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Shri Istrijatak Bhasatika

Pandit,.syam Sundar · 2012/02

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भूमिका। ज्योतिविनोदरसिकान्विज्ञापयामि। श्रीकृष्णचन्द, आनंदकन्द, नन्दनन्दन, भक्तनहितकार, अमरस हारी इंद्रमदहारी, श्रीगोवर्धनधारी मुरारीके चरणकमलका ध्यान करके पहिले आर्यावर्तनिवासी परम कृपाल विद्वानोंके पादारविन्दोको नमस्कार हाथ जोडकर करताहूं. अब देखना चाहिये कि, परब्रह्म परमेश्वरने इस असार संसारमें कैसी कैसी अद्भुत विद्यायें जगद्धितार्य बनाई हैं कि जिनके जाननेसे इन पंचतत्वोकरके रचित मनुष्यका शरीर ब्रह्मदेवकृत चौरासी लाख योनियों में अग्रणीय गिना जाता है और बहुधा इन विद्याओंके ज्ञाता मनुष्यों में भी देवताओंके समान पूजनीय होजाते हैं और राजा महाराजा उनका अधिक सन्मान किया करते हैं. इस समय अन्य विद्याओंके वर्णन करनेका कुछ प्रयोजन नहीं है. केवल संसारके हित करनेवाले संपूर्ण धर्मोकी मूल ज्योतिष विद्याके, विषयमें निवेदन किया जाताहै. जिस होराशानके जाननेसे त्रिकालदर्शी हरएक प्राणि मात्रका शुभाशुभ फल तीनों जन्मका बतलाया करते हैं और इस विद्याके नियमोंपर चलनेवाले सत्पुरुपोंको कोई भी दुःख नहीं होता है इसमें सिद्धांत, संहिता, होरा, जातक, ताजिक, प्रश्न, महूर्त इत्यादि अनेक भेद वर्णन किये है. तिनमें जातकभागको सब संसारी मनुष्य सबसे अच्छा मानते हैं. क्योंकि जातकदास मनुष्यका भूत, मविष्यत, वर्तमान तीनों समयका यथोचित फल कहाजाता है. उसके दो भेद है. एक मनुष्यजातक दूसरा-वीजातक सो पहिले मनुष्य जातक, विषयका ज्योतिपश्यामसंग्रह' नामका ग्रंथ पुरुषोंकी जन्मपन के फलके हितार्य संवत् १९५३ में नवीन बनाकर श्रीलंठगंगाविष्णु श्रीकृ. प्णदासजीके कल्याण मुम्नई "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" यन्त्रालयमें छपाकर प्रकाशित करतुकाहूँ. अब स्त्रियोंके फलहितार्थ श्रीमन्महाराजा. धिराज वीरशिरोमणि धर्मधुरन्धर कालूरदेशाधिपति विरासपुरापीश .

भूमिका । श्री १०८ महाराज विजयचन्द्र देवकी सहायतामे ये "स्त्रीजातक" मामक ग्रंथ वशिष्ठ, पृद्धयवन, शौनक, गर्ग, पितामह, नरपति, श्रीपति, स्कन्द, वराहमिहिर, गुणाकर, बलभद्रसूर, इंदिराज, भृगु, माग्दाज, देवकीति, नारद, गणेशदेवज्ञ, रामदैवज्ञ, वर्तमान श्यामदै. पाह इत्यादि पूर्वाचार्योंके प्रणीत ग्रंथोंसे संग्रह करके "श्यामसुंदरी" नाम मापाटीकासहित द्वितीय ग्रन्थ रचनाकर प्रकाशित करताहूं क्योंकि इस संसारमें मनुष्य के शरीरके सुखका कारण स्त्रीही है. और पूर्वावार्याने भी स्त्रीको त्रिवर्गसाधिनी कहा है. जिन पुरुषों के घरमें सुशीला स्त्रियां होती है वे मनुष्य चितारहित संसारी सर्व सौख्यो. सहित यावर्जव जगत्मे यश पाते हैं और जिन पुरुषों के दरमें दुशीला कार्कमा त्रियाँ होती है वे मनुष्य अहर्निश बनेक प्रकारके दुःख जन्ममर मोगा करते हैं और संदेवकाल लोकमें अएकीर्तिके मागी रहते हैं. क्योंकि ऐसा पूर्वाचायोंने कहा है. श्लोक-"सुलक्षणैः सुचरितरपि मंदायुपं पतिम् । दीर्घायुपं मकुवैति ममदा ममदास्प- दम् ॥ १॥ अतः सुलक्षणा योपाः परिणेया विचक्षणः । लक्ष. णानि परीक्ष्यादी द्वित्या दुर्लक्षणान्यपि ॥२॥" पर्यात् जो नारी मन्छे लक्षणोंकरके सुचरित्रोंकरके थोडी उमरके पतिषो भी दोघीयु करती है और दुष्टलक्षण) कुचरित्रोंकरके दीर्घायु मनुष्योंको भी अल्पायु करती है ॥१॥ इस कारणसे सुलक्षगाती स्त्रीको चतुर- मनुष्य विवाहे. लक्षणोंको पहिले परीक्षा करके दुर्लक्षणा कन्याको त्याग करना चाहिये. ॥ २ ॥ इस कारणसे जहाँतक होसके विवाह के पहिले अपने वर्णकी फुलझान् मनुष्यों के घरकी कन्या के जन्मपत्रद्वारा उसका स्वरूप, शील, गुण, सौभाग्य, संतान, सतीत्यादि विषयोंका विचार किसी बुद्धिमान् पंडितसे इस बालवर्णीजातकके द्वारा करार सम्बन्ध फर जो मनुष्य विवादके पहिल इस ग्रन्यद्वारा विचार कराकर समय करेंगे अपना कोई दोप कन्या के जन्मपग्रसे मालूम होय तो उसपी शांति इस अन्यके लिखे अनुसार विवाह के समय करके परिण:

भूमिका (७) यन करेंगे वे मनुष्य जन्ममरतक स्त्रीयुक्त दुःखको समर्मभी नहीं प्राप्त होंगे. बाजाम इस जगत्म श्रीपसके सर्वसौख्य मोगकर-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पदकोभी पायेंगे अब कम्पाके पिताको चाहिये कि धनका लोभ छोडकर जैसे कुयोग कन्यापक्षमें कई हैं वैसेही पुरुषपशीय जा- वकमन्यांसे परकी कुंडलीके दोर्पोफोभलेनकार विचार कराकर उसके गुण अवगुणोंको देखकर वरफी भायु इत्यादिकोका निर्णय करा. कर अच्छे निरोगी स्वरूपवान् कुलवान् कन्या वपसे डयोही उमरके परफे साथ कापाका विवाह करै. इसके विपरीत करनेसे कन्याके माता, पिता वा ज्येष्ठ भ्राता अथवा जिनको कन्यादानका अधिकार है वे सम्पूर्ण नरकके भागी होते हैं. आजकल पुरोहित तथा पाधा लोगोंने ऐसी व्यवस्था करसक्खी है कि, वरकन्याकी कुण्डली में वर्ण, वश्य, वारा, योनि, ग्रहमैत्री, गणमैत्री, भकट, नाडी इन आठ बातों को अट्टसह देखलिपा और निर्भय कायावरके पितासे कईदिया कि, कुण्डली बहुत अच्छी मिलती है. परन्तु जो बातें कन्यावरको कुंड- लीमें देखना चाहिये उनको कोई भी पाधाजी नहीं ध्यान करते हैं- जैसे आयु, कुष्टादि राजरोग, प्रव्रज्या, ज्ञातिच्युति,म्लेच्छ,अन्य दुर्यो- गोको कन्याका पिता किसी अच्छे विद्वान से वरकी कुंडलीका विचार फराले और परम पिता सन्याको कुंडलीम वैधव्य, निरपत्यता, दुःशील, उन्माद, व्यभिचार, राजरोगादि अनेक दुर्योग दिखावर तव सम्बन्ध करे. नहीं तो कन्पायरको जन्मभर दुःख सहना पडताह और उस पापके भागो वेदी पांडे न होंगे जिन्होंने मिशहके पूर्व कुंटलीका मेलन कग है परन्तु वर कन्याकी कुली शुद्ध इटकी होनी चाहिये. जन्मपत्रके नशुद्ध होनेका कारण यही कन्या चरके परस्पर दुःखका मूल है. जब मनुष्पके संतान उत्पन्न होनेका समय भाये तो मनु- प्यो चाहिये कि वालकके जन्मसे पहिले किसी अच्छे गणितज्ञको बुलाकर टालले, जिससे उत्पत्तिकालकी लत नहीं विगहने पावे और विवादक पहिले किती सद्विद्वान् से कुंडलीरा मेलन तयारिंगर भूमिका। लमका शोधन करावें, जिससे ये मानस वंशका दुःख जन्मभर सहना न पडे सो संसारम ऐसा अन्धकार छारहाहै चाहे कुंडली शुद्र बने या न बने. चाहे कन्या दुःख पावे चाई पर, परन्तु यजमान उन्हों अनभिज्ञ नक्षत्रसूची पाधायोंको बुलाकर सब निश्चय करा लेते हैं शोक ! शोक !! शोक !!! सन्तानके उत्पत्तिसमय पौर पर कन्याके विवाहके विषयमें दीनसे दीन मनुष्य सैकड़ों रुपया रण्डी भाँड अविशवाजी इत्यादि कामोंमें वृथा खर्च कर देते हैं, परन्तु ये किसीसे न होता है कि, दस बीस रुपये किसी बुद्धिमान् ज्योतिषीको देकर जन्मपत्र शुद्ध बनवा या कुंडलीका मेलन विवाहको लग्नको शोधन करावें इसी कारणसे उन पुरुषों को सम्ता- नको जन्मभर अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं. आजकल बहुधा ऐसा देखागया है कि, पंडितजन स्त्रियोंकी जन्मकुण्डलीका फलादेश पुरुषजातकादिग्रन्थोंसे कहा करते हैं ये सर्वथा ठीक नहीं है. विद्वानोंको चाहिये कि, पुरुपकी जन्मकुण्डलीका सव शुभा. शुभ फलादेश पुरुषजातक बृहज्जातकादिग्रंथोंसे कहना चाहिये और स्त्रियोंकी जन्मपत्रका फल ब्रीजातकादि ग्रंथोंसे विचार करना चाहिये. केवल स्त्रीपुरुषकी आयुनिर्णय तथा दशागणित एकही प्रका. रसे करना उचित है और स्त्रियोंके जन्मपत्रमें जो राजयोगादि 'माग्यकारक योग होय वह स्त्रीके पतिको कहना अवश्य है. अब जो पंडितजन स्त्रीजातकको तलाशकर देखते हैं तो स्त्रीजातकके पचीस तीस लोकसे ज्यादे कहीं नहीं मिलते हैं. इसलिये मैंने बालवी- जातक नामक एक नवीन ग्रंथ बहुतसे प्राचीन आचायोंके कहेहुए वाक्योंकी सम्मति लेकर बहुत बडा स्त्रीयोंके फलहितार्थ संग्रह करके बनाया है. जो पंडितजन स्त्रियोंकी जन्मपत्रीका सम्पूर्ण शुभाशुभ फल विचारकर भूत-भविष्यत्-वर्तमान इस ग्रंथके द्वारा कहेंगे वह समयानुसार टीक ठीक मिलेगा और जो भारतवर्षनिवासी विवाह के पहिले पन्याके जन्मपत्रको विचार करवाकर इस ग्रंथके द्वारा सब भूमिका। कन्याके लक्षणों को देखकर विवाह करेंगे वह मनुष्य परमेश्वरकी कृपास आजन्म स्त्रीपक्षके कष्टको स्वप्नमें भी न पायेंगे. प्रायः पुत्रपौ- प्रादिसहित सर्व सौख्यलाभ पायेंगे. मैं आशा करताहूं परम कृपाल पंडितवर मेरी चपलताको देखकर क्षमा करेंगे, किंतु मुझ चरणसेव. फको आशीर्वाद देकर मेरे परिश्रमको सफल करेंगे. और इस ग्रंथ किसी प्रकारकी अशुद्धि होय तो उसको अभियान छोडकर शुद्ध कर लेंगे. इस ग्रंथकी "श्यामसुन्दरी' नाम मापाटीका सरल वाणीमें करी है और इस ग्रंथको अठारह अध्यायसे सुशोभित किया है. अध्याय-प्रथम जिर सन्याके सामान्य लक्षण वर्णन किये हैं। अध्याय-दूसरा इसमें नखसे लेकर-चोटीपर्यंत छयासठ अंगोंके लक्षण और उनका सव शुभाशुभ फल सविस्तर वर्णन किया है. अध्याय-तीसरा जिसमें कन्याके सर्वांगके तिलमशकादि विल्लोंके लक्षण और उनका फल कहा है. अध्याय चतुर्थ जिसमें कन्याकी जन्मकुण्डलीसे त्रिंशांशका विचार वर्णन किया है. अध्याय-पंचम जिसमें अनेकप्रकारके ग्रहोंके योग भीर समभावस्थित नवांशसे सूर्यो- दिग्रहोंका फल तथा कन्याकी मृत्युके कारण वा प्रव्रज्यादि पत्तिसौ- ख्यके अनेक योग बनाये हैं. अध्याय-छा जिसमें स्त्रियों के राजयोग कुण्डलीसहित सचक्र उदाहरणके बनाये हैं. अध्याय-सप्तम जिसमें मतिपदासे लेकर पौर्णमासी पर्यन्त कन्याके जन्मकी तिथियों का फल कादि. अध्याय-अष्टम इसमें कन्याके जन्मकालमें सूर्यादि सार्वो चारोंका फल कहा है. अध्याय-नयम इसमें अश्विनी लेकर खेती- पर्यन्त २७ सचाईस नक्षत्रजातफल का है. अध्याय-दशम इशमें विपकुंभादियोगोंका फल कुमारीके जन्मसमयमें वर्णन किया है. अध्याय-ग्यारहवा इसमें क्वादिक करणजातफल कहा है. मध्याय- धारहवाँ इसमें मेपादिलमजातफल कहा है. मध्याय-तेरहवां इसमें चंदगशिजातफल कहा है. अध्याय-चौदहयाँ इसमें सूर्यादि राहु पर्यंत भागस्थित फल कहा है. अध्याय-पंद्रहवाँ इसमें अमुक्तपूलजा- .

- , (१०) भूमिका। तविचार और उसका विधान वर्णन करा है. अध्याय-सोलहरॉ इसमें पूर्वोक्त मुजातशांति बनाई है. अध्याय सत्रहवाँ इसमें मालेपा, मूल, त्रिविधगण्डोत, गण्डदोप, नक्षत्रजाति, दान, ज्येष्ठाशांति, रेवती, गण्ड, ज्येष्ठापादजातफल, दुष्टयोगजातांति, व्यतीपात, धृति, संक्रांति- जात, कुहू, सिनीवाली, दर्शशांति, कृष्णचतुर्दशीजातशांति, एकनक्षत्र जननशांति, चीतरशांति, प्रसवविकारशांति, सूर्यचंद्रग्रहणजननशांति वर्णन करी १. इनकी शांति करनेसे कन्याके दुष्टफल दूर होते हैं और शुभफलकी प्राप्ति होती है. अध्याय-अठारहवाँ इसमें ग्रन्थकर्ताके वंशका वर्णन है. प्रार्थना-जो कहीं इस ग्रंयमें इस्तदोष अथवा छापेके दोपसे भूल होगई होय उसको पंडितवर सुधारलेंगे और सदैवकाल तकर गे और जिस किमी सत्गुरुपको इस ग्रंथके विषयमें कुछभी प्रश्नकरना होय तो पत्रद्वारा नीचे लिखे पतेपर पन भेजकर कृतार्य करेंगे. ब्राहाणोंका कृपामिलापी-राजज्योतिषी पंडित श्यामलालशर्मा, ठिकाना-" पुगनी कोतवाली"-बाँसवरेली.

...." .... " .... " ... ४ .... .... ॥ श्रीः अथ स्त्रीजातकस्थाविषयानुक्रमणिका । En**com विषयाः पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठाकाः अथ प्रथमोऽध्यायः १. पादपश्चाद्भागलक्षणम् थारंमे मंगलाचरणम् १ पिण्डलीलक्षणम् ग्रंथारंमप्रतिज्ञा जानुलक्षणम्.... स्त्रीणां लक्षणवर्णनम् २ जंघालक्षणम्.... स्त्रीणां पादादिषट्यन्ताग फटिलक्षणम् लक्षणवर्णनम् ३ नितंवलक्षणम् कुशिलक्षणम् मांसपिण्डरक्षणम् इस्तरेखालक्षणम् योनिलक्षणम् भृकुटीप्रभृत्यगलक्षणम् जघनलक्षणम्... रेणां दोपवर्णनम् बस्तिलक्षणम् पथ द्वितीयोऽध्यायः २. नाभिलक्षणम् २० स्कंदपुराणान्तर्गतकाशी- कुक्षिलक्षणम् . खण्डस्यत्रीलक्षणविशेष- पार्थलक्षणानि वर्णनम् उदरलक्षणानि अष्टधा लक्षणभूमिकावर्णनम् ॥ हृदयलक्षणम् लक्षणप्रकार कुचलक्षणम् लक्षणक्रमः कुचाग्रभागर क्षणम् पादतललक्षणम् १० जत्रुलक्षणम् पादतलोखालक्षणम् ११ स्कन्धलक्षणम् २५ पादांगुष्टलक्षणम् कक्ष लक्षणम् पादागुलौरक्षणम् १२) भुजालक्षणम् पादनखलक्षणम् १४ हस्तांगुष्ठलक्षणम् पादपृष्ठरक्षणम् पाणितलस्य लक्षणम् पादग्रंथिलक्षणम् करपृष्टलक्षणम् " .... ८ .... .... 7 .... .... .... .... .... .... २७ .... .... .... .... .... .... .... " .... .... (१२) सीजातकस्थविषयानुक्रमाणिका। विपया पृष्ठांकाः विपयाः पृष्ठाङ्काः हस्तरेखालक्षणम् .... २७ / शीर्पलक्षणम् हस्तांगुलक्षणम् २९ मूर्धलक्षणम् अंगुलीलक्षणम् ३० केशलक्षणम् । संगुलानखलक्षणम् ..... सुलक्षणनीपरिणयनाज्ञा गुलक्षणम् अथ तृतीयोऽध्यायः ३, कृकाटिकालक्षणम् .... तिलमशकादिलक्षणम् ४२ कण्टलक्षणम् भूमध्ये तिलमशलक्षणम्....." चियुकलक्षणम् ३२) वामको रक्तमशकविहम् ॥ हनुलक्षणम् रदये तिलादिविहम् कपोललक्षणम् ३३ दक्षिणस्तने रक्तचित्रम् मुखलक्षणम् वामस्तने तिलादिचिहम अधरोष्टलक्षणम् दक्षिणगुरो तिष्टचिदम् नामाने तिलविरम् ४४ अोठलक्षणम् नाभेरधरतात्तिलचिदम् दन्तउक्षगम् | गुल्मतिलचिदम् जिहालक्षणम् .... पाहहे चिनम् .... तालक्षणम् |माले त्रिशूलचिदम् .... यन्वयर्पणलक्षणम् हमनलक्षणम् . रोम.वर्तचकलवणम् नामिकालभगम् नामी चलक्षणम् ... पृष्ठे चमरक्षणम् चतुर्लक्षणम् पृष्टे गर्नुलाकारचक्रम पक्ष्मलक्षणम् भूक्षगम ३१ टिगुटाम्पले चकम् पृष्टोदरे चक्रम् ४० करक्षणम् .....मामन्त रोचकरक्षणम् .... .. .... . ... घंटेकालक्षणम् ... ..." .... विशालक्षणम् ..- .... २८ भाटलाटे चक्रम् कागलक्षणम् सीमन्दरक्षणम् शिखास्थाने चक्रम् .... पृष्ठे चक्रम् .... 17 .... " .... .... " .... .... स्त्रीजातकस्थविषयानुक्रमणिका । (१३) विषयाः पृष्ठांका: | विषयाः पृष्ठांका .... ४७ | सूर्यभवने त्रिंशांशवशात्फलम् ६० कटिचक्रम् .... .... ४८ शशिभवने त्रिंशांशवशात्फलम् ६१ नाभिचक्रलक्षणम् पंचमोऽध्यायः ५. स्त्रीस्त्रीमैथुनयोगः सुलक्षणवतरीत्याज्यत्वम् कापुरुपयोगः कोषपतियोगः कुलक्षणवतग्राह्यत्वम् प्रशसशीलमयोगः उत्तमस्त्रीप्राप्तियोगः पतित्यागयोगः स्त्रीणां सौन्दर्यहेतुः पतिवश्यम् अक्षताया एव रण्डायोगः विवाहविहीनतायोगः साध्वीमसंगादीवायुष्यम् .... " विधवायोगः अथ चतुर्थोऽध्यायः ४. ६७ पुनर्विवाहयोगः ज्योतिषानुसारेण फलज्ञान- परित्यक्तयोगः प्रकार परपुरुषगामिनीयोगः खीणां वैधव्यसीमाग्यसुख- पत्याज्ञयादृश्वरीयोगः ६८ सौन्दर्यविचारः पुरुपाकृतियोगः ५३ योनिव्याधियोगः ख्याकृतियोगः चारुयोनियोगः मिश्राकृतियोगः ५४ मात्रासहव्यभिचारिणीयोगः ७० शांशवलविवार सप्तमम वगे स्वांशे सूर्यफलम् शांशवशात् फलम् सप्तमभावगेस्वाशे चन्द्रफरम" भीमगृहे लग्नेन्दोः त्रिशांशव सप्तस्थे स्वांशगे भीमफलम् ७१ शाकमात्फलम् सप्तमस्थे स्वांशगे वुधफलम् ॥ बुधभरने त्रिंशांशवशात्कलम् ५६ | सप्तमभावे जीवस्य राशिनवा- गुरुभवने त्रिंशांशवशात्फलम ५७ शफहम् भृगुभवने त्रिंशांशवशात्कलम् ५८ सप्तममावे शुक्रस्य राशिनवां. शानभवने त्रिंशांशवशात्फलम् ५९ शफरम् M .... .... ... " .... ५२ वंध्यायोगः .... 7 ... " ५५ , .... " .... ..

.... १ .... ७३ | वंध्यायोगः .... .... ७६ गर्भस्रावयोगः ...." (१४) स्रीजातकस्थविषयानुक्रमणिका । विषयाः पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठांका: सप्तममावे शनिगशिनवांश विषकन्यादोपापवादः फलम .....७२ जातकालंकारोक्तवैधव्यदोषा- स्त्रीपुरुषसप्तमराशिफलम् । पवादः सप्तमराशिस्थितग्रहफलम विषकन्यादोपपरिहारः पितृयो सौख्यवतीयोगः ब्रह्मवादिनीयोगः काकवंध्यायोगः होरामकरन्दोक्तयोगः वीरजातकोतवंध्यायोगः बहुगुणान्वितयोगः विधायोगः मृतमजायोगः.... अशुमोपि शुभमदो ये ग..... " कन्याजन्मवतीपोगः ८६ ग्रन्यांतरोतविधायोगः मृत्युकालयोगः अन्यो मृतप्रजायोगः निजदोपेण मृत्युयोगः भन्यो गर्भसावयोगः मर्तुःप्राड् मृत्युयोगः डायोगः पतिपत्नीतुल्यकालमृत्युयोगः ७७ | अन्यो रण्डायोगः जातकाभरणोक्ततुल्यमृत्युः मर्तुरग्रे मृत्युयोगः योगः पितृश्वशुरकुलईतृयोगः ....८८ दीघीयुर्योगः मल्पपुत्रायोगः पहुंपुत्रवतीयोगः वहुपुत्रवतीयोगः पतिपूज्यतायोगः वदुःखान्वितयोगः लोलपतियोगः पुंचेष्टितयोगः.... शैलाप्रपातान्मृत्युयोगः ग्रन्यांतरोत्तयोगः .... ८० कूपेन मृत्युयोगः संन्यासिनीयोगः वंधनान्मृत्युयोगः शास्त्रमयोगः ८१ जलेन मृत्युयोगः विषकन्यायोगः शखाग्निकोपेन मृत्युयोगः.... ९१ गुहूर्तगणपत्युक्तयोगः ८२ अय पछोऽध्यायः ६. जातकालंकारोक्तविपकन्या प्रथमराजयोगः ९२ योगः ८३ | द्वितीयराजयोगः ९३ " ... .... .... .... .... " ...७९ .... " .... .... .... ....

.net ... ९६ तृतीयाजातफलम् .... Bur 8 .... .IN ९८ पष्ठीजातफलम् .९९ सप्तमीजावफलम् 1. वीजातका विषयानुक्रमणिका (१५) विश्या पृष्ठाः विषयाः पृष्ठांकाः तृतीयराजयोगः अथ सप्तमोऽध्यायः ७. चतुर्धराजयोगः । ९४ तिथिजातफलाध्यायः पञ्चमो राजयोगः ९५/प्रतिपजातफलम् षष्ठो राजयोगः ....द्वितीयाजातफरम् सप्तमो राजयोग अहमो राजयोग ९७ चतुर्थीमातफलम् कुलद्धयोवतिकारिणी पश्चमीजातफलम् योगः नवमो राजयोगः ११३ दशमो राजयोगः अधमीजातफलम एकादशो राजयोगः द्वादशो राजयोगः ११४ त्रयोदशो राजयोगः एकादशीजातफलम् चतुर्दशो राजयोग हादशीजातफलम पश्चदशो राजयोग त्रयोदशीजातफलम् षोडशो राजयोगः लज्जावतीयोगः चतुर्दशीजातफलम् १०४ पौर्णमासीजातफस धनबद्धादयोगः अमावस्याजातफलम राजतेजोयुक्तभाव्योगः.... १०५ अथाष्टमोऽध्यायः ८. कांवनयुक्तपतियोगः मथ वारजातफलाध्यायः ११७ राजपूज्यपतियोगः दास्पलंकृतयोगः चन्द्रवारजातफलम् स्त्रीणां पतिलक्षणम् ११८ कन्याजन्मनिडिमाख्यचक्रम् १०७ बुधवारजावफलम् चक्रस्थितनक्षत्रफलम १०८ गुरूवारजातफलम् नारीवरम् भृगुवारमातफलम स्याकावन्पम् .१०९/शनिशारजावफल्म १०० नवमीजातफलम १०१ दशर्माजातफलम Pos son" .... . " ...." रविवासरजातफलम् ममिवारजातफलम् .... .... 444 ...

पृष्ठांकाः विषयाः .... .in" ....1 .... .... ...." -- (१६) बीजातकस्थविषयानुक्रमणिका । विषयाः पृष्ठांकाः पय नवमोऽध्यायः ९ पूर्वाभाद्रपदाजात- पथ नक्षत्रजातफलाध्यायः ११९ फलम १३० मश्विनीजातफलम् उचराभाद्रपदा जातफलम १३१ मरणीजातफलम् १२० रेवतीजावफसम् कृत्तिकाजातफलम् अथ दशमोऽध्यायः १०० रोहिणीजातफलम् १२१ योगजातफलाध्य या १३२ मृगशिरजातफलम् विष्कुम्भयोगजातफलम् ...." भाद्रजातफलम् १२२ गजातफलम पुनर्वसुजातफलम आयुमधागजातफलम् पुष्यजातफलम् सभाग्ययोगजातफलम् आश्लपाजावफलम् १२३ शोभनयोगजातफलम् मघाजावफलम् अतिगंडयोगजातफलम् .... १३४ पूर्वाफाल्गुनीजातफलम् .... १२४ सुकर्मयोगजातफलम् उत्तराफाल्गुनीजातफलम् ॥ धृतियोगजातफलम् हस्तजातफलम् .... १२५ शूलयोगजातफलम् चित्राजातफलम् गंडयोगजातफलम खातीजातफलम् १२६ वृदियोगजातफलम् विशाखाजातफलम् ध्रुवयोगजातफलम् अनुराधाजावफलम् १२७ व्याघातयोगनातफलम् ज्येष्ठाजातफलम् हर्पणपोगजातफलम मूल जातफल्म् ववयोगजातफलम् पूर्वापाडाजातफलमू १२८ सिद्धियोगजातफलम् १३८ उत्तरापाढानातफलम् व्यतीपातयोगजातफलम् । श्रवणजातफलम् १२९ वरीयान्योगजातफलम् धनिष्ठाजातफलम् परिघयोग जातफलम शतमिपाजातफलम १३०|शिवयोगजातफलम .... " .... .... .... ...." .... ....

१४९ .... .... .... .... .... .... 7 " .... स्त्रीजातकस्थविषयानुक्रमणिका। (१७) विषया: पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठांका सिद्धियोगजातलफम १४० कन्यालग्रजातफलम् साध्ययोगे जातफलम् तुलाळग्रजातफलमू शुभयोगजातफलम् वृश्चिकलनजातफलम शुक्लयोगजावफलमू १४१ धनुर्लग्नजातफलम् १५० ब्रह्मयोगजातफलम् मकरलमनातफलम् पेंद्रयोगजातफलम् कुंभलग्नजातफलम् वैप्रतियोगजातफलम् .... १४२ मीनलग्मजातफलम् प्रथैकादशोऽध्यायः ११० अथ त्रयोदशोऽध्यायः १३. करणजातफलाध्यायः १४३ अथ चन्द्रराशिफलाध्यायः १५२ बरकरणमावफलम् मेषराशिजातफलम वालवकरपाजातफलम् पराशिजातफलम कोलवकरणजातफलम मिथुन राशिजातफलम् देतिलकरणजातफलम् १४४ कर्कराशिजातफलम् गरकरणजावफलम् सिंहराशिजातफलमू पणिजकरणजातफलम् कन्याराशिजातफलम् विष्टिकरणजातफलम् १४५ तुलाराशिजातफलम १५४ शकुनिकरणजातफलमू..... वृश्चिकाशिजातफलम चतुष्पदकरणजात्तफलम् १४६ मागकरणजात लम् धनूराशिजातफलम किंस्तुभकरणजावफलम मकरराशिजातफला अथ द्वादशोऽध्यायः १२. कुम्भसाशिजातफलम् लमजातफलाध्यायः १४७ मीनराशिजातफलम् १५६ मेषलग्नजातफलमू अथ चतुर्दशोऽध्यायः १४. धृपलग्नजातफलम् सूर्यादीनांद्वादशमाव०ध्याय:१५६ मिथुनलमजातफलम १४८/ वनुभावस्थितवर्गफलम् ... कालप्रजातफलम धनभावस्थितसूर्यफलम ....१५७ सिंहलमजावफटम दवीपमास्थितसूर्यफला " .... 17 .... " .... .... m . " (१८) सीजातकस्थविषयानुक्रमणिका । विषयाः पृष्टांकाः | विषयाः पृष्टाका चतुर्थभापस्थितसूर्यफलम् १५७ | पष्ठमावस्थितभीमफलम् .... १६६ पश्चममावस्थितसूर्यफलम् १५८ सप्तमभावस्थिन भीमफलम् १६७ पष्ठमावस्थितसूर्यफलम अष्टमभावस्थितभीमफळम् ॥ सप्तममावस्थितसूर्यफलम् ॥ नयममावस्थितभीमफलम् ॥ सप्टमभ वरियतसूर्यफलम् १५९ दशमभावस्थितमामफलम् १६८ नवममावस्थितसूर्य कटम् ॥ लाभमावस्थितमीमफलम् व्ययमावस्थितभीमफलम १६९ दशमभावस्थितसूर्यफलम् ॥ तनुमावस्थितयुधफलम् ...." लामभावस्थितसूर्यफल्म....१६० द्वादशभापस्थितसर्यफलम् , धनभावस्थितयुधफलम् तृतीयमावस्थितपु रफरग १७० लास्थित चन्द्रफलम् चतुर्थभावास्थितधुवफलम् ॥ द्वितीयमावस्थितचन्द्रफलम १६१ पंचममावस्थितफरम् " वतीयमापस्थितचन्द्रफलम् ॥ पष्ठमावस्थिनबुधफलम् .... १७१ चतुर्थमावस्थितचन्द्रफरम् ॥ सप्तममारस्थितयुधफलम पंचममायस्थित चन्द्रफलम् १६२ अष्टममारस्थितयुधफलम् । पष्ठमारस्थित चन्द्रफलम नरममावस्थितयुधफलम १७२ सप्तममावस्थितचन्द्रफलम् १६३ दशममारस्थितयुधफलम् परममास्थितचन्द्रफलम् " | लाममाथिायफलम् मरममास्थित चन्द्रफलम् ॥ व्ययमावस्थितबुधफलम् २७३ दशममावरियतचन्द्रफरम २६४ लमस्थितगुरुफलम टाममानस्चितचन्द्रफलम् ॥ द्वितीयमावस्थितगुरुफटम् ध्ययमास्त्रितचन्द्रपटम् ॥ तृतीपमावस्थितगुरुपरम् १७४ लपस्थितीमाडम् ..- १६५ चतुर्थमावस्पितगुरुफल्म " धनमागस्पितभीमफारम पक्षममारम्थिनगुरुमला. तृवीयमापस्थिामामालन् । पटमास्थितगुरुफलम पतुरीमास्थितभौमपनम् १६६ नाममा स्थनगुरपालम् । पञ्चममास्थिनमारम् । मनमापरिपतगुरुसम्म... ३ " " " .... " " बीजातकस्थाविपयानुकमाणका । (१९) विषया: पृष्टांका विषयाः पृष्टाका: नवमभावस्थितगुरुफलम्....१७६ दादरामापस्थितशनिफलम् १८५ दशमभावास्थितगुरुफलम् । लममावस्थितराहुफलम् लाममावस्थितगुरुफलम्..... द्वितीयमावरियतराइफलम् , व्ययमावरिथतगुरुफला १७० वतीयभावस्थितराइफलम् १८६ तनुभावस्थितभृगुफलम् ... चतुर्थभ'वस्थित्तराहुफलम् ॥ द्वितीयम वस्थित गुफलम् " पश्चमभावास्यतराफम्म १८७ तृतीयभावस्थितभृगुफलम् १७८ पठभावस्थितराहुफलम चतुर्थभावस्थितभृगुफलम् ॥ सप्तमभावस्थितराहुफलम् ॥ पञ्चममारस्थितगुफलम अष्टममावस्थितराइफलम् १८८ षष्ठभाव स्थितभृगुफलम् .. १७९ नवमभावहिपतराहुफलम् ॥ सप्तममावस्थितभृगुफलम् ॥ दशमभापस्थितराहुफलम् ॥ अष्टममावास्यतभृगुफलम् ...." लाभभावस्थितराहुफलम् १८९ नवमभावस्थितभृगुफलम् ....१८० व्ययभ वस्थितराहुफरम् ॥ दशमभावस्थितभूगुफलम..... अथ पंचदशोभ्यायः १५. एकादशमावस्थितभृगुफलम्" मूलजन्माध्यायः १९० व्ययमाशस्थतभृगुफालम्....१८१ अभुक्तमूललक्षणम् लमस्थितशनिफलम् अभुक्तमूलकाल: १९१ द्वितीपमास्थित शनिकरम् ॥ अमुक्तमूलसंज्ञा तृतीयमावस्यिागनितारम् १८२ अभुक्तमूले त्पन्नस्यबालम्य चतुर्य मावस्थित शनिफरत " त्यागः पश्चममावस्थितशनिफलम् ॥ त्यागायती शांनिः पठमावस्थित शनिफलम् .... १८३ मूलनावरप चरण शेनफदम् १९२ सप्तमभावास्थितमानिफलम् ॥ याश्यानातस्य चरणपशेन मरममावस्पितशनिफलम् ॥ पलम् नबममावस्थितशनिफलम १८४ कन्याजन्मान मूल नातवरण- दशममानस्पितशनिफलम् ॥ पदम् एकादश मारस्थत शनिफलमा नारदोक्तमुरापाजातफटम१९६ .... 11 " ....

.... " " .... .... ...." । " (२०) स्त्रीजातकस्थाविपयानुक्रमाणका । विपया: पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठांमा मूळाश्लेषाजातस्यदुष्फला अस्य फलमू २०३ पवादः १९३ अय पोडशोऽध्यायः १६. श्वशुरादिहन्त्रीयोगः... मूल जननशांत्यध्यायः २०४ मूलजातफलम शौनकोक्तमूलशांतिकालाः २०५ मूलाश्लेपानातफलम् १९४ कर्तव्यकालव्यवस्था कुण्डनिर्माणमकारः २०६ अस्यापवादः... त्रिविधगण्डान्तम् कुंडस्वरूपम् २०७ तिथिगण्डान्तम् पंचामृतम् २०८ लमगण्डान्तम् अष्टमृत्तिका गण्डान्तकाल: .... १९६ ग्रन्थान्तरोक्तशतीपधी- गण्डांतजाते दोषावधिज्ञानम् वर्णनम् . २०९ गण्डांतजातानां त्यागः शतीपधीमूलवर्णनम् त्यागाशक्तावधिज्ञानम् १९७ शतौषधीनामभावे दशी- गंडांतजातानां परिहार पधीवर्णनम् २१२ गण्डांतदोपापवादः दशापधीनाममाबे चतुरौ तत्र पितामहमतम् १९८ पधीवर्णनम् २१३, मूल शांतिकालयम गर्गाक्तशांतिकाला तत्र वसिष्टमतम् पंचरत्नानि मूलवृक्षविचारः मूलक्षफलम् १९९ मूर्त्यभाव मूल्यम् जन्मनि गूलचक्रन्यासः.. पूजन विधिवर्णनम् मूलजनने कुलशययोगः... २०० मूलस्वरूपवर्णनम् मूलजनने वेलाफलम् २०१ शौनकोत.मूलशांतिविधिः २१८ पुरुषारतीमूलालपाघटीविमागः अधिप्रत्यधिदेवतास्वरूपवर्णन तस्य फळम् २०२ नम् मासवशान्मूलवासज्ञानम् २०३पूजाप्रकारवर्णनम im २२ " .... सप्त वीजानि नवरत्नानि १ मूर्तिप्रमाणम् " स्त्रीजातकस्थविषयानुक्रमणिका। (२१) ... ... .... .... " ... .... .... .... विषपा: पृष्ठांक विषयाः पृषक: दिशातला मत्स्यमांसनिषेध ज्याठाशांतिनिरूपणम् वर्णनम् .... २२३ ज्येष्ठाक्तीगण्ठान्तवर्णनम् २४१ हवानाविधिः २२२ ज्येष्ठापादफलम् बसिशेतावनाविधिः जटाण्डागांतिवर्णनम् । अभिपकायंप्रकथनम् २२६ ज्येष्ठा नक्षत्रध्यानम् २४२ मानविधिवर्णन २२७ अपसंख्याविधिवर्णनम् दानव ननम् . २२८ अर्घ्य मन्त्रः घृतारलोकनार्थमंत्रवर्णनम् २२९ / दुष्टयोगजतने शांतिः विसर्जनविधिः.... शांतिविधिः ..२४५ सप्तदशोऽध्यायः १७. व्यतीपासधांतसंक्रांति- माइकपाशान्त्यध्यायः २३० जातफलम माशेपाशन्तिविधिर्णनम् ॥ तस्य शांतेसिंधिः भालेवनक्षत्रध्यानवर्णनम् २३३ सहसिनीवालीदर्शप्रकार:....२४८ पाश्लेपाशान्तिकर्मविधानम् ॥ सिनीवाल जनन शांतिः कुम्भांजल्यमषेक २३४ सिनीवाल्यां पशुपक्ष्यादिजनने अमिपेकमन्सवर्णनम् रक्षामन्त्रकयनम् कटप्रमतिफलम .... " त्यागः ....

.... .... .... .. .... (२२) ग्रीजातकस्थविपयानुफमाणिवश । विषयाः पृचा विषयः पृष्टांकाः पूजाविधिः २५४ प्रसवतिकारफलम एक्नक्षत्रमननशान्तिः २५५ मन्यप्रसवश्किारफलम तत्र विशेपः २५६ प्राधिकारशान्तिवर्णनम् ॥ मातृषितमे कन्याजन्मनि दोया । सूर्यचन्द्रग्रहणसमयभमन- तत्र गामितम्.... शांतिविधिः शान्तिविधानम् ... अथाष्टादशोऽध्यायः १८. त्रीत रजनने शान्तिविधानम् २५८ ग्रन्थकर्तुशावलीवर्णनम् १६५ प्रसविकारफलम् २५९ ग्रन्यसमाप्तिः २६७ इति वीजातकस्थविषयानुक्रमणिका सम्पूर्णा । ... पुस्तक मिलनेका ठिकाना गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास पदमीवर "स्टीम् प्रेस ) "श्रीवेन्टेश्वर स्टीम प्रेम, कल्याण-मुपई. स्वेतवारी-मुबई.

जाहिरात.
...
...
की. रु. बा.
अयोध्याजातक-नापाटीकासमेत,
गर्गमनोरमा-भाषाकासमेत,
ग्रहगोचर-सपाटीका.
दावृत्तलक्षण-श्रीयुत पं. सुधाकर द्विवेरिनिर्मित
धुचरचार-पण्डित सुधाकर द्विवेदिनिर्मित
पनीमार्गप्रदीपिका-मूल.
पनकोश-मापाटीका-वर्षफलफा नापाध्याय अच्छाई ०-३
प्रश्नासंधु-आपाटीकासमेत
वृहदवकहोडाचक्र-आपाटीका रडा ..
बृहदवकहोडाचक-जापाटीकासमेत, छोटा
भुवनदीपक-सटीक संस्कृत,
मनुष्यजातक.
बिन्दुयोग-भापाटीकासमेत,
मानवपञ्चांग-संवत् १९७९-८०.८१ का
मुह चिन्तामणि रियूपपासीकासमेत, तेज
...
...
..
..
...
"तथा रफ
मुहूर्तफाश-मापाटीकासमेत । पं० चतुर्थीलालटत २-०
मुहू गणपति-मूलमात्र,
मुहूर्तदीपक सटीक संस्थत मुहूर्त देखने में सरल है ... .-४

२
नाम
की. रु. था.
मुझुंदपिजय-चोसमेत । चाम्से प्रभाविज्ञान होता है
रमलपिका-रमलविषयका यह बहुत उत्तम ग्रन्थ है १-०
लघुपाराशरी मापाटीका पडी.
लघुमातक-मापाटीशसमेत.
लघुमंमह-मापाटीकासमेत.
लाचंदिका-मूलमात्र. ...
त्यमातरू-मापाटीकासभेत.
लोमरासंहिता-(भावलाध्याय.) ...
वृश्यापी--ज्योतिप-नापाटीकासहित.
शहनमारी-संस्कृत-अमिपुराणान्तर्गत.
सम्पतीविषा-पाठ संवत्सरोका फल...
समाध्याय--पापाटीका...
शिखांतपोगाकर-भापाटीकाममेत.
...

अथ स्त्रीजातकम्। श्यामसुन्दरीमापाटीकासमतम् । गोवर्दनराधारं प्रणम्य पितरो मुदा । स्त्रीजातकं श्यामलालः कुबै वामावशंवदः ॥ १ ॥ अर्थ-मैं जो श्यामलाल हूं सो खीवालवर्णीके वशीभूत होकर " स्त्रीजावक " नाम ग्रन्थको करताहूं. गोवर्द्धनपर्वतके धारण करनेवाले श्रीगोवर्दननाथजीको प्रणाम करके और गौरीनाम्नी माता और बलदेवप्रसादनामक पिताको हर्षसे प्रणाम करके ॥१॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि कन्यादोपानशेपतः । यान्विज्ञाय सुधीः कापि न मजेदुःखसागरे ॥२॥ तस्मात्परीक्ष्य मतिमान्कन्या लक्षणम्युताम् । विवादेत तथा न स्यात्सर्वथानर्थभाननम् ॥ ३॥ यस्मादायकामानां साधी चेत्साधनं भवेत् । तस्मालक्षणं नारीणां तथा ममतो वे ॥४॥ अर्थ-इसके अनंतर कन्याओंके अशेप दोप कहताहूं. जिन लक्षणोको जानकर बुद्धिमान कोई पुरुष दुःससागर, लान न करे । २॥ तिस कारणसे लक्षणमंयुक्त कन्याकी (२) सीजातकम् । परीक्षा करके जिससे विवाह करणेसे हमेशा दुःसके भागी न होय ॥ ३ ॥ पतिव्रता नियोकरके धर्म अथं झामनादिक लोका साधन पुरुषको होता है तिम कारणसे गियों के लक्षण तथा लमका विचार कहते हैं ॥ ४ ॥ सथ स्त्रीणां लक्षणविशेषमाह व्याप्तः । मारिपिंगला नारी विपकन्येति कीर्तिता। सुवर्णपिंगला नारी नातिदुष्टा परे जगुः ॥ ६॥ कृष्णजिह्वा च लंबोष्टा पिङ्गाक्षी परिस्परा । स्याज्या यस्याय पादौ च कुचायोष्टौ च रोमशो ॥६॥ विश्लोयुलिदेता च कुचगंडवृहत्कचा। कृष्णतालुः परित्याज्या व्यङ्गाङ्गा पितृमावृतः ॥७॥ कनिष्टानामिका यस्या यदि मध्यामिका तथा। भूमि नस्पृशते शास्त्री विशेषा व्यभिचारिणी ॥८॥ अर्थ-पिलीकी तरह पीले वर्णकी ची विषन्या होती है, वह पतिको नाश करती है और तोनेशी तरह पीले वर्णकी सी अत्यंत दुष्ट नहीं होती है किन्तु मध्यम होती है, ऐसई पोई कोई भाचार्य कहते हैं ॥ ५ ॥ जिन औरतकी काल गीत, लये होठ, पीले वर्णके नेत्र, आवाज निगशी घर्राटक और जिस औरतके पैरोम कृचोंमें होठोंमें रोम हों यह श्री अवश्य त्याग करने लायक होती है ॥ ६ ॥ जिस सी.

झापाटीकासमेतम् । भंगुली तथा दांत छिदरे हों और कुचोंके ऊपर तथा गालोंके ऊपर बहुत बाल हों जिसका तालू झाला होगा यापक समान हीन या अधिकांगी हो सो वो जरूर २ त्याग करने ल- यक होती है ।। ७ । जिस स्त्रीके पैरकी कनिटा अंगुली अना- मिका और मध्यमा अंगुली धरतीको न छूती हो सो खी अवश्य व्यभिचारिणी अर्थात् परपुरुपगामिनी होती है ॥८॥ पादेप्रदेशिनी यस्या अंगुष्ठं समतिकमेत् । न सा मतगृहे तिष्ठेत्स्वच्छंदा कामचारिणी ॥ ९ ॥ उदरे धशुरं हति ललाटे हंति देवरम् । सिफनो पति लवमाने धनं कूमोदरीदरत् ॥ १० ॥ पृष्ठावती पति इति नाभ्यावा पतिव्रता। पायावता तु स्वच्छंना स्कंधावार्थभागिनी ॥१॥ सुस्वरा च सुवेपा च सृदंगी चारुभाषिणी। महारतासुमतिः कन्या या च दृङ्मानसप्रिया॥१२॥ अर्थ-निश औरतके पैरों के अंगूठेके पाससी अंगुली अंगु- टोपी होप यह नारी अपने पति घरमें नहीं रहती है अपने म के माक्तिक कामचारिणी होती है ॥ ९ ॥ और जिस नारीका पेट लंश हो वह नीश्वशुरका नाश करता है और जिस ग्रीका माचा लंरा हो वह देवरका नाश करती है और जिस वीक पेड़े लया होय वह नारा पतिका नाग करनाहै और जिल औरतका पेट कछुरके माफिक हो - स्त्रीजातकम् । वह धनको नाश करतीहै ॥१०॥ जिस औरतके पाठ में रोमाव- लीला चक हो वह नारी पतिका नाश करती है और जिस और- तकी दूडीमें रोमावलीका चक हो वह नारी पतिवना होती है और जिस नारीके कमरमें रोमावलीका चक होने वह नारी इच्छानुसार चलनेवाली होतीहै और जिस औरतके कंधेपर रोमावलीका चक्र होवे वह नारी धनमोग करनेवाली होती है ॥ ११॥ जिस औरतकी आवाज अच्छी हो अच्छे है- शवाली कोमल शरीवाली अच्छी वाणी बोलनेवाली अच्छी चाल चलनेनाली जिसे देखनेसे आँखें और मन प्रसन्न हो वह गारी अतिश्रेष्ठ होताहै ॥ १२ ॥ मंडूककुक्षिका नारी न्यग्रोधपरिमण्डला। एवं जनयत्ते पुत्रं स तु राजा भविष्यति ॥१३॥ मध्यांगुली या मणिबंधनात्था रेखा गता पाणितलेंगनानाम् । ऊर्य गता पाणितलेऽयवा या पुंछोथवा राजसुखाय हास्यात् ॥ १४ ॥ कनिष्ठिकामूलगताथवा या प्रदेशिनीमध्यमकांतराला। करोति रेखा परमायुपः स्या- प्रमाणहीनाथ तदूनमायुः ॥ १५॥ अंगुष्ठमूले प्रसवस्य रेसा पुत्रा बृहत्यः प्रमदाश्च तन्व्यः ।

भापाटीकासमेतम् । (५) अच्छिन्नदीपाच चिरायुपा ताः स्वल्पायुपनिलघुप्रमाणाः ॥ १६ ॥ अर्थ-जिस सीकी कोस मेंडकके समान और वटवृक्षके माफिक ऊपरसे बहुत विस्तार हो जिसके ऐसी कोससे उत्पन्न हुआ पुत्र राजा होताहै ॥ १३ ॥ जिस सीके कलाईसे लेकर मध्यमांगुलीतक हथेलीमें रेखा होवे यह नारी महारानी होती है और जो पुरुपके हाथ वही रेखा हो तो वह मनुष्य राजा होताहै ॥ १४॥और जिस नारीके हायमें कनिष्ठिका अंगुलीके से पैदा भई रेखा और वह रेसा मध्यमांगुली और प्रदेशिनी अंगुली के अन्ततक चलीगई होय तो यह नारी ( १२० ) एक्सौवीन वर्षसे कुछ कम उमरवाली होतीहै ॥ १५ ॥ और जिस वीके अँगूठेले मूलसे पैदा भाई रेखा बहुत बडी होणे तो पुत्रदानी होती है और छोटी बारीक होवे तो कन्या होती है और यही रेखा विना टूटी लंबी होय तो दीर्घायुमाले पुत्र होते हैं. दूटी होय तो अल्पायुयाले पुत्र होते हैं और वही रेसा बारीक लम्बी होवे तो कन्या दीर्घायुवाली होती है और इट्टी होय तो अल्पायुपाली कन्या होती है ।॥ १६ ॥ कलमलातयोः सख्यं जीवितास्यकनिष्टयो। मध्ये विचिन्तयेदक्षे वामहरते नरनियोः ॥ १७ ॥ अरेसं बहुरेख वा येषां पाणितलं नृणाम् । ते स्युरल्पायुषो निस्वा दुःखिता नात्र संशयः॥१८॥ केशसंपहयो रेखा कुर्याच्छिन्नायुपः क्षयम् । -- (६) ग्रीजातकम् । मणिबंधोन्मुसा वृद्धय विपदोंगष्टतंमुसा ॥ १९ ॥ मत्स्यः करतले यस्य स स्त्रियो बहुकाहायुद्ध । भाग्यरेखा सुतक्षिणाया शुभा ख्वाकृतिस्तथा॥२०॥ श्लिष्टाभ्यंगुलिमध्यानि व्यसंचयहेतवे । तानि चेच्छिद्रयुक्तानि त्यागशीलकराणि च ॥२१॥ अर्थ-उमरको रेखा और कानेट अंगुलीके बीचमें पुरुष सीके प्रेग परस्पर करनेवाली रेता होती है तो रेखा मनुष्यके दहिने हाथमें और नारीके वाये हाथमें देखना चाहिये ॥१४॥ और जिस चीपुरुपके हाथों रखा कोई न होय अथवा बहुत रेखा होय उन चीपुरुषको अल्पायु कहना चाहिये और धनहीन और दुःखित होते हैं इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥ और जिसके हाथ पत्तोंकी माफिक रेसा कलाईके सामने होय तो वह सीपुरुप छेश के नागी और दुःखित होते हैं और जो -रेखा कटी होय तो अमरका क्षय करती है. कलाईके सामने रेता वृद्धिकी होतीहै और अंगूठेके सामने रेसा आपदानी होती है ॥१९॥ और जिसको हथेलीमें मछलीके सगान रेखा होय वह पाणी अधिक धनवान होताहे और जिसके हायम छतरीके समान तीक्ष्ण पहुँचेके पास होवे उसका नाम भाग्य- रेखा है वह श्रेष्ठ होतीहै ॥ २० ॥ और जिसके हाथको अंगुलियोंका बीचका हिस्सा परस्पर मिला होवे तो धन इकट्ठा करता है और गितकी अंगुलियों के बीच छेद रहे धन खर्च करताहै उसके पास धन ठहरता नहीं है ॥ २१ --

भापाटीकासमतम् ।
मिलन्युग्मिका काणा लंबोष्ठी शुभकाणका ।
पक्रास्वनातिका चातिमांना त्याज्यातिमापिणी२२॥
यस्पाः केशांशुकस्पान्ग्लिायंतिकुसुमलनः ।
स्नानाभसि विपद्यते बहवः क्षुद्रजंतवः ॥२३॥
धीयंते मत्कुणा यस्यास्तथा यूकाच वासति ।
बायान्नमक्षिणी शौवहींना त्याज्या नितंविनी॥२४॥
इतिश्रीवंशावरेलिकास्थगोडवंशावतंतश्रीवलदेव-
भवादात्मजराजज्योतिषिकाण्डितश्यामला-
लसंगृहीते स्त्रीजातको स्त्रीलक्षणवर्णनो
नाय प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
अर्थ-जिस चौकी दोनों जौहें परसर मिली हो अथवा
कानी होते. जिसके ओठ लेने हो और कान सुपके समान हो
जिसका मुख टेटा हो नाक टेडी हो अत्यंत चुपकी रहेका बहुत
बोलनेवाली हो ऐसीनी सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ २२॥
जिस स्त्रीके बाल और कपडोंके सरी करनेसे फूलोंकी माला
कुम्हलाय जाये और जिस मौके सागके जलमें बहुत छोटे
जीव मरजावें ॥२३॥ और जिस सीके बाल और कपशेम जुर
बहुत हो और जो नारी चुराकर अन्न सावे और पवित्रता-
हीन हो वह नारी जरूर त्याम करनी चाहिये ॥ २४ ॥
इति श्रीवंशावलिकस्थगौडदशावतंसभीवलदेवनसावात्मन-
राजज्योतिपिकाण्डिनश्यामलालबतायां श्यामसुन्दरीजा-
पाटीकायां नीलक्षणवर्णनो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥३॥

(८) सीजातकम्। अध स्कंदपुराणांतर्गतकाशीखंडे स्त्रीलक्षणे विशेपमाह। अथ स्त्रीलक्षणकारणमाह- स्कंद उवाच ॥ सदा गृही सुखं सुंक्त स्त्री लक्षणवती यदि । अतः सुखसमृदयधमादी लक्षणमीक्षयेत् ॥१॥ सर्थ-रकंदजी महाराज कहतेहैं कि, हे अगस्त्य ! जिस गृहस्थीले घरमें अच्छे लक्षणवाली सी होतीहै वह पुरुष हमेशा सुख भोग करताहै इस कारणसे सुखप्राप्तिकी इच्छा रहनेवाले मनुष्य के लिये पहिले खीलक्षण कहताहूं ॥ १ ॥ अथारधालक्षणभूमिकामाह । वपुरावर्तगंधाश्च छाया सत्यं स्वरो गतिः। वर्णधेत्यष्टधा प्रोक्ता बुर्लक्षणभूमिका ॥२॥ अर्थ-शरीर, चक्र, गंध, छाया, पराक्रम, आवाज, चाल, रंग ये आठ प्रकारकी भूमिका के लक्षण विद्वानोंने कहें ॥२॥ अथ लक्षणप्रकार। सापादत्तलमारभ्य यावन्मौलिरुहं कमात् । शुभाशुभानि वक्ष्यामि लक्षणानि मुने शृणु ॥ ३॥ अर्थ-पैरोंके तलुओंसे आरंजकरके शिरके बालोतक क्रम परके अच्छे बुरे लोके रक्षण में कहताहू हे अगस्त्य ! 'तुम सुनो ॥ ३॥ .

मापाटीकासमेतम्। . अथ लक्षणक्रमः आदी पादत रेखा ततोऽगुष्टाडुलीनंखाः । पृष्ठं गुल्फयं पाणिजघारोमाणि जानुनी ॥४॥ ऊरू कटी नितंबस्फिग्भगो जधनवस्तिके। नाभि इक्षियं पार्थोदरमध्यवलिवयम् ॥ ५ ॥ रोमाली हदयं वक्षो वक्षोजदयचूचुकम् । जनुस्कंधासको द्विमाणिबंधकरदयम् ॥६॥ पाणिपृष्टं पाणितलं रेखांगुष्ठांगुलीनसाः । प्रष्टिः कृकाटिका कंठश्चिवुकं च हनुदयम् ॥ ७॥ अर्थ-पहले पैरोझे नीचेकी रेखा कहत] १. फिर अंगूठा २ अंगुली ३ नाखून ४ पैरोंकी पीठ ५ गते दोनों ६ दोनों एंटी ७ नंचा दोनों ८ रोगको लक्षण ९ दोनों जानूके लक्षण १० दोनों ऊरू ११ कमर १२ चूतर १३ पदे १४ जग १५ जवाके ३६ टूडीके नीचे १७ पेके ऊपर १८ टूडी ३९ दोनों कोस २० दोनों पसली २१ पेटकी तीन वलियोंके लक्षण २२ २३ १२४ रोमावली २५ हृदयके २६ छातीके २७ छातीकी ऊचाई २८ दोनों चैंचियोंके २९।३०धगल३१नीचे स्थान- को जत्रु कहते हैं अर्थात् बगल तिसके ३२ मुहीके ३३ क- धोके अंसाके ३४ कलाई दोनों ३५ दोनों हाथोक ३६ दोनों हाथोंके पाठके ३७ । ३८ दोनों हथेलियाले ३९ हाथोंकी देस्ताफे ४० अंगूठेके ४१ अंगुलियोंद ४२ नाखूनोंक ४३ (१०) वीजातकम् । पाठले ४४ पीठके नीचे के भागको सकाटिका कहते है तिसके ४५ गलेके ४६ ठोडीले ४७ दोनों हनूके ४८॥ ॥ ४ ॥५॥ ६ ॥ ७॥ कपोलो वक्रमपरोत्तरोष्ठौ द्विजजिह्वकाः। घंटिका तालु हसितं नासिका क्षतमक्षिणी ॥ ८॥ पक्ष्मभूर्णभालानि मौलिसीमंतमौलिजाः । पाहिः पडुत्तरा योषिदंगलक्षणसत्खनिः ॥९॥ अर्थ-दोनों गालोंके ४९ मुखके ५० दोनों होठके ५१ दांतोंके ५२ जीनके ५३ कागके ५४ तालूके ५५ हसनके ५६ नाकके ५७ छौंकले ५८ नेत्रोंके ५९ पलकोंके ६० भौंहके ६१ कानोंके ६२ माथेके ६३ शिरके ६४ भांग ६५शिरके वालोंके ६६ उयासठ नियोंके अंगोंके लक्षणांकी भूमिका वर्णन करी है ॥ ८ ॥९॥ अथ पादतललक्षणमाह। स्त्रीणां पादतलं स्निग्धं मांगलं मृदुलं समम् । अस्तेदममुष्णमरुणं वहुभोगोचितं स्मृतम् ॥ १० ॥ सूक्षं विवर्ण परुपं खंडितं प्रतिबिंबकम् । शूर्पाकारं विशुष्कं च दुःखदार्भाग्यसूचकम् ॥११॥ अर्थ--जिस स्त्रीके पैरोंके दलुऐ चिकने मांसकरके सहित मुलायम बरापर पसीनारहित गरम लाली लिये हों वह वो बहुत सोग करनेटायक होती है।॥१०॥और जिस नारीके पैरों के झापाचीकासमेतम् । तलुऐ खरखे फटेहुए कठोर खंडित जिसके पैरोंके चिह्नसे धरती खंडित दिखाई पडे सूपके समान आगेने चौडे विशेषकरके सूखे होय वह सो दुःख और बारिणयके करनेवाली होती अथ पादत्तलरेखालक्षणमाह। चकारसरितकशंखाजजमानातपत्रवत् । रास्याः पादतले रेखा सा भवेत्तितियांगना ॥१२॥ भवेदखण्डभोगायोमध्यांगलिसंयुता । रेखासुसर्पज्ञाकामा दुःखदारियचिकाः ॥ १२ ॥ अर्थ-जिस झीफे परके तलुएगे चक्र, स्वस्तिक, शंस, कमल, ध्वजा, गीन, उनके समान रेखाके चिह्न होये वह नारी राजाकी रानी होती है ।। १२॥ और जिस नारी परके तलपमें बीचकी अंगुली तक असंडित ऊर्ध्वरेसा होवे वह पी मोगके लिये उत्तम होती है और जिसके पैर चूहे, सर्प, कौमाके समान रखा होवे वह गारी दुःख दारिद्यको देनेवाली होती है ॥ १३॥ अथ पादांगुष्टलक्षणमाइ जनतो मांसलोऽङ्गुष्टो पर्वलोऽतुरभागदः । वको हस्वच चियटः सुखसोभाग्यभनकः ॥१४॥ विधवा विपुते याही अष्टेन दुर्भगा।

(१२) ब्रीजातकम् । अर्थ-जिस वीके पैरोंका अँगूठा ऊंचा और मांरासहित गोल होवे तो वह नारी बहुत सुखकी देनेवाली होती है और 'जिस सीके पैरका अँगूठा टेढा और छोटा और चिपटा होवे पह नारी सामाग्यके नाश करनेवाली ॥ ३४ ॥ और बहुत जडे अंगूठेवाली स्त्री विधवा होती है और लंबे अंगठेवाली दुगा होती है ॥ अथ पादाङ्गुली लक्षणमाह। मृदयोऽङ्गुलयः शस्ता धना वृत्ताः समुन्नताः ॥१९॥ अर्थ-जिस कन्याकी अंगुली कोमल और घनी गोल श्रेष्ठ ऊंची होते हैं वह नारी शुम होती है ॥ १५ ॥ दीर्घागुलीभिः कुलटा कृशाभिरतिनिधना। हस्वायुप्या च ह्रस्वामि ग्राभिर्भुग्नवर्तिनी ॥ १६ ॥ चिपटाभिर्भवेदासी विरलाभिरिद्रिणी। परस्पर समारूढाः पादाजुल्यो भवति हि ॥ १७ ॥ हत्त्वा बहनपि पतीपरप्या तदा भवेत् । पस्याः पथि समायांत्या रजोभूमेः समुच्छलेत्॥१८॥ सापांसुला प्रजायेत कुलश्यविनाशिनी । यस्याः कनिष्टिका भूमि न गच्छंत्याः परिस्पृशेत्१९ मा निहत्य पति योपा द्वितीयं कुरुते पतिम् । सानामिका च मध्या र यस्या भूमि न संस्पृशेत्२० पतिद्वयं निहत्याद्या द्वितीया च पतित्रपम् ।

भाषाटीकासमेतम् । पतिहीनत्वकारिण्या होने ते हे इमे यदि ॥ २३ ॥ प्रदेशिनी भवेवस्या अङ्गुशायतिरेकिणी । कन्येव कुलटा सा स्यादोय एप विनिश्चयः ॥ २२॥ अर्थ-जिस सीके पैरोंकी अंगुली अधिक लंबी हो वह कुलटा होती है और पतली अंगुलियोंवाली धनहीन होती है और बहुत छोटी अंगुलीवाली थोडी उमर पाती है छोटी बड़ी अंगुलियाँवाली कुटिना कपट करनेवाली होती है ॥ १६॥ और चपटी अंगुलियोंवाली दासी होती है और छिदरी अंगु- लियोंवाली दरिद्रिणी होताहै और जिस नीकी पैरकी अंगुली एकके ऊपर एक चढी होय ॥ १७॥ वह स्त्री बहुतसे पतियाँको मारकर अन्य स्त्रीकी कुटिनी होतीहै और जित औरतके चलनेसे धरतीकी बहुत धूरी उडे ॥ १८ ॥ सो श्री व्यभिचारिणी वेश्याके समान पिता नाना और पतिक इन तीनों कुलोका नाश करतीहै और जिस ग्रीके धरतीमें चलनेसे कनिष्ठिका अंगली पृथिवीको स्पर्श न करे । १९ ॥ मोनी विवाहित पतिको नाश करके दूसरेको पति करती है और जिस चीकी अनामिका अंगुली धरतीको सर्श न करती होय ॥२०॥ वह नारी आदिके दो पतियोंका नाश करके ती- सरा पति करतीहै भोर जिस स्त्रीकी मध्यमांगुली धरतीको स्पर्श न करे वह नारी तीन पतिको मारकर चौथा पति करतीहै और जिस भीकी कनिष्ट और अनामिका दो अगली

(१४) स्त्रीजातकम् ।
हीन होये यह नारी पतिहीन होतीहै ॥२१॥ और जिस चीकी
अंगूठेके पासकी अंगुली अंगूठ बजी होय तो वह नारी विना
व्याही अवश्य करके व्यभिचारिणी होताहै ॥ २२ ॥
अथ पादनखलक्षणमाह।
स्निग्धाः समुन्नतास्तानां वृत्ताः पादनखाः शुभाः।
अर्थ-जिस स्त्रीके पैरॉके नाखून चिकने ऊंचे लाल लिये
गोल होवें वह नाखून शुभदायक होते हैं ।
antar अथ पादपृष्ठलक्षणमाह । *.
राज्ञीत्वसूचकं स्त्रीणां पादपृष्टं समुन्नतम् ॥ २३ ॥
अस्वेदमशिराढ्यं च मसृणं मृदु मांसलम् ।
दरिद्रा मध्यमग्नेन शिरालेन सदाध्वगा ॥२४॥
अर्थ-जिस सीके पैरोंकी पीठ ऊंची होवे यह नारी
राजपली होतीहै ॥ २३॥ और जिस नारीके पैरोकी पीठ
पत्तीनारहित नाडियों रहित मुलायम चिकनी मांससे भरपूर
होये वह शुभ होती है और जिस औरतके पैरोंकी पीठ
चौमें टूटी हो यह नारी दरिदिणी होतीहै और जिसके
पैरोंकी पाठ बहुत नसबाली हो यह नारी हमेशा रस्ता
चलनेवाली होतीहै ॥ २४ ॥
Arke. अथ पादधिमणमाइ ।
रोषान्येन भवेदासी निमासेन च दुभंगा।
गृढौ गुल्फोशिवायोकाशिरालो सुबालो ॥ २५ ॥

झापाटीकासमेतम् । (१५) सुपुष्टो शिथिलो दृश्यों स्याता दोभाग्यबको । अर्थ-जिस सीके पैरोंके गढे रोमसहित हो वह दासी होतीहै और जिसके गट्टे मांसरहित हों वह नारी दुर्शगा होती है और जिसके पैरोंके गट्टे मांसकरके छोपे होप नसों करके हीन हॉर गोल होय वे शुभ होतेहैं ॥२५॥ और जिसके गट्टे घडे मोटे शिथिल हो वह नी दुर्भाग्यवती होती है । अथ पादपश्चाद्भागलक्षणमाह । सम्पाणिः शुभा नारी पृथुपार्णिश्चदुर्भगा॥ २६॥ कुलटोन्नतपाणिः त्यादीर्घपाणिश्च दुःखमाझ् ॥ अर्थ-जिस औरतके पैरोंके पीछेका आग बराबर होये वह शुत होतीहै और मोटी पाणि होय तो दुर्तगा होती है ॥ २६ ॥ जिस औरतकी पाणि उन्नव हो यह कुलटा होताहै और बड़ी होप तो दुःख भोगताहै ॥ अथ पिंडलीलक्षणमाह। रोमहीने सो निग्धे पबंधे कमवले ॥२७॥ सा राजपानी भवती विसरे सुमनोहरे ॥२८॥ एकरोगा राजपत्नी दिरोगा च सुखावला । विरोमा रामरूपपु भयेषगदुसमा ॥ २९ ॥ अर्थ-गिरा औरतके पिंडली रोमोरहित समान विनी गोल हो । २७ ।। यह समाती पत्नी होती है (१६) घोनातकम्। जिसकी पिंडली नसोरहित सुन्दर होय वह श्रेष्ठ होती है॥२८॥ जिसकी पिंडली एकरोमवाली होय वह रानी होतीहै दो रोमवाली सुख भोगती है और जिसके तीन रोम रोमके छिद्रमें हो वह विधवा दुःख भोगनेवाली होतीहै ।। २९ ।। अथ जानुलक्षणमाह। वृत्तं पिशितलग जानुयुग्मं प्रशस्पते । निमांस स्पैरचारिण्या दरिदायाश्च विश्लथम् ॥ ३०॥ अर्थ--जिस नारीके दोनों जानू गोल मांसकरके सहित हो वह श्रेष्ठ होती है और जिसके मांसरहित होरे वह नारी स्वैरिणी अर्थात् व्यभिचारिणी होतीहै और जिसके जानू दीले हो वह दरिद्रिणी होतीहै ॥ ३० ॥ अय जंधालक्षणमाह। विशिरः करभाकाररुरुभिर्मसणेघनः । सुवृत्ते रोमरहितर्भवेयुभूपवल्लभाः ॥ ३१ ॥ वैधव्यं रोमशेरुक्तं दोभाग्यं चिपिटेरपि। मध्यच्छिद्रमहादुःखं दारिद्य कठिनत्वचः ॥ ३२ ॥ अर्थ-जिस सीकी जंचा नाडियोंसे रहित ऊंटके समान हाधीकी सुंदके समान दोनों आपसमें स्पर्श करतीहों और श्रेष्ठ मोलाई लिये रोमहीन हो वह राजाकी प्यारी होती ह॥३३॥और रोमसहित होतो विधा होती है चपटी जंवों- मापटीकासमेतम् । (१७) वाली दुर्भगा होती है और वीचमें छेदवाली बडे दुःखको पाती है और. सस्त चमडेवाली जंघाको स्त्री दरिद्रिणी होती है ॥ ३२॥ अथ कटिलक्षणमाद । चतुर्भिरंगुलैः शस्ता काटिविंशतिसंयुतः। समुन्नतनितंबाच्या चतुरस्रा मृगीहशाम् ।। ३३ ।। विनता चिपटा दीर्घा निर्मासा संकटा कटिः। हरवा रोमयुता नायर्या दुःखवेषव्यसूचिका ॥३४॥ अर्थ-जिस औरतकी कमर चौबीस अंगुल ऊंची कमर ऊंचे चूतडसहित विस्तारवाली होय वह शुभ होती है ॥ ३३॥ नन्न हुई चिपटी लंबी मांसरहित कठोर छोटी रोमसहित कमर होवे वह नारी दुःख भोगनेवाली विधवा होतीहै ॥ ३४ ॥ अय नितंवलक्षणमाह। नितंबविवो नारीणामुन्नतो मांसल पुथुः। महाभोगाय संप्रोक्तस्तदन्योऽशर्मणे मतः ॥ ३५ ॥ अर्थ-जिन सियोंके चुतड ऊँचे मांससहित मोटे हो वह भारी आतिजोगके यक होती है इससे विपरीत होनेसे नष्ट होताहे ॥ ३५॥ अथ मांशपिंडलक्षणमाद । कपित्यफ्टवत्ता मृदुलो मांसलो धनो। रिफनो वाटावनिमतो रतियोस्यविवर्दनो ॥३६॥ .

(१८) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस नारीके चूतडके मांसके पिंड कैथके फलके समान गोल मुलायम मांससाहित घने पुष्ट हो तो रंतिसौख्यके बढानेवाले होतेहैं ॥ ३६ ॥ अथ योनिलक्षणमाह । शुभः कमठपृष्ठाभो गजस्कंधोपमो भगः । वामोन्नतस्तु कन्याजः पुत्रजो दक्षिणोत्रतः ॥ ३७॥ आखुरोमा गूढमणिः सुश्लिष्टः संहतः पुथुः। तुंगः कमलवर्णाभः शुभोऽश्वत्थदलाकृतिः॥ ३८॥ कुरंगखुररूपो यश्चुल्लिकोदरसन्निभः । रोमशो विवृतास्यश्च दृश्यनासोऽतिदुर्भगः ॥ ३९ ॥ शंखावता भगो यस्याः सा गर्भमिह नेच्छति । चिपिटंः खराकारः किंकरीपदो भगः ॥४०॥ वंशवेतसपवाभो गजरोमोचनासिकः॥ • विकटः कुटिलाकारो लंबगल्लस्तथा शुभः ॥ ४ ॥ भगस्य भाले- अर्थ-जिस औरतकी योनि कछुएकी पीठकी तरह, हाथी- के कन्धोंके समान और बाँई तरफसे ऊंची होवे बह नारी कन्यासंतान पैदा करती है और पूर्वोक्तगुणविशिष्ट भग दक्षि. णकी तरफसे ऊंची होय तो वह नारी पुत्र औलाद पैट करती है ॥ ३७ ॥ और जिन कन्याकी मग चहोके स गान रोमावलपिाली ठिा हुआ ठिहुना जिसका शोनायमा मजबूत मोटी ऊंची कमल के दलके समान शुज पीपल के पत्तेकी

पाटीकासमेतम् ।
(१९)
सी आकारवाली योनि शुन्न होती है ॥ ३८ ॥ हरिणके खुर-
के माफिक, चूल्हेकेसे आकारवाली, बहुतरोम करके सहित,
घडेके मुखके समान नाकवाली भग अत्यंत पुरी होती
है ।। ३९ ॥ और जिसको जग शंखके समान बलयबाली हो
वह गर्भ नहीं धारण करती है और चपटी, खिपडे समान
भगवाली खी दृती होती है ॥४०॥ और जिस नारीकी योनि
बाँसके पत्ते के समान और हाथीकेसे वाल जिसके ऊपर हों
और ऊंची नाकवाली भयंकर कुटिल लंबी गलेवाली अशुन
होती है इस प्रकारका भगका माथा नेष्ट कहा है । ४१ ॥
अय जवनलक्षणमाह।
जघनं विस्तीर्ण तुंगमांसलम् ।
मृदुलं मृदुरोमाढ्यं दक्षिणावर्तमीडितम् ॥४२॥
वामावतै च निमास भुनं वैधव्यसूचकम् ।
संकटस्थं पुटं रुसं जपनं दुःखदं सदा ॥४३॥
अर्थ-जिस नारीके जघन विस्तार किये हुए ऊंचे मांसस-
हित कोमल मुलायम वालों करके युक्त दहिनी तरफको आवर्त
हो जिसका ऐसा होवे वहशुन होतीहै और बाई तरफको भान
मांसरहित हो तो कुटिल विधवा करताहै जिसके पुट संको-
चित रुसा हो वह नारी हमेशा दुःख पानी है ॥ १२॥४३॥
अय वस्तिलक्षणमाह ।
वस्तिः प्रशस्ता विपुला मृद्दी स्तोकसमुन्नता।
रोमशाच शिरालाचरेसका नेव शोभना ॥ ४॥

(२०) 'स्त्रीजातकम् । -अर्थ-नाभिके नीचेके जागका नाम बस्ति है जिस नारी- का बस्तिस्थल बडा विस्तारवाला कोमल थोडा ऊंचा हो वह शुभ कहा है और जो बस्तिस्थल रोमोंसे रेखाऑकरके युक्त होवे वह नारी अशुज होती है । ४४ ॥ अथ नाभिलक्षणमाह। गंभीरदक्षिणावर्ती नाभिः स्यात्सुखसंपदे । वामावर्ती समुत्ताना व्यक्तीथिन शोभना ॥ १५॥ अर्थ-जिस नारीकी टूडी गसीर (गहरी) दक्षिणावर्त हो वह सुखसंपदा देनेवाली होती है और जिसकी टूडी वामावर्च ऊपरको उठी ग्रंथिवाली होय वह अशुभ होती है ॥ ४५ ॥ अथ कुशिलक्षणप्रकारः। सूते सुतान्वहन्नारी पृथुकुक्षिः सुखास्पदम् । क्षितीशं जनयेत्पुत्रं मंडूकाभेन कुक्षिका ।। १६॥ उन्नतेन वलीभाजा साक्तैनापि कुक्षिणा। पन्ध्या प्रवाजिता दासी क्रमाद्योपा भवेदिह ॥ १७ ॥ अर्थ-जो स्त्री भारी कुक्षियोंवाली होय वह पुत्र पैद करती है और बहुत सौख्य देती है और जिसकी कोख मंडूक समान होवे उस कोससे पैदाहुआ पुत्र राजा होता है ॥४६॥ और ऊंची बलवाली कोखकी औरत बांझ होती है और बल वान् कोखवाली नी संन्यानि .. है और धूमीहुई कमर

(२
भाषार्टीकासमेतम् ।
अथ पार्श्वलक्षणमाह ।
समः समांतर्मूदुभियोपिन्मनास्थिभिः शुभैः ।
पार्थः सौभाग्यसुखयोनिधानं स्यादसंशयम् ॥१८॥
यस्था दृश्यशिरे पार्वे उन्नते रोमसंयुते ।
निरपत्याच दुःशीला सा भवेहुःखशेवधिः ॥ १९ ॥
अर्थ-जिस खीकी पसली घराबर मांसयुक्त कोमल छिपी
हुएसे हाडवाली होय वे शुभ और सौभाग्यसंपदाके स्थान नि:-
संदेह होती है ॥ ४८॥ और जितके पसलियोम नसें दीखपढ़ें
और दोनों तरफसे ऊंची हॉ रोमकरके सहित हो वह नारी संता-
नरहित दुष्टम्वनावकी दुःखकी समूह होती है ॥४९॥
अथोदरलक्षणानि ।
उदरेणातितुच्छेन विशिरण मृदुत्वचा ।
योपिद्भवति भोगाव्या नित्यं मिटानसेविनी ॥५०॥
कुम्भाकारं दरिद्राया जठरं च मृदंगवत् ।
कूष्माण्डाभ यवाभं च दुष्पूरं जायते स्त्रियाः ॥५१॥
सुविशालोदरी नारी निरपत्या च दुर्भगा।
प्रलंबजठरा हति वारं चापि देवरम् ।। ५२ ॥
मध्यक्षामा च सुभगा भोगाव्या सवलित्रया।
ऋज्वी तन्वी च रोमाली यस्याः सा शर्मनर्मभूः५॥
कपिला कुटिला स्थूला विच्छिन्ना रोमराजिका।
चोरवधव्यदौर्भाग्यं विदयादिह योषिताम् ॥५४॥

(२२) स्त्रीजातकम् । · अर्थ-जिस वीका पेटे छोटा नाडियोरहित कोमल त्वचा- करके सहित होवे वह स्त्री भोग करनेलायक होतीहै और नित्यही गिटान भोजन करतीहै ॥ ५० ॥ और जिसका पेटे घडेके समान हो वह नारी दरिद्रिणी होती है और जिसका पेटे मृदंग वा कुम्हडे वा यवके समान होवे वह बडे दुःखसे भराजा- ताहै ।। ५३ ॥ और बड़े पेटवाली स्त्री निःसंतान दुर्जगा होती है बडे लंबे चौडे पेटवाली स्त्री अपने ससुर वा देवरका नाश करतीहै ॥ ५२ ॥ और जिसका पेट बीचमें सूक्ष्म होने पर नारी श्रेष्ठ भाग्यवाली होती है और जिसके पेट में तीन बलर पड़ें वह नारी भोगवती होती है, जिसके पेटार सीधी बारी रोमकी रेखा होय वह नारी सर्वकल्याणदात्री होती है ॥५३ | और जिस नारीके पेट में पिलाई लिये तिरछी छेदकी रोमों पंक्ति होवे सो चोरी करनेवाली विधवा दुष्टलाग्यवाली हो है ॥ ५४॥ अथ हृदयटक्षणमाह। निलीम हृदयं यस्याः समं निम्नत्ववर्जितम् । ऐश्वर्य चाप्यवैधव्यं प्रियप्रेम समालभेत् ॥ ५५॥ विस्तीर्णहृदया योगा पुंश्चली निर्दया तथा। उनिन्नरोमहृदया पति हत्ति विनिश्चितम् ॥ ५६॥ अादशांगुलततमुदः पीवरमुन्नतम् । सुखाप दुःसाय भवेद्रोमशं विषम पृथु ॥५७ ॥ tan भाषाटीकासमेतम् । (२३). अर्थ-जिस नारीका हृदय बालोंसे रहित बराबर निम्न तारहित होता है वह नारी ऐवययुक्त पतिको प्यारी पतिके प्रेममें तत्पर होतीहै ॥ ५५॥ और बडे विस्तारवाले हृदय- बाली खी व्यभिचारिणी दयाहीन होती है और जिसके हृदयमें बहुत रुगटे होवें वह नारी पतिका नाश करतीहै ॥ ५६ ॥ और जिस स्त्रीकी छाती अठारह भंगुलकी पुष्ट और ऊंची होवे वह नारी सुख देनेवाली होतीहै और जिसीकी छाती विषम हृदयवाली रुगटोंकरके युक्त होवे वह नारी दुःख देनेवाली होतीहै । ५७॥ अथ कुचलक्षणमाह। धनी वृत्ती हटा पानी समो शस्तो पयोधरों। स्थूलायो विरली शुष्को वामोरूणां न शर्मदी॥५८॥ दक्षिणोन्नतवझोजा पुत्रिणीष्वग्रणीमता । वामोन्नतकुचा सूते कन्या सौभाग्यसुंदरीम् ॥ ५९॥ अरपट्टपटीतुल्यो कुचों दोशील्यसूचको । पविरास्यो सांतराठी पृथुप्रान्तो न शोभनौ । ६० । मूलस्थूलो क्रमकृशौ परे तीक्ष्णपयोधरौ। सुखदो पूर्वकाले तु पश्चात्त्यंतदुःखदी॥६१ ॥ अर्थ-जिस चीके कुच घने, गोल और पुष्ट दोनों बरा- बर हो वह श्रेष्ठ होते हैं और आगेसे मोटे और चिरले. सूखे कुच त्रिपोंके श्रेष्ट नहीं होतेहै ॥ ५८ ॥ और जिस

(२४)
स्त्रीजातकम्।
तीका दहना कुच ऊंचा होवे वह नारी पुत्र पैदा करती
और जिसका बाँया कुच ऊंचा होवे वह नारी कन्या पैदा
करती है ॥ ५९ ॥ और जिस नारीके स्तन जलपटीके
समान होयें वह नारी कुशीला होतीहै और जिस सीके स्तन
ऊपरसे मोटे मुखवाले आपसमें दूर नीचेसे बडे मोटे
हों वह नेष्ट है ॥ ६०॥ और जिय नारीके कुच नीचेसे मोटे
और कमकरके ऊपरसे दुर्बल जिनका अग्रभाव तीक्ष्ण होवे
वह स्त्री पहिली उमरमें सुख करती है और पीछेसे बहुत दुःख
पातीहै ॥ ६॥
अथ कुचाग्रभागलक्षणमाह।
सुशां चूचुकयुगं शस्तं श्याम सुवर्तुलम् ।
अंतर्भग्नं च दीर्घ च कृशं क्लेशाय जायते ॥ १२ ॥
अर्थ-जिस नारीके कुचोंका अग्रभाग श्यामता लिये
गोल होवे वह शुभ होता है भीतरको छिदे हुए दुर्वल लम्बे
होनेसे क्लेशदायक होतेहैं ॥ ६२ ॥
अथ जलक्षणमाह ।
पीवराभ्यां च जन्नुभ्यां धनधान्यनिधिर्वधूः ।
श्लथास्थिभ्यां च निम्नाभ्यां विपमाभ्यां दरिदिणी६३
अर्थ--जिस औरतके कोसकी संधि मोटी हो वह नारी धन
अन्नकी स्थान होती है । ढीले हाडवाली नयी हुई अस्थियों-
झाली कमती बढती अस्थियोंवाली दरिदिणी होतीहै ॥६॥

भाषाटीकासमेतम् । (२५)
अय स्कंघलक्षणमाह।
अवदावनतो स्कंधावदीर्घावकशो शुभी।
को स्थूलो च रोमाठ्यो प्रेष्यवैधव्यसूचको ॥६॥
निगूढसंधी स्रस्तायो शुभावंसौ सुसंहतो ।
वैधव्यदो समुच्चायो निर्मासावतिदुःखदो ॥ ६ ॥
अर्थ-जिस स्त्रीके मुंडे अबद्ध नीचे लंबे नहीं होवे और
मोटे होवे तो श्रेष्ठ होते हैं. और टेढे बहुत मोटे रुगटोंकरके
सहित हाँ तो वह दूती विधवा होता है ॥६४॥ और जिस स्त्रीके
दोनों कंधे छिपे हुये मांसमें मिले हुये श्रेष्ठ होतेहैं और ऊंचेको
उठे हुए विधवा करते हैं और मांसहीन अर्थात् खाली कंधे
दुःख देते हैं ॥ ६५॥
अथ कशालक्षणमाह।
कक्षे सुसुक्ष्मरोमे च तुंगे स्निग्धे च मांसले ।
शस्ते न शस्ते गंभीरे शिराले स्वेदमेदुरे ॥ ६६ ॥
अर्य-जिस खीची दोनों कक्षा महीन रुगटेवाली मांस-
सहित चिकनी ऊंची होवे वह शुज होती है और वही संधि
कक्षाकी गंभीर नाडियोंकरके रहित पसीने सहित होदे तो
नेष्ट होते हैं ॥ ६६ ॥
अथ भुजालक्षणराह।
स्पातां दोपोतु निदापो गूढास्थी ग्रंथिकोमलगे।
विशिरोच विरोमागो सरलो हरिणहिशाम् ॥ ६७ ॥

(२६) खीजातकम् । वैधव्यं स्थूलरोमाणों ह्रस्वौ दो ग्यसुचकौ । परिक्लेशाय नारीणां परिदृश्यशिरो भुजो॥ ६८॥ अर्थ-जिस औरतकी वाहें दोपरहित छिपी हुई हाडवाली कोमल विना ग्रंथिके नाडी और रोगटेरहित होतीहै वह शुन होते हैं ॥ ६७॥ और जिसकी बाहोंमें मोटे रुगटे होवे वह विधवा होती है और जिसकी दोनों बाहें छोटी होवे वह स्त्री दुर्भगा होती है और जिसकी बाहोंमें नसें दीख पडें वह नारी क्लेश पाती है ॥ ६८॥ अथ हस्तांगुष्टलक्षणमाह। अंभोजमुकुलाकारमङ्गुष्ठा१लिसंमुखम् । हस्तन्यं मृगाक्षीणां वहुभोगप्रदायकम् ।। ६९ ॥ अर्थ-जिस औरतके हाथकी अंगुली और अंगूठा कमलके डांडेकेसी सीधी बंधी होवे ऐसे हाथवाली नारी बहुत भोगके योग्य होतीहै ॥ ६९ ॥ अथ पाणितलस्प लक्षणमाह । मृदुमध्योन्नतं रक्तं तलं पाण्योररन्ध्रकम् । प्रशस्तं शस्तरेखाट्यमल्परेखं शुभश्रियम् ॥ ७० ॥ विधवा बहुरेखेण विरेखेण दरिद्रता । भिक्षुकी तु शिराठ्येन नारीकरतलेन वे ॥७१ ॥ अर्थ-जिस औरतके हाथकी हथेली कोमल वीचमें ऊंची छेदरहित श्रेष्ठ रखायुक्त होये थोडी रेसावाली शुन भाषाटीकासमतम् । (२७) होती है ॥ ७० ॥ बहुत रेखाकारके सहित .हो तो विधवा होती है और रेखाहीन हाथवाली कन्या दरिद्रिणी होती है और जिसके हाथोंमें नसे दीखती होवे वह नारी निकारिन होती है । ७१॥ अथ करपृष्ठलाणमाह। विरोम विशिरं शस्तं पाणिपृष्ठं समुन्नतम् । वैधव्यहेतु रोमाट्यं निम्नं शिरायुतं त्यजेत् ।। ७२ ।। अर्य-जिस स्त्रीके हाथोंकी पीठ रुगटारहित नाडियोसे हीन होवे ऊंची होवे वह शुभ होती है और रुगों सहित नीची नाबाली हाथोंकी पीठ जिसकी होबे वह नारी विधवा होती है उसको त्यान करना चाहिये ॥ ७२ ॥ अथ हस्तरेखालक्षणमाह । रक्ता व्यक्ता गभीरा च स्निग्धा पूर्णा च चतुला। कररेखाङ्गतायाः स्याच्छुभा भाग्यानुसारतः।।७३॥ मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिकेन वसुप्रदा। पझेन भूपतेनारी जनयद्भूपति सुतम् ॥ ७९ ॥ चक्रवात स्त्रियाः पाणो नद्यावतः प्रदक्षिणः । शंखातपत्रकमा नृपमातृत्वसूचकाः ॥ ७९ ॥ तुलामानाकृती रेखा वणिक्पनी तु मा भवेत् । गजवानिवृषाकाराः करे वामे मृगीदृशाम् ॥ ७६ ।।

(२८) झीजातकम् । अर्थ-जिस स्त्रीके हाथमें लालवर्ण रेखा प्रगट और चिकनी पूरी टूटी न होवे गोलाई लिये होवे' वह नारी भाग्य करके शुज होती है ॥ ७३ ॥ और जिसके हाथमें मछली के समान रेखा होवे वह नारी सुभगा होती है और जिसके हाथमें तिर- कटी रेखा होवे वह धनवती होती है और जिसके हाथमें कमलके समान रेखा होवे वह नारी रानी होती है उसकी कुक्षीसे उत्पन्न हुआ बालक राजा होता है ॥ ७४ ॥ जिसके हाथमें नंद्यावर्त अर्थात् नंदीके समान दहिनावत रेखा होवे वह सी चक्रवर्ती राजाकी रानी होतीहै और जिसके हाथमें शंख छतरी कछुएके समान रेखा हो वह नारी राजमाता होती ॥ ४५ ॥ और जिसके हाथमें तराजुकी डंडीके समान रेखा होये यह नारी धनवान् वैश्यकी स्त्री होती है और हाथी, घोडा, बैलके समान बाये हाथमें रेखा होनेसे राजपली होती है ॥ ७६ ॥ रेखा प्रासादवजाभा घ्युस्तीर्थकर सुतम् । कृषीवलस्य पत्नी स्याच्छकटेन युगेन वा ॥ ७७ ॥ चामरांकुशकोदंडै राजपत्नी भवेध्रुवम् । अड्डष्टमूलानिर्गत्य रेखा याति कनिष्ठिकाम् ॥७८॥ यदि सा पत्तिइंची स्यारतस्तां त्यजेत्सुधीः । त्रिशूलासिगदाशक्तिदुंदुभ्याकृतिरेखया ॥ ७९ ॥ नितंविनी कीतिमती त्यागेन पृथिवीतले । कंकमंडूकनम्वूकपवृश्चिकभोगिनः॥ ८०॥. है भाषारीकासमेतम् । रासभोप्रबिडालाः स्युः करस्था दुःखदाः स्त्रियाः ॥ अर्थ-जिस औरतके हाथमें पूर्वोक्त रेखा और मकानके समान बजके तुल्य होवे वह नारी बडे भाग्यवाली शास्त्रका और तीर्थ करनेवाले पुत्रको पैदा करती है और जिसके हाथमें गाडी और गाडीके दुडंडी अथवा जुआके समान रेखा होने वह नारी खेती करनेवाले बडे आदमीकी स्त्री होती है ॥७७। और जिसके हाथमें चमर, अंकुश, धनुपके, समान रेखा होवे वह नारी राजाकी रानी होती है और जिसके हाथमें अंगूठेके जडसे रेखा चलकर कनिष्ठिकापर्यंत चली जाय ॥७८॥ वह नारी पतिको मारनेवाली होतीहै उसो दूर- सेही त्याग करना चाहिये और जिसके हाथमें त्रिशुल, गदा, तलवार, शक्ति, नगाडेके समान रेखा होवे ॥७९॥ यह नारी त्यागकरके अर्थात् दान देनेसे धरतीके ऊपर बडी यशवान् होती है और परंदक, मेंडक वा गीदड या मोडिया वा विच्छु वा सर्प ॥ ८० ॥ गधेके समान वा ऊंटके वा बिल्लीके समान रेखा जिस नारीके हाथमें होवे वह दुःख देनेवाली होती है । अथ हस्तांगुष्ठलाणमाह। शुभदः सरलोऽगुष्ठो वृत्तो वृत्तनखो मृदुः ॥ ८ ॥ अर्थ-जिसके हाथके अँगूठे सीधे गोल होबे वह शु होतेहैं और स्त्रियोंके हाथसे अँगूठेके नाखून गोल नसावा कोमल शुम होते हैं । ८३॥

(३०) स्त्रीजातकम् ।
अथालिलक्षणमाह।
अडल्यश्च सुपर्वाणो दीर्घा वृत्ताः क्रमात्कंशाः।
चिपिटाः स्थपुटा रूक्षा पृष्ठरोमयुजोऽशुभाः ॥८२॥
अतिहस्ताः कृशा वका विरला रोमहेतुकाः।
दुःखायाङ्गुलयः स्त्रीणां वहुपर्वसमन्विताः ॥ ८३ ॥
अर्थ--सुंदर पोरुओंवाली गोल क्रमकरके भागेसे दुर्बल
शुल होती हैं और चिपरी मोटी रूखी पीठमें जिनके
रुगटे ऐसी अंगुली अशुभ होती हैं ॥ ८२ ॥ और ज्यादे
छोटी पतली टेढी रुगटोवाली विरली बहुत गांठवाली अंगुली
नियोंको दुःख
देनेवाली होती है ॥ ८३॥
अथांगुलीनखलक्षणमाह ।
अरुणाः सशिखास्तुंगाः करजाः सुदृशां शुभाः।
निम्ना विवर्णाः हात्याभाः पीता दारिद्यदायकाः८४
नखेपु बिंदवः श्वेताः प्रायः स्युः सरिणीस्त्रियाः।
पुरुपा अपि जायते दुःखिनः पुष्पित खैः॥ ८५ ॥
अर्थ-लालवर्णके चोटीदार ऊंचे नखवाली स्त्री शुभ
होती है मुलायम और फेलेहुए सापके माफिक पीले ऐसे
नखवाली स्त्रियाँ दरिद्रिणी होती हैं ॥ ८॥ और जिन, और-
तोंके नाखूनोंमें सफेद विदे होवे वह स्त्री अक्सर अपने मनके
माफिक घूमनेवाली होताहै और जिन मनुष्योंके नाखूनों में
सफेद विंदे अर्थात् छोटे हो वह पुरुपनी दुःख पाते हैं ॥८५॥

झापाटीकासमेतम् । (३१)
अब पृष्ठलक्षणमाह।
अंतनिमग्नवंशास्थिः पृष्ठिः स्यान्मांसला शुर्भा।
पृष्ठेन रोमयुक्तेन वैधव्यं लभते ध्रुवम् ॥ ८६ ॥
भुग्नेन विनतेनापि सशिरेणापि दुःखिता ।
अर्थ-जिस औरतकी पीट भीतरको नीची और बांसके
माफिक देढी हाडवाली और मांसकरके पुष्ट ऐसी पीठवाली
औरत शुज होतीहै. और जिस नारीकी पीठ रुगटोंकरके
सहित हो वह विधवा होतीहै ॥ ८६ ॥ और जिसकी पीठ
कुटिल नीची नसों करके सहित हो वह नारी दुःखित होतीहै ।
अथ कृवाटिकालक्षणमाइ।
ऋच्ची कृकाटिका श्रेष्टा सांसा च समुन्नता ।। ८७ ।।
शुष्का शिराला रोमाढ्या विशाला कुटिला शुभा ॥
अर्थ-जिस औरतकी काठी सधी मांसके सहित ऊंची
हो वह श्रेष्ठ होतीहै ।। ८७ ॥ और जिस औरतकी काठी
सूसी नसों करके सहित रुगटोवाली ऊंची कुटिल होवे उसको
अशुन जानिये ॥
अथ कण्ठलक्षणमाह ।
मांसलो वर्तुलः कण्ठ प्रशस्तश्चतुरंगुलः ।। ८८॥
शस्ता ग्रीवा त्रिरेखाका त्वव्यक्तास्थिः सुमहत्ता !
निर्मामा चिपिटा दीर्घा स्थपुटान शुभप्रदा ॥८॥
स्थूलयावा च विधवा वऋग्रीवा च किकरी ।
चंध्या हि चिपिटग्रीवा हस्वग्रीवा च निःसुता ॥९॥

(३२) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस स्त्रीका कंठ मांसकरके सहित गोलाकार चार अंगुलका होवे वह शुभ होताहै ॥ ८८ ॥ और जिसका गला तीन रेखाओकरके अंकित छिपीहुई अस्थियोंवाला होने वह शुभ होताहै और जिस नारीका गला मांसरहित चिपटा बडा लंबा नीचा होवे वह शुभ नहीं होताहै ॥ ८९ ॥ और जिस नारीकी गर्दन मोटी होय वह विधवा होतीहै और टेढी गर्दनवाली दासी होती है और चपटी गर्दनवाली बांझ होताहै छोटी गर्दनवाली संतानहीन होती है ॥ ९० ॥ अथ चिवुकलक्षणमाह । चिवुकं व्यंगुलं शस्तं वृत्तं पीनं सुकोमलम् । स्थूलं द्विधा संविभक्तमायतं रोमशं त्यजेत् ॥ ९१॥ अर्थ-जिस औरतकी ठोडी दो अंगुल सुंदर गोछ मोटी मुलायम शुभ होतीहै और पुष्ठ मोटी दोनागवाली चौडी रोम- वाली अशुभ होताहै ॥ ९१ ॥ अथ हनुलक्षणमाह। हनुश्चिबुकप्तटमा निलोमा सुघना शुभा। वका स्थूला कृशा हस्वा रोमशान शुभप्रदा ॥९२॥ अर्थ-जिस नारीके ठोडीके ऊपरका स्थान रोमरहित सुंदर घन होय वह शुभ होता है और टेढा मोटा दुर्बल , छोटा रोमसहित हो तो नष्ट होताहै ॥ ९२॥ .

भाषाटीकासमेतम् । अथ कपोलरक्षणमाह । शस्तो कपोलो वामाक्ष्याः पीनवृतो समुन्नती। रोमशौ पंरुपो निनौ निमोसो परिवर्जयेत् ॥ ९३ ॥ अर्थ-जिस स्त्रोके गाल मोटे गोल ऊंचे होय तो शुत्त होते हैं और रुगटासहित कठोर नीचे मांसरहित नेष्ट होते हैं ॥ १३॥ अय मुखलक्षणमाह । समं समांस सुस्निग्ध स्वामोदं वर्तुलं मुखम् । जनित्यदनच्छापं धन्यानामिह जायते ॥ ९४ ॥ अर्थ-जिस औरतका मुख मांसयुक्त चिकना सुगंधिवत गोलाकार और उसके पिताके मुसके समान होवे ऐसी स्त्रियां संसारमें धन्य होती हैं । ९४ ॥ अथ अधरोष्टलक्षणमाह। पाटलो वर्तुलः स्निग्धो रेखाभूपितमध्यभूः। सीमंतिनीनामधरो धराजानिप्रिया भवेत् ॥ ९५॥ कृशः प्रलंबः स्फुटितो रूक्षो दौर्भाग्यसूचकः । इयावर स्थूलोऽधरोष्ठः स्यादेषव्यकलहप्रियः ॥२६॥ अर्थ-जिस औरतके नीचेके ओठ गुलाबके फूटके समान और चिकने गोल और रखाओं करके शोभायमान है मध्य- स्थल जिसका. इस प्रकारकी नारी राजाकी प्यारी होती है ॥ ९५ ॥ और दुर्बल लंबे स्फुटित अर्शद फटे सखे मोठ . (३२) स्त्रीजातकम्। अर्थ-जिस स्त्रीका कंठ मांसकरके सहित गोलाकार चार अंगुलका होवे वह शुभ होताहै ॥ ८८ ॥ और जिसका गला तीन रेखाओंकरके अंकित छिपीहुई अस्थियोंवाला होवे वह शुभ होताहै और जिस नारीका गला मांसरहित चिपटा बडा लंबा नीचा होवे वह शुभ नहीं होताहै ॥ ८९ ॥ और जिस नारीकी गर्दन मोटी होय वह विधवा होतीहै और टेढी गर्दनवाली दासी होती है और चपटी गर्दनवाली बांझ होताहै छोटी गर्दनवाली संतानहीन होती है ॥ ९० ॥ अथ चिबुकलक्षणमाह । चिबुकं व्यंगुलं शस्तं वृत्तं पीनं सुकोमलम् । स्थूलं द्विधा संविभक्तमायतं रोमशं त्यजेत् ॥ ९१॥ अर्थ-जिस औरतकी ठोडी दो अंगुल सुंदर गोछ मोटी मुलायम शुभ होतीहै और पुष्ठ मोटी दोनागवाली चौडी रोम- वाली अशुभ होताहै ॥ ९ ॥ अथइनुलक्षणमाद। हनुश्चिनुकसंलमा निर्लोमा सुघना शुभा। वका स्थूला कृशा ह्रस्वा रोमशान शुभप्रदा ॥९२॥ अर्थ-जिस नारीके ठोडीके ऊपरका स्थान रोमरहित सुंदर घन होय वह शुभ होता है और टेढा मोटा दुर्बल छोटा रोमसहित हो तो नेष्ट होताहै ॥ ९२ ॥ 1 भाषाटीकासमेतम् । अथ कपोललक्षणमाह। शस्तो कपोलो वामाक्ष्याः पीनवृतो समुन्नती। रोमशो परुषो निम्नौ निमौसो परिवर्जयेत् ॥ ९३ ॥ अर्थ-जिस सीके गाल मोटे गोल ऊंचे होय तो शुभ होते हैं और रुगटोसहित कठोर नीचे मांसरहित नेष्ट होते हैं ॥ ९३॥ अथ मुखलक्षणमाह । समं समांसं सुस्निग्धं स्वामोदं वर्तुलं मुखम् । जनित्वदनच्छायं धन्यानामिह जायते ॥ ९४ ॥ अर्थ-जिस औरतका मुख मांसयुक्त चिकना सुगंधियुक्त गोलाकार और उसके पिताके मुखके समान होवे ऐसी स्त्रियां संसारमे धन्य होती हैं ॥ ९४ ॥ अथ अधरोष्टलक्षणमाह । पाटलो वर्तुल स्निग्धो रेखाभूपितमध्यभूः। सीमंतिनीनामधरो घराजानिप्रिया भवेत् ॥ ९५॥ कृशः प्रलंबः स्फुटितो रूक्षो दौर्भाग्यसुचकः । श्यावः स्थूलोऽधरोष्ठः स्याद्वैधव्यकलहप्रियः ॥१६॥ अर्थ-जिस औरतके नीचेके ओष्ठ गुलाबके फूलके समान और चिकने गोल और रखाओं करके शोजायमान है मध्य- स्थल जिसका. इस प्रकारकी नारी राजाकी प्यारी होती है ॥ ९५ ॥ और दुर्बल लंबे स्फुटित अर्थात् फटे रूखे ओष्ठ ३ (३४) स्त्रीजातकम् । सौभाग्य करनेवाले होतेहैं और पीलाईालये मोटे ओठवाली स्त्री होताहै और विधवा लडाई जिसको प्यारी ऐसी होतीहै ।।९६॥ अथोझैष्ठलक्षणमाह । ममृणा मत्तकाशिन्याश्चोत्तरोष्ठः सुभोगदः । किंचिन्मध्यानतोऽरोमा विपरीतो विरुष्कृत् ॥ ९७|| अर्थ-जिस औरतके ऊपरके ओष्ठ नमोरहित चिकने होवें वह मोग देते हैं और कुछ बीचमें ऊंचा रोगहीन शुम होताहै और जो ऊपरको लौटा होय तो नेष्ट जानो ॥ ९७ ॥ अथ दंतलक्षणमाह । गोक्षीरसनिभाः स्निग्धा द्वात्रिंशदशनाः शुभाः । अधस्तादुपरिष्टाच समाः स्तोकसमुन्नताः ॥ ९८॥ पीताः श्यावाश्च दशनाः स्थूला दीघी द्विपंक्तयः। शुत्याकाराश्च विरला दुःखदार्भाग्यकारणम् ॥९९॥ अधस्तादपिकदन्तर्मातरं मशयेत्स्फुटम् । पतिहीना च विकटेः कुछटा विश्लेभवेत् ॥ १० ॥ अर्थ-जित स्त्रीके दांत गौके दूधके माफिक सफेद चि- कने बत्नीस दांत शुन होतेहैं और नीचेके दांतोसे ऊपरके दांत समान कुछ एक ऊंचे होवे तो शुम होतेहैं ॥ ९८ ॥ और पाले पर्णके या बंदरके वर्णके समान मोटे लंबे दो पक्तिवाले सौंपाकी समान छिदरे इस प्रकारके दात दुःख और दौभाग्यके बतानेवाले होते हैं । ९९ ॥ और जिस भाषाटीकासमेतम् । औरत के नीचे के दांतोंसे ऊपरके दांत अधिक हो वह श्री माताको नाश करतीहै और फटेहुये विकराल दांतवाली पी पतिको नाश करतीहै और छिदरे दांतवाली नारी कुलटा होतीहै ॥ १०० अय जिहालक्षणमाह। जिह्वयमिष्टभोक्त्री स्याच्छोणा मृद्री तथा सिता । दुःखाय मध्यसंकीर्णा पुरोभागसविस्तरा ॥ १०१॥ सितया तोयमरणं श्यामया कलहप्रिया । दरिद्रिणी मांसलया लंबयाऽभक्ष्यभक्षिणी ॥ १०२ ॥ विशालया रसनया प्रमदातिप्रमादभाकू । अर्थ-जिस औरतकी जीन सुर्ख मुलायम हो वह नारी दष्ट मिष्टपदार्थ भोजन करतीहै केही सफेदवर्णकी आगेसे विस्तार- वाली बीचमें संकुचित जीनवाली नी दुःख भोगतीहै ॥१०१॥ और सफेद जीनवाली नारी जलके दुःखसे मरवीहै और काली जीजवाली नीको लडाई पारी होतीहै और मोटी जीमवाली सी दरिदिणी होतीहै लंबी जीवाली घी न खाने- पोप चीनको स्वाती है । ३०२४ और पडे विस्तारपाली जीभकी औरत बहुत झूठ बोलनेवाली मदमाती होतीहै । अथ तालुलक्षणमाह। स्निग्ध कोकनदाभासं प्रसक्तं तालु कोमलम्॥ १०३॥ सिते तालुनि वैधव्यं पीते प्रबजिता भवेत् । कृष्णेऽपत्यवियोगार्ता रुक्षे भूरिखुटुम्बिनी ।। १०४॥

अर्थ-जिस औरतका ताल स्निग्ध चिकना कमलके
समान लाली लिये होय तो वह नारी कोमलतालुवाली उत्तम
होतीहै ॥ १०३ ॥ और जिस नारीका सफेद तालू होय
तो विधवा होती है और पीले तालुबाली संन्यासिनी होती है
और काले तालुवाली सैतानके वियोगसे दुःखी होती है और
रूखे तालुवाली बहुत कुटुंबवाली होती है ॥ १०४ ॥
अथ घंटिकालाणमाह।
कंठे स्थूला सुवृत्ता च क्रमतीक्ष्णा सुलोहिता।
अप्रलंबा शुभा घण्टा स्थूला कृष्णा च दुःखदा३०५॥
अर्थ-जिस औरतके कठके भीतरका काग मोटा गोल
क्रमकरके तीक्ष्ण लाली लिये शुभ होता है और लंबा मोटा
काला होय तो अशुभ होता है ॥ १०५ ॥
अथ इसनलक्षणमाह।
अलक्षितद्विजं किंचित्किंचित्फुल्लकपोलकम् ।
स्मितं प्रशस्तं सुदृशामनिमीलितलोचनम् ॥१०६॥
अर्थ-जिस औरतके हँसने के समय थोडे दाँत दीखे और
गाल थोडे ऊंचे उठे और आँखे बंद न हो इस प्रकारका
हँसना जिस औरतका होवे वह श्रेष्ठ होती है ॥ १०६ ॥
अथ नासिकालक्षणमाह।
समवृत्तपुटा नासा लघुच्छिद्रा शुभावहा ।
स्थूलाग्रा मध्यनिना च न प्रशस्ता समुन्नता ॥१०७॥

५
भापाटीकासमेतम् । (३७)
आकुंचितारुणाय च वैधव्यक्लेशदायिनी।
परमेष्या च चिपटा हवा दी कलिप्रिया॥१०८॥
अर्थ-जिस औरतकी नाक बराबर गोल दोनों नथनें
जिसके और छोटे छेदवाली नाक जिसकी वह शुभ होती है
और जिसकी नाक आगेसे मोटी बीचमें नीची और पीछे
ऊंची ऐसी हो वह शुभ नहीं होती है ॥१०७ ॥ जिसकी
नाक आगेसे सकुची आगेसे लाल होवे यह विधवा क्वेश-
दायक होती है. और चिपटीनाकवाली दुती होती है और
बहुत छोटी या बहुत बडी नाकवाली औरतको लडाई प्रिय
होती है ॥ १०८॥
अथ च्छिकारक्षणमाह।
दीर्घायुः कृत्रुतं दीर्घ युगपदि त्रिपिण्डितम् ।
अर्थ-जिस औरतके लंबे श्वासकरके दो तीन छींक
आ वह नारी बडी आयुष्य पाती है ।
अथ चक्षुर्लक्षणमाह ।
ललनालोचने शस्ते रक्तान्ते कृष्णतारके ॥ १०९॥
गोक्षारवर्णविशदे सुस्निग्धे कृष्णपक्ष्मणी।
उन्नताक्षी न दीपायुर्वृत्ताक्षी कुलया भवेत् ।। ११०॥
मेपाली महिपाक्षी च केकराक्षी न शोभना ।
कामगृहीता नितरां गोपिङ्गाक्षी सुदुर्वृता ॥ ११ ॥

(३६) - सीजातकम् । अर्थ-जिस औरतका ताल स्निग्ध चिकना कमलके समान लाली लिये होय तो वह नारी कोमलतालुबाली उत्तम होतीहै ॥ १०३ ॥ और जिस नारीका सफेद तालू होय तो विधवा होती है और पीले तालवाली संन्यासिनी होती है और काले वालवाली संतान के वियोगसे दुःखी होती है और रूखे तालवाली बहुत कुटुंबवाली होती है ॥ १०४ ॥ अथ घंटिकालमणमाह । कंठे स्थूला सुवृत्ता च क्रमतीक्ष्णा सुलोहिता । अप्रलंवा शुभा घण्टा स्थूला कृष्णा च दुःखदा१०५॥ अर्थ-जिस औरतके कंठके भीतरका काग मोटा गोल क्रमकरके तीक्ष्ण लाली लिये शुभ होता है और लंबा मोटा कालो होय तो अशुभ होता है ॥ १०५ ॥ अथ हसनलक्षणमाई। अलक्षितद्विजं किंचित्किचित्फुल्लकपोलकम् । स्मितं प्रशस्तं सुदृशामनिमीलितलोचनम् ॥१०६॥ अर्थ-जिस औरतके हँसने के समय थोडे दाँत दौखे और गाल थोडे ऊंचे उठे और आँखे बंद न होवें इस प्रकारका हसना जिस औरतका होवे यह श्रेष्ठ होती है ॥ १०६ ॥ अथ नासिकारक्षणमाह। समवृत्तपुटा नासा लघुच्छिद्रा शुभावहा । स्यूलाया मध्यनिम्ना च न प्रशस्ता समुन्नता ।।१०७॥

भाषाटीकासमेतम् । (३७)
आकुंचितारुणाया च वैधव्यक्लेशदायिनी ।
परप्रेष्या च चिपटा ह्रस्वा दीर्घा कलिप्रिया ॥१०८॥
अर्थ-जिस औरतकी नाक बराबर गोल दोनों नपर्ने
जिसके और छटे छेदवाली नाक जिसकी वह शुभ होती है
और जिसकी नाक आगेसे मोटी बीचमें नीची और पीछे
ऊंची ऐसी हो वह शुभ नहीं होती है ॥ १०७॥ जिसकी
नाक आगेसे सकुची आगेसे लाल होने वह विधवा क्लेश-
दायक होती है. और चिपटीनाकवाली दुती होती है और
बहुत छोटी या बहुत बड़ी नाकवाली औरतको लडाई प्रिय
होती है ॥ १०८॥
अथ च्छिकाक्षणमाह।
दीर्घायुःकृत्क्षुतं दीर्घ युगपति त्रिपिण्डितम् ।
अर्थ-जिस औरतके लंबे श्वासकरके दो तीन छींक
आवै वह नारी बडी आयुष्प पाती है ।
अथ चक्षुर्लक्षणमाह ।
ललनालोचने शस्ते रक्तान्ते कृष्णतारके ॥ १०९।।
गोक्षरिवर्णविशदे सुस्निग्धे कृष्णपक्ष्मणी।
उन्नताक्षी न दीर्घायुर्वृत्ताशी कुलयाभवेत् ॥ ११०॥
मेपाक्षी महिपाशी च केकराक्षी न शोभना ।
कामगृहीता नितरां गोपिङ्गाक्षी सुदुर्वता ॥ ११॥

(३८) नीजानकम् ।
पारावताशी दुःशीला रक्तासी भर्तघातिनी।
कोटरानयना दुष्टा गजनेत्रा न शोभना ॥ ११२ ।।
पुंश्चली वामकाणाक्षी वंध्या दक्षिणकाणिका।
मधुपिंगाक्षी रमणी धनधान्यसमृदिभाक् ॥ ११३॥
अर्थ-जिस औरतके नेत्र लालीलिये काली पुतलीवाले
हो वे शुभ होते हैं ॥ १०९ ॥ गौके दूधके समान सफेदी
लिये विशाल चिकने काली पुतलियोंवाले शुभ होते हैं और
ऊंचाईकरके हीन नेत्रवाली बडी उमर पाती है और गोल
नेत्रवाली कुलटा होती है। ११०॥ मेंटेकेसे व भैसकेसे
गिंगचेकेसे नेत्रवाली शुभ नहीं होताहै. और गौके समान पिङ्ग-
लवर्णके नेत्रवाली सदैव कामकलामें तत्पर होतीहै ॥ १११ ॥
और कबूतरकेसे नेत्रवाली खोटे स्वभाववाली होती है
लालनेत्रवाली स्वामीका घात करताहै और कोटरानेवाली
दुष्टा होतीहै हाथीकेसे नेत्रवाली शुम नही होती है ॥ ११२॥
और बॉई आंखसे कानी औरत वेश्या होतीहै और दहिनी
ऑससे कानी औरत बांझ होताहै और सहतके समान पीले
वर्णके नेत्रवाली औरत धनधान्य अनेक समृद्धियोसहित
होतीहै ॥ ११३॥
अथ पत्मरणमाद।
पश्मभिः सुपनः स्निग्धेः कृष्णः सुक्ष्मः सुभाग्ययुक्|
कपिलेविरलेः स्यूलनिया भवति भामिनी ॥ ११४॥

भापाटीकासमेतम् ।
अर्थ-जिस स्त्रीके पलक घने चिकने श्यामता लिये सूक्ष्म
हाय वे अच्छे भाग्यको करतेहैं और कपिल वर्णके विरले मोटे
जिस नारीके होय वह निंदित होतीहै ।। ११४ ॥
अथ लक्षणमाह ।
ध्रुवो सुवर्तुले तन्च्याः स्निग्धे कृष्णे असंहते।
प्रशस्ते मृदुरोमाणौ सुभ्रवः कार्मुकाकृती ॥ १५ ॥
खररोमा च पृथुला विकीर्णा सरला स्त्रियाः ।
न भूः प्रशस्ता मिलिता दीर्घरोमा च पिङ्गला॥११६॥
अर्थ-जिस औरतकी भौहे चिकनी काली मापसमें एकसे
एक मिली न हो कमानकी तरह गुलाई लिये शुभ होती
हैं. और कोमल रोमवाली धनुष्यके समान आकृतीवाली
शुन होतीहैं ॥ ११५॥ और कठोर रोमवाली या गधेकैसे
बालवाली मोटी फैलीहुई सूधी आपसमें मिलीहुई बहुत लंबी
पिङ्गलवर्णकी शुम नहीं होती है ॥ ११६ ॥
अथ कर्णलक्षणमाह ।
लंबो को शुभावतो सुखदौ च शुभप्रदा।
शष्कुलीरहितौ निधो शिरालो कुटिलो कृशो ॥११७॥
अर्थ-निस औरतके लंबे कान गुलाई लिये सुखके देने-
घाले हाँ चे शुभ होते हैं। चौडाईरहित बहुत नसेवाले दुर्बल
कुटिल अशुज होते हैं ॥ ११७ ॥

(४०)
खीजातकम् ।
अथ भाललक्षणमाह।
भालः शिराविरहितो निलीमार्धेन्दुसन्निभः ।
अनिमख्यडुलो नायीः सौभाग्यारोग्यकारणम् ११८॥
व्यक्तस्वास्तिकरेखं च ललाटं राज्यसंपदे ।
प्रलंबं मस्तकं यस्या देवर इति सा ध्रुवम् ॥ ११९॥
रोमशेन शिरालेन प्रांशुना रोगिणी मता ।। १२० ॥
अर्थ-जिप्स औरतका कपाल नसोरहित रोमहीन अर्द्धच-
न्द्र के समान तीन अड्डल ऊंचा होय वह नारी सौभाग्यवती
निरोगिणी होतीहै ॥११८॥ और जिसके ललाटमें प्रकाश-
वान् कल्याणकारिणी रेखा होय वह राज्यसंपदादायक
जानो और जिसका लंबा माया होय वह नारी अपने देवरका
नाश करती है ।। ११९ ॥ और जिसके माथमे रुगटे और
नसे होच तथा लंबे मस्तकवाली रागिणी होती है ॥१२०॥
अथ सीमंतलक्षणमाह।
सीमंतः सरल शस्तो-
अथ-जिस औरतकी मांग सीधी हो वह शुभ होती है।
अथ शीर्पलक्षणमाह।
मोलि शस्तः समुन्नतः।
गजकुंभनिभो वृत्तः सौभाग्यश्वर्प सूचकः ॥ १२१ ।।
अर्थ-जिसका शिर ऊंचा हाथीके मस्तकके समान गोल
होवे वह सौभाग्य ऐश्वर्यशयक होती है ॥ १२१ ॥

जापाटीकासमेतम् । (४३)
अथ मूर्खलक्षणमाह ।
स्थूलमूर्दा च विधवा दीर्घशीर्षा च बंधकी।
विशालेनापि शिरमा भवेदोर्भाग्यभाजनम् ॥ १२२॥
अर्थ-जिस औरतका चोटीका स्थान मोटा होय वह
विधवा होतीहै । और बड़ा चोटीका स्थान होनेसे पापिनी
होतीहै और बड़े शीसवाली औरत दुष्टभागिनी होतीहै ।। १२२॥
अथ केशलक्षणमाह।
केशा अलिकुलच्छायाः सूक्ष्माः स्निग्धाः सुकोमलाः ।
किंचिदाकुंचितामाश्च कुटिलाश्चातिशोभनाः ॥ १२३ ।।
परुषाः कुटिलायाश्च विरलाश्च शिरोरुहाः ।
पिङ्गला लघवो रुशा दुःखदारिद्यवंधनाः ॥ १२४ ॥
अर्थ-जिस औरतके बालोंकी पंक्ति चूंघरवाले बारीक
चिकने कोमल आगेसे कुण्डलके समान होव कुटिल श्याम हो।
वह केश अतिशुन होते हैं ॥ १२३ ॥ जिसके बाल आगेसे
कुटिल छिदरे पिंगलवर्णके छोटे रुखे वे बाल दुःख दारिय
बंधनको देव हैं ॥ १२४ ॥
तस्मात्परीक्ष्य मतिमान्कन्या लक्षणसंयुताम् ।
विवहेत यथा न स्यात्सर्वयानर्यभाजनम् ॥ १२५ ॥
इति श्रीवंशावरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके पट्पष्टिलक्षणवर्णनोनाम
द्वितीयोऽध्यायः॥२॥

(४२) वीजातकम् ।
अर्थ- पहिले बुद्धिमान् पुरुष पूर्वोक्त लक्षणों से कहहुए
श्रेष्ठ लक्षणोंवाली कन्याको परीक्षा करके विवाह करे जिससे
विवाह करनेसे क्लेशको नहीं पाताहै ॥ १२५ ॥
इति श्रीवंशांवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मज-
राजज्योतिपिपण्डितश्यामलालस्तायां
श्यामसुंदरी
भाषाटीकायां पट्पष्टिलक्षणवर्णनो नाम
द्वितीयोऽध्यायः॥२॥
अथातः संप्रवक्ष्यामि तिलमशकादिलक्षणम् ।
येन विज्ञानमात्रेण न मजेदुःखसागरे ॥ १॥
अर्थ-अब स्कंदजी कहते हैं हे अगस्त्य ! अब तिल म-
स्सा लहसन इत्यादिके मैं लक्षण कहताहूँ जिनके जानने मात्र
करके मनुष्य दुःखसागरमें नहीं डूबताहै ॥ ३ ॥
अथ भूमध्ये तिलमशकलक्षणमाह ।
भ्रुवोरतललाटे वा मशको राज्यसूचकः ।
अर्थ-जिस औरतके भौंहके बीचमें या मामें मस्सा होने
तो वह नारी अपने कुलके अनुसार राज्यको प्राप्त होती है
और राजकन्याके होय तो वह बहुत बड़े राज्यको मात्र
होती है ।
अथ वामकपोले रक्तमशकचिह्नमाह ।
वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नः स्मृतः ॥२॥
अर्थ-जिस औरतके यायें गालमें लालीलिये मस्सेका चिह
हो वह नारी मिष्टान्नका भोग भोगतीहै ॥ २ ॥

जापाटीसमेनम् । (४३) अय हृदये तिलादिचिह्नमाह। तिलक लाछनं वापि हदि सोभाग्यकारणम् । अर्थ-जिस औरतके हृदयमें तिलका चिह्न होवे वह नारी सौभाग्यको प्राप्त होती है । अय दक्षिणल्तने रक्तचिह्नमाह । यस्या दक्षिणपक्षोजे शोणे तिलकलाञ्छने ॥ ३ ॥ कन्याचतुष्टयं सूते सूते सा च सुतत्रयम् ॥ अर्थ-जिस औरत के दहने स्तनमें लाल तिल वा मरसाका चिह्न होवे ॥ ३ ॥ वह नारी चार कन्या भोर तीन पुत्र पैदा करती है। अंथ वामस्तने तिलादिचिह्नमाह । तिलक लोटनं शोणं यस्या वामस्तने भवेत् ॥४॥ एकं पुत्रं प्रसूयादो ततः सा विधवा भवेत् ॥ अर्थ-जिस औरतके बाये कुचपर तिल वा मस्सेका लाल चिह्न होवे ॥ ४ ॥ वह नारी एक पुत्र पैदा होनेके बाद विधवा होती है। अथ दक्षिणगुह्ये तिलचिह्नमाद । गुह्यस्य दक्षिणे मागे तिलक यदि योपितः ॥५॥ तदा क्षितिपतेः पत्नी सूते वा क्षितिपं सुतम् ।। अर्थ-जिस औरतके गृह्यस्थान अर्थाद भगके दहने (४४) खीजातकम् । भागमें तिल होवे वह नारी ॥ ५॥ राजाकी रानी होती है अथवा राज्य करनेवाले पुत्रको पैदा करती है । अथ नासाग्रे तिलचिह्नमाह । नासाये मशकः शोणो महिण्या एव जायते ॥६॥ कृष्णः स एव भर्तृघ्न्याः पुंश्चल्याच प्रकीर्तितः ॥ अर्थ-जिस औरतके नाकके अग्रमागमें लाल मस्सा होग वह नारी रानी होती है ॥ ६ ॥ और वही मस्सा काडे वर्णका होवे वह नारी स्वागीका नाश करनेवाली व्यनि- चारिणी होती है ॥ अथ नाभेरधस्तात्तिलचिह्नमाह । नाभेरधस्तात्तिलकं मशको लाउनं शुभम् ॥ ७ ॥ अर्थ-जिस औरतके नाभिके नीचे तिल मस्सा लहसनस कोई चिह्न होवे तो वह शुभ होता है ॥ ७ ॥ अथ गुल्फे तिलचिह्नमाद । मशकस्तिलकं चिह्न गुल्फदेशे दरिद्रवत् ॥ अर्थ-जिस नारीके एल्फ याने जांचोंमें तिल मस्सा लह सन होये तो दरिदकारक जानो । अथ वाहगे चिह्नमाह। करे कर्णे कपोले वा कंठे वामे भवेद्यदि ॥ ८ ॥ एषा त्रयाणामेकं तु प्राग्गर्भ पुत्रदं भवेत् ॥ अर्थ-मित्त नारीके हाथ कान गाल कंठ या अंग्में

भापटीकासमेतम् । (४५)
तेल लहसन मरसा इन तीनों से एकभी होय तो वह नारी
राहिले २ पुत्र पैदा करतीहै ॥८॥
अथ भाले त्रिशुलचिह्नमाह ।
भालगेन त्रिशूलेन निर्मितेन स्वयंभुवा ॥
नितंबीनीसहस्राणां स्वामित्वं योपिदाप्नुयात् ॥ ९ ॥
अर्थ-जिस औरतके माथेमें त्रिशूलका चिह्न ब्रह्माने ब-
नाया होय वह नारी एक हजार वियोंकी स्वामिनी होती
है ॥ ९ ॥
अथ दंतधर्पणलक्षणमाह।
सुप्ता परस्परं यातु दंतान्किटिकिटायते ।
सुलक्षणाप्यस्ता सा या किंचित्पलपेत्तया॥१०॥
अर्थ-जो नारी सोतेके बीचमें दाँतोको आपसमें किड़कि-
हावे अथवा विसे वह नारी अच्छे लक्षणोंसहितभी होवे तोगी
नष्ट होताहै ॥ १०॥
अथ रोमावर्तचकलक्षणमाह ।
पाणी प्रदक्षिणावता धन्यो वामो न शोभनः ।
अर्थ-जिस नारीके हाथों में दक्षिणावर्त चक्क होवे अथवा
हाथाकी पाठप रामावलीका दक्षिणावतं चक्र हो वह चक्र शुन
होताहै वामावर्त अशुन होताहै ॥
अथ नाभा चकलक्षणमाद ।
नाभी श्रुतापुरसिवा दक्षिणावर्त इंडितः ॥ ११॥

(४६) स्त्रीजातकम्। अर्थ-जिस नारीके टूडी व कान व हृदयपर रोमावलीका दक्षिणावर्त चक्र होवे वह शुभ होता है वामावर्त अशुभ होताहै ॥ ११ ॥ अथ पृष्ठे चक्रलक्षणमाह। सुखाय दक्षिणावर्तः पृष्टवंशस्य दक्षिणे । अर्थ-जिस स्त्रीकी पीठ दहने भागमें रोमावलीका दक्षि- णावर्त चक्र होवे वह शुभ होताहै । अथ पृष्टे वर्तुलाकारचक्रमाह । अतः पृष्ठे नाभिसमो बह्वायुः पुत्रवर्द्धनः ॥ १२ ॥ मर्थ-और जिसकी पीठमें गोलाकार नाभिके समान चीचाबीचमें चक्र होवे वह नारी बडी उमरयाले पुत्रोंकी वृद्धि करतीहै ॥ १२॥ अथ भगललाटे चक्रमाद । राजपल्या प्रश्यते भगमौलिप्रदक्षिणः । स चेच्छकटभंगः स्याद्रहुपुत्रसुखप्रदः ॥ १३ ॥ अर्थ-और जिस स्त्रीके जगके माथेपर दक्षिणावर्त चक्र हो वह नारी राजपली होती है और जो टूटेहुए; शकलकी तरह भगके ऊपर चिह्न हो तो वह नारी बहुत पुत्रोंका सुख पाती है ॥ १३ ॥ अघकाटिगुह्यत्यले चक्रमाद । कटिगो गुलकावर्तः पत्यपत्यविनाशिनी ।

--- भाषादीकासमेतम् । (४७) अर्थ-और जिसके कमरमें वा गुह्यस्थलमें रोमावलीका चक्र होवे वह नारी पति और पुत्रोंका नाश करताहै ॥ अप पृष्ठोदरे चक्रमाह। स्यातामुदरखधेन पृष्ठावर्ती न झोभनों ॥ १४ ॥ एकेन हंति भतारं भवेदन्येन पुंश्चली। अर्थ-जिस नारीके पेट और पीठमें दोनों रोमावलीका चक्र होवे तो वह नारी शुन्ज नहीं होताहै ॥ १४ ॥ जो एकचक्र होवे तो स्वामीका नाश करे और दोनों चक्र हो तो वह नारी व्यभिचारिणी होतीहै । अथ कण्ठे चक्रलक्षणमाह। कंगो दक्षिणावर्तो दुःखवैधव्यहेतुकः ॥ १५ ॥ अर्थ और जो कण्ठमें रोमावलीका चक्र हो तो वह नारी अनेकपकार व्याधियुक्त विधया होती है ॥ १५॥ अप सीमंरललाटे चक्रमाह। सीमतेऽथ ललाटे वा त्याज्या दूरे प्रयत्नतः । सा पति हन्ति वर्षेण यस्यामध्ये कृकाटिकाम् ॥१६॥ अर्थ-जिस नारीके मांगमें या माथेमे या काठीमें रोमाव- श्रीका चक्र होवे वह नारी एकवर्षके सीतरही पतिको नाश करती है उसको दूरहीसे त्याग करना चाहिये ॥ १६॥ अथ शिखास्थाने चक्रमाह। प्रदक्षिणो वा वामो वा रोग्णामावतः स्त्रियाः ।

(४८) स्त्रीजातकम् । एको वा मूनि द्वौ वा वामे वामगती अपि ॥ १७ ॥ मादशाहं पतिनो तो त्याज्यो दूरात्सुबुद्धिना ! अर्थ-जिस औरतके दक्षिणावर्त और वामावर्तमें रोमा- वलीका चक्र चोटीके स्थानमें एक अथवा दो हो तो वामावर्त चक्र नेष्ट है ॥ १७ ॥ वह नारी दशदिनके भीतर पतिको नाश करती है उसको बुद्धिमान् दूरसे त्याग करै ॥ १७ ॥ अथ कटिचक्रमाह। कट्यावर्ता च कुलटा- अर्थ-जिसके कमरमें रोमावलीका वामावर्त चक्र होवे वह कुलटा होती है। अथ नाभौ चकलक्षणमाह । नाभ्यावर्ता पतिव्रता ॥ १८॥ पर्थ-जिसके ढूंडीमें चक्र होवे वह पतिव्रता होती है ॥१८॥ अथ पृष्टे चक्रमाह । पृष्ठावर्ता च भर्तृघ्नी कुलटा वाथ जायते ॥ १९ ॥ अर्थ-जिसकी पीठों वामावर्त चक होवे वह पतिको नाश करनेवाली व्यभिचारिणी होती है ॥ १९॥ स्कंद उवाच । अथ सुलक्षणावतीत्याज्यत्वमाह । सुलक्षणापि दुःशीला कुलक्षणशिरोमणिः।

भाषाटीकासमेतम् । (४९)
अर्थ-अब स्कंदजी कहते हैं जो स्त्री सर्वलक्षणसंपन्न
हो और दुःशीला व्यभिचारिणी होय उसको सर्वथा त्याग
करना चाहिये वह नारी कुलक्षणवती स्त्रियों में शिरोमणि समज्ञाना
चाहिये ॥ १९ ॥
अथ कुलक्षणवतीग्राह्यत्वमाह ।
अलक्षणापि या साध्वी सर्वलक्षणसंयुता ॥ २० ॥
अर्थ-जो स्त्री संपूर्ण कुलक्षणों करके संयुक्त हो और
पतिवता होय वह नारी सर्वलक्षणवती स्त्रियोंमें अग्रणी गिनी
जाती है ॥ २० ॥
अथोत्तमन्त्रीप्राप्तिपोगमाह।
सुलक्षणा सुचारित्रा स्वाधीना पतिदेवता।
विश्वेशानुग्रहादेव गृहे योपिदवाप्यते ॥ २१ ॥
अर्य-सर्वशुलक्षणवी नारी शुमचरित्रोंसे युक्त अपने
पतिके अधीन निज पति है देव जिसके ऐसे श्री शिवजीकी
रुपासे घरमें प्राप्त होती है ॥ २१ ॥
अथ स्त्रीणां सौंदर्यहेतुमाह।
अलंकृताः सुवासिन्यो याभिः प्राक्तनजन्मनि ।
नानाविधैरलंकारस्ताः सुरूपा भवन्ति हि ॥ २२ ॥
सुतीर्थेषु वपुयाभिः क्षालितं वा विहाय तत् ।
ता लावण्यतरंगिण्यो भवंतीह सुलक्षणाः ॥२३॥

(४८) स्त्रीजातकम् । एको वा मूनि द्वौ वा वामे वामगती अपि ॥ १७ ॥ बादशाहं पतिनो तो त्याज्यो दूरात्सुबुद्धिना। अर्थ-जिस औरत के दक्षिणावर्त और वामावर्तमें रोमा- वलीका चक्र चोटीके स्थानमें एक अथवा दो हों तो वामावर्व चक्र नेष्ट है ॥१७॥ वह नारी दशदिन के भीतर पतिको नाश करती है उसको बुद्धिमान् दूरसे त्याग करै ॥ १७ ॥ अथ कटिचक्रमाह। कट्यावर्ता च कुलटा- अर्थ-जिसके कमरमें रोमावलीका वामावर्त चक्र वह कुलटा होती है। अथ नाभौ चक्रलक्षणमाह । नाभ्यावर्ता पतिव्रता ॥१८॥ अर्थ-जिसके ढूंडीमें चक्र होवे वह पतिव्रता होती अथ पृष्टे चक्रमा । पृष्टावर्ता च भर्तृघ्नी कुलटा वाथ जारने अर्थ-जिसकी पीठमें वामावर्त चक्र हे नाश करनेवाली व्यभिचारिणी होती है ॥ १. स्कंद उवाच। अथ सुलक्षणावतीत्याज्यर सुलक्षणापि दुःशीला

भाषाटीकासमेतम् । (५१)
अतः सुलक्षणा योपाः परिणेया विचक्षणः ।
लक्षणानि परीक्ष्यादौ हित्वा दुर्लक्षणान्यपि ॥ २७ ॥
इति श्रीशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादा-
मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके तिलमशकादिलक्षणवर्णनो
नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
अर्थ-अच्छे लक्षणोंकरके उत्तम चरित्रों करके थोडे आयु-
ध्ययाले पतिको आनंदकरके दीर्घायु करदेती है ॥ २६ ॥ इस
कारणसे विवाहके पहिले लक्षणों की परीक्षा करके और दुष्ट-
लक्षणवतीको त्यागकरके सुलक्षणवती ग्रीको बुद्धिमान् विवाह
फरे ॥ २७ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मजरा-
जज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकनायां श्यामसुन्दरी-
मापाटीकायां तिलमशकादिवर्णनो नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
प्राहुस्तुल्यं नखनितयोर्जन्म होगविधिज्ञाः
१ राहा-"यग्राफ नामो क्षममंगना नजदेपनि कासाई
विधेयम् । तासा तु ममरण निधने वपुस्तु दुगः शुमगजारतमये पतिय
तथा प-"यने शशांके च वपुर्विचिन्त्यं तयोः कात्र पतिवम-
मानि । मुनाल्यमावे प्रसवोऽवगम्यो वैधव्यमस्ताः किल कालगेहे ॥ २॥
यजन्मालावदितं नराणां होराप्रमाणः फरमेतदेव । स्त्री प्रकल्प्यं खलु
घेदय म्यं तत्रायके तत्परिवेदितव्यम् ॥ ३॥" भन्यच्च ग्रथांतरे-"स्त्री पुरु
पयो समन योग्या दशा पूर्वोक्तम् । यद्यद्य ग्यं पतिसामान्य तत्त
घदेस्तनापु ॥४॥

(५०) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ--जिस नारीने पूर्वजन्ममें क्वाँरी कन्या वा ब्राह्मणकी
स्त्रियोंको अनेक वस्त्र और आभूषणोंकरके अलंकृत कियाहै
वह नारी इस जन्ममें सुंदर रूपवती होती है ॥ २२ ॥ जिस
स्त्रीने पूर्व जन्ममें अच्छे तीथों में शरीरको स्नानकराया अथवा
उत्तम तीर्थमें देहको त्याग कियाहै वह नारी श्रेष्ठ रूपवती सर्व
सक्षण संपन्न स्त्रियाँ होती हैं ॥ २३ ॥
अथ पतिवश्यमाह ।
आर्चता जगतां माता याभिर्मुडवधूरिहं ।
ता भवन्ति सुचारित्रा योषाः स्वाधीनभर्तृकाः॥२४॥
स्वाधीनपतिकानां च सुशीलाना मृगीदृशाम् ।
स्वर्गापवर्गाववव सुलक्षणफलं हि तत् ॥ २५ ॥
अर्थ- जिन स्त्रियोंने इस जन्ममें पार्वती वा दुर्गा भवानीका
पूजन कियाहै सो नारी सर्वगुणसंपन्न अच्छे चरित्रपाली
पतिको वशमें करनेवाली होती हैं ॥ २४ ॥ और जिन स्त्रियों
के वशमें पति है और सुंदर है स्वनाव जिनका उन स्त्रियोंको
स्वर्ग ता मोक्ष इसी जगह है ये श्रेष्ठ लक्षणोंवाली नियोंका
निश्चय करके फल जानना ॥ २५ ॥
अय साध्वीप्रसंगादीर्घायुष्यमाह ।
सुलक्षणेः सुचरितरपि मंदायुपं पत्तिम् ।
दीर्घायुपं प्रीति प्रमदाः प्रमदास्पदम् ॥ २६॥

भाषाटीकासमेतम् । (५१)
अतः सुलक्षणा योषाः परिणेया विचक्षणः ।
लक्षणानि परीक्ष्यादौहित्वा दुर्लक्षणान्यपि ॥ २७ ॥
शति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादा-
त्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके तिलमशकादिलक्षणवर्णनो
नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥
अर्थ-अच्छे लक्षणोंकरके उत्तम चरित्रों करके थोडे आयु-
ध्यवाले पतिको आनंदकरके दीर्घायु करदेती है ॥ २६ ॥ इस
कारणसे विवाहके पहिले लक्षणोंकी परीक्षा करके और दुष्ट-
लक्षणवतीको त्यागकरके सुलक्षणवती श्रीको बुद्धिमान् विवाह
करे ॥ २७ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मजरा-
जज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकनायां श्यामसुन्दरी-
भापाटीकायां तिलमशकादिवर्णनो नाम
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
प्रोस्तुल्यं नखनितयोर्जन्म होगविधिज्ञाः
१ वराह:-"पवस्फल नरभवे क्षममगनाना तत्तदेत्यतेषु वा सफल
विधेयम् । तास तु भर्तृमरणं निधने वपुस्तु लग्नंटुगः शुभगजारतमये पतिश्च
"तथा च-"ग्ने शशांके च वपुविचारय तयोः पन्ने पविभ-
पानि । सुताख्यमावे प्रसवोऽवगम्यो वैधव्यमस्थाः क्लि बालगेहे ॥२॥
यजन्मयालाद्गदित नराणां होराप्रवीणः फरमेतदेव । स्त्रीण प्रकल्प्यं खलु
चेदयो ग्यं तत्रायके तत्परिवेदितव्यम् ॥ ३॥ अन्यच्च ग्रयांतरे-"स्त्री पुरु
पयोः समन योग्या दशा पूर्वोक्तम् । यद्योग्य पतितोमाम्यं तत्तत्स
घदेवनाथेयु ॥ ४॥

(५२) वीजातकम् । किंतु स्त्रीणां फलमनुचितं तत्पती तत्प्रकल्प्यम् ।। यूनावाच्यः पतिशुभगते ध्रगे भर्तृमृत्यु- नोहारांशोरुदयगृहत्तरतद्वपुञ्चितनीयम् ॥ १ ॥ अर्थ-जो फल पुरुषोंके जन्मकालमें ज्योतिषशास्त्र जानने- वालोंने कहा है सो फल स्त्रियोंकोसी कहना चाहिये जैसे थी युरुपकी परमायुदशाका विचार इत्यादि दोनोंको बराबर कहना चाहिये और जो फलतियों के कहने लायक नहीं होय जैसे राजयोग अन्यकारकादि पतिको सौभाग्यदायक सो योग स्त्रीके पतिको फलदायक कहना चाहिये और लनसे वा चंद्रमा सप्तम स्थानसे पतिका शुभ फल कहना चाहिये और लग्न वा चंद्रमासे अष्टमस्थानसे भतीकी मृत्युका विचार करना और लग्न और चंद्रमा जिस स्थानमें स्थित होय वहांसे वीके शरी- रका विचार करना चाहिये ॥ १ ॥ अथ स्त्रीणां वैधव्यसौभाग्यसुखसौंदर्य- विचारस्थानमाइ । वैधव्यं निधनगृहे पतिसौभाग्यं सुखं च यामिवे । सौन्दर्यतां लग्नगृहे विचिन्तयेत्युत्रसंपदं नवमे ॥ २ ॥ एषु स्थानेषु युक्त्यः सौम्याः शुभदा वलान्क्तिा ज्ञेया। रास्तु नेटफलदा भवनेशविवर्जिताः सदा चिंत्याः३॥ अर्थ-त्रियोंके विधवादियोग अष्टमस्थानसे विचारला.

भाषार्टीकासमेतम् । (५३)
और पतिका सौभाग्य और पतिका सुख सप्तम स्थानसे विचार
करना चाहिये, और शरीरकी खूबसूरती लगसे देखना
चाहिये और पुत्रसंपदा नवम स्थानसे विचारला ॥ २ ॥ जिन
स्त्रियोंके जन्मकालमें पहिले कहेहुए स्थानों में शुजगह बैठे होय
तो शुभ फल देतेहैं और पापग्रह इन स्थानों में स्थित होय तो
नेष्ट फल देते हैं, केवल पूर्वोक्त स्थानोंके स्वामी पापग्रह अपने
स्थानमें स्थित हो तो उनको नेध न कहना चाहिये किंतु वे
श्रेष्ठफलदाता होयेंगे ॥ ३॥
अथ पुरुषाकृतियोगः ।
पुरुपर्शे पुरुषांझे लगेन्द्रोः पापयुक्तयोर्जाता।
पुरुषाकृतिशीलयुतामर्तुयोग्यासमंजसा कन्या ।। ४॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मलममें लग्न और चंद्रमा पुरुष
राशि अर्थात् ।। ३ । ५।७।९।११ राशियोंमें
स्थित होवे और इन्हीं राशिके नवांशमें स्थित होष
और वहाँ लम चंद्रमा पापग्रहोंकरके युक्त वा दृष्ट होय तो
वह कन्या पुरुपस्वभाववाली पंतिके लायक नहीं खराब
होती है ॥ ४ ॥ तथा च गुणाकरः-"पुदेहशीलसहितान्य-
तमस्थयोश्च पापाः खलैगतिवृता युतदृष्टयोस्तु" ॥
अथ स्याकृतियोगः।
समराशी समभागे लगेन्द्रोः स्त्रीगुणान्विता कन्या।
सौम्पयुते दृष्टे या सुभगा साधी सुविख्याता ॥५॥

(५२) वीजातकम् । किंतु स्त्रीणां फलमनुचितं तत्पती तत्प्रकल्प्यम् ।। यूनावाच्यः पतिशुभगते ध्रगे भर्तृमृत्यु- नौहारशोरुदयगृहतरत्तदपुश्चितनीयम् ॥ १॥ अर्थ-जो फल पुरुषों के जन्मकालमें ज्योतिपशाव जानने- वालोंने कहा है सो फल खियोंकोसी कहना चाहिये जैसे स्त्री युरुपकी परमायुदशाका विचार इत्यादि दोनोंको बराबर कहना चाहिये और जो फल नियोंके कहने लायक नहीं होय जैसे राजयोग अन्यकारकादि पतिको सौभाग्यदायक सो योग नीके पतिको फलदायक कहना चाहिये और लमसे वा चंद्रमाने सप्तम स्थानसे पतिका शुभ फल कहना चाहिये और लग्न वा चंद्रमासे अष्टमस्थानसे भतीकी मृत्युका विचार करना और लम और चंद्रमा जिस स्थानमें स्थित होय वहांसे स्त्रीके शरी- रका विचार करना चाहिये ॥ १ ॥ अथ स्त्रीणां वैधव्यसौर माग्यसुखसौंदर्य- विचारस्थानमाह। वैधव्यं निधनगृहे पतिसौभाग्यं सुखं च यामित्रे । सौन्दर्यता लमहे विचिन्तयेत्सुत्रसंपदं नसमे ॥२॥ एषु स्थानेषु युक्त्यः सौम्बाः शुभदा बलान्विता ज्ञेयाः। रास्तु नेष्टफलदा भवनेशविवर्जिताः सदा चिंत्याः३॥ अर्थ-खियोंके विधवादियोग - अष्टमस्थानसे विचारला

भाषारीकासमेनम् । (५३)
और पतिका सौभाग्य और पतिका सुख सप्तम स्थानसे विचार
करना चाहिये. और शरीरकी खूबसूरती लमसे देखना
चाहिये और पुत्रसंपदा नवम स्थानसे विचारना ॥ २ ॥ जिन
स्त्रियोंके जन्मकालमें पहिले कहेहुए स्थानोंमें शुभग्रह बैठे होयें
तो शुभ फल देतहैं और पापग्रह इन स्थानोंमें स्थित होय तो
नेष्ट फल देते हैं. केवल पूर्वोक्त स्थानोंके स्वामी पापग्रह अपने
स्थानमें स्थित होय तो उनको नेष्ट न कहना चाहिये किंतु वे
श्रेष्ठफलदाता होयेंगे ॥ ३॥
अथ पुरुषाकृतियोगः।
पुरुषः पुरुषांशे लग्नेन्द्रोः पापयुक्तयोर्जाता।
पुरुपाकृतिशीलयुताभर्तुयोग्यासमंजसा कन्या ॥४॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मत्तम लम और चंद्रमा पुरुष
राशि अर्थात् ।। ३ । ५१७१९।११ राशियों में
स्थित होवे और इन्हीं राशिके नवांशमें स्थित होय
और वहां लग्न चंद्रमा पापयहोकरके युक्त वा दृष्ट होय तो
वह कन्या पुरुषस्वजाववाली पंतिके लायक नहीं खराब
होती है ॥ ४ ॥ तथा च गुणाकर:-"पुंदेहशीलसहितान्य-
तमस्थयोश्च पापाः खलैगतिवृता युतदृष्टयोस्तु" ॥
अथ स्याकृतियोगः।
समराशो समभागे लनेन्द्रोः स्त्रीगुणान्विता कन्या।
सोम्ययुते दृष्टे या सुभगा साग्वी सुविख्याता ॥५॥

(५४) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें समराशि अर्थात् २॥ ४।६।८।१०।१२ इन राशियोंमें और इन्हींके नवां- शमें लमचंद्रमा दोनों स्थित हो तो यह नारी स्त्रियोंकीसी मारुतिवाली स्त्रीगुणोंसहित होती है उन्हीं समराशिस्थित लम चंद्रमाको शुभग्रह देखते होय वा युक्त होय तो वह नारी श्रेष्ठमाग्यवती पतिव्रता करके विस्थात संसारमें होती है ॥५॥ चराह-"युग्मेषु लमशशिनोः प्रतिस्थिता स्त्री सच्छीलभूपण- युता शुभदृष्टयोश्च ॥ ओजस्थयोश्च मनुजारुतिशीलयुक्ता पापा च पापयुतबीक्षितयोर्गुणोना ॥ १ ॥ गुणाकरः-"चन्द्रा- अन्योः समगृहे प्रकृतिस्थिता स्त्री रूपान्विता शुभनिरीक्षितयोः सुशीला " अथ मिश्राकृतियोगः। लगेन्द्र विपमर्शगो शुभातौ सौम्यग्रहालोकितो नारी मिश्रगुणाकृतिस्थितिगतिप्रज्ञावती जायते । युग्मागारगतौ तु पापरहितो पापेक्षितो वा तथा तद्राशीशयुतेक्षितग्रहवलादायुः समरतं विदुः ॥६॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें लग चंद्रमा विपमराशि विपम नवांशके विषे स्थित होय और शुभग्रहोंकरके युक्त वा दृष्ट होय वह नारी मध्यम गुणोंवाली मिश्रचाल बुद्धिमती होती है और वही लग चंद्रमा समराशि समनशमें स्थित पाप यहाँकरके युक्त वा दृष्ट होय तो वह नारी मिश्रस्वाभाववाली मिश्र- भाषाटीकासमेतम् । (५५) एणा होताहै अथवा लग्नचंद्र राशीशको जो ग्रह देखते होय उनका बल देखके सम्पूर्ण श्रीकी आयुष्य कहनी चाहिये ॥६॥ अथ त्रिंशशिवलविचारः। लग्नदायों बलवांस्तस्य विंशांशकैः फलं वाच्यम् । विशाशे बलवांस्तत्प्रोक्तफलानि निसर्गतो यान्ति७|| अर्थ-त्रियोंके जन्मकालमें जन्मलन वा चंद्रमा इनमेंसे जो अधिक बलवान होय तिसके त्रिंशांशसे फल कहना त्रि- शके चलते स्वाभाविक फल कहताहुँ ॥ ७ ॥ अथ शिशिवशात्फलमा । अथ भौमगृहे लनेन्द्रोस्त्रिंशांशव- शाकमात्फलम् । लग्नेथवेन्दोकुजराशिपातत्रिंशांशकस्थेकुजपूर्वकाणाम् कन्येवदुष्टासुशठाथसाध्वीदुर्वृत्तियुक्ताभवत्तीहदासी ८॥ अर्थ-जिस स्त्रीका लम और चंद्रमा मंगलके मेष या वृश्चिकराशिम प्राप्त होय और पहिले मंगटके त्रिंशांशम स्थित होय तो वह स्त्री विवाहके पहिले परपुरुषसे सोग करता है और वही. राशिस्थित लग्न चंद्रमा बुधके त्रिशां- शमें स्थित होय तो वह स्त्री शठ माया रचनेवाली होती है, और वही लय चंद्रमा बृहसतिके त्रिंशांशमें स्थित हाय तो पतिव्रता होतीहै और शुक्रके त्रिशांशमें स्थित होय तो वह स्त्रीजातकम् । कन्या खोटो जीविका करनेवाली अतिनिंद्य होती है और वही लम चंद्रमा १ वा ८ राशि स्थित शनैश्चरके त्रिशांशमै होय तो वह कन्या दासी होती है ॥ ८ ॥ तथा च वराह:-"कन्यैव दुष्टा व्रजतीह दास्यं साध्वी समा या कुचरित्रयुक्ता ॥ भूम्यात्मजः क्रमशोशकेषु वार्किजी- बेन्दुजमार्गवाणाम् ॥ १॥" तथाच-“लनेन्दोबलवान्कुजस्य भवने शुक्रस्य खाग्न्यंशके कन्या स्यादतिन्दितां सुरगुरोः साधी नितांतं भवेत्॥ दुष्टा भृतनयस्य नूनमुदिता सौम्यस्य मायादिनी दासी तिग्ममरीचिमनुगगनाम्न्यशे फलानि क्रमाव॥" तथाच होरारत्ने-“भौमक्ष भौमांशे कन्या मृतसुतगुणहीना । मन्दांशस्था प्रेष्या दुःशीला बहुविधा नारी ॥ १ ॥ पुत्रवती जीवांशे बहुव्ययाती पतिव्रता कन्या। सौम्यांश नाचाराल्पप्रसूतिः स्यात् ॥ २ ॥ कन्याजननी कन्या शुक्रांश जारोगसंतुष्टा ॥ नानोरप्येवं त्रिंशांशफलं समादेश्यम् ॥ ३॥ अथ बुधभवने त्रिशांशशात्फलम् । तारानायकपुत्रभेऽवनिसुते त्रिशल्लो कार्पटा शोके हीनमनोभवा शशिमुनस्पातीव युक्ता गुणः । देवाधीशपुरोहितस्य हि भवेत्साध्या नितांत तथा खाग्न्यंशे मुनस्य मानिगदिता जीवस्यभार्याबुधैः९॥ अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें लप और चंद्रमा बुधकी राविश६में स्थित मंगल के त्रिशांशमें स्थित होय तो यह कन्या बहुमाया मलि- भाषाटीकासमेतम् । (५७) छली होतीहै, और वही लग्न चंद्रमा शुक्रके त्रिशांशमें स्थित हो तो वह कन्या रतिक्रीडासे हीन होता है और वही लपचं- द्रमा बुधके त्रिशांशमें स्थित होय तो वह कन्या बहुत गुणों- करके युक्त होतीहै और वही लग्न चंद्रमा बृहस्पतिके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह कन्या निरंतर पतिव्रता होतीहै और वही लग्न चंद्रमा शनिक त्रिंशांश स्थित होय तो वह कन्या नपुंस- क अर्थात हिनडाकी स्त्री होती है ॥९॥ उक्तं च होरामकरदे- 'स्यात्कापटी गुणयुताथ सती बुधर्श विक्षिप्तमन्मथमथो च नपुं- सकश्च । तथा च वराहा:- स्यात्कापटी क्लीबसमा सती च बौधे गुणाच्या प्रविकी गकामा । ' वृद्धयवन:-बुधवने गौमांशे कन्या जारनियाल्पपुत्रा स्यात् ॥ मंदांश क्लीवसमा मृतप्रजा वान्यजयुता॥ १ ॥ साम्नी पतिप्रिया वा जीवांशे क्षेत्रगते तुंगगे जीवे । सौम्यांशे च कुलाढ्या पशुधनमोगान्धिता शुक्रे ॥ २ ॥ अथ गुरुभवने निशाशयशारफलम् । देवाचार्यगृहेऽमृतांशुरथवा लग्नं खवयंशक सूसूनोर्गुणशालिनी सुरगुरोः स्याता गुणानां गणः ।। तासम्वामिसुतस्य चारुविभवा शुकस्य साध्वी भवे- नूनं भानुसुतल्यचारपसुरताकांता बुधैःकीर्तिता १० अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें लग्न या चंद्रमा वृहस्पति- की सशिम १ | १२ में स्थित मंगलके शिशिमें स्थित होय तो वह नारी त्रियों में गुणवती होती है, और वही लम ।

(५८) स्त्रीजातकम् । चंद्रमा बृहस्पतिके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी अनेकगु- गोंके गणकरके विख्यात होतीहै और वही लम चंद्रगा बुधके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह कन्या उत्तम वैभवकरके संयुक्त होती है और शुक्रके त्रिंशांशमें लग्न चंद्रमा स्थित होय तो वह नारी पतिव्रता होती है, और वही लग्नचंद्रमा शनैश्चरके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह कन्या थोडी रति करनेवाली होती है ऐसा पंडितजनोंने वर्णन कियाहै ॥ १० ॥ तथा च वराहा-"जीवः भौमांशे कन्या व्यभिचारिणी सुविख्याता । सौरांशे तु दरिद्रा कन्याजननी स्वतंत्रतानिरता ॥१॥ जीवांशे तु धनाढ्या सौम्यांशे लोक्पूजिता ललना । पुत्रवती शुक्राशे पगुणयुक्ता पतिव्रतासाध्वी ॥ २ ॥ गुणाकरः-"गुणाढ्य- श्वर्यसंयुक्ता जीवा गुणशालिनी। साध्वी स्वल्पगुणा प्रोक्ता भौमादीनामिहाशकः ॥" अथ भृगुभवने त्रिंशांशवशात्फलम् । दैत्याचार्यगृहे सुरेंद्रसचिवस्याकाशवह्नयंशके लने वाप्युडुनायके गुणवती भोमस्य दोश्याधिका । सौम्यस्यातिकलाकलापकुशला शुक्रस्य चञ्चद्गुणे- युंक्तायेनिपुणदिवामाणिसुतस्याशे पुनभूरिति ॥ ११ ॥ अर्थ-और जिस कन्याके जन्मकालमें लम और चंद्रमा शुक्रकी राशि २ । ७ में स्थित होकर बृहसतिके त्रिंशांशमें बैठे हॉय वह कन्या स्त्रियोंमें गुणवती होतीहै और भापाटी समेतम् । (५९) वही लम चंद्रमा मंगलके त्रिंशांशमें स्थित होवे तो वह कन्या दुष्टा होती है और बुधके त्रिंशांशमें स्थित होय वो वह कन्या समस्त चातुरीकलामें कुशल होतीहै और वही लम चंद्रमा शुक्रके विशांशमें स्थित होय तो वह कन्या 'दीनिमान गुणों- करके युक्त होती है और वही लग चंद्रमा शनैश्चरके विंशां- शमै स्थित होय तो उस नारीके दो विवाह होते हैं ॥११॥ अथातः होरामकरन्दे- 'दुष्टा कलासु निपुणा गुणशालिनी च ख्याता गुणै गुगृहे वनिता पुनर्भूः' इति । अन्यच्च वृद्धयवन:- "सितनवने भौमांशे दुष्टा खलपिया पतिदेष्या । मन्दाशे च पुनर्भूर्मूतमजा रोगसंयुता नित्यम् ॥ १॥ रूपाविता गुणान्या जीयांशे गर्तृपुत्रसंपन्ना ।। कुचरित्रा सौम्यांशे काव्यरलागेयस- तुष्टा ॥ २ । शुक्रांरो भोगवती विदग्धदायिता जगलिया स्याता ॥ पापयुते बलहीने विंशांशेनैव पुष्टफलमेति ॥३॥" अब शनिभवने विंशशिवशात्फलम् । मन्दालये खामिलये कुजस्य दासी च सौम्यस्य खला हि वाला । बृहस्पतेः स्यात्पतिदेवता सा पन्ध्या भृगोर्नीचरतार्कसुनोः ॥ १२॥ अर्थ-जिस खोके जन्मकालमें शनैश्चरके १०। २१ राशिमें लन वा चंद्रमा स्थित होकर मंगलके त्रिशांशमें स्थित होय तो वह कन्या दासी होता है और यही व्य चंद्रमा बुधके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह सी दुष्ट स्त्रीजातकम् । होताहै और वही लम चंद्रमा बृहस्पतिके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी पतिदेवता अर्थात् पतिव्रता होतीहै और वही लम चंद्रमा शुक्रके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी बाँझ होताहै और वही लग्न चंद्रमा शनैश्चरके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी नीच पुरुषोंसे गमन करनेवाली होतीहै ॥१२॥ गुणाकार:-"दासी दुष्टा भर्तृभक्ता न वन्ध्या नीचा- सक्ता मन्दचन्द्रांशतन्वोः । त्रिंशांशे तु मासुतादियहाणामुक्त ज्ञेयं तत्फलं वीर्पयोगात् ॥' अन्यच्च ग्रंथांतरे “मन्दः भौमांशे दासी कुल्टा मृतप्रजा कन्या ॥ मन्दांशे संभृता नीचा- रातिश्च दुर्भगा वनिता ॥ १ ॥ भर्तृप्रिया च सुभगा जीवाशे नैकनामभिः ख्याता । ममवता च कुलटा बहुमाया सौम्यत- स्यांशे ॥ शुक्रांशे प्रभुशीला वंध्या चारित्रलोचना वनिता ॥ त्रिंशांशफलमेव वक्तव्यं दैवविदिरबलायाः ॥ ३॥" अय सूर्यभवने त्रिंशांशवशास्फलम् । लग्ने वा विधुरर्कमंदिरगतो भोमस्य खाग्यशके स्पेच्छासंचरणोधता शशिसुतस्पातीव दुष्टाशया। देवाधीशपुरोधतो निगदिता सा राजपनी भृगोः पोश्चलपाभिरताशनेरतितरांपुंवत्प्रगल्भागना ॥१३॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें लम और चंद्रमा सूर्यके स्थानमें स्थित होकर मंगलके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी अपनी इच्छाचारी विचरनवाली होती है और वही भाषाटीकासमेतम् । (६१) व्य चंद्रमा बुधके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी अत्यंत दुष्टा होता है और वही लग्न चंद्रमा वृहस्पतिके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी राजपली होतीहै और वही लम चंद्रमा शुक्रके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह कन्या वेश्याकर्ममें तत्पर होतीहै और वही लग्न चंद्रमा शनिके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी पुरुपके समान प्रगल्मा होतीहै ॥ १३ ॥ तथा च होरामकरन्दे "स्वेच्छाचारा शिल्पिनी सद्गुणाढ्या दुःशीला स्याकांतिहा चेंदुराशौ । वाचाटा च ब्रनो युंचरित्रा सोमे आर्यागम्यगा पुंश्चली च ॥ १॥ अन्यच्च "वाचाटा रविनावे कुजनावे जारिणी विदेशरती ॥ कुशला कुशीलदरिद्रा मंदारों बहना नेया ॥ १ ॥ पुरुषाकृतिशीलयुता सौम्यांशे कार्यचौ- रिणी कुलटा । कुपतिप्रियाल्पसता शुक्रांशे नित्यरोगिणी भवति ॥ २॥" अथ शशिभवने त्रिंशांशवशारफलमाह । चन्द्रागारे खामिभागे कुजस्य स्वेच्छावृत्तिस्य शिल्पे प्रवीणा । वाचां पत्युः सगुणा भार्गवस्य साध्वी मंदस्य प्रियप्राणहंत्री ॥१४॥ अर्थ-जिस स्त्रीके चंद्रमाके स्थानमें ४ लम और चंदमा स्थित और मंगलके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी अपने इच्छानुसार विचरनेवाली हो और वही लम चंद्रमा बुधके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी राजगिरीके काममें चतुर होती है और वही लम चंद्रमा बृहस्पतिके त्रिंशांशमें स्थित होय

(६२) स्त्रीजातकम् ।
तो वह नारी अच्छे गुणवाली होतीहै और यही लग्न चंद्रमा
शुक्रके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह नारी पतिव्रता होतीहै
और वही लग्नचंद्रमा शनैश्चरके त्रिंशांशमें स्थित होय तो वह
नारी अपने स्वामीके प्राणोंको नाश करती है ॥ १४ ॥
अन्यच्च ग्रंथांतरे उक्तं च-"शशितवने गौमांशे स्वच्छंदा
कामिनी विनष्टसुता । मंदांशे पतिहीना कच्छ्रेणोपजीवनं लमते
॥१॥ अल्पसुता क्षीणयुता जीवांशे शिल्पिनी वुधस्यांशे।
वघ्या मृतप्रजा पा शुक्रांशेष दुष्टतमा ॥२॥
चन्द्रार्कस्फुटयोगात्रिंशांशफलं विनिर्दिशेत्तस्याः ।
लगदोर्योगवशात्रिंशाशबलं विनिर्दिशेदथवा ॥१५॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेव
प्रसादात्मजराजज्योतिपिकपंडितश्यामलाल
विरचिते स्त्रीजातके त्रिंशांशवशात्फलवर्ण-
नो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। ४॥
अर्थ-चंद्रमा और सूर्य के स्पष्ट योगते तिस औरतका
त्रिंशांशसे फल कहना चाहिये अथवा लम चंद्रमाके चलते
त्रिंशांशका फल कहे ॥ १५॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीपलदेवप्रसादात्मज
राजज्यौतिपिकपण्डितश्यामलालझतायां. श्यामसुन्दरी-
सापाटीकायां त्रिशांशफलवर्णनो नाम
चतुर्थोऽध्यायः॥४॥

भाषाटीकासगतम्
अथ स्त्रीत्रीमथुनयोगमाह सारावल्याम् ।
शुक्रासितो यदि परस्परभागसंस्थोशोकेऽथ दृष्टि-
पथगादये घटाशः । स्त्रीणामतीव मदनानिमदन-
वृद्धः स्त्रीभिः समं च पुरुषाकृतिभिर्लभते ॥१॥
अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें शुक्र और शनैश्चर परस्पर
नवांशमें स्थित होवे अर्थात् शुक्रके नवांशमें शनैश्चर और
शनैश्चरके नवांशमै शुरु स्थित होय और अन्योन्य देखते
होय एको योगः । अथवा जन्मलान वृप वा तुला होय उसमें
कुंके नवांशका उदय होय तो,यह स्त्री अन्य खोकी जंघाम
किसी वस्तुका लिंग बंधाकर उसको पुरुपारुति बनाकर
कामदेवकी अमिको शमन करातीहै ॥ १ ॥ वराहः "इसं.
स्थावसितसितौ परस्परांशे शौके वा यदि घटराशिसम्मवाशः ।।
नीतिः स्त्रीमदनविषानलं प्रदी संशांति नयति नरारुतिस्थिता-
मिः ॥ ३ ॥ " अन्यच होरामकरंदे "सवितृसतसितौ स्तोन्यो-
न्याय प्रयाती यदि यदि गुराशौ लमगे कुंमागे ॥ नरच-
रितरतानिः पंकजाक्षीनिरुच्चैः शमयति मदनानि योगयुग्मेन
योपा ॥२॥ ॥ जानकाहरणे " अन्योन्यमावेक्षणगौ
सितार्की यहा सिता तनुगे घटांश । कन्दर्पशांतिं कुरुते
नितांत नारी नराकारकराङ्गनाभिः । ३॥"
अथ कांपुरुपयोगः गर्गजातके।
शुद्धेस्ते दुबले यस्याः पापग्रहानिरीक्षिते ।
खोम्यग्रहदशाहाने साकापुरुपो भवेत् ॥ २॥

स्त्रीजातकम् । कीर्तितः ॥ १॥ (६४) अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें जन्मलमसे सातवां स्थान- में कोई यह न होय और सप्तम स्थान निर्वलं होय और सप्तम स्थानको पापग्रह देखता होय शुभग्रहोंकी दृष्टि से हीन होय तो उस स्त्रीका पति निरुद्यमी आलसी होताहै ॥ २॥ तथाच वराहा-“शून्ये कापुरुपो बलेस्तावने सौम्यग्रहाऽवीक्षिते तथा च ढुंढिराज:-"शून्ये मन्मथमन्दिरे शुनसगर्नालो- किते निर्बले. बालायाः किल नायको मुनिवरैः कापूरुपः गुणाकर:-"शून्ये बले कापुरुषः पतिः स्यात्सौम्यैरदृष्टे स्मरमेऽथ युक्ते ! १॥" अय क्लीवपतियोगः। बुधमंदयुतेऽस्ते च पतिः कीवसमो भवेत् ॥ वंध्या वा दुर्भगा वापि सा च नित्यं प्रवासिनी॥३॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सप्तम स्थानमें बुध, शनि स्थित होय उस स्त्रीका पति नपुंसकके समान होताहै वह खी वांझ वा दुष्टमाग्यवाली और नित्यही परदेशमें विचरनेवाली होतीहै ॥ ३ ॥वराहः-"क्लीयोऽस्ते वुधमंदयोः" इति । होरा- मकरंदे-स्मरशेऽथ युक्ते कीबो जशन्योः इति । जातकाभरण "जामित्रं बुधर्मदयोर्यदि गृहं पंढो भवेनिश्चितम् ॥ १ ॥ " अय प्रवासशीलभतयोगः। खप्तमे चरराशिस्थे नदीशे चरमांशके । भर्ता प्रवासशीलः स्यात्स्थिरमे स्वगृहे वसेत् ॥ ४॥ ।

, भाषादीकासमेतम् । (६५) अर्य-जिस कन्याके जन्मकालमें लगसे सातवें स्थानमें च- राशि १,४,७,१०, होवे और सप्तमभावका स्वामी भी चर राशिके नवांशमें स्थित होवे तो उस कन्याका पति हमेसा परदेशमें रहता है और जिसके सप्तम स्थानमें स्थिर राशि स्थित होय और सप्तम भावका स्वामी स्थिर नवांशमें स्थित होय तो उस नारीका पति हमेसा घरही रहता है और सप्त- म ३, ६, ९, १२ राशि होवे और सप्तमेश इन्ही राशियों के नवांशमें स्थित होय तो उस नारीका पति परदेश और घर दोनों जगह रहताहै परंतु बुद्धिमान् पुरुष सप्तम- भापस्थित राशिको और सप्तमेशके नवांशस्थित दानों- को देखकर फलादेश निजबुद्धिबलसे कहे ॥ ४ ॥ वराहः- "चराहे नित्यं प्रसान्वितः" ग्रंथांतरे राशौ तत्र चरे विदेश निरतो चंगे च मिश्रा स्थितिः" तथाच "चरो प्रवासी स्थिरे गहस्थो विरुचिति ॥ अथ पतित्यागयोगः। भस्तगेऽरिभिष्टे तथोत्सृष्टा भवेत्स्वयम् । अर्थ-जिस औरतके जन्मकालमें जन्मलग्रसे सातवें घरमें सूर्य स्थित होय वह शत्रुओंकरके देखागया होय तो वह कन्या पतिकरकेत्यागी जाती है. उक्तं च जातकारणे "सप्तमे दिनपतो पतिमुक्ता" होरामकरन्दे "त्यका प्रिय! मक- रेस्तसंस्थे। वराहा “ उत्सृष्टा रविणा" " (६६) स्त्रीजातकम् । अथाक्षताया एव रंडायोगः। सप्तमस्थे धरासूनो बाल्ये सा विधवा भवेत् ॥५॥ अर्थ-जिस स्त्रीके सातवें स्थानमें मंगल स्थित होय वह नारी बालविधवा होतीहै ॥५॥ राहः "रविणा कुजेन विधवा पाल्येऽस्तराशस्थिते " गुणाकरः "बाल्येऽपि भौमे विधवा प्रदिष्टा" ग्रंथान्तरे-"क्षोणिजे च विधया खलु बाल्ये" शति बहूनि वाक्यानि । अथ विवाहविहीनतायोगः। मन्दे सप्तमराशिस्थे तथा शनिरीक्षिते । न्येव विधवा भूत्वा सा जरामधिगच्छति ॥६॥ अर्थ-जिस कन्या जन्मकालमें जन्मलमसे सप्तम राशिम शनैश्वर बैठा होय तैसेही शत्रुग्रह देखते होय तो वह कन्या ही विना व्याही वृद्धताको प्राप्त होता है ॥ ६॥ तथा च "पापखगे च विलोकनयाते मंदगे च युक्ती जरती स्पात्" अन्यच्च "पापग्रहालोकनवर्गपाते कन्यैव वृद्धा भवतीह भूमौ' उक्तं च "कन्यवाभवीक्षितकतनये दाने जरां गच्छति " ॥ अथ विषवायोगः । अस्तगाः पापखेटाश्चत्पापरुं विधवा भवेत् । अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सप्तम स्थानमें पापन पापराशियोंमें बैठे हॉय तो वह नारी विधवा होती है. तथान "वैधम्पं रखेटेर्मदनगृहगतैः" वृहनातके "आप्रेयर्षियवार । 1 - आपाटीकासहितम् । (६७) राशिसहितैः" अन्यच्च " कलासंस्थैर्विवलैः खलाख्यैः सौम्य रदृष्टविभुना विमुक्ता । केचिन्मते " ॥ अथ पुनर्विवाहयोगः। चूने शुभाशुभर्युक्ते पुनर्भूः सा भविष्यति ॥ ७ ॥ अर्थ-जिस औरतके सप्तमस्थानमें शुमाशुभयह बेठे होय वह कन्या दोवार विषाही जाती है ॥ ७॥ वराहा-"मिश्रः पुनभूभवेत्" तथा "मदनगृहगतैर्विमित्रैः स्यात्न " ग्रन्या- न्तरे " कांताविपित्रैश्च भवेत्पुनः॥ ॥ अथ पतित्यक्तयोगः । वलहीनेस्तगे पापे सौम्यग्रहनिरीक्षिते । भवां वियुज्यते नारी नीचारिस्थे च पेरिणी ॥ ८॥ अर्थ-जिस ओरतके जन्मकालमें बलकरके रहित सप्तम स्थानमें पापग्रह स्थित होय और उसको शुभ ग्रह नहीं देख- से हॉय वह नारी पतिकरके त्याग करी जाती है और वही पाप- मह सामनयनमें नीचराशिस्थित वा शत्रुराशिस्थित होय तो वह व्यभिचारिणी होती है ॥ ८ ॥ गुणाकरः "पापेऽसौ वीर्य पुक्ते नवति परिहता प्रेयसा सौम्यदृष्टे" वराहा" करे होनबले. इस्तगे स्वपतिना सौम्येशिने पोझिता" तथालयसंस्थेवि- बले सलारपे सौम्येन दृष्टे पतिना विमुक्ता" ॥१॥ अय परपुरुपगामिनीयोगो गगजातके । अन्योन्याशी सित्तारी चेजारसका भवेद्वधूः ।

(६८) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस वीके जन्मकाल शुक्रके नवांशमें मंगल और मंगलके नवांशमें शुक्र स्थित हो तो वह नारी परपुरुपगामिमी होती है। यथा “ अन्योन्यांशस्थयोश्च क्षितिसुतसितयोध- की योपिदुक्ता"वराहः "अन्योन्यांशगयोः सितावनिजयोर- न्यपसक्तांगना" होरामकरन्दे "अन्योन्यांशावस्थितौ भौम- शुको स्यातां कांता संगतान्येन नूनम् ॥" अथ पत्याज्ञया दुश्वरीयोगः। तथैव सप्तमे चंद्रे दुश्चरी पत्युराज्ञया ॥ ९॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सप्तमस्थानमें शुक्र चंद्रमा मंगल स्थित होय वह नारी अपने पतिकी माज्ञासे परपुरुपमें रत होतीहै ॥ ९ ॥ उक्तं च जातकाभरणे “चद्रोपेतौ शुक्र वको स्मरस्थावाज्ञामेव स्वामिनश्यामनंति" अन्यच्च "चंद्रो- वासूनुशुक्रौ यदि मदनगृहे प्रेयसोनुज्ञया तु" पराहः "दाने वा यदि शीतरश्मिसहितौ भर्नुस्तदानुज्ञया" इति वचनात् । अथ वन्ध्यायोगः। मंदाराकविटनस्थौ शशिशुक्रौ यदा तदा । वन्ध्या भवति सा नारी पंचमे पापडग्युत्ते ॥ १० ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकाटमें शनि भौम रविकी राशिम जन्म लग्न होय उसमें शशि और शुक्र बैठे होंप भाषाटीकासमेतम् । जब पंचमस्थान पाप ग्रहोंकी दृष्टिसहित होय तो वह नारी वंध्या होतीहै ॥ १० ॥ अथ योनिव्याधियोगः। अकराशिगते भामे सूपारी स्वोशगावपि । सोरे कुजे क्रमादृष्टे व्याधियोनिश्च दुभंगा ॥११॥ अर्थ-जिस खाके जन्मकाल सिंहके नवांशमें सप्तम मंग- ल बैठा होय १. अथवा सूर्य मंगल अपने नवांशमें सप्तम स्थित होय २. या सप्तम भावमें मंगल स्थित होवे वह शनैश्चरकरके युक्त वा दृष्ट होवे उस स्त्रीकी जगमें रोग होता है और वह खोटे भाग्यवाली होती है ॥ १५ ॥ तद्यथा " स्मरे कुजे सार्कसुतेन दृष्टे यिनदयोनिश्च शुजाऽशुभाशे । "नयाच 'कोशके मदगते शनिवीक्षिते च योनिरुत्तमशा शुनगाशुभाशे' अन्यच्च 'कोजस्तेशे स्वैरिणीव्याधियोनिः' इति । चारुयोनियोगः। अस्तक्षे शुभदृष्टे च शुभस्यशि शुभेक्षिता । चारुश्रोणी प्रिया भल्लभा भवने वधूः॥ १२॥ अर्थ-जिस वीके जन्मकालमें सप्तमस्थानस्थित राशिको गुम ग्रह देखते होंय १ एको योगः, अथवा सप्तम स्था- नमें शुत ग्रहके नवांशाका उदय और उसको शुभग्रह देखते होय तो उस स्त्रीकी अग श्रेष्ठ, भवाके प्यारी, स्थानमें वह नारी सबको प्रिय होती है ॥ १२ ॥ चारभोणी वल्लामा सद्गहाशे " इति ।

(७०) स्त्रीजातकम्।
अथ मात्रा सह व्यभिचार-
णीयोगः गुणाकरः।
मंदारभे तनुगते ससुतोडुनायो मात्रा सहेव
कुलटाऽखिलखेटद्दष्टे ॥ १३॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें । १०।११1१८॥
इन राशियोंमें बुधकरके सहित चंद्रमा जन्मलममें स्थिति होय
पापग्रह देखते होय तो वह नारी माताकरके सहित व्यनि-
पारिणी होती है ॥ १३ ॥ वराहः " सौरारा लग्नगे सेन्दु-
शुके मात्रा साद बंधकी पापहष्टे " जातकाभरणे ॥ लगे
सितेन्दू कुजमन्दास्थौ रेक्षितौ सान्यरता जनन्या" इति ।
अथ सप्तमभावगे स्वांशे सूर्यफलम् ।
अस्तके स्वाशगे स्वः भर्ता रतिपरो मृदुः ।
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सूर्य अपनी राशिनवांशमें
..त जन्मलमसे सप्तम बैठा होय उस कन्याका पति संभोग
करनेमें मीठा होता है। वराहः "अतिमृदुरतिकर्मकञ्च सिंहे
भवति गृहस्तमुपस्थितेंऽशके वै" गुणाकरः भानोरंशेऽथ राशौ
मृदु रतिः" जातकाभरणे "सानो यदि वा लवाः स्मरगृहे
संमोगमंदः पतिः ।
अय सप्तमभावे स्वाशगे चंद्रफलम् ।
चंद्रेस्ते स्वसंगे स्वांशे मृदुः स्मरवशः पतिः ॥१४॥

झापाटीकासमेतम् । (७१) अर्थ-जिस स्वीके जन्मकालमें अपनी राशि नवांशमें चंद्रमा सतम स्थित होयं तो उस नारीका पति कामके वश कोमल होता है ॥ १४ ॥ यथा-"चंद्रस्यातिमदो मृदुः" तथाच "मदनवागतो मृदुश्चन्द्रे " ॥ अथ सप्तमस्थे स्वांशगे भौमफलम् । भोमेऽस्ते स्वाशके क्षेत्रे स्त्रीलोलो निर्धनः पतिः। अर्थ-जिस स्त्रीक सप्तममवनमें मंगल अपनी राशिनवांशम स्थित होय उस.नारीका पति स्त्रियोंको प्यारा धनहीन होता है यथा “क्षितिसुतस्य त्रीमियः क्रोधयुक्" तथाच "स्त्रीलोल: स्पाकोधनश्वावनेयः" अन्यच्च "कुभुवः क्रोधनः स्त्रीपु लोला" अथ सप्तमस्थे खांशगे बुधफलम् । सौम्येस्ते स्वाशके क्षेत्रे भर्ता विद्वान्भवेत्सुखी १५॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सप्तम भावमें बुध अपनी, राशिनवांशमें स्थित होय तो उस कन्याका पति पंडित सुखी होता है ॥ १५ ॥ यथा “चौधे विद्वानमुदक्षः" तथा च "विद्वाज्ञस्य अन्यच “विद्वान्भर्ता नैपुणश्चैव बोधे " इति ॥ अय सप्तमभावे जीवस्य राशिनवांशफलम् । जीवेस्ते स्वाशके स्वः गुणवान्विजितेंद्रियः। अर्थ-जिस स्त्रीके सप्तम स्थानमें बृहसतिकी राशि नवांश- का उदय होय उस कन्याका पति गुणवान जितेंद्रिय होताहै ॥ भन्यच “गुरोर्वशी राणयुतः" इति ।

खीजातकम् । अथ सप्तमभावे शुक्रस्प राशिनवांशफलम् । शुक्रेस्ते स्वशिके क्षेत्रे कन्येशो भाग्यवान्भवेत् १६॥ अर्य-जिस नारीके जन्मकालमें सप्तमभावमें शुक्रकी राशि- नवांशका उदय हो तो वह नारीका पति भाग्यवान होताहै।६॥ यथा"शौके सौमाग्ययुक्ता" अन्यच्च “शुक्रस्य नाग्यान्वितः" तद्यथा-"शौक्रे कान्तोऽतीव सौभाग्ययुक्तः ।" अथ सप्तमभावे शनिराशिनशिफलम् । मंदेस्ते स्वशिके क्षेत्रे वृद्धो मूों भवेत्पतिः। एवं सप्तमराशिस्थग्रहणां वदेत्फलम् ॥ १७॥ अर्थ-जिस स्त्रीके सप्तम घरमें शनैश्चरकी राशिनवांशका उदय होय उस स्त्रीका पति बूढा और बेवकूफ होता है इस प्रकार सप्तममावस्थित ग्रह और राशियोंका फल स्त्रियोंके जन्मकालमें कहै ॥ १७ ॥ अस्तराशिफलं प्रोक्तं लनराशिफलं तथा। भवत्येव हि दंपत्योहयोगबलाद्भवेत् ॥ १८॥ अर्थ-सप्तमनावस्थित राशिका फल कहा इसी प्रकार पुरु- पके लमराशिका फल जानो इस प्रकार स्त्रीपुरुपके ग्रहोंके योगके बलकरके फल कहना चाहिये ॥ १८॥ अथ सप्तमराशिस्थितग्रहफलम् । शुक्रन्दू स्मरगी स्त्रियं प्रकुरुतः मेष्यो सुखेनान्विता सोम्पेंदू च कलासुखोत्तमगुणा शुक्रन्दुपुत्रावथ ॥

भाषाकासमेतम् । चंबद्भाग्यकलाज्ञताभिरुचिरां सौम्यग्रहदास्तनी : नानाभूषणसद्गुणाम्बरसुखां पापग्रहेस्त्वन्यया ॥ १९ ॥ अर्थ-जिस खीके जन्मकालमें शुक्र चंद्रमा सातवें घरमें बैठे होंय वह नारी ईण्यासहित सुख करके युक्त होती है और बुध चंद्रमा सप्तम स्थानमें बैठे हॉय तो वह नारी उत्तम कला ओंकरके सहित श्रेष्ठ गुणपती होती है और जो सप्तमस्था- नमें शुक्र बुध स्थित होय तो वह नारी प्रकाशवान् भाग्यकी चातुरी कलाओंको जाननेवाली शोभायमान होतीहै और जिस स्त्रीके शुभग्रह जन्मलग्रमें बैठे होय तो वह नारी अनेक प्रकारके भूपण और वन उत्तम गुण और सुखोंकरके सहित होती है और जो पाप ग्रह लपमें होय तो विपरीत फल नेट देते हैं ॥ १९ ॥ यथा होरामकरन्दे “शुक्रंदू चेत्तु लग्ने जयति सुखपरा स्त्री बुधेन्दोः कलाज्ञा सौख्योपेता गुणाढ्या गुसुतबुधयोश्चारु- मूर्तिः पदिष्टा ॥ त्रिष्वप्येतेष्वनेकद्रविणसुखगुणैरन्विना सरसु वैवम्" इति । वराहः "ईर्ष्यान्वितासुखपरा शशिशुक्रलने झेंदोः कलासु निपुणा सुखिता गुणाढ्या । शुक्रज्ञयोस्तु सनगा रुचिरा कलाज्ञा त्रिवप्यनेकवसुसौख्यगुणा शुभेषु ।" अथ पितृगृहे सोस्यवतीयोगः । सौम्यक्षेत्रोदये चन्द्रे युक्ते शुक्रण सा वधूः । सुखी पितृगृहे नारी नित्यमस्थिरचारिणी ॥२०॥ ..

(७४) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालगे बुधके क्षेत्रमें चंद्रमाका उदय होय शुक्रकरके युक्त होय तो वह नारी हमेशा पिताके घरमें सुखी रहती है और नित्यही चंचलचारिणी होती है ॥२०॥ अय ब्रह्मवादिनीयोगः। चन्द्रज्ञो यदि लग्रस्थो कुलाढ्या ब्रह्मयादिनी । ज्ञशुक्रौ यदि लग्नस्थौ समस्थाने कुलाब्यता ॥२३॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें चंद्रमा और बुध लमम स्थित होय वह नारी कुलाब्या ब्रह्मविचार करनेवाली होतीहै और जिसके बुध शुक्र लगेम स्थित होंय और समस्थानमें होय तो वह नारी ब्रह्मवादिनी कुलाब्या होतीहै ॥ २१ ॥ तथा च होरामकरन्दे । सितारजीवेन्दुसुतेषु शक्त्या युक्तेषु लनेऽपिच युग्मराशौ। अनेकशास्त्रागमवेदिनी सा स्त्री ब्रह्मवादिन्यवनौ प्रसिद्धा ॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें शुक्र मंगल बृहस्पति बुध बलकरके सहित समराशिम लग्नमें स्थित होय वह नारी अनेकशास्त्रोंके जाननेवाली वेदेवदांतकी वक्ता ब्रह्मवादिनी- करके धरतीपे विख्यात होतीहै ॥ २२॥ उक्तंच जातकाभरणे "समे विलमे यदि संस्थिताः स्युबलान्विताः शुक्रवुदुर्जावाः । स्पात्कामिनीब्रह्मविचारच परागमज्ञानविराजमाना॥१॥ तथाच बृहज्जातके "जीवारास्फुजिदेवेषु बलिघु प्राग्लपराशी समे विख्याताभुविनकशासनिपुणा स्त्री ब्रह्मवादिन्यपि ॥१॥"

"
भाषा सतमेतम् ।
अथ बहुगुणान्वितयोगः।
चांदिचंद्रसिता लग्ने बहुसौख्यगुणान्विता ।
जीवे लगेऽतिसंपन्ना पुत्रवित्तसुखान्विता ॥२३॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें बुध चंद्रमा शुक्र लपमें
स्थित होय तो वह नारी बहुत सुखगुणांकरके युक्त होती है
और बृहस्पतिकरके युक्त पूर्वोक्त ग्रह होय तो वह नारी पुत्र
और धन सुखसहित होती है ॥२३॥ तथाच गुणाकरः--सौ
ख्योपेता गुणाढ्या नृराप्तबुधयोश्चारुमूर्त्या प्रदिष्टा त्रिष्द-
प्येतेष्वनेकद्रविणसुखगुणैरन्थिता सत्सु चैवम्" इति ॥
अथ विधवायोगः।
रेऽष्टमे च विधवा पापक्षेत्रे विशेषतः ।
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें पापग्रह जन्मलमते
अष्टम स्थित होय वह नारी विधवा होतीहै और वही
पापग्रह अष्टमस्थानम स्थित पापग्रहोंकी राशि होय तो
विशेष करके विधवा होती है ।
अशुभोऽपि शुभप्रदयोगः।
क्षेत्रोच्चसंस्थिता लग्ने अशुभास्ते शुभप्रदाः ॥२४॥
मर्य-जिन नियोंके जन्मकालमें उच्चराशिम पापग्रह
सप्तम होय तो शुभफलके दाता होते हैं ॥ २४॥

(७६) वीजातकम् । तथा च ग्रंथांतरे विधवायोगः। वैधव्यं स्यात्पापखेटेऽष्टमस्थे। अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें अष्टमस्थानमें पापी अह स्थित होय तो विधवा होतीहै ।। अथ मृत्युकालयोगः। रंध्रस्वामी संस्थितो यस्य चाशे मृत्युः पाके तस्य वाच्योऽङ्गनायाः ॥ अर्थ-और अष्टम स्थानका स्वामी जिस ग्रहके नवांशमें स्थित हो तिस ग्रहकी दशामें उस स्त्रीको मृत्यु कहना चाहिये। अथ निजदोषेण मृत्युयोगः। सोम्यरर्थस्थानगैः स्यात्स्वयं हि ॥ २५ ॥ अर्य-और शुनग्रह जिसके द्वितीयभावनमें स्थित हाय तो वह कन्या अपने दोप करके मरती है ॥ २५॥ तथा च बराहः--"यूरे मृत्युगते अवधिवता यस्यांशके मृत्युपः पाके तस्प शुभषु चार्थशवने तस्याः स्वयं पंचता" इति । अन्यच "कूरेऽष्टमे विधवता निधनेश्वरेशो यस्य स्थितो वयसि तस्य समे प्रदिष्टा । सत्स्वर्थगेषु मरणं स्वयमेव तस्याः" ॥ अय भर्तुःप्राइमृत्युयोगः। निधनस्थ दीनचन्द्रे दशायां निश्चितं भवेत् । सौम्येऽष्टमस्ये कन्याया भर्तुःप्रागेव संमृतिः॥२६॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें अष्टमस्थानमें हीन चंद्र सूर्य मंगल शनि हो तो यह स्त्री विधवा होती है प्रवीक्त ग्रहकी दशा

भाषाटीकासमेतम् । (७७)
अंतर्दशामें निश्चय विधवा होती है और जिस कन्याके शुभमह
अष्टम बैठे हो वह नारीकी भतीके पहिले मृत्यु होतीहै २६॥
अथ पतिपत्रीतुल्यकालमृत्युयोगः ।
पापसाम्ययुते तस्मिन्समकाले यतो मृतिः।
बलावलं तयोात्वा पुरुषेषु विनानता ॥
अर्थ-जिस स्निके जन्मकालमें पापी और शुमग्रह अष्टम
स्थानमें स्थित होय तब वह नारी और पति दोनों तुल्य कालमें
मृत्युको प्राप्त होते हैं स्त्रीपुरुष दोनोंके ग्रहोंका चल जानके
विद्वान् फल कहे ॥
तथा च जातकाभरण तुल्यमृत्युयोगः ।
रंध्रे मिश्रवले शुभाशुभखगैरालोकिते वा युते
दंपत्योः समकालमृत्युमखिलज्योतिर्विदः संविदुः ॥
एकस्यो मदरपोच यदि वालपस्थिते कामपे
कामस्थे तनुपे शुभग्रहयुते मृत्युस्तयोस्तुल्यतः २७॥
अर्य-जिस कन्याके जन्मलग्रमें अष्टमस्थानमें पापी मोर
शुभमह मध्यवली होकर स्थित होवे और अष्टमस्थानको देखते
होय तो वे स्त्रीपुरुप दोनों एककालमै मृत्युको प्राप्त होते है इस
प्रकार ज्योतिःशास्त्रज्ञाता कहते हैं अथवा एक स्थानमें सप्त-
मेरा भौर लप्रेश स्थित होय, अथवा लप्रेश सप्तम और सत-
मेरा लपमे स्थित होप शुभग्रहकरके युक्त होय तो वह नारीपुरु- .
. पकी एककालमें मृत्यु होती है ॥ २७ ॥

६७८) बीजातकम् । अय दीर्घायुयोगः। भाग्यस्थाने सिते सोम्ये सपापे चाटमेऽपि वा। भर्तृपुत्रसुतासाथै बहुकालं च जीवति ॥ २८॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें भाग्यभवनमें शुक्र बुध और पापमहाँसहित अष्टमस्थित होय तो वह नारी पति, पुत्र, कन्यासहित बहुत कालपर्यंत जीती है ॥ २८ ॥ अथाल्पपुत्रायोगः । धनु कर्कयमे लये भर्तृपुत्रादिदुःखदा । सिंहालिवृपकन्यासु चंद्रे तिष्ठति पंचमे ॥ २९ ॥ अल्पापत्यं विजानीयात्पुरुपेषु तदा वदेत् ॥ ३० ॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें धन, कर्क, मकर, कुम्भ लम स्थित होवे वह कन्या भतीपुत्रादिकोंको दुःखदेती वा उनसे आप दुःख पाती है और जिस कन्याके सिंह, वृष, कन्याराशिम चंद्रमा पंचम स्थित होय वह फन्या थोडे पुत्र- वाली कहना चाहिये ॥ २९ ॥ ३० ॥ होरा मकरंदे "कन्यासिंहालिगोपु स्थितवति शशिनि स्वल्पपुत्रा प्रदिष्टा" अथ वराहः 'कन्यालिगो हरिपु चाल्लमुतत्वमिन्दो' उक्तं च चातकापरणे "कन्यालिगे सिंहगते शशांक परुहाक्षी खल्ल साल्पपुत्रा" इति । अथ वहुपुत्रवतीयोगः। पुत्रालय चन्छुमखेचरेन्द्रष्टं युतं वा बहुता च पाम् ।

भाषाटीकासमेतम् । (७९)
मर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें पंचमस्थानमें शुजग्रह
स्थित होय या देखते होय तो वह नारी बहुत पुत्रोंवाली होती
है। तथा च गर्गजातके "सौम्यग्रहैः सुतगतर्बहुप्रसयमादिशेत्॥
न्याप्रदानकाले तु प्रोक्तमार्ग विचिंतयेत्" ।।
अथ बहुदुःखान्वितयोगः।
लयाचाष्टमभावस्थे-पापैर्दुःखफलान्विता ।
सोम्यग्रहरसंमित्रैः सर्वथा केशमानुयात् ॥३१॥
अर्थ-जिस बीके जन्मकालमें लगते अष्टमस्थानमें पाप
रह स्थित होय वह नारी हमेशा दुःखयुक्त होती है उसी अट-
स्थानमें शुजयह पापग्रह दोनों स्थित होय तो भी वह नारी
हमेशा क्लेश भोगती है ॥ ३१ ॥
अथ पुंचेष्टितयोगः।
रिक्त बुधेन्दुभृगुजै रविजे व मध्ये शेलेन सहि-
तेर्विपमलिग्ने | जाता भवेत्पुरुपिणी युवतिः
सदेव पुंटितात्र चरति प्रथिता च लोके ॥ ३२॥
अर्थ-तिस चीके जन्मकालमें बुध चंद्रमा शुक्र बलहीन
होय और शनैश्वर मध्यमवली होय वाकीके सम्पूर्ण ग्रह बल-
वान् होय विपमराशियोंमें स्थिति होय ३।३।५।१९
११ ऐसे योगमें उत्पन्न गई कन्या पुरुषों से सजाववाली
नियोके चरित्रोंमें अपणीय संसारमै होती है ॥ ३२ ॥

(८०) स्त्रीजातकम् । अन्यच्च ग्रंथान्तरे योगमाह। शुक्रन्दुसौम्या विरला भवेयुः शनैश्चरो मध्यवलो यदि स्यात् । शेषास्सवीर्या विपमे च लग्ने योपा विशेषात्पुरुषप्रगल्भा ॥ ३३ ॥ अर्थ-शुक्र चंद्रमा बुध निर्बल हॉय शनि मध्यवली होय शेष ग्रह बली होकर तिषमराशिमें स्थित होय तो वह नारी विशेष करके प्रगला पुरुपके समान स्वभाववाली होती है॥३३॥ तथा च होरामकरंदे-"निवार्यः सितचंद्रविद्भिरसितैमध्यं बलं संश्रिते लमे ओजगृहे भवेत्पुरुपिणी शेपैश्च वीर्योत्कदैः उक्तं च बृहज्जातके "सौरे मध्यबले बलेन रहितैः शीतांशुशुक्रेन्दुजैः शेष- वार्यसमान्वितैः पुरुपिणी यद्योजराश्युद्गमे ॥ १ ॥" अथ संन्यासिनीयोगमाह । रे यामित्रगते नवमे यदि खेचरा भवंति नूनम् । प्रव्रज्यामानोति नवमे ग्रहसंभवो नैव ॥ ३४ ॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सप्तम घरमें पापीयह स्थित होंय और नवमस्थानमें जो ग्रह निश्चय करके होय तो वह नारी फकीरी लेती है परंतु नवमस्थानमें जो ग्रह स्थित होय उसी ग्रहके समान फकीरी लेती है जैसे सूर्य बली होय तो तप करनेवाली, चंद्रमासे कपालिनी, मंगलसे गेरुएवस्त्र धारण करनेवाली, बुधकरके दंडिनी, बृहस्पति करके कपालिनी. शुक्रकरके चक्रधारण करनेवाली, शनि करके जापाटीकासमेतम् । (८1) नंगी होती है. ऐसे योग विवाहसे पहले और जन्म- पन मेलनके समय अथवा चरवरण करनेके समय अर्थात कन्यादानसे पहिले अवश्य देखलेना चाहिये ॥ ३४॥ तथाच वराहः "पापेऽस्ते नवमगतमहस्य तुल्या प्रव्रज्या युवति- रुपैत्यसंशयेन । उदाहे वरणविधौ प्रदानकाले चित्यं तत्सकले विधेयमेतत् ॥" अन्यच्च ग्रंथांतरे "अस्ते पाप लगपाते ग्रहोता प्रवज्या स्यात्स्त्रीपतेः संशयो न । दानोराहे प्रश्नकालेपु चैत्र चिंत्यं सर्व हौरिकस्तत्र युक्त्या " ॥ १ ॥ जो संन्यासयोग लान पहिले कह आये हैं वे स्त्रीको प्रव्रज्या पदाचित् न करें तो उसके पतिको सन्यासी करते हैं ऐसाभी किसी २ आचा- यंका मत है ॥ १ ॥ तथाच दुढिराजः " पापे स्मररथे न खगे च धर्मे किलागन्ना मवजितत्वमति" इति । अथ शास्त्रज्ञयोगमाह। बलिभिर्बुधगुरुशुकै शशांकसहितविलगगे शाशिभ । स्वा ब्रह्मवादिनी स्यादनेकशास्त्रेपु कुशला च ॥३५॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें बुध, बृहस्पति, शुक्र, चंद्रमा, बलसहित जन्मलममें चंद्रमाकी राशिमें स्थित होय तो वह श्री ब्रह्मवादिनी करके विख्यात सर्वशास्त्रोम कुशल होती है ॥ ३५॥ अथ विपकन्यायोगः यवनजातके। भादा तिथिर्यदाश्लेपा शततारा च कृत्तिका । मन्दाररविवारेषु विषकन्या प्रजायते ॥ ३६ ॥ "

(८२) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें द्वितीया तिथि आश्लेषा
नक्षत्र शनैश्चर वार एको योगः । सप्तमी तिथि शनिपानक्षत्र
अंगलवार द्वितीयो योगः। द्वादशीतिथि कत्तिकानक्षत्र रविवार
तृतीयो योगः। ऐसे योगोंमें पैदा भई कन्या विषकन्या कहला
ती है पतिको नाश करतीहै ॥ ३६ ॥ तथाच "द्वादशी वारुणं
सूर्य विशाखा सप्तमी कुजें ॥ मदेश्लेपा द्वितीया च जायते विप-
कन्यका" || तथाच जातकालंकारे " भौजंगे कृत्तिकायां
शतलिपाने तथा सूर्यमंदारवारे मद्रासजे तिथौ या किल जन-
नमियात्सा कुमारी विपाख्या ' ॥ तथा च मुहूर्तगणपतिः
"सूर्यगौमार्किवारेषु तिथिमदाशताभिधम् ॥ आलेपा कत्तिका
चेत्स्यात्तत्र जाता विपांगना ॥ १ ॥"
तथा च मुहूत्र्तगणपतिः।
जनोलंग्ने रिपुक्षेत्र संस्थितः पापखेचरः ।
दोसोम्पावपियोगेऽस्मिन्संजाता विषकन्यका॥३७॥
अर्थ-जिस कन्याको जन्मलग्नमें शत्रुक्षेत्री पापग्रह
दो
स्थित होय और लममें शुभ ग्रह होय उसमें एक पापी ग्रह
होय ऐसे योगमें पैदानई स्त्री विपांगना होतीहै ॥ ३७ ॥
नथाच त्रैलोक्यप्रकाशे " रिपुक्षेत्रस्थितौ दौ तु लग्ने यत्र
शुभयहैः । करैश्चरस्तदा जाता भवेत्नी विपकन्यका ॥ १॥"
अन्यञ्च जातकालंकारे " लमस्थौ सौम्यखेटावशुनगगनगवैक
आसीत्ततो द्वौ वैरिक्षेत्रानुयातौ यदि जनुपि तदा सा कुमारी
विषाख्या ॥१॥

भाषाटीकासमेतम् । (८३)
अन्यच्च विषाङ्गनायोगः जातकालंकारे।
भन्दाश्लेपाद्वितीया यदि तदनु कुने सप्तमी वारुणः
द्वादश्यां च द्विदेवं दिनमणिदिवसे यजनिः सा
विषाख्या। धर्मस्थोभूमिसुमुस्तनुसदनगतः सूर्य-
सूनुस्तदानों मार्तण्डः सूनुयातो यदि जनिसमये
खा कुमारी विपाख्या ॥३८॥
अर्थ-शनैश्चर, आश्लेषानक्षन, द्वितीयातिथि, एको योगः।
मंगलवार, शतभिषानक्षत्र, सप्तमी तिथि, दितीयो योगः। द्वादशी
तिथि, विशाखानक्षत्र, रविवार दिन, तृतीयो योगः । इन तीनों
योगों में पैदा भई कन्या विपकन्या कहलाती है । और जिसके
जन्म कालमें नवमस्थानमें मंगल और लममें शनैश्वर और सूर्य
पंचम स्थानमें प्राप्त होय ऐसे योगमें पैदा भई कुमारी विषा-
बन्ना कहलातीहै ॥ ३८ ॥ तथाच योगजात के "लमे सौरी
रविः पुत्रे धर्मस्थे धरणीसुते । अस्मिन्योगे तु जाता स्त्री सा
भवद्विषकन्यका ॥ १ ॥
तद्यथा मुहूर्तगणपतिः “ लगे
शनैश्वरो यस्याः सुतेऽको नवमे कुजः । विपास्या सापि नोद्दाह्या
विविधा विषकन्यका ॥ ३ ॥
अथ विपकन्यादोपापवादः ।
लग्नाद्विधोती यदि जन्मकाले शुभग्रहो वा मदना-
धिपच । यूनस्थितो हन्त्यनपत्यदोपं वैधव्यदोप
च विषाङ्गनाख्यम् ॥ ३९ ॥

(८४) खीजातकम् । अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें लमते अथवा चंद्रमाते शुभयह वा सप्तमभावना स्वामी सप्तम भावमें बैठा होय तो विधवादोप निःसंतानदोष और विपाङ्गनादोषको नाशकरता उक्तं च जातकालंकारे। लनादिन्दो शुभो वा यदि मदनपत्तिनिपापी विपाख्या दोपं चैवानपत्यं तदनु च नियतं हन्ति वैधव्यदोषम् । इत्थं ज्ञेयं ग्रहज्ञः सुमतिभिरखिलं योगजातं ग्रहाणा- मायरार्यानुमत्या मतापित गदितं जातले जातकानाम् ।। अर्थ-लमते वा चंद्रमाते शुभयह सप्तम बैठा हाय एको योगः । अथवा लम चंद्रमाते सप्तमस्थानपति सप्तम बैठा होय तो विपांगनादोप निःसंतान दोप वैधव्यदोपको निरंतर नाश करताहै. इस प्रकार ज्योतिपशाखके ज्ञाताओंफरके जान कर बुद्धिमान् ग्रहोंके योगकरके सम्पूर्ण प्राचीन ऋपियोंकी अनुमति लेकर मनुष्योंके जन्मकालमें कहना चाहिये ॥४०॥ विषकन्यादोपपरिहारः मुहूर्तगणपतिः । साविन्याश्च व्रतं कृत्वा वैधव्यविनिवृत्तये । अश्वत्यादिभिरुद्राह्य दद्याता चिरजीपिने ॥ ४॥ अर्थ-जो किसी स्त्रीके जन्मकालमें विधवा या विपाङ्ग ना दोप होय तो वह कन्या सावित्रिका व्रत विधवादोपनिवृ. त्तिके लिये दरे अथवा उस कन्याका वरके साथ विवाह कर- जापाटीकासमेवम् । (८५) -- नेके पहिले पीपल वृक्ष अथवा शालयाम या विष्णु मूर्ति के साथ विवाह करके फिर दीर्घजीवी वरको कन्यादान करें ॥४१॥ अथ ध्यायोगः । एन्धगो सूर्यचंद्रौ चेद्रियान्निजराशिगे ॥ बन्ध्या- अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें अध्मस्थानमें सूर्य चंद्रमा अपनी राशिमें स्थित हो तो कन्या चाँझ होतीहै । अथ कासवाध्यायोगः। - चन्नमा सौम्यः काकवंध्या तदा भवेत्॥१२॥ अर्थ-जिस बीके जन्मबलम लमते अष्टम स्थानमें चंद्रमा बुध अपनी राशिम स्थित होय वह नारी काकवंध्या अर्थात् एकवारप्रसूता होतीहै ।। ४२ ॥ अथ वन्ध्यायोगः वरिजातके। शनिभौमगृहे लग्ने चंद्र च सित्तसंयुते । पापहष्ऽथ ला नाग पन्ध्यत्वमुपगच्छति ॥ ४३ ॥ अर्थ-जिस खोके जन्मकालमें शनैश्वर वा मंगलके घरकी राशिम १०११११११८ चंद्रमा शुक्र सहित स्थित होय और पापग्रहों करके दृष्ट होय तो वह नारी बाँझ होती है ॥ ४३ ॥ अथ मृतमजायोगः । रखो मृतप्रजा प्रोक्ता राहणापि तथैव च ।। अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सप्तम सूर्य व राहु बैठा

(८६) स्रीजातम् ।
होय उसको शनि देखता होय तो उस नारीके संतान पैदा
होकर मरजावे ॥
अथ कन्याजन्मयोगः ।
चंद्रे बुधे तु सा नारी कन्याजन्मवती भवेत् ॥ १४ ॥
अर्थ-जिस नारीके सप्तम चंद्रमा बुध बैठा होय उसको शन-
श्वर देखता होय तो वह नारी कन्याओंकी औलाद पैदाकरे४४
अथ गर्भस्रावयोगः ।
सप्तमस्थाकुज चैव दृष्टः सोरेग सोऽपि चेत् ।
गलद्गर्भा तु सा ज्ञेया शनौ रोगयुताजा॥ ४५ ॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें सातवें घरमें मंगल बैठा
होय उसको शनि देखता होय तो वह नारी गर्भस्रवा होती है
और सप्तमस्थान में मंगल स्थित होय शनैश्चरयुक्त होय तो
उस मारीके रोगी संतान पैदा होय ॥४५॥
अन्यच्च मृतप्रजायोगः।
मृतापत्या च शुक्रेज्यौ-
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें अष्टमस्थानमें शुक्र बृह-
स्पति स्थित होय तो उस स्त्रीको मृतसंतान होताहै ॥
अन्यच्च गर्भस्रावयोगः।
-सारो गर्भस्वा भवेत् ॥ ४६॥
अर्थ-और अष्टमस्थानमें शुक्र बृहस्पति मंगल स्थित
होय तो गर्भस्त्रया योग होताहै ॥ १६ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (८७) अथ रण्डायोगः। व्ययाटगे कुजे करयुते रहौ सलग्नगे। रंडाथ लग्नगे सूर्गे सभौमे दुर्भगा शनौ ॥ १७ ॥ अर्य-जिस कन्याके जन्मकालमें बारहवें आठौं मंगल पापग्रहसहित और राहु पापयुक्त लममें बैठा होय सो नारी रांड होतीहै और जिसके जन्मलग्नमें सूर्य मंगल होय तोभी रंडा होतीहै और पूर्वाक्तयोग होते शनैश्चरयुक्त होय तोभी दुर्भगा विधवा होती है ॥ ४७ ॥ अन्यच्च रंडायोगः। मूर्ती रातभोमेषु रंडा मपति कामिनी । एषु शुके द्वितीयस्थे पतिमन्यं चिकीपति ॥४८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें जन्मलग्नमें राहु सूर्य मंगल स्थित होय तो वह नारी विधवा होती है और पूर्वोक्त योग हो तो दूसरे घरमें शुक्र स्थित होय तो वह नारी विवा- हके बाद अन्य पविशी इच्छा करती है ॥ ४८ ॥ अथ अर्तुरग्रे मृत्युयोगः। तथाष्टगाः क्रूरखगा विलनाद्वितीयगा शोभन- खेचरास्तु । सा भर्तुर म्रियते च नारी गोसिंह- कोपभुगतेल्पपुत्रा ॥ १९॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें जन्मलग्नते अश्मस्थानमें

(८८) खीजातम् ।
पापग्रह बैठे होय और दूसरे स्थानमें शुभयह बैठे होय सो
नारी जाके आगे मृत्युको प्राप्त होती है और जिसके सिंह
वृप वृश्चिक राशिगत चंदमा पंचम स्थित होय वह अल्प-
पुत्रा होती है ॥ ४९॥
अथ पितृश्वशुरकुलहंतृयोगः शौनकः ।
पापद्यमध्यगते चंद्रे लगे च कन्यका जाता ॥
निजपितृमुलं समस्तं श्वशुरकुलं हंति निःशेपात्॥५०॥
अर्थ-जिस वीके जन्मकालमें पाप ग्रहोंके बीचमें चंद्र-
गा बैठा होय कन्गलग्नमें वह नारी अपने समस्त पिताके
कुटको और ससुरके कुलको निःशेष करती है ॥ ५० ॥
अन्यच्च सिद्धान्तसारे बहुपुत्रवतीयोगः ।
नारीणी जन्मकाले कुजशनितमसः केन्द्रकोणेषु शस्ता-
श्वद्रोऽस्तेषु प्रशम्तो बुधसिनगुरवः सर्वभावेषु शस्ताः ।।
लनेशः कामभावे
कामभावे मदनगृहपतिर्लनधाचे बलस्पो
लागेशः पुत्रभावे पदति मुनिवरो बह्वपत्या सयन्ति॥५१॥
अर्थ-नियोंके जनकाटमें मंगल शनैश्चर राहु १, ४,
७, १०, ९, ५, इन स्थानोंमें शुभफलदाता होते हैं और प-
हिले स्थानों में चंद्रमा भी शुभ होता है और युध शुक्र वृहस्पति
तम भावों में श्रेष्ठ होतेहैं और लग्नेश सप्तम भवनका स्वामी
लनमायमें बलवान होय और लामेश पुत्रभवन में बैठा होय तो
वह गारी बहुतपंतान यालीहोतहि ये मुनीश्वरोंने कहाहै ॥५३॥

भाषाटीकासमेतम् । (८९) अथ पतिपुज्यतायोगः । पंचमस्थौ गुरुसितो बहुपुत्रयुता भवेत् । सुभगा पतिपूज्या च गुणयुक्ता तु सुत्रता ॥ २२॥ अर्थ-जिस खीके जन्मकालमें पंचमभवनमें बृहस्पति शुक्र स्थित होय तो वह नारी बहुपुत्रवती होती है और वह नारी सुलगा पतिकरके पूज्य गुणोंकरके युक्त पतिव्रता होती है ॥ ५२॥ अथ लोलपतियोगः। चौदासमंदेदुयुतेऽथ दृष्टे शुक्रेणलोलस्तु पतिस्तु तस्याः । चलस्वभावश्चपलो नितांतं भ्रषेण युक्तस्तु विवेकहीन:५३ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें बुध शनैश्चर चंद्रमा एक स्थानमें स्थित ोय और शुक्रकरके दृष्ट होय उस नारीका पति लोल चलस्वभाव निरंतर चपल श्रम करके युक्त चतु- रताकरके हीन होता है ॥५३ ॥ अथ झौलायपातान्मृत्युयोगः। सूर्यासै खजजाश्रितो हिरस्वतः लायपातान्मृतिः । अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सूर्य मंगल चंद्रमाने दशाम चतुर्थ स्थानमें स्थित होय वह नारी पहाटसे गिरकर मरताहै ॥

"
(९०)
स्त्रीजातकम् ।
अथ कूपेन मृत्युयोगः ।
भोमेंद्रर्कसुताः स्वसप्तजलगाः स्यात्कूपवाप्यादितः ।
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकाल में मंगल दूसरे, चंद्रमा
सातव, शनैश्चर चौथे स्थित होय तो वह नारी कुएँ वा
वावडीमें गिरकर मरती है।
अय बंधनान्मृत्युयोगः ।
सूर्याचंद्रमतो खलेशितयुतौ कन्यास्थिती बंधनात् ।
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सूर्य चंद्रमा पापग्रहों-
करके युक्त वा दृष्ट होवे और कन्या राशिमें स्थित होवे तो
वह नारी बंधनसे मरतीहै।
अथ जलेन मृत्युयोगः।
तो चेयङ्गविलनस्थितिकरी तोये विलना-
स्वत्तः॥१४॥
अर्थ-जिस कन्याका जन्मकालमें लमसे सूर्य चंद्रमा
३।६।९ । १२ इन राशियोंमें स्थित होकर लममें स्थित
होय तो वह कन्या आपही जलमें डूबकर मर-
तीहै ॥ ५४॥
अथ जलोदरेण मृत्युयोगः ।
रविसुतो यदि ककमुपागतो हिमकरो मकरोपगतो
भवेत् । किल जलोदरसंजनिता तदा निधनता
वनितासु च कीर्तिता ॥ ५५॥

भाषाकासमेतम् । (९१)
अर्थ-जिस कन्याके जन्मशालमें शनैश्चर कर्क राशि
और चंद्रमा मकर राशिम स्थित होवे तब वह नारी जलोदर
रोगसे मरतीहै १५६॥
अथ शस्त्रानिकोपेन मृत्युयोगः ।
निशाकरः पापखगांतरस्थं शस्त्राग्निमृत्यं कुजभे
करोति । पृच्छाविलग्ने वरवर्णकाले विवाहदाने
परिचिंतनीयम् ॥५६॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिषिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके विविधयोगवर्णनो नाम
पंचमोऽध्यायः ॥५॥
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें चंद्रमा पापग्रहोंके बीचमें
स्थित होय मंगलकी राशि १८ में तो वह नारी शस्त्र वा अमि
करके मरती है यह सम्पूर्ण योग प्रश्न कालमें सगाई करनेके
समय विवाहके वर वरण व कन्यादानके समय अवश्य विचार
करना चाहिये ॥ ५६ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मन-
राजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालहतायां श्यामसुंद-
रीमापार्टीकायां शुभाशुभयोगवर्णनो नाम
पंचमोऽध्यायः ॥५॥

,
(९०) स्त्रीजातकम् ।
अयं कूपेन मृत्युयोगः ।
भौगदर्कसुताः स्वसप्तजलगाः स्यात्कूपवाप्यादितः ।
अर्थ-जिस कन्या जन्मकालमें मंगल दूसरे, चंद्रमा
सातवें, शनैश्वर चौथे स्थित होय तो यह नारी कुएँ या
बावडीमें गिरकर मरती है।
अय बंधनान्मृत्युयोगः ।
सूर्याचंद्रमसो खलेक्षितयुतौ सन्यास्थितौ बंधनात् ।
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सूर्य चंद्रमा पापग्रहों-
करके युक्त वा दृष्ट होवे और कन्या राशिम स्थित होवे तो
वह नारी बंधनसे मरतीहै।
अथ जलेन मृत्युयोगः ।
तो चेहयङ्गविलग्नसंस्थितिकरो तोये विलना-
स्वतः॥५४॥
अर्थ-जिस कन्याका जन्मकालमें लमसे सूर्य चंद्रमा
३।६। ९ । १२ इन राशियोंमें स्थित होकर लयमें स्थित
होय तो वह कन्या आपही जलमें डूबकर मर-
ताहै ॥ ५४॥
अथ जलोदरेण मृत्युयोगः।
रविसुतो यदि कर्कमुपागतो हिमकरो मकरोपगतो
भवेत् । किल जलोदरसंजनिता तदा निधनता
वनितासु च कीर्तिता ॥५५॥

(९१)
माषाकासमेतम् ।
अर्थ-जिस कन्याके जन्मशालमें शनैश्चर कर्कराशिम
और चंद्रमा मकर राशिमें स्थित होवे तब वह नारी जलोदर
रोगसे मरतीहै ॥५५॥
अथ शस्त्रानिकोपेन मृत्युयोगः।
निशाकरः पापखगांतरस्थं शस्त्राग्निमृत्यं कुजमे
करोति । पृच्छाविलग्ने वरवर्णकाले विवाहदाने
परिचिंतनीयम् ॥५६॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिषिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके विविधयोगवर्णनो नाम
पंचमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें चंद्रमा पापग्रहोंके बीचमें
स्थित होय मंगलकी राशि १८ में तो वह नारी शस्त्र वा अग्नि
करके मरती है यह सम्पूर्ण योग प्रश्न कालमें सगाई करनेके
समय विवाहके वर वरण व कन्यादान के समय अवश्य विचार .
करना चाहिये ॥५६॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मन-
राजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालझतायां श्यामसुंद-
रीमापारीकायां शुजाशुमयोगवर्णनो नाम
पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥

श्रीजातकम् ।
अथ राजयागाच्यायप्रारम्भः ।
तथा वृद्धयवनः।
राजयोगकुंडलीयम् १.
RST
मूर्ती सुरेज्योऽस्तगतः शशांशोs-
थवा स्ववगै गगने च शुकः॥
जातात्यजानामपि जातिरन
योगे भवेत्पार्थिववल्लभा च ॥ १ ॥
अर्थ--जिस वीके जन्मकालमें जन्मलममें बृहस्पति
मौर सप्तम चंद्रमा और दशमस्थानमें अपने वर्गका शुक्र
ऐसे योग अन्त्य जातिमें उत्सन्न भईसी कन्या राजाकी
प्यारी होताहै ॥ १॥

भाषाटीकासमेतम् । अब द्वितीययोगः। द्वितीयराजयोगः२. 13 १ एकोपि जीवः पवर्गशुद्धः केंद्रे यदा चंद्रनिरीक्षितश्च । राज्ञी भवेत्स्त्री सघनात्र जाता वरेभदानादिनितंबविवार अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें एकही बृहस्पति पड्वर्गमें शुद्ध होकर १।४।१०। ७ इन स्थानों से किसी स्थानमें बैठा होय और चंद्रमा देखता होय ऐसे योगमें उत्पन्न भई कन्या रानी होतीहै धनवान् श्रेष्ठ हाथियोंके मदकरके आदित है नितंबबिंब जिसका ऐसी होतीहै ॥ २॥ अथ तृतीयराजयोगः। तृतीयराजयोगकुंडली ३० २म (९४) स्त्रीजातकम् । केन्द्रेषु सौम्या अरिबंधुलामे पापाः कलत्रे च मनुष्य- राशिः । राज्ञी भवेत्स्त्री बहुकोशयुक्ता नित्यं प्रशांता च सुपुत्रिणी स्यात् ॥३॥ अर्थ-जिस खीके जन्मकालमें १७३01 इन स्था- नौमें शुभग्रह स्थित होय और पापग्रह सू. मं. श. रा. ३॥ ६।११ इन स्थानोंमें स्थित हॉय और सप्तमनावमें मनुष्य राशि स्थित होय ऐसे योगमें उत्पन्न गई स्त्री रानी होतीहै बहुत खजानेकरके युक्त हमेशा शांनस्वरूप श्रेष्ठ पुत्रवती होतीहै ॥ ३ ॥ अथ चतुर्यो राजयोगः। चतुर्थकुंडली ४. बुशु लाभाश्रितः शीतकरो भृगुश्च कलत्रगः सोमसु- तेन युक्तः । जीवेन दृष्टे कुरुतेन राज्ञी लोकः स्तुतां वैदिवरैः सदेव ॥४॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें ग्यारहवें स्थानमें चंद्रमा स्थित होय और सतमस्थानमें बुधकरके युक्त शुक्र स्थित होप पार्टीकासमेतम् । (९५) आर बृहस्सातकरक दृष्ट होय ऐसे योग पैदा नई स्त्रियां रानी होती है और संसारम बंदीजनॉकरके स्तुती की हुई हमेशा होती हैं ॥ ४ ॥ अथ पंचमो राजयोगः। पंचमो राजयोगः श्व बुधे विलग्ने यदितुङ्गभाजि लाभास्थितेदेवपुरोहिते च ॥ नरेन्द्रपत्नीपनिताप्रसंगे तदा प्रसिदाभवत्तीह भूमौ ॥५॥ अर्थ-जिस वीके जन्मलग्नमें बुध जन्मकालमें जो उच्चका - स्थित होय और ग्यारहवें स्थानमें बृहस्पति स्थित होय ऐसे । योगमें उत्पन्न भई कन्या राजाकी पत्नी होती है खियोंके प्रसंगमें धरतीपर मसिद्ध होती है ॥ ५॥ अथ पष्टो राजयोगः। मष्टराजयोगकुडला ६. -- शु बीजातकम् । तृतीयगः सोमसुतोग्बुसंस्थः पड्वर्गशुद्धो यदि देवमंत्री । लग्ने भृगुः पार्थिवतुल्यतां च करोति नारी बहुवाजिवृंदाम् ॥६॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें तीसरे घरमें बुध स्थित होय और पड्वर्गमें शुद्ध बृहस्पति चतुर्थ स्थित होय और जन्मलममें शुक्र होय तो वह उस खीसे राजाके समान बहुतसे घोडोंके समूहोंकरके करता है अर्थात् उस रानीकी सेना बहुत सवागेकी होताहै ॥ ६॥ अथ सप्तमो राजयोगः। त्रिभिरुचग्रहै। चतुमिरुधग्रहै। पंचभिरुच है। ५ ३ ३१२० २१६ ३२० १ श३२० म ३२० ३२० ३१२. व३२) ३१२० ३। १० २ पपमिरुनग्रहः सप्तमिरुचाग्रह रुक्मिणीजन्मलग्नम् ९श रा ११२ म३२. ४ ८ १२ १० ३१२. ७ वि२ १० च२ भाषाटीकासमेतम् । (९७) पड्वर्गशुद्धिस्त्रिभिरेव मंत्री चतुभिरीशस्य तथैव पत्नी ।। पंचादिभिर्दिव्यविमानभाजा त्रैलोक्यनाथप्रमदा तदा स्यात् ॥ ७ ॥ अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें पड्वर्गमें शुद्ध तीन ग्रह उच्चके होय तो वह नारी युवराजकी पत्नी होती है और चार ग्रह उच्चमें होंय तो वह नारी राजाकी पत्नी होती है और पांच ग्रह जिसके उच्चमें होंय तो वह नारी महाराजाकी पत्नी होती है और छः वा सात ग्रह अपने उच्च वा स्वक्षेत्रमें स्थित होय तो वह नारी त्रिलोकीनाथकी पत्नी होतीहै ॥ ७॥ अथाष्टमो राजयोगः। अथाष्टमराजयोगकुंडली। सूश च०१२ ९म कोंदये सप्तमगे शशांके चतुष्टयं पापविव- जितंच राज्ञीभवद्भरिंगजाश्वयुक्ता पतिप्रधा. ना विजितारिपक्षा ॥ ८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें कर्कटमका उदय होय

(९८) स्त्रीजातकम् ।
सातवें स्थानमें चंद्रमा और केंद्र स्थानमें कोई पापग्रह न होय
ऐसे योगमें उत्पन्न गई नारी रानी होती है बहुतसे हाथी घोडा
करके युक्त जीते हैं शत्रुदल जिसने और पति है प्रधान जिसके
ऐसी होताहै ॥ ८॥
अथ कुलद्वयोन्नतिकारिणीयोगः ।
कुलद्धयोन्नतिकारिणीकुण्डली ।
१८
वाचस्पतिर्नवमपंचमकंटकस्थो जाताङ्गना भवति
पूर्णविभूतियुक्ता । साधी सुपुत्रजननी सगुणा
सुरूपा नूनं कुलद्वयमहोन्नतिकारिणी सा ॥९॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें बृहसति उच्च वा
स्वक्षेत्रराशियोंमें स्थित होकर ९।५।१।४।७।१० इन
स्थानों से किसी एक स्थानमें स्थित होय वह नारी समस्त
विभूतियोंकरके युक्त पतिव्रता सत्पुत्रोंकी पेश करनेवाली
अच्छे गुणोंकरके युक्त उत्तम रूपसहित निश्चय करके मातृकुल
और बारकुलकी बडी उन्नती करनेवाली होतीहै ॥ ९ ॥

सापाटीकासमेतम् । (९९) अथ नवमो राजयोगः। नवमराजयोगकुंडली। १२ वृ१० ८ ७ तुङ्गात्रिते शीतकर सुखस्थे जीवन हटे परि- पूर्णदेहे ॥ विद्याधरी चात्र भवेत्प्रधाना राज्ञी जितारिबहुपुत्रपौत्रा ॥ १०॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें उच्चराशिम स्थित होकर परिपूर्ण चंद्रमा चतुर्थ स्थित होष उसको बृहस्पति देखता होय तो वह स्त्री ऐसे योगमें स्त्रियों में प्रधान रानी जीते हैं शत्रु जिसने बहुत पुत्र पौत्रोकरके युक्त होती है ॥१०॥ अथ दशमो राजयोगः। दशमराजयोगकुंडली। २ ब वर. ७ स्वक्षेत्रगः सोमसुताम्बुसंस्थः पयर्गशुद्धोऽसु-

(१००)
ब्रीजातकम् ।
रराजमंत्री। शुक्रेण दृष्टः प्रमदा प्रसूते राज्ञी
महाशब्दसमन्वितां च ॥ ११ ॥
अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें चतुर्थ स्थानमें अपनी
राशिका बुध पर्वमें शुद्ध बृहस्पति करके युक्त स्थित होय
और शुक्रकरके दृष्ट होय तो वह नारी डंका निशान नौवन
नगाडेके शब्दोंसहित रानी होती है ॥ ११ ॥
अथैकादशो राजयोगः।
एकादशराजयोगकुंडलीयम् ।
'श
व
१२०
४
२२
१मा
२
चकस्तृतीये रिपुसंस्थितोऽपि वा पड्वर्गसुद्धो
रविजश्च लाभे । स्थिर विलग्ने गुरुणा च युक्ते
राज्ञी भवेत्स्सी पतिवल्लभाच ॥ १२॥
अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें मंगल तीसरे वा छठे
स्थित होय और पवर्गमें शुद्ध शनैश्चर ग्यारहवें स्थित होय
और स्थिर टममें बृहस्पति जन्मकालमें स्थित होय तो वह
नारी रानी होती है पतिको प्यारी होय ॥ १२॥

भापाटीकासमेतम् । (३०१) अथ द्वादशो राजयोगः । अथ द्वादशराजयोगचक्रम् । १ ६६ २ आयुस्थितस्तीक्ष्णकरः सतुंगे मूतौ शशांकः परिपूर्णदेहः । सौम्योम्बरस्थः कुरुते च राज्ञी पतिप्रधानां बहुपुत्रपौवाम् ॥ १३॥ अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें अष्टम स्थानमें स्थित उच्चका सूर्य और बलवान पौर्णमासीका चंद्रमा लग्नमें और चुप दशम स्थित होय ऐसे योगमें पैदालई त्रियाँ बहुत पुत्रपौत्र सहित पति है प्रधान जिनके ऐसी होती है ॥ १३ ॥ अथ त्रयोदशो राजयोगः। अथ त्रयोदशराजयोगचक्रम् । १२ १२. २ ८ ३ ७ १०

(१०२) स्त्रीजातकम् ।
षड्वर्गशुद्ध दिवसाधिनाये तृतीयगे सूर्यसुते रिपुस्यों।
भवेन्नृजाता प्रमदा सुराज्ञी धर्मप्रधाना पतिवल्लमा १४
अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें पइवर्ग शुद्ध सूर्य तीसरे
स्थानमें स्थित होय और शनैश्चर छठे ऐसे योगें पैदा भई
नारी रानी होताहै धर्म प्रधान जिनके पतिको प्यारी होती
है॥ १४॥
अथ चतुर्दशो राजयोगः।
अथ चतुर्दशराजयोगकुंडलीचक्रम् ।
२७
शा
१२
६
८९
७
स्थिरे विलग्ने शशितुंगपाते बुधेन युक्तप्यथ
चीक्षिते वा ॥ लाभस्थिते दैत्यपुरोधसा वा
चरेभवृन्दानुगता तदा स्यात् ॥ १५ ॥
अर्थ-जिन शियोंके जन्मकालमें स्थिर लम होय उसमें
चंद्रमा उच्च राशिका स्थित होय और वुध करके युक्त वा
देखा गया होय और लाजस्थान में शुक्र स्थित होय ऐसे योगमें
पैदा भई नारी हाथियोंके हलकेमें चलती है ॥ १५॥

भाषाटीकासमेतम् । (१०३) अथ पंचदशो राजयोगः। पञ्चदशराजयागकुण्डलायम् । वृ लाभस्थितः शीतकरो भृगुश्व कलत्रगः सोमसुतेन युक्तः । जीवेन दृष्टो भवतीह राज्ञी ख्याता धरायां सकले स्तुता च ॥ १६॥ अर्थ-जिन नियोंके जन्मकालमें ग्यारहवें स्थानमें चंद्रमा और सप्तम स्थानमें शुक बुधसहित बृहसति करके दृष्ट होय दो ऐसे योगमें पैदा नई स्त्रियाँ पृथ्वीम समस्त जनों करके स्तुतिकरी हुई विख्यात रानी होती है ॥ १६ ॥ अथ पोडशो राजयोगः सिद्धान्तसारे। जीवो वा भार्गवो वा परमवल्युतः काममावे पाशा कम्शो पर्मलाभे तसुखतनये कर्मकोशे वलस्थः । ता चंद्राननाना करलदलशां ना- यिका रूपयुक्ता राजते राजरक्ष्या मणिमयशि- विरे दासभावे सदेव ॥ १७॥ अर्थ-निस मोके जन्मकालमें वृहसति या शुक अत्यंत- वली होकरके सातवें बैठे हो और दशम भावका स्वामी ९ ।

(१०४) स्त्रीजातकम् । ११।४।५।२०१२ इन स्थानोंमें बली होकर स्थित होय ऐसे योगमें पैदाई त्रियाँ चंद्रमाके समान मुख जिनका और कमलके दलके समान नेत्र जिनके, ऐसी स्त्री रुपकरके युक्त शोभाको प्राप्त राजलक्ष्मी मणियोंकरके जटित महलों में हमेशा दासभावको प्राप्त हुए हैं पति जिनके ऐसी रहती है ॥ १७ ॥ अथ लज्जावतीयोगः। यदिशुभकरदृष्टा शिल्पिनी शुद्धचित्ता सततमिह सलज्जा चारुमूर्तिः सुपुत्रा । बहुधनसुखयुक्ता वल्लभे वल्लभत्वं व्रजति शुभशतानां. भाजनत्वं च नारा॥१८॥ अर्थ-जिस कन्याकी जन्मलमको सम्पूर्ण शुभग्रह देखते होय वह नारी चित्रकारी करनेवाली शुद्धचित्त निरंतर लज्जा सहित सुन्दर स्वरुपयाली अच्छे पुत्रों युक्त बहुतसे धन सुख- सहित अपने पतिको प्यारी सैकडों शुम कौकी जानन होती है ॥ १८॥ अथ धनवद्रातृयोगः। सहजभवननाथे पुंग्रहे पुंग्रहक्षे पुरुपखचरयुक्ते पुंग्र- झालोकिते वा । नयनभवनकेन्द्रे कोणगे वा ब- लिष्टे बहुधनसुखवंतं सोदरं याति जाता ॥ १९॥ अर्थ-जिन वियोंके जन्मकालमें तीसरे स्थानका स्वामी

भाषाटीकासमेतम् । (३०५)
पुरुष ग्रहकी राशिम स्थित और पुरुपग्रहकरके युक्त पुरुप ग्रह
देखते होंय २४३०५।९ इन स्थानों में बली होकर
भातृस्थानेश स्थित होय तो उस नारीका नाई बहुत धनवाला
और सुखवाला होता है ॥ १९ ॥
अथ राजतेजोयुक्तभ्रातृयोगः।
सहोदरस्थानपलाभनाथौ विलग्नतः पंचमराशियाती ।
नृपालतेजोगुणरूपवन्तं सहोदरं जातवधूः समति॥२०॥
अर्थ-जिन स्त्रियोंके जन्मकालमें तीसरे घरका और
ग्यारहवें भावका स्वामी जन्म लमते पंचम भावमें स्थित होय तो
उस कन्याके राजतेजकरके युक्त और गुणवान् रूपवान् माता-
की प्राप्ति होती है ॥ २० ॥
अथ कांचनयुक्तपतियोगः।
क्रोधान्विता सौख्यपरा सितेन्दो लमस्थिते कांच-
नसंयुत्ता च । बुधे कलाट्या सुखभावयुक्ता गुणे-
गुंता शुभयुरुस्तयैव ॥२१॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें शुक्र चंद्रमा जन्मलपमें
स्थित होय उस नारीका पति कोषयुक्त सौख्यवान् सुवर्णयुक्त
होता है और जो लममें चुत्र स्थित होय तो उस नारीका पति
चतुर कलामें प्रवीग होता है और जो लपमें शुक्र बृहसति
स्थित होय तो सुखसहित गुणवान पति होताहै ॥ २१ ॥
अपराजपूज्यपतियोगः।
समराशिगते तब सप्तमें शुभसंयुते ।
शुभग्रहेस्तया दृष्टे राजपूज्यः पतिर्भवेत् ॥ २२ ॥

(१०६) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सातवें स्थानमें शुम ग्रहकी समराशि होय और शुभमहोंकरके युक्त और दृष्ट होय तो उस नारीका पति राजाओंकरके पूजनीय होता है ॥ २२ ॥ अथ दास्यलंकृतयोगः। यदा शशी शुक्रबुधौ विलग्ने त्रयोऽपि तेजीवसिते- न्दुजाः स्युः । अनेकधा सौख्यगुणादियुक्ता नारी तु दासीमिरलंकृता स्यात् ॥ २३ ॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें चंद्रमा शुक्र वुध लममें स्थित होय अथवा बृहस्पति शुक्र चंद्रमा ये तीनों लम- में स्थित होयें वह नारी अनेक सुख गुणोंकरके युक्त दासियों करके अलंकत होती है ॥ २३ ॥ अथ स्त्राणां पतिलक्षणम् । गोराङ्गः पतिरस्तगे दिनको कामी सरोजेक्षण- श्चन्द्रे रूपगुणान्वितः कृशतनुर्भागी रुगातों भवेत् । नम्रः क्रूररसोलसः पटुवचाः संरक्तकोतिः कुजे विद्यावित्तगुणप्रपंचरसिका साम्पे मदस्थानगे ॥२४॥ दीर्घायुपतुल्यवित्तविभवः कामीच बाल्ये गुरोः कान्तो नित्यविनोदकेलिचतुरः काव्येकविक्ष्मापतिः। मन्दे वृद्धकलेवरोस्थिततनुः पापी पतिः कामगे राहो वा शिखिनिस्पिनेमलिनधीन चोऽथवा तत्समः॥

भापाटीकासमेतम् । (१०७)
अर्थ-जिन कन्याओंके जन्मकालमें सातवें घरमें सूर्य
स्थित होप उन स्त्रियों पति गौरवर्णके अंगवाला कामो को-
धसहित नत्रायाला होता है और चंद्रमा सप्तम स्थित होय तो
रूपयुक्त गुणवान दुर्बल शरीरवाला भोगी और रोगकरके
दुःखी होता है, जो सातवें घरमें मंगल स्थित होय तो नम्र
दुष्टस्वभावबाला चतुरवचन बोलनेवाला आलसी लालवर्णका
होता है और सातवें घरमै बुध स्थित होय तो वह विद्या और
धन गुणवान् प्रपंच जिसको प्यारा ऐसा होता है ॥ २४॥
और गृहसति सनम स्थित होय तो बड़ी उमरवाला राजाके
तुल्य धन ऐश्वर्यकरके युक्त बालअवस्थामें कामी होता है
और शुक्र सप्तमस्थित होय तो शोभायमान नित्यही आनंदखे-
लमें चतुर काव्य जाननेवाला घरी का पति होता है और श-
नैश्चर सप्तम स्थित हो तो बूटी हवाला चलायमान देहवाला
पापी होता है और राहु या केतु सप्तम स्थित होय तो यह
मलिन बुद्धिवाला नीच या नीचके समान पति होताहै॥२५॥
अथ कन्याजन्मनि डिभाख्यत्क्रम् ।
उक्तं च स्वरोदये।
मस्तके त्रीणि ऋक्षाणि सप्त भानि मुखे न्यसेत् ।
स्तनद्वयेष्टरक्षाणि हृदये त्रीणि भानि च ॥२६॥
नाभोवाण तथा गुझे कमात्सूर्यतो न्यसेव।
कन्याजन्मनि डिम्भास्यं चक्रमुक्तं वयंभुवा ॥२७॥

(१०८) स्त्रीजातकम् । अर्थ-त्रियोंके जन्मकालमें डिपाख्य चक्र कहते हैं सस्तकपर ३ नक्षत्र मुखमें ७ दोनों स्तनपि ४४ हृदयमें ३ ॥ २६ ॥ टूडीमें ३ पेडूपर ३ नक्षत्र सूर्यनक्षत्र ते क- मकरके न्यास करै कन्या जन्मकालमें डिभाख्यचक्र ब्रह्मा- जीने कहा है ॥२७॥ अथ चक्रस्थितनक्षत्रफलम् । शीप संतापयुक्ता स्यान्मुखे धान्यधनान्विता। हदि सौख्ययुता गुह्ये नारी स्वास्यभिचारिणी ॥२८॥ अर्थ-जो कन्याका जन्म नक्षत्र शिरपे आवे तो संताप करे और मुखपे आये तो धनधान्ययुक्त करे हृदयपर आवे तो सौख्ययुक्त करे पेडूपर आवे तो व्यभिचारिणी करे ॥ २८ ॥ स्तने ऋक्षे जन्मपातः पतिसौख्यविवर्धकः । असंतुष्टा स्वामिरता नाभौ स्याजन्मकालके ॥२९॥ अर्थ-जो कन्याका जन्मनक्षत्र स्तनोंपर आवे तो पतिका सौख्य बढाये और नाभिपर आवे तो असंतुष्ट स्वामीमें रत होती है ॥ २९॥ अथ नारीचक्रमाह जातकाभरणे । नारीचके मस्तके त्रीणि भानि के भानां सप्तकं स्थापनीयम् । प्रत्येकं स्युर्वेदतारा उरोजे तिनस्तारा हत्प्रदेशे निवेश्याः ॥ ३० ॥ नाभी देयं भवयं भाषावारतम् (१०९) त्रीणि गुह्ये भानोधिष्ण्याचंद्रधिष्ण्यावधीत्थम् । सत्संतापः शीर्षमै वनसंस्थे नित्यं मिष्टान्नान सौख्योपलब्धिः ॥३१॥ कामं स्वामिप्रेमवृद्धिः स्तनस्थे वक्षोदेशावरियतेऽत्यंतहपः । पत्युश्कि तानन्तवृद्धिश्च नाभौ गुहास्ये स्यान्मन्मयाधि- क्यमुच्चैः ॥ ३२॥ अर्थ-अव स्त्रीचक कहते हैं सूर्यके नक्षत्रसे लेकर चंद्र- नक्षत्रतकका फल कहा है यानी स्त्रियाकारस्वरूप बनाय करके सूर्यके नक्षत्रसे ३ नक्षत्र माथेपर स्थापित करै मुखपुर ७ और प्रत्येक चूंचीपर ४ । ४ । और तीन ३ हृदय पर स्थापित करे ॥ ३० ॥टूडौंमें ३ और ३ गृह्यस्थानमें, जो शिरके नक्षत्रोंमें चंद्रमाका नक्षत्र पडे तो संताप और मुखके नक्षत्रों में चंद्र आवे तो नित्यही मिष्टान्न लान होता है । ३१, स्तनके नक्षत्रम चंद्रमा पडे तो पतिसे प्रीति अधिक कहना हृदयके नक्षत्रोंमें चंद्र पड़े तो हर्ष प्रात होता है, नाशिमें नक्षत्र पडे तो स्वामीकी अत्यंत चिंता होतीहै गुह्यस्थानके नक्षत्रों में पड़े तो काम करके पीडित कहना चाहिये ॥ ३२ ॥ अय ख्याकारस्वरूपम्। पूर्वर्यन्मुनिभिः सविस्तरतया स्त्रीजातके कीर्तित सम्यवाऽप्यशुभं च यन्मतिमता वापं विदित्वा बलम् ।

(११०) स्त्रीजातकम् ।
योगानां च नियोजयेत्फलमिदं पृच्छाविलने तथा
पाणिप्रग्रहणे तथा च वरणे संभूतिकालेऽपि च ॥ ३३॥
इति श्रीवशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्र-
सादात्मनराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविर-
चिते स्त्रीजातके राजयोगवर्णनो
नाम पष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अर्थ-पहिले मुनीश्वरोंने स्त्रीजातको विस्तारपूर्वक अच्छा
बुरा फल भलेपकार जो कहाहै सो बुद्धिमानाने बलापल विचार
करके पहिले कहेहुए योगोंको नियोजनकरके ये फल
प्रश्नकालमें विवाहकालमें सगाई समय विचार करना
चाहिये ॥ ३३॥
ईतिभावंशपरेटिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवमतादात्मजरानज्यो-
तिपिकश्यामलालझतायां श्यामसुंदरीमापाटीकायां
राजयोगफलवर्णनो नाम पठोऽध्यायः ॥ ६॥
अध तिथिजातफलाध्यायो निरूप्यते ।
ऊक्तं च श्यामदेवज्ञेन ।
अथ प्रतिपदि जातफलम् ।
नारी यदा समितियो सुजाता सौभाग्ययुक्ता
पतिवल्लभा च । सुपुण्यशीला बहुपुत्रपौत्रा परा-
गमज्ञानविराजमाना ॥१॥

मापाटीकासहितम् । अर्थ-जो नारी प्रतिपदातिथिमें पैदा होय वह स्त्री सोना- ग्यकरके युक्त पतिको प्यारी अच्छे पुषयमें है शील जिसका बहुतसे पुत्रपौत्रोंसहित वेदवेदांतके ज्ञानमें विराजमान होती है ॥१॥ अथ द्वितीयाजातफलम् । नारी सुचेषा बहुकान्तियुक्ता दयान्विता पार्थि- ववल्लभा च । सुनेत्रकेशा बहुधर्मरक्ता सदा द्वि- तीयाप्रभवा मनोज्ञा ॥२॥ अर्थ-जो नारी द्वितीयातिथिम पैदा होय वह खी अत्यंत कांतियुक्त उत्तम वेषवाली दयायुक्त राजाको प्यारी अच्छे नेत्र और वाल जिसके बहुतसे धर्ममें तत्पर मनकी जानने- वाली स्त्री होती है ॥२॥ मथ तृतीयाजातफलम् । सौम्या तृतीयाप्रभवा सुसत्या भवेत्सुमन्दा- चिरकालकृत्या । तीर्थानुरक्ता वनितामि- जाता गुणान्विता पुत्रवती सपात्रा ॥३॥ अर्थ-जो स्त्री तृतीयातिथिमें पैदा मई होय वह नारी श्रेष्ठ चाग्यवती पतिव्रता मंदा बहुतकालमें काम करनेवाली सी में आमक गुणोंकरके युक्त पुत्र पौत्रावाली होता है ॥२॥ अथ चतुर्थीजातफलम् । सदा नृशंसा पनितातितीक्ष्णा सा स्त्री सकामा

(११०) स्त्रीजातकम् ।
योगानां च नियोजयेत्फलमिदं पृच्छाविलने तथा
पाणिप्रग्रहणे तयाच वरणे संभूतिकालेऽपि च ॥३३॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्र-
सादात्मजराजज्योतिपिकपण्डितझ्यामलालविर-
चिते स्त्रीजातके राजयोगवर्णनो
नाम पष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अर्थ-पहिले मुनीश्वरोंने स्त्रीजातक विस्तारपूर्वक अच्छा
बुरा फल चलेप्रकार जो कहा है सो बुद्धिमानाने बलापल विचार
करके पहिले कहेहुए योगोंको नियोजनकरके ये फल
प्रश्नकालमें विवाहकालमें सगाई समय विचार करना
चाहिये ॥ ३३॥
तिश्रीवंशवरेटिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवमसादात्मजराजज्यौ-
लिपिकश्यामलालझतायां श्यामसुंदरीमापाटीकायां
राजयोगफलवर्णनो नाम पष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथ तिथिजातफलाध्यायो निरूप्यते ।
उक्तं च श्यामदेवज्ञेन ।
अथ प्रतिपरि जातफलम् ।
नारी यदा समितिथौ सुनाता सौभाग्ययुक्ता
पतिवल्लभा च । सुपुण्यशीला बहुपुत्रपौत्रा परा-
गमज्ञानविराजमाना ॥ १ ॥

जापाटीकासहितम् । (१११) अर्थ-जो नारी प्रतिपातिथिमें पैदा होप वह स्त्री सौमा- ग्यकरके युक्त पतिको प्यारी अच्छे पुण्यमें है शील जिसका बहुतसे पुत्रपौत्रोंसहित वेदवेदांतके ज्ञानमें विराजमान होती है ॥ १ ॥ अथ द्वितीयाजातफलम् । नारी सुवेषा बहुकान्तियुक्ता दयान्विता पार्थि- ववल्लभा च । सुनेत्रकेशा बहुधर्भरता सदा द्वि- तीयाप्रभवा मनोज्ञा ॥२॥ अर्थ-जो नारी द्वितीयातिथिम पैदा होय वह स्त्री अत्यंत कांतियुक्त उत्तम वेषवाली दयायुक्त राजाको प्पारी अच्छे नेत्र और वाल जिसके बहुनसे धर्ममें तवर मनकी जानने- चाली स्त्री होती है ॥ २ ॥ अथ तृतीयाजातफलम् । सौम्पा तृतीयाप्रभवा सुसत्या भवेत्सुमन्दा- चिरकालकृत्या । तीर्थानुरक्ता वनितामि- जाता गुणान्विता पुत्रवती सपात्रा ॥३॥ अर्थ-जोखी तृतीयातिथिमें पैदा नई होय वह नारी श्रेष्ठ जाग्यवती पतिव्रता मंदा बहुतकालमें काम करनेवाली तीथोंमें आसक गुणोंरुरके युक्त पुत्र पौत्रापाली होती है ५३॥ अथ चतुर्थीजातफलम् । सदा नृशंसा वनितातितीक्ष्णा या स्त्री सकामा (११२) स्त्रीजातकम् । व्यभिचारशीला । द्यूते रता धर्मविवेकहीना नारी चतुर्थीतिथिषु प्रजाता ॥४॥ अर्थ-हमेशा पराये द्रोहमें शील जिसका वह स्त्री तीक्ष्ण स्वभाववाली कामसहित व्यभिचारमें शील जिसका द्यूत अर्थात, जुवा खेलनेमें तत्पर धर्म और विवेकरहित ऐसी नारी चतुर्थी- तिथिमे पैदा होती है ॥ ४ ॥ अय पंचमीजातफलम् । इयुता बंधुप्रिया सुशीला दक्षा सुकार्ये सुख- संयुता च । परोपकारे निरता विरक्ता यस्याः प्रसूतौ तिथिपंचमा स्यात् ॥५॥ अर्थ-बंधुगणों करके सहित भाइयोंको प्यारी सुशील- वती अपने कार्यमें चतुर सुखसहित पराये उपकारमें तत्पर जिसके जन्मकालमें पंचमी तिथि होय वह विरक होती है ॥ ५॥ अथ पष्ठीजातफलम् । पष्ठया प्रजाता वनिता सुसत्या नारी प्रधाना जनवल्लभा च । श्लेष्माधिका क्रोधपरा कठोरा महाव्यया नीतिविहीनगात्रा ॥६॥ अर्थ-जो नारी छठवीं तिथिमें पैदा होय वह पतिव्रता स्त्रियों में प्रधान मनुष्यों को प्यारी टेप्माका अधिक कोप मापाटीकासमेतम् । (१३) जिसको कोषयुक्त कठोरे जादे सकरनेवाली नीतिकर, हीन शरीरवाली होती है ॥ ६॥ अथ सप्तमीजातफलम् । विशालनेत्रा प्रमदा मनोज्ञा नयान्विता देवगुरु प्रतक्ता । सुदानशीला नियमः समेता तिथल- जाता विगताभिमाना ॥ ७॥ अर्थ-विशाल नेत्रोंवाली नारी मनके जाननेवाली नम्रता युक्त देवता और गुरुमें आसक्त अच्छे दानमें शील जिसका, नियमसाहित और दूरहुआ है अधिमान जिसका ऐसी सी सप्तमी तिथिमें पैदा होती है ॥ ७ ॥ अथाष्टमीजातफलम् । प्रियामिपा पानरता कुरूपा दुष्टस्वभावा सुतार- तहीना । दयाविहीना विकृतानुकारा गौरीपतर्य- प्रसवे तिथि: स्यात् ॥ ८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें पार्वतीके पति शिवजी- की अष्टमी तिथि होय उस नारीको मांस प्पारा, मदपानमें तत्पर, कुरुपवाली, दुष्टस्वनाव पुत्र और धनकरके हीन दया- रहित भर्यकर आकारवाली होती है ॥ ८॥ अथ नवमीजातफलम् । कुटुंबहीना रसना कठोरा पराङ्मुखी सर्वगृहस्य ८ (11४) श्रीजातकम् । कार्य । धन्यैव दुष्टा व्यसनेः प्रयुक्ता यस्याः प्रसूतो नवमी तिथिभवत् ।। ९॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें नवमी तिथि होय वह नारी कुटुंबहीन कठोर सब घरके कामोंमें पराङ्मुखी होती है और वह विवाहके पहिले व्यभिचारिणी अनेक व्यसनोकरके युक्त होती है ॥ ९॥ अथ दशमीजातफलम् । नारी भवेद्धर्मपा सुहा प्रलंबकण्ठा च सुख- प्रवीणा । देवार्चने प्रीतिकरा सुपुत्रा यस्पा जनो स्यादशमीतियिस्तु ॥ १०॥ अर्थ-जिस औरतके जन्मकालमें दशमी तिथि होय वह नारी धमें तत्सर, अच्छे मकान, लंबा गला, सुन्दर आवाज वाली, चतुर, देवताओंके पूजनमें प्रीति करनेवाली अच्छे पुत्रावाली होती है ॥ १० ॥ अथैकादशीजातफळम् । देवद्विजानितदानशीला पुण्यकचित्तोत्तमकर्म- दक्षा । नानाविच्छास्त्रपरागमज्ञा चैकादशी जन्मातीधर्भवेत्सा ।। ११ ॥ अर्थ-देवता और ब्राह्मणों के पूजन भौर व्रत दान में शील जिसका, एक पुण्यों उत्तम चित्त, उत्तमकर्म करनेमें समर्थ

भापारीकासमेतम् । (११५)
अनेक प्रकारके अर्थोंको जाननेपाली, शासज्ञा, जिसकी जन्म
तिथि एकादशी होती है वह स्त्री वेदांत जाननवाली होतीहै।
अय द्वादशीजातफलम् ।
जलाशये प्रीतिकरा सुशीला निजालये वासवि-
लायुक्ता । सुरेंद्रभावापररंध्रपक्षा या द्वादशीना
वनिता प्रधाना ॥ १२ ॥
अर्थ-जलाशयोंमें प्रीतिकरनेवाली, सुशीला, अपने
घरमें वास करे, विलासयुक्त पराये छिद्रको इंद्रके समान
हजार नेत्रोंसे देखनेवाली यह द्वादशीतिथिमें पैदाहुई सियोंमें
प्रधान होती है ॥ १२॥
अथ त्रयोदशीजातफलम् ।
रूपान्विता धर्मपरा सुसत्या सच्छास्त्रवेत्नी व
सुखप्रवीणा । क्षमान्विता सर्वजितारिपक्षा या
कामिनी कामतिथी प्रसूता ॥ १३ ॥
अर्थ-रूपकरके युक्त, धर्ममें तत्पर, पतिवता, अच्छे शा-
खोको जाननेवाली, श्रेष्ठ शब्दवाली, चतुरा, क्षमावाली सम्पूर्ण
जीते हैं शत्रुदल जिसने ऐसी वह नारी होती है जो कि त्रयोद-
शौतिथिमें पैदा होती है ॥ १३॥
अथ चतुर्दशीजातफलम् ।
कंदर्पलीलारतकार्यदक्षा विरुद्धचेष्टा पतिपुत्र-
दीना । स्याद्रूपजीवा मलिना कुशीला चतुर्दशीजा
हि विचित्रचित्ता ॥ १४॥

चीनातकम्। अर्थ-धामकलामें रत, कार्यमें चतुरा, टेढी चे, करके हीना, वेश्यावृत्तिकरके आजीविका करनेवाली, मलिन, दुष्टशील जिसका, जो नारी चतुर्दशीतिथिमें पैदा भई वह पूर्व कहे गुणोंवाली और विचित्रचित्तवाली होती है ॥ १४ ॥ अथ पौर्णमासीजातफलम् । सुचारुमूर्तिः सुगुणा सलज्जा साम्बी सुपुत्रा सुखिनीक्लाज्ञा । विशालनेत्रा विधुरन्मुखी सा यदुवश्चदितिथी सुकांता ॥ १५ ॥ अर्थ-सुन्दर श्रेष्ठ मूर्तिमती, सुन्दर गुणवती लज्जासहित, पतिवता, सुन्दरपुत्रवती, सुखवाली, कलाओंकी जाननेवाली बडेनेत्र, चंद्रमाकासा मुख जिसका, जिसकी पैदायशके समय पौर्णमासी तिथि हो सो कांता सुन्दर होती है ॥ १५ ॥ अथ अमावस्याजातफलम् । सुचारूपका द्विजदेवयता पतिप्रिया साधुसुशीलदक्षा । गृहस्थकार्य सुविधिप्रवीणा यदुद्भवो दर्शतिथी सुपुण्या ॥ १६॥ इति श्रीवंशक्रेलिकस्थगोडवंशावतराश्रीवलदेव- सादात्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलाल- विरचिते स्त्रीजातके तिथिजातफलवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अर्थ-सुन्दरमुख जिसका, ब्राह्मण और देवताओंकी शक्ति- वाली, पतिको प्यारी, माधुउत्तमशीलवती, चतुरा, घरके ,

सापाटीकासमेतम् । (१३७)
काममें विधिपूर्वक प्रवीणा, जिसके जन्मकालमें अमावास्या
तिथि होय वह नारी पुण्यवती होती है ॥१६॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मज-
राजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालहतायां श्यामसुंदरी-
मापारीकायां तिथिजातफलवर्णनं नाम
सप्तमोऽध्यायः ॥ ७॥
PARAD
काजा-
मथ वारजातफलाध्यायो निरूप्यते ।
तीक्ष्णा च सुभगा व प्रचंडा तेजसान्विता ।
पडसावादिनी कन्या जायते रविवासरे ॥ १ ॥
मई-तीक्ष्णस्वमाययाली, सुनगा प्रचंडस्वरूपा, प्रकाश
चाली, जिस कन्याके जन्मकालमें सूर्यवार होय तह छः
रसोंके स्वादलेनेवाली होती है ॥ १ ॥
अथ चंद्रवारजातफलमाह ।
सुनिग्धा सुभगा व सुस्मिता चारुभूपणा ।
जलवेलिकरा नित्यं जायते चंद्रवासरे ॥२॥
अर्थ-मुंदर चिकनी देहवाली, श्रेष्ठभाग्पसहिता, उत्तम
है हँसन जिसका, श्रेष्ठ आभूपणोंके धारण करनेवाली जलके
खेल नित्यही करनेवाली कन्या तोमवारके दिन पैदा
होती है ॥ २॥

.
(११८) वीजातकम्।
अथ भोमवारजातफलमाह।
प्रचण्डा तेजसा नित्यं कृतना क्रोधसंयुत्ता ।
फोसुंभवत्रा निरता जायते भीमवासरे ॥ ३॥
अर्थ-प्रचण्ड तेजकरके नित्यही प्रकाशवाली, अहसान
न माननेली, कोधकरके सहित, कुसुनेके रंगे वसोंमें तत्पर
कन्या मंगलवारमें पैदा होती है ॥ ३ ॥
अथ बुधवारजातफलमाद।
शुभानिपु वाक्येषु रंगते मिष्टभापिणी ।
धर्मकर्मरता नित्यं जायते बुधवासरे ॥ ४ ॥
अर्थ-अच्छे बुरे वचनोंमें प्रसन्न रहनेवाली, मिष्टवाक्य
बोलनेवाली, धर्मकर्ममें नित्यही तत्तर हो वह कन्या बुध-
वारको पैदा होती है ॥ ४ ॥
अथ मुरुवारजातफलमाह।
पापकविहीना च धनधान्यप्तमन्विता ।
देवद्विजार्चिता नारी या जाता गुरुवासरे ॥५॥
अर्थ-पापकर्म जितने हैं उनसे रहित और धन धान्य-
करके सहित देवता और ब्राह्मणों के पूजन करनेवाली जो भी
होती है यह बृहसतियारमें पैदा होती है ॥ ५॥
अथ भृगुवारजातपटमाद ।
पत्राभरणसंपन्ना गजवानिसमन्विता ।
साप्पी पुत्रयुता कन्या या जाता भृगुवासरे ॥६॥

भाषाटीकासमेतम् ।
अर्थ-कपडे और गहनोंकरके संपन्न, हाथी और घोडा
करके सहित प्रतिव्रता पुत्रक्रके युक्त होती है वह शुक्र-
वारके दिन पैदा होती है ॥ ६ ॥
अथ शनिवारजातफलमाह ।
मलिना च कुवेपा च प्रजल्पा वैरकारिणी ॥
अल्पावना दयाहीना कन्या जाता शनदिने ॥७॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिषिकपण्डितश्यामलालविर-
चित्ते स्त्रीजातके वारजातफलवर्णनो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥
अर्य-मलिन बुरे वेपवाली निर्भयवाक्य बोलनेवाली
रायसे पैर करनेवाली थोडे पुत्रवती दयाकरके हीन जो कन्या
होती है वह शनैश्चर के दिन पैदा होती है ॥ ७ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादा-
मजराजज्योतिपिकमण्डितश्यामलालहतायां पा.
मसुन्दरीमापाटीकायां चारजातफलवर्णनो
नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
अथ नक्षत्रजातफलाघ्यायो निरूप्यते ।
अथाधिनीजातफलमाह-वृद्धयवनः ।
जाताश्विनीपु प्रमदामनोज्ञा प्रभूतकोशा प्रियदर्शना च ।
प्रियंवदा सर्वसहाभिरामा वृद्धयान्वितादेवगुरुप्रसता ॥३॥

(१२०) स्त्रीजातकम् - अर्ध-अश्विनीनक्षत्र में पैदा भई नारी मनके जाननेवाली बहुत धनवती प्यारा दर्शन जिसका पियवाक्य कहनेवाली सबकी सहारनेवाली अत्यंत सुंदर वृद्धि करके सहित देवता और गुरु ब्राह्मणोंमें आसक्त होती है ॥ १ ॥ अन्यच्च ग्रंथा- तरे "कन्या बलवनी चैव त्वहंकारवती सदा ॥ व्यवहाररता दक्षा दसने जायते हि सा" इति ॥ अथ भरणीजातफलमाद । स्त्रीवर्गयुक्ता भरणीषु जाता भवेन्नृशंसा कलहप्रिया च । सुदुष्टचित्ता विभवविहीना हतप्रतापा सततं कुचैला॥२॥ अर्थ-भरणीनक्षत्रमें पैदामई नारी स्त्रीगणोंकरके युक्त परद्रोह शील जिसका, कलहप्रिय, अलेप्रकार दृष्ट चित्त- वाली, वैशवकरके हीन नष्ट प्रतापवाली निरंतर मलिन होती है ॥ २॥ अन्यच्च-"अत्यंतसुखिनी कन्या चावंगी हास्यकारिणी । मातृपितृप्रशस्ता च जायते यमदैवते" इति । अथ कृत्तिकाजातफलमाह । जाता भवेत्स्त्री त्वथ कृत्तिासु कोषाधिका युद्धपरा विरक्ता । प्रदेपिणी बंधुजनन हीना श्लेप्माधिका क्षामतनुः सदेव ॥३॥ अर्थ-कत्तिकानक्षत्रमें पैदा नई स्त्री अधिक क्रोधयुक्त युद्धमें रक्त विरक्त हमेशा वैर करनेवाली, बंधुजनों करके .

17 मापारीकासमेतम् । (१२) हीन श्लेष्मा अधिक दुर्बल शरीर हमेशा रहता है ॥ ३॥ अन्यच्च अथांतरे "तेजस्विनी यशोयुक्ता परसता तु कन्यका । बह्वाशनी जररूपा कृत्तिकायान्तु जायते । अथ रोहिणीजातफलमाह। जाता भवेत्स्त्रीत्वथ रोहिणीषु प्रभूतगात्राशुचिरप्रमत्ता। पत्तिप्रधाना पितृमातृभक्तासुपुत्रकन्याविभवः समेता॥४॥ अर्थ-रोहिणीनक्षत्र में पैदाई नारी बडे शरीर वा पवित्र मदकरके हीन पति है प्रधान जिसके पितामाताकी मत अच्छे पुत्र कन्या वशवकरके सहित होती है ॥४॥ अन्यमतांतरे "आयुष्मती सुतवती कन्यका कुलब- दिनी ॥ धन्या मानवती चैव रोहिपयां जायते हि सा । अथ मृगशिरोजातफलमाह । मृगे तु मान्या वनिता सुरूपा प्रसन्नवाक्या प्रियभूषणा च । नानार्थविच्छास्त्रपरा सुपुत्रा धर्माश्रया शुभ्रतनुः प्रसक्ता ॥९॥ अर्थ-मृगशिरानक्षत्रमें पैदाई नारी सुरूपवती मानयुक्त प्रसन्नचित पियवाक्य बोलनेवाली भूषणोंसहित अनेक अर्थोके जाननवाली शास्त्रज्ञ श्रेष्ठ पुत्रॉसाहित धर्मके आश्र- यमें तत्पर श्वेत शरीरवाली होती है ॥५॥ अन्यच्च-"मातुः पितुः प्रशस्ता च कन्यका धनमा गिनी ॥ रुपणा चान्यसता च जायते सोमदैवते ॥m "

(३२२)
नीजानकी
।
अथ आजातफलमाह ।
आर्द्रासु नारी कृतमन्युयुक्ता दुष्टस्वभावा कफपित्तभा-
जा। सुरेंद्रभावा पररंध्रदक्षा महाव्यया कृत्रिमपंडिताच ॥
अर्थ-आनिक्षत्रमें पैदाई नारी बनाये हुए अभिमान
युक्त दुष्ट स्वभाववाली कफ पित्त भोगनेवाली पराये छेदको
इंद्रके समान हजार आँखों करके देखनेवाली बहुत खर्च कर
बनावटकी पंडिता होती है ॥ ६ ॥
अन्यच्च-“पापकर्मप्रसक्ता च कुरुपा कलहप्रिया ॥
कन्यका दृढवैरा च जायते रौद्र देवते ॥"
अथ पुनर्वसुजातफलमाद।
पुनर्वसौभविहीनभावा श्रुत्याधिका पुण्यपरस्वभावा
नारी भवेद्धर्मपरा मनोज्ञा सुपूजिता नाथवती सदेव ॥
अर्थ-पुनर्वसुनक्षत्रमें पैदामई नारी अभिमान रहित
श्रवण कराहुआ याद बहुत रहे पुण्यवान् स्वमाव जिसका,
धर्मवती मनकी जाननेवाली मनुष्योंकरके पूजनीय सदा
पतिसहित सौजाग्यवती होती है ॥ ७ ॥
अन्यच्च-"क्षमाशीलपसता च कन्यका बांधवप्रिया ।
अवैरा परलोकार्थी जायते रौददैवते ॥"
अथ पुष्यजातफलमाइ ।
पुष्येषु जाता वनिता सुरूपा प्रसिद्धकृत्या सुभगा
सुगात्रा । देवद्विजा प्रणया सुहा सुखाधिका
बांधववल्लभा च ॥८॥

नापाटीकासमतम् । (१२३) अर्थ-पुष्यनक्षत्रमें पैदा नई नारी सुरूपवती कम्मौक- रके प्रसिद्ध श्रेष्ठ माग्यवाली सुंदर शरीरवाली देवताबाह्मणोका पूजन करनेवाली नम्रतासहित उत्तम मकान सुम्प अधिक आइयोंकी प्यारी होतीहै ॥८॥ अन्यच्च-"धर्मबुद्धिसदारूढा सर्वकार्यकरी सदा । प्रशस्ता कन्यका चैव जायते गुरुदैवते ॥" अथाश्लेपाजातफलमाह । साप्पै कुरूपा व्यसनाभिभूता प्रियाविहीनाति- कठोरखाक्या । नारी भवेत्सत्यविहीनकृत्या दंभान्विता पापरता कृतना ॥९॥ अर्थ-जो नारी आलेगा-शत्रमें पैदागई वह अनेक व्यसनोंसे युक्त प्रिय कर्मोकरके हीन अति कठोर पाणी बोलनेवाली सत्यकरके हीन कर्म करनेवाली क्रोधसहित पापमं तत्पर अहसान न माननेवाली होतीहै ॥९॥ तद्यथा-"प्रचण्डा च कृतघ्ना च कुरुपा कलहप्रिया । कन्यका प्रेमसक्ता च जायते नागदेवते ॥" अथ मघाजातफलमाह। मघासु मान्या बहुशास्त्रपक्षा श्रियाधिका पाप- विवर्जिता च । भक्ता गुरूणां प्रणता द्विजानां नारी भवत्पार्थिदसौख्ययुक्ता ॥ ३०

(३२२)
स्रीजातका
अथ आर्द्रजातफलमाह ।
आसु नारी कृतमन्युयुक्ता दुष्टस्वभावा कफपित्तभा-
जा। सुरेंद्रभावा पररंध्रदक्षा महान्यया कृत्रिमपंडिताच ॥
अर्थ-आर्द्रानक्षत्रमें पैदाभई नारी बनाये हुए अभिमान
युक्त दुष्ट स्वभाववाली कफ पित्त भोगनेवाली पराये छेदको
इंद्रके समान हजार आँखों करके देखनेवाली बहुत खर्च करै
बनावटकी पंडिता होती है ॥ ६ ॥
अन्यच्च-"पापकर्मप्रसक्ता च कुरुपा कलहाप्रिया ॥
कन्यका दृढवैरा च जायते रौद्र दैवते "
अथ पुनर्वसुजातफलमाह ।
पुनर्वचोदंभविहीनभावा श्रुत्याधिका पुण्यपरस्वभावा ।
नारी भवेधर्मपरा मनोज्ञा सुपूजिता नाथवती सदेव ॥
अर्थ-पुनर्वसुनक्षत्रमें पैदामई नारी अभिमान रहित
श्रवण कराहुआ याद बहुत रहे पुण्यवान् स्वभाव जिसका,
धर्मवती मनकी जाननेवाली मनुष्योंकरके पूजनीय सदा
पतिसहित सौभाग्यवती होती है ॥ ७ ॥
अन्यच्च-"क्षमाशीलप्रसता च कन्यका बांधवप्रिया ॥
अवैरा परलोकार्थी जायते रोदैवते ॥"
अथ पुष्यजातफलमाद ।
पुष्येषु जाता वनिता सुरूपा प्रसिद्धकृत्या सुभगा
सुगात्रा । देवद्विजा प्रणया सुहा सुखाधिका
बांधववल्लभा च ॥८॥

नापाटीकासमेतम् । अर्थ-पुष्यनक्षत्र में पैदा भई नारी सुरूपवती कम्मॉक- रके प्रसिद्ध श्रेष्ठ भाग्यवाटी सुंदर शरीरवाली देवताबाह्मणोंका पूजन करनेवाली नम्रतासहित उत्तम मकान सुख अधिक भाइयोंकी प्यारी होतीहै ॥ ८॥ अन्यच्च-"धर्मबुद्धिसदालढा सर्वकार्यकरी सदा ॥ प्रशस्ता कन्यका चैव जायते गुरुदैवते ॥" अथालेपाजातफलमाह । सार्प कुरूपा व्यसनाभिभूता प्रियाविहीनाति- कोखाक्या । नारी भवेत्सत्यविहीनकृत्या दंसान्विता पापरता कृतना ॥ ९॥ अर्थ-जो नारी आहेगनमत्रमें पैदाई वह अनेक व्यसनोले युक्त प्रिय कोकरके हीन अति कठोर वाणी बोलनेवाली सत्यकरके हीन कर्म करनेवाली कोषसहित पापधर्म तत्पर अहसान न माननेवाली होताहै ॥९॥ तद्यथा-"प्रचण्डा च रुतत्रा च कुरूपा कलहप्रिया । कन्यका प्रेमसक्काच जायते नागदेवते ॥ अथ मघाजातफलमाह। मघासु मान्या बहुशास्त्रपक्षा श्रियाधिका पाप- विधार्जिता च । भक्ता गुरुणां प्रणता द्विजानां नारी भवेत्पार्थिदसोध्ययुक्ता ॥ ३० (३२४) स्त्रीजातकम्। अर्थ-मपानक्षत्र में पैदा गई नारी सत्पुरुपोंकरके मान्य बहुत शात्र जाननेवाली लक्ष्मी सहित पापकरके रहित ब्राह्म- गोंसे नम्र गुरुजनोंकी भक्ता राजाओवरके सुखयुक्त होती है ॥ १०॥ अन्यच्च-"महाहनोजने सक्ता कन्या भागवती तु सा । पितृ देवार्चने रक्ता जायते पितृदैवते ॥ " अथ पूर्वाफाल्गुनीजातफलमाह । भाग्यर्जितारिः सुभगा सुपुत्रा नयान्विता स- व्यवहारदशा ॥ शास्नानुरक्ता प्रियवादिनी च स्वप्राप्तपुण्या हि भवेत्कृतज्ञा ॥ ११॥ अर्थ-भाग्यकरके जीते हैं शत्रु जिसने श्रेष्ठ भाग्यवती उत्तम पुत्रवती नम्रतासहित अच्छे व्यवहारमें चतुर शास्त्रमें आसक्त प्यारी वाणी बोलनेवाली आपही प्राप्त किया है पुण्य जिसने अहसान माननेवाली होती है ॥ ११ ॥ अन्यच्च--"त्यागशीलविहीना च लोमक्रोधविवर्द्धिनी । कन्यका दृढकामा च जायते नागदेवते " अथोत्तराफाल्गुनीजातफलमाह । जातोत्तरायां स्थिरचित्तवित्ता नयप्रधाना गृहकृत्यदक्षा ॥ गुणानुरक्ता व्यनैर्वियुक्ता नारी भवेद्रोगविवर्जिताङ्गा ॥ १२॥ अर्थ-जो कन्या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें पैदाहुई वह कन्या स्थिरचित्तवाली धनवाली नम्रता है प्रधान जिसके घरमें भागावासमेन्म् । (१२५) कामीम चतुर गणेगमें आसक्त दुर्व्यसनोकरके रहित रोगा- रके रहित शरीरवाली होतीहै ॥ १२ ॥ अन्यच्च-"अर्थसंचयसंयुक्ता कन्या छिद्रकारिणी किंचिद्धर्मवती चैव जायतेयमदेवते ॥" अथ हातजातफलमाह। हस्ते सुदरता शुभनेक्षणी क्षमान्विता शीलधना विधिज्ञा । भवनितांत वनिता सुभासा महासुखैर्व- द्धितगात्रकीर्तिः ॥ १३ ॥ अर्थ-जो क्या इस्तगावमें पैदा भई वह सुन्दर हाथ ने कानवाली क्षमासहित और शीलपती धनवती अनेक विधिको जाननेवाली निरंतर वह नारी सुन्दरकांतिवाली बहुत सुखकरके बढतीहै शरीरकी कीर्ति जिसकी ऐसी होतीहै १३॥ अन्य-" तीक्ष्णा च दृढकामा च परद्रव्यापहारिणी ।। स्वकर्मकुशला कन्या जायते चाकदैवते ॥ " अथ चिशजातफलमाह । चित्रासु चित्राभरणा सुरूपा चतुर्दशीमेकता हि हित्वा । तथा च कृष्णे विषकन्यका स्याच्छु- के दरिद्रा त्वथ बंधकी च ॥ १४॥ अर्थ-जो कन्या चित्रानक्षत्रम पैदाई वह कन्या विचित्र आमरणरूपवाली होताहै परंतु चतुर्दशी तिथि जन्मकी नहीं होय जो कृष्णपक्षवी चतुर्दशीमें जन्म होय तो विपकन्या (१२६) स्त्रीजातकम् । होती है और शुक्लपक्षको चतुर्दशी चित्रानक्षत्रमें जन्म होय तो वह नारी दरिद्रिणी और पापिनी होती है ॥ १४ ॥ अन्यच्च--"शुक्लांबरधरा कन्या हास्यकामिजनप्रिया । पितृदेवार्चने सत्ता जायते त्वाष्ट्रदैवते ॥" अथ स्वातीजातफलमाह। स्वातीषु जाता सततं सुताच्या चित्राधिका सत्य- वनाल्पपाना । नारीभवेत्कीतिसमन्विता च प्रभूतमित्रा विजितारिपक्षा ॥ १५॥ अर्थ-जो नारी स्वातीनक्षत्र में पैदा भई होय यह निरंतर पुत्रोंसहित अधिक चतुर सत्य और धनसहित थोडा पान करनेवाली यशकरके सहित बहुत मित्रोंकाली जीते हैं शत्रुदल जिसने ऐसी होतीहै ॥ १५॥ अन्यच्च-"निरालस्यातिरूपा च कुत्सिता च जया- न्विता । कन्यका चापमादी च जायते वायुदैवते ॥1 अथ विशाखाजातफलमाह । भवेद्विशाखासु, सुहृत्प्रभावा सुकोमलांगी विभ- कै समेता। तीर्थानुरक्ता व्रतधर्मदक्षा रामा भवे- द्वांधववल्लभा च ॥१६॥ अर्थ-विशाखानक्षत्र में पैदा नई कन्या अपने मित्रोंके प्रभाववाली कोमल शरीर वैभवकरके युक्त तीर्थों में आसक्त व्रत धर्ममें चतुर बांधवोंको प्यारी होती है ॥ १६ ॥ अन्यच्च-"धर्ममूलविनीता च प्रज्ञापनसमन्विता । दिदै- पते हि संजाता कन्यका सत्यवादिनी ॥"

झापाटीकासमेतम् । (१२७) अयानुराधाजातफलमाह। मैत्रे सुमित्रा विगताभिमाला प्रसन्नमृतिः प्रभुतासमेता। विनीतवेपाभरणा सुमध्या भक्ता गुरूणां पतिभक्तियुक्ता। अर्थ- अनुराधानक्षत्रम पैदा ई जो कन्या वह अच्छे मित्रोंसहित अभिमानरहित हमेशा प्रसन्नमूर्ति ऐश्वर्ययुक्त नम्रता लिये स्वरूप जिसका आजरणयुक्त बडे पुरुष तथा पतिकी हमेशा भक्का होती है ॥ १७॥ अन्यच्च-"बहुमुग्लोजसंपन्ना मदामांसरता सदा । कन्यका चान्यसंसक्ता नायवे मिदैवते ॥" अथ ज्येष्ठाजातफलमाह । ज्येष्टासु रम्या पनिता प्रगल्भा सुचारुवाक्या वि- नयान्विता च । प्रभूतकोपा सुभगा सुताच्या बंधु- प्रिया सत्यसमन्विता च ॥१८॥ अर्थ-ज्येष्ठानक्षनमें पैदा भई कन्या शोभायमान निर्भय वाक्य बोलनेवाली श्रेष्ठ वचन जिसका नम्रतायुक्त बहुतकोष करनेपाली श्रेष्ठ भाग्यवाली पुत्रोसहित माइयोंको पारी सत्यकरके सहित होती है ॥ १८ ॥ अन्यच्च ग्रंथांतरे-"शनोपचातिनी चैव महाकलहकारिणी। कन्यका चातितीक्ष्णा च जायते इंद्रदेवते ॥" अय मूलनातफलमाह । मूलेल्पसौख्या विधा दरिद्रा रोगामिभूता (१२८) सीजातकम् । बहुशास्त्रपक्षा । नारी भवेदान्धवलोकहीना पराभिभूता बहुनीचगर्वा ॥ १९॥ अर्य--मूलनक्षत्र में पैदा भई पन्या थाडा सुखवाली विधवा दरिदिणी रोगयुक्त बहुत शास्त्रको जाननेवाली बंधुजनोकरके हीन पराश्रयवती बहुत नीच अतिमानकरकेसहित होताहै१९॥ अन्यच्च-“पापकर्मा प्रचण्डा च कुकार्यनिरता सदा । कुलशयकरी कन्या जायते मूलो च या ॥" अथ पूर्वीपादाजातफलमाह । आप्येनुकूला कुलबंधुमुख्या सुपूज्यकौतुल- वीर्यसत्या । विशालनेत्राद्भुतरूपयुक्ता नारी भवेत्कीर्तियुता सदैव ॥ २० ॥ अथ--पूर्वीपाडानक्षत्रमें पैदामई कन्या अपने कुलके अनुकूल बंधुगणोंमें मुख्य पूजनीय कर्मकरनेवाली बहुत बल- वान् पतिव्रता बडे नेत्रवाली अद्भुतरूपसहित संसार यशवाली होती है ॥ २० ॥ अन्यच्च-“धर्मशीला विनीता च कन्यका सत्यवादिनी । पुण्पकर्मरता चैव जायते जलदेवते ॥" अथोत्तरापाठाजातफलमाह । वैश्वे तु जाता वनिता मनोग्या भवेद्वितीया प्रथिता च लोके । नानार्थभोगः सहिता प्रघाना संतुष्टीचत्ता पतिवल्लभा च ॥ २१ ॥ अर्थ-उत्तरापादानक्षत्र में पैदामई कन्या मनकी जानने भाषाटीकासमेतम् । पाली संसारको सियोंमें अपणी द्वितीया होती है अनेक म- कारके धनका नोगकरके सहित मयान संतुष्टचित्त पतिको प्यार होता है।॥ २१॥ अन्यच्च--"मती नियवचाश्चैव नित्यं चातिथिमेचिनी । कन्यका जायते या तु वैश्वदेवे सुतान्विता ॥" अथ श्रवणजातफलमाह। प्रभूतरूपा हरिभे सुविज्ञा शास्त्रानुरक्ता प्रचुर- प्रभावा ॥ स्त्री सर्वदा दानरता सुसत्या परोप- कारे प्रणता च नित्यम् ॥ २२॥ अर्थ-जो नारी श्रवणनक्षत्रमें पैदा भई वह नारी बहुनरूप पाली बुद्धिमती शास्त्रोंमें आसक्त बड़ा है प्रभाव जिसस हमेशा रानमें तसर पतिव्रता पराया उपकारकरनेवाली नम्रता सहित नित्य ही होती है ।। २२॥ अन्यच्च-"विनीता अधाना च कथालापमियासती। कन्यका स्वकुले पूज्या जायते विष्णुदेवते " अथ घनिष्ठाजातफलमाह। भवेद्धनिष्ठासु कथानुरक्ता नारी प्रभूतानसुव- खभाजा! नानार्थदा प्राणिदयानिपण्णा गुणा- घिका सद्गुणहिता स्यात् ॥ २३ ॥ अर्थ--जो नारी पनिष्ठानक्षत्र पैदामई वह कथावरण करने आसक्त बहुतसे अन्नवाली श्रेष्ठस्रोंको पहिरनेवाली भनेक प्रकारके धन देनेवाली प्राणीमात्रार दया करने खोजातकम् । वैयार बैठी गुणों में अच्छे गुणोंकीसी चेष्टा जिसकी ऐसी होती है ॥ २३॥ अन्यच्च-"अार्थिनी च लुब्धा च पुष्पमाल्यांवरप्रिया । कन्यका ह्यन्यसत्ता च जायते वसुदैवते ॥" अथ शतभिषाजातफलमाह । भवेत्सुदात्री त्वथ वारुणः स्त्रीसमता पूज्यतमा स्ववगै । देवार्चने श्रेष्ठजनानुरक्ता सदा हिता सर्वकुतूहलानाम् ॥ २४ ॥ अर्थ-जो स्त्री शतभिपानक्षत्रमें पैदानई बह दाता स्त्रियोंके गुलाह देनेवाली अपने कुटुम्बमें पूज्य देवताओंके पूजनकरने- बाली सबको हपदायिनी होती है ॥ २४ ॥ अन्यच्च-"पापकर्मप्रचण्डा च नित्यमुद्वेगकारिणी । परोप- कारिणी कन्या जाता वरुणदेवते ।" अथ पूर्वाभाद्रपदजातफलमाह । अजैकपादे वनिताभिजाता प्रभूतकाशा श्रुतला- सा च । सत्पात्रदा साधुसमागमोक्ता विद्यान्विता भूरिधनप्रधाना ॥ २५ ॥ अर्थ-जो नारी पूर्वानादपदके प्रथम चरण में पैदामई वह बहुत धनवाली कथाश्रवणमें है लालसा जिसकी अच्छे पात्रों. वो दान देनेवाली साधुओंके समागमकरनेवाली विद्या करके साहित बहुतधनवाली प्रधान होती है ॥ २५ ॥ अन्यच्च-"पापकर्मरता नित्यं कन्यका सर्वशक्षिणी। लायाविनी देवाका जायजैकपादने" ॥

भापाटीकासमेतम् ।
(१३१)
अयोत्तराभाद्रपदाजातफलमाह।
उपांत्यभे स्वामिहितानुरक्ता क्षमान्विता प्रीतिकरा
गुरूणाम् । प्रशांतगर्वा सुतसोल्ययुक्ता विवकिनी
सत्यपरा सदेव ॥२६॥
मर्थ-उत्तरामाद्रपद नक्षत्र में पैदाई कन्या अपने पतिके
हित करनेमें तत्पर क्षमासहित बडे जनों में प्रीति करनेवाली शांत
है अमिमान जिसका पुत्रसौख्य सहित चतुर सत्यमें तत्पर
सदा रहती है ॥ २६॥
अन्यच्च-"सुबुद्धिधर्मसत्ता च गुणशीलसमन्विता ।
अहिर्बुध्न्यदेवते तु कन्या जायते हि या ॥"
अय खेतीजातफलमाइ।
पोष्णसुपुष्टा बहुमित्रपक्षा स्वभावशुद्धा व्रतचारिणी च ।
तेजोन्विता भूरिचतुष्पवाट्या हत्तारिपक्षामियदर्शनाच२७
इति श्रीवंशवलिकस्यगोडवंशावतंघश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते
घाजातके नक्षत्रातफलवर्णनो नाम
नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अर्थ-जो नारी रेवतीनशत्रमें पैदा हुई यह पुष्ट बहुतहे मित्र
त्रियों जिसकी स्वतावहीसे शुद्ध व्रत तप करनेवाली तेजकरके
सहित बहुतसे चतुष्पद सवारीवगैरहकरके युक्त नाश को हैं
शव दल जिसने प्यारा है दर्शन जिसका ऐसी होतीहै ॥२७॥

स्त्रीजातकम्। अन्यच्च-"मातापित्रम्यश्वश्रूणां देववाह्मणसेविनी । अनु. कूला हि कन्याथ जायते पौष्णदेवदे ॥" इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौरवशावतंसश्रीबलदेवासादात्मज राज- ज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकृतायां मागसुंदरीनापाटीकायां नक्षनजातफलवर्णनो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥ अथ योगजातफलाघ्यायो निरूप्यते । उक्तं च इमामदेवज्ञेन। अथ विष्कुंभजातफटमाह । विष्कुम्भयोगे पनिता सुजाता पुत्रादिसौख्या पतिवल्लभा च । स्वातन्त्र्यका गृहकर्मदक्षा उदारचताः सततं विनीता ॥१॥ अर्थ-जो नारी विष्कुंभयोगमें पैदराजई वह पुत्र मित्रादि- कोंके सौख्यसहित स्वामीको पारी सब कामोंमें स्वतंत्र घरके काम िचतुर उदारचिच निरंतर नम्रतासहित होती है ॥ १ ॥ अप प्रीतियोगे जातफलमाह । या प्रीतियोगप्रभवा पुरंधी सच्छास्त्रविज्ञा धन- धान्ययुक्ता । रूपान्विता दाभकरा प्रवीणा प्रसन्नगात्रा जनवल्लभाच ॥ २॥ अर्थ-जो नारी प्रीतियोगमें पैदा भई वह अच्छे शास्त्रको निनेवाली धन और धान्यसहित रूपकरके युक्त दान

झापारीक्षासमेत्रम् ।
करने वाली चतुर हमेशा पान देहवाली मनुष्योंकी प्यारी
होती है ॥ २॥
अथ आयुष्णद्योगजातफलमाइ ।
नायुष्मति स्याचिरजीविनी पे जाताङ्गना का-
न्तिभराकरा सा । वनादिदुर्गेषु नदीषु सत्ता
विनातक्पा बहुधर्मशीला ॥३॥
अर्थ-जो नारी आयुष्मान्योगमें पैदालई यह परी
हमरवाली बहुत कांतिकरके युक्त यन, पर्वत, किला, नदी
इत्यादिकोंमें भासत नम्रतालिये वेप जिसका बहुत धर्मवाली
शीलवती होताहै ॥ ३ ॥
अथ सौभाग्ययोगजातफलमाइ।
सौभाग्यपोगे सुभगा सुकन्या प्रज्ञायुता सत्य-
परा घनाढया । सुमंदहास्या प्रियवादिनीच
सुगविता रूपवलेन नित्यम् ॥ ४॥
अर्थ-जो कन्या सौभाग्ययोगमें पैदाई वह श्रेष्ठमाग्य
पुद्धिकरके सहित सत्यमें तत्तर धनवती अच्छे मैद है हास्य
जिसका प्यारी वाणी बोलनेवाली अपने रूप बलकरके नित्य
ही गर्वित होती है ॥ ४॥
अघ शोभनयोगजातफलमाह
नारी भवेच्छोभनयोगमध्ये शोभान्विता याशु
सत्तरा सा । बुद्धयन्त्रिता दंभावहीनगात्रा
पुत्रान्विता सब्यबहारदक्षा ॥५॥

विवे.
(१३४) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ-जो नारी शोमनयोगगें पैदामई वह शोभाकरके
सहित जल्दी जवाब देनेवाली बुद्धिकरके सहित पाखंड करके
रहित शरीर जिसका पुत्रकरके युक्त अच्छे व्यवहारमें चतुर
होती है ॥ ५॥
अयातिगंडयोगे जातफलमाह ।
जातातिगंडे प्रमदा मनोज्ञा विशालयका समू-
दा सरोषा । कलिप्रिया झोषयुता कुरूपा
कहीना व्यसनाभिभूता ॥६॥
- अर्थ-- लो नारी अतिगंडयोगमें पैदा भई वह मनकी जान-
नेवाली विशाल मुख मिका अभिमानसहित क्रोधवाली
लडाई जिसको प्यारी मोधसहित कुरुपाली विवेककरके हीन
व्यसनामें तत्पर होती है ॥ ६ ॥
अथ सुकर्मयोगे जातफलमाइ ।
सुकर्मयोगे प्रमदा प्रसूता प्रज्ञाधिका सर्वाला-
प्रवीणा ॥ सत्साहसा दानरता कृतज्ञा परोपकारे
निरता सदेव ॥७॥
अर्थ-जो नारी सुकर्मयोगमें पैदा हुई वह बुद्धिमान अधिक
सब कलाऑमें प्रवीण उत्तम साहसवाली दानमें ततर
अहसान माननेवाली पराये उपचार करनेमें हमेशा तत्पर
होती है ॥७॥

भाषाटीकासमेतम् । (१३५)
अय' धृतियोगे जातफलमाह ।
धृत्याख्ययोगे वनिता विधिज्ञा प्रज्ञाधिका सत्य-
परायणाच । नयान्विता सा नियमेन युक्ता प्रशा-
तगर्वा बहुपुत्रपौत्रा ॥ ८॥
अर्थ-धृतियोगमें पैदाई नारी सम्पूर्ण विधियोंको
जाननेवाली बुद्धिमती अधिक सत्यमें तत्पर हमेशा रहती है
नम्रतासहित व्रतनियमोंमें युक्त शांत है अमिमान जिसका.
बहुत पुत्र पौत्रोंवाली होती है ॥ ८॥
अथ शूलयोगे जातफलमाह ।
शूले कुरूपा शुभवृद्धिहीना सत्कर्मविद्याविन-
योहाना ॥ शुलस्य रुक्तजठरे निततिं दंभा--
विता पानपरा कृतना ॥९॥
अर्थ-शूल योगमें पैदाई नारी शुनपुद्धिहीन अच्छे
कर्म और विद्या नम्रता करके हीन होताहे तिसके उदरमें
शुलका रोग निरंतर अभिमानसहित मदापानमें तत्पर करे
हुए भहसानको न माननेवाली होती है ॥ ९॥
अथ गंडयोगे जातफलमाह ।
दृष्टा सुहत्कार्यपराङ्मुखी सा क्रोधान्विता'
बंधुजनेन हीना या गंडपोगे प्रमदा सुजाता
प्रचण्डगण्डा पुरुषस्वभावा॥ १० ॥

वीणातकम् । अर्थ जोनारी गंडयोगमें पैदामई यह व्यभिचारिणी और अपने मित्रोंक कार्यकरने में पराङ्मुख क्रोधसहित भाई- मौकरके हीन बडे भारी गंडस्थल जिसके पुरुषोंकेसे स्वमा- बवाली होती है ॥ १० ॥ अथ वृद्धियोगे जातफलमाह । जाता सुनारी किल किल वृद्धियोगे धनान्निता दंभाविहीनगात्रा ॥ सुसंग्रहे प्रीतिका सुदक्षा सुपूजिता पुण्यवती सुशीला ॥११॥ अर्थ-जो नारी निश्चयकरके वृद्धियोगमें पैदाभई यह धनकरके सहित पाखण्ड करके रहित रुपवाली अच्छे संग्रह सरनेमें तत्पर प्रीतिकरनेवाली अति चतुर मनुष्योरके पूज- भीय पुण्यवाली उत्तम शीलवती होती है ॥ ११ ॥ अथ ध्रुवयोगे जातफलमाह। ध्रुवे सुमान्या सुभगा सुपुत्रा क्षमान्विता स- व्यवहारदक्षा ॥ मसवाक्या धनधान्ययुक्ता शास्त्रानुरक्ता जनवल्लभा च ॥१२ ।। अर्थ-जो नारी ध्रुवयोगमें पैदाभई वह सुन्दरलाग्यवाली सुत्रवाली क्षमाकरके सहित अच्छे व्यवहारमें चतुर प्रसन्न बाक्य बोलनेवाली धन धान्यकरके युक्त शास्त्रों में तत्पर अनुप्योंको प्यारी होतीहै । १२ ॥

आयाटीकासमेतम् ।
अपमापातयोगजातफलमाह ।।
व्याघातजाता खलु घातकी यसत्यगा प्रीति-
विदीनगाना , दयाविहीना कृपणा कृतमा
दंभान्विता युद्धपा विरक्ता ।।१३।।
अर्थ-व्याघात योगमें पैराई नारी निश्चय करके घाव
करनेवाली असत्यमें तत्पर प्रीतिकरके हीन है शरीर जिसका
दयाकरके रहित रुपण अहसान न माननेवाली पाखण्डसहित
खंगाममें तत्सर विरक्त होती है ॥ १३ ॥
अथ हर्पणयोगे जातफलमाइ।
जाताबला हर्पणनामयोगे प्रमिदकरया सुभगा
कृतज्ञा । रतांबरा हेमविभूषणाच्या सुस्निग्ध
गात्रा सुखीतियुक्ता ॥ १४॥
अर्थ-जो नारी हणियोगमें पैदा ई वह अपने सत्यों करके
मसिद्ध सुन्दर भाग्यवाली अइसान माननेवाली लाल कपडेवाली
सुवर्णक भूषणोंकरके युक्त उत्तम चिकना शरीर सुखकीर्ति
करके युक्त होती है ॥ १४॥
अथ वज्रयोगे जातफलमाह ।
या वज्रयोगे प्रमदाभिजाता सा पत्रपुक्ता शुभ-
भूषणाच्या ॥ प्रज्ञाधिका बंधुजनेन सत्ता सत्या-
न्विता दानरता सुदक्षा॥ १५॥

खीजातकम् । अर्थ-जो नारी बज्रयोगमें पैदाई वह हीराजाटत उत्तम आभूषणोंकरके युक्त बुद्धिमती अधिक अपने बंधुजनोंकरके आसक्त सत्यकरके सहित दानमें तत्पर सुन्दर चतुर झोती है ॥ १५॥ अथ सिद्धियोगे जातफलमाह। या सिद्धियोगे पनिता प्रसूता उदारचित्ता सुभगा सुकृत्या ॥ अच्छास्त्रयुक्ता प्रणता द्वि- जानां नारी भवेद्रोगविवर्जिता च ॥ १६ ॥. अर्थ-जो नारी सिद्धियोगमें पैदामई वह उदारचित्त सुन्दर भाग्यपाली अच्छे कमौके करनेवाली अच्छे शास्त्रयुक्त बाल- गोसे नम्र रोगकरके हीन शरीरवाली होती है ॥ १६ ॥ अथ व्पतीपातयोगे जातफलमाइ। जाताङ्गना या व्यतिपातयोग तदा कुरूपा कलहप्रिया च ॥ रोगान्धिता पापरता प्रगल्भा जनहिनिा विकृतानुकारा ॥ १७॥ अर्थ-जो नारी व्यतीपातयोगमें पैदामई वह कुरुपवाली लडाई जिसके प्रिय रोगकरके सहित पापकर्ममें तत्पर प्रगल्न मनुष्योंकरके हीन भयकर आकारवाली होती है ॥ १७ ॥ अथ वरीयान्योगे जातफलमाह । वरीयसि स्यात्प्रमदा मुजाता नयान्विता प्रीतिकरा

t
;
ܐ ܝ *
मापाकालनम्।
गुरुणाम् । सादा दानरत्ता सुदक्षा नारी
भत्कीर्तियुता सुरूपा ।। १८॥
अर्थ-जो नारी वरीयान् योगमें पैदा भई नम्रताकरके युक्त
पडे जनोंमें प्रीतिकरनेवाली वह वी हमेशा दानकरनेमें तत्पर
भतिचतुर कीर्तिकरके युक्त रूपवती होतीहै ॥ १८॥
अथ परिषयोगे जातफलमाह।
जाता भवेत्स्त्री परिघाभिषाने असत्परता क्षमया
विहाना । सदाल्पभाषी विजितारिपक्षा महाव्यया
पानपरा सदेव ॥ १९॥
अर्य-जो नारी परिचनामयोगमें पैदाई वह भसत्यमें
वत्सर क्षमाकरके रहित हमेशा थोडा बोलनेवाली जीते हैं शत्रु-
इल जिसने अधिक खर्चकरनेवाली मद्यपान करनेवाली हमेशा.
होती है ।। १९॥
अय शिवयोगफलमाइ ।
सम्मंत्रशास्त्राभिरता नितांत जितेंद्रिया चारुवचाः
सुशीला । शिव सुपोगे प्रमदाभिजाता तस्याः
शिवं स्याच्छिवसुप्रसादाद ॥२०॥
मर्थ-जो नारी शिवनामयोगमें पैदशमई वह मच्छे मंत्र
सालोंमें तत्पर हमेशा इन्द्रियोंकी जीतनेवाली श्रेष्ठ वचन कह-
मेवाली उत्तम शील जिराका तिसका कल्याण नित्य शिवकी
मासे होता है ॥ २० ॥

(१४०) खोजातकम् । अप सिद्धियोगे जातफलमाह । यासिद्धियोगे प्रमदाभिजाता सुखान्विता सत्परता सुगौरा । प्रज्ञाधिका दानदयानुरक्ता सिद्धयत्ति शायर्याणि कृतानि तस्थाः ॥२१ ॥ अर्थ-जो नारी सिद्धियोगमें पैदामई वह सुख करके सहित सत्यमें वत्सर गौरवर्ण बुद्धिमती विशेष दानदयामें आसक्त तिसके करेहुए सम्पूर्ण काम सिद्धिको प्राप्त होते हैं ॥ २१ ॥ अथ साध्ययोगे जातफलमाह । पासाध्ययोगे वनिता सुरूपा नूनं विनीता धन- धान्ययुक्ता । सन्मंत्र विद्याविधिन राई संसाधये- सीजनवल्लभा च ॥२२॥ अर्थ-जो नारी साध्ययोगमें पैदामई यह खी सुरूपवाली निश्चयवरके नम्रता लिये स्वभाव जिस धनधान्यकरके युक्त अच्छी मंत्र विद्याकी विधि सम्पूर्ण भले प्रकार साधन करने वाली मनुष्योंकी प्यारी होती है ॥ २२ ॥ अय शुभयोगे जातफलमाह। शुभे सुयोगे प्रमादा प्रमत्ता विशालनेत्रा शुभवा- ग्विलासा। शुभोपदेशं प्रकरोति सर्व शुभस्य की शुभलक्षणा च ॥२३॥ अर्थ-जो नारी साध्ययोगमें पैदाभई वह मदवाली विशाल मापाटीकासमेतम् । (१४) मंत्रावाली शुलवाणीको बोलनेपाली सबको शुभ उपदेश करे सब शुभलक्षणों करके सहित होती है ॥ २३ ॥ अथ शुचयोगे जातफलमाह शुक्लोद्भवा वै वनिता कृतज्ञा सन्मानशुलांवर- धारिणी च । जितद्रिया सत्यरता सुसाध्वी भवेदिनीता विजितारिपक्षा॥२४॥ अर्थ-शुक्ल योगमें पैदा भई नारी अहसान माननेवाली सन्मानसहित सफेद वस्त्रोंके धारण करनेवाली इन्द्रियाँको जीतनेवाली सत्यमें रत पतिव्रता नमना सहित जीते हैं शत्रु दल जिसने ऐसी होतीहै ॥ २४॥ अथ ब्रह्मयोगे जावफाउमाह। या ब्रह्मयोगे विधिवत्साविज्ञा सत्यान्विता दानरता सुहा। शास्त्रानुरक्ता प्रचुरप्रभावा सुपंडिता वादविवादशीला ॥ २५॥ अर्थ-जो नारी ब्रह्मयोगमै पैदश भई वह विधिपूर्वक कर्म- पागमें चतुर सत्यसहित दान में रत अच्छे मकानवाली शास्त्रों में वसर पडाह प्रभाव जिसका सो पंडिता वादविवादमें शील जिसका ऐसी होतीहै ॥ २५ ॥ भय ऍद्रयोगे जातफलमाह। पाचेन्द्रयोगे प्रमदाभिजाता नरेंद्रपनी प्रथिता च

(१४२) स्त्रीजातकम् ।
लोके । श्लेष्माधिका दानरता सुरक्षा बंधुप्रिया
सत्यसमन्विता च ॥२६॥
अर्थ-जो नारी ऐन्द्रयोगमें पैदाई वह राजाही पली
संसारमें अग्रणी श्रेष्मा है अधिक जिसको दान करनेमें तत्पर
श्रेष्ठ चतुर भाइयोंको प्यारी सत्यसहित होताहै ॥ २६ ॥
अथ वैधृतियोगे जातफलमाह।
या धृतीयोगमवा पुरंधी कठोरचित्ता कुटि-
लस्वभावा । दंभान्विता दुष्टजनेऽनुरक्ता दयाभ-
धाभ्या राहिता सदैव ॥ २७॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडबंशावतंतश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिषिकपण्डितझ्यामलालवि-
राचत स्त्रीजातके योगजातफलवर्णनो
नाम दशमोऽध्यायः ॥ १०॥
अर्थ-जो नारी वैधृतियोगमें पैदाई वह कठोरचित्तवाली
कुटिल है स्वभाव जिसका पाखण्ड करके सहित दुष्ट मनुष्योंमें
तत्पर दया और जयकरके रहित हमेशा रहतीहै । २७ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकाथगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्मन.
राजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालहतायां श्यामसुंदरी-
पापाटीकायां योगजातफलवर्णनो नाम
दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

भाषाटीकासमेतम् । (१४३) अय करणजातफलाध्यायो निरुप्यते उक्तं च श्यामदेवज्ञेन । अथ ववकरणजातफलमाह । वयाभिषाने वनिताभिजाता सुकातिरूपा सुभगा सुशीला । तस्या गृहं सर्वसमृद्धियुक्तं स्वप्राप्तपु- ण्याहि भवेत्कृतज्ञा ॥3॥ अर्थ-यवनाम करण में पैदा भई नारी अच्छी कांतियुक्त रूपवाली श्रेष्ठ भाग्यशाली उत्तम शीलवती तिसके घरमें सज तरहकी ऋद्धियाँ होती हैं और अपने आप प्राप्त कियाहै पुण्य जिसने ऐसी और कतज्ञा होती है ॥ १ ॥ अथवाल्वकरणजातफलमाह। या पालले स्यादनिताभिजाता प्रज्ञान्विता दारुविलासयुला । बलाधिका धर्मपरा मनोज्ञा गुणान्विता युद्धमा सुमध्या ॥ २॥ अर्थ-जो पारवकरणमें पैदाई नारी बुद्धिकरके सहित श्रेष्ठ विलाससहित अधिक बलवती धर्ममें तत्पर मनकी जानने पाली राणोंसहित युद्धमें चतुर स्त्री होतीहै ॥ २ ॥ अथ कोलवकरणजातफलमाह । जाता यदा कोलबनामकरणे नूनं स्वतंत्रा बहु- मित्रपुवा । दयान्विता सत्यरता प्रगल्भा सुकोमलांगी प्रियवादिनी च ॥३॥ अर्थ-जो कोलपकरणमें नारी पैदा होय यह निश्चय करने वान चत मित्रपुनीशाली दया परके सहित

(१५४) श्रीजातकम्।
इत्यमें तसर प्रगला कोमलशरीरवाली शियशणीही
बोलनेवाली होती है ॥ ३ ॥
अथ तैतिलकरणजातफलमाह ।
या तैतिले स्यादनिता सुमध्या प्रज्ञायुता चा-
रुवचाः कलाज्ञा । सुकांतियुक्ता गृहकर्मदक्षा
विनीतवेषाभरणा सुशीला ॥४॥
अर्थ-जो नारी तैतिलकरणमें पैदा भई वह बुद्धि करके
सहित श्रेष्ठवाणीकी बोलनेवाली सर्व कलाओंके जानने.
वाली अच्छी कांति करके युक्त घरके कामोंमें चतुर नम्रता
लिये स्वरूप जिसका अच्छे आभरणसहित उत्तम शील-
बती होती है ॥ ४॥
अथ गरकरणजातफलमाह ।
रामा गराख्ये करणेऽभिजाता शूरातिधाराति-
तरामुदारा । सच्छास्त्रयुक्ता विजितारिपक्षा
परोपकारे निरता सुदेहा ॥५॥
अर्थ-जो नारी गरकरणमें पैदा भई वह शुर अत्यन्त धीर
निरंतर उदार अच्छे शास्त्रोंमें युक्त जीते हैं शत्रुदल जिसने
पराये उपकार करने में तत्पर उत्तमदेहवाली होतीहै ॥ ५॥
अथ वणिजकरणजातफलमाह ।
यस्याः प्रसूतिर्वणिजे प्रवीणा वाणिज्यकार्य
कुशला कलाढ्या । प्रज्ञायुता मानविभूषणाव्या
सुमंदहास्या धनधान्ययुक्ता ॥ ६ ॥

भाषाटीकासमतम् । (१४५) अर्थ--जिस नारीके जन्मकालमें घणिजकरण होप सह प्रवीणा वाणिज्यकार्यमें कुशल होती है चतुर कलाओंकरके युक्त बुद्धिसहित मान और भूपणोंकरके सहित मदमंद हास्य जिसका धनधान्यसाहित होती है ॥ ६॥ अथ विष्टिकरणजातफलमाह । भद्रासु जाता बनिता कुरूपा कठोरवाक्पा पुरुपानुकारा । प्रियाविहीना सततं कुचला दुष्टा कुमित्रा व्यभिचारशीला ॥७॥ अर्थ-जो नारी विष्टिकरणमें पैदाभई वह कुरूपा कठोर वाक्य बोलनेवाली पुरुपोंकेसे आकारयाली प्यार करके हीन निरंतर मीन दुष्टा खोटे मित्रोंवाली व्यभिचारिणी होती है ॥ ७ ॥ अथ शकुनिकरणजातफलमाह । यदिशकुनिपु जाता शाकुनज्ञानशीला अंति- सुललितदेहा मंत्रविद्यामवीणा । बहुयुपतिसु- सख्या चारुतोमा ययुक्ता गुणगणपरियुक्ता सर्वदा सावधाना ॥८॥ अर्य-जो नारी शकुनिकरणमें पैदामई यह शकुनज्ञानमें चतुर अत्यन्तशोजायमानदेहयाली मंत्रविद्यामें प्रवीण बहुत त्रियों के साथ मित्रता रखनेवाली उत्तमनाम्यत्तहित राणों के समू- हकरके युक्त हमेशा सावधान होती है।

(१४६)
स्त्रीजातकम् ।
अथ चतुष्पदकरणजातफलमाह ।
चतुष्पदे स्यादनिता विनीता चतुष्पदास-
त्वयुता सुशीला । असंग्रहा क्षीणशरीरबन्धा
स्वाचारहीना विकृतानुकारा ॥९॥
अर्थ-जो नारी चतुष्पदकरणमें पैदाई वह विनीत चतु-
प्पदोंके बलकरके युक्त उत्तमशीलपती संग्रहकरनेवाली क्षीण.
शरीर भाचारकरके हीन बुरे आकारवाली होताहै ॥ ९ ॥
अथ नागकरणजातफरमाह ।
नागेषु जाता प्रमदा प्रमत्ता दंभान्विता दुष्ट-
वराः कुशीला । कलिप्रिया दोहरता कठोरा
असत्यरक्ता कुलघातिनी सा ॥१०॥
अर्थ-जो नारी नागकरणमें पैदाई वह मदवाली पाखंड
सहित दुष्टबाणी बोलनेवाली खोटे शीलकी लडाई प्यारी
निसको वैरमें ततर कठोरचित्त झूठमें आसक्त कुलकी घात
फरनेवाली होती है ।। १०॥
अथ किंस्तुघ्नकरणजातफलमाह ।
किंस्तुनजाता वनिता प्रगल्भा धर्मेप्यधर्म
समतामतिश्च । मन्याममैया स्थिरता न
किंचिदंगेप्यनङ्गे विवला सदेव ॥ ११ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिपिकपण्डिनश्यामलालावर-
चित स्त्रीजानके करणजातफलवर्णनो
नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११॥

भाषाटीकासमेतम् । अर्थ-जो नारी किंस्तुघ्न करणमें पैदाभई वह प्रगला पाणी बोलने वाली धर्म और अधर्ममें पकसमान है गति जिसकी मित्रता भौर शत्रुता एकसमान रहै, जो अंग और कामकलामें सदा निर्बल रहती है ॥ ११ ॥ इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसभीवलदेवप्रसादा- मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालसतायां श्या- मसुन्दरीमापाटीकायां करणजातफलवर्णनो नामकादशोऽध्यायः ॥११॥ अथ लगजातफलाध्यायो निरूप्यते । वृदयवनः। सघ मेपलनजातफलमाह । मेपोदये सत्यपरा तृशंसा नारी भवेकोधपरा सदेव । श्रेष्माघिका निवाक्ययुक्ता सदा विरक्ता निजवन्धुवर्गे ॥१॥ मर्थ-मोत्री मेपलममें उत्पन्नाई होय यह नारी सत्यमें तत्पर निर्भय हमेशा कोषयुरु वेष्मामकलियुक्त मिरवाय बोलवेवाली अपने बंधुवर्गोंसे सर्वकाल विरत रहतीहै ॥ १ ॥ मध वृषलग्रजातफलम्। वृपोदये खत्यस्ता मनोज्ञा विनीतचेया पति- पल्लभा च । नारी भवेत्सर्पकलासु दक्षा रख- गांचरक्ता द्विजदेवभक्ता ॥२॥ - 3 अर्थ-जो स्त्री पलपमें पाई पद नाही सत्यम तत्पर (१४८) स्त्रीजातकम् । मनकी जाननेवाली नम्रतालिये स्वरूप जिसका अपने पतिको प्यारी सम्पूर्ण कलाओंमें चतुर अपने बंधुवाँमें तत्पर ब्राह्मण और देवताओंकी मक्ता होती है ॥ २॥ अथ मिथुनलग्नजातफलमाह । तृतीयलमेऽतिकठोरखाक्यास्त्रीज्ञामहीनागुणवर्जिताच । सदानृशंसाकफवातयुक्तामहाव्ययाङ्करविचेष्टिताच ॥३॥ अर्थ-जो स्त्री मिथुनलममें पैदागई वह नारी कठोरवाक्य बोलनेवाली और कामसे रहित गुणोंकरके हीन हमेशा निर्णय कफवातसहित बहुत खर्च करनेवाली विकराल चेष्टाकी होती है ॥ ३॥ अथ कर्कटग्रजातफलम् । लगे कलीरे च भवेत्मसूता नारी प्रभूता विनयः समेता। वधुप्रियायाधुसुशीलदक्षाप्रजान्वितासर्वसुखैःसमेता॥४॥ अर्थ-जो नारी कर्कलगमें पैदा भई वह स्त्री बहुत नम्रता करके सहित ताइयोंको प्यारी अच्छे शील करके युद्ध चतुर संतानसहित सर्वसुखॉकरके युक्त होती है ॥ ४ ॥ अथ सिंहलमजातफलम् । सिंह विलने वनितातितीक्ष्णा भवेकफाढ्या कलहप्रिया वा। नानागदेर्युक्तशरीरगात्रा परो- पकारे निरता सदेव ॥५॥ अर्थ-जो कन्या सिंहलपमें पैदामई पह - नारी अत्यंत साक्ष्णस्वभाववाली कफकी प्रजातिवाली लडाई जिसको प्यारी मापा मगन मेलम् । (१४९० अनेक प्रकारके रोगोंकरके सहित देह जिमको पराये अगारमें बार हमेशा होती है ॥ ५॥ अप कन्यालगजातफलम् । कन्योदये था पनिताभिजाता सौभाग्यतोख्यैः सहिता हिताचा भवेत्स्वर्गवहुधर्मरता जिते- न्द्रिया सर्वकलासु दशा ॥ ६॥ अर्थ-जो नारी कन्यालममें पैदालई वह नी सौभाग्यसौ- व्यकरके सहित हित करनेवाली और अपने वर्गमें बहुत धर्ममें तत्पर इंद्रियोंके जीतनेवाली सम्पूर्णकलाओंमें चतुर होती है ॥ ६॥ अथ तुलालगजातफलम् । लने तुलाख्ये चिरकालकृत्या भवेत्सुमंदा प्रण- येन वीना । सुगर्विता कान्तिपिवर्जिता व तृष्णाधिका नीतिविहीनगात्रा ॥ ७॥ अर्थ-जो नारी तुला लममें पैदागई वह नारी बहुतका- लमें काम करनेवाली मंदबुद्धि नम्रतारहित गर्वकरके सहित शोमा रहित अधिक तृष्णा जिसको नीति करके हीन होती है ॥ ७ ॥ अथ वृश्चिकलप्रजातफलम् । नारी भवेदृश्चिकल्पनाता सुरूपगावा नयनाभि- रामा । सुपुण्यशीला च पतिव्रताच गुणाधिका दत्यपरा सदेव ।। ८॥ अर्य--जो नारी वृधिक लयमें पैदा भई वह कन्या रूपमें मेव शरीरवाली आनंद देनेवाले हैं नेत्र जिसके श्रेष्ठ पुण्यमें

(१५०) स्त्रीजातकम् ।
है शील जिसका पतिव्रता राणोंमें अधिक सत्यमें हमेशा तत्पर
रहती है ॥ ८॥
अथ धनुर्लग्रजातफलम् ।
चापोदये या वनिताभिजाता सा बुद्धिशूरापुरु-
पानुकारा। सामेकसाध्या विधिना कठोरा नि:-
स्नेहयुक्ता प्रणयेन हीना ॥ ९ ॥
अर्थ-जो कन्या: धन लममें पैदामई वह नारी बुद्धिमानोंमें
शुर अतिबुद्धिवाली पुरुषोंसे आकारवाली सो एक साध्य
विधिकरके युक्त कठोर विना स्नेहकरके नम्रता रहित
होती है ॥ ९ ॥
अथ मकरलगजातफलम् ।
मृगोदये जी सुभगा सुखत्या तीर्थानुरता इतश-
पक्षा। प्रधानमत्या प्रथिता च लोके गुणा-
विता पुत्रवती सदैव ॥ १०॥
अर्थ-जो मकर लगमें पैदाई नारी सो श्रेष्ठ भाग्योंवाली
सत्यमें तत्पर तीर्थमें भासत नाश करे हैं शत्रुदल जिसने सब
कामोंमें प्रधान संसारमें अग्रणी गुणोंकरके सहित पुत्र करके
सहित होती है ॥१०॥
अथ कुम्भलग्नजातफलम् ।
कुम्भे च लग्ने वनिता सुजाता स्त्री जन्मदक्षा क्षत-
जादिताच । नित्यं गुरूणां सुविरुद्धचेष्टा व्यया.
धिका पुण्यपरा कृतना॥1॥

भाषाटीकासमेतम् ।
अर्थ-जो नारी कुम्मलममें पैदाई वह श्री जन्मतेही
चतुकरोग वा घाव रक्त करके दुःखी हमेशा बडे पुरुषोते
विरुद्ध है चेष्टा जिसकी ज्यादे खर्च करनेवाली पुण्यवाली अह-
सान न माननेवाली होतीहै ॥ ११ ॥
अथ मीनलगजातफलम् ।
मीनोदये स्त्री बहुपुत्रपौत्रा पीतप्रिया बांधवलोक-
मान्या । सुनेत्र केशा सुरविप्रभक्ता नयान्विता
प्रीतिपरा गुरूणाम् ॥ १२ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रवा-
धात्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविर-
चिते स्त्रीजातके लग्नजातफलवर्णनो
नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
अर्य--जो नारी मीनल में पैदा गई वह वी बहुत पुत्र-
पौत्रादिकों करके सहित पंतिको प्यारी नाइयोंको और
मनुष्यों को मान्य अच्छे नेत्र और बाल सुन्दर जिसके देव
बाह्मणोंकी जक्ता नम्रतासहित गुरुओंकी प्रीतिमें तत्पर
होताहै ॥ १२॥
इति श्रीवंशवालिकस्थगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्म-
जराजज्योतिपिक पं०श्यामलालकृतायां श्यामसं-
दरीक्षापाटीकायां लमनातफलवर्णनो नाम
द्वादशोध्यायः ॥ १२ ॥

(१५२) स्त्रीजातकम् । अथ कन्याजन्मनि चंद्रराशिजातफला- ध्यायो निरूप्यत्ते वृद्धयवनः। अप मेपराशिजातफलम् । चंद्रे क्रियस्थे वनिता प्रगल्भा जाता भवेत्कृत्य- परा प्रधाना । पुत्रालिता प्रीतिरता सुसत्या सदा गुरूणां प्रणयानुरक्ता ॥ १॥ अर्थ-जो स्त्री मेपराशिम पैदा होय वह नारी प्रगल्मा हातहि सत्यमें रत प्रधान पुत्रोंकरके सहित प्रीतिमें तत्पर पति- व्रता हमेशा बड़े जनोंसे नम्रतासहित होती है ॥ १ ॥ अथ वृपराशिजातफलम् । वृपाश्रिते शीतकरे सुशीला विद्याविवेकागमशा- स्वरता । तीर्थप्रसक्ता बहुपुत्रपौत्रा पंतिप्रिया कामकलाप्रवीणा ॥२॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें वृपराशिमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी विधाम चतुर वेदवेदांतशास्त्रमें रत तीर्थमें आस- क्त बहुतसे पुत्र पौत्रोंसहित पतिको प्यारी कामकलामें चतुर होतीहै ॥ २॥ अथ मिथुनराशिजातफलम् । नृपस्थिते शीतकरे विनीता भवेत्सुगात्रा प्रियद- र्शना च । नानार्थमानः सहिता विदग्धा परोपकारे निरतोत्पलाक्षी ॥३॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें मिथुनराशिमें चंद्रमा रिपोय यह नारी अच्छे शरीरवाली प्यारा है दर्शन

जापाटीकासमेतम् । (१५३)
जिसका अनेक प्रकारके धन और मानसहित चतुर पराये-
उपकारम तत्पर तथा कमलसे नेत्रवाली होतीहै ॥ ३ ॥
अथ फर्कराशिजातफलमाह ।
कर्कस्थिते शीतकरे तु जाता नारी भवेत्पूज्यत-
मा स्वर्गात् । सुमानिनी बांधवलोकमान्या
हतारिपक्षा द्विजदेवभक्त ॥४॥
अर्थ-जिर कन्याके जन्मतालमें कर्क राशिम स्थित
चंद्रमा होय वह नारी अपने कुटुंबियोंकरके पूज्य श्रेष्ठ
मानवती अपने भाइयोंकरके मान्य, नाश करे हैं शत्रुदल.
जिसने ब्राह्मण देवताओंकी भक्ता होताहै ॥ ४ ॥
अथ लिहाशिनातफलम् ।
सिंहस्विते चंद्रमसि प्रधाना नारी भवेच्छौर्य-
समन्विता च ॥ प्रियामिपा भूपणवत्रभाजा .
क्षमान्वित्ता चपरा सदैव ॥ ५ ॥
अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें सिंहराशिम चंद्रमा स्थित
होय वह नारी शुरतासहित प्यारा है मांस जिसको
भाभूपण और चोंको भोगनेवाली क्षमासहित पवित्रतामें
तत्पर होती है । ५॥
अथ कन्याराशिजातफलमाह ।
कन्याश्रिते शीतकरे तु जाता नारी भवेद्वित्त-
चतुष्पदादया । प्रीतिप्रधाना जितशवपक्षा
उदारवेशसभगा सरूपा॥६॥

(१५४) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस कन्या जन्मकालमें कन्याराशिमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी धन और घोडे गौऑकरके युक्त भीतिम प्रधान जीते हैं शत्रुदल जिसने उदार स्वरूपवाली भेष्ठ भाग्यवाली अच्छे रूपवाली होती है ॥ ६॥ अय तुलाराशिजातफलम् । तुलाधरल्थे शशिनि व्रताच्या जाता भवेत्स्त्री हितबंधुवा । पतिव्रता पुत्रवत्ती मनोज्ञा विव- जिता दभमनोभवाभ्याम् ॥७॥ गर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें तुलाराशिमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी अपने बंधुवर्गते हितकरनेवाली पतिव्रता पुत्रों- करके महित मनकी जाननेवाली और पाखंड तथा कामवला. करके रहित होती है ॥ ७ ॥ अथ वृश्चिकजातफलमाह। चन्द्रेऽलिसंस्थे तु सुगुप्तचिंता स्थिरस्वभावा सुविदग्धचेया ।हिता गुरूणां नियमः समेता प्रभूतकोशा विगताभिमाना॥ ८॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें वृश्चिकराशिम चंद्रमा स्थित होय वह नारी स्थिर स्वभाववाली श्रेष्ठ चतुर चेष्टा- वाली बडेजनोंमें हितकरनेवाली व्रतनियममहित बहुतधन- बाली दूर हुमा है अभिमान जिसका ॥८॥ अथ धनराशिजातफलम् । घनुपरस्थे शशिनि व्रताव्या नारी भवेदान- . भाषाकासमवम् । (१५५) परा सुरागा। गीतिप्रिया प्राणहितानुकूला प्रिया- नंना स्त्रीजननी हतारिः ॥९॥ अर्थ-जिस कायाके जन्मकालमें चंद्रमा धन राशि स्थित होय वह नारी बॉकरके युक्त दान करने तत्पर लाल मोठवाली गीतादिकोंका प्यारकरे प्राणीमात्रके हितके अनुसार करनेवाली प्यारा है मुख जिसका नाश किये हैं शत्रु जिसने वह कन्याकी संतान पैदा करताहै । ९ ॥ अथ महारराशिजातफलम् । चन्द्रे मृगस्थे विकरालदंष्ट्रा नारी भवेदेवपरा मनोज्ञा । विद्याधिका सत्ययुता सुरूपा दया- विता नीतिपरा विनीता ॥ १० ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चंद्रमा मकरराशिम स्थित होय वह नारी विकरालदाडवाली धीरजवाली मनकी जाननेवाली अधिकविद्यासहित सत्यसे युत रुपवाली दयासहित नीतिम तत्पर नम्रतासहित होती है ॥ १० ॥ अय कुम्भराशिजातफलम् । घटाभिते शीतकरे तु जाता नारी भवेचंद्रशमा- नवका । सुदानशीला सुतपित्तयुक्ताशुभानुकारा प्रथिताभिमाना ॥११॥ मर्य-जो नारी कुम्भ राशिस्थितचंद्रमामें पैदा होय वह भारी चंद्रसमानमुखयाली श्रेष्ठ दान करने में स्वनाब जिसका पुत्र और धनसहित शुनकर्म करनेवाली यथोचित मभिमानी होती है।

(१५६) स्त्रीजातकम् । अय मीनराशिजातफलमाह। भीनस्थिते वे हिमगौ सुताच्या नारी भवेन मपरा सुशीला ॥ जितेन्द्रिया सर्वकलासु दक्षा लज्जान्विता मानयुता मनोज्ञा ॥ १२ ॥ इति श्रीवंशवालिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादा- मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते बालवीजाचके चंद्रराशिफलवर्णनो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें मीनराशिमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी पुत्रवाली धर्ममें ततर सुशीला इंद्रियोंकी जीतनेवाली सम्पूर्णकलाऑम चतुर लज्जासहित मानयुक्त मनकी जाननेवाली होती है ॥ १२ ॥ इति श्रीवंशवरोलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादात्म- जराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकनायां श्याम- सुंदरीनापाटीकायां चंद्रराशिगुगवर्णनो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ अथ सूर्यादीनां द्वादशभावफलाध्यायः अथ तनुभावास्थितसूर्यफलम् । मूती रविस्तीव्रमुखां प्रसुते नारी तथा तीवरू जासमेताम् । दुष्टस्वभाव सुकृशा कृतमा परान्नरक्त प्रभया विहीनाम् ॥ ५ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकाटमें रनमें सूर्य स्थित होय वह श्री नीव मुखबाली नीवरोगों करके सहित दुष्ट स्वभाववाली भापाटीकासमेतम् । दुर्बल शरीर अहसान न माननेवारी पराये अन्नमें रत भय- करके हीन होती है ॥ १॥ अथ धनभावस्थितसूर्यफलम् । धनस्थितोऽका धनधान्यहीना कठोरवावयाँ गतभक्तिभावाम् । युद्धप्रिया द्वेषरतां सलां व नारी प्रमूते गतसोहदा च ॥२॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें धनमायमें सूर्य स्थित होय वह नारी धनधान्यकरके हीन कठोर वाश्य बोलनेवाली दूर हुआ है भविभाव जिसका लडाई जिसको प्यारी बैरमें उत्तर खोटी दूर करा है मित्रज्ञान जिसने ऐसी होती है ॥२॥ अथ तृतीयभावस्थितसूर्यफलम् । तृतीयगस्तीक्ष्णकरः प्रसूते सौख्येन हीनां वनिता सदेव । नीरोगदेहां च सुरूपवका विशालवशोजना नितान्तम् ॥ ३॥ अर्थ-जिस औरतके जन्मकालमें तीसरे घरमें सूर्य स्थित होय वह नारी सौल्यकरके हीन हमेशा रोगरहित शरीर अच्छे स्वरुप और मुसवाली ऊंचा है चक्षस्थल जिसका निरंतर वह यशपाली होती है । ३ ॥ अप चतुर्थभावस्थितसूर्यफलम् । चतुर्थगस्तीक्षणकरः प्रसूते पोस्पेन हीना पनि- तां सदेव । रोगदेही विकरालदंगा प्रभाविही- नां जनताविरक्षाम् ॥१॥ मर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चतुर्थस्थानमें सर्प रियत

(१५८) स्त्रीजातकम् ।
होय वह नारी सुखकरके हीन हमेशा रोगसहित शरीखाली
विकराल है दार्ट जिसकी शोभारहित मनुष्योंसे विरुद्धरहने
पाली होती है ॥४॥
अथ पंचमभावस्थितसूर्यफलम् ।
सुत्ताश्रितः स्वल्पमुतां प्रसूते नारीप्रधानां व्रत-
संयुतां च । स्थूलास्पदंता पितमातृभक्ती प्रि-
संवदां वाह्मणसंमत च ॥५॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें पंचममाघमें सूर्य स्थित
होय वह नारी थोडे पुत्रपाली स्त्रियों में प्रधान व्रत नियम सहित
स्थूल मुख और दाँतोंवाली पिता माताको सत्ता प्यारी पाणी
पोलनेवाली ब्राह्मणोंकी का होता है ॥ ५ ॥
अथ षष्ठभावस्थितसूर्यफलम् ।
पप्ठे दिनेशः कुरुते प्रगल्भा हतारिपक्षां वनिता
विदाधाम् । प्रशातचय्पी प्रियधर्मकन्या धर्मा-
नुरक्तां सुभगां सुरूपाम् ॥६॥
अर्थ-जिस चौके जन्मकालमें छठीभावमें सूर्य स्थित
होय वह नारी प्रगल्ला नाश करे हैं शत्रुदल जिसने रियोंमें
पतुर शांति है स्वगाव जिसका प्रिय है धर्मरुत्य जिसको
धर्ममें तत्पर श्रेष्ठ भाग्यवाली रूपवती होती है ॥ ६ ॥
जय सप्तमभावस्थितम्र्यफरम् !
सूर्येऽस्तसंस्थे एतिभावमुक्ता नारी भवेत्सवसु-
सर्विमुत्ता ॥ सप रोद्रा प्रणयेन हीना कफाय-
या किल्बिापिणी कुरूपा ॥ ७॥

भाषाटीकासमेतम् । अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें सूर्य समभावमें स्थित होप वह नारी पतिवायमें रहित हमेशा सम्पूर्ण सुखासे हीन सर्वकाल कोपटिये स्वभाव जिसका नम्रतारहित कफ प्रकति पापिनी खोटेपवाली होती है ॥ ७ ॥ अथाष्टमभावस्थितसूर्यफलम् । सूर्योऽष्टमस्थानगतः प्रसूते दारिद्यदुःखान्वित- बंधुगोत्राम् । नारी कुधर्माधिवसर्वकृत्यां विषादयुक्तां शतजादितांगीम् ॥ ८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें अष्टम स्थानमें सूर्य स्थित होय वह नारी दारिद्य और दुःख सहित अपने गोत्री भाइयोंसे युक्त पापमें तलर खोटे कर्म करनेवाली विपादन- हित पार करके सहित शरीरखाली होती है ॥ ८॥ अथ नवमभावस्थितसूर्यफलम् । घमंस्थितो वासरपः प्रसते नारी कुधम्मी प्रिय- साहसां च । भाग्यविहीना बहुशत्रुपक्षां प्रभु- तरोगां विभर्पिहीनाम् ॥९॥ अर्थ-जिस नारी के जन्मकालमें नवमनावमें स्थित सूर्य होप वह नारी कुछ धर्मप्रिय साहनी होती है और भाग्य- करके हीन बहुत शत्रु ओसाहित बहुत रोग करके युक्त वैभव हीन होती है ॥ ९ ॥ अथ दशमभावस्थितसूर्यफलम्। फर्माश्रितो वासरुपः प्रसूते कुकर्मरता पनिता (१०) श्रीजातकम् । सदेव । प्रभावहीनां शिथिलां वकृत्ये स्व. भावकृच्छाभ्यधिकां नितान्तम् ॥ १० ॥ अर्थ-जिस औरतके दशम स्थानमें सूर्य स्थित होय तो वह नारी हमेशा खोटे कौमें तत्पर कांतिहीन अपने का- मॉमें शिथिल स्वाभाविक दुष्ट अधिक होती है ॥ १०॥ अथ लाभभावस्थितसूर्यफलम् । लाभाश्रितः संकुरुते दिनेशो नारी सलामा बहुपुत्रपौत्राम् । जितेन्द्रियां सर्वकलासु दक्षा क्षमान्विता वांधवपूजिताच॥ ११ ॥ अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें लालस्थानमें सूर्य स्थित होय वह नारी लामसहित बहुत पुत्रपौत्रवती होतीहै इंद्रियों- को जीतनेवाली सर्वकलाओंमें चतुर क्षमाकरके सहित वांधवोंकरके पूजनीय होती है ॥ १३ ॥ अथ द्वादशभावस्थितसूर्यफलम् । असन्यया द्वादशगे दिनेशे नारी प्रसूता विनयेन हीना। वहुव्ययापानरतानृशंसासर्वाशयाशोचविवर्जिताङ्गी१२॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें बारहवें स्थानमें सूर्य स्थित होय वह स्त्री खोटेकममें धन खर्च करनेवाली नम्रता: राहत पहुत खर्च करनेवाली मद्यपानमें तत्सर निर्भय भक्ष्या: भक्ष्य सानेवाली पवित्रतारहित शरीरवाली होती है ॥ १२ ॥ अथ लपस्थितचंद्रफलम् । चंद्रोविटग्नेय दिशुक्लपक्षेनारीप्रसूतेऽतिसुरूपगात्राम् । कृष्णेकशादीनतरासरोगांविवादशीलांसततंकुचेलाम् ।।

जापाटीकासमेतम् । १६१) अर्थ-जिस बीफे जन्मकालमें शुक्लपक्षका चंद्रमा लममें स्थित होय वह नारी अत्यंत रुपयुक्त शरीरवाली होती है और जो कृष्ण पक्षका चंद्रमा लममें स्थित होय तो वह नारी दीन रोगसहित झगडा करनेका स्वमाय जिसका निरंतर मलिन होती है ॥१३॥ अथ द्वितीयभावस्थितचन्द्रफलम् । धनाश्रितः शीतकरः प्रसूते प्रभूतवित्ता प्रणयप्र- धानाम् । धानुकूलां पतिकृत्यदक्षा नयाधिका ब्राह्मणदेवभक्ताम् ।। १४॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें धन भावमें चंद्रमा बैठा होय वह स्त्री बहुत धनवाली नम्रता है प्रधान जिसके धर्मके अनुसार स्वामीकी सेवकाईमें चतुर नम्रता अधिक देवताओं और ब्राह्मणोंकी भता होती है ॥ १४॥ अथ तृतीयभावस्थितचन्द्रफलम् । चन्द्रस्तृतीये कफवातसारां नारी प्रसुतेतिकठोर- वाक्याम् । कृत्संस्थितां नीतिविवर्जितांच स्वभावदुष्टों कृपणां कृतघ्नाम् ॥ १५॥ अर्य-जिस स्त्रीके जन्मकालमें चंद्रमा तीसरे घरमें बैठा हो वह स्त्री कफवात अतीसारके रोगकरके पीडित कठोर वाक्य बोलनेवाली क्रोधमें स्थित नीति करके हीन स्वाभाविक दुष्ट रुपण और कृतन होती है ॥ १५ ॥ अथ चतुर्थभावस्थितचंद्रफलम् । चंद्रः सुखस्थो वहुमोल्ययुक्तां नारी प्रसतेऽ.

(१६२) स्त्रीजातकम् । द्भुतभूषणां च । स्थिरस्वभावां श्रुतधर्मकृत्यां भोगाधिका देवगुरुप्रसक्ताम् ॥ १६॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चंद्रमा सुखजायमें स्थित होय वह स्त्री बहुत सौख्यसहित अद्भुत आभूपण धारण कर- नेपाली स्थिरस्वभाव वेदके धर्मकरनेवाली अधिक लोग करने वाली देवता और ब्राह्मणोंमें आसक्त होती है ॥ १६ ॥ अथ पंचमस्थितचंद्रफलम् । सुताश्रितः शीतकरः सुपुत्रां करोति नारी गुण- गौरखान्याम् । प्रभूतभृत्यां सुतसोख्ययुक्तां धनान्वितां सब्यवहारशीलाम् ॥ १७ ॥ अर्ध-जिस नारीके जन्मकालमें पंचम घरमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी अच्छे पुत्रों सहित गुण गौरवता करके सहित बहुतसे नौकरोंवाली पुत्रसौख्यसहित धन करके सहित अच्छे व्यवहारमें है शील जिसका ॥ १७ ॥ अथ पष्ठस्थितचन्द्रफलम् । चंद्रोऽरिसंस्थः कुरुतेऽल्पवित्ती प्रभूतपैरां विनयेन हीनाम् । चलस्वभावां क्षतसर्वगात्र पतिप्रयुक्ताम- निशं सुरूपाम् ।। १८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चंद्रमा छठे स्थानमें स्थित होय वह खी थोडे धनवाली बहुत दुश्मनाई करनेवाली नम्रता- रहित चलायमानस्वभाव सब शरीरमें घाव स्वरूपयुक्त पति- करके सहित होती है ॥ १८ भाषाटीकासमेतम् । अथ सप्तमस्थितचन्द्रफलम् । चंद्रोत्तसंस्थः कुरुते विदग्ध पतिप्रियां धर्म- विवेकयुक्ताम् । सुचारुवाचं विभवः समेता तेजोन्विता पुण्यपरा सुसत्याम् ॥ १९ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चंद्रमा सप्तमस्थानमें स्थित होय वह नारी चतुर पतिको प्यारी धर्म और विवेक करके युक्त श्रेष्ठ उत्तमवाणी बोलनेवाली वैशवसहित तेजकरके सहित पुण्यों -तत्पर पतिव्रता होती है ॥ १९ ॥ अथाष्टमस्थितचंद्रफलम् । चंद्रोऽयमस्या कुरुते नृशंसा नारी कुनेत्रा कुकु- चौ कुयोनिम् । विहीनवेपाभरणां सरोगों निता- तमत्पद्धतगईणां च ॥२०॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें अष्टमस्थानमें चंद्रमा स्थित होप वह ची निर्भप बुरे नेत्रोंवाली बुरे हैं कुछ और योनि जिसकी स्वरुपरहित आमरणहीन रोगसहित निरंतर अत्यंत अद्भुत निंदित कर्म करनेवाली होती है ॥ २० ॥ अथ नवमभावस्थितचंद्रफलम् । धर्माश्रितः शीतकरः प्रसते प्रभूतघी बनिता विदग्धाम् । भाग्याधिका कल्पतमा मनोज्ञां सुभृत्यपुत्रांच सुभूरिसोस्याम् ॥ २१ ॥ मर्प-जिस चीके जन्मकालमें नयमनावमें चंद्रमा स्थित होप यह नारी बहुन धर्मकरनेवाली वियोम चतुर झाग्यवाली (१६४) स्त्रीजातकम् । प्रशंसालायक रूप जिसका मनकी जाननेवाली श्रेष्ठ नौकर और पुत्रोंकरके बहुत सौख्य पाती है ॥ २१ ॥ अथ दशमभावस्थितचंद्रफलम् । कर्माश्रितः शीतकरः प्रसूते प्रभूतहेमद्रविणां प्रसिद्धाम् । नारी निरीहाँ कुलसर्वमुख्यांत्या- गान्वितां पुण्यपरा सुसत्याम् ॥ २२॥ अर्थ-जिस नारीके दशमनावमें चंद्रमा स्थित होय वह नारी बहुत सुवर्ण और धनवानोंमें प्रसिद्ध कुछ इच्छा न करे अपने कुलमें सबमें मुख्य त्यागकरके सहित पुण्यमें तत्पर पतिव्रता होती है ॥ २२॥ अथ लाभास्थितचंद्रफलम् । लाभाश्रितःशीतकरःसलामा भव्यां विधिज्ञां कुरुते सुदात्रीम् । नारी प्रसन्नां प्रणयेन युक्तां दानान्वितां रोगविवर्जिताङ्गीम् ॥ २३ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें ग्यारहवें भावमें चंद्रमा स्थित होय वह ची लालसहित प्रकाशवती विधियोंकी जानने- वाली दाता प्रसन्न नम्रतायुक्त दानकरनेवाली रोगकरके रहित शरीरवाली होती है ॥ २३ ॥ अथ व्ययभावस्थितचंद्रफलम् । करोति चंद्रो व्ययगो व्ययाव्यां गतप्रभाषां वनितां सुतीवाम् । दीनां नता नीतिविवर्जिता च क्षमाविहीनां सरुजां संदेव ॥ २४ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें चंद्रमा बारहवें स्थानमें

भाषाटीकासमेतम् । (१६५) .
स्थित होय वह स्त्री खर्चकरनेवाली दूर हुआ है प्रभाव जिसका
तीवस्वभाववाली दीन नीतिकरके रहित समाविहीन हमेशा
रोगसहित होती है ॥ २४ ॥
अथ लनस्थित्तभोमफलम् ।
लयाश्रितो भूतनयः प्रसूते नारी महारक्तसुदुः
खिताङ्गीम् । गतप्रभाव पतिना निरस्तां सुदु-
भगां गर्वप्तमन्वितां च ॥ २५ ॥
अर्थ-जिस नाराके जन्मकालम लमवर्ती मंगल होय तो
चह नारी बहुत खुनके रोगहरके दुःखित शरीरवाली दूर हुआ
है प्रभाव जिसका पतिकरके त्यागीनई दुष्टभाग्यवती अभिमान-
सहित होती है । २५॥
अथ धनभावस्थितभीमफलम् ।
धनाश्रितो भूतनयो विशालघनेन हीनां कुरुते
कुकांताम् । पराधिका कामपरी सरोगा क्लेशा-
पिका केशविवर्जितां च ॥ २६ ॥
मर्थ-जिस नारीके जन्मक में धननावमें मंगल स्थित
होय वह स्त्री विशाल धनकरके हीन खोटी होती है और सौत
भावसहित विषयासन रोगवती भधिक केशोंकरके हीन
होती है ॥ २६ ॥
अथ तृतीयभावस्थितभीमफलम् ।
तृतीयसंस्थः कुरुते कुपुत्रां नारी नितांत सुभ-
गां सुशीलाम् । वधुप्रियां साधुरतां प्रशस्तां
विहीनरोगां प्रपितप्रभावाम् ॥ २७ ॥

' (१६६) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें तीसरे घरमें मंगल स्थित होय वह स्त्री निरंतर श्रेष्ठ भाग्यवती उत्तम शीलवती भाइयोंको प्यारी साधुओंमें तत्पर शोभायमान रोगरहित यथोचित प्रभाव शाली होती है ॥ २७ ॥ अथ चतुर्थस्थितभोगफलम् । चतुर्थगो भूतनयः प्रसते नारी हताशा हतकर्म- कृत्याम् । सौख्येन हीनामधनां विशालां जन- निरस्तां सततं सरोपाम् ॥ २८॥ अर्य-जिस नारीके जन्मकालमें चौथे स्थानमें मंगल स्थित होय वह नारी नाश हुई है आशा जिसकी निंदितकर्म करनेवाली सौख्यकरके हीन खोटे स्वभाववाली मनुष्योंकरके त्यागीभई निरंतर क्रोधमूर्ती रहती है ॥२८॥ अथ.पंचमस्थितभीमफलम् । सुताश्रितो भूतनयः प्रसूते नारी कुपुत्रों कृपया विहीनाम् । कुसंमतिं पापविधानरक्तां श्रुतेन हीनां हतबंधुवर्गाम् ॥२९॥ अर्थ-जिस सीके जन्मकालग पंचमभाव में मंगल स्थित होय वह नारी दुष्टपुत्रोंपाली रुपाकरके रहित खोटी सलाह देनेवाली पापकर्ममें तत्पर वेदकमसे हीना नाश करे है बंधुवर्ग जिसने चा आप बंधुवाँसे हत होती है ॥ २९ ॥ अथ पष्ठस्थित भीमफलम् । रिपुस्थितो भूतनयः प्रसुते नारी सनाथां हत- । भाषाटीकासमेतम् । शाहपक्षाम् । प्रभूत्तकेशा सुजनानुरक्ता विद्याधि- का रोगविवर्जितां च ॥३०॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें छठे घरमें मंगल स्थित होय वह नारी पतिकरके सहित नाश करे हैं शनुदल जिसने बहुत केशीवाली अच्छे जनोंमें तत्पर अधिक विद्यावाली रोगकरके रहित शरीरवाली होतहि ॥ ३० ॥ अब सप्तमभावस्थितमीमफलम् । मस्ते स्थितो वे घरणीसुतस्तु बाल्ये प्रसूते विधां च नारीम् । दुरस्तभावां विभवेन दीनां सुकुत्सिताङ्गी गुणवर्जितां च ॥३१॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें सप्तमन्नावों मंगल स्थित होप बह- नारी विश्या दुष्ट स्वभाववाली वैभवकरके हीन बुो शरीरवाली गुणोंकरके रहित होती है ॥ ३१ ॥ 'अघाटमभावस्थित्तभौमफलम् । मृतिस्थितो भूमिसुतः प्रसूत्ते प्रभूतरोगां सुरक्षा विनाथाम् । दरिबदुःखां कृतशोकभाजा दिसा- पिका कातिविवर्जितां च ॥३२॥ अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें अष्टमभावमें मंगल स्थित होप वह नारी बहुत रोगसहित दुर्बल शरावाली पनिरहित दरिद्र और दुःसोंकी नागी शोकसहित हिंसाकरनेवाली शोनाहीन होती है ॥ ३२॥ अथ नवमभावस्थितभामफलम् । धर्माश्रितो भूतनयो विधौ करोति नारी सुमु.

(१६८) स्त्रीजातकम् । खां सरोगाम । भाग्यविहीनां स्वजननिरस्ता प्रियामिषां पानपरा सदेव ॥ ३३ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें नवमभावमें मंगल स्थित होय वह नारी धर्मरहित श्रेष्ठमुखवाली रोगसहित भाग्यकरके हीन अपने कुटुंबियोंकरके त्यागीभई प्रिय है मांस जिसको मद्यपानमें तत्पर होती है ॥ ३३ ॥ अथ दशमभावस्थितभामफलम् । काश्रितो भूतनयः प्रसूते नारी कुकर्मश्रवणां कुभावाम् । शीलेन हीनां निरतां विधाँ लज्जाविहीना मतिवजितां च ॥३४॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें दशमस्थानमें मंगल स्थित होय वह नारी कुकर्मके श्रवणकरनेवाली, खोटे स्वभावकी, शीलरहित, खोटे धर्ममें तत्पर, लनाविहीन, बुद्धिरहित होती है । ३४॥ अथ लाभभावस्थितभौमफलम् । लाभाश्रितस्संकुरुते महीजः प्रभूतलामा वनितां निरीदाम् । शुभस्वभावां विविधोपचारामम्बारतां पतिपरां च धर्म ॥ ३५॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालग लालस्यानमें मंगल स्थित होय वह स्त्री बहुत लानसहित इच्छारहित अच्छे स्वभावकी अनेक उपचार करनेवाली माता तलर आने धर्ममें प्रीति करनेवाली होती है ॥ ३५॥ - भाषारीकासमेतम् । अब व्ययभावास्थितभीमफलम् । व्ययस्थितो भूतनयः प्रसूते नारी कृतनां गुणव- जिताङ्गीम् । असन्ययां पानपरां नृशंसां सदातुरां प्रीतिविजितां च ॥३६॥ -जिस नारीके जन्मकालमें बारहवें स्थानमें मंगल स्थित होय वह स्त्री अहसान न माननेवाली गणोंकरके रहित खोटे काममें धन खर्च करे मद्यपानमें तत्पर निर्भय - हमेशा भातुर प्रीतिकरके रहित होती है ॥ ३६ ॥ अय तनुभावस्थितबुधफलम् । करोति सौम्यस्तनुगः सुरूपां प्रीतिप्रधानां न- यधर्मयुक्ताम् । विशालनेत्रां.प्रचुरानपानां प्रियं- वदां सत्यसमन्वितां ॥ ३७॥ अर्थ-जिस भारीके जन्मकालमें लगम बुध स्थित होय वह श्री रूपसहित प्रीतिमें तत्पर नन और धर्मसहित बडेनेत्रोंवाली भधिक मन और पानादिसहित पारी वाणी बोलनेवाली सत्यसहित होती है ॥ ३७ ॥ अथ धनभावस्थितवुधफलम् । धनस्थितः सोमसुतः प्रसूते धनान्वितां शुद्धि- युतां सुरूपाम् । नारी द्विजाराधनतत्परांच ऋतुप्रियां श्रीसहिता गुणाढ्याम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-जिप्स नारीफे जन्मकालमें दूसरे स्थानमें बुध । होय यह यी धनवती शुइतालिये स्वरूप जिसका ब्राह्माणाका

(१७०) खीजातकम् ।
रोवामें तत्पर यज्ञ मिय जिसको लक्ष्मीसहित शोमायुक्त गुणवती
होती है ॥ ३८॥
अथ तृतीयभावस्थितबुधफलम् ।
तृतीयगः सोमसुतो धनाड्यां नारी प्रसूते सुत-
मानभाजम् । जनानुकूलां प्रभुतासमेत बन्धु-
पियां त्राणयुतां सुभासम् ॥ ३९ ॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मालमें तीसरे घरमें बुध स्थित
होय वह ही धनवती पुत्रोकरके मान मोगनेवाली मनुष्योंकी
आज्ञानुसार चलनेवाली ऐश्वर्यसहित भाइयोंको प्यारी
रक्षासहित शोभायमान कातिवाली होती है ॥ ३९ ॥
अथ चतुर्थभावस्थितबुधफलम् ।
सौम्यः सुखस्थः सुसुखां प्रसुते नतां प्रभूतः
सुजनेः सुभृत्यैः । देवद्विजाराधनतत्परां च
प्रख्यातवंशां प्रियधर्मवर्णाम् ॥ ४०॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मवालम बुध चतुर्थनावमें स्थित
होय वह नारी श्रेष्ठ सुससहित बहुत नम्रता और अच्छे पुरुष
श्रेष्ठ नौकरों करके सहित देवता और ब्राह्मणोंके माराधनमें
ततर अपने वंशमें नामी अपने वर्णका धर्म है प्रिय जिसको
ऐसी होती है ।। ॥४०॥
अथ पंचमास्थितबुधफलम् ।
सुतस्थितः सोमसुतोऽल्पपुत्रां स्वल्पानवित्तांक-
लहप्रियांच । वृथाटनां गर्हितपर्वकृत्यां लक्ष्म्या
विदीनां इतसाधुपक्षाम् ॥४१॥

मापाटीकासमेतम् । (१७१) अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें बुध पंचम स्थानमें स्थित होय वह मारी थोडे पुत्रवाली थोडा अन्न और धनसाहित लडाई प्यारी जिसको वृथा भ्रमण करनेपाली निदिन काम करनेपाली लक्ष्मीरहित साधुभोसे विमुख होतीहै ॥ ४१ ॥ अथ पष्ठमावस्थितबुधफलम् । सौम्यो रिपुस्थो हतशत्रुपक्षा नारी प्रभूतविभवः समेताम् । गतायुपं तीवकर सुझामां परोप- कारव्यसनाभिसताम् ॥४२॥ अर्थ-जिस नारीके बुध छठे स्थानमें स्थित होय बह- स्त्री शवपक्षको नाश करनेवाली वैयकरके सहित दूर हुई है आयुष जिसफी बडे हाथ शामकलामें आसक्त पराये उपका- में तत्पर तथा विषयमें भास होती है ॥ १२ ॥ अथ प्रप्तमभावस्थितबुधफलम् । सौम्यः कलने प्रवरां विदग्धां शास्त्रानुरला शुभमर्तृकां च । करोति नारी नियमेरुपेता शुभप्रभावां प्रणयान्वितां च ॥४३॥ अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें सप्तम भावमें बुध स्थित होय वह नारी बड़ी भारी चतुर शासमें आसक्त श्रेष्ठपतिसहित वह औरत नियमों करके सहित श्रेष्ठ है प्रभाव जिसका नत्र- तासहित होती है ॥ ४३ ॥ अथाष्टमभावस्थितबुधफलम् । मृत्युस्थितः सोमसुतः कृतनां नारों प्रसूते .

है १७२) खीजातकम् । विगताभिमानाम् । निरस्तधम्मी जनसंविरुद्धा सदातुरां भीतिसमन्वितां च ॥४४॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें भटम स्थानमें बुष स्थित होय वह नारी अहसान न माननेवाली दूर हुभा अतिमान जिसका धर्मोकरके रहित मनुष्योंसे विरुद्ध हमेशा आतुर भयकरके संयुक्त होती है । ४४ ॥ अथ नवमभावस्थितबुधफलम् । धम्माश्रितः सोमसुतः सुकमी पतिप्रधानां बनिता प्रसूते । प्रभूतकोशां विनयान्वितां च सुवर्णभूपां व्रतदानयुक्ताम् ।। ४५ ॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालगें नवम भवनमें धुध स्थित होय वह नारी अच्छे कर्म करनेवाली पति है प्रधान जिसके बहुत धन नम्रतासहित सुवर्णके भूपण और व्रतदानसहित होतीहै४५ अथ दशमभावस्थितबुधफलम् । काश्रितः सोमसुतः सुधौ धन्या प्रसूते पनिता विनीताम् । भाग्याधिका कीर्तिपरी सुदक्षां क्षमाधिको सत्यसमन्वितां च ॥ ४६॥ अर्थ-जिस नारीफे जन्मकालमें दशमनावमें बुध स्थित क्षेप वह नारी अच्छे धर्मकरनपाली नियोंमें धन्य नम्रतासहित अधिकभाग्यवाली कीर्तियुक्त श्रेष्ठ चतुर अधिक क्षमा और सत्पसहित होती है ॥ ४६॥ अय लाभास्थितबुधफलम् । लाभाश्रितः सोमसुतः प्रसूते नारी प्रभूत प्रिय- भाषाटीकासमेतम् । (१७३ पुष्टावत्ताम् । सुलाभयुक्तां शुभशीलभानं पति व्रतां बांधवसंमतां च ॥४७॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें बुध लाम स्थानमें स्थित होय वह बी बहुत प्रिय पुष्ट धनवती अच्छे लाभसहित अच्छे शीलयुक्त पतिवता भाइयोंकरके संमत होती है । ४७॥ अय व्ययभावस्थितबुधफलम् । व्ययाश्रितः सोमसुतः प्रसते नारीमलक्ष्मी विगतमतापाम् । विवादशीलां विकलां कृशानी गुरोवियुक्तां सुजनेनिरस्ताम् ॥ १८ ॥ भर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें बारहव चवनमें बुध स्थित होय वह नारी लक्ष्मीरहित दूर हुआ है प्रताप जिसका विवाद करनेका है स्वभाव जिसका विकल दुर्बल शरीर पडे पुरुषों रहित अच्छे जनोंकरफे त्यागीभई होती है ॥४८॥ अथ लयास्थितगुरुफलम् । लग्राश्रितो देवगुरुः प्रसूते सुसत्ययुक्तां सुमनोज्ञभोगा गंभीरवाक्यां प्रियसाधुपक्षा सुरूपगात्रांप्रमदोत्तमांच। अर्थ-जिस पीके जन्मकालमें बृहस्पति लशमें स्थित होए यह नारी पतिनतत्वसहित श्रेष्ठ मनकी जाननेवाली भोगकरके सहित गंभीरवाणी बोलनेवाली प्यारे हैं साधु जिसको श्रेष्ठ रूप और शरीर करके त्रियों में उत्तम होती है ॥ १९ ॥ अथ द्वितीयभावस्थितगुरुफलम् । धनास्थितो देवगुरु प्रसूते प्रभूतपित्तां सुभगां मनोज्ञाप (१७८) खीजातकम् । अग्रणीय धर्ममें तत्पर सो श्री धन्यकमौकरके विख्यात माला याणी बोलनेवाली होती है ॥ ६२ ॥ अथ तृतीयभावस्थितशुक्रफलम् । तृतीयगो दैत्यगुरुः प्रसूते नारी सुकृत्यां विनयः समेताम् । युक्तामनेकैः सुसहोदरश्च सहोदरी- भिश्च तथोत्तमाभिः ॥ ६३॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें तीसरे घरमें शुक्र स्थित होय वह नारी श्रेष्ठ काँसहित नम्रतायुक्त श्रेष्ठ अनेक भाइयों- करके सहित तैसेही श्रेष्ठ बहनोंकरके सहित होतीहै ॥ ६३ ॥ अथ चतुर्थभावस्थितशुक्रफलम् । चतुर्थगोदैत्यगुरु प्रसूतेप्रभूतसौख्यांवनितांधनाट्याम् । विलासशीलांपरधर्मकृत्पांजितेंद्रियांवंशविभूषणां च ।। अर्थ जिस नारीके जन्मकालमें चौथे घरमें शुक्र स्थित होय वह स्त्री वहुत सौख्यवाली धनवती विलासमें स्वभाव जेसका पराये धर्मको करे इंद्रियोंकी जीतनेवाली अपने वंशेमें आभूपणसमान होती है ।। ६४ ॥ अथ पंचमभावस्थितशुझफम् । मराति नारी खल पंचमस्थः साधी समृद्ध बहुकन्यकाढ्याम् । रम्पानुकारां खलु संगहीनां नित्यं प्रधानां रिजवंशमध्ये ॥ ६५ ।। अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें शुक्र पंचमनायमें बैठा होय वह नारी ऋदियोंगहिन बहुन कन्यासंतानसहिह शोमा- मापारीकासमेतम्। यमान आकारवाली निश्चयकरके संगहीन अपने वंशमें नित्यही प्रधान होती है ॥ ६५ ॥ अथ पाठस्थित शुक्रफलम् । शुक्रोरिसंस्था प्रकरोति नारीमायाप्रधानां बहु- कोपयुक्ताम् । तीवस्वभावां विजितारिपक्षां सदा निरस्तां पतिपुत्रवर्गः ॥६६॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें शुक्र छछे स्थान में स्थित होय वह बी द्रोहकरनेवालियोंमें प्रधान बहुत क्रोधसहित तीव- स्वभाववाली जीते हैं शत्रुइल जिसने हमेशा पतिपुत्रादिकों करके- निरादर करी गई होती है । ६६ । अथ सप्तमस्थित शुक्रफलम् । कलनगो दैत्यगुरुः प्रसूते नारी प्रभूतां द्रविण- प्रभावाम् । पतिप्रिया शास्त्ररता प्रगल्भां हिता द्विजानां जनयल्लमां च ।। ६७ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मशालमें अष्टम जवनमें शुरू स्थित होय वह ची अधिक धन के माताव सहित पतिको प्यारी शानमें तत्पर मगलमा ब्राह्मणोंका हित करनेवाली मनुष्योंक्षी घारी होती है ॥ ६॥ अथाष्टमस्थित शुक्रफलम् । शुकोऽमस्थः कुरुते प्रमत्ता विपादभाजां विभ- वियुक्ताम् । दयाविहीना पवंचनाती कुरेलिली. धर्मविष जितां च ।। ६८॥ अर्य-निम नारी के जन्मकाल अष्टम नवन में शुकरिया (१८०) स्त्रीजातकमा होय वह सौ मतवाली विपादकी भागी दयावर हीनमनुष्यों करके निंदित करी भई मलिन धर्मरहित होती है ॥ ६८ ॥ अथ धर्मभावस्थितशुक्रफलम् । धम्माश्रितो धर्मपरां प्रसूते शुकः सुमुख्या वनितां च लोके । नानार्थवस्त्राश्रयभोजनान्यां सुपुष्टचित्तां पुरुषानुकाराम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें नवम स्थानमें शुक्र स्थित होय वह नारी संसारकी स्त्रियोंमें अग्रणी अनेक प्रकारके वक्ष और स्थान भोजन करके युक्त श्रेष्ठ पुष्ट चित्त पुरुषों के माफिक उदार होती है ॥ ६९ ॥ अथ दशमभावस्थितशुक्रफलम् । कम्माश्रितोदैत्यगुरु प्रसूतेनारीयशस्पांसुधनासमेताम् प्रसिद्धकर्मप्रतिपूजितांगीरूपाधिकांकल्पतरांसुसत्याम् अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें दशम स्थानमें शुक्र बैठा होय वह नारी यशवाली श्रेष्ठ धनसहित काँकरके प्रसिद्ध कर्म करनेवाली पूजित शरीरवाली बुद्धिमती प्रशंसायोग्य है रूप जिसका ऐसी श्रेष्ठ पतिव्रता होती है ॥ ७० ॥ अयेकादशभावस्थितशुक्रफलम् । लाभाश्रितो दैत्यगुरुः प्रसूतेप्रभूतलाभा वनितां सदेव । विमुक्तदोषां बहुशास्त्ररक्ता महाप्रभावांविविधालयांच। अर्थ-जिस नारीके जन्मकाल लामस्थानमें शुक दशम स्थित होय वह स्त्री बहुत लानसहित सदा होती है सर्व भापाटीकासमेतम् । दोपोसे रहित बहुत शासोंमें तत्सर बडे प्रभावाली अनेक स्थान सहित होती अथ व्ययभावस्थित शुक्रफलम् । व्ययाश्रितोऽसल्ययदुःखमाज नारी प्रसूते भूगुजः समायाम् । क्रोधाधिका कृत्रिमवाक्यरत होगान्वितां बुद्धिविहीनदुष्टाम् ॥ ७२ ॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें बारहवें भावमें शुक्र स्थित होय वह स्त्री अच्छे काममें धनखर्च करनेवाली बनाव- टके वचन बोलनेवाली रोगसहित बुद्धिहीन दुष्टा अर्थात् पर- पुरुषमामिनी होती है ॥ ७२॥ अथ लग्नास्थितशनिफलम् । करोतिः शौरः खलु लासंस्थो विरूपदेहां वनिता नितांतम् । सामाधि कीर्ति विवर्जितांगी स्थूलास्थिदंतां नयनविहीनाम् ॥ ७३ ॥ अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें जन्म लममें शनैश्चर स्थित झोय वह नारी बुरे रूपवाली देहकी निरंतर होती है भामाति. मार रोगसहित यश करके हीन मोटे हाड और दांत जिसके मंत्रहीन होती है ॥ ७३ ॥ अथ द्वीतीयमावस्थितशनिफलम् । धनाश्रितः सूर्यसुतः प्रसूते धनेन हीनां वनितां निरस्ताम् । पदाभिभूतां प्रणयेण हीनां नृशंसभा-

(१८२)
वीजातकम्।
अर्थ-जिस वीके जन्मकालमें दूसरे घरमें शनैश्चर स्थित
होय वह नारी धनकरके हीन मनुष्यों करके निरादर करी नई
नम्रताहीन निर्भयमाववाली रोगसहित होती है ॥ ७४ ॥
अथ तृतीयभावस्थितशनिफलम् ।
तृतीयसंस्थो रविनः प्रसूते दक्षां प्रधानां वनितां
सुधन्याम् । बहुप्रजा त्राणविधानसक्तां प्रशंसितां
साधुजनेन नित्यम् ॥ ७९ ॥
अर्य-जिस नारीके जन्मकालमें तीसरे घरमें शनैश्चर
स्थित होय वह स्त्री चतुर स्त्रियों में प्रधान धन्य होती है बहुव
संतानसहित रक्षाकरनेमें तत्पर हमेशा साधु मनुष्यों करके
प्रशंसा करी जाती है ॥ ७५ ॥
अथ चतुर्थभावस्थितशनिफलम् ।
करोति मन्दः सुखगोऽल्पसौख्यां मतिपहीणां
वनितां कृतघ्राम् । चलस्वभावां विभवेविहीनां
सदाहितां नीचसमागमां च ॥ ७६ ॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें चतुर्थ स्थानमें शनैश्चर
स्थित होय वह नारी मतिहीन अहसानको न माननेवाली
चलायमान स्वनाव जिसका वैजवकरके हीन हमेशा अहित
करनेवाली नीच पुरुपोंके साथ रहती है ॥ ७६ ॥
अथ पंचमस्थितशनिफलम् ।
सुताश्रितोभास्करजो विपुत्रा नारी प्रमुत घृणया
विहानाम् । प्रभूतदपी गणिकानुकारा विवर्जितां
साधुसमागमेन ॥ ७७॥

भाषायीकासमेतम् । (१८३) मर्थ-जिस खोके जन्मकालमें पंचम भावमें शनैश्वर स्थित होय वह नारी घृणाकरके रहित बडे अभिमानवाली वेश्या- ओंके समान आचार जिसका साधुओंके समागमते रहित पुत्रहीन होती है ।। ७७॥ अथ रिमुभावस्थितशनिफलम् । मन्दोऽरिसंस्थः कुरुते विमन्दा नारी प्रधाना तनयः समेताम् । प्रभूतवस्त्राभरणः समेत गुणानुरक्तां पतिवल्लभां च ॥ ७८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें छठे भावमें शनैश्वर स्थित होय यह स्त्री मंदतारहित स्त्रियोंमें प्रधान पुत्रोंसहित बहुत वन आभूपणासहित गुणोंमें तत्सर अपने पतिको प्यारी होतीहै ॥ . अथ सप्तमभावस्थितशनिफलम् । सोरोऽस्तसंस्थोविधा प्रसूतेविवर्जितावापतिनासदेव । रोगाधिकांपानपर्श कुमित्रांप्रभूतदोपांबहुपापमाजम् ।। अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें शनैश्चर सप्तमस्थानमें स्थित होय वह स्त्री विधया होतीहै अथवा पति करके रहिन हमेशा रहे अधिक रोगवती मद्यपानमें तत्पर दुष्ट मित्रावाली बहुत दोपोंसहित अनेक पापोंकी भागी होती है ॥ ७९ ॥ अथाष्टमभावास्थितशानिफलम् । स्थानेऽष्टमे सूर्यसुतः प्रसूते स्निग्धां च नारी निजकर्मदोषाम् । दुष्टस्वभावां गतकर्मसत्यां मालम्लुचां पंचनतत्परांच ।। ८० ॥

. (1८४) जीजातकम् । अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें अष्टम स्थानमें शनैश्वर स्थित होय वह नारी चिकने शरिवाली अपकौके दोपॉसहित दुष्टस्वभाववाली नाश करे हैं कर्म और सत्यता जिसने मलिन स्वताव निंदाकरनमें तत्पर होती है ॥ ८॥ अथ नवमभावस्थितशनिफलम् । धमश्रितः सूर्यसुतः प्रसूते कुकर्मरतां वनितां सदेव । व्यपाधिनालुब्धसुहृत्समेतानिसर्गदुष्टांधनवर्जितां च ।। अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें नवम भावमें शनैश्वर स्थित होय वह नारी खोटे की आसक्त हमेशा होती है ज्यादे खर्च करनवाली अपने मित्रों सहित कपण विद्याहीन बहुत दुःख भागी होती है ॥ ८१॥ अथ दशमभावस्थितशनिफालम् । काश्रितःसूर्यसुत प्रसूतेकुकर्मरतां विकृतानुकाराम सुशास्त्रसंगव्यसनाभिभूता निसर्गदुष्टां धनवजितां च ।। अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें दशम भावमें शनैश्वर बैठा होय वह स्त्री सोटेकम्मामें तत्पर विरूपदेह खोटे शास्त्रोंका संग करनेवाली व्यसनीम तत्पर स्वामाविक दुष्ट धनकरके रहित होती है ॥ ८२ ॥ अप लाभभावस्थितशनिफलम् । लाथाश्रितो भास्करजः प्रसते रतनधिका वात- कफप्रगल्भाम् । विवेकहीनां कुटिलतभावां सदा निरस्तां व्यसनाकुलां च ॥ ८३ ॥ सर्थ-निम नारीके जन्मकालो लागस्थानमें शनैश्वर नापाटीकासमेतम् । (२८५) स्थित होप यह थी खनके फिसाइसहित ज्यादे बात कफाल- तिवाली प्रगल्ला चतुरताहीन कुटिल स्वभाव हमेशा निरादर करीहुई व्यसनोकरके आकुल होतीहै ।। ८३ ॥ अथ व्ययभावास्थित शनिफलम् । उपयाश्रितोभास्करण प्रस्तेच्ययेनयुक्तांकृष्णस्वभावाम् । भसन्धयांपापरतानिरस्तानिसगदुष्टांधनवाजतां च॥८॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें वारहवें स्थानमें शनैश्वर स्थित होय वह स्त्री बहुत खर्च करनेवाली कपण स्वज्ञावाली खोटे कर्ममें धन खर्च करनेवाली पापकर्ममें ततर निरादर करीहुई स्वाभाविक दुष्ट धनरहित होतीहै ॥ ८४ ॥ अथ लमभावस्थितराहुफलम् । उक्तं च श्यामदेवज्ञेन । करोति राहुर्य दिलमसंस्थो विरूपदेवां वनितां विशालाम् । रोगाधिका मानविवर्जिताङ्गी क्रोधान्वितां सर्वजननिरस्ताम् ।। ८५ ।। अर्थ-निस नारीके जन्मकालमें राहु लमनावमें स्थित होय वह सी दुरी देहवाली शीलरहित अधिक रोगसहित मान करके हीन शरीर जिसका कोपसहित सम्पूर्ण मनुष्योंकरके तिरस्कार की जाती है ।। ८५॥ अथ द्वितीयभावस्थितराहुफलम् । द्वितीयभावे यदि राहुसंस्थितिवित्तविहीनां (१८६) स्त्रीजातकम् । कुरुते कुकान्ताम् । सौख्यविहीनां विधवां सरोगां दारिद्रयदुःखान्वितपापभाजम् ॥८६॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें दूसरे घरमें राहु स्थित होय वहनारी धनहीन खोटी औरत होती है सौख्यरहित विधवा रोगसहित दरिद्र दुःखयुक्त पापोंकी भागी होताहै । ८६ ॥ अथ तृतीयभावस्थितराइफलम् । तमस्तृतीये वनिता प्रसूते विहीनवन्धु भगिनी- विहीनाम् । सुपुष्टदेहां विजितारिवृन्दा क्षमान्वितां रोगविजितां च ॥ ८७॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें तीसरे भावमें राहु स्थित होये वह सी भाइयोंकरके हीन तथा बहिनीकरके रहित बलवान् देहवाली जीते हैं शत्रुदल जिसने क्षमासहित रोगवि: हीन होती है ॥ ८८॥ अथ चतुर्थभावस्थितराहुफलम् । करोति राहुः सुखगोऽल्पावित्ती जनविहीनां प्रमा कृतमाम् । चतुष्पदप्रीतिसरोगदेहां विवर्जिता मातृसुखनितांतम् ॥ ८८॥ अर्थ-जिस वीके जन्मकालमें चतुर्थस्थानमें राहु स्थित होय वह नारी थोडी धनयाली और मनुप्पोंकरके हीन अहनान न माननेवाली चतुप्पद सवारी वगैरहसे प्रीति करे रोगसहित शरीर माताके सुसकरके रहित निरंतर होती है । ८८॥

[पाटीकासमेतम् । (१८७)
अय पंचमस्थितराहुफलम्।
सुताभिधाने भवने तमो वै नारी प्रमत्तां प्रभु
ताविहीनाम् । स्थूलास्यदंतां गणिकानुकारा
प्रभाविहीन स्वजनविमुक्तान् ॥ ८९ ॥
मर्य-जिस नारीके जन्मकालमें पंचम घरमें राहु स्थित
होय वह स्त्री मदमाती ऐश्वर्यहीन मोटे दांत और मुख जिसका
वेश्याके समान कांविरहित अपने जन बंधु पुत्रादिकोंसे त्याम
करीमई होतीहै ।। ८९ ॥
अथ षष्ठभावस्थितराइफलम्।
तमोरिसंस्थाः कुरुते प्रगल्भां दयान्वितां सर्व-
जितारिपक्षाम् । प्रभूतविद्या धनधान्ययुक्तां
सदा सुभाषी पत्तिवल्लभां च ॥१०॥
अर्थ-जिस स्त्रीके जन्मकालमें छठे घरमें राहु स्थित
होय वह नारी प्रगल्मा दयासहित समस्त जीते हैं शत्रुदल
जिसने बहुत विद्या और धनधान्यसहित हमेशा मीठी वाणी
बोलनेवाली पविको प्यारी होती है ॥ १० ॥
अथ सप्तमास्थितराहुफलम् ।
বৰ পৰিশাল নবি সহ স্কুল
कुरुपाम् । सुदुष्पचित्तां कृपणां कृतनां सदा
निरस्तां निजबंधुवगैः ॥ ९॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें राहु सनम स्थित होय वह
श्री पतिहीन कुरुपा होती है सो दुरचित रुपण और रुतम
हमेशा अपने बधुवासे त्यागकरी हुई होती है ॥ ११ ॥

(१८८) श्रीजातकम्।
अपाटमस्थितराहुफलम् ।
यदायमस्थो दिननाथशष्टः सरोगदेहाँ विधवा
कुरूपाम् । कठोरचित्तां व्यभिचारशीला
महागः पीडितलोकहीनाम् ॥ ९२ ॥
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें आठवें स्थानमें राहु
स्थित होय वह स्त्री रोगसहितदेहवादी विधवारूप सहित
कठोरचिन व्यभिचारमें शील जिसका बड़े रोगकरके पीडित
अनुष्योंकरके हीन होतीहै ॥ ९२ ॥
अथ नवमस्थितराहुफलम् ।
यता तपस्थो रजनीशशचनारी विधौ परधर्मपक्षाम् ।
प्रियामिपापानपरां नृशंसां वृथाटना कीतिविवर्जितां च
अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें नवम स्थानमें राहु
स्थित होय वह स्त्री धर्मरहित पराये धर्मका पक्ष करनेवाली
मांस प्रिय जिसको, मद्यमें तत्पर निर्भय वृथा घूमनेवाली
यश रहित होती है । ९३ ॥
अथ दशमास्थित्तराहुफलम् ।
सिंहीसुतश्वेदशमे स्थितः स्यानारी प्रसूते.
पितृमातृहीनाम् । पत्या निरस्तां स्वजनविरुद्धा
क्रोधान्वितां सर्वहतारिपक्षाम् ॥ ९४ ॥
अर्थ-जिस सीके जन्मकालमें दशमस्थानमें राहु स्थित
होय वह नारी मातापिता करके हीन पति करके निरादरकरी
भई अपने मित्रजनोंसे विरोध करनेवाली कोषसहित सम
नाश करहँ शत्रुपक्ष जिसने ऐमी होती है ॥ ९४ ॥

भाषार्टीकासमेतम् । अथ लाभास्थितराहुफलम् । बभे तमोऽत्तीरसुखपयुक्त सदा विनीता पतिवल्लभां च । तुरंगनागः सहितां प्राप्त- नां सुभृत्यपुर्वनितां समेताम् ॥ ९५॥ अर्थ-जिस नारीके जन्मकालमें लानस्थानमें राहु स्थित होय वह स्त्री रूपसहित हमेशा नम्रतासहित पतिको प्यारी घोडे हाथियोसहित प्रसन्नचित्त श्रेष्ठ नौकर और पुत्री करके युक्त होती है ॥.९५ ॥ अथ व्ययभावास्थतराहुफलम् । राहुव्यवस्थः कुरुते कुकामसझ्ययां दुःखदरी- द्रभाजम् । जननिरस्तां पतिपत्रहीनां च्यपाधिको नेत्ररुजासमेताम् ॥९६॥ वसिष्टगर्गादिमुनिप्रणी- तान्वराहकल्याणकृतानिरीक्ष्य । सज्जातके खेट- फलंक्रमण सुयोपिता सघशसे कृतं हि ॥९७॥ इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा- दात्मजराजज्योतिषिक पण्डितश्यामलालतिर- चिते स्त्रीजातके ग्रहभावफलवर्णनो नाम नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मकालमें बारहवें स्थानमें राहु स्थित होप वह नारी खोटे कम्मामें तलर बुरे कामामें खर्च करनेवाली दुःख दरिद्र जोगनवाली मनुष्योंकरके त्यागी हुई पति और पुत्रोकरके हीन सर्च ज्यादे करनेवाली नेत्र

(१९०) सोजातकम् ।
के रोग सहित होतीहै ।। ९६ ॥ वासिष्ठ गर्गादि मुनीश्वरों
करके प्रणीत और वराह कल्याण भाचारदी करके कहे हुए
ग्रंथोंको देखकर ग्रहोंके फल क्रमते उत्तम स्त्रियोंके हितार्थ और
यशोथ यह नवीन ग्रंथ संग्रह किया है ॥ ९७ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्मज.
राजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालहतायां श्यामसुंदरी-
नापाटीकायां ख्यादिग्रहमावफलवर्णनो नाम
चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
अप मूलजन्माध्यायः।
तत्राभुक्तमूललक्षणमाह-नारदः ।
यो ज्येष्टामूलपारतरालप्रहरजः शिशुः ।
अभुक्तमूलयोः सामधानक्षत्रयोरपि ॥१॥
अर्थ-जो लडका लडकी ज्येष्ठा और मूल नक्षत्रके बीच
एक प्रहरमें उत्पन्न हुआ तथा आश्लेपा और मघा नक्षत्रके
एक प्रहर बीचमें पैदा हुआ वो अभुक्तमूल कहाता है अर्थात्
ज्या नक्षत्रमें अंतकी ।। पौने चारघडी और मूल नक्षत्रके
आदिकी ३॥ पौने चार घडी यह एक प्रहर हुआ उसको
अभुक्त मूल कहते हैं इसी प्रकार आश्लेपा नक्षत्रके अंतकी
॥ और मघा नक्षनके सादिकी ३॥ घही इसको जी
अभुक्तमूल कहते हैं परन्तु गणितागतमें प्रहराका प्रमाण
जरूर देखलेना चाहिये पहिले नशत्रका सर्वक्ष वनाले उस सर्व-
शे सोलह हिस्सा नक्षत्रके आदि अंतका अभुक्त मूल
पहताई ॥१॥

N नापाटीकासमेतम् । तत्रामुक्तमृटकालमाइ-वसिष्ठः । भुजंगपोरंदरपोष्णभानां तदयभानां च यदंतरालम् । अभुक्तमूलं प्रहरप्रमाणं त्यजेत्सुतां तत्रभावासदेव ॥२॥ अर्थ-आश्लेषा-ज्येष्ठा-रेवती इन नक्षत्रोंके अगाडीके अर्थात् आश्लेषा-मधा और ज्येष्ठा-मूल, रेवती-अश्विनी इन नक्षत्रोंके अंत और आदिका जो अंतराल है उस एक प्रहरका नाम अभुक्तमूल है इस प्रहरमें पैदा हुई जो कन्या उसको निरंतर त्याग करनी चाहिये ॥ २॥ तथा च लभुक्तमूलंसंज्ञामाह-शौनकः । साचपन्यत्वयशामलपोष्णाश्विनीनांच यदंतरालम् । अभुक्तमूलंप्रहरप्रमाणंतदुत्थकन्यांनविलोक्योत्पिता ॥३॥ अर्थ-आश्लेपा-मयाका और ज्येष्ठा मूलका, खेती- भचिनीका जो अंतराल है वह अभुक्त प्रहर प्रमाण है उस प्रहरमें पैदा हुई कन्याको पिता न देखे ॥ ३ ॥ । अभुक्तमूलोत्पन्नवालस्य त्यागः। अभुक्तमूलजं पुत्र पत्रीमपि परित्यजेत् ॥ अर्थ-अभुक्तमूलमें पैदा हुभा टडका का लहकीका परित्याग करना चाहिये। अथ त्यागाशक्तो शांतिः । अथ वादाष्टकं तातस्तन्मुखं नावलोक्येत् ॥ ४ ॥ अर्थ-जो त्याग करनेको शक्ति न होय तो जाठ वर्ष पीछे शांतिलरने वालमा मुख देखना चहिये । ४.

(१९२) स्त्रीजातकम् । अथ मूलजात्तस्य चरणवशेन फलम् । मूलायंशे पितुन शे द्वितीये मातुरेव च॥ तृतीये धनधान्यानां नाशस्तुय्ये धनागमः ॥५॥ अर्थ-जो बालक मूलके पहिले चरणमें पैदा होय तो पिताका नाश करे दूसरे चरणमें उत्पन्न माताका नाश करे तीसरे चरणमें उत्पन्न धनधान्यका नाश करे चौथे चरणमें उत्पन्न धनका आगम कराता है ॥ ५॥ अथाश्लेपाजातस्य चरणवशेन फलम् । फलं तदेव सापेक्षे प्रतीप चान्त्यपादतः ॥६॥ अर्थ-जो कन्या या पुत्र आश्लेषा नक्षत्रके पहिले चरणम पैदा होय तो धनागम होय दूसरे चरण धनधान्यका नाश करे तीसरे चरणमें उत्पन्न माताका नाश करे और चौथे चरणों उत्पन्न पिताका नाश करै ॥६॥ अथ कन्याजन्मानिमूलनातचरणफलमाह । मूलस्य प्रथमे पादे पशुपीडा प्रजायते। द्वितीय चरणे जाता सर्वसौख्यप्रदा भवेत् ॥ ७॥ तृतीयांनो च मूलस्य पितृपक्षविनाशिनी ।। चतुर्थीनिप्रजाता स्त्री मातृपक्षायंकरी ॥ ८॥ अर्थ-जो कन्या मूलके पहिले चरणमें पेश भई सो पशु ऑको पीडा करती है और दूसरे चरणमें पैदा भई सम्पूर्ण तौल्पदायिनी होती है ॥७॥ और तीसरे चरणमें पैदाई पितापक्षका नाश करती है और चौथे चरणमें पैदामई मावा पक्षका नाश करता है ।

भापाटीकासमनम्।
अथ मूलाश्लेपाजातफलमाह-नारदः ।
सुतः सुताच नियतं श्वशुरं हति मूटजा।
अर्थ-जो लडका लडकी निश्चयकरके मूलनक्षत्र का आ-
छपा नक्षत्रम पैदा होय तो वह वशुरका नाश करती है ।
अथास्थापवादः।
तदत्यपादयौनव तथालेपाद्यपादजा ॥ ९॥
अर्य--जो लडा लडकी मूलनक्षत्रके अंतिम चरणम पैदा
होय और आश्लेषा नक्षत्रके पहिले चरणमें पैदा होय तो
मूलभात दोप नहीं है श्वशुरको शुभ है ॥ ९ ॥
अथ श्वशुरादिहंघीयोगः।
मूलजा श्वशुरं इंति व्यालजा तु तदंगनाम् ।।
ऐंद्री तदान हति देवरं तु द्विदेवजा ॥ १०॥
अर्थ-जो कन्या मूलनक्षत्रमें पैदा होताहे वह श्वशुरका
नाश करती है जो कन्या आश्लेषा नक्षत्र में पैदा भई वह सास-
का नाश करती है जो कन्या ज्येष्ठा नक्षत्र में पैदानई यह पतिक
वढे भाईका नाश करती है जो कन्या विशाखा नक्षत्र में पैदा
मई वह देवरका नाश करती है ॥ १० ॥
तथा च मूलजातफलं-श्रीपतिः ।
जननी जनक ति मर्तुर्मूलारिधिष्ण्यना ।
द्वीशान्त्यपादनौ दुष्टो तवज्ज्येष्टान्यपादना॥३१॥

(१९४) खीजातकम् । अर्थ-जो कन्या मूलनक्षत्र में पैदा नई वह कन्या जीके भाता पिताका नाश करतीहै और विशाखानक्षत्रमें अंतिम चरणमें पैदामई कन्या या पुत्र माके मातापिताको दुष्टफल देते हैं तिस प्रकार ज्येष्ठानक्षत्रके अंतिमचरणमें उत्पन्न कन्या पूर्वोक्त दुष्ट फल देती है ॥ ११ ॥ तथाच मूलाऽऽश्लेपाजातफलं-गणपतिः। आश्लेषाख्यसमुत्पनो श्वश्रू अन्यासुतो हतः । मूलनो श्वशुर हात ज्येष्ठोत्था स्वधवाग्रजम् ॥१२॥ अर्थ-आश्लेपानक्षत्रमें पैदाई कन्या तथा पुत्र सासका नाश करते हैं और मलनक्षत्र में उत्तन्न श्वशुरका नाश करते हैं और ज्येष्ठानक्षत्रमें पैदामई कन्या स्वामीके बड़े भाताका नाश करे और लडका बडी सालीको नाश करे ॥ १२ ॥ अस्यापवादः । आश्लेषाप्रथमः पादः पादो मूलांतिमस्त विशाखाज्येष्ठयोरायास्त्रयः पादाः शुभावहाः।।१३।। अर्थ-आश्लेपानक्षत्रके पहिले चरण और मूलनक्षत्रका अंतिमचरण और विशाखा ज्येष्ठानक्षत्रके आदिका चरण इनमें पैदा हुआ बालक शुभ होता है और बाकी तीन चरण नक्षत्रके नेष्ट हैं ॥ १३॥ अथ विविधगण्डांतमाह-श्रीपतिः । पोष्णाधिन्योः सार्वपित्रयोश्च यत्र ज्येष्ठा- भाषाटीकासमेतम् । मूलयोरंतरालम् । तद्नं गण्डं स्याचतुनाडिक हि यात्राजन्मोद्धाहकालेप्वनिष्टम् ॥ १४॥ अर्थ-रेववी अश्विनी भाशेपा मया ज्येष्ठा मूल इन नक्ष- बोके अंत आदिकी चार चार घटी गण्डान्त कहाती हैं सो यात्रा जन्मकाल विवाह यज्ञोपवीतमें नेष्ट फल देती है रे, भाटे. ज्ये. इनकी अन्तकी ४ घटी अश्वि.म. मु. आदिकी ४ वटी नष्ट हैं ॥ १४॥ अथ तिथिगण्डांतमाह-नारदः । पूर्णानंदाख्ययोस्तिथ्योः संधिर्नाडीद्वयं तथा । गंडांतं मृत्युदं जन्म यात्रोदाहनतादिषु ।। १५ ॥ अर्थ-पौर्णमाप्ती प्रतिपदा पंचमी पष्ठी दशमी एकादशी इन तिथियोंकी दो दो घंटी गण्डान्त कहाती है अर्थात् १५१५ १० इन तिथियों के अंतकी एक एक वटी, ३।६।१३इन तिथिपोंके आदिकी एक एक घटीका नाम गण्डान्त है ये नृत्युकी देनेवाली हैं इनमें जन्म यात्रा विवाह यज्ञोपवीतादि नेट॥ १५ अप लग्नगण्डातमाह। कुलीरसिंहयोः कोर्यचापयोनिमेपयो । गण्डा- तमंतरालं स्याटटिकाई मृतिप्रदम् ॥ १६ ॥ अर्थ-कई-सिंह, वृश्चिक-धन, मीन-मेप, इन लोंकी गंधिको आधी घटी गण्डन कहानी है ४ 1 ८1१२ इन - (१९६) स्त्रीजातकम् । लनोंके अंतकी घटीके १५ पल और ५।९। १ इन लमोंके भादिके १५ पल गण्डान्त कहाते हैं इनमें यात्रा विवाह जन्म यज्ञोपवीत करनेसे मृत्यु होती है ॥ १६ ॥ मथ गण्डान्तकालमा । दिवाजातस्तु पितरं रात्रौ च जननी तथा । संध्ययोति चात्मानं नास्ति गण्डे निरामयः ॥१७॥ अर्थ-दिनमें उत्पन्न बालक गण्डान्तमें होय तो पिताका नाश करे और रात्रिके समय: गण्डान्तमें उत्पन्न होय तो माताका नाश करे और दिनरात्रिकी संधिक समय गण्डान्तमें उत्पन्न होय तो अपनी आत्माका नाश करता है गण्डान्तमें उत्पन्न बालक निर्दोप नहीं होता है ॥ १७ ॥ अथ गण्डांतजाते दोपावधिज्ञानमाह-यवनः । वत्सरात्पितरं हति मातरंतु त्रिवर्पतः। वात्मानं मासमेकं तु इति गण्डोबुधैः स्मृतः ।। १८ ।। अर्थ-गण्डान्तकालमें उत्पन्न वालक पिताको एक वर्षके भीतर नष्ट करता है और मातालो तीन वर्ष भीतर नह करता है और अपनी आत्माको एक मासमें नाशकरता है ये विद्वानोंने कहा है ॥ १८ ॥ अथ गण्डान्तजाताना त्यागमाह । सवेपी गण्डजातानां परित्यागो विधीयते ।

भापाटीकासमेतम् । (१९७) अर्थ-जो बालक सम्पूर्ण कहेहुए गंडकालोंमें पैदा होय उसका परित्याग करनाही विधान है। अब त्यागाशक्ताववधिज्ञानम् । वर्जयेद्दर्शनं तावद्यावत्पाणातिको भवेत् ।।१९।। अर्थ-जो गण्डान्तकालमें उत्पन्नचालक होय उसका दर्शन तबतक वर्जित है जबतक छः महीनेका न होय ११९३ अथ गण्डांतजातानां परिहारः । सूलसापादिजं पोष्णं स्पादपश्यति लमपे। सरेऽन्ने च विवले शुभदृष्टिविवर्जिते । तदा भण्डालजाताना न दोपो मुनिभिः स्मृतः ॥२०॥ अर्थ-मूल आश्लेपा रेखती इन नक्षत्रोंमें पैदा हुआ बालक होय और चंद्रमा लमपति न देखता होय और पाप- प्रहांसहित निर्बल चंद्रमा शुभग्रहोंकी दृष्टिरहित होय तो उस गण्डोनमें उत्पन्न बालक निदोपी होता है ऐसा मुनीश्वरोने है अन्यच्च गण्डांतदोपापवादः। मूलाधपादोयदिरात्रिभागेतदात्मजानास्ति पितु- विनाशः । द्वितीयपादो दिनगो यदि स्यान मातुरल्पोऽपि तदास्ति दोपः ॥२१॥ अर्थ-जो बालक मूलनक्षत्रके पहिले चरणमें सत्रिक समय उत्पन्न होय दो वह बालक पिताका नाश नहीं करता है (१९८) श्रीजातकम् । और मूलनक्षत्रके दूसरे चरणमें दिनके समय पैदा होय तो वह बालक माताको दोप नहीं करता है ॥ २१ ॥ तथा च पितामहः। नक्षत्रातिथिगण्डांतं नास्तीदो बलभाजिनि । तथैव लग्रगण्डांतं नास्ति जीवे बलान्विते ॥ २२ ॥ अर्थ-जो बालक नक्षत्र और तिथि गंडान्त में पैदा होय और चंद्रमा बली होय तो निर्दाप जानो और लमगंडांतमें बालक पैदा होय और बृहस्पति बली होय तो निदॉप जानना चाहिये ॥ २२ ॥ अथान्यच्च परिहारः-वसिष्ठः। गण्डांतदोपमखिलं मुहतोऽभिजिवाह्वयः । इति तद्वन्मृगं व्याधः पक्षिसंघमिवासिले ॥ २३ ॥ अर्थ-जो बालक अखिल गंडांतदीपमें उत्पन्न हो और जन्मसमयमें अभिजित मुहूत होय तो जैसे व्याध मृगपक्षियोंके समूहको नाश करे तिसी तरह अभिजिव सब गंडात दोष नष्ट करै ॥२३॥ मथ मूलवृक्षविचारः-नरपतिः। मूलं स्तम्भस्त्वची शाखा पत्रं पुप्पं फलं शिखा ॥ मुंनयोप्टो दिशो रुद्राः सूर्याः पंचाव्धयोग्नयः ॥२४॥ अर्थ--मूलनक्षत्रमें उत्पन्नहुए बालयका मूल वृक्षमें विचार करना चाहिये एक वृक्षाकार बनाकर उसकी जडमें ७ घटिया और स्तनमें ८ छालमें १० टहनियोंमें ११ पत्रोंमें १२ .

आषाटीकासमेतम् । (१९९)
फलाम ४ आर वृक्षके शिरपै ३ इसीप्रकार नक्षत्रके ६० घडि-
योका न्यास करै । २४॥
अथास्यफलमाह-जपार्णवे ।
मूले तु मूलनाशः स्यात्स्तम्भे वंशविनाशनम् ।
त्वचि मातुर्भवेत्लेशः शाखायामखिलस्य च ॥२५॥
पत्रे गज्यं विजानीयात्पुष्पे मंत्रिपदं स्मृतम् ।
फले च विपुला लक्ष्मी शिखायामल्पजीवनम् ॥२६॥
अर्थ-जिस बालकके जन्मकालमें नक्षत्रकी घटीजडमें आ
तो वह बालक मूलका नाश करे और थनेमें आनकर पडे
तो वंशका नाश करे और छालमें पडे तो माताको क्लेशकरे
और शाखाओंमें पड़े तो सर्व सौख्य प्राप्त करे ॥ २५ ॥ और
पत्रमें पडे तो राज्यफल देवे और फूलमें पड़े तो वजीर करे और
फलोंमें पड़े तो बहुत लक्ष्मी प्राप्त करे और शिखामें पड़े तो
अल्पजीवी करे ये मूलनक्षत्रकी ६० घडियोका फल विचार-
कर कहना नक्षत्रकी जिन घड़ियोंमें पैदा होय 'उसीका विचार-
करना चाहिये ॥ २६ ॥
জঙ্গ সম্মা পূজা-নামঃ।
मूलस्प पटिकान्यासो मूर्ध्नि पंच नृपो भवेत् ।
मुखे सप्त मृतिः पित्रोः स्कंधे वेदा महाबलः ॥२७॥
बाहोरटो बली कण्ठे तिम्रो हान्वितो भवेत् ।
सदिखेटा भूपमंत्री नाभौ दो वविद्भवेत् ॥२८॥

(२००)
नाजातकम् ।
गुो दशातिझामी ल्याजानुनोः पण्महामतिः ।
पादयोः पण्मृतिस्तस्य चैतदुक्तं स्वयंभुवा ॥२९॥
अर्थ-कन्याओंके जन्मकालमें नियाकार स्वरूप बनाक-
उसकी चोटोंमें पांच घटी स्थापन करे वोह घटीम उत्पन्न
लडका लडकी राजा रानी होते हैं मुखमें सात घटी मृत्युदा-
यक पिताकी होती है और कंधे ४ घटी महाबली करती
॥ २७ ॥ बाहोंमें ८ घटी बलदाता जानों और कण्ठमें
तीन घटी स्थानलाभ करती है हृदयमें ९ घटी राजाका मंत्री
करतीहै और टूडौंमै २ दो घटी बलदायक होती है ॥२८॥
कमरकी दश १० घटी अतिकामी करती है और जंघामोंकी
६ छः घटी बुद्धिमान करती है ओर पैरोंमें ६ छः घटी
मृत्युदायक होती है ये ब्रह्माजीने कहा है ॥ २९ ॥
अय मूलजनने कुलशयमाह ।
कृष्णेतृतीपादशमीवलोभूतोमहीजाकिबुधःसमेतः ।
चजन्मशालेकिलतबमूलसुन्मूलनंतत्कुरुतेकुलस्य ।।
अर्थ-जिस कन्याका जन्म कृष्णपक्ष तीज तिथि मंगलवार
आशेपानक्षत्रमें होय एको योगः कृष्णपक्षको दशमीतिथि
शनैश्चरवार ज्येष्ठानक्षत्र द्वितीयो योगः और चतुर्दशी तिथि
बुधपार मूलनक्षत्र तृतीयो योगः इन तीनों योगमें जो लडका
लड़की पैदा होय वह अपने कुलको जडसे नाश करते हैं ॥३०॥

जापाटीकासमेतम् । (२०६)
अथ मूलजनने वेगफलम् ।
दिवा सायं निशि प्रातः तातस्य मातुलस्य च ।
पशूनां मित्रवर्गस्य कमान्मूलमनिष्टदम् ॥३३॥
अर्थ-जो बालक दिनमें मूलनक्षत्र में पैदा होय वह पिताका
नाश करे और सायंकालके समय मूलमें पैदा होय तो मामाका
नाश करे और रात्रिके समय मूलगें पैदा होय तो पशुओंका
नाशकरे और प्रातःकालके समय मूलमें पैदा हो तो मित्रवर्गोको
नेष्टफल देताहै ये कमकरके फल कहना चाहिये ॥३१॥
अथ पुरुषाकृतो मूलाश्लेषाफलम् ।
मूनि पंच ५ मुखे पंच स्कंधयोटिका ८ टकम् ।
गजा८वीरभुजयोयुग्मरहस्तयोहदयेष्टकम् ८१३२
युग्मं नाभौर दिशो१० गुह्येपड् जान्योपद चपादयोः
विन्यस्य पुरुपाकारे सार्पस्य फलमादिशेत् ॥ ३३ ॥
अर्थ-जो बालक आश्लेपानक्षत्र में पैदा होय तो पुरुषा-
कार बनाकर नक्षत्र ६० घटियोंका उस काल पुरुपके शरी-
पर न्यासकरे शिर ५ मुख ५ कंध ८ भुजा ८ हाथ २
हृदय ८ नामि २ कमर १० जंवा ५ पैरोंपर ६ इस मकार
साठ घडियोका न्यास करना चाहिये ॥ ३२ ॥ और इसी
प्रकार पुरुषाकार मूलनक्षत्रकी जी ६० घटियोंका न्यास
करना चाहिये ॥ ३३॥

(२०२) स्त्रीजातकम् । अथास्यफलम् । चलाभः शिरोदेशे वदने पितृकांतकम् । स्कंधयोनहत्त्वं च बाहुयुग्मे त्वकर्मकृत् ॥ ३४ ॥ हत्याकरं करवटे राज्याप्तिहदये भवेत् । अल्पायुर्नाभिदेशे च गुह्येच सुखमद्भुतम् ॥ ३५॥ जंघायां भ्रमणप्रीतिः पादयोर्जीविताल्पता। घटीफलं किल प्रोक्तं मूलस्य मुनिपुंगवः ॥ ३६॥ विज्ञेयं विबुधैः सबै साप्पै तच्च विपर्ययात् ॥३७॥ अर्थ-जो बालक शिरकी घडियों में उत्पन्न होय तो उन लाज १ मुखकी घडियों में पैदा होय तो पिताका नाश २ कंधेकी घटीमें धननाश ३ और दोनों बाहुकी घड़ियोंमें खोटे कर्मकरनेवाला १॥३४॥ दोनों हाथकी पडियोंमें उत्पन्न हत्या करे ५ हृदयकी घड़ियोंमें राज्यमाप्ति करावे ६ नाभिकी घड़ियों में अल्पायु करै ७ कमरकी घडियोंमें अद्भुत सुख करावे ८॥३५॥जयाकी घडियोंमें उत्पन्न भ्रमण करे ९ पैरेकी घडि- योंमें उत्पन्न थोडे दिन जीये १० ये मूलनक्षत्र घडियोका फल निश्चयकरके श्रेष्ठ मुनियोंने कहा है ॥ ३६ ॥ और आक्षेपा नक्षत्र में उत्पन्न होय तो पहिलेके समान उसन्न फल सम्पूर्ण पंडित जानकर कहै अर्थात शिरकी घडियों में उत्पन्न थोडे दिन जीवे ३ और मुंहकी घडियों में उत्पन्न भ्रमण करे २ कंधेकी घड़ियोंमें उत्पन्न अद्भुत सुख करे ३ और दोनों बाहॉर्क

भाषायीकासमेतम् ।
घाडयौमें उत्तन थोडे दिन जीवे ४ दोनों हाथोंकी बहियोंमें
उत्पन्न राज्यप्राप्ति करे ५ हृदयकी घडियों में उत्पन्न हत्या करे ६
नाषिके घडियो में उत्पन्न खोटे कर्म करे ७ कमरकी घडियोमें
उत्पन्न धननाश करे ८ जंघाओंकी घडियोंमें उत्पन्न पिताको
अंत करै ९ पैरोंकी घडियोंमें उत्पन्न राज्यला करे १० इस
तरह आलेपानात पडियोंका फल कहना चाहिये । ३७ ॥
अथ मासवशान्मूलवासज्ञानमाह।
मार्गफाल्गुनपैशाखे ज्येष्ठे मलं रसावले।
श्रावणे कार्तिके चत्रे पौषे मूलं च भूतले ॥ ३८॥
आषाढे चाश्विने भाद्रे माघे मूलं दिवि स्थितम् ।
अर्थ-मार्गशिर फाल्गुन वैशाख ज्येष्ठ इन मासोंमें मूल
पाताललोकमें वास करते हैं और श्रावण कार्तिक चैत्र पोप
मासमें मूल मृत्युलोकमें वास करते हैं ॥ ३८ ॥ आषाढ .
आन्धिन जादपद माघ मासमें मूल स्वर्गमें वास करते हैं।
अथास्य फलमा।
वगै मूलं भवेदाज्यं पाताले च धनागमः ।
मृत्युलोके यदा मूलं तदा विघ्नं विनिर्दिशेत् ॥ ३९ ॥
• इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादा-
मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविरचिते
स्त्रीजातके असुक्तमूलजन्मवर्णनो नाम
पञ्चदशोऽध्यायः॥ १३॥

(२०४) स्त्रीजातकम् । अर्थ-जो बालक मूलमें पैदा होय और मूलका बास स्वर्गम होय तो राज्यदाता है और मूलका वास पाताललोकम होय तो धनका आगम करे और मृत्युलोको मूलका वास होय तो विन कहना चाहिये ॥ ३९ ॥ इति श्रीवंशवरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादात्म- जराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालकतायां श्याम- सुंदरीभाषाटीकायागभुक्तमूलफलवर्णनो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ अप मूरजननशांतिरप्यायो निरूप्यते । तत्र शान्तिकालयमाह-वशिष्टः । शास्त्रोक्तरीत्या खलु सूतकाते माते तृतीयेऽप्यय वत्सरांते ॥१॥ अर्थ- मूल नक्षनमें पैदाहुए पालककी मूलशांति शास्त्रोक्त रीत्यनुसार सूतकके अंत करना चाहिये. या तीसरे महीने में करना चाहिये या वर्षके अंतमें करना उचित है ॥ १ ॥ अन्यच्च शांतिकारमाह-गर्गः । मातृगण्डे सुत्ते जाते सूतकांत विचक्षणः। कुर्याच्छाति तहक्षे वा तदोपस्यापनुत्तये ॥ २ ॥ अर्थ-मातृगण्डमें उत्पन्न हुआ लडका वा टडकी उसकी शांति सूतक निवृत्त होनेपर करना चाहिये अथवा जिस नक्ष- भाषाटीकासमेतम् । (२०५) अमें बालक पैदा होप उस नक्षत्रों गण्डदोष निवृत्तिके अर्थ शांति करना उचित है ॥२॥ अथ मूलशांतिकालं कयपति-शौनकः। अथातः संप्रवक्ष्यामि मूलजातहिताय च। मातापित्रोधनस्यापि कुले शांतिहिताय च ॥३॥ जातस्य द्वादशाहे तु जन्मक्षे वा शुभे दिने । समाष्टके वा मतिमान्कुर्याद्वाऽतिविचक्षणः ॥ ४॥ अर्थ-इसके बाद शौनकजी कहते हैं मूलनक्षत्रमें उसन हुए लडका लडकीके हित के लिये माता और पिता धन और कुलके शान्तिके लिये ॥ ३॥ बालकके जन्मदिनसे बारहवें दिन अथवा जन्मनक्षत्रमें अथवा शुभदिनमें या आठवें वपमें बुद्धिमान अति आदरसे शांति करे ॥ ४ ॥ अथ कर्तव्यकालव्यवस्थानमाह पछिष्टः । सुसमे पुण्यदेशे च मंडपं धारयेदुधः । पेशान्यामयवानाच्यासुदीच्यां विशिकल्पयेत् ॥५॥ मंडपं चाष्टभिहस्तेश्चतुर्भिवा समततः। चतुर्दारसमायुक्तं तोरणाघरलंकृतम् ॥ ६ ॥ कुण्डं च तदहिः कुर्याद्रहयज्ञोक्तमार्गतः। अर्य-अच्छे कालमें पुण्यस्थानमें पंडितजन मंडपबनाने भकानके ईशानकोणमें अथवा पूर्वमें या उत्तरदिशामें मण्डप बनाये ॥ ५॥ वह मण्डप आठ हाथका अथवा चार हाथका चौरस चार दरवाजासहित बंदनवारसे अलंकन (२०६) श्रीजातकम् । करके ॥ ६ ॥ तिस मण्डपके बाहर महोंके यज्ञरीतिके माफिक कुण्ड बनावे ॥ अथ कुण्डनिर्माणप्रकारः। कुण्डवत्तदहि गे कारयेचतुरस्रकम् । वितरितद्रयखातं यत्सकुंडं चतुरड्डलम् ॥ ७ ॥ विप्राणां क्षत्रियाणां च चाडुलत्रयसंयुतम् । वैश्यानां व्यंगुलाधिक्यं शूद्राणां हस्तमात्रकम् ८ प्रथमा मेखला तत्र द्वादशाङ्गुलविस्तृता । चतुर्मिरगुलस्तस्याश्योन्नतत्वं समंततः ॥९॥ तस्यायोपरि वमः स्याचतुरङ्गुलमुन्नतः।। अष्टाभिरडुसम्यामिस्तीर्णश्च समंततः॥१०॥ तस्योपरि पुनः कार्यों वः सोपि तृतीयकः । चतुरडलविस्तीर्णश्वोन्नतश्च तथाविधः॥११॥ योनिश्च पश्चिमे भागे प्रामुखी मध्यसंस्थिता! पडड्लैश्च विस्तीर्णा चायत्ता बादशाड्डलेः।।१२।। पृष्ठोन्नता गजस्येव सच्छिद्रामध्यमोन्नता ॥ एवं लक्षणयुक्तं कुण्डमिष्टार्यसिद्धये ॥१३॥ अनेकदोपद कुण्डं यत्र न्यूनाधिको सवेत् ॥१४॥ अर्थ-कुण्डकी तरह मण्डपके बाहर एक चौरसूंटा कुण्ड बनाये दोविलस्त लंगा और दो पिलस्त चौडा चार अहुल गहरा है सात जिसका ऐसा कुण्ड बनावे १७ ॥ परंतु ब्राह्मणों- का कृण्ड एक हाथ चार महल ला चौडा बनाना चाहिये भाषाटीकासमेवम् । (२०७) क्षत्रियों के वास्ते एक हाथ तीन अंगुल लंबा चौडा बनाना चाहिये और वैश्यों के वास्ते एकहाथ दो अंगुलका कुण्ड बनाना चाहिये शुद्रांक वारते केवल एक हाथ लंश चौडा कुण्ड बनाना चाहिये ॥ ८॥ उस कुण्डके आर पहिली मेखला बारह अंगुल चौडी और चार अंगुल ऊंची बनाना चाहिये ॥९॥ दस मेखलाके ऊपर चार अंगुल ऊंची और आठ अंगुल चौडा वर बनाना चाहिये ॥१०॥तिसके ऊपर फिर तीसराम बनाये चार अंगुल लंबा और चार अंगुल ऊंचा वा बनाना चाहिये ॥३१॥ कुण्डके पश्चिमकी तरफ पूर्वको है मुख जिसका कुण्डके वनमें छः अंगुल चौढी बारह अंगुल लंबी योनिबनावे अर्थात् जगाकार स्वरूप बनाना चाहिये ॥ १२ ॥ वह योनि पीठकी वरफसे ऊंची बीच में छेद जिसके और बीचमें ऊंचाई लिये होना चाहिये इन लक्षणोंसे सहित जो कुण्ड है सो इष्ट अर्थात् सब प्रकारके मनोरथ सिद्धिदायक होते हैं ॥ १३॥ और जो पहिले कहाहुआ कुण्ड जो कमती बढती होय तो अनेक प्रकार के दोप देता है ॥ १४ ॥ कुण्डस्वरूपम् । पहिलाना। अण्ड योनि

(२०८)
स्त्रीजातकम् ।
अथ पञ्चामृतमाह ।
पंचामृतं पंचगव्यं पंच त्वक्पल्लवानि च ।।
उदुंबरवटाश्वत्थप्लक्षाम्रत्वक्सपल्लवाः ।। १५ ॥
रोचनं कुंकुम शंखं गजदंतं च गुग्गुलम् ॥
शतोपधीमलशंखं नरवानि मृत्तिका ॥ १६ ॥
अर्थ-पंचामृत-पंचगव्य-पांचछाल-पंचपल्लव एकत्रित क-
रना चाहिये गौका दूध-घृत-दधि-सहत-साण्ड-इन चीजोंको
मिला देनेसे पंचामृत बनता है।
अथ पंचगव्यमाह-गौके दूध-धी-दधि-गोवर-गोमूत्र इन
चीजोंको इकट्ठा करनेसे पंचगव्य बहाता है।
अथ पञ्चत्वचा तथा पंचवपल्लवान्याह-गूलर-वरगद-पीपल-
पाकड-आम्र इन वृक्षोंकी छालको पंचत्वक् कहते हैं और
इन्हीं पांचों वृक्षोंके पत्तीको इकहा करनेसे पंचपल्लव कहा
जाताहै ॥ १५॥ गोरोचन-रोली-शंख-हाथीदांत गूगल सौ
औपधियों की जड-शंस नवरत्न अश्मृत्तिका इनको एकत्रित
करना चाहिये परंतु"स्योनापृथिवि" इस मंत्रकरके अष्टमृत्ति-
का एकत्रित करे ॥ १६ ॥
अथाष्टमृत्तिकामाई!
गजावाथ्यावल्मीकसंगमस्थानधभवाः ।
हृदगोराजनगरद्वात्तश्चाष्टमृत्तिज्ञाः ॥ १७॥

भापाटीकासमेतम् । अर्थ-गजशाला-अश्वशाला-मार्ग बांधी-नादियोंके मेलकी जगह वा दो रास्ते जहां मिले हाय तालाब गोशाला राजाक दांजेकी नगरके द्वारकी ये मृत्तिका आठ कही है ॥ १७E. अथ शतोषधीमूलमाह-वसिष्ठः । श्रीवृक्षो बिलखदिरविष्णुकांता पुनर्नवा । देवदारु जटामांसी सहदेवी मुरा शिवा ॥ १८॥ फलिनी बकुला जाती कला मांजिष्ठसंज्ञकाः । वटप्लक्षाऽम्रनीषारखदिरामल्लिकार्जुनाः ॥ १९ ॥ मदयन्ती महाजाती निंबोशीरहरिद्रकाः । साक्षी तुलसी रौद्रा कुटा दाडिमचंपकाः ॥२०॥ मातलिङ्गं जयो रक्ता कार्णका ऐणकांचनाः । सेवंती पनसो द्राक्षा विश्वासी श्वेतसर्पपाः ॥ २१॥ राजीवकुंदमुकुलनीलोत्पलकरंजकाः । पुन्नागं चंदनं द्रोणमंदारी हेमदुग्धिका ।। २२॥ रक्तचंदनजबीरयूयिकादमल्लिकाः । शम्पर्कसिंदुवारेंद्ररक्तधत्तूरशाडिमाः ॥ २३ ॥ अपामार्ग च पाशं बृहती करवीरकः । नंद्यावर्तकुबेराक्षीपाटलाहेमपुष्पिकाः ॥२४॥ शिरीषामलकाशोकरक्तागस्तिकपित्थकाः । बंधूक,गराजाल्पकृष्णा वे माधवी लता ॥ २६ ॥ चातुर्जातो चर्दिशिखा कुटजो मेघविम्बकः । १४ (२०) श्रीजातकम् । समालमरुपुष्पंहपुप्याख्याः शुक्रमर्दिनी ॥ २६ ।। वाकुचीशाल्मलीमोडीशल्लाखपटेलिकाः। मदाखजूंरिकानारीकेलाख्यास्ते शतद्रुमाः ॥२७॥ अर्थ-सरीफा १ वेल २ खरं ३ विष्णुकांता ४ पुनर्नवा ५ देवदारु ६ जटामांसी ७ सहदेई ८ वालछड ९ ड्रड १०॥१८॥मालकांगनी मौलसिरी १२ जायफल१३ मंगीठ १४ बरगद १५ पाड१६ आम१७ समा१८ खदिर अन्य वृक्षनेद १९चमेली २० अर्जुन २१॥१९॥ वनचमेली २२ वासंति २३ नाम २४ खस २५ हलदी २६ नाग- काली २७ तुलसी २८ रौद्रा वृक्षोद २९ कुडा ३० दाडमी ३१ चंपा ३२ ॥ २० ॥ विजौरा ३३ गुलदुपहरिया ३४ मुंबची ३५ करनैल ३६ अडौआ ३७ धतूरा ३८ सेवती ३९ कटहर ४० मुनक्का ४१ शतावर ४२ सफेदसरा ४३ २३॥ कमल ४४ कुंद ४५ मुकुल ४६ नीलकमल ४७ कंजा ४८ नागकेसर ४९ चंदन ५० द्रोणवृक्ष ५१ मंदार या ५२ पीलाथोहर ५३ ॥२२॥ लाल चंदन ५४ जारी ल५ जुही ५६ वागचमेली ५७ जण्ड ५८ आक ५९ निर्गुण्डी ६० इलायची ६१ लालधतूरा ६२ शाडिमा वृक्षारोद ६३ ॥ २३ ॥ अंदाझाड ६४ ढाक ६५ कटैया ६६ करनेल ६७ वंदावर्त वृक्षविशेष ६८ कुराक्षी वृक्षवि- शेप ६९ पाटल ७० पीली चमेली ७१२४ ॥ सिरस ७२ भावला ७३ अशोक ७४ लालअगस्त ७५ रुथ ७६ भाषाकासमेतम् । (२११) विजयसार ७७ जागरा ७८ पीपल ७९ माधवीलता ८० ॥ २५ ॥ चातुर्जात अर्थात् केतर ८१ दालचीनी ८२ तेज- पात ८३ लाल इलायची ८४ मोरशिखा ८५ ॥२६॥ इंग्रजी ८६ मुलहठी ८७ इंद्रायण ८८ तमाल ८९ मरुपुमा वृक्ष- दिशेष ९० ऐंद्रपुष्पाकलियारी ९१ शुक्रमर्दिनी अर्थात चित्रका ९२ वाकुची ९३ सेमर ९४ मुण्डी ९५राल ९६ खर्व अर्थात् कुगक ९७ परवल ९८ बडी खजुर ९९ नारियल १०० ६२७ ॥ ये सौ वृक्षोंके नाम कहे अब विद्वानोंको चाहिये कि जिस वृक्षका नाम न मालूम होसके उस नामको कोपादि अनेक अंथ अर्थात शब्दकल्पद्रुम शब्दस्तोममहोदधि वाचस्पत्यबृह-- दभिधान शब्दार्थचिंतामाणि इन कोपोंमें हुँढबालेवे ॥ अथ ग्रंथांतरे शतोषधीराह। एषां मूलानि सर्वाणि गृहीत्वनो नुदति यत् । शांतिकर्मणि सर्वत्र निक्षिपेत्कलशोदके ॥२८॥ अर्थ-पापाणभेद ३ सहदेई २ विष्णुकांता ३ गई हसठ ४ शंखाहूली ५ मोरशिखा ६ चिकसी ७ लक्ष्मणा ८ नीलकंठी ९ चोरा १० घीकुवार ११ पाढर १२ ईसलिंगी १३ परवल १४ घुसरापिन १५ चनांगी १६ मालकांगनी १७ सवंती १८ अंदाझाडा १९ श्वेतवीयी २० स्यामरखासन २१ हसलीश्वेत २२ फरफेडुआ २३ शतावर २४ अंधाहूली २५ सेमरकी जड़ २६ असर २७ मिउडी २८ देवदार २९

(२१२)
बीजातकम् ।
पाकड ३० बढ ३१ गृलर ३२ पीपल ३३ आन ३४
पियावांसा ३५ विशोटा ३६ झाड ३७ छिडकर ३८ सिंहमु-
सी ३९ भांगरा ५० जमनी ४१ बेत ४२ नदीवृक्ष ४३
नागकेसर ४४ अर्जुनवृक्ष ४५ पाद ४६ विवरेली ४७
चमेली ४८ केतकी ४९ चांदनी ५. केरा ५१ बिजौरा
५२ जयंती ५३ जवासा ५४ अनार ५५ गूमा ५६ बांसके
पचे ५७ कायफल ५८ खस ५९ चंपा ६० पदमाख ६१
सूर्यमुखी ६२ अशोक ६३ माधवीलता ६४ कुंद ६५ मौल.
सिरी ६६ गुडहर ६७ केरा ६८ गोमती ६९ आँवला ७०
ब्रह्मी ७१ धत्तुरा ७२ कचनार ७३ कफही ७४ कसौंधी
७५ अजमाइन ७६ नारंगी ७७ गिलोय ७८ कमलगट्टा
७९ अपराजिता ८० कैत ८१ जिमीकंद ८२ बेहू ८३
बडहर ८४ कुश ८५ काश ८६ कठहर ८७ बेरकीजड ८८
दारुहलदी ८९ हिरनी ९० हड ९१ अगर ९२ बालछड
९३ तुलसी ९४ शिरस ९५ हुलहुला ९६ नीम ९७ वका-
इन ९८ चीता ९९ पिंडगिलोय १०० इन एक सौ औपधि-
याको प्रेरणाकरके ग्रहणकरके सब जगह शांतिकर्ममें जलपू-
रित कुम्भमें डालना चाहिये ॥ २८ ॥
अथ शतोषधीनामभावे दशोपधाराह ।
कुलमांसी हरिद्रे द्वे मुराशेलेयचन्दनम् ।
वराचंपकहस्ताश्च सर्वोपध्यो दशेव हि ॥ २९॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१३)
एपामभाव तु दश सर्वोपच्या दशैव हि ॥ ३० ॥
अर्थ-मौलसिरी १ जटामांसी २ हलदी ३ आमाहलदी।
चालउड ५ पापाणभेद ६ चंदन ७ वच ८ चंपा ९ हस्ता १०
ये दशोपथी सर्वोपधीही कहाती है ॥२९॥ जो एकसौ औषधी
कही हैं ये न मिले तो यही सवापधी कहातीहै ॥ ३० ॥
अथ दशोपधीनामभावे चतुरोपधाराह ।
विष्णुकांता सहदेवी तुलंती च शतावरी ।
मूलानामानि गृह्णीयादशालाभे विशेषतः॥ ३१ ॥
अर्थ-विष्णुकांता सहदेई तुलसी शतावर इन चारों
औषधियोंके मूलको ग्रहण कर जो दशौपीका अनाव होय
तो इनकोही सर्वोषधी जाने ॥ ३१ ॥
अथ सप्तबीजान्याह।
तिलमापयवत्रीहि गोधूमाश्च प्रियंगवः ।
चण सहितानीति सतबीजानि सर्वदा ॥३२॥
अर्य-तिल १ उडद २ जौ ३ कुकनी ४ गेहूं ५ मियर
राले चावल ६ चना ७ ये सात वीज श्रेष्ठ कहे हैं ॥ ३२ ॥
अथ नवरतमाह।
माणिक्यविद्रुमं मुक्ताफलं वैडूयनीलकम् ।
वनं गारुमतं पुष्परागं गोमेदसंज्ञकम् ॥ ३३ ॥

(२१४) मोजानकम् ।
अर्थ-मानक 1 मूंगा २ मोती ३ वेडयमणि ४ नीलम ५
हीरा ६ गारुत्मत ७ पुष्पराज ८ गोमेद ९ ये सब रत्न कहे
इनको कुम्ममें डाले ॥ ३३ ॥
अथ पंचरत्न माह ।
वज्रमौक्तिकवेडूर्यपुष्परागेन्द्रनीलकम् ।
पंचरतामिदं प्रोक्तं मंत्रः कुंभेषु निक्षिपेत् ॥ ३४ ॥
अर्थ-हीरा १ मोती २ वैडूर्य ३ पुष्पराज ४ नीलम ५ ये
पंचरल कहे हैं जो नवरत्न न मिले तो मंत्रों करके कुंजमें
पंचरत्नही डालना चाहिये । ३४ ॥
अथ मूर्तिप्रमाणम् ।
सुवर्णेन प्रमाणेन तदपिन वा पुनः !
नितिप्रतिमां कुर्याद्वित्तसाव्यविवर्जितः ॥ ३५ ॥
अर्थ-तोलेभरकी छ: मासेकी वा तीन मासेकी सुवर्णकी
देवताकी प्रतिमा बनावे परंतु अपने शक्तिके माफिक प्रतिमा
बनावे कम ज्यादे न बनाना चाहिये ॥ ३५ ॥
ग्रंथान्तरेण मूर्तिमानमाह-शौनकः ।
पलमानेन चान पादेनाथ स्वशाक्तितः ।
नक्षत्रदेवतारूपं कारयित्वा विचक्षणः ॥३६॥
अर्थ-सोलह मासे वा आठमासेकी वा चारमासेकी या
अपनी शस्त्पनुसार नक्षत्रदेवता रूप बनाना चाहिये॥३६॥

भाषाटीकासमेतम् । (२१५ अथ मूर्त्यभावे मूल्यमाह। मूल्यं सुवर्णस्य पुनः स्थापयित्वा प्रपूजयेत् । सुवर्ण सर्वदेवत्यं सर्वदेवात्मकोनलः ॥ ३७॥ सर्वदेवात्म विमः सर्वदेवमयो हरिः ।। अर्थ-जो सुवर्णकी मूर्ति बनानेमें श्रद्धा न होय तो उसका मूल्य प्रतिमाकी जो स्थापित करके पूजा करे क्योंकि सन देवता सुषर्णमें वास करते है और अमिती सर्वदेवमय है। ३७ ॥ और बाहरणती सर्वदेवमय है और विष्णुग- चान्भी सर्वदेवमय जानो। अथ पूजन विधिः। वस्त्राणि षोडशाष्टौ च शुभसूक्ष्माण्यतंद्रितः ॥ ३८ ॥ ब्राह्मणान्पश्येत्पश्चात्स्वस्तिवाचनपूर्वकम् । श्रोत्रियांश्चतुरोटौ च द्वादश त्वथ पोडश ॥ ३९ ॥ प्रधानाचार्यमता श्रेष्टं तत्पतिमार्चनम् । ईशानादिचतुष्कोणेष्वत्रणाचलपूरितान् ॥ ४०॥ पूर्वोक्तद्रव्यसंयुक्तास्थापयेद्रलवर्णकान् । विप्रान्पृथक्पृथयापि मधुपादिनार्चयेत् ॥ ११ ॥ अर्थ-सोलह वा आठ वन सफेद बारीक बिना मालस्यक देके ॥ ३८ ॥ पीछेसे ब्राह्मणों को स्वस्तिवाचन सहित दरण करै यज्ञके करनेगाले चर या आठ वा बारह पोडश ॥ ३९ ॥ इतने प्रधान आचार्य श्रेष्ठ प्रतियाका पूजन करे ।

(२१६) स्त्रीजातकम्।
ईशान दिशाको मादि लेकर आनेय नैऋत्य वायव्य जलपरित
घट स्थापित करें ॥ ४० ॥ पहिले कहीहुई औषधियोंसहित
लालवर्णके घट स्थापित करें अलग अलग ब्राह्मणों को पाद
अयं आचमन मधुपर्कादि रीतिसे पूजन करें ॥ ४ ॥
बारेषु जापकानटो द्रौ द्वा च वरयेत्पुनः ।
आप्या वारणेमवेः शुक्लपुष्पाक्षतादिभिः ॥ १२ ॥
तत्कुम्भस्थजलं स्पृष्ट्वा कुशकू.पदिति ।
रूबसूक्तं च भद्रागेरानो भद्रा इति कमात् ॥४३॥
पुरुषसूक्तं च तन्मन्त्रेदेवान्ध्यात्वा प्रयत्नतः ।
गोमूत्रं गोमयं क्षीर दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ १४ ॥
पंचगव्यामिदं कुम्भे क्षिपेद्जमदान्वितम् ।
रजतं कांचनं तानं विद्रुमं तीर्थवारि च ॥ ४५ ॥
अर्थ-मंडपदारॉमें आठ जप करनेवाले अर्थात एक
झारमें दो जप करनेवाले (भाप्यैरिति ) या वरुण मंत्र करके
सफेद पुष्प अक्षतों करके वरण करै ॥४२॥ तिस कुम्भके विपे
जलको स्पर्श कर (कुशकूर्च) इस मंत्रको जप करे (रुद्रसूक्त)
और (भद्रामे आनोभद्रा) मंत्रोंसे कम करके ॥ ४३ ॥
और पुरुषसूक्त और पूर्वोक्तमंत्रोंकरके यत्न करके देवताओंका
ध्यान करके गोमूत्र गोबर गोदधि गोघृत और कुशजल॥४४॥
ये पंचगव्य उस घटम डालना हाथ के मदसहित चांदी, सोना-
बौवा, मुंगा, तीर्थोका जल ॥ ४५ ॥

- नापाटीकासमेतम् । (२१७) निक्षिपेद्धेममूलं च दशाष्टयवनिर्मितम् । देवदारुच शेलेयपद्मनीलोत्पलं तथा ॥ ४६॥ वचालोध्रप्रियंगुं च शतच्छिद्रे घटे क्षिपेत् । वंश- पात्रोपरि न्यस्तं शतच्छिद्रे घटे स्थितम् ॥४७॥ ततश्च निति देवमर्चयेत्पश्चिमामुखम् । मोषुणस्त्वितिमंत्रेण शुक्लवस्त्राक्षतादिभिः ॥१८॥ अर्थ-अठारह यवपरिमित हेममल और देवदारु, उलीरा, कमल, नीलकमल ॥ ४६ ॥ वच, लोध, कुकनी ये सम्पूर्ण चीजें सौ छिद्रके टके विप स्थित करे ॥४७॥ तिसके बाद नक्षत्रदेवताको पश्चिममुख होकर पूजन करे ( मोषण स्त्विति ) मंत्रकरके सफेद फूल और वस्त्र अक्षतादिकों करके पूजन करना चाहिये ॥ ४८॥ अय मूलस्वरूपमाह । मूलरूपं विधातव्यं श्यामं कुणपवाहनम् । खड्ग- खेटघरं चोग्रं द्विमुखं च वृकाननम् ॥ १९॥ चरंच श्रपपेत्ता नेति दुष्कृतापहम् । स्थाप- येत्तु ग्रहांश्चैव वनगंधादिभिर्यजेत् ॥ ५० ॥ १चार घट: चारों दिशामें स्थापन करे एक घट अलग रुद्रस्था. पनफे अर्थ स्थित करे एक सौ छेदके घडेमें देवदारु शैलेय इत्यादि औपधी सुवर्णमूल अठारह यवपरिमित डालकर वाँसको बलियमें रखकर उसके ऊपर कपड़ा बांधकर नक्षत्रदेवताकी प्रतिमा रुद्रप्र- तिमा जनप्रतिमा सहित स्थापन कर मौर उसका पोडशोपचार पूजन करना।

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(२१८) मीनातकम् ।
अर्थ--फिर मूलनक्षत्र के रूपका विधान करे, काला है
वर्ण, मुरदा है वाहन, तलवार और सेटको धारण करे. दो हैं
मुख बैलकासा है आगन जिसका ॥ ४९ ॥ चरु करके
नक्षत्रदेवताको पाप नाश करनेके लिये और यहाँको स्थापन
करे तथा वस्त्र गंधादिकोंकरके पूजन करना चाहिये ॥ ५० ॥
उक्तं च शौनकेन ।
पुण्यादिमंत्रितेस्तायः मोक्षितायां क्षितो ततः ।
तत्रोदकुम्भं सुश्लक्ष्णं रक्तं व्रणविवर्जितम् ॥११॥
आकृष्णमूलनिर्णीतं पूरयेन्निर्मलाम्भसा । आस-
लोष्वित्यनया कलशस्थापनं शुभम् ॥ ५२ ॥
अर्थ-पुण्यादि मंत्रोंकरके जलकरके जलके कुम्मको
देखकर घट और जल सुंदर टूटा न होय कोई छेद न
होय ॥ ५१ आरुष्ण मल जो कहा है उस करके निर्मल
जससे घट पूरण कर ( आकलशेति ) मंत्र करके कलशका
स्थापन करना शुभ है । ५२ ॥
इमं मे इति मंत्रेण पूरयेत्तीर्थवारिणा।
कुर्वन्देमसमायुक्तं कृतपल्लवसंयुतम् ॥ ५३॥
स्वस्तिकोपरि विन्यस्य क्षीरद्रुमसपल्लवैः। द्रोण-
बीहिं च निक्षिप्य ईशाने च निधापयेत् ॥५४॥
पंचरत्नानि निक्षिप्य सर्वोपधिसमन्वितम् ।
अचितं गंधपुष्पायैः श्रीरुद्धं तत्र पूजयेत् ॥ ५५॥

नापारीकासमेतम् । (२३९) तत्र प्रतिरथं सूतं शतरुद्रानुवाचकम् । रक्षा- मंत्र तथा पुण्य रक्षोघ्नं च स्पृशनपेत् ॥ २६ ॥ अर्थ--( इममे ) इस मंत्रकरके तीर्थोके जलसे पूरण करे हेममूल सहित करके पंचपल्लवसहित ॥ ५३ ॥ स्वस्तिवाचन करके दूध वृक्ष पश्चय सहित घटके ऊपर न्यास करे व वीस शेर धानकी ढेरी लरके उसपर ईशानादि दिशाम वयो स्थापन करना ॥ ५४॥ पंचरत्न डालकर सम्पूर्ण औषधियोसहित घटको गंध पुष्पाक्षतादिकोंकरके पूजन करे और श्रीरुद्रम- वको जप करे ॥ ५५ ॥ तिसके प्रति वेदोक्त सूक्त और शतरुदीपाठ रक्षामंत्र तथा पुण्याह वाचन ( रक्षोत्रं ) इस मंत्र करके स्पर्श कर जाप करे ॥ ५६ ॥ त्र्यंबकं च जपेत्सम्यगष्टोत्तरसहस्त्रकम् । एक- वारं तथा जाप्य पावमानीस्पृशनपेत् ॥ १७ ॥ जपार्थे पंच कुम्मांश्च पुवपित्रोदयं तथा । प्रस्रवतोऽभितस्ते च च्छन्ना बस्नेश्च पंचमिः ॥५८॥ वस्त्रावग्रंटितान्कुंभान्पूरयेत्तीर्थवारिणा । पंचरत्नसमायुक्तानाम्रपल्लवशोभितान् ॥ ५९ ॥ अर्थ-( व्यंबक ) मंत्रको अटोचर सहल १००८ भले प्रकार जप करे एक समय तैसेही जप करके ( पायमानी) इस मनसे सक्ष कर जप करे ५७ ॥ जाके पाँच कुमार (२२०) वीजातकम् । और दो पिता पुत्रके चारों तरफसे झरते होय पाँच वनोंक- रके आच्छादित करे ॥ ५८॥ कपडेसे बांधकर तीर्थोके जलसे पूरण कर पंचरत्नसहित आम्रपल्लव करके शोजायमान चरना चाहिये ॥ ५९ ॥ तेषामुपरि पात्राणि हेममृद्रौप्यजानि च । शुद्धवस्त्रेश्च संछाद्य शतमूलानि निक्षिपेत् ॥६०॥ कुम्भोपरि न्यसेद्विद्वान्मूलनक्षत्रदेवताइ । अधिप्रत्यधिदेवो च दक्षिणोत्तरदेशतः ॥ ६ ॥ अधिदेवं जपेमादी ज्येष्ठानक्षत्रदेवताम् । एवं प्रत्यधिदेवं च पूर्वापाझदेवतम् ॥ ६२ ॥ अर्थ-उन घटोंके ऊपर सोना व चांदी या मृत्तिकाका पात्र धरे साफ कपडेसे आच्छादित करके सौ वृक्षोंकी जड डालकर ॥ ६०॥ घटके ऊपर पंडितजन मूलनक्षत्रके देवता स्थापित कर इसी प्रकार प्रत्यधिदेवताके घटको दक्षिणोत्तर देशमै स्थापन करे । ६३ । पहिले अधिदेवताका जप करे ज्येष्टानक्षत्र के देवताका नाम अधिदेवता है इसी प्रकार प्रत्य- घिदेवताका घट और जप करे पूर्वापाठनक्षत्रके देवनाका नाम प्रत्यधिदेवता है ।। ६२ ॥ अयाधिदेवतास्वरूपम् । महाकायो वज्रधरो ग्रहेंद्रो गजवाहनः । द्विभुजश्व जलं पनं गृहंश्चन्दनचचितः ॥ ६३ ॥ अर्थ-बड़ा है शरीर जिनका; वज्र को धारण किये ग्रहों.

मापाटीकासमेतम् । (२२) के राजा, हाथी है वाहन, जलसम, दो हैं भुजा, कमल हाथमें चंदनलेपित शरीर जिसका ऐसा प्रत्यधिदेवताका स्वरूप जानो । ६३॥ अथ पूजाप्रकारः। स्वालिङ्गोक्तश्च मंत्रश्च प्रधानादीन्प्रपूजयेत् । पंचामृतेन संस्नाम्य ह्यावाह्याथ समर्चयेत् ॥ ६ ॥ उपचारः पोडशभिः यद्वा पंचोपचारकः। रक्तचंदनगंधाधैः पुष्पैः कृष्णसित्तादिभिः ॥६५॥ मेषशृंगादिधूपश्च घृतदीपस्तथैव च । सुरापोजिकमांसाधेनवेद्यर्भोजनादिभिः ॥ ६६ ॥ अर्थ-स्वलिङ्गोक्त मंत्रोंकरके प्रधानादिकोंका पूजन करे पंचामृतसे स्नान करावे आवाहन करके पूजन करे ॥ ६४ ॥ पोडशोपचार करके अथवा पंचोपचार करके लालचंदन गंध पुष्प श्याम श्वेत करके पूजन करे ॥ ६५ ॥ मेपशृंगा- दिधूप करके वृतदीप शराब पोलिक मांसको आदि लेकर नेवेद्य करके भोजनादिकसे पूजन करना चाहिये ॥६६॥ अथ दिजातीनां मत्स्यमांसनिपेधः । मत्स्यमांससुरादीनि ब्राह्मणानां विवर्जयेत् । सुरास्थाने प्रदातव्यं क्षीर सेंधवमिश्रितम् ॥१७॥ पायस खणोपेतं मांसस्थाने प्रकल्पयेत् । " उक्तगंधायभावे तु यथालाभं समर्चयेत् ।।.

(२२२) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ-मछलीका मांस और शराब ब्राह्मणों को भोजनमें
नहीं देना चाहिये जहां शराब चढानेकी जगह हो वहां दुधमें
सेंधव निमक मिलाकर चढाना चाहिये । ६७ ॥ और
सौरमें निमक मिलाकर मांसकी जगह स्थापन कर चढाना
चाहिये और जो उक्त गंधादि चीजें कही हैं वे न मिले तो
जो वस्तु मिले उसीसे पूजन करना चाहिये ॥ ६८ ॥
पुष्पांतं तु समभ्यय होमं कुर्याद्यथाविधि ।
निर्वापप्रोक्षणादीनि चाग्रे कुर्याद्ययाविधि ॥ ६९ ।।
हव्यं गृहीत्वा विधिवन्नैर्ऋत्येति ऋचा हुनेत् ॥ ७० ॥.
अर्थ-अंतमें पुष्पोंको समर्पण करके यथाविधि हवन
करना मोक्षणादि पात्रोंको निर्वाप करके यथाविधि अनिमें
परे ॥ ६९ ॥ उनको विधिवत् ग्रहण कर नैर्ऋत्येति इस ऋचा
करके हवन करना चाहिये ॥ ७० ॥
अथ हपनविधिमाह-चविष्ठः।
पालाशमिताज्येन चरुणाटसहतकाम् ।
रापबाटोत्तरशतं प्रत्यकं जुहुयात्ततः ।। ७१।।
प्रजामित्यष्टाभिर्वाक्यमंत्रद्येन च ।
सोमनत्यमस्वत्यसंभवः ॥ ७२ ॥

नापाटीकासमेतम् । (२२३) करके दोनों मंत्रोंसे मूलाय स्वाहा प्रजापतये स्वाहा सावित्र- योगमै स्पैः यंत्रोकरके पीपलकी ॥ ७२ ॥ समिहिन्ध तिलबीदील हुत्या व्याहृत्तिमंत्रतः। सूल प्रजामिस्त्यिष्टौ वाक्यानि नव चै जपेत् ॥७॥ महोत्तरसहर वा शत वा नियतात्मवान् । अपं होमप्रकारस्तु शाखांतरविशोधितः ॥७॥ मोषुणः परापरोति यत्ते देवेति वा पुनः ।। पाय घृतपित्रं च हुनेदष्टोत्तरशतम् ॥ ७९ ॥ अर्थ-समियों करके तिल और धान साठीके हवन करे व्याहृतियोंके गन्त्र करके (मूलं प्रजाभिः) इन आठ बास्यों- करके नौ वार जप करना ७३ अष्टोत्तर सहन (२००८) या एकसौ आठ बार (१०८) नियत करके जप करे ये होम- का प्रकार कहा अपनी शाखाओं करके जप करे ॥ ७४ ॥ (मोषणः परापरेति ) इस मंत्र करके ( यने देवेति) मंत्र करके करना चाहिये ॥ ७ ॥ समिधाज्यचखनात्मशक्तितः संस्थया हुनेत् ।। अधिदेवतयोश्चैव जुहुपारस्पस्वमंत्रक ॥ ७६ ।।. नक्षत्रदेवताभ्यश्च पायसेन तु होमपेत् ॥ . कृणुष्यति पंचदशभिजुहुयात्कृसरं ततः ॥७७॥ अर्थ-समिधे, घृत, अन्य चरके अपनी शक्त्पनुमार हवन करे अधिदेवता और प्रत्यधिदेवताओंके मंत्रसे हवन करना

(२२४) खीजातकम् ।
चाहिये ॥ ७६ ॥ नक्षत्र देवताके अर्थ खीरसे हवन करे
(कृणुष्वेति ) मंत्र करके पंद्रह वार चंडीका हवन करना
चाहिये । ७७ ॥
गायत्र्या जातवेदेति अष्टाविंशतिभिः क्रमात् ॥
वाशपुंजतितामनिवास्तोष्यपतिमेवच ॥ ७८॥
क्षेत्रस्य पतिनेत्येश्ममिदूतं तथैव च ॥
श्रीमुक्तेन तथा विद्वान समिदाज्यंचरून्क्रमात॥७९॥
अष्टोत्तरशतैर्वाय ह्यष्टाविंशतिभिः क्रमात् ॥
अष्टाटसंख्यया वापि जुहुयाच्छक्तितो बुधः ॥८०॥
अर्थ-(गायच्या जातवेदसं ) इस मंत्र करके २८ अहा-
ईस वार कम करके निरंतर अमिमें देना चाहिये और वास्तो-
पति इस मंत्र करके ॥ ७८ ॥ और क्षेत्रपतिना० अमिंदूतं
इसी प्रकार ( श्रीसूक्त करके) पंडित जन समिधोंमें घृत और
चरु करके क्रमसे ॥ ७९ ॥ अष्टोत्तरशत १०८ वा अटा-
विशतिकम करके अथवा आठ आठ संख्या करके शक्त्यनुसार
पंडित हवन करे ॥ ८० ॥
त्वं सोमेन पायसं च जुहुयात्तु त्रयोदश ।।
चतुर्ग्रहीतमाज्यं च यातेरुदेति मंत्रतः ॥८॥
सुवेण जुहुयादाज्यं महाव्याहृतिभिःक्रमात् ॥
हुत्वा स्विष्टकृतं पश्यात्प्रायश्चित्ताहुती नेत् ॥८२॥
यजमानो वा चानो पूर्णाहुति हुनेत् ॥
होमशेपं समाप्याथ वह्निमारोपयेत्ततः ॥ ८३ ॥

भाषाटीकासमतम् । (२२५) अर्थ-(वं सोमेन) इस मंत्र करके तेरह मरतो आहुति देना और (याते रुदेति ) मंत्रकरके ४ आहुति घृतकी देष । ८१ ॥ वेदोक्त व्याहृतियोंकरके घृतका हवन करे हान करने के बाद स्विष्टस्तु हवन करके प्रायश्चित्तकी आहुति देय ।। ८२५ माचार्य और यजमान अनिमें पूर्णाहुति देय भशेष हवन की शांतिके लिये अनिको आरोपण करै ।। ८३ ॥ कुम्भाभिमंत्रणं अय्यांदक्षिणेनाभिमंत्रयेत् ।। मृत्युपशमनार्थ च जपेयंबकमत्रकम् ॥ ८॥ रुकुम्भोक्तमागण रुदमंत्रं स्पृशक्षिपेत् ।। धूपं दीप च नेवेद्य कुंभेषु विनिवेदयेत् ॥ ५ ॥ प्रसादेषततो देवमभिषेकार्थमादरात् ॥ भवासनोपविष्टस्य यजमानस्य ऋत्विजः ॥ ८६ ॥ दारापत्रसमेतस्य कुयुः सर्वेऽभिषेचनम् ।। मशीभ्यामिति सुक्तेन पावमानीभिरेव च ।। ८७॥ हार्य-कुम्मको दाहिनी तरफसे अनिमंत्रण करके मृत्युके दूरकरनेके निमिच (यंपर्क) मंत्र जप करना चाहिये #८४ ॥ रुद्र कुम्भको कहे हुए मार्ग करके रुखमन्त्रकर सर्व कौधा दीप नैवेद्य करके विपे निवेदन करे ।। ८५ ॥ प्रसन्नतापूर्वक तिसके वाद वताझा आदरते भाभिषेक को कल्याण करनेवाले भासनमें बैठे हुए यजमान भौर यह करानेवाबा।८६॥ श्री पुत्र ततिक्षा अभिषेक सन १५ (२२६) बीजातकम् । चरै ( अक्षीयां) इस सूक्त करके ( पावमानी ) मंत्र करके ॥ ८७ ॥ आपोहिष्ठवि नवभिरापइदादयेन च । सहस्राक्षेत्पृचा वापि देवस्यत्वेति मंत्रकः ।। ८८ ॥ शिवसंकल्पमंत्रेण वक्ष्यमाणेच मंत्र। अर्थ-(आपोहिष्ठेति) नौ मंत्रों करके (आपइदा) इन दो मंत्रों करके (सहस्राक्ष ) इस ऋचा करके ( देवस्य) इस मंत्र करके ॥ ८८ (शिवसंकल्प ) मंत्र करके और जो कहे हुए मंत्र हैं जिन करके भभिषेक करना चाहिये । अयाभिषेकमंत्रमाह। योसो वनधरो देवो महेन्द्रो गजवाहनः । मूलजातशिशोदीप मातापित्रोद्यपोहतु ।। ८९ ॥ योसौ शक्तिधरो देवो हुतभुङ्मेषवाहनः ।। यः सप्तजिह्वो देवोग्निर्मूलदोपं व्यपोहतु ।। ९० ॥ योसो दंडधरो देवो धमों महिपवाहनः॥ मूलजातशिशोदो व्यपोहतु यमो महान् ॥ ९१॥ योमो खड्गधरो देवो निती राक्षमाधिपः । प्रशामयतु मूलोत्यं दो गण्डांतसंभवम् ॥ ९२ ॥ योसो पाशधरो देवो वरुणश्च जलेश्वरः । नकवादःप्रचेताहो मूलोत्याचं व्यपोहतु ॥ ९३ ।। योसो देवी जगत्प्राणो मरुतो मगवाहनः ।

भाषाटीकासमेतम् । (२२७)
प्रशामयतु मूलोत्यं दोषे बालस्य शांतिदः ।। ९४ ॥
योसोनिधिपतिर्देवः खगभनरवाइनः ।
मातापित्रोः शिशोश्चैव मूलदोषं व्यपोहतु ॥ १५ ॥
योसो पशुपतिर्देवः पिनाकी वृषवाहनः ।
आश्लेषामूलगण्डान्तदोपमाशु व्यपोहतु ॥ ९६ ॥
विघ्नेशः क्षेत्रपो दुर्गा लोकपाला नवग्रहाः।
दोषप्रशमन सबै कुर्वतु शांतिदाः ॥ ९७ ॥
त्रैलोक्ये पानि भूतानि चराणि स्थावराणि च ।
ब्रह्मार्कविष्णुयुक्तानि तानि दोष व्यपाहतु ॥ ९८ ॥
तद्वयोरभिषेकं तु सर्वदोषोपशांतये ।
सर्वकामप्रदं दिव्यं मङ्गलानां च मङ्गलम् ॥ ९९ ।।
अर्थ-इन मंत्रों करके अभिषेक करना चाहिये ॥ ८९ ।।
९. ॥ ९१ ॥ ९२॥ ९३ ॥ १४ ॥ ९५॥ ९६.
अथ स्नानम् ।
वनांतरितकुम्भाभ्यां पश्चात स्त्रापबुधः ।
ततः शुक्लांबरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥ १० ॥
मर्य-चन करके ढके हुए घडॉकरके पीछेसे पंडित जन-
समान करावे सफेद कपडे धारण कराय सफेद माला पहिराय
श्रेठ पारिकोंकरके लेपन करना चाहिये ॥१०॥

(२२८) सीजातकम् । अय दानमाई। यजमानो दक्षिणाभिस्तोपदविजादिकान् । धेनुं पयस्विनी दद्यादाचाय्यार्य सवत्सकाम्॥१०॥ निर्ऋतिप्रतिमा कुम्भं पत्र हेमं च दापयेत् । प्रार्थ वस्त्रप्रतिमा तस्मै दद्यात्प्रयत्नतः॥ १०२ ॥ अर्थ-तिसके बाद यजमान दक्षिणा करके ऋत्विजोंको तोप करे और दूध देनेवाली बछड़ा सहित गौ आचार्यको दान करके देय ॥ १०१ ॥ नक्षत्रदेवताकी प्रतिमा और घट सुवर्ण भाचार्यको दान करके देय ग्रहोंके लिये जी धन और प्रतिमा बनाई है वह भी यलपूर्वक आचार्यको देप॥१०२॥ श्रीरुद्रजापिने देयः कृष्णोऽनड्वान्प्रयत्नतः। तत्कुम्भं वस्त्रप्रतिमा तस्मै दद्यात्प्रयत्नतः॥१०॥ बक्तालाभे ततो दद्यादाचार्यब्रह्मऋत्विजाम् । वत्तन्मूल्यं प्रदातव्यं शत्या वाय प्रदापयेत्॥१.४॥ मपशिएं ब्राह्मणेभ्यो यावच्छत्तया च दक्षिणाम् । दीनांधकपणादिभ्याकिंचित्किंचित्प्रदापयेत् ॥१०॥ अर्थ-श्रीरुपके मंत्र जपनेवालेको यत्न करके कालावल रेय और भीरबका हुम्न और वन प्रतिमा तिसी जपकर- नेवालेको देना चाहिये ॥ १०३ ॥ जो श्रीरुदके मंत्रका जप करनेवाला न होय तो भाचार्य या अन्य ऋत्विज बलको

जापारीकासमेतम् । (२२९)
देय अथवा तिह तिराका मोलदेय या अपनी शक्त्यनुसार
देय १०४॥ और बाकी बचे जो ब्राह्मणों के अर्थ अपनी
शक्केि लायक दक्षिणा देय दीन पुरुष अंधे लूले लंगोंको नी
थोडा धन देये ॥ १०५॥
अथ घृतावलोकनार्य मंत्रः।
बंदे सर्वरसश्रेष्ठं त्वामहं भगवानजः ।
अग्र आज्यसुधारूपं सर्वश्रेष्टं कुरुष्व माम् ॥ १०६ ॥
यालक्ष्मीयच मे दोस्थ्यं सर्वगात्रेष्वस्थितम् ।
तत्सर्वं भक्षयाज्य वं लक्ष्मी पुष्टिं विपर्धय ।। १०७॥
अर्थ-इन दोनों मंत्रोकरके वृतमें शरीर देखकर गया
पान दान करे ॥ १०६ ॥ १०७ ॥
निसर्जनम् ।
उदासयेत्ततो पहिमहान्दवान्दिजानकमात् ।
दद्यादानंपायसादिब्राह्मणान्भोजयेच्छतम् ॥ १०८ ॥
अलामे प्रति पंचाशदशकं तदलामतः ।
सर्वशांतेश्च पठनमाशिषां ग्रहणं तथा ॥ १०९ ॥
इति श्रीवंशवरेलिकस्थगोडवंशावतंतश्रीवरदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिपिफपण्डितश्यामलालदि-
रचिते स्त्रीजातके मूलशांतिवर्णनं नाम
पोडशोऽध्यायः ॥१६॥

(२३०) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ-फिर अमिका विसर्जन कर ग्रहोंका, देवताओंका,
वालणाका क्रमसे विसर्जन फरै और एक सौ ब्राह्मणोंको खीर-
को भादि लेलेकै पकानोंका भोजन देय ॥१०८॥ और जो
सौ बाह्मण न मिले तो पचास ब्राह्मण जो पचास न मिले तो
दश ब्रह्मणोंका भोजन देय और सब ब्राह्मण शांति पाठ करें
श्राह्मणोंसे आशीर्वाद ग्रहण करे ॥ १०९ ॥
इति श्रीवंशबरेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसादास्म-
जराजज्योतिपिक पं०श्यामलालहतायां श्यामसं-
दरीभापाटीकायां मलशांतिवर्णनं नाम
पोडशोध्यायः ॥ १६ ॥
अथाऽऽश्लेपाशतिरघ्यायो निरूप्यते ।
आश्लेषायां तु जातानां शांति वक्ष्याम्यतः परम् ।
जातस्य द्वादशाहे तु शालिहोमं समाचरेत् ॥ १॥
अलाभे मे तु जन्मस्थे कुर्याच्छांति शुभे दिने ।
स्नातोभ्यंगादिमिस्त्वस्मिन्परयेत्तु द्विजोत्तमान् ॥२॥
अर्थ-आश्लेपानक्षत्रमें पैदा हुआ लडका वा लडफी
उनकी शांति कहता हूं जिस दिन बालक पैदा होय इससे
वारहये दिग शांतिहोम करना चाहिये ॥ १॥ जो बारहवे
दिन न करे तो जन्मके नक्षत्रके दिन उत्तम दिनगें शांति करे
उबटन करके स्नान करे फिर उत्तम ब्राह्मणोंको वरण
करना चाहिये ॥ २ ॥

.
भापाटीकासमेतम् । (२३१)
विभवे पंच कुम्भांश्च द्वयं वा तदभावतः ।
देवतास्थापने चैक एको रुद्राभिमंत्रणे ॥ ३॥
मूलशांतिप्रकारेण कुंभ निक्षिप्य पूजयेत् ।
गोमपालेपिते देशे धान्पादो परिशोभने ।। ४ ॥
पर कारयेत्तत्र भूपालमितं तथा ॥
तंदुलेः कारयेत्पमं रक्तपीतषितासितः ॥५॥
कर्णिकायां न्पोच्छी ह्रीं स्थापयेत्तेषु कुंभकम् ॥
आकलशेवित्यनया कलशस्थापनं शुभम् ॥ ६॥
अर्थ-धनवान् होय तो पांच कुम्न स्थापित करे और
पांच कुम्भकी श्रद्धा न होय तो दो कुम्म स्थापित करे एक
घट नक्षत्र देवताका स्थापन करे और एक घट रुद्रदेवका
अभिमंत्रण करनेको स्थापित करना चाहिये ॥ ३॥ मल-
शांति प्रकारकरके कुम्मके धीचमें औपधी डालकर पूजन करे
गोबरसे धरती लीपकर धान्यकी राशिपर घट स्थापित
करे ॥ ४॥ तहां अन्नका कमल बनाये चौबीस अंगुलका
अथवा चावला कमल बनावे लाल पीले सफेद श्याम चाव-
लका बनावे ॥ ५॥ और कमलकी दलोपरी ही मते
बनाये तिसके बीचमें घट स्थापित करे (भाकलशे) इस
मंत्र करके कलश स्थापन करना शुभ है ॥ ६ ॥
इमं मे इतिमंत्रण पूरयेत्तीर्यवारिणा । कुम्भं प
पत्रगंधायैस्तत्तनपत्रः प्रपूजयेत् ॥ ७ ॥

(२३०) स्त्रीजातकम् ।
अर्थ-फिर अमिका विसर्जन कर ग्रहोंका, देवताओंका,
प्रालणाका क्रमसे विसर्जन करे और एक सौ ब्राह्मणोंको खीर-
को आदि लेलेकै पकानोंका भोजन देय ॥१०८॥ और जो
सौ बाह्मण न मिलें तौ पचास ब्राह्मण जो पचास न मिलें तो
दश ब्रह्मणोंका भोजन देय और सब ब्राह्मण शांति पाठ करें
आह्मणोंसे आशीर्वाद ग्रहण करै । १०९ ॥
इति श्रीवंशबरेलिकस्थगौडवंशावतंसश्रीबलदेवप्रसादास्म-
जराजज्योतिपिक पं० श्यामलालहतायां श्यामसुं-
दरीभाषाटीकायां मूलशांतिवर्णनं नाम
पोडशोध्यायः ॥ १६ ॥
अथाऽऽश्लेपाशतिरघ्यायो निरूप्यते ।
आश्लेपायां तु जातानां शांति वक्ष्याम्यतः परम् ।
जातस्य द्वादशाहे तु शांतिहोमं समाचरेत् ॥ १॥
अलाभे मे तु जन्मस्थे कुर्याच्छांति शुभे दिने ।
स्नातोभ्यंगादिभिरत्त्वस्मिन्वयेत्तु द्विजोत्तमान् ॥२॥
अर्थ-आश्लेपानक्षत्रमें पैदा हुआ लड़का या लड़की
उनकी शांति कहताहूं जिस दिन बालक पैदा होय इससे
वारहये दिग शांतिहोम करना चाहिये ॥ १॥ जो बारहवें
दिन न करे तो जन्मके नक्षत्रके दिन उत्तम दिनमें शांति करे
उबटन करके स्नान करे फिर उत्तम ब्राह्मणोंको वरण
करना चाहिये ॥२॥

भापाटीकासमेतम् । (२३)
विभवे पंच कुम्भांश्च द्वयं वा तदभावतः ।
देवतास्थापने चेक एको रुद्राभिमंत्रणे ॥३॥
मूलशांतिप्रकारेण कुंभ निक्षिप्य पूजयेत् ।
गोमयालेपिते देशे धान्यादौ परिशोभने ॥ ४ ॥
पानं कारयेत्तव भूपालमितं तथा ।।
तंदुलेः कारयेत्पनं रक्तपीतपित्तासितः ॥६॥
कणिकायां न्यसेच्छी ही स्थापयेत्तेषु कुंभकम् ॥
आकलशेष्वित्यनया कलशस्थापनं शुभम् ॥ ६॥
- अर्थ-धनवान् होय तो पांच कुम्भ स्थापित करें और
पांच कुम्भकी श्रदा न होय तो दो कुम्भ स्थापित करे एक
घट नक्षत्र देवताका स्थापन करे और एक घट रुद्रदेवका
अमिमंत्रण करनेको स्थापित करना चाहिये ॥ ३ ॥ मूल-
शांति मकारकरके कुमाके बीचमें औषधी डालकर पूजन करे
मोचरसे धरती लीपकर धान्पकी राशिपर घट स्थापित
करे ॥ ४ तहां अभका कमल बनाये चौपीस अंगुलका
अथवा चारलका कमल बनावे लाल पीले सफेद श्याम चाव.
लका बनाये ॥ ५॥ और कमलकी दलोपरी ही ममते
बनाये विसके घीचमें घट स्थापित करे (भारतशे) रस
मंत्र करके कला स्थापन करना शुज है ॥ ६ ॥
इमं मे इतिमंत्रेण पूरयेत्तीर्थवारिणा । कुम्भंग
पनगंवायत्तत्तमंत्रः प्रपूजयेत् ॥ ७॥

- {२३३) खांजातकम्। याः फलिनीरित्यनेन दक्षिणोत्तरयोर्यजेत् । ऐयादीशानपतमितराणि पूजयेत् ॥ ८॥ अर्थ-( इमं मे ) इस मंत्रभरके घटमें तीर्थोका जल परना चाहिये घटको पद्य गंध पुष्पाक्षतादिकोंकरके तिम मंत्रोसे पूजन करना चाहिये ॥ ७ ॥ (याः फालनी) इस मंत्र करके दक्षिण उत्तर दिशामें यजन करे पूर्व दिशासे लेकर गपर्यंत, इंग्र, अग्नि, पितृ, निहति, वरुण, मरुत्, कुबेर, रा इन देवताओंका पूजन करना चाहिये और ग्रहोंकामी पूजन प्रत्येक दिशाओंमें करे ॥ वराहः-मागाया रविशुक. लोहिततमः सोरेंदुवित्सूरयः ॥ ८॥ सूलोक्तविधिनानेन कुम्भयोरभिमंत्रणम् । रुद्रार्चा रुद्रकुम्भेषु पूर्ववच्छेपमाचरेत् ॥९॥ अर्थ-और सब विधि मूल नक्षत्रमें कही है तिस माफिक कुम्भका मनिमंत्रण करके और रुद्रकुमाको रुद्रके मंत्रकरके पहिले कही हुई विधिके अनुसार सब कार्य करे ॥ ९ ॥ अर्थात् मूल नक्षत्रके माफिक आश्लेषा नक्षत्री भी शांति करनी चाहिये सम्पूर्ण सामग्री सहित पांच कुम्म स्थापित कर और पांचकी श्रद्धा न होय तो दो कुम्न स्थापित करे और एक कुम्भ रुखका दूसरे कुम्भपर आशेपा नक्षत्रकी प्रतिमा स्थापित करे पूर्वोत्तरीत्यनुसार दोनों कुम्नोंका अनिमंत्रण करे तहाँ भालेपा नक्षत्रकी प्रतिमा साकार बनावे भौर .. पाटीकाममतम् । (२३३) और उसका अधिवेषता यहसतिको प्रतिमा भौर प्रत्पपिदेवता पिभीश्वरोंकी प्रतिमाका स्थापन कर (नमोस्तु सापः) इस मंत्र करके पूजन करे । अथाश्लेषानक्षत्रध्यानमाह। सप्पो वक्ताश्विनेत्रश्च द्विभुजः पीतवस्त्रकः । फलकाधिधरस्तीक्ष्णो दिव्याभरणभूषितः ॥ १० ॥ अर्थ-भाशेपा नक्षत्रका ध्यान करना चाहिये ॥ १० ॥ मय कर्मविधानमाइ । फर्तुः शाखोक्तमार्गेण भाचार्यस्याथ वा चरेत् । मसांतं कर्म निर्माय विरादाय शास्त्रतः ॥११॥ इंदं सभ्यो जुहुयात्साधिप्रत्यधिदेवतम् । अष्टोत्तरशतं वाथ अष्टाविंशतिरेव च ।। १२॥ मूलनक्षत्रवच्छेपं होमकर्म समापयेत् । पूर्णाहुत्यंतफआणि कृत्वा संपातकं तथा ॥ १३ ॥ अर्थ-अपनी शाखामार्गक्रके पूजन हवन आचार्य वा यणमान करे यज्ञके अंतमें कर्मनिवारण करके शाबानुसार हविष्य लायकर ॥ ११ ॥ (इदंसप्पयो) इस मंत्रकरके हवन करे अधिदेवता और प्रत्यधिदेवताका अष्टोत्तर शत (१०८) अथवा अाविंशति ( २८) संख्या- रके ॥ १२ ॥ बाकीका सम्पूर्ण कर्म मूलनक्षत्रके तुल्प करके

(२३४) स्त्रीजातकम् ।
इवनकर्म समाप्ति कर अंतमें पूर्णाहुति कर्मकरके फिर प्रायश्चि
तनिवारण करना चाहिये । १३ ॥
अथांजल्यभिषेक।
कुम्भाञ्जलिं तु प्रक्षिप्य अभिषेकं समाचरेत् ।
पुत्रदारसमेतस्य यजमानस्य पूर्ववत् ॥ १४ ॥
अर्थ-जिस घटको अंजलि देकर पुत्र स्त्री सहित जो
यजमान है तिसका अभिषेक करना चाहिये पहिलेकी
तरह ॥ १४ ॥ और घटके जलसे पुत्र सी यजमानका अभि-
पैक करना अर्थात् घटके जलमे छोटा देना चाहिये।
अथाभिषेकमंत्रमाह।
आश्लेषानाजातस्य मातापित्रोधनस्य च ।
भातृजातिकुलस्थानां दोपं सर्व व्यपोहतु ॥ १५ ॥
अर्थ-आश्लेषा नक्षत्रमें पैदा हुए बालकके माता, पिता
और धन, भातृगण, चंधु लोगोंके सम्पूर्ण दोपोंको नार
करे हैं ॥ १५ ॥
अय रक्षामंत्रः।
'पितरः सर्वभूतानां रक्षतु पितरः सदा।
सर्पनक्षत्रजातस्प वित्तं च जातिवांधवान् ॥ १६॥
सर्वाधीश नमस्तुभ्यं नागानां च गणाधिप ।।
गृहाणाध्य मया दत्तं सर्वारिष्टप्रशांतये ॥ १७॥
मूलनक्षत्रवत्कुर्यात्सर्वदोपे तनामतः ॥ १८ ॥

आपाटीकासमेतम् । अर्थ-इस मंत्रकरके रक्षा करना तथा अध्य देना चाहिये ॥ १६ ॥ १७ ॥ मूलनक्षत्रके तुल्य आश्लेपानक्षत्रके नाम करके सब कर्म करना चाहिये ॥ १८॥ अथ मूलदोषमाह-नारदः। मूलजा वारं हति व्यालजा तु तदंगजान । ऍद्री तदननं इति देवरं तु द्विदेवजा ॥ १९ ॥ शांति पुष्कला चेत्स्पातदि दोपो नकचन ! इति सर्पक्षनाता च सुता शांतिमगाच्छुभम ॥२०॥ अर्थ-मूल नक्षत्र में पैदा गई.कन्या श्वशुरका नाश करती है और आश्लेपा नक्षत्रमें पैदा भई पतिके वहिनका नाश करे और ज्येष्ठा नक्षत्रमें पैदा भई बने भाईका नाश करे और विशाखामें पैदा भई देवरका नाश करती है ॥ १९ ॥ पूरी पूरी शांति करनेसे सर्व दोष दूर होते हैं. मूल ज्येष्टा आश्लेपा विशाखा इन नक्षयोंमें पैदा. भई कन्याकी शांति जन्मसमय अथवा विवाहसमय करना चाहिये क्योंकि मूल दोपमें उत्पन्न जो वालक है सो उत्पत्तिकालमें अपने कुलको दोष करते हैं और विपाहके बाद श्वशुर कुलको दोपी होते हैं.भाश्लेषा नक्षत्रमें पैदा मई कन्याको शांति पूर्ण कही है। २० जय विविधगण्डतशांतिनिरूप्यते । गण्वशांति प्रवक्ष्यामि सोममंत्रेण भक्तिमान ।

भाषाटीकासमेतम् । (२३७) इस मंत्र करके निश्चय करके पुजा करे गणदोषकी शांतिके लिये इष्ट दक्षिणा देव ॥ २५ ॥ शुक्लं वागीश्वरं चैव ताम्रपात्रसमन्वितम् । गण्डदोषोपशात्यर्थं दद्यादेदविदे शुचिः ॥२६॥ अभुक्तेतरजातानां सूतिकांते दिने तथा ॥ शांति शुभेनि वा कुर्यात्तावत्पुत्र नलोकयेत् ॥२७॥ अर्थ-शुक्लवर्ण वागीश्वरकी मूर्ति तानपात्रमें घृतसहित स्थिति करके गडदोपकी शांतिके अर्थ देके जाननेवाले बाह्म- मको देय ॥ २६ ॥ अमुक्त मुलासे इतर दोषोंमें पैदा हुए बालककी शांति सूतकके भंतमें भथया शुभ दिनमें करे जब तक शांति न करे तबतक कन्या पुत्रका 'मुख न देखना चाहिये ॥ २७ ॥ अय विशेषगण्डमाह। मूलाधिपिपचरणे प्रयमे चनूनं पोष्णेद्रयोश्च फ. णिनवरीषपादे । मातुः पितुः स्ववपुपः प्रकरोति नाशं जातो यदा निशि दिनेष्यथ संध्ययोश्च ॥२८॥ भर्व-मूल अधिनी ममा इन नक्षत्रोंके पहिले चरण यो बालक पैरा होय और रेती उपेठा आटेपा नक्षत्रके चौथे चरणमें जो उत्पन्न बोय तो वह बालक माता पिना और भपने शरीरको नाश करता है और जोपाठक राप्ति भौर दिनकी सपिमें उसन्न होय तोती पूर्ववत् भशुत फल (२३६) स्त्रीजामाम् । वास्थपात्रं मकुर्वात पलैः पोडशामिन्दम् ॥२१॥ गयाभिश्च चतुर्भिा द्वाभ्यां वा शोभनं तथा । तन्मध्ये पायस शंख नवनीतेन पूरिते ॥ २२ ॥ राजतं चंद्रमभ्यर्च्य खितपुष्पसहस्रकः । देषज्ञः शुकवासास्तु शुकमाल्यांवरार्चितः ॥२३॥ सार्थ-भप गंउदोपशांति कहताहूं-चंद्रमाके ( इमदेवा) इस मंबकरके शक्तिसहित श्रेपन ५३ तोले चार मासेका कांस्यका पात्र बनाये अथवा तीस तोलेका कांसेका पात्र यमाचे ॥ २१ ॥ अथा २६ छब्बीस तोला आठ ८ मासेका या १३ तोले चारमासे या छः तोले आठ मासेका शोपाय- माग पात्र बनाये उसके बीच सीर मरे और खीरके बीच मासन शंखमें भरकर ॥ २२ ॥ चांदीका चंद्रमा उसमें रसस्त एक हजार सफेद पुष्पोकरके पूजन करना और ज्योति यीका मफेद पोंकरके सफेद पुणोंकी माला बनाकर पूजन करना चाहिये ॥ २३॥ सोमोहमिति संरित्य पूनां कुर्यादतंद्रितः । जपेत्तस्रक मंचं श्रद्दधानः समाहितः ॥२४॥ माप्यायलेति मंत्रण पूजा कुर्यात्समाहितः ।। नया दक्षिणामिष्टो गण्डदोपप्रशांतये ॥ २५ ॥ गृहाणायन) इस मंत्र करके भालस्य ड करके मूलनक्षत्रवत्पुरक हजार मंत्र जये।॥२४॥ (आप्यायस्य) भाषाटीकासमेतम् । (२३७) इस मंत्र करके निश्चय करके पूजा करे गणदोषकी शांतिके लियर दक्षिणा देय ॥ २५ ॥ शुक्खं वागीश्वरं चैव ताम्रपात्रसमन्वितम् । गण्डदोषोपात्यथै दद्यादेदविदे शुचिः ॥ २६ ॥ अभुक्ततरजातानां सूतिकति दिने तथा ॥ शांति शुभेह्नि वा कुर्यात्तावरपुत्रं नलोकयेत् ॥२७॥ अर्थ-शुक्लवर्ण वागीश्वरकी मूर्ति ताम्रपात्रमें घृतसहित स्पिति करके गेहदोपकी शांतिके अर्थ वेदके जाननेवाले बाल- पको देय ॥ २६ ॥ अभुक्त मूलॉस इतर दोषोंमें पैदा हुए बालककी शांति सूतकके भंतमें अथवा शुभ दिनमें करे जब तक शांति न करे तबतक कन्या पुत्रका मुख न देखना चाहिये ॥ २७ ॥ अथ विशेषगण्डमाइ। मूलाश्चिपिचचरणे प्रयमेच नूनं पोष्णेद्रयोश्च फ. णिनश्चरीयपादे । मातुः पितुः स्ववपुषः प्रकरोति नाशं जातो यदा निशि दिनेग्यथ संध्ययोश्च ॥२८॥ भर्व-मूल अश्विनी ममा इन नक्षत्रोंके पहिले घरणने को बालक पैरा होय और रेवती उपेठा -आटेपा नक्षत्रके चौथे चरणमें जो उत्पन्न बोय तो वह बालक माता पिता पौर भपने शरीरको नाश करता है और जो बाउक रामि गौर दिनकी संधि उतन होय तोतो पूर्ववद मशुल फल

(२३८) स्त्रीजातकम् ।
करता है ॥ २८ ॥ इन गडदोपोंमें उत्पन्न बालकोंकी भी
पूर्ववत् प्रतिमा कलश भभिपेक हवनादि कर्म करके शांति
करना चाहिये।
अन्यच्च गण्डदोपमाह-श्रीपतिः।
उत्तरातिष्यचिवासु पूर्वापाढोद्भवस्य च ।
कुच्छिाति प्रपत्नेन नक्षत्राकारजां बुधः ॥ २९ ॥
अर्थ-उत्तरा पुष्प चित्रा पूर्वापाढमें उत्पन्न हुए बाल-
कॉकी भी नक्षत्रके अनुसार यत्न करके शांति करता
चाहिये ॥ २९॥
अप पादभेदेन गण्डदोपमाह-वसिष्ठः ।
चित्राय) पुष्यपादे द्वितीये पूर्वापाराधिष्ण्य-
पादे तृतीये । पूर्वाफाल्गुन्युत्तराद्धे विषाती
मातापित्रोधीतुरेवात्मनश्च ।। ३० ।।
अर्थ-चित्रानक्षत्रका अदमागमें पुष्य नक्षत्रके दूसरे
चरणमें और पूर्वापाढनक्षत्रके तीसरे चरण और पूर्वाफाल्गुनी
नक्षत्रके चौथे चरणमें जो बालक उत्पन्न होय वह माता पिता
भाता और अपनी भात्माका कमसे घाती होता है। ३०॥
मय नक्षत्रजातवशाद्वारकस्य दर्शना-
वषिमाइ-गर्गः।
दिमासस्पोत्तरादोपः पुष्पश्चेव त्रिमासकः ।।
पूर्वापादाष्टमे मासे चित्रायामाष्टमासिकम् ॥ ३१ ॥

भापाटीकासमेतम् । (२३९) नपमा तथाश्लेषामूली वाष्टसमा स्मृताः। ज्येष्ठा पंचदशे मासे पुत्रदर्शनवर्जिता ॥ ३२॥ अर्थ-उत्तरा नक्षत्रमें उत्पन्न बालकको दो मासतक न देखना चाहिये पुष्य नक्षत्रमें उत्पन्नको तीन मासतक पूर्वा- पाढमें उत्पन्नको आठ मासतक चित्रामें पैरा हुएको छः महीनेतक ॥ ३१ ॥ आश्लेषामें उत्पन्नको नौ मासतक और मूलनक्षत्र में उत्पन्न बालकको आठ वर्षतक और ज्येष्ठामें पैरा हुएको पंद्रह महीनेतक नहीं देखना चाहिये । अथ नक्षत्रजातेदानमाह । उत्तरे तिलपात्रं स्यात्तिष्ये गोदानमिष्यते ॥ अमां चित्रासु वे दद्यात्पूर्वापाढे तु कांचनम् ॥३३॥ यपान्त्रीदीश्च मापांश्च तिलमुद्गोश्च दापयेत् । यथापित्तानुसारेण कुर्याद्वाह्मणभोजनम् ॥ ३४॥ पितुरायुष्पवृद्धयर्थ शांतिरत्र विधीयते ॥ ३५ ॥ मर्य-उत्तरानक्षत्रमें उसनके शांत्यर्थ तिलपात्र दान करे पुष्पमें पैरा हुऐको गोदान करना चाहिये चित्राजातको बकरा दान करना चाहिये पूर्वापारामें पैदा हुएको सुवर्ण दान मला चाहिये ॥ ३३ ॥ जौ, धान, उई, तिल, मूंग रान सरसा चाहिये भोर भपनी शक्त्यनुसार ब्राह्मणभोजन करता चाहिये । ३४॥ पिताकी भायुष्प बढानेको ये शांति " , पिसी है। ३५॥

4 (२४०) स्त्रीजातकम् । स्वनिक्षत्रेषु जाते शांति विना दानमाई- वसिष्ठसंहितायाम् । विप्रेभ्यो गोत्रयं दद्यात्तदोपकामनाय । अशक्तो गोद्रयं दद्याद्वामेकां वापि भक्तिमः ॥३६॥ अर्य-पूर्वोक्त नक्षत्रमें जो वालककी शांति करानेकी शक्ति न होय तो ब्राह्मण तीन गोदान करके देय तिस दोप. शांतिके लिये जो तीन गोदागकी शक्ति न होय तो दो गोहान करे अपनी भक्तिसहित एक गोदान करे ॥ ३६॥ मथ ज्येष्ठाशांतिनिरूप्यते-भरद्वाजः। अथ ज्येष्ठाजाते प्रत्येकपघटिकाफलमाह । ज्येष्ठादी मातृजननी मातामहद्वितीयके । तृतीपे मातुलं इंति चतुर्थे जननी तथा ॥ ३७॥ मात्मानं पंचमे इति पष्ठे गोत्रक्षयो भवेत् । सप्तमे कुलनाशः स्यादृष्टमे ज्येष्ठमोदरम् ॥ ३८॥ नवमेश्वशुरं हति सर्वस्वं दशमे तया । प्रत्येकं घटिका पट् स्यात्फलमुक्तं द्विजोत्तमैः॥३९॥ अर्थ-ज्येष्ठा नक्षत्रकी ६० घटीके इश भाग करे प्रत्येक भाग छ। छ। घटीका हुआ उसका फल कम करके कहते हैं. प्रथम भागमें उत्पन्न बालक नानीका नाश करे, इसरे भागेम नानाका नाश करे, तीसरे भागमें मामाका नाश चतुर्थ भाममें माताका नाश करे ॥ ३७॥ पंचग भाग, आपाटीकासमेतम् । (२४१) अपनी आत्माका नाश करे छठे भागमें गोत्रका नाश करे सातवें भाममें कुलका नाश करे आठवें भागमें बडे भाईका नाश वरे ॥ ३८॥ नयम भागेम श्वशुरका नाशकरे और दशम मागमें सर्वस्व नाश करे हर एक छः घटीका फल पंडितों. करके कहागया है ॥ ३९ ॥ अथ ज्येष्ठारेवतीगण्डान्तमाह । घटिककाचमैत्रांते ज्येष्ठाद घटिकाद्वयम् । तयोः सांधारीत ज्ञेयं शिशिगण्डान्तारितम् ॥४०॥ अर्थ-अनुराधानक्षत्रके अंतका एक घटी ज्येष्ठाके मादिकी दो घटी इनकी संधिको गंडान्त कहते हैं ॥ ४० ॥ अथ ज्येष्ठापादफलम् । प्रथमे च द्वितीये च ज्येष्ठः च तृतीयके । पादत्रयपि यो जातः स च श्रेष्ठः प्रकीर्तितः ॥ ४१ ज्येष्ठांतपादनातस्तु पितुः स्वस्य विनाशकः ।। ज्येष्ठ कन्यका जाता हंति शीघ्रं धवाग्रजम् ॥४२॥. अर्थ-ज्येष्ठानक्षत्र पहिला दूसरा तीसरा इन तीनों चरणों उत्पन्न हुए वालक श्रेष्ठ होते हैं ॥ ४॥ अंतिम चरणमें उत्पन्न वालक पिताका और अपना नाश करता है और ज्येष्ठानक्षत्र में उत्पन्न भई कन्या स्वामीके बडे माताका नाश करती है ॥ ४२ ॥ अथ ज्येष्ठागण्डान्तशतिः। शांति तस्य प्रवक्ष्यामि गण्डदोपप्रशांतये। ॥ ज्पेठाके (२४४) सीजातकम् । गृहाणाध्य मया दशं गण्डोपप्रशांतये ॥ १३॥ अर्थ-इस मंत्र करके अयं देना चाहिये ॥ ५३॥ इति ज्येष्ठाशांति ॥ अध दुपयोगजनने शांतिः। दिनक्षये व्यतीपाते व्यापाते विष्टिवैधृतौ । शूले गण्डे च परिघे वने च यमघंटके ।। ५४॥ कालदंडे मृत्युयोगे दग्धयोगे सुदारुणे । तस्मिन गंडे दिने प्राप्ते प्रसूतियदि जायते ।। १५ ॥ अतिदोपकरी प्रोक्ता तब पापयुते सति । विचार्य तत्र देवज्ञः शालि कुर्याययाविधि ॥५६॥ अर्थ-जिस कन्याके जन्मसमयमै दिनक्षय अर्थात तिथि क्षय होय व्यतीपातयोग होय, व्याघातनाम योग होण वा भद्रा होय वा चैधृतिनाम योग होय शृलयोग होम गडयोग होय वा परिघनाम योग होय वा यमघटनाम योग होय अर्थात् सूर्यवारको मघा, चन्द्रवारको विशाखा, भौमवारको भाद्री, बुधवारको मूल, बृहस्पतिको कृत्तिका, शुक्रको रोहिणी, शनैश्वरको हस्त नक्षत्र होनेसे यमघट योग होता है ॥ ५४॥ या कालदंड योग होय अर्थात् रविवारको भाद्री मंगलको भरणी, चंदवारको मघा, बुधषने चित्रा, बृहस्पतिको ज्येष्ठा, शुक्रको भाजित, शनैश्वरको पूर्वाभाद्रपद होनेसे कालदंड योग होता है या मृत्युयोग, रविवारको अनुराधा, चंद्रवारको उत्तरा ३, मंगलको शतभिषा, बुधको अश्विनी, सहसतिको मृगशिर, शुक्रको आटेपा, शनवर वार हस्त नक्षत्र भापाटीकासमेतम् । (२४५) होनेसे मृत्युनाम योग होता है दग्धयोग अर्थात् रविवारको द्वादशी, चंद्रको प्रतिपदा, मंगलको पंचमी, युधको तीज, बृहस्प- तिको पडवा, शुरुको अष्टमी, शनैश्चर, नवमी तथा रविवारको चरणी, चंद्रयारको चित्रा, मंगलको उत्तरापाड, बुधको धनिष्ठा, बृहस्पतिको उत्तराफाल्गुनी, शुक्रको ज्येष्ठा, शनैश्चरको रेवती होनेसे दग्धयोग होता है वा दारुणनाम योग होय अथवा सम दिन गंड होय अर्थात् नक्षत्रगंडांत तिथिगंडांत लमगंडांत ये तीन प्रकारके गंडांत होते है, नवमी तिथिके अंतकी २ घडी पंचमी अंतकी १ घडी चौथकी अन्वकी आधी घडी गंडांत कहानी है ज्पष्ठानक्षत्रके अन्तकी २ चडी अधिनीकी आदिकी २ घडी आलेपाके अंतकी २ घडी, मयारू आदिकी दो घडी गंडांत कहाती है। कर्क, मीन, वृश्चिक इनके आदिकी २॥ घडी, सिंह मेप धन इन लयोंके आदिकी आधी घड़ी गंडांत कहाती है ऐसे समयमें जन्म होनेसे ॥ ५५ ॥ अत्यंतदोपकारी है और उन्ही टोंमें पापग्रह युक्त होय तो ज्योतिषी लोग विचारकरके यथाविधि शांति करे ॥ ५६ ॥ वस्य शांतिः। यजनं देवतानां च ग्रहाणां व पूजनम् । दीपं शिवालये भत्त्या गोघृतेन प्रदापयेत् ।। ५७॥ भाभिषेक शंकराय तथाअत्यप्रदक्षिणाम् । अभीष्टफलसिद्धयर्थं कारयेद्ब्रह्मभोजनम् ॥ १८ ॥ गाणपत्यं पुरुपसूक्तं सोरं मृत्युंजयं तथा।

"
(२४६)
स्त्रीजातकम् ।
शांत्यै जाप्यं पुनश्चैव कृत्वा मृत्युंजयी भवेत् ॥२९॥
अर्थ-देवतामाके अर्थ यज्ञ करे, ग्रहोंका पूजन करे,
शिवके मंदिरमें गौके घीका दीपक वाले ॥ ५७ ॥ और शि-
वका अभिषेक करके पीपलकी प्रदक्षिणा करे, अभीष्ट फलकी
सिधिके अर्थ ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥५८॥ गाणपत्यसूक्त
पुरुषसूक्त सौरमंत्र और मृत्युंजयके मंत्रका जप शांति करनेसे
मनुप्प मृत्युंजयी होता है ॥ ५९ ॥
अथव्पत्तीपात्तवृतिसंकतिजातफलम् ।
कुमारीजन्मकाळे तु व्यतीपातश्च वैधृतिः ॥
संक्रांतिश्च पेस्तन जाना दारिद्रयदुःखिता॥ ६० ॥
अर्थ-कन्याके जन्मलों व्यतीपात वैधृति सूर्य क्रांति
होनेसे दरिद्रता कारक होताहै " व्यतीपातवैधृती गणि-
तागती महापातसंजौ यो संमोहमयत्र पोडशघटी मिती
ज्ञेयौ ॥ १ ॥६०॥
तस्य शांतिः।
नवग्रहमखं कुर्यात्तल्य दोपस्य शांतये ।
प्रथमे गोमुखाजनम ततः शांति समाचरेत् ॥६॥
गृहस्य पूर्वदिग्भागे गोमयेनानुलिप्य च ।
अलंकृतं स्वदेशे तु ब्रीदिराशि प्रकल्पयेत् ॥ ६२॥
अर्थ-नवग्रहोंका यन को निस दोपकी शांतिके लिये
जो पहिले गोमुखते जन्म होय तिसकी शांति करे ॥ ६ ॥
घरके पूर्वनागमें गोबरसे लीपकर तिस स्थानको अलंकन करके
धान्यकी देरी कलना करे ॥ १२॥

आधिदेवं भवेत्सूर्य चंद्रे प्रत्यधिवतम् ॥६८॥ . (२४७) भाषाटीकासमेता। पंचद्रोणमितं धान्यं तदध तंदुलेन च । वध तु तिल कुदिन्योन्य परिकल्पयेत् ॥ ६३ ॥ पत्रितयराशोतु अष्टपत्र लिखेट्बुधः । पुण्याहं वाचयित्वा तु आचार्य कारयेत्पुरा ॥ ६ ॥ राशो प्रतिष्ठितं कुम्भमवणं सुमनोहरम् । तीर्थोदकेन संमृज्य समृदोषधिपल्लयम् ॥ ६५॥ अर्थ-चार मन जौ दो मन चावल एक मन तिल इनकी अन्य टेरियें कल्पना करे ॥ ६३ धान्यकी तीनों ढोरयोंपर अष्टकमल पत्र लिखे पीछे पुण्याहवाचन आचार्य पहिले करे उन तीनों धान्यकी टेरियोंपर सुन्दर विना टूटा घट स्थापनकर पटोंमें तीथोंदक डालकर सप्त मृत्तिका शौषधी पंच पडव हालै ॥ ६४ ॥६५॥ पंचगव्यं पंचरत्नं वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम् । तस्योपरि न्यसेत्पात्रं सूक्ष्मवस्त्रेण वेष्टितम् ॥ ६६ ॥ प्रतिमा स्थापयेत्पश्चात्साधिप्रत्यधिदेवतम् । चंद्रादित्याकृती पार्श्वे मध्ये वैधृतिमर्चयेत् ॥ ६७ ॥ अर्थ-पंचगव्य पंचरत्न घटमें डालकर दो वनों करक वहन करे तिसके ऊपर पात्र रखकर महीन कपडेसे युक्त करे॥६६॥ फिर घटके ऊपर प्रतिमा स्थापन करे अधिदेव- ता और प्रत्याधि देवताकी चंद्रमा और सूर्य घटके पावती पर बीचमें वैधतिका पूजनकरे ॥ ६७ ॥ एवमेव व्यतिपाते शांते संक्रमणस्य च ।

(२४८) खोजातकम् । तत्तव्याहृतिपूर्वेश्च तत्तन्मः प्रपूजयेत् । यंवकेन मंत्रेण प्रधानप्रतिमां यजेत् ॥ ६९ ॥ उत्सूर्य इति मंत्रेण सोमपूजा समाचरेत् । आप्पायस्वेति मंत्रण सोमपूजा समाचरेत् ॥ ७० ॥ तवाष्टोत्तरसाहस्रमष्टोत्तरशतं च वा। अष्टाविंशतिसंख्याकं जपं सर्वत्र सौरजम् ॥७१ ।। अर्थ-इस प्रकार व्यतीपातकी और संक्रांतिजननकी शांति करना चाहिये सूर्पको अधिदैव चंद्रमाको प्रत्यधिदैव करके ॥ ६८ ॥ तिन तिन पूर्वक ही व्याहृतियों करक तिन्हीके मंत्रोंसे पूजन करे, त्र्यंबक मंत्र करके प्रधान देव- ताकी प्रतिमाका यजन करे ॥ ६९ ॥ (उत्सूर्य) इस मन्त्र करके सूर्यकी पूजा करे (आप्यायस्वेति ) मंत्र करके चंद्र- माका पूजन करे ॥ ७० ॥ तिसके बाद एक हजार आठ मंत्र अथवा एकसौ आठ वा अहाईस मंत्र का जप, सब जगह सौरज रीति करनी चाहिये ॥ ७१ ॥ अथ कुहसिनीवालीदर्शप्रकारः। तहां अमावास्याके प्रथम महरमें जिस बालकका जन्म होय तो सिनीवाली शांति करनी चाहिये. और अमावास्याके २! ३।४।५।६ इन प्रहरीमें जन्म होय तो दर्शशांति करनी चाहिये और अमावास्याके ७८ प्रहरमें जो बालक उत्पन्न होय तो कुहूशांति करनी चाहिये, यहां अमावास्याके तीन भेद शांतिनिमित्त रहे हैं किसी २ आचार्यके मतमें सिनी- पाली कुहू ऐसे दो भेद कहे हैं। - झापाटीकासमेतम् । (२४९) नथ सिनीपालीजननफलम् । सिनीवालीप्रसूता स्याबस्य भार्या पशुस्तथा। गौरवी महिपी चैव शकस्यापि त्रियं हरेत् ॥७२॥ अर्थ-जिस मनुष्यकी औरत वा पशु गौ घोडी भैंस सिनीवाली अमावास्यामें प्रसूता होय तो उसके घरमें इंद्रकी रक्ष्मी होय तो भी हरण होजाय ॥ ७२ ॥ अथ सिनीवालीपशुजनने भेदमाइ । येच संति द्विजाश्चान्ये स्वासादोपजीविनः । वर्ज- येत्तानशेपास्तु पशुपशिमृगादिकान् ॥ ७३ ।। अर्थ-जो घरमें पशु पाले जाते हैं ये सिनीवालीमें प्रस्ता होय तो दोषी होते हैं, जो पक्षी वा पशु अपने बलते उपजी- वन करते हैं अर्थात जंगली मृगादिक पक्षी वगैरह हैं इनको छोड करके अन्य कोई प्रसूता होय तो उसकी शांति जरूर करना चाहिये । ७३ ॥ अथ कुहूप्रसूतीफलम् । कुहप्रसूतिरत्यर्थं सर्वदोपकरी मता। यस्य प्रसूतिरेतेपा तस्यायुर्घननाशिनी ॥ ७ ॥ अर्थ-जिस मनुष्यके घरमें कुछमें बालक पैदा होय यह सर्वमकारके दोप करनेवाली होती है और वह बालक माता- पिताकी आयु और धनका नाश करता है ॥ ७४ ॥ अय कुहसिनीवालीदर्शशांतिगाह ! नारी विना विशेपेण परित्यागो विधीयते । त्यागाशक्तः परां शांति कुन्नित्त्या विचक्षणः ७५॥

(२४८) खीजातकम् । तत्तव्याहृतिपूर्वेश्च तत्तन्मत्रः प्रपूजयेत् । यंबकेन मंत्रण प्रधानप्रतिमां यजेत् ॥ ६९ ॥ उत्सुर्य इति मंत्रेण सोमपूजा समाचरेत् । आप्यायस्वेति मंत्रेण सोमपूजा समाचरेत् ।। ७० ॥ तवाष्टोत्तरसाहस्रमष्टोत्तरशतं च वा। अष्टाविंशतिसंख्याकं जपं सर्वत्र सौरजम् ॥ ७ ॥ अर्थ-इस प्रकार व्यतीपातकी और संक्रांतिजननकी शांति करना चाहिये सूर्यको अधिदेव चंद्रमाको प्रत्यधिदैव करके ॥ ६८ ॥ तिन तिन पूर्वक ही व्याहृतियों करक तिन्हीके मंत्रोंसे पूजन करे, व्यंबक मंत्र करके प्रधान देव- ताकी प्रतिमाका यजन करे ॥ ६९॥ (उत्सूर्य) इस मन्त्र दरके सूर्यकी पूजा करै (आप्यायस्वेति ) मंत्र करके चंद्र- माका पूजन करे ॥ ७० ॥ तिसके बाद एक हनार आठ मंत्र अथवा एकसौ आठ वा अहाईस मंत्रका जप, सब जगह सौरज रीति करनी चाहिये ॥ ७१ ॥ अथ कुहसिनीवालीदर्शनकारः। तहां अमावास्याके प्रथम महरमें जिस बालकका जन्म होय तो सिनीवाली शांति करनी चाहिये. और अमावास्याके २॥ ३।४।५।६ इन प्रहरोंमें जन्म होय तो दर्शशांति करनी चाहिये और अमावास्याके १८ प्रहरमें जो बालक उत्पन्न होय तो कुहूशांति करनी चाहिये, यहां अमावास्याके तीन द शांतिनिमित्त कहे हैं किसी २ आचार्यके मतमें सिनी- वाली कुहू ऐसे दो भेद कहे हैं।

जापाटीकासमेतम् । (२४९) अथ सिनीवालीजननफलम् । सिनीवालीप्रसूता स्याधस्य भार्या पशुस्तथा। गोरश्वी महिपी चैव शकस्यापि श्रियं हरेत् ॥७२।। अर्थ-जिस मनुष्यकी औरत वा पशु गौ घोडी भैंस सिनीवाली अमावास्यामें प्रसूता होय तो उसके घरमें इंद्रकी रक्ष्मी होय तो भी हरण होजाय ॥ ७२ ॥ अब सिनीवालीपशुजनने भेदमाह । येच संति द्विजाचान्ये स्वप्रसादोपजीविनः । वर्ज- येत्तानशेपास्तु पशुपक्षिमृगादिकान् ॥ ७३ ।। अर्थ-जो घरमें पशु पाले जाते हैं ये सिनीवालीमें प्रसूता होय तो दोषी होते हैं, जो पक्षी वा पशु अपने पलते उपजी- चन करते हैं अर्थात् जंगली मृगादिक पक्षी वगैरह हैं इनको छोड करके अन्य कोई प्रसूता होय तो उसकी शांति जरूर करना चाहिये । ७३ ॥ अथ कुहूप्रसूतीफलम् । कुहप्रसूतिरत्यथै सर्वदोपकरी मता। यस्य प्रसूतिरेतेपो तस्यायुर्घननाशिनी ।। ७४ ॥ अर्थ-जिस मनुष्यके घरमें कुहमें बालक पैदा होय वह सर्वमकारके दोप करनेवाली होती है और वह बालक माता- पिनाकी आयु और धनका नाश करता है ॥ ७४ ॥ अय कुहसिनीवालीदर्शशांतिगाह ! नारी विना विशेपेण परित्यागो विधीयते । त्यागाशक्तः परां शांति कुर्याद्रतया विचक्षणः ७५||

(२५०) स्त्रीजातकम् ।
प्रतिमां कारयेच्छंभोश्चतुर्भुजसमन्विताम् ।
त्रिशूलखगवरदाभयहस्तां यथाक्रमात् ॥ ७६ ॥
श्वेतवर्णी श्वेतपुष्पा श्वेतांबरवृपस्थिताम् ।
त्रयंबकेन मंत्रेण पूजां कुर्याद्यथाविधि ॥ ७७ ॥
अर्थ-जो नारी कुहू सिनीवाली दर्शमें प्रसूता होय उसका
परित्याग करना मुख्य है और जो परित्याग करने की शक्ति
न होय तो विचक्षण शक्तिकरके शांति करे ॥ ७५ ॥ शिव-
जीकी प्रतिमा बनावे उसको चारभुजाओंकरके युक्तकरे
त्रिशूल खड्ग वरद अनय ये हैं हाथों में जिनके ॥ ७६ ॥
खेत है वर्ण जिनका श्वेत पुष्पोंकी माला धारण किये, सफेद
वस्त्र बैलपर सवार व्ययक मंत्रकरके सर्वशास्त्रानुसार विधिक-
रके शिवका पूजन करै ॥ ७७ ॥
अथ इंद्रपूजनमाह।
इंद्रश्चतुर्भुजो वज्रांकुशपाशससायकः ।
रक्तवर्णो गजारूढो यत इंद्रेति मंत्रतः ॥ ७८॥
अर्थ-चार भुजाओंको धारणकिये अंकुश पाश वाण हैं
हाथमें जिसके रक्त वर्ण हाथीपर सवार इस प्रकारके स्वरूपवान
इंद्रका (यत इंद्रेति) मंकरके पूजन करना चाहिये ॥७८॥
अथ पितृपूजनमाह ।
पितरः कृष्णवर्णाश्च रतुईस्ता विमानगाः।
घडक्षिसूत्रकमंडल्वभयानां च धारिणः ॥ ७९ ॥
भर्य-श्यामवर्ण चारहाथ विमानपर सवार छः नेत्र सूत्र
मंडलु धारणा किये इस प्रकारके पितर देवताओंका पूजन
चाहिये ॥ ७९ ॥

(२५१)
भाषाकासमेतम् ।
अथ पूजनप्रकारमाह।
ये सत्या इति मंत्रेण पूजां कुर्यादनंतरम् ।
कलशस्यापनं होमं कृत्वा पूजादिपूर्ववत् ।। ८० ॥
समिदाज्यचरोहोमं तिलमान सप्पैः ।
अश्वत्थप्लक्षपालाशसमिद्भिः खादिरैः शुभैः।। ८१ ।।
अष्टोत्तरशतं मुख्यं प्रत्येकं जुहुयाद् बुधः ।
यंबकेन मंत्रेण तिलान्ध्याहृतिभिर्खनेत् ।। ८२ ।।
शंकरस्याभिषेकं च कुर्यात्पूर्वानुसारतः ।
अन्यत्सर्वामिषेकं तु कुर्यादाज्यावलोकनम् ॥८३॥
अर्थ-(ये सत्या) इस मंत्रसे पूजनकर तिसके बाद कल-
शका स्थापन कर हवन करे पहिलेकीतरह पूजन करे ॥८॥
समिध घृत चरु करके तिल उर्द सरसों करके हवन करे
पीपल, पाकड, ढाककी समिध करके खैरकी शुन्न समिध
करके ॥ ८१ ॥ एकसौ आठ आहुति हरएकका हवन पंडित
करे (त्र्यंबक ) मंत्रकरके तिलोंका वेदकी व्याहृतियोंकरके
हवन करे ॥ ८२ ॥ पहिले माफिक शिवजीका अभिषेक कर
और सबोंका अभिषेक कर फिर घृतावलोकन करे ॥ ८३ .
अय दर्शशांतिरुच्यते।
अयातोदर्शजातानां मातापित्रोदरिद्रता।
तद्दोपपरिहारार्थ शांति वक्ष्यामि नारद ॥ ८४ ॥
न्यग्रोधोदुंबरावत्याः सत्ता निवकारतया।
एतेषां किल मूलानि त्वगादीपलवांस्तथा ॥ ५ ॥

. .(२५२) खीजातकम् । पंचरत्नानि निक्षिप्य वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत् । सर्वे समुन्द्र इति चाऽऽपोहिष्टादिन्यूचेन च ।। ८६ ॥ थअ-इसके अनंतर दर्शअमामें उत्पन्नहुए मनुष्य माता पिताको दरिद्रता करते हैं जिसके दोष दूर करनेके लिये मैं शांति कहता हूं ॥ ८४ ॥ संकल्पकरके कलशस्थापनकर कलशमें बट, पीपल, गूलर आम्र, पाकड इनके पत्ते और जड और छाल । ८५ ॥ पंचरत्नको कलशमें डालकर दो कम्पोंसे वेष्टनकर ( सर्व समुद्राः ) इस ऋचा करके (आपोहि छादि) ऋचाओंकरके घटको अभिमंत्रित पूर्वक अग्निको. णम स्थापन करे ॥ ८६॥ अथ दर्शदेवतास्वरूपम् । दर्शल्य देवतायाश्च सोमसूर्यस्वरूपजाम् । प्रतिमा स्वर्णजां नित्यं राजती ताम्रजां तथा-॥८७॥ आप्यायस्वोति मंत्रण प्रविता पश्चात्तमेव च । उपचारः समाराध्य ततो होमं समाचरेद ॥ ८८॥ समिधश्च चरुंगव्यं कमेण जुहुयाग्रहीं। हुनेत्सवितृमण सोमो धेनुश्यमंत्रतः ॥ ८९ ॥ अर्थ-दर्शअमाका देवता चंद्रमासूर्यके स्वरूपसे पैदाहुआ • प्रतिमा सोनेकी बनावे अथवा चांदी या तावकी बनावे॥८॥ आप्पायस्वेति ) मंत्रकरके सूर्यका पोछेसे पोडशोपचार रके पूजनकर पीछेसे हवन करे । ८८॥ समिध और रुद्रव्य करके क्रमते यजमान हवन करे ( सवितृमंत्रकरके) मन्त्रसे ॥ ८९ ॥ निज बाह्मणों को भोजन कराकर स्वस्तिवाचन करे ॥ ९१ ॥ उसकाछः प्रकारके फल जानना चतुर्दशी तिथिके छः जाग भापाटीकासमेतम् । (२५३) अष्टोत्तरशतं वापि अयाविंशतिसंख्यया । अभिषकादिकं कार्य पूर्वरीत्या द्विजोत्तमैः ॥ ९० ॥ हिरण्यं राजतं चैव कृष्णा धेनुश्च दक्षिणा । ब्राह्मणान्भोजयेत्तवकारयेत्स्वस्तिवाचनम् ॥९१ ॥ अर्थ-एकसौ आठ अथवा अढाईस संख्या करके आ- हुतिदेय पहिले माफिक अभिपकादिकार्य पंडितजन करै ।। ॥ ९० ॥ सोने वा चांदीकी श्यामा धेनु दक्षिणासहित देकर , अथ कृष्णचतुर्दशीजननशांतिः। कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां प्रसूतः पविषं फलम् । चतुर्दशी चपड्भागां कुर्यादादो शुभं फलम् ॥१२॥ द्वितीये पितरं क्षति तृतीये मातरं तथा। चतुर्थे मातुलं इति पंचमे बंशनाशनम् ॥ ९३ ।। षष्ठेतु धनहानिः स्यादात्मनो नाशकारकः । तस्मात्सर्वप्रयलेन शांतिं कुर्यादिधानतः ॥ ९४H अर्य-जो बालक कृष्णपक्षको चतुर्दशीमें उत्पन्न होय है देशदश घटीके करे आदिके भागमें पैदाई कन्या शुन्न होती । १२ । दूसरे भागमें पिताका नाश करे, तीसरे नागमें माताका नाश करे, चतुर्थ भागमें मातुलका नाश करे, पंचम मागमें वंशनाश करती है ॥ ९३ ॥ छठे भागमें धनहानि करे और आत्माका नाश करे, ऐसे योगमें उत्पन्न वाटर निजकुलको फल करते हैं, करपा श्वशुरकुलको फल करती है तितते सब यलोंसे शांति विधानते करनी चाहिये ॥ ९॥ १ (२९) वीजातकम् । अब विशेषमाह-वसिष्ठः। पित्रोच जन्मनक्षने जातस्तु पितृमातृहा । जन्मक्षाशे च तल्लो जातः खद्यो मृतिप्रदः ।।१०५|| अर्थ-माता पिताके जन्मनक्षत्रमें पैरा हुआ बालक माता पिताको हनन करता है, जन्मकी राशि तथा लग्नमें पैदा हुआ बालक शीघंही मृत्यु देता है ॥ १०५ ॥ अथ मातृपितृभे कन्याजन्मनिपेध- माह-देवकीर्तिः। थोकस्मिन्धिष्ण्ये जाता दुहितरोऽथवा पुत्राः ।। पिनोरंतकरा स्युर्यधपरे प्रीतिरतुला स्यात् ।।१०६॥ अर्थ-पिताके नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ पुत्र अथवा कन्या पिताका नाश करते हैं अन्यके नक्षत्रमें उत्पन्न होय तो बहुत प्रीति षडाते हैं ।१०६ ॥ तथा च भगवान् गार्गिः । यस्यैव जन्मनक्षत्रे भ्राता जायेत वा सुतः सजातोवाऽत्मनो भ्रातुः पितुःप्राणान्होदुषम् ।।१०७॥ अर्थ-जो बालक जिसके नक्षत्रमें पैदा होय भाई या बहन होय वह बालक अपना या दूसरेके प्राणोंको अवश्य नाश करता है । १०७॥ अथ शांतिविधानमाह । तत्र शांति प्रवक्ष्यामि साचार्यमतेन तु । अग्रीशानभागे तु नक्षत्रप्रतिमां ततः ॥ १०८॥ तन्नक्षत्रोक्तमार्गेण चायेत्यालशोपरि ।

भाषाटीकासमेतम् । रक्तवस्त्रेण संगद्य वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत् ॥ १०९ ॥ स्वस्वशाखोक्तमार्गेण कुर्यादग्निमुखं तथा । अनेनैव तु मंत्रेण हुनेदष्टोत्तरं शतम् ॥ १० ॥ प्रत्येक समिधः साज्यः प्रायश्चित्तान्तमेव च । अभिषेकं ततः पित्रोः कुर्यादाचार्य एव च ॥११॥ वस्त्रालंकारगोदानराचार्य पूजयेत्ततः । ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यान्मापमानं सुवर्णकम् ११२॥ देवताप्रतिमादानं धान्यवस्त्रादिभिः सह । पानशय्यासनादीनि दद्यादोपप्रशांतये ॥ ११३ ॥ भोजयेद्राह्मणान्सर्वान्वित्तशाठ्याविवर्जितः ॥११॥ अर्थ-तिसके बाद शांति कहता हूँ। सब आचार्योंके मत करके आमेय वा ईशान मागेम नक्षत्रकी प्रतिमा स्थापन करे ॥ १०८ उसी नक्षत्र के अनुसार प्रतिमाको कलशके ऊपर पूजन करे टाल वस्त्र करके आच्छादित कर दो पत्रोंकरके पेटेन करे ॥१०९॥ अपनी अपनी शाखाके अनुसार भगिमुस होकर पूजन करें इन मंत्रों करके अष्टोत्तरशत होम करे ॥३१०॥ हर एककी समिधे घृतसहित हवन करे, प्रायश्चित्त के मंचमें आचा- र्य पिता माताका अभिषेक करे ॥ १११ पत्र अलंकार मोदान कर भाचार्यकी पूजन करे, ऋत्विक बामणोंको दक्षिणा वीन तीन मासे सुवर्ण देव ॥११२॥ नक्षत्रदेवताकी मतिमाका सन धान्य वनानिहित करे पान शप्पा आमन भादिदान कर (१८) स्त्रीजातकम् । और भोजनका दान दोपकी शांतिके लिये करे ॥ ३१३ ॥ पीछे सब ब्राह्मणोंको भोजन करावे वित्तसे ज्यादे नहीं॥११४॥ अथ त्रीतरशातिरुच्यते । सुतत्रये सुता चेत्स्यात्तत्रये वा सुतो यदि । मातापित्रोः कुलस्यापि तदारिष्टं महद्भवेत् ॥११॥ जातस्यैकादशाहे वा द्वादशाहे शुभे दिने । आचार्यमृत्विजो वृत्वा ग्रहयज्ञपुरःसरम् ॥ ११६ ॥ ब्रह्माविष्णुमहशेंद्रप्रतिमाः स्वर्णनिर्मिताः। पूजयेदान्यराशस्याः कलशोपरि भक्तितः ॥११७॥ पंचमे कलशे रुद्रं जपेत्तद्रुद्रसंख्यया। रुद्रसूक्तानि चत्वारि शांतिमुक्तानि सर्वशः॥१८॥ द्विज एको जपेरोमकाले शुचिसमाहितः । भाचार्यो जुहुयादव समिदाज्य तिलांबरुम्॥११९॥ अष्टोत्तरसहस्र वा शतं वा विंशतिस्तु वा । देवताभ्यश्चतुर्वकादिभ्यो ग्रहपुरःपरम् । कात्याज्यवीक्षणं कृत्वा शेपं पूर्ववदाचरेत् ॥१२०॥ अर्थ-जिस मनुष्य के तीन पुत्र होने के बाद चौथी कन्या नापाटीकासमेतम् । (२५९) वकी सुवर्ण की प्रतिमा बनाकर अन्नकी देरीके ऊपर कलश स्थापन कर उसपर मूर्तिदेवताओंकी स्थापना कर अपनी भक्ति करके पूजन करे ॥ ११७ ॥ पांचवें कलशपर शिवजीको स्थापन कर ग्यारह हजार जप करके. रुद्रसूक्त करके चारों देवताओंकी शांतिसूक्तमे पूजन करे ॥ ११८ ॥ होमकालमें एक ब्राह्मण पवित्र होकर आचार्य हवन करे समिध और घृततिलके चरु करके एक हजार और आठ आहुति देय अथवा एकसौ आठ आहुति देय वा अठाईस आहुति देवे ब्रह्माको आदि लेकर चार देवताओंका पूजन कर ग्रहयज्ञ पहिले करके कांसीके पात्रमें घृत नरके उसमें मुख देख कर दानकरे और सब पूजन पहिले जो विधि कहिभाये उसकी माफिक करे ॥ ११९ ॥ १२० ॥ अथ प्रसवाधिकारमुच्यते । हीनकालेऽधिने काले प्रसवे सति योपिताम् । असंख्यदिवते युग्मे प्रसवे चापि नाशनम् ॥१२॥ अमानुपाणि चांडानि जायन्तेऽन्यांइनानि च । होनांगाश्चाधिकाङ्गाश्च अनंगाः संभवति या । विशिरोद्वित्रिशिरसो विमुखाः पशिसंनिभाः ॥१२२॥ अर्थ-जिस मनुष्यको खी थोडे कालमें अथवा ज्यादै कासमें संतान पैदा करे अथया असरस्य दिनान संतान उत्पन्न भया प्रसव नाश करे ॥ १२१ । मनुप्यके विना और - उत्सन्न करे अंडेकी या पक्षियों की उत्सनि करे हौनांग वा (२६०) योजातकम् । आधिकांग वा अंगहीन संतान पैदा करै । शिरहीन वा दो तीन शिरकी मुख हीन वा पक्षिसहश संतान उत्पन्न करे ॥१२२ ॥ अथ प्रसवविकारफलम्। विनाशं तस्य देशप कुलस्य च विनिर्दिशेत् । मासत्रयांतरे नूनं परचनागमं वदेत् ॥ १२३ ॥ अर्थ-जिस देशमें इस प्रकारकी संतान उत्पन्न होय तो उस देशका नाश करे और जिस कुलमें उत्पन्न होय उस कुलका नाश करे तीन महीने के भीतर पराई फौजका उस देशमें आगम होय ॥१२३॥ अन्यप्रसवविकारमाह । अप्राप्ते वयसि चूणो द्विचनुष्पात्रिपादपि । अत्युच्चान्विनतांश्चापि संतानं प्रसवेद्यदि ॥ १२॥ विमुखान्पक्षिणशास्तथाईपुरुषांश्च वा । बडवा हस्तिनी गां वा यदि पुत्र प्रसूयते ॥ विमुखां विकृतां वापि पड़ामसिस्त्रिपक्षकः॥१२५॥ अर्थ-जिस सीकी उमर गर्न लायक न हो और उसके गर्भ स्थित होजाय, द्विपाद वा चतुष्पाद वा त्रिपाद संतान उत्पन्न करे अत्यन्त ऊंची व अत्यन्तनांची इस प्रकारकी संतान पैदा करे ॥ १२४॥ मुखहीन वा पक्षिसश अथवा आधापुरुष आधा और घोडा हस्तिनी गौके आकार समान अथवा दो संतान पैदा कर इस प्रकारको संतान जहां पैदा होय तो मनुष्य- • देश छः मास वा तीन पक्षमें करदेती है ।। १२५ ॥

भाषाटीकासमेतम् । (२६) अथ प्रसवविकारशांतिरुच्यते । (यक्तव्याः परदेशेषु भार्यास्ताः स्वहितार्थिना। त्यवत्वा दिवानिशं होमं पूर्वोक्तं कारयेज्जपम्।। १२६॥ प्राजापत्येन मंत्रेण समिदाज्यं चरुंक्रमात् । द्विजान्संतपंवेदन्नेहशांतिं च कारयेत् ॥ १२७ ॥ हुत्वा च तर्पयेद्विद्वान्वहुस्वर्णसुभोजनः । एवं यः कुरुते सम्यक् तस्मादोपात्प्रमुच्यते ।।१२८॥ अर्थ-बुद्धिमानको चाहिये ऐसी विकत संतान उत्पन्न कर- नेवाली स्त्रीको परदेशमें त्याग दे अर्थात् भेज दे जो अपने हितको चाहना होय तो त्यागकरनेके उपरांत दिनरात होमकर और पूर्वोक्त जप करवावे॥१२६॥प्राजापत्य मंत्र करके समिध घृतका चरसे कम करके हवन करे, ब्राह्मणोंको अरडे अन्न जोजन कराके तृमि करै ग्रहोंकी शांति करै ।। १२७ ॥ हवन करनेके बाद पंडितों को बहुतसा सोना और अच्छे भोजन देकर प्रसन्न करे ऐती विधिसे जो मलेप्रकार करे तो तिस दोपसे छूट नाय फिर स्त्रीको ग्रहण करै ॥ १२८॥ अथ सूर्यचन्द्रग्रहणसमयजननशांतिः । ग्रहणेचंद्रसूर्यस्य प्रसुतिर्यदि जायते। व्याधिपीडा तयास्त्रीणामादौ तु ऋतुदर्शनाव:२९॥ शांति तास प्रवक्ष्यामि नराणां हितकाम्यया। यस्मिन्नृक्षे विशेपेग ग्रहणं संपजायते ।। १२० ॥ तहशाधिपते रूपं सुवर्णेन प्रकल्सपेत् ।

(२६२) स्त्रीजातकम् । यथाशत्पनुसारेण वित्तशाव्यं न कारयेत् ॥१३१॥ सुर्यग्रहे सूर्यरूपं सुवर्णेन स्वशक्तितः । चांद चंद्रग्रहे धीमान रजतेन विशेपतः ॥ १३२ ॥ अर्थ-जिस बालककी उत्पत्ति सूर्य चन्द्रग्रहणके समय होय नो व्याधिपीडाको करते हैं अथवा ग्रहणसमयमें आदि ऋतु ग्रीका होय तो जीको बडी पीडादायक जानो ॥ १२९ ॥ तिसकी शांति मैं कहताहूं, मनुष्योंके हितके लिये जिस नक्ष- में विशेप करके ग्रहण होय ॥ १३० ॥ उस नक्षत्रके अधि- पतिकी मूर्ति सुवर्णकी बनाये अपनी शक्ति के अनुसार वित्तसे ज्यादे नहीं बनाना ॥ १३१ ॥ सूर्यग्रहणमें सूर्यका स्वरूप सुवर्णका बनाये और चंद्रग्रहणमें चंद्रमाका स्वरूप चांदीका बनावे विशेषकरके ॥ १३२॥ राहुरूपं प्रकुति मागेनैव विचक्षणः । शुचौ देशे प्रयत्नेन गोमयेन प्रलेपयेत् ॥ १३३ ॥ तरयोपरि न्यधान्यानस्वस्त्रं सुशोभनम् । त्रयाणां चैव रूपाणां स्थानं तत्र तु कारयेत् ।।१३४ रक्तामतान् रक्तगंधं रक्तपुष्पांवराणि च । सूर्यग्रहे प्रदातव्यं सूर्यप्रीतिकरं च यत् ।। १३९ ।। श्वेतवस्त्रं श्वेतमाल्पं श्वेतगंधासतादिकम् । चंद्रग्रहे प्रदातव्यं चंद्रप्रीतिकरं च यत् ॥ १३६ ॥ अर्थ-राहुका रूप बनाये सीसेका, नाग बनावे पवित्र .९ यत्न करके गौके गोबरसे लेपन करे ॥ १३ ॥ उसके - भाषाटीकासमेतम् । (२६३) उपर अन्नोंकी ढेरी लगावे, नया कपडा शोभायमान तीनों रूपोंको तीन जगह स्थानमें स्थापन करे ॥ १३४ ॥ लाल अक्षत लाल गंध लाल पुष्पादिकोंकरके सूर्यग्रहका दान करे सूर्यको प्रतिके लिये ॥ १३५ ॥ सफेद कपडा सफेद पुष्योंकी माला सफेद गंध अक्षतों करके चंद्रमाका दान देय चंद्रमाको प्रीतिके लिये ॥ १३६ ।। राहवे चैव दातव्यं कृष्णपुष्पांवरादिकम् । दयानक्षत्रनाथाय श्वेतगंधानुलेपनम् ॥ १३७॥ सूर्य संपूजयेद्धीमानाकृष्णेनेतिमंवतः । चंद्रप्रपालाशैः समिद्भिर्जुहुयानरः ॥ १३८ ॥ दूर्वाभिर्जुहुयादीमाबाहोः संप्रीणनाय च । समिद्भिर्ब्रह्मवृक्षोत्थभैशाय जुहुयात्ततः ॥ १३९ ॥ पंचगव्यः पंचरत्नेः पंचत्वपंचपल्लवैः । जलेरोपधिकल्कैश्च सहितः कलशोदकः॥ १४॥ अर्थ-राहुबहके अर्थ काले पुप्प श्याम वनादिकों करके पूजन करना चाहिये और जिस नक्षत्रमें ग्रहण हो उस नक्षत्रके स्वामीके लिये सफेद गंध लेपन वनादि करके पूजन करे ॥ १३७ में सूर्यका पूजन बुद्धिमान (आकृष्णेति ) मंत्र करके करे । चंद्रमा के लिये आक और टाककी समिधा करके हवन करे ॥ १३८ ॥ और राहु ग्रहके अर्थ बुद्धि- मान दर्शकरके हवन करे और नक्षत्राधिपति के लिये पीपलको

(२६४) स्त्रीजातकम् ।
समियों करके हवन करै । १३९ ॥ पंचगव्य पंचरल पंच-
वल्लव तीर्थजल सपिधि कुम्भमें डालकर पूजन करे ।।१४०॥
अभिषेकं प्रकुर्वीत यजमाने च यत्नतः ।
मवारुणदेवत्यैरापोहिष्ठादिभित्रिभिः ॥ १४१ ॥
इमं मे गंगे पितरस्तत्वायामीति मंत्रक ।
अभिपके निवृत्ते तु यजमानः समाहितः ॥१४२॥
आचार्य पूजयेत्पश्चात्सुशांतो विजितेंद्रियः ।
तस्मै दद्यात्प्रयत्नेन भक्त्या प्रतिकृतित्रयम् ॥१४३
दक्षिणाभिश्च संयुक्तमात्मशक्त्यानुसारतः।
ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥१४॥
अर्थ-यजमानको यत्न करके अभिषेक करे वरुणदेवता-
ओंके मंत्र करके [आपोहिता] दिनीन मंत्रोकरके १४१॥
[ इसमे गंगे पितरस्तत्त्वायामि] मंत्रकरके अभिपेकसे निवृत्त
होनेके बाद यजमान भले प्रकार ॥ १४२ ॥ आचार्यका
पूजन करे शांतस्वभाव जितेंद्रिय हो यजमान आचार्यके अर्थ
यत्न करके भनि करके तीनों मूर्ति देवे । १४३ ॥ दक्षिणा
करके संयुक्त अपनी शक्त्पनुसार ब्राह्मणों को भोजन करावे
फिर दंडवत् करके विसर्जन करे ॥ १४४ ॥
तेभ्यश्च दक्षिणां दद्याद्यजमानः समाहितः।
अनेन विधिनाशांति कृत्वा सम्यग्विशेषतः।।१४९॥
अकालमृत्युशोकं च व्याधिपीडां न चामुयात् ।
सौख्यं सोमन नित्यं सौभाग्यं लभते नरः॥१६॥

गीय रामगङ्गाके उचर किनारे गोविराम है नाम जिनका भापार्टीकासमेतम् । (२६५) इत्थं ग्रहणजातानां सर्वारिष्टविनाशनम् । कथितंभार्गवेणेदं शौनकाय महात्मने ॥१७॥ इति श्रीभृगुप्रणीते स्त्रीजातके ग्रहणजननशांतिवर्णन नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७ ॥ अर्य-तिन ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर यजमान सावधान होकर इस विधि करके जले प्रकार शांति करै ।। १४५ ॥ उसको अकालमृत्यु शोक व्याधि पीडा नहीं होती है उसके मनमें सौख्य नित्यही सौनाग्य लाभ होता है ॥ १४६ ॥ इस प्रकार ग्रहणमें उत्पन्न हुए मनुष्योंका सर्वारिष्ट निशरण करनेको शौनक महात्माके आगे शुक्रगीने वर्णन करा है ॥ १४७ ॥ इति श्रीवंशवरेलिकन्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवमसादात्मज राज- ज्योतिपिकपण्डित श्यामलालकतायां श्यामसुंदरी भापाटीकायां ग्रहणजननशांतिवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ अय वंशाध्यायप्रारंभः। रम्येवंशवरेलिकाख्यनगरे ज्योतिर्विदामग्रणीश्चा- सीद्रामनदीसदुत्तरतटे गोविंदरामाभिधः ॥ तस्मा- त्यापजनिमहेशचरभोजक गः शुचित्तंत्रा- म्भनिधिपारगः खलुघनश्यामाभिधापडितः॥१॥ अर्थ-रमणीक वाँसबरेलीनाम नगरमें ज्योतिर्विदोंमें अब

(२६६) स्त्रीजातकम् ।
तिन करके प्राप्त हुई है उत्पत्ति जिनकी शिवजीके चरणकमलके
भमर अतिपवित्र तंत्रशास्त्र समुद्ररूपके पार जानेवाले निश्चय
करके घनश्याम नाग पंडित हुए॥१२
तत्पुत्रो बलदेव उत्सवरतः सद्भक्तिभावोऽभवत् ।
सुनुस्तस्य महीपपृजितपदःश्रीश्यामलालाभिधः ॥
देवज्ञोऽभिमतः सता रचयिता ग्रंथान्सुटीकायुतान् ।
सोय स्त्रीप्रणयेन जातकामिद पंतु प्रवृत्तोऽभवत् ॥२॥
अर्थ--तिनके पुत्र बलदेव प्रसाद श्रीकृष्णके उत्सवोंमें तसर
अच्छी भक्ति भाववाले होते हुए पुत्र जिनका राजाओंकरके
पूजित हैं चरण जिसके श्यामलालज्योतिपिक सत्पुरुषाका
मारा टीकामहित ग्रंथोंका रचनेवाला सो श्यामलाल स्त्रीके
प्यार करके यह सीजातक करनेको प्रवृत्त होता हुआ ॥ २ ॥
स्त्रीजातकमखिलमिदं भूधरभूताङ्गभूमिते पै ।
जातंकृष्णकृपातश्चरेकृष्णे दले द्वितीयायाम् ।। ३ ।।
असमंजप्तमिह विबुधजीतं यन्मन्मतेदापात् ।
रोपात्तन्त्र विरोध्यं शोध्य बोध्यं क्षमासारः ॥ ४ ॥
इति श्रीवंशक्रेलिकस्थगोडवंशावतंसश्रीवलदेवप्रसा-
दात्मजराजज्योतिपिकपण्डितश्यामलालविर-
चिते स्त्रीजातके स्ववंशवर्णनं नामा-
टादशोऽध्यायः ॥ १८॥

লোশীকান্ত। (२६७) अर्थ-यह खोजातक सम्पूर्ण भूधर ७ भूत् ५ अंक ९ भूमिते १ अर्थात् १९५७ के वैक्रमीय संवतमें श्रीकृष्णकी कराते पूरा हुआ चैत्रमास कृष्णपक्ष द्वितीयाको ॥ ३॥ है विद्वानो । जो मेरी मति करके अशुद्धता होय उसपर शोध न करना क्षमा करके शोधना और शिष्योंका समज्ञाना ॥ १.. इति श्रीवंशवलिकस्थगोड-शावतंसश्रीबलदेवमंसादात्म- जराजज्योतिषिकपण्डितश्यामलालकतापां श्याम- सुंदरीनापाटीकायां वंशवर्णनं नामाटा- दशोऽध्यायः ॥ १८॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, मराज श्रीकृष्णदास, “समीकटेश्वर स्टीम प्रेस "विटेश्वर स्टीम प्रेस त्याण-मुंबई खेतवाडी-मुंबई दमौवेंकटे घर " स्टीमू-यन्त्रालयको परमोप- योगी स्वस्छ शुद्ध और सस्ती पुस्तकें । यह पेष आन ३०४० वर्षसे भाधक हुआ मारतव. में प्रसिद्ध है कि इस यन्मालयकी पोटा पुस्तकें सकी- तम और सुन्दर प्रतीत तथा प्रामाणित हुई है सो इस पम्मायम प्रत्येक विषयको पुस्तके जैसे मेदिक, वेदान्त, पुराण, धर्मशास्त्र, न्याय, मीमांसा, छन्द,ज्योतिष, काव्य, मलकार, पम्भू, नाटक, कोप देयका साम्मधु यत तथा तोत्रादि संस्कृत और हिन्दी भाषा के प्रत्येक नातापर विनीक अर्थतेपारहो है। शुद्धता स्वच्छता तथा कांग- नकी चत्तमता और जिल्दको बंधाई देशभरमें विख्यात है। इतनी उत्तमता होनेपरमी दाम बहुतही सस्ते रखे गये हैं और कमीशनभी पृथक काट दियाजाता है। ऐसा ।। सरयता पाठयोंको मिलना असंभव है सावृत तथा हिन्दीके रसिकोंको अवश्य अपनी २ भावश्यकतानुसार पुस्तकों के भगाने में चादन करना चाहिये, ऐसा उत्तम, सस्ता और शुद्ध माल दूसरी जगह मिळंता असम्भल है सूचीपत्र भगा देखो। पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्स, कल्याण-मुंबई

३६४
॥ सुश्रुतः।
[अध्याय ३७
रते गुहस्य रचाथै कृत्तिकामानिनिभिः।
सृष्टाः परवनस्यस्य रचितस्यात्मतेजमा ।।
स्वीविग्रहा ग्रहा ये तु नानारूपा मयरिताः।।
गङ्गोमाकृत्तिकानाञ्च ते भागा राजसा मताः ॥
नैगमेषस्तु पावत्या सृष्टा मेपानना ग्रहः ।
कुमारधारी देवस्थ गुहस्यात्मसमः मखा।
स्कन्दापस्मारसंज्ञा या मोऽमिनानिसमधूतिः ।
सच स्कन्दसखा नाम विशाख इतिच्यते॥
स्कन्द सृष्टा भगवता देवेन त्रिपुरोरिणा।
विभर्ति चापरा संज्ञां कुमार ति म ग्रहः ॥
बाललीलाधरो योऽयं देवो रुद्राग्निसम्भवः ।
मिथ्याचारपु भगवान् खयं नेप प्रवर्तते ।
कुमारः स्कन्दसामायादव केचिदपण्डिताः ।
ग्रहातीत्यल्पविज्ञाना ब्रुवते देवचिन्तकाः ।।
ततो भगवति स्वन्दे मुरमेनापती कृते ।
उपतस्युर्यहा: मध्ये दीप्तशक्तिधरं गुई।
ऊंचा प्राबलययनं वृत्ति न. संविधत्व वै।
तेषामयं ततः स्कन्दः भिवं देवमचादयत्।
ततो ग्रहास्ता नुवाच भगवान् भगनेत्रहत्।
तिर्यग्यानि मानुषञ्च दैवच्च वितयं जगत्।।
परस्परोपकारण बनतेधार्यतेऽपि च।

.
अध्याय ३७।]. ॥ उत्तरतन्त्र ।
३८५
देवा मनुय्यान प्रीणन्ति तैयग्यानीस्तथैव च ॥
वर्तमानैर्यथा कालं शीतवर्षोषणमारतः।'.
ज्याचलिनमस्कारजपदामजतादिभिः
नरामन्यक् प्रयुतश्चमीणन्ति त्रिदिवेश्वरान्।
भागधेयं विभक्तञ्च शेषं किञ्चिन्न विद्यते ॥
नाभाया उंभा वृत्तिालेवेव भविष्यति ।
कुलेषु येषु नेज्यन्ते देवाः पितर एव च ॥
नाहाका माधवश्व गुरवोऽतिथयस्तथा
ग्टहेषु नेषु ये बालास्तानग्टही ध्वममशिनात
तब वो विपुला दृत्तिः पूजा व भविष्यति।
एवं ग्रहाः समुत्पन्ना बाँचान रहन्ति चाप्यत:
ग्रहोपरया बालास दुश्चिकित्यतमा.मता
वैकल्यं मरणं चार ध्रुव, स्कन्द ग्रह.मतं ।।
स्कन्दमहोऽस्युंगतमः मवैव्येय यतःस्मृतः ।
अन्योवा सर्वरूपस्तु, न साध्या-यई उच्यते॥

Shri Istrijatak Bhasatika

Author
Pandit,.syam Sundar
Title
Shri Istrijatak Bhasatika
File name
Shri Istrijatak Bhasatika
Text
OCR done
Citation
1846
Published
2012/02
Publisher
Bombay,.kalyan
Language
Sanskrit
Pages
301
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312449
Barcode
99999990321236.00
Scanning centre
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