Adarsh Library, Jaipur
Jalta Howa Golab
Front matter
No text on this page.
जलता हुआ गुलाव
[पंजाव की ज्वलंत समस्या पर
आधारित महत्वपूर्ण उपन्यास]
No text on this page.
जलता हुआ गुलाब तरसेम गुजराल
No text on this page.
पहलो प्रति
कविता गुजराल, अनिरुद्र और
शिल्पा के लिए
आभार
.
.
माता-(स्व.)भापाजी का और बहनों का ।
गुरवचन, अवतार जोड़ा, मोहन सपरा, सिमर सदोप, राजेन्द्र चुघ,
रमेश बत्तरा, सुरेन्द्र मनन, प्रचण्ड, नरेन्द्र निर्मोही, कमलेश भारतीय,
सुरेन्द्र मंथन, कीर्ति केसर, जे० बी० सिंह घई, पाली और रमेन्द्र जाखूका, ,
.. जिनसे चलती बहसें बहुत बल देती हैं।
विजय धवन (कुवैत), अक्षय शर्मा, नन्द किशोर वैद और सन्त प्रकाश .
सिंह का, जो मेरी धड़कनों में हैं ।
वाणी प्रकाशन परिवार का, जिसमें लेखकों के लिए सहयोग की भावना
है
कुछ इस उपन्यास के वार में
.
इस उपन्यास का एक ही पात्र है, पजाब ।
इन उपन्यास की एक ही प्रेरणा है, पजाय ।
इस उपन्यास की एक ही चिन्ता है, पजार ।
इस उपन्यास का एक ही उद्देश्य है, पजाव ।
-तरसेम गुलजार
No text on this page.
जनवरी के अन्तिम दिन थे। कालिज के सायकिल स्टैण्ड पर वृक्षों के टूटे पत्ते बहुत बड़ी तादात में जमा थे। अविनाश हरदीप का इन्तजार कर रहा था। उसे ख्याल आया कि आज उसका एक सहकर्मी वह रहा था-"प्यार एक अजीब किस्म की बीमारी है । इसके कीडे ट्यूबरक्युलोसिस की तरह सांसों में बिखर जाते हैं इसका इलाज डब्ल्यू ० एच० ओ० के पास भी नहीं। सिर्फ यही हो सकता है कि आप आपो पर पट्टी बांधकर हैलीकाप्टर से घने जंगल में उतार दिये जायें।-सिर्फ भटकते रहे और इतने में जिन्दगी की शाम हो जाये।" बड़ा फिलासफर हो गया है यार ।" ..फिलासफर नहीं, बीमार-" "नोट खाये लगते हो भाई।" और वह खिलखिलाकर हंस दिया । अविनाश ने हरदीप को हिन्दी साहित्य समझने में सहायता देना शुरू किया था। हरदीप एम० ए० के एग्जाम दे रही थी। एक दोस्त के अनु- रोध पर अविनाश उसे साहित्य के अलग-अलग मुद्दो पर छोटा-मोटा माषण पिला आता। पिछले हफ्ते उसने कुछ कितावें देख लेने का सुझाव दिया था। उसने कहा कि वह उसके साथ ही मार्कीट चलेगी और जो किताबें ठीक लगेंगी, खरीद ली जायेंगी। तय यह हुआ था कि अविनास प्रानिवार ग्यारह बजे उसके कालिज आ जायेगा। पह उसी की हिमाकत कहिए कि वह दस मिनट पहले से ही वहाँ मौजूद पा और व्ययं ही गुजरते हुए चेहरे के भाव पढ़ने में वक्त गुजार - । 10 / जलता हुआ गुलाव रहा था। इस बीच शायद वह तीन-चार बार घड़ी देख चुका था । उसे घड़ी की सुइयाँ इतनी धीमी कभी नहीं लगीं। खासकर ग्यारह बजे के वाद का समय तो वह काट ही नहीं पा रहा था । अविनाश का जी चाहा कि किसी से पूछ कर उसके क्लास रूम तक चला जाये । सायकिल लॉक कर वह आगे निकला। पार्क का हिस्सा पार करते ही उसे सामने से आती हरदीप दीख गई। उसने क्रीम सूट पहना हुआ था और ऊपर गहरे चाकलेटी रंग की शाल ओढ़ रखी थी। इस तरह कुल मिलाकर अपनी चाल के अनुपात से वह खासा संजीदा लग रही थी। अविनाश को उसने थोड़ी दूर से ही देख लिया था और मुस्करा दी थी। पास आकर मुस्कराहट चहकने में बदल गई। "आपको ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा ?" लगभग आधा घण्टा ।" "गीता मैडम छोड़ ही नहीं रही थीं। मुआफ करेंगे न प्लीज।" "यह बात-बात पर मुआफी मांगना छोड़ दो; नहीं तो आधी जिन्दगी क्षमायाचना में ही गुजर जायेगी।" "अच्छा इसके लिए भी मुआफ कर दें।" उसने हंसते हुए कहा। "तुम नहीं सुधरोगी।" दोनों सायकिल स्टैंड की तरफ पलटे। "आप सायकिल लाये हैं न ?" "और क्या मेरे पास स्कूटर होगा।" "होने को स्कूटर भी हो सकता है।" "गाड़ी भी हो सकती है ?" "हो क्यों नहीं सकती।" "नहीं हो सकती। "न ही मैंने कभी इच्छा की है।" "इच्छा तो करनी चाहिए न।" "खाक ! स्मगलिंग हम करेंगे नहीं । वाप की लम्बी-चौड़ी प्रापर्टी है नहीं। जुआ हम खेलते नहीं। लाटरी खरीदी नहीं कभी । भगवान के छप्पर फाड़कर देने में हमारा विश्वास भी नहीं. 'जो पगार मिलती " जलता हुआ गुलाब /11 है उससे कमरे का किराया देते है। होटल वाले का तेज मिची की दाल- सब्जी का बिल देते हैं। कुछ घर भेजते है और बाकी की किताबें और पत्र-पत्रिकाएँ। इतना ही चलता रहे तो गनीमत है। फिर गाड़ी और दीगर चीजो की ख्वाहिशों में दिमाग क्यो खराव करें।" हरदीप ने अपनी किताबें और नोटबुक सायकिल के पीछे जमा दी। तीन कितावें थी। पहली हिन्दी साहित्य का इतिहास,' दूसरी 'गोदान' पर समीक्षा की पिताव और तीसरी पर अखबार का क्वर होने के कारण अविनाश देख न पाया। इन सबके बीच उसने अपना पर्स एडजस्ट किया। अविनाश का मन किया कि पूछे, वह अपने पैसे उस सेफ मे क्यो नहीं रखती जहाँ दूसरी औरतें रखती हैं, लेकिन फिर टाल गया। यह प्रश्न उसे खुद ही काफी चीप सा-लगा जयकि वह उसे गंभीरता से लेने की चेष्टा कर रहा था। कही उमके भीतर यह दिखाने की भावना भी थी कि वह दूसरे लोगो से ज्यादा बेहतर ढग से सोचता है, ज्यादा संजीदा है और जिन्दगी को फुटवाल या चुटकला नहीं समझता। जहाँ तक यन पाता वहाँ तक जिन्दगी को इन्सानियत-भरे माहौल में जीने की चेष्टा करता है। जहाँ नहीं हो पाता वहाँ उसे बेहद तकलीफ होती है । अविनाश और हरदीप अपनी-अपनी सायकिलो पर निकले । हरदीप ने कहा, "कल मैं सन्तोप भाभी से मिली थी।" "अच्छा!" अविनाश ने हैरत से देखा। बहुत अच्छी हैं।" "इममे क्या शक है।" "ये बता रही थी कि इस नौकरी में आने से पहले आप 'कमल' में काम करते थे।" "मंपादन तो आपकी रुचि का काम था। वहां से क्यों छोड दिया ?" "उसका सपादन धामिक काम जैसा था।" "शामिक काम?" "हो । दो-दो, तीन-तीन महीने अगर पगार न मिले तो इसे धार्मिक काम ही कहेगे।"
. । 12 / जलता हुआ गुलाब "नियमित पेमैंट क्यों नहीं देते थे वे ?" "उसका मालिक संपादक बड़ा विचित्र आदमी था । हरेक को पेमैंट के लिए किसी न किसी पार्टी के पीछे लगा देता, जिसका उसने विज्ञापन छापा होता। वहाँ से पेमैंट मिलने पर ही कर्मचारी का हिसाव करता। एक वार बड़ा रोचक किस्सा हुआ। उसने अपनी सालगिरह पर जव पार्टी दी तो हम सबने अपने होटल के विल, चाय के विल, विजली के विल उसकी पत्नी को प्रेजेन्ट कर दिये।" हरदीप हँस पड़ी। अविनाश को उसका हँसना बहुत अच्छा लगा । "बहुत सिटपिटाया होगा बेचारा?" अविनाश ने राय दी कि वे दोनों सायकिलें स्टेट बैंक आफ इण्डिया के सामने सायकिल स्टैंड पर छोड़ दें और माई हीरा गेट तक पैदल मार्च करें। हरदीप ने तुरन्त स्वीकृति दे दी । अविनाश ने पहले वाली बातचीत जारी रखते हुए कहा, 'यदि दल बदलने का कोई पुरस्कार मिल सकता है तो उसी सम्पादक को मिलना चाहिए । उस जैसा ग्रेट दलबदलू दुनिया में नहीं होगा। पहले वह जनसंघ में था। फिर कांग्रेस में चला गया । एक दिन उसने उसके एक सहकर्मी को इन्दिरा गांधी पर लेख तयार करने को कहा लेकिन जब तक वह लेख लिखकर लाया वह जनता पार्टी में शिफ्ट हो चुका था। जनता पार्टी से फिर लोकदल में चला गया। अब सुना है कि वह पुनः इंका में है। संपादक को अपनी तुकबन्दी सुनने का और सुनाने का बहुत शौक था। एक दिन मैंने मूड में आकर उनसे कह दिया कि वे अपनी तुकवंदी सुनाने के लिए रोज सुवह उधम सिंह कालोनी के मन्दिर के पास खड़े हो जाया करें। जो भी बच्चा मन्दिर जा रहा दीख जाये उसे रोककर तुकबंदी सुना दिया करें। इससे एक तो उनकी पाचन-शक्ति ठीक रहेगी, दूसरे बच्चे भी खूब स्वस्थ रहेंगे। उन्होंने इस राय को गंभीरता से लिया और लेकिन उधम सिंह कालोनी के मन्दिर के पास ही क्यों ? " "इसलिए कि वहां जाने वाले अधिकांश बच्चे डेफ एण्ड डंव स्कूल के होते हैं । " हरदीप फिर हंस पड़ी। वह ठगा-सा उसकी चमकती कहा, जसता हुआ गुलाव / 13 दन्तपंक्ति देखता रहा। "उमने आपको कुछ कहा नही ?" "कहता क्या ? आर्डर निकाल दिये कि उसी दिन से साहित्य का काम शोभा जी देखेंगी और महिलाओ का पन्ना मुझे दिया जायेगा। वहीं मुझे यही सब लिखना होता था कि गोरे फैसे बनें। नीयू का आगार कैसे डालें। या फिर मोहनहलवा और खीर पर कालम लिखना होता । "इसका मतलब खाना पकाने और महिला सौन्दर्य की भी खूब जानकारी है आपको।" "हाँ जी, इसी जानकारी ने तो नौकरी छुहवा दी।" "क्यो भला?" "मैंगे पेठे और अगूर की सब्जी बनाने की विधि लिखी-नौकरी छुड़वाने के लिए यो तो पहल। पक्ति ही काफी थी-एक अगूर का दाना लें और एक पेठा लें। दोनो के काट कर बरावर टुकड़े कर ले...' इस यार हरदीप की इतने जोर से हंसी छूटी कि मिट्ठा बाजार के दुकानदार चौक गये और ग्राहको को छोड़कर इधर देखने लगे । माई हीरा गेट से अविनाश ने उसे उपन्यास और लोक जीवन' 'यथार्थवाद' और मुक्तिबोध के समीक्षा-सम्बन्धी लेखो का एक संग्रह खरीदने का मश्वरा दिया। मैक्सिम गोर्की का 'मौ' और प्रेमचन्द का गोदान' भी खरीद डाले । वह जानता था कि दोनो कितायें हरदीप के पास नहीं है। किताय की दुकान से निकल कर अविनाश ने कही बैठकर चाय पीने का प्रस्ताव रखा । हरदीप की इच्छा थी कि पर चलें और चाय वह खुद बना कर पिलाये । अविनाश ने कहा कि घर वह किसी दूसरे दिन चलेगा। आज उतना समय नहीं है। चाय वही पी जाये । यह वायदा करने पर कि अविनाश मुक्तिबोध पर तैयार किया हरदीप का लेख दूमरे दिन हो, देखने घर आयेगा, हरदीप ने मान लिया। माई हीरा गेट के ही एक रेस्तोरी में वे लोग घुसे । अविनाश ने पनीर के पकोड़े और चाय का आर्डर दिया । अविनाश
14/जलता हुआ गुलाव
ने दोनों खरीदी हुई कितावें पैकेट से निकाल लीं। पेन निकालकर उसने
'मां' के पहले पृष्ठ पर लिखा-
"हरदीप के लिए सप्रेम"
अविनाश
फिर 'गोदान' के पहले पृष्ठ पर लिखते वक्त उसे कुछ ख्याल आ गया
और उसने लिखा "हरदीप के लिए जिसे अव यथार्थवादी ढंग से सोचना
चाहिए।"
-अविनाश
हरदीप ने उन किताबों को आँखें बंद करके छाती से लगाकर प्यार और
आभार व्यक्त किया और फिर पढ़ा। वेटर पानी के गिलास रखने लगा
तो हरदीप ने अखबार उठा लिया।
"सुना था लड़कियां बातें बहुत करती हैं। लेकिन आज तो मैं ही
ज्यादा बोलता रहा हूँ। अव तुम्हारी बारी है।" अविनाश ने कहा ।
"इस समय मेरी नज़र अखबार की इस खबर पर लगी है।" उसने
अखबार मोड़कर अविनाश की तरफ बढ़ा दिया।
किसी मन्दिर में गाय के कटे हुए सिर और पूंछ मिलने की खबर
थी।
"लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए क्या-क्या नहीं किया जाता।
राजनैतिक हवा इस बात को जब जी चाहे, अपने लिए सीढ़ी बना सकती
है।" अविनाश ने टिप्पणी की।
"साम्प्रदायिक आग बहुत खौफनाक होती है । इसी आग ने बटवारा
करवाया था। कितने घर जले, कितने लोग उजड़े--कोई ठीक अन्दाज
नहीं। हमारे परिवार तीन दशकों के बाद भी अपने उखड़ जाने का दर्द
नहीं भूल सके।"
पकौड़े वे लोग खा चुके थे। चाय पीते हुए अविनाश ने पूछा,
"भापा जी की सेहत कैसी है ?"
"डाक्टर ने किडनी वदलने की सलाह दी है।"
"तो इसमें देर किस बात की हो रही है ?"
जलता हुआ गुलाब /15 हरदीप ने नजरें झुका तो। "किडनी नहीं मिल रही न?" "हाँ" "आज उनसे जाकर कह देना कि किडनी में दे दूंगा।" हरदीप ने चौंककर देखा। कितनी सरलता से कह रहे हैं कि किडनी दे देंगे, जैसे किडनी न दे रहे हों अपनी दवात से स्याही भरने की इजाजत दे रहे हों। जैसे अपने पिनकुशन से एक पिन लेने दे हो-जैसे कह रहे हों कि उन्हे लैटर बाक्स के पास से निकलना तो है ही, उनका लेटर वही पोस्ट कर देंगे। "आप भला क्यो देंगे।" उसके मुंह से निकला । दरअसल उसे लग रहा था कि अविनाश जरूरत से कुछ बहुत ज्यादा उसके परिवार के लिए करना चाहते हैं । शायद उसको ही वजह से । लेकिन इतना कुछ वह कैसे ले सकती है ? उसके सामने एक कहावत की इबारत घूम रही थी कि 'सज्जन मित्र अगर उँगली दे तो हाथ नहीं काट लेना चाहिए।' "हम भला क्यों नहीं दे सकते । टी० बी० मुझे है नहीं । स्वस्य हूँ। मुझे नहीं लगता कि मेरी किडनी डैमेज होगी।...फिर किडनी देने से पहले डाक्टर से जांच भी करवाई जा सकती है।" "हद करते हैं आप।" हरदीप जान गई थी कि अविनाश उसे चिढ़ा रहे हैं और समझ कर भी असलियत नही पकडना चाहते । "हम तो हमेशा सरहदें तोडना चाहते हैं।" अविनाश ने अपनी आँखें हरदीप के मासूम, लेकिन वेचन चेहरे पर टिका दी। "उनके तीन जवान बेटे हैं, जब वही यह आफर नहीं रख रहे तो आप ही क्यों ?" लाचार हरदीप को कहना पड़ा, जो वह कहना नहीं चाहती थी। "बहुत छोटे ढंग से सोचती हो । सिर्फ पून के रिश्ते अर्थपूर्ण नहीं होते । मैं क्या उनको कम कद्र करता हूं। पिता-समान ही हमेशा समझा है मैंने।" कुछ देर चुप रहने के बाद हरदीप ने कहा, "आप तो दूसरो से यथार्थवादी होने की बात कहते हैं। कहते हैं एप्रोच प्रेक्टिकल होनी 16/ जलता हुआ गुलाव चाहिए।"जिन्दगी में तो बहुत आदर्शवादी हो रहे हैं।" "एक आदमी की जान बच सकती है इससे ज्यादा प्रैक्टिकल एप्रोच क्या हो सकती है । प्रैक्टिकल एप्रोच का मतलव कोरा स्वार्थ तो नहीं होता..." "वातों में आपसे कोई जीत नहीं सकता।" हरदीप ने कहा । उसने समझ लिया कि यह आदमी कुर्वान होकर रहेगा। अविनाश ने पैसे चुकाये और दोनों बाहर आ गए। लौटते वक्त रास्ते में उनका संवाद न चल सका। हरदीप को यह अविनाश की अहम्मन्यता लगी। वह भापाजी से बहुत प्यार करती थी। उनकी जान की सलामती हर तरह से चाहती थी। लेकिन इसके लिए अविनाश बलि का दकरा बने । जाने क्यों यह बात उसे पच नहीं पा रही थी। अविनाश पहले ही अपना कीमती वक्त उसकी पढ़ाई की देखरेख में खर्च कर रहे हैं । यह सव कम है क्या ? और अगर कम है तो यह कमी वे अपनी किडनी देकर पूरी करेंगे? उसे लग रहा था कि वह जिस ढंग से वात रखना चाहती थी, रख नहीं पाई। कुछ कहने के लिए आतुर तो थी लेकिन फिर ओंठ काट लेती । उन्हें भी तो कुछ समझना चाहिए। किडनी कोई बाल-पाइन्ट पैन का सूखा रिफिल नहीं होती, न डबलरोटी का । रैपर। अविनाश ने किडनी दे देने का फैसला चार-पांच दिन पहले ही कर लिया था। फिर भी उसने पुनर्विचार के लिए चार-पांच दिन का समय लिया। उसे लगा नहीं कि उसके फैसले में कुछ भी गलत था। सिर्फ अपने लिए जीना भी कोई जीना होता है। जीना तो वह है जो किसी के काम आय। फैसला सुना देने पर हरदीप की जो प्रतिक्रिया थी, वह उसे भली लगी। उसे हरदीप के प्यार की थाह मिल रही थी और वह इसी को पुरस्कार मान रहा था। माई होरा गेट से लौटते वक्त हरदीप के खामोश और उदास चेहरे को थोड़ी देर पहले के खुशमिजाज चेहरे में बदलने के लिए उसने एकाध वार कोशिश की, लेकिन फिर उसे अपना प्रयास अधूरा-सा लगा और जलता हुआ गुलाव /17 यह चुप हो गया। 'दुनिया में सबसे मासूम और पवित्र सिर्फ प्यार करने वाले लोग होते है-उसने सोचा । यही यात उमने हरदीप से बहनी चाही, लेकिन उसका विगडा मूह देपकर चुप रहा। स्टेट बैंक के पास सायकिल स्टेट पर पहुंचकर अविनाश को आस थी कि हरदीप शायद एक बार फिर उससे घर चलने का प्रस्ताव रसे। इस बार अगर वह कहेगी तो वह चला जाएगा। हरदीप ने वितायें कैरियर पर टिका दी और 'अच्छा' कहा । अविनाश ने पूछा, "चाय नहीं पीना चाहोगी एक बार और।" "नही अब नहीं-काफी देर हो गई। घर में लोग इन्तजार कर रहे होगे।" अविनाश ने उसे सायक्लि पर जाते हुए देखा और उसे लगा कि चाकी दिन के लिए कोई काम उसके पास वचा ही नहीं। घर पहुंचकर हरदीप के मन में रह-रहकर कुछ उफनता रहा । हारकर उसने अविनाश की भापाजी के लिए किटनी देने की बात भरजाई को बता दी। उसे लगता था कि भरजाई अभी उसे लेकर साथ अविनाश की तरफ निकलेंगी और उसे मना करेंगी। लेकिन भरजाई ने सिर्फ इतना यहा, "वह बहुत मला आदमी है।" मनजीत भाजी जव दुपहर का पाना खाने आए तो भरजाई ने उन्हें अविनाश की किडनी देने की बात बता दी। उन्होंने कहा, "वह भला ही नहीं, वहादुर भी है।" मनजीत भाजी ने भापाजी से पूरी बात कही और कहा कि सच नो यह है कि उनका पूरा खानदान अविनाश के उपकार का बदला नहीं चुका सकेगा । घर में सभी लोग अविनाश की प्रशमा कर रहे थे। बडे बुजुर्ग कह रहे थे, "इस जमाने में ऐमा पुण्यात्मा मिलना बहुत कटिन है। ऐसे ही लोगो से चल रही है, नहीं तो दुनिया गर्क हो जाती।" बाकी कह रहे थे कि दूसरो के लिए कुछ कर पाने की क्षमता अविनाश में है । हरदीप को कोपत हो रही थी, 'सभी लोग इस तरह बात कर र 18 / जलता हुआ गुलाव हैं जैसे किडनी का बदल लेना तय ही हो चुका है. कोई उनके पक्ष का क्यों नहीं सोचता ?' हरदीप भी क्या करती ? भावना के तीखे वेग में वह बिल्कुल अकेली पड़ गई। पिता-विरोधी वह नहीं थी, लेकिन एक भी लफ्ज़ मुंह से निकलता तो वही मान ली जाती । अविनाश से अव दुवारा बात उठाने का कोई लाभ नजर नहीं आ रहा था। अब क्या होगा? मनजीत भाजी पहले बर्मिघम टेलीफोन बुक करवाएंगे सुरजीत भाजी के लिए। फिर डाक्टर से बात करेंगे हरपाल को भेजकर अविनाश को वुलवाएंगे या खुद उनके पास जाएँगे। आपरेशन में चार घण्टे लगे। यह एक दुहरा आपरेशन था । अविनाश का और फिर भापाजी का। हाथ धोकर टावल से पौंछते हुए डाक्टर के चेहरे पर सफलता की मुस्कराहट थी । नरिन्दर भरजाई, जिसने अविनाश और भापाजी दोनों की सेहत के लिए अखण्ड पाठ की सुखणा सुखी थी, आंखें बन्द कर मन ही मन कहा, 'सच्चा तू ।' चार घण्टे हरदीप का दिल भंवर में फंसी किश्ती-सा रहा। और यह हालत वह किसी से भी ब्यान नहीं कर सकती थी। अविनाश को जब होश आ रहा था उसके कान वरामदे में चल रही वातें सुन रहे थे । कोई कह रहा था, "वस से उतार कर एक ही फिरके के सात आदमियों को गोली से उड़ा दिया गया।" अविनाश को अपने भीतर कमजोरी-सी महसूस हुई। उसे लगा कि वलिदान के जिस तेज की कल्पना वह करता रहा है उसे मेन्टेन नहीं कर पा रहा है ।
-- दो बिट्टी गेट पर खड़ी थी । अविनाश ने सायक्लि दीवार के साथ लगा दी। "नमस्ते अवल।" "कैसी हो विट्टी?" "माज बहुत दिनों बाद भाए।" फिश्य में पदवी विट्टी से यह सुनकर उसे अच्छा लगा। "यम ऐम ही," कहकर अविनाश ने उसके गाल पपपपा दिये। "मायकिल में ताला लगा दें। कम बबलू लोगों का नया स्कूटर छीनकर ले गए हैं।" वह दुवारा बाहर निकला और सायकिल लॉक कर चावी जेच के हवाले की। "तू तो बड़ी सयानी हो गई है विट्टी।" "दीप आटी कहती है कि पूरी मल्ली हूँ मैं। मेरा कोई पूरी टोला है । अगली बार अमृतमर जाएंगे तो कसवाकर लाएंगे।" विट्टी के हरदीप का रेफरेंस देने में कोई खाम प्रयोरन है या ऐसे ही ? अविनाश ने सूंघने का यत्न किया और फिर 'मुझे लो याहमखाह मम्बन्ध मूंघने की आदत हो गई है।' कहकर एटकाग पाने की चेष्टा की। पिछले दो सालों से अविनाश इस पर ये बेरोक-टोक माता-जाता रहा है । घर में थाना हरदीप की वजह से शुरू हुआ था, लेकिन धीरे- धीरे घर के सभी सदस्यों से आत्मीयता वैधती चली गई है। अब वह इस घर का ही सदस्य जाना जाता है। घर की कोई बात उससे पोशीदा नहीं, रखी जाती। भापाजी के आपरेशन के बाद तो उसका सम्मान और भी बढ़ गया है । हाँ, हरपाल को नजरो मे उसे कभी-कभी उपेटा ना बाती रही है, लेकिन फिर इस उपेक्षा को वह उसके अक्खड़ 1 ।
20/ जलता हुआ गुलाच . एक अंग मानकर चलता रहा है। भापाजी का कमरा परली तरफ था। वह उसी ओर चल पड़ा। अगर चाहता तो सीढ़ियां चढ़कर सीधा हरदीप के कमरे में चला जाता। हरदीप अगर कमरे में नहीं होती तो विट्टी के बता देने पर चली आती। घर में उसके ऐसा करने पर कोई पहरा नहीं था, लेकिन उसे अपने भीतर से इसका कोई स्वीकार नहीं मिला । शायद वह हरदीप का रवैया परपना चाहता था। भापा जी तस्तपोश पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे वर्फ-सी सफेद दाढ़ी । पीला पटका । मोटे शीश की ऐनक। चेहरे पर आपरेशन के पीलेपन के बाद अब थोड़ी ताजगी फिर लौटने लगी थी। "भापाजी, सासरीकाल ।" "सासरीकाल।" विना अखबार से नजर हटाये ही अभिवादन का उत्तर देकर उन्होंने नजर उठाई और उसे पाकर निहाल होते हुए कहा, "जीते रहो । लम्बी उम्र हो । जवानियाँ माणो। भाज इतने दिनों बाद याद आई हमारी। मैं आज ही हरपाल से कह रहा था कि रणजीत नगर जा आए, तुम्हारी सुख-सांद पूछ आए। कह रहा था कि शाम को मनजीत भाजी का स्कूटर लेकर हो आयेगा । ठीक-ठाक रहे न?" उसने कुर्सी पर बैठकर रूमाल निकालकर पसीना पोंछा और कहा कि यह मजे में रहा। उसकी नज़र कानिस पर पड़े गुरु गोविन्दसिंह के बड़े से चित्र पर पड़ी। कमरे में यही एक परिवर्तन था । गुरु गोविन्दसिंह के इस चित्र ने उसे हमेशा प्रभावित किया है। उस चित्र में कशिश की बात थी, उनकी आंखों में दृढ़ता का भाव । यह भाव उसे कायल कर देता। इस दृढ़ता के आगे वह नत्तमस्तक था। "यह तस्वीर मनजीत लाये हैं अमृतसर से।" भापाजी ने कहा। "अफेले गए थे क्या ?" "नहीं नरिन्दर भी गई थी। नरिन्दर के झाईजी बीमार थे कुछ। तुम्हारे लिए कड़ा लाए हैं।" "अच्छा। भाजी कह रहे थे जब भी अमृतसर जाएंगे, लेकर आएंगे।" तभी हरदीप दे में दो गिलास लेकर दाखिल हुई। भापाजी के लिए । .
जलता हुमा गुलाम /21 लस्सी और अविनाश के लिए शिकंजवी। आज वह हल्के नीले रंग का पाकिस्तानी सूट पहने हुए पी। वह जानता था कि यह सूट मनजीत भाजी पाकिस्तान से लाये थे। तब उसके लिए वाटर कूलर की वाल्टी आई पी। दीप का सूट स्कीवलेस था इससे उसके कन्धे से लेकर वुहनी तक और फिर हायों तक का सुडौल जिस्म बहुत प्यारा लग रहा था । खासकर टीके की निशान वाली जगह, जिसे देखकर अविनाश का अक्सर चूम लेने का मन करता है। दो चोटियों में उसके चेहरे पर टंकी मासूम आखें उसे आज भी भली लग रही थी। हमेशा की तरह । एक नजर में अविनाश को वह उतनी उदारा और गमगीन नहीं लगी जितनी अविनाश उसके बारे में इतने दिन सोचता रहा। उसे लगता था कि जब वह उसके विना मुश्किल से जी रहा है तो उसे भी तो परेशानी होती होगी-कोई दुख, कोई रंज, वेदना का एक वृत्त, पाहै छोटा क्यों न हो । एक टीम-सी उभरी और अविनाश ने इसे एटीकेट में दवा दिया। क्योकि उसे लगा कि दीप भी वही कर रही है । "नमस्कार !" "नमस्कार !" "याज बहुत दिनों बाद आए "वस यों ही।" "अविनाश के लिए भी लस्सी ले आती ना" भापाजी, यमी ले आती हूँ।" "न-न-यही ठीक है।" "और लेंगे न।" "नही बस । तुम नहीं ले रही ?" "मैंने अभी चाय पी है।" अविनाश को 'मम्मी' में मजा आ गया, लेकिन प्यार की उस आंच के लिए, यह इसे बहुत नाकाफी पा रहा था। उसने गिलाम उठाए और चल दी। अविनाश देखता रहा लेकिन वह नजर बचाए रही, जिसके लिए वह दीप के सभी गुनाह, मभी जल्म मुमाफ कर सकता था। दीप ने पिलास ट्रे में रखे और बचनी ई-सी "यह पियें 22/ जलता हुआ गुलाव निकल गई। "अविनाश भाजी आए हैं क्या ?" उसने हरपाल की भावाज सुनी। "हाँ, भापाजी के पास बैठे हैं।" यह हरदीप की आवाज थी। "सासरीकाल !" उसने उठकर हरपाल से हाथ मिलाया। हरपाल ने दाढ़ी खुली छोड़ी हुई थी और सिर पर केसरी पगड़ी थी। घर में मनजीत पहले दाढ़ी की ट्रिमिंग करवाया करते थे। बड़ी स्टाइलिश दाढ़ी रखी हुई थी उन्होंने । दिलखुशा मार्किट में रहमान से दाढ़ी ट्रिमिंग करवाते थे । घर में पूछने पर कई बार पूरे खुलेपन से बता दिया जाता था कि दिलखुशा गए हैं नाई की दुकान पर। लेकिन अब पूरी दाढ़ी रखने लगे थे। "भापाजी आज मुझे आपकी तरफ भेज रहे थे।" "अच्छा ! इसीलिए मैं खुद चला आया।" वह इत्मीनान से बैठ गया और बोला, "तुम्हारे बाहर जाने का क्या हुआ ?" हरपाल वेकार चला आ रहा था पिछले दो वर्षों से। बड़े भाई सुरजीत वर्मिघम में हैं । उनका ध्यान आते ही अविनाश को एयर इंडिया का महराजा और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ 'वल्ले-बल्ले वरमिंघम' याद हो आता है । हरपाल की कोशिश थी कि उन्हीं के पास चला जाए। उसका विचार था कि वहाँ से कहीं और भी निकला जा सकता है। "कहाँ जी। फारेन वाले जव तक पालम का गेट नहीं लाँध लेते तब तक आपके यहां से जव आप 'बाय' कह देते हैं और वहाँ उतरते ही उनकी किसी मेम से 'हाय' हो जाती है, इस 'बाय' और 'हाय' के बीच आपका बंदा गया हाथ से।" हरपाल की इस बात पर भापाजी और वह दोनों हंस दिए। '"तुमने बैंक में भी एप्लाई किया था ?" "एप्लाई तो अलग-अलग जगहों पर चौबीस वार कर चुका हूँ। पच्चीसवीं वार करूंगा तो सिल्वर जुबली मनाऊँगा, आपको भी इन्वाइट करूंगा।" "नोकरी मिल जाएगी तव लेंगे पार्टी।" "नौकरी का तो कुछ पता नहीं। यह मौका क्यों जाने दें।"
जलता हुमा गुलाव /23 विट्टी ने आकर हरपाल से कहा कि एंटीना की राड टूटी हुई है। हरपाल उमका हाय पकड़कर बाहर चला गया। "लड़के भी क्या करें। वेवारी ही इतनी है । एक साली स्थान निकले तो सैकड़ी अजियां पहुंच जाती है ।" अविनाश ने यहा। "मुझे तो लगता है कि वह्त्तर-तिहत्तर के बाद पंजाब में पिसी महल में में कोई बड़ी भर्ती हुई ही नहीं। सच कहूं पढ़े-लिम कार तो मां-बाप की आंख में भी खटकते हैं।' उसने देखा कि भापाजी ने फिर ऐनक चढ़ा ली है और अपवार में दूद गए है। "क्या लिखता है अखबार ?" "अखबार वहाँ सही हैं ? पजावो का अखबार पढने के बाद मुझे इंडियन एक्सप्रेस पढ़ना पड़ता है। तुम्हे भी शायद हिन्दी का अपदार पढ़ने के बाद ऐसा लगता हो।" अविनाश मुस्करा दिया। "आज को कोई खास खबर ?" "खाम खवर क्या ? वही चण्डीगढ़ वाले मनले में भग पड़ा है अखवार।" "अब तो इक्कोस को मिल रहा है न पजाब का।' "हो, वरनाला भी यही कह रहे है, पर मुझे नहीं लगता। मरी समझ मे आज तक नहीं बाया कि चण्डीगढ गा झगडा है क्या। चण्डीगढ हरियाणा में रहे या पंजाब मे, रहेगा तो इमी दश मे न ? कोई पाकि- स्तान तो नहीं ले जा रहा इसे जो इतना बड़ा विवाद खड़ा हो गया। भयो, तुम्हारी क्या राय है ?" "मैं सोचता हूं कि वेन्द्र सरकार को पजाव ममझौता लागू करने में देर नहीं करनी चाहिए थी। जब सैद्धान्तिक रूप में चण्डीगढ को पजाब का अंग मान लिया गया या तो उसे पहले ही पजाव को दे दिया जाना चाहिए था। इसके एवज में दिए जाने वाले इलाके के लिए एक वर्मन नियुक्त किया जाता, जिसका निर्णय दोनो को स्वीकार्य होता।" "इन कमोशनो के जरिए जो मजाक होता रहा है वह न रहो । सियासी लोडर जिस तरह से बयानबाजी करते हैं के , 24 / जलता हुआ गुलाव वहमों का शिकार बनाते रहे हैं, हद है । शाह आयोग ने मैट्रिक की परीक्षा देने वाले छात्रों के माधार पर इसे हरियाणा की झोली में डाल दिया-तुम्हें याद है दर्शनसिंह फेरूमान इसके लिए शहीदी प्राप्त कर गए थे। सन्त फतहसिंह ने भी व्रत रखा था।" "इस शहर की सुन्दरता की परवाह किये बगैर इसे बांट देने की. चात भी चली थी।" "हाँ जी 70 में चौ० बंसीलाल ने भी ऐसा ही बयान दिया था । मैंने जो बयानबाजी की बात कही थी उसमें यह बात भी आती है। जो गियापा मौसी ने खड़ा किया वह अमली रूप में खतरनाक था । अवोहर- फाजिल्का का क्षेत्र हरियाणा को दे दिया जाय, चण्डीगढ़ पंजाव को। मैथ्यू को कंदूकेरा (फांदूखेड़ा) गांच का गलियारा निकालने के लिए मुसीबत आन पड़ी।" भापाजी का कंदूखेड़ा गांव का वी० वी० सी० उच्चारण सुनकर अविनाश को हंसी आ गई। "और अब वेंकटरमैया कमीशन की रिपोर्ट तो देखिए । सत्तर हजार एकड़ जमीन पंजाव देगा लेकिन कौन-सा क्षेत्र और किस विना पर, इसका पता नहीं। इसके लिए कमीशन और फिर एक कमीशन बैठा दो। नया कमीशन कहेगा, एक और कमीशन फिर एक और कमीशन ।" "बरनाला पैंतालीस हजार एकड़ की पेशकश कर रहा है और उधर देवीलाल ऐसा करने से निपटने नहीं देंगे। उनके लिए राजनीति का दांव रोलने का यह अच्छा मौका है 'क्यों अकारथ जाने देंगे ? देश जाए भाड़ में, किसी को क्या पड़ी है ! केन्द्र सरकार हरियाणा में अपनी साख खोना नहीं चाहती। इसलिए पंजाव को कुछ भी मिलना हो तो यहाँ पेट में उठने वाले मरोड़ का पहले ध्यान रखा जाता है। भजनलाल का बयान सेंटर से इशारा पाये बिना ही आ जाता हो, ऐसा मेरी नाकश सगा में नहीं आता।" तभी हरपाल कमरे में चाय की ट्रे लेकर घुसा। अविनाश थोड़ा कट-गा गया। समा रहा था हरदीप चाय लेकर आयेगी।""तो तुमने मुझे एवायड करना शुरू कर दिया है ?' उसने मन में कहा।
जलता हुआ गुलाब /25 हरपाल ने सेंट्रल टेबल पर ट्रे रख दी। दो कांच के कपों में चाय और एक बड़ी प्लेट में दालमोट, विस्कुट और दीप के हाथो तले हुए पापड़ । भापाजी चाय सिर्फ सुबह-शाम ही लेते थे, वह भी मोठ, तुलसी, मुलट्टी, इलायची जैसी वीस चीजें डलवाकर । भापाजी एसी चाय को 'जन्तर मन्तर पोड़ा कटन्तर' कहते थे। हरपाल ने भापाजी की अन्तिम दात मुन ली थी। उसने चर्चा में शामिल होते हुए कहा, "प्रोफेसर दर्शनसिंह ने कहा है कि चण्डीगढ़ का नाम चण्डीगढ साह्यि रख दो। लोग अमृतसर की जगह चण्डीगढ़ दर्शनों के लिए जाया करेंगे। सिखो ने क्या सीमेट-कंपीट के उस जंगल के लिए कुर्वानियां दी है ?" चाय का प्याला अविनाश को देकर कुर्सी पर बैठते हुए उसने कहा, "भाजी सेंटर पंजाब को कुछ भी सीधे से देना ही नहीं चाहता । लंगुएज के आधार पर राज्यो का गठन 55-56 में हुआ था लेकिन पंजावी मूवा बनाया गया 66 में, वह भी लम्बी दौड़-धूप के बाद । जव लंगुएज के आधार पर आप सभी राज्य बना रहे हैं तो पजाब ने आपके कौन-मे माह मारे है जो इसे दस माल तक लटकाया जा रहा है । "राजीय-लोगोंवाल समझौते का क्या हाल हुआ? आठ महीनों बाद भी सरकार दरियाई पानी का कोई मही हल लागू नहीं कर सकी। चण्डीगढ़ का कुछ नहीं । जोधपुर जेल में डाले गए कैदियो का कुछ नहीं हुआ। "यह सव इसलिए कि कहीं सिख यह न समझ लें कि सेंटर से आसानी से कुछ मिल सकता है। हर जगह सौतेला सलूक किया जाता है। हैरानी की बात देखिए कि वे लोग जो खाते पंजाव का है, पहनते पंजाव का हैं, वोलते पंजाबी हैं, मरदमशमारी के वक्त अपनी मातृभाषा लिखवाते हैं हिन्दी । पूछो कोई उनसे कि यदि आपको पजाबी लिखवाते हुए इतनी ही हेठी लगती है तो पजाब छोड़ क्यो नहीं देते ? वहाँ चले जाओ जहाँ 'हमको तुमको' चलता है।" "क्या फालतू की वहस ले बैठे हो।" भापाजी ने टोका। "नही में ठीक कह रहा हूँ। मैं सिर्फ पंजाब के हिन्दुओं की बात 26/जलता हुआ गुलाब नहीं कर रहा, पंजाब के सम्पन्न सिख फैमिलीज में भी मियां-बीवी आपस में पंजाबी में बात करेंगे, लेकिन जब बच्चे को साथ लेकर बाजार निकलेगे तो 'मुन्ना टाफी लेगा, हमाला लाजा वेता टाफी लेगा' करेंगे। "अनेक वेकसूर पकड़ लिये जाते हैं और जेल में ढूंस दिए जाते हैं। योई पूछता नहीं, कोई सुनता नहीं। ब्ल्यू स्टार ऑपरेशन के बाद जैसे सी० आर० पी० को जायज-नाजायज सब करने की खुली छूट मिल गई हो । मामाजी की कल दिल्ली से चिट्ठी आई है। जानते हैं क्या लिखा है उन्होंने ? लिखते हैं उनकी अगर कोई सुने तो वे यही कहेंगे कि सरकार चण्डीगढ़ रखे अपने पास । हमें नहीं चाहिए। लेकिन हम सभी टरवन वियरर्ज से हिन्दुस्तान में रहने का अधिकार तो नहीं छोने। आज सभी टरवन वियरर्ज एक्स्ट्रीमिस्ट हो गए ?" "देखो अविनाश, मुझे लगता है कि सेंटर का पंजाब कोलेकर दिल साफ नहीं है । वे चाहते हैं कोई न कोई पंगा खड़ा रहे और उनकी कुर्सी कायम रहे। लाशें गिरती रहें और वे लाशों के सेक पर रियासत की रोटियां सेकते रहें।" "हां, पंजाब में कोई बड़ी इण्डस्ट्री कभी नहीं लगाई गई कि कहीं इन्हें अधिक रोजगार के मौके न मिल जाएं। पंजाच सारे देश के लिए गेहूँ पैदा करता रहे और पंजाची मान के साथ कभी जी न सकें। पंजाबियों के हिस्से क्या आया कुरवानियां और सिर्फ कुरवानियाँ ।" हरपाल के रुकने पर अविनाश ने कहा, "कुरवानियाँ तो सारे देश ने दी थी आजादी के लिए, लेकिन सत्ता का चैक भुना ले गया सिर्फ एका वर्ग।" "तुम चण्डीगढ़ की पंजाव को मिलने की बात कह रहे थे न ! मैं चाहता हूं चण्डीगढ़ मिले न मिले, यह कांग्रेस पूरे मुल्क को समुद्र में अबोकर दम लेगी। अपनी वोटों के लिए यह जिस तरह फिरकापरस्ती अमल में ला रही है वह बहुत खतरनाक है।" सभी विट्टी आ गई,. "अंकल जी! अंकल जी! आपको मम्मी बुला रही हैं।" अविनाश ने भापाजी से कहा, "यापकी बात वाजिव है।'
- जलता हुआ गलाय / 27 वह अभी इस मसले पर विस्तार में बात करना चाहता था, क्योंकि यह समस्या पूरे पंजाब का दर्द बनी हुई है । एक ऐमी आग जो पूरे पंजाववासियों के भविष्य को खाये जा रही है. "पन की होली चल रही है और केन्द्र हुमायू के मकबरे को तरह चुप है। इस पूरे यातनाचक्र से अविनाश अलग कैसे हो सकता था, लेकिन पिट्टी उसका हाथ पकड़कर खीचने लगी। "चलोन अंकल जी।" "जाओ, मरजाई अपनी को बात सुन लो पहले। कड़ा जो लाई है तुम्हारे लिए।" दीप के कमरे के साथ ही भरजाई का कमरा था। अविनाश के कदम दीप के कमरे की ओर उठे लेकिन उसने रोक लिया। पलंग पर बैठी नरिन्दर स्वेटर बुन रही थी। उसने अपने आपको चौंकने से बचाया। नरिन्दर के पास ही हरदीप चावल साफ कर रही थी। "सासरीकाल भरजाई जी...!" "सासरोकाल जी। आज तो बहुत दिनों बाद दर्शन हुए आपके ।" "हमारा क्या है जो, हम तो रास्तो के पत्थर हैं। कोई भी कभी भी ठोकर लगा सकता है।" कहते हुए उसकी नजर हरदीप के चेहरे पर ही केन्द्रित थी। "ऐसा क्यो कहते हैं आप । आप जैसा कोई बनकर तो दिखाए।" "क्यों अच्छे लोगों को कोसती हो भरजाई जी। हमारे जैसे तो विना मोल बिकते हैं ।" अविनाश पूरी खुन्दक पर था । हरदीप के चेहरे पर की छाया को गौर से देख रहा था। "हीरे का मोल हीरा नही जानता। आपके एक-एक गुण को हम जिन्द बेचकर ले लें।" अविनाश का ख्याल अब नरिन्दर की तरफ गया । उसे लगा कि भरजाई को अनायास ही आहत कर रहा है। उसने खुद को - और कहा, "असल मे आप तो यहाँ थी नही और हमे कहती है कि नहीं हुए।" " .
28/जलता हुआ गुलाब
हाथ में
"मैं तो सिर्फ पिछले हफ्ते यहां नहीं थी। आप तो बहुत देर से ही
नहीं माए । मेरी पक्की सूचना है।" कहकर उसने हरदीप की ओर देखा।
वह चुपचाप ओंठ काट रही थी। जैसे सारी थरथराहट वहीं रुकी हो या
फिर चावल चीनने में।
"मैं कैसे कहूँ कि आपका टेलीप्रिंटर झूठ बोलता है । क्या हाल है
वहां अमृतसर वालों के ? झाईजी, दारजी सब ठीक हैं न !"
"ठीक ठाक हैं । आपके लिए कड़ा लाई हूँ।"
नरिन्दर ने उठकर पर्स से कड़ा निकाला। अविनाश ने दायें
पहन लिया और कहा, "वहुत-बहुत मेहरवानी।"
"क्या लेंगे? कॉफी, चाय या ठण्डा ?"
"ठण्डा ले चुका हूँ और फिर चाय भी।"
"तो फिर अब कॉफी ले लें। मैं बनाती हूं।"
"नहीं, सचमुच अव जरूरत नहीं। आप पर उधार रही।"
"मैं इन्तजार करूंगी व्याज-सहित चुकाने का।"
"कोई चावलों के लिए पूछता तो और वात थी।" अविनाश ने
जाते-जाते जुमला चुस्त किया ।
"आप रुके, चावल अभी बन जाएंगे।" हरदीप ने मुश्किल से कहा।
"शुक्र है मौनी बावा का मौन तो टूटा।" अविनाश ने कहा और
वाहर निकल गया।
।
तीन कोई नौकरी नहीं मिलने पर रामरत्न वकील एन० एस० घई के वहाँ मुंशी हो गया था। वह वहां पांच साल से नौकरी कर रहा या । पई साहब का सलूक अच्छा था। आज के जमाने में उन जैसे दयानतयार आदमी कम ही देखे जाते हैं। रामरत्न ने तीन सौ को नौकरी शुरू की थी, अब साढ़े चार सौ पा रहा था। रामरत्न आज पूरी रात नहीं सो पाया । उसकी तीस साल की जिन्दगी में पहले भी कुछ रातें ऐसी आई थी जब वह सो नहीं पाया था। एक बार तव जव दफ्तर की कुर्सी पर बैठे-बैठे उसके पिता का देहान्त हो गया था। वे घर से साढे आठ बजे ठीक-ठाक अपनी खटारा सायकिल पर दफ्तर गए थे। नौ बजे आफिस का समय था। वे आदतन दफ्तर यों पांच-दस मिनट पहले पहुंचते थे और उस दिन के काम को कार्य-सूची तैयार करते थे। उस दिन वे अपनी कार्य-सूची पूरी नहीं कर पाए थे। नौ बजे दफ्तर आने वाले लोगो ने उनका सिर टेवल पर टिका पाया। गुहमानिग' का जवाब नहीं मिलने पर उनकी तरफ ध्यान दिया गया तो उन्हें मृत पाया गया । रामरत्न उस दिन पूरी रात नही मोया था। वह यही सोचता रहा था कि एक आदमी कैसे इतनी जल्दी मर सकता है ? दूसरी बार तव जय उसकी बहन अस्पताल में दापिल थी। उसका प्रसव होना था। रात दो बजे तक वह चीखती रही थी और रामरत्न अस्पताल के लम्बे बरामदे मे चक्कर काटता वेवस उसकी चीखें सुन र था। तभी जमादारिन ने उससे कहा कि परली तरफ कोठी में बड़ी सो रही है । अस्पताल के किसी कर्मचारी में हिम्मत नहीं कि 30/ जलता हुआ गुलाव दे । वह अगर यह काम कर ले तो उसकी वहन की जान बच जाएगी नहीं तो सच्चा पातशाह वाहेगुरू जाने । वह उन्हें जगाने चला गया था । पहले तो कुत्ता जिस तरह उस पर गुर्राया, वह एकदम धवरा गया था। कुत्ता वहुत पला हुआ और हिल था। जगा दिए जाने पर डाक्टर उस पर उससे भी ज्यादा गुर्रायी थी। उसकी बहन की जान बच गई। पेट का वच्चा पहले ही मर चुका था । वह पूरा वक्त कुत्ते और डाक्टर के हमले के बारे में सोचता रहा। वह सोचने लगा 'नेरो ऐस्केप में खौफ पूरा रहता है।' तीसरी बार तव जव शार्दूल सिंह ने उन्हें अपना मकान खाली कर देने को कहा था, क्योंकि उसका लड़का अब बाहर के कमरे पर शटर लगाकर छापाखाना खोलना चाहता था। वह दो दिन मकान ढूंढ़ता रहा था, लेकिन सौ-सवा सौ रुपये महीना किराये पर कोई रहने लायक कमरा मिल ही नहीं रहा था। एक दिन शाम ढले जव वह घर लौटा तो शार्दूल सिंह और उसके लड़के ने उसका सारा सामान बाहर सड़क पर फेंक कर अपना ताला लगा दिया था। उसने उनसे गिला किया तो उसका लड़का किरपान लेकर दौड़ा । उसकी माँ दुपट्टा मुँह में ठूस कर बुरी तरह रो रही थी। वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा था और न ही कुछ कर रहा था। वह पुलिस में जाना चाहता था लेकिन एक बुजुर्ग ने उसे समझाया कि इसका कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि पहले तो उसके पास पुलिस को खिलाने के लिए पैसे नहीं होंगे, दूसरे उसके पास किराये की एक भी रसीद नहीं होगी, जिससे वह सिद्ध कर सके कि वह किराये- दार था और इतनी रकम किराये के तौर पर देता रहा है । वह पूरी रात आसमान देखते निकल गई थी। लेकिन यह रात रामरत्न के लिए तमाम रातों से अलग और कहीं अधिक खौफनाक थी। वह पेशाव के लिए उठा था कि सामने कचहरी में यकायक गोलियां चल गई। लोगों में भगदड़ मच गई। तड़ातड़ दुकानों शटर गिरने लगे। आगे घरों के दरवाजों और खिड़कियों को फटाक् वन्द कर लिया गया था। दनादन गोलियों की आवाज से चहरी क्षेत्र कांप उठा था। एक गंजा अहलमद मेज के नीचे घुस गया । पूरा नई जलता हुआ गुलाय /31 था। एक वकील की भागते हुए ऐनक गिर गई थी। हमेशा कार में देखें जाने वाले एक जज को भी उसने पैदल भागते हुए देखा । वह बुरी तरह हाफ रहा था । एक पेशकार ठेले से जा टकराया। लोग जिधर मूझा उधर भाग रहे थे। वह खुद कही छिप जाना चाहता था। कोई गेल्टर हो । कोई सहारा । कही भी । कैसा भी। अपने दफ्तर का दरवाजा, जहाँ यह फाइलों के साथ साँस लेता रहा था, उस पर बन्द हो चुका था। हार कर उसने संभे को आड़ ली। उसका दिल बेकाबू हो रहा था। बिजली गिरी थी। पानी में आग लगी थी या कोई चट्टान सरक गई थी। पता नहीं कितने मरे होगे और कितने जख्मी, उसने सोचा। मोल इतनी सस्ती तो कभी न थी। तभी उसने जीप की आवाज सुनी । जीप के जाने के बाद भीड़, जो कि कचहरी रो बाहर की तरफ भागी थी, तब एकदम कचहरी की ओर फट पड़ी। रामरत्न की घबराहट कुछ कम हुई। लोगों की भगदड थम गई थी। पुलिस को पीछा करने की कार्रवाई शुरू करने में दस मिनट का यक्त चला गया होगा। इतना उन लोगो के लिए निकल जाने के लिए काफी था। लोगों का वार्तालाप उसके कानो से टकरा रहा था। पांच मर गए "पाँची पुलिस वाले थे।" "बहुत जवान थे।" "वेचारे!" "पुलिस वाले और बेचारे ?" "ये लोग निकल गए क्या ? "और क्या । अपने तीन आदमी भी छुड़वा ले गए।" "पुलिस पीछा कर रही है। पकडे जाएंगे।" "पहले पकड़े गए हैं कभी?" "वे जीप पर गए हैं।" "सायक्लि पर होते तब भी क्या उखाड लेते ?" - 32 / जलता हुआ गुलाव "तीन आदमियों को पुलिस के हाथों छुड़ाकर ले जाना कोई आसान काम है !" "और वह भी दिन दिहाड़े !" "उनके लिए सब कुछ आसान है। उन्होंने जब भी जैसा चाहा वैसा ऐक्शन किया। कोई कुछ नहीं बिगाड़ सका । कानून व्यवस्था सब टिच, वे किसी को कुछ नहीं समझते।" "और बाद में सिर्फ एक वयानं-पुलिस सतर्क कर दी गई है।" "इन्हें रोज नये सिरे से सतर्क करना पड़ता है।" "अभी कपडूं लगा दिया जाएगा। जो कुछ निपटाना है निपटा लो पले ।" शटर तब तक उठाए जा चुके थे। घरों की वन्द खिड़कियां और दरवाजे खुलने लगे। फोटोस्टेट दुकान का हेल्पर सुरिन्दर सायकिल पर जा रहा था। "कहाँ जा रहे हो?" "वच्चे मौसी के घर गए हैं अली मुहल्ले। उनको ले आऊं। फिर क.पर्यु लग जाएगा।" उसने सोचा कि वह भी निकल जाए। सुबह वह गेहूँ पीसने को छोड़ आया था। पिस गया हो तो ले आए । तभी घई साहब ने आवाज दी और सोहन लाल वनाम विजली बोर्ड की फाइल निकाल लाने को कहा। उसे बहुत हैरानी हुई । अदालत का काम बदस्तूर चलेगा क्या? फाइल निकाल देने पर वकील साहब ने उससे कहा कि नाज सिनेमा के पास जाए और स्कूटर के बारे में पूछ कर आए कि रंग हो गया या नहीं। रामरत्न पूरे रास्ते पंजाव के हालात पर सोचता रहा । इन चार-पांच सालों में क्या से क्या हो गया है ? सैकड़ों मासूमों और बेगुनाहों का खून बहाया गया है। पंजाब की पूरी धरती वारदातों की दास्तां बन कर रह गई है । सिविल अस्पताल के पास लोगों की भीड़ थी, उसे पता चला कि कचहरी गोली काण्ड में मारे गए सिपाही वहां लाए गए हैं । उसने सायकिल विजली बोर्ड के दफ्तर के पास खड़ी कर दी और अन्दर चला गया। अस्पताल जाते वक्त वह हमेशा अपनी सायकिल वहीं जलता हुआ गुलाब /33 'सड़ी करता। इससे सायकिल स्टैट के पचास पैसे यच जात । अभी तक वह लुधियाना और नकोदर की यवरो से ध्यान हटा नहीं पाया था। लुधियाना में कुछ दिन पहले दरेसी में व्यायाम कर रहे और दरेमी से दोमोरिया पुल तक सर करते लोगों पर गोलियों की बौछार कर दी गई थी। इस सूनी काण्ड में चौदह मादमी मारे गए और फिर अचानक नकोदर में गोलियों की बौछार, जिसमें आठ लोगों को मृत्यु के अन्धे कुए में धकेल दिया गया था। इस तरह कलपती विधवाओ और रोते-दिल- राते यतीमो में इजाफा किया गया था। इन दोनों गोलीकाण्डों का अमर अभी तक रामरत्न के दिल पर था। वह अपने भीतर कुछ जलता हुआ. सा महसूस करता रहा था। इन गोलीकाण्डो पर अखबारो में छपे नोट्स उसे हैरत में डाल रहे थे। एक अखबार में दपतर मे मिले पत्र के हवाले से लिया गया था कि ये लाशें पुलिस के नये अफसर की सलामी में विछाई गई हैं, कि वे लोग जितनी गर्मजोशी से नये अफसर का स्वागत करना चाहते थे उतनी गर्म- जोशी से नही कर पाए, कि इसका उन्हें खेद है । वह पढ़-पढकर अमित हो जाता। लाशधर के पास तीस-चालीस लोग जमा थे। वह दरवाजे के पास पहुँचा। एक सिपाही भीतर से मृत पुलिसकर्मियों की वैल्ट उतार कर ला रहा था। सिपाही के हायो पर पून लगा हुआ था, और एक बेल्ट भी खून से सनी थी। वह वेल्टो को गिनना चाहता था लेकिन सिपाही ने पुलिस वैन मे खडे दूसरे सिपाही को थमा दी। लाशघर के दरवाजे पर पुलिस का पहरा लगा दिया गया था। पीछे की तरफ जाकर उसने जालीदार खिड़की से झांका। दो शव मेजो पर पड़े थे। तीन जमीन पर । वे पांचो पतीस से कम उम्न के थे। अच्छे सेहतमंद और कद्दावर । उनका काफी रयत यह चुका था। पशंपर खून के चकत्ते थे। तभी उसे और चार-पांच दूसरे लोगो को, जो जाली- दार खिड़की के साथ खड़े थे, खदेड़ दिया गया। एक पुलिसकर्मी को वहाँ भी पहरे पर लगा दिया गया। एक प्रेस रिपोटर सागो का गोरा पूछ रहा था। नरसंहार अब सिर्फ एक आंकड़ा वन कर 34 / जलता हुआ गुलाव - वेहद बुझे मन से वह निकल लिया। जख्मों की ताव न लाकर इस गोलीकाण्ड का एक और जस्मी दम तोड़ गया था। उसे लाशधर में लाया जा रहा था। उसके लम्चे केश नीचे झूल रहे थे। उसने किसी को कहते सुना कि इसे खून दिया जाना था और खून नहीं मिल रहा था। राम- रत्न बड़े खिन्न मन से लौटा। शहर में कोई तवदीली नहीं थी । गाड़ियों के नीचे तेलिया लिवास में लेटे मिस्त्री उसी तरह पुर्जे ठीक कर रहे थे। चाय की दुकान में स्ट्ठी लह-लह कर रही थी। केतली में पानी खोल रहा था । मेजों पर गप्पें चल रही थीं। कचहरी के पास डाकखाने में उसी तरह कार्ड और टिकट बिक रही थीं, पार्सल लिए जा रहे थे और रजिस्ट्रियां हो रही थीं। कचहरी कैम्पस में, जहाँ थोड़ी देर पहले वारदात हुई थी, रोजमर्रा की तरह काम चल रहा था । पेशियां हो रही थीं, तारीखें डाली जा रही थीं, गवाह भुगताये जा रहे थे और पेशकार-मुहरिर ग्रामीणों से दो-दो, पाँच-पाँच वसूल रहे थे। सावत दिन निकल गया। शहर में कप! तक नहीं लगाया गया, जो कि उसे निश्चित लगता था। रामरत्न ने नुक्कड़ वाले खोखे से लैम्प का सिगरेट खरीदा और पछा, "आज दुकानें वन्द नहीं हुई ?" "क्यों होती भला?" "कचहरी में गोली चली और..." "वाऊ जी, मरने वाले हिन्दू होते तो हिन्दू दुकानें बन्द करवाते, रोख होते तो सिख बन्द करवाते । वे तो पुलिस वाले थे।" रामरत्न को रात-भर नींद नहीं आई। बार-बार लाशघर में पड़ी © उसकी आँखों के सामने आ जातीं।
चार । दफ्तर से बाहर निकलते ही अविनाश के सामने जो पहली समस्या बाई वह यह कि जाये तो जाये कहाँ ? उसके कमरे को बिजली खराब थी। पूरा दिन दपतर में फाइली से उसे आंख उठाने का समय भी नहीं मिला था। आज दुपहर को वह खाना साने भी नहीं जा सका। दफ्तर में अपनी मेज पर ही छोले-बुलचे खाकर सन्तुष्ट रह जाना पहा । रमेश ने उससे कहा था, "इतना काम करते हो, यहाँ काम का कोई रिवार्ड नहीं मिलता। जो इनको निकाल कर दिखाता रहे वही अन्छा । जो काम करता रहे उसे और लादते रहते है ये लोग।" लेकिन वह मुस्करा कर काम में लग गया। हैड आफिस से वह स्टेटमैंट वार-बार मामी जा रही थी। डी० ओ० तथा तार तक पा चुके थे। स्टेटमैंट दो सालो की थी और समय ले रही थी। अपने दफ्तर के अधिकारी बगर किसी पेचीदगी को समझे उसे नोट पर नोट दे रहे थे। ऐगे मेन हो तो वह छुट्टी ले सकता था न ही पोडी देर के लिए गायव हो सकता था। दफ्तर की उस तथाकथित गभीर (लेकिन टुच्ची) स्टेटमैंट के सामने उसके अपने कमरे की बिजली क्या वकत रखती थी। कई बार अविनाश और उसके सहकर्मियों को छुट्टी के दिन दफ्तर हाजिर होना पड़ता, कई वार शाम को देर तक काम करना पटता, लेकिन इसके लिए उन्हें कोई ओवर टाइम नहीं मिलता था। इसके एवज में उन्हे सिर्फ छुट्टी मिल सकती थी और छुट्टी अक्मर वे लोग इस डर से नहीं लेते थे कि काम और जमा होता चला जायेगा। इतनी खराव पकिग कडीशन मे उसका दम घुटने लगता । इतना काम करने पर भी वे अफसरो के कोप का भाजन बने रहते । नरे 36/ जलता हुआ गुलाव अतिरिक्त कुछ लोग 'शुद्ध लाभ' की सीटों पर काम करते थे। वे उच्च अधिकारियो को पार्टियां वगैरा देते थे। उनके निजी कामों में मदद करते और आफिस में उनकी हाजिरी नाममात्र रहती। काम के नाम पर वे एक ही फार्मूला जानते थे-~~-कौन है, कैसे पकड़ना है ? जाहिर-सी बात है कि कामयावी उनके कदम चूम रही थी। उनका उच्च अधिकारी सिख था । अविनाश बखूबी समझता था कि अगर उसकी जगह एक हिन्दू विठा दिया जाता तव भी उसका व्यवहार . उन लोगों से ऐसा ही होता, क्योंकि उसका विशेष व्यवहार सिस्टम की देन था, किसी मजहब की नहीं। गर्मी काफी थी और अविनाश को थकान-सी लग रही थी। कमरे में लौटकर वगैर पंखे के समय काटना एक और नरक था। इससे पहले कि वह कुछ तय करता, उसने बनवारी से एक प्याला चाय पीना पसंद किया और चाय से पहले एक गिलास वर्फ वाला पानी। वह जानता था कि अगर चाय का आर्डर नहीं हो तो बनवारी को यर्फ डाल कर पानी देने में दिक्कत लगती है । कुछ अज्ञात उग्रवादियों ने ममदोट क्षेत्र में सफेद कार में से गोलियां चला कर कुछ बेकसूर राहगीरों को मार डाला था। इस पर जी० एफ० रिवरो की स्टेटमैंट अखवार में छपी थी कि फिरोजपुर में अब हमारी (पुलिस की) वारी है । इससे पहले भी उनकी उग्रवादियों को लेकर तेज स्टेटमैंटें आ चुकी थीं। बेंच पर बैठे हुए चाय में डबलरोटी भिगो कर खाते दो आदमी उनके बयान की चर्चा कर कहे थे। "तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि उग्रवादी और पुलिस वाले वारी बांधकर चलते है ?" . " "तो क्या इसका मतलब यह नहीं कि अफसरों, मंत्रियों और लीडरों के लिए पंजाब एक खेल का मैदान है ?" "विलकुल।" "तो क्या पंजाब में जो आग लगी हुई है, लोग घर छोड़-छोड़ कर "भाग रहे हैं, इन कुसियों वालों को पता नहीं ?"
जलता हुआ गुलाव /37 "पता कैसे नहीं होगा जी। खुद तो बाहर निकलते हैं तो मरे गोली पार न करने वाले कोट पहिनकर और दस बन्दूकचियो का लश्कर आगे और दस का पीछे, लेकिन जो लोग अकेले-टुकेले मर रहे हैं, इनका क्या जाता है।" "तो क्या यही समझा जाये कि सारी लड़ाई गहियों को है ?" "एकदम ! जनता वेचारी को कौन पूछता है।" "तुम तो लीडर जैसा-बोलते हो..." "चोप, गाली दी तो सारी चाय सिर मे डाल दूंगा । देख यनवारी,. गाली देता है।" "क्या कहता है ?" " 'लीडर 'भोक्ता है।" "न भई, चोर कहो, उचक्का कहो, लोडर मत कहो।" अविनाश मुस्करा दिया। चाय पीकर अविनाश ने बनवारी को आवाज दी, "मेरे मैथेमेटिक्स में डाल देना।" अब तक उसकी उलझन काफी खारिज हो चुकी थी। उसे ख्याल आया कि तोपी भाभी का सत्ती के हायो सन्देश आया था कि आज उनके यहाँ आये । वह उधर निकल पड़ा। उमका एकवारगी जी चाहा कि मंगल के यहां से लौटते हुए क्यो न हरदीप के यहाँ हो आये । फिर उसने इस स्याल को सस्ती से दवा दिया। पिछले कुछ असें से अविनाश को लगता रहा है कि दीप उमकी उपेक्षा कर रही है लेकिन फिर वह इसे अपना कोरा वहम समझ कर टालता जा रहा था, क्योकि इसके कोई ठोस कारण उसे नजर नहीं आ रहे थे। इसे चेक करने के लिए उसने तय किया कि हरदीप के यहाँ कुछ दिनो तक नहीं जाया जाये । इस पर उसने अमल भी किया, हालांकि उस पर प्रस्टिस भारी पड़ रही थी। पूरे पन्द्रह दिनो तक उसने जन्त किया। इन पन्द्रह दिनो में उसे कोई फोन, कोई चिट्ठी, कोई सन्देश हरदीप की ओर से या उसके घर के किसी अन्य मेम्बर की ओर से नहीं मिला। अपनी सीमा तोड़कर जब वह हरदीप के यहां पहुंचा या तो पूरे परिवार ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया लेकिन दो की योर से जो ठंडा ? 38 / जलता हुआ गुलाव और बुझा-बुझा-सा व्यवहार था उसने उसे छलनी कर दिया। वह तय नहीं कर पा रहा था कि वह ऐसा क्यों कर रही है अविनाश उसके प्यार की एक-एक बूंद के लिए तड़प रहा था लेकिन यह चीज बनवारी की दुकान पर बिकने वाली तो थी नहीं कि वह एक प्याले का आर्डर दे देता-पीता और पोकर निकल जाता। उसे आवाज दे देता-लिख लेना अपने मैथेमेटिक्स में। लेकिन यहाँ तो जिंदगी का पूरा मैथेमैटिक्स गलत हो रहा था। यह रकम किसी फार्मूले से हल नहीं हो रही थी। इसे हल करने में दीप की और सिर्फ दीप की सहायता की जरूरत थी और वही जैसे पूरे परिदृश्य से झलक दिखाकर गायब हो गई थी। अविनाश को दीप के साथ मुजारे हुए अंतरंग दिन याद आ रहे थे, जव वे साहित्य के बारे में घण्टों वातें किया करते थे। उन लोगों की बातें खत्म ही नहीं होती थीं। वे हैरान हुआ करते थे कि ये सात कव वज गये ? अभी तो पांच ही वजे थे। यह अँधेरा कव छा गया, अभी तो खिड़की से धूप कमरे में, विखरी पड़ी थी । एक-दो वार तो ऐसा भी हुआ कि कमरे की बत्ती आकर भरजाई ने जलाई । अब वे दिन सिर्फ स्मृतियों के पन्नों पर दर्ज थे । वह एक पुश्तैनी लाला की तरह इस खाते को सीने से लगाये फिरता है। एक ऐसे कर्ज की तरह पैनी, जिसकी उगाही न हो रही हो । दीप प्रकरण में अविनाश को पता ही नहीं चला वह कब बस्ती नौ का मोड़ मुड़ गया । नाले की पुलिया उसने सायकिल से उतर कर पार की । एक खट्टी-सी गंध उसे भीतर तक तिलमिला गई। मंगल के घर के सामने उसने सायकिल लॉक किया। मंगल को एक आवाज देने के साथ ही वह भीतर चला गया। एक लंबी मुद्दत तक मंगल किराये के मकानों में धक्के खाता रहा है । दुकान से इतनी आय थी नहीं कि जल्दी मकान बनवा लेता । पूंजी निकाल लेने से काम बिगड़ जाता, पांच साल पहले उसने यह जमीन का टुकड़ा खरीदा था और दो कमरों का सैट बनवाने में भाभी की अंगूठी तक बिक गई थी। दूसरे कमरे के पलस्तर वगैरा अभी शेष थे कि मंगल लोगों ने इधर शिफ्ट कर लिया था। पिछले पांच सालों में न ही तो जलता हुआ गुलाव /39 मंगल प्लाइवुड गरीदकर यालमारियां बनवा सका और न ही छूटे र मरे कपलस्तर लग सके। गहने देते वक्त तोपो भाभी ने बड़ा जिगरा दियाया था। बहती थी कि मकान भी तो एक तरह का गहना ही है । मोने के गहने में अवेली पहनूंगी, मकान जैसे गहने मे सभी रहेंगे। फिर आजवल गहना पहना ही कहा जाता है । वालियां उतारने के लिए गुण्डे कान खींच डालते हैं । चेनियां तो सरे राह उतर जातो हैं ।-एक दिन अखवार में पढ़ा था कि चूड़ियों के लिए चोर यांह काटकर ले गये । पांच बरस के लम्बे अरमे में विवाह, शादियों बार पार्टियों में वे जव भी शामिल हुई हैं और करवा-चौथ के दिन जब भी सजधज कर जनकी के घर व्रत पूजने गई हैं, उन्होंने एक ठंडी सांस भरी है और बाहो पर चमपती चहियों और कड़ों से, चेनियों और मटर माला से, यालियों और कांटों में लाखो बार नजर चुराने की कोशिश की है। पांच साल बाद आज जव न हो तो उस छूटे कमरे के पलस्तर लग सके हैं और न ही वह वीस वायदो के वावजूद एक मुंदरी तक बनवा कर दे सका है, जबकि रोज ययवार में लिखा रहता है कि फलां गांव से सभी हिन्दू परिवार पलायन कर गये, पचास शरणार्थी दिल्ली पहुँचे.. गीता मन्दिर मे ठहरे हिन्दू परिवारो को काणिक दास्तां पढ़- पढ कर तोपी भाभी के पेट में मरोड उठने लगती। वे जब सामने वचनी को इकवाल कोर से बातें करती हुई देखती और यासकर तब जब वे उनके घर की ओर देखफर बातें कर रही होती तो उनके जी मे हूक-सी उठने लगती। उन्हें लगता कि बचनी यही कह रही होगी कि उसकी नजर तो तोपी के मकान पर है। कब ये लोग हरियाणा की तरफ निकलें और कब उसका कब्जा हो। ऐसे में वह कई दफे अपनी जिम्मेदारी की भावना से प्रेरित होकर पानदान की नाक बचाने के लिए वहा दिये गये तीस हजार को याद करती तथा बेहद दुखी हो जाती। मंगल की वहन निर्मला हायर सेकंडरी पास करते-करते मकानो एकदम जवान हो गई थी। उस दिन रात को रोटी पाने के.
- 40/ जलता हुआ गुलाव ने हाथ घुमाते हुए कहा,"कुछ ख्याल भी है, निम्मो पूरे सोलह की हो गई है। कोई ठीक-ठाक-सा वेऐवा लड़का देखकर इसके हाथ पीले कर दो।" मंगल ने आसपास रिश्तेदारी में बात चलाई, लेकिन कोई ढंग का लड़का मिला नहीं। लड़के वालों के मां-बाप सोने की कीमत की तरह अकड़े हुए थे। 'सब लेखों-संजोगों की बात है' पर विश्वास करते मंगल ने निम्मो को बी० ए० में दाखिला दिलवा दिया। कालिज दूर था। रिक्शा न तो सूटेबल था न विश्वसनीय, लिहाजा निर्मला को सायकिल खरीद कर देनी पड़ी। दुपट्टे की वी (v) बनाकर, दो गुतें आगे फेंककर, नये सैंडिल पहन कर, नये सायकिल पर जब टिनोपाल में धुली सफेद कबूतरी की शान से जब उडड-पुडड जानी निम्मों सायकिल की रफ्तार बढ़ाती तो बीसियों लड़कों का दिल धक से रह जाता । रंग-रूप तो कम्बख्त ने पहले ही माँ का पाया था । सन् चालीस में जव वह नीला सूट पहन कर निकलती तो. लोग शर्ते लगाते कि पूरे ऊड़ी क्षेत्र में उस जैसी खूबसूरत लड़की को ढूंढ कर दिखाओ। एक वार चाचा के साथ लाहौर गई तो उसने अपने कानों से सुना-"भई खूबसूरती तो काफिरों के पास भी लाजवाब है।" सन्तोप ने अभी कपड़े धोने का काम खत्म किया था कि निम्मो ने गुसलखाने में झाँका, "लाइए कपड़े छत पर डाल दूं।" "देखो निम्मो, जव पढ़ रही हो तो काम के लिए उठने की कोई जरूरत नहीं ।" निम्मों मुंह लटकाये चुपचाप अन्दर चली गई। सन्तोष ने अभी छत पर वाल्टी रखी ही थी कि ठप्प से एक रोड़ा,. जिस पर कागज लिपटा था, छत पर गिरा। फेंकने वाला जैसे वाल्टी की आवाज का इन्तजार ही कर रहा था। सन्तोष सूखने के लिए कपड़े डालना भूल गई। रोड़ा हाथ में लिये उसने अपने को रोंस पर ढेर हो जाने दिया। दिल की धड़कन और 'शाने पंजाव' की स्पीड में कोई । - फर्क न रहा। कागज खोला। पढ़ा। काटो तो बदन में खून नहीं। खसमानु- खानी-~-मर जाये भूतनी कहीं की। इस निम्मो घडिम्मों पर नई जवानी चढ़ी है । यह चुडैल पूरे खानदान पर कालिख पोत कर जायेगी। आग जलता हुआ गुलाब / 41 लगे ऐसी जवानी को जो पूरे खानदान को अपमान के अन्य कुंए में फेंक दें। कल को किस मुंह से हम अपनी विरादरी में अपनी बच्ची का रिश्ता टूढने निकलेंगे? (हालांकि उसके यहाँ अभी कोई बच्चा नही था) सभी कहेंगे कि वही लड़की है न जिसको भुआ पड़ोसी के साथ भाग गई थी। पता नहीं कब से चल रहा है यह सब और मुझे खवर तक नहीं । अडिए निम्मो एक बार मुंह से कुछ फूटतो तो भरजाई ही समझा न उसने यायिर'मा नहीं.. पेट से नही जन्मी तो क्या ? मां की तरह पाला है। दुख-सुप में प्यार की छाया दी है। उसकी सांस के साथ सांस ली है फिर भी उसने पराया समझा। और पिछवाडे वालो का इन्द्रजीत मोया कैसा शरीफजादा बनता है। जहां भी मिलता है 'मरजाई जी, सासरीकाल' जरूर कहता है। इन दफा होने मिलटरी वालों को सरकार दो महीने की छुट्टी इमलिए देती है कि छुट्टै सांड की तरह पड़ोसियो की बगिया मैं मुंह मारते फिरें। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर करे तो पर क्या ? क्यों न अभी इन्द्रजीत को मां को जापरी-खरी सुनावे । पता चले उसको कि उसका सपूत क्या-क्या गुल खिला रहा है। लेकिन इससे होगा क्या? वदनामी अपनी होगी। लड़की वालो को बहुत कुछ वरदाश्त करना पड़ता है-वह अपने मुंह से तिल कहेगी लोग पहाड बना देंगे। वह पन की यात उठायेगी, लोग गर्भ गिरा आने तक की कल्पना पर पहुंचेंगे । उसने समझदारी से काम लिया । हालात के धुएं का गोला उसने अपने भीतर उतार लिया। मंगल से सलाह की (टोनू को छोटा समझा जाता था और घर के ऐसे मामलात में उसकी सलाह जरूरी नहीं समझी जाती थी) और अगले दिन इन्द्रजीत को घर बुला लिया। उसी दिन शाम को मंगल ने इन्द्रजीत की चाची विद्यावती से रिश्ते को बात पपकी कर दी। छुट्टी खत्म होने से पहले इन्द्रजीत का विवाह निम्मो से कर दिया गया। उन दिनों प्रकाश सिंह बादल पंजाब के चीफ मिनिस्टर धे। उनको वि युछ आज की छवि से भिन्न थी। वे तब न तोदाड़ी पली छोड़ते 42 / जलता हुआ गुलाव . थे न ही आज जैसे उत्तेजक भाषण देते थे, जो कि शायद उनके राजनैतिक स्टैंड की मजबूरी है। हिन्दू-सिखों के आपसी सम्बन्धों में कहीं एक दरार तक नहीं थी। यों यह सम्बन्ध छियासी तक भी वहुत झकझोरे जाने के बावजूद काफी हद तक नार्मल है । लेकिन फिर भी उन पर कहीं न कहीं एक संदेह की छाया डोल रही है। भिण्डरावाले ने अभी सिखी का जलाल उठाया नहीं था, लिहाजा हिन्दुओं में इसकी प्रतिक्रिया भी नहीं थी। हिन्दुओं का सिखों से वैवाहिक सम्बन्ध बहुत सामान्य लिया जाता है । स्वयं इन्द्रजीत सिंह के चाचा-चाची हिन्दू थे । बे-औलाद होने पर उन्होंने बड़े भाई गुरमुखसिंह के दूसरे लड़के को गोद लिया और गुरू घर में श्रद्धा होने के कारण उसे सिख बनाया। निम्मो की खुशी के लिए सन्तोष ने क्या कुछ नहीं किया। जहाँ उसने चाहा वहीं उसकी शादी की और अपनी विसात से बाहर जाकर की। वार-बार यही दिमाग में आता था कि कोई यह न कहे कि मां मर गई तो किसी ने चाव न पूरे किये। लेकिन किस्मत की मार के आगे ह भी क्या करती । जून चौरासी में ब्ल्यू स्टार आपरेशन हुआ। पंजाव अन्धे कपy के हवाले कर दिया गया। प्रेस सेन्सर कांच की अपारदर्शी दीवार बना जिससे आप कान लगाकर भी एक दिल दहला देने वाली चीख तक नहीं सुन सकते थे। सैनिक छावनियों में खबरें प्रेतकथा की तरह पहुँच रही थीं। 8 जून को इन्द्रजीत गंगा नगर की लालगढ़ छावनी में था। उसने सुना-भारतीय फौज ने हरिमंदिर साहब में टैंक चढ़ा दिया। उसने सुना-अकालतख्त और दरवार साहब तहस-नहस कर दिये गये । आनंदपुर साहब में गोला- बारी हुई । तरनतारन का गुरुद्वारा उड़ा दिया गया। उसने यह भी सुना कि गांवों में सिखों की आवरू को कीचड़ में लथपथ किया गया। सिख नौजवानों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है। वेशक इन खबरों में अतिरंजना थी, लेकिन उनके पास इसे जांचने का कोई मीटर न था। उसके दिमाग में अरदास की एक सतर बज रही थी "सीस दित्ते, वंद-बंद कटाये, खोपड़ियाँ लुहाइयाँ, चरखियाँ ते चढ़े, आरियां नाल चिराये गये धरम नहीं हारिया।"
जलता हुमा गुसार / 43 इन्द्रजीत वेशक रोज पाठ नही करता पा। गुरबारे भी रोग नहीं जाता था, लेकिन प्रोफेसर दर्शनसिंह या कीर्तन उसे अच्छा सगा पा। उसे पता नहीं पा लेकिन उसके भीतर छिपी हुई काई गहरी पोग पी। इसे शायद संस्कार कहते हैं । उमे मगा कि यह नीज हिल गई है। जराके हिल जाने से कोई सन्तुलन नहीं बन रहा । उस हिल जाने से निक अनुशासन की दीवार भी लद-सी गिरती पनी गई। उसके सामने दो फौजी गाडियां पंजाय की ओर जाने के लिए निकल पडी । सोचने में एम. पल भी जाया पिये यह उनमें से एक में सवार हो गया। मार्ग 1857 मे बैरकपुर छावनी में गाय पो पर्थी सगे भारतूस दिये गये थे। इन्हे मुंह से काटना पड़ता था और लोगो ने उसके इस्तेमाल से इनकार कर दिया था। इन्द्रजीत अपने साथियो के साथ पकड लिया गया और जोधपुर जैस में डाल दिया गया। यह सब उसने अपनी एक चिट्ठी में सन्तोष को लिया। तोपी समझ नहीं पाई कि उसने ठीक किया या गलत। वह इस गुत्थी को योलना पाहतो तो उसका सिर दर्द करने लगता, लेकिन यह जरूर पाहती कि उसे जल्दी छोड़ दिया जाये ताकि यह निम्मो और अपने दो बच्चे को संभाले । क्योकि निम्मो ने जालघरभाने के प्रस्ताव पर साफ इंकार कर दिया था। अब उसीयूयगरती पर एक कलोस-सी आ गयो पी। चेहरे पर एक ऐसी घाया थी जिरो गदिश युन लेती है। . अविनाश जय घर पहुंचा तो सन्तोष भाभी गुसलपाने में पेटीकोट- ब्लाउज पहने कपड़े धो रही थी। अविनाश सीधा कमरे में पला गया और पषा चला लिया। उसने जेब से हमाल निकाल पसीना पोछना चाहा लेकिन रूमाल से पसीने की आसी हुई गध सूंघते हो वापिग जेष में डाल लिया। उसे लगा कि उसका कुछ भी नियमित नहीं है । कभी हो भी पायेगा, इसमे उसे सन्देह था। भाभी पेटीकोट ग्लाउज में ही उसके लिए एक गिलास पानी लेकर आ गई। इससे पहले ऐसा नहीं होता था। एक बार अविनाग में उन्हें पर में पेटीकोट-ग्लाउज पहनकर घूमने से मना कर दिया था। सबसे 44 / जलता हुआ गुलाब अगर उनके पेटीकोट-ब्लाउज पहने होने पर वह घर में आ जाता तो वे पिछले कमरे की तरफ भागती और साड़ी लपेटकर ही अविनाश को नमस्ते का जवाब देतीं। उस दिन वे अधिक परेशान नज़र आ रही थीं और क्या करना चाहिए का भाव भूल गई थीं। पानी का गिलास अविनाश को देकर उन्होंने कहा, "टीनू को पुलिस पकड़कर ले गयी।" इतना कहते ही उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। अविनाश ने उनका हाथ पकड़कर सोफे पर विठा दिया और जो पानी उसके लिए लाया गया था, उसने भाभी को दे दिया। - "कव?" "कल !" "वह पिछले - "लेकिन क्यों ?" "वह दो-तीन लड़कों के साथ देवी तलाव घूमने गया था।" "इसमें पुलिस को क्या ऐतराज ...?" कुछ दिनों से शिव सेना में चला गया है। "मोह ! तो यह बात है।" "मंगल जमानत वगैरा के लिए गए क्या ?" "कल से भटक रहे हैं, लेकिन कोई नहीं सुनता । 'कल रात को साढ़े ग्यारह बजे घर आए। आज भी सुबह से गए हैं बगैर नाश्ता किए।" "वाकी लड़के ?" "एक तो सुरेश है, इसके साथ ही पढ़ता था। उसका बाप भी टक्करें मार रहा है।" "आपने कुछ खाया या नहीं ? उसे अचानक ख्याल आया।" "तुम्हारे भाई साहव जव नाश्ता ही नहीं कर गए और टीनू भी भूखा बैठा होगा, तो मुझे भूख कैसे लगती।" "खाली पेट कपड़े धोये जा रही हैं फटाफट ।" "अकेले खाने को मन करता है भला?"
? जलता हुआ गुलार 145 गोमा करते हैं पहले मैं अभी कुछ ले आता हूँ वाजार से। म मौ भूख लगी है।" "नही घर में ही कुछ बना लेती हूं।" "टममं वक्त लगेगा। आप चाय का पानी रख दें।" अविनाश ने नुक्कड़ की दुकान मे पकोडे सरीदे और एक दुकान में बिल रोटी। रास्ते में वह गही सोचता रहा कि यदि वी० ए० करने के बाद टीनू को नौकरी मिल गई होती तो क्या तब भी उसने शिव मैना जापन की होती ? उसे सहसा हरपाल की याद आई । हरपाल को भी अभी तक काम नहीं मिला। हो सकता है उसे सिय स्टूडेंट फंडरेगन या दमदमी टकसाल का चम्बक अपनी तरफ खींच ले या बीच चुका हो । हमारे वक्त में साप्रदायिकता को आग क्या इतनी तेज है कि इससे बचना वतई मुश्किल होता चला जाएगा? टीनू और हरपाल की जीवनधारा को इस आग से बचाया नहीं जा सकता? वे कौन-सी चीजें हैं जो टीनुओं और हरपालों को इस अन्धी नदी में झोंक रही हैं ? यह आग जितनी नुकसानदेह एक वर्ग के लिए है उतनी ही दूसरे वर्ग के लिए, क्या जनता इसे समझ नहीं रही ? अविनाश के घर लौटने तक भाभी साडी पहन चुकी थी। रसोई में चाय का पानी खौल रहा था। अविनाश ने दो प्लेटें लेकर पकौड़े और डबलरोटी के पीस रप दिए। "आज कपडे धोने का शाम का वक्त क्यो चुना आपने ?" "पूरा दिन न तो पानी होता है न ही मरी विजली। समझ नहीं आता कारखानों में काम कैसे चलता होगा? काम नहीं चलेगा तो मजदूर याएंगे क्या?" "उनको चिन्ता किसे है ? जियें-मरें जैसे भी रहें कौन पूछता है "सरकार बिजली का कुछ करती क्यो नही ' मोटे-मोटे विल भेजने को और हैं लेकिन पूरा दिन गर्मी मे सहते रहो उसका कुछ नहीं।" "भई, सरपार विसी है पंजाव ममस्या में । हमे शर्म आनी चाहिए ऐसी छोटी-छोटी समस्याएं सरकार के सामने रखते हुए । कम-से-कम देश की एकता और अखण्डता का ध्यान रखा जाए।" " 46/ जलता हुआ गुलाव भाभी अविनाश की इस टोन को पहचानती थीं। उन्होंने पूछा, "और पंजाब-समस्या का क्या हो रहा है जनाव ?" "उग्रवाद इस समय विश्व-समस्या बनी हुई है। स्थिति गम्भीर है लेकिन नियन्त्रण में है।" "पूरे लीडर हो गये हो।" "गाली मत दो भाभी। हिन्दुस्तान का पढ़ा-लिखा समझदार सिर्फ क्लर्क बन सकता है । लीडर होने के लिए आजकल गुण्डागर्दी जरूरी है।" "लाली कह रही थी कि पुलिस बड़ी बेरहमी से पीटती है। फिर . पंजाब पुलिस तो खसमानुखानी वैसे भी उग्रवादियों के साथ मिली हुई है। मुझे तो टीनू के बारे में सोचकर वहुत डर लग रहा है।" टीनू की याद आते ही भाभी संजीदा हो गई। अविनाश अपने डर के बारे में सोचने लगा। उसने उस दिन सुबह एक पांच साल के बच्चे को स्कूल जाते हुए गातरा पहने देखा था। उसे याद आया जिन दिनों वह खालसा कालेज में पढ़ता था उन दिनों उसका कोई भी सिख दोस्त पूरी दाढ़ी नहीं रखता था। उसे महँगाई से डर लगता था। उसे बहुएँ जला देने वाले और दहेज खा लेने वाले सभ्य राक्षसों से डर लगता था। वह मन्त्रियों के बयानों से डरता था। वह दंगों से बहुत भयभीत था। शिवसेना और दमदमी टकसाल उसे डराते थे। उसे मौलवियों, ब्राह्मणों, ग्रन्थियों और पादरियों से डर लगता था। उसे ज्योतिषियों, सांपों और जहालत से भरी बूढ़ी औरतों से डर लगता था। वह अमेरिका और रूस द्वारा तैयार की जा रही बारूद की फसल से भयभीत था। आरक्षण के कोटे से वह डरता था। दफ्तर में अपने तथा अपने सहयोगी कर्मचारियों पर अनुशासन के नाम पर दिया जाने वाला धीमा जहर उसे डराता था। उसे उन कारों से डर लगता था जो सड़क पर चलते हुए इतनी धूल उड़ाती हैं कि उस धूल से आसपास की झोपड़ियां भर जाती हैं। उसे मौत. उतना भयभीत नहीं कर पाई जितना कि कचहरियों में इन्साफ के लिए तारीखें सुनती जिन्दगियां। कल ही परियाम उससे कह रहा था कि "इस वक्त हर आदमी । जलता हुआ गुलाय/47 नोचने-रासोटने में लगा है। मेरा दिल सुवह बम पकड़कर आफिस याने से शुरू होता है। इस मे यहाँ तक कि टिकट तीन रुपये पंमठ से की है । यदि कंडक्टर को मैं पांच का नोट देता हूँ तो यह मुझे एक रुपया वापिस करता है और उमका वोलचाल ठीक रहता है । यदि छुट्टे देने हो तो वह कभी पैसट पैसे नहीं मांगता। कहता है निकालो हे पचहतर पैसे। पूरे पैसे देने पर इस तरह मेरी ओर देखता जैसे मैं कोई कुस्यात अपराधी हूँ। मैं उमे तभी गरीफ नर आता हूँ जव पांच का नोट उसे + और याकी रुपया लेकर सन्तुष्ट हो आऊ। पूरे दिन का सफर इमी तरह मटता है। बाजार खरीददारी के लिए निकले तो दुकानदार चाहते है कि हमारे कपड़े भी उतार लें । "तुम्हारा बटुआ निकल जाए तो जरा पुलिस वालों के पास जाओ और कहो कि रिपोर्ट दर्ज कर में वे तुम्हें कच्चा पा जाने वाली नजरो से देखेंगे। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं युद को इम कीचड में लपपप होने से बचा नहीं सकता कोई तुम्हारे कमरे का रास्ता भी पूछे तो मुझे कहना चाहिए कि कुछ हथेली पर गिराओ, नहीं तो चहते-उतरते रहो सीढ़ियां । फिर अगर वह आदमी उतरते वक्त हांफता हुआ मिल जाए तो फहूं कि मुझे क्या मालूम या भैया, तुम अविनाश बाबू के कमरे को पूछ रहे थे ? मैं तो ममझा कि विनाश का रास्ता पूछ रहे हो?" कहकर हो-हो करता हम दिया। जवाब में अविनाश हंस तो नहीं सका लेकिन मुस्कराकर रह गया।"उस मुस्कराहट मे जहर था। पटिया ढांचे मे पनप रही धूतों, येईमानों की और आदमखोरो की फसल का जहर । इस घुटन में मांस सेने वाली में से शायद ही किसी के पाम इस जहर का काट हो । रात के पदें शहर पर गिर चुके थे। "अच्छा भाभी, मैं चलता हूँ। मगल का भी कुछ पता नहीं कर घर लौटे।" "रक जाओ, अभी जल्दी क्या है। तुम्हारी कौन-सी घर में लाल चूई वाली घंटी है।" उन्होने मजाक मे कहा लेकिन अविनाश ने मजाक को छुने न दिया और कहा, "कल सुबह चक्कर लगाऊंगा। अब चलता हूं।" "घाना खाए बिना तो जाने पाओगे नहीं।"
48/जलता हुआ गुलाव भाभी के ऐसा कहने का मतलब था कि अब टस से मस नहीं। अविनाश उनके अधिकार-क्षेत्र को जानता था। उसने सैंडिल का वक्कल खोलना शुरू कर दिया। "यह हुई न वात। मैं आलू की सब्जी बना लेती हूँ फटाफट । " अगर जाने की जल्दी नहीं तो मांह की दाल बन सकती है।" "आप बेशक मांह वनाइए। अव तो मंगल से मिले विना हिलूंगा नहीं।" अविनाश ने टू-इन वन पर रेशमा की कैसट चढ़ायी और सोफे पर पसर गया। अविनाश को स्याल आया कि उसने सिल्की को अभी तक देखा नहीं । अव तक तो वह पांच चक्कर लगा चुकी होती । कहीं वह वीमार तो नहीं पड़ गई। मंगल के सामने वाले घर में मौसी इकबाल कौर की रहने वाली पोती का नाम है सिल्की । चार साल की वह चपला अविनाश का सिर खा जाती। उससे सिरखपाई में उसे मजा आता। आते ही लपककर अविनाश की गोदी में बैठ जाती या कमरे की तमाम चीजें उथल-पुथल कर देती। भाभी भी उसे झिड़कती नहीं। ज्यादा से ज्यादा किसी टूटने वाली चीज को देखकर कह देती, "न सिल्की टुटू हो जाएगा।" सिल्की की प्रतिध्वनि होती, "टुटू हो जाएगा ?" "हाँ, टुटू हो जाएगा । हौवा पकड़ लेगा?" "हौवा पकल लेगा?" "हाँ, पकल लेगा और खा जाएगा।" "खा जायेगा ?" "हां, खा जाएगा।" फिर सिल्की उस टूट जाने वाली चीज को यथावत रख देती और पूछती, "अव तो हौवा नहीं पकलेगा न?" "हां, नई पकलेगा।" "नई खाएगा न?" "नई खाएगा।" भाभी के दाल गैस पर रख आने पर अविनाश ने पूछा, "क्या बात - अविनाम दो चीजों के बारे में सोचने लगा एक यह दिml) जलता हुआ गुलाम /4 है, बाज सिल्को नहीं दीख पड़ती?" "कुछ पूष्टी नही। जब से टीन में त्रिशूल पहना है, मोमो इकबार कौर के परिवार ने हमसे जैसे रिश्ता ही तोड़ लिया। अब वे न तो सो मुंह बात करती है न इघर आती-जाती है। "एक-दो बार सिल्की को घर याते हुए मैने पद देखा है, लेपिन पीछे से मौसी ने आपान दे दो, 'योधर नई जाणा।'... मेरा जी करता है कि एक दिन सिल्की इधर हिवर ही आ जाए। उसे अच्छी तरह घूम तूं। मौगो का बर-विरोध हमारे साय है तो वेगक निकालें । उस मासूम बच्ची पर क्यो अत्याचार करती हैं ?" अविनाश मामी की समझ के धुंधलेपन पर बात करना चाहता था लेकिन इसका मौका नहीं मिला। दरवाजे पर दस्तक हुई। भाभी उठकर चली गई । दरवाजा खोला। मंगल आ गया था जाने कहाँ-कहाँ के धक्के खाकर। भाभी ने आंगन में ही बता दिया कि अन्दर अविनाश इन्तजार कर रहा है। टीनू के बारे में वे चेहरा देखकर ही समा गई होगी इसलिए कुछ कहा नहीं। "वहुत दिन बाद आए तुम ।" मगत ने जश्फी डालकर रहा। "माए कहाँ, मैंने बुलवा भेजा था।" भाभो ने मगल को पानी देते हुए शिकायती नजरों से अविनाश की तरफ देखा। "टीनू से मिले ?" खाली गिलास लेकर उन्होंने मंगल से पूजा "हाँ । खाना खितारर आता हूँ।" "उसे छोड़ने के बारे में बात हुई ?" अविनाश ने पूछा। "हो० एस०पी० तो मान गए थे लेकिन छोड़ने में पहने उन्हें डी सो० से बाउरला बहरो नपता या। डी०सी० मदनरकदिन्टि के कार में नहै। क्त नारा हो जाएगा। शमां ने बहन कार की। सार ही जा रहा सारा दिन, उसको एप्रोच भी अच्छी है। अंग्रेजी भी की बोल लेता है।" - कामा नारकर फेंके हुए उनतालीस साल हो गए हैं ले'ि को प्रभावशाली माना जा रहा है जो अच्छी अंग्रेजी A 50 / जलता हुआ गुलाब परियाम का कहना था कि "देश के प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रालय में उन लोगों को ज्यादा पसंद करते हैं जो अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं। यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में मन्त्री होने के लिए आवश्यक हो जाएगा कि वह दून स्कूल का विद्यार्थी रहा हो।" उसे खुद अपना किस्सा याद आया जव एक वार वह हिन्दी प्रवक्ता की नौकरी के लिए साक्षात्कार देने गया था। बोर्ड के अधिकारी उससे सभी प्रश्न अग्रेजी में पूछ रहे थे। वह उत्तर हिन्दी में देता रहा। इसे उसकी कमभक्ली' और 'बदतमीजी' दोनों समझी गई, जैसा कि बोर्ड के एक अधिकारी ने कुछ वर्षों बाद एक मैरिज पार्टी में ह्विस्की गले में उड़ेलते उसे बताया । अगला पैग ढालते हुए उन्होंने कहा था, "इन्टर- न्यूज में हिन्दी बोलने वाला केंडीडेट पूअर एपियरेंस देता है । "एकदम यतीम के माफिक ! ऐसे गांडू लोग सिर्फ आयुर्वेदिक दवाओं के नाम लिखने के काम आ सकते हैं।" उसका जी चाहा था कि उसे टाई से पकड़कर घूसे जमाए, नहीं तो टाँगों से पकड़कर घसीटना शुरू कर दे लेकिन पड़ोसी का मेहमान होने का ख्याल आया, और वह मुठ्ठियाँ भौंचकर रह गया। दूसरी बात जो वह सोच रहा था, यह कि बाइ द वे अगर कहीं उसे पुलिस ऐसे किसी जुर्म में विलावजह गिरफ्तार कर लेती है, तो उसका क्या होगा ? उस जैसा कोई भी आदमी, जिसकी उच्च अधिकारियों तक न कोई जान-पहचान है, न दे सकने के लिए धन, पुलिस के शिकंजे से छूटने के लिए क्या कर सकता है ? किसको आवाज दे सकता है ? मंगल ने मुंह-हाथ धो लिया था और कपड़े वदल लिये थे। "तीवा ! कितनी गर्मी है ?" उसने कहा । "हाँ" "तुम देख लेना अविनाश, पंजाब में हिन्दुओं का रहना दूभर हो जाएगा।" आराम से पसरते हुए उसने कहा। "नहीं, ऐसी बात तो नहीं है।" "कमाल करते हो यार । तुम किताबों में खोए रहते हो या कुछ सुध-बुध भी रखते हो?"
जलता हुआ गुसार / "पंजाव ही क्या मैं तो यह मानता हूँ कि पूरे हिन्दुस्तान में हिन्दुओं में ज्यादा उपेसित तवका कोई नहीं होगा। दुनिया में गायर ही ऐसी मिमाल होगी कि अल्पसंख्या वाले अल्पसंख्या-अल्पसंख्या का शीतंन करते- फरते बहुसंख्यक की छाती पर सवार हो जाएं।""तुम मुसलमानों को स्थिति पर गौर करो। संतालीस में पता चल गया कि हमारा-उनका वव एक साथ गुजारा नहीं होगा। देश के टुकड़े किए गए। पाकिस्तान बना दिया गया । जव पाकिस्तान बन गया तो सभी मुमलमान अपना डंडा-डेरा उठाकर वहां क्यों न चले गए ? वे फिर हमारी छाती पर मवार हैं, बेतहाशा आवादी वढा रहे हैं। क्या आने वाले सालो में हम उन्हें एक और पाकिस्तान काट कर देने के लिए तैयार हो सकते हैं ? उन्हें कहें कि भैया हम तो हम दो हमारे दो' का ख्याल करते रहे हैं, सेविन तुमने जो चार-चार वीयियों और सोलह यच्चो को जन्म देने से शरह से इजाजत लेकर नेकख्याली को है। उसके एवज में हम तुम्हें इधर अलीगढ़ और कश्मीर का इलाका खुश होकर दे रहे हैं। अल्ला मियाँ तुम्हारा इकबाल बुलन्द करें। हैदरावाद और गाजियाबाद भी पाने की तैयारी करो।" मंगल ने उठकर सिगरेट सुलगाई और लम्बा कश लेकर पहा, "तुम टीनू का शिवसेना में जाना गलत समझते हो न?" "हो, मुझे लगता है कि इससे.. "मुझे भी पहले ऐसा ही लगता था कि इससे साप्रदायिर तनार बढ़ेगे । पर यह गलत है, मेरे प्यारे । बिल्कुल गलत । मुसलमान अपने को मुसलमान कहने मे फक्र समझता है । सिप अपने को सिरा वहने के पोरर समझता है, लेकिन हिन्दू अपने को हिन्दू कहने में हिचरता है । उसे अपने को हिन्दू कहने में शर्म लगती है। क्यो? क्योकि खुद को हिन्दु रहते मात्र से ही वह फिरकापरस्त ममझा जाता है। पारिस्तान में हिन्द- सभा को करपना भी नहीं की जा सकती, उकि हिन्दुनन लोग पांव जमा रही है । हिन्दुओं को अपनी महान 52 / जलता हुआ गुलाव हृदयता का यही सिला मिला कि आज आप जैसे प्रगतिशील उसे जुर्म के कठघरे में खड़ा कर रहे हैं । वह जिन्दा रहने का, आत्मरक्षा का अधि- कार भी मांगे तो साम्प्रदायिक है। अगर हिन्दू समाज बड़ा लिवरल रहा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि सभी उसी की गर्दन नापते चले जाएँ।" "तुम किस तरह हिन्दू को दूसरों से ज्यादा दवा हुआ देखते हो ?" "इसके मेरे पास ठोस सबूत हैं और सबूतों के वगैर मैं वात नहीं करता । सुनो । 'कश्मीर सरकार अपने यहाँ मुसलमानों को हिन्दुओं की अपेक्षा नौकरी के ज्यादह मौके दे रही है तो यह नाजायज नहीं है। .."चुना तो इस सरकार को हिन्दू-सिखों सभी ने था फिर यह 'सरकार' न होकर 'पंथक सरकार' क्यों हो गई ? पंथक सरकार अपने को पंथक सरकार कहती है तो यह नाजायज नहीं है । 'मंत्रियों में एक भी हिन्दू मन्त्री का चेहरा नज़र आता है तुम्हें ?..'मार्किट कमेटियों के पदों के लिए मनोनीत किए गए कितने मेम्बर हिन्दू हैं ? एक भी हिन्दू लिया गया हो तो शर्त बाँध लो । सिखों ने आज तक कभी साफ दिल से उग्रवाद को निन्दा की है ? इतने वेकसूर और मासूम हिन्दू मौत के घाट उतारे जा रहे हैं. यदि सिख नैतिक तौर पर इस वतीरे को गैर-इन्सानी समझते हैं तो इसके विरुद्ध गुरुद्वारों से हुक्मनामा क्यों नहीं जारी किया जाता ?" मंगल ने सिगरेट का टुकड़ा गिलास में फेंक दिया और उठकर नई सिगरेट सुलगा . ली। "अपनी पुलिस को जानते हो भाई । इनका एक ही काम रहा है । जहाँ कहीं लड़ाई हो रही हो मजे से होने देते हैं ।. लड़ाई के बाद पहुँच जाएंगे। चार जूते एक को लगाएंगे। चार दूसरे को। दो सौ एक से वसूल करेंगे, दो सौ दूसरे से । मूंछों को ताव देंगे और जाकर वर्दी पर पीतल के काम को चमकाना शुरू कर देंगे। ऐसी पुलिस उग्रवादियों का मुकाबला कर ही नहीं सकती.. करती भी नहीं। कभी पांव के नीचे वटेर आ जाने की तरह उनके हाथों एक-दो उग्रवादी मार दिए जाते हैं तो शोर मच जाता है । मन्त्री तक बयान देने लगते हैं कि फलां कार्रवाई जलता हुआ गुलाब /53 बिल्कुल गलत और नाजायज घो। बरनाला खुद एक तरफ गुरुद्वारे में जूते माफ करते हैं। यह किम तरह के राजनतिक दांवपेंच है ?" भाभी ने आकर पूछा, "खाना तैयार है । मेज पर खाएंगे या फर्श पर?" "मुझे तो फर्श पर बैठ कर ही अच्छा लगता है । यविनाम से पूछ लो।" "फर्ग पर ही बैठेंगे।" भाभी ने एक कोने में दरी बिछा दी और प्लेटे लगानी शुरू कर दी। मंगल ने कटे हुए प्याज पर नीबू निचोड़ कर कहा, "नुम अयबारात देखते रहे हो । बीसियो वार रिपोर्ट आ चुकी है कि पाकिस्तान में प्रशि- क्षण प्राप्त करके उप्रवादी चुपचाप सीमा पार कर आते हैं और पजाय में तहस-नहम मचा देते हैं। इसके इलावा तस्करी का कितना बड़ा बाजार इम बाहर से चल रहा है जिसकी कल्पना नहीं की जा मरतो । एकाध अग्रवार ने तो दवे-चुपके तस्करी में किसी नेता का हाथ होने की बात भी कही थी।"चाहो तो दाल में नीबू डाल लो.." "नही.. चलेगा..." "अच्छा तो मैं कह रहा था कि बार्डर सील कर देने के लिए इतनी बार बात उठाई जा चुकी है, इतना गोर मचा है, लेकिन सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रेंगती। सरकार इतना भी हिफाजत या कदम रठाने को तैयार नहीं। और आये दिन मासूम और बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा है । "सरकार कर क्या रही है ' लाशो का हिसाब लगा रही है ? सरकार की सामोशी से लगता है कि मौन के इम पिनौने खेल में उसे कुछ भी लेना-देना नहीं.. नेतागण आएंगे, बयान जारी करेंगे एकता और अखण्डता का और चल देंगे।" अविनाश ने भाभी को भी साथ खाने के लिए बला लिया। चपातियाँ पर्याप्त मात्रा में सेकी जा चुकी थी। उन्होंने रसोई की कुण्डो चढा दी तौलिया से पसीना पोंछा और साथ आ बैठी। मंगल लयालब भरा हुआ था। जैसे बहुत दिनो बाद कोई दिल की गुनने वाला मिला हो । अपनी बात का छूटा सूत्र हाथ में लेते हुए उसने पहा, "हजारो हिन्दू उजड़कर चले गए हैं। अच्छे-भले खाते-पीते लोग 54 / जलता हुआ गुलाव आज शरणार्थी बन गए हैं। उनसे ये लीडर गले में पल्लू डालकर पाहते हैं, अपने-अपने घरों को वापिस चले जाइए।".''दाल का एक सुड़का मारकर उसने कहा- “उनका जवाब होता है-'कहाँ चले जाएं । उन इलाकों में भेज रहे हैं आप जहाँ आप खुद बन्दूकधारियों के लश्कर के विना नहीं जा सकते ।' 'घर से बेघर होने का किसी को शौक नहीं होता । न ही हम यहाँ पिकनिक मनाने के लिए निकल आए हैं। हमारे जान-माल की सुरक्षा हो तो हम आज ही चले जाते हैं । पानी दो।" पानी पीकर उसने सवाल किया, "गोलियों के सामने संगीनों के साये में जीना आसान होता है ?" अविनाश टुकुर-टुकुर देखता रहा। यह सवाल उसका अपना दंश । . था। "तुम्हारा काम-काज कसा चल रहा है ?" अविनाश ने पूछा। वह उसकी साम्प्रदायिक कोण से की गई बातों को खदेड़ना चाहता था, लेकिन उसे लगा कि यह वक्त उन बातों का नहीं। फिर कभी जमकर बात करेगा। "काम क्या हो सकता है ऐसे में ? पंजाव जितना खुशहाल था उतना ही बदहाल होता जा रहा है। जो लोग मोटे हैं वे हरियाणा या दिल्ली में अपने सेल बनाते जा रहे हैं। मोनिका सिल्क सेंटर वालों ने दिल्ली में शोरूम ले लिया है । बड़े लड़के को वहाँ भेज दिया है । प्रवीण इम्पो- रियम बालों ने अम्बाला में एक दुकान ले ली है। फैंसी शू वालों की बात सहारनपुर में चल रही है। वे मोटे लोग हैं उनके लिए सब कुछ मुमकिन है 'हम इस तरह फंसे हैं कि ऐसा सोच भी नहीं सकते फिर भागें क्यों ? हमाग क्या जालन्धर के साथ कोई रिश्ता नहीं रहा? सब कुछ कोसे खत्म हो सकता है ?" "भागने के हालात वैसे भी ठीक नहीं । न ही वैसे हालात हैं।" "हालात कैसे नहीं हैं ? खालिस्तान का नाम रख दिया गया है तो यह वनकर ही रहेगा। अमेरिका जैसी शक्तियां चुपचाप किसी भी देश में कुछ करवा सकती हैं। पाकिस्तान पूरा शेल्टर दे रहा है।" बाइ दवे में पूछता हूं कि आज खालिस्तान नहीं होने पर भी क्या ?
१ जलता हुआ गुलाव /55 पालिस्तान जैसे हालात नहीं है । हिन्दुओं की नौकरियां नहीं मिल रही... आने वाले दिनों में और भी बुरा हाल होगा 'कालिजों में हापटरी वगरा के लिए एडमिशन में भी फिरकापरस्ती पलंगी।''आज जिसे जहा जी चाहे मारा जा सकता है। यह क्या जीने के हालात है ? यह हिटलिस्टो की परंपरा.. वो से पीचरूर चुनकर हिन्दुओ को मार दिया जाना ये तमाम चीजें क्या पलायन के बारे में सोचने पर मजबूर नहीं करती ?" अविनाश फिर उसे कुछ पहना चाहता था लेकिन गगल इतना भग हुआ था कि उसने उस वक्त नप रहना ही बेहतर समझा। टीनू का गिरफ्तारी धोर छुडाने मे थाई परेशानी ने शायद उसे और भडका दिया या। पुलिस का व्यवहार तो अच्छे-भले आस्तिक आदमी को याद होने के बारे में सन्देह से भर देता है भाभी अविनाश की प्लेट में चपाती रखने लगीता अविनाम। .. पर दोनो हाथ रख दिए । "कितना कम पाने लगे हो तुम एक चपानी ताल "पेट चिरकुल भर गया है।" "यह हाय कोई चीन की दीवार है।' भाभी ना. चपाती प्लेट में छोड़ दी और कहा, "कल का हरदोष नाना देगी न कि देवर को कुछ पिलाया नहीं। अविनाश मुस्करा दिया। "तुम कड़ा कब से पहनने लगे?' मगल न पुरु "नरिन्दर भाभी लाई यो अमृतसर में । हमने न बिया । "यह नरिन्दर कौन है?" "आपको तो कुछ पता ही नहीं। हादर के भाताई और कौन।" भाभी ने जवाब दिया। "चुस्त होता जा रहा है हमारा बना। मगल ने अविनाश को थापी देकर कहा। "जरा यह तो पूठिए इनमें कि मामला पहुंचा कर ने मंगल के बहाने अविनाश में पूछा। "मैं तो काफी दिनों में मिला भी नहीं।" कहते क 56/ जलता हुआ गुलाव । से भर गया। "मुझे तो डर लगता है कि तुम्हारी कछुआ चाल में मामला खटाई में न पड़ जाए।" अविनाश भला क्या कहता। "मेरी मानो तो अपनी भाभी को वहां भेज दो वात करने के लिए।" "नहीं । अभी उसकी जरूरत नहीं।" अविनाश मुश्किल से फूटा। "कमाल के आदमी हो तुम।" मंगल ने कहा लेकिन फिर उसका चेहरा देखकर वात बदल गया। "आज संगराद है न ?" मंगल ने पूछा। "हीं।" सन्तोप भाभी ने कहा । "करतारो मौसी ने कड़ाह परशाद नहीं भेजा ?" "नहीं। सभी हमसे कटने लगे हैं जवसे टीनू ने त्रिशूल पहना है।" अविनाश ने देखा मंगल का चेहरा बुझ-सा गया। थोड़ी देर पहले हिन्दुओं के हक में आवाज बुलन्द करने वाला जैसे कोई और था। करतारो मौसी से संगराद के दिन कड़ाह परशाद नहीं आने पर दु:ख महसूस करने वाला मंगल कोई और । रात के साये गहरे होते जा रहे थे। अविनाश ने विदा लेनी चाही। लेकिन उसे विदा नहीं दी गई। चाय का दौर चला । जाने से पहले भाभी ने वहीं सो जाने के लिए कहा लेकिन अविनाश निकल लिया। कमरे की ओर जाते वक्त उसके दिमाग में मंगल की बातें गूंजती रहीं। मंगल की चिन्ता का विषय था पंजाव में हिन्दुओं का क्या होगा" लेकिन वह सांप्रदायिकता के जहर को सांप्रदायिकता से काटना चाहता है. इस काट का मरहम कोई फिरकापरस्त नहीं कर सकता । पंजाब का वास्तविक दर्द क्यों नहीं समझना चाहते लोग ? . . 'गोलियों की आवाजें वहता हुआ खून और लाशे.. 'पंजाव की धरती का चप्पा-चप्पा आग में जल रहा था । सुवह दरवाजे पर गिरने वाला अखवार खून में तर होता। अपने कमरे में जाते वक्त वह अपने ईश्वर से प्रार्थना करने लगा, 'हे ईश्वर ! कल का दिन मुझे खबरमुक्त कर दो।' ।
पाँच अचानक सन्तोप को स्याल आया कि उसने अभी तक दूध गर्म नहीं किया। कही खराव न हो गया हो। उसने उटना चाहा लेकिन हिम्मत जवाब दे गई । यपार बढ़ गया था । 'होने दो जो होना है, हम तो पड़े हैं पटिया लेकर' की टोन में उसने अपने को विस्तर पर गिरा लिया । पहले उसने सोचा कि वचनी को कहे कि विल्लो को भेज दे। दूध गर्म कर दे और तुलसी डालकर चाय बना दे लेकिन जब से टीनू ने त्रिशूल पहना है बचनी वह वचनी नहीं रही। इक्याल कौर भूल से भी घर में नहीं घुमी । ऐसे में वह पचनी से कुछ भी नहीं कह सकती। फिर वह सोचने लगी कि अगर वचनी को उसके धुधार का पता पल जाए तय भी क्या वह नहीं आएगी? उसे लगा कि तब उसके लिए रुकना मुश्किल हो जाएगा। मंगल कुरुक्षेत्र न गया होता तो उसे डाक्टर के पास ले जाता । उसे मंगल के कुरक्षेत्र जाने को तुक समझ नहीं आई। पंजाब में आए दिन मासूम लोगो को हत्याएं हो रही थी । वसो से घुन-चुनकर हिन्दू मारे जा रहे थे। बैंक लूटे जा रहे थे। पेट्रोल पम्प और व्यापारी सूट लिए जाने की घटनाएं हो रही थी। बहुत से हिन्दुओ ने पलायन का रास्ता इस्तियार कर लिया था। कुछ सीमावर्ती इलाको में गांव के गांव हिन्दू मावादी से रिपत हो गए थे। मगल भी चाहने लगा था कि जालघर से हरियाणा के किसी शहर में या दिल्ली में कूच फर जाए। मंगल यहता है कि बडे लोगो के हमेशा मजे रहते हैं। अकाल पडे या भुखमरी, ओले पड़ें या सूखा, बाढ़ आए या जलजला, जग छिड़े या 58/ जलता हुआ गुलाव - दंगा हो, सब जगह सव हालातों में इनका मुनाफा बढ़ता ही है। कम नहीं होता। पंजाव आग में जल रहा है। उन लोगों के मुनाफे बढ़ रहे हैं जिनके पास लम्बी बाँहें हैं, पैसा है, उन्होंने अपने व्यापार की शाखाएँ दिल्ली में भी मजबूत कर ली हैं। 'मोनिका सिल्क स्टोर' वालों की दिल्ली वाली दुकान भी अच्छी चलने लगी है। इधर हम हैं कि दिल्ली की दुकानों की पगड़ियाँ सुनकर हैरान हो रहे हैं, जैसे ट्रांजिस्टर समझकर हाथ में उठाया हो और वह वम की शक्ल में फट गया हो । मंगल अपना ठय्या दिल्ली ले जाने की स्थिति में नहीं था। इसलिए वह चाहता था कि हरियाणा में किसी जगह अपने पांव जमा सके। घर छोड़ना आसान होता है क्या ? धरती के जिस टुकड़े ने आपको प्यार दिया हो, धरती के जिन लोगों के बीच आपकी दोस्तियां, मजाक और उद्गार पनपे हों, जिसके साथ आपकी तमाम छोटी-बड़ी सफलताएँ- विफलताएँ जुड़ी हों, वह धरती आपके तन-मन में खुशबू की तरह रच जाती है। आदमी यन्त्र नहीं हो जाता, न पत्थर ही कि सैंतीस साल तक विकसित होते रहे सम्बन्धों के एकदम पार चला जाए। मंगल के जहन में पंजाब छोड़ जाने की बात जोर तो मार रही थी लेकिन अपने शहर के वरावर उसे कोई दूसरा शहर जंचता भी नहीं था। पिछली बार सन्तोप से कहकर गया था, "अम्बाला हम जैसे तप्पड़- धसियों के लिए ठीक रहेगा। फिर हो सकता है कि कल को हरियाणा की राजधानी भी बन जाए-नहीं भी बने तो हरियाणा के प्रमुख शहरों में रहेगा ही-लगता है कि अब वहीं के लिए दाना-पानी उठेगा।" और फिर जब दो दिनों तक अम्बाला के बाजारों की खाक छानकर लौट आया तो सन्तोप से कहा-~-"मुझे लगता है कि वहाँ काम-काज उतना नहीं है । एक तो मेन मार्कीट में कोई ठीक-सी जगह नहीं है, दूसरे ग्राहक की परचेजिंग पावर भी उतनी नहीं है।" फिर कुछ दिन गुजरे तो मुक्तसर में वसों से खींचकर कुछ हिन्दुओं की हत्या कर दी गई । मंगल कहने लगा कि पंजाब में हिन्दुओं का जीना मुश्किल हो गया है, जितनी जल्दी कोई यहां से निकल जाए उतना ही अच्छा। बाद में जेहलम छोड़ने की तरह तीन कपड़ों में भागना पड़ेगा जलता हुआ गुलाव /59 रातोरात । जैसे मंगल के मां-बाप भागे । जैसे सन्ताप के पिता बोर चाचा भागे ये घर-बार सब कुछ छोड़कर। जैसे उन तमाम चीजों के प्रति विराग उभर आया हो। करीम वादा ने पद ही आकर हाय जोड़ दिए थे, "मृदा हम पर बहुत पफा है मेरे बच्चो ! यह कयामत के दिन भी देखने थे। गलियों में करलो-गारत की इंतहा हो चली है । वान के इम बालम में कोई विमो की नही मुनता। मेरे जिगर के टुकडो ! पहने हुए मेरा दिल इवता है। तुम लोगों की हिफाजत अब हमारे बम की नहीं । रहमत तुम लोगों को चौक तक होड आएगा।" और दो बंद मामू करीम बाबा को मुरियों में अटक गए थे। वे लोग अभी थोड़ी ही दूर निकले ये कि दंगाइयों ने उनके घरो को आग लगा दी। उठती हुई लपटों ने उनके दिल को चीकार में भर दिया। वहाँ मे उजहकर माने पर मंगल के बाप को रोजी-रोटी के लिए कितने पापड़ बेलने पडे, उसे बहना बासान है, झलना बहुत मुश्किल । गदिश के भयंकर दिनी में उसके पास एक ही सहारा था कही मेहनन का । उसने अथक मेहनत का दामन नहीं छोड़ा। इमी से चमे खडे होने की जगह मिली। मुक्तमर काण्ड के तीसरे दिन मगल कुरक्षेत्र के लिए नयार हो गया। सन्तोप ने टोना भी। जय अम्बाला ही अच्छा नहीं लगा नो कुरुक्षेत्र क्या अच्छा लगेगा। जो होगा देखा जाएगा । यही जिये हैं यही मरेंगे, लेकिन मंगल नहीं माना। पजाव में हिन्दू अब दूसरे दर्जे का नागरिक होकर रहेगा। यह पंएक मरकार हमारी रक्षा नहीं कर सकती। जो सरकार नोरिया देने में हिन्दू-सिघ का भेदभाव करती है, वहीं और इन्माफ की क्या उम्मीद हो सस्ती है। मन्तीप वापरूम जाने के लिए उठी। मिर दर्द में फटा जा रहा था। टांगों में हिम्मत बिल्कुल नहीं थी। जैम विन्दुल निचट गई हा । दीवागे- दरवाजों या महारा लेकर गई। निपटने के बाद हाथ धोये और गंट को आधा पोतकर वाहर मौका मिल्को गेंद में पेल रही थी। उमकी गुड्डी दूगरी नरफ रखी हुई थी। एक बार अपनी बारी मेलती, एक बार गुढी भी बारी।
60/जलता हुआ गुलाव "सिल्की!" आवाज गले से उभरी और ओठों तक आते-आते जन्त हो गई। कहीं इकवाल कौर या उसकी बहू ने सुन लिया तो बुरा मनाएंगे। मन ही मन 'सिल्की तुम्हें मेरी उम्र भी लगे' कहकर उसने गेट बन्द कर दिया । 'चल खुसरो विस्तर आपने' कहा और खाट पर लेट गई । सिल्की बहुत दिनों से इधर नहीं आई या उसे आने नहीं दिया गया था। आंखों तक आँसू की बूंदें दुलकी और रोक ली गई। छाती में दर्द-सा था। पता नहीं सिल्की के प्रति ममता के लिए या बुखार के लिए । डाकिए ने चिट्ठी फेंकी थी शायद । सन्तोष फिर दीवारों-दरवाजे का सहारा लेकर वाहर निकली। सन्तोष के ताया के घर से चिट्ठी थी। दिल्ली से। सन्तोप के दादा निहालचन्द के यहां विवाह के पांच साल गुजर जाने तक कोई सन्तान नहीं हुई थी। निहालचन्द के कान किलकारी को तरस रहे थे। उसने गुरुद्वारे जाकर अरदास की। सुखना सुखी । पहला लड़का होगा तो गुरू का सिंह सजाएगा । गुरूघर में अरदास सुनी । सन्तोष का ताया करतारसिंह बना। आह भरकर सन्तोष ने सोचा, 'कितनी दूर निकल आए हैं हम लोग।" पाकिस्तान से उजड़े तो ताया करतारसिंह दिल्ली जा बसे । चांदनी चौक में फड़ी लगा ली, कपड़े की। जहां से माल लेते थे वहाँ से एक बार गलत कपड़े के दो थान धकेल दिए गए। माल खराव निकला। जगह-जगह टांक थे और एक किनारे से बदरंग । जैसे कैमरे की रील को हवा लग गई हो। लेने की जगह देने पड़ गए। जहाँ से खरीदा था उसने वापिस नहीं लिया। उसका उधार फैसा होता तो 'चाचा' कहकर वापिस लेता लेकिन माल नकद गया था। रिफ्यूजी को उधार देता कौन है। कपड़े के दो थान अपने पेट में डालना करतारसिंह के लिए मुश्किल था। कपड़े के उन दो थानों ने उसका धन्धा चौपट कर दिया। विक्री में कभी मार खा गया दुकान- दार फिर संभल जाता है लेकिन खरीद में मार खाया सांप के काटे की तरह होता है। छोटी पूंजी वाला और नया दीक्षित हुआ आदमी तो उसी वक्त लहरें लेने लगता है। करतारसिंह का जी खट्टा हो गया। कपड़े का काम छोड़ देना पड़ा।
जलता हुआ गुलाव /61 । बचे पैसों मे पनो का काम शुरू कर दिया। काम चल निकला। साल मर बाद ही वह योक और परचून दोनों काम करने लगा। दुकान किराये पर ले ली। साठ के जमाने में वही दुकान खाली करने का डेढ़ लाख मिल गया । पनो का काम ज्यादातर पोक का ही कर लिया गया। इसके लिए जरा पीछे हटकर पचास हजार मे दुकान मिल गई। मकान पहले हो करोल बाग मे लिया जा चुका था। गुरटेक जब बड़ा हुआ तो कहने लगा कि उसे कपड़े की दुकान खोलनी है। फरतारसिंह को कपड़े की दुकान से चिढ थी। गुरटेक जब भी कपड़े की दुकान की बात करता उसे अपनी खरीद के वे दो थान याद आ जाते । दो-तीन मीटर अन्दर जाते ही प्रिंट जैसे धुलने लगा हो। उस कमरे के उतरे हुए अवस-सा जिसकी फिल्म को हवा लग गई हो । गुरटेक ने कपड़े की दुकान पर नौकरी शुरू कर दी थी। वह अपने मालिकों की चर्चा से थकता नहीं था, "उनके पास कार भी है। ग्रेटर कैलाश में साफ-सुथरा बैंगला । दूध गिराकर इकट्ठा कर लो तो पता भी न चले कि फर्श पर गिरा था। लाखो के वारे-न्मारे होते हैं । यह सब कपडे के काम से ही हुआ है।-एक हमारे भापाजी हैं।-कपडे का काम तो करेंगे ही नहीं।" फिर कहता, भाजकल लोग खरीदते ही क्या हैं कपड़ा सिर्फ कपड़ा। कपड़ा बढ़िया होना चाहिए। भीतर चाहे योलमखोल हो । पसनैलिटी में सिर्फ एक ही चीज रह गई है कपड़ा। सब जगह कपडे देने जाते हैं, सिर्फ कपड़े । लोग भूखे रह लेंगे, कम खा लेंगे लेकिन कपड़ा वडिया पहनेंगे। फिर कपड़े का काम ही क्यो न किया जाए।" कुछ दिनों बाद विद्यादेई ने भी जोर डालना शुरू कर दिया, "काके को कपड़े की दुकान ही क्यो नहीं पोल देते। नौकरियां मिलना कहाँ आसान है । जूते घिसते फिरो। टक्कर मारते फिरो हाथ मे सर्टिफिकेट लेकर । कोई दो कौड़ी का नहीं पूछता। दुकान होगी तो शाम को बिल्ला भी वही यंठ जाएगा। पनों का काम तो आप और वरमू संभाल ही रहे .. मजबूरन करतार सिंह को खराव कपड़े के उन दो थानो के पार 62 / जलता हुआ गुलाव झांकना पड़ा। कपड़े के कारोबार के लिए राजी हो जाने पर भी जो असल अड़चन आई वह यह थी कि करतारसिंह चाहता था एक तलपोश लगा दिया जाए । लकड़ी के पुराने फट्टे दुकान में ठुकवा दिए जाएं और काका फाँटदार पजामे का कपड़ा, रजाइयों के गिलाफ का कपड़ा और आठ-दस रुपये मीटर वाले सूटों का कपड़ा वेचे । फिर कमा-कमाकर काम बढ़ाता रहे जितनी भी उसकी समझदारी हो । गुरटेक उसके लिए. जरा भी राजी न हुआ। गुरटेक के दिमाग में एक जगमगाते शोरूम की कल्पना थी। करीने से लगा हुआ काउंटर । छत पर प्लाईवुड की फिटिंग और झुककर माती हुई ट्यूब लाइट्स और वाहर नयोन साइन में जगमगाता 'पंजाव क्लाथ हाउस'। कदमों के नीचे बढ़िया कारपेट और कस्टमर के बैठने के लिए गोल गद्देदार काउंटर तक उठ आते स्टूल । उसे फाँटदार पजामे के कपड़े और कोरे लट्ठे के नाम से ही चिढ़ थी। कोरा लट्ठा तो उसे ऐसा लगता जैसे थान के थान खुलकर पूरी दुकान को लाश में बदले दे रहा हो। वह पिता की इस सलाह पर भड़क उड़ता और घर में कबूतरखाना मच जाता। पिता उसे बदतमीज, नालायक और ज्यादा जवान चलाने वाला बताते । वह पिता पर इल्जाम लगाता कि सीधी-सी बात है कि वे उसके लिए पैसा खर्चना ही नहीं चाहते। बुरी हालत होती विद्यादेई की। वह दोनों तरफ हलाल होती। पति की अलग मिन्नतें करती, पुत्र की अलग । उसकी दशा उस नन्हीं कबूतरी से बेहतर नहीं थी जो पेड़ की टहनी पर है। ऊपर उड़ती है तो वाज, नीचे आती है तो शिकारी का जाल । इस किनारे पति का अहंकार और उसका अपना अनुभव, दूसरे किनारे अन्धी ममता । दोनों तरफ के गुस्से पर वह प्यार के ठण्डे जल की छींटे देती। लेकिन गबरू लड़के का गुस्सा । 'तीवा-तौवा, उसमें तो उसका नेह-जल भी खौलने लगता। विद्यादेई ने अपने पति को समझाया, जोर डाला, नाराज हुई, अपने सिर की कसमें दी, लड़के के भाग जाने या आत्महत्या कर लेने की खौफनाक स्थिति प्रकट की। सन्तान के लिए आदमी क्या नहीं करता । वावर ने हुमायूं की खाट - जलता हुआ गुलाव /63 फे गिर्द तीन चक्कर लगाकर अल्लाह से उसकी बीमारी अपने सिर मांग ली थी और अपनी आयु उसे दे दिए जाने का रहम । करतारसिंह जम्त कर गया। भीतर का तूफान भीतर ही थम गया। एक आवाज तक नहीं। 'पंजाव क्लाथ हाउग' घोलने में विद्यादेई की कानों को शानियां तक विक गई। गुरुग्रन्य साहिब को वीड़ गुरद्वारे छोडकर थाने के बाद साडे मान सौ का टण्डा उडा और सात सौ के मोतीचूर लड्डू बेटे । करतारसिंह को यह सचं भी फालतू का लगा लेकिन वह चुपचाप घड़ा रहा । दाढ़ी संवारी और नजर बचाकर मन ही मन कहा, 'हे मच्चे पातशाह तू इसके काम में बरकत हाल ।' मुहूतं पहली अक्तूबर को किया गया । इसी दिन गुरटेक का जन्म हुआ था। गुरटेक का काम चल निकला । पन्द्रह-योग दिनो मे ही करतारसिंह को लगने लगा कि वजाजी के काम को लेकर उमकी अनिष्ट आशंका प्पर्य थी। एकाध बार तो इस बात पर भी अफसोम जाहिर किया कि नाहक पंनों के कारोबार में इतनी जिन्दगी यदि की। फिर कहा कि जिस रंग में राते वो उसी रंग में रहना । गुरटेक के लिए अच्छे परों के रिश्ते आने लगे। माल उधार मिलने लगाया। गर्म सूटों के कपडे की व्यवस्था भी कर ली गई। शोकेस के लिए एक खूबसूरत स्टेच्यू भी मिल गया था, लेकिन आदमी युछ सोचता है, होता कुछ और है। नवम्बर का महीना माया। एयः यहा पेट गिर गया। धरती सप उठी। इतनी नृशंस घटनाएं हुई कि धरती का दिल फट गया और सगा कि धरती कांप रही है। प्रशासन पोस्त के होडे पीकर सो गया। देयने में शोफ.प्रस्त और कारगुजारी में निप्रिय। इन्सानियत का लिवारा जो कि इतने जतनो और वर्षों का श्रमसाध्य पा, उतार फेंका। हिमा की शक्ल में पोर चरमसीमा पर था। राजनीति में उछला हुभा मिक्का । बिजली की तरह अवाम के कुचले हुए अरमानों के काले कम्बल पर गिरता हुआ। मामूम जिन्दगानियो को अपनी आग से तबाह करता। यून, मूट- मार और यौफनाक आवाजों का एक नगा जलस दि की सड़को पर
64/ जलता हुआ गुलाव
निकला। इस जूलूस में लोगों के चेहरों पर वूचड़ों, गर्म ताजा खून पीकर
आने वाली मुस्कराहटों, और बदइंतजामी के सिर पर नंगा हैवानियत
भरा नाच करने वालों का इतिहास खुदा था। उनकी चाल में दुश्मन के
इलाके वरवाद कर शहर लूटने वाली दरियावुर्द चाल का अन्दाज था।
इतिहास की खास परिस्थितियों से खून पीकर किसी राक्षस की वारात
सजाकर जमीदोज रास्तों से भुखमरों की जमात निकल पड़ती है । और
फिर इन्साफ, दानिशमंदी, प्यार, खलूस और इन्सानियत जैसी तमाम
खूबसूरतियों को क्रूर कदमों से रौंदती आंखों पर घोर स्वार्थपरता और
हिंसा की पट्टी बांधकर निकल पड़ती हैं, एक अन्धापन फैलाने के लिए।
चीख-चीखकर यह खून की प्यासी सन्तानें कहती हैं :
गलियों चौराहों को लाशों से पाट दो,
लेकिन हमें खून दो।
घरों इमारतों को आग लगा दो,
लेकिन हमें खून दो।
चंगेजी गजनवी लूट मचा दो,
लेकिन हमें खून दो।
फिरकापरस्ती के जंगल उगा दो,
लेकिन हमें खून दो।
सल्तनत की जड़ें गहरी लगा दो,
लेकिन हमें खून दो।
ज्ञान-विज्ञान को ताक पर रख दो,
लेकिन हमें खून दो।
मन्दिरों में गोमांस फिकवा दो,
लेकिन हमें खून
दो।
गुरुद्वारे में बीड़ जलवा दो,
लेकिन हमें खून दो।
मस्जिद में सूअर मरवा दो,
लेकिन हमें खून दो।
जलता हुआ गुलाब /65 सच्चों के हाथों पर बंगारे वरमा दो, सेकिन हमें यून दो। बहनों को विधवा बना दो, लेकिन हमें यून दो। माओं की गोद उजाड कर रणदी, लेकिन हम गून दो। यून दो, यून दो। खून दो, पून दो। गुरटेक को देखनेवाले पाए थे। वाया गुरटेक और वीवी हरप्रीत दोनी ने एक-दूसरे को संकोचभरी नजरों में देखा और पसन्द किया। मेज पर काजू की वी, चीज पकौड़ों, डयलरोटी ये स्लाइसो में जरूरत से ज्यादा दवे हुए मक्खन, कुरकुरे विस्कुट, वगाली मिठाई 2. रसगुल्लों और करार समोगों से बेपवर ये दो चेहरे चोरी-छिपे एक-दूसरे को नरफ देय रहे थे। हरप्रीत की भरजाई या साथ वाले औवरायो की बहू दोनो यो कुछ पपडा देती तो दोनों चिड़िया को तरह पुतरने लगते । गुरटेक का छोटा भाई विरला शरारतो के मसाले लगा रहा था। करतार सिंह के मन में लेन-देन का ज्यादा आग्रह नहीं था । 'वाहे गुरु की फिरपा से बहुत कुछ है ।' लडको गुरटेक को पगन्द आनी चाहिए और घर संभालने वाली हो। पहली बात टोक निकल रही थो, दूगरी को परराने का कोई मीटर नहीं था । सो उन्होंने अपनी तरफ से सज्जन- सिंह को हरी झण्डी दे दी। सज्जनसिंह घर से ही तैयार होकर आए थे। बिल्ल को भेजकर मिटाई या हिय्या गली के कोने से ही मंगवा लिया । जेब से निकालकर सोने का कड़ा गुरटेक को पहना दिया। एक सौ एक रुपया विद्यादेई और करतार सिंह का रखा । इक्यावन विल्ले के लिए और एक सौ एक गुग्टेक को देकर रिस्ता पक्का कर दिया। मिठाई मुंह सगाई और दोनो तरफ से मुबारकबाद दी गई। जब गज्जनसिंह का अपनी बह और लड़की के साप घर माना टेलीफोन पर तय हुआ था तब तक इन्दिरा गाधी जिन्दा थी, Aकिन जब 66/जलता हुआ गुलाव . तक वे इधर आए इन्दिरा गांधी को गोलियां लग चुकी थीं और वह आयुर्विज्ञान संस्थान में मृत घोपित की जा चुकी थीं। दरवाजों-खिड़कियों की आँखें और दीवारों के कान सरगोशियों में डूबने लगे। राजनीति ने फन उठाया और हवा में जहर घोल दिया। अपने ख्यालों के नर्म बिस्तर पर झूमता गुरटेक हरप्रीत और उन लोगों को बाहर तक छोड़ने आया । प्रीत की सलज्ज मुस्कराहट उसे वींध रही थी। जुदाई वह अभी भी नहीं चाहता था। हरप्रीत की भरजाई ने पुल का काम किया 'आप हमें स्टैंड तक छोड़ आइए न।" विधा-विधा- सा गुरटेक साथ चलता गया। प्रीत साहिबा थी। स्यालों की हीर थी या सखी । हंसती तो गालों में टोये पड़ते। एक दिन गुरटेक के दोनों हाथों में हरप्रीत का यह भोला और मासूम चेहरा दर्पण की तरह रखा होगा । होंठ लरजते होंगे । पलके लज्जा के दवाव से बन्द । तीन-चार वार कहने पर उठेगी। गुरटेक कहेगा, "सोहणयो हमारा विश्वास 'दो या तीन बस' में है नहीं। हम तो पूरे ग्यारह बच्चों से आपको भर देंगे। फिर बनेगी गुरटेक एण्ड हरप्रीत इलेवन ।" वह हँस देगी तो गालों में टोये वन जाएंगे। बस यहीं तो फिदा हो जाने की बारी आएगी गुरटेक की। वस मिली नहीं । लोग हड़बड़ाहट में थे। एक अफरा-तफरी सड़कों पर मची थी। चक्रवात की तरह जरदोज खबरें सड़कों पर रक्स कर रही थीं। गुरटेक की जैसे तन्द्रा टूटी हो। उसने इस स्टाप को कभी इतना पीरान नहीं पाया। तभी एक स्कूटर सवार हिन्दू उनके पास से गुजरा। राने सिख परिवार देखकर कहा, "आप लोग स्कूटर-टैक्सी जो भी मिले, कर तुरन्त निकल जाओ। आपको शायद पता नहीं पूरी दिल्ली में एखों पर हमले हो रहे हैं।" "क्या, हुआ क्या ?" सज्जनसिंह के मुंह से निकला। "ज्यादा कहने-सुनने का वक्त नहीं। मेरे मामे का परिवार सिख । मैं उन्हें देखूगा जरा।" कहकर वह स्कूटर तेज कर भाग निकला। गुरटेक ने देखा, प्रीत और भरजाई का चेहरा पीला पड़ रहा है । तभी - 1 जलता हुमा गुलाब 167 टेवसी मिल गई । सज्जन सिंह ने गुरटेक को भी साथ चलने को पहा लेकिन गुरटेक ने कहा कि उमको चिन्ता न करें, अपना ख्याल र और पर पहुंच कर फोन कर दें। उसने महेगचन्द्र बीयराय का नम्बर दे दिया। गुरटेक ने पीछे घूम कर देया । टंक्गी से हरग्रीन का हाप हिल रहा पा । उसने भी रुक कर हाय हिलाया और टैक्सी के ओपन हो जाने तर वही रका रहा । फिर वह भारी कदमों मे घर की तरफ चल दिया। राहक का सन्नाटा भाय-भाय कर रहा था। नुवकड़ पर पान- मिगरेट और सोडावाटर की दुकान भी बन्द थी। थोड़ी ही दूर पर पांच वियरा हुआ था। किमी सर पर पत्थर फेंका गया था । जमने हैरानगी से देखा क्योंकि पहले हरप्रीत लोगों के माप गुजरने वक्त उसने इस तरफ रावज्जो नहीं दी यो । याच का चूरा उसके दिल में अज्ञात किस्म का ४र मर रहा था। इस हदूद से आठ-दस गिनती के पदम उसने लिए होंगे कि बीग-पच्चीरा लोगों का झुण्ड मरभुक्ये राक्षसों की बारात की तरह जैसे मुरंगी के रास्ते से या निरला हो। गुरटेक को घेर लिया गया। पकड़ लो साले को।" "जाने न पाए।" "पजाव में यहत हिन्दू मारे हैं इन लोगो ने ।" "मैं तो सात साल से पंजाव गया ही नहीं।" लेकिन उसकी आवाज गुनने वाला यह कोई नहीं था। एक जलता हुआ टायर उसके गले में डाल दिया गया। गुरटेक पीवार कर उटा । माग से उसका गला, छाती, कंधे बुरी तरह जलने मंगे। यह तडप रहा था। हायों से एक रोफेड जाया दिए विना इममें मुक्ति पाना चाहता था लेपिन उसके हाथ अपने वरा के नहीं थे। आग का समन्दर उमेदवोचता चला जा रहा था। पीड़ा तेज धार से नहीं, भोयरी धार से उमकी रुह फना कर रही थी। पोफ. और पीडा की तग दरें ने स्मयी आयाज को एक अजीब आतंनाद में बदल दिया था जिसे उसने कभी पहचाना नहीं था। टायर की जलती हुई रवट प्राणों को पूरी तरह काटती चली जा रही थी। तड़प और तकलीफ की यह चरम सीमा थी। मौत की इस भयानक शक्ल की उसने कभी पल्पना तक नहीं की .68 / जलता हुआ गुलाव थी। दहशत से कई सौ दर्जे आगे खड़े वे लोग नवम्बर को लगाई इस आग में एक आदमी के लाश में बदलने की वेइन्तहा जंगली प्रक्रिया देख रहे थे। गुरटेक को एक वार हरप्रीत का चेहरा याद करने का वक्त भी नहीं मिला। उस वक्त उसके सिख होने से नफरत करने वालों को उसके सोने के कड़े से जरा भी नफरत नहीं थी। कड़ा उतर कर एक की जेव के हवाले हो चुका था। महेशचन्द्र ओबराय फरीदाबाद किसी पार्टी से पेमेंट लेने गए थे लौटकर घर आते वक्त उन्हें दिल्ली में शुरू हुए सिखों पर हमले का पता चला। रास्ते में एक झुंड दुकान जला रहा था । उनका मन अजीव किस्म के दवाव से भर गया। वे लूटमार की डरावनी शक्ल पहचानने में असमर्थ थे । घर लौटते ही उन्होंने करतार सिंह को बेसब्री से गुरटेक का इन्तजार करते पाया । वरामदे से ही सावित्री को आवाज देकर उन्होंने कहा, "हालात ठीक नहीं हैं । बीस-पच्चीस लोग रास्ते में दुकानें जलाते इधर आ रहे हैं। तुम करतार सिंह के परिवार को घर ले आओ और ऊपर के कमरे में छिपा दो।" करतार सिंह आने से इन्कार कर रहे थे, लेकिन महेशचन्द्र गलवकड़ी डाल कर ले आए । विद्यादेई को गुरटेक की चिन्ता खा रही थी। उसे कहीं तंग न करें खसमानुखाने । विल्ला उसे ढूंढ़ने के लिए निकल जाना चाहता था। पता नहीं वीर पर कैसी गुजर रही होगी। लेकिन कोई जाने नहीं दे रहा था । सावित्री की बहू ने उसका हाथ पकड़ कर कहा, "वीर तुम्हें मेरे सिर की कसम जो मेरे बिना कहे सीढ़ियों से नीचे भी उतरे तो, आप लोग वक्त की नजाकत को क्यों नहीं समझते । वे लोग भूखे-प्यासे जानवर की तरह टूट पड़ते हैं, कुछ सुनते नहीं, कुछ समझते नहीं । मार-काट करते हैं, लूटते हैं और चल देते हैं।" करतार सिंह को समझ नहीं आ रहा था कि एक दिन में ही सारे- -के-सारे सिख गद्दार कौम कैसे बन गए। खून की प्यास में गर्क अपने खाली खप्पर लिये लोगों का एक झुण्ड आकर 'पंजाब क्लाथ हाउस' के सामने रुक गया। एक ने पत्थर चला- - जसता हुमा गुलाब / 69 कर माइन बोहं चीने-पीने कर दिया । ताला तोड़ने की कोशिश की गई, मेदिन टूटा नहीं । जाने यहाँ से एक सम्वल उठा लाया गया। गटर को पत्ती के नीचे रणकर दो-तीन ने मिलकर जोर लगाया तो पत्ती पिचक गई। शटर उघड़ गया। यानों के थान हाथोंहाथ उछलने लगे। एक. मादमी, जो कि झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाला था और राजनीति के एक इशारे पर मरभुवयों को जमात में शामिल हो गया था, ने गर्म कपडे का थान उठाया और भाग निकला। जिसने ताउम्न नई कमीज नहीं परीद कर पहनी थी, हमेशा जामा मस्जिद के पास को फटी-पुरानी कमी पांच-दस रुपये में खरीदता रहा था, वह आज गर्म मूट के कपड़े पा पान उठाए सरपट भाग रहा था। एक पुलिसमैन को देखकर उसकी रफ्तार कम हुई । डंडा लहराता हुआ पुलिसमैन बोला, "माले तू गर्म मूट पड़ेगा। कभी हाथ से छूकर भी देखा है गर्म सूट को । ला इधर.. नाता है घर कि एक हूँ।'तेरे को लेना है तो अपने लिए और से भाना।" पान पुलिस वाले को देकर वह उल्टे पांव भागा। फूली हुई सांस के साय जब तक वहाँ पहुंचता तब तक 'पजाव क्लाय हाउस' में आग लगा दी गई थी। आग के गोले उठते देखकर यह वही रका रह गया। करतार सिंह के अन्दर गुरटेक और गुरटेक की दुकान यो चिन्ता होलदिनी भर रही थी। वह एक बार दुकान देख पाना चाहता था। महेशचन्द्र से बाहर निक्लने तक से मना कर रहे थे। करतार सिंह समान नहीं पा रहा था कि उस बूढे पर आखिर कोई क्यो हाथ उठाएगा। गुरटेक के लिए उसके उसी दिन वने ससुर के पड़ोस में फोन किया गया। पता चला कि जब वे टंक्सी लेकर निकले तव वह बस स्टैंड पर ही था और यशवाश था। ज्यों-ज्यो समय बीतता जा रहा था और गुरटेक के लौटने में देर हो रही थी, करतार सिंह का दिल कुतरा जा रहा था। विद्यादेई तो रोती जा रही थी। पुत्र को सगाई की युशियों से भीतर से चुकी थी। करतार सिंह समप्त चका या उसे वे लोग बाहर नहीं जाने देंगे, उड़नछू हो 70/ जलता हुआ गुलाव लेकिन भीतर से एक पुकार उसे मथ रही थी कि उसे बाहर निकलना चाहिए। शायद वह गुरटेक को कोई मदद पहुंचा सकता हो । कहने को तो वह विद्यादेई से रोने की बजाय पाठ करने के लिए कह रहा था लेकिन खुद वह डूबता चला जा रहा था और उसे कोई सहारा नहीं मिल पा रहा था। सहसा वह इस तरह उठा जैसे पेशाव करने के लिए उठा हो। फिर चुपचाप ढंग से दरवाजे की सिटकनी खोली और वाहर आ गया। सड़क पर आते ही उसने वेइन्तिहा वीरानगी देखी। जैसे वह कब्रिस्तान का रास्ता हो। अचानक उनकी नज़र आकाश में घूमती चील पर पड़ी। उसने दिल्ली में गुजारे सैंतीस साल में आकाश की तरफ इतने गौर से नहीं देखा था । सैतीस साल वाद इस ओर देखना उसे बहुतधूसर और मनहूस लग रहा था। मुश्किल से दस कदम और चला होगा कि एक जला हुआ स्कूटर उसके सामने था । वहाँ क्या हुआ होगा की हैवतनाक कल्पना उसे गुरटेक के साथ किसी कठोर व्यवहार की आशंका से जोड़ती चली जा रही थी। दो लड़कों ने उससे पूछा कि वह किसी को ढूंढ़ रहा है क्या ? उसने बताया कि उसका लड़का काफी देर से घर नहीं लौटा। गुरटेक नाम है उसका । मेहमानों को छोड़ने गया था । लड़कों ने आगे जाने का इशारा कर दिया, लेकिन उनकी आँखों में शरारत थी। करतार सिंह का एक- वारगी जी चाहा कि वापिस लौट जाए लेकिन कदम बहुत भारी लगे। सीधी सपाट पथरीली सड़क दलदल लग रही थी। तभी दस-पन्द्रह लोगों ने उसे घेर लिया। एक ने पीछे से सरिये का वार उसके सिर पर किया। इससे पहले कि करतार सिंह उन लोगों से पूछ पाता कि वे कौन हैं और क्या चाहते हैं, वह एक कटे पेड़ की तरह गिर गया। वह समझ नहीं पाया था कि हुआ क्या है । खून की धार ने उसकी सफेद दाढ़ी भिगो दी। ताई जी का खत तिलक विहार की झुग्गियों से लिखा गया था। वहाँ उन जैसे और भी कई विस्थापित परिवार रह रहे हैं जबकि धरती के कांपने को दो साल का अर्सा गुजर चुका था। विधवाओं के एकत्रित जलता हुया गुलाव /71 हो जाने से वे झुग्गियां मनहूस और मायूस हो उटी थी। कोई विरला ही घर (?) होगा जिसके चार-पांच लोगों को नवम्बर चौरासी की वह काली आंधी ले न बैठी हो । लुटी हुई तवाह और बेसहारा जिन्दगियो को जोड़ने की कोशिश की जा रही है । ताया जी और गुरटेक को खोकर ताई का परिवार दो सालों में खड़े हो सकने का जुगाड़ भी नहीं कर पाया। महेशचन्द्र ओवराय ने घर मे शरण देकर और झूठ बोल कर, लड़-झगड़ कर ताई और विल्ले की जान तो बचा ली, लेकिन घर को जलने से नहीं बचा सके। ताईजी ने लिखा था कि विल्ले का कारोबार कोई दंग का नहीं हो सका। पैनों के कारोवार से कर्ज लेकर पंजाब क्लाय हाउस' में डाला था, जो कि राख के ढेर में बदल गया। फिर कारोबार का भेद बिल्ले को था नही । जिनसे लेना था वे आंखें बदल गए, जिन्हे देना था वे आ धमके। दुकान छोड़कर कर्ज पटा दिया है । ताई चाहती थी कि जालन्धर, अमृतसर या लुधियाना में उनके सिर छुपाने की जगह का इन्तजाम हो पाता तो ज्यादा बेहतर था। वहां दिल्ली मे बिल्ले को कुछ अच्छा नहीं लगता । सन्तोप खत पढ़ कर अजीव-सी हालात मे आ गई। शायद उसे बुखार की तकलीफ इतनी नही थी जितनी जिन्दगी के इस मोड की । राजनैतिक परिस्थितियों ने उन्हें कहां ला पटका है । मंगल चाहने लगा कि कही हरियाणा में या दिल्ली में संटिल हो जाए। ताई चाहती है विल्ले को लेकर पंजाब में कही टिक जाएँ। मंगल को, जिसका संतीस वर्षों से पूरा जुड़ाव पंजाव मे रहा है, पंजाव में रहना असुरक्षित लगता है । करतार सिंह का परिवार, जिसकी दो टहनियां ही बाकी बची है, जिसका संतीस वर्षों का नाता दिल्ली से रहा है, पजाव आना चाहता है । सन्तोप ने घडी मे वक्त देखा। तीन बज रहे थे। टीनू ने अब तक जरूर बाजार से कुछ लेकर खा लिया होगा । हो सकता है कुछ भी नहीं खाया हो । अगर नहीं खाया होगा तब वह घर भी आ सकता है। घर ही या जाए तो अच्छा हो । कोई दवा तो ला देगा। उसका सिरदर्द बढ़ता ही जा रहा था, जसे अभी फट जाएगा।
72 / जलता हुमा गुलाव उसने उठकर खिड़की खोल दी। प्रसिन्नी नाली निकाल रही थी और बुड़बुड़ा रही थी। वदवू का एक भभका खिड़की की सींखचों को पार करके अन्दर आ गया। उसने खिड़की बन्द कर दी । 'बन्द' की जगह 'पटक दी' कहना ज्यादा संगत होगा। सिरदर्द उसकी सहनशीलता की सरहदें तोड़ रहा था। उसने अपनी चुन्नी उठाकर माथे पर बांध ली। ? सन्तोष को कुंवारेपन के वे दिन याद आए, जब सिर इस तरह फट रहा होता था और मां उसे विठाकर सिर में तेल डालने लगती और आहिस्ता-आहिस्ता हथेलियों से थपथपाती रहतीं। मां की शीतल छाया- सी याद जब तक वह जिन्दा है, मन में छाई रहेगी। बेकार और वीमार आदमी को यादें क्यों इतना सताती हैं ? चक- मक पत्थर में आग की तरह छिपी रहती हैं। वक्त मिलते ही चिंगारियां छोड़ती हैं। गेट फिर खटका । सन्तोप उठकर आँगन तक आ गई। गुलावी फाक में सिल्की खड़ी थी। उसकी गेंद आँगन में गुलाब के पास गिरी थी। सन्तोष ने गेट खोला । सिल्की तुरन्त भीतर आ गई। सन्तोष ने एक वार सामने इकबाल कौर के घर की तरफ देखा । वहाँ कोई नहीं था। उसने गेट उड़का दिया। "आंटी, तुम्हें माथे पर पी हो गई ?" "हाँ बेटे, पी हो गई।" "मैं वाग लगा दूं आंटी ?" सन्तोष पांव के वल फर्श पर ही बैठ गई। सिल्की ने उसे कई दिनों बाद पुकारा था। दोनों घुटनों में सिल्की का हाथ पकड़ कर खींच लिया, दोनों बांहें उसके पीछे बांध दीं फिर दोनों हाथों से उसका चेहरा थाम लिया । भीतर से साँस खींच कर माथा चूमा । "तुम तो खुद ही मेरा वाम हो, सिल्की। मरी इतने दिनों आंटी की याद नहीं आई ?" "आंटी, विछकुट दो ना।" सन्तोष ने भड़ाक से रसोई का दरवाजा खोला। बढ़िया विरकुटों ।
जलता हुआ गुलाव /73 का नया पैकेट फाड़कर प्लेट भर कर वाहर लाई । "मट्टी ! खूब खायो विष्कुट, लेकिन मेरे पास बैठकर ।" जब सन्तोष सिल्की को विस्कुट खिला रही थी तो सिरदर्द का अहसास तक नहीं हो रहा था । जव इकवाल कोर का छोटा लड़का गगन- दीप, जो कि आजकल मोटर पार्ट्स को एजेंटी कर रहा था, सिल्को को गली में बावाजें दे रहा था। इन आवाजों को न तो सिल्की सुन रही थी, न सन्तोष ही। गगनदीप ने इधर झांका। "आंटी तुम्हाले गुलाव के पेड पर भूत है।" मिल्की ने कहा। "जो यच्चा बिछकू खाता है उछे भूत कुछ नहीं कहता।" कहकर सन्तोप ने एक विस्कुट सिल्की के मुंह मे ढूंस दिया । सन्तोप हतप्रभ-सी रह गई जब उसने गगनदीप को सामने खड़े पाया। "यह विस्कुट बाजार के ही बने हैं। मैंने इनमे कुछ नहीं मिलाया और इनके अलावा कुछ नहीं खिलाया।" कहते हुए उसको दोनो आँखें आंसुओं से भर थाई। "आप ऐसा क्यो सोचते हैं, भरजाई जी, हम क्या इतने गिरे हुए हैं ? 'मैं जानता हूं आप सियों को कितना प्यार करती हैं । ये तो आपकी ही बेटी है।" उस समय सिल्की कह रही थी, "आटी, तुम क्यों लोती हो? तुम्हे भूत नई मारेगा। जो बच्चे विछकू खाते हैं उन्हे भूत कुछ नहीं कहता। तुम भी एक विटकू पा लो ना।" अव सन्तोष सिल्की के हाथो विस्कुट खा रही थी।
छह
प्रोग्रेसिव रिपोर्ट भिजवाने के बाद अविनाश ने घड़ी देखी। छः बज रहे
थे । तेरह तारीख । उरो ख्याल आया कि आज पांच बजे उसे जम्हूरी
अधिकाररक्षा वालों की बैठक में जाना था। दो-तीन दिन पहले
बलविन्दर उसे साइक्लोस्टाइल कागज दे गया था। बलविन्दर को उसने
एक-दो बार मेहनत' के दपतर में देखा था। साइलोस्टाइल कागज पर
था:
"गया पंजाव में सिर्फ दो प्रकार के लोग हैं ?
एगा ये जो खालिस्तान चाहते हैं और दमदमी टकसालं जैसे
दलों के साथ हैं,
दूसरे चे जो हिन्दू शासन के समर्थक हैं और शिवसेना जैसे
दलों के समर्थक हैं।
यदि हो,
तो हिन्दुओं को पंजाव छोड़कर भागने दीजिए।
पंजाव के बाहर के सिखों को पंजाब में आने दीजिए।
और पतलों की निन्दा का अधिकार भी खो देना चाहिए।
जो ऐसा नहीं सोचते
उनको एक ऊंट पर एकाशित होना चाहिए
और इस विकट स्थिति का मुकाबला फ़रना चाहिए।"
बैठक गी तारीष ने बारे में निश्चित होने के लिए अविनाश ने मेज की
दराज में उस कागज को ढूंढना शुरू किया । दराज भनाप-शनाप कागजों
से भरी थी। इस बात से उसे बहुत चिढ़ थी, लेकिन यह इससे अपसर
बच नहीं पाता था। अनाश-शनाप फागज दराज में ही ठुसे जाते और
जलता हुआ गुलाव/75 फिर एक दिन भर जाती तो उन्हे चुनने, फाड़ने और रयने के लिए अपनी एक छुट्टी खर्च करनी पडती थी। ढूंढने पर उसे वह कागज मिल गया। तेरह तारीख ही थी। अविनाश ने साइकल ली और निकल लिया। कमरा खचाखच भरा हुआ था। उसे नहीं लगता था कि इतने लोग ऐमे सार्यक लेकिन लोगो के तत्कालिक लाभ से नहीं जुड़े हुए मुद्दे पर एकत्रित होकर बात कर सकते हैं। बैठक अभी शुरू नहीं हुई थी। सभी लोगो से अपना-अपना परिचय देने के लिए कहा गया। वे सभी समाज के प्रगतिशील तबके से थे । अपने अधिकारो के प्रति सचेत और अन्याय का प्रतिकार करने के लिए तैयार। वे थे प्रेस कर्मचारी यूनियन के मुख्य सचिव, सफाई मजदूर यूनियन के प्रधान, खाद्य निगम स्टाफ यूनियन के प्रचार सचिव, टीचर यूनियन के सरगर्म सदस्य, बिजली बोर्ड संगठन के जिला अध्यक्ष, स्थानीय समाचार पत्र के सम्पादक और एक मासिक लघु पत्रिका के सम्पादक जिसका अक साल-डेढ़ साल के बाद ही निकल पाता। 'मेहनत' अखबार के कातिव भी एक कोने में मौजूद थे। सबसे पहले बलविन्दर ने बोलना शुरू किया । उसने कहा, "पंजाब समस्या आपके घर से कदम बाहर रखते ही शुरू हो जाती है, बल्कि कहना यह चाहिए कि यह आपके घर में ही दाखिल हो चुकी है और मापके चारो तरफ हर वक्त मंडराती रहती है। पंजाब समस्या को लेकर जो गुल खिलाए जा चुके हैं वे आपके सामने हैं । साफ नजरों से जब भी देखा जाएगा तो कुछ चीजें बिल्कुल साफ उभरकर आएंगी। सन्त भिंडरावाले का रोल बीसवी शताब्दी के इतिहास-चक्र को उल्टा घुमाने की चेष्टा कही जा सकती है । धार्मिक जुनून मे हिटलिस्टों को कभी जायज करार नही दिया जा सकता।"दरवार साहब अमृतसर की फोजी कारवाई को भुलाया नहीं जा सकता."भ्रष्टाचारी प्रबन्ध के चौधरियों ने, निना नेतृत्व इन्दिरा गांधी कर रही थी, इस समस्या का हल अन्धी तारत के वल पर करना चाहा और अमृत के सरोवर को लहू के सरोदर ने बहन दिया "वसों से उतारकर निर्दोष और मासूम लोगों को परिषद 76/जलता हुआ गुलाव - सांसों को गोलियों से भेद देना गलत कहा जाएगा। नवम्बर के दिल्ली दंगों की वर्वरता और मानसिक छिछोरेपन का हम अभी तक कोई ठीक नाम खोज सके ?.."उस घटिया व्यवहार को इन्सानियत के बाहर माना जाएगा । अव हालात क्या हैं। पंजाब समझौता हो चुका है, जिसे लागू करने की हिचकिचाहट नुकसान दे सकती है--लोकप्रिय सरकार स्थापित हो चुकी है, जिसे लोगों को जरा भी ध्यान नहीं। लिहाजा पंजाब के हिन्दू पंजाव छोड़ रहे हैं और पंजाव के बाहर के सिखों को पंजाव के बाहर रहना सुरक्षित नहीं लगता। ऐसे हालात में पंजाब के वे लोग जो खालिस्तान नहीं चाहते, हिन्दू शासनवाद के समर्थक भी नहीं हैं, जनता के लिए न्यायपूर्ण स्थितियों का पक्ष लेते हैं, क्या करें ? इस मंच पर सभी साथियों को पूरे हालात पर खुले मन से बातचीत करनी चाहिए। सबसे पहले हम अमृतसर से आए हुए साथी इन्द्रजीत से अनुरोध करेंगे कि वे अपने विचार आपके सामने रखें..." इन्दरजीत ने कहा-"माज जब हम भिंडरावाले को पंजाब के व्यापक कतलों का जिम्मेदार ठहराते हैं तो इस बात को आंखों से ओझल कर देते हैं कि भिंडरावाले को राजनीति का हीरो बनाने में किसका हाथ है ? .. सभी लोग जानते हैं कि कांग्रेस के कारनामों से उसका नाम राज- नीति के पर्दे पर चमका था-ब्लू स्टार ऑपरेशन के लाभ शायद कम ज्ञान होने की वजह से मुझे मालूम नहीं, लेकिन जो नुकसान हुआ है वह हमारे सामने है-इससे सिख मानसिकता को चोट पहुंची है और उसकी पूर्ति के लिए कुछ नहीं हुआ। कोई मरहम इस पर नहीं रखा गया । पंजाब के साथ वितकरा हुआ है और इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता। भापायी आधार पर प्रान्त बनाए गए लेकिन पंजाबी सूवा उन्नीस सौ छयासठ में बना 'अव आइए पंजाव समझौते पर समझौता हरमिन्दर सन्धू के साथ किया जाना था। सन्धू को जेल से दिल्ली ले जाया गया-सन्धू का बयान इस बारे में आ चुका है और सरकार इससे इन्कार नहीं कर सकती. 'लेकिन लौंगोवाल जी के साथ सौदा कुछ सस्ता पट रहा था इसलिए वही किया गया. 'लालडेंगा ने भाप सभी जानते हैं आई स्ट्रगल लड़ा है, लेकिन फिर भी उसके साथ समझौता .
उनकार.27 किया गया-जब ऐसा वहाँ सही है तो पंवार नहीं नह है ? लालडेंगा के सभी साथियों को रिहा कर दिया है। ऐसा क्यो नहीं किया जा सरता?.. सेनाकोतिरेर पूरा हालने में इस समस्या का हल नहीं हो सकता। इनिहारा, पन्ना उठाकर देखिए"फौजों की नावने हो भी कोई नहीं निकाला, इसलिए पजाब को घोगों के हरि रोड कही जा रही है-एकाध राजनैतिक पार्टी इस निबन्द चला रही है- हमें इसका विरोध करना चाहता दिना कहकर मैं अपनी बात समान्त मना--हमहरि मग एंड आर्डर की समस्या नहीं है-ना प्रचार कसैहन मरकामी समझना चाहते हैं जबकि सांप माप है और भी मामही नहीं जाएगा। यह एक पोलिटिक्न समस्या है और इमरान टिकल होगा।" इन्दरजीत के बोलने वा ढग काफी वीमामा रमादाने नवर की फोल्ड वर्क ने उनकी टिप्पणी शेतस्दी दे दीपी। इसके बाद 'मेहनत' के कातिब सदागिद मांडताना रस। उनकी आवाज बड़ी धीमो यो। कमरे में बैंकमर की दर सुनने की कोशिश ही करते रहे । उन्होंने तीन बार मानी। बार बोलने से पहले कि अगर कोई मूल-चूर हो तो उन्हें मारकर दिया जाए---एक बार बीच मे जव रमेगनी म्हादत कोसाद कन्हें हुए वे लगभग रो पडे-एक वार अन्त में उद उन्होंने पोटा बोयरी कहा कि उन्होंने वज्म में हाजिर लोगों का काफी दम्न लिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने रामचरित मानस रिवन दान में पता है इतने ही ध्यान से आदि गुरुप्रन्य साहब भी। दान में ही दे गुरद्वार आते रहे हैं और गब्द कौतन सुनते रहे हैं। उन्होंने अपनी टेटी दिदष्ट पर 'लवि' भी गुरुद्वारे में ही की। उन्हें निदोष नोगों की हत्याओका बहुत दुख होता है। रमैग बी की हत्या जव हुई दे का दिन ना मी नहीं सके । वे बहुत ही नेक इन्सान थे।" उनके बाद प्रेस कर्मचारियों के यस तारनामह को इरदान 78 / जलता हुआ गुलाब - । । गया। उन्होंने कहा, "मौजूदा सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं। उनके आधे मन्त्री उग्रवादियों के हक में वयान देते हैं । उग्रवादी कार्रवाइयों के चलते पंजाब में महंगाई बहुत बढ़ गई है। जरूरी वस्तुओं के भाव लगभग दोगुने हो गए हैं। तेजी से बढ़ती हुई महंगाई के सामने मुलाजिमों की तनख्वाहें बहुत कम हैं । सरकार के पास जव यूनियन तनख्वाहें बढ़ाने की वात कहती है तो वे कहते हैं कि इस वक्त उनका ध्यान उग्रवाद पर काबू पाने में लगा है । इतनी हत्याएं हो रही हैं और आपको तनख्वाहों की पड़ी है। उनसे पूछिए कि उग्रवाद का क्या हुआ ? वे कहेंगे कि सरकार इस पर गम्भीरता से विचार कर रही है। स्थिति गम्भीर है लेकिन नियन्त्रण में है। साथियो ! इस सरकार के पास अपने कर्मचारियों की तनख्वाहें बढ़ाने का समय नहीं है लेकिन पैप्सीकोला की फाइलें उठाकर दिल्ली के चक्कर लगाने का समय है। "आज फिरकापरस्ती बढ़ती चली जा रही है। मैं समझता हूँ कि फिरकापरस्त ताकतें वहीं अपना काम आसानी से कर सकती हैं जहाँ लेफ्ट फोरसेज बहुत कमजोर हैं और कोई मूवमेंट चला नहीं पाए । आज अगर हम महंगाई विरोधी मूवमेंट चलाएँ तो मेरे ख्याल से फिरकापरस्ती को नथ डाली जा सकती है।" उनके बाद बोलने के लिए आये दिलवर । उन्होंने कहा कि वेशक वे हिन्दू परिवार से हैं लेकिन गुरु की वाणी को कई रूढ़िवादी सिखों से ज्यादा समझते हैं। आज 'कड़ाहखाणे' इस बात का महत्व नहीं समझते कि गुरुजी ने मलिक भागो की रोटी से लहू और भाई लालो की रोट से दूध की धार दिखाकर क्या सावित करने की कोशिश की है। सा जाहिर है गुरु नानक देव जी को एक मजदूर की रोटी एक अमीर पकवानों से ज्यादा बेहतर लगती है। फिर जब वे यह कहते हैं कि पाप की जंज ले काबुलों घाया जोरी मंगे दान वे लालो या ऐसा कहते हैं कि- जे सकता सकते को मारे ता मन रोप न कोई। - जलता हुआ गुलाव /79 तो किसी अपनी समकालीन सच्चाई को उजागर करते है और अन्याय का पूरा विरोध करते हैं। आज जरूरत है गुरुजी की बात को ठीक ढंग से समझने की और प्रचारित करने की। आगे उन्होंने कहा कि कुसियों वाले मूर्खतापूर्ण काम कर रहे है । वोटो की खातिर एक जाति को दूसरी के खिलाफ भड़का देना बहुत वड़ी मूर्खता है, जिसका अंजाम हमे देर तक भोगना पड़ता है। आज कांग्रेस का पहले वाला सेकुलर होने का चेहरा उतर चुका है। वोटो के लिए कही हिन्दू-मुस्लिम, कही कही हिन्दू-सिख झगडो मे धकेता जा रहा है । यह कोई अच्छी बात नहीं है। हमे हर सूरत मे इसका विरोध करना चाहिए। दर्शनसिंह ने हाथ खडा करके पहले बोलने की इजाजत मांगी फिर विना इजाजत मिलने की परवाह किये खडे हो गए। वे बहुत आवेश मे थे। उन्होने कहा, "दिलवर जी की उस बात के साथ मे सहमत नही हूं.''जब वे ऐसा कहते है कि व्यवस्था चलाने वाले लोग वेवकूफ है । मैं यह कहना चाहता हूँ कि सबसे बेवकूफ जमात हमारी मजदूरों की जमात है । हमे बेवकूफ बनाया जा रहा है और हम बन रहे हैं। पूरा दिन हम लोग काम मे इतना जुते रहते हैं कि हमारी सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है । वे लोग बहुत सयाने है। नफा-नुकसान को वात दूर तक सोचते हैं, वे जानते है कि कब कहां कितना पैसा लगाना है और कितना मुनाफा लेना है । अगर वे समझदार न होते तो हमारी तरह दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करते और शाम को पीपा उठाकर राशन की लाइन में लगते । नाले के पास के घरों मे रहते और बीमार होने पर सरकारी अस्पतालों मे सूअरो की तरह धक्के खाते लेकिन नहीं । ऐसा बिल्कुल नहीं है।"... और वे बैठ गए। बलविन्दर ने उनसे कहा, "पजाब समस्या पर अपने विचार ।" "वाको ठीक है। आप कार्रवाई चलाएं। जहाँ जरूरत होगी फिर बोलेंगे।" लघु पत्रिका के सम्पादक गिरीश जी की बारी थी।
80 / जलता हुआ गुलाव की-"उस उन्होंने अपनी बात पंजाबी के किसी नावेल से शुरू नावल का एक किरदार कहता है कि मेरे दोनों वेटे नालायक निकले। एक ने इण्डिया में रहकर मुझसे डर कर वाल नहीं कटवाए । दूसरे ने इंग्लैंड जाकर वहां के लोगों के दवाव में बाल कटवा दिए। 'मेरा एक मित्र है पाली । आर्टिस्ट है। दिल्ली में रहता है। नवम्बर दंगों में उसे अपने बाल कटवा देने पड़े। पिछली बार जब मैं दिल्ली गया तो भाभी ने मुझसे पंजाब के हालात के बारे में पूछा । मैंने कहा-हालात तो यह हैं कि यहाँ पाली केश कटवा दें और वहाँ मैं केश रख लूं । "हम ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जहाँ कोई शख्स किसी भी वेश में-चाहे दाढ़ी केश रखता हो-चाहे कटवाता हो पूरे अमन-चैन से जी सके और तन्त्र ने हमें इस मुहाने पर ला पटका है कि इस वेसिक चीज के लिए भी हमें संघर्ष करना पड़ेगा। "थोड़ी देर पहले मेरे साथी ने वितकरे की बात उठाई । मैं कहना चाहूँगा कि पूरे देश में इस समय नोकरशाही अन्याय और दमन के बूते पर अन्धेरनगरी का वातावरण बना रही है। एक तरफ दक्षिण अफ्रीका के महान जनगायक कवि भोला इसकी फांसी की तीव्र निन्दा की जा रही है तो दूसरी तरफ अपनी सांस्कृतिक आजादी के पहरेदारों को कुचला जा रहा है । आन्ध्र में तेलुगु पत्रिका 'एनकाउंटर' के सम्पादक की हत्या राजस्थान में गिरगिट' के प्रदर्शन पर प्रतिवन्ध, विहार में रंगकमियों को कानूनी शिकंजे में फंसाया जाना, दिल्ली में दास्तान-ए-गैस कांड के प्रदर्शन पर पुलिस अवरोध ऐसे कारनामों के कुछ उदाहरण हैं । "दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता के लाखों मजदूरों का जीवन स्तर बहुत घटिया है । महंगाई जितनी पंजावियों को परेशान कर रही है उतनी ही विहारियों और हिमाचलियों और हरियाणवियों को-इसलिए ऐसी मूवमेंट का चलना जरूरी है जो इन सब लोगों के हितों को देखती हो और जिसमें ऐसे सभी लोगों का साथ लिया जा सके।" उनके वाद वुलवाया गया लुधियाना के कामरेड सरूपसिंह को । उन्होंने अपनी बात कहने के लिए पहले स्पप्टीकरण दिया कि उनके विचार उनके अपने विचार हैं। किसी ग्रुप या पार्टी के नहीं। वे जैसा जलता हुआ गुलाद/81 इन दिनों सोच रहे हैं वैसा ही कह रहे हैं । इस पर यदि दूसरे साथी चाहें तो विचार कर सकते है । अगर उन्हे इस सोच मे ज्यादा वजन न लगता हो तो छोड़ सकते हैं। उनकी आवाज बड़ी धीमी आ रही थी इसलिए बलविन्दर ने उन्हें जरा ऊँचे बोलने को कहा । उन्होंने कहा : "मुझे इधर लगता है कि हममे से ज्यादा लोगो को खालिस्तान का भूत सता रहा है । सोते-बैठते, उठते-जागते हर वक्त इस भूत का ख्याल रहता है । इसलिए हो सकता है कि मेरी इस विचारधारा के कारण मुझे भी खालिस्तानी समझ लिया जाए। मैं पहले ही साफ कर दूं कि मेरा खालिस्तान अथवा अकाली पार्टी के साथ दूर का रिश्ता भी नहीं "अकाली पार्टी जिस तरह से मोर्चा चला रही है, वह कौमी मुक्ति का मोर्चा बनता जा रहा है। यह व्यापक मोर्चा बनता जा रहा है । वयासी से चौरासी तक इसके लिए डेढ लाख से ज्यादा स्त्री-पुरप गिरफ्तारी दे चुके है । अकाली बिल्कुल वही कर रहे हैं जो एक सर्वहारा जमात को करना चाहिए। आज हिन्दुस्तान के पजावी इलाको की दलाल सरमायेदारी हिन्दी दलाल सरमायेदारी के साथ मिलकर हमारी भाषा, सभ्यता, कला, साहित्य और इतिहास के नवश विगाडने पर तुली हुई है । हिन्दी दलाल सरमायेदारी पंजाबी दलाल सरमायेदारी के साथ मिलकर जबरदस्त लूट कर रही है । पजाब से खरीदा हुआ नरमा दिल्ली, अहमदाबाद और कानपुर ले जाती है वहाँ से कपडा तैयार करवाकर पंजाब में बेचा जाता है फिर वे कामरेडो की तरफ मुडे । "हमारे कामरेड भाई", उन्होंने एक बार पूरे कमरे का जायजा लिया और वक्तव्य जारी रखा, "सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय पैमाने पर सोचते हैं । माक्र्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद से हमे गाइड लाइन मिल सकती है और वे सब कोरे सिद्धान्त नहीं है, व्यवहार में परखी जाने वाली चीजें हैं । लेकिन अपने देश को परिस्थितियो पर जारी नहीं कि हम वही प्यूरी लागू करें जो चीन में हुई या रूस मे हुई । हमे अपनी परिस्थितियों मे अपने ढग अपनाने चाहिएं तभी हम इस मशाल को जला सकेंगे । क्यो 82 / जलता हुआ गुलाव न हमारे कामरेड इस मूवमेंट में कूद पड़ें और इसे सही अगुवाई देने की कोशिश करें। मैं समझता हूं कि असल में जरूरत है इस मूवमैंट को इन्कालावी दिशा देने की।" उनकी इस बात पर खुसर-पुसर शुरू हो गई। इस वक्त तक कमरा खचाखच भर चुका था। कमरे से बाहर भी कुछ लोग जमा थे । खुसर- पुसर चारों ओर हो रही थी। बलविन्दर के साथ भी तारनसिंह कुछ बातचीत कर रहे थे। लगभग पांच मिनट तक सभा-संचालन का काम रुका रहा। बलविंदर को खड़े होकर तीन-चार वार सुनिए-सुनिए कहना पड़ा। फिर कुछ के नाम लेकर चुप करने की प्रार्थना करनी पड़ी। उसने कहा, "साथी सरूपसिंह की बातचीत पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई है। मैं साथी निरंजन से गुजारिश करूँगा कि वे इस पर अपनी राय प्रकट करें।" निरंजन ने खड़े होकर सरूप पर बरसना शुरू कर दिया, "यह एक मुक्ति-संग्राम के प्रति उदासीन और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गड्डमड्ड समझ की अभिव्यक्ति है। उनके विचारों में बहाव है, सोच की दृढ़ता नहीं। वे कहते तो हैं कि उनका खालिस्तान से कुछ लेना-देना नहीं है लेकिन उनके विचारों से ऐसा लगता है कि वे समझते हैं कि खालिस्तान, बलोचिस्तान सर्वहारा की मुक्ति के निशाने हैं। जबकि यह समझ गलत हैं, वेबुनियाद है और फ्रांति की भ्रमपूर्ण धारणा को जाहिर करती है।" स्वरूप ने बोलने के लिए एक मिनट' कह कर उठना चाहा लेकिन बलविंदर ने कहा, "आप उनकी पूरी बात सुन लें पहले।" निरंजन ने फिर कहना शुरू किया, "साथी को समझ लेना चाहिए था कि यह मूवमैंट कुर्सी-युद्ध है, कोमी मुक्ति का संग्राम नहीं । 'अब श्रान्तिकारी हिरावल देखने के लिए प्रयत्न करने की जगह गुरुद्वारों में लंगर छकोंगे और जनता को संघर्ष की जगह अरदास करने की प्रेरणा देंगे।" इस बार तो सरूपसिंह खड़े हो गये, "मुझे इस पर सस्त ऐतराज है।" बलविंदर ने उन्हें बैठ जाने और निरंजन जी को अपनी बातचीत पूरी करने देने को कहा। सरूपजी ने कहा, "लेकिन यह सरासर मला जलता हुआ गुलाब | 83 निरंजन ने कहा, "आपने खुद जब सारे कामरेडों पर हमले रिये तब"'अब कहा है तो सुनने का जज्बा भी रखिए।" तारनसिंह और इन्दरजीत ने भी उन्हें बैठ जाने के लिए कहा। बलविंदर ने उन्हे दुबारा वोलने देने का वायदा किया और कुछ न समस पाने की शक्ल लिये स्वरूप बैठ गये। निरजन ने फिर अपनी बात शुरू की, "साथियो ! मेरा मकसद किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाने का नहीं है लेकिन मैं इतना जरूर कहूंगा कि सायी स्वरूपसिंह"हालाकि अगर वे ऐसी ही बयानबाजी करते रहेगे तो मुझे 'साथी' संवोधन पर दुवारा विचार करना पडेगा... उनका पूरे का पूरा वक्तव्य क्रातिकारी चेतना के क, ख, ग के विपरीत है। उसमें मूल प्रेरणा जड़वाद की हिफाजत की है नौर जड़वाद को सौ गुणा हजार गुणा करके लागू करने से जनता की समस्याएं हल नहीं होगी। यह कि हम डेमोक्रेसी के झूठ को छोड़कर जट्टवाद के सन्दक में चले जायेंगे । मैं इस विषय पर यहां ज्यादा विस्तार से बात नहीं करना चाहता और साथी बलविंदर से भी अनुरोध करूंगा कि वे बागे बोलने वालो को पूर्ववत मूल समस्या पर ही बोलने के लिए कहें. "इम पर अलग से एक विचार चर्चा रखी जा सकती है।" अविनाश अब तक सभी वक्ताओ को सुनता रहा था, वीच-बीच में एक वदता घोल कर हटते तो उसे लगता कि शायद उसे बोलने के लिए कहा जायेगा लेकिन फिर जब कोई दूसरा नाम सामने या जाता तो अपने बोलने की बात स्थगित कर देता । कई बार उसे लगता जैसा वह मौचना था वैसा कहा जा चुका है। अब तक उसे लगने लगा कि एक तो मक पास कहने को कोई खास बात रही नहीं, दूसरे उमके बोलने को जट भी नही समझी जा रही। तभी बलविंदर ने उसको बोलने के लिए कहकर चौका दिन। अमली झटका उसे तब लगा जब बोलने के लिए खड़ा होते ही नगरी नजर लड़कियों पर पड़ी । पहलो डा० गीता थी। वे महिलाओं के नि एक बाठ या सोलह पेजी पर्चा निकालती थी। दूसरी पर नजर पड़े ।
:84 / जलता हुआ गुलाव अभी काबू ... उसके दिमाग में पांच-सौ वाट के हजार वल्व जलने और वुझने की हालत हो गई । वह हरदीप थी। एकदम हरदीप । वेशक अविनाश की चेतना को इस स्टेशन से निकलने में कुछ सैकिण्ड ही लगे लेकिन वे कुछ सैकिण्ड भी जलजले से होकर निकलने जैसे थे । बमुश्किल अविनाश के मुंह से फूटा, "साथियो ! बहुत कुछ पंजाव समस्या के बारे में कहा जा चुका है-" उसे लगा कि उसकी लड़खड़ाहट में नहीं आ रही । उसने फिर पूरी तरह से चेतन होने के लिए जोर मारा. "मैं इस संबंध में यह कहना चाहता हूँ कि हमें बहुत ठोस कदमों से चलना होगा। पूरे यथार्थवादी ढंग से नजरों के पैनेपन के साथ देखना- समझना होगा, जैसे हम पानी में डूबते ववत करते हैं । यदि हमें डूबने से बचना है तो। नहीं तो एक-दूसरे के गले पड़ने का पूरा मौका है। अनेक शक्तियां 'वक अप', 'वक अप' कर रही हैं। मैं यदि गुरु गोविन्द सिंह की जुझारू नीति का वहुत आदर करता हूं तो यह मेरी भावना है। शक्लो-सूरत से मैं हिन्दू हूं और संकटकाल में हिन्दू ही माना जाऊँगा। सुमीत, 'प्रीतलड़ी' का संपादक अपने कटे केशों के कारण हरियाणा से बच कर निकल आया लेकिन पंजाब में हिन्दू समझ कर मार दिया गया। अकेली भावना और कोरा आदर्श दूर तक चलता नहीं। महात्मा गांधी ताउम्र अहिंसा का जाप करते रहे लेकिन उनकी मृत्यु हिंसा से हुई ।" अविनाश को लगा कि उसकी बात को ध्यान से सुना जा रहा है, इसलिए उसने आगे कहना शुरू किया, "आप सभी जानते हैं आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक मांगों को लेकर शुरू हुआ यह आन्दोलन साम्प्रदा- यिक मार-काट की शक्ल इख्तियार कर गया है। जहाँ संत भिंडरावाले की नीति इसके लिए जिम्मेदार है वहीं क्या सरकार की लटकाने वाली नीति और सरकारी ढांचे के मूल तत्व इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ? पहले जानबूझ कर इसे जहरीला फोड़ा बनने दिया गया, फिर वेवक्त और गलत ढंग से 'नीला तारा' आप्रेशन करके सिख मानसिकता को चोट पहुंचाई गयी। धामिक जजबात दवाव में और भी भड़कते हैं। हालात यह है कि आज संत भिडरांवाले और इंदिरा जी. दोनों नहीं जलता हुआ गुलाब/85. हैं. लेकिन अपने-अपने सेक्टर में दोनों जिन्दा हैं। "जहाँ तक तमाम कम्युनिस्ट पार्टियों और ग्रुपों के मोर्चे का सवाल है. मैं समझता हूँ कि पंजाब में इनकी कोई कारगर भूमिका नही रही है । कोई कारगर भूमिका होती तो आज हालात यह न होते। यह दोप उनके संगठन में है, नीतियो में है या लीडरशिप में, यह वही देखें । वटाला का उदाहरण लिया जा सकता है। वहाँ लगभग एक महीने तक बंद रहा है। अगर कम्युनिस्ट पार्टियो मे से कोई ग्रुप भी वहां की मजदूर जमात को मंगठित कर कुछ कार्यवाही करता तो दशा बदल सकती थी। कम्य- निस्ट लीडरशिप अगर कोई दिशा दे सकी होती तो पजाव में यह धर्म का अन्धा जुनून नहीं होता। इसकी बजाय लोग उनके गले पड़ते जो महगाई बढाते हैं, जो विजली नहीं देते, जो वेकारी के जिम्मेदार हैं और जो हिन्दू-सिख को लड़ा रहे हैं । "जितनी आग इस वक्त तक लगाई जा चुकी है, उसे देखते हुए यह बैठक हमारे किये जाते प्रयत्न बहुत छोटा-सा रोल अदा कर सकते हैं. लेकिन हमें इसे हाथ से नही जान देना चाहिए। ऐतिहासिक करवट में कई दफा छोटी-छोटी चीजें भी व्यापक बन जाती है और पूरा प्रभाव छोड़ती है।" बैठने से पहले अविनाश की नजरें हठात हरदीप की तरफ उटी । हरदीप उसकी तरफ ही देख रही थी एकटक । सरूप ने फिर बोलने के लिए समय मांगा लेकिन पीछे से किसी ने बावाज कसी कि यदि स्वरूप वोलेंगे तो निरजन फिर बोलेंगे। बलविंदर चक्कर में पड़ गया। तारनसिंह ने विवाद मिटाने की गर्ज से कहा कि इस विषय पर अलग से एक बैठक बुलाई जा सकती है और वहस रखी जा सकती है। इन्दरजीत ने भी तारन की बात को समर्थन दिया और कहा कि समय भी काफी निकल चुका है । हालात पराव है और कुछ लोगों को शायद दूर जाना है। स्वरूप गुस्से मे उठकर चले गये। बलविंदर ने उन्हें रोकना चाहा लेकिन तारनसिंह ने मना कर दिया और कहा कि आगे की कार्यवाही चलायें । फिर बहस एक्शन हुई । कुछ लोगों का ख्याल था कि मुहल्ला कमेटियां बनायी जायें, कुछ का विचार था कि पहले रलियां निकाली - 86/ जलता हुआ गुलाब जायें । एक सुझाव यह भी था कि एक्शन कमेटी बना दी जाये। सर्व- सम्मति से एक्शन कमेटी के मैम्बरान चुने जायें। जो एक्शन मुनासिव समझें, वही लिया जाये । अन्त में सबसे पहले चण्डीगढ़ में एक रैली किये जाने का प्रस्ताव पास हो गया। अविनाश ने बाहर निकल कर चप्पल पहनी । शहर के चप्पे-चप्पे पर रात के डेने डैने पसर चुके थे। अपनी साइकल देखने के लिए उसने मुंडर से झांका । इन्दरजीत आकर उसके पास रुक गया, "कभी अमृतसर आगो तो मिलना" उसने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा । "जरूर" अविनाश ने कहा । इन्दरजीत ने अपना पता लिख कर दे दिया। अविनाश का ध्यान हरदीप की तरफ था । वह बाहर निकल कर चप्पलें ढूंढ़ रही थी। इन्दरजीत उसे बता रहा था कि किस तरह पुतलीघर के पास एक ली-सी बात पर उठा हुआ विवाद हिन्दू-सिख झगड़े का रूप ले रहा था। अगर मौके पर वे लोग नहीं होते तो जरूर चार-छह लाशें गिर गई होती। हरदीप को चप्पल मिल गई थी। वह पहन कर उनकी तरफ ही आ रही थी। इन्दरजीत कह रहा था कि कभी-कभी उसे लगता है कि तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद हम लोग उल्टे कदमों से चलकर किसी अन्धकार की तरफ बढ़ रहे हैं। हरदीप उनके पास ही आकर रुक गई। उसने अविनाश को नमस्कार किया और शिष्टाचार के नाते इन्दरजीत को भी । इन्दरजीत ने यह देख कर कि वह अविनाश से बात करना चाहती है, अविनाश से विदा ली। "आप वाकई अच्छा बोले।" हरदीप ने इन्दरजीत की जगह खड़े होकर कहा। "धन्यवाद ! मैं तो तुम्हें यहाँ देखकर चौंक गया।" "क्यों? अगर आप सूचना नहीं दें तो क्या हमें विल्कुल कुछ पता नहीं चलता ?"
जलता हुआ गुलाव /87 "इम बात का जवाव और बहुत-मी वातों के साथ दिया जा सकता है । चनो, चलते हैं । मेरा सिर दर्द कर रहा है, कहीं चाय-कॉफी पीते हैं। फिर मैं तुम्हें घर छोड दूंगा।" "लेकिन अभी हरपाल स्कूटर से मुझे लेने आने वाला है।" "हम यहां बलविंदर को कह जायेंगे कि हरपाल को बता दे कि मैं तुम्हें साथ ले गया हूं और छोड दूंगा।" "लेकिन?" "क्या बात है, डरती हो कि घर में मेरे उडा ले जाने पर बुरा मनाया जायेगा।" "नहीं, वो वात नहीं।" "तो बात है क्या तुम जानबूझ कर मुझे काट रही हो। मेरी अव. हेलना कर रही हो। और इसके बारे में वित्कुल अनजान बनी रहना चाहती हो।" अविनाश की आवाज मे तल्खी थी और उसकी आवाज इतनी उठ गई थी कि सैडिल पहनती डा० मीता ने भी उघर देखा। अविनाश शायद आगे भी कुछ कहता लेकिन हरदीप ने कहा-"चलिए।" "यकीन करो तुम्हारी इजाजत के बगैर मैं तुम्हे.. "चलिए भी।" अविनाश ने बलविन्दर से इजाजत ली लेकिन तभी डा० मीता ने उसे टोका और कहा कि एक मिनट रुकें। मीता अपने बैग से दवी कुचली औरतों के बारे में एक पत्रिका निकाल कर लाई और उसे देते हुए कहा कि पढ़ कर अपनी राय दें। एक साफ-सुपरे ढंग को पत्रिका निकालना और वह भी वगैर किसी समझौते के, कितना मुश्किल है यह तो वे जानते ही हैं । अविनाश ने पत्रिका लेकर अपनी राय और चन्दा भिजवाने का वायदा किया। सीढ़ियां उतरते हुए उसने हरदीप से कहा, "जरा ध्यान से, अंधेरा है।" जेब से चाबी निकाल कर साइकल का ताला खोला और हरदीप के साथ हो लिया। आज वह हरदीप से बहुत-सी बातें करना चाहता या। घर-परिवार के बारे में, घटिया नौकरी के बारे में, अपनी उपेक्षा 88 / जलता हुमा गुलाब और अपेक्षा के बारे में-दुनिया जहान की ढेर-सी बातें और ढेर से जख्म हरदीप के सामने खुलेंगे । उसने सोचा कि यहाँ से केसरी तक पैदल जायेंगे । वहां कॉफी लेंगे फिर पैदल हरदीप के घर तक । इस तरह उसे इफरात से बातें करने का मौका मिलेगा। उसने कहना शुरू किया, "मुझे लगता है कि हमारा सब कुछ भ्रष्टा- चार की नींव पर खड़ा है । हमारी शिक्षा, सेहत, खेलकूद, शक्ति, खुश- हाली, रिश्ते-नाते, दोस्तियाँ, प्यार-प्रेम सव कुछ को यह भ्रष्टाचार का दीमक नाट रहा है।" उसने हरदीप की तरफ देखा । वह विल्कुल उसके बराबर चल रही थी और उसकी वात का एक-एक शब्द बड़े ध्यान से सुन रही थी। "यह तमाम चीजें कितनी बड़ी नेमतें हैं लेकिन..." वे लोग वमुश्किल शास्त्री चौक पार कर पाये होंगे तभी एक स्कूटर को लाइट सीधी उनकी आँखों में पड़ी । फिर विल्कुल करीव आकर बुझ गई और स्कूटर की आवाज बंद हो गई। स्कूटर पर हरपाल था। उसने अविनाश को 'सत्सरी अकाल' की और हाथ मिलाया। "मनजीत भाजी दुकान से बहुत लेट आए । मैंने समझा तुम कव की जा चुकी होगी। मीटिंग तो सात बजे खत्म होने वाली थी न !" उसने हरदीप से कहा। "नहीं आठ ही बज गए खत्म होते-होते।" "तुम दोनों रिक्शा ले लो घर के लिए, मैं चलता हूँ। लेकिन आपके पास साइकल है।" "फिर क्या ? तुम स्कूटर धीरे चलाना । ये साइकल से चलेंगे।" "नहीं, मैं घर नहीं आ पाऊँगा । मुझे कहीं जाना है।" अविनाश ने बुझी आवाज में कहा। "कहाँ जाना है आपको? अभी तक तो कोई कार्यक्रम नहीं था।" हरदीप ने पूछा। "मुझे मंगल भाई के यहां जाना है। पहले से तय था लेकिन मुझे याद नहीं था।" "छोड़िए । घर चलिए। मैं अच्छी कॉफी बना लेती हूँ। फिर आपके । ?
जलता हुआ गुलाव /89 मिर में दर्द है। थोड़ी देर वहां आराम कर लेंगे।" "नहीं ! मंगल लोग इन्तजार कर रहे होंगे। फिर कुछ ऐसा ददं भी नहीं है।" हरदीप समझ रही थी कि मंगल के यहां जाने का बहाना है। वह इम वहानेवाजी को वजह भी समझ रही थी, लेकिन अविनाश साइकल पर सवार हो चुका था और हरपाल से हाथ मिलाकर दिदा ले रहा था। "घर चलिए न । कई दिनो से आप आए नहीं । भापाजी पूछ भी. रहे थे।" हरपाल ने कहा। "भापाजी से कहना कि मैं फिर कभी आऊँगा।" और जोर के माय माइकल का पंडल मारा और चल दिया । हरदीप की तरफ देखा तक नहीं। स्कूटर के पीछे बैठी हरदीप जव अविनाश के पास से गुजरी तव उसने विश के लिए हाय रटाया लेफ्नि अविनाश ने जैसे देखकर भी नहीं देखा। अविनाश के माइकल की चैन उतर गई । वह उतर कर चढने लगा। मंगल के यहां उस शाम उसे न जाना था। न वह गया। एक बार उसका जी चाहा कि वापिस बैठक स्थल पर चला जाए । इन्दरजीत, डा० मीता, दलविन्दर वर्गरा अभी वही होंगे । योड़ी देर उनके साथ गुजारे, लेकिन फिर वह अपने एकान्त अंधेरे कमरे की तरफ चल दिया। .
सात रामरत्न को वकील एन० एस० घई की मुंशीगिरी करते हुए तीन साल गुजर गए थे। इन तीन सालों में मुंशीगिरी के काम के लटके वह नहीं सीख पाया था। उसे अदालतों में धक्के खाने वाले लोग इतने बेबस और निरीह लगते थे कि वह उनसे पैसा नहीं बटोर पाता था। दूसरे मुंशी जितनी आसानी से हर पेशी पर मुवक्किल की जेब से नोट निकलवा लिया करते थे वह नहीं कर पाता था। कई बार ऐसा हुआ है कि मूंडने के लिए उसने उस्तरा तो तेज किया है लेकिन ऐन वक्त पर उस्तरे को बक्से में डाल दिया है। उसे लगने लगता है कि वह एक लुटे हुए आदमी को लूट रहा है या किसी ऐसे आदमी से आखरी लंगोटी छीन रहा है जिसने नहाने के लिए कपड़े बाहर रखे थे और कोई नकदी, घड़ी, कपड़े और जूतों सहित चम्पत हो गया । वह पैसे मांगने के मामले में हकला कर रह जाता और बाद में डांट भी खाता और खुद भी पछताता। वकील साहव उसे बुद्ध मानने लगे थे। दूसरे मुंशी उसे समझाते-घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या । मुंशी रामसरन ने उसे कुछ दिन श्मशान घाट या हरिद्वार के पण्डों के साथ गुजारने की सलाह दी। वे लोग तो मुर्दे के शरीर और राख की बुनियाद पर धन्धा चलाते हैं। रामरत्न ने इस वीच कई वार बैंक, पी एण्ड टी, रेलवे वगैरा के क्लर्क पद के फार्म भरे, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया । उसे समझ नहीं आता था कि ऐसी नोकरी और उसके वीच फासला आखिर किस वात का है ? ।
जलता हुआ गुलाब /91 मां कहती तुम्हारा तो पढ़ा-लिखा सब रेत पर वह गया । तुम इतना पढ़-लिखकर चार सौ कमाते हो । शोकी रेहड़ी वाला विना पढाई किए सात-आठ सौ रुपया महीना नहीं छोड़ता। रामरत्न ने कह-कहलवा कर अपनी पगार साढे चार सौ तक करवा ली थी लेकिन चीजों के भाव देखकर उसकी रूह फना हो जाती। सिर्फ सन्जी खरीदने जाता तो बहुत कतर-व्योत करने पर भी सात-आठ रुपये सर्च हो जाते और वह ठगा-सा झोला लिये घर लौटता। जसमेल फोटोस्टेट की दुकान से वह वकील साहव के मुकदमे की कापियां वनवाया करता था। वे उसे भरोसे का आदमी समझते थे। जितने का बिल वह लाता उतने अदा कर दिए जाते वगैर पडताल किए। एक दिन उसने जसमेल से बीस कागजात की तीन-तीन कापियाँ वनवाई । एक रुपया पहली कापी का, पचास पैसे दूसरी और तीसरी कापी के । चालीस रुपये का काम या। जसमेल ने भूल से पचास रुपये का बिल बना दिया। विल लेकर उसने जैब में डाल लिया और पैसे देते वक्त मन ही मन मे दुवारा हिसाब लगाकर कहा, "चालीस बनते " "चालीस ही दे दो।" जसमेल ने कहा । उसने पचास का नोट देकर दस रुपये वापिस ले लिए। "विल ठीक कर दूं?" जसमेल ने पूछा । "छोडो।" कहकर कागज समेट कर वह बाहर आ गया । 'छोड़ो' कहते वक्त ही उसके दिल मे एक मामूली-सा फर्क आ गया था। यह फर्क उसे बार-बार कुरेदता रहा। उसका जी चाह रहा था कि दस रुपये गोल कर जाएं । यह वात पहली बार उसके मन में आ रही थी और उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। इन दस रुपयो से वह मां को प्लास्टिक की चप्पलें लाकर दे सकता है । उनकी चप्पल बिल्कुल टूट चुकी थी। लेकिन अगर जसमेल ने वकील साहब को बता दिया तो सारा किया. कराया चूल्हे में चला जाएगा। चार साल से ज्यादा अरसे का बना हुआ विश्वास एकदम टूट जाएगा।
92/ जलता हुआ गुलाब । जसमेल को क्या पड़ी है यह बताने की । और वकील साहब कोन उनसे पूछने जा रहे हैं ? जैसे यही एक वात वची है उनके दरियाफ्त करते-फिरने की । फिर कौन सावित कदम है इस जमाने में? जिसका जहां दाव चलता है गिरह लगता है और तीतर हो जाता है। यार दस रुपये की ही बात है। दस रुपये के पीछे अपना करेक्टर खराव करेंगे। उसने हातिमताई के अन्दाज में मन में कहा । उसने जाकर कागजात वकील साहब को सौंप दिए । "अच्छा, हो गए। कितने पैसे लगे ? रामरत्न ने रसीद आगे बढ़ा दी। कुछ कहा नहीं। घई साहब ने पर्स की जिप खोल कर सौ का नोट बढ़ा दिया और पचास रुपये फोटोस्टेट के और पचास रुपये मोहन सिंह के केस में जुर्माना भरने के । “उसका जुर्माना जमा करवा दो और रसीद ले आओ।" 'हाँ' और 'न' के वीच चलते-चलते भी रामरत्न ने दस रुपये अपनी जेव के हवाले कर लिये। पूरा दिन और पूरी रात उस पर इसका बोझ रहा । नींद उसे तभी आई जब उसने दस रुपये घई साहब को दूसरे दिन जाकर दे देने का फैसला कर लिया। वकील साहब ने स्कूटर की चाबी देखने के लिए काले कोट की जेब में हाथ डाला तो पता चला कि बच्ची के डेट आफ बर्थ के सर्टिफिकेट को फोटो काफी करवाने के लिए सुबह जेब में डाला था । जेब में ही रह गया । कापी उसके स्कूल में दी जानी थी। दो-चार मिनट पहले ही उन्होंने रामरत्न को छुट्टी दे दी थी। "जाते वक्त जसमेल से करवा लेंगे।" उन्होंने सोचा। जसमेल की दुकान पर स्कूटर रोककर उन्होंने फोटो कापी तैयार करवाई और पर्स खोलकर पांच का नोट बढ़ा दिया । "रहने दें जहाँ इतना काम होता है वहां एक कापी का क्या है ?" जसमेल ने नम्रता से कहा। "नहीं, नहीं । पैसे तो तुम्हें लेने ही पड़ेंगे नहीं तो काम भेजना बन्द कर दूंगा।" ।
जलता हुआ गुलाब/93 लाचार उसे पैसे लेने पडे। चार रुपये लौटा कर उसने कहा, कि गिन लें, कही उससे भूल न हो जाए। "तुमसे क्या भूल होगी ?" "भूल सभी से हो सकती है, घई साहब । आज की ही बात बताऊँ, रामरत्न से चालीस रुपये लेने थे वीस कागजो के। बिल काट दिया पचास रुपये का।" "वया?" "हाँ जी, फिर विल तो ठीक नहीं किया, लेकिन दस रुपये लौटा दिए ।" धई साहब ने स्कूटर स्टार्ट किया और चल दिए । लेकिन कोई चूल हिल गई थी जैसे । उन्होंने वी० एम० सी० चौक से स्कूटर वापस मोडा । 'पता नहीं कब से क्या-क्या चल रहा होगा।' जसमेल से पूछा कि रामरत्न ने पैसो के मामले में उससे सांठ-गांठ तो नहीं की । जसमेल ने सूखे काठ को कसम खाकर कहा कि रामरत्न ने कभी एक पैसे की गड़वह नहीं की। वह तो बहुत ही सीधा और शारीफ आदमी लगता है। रात मोते वक्त वकील साहब को रामरत्न का ख्याल रहा । उन्हें उसमे कोई खास खोट नजर नहीं आया। फिर भी वे तय कर चुके थे कि अब उसे अपने पास नहीं रखेंगे । उन्हें बार-बार लगता रहा कि रामरत्न को उन्हें बता देना चाहिए था, उसके पास दस रुपये ज्यादा चले गए हैं । मुवह उठ कर डेरी से दूध लाना वकील साहब का पहला काम रहता है । दूध लेकर आते वक्त भी वे रामरत्न के बारे में सोच रहे थे। जबकि आमतौर पर इस वक्त वे अपने सबसे पेचीदा केम के बारे में सोचा करते थे। तभी उन्हें जस्टिस एच० एल० चोपडा दीप पड़े । वे अपनी सिमटी की जंजीर घाम सैर से लौट रहे थे। वकील साहब उनकी बहुत कद्र करते थे। उन जमा न्यायप्रिय और बात की तह तक पहुंचने वाले जज बाजकल के दौर में कम ही मिलते हैं । वकीलों के वाक-जाल में क्व वे सही वात तक पहुंच जाते हैं, कोई नहीं जान पाता। दुआ-सलाम हुई। बरियत पूछी गई। । ।
94 / जलता हुआ गुलाब जज साहब ने कहा कि घर का कामकाज, सौदा-सुल्फ लाने और बच्चों को दुपहर का खाना वगैरा पहुंचाने के लिए कोई लड़का निगाह में हो तो बतायें। वकील साहब ने कहा कि वे रामरत्न को भेज देंगे । लड़का नेक है। बी० ए० पास होने का जिक्र उन्होंने किया नहीं कि कहीं वे मना न कर जज साहब ने कहा कि उन्हें तकलीफ होगी। वकील साहब ने जवाब दिया कि कोई तकलीफ नहीं होगी। अगले दिन रामरत्न को सफाई का मौका दिए बगैर वकील साहब की नौकरी छोड़कर जज साहव के यहाँ नौकरी शुरू करनी पड़ी। उसे इस बात का बुरा लगा कि उससे विना पूछे यह तय कर लिया गया है । वकील साहब के दफ्तर के काम और जज साहब के घर के काम में बद- लना भी उसे रिवर्ट होने जैसा लगा। लेकिन एक तो पहले दिन का दस रुपये वाला काण्ड और दूसरे नौकरी की जगह किसी दूसरे विकल्प के नहीं होने पर उसने इसे स्वीकार कर लिया । मरता क्या न करता । घर के लोगों को भूखे तो मारा नहीं जा सकता । जब पूरा निजाम अपने पढ़े-लिखों को धक्के खाने पर मजबूर कर रहा है तो यही सही। उसकी क्लास में एक लड़का था राजेश्वर नाथ । एकदम नालायक फिसड्डी, लेकिन हद दर्जे का वातूनी और शरारती। कोर्स की किताबें वेचकर फिल्म देख माना उसके लिए बेहद मामूली बात थी । उसके मां- वाप अनपढ़ थे। एक बार ब्लाटिंग पेपर खरीदने के नाम पर उसने अपने वाप से पचास रुपये ऐंठ लिये थे। परीक्षा सिर पर आ जाने से नकल मार कर पास होने के सिवा उसके पास कोई रास्ता न था । जैसे-तैसे वह वी० ए० पास कर गया था, लेकिन एक प्रार्थनापत्र तक नहीं लिख सकता था। एक दिन दुर्घटना में उसकी बाई बाँह जाती रही। उसे 'फिजीकल हैण्डीकंप' होने के कारण खुराक विभाग में नौकरी मिल गई। आजकल वह रिक्शा लेकर रोज उसके सामने से निकलता है और रामरत्न को 'हलो' कहता है। फूल-सी कोमल लड़की से उसकी शादी हुई है। शाम को वे दोनों टहलने के लिए निकलते हैं। तव भी अगर रामरत्न जलता हुआ गुलाब/95 उसे दीख जाए तो विश जरूर करता है। रामरत्न थोड़ा और दुख जाता है । उसके मुहल्ले का ही एक और लड़का चमन लाल था। स्कूल के दिनो में उसने केश रख लिये थे और सिंह सज गया था लेकिन नाम चमन लाल हो रहा । पढ़ता बहुत था। हर वक्त किताव खुली रखता। चन्द किताब भी उसके हाथ में होती तो अंगुली किसी लैसन में फंसी रहती । किस्मत की मार यह कि नम्बर तीस-पैतीस से ज्यादा कभी नहीं आए। वजीफा मिलने लगा था लेकिन शैड्यूल कास्ट होने का । हम कहा करते कि टीचर को उसकी पुस्तक-पूजा देख कर ही पचास- साठ नम्बर दे देने चाहिए। लेकिन टीचर-फटीचर चमनलाल और उसकी किताब न देखकर पेपर देखते और मर कर पास करते। वही चमनलाल कोटे के अधीन पजाव एण्ड सिन्ध बैंक में नौकरी पा गया और मोपेड से आने-जाने लगा था। ऐसे में कभी-कभी उसका जी चाहता कि वह या तो शेड्यूल कास्ट होता या फिर फिजीकल हैण्डीकंप । कम-अज-कम सरकारी नौकरी तो मिल जाती। फिर कभी वह तय करता कि जिन्दगी जैसी भी है वह इसे जीयेगा। आत्म-हत्या नहीं करेगा। कभी भी नहीं।"और" और कभी मौका मिला तो समाज में कोढ की तरह फैलती हुई बदइन्तजामी, भ्रष्टाचार, वैइन्साफी फैलाने वालो को कोडे मार-मार कर पूछेगा-मालो मुझ जैसी ने आप लोगों के खेत में कौन-सी भूषी भैस छोड दी थी जो हमारा यह हथ किया? फिर बहुत से सवाल उसके सामने आ जाते-यह मौका उसे मिलेगा कव ? मौका उसे कौन दिलाएगा? कोई उसके लिए मौका क्यो दिल- वाएगा जब वह खुद ही कुछ नहीं करता ? वह खुद करे तो करे क्या' और इन सवाल टकराते-टकराते उसे नीद आने लगती। जज साहब बहुत ही बढिया आदमी थे। नौकरो तक मे कभी तुम से वात नहीं करते थे। उनकी बडी विटिया सध्या जो वि कानि पढ़ती थी बहुत ही शालीन और कुलीन थी। रामरत्न को नरे यहां काम करके खुशी ही मिलती। काम था ही क्तिना । अनसनी 96/ जलता हुआ गुलाब को स्कूल छोड़ देना और ले आना। सुबह भैंस का दूध और शाम को बच्चों के लिए गाय का दूध लाना । दुपहर को दोनों बच्चों को टिफिन पहुंचाना। मार्किट से छोटी-मोटी चीजें खरीद कर लाना । जज साहब की मेज-कुर्सी की सफाई और किताबों को करीने से रख देना। उसकी ड्यूटी का समय जरूर बढ़ गया था। वकील साहब के यहां उसे सात बजे तक छुट्टी मिल जाती थी लेकिन यहाँ वह नौ से पहले घर न पहुंच पाता । आठ बजे घर के सभी लोग खाने की मेज पर जुटते थे। खाना खाने के बाद उसे बरामदे से टेलीफोन और टी. वी. जज साहब के कमरे में पहुंचा देना होता था। रात को वे सिर्फ न्यूज ही टी० पी०पर देखते थे। बाकी कमरों में टी०वी० था ही । इस तरह वह नो बजे घर पहुंच पाता। घर पहुँचना उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी नगर से खण्डहर में आ गया हो । पोश कालोनी की जगह बस्ती । वंगलों की जगह तिड़कते हुए मकान । फूलों से लदे पार्कों की जगह गन्दी नालियों की वदवू । भव्यता की जगह फटे हाल मामूलीपन । एक दिन बरामदे में अजय होम-टास्क कर रहा था । एक प्रश्न नहीं आने पर वह सन्ध्या को पुकार रहा था । सन्ध्या के नहीं आने पर उसने नोट बुक पटक दी। रामरत्न ने नोट बुक उठाई और अजय से कहा कि वह उसे सवाल ' करवा देगा। अजय की मासूम आँखों में अविश्वास था । रामरत्न ने पूछा कि कौन-सा सवाल है । अजय ने बताया कि तीन प्वाइन्ट दो का तीसरा । रामरत्न ने सवाल देखा । बहुत ही आसान था । उसने अजय को बड़े दुलार से समझा दिया। हरदीप जव सन्ध्या से मिलने आई तव रामरत्न सवाल समझा रहा था। हरदीप ने पूछा-"सन्ध्या ?" "ये नहा रही हैं । आप वैठिए ।" रामरत्न ने कुर्सी आगे कर दी। "आपके लिए चाय लाऊँ या ठण्डा ?" "नहीं, सन्ध्या नहा लेगी तभी लेंगे।" "तुम पहले कहां काम करते थे, रामरत्न ?"
No text on this page.
98 / जलता हुआ गुलाव होगा।" 2 "मुझे लगता है विज्ञान की लाख प्रगति के बावजूद हम लोग अपने- अपने संस्कारों से विल्कुल जाहिल हैं । धर्म हमारा सबसे सेंसेटिव मसाला है । वे लोग इस कमजोरी से परिचित हैं और सत्ता चलाने के लिए इस सेंसेटिव मसले से छेड़छाड़ करते रहते हैं । वोटों के वक्त यही देखा जाता है कि कौन किस एरिया से हिन्दू वोट ले सकता है, कौन किस एरिया से सिख या मुसलमान वोट ले सकता है। अकाली लीडरशिप का उग्रवादियों के प्रति उदार रवैया है, वोटों के कारण। केन्द्रीय सरकार लौंगोंवाल-राजी व समझौते को लंगड़े ढंग से लागू कर रही है वोटों के कारण । 'मुझे नहीं लगता कि अब हम जिन भयावह परिस्थितियों में धकेल दिए गए हैं वहाँ से कभी बाहर आ पाएँगे।" "वाहर निकलने की एक सूरत हो सकती है। वह यह कि पंजाब के ऐसे तमाम लोग जो न तो खालिस्तान चाहते हैं न हिन्दू राज्य, एक मोर्चे पर इकट्ठे हो जाएँ ।" फिर हरदीप ने सन्ध्या को पिछले दिनों हुई बैठक के बारे में बताया। सन्ध्या ने कहा कि उसे चाहिए कि ऐसी वैठकों की पूरी रिपोर्ट उसे दिया करे। फिर खुद ही अपनी बात करते हुए कहा कि अव शायद उसकी काम करने की आजादी पर प्रतिवन्ध लगा दिए जाएँ। "क्यों ? तुम्हारे पापा तो बहुत खुले मन के व्यक्ति हैं ।" "वात पापा की नहीं, हालात की है। अब पापा चाहेंगे कि मैं नजरवन्द की तरह रहूँ।" "क्या हुआ, बताओ न ! तुम्हें मेरी कसम।" "पापा को खालिस्तान कमांडो फोर्स की ओर से लिखा हु मिला है कि उन्हें और उनके परिवार को गोलियों से उड़ा दिया जाए। कहते हुए सन्ध्या के होंठ थरथरा रहे थे। "अरे !" "मैंने आज पापा से कहा था कि वे कोर्ट नहीं जाएँ। उन्हों कि 'पागल ! डरकर काम नहीं छोड़ दिया जाता।" "लेकिन उन्होंने कुछ किया नहीं ?"
जलता हुआ गुलाव /99 "क्या करेंगे?" "मेरा मतलव डी० सी०, सी० एम० को रिपोर्ट करें।" हरदीप के मुंह से निकला। "यह सब तो शायद वे करें भी लेकिन इससे फायदा ? दो मुरक्षा- कर्मी दे दिए जाएंगे और क्या और तुम जानती हो कि इससे कुछ होता-हवाता नहीं व उन लोगो ने जव भी जहाँ भी वारदात करनी चाही है पूरी कामयावी से की है। सुरक्षा गार्ड या तो कुछ कर नही पाये या मारे गए। यदि अमृतसर में डी० आई० जी० वटवाल मारे जा सकते हैं और दिल्ली में इन्दिरा गाधी मारी जा सकती हैं, पुणे में जनरल वैद्य मारे जा सकते हैं, पुलिस उच्चाधिकारी रिवैरो के पुलिस किले में उन पर हमला हो सकता है तो पापा तो किसी जगह नहीं आते।" हरदीप खुद मृत्यु के डर से सिहर गई। मृत्यु जैसे सन्ध्या के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी। अतीत की बीसियो घटनाएं उसके सामने थी। उन लोगो ने जिसे भी टारगेट बनाया फिर उसे छोडा नहीं । सुरक्षा गार्ड साय मूर्तियां बने रह गए। अभी अपनी बन्दूक भी सीधी नहीं कर पाए कि वे लोग अपना काम पूरा करके दनादन गोलियां चलाते हुए निकल गए। कोई उन्हें रोक नहीं पाया और उनके निशाने को कोई वचा नहीं पाया । मौत का जाल उनके हायो मे रहा है जो उन्होंने फैलाया है, जाल समेटा है और चलते बने हैं। पीछे छूट जाती है परिवार की हृदय- विदारक चीखें, पुलिस पार्टी को पकडने को नाकाम कोशिशें और शहीद फंड या वीमा से मिलने वाली रकम..। पजाब का प्रशासन जैसे अंधेरे में चल रहा है। कभी दो कदम इधर तो कभी दो कदम उधर । उप- वादियों को हिंसक घटनाओं के बाद हर वार पुलिस नये सिरे से सतर्क होती है । नियंत्रण के लिए नये कदमो की घोषणा होती है जबकि सरकार के दावों से लोग बुरी तरह ऊब चुके हैं । उमने सन्ध्या की तरफ देखा। कितना साहस है उसमे । उसने शायद उसे बताया तक नहीं होता अगर विशेष प्रसग नही आ जाता। उसने वीरता की बातें करते और शेखी मारते वहुत-से लोगो को देखा है लेकिन खुद को जरा-सा सेक लगते ही वे दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं । मिहिल 100/ जलता हुआ गुलाव । क्लास की होचपोच में ऐसे लोगों की कमी नहीं । सन्ध्या क्या अपने पर झूलने वाली इस आंधी को झेल सकेगी? उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे वक्त में हौसला बढ़ाने के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है और उसके पास हौसला देने के लिए है ही क्या। सत्ता के बहरे कानों को कुछ नहीं सुन पड़ रहा । उसे सुनाने के लिए जिस आवाज को बुलन्द करने की जरूरत है, वह उतनी बुलन्द हो नहीं रही। झूठी तसल्ली देने के लिए लड़खड़ाते हुए लुंज-पुंज शब्दों का इस्तेमाल उससे हो नहीं पाता। "मुझे कभी-कभी लगता है कि सभी राजनैतिक पार्टियों, सभी पत्रकारों, सभी विद्वानों ने पंजाब की जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया है । कोई भी समस्या का हल निकालने में संजीदा नहीं है। पंजाव के लोग अपनी नियति को जीने पर विवश हैं। नियति, जिसे राजनीति के रक्तरंजित हाथ निश्चित कर रहे हैं।" सन्ध्या बहुत धीमे लेकिन बहुत असरदार ढंग से बोल रही थी। जैसे टिटनेस के मरीज को अपने दमघोंटू अंधेरे के बारे में कुछ कहने का मौका और सूरतेहाल मिल रही हो। स्करालिंग के बाद उसके गले का पाइप निकाल लिया गया हो और वह वोलने में समर्थ हो गया हो। हरदीप ने फिर आने की बात कहकर विदा ली। सन्ध्या ने भी उसे आते रहने का अनुरोध किया। उसके अनुरोध में तरलता थी। दूसरे दिन रामरत्न को जज साहब ने बुलाकर कहा कि रोज शाम को चार बजे से पाँच बजे तक साइकल लेकर माकिट में पिटमैन कालिज में जाया करेगा। उसकी एक माह की फीस अदा कर दी गई है और वहाँ उसे लगन से टाइप-शार्टहैंड सीखना चाहिए। रामरत्न ने जज साहब को बहुत ही नेक और मितभाषी पाया । ज्यादा वक्त उनका कितावों में गुजरता। नौकरशाही की हवा और बड़प्पन की बदबू उन्हें छू नहीं गई थी। इस जमाने में जब एक से बढ़िया बंगले, खूबसूरत गाड़ियां, लम्बे बैंक-बेलेंस और कीमती प्रदर्शन सामान की हविस लोगों के दिलों में सुलग रही थी, वे सिर्फ अपने वेतन पर सन्तुष्ट थे। इस जमाने में जब ईमानदारी एक बड़ी चुनौती बनती कि वह जलता हुआ गुलाव | 10 चली जा रही थी वे इस पर अडिग थे। शायद यही कारण था कि उनके दिए गए फैसले वहुत सही होते योर चर्चा का विषय बन जाते । गांव में सुरजनसिंह की खूब लम्वी-चौडी जमीन थी। समझिए पूरे का पूरा गांव ही उसी का था। उसके अपने चार बेटो के नाम जमीनें । पत्नी और बूढी मौसी के नाम जमीनें। उसकी दोनो लड़कियों के नाम जमीनें। कहने वाले तो कहते थे कि सुरजनसिंह के कुत्तो के नाम भी जमीनें हैं। छोटी जात के पजावी और यू० पी०, बिहार से आई भैया लेबर ही सारी मेहनत-मजदूरी करती। सुरजनसिंह के पास धन और फुसंत दोनो थे इसलिए वह नीली पगडी पहनकर अकाली पालिटिक्स मे दखल देने लगे। मंझला लडका वेमन्त अपने कारनामों के कारण दूर-दूर तक चचित या। किसी की हड्डी-पसली तुड़वानी होतो तो वेअन्त को भेजा जाता। लोग उसकी खरमस्तियो के मारे परेशान थे। शिकायत करते तो मुरजन सिंह चार मोटी-मोटी पंजाबी गालियां निकालते और कहते कि वह तो है ही ऐसा। मैंने तो उसे मुंह लगाना छोड़ दिया है। शिकायत लेकर आने वाले निहत्तर लौट जाते। फूलो चमारी जब भी हवेली मे गोवर संभालने आती, वेअन्त वही मंडराने लगता। एकाध दफे छेडछाड की लेकिन फूलो ताव खा गई। अन्त ने ऐसे तेवर कभी देसे न थे। कहर की चढती जवानी के तेवर होते ही हैं, मित्रों ने समझाया। एक दिन चमादड़ी के पास ही कमाद के खेत मे खीच लिया उसने फूलो को । फूलो की चीखें सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। फूलो के फटे हुए कपडे देखकर उनकी आंखो में खून उतर आया। वेअन्त की खूब ठुकाई हुई। वह वही खून थूकने लगा। अस्पताल तक पहुँचते-पहुंचते दम तोड़ गया। सुरजनसिंह ने पुलिस के साथ मिलकर गांव के सात आदमी ठुकवा दिए। एक को कालिज के होस्टल से धर पकड़ा। दूसरा उस दिन अम्बाला साले के विवाह के फेरे करवा रहा था, लेकिन सिर बहुत उठाता - 102 / जलता हुआ गुलाब था, इसलिए कत्ल के केस में गिरफ्तार कर लिया गया। सुरजनसिंह चाहते थे कि सातों को फांसी हो तभी उनके कलेजे ठण्ड पड़ेगी, नहीं तो वेमन्त की चिता उनकी छाती में जलती रहेगी। वे खुद एक दिन जज साहब के यहां आए। रामरत्न को एक पीपा दे दिया और कहा कि इसमें घी है। जज साहब ने मँगवाया है। सन्ध्या उस वक्त किचन में ही थी। पीपा खोलकर देखा तो उसमें नोटों की गड्डियां । रामरत्न की आँखें फटी की फटी रह गई। जज साहब वाहर निकले और उन्होंने सिर्फ इतना कहा, "आप बुजुर्ग हैं। मैं आपकी इज्जत करता हूँ और कुछ कहना नहीं चाहता । मेहरबानी करें और यह कनस्तर उठवाकर ले जाएँ। एकदम ।" रामरत्न इस घटना से बहुत प्रभावित हुआ। घरेलू नौकर को जब कोई आदर्श प्रभावित करता है तो वह जी-जान से काम करने लगता है। पौराणिक परम्परा में हनुमान जी जैसी आदर्श सेवा की भावना पहले से ही मौजूद है। रामरत्न कल दिन में जब ए एस डी एफ जी सेमीकोलन एल के जे एच जे सीखकर लोटा तो बंगले में एक बन्दूकधारी देखा । रामरत्न को यह तो पता था कि कुछ दिन पहले दो कथित उग्रवादियों का केस उनकी अदालत में लगा है । उस सम्बन्ध में उन्हें फोन पर धमकियां दी जा रही हैं, इसका पता भी उसे जज साहब को सन्ध्या से हुई बातचीत से चल गया था। वह जानता था कि टस से मस नहीं होंगे और शायद फोन फरने वाले भी समझ रहे थे, इसीलिए उन्होंने अपने साथियों को जेल से फरार करवा लिया था, लेकिन रामरत्न को एक दिन पहले मिले पन के बारे में मालूम नहीं था। मालूम हो जाने पर भी रामरल कुछ नहीं कर सकता था, जज साहब की लम्बी उम्र की प्रार्थना करने के सिवाय । हालांकि वह जान चुका था कि इससे कुछ होगा नहीं, क्योंकि कभी भी प्रार्थना से उसका कुछ विगड़ा-संवरा नहीं। सन्ध्या ने गवर्नर और सी० एम को तारें भेज दी और लिखा कि उनके पिता को वचाएँ। हालांकि वह जानती थी कि इससे कुछ होगा जलता हुआ गुलाव | 103 नही क्योकि अक्सर ऐसी तारें और पत्र कुछ संवार नही सके । जव किसी घटना की आशंका हो और चार-पांच दिन कुछ न घटे तो सारी की सारी मुस्तैदी सुस्ताने लगती है । वदियो के कलप दीले नहीं पड़ते, जूतो के फीते बदस्तूर कसे रहते हैं, पीतल का काम बराबर चमचमाता रहता है लेकिन इस सबके बावजूद क्षमता में दीमक-रोग झांकने लगता है। जज साहब के यहाँ फोन डैड हो गया था। सुरक्षा गार्ड का कहना था कि फोन जल्दी ठीक करवा लेना चाहिए। कथित दल खालसा की चिट्टी मिले आठ दिन हो चुके थे। वारदात का खतरा टल गया लगता या और सब कुछ एक स्टीन में बदल रहा था। जज साहब निकले थे कि कॉलोनी के मुहाने पर कैमिस्ट की दुकान से फोन कर दें। कमिस्ट की दुकान पर पांव रखने ही वाले थे कि गोलियां चलनी शुरू हो गई । एक उनकी वाह मे लगी, दूसरी कैमिस्ट के मतवान फोडती दुकान को दीवार में । कांच और रैपरी सहित गले और खामी की गोलियां जब तक फर्श पर विखरती तब तक उन्हें दो गोलियां लग चुकी थी । नुरक्षा गार्ड जब तक बन्दूक संभालता और गोली चलाता तब तक उग्रवादी स्कूटर से भागने की तैयारी मे थे । गोली उन्हें लगी नहीं। दूसरी गोली चली जरूर लेकिन तब तक वे निकल चुके थे और खून की वहती धाराओं के साथ जज साहब नीचे गिर चुके थे। रामरत्न मेज झाडता हुआ भागा और सन्ध्या अपने विस्तर से अखवार छोडकर एक्सप्रेस गाड़ी की रफ्तार या घडकता हुआ दिल लिये। "उन्होंने अपना काम कर डाला।" रामरत्न के मुंह से निकला। सध्या चीख उठी, "पापा...।" "पापा को कोई अस्पताल ले जाए। यह बच जाएंगे।" जज साहब ने बेटी की आवाज बहुत दूर घाटियों से आती सुनी। खून से लथपथ हाथ उठाना चाहा, उठा नहीं । आँखें खोलकर एक ६ र देखना चाहा लेकिन विजली का बल्व फ्यूज होने की तरह उनकी चाहते जवाब देने लगी। धूढ़ा कैमिस्ट चिल्लाता रहा-~'कोई उनका पीछा करो।"उस तरफ गए हैं वे । अभी बहुत दूर नहीं गए होंगे ।' पलिस. ।
104 /जलता हुआ गुलाव की जीप ने कोई देर नहीं की और वीस मिनट बाद ही वहां पहुंच गई। 'अब तक तो वे लोग घटनास्थल से वीस किलोमीटर से ज्यादा दूर तक का सफर तय कर चुके होंगे' बूढ़े कैमिस्ट ने सोचा लेकिन कहा कुछ नहीं। पुलिस के कौन मुंह लगे। प्रशासन ने पूरी मुस्तैदी से काम किया। पुलिस के चार आदमी बंगले पर लगा दिए गए। चार आदमी शव साथ लेकर पोस्टमार्टम करवाने सिविल अस्पताल पहुंचे और पोस्टमार्टम तक वहीं रहे । अगले दिन स्कूटर पकड़ लिया गया। यह भी पता लगा लिया गया कि स्कूटर कुछ दिन पहले पार्क के पास छोना गया था। स्कूटर नया था और केवल एक सौ तीस किलोमीटर चला था। यह अनुमान भी लगा लिया गया था कि यह उग्रवादियो के किस ग्रुप का काम हो सकता है । खबर मिलते ही हरदीप जज साहब के निवास की तरफ भागी। उसकी भाभी नरिन्दर भी सफेद चुन्नी लेकर उसके साथ निकली। सरदार जी पहले अस्पताल गए और फिर घर । सन्ध्या का चेहरा पीला फक् हो चुका था। अविनाश ने खबर सुनी तो उसने रमेश से कहा, "दफ्तर में किसी क्लर्क से अगर एक मामूली कागज भी एक दिन लेट हो जाए तो व्यवस्था उसे बहुत बड़ा गुनाहगार समझती है। इतने वेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं और व्यवस्था इसे विदेशी हाथ' कहकर टाल देती है और समारोहों की तैयारी करने लगती है।" शव यात्रा के वक्त सन्ध्या ने आँसू पोंछ लिये। रोने के लिए सारी उम्र पड़ी है। उसे पता चला था कि गवर्नर साहव अर्थी पर फूल चढ़ाने आ रहे हैं। सरकार के इस तौर-तरीके ने उसे बुरी तरह झिंझोड़ दिया। पहले अपनी जनता को भेड़-बकरियों के रेवड़ की तरह कसाइयों के हाथों खुलेआम सौंप देना और फिर उनके गले कटने पर आंसू बहाना। इतनी हिपोक्रेसी क्यों ? क्यों आते हैं अव जव पहले उसके पापा की हिफाजत नहीं कर सके ? अब वह क्या करेगी उनकी सूखी संदेदना का ? गवर्नर साहब के भाकर तसल्ली देने से उसके पापा लौट नहीं आएंगे। उसे कुछ जलता हुआ गुलाव /105 नहीं चाहिए। चाहिए तो अपने पापा। क्या गवर्नर साहव उनके प्राण लौटाने का कुछ कर सकते हैं ? हरदीप ने जज साहब का काफी पन वह जाने के बाद का चेहरा देना और सोचा, 'व्यवस्था को हजार-दो हज़ार बादमी मर जाने का भी कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए प्रशामन चलना चाहिए चाहे मून की होली से चले। मन्ध्या ने हरदीप को पाम बुलाया और कहा, "देखो, इममें दो राय नहीं कि पापा सरकार की करतूतों की भेंट चढ़ गए। मेरी कोमिम रहेगी कि मेरी आँखों से एक भी बूंद आंसू न गिरे कम-अज-म. माज," मन्ध्या ने एक-बकर कहा और उसकी मीपी-सी होनी में आंसुओं से भर आई। "सुना है गवर्नर मा रहे हैं तसल्ली देने के लिए "मुझे यह जले पर नमक-जमा लगता है। .."पापा चले गए. मुझे कुछ नहीं चाहिए. कीमत के तौर पर पचाम हजार या लाख की रकम मुझं नहीं लेनी “हम निकम्मी सरकार के विरोध में नारे लगाएंगे"इसका परिणाम चाहे वृष्ठ भी हो। तुम अविनाश को भी फोन कर देती।" जज साहब को अन्तिम यात्रा निकली। लोगो का विमाल हम उनके साय या । कचहरी का कामकाज, जो कि गोलीकाण्ड के दिन भी नहीं एका पा, याज विल्कुल टप था । वकीलों की हड़ताल थी। देखते ही देखते शव यात्रा-जुलुस में बदल गई। सन्ध्या ने नारा लगाया, "अपने लोगो की हिफाजन कर न मकै ।" भरपूर जवाब मिला-"वह मरकार निकम्मी है।" हरदीप ने नारा लगाया-"मगरमच्छ के मामू" "नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।" रामरत्न ने कहा, "शहीद एच० एल० चोपडा" "अमर रहें।" अविनाश ने नारों को मंभाला-"क्य तक होती रहेंगी हत्याएँ- जवाब दो जवाव दो।" "क्य तक मरेंगे वैगुनाह-जवाब दो जवाब दो।" प्रशासन के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
आठ रात काफी देर तक अविनाश और सुरजन पोस्टर बनाने की योजना में लगे रहे। यह काम उनकी आतंकवाद-विरोधी मुहिम का एक हिस्सा था। करीव दो बजे वे लोग अन्तिम रूपरेखा बना सके। अविनाश ने सुरजन को वहीं सो जाने के लिए कहा। विगड़े हालात के कारण उसे इतनी रात गये भेजना अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन वह हर हाल में घर जाना चाहता था, क्योंकि अगली सुबह फिर उसे फरीदकोट के लिए निकलना था । काम में थके होने पर उन्हें उस वक्त चाय की तलव लग रही थी । वेशक उसके स्टोव में पम्प चलाना खासा मेहनत का काम हो गया था, फिर भी अविनाश ने उसे कहा कि वह चाय पीकर ही जाए। लेकिन सुरजन रुका नहीं। सुवह होने के साथ ही गुरुद्वारे से पाठ की आवाज आने लगी थी। गोकल की डेयरी से गाय-भैंस और चारा-सानी की आवाजें आने लगी थीं। उसकी मकान मालकिन तुलसी के चौरे पर पानी दे चुकी थी और अव भागवत-पुराण वाचने लगी थी। अविनाश जाग चुकने के बावजूद आंखें वन्द किये पड़ा था। उसे लग रहा था कि सुरजन को जैसे उसने अभी-अभी दरवाजे पर छोड़ा था। उसका मन थोड़ा और सो लेने का था. लेकिन अब उसे यह असम्भव लग रहा था। अविनाश ने उठते ही चाय के बारे में सोचा, लेकिन स्टोव पिछले हफ्ते से खराब चल रहा था और पम्प चलाते रहने के लिए जितनी कसरत अनिवार्य थी, अविनाश सुबह-सुबह मानसिक रूप से उसके लिए जलता हुमा गुलाब/107 तैयार नहीं था। उसने बस स्टैंड के पास जाकर चाय पीने का फैसला किया। इससे चाय के साथ पंजाबी का अखवार भी मिल जाना था। उसका अपना अखबार जरा देर से आता था। उसने पानी का गिलास लेकर चुल्ली की । नीद को विल्कुल गायब करने की गरज से आंखों पर पानी के छीटे मारे । तौलिये से चेहरा हल्के- हल्के पोंछा । बालों में ऊपर से कंधी की, कुरता पहना और बाहर निकल पड़ा। सामने आ रही बुजुर्ग महिला उसकी तरफ देखकर मुस्करा रही यो । अविनाश अवसर उन्हें दूध लेने जाते वक्त डेरी से आते-जाते देखता रहा है और हमेशा उन्हे देखकर उसके दिमाग मे यह जुमला आता रहा है 'खण्डहर को देखकर पता चलता है कि यहां एक भव्य इमारत रही होगी।' लेकिन जब से अविनाश ने उनको शख्सीयत के वारे मे नई बातें सुनी है तब से उसके मन में उनके प्रति आदर की भावना जागृत हुई है । यो भी पता नहीं क्यों वे अविनाश को दीप की झाई जी जैसी लगती। नई बातें जो अविनाश ने उनके बारे में सुनी थी, उसे आश्चर्यजनक लेकिन सुखद लगी। आश्चर्यजनक इसलिए कि एक सीधी-सादी घरेलू लगभग पचपन पार हुई पारम्परिक महिला से उसे इसकी आशा नही थी। सुखद इसलिए कि पंजाब में झूल रही इतनी आँधियो के बावजूद कुछ दीपक अपनी उजास बिखेर रहे थे। उनके बारे में उसकी मकान- मालकिन ने जो कुछ बताया था वह अविनाश के लिए नया था। उन्होंने उस दिन गुरुद्वारे के प्रागण मे डटकर कहा कि अमृत प्रचार के वहाने जो सिखों में भड़काहट पैदा की जा रही है वह ठीक नही है। यह ठीक है कि अमृतसर की नीला तारा कारंवाई और नवम्बर के दिल्ली दंगों से हमारे दिल बहुत डर गए हैं, लेकिन इन चीजो के बारे मे ठण्डे दिमाग से सोचना होगा। दिल्ली में जो काली आंधी चल रही है उसे ध्यान से देखें तो साफ पता चलेगा कि किसी साधारण हिन्दू ने किसी साधारण सिख पर हमला नही किया। सिस्टम के पाले हुए गुण्डा तबके ने खून और लूट का कोहराम मचाया। गुण्डा तबके को बाकायदा हिदायतें जारी की गई थी और जिन्होने ऐसी हिदायतें जारी की है वे 108 / जलता हुआ गुलाब हमारे ही नहीं पूरे, देश के दुश्मन हैं । उन्होंने यह भी कहा कि आज यह बहुत जरूरी हो गया है कि हम धर्म, सियासत, फिरकापरस्ती और जुनून के बारे में गहराई से सोचें और इसमें फर्क करें। आज जिस मुहाने पर हमें इतिहास ने धकेल दिया है वहां उनमें फर्क करना निहायत जरूरी है। अन्त में उन्होंने कहा कि सुबह-शाम वाहेगुरु से यही अरदास करती हैं कि इस अंधेरे में उनकी कौम को सुमति बख्शे और सिख पन्थ अपने सही मार्ग पर चल सके। "सासरीकाल आंटी", अविनाश ने उन्हें अपनी तरफ मुस्कराते हुए देखकर कहा। "सासरीकाल वेटे । लम्बी उमर हो । सेहरे वांधो।" "इसकी क्या जरूरत है आंटी।" "क्यों बेटे ? आंटी का भी जी चाहता है बारात में शामिल होने को।" "विवाह का पूरा सिस्टम ही मुसीवतों से भरा पड़ा है।" "मुसीवतों से भागना शुरू करोगे तो हो चुका ।" "मुसीबतों से नहीं बेवजह की मुसीवतों से..." "इस वक्त तुम्हें अपनी नहीं मां-बाप की देखनी चाहिए।" "उनकी इच्छा देखी होती तो अव तक दो बच्चों के वाप होते ।" "अच्छा ! बातें खूब बना लेते हो। शाम को घर आ जाओ। वहीं वातें होंगी। सिख अव क्या करें ?' की गोष्ठी पर बातचीत करेंगे और साथ में चाय और गोभी के पकौड़े तुम्हें मिल जाएंगे।" गोभी के पकौड़े कहते हुए आंटी अर्थपूर्ण ढंग से मुस्करा दीं। उसने छह बजे पहुंचने का वायदा किया और निकल पड़ा। आंटी का गोभी के पकोड़ों पर जोर देना और विवाह की वात छेड़ने का मतलब अविनाश समझ रहा था। आंटी ने उसे हरदीप के साथ पिछले दिनों दो-तीन दफे देखा होगा। एक बार वह हरदीप को मोड़ तक छोड़ने के लिए गया था। मोड़ पर ही वह कोठी है जिसके एक कमरे में आंटी रहती हैं।
। जलता हुआ गुलाव /109 हरदीप उस दिन अविनाश को अगले दिन घर आने का निमन्त्रण दे रही थी। हरदीप चाहती थी कि वह रात को मुक्तिबोध की कविताएँ 'पढ़ लेगी और उन पर नोट लिख लेगी। शाम को अविनाश आकर देख लेंगे तो उसे अपने नोट की सीमाओं का पता चल जाएगा । यविनाश कह रहा था कि कल वह मंगल के यहां जाना चाहता है क्योकि बहुत दिनो से उधर जा नहीं पाया । वह खुद नहीं जानता था कि उसके ऐसा कहने में मंगल के यहाँ जाने की अनिवार्यता कितनी है और यह देखने की कितनी कि हरदीप सिर्फ मुक्तिबोध पर नोट्स के सम्बन्ध मे राय ही जानना चाहती है या उससे मुलाकात की कोई इच्छा भी है। हरदीप ने कहा कि वे मगल भाई के यहां किसी अन्य दिन चले जाएं। कल के लिए वह इन्तजार करेगी और गोभी के पकौड़े बना कर रखेगी। मंगल माई के यहां वह भी साथ चली जाएगी। भाभी से बहुत दिनों से मिली भी नहीं। हरदीप और अविनाश एक-दूसरे में खोये हुए थे। वे तव नही जानते थे कि आटी उनकी बात सुन रही है। इसका पता भी आज ही आटी के आमन्त्रित करने पर चला, लेकिन आंटी को यह नहीं पता कि वह हरदीप से कितनी दूर जा चुका है । इस पेचीदा प्रसग के बावजूद उसे सुबह की पहली मुलाकात और वह भी आंटी जैसी महिला से अच्छी लगी। मोड काटते ही अविनाश को आधा जला हुआ खोखा नजर आया। ऊपर फट्टी पर लिखा हुआ 'सलीम हेयर कटिंग' अव धुआँ खा जाने से बहुत बेदम-सा जान पड़ता था। पिछले दिनो नाइयो की दुकानो को जला देना भी उग्रवादी कार्रवाई का एक हिस्सा रहा है। योड़ी ही दूर मीट का एक खोखा था। अब उस पर भी ताला लटक रहा था। नाई का खोखा जलाने के अगले दिन वह डर कर भाग गया था । थोडी आगे चौक में एक अंग्रेजी शराब की दुकान थी। दो सी० आर० पी० के आदमी अब पूरा दिन वहां खड़े रहते । पता नहीं चौक की ड्यूटी वे वहाँ पड़े रह कर पूरी करते या शराव वाले को सुरक्षा गार्ड मिली थी। चाय वाले को अविनाश ने एक कप चाय के लिए वोला। एक बजगं 110 / जलता हुआ गुलाव टूटी तनी वाला वैग बगल में दवाए अखबार पढ़ रहे वे । उनकी ऐनक नाक की चोंच पर टिकी थी। यह जानकर कि अविनाश भी अखवार देखना चाहता है उन्होंने पहला पेज अविनाश की ओर सरका दिया। पंजाब को तो किसी की नजर ही लग गई ।' उन्होंने चोंच पर ऐनक ठीक करते हुए स्वगत कथन किया। अविनाश ने देखा चण्डीगढ़ के 35 सेक्टर में आतंकवादियों ने केन्द्रीय गुप्तचर प्रशिक्षण विद्यालय परिसर में दो प्रशिक्षणाथियों की गोली मार- कर हत्या कर दी थी। आतंकवादियों की अन्धाधुन्ध गोलीवारी में छह पुलिस अधिकारी जख्मी हुए जिनमें से दो की हालत नाजुक बताई गई थी। घटना सुवह लगभग साढ़े पांच बजे हुई । गुप्तचर प्रशिक्षण विद्या- लय के कुछ जवान रोजाना की तरह व्यायाम कर रहे थे कि अचानक एक फिएट कार में सवार आतंकवादियों ने कार से उतर कर अन्धाधुन्ध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। व्यायाम कर रहे प्रशिक्षणार्थी तुरन्त जमीन पर लेट गए। उग्रवादियों के पास अत्याधुनिक हथियार थे । एक पुलिस अधिकारी के अनुसार गोलियां अत्याधुनिक चीनी एसाल्ट राइफल से चलाई गई थीं । इससे एक मिनट में 600 गोलियां चलती हैं। एक प्रत्यक्षदर्शी से कार का नम्बर पता चल गया था। कार्रवाई में लगा समय भी पता चल गया था। लगभग चार मिनट में वे सारी घटना करने के वाद फरार हो गए थे। उनकी संख्या के बारे में अटकलपच्चू था। वे दो थे या चार, अखबार से पता नहीं चल रहा था, लेकिन वे वारदात करने के वाद हवा हो गए थे। उन्हें जमीन निगल गई थी या आसमान, कौन जाने । अलवत्ता गम्भीर रूप से घायलों को पांच-पांच हजार और मरने वालों के परिवारों को एक-एक लाख रुपये देने की घोषणा चण्डीगढ़ प्रशासन ने की थी और भारतीय दण्ड विधान की धारा 307/32 व शस्त्र कानून की धारा 25-27/54/59 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया। "हर बार यही होता है। आतंकवादी आते हैं, वारदात करते हैं। निकल जाते हैं । बहस इस बात की रह जाती है कि वे किस वाहन से ।
। जलता हुआ गुलाव / 111 आए, संख्या मे कितने थे, कितनी गोलियां चली, कितने मारे गए, जैसे मासूम निरपराध लोग सिर्फ संख्याएँ हों, और हत्याओ का काम साख्यिकी विभाग का काम हो। आदमी का खून न हुआ वारिश हो गई और प्रशासन का काम कुप्पी लेकर सिर्फ नापना हो कि कितने से० मी० हुई है।' अविनाश ने सोचा। आगे चार और हत्याओं को खबर थी । दो यादमी पुलिस के मुखविर मान कर गोली से उड़ा दिए गए थे। एक उग्रवादी पुलिस-मुकाबले में मार दिया गया बताया गया था। वह खालिस्तान कमांडो फोर्स का स्वयंभू जनरल बताया गया था जो कि कुछ महीने पहले मानोचाहल के गुट भिंडरांवाले टाइगर्स फोर्स मे शामिल हो गया था लेकिन बाद में दोबारा खालिस्तान कमांडो फोस मे चला गया। पुलिस ने पिछले दिनों हुई कुछ वारदातें उसके नाम लगा दी पी और बताया था कि वह पाकिस्तान में भी कुछ दिन रहा था। "चाहे गवर्नर का राज हो चाहे वोटों वाली सरकार का, पंजाव की जनता का कुछ नहीं होना।" बूढ़े आदमी ने चोंच पर ऐनक ठीक की। गोद से टूटी तनी वाला बैग उठाया और चाय वाले के पैसे दिए और चल दिया। शायद उसकी बस का समय हो गया था। जाते हुए वह एक दार का और कहा, "मुसीबतें जब पड़ती है तो वहादुर वह है जो हल निकालता है। कमजोर तो आराम की नीद सो जाता है । इस समय तुम जैसे जवानों को आगे आना चाहिए, खेल-तमाशों में वक्त नही गुजारना चाहिए।" उसने एक फिल्म के अश्लील पोस्टर की तरफ इशारा किया और चलता बना। "क्रक लगता है पोहा," चाय वाले ने कहा। "गहरी चोट खाए होगा।" रिक्शा वाले ने, जिसने अभी चाय का आर्डर किया था, कहा। अविनाश ने पैसे दिए। चलते-चलते किसी सास्कृतिक मेले पर करोड़ों रुपये खर्च करने की खबर पढ़ी और कमरे की तरफ चल दिया। मोड़ पर एक और अश्लील पोस्टर लगा था। अविनाश को लगा कि सेक्स और मारकाट की घटिया फिल्मे फसली बटेरो की तरह निकली हुई हैं । सेंसर सोया हुआ है। कोई रोक-टोक नहीं। वी० सी० आर०, 112/जलता हुआ गुलाव वी० सी० पी०, घर-घर में ब्ल्यू फिल्में दाखिल करवा देंगे । सरकार सांस्कृतिक मेलों पर अपने गुणग्राहक खरीदने के लिए करोड़ों रुपया पानी की तरह वहाती रहेगी; जवकि संस्कृति को घटिया फिल्मों, वाजारू नावलों, चीप पोस्टरों के सहारे छोड़ दिया जाएगा और हमारे प्रधानमंत्री प्ले व्याय' को इन्टरव्यू देते रहेंगे। कभी-कभी अविनाश को लगता कि ऐसी गम्भीर साजिश देखकर उसका सिर दर्द से फटने लगा है। कोई आश्चर्य नहीं कि वह पागल हो जाए। घर आकर उसने दो-तीन वाल्टियाँ सिर पर डालीं। इससे तनाव कुछ कम हुआ । उसे ख्याल आया कि एक बार गांव में एक विवाह पर वरियाम उसे खींच ले गया। रात को देसी के दौर चले और इंग्लैंड- रिटर्न लड़के के चाचे ने फिर बढ़िया गीतों की एक कैसेट लगा दी। उन बढ़िया गीतों के दोहरे पंजावी अर्थ इतने घटिया थे कि वह पिन लगी 'रंगीन जवानियाँ' जैसी किताबों को मात दे रही थी । 'मनोरंजन जव स्तरहीन होने लगे तो आदमी के विकास के तमाम रास्ते चन्द समझने चाहिए।' उसे अपने हिन्दी टीचर की यह बात बार-बार याद आती रही। नहा-धोकर वह नोट्स लेकर बैठ गया। उसे नेल्सन मंडेला पर एक लेख पूरा करना था। "अपने अनुभवों के आधार पर हमें यकीन हो गया था कि विद्रोह की हालत में सरकार मासूम देशवासियों का अन्धाधुन्ध कत्लेआम करेगी, लेकिन दक्षिण अफ्रीका की धरती मासूम अफ्रीकियों के खून से इतनी तर हो चुकी थी कि सरकारी हिंसा से अपनी रक्षा के लिए दीर्घकालीन युद्ध की तैयारी हमारे लिए जरूरी हो गई।" उसने नेल्सन मंडेला के सन् चौंसठ के इस बयान को दो वार पढ़ा । उसका ध्यान दीर्घकालीन युद्ध पर टिका रहा। हिन्दुस्तान में भी अभी दीर्घ- कालीन युद्ध की जरूरत है । यह दीर्घकालीन युद्ध एक आमूलचूल परि- वर्तन के लिए होगा । अविनाश अपना लेख आगे न बढ़ा सका। वह दीर्घकालीन युद्ध पर सोचता रहा ।'' यहाँ तक कि उसकी पलकें वोझिल होने लगी। लेख रात को पूरा करने का विचार बना कर वह दपतर के लिए तैयार होने लगा।
पलता हुमा दुताव / 113 । दपतर नाते दस्त ने नारी को दरामदे में बंटकर अपवार पड़ते पापा । बार गान बारी के यहां जाना है। उसने अपने-आपको कन्फर्म किया । आटी में सेहरे बांधने की आशीष देती है । जिस हालत से वे लोग गुजर रहे हैं, उसमें शादी-ब्याह की दात कहाँ व्हरती है ? क्यों मादी करके दो-तीन सन्तानों को मुखमरी, उदअमनी और देकारी के संबट में भिड़ने के लिए छोड़ दें। कुछ देर पहले की बात और यो। तब वह बलविन्दर लोगों के ग्रुप के साथ जुहा नहीं था। मामाजिक कार्य को अहमियत पंदा नहीं हुई थी। सब वह भी दीप के साथ कई सपने देखा करता था। हरदीप और वह सोई और जागी दोनो आँखो के स्वाव। एक ऐसी दुनिया जिसमे उसके और हरदीप के सिवा कोई नहीं होता था। होती थी तो लम्बी प्यार- भरी कहानियां। दफ्तर पहुंचकर उसने पाया कि चर्चा गर्म है। विन्दर मेज पर बैठा कह रहा है-"क्यो दिया जा रहा है हमारा पानी, हमारी विजली हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को । यह सब पैतरेवाजी है केन्द्र की। केन्द्र पंजाव को भूवा-नंगा मारना चाहता है, कुछ नहीं देना चाहता।" दूसरी मेज पर बैठे रमेश ने कहा, "असल सवाल यह है कि जनता को सरकार की जरूरत क्या है ? इसलिए न कि उनके अधिकारो का हनन न हो और उनके जानमाल की हिफाजत हो "अगर यह वेसिक काम भी सरकार नहीं कर पाती तो उसके होने न होने का कोई मतलव नहीं रह जाता । वाकी काम सिर्फ टैक्स इकट्ठा करने का ही रह गया न। वह तो दो-चार लठत किस्म के लोग भी कर सकते है।" "ज्यादा खूवी से कर सकते हैं। उनके लिए यह तो नहीं होगा कि यह बडा चोर है इसको छोड़ दो, वह छोटा चोर है उसको पकड लो और मारो साले को।" वरियाम ने कहा जो कि सामने चेयर पर बैठा था। "देखो रिचरो पूरी बहादुरी से आतकवाद का मुकाबला कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है उन्हे सरकारी मशीनरी का पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है। नही तो वह तो सफाई कर दें, सफाई।" विनय ने सपाई की बात पर कटाई की तरह हाथ चलाकर इशारा किया।
114 / जलता हुआ गुलाव "रिवैरो जान हथेली पर रख कर काम कर रहे हैं । कोई और होता तो दुम दवाकर भाग लिया होता।" मुकेश टाइपिस्ट ने कहा । तव बहस में अविनाश ने हस्तक्षेप किया, "कोई पुलिस आफिसर निडर हो सकता है, बहादुर हो सकता है, लेकिन आप लोगों को इस लाइन पर सोचना चाहिए कि एक पुलिस प्रशासन में हम सब लोगों के जम्हूरी हक सुरक्षित रह सकते हैं अथवा नहीं...।" "पुलिस या मिलिटरी के नाम पर भी स्टेट चली है कभी ? तुम्हें शायद पता नहीं ब्लूस्टार आप्रेशन के दिनों अमृतसर वगैरह के वार्डर एरिया के कितने लोगों ने अपने जवान लड़कों को सीमा पार करवा के . पाकिस्तान भेज दिया। किसी तरह जिन्दा तो रहें। यहाँ तो पता नहीं कब पकड़कर रात को किसी पुल पर ले जाकर मरवा दें।" सुखवीर अकाउंटेंट ने कहा। वरयाम ने कहा, "मैं तुम लोगों को आपबीता जैसा एक किस्सा सुनाता हूँ-पिछले हफ्ते मेरी मौसी के लड़के को कालेज के वाहर पकड़ लिया गया। उससे पूछा गया कि वह कहां घूम रहा है ? उसने कहा कि कालेज गया था। पूछा गया कि जब कालेज में स्ट्राइक चल रही है तो वहां उसकी मौसी बैठी हुई है, जिससे मिलने गया था? उसने कहा कि उसे पता चला था कि स्ट्राइक खुल रही है। वह पता करने गया था कि कल उसे कालेज आना है अथवा नहीं । फिर जब उस कालेज में पढ़ता है तो उसका वहाँ जाना गुनाह नहीं है। फिर पूछा गया कि क्या वह पाकिस्तान गया है कभी? उसने कहा पिछले साल ननकाना साहब दर्शन के लिए जाने वाले जत्थे में वह शामिल था। वस उसका इतना कहना था कि उसे पकड़ लिया गया। जालन्धर, अमृतसर, कपूरथला, जहां-जहां जा सकते थे, गए। घर के सभी लोग जितनी भाग-दौड़ कर सकते थे, की, लेकिन दो दिन लड़के का कुछ पता नहीं चला । तुम लोग अन्दाजा लगा सकते हो घर के लोगों की क्या हालत हुई होगी ? चूल्हा तक नहीं जला। मौसी और मौसी की दोनों लड़कियाँ रो-रोकर आधी रह गई। बुरे-बुरे ख्याल दिल को छीलते जा रहे थे. और कोई नहीं जानता था लड़का है कहाँ और उसके साथ क्या हो रहा है ? ?
बतता हुआ दुताब/ 115 "टीजरे दिन में तहके चार बजे जालन्धर कैन्ट के स्टेशन परोड़ दिलासा दे लोग उसे पटियाला ले गए थे। बावंकवादी गतिविधियों हाय बार विदेशी हाथ पूने के लिए इतनी बेरहमी से मोटर कसरि उसकी पूरी देह जगह-जगह से फूट गई लमतो यो।रिरहे-बड़े उसने पर की तरफ जाना शुरू किया। जाने कैसी मुक्तिों से पैसोत प्रमादक पहुँचा होगा। फिर वहाँ से एक सब्बी सादर होने वाले टनो वाले की मिन्नत की । उसने उसे घर पहुंचाया। "अब हालत यह है कि दाई टांग पूरा वजन दास्त नहीं रही। रामटरों को अपनी-अपनी राय है और अपना-अपना इतार ।" "तुम कहना क्या चाहते हो कि जितने भी पकड़े जा रहे हैं, अगर और मासूम है ।" मुकेश ने पूछा। "नहीं ! मैं यह कहना चाहता हूं कि हमारे पुलिस न के खये में कमूरवार या वेकसूर का फर्क नहीं रहता। जहाँ तक मेरे वह वही है जो नारा हम कुछ साल पहले सगावा करते घे-'सफेद वगुले नीले मोर-ये भी चोर, वे भी चोर।' सरबजीत कैशियर ने, जो कि अभी भाकर एक गया था, "मैं पालीटिक्स ज्यादा नहीं जानता। बयानबाजी से तंग आकर मैंने तो अखबार पढ़ना भी छोड दिया है। मैं इतना जरूर कहूंगा कि यालिमान मगर नहीं जा रहा, पालिस्तान दिया जा रहा है। एक बात और, दर्गनसिंह रागो का सरण्डर करना यह मताता है कि पंजाब में मातंक- वाद की समस्या बहुत गहरी हो चुकी है।" "दिक्कत की बात तो यह है कि किसी राजनैतिक पार्टी, विसी लोहर, किसी सम्पादक को दृष्टि इस समस्या को गम्भीरता पर नही जा रही, न ही इसे निपटाने की कोशिश की जा रही है ।" अविनाश ने कहा। "एक रोग अगर लाइलाज छोड़ दिया जाए तो वह कई रोगो को जन्म देता है।" परियाम ने कहा । तभी सतनाम ने आकर कहा कि वरियाम, मुकेश और अविनाश धाजी को हो.ही. एम. साहिम ने बुलाया है। का सवाल 'में 116/ जलता हुआ गुलाव बुलावा आ जाने से वह चर्चा वहीं रुक गई। दफ्तर की रुटीन शुरू हो गई। फाइलें, नोटिंग शीट, लैटर, डी० ओ० सेलिग्राम, टेलिग्राम, टेलीफोन, मीटिंग, एजेंडा, रेलवे क्लेम, चार्जशीट केस, इन्क्रीमेंट, ओपनिंग वैलेंस, वाउचर, बैलेंस शीट वगैरह वगेरा.. वगैरा। सवा एक बजे के करीव सरवजीत बैंक से कैश लेकर आया। उसने -आकर अविनाश से पूछा, "तुम रणजीत नगर की तरफ रहते हो न !" "हाँ ! क्या हुआ ?" "सुना है, उधर गोली चल गई है।" "कहाँ ? कब ? कौन मरा?" अविनाश ने हकलाकर पूछा। "ज्यादा पता नहीं चला। बैंक में कोई कह रहा था कि एक घर एक औरत मार दी गई। वाहर गली में सिनेमा के पोस्टर लगाने वाला एक आदमी जिसने उन्हें देखकर शोर मचाया था, गम्भीर रूप से घायल हो गया।" अविनाश का ध्यान औरत के मार दिये जाने की खवर पर -अटका रहा। 'हो न हो आंटी ही हों।' उसने सोचा। 'नहीं आंटी क्यों होंगी भला !' उसने अपने आपको धिक्कारा । "मैं जा रहा हूँ। कोई पूछे तो बता देना।" उसने कैशियर से कहा और निकल गया। उसे गली के मोड़ पर ही पता चल गया। आंटी अव तक 'घल आये नानका सदे उठ जोय' के अनुसार दुनिया छोड़ गई थीं। लाश पोस्ट- 'मार्टम के लिए ले जाई जा चुकी थी। आज शाम आंटी ने उसे घर बुलाया था। आंटी उसके साथ कुछ बातचीत करना चाहती थीं। वह बातचीत हो न सकी । आंटी के ओठों पर अनकहे लफ्ज एक वार दहके होंगे, फिर दम तोड़ गए होंगे। केतली में शाम की चाय का पानी भरा ही नहीं गया होगा। पतीली में भीगा वेसन अब कभी छौंक की इन्तजार नहीं कर पायेगा। बरामदे में चेयर होगी लेकिन आंटी वहाँ वैठकर अखबार नहीं पड़ेगी। आंटी उससे भला क्या बातचीत करना चाहती होंगी? अविनाश ने सोचा। निश्चित रूप
जनता हुया गुलाव/117
से आटी पंजाब में चल रही काली बांधी के खिलाफ कुछ करने की योजना
पर बात करने वाली पी। उसने मन ही मन बांटी को मलाम किया,
क्योकि ये सच का साय देने वाली थी।
"किसको दुख है आंटी के मरने का। यहाँ तो मौत अब मि
अग्रवारों का किडा बन गई है।" बांटी के साय वाले मान का बैंक
या बाबू प्रेम फोटोग्राफर में यह रहा था।
नौ सन्तोष आज बहुत खुश थी। आज सुवह मंगल ने अपना फैसला सुना दिया था। 'जिएँगे तो यहीं, मरेंगे तो यहीं।' यह धरती वे लोग छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। सन्तोष का घर छोड़ जाने के नाम पर ही कलेजा कॉप-कांप उठता था। पंजाब से बाहर जब भी कभी वह गई, उसे जालन्धर, लुधियाना, अमृतसर जैसे शहर कहीं नहीं मिले। कोई बात थी इन शहरों में जो दूसरों में नहीं थी। एक प्रकार की मोह-ममता, एका खास किस्म की स्निग्धता थी जो वांधे रखती थी। मंगल कहा करता था, 'शहरों का क्या है ! सभी शहर एक-से होते हैं। हमें अपना मुनाफा देखना चाहिए। जहाँ चार पैसे लगाकर दुकान खोलेंगे वहीं रोटी खा लेंगे।' ... आए दिन हत्याएं हो रही हैं । बैंक लूटे जा रहे हैं । जहाँ जान- माल की हिफाजत ही नहीं है वहां कोई क्या करेगा ?' प्रगट रूप में सन्तोप उसका विरोध चाहे नहीं करती थी, लेकिन उसका दिल इस वात को नहीं मान पा रहा था कि शहर एक-जैसे ही होते हैं । अव दिल्ली को ही लें। कश्मीर वाले मासड़ जी कहते हैं-'स्वर्ग नरक सब यहीं है । जो सुखी हैं वे स्वर्ग भोग रहे हैं।' सो दिल्ली में रहना तो नरक है नरक । सैकड़ों लोग पागलों की तरह इधर से उधर भाग रहे हैं। जैसे कहीं आग लगी हो। किसी के पास रुककर बताने का वक्त नहीं है कि आग लगी कहां है।' ..."उसे लगता कि यह शहर एक प्रकार के लावे के ऊपर ठहरा हुमा है। इस आग को बुझाने की बात ही दूर रही। और तो और, सभी जलता हुआ गुलाब / 119 नागरिकों के भीतर उस लावे का दहाता अतृप्त अंश है। कमी दहाता है, कभी मुलगता है और ज्यादातर उस पर राग की परत हाई रहती इघर अपना शहर है । इसकी गलियो, सडकों का चप्पा-चप्पा जाना हुआ है । बारिश याद में होती है पहले ही पता चल जाता है कि किम- किस रास्ते में पानी भरा होगा बोर किम रास्ते में कीचड़ मूयते-बिखरते दो दिन ले लेगा । अविनाश कहा करता है-'इम शहर की खूबी यह है कि यदि आप किसी से दो-चार दिन नहीं मिल पाये तो रनर बाजार से शेखां बाजार और कला बाजार का चक्कर काटते हुए जी. टी. रोड से होकर रैनक बाजार के चौक में पहुंचें। अव्वल तो पहले चक्कर में ही वह आदमी आपको मिल जाएगा अगर नहीं मिला तो दूसरे ऐसे चक्कर में उसका मिलना अनिवार्य है।' "तुम हरदीप को क्या इसी तरह मिलते रहे हो ?" सन्तोष ने पूछा था। "आप भी बात बदलने में कमाल करती हैं, भाभी?" "गौर से देखो। वात कोन बदल रहा है ?" "अच्छा । चायन्याय पिलाती हो कि चलें।" यदिनाश पिछले दो हफ्तो से घर वाया ही नहीं। याजकल उसे फुर्सत ही नहीं होती। बहुत काम कर रहे हैं । पजाव भर में आतंकवाद और फिरकापरस्ती के विरुद्ध रलियां निकालने में लगे हैं। मंगल बता रहे थे कि आजकल उसका ज्यादा वक्त मजदूरो के बीच गुजरता है । पिछली बार जब आया था तब सन्तोष ने पूछा या-- "तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो? क्या बात है हरदीप से कुछ कहा-सुनी हो गई ?" "न"नहीं तो।" "तुम लोग विवाह क्यो नहीं कर लेते ? कही नो मैं हरदीप के घर जाकर बातचीत कर ?" "नहीं भाभी ! अब इस सवकी जरूरत नहीं रही। हां, पिछले दिनों जरूर उसके लिए तहपता रहा हूँ। मुझे लगता था कि उसके दिन जीना एक मुश्किल काम है। बहुत ही मुश्किल । अब तो लगता है कि 120 / जलता हुआ गुलाव धरती पर करने लायक इतना काम पड़ा है कि उस सबके सामने शादी- विवाह एक छोटा और किसी हद तक मूर्खता का मामला है। 'अच्छा हुआ कि ऐसे झमेले में पड़ने से पहले मुझे अपनी दिशा का पता चल गया।" सन्तोष असहमति के बावजूद उसे कुछ कह न सकी। उसे लगा कि मगर वह लोगों के लिए कुछ कर गुजरना चाहता है तो यह बड़प्पन का काम ही होगा। करना वही कुछ चाहिए जिसमें आत्मा का हनन न हो। उसकी असहमति थी तो इस वजह से कि उसे हरदीप सुन्दर और काफी पढ़ी-लिखी और समझदार, लगती थी। अविनाश भी वहुत समझ- दार और गम्भीर लगता था। उसे यह भी पता था कि दोनों एक- दूसरे को जी-जान से प्यार करते हैं । ऐसे प्यार में टूटन आगे की जिन्दगी पर हावी रहती है। इसलिए उन दोनों को एक सूत्र में बंध ही जाना चाहिए। लेकिन इसके लिए राय प्रगट करना और उस पर जोर देना उसने फिर किसी दिन के लिए स्थगित कर दिया । उसे लगा कि अभी इसके लिए वक्त नहीं है । यह ख्याल आते ही उसने सोचा कि अभी उसे अपनी चेनी उतारकर देने में कुछ दिन बाकी हैं। उसने मन ही मन तय कर रखा था कि अविनाश के विवाह के दिन वह हरदीप के गले में अपनी चेनी उतारकर डाल देगी। इस बारे में उसने मंगल से भी वात कर ली थी। मंगल ने कहा था कि जव देने का मन बना लिया है तो वह भला कवाव में हड्डी क्यों बनेगा। सन्तोष आज बहुत खुश थी। आज के दिन वह मंगल से पहली बार मिली थी। पहली बार मिलने की रील उसके सामने घूम गई हुआ यह था कि अभी-अभी कमरे में पोचा लगाकर हटी थी। मैला पानी दरवाजे के बाहर फेंकने वाली थी। उसने गली में देखा। वाल्टी उठाई। एक हाथ में हैन्डिल और दूसरे हाथ में तल्ले का कड़ा। इतने में रसोई में कुछ गिरने की आवाज हुई। उसने सोचा बिल्ली ने दूध गिरा दिया होगा। दुवारा दरवाजे की ओर देखे वगैर गन्दा पानी उछाल फेंका । कौन जानता था इस बीच कि दरवाजे के बीच की जगह को एक अजनवी भर चुका होगा। दरवाजे की चौखट के फ्रेम में एक तस्वीर की तरह । ।
जलता हुआ गुलाब | 121 मंगल उस शहर में किसी काम से गया था। मौसी गियानवन्ती ने सन्तोष की प्राईजी के लिए माता का परशाद भेजा था। परशाद का बहाना था। मौसी गियानवन्ती की इच्छा यही थी कि लड़का इसी बहाने जरा झांक लेगा। मंगल ने गली के मोड पर के हलवाई से दरियापत कर लिया था कि यही मकान है जहाँ दीवार से उठी हुई दरेक को फुनगिया नजर आ रही है। मगल पहुंचा तो उसकी नगर एक भरपूर जवानी में कदम रखती लड़की पर पडी। मलवार के पायचे खोसे जाने से पिंडलियों तक उठे हुए थे। सूबसूरत गोरे पाव और गोरी सिंडलियो । इससे पहले कि उमको नजर ऊपर उटनी, पूरी वाल्टी का गन्दा पानी उम पर आ गिरा था। सन्तोप इतना झेंपी थी कि घर के सब लोगो के लास बने के बावजूद फिर मगल के सामने नही आई । मगम जितनी देर वहाँ रहा, उसकी सूरत न निहार सका। मगल जब वापिस लौटा तो मौसी गियानवती ने पूछा, "क्या लहकी देखी ?" वह 'हाँ'-'ना' के बीच फंस गया। उसने तो अभी पवि से लेकर पिण्डलियो तक ही लड़की को देखा था कि बाल्टी अपना काम कर गई। उसने कहा कि लडकी को उसने देखा तो नहीं लेविन शादी करेगा तो उसी से नहीं तो उम्र भर कंआरा रह जाएगा। मौमी उठाकर हम पहो। और सभी को सुनाती रही "देखा है नहीं, लेकिन मादी वहीं करेगा। नहीं देखे का यह हाल है तो अगर देख लेता तो रतनसेन की तरह बेहोश ही हो जाता।" मंगल पानी फेंकने की उस घटना का पचासो बार पूब नमक-मिर्च लगावर वर्णन कर चुका है । आज भी उस बात को याद जैसे विभोर कर देती है। सन्तोप आज बहुत खुश थी। आज योड़ी देर ही पहले वह हा० मिमग्नजीत कौर से मिलकर आई है । डा० को पूरा यकीन है कि वह दुनिया का सबसे खूबसूरत काम अंजाम देने की प्रक्रिया में है। इन वादियों में बहार आएगी । मूखी नदी वेगवती धारा से भर गई है। घर का आंगन चहकता फिरंगा ।
122/ जलता हुआ गुलाब । ममता की एक अजन्न धारा उसकी छातियों में बहेगी। उसकी गोद गौरव से भर जाएगी । एक खूबसूरत पालना खरीदा जाएगा। इसमें टुनटुनाती नन्हीं घण्टियाँ होंगी। फिर चावी वाले खिलौने । नन्ही-नन्ही सी गाड़ियां आंगन में भागती चली जाएंगी। उनके पीछे आएंगे नन्हें- नन्हें पाँव । नन्हें कदमों से उठना और उठकर चलने लगना शायद दुनिया की पहली विजय है । पहली खूबसूरत और संगीत भरी विजय । किलकारियां और तुतलाहटें पूरे घर का मंजर वदल कर रख देंगी। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े काम को उत्साह से भर देंगी। एक नन्ही-सी जान उसकी बाहों में बंध कर उसकी छाती से लग जाएगी। उसके गले में अपनी नन्ही-नन्ही वाहें डाल देगी। और फिर पूरा जहां उसका अपना होगा... आज जब मंगल को यह खवर देगी तो मंगल उसके हाथ चून लेगा, भंग खाए आदमी की तरह हँसता चला जाएगा, पूरा घर सिर पर उठा लेगा। फिर कहेगा मुझे तो सिल्की विटिया चाहिए । मैं कहूंगी कि मुझे टीनू जैसा वेटा चाहिए जो कि समझदारी में अपने अविनाश चाचा-जैसा हो. फिर हम दोनों में एक मीठा-सा झगड़ा चलेगा। मंगल ने बच्चा नहीं होने के बारे में कभी कुछ नहीं कहा, सिर्फ इस- लिए कि कहीं सन्तोप का दिल न दुःखे । लेकिन अपना बच्चा चाहने की इच्छा उसकी कितनी तीव्र है, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है। सिल्की को वे बहुत ही प्यार करते हैं । दुकान के पास से जाते बच्चों को आवाज देकर बुला लिया करते हैं और उनसे बातें करते रहते हैं। उनके काउंटर की दराज में पैन्सिलें, रवर और टाफियां भरी रहती हैं। मंगल किसी भी बच्चे को बुलाकर बातें करेंगे और फिर किसी को टाफी, पेन्सिल या रवर देंगे । कहेंगे, "छोटे-छोटे बच्चों को विस्तरवन्द जैसा वस्ता उठवा देते हैं । यह पढ़ाई है या गधे का वोझा ।" सन्तोप उत्साहपूर्वक सफाई में जुट गई । रसोई में डिब्बों के नीचे विछाया अखवार गन्दा हो गया था। उसने बदलने के लिए दूसरा अखबार उठाया । अखबार पर पांच मृत लोगों की तस्वीरें थीं, खून से तरवतर। पंजाव के अलग-अलग हिस्सों में घरों में जलते पांच और जलता हुआ गुलाव / 123 चिराग पिछले कुछ वरसो से झूलती आंधी मे बुझा दिए गए थे। मौसी बता रही थी ब्रह्मपुरा में सी० आर० पी० ने बडी ज्यादती की गांव के लोगों के साथ। बिलावजह बेकसूर लोगो को तंग किया गया। कहते हैं अवतार ब्रह्मपुराने घोषणा की कि वह गांव के टाऊटों को खवरदार कर रहा है। सी० आर० पी० को खवरदार कर रहा है कि वह ज्यादतियों छोड़ दे। वह वही है सी० आर०पी० अगर उसे पकड़ना चाहती है तो आकर पकड ले । लगभग आधा घण्टा बाद सी. आर०पी० का दल पहुंचा ब्रह्मपुरा गांव छोड़कर जा चुका था। सी० आर० पी० के दल ने गांव के लोगों पर सारा जोर लगा दिया। उस दिन हरदीप आई थी। डी०ए०वी० कालेज के प्रोफेसर के, जिनसे उनके निकट के सम्बन्ध थे, मारे जाने की खबर सुनकर सन्तोप के हाथ- पांव फूल गए थे। हरदीप ने कहा कि शासन को रोज विछती लाशो की जरा भी परवाह नही । इधर पंजाब में खून की आंधी चल रही है और उघर सैर-सपाटों और तमाशों में करोड़ो रुपया फूस की तरह फूंका जा रहा है। सन्तो की छोटी बहू भी उस वक्त वही पो। सन्तोष से स्वेटर का नया डिजाइन पूछने आई थी । उसके पिता कांग्रेस भक्त थे। कहने लगी, "सरकार पर तो सभी लोग व्यर्थ का लांछन लगाते हैं । वे तो अपनी तरफ से पूरे भारत के कल्याण को चिन्ता मे कसर नहीं छोड़ते।" "सारी चिन्ता भाषणो मे है और कुछ नहीं।" हरदीप ने कहा । "स्त्रियो के लिए ही लीजिए, नौकरी के मौके देने के लिए पुलिस की भर्ती कर रही है।" "स्त्रियों के लिए बटालियन तो जरूर शुरू कर रहे हैं लेकिन उन करोड़ो औरतों का क्या होगा जो आधा पेट भोजन पा रही हैं ? उनका क्या होगा जो घटिया व्यवस्था के कारण अनपढ रह जाती हैं ? उनका क्या होगा जो परिवार के लिए अपने गोश्त का व्यापार करने पर मज- बूर हैं ? उनका क्या होगा जो मुट्ठी भर चावल के लिए देह तोडती हैं ?.."जिनका शारीरिक-मानसिक शोषण हो रहा है, जो रोज दहेज की वेदी पर बलि चढ़ाई जा रही हैं, जिनके शरावी लम्पट पति पीट- पीट कर अधमरा कर देते हैं.''वे जो भोपाल गैस कांड से पीड़ित हैं...
... 124 / जलता हुमा गुलाब वे जिन्हें नवम्बर के दिल्ली दंगों ने जीवित रहते भी मार दिया है. 'वे जो नागरिक कालोनियों में रहकर भी चकलों जैसे काम कर रही हैं इन सबको क्या पुलिस महिला बटालियन बन जाने से मुक्ति मिल जाएगी..." सन्तो की छोटी बहू गली में सबसे अधिक पढ़ी-लिखी और तेज- तर्रार मानी जाती है । सन्तोष को इस बातचीत में बहुत मजा आ रहा था। छोटी बहू का मुंह जरा-सा निकल आया था । आज पता चला था कि पढ़े होना एक बात है, पढ़ाई के बाद अपने आस-पास के जीवनचक्र की वास्तविकता की समझ रखना दूसरी । "दरअसल पुलिस की महिला बटालियन का मतलव कुछ और ही है और आपको थोड़ी देर में समझ आएगा। यदि आप समझना चाहें तो..। अस्ल में वह्नों, औरतों की गुलामी हिन्दुस्तान की आजादी के इतने बरसों बाद भी वैसी ही है ! ''आजादी अगर हासिल करनी है तो बैठे-विठाए मिलने से रही सरकार तो चाहती है कि हम सभी अपने पचड़ों में पड़े रहें, जैसे हिन्दू-सिख, हिन्दू-मुसलमान, खालिस्तान-गोरखा- लैंड ताकि अस्ल लड़ाई हो न सके...।" बाद में सन्तो की छोटी वहू कहने लगी, "तुम्हारी वो हरदीप सयानी तो है लेकिन मुझे कम्युनिस्ट लगती है। ऐसे लोगों से जरा बचकर ही चलना चाहिए, कोई पता नहीं कव जेल करवा दें।" सन्तोप उसकी इस चेतावनी पर मुस्कराकर रह गई। सन्तोप उस दिन खुश थी। टीन दुकान से जरा पहले लौट आया। यों भी आजकल सात बजे ही बाजार बन्द होना शुरू हो जाता है। नौ बजते-बजते तो पूरा शहर वीरान हो जाता है। सभी लोग घरों में वन्द हो जाते हैं । पहले की तरह ग्यारह-ग्यारह बजे तक सैर-सपाटे नहीं होते। टीनू को खाना खाकर अस्पताल जाना था। उसके दोस्त की मां बीमार थी।...और रात में उसे अस्पताल में ही सोना था। उसके दोस्त को अपनी वहन को लेने पटियाले जाना था। मंगल जव घर आया तो उसकी चांदी की पायलें लेकर । पायलें टूट जलता हुआ गुलाव / 125 गई थी और लगभग महीना-भर पहले लाल बाजार में ठीक करने के लिए दी थी । सन्तोप ने कई बार याद दिलाया, लेकिन मंगल को उधर को जाने का वक्त ही नहीं मिलता था। आज टीनू को दुकान पर बैठा- कर जब वह अटारी बाजार की तरफ माल खरीदने के लिए निकला तो उसे पायलो को याद आ गई । दुकानदार ने पायलो को धो दिया था और अब वे नई लग रही थी। मन्तोप ने पहनकर देखने के लिए पहना और फिर छमछम की हल्की आवाज के कारण पहने रही। मंगल को खाना खिलाते वक्त जब वह आती-जाती तो पायलो का संगीत मंगल को खीचता । सन्तोष के गोरे निछोह पांवो ने वेजान पायलो को धड़कन अता कर दी थी। सन्तोष ऐसे मामलो मे बहुत कजूस थी। ऐसी चीजें सिर्फ विवाह-शादियो के मौके हर पहनने के लिए रख छोडती थी। मगल ने उससे कहा कि वह रोज पहना करे । कम से कम उसे रात खाना खिलाते वक्त जरूर । सन्तोष हंस दी । उसे आज वात-बेवात पर हँसी आ रही थी। चेहरा फूल की तरह खिला हुआ था। वह आज घर में किसी और को नहीं सह पा रही थी। सिल्की की मम्मी जब दही जमाने के लिए खट्टा लेने आई तो वह मन ही मन चाहती रही कि वह जल्दी चली जाए। आमतौर पर सन्तोष और वह बहुत-सी बातें करतीं। ज्यादातर बाते सिल्की के बारे में होती। सिल्की की मां जाते-जाते फिर लौट आई। "एक बात कहनी थी आपसे।" "कहिए।" "आप पायलें जरूर पहना करो।" सन्तोप का चेहरा ज्यादा ही खिल उठा। खाना खाने के बाद सन्तोप ने मगल को डा० सिमरनजीत की बात वता दी। मंगल झूम उठा। हंसी के वतासे फूट उठे। सन्तोप जाकर वर्तन साफ करना चाहती थी। मगल ने उठने नहीं दिया। वह अपने आपको खुशकिस्मत मान रहा था। खिलखिलाते हुए वह तुतले स्वरो में वातें करने लगा। कौन कह सकता था कि उन दोनो की उम्र पैतीस और 'चालीस के बीच होगी । सन्तोष जैसे सोलह साल को अल्हड हो और 126/ जलता हुआ गुलाब मंगल उन्नीस साल का वांका जवान । खूब प्यार करने और भविष्य को कुछ योजनाओं पर विचार करने के बाद वे दोनों सो गए। । रात शायद आधी से ज्यादा गुजर चुकी थी। गोलियों की आवाज और डूबती हुई चीख से मंगल की नींद टूटी। इससे पहले कि वह आंखें भी खोल पाता एक और गोली उसकी छाती में लगी। गोलियां शायद बहुत करीब से दागी जा रही थीं.. पीड़ा एक गर्म लाल सलाख की तरह चीर रही थी"इससे पहले वह इसे दुःस्वप्न मान रहा था। एक और गोली उसके माथे को छूती निकल गई। जब उसकी थोड़ी-सी चेतना लौटी तो उसने हाथ बढ़ाकर सन्तोप को छूना चाहा । लेकिन उसके हाथ खून का गीलापन ही लगा। उसने उठना चाहा लेकिन उठ नहीं सका । जोर लगाने पर थोड़ा और खून बाहर निकला और वह गिर गया । सन्तोष पहले ही वेदम हो चुकी थी। चौकीदार मेघ वहादुर मन्दिर वाली गली में था, जव उसने गोली की आवाज सुनी। जब तक वह इस गली में पलटता, दो अनपहचाने लोग अपना काम करके जा रहे थे। मेघ वहादुर ने हाथ की लाठी चलाकर फेंकी, जोकि सिर्फ विजली के खम्भे से टकरा सकी। मंगल लोगों के घर की दीवार पर बांस की सीढ़ी लगी थी जिससे कयास लिया जा रहा था कि लोग इस सीढ़ी से अन्दर गए होंगे। अव तक बाहर काफी लोग जमा हो गए थे। पुलिस भी आ गई धी। सन्तोप और मंगल की लाशें अस्पताल भेजी जा रही थीं। वे जानना चाहते थे कि शिवसेना से मंगल का सम्बन्ध था अथवा उसके भाई का। इकवाल कौर को ध्यान आया कि थोड़ी देर में अभी सिल्की उससे पूछेगी-'विछकू वाली आंटी कहाँ है ?' तो वह क्या जवाव देगी ? रुलाई का वेग उसे तरबतर भर गया। सीढ़ियों में कोई गठरी बना बैठा था। घुटी-घुटी-सी रुलाई उनके कानों से टकरा गई।.." सिल्की की मम्मी थी। उन्होंने उसके कन्धे पर हाथ रखा तो फूट पड़ी। जब पुलिस वाले लाश उठवा रहे थे तब उसकी नज़र सन्तोप के पांव पर पड़ी। चाँदी का पायल अंधेरे में चमचम चमक रही थी। सियासत के हाथ और कितने मासूम लोगों के खून से रंगने वाकी हैं। उसने सोचा।
दस
हरदीप की नजर खिडकी के बाहर दूर क्षितिज पर टिक गई। इस क्षेत्र
पंजाब के हालात के साथ-साथ क्तिनी बड़ी ज्यल-पुपल से गुजरी है वह।
अपने परिवार के वाकी सदस्यो के साथ-साथ । कौन जानता है मिरे
पंजाब की जलती हुई लपटें कब किसी घर को जाने नातिन नेवार
लें। फिर वहाँ बचे तो आधे जले हुए शहतीर, धुएं से काली दीवार और
मलबे का देर। और और कांपते हुए लहसास, बात-बात पर विश्रा
नम आँखें, पोडा के वाणो से न्दिा हुमा नन्हा-सा दिल न भन्ने का
जरूम से अभाव और पहाड़ की तरह कटते वारी के दिन-राउ..
सन्च्या के पिता गोलियों से हलाद कर दिए गए हैं। हर
दुःख उससे देखा नही जा रहा था। वह बया कर दी है। सीज
पर सवेदना के फाहे रखने के अलावा घर-घर .
भुगतान किया जा सकता है क्या ?
कौन जानता था हरपान के भीतर ही मन:
और फिर एक दिन उसका विस्फोट इन नरह
भापाजी से लेकर पिकी तक हर सम्म गाल::-
पटाता रहेगा। मापाजी को नीद मापद हनः
है। पिंकी को आइसक्रीम मिलती है नो::37
है । वर्षी का एक टुकड़ा मिरता है नो
का परशाद आधा चाचा के लिए। नरिन्द्रमा:
कहती, चुपचाप कमरा बन्द कर नई-2-
स्याही अपने माये लेकर । और है-
हो गई हैं।
र
गह
. 128 / जलता हुआ गुलाव उस दिन सुबह तक कोई कुछ नहीं जानता था। भापाजी ने नहा- धोकर वाफ लिया.. मनजीत भाजी स्कूटर साफ कर रहे थे""गरजाई जी पिंकी को स्कूल जाने के लिए तैयार कर रही थीं। वह रसोई में नींव खोज रही थी. मनजीत भाजी को नींबू वाली चाय देने के लिए... टोकरी में सिर्फ एक नींबू था सूखा-सा । "भाजी नींबू खत्म लगते हैं।" उसने वहीं से कहा । "हरपाल को उठाकर भेज दो, ले आए। रोज ही देर से उठने लगा है आजकल..." लेकिन हरपाल कमरे में नहीं था. 'न छत पर। । .."भापाजी ने कहीं भेजा न हो। 'न जी 'सुवह सवेरे उठाने पर वह इतना कुनमुनाता है कि भापाजी को खीझ होने लगती है। इसलिए वे अब उसे उठाते नहीं। मनजीत भाजी नींबू भूल गए "स्कूटर लेकर उसके दोस्तों से पूछ- ताछ के लिए निकल पड़े। हरदीप दुवारा उसके कमरे में गई तो सिरहाने के नीचे एक कागज मिला । काँपते हाथों और धाडधाड़ धड़कते दिल से खोला--"मुझे ढूंढने की कोशिश न करना, मैं खड़कुओं के साथ जा रहा हूँ।" भापाजी रात की बात लेकर भरजाई पर कुढ़ने लगे। हरपाल को माह बहुत पसन्द थे। उस दिन भरजाई ने माह बनाने थे लेकिन टी० बी० पर नाटक देखने के चक्कर में माह जल गए। हरपाल ने रोटी के लिए शोर मचाया तो भरजाई ने एक कटोरी परोस दी । हरपाल ने पहला कौर मुंह में डाला और थाली पटक दी। "यह मांह की दाल बनाई है या मां का सिर ।" भरजाई ने भी कह दिया-"काम के न काज के दुश्मन अनाज के।" इतने से भी तसल्ली नहीं हुई तो मेज पर पोंछा लगाती ने यह भी कह डाला, "तुम तो इस घर के पेड़ पर अमरवेल हो अमरवेल ।" "अच्छा अमरवेल हूँ, मैं तुम सब लोगों का खून पी रहा हूँ 'वेकार निठल्ला हूँ मैं मैं नहीं रहूंगा इस घर में, सबकी आँखों में मिर्च की तरह लगता हूँ''नहीं रहूँगा.. चला जाऊँगा यहाँ से...!" । -
No text on this page.
130/ जलता हुआ गुलाव वह ऐसा सोच नहीं पाती.. उसके बारे में इतनी सचेत रहती है कि कुछ तय करने में कुछ का कुछ हो जाता है । एक चिड़िया पंखे से टकरायी और उसके परखचे उड़ गए । हरदीप ने पंखा बन्द किया जबकि अव इसका कोई लाभ नहीं था। हरदीप ने वैडशीट से चिड़िया की देह को रूमाल पर रखा। करीव से देखा वह शाश्वत तौर पर फुर्र हो चुकी थी. चिरन्तन सत्यों की तलाश में । अविनाश के लिए हरदीप का मन किसी अत्यन्त गहरी पीड़ा से भर उठा। - पिछले दिनों हरपाल के चले जाने से भापाजी वेहद उदास और गमगीन से रहने लगे थे। उनकी सफेद दाढ़ी में चेहरे का ऐसा पीलापन झांकने लगा था, जैसा ऑपरेशन के दिनों में भी नहीं था। एक दिन मौसी की बातें सुनकर भन्नाये हुए आए, "एक तो हरपाल ने मेरी कमर तोड़ दी है, दूसरे तुम किसी तरफ नहीं लगने देती।" आखिर क्या बुराई है पटियाले वाले लड़के में। एक्साइज में इन्स्पेक्टर है। पढ़ा-लिखा है. 'खाता-पीता अच्छा घर है। गुरमुख आदमी है। रोज गुरुद्वारे जाता है। ऐसा लड़का मिलना कहाँ आसान है । फिर कोई लम्बी-चौड़ी मांग नहीं। हरदीप कुछ नहीं कहेगी। फर्श से निगाहें भी नहीं उठेगी। वे झल्ला उठेंगे, “नरिन्दर, तुसी समझाओ इसे । जव बेटी छत-जैसी ऊंची हो जाए तो वाप को नींद नहीं आती।" नरिन्दर भरजाई ने सलाह दी, "तुम अविनाश से क्यों नहीं मिलती?" "वे मुझसे दूर हो चुके हैं।" "तुम्हारा पागलपन है और कुछ नहीं। ऐसी दूरियां बनाए रखने से बनी रहती हैं। तुम एक वार जाओ समर्पण की भावना के साथ । देखना कोई दूरी नहीं रहेगी।' 'अविनाश पर भरोसा किया जा सकता .. बहुत अच्छा आदमी है । "एक वार गलत मोड़ मुड़ जाओगी तो जिन्दगी भर पछताओगी। "तुमसे नहीं होता तो मैं बात करूं।" ऐसा नहीं कि हरदीप ने अविनाश को चाहा न हो 'बहुत चाहती जलता हुआ गुलाव / 131 थी, जी-जान से। उन दिनों उसका हर सपना अविनाश से शुरू होकर अविनाश पर ही खत्म होता था ! उठते-बैठते, जागते-सोते कोई ऐसा हिस्सा नहीं था जिस पर अविनाश की कोई जगह न हो ।"यह पहले प्यार की दिवानावार चाहत थी जिसकी शिद्दत को शब्दो मे नही बांधा जा सकता। फिर भापाजी की किडनी बदलने का सवाल सामने आया, उनके लिए किडनी नहीं मिल रही थी। एक सावित जिन्दा आदमी की किडनी चाहिए थी। विज्ञापन दिए जा चुके थे, इधर-उधर झोपडपट्टी मे, कारखाने के मजदूरों मे, होटलों पर वर्तन धोने वालों में सब जगह एक किडनी की तलाश की गई। सब व्यर्थ रहा। अविनाश के सामने यह समस्या रखी गई तो वह एकदम तैयार हो गया जैसे अपने पिनकुशन एक आलपिन निकालकर देने की बात हो । हरदीप नही चाहती थी कि ऐसा हो। उसे बार-बार लगता रहा कि यह एक्सप्लायटेशन है सम्बन्धों की। ऐसा नहीं कि वह भापाजी से प्यार नही करती थी या उनकी सलामतो नहीं चाहती थी. लेकिन इसके लिए अविनाश का इस तरह कुर्बानी के लिए तत्पर हो जाना उसे बहुत अजीब लगता था। उसने रोकने की कोशिश की लेकिन वेअसर । हरदीप को अपने घर के लोगो का रवैया इस तरह का लगा कि जैसे उनके गले का फन्दा अविनाश के गले में कस रहा हो ।' 'अविनाश की आत्मबलिदान की भावना कचोटने लगी। उसे सरासर अविनाश की अहम्मन्यता लगी या महनीय वाँध... उसे लगा कि महान करार दिए जाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है। ऑपरेशन के दिन के बाद से घर में अविनाश के नाम की धूम मच गई। वह नाम एक उदाहरण बन गया। परिवार वालों को उसे देवता रवीकार करने में कोई संकोच न था ।.."उसे देवता और ऊंचे दर्जे का इन्सान समझ लेने के बाद उनके लिए इसकी संभावना गौण हो चुकी थी कि आखिर वह भी एक इन्सान है। जीता जागता "जिसके उनके घर को एक मात्र जवान लड़को से प्रेमपरक सम्बन्ध हो सकते है। हरदीप अविनाश को लेकर पनपी हुई उदात्तता मे और शोर-शराये । । 132 / जलता हुआ गुलाब में अजीव तरह से तटस्थ होती जा रही थी। कभी वह सोचती कि अविनाश ने जो कुछ भी किया उसके लिए या उसके परिवार के लिए किया । उसे बैंकसूर मान लेने पर भी वह एक अजनबी धुन्ध और ठण्डेपन में लिपटी रहती। इस धुन्ध को काट फेंकने का सिर्फ एक मौका वना। जब वे लोग बैठक के लिए एकत्रित हुए थे। वह सन्ध्या के लिए इसलिए कृतज्ञता महसूस करती थी कि उसने उसे वहाँ भेजकर अविनाश से मिलने का मौका दिया। हरदीप ने एक तकिया वैड के पिछले वाक्स पर टिकाकर सीधा खड़ा " किया और उस पर पीठ टिका दी। टांगें सीधी पसार दी, दूसरा तकिया गोद में रख लिया और डा० मीता की दी हुई पत्रिका खोलकर देखने लगी। जहाँ महिलाओं के लिए दूसरी पत्रिकाएँ 'अचार कैसे डालें ?' 'चटनी बनाने का तरीका', 'गर्मियों में घूमने जाएँ तो किस रंग की साड़ी साथ हो', 'नहाने की तैयारियां', 'गोरे कसे बनें ?', 'सेक्स की समस्याएँ और महीने के व्रत अनुप्ठान' जैसे विषयों से भरी रहती हैं, यह पत्रिका दवी-कुचली महिलाओं और चल रहे संघर्षों के बारे में लेखों से भरी थी। इस तरह से इस पत्रिका को लेकर हरदीप की पहली राय तो यह बनी कि यह पत्रिका निकालने वाले महिलाओं को केवल घर, उपभोक्ता संस्कृति का हिस्सा मानकर वास्तविक मुक्ति के लम्बे संघर्ष में एक वरावर का हिस्सेदार समझते हैं। पत्रिका में पहला लेख धर्म और साम्प्रदायिकता पर था। हरदीप गौर से पढ़ने लगी, "धर्म अन्तिम रूप में समाज और व्यक्ति के विभाजन 'पर, तथा उनके बीच के काल्पनिक वैमनस्य पर आधारित है। जब तक फरिश्ते बने पोंगे लोग और अपने स्वार्थो के लिए सिर चढ़ाने वाले अहम- वादियों का समाज मौजूद है, राज्य अपनी नकेल हाथ में लिये प्रस्तुत रहेगा । न्यायाधीश दण्ड की घोषणा करते रहेंगे, जल्लाद फांसी की डोरी . खींचते रहेंगे, चर्च और अन्य धर्मस्थान आत्मा की शान्ति और मुक्ति की प्रार्थना करते रहेगे तथा पुलिस वाले मुजरिमों या कथित मुजरिमों की टोह लगाते रहेंगे।
पहा ला 133 "धका परिटिव रोल तो एक सपना हो बना रहा निपटा "लेकिन नोनेटिव एस ने धरती पर मासूम सानो । इतना खून बहाया है कि किसी भी पापरदिन के दर से रोग बरे हो जाएं। इसका नोगेटिव पस वह बन्धो साम्प्रदायिता है जो अपने को बुलन्द करने को हविस में लाशों का अम्बार सगा देने में जरा भी संकोच नहीं करती..." उस दिन हरपाल मगर पांच मिनट भी लेट हो जाता तो यह अनिता के साथ कॉफी पीने के लिए निकल चुकी होती । अविनाश पर पड़ेगा से बातचीत करना चाह रहा था। हरदीप भी तैयार हो गई थी, किंग हरपाल के तुरन्त आ जाने से जैसे खाका ही यदल गया हो। दीपगे घर आने के लिए कहा तो अविनाश ने मगल लोगो के. यहा मागेमा वहाना बना दिया। उस वक्त वह खुद चाहने लगी थी कि आग शारी बातचीत हो जाएगी-सारी मन की गिरह एकादग पुरा गाएगी.. सारी बातें जिनको वह शब्द नही दे पायी-यरा घुषमा टरा की राह स्वीकार कर गई। अविनाश प्रताडित हुआ और वह तटस्थ न रह सगी । परापर दुप महसूस करती रही । लेकिन सब कुछ इच्छानुसार काही होता है फिर राम जव इच्छा भी जटिल हो चुकी हो । अगले दिन जब मन्ध्या उसके पाम 'बैठा मे क्या-पया हवा', जागी के लिए माई तो हरदीप ने सन्ध्या से पूछा, "दुग यया गीगी मममी मी तरह होता है-जले भी और नापमन्द भी किया जागा ।" के पास इसका जवाब न था। उसने ती अविनाश in लेने का मशवरा दिया। वह यदिनाम में मिली, लेकिन मायद दमक विदाको in वह मनोबैगों के कई पुल पार कर चुका था। चटक की नस माम के बार बार उममें पहने हातापाया दिमाग में कुछ महान टमा। पहला मदान म्हहि वही हरदीय न को लड़का और दिन दीनही मन था? श्राम मन्ध्या - 134/ जलता हुआ गुलाव हवा में ऐसा सोच लेना गैरमुनासिव भी नहीं। 'नहीं ऐसा नहीं हो सकता। मैं हरदीप को जानता हूँ, वह ऐसा सोच भी नहीं सकती। कतई भी नहीं...' उसके अन्तर्मन से आवाज निकलती। फिर एक सवाल और उभरता, 'कहीं ऐसा तो नहीं कि एक किडनी दे चुकने के बाद हरदीप उसे एक अधूरा व्यक्ति समझती हो। वह सोचने लगी हो कि अपाहिज आदमी के साथ जिन्दगी गुजारने में क्या सुख ? वह सुन्दर है । पढ़ी-लिखी है, समझदार है, अच्छे घर की है, उसे एक से एक अच्छा योग्य वर मिल सकता है । अगर वह ऐसा सोचती है तो यह एक व्यावहारिक नजर है। हमेशा जज़वात निभाये रखना तो अविनाश जैसे उल्लू लोगों का काम है। अविनाश अब सिर्फ ग्रेट माने जाने की चीज़ हो गया है। जिसे नेट मान लेते हैं उस पर सिर्फ श्रद्धा के फूल चढ़ाए जा सकते हैं । ''उससे शादी-ब्याह की बात थोड़े ही की जाती है। फिर वह भी अविनाश जैसे..' अपनी अपंगता के लिए कोई उसे योग्य शब्द नहीं मिल रहा था । परम्परा में लूले, लंगड़े, टुण्डे, काने और जैसे विशेषण मौजूद थे. लेकिन इनमें से कोई भी विशेषण बगैर एक किडनी के आदमी के लिए नहीं था.हाँ 'अन्धा' उस पर ठीक उतरता था और इस कामकाजी, चापलूस, अर्थलोलुप और स्वार्थी दुनिया में वह 'अक्ल का अन्धा' था। निःसन्देह वह अपने आपको 'एक किडनी वाला आदमी' मानता था। और 'एक किडनी वाले आदमी' को कोई हक नहीं रह जाता कि वह हरदीप जैसी मार्क की लड़की से 'उम्र भर के साथ' के ख्वाबों में भटकता फिरे। उसने अपने लिए 'किडनड़ा' विशेषण खोज लिया। हरदीप अगर उस जैसे 'किडनड़े' से दूर रहने की कोशिशें कर रही है तो इसमें ग़लत क्या है ? अविनाश सोचने लगता कि उसने क्या ग़लत किया ? कहाँ ग़लत किया? वह भगर 'किडनड़ा' बना तव भी हरदीप के लिए न ! उन दिनों हरदीप और उसके परिवार की सबसे बड़ी समस्या 'एक . - जलता हुआ गुलाव / 135 किडनी' को तलाश थी। हरदीप की खुशी के लिए उसने अपनी किडनी आफर की। सिर्फ आफर को? निकलवा कर दे दी 'दह व्यावहारिक होता तो सिर्फ आफर करता और बाद में कोई वहाना लेकर निकल जाता। उसके लिए क्या यह सव भासान था? क्या किडनी कोई घर में टूटा प्लास्टिक का खिलौना होती है."उटाई और किसी भी बच्चे को दे दी ? वह खुद किडनी को पटा पोस्टकार्ड समझ बाहर फेंकने के लिए उठाए नहीं फिरता रहा। जितनी जान दूसरे लोगो को प्यारी है उतनी उसे भी तो थी। वह खुद को प्यार करता था, करता है और करता रहेगा । आत्महत्या का भी उसने कभी नहीं सोचा न दधीचि जैसा आत्म- बल उसमें था कि हथियार बनाने के लिए रीढ़ की हड्डी दान में दे दे और न इस दर्जा तपस्वी अवस्था कि आत्मा को सब कुछ माने और जिस्म को कुछ भी नही। वह अपनी 'किडनी' को 'किडनी' ही समझता था। दे देने से पहले डाक्टर से परामर्श भी किया था । अनेक दुश्चिताएं और कमजोरियां उसे वरावर घेरती थी। उसने उन पर काबू रखा था। किडनी दे चुकने के बाद उसकी चर्चा के शोर-शराबे मे भी अपने भीतर एक खोखलेपन का अहसास उसे बहुत दूर तक दबाता रहा। उसे लगता था कि उसके भीतर से कोई चीज निकल गई है और वहाँ शून्य भर गया है। यह ख्याल आते ही टांगों में अपना वोझ उठाए रखने की क्षमता रिस जातो. "वह खुद को एक निचुडा हुआ आदमी समझता । वेशक डाक्टर ने इस गहर में से निकलने के लिए उसका बहुत साथ दिया था, लेकिन उसे हरदीप से जिस प्यार की, स्निग्धता की जरूरत थी वह उसे क्रमशः दूर होती लग रही थी कभी उसे ऐसा भी लगने लगता कि सुन्दरता और प्यार को आड़ मे उसका शिकार खेला गया है। तब उसका किसी खण्डहर में बैठकर रोने का जी हो जाता। फिर वह सोचता कि उसने एक अच्छा काम किया है। अच्छे काम के लिए बहुत-से वहानों की क्या जरूरत है। क्या इतना कम नहीं कि एक आदमी को जिन्दगी मिल गई।
. 136/ जलता हुआ गुलाब लेकिन सम्भव है हरदीप के लिए उसके 'किडनड़े होने का सवाल' नहीं हो। तब ?.. तब एक ही सवाल वचता है कि हरदीप को उस जैसे आदमी, जिसके पास न ढंग का मकान हो, न लम्वी रकम पाने वाली नौकरी, न सामाजिक राजनैतिक रुतबा, के साथ जिन्दगी बसर करने की कोई तुक न नज़र आती हो। उसने उसे सिर्फ पढ़ाई में सहायता करने योग्य समझा हो । वह काम पूरा हो जाने पर उसकी कोई जरूरत न रही हो। एक बार उससे बात तो करनी ही होगी। वह बहुत बार सोचता और उतनी ही वार टाल देता। फिर एक दिन जव पंजाब समस्या पर हुई बैठक में अचानक उसकी नजर हरदीप पर पड़ी तो उसने तय किया कि वह उससे पूरी तरह वात करेगा। लेकिन यह अवसर भी हाथ से किसी सुगन्ध भरे झोंके की तरह छूट गया। उस रात अविनाश अपने दर्द को बिना हमदर्द के भूल जाने की अधूरी चेष्टाएँ करता रहा। उसका न तो खाना खाने को मन हुआ न खुद स्टोव पर खिचड़ी पका लेने को जी चाहा, मकान-मालकिन खीर की एक कटोरी दे गई थी। वह भी ज्यों की त्यों पड़ी रही। सुबह उठते-उठते उसने इस दर्द को स्थगित कर देने का तय किया। इस टोन में जब उसे ही मुझे लेकर कोई चिन्ता, लगाव या परेशानी नहीं है तो मैं क्यों खाक छानता फिर.. कोई किसी के वगैर मर नहीं जाता। वह उठा । ब्रुश किया। ठंडे पानी के छींटे मुंह पर मारे और खीर गर्म करके खाने लगा। उसे ख्याल आया कि महात्मा बुद्ध जव तपस्या में अचेत होने लगे थे तब किसी महिला ने उन्हें खीर खिलाई थी। इस ख्याल पर वह मुस्करा दिया। उस दिन से वह रोज शाम बलविन्दर लोगों से मिलने लगा। उसे लगा उसके लिए पूरा क्षेत्र खुला है। करने के लिए बहुत काम है। वह तो खामखाह अपना जुकाम लेकर कमरे में बन्द होता जा रहा है। रास्ता आगे निकलता है और उस रास्ते की अपनी संभावनाएं हैं। तारनसिंह छोटी फैक्टरियों के मजदूरों के बीच काम करता था।
जलता हुआ गुलाव / 137 उनकी दशा बहुत विकट थी। फैक्टरियों के मालिकों के मजदूरों के साथ सम्बन्ध भी अजब थे। सुवह माल तैयार करने की किसी गलती पर मजदूर की तनख्वाह में से एक सौ रुपया काट लेगे। शाम को उसके बच्चे के लिए गेंद दे देंगे । एक शाम उसे खूब डांट पिलाएंगे। गधे तक का दर्जा दे डालेंगे । अगले दिन सुबह स्कूटर पर उसके घर पहुंच जाएंगे और घर से ले आएंगे। तारनसिंह के लिए भी इनकी लड़ाई बहुत पेचीदा बनी रहती। लेकिन तारनसिंह का जीवट, व्यवहार को समझ और शोषण के प्रति नफरत गजब की थी। अविनाश के लिए बहुत काम था और सोचने के लिए बहुत से गम्भीर मुद्दे थे। उसे यह देख-देखकर दुख हो रहा था कि जनता की वास्तविक चिन्ता रखने वाले लोग छोटे-छोटे गुटों मे बेटे हुए थे। लोगों के लिए मुक्ति की बात सभी के सामने थी, लेकिन लोगो की मुक्ति के लिए व्यापक संगठन की वात किमी के पास नहीं । पंजाब का सन्ताप तो उससे सहा नहीं जा रहा था। रोज अखबार लागो की तस्वीरो से भरा रहता। कई दफे वह सोचता, पजाव समस्या, गोरखालँड या टी० एन० वी० इनका स्वरूप कैसा भी हो, है तो वास तरह की व्यवस्था की देन । एक दिन सुबह अचानक जब वह नहाकर कमरे मे गया तो किताबो, पत्रिकाओ को झाड़कर तरतीच देती हरदीप को देखकर हैरान रह गया। रविवार का दिन था। हरदीप जानती थी कि वह जरा देर से उठेगा। और देर तक अखबार और पत्रिका फाक्ता रहेगा फिर कही दस-साढ़े दस बजे नाश्ता होगा। लेकिन इन आदतों में काम के कारण तवदीली आ चुकी थी। अब कई दफे रातभर वह तारनसिंह के कमरे में ही रह जाता। कई दफे तडके उठकर निकल जाता। इधर एक पर्चा निकालने की योजना में उसकी व्यस्तता और भी बढ़ गई थी। "अरे...! कमाल है..." अविनाश के मुंह से निकला। "देख रही हूं, पत्रिकाएँ और किताबें बढ़ती जा रही हैं । इनके लिए 138 /जलता हुआ गुलाव एक बड़ा रैक तो लेकर आइए। यह अलमारी तो पूरी ढुसी हुई है।" हरदीप इस तरह स्वाभाविक व्यवहार कर रही थी जैसे वीच के इस पूरे समय के टुकड़े में कोई व्यवधान उभरा ही न हो। जैसे वह किताव से धूल पोंछने की तरह समय को भी पोंछ सकती हो। "भुलावा होता है साह्न ! कोई पोंछ नहीं पाया' अविनाश ने मन में कहा । "आप प्लीज मेरी मदद करें। मेज पर पड़ी तमाम किताबें और पत्रिकाएं मुझे पकड़ा दें। और कुर्सी पर से भी। कितावें आखिर सव कहीं तो नहीं हो सकतीं।" "इन्हें जहाँ होना चाहिए वहाँ भी नहीं हो रहीं।" कहने को वह कहना यह चाहता था कि अब इस नाटक की क्या जरूरत है ? "कभी-कभी मुझे लगता है कितावों की दुनिया का अपना जादू है।" हरदीप ने कहा। "कितावों की बात दरकिनार रखें, मुझे तो कई वार लड़कियां भी जादू का खेल खेलती दीख पड़ती हैं।" हरदीप ने पूरी अर्थवत्ता सोखने के लिए चेहरा उस ओर घुमाया और अविनाश को गम्भीर पाकर मुस्करा "तुम यह क्या खटराग छेड़ वैठी। यह व्यवस्था तो मुश्किल से एक- दो दिन ही चलेगी।" "मैं फिर आकर संभाल दूंगी।" "कहाँ वार-बार आने की फुर्सत रहेगी तुम्हारे पास ? आज भी पता नहीं कैसे इतने दिनों बाद..." "आप कहें तो हमेशा के लिए आ जाऊँ इसी कमरे में।" इतना अचानक सवाल था कि अविनाश को जवाब में दो-चार शब्द हूँढने के लिए भी जैसे कुएं में डुबकी लगानी पड़ी। एक बार वह हरदीप के खिले, लेकिन खास शर्म से भरे और मुस्कराते चेहरे को देखता ही रह गया । वक्त की धार भी कैसी बेरहम होती है। काटते वक्त आगा-पीछा नहीं सोचती। अविनाश के मुंह से सिर्फ इतना फूटा, "अपने ऐसे भाग कहाँ ।” ठेठ अभिव्यक्ति। जिस में न जाल न जाले । दी। - ।
जलता हुमा गुलाव / 139
हरदीप फिर मुस्करा दी, ऐसी मुस्कराहट जिस पर सदियों से बहुत
कुछ न्योछावर होता रहा है ।
"भापाजी कैसे है ।" अविनाश ने सचेत होकर पूछा।
"जैसे हो सकते हैं।"
उमके कुछ पल्ले पड़ा, कुछ नहीं ।
“झाईजी। नरिन्दर भरजाई ?"
"हरपाल का नहीं पूछेगे।"
"क्या हुआ? खैरियत तो है ?" उसका गमगीन चेहरा देखकर
अविनाश ने पूछा।
"एक रात वह अचानक घर से चला गया। उसके कमरे में चिट
मिली. खडकुओ के साथ जा रहा हूं। तव से घर का सुख-चन ही
लुट गया है।" कहते-कहते उसको रुलाई फूट पड़ी।
"मुझे इसी का डर था।" अविनाश ने कहा। फिर पूछा, "कोई
खबर, कोई रुक्का ?"
"कुछ नही' 'पुलिस आए दिन अलग परेशान करती है.. भापाजी
का, हाईजी का बुरा हाल हो रहा है।"
यविनाश ने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया, जैसे सहारा दे रहा
हो।
"कितने दिन हो गए?"
"पांच तारीख से।"
"पच्चीस दिन हो गए और मुझे किसी ने खबर भी नहीं दी। मैं
उस घर से इतना दूर हूँ ?'
दीप ने इनकार में सिर हिलाया। आंसूभरी आँखें और सिर हिलाने
पर झूमती हुई वालियां । अविनाश का उसे चूम लेने को मन कर आया।
आमू के खारेपन को जुवान से स्पर्श करने का । लेकिन उसने हाथ
वड़ाकर आंसू पोंछ दिए और थोड़ा पीछे हट गया।
"हिम्मत से काम लो, दीप । यह हमारी शताब्दी का जहर है...
हमें पीना ही होगा। पीना ही होगा और थूकना भी होगा। ठीक
जगह।"
140/जलता हुमा गुलाव "हरपाल अब हमें कभी नहीं मिलेगा ?" हरदीप ने पूछा। एक सवाल था जिसका जवाब अविनाश के पास भी नहीं था।... कमरे में आधा मिनट तक सवाल निगाहों से और दीवारों से टकराता रहा। -- अविनाश ने कहा, "हिम्मत से काम लो, दीप । मुंह धो लो। मैं चाय बनाता हूँ।" "नहीं, चाय मैं बनाऊँगी।' "अच्छा वावा ! पहले मुंह-हाथ धो लो।" "आपने नाश्ता नहीं किया न ?" अविनाश ने इनकार में सिर हिला दिया। "वेड और बटर ले आएं बाजार से जरा।' अविनाश को याद नहीं आ रहा था पिछली बार उसने रोड के साथ बटर कव खाया। लेकिन उस वक्त उसकी निगाहें कुछ और खोज रही थीं। दीप के मुंह-हाथ पोंछने के लिए कोई दूसरा तौलिया नहीं था। बहुत देर से उसका काम एक ही तौलिए से चल रहा था। उसने दीप को सुझाव दिया कि वह तौलिए की जगह दराज से रूमाल ले ले । लेकिन उसने वही तौलिया ले लिया और गालों से सटाते हुए कहा, "आपसे जो काम कहा है, आप करें।" नाश्ते के वाद हरदीप ने कहा, "भापाजी हरपाल को लेकर परेशान हैं ही, अव मुझे लेकर भी सोचने लगे हैं।" "क्यों, तुम्हारा क्या है।" उसने बुद्ध की तरह सवाल किया और फिर पछताया। "वे पटियाला में एक लड़का देख रहे थे मेरे लिए।" "तुमने क्या सोचा ?" "आप वताएँ क्या सोच सकती हूँ मैं ?" "कुछ भी "आखिर तुम्हारे सामने पूरी जिन्दगी पड़ी है। तुम्हें सोच-समझकर ही फैसला करना चाहिए।" उसके भीतर से 'किडनड़ा' शब्द जोर से उठ रहा था। "मैं यह पूछना चाहती हूं कि यह समस्या सिर्फ मेरी है या आपकी जलता हुआ गुलाब/14 "मैं समझा नहीं।" अविनाश ने भौचक होकर कहा । "मीधी-सी बात है और आपके लिए बहुत आसान।" "पहेली की बजाय खोलकर कहो।" "हम दोनों एक साथ नई जिन्दगी शुरू कर सकते हैं । "बाप कहें तो मैं भरजाई से कह दूं । वे भापाजी मे कह देंगी।" "हूँ."।" अविनाश जैसे कही डुबको लगा गया हो। "आपको विचित्र लग रहा है ?" "स्थितियां अजीबो-गरीव सेल खेलती हैं..." अविनाश ने कई उलझे मूतों का सिरा हाय में लेने की कोशिश की। उसे इस में दीप के साथ गुजारे कई मानदार क्षण पलक झपकते-से लगे। “उसने फिर कहा, "अब जिस रास्ते पर मैं कदम रख चुका हूं यह है तो सिर्फ मानवी मुक्ति के लिए एक सीधा-मा रास्ता लेकिन, क्योकि यहाँ छोक को ठीक और गलत को गलत कहना जोखिम भरा होता है इसलिए बहुत मुश्किलों भरा है । " यह रास्ता चुनने के लिए मुझ पर कोई बाहरी दवाव नहीं थे. मैंने अपनी इच्छा से इसे चुना है ।"अब मेरे लिए इस सघर्ष के रास्ते से अलग कुछ सोचना मुश्किल है । " मैं नहीं चाहूंगा कि लड़ाई से पहले मेरे हाप बंधे हुए हो।" उसने मुश्किल से इतना कुछ कहा । "कही ऐमा तो नहीं कि आप अपने आपसे कवकर सघर्ष में उतरे "तुम शब्दो का चुनाव करते वक्त गच्चा खा जाती हो । सीधा क्यों नहीं कहती कि प्यार से हार कर संघर्ष में उतरा हूं और वह भी तुम्हारे प्यार में ?" अविनाश ने कहा। हरदीप सिर्फ ओठ काट कर रह गई। "लो मुनो, माज में मव कुछ कह दूंगा । मैं ऊवकर संघर्ष में नहीं उतरा। "मैंने तुममे प्यार किया है । वेहद प्यार किया है । सच्चे दिल में। इससे ज्यादा मैं कभी जिन्दगी में किसी चीज को नहीं चाह सका । .. लेकिन तुमने पूरी निर्दयता से मेरे अहसासो को रौंदा है । "यह मेरे लिए बहुत बड़ी यातना रही है। मैं तड़पता रहा हूँ एक बूंद प्यार के . 142 / जलता हुआ गुलाव लिए। लेकिन यह मेरी अन्तिम पराजय नहीं थी. ''मुझे अब भी लगती है कि अगर मेरी जिन्दगी में कोई लड़की आई भी तो मैं उसे वह प्यार की तीव्रता नहीं दे सकता, जो तुम्हारे लिए मेरे भीतर मौजूद थी।... खैर, मैंने इसे स्वीकार कर लिया है, लेकिन संघर्ष में कूदना मेरे लिए अनिवार्य इसलिए था क्योंकि यह मेरे भीतर की पुकार थी. मैं जिन्दगी से प्यार करता हूं इसलिए इंसाफ को प्यार करता हूँ | जिन्दगी और जिन्दगी के इंसाफ की हिफाजत आज वाक्पटुता से नहीं हो सकती। इसलिए मुझे एक लम्बी लड़ाई के लिए तैयार होना पड़ा..। अव मैदान में उतरकर भागना मेरा असूल नहीं है।" "लेकिन उन दिनों आप खुद यही कुछ चाहते रहे हैं।" "सचमुच चाहता रहा हूँ। उन दिनों तुमने उस कोमल पत्तों वाली टहनी को झटका न दिया होता तो शायद यही प्रस्ताव मुझे दुनिया का सबसे बड़ा सपना पूरा होने जैसा लगता. 'तव मेरे सामने मेरी लड़ाई की शक्ल शायद इतनी साफ नहीं थी। ''मुझे अपने साथियों के साथ एक लम्बी लड़ाई लड़नी है, जिसमें कुछ भी हो सकता है.."जेल, यातना शिविर' या गोली, कुछ भी।" "आप शायद अव मुझसे प्यार नहीं करते।" "ऐसा मत कहो । बहुत प्यार करता हूँ और प्यार के काविल माहौल बनाने के जेहाद में लग गया हूँ ।' 'तुम समझने की कोशिश नहीं कर रही। जरा आँखें खोलकर देखो, दीप। किसी साजिश ने हमारे जीवन के चप्पे-चप्पे को ऐसी दूषित हवा से भर दिया है कि दम घुटता वेइन्साफी.''दमन के शिकार हजारों-लाखों लोग अंधेरे में भटक रहे हैं। "एक दारुण जिन्दगी जी रहे हैं. 'सुनने-देखने में अजीब लगता होगा लेकिन यह विल्कुल सच है.."प्यार की दुनिया कायम करने के लिए नफरत की भयंकर आग से गुजरना होगा ।''धरती को निर्दोपों से परि- देखने का सपना हमारे प्यार का सबसे बड़ा अंजाम है।" "आपकी सारी बातें ठीक हैं, लेकिन मुझे वरावर लग रहा है कि मैंने आपको निराश किया है।" "नहीं दीप। जिस काम में हम लोग लगे हैं वहाँ निराशा का नाम ...
जलता हुआ गलाय / 143 तक नहीं, तुम अपने आपको अपराधी मत समझो। मेरे लिए यह बात हमेशा सम्मान की रहेगी कि तुमने येशक देर से सही, मुझे अपने साथ पूरी जिन्दगी गुजारने लायक समझा "नही तो शायद सम्बन्धो का यह पहलू मेरे लिए हमेशा एक अनसुलझी पहेली बना रहता और वक्त-वेवक्त इसके ताने-पेटे में की तन्द्रा मे उलझा रहता। "मुझे बार-बार यह सवाल कोचता रहता कि आखिर खोट कहाँ थी ? मेरी मासूम और निर्दोष ख्वाहिशो को दीप ने क्यों गम्भीरता से नहीं लिया ? "मैं तुम्हारा शुषगुजार रहूंगा दोप! मैं तुम्हारा दोस्त हूं-रहूँगा।" अविनाश ने उसका हाय अपने हाथ में लेकर कहा । कुछ मिनटो बाद आहत-सी हरदीप चलने के लिए अपनी सडिल खोजने लगी। "जा रही हो?" "हां, बाज सुबह एक चिड़िया पंखे से कटकर मर गई। जिस चादर पर वह गिरी थी वह मुझे अभी जाकर धोनी है।"
ग्यारह अविनाश ने करवटें लेना छोड़ दिया। बहुत बेचैनी हो रही थी। पूरा पंजाव जिस गहरी वेदना के दौर से गुजर रहा है उसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता, उसने सोचा कल ही उसका एक मित्र कह रहा था, "तुम्हें नहीं लगता खुड्डा बस कांड के खून के छींटे हम सब लोगों की कमीज पर पड़े हैं।" "हाँ, जवकि हम अभी तक आपरेशन नीला तारा और नवम्बर के दिल्ली कत्लों के छीटों के दाग धुलवा नहीं सके हैं ।" उसका वह मित्र अवाक्-सा रह गया था। अविनाश की आँखों में अखवार के विवरण के जरिये वस का वह दृश्य झांक उठा । वस का फर्श पूरी तरह खून से भीगा हुआ था। खून से किसी भी चीज को अलग नहीं किया जा सकता था। खून से भीगी चप्पलें, बैग सव कुछ आदम-खून से तर था..'चौवीस लाशें लेकर बस प्रशासन के कानूनी नुक्ते सुलझाने के लिए देर तक से इधर से उधर और उधर से इधर भागती रही। अविनाश ने विस्तर छोड़ दिया। खद्दर के कुर्ते पर लोई मोड़ ली और चप्पल पहनकर बाहर निकल गया। जाने से पहले उसने मंगल भाई और सन्तोप भाभी की तस्वीर की ओर एक नज़र देखा और तेज पीड़ा से भर उठा । सड़क पर घुड़सवार पुलिस का एक दस्ता गश्त कर रहा था। अविनाश ने एक रेहड़ी वाले से मूंगफली खरीदी और कटर-कटर करता हुआ सेंट्रल टाउन की तरफ चल दिया। 'घोड़ों पर पुलिस की गश्त शहर में दहशत फैलाने के लिए होती है, उसने सोचा, 'दहशत पहले ही कहाँ कम है।' तारनसिंह के कमरे में सामने दीवार पर लेनिन का बड़ा चित्र लगा
No text on this page.
146/ जलता हुआ गुलाब उसने पिछले दिनों अखबार में पढ़ा था कि उग्रवादियों ने बलदेव सिंह की हत्या कर दी है। मान किसानों के संघर्ष में कन्धे से कन्धा मिलाकर जुटे हुए थे। संघर्ष के काम में डूबे रहने के कारण उन्हें घर- परिवार से दूर रहना पड़ा। यहाँ तक कि प्रसवावस्था में पड़ी जीवन- संगिनी की खोज-खवर का काम भी उन्हें स्थगित करना पड़ा। अविनाश के हाथ में वह दस्तावेज-मान का अपनी प्यारी नवजात बच्ची को लिखा गया खरी भावना की खुशबू से भरा खत था। साफ पता चलता था कि एक सच्चे कम्युनिस्ट में इन्सानियत का तकाजा कितना प्रवल होता है । खत इस प्रकार था: "तुझे स्वागत कहता हूँ, मेरी प्यारी बच्ची ! आज ही तेरे जन्म का समाचार तेरी दादी से 18 तारीख सितम्बर 1986 को प्राप्त हुआ। तेरी दादी ने समाचार उतनी प्रसन्नता से नहीं बताया जितनी प्रसन्नता से यह समाचार उसने तेरे स्थान पर लड़के के जन्म की स्थिति में मुझे देना था । क्योंकि तू एक लड़की है, इसलिए घर का माहौल तेरे जन्म से इतना खुशगवार नहीं हुआ। शोकसंतप्त ढंग से तेरी ताइयों ने यह कहा ॥ गुड्डी आ गई ?' जैसे कि शायद इस प्रकार कुदरत ने मेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया हो। इस तरह के माहौल में तेरे आगमन के बारे में मुझसे पूछा जा रहा है। तेरे तायों ने इस पर कोई भी आज मेरे साथ टिप्पणी नहीं की। शायद वे इस बारे में कुछ भी न कहना बेहतर समझते हैं। कुछ कामरेड दोस्त जो मेरी विचारधारा से अवगत हैं, या इस प्रकार कह लो कि मेरी विचारधारा के साथी हैं तेरे जन्म की खुशी की बधाई देंगे और मामा से तेरे जन्म की खुशी में पार्टी लेने के लिए कहेंगे । तेरी दादी ने तेरे नानकों (ननिहाल) की ओर से भेजे गए बधाई के पैसों पर भी आश्चर्य व्यक्त किया है तथा हैरानी-भरे लहजे में पूछा है कि, 'लड़कियों की काहे की बधाई होती है ?' उसे यह गम है कि उसका पुत्र 'बढ़ा' नहीं, बल्कि वह तो 'घट' गया है। वह तभी 'बढ़ता' यदि उसके घर पुत्र ने जन्म लिया होता।" तभी तारन के दफ्तर में एक लड़का चाय के तीन गिलास दे गया। तारनसिंह ने एक गिलास अविनाश को पकड़ा दिया।
जलता या गुमाय/147 "कुछ खाओगे क्या?" "नही, बस चाय की ही जरूरत थी।" महफर यह पाय के हो? छोटे चूंटो के साथ शहीद बलदेवसिंह मान का पत्र पदन नगा : "मेरी बच्ची, मुझे इम सर पर कोई हैरानी नहीं और अत्यन्त गहराई के साथ इस बारे में ज्ञान है कि वर्तमान मामात्रिक प्रणाली में गड़वी एक बोझ समझी जाती है, ऋण का मार ममानी जाती है । मैंने रग विषय पर बहुत कुछ पढ़ा है और आज में व्यावहारिय रूप में अपने दमी धनमय तया अनुभूतियों के माय चल रहा है। इससे बड़ा गम मायद दंगदादी को इस कारण भी हो सकता है, क्योंकि मैं टमकी नगरों में एक. कमाऊ तया बेकार हूँ और शायद निकम्मा भी। इसलिए हमे मिगी कमाऊ और रोजगार में लगे पिता की बेटी बनना चाहिए था। "चलो, इस ममाज का व्यवहार मदियों में ऐमा ही चलना या रहा है। औरत की गुलामी का सिलमिला जागीरदारी तथा यादी व्यवस्था की भी पैदावार है। "मेरी वच्ची, तेरा पिता न ही निकम्मा बोर न ही देरमाक है। वह इस समाज गे बदलने की सहाई नह रहा है, टिम ममा दंग जन्म एक मुशीभरी मबर नहीं, दरिब एक दुखमरी घटना माना जाता है। इसमें का नहीं कि अधिक प्रगतिशील विचारों दान भी मार रे लिए पय-प्रदर्शक नया नायक के रूप में पंग बात रई, नरिन व्यावहारिक जीवन में उन्होंन अपनी बेटियों के माप दही बहार पिसारी पर प्रतिक्रियावादी नोग किया करते हैं। नदिन में अनादर लोहा ही इन दरह जीने का प्रन दिया कि तिमी कपनी बोर की "प्यारी बच्ची, मरेरीवन काग्य और दागी गरी सहाई शायद तुझे बहुत ही देर में दही हो र म ?! तेरीमा को मात दक नही मममा मा हिमानी उनी नबरों में भी नष्ट किया जा रहा है, हिनं हाट का * पति के लिए नमाया जा रहा है। मनर का परि नाई रह रहा है जिसमें मानव के गाने पर 148/जलता हुआ गुलाव चकनाचूर हो जाएं, दवे-कुचले लोगों को इस धरती पर स्वर्ग प्राप्त हो सके। भूख से मर रहे बच्चे, शरीर बेचकर पेट भरती औरतें, खून वेचकर रोटी खाते मजदूर, ऋण की गठरियों तले पिसते किसान, इन सवकी मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है जिसमें तेरा पिता अपना विनम्र योगदान कर रहा है।" चाय का गिलास खत्म हो चुका था। पत्र पढ़ने में तल्लीन रहने पर उसे अन्तिम चूंट का पता ही नहीं चला और तलछट गले से उतरने पर उसने गिलास की तरफ देखा । खाली गिलास मेज पर सरकाकर उसने पत्र पर ध्यान केन्द्रित कर लिया। आगे लिखा था : "जिस समय तूने जन्म लिया है, पंजाव की धरती साम्प्रदायिक आधार पर बॅटी पड़ी है। कहीं इसलिए लोग मारे जा रहे हैं, क्योंकि उनके सिरों पर केश नहीं हैं । उधर इस कारण जिन्दा जलाए जा रहे हैं, क्योंकि उनके सिरों पर केश हैं। धर्म के नाम पर मानवता की हत्या की जा रही है। लोगों को विभाजित करके, खून की होली खेलने में लगाकर, शैतान दूर बैठे हँस रहे हैं। मेरी बच्ची, जहाँ तूने जन्म लिया है, तेरा पिता इन काली ताकतों के खिलाफ संघर्ष में व्यस्त है । काली ताकतें इस धरती से प्रकाश को ओझल कर देना चाहती हैं । रोशनी वांटने वाले सूर्यो का अन्त करना इनकी साजिश है । मेरी वच्ची, इन साजिशों के विरुद्ध संघर्ष करना; शहादतें देना अत्यन्त आवश्यक है। मैं दावे के साथ नहीं कह सकता कि मैं भी किरने वाँटता हुआ इनके हाथों शहीद नहीं हो सकता। कुछ भी हो मेरी वच्ची, तुझे हमेशा अपने जीवन में इस बात पर गर्व होगा कि तू एक ऐसे पिता की बेटी है, जिसने इन बांधियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी थी। शायद तेरी जिन्दगी में मैं तुझे वे सुविधाएं न दे सकूँ और न ही वे जिम्मेदारियां पूरी कर सकूँ सकूँ जो एक पिता को बच्चों के लिए करनी चाहिए, लेकिन मेरे सिद्धान्तों की विरासत तेरे लिए सबसे अनमोल होगी। तू एक ऐसे दीपक से उत्पन्न ज्योति है जिसे प्रकाश वांटना है। देखना, कहीं ऐसे शैतानों से गुमराह न हो जाना, जो मानवता के लिए झोंपड़ियाँ जला देने की साजिशें रचते हैं। यह युद्ध, मेरे लोगों का यह युद्ध अवश्य जीता जाना है। शायद तुझे वे काले पहर - जलता हुआ गुलाब | 149 न ही नसीव हों, जिनमे से अभी मेरे लोग गुजर रहे हैं । वलिदानों के सिर वीज कर हम यहाँ एक ऐसे चमन की रचना कर डालें जिसमें तू आजादी की हवा खा सके। यदि हम इस लड़ाई को जीत न भी सकें तो मेरी बच्ची, तू उस सच के लिए लड रहे काफिले की नायक बनने की कोशिश अवश्य करना। मैं कभी नही चाहूंगा कि तुम सिय वनो, हिन्दू या मुसलमान । तुम सबसे ऊपर उठकर इन्सान बनने को अवश्य कोशिश करना । देखना, कही इन बंटवारों में तुम्हारी इन्सानियत न बँट जाए। "मेरी प्यारी बच्ची, ये कुछ शब्द लेकर तेरे जन्म पर मैं तुझसे सम्बोधित हुआ हूँ। आशा है स्वीकार करोशी। यह कुछ शब्द तेरी जिन्दगी की बुनियाद हैं, इन पर अपनी जिन्दगी के महल का निर्माण कर लेना। जन संघर्ष का सिपाही तेरा पिता बलदेवसिंह मान 18.9-86" अविनाश पत्र पढकर कायल हो गया। प्रतिक्रियावादी रीति-रिवाजो से शुरू होकर राजनीतिक हालातों का खुलासा करते हुए काली शक्तियों के खिलाफ सडी जाने वाली अपनी लडाई का साफ खाका उस पत्र से उभर- कर आता था। अविनाश ने पत्र के कुछ अंशो को दुबारा पढ़ा और एक प्रेरणा-सी महसूस की। पत्र का एक-एक अक्षर उसे भीतर तक झिंझोड़ गया। अव तक तारनसिंह कारीगर का आवश्यक काम यत्म कर चुका या। "वाकई बढिया चीज़ है।" "जमाने ने मारे जवां कैसे-कैसे।" कारीगर ने कहा । "इसे सर्कुलेट करना चाहिए।" "हां, कर रहे हैं।" बलविन्दर और इन्द्रजीत भी आ गए। दोनों ने अविनाश से हाथ 150/ जलता हुभा गुलाव मिलाया और हाल-चाल पूछा। "दुनिया-जहान की खाक छानकर तुम्हारे पास आए हैं । इतना भी नहीं होता कि हमें चाय के लिए पूछ लो।" इन्द्रजीत ने तारनसिंह से कहा। तारन उठने लगा तो बलविन्दर ने रोक दिया और कहा कि वह पहले ही चाय वाले को कह आया है। "इन्द्रजीत भटिण्डा से आया है। भटिण्डा की धागा मिल के किस्से सुनो तो तुम्हारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे।" वलविन्दर ने कोट उतारकर कील पर टांग दिया, और लोई लपेटते हुए कहा । "पिछली बार जब मिले थे तव तो अमृतसर में थे।" अविनाश ने पूछा। - "अमृतसर से भटिण्डा जाने का किस्सा भी दिलचस्प है। अमृतसर के रेलवे गोदाम में मुझे किसी काम से जाना पड़ा। जिससे काम था वह वहाँ नहीं था और मुझे थोड़ी देर इन्तजार करनी थी। मैं टहलने लगा। पास ही ट्रक से एक वैगन में गेहूँ की ढुलाई हो रही थी। मैंने गौर से देखा ढोने वाले मजदूरों में एक लड़का बहुत ही मुस्तैदी से काम कर रहा था। मैंने गौर से देखा तो मुझे उसका चेहरा जाना-पहचाना-सा लगा। मैंने उसके दाढ़ी तराशने के ढंग और चेहरे-मोहरे पर थोड़ा जोर दिया तो मुझे उसकी शक्ल लेनिन से मिलती-जुलती नजर आई । जव वह काम से थोड़ा फारिग हुआ तब मैंने उससे कहा, 'तुम्हें पता है तुम्हारी शक्ल लेनिन से मिलती है । इसके बाद मैं उसे बताने वाला था कि लेनिन था कौन । लेकिन जवाव ने मुझे चौंका दिया 'जी हाँ।'" "अरे!" "मैं पॉलिटिकल साइंस में एम० ए० हूँ।" "उसने मेरे अचम्भे को कई-गुना करते हुए जवाव दिया। उसने कहा कि उसे कोई नोकरी मिली नहीं, इसलिए यह काम कर रहा है और यह काम कहीं भी आसानी से मिल जाता है। "मैंने उससे कहा कि मैं मजदूरों के लिए मजदूरों के बीच काम कर रहा हूँ। उसने कहा कि मजदूरों के लिए असल काम सिर्फ मजदूर और जलता हुआ गुलाव / 151 । किसान ही कर सकते हैं, दूसरा कोई नही। फिर भी अगर में कुछ करना ही चाहता हूं तो मुझे अमृतसर की बजाय भटिण्डा चले जाना चाहिए, जहाँ धागा मित के मजदूरो पर खालिस्तानी ट्रेड यूनियन का दबाव लगातार बढ़ रहा है । जहाँ वास्तविक लक्ष्य मजदूर की मांग नहीं प्रवासी मजदूरों को भगाना बना हुआ है । "मैंने अपने साथियो से मश्वरा विया तो उन्होंने मुझे बताया कि ऐसी रिपोर्ट पहले से ही उनके पास थी और एक-दो साथी वहाँ के हालात का जायजा लेने की कोशिश कर रहे हैं। मैं भी अगर वहां काम करना चाहता हूँ तो जा सकता हूँ। "जनवरी छियासी मे ही यहां वलात केसरी झण्डा झुला दिया गया था और वहां काम कर रही यूनियन के वर्करो पर लाठीचार्ज करवाकर मजदूर दल की स्थापना का ऐलान कर दिया गया था। नौ महीने के निरन्तर दवाव के बावजूद दो हजार वर्करो मे से मुश्किल से सौ वर्कर दल के साथ जा सके। मेहनत की कम मजदूरी दर और कठिन हालातों के कारण मजदूरों की बड़ी गिनती यू०पी०, विहार से आए हुए मजदूरो की है जबकि प्रवन्धकीय ढांचे में बड़ी गिनती पजाबियो की है। उनके द्वारा प्रेरित दल फिरकापरस्ती और 'भेया भयाओ' की आड में काम कर रहा है। "दल के लीडरों ने मिल गेट पर आकर्षक मांगें रखकर हडताल का ऐलान कर दिया। उन्होने बीस प्रतिशत बोनस, तनख्वाहो मे पच्चीस प्रतिशत बढ़ोत्तरी, मकान किराया भत्ता आदि मांगें रखी। दूसरी यूनियन की सिर्फ आठ तैतीस की योनस की मांग थी और अगले वर्ष तक मैनेज- मेट के साथ कोई भी आर्थिक मांग नहीं उठाने का लिखित समझौता किया हुआ था।" "यह तो गलत है..." अविनाश ने यहा । "हाँ है तो, लेकिन उनका समझोता था। इस सबके बावजूद मजदूरो ने दल को कोई समर्थन नहीं दिया । अक्तूबर मे जब धागा मिल मजदूर यूनियन की ओर से गेट रैली की जा रही थी तो दल के लोग दहशत और दबाव बनाने के लिए जीपो, मोटर-साइकिलो पर सवार होकर हथियारो से लैस वहां पहुंच गए, लेकिन उस दिन मजदूरो की वडी सख्या अपने 152 / जलता हुआ गुलाव लीडरों को बचा गई।" चाय आ गई थी। सब लोगों ने अपने-अपने गिलास ले लिये । यों इस वक्त तक ये सभी बातों में इतना डूब चुके थे कि चाय की बात भूल ही गई थी। इन्द्रजीत ने पुनः कहना शुरू किया; "कुछ दिनों वाद अचानक दल की ओर से ऐलान कर दिया गया। मजदूरों को इस सम्बन्ध में किसी तरह की अग्रिम सूचना तक नहीं दी गई। हड़ताल की सफलता के लिए मिल की ओर जाने वाले रास्तों पर मोटरसाइकिलों पर हथियार- बन्द स्ववैड तैनात किए गए। अमरपुरा वस्ती से आते हुए अढाई-तीन सौ मजदूरों पर वे लोग टूट पड़े। तीन मजदूरों को गम्भीर चोटें आई और बाकी कुछ लोगों को साधारण चोटें । हमले, मारपीट और धमकियों के इस रवैये से तंग आकर उन मजदूरों ने हड़ताल का विरोध करने का फैसला किया। अगले दिन जब शहर की ओर से मजदूर मिल की तरफ जा रहे थे तो उन पर पुनः हथियारों से हमला किया गया। इस बार उघर से भी इसका जवाब दिया गया । "नवम्बर में बस किराये की बढ़ोतरी के खिलाफ जिला कचहरी में सर्वपार्टी धरना रखा गया था। धरने से लौटकर आते हुए दल के लोगों ने घात लगाकर पकड़ लिया । नौ मजदूर राजेन्द्रा कालिज में, दो मजदूर बस स्टैंड के पीछे, एक घर में और दो आई० टी० आई० की ग्राउण्ड में खींच लिए गए और नंगे करके बुरी तरह पीटे गए।" "यह तो बहुत शर्मनाक है।" तारनसिंह के मुंह से निकला। "हां, इस घटना से इतनी दहशत हुई कि कुछ मजदूर उसी रात गाड़ी पकड़कर यू० पी०, विहार चले गए । वे लोग सिर्फ प्रवासी मजदूरों को ही तकलीफ पहुँचा रहे हैं, ऐसी बात नहीं है । वे लोग गरीव पंजाबी मजदूर औरतों को भी तंग करते हैं।" "इसका पूरा विरोध किया जाना चाहिए।" अविनाश ने चाय का गिलास रखते हुए कहा। "हमें चाहिए कि सभी यूनियनों की बैठक बुलाकर उसमें इन्द्रजीत की रिपोर्ट पर सोच-विचार किया जाए।" "यह ठीक रहेगा।" तारनसिंह ने कहा ।
जलता हुआ गुलाब / 153 "मुझे समझ नहीं आ रहा कि आखिर खालिस्तान से मुराद क्या है।" कारीगर ने मार गिलाम कोने में रखते हुए कहा । "कुछ नहीं, यह सिर्फ साम्राज्यवादियो की मंगा है।" तारनमिह ने कहा, "वही लोग इसे पूरी तरह फोक्स कर रहे है।" "मियों का दिल जीतने और घाव भरने के लिए कुछ साहसिक पदम उठाए जाने चाहिए थे, लेकिन सरकार ने इस ओर उचित ध्यान नहीं दिया।" अविनाश ने कहा । "कोई सियासी लीडर इस रोग का निदान करने के लिए आगे क्यों नहीं आता।" कारीगर ने कहा । "हालात बहुत पेचीदा हैं । सियासत के इस सेल में केन्द्र के वचनों का एतबार नहीं रहा। आतंकवादियो और सुरक्षा दलो की वन्दुको के बीच लोकतन्त्र का कुछ बचा नही । हरित क्रान्ति के फलो से अव सडाँध आने लगी है। आतकवाद को अप्रासगिक करने के लिए अकाली पार्टी भी कोई गम्भीर कोशिश लगती नहीं। अच्छा, जरा बताओ तो कि मुनि मुशीलकुमार और दर्शनसिंह रागी की कोशिशो का क्या हुआ... कुछ भी नहीं न ।" तारनसिंह ने दाढ़ी में उंगलियां फिराते हुए कहा । "तुम लोग दो-चार बैठकें करके चुप क्यो हो जाते है ?" कारीगर ने अगला सवाल किया। "वास्तविकता यह है कि गलत बात जल्दी जोर पकड़ जाती है और मही बात को पहुंचने में देर लगती है।" तारनसिंह ने जवाब दिया । "हम लोग अपनी लडाई लगातार नही लड रहे।" इन्द्रजीत ने कहा । "क्यों न हम सभी शहरो मे रैलियां निकालें ।" वलविन्दर ने सुझाव दिया । "यही टोक रहेगा।" तारनसिंह ने कहा । "आप लोग डेट दे दें,हम तैयारियां शुरू कर दें।" अविनाश ने कहा। डेट तय हो जाने पर अविनाश उत्साह के साथ वहां से निकल पड़ा। लौटने भी मंगल भाई और सन्तोप भाभी के चेहरे उसकी स्मृति को घायल कर रहे थे। सबसे ज्यान दुख उसे इस बात का था कि भाभी को रव गोलियां लगी तव वे एक बच्चे को जन्म देने की आस मे थी।" वह बहुत ज्यादा काम में डूबा रहना चाहता था। इतना कि कुछ भी याद न रहे । काम में ही उसे राहत मिलती थी।
बारह हरदीप के आँसुओं का समन्दर अव सूख चुका है। आँखों में अब कोई चीज लाट की तरह जल रही है। यह वह चीज है जो हजारों मुश्किलों के बाद भी जिन्दगी और जिन्दगी को अर्थ देने की ख्वाहिशों का दम भरती है । कुछ दिन पहले वह एक बार कटी हुई लता की तरह नीचे जा गिरी थी। एक थकी-हारी जवान लड़की । चुके हुए हौसले और परास्त वोझिल मन । जिन्दगी का सब कुछ हाथों से बाहर की तरफ फिसलता हुआ। जब उसने खबर सुनी थी, उसे नहीं लगता था कि वह जी पाएगी। यह तो इन्तहा थी। खबर थी कि अविनाश को गोली मार दी गई। खबर नहीं थी जलजला था। हरदीप की जिन्दगी का सबसे भयंकर तूफान वह कटी लतर की तरह जा गिरी । अविनाश लोगों ने आतंकवाद के खिलाफ पर्चा निकाला था। पहले अंक के विचारो- तेजक लेखों का अच्छा स्वागत हुआ था। लेकिन धार्मिक उन्माद के नाम पर शोले उठा देने वाले हलके में तीव्र प्रतिक्रिया भी हुई। दूसरा अंक निकालने के लिए पास के किसी गांव में मीटिंग थी। अविनाश और सुरजन शाम को पहुंच गए । डा० मीता को अगले दिन आना था। अविनाश और मुरजन सुवह नहाने के लिए ट्यूबवैल की ओर जा रहे थे। थोड़े ही फासले से गोलियां चलनी शुरू हो गई। सुरजन ने पहले देखा । उसने अविनाश को बचाने की कोशिश की। उसे गोलियों से छलनी कर दिया गया। जैसे मशीन की सुई से कपड़ा सिलता है। अविनाश को तीन गोलियां लगीं। पास के खेत से पानी काटते भैये ने तूफान । इसी में वह
जलता हुआ गुला/155
शोर मचाया। वारदात करने वाले निकलकर भागने में सपत रहे।
अविनाश को ट्रैक्टर से अस्पताल ले जाया गा ।वही असताल जाने
के काविल था। मुहब्बत का घायल सुरजनसिंह वही दम तोड़ पुराया।
अस्पताल में अविनाश का आपरेशन शुरू हुना, तेरिन पोड़ी देर
बाद ही 'डेड' घोषित कर दिया गया।
डा० मीता हरदीप से मिलने उसके घर बानी। तारान्ह का कहना
था कि अविनाश की किताबो नौर डायरी दरह पर पहला ह हरदोष
का बनता है। यदि वह इसे संभालने से इन्कार कर देश भालने में
किसी कारण से असमर्थ हो, तब दूसरा कोई विकल्प नोवा कार की
सामान अविनाश के घर के लोग ले गए थे। किताबें और हाररोवर
तारनसिंह को दे गए थे।
अविनाश की बातें डिइने पर डा. मीना ने पूछा कि क्या होत
जानती थी कि अविनाश एक विहनी पहले ही रिसी कामें
निक्लवा चुके हैं या दे चुके हैं। हरदीश कुरकुर देगड़ी रही।
डा० मीता ने बताया कि उन्हें यह ऑरेगन के दिन हीन बन्न
कि अगर उनको दूमरी किडनी होती तो शायद वे बस । वि
एक ही गोली भीतर तक उतर गई थी, बन्द और टांगने
तो निकाली जा चुकी थी। हरदीप की चीख कि।
लगा कि दिल के अभी टुकड़े-टुकड़े हो जाने।
हरदीप पीछे देखती थी तो दहुद परन्ट हो रही थी। इन
ही जस्म थे । सन्या के पापा गए.."माई
चेहरा उमकी आंखों में नहीं उदरा का। दिनार
आटो गई"हरपाल एक कमी न मरे बना दे और
अविनाश की मृत्यु समाज और समय के चेहरे पर दागबन्द्र
चमक रही थी। "पो देखे बिना रहा नही टाइम
की आवाजें हमारा पीछा नहीं छोड़ती।
लेकिन जिन्दगी के नक्श नंदारने के लिए आवेदन ।
'चलो उठो हरदीप । और नहीं दनान दिग। दरबार
भीतर से वार-बार ट रही थी। यह अवारकदिरीईई।
156/ जलता हुआ गुलाव आज हरदीप की आँखों में एक चीज लाट की तरह जल रही थी। "उसे अभी अविनाश की कितावें और डायरी वगैरह लाने के लिए जाना था और तारनसिंह तथा दूसरे साथियों के सामने आहिस्ता-आहिस्ता यह योग्यता भी साबित करनी थी कि उसका नाम उस टीम में रखा जा सके, जो उस पत्रिका का संपादन कर रही है, जिसका पहला अंक अविनाश और सुरजनसिंह ने निकाला था।
No text on this page.