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Rajasthani Vachnikaye
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गाण सिवदास पय खिरिया जगाल
राजस्थानी वचनिकाएं
[साहिरिया एवं मापा वैमानिक अध्ययन]
मासमशाह खाम
एम ए, रिसर्प स्मॉलर
हिन्दी विभाग
महाराणा भूपाल कमिग गपपुर (राबस्थाम)
इमिका
महारामकुमार ग रघुवीरसिंह
एम ", एल एल बी,रि लिन
प्रायराक
राजस्थान साहित्य अकादमी (सगम)
उदयपुर
प्रयम वार
मूल्य-४१०५ पैसे
सम् १६६४
भूमिका मई १t में पर पगस्तान रिपरिणामय में एम. ए. (मिमी) तर पीमा सिए मिसा नया भी प्रामम शाह वाम कापौरमोश 'एमापानी कोही पनिकाए' परीक्षणा मेरे पास मैगा तब मुझे न मनुमब इए । पीलियों में प्रवमान में यह कारण सा को पहिनी भाषा मापी वो नहीं कहा मा सस्ता है परन्तु पयस्मान के मुमतमान प्राय की मोसी ही प्रपितर बोलते-सिकते है । परस्मानी प्रपा मिर की मोर रनोंने कमी रिपेप प्यान नही रिया । इस कारस मासम भार मान से परमानी और सिंगम की पोर पो पापितहमा बदर श्व मौवामहमा । पपने सामी सा-संपारण 4. कापीयम पर्मा के सहयोग से सदिया गयां भी बानिया बानो नया संस्करण तयार मिा पपा पा उसको प्रामिए तप पार-पाच पदमी महाँ बीते ।मतः मह स्पर ना किसके प्रयापन के मरमप या पोष-मेल मिस लिमा पमा पा । पुमः मिस गाण त पसराम बीपी पनिका सभी प्रमाणित हामील कारणो से भी में इस पोमव को ध्यान पूर्वक पड़ने को सरसुक हो रहा । र एम.ए. (रतपर)ीमामा पी-ए.सी. मित्री निलिये पये मोका-एक पौल-ब सामने माए हैं, उनमें प्राप पाधुनिक साहित्य के हो किसी पीमित पासू विप का सम्मान होता है। गरि किसी ने कभी मध्यधामीय साहित्य को पोर मान दिया मो तो उप सोप मेख में पियक साहिपको कारी-ऊपरी जानकारी का मन अमितर रेसने को मिलता है। पतएव स धोरमेह में मम्मममीय पाहिम को रिपाठ के समकोण सम्पसन को मोर मेरा विप पान पापित होना सामाषिकहीना। सपनो पिस्तव प्रना मैं पनिका साहित्य के प्रारंभ मौर विकास की पृष्ठ- भूमि प्रस्तुत करते हुए पानम शाह नाम से प्रशानी पर प्रभवों पर नमी बिमितापों पर भी प्रकाप गया है। पुनः रिम की १६वी सरी में मिखी काम मित्रों का निवास कर इस मोप सेव में पासोधिरोनों मनिसार को अपनीम कश्मिा भी प्रस्तुत करते है। इस मोम-रोमार करने बिच मे हम दोनों मित्रों का साल पहप प्रधान किया है। निकायों में गणित पटनामा पहिासिक पष्ट भूमि की प्रत्यावर यमरी मातबर पनिकायों में प्रस्तुत पस्तु- विषम पपा परिप-मित्रों की उसने गमक गोप की है। मूनों को मानपूर्वक पार की एपने और ना ही पर्प निभाने का उसने पूछ-पुप प्रमाल मिाहै। पुना इन दोनों पनियों साहिस्पिा समीक्षा के साप ही मम पापा पारी पिन भी किया नया है। नव परीक्षण में मामम पारवान को प्रगम अलीश मिता पर इस पोपीस की रपना के बार बहई नदिमा बमा त पनि कम नमा सरल नुनय हुमा, वहाँ विषयस पारण की सनित भी सामून परस्थानी रिस रस्टीटपट बीकानेर प्रापित हो गई है। मत प्रापना स सोप मेवा का संपावन करने में मिनट में बसे पाम तमया है। पुन मून सोपोर मे समय घोटी मोठी मुटिया को मेरबरने का उसने पूरा प्रयत्न किया है। पार एभरणा पयस्थानी साहित्य का पपन पाही मालपूर्ण हो। सबिना मातीन बरपान कायनेमिक इविदास कापि नही लियामा बगा। गवान के सामीन सपार मौर बम साबीपन की पूरी-पूरी सही जानकारी मिये को परस्पानी साहिम, और इसमें भी रिपतरा मा- साहित्य का पाप मापन सर्वमा पनिवार्य हो पना है। पगाराम के माममतीन इतिहास या नमागी भनेक रानी हमर पहनिर्मों का भी हम इस प्रकार अप्पपन से ही सब हो चपेया। मक महकर विप प्रसपा प्रमाणात साहित्य प्रकारकी रायपुर र पोरबको पञ्चमित कर दी। मुझे पाया ही नही पूर्ण विरास हिर प्रभर पस्मारवा पायोग मोर प्रोत्साहन पाकर मामस्मानी साहित्य के प्रधान में प्रशिपिक पर होकर परिम में विपक्ष और भी महत्वपूर्ण रफ्पोपी वासिय को रगतामा हेवा । रघुवीर निवास' सौपा (मानका), रघुवीरसिंह रिखमार, १६..
वक्तव्य परमपन बीपी-पनि पौर पनिष प. सनसिपी महेसा मोखरी' परस्मानी मालपूर्ण मोर मोकप्रिम रचनाएं 1 गिम की पम्बहाली प्रवासीवित 'पपरास सोपी पनि रामस्वामी के पारसी माको सपना है और रिम सं. १७१५ में एपित रतनमियरपरिका पारसी मास्मम्मद की और कति है। पहिरम इतिहाथ पौर मापा-विमान तीनों ही हटियों से परस्पानी साहित्य में इन दोनों रपनामों का विशेष महत्व है। मस्तु निर्य के प्रमयम का विषय ही दोनों पनिकाएं हैं। हमने अपने पप्पपनकोस रोमातियों के साहित्य कोपर्व नपान पोर भाषा धास्त्रीय विमन ही सीमित रखा है। पलानी-पप टि सोनों पचनिधएं प्रत्पन्न ही महत्वपूर्ण है। मत प्रस्तावना में संत से मेकर पानी तक पप विकास को समेर में प्रस्तुत मिा बसा है पाप ही राजस्थानी बच के विभिन्न स्मों का परिषय देते हुए तु पण ममय को पोसटले का प्रपाम किया है। या निबन्ध स्थानी भाषा पर्मश विधन व पुखर प्रो. मतमाम श्री स्वामी के सामाम्प निरामण तथा प्रारहीम प्रो पी हमारी पौषिय निरयन में सिवा पया है। निवाब प्रशासन मे मेरे मारि पुर भी पुस्मौतममानवी विवारी और पुम्मा भी पनाम्सी मा से मुझे की सहायता मिमी है। तलम परमे इन पुस्यों का मापारी हूं। पर मुमि भी कोतिवापरली ने भी उमप-सपा पर पार्व-नियबर पोर प्रारम्पक प्रपा र मैरी सहामता की। पता में मनकामी पपाय निस प्रपन में मिनिममोंचों से मैंने प्रस्सम या अप्रत्पम म यो वायता दी। समय प्रति भी मेला प्रापित बा। सिसमय यह निबन्द लिखा गया वा पाहीण्य ठिपों पर कोई विक्षेप ग्लेखनीय भनहीं हो पाया था। पर घमास सीपी परिम' भी रोमानामजी पौर 'प. पसिष महेमचमाती पमित्र' मी काशीराम धर्मा एवं स. एरोसिदए पारित होकर प्रशित होकमित्रों के इस मण प्रभापित करणों के प्रभम निरप में अतिम पापमा संपोषन लिये गये। वर में इन पियों के प्रतिमा मास्तिरमा पमा तप्प समता हूँ।
इस निबन्ध के परीमा महापय गुमाए ग. रसुवामा । समान पपने उदयपुर पाबास के प्रवसर पर इसी निबन्ध में मुझे मार लिया और प्राम साक्षात्मर में हो मेरा इसमा उत्साहन दिया कि मठ पगया। निबम्प प्रणयन से गित फा को ममे मापा की मी पानी जम्प म सग भिन्तु इसके माप्यम से एक महिम पतितप की स्नेह-साया मुझ प्ररस्य प्राप्त होन-पौर में इसीसे संतुष्ट । पाररणीय महापन इमार मे किषित प्राह मात्र हैन पम इस निबम्ब * बिए अपनी भूमिका मिस भैसी प्रपितु प्रत्यायापक ऐतिहासिक टिप्पस प्रगन कर त्रियों की ऐतिहासिक बार को पुर एवं सक्सिस बनाने में भी सहयोग दिया। उनके इस भागहरे प्रति कोई प्रोपपारिक मात कह कर में मामार युक्त होना मही पावा। राजस्थान साहित्य पचरमी, पम्पम ५ मामय मापद, संपामक ग• पोमनाराम मोर पम्पाग्य र मरस्य महानुमानों का मी में पाया। गिकी पदारमता के परिणामस्वरूप मा निबम्ब प्रकाशित हो सके। हिन्दी विभाग महारासा भूपालमिय उदयपुर (पजस्मान) भारम शाहसान २.रिसम्पर १६५ विषय - सूची प्रस्तावना पृष्ठ १ से २० (१) अचशम खीची री पप निका पु. २१ २५ १.२० २७ १ ति मौर विमर २ साहिरियक विषमा ()पनिका की कमा (अ) मस्त निगम (4) प्रति- पिण (घ) मर्मकार-मर (6) भाषा-स्तो पापापास्त्रीय प्रम्पयन पू .. (२) वनिमय रा० रवनसिंघवी महेसदासोठरी १ छवि और विकार पु.१ से ११ २ साहित्पिा मासोपना १.100१.0 (७) पनि की कमा (4) मनु सिम्मान (पर्याय (4) लिपि (1) प्रभा ८२ (१) क्षर रिपार (घ) मापासेमी (२) पाप-बमा भाषा पारधीय मम्मपन पु. १.. १२६ परिधिप परिषिष्ट २ सहायक सत्य सूफी प्रकाशकीय प्रस्तुत पुस्तक 'राजस्थानी बच निकाएं को भी मात्रमशाह मान ने एम ए. (हिन्दी) की परीक्षा के निमिच शोष-निबम्प (Dister tation) के रूप में हिन्दी, संस्कृत मौर रायस्थानी भाषा पर्व साहित्य के परिस्त भाचार्य नरोचमदास स्वामी के निदेशन में तैयार किया। प्रो० मान ने राजस्थानी साहित्य के विद्वानों की कतिपय सम्म वियों के मापार पर पुस्तक को प्रकाशन के लिये अंतिम रूप देने में मी पपा मम किया है। राजस्थानी साहित्य के शोम वर्ष में नकी पिप रुपि है और भाजपा वे महाकवि सूर्पमएस के विम्याव ग्रंप 'वरा मास्कर' पर अपना शोध प्रर्य कर रहे है। विषय प्रतिपादन और मापा की रष्टि से भी पुस्तक के महत्व को स्पीनर किया गया है। माशा है सुधी पाठक इस पुस्तका सम्मान करेंगे। शांतिलाल भारद्वाज 'राकेश पास्ते निदेशक राजस्थान साहित्य मयामी (संगम) उपयपुर (राजस्थाम) प्रस्तावना भारतीय समय में मप न प्रथम वैदिक संहिवामों में होते है। संत परम प्राचीनतम रुप मयुर पार पीर में मिसन है। यात्मक मौका सामानतया बर में है।किएको मा परम्पप बामणों मारप्पो एष पनिषों व मी पर है। इस मनम्तर मूत्र साहित्य का पद पाग है । महाराण मार पुराणों में भी यम-तब पए का प्रयोग हमा है। पुराणों में इस ष्टि से भाववत पुषण और विकास रलेसनीय है । मानयत काम प्रापीन मैनी का है, उसमें प्राचीनता का पुतला-पुराण का मप पपेलाय परत है। (क) प्रोपिक सस्तव नगर पुपों पये मय को पार विमार्मों में विमान किया । मकता है- १ भास्त्रीय-पर २ नीतियों का बच । मनोरमन या माहिम का पत्र और ४ साहिस्विरमा-पूर्व पप । १ पास्वीय पारंपारिक पप मानों, स्याम्मामा, टीकापों और प्रमों कप में प्रमुख हमा है । बलि का भागमाप्य हर का वाम मार पौर पर स्वामी का मीधा-माम्म शास्त्रीय पदी सुम्मर रपमाए । पामे पत कर बामियों में परर मह पप गित पौर धिम हो गया है। २ नीति बाप को सबसे प्रमुख रपना पंपठेन। उसके अनेक सविर भावांतर यो । हितोपरेशान एकरपावर माना गया है। नीति पापों पसार हार पाचशेष में पप भी पाया गाता है। मानेर माधार पर पित पाय पूरबा-माना सब को भी इस कोटि में माया सख्या है पथपि उसमे सनी मपेमात पनि है। मिपिका के सुपरि विद्यापति की पुस्प परमा' भौधौ प्रकार की नीति-नपामर खमा है। मोहिमपापों से मिचलाभुमता मनोरंबा मागे न पाहित्य है । ऐसी एषामों में विम परित विज्ञापनसाविधिका मा प्रविधि पुक्त कर, वाम पमानातिन, सत साति मोर प्राय समेखनीय है।
२] [ राजस्थानी पचनिन ४ दिन काम मे दो सीमा-माया गप बचा पा रहा पा मोरिक स्व में से पस्त करने की प्रवृत्ति प्राग । पब मध में भी कमा एवं कपिल का संचार करके उसे पचका-सा ममित और सम्म बनाने का प्रयास किया बाने मपा । नामांतर मे पमकरण प्रौर अपिल -ए में इतने प्रमुख एवं रिसिप्ट बन यमे कि उमे पय काम्प' को संज्ञा से पमिहीन श्यिा पाने मना । पप मिसन को गो कमियों की कसौटी पकाना पिकांग परन्ति' कहा गयाइरसका कारण भी पसार-पच की यही पमा प्रपानता है। प्राचार्य बामन में अपने नाम्यामकार-सूत्र में संसास-पच के भो तीन भेर तपम्पि, परिका एवं उत्पतिका प्राय किये है उनका प्राधार भी संभवता मय की यही प्रवृत्ति । मृत्तमम्बिका समय उन्होने यह रिया है 'पश्यमायबर मतद११ २१] मवि पत्तगम्पि गप का पास है जिसमें किसी पच पा र केस विधमाम पते हैं । पातातठानुतम-वासिनु सामनेषु । इस रसरस में पसंतमतिका परम पंस स्पष्ट नमित होता है। पण पच का बाप । जिसमे छोटे-मोटे समस्त पोर बक्षित मम्-ए। उत्पतिका माम' पर्णक के विपरीत प्रापर प्रौर परत पर होता है मर्मात् उसमे बोबो समास और कमेर पर होते हैं।' कालात्मक मय के दो भेद है-(१) मासापिस पार (२) पा । कामा मोर पपी , पसंत पप-काम्प के लिए 'कमा पर का प्रयोग किया है।' इस साहित्य की परम्परागत प्राचीन है। कात्यायन मे पास्यायिका का उल्लेख मिमा है । परमि मममाप्य में पासबरता और सुमनातरा नामक मापायिकापों मौर मैमरी नामा कला का सम्मेवहुमा है। इनके अतिरिक परपिरत पास्मति पमिम सौमिम छठ मुरक-मया मादि का एक सामों का उस्नेय मिलता है। परन्तु उक्त सभी कृतियों कपल उन्नत ही प्राप्त हुए है। कोई ति मभी तक पतन नहीं। कसारमा-गप + प्रारंभिक रमन रामा के पिरमार सिना-मेस में हस्ते बिसम ममम संवत् २.. के मममप है। हरिपण-स समुपुप्त की प्रचस्ति। (मममम मम ४१२) भी इस कतारमा या प्रसंग मचा प्रश्न उपहास उपस्थित कती है। गुपन्यु की पामरता कपा मारमा बम की पर्व प्रपम उपसरप बना। पुवायु का समर संवत् ११.नपभव है। संसठ नप के सर्वश्रेष्ठ मेसा पाणमट्ट पनी रो पनाएं प्रसिर-(१) हप पणि पौर (२) कापरी । बलि मायापिका है और पारम्परी या कारमारी में मतमा अपने पूर्स मार्य को २ १--म्पासात मा. विशेषकर पा•ग मोम सीमामशर प. २. २-- हमारी प्रसार मिरी हिनी साहिल का पारिजान १.५० प्रस्वामना] [३ पगी सवय 400) सकुमार पति एक पारी मायामिका है जिसमा पर मारहारिकता निष्ट। उत्तरसमीन हतियों में ममपामा सिसक मेगरी सपी पवामी ) पायसिंह-ठ पप निम्तामसि (पापी सवामी ) सोबत-का पसुमारा-मा पारि रोसनीय । कसारमक-पप का एकप पम्मू-कामों में मिसता है, जिनम पवार पर पी मिमित पता है। पम्प-काम्पों में सबसे प्राचीन विभिमानम्मू (नदी पतामी)। (ख) पोट भोर वैनौ गय महामानी बोडों में भी सस्त पाको सपनाया पौर प्रहर पम्-साहित्य की षमा की। चमिस्तार प्रबधनपर पासमामा प्रादि महत्वपूर्ण और समाएं रासहीती पाहिस्पिक है यो स्थान-बान पर प्रस्ताव पर है। निक्षेप समे बामाला मे अन्यस्त प्रमान है। इसमें पम्न पूर्व परेसा वा पाता है। मोहाय निति संतत-पप साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में मिमता है। का साहिम निमेपता कहानी प्रधान है।र पर साहिब का एक मालपूर्ण म शिव एतिहासिक प्रा तिहासिक पक्रियों के पीबन कीटनामों का पर्सन होता प्रस्तुप मुरि की प्रकिाम और परम्प कोछ मौकी मलेखनीय दिया। (ग) संसपेर मापामों में गय पाति-वारों की बर्म पापा पामि में प्रदुर पप-छाहिल पा रमा । साहित्य दीरष्टि से बाल-वार्मों का विशेष महत्व है। प्राप्तगुमवर ने पादिको घोगार प्राप्ती का वर्गीकरण इस प्रकार पिया महाराष्ट्रीय । औरती। मायधी। म मापभी। माराष्ट्रीय सारनी। इनमें से प्रथम तीन को माटोय प्रास्त और रूप पीन को म माविका है १-~-परफरबी युमसर : दोगमनल प.४ ४] [ राजस्मानी पमिकाएँ इन सब प्रास्तों में सौरसेनी साधारणतया पर की प्रान बी । पपपिपरा-य इसके दर्शन और में भी होवे रिसाई परे कि माटों के बाहर इसका प्रमोप बार की अपेक्षा पहले पपिक या। बैनों में महापष्ट्री का प्रयोग कमी-कमी या पौर पर दोनो में किया मद्यपि पौरमैनी के सामने महाराष्ट्रीय गव नाम पा!' इस प्रकार यचपि प्रास्तों में प्रचामता पप की ही पी फिर भी उनमें गर का मितात पमान नहीं था। भामह भौर एपी द्वारा निरिष्ट मा के ममणों को देखकर ग.हमारीप्रसाद टिवी ने विचार मत किया है कि 'भामह पौर रपी नाय को देखकर ही ममण पनाए होगे । उनके अपने मकयों से ही सष्ठ है कि मास और प्रपन प मापा में लिखे पसे काम्पों से परिषित। इसलिए कमा तमस मिखते समय उनके साममे प्रात पौर सित की पुस्तके प्रवस्य पर्वमान की। प्राने सन्हान लिया है कि-प्रारत में सिखी माएं पच-बस मोवी पी मौर गम में भी मिली माती वी। बहर-कमा (पेपापी मारत में मिश्रित प्रप्राप्प सप) के सम्बन्ध में छुप निश्चित म से कहना कठिन है कि यह पत्र में मिसी गा मी वा पध में परन्तु पसुपहिणि नामक यच निकर प्रातील प्राय का उपपरयो मा मूर्षित करने के लिये पर्याप्त है कि प्राइस में गव-बर पाएं प्रवस्य लिली बाठी पी।' प्रपत्र-अपम में पच-साहित्य का प्राय' प्रमाण है। पर लोक माषामों ॐ उदय के सार पचपा पुमः अभ्युदय होमेमा। मो.नरोत्तमयमयी स्वामी मतानुसार पपनस की गप-ति पत्तिमता (पिचापतित ) बोकमापापों के उत्पान के बारकी पना है जिनमें मषिमी का प्रभाव या-त्र दिखाई पड़ता है। प्रपत्र गप की महत्वपूर्ण रखना कीतिमता हो। पर गयोतम मूरिस्त पुगतमामा-कपा (मि • ५३९) पौर 'मत्सुम्ररी प्रयोगमाना' (१३ साली) नामक 4 अप में भी यही-ही प्रपन म-गचा प्रपोप मिमता है। Couten was normally the Prose Prakrit Though it appan to have been occasionally ued in rene in employment in pront oat ude the drama wa probably onct much wider than the ar ben the Jalos used a form of Maharatri for proke 13 ell us for Yers though the presence of courkoj foros in prose sugjusa thac Mubaroti is here intruine (latroduction A Hlstory of Sanskrit Literature-A B heith - Page 27 ) २-ग हमारी प्रसार हिरे साहित्य का मारिकास प• १७ १८ प्रस्तावना ] [५ माये बन कर तोम्पापरामों के रवान साप पानी रस्म निर्मित मा रक्ष पीर-पीर सातत्सम पदों का प्रयोग पसा पता नया है। इस विश्व में ग. हमारप्रसार रोख मत है कि मनिसरी पठानी से ही बोमपाम श्री भाषा में उत्सप-यों प्रदेष के प्रमाण मितने सपते है और पी पताम्दी मारम से तो स्वम-गार निरिम से अधिक मात्रा में पाहत होने समे। (प) राजस्थानी भाषा में गपः पिस्वामी समय साहित्य यात प्राचीन है। पीठामी से पार तक पस्वामी में पक-साहित करना होती पाई है। महरिखना प्राधीन है उतना ही मिस्त भी । सबरवानी में सम्पूर्ण प्राप्त पव-माहिस्म को प्रत मापों में कि म्मिा पा सकता है। १ धार्मिक गप-साहित्य परस्मान ममिक पप-साहित्य र सपा में पिसता है (5) म पौर (1) पौराणिक । पन में वात्मा मेस माविक है। पीपलिक मप मनुवाद रप में मपिक मिलता है। () वैव-मार्मिक-पय टीमों में भी मिलता है और सबलप में भी । टीमए रो पों में भी मिलती है-(१) पामारदोष पौर (२) । मायामोल का पमिसाव सरम मीर सूपोप टीम है। इनमें भूत की म्मामा हो मही अपितु पुम सिदान्तों को सप्टपणे बासी खाएं भी होती है। पेबानागोष समों की मा म लिये गये मोर मोकप्रिय भी हुए । एमा वामावरोप में बहुत समित होता है।समें मुस समाप उसके मर जीपा पाने में रिमा गाता है। (४) पौरासिक पार्मिक पर साहित्य पोसिक प्रेप मा उनके पापार पर nिt बरे पापण महाभाख भारत, पहारा पम-वास्थ कर्मण, स्तोत्र मादि के अनुसार म में मिलता है । पिप समय मनुषार १५ पटी पारी tीनता और विधवा दोनों ही रष्टियों में बमों की रवनाएं महत्वपूर्ण है। २. ऐतिहासिक गप-साहित्य : (क) पैन एतिहासिक गय-4 मिनाले ऐतिहासिक मच मी गरमामा में का है। यह मुमता महावभी, संशावली (याही एविहासिक-टिप्प पार उत्ति सप में मिवता है । पट्टायनी में मापार्यों की परम्पराका विहार एज है, स्थापती में किसी बाधि विपकी बस परम्पप कर मर्णन होता रखर वही में 1- हमारी प्रसाद गिरी : दिली पाहिप का मासिान पृ. १८ ६] [ रामस्थानी पनि धपा समय मिहार पोरोमाविकीपाठों को मिपि सम्मिा बाबा, ऐतिहासिक टिप्पण में मेगा ऐतिहासिक विषयों हो -पुट सम में विद्या करने और रसति अषों में मिती बत, पापारिकी उत्पत्ति का विझत पाहै। (ब) मेमेतर ऐतिहासिक गवनेतर ऐतिहासिक बाबी पनेक मो में मिलता है। जिनमें से प्रमुख रप निम्न लिखित है- १ स्याता पौरोपकर हीराकार मोन के मनुसार राजपूताने में भाव ऐतिहासिक पप सपा की हा खासात में परपूत रागापों का दलिय मा प्रमुख परनामों का काम कमानुसार या पम्म समानुसार या रसपी ी मात रमासाम रीम्साल, बोराम रसात मारि पथरमानी मा की महत्वपूर्ण मच रसमाएँ । २ बात-एस्सामी में 'पाठ' या मा पानी गर्माय है। पयस्थानी मेगको सम्पा में गायों को बना हो. नवरात्री सामानों में बामाबाबतोरसाने सिने प्राप्ति मारमा सहम स्वनी परिष बार हो पाम । ३ पीरियाबमी-पानी-नमें रिसीप मे देले बाने मतियों माम हो कमपः संरहीत होते है। इन पीववावधिमा में पति के नाम के साम रख महत्वपूर्ण अर्य का भी रामेबलिमा नसा है। यमों के मतिरित हैम्साहूकारों तसा पारिको भी चारदिवा मिलती है। उपाहण्यार्य 'एमग सारनी' 'बीपी माग पपमेमरीपी पीसोरियों धामो प्रोम्बामा चारमा प्रादि । ४ हाम, पहबास, हगीगत, याददास्त, बहकीकात पादि-लमें पटवामा विस्तार बर्णन पता है। सबिता बीया समापसू मिया ये हाल' पातमाह पोरको रोसोबत' 'या मोरानी हरिया रोगार' मानि ३ मसात्मक गप साहित्य पसारमा साहित्य मम्मामालिन, मलक-नक प्रादि। वात संतत वा-'- पसू जिसन मा मापन में पाते। र प्रामामधाम से मही सुनो गारो । १० भवामी प्रेत बा १५ पतागि प्रारम्म एस्मानी माों को लिपि-पहिले गाने प्रभास मिलते। २ पर्णक परमों को वर्णन-कोप--मना ही नत होला में भावाप्रमा बन पाये १ बमर-सन विषय-पन भौरवर्णम पनु पर्स मुठ-परम १- पोरगर होगा प्राव-लती कौम्पात भावो-मिता - प्रस्तावना] मारन प्रारित 'रागार समात-पणाव सीपी गरेर नापामत दोपहरी 'मुस्लमानुपास', शास' 'समा अपार' प्रतिवी प्रारप्रय है। पावित परिवार पर मापे सविस्तार प्रकाश सा गायेगा। ४ हानिक गप-शाहिस्म गवस्थामी गय में हामिर साहित्यमा तो मनुवार के कप में निमता है माप में । पापुर ग्योतिए पड़मावली सामुदियास्त्र, वमन्मेन मारिनेक रिपयों के संसत पंपों पयस्वाती भनुवार मामा पापार पर मिकी इरानी पप की पनाएं मिलती है। ५ प्रकीर्णक गप साहित्य र प्रस्ताव परों और मस्तितों में तय नियामा समता है। पारपक च मुस्वा पनीर पर महार में उपतप है । प्रमस्विर पिमा-मेल वाम-पत्र पादिम प्रयोग प्रपितमिमता है पर समय परस्पानी पापी प्रयोग राजस्थानी गध का काल बिमामन परस्पानी गप-साहित्य के विकास बम को स. पिरस्परप पर्मा ने अपने घोष 'यवस्थानी मा साहिल का विस पोर इतिहास मतीन सालों में पिारित किया है। पा--- प्राचीन ग्राम [F} प्रमाध-काम-4.११... १४..) [4] विकास-मास-स. १४.. ...) २ मम्म-कास-पितित-कान (स. १५०० सं० १५.) ३ मानिक-काम-~-(. १६५. सब तब} प्राचीन (क) प्रयास-कास्त-मन परस्थानी परमहस्व उसकी प्राचीनता पौष्टि मेलाम में देर-बनी में प्रवीन ए बिनम जैन शिनों का हो कार से प्रसमाएं ये है माएपना (401) बाम-पिता (4. १२३६) पतिवार ( ११४.) मामा मामान ( १९५५) परताय नमस्मर तरंग (*. १५५६) 5] [ राजस्मानी पनि प्रतिपार (• १३६९) सस्व रिकार प्रकरण (नगमग १४ी ताम्मी) पनपान कपा (मनमन १४ भवायो) प्रमिपक्ति प्रणामी ममा संगठन पाम्प पिम्पास एवं भापानमाप की दृष्टि से परस्पानी का यह प्रारम्भिक पर हिन्दी भाषा के विकास को ममम्ने में पर्याप्त महायता देता है। (स) विकास कास-या पगलानी गय का प्रपति काम है। इस काल में पप एक निरिपत साप पाप कर मेता है। प्रयास काल के प्रयोग पर समाप्त होगये। भौली में सुपएपन मापा पार भाषा संपत्त एवं स्पष्ट होकर प्रवाहमपी बनने समी। इससे पूर्व गव स्पट मार टिप्परिपपों या मागावों समा मिसा गया था, मग पच पर रपमा भी होने लगी । इस काम में मोनो मे ही प्रार मा हतियों से निर्माण किया पर बेमेतर मेवों प्रयोगान भी कम नही पा । पार्मिक ऐतिहासिक कनारमा और मामिक सभी प्रचार की मच पनाएं इस काम में रखी। विकास-कास की प्रथम प्रौर मप रपमा प्रा. राम-प्रमूख पगमस्या बालारोग (• १४११) है। कतारमा मप की प्रपम पमा माणिकतम मूरिक्त प्रपतीपर पति-पवर नाम 'मामिलास' (सं. १w.) भी इसी काम करना है। पारसी मारमा-गएकी प्रथम पना शिवसरत मरसाहसीरीपिपनिका' (.११.) भी इसी काम में मिलती है। जिन समुद्रसूरी पौर विधापरति की रोगनिदाएं गिनन उमेर मागे फिमा बायमा भी इस काम मपी। पी विनवर्पन मूरिस्त विमी (सं १४२) इस कार की तमच बेगानामों में सम्माबित एक एतिहासिक रपना है। इसकी माग रयानुप्रामुत प्रवाहमम एवं रखनकारी है । पुत-मपन+त मुखापयोष मोक्तिक (# १४१.) इस पस का प्रमुस प्याकरण प्रक। पतिवार (H• Int) एवं पसुपति विपतिरा मानापोप (*. १०) इस समय में वैमानिक गव का मुलर स्वरप प्रस्तुत करते है। विक्सन-कान पग्य प्रमुख पच मेसमें में सोम सुन्दर मरि (सं. १४४-१४) मेषतुपर सरपमा (१६वीं पताम्मा का प्रारम्भ) और पार्समम तरि (सं. १२५. १९१२) के नाम लेखनीय है । इन दोनों नापायों में पाए बातावदोषों की रसमा र बस्पानी मप को एक लिखित नति और रिमय प्रसन किया। २. मध्य-प्रम-विकसिद-काल विसित-पात परस्पानी पच परम गर्व साल है। साल में भाषा और पौर परिमानित होनी में विचार मामा पौरपद गमाविरम भापों की प्रस्तापना] [. पश्चिमामा सामण मोबहस करने गयी। सानिका मोर सात मप पेनियो का निकास नहीं पार हुमा । मोनिक टीम और मनुवार तीनों रूपों में मास्म के साथ नप रचाएं होने सपी, मिासे पगाबान बाठीका मप्र इतना समय हो गया कि परमादीमकोक-मापापों के यव साहित्य के मम्म सपना था और स्म पान पाने प्रकिारी बन सके। प्रमिमवीर या पारम पर भी इसम में प्रयुर मात्रा मैं सिसा बया। साल की सबसे महत्वपूर्ण समा मासिरिया पनिका रामर पसिनी 0 महेपमोतरी (से. १७११) इसमें प्रयुक्त प रामस्मानी पर मा मतपट नमूना है। व कान की मायाम्म महायपूर्व मय रसनामों में तुरीन सहारे की बात' (१भी सवानी) पर प.१४८८) १८ पलामी में पित समागमार', 'म', 'सीदी मेरमीयामत ये रो पहरो' रागान परत रोपात पसार पारि प्रमुख है। पनी पवादी मत मा १६॥ सवाबी प्रारम्भ में हमें पता संभा एसम्पानी नप-पैमी एक विलेप प्रकार होने नमते है। पर इस गाने मया मान विचार मा कपि यस्तार हर-राम' (4.१५१९) पार पिचर घोराति (२०ी पापी) भी विषय कामी उस्मेवनीय मनाएं। ३ भाधुनिष्कास माइनिकाल में मी प्रस्थानी की पथ परा प्रथम महाँहा है। विषय काम मंठिन भएप म पनेवर मनाप थिमिस होममा मन फिर से राजस्थानी पर पामोरवा हमारामारा उपम्याप्त बहामी, सा-पित मारिसमा पाहित्यिक विमों का दिमत होगा है। निबम्ब के क्षेत्र में रह पपी मामे नहीं या पाया। २ तुकान्त गप (जाधव-पप ससस्त्र का पय-साहित्य प्रतुत है। तुमच परका प्रारंभ पपा मकान से ऐठा। प्रपत्र प-भान में साहित्य पर बोला म प्रभाव पड़ने सप गया था मार गोमाय पीतात्मक पार मतुर्भत होय है । इमबिए प्रपत्र म-साहित्य में तुम प्रति इतना अपच मारता है । तुवापुर का विकास सोन्मापापों की परप से इपा और संत साहित्य में अबदेश पारितो मे ही पहमपार रूप में बाबा माता।'' भपध-सम्म में मोड पीने के पापार पर नवीन मंदो प्रावमापा। २१ समास-पास की माठि परिसत न होकर मानिक बाप ही समय १--हिन्दी साहित्य प. १२५ ८] [ राजस्थानी पनि परिपार (12) उस विकार प्रारण (मबमप १४ पी पवादी) बनपाम कमा (मपमा १४ी मतानी) पमिम्पति प्रसामी, मम संगठन पाप बिग्यास एवं मापा-मम्मको स्टि से एगस्मानी कम या प्रारम्भिक मच हिन्दी भापा के विभव को ममम्ने में पर्याप्त सहायता देता है। (ब) विकास कास-पह रावस्थानी बप मा प्रगति काम है। इस काम में पप एक निश्चित सम्म प्रहण कर निता है । प्रयास काम के प्रयोन पब समाप्त होने। वैली में मुपपन प्रापा और भाषा संपत एक स्पष्ट होकर प्रवाहमयी बनने बनी। इससे पूर्व पर सूट मार टिप्पणियों या मारदास्तों के रूप में ही मिसा या पा, पर पसरपना मी होने चयी । इस काम में भी बनों में ही प्रतुर बब हतियों म निर्माण किया पर नेवर मेसों का योगपन भी कम नही पा । पार्मिक, ऐतिहासिक कमात्मक पोर हानिक सभी प्रकार की पच रचनाएं इस कान में रपी गई। मिस-कान की प्रथम प्रौर गप-रचना पा• तम्ण-प्रमसूरी त परापरवा पानारगोष' (सं. १४११) है। मारमा पर की प्रथम एषना मासिकचन सूक्ति पुपरीत परिण-सबर नाम 'बाधिमात' (सं.10.) भी इसी बात करना है। पाली कमारम-पथ की प्रथम ना घिषपस त अपमास सोपी पनि (सं.१t.) भी इसी काम में मिमठी है। बिन समुबसूरी पार सातिवापर हरि कीपोन मनिकाएं गिनका उत्तम मापे म्मिा बायगा भी इसी कात में रची गई। भी जिममम मरिल पिनी (सं. १४५९) इस काम की तपापच्छ पैनापायों मे सम्बन्पित एक ऐविझसिक रसना है। इसको मापा प्रत्यानुप्रासाल, प्रचारमय एवं रबमारी है । कुन-मगा- मुम्पापमोम मोक्तिक ( ११.) इस कान का प्रमुख म्पारण पर है। पशिदवार (सं. १m) एवं गणपति विपतिम दावारकोप (सं. १ ) इस समय में शामिक मप सुना सरस प्रस्तुत करते है। विनय-पम के पग्य प्रमुख मच बाहों में सोम मुम्बर मरि (सं. १४५.१m) मेस्तुर खरपन्ध (१६षी पवानी म प्रारम्भ) पार पाचन परि (d. 1. ११२) के नाम सोलनीम । न तीनों मापायों में सामान एक बालापगोषों की रचना कर परस्पानी मघको एक मिति पति और विपत प्रथम किया। २. मम्म-न-रिसि-पास रिक्ति-कान परस्थानी मापस र काम है। इस साल में भाषा और पौर परिवारिता मी में निधार मापा पार पाम्माविरम बारों की प्रस्वापमा ] [. मभिबमा का सामप्म भी पहण परमे मगी। सानिका प्रौर साठ पप गैतियों का विकास पही मार हमा । मौमिक टोका और पनुपाव टीमों पों में पास्म साप पप रचनाएं होने सगी जिससे एयरपान भारती का मगर इतना समर हो गया कि मातीय पोष-माषाओं पर साहित्य के मम्प प्रपना पुरा और स्वतंत्र स्पान पानेमकिरीबन पाई। पमिमेवीय या पनारमा पप भी इस काम में प्रयुर मात्रा में मिसा पया। इस काम की सबसे महत्वपूर्ण समा बमा सिरिया त बनिका' पठार रखनसिंहनी री महेशमोतरी ( ११५)। इसमें प्रयुक्त गप रामपानी-गप का सोकष्ट नमूना है। इस काम में प्रम्पाग्य महत्वपूर्ण पप सपनामों में 'कुतुहीम सहमारे की बात' (१ली तामी), पर पक' (म.१७८८) १८वी पवामी में एपित 'समाज पार' कुसहनम्' सौपीनब मांबायत रोरो पहरो रागान परत से बात पणार पारि प्रमुख है। १भी पवामी के प्रत या १८वी भवामी प्रारम्भ में हमें बात' संमा में परस्पानी परमी के एक विशेष प्रकार के रम होमे नपते है। पर हम भामे ममा स्थान विचार करेंगे। कषि बस्तार सकार-प्राध' (H• १६५१) पौर पिवर पोत्ति (२०ीं पसामी) भी पिसत कान की परमेसनीय एनाए है। ३ मामुनि प्रल माधुनिक कान में मी राजस्थानी की मच पारा प्रपत्र नहीं हुई। विकास पर मंतिम पण में मच-वन भस्म शिपिस होममा प्रब फिर से परस्वामी पप ममा मोरता मा रोस रहा है। नाटक, उपम्पास गहामी, साविक प्रारि समी साहित्यिक विधों प विकास होगा। हो, मिबम मेत्र में यह भी प्रामे मही म पापा है। २ तुफान्त गप (क) कम्त-पप पसात का पच-साहित्य प्रतुत है। दुकान्त पच का प्रारंभ मपम पकान में होता है। मपप्रम-कान में साहित्य पर मोरनाम्प का प्रमाव पड़ने मग या पा पौर योजनाप्प पावारमा पार सतत होता है । इमथिए प्रपन -साहित्य में है प्रति इतना प्रबन माह बता है । पस्तुत तुक का विकास नोक-मापामों की कप-परंपरा से प्रा पौर पर-वाहित्य में पोय प्रारिक गीतो मे ही परमपपार प में पापा जाता है।' प्रपप्रम-काम्म में योग पीतों के प्रापार पर मबीन मरों का माषम हपा । पर समात-पात बाकी भाति पसितम होकर माणिक पाप हो ये संसस्त १-हिन्दी साहित्य मेप प. १२५ १० [राजस्थानी पनि प्राय प्रारी मापा मारि मानिसबरों से मी मिन प्रधर पौर स्तुत भी प्रापे पन र सुन्नई का प्रपतन इमा गया कि प्रपत्र खमिवानों ने संसः पणिक घरों में पी तुकामबाप किया। जिस प्रहार पाए माता प्रिय रहा है उसी प्रणा हा प्रपत्र का सिर एवं प्पापा वर है। यह घर (हा) नापसी ठाणी में गत मोगापिय होमयावा । इस घर में नई बात यह है कि दवमें तुम मिमारे जाते।। संमत प्रा6 में तुक मिलाने की प्रथा नहीं पी। दोहा बह पानावर पिसम तुम मिमाने का प्रयतहमा परि मा पा र एक भी ऐसी पपा-पिता नही मिसी पशिसमें मिनाने की प्रमान हो। इस प्रमर प्रपत्र सारिता एक मीन पर कर ही नही माई सिमरीन कारीगरी मेकर मी पापि। (स) सुन्माप हे के दस पापक प्रचार पोर तु रिममे की कारीपरीपपम नप में भी प्रवेश किया पर वीरे-धीरे समेत म्यारमा पर मैं तुझा प्रपोय प्रसारण रेका मेसेना । पा- 'मोर पत्तीय प्रबर परिवार एग भोष पहिरिष परंग परिजन विमुल पनि पाये पानविन गमभूमि को मोह मोरिस पनि धोदिाप । (ग) राजस्थानी दुधन्तनगर परस्थानी साहित्य में हमें यो मारमा पर मिलता है--साधारण गोमपान नसीरा-सारा मच मोर पस्यानुप्रासयुक मारमा-पप । सस्थानी गप परपए में प्रेमानुसार मुक्त परामरमिता पाता (पाप्ता) उमान पारि मामों मिलते है। पति को प्रोडर पनि त माल पारि प्रयोग पीराम पसो मीहए। पपनि धीर दात परस्मानी के प्रतिरति-प'एनाप रफ मयो प्रसार-1 पनिका पौर २ बार-बताये गये है। लोगों के भी पपा-सपर दो-दो मनि मापा- १ सपनिम्न के भेद रोप भेर समग्र रा एम पानी मर चमू गर प रोम मे एको बाला जी पारा में मोहरा गए। रोम और पाप १-पापारी प्रसादी हिनी साहित्य का माविका .. २-10.m.गापम समेमा - कीतिमा प. २२ १ प्रस्तावना [११ बनम है एसो मा मात्रा पर हुने, एगो पर बोस माषा रो पर। (क) बाप (गणप) निमें माधों का विवम न हो। मौर (स) पर्बम (पनबंध) जिसमें माधों का नियम हो । इन दोनों पनि मेरों भी रो पुरस-भषारो प्रकार है। पपा १ पतुप्रेता वापाण्ठ मए प्रपर माम पाया। २ सतुत पप (माधालयप नही) । पा- विस सपा में श्री मुगवाणी, लिहपसी तारीफ मासी । माठो सारा पाल पाई ख बम रापला गौतों ने सीता पाई। (ख) पदप पनि १ तिने पाठपाठ नापामों के सातुमेव पमहमूह मा पाप हो। सा- पर विधाम, रपुरर रिसाल, वर्ष पार मुख मरष सूर, इसमत एह इस ख प्रद सेमा सुसैन, किनी पत। कर मेण पुणे विपत सेण पंचमटी प्रीव एवं सुरीत, पण इस मार प्रवास पाम मासुर मामीत, विस ही सोच । २ जिसमें बीस-बीस मानापों समेत पा पाप हो । यदा--- बोले तोवाच स बी बीपी सुलर नाम बमै सुहायो । नेपानम इसमत निम हो समा बर्ष र बीपी गई। २. वात के भेद: 'ये मंचकी तिक बात विष रोप । एक मुर्गम होत है, एक परम्प होय ।।" उपयुममण देने के बार सुनार स्सा पारने पाहा:- "रोग वो वात। तिस में पप पाट में मापा से मेम मही में परब में माना रो पर में मास हुई। इस शिनुसार सात से मेरनिखिोटे- १-टिप्पणी-मुरित 'पुलाव पपक में मर स्थान पपाप मौर पर स्थान पर है। हरमट और इसनिषित प्रतियों में मेवा ममा हो बमा भान पता है। श्री मपरपर नाहटा ने को पवस्वान पुफ्तत्वापर मंदिर प्रय प्रापित 'पसरवानी साहिब पह' मान में 'एयस्मानी सप काम्प परपर' हाक मेख में इसी बात में माना है।
१२] [राजस्थानी पनि १ मद्वप (गपबंध)-रिसमें मतुत गप सप होवे, मात्रामा का नियम नही होता । यमा- 'प्रपम हो प्रमोम्पा नगर विमा पसाब बारे बोबन हो और सोमै जोबन फिराव पोतरफ फैसाब पोसठ गोबम के फिराव तिसके तो सरिता परिव मा पापत म बई पोसर कोतों के पाट ।' २ पदवंध (पचवष)-विसमें २४-२४ मात्रामों के एम-समूह का पाप होवे है । यपा- हाभियों के हमके असू बहाते गोमे परापत के सानी भागतिक येमे । प्रत देहु रिमय पिन्ध्यापन बाप रंग रम पि मुगर के बयान । मूल की बस पीरट के ठणके मारतों की बसमपामेरे मेरे मोरों की फर्म भएके। फन करके पर मारी को इस माहर के भार बोफ्माना की । बनिन और पवाव में अन्तर सुनाव साभार परिवे पे पर गाने के एक ग्याहय्स प्रत्येक पच-बाप में मियमानुसार २४-२४ माषामों ममण का निर्वाहनहीं पा उनमें माताएं कम पारा है । इसी प्रकार पदम पनिका के दूसरे मर और पाव * पाले मेर कार्य में मौ कोई अंतर परिममित मही होता । ऐसी स्थिति मे सपनिम्न और बात के मंतर को बवाना बना कठिन है। इसलिए पी प्रभावन माह में मिकिपात पार पनिका में पपा प्रतर है? या मनो तक समझ में नहीं माया है। माप स्पर कार पी मेहवागतम बार के मतानुसार बनिकाए सातही भेर मासूम होती है। इतना-सा मेर मासूम होगी पपनिका धनम्मी मौर विस्तृत होती है और मम मनोका धरों के छोटे पति युग्म पनिका रुप में पुरवे बने बाये है। भी हार की यह पारसा रषित नही कि पनिभए बाहो मेर है। मोकि निगा रखने की परंपरा रखापत (पना परंपरा है बापी प्राचीन है। सबसे प्राचीम सपसम्म पनि सिरासत प्ररमास सीवीरी मनिष सिकी एषमा • im. के पारपास हुई बी बबकि पफ्लप बगायतो मे सबसे प्राचीन मर्पसारास पोर की सात विसका बिनाकाम माइटानी में भी पटीका १-श्री अमरपर माइय-परस्पानी पचनस की परम सौपकरण। १ 4 प्रस्तावना [१३ प्रेत मानी पानी का प्रारम बताया है। ऐसी स्थिति में मह नहीं कहा या पाठा हि पनि सात सा ही एक प्रकार मा मेरो पनि पौर रसात में मुख और मापा संधी है । उपतम दरात साप-मिरीमा से मात होता है कि पर पर निषितस से उपरमी पप-प्रेमी का प्रमान है। श्री नायगी का भी मा मत है कि इसमे (पाठको) परपरा को फारसी । बपित है। 'पपि पनियों में बनेप हर बार की पनामों में भी पुकारती म प्रयुक हुए है। पर सूघरपी पप पैमी के प्रमार है पुल है। मो. नरोत्तमदास सामी भी पनिका मार बात में भाषा-संबंधी मंवर ने ही पुम मानते हैं, उसके मतानुसार पनिकायों को मापा अगस्पानी है और पारतों में मापा सही होतो दिल्ली मा गपिपित किमी है।' पचनिधी म्युत्पत्ति भोर भईः पनि एम (रिसे परवानी में पानीमा पमा }) के पम पर मना , पमस्थानी में इसका म प है परसमा, रपुनार पार मेची पर्व में इस प्रयोग किया है । पापे रहर पनि' का प्रमोग दुभव पर्व में होमे सपा पारबारे पत्र लिए गाया सात, माविक मादि सम काम में बाये बाने सपे परन्तु पुराना नई मी वाम-पाच पाना पा । पा- पनिका महापना र विषा प्रापम पम पमनमानी की। पिल मो मलमारप रो पारमा पेड़ पार सूर्य पूर्व परसाहसिन रिनिया बना पर माहे पहा ह यमाको म्या सूर्य पूर आर एस परसणाईने ममा हुमे । -अचमित्र प. रतनसिंपनीरी महेसवासोवरी पने मेस में बना पार पावा कर एकही पर्व में प्रयोष मिाहै। पीकही दुर्भत पर लिए भी पात' पातिक' माया भादि का प्रयोग है। मारवा पौरपा Trar मादर पसार तपस्मारे वेबपुष एक विस्तार । माप का पिहाई सा प्रताप निर्णन भारतमा विती बोवनी दिए । १--पी पपरपन माझदा-सात नामों की परपोष पत्रिका र १२ मा २ विखम्मा १५६.।
१४] [ राजस्थानी पनि मापन पर प्राप का रिपान, ताप का पेस बात पप का पुर। सबसे पावसार प्रफसे सनाई परियम पमा प्राए मग पाई। पणी में दोगेश्वर गाणी में बपरीस पासो में सिबनेन सहसी में महीट । बाके अप तप मागे सिर पीन ता पर हस्त पुरस को हीन " पवन पीर मामय गय रूपक मैन बलों ने बनिया का प्रयोग साधारण गप में निषित टीका प्रमुगार मा प्यारा पर्व में किया है । म मिानों द्वारा टीका-माम्याम्प में लिखित अषम छाहित्य प्रार परिमाप मे उपमम्प है। यह मात ऐसी सब पनिकामों के नामों की पृषी 'परिपिष्ट में है। 'पाच' राम की व्युत्पत्ति और धर्म 'बातम की प्युपति मार प्रयोना ही-संदिग्ध है। सात संश पनार्मों को प्रकास में माने पाने मी माझी भी प्रभी तक पारेख के बारे में अपना कोई मत निर्वाप्ति नहीं कर सके । राम्होने इस विषय में लिया है कि सारंव पमा म पी मुझे नई मादि के कोप एका में प्राप्त नहीं हमा। फिर भी उन्होंने साह को भी पानी में मिली में विकसित भरधी का एक समा प्रकार माना है । पर अपने इस मामो मापार स्पष्ट नहीं किया है।' पहसे पाबा है कि अभी तक पपसाप सनी बात मार्यो पर पारसी पना-सैमी का प्रभाव स्पष्ट रनमें यूपरतीपम र परिमाण में प्रयुकाए ही है साप । उनका प्रपोच भी पारसी-गकी पर विशेष रपमा-सी में परहमा है। एपी स्थिति में बात का संबत से मानना ममुक्ति नहीं होगा। मेट' परवी (पुस्सिंग) सम, जिस पर है एक मे या मिसरे (पाण)। सात मे मी दोन समान तुपाने गप-बम होते हैं। साताको पनाए हमें पक्षम्म रनमें कोई भी एपी पवामी पाने की रखना नहीं है। भवानी प्रसमप हमारे साहित्य का समययनात है। समय परसा-साहित्य का प्रमाग गईमाप्यम से पीय नापामों 6 पार मया पा इस तर मही। इसलिए पापानी सपितामों में बिन वाही पार से किसी न किसी प्रकारका निकट वमन्मबा, मी प्रप्ती समानी 4 १-श्री प्रपरमारनाशनमात-सा पनार्थों की परमप चौक-पोक- परिस १२ प२ सिमर १६९.। २-माम्मा मस्तूम-उन-नीली पयकोष .
प्रस्तावना [ १५ मे प्रमाणित होकर पलाएं की हो वो कोई मापर्य नहीं । रामपानी में माता के कसम से-वजन हाल, महास, हसीत (ही) प्रावि मा प्रकाप में एस पये है और फिर बानी' 1-(ो हमारे यहां की 'मरपाम समान ही एक साहिरिया गम है) का तो मम्म काम म्यापक प्रचार पहा,माराग धरसी नागने मासे मार में मोर प्रिम बनी हुई है। ऐसी स्थिति में पगस्वाती पनामों में यदि साहित्यिक-समन्वय की प्रेरणा भगवा म्यापक मोड प्रिमठा मापार पर अपनी भाषा में भी त' में समाएं की होको परमसमर नहीं। सास समता परबी दोनों रा और मैम से बमा हैमात रवा (प्रस्थानी भाषा में मोप प्रार भनि परिवर्तन सामायण मी समका स्पष्टीकरण हो एम है। रा) साप कार से मोहा मया प्रतीत होता है । म सपना-वीसी 46 इस पारणा का मापार कि हेमरतन मरिमे १६५ में एपित मपने पयस्थानी भाषा के पोप मारन परमिनी भोपाई म मरेने पावि (47) पप का प्रयोग-नरके अप में किया है। मका- ईद माति (क) हमार र पारिन । मेर सजिम दुरपार । निमपुर मम । दिम मार हतार ॥१०॥ जन पर पारसा बम । रस दिवार पार । रोबर सरोग मेस्ती। पग बार पार ॥॥॥ (ख) सामे कोई व माहे मिणिपोई संता१८॥ हेमलम सूक्ति पोप भारत परिमनी गोपा (सं. १९४२) अपि स्वायर में भी अपने हा प्रका' (पना कान • १३१६) में भर का प्रयोग किया है। मा- (ग) प्रसीमा स्तम बानी हटाप । हामन्ती पर पर मन भानी भाम ।। हर प्रकार १४ १-देशमाची पन्नों एक इस्मी समन मिसमें एक नाम राता मोर समरा उस र प्रतिम प्रभार से प्रारंभ होने वाला दूसप मेर पाता। पारसी विषय पर दूसरी रक्ति पाया है। -ही.
[राजस्थानी सपनिमय इसी प्रत्पर गरीबरास में भी 'मपनी' पराकी पानी में 40 में रसमा 'काका' परपी एम मायाप या साप तिथ एक परमी है।' इसमे हम सात (गाबादेत) का मर्म में सिवित मा मे से। इसे पपिक महा रापा (मो परस्सामी में 'सा' बना है ) मका कोई महत्व प्रतीत मही होता। एर पम्प प्रकार से मी 'पाठ' पनकी पुत्पत्ति की मोर सीव किया था सस्ता है। पारतको एक मिपित धमपू+व-पानवारक-मान र पर अनुमान किया ग सकता है कि परस्पानी में नौकप्रिय र पा (ोहा) प पर पित कारखी या प्रमनिय (पना प्रकार को राजापानी पपितामों में 'खासमारी हो तो गई पाप नहीं। यह मौका (m) म सपर से हो गोड़ा गया गया है। घरमा म मुझपर पति तुम्मुल पर भेती का प्यापक प्रचार पर है पर इससे पह नही कहा बा ताता कि पमस्वामी की पनि पौर सातलियों परम फारसी से गम है। पानी पर तो पारती प्रश्न पर पथपि इस पर भी राजस्मानी आ पपना रंग करनी है परन्तु पनि ती तो मरन भारतीय प्रास्त कप पारपायिकामों में पप भी मसतीपोरा सम्॥ (१) सुबन्त गप की रपनामों घ संक्षिप्त परिचय राजस्थानी चाहिए जितना पिसाप है रसमा हो विषय बनी पोर बना सिप्प पूर्ण की। राजस्थानी के साहिस्सका मै तुर्मत गव में मार पना की है, महसप पिकतर पाप मुकामाप साप बीप बीच में एपमा करने की प्रणाली राजस्थानी में काफी पुपनी है। पाने पर बर दुमत कर पौर पप मिभित नामों को निधनाम से प्रमिाव किया पया है। मस्तु । पप्पाचन पति पर नाम 'पानिमास (सं. १ ) परस्मानी : पपीत प्रपम सना है। इस मेस मासिवनम मरि है। इसमें महाण पहासपुर पाटण पगा प्रपतीवम प्रयोम्पा धमा सोमया एनमरी में प्राप्त करने की कला है। पप बनारमहरासी भागात पप प्रमुमर पहरण प्रस्तुत कता है। बवा- १- एमयुमार पक्ष । हिन्दी पाहिला विकारमा लिदाय प. २४ २ मामा मुस्तुम हिन्दी एप कोष । 1 . प्रस्तापना ] ' चिसो पाम प्रामेन प्रनिराम । पो नगररांगहो पानीमा कर दुर्ग, शिमा होस पाय न मीपणा यामाग्य । प्रगर मोना स्पा सणा सार। म रेम माहि नही पहई तोक मुर निहा। हरि पुष्प तर निदेय मरमम प्रम । तिणि देवि पहरणपुर पाटण परीर, मिहान प्रयाय मत । जीसदमपरि कासी में कार पामि पो मार रार प्रसोनी पार पावाम मणी बाई महासम पाई, समुा बहन भाई। 4 किमान पर सिर मार, रमा मम पणा माना RE रसमास मरवरी पोटीप्पर तग्गा प्राधाम । मामन मन को पर मान । पारी र बमपर प्पर महनह प्रक्षर। पुरिनी (#. १४९२) रामापानी तुमेत का पणारी मय की इसरी महत्वपूर्स एपना है। इसके पिता श्री मिनवन पहन पासन संग सपपय पापायों से संबर एक ऐतिहामिक रसना पनकी मारा प्रबादममी 0 ऐषक है। सपा- "बिम र बाहिर निम गोरिणा मादिर बिस इस पाहि काम, नि त बस्तु माहिति जिम नरेन्द्र मारे पम रिण स्पट पाहे काम सिम की माहे एमा निम पारिश माहे मा निम सदी मामि दौता बिमी बाहि वीता जिम साइक्षिक माहि रिमारिय, बिमल माहि मारिस निम प्लमान पितामणि रिम पामरस माहि गरिस भिम पर्वत मान मरममा, गिम परेन्द्र माहि ऐपण विन्यु बिम रख पारि पुत्र रिम मपुर मस्त माहि ममूत विम सांप्रतिपनि साल मामि प्रानि विज्ञामि तपि बपि पनि रमि संपमि की प्रवक्ष्म एमी तपोमन पाताई अपर। इस प्रसिरित राजस्थानी की पोरनी का पनामो में 416 मुर गरण मिलते हैं कि भारए मन नाम हो मीने विवाद है- रचनाकाम से विकमी होपमान मूरि २ मुलबानुमान १५वी मवादी १-श्री प्रगरपान नाम के एवरमाली गय काम्य पामरा भी कम पारा १ बस्तुपात चपाम राम पशान है " [राजस्थानी सपनिम्नमें सीम साहिबारे रीमान प्रमात . भीमन बिगिनि ममनमुम्र ३ ममाग मार प्रभाव १बीवानी जापानमेव भी पाबत रोरो पहरो प्रसन ग्रमा राति पणा मसात मिरगोत्पनि उपनाम 'पाडौ बालिक कपिमा पोशाम रमहर-प्राम दायत-धना 'नाम सपा में रिस पर पाठ के माला बी टीम श्री महावन मारेर में मिला है कि 'रवात मोई परमही है रिस मामामो पर्यो प्रया गणों विपार हो । या मत्मानुपास स्प गध-बाम है । मत्पानुपास ममानुप्राप्त पौर मिी प्रसार का मानुशस मा यमा सिमा हुमा नच प्रकार है।' गाय मा समाएं पति पतन महीनी समग रबमा १८ नीबार की है। इनकी माषा और प्रेमी-पाप पर विचार रने मे प्रष्ट होता किनमें गभरमी रस भाषा मे गोए पागों मा बागम्य है-माही बोम की माघारमा ससप के श्री वर्मनस हो गावे- पा मापो । पार बसे राधारा पोरनी पत कहो मममस की बाधा हापौरा होगा मुनर कोसी रागा। कोण कोण पानिमा कोरम को पाम 4॥ -सिनमुन मूरि बात (१७७२) मम प्राण वामेत मग नागे निम्मििमत है- स्पन। रमिता रपनारस विक्रमी म०में १ मतिराम गौरीसान मा मापौरम बी एमाली २ मिमुबसूरि साव उपनाम गम पिय १००२ माग परमप ४ शिममाममूरि मापन पम्मपराम १५१.मौर १५२. ( विसरमा) माप १-ममयमा प्रमोइसिस आवाराम पवारिमा १२ १-नाप पर मीन -1 २३ प्रस्तावना ५ महापर सरदासिंहगीत प्रज्ञान पात पाव ७ महापर रखनसिपी की दयाराम भी मामी बगाव ८ पुरगरत बी पाह दुरगारत पर संग्रामसिंह कारवायत प्रभाव प्राप्त प्रति स० १८९० उपयुक सभी बावा का संक्षिप्त परिषप धी अगरबर माहटा में अपने पात संमक पनामा की परम्परा शीर्षक सेत म रिमा है। कनिका संज्ञक तुत गर्ग की रचना पनिका राजस्थानी की एक अस्पानुप्रास प्रबना तुगत मप-सेना है। किन्तु परपरा म उस गप्म प को 'पपनिका' संझा बी गई है जिसमें तुकात मच के साथ पप भी सम्मिलित होता है । ऐसी (एनामों में पच की अपेमा पप बात ही कम हठा है । पाहिल्प पर्पणकार की मान्यता 'गपपयमय काम्य परित्यभिधीमव' के अनुसार परनिरामों को 'चमू' कहा जा सकता है। पगस्पानी में जैनों में भी अनिवाना की रपना की है परि पारण ने भी (क) जैन विपनिया- मपि न पयितामों 'पपनि सयको साधारण मचके पर्व में ग्रहण करके अपनी टीममा, मास्मामों और प्रमुबारनामों को मी पनिका' माथी परन्तु १६षी पाती के रत्तराईनों पित दो ऐसी पमिकाएं भी पिनी । जिनमें तुमर्मत नप का प्रयोग किया गया है । इनके नाम से 8-(१) लिम समुद्र सूरि की निका' पौर (२) चौतिसागर मूरिकी पनिकामीचे इसका संक्षिप्त परिषय रिवाना हा है- १ जिनसमुद्र सूरि की पनिका इसमें सममेर के सप्तरपञ्चामा भी मिन समुा मूरिकी अपनी रामपानी मे मसम्मान पाममित करले बाने अब धातमके यण मौर कीतिमा वर्णन है। से. १५४८ मा मास में प्राचार्य श्री बोमपुर पबारे में। यह मनिका भी पूर्व पपनिकामो की ही भोति परखन-मिपरता से पूर्ण है। उसकी विषय परिपि राम सातस द्वारा भी जिन मूरिको पार्मभित करने पर बातम पस-वर्णन पापा का मपर प्रपा पनन स्वापत पार उस्सर बरन क सीमित है। १ मे होना बनिभार ग्रस्मानी भाग २ पृ• ७७ पर प्रकाधित हो की है।
३०
[ रामस्पानी पनिकाएँ
२ शांतिसागर मूरिकी वपमिका
यह सरवर पम्मी पाभ्य पक्षीय पाखा के प्रमुख वावग्यापार्य श्री
मासियामर सूरिस सम्बर 1 में पारार्य पिम की १६षी पती के मध्य म
विद्यमान । इस बनिका बम विषय का प्राधमन इस प्रकार किया जा
१ सतरपन्यापाय पी पातिसापर मूरि का वध-वर्णन ।
२ पर बोय पुत्र पी मूर्यमन व मि ।
३ रिपन पुरय पारा पापाय भी पेपता गुमापा गामा ।
। स्वागत समारोह सपा उत्सव ।
५ बोपपुर में रिणव ठाकुर डारा उनका प्रदोत्सव ।
६ बापपुर में प्राचार्य का पातुर्मास ।
उपरोनों बम पनिकाए परमानुप्रासयुक्त पच म रखी गई है । माय
मारत मे है। दोनों रपमामो सवितामो के माम प्राप्त नही है।
, मोटर साहस कीपर बउ पार पसाबर बोडासी र इस्यास
पएर पाणीपट । किन पवार रिण मुमार । भाषा परिषत कोट कटा पन
मदन । हारिमा मान मनमाम बारम पग रिणमन पुन मग्स भी गोषपसा
प्रतापी प्रवण माण पत्र समापिएन साप साप ।
दिन समरसूरि पनि
२ इसी परिभाष्य प्राठि गाई जित बाई मी पुरि पाई, मा
नापस माई प्राहे वाहपरसाई यदि प्रम्हान्सर सगाई। प्राय तह प्रापि
पिरप रोवापि महम मोटा कर पापि सकस पावक भी प्राप्त प्रपि ।
पातिवापर मूरि की परमिका
(A) भारणी बनिया-
मब तक मारणा पिता ही परनिकाएं उपसम्म -
१ पिपास कारण अपमपास गोची री पनि (१४.) मोर
(२)सिरिया गानिका पोर खनसिपमी महसरायोत (
44)।
र रोमों पारणी पनिका हमारे निप का विषय है।
M
अचलदास खीची री वनिका
धारण सिवास रो कही
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अचलदास खीची री वचनिका कृति भौर कृतिकार अपमपम सीपी रोपनिमा पारणी माहिरप मनात्मा मय पर प्रपम पवारा• सीतोरी मे इसे The treat Clasical model की सहा दी है। यह एक ऐतिहासिक सना है, जिसमें गागरीमण (कोड राग्याननस) मा प्राय पाम बीपीपा कीति-स्तबम किया गया है। परमास सोपी किम संवत् ११७ प्रामपाम मिहामनाबद हुमा का। समय विवाह मेवा महापणा मोरत की पृषी पुप्पा में हुपा पा-बमिका में मही नाम मिलता है बब किस टार मे उममा नाम मौसाबाई रिया।। पचमरास मौनी बार नामक एक प्रग्म राजस्थानी रचना में भी मोकम की पुषीस नाम नीमा दिया गया है। मामाता है कि सिंह के समय प्रपनाम में महाराणा मोक्न से बहमपन सिमा पा हि गोंगाए म राम्प पर मामण किये गाने पर महाराणा वधको महापणा करेंगे। समान (मा) सुलतान होगणा पोरी मे गागरोण पर साईकी तब अपमपम ने प्रपमे पुत्र धीरज को महाशा पास सहायता प्राप्त करने गय में मेगा । पमिका मे भी कहा गया है, पीस रहीपणा मोसमी पासिमपर। महाराणा अमनरास की सहायता पामरण के लिए परमान करती है कि पापा पर मेरा म उन पर शमा । मारमा राम रणमम मी प्रथमराम की सहायता के लिए मारिन्तु मार्ग में ही महापणा मोरम के बम का समापार तुम पर सीने मेमा, पो गये। इस प्रकार अपने लिपियों की सहायता यषित होकर मतदास मही मागाह मोरी से पुर पिया । परिझाम साप उसकी पमियों में गौहर अमावा और बह पपने सापियों सहित पशु संहार करता हुमा बीरगति को प्राप्त हमा। इसी प्रसंग कोबर पारण भिररास ने पक्षमाम बीपी पनिया की रचना की है। बीर अपनराम भविमोषित पारस एवं बनिसन मा प्रतिपान करने मानी यह भीर-रमारमक रचना मागे पम कर पायनिक मोतप्रिय हुई मौर महीप १-तेसिवोगे-- रतनसिपी महेसचमोतरी पनिहा-दादोगान ११ २- पगरपान मा मस्तरण १ ३३१ १-अपीमनि गहलोत : मारपार का इतिहाम प१५ २४ [राजस्मानी पनि एक प्रतियो पार हुई।' इनमें से प्रतिया बीमार के प्रभूप पुस्तकालय में मुरक्षित है। मो.नरोतमरावी स्वामी समेती पंप की प्रति को प्रमाणित मान र इसका सम्मान कर ऐ३ हपने भी अपने पम्मपन में भी सहरमा रिये ।। शिपवासच बीवन-व- पिन के विषय में इतना ही ज्ञात है कि वह नागरीण रामा प्रपनाम प्रपाभित पारण कवि मा प्रतिरिक इम गोपनपत्त के बारे में ही पुरा नहीं मिलता। उसके पिप में यह रिकाम्ती माय प्रमित है कि पुरके समय नम महकी सा र पाना असम्भब हम्मया तब अपने प्राय साप निरास भी पशु मे ना कर पीर-गति प्राप्त करने के लिए प्रस्तुत हुमा, पा से पुर में मम्मिलित हो किया गया । उमे पाहा की गापामा (बिने गुर से मिल कर दिया गया मा) की दुमा मिए बोषित हे एक प्रस्तुन मुख विपस में काम्य-रचना काये पानपरावा की नीति को पिरषापी बना । ततः सिमास को मात्रामा पामम पला । सपने सम्पूर्ण पुरको पपनी पानों में बाबा पपमै मायरामासा अमर करने के लिए इस पनिका पीसना की। पनिका घरचना पना- पनिका' में रमको मना तिपि वा मारे में कोई समेत नही दिया मा पठएर रमा रमाकास निधि निर्धारित नही मिा गा सावा पर इतना निश्चित है विपकी रचना उपयुक्त पुरको मना + बार ही कभी हुई है। ग. गौरीपहर हायपर मोम के अनुसार यह पुर वि. म. १४२. पासपाहमा पारि महापणा मोम मप वि.. १५.ममा। मौवामान पैमारिया ने इन पुठ का समप विहे. १४६१ माना । ये दोनोंमत सीरीम नहीं गान पड़ते । १--रा.सीटोरी को इसकी कई प्रदिपा पपने अनुसंधान ममय प्राप्त हबी मिना गहरे पर्गम पार पपिपाटिल मोसायटी पार मान माग १२ व ११ मार बाग सन् १९१० महिमा है। २-टप ग.टोरी पनिका ग. लनियनी महेमरानोतरी-पदोमान ४ ग. ३-० मिटोरी-मिनियरिय पेटमाप पार पाकिor freोतिम नम इटिमो मेहग मासिक पोटी माग १ बतानेर रेट पर r-n. मो.80 प्रोमा-यपुर पम्प इतिहास पानी सिम पृ. ३५० 1-0• मोठीमान मनारिमा-पसम्मानी मापा और माहिरण ....
रुनि और विकार [२५ मुखपमानी एमी तपरिणी में भी पप इस मामण, पुर तपा मानरोण नियम की कोई मिषित ठारीस नही दी गई है परन्तु उनमे बरिणत पटनामा तमा मान रमाम पर दिपे पये हिररी सनों के मापार पर मामरोण पुरतमा भबमास कमी की मापु की तारीक और सह संपत् निषित करमा पनि नही है। बावन पारी' पौर मार-करिया रे प्रभुमार पामरोण पर होमपाहमा मालमण हि सर २१ (. १४० वि-२४२३१०) मा पा । पुराव का मुमताम प्रहमा घार २४वीस-मानी १२६ f. (घास पसा १. १४. f. पप्रेम । १४२५०)को पुरापत वापस मोर पपापा 1 बनता पापप्पा पारी का होगा में पागरेण परपी'म फारधी पारिकों में मारपेण त्रिय सम्मापीनोई विस्मृत वर्णन मही सिमा पपा है । गायरोण गीत मेरे के बार होगमाह मे लामिमर पापा की तब रित्तो का सेयर सुमताम मुगरा शाह सामिपर की सहायता करने को पाला होता पण मौनपुर पहुंषा । वहाँ मन्त मे मुबारसपाह और होगी में मोर दोनों के बीच मापसी समझौता होगया । इस वाई ये मौट कर मुबारक मा रमय १२७१ (पषिक प्रापा ११ मि.-- १२.) मे मापस रिस्ती पहना पर। प्रव. सप्टतया नामप्रेस पर पाई मौर विजय दिनरी सन् १२६ (१० सन् १४२१ वशुमार • १. वि) के तपय मे होगी। फारसी मारिसों में इस पहाई और बिबप ममा नही दिया गया है। पपमपास सीपीरी बनिय पनुसार यह मुर महाष्टमी (मापियन पुगत ) मे रेकर दूसरी प्रप्टमी (कार्तिक ..८) पना पायबा इसी परिस्पो साटो सामता मरता माot महा पम्टमी भारप एप मावर पर स्पो पूपरी अस्टमी मार से प्राप्ती हसी ।" मामी छोममार, सितमा ११४२३१ को पीपातिक धोमगार, विनम्बर २७ १४२११.को पड़ी थी। पता सष्ट है कि प्राराम सीपी की परागम प्रौर मृतु हार्तिक १८ मि. (सितम्बर २७ १४२.)को ईपी। १-~-मान-प्रकार (मप्रेमी अनुवाद) • २०17 , हिम्म रखवारी सिरिता का प्रेमी मनुवार ४, पृ. २५ २५,२८२।। ए-उराहा, १ • 100 NNY., विम्म ११० ११५५१८,४ पृ.१८), पावसामुगारमाही (अंग्रेजी अनुवा). २.१ २१. । १-रोमानापसीईपास अपनास औधी रीमनिकापा. परम धर्मा का ऐतिहासिक परम प..
- [राजस्थानी बचानिका मुस्ता मैसपी की मात में एकतिपयक वो भी उस्लेख है । ईसा की पानाम्दी समिए प्रामाणिक नही माने वा सन्ते । प्रत उनके पापार र महापणा मोफत और प्रवास सोपी मृत्यु संरत को ए- मान र विकार रमाक नहीं । मामोम्म पनिका सस्नेह से गापरोस रहाई के समय महा पणा मोकन पिपमान में 1 प्रत मोक्म के मरण संवत् १४८५ (१४२८.) मार दाने में कोई कठिनाई उपरिपत नहीं होती। इस प्रपर मिय है कि इस पनिका की रचना मानरोण पुरा पति कि.न. १४. के बार ही है। इस कतिपमानास विषय में ग. मोठीनाम मेनारिया का मत निरामार सिख होता है । एक प्रोर वो मेनारिया बी पापण्ण पुरा की मामा को वि० से १४५ मामते है 'पौर दूसरे स्वम पर इस मुरम बमा को लेकर मिसी गई इस बरामिका का पनायन वि.स.१७. निर्धारित पानीपरंप के प्रसिरित परसरात पर दुरटला को हर परस्पानी में एक सपना और रसीदो प्ररतरास पीपीमारता' नाम से प्रदिर है। इसकी एक प्रति सबकीय पुतिममय रायपुर में और एक मुनि भी कातिमानरमी के संण में मुरमित है। बीकानेर में भी इसकी कुध प्रतिया उपमम्प । 'मान + पारम में परमरात की दो पनियों के प्रेम की कमी है पौर उत्तर मे ममम मोर माग मुम्तान के पुत्र का सम्मेव है जिसका पनिका में पमित पुरका पूर्ण माम्म। पात' में बार मौर बीररस प्रधान सकि पनिका में कही प्रपान रम प्रौर पह। पौर' । १- मोपीनाम मेनारिया-पवान मारा पीर साहिम पृ.१.. २-1.मोतीलाम मेनारिया-नगम में पीर रस १.१६ ३-मोतीमान मेनारिमा-परस्पान में हरतनिखित पनकी जोर बाप ११.१-२ साहित्यिक-विवेचना पपनिका की कथा करिने पुतलो-वीस इनि-की सम्वना पौर या पुस्तक पारिणी समीर गरि पति पीतनार पुरस रिसरण पावती' का स्मरण करके परमे पन्नका समारम्म यि बरिको मरमी प्रतिमा मोर पर्य-विपम पर पहै जिसे उसने म मर घाबर पर बोलर पर मुभात एक मगन मौरसमा विषाय" मत पिया है। तापि पर यह मानता है हिबाह भी सस्त आपमा बारेमा यदि भाषी राणा परती सभा सहित पति सम्पपारखिमों सहित उसकी गति को वित देकर मुर्नेमे- पामिन पग पगा सहित मूरित हुई सुबह तर सुमरि हसके बारपा मारम्भ करती है। मारपति होषणा पोरी का बलगम पोटी पर है। उसकी विस्ट माहिती माने पारों पिणामों के पास मठ-तिर हो गये हैं। पर इस समधिमान मोर-पमा पपसरावीपी पर पढ़ाई की टम रसके साप प्रत्याप ११ मम्मत पापति पी द्वार ही मिले। पोरी मा की मेना प्रसंस्म पी रमने १२ साब पायी पाया मरसाच मामर सैनिक इनके प्रतिरित मियो समान बाम गयनी बार समरबार एयरत पार सरीर पर पनीर पार उम्पूर्ण सा-सम्पन्न पराक्रमी दिम नरेश नापिनी पपने रन-बान पहित उसकी सेना में सम्मिमित में। पोरी बाकी यह घेना बापती की सब सूर्य पुन मान्चर पाता का मौरी शती ई पायमान हो सम्ठी पी।प्रामान समय सेना के अपने नाम को बही पानी मिसता या उसके मम्प माप को ही की मिलता पा और जब सेनाका मन्तिम भाप बस मै पुगताना तो यहाँ एम रहने समठी पी। रस्तुत गसप निम्मापिया। सिहपौर एपी एमप-प्रदेष में नाम करने पिर उनमें ऐसा पा मन्या कि हामी दो मास पये में पिता पर सिह को कोई कोरी में भी नही मेगा । यो कारण यही है कि हामी प्रपने बमे में बम-बम्बन समा मेवा है-परापानठा सीमा दावा है। एसे लोग यहाँ मौसीप रही पता गावा है । मरि सिंहबी हापी की भाति नन-बान पारस करने तो हमी रस साल २८] [गमस्थानी सपनिया मरिमा पर फिर भी सस्ता कहा बायपा। पर पा ससकी पीर प्रकृति मौर मस्सा - अपमारास सिंह के समान है। उसने गोरी पराका पन मर्वाद पसी पापीरता स्वीकार पर मेले में प्रस्ताव माग से गुपित होकर दोनों हापों में पारा मार मोहित पुर किया । वह मरमा (अपराम) अनु की पका में ही पाबा पराधीन नही बनाया गा सका-मने कापर ( हायी ) की भांति पणापता (गम-मापन )स्वीकार नहीं की। पमीप पस-तेग और मौरब मगित पराममी गोरी पा धप्रदेस के प्रमेक मिक्स पोरों के साप अपमाम की मोर बापमा वा पापा। ऐमा कौन हित रेम है ना मोरी प्रति मर में भी मुशित होने का साहस कर सके। किसन मापा सका है? सिमे ये म्ट हमा है ? और दिमडी मां ने दूप पिसापा है गो रसकी तनबार सामने टिक सके । प्राय स्पिशि बड़ी स्पनीय है। प्रा रेम में न तो मोम मौर धाम मे भीरमाही पीर महीमहरष से पपम्मी पगाही अप है-हीना हमोर भी प्राप्त हो पुत।। पों का पहले भी एक से एक बार यवन-मुम्तान हो पुरे मिहोने एप ही दिनों में चोरामी युग जीत लिये परन्तु इस गौरी मुम्तान , वो एक ही दिन म ८४ दुर्ग जीवे है। मे पिस्ट पोर पोर दुई मोश के सामने कौन टिम सस्ता है? और किम ने पटना माहन ! मो उमड़ी तमनार के पानी के मामने पर मो? पोरी मुम्वान + बम पोम्पपी कोई मीमा नही-उसने सब रिमामों को बीर राम परमेस्वर (परमानाम) पाप है उमा साहस एतापनीय है। योकि उसने उस पिपट पाजता से बाहर मिया- उहने म पो समय पीनता प्रापित की पौर म प्रम्प कोई ऐसा कार्य हो या रिमो रमा सावित गित हो। प्रपमरास की ही माती पीन उमने उम मोरी रामा गोहा निया जिसमे रिधाए पवीपी। दुर्म भरा गोरी राणा सरस-बम गापरोस निर प्रा पमन । ग्वने पास पास पार कोस को खीमा म तम् पारिशकर गागरोण गा को पेर विकास एसको बारा परे की सूचना पाते हो प्रवनदाम पुर के लिए बम्नर हो गया। उसने पान साधी मामन्ती और सेमिका को प्रापा पर मर भी नामा करने का प्रण नेके मिए प्रेट करने पर हमारे मा की पुस्ता प्रकारे तमाम माविषम है बगमा भी उस कार में पुरता पा रहा है। पोप प म मयाम्प दुर्गमन ही जीत मिए हो पर दम यह एर्प ना भारी पपा । म संसार साहिस्पिक-विवेचना [२५ का बम पारण कर मी पहबर पर पार नही रा सोपा- साह मायनसार परम पार म पायिमर पबम को पुरमिए पनर देम कर गौरी में उसके पास पपमा त मया । पूव में भषम को समझाते हुए कहा कि पोरी मुम्बाम पामरोण मेने के लिए ऐसी पिठ मार विनाम माहिनी सगाई है यो ग त को निमित परले में समर्व है-- मममसर मणपार रस सविसर परिणय-रागत ॥ सहा लेपमहार कोर पोरी पर मारणी।। पतएम रस मी प्रन्यान्य दिन रागामी का पनुमरण करते हुए गा घोर देना पाहिए-रमे पामम (पोरो) मे पार पपमा प्रेत मिस्टमही साना पाहिए- 'परम परे मासम मरिस पंत पापरर म पासि। पर मरत मही माना । उस कुप पार्मों में भी उसे समझाया परवामपने निरषय से मही गिरा। मपम ने मा-मुस्तान र कर पाया है पो हम सामना करेंगे। पहले भी परपरा प्राये पर पौहाम संघीम मविय भपने गाको घोर कर कभी एनावित नहीं हए-पीमर मेमी करि पानि न पर पवारस"-टीपीसीय परत मी या के सम्मुख भी मही भुकेश- मानसीबी मीर पर मी पर मेली की" अपने स्वामी के पुत्र करने के नियम को सुन कर उसकी रानिमो भी गम तम्या सान कर बाहर प्राई । मेवार पणा मोकम की पुत्री पुष्पा मे मबम से पाकिस्मामो मुटबम बम भाप के पास म प्रग रेये तब मैं भी अपने दोनों मात्र पितु मौर मपुर-पोको समुग्यवत करो। यथा- सामि तू सर मानि पासिम मापाईगा। हर रगामिसिपापसा, ये पर सिणि सादि। सालाही रामी में भी ऐसा हो उत्साह मिलाते हुए कहा सणे पाणों की वर्षा होगी तब में ना की कोट पर की होकर प्रापके पारे मागाळपीमा- बह रेखा परपेठ कोटे माही कहा। हो मारी होइसम दम हट कोसीयो ठ ।। बापाप की सोचती पनी मे भी पौर-मंत्र को ही पतप्ट बताया 'ममर मग मरिवारबोमा पनि बापागी । क्षबाधिपो ऐसे और कम सुन कर मतीमो सारे सनिय पुर के लिए इनर हो । रए-मेष मे प्रमेय बले से पूर्व पारे सभी सामन-निक प्रपनगम ३०] [राजस्थानी सपनिमः में मेंटने पाये। म प्रथम प्रगम ने अपने पुष पारहणसी से भेंट की। तदुपर्यत प्रमाणसिंह बरणसिंह कमसी मारि सभी प्राप्तीसो बैंकों में अभियों से की। इसी समय ४. Bहम नारियो का समूह भी सामने माकर सपरिणत होपया । मबमा पौगए और मौसी पोरसी बाबाएं मारि सभी मपने अपने बार भरवार के पुष्पा को देखने की माकांचा से प्राप्मानित पी । इममे प्रचाकी मावा सफमारे भी उपस्थित थी । पुप्या मारि पनि प्रसपमो सी सप ही पी।सके प्रासारो के स्वर्ण मरित कमचा के उपर प्रपती हुई प्रगामों के सौरम का वर्णन नहीं किया बासासा। - हमर गौरी-मुमतान अपनी प्रसार मा साप कामो मेरेड़ापा । प्रचस मै भी दुर्ग की रजा का पूरा प्रपन्य कर लिया पार-द्वार पर ही नही पप-पर पर मनुरी पीर सैनिक और स्थान-स्थान पर मर-मैना नियुक्त की पापी । इस प्रकार पा मेने पाले प्रामोठा बोरी और गरमक पर दोनों का पप-पग्राम मापपर्य बमक और भयावह पा। नपारे पापड़ाने मगे नियम पुत्री पार पासपोमा प्रोपित हो बठे। मातम (गौरी) और मपम रोगों पाने । पुर प्रारम्म मा । मनुषों की प्रस्चाएं तमी गणों की बोवार होने ममी रवि यह पता पौर र मारले मने । इस प्रकार हरामिम मौरी पौर सीपी पपसरास ने ऐसा भयंकर पुर पा कि पत और रिन का प्रवर मिट पपा भूख और प्यास विस्मृत हो गई। पदवे-माये, मरने-मारत एक प्रष्टमी के बीतने पर इस प्रष्टमी प्रार्ग पर मुरा का प्रत न पामा । विष्ट स्थिति रहकर प्रपम ने अपने साथियो काकि परण एक बार होता है और यह पर्व बार-बार नही माता । प्रतः कीति की रमा होनी ही पाहिए-मौहर बसानो प्रौर मु-पम पर टूट पड़ो। सभी पार्मत मेनिने में इस बात का समर्थन किया । सात नाएर प्रथा को सुपाया कि हम भानियान और पवित्र दुनमी की माता पारण करके पौरी पुस्तान पर पर गौड़ना चाहिए इस प्रकार मरि हमने प्राणों की बमि तो हमे सूर्य-ममन में स्थान मिनेपा- बिने पग पत्र की भोर पकायें हम रतने ही मालमेष यो के पुष्प के मानी बने। मपन में इस प्रस्तावको प्ररने ही मन की बात कहकर स्वीपर कर लिया। बोहर माने का निकाय होने पर तलाम ही ४. महम मारिमा पनि स्मात करने के लिए प्रस्तुत होगा । उना भटम विश्वास पाहिब पीर सोने में नही गीत सम्वा सौ प्रचार गौरी-एमा रन नही जीत मया-पहिस्सा नारी सम्मुख तो महाप घिर भी हार मान पर पे गौरी की तो बिसात ही गया ? RAरास में भी परें इतिहास में पणिव बोरसम्म नीति को पुनपत्ति बले हेतु प्रति किया।
साहिस्पिा-विरेषना] [३१ परमार बीरको मेवाहापिाहि पणा मोका के पास सहायतार्प भैया नमा पा पर उसकी ममी का कोई सूचना नही मिनी को पा नही उस पर मा बीवी । मवएर मनात ने नियम मा के लिए अपने दूसरे दुमार पाहणसी से युद्ध वित होकर अपन किती सुरमित स्वान परपसे गाने को कहा । पर बीमार ने से कायम सूपा रवा कर प्रवीश्रर कर दिया । ऐसी स्थिति में सुम-रक्षा के प्रश्न में सरको पिठित ररिया। परम की मात्र समारे और उसकी पनी पुष्पा में पासपी को समग्रमा हिम को सिरसने के लिए बोर को मारा हर ना ही पाता है। पता उसका पुर से विरत होगा कावया नही हमादेवी । फिर भी पासणी नहीं माना । इस पर प्रपस मे पाहवती को संबोपित कर कहा कि "हू कापर है, पुप पोजिस मरमा पाइला है बीवित रहकर पो उत्तर पवित का निर्वाह कला तुफ ममीष्ट महीं।' इस पर माह पाया पाकि जपानमा मर माया । बोरा बार फिर कम्मर विमति हो बोता 'अपने लिपी सास-सरपरकामारी मीर पमणी तुम पुर पिरत ही नामो।" पाहणसी निस्तर होममा प्रवत ने भाव-मिगाम होकरमारको पने से सपा मिया एवं मधु पोध कर उसे मापार से हुए मा कि सारा पर प्रपने प्रताप का प्रसार करो और पोरी मुस्कान से मार भयो, यो प्रतिशेष सी । मन्तत निमम शेकर पासपती को अपने पिता प्रामा पामन रमा पा मारमा पानी मातामों से गले मित मिस कर दिया हो गया। पर बौहर या रिया क्या, प्रमि प्रमसित हो रही परवानी मत्रिय पीपमा "हरिही सपाल साप पीहर की माला में प्रविष्ट होई । बोहर यमाने पर पर बोहरिरे पसे । यस सार रसके ममी वर्षिय वामक-मिल माटी में रखा मारे एवं पशुपम रट पो। मगर -सात पीर परनारमा पर प्रदेश पों को मुष्ठि हा हा पंत में स्वर्य भी रोगवि प्राप्त हुमा-"पसा प्रसुर परम पार पारे पसर पो।' रममे प्राणों पहले मपना पर मनु को नही सोपा-"मापण दुमन पप्पियो बीरत भाइन पद'इस प्रकार मरत ने बार में अपना नाम और सर में प्रस्नो पारमा रोगों को प्रपात बना रिमा-खेसारिबोर मातम पनि पम पिपा पपस। बस्तु-विवेचन पपविका की कमा मसान्त सहिप्समा बस्न भी मरम मौर पर है, कही मोरनही ही धुनाव नहीं, सर वित्त पति और स्वाभाविक प्रबाह है सिका प्रासान कपके प्रेस में हीमा है।
३२] [ राबत्यानी पनि कुम देवी की बम्बना पौर सम्वती को स्मरण करके परम्परापत मंगमा-गरण एवं परम्पपमा निहि किया गया है। मुम रूपा के प्रारम से पूर्व कमा के केमस रिकार (सेंटरम) मारशियाचो कि निमित ही सापीमता र गौरव एम बीरप का प्रतिपारन करने पाला है--को मस्यंठ ही सपत भैमी में प्रस्तुत कर दिया गया है। पना- नामर पत्ता पमुस्लिपर यहाबाद। सिंह मदतए ने सहा पित किए। प्रवन नर-सरी है यह कायर (सपी) की भाति पपपीनता (मत-म्पन) कमी सहन नहीं कर सकता फिर चाहे उसका सभी पुष यो म स्वाहा हो पाये। यही वह मून पुर्य है-सम्म का म्येय याय है-विस पर घमस्त कमा अमती ।। नारी सुम्तान अपार सेना संगोकर प्रथम परम पाया है प्रसम्म नरेस उसके साप है और प्रतीम उसका बम है । धमस्त स-सम में कोई ऐसा नर-नरेप नहीं दो उसके पाप कि सके । प्रतएव मह प्रबल बम्प है बिसने ग्स रिष्ट मी- बन पन हो पा प्रपलेसर । बारा नियठ बिरिस पतिमाह स सांग्स नियम्।' उस परम को सावार है कि जिसने मुस्तान सम्मुसम्म प्राप्ति कर प्रपने समितको चमित नहीं मिला । वास्तव में प्रथम मममय ही है। यथा- हणि पाविसाह पाया सांतरि सत पारि नही मनोग नही मन माहा पापर मंषित न होई परा परमेयर मरस मद ममसेस हो गई।' महा कपि, प्रपम की विस दौर-माठि की पोर संत लिया है पाने गमका गरबा न करके रखकी पूर्ण कप से पुष्टि की है। प्रबल पुर के लिए समय है। पीपीपीय नाम कमी नहीं एक साता नाम बीपी नीष । उसको रानियां मी मर-मिटर प्रपने तीनों पक्षों को सम्मम बनाने को प्रस्तुत है- मामिति प्रापणा मेणे पस तिणि वादि । दुहार और करके सपिय पीर परसर पानिपन करने के उपपन्त का सामना करने के लिए प्रस्तुत हो गाते । । एक प्रष्टमी बीत गाने पर दूसरी मष्टमी पाई पर पुर समाप्त है ।। अंत में बौहर बनाने का निश्चय किया गाता है। पर मर मिटने को प्रस्तुत है। यही प्रबन के सम्मुख मपनी कुमरक्षा में प्राय माता है । फाटा मार पाराणसी से पुल-रक्षा एवं पारी में प्रतिचाप मने + निमित पुर में लिप्त होने को पहा नाता है पर यह इन्भर करता है।पा का यह एक प्रत्परत ही मार्मिक स्बम है। कमि बारम्म में बीरबको ही अपने म्मेय वामकप में प्रतिपारित पर पुरा है। ऐसी स्थिति में उसके लिए पानी में पूरा पिख हेग इमा रिहाना मे संभव हो सकता पा! पर कमि में मानवीय समना को मायरममा - साहित्यिक विवेपना । पर दुकर भर्य को भी समतापूर्वक संपन्न किया है। पिता यह इसमें मठो कमिमीट को ठेस पहनी है मौर म ही पाहणसी परिमा क्षय हमा है । सब समय पर हार गये ! पर वीरकुमार पाहणसी मुर में सम्मिलित होने अपने निषय पर मम है। परमा बास कापर-कापुरम कह कर उसकी मीर भावना को ममहारा पाता है तब सिंह पुष गितम हो उठता है पर घरे ही क्षण पिता की पनको पर हरे हुए पभुषण रसस अपनी ममबाही गात मनका मेटे है। यह स्प इसमा मार्मिक और संरनीय है कि इसे पढ़कर पास की पसमें मी बरसी हो पाती है। बावाम पार प्रम, कसम्म और बसिरान एवं पौर्य मौर स्नेह का मही एक नाम मम सम्मिमण उपस्थित मा है। यही क्या अपने परमोतर्पको प्राप्त होती है । इसके पापा का वार प्रारम हो पाता है और न ही रसर में पपस की माप होने पाप ही बना पंस हो दावा है। इस प्रकार कवि अपने ममीए के पनुपस लानामा पोगन करके पीर भावना के तगमप प्रमान की मष्टि करने में पूर्ण रूप से अफम इया है । कपा के रो ही प्रमान रिपर है--एक पुर और इसप बाहर न रोगों में तुमन मनाये रखमे का सहन प्रयास किया गया है । ई, पारी की सेना का वर्णन कुछ पपाय माया है पर ऐसा पीर-रस + परिपाक और मुवानम बातावरण के निमित्त ही किया पमा है । पमह पनों की वस तो इसमे है ही नहीं दो बाउ है यह कपा से सम्पर पीर उसके गम को मामे गाने नामी-प्रत्येक मार क्या मत पूपिर म को मोमग हा का विकास में सहायक बना है। कसानु मे होकही पिपिता पाई और मो उपका प्रवाह ही समय मा है। स्पष्ट है किमिका की या में प्रभावित एकतामा समस्या सुयोगम संतुमन एवं भाषा का प्रमानेरा मौर मनमा पहिबार माती मी पण समाविष्ट है। रपयुक विषम पापार पर हम इस विष पर पहुंचते हैं कि मि की निष्प साहिरिपाक विमा के नियमो में कर मनिका की रमना नहीं की है। की वैसी घटमा अपने ममा रप में बटी पीसने अपने मन में उसे बसा ही विषित कर दिया है। सपना ने पुष्प गपय से उसने अपनी पार से कोई प्रायोजन नही मिाहै। मयस्प हो कपि मे मनु सेना को सम्मा पारित में और उसके पास पगम ममसन र म मतिरंगना से काम लिया है पर, पेक्षा हि पहलमा नाम कि ऐसा बसने पीर-रस के विमान के लिए ही किया है। कपा-मूम में बार एकरी ना होने के प्राण गमे बसाप मपमे राम का मेवर माया है । मुम्म पप से सेना और बौहर में सर-दो ३४] [पजस्थानी मनिष होबखन मरे पाये है, कवि में पुर पर्यन भी मपित नही दिया है समन्व-पून जोड़ने मानी पारमय बाप्त कर ही या प्रापे का पपा । मौषापन में कर विवेप रूप से रमा है पर इसमें भी रखने बाप साग-सापनों का वर्णन करणे विमिम पा की पारित्रिक विशिष्टतामों को प्रष्ट कामे पाने भाषों का ही वर्णन किया है। इससे हवा में नवीनता पौर रोषाला प्राई है। परिष-पित्रम पनिका में गोपन की पास और सापारिक प्रभिम्पति। यो पात्र मापा एक ही बोटिक है। पबम-पार्थों का काम के निमित्त नामोग्नेब पर पा है।घेप सभी धषिय पात्र समान संस्था और भारत में मपिता पर्यतीपर पुरकी पना का ही सीमित होने के कारण पार पची पानी का परिण रितना म्पक हमा : उतना विकसित नही हो पाया या साविक भी है। क्योकि पनिका पुस-प्रमान पनास तभी पार पीर प्रकृति हावीर के परिज म प्रतया निरोपकर पुर पपसर पर, बनि पानी पानी कपी हो+लिए कोई सान नहीं होता यह तो बर्म-भावमा से प्रति होकर निज पर्म और कुमाल की मा सरर मरने-मारले को प्रस्तुत पाता है। परिणाम की चिन्ता पा पात का भय पसे नहीं होता । फमत पहर की स्थिति में भी नहीं पता । बनिया की पाथ-वधि में हम पट्टी पर सरे । फिर भी शिरा मानव-मनोति को परमानने में समर्प अपनी मुमति परनस मार मार पाहससी को लकी स्पिति में मार उपस्थित हिमा है यह निविसे पास कोटिस कमि सिजकरने वानी है। पनिका में पात्र हा एक पर सनम परम पार मार पासणी हीरो ऐसे परिणनि पर पान का पान मित होता है। पानों में पानी की पिस्ता नहीं है मपत के परिलोतम यही सापक हए । प्रस्तु । अपसरास सीपी पनिका का नाप स्पट पपमराम है। सम्पूर्ण रुपमा समेत पी। पौर साप मा उसी में मेकर मागे दी है। प्रथम पापेपत्त प्राति म मोर निय मरण है ।बाम से पौर भावना से गुस विसरों से खबर और ससाभिमानी। ऐसे सुपर मे फि माय भूमि विरेसी पासवानों के पवित से ही है, पपी पिता के परिप-वैर का तर्प पता जाट हित मरेप पारस्परिक पिकी भाबमामों की तुष्टि मौर अपने पुत्र पापा की साहिस्पिक-विवेपना ] [२५ सिटिसिए रिदियों के पिएसमा बन देश को रसातम की मोर पसीटने में मये है अपसरास एकमात्र ऐसा पीर साभिमानी मरेपा है जो मिर पर्म और स्वाधीनता की साप पार पति संपन से पूमने को प्रस्तुत है। कमि मे अपन साहस-गरणको पक्त करने के लिए गोरीक पर निवात ही मतिरमित वर्णन मिया है। पौरी रामरकी मावि प्रसंस्म सेमा मकर मषस पर परमाया है, पर वह मयभीत हो । साहस और पेय का पनी प्रथम को प्रारम-समर्पण कला वो र रहा रसके सम्मुख समता तक प्रपपित नही बता पवा- वेरिण पतिमाह मा सातरि सत पाटिमही बन पांग नहीं सैन म भाषा पागर मंक्ति म होरपना प्रचसिर सारिता अपय भर परोष ही हाई। निएषम ही अषम पकि उसने गोरी 4 सब-शक्तिमान एड से मोहा मिया पम्प पम्प हो या बसेसर पारर निपर विणि पाक्षिसाह र सारठ मिगढ़ । पषमपुर-भाषय की सूचना पाकर मौरी उसके पास पपमा दूत भेरता है। पूत उसे समझाता है हिपौर मुस्तान मे पानव की भांति अपार घेना सगाई है- रत मानिपत राण तण-पतएन पसे उससे (बोरी से) मर कर अपने पान को निमंत्रण नहीं देना चाहिए- प्रपन मरे पानम सरिस पंत प्रापरतन प्राणि' पौर प्रग्याप हिम पगायों की मोठि ससकी अपीनता स्वीकार कर मेनी पाहिए। पर प्रपात अपने निरषय से नहीं रिपता है। पूत को रसका बतर है कि बीपी नरेस कमी किसी के पागे नहीं मुष्ठा-मानसीपी नीर । पत्रको प्रपना दुई सापने का विचार ही उसके लिए मर तुस्म है-पट न होर मय हमर गा मैमिरर । पसे पूर्ण विश्वास है कि पोरी एगा उसे कभी भी नही बीस सोमा सर पारी पर पप सप मिहि गाति म पाति-यह सबस-बच उसके सम्मुख मृतु यि होगा । पमा- माइए पास परवा पारम प्रापिमा । पुरिया पौरी एप-म माईपन सबम प्रपार ॥ प्रपने इसी विमान के पत्त पर यह एक माह तर वीरता-पूर्वर परीके हमसे सरकारमा करता है । इसके भार अपने पक्ष की दुमता सट होगाने पर भी मह सके सम्मुख नत-मस्तक होने की बात नही घोषता मपितु मरण को भहम्म पर्व अप में साकार रहे-मरण तर ऐक गरमा इसा प्रब बार-बार-सत्रिय रीगनामों को बाहर पक्षाने के लिए प्रेरित करता है। बा- 'भावमा म करत म्परं बोपा गोपाइत हेपरी सरहर पा.. तिहुं पहप कि मास पी हुसी हुमा रया वा पूर्ण करि रिशानस पूरी इमी हत्या पररेपि बाहरि पपीमर ।
[रासरयानी पनि इस प्रकार परम के परिण में सभी बारोपित पुणों का समारोप हमा है। उसरा मिषय शिरास और पाप सभी उसके माम की ही भौति पवन! यहाँ तक प्रथम मस्तिरम के कोर- पद का ही उपाटन हुमा है। पाने बम र उसका हम सा के विचार से मितित और पुत्र प्रम स रिबो पप सामने पाता है उसे देखकर तो पाठ मम ममिमूत हो जाता है । मिश्चित ही परम उस पार्वतीय प्रस्तर-पग के समान है यो कार से कठोर प्रौरा रिसाईने पर भी पपने अमर निर्मन बस की स्निम्प पाराधिपापे रखता है। प्रपम भरन कुम-सा के प्रश्न वितिस है-इन तर पर पिता बसतो तमी संतोप हो सकता है जबकि रसके दोनों मार पीरज और पाम्हपसी सुमित बन गा, इसी में उसका हित है मायपा उसके गुम का नाश निश्चित है- उहां भी वो इहा पाम्हणतो मीसरे तो सब बात सबरी मही तो पगा पर समरणी नई हमरी। प्रपन की इस मनोवृत्ति को सर संसय हो सम्ता है कि मिर कुम-रमा मिस अपने पुत्रों की प्राण-रमा करने की हीन भावना से पस्त है। संघय एकरम मिरापार भी नहीं लगता क्योकि बब सभी क्षत्रिम पर-नारिया मर-मिटन को प्रस्तुत है तभी बम प्रामे पुर्षों की प्राण रक्षा की बात करता है। परतु तप्प यह महोकर कुछ मौरही है। पाहणसी अपने पिता की पाशा की प्रबहेलना कर पर पुरस पित होने लिए परी नही होता तर प्रपन उसे पाठा मा पा है कि वह (पासणसी) कापर-कापुस्प बाकि वह मरमे मिस मपने मापी पु रत्तरदापित से अपना पाहता है। पपा- पर बकायर कापुरिस हा तर पर ही बार मिस..... ...पमान पामा बारकी प्रति मे यह मार पपिक पटबा-पो होपायर पर का पुरता याबी पायबा को पतग्रह भार बात नहीं यह मरवाही ना मीम' परम सन स उपयुक्त संचय पूर्णत निम स्प सिब हो जाता है। मारे उसने पाखों में पानी भर र पासपसी को क में मत हुए बो पर मेह भी उसपोरवपाली परिणी सभापयसा को मार र प्रमट कराया- बगही की माई सकस हीप्रपमि प्रतपिम्पर भर पानौरपर हररर मुरितारण पोरी पमा सरकीपउ । इस एपर स्पष्ट है yिमार पाहणनीकापुर से पनप रहने के पीपे भवनरास की पपने पुत्र को जीवित रसने वैसी कोई हीन भावना नही है मपितु पपनी २१ परपरा को स्थानी रखने के माप हो अपने कुम-गौरव सीपुतिया बाप माहिस्पिा-पिरेषना] है। सब ने रिप्रेमीपूत होकर पामणसी को बुर से प्रातम नहीं किया भिपितु समे एक महान तरपिक के निर्वाहा प्राण देने के लिए जीवित रहा है। पर शिकाग्रे सपो हई मेतमी काही कार्य था कि उसने परम को रस पूरभरात में गम कामी उमरे पति की निर्ममता और पासवा को कोई मारमही पाने पीता मोर प्रेम साजेसा प्रदूमा संयोग परम परिम में हमा या मापत्र मिममा मर ही है। अंत में प्रम मोहरबमा कर अपने और साथिया रे साप । महाराणा हुमा वीर गति को प्राप्त होता है~णा मगुर पण पार पारे पपरमर पायो । पसने प्राणों के पते प्रपना दुगनु को नहीं दिया--"पारण दुरयन पपिपी गत जान-पास प्रथा कपिछलों में प्रथम में मंमार में अपना नाम और मर्म में अपनी प्रस्मा को मथन (अमर) मा रिया- ममारि गोष पाठम सरपि पपन रेसिपीपा पपस । पामससी- परिज पिपल की ष्टि से कुमार पाहणसी पमिमा का महत्वपूर्ण पार है। बिस वपन मेरमै गुमरना पड़ा है किसी भी पति के परिण की कसोटी हा बासमता है । पसर पर स्व-एक ही पदिक्षीस देबर निगम की का कुन कामासना मर मिटने प्रानुस है पर पासलती को तुमसा का भारताकर पुर से विरत हो पाने के लिए मिला पिया जाता है।मही मातापिता की मात्रा पार पम्याग्य हितपी-बनों की सम्मति है ! एक पोर पूज-पर्म है वो इस मोर मीर-गर्म । पाहलमी हिसा बरला करे ? पुष धर्म का निर्वाह करने पर पपयम और का पानी बमने की पूर्व मावा और मीर-पर्म पर पटप रहने में पिकनि की प्रतिम पाया का उत्पन होता है। इसी दुनिया है ? *सा पम-मर है? पर पाहसपी वीर धाम है मत पीर-मर्म का निर्वाह करना ही उसे ममोष्ट है। इसीमिए पो सममाने गुमाने पर मी पह पुर से लिप्त होने की बात मानने को प्रस्तुत नही । पितृ-मामा की पपईनमा कसे मी गुर भी बह पीर पा रहना पाहता है। पर बद उसके 'पीसब परीकका रसे मपणे उत्तरायिव में बान र मरने रामा कार सपुष्प का दिमा पाता है जो गभीर-सुबह विद्वान हो उठता है-तिमिमा-भाता है। भाणो पर समे रामे अपने पीर पिता कीमड़ी पर सवार पांमुषों को देख कर यो सकी यम-पपण प्राति की समी भावनाएं काफूर हो जाती है और पर प्रात पाभू पोपमा पारसे भर में मार- माम पूनिकमास तिसर-संपूर्स एप पर पपने प्रकार का प्रसार करते अपने पनि प्रमन्वय- स्पक- [ राजस्थानी सपनिमा । बहर बाहर भाषा १ तारिप सममी २ तसिबमणो सिय मिरकरे मे पावर मात ३ पपि-पगि पनि ममि हस्ती कोस पर उत्प्रेक्षा- इम पहबी बीमे कम मगा पिरिपाठ 30 पपमिका एक पोटी पी रपमा सिमें पच और पप कुल मिपाकर .r परतण गप बस ११हप दहा १ सोप्ठा १ गाहा २ मापा १ सामापुरसिमा १ और २ कवित्त ५१ पचायण। पनिका में पंतमेम हे पाही पपिक प्रमोग हुपा है । पपा- पणा पर पण भाई पारे प्रचनेसर पायो। पापण रकम पपिपी बीयत बास- भाषा-शैली पनि शिराप की सपना का एकमात्र मम्स अपने प्राध्याता पवनपा पोरवीर परिणगान करके मा कोवि-हन करता है । इसके लिए रामने तत्कालीन पारठीप ममान की पतितागरपापिएको प्ररना पार बनाया। मप्म-युगीन भारत का इतिहास हिणवाति मा पतन का इतिहास है। या मह समय पर हमारी प्राचीन संमति मुप्त हो रही दी एसम्प-रम पाप-शनात में नित पा-पारापरिक चिनिय उसकी मतिका तप कर रिमा प-सामंत वर्ग एपने संकुषित पाकीसिरिलिए विपियों की सभा में मापा पा। और मप्यम एवं निम्न मामने अपने भरण-पोपण की समस्या ऐना विपर पप मारण कर पी पोहिमा प्रम मोरणीय एकता की भावना से सनका पूर भाभी कोई समय नही हा काकी सी हौन पौर पतिवारमा परि कोई मरेश निगम स्वाभिमान और स्मापीनता की रक्षा सप्ताहमा पाया जाये तो पर निश्चित ही परम पति पिणारी है । रेस की सलामीम पतितापरवाही पोर मत करोति विसरात में पान को एक ऐसे ही पीर और मा मात्र ऐप में चिमित पिया है। प्रापः सधी निय-नरेश इस-प्रम नियम होकर अपने रचा पिर पये समतो. च-माया मा का माहम भारत भी माता रहा है। अपने प ४ साहित्यिक विवेपना] में दो र होते हैं पर उममें इतना सामम्मे भैप मही कि मवन-यामों का सामना कर सकें। सपा- (७) उत्तर दिन देस पूरब पश्चिम वसा । बटिया परेशानिमा ममिया कम मरे । (ब) बप विकार पर पर प्रति वर पण। मिसिया मेम्परा-सा मुण पाद संपार ।। (4) ई पतिमाह तणा पायापर पारम सुणी। हनाहिया वाणा मतपति पमे ममेह ।। हीरनामा भारत-भूमि में कोई ऐसा पीर पर नहीं रहा है जो है मोहा मेने की मात तो दर र प्रविपित होने तक का साहस कर सके । सोम सातम कामगर पौरहीने हमीर में पीर और परमीहिन मरों पर गो गीत पपा। है। कामर बर । वा- इसर हि एमा पठि करण घा गिई मनि पतिमाह की रीम यमी करण मारा-तई बिमा सण की माई पिवारणी सामर पर प्रणी पाखी, भार वर सौम सब भम्हारेनही विमा परिवर गहिनवार नही सीहरि रग्म नहीं हो पर हमार पाषामा।। ऐसी स्थिति में पम्य है वह मसराम निसने पारों पियानों को जीतने में मम गौ-मुम्वान र मापे सिर महों मुशा- पर तर पावसाह सतर परिहन पूरा पग्विन गतवार इष पुरवा रखनही पापगार भन भन हो पा ममसर पारर भियत बिसि पतिमाह सरे र सिपर। स्पष्ट है कि भने मपने परिख-माया के महत्व का प्रतिपादन एक सुप मिति पर किया है। पहले से एक माई परमार प्रतिप्रिसे उसे पाठक की पनाम पपिपरी बमाया है तदुपग्रस्त रमे पापुषार रिमा है । इस प्रकार की में पाठकको सती मनोभूमि पर अवस्पित कर दिया है घिस पर एकर रतने काम्परपना की है। ग्वी मी का यह कौमस तापनीय है । प्रस्तु। पनि गप-पचमय पैती में परित पीर मारमक काप्य है। पिनास मा और पपरोनो पैनियों का सम्म प्रसौल है। पनि का परगना मस्तानी गय की प्रथम मोर मच पनामों में की गई है। पपपि इसमें पच की तुलना में पच गव कम प्रयुता है फिर भी वह इतना और मुफ पीर पर-पुणपर है जिसके प्राशर पर पस्मानी माषा पपने परिवार ४२] [ राजस्थानी सपनिमाएँ की प्रग्याम भाषामों के प्रारंभिक पच-साहिरप के सेत्र में निषित हो जी स्पाम की प्रपिकारी बन सकती है। पिपरासी मच ऐसी में एक महम और सरम प्रसार है। रेस मरिता के स्वामाथि बम प्रवाह , साप रसम्म प्रामे पड़ते पमते है और उसकी पति को प्रमट करते है उसी प्रकार पाय का प्रत्येक एम कवि की भाव-पाप के अनुसार पमीप पर्ष को पत करता हुमा वर्ण विषय को स्पष्ट मौर मप्रसर करता हुमा पलता है। कषि की भाष-बाण ही भी प्रमों। बोस कर नही है। भाग मितने सहम और स्मारिक सतनी ही उमड़ी प्रमियबना परम और स्पष्ट है । पषा- तेणी पाठिमाह पाया घातरि कुण यहा ? पुसा सहिरा पुलकी पुस्ती ? कुस की प्राती पुण की माइ बियाणी पामर पर पक्षी पासी ? तेरिए पातिमाह माया पोटीि मत भारि नहीं बन पागनहीं रीख न माना पापार म मभित होईपमा प्रपनेसर सरिया मषम ना प्रबमेस ही हाई पझ करि का ममीष्ट भवन के साहस और देव की पबमा करना है। इसके लिए उसने प्रपन के भौतिक सामर्प और भक्ति का वर्णन नहीं किया है अपितु प्रतिपम के बम और पराक्रम का निबर्मन मात्र करके मफ्ने प्रमोष्ट की सिदि की है। मभीष्ट मार से प्राम-विमो की सीमा को अवहेलना करता हुमा एक दम प्रतिम पाय क पाकर माधि प्रमाव की मष्टि कर नितांत ही स्थाबारिकप से प्रमिभक्त होक्या है। सिषपस की पप-मेमी की एक पम्प पोर महत्वपूर्ण पिमेपता यह है कि उसन प्रस्ले पचावतरण चाहे वह बड़ा हो मा घौटा अपने पाप में एक पूर्ण भाष मा विचार मिए हुए है। बा- पिसी कबीर न पीपद मा एतर म दीपा हम-हा विन सप्ती सम पुरती सिग हारसर गीत्पर साति ऐसी बगाई हा सण मति मम पूषा की पैन मर्प मार-बाप पीस, तीम पर पर। महाकवि में मिने-चुने पदों में क्षत्रिय नारी श्री पीर भावना और सरात परिष को सभिप्त किन्तु अपने प्राप में पूर्ण पीर मार्मिक का प्रस्तुत करती है। मुगा की 4न म-मृत पति पाप सती होने से वार्य है। इस छोटे से गाय में कपि में बारी बात के बीच मात्र को मक कर रिया है। पाने के पास रसी की पुष्टि करने हेतु प्रयुक हए । प्रथम बाप के मोर' और कमा सम मा मदन सति पौरमा संसति प्रतीक बन कर पाये। पिसम में प्रपिकसर म एपना में निका-नी (तुर्भत पप-समी) हो प्रयोग मिार पर रहीं-कही उसने पापारल पच को भी अपनाया है। सपा माना की फया ] [४३ . ....मांतर पावसा पनि पाखी पापिमा दसि पादम यामाहागठी बार दूसरा रिखमात - " 1 महरि ने दुकांत गप-ौती पहल की है वहाँ भी उमने पितामही पाने है। मिह के लिए दो उपने पगों को ठोर मरोर कर मद-मार मिमने का प्रयास मिाह पोरनही वाप रसना सापारण नियम को ही ग दिया।बमा- इसा-ऐकतर पासमाह स्टाप मरनेसर र म बाट का सा--- पिलधारका पाली ता परवतो सिरि एच मापा दुपट पट भामा, सूर ममा मही मेह पापा महो , पाप-विन्यास मस्त-मस्त हुपा है पोरन भाषा प्रबाह परम्स । 'या''मूटा' 'पू' मापा' 'माया' एवं मामा पम्प तुर निर्वाह की टि विमे स्थानाविक स्वम ही पर्ण पस्तु के अनुभम भी पर निबने में सिरास विना पर रखना यसमा में गमगी। यह एक नैसगिक है। भान सहन एप और साहस सुगर वासी योग में रखी करिया बम्मी है। प्रभा बमकार और ना प्येचना कौशन मा रीता है। दिल की बात सुनकर मुने पमों में करना उसका प्रण है। हार्दिक अनुमति की सहन और माथिम ममिष्यक्तिको परि पिता का गाय at पिपास निश्चित ही एक सफल पनि है। रसकी अनुभूति निवतो तम! उनी ही उसकी प्रमिपति सरम है।मा- एम पनि पसंतरा एवर तरकार सीह कारी मह महा पापर मति विकार ॥ पावर पाना पालियर रह पाई जाए। चौह ममत्व सहा दर मयि विकार।। इल हिमों में कमि का पौष्ट मार-माधीमता की परिमा परिपाय होकर निम्मतिहमा है। एक एक धान पाव वहरि से बंगा है। प्रथम परण में एक प्राण उमर विमासा रत्पान कोना है मो तीय परण में पाकर समम पाप पारण कामेती और प्रतिम को परणो में निर्माता मार्मिक मे उसका समापान र रिया बाट कि श्री माय पप रपमा एस मे मैखमी पीपमा है, वह सर एक भाव या विचार को लेकर प्रसर हुमा है। पनि प्राय, पर्सनारा मी, उसमे भी प्रस्पम परत पाति का प्रपमाया है। उसने परों को भी मी कट-पोट र निरक समाप प्राषित करने का प्रयास नहीं लिया है वा- [ राजस्थानी पनिकार्य (क) गारद मानवामा पदमा मरिमता पररासौ मईपत गाहण सइस तीस मर देह माममसाह प्रसी पर फेरह (स) पामम मबसरि पापा एही देऊ पस पिरि पेणा हा पार वेवा सहट तुरसा मोहरकी माता में प्रदीप्त रागपूरा वीरांगनामों पर म्पर्य पौरव ही भावमा से प्रेरित मण्णातुर पतार भागपारी प मोर प्रग्याम्प सनिय यामामों स्पाप और बमिशन मे कवि पन्तर्मन में एक प्राप की सष्टि पापी है उसी पारंप में एकर उसने सना की।पही भरप है कि उसी करिता समेष कुरित हुई है उसले लिए सो कोई विर पायोमन नहीं भरना पड़ा है। वस्तुता रमने पिता की नहीं है कही है। पा-~- पासणी प्रापि पाठ पनि सपा-या पागि । विण जैसा हीया मी पर पा रोपण भाग ।। महाकपि में बाहर ही मामा में माप होने को प्रस्तुत पनियों को मार पासससी के अंतिम भेंट का कितना सौर और मार्मिक भिम बीमा है। मनपर गमलार से दूर पामों की कतार म्योत से परे पौर पर पंचना से परिव प्रापत भी पति की यह पमिम्मति इतनी सरम पोर प्रभाषमाती है कि परवे पापे पाठक अमन हिप रहा है। मिक्षा देने (प्रभाषिरा करने और पानन्दित करणेस्ट्रार तार) को ही कविता का प्रयोगम कहा गया है। सपनो मल पुणों धार ही मलित करणे सो पुस । मरतः पनी दे प्रमाणित होकर पारगारब वाहिस्प मनापी ग. मोटोरी में प्रामोप्प पति को और साहित्य की महान इति (सट क्लासिकल मोरम) रहा है। पनि की भापा पुरानी पपषमी पगापामी! पिसम पत्र- पूर्व पनी रिवा पारिका मापा पर पूपमपितार बह पों को पाने संपारने पाना कारीगर की ही है शमे प्रामोपोर मागम पमों कीगी पहिान है। इसी परिपान के कारण वही एपमा महती सोपपिपता की मापी ग मी गों को गर कर नहीं अपितु परररमका सयोन परमी समा मकिया। सपा- ता पविसाइप्सेह पसाएर पाप मुसी। लहनिदादेपालबार सपति ममे नमेह ।। 1. देवाटोरी पनिता पो मनसिंह भी मसरामोतरी दोषयम • ६ पनिकीमा ] [४५ यहाँ सब गिवने सास, ससने ही मनापूर्ण भी। मोति पदों से मी योगायों की प्रस्थान पति मनित हुई है वही यकी मस्ती पौर उम्मत रस्साह मार भी माउ हापये है। बोर रमारमा धम्म एना करके भी कपि में संयुक्तापर तीस प्रयोग नही हिमा है। घर मादि मोमा मम तो इसमें ने पर ही कही बिस ! मापार सम्पनी का प्रयोग करके भी कवि ने उसमें वीर रसाहन योग पुण का संचार कर दिया है। यथा- हरप द्विार पर परमति पर पर। मिमिया मैप पर करण उपरा संचार॥ इस रोहे का प्रस्वा रामपारी बस पपा को स्पट करते पार है। हीमो कोई पर कामतू है और न ही निराक। कहीं कहीं दो शिमरास ने रोकार सम्मों में पूरी भाव सप्रसंग म्पपकर दिया है। पा- भवद नवीपीमीर बोम्पाप माषा इस एक परण में मपम के समस्त बाढीम हार पौर मीर नाव एक पारपळ होप है। पि की भाषा की समाहार प्रति कामद सुपर सबाहरण है। मारमा पैसो के एक राहण्य मोर एम्प :- (क) मसर मंत्र परिवार (स) भार हा एकमार मारदा प्रब पापर भार-बार बोबो सपों को पोजना स्मान पर मन-भाष को स्परले पाने ऐसे घोरे कोटे मुभारमह वायों को कर अपनी पनाको अनावस्यक विस्तार सेका सिपाहै। कमि की मापा मार्ग न स्पों में पिस से पनीय है बड़ी रखने रियम के अनुरसारमा पदों का प्रयास यिा। ऐसे स्पनों में घम पनि भमोष्ट पर्पी बना होता है। सम- (क) बह देही पाणावती पर पुलिप प्रसता प्रणी मखी मातुनी बम बना तो पिर पर एमवती बनाने कमर महारती... (घ)हरम वा सुर मनिपर पर इम मी.... निभ में पिर गिस के अपने घर ही प्रयुक हुए, फिर भी सौ संसल तत्सम मप प्रम् की कमी नही है। कुक परवी भरमा यमनी इसमें मापे पर गन्होने पस्मामी बोमा पारस र निमा है।
४६ [राजस्थानी सपनिमा यह भ मुहावरों का भी प्रयोग हमा है। सपा माल भोय कम्पनरर्स रळ करण की माषा दिली पहल को मार गिराणी मामर पापणी पाही सोमर पर मुबास म माहि धाकर पग पापि । पूरी एमा को पा कर हा पा सता है कि श्री ने अपनी सना प्रारंभ में सोमउ पर मु-बाय एक प्रथम पर मर सिर अपनी प्रतिमा पार गर्व विषय प्रति लोग व्यक्त घ्यिा है, उसमें कोई प्रसुधि नही है। मार-पंजना शिवराम ने रमनिराकी रचना मासमयी मनास्थिति से प्रेरित होकर की। यह माय भाष-पग्य । पचमदास बीपी एवं उसके साथ सम्पाय पनेक भत्रिय वीर मर-नारियों में निरपर्म और बाठीय गौरवको मा अपने प्रामा माहुति रनिस माव की स्माम्ना को है बनिया उसी की मालमपी ममिम्पत्ति है। कमता पनि में सर्व परिव-नादि साहस और एक स्पाप पौर बनियान की भावनामों का ही प्रतिपारम मा सो समय पर ही पीरप काको पया। पनिका का प्रपान पीर सीवर और वीरत का स्वामी माग है उरसाह । रस्साह' में प्रापय- पौषिष्य का व बगा पहाग है। रमाही विधाप्ति से कम को रेषता है पर सोक मिस प्टि से मस्साहो पा उसके कम को पता है पर दृष्टि उरसार रसास्थान में प्रमुमोमो इनमें परि किती प्रकारका मनोविश्वपापातीपमहमोरिय किरसाहका स्वासारन मही हो समय । उत्साह सब सारिया पम को मकर सने मामाभाबीर सातिठा मोर-मत ही होती है। पतएप पीर-नस की निप्पत्ति के लिए मा पापाप है कि पहले मापप-पम गसप्रौनिय निपिच पर उसे सोमव मिररियाया विराट ऐकाही भामोगा लिया। पार्मबम-मा (री-पस) सरत-बस पाधय-पक्ष (पा-म) को 'सापानता ा प्राण करने के लिए पापापा है। सामोपी पिसे परित महीना गारठापाठाया तो वे कमी पाप-बत सरकारमही कर सा । अपने वि स पुरभि पि कर वापप-पस में प्रतिलियासस 1-बीबरेपण और ममगारतीय विचन पु.- २लापरपावर पारन पुगिन पापपार । पौर पर रिमविनर रायबाहार॥
साहितिानीरपना] [४७ रिम स्था-सा पासोकामा है, तापापार सिस्मित ही गाता है और बार एमो मत भी। सार- पस समाह बीमारिसता परखने मिए रिमे पाचन पात्र मरन पिा है। सपा- "पर पाउमा उत्तर दक्थिन पूरब पश्चिम र सार। स पुरतारण भाय नही पारावा मरि पान उत्साह के पौषित्प पर पाप-परको विकास नही हावा और वाप्तियार-माष मी संभय होता तो पर पा हिपह मानबम-परा सम्पुल पुरवाता पर ऐसी बात मही है। प्रामप-पप का उत्साह पपस है- परमही बाबरमही दोन भाग पागार मपित महा मिएका में बासी 'मोका बनकर पम्य पम्प पी पनि के साप उसकी पीठ ठोष्ठी है- 'पन पर हो पण प्रथमेवर पारर रिपर मिति पतिमाह सेठ मस्त सिपर ! सप्ट है कि मितही मायरमो नी में पाय-रस के उस्माद पोषित्व का निराकर रस पानी मनोमारना सम वागरम्प पापित कर दिया है। स-परिसा लिए इसमे अधिक और पाहिए भी गया ? रस-मिगत हम मे हो वाधरणीकरण' झा है। मस्तु । सि रत्ता भार भी मारपदो पर सा पनिता में भारत बार एया है । पर की गया , बीरी मीष मण पापा मेमिमर' पापि रक्रियाका मून पोटही उत्साह है। इसी प्रकार अपिस पापनामों के परमात में प्रविष्ट होने 'पामि परवासि पासिष्ठ और पाए- के समय स्वयं को मामे करने के निरषय बहुगुर परसव तो प्रारी हादर्स ठर' पाछ भी पही सत्ता है। सी उत्साह से प्रेरित होकर पाहणसी पुर में सम्मिमित होने की बने इए है। पीर प्राण देने के बार भी इसी उत्साह को जीवित रखना चाहता के घर पर सौरउ हमारत बहर मुणिण गौरी परा सर की पर' पमो से यही भाष पळापा है। कहने का तात्पर्य माहितरम पर प्रात रस उत्साह की वो इतनी पहरी ! हिबिना पायाय का प्रतिकार हुए यह कमी रपा नहीं हो सकता । यही कारण है कि हर बनाया गाता है रिसने नापार्यों में पपिरदनी माता पिन-मिम 1-(1) मा मात्र सार पैदल पार न प्रामिया। शिया पौरी ग्रपना मापन बबन परार ।। (6) सर पारी पर मग मिहिनाविक पाति बिम ४८] [ राजस्थानी पपनिकाएँ बनी हुई प्रविष्ट हो गाती - सवि परणी सिप-विर करे पइसे पारा माहि। अनि में मथिट हो समय मी रमा उत्साह भीण महीं होता। अपने मे पागे मामी नारी को पीछे छोड़ कर स्पर्य भावे पाकर मौहर की गामा में भस्म हो वाठी- मगहर याहि जनिराह इसरलेय पासा प्ररम । पहिनी पो रहि पानी पप एहि पाये ना सायिक उत्साह के पुम फल स्वरप हो मामय पक्ष को और पति प्राप्स होती है और हमोक एवं पातोड रोमों मे उसको कीति मुस-स्थायी हो जाती है- संसारि मार माहम सापि भवम येषि दीपा प्रबल । उपमुक्त विशेषन के पापार पर कहा गामाता है कि पनिडा मे उत्साह की तोत्र सामाणिक और प्रभावपूर्स बना के प्रापार पर और रस का पूर्ण परिपात हमा है। परमिक इस विवेचन स एक विशेष बात को सामने गाती है पाया है किसमें बीर-रस के स्थायी भाव उत्पाद का जितना ससक्त प्रतिपादन हमा! रखना उसके मिमाष अनुमाष संचारि प्रारि भाषों का मही पपापि इलम भी इसमें एकात प्रमार नही है। पनि का पान स तो बीर ही है फिर भी इसमें कुमार पाहणसी की प्रतिम मेंट के प्रसंग में सहर हो कण-रस का गोपपा । पा- पाससमी पूपिहि पपन पनि हया सम्मि । विरिण मा होया मरी गए पा रोपण ममि ।। इस प्रकार बम हम प्रबन ये पुरवारको भावों में मोसू परे हए पाहलवी भटकरवा पा-पास पुविमान सियर-देखते है तो हमारा मन कण्णा से मषि- भूत हो गाता है । संमत ऐसे ही मिची पण प्रसंग को कर मरभूति की पाणी नमो में फूट पड़ी होनी- अपि पाया ऐरियपि सति बचाप हरयम् ।
अचलदास खीची री वचनिका
मापा शास्त्रीय अध्ययन
१ ध्वनि विचार
(क) प्रयुक्त पनियां
स्वर-पाई उ ऊ ए ऐ मो पो प्रेम
व्यंजन
टस
हकपम
बफरमम
सह (1)
(स) पनि-पिकचर
स्वर विकार
म- किवार (कपाट) मदिमत (मरमत) उत्तिम (उत्तम)
4-3 मुला (मह)
-ए मतिया (विनती) कष्ट (कनिष्ट)
१- पवार (परिवार)
f-ए जा (पीया)
उ-म पारप (पायुप)
- पुरिस (पुरुष)
मो- रोम (प)
-पा पार (10)
पौ-पर काविप (तुष)
4-3 पूठि (पृष्ठ)
- र पामत (पंचामृत) पर (पर)
[रामपानी वानिकाएँ ध्यान-विकार। प-म विग (ौतुइ) मुगः (मुक्त) सपति (मति) -प परिसपर (दिनकर) -- प फपियस (पियन) 2-6 सूटा (टित) ८- ग्रेवि (कोटि) 6-4 मारपी (पाणी) स्व-प पाबम्पर -1 पनि - उबहि (उपपि) 1-1 (कम) प-ह सहिर (कपिर) कुसबा (कुनयपू) सहि (मि) म - कषिपण (कवियन) सुरताण (मुसताम) प-4 मर्प (माल) प-पत्र प्रपथ (मप्स) म- पीर (सीम) पात (सामव) 4-4 g (पुर) स-सा (पा-उज) ग्याग (पह) पुपठि पुति) 4- पारम (पापुष) 4- रामारण (पमायस) पा (पय) मार (पाप) - पर्व (प) श-8 प्रसेट (प्रप) सामिग्राम (पातिपाम) भस्मैव (मयमेष) प- पुरणारप (पुरुपपार्ष) रिप- २ उप-विधार नाति परमात में भारी बाति बनाने के लिए निम्ननिमित प्रत्ययों का प्रयोग ई-१ बोरस बरस की पडी ताली " २ कोटम्पवाही कहा।
मयलदास सीपी रो पयनिका ]
[५१
दो-१ या पुस्ता पारिणी ।
२ पन मेघी मेहा सातपरिणी नि हो।
बचन
दोनों गानों में घमास एक समान ही पाये माते है । बम गिम पर
मन्त में मर (गो पापे मत करो तरा मा हो पा) पनका महवपन बनाने में
पर (मो पो) करपा र दिया गया है। बाहरण-पोरस (पाग), साय
(सावा) र (म) ।
कारक
(१) पविकारी रुपा (२) रिकारी । प्रनितारी प पप का मूल रूप
होवा विधी हा विकारी प्राने प्रत्पम गोरबमामा गवा है।
प्रतिारी वालिक सामा प्रिया का का नहीं होता। मिरी मूक-बालिक
सापक ाि का कर्ता होतामा अम्पाम्प कारकों के परसप भी इसी के साये
बोरेवावे।
१ का कारक
(१) बाप्प कहा
(२) प्रेबर पर कार
(३) रंग गम परिवाया
(१) इस्तो मेधि पानपट
(१) प्रनेक ग्रामपति भी मस्ता
(१) एतरा हिरवारला
पोरा मसपटान पटे
संपरान परफ
कणा (निसको - किस पर)
सब ए मेटर घर (सबसे
प्रपोष पर प्रति
कबीर पीपासमा
५२] [राजस्थानी बनिन्नएँ भपादान कारक १ इमारत मार सुप्तिाण मौरी पगा-पर कीम्पर । २ पाता गड तमहटी वसका मापा-बिसी संगम कारक रर-१ मासबार बारबती २ इन्टरपनर पारंम परम ३ सूख पखर प्रमम र बरालम्म सिधा। रा-१ मामला पटक फेरा-१ काया कारण पनि कोपिनु रामम-नेप। का-१ पना मासिपद्यम- कामर । अधिकरण घरका -1 रखा पुस्तक पारसी कासमीर रिपसति । २ साइसाररा मनि परि। २ एकर पनि वसंतग। ४ एका रिग। ५ महंभरि पण दूसरउ । माहि-१ इप माहि पाकर पग संबोधन कारक १ बाप हो बाप। २ पगाप्रपोमर कहा या भाई हो। । सो महिदो प्रकुरे। । है। मार। सर्वनाम : ह-हर मामसि प्रापणा के पल तिणि तामि । महारत-मोनिकी मूरज बसी सुमिस्त मित मार सदा । मूम-भूमण साधी मुला। मंद-मर कीपर वेहबर मरण । पम्हारा-प्रमाण मनि नहर वा। मापण-मापण दुरंग म पप्पियो।
भपसास सीधी रीवपनिय] मापरणा-पापणा देबर पेठ भावार। पाप-पाप कारिनि माप समारपी। पापगाउ-पापणार ही म्मिर ति गार। हमारठ-हमारर पर मुखिाण गौरी पग मर कोग्य। हम-एव म गीपर हम हर। हमारी-बरी दी हमारी माहि । [तुम्हारी-मुर रे मुर पर बार तुरि बीग हनि । तुहार-मास तुहाय पापणा। तिम्हे -पर रात तमही पूर। सम्हा-तम्हा का मानर पापणमन माहि पहित । तठे-dad कापुपर फापुरिम । पारइ-पारा पिपर। पारत-बार गियर मिरिण पतिता समोर मियत । कठए-हिन पगा रणरण । पुण-तणे मात गुण पाप मा। करणामापावर पिसी। मिका-चिका मनि पतिसाहकी सबसी । मिणि-मार गिपर मिरिण पतिसादा परेशर निपर । बिहि-पोरी पर खरा मिहि बाति न पाति । सस्पावाचक विशेषण [क] गयना वाचक प्रेक-येक प्रपन पर मासिवयम | मण रयाकबार। प्रेकई-परपसी ग मिया मा प्रेकर रिहाग। प्रेकरिण-पेखि रिति माया प्रसुर । प्रकि-कि काग बीपी का तीमि-पोनि पर उपए। पा-पारित पड़ी। माया कि [ रामरपानी पनि मध्यम पुस्प महरमन- पट (गया) १ तमे मानव प्राण मन माहि प्रहित । उत्तम पुस्प बहुपन- मो (पापन) १ भूषाकी 4 मर २ माइबाप बीसर । पौमि पर उपर। ४ मभिमान पठण सताये। भूतान के प्रत्यय एकवचन मर माति १ प्रधनियर पर पमपमी । २ मिर पया पुरा परिणमेति महिपाप । ४ बम सामियर रावण । १ ममनिउ मनमाहित रिख मेति मेहिनास्पट । महवपन मरवाति- इया (गपवन) १ पनेकपा ममानित कर लिया। २रिया ग्यालय टक। मनिया (ममिया) सम्म नरेस। ४ हम इमिपा हेमारा पापति गमे बमोह। मा- १ पास्पा स्रामि समाणमौ । २ उनिपासा प्रागी हुवा। प्रेमाणि रिषि प्रापा प्रानुर नारी जाति पषलास स्त्रीची री पपनि] १ का सिर मनि पठिसाह की रीन बसी । २ करण की माई पिपाणी। । स्वामी का मामी मुण्ण । मूवकास के विग्रेप स्पः १ पामिन पर पौहाण । २ कारण हुई। कसकी माई विपाणी। ४ पावसाह एकप प्रमानेस्वर पर यूटा। ५ बाट कारबस य । हका पाणी सूटा। भविष्यकाल के प्रत्यम सो (ोनों कानों में) एक.र नपानसी मार देने पर विण वामि । बहुप.-पपम पापर पर पनि पीरती पहामिमी। उत्तम दर कोसी त। पुस्प स्यो बहु . हा रस्मा इरपुर रिसा । सो पूर्वप्रसिक बन्न प्रत्यय १ मरण देखि परिवाह। २ सपतिको विहर-मर नही हेपी मरम हेतुलन्द बा- बरिणा पर्वमान लम्त बती फिर से हिमा पिरोपण यन्त प्ररयम- ५] [ राजस्थानी पनियों तह-५ साचन । सूर। वा-१ भाव हा पार माये । परिव प्रस्पप हार- पाप पारंप पारम भागि बस मेयण हार । २ ष रामबहार। ३ भांबणहार। ई-१ मिना राम मरणी। २ कमि पालट करणी। एस (स्मार्थिक प्रस्पय) १ मोल बाणी मु हमेप। २ पतिसाह हुमा मामा मापिनेरा। ३ मम ममेरा। क्रिया पिरोपण। काम वाचन १ तितर-तिवराऊ मावबईता पार माया । २ - पतिमाहणेह। १ तर-मति महार वर पाप । ४ गानमा पर्ट कीगा। . तिसर-तिसाता ठिण तामि । ६ तब-तब गाइशारा मनहर दो सिपामागा। स्पान वाचक १ गह-पागाइ । २ तह-हवाईबाइ। ३ स--वा- पिस मसाण कारक की पाती। ४ पापी-लिवाणा मापी हमा। ३ उमरिस्ती की पगपटा सी सरि सात सात सा बना पर परम। पासपास-म्प बापर स्पः मरण पासपास । • सामर-मरण की मारियाणी र दामउ परमाणीपागणी। ८ गहां-पीठ गो पणा मोरमसि पासि पर ।
अचसापास मीची री पनि ] रीति पापका 1 इमपासम प्रपनेसरि अन्य सेन बिहे हम तमिमी । २. सर-सर की। । इसिपरि-विपरित्या सात पाता। ४ इवोपरि-नसीपरि स्वामम पौरी राग मक्ष किया विरोपण १परप्रेशर २ नावीह गाना महा। संयोजक पर- १ होगर पर मुबास। २ प्रेत पर सिमरान । १ कही ईतर मापस पाहा मानहा। २ प्रपिता मुसार दर मुनि । पूरबमा पच्चमणा। समास पनिका में हम हमास भी अपुग है । सापारपतमा । दो-दो सयों पीस-हम ना-माय भानी-मौनी गली-पाणी भरा-पापा-का गर-हर-एप परमाात पति-पपरसो मादि । विरूपस-शब्द बत मस, बम बम्प पर रस ग्म र सिमिठप घर की Feau fado पुर परि-पति, मनर कार, पपि पषि, परति पनि, माप दास जमो पलो मार बाग, मुभव मुभम माहि माहि माता मा भार बार यह णमा को, गम सहस मामा, मपी मापी, पारंप पारम, परमो परमी मारि । शब्दकोश पनि स्थय राम गमय पण विगी (परती परमी) पम पौर मिन अपने पाए प्रयुत परिमो मम अपेमा परी
६.]
[राजस्थानी पनिका
१ तस्सम शम्प
मबहा, सपर प्रवर मेडमात अभिमान प्रारम प्रावास प्रदिन प्रति पसुर,
अनेक सरस, नाम कमा, ससस ना, मानि, ना, मुर कप हुए
पिता बतुरंग जीवन जाति र तिनक, सम देवता, दीर, पन पुर, प्रवाह प्रोग
पंचामृतप्रवा, परिवार मरोग्मत्त मर-मित मरण-मंग मूम महासती मोत पप
पिपा, मिधि सुमन, सुपास समा सहित सद पदस सबम सारंग मारि ।
२ समय शम
परतिप, कभी कारम बि कोरिकापरित, होरस पारपती शिर
परित पम्म पेठ, पितु, पम्पिर, नेग, पुरवारव प्रय, पूत पुरष प्रषिमि भाचा
मोम मुपत, रीस, सहर, मामि परस, रसा, मरिब सास समि, सहति संप्राप्तो
प्रा, प्रस्त्री, पर, बरि, मानम्बर प्रचनेतर प्रमेत प्रोति (मममि) पापण
ग्गामा उम्मबहभारि।
३ गिम के एम विरोप शण
प्रबहहर, पावट्टर, प्रमोमि परो उपगम उनिगासा संमार
गमत्तण पाइप बिसहार मेन ठाठी पारीमी अमिपर पम पपी
नया, ममि महपि विवापी होगा, पन्नी, गहिना, पोग पी गगहना
ग मारि।
४ विदेशी शण
पानम पाना मातमसाइ, पतिक्षाह गोरी पारि (महर) मुडाम गमन
(चम) पाह, विद्या प्रापि।
२
वघनिका
राठोड़ रतनसिंघजी री महेसदासौत री
सिरिया नगारी कही
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कृति और कृतिकार सिरिया बसा य एपित पनिका परनसिंह महेमामोहरायस्पानी साहिरप पवार की स्थापी विपि है। एयरपान और मानवा मै यह नो मोत्रिय रही है कि परि इसे मरिमों में गाठीम काम कहा बाय हो मनुपित म होगा। मलेक मुरवि संपन मोर साहित्य रसिक पार पास इसकी हस्तमिशित प्रति मरस्ममेव एती योगही कारण है कि परस्मानी भाषा के मर्म निशान देतीतोरी को गति प्रभाव के ही प्रोपपुर, बीकानेर, गयपुर पौर मामबारे पुस्तक संग्रहासों सी.हस्तषिक्षित प्रविध पास हो पानी मिलमे है कतिपम प्रतियों का लिपिकास पनि में परिपत परमठ पुरकी पटना स .. वर्ष पाषात है। ग० देतीतोरी प्राप्त प्रतियों में से १५ प्रामाणिक प्रतियों के प्रापार पर पनि का संपादन कापसे मान से ससमय व पूर्व ऐवत एशियाटिक सोसायटी से प्रमाधित परसाई भी हममे इसे ही प्रामापि मानना अपने प्रमाप्रपामार बनाया है। रोगपुर के महाराणा असतसिंह और मुपम-बार धाइरह से गिरोही पजमा-मारपवेश एवं-मुरारक बीपको परे परमठ (उम्म) पुर की पुष मि पर चित पनि एक ऐतिहासिकसम्म है जिसमें साम मरेप बनविह स्पा और बमिरानो पदमाम करपात्र-पर्म और माय-बायका प्रतिप्की मपि यह पनि' नाम ही प्रक्षित पहा है, पारिदिने से एक दूसरा नाम 'यसौ खर' मी दिया है । मबा- बोरिमले बिरियो बनी एपी रकम रसाम। महापमा जनसिंह पोवन-परिष से संबपित न पती' नामक सिन में पित एकति पौर भी है, विपन्न पविता वीर पायापारस प्रमाण है। करण और चिनिया का दोनों मामीन और खनविर पुन पसिंह पापा में रहे है। ऐसी स्थिति में रोगो पनामों पनाम एक होमे से उनकी में अषम होने की संभावना की। संभवतः इसी मरस मातोच पना पनि नाम से प्रसिपी है।पनिय नाममण होने का एक सरस का भी किषित भारत बीवी नमिम' में पाति इसमें भी किया सीप पनुपम मिया या है। प्रस्तु।
६४ ] [ रामस्थानी वर्षानमा खिडिया जगा का जीवन-मत अपमिका' के गोरि मणे गगी' से यह तो सता मिस है कि इस का रपपिता शिरिया गया है। पर इसके मतिरिक्त रचियता के पौषममत के विषय में मनिका' में कुछ नहीं मिलता । म.देसीतोरी को पारणों के माट राप से बपा का गोप-गुष मिना पा, पाइस प्रकार है- मेतसी - 1 । ममा प्राप्त जानकारी के अनुसार ग सीटोरी , बताया कि पहले चपा महापया बसरतसिंहका पाभित पा । उसके पूर्वगों को सांभा नामक ग्राम पायन' से मिमा पा । मुपन सम्राट बागी । बब बरतसिंह को मौरपवेष और मुराब का रमन करने के लिए मेरी मईबाही सेना म सेनापति नियुक्त किया तब जमा भी उसके पाप सरन मुख-मोष में पमा वा । किन्तु पर पबपूत पुर के लिए सम्पर होकर मणिय परंपरानुसार केसरिया बाना पारख ले भये खबमा को पुर मे सम्मिपित होने की मामा नहीं की गई। उसे एनसिंह के ज्येष्ठ पुत्र पमसिंह संप्माण मय कर काम्प रखना ए इस मुरकी पटना को पिर-स्मरणीय बनाने को कहा गया । कषि (चारण) को पुर से विरत रख कर काम-रचना पण पुर की घटना का अमर बनाये रखने की इस गिरती का प्राचार सिवाय विचित पपमयत बीपी पनिका के समय में प्रचलित इसी प्रभिप्राय की गिरती ही प्रतीत होती है। जगा महागा पसबसिंह के प्रापित होने के बारे में गावेसीतोरी मापति उबई यो रषित है। क्योकि बीकानेर के पवार प्रेमामम मे सुमित एक हस्तलिखित ग्रन्थ मे प्रम्पाम्य पारणी पीतों के साथ एनसिहप्रवा में लिखित पित मिने, बिनम रमिता सिरिया बसा है। समयता कपित्त पराम एमतिबीय काम में रखे। परिमाको बसमका माप्रित मान भी दिया गाप हो बहसपथ नहीं किन बीवित पते (एमा एनविहम प्रापय स्पीचर से मोर रवा यस पार रुति मोर कतिपर ] सप पुख मेहर विस्ये उसके स्वामी सम्वहि को एकमेव से विमुख होना पापा। यह पारसी पारण पिस भी है। प्रम्ह:-माय मापार पर भी रेस तो प्रष्ट होता है जिसम्पूर्ण रपमा में कपि रत्नसिंह के प्रति झखि सामी भक्ति में मोखोत है। एक बात और भी है-सरसा सिरिया पमा के नाम से एपित मोभी समाएं मिमी है उसमें एमविहम ही लगाम किया मया है। परि करि महाण्या बसन्ततिरका मामित होता होगा शोधपुर के प्रवर्ग के बारे में कुपन मुष अम्मरणमा प्रवास करता परन्तु ऐसी एक भी पता प्राप्त नहीं है। इन तयों के पापार पर मही मानना न्याय-सेपट है कि नगा बसरतविर का माभित न होकर एलसिह काही पाभितपा। पनि शिरिया बना समाक्षिा का प्राभित होने का प्रम मने का कारण मही प्रतीत होता है रियसिंह की मैना में सिरिया या नामक एक पम्प योगा पाप बाकी मामी पनिका में इस तस्व मिामा- रन मेहे दरिमार, है यहि समाप्त । मोरे रिखमाई यो हिमो यर । पपसिंह भी अपने पिता पलसिंह की मांति सपियों का मामय राता का। रय पसोपवित भारस मी उसके प्राथय म एका बाबा अपनी पनिकीमा पनि परवार में एकर की पी।फिरती के नुसार पसिंह बबा को 'मामनिया' पौर परी' नामक यो पनि पुरातार स्वरपरिव , गिन पर संमन् १९६० का सबके पचास प्रशिकार होना बताया गया है। इससे प्रपिक पारे बोबम-परिवारे में बात नहीं है। माना मावासको मृत्यु सलाम में ही हुई पर नहीं पग-पग मसान भूमि सिराय में प्रवेपिएको पीपी। पपनिका का रचनाकाल- कवि अपनी इदि एपना-मन के विषय में एम नही हा है। पर गुरप समय इस प्रकार विपाई- परवाह तिथि ममि परऐतरे परस्मि । बारि सुकर चम्मिा विदा हि एक बहरित ।। अर्थात् 'सं. १७१५: वि.। मैं माल पक्ष की नवमी तिमि एबमारको हिम और मुवामान जताए यो। इस प्रभर पनि पनुवार परमत के मुरकी सिवि विषम संपत १.१४ + ! पुमार निरिक्त होती है। धरती समापनों में भी पुनरिम परमव [राजस्थानी गमिपए खिरिया जगा का भीवन-पत बनिका २ गोरि भणे बगौ से यह तो स्वता सिटहै कि इस का रमिता चिरिया बगा है। पर इसके अतिरिक्त रचियता बीपन-त रिपब में परमिका' में कुछ नहीं मिमता । ग• सीतोरीको बारसों माट राप से ममा का बोपमम मिना वा बह इस प्रकार है- मूमन मा मतसी । । बया प्राप्त वामनरी के अनुसार ग तेसीतोरी, बताया कि पहले गया महारामा बसतमिह का माझ्ति मा । र पूर्वबों को सांय नायक बाम पासन से मिधा पा । मुपत सम्राट माइरहो बब बस तसिंह को पोरकीब पौर मुग्रा का दमन करने के लिए मेगा पा पाही सेना का सेनापति निमुळ श्मिा तर बाबी उसके पार उम्मेम के पुर-क्षेत्र में कमा पा । मितु मन पगपूत पुर के लिए सम्बर होकर बपिय परपयनुसार परिमा माता पारण करने ममेकाबमाको पुर में सम्मिनित होने की प्राहा नहीं गई । उसे एमसिंह के मेस पुष प्रमसिंह के समय में प कर काम्म रखना आप इस सुर को पटना को पिर-स्मरणीय बनाने को म्हा पया । कपि (पारण) को पुर में पिरत पर काम्प-पमा पपपुर को पटना को प्रमर बनाये रखने की इस किती प्रमापार सिपास विरचित पपमयसीपी रीपनिन के सम्बन्ध में प्रचलित इसी अभिप्राय की किरती ही प्रतीत होती है। बना के पहरा जसवंतसिंह के मामित होने के बारे में ग.सीतोरी मापत्ति पई है भो रवित है। क्योकि भनेर दरबार प्राप्तम में सुरक्षित एक हस्तलिखित प्रन्प मे मम्याम्य पारणी माता के पाप सनसिंह को प्राता में निवित परित पिले बिकम पिता तिरिका बसा है। भवतः पिच पर है मतिबीन काम में रणे। गरिजा को यदि का प्राभिन माम भी मिया गार वो पा संभव नही कि रमजीवित पर्व हुए बह रमणिका मामय स्पोमा कसे मार रावसा यस पार कति और रुविकार पर पुरको मेहरसि उस सामी उसबमिह को पत्र में निपुरा होना पर माया पारधी पारयों के विस्त भी है। पहभाप के पापार पर भारत तो मष्टोता है जिसम्पूर्व रसमा में कपि प्रसिंह के प्रति हारिकत्वामी तिने पोखमोन है। एक बात पर भी हमरा सिरिया थारे नाम में पिट गोभी पनाए मिली नौ एलसिंहको पुस-नाम घ्यिा पपा है। परिकर्षि महापग बसमविद म मामिन होता तो वह गोमयुर के पद के बारे में कुछ म पुष काभाषमा प्रयास करा, परन्तु ऐसी एक भी पता प्राप्त नहीं है। इन तमा मापार पर यही मावना बाव-संमत है कि मा सबसिह म माभिम होकर एमसिंहका मामिव पा। गि खिरिपापा मसामिह का मामित होने का प्रम सन कारस पही तीत होता है कि यहां की सेना मे सिरिया सरा नाम एक मग्य पोया पारि जमाने की अपनी पनि दमन रमेड म्यिा है । परा--- इस गेहे परिवार, १ महि रमा। बोरे रिणमामा रपी, पीपी या समविद अपने पिता नसिह की मोवि कारियों प मामय सवाया। प्र पो म समिताभकरण मौ सो प्राप्रम में एका मा पनी पनिका की रपमा पसिह के दरबार में परीकीfatी के प्रमुसार रामतिर बया को प्रातनिपा' और '2.0' नामको पाप पुकार साप दिपे, जिम पर मत् १३५. रसके प्रधान पपिचर होना पवाया माता है। इससे पिटवा मोरन-परित पारे में बात नही है। पर माना बावा है कि उसकी मृत्यु प्रकार में ही हुई और नही पर-बंध की इमपान भूमि शिवबाप में उसकी स्टेप्टिकोनी दी। पनि घरचनाल- कवि पनी कि रफ्ना-प्त विषय में एष नहीं रहा है। पर परम सुरस समय इस प्रकार दिया है- पास पा लिपि भवनि परोती परस्ति। मुरबरिया दिए छि तुरुपहसि ।। बात'. १७१५ कि. मे चार पल पर की गमी शिपि पुस्पार को दिन मौर मुखममान समाये हुए हो।' इस प्रपर परिम मनुवार पणारी विवि ARE NO १७१५ प! पुमार मिषित होती है। परमी तपाणों में भी मनात [राजस्मानी सपनिमा मुबार २२ रबर १.१५ हिरा दिया गया है। यों यह सुर मुमार १६ मप्रेत सन् १९५० को हुमाया। कविराला स्मासमक्ष ने प्रो पर इविहाव प्रय पौर विमोर में इस पुर की तिषिपाल कृष्ण ८ पि.स १०१ तरनुसार ला. २२ र सन् १.६० हिमरी दी है। स.ग. यदुनाव परचार मे भी इस पुरकी साब १५ प्रप्रेत सन् १९५० मानी गे ए पोमेरीर के अनुसार वि.स. १७१मावण युरपार मा २२ रनब सन् १.१८ हिन रिन पाती है। परन्तु स सब पणनामों में भरती तपारीतों में दिये गपे 'सुमार' की अपेमा ही है । एफमेन की रस्से की मह वप पोच करने में मह स्पष्ट हो जाता है कि हिवरी वास २२ रबर यस्तुतः गुम्सार १५ अप्रैम १९५८.को सम्मा समय हो प्रारम होहर दूसरे दिन सुबमा १६ पान, १९५८.को रिल मर ही । प्रत' सिरिया बगाना विपि प्रौर बार समापही है।" परपि इसरा कहीं भी कोई पत्नेश माही मिसता कि इस पुरके सिने समय पार विरिया बना । प्रानीय समनिका की ना की, पस्तु अनुमान रही है कि पुरके परमार पीप ही उसने यह च विस गना होगा। १-विपना श्यामनयम-और विनार प. ३५४ । २-० पानाप सहार-हिस्ट्री को पार गरेरमाण १-२ प्रप्याप ११ पृ. -१.। --ॉ. एपीर सिह-निका प. खतिष महेमरासीतरी-(पीपम पर्मा एक्स. सुगम वाप पारित) •~!
साहित्यिक आलोचना अपमिका को कथा सबका पार पखपति-परवा रिष्णु, शिब पति, एक सिरिमी सरसती स्मरण मे-मनवायरस पौर देर-स्तुति की परिपाटी के निर्वाह - साम हुपा है। गनसिंह की प्रास्ति एवं एसपीर-मभिप्त परिषरे अन्तर्गत उपके पराक्रमी वा पहेपराम की मर-विषय बासौर प्राप्ति प्रादि पीर स्यों का सिप में बनाम करने के परमात मून ला प्रारंभ करपी है। रिस्मी का बारमाह बीमार क्या हमा मानों जीते जी ही मर गया। बह दिन पर एब-प्रामारों में दवा पर वार (मान) मनाने की रसमें समता नही की ।ध में उसकी मृत्यु की अफवाह फैल गई। निसा पाहमारे अपने प्रपने मेषों में सक्ति दरिया र सखोर हो गये । पूर्व में मुरा पुरयत में मुपर और दक्षिण में मारपोर पारी सामान बेठे । यह रेस र गाहा मोर दाराशिकोह उन पर कुपित हुए । पाहहाँ मे अपमे से सिमस्त भइसीसी हिन्दु रामा नपरिह और समिर को दुमपामा पोर सम्हें सम्म-हावी-पोरे प्रारि देकर खिोही राजकुमारों का रमन करने के लिए भेगते हुए कहा 'पतिमाही को पर। अपरिह अपने पौर सहित पूरा मरने लिए पूर्व में भेगा पया मोर भरेता पमणि पौरपर पीर मुपर से न मिए नियुक्त किये पवे । बसविद मे पाही एमसरों पौर राठौर मनाहा सितोरिया, हाहा पौर, पाव भासा पारिपतीयों रंगों के बीर मोमों को वापर मातारा प्रस्थान किया । समके साप तोपों में पोर पोतों से मैस हानियों भोड़ों एवं टों की विमान पाहिनी पी-माही पवा पाप के मध्य नहाप ही की। पति प्रस्थान करती हुई यह पाहो पेना ऐषी प्रतीत होरही मामो भगवती मही पहार से पानी मेकर निकस हो हो । कामे की सपन और गर्म सम्म-पक्तिको ऐसी को मानो नाम माप के भारत बिर पाए हों । इस विण्ट पाहिनी के प्रयास से प्राय फटा पाहा पा समुद्र उचित पा परत एक होकर प्रमी में नन मये नदी नामों का पानी मूब पमा मौर बोरों की टापों में परी पून पाकाए पुपमा पयास प्रभर बसवंतरि सरस-रस जिोड़ी साइना से नौशा सेने के लिए ग्न-पर पाप पया। बसवंतसिंह ने अपने बाप रलक्षिा को सुनवामा र इस्तिमार पार मातील मार' नसिह दुस्स पाही मना में मिला।
६] [ राजस्थानी वरनिकाएँ रबर दोनों भाई-प्रोसंग पौर मुपर मी माकर मर गए । नपा पागड़ा उठे। दोनों सेनामों में किया । पोप प्रेरित गोगा बहा कर बोरों पर बो। प्रतिद्वन्दी पेना का ग ऐसा पा मानो मौ सौ मरिया बस बोर के साथ पा से मिलने पती हो। तुईबाति के किट और सस्मारक पारण करपा । रात पौर दक्षिण की संयुक्त सेना र प धारण कर सम्बन की पोर उन्मुख हुईमस पर पौर रस सेना के पट्ट अंधे प्रवीत होहे इम वर्षा की भनी मग हेतु बाइसों के समूह सबाए हो। दोनों पकन रामकुमार एल-टिक हेम-का बारण कर पर्व से मों पर बस देते हुए एक बर हुनबान हुए मेवोपम हापियों पर समार हुए। काहस अम्बान्त मेरी फेरी पोर तुम्ही का नार हुमा । गर पमकने लगे मोर भोगे की होस हई । पमपमावे हए नैनों के साथ सेनाए मगाएं फहराने मणी । यमन-मस्यो की टय पासाम में प्रतिम्मानित होने मनी । मात्रय में रब चापा मानो पाकास के मम्म एक मन्य पाकाण पार बार पाप-माप कापित हो रम सारी पर पाबी हपई मामों पातों समुद्र पप्पी पर उलट माये हो । इस प्रमर साबाजारों की सेना भी नरबन मा पनी । अब दोनों पोर की मनाएं प्रामने-सामने पाहर रट गई। पौर पर और मुरारी बसलसिंह को एक इरमान मिस करमा कि- पणा । हमाप यस्ता मत रोको । पुस न बनो । हमें दिल्ली गामे । हम बारमाह परम सर्व कर मापस नोट पाएमे । परन्तु बसवंतसिंह ने स प्रस्ताव को सुप रिपा मोरया मुझे तुम ऐक्ने सिए भगा है फिर में तुम कैसे बनाने नुपर्पत उसने अपने प्रमुख धामन्तों परामर्श के लिए एक पिया । सामों में कहा माप रिठना पतुर कौन है ? फिर भी प्राप उमेर एनसिंह से परामर्ष में पार मादि में निपुस । बसवंतसिंह रिलमि से पपम पर मूह रचना की मार पपने विभिन्न पोगानों को सपोषित स्थानों पर नियोबित कर दिया । इस प्रभर प्रपनी मैना को तीन भाग-हापम पमीम मौर योग में गिमात कर बसपातमिह स्वयं भी पोल में भो होनए पौर बोले- दोनों भाई-ग्राहगारप मेकर हमें मवमरने समेह पार उत्साह से पास को स्पन कर रहे । ऐसी स्थिति में हम भी पमायण सा मुख र पौरपत्रमा मी धवप्न कौतिभागी बनेंगे। बसबगतसिंह का यह प्रामान पाकर एनसिंह निरन मिा 'मी रमपमस्त मार मुझे साँप कर पाप गोपपुर बमे गाइसे पोर पपने को रमा कोबिने । पापा पुर पित होना नीति विस्य नही है क्योकि दुर्योवर मी मुग्लोष से रपया का और पीरपण भी मानववन के सम्पुख पमापन पर गए । मरि मेरे प्राणोत्सर्म में ही पम्प भी रखा होपई हो प्रमों को कोई पुरा नही पा । पौरपर से मममा रिकि हरतीय महापातलिए प्रस्तुत होगाए । ?
साहित्यिक मालोचना] [६६ परस्तु बमबम्तमिद मुखरित नहीं हुए । नहाने रसिंह को मरण-पत रेरिया । लसिंह अपने शिविर मे और पाये। तमोमे उप-सप सन-पुण्य एष्टा का बन पारि हरपाया और पपले योठामों में मिष्टान वितरित करणार उन्हें पम्मेमसे पवित्र तीर्वमान में पारा-स्माम हर सामी-धर्म सामन पार मायमर्यात की साबिए प्रेरित किया । सामन्तों ने सर्वसम्मत रे रस मारहान का स्वागत छिया । पियन वामम्तों को सस्तारित करने समे मोर मार एवं राहिसे बिरामीबाने ममे। मारवार वीर पों में साहस सूचन मापा गा पर बरा पार पिष्ट के विरे मातुर हो रहे । सिपहसाने बोस रिपे गये । पूसरे दिन मोरंग में पनपौर बसवमा ने मेरों का पाठ पररा र दोनों ने परस्पर मुसलिए, पुनाजी भैगरी नौपस प्रकार पुरु मा । इमस्तानमाह पौर हरिनी के पोष साब रोमों पर एक सरम संहार करने ममे । दुरारिमापिका को देखने लिए मुर अतुर मा पषि । गलपियो मेरस पामा पाने तपी । पोम प्रहर हर बसता हा । एसपूत अपूर्व पीरता से सो पर मोरपर भी रिचय मिरिषद भी होमा । पीप प्रहर में भी पुरा पन्ठ समीप न कर सर यो रिणयन अपने सापियों को संबोषित र बोला 'पुर मर का त है। इस पर सुरमित रहने पर ही बानी पती है। परिक्ष पासादहमा बमोरिवी प्रभा महापरबसलसिंह को दुर ये बाहर निकामी। मिलन समिएस से बाहर निकाल रिय मये पौर र स्पार पर एमबिह के सेनापठित्व का स्थान हस पिया। भाप (दुस) की मार पर प्रसिह की सुगाों पर प्रा टिकी मस्तक पर मर पर पीर सुमामों में पाय-मीरमको पारण करणा-यमा पर पिन परा। समय पर ऐसा जपताना मानो मामा पुस में माई या नर में मकरस हो । मुटने मोर भी किए बार कर लिया वीर योद्धा प्रसपा से पम मने समे पौर प्रापए पीरों का परम दरले मपी । अनेक पक्षिय गोगा बीर मति को प्राप्ताए दिपकी भी मुशि हए । पंव में रामसिंह भी शपु संहरा मा मामी हुमा । रसके पास पर्व २६ मने आये और समसार भर पाए। रलसिंह परमामी होते ही परिवार की सिमि पर उठी । पनातिय धामीमाएँ । सने विवामित्र मंदो को एकत्र करके बालों और माना। माग से पिता मार को योर मन नर-ऐश को अस्म कारी। एलसिंह अमरत प्राप्ठमा पिपा महेष वारि यता म सरमुख उपस्थित हुए और को A पनने की प्रारंना की मिह में सवामों में मरने और-मति प्राप्त मापियों।
६८ ] [ राजस्थानी सपनिम्म उपर दोनों भाई-मौरपंपैव प्रौर मुरारमी माकर प्रा. मए । मारे मापना रठे। दोनों सैनामों में किया । पौरप प्रेणि पोडा पाकर बोरों पर परे । प्रतिगी मा काम एसा पा मानो मौकोनरियो यस गोर के शाप सम्र से मिलने पती हो। तुरंत रे फिट पीर साधारण पारण कर पर गो। पुरत मीर रविष की संयुक्त सेना पर रूप धारण कर मेम की पोर समुराई । मम कर पौर परम सेना के प्रेसे प्रतीत हो । वैसे इन मे वर्षा की मी मगर पारणों के समूह पगाए हों। दोनों परम परमार एम-चटित हम-बर पारण कर मई से महा पर बम देते हुए एक बार हुनमाते हुए मेमोपम सपियों पर सवार हुए। काहम भाषाम्त मेरी गरी पोर तुम्ही का मारहमा । पर गमकमे लगे और बोले की ही बमबमाते ए मेनों के साप सेनाएं पवाएं पश्यने मनी । ममन-मामी को टा पातान में प्रतिमानित होने मना । पाकाण में रज पाग मानी पापाप के मम्प एक मम्य पाका पोरन गया। पेपनाब पित हो रख सारी परापासी इमरमानों पार्यो समापी पर उलट पाये हों। इस प्रकार पाहवारों की सेना भी सम्म मा पहुंची। मम पेनों मोर की सेनाएं पापने-सामने मार ट। पोरगजेड पौर मुपद ने बतसिह को एक फरमाम मिस कर कहा हि- पगा। हमारा प्रस्ता मत रोको । सुर म बनो। हमें रिली पाने दो। हम बारपार कपरण-पर्ष कर वापस मोट गाएंगे। पतु सर्वमा मे प्रस्ताव को दुरुप रिया और कहा मुझे तुम रोक्ने लिए भैगा है फिर में तुम्हे से बामे ?' सुपरांत उसने अपने प्रमुख नामों को परामर्ष के लिए एक भिया । सामवा में श्रा माप विना पतुर कौन है ? फिर मी माप पर रानसिह से परामसन पापुर मारि मनिपुण है। मतसिंह एमविद स पपमा कर यूह रसना की मार पपने मिनिम्न योगों को पोषित स्थानों पर नियोबित कर दिया । इस प्रकार प्राली सेना की ठी भानो हपयन पोम पोर बोन में रिमाल कर असरम्तसिंह स्वयं भी पोल में सो होगए पौर बोले- दोनों भाई-बागरेच मेकर हम गलकाले नगे और उसा मे प्राकारा को पा रहे है। ऐसी स्थिति में हम भी रामायण वैसा पुर रचने मोर पम्मा सी परम पति के भागी बने । बमबम्तमिह का पह माम्हान पार एलदिने निशन किया है पुन-पीपक पुरका घमस्त मार मुझे सौंपकर पाप गोपपुर परे बाइपे पार प्रपने संघ की रमा कोरिपे । प्रापक्ष र विख होना नीति विराट नहीं है पमोकिएपीपन भी पुरन्मेष सह या पामीर पीप्प को पनपन के परमुख पनापन कर पए 4 । परि मेरे प्राणोत्सर्प से हो पम्प की रक्षा होगा तो प्रमों को कोई नुप नही पहना । पारगर से काममा रोगिक रितीय महाभारत के लिए प्रस्तुत होगगाए।
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[ राजस्थानी पनिका लिए भी दुष्ठ पाप की म्पबस्था करमे का अनुरोध कसे हुए १२ रिण का वीमा करने को कहा बिससे कि उसकी रानियां भी पती होकर उसकी सावामिनी हो म । विषा मे मह मनुरोप स्वीकार कर लिया । तत्परमात् पुष्मापपिएमा को एलपुरी नामक एक नगरी का निर्माण करने की माझा हो । नगरी म निर्माण देवी- धमत्तार से उसान होगया । फिर विष्णु भगवान ने एक सभा का पामोगन कर एनसिंह को अपने पास बिठाया देवतामों में उसके बर दुमाए एवं पूर्व और पनामा उसके पास बने । रमा, सर्पसी भारि प्रप्सयमों का हार माप-यू मुस्म इपा और वह रापों बत्तीस पगिनियों क सप्ठ-रसरों में संगीत होसे कमा। इसी समय रत्नसिंह की मृत्यु का समाचार उसकी रानियों को मिला। उसकी पार पमिमा प्रतिस्पर सपनसुसरे मुसाबपी और मुखरपने पौर तीन उपपलिया सती होने को प्रस्तुत हुई । उन्होंने पंमा-स्नान कर बस्पारपण धारण कर सोसह पगार किये, परंपरानुसार वासून कपूर प्रापि का सेवन किया और राम पुष्प करवा कर मोको पर मबार हो सरोबर की पाम पर वा पापी । पहिर-गौरी की पूजा कर गाम बामावर र रतसिंह को ही मार कप में प्राप्त करने कामना की। फिर पुप्पी प्राकास पबन गत सूर्म और पम्मा को प्रसाम किया और मागेपी की परिजमा पणी र पपने परिजनों को प्रतिम प्रासीप कर हरि-हरि की प्रति साप पनि में प्रविष्ट हो गई। मपमी कायाको होम कर सतिया बिमाम सरा स्वर्ग को पानी। बांगनामी मै पुष्प पर्पा कर उनम सापत यिा और उमें प्नसिह के पास पना दिया । रंगों में पागवाणी बाप नसिंहको अभाई। इस प्रकार उसन्न पप समर हो गया। वस्तु विन्यास पनिका एक सपकाम्प है। बाकाम हो पाहित्यकार मापार्य विपणनाप ने एक देशामुसारी महा है। तात्पर्य यह किसमें एक रेप या पंथम पसरस होता है। उसमें खिी एक महत्वपूर्ण पटमा मामलन-किसी मान पत्तिस्य के जीवन के एकही पन का रिसेपण होता है । सण-त्रम्स में पूर्स पावन का विषण होना चाहिए। ग्वकी कपा की समयता एवं मुप्मा बम मनिवार्यतः प्रपेक्षित है। पवामिन इन सभी पिपता मुक्त है। इसमें एलविह जीवन की एक ही घटना-युट पौर सर्व-प्राति का चित्रण हुमा है । मनिका की वस्तु प्रत्यंत संधित है। प्रासंगिक वस्तु के लिए तो सग-प्रम्प में मकाए हो नही पता है । ततः इनमें कोई प्रासंपिका नहीं है। परिकारिकमा में भी कार्य की पौर रम्पुष साहित्यिक पासोपना] [१ गणे पापे मामला प्रसपा को सिमा पापा-स्तु पुर्वपमि है। पौर परि इप प्लशि को सशतिने काका' (प्रय) मा सो ममें विभिन्न प्रसस्वामों का भी तुपा निर्वाह हा है। मौरप पोर गुपर पिस्ट भैकी नई पाही सेना के सेनापति पम में सक्षम पहुंचते ही महापन असहि रमधि को पुर में सम्मिलित होने के लिए दुनारा मेरते है। रालसिंह तलाम उपस्थित होता है-रितमार मेको हो तो दना मार' (पारम)। मोरवयम के पुरम अनने के प्रस्ताव को लय कर रख समविद अपनी सेना की म्यूहरममा कर मोन' में बरे होकर यमापस जैसा पुर रब हर उग्मम कति पनामी होने का माद्वान कर हम मिह मसित मे किन पता है कि पुरका सम्पूर्ण भार समे सौर कर पुर मे पिणी गरे रणका मानोग मे रिया गाय- सोपी पतिताह मुह स! सबसी नाम भरण पनि सबम । मरस सो सोमा भो । टीमो पर परा हो । सापर मोमपि कि काया। रिस माम्यो म पगा। पही 'पन। मुपपन्त एनपिर 'मरस-वत' पार करकाने मरम ममोर कीपा-अप-सप पान-पुष , टोपों की पूना मादि करवाता है और सम्मान तीसरा महामारण सभा का प्रपने पापी योदामों 'मेहत प तीरण किती रो परम तापी मानणामा पुरा लिए प्रस्तुत हो गाता है । इध प्रशर प्रयत वफल होता है पर ममी पापा पोकि अपर्वतसिंहपुर में सम्मिमित होने का अपना निरसन बसे। (शपयार) मकर र होता जिसमें नवरतसिंह विपमियो रामेर मिएर बारी है। इस विष्ट पड़ी में मार रिणमस मप पारियों भी है ये शतरंकरीयान बगिमो एका परिये बानी हे।" मी को पठन पाडौ । इस पर रमसिंहपुर से बाहर हो जाते हैं मौर रविन सो स्थान पर सेनापति हर मुरबार अपने सर देता है। यह मार १-हो पित भी है क्योकि कवि दे सर्म कहा है कि मुक्ति मिप न पौर भूमि के लिए पाबारे परस्पर भिए - मपावत व प्र मुपति नियोतिप्रापयतया प्रक्षपति।
४२ ] [ राजस्थानी सपनिमा रानसिंह की पीर-पति निविषय हो पाती है (नियताप्ति)। इसके परमार पनहि अपने साथियों के साथ पशु संहार करता हुमा बीर-गति को प्राप्त होता है-पार कोट उम्पेरिस सरि पिरि सम राब परे और दुष्ठरास ग्रहण कर ममस प्राप्त रखा है (फनापम)। स्पष्ट है कि परमिका की कमा भरपेठ मिप्त है। बपि इतिहास की एक पटना को निकर पनामा पौर विकास की सीमा ही एमे माम्बपी। परिका में काम का प्य रलसिंह को मापक के रूप में प्रतिष्ठित कर उसका कीति-स्तवन करना पा- 'पावाणू कमसम्म पुषहि पमा मनपत्ति । परन्तु इतिहास की रष्टि से प्लसिंहका कोई महत्व नहीं है । मिस पुर की घटमा को प्राधार बना कर कपि सपने माय गाता रत्नसिंह का नापाय प्रतिपादित करले पमा है उसका नापतित्व साहनी द्वारा महाराणा बसवन्तसिंहको सौंपा गया था, जिसमें एनसिस्मिति समो प्रपीन प्रग्याप सामंतों के समान ही पी । पाप हो ऐतिहासिक सत्य के निहिक लिए यह भी भाषामा पा कि बस तसिंह गुरकी पमा में प्रमुख एवं निमिष्ट बने में और सम्पूर्ण का प्रभार में बराबर मात्र मेकर भागे हो । ऐसी स्थिति में रलसिंहको नायक के रूप में परवरित को मा-सूत्र का संयोगन करला एक पटिन दुकर कार्य करता है। किन्तु यमा मै मानी माप अपवा-पति पौर वर्णन कोसन से बरमा-म को इस प्रकार मोड़ रियाल एलसिंह पुन: सनः कमानाम मपिपिटवा पहरा कसा मा स्वाभाविक रूप से नापम्त परण कर देता है। प्राय प्रारंभ में ही कवि रत्नसिंह पम्मी पौर तेगोमपत्र प्रास्मान पणे साप ही उसका रस भाण सन परखच मारप कन' पौर पर पूरे साहिमहान मना' के रूप में परिषम देता है । सम्बन पहुंचने पर बसवंतसिंह एमतिर को पुतावा भेगते - बोचर एन गुमापियो से स्वहरिण मंग-दो या परिषद ग्मी प्रति पार्षण में परम गाता है और बब यह प्रणमप पहार उग्मेन में बस तसिंह पार मित बावा दो मह भावपण एलसिह प्रति पारमीनता में बरत गावा है । इस प्रथर से रत्नसिंह प्रत्पम्त ही स्मापारिक रूप से कमा भूमि पर प्रवेस करा है। पर पभी कमा माग्न बसबसिरही है। और यहारा 'या मरिक तरफ हि मागे पौधे पाव रे पापया फरमान मगने पर ही सम उत्तर नौ मारे मस्हिपी-कमो गोप यूमि'कार देता है। किंतु पर बमदेवसिंह बाप र पिम में पपने मामा की सम्मति पाई गाने पर पण पितरो कुस बोणे के ताप ही वह हा पावा है कि परचमी प्रम जाणवर राग पनि एग्मो समय एनसिंह की बारी में प्रा गाता है। जिसकी पुष्टि जसवंतसिंह के गप पनि ही मन्त्रणा गे मा पना किसे गाने में हो गती है- और साहिस्पिक मालोचना] हा प्रामोर हार स पतिम हो ममण समार। रितु एमाएक ही महारार अमरसिंह या शेम' में सो शेरपि रामायण रिको पाएमरें मपे नाम मिसाया पाद्वार पर है तो फिर सहा पहिस्स सारख्या है पर इस ही भए बात परम गाती है। mfat पाल म पूजा ममिवा हमा--'मरण सो हो मोरे मोतिह में मुर का संपूर्ण भार उसे सौर-रिस मारयो म पगा' युर मे वित हो जाने के लिए निवेदन करता मोर मोरन को पुरकी दी मैमने के लिए हवा है। यहां पर पाठक को मापपर्य पब्टि कसा हा प्रमा-रेगन राता है। परीस्थिति कम समय पौर भी पूरा हो जाती है जब बसिंह भी मे सनि सीम!-- 'मतो रियाद दिने परमार मीच समीप मम सार। पही रमसिंह पम्पत्तिय संपूर्ण मा पर पाबाना है। पर मरम्प-वत पारण कर पम-एप पर-प कमाता है और पुरनिए लाहो पाता है। अपने पीर मापियों को एक राग दोमा इम्प यमबहोर भी 'पसी रोकाय सकी रोपाप' पामा करने का प्राकाम रहा। जिसका तमी पौरप हो रसार करने महा समाते-पात पसहि प्य भूमि में पा जाता है। भागे पा कर पांच-यापार बत्ततमि माम मातामह पौर प्रम-निरोप भी रष्टि । पर्यत पा-पक्ष की मम पित हो जाने पर बसतमिह पपने हामी सामेटा पाए पर पुर पचामन हर बावे ।पमतः पादि सरकाधम पार पहल कर'-'पार भर भारतमापीर मलिया पुस मसात पण करता है। यहां प्रारपि की रस्तति पाणी पाप-पम' की मनिता सिंह की पुनमा में पलविद मे ऊंचा सत्र देवी- किमो रेली कमर पर बीपमानित मारि। गरि मुखे रविप्रो बमे रसम ममि परि॥ प्रापमकर पिने रतन के बस, प्रौर पनाम का नया पोर पसाड़ी पर्यन र उक्त कार-पति को पिपिच मिा है। महकमे कम स में एम्मास (पमल्ल) प्राप्त होता है और उस अप रिमाया हो जाता है। परिपत्र में स्पष्ट है कि प्रति मे महाडिको भा में मानता है हुए भी एनसिंह को मावा के रूप में प्रतिष्ठि करने में पूर्ण समयता प्राप्त की। विपता कि रालहि को भारत प्रपन कसे मी रसने बसरहामाही पारिपरिपा को पम्प बनाये सवा। कपा-मूनही [ राजस्थानी पप निकाय वस्तु-विग्यास में भी जमा नै सर्वत्र प्राषिरम मौर संपति का निर्वाह किया है और उसमे मापात तारतम्म मौर एसटा बम ए रखने का प्रयास मिया ।वना सब पुच करने के उपरान्त भी उसने कही भी ऐतिहासिक पस्म की हत्या नही की। पगि का यह कोपन सानीय है। संपूर्ण पारपी-साहित्य में मादी निकासी मुमसम-या मुक्त और इतिहास-सम्मत रसना पावर ही कोई मिमेगी। वर्णन पनिका एक वर्णन प्रधान बना है। या स्पस है मिमित वर्णनों हाय उतका कलेपर गया पया है। इसमें निम्नमिमित वर्णन माए हैं- १ प्लसिंहका स-वर्सन । २ साहो सेना के प्रस्थान का वर्णम । पोरगरकी सेना का वर्णन । ४ हापियों मवर्गन । ५ बोगों का वर्णमा १ पत्रिवपी का वर्णम । ७ मुखतों का वर्णन ८ ऋतु पर्सन । ६. पुख वर्गाम। १. विश्वकर्मा ारा निर्मित रतनपुरी (नगर) का बलन । इन पधिक वर्णनों से काम्प के मा-प्रबार में विषम पाया है और कमा की एक- मूत्रता भी भब हुई है । परन्तु हमे यह भी बीकार करना पोपा किमपि के पास पहने मिए कोई सम्म कमा नहीं है। मा तत्व के रूप में मम पुर की एक घटना और प्रपने परिण नामक सौर्य एवं पतिराम की बात को मकर पाना है। ऐसी स्थिति में इस रपमा में परिपुर पोर पुर सम्बन्धी प्रग्य ग्य पर्णम मापए हो तो कोई मार्य नहीं। और फिर कमि के सम्मुख रोष काम से पनी मा ही बीर-माम्प परम्परा का पार भी सोपा जिसमें वन ही प्रपान । अपनिका में वर्णन प्रायः प्रबंप और मान के पमुरुप होकर पाए।मने प्रम-सापर्य में पति हर प्रौरवि की प्रविन्ध का तर्प श्री प्रकट हुमा है । फिर भी हाली बोड़ों सपा (सत्रियों) मुनों पारिके बन मबरने पाने है, इनमै कसानुबन्ध में पिषिमता माई है। करि पादता तो इनसे सभी गया बासमत गुटक मनुहम पातावरण निर्माण की ष्टि मे ही उसने इस पर्सनों पापोवन ना है। पस्तुत पे वर्णन पुरका वातारण निमित करने में नितांत उपयोगी मिर हुए। मोर इससे पौर-रसके परिणाम मी सहायता मिमी है।
माहित्यिक पालोचना ] कपि माम-परिणखम मी से भी मही बस पल, किन्तु प्राय पीर दाम्पो पति इसमें कोरी इनितारमा नहीं है। भीम नाम के परिमलम के साथ संपादों और बीर-मानों की परवारमा करपसमों में एक प्रकार की नाटकीप सरा मधमारेस कर रिमा है विस । सरस बन पये । वीरोकियों से पीर 'गमाइ भाष परिपृष्ट हमा है। कवि पर्सन-पढ़ है। वो बर्णमा में प्रतियोक्तिया , फिर भी जीत मे एकरम परेमही सम प्रमावित करने की मस्त क्षमता है। वनों में पति ने धारम भूमा मनगरों ही वर्णन किया है। उपमानों की योग्णामों मम देवत माम अपितु पाम का माम रखा पा है। प ण मार लिया जातीय मनुसर कपने बम ही सान ही मावावाम मो । ऐसे बर्खनो मे पाठक एकरम वापारपीत हो पाया है। पानसर न होते हुए भी बुरा-वाहिनी का वर्णन करणे हुए पद्बा वर्णन मोर मप-रस बर्णन लिए, प्रबार निभाकर परंपरा-पालन करने का प्रमास किया। -गरम का प्रारम ग्राम प्रहमा है । कषि मै निति प्रसावागत सपनिमा धौमी में पद-गों एवं नामों का सक्षेप में वर्णन किया है जो मापा और मी दोनों की ही में राजस्थानी मापा पप का पुनरवन नाहरण है । पर मह बम परम उपमानों के माशा पर सर पिया भया है। फल मर परपय मुक्त ही कहा पाया । सब होने पर भी काम में से प्रतापरक विरवार मकर मा-मोन होने से या सिगा है। पुरपार पति प्राप्त हो रमसिंह प्रमरत्व प्राप्त करता है। मान असा समता स्व में 'पपुर नाम नबर का निर्माण परमावे RA सला म विपरवन स्मिा है। परि सूत रष्टि से मा वाम तो यह वर्णन निरवर मोर पसेमा प्रोत होपा । शिशास्तविकार मे इमाण परनी कमा को एक नया मोर कर पपने परितमामा की सौशिक परामम को पोधित रियम के रस में पिषित किया है। विदित होरर मी रत्नसिंह पमरत्व शप्त सा है और सर्प देवता व सा सम्मान करते है पही दिलाना कर को प्रमोट है, मोर इसलिए उसने इस पर पर्णन का प्रायोजन दिया। मतीनन मम्तमा पनि मासिका वर्णन करवमय कवि रीति जामीन ममि पर उतर माया बीजाप्रसंप में यपार मायोजन कर पाठाष्टिनीस्मिठ हो पाता है। मितु महई भी परि पस में नही पाया। पीर भूमि एरस्थान मानपा की नमनाएं रक्ति में पीर-पति को प्राप्त प्रपने पति भाप सती होने के प्रयमर को एक पा माल म सोना पार में सम्मिल हो पनि [रस्परमानी पपनिया स्नान करती माई है। इसी परंपरा के अनुसार करि नै ती प्रम में मारपी मवतारणा की। इस प्रकार पनिका के प्राप, समी पर्णन सप्रसंप मारमा-म में किसी किसी प्रकार सम्बर को वर्णन कपा-पिम्पास से तमित पर भी अपने सम्म मौर्य के कारण इतना मार्मिक है कि पाक रखने प्रभिमूव होकर तमय हो गता १-म्पोही मत माता है स्पो ही काम पिता गाता है और सपा रिकामोम्युम हो जाती है। रिकाम्पों में प्राठि प्राय अपेक्षित रही है, उसका को कुछ भी पोड़ा पिए मिमता है पप्रस्तुत रूप में है और परंपरा पुक्त भी। सपनिम्न में भी यही प्रति मसिव होती है। कवि पुर और पुट सम्मानी परमों में इतमा तम्तान है कि उमे प्रति-निरीमण के लिए प्रकार ही नहीं । फनता पनिका मनो मी सत्र पप मे प्रति विषण नही हपा है। फिर भी कवि ने हम-बनुप मेप पटा बिस्ती वर्षा पाप नरो-प्रबार प्राकाप्च परत पारि प्रति प्रस्तुत उपमानों पर कही-कही प्रहति । मुम्बर प सा प्रस्तुन जिस ष्टि में पवन भरवत ही मुना बन पाई। चरित्र चित्रण विका में जीवन की निरिक्ता का चित्रण न होकर एक विशिष्ट बना कामपा है। यह माना मुरकी है जिसमें कर्म की गतिधीनता पौर भावमा पता हो हैसितु प्रताप या मनोविएनेपण की प्रकिया नहा-इसमें मिप्य है इसमें पात्र उतने ही है बितने कि किसी मेना में सामंत सरदार होमस्टे प्ररपेक पाच विषय रवि घन परवायाच पार प भी होने।। इनमा होने पर भी पाठा की टि एनसिंह महापमा नसासिंह, पौरङ्गरमारिरी पार पानों पर टिकता है। पीर पार पातु विषन में किसा माया पनसिह है। पाप्यात संपूर्ण मटमा । एनसिंह को ग मात्र कर प्रप्रसर हमा । उसके सहयोगियों को शोरोतिया और नमो संभार एवं स्पाम मापना की प्रतिमलितमी रसके परिमोलाना तान बने है। बस्तुनः रेवा गार तो कपि मे मी एक पक्ति लिप पारिपीकरण करने का प्रयास नही दिया स्तुि रलपिको पाप में प्रतिदिन के समस्त मपिप राति परिष की माभूरियर में म तुत करने का माल पिया है । मरतः इन एपना दी माती गोपनियता मा एक कारण यह भी है। - - साहिलिामालोचना रत्नसिंह एमाता मनिका का मायक है। यह पसकुनोत्सान परण मौर रर्ण के बमान गमड वीर मर-मगर, सई-म विपक्ष वारणहार समर्माण सुम्पर पुस्प है।' परीकन समान सरास-परिव पशुओं के मिए पहुंचने वाल समान निकाय मग भीम के समान बी, पर-नापा प्रवीण पोनाम रखा एवं वेजस्ती सीमा पान है। इस प्रकार एबीवात्त-मारक के सभी गुणों से रिमूपित है। बसरतसिंहपुर में सम्मिलित होने के लिए गुमामा मेगठे हैं। यह कानी पना रिमन उपस्थित होता है । बसतसिंह मरने वाषी सामों को पुर के लिए माझान करने को एलमिा पूरै पुर प्रभार सय मरने को प्रस्त हो नस्तर है । रम पार है- रिम मोहिमो पर ऐसो वाम पाईपदुऐकव्हेसी । पसी प्रारम से प्रेरित होकर पायंचसिंह से हवा है- 'पौरय साहि दिसी पासी इस सुप परिस्पा कोष पापर पिस । पही सामोरे साप यह पुरनिए किस बाता है- शाम पार किमो बम दोमे, गौरी बम मिलत्या इति यो। बीपी विक भयो परिबानी प्रायो अपि मो पधि पायो । संपस मार कर्म की सबषया बीस्वरिषको पिपिण मानी मह परिव में रोना सरममा छ बन कर पकाए । पौर-पति प्राप्त हने पर पर मोक-सन में मिलने सिमाप के कारण लिपि भाति मम्मको एएस में इस परतीमा है।' मनि पहा अपने पसी बापट लिमास मेहंसते हुए पत किया है। एलसिंह सम मेवा-माया है। प्राणों पाने में विकार पर है रहना ही मने सापिकी मे मरल-पाठ काने में विपुष मीरपुर का प्रय १-वर सेक्या ४ २-घर रस्सा ७t-. 1-पाची धासू हे काम। मा बनेगा इससे पूत मरेगा माय ॥ पीर सवसई-पूर्वमन [ राजस्थानी पनि पौर बीयब उसका बामा है । पुर के पाप कोनि का प्रस्न है, जिसक मिए मानका और कुरक्षेत्र में पाए उम्बन के रण-क्षेत्र में तीसरा महामुर पने के लिए प्रार है। वह मूचो पर हाप पर कर वमबार वोमठा हुमा अपने पारियों से कहता है- तिम बारावार मूमर पा न मचा करिबासि बोसे तरभार सौमे नगणित मारा सीरप बसी रोमम सिमी रो धर्म साप पीये मोई रा दौर सेमा एमका मीने । बोगबाट बरी पट मी पामिने । पाति-माहो। मम पार पीये । पुरवा पुरवा हा परी । वो बैकुण्ठ परी । स्वामी धर्म की रक्षा एवं मार्य-सारण की प्रतिप्य सम्पयनी 4 परिष पाम में बीर-गति प्राप्त कर वर्मारोहण के सरस्प से निमित इस रिकोण मे प्रतिष्ठित एन सिंह का सरममारी म पसे साभाठ बीर-रसाबधार सिट करने में समर्थ ।जपा ने यहां परिब पाप ही जिस विष का मान किया है, यह परिमांकन की एक रिसिप्ट पेमी नही मा पकती है । रत्नसिंह के मुख स निकला हुपा एक-एक सम्म यहाँ पीरम का मम रिणाम बन हर प्रभिम्पमा है, जिसकी प्रतिपनि पाठक के प्रवास में बाहर बती है। वीरवा पानी की गांड में मकर रहने वाना पारतोषिक पूण मही है अपितु बहमीकिक धर्म है। निषा विस्तार प्रबसर माने पर गर्म को सीमा तक हो जाता है जिसमे तत्व-पिन्तम का प्रपंप नही पापों की परवाह नही एवं प्रागत का भय मही । इस स्थिति में सौर्य का गाना की रात, साहस का पत पराक्रम का तेज सुमामो का प्रताप और मर मिटने का उत्साह ही कीर के प्रस्ताव होते ! । इस कसोटी पर कसने पर एनसिंह पमा और सिर होता है। तीन पार के भयंकर पुरके परपात बब साहो मेना में पपरम निश्चित सी हो जाती है और नसतसिंह पनप में गिर जाते है सब मोगरा रिणमन - प्रयो। मा रातिमे मागीह। - "मोती पाडो । पनो मे मरियो में पारपान करते हैं। इन पम्ों को मुनवे ही रामसिंह पापे पाता है और बिना किसीमो परत्व से प्रेरित होकर-प्रपने स्वामी के पालों की रमा सर्य को गोखिम में गम कर पुरका भार स्वयं पहण कर लेता है-मारप परमार नापिर प्रतिपा। प्रसवंतसिंह मुर से विरत हो बावे है और रनसिंह रपमेन में उनका स्थान प्राप पर मता है--शि मुहे बनियो यसो पे हम भमि परि। वीप्त का उगम पौर वास्तविक सम्प यही है पौर यही रलहि के परिष कामामोसमी । सात पौर-भावना मे प्ररित होकर मस्तक पर मार और सुमार्गों में पार्य-चर्म +विर का मारणको पनविह पा-सेना पर टूट पड़ता है। माम विचार पहभपने पीर से रूठ गाता है। पपा- १- संम्मा १४ हिस्यिक मातोपना } [4 एस दोम मिनि मार बसण रेष्ठ विपारे । गि मोर बर मोह मोह मोहाँ एप तेवण । ठाणि मूस रसमै मारिप पागर मरण । सहमे रोम पास मठि हे पछाए रणे। ठो सी परि खान से जीत पमन्य। पईभी एपिर पतिरिक रवाह पार वेनोपय पाहार को पार्यत ही पोर वरठ मभिपति से है। मारनपण की मरमा रसकी सरपर्ण अप प्रतिमा में परिवार का यही रस्ता बीर पौरपा संचार के उसकी रोपारसी में पुनरू पौर अगायों में हाथियों को पकाने को पति मर देता है। बिपिता यह है कि पाने का गम ने फिर माध विवार पौषप प मार करता है और प्रेठ में रस निषपी पूतिमिए पीर सकियोबावा है। परिष विकास की यह प्रतिमा पपने मामा के साप परमेत सार्यक पौर प्रभारपूर्स का पड़ी है। रत्नशिप मोना है। वह प्रपाम पारण करके स-पेमा परिपुम महारता है और अंत मे सर्प पीर-पति को प्राप्त होता है। नारीकोट परिण मार रामा पो " पार कर रलहिको मुटु दि इविहाय की सीमा में पर सपना की। इस परमात पलसिंह सहित असनिक बर्षन में देशवामाना उस मान-सम्मान रिता कर सूर्प-पल को उसके स मम विविध करके रामलविसी पारिषिक सत्तष्टता एवं पौर प्राषित किया है। बीपी मी रिसा पास से प्रतिसयोति प्रपा प्रतिबना ममे ही माने पितु परिप संस्कारों में पते पमा से पक्रिमों के लिए यह विषण पस्मामारिक नही है।वी समर पर गा रे पपने परिजननायक में सेवा-सरता यभार किर उसे पार पी साधपता-बपित कर दिया है। परसोपति पर एफमार एनगि एमाप करने को पाते है यह मोमा सपासप भापी मही बनता अपितु यह उनसे अपने बी वीरमति प्राप्त शानियों के लिए माडी भास्या काले को समापीररिता परमोसन है रिसे बादुर में प्रतिपारित किमाई। पुसकी एक सता और पटना पहनता में गा पने पति माया परिवोल को रिझाने प्रयास लिया है। रसने ११ भी ऐसा स्पा पपने शाप से नही बने दिया है वह परमसिंह की भाषिक विशिष्टयामा कानिान कर पिउन ।
-] [ राजस्थानी पनि कता पाछोटे से छोटे अबसरमौर पिक का नियोजन भी उसके परिव-विकासका अपन बन रहो माया है । इस विषय में 'बस्तु- विषम' में प्रातर्मत प्रकाय गमा का। महाराजा जसवंतसिंह बस तसिंह का परिचालन करने में कषि को एक की परीक्षा से पुरारना बमर्मतसिंह गोमपुर के महारारा है, उनके समान मानकर कोई मही । (राय सपे कुम्प वा ।)। मति भाम्प प पौर देव मे हिमों के पूर्व है । (मति बसत वेब सूरव हिन्दु मानो। एवं गोपामों के पत्र है । (तुम पदि दोषी कर गोप य इम अपै ।) एक बारपार पाहगहाँ ने उन्हें मूषा कर किन मौर मुसलमान होना की योयमों का सेनापति नियुक्त किया है । (तुम सिपर रण साह सोगी रे पप्पे ।) किन्तु विपि को विरम्ना है कि गर्ने अपने सैनिकों-मारियों को रसमेत बोरकर पुर क्षेत्र से पमापित होना परा है । मा पन पर साधारणतया एक *क माना गया है कुछ इतिहासकारों ने भी इस मोर पती रमा। एसी स्थिति किसी भी पनि लिए बड़ा कठिन पाकिबह बसतसिंह को निकारक सिर करके के पारिमिक नौरव को मुम्य बनाये रख सकता । किन्तुबमा ने प्रपनी बानिका मात कापना-क्ति और सम्म बुद्धिाधन से घर तक बसम्वधि परिष की पर रखने का सफल प्रयास मिया है। बसन्तसिंह को मको रोगमट वीर मौर सहि-सम्पन्न गरा से मोबा ।पा। साहगा बि सामुही एक जमो मण भप । किन्तु यसबन्धसिह विनित ए । पौरपरकी पोर से परिमपरिक तरफ हि प्राने पीधे पाया चार पाकर मी पापनिषय बमे थे और यह पमक पौरबमय परित्र काही वेग नसे प्रेरित होकर नमहोने मौरंग से सरसों में परया है मौ का प्रारी हमी हो मण रेमि। बसरतसिंह बाम-गत पीर है । मपने पायमे अधुना को रखकर तुरंत अपने वों की सम्मति से पूहसमा स्वयं मुर के लिए पोत में बड़े हो गाणे । एवं ने साथियों से पमापस जैसा विष्ट पुरस कर पन्ना-नामा निबनाने के लिए -- रिण मारण बिसी रवाना नो मरबर माम पिबायो। एकदीर नापति परिमोला इसमे पहा प्रमाण और सा हो वीन पोहर गहिस्पिा भासोपना] [१ सण्ठ माहान से प्रति होकर 'मरण म सूपा मांगता हुपा रामसिंह रविद स पुर में दिख र प्रमु पर भोग के लिए लिख रहा है पौर नमो दुध पित होने की बात को मुक्ति मृत ठहराने के लिए पोपन और श्री कृष्ण समापन सघहरण भी प्रस्तुत कप्ता है, किन्तु सम्वमिह अपने पुरनियम मरस बने यी है। सबसिह पौर पलासह दोनों पारिरिक सम्र्पको अमित करने के लिए कवि ने यह साए पामोबम रिपाई को मापातु से नितमा डामा है ग्वाही पपिति और पात्रों में भी । मसमविद मौरपर से पैसा ही मुर विमा सा सूर्य पौर राष्ट्र करत पांग बसी प्रमाहिया एव प्रहनिम । इस प्रकार भर मे जसवंतसिंह को प्राणों पर समता मा रिषित पिया है। चिना ही नहीं उसने उसस्तसिंह का उपगम-सौर्य पनि हेतु पौरपरको देवता कामवतारदरियाबा- पर प्रसार ।णि पाये बमण्णो विमूहा को दिए हापू महाया पसरतही मर। बिस गुग मोगा पोरन सामम स पनपन पर मोर रेता है उसमे वीर पर मनोहाना बसपातचिह के वेब पणाम मौर साहस का ही कार्या। अपातखिद पंह तक ना ऐ । उन्होंने रण-मेष विषय होकर बोला । नामी तर मदिन वापी-सामंती मो मो में समान पाम कर रहे पुर-मेर से बाहर कर रिमा बामा पनि परामवासिमापार रिम-मप्रान मीठो उनके वाम बा। सत्र है कि कवि पनापिठ असतविपरिक पोर पोर मात्र पारमा पाइयाम्ठ स्वाभाविक रूप घे निर्वाह म्मिा है और बड़ी निपुणता चमके माप पर माने जाने वाग का मान कर सकी मम-बौदिको प्रतिष्मपमा करणे का प्रयास म्मिा है। प्रन्प-पात्र कवि की रष्टि मुम्मतः पाक दो ही पारों परिध पर ही है । जाने प्रतिपके पाप सप से परिमान करने प्रयास नही पिपा। फिर भी अपने स्थान-स्थान पर उगो वीरोचित पूणों को पता है । मुतनों के पन में उनके गाठीय ईसा प्रौर मेहा प्राति का गमान हुपा है। बसवंतसिए को को प्रमान से पौरपरकी नीतिमता की मोर मी परत म्यिा पसा है। इस प्रकार दिने प्रतिफल पाना को भी मोटे मोटे हा मारकरी विपित दिया 1-पता ने नही है ।कोमा प्रमोष्ट भी महीमा पौरन ही तो रसमा ८२] [ राजरथानी बपनिम प्रकाश पा । प्रति-पम के बतौर पराम के वन सेमी मायक-पपरिष ही रितसित पौर स्मृर हए है। पुर-भूमि में पौर-पति प्राप्त करने पाते प्रम्पाग्य पोरों क गुणों का भी रवि में बर्गम यिा है जो सामूहिक ससे पापिय बाति की पारिरिक महत्ता को ही मतका भसकार बगा ने रीतिकामीन प्रनारपारी सुप में रपमापी मसका प्रभयंत ही संपत मौर स्वामाविक प्रयोग किया है। माघ रक्तिमकार और पामेति विपाल कवि का मस्प कही है। उसने मामोतवं पौर प्रवरणीपता को हिपत पाते ए पसंकारो का प्रयोग किया है । वह पि भाव-विभोर हो गया है वहाँ उसने महारा की योगना किए बिना ही सफल काव्य-रचना की है। पनिका याम्मतकार और प्रमिहार दोनों का प्रमोम हमा है परन्तु में पसार ही मी प्रपल प्रसूत नही पान पाये । कपि में प्रसापानी पारण पियों श्री प्रपा अनुमार पुरक विवाह मोर पट-पतु एवं निरोप पान गुमा रोकिये पर एनम मी बेमेत बनावट पौर प्रस्तामाविकता नही ।।दमा मकारों में प्रस्पानुपाम फेानुमास भन्यानुमास प्रस्वानुमास बहमवा में प्रयुक्त हए :- प्रस्थानी पण समाई मर्मस्पर का तो प्रायः हम नियहि हपा है पूरे मन में कठिनता १.२. स्वल ऐसे हो रहा गया सपाई का प्रयोग नही हपा हो । पपिका दिमत मापा पर पूप पपिचार है और उसका प्रकोप विधान है। एमबसपमुहम पनों का मनोति प्रबोप करने में समर्प है। यही परम कि पपण सगाई नै पगार्मकार र प्रयोग करने भी उसने भाषा माधुर्य और गाभाविक प्रवाह को रमाये रखा है। बया की वयोगमा और पम-पवनी पर कना ने पनिका को पनिकाम्प बमा रिया है। प्रस्तु । शन्दासफार १-यगासगाई पण सपाई रिपत कविता पमपना एक विपिष्ट असंहार परिसर मान पापिठ माझी हा सरप। इसमे पण प्रथम परप्रारिर्ण परप प्रतिम पार पारिनारसनों में सम्माप सापित किया जाता है। मे :- बसवधि दोष मौर पारे महिला परत । १-प्रौ.रोत्तमराम स्वामी-बियन पमलीमिपी मापना ...
. साहिस्पिक माशोचना] मध परिसि मरापिमो रखनागिर राठौर ॥ पण सपाई या 4-सपाई साधारणपा परण के प्रपम पर प्रतिम रामो की ही होती है, पर भी कमी मम्याग्य सगरों की भी होती है साटिए २७ सपाईकोराम-~1) सापारस पोर (२) पाथरण माने गये हैं। , साधारण वैण सगाई-शिसमें पण प्रथम पद की परण के प्रतिम माप समाई रानपा। २ असाधारए वैण सगाई-(क) पर प्रभम पगी परण उपारम प्रसाद पवा- (क) पण रितीय मरदी पर मेठिम साप सगाई हो। पना ने पिस्वर साधारण पण मनाई का ही प्रयोग पिया है पर कही-कहीं प्रमाणपण सगाई के बाहरण भी मिल जाते है। बाहरण साभारण-1 मुसान्हा पो त सैले २ रिश्पा मसे गुमो रेसागती ३ पुर्या पाण्णा रित प्रेसा समोर ४ पुरी गम्म मा बती सुम्मयाती असाधारण-१ परि भम्पए प्रति होस २ पप बहाना बग्गिामा बैल प्रनाईलो एक ही बार पारमी रो मित्र राप स्थापित की गातीत सि समाई के उत्तम मम्मम और प्रथम (पषिक, सम प्रार पून) ये 1 मे होते है- १ उत्तम मा अषि-वर सगाई उसी वर्गवारा हो । २-१ मम्मम या सम और ममम म्यूम-सब समाई सी व रामकर दो मित्र बलों द्वारा हो। मिश सयें और धर्म ससरों की बैण सवाई मनप या मित्र मंचनों की रुपाई पर मामी पर। पातोय एना में सप्रेक तीनों प्रसारण समाई मिलती है पर पथिक नही बतिपम रणरण एम्स है- २ १-ही-१ २.मी. नौतपास स्वामी-विन रम्मी को प्रस्तावना समोर .. " ४] [रामस्थानी सपनिमा उत्तम- हीर बरित पर हेम २ किम सो किरणात पर सारी परिपाक मध्यम- इसा पम्प पटानपटा प्रपार २ राम मारोग प्रवासा ३ पा हरिनाम उम्पारिप्रो घोहियाण पनाह मधम- परिहा पैठनमे । २ ठाम पर मेह टमटूमि । बहे पोना सर बाण। ४ पगा पबिनेगा क्या सीमा देण सबाई को स्पापित करने बासा मर्ग कमी प्रतिम पम मारि में प्राता है। कभी मम्म म मौर कभी मंठ में । इस रष्टि से मो मेस सबाई कठीन मर होते हैं- , मादिमेस-यण साई को स्थापित करने वाला वर्ग अंतिम सम केमार में पाये। २ मध्यमस-बस समाईश स्पा वर्ण मंतिम ममम म पाप । ३ मतमेस-पब मेरस बनाई का स्पाप पर्ण प्रतिम पम के प्रत में मारे । मानोस त में पारिमेन नही प्रपिक प्रयोग है पापि माहीं मप्पमेम और अन्तमम पाने परण भी मित्र बाते है। दाहरण: प्राविमम-१ टि सिषतिमा माती २ पित्त मित्त पवित्त मात दी। ३ ठोकिन त प्रनारसी ४ मा प्रसस्कसा बनी मध्यमस- सुपह प्रने पतिवाद २ हि तुरा यहस्ति ३ पो मसाला पर्य प्रणपार ४ गासि बामर निरबार प्रतमस-१ प्रमर मई पाइ २ सती उममे सपरिसा १ मुहमापेपरि प्राम -
साहित्यिक पानोपना ]
पण मनाई के पापान इमए महत्वपूर्ण प्रकार शिक्षा प्रयोग पनि में
हमा पनुप्राव है। पूरी एना में अनुपास की नोडी पन पाई हुई है, पर नहीं
भी ऐसा मान नहीं होता कि इस योजना में कसरत है ३ सय सामारिष
मौर अविना प्रमूव है। भाषा-अपिकार पर निपार करते समय अनुपास के राहण
रिसंवाद है-कुग मोर साह रम्य है-
अनुप्राम:
१ पण बाजितपण मार पम अपक्षय पुण्य ।
२ रमे महाशि मरम।
३ गोवानीमापा कास गरी मिर काम।
४ ममता मिसि पले मगर।
पापोर प्रपामा प्रसार।
परवा पराम।
'समर का भी कहानो प्रमोन हुमा है पर भोप के दम
भी नही होते।
१ करण मार मारहाण ।
२वीप मिले पखीरा
, सी वी विनिमी सूर तमा रिपसूर ।
४ पूर्णपति पुणे पुखणादण पन पुग्ध रिप्रण।
२. परम पहिरण बस पाण सा पापरिमाप ।
(स) मनिमा
रनिया में पमिका पति पुल tiri,vtment. ti
मिति मन रपमा रोता रपा मrrittituter
पाई। पवा-
उपमा
१ ह य एलयू पल पर्मा
पारगारे पाप, पो पर
। प्रो सिर दोगकमत्पर ।
ममास दो विम भाग 1
[रामस्थानी पनि करना बन रिण काम । तकलीपर मेव विथ ।। १ डरे किस किला म्मू फूल पान मिपि रशिपाई। स्पक १ पाना बाहिर प्रेम वेति पयो मेगासम्बर । २ बाप मारिन मुन मन गा। २ म सिमगाररपोगी। ४ काही कम ५ सती मामेर। ५ सरहिम पापी। सांग रूपक १ बसाबोल रिण समन्द माहे प्रतिनिहाय पर्य। २ दुल्मह पण दुधन सूप पूरा नाम मह। १. सहरिण हुई पर ठोरण पसरान ।। विपम १ कामे प्रबुमामी किमी मापिरलो मषिपट्ट सरपेक्षमह पि का सर्वापिक प्रिम पमन्नर है। मनुप्रास पोर रेख सपाई पापा यही पर्मकार है भिसा कवि ने बी सोम र प्रयोग किया है। उत्प्रेभापों को योजनामा में गाँषि ने परंपरागत उपमान अपनाये वही उसने कतिपय भने उपमान भी पास किये हैं। यपा- १ पिर ग पा हिरे समिमान । मौ मारि गाणे चिक अभिमान । २ भयाणक भैमीत सौमत मार । कमे बासिमाधी निसा बहार। पस्यै पिस मे सर सेह पपीस । पोहे फिर समिरमर सीत ॥ ४ रमातम मौर मिहीं महिपत । सका हम बाणिक माघर हात ।। चंड विचार बमा ने अपनी पनिकारपना वीर रखामा भम्प परति का अनुसरण ले इए की प्रतः इसमें पीर रस के उपयुक्त घरों को ही पास मिमा गया है। पनि में पत्र (पमिका) और पप दुम १६ पयतरण। जिनमें १२ प्रकार के साहित्यिक पाखोचना ) [. विभिन्न घर प्रमुक्त हुए है। छाको रिपिता पौर परिवर्तनशीलता इस प्रतिको विमेवता है। र पणिक भी है मौर माविक भी। (क) मात्रिक छद १ गाहा-चर संख्या १,५७८५ गाहा पात का मुपस्टिव है संरक्स में इस माम मा पनिता में प्रयुक्त 'माझ तीन प्रकार का है- १ बम पण १२ मात्रा। विवाय पाए में १८ मात्रा। नवीय परण में १२ मात्रा। चतुर्व परण में १५ मात्रा। पर सम्या ७५ में उपमु -नियम का निर्वाह हमा है। २ प्रम पर ती पणो मे १२-१२ पात्राएं। रितीय प्रौर बर्ष भएको में १५-१५ मामा । पर सम्मा १ मे इस सभा निर्वाहहमा है। ३ प्रधम परण में १४ मात्रा । प्रवीय रण में १२ मारा । रितीम प्रौर पातु परण में १५-१५ मात्राएं। पहरममा प्रमुख हुमा है। मथा- प्रपसारा मरख म पारा सामि मि मैत्रि दहा । सोपट मिशन प्रामागे पुल रेहा In पर गाह बस्तुत उपयु छ याहा संस्था २६ feet at पए में कमी कभी दो मापाएं अधिक रसो गाती irman तूपक होती है । गीतों की इस परिपाटी का शमा वि.mat में भी मी मा बावा है, मै कि पृषीप की विना- मामा प्रपम परस में १४ माना अभवता उसी पत्तिाटी ninth २. गाहा मेस-ई संम्पा २४ गहा मेम में १९१९ मात्रा पार mtite mint or पौर कृतीय एवं प परण में तुरु मिनाई गती । 4- ८८] [राजस्मानी पचनिया इम न होमि बिमारसे माई प्राये पुत्र हामी माई । करि मद कोर पुल शिरसा करि सामि मितस पासी सहि मुम्बरि ।।२।। ३ गादा पोसरममा ४० ४८, २५६ 'माहा चौसर में१३ ११ मात्रामों के पार होते और समी परडो प्रेत में एक ही पद प्राता था-- एम रितणाव देखने । पई रिमा देठाते। बाण झा ठाने। समिस पो भयो पेयमे। (४७) ५ विसरी-चमण्या ५० से ७ तक इसमें १९११ माघापों के पार पर होते । मह पौराईकाकीण प्रकार है। यथा- जनाहरी मिसर fry प्रती पौषमिपा बांबमि प्रॉपानी । से पो पिया माये चौकास बैठा एन गामे ॥१८॥ ५पदारणो- सम्या ३ इनके रोक पाए में ११.विधाम से २१ मात्रा होती!" पाषा में जमरण और। मारे मंत्र मरण शवा। पपा-- प्रेमा बस पनीस रमार समर्प माम याद रहित प्रारिखमय। औषी परिविजोष दिपने म्पारका परिपी बम्पकमम्प मपासण मारणEn सिमित पण या कार में कही एगी। मिल पाए में ऐसे परजोडने की परस्थानी कवियों में एक परिपाटी पी है। कषिच का समया २,३,११,१३२,१५७ २४३ हिनी यस पम का नाम पपप | पलानी या करित माग में अभिर है। इनमें सेना पण रस्ताना पका मिश्रण होता है। गा- बनू सारिता पा साहित्यिक भासोचना ] [१ मुणि नवाब यमपर सिताब मा मा ! सर निमा गोबरपम मा पामेत तेश माहेष तिग्राप । पीथम म उरिम मिसा मपुर पर। बपराब स्पा पिरपर विसा पूमि मे मौर्य पहा । माय मरो प्रसपत्ति सू कत्री बाग काध मा ॥२२॥ .दा-द सैरया : से १७, २५ से ३०, ४४ से ५१, ७६, ८७ से १० १२६, १३०,१३४,१४४,२४२,२५० से २५४,२५० ६१ से २६५ । इसमें विपम परण मे १५ और सम परण में ११ माषाएं हवी एक तीम और चतुर्व परण मे तुम मिमाई पाती है । मपा- समि पारा पा समासमा एस समियूर । समाचमा रम् सानुले नहेबामा दूर ॥१४॥ ८ पदाहा-मंद संस्था ३० से ४६, १३५ से १४३, १४८ से २४ यो पूरे में ११ १५ प्रौर १११ परण होवे हैं और प्रथम और पतु चरण में तुमिनाई पाती है। पना-~ नरपर सर निफेम मारब मषि रीती मरी मारे बारे मपररा बमि प्रष्टपति प्रेम ।।१४२॥ (स) पक्षिक बंद पनिका मणिकदरों का भी प्रमोग पा है। इस प ध में पिमेपठाएं हष्टिपोपर होती है- १ मा कार का प्रयोम हमा!। पा- रामा परि र सिमी भ्रम रह मामात अंग पर पिठ मारी मोतीराम मंद. २२६ रपाधि पर्ण और मा में हम 'म' का प्रदोयमा है ।
पुाप बिरसाकर ८८] [ राजस्थानी पनि इम प्रेग होमि बिमासे माई मामे सुरभिम सामी प्राई। करि कोर सामि मिन पामी समि मुम्बरि ।।१४।। ३ गादा पोसरवर संम्या , ४८, २४८ माहा चौसर में १५ १६ मात्रामो के पार पास होते है और ममी परगो के प्रत में एक ही पम पावापा- दम रिषणामि देयमे । रेप दुई विप्रा देठम्मे ई वाया गया। रामिण पयो पो प्रमे। (७) ४ विभत्सरी-वर संम्मा ५० से. तक इसमें १५ ११माणामों के पार चरण होते ।।बह पौपाई का हो प्रभार।बा- माइरी शिवर रिण प्रती पीबमिया गोपनि प्रौपानी सौशिरस 4ठा धम गामे ॥५॥ ४पनाणी- संख्या ८५ इमर प्रवेश पर में ११ १.२ विधाम मे २१ माषाएं होती। मात्रा के पंत में उपस और १ भाग पंत में गण पाता है। मा- प्रेता 8 त्रीत परमा नम्बर्ग सामनवमरम्मा पारिसरा। बीपी रिषियोष गिरा पारा परिहा जीवनम्प ममारत मारला ॥३॥ रसारित पर पदिनी पराना परस में नहीं होगी। प्रतिम परण में ऐसे पग मारने की परस्पानी कवियों में एक परिपाटी पी है। ६ कपित्त-घर संम्पा २,५१,५३,१५१,१३२१४७१४३ हिन्दी में इस पर कानाम पर है। परमानीमा कतिनाम में अगिर । इनमें रोमा मा चम्माना पानिमय होता है। मा- साहित्यिक भानोबना ] [t मुलि मबार बाराम देखि सिताम महा मर। बडू मारिता भिसा माधरचन प्रमा भानेत तरि माहेस हिमाणे। कन्न ररित विमा मकर मारी। अपराकमा मिरवर विद्या पूमि मे मोटी पहा । प्रा गरी मतपत्ति मू श्री गाय काम कई ॥२३२।। .रा-सरमा ! से १७, २५ से ३०, ४ से ५१, ७६ ७ से १८ १२, १३०,१३४,१४४,२४२०४२ से २५४,२५७ ६१ से २६५ । इसमे पिम परण मे १५ और धम परण में ११ माषाएं पती पतीम पौर पर परण में तुम मिसाई बाती है । पपा- समि पारा पा समासमा रम समिमूर। बमासमा बम मानने को पाना तूर ।।१५४॥ र पहाएर सम्मा ३० से ४६, १३५ से १४३, १४८ से ०२४ कोई में पीर पर होते हैं पौर प्रथम पार गर्व में तुमिचाई पाती है। मगर-- करपा र भिम भाप मषि 0ठी मी मारे गये अपना अपि पपपरि म ॥१४२॥ (ख) यक्षिक बंद पनि में परिणामी प्रपौष मास मोम सेरो पिपवाएं हरिमोपर हावी है- । इस प्रारमा प्रयोगमा है। यपा- राम करि हाक बिली प्रम पर मामाग्रत प परे णि माह मोतीराम बर#. २८ कितपणे और 'मा' में हम' का प्रयोग हमा है ।
१०] [ राशस्थानी बचनिका ३ (क) एक स्वर्ण के स्पान पर दो ना मरणों का प्रयोग । समा- राम रिमण मागस्पग्य 'यार हणून एक परण है । सास की मोगना के लिए रिम को प्रात् पो सबों को एक रूम के रूप में प्रयुक्त किया गया है। (8) दो नए पोरे पान पर एक पुरुवर्ण पत्र प्रयोग । पत्र- हिनोने पार पाये होक-- मोतीराम दम परण में सान्ति 'मे' पौर ममग पनप गेमा वर्णों के स्थान पर प्रयुक्त हए ।। १ श्राफाक्षर संख्या ४ यह सम पणिक मर है जिसमें सपण गरण पौर नगरस कम मे वर्ण होते है। इसकी गति योमर और बोर घरों से मिलती है । मा- रस भास सम्म मरगाह मुहमीर ग्रहबम्य ग्यान गहीर । ससमल सर कर पर रीमण भांगण मग्य। पिवयाव वारण परह सिणवार वेप सता २. मोसीदाम-ईद संख्या २२४ से २४१ इसके प्रस्परसमभार जमण होते हैं। बा- नपा परि पार हमे वि विक्षप परे भार हितु ममेष प्रपण। रस्तान मीर विहीं गहराम बनाइसि गाणि हि भारए भात ॥२१॥ २ भोटक र संस्या से ८, २.५ से २५१ इसके प्रदेश परण में पार सपस होते है। पुरव मुपत्ति मासि पुर्ण मुम्पत्तिम म खम्न मल। पिन नानु महेश नरेस पर साहित्यिक भासोपना] ४ मुजंगी-एसमा से.४ परमार के अनुसार यह साल का सुपरपावर रिस प्ररयेक गरण में पारसरण पो। सपा-~- महन्ती इसी पम्यि मोपे बहीर मी ईम पीने पाती गाणि मीर) कमाये कह से रमकामा बहेबारमा मारिण मारमामर ॥२१॥ बचनिय की मापा-शैली बनिन पच पच मम ऐबो में बित एकबीर मामाकाम्प रिपारण है। उसने अपनी रचना को 'मारि भले सिरियो जपी पप्ती सन रसान कहकर रातो काम में भी पमिहीत रिवारै पसतः इसमे पारणी-काम पार के पाप ही उसो-काम्प परपरामों की विस्पतालों का भी समाहार हुआ है। पपविकत बीर-काम बीर ही रमा पारस है । मत कमि को मुस्पत पीर रसारमा मापा मीही मामय प्राण करना पा है। कपिको अपने गित स्वामी की वीरता रोग परामम मौर साहस का विषण कला ही भी है। फसत सीमापा-मी में मोर रसाह, नियम मानि गुण सहर ही पापये। कमि की भावना रात मन्तम बीर एवं पाणी पिट और पमत्कारी है। भावना पौर पमिमायता का मह मणिकचिन संबोन रेखते ही बनता है। रवि पाहे पर को अपनी ममिपति र धापन माया हो पा पचको उसकी पाप-बाय दोनों में मै सपिकस में मप्रतिहत प्रवाहित हुई है। उसमे कही परोप नही रह प्रमी प्रभार पुष्टि करने में समर्थ है बापच मोर पप रोगों में मभिकार पूर्वक एना करने की पूर्व कम है। पपि प्रामोम्य रचना को 'पपनि का दी गई। विन्तु इसमें पच की सुमना में गा बहुत कम प्रभुत हुपा है । पासीय-समनि। (२) माता (१) पौर पनिका (६) छोटे पोव १२ पाप-सप इसमें पर्यों के बीच बीच में पाए । पहें ने जात होता है मानवास सोपी री पनिका में प्रयुक्त रावस्पानी पर इस काल तक पात-पाते पपने बिहार की परम सीमा की पहुंच पाया। बना रे, मिनी प्रासारिकता रखनी ही सामाविता और प्रपामपवा 1 अनुशाम मन्द नार पनि पौरही-सास-ससाई पो सेमा प्रसाद और भीषम हो म है। जी सिंगम माहामा म समारती हुई तो कहीं निगम की बहस मिप्रित परापनी मे मेबर पति से प्रवाहित पौरखी [ राजस्थानी सपनिमा या- बारा ऐमी परस्त पनि पाम कली है कि पाक के मन में उत्साह और उनकी महर सी उम्र मगमी है और यह कषि की भाष-मूमि मे विपरले ममता ।। वही पनि लिंगम-काप्प का प्रारम है गे पामोम्य इति में अपने पूरे तेर और प्रभार माप पिचमान है। फोगा त माग । कामी रो बनस । सती प मानेर । साहस रा साट्न । भगवान प्रमर कोमिमा यहादर । पाणा मोमा पुरा मारि मोपि हापिमा रे पुम्भाषपे सगधय बार्ग पर गम पा र पसिसा रा बाया मा बाग पर पारी बगा बारस्पा | म पिपाना पीपस्या पाइरपा । पावर विपिस्या विहारस्पा । रिण वेटर विस रमिमै वाणधि मतवामा मे मा को हानि मूना माइस्पो।। रित बरणों टकार और कार सम्मों को प्रयुक्त मर भी यहाँ पपिठा मे बिरम्म योनी में बोरामों के पातरिक उत्साह-रमेय की बार भाषना को नूपी के साप म्मत कर दिया है । पीर परिषय में कषि मे उपमानों की भी नया ॥ किन्तु उनसे कही मी मात्र प्रपतनही हुमा है। कोरे गमतार से परे सबम स्मरो युक्त वीर कम्पमितत्व को निरापित करने में सहम हुई है। पोता और पुर मपर्णम करो समम गहरी स्पारणी सार-सरणामों पारि का नम्बा पौड़ा विवरस रेने पामे कपि वो ममकान में बहुत पिन गायेंगे पर इस सबके पनाव में बीर भावना' को पिषित करणे पामे कपि विणे ही निमगावीर को कासी रो कानस' पोर सीप नामेर हरर मे प्रपूर बना सकिका परिषर रियासिसा मनुकरण रिपन समर्प करि मूर्यमन तक ने मपनी कार सतसई में दिया है।' बिससे उसके घमस्त धीर सार मुभर होनए । म पिपासा पीपस्मा पाइस्था' हापि मुटमा माइस्पा' प्राति पौरोटिया गो पोर रस परिपाक में सहायक हुई ६ नही पनसे बर्मन सरस भी होगया है। सिपारथि पृप्पीण्य गिम भापारमनीय सरप पोस्ता के गप में प्रसिटही बया में भी अपनी बरमिका में रिमम पापा की पटोरवा मधिो मरसता सास को पार करने काग और पप दोनो मे सफल प्रयास किया किषि ममतपयुक्त भापा मोर पेली के प्रयोग में निपुण है । एनसिह के लियत होने के पम्हशी पति से निर्मित खमपुर रणन करने में मिले पिरमापार कमनीय सापकोपहरण दिया है। पपा- १-परी पामीरीसम बनती मारेर । एक पूपोलो मार नि परर -और मवई पवा- HHHHHH साहित्यिक मातोपना] [३ 'मा मार मानि माम् मिस मति बग हिमा चै । बाट पण मूहग मापे मिरे । तीन प्रकार रो पान पारे । सीतमन सुनन्ध मने परिमम भधेमा माई महिर है। मुहम माने पाबारे रामा पावर नट मटिका संपीय भूमि करि करि रिसाये थे । ग्या रा मसूक हाप पार कर पा । सोमह सिंगार किया। म प्रेम का मा। वेरपुष । पके पर धमकी कमी। समय पीर । सुबकी सिंसार । विपकी बीर । प्रेसी उरवसी बसी प्रपथप मुइग प्रागे हार भार प्यायो नित करे। प माम्पत व ने वर्णनात्मक सी का ही मनुकरण किया है किन्तु वर्णनों में भारमठा उसका स्तापनीय गुण है। जिसमे वर्णम कोय बारमातुर्म भाममा विमत बनने से पर नपा है। कपिले पनि मैली में पान-वर्गम नही किमा परम उनमें कही संपादों की योजना करके परसत कौसम का परिणम दिया है। इस प्रसार संबाय पाओं की पीर-भाषमा म्पत करने के साप ही पुर के लिए नावावरण निर्माण में सहायक हुए। हिसिला पातार मूसार पाउन मुधाकर पाठियो मार वोमे। "जेसिव पारा वीरप पणी पै काम भी परम साम बीमोहा पोई सेमा राप पारे । बोगरी पाटरि माटी रपाधि नि । पाविमाहारीमा मा प्रोमा मारि मिये । पातिताहाँ बार । पुरमा पुरगाह परी । तो दुष्ट पारे । माहट बस पर? महापन ! महायर प मनोसमी महापर पूरे । पहिति मरे । मापन राहग मापे मर्ग का पर्ग। यहो ऐसा दाता है से एक पीर सेनानायक अपनी मू घों पर बन रेवा हमा से तमनार लिए पीरठा की प्रतिमूति बना हमारे सामने वा पो समिकों को दुर के लिए प्रेरित कर पा है । करि की यह विषारपा-सगना प्रमुखो है और निरिपती से पका कवि मिस करने वाली है । प्रतिम पेपटिया मोरामों पारिषिक- पिप्ट्य को प्रकट करमे के साथ ही भाग गुरकी मौपणण को भोर भी परत करणी । मिने-सुने सम्ों मै कमि का यह लापर प्रपपनीय है। पमिकामा-गरम में प्रपत्र भी अंगारमा ममी 'महल की गई है। पररातु चारों में पार्टी का उत्तस्यायुततर पार कम हुपा है । एक पान की मार पूरी होने पर इसप बोस रटता है और यही म माने भारी पहा है। इस बात को दिखाने मिए कपिको कही भी स्वयं मी बोलना पड़ा है। यथा- 60 मार सिमी यसो १ सपे मारापर्णन पीप बीप में सेवारों की मोगमा से समे एक प्रमर की मारकीमता प्रापर है । इसे पाठक पता नहीं अपितु समानता का अनुपम हारमो मामे माने वाले विपर के प्रति सव पि रत्पन कर देती है।
पमा- १४] [राजस्थानी पनि बमा ममता कापि है। बनिहा-पैमी में पिरा रसके पप में पच का सा सौम है यो प्रपने पूरे प्रमाण निसार पौर मार के साप प्रष्ट हुपा है । उसका पर मबाह पूर्ण रम्प और प्रेषणीय है। परसा रिठ परणी सर रित पहपी। रिण समन माई र मत हिसि नियमान हपा । पादा ही बाबरनी भरपय मोमहकमा मुषा नेह सम्पूर्ण स्ति ह। सौ सी पासोर की पूनिम सर खि नैसी उसमी । फौगो उपर बमो भामा परम्पर मम भाट करिबगायोति मागी। गाणे बरफ पटक हेमापस पहार मा विराजमान हपा । इमम्त ति मागी। विमिर रित वागीक हिस बापी। काामू ग तापी । हाल पर पूर्व पर पर उर राव हार गोग हा कर । पा माप एक सफल पप पाम्प की सभी विभपतामा से परिपूर्ण है। तग्मय भास्ता कोमन सम्पना ममित मापा और माहारापरी सगीय श्रमी समी का यही मुनर सामंजस्य प्रष्टस्य है । तुपर्णम को परपरा हमारे पहा नई नहीं- सरात कवियों ने भी इसे अपनाया है मौर मध्य कासीम मा एक राति-करियों ने भी इम प्राण किया है कि प्रस्तुत का प्रस्तुत पाप उतम सा अनिष्ट संबम्प निर्वाह पर्प विपस के साथ उसका पैसा प्रवठा प्रपोगन पाप-बार नियों में ही मिने तो मिले । रण समुद्र में पर-पार रपी कमन मिसित ए को पिपित करने के पाप खोमहा गाएमपी पपगली प्रपाप का सदप रिचा कर कपि मेन मेमस सत्तम काम्य-प्रतिमा म परिचय दिया है अपितु वीर प्रम्प की काम-रका निर्वाह करते हप सध्या समय कमन के संकुपित होने के साप ही पोर पति प्राप्त पोरा प्रमा हाय परण किये जाने का मार्मिक परेत भी कर दिया है। स हिम पापी (प्रति उनकारों के मार्यों की पापी बमने नसी) माय कपि की भाषागत समाहार पति मग्या ममूना पेपणा है । पागे कारण ठपि मापी कार कमि पर्णम को विषय स संबर कर पूर्ण पर का प्रबन्ध गाा रिमा है । मत के रोनो बाबम गित मापारण से घामारण मण्यारमाएको प्रकट कसे।। गप नियते समय प्रायः परनिरा को तुत गप-सी ही अपनाई माह किन्तु तुको प्रति कमि का दुराग्रह सी मही है। उसने माप + मूम्प पर प्रस्थानमा पिस्ता सीपार नहीं की है। पच-सरों में सर्व तुर-मिाह नही है बात को पामे माने भए मीभाव में तुफ पंप किया है।पणन परते करते यहाँ कमि परमपित भार रिहम हो । यहाँ रसमे तुका मोह एकदम माम मर रखने कापसमाति प्रा भूमि पापा कापमा कोहै।ऐने पनों पार मापनीय है। लिए पाप-तुपर्णन पामा मार मात गाइरण प्रष्ट है। समकादिगुरुना पाना पाना तोटा अपमापों की स्वाभाविक पभिवचनादी है। बनियापो में रहीमही सापारण पर भी प्रपुरातमा। मा- साहिस्पिक भालोपना] [y महापर दिमाह पापम पम पमान सम्माषी की तपिल मी पहामारप से प्रारम । एक बार सूर्य पूर्व परवासिय चिनिया बस एप माहे पाहा पारीमा सूर्य पूर्ण पाप रेस पक्षणा अमा हु। ऐसे हगहरण मपवार साप हो। पम्पमा सर्व मारपण युक्त प्रवाहमय तुभव बाकी पनाती क्या हिकी हई है।पको एकपड़ी विशेषता यह है कि उसने तु निमे + थिए ही मी पाय-पिम्पास में सामापस पाकरण-नियम को भरमही किया है। यही कारण है कि पमित्रों में रोनो सम्ों तक मारम १ पनिष-मेसी मत पच-समी का प्रयोग प्रायः कपा-कम को पामे बाम मामी पपात मचाणम्प बोने लिए किया है। कहा जा सकता है हिमानोप मापाम्पस्वी प्टि पिठमा सरस सरप और पार्मिक है उठना ही प्यार की हष्टि से पोर पोर पर मौ। पप में हमे विस मी कोपन के बम होते है यह पत्र में मार अपने परम मराई को परपसा है। हाकिमा काम है कि पमिका' एक बार-बाम पौर वीरव ही एक प्रतिपाप्य है। गरिने अपने प्रतिपाय को प्रतिष्य हेतु सर्व प्रथम उसके अनुभव वातावण की सष्टि की है। यह अत्यन्त प्रावस्या भी है क्योकि नवीर रस का नाम मोपे ही बहानुभूति नही हो पाती र कामावायरस पपस्थित किये जाने पर ही रस का सम्मा पास्वारन बिा गा सकता है। विरबागान भातावरण निर्माण के लिए कवि भान ही सप्टपा है। मपम परिमायककी और परंपरा काठको एए चपने पार संसारी का पस्मार मा है। प्रारंभ में हो रनसिह को पापण मित बागल पर और 'पण माण खम्म कण शरण में संबोषित कर गौरतको पकीटकप में स्थित कर दिया दुपरांत बीपक प्रिय साहिए और साहिबार्य बोरारा परस्पर विरोपी और संध्यपान स्थिति कम सरेर बसा हानिमी प्रापयति माप सिमो साहिए मन ममिका मसैन्य प्रस्थान किरमानी पुरको सूपमा पर है। मा प्रस्थापित कपि की मामी सी है- पानी हसी पनि मापे महार रबी हेम पी में पानी बालि नौर। तये कण बाते मकामा को बारला बासि भाग मा । 14.बानान सामनार मई में भूमि.१.१ - १६ ] [राजस्थानी पनि यहाँ कवि की बिम्बमा हिणी प्रतिमा में गो चित्र प्रपित भ्याई पर पार में हसना पूर्ण प्रमावधानी और परमामय है कि पाठक के मानसमा । सामने परम्य उरमा और मेग के धाप प्रस्पाम करती हुई विधान पाहिली का परिमा पवित्र उपस्थित हो पाता है। प्रथम पंक्ति के प्रपम सग से प्रतिम पति के मंदिर मग तम पावे पाते ऐना मगता हिमरमाते सैनिकोकोका तिला पाय । मागे होहर निकम मा स्तुि प्रमी सेना का प्रधिम मोर मही पाया है। पस्तुत के माम्पम प्रस्तुन को मिमित करने की प्रणाची काम्स मे पछी किन्तु प्रस्तुत मौर मप्रस्तुत का ऐसा गुण धर्म और मनि-माम्म मन्या मितना पर है। बी हेम पी ने पाली गणी मार से मंगवठी पहाणी मरी की मातिए समति । प्रस्पाम करती हुई मा कम ही बम भित्र धामने नहीं माता पितु मात्र मयों में वामदाट हापी दोहों की पीस पार और सैनिकों की पर पाप मी प्रतिपरिश होती है । कषि की यह बिम्ब विवायनी-मी सीमित समों में पूर्व परिसंचना- कोपन का प्रतीक है। इसी प्रकार प्रतिमा पहिमा भी कवि विचारमा सरना की प्रतीक है । महा कामे कटों की समन पलियों की मामास पय टोप बारकों के साब रत्प्रेक्षा प्रत्यन्त ही धाबम पड़ी है। कवि पाय पातुर्म का एक प्रमास यह भी है कि उसने मन पौर अतिम्म बाना में समान रूप से पीरता मोर उत्साह का संचार खिाया है। एक मोरगा उसने नायक-पक्ष के अभिप यौनामों को महाभारत के से रिष्ट पुरानो रूप में निषित भिमा है- समे स यत्तीस हिम् समत्व करपा महासूर भारत्व करने । वही मरी पोर प्रतिपक्षीय यमन कमिका को काम के रूप में पस्किस निमा है। बमट्ट पुट्ट हलमा बबास परत्या सापानिमा पसास । परि रात्रिय अपने तेज के प्रताप से तनबारे पोड़ने का सामर्म एमाते है- वरमार पा र पप गुटै ।' ता यबम भी बम मौर वीर्य से पनसे किसी प्रकार कम नहीं-नको सुगमो म भी गमत पर्यो र गोर ने माना बम पौर मुक्की में रिहा कायम करने की सम है- मरे या कप तो मए हो गिता निष मुली वा ।
साहित्यिक भाशोपना [. प्रतिपम बस और बीच मह पर्सन बहा दौर रसके परिसाएकी रष्टि में पिसी मुसकपा मनुम भी है। प्रतिपक्ष की दुता और विश्वा के प्रत्यम हो माने । माया-पक्ष की पपरपा प्रौविस्प सिरोया है। यही कारण पिपगित हो गाने पर भी उसकी उममाघयता परम्प बनी दी है। पए में निस संचार मी का प्रतिपाल किया गया है उसका पप में भी पूर्ण कौसम साप निर्वाहमा है। पौरपर सर्वतसिंह को फरमान मेन कर मा-- पाम करि एक वरप हि मागे पाँच प्राय। उससह का उत्तर- मोपा पाहो महिमा सो बाण पूर्ण केम। इस बार बसतसिंह भाषी र विषय में अपने पामतो की सम्मति पाहवे- उमर भरो पसपतिम हो माग असू हो । गार मिलता है- पनि जिव पुस बाल मती बात पर गि पूरिक हिमाण। संपार की हष्टि में एक उपहरण और रप्टम्म है- रिण पपारण निती वारी मरे पर नाम मिबापी। यसपट प्रेम मोमिमी पाप तप माहेस प्राव की बाएं। बोबो पक्षी बरणा दिन बीपी इस सिपारौरी। दे सौगो परिमाह पूम रस । सबदी मार मण पमितमम् ।। इस प्रकार के संवारों से बझे पनि कोरे इतित बनने से पर पहरा इन पाों प्रारों की प्रमिप्पति पाई। समारों की पोयना में भूमि में मपनी सूक्ष्म युरिका परिषय दिया है।
[ रासस्थानी वनिम्न गरिने बीर-वर्णन में पीरों का बम बामवित्रण ही प्रस्तुत नही किया है अपितु उनकी मंतः प्रजाति का भी सम्मक उदघाटन किया है। पषा- रिण मो परमो पर खेती हम वो कोई म दुर्ण मेसी । x x वाम प्रहार किमो बग हाले गौ मषि मिमस्या इति बोले । बीचे तके महा परि गागी मा पनि मो साचे प्रायो। रानसिंह के इन उगाऐं में उसके समस्त सरभर मुखर होकर प्रकट हुए है। जमा मे बस अपने परित-नायक की मतः प्रकृति का उपाटन करप्रपमे पर्य की इति भी नही माननी है अपितु उसने स्थान-स्थान पर प्रन्पाग्य प्रत्रिय पी की मनो मारनामों का भी ममिपति की है । उसकी यह अभिम्पति मिनी सयम सटीक पौर संगना पूर्ण है- म रम्मा म पारे महायुर माया कोष घोसी बिसी काया ॥ पी की बर्णम पटुता की मोर पहने इपित किया गा तुम है। सम मा के प्रमाप में कमि की प्रतिमा बर्णनों मे ही उमरी है । पपनिका ने प्रशिक न भाये है कि किसी भी कपि के काम्पीयन की कसौटी पन प्रवे , मितु चपा ने अपनी कल्पना पति पौर मासुर मनिम्मंचमा कौसत से इन विविध वर्मनी अपने काम को और भी मनोहारी बना रिया है। कवि की पि-विधायनी मी मेरित पियों की धमना की है पारणी पाहिएम में प्रपूर्ण समा- भमानक पीर बिके रोम मूप पर बार बीमा हिने पाट पूप। प्रतम मुबी र सी परपसी सुर्ग बम्म पहा पसी समामाची ॥ यावर्गम गहाँ मुननों का रेबारिष प्रस्तुत करता है वही उनके गाविपत संस्मरों और प्रकृति पर भी प्रयास गमता है। रस-मेष में एमसिंह के परासायी होने पर कवि अपनी सम खानी से मोति पंकित किया है यह वित-रिवार की बीमा महा या समता है। बा- 'पणे निण से सर सेह पीस मोहे बिर मिरमर पीस।
साहिस्मिक भाझोपना] [ (पत् रस्लसिंह के परीर पर तीन सौ बास तपासमोस भासतमे है, ऐसे मोमित हो रहे है हिमानों पर मिसर पर बोस उपे हो।) श्री यह प्लसिंह की रिपात काम के लिए समूष पदको उपमान न बना कर बस पर्वत-स्थिर को उपमान रेस में प्रस्तुत किया है। वासों और भार्मों के लिए गोखों की उपमा मी एकदम सामाणि-मानों के दम तो नामों ही बाण बों की छोटी-मोटी पावामों के स मे पण किये जा सकते है पाला बाग में मारे गोप की धारा भी नीच ही पूटती है। ऐसे ही पर्समों से मविसबोलिमा भी सिपा। पोबार पाण्म राउ परत करे। परे माम उमरान मुफ्त भूप मीरमर । पोसमझ पा पड़ा इसा से पविहारे। मारी णि पाणि पालिकामा गिरणबारे। (पान-स-क्षेत्र में एक परत वर हाथी और मोर पिरो । बाम रपया मोर पूरे मुरम पिए पो है--सोपए झापी और घोड़ों के पामिर पोह। तर ऐसे सब रहे है मानों किसी बमबारे में पपनी बामरमाई है।) रण-क्षेत्र में घर पर बिछरे हुए मीरी को पार हामी बोड़ों में पियों मेरमवारीयो बामरप में चित्रित करना बगा की प्रतिमा है पार पाप कि बिना पर्ष पूर्व बिना ही परिणहिमाम मी। अपि मिस कौमत के साथ स्थिर दिया निर्माण किमारत से मापन कतिपम नमार पति-पित्र भी प्रस्तुत किये हैं। पपा- बटम बिई हा पर मरममापन पुरै। हरा परमारपणे बरिया पौरस TM पाए प्रोक पाता। पिनमा किराती मरण १०० ] [राजस्थानी पचनियर गाों की मा पार से उत्साहित पाएं घोड़ों र पाने की मिाको से यहां पदों में बांप रिमा गया है । रणातुर गोवित म मा की प्रस्थान-पति को मो सो नदियों के परमोर की पति के समान बसवा कर पिने एक मनोरम पति- पित उपस्थित कर दिया है। रण-क्षेत्र में बीर-पति प्राप्त पीपप्सरामों अपर दिए जाने की गति को प्रहट पटी की मप्रस्तुत गोयना से विषित करी ने अपनी सम्म विषय-मा का परिचय पिया है । यषा- मरपर सूर निगेम मारष मपि ती भरी माये गाये पपररारपि प्रपट परि म ।। यहाँ प्रस्तुत कर से पुर की त्वरा की मिति ही मामिक प्रमिभ्यसना हुई है। कही कही कपि मे पर्प-बस्तु का समप्र चित्रण म कसे केस पर कर रिपे है।मा- धारा पा प्रोमा परिमाराया पारवती रामा कमी एल सी पाडे वर्ग पर। इन पक्रियों में बापित रहने पासे समस्त बोगामी का वर्णन करके रलसिंह को सम विहीन परत कर हर संभव भर कर दिया है । महत तमा नारा स्पष्ट और भगना पूर्ण है कि इससे पाठक के सामने सम्पूर्ण पुर का पिग सपरिषत हो पाता है। हापियों पौर मोड़ों के पर्सनों से यपपिका-प्रवाह में विराम माया है, तापि सुर काम्प की प्टि में इनका पाय प्रसनीय है।पि की भापा सही समस्मर निम्नलिखित पक्तियों में रेसिप- कपोम पर्ग गगा पोन सिमा से बेसर तिम्रो मार भी बणे व तास पर्व पर पाणि पुनी पमा । मगीन नमामों से परिपुष्ट प्रस्तुत पौर प्रप्रस्तुत करत्येसामय या सपिनष्ट लिए परमत ही भम्प पोर हायपाही बन पड़ा है। सिपूरबवित पर-पमफरे के विप कपोम पम का उपयोग भी नितांत ही मामिक है । गा भाम पर अंकित मान tण की पर्वत पर पूरे पमास मे स्टोपा प्रस्तुत प्रौर प्रस्तुत रोगों की मामी प्रस्तुत करने समर्प है। इस प्रथर कपि मे शिस पर्णमामा-मी को अपनाया है उसमें पर माहात सफल रहा है। परखें।
साहित्यिक मासोपना । । १९ जण की मेसी की एक महत्वपूर्ण रिमयता यह भी है कि रामसरनुमार पौर विम्बित है । मना पाएम में इमे सि पारहाणारी एवं मी न होते है पाप- बन में एक रन का पारण काठी हुई प्रमिाको मृत्यु के पिपस में मायति होहर रिमम्मित होपाहतो हिमारे दोररहने पापी र तीमी गती इसी पन्धि मोपे गहीर । बरी हैम वी मे पासी गालि मीर औरही या भापत पोमप सा-समोसम 'मायकोर चणि मार पिरि मन परे प्रषा तिथि बेता रामारे साहिए मगम भूणि निरिए निमा | सासू गरिमा र यमाई । अमरप पाई। मानिसको मापा 'जिन'। परि रिमम मापारित है। मापा के प्रयोग में उपयुक्त समापनी नार-सौदर्य पार पारिमा रहने पूप प्यान या है। मापा में मेत समावट पौर भिमा काममार है । स्मारिता मोर पावनामा ra Toकाम्या मुस्प विषय 'पुर' होने के कारण करि में मम्मी पापा को बस उस्मार मौर वैन सममित बनामा है। कपिने सम पन में बड़ी सारमानी से पम दिया है। अपने माणिक पाटबरने के साथ ही मार पंचना में भी पूर्व समाजाको पनि हो मार पप्ट हो जाते है। सपा- पमे दोम विधि पार पसरा एस बिपारे। गरे मोह परि सोह मोहबाहो एप प्रगा। सामा बाण पापा मण्यए। उससे रोग पौसि मति प्रो पद्माण पर। नौ वर अपरि न गुठी सौम परमार्य। और रम की रपमा ए मा पनि में संपुजारी का प्रयोग बहुत कम हमा है।" सुस्तामर सादापती पौर मार्यो को बिना तो मरोई ए भी कपि गौर रस के प्रतिपादन में सहपा है। पा~- मृध मो सो परिबार बिहिण TT हिम मोय प्रार १०२] [ राजस्पानी पपनिमः रमंत्तति मौर विहीं हिरास मलाहमि गासि कि माइप बात ।। मह प्रत की दो पंक्तियों में पों के पम्पारमाण मर्य विषयको प्रमीप्ट पनि मुहर होकर सत प्रभिम्पक होगई है। फपिने कही मी 'कार र कार पारि सोमहर्षक वर्गों का प्रस्वाभाविक पौर निमाप में प्रयोग नहीं किया है । एक स्मों पर ऐसा प्रायोजन किया भी है वो यह बातावरण के अनुस्म चिरण के लिए बना पापित प्रापारमा गुण माने के लिए ही हपा है। बदि में अपनी मापा में मारपनि का संचार करने के रस्म से दरभरण के प्रत्ये समा प्रारंभ प्रापः नमान पर्स में किया है।' पा- + पुणपति पुणे रिण मो पहियों पर देसी गमा पी शिबीपीवीर चामै परिमास १. पण रमण णि रु मनीक इसी प्रकार कपि मे प्रमी प्रमापनी में पोवारमा प्रभार उत्पन्न करने के मिए ममान एय-गों की प्राति भी की है। पहा- मारण मरण करण र मापो ब ग . FR . रखना सब कुछ करने पर भी रमने कहीं भी मन पार पपरत पदों की भणीमही की है। पनिका की भाषा की मह विपता है कि उसमें एक ही सम रेमियों पर्यायवाची मम प्रयुक्त हुए हैं। पने मुतनमान पर लिए २० पर्यापरापी गगर प्रयुक्त हुए है। पमा प्रमुययण पिनय, नुगामिम नाम पापा समरिमान मनात गरम पाम बीरा ममेष मेघ म पर मुपमास मेघाम पाहाम इसी प्रकार हाती पोरे दमबार पाकाप मारि के लिए भी अनेक पर्यायवाची सम्पाये। १.स्सायेरीपनिका . रामसिंह महेमरामोतरी की भूमिका प.४ २ बी १.४ साहित्यिक माझोपना] [१०३ मापा प्रमाव पुए सम्मान है इमक मिए एक ही रखहरण पेष्ट होमा-- पनिता मुख पूनम र पणी पिपरई प्रिम रुप मणी । ४ कोकस एड अनारकमी पर मार प्रसार कमा उमती।। परगी पारसी यम यमेष्ट संस्मा में प्रयुक्त हुए हैं किन्तु सग रागस्पानी सप पहण किए हैं। करि मे संमत के तत्सम पदों का भी प्रयोग स्मिा है किन्तु ग्मी ला में नमक पल ही मपिक मिलते हैं। मार-व्यंजना पनिष एक भार प्रगन और मारमा पाप है। सपा पार कपमान में कपि की भाष प्रपणी साम्य-प्रएपना प्राधार बनी है। कमि में अपने भाभयावा महारारा सिंह के निस्सा त्याप मार मिरान पूर्ण भारत को प्रतिपारित करने र शान पर्म मार मार-गौरतकी मार-मपी पमियरमा की है। जा स्पर्य दीर-भाषियमा नपने अपनी पता में शनिय भाति के प्रादमा विस्वासों पर सवारों का प्रत्यंत ही मामि पित्रा हिमा है जिससे इसमें बीर-रम की गाम-मापन पड़ी है। मन मोर लिप-ति धीर-मधिय ही पाती है जिसे वह शिष्ट पुरप र प्राणोरक्षा प्रक्षित करने के लिए मय प्रातुन एका - रिल पमाण जिना पानी मोमर नाम लिखा। अपने नाम को पत्रमा पर प्रतिकार की प्रासामे प्रेरितवीर ममा पर पाहेमा कि नप उमे एपपो- 'रिण मो हिमा पर ऐसी कर्मश कोई न पुरी रहेगी। हार गीतहरहा। प्रा प्रतिसदी मे मिह रामा ही पेपर- हार पीत वार्वा हर हाये गिढ़ मतिमाहि सरिसह सरे । पौर सस' पर है और निर्णय ही हम यही शिराम रमेबल स्टाने के लिए प्रेरित करता है- 'वाम बह्मा प्रिो मप धोने पीमि मिनस्वी इमिगो ।
१०.] प भ [ रावरमानी पपनिमा रमत्तमि नीर बिही रहिरास समाहति मासिक माप बाम ॥ महा मंतकीरो पक्तियों में समों के प्रम्पारमाण पप्प मिपाकी प्रमोष्ट पनि मुबर होकर स्वतः ममियत होगई है। परि मे कही भी 'द सरकार प्रारि मोमहर्पकरणों प्रस्सामानित पौर विमरप में प्रयोग नहीं किया है । दो-एक स्मनों पर ऐसा मायोजन किया भी है तो बह पाताबएस भनुरूप चित्रण के लिए पापा बाधित मग्यात्मक पुरण माने के लिए ही हुमा है। श्रम में अपनी भाषा में मार पनि का संचार करने में वय से घर पर प्रत्येक धमका प्रारम प्रायः मान वर्ण मे किया है।' पा- + पुणपत्ति पुणे रिण भो पहिया राम ऐषो, बगता मह बिर गोपीगीर पण पाप परिपान, .. एस रमण रिण एक ससीक मस्सार इसी प्रकार कवि ने पानी समावमी में संबीतारमक प्रभाष उपग्म करने मिम ममाम एय-सगों की माइति भी की है। बा- मारण मरण करस रण मापो माण पह इतना सब कुछ करने पर भी रमने कही भी पालन और प्रघात पयों की मरती नहीं की है। पनिका की भापा की यह विपता है कि उसमें एक ही प्रग के रतिर्यो पर्यायवाणी गर प्रयुक्त हुए है । पकेने मुतममान पमरे लिए २. पर्यायापी राम प्रयुक्त हुए है। पपा पसुपपण रिमब, दुरामिम मान पच्या पामरिमात मतान बन पाम बीना ममेष मेघ मुमा मुबमाम मघाम र रो रोशन रा प्रापप । इसी प्रकार हापी पोई तनपार प्राकाय पारिसिए भी मनेक पर्यायवाणी पार पाये है। १ ग.देसाटोरी-पप निका' खमसिंह महेमामोतरी की भूमि ३.४ २ नही १.४ . सास साहिस्मिक भाशोपना ] [१०३ भाषा प्रमार पुग्ण सम्पप है इसके लिए एक ही स्वहरण पेष्ट हामा- बनिता मुख पूनिम पर रखी पिपमा भिप प मसी। कम कोरिम इठ प्रनारसमी मस बार प्रसारमा रगती। परली पारमा पप र संस्था में प्रयुनाए है किन्तुरंग परवानी रुप पण किये एप दिने संमत के तत्सम पदों पर भी प्रयोग किस्तु रवी रखना में पदमा मम ही प्रति मिलते हैं। मार-व्यंजना पनिष एक माप शाम पीर मामा काम है। सूरमातरम पमान में कमि की मार प्रवसना हो सके सम्म प्रहमन का मापार बनी है। कवि मे मपने पाभपराता महापग पति के निस्वार्थ त्याग और बसिरान पूर्ण राम को प्रतिपारित करते हुए माव-धर्म और पार्म-गौरव की भाष-मयो अभिम्बना की है। पमा सम और मषिमा रसने पपनी रचना में अभिम बातिमाटो दिसायों और संस्म पर्यत ही मापिकरिमप्यिा है रिसमे इसमें पीर रस की रहाम-मारा पड़ी है। पार और निमारक कीति वीर-सनिय की बाती है, निम या पिकट पुरा रासस ए प्रनित करने लिए करे प्रागुत दवा है- पल पमार रिसो वार मो मरद माम मिबायो।' अपने नाम को पन्द्रमा पर ति करने की माया में प्रेरित बीर भमा र पाहेगा कि यम से पुरा-- 'रिस मोहिमा प्रम पेसी पर्ममा कोई म पुरी पहेली।" हार बीत हरि हार , प्रत् पनिामी से मि मामा हो पर- हार जीत पाठी हरिदार दिई मतिमादि रिमाये । और माप' पर है और निलप हरि-वही रिम मे पास रखने मिए खिम है- "ठाम रहार किया हम १०४ ] [ राजस्थानी पनिधः बीपी तिके महा परि वापी प्रायमपि माँ पार्य मा।। पर्य रमा प्राय देने पर सर्व की प्राप्ति होती है। इसी मरीमे पर पीर मरने को प्रस्तुत हो जाता है- कामे मरण मनोरष कोषा माय मरण भारष मुदिनी । इस प्रसस्प संचार में सर निसार है मान-स्वामी-धर्म हो तरव है । यही पम्बयोगाना और मरना जानता है। फिर पीर स धर्म का स्मापसे कर पता है? और फिर मी तो रमपनी की परिवठी बाण हाणा होकर गिरेगा मौर निषित पर्वका प्रपिकरी बनेग-- सांग साटमगि भाटीया सोने - पाति-माई १ पा पाठ की । पुरा पुरा हर पीये । दुष्ठ जी। मिग बर्म रमा भत्रिए मषि-पाप का पान कप पार पान में भी करमापे मारे फोरेंगे और सवा दर रोमख म बावनों की बद दापियों से टम्से सार्येपे । माझएको पोप अर्पित करेंगे तो पप्प ग्नापर करपी बना उनकी पीठ ठोकर पार गम में रानी बीविनी- "सपिमामा पिमा पारा। पार शिपिमा विपापा। रिश तर विवरपिपे पाणामि मतवाना म्यू धमता परी हानियो मू वा सारमा । महास, सिर पैसा । अपघता स्याबाट करिसी । पात हिंसी । इसीलिए पुरी के लिए एक प्रतम्य बसा है यमे भरने को समुग्मान करते है (८६पनिका पंक्ति १-५) पार रण-तमुर में प्रति-नाम पर परकर सार सापर से पार हो जाते है- उमा पोन रिण हमाग माहे मति मिहान पोजिमा मग मारि पारि कम वो पपपपरा नहीं तो नीषित सिम्म हुइ हारी। उबरने और प्रयापों कोबरण करने की तट प्रापसार में परम्म उत्साहका पार करती है- मूर्य पूर्ण पार राम परुपा में ऊभा मे । पौषि पसल परे। पामे परम्प प्रासा सर्प पाने की प्रथम माह पौर स्वामी-पर्म की टेक RAरित प्रमाण मिर' पीर लिए बीयन हेम बम गाता है | यह १-इसपर मोटपमा पमपे पृष्ठ पर। .
साहिसिक भालोपना] बोरावका बाना भारस से मन मंगन ना हमा पार पेट्रष्ट्राकर पमता है --पापा से स्पाम र मरनी कागा को पर ही मौत भरमसीत बना देता है (मो बरिटी है जो पुमती भी है)- 'पराठा रिमै माय पम्मा प्रपर बता मारि सरग सर्ग। मरता म पारे महायुर मावा रैपर बाधी पिसी मया ।। वीर र पि, निषित मटन और विमान मास, पर समके रस क्षेत्र में पाप सोने का प्रश्न ही नही उठता तो मारने वालों पर म मा पिएस भाला न मरे सरोग हा सण पिा मारे। इस प्रकार कपि, प्रपनी कीव धीर चपत पनिम्पसना में क्षत्रिय मावि गोमय पौरस्य पौरव-पपिठ धर्म-संस्मर और राम कम्प-भारमा वा निठाठ मार्मिक एवं प्रभारपाची पिप टिया है। बीर-रस के परिपाक लिए यही प्रमित है, क्योकि 'वाह सता पक्त नही होगा, किसी न किसी मार से प्ररित होकर प्राट अब । रिस मार से प्रेरित होकरमा प्रहर हावा है उस भाव पर अभीष्ट कोई कम होता है और पार्म गत्साह की वसमता से सिर होता है।' परिका में पम रस्साह' की जो नहर मापांव मारा देखते है यह परिस मोगा यातीय प्रेस्थर बाब पीर-मामा से प्रेरित है। इस भारमा प्रभीष्ट कर्म 'पुर सिमी मिति माह से हुई है। सही मार-माप 'सत्या' राबसिंह को पुरकर्म के लिए प्रेरित करता है इसी उत्साह वे उसकी रोमारमी में पौरप पर ऐता है और यही 'इत्ता पसरी पुगामों में हाथियों को पधारने म मग मी भरता है। पा- पते बोम विपि भार पण छ विपारे। हर माह परि सोइ मोह बह एप नेमण। वापि मुख ममे बाण पागम भरमस । महले ऐम पौरित प्रति हे पहाास एं। प परीर भरि मन मे मीस पमण। १-मामेट र सासम्म पनि सग्गिय भग्मिय पानिये। संधार पात पति, बहे परि मामिये । पदी राब रासार २.२.४ नष्टम्म-मोकण-पीरलम का पास्त्रीय विषन ..॥
१०६] [ राजस्थानी वपनिका वीरों का यह सरमा परमे सामने काम को अपनी पान से बनाने माने 'मोगामि मू बनाये बाप मुना और प्राने पौम्म से स्वयं वदने पाते बम प्रापर रोस सा एपन्न प्रतिपक्ष के योगामों का प्रासम्मन पाहर मापदाते नपा सिन्धु राम-सिम सासर ना मीसाग निहस्मै मात्राम से घर और पोतों की वर्षा शिता नापी बरसमा गोमा सर पेमाण एवं सानियाँ-पोवनियों मारिके रख-रोग में मुक्त वितरण में सराप्त होकर मौर मप्सपबाण की कामना, खतामों से पावार प्राप्त करने की पपा प्रलय कीति ( महाप ने सिर पेस 5 पपहर बर। देवता स्मागास पहिसी । बात पसी । ) की मामा पारि संचारियों से परिपुष्ट होकर पीर रस पूर्ण परिपाक में समर्प हुमा है । पनिका प्रपान रस पुरा-वीर है फिर भी रस्मसिंह पपने रे में बान-पुष्प करने कर्णन है इसमें रानीरा भी समावेश हो गया है। पा- पर तीर मषि पीप विर्मा वित सपठ पात चोरम मिसमी सह बममे मस णा मुम्ही मा। रस्मसिंह बमिरान को प-बीर रेम्प महण किया जा सता है। उसने प्रपने स्वामी पाखों की रक्षा कर मरने प्राण रिसे । स्वामी-पर्म का मा उप पार है जिसका उसमे पूर्ण निर्वाह किया है । इसी प्रकार रमसिंह की पनियो । भी अपने पति सप सटी होहर सती-पर्म का पालन किया है। पीर रम परमात् पनिम्म' में इमरा मालपूर्ण रस है पगार' । एनसिंह की मृत्यु के बार रीति-रियों के से मम पिन वर्णन साप पार प्रामोयन को रेस कर पाठकको मापपर्य होता है। सिंह मितम-सपा परती पनिता मुम पूनम पर बपी प्रिग मूह पर भणी मारि सम्मिों से रस-रिप्रेयसी मी पंग होने मगती है, परन्तु वास्ता मे ऐसा नही । पारस प्रापोगा पीये बषिय नारी मार का प्राधार है। पौर-सभिप पनी की बग्मयग्माग्तर की पही साम रही है कि उसे पीरपाली कानाने का पर प्राप हो पोर पसे र रोष में वीर-पतिको प्ति अपने सामी के पाप सती होने का मनम्य मबसर मिले । मे सर पर प्रसर मिलता है पर सोनहरमा से सुमग्मित होकर अपने पति की पपाठी र रिता में प्रविष्ट हो पाती है। इसी हरि सेकपि यह गमारकी प्रतारणा की है। यह मास है कि इस पार-वर्णन' में राम की कमी पब पर पीर, पिप की बार मुसभी सितार परिण पत्तिय गात चिन्हे पर नास मोफत रिपि पत्ति ममी पारि रहिमों में पति-कालीन ग गारपियो ग सा हमापन मा बसा है।
साहिस्पिक मासोपना ] [१०७ इसे पतासीन काम्प-बाप प्रमाबाबा सता है। फिर भी कपि पवम है उसने इस पर्सन को अधिक नहीं बीता है-मोटकरी में ही समाप्त कर रिमा है। साम ही रखने पमियो'काता पविपत मारि कहा है और इन्हें सारिक भ्रम र प्रपन हरम में पति के पान को धारण किये गए पिषित किया।मा- "चिति माम मुराम सम्मारि पसी प्रम मोह संसार विमार भनी । मिमिया प्रिम भीप पझे मरण प्रतम छ' में रलति पार पकी रानियों मन रिसार-मर रल सतिमा मिनिमा मामास-पूर्ण गार-वर्णन को साकार दिला है। बत घर पौर-रस के सामनपार की मोजमा करके प्रमारा परिमाम म होकर सती-पम पर पारित मनिय-परपरा का प्रतीक है। कगि ने सर्व पीर भावना मौर मनिय-धर्म के मारों से प्रेरित होकर सना की, भवः उसने मृत्यू, संसार-स्पाप पारि पर बरस पा यांत व प्रतिपादन नही श्मिा है, फिर भी ऐसे स्पों पर पोश मौर निर मार स्वामक हो यो । सती समय सा रिसा मोहतमित नोक से निक माव-बाप 'सि-रस की ममिति हुई है. तो हेहे पर पुकार हर पम पम मणि पम बाप म्पवित पोर की पारा 'कस्प-स' का प्रतिपारन करती हुई दीव होती है। पुर-र्णन में कहाँ ही बीमरस पिपण मी प्रस्तुत किये पपे। पप- (6) स्पा पति फर हमे गि-बिग (1) पति मार विहीं महिपन् । बासाहति बारिप कि प्राइवसाच। (५) मा सप भट निपट प्राप पो रि- विक पो मी पम्म । बीमत्व ये प्रति वीरन की पुष्टि लिए है पाये। इनके मारेष से बीमत्व-रसको प्ररठारणामही मानी वा सती । समय होने पर भी काम में अपनी रसमा में भयानक और रसों की सष्टि पका प्रसार नहीं म्मिा है। ममता उसने प्रस्त-रघनित है सुन्दर परिपारिवाना है। विमा, बझा एक पारियों नाम में मारेपविराम कर्मा पप निमित मवर का मर्सन पापों आप प्रायोपित लिखा अभिनन्दन प्रमाण पऔर पैन मे समोक में रत्नसिंह और उसकी पनियों का मिसाप समी पचनिका राठौड रतनसिंघजी री महेसदासोतरी भाषा शास्त्रीय अध्ययन पनिका की मापा रिगस है। इसमें रिंगत प्राचीन पौर परपी रोगों स्वस बक्षित होते हैं। इसकी माषा सम्बन्धी विलेयतामों का पालन इस प्रकार च्मिा गसता है- १ पुल जनक सरनोकरण की प्रवृत्ति है । यमा-रिसन (विपy) नरेसुए (नरामर) परसती (मरसती), कमपम (कमपत्र) मादि। समुक्त संगों के परिवर्तन में सबसे महत्वपूर्स पम्प जन+पा +पन्य व्यंजन है। ही कही पंगन दिप साप ही एफ विपर्पय मी हो गया है। फमत पनिन में पर्म के परम परराम एवं प्रम्म तीन प्रकार केस मिनट २ भाव मपम सकी मांति मंचन हिस्व की लता मिनती। यह रिवीकरण प्राय भति में होता है । यपा-कम्प मर मर गारम भीग मुनम्न किरणम पुमत्ति, राम धपत्ति प्रादि । परके पनुर्पपरी प्राप मा पार हो पुरुपौर मुरुमगर मोम बना दिया गया है। माको पुरु बनामे के लिए प्रमावर्यव- (5) हस्सनबरा कर दिया जाता।। (ब) सर के साप मनुसार धोरिमा बाता है। (4) संगन को पुरा हर रिया का है। (4 समास में भी रितीय पर प्रपम ज्ययन का विकले की प्रति। मनुसार के प्रनुमार की बिपि गाम में माई गाती है। ध्वनि-विचार (5) प्रयुक्त पनि हरप-सर-मार मो समिरमा में प्रोप्रा पंमम- पर पपमम मपनि राठौर रवनसिपबीरी महेसदासोवरी] [ टण चपन पर मम परमम टिप्पणी-मा' या' हम स है। देवीटोरी मे इसके लिए मा नि मा प्रयोग किया है। (स) पनि विकार १ स्वर-विकार- पार (पाट) १-में-हेम (मि) मो-में-केरा (औरष) २ पवन विकार- +- 4 - पाइस (गहरू) तरपठ (तरणस) मुपर (मुकुट) कारिप (नाक) बम-पुणीमन (पणीमन) ४-१-परित (बटिव) मसमर (महामह) ---विसम (षिug) wa (PG) -म-पमान (पासास) --भारप (भारत) 4-0-बामल (मानन) गोवाण (यात) गणव (पनय) 4-2-पासि (पर्म) -म-मय (4) -- (पवन) प (पुर) मारम (पारस) 1-1-पार (पायक) रामास (पमायण) कार (गर) पिया (पिराय) १- म - बिमार (विवाह) पमत (परम) - पूरब (पूर्व) कार (बाय) --भाभारत (पामायत) भार (भार) 1-1-सिप (सिंह) 8-1-बहरीनरी) प-प-अपमय (मप्स)
११०]
[राजस्थानी पनिका
मसंयुक महापाणपोप मौर मघोष म्यजनों का महाप्राणत्व ही पप
गया है ।यपा-
रूप-विचार
जाति-मा पम्रो की नातिया -१)मर पाति पौर (२) मारी
पाति । नर-नाति से नामादि बनाने के प्रत्यय और रवा-
सेशात क्षति
F-वाही देरी इसमी वणी ही, उभी
वचन-चरम रो!-(1) एक पपन प्रौर (२) बापन । बहुवमान बनाने
* लिए मर पातीय समों में कोई प्रत्यय नहीं हुवा त भोकात पर्यों में पा
प्ररपम एस्सा है। सपा-बारको (एक पसन) पारना (बहुवचन)-'बहे पारमा पाणि
मारमाहात
मारी जातीय पमों को बहुपन बनाने के लिए मा प्रत्पय पुरावा है । पपा-
पवार
बता
महासकी
मापतिपो
बहु अपन बनाने के लिए इण' (पल पर पल) भी प्रयोग
हमा है। पपा-
प्रमुगाण
हिन्दी की प्रति परापना में भी संशा पारों के दो पह-१ मिमी
मौर २ मधिकारी प्रश्मिीप सकर्मक च्यिा को बोरर सेप मामों
का काम भयुक होता है मौर विमरीप व कामिक कर्मकमा
कर्ता के सम प्रमुख हटाए।
पारस्पों के सहरण
मरिमीका मारप गुग मीपा । १ वराव मार
पुमा
२ गोषरापि मिले पिर मामो ।
ण्ठौर रखनसिपजी री महेसपासोतरी ] [२११ , पारि पपन्दो। ४ नी सोधिने मीर निमाण मामा। ५ फटे पाम के बाणि सामग्र पट्र । पवन बामसी। ७ पर हर रिण नानिमो। - गारीप उममिक सकर्मक रम माविमो असे पण १ बहतो तुर्य पाय प्रा का कत्ता) रिणबंगा पायाम वाया। २ कर्म मरण मनोरम कीमा । २ हमीमा हिने मैप ३ बोपरिमे पग एप मारे हत्ती। दहा रिमा। ४ प पाहिले बाट प्रोपाट पगे । बापम + प्रविमा पप सोपमाविमो दु । म बापत ताबीन। मपणयास । २ पोतिरपीपीसर प्रौपाने । ३ कवि पपूत पोसिमा कामे । + विरी १ मरण वणी योगो मोनू । १ अमर ठगी नापी। २ सतीशम में मप रिसा। २ प्रपद पर १ मेषगरिसी मम्मपिनो। मौर वीर्य बनाये। ४ पौरन साहिरिसीमावरम । ४ गिरा बि माया पाणिपग्य। २ टोलो पन पगबन तादू । यो मरिमेकर करण १ किमि मेणि पो धन । २ वी पोम मिटिमा १ सप मप्रयं भवसी। २ प्रतिमा पर १२] [ राजस्थानी पनि गम्बराये। F मरी। ६ बाते काम मू पानि ३ हादिया सदमा पाइयो। ४ सहि वापि म मा कासमूता । ४ संप्रदाय १ सामि कामि परिप्रे देहा। १ कवि सुप २ सझे पाविमो प्रेम नगणी २ परपोरष मधिदीप धार। विप्रा पित। । कमर रापता बतमा गि। ४ महारत मे सिर पेस एं। ५ पपावान , मी हेम पी मे बासी सी १ सरीराइमा बम मीर। पिपास मारे। २ साले पिरो मेरी नौरक्षतं । . मातमोकपी मानो माइस्था । ४ पायाम मोपनमय विवाण पिसी भाया। 2ठ मू मिसमी सहित) इममोकप्तीसरि देवता । रिमास सिप पाली पपी। ८ हसे मार पार पची मोम हो । ६ नौ हामिमो मापण इविम्मा । १ संबंप १ मिमा पाहिए सम्म १ पर पति पत। समताम् । २ कासी एकसस । २ पानी गरण मेणारठ सिता-सरबार। , पठी पनापर। बोरस पामगारवारे ४ रिती पर भारष । ४ मावा राष्णिवापि १ चमबाट परी। पणी काम मित्री री 1. मोहो रायो। परम पानी। फोगा पवारा। ७ पाक्षिणा पत्र पारी। पाठीमारी फोर्ग मी। - पारे पूत परिवार। . बाण गोमो मारि पपनिका राठौर रखनसिंपली री महेसवासोतरी] [११३ ६. मसराम बाया । विर्मा सीपको। १. बसमा समपणा१. बाबा परिमार्मा । ११ मोरम्मी मरि । ११ विरपर पर पायंह। १२ पहली बस बाहन । १२ पान पाना मनमो। १३ पुग्पर तो पहरा १४ बर मिसे सिविल तखा। १५ रोस या पिया। १६ सिणिपार विमा रहनेछ। १. पाप फिरि प्रायो। १८ एसो रसापर हो। १८. निमा बखे एसपी रेसबादी । २. सिवार दोपदी। २१ परबरमबाण। २२ ररमा पम्मपर। २॥ पी भारपि बाहरी विरमा बम पायह। २४ एलप गूज । प्राधिकरण १ पाप गरियो। १पिनो मेवारपर। २ इमि पषि पोपे बहार । बपि बहवे पारिमा रालय प्रब ४ दुबमाण पर प्रपत्र्यो कमप । १ विपदी बात साकादम्य प्राइसिर । हापि माष पप गार्ग। ७ पो प्रामियो गीहा पतंग। ८ हि माहि मंत्री बसे रेत वा । 1 रिख सनम पारे पति विहार पर। १. परममि पर। १ मा पाणिनी महम्द । १२ पुग्धि गिर्मा गोब पैन्य पूष । १५ का दरबार । १४ व पाप पिपिटि पर।
११४] [ रामस्पानी पनि ५ संबोधन १ पू वापर २ माई हो माई। रापोवाप। १ बकु । मन मात-पिमी। सर्वनाम पनि म माये हुए सर्वनाम पदों के निमित स इस प्रकार- प्रकार मूलप विधीम संबंपकारकाप एक. या एक.40 एक.बा. १ पुस्पबारक + मो प्रापे मौ माप । मापणी माहरे मूम मी मौन () मपम पु. तुम + तो + तो (1) पम्प पु. वास |+ बी तिम्रो स्या तिका तिको स्पा टिक वार २ नियमापन प्रापा + + + + मिन में + + प्राप वी राषि पनिमा राठोड रवनसिंघजी री महेसदासोवरी ] [११५ प्रमा मृमम विकारीम सरकारकप एकप .. (1) निश्चममा प्रे तिम्रो मो परिण स्पाम ++ ++ + विखि ठिया (1) निकष + + + (1) निस्थ पा. + + + प्रमा- स्म चि + + + रिए बसि बाम विस + विमा ज्या प्रिया क्रिया करूप बास एवं पुस्प बर्तमान तबा अपर पुम्प प्रत्यय- प्रश्यप .] [राजस्थानी बपनिम्नएँ कास एवं पुरप प्रा- १ पातिसाहारी पौया सू बासागू कमपम पहरिया परपती । मर्ग। २ मारा विधि गरि पर्ग। १ महामारप करिम। ४ रिण समन माह मसि बिसाय पर्य। १ अपप पर। प्रत्यय- मपम पुरुप प्रो- १पम माहे नगर गया। २ सूर्य पूर्व सिनिमा R सूर्ण मे- १ बसी रोम वितर परम सौपदी। प्रत्यय प्रत्यय प्रम्य पुरप प्र- प्रे- १ उमै विस्म्स। १ यो बारमा बारिण भाामासा २ भुग पूरे साहियहाँ पत्ता । २ पाणे पेगरियो । नामबाण। १ पुरा हमे गिम जीव। ४ पति दोहनरपे। ४ दिपेपर। १ पुग्म हमे सारी भए। । हमे पनाह पनाह । १ प पाहिले बाट पौषाट पमे। प? अरे मर पाए। • पहन्ती इसी पग्वि पोप बहीर ।
षपनिम गौर रतनसिंपजी री महेसदासोतरी ] [११७ बाम एवं पुस्म भविप्पद-काम तम पुस्प प्रत्यय स्पो इस्पा १ सपिमामा पीपस्या पाइयो । २ पापर बिशिस्मा बिहमास्यो । ३ पुप करिस्पा कर पापप गिम । ४ बो भनि मिमस्या पम्म पुरप प्रत्यय- प्रत्यय- सी इसी सी-सी ऐसी १ पात रहिसी। देवता स्पावास कहिसी। २ रिण मी पहिलो राम रहेती । १ कमको फोरम दुरीकसी। ४ प्रसानिमारसी। पपन वापसी। मराम एक्सी। हिन्द्र प्रसुपारण मासी। ८ पापणी ही नेक मुणसी। प्रत्यय- प्रत्यय- प्रा यामा १ विषिणि नमो क्षम १ पेरिमा या टपम पेरिस रिमा । हिवरे। २ "मा पमिम दिया । २ पुकाीमा प्रसपति। ३ हिमू नाम हारिमा पि नसो १ पोती सा परिहियो। ४ वरपसबम्पिमा। ५ ठारे प्राप्तोष बहार। सोनौम सूमोटिमा नम्मरा। दरा पाया पर मुसाया। ८ । पत्रपति माहिसिपा। मो- सिप ।
११] [रामस्थानी पनि कात एवं पुरुष एकपम मी- १ माप पत्र मगारिणौ। १ सिमहो मामा मा। २ प्रमिपा रण। २ मण पण स्माम । ३ मो पो माग महिमा। ३ परे उपट मापाय पदान । ६-(नारी-बादि में) ४ प पद पाल मिर मम्मकामा । पीस छन कोपा पार । १ पोप पन्धी प्रापे रम्मकोर। २ परिसरमा रही। ५ मुमतमान हार्य । ३ म्यास पासमीकसी। . पीप पारिप बीरपण्यापारही। "उमा बम रेस मासा प्राइसिtt ६ पुपा पातिसादा प्रोगा प्रग। प्रे-भूगा करि पापर। मप्पम पु. (मार बापक) प्रत्यय- पी- १ पग एप माहे पराहा गया। २ स्रोपन में महिमापत राय । ३ सहर रोमाम रतनपुर पौ। - २ इलिगला गाय लिये मुख्य अपन पवन मारपी। सयुक्त किया । पेसा पीपपणार करिब एक मुर। २ महाराय मे गारपी मार।
[१५ अपनप राठौर रतनसिंपली री महेसबासोवरी ] बोड दिमी पिरिबारमा । ४ साहिन गोण। ५ फूल पापं विपि गड पर्ग। पाटि मिमी। Bठी परिसाह। ..विजापौरसपा। १. किसेत मिमि पनि रही। ११ पठाहीर कणि माये । प्रेरणाका प्रथम- प्रेरणापा बनाने दिये निम्नलिखित परमय प्रनुलए! भाषा १ बम पप माहे गदा पवागे। प्रापौरत मारी। ४ भिन्ते को ममारिमा । मरिरपालिसा बर। १ मर्ग पारिबारि पौधारिमार। मार १ पारितारमा मीठ परस। विष बिमोम्मा पास गर्न । २ पसेन मन मोहरवा रहा । रामो मारो। ४ मणीसार। इयमेवमपर। भारपरम सर को सरकारले भी प्रेरणा सप बनाये गाते है- १ पौधीमा २ बाप्रमाणे म माविमा भिक मम्मिमा। ४ हण पारि पारे पैसी मोम वा ।
१२०] [राजस्मानी पनि १ पूर्णकालिक सन्स प्रत्यय- १ समरि पिसम सिब सपति। २ पुम्देव समत्ति समापि पूर्ण । परिसीपसमा पर। ४ रविधी रिम पर। २ सूगा रिति विष समि। १ सिरि परि परि मुर्वा सुकर । श्री प्रेम पान सिमान महावि। ८ सिफामिनाया। Lखन सूपा कर माति पौने । १. मारिखसारिमा मीठ पाय। प्रेस १से पास जम्मयेरकामा । २ बमपर गिरि पर करे। 'भपति बर। ४ रिया पावस। ५ बमबारत तापीम रे। १ पाया बरे सण। २. तुलन्त प्रस्पब- भए- १ बम्पर पवन कुमामिमो मे पण रिए । २ पुप मपए मनाला ३ तर रिण। ४ बम मिप। ३ करिषा मारप पता - पनि राठौर रतनसिपजी री महेसवासोतरी ] पा- १ रेवा महासूर भारत्पम् । २ मरेगा परेको पाएप मम्न । ३. पर्वमान विरोपण पन्त प्रत्पब-- पंत (नारी.-ती) १ माती इसी पपि माप पहार। २ पाता रिमे प्राम बम्मा प्रपण। १ परम्ता नपारे महारुप मामा । ४ मूव विशेपस पन्त प्रसव- १ सुरै धारिमा काम म गए मम्मे । ५. पापक स्वत: प्रत्यय- १ पाणण विपण। २ परपर रिफ्ण। १ तारण मिस पपन। ४ मारण गया। पवित प्रत्यय १ माठि बार फौर्माप मारणहार । २ ममम्त हाधिो रा मारणहार। । पतिताहा एगिमारणार । १ सेपासम्म पकाना। परी पाणि पाहार हेमंत पाना । २ मोवादमा मारिण मारपरामा । . पोपटो बह पठार मामा ।
१२० ] [ राजस्थानी बपनिमः कदन्त १ पूर्वकालिक लम्त प्रत्यय- १ मुमरि विसन सिम सपति । २ पुम्देव समत्ति समापि पुर्ण । बहिमोमबारक अप। ४ बीरी पिन पर। ५ सूना बिसि सिंध समि। सिरि परि परि मुफ मुका। ० परि पान सिमान महाशित । ८ मा परविध मागti ६. रतन मुकर पाति बने। १. मारिसारिणामोठ पर । १ से पास बम्म राना । २ माग्य ऐपिरि एप करे । "सबमतिरे। ४ शिवा बाराम १ सपारम वाबीन। पाया बो उबेस । २. तु रुदम्त: प्रत्यम- १ बम्पर खन गुमाविमो बमे पण रिण । २ पमपण बमबाग। महरिप्रण। ४ बम मिम। १ करिषा मारपप्रम ।
षपनि सोर रतनसिपछी री मसिदासोतरी ] [१३ १ सा महामूर पारप प्रत्यं । २ मरेगको और मारप मन्न । ३. वर्तमान विरोषण मन्त प्रतम- पेठ (मारी.-4ठी) १ पाती इसी पपि पोपै यहार । २ पान्दा रिपे माम मार्ग 1 मरम्ता नपार पहारप माया। १ मूव विरोपण पन्त प्रत्यय- [राजस्थानी पनि १२२] ४ येथे तरमस पन्धिमा तुरकी एपाना तुएफ । ५ धिम्त पामा माप मू। १ रवि फोना पडाम । २. बार फिर करवाम । सीरवी पायी पास प्रि मोसो किरणाम । ४ पुषमपण बमजान । ५ मा विराम । की जमारास । १ पुवानन्। मानी- मनीको किनारा २ कामी प्रपामा किया। । प्रौपालो मुशती, पपानी। ४ मा कमपाल पाना । प्राम- १ बरी जोधाण मनमा कर्य। २ हिमास तिन दिन बिहा। - १ वारीभरि बंग। प्रध्यम (क) क्रिया दिशेपण (भ) काम वाचक गह-जातीर पटे पर दीप गई। बा-आसमंत परिप सादगा। अपग्मय बोरिए किस विप्रार। पार ग्या सर्वप्रम दौमिमो ग्या। नाम-पूय रखनागिर पौरम पाम ।
. - पपघि राठौड रतनसिपखी री महेसवासोतरी । निरिणबार--सार दर मरि सोहिमा बीमोही मिणिबार। ई-टगरम्मी मगी हई। वाम । वाम एमएरिपो मिमै तण रमार -विनोक कोसिप देखत स्मार। स्याएं ब-ठण माहेस मार की त्या। दिपार -रि माहेस विप्रा भई -सनमान करे मुखान मई। (4) स्थान-पापक तर-पोर सिमा होस । मापनि-मोनापिरीभापमि सलामो । मामे- पीये- -मामे पीधे भाव। उपर मम्मे-परायो रिवाना किया पट्ट पग्मे । ज्पा-सह-म्या साहिबार बोर । गप्पर -पये उप्पणि मने पसा । पत्तरिमा इसम्परे। भरलागत अपर कले। संपाम- -सुगावत पोरे मार समि। पारपती-पास-परिरमा पारवती । पौसपमा प्रार-पौतरा पर दुमै थे। रिसा -पी उममे लिप दिया। पिसिौर -मा रिसि वैसिंग समि। रिसो -पारपसार रिसी भाली । बाहिर ----प्रामा बाहिर प्रेम। निधि -बिपि मरघरमीमा। पीपमाल विष सितारे। विषाम) -feी पाम विषामे प्योम ।
१२२] [ राजस्थानी सपनिम्न ४ तरगम इन्धिमा तुरकी पमानो तुरक। २ बिटम वाला ज्माप म् । प्रान- १ रविना साम। २. बार फिर करसाम । शी रवी पायौ परस किप मासी बिरसाम । ४ पुषमपरामनाम । भाई गिराम। शकीबमरहाना पानी- पनीलो विपर। २ बानी प्रामाप्तौ किमी। प्री पानी सुगामी चमामी । ४ मा कमपम हवाला। परी गोपाष यता कए। ९ खिपाण तिमा हिन्दू विहर । हरी--- १ मेहरी करिबंप। प्रध्यप (क) क्रिया दिशेपस पा-पानार पटे या दीप । पारपर्वत मोरम साहना। -जमग्यप बौषिकिट निमार। मार - ज्या --सतम बौनिमा पार्य। नाम-पूय रतमाभिर पौरप बाम !
पनि राठौर रतनसिपमी री महेसवासोवरी । विणिमार-मार से मरि सोहिमो बीपी ही बिणियार। -टमटमी मम्मी हई। वामा -अम पण रिपो निमै वस। स्पार -विनोक कौविप रेखा स्मार। स्याय उब -तण माहेस परम की स्वा। तिमारी सेरि माहेस विधाय। सई --सनमान करे मुस्तान मई। (प) स्थान-यापक उपोग विपी ही। भापति-पोनगिरी मानसि ममम । मागे- }-भागे पौधे भाव। पौधे- मम्मे- -प्रपा रिवाया किमा बट्ट मम्मे । म्या-बाहामा सहिना बोर । गपरे -पये उप्पर पशि को पता मरे -सरिमा इमम्स। रलायन पर करे। पौर -सूगायत पोर मकर समि। पारपती-गास-परि मुहकमा पारवठी। पासप-चारों पोर-पोसपबर एमै छ। रिसा -मठी मरमेसिन रिसा । विधिपौर -ममा पिसि सिप समि। रिसो -प्रारंपमाहि रिती प्रायोस। बाहिर । बाहिर प्रेम। -पिषिमंटरमीण। बीप में पोम विष सिरपारे। -किपी पाम बियाने पाम । पिपास [राजस्थानी पचनिएँ ४] सा -सरे सर साह प्रसत । धामी सामने मागे मुरभिम साही मा। सामुहा --मैन श्वेणी सामुहा। पुठि-पौधे -ग पूठि पदोम रिपारे । मेगा-पात -बम प्रामा मेरा। स) परित्राण माचक निफ्ट -frपट लिन्हे बात मामा मेग। गिरी -परिमित मुख बाण। यू-से -पापर पविवाह । - पाले रमयर राशि वितरीण गाणे । - ईम -परे तिर पोम नर्मपर मि । प्रेम -सपालियो म सम्मणि सार। मि -माया कहिमो मेमि। ही वाणरय मि । बैम -पाने बारे प्रपपप सप भार परिश्रम । --पुषपति पेमि वन भए । -जंगम्म पसम्म सुसमस्त पेहो । (ख) संघ पोषक विशेपण ममै--साहिमामाण -मपर प्रउ तो बना गि। कार --कण मरास पायब। -सती हो पाये। -दीराम पर धन छन । लिए- -बसर्वत पनि माने पाहि । -मेगामिप्रो प्रेम उग्मणि सार। पति पाह
पनि और रतनसिंपनी री महेसवासोवरी ]
(ग) सयोजक
सिमा अपमानिमा मधपति पुम्मेण मारे।
-बाबम निरपरसाम।
मानो
हिरि) वर दुग्गोण करंग।
~~-TE मे पाडसाह।
पौर
-पापा पर मुसापा
है-पपरा -टो माम बाणि सामंद्रम।
--पिण पो महामारत पे मापन ।
-तिका होगाउपाय।
तो - रेष्ठ परि।
(घ) विस्मयादि पोषक
बाप होपापाप हो बाप ।
माह बार बार बार पापम्मी मी म्ही ।
विशेषण
(5) सारस्वापक विरोपण।
विटी - रमह संभ का विती ।
-बधि मेहा परको हुमा रिस गरेपर।
पैटी -प्रेमी बरबसौ सौ परपय।
पैही गम्म पसम्म मुबमत्त हो ।
der --बसरार अमेसर।
रिसा -रिमा पोबरपा पर।
रिती -रिस मास मितीपाग
प्रेमा तो ऐन काल मेसा एवम ।
पैसो पसीसी अपाय।
प्रेमी
१२६ ] [राजस्मानी पनि (स) सायनामिक विशेषण बहसी इसी पविमोपे नही। सा पसंता पा मार दी बनाये। इसे बान से बिमारिण। वषयी -घी गण नात। सा -समापसा किसी -किसीहीदी । पिरी -ति पतीपरता विही। सर्वनामों का परिचय सर्वनामा पम्तर्गत दिया ही गा पुत्र है। (ग) संस्था-बापक विरोपण गणमा बोरक- पारि -कबसी पण भग। डि -णि पोट यताय । माई बिराम। बि-र -बि-बिस परिवार मे रि-गि तप । तीन --तीन पीहर हा महापब असपर ही म। मारि पपी विणकासि । पर हर मुर पुरणे दिया। -मामाहरोप पर। -~-पारिएकी प्रिए साम । 41 -नीपंपरी महामुर पहा । बाद भारबाण। -पारित मर रस निगरि प्रा। प पण मुरमाए । तात -सात सनविरमा सरत -पतीस रागणी सपा मुर। बनिधि मुरपा बाणि मा -पाठ ससुर गर मेक। सामाशिष मासा ।
[१२७ पनि राठोड रतनसिपमी री महेसवासोवरी ] - मारिखिममहो। आप बस मुहम पारे मिसाप । -सिमपार हेट समय सौम् --ौतु निकार रही। पौवा -तीबा रिपार र प्रेम का मर। सोप पर सेतीस। - पूण नीस टकी कार्य । -तीस बोरियता। मनीस स हि सरीस करि । प्रवीस पीच पानिन बान । बतीत -मेशा सक्तीस । बीसी - परीस- पुरम । -सठि बोपणी बापम पीर । बास -भापहिगार फौगो मोबबहार । पौषति -पौसठियोगणी यवन बौर। पसी -पशीसम भारमाधम भूप। -पसी विद पिवमान हुमा है। प्रामी -मै बाशि प्राची निमा बार। पारी -पानीमारि। सामा -पमा बाबा परिणमा । -मसात मत्सबमेत रिमा। -बाबमा नादीमा तीस बोशित (प) कम पोषक दुग्यो --हिमी यो मोकरमा पूसरी दूसरी मार। बौना -श्रीया प्राचार्या समान। भी दिन रविपरि। तोरणे -पो ठोस महाभारप ।
१९८] [राजस्थानी पनि पौपा -ौषा पौहर मामा । सावमे -पग पातमे पवामि । पनरोत्तर -पनरोप्तो पस्मि । (३) समूह पापक विरोपण -तुम सिपर पुर पह। - फोर फम गिर गग्य गणे। -साहिगाय यि सोमहो । पि -माप साहिबार बिहा राप मार । -निपट बिहे फौष फौगापणी पत्रा हो । मेरे परम । - सूरबि यह बवासी करे थे। विप्रे -पिन नीक। बसो -बोगपसिौ रिसिपाती। हगारी -हमारा मुह वापिने वीर हाई । समास परमिता में समास भी पर्याप्त संम्पा में प्रयुक्त -रोरो सम्ो। पपा- बया-पम्भ गर-पति हस्तिमार बोपण-पति बम-र बोषा-पणी, रन सिसवार एप-बम्प मुगवति, पण मर-बब बर पर रिणत एि-समंग परसाण-सिव मातीम पारित समासना में नही कही पिपप भी हो गया है। सपा- पति रिस्तो पति-गवन बाहेम पिरमर मारि। शब्द-कोश पनिकता के सम-होप में संसास रसम पर्प-सस्थम एवं जर म दिरेसी (मरवी प्रावी) पर प्रौर सिव पने शिष पप परिमसित होते है। इसमें मनुरणारमा राम का प्रयोग भी हमा है। विभिन्न प्रकार प्रमों एप गहण प्टिम्प :- १ वस्समरा कवि कमल रा स रा म एतेन वप परम पवित्रता गा मनोरष मानसरोपर विपि पर-पान म बिए भीर मर सप सुप, रापन व म, गयार इस गम मापार, प्रपा बोराषिपीर मारि।
पनिका राठौर रतनसिंघजी री महेसवासोवरी ]
२. पर्व-तत्सम
प्रप तरस तुणे, माम एम योम मामित पूणीपन, रिफिलिपि मुर
मित पर पत-निम, बहमर मिर, शमिस सास, मारण दुसमेत पनि
बरमोड प्रावनोक पारित
बमबम
अपक्षण, महल बमऊ, ए परसे पाठि पोधिमा ग्यार, माण कम
पसी पूप, नेग, फा, उमाद समर सरिस बिसन, किसन नयम, इना, मा,
सामि रेट पारित
४ विदेशीराम
मरस, परवपूर कहा, महर राबवाय उरष्ठ, दीराम बार सहर
(पहर) गिहाण (गाय) पुरवाण (फरमान) बोर (घोर) महापूर (बहादुर) सिमस्यामा
अम दुपा गाइपर, रित पुरमा पेस सप) पह गर मारि।
भनुरणात्मक राम
काम सात बस बाटबरी परमा
बर्षका भटमी
पार, मी या पामा परम्म इमानो समरममि मरमण ।
६ जिंगम मापा में प्रयुष अब पिप राण
भमाहिमामाची पावर पणन, प्रणमोह, प्रसो, प्रना पलसम्प
प्रपतीपास पय परिसाल, पपमा माग्यो मामापरे, पापमती सरा,
पोलखो, मानार, के समसणी मिस और पलको बतप, बीच मारा
पर पाइली प्रगली, मोत भवपाल पपाही पार पाच सापटी पोरम,
पल मि बपनेठ बरामे, भारनि भा भगन मीक रमर हिवारी, भात,
ही मन बापत पणो निम पर्व पठाम परिपाइण, पाटी, प्रौपानी
पटी दोह, ममताट मममोट मस्पो माती, सण, हिल सीप ma
विपक्षी पिरोत पानी सो सूबसी सूरमा हमागो, हम हम्म मत
होपडा पारि।
गारण सिवास एव सिरिया नगा तुलनात्मक अध्ययन पवस्वानी का पप साहिस्प पितमा परिमाणित प्रविष्य-पूर्ण विविध पसी पन एवं विस्तृत , उतमा ही इसप पच-साहित्य भी विस्म की १४ की पती ता माते-पाते हम पयस्थानी बच के प्रथम पर्पन होने मसिनो परम्परा पाम तक किसी न किसी रूप मे प्रक्षुम्ण बनी है। एजस्थानी-गप रपितामों ने धर्म रसन इतिहास, गलित ज्योतिष पाटीका-टिप्पण, पनुशार मारिधी को परमा पिप बनाया है। मोहरमनपरी मनपिनत बातों स्माता मावि में हो यस्मानी-ग मसत मिसमान पा है। हवी प्रारंभिक हतियां बह हम किसी की ममिति-प्रणामी एम्म-समम रिमात भाषि की तमनने में सहायानी इसके विराम-कान भी दिया मागी बिमरी-पके साप एवं उसके विकासपीरिया-कित रेती मष्टीत होती है। पजस्थानी पप-मापकाको विकायोग्मुखी प्रभार समुदाय बीमो पनि मरपमान है यह रोगई पतानियों व मम्माम्य-पागको प्रििषित करता हमा 'प. समादिपरी महे समातीत सपनिम' में मपने पूरे मोर उतर साय र हुमा है-बीका पोक्तियों में प्रचारपान होकरों की कार्य में बनता हमा सतीस्यकी स्वयतोकनी व मरणाचन परमादीम पाणीपा बसी होने वाले पोय सुत परियों परलों में धारमी साप पर क्या है। पारण सिवरास पौर विडिया चपा पारसी-भाषाभिरित पगरपानी सामप्रिय साहित्य-समानकी प्रतिमा समिकों के यातीय प्रमितेखों के शप समारत होएमपिक टि-बिन्दुर्मों में पेनों पपिता इमान पपम पर प्रवस्मित पोरर होते है। रोनी पनि प्रो विषय में गिरवियो प्रबलित मपने-अपने पामपपतामों के बार में पूम गावे मात्र अपने स्वामियों रमि-जीवन स्वम्म पर गम्प समात-समय पर उनको भपक परान ए हेतु जीवित प पपे । रोमों मितानों का समय अपने बार-पाभावामों कीति-स्तान ही है। रोगों की दाम्प प्रतिमा इतिहास बीवितामों में मरती गई एक मोर काप सिमें मानानुति का पार करतीमा-पम मार सति का तुलनात्मक भम्पयन] [११ मोति मग एकता है वहीं दूसरी मोर त्यामेपी विहासकार को मान लिया पतिहासिक रियों को गोरा धाम भी प्रदान करती। घमासानी बीर-काम्बरमामों समय मोनाएं युवकाम्प निमें मम सरस भव प्रमम, पोर पोर पण्विनित हुर। अपितु रिषी कम केशति-माम पादिर भी विस्त पर्सन हमा है। इस रष्टि से होगो बल भमान पनाएं।पुर के पूर्व पर माया सपशीय पोवामा मभित्रकाका मायोजन पलोम्मत मरणापुर पारा प्रतुमार-पिए गौहर समय पर मंत्र में नामा की प्रासाठिक हस्यमों में ही समान लिविस प्रकार रोमी पपरिधएं सप्ट बोर-सम्प-गोगों का भीरम वीरपण रसकट दो एक सन पर रोनों पनागों में है जिनके समिर पाप की पत नाग जाती है। बत गार भूमि में एप्टि पपितु भैलोसम्म पसरा मा पिके विवार से भी दोनों परिवार एक ही मा पा पनुसरण हुए । परिप-बी में रति परमानी कतारमा पपी पवार मुकमित-सम्म चौरम दोनों रहमानों के पफ मुगापित है। पारण पिस अपेमात पूर्वमती कपि-फिर भी उसकी प्रतिमा में ये प्रतानियों बार मना करने वाले समाविबाहिरिया को पूरा प्रभावित मिा मानक रोनों मिशनो के इतने प्रषिक साम्पका कारण रोगों निमोनित एक तो ऐतिहासिक घटनाएं है, फिर भी पपनी तनाबी गिए बया निश्चित ही शिवरामी है। इतना सीमर करने पर भी बना पर सिरण का प्रयास परपोषारोपल नहीं पाया पता विपक्ष की सपमा प्रस्थान मरस मिस्मण इस प्रभर श्मिा र सम्वाद- सपा की पना मार-कुन होये हुए भी मन-प्रदान है। सिर में प्रपेमा पार प्रधान शिति पर्तनों से अपा की पत्तिा सा-TE में स्वास्नीय निचार मा ममा पपि हम पर्सनो पा प्रपद में होगा पिप्रम पार पापा। शिवरासकीएपनिका में प्रवासात्मरका एक रम प्रभार है-उसकी मामी प्रसरसोई रोक नही है। जपाने पीर के बाप ही मार सभी पर्सन रिमा पर हो ति-कालीन प्रभाव विकरात की सानिया में मार रस स नाम भी नही है- रस्सा न रोगों में।
१३२] [राजस्थानी सपनिम्र रामसिंह की मृत्यु के परमात स्पर्म में उसके भभिमबस पारि पिस्तार पर्सन करणे बणा में अपनी बपनिम्न में सम्पनिक पंच का समास र रिसा है। मिरास पपा हो ही पास किया है। गया एक कमाकार कवि है । रसकी पनिका का भाव-पय विवना मदुर उतना ही एमका मा-पम भी रम्पत है । उसका मन भी काम मा रम्म मौर रोगा। इसके विपरीत सिरबास मैसपिक भावना का सरम कपि । पापि उसका कविता का मापन किसी भी प्रकार से इस नहीं है फिर भी उसमे पसे सगाने की पोर पिर ध्यान नहीं दिया है। उपयुक विपन प्रापार पर हम पहीमा पर किमो पि समान भाष पूमि पर समान-मनी में रखना हरके भी पूरा-पपा पहला विकारी। तुमना रा एक को पूसरे से गया या बोटा कपि सिस महा मिया बा सायास अवसर पर इतना ही कहा 1 मा किसिषपस पप निपित पयस्थमी की बपनिम मी मा हालों में पार विसोग्मुख हो ।
परिशिष्ट २ टीमामास में सिसित बन गमिषाएं । १ मोफरायमी गोदिका-सांगानेर निवासी मापसीप पनिका। २. टोरमल-सम्म सं० १५५ । २ सोसार की मनिका । . भारमानुवासन बपनिम-महमहरि पम्प पर उसका है। ४ पुरुमा सिमुपाय की सपनिका मिसे पं.मनपम ने पूर्ण किया। ३ दौलतराम, पसवामाम निवासी-जो अनुमानत सं० १८३० वि० तक विपमान : ५ हरिबंध पुराण (१८२० की बानिका । 1 पुप्पामा बानिका (१७७७)। . परमात्म प्राय पनिका । ८ श्रीपानपरित पनिया। 1. बसुनरि पाप-नापार (प्राय) की बपनिका । ४ मन्नालालजी सांगण-मन्म सं०१८२६ १. परितसार की पपनिम (माष .. १८७१ म पूर्ण) ११ प्रतिक की पनिका (अपूर्ण)। ५. केसरी सिंहबी १२ बरमान पुषण पनिका (१८७१)। ६ पेपीवासमी १५ सितिसार संपनिय १४ पत्ता सुषमपनिका । सं..! ७ अयचमी वापग-अयपुर १५. प्रमेम प्लमाता की पनिका (१९९५)। खतरामडी-१६पीशवायी के मंत्र में विपमान से ११ पर्म एरिकमा पनि। १५ मिम्पालापन नाटक पनि। - {t.
१३४ ] [राजस्थानी परनिफा .. शिवलालजी सयपुर निवासी १८ रान संपहपनि। १६ वर्षा संपनिका। २. नरनिहा। २१ समास्वामी व मायकापार निका। २२ पेहप जन प्रौर पनसार पनिमा (स. १८५२) १० माधूराममी वोसी-जयपुर निवासी बम्म पी रावी पचरा मू० सं० ११२५ २३ समाम परिष पनिका। २४ नामावमिका। २५ पोडा कारण बपमाम पनिका। २६ पसभा रलाय यमालपानिका । २० पदोपर प्रष्ठादिनका कमा पनिका । २८ समाधि रान मित्र। ११ सदासुख जयपुर निवासी बम्म १२२ मृ० १२३ २१ माकपनिया। । मून महोत्सर पनिमा ५ समय सारमिता १२ पारसदासद्धी विगोस्पा-जयपुर मृत्यु सं० १३१६ २२ सार परिषति पनिहा। १५ दीपचन्द-मामेर ॥ मनुगर प्रकाश परमिछ। १५ पासास सिंपी-अम्म सं० १८७१ मुस्यु म्येष्ठाणा १०६० १६४० । पनिका। १५. फतहसासमी जयपुर १ साग रीपिका पौर दत्वा सूप की पाकिए। १५ स्वस्पन्द विक्षामा १ मत पपनय पनिका (. ११८)। १. एपमामी २७ राप्रप पनिन । १८ पारावार पनि। ३४ तथा
परिशिष्ट २]
[१२४
१- बीररी सास शाह रचना काल सं० १६१४
१५ सेमेर शिखर पूगा पनि।
४. पामनदीपषिपवित्र गनिमा
१५ नन्दमासमापन
४१ ममवापार की निका।
२० बयचम्माम बाबा
४२ मामृत मोठानिन ।
२७ रुपचन
४ सयपधार पनि।
इम पतिरिक्त श्री ममीपन धारणी ने अपने संबहिनी -साहित्य परि
जीवन' भार २५ २१२ १४पर दुध और पनिकामा नाम बिनाए।
सहायक ग्रन्थ सूची १ भपध धसाहित्य ग.हरिका कोषा २ किसन समणी री वोसि (भूमिका मात्र) प्रो.रोतास स्वामी ३ कीतिमता संपा. ग. बाराम मासेना ४ पद परवाई और उनका काम्य ग. विपिन गिरी ५ छन्द प्रभाकर बगान मानु ६ डिंगम में वीर रस 4. मोती नाम मेनारिया • राजस्मामी गप साहित्य का इतिहास और विकास (पप्रकाशित) ग. शिवससम्ममा पर ८ रावस्पानी भापा और साहित्य ५. मोती धाम मेनारिया १ रागस्माम के हस्तलिखित प्रपों की 4. मोती वाम मेनारिया १. रामस्थामी साहित्यकारों का परिचय प्राम-सापन समिति १२ मणि मन म.मा.हिदी साहित्य सम्मेलन सोग माग बष्ण ११ वीर रस का शास्त्रीय विवेचन १२ बोर सवसई (भूमिका मात्र) ग. कर्मपाधान वाम १३ संस्कृति गप बस्सरी प्रो.बरोत्तमदास स्वामी १४ संसत साहित्य का इतिहास बहरेषपाध्याय १५ हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रा. रामचनपुरम १६ हिन्दी साहित्य का मालोचनात्मक इतिहास ग. रामामार वर्मा १७ हिन्दी साहित्य का मादिकाम ग. हमारी प्रसार निरी १८. हिन्दी अन-साहित्य परिषीलम भाम नमीपग शास्त्री १८. हिन्दी बीर-काम्प ग.टोनमहिनोमर २० हिन्दी कायाकार सूप (एगी} संश..मेग २१ हिस्ट्री पॉर संसत निट्रपर २२ पट्रोरस्थम दृप्राकस कोशाप ए.सी.पुसना २३ उद-हिन्दी कोच संपा. मुहम्मर मुस्तुण २४ हिन्दी साहित्य कोप संपा.गापौरेल मारि एसिप्रिटिषसांप पौरातिपदिए मर बरमा प्रारमिव एप्रियाटिक सोपापरीरकरR मंच सहायक पंप सूपी ] राजस्थानी मापा क ग्रंथ २. केहर प्रकाश अबिवर पसार २६ रघुनाप स्पक २७. रघुवर बस प्रकाश संपा. सीताराम मानस २८ रामस्थानी साहित्य संग्रह भाग १ संपा.मो.मरोत्तमयम स्वामी २६. पमिका रा. रतनसिपमीरी महेसदासोतरी संपा.स.टेसीटोरी ३० वषनिका रा० रतनसिपबीरी संपा.पापीपम धर्मा पूर्व महेसवासोतरी म. रघुवीरसिंह ३१ मबलदास नीची री पनिका (हस्तलिखित) सिनरास पारण १२ मधमदास सीपी रीवनिका संपा.पीनामावली २६ पथमदास सीधी री बात (हसमिक्षित) इविदास ग्रंथ ३४ उदयपुर राग्य का इतिहास म. पौमिकर होपर मोमा ३५ पीर-विमोद कवियमा मापसरास १६ मारवाड़ राग्य का इतिहास बारीमति मानो ३७.रतमामका प्रथम राम्य एपी सिंह ३८. हिस्ट्री प्राव पोरंगरेज १२ ग. पानाच सरकार ३६ पारंगवेग (हिन्दी) 1. पदुनाब सरकार ४० रामस्पाम कर्ममा ४१ इणियन एफीमेरीर एस.२.पि १२ निजामुद्दीम त 'तबकात-ए-पकारी' पिनी पनुपात ४३ तारीख-रिक्वा' निजात ४ याहयात 'तारीख-ए-मुवारकशाही प्रपती पनुपार पत्र-पत्रिकाएँ परस्पाम माख पाव कप बनारी १५ परस्पानी भाग २ सोपविभब १२ क २ सिमर १५. पिसी अपार बम पोट कम बारिक पोइट्री मार
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सहायक प्रम सूची] राजस्थानी मापा के ग्रंथ २५. केहर प्रकास कवियरबस्तार २६ रपुनाप स्प संपति २० रघुबर बस प्रकार संपा.मीतापम मासस २८ राजस्थानी साहित्य संग्रह भाग १ संपा. प्रो. नरोत्तमपस स्वामी २६ वषनिका रा० रतनसिषगीरी महेसदासोतरी संपा. टेसीटोरी ३० वपमिका रा० रतनसिपमीरी संपा. सीपम धर्मा एवं महेसदासौतरी रसुपारसिंह ३१ प्रपमदास सीची रीघनिका (हस्तनिलित) सिपरास पारण ३२ प्रथमदाससीची री वानिका संपारीमामापत्री ३३ प्रथमदास सीबीरी बात (इस्तमिति) इतिहास प्रय २४ उदयपुर राम्प का इतिहास ग. पौर्णिकर हीपी मोम्य २५ बीर-विमोद कषियमा स्यामारास २६. मारवार पग्य का इतिहास अपर्णसिंह परमोट १७. रखमाम का प्रथम राग्य म. पारसिंह २८. हिस्ट्री भाब पोरगव १२ ग. यालाच सरकार ३६ पोरगवेग (हिन्दी) ग. पानाष सरकार ४० रायस्पाम कामटर ४१ इणियन एफीमेरी एष... पिस्नई २ निजामुरीम कत तबकात-ए-पकारी' मपणी अनुरारपण २ ४२ तारीख-फरिश्ता' विग्यात प्रदेषी मनुबारस १४ ४ याहया त 'तारीख-ए-मुबारकपाही' प्रदेवी मनुवार पत्र-पत्रिकाएँ परस्पान भात भापकर बमवरी ११ रामस्वामी भाप २ मो-पत्रिभर १२ प्रेक २रिसम्बर १६. बालम मोपरी रोपन एप्रियाटिक सोसायटी पॉर ईमाम पाप १२ प १५ परिसिटिक बेटतान पार पारिक एप हिस्ट्रोरीम मैनन्ट्सि पोर्ट का बारिक पोइंट्री माप १ बोकानेर स्टेट