गुरुजी ने बच्चा नी-सी निश्छल हमी से कहा था 'तुम्हारी निकम्मी सरकार बस 118/एक नीच ट्रजेडी आपत्ति पर वाति माली सोहै। हमने दोन एक्सचेंजमें पहले ही दाम चुक्ता कर दिये देवेन्दा' उन्होंने 'क चाचा को मन मार चमडे के दरले रनदरितापीयी। "हो जाना, इतना क्वार के चाचा भक्तिमी का मूद नेते हैं। हो जाता है। उडन- तरवरियों ' तुम्हें न देखते हुए भी मुझे पूरा मरीन है कि मालग्रह मे प्राणी जार वने हो। हमारे ही सरीखे। क्योंकि हम लोगा से बडा अजूबा हो हो क्या सकता है। नहीं? 'ता समये अन्दर की दुनिया क्ल्टीवेट करो।" 'क' चाचा संजीदगी से विलायती रोयमस सिगरेट का सुनहला दिलकश कश लेकर बडे भैया से कहत हैं। और बाहर की दुनिया आपलोगा के हवाले कर दें, क्यो?" मैया तल्यो से उठ जाते हैं। घर मे अचानक इतना धुआ भर गया है कि आंखें नहा खोली जाती। "आप परेशान न हा भाभी," 'क' पाचा शर्म रापानी-मानी हाती मा से कह रहे हैं, "मैं इन लोगा वो बाता को गलरा ही शायाह तो उम्र ही ऐमी है। हम भी जब इस उम्र में पे में अधीर देष सरनी हूँ कि आप जब इस उम्र मे थे तो परो रहे हागे 'प' माना। पटटीदार बाल बनाये, मां की पराद ये रवटर पर । मया लाल और क्या? पर वे चालू है, "गुरुशी सोपहते । मासी को अगी। इच्छा पूरी कर लेनी चाहिए तामि गरीरही मी गह न रोक सके। २' चाचा या प्रयणा जागmitrat जव मुना चाचा अपना वुण्डलीशास्ता नामा यही साहब लगभग गिडगिडाते हुऐ जाग पूछt In Tannt सूय का प्रवेश कब होगा, योगि अब आRIT MATLite रेम' मे प्रमोशन मा पत्ता पाटोपाले RTी मी बुखार में भी वे अपो बड़े अपगरमी धीमीमा fruit tetin परत करने अस्सी सिमापीर गोर बा #Pritam कण्डोडेट को इण्टरव्यू पी धारणी मै भनी १the Mit देते रहे हैं। पर अगर REE TREATME बतनी ही पड़ती है। पा माई गास ? Antim AIPMERIT और थी। एस ता यूं ही मंगल गीIATrniturintention । जाता है 'क' चाचा खुटिवश लेते हैं, उनका नाम इस वारजॉयट सेक्रेटरी पनल में आ गया है। जब अल्ला के किसी वदे की मजाल नहीं कि उह टम में मस भी कर सके, "वस सेटर म पहुंचन की देर है । सविसेज का ता, भाभी, अब सारा चाम चला गया। अग्रेजा का चाहे जो कहो, आदमी की परख थी उह । आखिरजभी तासक्डा बरस मुल्क पर हुकूमत कर गय।" वे धुए का छल्ला निकालते है । "कपडो का सलीका बोलने का ढग, कुछ भी ले लो, पुरान अपसर वाकई म थे अफ्मर। क्या शालीनता, क्या रोआध वर्ना अब तो क्स-कैसे देसी टाइप टुच्चे लोग चले आते है जा या तो एक जुमला अप्रेजी भी सही नहीं बोल सक्ते या बस माओ और चे का नाम लेकर अलख जगाते फिरते है। क्या अवमूल्यन हुआ है युवा पीढी का एक्दम राजनैतिक इवाल्वमेण्ट नहीं।' "और जो अपनी राजनतिक मा यताओ से जेल गये है सो" बड़े भैया दूध के क्ढाव में अम्ल की खट्टी-खट्टी-बूद से टपक पडते हैं। उनके वारे मे अपनी क्या राय है?" "सोतो नक्सली और फासिस्ट लोग हैं, जि हे तुम्हारी ही पीढी सर पर उठाये है ।" 'ब' चाचा तनिक तल्खी से रहते हैं । फिर उह अपने गुरु की चेतावनी और अपनी आत्मिक गरिमा का ख्याल नर्मा जाता है और वे कहते है कि हां, कुछ बार जरा धरापाड मे ज्यादती हो जाती है । सायूं कि जो आडर लेनेवाले छोटे अक्सर होते हैं, बडे दो गोडो के होते हैं (बाजारू मुहावरे को बाजारू दाद के लिए हमारी तरफ नजर प्रक्षेप) पर जब तक पर न पडो, शासन नहीं हो सस्ता, ये पाठ हमे अग्रेजा से भी सीखना ही होगा। व अंगडाई लेकर जिस्म तोउते हैं। अभी ये एक डेलीगेशन को लेकर लम्बे विदेशी दौरे से लौटे हैं उनके नैतिक क्तव्यभार की थकावट अभी भी उनकी रगें चटखा रही है। शालिनीजी, आपको मिक्सी ले आया हूँ इस बार, कस्टम्स को चरका देवर, चलें अब।' सब लोग उठने लगते हैं। यया हुआ? बढी जल्दी आ गयी ' तुम्हारे तोमहीने के मापिर से इम्तहान 120/एर नीच ट्रेजेडी " m शुरू हैं ना ड्राप करने का इरादा है क्या?" छोटा वात को घुमा फिरा कर रम ही वहता है। फिर उसने सूटकेस उठा लिया, मैंने बैग । 'नाही, वह तो नही । शायद इम्तहान ही पोस्टपोन हो जायें, पर पक्का नहीं।" "वाह, तुम लोगो ने हडताल नही की क्या?" छोटका धम्म-से कोने में सूटकेस पटक देता है। "क्या पत्थर भर लाती हो इनमे तुम "सब कहां गये हैं इतनी सुबह ?" में कूल्हे पर पसीना-पसीना गदे- लियो पोछती हूँ,"घर मे एक्दम सियार बोल रहे हैं । अम्मा बाबू "हॉस्पीटल ।" छोटा बभतलब मक्खीमार से दो तीन वार अनदीखती मरिखया पर करता है। 'एँ "आश्चय से मेरा मुह शायद देहातना की तरह खुल गया होगा। छाटा तुरत मुझे यह जानकारी भी दे देता है। "पर क्या गये हैं।" "बीमार लोग कहां जाते हैं, मदिर" चिडचिडाहट में उसकी किशोर आवाज पट जाती है। मैं अचानक देखती हूँ कि उसकी नाक के नीचे उग रही हल्ली रेख के तले उसका चेहरा वित्तना डरा हुआ और बच्चा है। 'माखिर है कौन बीमार?" मैं तनिक मुलायमियत से पूछती है। बच- पन मे उससे तनिक-सी ऊँची आवाज करके वोलते तो अम्मा की गोदी मे मुह छिपाकर पिल्ल-मे रो देता था। गावदीरही का। "अम्मा बीमार है, और कौन ] उही को तो शौक है चुपचाप ये सब रोग पालने का। वह एक रिसाला उठाता है, फिर युझलारर पर देता है। "चाय पीने का मन हो तो रुकना पड़ेगा। हरी बाजार गया है।" 'हुआ क्या है आखिर ?' 'पता नहीं, छाती पर शायद कोई गाठ-सी मालूम हाती पी, बायोप्सी को भर्ती हुई हैं । दो दिन हो गये। आज कल म टोके कट जायेंगे, वैसे आज घर आ जायेंगी। बाबू भैया लेने गये हैं।" छोटे ने फिर कुछ वार हवा में दिये और नार सिकोडी, "तुम नहा धो क्या नहीं लेती बरी जैसी गंधा एक नीच जेडी/ 121 रही हो" मैं उमे आग्नय नेता से देयपर पाथरूम म धुम जाती हूँ। हमेगा छांट कर नादरीय मौवा चुनेंगी अम्मा भी। हर एप काम के लिए। एक तो पढाई की, इम्तहान की अनिश्चितता से सभी यू ही सनके हुए हैं, ऊपर से छाती पर गांठ। मेरा साबुन पिसलवर पटले के नीचे जा घुसा। स्साले । तेरी ऐसी की तसी। दांत पीसकर मैंने हाथ पलाया। पटला पुराना पा और ऊपर से साफ दिखने के बावजूद नीचे से पानी में लगातार स्पा से उसको लाडी एक्दम पिलपिली हो चुकी थी। नाखूना स उसका वीचड धोते मैंने सोचा कि अभी बाहर निकलवर हल्ला मचाऊँगी । बस अपर- ऊपर की सफाई होती है इस घर मे, भीतर चाहे जो गूदड पडा रह । जहाँ आंख पडे बस वही साफ करेंगे । वाह क्या क्ला' तौलिये वे लिए हाय वढाते ही मैंने पाया कि तौलिया तो वाहर ही छूट गया था। दांत भीचकर मैंने बुलकारा-"छोट--तोलिया । 'कोई और वक्त हाता तो कई मिनट सताक्लपाकर वेहद अहसान जताता हुआ एक हाथ तौलिया पट्ट से पानी म फें जाता । पर आज तोलिया चुपचाप हस्तारित पर दिया गया। 'क्या रिएक्शन हुआ?" तौलिये से बाल रगडती, मैं छोटे से पूछती हूँ, सामने पडे अखवारा म बजट की सुर्खिया हैं। "हुँह " छोटे +धे उचकाता है। "सभी को पता है वही फिर होने लगेगा।"सिफ तमाशा ही ता है हर बार 'मान लो कि फर पडा? तब?" 'अखबार पढती हा कभी वहाँ? छोटे एक बेहद फूहडपने से बनायी चाय की प्याली रख देता है-"पढनी होती तो शायद छोडकर वेहद गुस्से से पीठ पुजाने लगता है। 'नही, सच बवाओ अगर तुम वोट दे सकते तो अब किसे देते? यानि अगर दे सकते तो?' "क्यो बतायें आपका?" कुछ देर को छोटे की आँखा म परिचित शंतानी चमकती है फिर वह भेद भरे ढग मे झुक्ता है "पता है इस बात पर सब साले मुह सिये हुए हैं। और ता और, हरी से भी पूछो तो टाल देता " वह वात आधी 122/एक नीव ट्रेजेडी "मतलव ?" "मतसव क्या? अरे वोट का मतलब ही क्या रह गया।" हम दोनो चुप हो जाते है। किसी भी चीज का साला क्या मतलब रह गया है ? अचानक मुझे लगा कि छुटिटया मे घर आना कतई बेमानी था। यानि कि अगर लौटने के लिहाज से देखो तो। 'गुड लक' मैंन अपने आपसे कहा, 'और दस दिन तुम्ह पाटन हैं यही।' बालो वा गुच्छा उँगलिया पर लपेटकर कूडेदान मे डालने को निकली ही थी कि कार रुकने की आवाज आयो, फिर दरवाजे खुलने-बद होने की, फिर छोटे का एलान-"सुधा जा गयी।' तब तक मैं भी बाहर थी। अम्मा वैसी ही लग रही थी। सिवा इसके कि विदी नही लगी थी और बाल उडे- उडे-मे थे जिनसे चेहरा कुछ थवा थका-सा लगता था, वस । "क्व आयो'" अम्मा ने धे पर हाथ रखा । "तार कर दिया होता। स्टेशन से घर कसे आयी?' "इजनड्राइवर पहचान का था,ट्रेन घर तक ले आया।" "इस लडकी की जुबान तो अम्मा की बात आधी शिकायत और आधी हंसी मे हमेशा की तरह जटक जाती है। वे मुझे बाहो से ऐसे घेरती है, जसे मुझे नही मेरे द्वारा बनाये गये स्पेस का आलिंगन कर रही हो । "तुम कब आये ?" मैं भैया ये पूछती हूँ। 'दो-तीन दिन हुए,' उडता-सा जवाब देकर वे बाजू के साथ सामान उतरवान लगते हैं। सामान से, अम्मा मे, बाबू भैया सबसे मुझे अचानक अस्पताल की गध आने लगी है । थकी-चीमार । बुझी-बुझी। एक थमस लुढकता है। "टूट गया क्या" भीतर घुसती अम्मा पूछती है, 'एक्दम नया था।" थका हुआ अभियोग-भरा मुर। "धीरे धीरे निकालो यार,"वाबू भीतर जाते-जाते कहते है । भया का चेहरा तनता है, अस्पताल की गध और तीखी हो जाती है । "पूर छब्बीस रुपये सत्तावन पसे का है। समये गावदी ?" भया छोटे एक नीच , जेडी/123 रो महते हैं। "सेल्स-टमा अलग," हादरे जोडता है।"यह भी पहले गा लिया था, थाजसो " दोना हम पाते हैं। अम्मा भीतर सेट गयी है। 'चाय पिपोगी?" मैं पूछनी हैं। "ही, जो नहीं है, पहले नहाऊँगी, पिर।" अम्मा आ व पर कार हाप रय सेती हैं। मैं उठकर याहर आ जाती है। मावारिम और पालतू । याहर छोटा मेरे धग से मेरी नापी वितायें उतट-पलट रहा है, मैं चिचियाएर उसमे मिड पहती हूँ रि यगर रिमी से पूधे उसमा सामान यगाल डालना महरी शरारत है वोई चिपहा भी प्रायवट नही इस पर में । हर चीज सार्वजनिक सम्पत्ति है । मैं गुस्से से फेड आउट वर जाती हूँ। छोटा रिता पटवकर यहा हाता है। फिर हमा में तीन बार खाली थार 'जूडो ने वरपे बाहर चला जाता है। अब वह वे वितायें कभी नही लेगा, हालांकि सायो तो मैं उसी ये लिए थी। बाहर वावू अपवार पद रहे हैं, मैं भी सिसिपाई-सी बैठ जाती हैं। "इमत्तहानो का फ्पा हिसाब है" वे नर्माई से पूछते हैं, ढीले-नाले से। मुझसे बातें करते वक्त उनका दिमाग हमेशा यही और रहता है । मैं कुछ पिटा-सा जवान देवर रिसाला उठा सेती हूँ, बाबू अपवार को सुखिया में मौट जाते हैं। 'टक्म तो कुछ पटें हैं इस बार "मैं सप्रयास जमुहाई ,क्ती हूँ। "हू देखो क्या होता है "बाबू जैसे अखबार की ही रावर पढ रह हो। तभी धाड से दरवाजा भेडता छोटा आता है। 'यार जरा तमीज से दरवाजे भिडामा करो।' बाबू तल्खी से अख- दार झटकारते हैं अखवार के कोने मे गोभी के फूल जितना फूल जूडे में लगाये एक हसीना टेलीविजन वेच रही है। हमारे शहर में अभी टेलीविजन भी नहीं चाल हुआ है। गये साल एक सत्तर मिलीमीटर के पर्दे का सिनेमा घर पर बना है जो अभी तक शहरवासिया के लिए ताजमहल का दर्जा रखता है। हाये, असे पटेंगी छुटिटयां मैं फिर जमुहाई दाबती हूँ। पहले तो हम दिन बाटन को डेरा सनीमा देख डालते थे छुटिटयो मे फिर एवं नया रोल लेबर पर मे दखिल होते। कुछ देर को देनी 24/एक नीच जेडी नयी मुद्राएँ भेजाते हुए। हम सब पैदायशी एक्टर थे ही। पर्दा खोलते, भवै उठाते, कधे उचनाते हम सब दशको की आँखें अपने पर महसूस करते रहते । बाबू को यह पस द नहीं था। उनका कहना था कि जीवन मे या तो बाप सफल होते हैं या असफल । दानी चीज कोई नहीं होती। सो बाता का गम्भीरता से लो और अब बचपना छोड दो। जितनी जल्द हो सके। पर हम जानते थे कि उनका यह गुस्सा भी हमारी मुद्राओ की तरह अन्तत एक मुद्रा ही थी। मुझे बावू पर लाड उमड आया। 'अरे भाई, पेशेण्ट कहाँ है ?" प्यार से पानी-पानी हुआ जाता मेरा दिल तलवा तक खिसक जाता है । मारे गये बेमौत, फला का बैग उठाये 'क' चाचा नमूदार होते हैं। "आओ यार।" वाबू अखवार डाल देते है, मेरे भीतर खतरे का घडियाल 'टनटनाते लगता है भाइयो को चेताना होगा आज इतवार है न, अभी बाकी लोग भी आ धमकेंगे, गये काम से। "कहाँ है भाभी' चाचा सुर धीमा करते हैं। * सो रही है शायद।" 'सो नही रही है, नहा रही है।" छोटे की किरमिची किशोर आवाज आयी। 'अरे छोटे भाई, जरा इधर तो आना।" 'क' चाचा अथपूर्ण ढग से बाबू को जाँख का इशारा देते है, "हम भी तो मिलें अपने एग्री यग मैन से, सुना आजक्त बहुत माक्सवादी हो रहे हैं कुछ लोग।" "छोटे ।' बाबू पी रौबीली हाँक से मेरे भीतर कुछ खिंचकर दूर तक घिसटता विमुख होता चला जाता है। नपथ्य में कोई हलचल नहीं। 'क्या उम्र है यार हम तो अपने घर मे बैगाने हो गये। कल के छोकरे हैं और हमसे ऐसे पेश आयेंगे जैसे कि हमारे चवा हो । एक हमारे बडे साहबजाद है, जिह जमान-भर के बुजुग दुश्मन लगते है, कभी हम-तुम भी नौजवान थे यार पर ऐसी भी क्या वावू की मुद्रा अव प्रताडित पिता की है। सिफ उनके बदन पर साटन का रेसिंग गाउन और मुह मे सिगरेट भर नहीं है, वर्ना एक्दम हिदी फिल्मो के बाप लगते, अभिनय क्षमता की एमेच्योर स्तर पर भी कमी नहीं, मानना पडेगा। क्या चुटीले सवाद, एक नीच ट्रेडी/125 क्या भगिमाएँ, वाह मैं पैर घसीटती हुई भीतर चल दी। शुरू हा गया या फिर मे वही सब । मुझे लगा कि शायद मुझे रो पडना चाहिए। पर मैंन यूव जार से ट्राजिस्टर पर विविधभारतीनी मुई लगा दी। यह जानते हुए कि सुबह । मैंने आहिस्ता से बगल मे अलसाते पर को उठाया, परवा, पन-से फॅका, गाच लिया, अब वह मेरी गदेलियो पर चित पडा था। शाल और चपटा होकर । दुबारा उछाले जाने की आशा और आशका के दरम्यान । मैंन उसे वापस धर दिया और सर तक चादर बीच ली। भी बहुत जल्दी थी, और उठ कर मरना भी क्या था? हमारे शहर म देर तर सोनवालों की नितात कमी है। हो भी क्यो नही ? शाम सात बजे सडरो पर साता पड जाता है, और रात दस बजे तक तो ऐसी यज्जर चुप्पी छा जाती है कि उस दम शहर को मूस भी उठाकर ले जाय ता पता नहीं चले। पर यह नहीं कि यह सिफ रात के लक्षण हैं। चरम जागृति रे दुपहरी क्षणा मे भी हमारे यहां हर चीज समुद्र-तले वी वनस्पतियों की तरह एक एसी अलस तद्रिलता से लहराती हुई वढती है जो विही लागा की नजरा मे काव्या- त्मक हो तो हो, पर अगर आपकी अठारह साल की उम्र कुम्मत घाडे की तरह आपके जिस्म के भीतर छूट भागने को जमीन खूदे जा रही हो तो पागल बना देने की हद तक खिझा जाती है । अपन का बहुत उदार समझो- वाले हमारे मां-बाप जैसे लोग कहेंगे कि जाओ जरा घूम घाम आआ। पर सवाल उठता है कि वहाँ कहाँ ? कहा इस शहर के समृद्ध नौजवा।। की शौकीनी का चरम लक्ष्य यह कि साफ्टी आइसक्रीम खाने सिविल वाजार चल दिये और वहा उस जग्रेजी नाम वाले रेस्तरा की अंधेरी मन हूसियत मे जा धंसे जहा हमेशा कच्चे प्याज और भुनी सौफ की अफरा देने वाली गध वसी रहती है, और शोरबे के दागी से भरा बूढा वटर आडर देते ही मोनू आपके हाया से झपट ले जाता है। या कि फिर वही सडक किनारे नितात मनहूस किस्म की चुहलबाजिया म मुतिला होखरामा परामा दूकाना के विस्तार के आगे टहलते रहो-चप्पलें, प्लास्टिक के 126/एक नीच ट्रेजेडी 7 । ? चमकीले और गैरजरूरी उपकरण, भडकीली साडियां, रजाई की फद से ढंका खादी आश्रम, और अत मे केमिस्ट की लटटुओ में जलती-बुझती दूकान धत्त दिन एक विराट जमुहाई की तरह जबडा परडे सामने खडा था, और हम आँखें चुरा रहे थे। आंगन मे अभी धूप अच्छी लग रही थी। वाद को शायद तेज हो जाती । अम्मा पूछती हैं कि हम सबने ठीक से नाश्ता क्यिा कि नही और आश्वस्त होकर मेरी लायी किताब फिर पढने लगती है । उह इस उमर मे भावविह्वल होकर अग्रेजी रूमान पढते देखकर राजा ययाति की तरह हमेशा मेरे बाल सफेद हो जाते है, "अच्छी किताब है, वे मुस्कराकर मेरी परख की दाद देती हैं। हाय री विडम्बना मानव-जीवन की अबूझ प्रहेलिका, हाय | फिर हमेशा की तरह वे अपना यक्ष प्रश्न दुहराती हैं कि हिदी मे ऐसा रूमान क्यो नहीं लिखता कोई ? यह नहीं कि हमारे यहाँ साम ती परम्परा नही, या रोमास का जभाव हा-हैं? मैं फट पडती हूँ। कुछ इस तरह की बात कह कर कि-'न कही आयेंगे न जायेंगे, न अपनी उम्र के लोगा मे उठेंगे-बैठेंगे तो दिन भर बडो से जुवान लडाने के अलावा मूझेगा भी क्या, ठीक है, हम लोग कितने दिन के है, मा-बाप होने का दण्ड तो भुगतना ही है, --अम्मा लेट जाती है, कमरे म चिलक्ता दिन भर गया है, भैया और छोटा एक एक कर जादुई बोनो की तरह अलोप हो जाते हैं, बाकी बची म-हमेशा की तरह । टरटर बाहर फोन बजा। मैने उठाया, बुआ का था, वे अम्मा को पूछ रही थी, "अम्मा लेटी है, मैंन वहा । "क्या तबियत ठीक नही?" वे पूछनी हैं । "हो', मैं कहती हूँ। "अरे क्या हुआ?' वे पूछनी हैं। 'कुछ खास नहीं, छाती पर एक 'ग्राथ' थी, उसे निकाला गया है वायोप्मी से।" 'कुछरिपोट आयी?" उनका सुर चिता जिज्ञासा, कुतूहल, उत्तेजना से सेंट के योवडे की तरह बलबला रहा था। 'नही, अभी मालूम नहीं क्ल-परसा तक रिपाट आयेगी।" मैं कहती हूँ। देखो एक शहर में रहते हैं पता ही नहीं चलता-- वो ता मैं ही कभी फोन कर लेती हूँ तब कुशल मिलती है, तुम्हारे यहाँ से तो एव नीच ट्रेजेडी / 127 7॥ " कोइ फोन परता नही । यही पता नही था कि तुम लोग आपे हो।"चुप्पो। "अच्छा आना फिर । आशीप, निशा तुम लोगा को याद करते रहते हैं।" "अच्छा "मैं भली भतीजी के सुर मे कहती हूँ और फोन रख देती हूँ। बुआ के घर से हमारे घर तक एक चिलवता-सभ्रात-सशक विस्तार है जिसम असख्य उपालम्भ, वतकहिया, सामाजिक बुलावे और खानदानी विस्से पटी पतगा की तरह लटके पडफडाते रहते है। हमारे परिवार के बीच प्रेम और सशर हिकारत या जायज अनुपात क्या है हमारी समझ में अभी तक आया नही, पर हां सामाजिक अवसरा पर जात्मीय मेलजोल की औपचारिक्ता जरूर कायम है। "क्सिका पोन था जम्मा आकर बाहर बैठ गयी थी। "बुआ का।" "नाराज थी क्या "पता नही, हो भी तो तुम्हे क्या मतलब? "अरे तुम नही जानती, जरा-जरा सी बाता से ही तो-'" अम्मा की आवाज मे औरताना बतकही का भरपूर गन्देदार फैलाव था। उहाने गूढ अध्यात्म से यह बात जोडने को एक सुरसुरी सास भी खीची, पर तब तक मैं उछलकर उहे फलाग गयी थी। "अरे छोडो, जिस तिस को लेकर क्या परेशान होती हो। अपनी तबियत पराब करोगी और।" मैंन विताब उठा ली। "इम्तहान कब तक शुरू होंगे।" "पता नहीं। 'कुछ तो खपर होगी ही।" "मुझे नहीं मालूम बावा । पर्चे तो जितने खराव होने हैं हांगे हो।" अम्मा हंसने लगी- आज तक कभी तेरे पर्चे विगडे भी हैं, जो अब पराब हांगे । "कोई गारटी है क्या?' मेरे भीतर फिर भददे दांतदार बनले जानवर भंडराने लगे थ, "या तुम्हारे मुना चाचा के ग्रह-नक्षत्र इस तरफ भी रक्षा कर देंगे" अम्मा इस वक्त झडप के मूड मे नही थी, सो टाल गयो । “तुम न 128/एक नोच ट्रेजेडी . मानो पर मुना कहते हैं कि बुद्धिबल तो हमेशा ही-" "मान लो सिफ मुना चाचा की भविष्यवाणी उल्टी साबित करने में फेल हो जाऊँ तो वोलो, इसे रोक सक्ती हो?" अम्मा क्तई झगडे के मूड मे नही हो तो नारदमुनि भी उहे नहीं लडवा सक्ते। वे फिर हंसने लगी। "क्यो बेकार सुबह से लड़ने का मौका ढूढ रही है, कही हो आ न । इतनी पुरानी सहेलियाँ है, कोई भी छोड आयेगा।" "बोर है सुसरी सबकी सब " मैंन गुलेल की तरह अपने को खीचा और लद्द-से तखत पर गिर पड़ी। "मैं बताऊँ अम्मा, तुम मेरी शादी कर दो।" मैं बेहद सजीदगी से टागें नचाने लगी। 'हमारी मांगें कुल चार है । एक-खूब अच्छे स्वभाव का हो, कभी भी गुस्सा न करे। दो-इकलौता लडका हो ताकि नद-फद का दद्व न हो। तीन-शक्ल सूरत, से ठीक ठाक हो। और चार-दिमाग का भुम।' भैया प्रक्ट हुए-"इतना पढ़ लिख कर भी मांगोगी वही औरतो की पत्रिकाओवाला चौडा चकला बनमानुस । आह " मैंने लात चलायी, जो नही लगी। बहुत दिन के बाद हम सब हँस रहे थे। मैंने भीतर दूसरी जोकरी मुद्रा खुश होकर तलाशी, पर खुशी स्थायी हो क्स सक्ती थी इस घर मे तभी टर | घण्टी बजी। लो । मौसियां आ पहुंची थी। बच्चो, चाभियो, टोकरिया और सहानुभूति से लदी फंदी। हमने अपने आप को तुरत तहा लिया और इधर-उधर होने की सोचने "आज जरा घर मे रोनक्-सी दीख रही है।" मालिनी मौसी बैठ गयी। शालिनी मौसी अपने पिनक्ते बिगडल बेटे को अग्रेजी मे डांटने लगी। "सुधा, जरा बाहर स्कूटरवाले को पैसा तो दे आ।" मालिनी मौसी ने पस खोला। "क्यो कार क्या हुई? अम्मा शालिनी मौमी की बेटी को सहला रही थी। अरे कार की क्या पूछती हो? पुरानी गाडी है हर छठे दिन गैरिज मे---और फिर कभी दो सौ से कम बिल नही आता । हम तो सच मारे गये एक नीच ट्रेजेडी| 129 । इस महंगाई मे।" छोटे और भैया समझदारी से पहले ही स्कूटर को पसा देने फूट लिये थे। मैं फंसी हुई इधर-उधरताक्ने लगी। "शालिनी, तेरी आया ने क्या कुछते विया फिर, रहेगी कि जायेगी" अम्मा के पूछने की देरी थी कि शालिनी मौसी वा थमा फौवारा फूट निकला। इस वक्त उह देखकर कोई नहीं कह सकता था कि कभी अपने जमाने मे वे भी एक जहीन दिमाग रखती रही हागी और सुबह तीन बजे का अलाम रखकर ई एम फोस्टर पर नोटस वनाती अव तो मालिनी मौसी के कडवे वैराग्य, मुना चाचा के नक्षत्रो और 'क' चाचा के मजाका ने उसे इस कदर डरपोक और पिलपिला बना दिया था कि वे अभियोगा और आसुओ से लस्त एक चपटा आकार-भर बनकर रह गयी थी। भैया का कहना था कि उनके चोट भी लगती हो तो उसमे से खून के बजाय आँसू निकलते होंगे । च्च च्च च्च | इस वक्त भी प्रसग की प्रासगिकता की रक्षा करती हुई मा और मालिनी मौसी उनके चारा ओर डने फैलाये मुर्गिया-सी, सात्वना देती अग्रेजी में कुडकुडाने लगी- 'बेचारी, वडी परेशानी है इसकी भी-" "वही तो, छोटे छोटे बच्चे और मदद के नाम पर कोई नहीं।' 'क्से लाड से पली थी बिचारी। "सच मे सोसायटी तो बदल रही है वैस्ट की तरह पर वहा की कोई भी सुविधा यहाँ घर की औरत को नही।" और परेशानिया वही, ऊपर से महँगाई।" मैं क्तिावें समेट कर उठने की फिराक म थी कि शालिनी मौसी ने, जो अब तक जपने दैनदिन स्यापे से फारिग तथा पारिवारिक सवेदना से तप्त हो चुकी थी, रोक लिया- कहा चल दी-कठो न । "पढना है।" "अरे रोज रोज का ऐसा भी क्या पढना? हम लाग कोई रोज रोज थोडे ही आते हैं। "धठो भी, हरदम पढ़ लिखकर ही क्या करना है? 'और क्या?' शालिनी मौसी की खतरनाक ढग से डबडबाई आखें मुदूर क्षितिज पर टॅग जाती हैं । तीन साल पहले उहाने दबी इच्छा व्यक्त . 130/एक नीच ट्रजेडी । की थी कि वे सोचती है, प्रायवेटली पढाई पूरी कर दें, पर मुना चाचा की भृगुसहिता मे उन पर शनि की महादशा का अतिम चरण चल रहा था, उसमे नये काम म हाथ डालना ठीक नहीं होता। फिर पति की मुविधा, फिर बडे बच्चे के लिए भरोसेदार आया ढूढने का सवाल | 'क' चाचा की राय ली गयी तो उहनि गुरु-गम्भीर सुर में बहा कि हर औरत का पहला नैतिक पतव्य पति-बच्चा और सास-सुसर की सेवा हो जाता है, इसम चूक नहीं होनी चाहिये। वाह, क्या समझ है | अम्मा गद्गद हो गयी थी । शादी नहीं की तो क्या ? व्यावहारिक्ता की क्सी पूरी समय है चाचा को, छाडो यह सब कुछ। बहुत है भगवान का दिया, तुम्ह जरूरत भी क्या? फिर तभी शालिनी मौसी के पेट म दूसरा बच्चा आ बैठा और बात इधर उधर हो गयी। मैं फिर उठती हूँ। "बैठो न!" मालिनी मौसी का सदाशय प्रेम मुझे चटखा जाता है। "दुवली हो रही हो इस बार" वे हर बार की तरह कहती है। पढाई बहुत कर रही हो क्या ?" नहीं, ऐसा तो नही, कुछ इस तरह की बात मैं कहती हूँ, पर मालिनी मौसी की रचि अब मुझ मे नही है । "सच जोजो, मैं तो अपने इस बढते वजन से तग आ गयी-" वे अम्मा से कह रही हैं। अम्मा हमेशा की तरह प्रतिवाद करती हैं कि ऐसा कहा ? तब तक शालिनी मौसी को भी अपन वढते वजन का खयाल आ गया है। फिर वे अग्रेजी की क्सिी गहोपयोगी पत्रिका म छपे वजन घटान के नुस्खा की चर्चा करन लगती है । मैं सप्रयास जमुहाई रोक्ती हूँ, 'अब किस क्लास मे है पिण्टू ?" शालिनी मौसी दाना हाथा से भकाभक दालमोठ मुह मठूमते अपने पुत्र पर एक करण दप्टिपात करती हैं-"थड मे है।" 'क्या-क्या पढत हो पिण्टू' -मुह से वात निकलते ही मुये अपने प्रश्न की सदाशय निरथक्ता चुभती है। यही प्रश्न घर के हर बडे ने घर के हर बच्चे से कभी न कभी पूछा होगा, और शायद ही कोई बच्चा इसका जवाब देना चाहता होगा। 'जीजी को बताआ न, वह उत्तर का इतजार कर रही ह–' शालिनी मौसी अग्रेजी मे कहती है। अपने बच्चो स हमेशा जहा नर याद एक नीच ट्रेजेडी/ 131 -- रह वे अंग्रेजी मे ही बोलती हैं। पिष्टू चुपचाप खाता रहा। मैं होती ता मैं भी यही करती। शाबाश बच्चे । तुम्हारे लक्ष्य ठीक-ठाक हैं अभी तक "स्कुल अच्छा है?" मैं प्रश्न मा की ओर मोडती हूँ। मेर उत्तर पाने से पहले एक मन की आवाज के साय दालमाठ की पोट फश पर गिर पर टुरडे-टुकडे हो जाती है। पिष्टू भय मे जड यहा है। विद्य त गति स उसकी मां दो तमाचे देती है। "यू स्टूपिड ऐस!" "स्टूपिड योरसल्फ" पिष्ट्र रोते रोते चिल्लाता है। शालिनी मौसी भी चीख चीखते रो पडती है फिर अम्मा और मालिनी मौसी कुछ नहीं हुमा बच्चा ही तो है, से माता को और-अभी इत्ती-बडी प्लेट दालमोठ देंगे, से पुत्र को एक साथ चुपाने का निप्पल प्रयास बरने लगती हैं-नेपथ्य से छोटा भवें उचकाकर मूक इगित स पूछता है कि अब क्या हो गया? वसे यह नयी बात नहीं न ही सचमुच इससे विसी या कुछ होता-हवाता है। यह छोटे छोटे वाकये भी इस शहर की ठस जिदगी न पलवतायें तो य उक्ताई मां पागल न हो उठे ? हरी दालमोठ की दूसरी प्लेट और कुछ मीठा रखकर विचे बटोर ले गया है एव अतिम आग्नेय दष्टि अपने बच्चा पर डालकर शालिनी मोमी फिर मामाय हो चली हैं। बात महंगाई पर उतर आयी है। पूरा नहीं पडता, ऊपर से रिश्तेदारा की आवत जावत और अग्रेजी स्कूलवाला की मांगें जाज फलां सेष्ट का उत्सव है ता आज पोप का जम दिन है--- और हिंदी स्कूल ऐसे हैं कि दो वाक्य अग्रेजी के सही नहीं बोल सकता उनका प्रिंसिपल भी । बच्चो का भविष्य तबाह करना हो तो वहां भेजा। काश हम इनको बाहर कही हास्टल भेज सक्त उनके वक्तव्य का कथित सुर अम्मारा कलेजा हिला जाता है-फिर वे नर्माई से समयाने लगती है पि ईश्वर का है उस पर भरोसा रखना चाहिये, यह जीवन जो है एक आल्मारी है, देर मवेर इसके सभी याने भर ही जायेंगे। वस धीरज रखो। बाकी तो सब माया जाल है~~मन का विवेक और आत्मा को शुद्धि-~-मैंने कान बद कर लिये हैं और झटके से उठ पडी हाती हूँ- पढना है। मैं भुनभुनाती हूँ। भया और छोटे गायव हैं । दगाबाज कही के । हुँह । जीवन एक माल्यारी है | आज का विचार-बाट फार द है। 132/एल नीच ट्रेजेडी । " "क" चाचा भी दीवानखाने में आ गये थे शायद । हम पारिवारिक आबाजा को पडफ्डाते अखबार के नीचे दवाते हैं, पर कान हम तीनो के उधर ही लगे हैं । अखबार मे बेतहाशा खबरें छपी हैं—अल्पसख्यका के अधिकार, जनता का हाहाकार, महिलाआ का चीत्कार, सघष की पुकार - सामुदायिक पिच पूजोनिवेश। बजट-बजट-बजट । वहा वे लोग भी शायद इसी के चर्चे कर रहे हैं । अम्मा कहती है कि मुना चाचा अगले दो साल तक देश के नक्षमी की स्थिति में कोई परिवतन नही देखते । नहीं देखते वि नहीं चाहते हैं? बोलो । पर, अम्मा यात बढाती हैं, विकल्प ही क्या है देश के पास फिर वे कुछ रुपकर अपन गुरु गम्भीर स्वर म चार हजार पांच सौ छप्पनवी बार अपने जीवन-दशन का रुपहला शानमुक्ता दिखाती हैं, "तोडना तो बहुत आसान है, पर मैं पूछती हूँ कि जो हमारी यगरपीढी ताडे जा रही है, तोडे जा रही है, उसे 'रिप्लेस' किससे करेगी? यानी एक हमारी सस्कृति है, एक मर्यादा है, एर "अब यह पीढियो वा टकराव तो एक चक्र-सा है" एकथकी आवाज कहती है, "चल गया चल गया-कना तो मुश्किल है इसका । सवाल है कि क्या कुछतरक्की हुई है ? देखकर तो"-"नही नहीं, ऐसा नहीं।" सरकार के वफादार तावेदार गम्भीर स्वर देश के स्वणिम सामुदायिक आंकडे दे रहे हैं-"जो हडताले स्थगित हुइ, जो उत्पादन बढा, जो जनसख्या मे घटती हुई, जो हिंसा और गुलगपाडे मे कमी हुई उसकी क दीलें देश के अंधेरे मे कसे जगमगा रही हैं। बताओ। अगर ऐसे लोग न होते तो कभी तुम लोगो को इतना मालूम हो सकता या क्या ? कि सरकार बहादुर अपनी प्यारी अवाम के लिए--" 'अब ऐसा है भाभी"-जभी क'चाचा की नक्की आवाज उभरती है, कि अपो-अपने दृष्टिकोण की बात है। मेज पर एक अघभरा गिलास हो तो आप यह भी कह सक्ते है कि यह तो आधा भरा है या यह तो आधश खाली है पर अव आजक्ल आपका-सा सरल और गास्थावान अपने देश मे बिरला ही होगा जो कहे कि गिलास तो आधा भरा है। ज्यादातर तो यही कहेंगे कि यह तो खाली है। क्यों सा ब, क्या में कुछ गलत कह रहा है" एक चिपचिपा और गाढा अनुमोदन शहद की धार की तरह कमरे एक नीच ट्रेजेडी / 133 गया। कभी 1 मैं फैसता है। 'व' चाचा कुछ एकपर फिर मोलने लगे हैं-"हमारे गुरूजी का कहना है कि जीवन एक मुट्ठी है।" समा-दिन आये हैं , जीवन न हुआ जीद्गुर कामाल हो। उसय माल्मारी बन जाता है तो अभी मुझेठी। 'जितना इसे क्सकर वद रखोगे उतना ही भीतर से पाली रहेगा, जितना फैलाआग उतना ही भरेगा क्यो भाभी?" फिर बात उनके गुरु के गहन इन्द्रियातीत ज्ञान और रहस्यवाद की ओर मुड जाती है। "क्सिी ऐसे-वैसे नही, रायल पानदान के हैं गुरुजी । पर साब, मानते हैं अपन ईस्टन रहस्यवाद का लोहा हम भी । पश्चिम मे रखा ही क्या है ? वस अनाप शनाप भौतिक्ता-" 'वही ता में भी कहती हूँ रुपये पैसे से क्या होता है । असली चीज तो आत्मा की शाति है। अब महगाई के चर्चे लुप्त हो गये हैं गहन अध्यात्म एक अगरबत्ती की तरह हर सडाघ को ढकता महक रहा है। काई कहता है कि अग्रेज तो अब पिटी हुई कौम है साहब । उनके दिन तो गये । काई तुरत पो देता है कि अमरीका भी अब रोमन साम्राज्य की तरह पतन के कगार पर है-उन पर अपने कर्मों का वन्न शीघ्र ही गिरेगा | इटली भी ता जमनी भी तो । जापात भी ता 'साव, भौतिकता की तो हार होनी ही है । अत मे रह जायेगा सिफ प्रेम और विश्वब धुत्व ।' 'क चाचा कुछ चुभलाने के लिए रुकते हैं- 'पिछले दिनो जव मैं फास मे था, एक बूढी मुझसे सूत्र मे कहने लगी कि उसकी दिली तमना है कि वह अगलाजमयदि ले तो भारत में दुनिया की समस्याआ का हल अगर अतत कही से निकलेगा तो इसी तीसरी बाबू की नपी-तुली आवाज नग्रेजी में रहती है-'विकास शील देश ही दुनिया की आर्थिक व्यवस्था संभालेंगे और नयी मूल्यव्यवस्था देंगे। यह याद रखना इतनी भारी-भरकम उदघोषणा के बाद कुछ देर कमरे मे सनाटा रहता है-फिर हरी कुछ गम ले आता है और बातचीत नये जोश से फूट निकलती है "अग्रेजी तो आप हटा ही नहीं सकते," मालिनी मौसी अपना प्रिय मुद्दा दाहराती हैं ' आज जब बाहरी शिक्षा से जुड़ने की एकमात्र कडी 134/एक नीच ,जेडी दुनिया से ।

। अप्रेजी है तो आप उससे विमुख हो जायें, ये कहां का याय है?" "राज- नैतिक प्रीपेगण्डा है जी मव" उनके पति तल्खी से दोहराते हैं, "इन सब हिदी-प्रेमियों के बच्चे किन स्कूलो म पढते है जरा यह तो पूछकर देखो।" "और, तहजीव तो विल्कुल इन हिदी स्कूला म नही," शालिनी मौसी अप्रेजी मे कहती है। उनका बेटा अभी दो प्लेट पकोडे, अनेकानेक टुकडे मिठाई वे व चार थप्पड खाकर सोया है। फाडस बडे भैया तरखी से अखबार पटक देते है । हरी आकर कहता है कि माजी हम तीनो को चाय पीने को वही बुला रही हैं। "कह दो हम यही पियेंगे।" बडे भया मेरी बाह पक्ड लेते हैं, "ठहरो, तुम नही जा सकती।" "ठहरो, यह शादी नही हो सकती।" छाटे गम्भीर चेहरा बनाये दुहराता है। हमारी हसी छूट जाती है। हरी शायद भरी सभा मे हमारे निमत्रण को अस्वीकार करने की बात बह रहा है-अचानक वहा स नाटा छा जाता है । हम तीनो बर्र की तरह डक चेताये तैयार है । कुछ देर फिल्म के 'स्टिल' की तरह सब आधा- अधूरा टंगा रहता है, फिर प्यालियो की खनखनाहट के साथ बातचीत चल निकलती है-- "पशन है फ्शन" कोई कह रहा है। "बस भेड चाल है जी कोई आदशवाद वगरा नहीं रह गया, सब पश्चिमी पढाई , एक हमारा भी जमाना था, अंग्रेजी हमने भी पढी थी, पर यह था कि अपनी सस्कृति कपिटलिज्म सिनिसिज्म मर्यादा । ऊँच नीच की समझ अनुभव " ज्ञान 'क' चाचा अपना आचायत्व भरा गला खखारते है । कमरा विराट उद्घोषणा के इतजार मे चाय-पकौडे तिलकुट और मठरियां चुभलाता है --"दरअसल बात मे है " 'क चाचा कहते है, "कि आजकल की युवा पीढी के ढोल मे एक बहुत बडी पोल है (सामूहिक हाम्य) वह यह कि उनका कोई दशन नहीं, अगर कोई है तो यही कि हर कोई अपनी फिकर परे। मां-बाप भाई-बहन जायें कही भी, उहे क्या? देश, धम, सस्कृति इनके लिए कुछ नहीं क्या भाई साव, कुछ गलत कहा मैने ?" अवशमा मालिनी एक नीच ट्रेजेडी/135

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फोन बजता है--दिदि चूपी-दिदि वायू पोर उदारी है। चायू पोरामा वायू पहो । ति अगामी रपट मा गमी है और राय ठीय है। सर यो गीगाँट गंगहीं मिला । पारपर इत्मीनान से थया हुआ है। Meerमा हरासी हुई पहो लगती हैं उह तो पहले ही पपीfrrafaeगा ही, क्यापि मुना न तो उनकी कुण्डली देख- Trrही महापानि अभी बडी शत्यप्रिया का योग नहीं है। "अरे हरी, जरा चाय और लाना !" "' चाचा बुलवारते हैं, "जरा स्पेशल लाना इस बार, समझे" कमरा लागा की चहचहाहटो से फिर भर । भैया लपककर युर्सी से छूट निकलते है और प्रस-ली की र छोटे को गदन पर 'कराटे' का हवाई वार करते हैं। 'टा उछलकर हवाई कलागाजी खाता है और उनका वार र चलाता है। झड लेती हूँ। क साथ धराशायी हो ऐसे तिलमिलाने यी हो। ००० मोसी के पति के सामन है, प, जसा नि उनी सादरा है, तुरत पानी के बंगन बन जाते हैं । सुदरने या तत्पर,-'अजी एपम माप टर की बात है। हम तो मालिनीजी से पह ही रहे पे हाल मही, कि बेहतर होरि अब हम लोग ये बुडापे भी नाटीयाले अरमान भूल जायें। इन बच्चों या माया-मोह ही तो सारे षष्टमी जर है। आग हमे ५ फ्लपा रहे हैं, मन जय हमें जरूरत होगी तो य उडनछु । यार, तुम्ही निरले समझदार गि शादीम्याह-बच्चों का जजाल नहीं पाला । यया बहत हैं उसे वि क्या नाम, जोरून जाता, अल्ला मियो से नाता।" प्यालिया फिर पनवने लगती हैं । मन । घुछ गिरला है। छोटे न युध गिराया शायद । अचानक मुझे लगता है वि हमी निरे गावदी पे, अरे पतई मूय थे हम, जो इतने असे से अपने निरीह मां-बाप कोही कोसते रह गये। असली दुश्मन तो हमारा आज नराव उतारपर सामने आया है। यह भेदिया-गेस्टापो 'क', जो खुद को पारिवारिस जिम्मेदारियों से बचाने को शतुर्मूग की तरह अपनी पुर्राट गदन गुर चरणों मे रोप देता है, और अपने गुप्त अरमानों का भद्दा जेबी सस्सरण लिये तार मे छिपा रहता है कि ज्यू ही अंधियारे गलियारों में से कोई पवराया हुआ मां-बाप का जोडा नमूदार हो, उसे उनकी छाती पर तानवर पूछे-कि क्या तुम सच मे अपने बच्चो के प्यार मे यकीन करते हो? विश्वासघाती नोच, परमात्मा का कुत्ता, जव कि देश के सत्तर प्रतिशन रिसान भूमे पेट गुजारा कर रहे हा, यह अपने पाखण्डी गुरु को सरकारी अनुदान से उत्तम नस्ल वे आस्ट्रेलियाई सांड और जमन ट्रेक्टर दिलवाता है । इसी के हाथो म उन तमाम खिसियाई बिल्लियो वा शिखर नेतत्व है जो वेद्रीय सरकार की औद्योगिक विकास जैसी गूढ परिवतनो की रूपरेखा बनाती या आपात्काल मे बीमार इकाइया के लिए नियत्रण अधिकारी नियुक्त कराती हैं । इसी के ट्रक और न रुको वाले बुलडोरगरीबो की झुग्गियां झोपडे ढहापर, फिर मोतिया की माला और धूप का चश्मा लगाये अपनी समाजसेवी कृपानिधान बीविया को सरकारी सेद चुहचुहाता अगरेजी मरहम पोतने वहां भेजती हैं। यही है हमारा थोया अध्यापक, हमारा काइयां अफसर, हमारा ढागी राजनेता और हमारा घूसखोर दाबू 136/ एक नीच द जेडी फोन बजता है-दिदि चुप्पी-~-ट्रिदि। बाबू फोन उठाते हैं। बाबू फोन रखते हैं। बाबू कहते हैं कि अम्मा की रपट आ गयी है और सब ठीक है । कसर का कोई निशान उनकी गांठ में नहीं मिला । उनका स्वर इत्मीनान से थका हुआ है । चुप्पी ! फिर अम्मा हँसती हुई कहने लगती हैं उह तो पहले ही मकीन था कि कुछ निकलेगा नहीं, क्योकि मुना ने तो उनकी कुण्डली देख- कर पहले ही कहा था कि अभी बडी शल्यक्रिया का योग नहीं है। "अरे हरी, जरा चाय और लाना " 'क' चाचा बुलकारते हैं "जरा पेशल लाना इस बार, समझे ।' कमरा लोगा की चहचहाहटों से फिर भर गया है। "है इक"। भैया लपककर कुर्सी से छूट निकलते है और असली की पूखार मुद्रा बनाकर छोटे की गदन पर 'कराटें' का हवाई वार करते हैं। "हउप " छोटा उछलकर बाईकलाबाजीखाता है और उनका वार बचाते हुए एक दुलत्ती मुझ पर चलाता है। "हो" मैं उसे पीछे से जकड लेती हूँ। और अब हम तीनो उछलकरएक साथ धराशायी हो ऐसे तिलमिलाने लगते हैं, जसे हम गहरी मरणातक चाटें आयी हो। ०००

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मृणाल पाण्डे
1946, मध्य प्रदेदा मे।
शिक्षा
1966 में प्रयाग विश्वविद्यालय से अग्रेजी
में एम ए।
मध्यप्रदेश के विभिन्न कालेजो और फिर अमेरिका
और यूरोप म पढाने के बाद आजकल नयी दिल्ली
के जीसस एण्ड मेरी मालज.म अग्रेजी की
प्राध्यापिका हैं।
अपनी रचनाओ के बारे में उनका कहना है--
अपनी ओर से बहुत ईमानदारी और मेहनत से
बनाती हूँ जिसमे मेरे दिमाग का ब्लड ग्रुप, मेरी
अस्थि काशिकाएं मेरी मज्जा है जरूर, पर इसके
बाद रचना रचना है और मैं मै हूँ।

Ek Neech Tragedi

Author
Mrinal Panday
Title
Ek Neech Tragedi
File name
Ek Neech Tragedi
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2011/03
Publisher
Rajkamal Prakashan Private Limitad New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551537
Barcode
4990010032267.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
LxRBVcSvM6t
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Ek Neech Tragedi