Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Paryavaran Prakriti Aur Manav

B. L. Garg · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

पर्यावरण, प्रकृति और मानव
प्रो० बी० एल० गर्ग
एम एस सी
अभिनव प्रकाशन, अजमेर

--
ISBY
81-8524524-x
मर्गधियार गुरभित
प्रयममस्मरण
1990
प्रभिनय प्रकाशन
पहली मजिा, 56 पचहरी रो
पोस्ट बोमन 118
अजमेर-305001
मुर
स्वस्तिा प्रिटर्स
हामी भाग मत्रमर
पचहत्तर रपये
Parya 132n, Prakarati Aur ) 1978v Dy a L. Garg Als 75.

अनुक्रम 5 12 18 48 53 61 -69 74 9 84 1 पर्यावरण और मानव 2 पर्यावरण तथा उसकी उपयोगिता 3 पर्यावरण एक वैज्ञानिक अध्ययन 4 पर्यावरण-ससाधन एव सरक्षण 5 पर्यावरण सरक्षण में वनो का महत्व 6 पर्यावरण - प्रदूपण 7. जनसख्या तथा पर्यावरण प्रदूषण 8 वायु प्रदूषण व नियन्त्रण जल - प्रदूपण एव नियंत्रण 10 भूमि - प्रदूपण एव प्रबंध 11 महासागर - भौगोलिक पर्यावरण 12 सागर -प्रदूपण तथा निवारण 13 ध्वनि प्रदूपण तथा नियत्रण 14 भू - ओजोन प्रदूषण 15 पर्यावरण तथा पीडकनाशक रसायन 16 पर्यावरण तथा विकिरण के खतरे 17, पर्यावरण - प्रशासन एवं प्रबंध 18 बदलती हुई मानसिक्ताये और पर्यावरण संतुलन 19 पारिभाषिक शब्दावली 93 97 103 108 "r 112 - 115 128 144 157 171 00 +

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य मे पर्यावरण
भारतीय संस्कृति म पर्यावरण के प्रति सवेदनशील जागरूकता वैदिक
काल से ही मिलती है । अथववेद में लिखा है-
'माता भूमि पुरोऽह पृथिव्या'
भूमि माता है । मैं पृथ्वी या पुन हू ।
वैदिक ऋपि को प्रकृति के विभिन्न घटव पवत,वन, नदी आदि सहोदराए
जान पडते थे। यथा-
गिरयस्ते पवत हिमवन्तोऽरण्यते पृथ्यो स्पोनमत्सु --प्रथव
(हे पथ्वी) तरे पवत, तेरे हिमावृत शत्य, तेरे अरण्य सुखदायक हो।
केवल यही नहीं, वैदिककाल का मानव प्रकृति के प्रति संवेदनशील तो
था ही, साथ ही उसका सौदय-बोध भी विकसित था । उसे धरती का सोदय
इतना प्रिय था कि वह उसे अनन्तकाल तर देखत रखने की कामना करता
था। यथा-
यावत तेभि पश्यामि भूमे सूर्येण मेदिना।
तावन्मे चक्षुर्मामेष्टोत्तरामुत्तरी समाम् ॥
हे भूमि | प्रकाशित सूय के साथ जब तक तेरी ओर देखता रहू, तब
तक वप वर्षातर तक मेरी दृष्टि क्षीण न हो।
मा ते मर्म विनावरि मा ते हृदयमपिपम । - अथर्व
हे पवित्र करने वाली भूमि । मैं तेरे हृदय को आघात न पहुचाऊ ।
स्वयित्री महादेवी वर्मा के शब्दो म आज के वैज्ञानिक युग मे जब पृथ्वी
से सब कुछ लकर भी उसे नष्ट करने के साधन खोजता रहता है, वैदिक
मानव को यह भावना पर्यावरण की विशुद्धता के प्रति हम मे सजग दष्टि प्रदान
करन के लिए यथेष्ट है।
-डॉ रामगोपाल गोयल
-

पर्यावरण और मानव प्रकृति ही मानव का पर्यावरण और यही उसके ससाधनो का भण्डार है। आज का मानव प्रकृति की गोद में पलकर भी अपनी स्वय की अज्ञानता के पारण तथा नानिक व तकनीकी जानकारी के अहवश, पर्यावरणीय ससाधनो का क्रूरता के साथ दोहन करने मे लिप्त है । गत 25 वर्षों से पारिस्थितिकविदो ने समझन व समझाने का अथक प्रयास क्यिा है कि दिक व काल की सीमाओ मे हमारे ससाधन सामित ही हैं । अति उपभोगी सभ्यता में औद्योगिक उत्पादन प्राकृतिक ससाधनो और ऊर्जा के भण्डारो पर ही निभर हैं और यह दोनो ही निश्चित रूप मे उदारता व त्वरित गति से उपयोग मे लाये जा रहे हैं व क्षीण हो रहे हैं । इस प्रक्रिया में ससाधनो द्वारा पोषित जीव-तन्त्र सकीण, दूषित तथा विषाक्त होता जा रहा है। आज विज्ञान ने मानव को एक चौराहे पर ला खडा किया है जिसके दो विकल्प हो सकते है। प्रथम विकल्प विवेक, मितध्ययता और नतिकता का लम्बा मार्ग अथवा दूसरा विकल्प-पर्यावरण विनाशक विलासमयी उपभोग मूलक सस्कृति या मार्ग? हमारे वेद, पुराण, उपनिषद् तथा अ य शास्त्रो मे धरती को माता कहकर (सम्बोधित क्यिा है और प्राकृतिक शक्तियो को बदनीय माना गया है। यह भाव केवल इसलिय भिव्यक्त किया गया है कि धरती माता हमारी व सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियो, को जननी व पोषक है । पथ्वी तथा प्राकृतिक शक्तियो के बीच सतुनन पर ही मानव का अस्तित्व निभर है। यदि प्रकृति का सन्तुलन गडबडा जाये तो उसका अस्तित्व ही काल ग्रसित हो जायेगा। सम्भवत यही कारण है कि मनीषियो ने धरती तथा उसके प्राकृतिय ससाधना के सरक्षण का सदेश दिया है। प्रकृति का मानव के साथ जो गह्न रिश्ता, जिस परिप्रेक्ष्य में भारतीय प्राचीन प्रथो मे दर्शाया गया है वैसा भय स्थाना पर मिलना दुलभ है । मानव तो इम अन त ब्रह्माण्ड मे एप' अशमात्र लघु प्राणि है। यह ब्रह्माण्ड जो अपार शूप के रूप मे दृष्टिगत है ज्ञान की हमारी सोमा रेखा-सौर परिवार तक ही है जिसमे हमारी धरती के अतिरियन बुध, शुक्र, मगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण व यम वणनीय हैं। इस धरती को छोडवर अ य किसी ग्रह पर जीवन को उपस्थिति प्रमाणित होना पर्यावरण और मानव/5 . ऋर हाथो शेष है। पृथ्वी पर ही जीवन के नाना रूप लघु से लघुत्तर व वहत से वृहत्तर दिखाई पडत हैं । परतु जिम निदयता के साथ हम इस धरती माता को लूट रहे हैं, सचमुच ही हमारी प्रगति के लिये शुभ नहीं है । प्राकृतिक समाधनो का दुरुपयोग, अममय म मानव विनाश का प्रतीक है। पथ्वी पर यदि हम उसकी अजैविक सम्पदा तथा जैविक ससाधनो को भावी पीढियो के लिये बचापर नहीं रखेंग तो हमारी कृतघ्न पीढी इसके लिये पदापि क्षमा नहीं की जावेगी। सुजलाम् सुफलाम शस्यश्यामलाम्" की सुखद कल्पनायें भावी पीढियो के लिय अवश्य ही एक कहानी मान बन कर रह जावेगी। महात्मा गांधी के शब्दो म यदि कहै कि भावी पीदियो के हित को सोचे बिना, धरती को विनाश के कगार पर ला खडा करना, केवल हिंसा ही होगी। 'मां धरती हमारी सभी आवश्यकताओ की पूर्ति करती है, किन्तु हमारी सभी इच्छाओ और लालसाओ तथा अभिलाषाओ की नहीं। अतएव हमको अपने अस्तित्व के रख-रखाव के लिये, अपनी इस जननी की हर प्रकार से रक्षा करनी होगी । इतिहास साक्षी है कि मानव से सम्पन हुई विनाशलीला में कितनी ही जीव प्रजातियां नष्ट हो गयी है तथा अ य कई विनाश के कगार पर खडी है। 19वी तथा 20वी शताब्दी मे हुए सभ्यता एव औद्योगीकरण के तेज प्रसार के कारण पक्षीजगत् अधिक प्रभावित हुआ । यूरोप, अमेरिया, अफ्रीका तथा एशिया के महाद्वीपो मे लायो हेक्टयर भूमि पर से वनो का अविवेकपूर्ण घटाव हुआ। नये वन कम लगाये गये या लगाये ही नहीं गये। इसका नतीजा यह निकला नि वे वन जो पक्षियो के आवाम स्थल थे, जहा वे अपने घोसले बनाते थे, और अण्डे देत थे, मानव के निमम हाथो द्वारा छीन लिये गये । तात्पय यह कि घोसला बनाने लायक उपयुक्त स्थानो के अभाव मे पक्षियो के समूह के समूह उस स्थान को छोडकर अयत्र चले गये और स्वय को नये वातावरण ढालो लग । जो पक्षा प्रजातिया ऐसा करन मे असमथ रही, वे धीरे धीरे नुन हो गई । अब तक वनस्पतियो के भी अनेका समूह धरती के गभ मे समाहित हो गय है, इनमे बहुतो के चिह धरती मे मिल जाते हैं । पुरावन- स्पनियास्त्र अध्ययन से अनक पौधो का पता चलता है जो बाला तर में पाय जाते थे रितु वे अब विलुप्त हो चुके हैं। मम्पूर्ण विश्व मे पर्यावरण के प्रति ध्यापक चेतना का जापत हाना, तथा स्थगितगत स्तर पर भी उत्तरदायित्व पूर्ण भावना वा उदित होना, इम शताग्दा की गवस महत्वपूर्ण घटना है। सवप्रथम 1972 में स्वोहन की साधानी 'स्टॉ होम म सम्पन हा पर्यावरणीय सम्मलन म यह बात 6/पर्यावरण प्राति और मानव अनुसार प्राणियो म, उभर कर सामने आयी कि पर्यावरण सरक्षण आवश्यक हो गया है और तभी विश्व स्तर पर मरक्षण हेतु नित्य नये-नये साधनो, प्रयासो व खोजो को बल मिलता जा रहा है । सयुक्त राष्ट्रसघ द्वारा भी प्रसारित अपील 'ओनली वन अथ' (केवल एक ही धरती) वतमान मे सम्पूर्ण दुनिया के लोगो की एक आवाज बन गई है। इसी सदभ मे शुक्दवप्रसादजी, सयोजक', 'अखिल भारतीय पयावरण गोष्ठी' को यह पक्तिया अत्यत सारभित है-- "धरती माता को प्रणाम । वदनीय तरुओ को नमन् ॥ सूय देव को नमस्कार । जलदेवता को प्रणाम् ॥" भारतीय मनीषियों ने समूची प्रकृति ही नहीं, वरन सभी प्राकृतिक शक्तियों को पूजनीय माना है । ऊर्जा के अपरिमित स्रोत को देवता के रूप मे मा यता दी है - सूयदवो नम' । वस्तुस्थिति यह है कि सूम हमारा अर्थात इस पृथ्वी ग्रह का जीवनदाता है। बिना इसके वनस्पतियो तथा परोक्ष मे अय जीवो का अस्तित्व संभव नहीं है । वैदिक काल म ऋषि- मुनियो ने तभी तो यह कामना अभिव्यक्त की है कि मूय कभी हममे जुदा न हो। सूय को तो जगत को आत्मा उद्घोषित किया है। उपनिषदा ने सूय को प्राण को मज्ञा दी है। कहना होगा की सूय मानव-मान मे, सभी वनस्पतिया में जीवन का सचार करता है। सागरो की अतल गहराहियो मे अरबा वष पूर्व, जीवन का जो आदि रूप पनपा था, उसमें सूर्य की किरणों से ही जीवन सचारित हुआ था। यह प्रक्रिया आज भी निरतर जारी है । वनस्पनिया सूय की किरणो से हो ऊर्जा प्राप्ति कर आहार का सृजन करती हैं तथा उही से अय पक्षी जीव-जन्तु अपना पोषण करते हैं । यदि जीवनदाता के रूप में बीत के प्रतीक की पल्पना की गई थी तो उसका औचित्य था। साज र शाश्वत मूल्यो यो विसराया नहीं गया है और घर का .. भोर रखा जाता है ताकि सूय का प्रकाश घर मे चारों भोर Pri उपनिपदा मै वायु की भी व्याख्या की गई है । ***-uary अवधारणा निहित है । इनका बना था कि गयी "rmysfrt वास करता है । भारतीय सम्वृति म जन का arket- वरुण देवता इसी का पर्यायवाची हैं । armrosar frrt (नदियो) के किनारे उदित हुई, यो artiy* आर मूल्य वदल गये हों परन्तु हमारी प्राई rest from art पोखरो में मल-मूत्र विसजन #wr rat fort भी स्वीकारा जाता है कि - न पदार्थों को नही त्यागें। इसीलिये ऋषि-मुनियों ने सदैव शुद्ध एवं पवित्र जल की उपलब्धता की कामना की है यथा,- "शुद्धा न आपस्त वे क्षरतु अर्थात-हमारे शरीर के लिये शुद्ध जल सदैव प्रवाहित होते रह । परम्परा यह रही थी कि तालाबो व सरिताओ मे स्नान करने से पूर्व ककर फेंकवर सोयी हुई पवित्र-पाविनी गगा को जगाया जाता था । तत्पश्चात हो वदना के उपरात, उसम स्नान किया जाता था। परतु आज हमारी सोच की सवेदनशीलता न यान्त्रिक्ता को झकझार डाला है । हम अपनी थाती मे निहित शुभ सक्ल्पा को समझने में असमर्थ रहे है और आज भी तकनीकी संस्कृति की ओर द्रुत गति से दौड रहे हैं । यह कैसो त्रासदी है। जिस पवित्र गगा के विषय मे, हम आदि काल सोचते आ रहे हैं कि उमर दशन मात्र से ही मुक्ति का माग खुल जाता है। परन्तु हाय र 'आधुनिक तकनीकी प्रसाद' | आज गगा सहित अ य सभी नदिया दूपित हो चुकी हैं । आज के जीवन मूल्यो व शैली में अदभुत बदलाव आ गया है कि मो-ग। शहरो का मेला तथा फक्टरियो की गदगी ढोते-ढोते इस वदर प्रदूषित हो गई है कि उसका पानी पीने योग्य ही नही रह गया है, वह अनेक प्रकार का थीमारियो का घर वन चुकी है । औद्यागिक विकास की यह कैसी गाथा है कि हमारी जीवनदाना नदिया की निर्मलता पवित्रता व पावनता को ही नष्ट कर दिया गया है। भारतीय संस्कृति व सभ्यता में वृक्षो को भी पूजनीय माना गया है। केला वट, पीपल, तुलसी आदि इस अनुकरणीय उदाहरण हैं । भारतीय आयुविनानियो का भी मानना है कि विश्व में एसी कोई वनस्पति नही है जिसका योषधि के रूप में उपयोग नहीं किया जा सके । सम्भवत् इसी कारण वृक्षो को भी वदनीय समझा गया है। हम देवता उसी को मानते है जो नि स्वाथ भाव से दूसरा की सवा मे तत्पर रहे और हमेशा ही कुछ देता रहे लेवे कुछ नही । वक्ष अपनी उत्पत्ति के साथ ही अनेक रूपो म प्राणि जगत् को कुछ न कुछ देता ही है । इसलिये पुराणों मे वक्षो के लिये कहा गया है । मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु साखायाम् महेश्वरम । पत्नम, सवदेवानाम् वृक्ष देव नमास्तुते । वक्ष फूल-पत्ता तथा पो के बोझ को वहन क्यि रहते है धूप की तपन तथा शीत की पीड़ा का सहन करते रहते है पर तु दूसरो मुख व लिये अपना शरीर सदव अर्पित करने में कभी नही थक्त । ऐसे वदनीय श्रेष्ठ को शत् शत नमन । मह एक मार्मिक भावना है वक्षा के प्रति अनुराग की जो 8/पर्यावरण प्रकृति और मानव अन्य देशो यो सस्कृतियो मे नहीं मिलेगी । यहा वृक्ष का पुत्र से भी कचा स्थान दिया गया है इसके काटने की बात तो सोची भी नहीं जा सकती परन्तु वाह र, आधुनिक सभ्यता । आज हमारे नैतिक मूल्यो मे गिरावट आ गई है, हम अपनी सुसास्कृतिक भापा को भी सुन पाने मे समोच कर जाते है । यह इसी का कुपरिणाम है कि प्रकृति को दोनो हाथों से लूटन व नष्ट करने की होड मानव मात्र में लगी हुई है। हमारी अर्वाचीन संस्कृति प्रकृति में देवी का दशन करती थी, उसकी पूजा करती थी, उमको मां के रूप में देखती थी, परतु आज इम मूल्यविहीन युग मै, हम अपनी स्वय की पहचान को भूल गये हैं, नैतिक मूल्यो की रक्षा करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । मनुष्य जाति व प्रकृति के बीच जो रिश्ना कायम था, वह नापाक हो गया है । मानव अपने ही कुशरयो से अपने पर्यावरण को इस कदर बिगाड़ लिया है कि वह आज जीने के योग्य नहीं रह गया है। मानव के सम्मुख, प्रकृति को वश मे करने की प्रवृति बलवती हाती जा रही है, तथा उसे लूटन का नतीजा रहा है जि ऊर्जा स्रोत के समस्त भण्डार- कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि जवाव देने लगे हैं। यह हमारी औद्योगिक युग की बढती हुई मागो को पूरा करने म असमय सिद्ध हो रहे हैं। प्राकृतिक शक्तियो मे जो हम आज तक देवी-देवताओ के स्वरूप को देखते आय थे, उसका तात्पय यही है कि हम उनकी रक्षा करें, उनसे अनुराग की भावना रखें नथा स्वस्थ एव सतुलित जीवन व्यतीत करें। पर तु आज क समाज म न ता जल ही शुद्ध रह गया है और न वायु । वायु म विप, नदियो मे विप, वादियो मे विप घाटियो मे विप यहाँ तक कि मानव आचरण म भी विष घुल गया है। जिम मस्कृति में भूमि तथा सभी प्राकृतिक सम्पदाय यथा-जल, वनस्पनियां आदि पूजा अचना की वस्तुएं समझी जाती रही हो उनके पीछे छिपे रहस्य दूरगामी परिणामो को अभिव्यक्त करत है। उन लोगो को यह पता था कि एस ससाधन मानव की महती आवश्यकताऐ है, तथा उनका अपव्यय होने पर यथाशीघ्र ही चूक जायेंगे और यह रट खसोट समस्त मानव समाज के लिये सकट पूण तथा घातक सिद्ध होगी। कुछ ही शब्दा म कहा जा सकता है कि मशीनी काति का नशा यदि इसी प्रकार मानव पर हावी होता रहा तो निश्चिय ही हमे मानवीय रिश्तो को तिलाज्ली देवर, पाश्विक जीवन जीने पर आमादा होना पड़ेगा। आज हम 21वी शताब्दी मे प्रवेश करने के लिये उत्सुक है और उसकी देहली पर दस्तक दे रहे है, परतु हमे स्वयं को आकलन करना है कि हम अपनी किन विरासतो के साथ आने वाली शताब्दी में प्रवेश चाहग ? प्रकृति से निर तर क्टन चाली, निष्ठर तकनीकी संस्कृति, मूल्यरहित जीवन, झूठी - Ear पर्यावरण और मानव/9 विरासतो तथा हास्यास्पद नैतिकता के साथ हमे 21वी शताब्दी में प्रवेश वरना है, ऐसे ही नाजुक व मार्मिक अवसर पर एक आह्वान को याद ताजी हो जाती है-'सम्पूण वसुधरा एक परिवार है तथा यह सुखद एवं कल्याण- मयो हा।' यह तभी सभय है जब हम यह सवल्प करें वो पृथ्वी तया उसर मसाधन व छिपी सम्पदायें सुरक्षित बनी रहें। इसकी अनुपालना म हम अपनी धरती को हरी-भरी बनाये रखें। फिर भी यह कहना पडेगा कि मतिभ्रम के कारण मनुष्य यह दम करने लगा है कि उसने अपन वातावरण पर भौ फीसदी प्रभुता प्राप्त कर ली है। परतु उसका यह समझना, उसी सबसे बड़ी भूल है । यह अपने निवास स्थान पर या कार्यानय को पूर्ण वाता. नुकुलित कर लेता है और सोचन लगता है कि जलवायु सदभ में पूरी तरह स्वतन्त्र हो गया है तो यह वास्तविक्ता नही है-उसे अपनी निकटस्थ धन- पति व प्राणी वग को भी वातानुकुलित सुसज्जित करना होगा। परतु इस अप्राकृतिक वातावरण मे यह प्राकृतिक उष्णता, शीत, मूखा, व अन्य जल- वायवीय निया से अछूता नहीं रह सकेगा । इसी प्रकार स यदि किसान यह मारने लग जाय कि उसने आधुनिक वैज्ञानिक व प्रद्यागिकी में विकास के परिणामस्वरूप अपने खेता को पूर्ण नियबित कर दिया है तो वह एक भारी भून कर रहा है कि फास्फोरस का एक अश अवश्य ही पहाडिया से झीला म उसके खेत द्वारा पलायन कर रहा है-लौर यह इस नीद्रगति से सम्पन हो रहा है जो भविष्य म कल्याण के माग में केवल राडे ही डाल सकता है नियत्रण की बात तो बहुत दूर रह जाती है। यहा जो दशन, यथाय मे प्रस्तुत है-- पारितन मे मानव वा स्थान, भचत्रणा म उसका योगदान को देखते हुए तो प्रति पर मनुष्य का पूण प्रभुसत्ता असम्भव है। क्योकि मानव उसमे स्वय भी स्वत व न होकर उस पर आश्रित है और आहार शृखलाओ मैं उमने एक उचित स्थान प्राप्त किया हुआ है। मनुष्य के लिये यह श्रेयस्कर होगा कि वह स्वय समयले कि अय जाया की भाति वह भी पारित का एक आश्रित अग है। यह कहते हुए दया का भाव भी उमडता है कि मानव जो उत्पादन, निमाण व प्रदूपण फैला रहा है तथा प्रारतिक संसाधनो व सम्पदाओ का शरता स दोहन कर रहा है जिससे कि समस्त आर्थिक पुरस्कार प्राप्त हो जाय माय हो पूण नानिक आरक्षण भी। सभ्यता के आरम्भ के दिना म तो उसे अपन जीवनाधार के लिये पर्यावरण के सुधार व विकास की अनुमति दी जा सकती थी परतु आज के परिदेश मे यह अनुमति सवथा अनुचित होगी, उसे भी विशिष्ठ नियमो म बाधना होगा। 10/पर्यावरण, प्रकृति और मानव सवैधानिक व्यवस्था व पर्यावरण पर्यावरण व प्रदूषण की समस्या केवल राष्ट्रीय ही नहीं वरन अतर्राष्ट्रीय है। विभिन्न राष्ट्रो की अपनी भिन-भिन्न समस्याएं हैं। 1947 को स्वतत्रता प्राप्ति के पश्चात सन् 1950 मे भारतवासियो ने भी अपना एक सविधान स्वीकार किया। सविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार जीवन जावन के गौरव, एक सतुलित पर्यावरण मे रहने, सकामर रोगा और उनके खतरो से बचान की गारटी देता है। भारतीय पर्यावरण म सन्तुलन बनाये रखने के लिए केन्द्र तथा प्रातीय सरकार ने विभिन याय व्यवस्थाओ को स्थापित किया है। सामान्य कानून वे अतगत भारतीय दण्ड सहिता के द्वारा अनेक अधिनियम पयावरण सुरक्षा हेतु प्रभाव मे लाये गये हैं, जैसे 1 किसी प्रकार की छूत की बीमारी जो जीवन की सुरक्षा घातक हो। सामाय काम म जाने वाले जल प्रवाह, स्रोत, झरने तथा पार्न के सुरक्षित भण्डार को अपनी मलिनता से खराब करते है-दड का - 2 प्रावधान। 4 3 जो तत्व वायुमण्डल को प्रदूषित करते हो, जिससे स्वास्थ्य पर हानिकर व प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, दड व्यवस्था मे आता है। मावजनिक उत्पाती को अपराधी घोषित किया जाता है। 5 पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले नागरिव दण्ड दन की परिधि मे आत हैं। इनमे अनेक संशोधन भी हुए हैं और विशिष्ट कानूनो का भी निर्माण किया गया है, यथा--'वाइल्ड लाइफ (प्रोटक्शन) एक्ट 1970 ।' पर्यावरण और मानव/11 । पर्यावरण तथा उसकी उपयोगिता जिस वातावरण या परिवेश में आज हम रह रहे हैं, उसे ही 'पर्यावरण रहते हैं। हमारे चारा ओर फैला प्रकृति का यह सुदर पारिश्मा ही वाता- वरण मा सजनकर्ता है । इसके विभिन्न घटको म से ही मााय एक घटक है । पर्यावरण के सभी घटक एक दूसरे पर निभर हैं तया उन्हें प्रभावित करते है। जिम प्रकार पर्यावरण की सुदरता एव भव्यता मानर पर आधारित है, उमी प्रकार मनुष्य का जीवन पर्यावरण पर निभर है। इसलिये पर्यावरण हमारे निय अत्यन उपयोगी एव महत्वपूर्ण है। वैदिन घालीन ऋषि-मुनियो ने हजारा वप पूर्व ही माना था कि प्रति हमारी जननी है जो अपना सब कुछ अपन बच्चा को अपण कर देती है तथा अपन स्वय के लिये कुछ नही चाहती।" मानव एव प्रकृति मे परस्पर प्रगाढ सम्बन्ध है जो एक दूसरे के प्रति प्रेम व सवेदना वा मदेश देता है। माव जाति के जीवन के लिये जैविम ससाधना का सुलभ होना अनिवाय है । जैविक' ससाधना अतर्गत वनस्पतिया व प्राणी जगत दोनो ही का समावेश हाता है । वनस्पतियो मे धास, झाडियां पड़ पौधे सम्मिलित हैं ) जिनस मानव को 85 प्रतिशत आहार भोज्य पदार्थों के रूप म प्राप्त होता है व शेष 15 प्रतिशत पशुआ के रूप म । यह भी म्मरणीय है कि मनुष्य का भाति पशु भी अपने आहार के लिये वनस्पतियो पर निभर रहते है। पहनने योग्य वस्त्र जलाने के लिये लक्ड्री फुल, फूल, वृक्षो से ही प्राप्त होत हैं । वस्तुत वनस्पति जगत जीवमण्डन के लिये अस्तित्व का साधन बन गया है। मानव ने जबसे इस भूतन पर आंखें खोली हैं अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति के लिय ड ही 1 पौधो की ओर देखता आया है। तब यह पथ्वी भी वनो मे पटा पडो थी, वन मानव के निये साधन सम्पन्न क्षेत्र थे--पेट वो अग्नि को वुमान के लिये रन, उठन-वठने चलन फ्रिन सोने जागने, जम-मत्यु मभी प्रकार के समाधान वना से मुहय्या हो जाते थे । आम भी मानव अपनी बाल्यवस्था मे झूले अथवा पालने के रूप म वृक्षो से जुड़ा है वृद्धावस्था मे लाटो के रूप में वक्षा का ही सहारा लेता है। आदि काल म वनफूल, पर मूल, मत्स्या के शिकार हतु प्रयुक्त होन वाले उपयोगी शस्त्रा आदि यो वना स हो दूढा या। रागों स ग्रसित होन पर उपचार के अचूर्व नुस्खा हेतु भी वय जडी-बूटिया थी। पर तु सभ्यताआ के विकास के साथ- 12/पर्यावरण प्रकृति और मानव -- माय बन सिमटत चले गये हैं, छोटे और छोटे होते जा रहे हैं तथा उनको उपयोगिता का स्वरूप ही परिवर्तित होता जा रहा है। कृषि युग का मारम्भ होने पर वनो यो बेतहाशा काटा जाने लगा, जनसख्या पी वदि के साथ साथ खेती का दायरा बदन लगा और स्थायी रूप मे घुम्मकड मानव को एक स्थान पर बसने की प्रक्रिया वा आरम्भ हुआ। अब तक वन क्षेत्रा के दायरे घटने से कोई विशेष हानि का अनुभव भी नहीं हुआ, क्योंपि वनो का क्षेत्र विशाल था और वनस्पतियो का बाहुल्य था । परतु वतमान में यह स्थिति नहीं रही। भौतिक मस्कृति का सबसे बड़ा पहर सर्वाधिक रूप में पर्यावरण' पर ही घरपा है । इससे वनो एव वक्षो की अपूणनीय क्षति हुई है । आधुनिक आरहा ये आधार पर सम्पूण भौगोलिक मेन का 227 प्रतिशत ही वन क्षेत्र रह गया है, जबकि 33 प्रतिशत क्षेत्र में वनो का होना अनिवाय समझा जाता है । आज वनो के नाम पर केवल उपवन, अभ्यारण व राष्ट्रीय पा ही शेप गये है। भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात इन 40 वर्षों में हमने 6 000,000 करोड रुपये मूल्य के वनो को नष्ट कर दिया है जिसके परिणामस्वरूप मूखा, वाढ भू-अवरदन, भू स्खलन, तया पर्यावरण अस तुलन को समस्याओं को बल मिला है । पवतो तथा वनो की छाती को वीधकर बनी सडवे व रल की पटरिया तथा उनमे रेंगते वाहनो द्वारा निरतर उगलती, विषली पावन-डाइऑक्साइड गैस तथा क्ल-/ कारखाना से उगलती अन्य गैसें यया सल्फर डाईऑक्साइड वाबन मोना ऑक्साइड, प्राकृतिक सौ दय को नप्ट करने पर तुल गये हैं । नदियो के सूखने- से जल विहीन होने का भय उत्पन्न हो गया है तथा वितलीय जल (Plutonic water) का स्तर भी निरतर गिरता जा रहा है। वृक्षा की निमम कटाई के अकारण वनो का क्षेत्र फल सिकुड गया है और देश म मरुस्थलो का नव/ बराबर प्रसार की ओर अग्रसर होता जा रहा है। पर्यावरण को शुद्धता अच्छे स्वास्थ्य का लक्षण है। मध्य प्रदेश की राज- धानी भोपाल की गैस त्रासदी स तो सभी भारतवासी अवगत हैं-3 दिसम्बर 1984 को वह कान रात्रि जो मौत के पजे फैलाये थी-जाडे के मौसम की क्डक्ती सर्दी में सोया हुआ शात शहर-मत्यु की काली विभीषिका के चक्र- व्यूह मे घिर गया। उस रात मे भयावह गैस स्राव ने मृत्यु का जो नगा खेल खेला, सम्भवत हम कभी भूल नही पायेगे। यह एक ऐसा उदाहरण है हमारी उदासीनता का प्रकृति के प्रति, उस पर्यावरण के प्रति जो हमारे जीवन का मूलाधार है । यह पूर्णतया स्पष्ट है कि भोपाल गैस त्रासदी का दुष्प्रभाव उन स्थानो पर यूनतम रहा जहा पर पोधो वा बाहुल्य था । यदि सभी स्थानो पर वृक्षो का आधिक्य होता तो निश्चिय ही इस प्रलयकारी घटना की बड़ी पर्यावरण तथा उसकी उपयोगिता/13 सीमा तक शांत रखना सम्भव हो सकता था। वक्षा की उपस्थिति विपली गैसो को आत्मसात करने मे समथ है। कावन-डाइ आक्साइड तो वनस्पति के लिय खुराक है जो बदले मे जीवनदायिनी प्राण वायु आक्सीजन लौटाते हैं। प्रकृति अत्य त उदारमना है परतु क्रूर व्यवहार को सहन नहीं कर पाती । जब उस पर आघात किया जाता है अथवा उसका विदोहन क्यिा जाता है, तब वह हम क्षमा नहीं करती। वस्तुत वक्षो व अपने ही पर्यावरण के साथ हमन अवश्य ही क्रू र व्यवहार क्यिा है । एक व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 400 ग्राम काबन डाई-आक्साइड गस श्वसन क्रिया द्वारा बाहर फेंक्ता है । 70 कराड की जनसग्या वाले भारत देश के विषय मे आप स्वय अनुमान लगा सकते है मि वनस्पति के पोषण का मुय्य सात काबन-डाई ऑक्साइड ही है जो भोजन वनस्पतिया में सचित हो जाता है, तथा जीवधारिया के लिये अनिवाय है । प्राण वायु जीव- धारिया के लिय अनिवाय है । प्राण वायु जीवधारियो को वनस्पति वग से ही प्राप्त होती है । पेड पौधो की रमास्वेदन क्रिया मे पथ्वी से जल का अवशोषण करते है इसके साथ ही उनम वाष्पोत्सजन भी होता है जो प्रदूषित पदार्थों को स्वच्छ बनान म सहायक' है तथा वातावरण का भी स्वास्थ्यवधक बनाते है। वतमान मे सबसे महत्वपूण जाधार बिदु है पर्यावरण तथा सम्बधित घटका का आर्थिक पक्ष । सभी प्रमुख उद्योग-ध धो के लिये कच्चामाल पथ्वी के गभ से ही प्राप्य हैं जिसे प्राकृतिक सम्पदा का नाम दिया गया है। स्वय सिद्ध है कि पर्यावरण पर न केवल स्वास्थ्य, वरन आज के युग की भौतिक्ता भी निभर है । ऊर्जा के प्रमुख स्रोत वृक्ष हो रह हैं । वनो का उपयोग ईधन प्राप्ति मे हा नहीं है वरण वह सौर ऊर्जा से अपने वक्षा माध्यम से भोजन मजन करन मे सहायक है जो प्राणियो के लिय आवश्यक है। पट्रोल ब पोयना जो जीवाश्म ईधन' है का ऊर्जा के रूप में उपयोग भी पर्यावरण का ही एक अग है । वन से अप दूसर आर्थिक लाभ भी है यथा-जड़ी बूटिया, इमारती लकड़ी दियासलाई बीडी उद्योग वारपीन का तेल बागज गाट मोम, लास्ट तर रेशम रजक, इत्र, सुगध पर उद्योग, वस्त्र उद्योग किमी न पिसी सिम हमार पर्यावरण से ही सम्बंधित है। मूखा भूकम्पबे वाढ यादि प्राकृतिक आपाओस जा आर्थिक हानि व विनाश हाता है-पयावरण अग तुलन के क्रिया क्लाप हो तो हैं । 14/पर्यावरण प्रकृति और मानव - धम तया पर्यावरण के मध्य भी प्रगाढ सम्बध रहा है । भारतीय संस्कृति एव सभ्यता इस तथ्य का पुष्ट प्रमाण है । भारत मे सभी धर्मों को सदैव आदर को भावना से देखा गया है और प्राय सभी धर्मों का एकमात्र आदश रहा है 'जिओ और जीने दो" । जीओ और जीने दो का सम्बध न केवल मानव समुदाय तक ही सीमित है वरन इमवा घर अचर, जड, जीव, प्रकृति व पर्यावरण से भी अटूट सम्बध है । भारतीय शास्त्रो वेदो, पुराणो, उपनिपदो व अन्य ग्रथो मे हमेशा सय, अग्नि, जल, वायु इद्र आदि की पूजा का प्रावधान रखा गया है। पीपल वट वृक्ष, तुलसी केला आदि पादपो को भी देव तुल्य मानकर उनकी पूजा अराधना की जाती है। कल्प वक्ष तो मानो कामनाओं की पूर्ति का प्रतीक बन गया है । यज्ञा में आहूति देने पर इच्छित फल प्राप्त होत है जिससे प्रवृति विकसित, प्रस्फुटित व प्रफुल्लित होकर मनुष्य मात्र की सभी अभिलाषाओ की आपूर्ति करती है । ईस्लाम धम मे भी प्रकृति को सजोने सवारने का मानव का पुनीत क्त्तव्य माना गया है । धम की आयता मे जीव हत्या का निषेध तथा पेड-पौधो की रक्षा करने की हिदायते हैं । हजरत अबूबक्र न भी कहा था फल देने वाल पडो को काटना बुरा है तथा फसला व जानवरा को तबाह नही पिया जाना चाहिये । कुरान शरीफ मे भी अनक स्थानो पर इस प्रकार के सकेन मिलते हैं कि खुदा तथा जीव के बीच अटूट रिश्ता है ।" कुरान यह भी मानता है कि खुला आकाश मे रहता है वह प्रेम और दया का आगार है । पितु जब इस्लामिया देश राकेट छोडते है तो विस्फोट होता है जिससे खुदा को चाट पहुंचती है। माहम्मद साह्य स्वय खजूर के वक्ष के पास बैठकर शिक्षा दिया करते थे, उनका कहना था कि "खुदा स्वय सौ दय का प्रतीक है और बदा उसका पुजारी है।" जन तीर्थक्रो के उपदेश भी आचार-विचार, रहन-रहन, रीति रिवाज, सत्य, अहिंसा जस्तय तथा प्रहाचय के आदर्शों से परिग्रहित है । उनके उपदेशानुसार प्रकृति की रक्षा करने का सदव प्रयत्न करना चाहिए ताकि पर्यावरणीय प्रदूषणो का रोका जा सके तथा 'सर्वे भवतु सुखिन सर्वे मतु निरामया' की कल्पना साकार हो सके। ब्राह्मण काल मे आर्यों ने प्रकृति को हमेशा पूजा है । द्वाविडा न भी प्राकृतिय उपादानो पत्र, पुष्प, च दन को पवित्न माना है तथा उनकी मा यता थी कि हवन क्रिया से प्रदूषण समाप्त हो जाता है, इमलिय वे पुष्प चन्दन वी सुगध से वातावरण को सुरमित बना दिया करते थे। आर्यों ने भी धन पद्धति को स्वीकारा था इसीलिय आज भी हिदू लोग परम्परागत् वक्ष जल वायु व अग्नि की पूजा करने हैं। । पयावरण तथा उसकी उपयोगिता/15 ईसाई धर्म सदा से ही अहिंसा का पक्षधर रहा है । ईसा मसीह स्वय जीवो पर दया, करुणा मंत्री व अहिंसा मे विश्वास रखते थे। वे भौतिकवादी विचारधारा के कटटर विरोधी थे। उनकी स्पष्ट मायता थी की भौतिकवादी दृष्टिकोण ही असतुलन उत्पन करता है । स्वय को सूली पर चढाने वालो के प्रति भी उनके मन मे दया का भाव ही रहा था। ईसा मसीह का मूल सदेश या 'जिओ और जीने दो (live and let live), मानव मान से प्रेम करो, जीवो पर दया करो, प्रकृति की पूजा करो तथा हिंसा से दूर रहो'। कहने का तात्पय यह है कि सभी धर्मों म सदा से ही मानव मात्र के कल्याण की परिकल्पना निहीत है, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को स्वीकारा है तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामाया' की कल्पना से सजोया है। उहोने जड जीव, चर, अचर के अस्तित्व के लिये प्रकृति के सभी उपादानो के सरक्षण का भी आवहान किया है। आज विश्व के सभी धर्मों के उपदशा का एक ही सार है प्रकृति का दोहन करने से पर्यावरण प्रदूषित होगा तथा मानवता के बाल ग्रसित होने की सभावनाएं बलवती होती रहगी। बभो के विस्फोट से, गैसीय रिसाव से, वक्षो के असगत काटने मै, कल कारखाना के धुए से, गदे रासा- यनिक द्रव्यो के बहाव से, जल, थल, नभ, अग्नि, वायु सभी प्रदूषित हाग इसलिये मानव कल्याण को ही अपना सच्चा धम जानकर वातावरण को प्रदूषित होने से बवावे और यही पर्यावरण का सारभूत शाश्वत सत्य है । अपव्यय रोको, प्रदूषण रोको। तया अपने पर्यावरण की रक्षा करो। भारत मे प्रारम्भ से ही पर्यावरण के प्रसग को लेकर भी सर्वोदय दशन का मूलमत्र रहा है सारा जनसमुदाय सुखी रहे सभी निरोग रहें, सभी पारस्परिक कल्याण का प्रयास करें तथा क्सिो को किसी प्रकार का दुख ना रह । महात्मा गाधी की आर्थिक नीति मे-सर्वोदय दशन के स्तम्भ-भूदान, सम्पतिदान मणिदान व श्रमदान के आधार पर भूमिदान, सम्पतिदान ग्राम दान, श्रमदान एव ग्राम्य स्वराज्यदान के अनुकूल-न तो शहरीकरण को बढावा मिलेगा और न ही पर्यावरण अशुद्ध होगा। देश मे 80 प्रतिशत खेती बैला से ही सम्पन हाती है तथा भूमि को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। और यही सरल सक्नीवी प्राकृतिक सौ दम और मानवीय अस्तित्व के लिए उपयुक्त भी है। यदि हम पर्यावरण परिशुद्धि के लिय प्रयत्नशील नहीं रहे तो सर्वोत्य के पारा स्तम्भ-भूदान, सम्पत्तिलान मणिदान व श्रमदान में छिपी भावना सबका उदय, सबसरा क्ल्याग, मव का सुख, किसी को दुख ही अपने महत्त्व को 16/पर्यावरण प्रकृति और मानव अक्षुण नहीं रख सकते, धूल-धूसरित हो जायेंगे । आज पर्यावरणीय प्रदूषण के फलस्वरूप शहरो ही नहीं, अपितु गावो का अस्तित्व भी नष्ट हो रहा है। फिर भला सर्वोदयी वगहीन समाज के निर्माण की अवधारणा कैसे फलिभूत हो सकती है। इस पर प्रश्न चि ह लगाना आवश्यक है । सम्प्रति जन प्रदूषण वायु प्रदूपण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूपण तथा विविरण प्रदूषण विश्व पर्यावरण को प्रदूषित करने पर आमादा है। ऐसी विषम परिस्थिति म सबका सहविकास, सबका अभ्युदय जो सर्वोदय की आत्मा है इसको किस प्रकार जीवित रखा जा सकेगा? आज यही प्रश्न विश्व के सभी बुद्धिजीविया के लिये चिन्ता का विषय बन गया है। सभी ओर से प्राप्त आंकडा से निष्कर्ष निकलता है कि भूमि, वायु व जल हर पल दूपित होते जा रहे हैं। प्रति वप अनुमानत 100,0000 लाख टन ऑक्सीजन का दहन हो जाता है तथा 240,000 लाख टन काबन डाइ बॉक्साइड विसर्जित होती है। 'हरित क्राति 'रक्त काति' मे बदलती जा रही... है वनविहीनीकरण तीव्रगति से सम्पन हो रहा है तथा आनुवशिक सग्रहण में भी भारी ह्रास हो रहा है। मायस (1980) न स्पष्ट अभिव्यक्त किया है कि मानव अपने संसाधनो का उपयोग बिना साचे विचारे अधाधुन गति से कर रहा है और वे तेजी से समाप्ति की ओर अग्रसर हो रह है। बृहद तकनीकि विकाम कायक्रमो के कारण अपक्षय पदार्थों के नष्ट करने में भी भारी कठिनाइयो का सामना करना पड़ रहा है। यूजीलैंड निवासी तथा एवरेस्ट विजेता सर एडमण्ड हिलैरी ने भी अपना पुस्तक 'पारिस्थितिकी 2000' में स्वीकार किया है कि विश्व 2000 क सम्बधम सन 1980 में अपने प्रतिवेदन के अनुसार विश्व जनसख्या का विस्फोट होने जा रहा है, जिसमे प्रदपण और बढेगा और आज की तुलना में 'पारिस्थितिक स्थायित्व' के दिन-भिन होने का क्रम उत्पन्न हो जायगा। यद्यपि औद्योगिक क्राति के कारण जीवन की गुणवता मे भारी सुधार हुआ है परतु मानव के सम्पूण स्थायी खतरो की सम्भावनायें बलवती बनती जावेगी।" पर्यावरण तथा उसको उपयोगिता/17 पर्यावरण : एक वैज्ञानिक अध्ययन पर्यावरण शब्द-दो शब्गे परि+आवरण सधि से मिलकर बना है जिसका अथ परि' - चारा आर तथा 'आवरण' -घेरा अर्थात हमे चारो जोर स घेरने वाला पर्यावरण हा है । 'पर्यावरण' का ही आधुनिर पर्यायवाची पारिस्थितिकी है, जिसमा ज्ञान उता ही प्राचीन है जितना पुरातन मानव स्वय है । मानव विलक्षणता यह रही है कि वह अपने चारा ओर घेरे को, उसमे सम्पन्न होन वाले परिवतनो-त्रियाओ तथा मतरत्रियाओ को समझकर तथा उही के अनुरूप स्वय को ढाल कर आगे प्रशस्त होता रहा है और यही आदिम मानव के विकाम को क्या है। पूर्व में भारतीय ऋपि-मुनियो व अय मनीषियो को इस विषय का ज्ञान अवश्य था जो अपने वेदो, पुराणों उपनिपटो तथा अन्य प्रायोन प्रथा में अभि यक्त घर गय हैं । औषधि विनात क महान विद्वान आदिगुरु चर' न पादपा क जीवन हतु जल, वायु, देश (मिट्टी) व काल (समय) के चार महत्त्वपूर्ण कारने का वणा कर गये है । इही चार मूल कारका को लक्ष्यकर सैद्धान्तिक औषधि विनान पर मूल प्रथ-चर सहिता को रचा गया जिममे मानव समाज का भारी कल्याण वतमान में प्रचलित 'पारिस्थितिकी का आग्ल अनुवादित शब्नाथ इकोलॉजी (ECOLOGY) का उद्गम् ग्रीक भाषा के दापट GIKOS (ECOS) - House (घर) तथा LOGUS= Study (अध्ययन) से हुआ है । अन घर' या अभिप्राय पादपा व जतुआ ये पावामस्थल अथवा पर्यावरण से है । जमन वैज्ञानिस मरनम्ट हैपिल (1809) न इस शब्द की पूण याख्या करत हुए ECOLOGY वो निम्न प्रकार परिभाषित किया है--विसी भी जो-जतु व समस्त अभावनिक व कावनिक वातावरण के पारस्परिव सम्बधों का पर्यावरण' कहते हैं । कालानर म भी इसे अनेक प्रकार से परिभापित किया गया गया है और हमार उपप तु बीरावी शतारी व चैम्बम' शब्द कोश में दी गई परिभाषा पर्याप्त य सवमा य है। इमय अनुमार ‘ज तुओं अथवा पादपा, या जीव. माओं या समुदायो और उना वातावरण दे परस्पर सम्बधी के अध्ययन या हो पारिस्थितिको महते हैं। दमम माटे तौर पर हम जीवधारियो तपा उनर पर्यावरण बिमम ममा भौतिक एव विर वातावरणीय वारक सम्मिलित 18/पयापरण, प्रति बोर मानर है, के परस्पर आदान-प्रदान की प्रक्रिया तथा विभिन जातियो के अ तर व भत जातीय सभ्धो का निरीक्षण करते हैं। अत हम पर्यावरण विज्ञान अथवा पारिस्थितिक तप का वैज्ञानिक दृष्टिकोण मे अध्ययन करना होगा, तभी हम अपने पर्यावरण ढाँचे के वास्तविक स्वरूप से परिचित हो सकेंगे। ईमा पूर्व चौथी शताब्दी मे थियोफ स्टस ने सर्वप्रथम पादपो और उनके भौतिक वातावरण के मातर सम्बधा पर प्रकाश डाला था तथा विश्व का प्रथम पारिस्थितिकी वेत्ता होने का श्रेय लिया था। 16वी शताब्दी में विज्ञान की यह शाखा प्राकृतिक इतिहास' (Natural History) के नाम से जाना जाने लगा। 18वी शताब्दी मे बफन (1707-1788) ने जोवो तथा वाता- वरण के परस्पर सवधो का सुव्यवस्थित ज्ञान प्राप्त किया और उनकी मा यता वनी की सभी पादप समुदाय एव ज तु ममुदाय अपने वातावरण के प्रति अनुलित होते हैं जिस उ होन 'वातावरणीय अनुकूलता' कहा। 19वी शताब्दी म अनको वैनानिको में पादपो तथा जन्तुओ वातावरणीय अनु- क्रियाओ का अध्ययन किया तथा मेटहिलारं ने इस विज्ञान को ईथोलॉजी (Ethology) नाम दिया । 1 पारिस्थितिक तव (Eosystem) पर्यावरण को प्राय भौतिक तत्त्वा की वास्तविक्ताक नियन्त्रण को लेकर गलत रूप मे प्रस्तुत किया जाता रहा है। साथ ही पर्यावरणीय समस्याएं जो वतमान में एक महत्वपूव विषय के रूप में उभर कर सामन आ रही है वेवल आर्थिक दशन के परिपक्ष मे ही देखी जाती रही है। यदि इह भौगो- लिक परिवेश में देखा जाता तो अपेक्षित उपयोगी सिद्ध होता, जिसमें आर्थिक उन्नति के साथ जीवन की गुणवता का भी अवलोकन किया जा सकता था। आज 'पर्यावरण' शब्द ने विश्व के अधिकाश लोगो मा ध्यान आकृष्ट क्यिा है और यह त्रुटिपूण अर्थों में समया गया है। पयावरण का साहित्यिक अथ है-जो चारा आर है और चारो ओर कावनिक व अकावनिक पदाथ है जि हे दो आनुवंशिक घटको म विभाजित किया गया है-(अ) प्राकृतिक पर्यावरण, यथा कायिकी, जलवायु वनस्पति मृदा जलाशय, वन्य प्राणी तथा खनिज आदि व (ब) मानव पर्यावरण, तथा सभी तत्व जिहोन मानव का छुआ है और जिसके अ तगत मानवीय प्रक्रियाएं सम्मिलित है। पर्यावरण की मम्पणता को अधिकाधिक समयने के लिये निस्सदेह प्रकृति की स्थूल-शारीरिकी (anatomy) व कायिकी (physiology) का अध्ययन आवश्यक है । तालाव, नदी, सागर, वन, ग्राम आदि को पारिस्थितिक तनो के रूप मे प्रस्तुत किया जाता है। सवप्रथम मन 1935 में अंग्रेज वैज्ञानिक ए०जी०टेसले ने इसके लिये शब्द ECOSYSTEM' वा प्रयोग किया था। पर्यावरण एक वैज्ञानिक अध्ययन/19 तत्पश्चात अन्य वनानिको मे इसकी जटिलताओं के कारणवश अय अय शब्दो का उपयोग किया। मोवियश (1877) ने घायोसिनोसिस' फॉरविस (1877) ने माइक्रोकॉस्म तथा सूकाय (1944) ने 'जिओवायोसिनोसिरा नामा से सम्बोधित किया था। परतु टेन्मले द्वारा अभिव्यक्त नाम 'इकासिस्टम' अथवा 'पारित न' अथवा पारिस्थितिक तत्र ही सवमा य रहा है। उपरोक्त शब्द इकासिस्टम को विस्तता के साथ समझन के लिय समुदाय के जीवन स तुलन' के रहस्य को जानना अति आवश्यक है। पारित न एव' अत्यत जटिल सक्त्पनात्मक इकाई है जो सजीव जीवों तथा उनके वातावरण से निर्मित है। मौतिक रूप में यह एक ऊर्जा द्रव्य एव सूचना स्थाना तरण तन है अर्थात प्रत्येक जव समुदाय क सदस्य निर तर एक दूसरे से अनुक्रिया करते है, जिनके माध्यम से आवश्यक' ऊजा एक पोपण स्तर स दूसर और दूसरे से तीसरे स्तर तक स्थाना तरित होकर समुदाम के सभी सदस्या की मूल भूत आवश्यताओ की पूर्ति करती है। साथ ही अनुत्रियाओ की शपला मात्र जावित सदस्या तक ही सीमित नहीं रहती। वास्तव में ऊर्जा तथा आवश्यक सनिजी का निर तर प्रवाह ही समुदाय जीवन-चक्र को गतिशील रखता है। इनकी निरतरता जव समुदाया को पारस्परिव' अनु क्रियाओ व प्रतिक्रियाओ के साथ-साथ अजीवित पर्यावरण से क्रियात्मक आदान-प्रदान के लिये भी आवश्यक है। पैटन (1959) का कथन है कि समस्त तन चत्र में होने वाली अनुक्रियाएँ वास्तव म पुन निविष्ट (feed back) क्रियाएँ हैं जो पारित व में पाये जाने वाले जीवधारियो में विकास एव जीवसख्या को नियतित करती हैं। 2 पारितन के घटक किसी भी एक पारितन्त्र के निम्न दो घटन हैं-(अ) अजीवोय तत्व (ब) जोवोय तत्व (अ) अजीयीय तत्व ~निर्जीव घटकावे अन्तगत सम्मिलित हैं- (1) अपावनिक घटक- यथा वावन, नाईट्रोजन, ऑक्सीजन, खनिज सन, पावन डाइऑक्साइड, जत आदि जो सदैव पारितत्र मे चक्रीय पथो में पनाममान रहते हैं। (h) कायनिक घटक --यपा वार्वोहाइडेटस वसाऐं प्रोटीन्स ए टी पी मग डो एन ए अण, ना तन ए अणु क्लाराफ्लि (पणहरित) आदि जो तव अविर तथा अजविष तत्वा के मध्य यडी के रूप में पाये जाते हैं तथा (11) जालयायु घटायथा तापत्रम, प्रयाग, नमी के अतिरिक्त धाराएं, पवन, दार गुरुत्वबल जैसे भौतिक पारर । - 20/पर्यावरण, प्राति और मानव उपरोक्त अजैविक तत्व पारितन को दो प्रकार से प्रभावित करते है। एक विशिष्ट भौतिक एव रासायनिक लक्षण जो तात्र की प्रकृति को निर्धारित करते है क्योकि ऐसे लक्षण तन की समष्टिया (populations) मे पाये जाने वाने प्राणियो को सीमाबद्ध कर देते है व दूसरे भौतिक तथा रासायनिक कारको के साथ ऐसे लक्षण समप्टियो पर परम्पर होने वाली क्रियाओ, अनु- नियाआ को निर्धारित करते है व पारित न को निर्यातत रखते हैं। (ब) जीवीय तत्त्व-पारित न म जीवित पादपा, प्राणियो व सूक्ष्म जीवो को समष्टियां भी पायी जाती हैं जो सयुक्त होकर तब की समुदाय (Community) सरचना करती हैं । एक समुदाय में स्थित सम्पूण जैविक द्रव्य को जीवभार (biomass) कहा जाता है । जैविक तत्त्वो के अतगत जीवधारिया को भिन सवर्गों में विभाजित कर दिया गया है (1) उत्पादक अथवा सृजक (Producers)-यह वे सजीव सदस्य हैं जो कावनिक तथा अवायनिक तत्त्वा से भोजन का सश्लेपण करते है। यह स्व- पोपित (autotrophic) जीव हैं। पारित न मे उत्पादक केवल प्रकाश- सश्लेपी (photosynthetic) पादप ही हो सकते है । तालाबो, योलो मे सूक्ष्म- दर्शीय पाल्प, जलीय पादप तैरने वाले पादप, सागरीय शैवाल (algae), घास स्थलियो की नाना प्रकार की घासें (grasses) तथा वना मे प्रयुक्त याडिया (bushes) तथा छोटे व पडे बक्ष पारित न मे उत्पादक एवं सजक (producer) वो हैमियत से रहत हैं। (1) उपमोक्ता (Consumers)-~यह वै सजीव सदस्य हैं जो उत्पादया द्वारा मश्लेपित भोजन का उपभोग करते हैं तथा उपमोक्ता कहलाते है । इस सवग के जीवधारियो को आगे भी श्रेणीबद्ध पिया जा सकता है (क) शाकाहारी प्राणी (Herbivores) अपने आहार अथवा पाषण के लिये पूर्णतया पादपा पर निभर रहते हैं- प्राथमिक उपभोक्ता के रूप म माय हैं। एक वन म हिरन प्राथमिक उपभोक्ता हैं, प्रेयरी घासस्थलियो म वारी, भैस बायसन आदि प्राथमिक उपभोक्ता ही हैं, तालावो व सागगे म शेवालो का आहार करने वाले जीवधारी यया प्राजीय, अस्टेशियनलार्वा तथा सीप व घोघे आदि प्रायगिर उपभोक्ताआ की येणी म ही रखे गये हैं। अनेक चोट य चूह मूप स्थलीय वातावरण म मुख्य शाराहारी जीव हैं। रहने या तात्पय यह है कि उपरोक्त जीवधारी अपन-अपने पारितत्र हेतु प्राथमिक उपभोक्ता माम हैं तया प्रत्यक् तत्र का सम्पूर्ण जीवन इही शाकाहारियो की उपस्थिति म क्रियान्वित (operate) होता है। एल्टन (1927) ने मधेगी पे प्राणिया यो 'मुन्य उद्योग प्राणियो' को सजा दी थी। गाय, पर्यावरण ! ए मागिर अध्ययन/2!

(ख) मांसाहारी (Carnivores)-प्रथम मांसाहारियो पा भोजन माहार शाकाहारी प्राणी होते हैं, द्वितीयम मागाहारी प्राथमिर मांसाहारियों को अपन आहार ये स्प मे प्राप्त परत हैं तया तृतीयर मासाहारी प्राणी द्वितीयप मामा हारिया या भक्षण करते हैं । यह सभी मासाहारी प्राणो मयुक्त रूप में द्वितीया उपभोक्ता पहनाते हैं। इस प्रकार प्रम से आहार एप येणो वे प्राणिया से दूसरी व तीसरी और चोयी श्रेणी में प्राणिया म स्थानातरित होता है तथा एक आहार नृपला (food chain) बन जाती है। पारित त्र मे ऐसी अनेक आहार- शृखलाएँ होती हैं । स्पष्ट है कि एक ही तत्र के प्राणि-ममुदाय म-~-एक प्रजाति या समष्टि दूसरी प्रजाति या समष्टि के लिये आहार बन जाती है तथा एक 'जाल' सा बन जाता है। आहार-श पलाओं में इस तान-बान वा 'आहार जाल' (food web) यहा जाता हैं । प्राथमिक व द्वितीय उपमाता श्रेणी के जीवधारी-'गुरु उपभोता' अथवा भक्षय पाषी अथवा परपोपित प्राणी कह जाते हैं। (ग) विघटक (decomposers)-यह भी पारितन्त्र ने सजीव सदस्य हैं जो इस सवग म अधिपाशत जीवाणुा व यवको के रूप म पाय जात हैं। एसे जोन समूह उत्पादक व उपभोक्ताओ ये मृतक शरीर पर त्रिया करत हैं तथा जटिल पदार्थों को विघटित कर सरल पदार्थों म बदलत है । वास्तव में विसी पारितत्र के सचालन म विघटका की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उत्पादका व उपभोक्ताओ की होती है । सरल पदाथ मुक्त होकर मूल पदार्थों के रूप म अज विद वातावरण मे घुलमिल जाते हैं और उत्पादक पुन इनका उपभोग कर सकते हैं । ऐसे अपघटका को मदम उपभोक्ता या मतपोपी या परासरणपापी भा कहा जाता है । विघटन का प्रक्रिया म उत्पादा का कुछ अश यह मम जीव अपने आहार के रूप में भी ग्रहण कर लेत है । इसलिय इह सूक्ष्म-उपभोक्ता कहा गया है। प्रकृति मे यदि विघटव तत्त्व मौजद ना हा तो मृत-जीवो के अम्बार लग जावेंग और पर्यावरण मे आवश्यक खनिजो का पुन लौटना दुप्वर या असभव होगा तथा जीवन-चक्र को गति अवरुद्ध हो जायगी । वातावरण मे मुक्त कावनिक पदाथ, ऊर्जा के नये साधन हो सकते है या अ य जैविक घटको के लिय उत्तेजर या सदमनकारी भी हो सकते हैं । (घ) स्पा तरणकारी (transformers)-प्रसिद्ध पारिस्थितिक्वत्ता पार के मतानुसार आहार शृखला में भाग लेने वाले अन्तिम जीवधारी रूपान्तरणकारी भी हो सकते हैं । यह विघटन के उत्पादा पर प्रिया कर, जह ऐस भावनिक तथा अकावनिक पदार्थो मे परिवर्तित करते रहते हैं जो उत्पादको द्वारा पुन प्रयोग मे लाये जा सकते है । यह भी जीवाणु समूहो से सदभित होते हैं। 22/पर्यावरण, प्रकृति और मानव उपरोक्त यर्णन से सिद्ध होता है कि पर्यावरण के जैविक सगठन मे पादप समुदाय उत्पादव' या सजक होत है, जतु समुदाय उपभोक्ता, सूम जीव समूह विघटक अथवा रूपातरणकारी होते हैं । जीव विज्ञान के प्टिकाण से पर्यावरण मे जीव व जीव मख्याओ का स्थायित्व अत्यन्त आवश्यक व महत्वपूर्ण विषय है अत यह अध्ययन जागे के पृष्ठो मे किया जायगा । 3 विभिन्न पारितत्रों के नामकरण वतमान में विभिन्न पारित त्रा के नामवरण भी जीवो के प्रकार तथा आवासीय स्थलो के आधार पर किये गये हैं स्थलीय पारितनो मे कृषि भूमि, पास स्थली वन एव मरस्थली पारित व प्रमुख है । इसी प्रकार स्वच्छ जलीय तन्त्रो के अतर्गत पोखर, तालाब, झील, व नदी पारितत्र सम्मिलित है। पर तु इन सभी सत्रो मे सबसे 'विशाल' यकुमाव खारे जल से युक्त. पारित न--सागर है। विश्व के विभिन्न परिस्थितिय तत्र -निम्न प्रकार दर्शाया गया है PraMIT (1) स्वच्छ जलीय आवास (अ) लोटिव जल अथवा प्रवाही जल-परने व नदिया नाम (ब) लेटिक जल अथवा स्थिर जल-पील, तलया व पोखरे । यीलो व तालाबो के किनारे निचले स्थानो पर जल एकत्रित होकर मिट्टी के साथ मिल कर दलदली भूमि-पच्छ तथा अनूपा का निर्माण करते हैं। (1) समुद्री भावास (अ) बलावर्ती प्रदेश (क) नेरीटचली क्षेत्र (ब) महासागरीय क्षेत्र (ब) नितलस्थ प्रदेश (क) वेलाअचली क्षेत्र ~सुबेताअचली व उपबेलाचली (ब) गहरा सागरीय क्षेत्र-वेथाइल, वितलीय व हाडल क्षेन । परतु सागरी आवास अपने आप में एक ही जीवोम का निर्माण करता है। (ii) स्थलीय आवास मिट्टी से ढके थलीय आवास को अनेक आवास क्षेत्रों में विभाजित किया गया है क्योकि जलवायु कारको के कारण यहा अनेक विशेषताएँ तथा पर्यावरण एप वैज्ञानिक अध्ययन/23 - विभि नताएँ उत्पन हो जाती है। यह आवास निम्न प्रकार वर्गीकृत हैं (अ) मरुस्थल, (ब) घास के मैदान (स) टु डा (द) टैगा (ए) पवत (फ) वन (4) पर्यावरण स्थायित्व प्रत्येक पारितन मे जैविक तथा अजैविक घटको म कायिक सतुलन का आवश्यकता होती है। इन सभी घटको का उतार चढाव एक निश्चित सीमा के भीतर रखने के लिये किसी भी परिवतन से उत्पन्न स्थिति का स्वत ही आवश्यक प्रतिक्रियाओ द्वारा पुन सामा य बना दिया जाता है । प्राकृतिक स्प में तन सन्तुलन की इस प्रवृत्ति यो समस्थायित्व अथवा समस्थिरता (Homeostasis) कहते है। किसी पारितत्र में ऑक्सीजन और कावन- डाइआक्साइड की मात्रा एक निश्चित स्तर पर सीमित रहती है। यह माना परीसीमन तत्र की स्वत संचालित प्रक्रियाओ के कारण होती हैं । जब कभी जीव सय्या घनत्त्व में कोई वडा उत्तार-चढाव उत्पन्न होता है तो तन्न का प्राति स तुलन बिगडने का खतरा उत्पन्न हो जाता है । इस परिस्थिति को सतुलित बनाने का प्रयास स्वत ही आरम्भ हो जाता है अयथा सम्बधित जैविक घटक नष्ट होकर अ य जीवा के लिय स्थान खाली कर देते हैं जिसक परिणामस्वरूप पारिस्थितिकीय अनुक्रमण (ecological succession) प्रभावी हा जाता है तथा पारिस्थितिकीय विकास (ecological development or evolution) की सम्भावनाऐं बलवती हो जाती हैं। (5) पारिस्थितिष-तत्र को क्रियात्मक शैली वाहर से जैविक तथा अजैविक घटक अलग-अलग दियायी पडते हैं, परतु इन दोनो घटका मे जटिल एव स तुलित क्रियात्मक सम्बध अवश्य होता है तथा तत्र का चरण स्थायी रूप में बना रहता है। विभिन्न घटक अपनी व्यक्तिगत पहचान के साथ स्वत न अस्तित्व को बनाये रखत है और एक दूसरे से परस्पर कार्यात्मक सम्बधो से भी वधे रहते हैं । इह निम्न विदुओ ये अध्ययन द्वारा सुस्पष्ट किया जा सकता है। (4) कर्जा-प्रवाह चक्र, (प) भोजन-पत्र व पोषण स्तर (ग) सनिज पापा तथा जव भू-रासायनिय चक्र, (घ) निरवण (८) म पवार । 24/पर्यावरण, प्रकृति और मानव - (क) ऊर्जा प्रवाह चक किमी भी पारित त्र मे जैविक क्रियाओ को क्रियावित (operate) करने के लिये प्रत्येक जीव को कर्जा को आवश्यकता रहती है । अततोगत्त्ववा यह ऊर्जा सौर विविरण से ही प्राप्त होती है। सौर ऊर्जा स्वपोपी जीवधारियो के द्वारा ही ग्रहण की जा सकती है और परपोपियो को आहार के रूप मे स्थानान्तरित की जाती है। इस भाति किसी भी पारिस्थितिक तत्र मे 'कर्जा का प्रवाह आहार शृखलाओ के द्वारा सम्प न होता है। ऊर्जा का प्रवाह अचत्रीय तथा एक ही दिशा म प्रशस्त होने वाला क्रम है, जिसे विस्तार से समझने की आवश्यकता है। भोजनस्सर उपादक उपभोक्ता 2 शाकाहारी मासाहारी हत शत) (लोमड़ी शेर सम्पूर्ण प्रदाश A I ताप श्वसन श्वसन- श्वसन 1 सम्पूर्ण ऊर्जा A सम्पूर्ण स्वागीकरण , प्रायपिक उत्पादन चित्र-ऊर्जा प्रवाह चक्र सौर-विकिरण ऊर्जा का एक निश्चित परिमाण पृथ्वी के बाह्य वायु- मण्डलीय पटल पर पहुचता है जिसे सौर-अभिवाह (solar flux) कहते है । सौर अभिवाह का मान मौसम विज्ञान के आक्डी के आधार पर 194 ग्राम कैलोरी मी/ मिनट होता है। पृथ्वी ग्रह के धूमने कारण, एक निश्चित स्थान पर इस सौर-अभिवाह मे परिवतन आते रहते हैं, यथा ऋतु परिवतन होते हैं । जब सौर विकिरण वायुमण्डल से प्रवाहित होते हैं तो इनके लगभग 40 प्रतिशत भाग को धूल व बादलो के कारण परिवर्तित कर दिया जाता है, 10 प्रतिशत को जोजोन, आक्सीजन तथा जल भाष्प अवशोपित कर लेते हैं और शेष 50 प्रतिशत अश ही भूतल पर पहुंच पाता है (गोगर 1950) । इस प्रतिशत का भी कुछ अश भूतल की चमकती सतह परिवर्तित कर देती है । कहने का तात्पय यह है कि लगभग 33 प्रतिशत भाग पृथ्वी पर पहुच कर, पादपो द्वारा प्रकाश-संश्लेषण क्रिया के लिय प्रयुक्त होता है। विभि न वैज्ञानिका द्वारा प्रदत्त कुछ सदभित आक्डे नीचे दिय जा रहे है पयावरण एक वैज्ञानिक अध्ययन/25 -- (6) बाह्य-स्थलीय गृय का प्रकाश जो जीवमण्डल तक पहुचता है- ~-मान 2 ग्राम कोरी/से मी /मिनट (u) दोपहर के समय जब सूप अपने पूण प्रकाश के साथ चमक्ता है व 67 प्रतिशत भाग हो ग्रीष्म ऋतु के स्वच्छ दिन पृथ्वी तक पहुचता है --134 ग्राम कैलोरी/से मी /मिनट (1) रेफिन्टर तया लल (1965) के अनुसार पारिस्थितिक तत्र में स्वपोपी पटल पर प्रकाश का निर्गमन निम्न प्रकार होगा 300-400 ग्राम क्लोरी/से मी /मिनट अथवा 300-400 पिता कैलोरी/मो/दिन अथवा 11-15 मिलियन पिक /मो/प्रतिवप उपरोक्त बिदुओ तथा परिमाणो के आधार पर अमरीकी विद्वान गेटस (1969) ने भूमण्डल की सतह पर उत्पन जीव भार (biomass) के सम्बन्ध म निम्न आवर्ड प्रस्तुत किये ह (iv) भूमध्य रेखा से 40° उत्तर व 40° दक्षिण अक्षासो तक वापिर विकिरण की गति-~-सागरो व महामागरा की ऊपरी सतह पर 1 मिलियन कि /मो/प्रतिवप -महाद्वीपो के पटल पर 06 विलियन कि के/मी/प्रतिवप इस आधार पर विश्व का सम्पूण उत्पादन 108 वि के /प्रति वप होगा। अर्थात् प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा निर्मित शकरा का परिमाण पारितत्र के प्राथमिक उत्पादन का द्योतम होता है । अपने स्वयं के जीवनयापन हेतु पादपो का भी ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है- आफ्मीकरण से प्राप्त हो जाती है। इस प्रकार प्रकाश-संश्लेपण त्रिया में निर्मित शकरा या कुछ अश पादपो द्वारा अपनी जीवन-त्रियाओ को सुचारू रूप में सम्पन्न करने के काय म ले लिया जाता है, शेष भाग मॉड, वसा तया प्रोटीन निर्माण म परिवर्तित हो जाता है । निर्मित की हुई शबरा का बुल परिमाण-सक्ल प्राथमिक उत्पादन का द्योतक है। ऑक्सीकरण के पश्चात शरा का शेप परिमाण नेट प्रायमिक उत्पादन का द्योतक होगा। जब उपभाक्ता द्वारा पादपो का उपभोग होता है तो उत्पादन दर की ऊर्जा प्राथमिक उपभोक्ताओं में स्थानातरिन हो जाती है। प्रत्येक पोपण स्तर पर ऊर्जा का स्याना तरण तथा उपभोग को जानने के लिये प्रत्येक स्तर पर जोर मार अथवा स्टेडिग क्रॉप (Standing crop) के आकार को भी 26/पर्यावरण प्रकृति और मानय लगभग --यह ऊर्जा शराओ के कर्जावानेट उत्पादनममmatarrz me जानना आवश्यक होता है । भोजन उपभोग के साथ ही जतु भी ऊर्जा प्राप्त करते हैं तथा ऊर्जा को सकल अतरग्रहित ऊर्जा कह कर पुकारते है । इस ऊर्जा का वडा अश ज तुआ द्वारा स्वय के अस्तित्व का बनाये रखन तथा कार्यिकी में प्रयुक्त हो जाता है। काय करने के लिये ऊर्जा का एक स्वरूप दूसरे स्वरूप में स्थानातरण होता है । ऐसी परिस्थियो मे उज्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार इम स्थाना तरण मे स्वतन्त्र ऊर्जा का ह्रास हाता है। काय करने में लगी कुल ऊर्जा को श्वसनीय ऊर्जा कहा जाता है। स्पष्ट है कि सबाल अन्तरग्रहित ऊर्जा एव श्वसनीय ऊजा का अतर उपभोक्ता स्तर का नट उत्पादन होता है। जिस दर से नेट उत्पादन एकत्रित होता है उसे नट उत्पादन या केवल उत्पादकता कहते हैं। किसी भी पापण स्तर का नंट-उत्पादन, उत्सजन तथा मृत प्राणिया के विघटन मे सयोग कर सकता है यही समष्टि की वृद्धि के रूप मे दिखाई दे सकता है अथवा किसी उच्च-पोषण-स्तर मे भा स्थानातरित हो सकता है । प्रत्येक पोषण स्तर पर अन्तग्रहित भोजन की ऊर्जा का कुछ अश प्राणियो द्वारा विष्ठा, मलमूत्र अथवा उत्सजन के साथ निकाल दिया जाता है यह उत्सजन ऊर्जा कहनाती है । अनर' प्राणी, परपोषण के अतिरिक्त भी बीमारियो, दुघटना बुढापा, भुखमरी आदि के कारण मर जाते हैं । इन प्राणियो म सग्रहित ऊर्जा उच्च पोपण स्तरो म प्रवाहित नहीं होती। वेवल वही प्राणी जो परभक्षियो द्वारा मारे या खाये जाते हैं, उस ऊर्जा के द्योतक हैं जो उच्च पोषण स्तगेम म्याना. "तरित होती है। यह भी सभव होता है कि शिकार परभक्षी द्वागपूरक पूरा नहीं खाया जाय । ऐसी परिस्थिति मे पेवल परभक्षी द्वारा माया शिकार का अश ही उच्च पोपण स्तर द्वारा उपभोगी कर्जा या दोन wer शिकार का उपभोग मे नहीं लाया गया भाग, अपशिष्ट . भरता है। इस प्रकार लगभग हर पोपण स्तर पर मी ... परभक्षी के अतिरिक्त अन्य कारणा से हुई मृत्यु ,rrit द्वारा किय गये अथवा छोड़े गये शिकार के यानिटार रहती है । यह ऊर्जा मृतक-धारीर भक्षियों (Sapers arrrrrr- कारिया द्वारा उपभोग म ले ली जाती है । ratrain किया जाता है तो यही ऊर्जा स्पारक rite पुट परिसचारित हो जाती है। हर एmrat - भक्षण के अतिरिक्त अय कारण : triarti किये गये शिकार के मिटा सा बाद स्तरो ये परमशिया द्वाtrry retA किया गया उपमा-Errrrrrr:

समष्टि बढ जाती है । परन्तु परभक्षियो द्वारा किया गया, उपलब्ध उपभोग, नंट उत्पादन से अधिय हो ता समष्टि पट जाती है । समष्टि में यह परिवतन जीवभार के परिवतन पहलाते हैं-यह घट तथा यह भी सकते हैं। इस अध्ययन द्वारा सिद्ध होता है कि प्राणिया की वृद्धि से जीवमार वरता है और वृद्धि का तात्पय है वि जैव पदाथ के बढ़ने से प्राणी आकार या भाषाभार का बढ़ना । प्रजनन की क्रिया में प्राणियों की संख्या में वद्धि होती है परतु जीवभार या बढना आवश्यक नहीं है। जीवभार तभी बढता है जब सता का आपार भी बढ़ता है । परन्तु अधिवाश जातियो मे घद्धि की कुछ सीमाएं निश्चित हैं--ऐसी स्थिति मे ही प्रजनन के कारण समुदाय की उत्पा- दक्ता-शक्य उत्पादकता बढ़ सकती है । शक्य उत्पादक्ता द्वारा प्राणियों की सख्या वृद्धि के साथ आकार वृद्धि भी मायर है। उपरोक्त सम्पूण वाय प्रणाली को दर्शन के लिये हवीसन (1934) ने प्रत्येक पोषण स्तर पर सकल अ तग्रहित ऊर्जा का क्या निवप निकलता है निम्न समीकरण प्रस्तुत किया है। JA - E+R+D+w+IA+1)+b यहाँ 1A सक्ल अ तग्रहित ऊर्जा हैं E उत्सर्जी ऊर्जा है R श्वसन उर्जा है D वह ऊर्जा है जो परभक्षण में अतिरिक्त अन्य कारणा से हुई मृत्यु के रूप मे व्यथ जाती है W वह ऊर्जा है जो परभक्षियो द्वारा अप्रयुक्त है-शिकार के रूप में छोड़ दी जाती है I+1 उच्चपापण स्तर द्वारा उपभाग की गई ऊजा है तथा b जीवभार मे हुए परिवतन का द्योतक है। अब यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि प्रत्येक पोषण-स्तर को उस ऊर्जा का परिमाण क्या होगा यह निम्न समीकरण द्वारा स्वप दर्शित हो जाता है। IA +1=IA-E-R-D-W--b या IA+1=IA--[E+R+D+V+b] (ख) माहार- खलाएँ तथा पोषण स्तर सौर ऊर्जा का केवल हरे पादप ही उपयोग में ला सक्ते सावन या अपचयन मरन के लिये काम में आती है जिससे जीवन रूपी इधन या निर्माण होता है मथा कार्बोहाइडेटस वसायें तथा प्रोटीन । वस्तुत सभी जोयित प्राणो ऊर्जा के लिये हर पादपों पर हो आधित रहते हैं । लाहार- श सलाऐं सम्भरको (feeders) व पाद्य पदार्थों को रेखीय श्रेणी है अर्थात पादपो द्वारा सचित ऊर्जा समुदाय द्वारा एक क्रम मे खाने वाले तथा खाये जान को सला से गुजरती है-पाहार शृखला (food chan) बहलाती 28/पर्यावरण प्रकृति और मानव । यह कर्मा है । अग रूप में इस प्रकार भी कहा जा गक्ता है कि आहार-शृपला जीवधारियो का एक श्रेणीवद्ध प्रम है जिसमे भोजन करने वाले तथा भोज्य- पदार्थों की पुनरावृति होती है । इसके माध्यम से पादपो के स्रोत से अय प्राणियो तर पाच-ऊर्जा का स्थाना तरण होता है । आहार शृखला की एक वर्गीयीय सत्ता को आहार बडी (food link) कहा जाता है। ज्यो-ज्या एक पही से दूसरी कडी तक ऊर्जा का स्थानातरण होता है, स्थितिज ऊर्जा के अधिकाश भाग को ताप के म्प में हानि होती है, इस कारण एम आहार शृखला म म स कम तीन वडियो का होना नितात आवश्यक है जसे । पादप शाकाहारी- मांसाहारी देखा जाता है कि बडे मासाहारी छोटे मारााहारियो का शिकार कर खा लेते है तथा यही पम चलता रहता है जब तक कि चार या पाच कडिया सम्मिलित नहीं हो जाती । प्राय आहार-शृखला मे पाच से अधिक पडिया नहीं पायी जाती हैं । सन् 1926 में सवप्रथम थिनेमान ने आहार पडियो के समूह को-उत्पादक, उपभोक्ता, विघटक तथा स्थानातरणकारी नाम दिया था। ऐसी शृखला का उदाहरण है हरे पादप-→ शाकाहारी- मासाहारी-बडे मासाहारी (हिस्र जतु) →उच्च अपमाजका जलीय वातावरण में अधिकाशत देखा गया है कि शाकाहारी संख्या में वहुत कम होते है । यहा पादप पदार्थों को जन्तु पदार्थों में बदलने के लिये अबसर पाच या अधिक कडिया हो जाती हैं । एक पोखरे अथवा ताल म यह क्रम निम्न प्रकार कायरत रहता है शैवाल- प्राजीव-छोटे जलीय कीट- बड़े जलीय कीट- मेढक व मछली विशाल जल समूह अर्थात सागरो मे पाच या अधिप' कडियो का अब- लोकन किया जा सकता है। सबसे कम यडियो वाली भोजन शृखला उर्जा सबधो के दृष्टिकोण से बहुत महत्त्व की होती है। मनुष्य अपनी भाजन शखलाआ वे पदो यो कम करने अपन लिय उपयोगी भोजन ऊर्जा को वहा सकता है । घनी आबादी वाले देशो-चीन भारत, व वगला देश मादि मे मनुष्य अधिक्तर प्राथमिक उत्पादका-पादपो पर आश्रित रहता है तथा इन देशा म भोजन शृखला बहुत ही छोटी होती हैं । इसी के परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र की पैदावार अधिक आवादी के भोजन की आपूर्ति कर सकती हैं। पर्यावरण एक वैनानिक अध्ययन/29 लिंडामन (1942) ने आहार गम्यायो यो विविक्त पोपणो स्तरो MITA2 A. इत्यादि, पी श्रेणी मेस्प में दिशित किया हैं। इनके द्वारा प्रस्तुत पोषणी स्तर प्रमश उत्पादा, प्राथमिक उपभोक्ता, द्वितीय उपभोक्ता आदि ये सगत थे । प्रत्येर पोपणी स्तर उत्तरातर कम से ऊर्जा ये साधन पे रुप में पहले वाले स्तर पर निभर रहता है। उत्पादय (A) कर्जा ये माधन के रूप में सीधे अपनित सौर विकिरण पर निभर परते हैं। हरे पादपा या पोपणी स्तर प्रथम हाता है, शाकाहारिया या द्वितीय, मासाहारियो वा तृतीय तथा द्वितीयर मासाहारियो या धतुप पोपणी स्तर होता है। इस कारण यह मानना उचित ही होगा मि समुदाय म पार या पाच तर पोषणी स्तर हो सकते हैं। हर स्तर पर विभिन्न जातियो• प्रजातियां होती है तथा प्रत्येक जाति म प्राणियों की संख्या भी भिन्न-भिन्न हाती है । वास्तय म स्वागीकृत कर्मा के साधनो ये अनुसार एप जाति-समष्टि एक या एक से अधिक पोषणी स्तरो पर स्थित हो समती है। वे प्राणी जो पादपो से आहार कडियो की समान सख्या के पश्चात भाजन लेते ही पापणी स्तर के होते हैं। पोषणी स्तरा की सकल्पना म लिण्डेमैन ने कुछ महत्वपूर्ण निष्वप भी निकाले है, यथा (1) पोपणी स्तर की श्रेणी में एक प्राणी ऊर्जा के प्रारम्भिक स्रोत से जितना अधिक दूर होगा, ऊर्जा सोर के रूप में पहले वाले स्तर पर पूर्णरूप से उस निभर रहन की सम्भावनाएँ भी कम हो जायेंगी। (1) निम्न पापणी मे उच्चत्तर पोपणी स्तर तक श्वसन के मारण ऊर्जा यो प्रतिशत हानि म आशातीत वृद्धि होती रहती है । (n) जब भी उच्चत्तर पोषणी स्तर का परीक्षण किया जाता है तो मालूम पड़ता है कि उपभोक्ता अपने-अपने खाद्य सम्भरण के उपयोग म अधिक दक्ष हात जाते है । परभक्षियो को बढी हुई क्रिया के कारण वे अपने शिकार या दूढने म अवसरा की वृद्धि कर लेत है। पोषण स्तरों व आहार शृखलाओं का वर्गीकरण विदित हो चुका है कि (1) उत्पादक प्रथम पोपण स्तर बनाते हैं- हरे पादपो का समूह है जो सूर्य की प्रकाश ऊर्जा को सचित कर लेते है तथा साधारण अकाबनिक पदार्यों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं । (1) उपभोक्ता दूसरा तीसरा व चौथा पोपण स्तर बनात है-शाकाहारी, मासाहारी व 30/पर्यावरण, प्रकृति और मानव - हिंसक' जन्तु हैं (u) सवभक्षी-पिसी स्तर पर अपना भोजन पर सक्ते हैं तथा (iv) विघटक जीव-अतिम पोषण स्तर बनाते है जो मृत जीवो के अवशेषो को सरल पदार्थों में बदल देने की क्षमता रखते हैं तथा जीवाणु यीस्ट व फफूद (कवक) होन है । एक सामा य आहार-” खला को पोपण स्तर पर निम्न रूप में दर्शाया जाता है प्रकाश चाबन-डाइ-आक्साईड पोषक्लवण । उत्पादक (पादप) A1 विघटक जीव AM -- . प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी प्राणी) (जीवाणु आदि) मित्यु व सडा द्वितीयक उपभोक्ता तृतीयक उपभोक्ता (प्राथमिक मासाहारी) (द्वितीयक मासाहारी) चित्र--सामा य आहार- खला का पापणी स्तर ई० पी० ओडम (1971) ने आहार-शृखलाओ को दो मूल भागो मे वर्गीकृत किया है (1) चारण आहार खला। (1) अपरद आहार शृखला । (1) चारण आहार शृखला-हरे पादपो से आरम्भ होकर शाकाहारियो तर जाती है तथा मासाहारियो मे जाकर समाप्त हो जाती है । इस प्रकार की आहार शृखलाओ से हम भलिभाति परिचित हैं। इनम सौर ऊर्जा का उप- योग पादप प्लवको द्वारा किया जाता है जिहें ज तु प्लवक ग्रहण करते है, तदोपरात जि हे मछलिया ग्रहण करती है, जिह बडी मछलियां खा जाती हैं और तब वढी मछलिया को मनुष्य अपने आहार में सम्मिलित करता है। सौर ऊर्जा + वनस्पति प्लवक जतु प्लवर ज तुप्लयर भक्षी कीट (उत्पादक) → प्रथम उपभोक्ता)→ तथा प्रस्टेसिया (शाकाहारी) (द्वितीय उपभोक्ता) (प्रथम मासाहारी) विघटन छोटी मछलियां भक्षी + कीट व अटीशिया भक्षी पर्यावरण , एक यज्ञानिक अध्ययन/31 (जीवाणु एव क्वर) + बड़ी मछलियां बोटी मछलियां (शिखर उपभोक्ता) (ततीय उपभोक्ता) (तृतीय मासाहारी) (द्वितीय मासाहागे) पारिस्थितिक तन म पायी जाने वाली ऐसी अन्तनिभरताऐं सम्बधित प्राणिया के आकार को प्रभावित करती हैं। पादप उत्पादको के आकार भिन्न- भिन्न होते है-बड़े से बड़े वृक्षो से लेकर छोटे से छोटे पादप-प्लवको तय विभिन्न आकार के पादप उत्पादव या मजक' होत हैं। जिन पादप-समूहा पर शाकाहारी प्राणी जीवन निर्वाह करते हैं उनके सम्मुख वे छोटे अथवा बडे हो सक्त है परतु शाकाहारिया की तुलना मे मामाहारी अधिक शक्तिवान तथा बड़े आकार के होते है। इस कारण यह कहा जा सकता है कि परभक्षा आहार शृखला मे उत्तरोत्तर पोषणी स्तरो पर प्राणी प्राय आवारिव प म वडे से और बडे तथा शक्तिशाली भी होते रहते है । पादपा तथा ज तुओ पर निर्वाह करने वाले परजीवियो को भी उपभोक्ता श्रेणी मे ही रखा जाना चाहिये क्याकि यह अपना पापण पादप एव जतु उत्तको से प्राप्त करते है। इन परजीवी शृखलाआ म उत्तरोत्तर स्तरा पर प्राणी आकार मे छोटे से और छोटे होत जाते हैं । उदाहरणाय पादप जडो पर गोल कृमि (Nematodes) परजीवी होत हैं जिन पर जीवाणु परजीवियो के रूप मे छोट से छोटे (सूक्ष्म) होत जाते है । सामा यत स्तनधारियो व पक्षिया पर सूक्ष्म आकार के ही पिस्सू, जूऐ आदि परजीवियो के रूप में पलती है । (1) अपरद आहार शृखला-हर आहार शखला पादप उत्पादको से ही आरम्भ हो एसी बात नहीं है कुछ आहार ” खलायें मृत काबनिक पदार्थों से भी आरम्भ होती है । उस पदार्थ का उपभोग सूक्ष्म जीवा द्वारा किया जाता है जो तदुपरात अपरद भोजिया एव उनके परमक्षियो द्वारा खाये जाते हैं । एसी आहार शृखलाऐं जो मत कावनिक यौगिको से आरम्भ होती है, अपर आहार शृखलाएँ कहलाती हैं । जैसे- . - उस्तू या अपरद घाघा थ्र चिचडी → बिच्छू। नीमेटोडस → अपरद - इन शृखलाओ मे भी परभक्षण होता है। अतएव उत्तरात्तर पोषण स्तर पर आवार यडे से बडा हो जाता है। आहार ” खलाओ के सम्बध में ए- और तथ्य भी सामने आया है, आहार शसला भी हर क्डी के साथ के पदार्थों की साद्रता भी बढती रहती है। इस घटना को आहार-शखर साद्रता या जव भावधन कहा जाता है। 32/पर्यावरण, प्रकृति और मानव समुदाय विशेष मे पायो जाने वाली अयाय जातिया-प्रजातियो धी आहार सहक्रियाएँ सरल नहीं होती जैसा कि ऊपर दिये गये विवरण से अलपता है । प्राय एव' प्राणी एक ही प्रकार के आहार पर निभर नही रहता है वरन् एक से अधिक प्रकार के भोजन (प्राणिया) पर निर्वाह करता है और स्वयं भी एक ही परभक्षी नही वरन विभिन्न परभक्षिया वा आहार सामग्री बनता है। वना मथ केवल माघे ही नहीं पाता, यह विभिन्न प्रकार के कीटा पा भी भक्षण करता है, तथा वह स्वय भी केवल उल्लू द्वारा ही नहीं वरन् बाजो, लोमडियो, वीजल व भय प्राणियो द्वारा खा लिया जाता हैं। समुदाय की सभी जातियो के ऐसे आहार सम्बधो यो यदि आरेखित किया जाय तो भोजन शृपलामो का एक जटिल जाल बुन जायगा। आहार सम्बधा के इस जाल को 'आहार जाल' कहते हैं। . पारिस्थितिक स्तूप (Ecologreal pyramids)-- इसी अध्याय में पूर्व मे भी कहा जा चुका है कि ऊर्जा स्थानातरण के समय आहार ” खलाआ के हर पोपण स्तर पर उपयोगी ऊर्जा की हानि होती है, इसवें परिणाम स्वरूप उच्चतर पोषणी स्तरा को बहुत बम कर्जा प्राप्त हो पाती है। यह परिस्थितियां इस बात का अपवाद है कि जिनमे कारनिक पदापो का आयात होता है। मृदा के कई क्विटल भार में से पास के कई क्विटल लेकिन वम भार को प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार घास भी शाकाहारियो का भरण करती हैं तथा इन शाकाहारियों का भार घास के भार से कम होता है । ऐसे समुदाय मे भोजन पर आश्रित मामाहारियो का भार अपेक्षाकृत कम होता जायगा । पारिस्थितिकवेत्ताओ ने सख्या, जीवभार व ऊजा प्रवाह के आधार पर इसको क्रमश तीन स्पो मे -स्तूपो आकार मे चित्रो सहित अभिव्यक्त क्यिा है- (1) सख्या स्तूप, (1) जीवभार स्तूप व (i) ऊर्जा स्तूप । (1) भोजन शृखला में प्रत्येक प्रोषणी-स्तर पर जीवधारिया की सख्या निरतर कम हाती जाती है तथा इस कम होती हुई सस्या का स्तूप पयावरण एक वैज्ञानिक अध्ययन/33

(pyramid) की सहायता से प्रदर्शित किया जा सकता है। पारिस्थितिवाय
स्तूपो का प्रयोग सवप्रथम अग्रेज पारिस्थितिकीवेत्ता सी० ई० एल्टल (1927)
ने किया था। भोजन शृपला के निम्नतम स्तर पर जीवा को साया सवाधिक
हाती है, आगे की काडियो में मासाहारियो की संख्या कम हो जाती है और पर
अत तक चरम-मासाहारी को सख्या न्यूनतम हो जाती है। इस अवधारणा
यो सध्याआ का स्तूप कहत हैं । (चित्र)
मुर्थिक उपभोक्ता
तृतीयक उपभोक्ता
द्वितीयक उपभोक्ता
प्राथमिक उपभोक्ता
a
उत्पादक
सख्यास्तूप
(1) जीवमार, पिसी एक समय पर उपस्थित इवाई कर्जा ये पूण शुल्क
भार पर मारित होता है, क्योकि जब आहार शबला ये हर मयोजय स्तर
पर पुष कर्जा य पदार्थ नष्ट होता है तो जयिर भार यो पूण मात्रा में,
34/पर्यावरण प्राीि और मानव

प्रारम्भिक स्तरो से अतिम स्तर तक कमी होती रहती हैं। यह समुदाय में
'जीवभार'
स्तूप की सहायता से दिग्दर्शित होती है । (चित्र)
मीन
दतीयक मासाहारी
द्वितीयकमासाहारी
प्राथमिक मासाहारी
कृमि सीप घोघे
शाकाहारी
पदपप्लवक
स्वपोषी
सागरीयसमुदाय जीवभारस्तूप
भूमिसमुदाय जीवभार स्तूप
(1) जजा का स्तूप आहार शृखला के प्रत्येक स्तर पर प्रवाहित होने
वाली कजा वे अतिरिक्त विभिन्न जीवो द्वारा ऊर्जा स्थानातरणो मे की गमी
सही काय क्षमता को दर्शाती है । ऊर्जा के स्तूप भी प्रारम्भिक स्तरा से उच्च
स्तरा तक प्राप्य ऊर्जा की कमी का स्पष्ट दिग्दशन है। यह उष्मागतिकी क
दूसरे नियम के अनुरूप होता हैं । (चित्र)
तृतीयक मासाहारी
-दितीयक मासाहारी
प्राथमिक
मासाहारी
उत्पादक
ऊर्जा स्तूप
एक पारिस्थितिक तन मे एक से ज्यादा खाद्य स्तूप सक्रिय रहते है।
प्रत्येक स्तूप एक भिन्न आहार-शृखला को व्यक्त करता है जो भिन्न मासा-
हारियो मे समाप्त होती है । खाद्य स्तूप ही समुदाय की स्थायी अवस्था को
पर्यावरण एक वैनानि अध्ययन/35

बनाये रखने में सहायक होते हैं । जब एक स्तूप के किसी स्तर पर यदि सध्या म सार्थक परिवतन कर दिया जाय, तो दूसरे प्रत्यय स्तर मे स्वत समायाजन हो जात हैं । मासाहारियो की बढती आबादी से शाकाहारियो की संख्या घटती है और जब मासाहारियो को पूण आहार नहीं मिलता, उनकी अकाल मत्यु से सख्या कम होने लगती है । तत्पश्चात शाकाहारियो को सख्या बढने लगगा । खनिज पोषक एव भू जैव-रासायनिक चक जीवधारिया को अपनी जैविक प्रियाओं के लिए लगभग 20 तत्त्वो की मावश्यक्ता होती है। इन तत्त्वा को जीव अपन लिये वातावरण द्वारा ही विशिष्ट चको के रूप में अधिग्रहण करते है और पुन वातावरण मे ही मुक्त कर देन है। इस प्रकार पारिस्थितिक त म खनिज तत्वो या पोपका पा चक्रीय प्रवाह होता है। इही चत्रा को जैव भू-रासायनिक चक्र बहते हैं । जीवन के लिये आवश्यक तत्त्वो व अवाबनिक यौगिको के प्रवाह को खनिजो का पत्रीय प्रवाह कहा जाता है। प्रत्येक चक्र को दो भागो मे विभक्त किया जा सकता है चिय कुण्ड-- यह साधारणतया जैविक घटक ही होता, तथा यह मद गतिशील होता है। 2 विनिमय कुण्ड-यह छोटा एव सक्रिय घटक होता है। चक्रीय प्रवाह म यही घटक वातावरण व जीव के मध्य विनिमयशील (exchangeable) होता है। यदि किसी जीव का निचय कुण्ड वायु मण्डल या जल भण्डल हा और जिमम यह तत्त्य गैसीय अवस्था में पाया जाता हो तो चीय प्रवाह को गमीय चक कहते हैं। इसके उदाहरण ह ~ कावन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, भऑक्सीजन पत्र व जल एक । और यदि किसी जीव का निचय कुण्ड स्थल-मण्डल हो तो जिसमे तत्त्व अपक्षय द्वारा मुक्त होता हो तो चीय प्रयाहा को अयसादी चर कहते है। गयर व पारफोरम चा अवमादी चयापी श्रेणी में पाते हैं। इन पत्राम मम्मरण के अग यी हानि हो सकती है और इस प्रकार यह अश प्राणिया को पट्ट्य मे बहन दर चला जाता है तथा निरतर होने वाले पत्रीय प्रवाह को मीमा म सहा हो जाता है। उपरोक्त सभी चाम्नि वि दुक्षा में मयिस्तार या पिया जा रहा है 36/पर्यावरण, प्रालि और मानद 1 कावन चक्र पानी वायुमण्डलीय सावन डाइ ऑक्साइड पानी श्वसन सहना प्रकाश सश्लेषण ऑक्सीजन जैविक काबन ऑक्सीजन चिन---बावन चक्र सभी का निव' यौगिको मा एक मात्र आधारभूत घटक' पावन है। पार्वोहाइड्रेट्स तथा वसाओ के उपयोग से एफनिवारण के परिणामस्वरूप होने वाले ऊर्जा प्रवाही मे कर्जा के प्रवाह के साथ ही पारित न मे पावन भी अग्र- सित होता रहता है। वायुमण्डल व जल मे घुली हुई काबन डाई ऑक्साइड ही किसी न किसी रूप में इन यौगिका के लिये आवश्यक काबन का स्रोत हैं। (1) जीवित जीवधारियो मे पावन डाइ-ऑक्साइड के उपयोग सव- प्रथम हरे पादपो द्वारा प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया है। (1) काबन, हाइड्रोजन एव ऑक्सीजन, सूय ये प्रकाश की उपस्थिति मे सरलतम कार्बोहाइड्रेट्स यथा ग्लूकोज में बदल जाते हैं । यह तत्पश्चात् पादपो द्वारा जटिल वसाओ पालीसेराइड्स मे सश्लेपित किये जाते हैं । वसा एव पालीसेराइड्स जो पादपो के उत्तको म सग्रहित हो जाते हैं, ज तुओ द्वारा उनका उपभोग होता है, तब इन काबनिक यौगिका का दोबारा अय यौगिका मे सरलेषण हो जाता है । माकाहारी प्राणी पादपा को खाकर अनेक कावन यौगिका का स्वागीकरण करते हैं और दोबारा इन योगियो का दूसर यौगिको मे सश्लेषण करते हैं । (i) काबन की कुछ मात्रा दोबारा वायुमण्डल में चली जाती है, क्याकि फार्बन-डाइ मॉक्साइड पादपो व ज तुओ, दोना के लिय श्वसन का सहउत्पाद होती है। जतुओ द्वारा उत्सजित पदाथ तथा पादपो व प्राणी वग के जीवद्रव्य म वधा हुना काबन, शरीर के विघटन के पश्चात् निमुक्त होता है । जीवाणु तथा पर्यावरण एक बैज्ञानिक अध्ययन/37" 3 क्वक इन पादपा व प्राणीवग के विघटन के बाद उनके शेष भागा को यात हैं तथा जटिल जैविक यौगिको को सरल पदार्थों में परिवर्तित करत हैं जो बार म पुन चरण (recycling) के लिये उपलब्ध हाते हैं । वायुमण्डलीय कावन डाइ आक्साइड का कुछ अण निर्जीव दहन द्वारा भी पुन पूरित किया जाता है जसे दावानल से या इधन जलाने से कावन-डाइ ऑक्साइड मुक्त होती है । सभी इन इधना मे पावनिक पदाथ विद्यमान होत है जो अतीत मे कभी प्रकाश सश्लपण के ही कारण निर्मित हुए थे एव जिनके निर्माण म वाबन डाइ मॉक्साइट प्रयुक्त की गई थी। इनके ज्वलन के साथ ही वातावरण में वाबन- डाइ ऑक्साइड को मुक्ति से एक विलम्बित कावन-चक्र पूर्ण हो जाता (2) नवजन-चक पुन नत्रजनीकरण वायवीय नत्रजन फिकमर मन्नजन चट्टानो का घुलना । विद्युत तडतना--- नाइट्रेटस जैविक पादप नन्नजन जविक नत्रजन उवरक | जीवाणु जैविक जतु नाइट्रेटम नत्रजन अमोनिया नत्रजनीकरण सडने की क्रिया चित्र-नाइट्रोजन चक्र सभी जीवधारियो को प्रोटीन, पूक्लिक अम्ल तथा अ य नाइट्रोजन युक्त पदार्थों के सश्लपण का आवश्यकता होती है। रासायनिक रूप म अक्रिय होने के कारण वायवीय नाइट्रोजन अधिकाश प्राणियो द्वारा उपयोग में नही ली जा सपती है, फिर भी इन पदार्थों के लिये वायवीय नाइट्रोजन हो नाइट्रोजन का आखिरी साधन है। उपयोग म आने वाली नाइट्रोजन रा स्रोत अधिकतर नाइट्रेट आयन होता है। 38/पर्यावरण, प्रकृति और मानव वातावरण में नाइट्रोजन के साधन () सचित पनिज होते हैं जो जल द्वारा चट्टानो के विलयन से बनते ह, (ii) मानव द्वारा उवरकों को भूमि में डालन से बनते हैं तथा (1) तडित ऊर्जा ये प्रयोग से वायवीय नाइट्रोजन एव आक्सीजन के सयोग से वायु मे वृध नाइट्स वन जात हैं और यही नाइ- ट्रेट्स वर्षा के माध्यम से पुन भूमि में प्रवेश कर जाते हैं। नाइट्रेट्स का दूसरा मुख्य साधन सावनिक नाइट्रोजन-चक्र है । वातावरण मे पादपा द्वारा नाइट्रेट आयम या खनिज मेटाबोलाट्स के रूप में अवशोषण हो सकता है फिर पादप नाइट्रेटस को अमीनो अम्ल समूह एव जीवित द्रव्य के भय नाइट्रोजन युक्त घटको म परिवर्तित कर देते हैं । जतु न तो नाइट्रेट्स ग्रहण करते हैं और न ही इहें अमीनो समूह में परिवर्तित करते हैं । वे उपयोग में तेने लायक नाइट्रोजन को पादप-भक्षण कर ही प्राप्त कर सकते है । नाइट्रोजन चक्र का महत्त्वपूर्ण पहलू है पि यह एक गैसीय चक्र है जहाँ जैव, द्रय की नाइट्रोजन, काबनिर से अबायनिक नाइट्रोजन के रूप मे कुछ विशिष्ट जीवाणुओ के माध्यम से अपघटित होती है। नाइट्रोजन का एक अश नाइट्रेट मायनस बनाता है जो शोन ही हरे पादपो द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है और इस प्रकार नाइट्रोजन चक्र निर तर चकित रहता है । वायु म 80 प्रतिशत नाइट्रोजन मिश्रित होती है तथा यह नाष्ट्रोजन का एक विशाल भण्हार है जो पारित न का सुरक्षा-वपाट (Safety valve) बन जाता है। नाइदाजन निर तर विनाइट्रीकारी जीवाणुओं की क्रियाओं के कारण वायु म प्रवेश करती रहती हैं तथा इसी प्रकार निरतर नाइट्रोजन स्थिरिकृत जीवाणुओ की मियाओ के फलस्वरूप चक्र में लौट आती हैं बुछ अश विद्य त तडित के कारण भी धक मे प्रवेश कर दी जाती है । कुछ जीवाणु तथा नीलरहित शवाल जल व मृदा मे रहते हैं जो वायवीय नाइट्रोजन का अवशोषण करते हैं और अपने प्रोटीनो मे समाविष्ट कर देते हैं। कुछ जीवाणु मुक्तिजीवी होते है और जब वे मरते हैं तो उनके शरीर के भय से मदा मे अमोनिया गैस मा जाती है जो नाइट्रोकारियो द्वारा नाइट्रेट्स में परिवर्तित कर दी जाती हैं । अ य नाइट्रोजन स्थायीकारी जीवाणु फलीदार पादपो की जडा म सहजीवियो के रूप मे बसत है । यह जीवाणु अभिलक्षनिक जडिय ग्रथिकाओ का निर्माण कर लेत है तथा इनके द्वारा स्थिरीकृत की गई नाइट्रो- जन उपयोगी नाइटोजन के रूप मे फलीदार पादपो को उपरब्ध होती है । इस प्रकार नाइट्रोता स्थिरीकृत जीवाणु वायवीय नाइट्रोजन को उपयोगी नाइट्रोजन में परिवर्तित कर सावनिक नाइट्रोजन चत्र को पूरा कर देत हैं । कहता न होगा कि नाइट्रोजन चक्र की आधारशिला प्रकृति में विद्यमान जीवाणुआ ये चार समुच्चय हैं क्षयकारो नाइट्रोकारी, विनाइट्रोकारी पर्यावरण एक वैनानिय अध्ययन/39 एव नाइट्रोजन स्थिरोत जीवाण जो जपनी विशिष्ट क्रियामा द्वारा शीघ्र उपापचयिक लाभ प्राप्त करने के लिये विभिन काय करते हैं । उदाहरणत रसायन सश्लेषी जीवाणु नाइट्रोसोमानास अमोनिया आयन को नाइट्राइट आयन मे तथा नाइट्रविक्टर नाइट्राइट् आयन को नाइट्रेट आयन मे बस देते हैं। विनाइट्रीकृत व नाइट्रोजन स्थिरीकृत जीवाणुओ के लिये ऊर्जा की आवश्यक्ता होती है जो इन परिवतनो के कारण प्राप्त कर ली जाती है। हचीसन (1944) का अनुमान है वि वायु मे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण 140 1 700 मिग्रा /मी/प्रति वप यानि 1-6 पौड/एक्ड होता है । डोविच (1969) के अनुसार नाइट्रोज न स्थिरीकरण की दर 1 ग्राम/मो /प्रति वप अर्थात् 10 पौड/एकड है और उपजाऊ क्षेत्रो म तो जैविक स्थिरीकरण को गति 20 ग्राम मी/प्रति वप तक हो सकती है । (3) जॉक्सीजन-चक्र भोजत पदाथ वायुमण्डलीय आक्सीजन भोजन पदाथ श्वसन प्रकाश संश्लेषण वामन-हाइ-ऑक्साइड --| वातावरणीय जल नावन-डाइ- ऑक्साइड चित्र आक्सीजन-चक्र आमीजन का वायुमण्डल में एक निश्चित अनुपात बनाये रखने के लिये प्रकृति मे निर र आक्सीजन प्रवाह की महती आवश्यकता है । इसका पत्रण मापन हाइ-ऑक्साइड व जल के साथ-साय चलता रहता है । (6) ऑक्सीजन गैस के रूप में श्वसन क्रिया से रीवधारिया के शरीर मे प्रवेश करती है और इस पिया मायन-डाइ-ऑक्माइह व जल उत्पन हाते हैं । इस विधि म निर्मित उपापचयो जर शरीर में पूर्व विद्यमान जल के साथ रागत भर जाता है। (1) उपापचयी जा रे कुछ भाग वा उपयाग अत म जव पदायों में उत्थान में हो नाता है और कुछ भाग उत्सजन द्वारा पुन वातावरण म पना 40/पर्यावरण प्राति और मानव जाता है तथा शेष भाग पादपो में प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में काम मे मा जाता है। (1) प्रकाश-सश्लेषण मे उत्पन ऑक्सीजन पुन वायुमण्डल मे मिलकर चक्र पूरा करती है । प्रकाश सश्लेषण मे आक्सीजन निम्न प्रकार समीकरण द्वारा प्रदर्शित होती है 6co+ 12H,O+ CHOD+ 60 +6H,0 वायुमण्डल में व्याप्त एव जल मे घुली आक्सीजन, प्रकाश-सश्लेषण की सह-उत्पादक है । पादप व जतु ऑक्सीजन को श्वसन क्रिया में उपयोग करते हैं तथा कावन-डाइ-ऑक्साइड के रूप मे घायुमण्डल एव जल म छोडते है । कावन-डाइ-आक्साइड पादपो द्वारा कार्बोहाइड्रेटस सश्लेषण मे कच्चे रूप में उपयोग की जाती है । इस प्रकार एक पारितत्र में इस सरल जैव-चक्र के माध्यम से ऑक्सीजन का सतुलन बना रहता है । (4) जल चक्र वातावरणीय जल माल काबन डाइ-ऑक्साइड H, सडना पोषण ग्रहण H2 Oa Co. CO2 02 जैविक पदार्थों के घटक वातावरणीय ऑक्सीजन 1. चित्र-ऑक्सीजन, जल व कावनचक्रो का पारस्परिक सम्बध जल का वायु, थल व सागर के मध्य तथा जैविक जीव एव उनके वाता- वरण के जीवो का रूपातरण जल चक्र के माध्यम से ही परिपूर्ण होता है। जल चफ वाष्पोत्सजन, बादलो का बनना व अवक्षेपण आदि त्रियाओ को पयावरण एक वैज्ञानिक अध्ययन/41 प्रभावित ारता है । इनमें मुख्य अभिक्गिा वाप्पन से ही है क्योकि वाप्पन ये पारण ही वायुमण्डत म आद्रता बनी रहती है तथा बादल बनान व अरक्षेपण के लिए आवश्यय नमी प्राप्त होती है। हम देयत है कि वायु मण्डलीय आयमीजन इगी प म उपापचयी निया म वेवल श्वसन द्वारा हा प्रविष्ट होती है तथा उपापचय से प्रकाश संश्लपण द्वारा बाहर निकलती है । तय यह जल से मगत गरती है और दम स्प मे यह जल चर से या अप्रत्यक्ष स्प मे पावन चक्र मे सम्बंधित हो सकती है। अत तीना पर ऑक्सीजन, पावन य जल चक्र परस्पर सम्बधित रहते हुए पारित न म सघारित रहते हैं । (5) गधक धक (1) जल म घला हुआ सल्फेट हा गधा या मुख्य स्रोत है । वायुमण्डलाय क्षेत्र व स्वपोपी पादप इसका अपचया करते है जिससे यह प्रोटोन रूप मे उप सचित हो जाती है । गधा तत्त्व अनेक अमीना अम्ल वा अवयवमाना गया है। (1) जब पादप व जतु शरीरो का अपघटन होता हैं तो जविक रूप में सयुक्त गधय का अधिकाश भाग का खनीजीकरण हो जाता है। यह प्रत्रिया एस्परजिलस तथा यूरोस्पोरा जैसे जीवाणुओ र पचको द्वारा सम्पन्न होती है और अमावनिक सल्फटस का निर्माण हो जाता है। (1) अवायवीय परिस्थितिया मे अपचय के परिणाम स्वरूप जैविक रूप मे सयुक्त गधक की कुछ माना सल्फाइडस में बदल जाती है और साथ ही हाइड्रोजन सल्फाईड भी तैयार की जाती है । सल्फाइडस के बनने मे एश्चेरिया तथा प्रोटियस जैसे जीवाणुआ की आवश्यक्ता होती है । पर हाइआक्सादर पी 504 H2S वायुमण्ड' प्राण अशोषण ज्दपहरा आधसीजनी चिलमण्डल अक खनिज घोडा सीविग ॐउभीजी दोत्र 0 लेह संत्पा चिन्द्र-गधक चक्र 42/पर्यावरण प्रति मोर मानव (iv) फेक्टरिया आदि के इधन के अपूण दहन के कारण कुछ कावनिक गधर सल्फर डाइ आक्साइड बनकर वायुमण्डल मे विमुक्त हो जाती है । (v) सल्फा विनियो नामक जीवाणु वातावरण में व्याप्त इस सल्फर डाइ-ऑक्साइड गेम को मूलतत्त्व गधक व सल्फाईड आयन मे बदल देते हैं जहा हाइड्रोजन सल्फाइड भी बनती है। यह सम्पूण किया मवायवीय स्थिति मे होती है । कुछ विशिष्ट सल्फर जीवाणु हाइड्रोजन सल्फाइड को पुन सरफेटस मे परिवर्तित कर देते है । सल्फेट निर्माण हेतु हाइड्रोजन सल्फाइड का परिवतन वेंगियटोवो व थायोवेसीलस नामक रगहीन सल्फर जीवाणुओ की उपस्थिति में ही सभव है। (1) वायुवीय अवस्थाओ मे थायोवेसीलस जीवाणुगो की अन्य प्रजा- तियां सल्फाइड को गधक मे तथा गधक वो सल्फेट में बदलती रहती है। इनमे कुछ जीवाणु रसायन सश्लेषी भी होते है । (काबन की प्राप्ति के लिय काबन-डाइ-आरमाइड के अपचयन म जिस ऊजा की आश्वयक्ता होता है, यह जीवाणु उस ऊर्ग को अभावनिर रमायना के आक्सीवरण से प्राप्त करते है। (vi) अपघटन अवसाद के रूप मे होने के कारण अवायवीय स्थिति उत्पन्न होती है जिसके कारण हाइड्रोजन सल्फाइड बा ऑक्सीकरण नहीं हो पाता तथा यह स्थल मण्डल में प्रवेश कर जाती है जहा गधक तत्त्व का लोह खनिज से ससग हो जाता है और फरिक सल्फाइड बनता है। इस प्रकार गध विलेय के रूप मे जीवो को प्राप्त होता रहता है। (6) फॉस्फोरस चक्र जैविक ततो मे फास्फोरस भी एक महत्त्वपूर्ण पोषक तत्व है जो न्यूक्लिय अम्लो, फास्फोलिपिडस तथा अय कई फॉस्कोरीकरण से सबधित यौगिको या एक अश होता है। सभी मौलिक रूपा तरणो मे इस तत्व की आवश्यकता पडतो है परतु जैविक माग को देखते हुए यह तत्त्व भूतल पर अपेक्षाकृत विरलता मे पाया जाता है। प्राणिजगत में फास्फोरस तथा अन्य तत्त्वो के अनुपात प्राप्य एव प्राथमिक सपदा की अपेक्षा काफी ज्यादा है। अत यह तत्त्य पारिस्थितिय दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। पह उत्पादकता मे अस्पत सोमावारी अथवा नियतणकारी बन जाता है। (1) पादपो के पोषण के लिये आवश्यक अकाबन फास्फेट अर्थोफास्फेट के रूप मे उपभाक्ता एव अपघटव के शरीरो मे स्थानान्तरित किया जाता है जो अपघटन तथा खनीजीभवन द्वारा पुन चरण में प्राप्त हो जाता है । (1) वैद्रीय चक्र से भौतिक तथा जविक दोनो विधिया द्वारा अधिकाश पॉस्फेट को हानि होती है। जीवा की पहुंच तथा प्रमुख जल सचरण से पर्यावरण एवं वैमानिक अध्ययन/43

फॉस्पेट को दूर हटाने पाली भौति विधिपो म अवसादन भी एक
प्रदिया है।
जीव द्रव्य
पादप जगत
प्राणी जगत
जीवाण
जीव द्रव्य सश्लेपण
उत्सर्जन
फॉस्फेटिव मारव
जीवाणु
अस्यियाव
सागर पक्षी
एक मतस्य
फॉस्फोरग युक्त चट्टानें
खाना अण्डार
जिवाश्म अस्थि भण्डार
1
दात आदि
1
| ज्वालामुखी लावा
अपरदन
घुलन शील
फास्फेटस
सागरीय
अवसाद
गहरे अवसादो
मे छिपना
चिन-फॉस्फोरस चक्र
44/पर्यावरण, प्रकृति और मानव

(ii) फॉस्फोरस चक्र के मुख्य भाग से फॉस्फोरस की हुई समी एवं हारा
के लिये दांतो व हड्डियो मा निर्माण तथा उत्सजन जैसी जैविक क्रियाएँ भी
उत्तरदायी मानी गयी हैं। अनेक विधियो द्वारा तत्व को कम मात्रा मे पुन
चक्रीय पय मे डाल देती है।
(iv) वहां चट्टानो का अपक्षय, वायु मे उपस्थित धूल, ज्वालामुखी गैस
तथा वायु द्वारा ग्रहण को गई लवण-पुहारो (Salf Spray) के अश में
माध्यम से यह स्थानान्तरण होता है जो कुछ जैविक विधियो से भी सहयोग
प्राप्त करते हैं।
(v) इस चक्र से हुई हानि की तुलना में पुन प्रवेश कराने पासो विधियों
अपर्याप्त रहती हैं। वास्तव मे फॉस्फोरस को उपलब्ध माना अकाबनिय रूप
मे पारित त्र मे कम होती है परतु चक्रीय पथ पो गति तीय होती है जिससे
पारितन्त्र की क्रियाओं को उचित ढग से चलाने के लिये इस तत्व का
सम्भरण पर्याप्त मात्रा में चलता रहता है।
(1) डॉ अल्फेड रेडफोल्ड (1969) के मतानुसार सागरी में लाइट्रोजन
तथा वायुमण्डीय ऑक्सीजन के परिमाण जीव रसायनिक चको द्वारा नियमित
रखे जाते हैं एव यह धक अतिम रूप से फॉस्फोरस द्वारा नियवित होते हैं।
फिर भी हमे फॉस्फोरस चक्र का अभी तक पूर्ण ज्ञान नहीं है।
(4) नियत्रण सहति
शोध बिदु
ऋणात्मक निविष्ट
सवेदव
नियनित
परिमाण
-शोर
परिपथ
प्रभावी
निगम
ऊर्जा स्रोत
चिन-सामान्य नियन्त्रण महति
पर्यावरण : एप मेगामि मध्ययग/

- वारनर(1898)न सवप्रथम सायटिक्स (Cybernatics)शन याप्रयोग क्यिा था । मानव शरीर में अने तन्तु, अग व सहतियां हैं जिनकी वार्षिको भी भिन्न भिन्न है फिर भी सभी स्वनिय वित व स्वस तुलित हैं और इमा सदम मे सायबर्नेटिक्स शब्द का उपयोग भी दिया गया था। एक्ल प्राणियो तथा समप्टियों की भाति पारित नको अपना निर्वाह द नियत्रण स्वय ही करने में समय है। नियत्रणो वे इस विज्ञान को ही सायबर्नेटिक्स' वहा जाता है । जैविरताना को यह प्रवृति जिसमे परिवतनो का मुकाबला कर लिया जाता है तथा साम्यवस्था में बने रह सकते हैं 'समस्थिरता' (homeostasis) कहते हैं । उदाहरण के रूप में किसी भी पारितन मे आक्सीजन व कावन डाइ ऑक्साइड की एक माता एक निश्चित स्तर पर सीमित होती है। यह माना परिसीमन तन की स्वत सचालित प्रक्रियाओ से होता रहता है परतु वमी कभी जीवमस्या घनत्व मे गम्भीर उतार-चढाव होने से तन मा प्राकृतिक सतुलन विगडने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। ऐसी अवस्था मे सन्तुलन को बनाये रखने का प्रयास किया जाता है अन्यथा सम्बधित जैविक घटक नष्ट होकर अय जीवा के लिये स्था। खानी कर देता है। विशात पारित त्रों में पदाथ चक्रा एव ऊर्जा प्रवाहो की परस्पर क्रिया से स्वत सुधारक समस्थायित्व (Self correcting homoestars) का विकास हो जाता है जिसको पिसी बाहरी नियत्रण या निश्चित मारक की आवश्यक्ता नही पडती । अन्त निवेश के वढो से 7वीन सतुलन स्तर कुछ उच्च स्थिति में होते हैं और वहा अल्प परिवतनो का प्रभाव नगण्य होता है। वास्तव मे उद्धिकासीय समायोजन की एक अवधि के पश्चात, एक' यथाथ अच्छा समस्थायित्व नियन्त्रण प्रभाव मे आता है। सरलतम आधार पर, नियन्त्रण तत्रा मे यो वैभव पेटियां-एक वैभर पेटी सवेदक व दूसरी प्रमावक के रूप में रहती है तथा एक नियत्रित परिमाण होता है जो निगम एव निविष्ट परिपथो के रूप मे रहता है, यह सवेता द्वारा थत मयोजित होता है। नियन्त्रण पुरा निविष्ट पद्धति पर निभर करता है। यह पुन निषिष्ट तव हाता है जब निगम अथवा उसका एक भाग निविष्ट यो माति काय करता है। जब भी पुन निविष्ट धनात्मक होता है तो परि माण बढ़ता है । धनात्मर पुन निविष्ट प्राणी की वद्धि तथा उत्तरजीविता ये लिये आवश्यक होती है। ऐसी स्थिति मे नियत्रण तो ऋणात्मक पुन निविष्ट द्वारा ही होगा। विमी भी पारितत्र के स्तर पर वाय वरने वाली निय त्रक विधियों मे ये विधियां ही शामिल हो मस्ती हैं जो पापक तत्वों पे सप्रहण तथा मुक्ति पर सपा वावनिप पार्यों के उत्पादन तथा अपघटन पर नियन्त्रण रखती है। 46/पर्यावरण प्रनि और मानव बडे परितत्रो मे तो खनिज-चको तथा ऊर्जा प्रवाह की अ त क्रियाएं स्वशोधित समस्थिरता उत्पन्न करती है जिसके फलस्वरूप बाहरी नियन्त्रण या शोध बिदु की आश्यक्ता ही नहीं पड़ती। यद्यपि पारितन नियत्रित होता है, फिर भी जब प्रतिबल बढता है तो हो सकता है कि यह ठीक पहले वाले स्तर पर लौटने मे समथ न हो। यह भी ध्यान देने योग्य है कि वास्तव मे अच्छे समस्थिरताकारी-नियत्रण, विकासीय समायोजन की एक अवधि के बाद ही प्राप्त होते हैं। पुराने पारितत्र की अपेक्षा नये पारित त्र अधिक प्रचण्ड दोलन करते हैं तथा बाहरी विक्षोपो का प्रतिरोध करने मे कम समथ होते हैं। पुराने पारित त्रो घटका को एक दूसरे के प्रति पारस्परिक समायोजन के लिए अवसर मिल चुके होते है, इसलिये वे बाहरी विक्षेपो का प्रतिरोध भधिक अच्छी तरह से कर सकते है । पर्यावरण एवं वनानि अध्ययन/47 पर्यावरण-संसाधन एवं रारक्षण जीवन को आधारभूत आवश्यक्ताओ की आपूर्ति जिन साधना से होती है, मानव सम्पदा है और इही को ससाधन (resources) कहते हैं । आधुनिक सभ्यताओं के विकास के साथ वातावरण म उत्पन खतरो तथा जनसध्या विस्फोट, अत्याधिन जनन तथा प्राप्य प्राकृतिक सम्पदाओ अथवा ससाधनो वा दुरुपयोग अधिक से अधिक हुआ है। इन सभी ससाधना को जो जोव सख्या व पारित न के मध्य सामजस्य स्थापित करते हैं, दो प्रमुख श्रेणिया मे वर्गीकृत किये गये हैं (1) अकावनिक संसाधन -वायु, जल, खनिज, जीवाश्म ईधन, खनिज अयस्क तथा पथरीली चट्टानें आदि सम्मिलित है । (1) कावनिक ससाधा -इस श्रेणी म पादप, जतु व सूक्ष्मजाव (microbes) सया इनसे उत्पन्न भोज्य पदाथ, कोयला, तेल, प्राकृतिक गसे, वन तथा लव डिया सम्मिलित है। प्राकृतिक ससाधनो की बहुलता प्राप्ति की सभावनाआ के आधार पर इह पुन तीन वर्गों में विभाजित क्यिा गया है () सचित ससाधन -( Fund resources )-ऐसे पदाय जिनका उपयोग येवल एक ही बार किया जाता है तथा इहै पुन काय योग्य नहीं बनाया जा सकता। जैसे-कोयला जीवाश्म इंधन, तेल, प्राकृतिक गसे, नोह खनिज, एल्यूमिनियम आदि। इनके गारा अथवा भडारो का विस्तार मानव के बूते में नहीं है। लाखो करोडो वर्षों मे पथ्वी के गम में बनने वाल यह मसाधन निर तर उपयोग में आत रहने के कारण समाप्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं। यह हमारे सचित ससाधन हैं और इन ससाधनो के सरक्षण की समस्या भी अत्य त गभीर है। (प) पुनस्य यो ससाधन (Flow resources)-वर्षा, जल, मता आदि ऐगे माधन है निमा निर तर उपयोग होता रहता है और उह मय उपयोगी स्थिति में पूरा परिवर्तित किया जा सकता है। यह गुनथ्ययी समाधिन पहनात है। (ग) कभी ममाप्त नहीं होने वाले ससाधन (Inexhaustible resources) मानव उपयाग पभी समाप्त नहीं होने वाले ससाधना म गूप मस 48/पर्यापान, प्राति और मानव महत्वपूर्ण है। अमेरिका के एक पारिस्थितिकविज्ञ रेफिडर (1968) का पा अभिमत है कि 305x1015 रिलो बैलोरी क्षमता की ऊर्जा पृथ्वी के भीतर जीवावशेषीय इंधन के रूप मे सचित है। यह विशाल सम्पदा प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष मानव के लिए उपयोग की वस्तु रही है। मनुष्य जीवमण्डल वा एक महत्वपूण सदस्य होने के नाते मूल उपभोक्ता के रूप में प्रतिस्थापित है तथा 61x1015 किलो कैलोरी क्षमता वाली कर्जा का अपने पोषण के अतगत उपयोग में लाता है। खनिज भण्डारों में क्षति -अय स्थानो पर भी कुछ उपरोक्त प्रकार के आवडे दिये गये हैं जिससे विदित होता है कि सचित ससाधन शीघ्र ही समाप्त हो सकते हैं। यदि इस तथ्य को सही मान भी लिया जाय कि विश्व की जन-सख्या आज के समान स्थिरांक पर रुकी रहेगी तथा विभिन खनिजो के खपत की दर भी स्थिर रहेगी, मानव उपयोग में 'खनिजा की उपादेयता' के समय के पैमाने को 'जीवन काल' कहते हैं यहा विश्व के कुछ प्रमुख खनिज भण्डारो का जीवन काल निम्न प्रकार मा य है (1) हिलीयम, मशीनी तेल, प्राकृतिक गैस, युरेनियम, टगस्टन, ताबा, सीसा, जस्ता, टिन, सोना, चादी व प्लेटीनम- 2000 AD तत्र (1) एल्यूमिनियम, कोबाल्ट, मेगनीज व मोल्वेडेनम- 2100 से 2200 AD तर (ii) कोयला, लोहा व क्रोमियम - 2530 से 2800 AD तक खनिजो के विषय मे उपरोक्त जीवन काल अनुमान से अधिक ही प्रतीत होते हैं क्योकि विकसित एव विकासशील देशो में विशेषतया इनको खपत दिनो दिन तीव्रगति से बढ़ रही है तथा बढती हुई जनसख्या के साथ ही शहरी करण औद्योगीकरण की दृष्टि मे यह खपत और अधिक होने की सम्भावनाऐ - पुन चक्रणअनेको खनिज अयस्का का आधुनिक तकनीकी विकास के परिणामस्वरूप तेजी से अभाव हो रहा है और भविष्य में भीषण समस्याओं का जम हो सकता है हम खनिजो की कमी मे कुछ देरी अवश्य ला सकते हैं क्याकि पुन चक्रण द्वारा इन खनिज अयस्को की जीवन अवधि को बढाया जा सकता है । आज खनिजो से बने बरतनो के स्थान पर प्लास्टिक के बरतनो का बरता जान लगा है । चादी रो बने सिक्को के स्थान पर ताबा, निकल गिलट - व जस्ते का उपयोग होने लगा है । पादप पोषको मे नाइट्रोजन व पास्फोरस के स्थान पर जैविक पुन चक्रण को सभावनाओ की खाज की जा रही है । पर्यावरण-ससाधन एव सरक्षण/49 हम खनिजो की कमी को लेकर भी ,जीवनयापन करने की विधि ज्ञात कर है । यदि हम अपने आवागमन के साधनो, ऊर्जा, उद्योगो व सचार तरीकों मे ध्यापक परिवतनो का समावेश करने का विचार करलें तो अपनी जनसख्या पर भी कोई घातक प्रभार नहीं पड़ेगा। जीवावशेष इंधन इनके अतगत ऊर्जा के ऐसे साधनो, या समावेश हाता है जिहें पुन उपयोग मे नही लाया जा सकता-यथा कोयला, खनिज तेल एव गसें। विश्व मे कोयले व खनिज तेला के भण्डार क्षेत्र व मात्रा मे सीमित हैं तथा नित्य प्रति शहरीकरण व औद्योगिकीकरण के कारण उनकी आवश्यकता बढती जा रही है । खपत की वतमान दर से समस्त सचित राशि मे भारी कमी हो रही है और हम ऊर्जा समस्या की ओर बढ़ते जा रहे हैं। कोयले की भी यही स्थिति यद्यपि कोयले के सचित भण्डार पेट्रोल भण्डारो से अधिक हैं । कोयले के उत्पादन की दृष्टि में चीन (स, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, भारत, जापान, पोलंड, चेकोस्लोवेक्यिा, कुवैत, सउदी अरब, ईरान, ईराक, नाईजीरिया, लीबीया तथा इन्डोनेशिया की स्थिति काफी अच्छी है। भारत में कोयले के भण्डार विहार, बंगाल, उडीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू- कश्मीर मेघालय व आध्र प्रदेश में पाये गये हैं। बम्बई के समीप 'बाम्बे हाई' मे समुद्र तल मे तेल के नये भण्डारी का पता चला है, जहाँ 'सागर सम्राट' की सहायता से तेल का खनन किया जाता है। भारत मे कोयले के 131 000 ताख टन के भण्डार हैं जिनके विषय मे अनुमान है कि यह अगले 1000 वर्षों के लिये पर्याप्त होगे यदि इनकी खपत दर आज के समान ही रहती है। भारत आज 170 लाख टन खनिज तेल का भी उत्पादन कर रहा है जबकि उसे प्रतिवप 300 लाख टन तेल की आवश्यकता है । विश्व उर्जा की महत्वाकाक्षाएँ औद्योगिक क्राति के आरम्भ से लेकर सन् 1970 तक एसा अनुमान लगाया गया है कि सम्पूण विश्व मे जीवावशेप ईंधन के द्वारा 16 000 लाख क्लिो वाट/पटा कर्जा का उपयोग किया जाता रहा है। जीवावशेष इधन (कोयले) के 95 प्रतिशत भण्डार अभी भी शेष हैं जिहें उपयोग म नहीं लाया गया है तथा 4 प्रतिशत तेल व 1 प्रतिशत खनिज गैसो के भण्डार शेष रह गये हैं। पट्रोल पदार्थों की खपत दर अपेक्षाकृत अधिक है। इलिगोनिस के ऊर्जा विभाग के निदेशक प्रा डेनिस हज् ने अपनी पुस्तक "माशा की किरणे" (Rays of Hope) में अभिव्यक्त किया है कि विशाल विद्युत सयनों, पक्ट्रियों तथा तीव्रगति से चलने वाले आवागमन के साधनो के निर्माण में पट्रोल एक महत्त्वपूर्ण कारव' है पर तु यह शीघ्र ही समाप्त होने वाला है। 50/पर्यावरण प्रकृति और मानव जल ऐसी स्थिति मे तेल भण्डारो को लूव्रीकेशन, वायुयान तथा पेट्रोरसायन सस्थानो के लिये सुरक्षित रखना अनिवाय है। अन्तरिक्ष उष्मा तथा शीतिकरण के अनावश्यक उपयोगों के लिये पेट्रोल उपयोग का निषेध कर देना चाहिये । केवल अमेरिका ही इस क्षेत्र मे पहल कर बडी विफायत कर सकता है अ यथा पेट्राल के भपटार इस सदी के अन तर जवाब दे देंगे। कोयले के भण्डार भी अधिर लम्बे समय तर माथ नहीं दे सकेंगे। ऐसी अवस्था में जीवावशेषी इंधन के विकल्प रूप मे दूसरे ऊर्जा ससाधनो की खोज करली गई है जो- जल विद्युत शक्ति, पवन शक्ति, अणु शक्ति सौर ऊर्जा तथा जैव गैस के रूप मे प्राप्त की जा सकती है। (1) जल विद्य त शक्ति-अप्यति जल विद्युत ऊंचाई से जल को गिरा- पर गतिज ऊर्जा उत्पन की जाती है। भारत में कई नदियो को बाधकर अनेक कर्जा घरी का निर्माण किया गया है जो जल विद्युत उत्पन करते हैं । विद्युत उत्पन्न बने हेतु-समुद्री ज्वार का भी उपयोग किया जा सक्ता है । फ्रास ने इग्लिश चेनल पर विद्य् त उत्पादन के लिये ज्वार विद्युत सयत्र का निर्माण कर लिया है। भू उष्मा मर्जी के रूप में गम पानी के स्रोतो (geysers) से भी ऊर्जा उत्पन की जा सकती है। (2) पवन ऊर्जा-विश्व के कुछ भागो मे पवन चक्क्यिो का उपयोग काफी लम्बी अवधि से किया जाता रहा है। राजस्थान (भारत) मे गहरे कुओ से पानी खींचने के लिये पवन चक्क्यिो का उपयोग आरम्भ हो गया है । योरोप व अमेरिका मे मिलो को चलाने में यह आशातीत योगदान कर रही हैं। सम्पूर्ण शक्ति को 01 प्रतिशत ऊर्जा केवल पवन शक्ति के रूप में ही प्राप्त की जाती है। (3) अणु शक्ति--यह ऊर्जा कुछ तत्त्वा के विखण्डन या सयोजन से प्राप्त की जाती है। अत्र युरेनियम-235 की चार ग्राम मात्रा को विखण्डित किया जाता है तो उतनी ही ऊर्जा प्राप्त होगी जो 15 मीटरीक टन कोयले के जलाने या 14 वेरेल क ड तेल वे जलान पर मिलती है। युरेनियम-238 व थोरियम 233 आण्विक उर्जा प्राप्ति के और भी अच्छे स्रोत हैं। यह अधिक इधन उत्पन्न करते हैं और विखण्डन के दौरान इनकी खपत भी काफी कम होती है । ऐसा अनुभव है कि 6 20 वर्षों की अवधि एक नोडररिएक्टर म इसकी माता द्विगुणित हो जाती है । भारत इस दिशा मे पापी भाग्यशाली है, उनके पास थोरियम के विशाल भण्डार हैं जा ऊर्जा उत्पादन के उज्ज्वल भविष्य में योगदान कर सांगे। भारत में ऐस तीन परमाणु बिजली घर वायरत है- सारापुर (बम्बई), राणाप्रताप मागर कोटा (राजस्थान) तथा अल्पारम (तमिलनाइ)। पर्यावरण ससाधन एवं सरक्षण/51 आण्विक सयोजन ऊर्जा उत्पादन का दूसरा तरीका है। जब हाइड्रोजन समस्थानिको यथा ब्यूटीरीयम व ट्राईटीयम का सयोजन होता है, हिलीयम बनती है । यही विधि सूय मे क्रियाशील है जिसकी वजह से विद्य त चुम्बकीय विकिरण होता है । इयूटीरीयम के आश्विक सयोजन के कारण विशाल को का उत्पादन होता है तथा यह समुद्री जल से प्राप्त किया जाता है। अनुमान है कि 27 घन किलोमीटर समुद्री जल उतनी ऊर्जा हेतु इयूटीरियम उत्पात कर सकता है जितनी विश्व के समस्त जीवावशेषो ईधन भण्डारा में निहित है। (4) सौर ऊर्जा-वतमान में वैज्ञानिको ने ऐसी विधियां खोज निकाली हैं जिनके द्वारा सूय की किरणो से भोजन बनाने, पानी गम करने तथा कुछ मशीनो को चलाने जितनी क्षमता वाली ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है यथा धूप चूल्हे व सौर बैटरिया। सूय वह साधन है जिसमे कभी नहीं चूकने वाली ऊर्जा विद्यमान है तथा इसमे वायुमण्डल पर भी प्रदूषण का प्रभाव नहीं बनता। (5) जव गस सपत्र-बायो गैस सय त्र का निर्माण सामा य सिद्धात के आधार पर किया जाता है जिसमे गोबर व अन्य काबनिक पदार्थों का उपयोग होता है । इ है जब वायु की अनुपस्थिति में किण्वित किया जाता है तो ज्वलनशील मोथेन गैस बनती है। यह 55 प्रतिशत मीथेन व 45 प्रतिशत कावनडाइ-आक्साइड का समिश्रण है। यह गाव के लोगो को घरल काम के लिये मुहय्या की जाती है। जिस गाव मै 40-50 तक पशु होते हैं वहाँ हर गांव म इस सयन को लगाया जा सकता है। 52/रण, प्राति मोर मानव पर्यावरण संरक्षण मे वनो का महत्त्व -गौतम बुद्ध "यक्ष सवेदनशीलता व असीमित उदारता की जीती जागती प्रतिभूति है जो स्वय के जीवन के लिये आपसे कुछ नहीं मांगते, घरन अपने जीवन के' सभी तस्य मापको उदारता के साथ अपित करते रहते हैं। ये सभी जीयो को सुरक्षा प्रदान करते है तथा पुल्हाड़ी सिये उस व्यक्ति को भी छाया देते हैं जो उहें निममता से काटते हैं।" यह सारा का सारा पर्यावरण जिसम मानव भी एक मुख्य अदाकार है एव वह जिनसे जीवन का सीधा सम्बध है यथा वायु जल, भूमि पादप तथा जीव जतु आदि सब कुछ मिलवर ही पर्यावरण बनता है । पर्यावरण के यह सभी घटक, परस्पर मत प्रक्रिया पर सतुलन को बनाय रखते हैं। सभी घटव एक दूसर का विसी न किसी रूप में अवश्य ही प्रभावित करते हैं । यदि इनम स एर' भी घटप अपन स विलित हो जाता है ता उसकी परिणिती पर्यावरण अस तुलन या कारण बन जाती है और भविष्य एक' भयावह प्रासदी बन सकता है। भारत उन कतिपय देशो में से एक है जि होने अपने सविधान में पर्यावरण सरक्षण की आवश्यक्ता पर बल दिया है । वना, शीला, सरिताओ वय ज तुमा और पादपा तथा वातावरण की शुद्धता एव उन्नति तथा अभि- रक्षा में भारत के हर नागरिक का यह कत्तव्य होगा कि वह उसकी रक्षा करे तथा जीवित प्राणियो पर दया की भावना रखे। मानव जीवन मे अनादि काल से ही वनो का भारी महत्त्व रहा है । वेद पुराण व उपनिषदा मे भी वक्ष की महिमा को स्थान-स्थान पर स्वीकारा गया है तथा उनकी रक्षा के लिये कुछ निर्देश भी अभिव्यक्त है । आरम्भ मे धरती का भाग वनो से आच्छादित था-12 अरब 80 करोड पटेयर भूमि पर वन थे और पर्यावरण, मानव जाति के लिये पूर्णतया अनुकूल था । परतु मानव ने मेवल अपनी आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिये वन सम्पदा का वाछित उपयोग न कर शोषण वति अपनायी तो प्रकृति उसे सहन नहीं कर सकी। गत् 25 वर्षों में भारत वष मे हा 4 लाख हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र नष्ट हो गया है। अब देश के 328 लाख हेक्टेयर भूमि में से केवल 75 लाख हेक्टेयर भूमि पर बन रह गय हैं जो 23 प्रतिशत वन क्षत्र को दर्शाते है। स्वस्थ पर्यावरण के लिय प्रस्तावित यूनतम सीमा 33 प्रतिशत वन हैं। इन 23 प्रतिशत वतमान वन क्षेत्र में भी शिलाखण्ड, हिमानिया, चट्टानें, रेत के पर्यावरण सरक्षण में वना का महत्त्व/53 टोले व मरुस्थली भाग तया नदियां भी सम्मिलित हैं। वह अलग कर देने पर तो केवल 16 प्रतिशत ही या क्षेत्र बचा रहता है। इनम स भी क्वा 10 प्रतिशत अच्छे वन उत्पादा श्रेणो ये हैं। वा ससाधन सरमण पर विचार बरन से पूर्व यह जानना भी आवश्यक है कि ससाधन शन्न का तात्पय क्या है ? मसाधन पाई पदार्थ अथवा वस्तु नहीं है, यह वास्तव म एक मिया है जो एक पदाथ प्राप्त करता है या एक प्रक्रिया है जिसम पदाथ भाग सेता है। मानव-पान ही सबसे यहा ससाधन है अत विचारणा के मतानुगार ससाधन पूब म हाते नही परन् बनते है या मनाये जात हैं। इनके बनने म मानवीय समपद्धता की आवश्यकता होता है और इनवे स्थापित होते ही ससाधन गतित्रम में आ जाते हैं। यह मसाधन क्रियाशीलता के सिद्धात के प्रतिफन हैं। ज़िमरमैन ने ससाधन शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए तीन महत्वपूर्ण तथ्य रखे थे (1) वे तत्व जिन पर मानव की आश्रयता है । (1) जिनमे मानव इच्छाओ की पूर्ति होती है, तथा (1) जिनमे नठिनाईयो या सामना करने की शारिरिक व मानमिय क्षमता है। यह ससाधनो का मूत्यापन करने वालो पर निमर है अत यह वस्तुनिष्ठ अथवा व्यक्तिनिष्ठ होता है। विद्वानो वा क्थन है कि जन संध्या और उनके जीवन-स्तर तथा प्रकृति के संसाधनो के मध्य स तुलित अनुकूलन व सामजस्य की स्थापना ही सरक्षण का मूल उद्देश्य है । वनों का महत्व -- वना की हमारे आर्थिक जीवन मे बड़ी भूमिका है। 2 परागाहो के अभाव मे यह लगभग 5 5 करोड पशुओ को चरने की सुविधा प्रदान करते है। 3 वन लगभग 50 लाख व्यक्तिया को प्रत्यक्ष रूप में व्यवसाय दिखलात है। 4 वनो से सरकार को बडी आय होती है । 5 वनो से लपडी के अतिरिक्त कई गौण उपजें भी प्राप्त होती हैं तथा गौद, लाप, बीटी, के पत्ते, शहट मोम मादि । अप्रत्यक्ष लाम के मतगत वनो को यूनता के पारण जहा एक और मना मे नमी तया वर्षा का न होना आदि बातें सम्मिलित हैं वहा बालों पर नियंत्रण रखना, जलवायु की विषमताओ को दूर करना, जल स्तरों को 54/पर्यावरण, प्रकृति और मानव बनावा, मृदा के उपजाऊपन को बढाना, प्राकृतिक सौदर्य मे अभिवद्धि तया जीव-जन्तुओ के आश्रय स्थलो के रूप मे वना की एक बड़ी भूमिका रही है। श्री चटरवर ने कहा है कि 'वन राष्ट्रीय सम्पत्ति है।' आधुनिव सभ्यता को इनकी महती आवश्यक्ता है । यह मात्र जलाने की लक्डी ही प्रदान नहीं करत प्रत्युत् हमारे उद्योगों के लिये कच्चा माल व पशुओ के लिये चारा भी प्रदान करते हैं । उपरोक्त सदर्भ मे बलवत्ता विश्वविद्यालय के वनस्पतिविज्ञ डा तारक मोहन दास के द्वारा भारतीय विज्ञान काग्रेस म पढे गये शोधपन से एक उदाहरण प्रस्तुन है । उन्होने एक वृक्ष की वायक्षमता का रपयो मे वास्तविक मूल्यावन दिया था। उनका कथन था कि वृक्ष को काटने पर उसका देवल 03 प्रतिशत मूल्य प्राप्त होता है, शेष 997 प्रतिशत समाज के लिये किसी उपयोग का नहीं रह जाता । उनके अनुमार एक 50 वर्ष पुराना वृक्ष जिसका भार 50 टन हो, अगल 50 वर्षों के लिये 157 लाख रुपये मूल्य का लाभ निम्न प्रकार देगा। मूल्य (10 लाख रुपयो में) एक वप में उत्पन 1000 किलोग्राम आक्सीजन 025 (5र प्रति किलोग्राम की दर से) 2 वायु प्रदूषण एव वायुमण्डल की स्वच्छता 050 (वैज्ञानिक यनों की सहायता से मापा गया) 3 वर्षा के जल का सचय तथा वायुमण्डल में आद्रता नियंत्रण 030 4 भूमि कटाव से बचाव तथा नदियो, बाधा आदि में 025 5 पक्षी एव जीव जन्तुओ का आश्रय 025 6 पशुओ के लिये पेड की पत्तियो से प्रोटीन 002 सिल्टिंग से सुरक्षा जोड रुपये 157 यह एक अकाव्य सत्य है कि औद्योगिकीकरण की त्रासदी मे धसती दुनिया को केवल 'वन व वक्ष' ही उबार सस्ते हैं क्याकि वनो का सबसे बड़ा योगदान वातावरण को परिशुद्ध एव स्वच्छ रखना हैं । जीवज तु श्वास क्रिया मे पावन हाईऑक्साइड गम निष्कासित करते हैं तथा कोयला, पेट्रोल, डीजल आदि के दहन के परिणामस्वरूप भी वातावरण अशुद्ध हो जाता है। वूम इस अशुद्ध वायु को प्रहण कर प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा ऑक्सीजन घ पोषक तत्वा मा निर्माण करते हैं । इस प्रकार मानव का स्वस्थ एव दीर्घायु बनाने हेतु वनो का पर्यावरण सरक्षण में वनो का महत्व/55 होना आवश्यक है। मानव या अस्तित्त, उमी प्रगति एव समद्धि काफी ह तब वनो व वृक्षो पर ही निभर है । अत उसे स्वय वनों के प्रति अपने दायित्व का बोध होना चाहिये । चू नि अब हमारे वना या प्रतिशत वाफा अधिक मामा मे गिर गया है और निर तर गिरता ही जा रहा है इस कारण अनेक वय प्राणी भी विलुप्त हो गये है। इन जीवधारिया के विलुप्तीकरण का सीधा सबध पर्यावरण असतुलन से है । आज प्रश यह उठण्डा हुआ है कि दुलभ वय जन्तु व वनस्पति के लिये प्रतिकूल बनते जा रहे पर्यावरण की रक्षा रिस प्रकार की जाय? के हिमालय पर्वत माला अनादि काल से ही इतिहास में भारत की जन प्रहरी के नाम से जानी जाती रही हैं । एशिया महाद्वीप की अनेक जा जातिया ने उत्तर की ओर से अनेक बार भारत पर आक्रमण किये, वितु हर बार हिमालय के उस विस्तत एव बीहड क्षेत्र ने जा 500 मीटर से 8000 मीटर तक की ऊचाई पर स्थित है तथा सदैव बफ से ढका रहता है एक सिपाही की भाति भारत को सुरक्षा प्रदान की है । गष्ट्रीय सुरक्षा तथा विकास र नाम पर 1962 के चीनो आक्रमण के पश्चात वाहनो के लिये यहा सहकाका जाल विछा दिया गया है । अब यहा स्थिति पूणरूप से बदल गई है । भारत अब उत्तर दिशा की ओर से आक्रमण को लेकर "सुरक्षित नहीं' बहा जा सकता है। इस क्षेत्र मे धन जगल हैं, पेडो व झाडिया की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती हैं । अलकन दा, भागीरथी (गगा) काली यमुना सिधु, ब्रह्मपुत्र आदि वारहमासो नदिया सम्पूण भारतवप की प्राण धाराए हैं और यहा मनमोहक जलवायु से आकृष्ट होकर अनेक लोग स क्षेत्र मे आकर बस गय हैं । अब इस पहाडी क्षेत्र में अनेक मैलानी क्षेत्रा, यथा-शिमला, मसी, नैनीताल दार्जीलिंग आदि का विकास हो गया है। नये दौर का आरम्भ हुआ । आर्थिक लाभ के लिये मानव न प्रकृति स्पी कामधेनु का अधाधुध दोहना आरम्भ कर दिया घा जगलो पर कहर बरपने लगा, विनाशलीला का गा ताण्डव प्रारम्भ हुआ जो उन से उग्रतर होता गया। वन सिमटने लगे और बस्तियो से दूर होने लगे। जगला के विरुद्ध तो जसे युद्ध ही छिड गया । बस्तियो मे विना सोच विचार के हजारो की सम्या में पेड़ काट डाले और नदियो के माध्यम से उह बहाकर ले जाया गया । आज भी यह क्रम जारी है। भूस्खलना व बाद का सिलसिला अब माम बात हो गयो है । नतीजा यह निकल रहा है कि धरती की जल अब शोषण को क्षमता भी बहुत कम हो गयी है। कहना होगा कि हिमालय क्षत्र म सक्ट गहराता गया है । जगलो के क्ट जाने से पर्यावरण का अस तुलन हुआ ही है, वहा के जन जीवन पर भी सामाजिक तथा आशिर कुप्रभाव तो 56/पर्यावरण, प्रकृति और मानव । सन पडा है। यह जगन स्थानीय लोगो के लिये, चारे जलाने की लकडी तथा सेनी के उपयोगी औजार बनाने में मुख्य साधन थे। जगतो ये सिकुडन से वहा का जन-जीवन कठोर, अष्टमय व अस्त-व्यस्त होने लगा है और इसान सापने को मजबूर हो गया-इस दुश-चक्र से विस प्रकार निजात पायी जाय। सन् 1965 म देश म लवडी या औद्योगिक उपयोग 127 लाय टन था जो 1990 में वप तक 326 लाख टन हो जाने का अनुमान है। इसी प्रकार इधन के रूप म सक्डी वा उपभोग 1965 मे 1040 लाख टन था 2001 तर 2900 लाख टन होने की सम्भावना है । सा 1980 के आवडो के अनुमार लमही या वृद्धि दर 5 लाख टन प्रतिवप है। वना की दृष्टि मे राजस्थान राज्य की स्थिति अत्य त दयनीय है । रेगिस्तान के प्रसार को रोकने के निय तो राज्य सरकार तथा जनता को व्यक्तिगत आधार पर बहुत कुछ करना होगा। एक विद्वान न सही वहा है 'वक्ष तो बिना मानव में भी जी सकता है परतु मानव विना वा वे ही जी सकता है।" प्रसिद्ध कवि हरिद्रनाथ चट्टोप द्याय न भावुकतावश यहा था कि जब भी कोई वृक्ष गिरता है ईश्वर के शरीर में दरार पड़ती है तथा आव्हान दिया 'वृक्ष, तुम्ह बचाना ही हागा और तुम निश्चित रूप से बचाय भी जावोग'। टेहरी-गढवाल निवासी श्री सुदरलाल बहुगुणा के रुप म वक्षा को एक सच्चा मित्र मिल गया उहोने वक्षो की सुरक्षा के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन ही समर्पित कर दिया है । वन-सरक्षण की दिशा मे 'चिपका आदोलन' उनका साहसी कदम है । उत्तगखण्ट में जमा और चल रहा चिपको आगे- लन केवल हिमालय के पवतीय भाग मे पडो की बटायी रोक्ने वा प्रतिका- रात्मक आदोलन नही है एक प्रत्यक्ष दशन है, व जीवात विचारधारा है और मौजूदा भोगवानी सभ्यता के खिलाफ एक खुली बगावत हैं। यह उपरोक्त पथन प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक तथा भारत महरित क्रान्ति' के उत्प्रेरक प्रो. स्वामीनाथन का है । बगावत का यह विगुन 27 माच मन् 1973 को चमाली जिले के मण्डन गाव मे सवप्रथम बजा जब उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा इलाहाबाद की एक खेल-कूद का सामान बनाने वाली कम्पनी को अगू (Ash) के पड़ों का काटन से गाव के लोगों ने रोक दिया। उन लोणे ने प्रतिरोध के स्वर में कहा जिन पेडो को हमने पाला पोसा है, उनका उपयोग हम अपने जीवित रहने के लिये तो नहीं कर सकते हैं, बहुत दूर आमाद-प्रमोद के साधनो के निर्माण के लिय उह ठेकेदारों को बेचा जा सकता है' यह कौनसा विज्ञान है ?" पर्यावरण सरक्षण मे बनो का महत्त्व/57 चमोली के लोगो ने इस वाणिया विज्ञान या यह कहकर चुनौता अवश्य दे नाली “यति पेड काटने वाले कुल्हाडिया लवर आये तो हम उनसे विपकर उनको रमा करेंगे । यह कुल्हाडिया जिले के गरनाथ क्षेत्र म मलाकिनी घाटी की ओर मुड गई । वहा भी बगावतियो न उनका पीछा किया तथा वक्षो को काटने से रोक रखा। जुलाई 1970 म अलकन दा पी धाग मे अवरोध उत्पन हो जाने के कारण गगा नदी में भयकर वाढ आयी और जन धन की अपार क्षति हुई। कई गावो के धसने ये चिह्न देसे गये व अनेक स्थानो पर भूस्खलन के कारण बहुत सारे व्यक्ति दब गये। ऐसे ही समय चिपको मा दालन' को नया बल मिला। माच 1974 मे ही अलाना क्षेत्र में स्थित 'रेणी गाव के निवासिया को वहा पर अक्ति वक्षो का राक्न की प्रेरणा दी। इन वक्षा को पाटन हतु एक ठेकेदार को बेच दिया गया था। जब पेड काट पाने लग, कुहाडी लिये मजदूरो को वहा की महिलाओ न यह कह पर जगल स बाहर खदेड दिया था यह जगल हमारा पीहर मायमा है हम इसे फटने नहीं देंगी।" मायका महिलाओ के लिये वह स्थान होता है जो सक्ट के समय उनका सवल वन कर खडा हो जाता है। रेणी गाव के आदोलन के पश्चात, अगस्त 1974 मे चिपको आदोलन वे कायक्ताआ का ध्यान विराजा व तारपीन बनाने वाले चीन के पेडो से लीसा निकालन हेतु पेड पर किये जा रहे गहरे घावो से होने वाली क्षति की आर गया। इसके लिये अक्टूबर 1974 मे धरने देवर नीलामा अवराध उत्प न दिये गये तथा उपवास रखकर सरवार का ध्यान आकर्षित समय किया गया। 30 मई 1977 को उत्तराखण्ड के पाच मनिपियो ने चीढ के पडो या प्रदन गुन वेहरी गढवाल जिले के हगल घाटी मे चोद के पेडो पर गोली मिट्टी का लेपकर गोद निकालने हेतु ठोकी गई कीलो को निकाल कर फें दिया तमा उनकी रक्षा की। इन सबका परिणाम यह निकला चि हिमालय के वना की वे लिमै चिपको बादोलन को मागों का समर्थन घरते हुए उत्तर प्रदेश मार ने भी अपनी यन नीतिया म आमून चल परिवतन बरो वा मानस बना लिया । पुछ अवसर पर घाटी की महिलाओ ने अत्याणी गाय मे बटाई र नियमपित पठा को रायो वायर र उनकी रक्षा का सपल्प लिया। सुरक्षा 58/पर्यावरण प्रकृति और मानय . इसी प्रकरण में वृक्षो को काटने को लेकर महिलाओ की एक और वेदना सामने आयी है। राज्य सरकार न वैज्ञानिक दोहन की दुहाई देकर वनो का काटना जारी रखा। वन अधिकारियो को विज्ञान सिखाने हेतु अनपढ महिलाओं के नाम लेकर भेजा गया । परन्तु महिलाओ न दिन-हाडे जलती हुई लालटेनो से उनका स्वागत किया। अदवाणी पे जगला में ग्रामीणो को लालच देकर पुसलाने के जब कुल्हाडी वाला के सब ही प्रयत्न असफल रहे तो 1 फरवरी 1978 को सशस्त्र पुलिस के 50 जवाना की टुकही कुल्हाडी बाला को साथ लेकर वहा पहुची। इस अवसर पर स्वय महिताऐं यह कहत हुए पेडो के साथ चिपक गई 'पड नहीं, हम कटेंगी", और सगीन तनी की तनी रह गई। 'चिपको आदोलन केवल हिमालय मे रहने वाले लोगो की समस्या का उत्तर नहीं है यह तो समस्त मानव जाति को समस्या का हल है। पर तु 'विपको के लिये भी वडा सकट बना रहता है । वन के ठेकेदारो, उद्योगपतियो और उनका शह देने वाले राजनीतिनो तथा प्रशासनिक अधिकारियों के सगठित विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उनके पास बगावत करने के लिये कानून भी तनवार है। यह सच है कि भापणो म 'चिपको' को समथन देना थाज फैशन बन गया है बुद्धिजीवी व वैनानि इस निष्क्ष पर अवश्य पहुच गये है कि अब राजनीतिको का युग समाप्त हो गया है और पारिस्थितिवी (Ecology) का युग आरम्भ हो गया है । स्वय थी सुदरलालजी बहुगुणा के लेख-चिपको सरक्षण का अभिनव 'जन आदोलन पढ पर यही निष्कप निकलता है कि उस गरीब वृक्ष की पुकार' सुराने वाला कोई नहीं है। बनो तथा वृक्षों सरक्षण सदभ मे गढवालियो वा चिपको आदोलन, राची (बिहार) में नेता वारसा मुण्डा की बगावत तथा डोली (राजस्थान) के विश्नोई समाज का योगदान सवविदित है। लगभग 500 वर्ष पूर्व भी राजस्थान में जोधपुर राज्य के रामासडी गाव की श्रीमती वरमा व श्रीमता गौरा ने वृक्षा की रक्षा हेतु अपने प्राण योछावर किये थे। दूसरी घटना ग्राम तिलासणी (जोधपुर) में श्रीमति खोवणी तथा श्रीमति नेतू जीणा ने पेडो को काटने पर विरोध प्रकट किया और मौत की बलिवेदी पर राशी खुशी चढ गई । सेजडली भी जोधपुर से 25 किमी की दूरी पर एक छोटा गाव है जहा 1787 AD म खेजडो के पडो को काटने पर श्रीमती अमता देवी दामी व चीमा ने न केवल इसका विराध ही किया वरन् साथ मे 363 महिलाओ ने अपने प्राणो की आहुति दे दी । महिताओ का सीधा सम्बध गह ऊर्जा से है अतएव महिलाएँ परस्पर जागरूाता उत्पन्न बर परिवार पयावरण सरक्षण में वनो का महत्त्व/59 पत्याण, आपिय स्वास्थ्य सबधी पायमों को सपल घनाकर पर्यावरण शुद्ध रयन या सपन प्रयास कर सकती हैं और समाज यो विषम परिस्थिनिया से बचा सपती हैं। 'चिपसो' शब्द पेडो को पाटने से बचाने के लिये पडो का मालिंगन करने या उनसे चिपर जाने के आधार पर प्रचलित है। यह शब्त विश्व क सभी साहित्यो में लोकप्रियता ये चे सोपान लांघ गया।"चिपयो' दक्षिण भारत मे भी अप्पिको के रूप में उभर पर मामने आया। 'अप्पिका' पनड भाषा का शब- है और चिपयो पा पर्याय है। यह आ दोलन चिपो में 10 वप के पश्चात अगस्त सन् 1983 मे प्रकट हुआ था तथा बयेही हाउडल प्रोजेकर पर पनड के लोगों ने गुF पिया था। यह साफी जोश-खराश के साथ एक महीना व आठ दिन तर चलता रहा था। युवाया न जब देखा कि उनके गाव ये चारो जोर के जगल धारे धीरे गायर हात जा रह हैं ये इस आदोन म जोर-शार से लग गय । उहान पाया कि कागजो पर तो प्रति एकड दो पड़ा की कटाई दियाइ जाती है परन्तु वास्तव म काफी अधिक संख्या म पड़ काटे जाते है। गाव वालो ने हर पडो के काटे जान पर पूरी तरह पावदी लगाने को माग की । यहा पर लागा का यही नारा था कि पेडा वो काटना है तो पहले हमारे ऊपर कुल्हाही चलाआ। अहिंसा के इस आदतन न अन्य लागो को भी प्रेरणा दी है। इस प्रकार के आदालन, प्रकृति के नाजुक सतुलन को बनाये रखन की राह दिखाते हैं जा सामूहिक हैं, व्यक्तिवादी नहीं । पुरुषो, स्त्रियो, सामाजिक कायकर्ताओ छात्रो, वैज्ञानिको यहा तक की सरकारी अधिवारिया ने भी ऐसे आदोलनो को स्वीकारा है । अब यह आवश्यक हो गया है कि नाजुक व जल ग्रहण क्षेत्रो म किसी भी किस्म के पडो का गिराया जाना राक दिया जाय और वनाच्छादन वढाया जाय । वन व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य होना चाहिये। मिट्टी की रक्षा, जलधारण व पर्यावरण का स तुलन । वनरहित कर दिये गये पहाडी ढलाना को फिर से हरा भरा बनाने के लिये वक्षारोपण किया जाप जिसम जनता का भरपूर सहयोग लिया जाय । सरक्षण की दृष्टि से वन रक्षा व वन-रोपण एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं और लोगो को शिक्षा के माध्यम से यह महसूस कराना आवश्यक है कि यह वायत्रम उनका अपना है । 60/पर्यावरण, प्रकृति और मानव पर्यावरण प्रदूषण , पर्यावरण प्रदूषण, आधुनिक युग मे, मानव के लिये मबसे बड़ी चुनौती वन गई है। विकसित व विकासशील देश सभी, इस समस्या से गभीर रूप में चितित हैं। भूतपूर्व प्रधान मत्री स्व श्रीमति इदिरा गाधी ने पर्यावरण प्रदूषण के खतरो को पहिचाना और इस पर काबू पाने के लिये स्वतन केन्द्रीय पर्यावरण मत्रालय की स्थापना की। तब से अब तक राजकीय और गैर राजकीय स्तगे पर अनेक विचार गोष्ठियो मे इस समस्या के समाधान के उपाय ढूढने का प्रयत्न किया जा रहा है। पर्यावरण सम्बधी रक्षा कानून बना दिये गये हैं पर तु मान कानून बना देने से ही तो काम नहीं चल सकता। जब तक आम आदमी को पर्यावरण प्रदूषण तथा उसके सम्भावित खतरी से अवगत नही करवा दिया जाता, तब तक इस समस्या के समाधान की कल्पना करना ठीक नहीं होगा। साधारणत हम जिस स्थान पर निवास कर रहे हैं, उसके आस-पास के सभी प्राकृतिक परिवेश जैस जल, वायु मृदा वनस्पतिया, धूप, वन एव वक्ष तथा वन्यप्राणी आदि हमारा पर्यावरण या प्राकृतिक वाता- वरण बनाते हैं । फिलहाल उचित होगा, हम देखे की 24-25 किलोमीटर तक की मोटाई तक की वायुमण्डल-वायु का आवरण हमे लपेटे हुए है, उसमे से भी 15-16 किलोमीटर की वायु पट्टी को समझने भर मे काम चल जायेगा। इसी पट्टी मे हम देखने को मिल जाता है-बदलता है रग आस्मा कैसे कैसे । इसी पट्टी मे हम जीवनोपयोगी विभित गैसें भी मिल जाती हैं जिनम प्रधान हैं, नाइट्रोजन 78 प्रतिशत, ऑक्सीजन 21 प्रतिशत और शेष । प्रति- शत में जलवाष्प, रजवण, सूक्ष्म जीवाणु, परागकण, 'हाइड्रोजन, हिलीयम, आगन नियोन, निपटान काबन डाइऑक्साइड आजोन आदि की बारात । वतमान मे हम ऐसे पर्यावरण में रह रहे है जो जैविक क्रियाओ का बना है। माक्सीजन जो हम श्वसन मे ग्रहण करते है कावन डाइऑक्साइड का हरे पादपो द्वारा उपयोग पर बनती है और इस प्रकार पर्यावरण स्वत ही शुद्ध होता रहता है । ऐसा भी अनुमान है कि गत 100 वर्षों मे 12 5 लाख टन फिल्निट, 14 टन आरसेनिक, 60 लाख टन कोबाल्ट, व 8 लाख टन निक्लि जो अत्यत विषले तत्त्व हैं, वायु पट्टी में प्रवेश कर चुके है। जीवावशेष इधन पे ज्वरन से इस शताब्दी मे 24 लाख टन ऑक्सीजन वा दहन हुआ है व 26 लाख टन कार्बन डाइ ऑक्साइड वायु मे विमुक्त हुई है। इसके परिणाम- स्वरूप वायु मण्डल मे पावन डाइ आक्साइड की प्रतिशत बढी है और ऑक्- पर्यावरण प्रदूषण/61 सीजन की प्रतिशत कम हुई है। यह स्थिति अत्यत भयावह है । स्पष्ट है कि प्रकृति ने वनस्पति को जीवनदायिनी नाइट्रोजन तथा मनुष्य को प्राणवाय आक्सीजन बड़ी ही दरियादिली स वाशी है, अगर हम चाहें तो शराफ्त से प्रति के साथ मिलकर इसका भरपूर साभ उठा सकते हैं, पर्यावरण सम्बधी प्रदूपण जल व वायु तक ही सीमित नहा रह गया है, प्रदूपण तो आज सवव खान-पीन में भी हैं शोर-शरावे में है, साथ ही नागरिक और पारिवारिक जीवन में भी समा गया है। म सम्बधी विचलित कर देने वाली बावली लहर में भी विद्यमान है। मानव मान की इस उखाड-पछाड से खुदा तो नहीं, मगर उसकी खुदाई मे प्रकृति को अवश्य ही चकार म डाल दिया है। जन-मख्या वृद्धि जिस तीव्रता के साथ खाद्य भण्डारा का सफाया करने में उतारू हो गई है उससे तो स्पष्ट है कि यदि आज मछलिया नहीं होती तो मनुष्य का क्या हथ होता ? एक वार वनारम शहर मे गगा किनारे जाकर दखिये, वहा पर हर सौ क्दम पर पावन गगा मे गदे नाले प्रवाहित हो रहे है। मुर्दे भी नहाने वालो से आकर टकरा जाते है । भारत की सबसे पवित्र पावना नदी का यह एक उदाहरण है । हमारी सैक्डो नदियो, तालावा और शीली पर क्या बीततो होगी। आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण शहरीकरण तथा भोगविलास' को अधी दोड मे मानव पागलो की भाति भागा जा रहा है उसे पीछे मुडकर दखन स क्या वास्ता। उसे तो बस उद्योगों को बढाना है, वस्तिया व कोलोनिया बसानी है । प्रकृति द्वारा बख्शी धरती भी उस छोटी पड़ने लगी है । एव' ओर वह निर तर जगलो को काटता चला जा रहा है तो दूसरी ओर 'हरित क्राति' वे नाम पर मरुस्थलो मे बाग लगाने की तम ना रखता है। सागर तटा को पाटते-पाटते जितनी भूमि और मिल जाय, इस जुगाड मे लगा हुआ है। देवर जो अत्यन्त उपजाऊ सागर तट की एम सरी सो पट्टी, उसे विरासत में मिली हुई है उसे भी उजाडन में कोई कसर नहीं रख छाडी है । बीसवीं सदी मे यातानुकूलन का एक बडा शोर चर्राया है जो प्राकृतिक सतुलन को विगाडने का एक अनुपम साधन है। गर्मी मे शात की और सलियो मे उष्पाता की, गील दिना म सुम यो इच्छाएँ नित्य प्रति बढ़ती जा रही है । गमिया म उसे गोभा व मटर को आवश्यकता है तो शरद अतुम भाजन माय आम व परबूजे भो चाहिये। यह सर करिश्में तो वैवल बिजली घर ही दिखा सक्त है जो वातानुक्लन तथा फ्ला आदि वे मामयिर रार ण या एक मात्र साधन हा मपन हैं । आईय-जरा उस वायु आवरण 62/पर्यावरण प्राति और मानव ले पृथ्वी के रम्बल की ओर भी गौर करें जिसमे चिमनियो, कारो, ट्रको, रेल- गाडियो व पैयट्रियो आदि से निकला धुआं पूरी तरह समा गया है । स्टील के पारखानी से, धातु उत्पाद सस्थानो से, खाद्य तथा वीटनाशी रसायन उद्योगो से, तेल शोधक रिफायनेरीज़ से, सेतो व चना मे स्थान-स्थान पर जलाये जान वाले कूड़े के ढेरी से उढते हुए धुआं मे सत्फर डाइ आक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जानलेवा वाबन मोनाक्साइड पारा एस्विस्टॉस, सीसा, जस्ता अमोनिया, कोबाल्ट, आरसेनिक व रेडियाधी गैसो की भरमार रहती हैं जो वायुपट्टी में व्याप्त होने जा रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के पश्चात अमेरिका व रूस ने बेतहाशा परमाणु विस्फोट किये, मिहोने पर्यावरण की तो धज्जिया ही उडा दी। उनसे विषाक्त धास आदि चरन पर मवेशियो तथा उनका दूध पीने वाले जीव मत्यु का आलिंगन करने लगे, तब हारकर अतर्राष्ट्रीय स्तर पर जणु विस्- पोट पर रोक लगानी पड़ी लेकिन परीक्षणो हतु तो आज भी भूमिगत विस्फोटो का क्रम रुका नहीं है । याद्य प्रदूषण के क्षेत्र में तो भारत अद्वितीय व अग्रणी कहा जा सकता है यहा तक कि जीवनदायी दवाईयो और सखिया (Arsentc) तक मे मिलावट या बोलवाना हो गया है। परत मिलावटियों ने आपका जोना तो जोना, मरना भी मुश्किल कर दिया है। 2 प्रदूषण एव जन स्वास्थ्य अपने अल्पकालीन लाभ के लिये मानव प्राकृतिक सम्पदामो या दोहन करता आ रहा है। उसने यह कभा नहीं सोचा कि इससे वातावरण मे अवा- छनीय परिवतन आ जायेंगे। बिना सोचे समझे मोटर गाडिया व रेल गाडिया का प्रयोग श्रोद्योगिकाकरण कपि वा औद्योगिकीकरण, जनसख्या वद्धि, शहरीकरण, मानव की नित्य प्रति बढती हुई महत्वाकाक्षाएँ, आवश्यक्ताऐं, प्लास्टिक जसे मश्लेपित रसायनो का अधिक से अधिक उपभोग आदि सभी वातावरण म अनिश्चितता व दूपण उत्पन भर रहे हैं। आज यह स्वयसिद्ध हो चुका है कि सभी प्राणी, जम से लेकर मृत्यु तक, अपने सम्पूर्ण जीवनकाल मे पर्यावरण के सभी प्राकृतिय ससाधना का मुक्तरूप मे दूतगति से उपभोग बरत हुए, जैविक-क्रियाएँ सम्पादित कर रहे हैं। कोई भी एमी प्रक्रिया अथवा पदाथ जो प्राकृतिक समाधनो के मुक्त उपयोग म बाधा डालते हो या व्यवधान उत्पन करते है, उसे 'प्रदूपक' पहा जाता है, तथा फ्ल के रूप मे स्थिति को 'प्रदूषण कहा जाता है। दूसर शब्दो में इस प्रकार भी ध्यत्त विया जा सकता है कि "प्राकृतिक साधनों की शुद्धता को प्रभावित कर, उनकी जीवन उपयोगिता को कम करने या नष्ट पर्यावरण प्रदूषण/63 परन वाले पदाथ 'प्रदूपर' और ऐसी प्रणिया 'प्रदूषण' है । सीधे अर्थो म अभिव्यक्त है कि अवाछनीय पदार्थों या तत्वा भी मिलावट ही प्रदूषण है। यह भी यहा जा सकता है कि प्रदूपर उन यस्तुओ के अवशेष है जिह हम बनात हैं, उपयोग में लाते है और बाद में उह फेर देत है। वटती हुई आबादी तथा प्रति व्यक्ति बढ़ती हुई आवश्यक्ताआ म पारण व्यक्ति प्रति वप अधिर' से अधिर' अवशेपों को पता है तथा फेंगी गई वस्तु को पुन काय योग्य बनाई जाय तो उस पर वास्तविक्ता स भी अधिर रकम को सच करना पड सकता है जिसका भार मानव समाज को ही वहन करना पडता हैं। हरित प्राति की सफलता के लिय भारी मात्रा म उवरको, कोटनाशिया, पीडवनाशिया, आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसस जल-प्रदूषण का बढावा मिल रहा है । विशाल उद्योग, अवश्य हो मानव समाज के लिये उन्नति का मार्ग खोल रहे हैं, वही वे सश्लेपित रसायनो-पारा, सीसा, जस्ता आदि से उत्पन्न अज्ञात उत्पादनो का जाम दे रहे हैं। रडियोधर्मी तत्त्वो स होग वाले जल एव वायु प्रदूपणा को छिपाया नहीं जा सकता। कोयला डीजल, पेट्रोल व अनव जीवाश्म इंधना से श्वास को अवरद्ध करने वाली गैसें मा जीवन के लिखे खतरा सिद्ध हो चुकी है। प्लास्टिक' जैसे सश्लेपित रसायन भी ठोस अपशिष्टो से छुटकारा पान की समस्या भी बराबर धढती जा रही है । नये अपमाजक (detergents) (जिनका सूक्ष्मजीवो द्वारा अपघटन नही हो सकता) भो नदियो व तालाबो को दूपित कर रहे है। प्रदूपण की यही समस्याएँ हर व्यक्ति को बाधे हुए है । इसको गम्भीरता भिन-भिन्न देशो में भिन्न हो सकती हैं--अविकसित राष्ट्रा मे भोजन व प्राकृतिक सम्पदा की रमी प्राणिया में अपशिष्टो ने वारण, रोगो को उत्पन्न करने म सहायक हैं तो विकसित राष्ट्र औद्योगिकीकरण, कृषि नौद्यागिको व रसायन प्रापण से गम्भीर रूप मे ग्रसित है । प्रदूषण क्या करता है ? यह मानव समाज को तान प्रकार से प्रभावित करता है (1) ससाधनो के उपयोग के पश्चात उत्पादो का अनावश्यक रूप में शेप रह जाना तथा उनसे हानिया। (1) प्रदूषण की मात्रा में कमी लाने के कारण या उनके नियन्त्रण का अत्यधिक ध्यय मानव समाज को वहन करना, तथा (an) प्रद्पण के कारण मानव स्वास्थ्य पर कुप्रभाव । उपरोक्त तीनो म से प्रदूषण का अतिम प्रभाव ही सबसे अधिक खतरनाक सिद्ध हो रहा है । अध्ययन व आरडा से नातव्य है कि तपेदिक, मोतीझरा व 64/पर्यावरण, प्रकृति और मानव व डिपथिरिया जैसे मक्रामक रोगा से मृत्यु दर मे भारी कमी आयी है परन्तु वातावरण सम्ब धी श्वास रोगो व कैसर से मृ युदर उतनी ही अधिक बढ गई है। लेब तथा सेस्किन (1970) के आकलन के अनुसार केवल शहरी क्षता मै ही वायु प्रदूषण मे 50 प्रतिशत कमी से रोगी के उपचार तथा बीमारी मे खोय गय काय घटा की कीमत के रूप में सालाना 20 परब डालर की बचत हो सकती है। इस बचत मे माटर गाडियो एव औद्योगिक दुघटनाओ के कारण होने वाली मानव विपदाओ, मृत्यु अथवा असमथता (disability) की कीमत सम्मिलित नहीं है। इन दोनो ही लेखको ने सभी श्वसन रोगो तथा वायु प्रदूषण के मध्य गहरा सम्बध भी प्रमाणित किया था। इनकी मा यता है कि कैसर से होने वातो मत्युआ को प्रदूपण से सम्बधित बतलान के लिये भी काफी प्रमाण उपलब्ध है। ज्यो-ज्यो मानव शरीर पर वाता- वरणीय प्रतिबल बढत हैं, शारीरिक प्रतिरोध कम हो जाता है और रोग बढ़ जाते है। वायु-प्रदूपण व जन-स्वास्थ्य वायु प्रदूषण के बढत प्रकोप का अध्ययन पश्चिमी देशो मे आरम्भ किया गया। शटैलिन व लैडो (1961), कोहने एव साथी (1972) नथा मस्टार्टी एव लेयोनाड (1974) ने ब्रिटेन व अमेरिका में वायु-प्रदूषणा से होने वाले मानव रोगो की विस्तत समीक्षा की है । भारत मे भी वे द्रीय जन स्वास्थ्य इजीनियरी अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने 1970 म बार महानगरो के पर्यावरण वा सर्वेक्षण दिया था और अत्यधिक चौकान वाले आपडे प्रस्तुत किये थे देहरादून के चूना पत्थर उद्योग की एक सर्वेक्षण रिपोट यहा प्रस्तुत की जा रही है । यह उद्योग दो भागो मे विभक्त है (6) भट्टिया म चून के पत्थर को जनाकर चूना प्राप्त करना तथा (1) जला हुआ चूना पत्थर मशीनो में पीसकर चूना तैयार करना । इस उद्योग में निरतर गैसें, धूल व धुआ निकलता रहता है । गैसा म काबन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, वाबन मोनोऑक्साइड, नाइटोजन के आक्साइडस तथा हाइड्रोजन साइनाइड प्रमुख हैं । इस उद्योग मे लगे 50 कमचारियो के स्वास्थ्य के अध्ययन में पाया गया कि परिणाम काफी चिताजनक थे। क्याकि 40 क्मचारी श्वास के रोगों व रक्ताल्पता ((anaemia) से ग्रसित थ । 20-25 वप आयु वर्ग के क्मचारी अपक्षाकृत पर्यावरण प्रदूषण से कम प्रभावित थे लेविन 30 वप से अधिक आयु धग वाले कमचारी अधिक । रक्त परीक्षण पर 60 प्रतिशत से अधिक कमचारी रक्ताल्पता + शिकार थे, इनकी नाडी गति धीमी तथा रक्तचाप भी कम था। खासी, बलगम, जुवाम, गले के रोग 75 प्रतिशत से पर्यावरण प्रदूपण/65 गैसीय प्रदूषण अधिव ही लागो पो ये। यह बात भी सर्वेक्षण द्वारा जात हो सकी कि उस उद्योग के अतिरिक्त ममीप मे रहन याल नागरिया में भी उपरोक्त रोगा का पता लगा है। सारिणी रोग वारन डाइ-ऑक्साइड -दम पटना कावन मोना-ऑक्साइड -~-रक्त में ऑक्सीजन प्रवाह म यमी, जहरीना प्रभाव। कावन के अन्य आपसारडस -रक्त हिमाबिन मे सयुक्त हाकर पारबॉक्मी हिमाग्लोबिन बनाता है जो एव विष है तथा मृत्यु का कारण बनता है। मरफर डाइ-ऑक्माइड - आँख, नाक व गले म सूजन, तेज मिरदद तथा मृत्यु नाइट्रोजन आक्साइडम -~बासी, कफ, गले की गिटियो मे सूजन, जिटाइटिस, म्वर यन शोध । हाइड्रोजन साइनाइड -स्नायु तव भनियाशील होना, नेन दोष गैसीय धूल तथा धुआ -आख व गले के रोग-फेफडो के रोग जसे दमा, खासी व ग्रोनकाइटिस । वणित अध्ययन से प्रस्तुत है वि शहरो म नौद्योगिक प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव पडत हैं और मनुष्य का भारी हानि उठानी पडती है । हृदय रोग, रक्ताल्पता, श्वास व नेत्र रोग काफी हद तक वायु प्रदूषण के कारण हा होत हैं । सूक्ष्म गैसीय ध्ण वे कण नामिका छिद्रा में होकर फेफडा में पहुंच जात है। सल्फेट कणो से निमोनिया हो सकता है । दिपली गसो से आखा म जलन जुकाम, बलगम व श्वास तथा गले के रोग, बेहोशा व मिर दद होन लगते हैं । फेफ्डा की आक्सीजन धारण क्षमता व लचीलापन समाप्त हो जाता है जिसस रक्ताल्पता होने लगती है । शोध कर्नाओ पो मा यता है कि सास के रोग, राजयक्ष्मा (टी वी ), दमा जुकाम, खासी, टॉ िमलाइटिस पर एजा आदि का सीधा सम्बध उस स्थान पर स्थित बौद्योगिक इकाईया ही हो सकती है । वायु प्रदूषण के कारण ही एक अय समस्या मारत के कुछ महानगराम उठ खडी हुई है जहा कपडे को मिलें अधिक है। महाराष्ट व गुजरात राज्य के बम्बई, मूरत व महमदावाद म रूई मे स्थित धूल के कणो को मात्रा असहनीय 66/पर्यावरण प्रकृति और मानव ।

हो गयी है तथा मजदूरो मे बायोसिनोसस नामर रोग घर कर गया है । इन कयो की सीमा जब 100 थी, यह रोग भी सह्य था 1 पडित (1973) के मतानुसार अब यह सीमा रेखा 763 के विदु को पार कर गयी है और यह रोग अपना विकराल रूप धारण कर गया है। जम्ता केडमियम तथा पारा यद्यपि वायु के प्राकृतिक घटका की श्रेणी में नहीं आते परतु जस्ता खनन के अवसर पर जस्त के कण मानव क लिय खतरा अवश्य बने रहते है । जब भी तावा, जस्ता व सीमे का खनन क्यिा जाता है, जस्ता भाप बनकर उहता है । केडमियम भी एक मूक्ष्म पोषव है, अति सूश्म मात्रा (traces) मे मानव वृक्क, फेफ्डो तथा यकृत मे जमा हो जाता है। इससे फेफडा में खुजली आरम्भ हो जाती है तथा मूत्र नलिकाएं भी कुप्रभावित होती है। जल प्रदूषण व पर्यावरण स्वास्थ्या- वायु मानव के लिये आवश्यक है ठीक उमी प्रकार जल भी आवश्यक है। जल तथा वायु दोना के बिना हमारा अस्तित्व सतर म पड जाता है । पोन के पानी के सम्बध में भारत की गिनती सम्पन्नतम देशा मे होती है । लेकिन जिस प्रकार वायु मे प्रदूषण के कारण पर्यावरण पर प्रतिक्ल प्रभाव पडा है, उसी प्रकार जल प्रदूपण स हमार जीवन व पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है । जल प्रदूषण का प्रमुख कारण बढती जनसख्या के कारण वना का विनाश ही है । तालाब झील, पोखर, नदी, नाला व नहरा के वरास्टोक दुरुपयोग से प्रदूषण मे वृद्धि हो रही है। गगा-जमुना जसा पवित्र दिया भी औद्योगिक कचरे को ठिकान लगान के उद्देश्य से काम म ली जाती है । इस विषय में अनेक उदाहरण दिय जा सक्त हैं। पर्नाटक के हरिहर शहर म हरिहर पाली फाइवर फैक्ट्री का पानी तुगभद्रा नदी मे फंवा जाता है जिसम उसरे पानी या रग काला, भूरा, ताल व बदबूदार हा गया है। इस गद पानी में विपली गैसें यथा-सल्फर डाइऑक्साइट, पायन-माना आरमाइड व हाइड्रोजन सल्फाइड के कारण लोगो के पेफडे छलनी हा रह है । यहाँ पहल प्रति एकड 6-7 टन ज्वार पदा होती थी अव देवल 2 टन हाती है । नीम पड भी पोले होत जा रहे हैं। राजस्थान में जोधपुर, पाली, तया मालोतरा के लघु उद्योग संवडा लीटर पानी नालियो मे छोइत रहते है। वहाँ को मिट्टा रेतीली है अन पानी के माय विपल रामायनिक पदार्थों प प धार पुओं, तालाबो व अन्य जनाशया म आ जात है जिसका सीधा प्रभाय अन्य जीया, घरेलू पशुओ तथा मानव स्वास्थ्य पर प्रतिपूल पहता है। विभि उद्योगा म सयन कोटा परने में रिये जर प्रयुरा रिया जसा नम जल नगिया व मीना म यिसजिन लिया जागा सो जानीय ধাবি मस्तित्व को भी खतरा हो जाता है। ऐसे प्रदूषित जल के सवन से जलवाहित राग जैसे हैजा, मोतीपरा, शिशु प्रवाहिका, पेचिश रोग उत्पन्न हो जाते हैं। कारखाना के अवशेषो म अति भयकर तत्व विद्यमान रहते हैं जिनसे विभिन्न प्रकार की बीमारियां हो जाती है और कंसर तक हान की सम्भावनाएं होता हैं। नदियो मे बढते जल-प्रदूपण के कारण महतियो यो दुर्ति हो रही है । वायु रस जनित रोगो ने मकामपयकृतशोध, पोलियो, सूक्ष्म जन्तुओ से फलन वाल रागो मे अभिपि अतिसार, अभोपिर यकृत एप्सिस, आतो मे एमरिस, पतिमि सम्व धी रोग हो जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रो म प्रदूषित जल ग्रहण करने मे नारु रोग का खतरा बना रहता है। जल के प्रदूषण से फ्लोराइड की मात्रा दतक्षय या द त विकृति रोग हो जाते हैं। भूमिगत जल मे लोहे के लवणों 'वारण बदहज्मी व कोष्ठबद्धता जैसी बीमारिया भी हो जाती हैं। आज देश में बडे-बूढे, औरत आदमी, अमीर गरीब आदि विना जातिगत व क्षेत्रीय भद-भाव के सभी को औपचारिक व अनौपचारिक रूप से प्रदूषण फैलन के कारण तथा उनके दुष्प्रभावा के बारे मे ज्ञान प्रदान करते हुए पर्या वरण को सुरक्षित व सतुलित बनाय रखने हेतु राष्ट्रीय अभियान आरम्भ करने की महती आवश्यकता है। प्रत्येक देशवासी का अपना नैतिक क्तव्य बनता है वि' वह समाज राष्ट्र तथा अतराष्ट्रीय स्तर पर सावजनिक स्वास्थ्म को ठीक रखने मयागदान करे। 68/पर्यावरण प्राति और मानव जन-संख्या तथा पर्यावरण प्रदूषण यह एक अटल सत्य है कि मानव जन-सख्या उही प्राकृतिक नियमो से प्रेरित है जिनके द्वारा अय जीव सख्याएँ प्रचालित होती हैं। एन पारितत्र मे जन-मम्या वृद्धि तथा जम-मत्यु इनके भौतिक व जविक पर्यावरण पर आधारित है । भौतिक अथवा अजीवक पर्यावरण के अतगत जल, वायु सूय का प्रकाश, तापमान मृदा चट्टाने और खनिज आदि सम्मिलित है जरवि जैविक वातावरण सूक्ष्म जीवा, पादप तथा जन्तुओ का विशाल समूह है और मानव भी उसी समूह या समुदाय का एक अभिन्न अंग है । मानव अपन श्रेष्ठ विकसित दिमाग-मस्तिष्क के द्वारा सोच सकता है, योजनाएं बना सकता है तथा अपन विचारा का आदान-प्रदान करने की क्षगता रखता है। यह औजारो तथा मशीनो का निर्माण कर प्रयोग मे ले आता है, नये पर्यावरण स्थलो का निर्माण, सृजन कर सकता है तथा अपनी सामाजिक व आर्थिव आस्थाओ के अनुकूल पूवस्थित प्राकृतिक 'पारितव' का विकास कर सकता है। कृषि व शहरीकरण मानवीय योग्यताओ के दो ऐसे विशिष्ट उदाहरण है जो उसके पर्यावरण तथा नवीन पारितत्रा के सजन को परिलक्षित करते हैं। मानव जाति का प्रागऐतिहासिक इतिहास केवल 50,000 वप प्राचीन है । यह प्रारम्भिक प्राग् इतिहास वा एक मार ऐसा प्राणी है जा आवश्य- बतानुमार सोचकर अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता है तथा जातिगत् जीवन एव वद्धि करने की क्षमता भी रखता है । यद्यपि प्राचीन मानव जन- सध्या की गणना असम्भव थी परन्तु 8000 ई । म विश्व की आबादी 53 साप मानी जाती थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यह बढकर 2000 ईपू मे 8 वरोड 56 लाख हो गई । यह वह समय था जब नीन नदी की घाटी में प्रथम मिस्री सभ्यता का सूत्रपात हुआ था। दजना व परात नदी मभ्यता भी इसी समय मे उदित हुई थी। ईसा के समय में विश्व पी अनुमानित जनसंख्या 30 वराड के लगभग मानी जाती थी। 17वी शतानी में यह 50 करोड थी जो 100 वर्षों मे अर्थात मन 1800 म य अरब ये लगभग हो गई । सन 1901 को मतगणना के आधार पर स पूण विश्य पी जनसख्या साढे 3 अरब थी जो 7 रोड प्रतिरप यो दर गे बदी और 1980 दे दशक में विश्व की जनसख्या सान 4 अरब थी । अब यह पहा जा सकता है कि 21वीं शताब्दी वे आरम्भ होन तर 5 भरप हो जाएगी | T- सख्या वद्धि की दर इसी प्रकार बढती रही तो अगल सी यो में यह समस्त है जा मया तथा पर्यावरण सुनिश्चित है कि आज जिस भी अवस्था मे मनुष्य जी रहा है वह स्थिति प्राणिया को सख्या पी15 प्रतिशत सख्या के बराबर हो जाएगी, व अगल 300 वर्षों में अन्य सभी प्राणिया के समतुल्य होगी। मनुष्य के विकास के इतिहास में 'जनसख्या विस्फोट' को तीन महवपूर्ण घटनायें पर्यावरण परिवतना के अनुरुप व समयानुकूल ही हुई थी प्रथम विस्फोटर स्थिति 20 000 वप पूव आयो, जब उसने शिकार एव भोजन एकत्र करने की दृष्टि से पत्थर के औजारो या उपयोग आरम्भ किया। यह मानव विकासक्रम में प्रथम प्राति-औजार निर्माण काति' थी । अब से 6000 वप पूर्व दुमरी प्राति आयो जिस कारण 'सेती म सुधार था। यह कृषि फाति थी । तीसरी प्राति मा आगमन 300 वर्ष पूर्व हुआ, जब भोजन उत्पादन उद्योग व औषधि ये क्षेत्र में सुधार होने लगे। इस वैनानिक अथवा 'औद्योगिक क्राति' के नाम से पुपारा जाता है । ऐसा अनुमान हैं कि आज विश्व जनसख्या वद्धि की दर 2 प्रतिशत प्रति वप है । देखन सुनने मे यह बढ़त तुच्छ प्रतीत होती है पर तु वास्तविरता यह है कि वद्धि की यह दर अत्यन्त गभीर है। यदि जन वद्धि की दर यही रहती है तो 700 वर्षों मे स्थिति यह उत्पन्न हो जायगी कि भूमि पटल पर प्रति एक वर्ग फीट मे एक व्यक्ति दिखाई पड़ेगा। निश्चित ही यह परिस्थिति अत्यात भयावह होगी । क्योकि इस बात से अनेर पर्यावरणीय प्रश्न जुडे हुए हैं । पादप-सगठन की स्थिति क्या होगी? विश्व के शाकाहारियो को भोजन कहा से प्राप्त हो सकगा? ऊर्जा के साधन व उपयोग क्या मानव आवश्यक ताओ के अनुरूप रह सकेंगे ? वनस्पति का विनाश अवश्यभावी है, वायु मण्डल मे ऑक्मीजन व काबन-डाईऑक्साइड का अनुपात क्या होगा? अय कौनसी नयी समस्यायें आ सकती है जिनकी आर हमारा ध्यान गया ही नहीं। क्दापि नही रहने वाली । अवश्य ही मनुष्य को किसी दुर्भिविश्व सहति के साथ जुडना हागा व उससे अनुकूति होने का सुअवसर भी आ सकता है जिसका अभी तक निर्माण ही नहीं हुआ तथा उसके सबध मे आज भी वहना मुश्किल है। अतएव पर्यावरण विनान जीवन तथा उसके वातावरण' को ऐतिहासिक, वतमान तथा भविष्य की सफलताआ के परिपेक्ष म कल्पना करने के लिये । पुन भाग्यवाद, आशावाद व निराशावद के यथार्थों पर प्रश्न चिह लग जाता है । कोयला खनिज तेल गसें व उनके उत्पादना को किसी भी राष्ट के जीवनरक्त के रूप मे अभिव्यक्त किया जा सकता है । वतमान मे सम्पूण विश्व मे 21 जरब टन कोयला 125 अरव टन खनिज तेल तथा 6 अरब टन प्राकृतिक गैसा का प्रतिवप विनियोजन हो रहा है । इस प्रकार 70/पर्यावरण प्रकृति और मानव 7 उकसाता पर्यावरणीय तत्वो का वृहद भाग ऊर्जा उत्पादन मे ही व्यय हो जाता है। सवविदित है कि धूल के कण, रोगाणु, ध्वनि, तथा जीव विनाश हमारे पर्या- वरणभ में कमी ला रहे हैं। बहन को तो सभी यही कहगे कि यहा मनुष्य में साधारण हित सर्वोपरि हैं पर तु विश्वसमरूपी जीवन' जाल लिये यह अत्यन्त महत्वप्ण है। तभी तो विषय एम विश्वव्यापी मुद्धा बन गया है । म्वय सयुक्त राष्ट्र मध भी यह सोचने विचारने पर आमादा हुआ है कि 'पर्यावरण विहीन"- विश्व-समाज को लेकर क्या होना है ? विश्व मे चारो ओर विहीन (Less) बिहीन शन्दा का प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है, ममा स्थान विहीन', आवास- विहीन निद्राविहीन शातिविहीन आदि । और संयुक्त राष्ट्र संघ ने वप 1986 को विहीनता'-'अभाव वप' के रूप मे मा यता दी है। वर्ष 1987 को यह कहकर व्यक्त किया गया है कि किसी को भी भोजन विहीर आवास- विहीन व सम्पनताविहीन नहीं रहने दिया जायगा, जो सयुक्त राष्ट्र संघ चाटर पा एक मुख्य उद्देश्य है । हम इस ओर से आशाविहीन नहीं हाना है। वतमान युग मे पर्यावरण, सभ्यता, सस्कृति एव विकास को लेकर वैज्ञा- निको, दाशनिको, लेखका व विश्व की आत्माओ ने समय समय पर विश्व जन- समुदायको पर्यावरण को लेकर अपने विचारो से अवगत कराया है तथा प्ररित किया है कि वह किस प्रकार से अपने लिये तथा भावी पीढिया के लिये शुभ्र आकाश, प्राणदायी जल व वायु हरी-भरी धरती तथा एक पावन रमणीय शुद्ध व विराट विश्व की अपेक्षा कर सकता है। विवशता में घूट पोकर, मानव प्रदूषण को ज्वाला मे भस्म होता जा रहा है। अपने परातन्त्र की भीष्ण झया म-दावानल से उजडत वना को नुप्त होती वर्षा को, उभरते रेत के टोला को देखकर सुटर दुलभ व य जीवो व विलुप्तीकरण, से मानव के स्वय के गव के कारण की छेडछाड से दुखी होकर- जमन वैज्ञानिक स्वातेजार का कथन है कि मनुष्य ने अपनी भविष्य दृष्टि व भविष्य-निर्माण की क्षमताओ को खो दिया है और पृथ्वी को नष्ट पर वह स्वयं को नष्ट करने पर तुल गया है ।। प्रो ई एफ शुमाखर ने भी सही कहा है कि "अपनी वैज्ञानिकी व तकनीकी शक्ति के मुखरित होने के उत्साह में आधुनिक मानव ने उत्पादन की ऐसी प्रणाली का विकास कर लिया है कि जो प्रकृति के साथ अनाचार वरती है और एक ऐसे समाज की रचना कर डाली है जो मनुष्य को विकृत करती है। मानव, उस प्रकृति जो उसकी मा' है, जननी है की सौम्यता, सदाशयता व सुदरता के साथ बराबर खिलवाड कर रहा है। उसे तनिक भी चित्रा जन सख्या तथा पर्यावरण प्रदूपण/71 नहीं है कि जिस पृथ्वी-प्रकृति से उसकी समस्त बुनियादी आवश्यकताएं पूरी होती हैं, अपनी भोग्यत्व भावनाओ, चौय वृति और तणा के वशीभूत होकर उसे हो लूटे जा रहा है । युगपुरष महात्मा गाधी भी भावतिरक मन को वाघ पर नही रस स और सत त हृदय से वहा - "यह घरती अपने प्रत्या निवामी की आवश्यकताओं को पूरा करने लिय यथेष्ट साधन उपलब्ध करती है परतु हर व्यक्ति के लालच को पूर्ति नहीं कर सकती हैं।" आधुनिक सभ्य मानय ने किस प्रकार अनुकूल पर्यावरण को बर्बाद कर दिया है कि वह पर्यावरण को दूपित बरने के लिए धरती के साथ जोर जबरदस्ती करने में नहीं चूका है । आज की सभ्यता की यह एक जीती जागती मिसाल है। अथशास्त्र का एक साधारण नियम है मि मानव को मूलभूत आवश्यक ताएँ जनसच्या वृद्धि के साथ वढती है व उत्तरदायी ससाधनो की राशि, उस अनुपात म सीमित हैं। इस विचारधारा को अभावाआत्म नियम (Law of diminunsching return) के रूप म मा यता मिली है। इस विचार से विमुख नही हुआ जा सकता है कि एक पारित (Ecosystem) मे मनुष्य को उपभोक्ता माना गया है और उसका जीवन आधार हा भौतिक मडपल है। पोषक तत्व जल, वायु मृदा, खनिज पदाथ आदि भूतल पर असीमित मात्रा मे उपलव नहीं हो सकते । तात्पय यह है कि सभी आवश्यक ससाधन सीमित हैं वितु मानवीय आवश्यकताएँ असोमित हो गइ हैं । ऐसी अवस्था मे ससाधना की कमी, मनुष्य कभी न कभी तो अवश्य ही अनुभव करेगा - उस समय मनुष्य की हालत हास्यास्पद, दयनीय व भयावह बन जाएगी और वह स्वाथ के वशीभूत होकर आवश्यक रूप से अपने पर्यावरण मे निश्चय ही भारी फेर बदल करने की कुचेष्टा करेगा, तब तक वह अपना बहुत कुछ खो चुका होगा। ययाय की दृष्टि से पूर्व में भी परिणाम कुछ अच्छे नहीं रहे है अनेक स्थानो पर जीवनोपयागी पदाथ प्राय नष्ट हो चुके हैं। यह आम धारणा है कि अर्वाचीन में आज के मरुस्थला के स्थान पर सम्भवत वैभवशाली प्राक- तिर वन रह होगे-~उही वो स्वाधवश बाट कर मानव ने कृषि स्थला मे बदना होगा तदोपरात तेज आधिया व वर्षा के कारण जमीन कटने से, मिट्टी पर स नियत्रण हट गया होगा व मिट्टी उडने से मरुस्थलों का उन्य सम्भावित है। कहना होगा कि मनुष्य अपनी तुच्छ स्वाधमिद्धि के लिये कतिपय समाधनो का नष्ट करने के लिये स्वय ही जिम्मेदार एव दोषी है। मरय त उपयोगी ससाधना या अधाधुध दुरुपयोग, मनुष्य अपने भविष्य को अनरेखा पर भी यरता रहा है। बस्नुन उस स्थान विशेष स व ससाधन ही समाप्त हो रहे हैं । एसा परिस्थितियो म मानव हिनों रा हनन काई आश्चय 72/पर्यावरण, प्रकृति और मानव . नहीं है । मानव के सम्मुप प्रकृति विवरालरूप धारण वरती जा रही है और निस्मदेह पारित व असतुलन वी सभावनायें भी बढ रही है। अनेक आयुर्वेदिय पादप जिनका उपयोग औपधियो में दिया जाता रहा है, वे पादप प्रजातिया भूतल पर से विलुप्त होन लगी हैं और बहुत तो प्राय लुप्त हो चुकी हैं। इसी प्रकार अनेक प्राणी भी विलुप्तीकरण के द्वार पर दस्तक दे रह है । उचित होगा कि एसे प्राकृतिक ससाधना का उपयोग बुद्धि- मतापूर्वक किया जाय तभी उनका सरक्षण (conservation) सभव होगा और यही एकमात्र समस्या का निशान भी है। प्राकृतिक साधना का उपयोग, पर्यावरण सबधी नियमो का पान पर्यावरण सबंधी आवडो का सही आकलन और सामयिक य विवपूण निणय लेना ताकि भविष्य में उनका ह्रास न हो वे मानव जाति को निर तर उपलब्ध होते रहे-अभाव तथा असतुलन विषयो समस्यायें उदित न हो। हमारा प्रयत्न भी सदैव मही रहना चाहिये कि 'जीव' व 'जड'- सजीव व निर्जीव पर्दार्थों की यह व्यवस्था सामाय बनी रहे । यह बहुत ही आवश्यक है वि अल्प सुलभ व दुर्लभ (rare) जातियो व प्रजातियो की रक्षा की जावे, दुष्प्राप्य खनिजो या कम से कम मात्रा में दोहन व उपयोग हो तथा नये अनुसधानो की सहायता से अ य व य विधियो व साधना (Substitute methods) के बल पर कमी को पूरा पिया जाय । जन-संख्या तथा पर्यावरण प्रदूषण वायु-प्रदूषण व नियन्त्रण से जल तथा मना प्रदूपण यो तुलना में यायु प्रदपण अधिग हानिरारक है क्योकि पहला तो यह क्षेत्रिय नहीं होते और दूसर कार्ड भी जीव अधिक लम्बी अवधि ना श्वास रोक्न में असमर्थ है तथा यह प्रदूषित वायु स मिमी भी प्रकार बच नहीं सकत । मनुष्य तथा जानपरो यो अपेक्षा पाप वायु प्रदूषण के प्रति पई गुणा अधिक संवेदनशील होते हैं। एसे प्रदूपणा स वनों या विनाश अवश्य भावी है तथा फमला को क्षति होने स ममस्त विश्व को आर्थिक हानि वह्न पगी पडती है। जत की भाति वायु भी पृथ्वी गा अविभाज्य प्रारतिक' स्रोत है जिसके वर्गर एक पल भी जीवित रहना पठिन है। सभी जतु व पाप किसान किसी प्रकार से वायुमण्रत से सम्बंधित है-- इनम जतु-जगत वायु आक्सीजन प्रयाग प्रिया में ग्रहण करता है तथा विपली पावन डाइआक्साइड छोहता है जो पुन वायुमण्डल मे ही मिल जाती है । इस प्रश्रम मे निरतर गतिशील रहने के लिय वायुमण्डल का निश्चित अनुपात वा बना रहना अति आवश्यक है। जैव मण्डल के अतगत क्षोभमण्डल (troposphere) में ही आवश्यक जीवनोपयागी गैसा का मिश्रण नाइट्रोजन ऑक्साजन, मावन डाई मआक्साइड तथा अय निष्क्रिय गैसें अथवा 'वायु एवं उचित तापमान और आदता आदि कारण उपल ध है । वायु जब तीय गति स चलती है तो जल वाष्प को वादलो में परिवर्तित कर वर्षा म महत्वपूर्ण योग देती है । वाय के वेग के वारण ही ऋतुना का निय त्रण सभव है। जीवधारिया के लिय पयाप्त आवमीजन की आवश्यकता है और सभव है जब पायुमण्डलीय गैसो का सतुलन बना रहे । विभिन्न प्राकृतिक चर-नाइट्रोजन माक्सीजन व वाबन-डाइआक्साइड तथा वनस्पतिया हो रस सन्तुलन की प्रमुख इवाईया हैं । परतु आधुनिक उद्योगो के वारण उगली हुई जहरीली गैरों वायुमण्डल में मिल जाती है । फलस्वरूप जीवनोपयोगी गंसा का स तुलन गडबडा जाता है। मानवीय वृत्यो वे उपउत्पादन (byproducts) जो प्रदूपको के रूप में हमार सम्मुय आते है वेहिमाय है और उनका किसी भी प्रकार वर्गीकरण कठिन कार्य है । विकसित देशों में प्रदूषण मा मुख्य कारण उद्यागों म शेष कारा, पस्टीसाइड (पीडक नाशय) शावनाश बोटनाशक, उवरक तथा 74/पर्यावरण प्रकृति और मानव यह तभी अनेक ग्मायन पदाथ हैं । सक्षिप्त में उहे निम्न प्रकार अभिव्यक्त क्यिा गया है (1) जमा पदाथ अथवा ठोस अपशिष्ट--काजल, धुआ टार, धूल तथा घरेलू अवशिष्ट जैसे रसाई धर की जू ठन टटी-फूटो बोतले टूट मिट्टी व चीनी के बतन, प्लास्टिक के बरतन, राख, पत्तिया, पास बगीचे की क्तरने व फ्टे कागज मादि। (2) गैसीय पदाथ-कावन नाइट्रोजन व गधक के ऑक्साइड्स, हेलोजनम जैसे कनोरीन ब्रोमीन नायडीन इत्यादि । (3) औद्यागिक प्रदूपक-~ब जो पापरीन, के जीन, ईथर, एसिटिक अम्ल, व सायनाइट यौगिक । (4) कृषि प्रदूपक-पीडनाशी, शाक्नाशी, क्वकनाशी कीटनाशी व उवरक। (5) प्रकाश-रसायन प्रदूषक -ओजोन, नाइट्रोजन के आक्साइड्स, एल्डी हाइडस इथिलीन प्रकाश रसायनिक स्माग। (6) विकिरण प्रदूषक-रेडियो धर्मी तत्वो द्वारा विकिरण तथा परमाणु परीक्षणो के अन्तगत रेडियो फाल आउट्स । नित्य प्रतिदिन उपयोग में आन वाले पदार्थों को विभिन्न प्राकृतिक-चको तथा प्रक्रियाओ के माध्यम से दोबारा उपयोगी बनाया जा सकता है साथ म कुछ ऐसे पदार्थों की जानकारी उपलब्ध हो सकी है जिन पर प्राकृतिक विघटका या चत्रो का कोई भी असर नहीं होता और ऐसे पदाथ आगे चलकर गभीर समस्याएँ पदा कर देते है । इसी आधार पर प्रदूषको को दो श्रेणियो में विभक्त कर अलग कर दिया गया है (1) जय विघटनात्मक अथवा निम्नीकरणशील प्रदूपक यह प्रदूपर अधिकाशत जीव ज तुओ तथा पादपो को जैविक प्रियाओ के कारण उत्पन्न होते हैं तथा उनकी रासायनिक सरचना स्थायी नहीं रहती। यह पनाथ पव' या जावाणुओं के द्वारा सरल रासायनिक अवयवा म बिखर- वर मदा को उवरा बनाने में सहायक होते हैं पर तु जव इनका उत्पादन विघटन क्षमता से अधिक होने लगता है तो यह वायु, जन एवं मृदा प्रदूषण का कारण बन जाते हैं जैसे मनुष्य तथा अय जन्तुओ द्वारा उसजन, मब्जिया, फ्ल, खाद्य पदाय, घरेल पचरा आदि एक सीमित मात्रा में मिट्टी को उवरा बना सकते हैं परतु अनियवित जनमख्या वृद्धि के कारण अय महानगरा में सबसे बड़ी समस्या इसी कडे के ढेर को निपटाने या ठिकाणे लगान को हो गयी है। भारत में बढती हुई विस्फोटक ना राम्या ही में पयावरण प्रदूषण की विषम समस्या को जन्म दे दिया है। - वागु-प्रदूषण (1) अविघटनात्मक अथवा अनिम्नीफरणशील प्रदूषक मानव द्वारा उत्पादित बहुत सारे पदाथ ऐसे भी हैं जो प्राकृतिक विघटकों एव चयो मे सदा अप्रभावित रहते हैं और इससे उपजी समस्या और अधिक गम्भीर रूप धारण कर गयी है। यह मूलत अकावनिक यौगिव है जस क्लोराइड लवण, खनीनीय ऑक्साइडस, अपशिष्ट उत्पादन, एल्यूमीनियम व टीन के केस, पारे ये लवण फिनोलिक योगिक, डी० डी० टी० बी० एच. सी० एल्ड्रीन, टाक्याफोन इत्यादि । यह पदाथ स्थायी हैं और साधारणतया विभि न, स्रोतो म ममायोजित होत रहते हैं। कभी कभी यही पदाथ अम प्राकृतिक तत्वो के माथ सयोग कर विषले पदार्थों का निर्माण कर देते है तथा पर्यावरण के लिये भयावह पतरा उत्पन्न कर देत हैं । ऊपरवणित दोना ही प्रकार के प्रदूपर जल, वायु तया मदा के साथ मिलकर उ ह प्रदूषित करते रहते हैं । इस अध्याय मे हम केवत वायु प्रदूषण के ही अध्ययन तर सोमित रहगे। यह सौ फी सदी सच्च है कि आधु- निकरण की अ यवस्थित दौड म हमने वायुमण्डल की जीवनोपयोगी गसो में अनुपात को पूर्णतया छिन भिन्न कर दिया है तथा उसके सतुलन को बिगाह कर अपने पैरा पर कुल्हाडी मारने का दुस्माहस किया है तथा अपनी मौत का सामान भी स्वय ने ही तयार कर लिया है। वायु मे विषैली गैसो की मिलावट को ही वायु प्रदूषण कहा जाता है और उसकी जीती-जागती मिसाल है 3 दिसम्बर 1984 को वह कालरात्रि- भारत के वायु प्रदूषण के इतिहास का वह 'काला दिन' जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल मे रात्रि को अक्समात युनियन कार्बाइड उद्योग के एक टर से मिथिल आयसोसिनेड (megas) गैस रिस कर वायुमण्डल मे व्याप्त हो गई तथा प्रदूषित वायु के सेवन से तत्काल दो हजार व्यक्ति काल के गाल म समा गय । मानव की विनाशलीला की यह गाया यह विभीपिका भुलाये नही भूलेगी। जापानवासी भी तो 5 अगस्त व 9 अगस्त 1945 काले दिना को या आज तक दिल में रखे हुए हैं । स्थिति का वणा परते हुए आयें भीग जाती है। उस क्षेत्र की जनता आँखा, पफ्डा के रोगो तथा अयघातक रोगास आज तक भी अपने आपको मुक्त नहीं कर पाया। दुधारू चौपायो में दूध देने को क्षमता घट गई है । जीव जतुओ तथा पापो पर भी गैस रिसाव के कुप्रभाव देसे जा सकते हैं । कापा है यह वायु प्रदूषण पे घटको मो मापा के लिये। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एवं मवमाय भाषा म परिभापिन भी किया है वायु म उपस्थित हानिकारक तत्त्या की मात्रा को जो मानव तथा उमा पर्यावरण पतिम पातर हो प्रदूपक हैं तथा उस प्रक्रिया को यायु प्रदूषण पहत हैं। - - 76/पर्यावरण प्रकृति और मानव - - वायु-प्रदूषण के स्रोत-वायु-प्रदूषण के अनेक कारण है जिन्हे निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है (1) औद्योगिक प्रदूषक -बिजली-घरो तथा चिमनियो से निक्लने वाली गैसे सल्फर डाइ-ऑक्साइड, कावन मोनो ऑक्साइड, पावन डाई- ऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड प्रमुख हैं । इनके साथ ही हाइड्रोकाब स धल के कण धुना तथा गद भी वायु-प्रदूषण का काय करते हैं । यह कोयले तथा पट्रोल के जलते ब ताप विजलीघरा म लिगनाइट की ज्वलन अभिक्रिया से उत्पन्न होते हैं । भने रसायन उद्योग/Tमक का अम्ल, क्लोरीन नान्ट्रोजन के आक्साइड व तांबे, जस्ते, मोमे पारे व आरसनिव' के आक्साइडस भी बनाते हैं जो घातक हैं। वम्बई के चेम्बूर क्षेन में 3-6 गुणा अधिक प्रदूषण आया गया है। गोरए- पुर तथा अहमदाबाद के समीप स्थित साद्य के कारखान, तमिलनाडु मे नवेली लिंगनाइट उद्योर तथा भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर व जमशेदपुर के स्टील के कारखानो के कारण किलो वाली गैसो द्वारा हो वायु-प्रदूपण बहुत भयपर रूप से घर कर गया है। (1) स्मोग (Smog)-- यदि स्मोग का शाब्दिर अर्थ देखा जाय तो यह हयूमस, धुआ तथा कोहरे का विभिन्न अनुपातो मे समिश्रण है । शहरो म जहाँ औद्योगिकीकरण चरम सीमा पर होता है, मरदी की मौसम में कोहरे का धुऐ के साथ मिल जाना एक साधारण बात है परतु स्मोग का निर्माण तय होता है जब यह अनुपात इस प्रकार घटे या बढे की वह असामाय हो जाय । सन् 1931-40 के दशक में अमेरिका के प्रसिद्ध शहर लासजिल्म मे लोगो । स्मोग के कारण वायु-प्रदूषण अनुभव दिया था । लोगों की भाषा म जला, पानी आना, तथा र ज्योति मे एकाएममी आने लगी । इस पारण रबर की बनी हुई यस्तुऐ तव' घटयने लगी जा सामाय यात मही है। सदन शहर म भी गधर युक्त बायला इधन ये रूप म काम में लिया जा रहा है जिसमें कारण स्माग का निर्माण बहुत अधिर हाता है। अनुमा रा पुष एमय के बाद ही इस बात का पता लगा । शहरो म मम पाहम सिर अधिक होता है वहा भी स्मॉग पा निर्माण होता है, सॉस जिET mah भिन्न है । रासायनिक एप्टि में लॉसएगिल्म से प्राश entr पाण' पाया गया है व मय स्थाना पर 'अवधार' । मागीतारमश लक्षणों के कारण इसे फोटो मिक्ल स्मोग भी गा गया है mrtm उन स्थाना पर पाये जाते हैं जहां पारा ओर पालियो दोr TET पारी मे घसा हो । वतमान में यह स्मोग एम गंभीर समस्या या भा। - sh 1 पाणु प्रषण ।

(1) ओजोन, हाइड्रोजन व दूसरे पावनिक 'परॉग्साइड्स व हाइड्राक्सा इड्स जिस वातावरण म अधिक होते हैं, वहा प्रकाश रासायनिक स्मॉग को देखा जा सकता है । मूर्य के प्रकाश में जब नाईट्रोजन हाइड्रोराब स, मोटर साइक्लिो व गाडियो से उत्पन धुऐ के माय मिलकर क्रिया करते हैं तो यह विशेष स्मॉग-परॉक्सी एसिटिल नाइट्रेट (पी ए एन ) तथा पराक्स पेय- जल नाइट्रेट (पी वी एन) बनाते हैं। वायु प्रदूषण पर्यावरण मे इनकी उपस्थिति से नेत्रो मे जलन होने लगती है और पानी बहनें लगता है । यदि जोजोन की मात्रा बढने लगती है तो प्रकाश-रसायनिव' स्मॉग की सम्भावना भी बढने लग जाती है। कभी-कभी ऐसे स्माग वातावरण मे हाइट्रोजन सल्फा इड व मल्फर डाइऑक्साइड गैसें भी प्रवेश कर जाती हैं। यदि ये वातावरण की सहनीय स्थिति की सीमाओ को तोडकर पार कर जाती है तब उसके बहुत ही गभीर परिणाम होते हैं । अम्लीय वर्षा वस्तुआ का शरण (चटखना) तथा नत्र ज्योति की कमी होना व स्वास्थ्य-सवधी गम्भीर खतरे उत्पन हो जाते है । सल्फर डाइआक्साइड व हाइड्रोजन सल्पाइड्स को उपस्थिति मे तो पेड-पौधा तक पर इसा घातक प्रभाव पड़ता है। ओजोन गैस भी हानिकारक सिद्ध होती है। सारणी 2 वायुमण्डल मे मोजोन का अनुपात व मानव जीवन पर दुष्प्रभाव अनुपात (एक लाख मे एक का अनुपात) दुष्प्रभाव 02 सामान्य, 03 नाक व गले में जलन, 100-300 भारी थान तथा शिथिलता, फेफडो मे सूजन तथा मत्यु ओजोन का दोहरा प्रभाव होता है। यह मानव जीवन को तो सक्टपूण बनानी ही है, वनस्पति को भी प्रदूपित कर पर्यावरण को भी विश्व के लिये सक्टग्रस्त स्थिति मे डाल देती है । तम्बाकू की खेती में यदि ओजोन की हानि- फारव' माना 6 घटे भी आ जाय तो फसल आधी रह जाती है। मूली तथा अय मूसला जड वाली फसलो पर भी इस गैस या घातक प्रभाव पड़ता है। एक मय भयकर सरमण तब होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड नम उत्तक या आद्रता पणो के सम्पर में जानी है व गघर के अम्ल में परिवर्तित हो जाती है। ऐसा अम्लीय प्रदूषण स्वास्थ्य के लिये पातक सिट होता है । यह धातुओ तपा चूने के पत्थर को भी शारित वर देता है और मानव जाति के 900 . 78/पर्यावरण प्रकृति और मानव - लिये माथिक हानि का कारण बन जाता है । धूम्रपान से भी घायु-प्रदूपण होता है और कावन मोनोऑक्साइड के कारण रक्त मे विषाक्तन होने लगता है मोटर गाडियों के निर्वात- मोटर गाडियो, हवाई जहाज, मोटर साइकिलें जो पेट्रोल व डोजल तेलो से चलती हैं, काबन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड व अनेक हाइड्राराब स उसन्न धरते हैं। इनसे वायु मे प्रतिदिन हजारो टन हाइड्रो- काबन्स व काबन मोनो ऑक्साइड छाडी जाती है। अकेले बम्बई शहर मे हो सन 1972 में दो लाख से भी अधिक मोटर गाडिया मौजूद थी। एक गैलन पट्रोल के ज्वलन में 3 पौंड काबन मोनोऑक्साइड व 15 पौड नाइट्रोजन डाइ ऑक्साइड उत्पन होती है । इनमे से प्रत्येक 8 लाख धन सेंटीमीटर से 20 लाख घन सेंटीमीटर वायु को प्रदूषित करने के लिये पर्याप्त है । अमेरीका में 830 लाख कारो के कारण 60 प्रतिशत वायु प्रदूषण की समस्या है। वायु-प्रदूषण के दुष्परिणामो को विस्तारपूर्वक' पादपा, ज तुओं, मानव तथा जलवायु से सदर्भ में अध्ययन करना आवश्यक हो गया है। (अ) पादपों पर प्रदूषकों का प्रभाव - प्राय वायु प्रदूषको के घातक प्रभाव पाप समुदाय मे दृष्टिगन हुऐ हैं । कोलिफोर्निया मे ही गाढ़े स्भाग के कारण लगभग 5 लाख वृक्ष नष्ट हो चुके हैं । पादपो तथा उनको पत्तियो पर अनेक दुष्प्रभावी चि हो का अवलोकन किया जाता है जिहे विस्तार सहित वर्णन किया गया है (1) वायु प्रदूषका की उपस्थिति से पादप कोशिकाओ मे नाविकोकरण (plaomolysis) आरम्भ हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप पत्तियो का जन के साथ सम्वन्ध टूट जाता है पतिया पोली पड़ जाती है और ढीली होकर टहनियो से गिरने लग जाती हैं । कभी-कभी प्रदूषका के कारण पत्तियो म सलवटें (nectrotic patterns) भी उत्पन्न हो जाते हैं-~यह प्रदूषको के प्रकार तथा साद्रता पर निभर रहता है। (1) हरितमाहीनता अथवा हरितरोग (Chlorosis) के कारण पणहरित का अभाव हो जाता है जिससे पत्तियो का रंग पीला पड़ जाता है, पत्तियो पर पीले रंग के चक्ते दिखाई पड़ने लगते हैं । सभी कभी वणको {pgments) की उपस्थिति के बारण अय रग भी प्रदर्शित होते है जो सामा यत हरे पणक मे कारण अदृष्य रहते हैं। इसका मूलकारण वायु में मल्फर डाई माक्साइड की उपस्थिति ही है जो क्लोरोइडस के साथ सयोग पर भूरा प्रणय बनाती है। प्राय पादपो में यह हरितरोग व उत्तमा के मरनासन्न होन की पियाएँ समवित होती है। वामु-प्रदूषण व नियन्त्रण/79 (1) वद्धि तनुकरण-वायु-प्रदूषण के पारण पादपो को वद्धि क्षमता पर गहरा असर पड़ता है, उनको वृद्धि हक जाती है तथा पतियो का झडना, धद्धि का पना, पुष्पो व फला का छोटा होना जैसी पादप नियामो का अव. लोकन किया जा सकता है। (ब) ज तुओ तथा मानव पर प्रदूषकों का प्रभाव प्राणी वग में वायु जनित प्रदूषका के भी कुछ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभावों का अध्ययन किया गया है। इनका वास्तविक प्रभाव फेफडो व वायुनलिका पर अधिक होता है जिसकी वजह से फफडो की सूजन तथा फेफडो के कैमर जसे रोग उत्पन हा जाते हैं । आंखो मे तया श्लेषमा झिल्ली पर जलन की क्रिया, फेफडो में बलगम का भरना, वोनसाइटिस व यक्ष्मा जैसे रोग हो जाते है। पशुओ का यदि फ्लोराइडयुक्त धूल के कणो से सम्पक बन जाता है तो अस्थि रोग (Florosis) हो जायगा । इसके अतिरिक्त भी कायिकी प्रभाव, पश्मो की गतिविधिया, फुस्फुस कायिकी विशिष्ट किण्वक प्रतिक्रियाओं का रुकना आरम्भ हो जाता है और रक्त रसायन क्रियाओ में भी बदलाव आ जाते है। (1) ओजोन अधिग्रहण के कारण मह नाक व गले को श्लेपमा झिल्लिया सूखने लगती हैं आँखो की ज्योति मद पड जाती है, सिर दर्द, पुस्पस का बलगमयुक्त होना और सूजन आरम्भ हो जाती है। इसको अधिक सा द्रता भी घातक होती है । पेटनर (1969) का क्थन है कि ओजोन के कारण गुण सूत्रो मे व्यतिक्रम भी उत्पन्न हो जाते हैं । (1) नाइट्रोजन डाइआक्साइड एव तीव्र प्रकृति को गैस है इस के कारण भी आखो मे जलन, पुस्फुस श्वसनी शाध तथा सूजन हो जाती है और अन्त मे निमानिया के कारण मत्यु तक हो मक्ती है । (11) गधक के ऑक्साइडस तथा सल्फर डाइ ऑक्साइड के कारण नाग- रिकगण मरदी जुकाम पासी, श्वास लेने म रुकावट व हृदय रोग से ग्रसित रहते हैं। कभी-कभी आहार नाल तथा प्रजनन नाल मे भी जलन आरम्भ हो सकती है। (v) वायु-प्रदूपको म सरसे खतरनाक सावन मोनोऑक्साइड गैस है । गधरहित होन के कारण श्वास लेते समय भी इससे पहिबानना कठिन है। रत में स्थित होमोग्लोविन के साथ साम्य होने के कारण जब यह रुधिर- प्रवाह के साथ मिलती है तो यह ऑक्मोहीमोग्लोविन को ऑक्सीजन को हटा पर स्वप उसरा स्थान ले लेती है। इस प्रकार होमोग्लोबिन की आँश्मीजन ले जाने वाली क्षमता म भारा कमी आ जाती है, और रक्त में पावन हार- 80/पर्यावरण, प्रकृति और मानव आक्साइड की साद्रता बढ़ती जाती है, फलस्वरूप सिरदद उल्टी, आँखो के सामने अधेरी आना, कान का बजना, हृदय का धड़कना, छाती पर दवाव, श्वास लेने में कठिनाई, मास पशियो की कमजोरी, बेहोशी जैसी अवस्था और अन्त में मत्यु की पूरी सम्भावना बन जाती है। (v) अन्य कावनिक मौगिक यथा पॉरमेल्डिहायड्स, थायोत्स, टौलिप भोस वि दु पट्रोलियम, खनिज तेल, मोटर तल आदि भी श्वास लेने मे कठिनाई उपस्थित कर देते हैं। (1) वारसिनोजीनीक पदाथ साधारणतया वे पूणरूप से जले पदार्थों से निकलते है, प्रदूषित वायु मे बड़ी मात्रा मे मिल जात है तथा यह श्वास नलि- फाआ के कैंसर के लिय उत्तरदायी है। संयुक्त राष्ट्र संघ पर्यावरण कायक्रम के निदेशक डा मुस्तफा टोलवास ने 1980 में अपने पर्यावरण सबधी प्रतिवेदा मे कहा था बि सीसे के विलेपन के कारण मष्तिष्क तक नष्ट हो जाता है, मंगनीज़ कणो के श्वास नलिवा में प्रवेश से निमोनिया, निकल व क्रोनियम कणो से कैसर, पारे की वाष्प के कारण के द्रीय नाडी सस्थान तक नष्ट हो जाते है। केडमियम की उपस्थिति मे उच्च रक्त चाप व हृदय रोग ही जाते है । (vi) रेडियोधर्मी विकिरण भी वायु को प्रदूपित करते हैं । जा नाभिकीय छिडकाव पृथ्वी पर नाभिकीय विस्फोट के कारण होता है अवशोषित हो जैविक सस्थानो मे पहुच जाते है और प्रमुख रूप से कैसर रोग उत्पन्न करते है। कभी-कभी पादप पत्तियो व जैविक सगठनो मे परिवतन लाकर उत्परि- वतनीय विभिनताएँ ला देते हैं जो पीढी दर पीढी चलती हैं। (स) जलवायु परिवतन अय्यर (1973) को यह अभिव्यक्ति रही है कि जलवायु म धूल, धुआ, कावन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन व गधक के माक्साइडम की साद्रता बहुत यधिक हो जाती है तो 'प्रकाश का बिखराव आरम्भ हो जाता है और उसके साथ ही जलवायवीय परिवतन शुरू हो जाते हैं। औद्योगीकरण मे पेट्रोल, कोयना या अभ्य प्रकार के इंधन का निरन्तर प्रयोग हो रहा है जिससे प्रकृति मे काबन डाइ ऑक्साइड की मात्रा में निरतर वद्धि हा रही है। एक अभ्ययन के अनुसार सन 2020 तक' इसका स्तर दुगुना हो जायेगा, अत विपद वा तापक्रम 30 सेल्सियस बढ जायगा और 2100 तब तापक्रम 6° सेल्सियस बढ जायगा, जिससे सारी प्रवीय बफ पिघल आवेगी और नदियो मे बाद की स्थिति होगी। धीरे धीर यह तापक्रम मौसम चक्र तथा जलवायु पोप्रभावित कर, खेती बागे तथा मानव को भी प्रभावित कर सकेगा। वायु प्रदूषण व निय नम/81 मायु प्रदूषण पर निय वण - (6) पादपा की सबसे यही विशेषता यह रही हैं कि इनकी अनुप्रिया का अध्ययन पर यायु की शुद्धता पोशात किया जा मरता है। पादप प्रदूषक सूचक होत हैं तथा रायदी पादप अपने ऊपर हुए विशेष प्रभावा यो गित परते हैं । इनकी सबसे बडी उपयोगिता यही रही जा सकती है कि यह सभी परिस्थितियो व सभी स्थानो पर पाये जाते हैं और सस्ते भी होते हैं जरि वायु प्रदूषण मापने पाले यत्र माफी महगे होत है और सभी स्थानो पर नहीं ले जाये जा सकते । ऐरो सूधप पादपो की अनुक्रिया के साथ प्रदूषक की मात्रा (सादता - समय) पा सम्बध स्थापित किया जाय । पादपा पर उत्पन क्षति पे लक्षणों और उनकी पत्तियो मे मचित प्रदूषक' को मात्रा की जानकारी प्रदूषण मापने मे सहायक होती है। इसी सदभ मे पहा जा सस्ता है यि पादप वायु शोधक भी होते हैं। इतकी पत्तियां प्रदूषक पदार्यों को अवशोपित पर वातावरण म प्रदूपकों की माना निरतर पम पर करती हैं। प्रदूषित भागो म, नगर के मागों के किनारे वृक्षारोपण वायु प्रदूषण कम करने की प्रप्रिया मे बहुत ही लाभदायक सिद्ध होते हैं । विभिन सधानो से पता चला है कि अनेक पादप 25 से 50 प्रदूषण कम करने म सहायक हैं। ये प्रदूपर कणा (pasticulates) को 80 प्रतिशत तक राक लेते हैं। एक परीक्षण से पात हुआ है कि जगल जलेबी नामक वृक्ष का सघन रोपण कोयले की राख के अवशोषण के लिये बहुत ही उत्तम व लाभकारी रहता है । अनेक पादप विषपायी भी होते है जो विषाक्त प्रदूषको वा अवशोपण पर उहे अविपाक्त तत्त्वो म परिवर्तित करने की अदभुत दामता रखते हैं। कुछ प्रतिरोधी पादपा म यदि प्रदूषक' पदार्थों की अधिक मात्रा मचित हो जाती है तो भी उन पर कोई घातक प्रभाव नहीं पडता है । पादप अपनी सभी जैविक प्रियाओं में प्रदूषको वा उपभोग भी कर लेते हैं और पादपो की इस क्षमता का उपभोग सरलता के साथ प्रदूषण की रोक्थाम के लिये किया जा सकता है । (1) कारखातो वो शहरी आबादी से दूर स्थापित करा चाहिम, साथ ही ऐसी-ऐसी तकनीको का उपयोग भी करना चाहिये जिससे या धुए का अधिकाश भाग अवशोपित हो जाय और अवशिष्ट पदाथ व गसे वायु के साथ अधिक न मिल सके। (in) शहरीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिये गावा तथा कस्बा म ही कुटीर उद्योग अपनायर राजगार व अय सुविधाए उपलब्ध करा दी जावे ताकि गाव वालो की दौड शहर तक न हो। (iv) वाहनो तथा कारखानो से निक्लने वाली धु आ का इस प्रकार समायोजित करना होगा कि जिसमे कम से कम धुमा निक्ले । 82/पर्यावरण, प्रकृति और मानव

(४) निर्धूम चूल्हे व सौर ऊर्जा के उपयोग को प्राथमिक्ता व अधिक
प्रोत्साहन की महती आवश्यक्ता है ।
(v) वनो की हो रही अधाधुध व अभियनित कटाई पर रोक लगा देनी
चाहिये।
(i) शहरो नगरा मे अपशिष्टो के निष्कासन हेतु सिवरेज सभी स्थानो
पर होना आवश्यक है।
(vii) इस विषय को पाठ्यक्रम के साथ शामिल कर, बच्चो मे पर्यावरण
सरक्षण के प्रति चेतना जाग्रत हो तथा मानव समाज को सजग रहने के लिये
विभि न सूचना माध्यम यथा टो० वी, रेडियो, समाचार पत्र प्रचार के माध्यम
होने चाहिये।
130
--
वायु-प्रदूषण व नियन्त्रण/83

जल प्रदूषण एव नियन्त्रण जल ही जीवन का एक आधारभूत तत्त्व है सार है, निचोड है अनिर्वा यता है । पृथ्वी की उत्पत्ति और मानव सभ्यता के विकास का कहानी मजा की अहम् भूमिका रही हैं । जीव विकास को आरम्भिक अवस्था म जीवद्रव की उत्पत्ति पानी से हुई थी। जल की एव वू द म हजारो-लाखो मूक्ष्मजीवियों गा जीवन चा प्टि गोचर होता है और जल के कारण ही पृथ्वी पर जीवन सभा हो सका है। इतिहास व पृष्ठ इस बात के साक्षी है कि सभी आदि सम्मताएँ नील, दजला मरात, सिंधु-गगा व चीनी नदी घाटियो मे ही जमी व प्रस्फुटित हुई थी। आज ससार के सभी प्रमुख नगर, नदी, झील, सागर-किसी न क्सिी जल-स्रोत पे बिनारो पर ही बसे हुए हैं । जल ये साधन अनत नहा है । पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का 0 3 प्रतिशत ही शुद्ध, साफ व निमल जल है, जिस पर समस्त विश्व या पारावार निभर है । परतु इसे भी दोनो हापो से उलीच रहे हैं, उपभोग पर रहे हैं । आज जल की खपत सभ्यता का मापदड बन गई हैं । एक किसान परिवार की तुलना में शहरी परिवार प गुना अधिा पा उपयोग परता है तथा एक मौद्योगिय देश विर सगोल देश की अपेक्षा 20 गुना अधिर उपयोग कर रहा है। एप' अनुमान ये आधार पर हमारे देश में 70 प्रतिशत जल पिसीन पिनी रूप में प्रदूपित है । यस्निया स निवला मैला गंदा पानी और मौवाणि प्रतिष्ठाना रो निरल अपशिष्ट पदार्थ मित्रपर इस प्रापण मा निरनर मा कर रहे हैं । पश्चिमी राष्ट्रा मो मोषोगिर विमरी यही मीमत gril न रहा है या जल प्रदूषण की ममस्या मानय नियंत्रण से बाहर हाडा रही है। विश्व का सबगो राष्ट्र मयुक्त राज्य अमेरिका भी जम रे समो. সন। মা বৰ বান ম মন মা? সময় মাস নাই। मारपमा सम्म पाना योगीलें जिनमें हरी गोल र १ मा मृतर'मा पोरोको सान नरी ARE जमन भाम महा मन मा or मान या नाना मनर | मारी मारपोrrenभा यहा हामी नि योमर परिधाम Part Times Amma Trय सवारी HITATE HAIN, AREITruareasiग पारि गरे riमासमोर मामाहा रहे। Herगार कार भारतीय विज्ञान काग्नेस मे मन् 1981 मे अध्यक्ष पद से बोलते हुए प्रो ए के शर्मा ने कहा था कि भारत की जीवनदायिनी नदियो का 70 प्रतिशत से भी अधिक जल प्रदूषित हो चुका है और पावनी गगा तो विश्व को सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन चुकी है। दिल्ली से लेकर इलाहाबाद ता यमुना भी अति विपाक्त और प्रदूषित पाई गई है । गगा तथा यमुना का द्वावा जिसे भारत का अन भडार कहा जाता है, दुर्भाग्य से सबसे अधिक दूषित क्षेत्र बन गया है । काश्मीर की डल झीन तथा नैनीताल की ननीझील भी अपनी मोहकता व रमणीयता को प्राय खो चुकी है । आज तालाब, झील, पोखर नदी, कुओ नहरो तथा सागरो म वेरोक्टोक दुरुपयोग से प्रदूषण मे वद्धि हो रही है। देवी स्वरूप गगा यमुना जैसी पवित्र नदिया भी औद्यागिक कचरा तथा शटर का मैला ढोन के लिये याम म ली जाती हैं । कुछ फैक्टरियो का गदापानी जिसम सल्फर डाइ आक्साइड, कावन मानो-आक्साइड तथा हाइड्रोजन सल्फाइड घुली रहती है, तालाो म पंया जाता है जिससे पानी का रग पाला, भूरा, लाल व बदबूदार हो जाता है। राजस्थान का पाली नगर इसका एक जीता जागता उदाहरण है। प्रमुख जल-प्रदूषक यह एक तथ्य उभर कर सामने आया है यि प्रदूषण यो समस्या मे मूल कारण जन-सख्या की वृद्धि है और समूचा विश्य हम बात को लेकर चिन्तित भी है। विज्ञान की प्रगति ने मानय के लिये जितने भी ये रारत खोले हैं उतने ही प्रदूपणो की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हाती जा रही है। यहा ऐसे ही कुछ व्यापक प्रदूपणो पा विवरण दिया जा रहा है। (1) नगरीय ग दगी -बढती हुई अनियनिन नारादया ये द्वारा अनेर नगरो व पस्बों में परेर पचर के अम्बार लग जाते हैं। यह अपरा सडे-गले खाद्य पदार्थ, मल-मूत्र, गोवर, पूडा-परपट आदि स गिलपर माता है। भारत मे 80 प्रतिशत लोग गायो मे यसते हैं, परम्परागत उनमा जीया नदी, तालाबा, कुआ पर निभर परता है। शिक्षा रे पारण अशातायश या अय विकल्पों पे अभाव में गाय पी सारी थी सारी गावगी स्रोतों मावर मिल जाती है जिससे यहाँ पा जप पूपिया जाता है। इस जल का दुष्प्रभाव यहां से नियासियो पर पा स्यामाथि गरे विपरीत शहरी म उपरोक्त प्रभार भी गदगी सनस प्रदूषण साहोता ही है, उसके साथ मल-मूत्र आदि बिना उपपार frय ही जमाण of Art भी जल प्रदूषण मे भारी वृद्धि होती है। राजधानी दिदी भी 17Mam 130 टन विपापन पधरा प्रतिक्षित पना नदी में प्रवाहित होगी प्रकार विभिन्न नगरोसे गाले हजारों टन परा मrat if and जगपूषण व (1) औद्योगिक अपशिष्ट -हर विकसित नगर की पहिचान उसमें चल रह उद्योग-ध धो से ही होती है। हजारा औद्यागिक , प्रतिष्ठिान सकडो टन अवशिष्ट विषैले पदार्थों का उत्पादन करते हैं। उन्हे ठिकाने लगाने का सबसे सरल, सस्ता व निकटतम स्थान नदी या झील ही है। इन अवशिष्टो मे अनेक प्रकार के लवण, अम्न क्षार तथा विभिन्न प्रकार की गसें व रसायन घुले रहते हैं । ऐसे पदार्थों से जीव-ज तु वनस्पति आदि सभी प्रभावित रहते हैं। कागज, चीनी, चमडा, वस्त्र, मदिरा व रसायन आदि प्रमुख रूप म ऐसी औद्यागिक इकाईया है जो जल का सबसे अधिक उपयोग कर उसे गभीर रूप मे दूषित करती हैं । (1) अपमाजक (डिटरजेटस)-बढती हुई औद्योगिक प्रगति तथा सभ्यता के विकास यो प्रवृत्ति के फलस्वरूप सफाई के लिये नित्य प्रति नये- नये अपमाजक बाजारो मे जाते जा रहे हैं। उत्पादनक्र्ता द्वारा इनके तात्का लिक लाभ के लिये उपभोक्ताओ को आकर्षित करने से इनका उपभोग उत्तरोत्तर बढ रहा है। यह अपमाजक बराबर जल मे घुलकर जलदायो में पहुचते है तो जल की सतह पर इनके ठोस क्णो की पतली परतें बन जाती है । इन परतो के कारण सूय का प्रकाश जल के भीतर प्रवेश नहीं कर पाता जिससे जल मे आक्सीजन पर्याप्त मात्रा में घुल नही पाती और जल प्रदूषित हो जाता । आक्सीजन की कमी होने से जल-जतुओं तथा वनस्पतियों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। (iv) कृषि-जनित जल-प्रदूषक -उत्पादन बढाने के उद्देश्य से खेतो म रासायनिक खादो का उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ रहा है। ऐसे उवरक फसल के पश्चात् बचा हुआ पदाथ वर्षा जल के साथ घुलकर मिट्टी के नीचे पहुच कर भूमिगत जल स्रोतो को प्रदूपित कर देता है। इसी प्रार खरपतवार और रासायनिक कीटनाशक, शाक्नाशर, व पोडक्नाक भी भूमिगत जल को प्रदूषित कर रहे हैं। खादो को बड़ी मात्रा, नदी, तालाबा व झोला म भी पहचती है जिससे जल मे शवाल की मात्रा बढ़ जाती है। शवाल द्वारा अपने विकास में जल की जधिवाश माक्सीजन के उपभोग से आक्सीजन की कमी हो जाती है जिसवा जलीय-ज तुआ और मानव पर घातर प्रभाव पड़ता है। (7) मोद्योगिक तापीय प्रदूपण-अनेक औद्योगिक मयना यो ठडा रयने पे लिये जल का उपयोग किया जाता है तथा उपयोग के पश्चात् उष्ण जल यो नदिया तालावा, यमीलों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इससे जल सागो म जल या मापमान या जाता है । ऐम म प्राकृतिक संतुलन बिगह जाने के कारण जीवा को भारी क्षति उठानी पड़ा है। 86/पर्यावरण प्राति और मानव (vi) खनिज तेलों के द्वारा प्रदूषण-सागर जल-मागों से खनिज तेल ले जाने वाले जहाजा के दुघटनाग्रस्त होने से जल प्रदूषण तो होता ही है, भूमि पर भी तेलो के बिखरन के कारण प्रदूपण होता है। बडे-बड़े जलपोत टना खनिज तेल जल सतह पर छोडत रहत हैं । परन्तु खनिज तेलो के उत्पादन, शुद्धिकरण, सग्रह तथा वितरण व्यवस्थाओ मे, उनका भूमि पर गिरना स्वाभा- विक हैं । यह तल मिट्टी के साथ बहकर भी जलाशयो मे पहुचकर प्रदूषण फैलाता है। (vi) शवों का जल प्रवाह और प्रदूषण-नदिया के किनारे बसे नगरो मे शव प्रवाह का प्रचलन है। रोगजनित जीवाणुओ सहित मानव तथा पशुओ के मृतक पारार नदिया मे प्रवाहित कर दिये जाते है जिनसे जल का प्रदूषण अवश्य होता है । कई स्थानो पर जती अधजली लाशे प्रज्वलित अग्नि व राख को नदी में प्रवाहित कर देने पर तापक्रम बढ कर जल प्रदूपण हो जाता है। जल के मुख्य प्रदूषक तत्व- जल मे मिश्रित कुछ प्रदूषक तत्त्व बनस्पति तथा ज तुओ पर घातक प्रभाव छोडते है, कुछ तत्व तो तत्काल दुष्प्रभाव प्रणित कर देते है और कुछ अपना असर धीरे धीरे दिखा पात हैं । इनसे अनेक प्रकार के रोग ज म लेते हैं । जल मे मिश्रित तत्व जब अपनी सीमा से अधिक हो जाते हैं तो मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिहें अलग-अलग प्रस्तुत किया गया है (1) फ्लोराइड्स --अबावनिक फ्लोराइड अत्यन्त विषैला तत्व है। इसको लगातार मात्रा का उपयोग करने पर वजन कम हो जाता है रक्त की कमी दातो के रोग, अगो का असाधारण रूप में विस्तार, जोडो का दद, हड्डिया का गलना व मुडना आदि राग हो जाते है। पश्चिमी राजस्थान के भूमिगत जल मे फ्लोराइड को काफी अधिक मात्रा पाई जाती है। यदि यह मात्रा 1 पी पी एम से अधिक हो जाती है तो बच्चो के दातो मे छिद्र , तथा 1 5 पी पी एम से अधिक होने पर दातो पर घरे पड़ जात है, उनकी चमर समाप्त हो जाती है तथा वे पीले पड़ जाते है । (11) सोसा --यह एक साधारण जहरीला तत्व है जो निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में घुलने पर जनस्वास्थ्य का प्रभावित करता है। इससे भी यने प्रवार को पुस्फुस व वस्व सम्बधी बीमारियां हो जाती है। (i) पारा यह एक जीव द्रवजनिक विष है जो रक्त परिवह्न तत्र में अवशोषित हान के पश्चात, यकृत, गुर्दे प्लाही तथा हड्डियों में जमा होने लगता है। इससे मुह व मसोडो पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है । अम्लीय पारा जल-प्रदूषण व नियत्रण/87 तो और भी अधिक विपाक्त पदाय है और इसकी मात्रा में बढ़ोत्तरी हाने पर मिनिमाता रोग' हो जाता है। (iv) सोडियम -अत्यन्त सक्रिय तत्व होने के कारण योगिय रूप मे पाया जाता हैं । इन यौगिको मे जहरीलापन केवल धन आयन के कारण हो सम्भव होता है। (v) जस्ता - यह स्वय तो जहरीला नहीं है परतु इसपे यौगिक अवश्य ही कुछ विषैले होते है। जब जस्ते को गम किया जाता है तो जिक- ऑक्साइड बनता है जिससे ग्रास फाउडर रोग तथा वास विल्स' नामक बीमारिया हो जाती हैं। जिंक क्लोराइड की अधिकता से फेफडो सम्बधा रोग हो जाते है। (vi) फिनोल -यह एक अत्यत विपला कावनिक पदाय है । यह त्वचा तथा अत झिल्लियो को घातक रूप मे प्रभावित करता है । गुर्द, यकृत, प्लीहा तथा फेफडा पर भी घातक प्रभाव छोडता है। 15-20 मिनट तक हो त्वचा के साथ सम्पक रहन पर सिर का दद, मास पेशिया में ढीलापन, यून दप्टि, कम सुनना, तथा जल्दी-जल्दो श्वास लेना, बेहोशी आ जाना उत्पन हो जाते हैं और अत मे मत्यु तक हो सकती है । (vi) नाइट्राइट -यह भी एक खतरनाक यौगिक है जिससे शिशुआ मे रक्तावण गेग हो जाता है तया ऐसे शिशु को नीलावण शिशु (bluebaby) कहा जाता है। (vi) रोगजनक जीवाणु अथवा बारमेनिज्म-स्वास्थ्य के लिये अत्यत हानिकारक हैं । इनसे हैजा, मोतीझरा निमोनिया तथा इन्फ्लूएंजा आदि रोग फलते हैं। शुद्ध जल को पहचान किसी भी पनाथ की परिशुद्धता जानने के लिये एक विशेष पैमान (Scale) की आवश्यकता है यह बात दूषित जल के लिये भी सान होती है (अ) गदलापन जल म घुलनशील कथित बलिल तथा निलम्बित ठोस पदाप छितरे रहत हैं जो पानी को गदला करत हैं। यह जल पीने योग्य तो नहीं होता परतु नहाने धोने तथा मिचाई मे उसका उपयोग अवश्य दिया जा सकता है। प्राश यो स्तिनी मात्रा जल दो भेद सकती है ये अनुमार जल साफ या गदला रहतायेगा। (1) तापमान -जलीय जीव जतु एक निश्चित तापक्रम पर हा जीवित रह सकत है । तापक्रम के अनुकूल ही उनका अभिपिपाएँ भी प्रभावित 88/पर्यावरण प्रति मोर मानव - होती हैं सूक्ष्मजीव 27° सेल्सियस पर अधिक क्रियाशील तथा 32° सेल्सियस पर निष्क्रिय हो जात हैं। मत्सय 30° सेल्सियस पर सुचारू रूप से जीवन व्यतीत करते हैं और 35% सेल्सियस से तापक्रम बढने पर मरने लगत हैं। (स) जव रसायनिक मापसीजन अपेक्षा-(Brochemical Oxygen Demand-BOD)-~वायु को अनुपस्थिति मे निश्चित समय व तापमान पर जैव पदाथ के जैव रासायनिक आक्सीजन (अपघटन) के लिय ऑक्सीजन की मात्रा को जैव रासायनिक आक्सीजन अपेक्षा (BOD) बहलाती है। यह क्रिया अत्यत धीमी गति से चलती है । समयानुसार जैव पदाथ उसी गति से स्थिर होने लगते है आक्सीजन की माग भी कम होने लगती है। इसके लिये 200 सेल्सियस तापमान तथा 5 दिन की अवधि एक आदश स्थिति मानी गयी है । औद्योगिक अपशिष्टो मे विद्यमान प्रदूपयो के आधार पर इहे तीन श्रेणिया मे विभक्त किया गया है। (1) अपशिष्ट जिनमें उच्च ऑक्सीजन अपेक्षा (BOD) है अनेक फल व सरकारी भण्डार, गन्ना मिलो तथा कागज पी मिलो के अपशिष्टो मे शकरा के कारण ऑक्सीजन अपेक्षा उच्च स्तर की होती है। अनुमान है कि एक साधारण मध्यवर्गी कागज़ की मिल से उपसजित अपशिष्ट एक साधारण नगर जिसकी जन संख्या कई लाख हो सकती है के द्वारा फेंके गये अपशिष्ट के बराबर है। इनके काबनिक घटक भारी मात्रा में जीवाणु तथा पवको को पोषण प्रदान करते हैं। ऐसे जीवो को चयपचयो क्रियाओ मे आक्सीजन की मात्रा मे भारी कमी हो जाती है तथा यह क्षेत्र तेजी से ऑक्सीजन अभावी क्षेत्र बन जाता है । इस परिस्थिति मे मछलिया या तो मर जाती हैं या उस क्षेत्र को छोड़कर अन्यत्र चली जाती है। (2) अपशिष्ट जिनमें उच्च ऑक्सीजन अपेक्षा तथा यून विषपन है कुछ औद्योगिक अपशिष्ट ऐसे भी हैं जिनकी ऑक्सीजन अपेसा बहुत ऊचो होती है साथ ही काबनिर तथा मकावनिक विष पदाथ भी रहत हैं तथा इनके साथ ही हाइड्रोजन आयन की मात्रा बहुत उच्च तथा बहुत निम्न हो सकती है। शकरा पदायों के अतिरिक्त लक्डी को लुगदी के अपक्षपी पदार्थों मे उच्च ऑक्सीजन अपेक्षा, मोडियम हाइड्रोक्साइड, सोडियम सल्फाइड, फार्मलडिहाइड, व सोडियम लवण तथा फैटी अम्ल पाये जाते हैं । इन अपदायी पार्यो का उच्च वावनिक घटकों के कारण जल मे घुली ऑक्सीजगली मात्रा घट जाती है। अब यह स्थिति वायु मे सास लेने वाल जीमो उपयोगी नहीं रह जाती ! जरा भी हल्के विपले पदार्थो को Statt जन्तुओ मछली आदि पर घातक प्रहार करते हैं । जल-भf३९६४ (3) अपशिष्ट जिनम 'पून ऑक्सीजन अपेक्षा य उच्च विषपन है- खनिज एव रमायनिक उद्योगा से निक्लो वाल अपशिष्टा म विपल पदार्थों को मात्रा अधिर व काचनिय पदायों की मात्रा न्यून होता है एसे पदार्थों को ऑक्सोजा अपेक्षा यून होगी तथा विलापन अधिय होगा। ताबा, पारा तथा सीसा युक्त अपशिष्ट अधिर' भयपर सिद्ध होग। (4) रासायनिक ऑक्सीजन अपेक्षा (COD) खास परिस्थितिया म रासायनिय' मॉक्सीकरण (अपघटन) के लिये आवश्यक आक्सीजन की मावा रामाययि आक्सीजन अपक्षा (COD) होती है । प्रदूषण की मात्रा यो शीघ्रता से मापने के लिये इस विधि का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया दो तीन घण्टो मे पूरी हो जाती है । (5) जल मे पुली आक्सीजन (DO)-- जलीय प्राणिया तथा वनम्पति का जीवन जल मे घुली हुई आक्सीजन पर निभर करता है। जब जल म मल-मूत्र तया औद्योगिक अपक्षय अधिक मात्रा मे डाल दिय जाते हैं अपघटन के कारण पानी में घुली ऑक्मीजन म भारी कमी आ जाती है और मछलिया मरने लग जाती है, इस प्रकार जल दूपित होने लगता है। जल मे घुली आक्सीजन शुद्ध जल क्षमता की धोतर है । इसलिये जल म विद्यमान ज तुआ तथा वनस्पति के द्वारा प्रदूषण का पता लगाया जा सकता है। (6) हाइड्रोजन आयन की मात्रा (pH मान)- जल मे हाइड्रोजन की मात्रा से उसकी अम्लीयता व क्षारीयता का मान होता है । यदि pH का मान कम है तो इसका सीधा सा तात्पय यह है कि जल अम्नीय है। जब pH का मान 7 हो जाता है तो जल को उदासीन कहा जाता है। (7) जीव विज्ञानी विधिया--- जन पीो योग्य है अथवा नहीं यह जानने के लिये जल में कालीकाम नामक जीवाणु की गणना की जाती है। यूलोप्रिक्स नाम शैवाल शुद्ध जल में तैरता रहता है और क्लोरला नाम शैवाल क्षपित जल म । जल में फास्फेट की मात्रा अधिक हान पर हरी व नीली शवाले बडे बड गुच्छो के रूप जल सतह पर तरन लगती हैं । इसका मुख्य कारण है पर्याप्त पोषण क अभाव में यह नष्ट होकर महने लग जाती हैं और जल प्रदूपण म भागोदार बनती हैं। जल प्रदूषण निवारण तथा नियत्रण- जन सत्या म विस्पोट औद्योगिक विकास तथा शहरा के यापर विस्तार के परिणाम स्वाप दिगो नि' शुद्ध जल को माग सपत बढती जा रही है। 90/पयावरण प्रति, और मानव , जल को आवश्यक्ता तथा उपभोग का संतुलन के लिये जरूरी है कि जल अपव्यय पर नियत्रण किया जाय, उपलब्ध जल भण्डारो पो सुरक्षित रखा जाय तथा नये जल स्रोता की निरतर खोज की जाय । इसके अतिरिक्त शुद्ध मोठे जल को प्रदूषण से बचाया जाय और दूषित जल का समुचित उपचार करने के बाद उसरा फिर से उपयोग करने की दिशा में ठोस पदम उठाये जावें। जल के प्रदूषण पर दो विधियो से नियत्रण रखा जा सकता है - (अ) नदिया, तालाबो झीलो आदि मे स्वत शुद्धिकरण की प्रक्रिया द्वारा तथा (ब) प्रदूषण के साधना पर अकुश लगावर । जलाशया के जल स्वत शुद्धिकरण क्यिा मे सूय, प्रकाश वायु सूम- वनस्पति तथा जलीय जन्तुओ का महयोग होता है। जब प्रदूषण अधिक हो जाता है तो जल का स्वत शुद्धिकरण होना संभव नहीं है । ऐसी परिस्थिति में प्रदूपकों को उनके स्रोतो पर ही नियत्रित करने की विधि सफल हो सकती है। उसके लिये आवश्यक है कि बड़े शहरो मे भलस्राव प्रणाली विकसित करके स्थानीय परिस्थितियो व आर्थिव माधनो के अनुसार उपचार किया जाये तथा दूसरे उद्योग जनित अवशिष्टो के उपचार के लिये सपत्र लगाने मे योद्यागिक इकाईया पहत बरें। उपचार के पश्चात ही इन पदार्थों को जलीय ससाधना मे प्रवाहित किया जाय । इसके अतिरिक्त अन्य निवारक उपाय भी अपना जा सकते हैं (1) अपमाजको के अधिक उपयोग से हानिकारक प्रभावो के विषय में जनता मे जागरण की आवश्यकता है । (1) कृपि मे वम से कम जीवाणुनाशक, कीटनाशक तथा शासनाशक औषधियो का प्रयोग होना चाहिये । (u) मानव तथा पशुमा के शवो अथवा हड्डियो का विसजन रोकने हेतु सामाजिक वातावरण तैयार किया जाना चाहिये । (iv) पृथ्वी पटल से 30 से 35 प्रतिशत जल भाप बनकर उड जाता है उसे रोकने के लिये वैज्ञानिक वरावर प्रयासरत हैं, दूसरी ओर सागर के खारे जल को भी पीने योग्य बनाने के लिये प्रयोग किये जा रहे हैं । ऐसी स्थिति मे जल का अपव्यय मानव जाति व जीव जगत के साथ “याय नहीं होगा। इसकी रोकथाम करना प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। (v) उद्योगपतियो का शासक एव प्रशासको के साथ अपवित्न गठबधन पर्यावरण सरक्षण को महती आवश्यक्ताओ पर कुठाराघात है । गोमती नदी - जल-प्रदूपण व नियत्रण/91 मे जल को प्रदूपित करने वाले शक्कर तथा शराब के कारखाना के उच्च सपक रखने वाले मालिक' लोग ही थे। यदि ऐसे लोग अपने तुच्छ आर्थिक स्वार्थों को ताक म रख दे तो मानव जाति का वडा उपकार करेंगे। इहें यह समझना चाहिय कि शुद्ध पेय जत की कमी के कारण ही लोगों में विशेषकर बच्चो में हैजा, पेचिस टायफायड, क्षय, मलरिया, पेट के कीडे नारु आदि रोग उत्पन्न होते हैं। केवल भारत में ही दो-तिहायी बीमारिया का कारण अशुद्ध जल है। (a) काबनिक पदार्थों के निष्पादन से पूर्व उसका ऑक्सीकरण कर दिया जाय । पानी मे जीवाणुओ को नष्ट करने के लिये रासायनिक पदार्थ जसे ब्लीचिंग पावडर आदि का प्रयोग करना चाहिये । (vi) जब जल मे परमाणु परीक्षण किये जाते हैं तो जल में इनके नाभिकीय कण मिल जाते हैं और यह जल को प्रदूषित बनाते हैं। समुद्रों में होने वाले परमाणु परीक्षणा के कारण नाभिकीय कण सोधे ही समुद्री जीवा व वनस्पति को नष्ट कर देते है और सागरीय पर्यावरण मे अस तुलन की स्थिति जन्म लेती है अत अतर्राष्ट्रीय स्तर पर जल मे किये जा रहे पर माणु परीक्षणों पर रोग लगाती अनिवाय है। 92/पर्यावरण,प्रावि और मानव भूमि-प्रदूषण एवं प्रबन्ध एली पार एव पार (1967) ने मृदा के विषय मे कहा है कि यह भूमि भी वह ऊपरी थिथली' परतें हैं जो हजारो वर्षों से चट्टानों के टूटन स बनती है तथा जीवा और काबनिक यौगिको मे सम्बधित होती है । ट्रेशो (1970) ने मृदा या 'एक जटिल भौतिय-जविर महति कहा है जिसमे जल, पोषक तत्व व पादपो के लिये आक्सीजन सहयोगी है।' आज के परिवेश में वनानियों मृदा विज्ञान को जिस प्रकार विकसित किया है इससे समझा जाता है कि मिट्टी मृत नहीं है, उसका अपना जीवित ससार है। मिट्टी भी श्वास लेती है तथा सूक्ष्म जीविया सहित उसमे समस्त गदगी को नष्ट करने की निश्चित क्षमता है। यदि बाहरी साधना से जीवनाशियो के प्रयोग द्वारा उसकी क्षमताओ को कम किया जाता है तो मिट्टी मे गदगी घटने के बजाय और बढ़ेगी और मानव-स्वास्थ्य पर उसका दुष्प्रभाव ही होगा। मृदा पर्यावरण का एक अभिन्न अंग हैं और यह प्रदूषण से अछूती नही हैं । चाहे वायु-प्रदूषण हो अथवा जल-प्रदूषण इन सब मे मृदा भी सहभागिनी है । इसलिये मृदा, जल व वायु की अपेक्षा प्रदूपण वो सम्भावनाय से अधिक सत्रस्त है। उसे उष्मीय तथा नाभिकीय प्रदूषण भी बरावर आतक्ति पर रहे हैं । मिट्टी अपने प्रदूषण को स्वय तक ही सीमित नहीं रख कर उसे वनस्पतियो मे, फिर पशुओ मे और मत मानव में स्थाना तरित करती है। यह पत्र निर तर गतिशील रहता है। धुआ, गद व सडन भी सदय मृदा से चिपकी रहता है । औद्योगिकरण के कारण भी भूमि-प्रदूषण बढा है । आज भूमि एT रद्दी की टोकरी बन गई है। इसमें बिना किसी सोच विचार के अपशिष्ट या रद्दी माल फर दिया जाता है। कोई भी ऐसा पदाथ जा मृदा के साथ मिलकर उत्पादकता को प्रभावित करे मृदा प्रदूपर' कहलाता है। प्रदूपयो के कारण उत्पन स्थिति को प्रदूषण कहते हैं । प्रदूषित मृदा जन्तुओ को हानि पहुचाती है तथा मृदा के भीतर ही बदलाव आ जाता है । यह धनात्मक प्रदूषण है परन्तु इससे भी घातर प्रदूषण यह है जिसम स्थलाकृति मे ही रद्दो-बदल हो जाती है और जो विसी उपभोग या निष्कासन के कारण होता है, वह ऋणात्मक प्रदूषण होता है। भूमि अपरत्न ऐसा ही प्रदूपण है जो पशुचारण या वनस्पति के विनाश के कारण होता है। रेगिस्तान की उत्पत्ति का मुख्य कारण भी यही है। अपने घरो को स्वच्छ रखने की होड़ में घर का कूडा करवट, धातु निर्मित टीन, प्लास्टिर का भूमि प्रदूषण एवं टूटा सामान, कांच की बोतलें, अखवार व रद्दी कागज सेता म फर दियै जाते हैं, इसे तृतीय प्रदूषण की सज्ञा दी जाती है । अमेरिकन नागरिक प्रतिवप लमभग 250 किलोग्राम यागज प्रयाग कर फेंक देता है। विज्ञान तथा प्रगति की अधी दौर मे हमन भूमि को ही नहीं बरुशा है, प्रतिवष अरवा टन मिट्टी का परण केवल इसलिए हो जाता है क्योकि मानव भलि-भांति इसका उपयोग नही कर रहा है। अनुमान है कि भारत म ही कम से कम 17 5 लाख हेक्टेयर भूमि पर अनावृत्तिकरण का गम्भीर सक्ट है । सामाजिक वानियो ( Social forestry ) के नाम पर बडे बडे वनो का सफाया पर यूक्लिपटस के पेड रोप दिये गये हैं, भूमि में मनमा ढग रो उवरवो के उपयोग के कारण भूमि अपनी उवराशक्ति को खोकर खाद पर जीवी हो गई है। यही कारण है कि भूमि में जो पा डाली जाती है वह खाद्य-पदार्थों के जरिये मानव शरीर मे पहुच कर अनेक प्रकार के राग पदा कर रही है। खाद्य पदार्थों, दूध मक्खन आदि में डी० डी० टी० ३ अय जीवनाशक, कीटनाशक' क्ववनाशक, शाक्नाशक औषधियो के तत्व मिल गये हैं। इनके अतिरिक्त भी विवामित राष्ट्रों को होड में महाशक्तिया दिन रात अणु, परमाणु हाइडोजन बम परीक्षण, नाभिकीय सस्थान रेडियोसत्रिय अपशिष्ट पदार्थों, रेडियोसमस्थानिको आदि को विसर्जित करता रहती है जिससे पर्यावरण प्रदूपित होकर कैसर बाझपन तथा मानसिक रोगियो को सख्या म वृद्धि हो रही है। गावो मे पशुआ का गोबर व मूत्र गदगी का एक प्रमुख कारण है परतु इ ह यदि कामपोस्ट के रूप म घेतो मे डाला जाय तो ये भूमि को उवराशक्ति को बढात है । उनत देशो मे जहा पशु उद्योग संगठित है बडे बडे डयरी फाम हैं वहा की स्थिति गभीर है । पशुओ का मलमूत्र उठाना दुष्कर हो रहा है जिससे प्रदूषण भी बढा है । यहा कृषि के अवशेष उग्न समस्या बन चुके हैं। चावल मिला के आसपास भूसे के ढेर चीनी मिला के निकट गने की खोई तथा शीरा कागज की मिलो तथा कृपि-उद्योगो के अपशिष्ट भी उन प धारण कर गय है । 25 000 टन फला व सब्जियों या अपशिष्ट भी निकलता है । प्राप्त आफ्डी के आधार पर कहा गया है कि भारत मे ही कुल 2 अरब टन अपशिष्ट होता है जिसके लेशमात्र भी कृषि में पुन वाम मे नही आता यह मदा-प्रदूषण को ही बढावा देता है । हमारे देश मे बजर तथा लवण युक्त मिट्टियो की भरमार है जो लवणो के अत्यधिक सचय के कारण है । यह लवण सिंचाई-जल तथा भूमिगत जल से बचे रहत हैं । लवणो के सचित होने पर मदा की भौतिक स्थिति धराव हो जाती है । वर्षा का बल भूमि के भीतर प्रवेश नहीं कर पाता और ऐसे सत्रो म पसलो को उगाना सम्भव नहीं होता। 94/पर्यावरण प्रकृति और मानव जब जन मख्या में वृद्धि होती है, मनुष्य को नये आवासो की खोज करनी पडती है, तब उमे अन्य धोतो से नये संसाधनों के उपयोग की आव- श्यक्ता होती है । वह समाज में रहकर अनुभव करने लगता है कि अपन वातावरण को सुरक्षा दे, ममानो का सही उपयोग कर तथा समस्याओ के धेरे मे उलझ कर नहीं रह जावे । मनुष्य ने प्रकृति को 'दास बनाया है तथा ससाधना यो दृढ बनाने का भयक प्रयास भी किया है परतु इसके परिणाम बहुत हद तक मनुष्य के लिये अहितकर सिद्ध हो रहे हैं। इह साधारणतया "पारिस्थितिक दुष्परिणाम (Ecological blacklashes) कहा जाता है । फावर तथा मिल्टन (1969) ने विश्वस्तर पर ऐसे दुष्परिणामो फी मार ध्यानाकषण किया है। अविकसित देशो म बडे-बडे बाध बन जाने के कारण दूसरे प्रकार की समस्याओं मछलियों की उपज में भारी कमी, मदा का अपरदन, बड-बड़े दलदलो का निर्माण, सी ती मक्खियो की जीव सख्या में भारी द्धि तथा महामारियों का प्रकोप । भूपटल के कपर तथा जलमण्डल के नीचं तक जैव-भ-रासायनिक आवरण मृदा जव पदार्थों व चट्टानो की अतरक्रियाओं से हजारो वर्षों के सत्तत् प्रयास से बनी है । औद्योगीकरण व शहरीकरण व अन्य मानवीय कृत्यो का मृदा पर गहरा असर हुआ है । वना मे अयोजनापूर्ण बरबादी का जल व भूभाग पर घातक प्रहार हुआ है । वन क्षेत्रो में पड़ा के क्ट जाने से मृदा के उपजाऊ कण भी बह जाते हैं तथा विषम परिस्थितिया उत्पन्न हो गई हैं । कृषि में आधुनिक्तम तरीको वा उपयोग व मधाधुध रासायनिक खादो ने पर्यावरण को भयकर मोड पर ला खड़ा किया है। एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अरावनिय खादो के स्थान पर बाब निद पदार्थों का उपयोग अधिा श्रेयार होगा। जमीन को पटाव से बचाने के लिये घासस्थलियों का विकास किया जाय, यो तथा उपवनों वे महत्व को समया जाय । चट्टाने मदा की जननी है और मदा का निमाण हजारो वर्षों में पूरी होता है । यह मृदा ही पादप-उत्पादन का माध्यम है तथा इसी के भीतर पादपो पा भूत परिवधन सम्भव है । वस्तुन मदा पृथ्वी की बाह्य पटल गया जलय घट्टाना रे आवरण वा काय करती है। इस परत म खनिज लवणा, अधिक दव, सूमजीवी पोषक तत्व तया वायु व जल पी उपस्थिनि अनिवाय है। मानव भाजन का मूल माघार पादय समुदाय ही है । इस प्रकार स्यत्तीय पादपों की मूला अओं या पर्यावरण भूमि की परतो के रुप में 'मदा प्रणाली में निहित है । इस तथ्य से स्पष्ट है कि मृदा मी वायु जल की भाति एक प्रातिर मसाधन है और उतना ही आवश्यक भी। यदि मानव को इस भूपटल पर अपना अस्तित्व रखना है तो उसके लिये मृदा यो उपना करना भूमि प्रदूषण एवं प्रब/95 महासागर-भौगोलिक पर्यावरण भूगोतवत्ता के अनुसार पृथ्वी ए जलीय ग्रह है। चूकि परतो का आसकरण हो गया है पृथ्वी का भीतरी जल बाहर निकल कर, निवल तलो म एकत्र हो गया है। पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग जलीय आवरण से आवरित हो गया है और कही-बही जल को हरायो 3730 मीटर तक हो गयी है। केवल कुछ ही जम तक पृथ्वी जल का एक छोटा-सा बश वायु• मण्डल में समाहित होता है, स्थल पर झोलो, तालावों आदि के भीतर भरा रहता है हिमानियो या परत को चोटियों पर बफ के रूप में जमा रहता है। जल का अधिकाश भाग तो समुद्रो के भीतर ही समाया हुआ है। समुद्र विशाल, गभीर व मर्यादा की महिमा बनाये रखते हैं। पृथ्वी पर जन समुदाय कुछ सौ किलोमीटर सागर तट पर ही बसा हुआ है। इस जन समुदाय के लिये मागर मौज मस्ती के क्षेत्र, भोजन ससाधन तथा व्यापारिक मार्गों के रूप मे काय करता है। ऐसे समुदायों के लिये भी जो सागर ता से दूर स्थित है, उनकी दैनिकचर्या को भी बड़ी मात्रा में प्रभावित करत है । सागर केवल जीवन क आवश्यक तत्व जल को ही उपलब्ध नही कराता वरन् यह मौर ऊर्जा को भी संग्रहित कर पृथ्वी के वायुमण्डलीय चत्रण द्वारा ऊजा का वितरण करता है फलन्, मौसमो का निर्माण भी करता है । हमारा विभव सक्षिप्त मे जलीय ही है तथा सागरा के विस्तृत अध्ययन द्वारा ही हम अपने स्वयं के पर्यावरण को अधिक से अधिक जान पाते है। भूमि-तल जो लगभग 5100 लाख वग किलोमीटर मे विस्तृत है, उसे देखते हुए महासागर 3610 लाख वग किलोमीटर अर्थात् 70 8 प्रतिशत मे फैले हुए हैं। विश्व का आयतन 1368 x 1018 लीटर है, उसकी तुलना मे महासागरों का मानाभार 1,419 x 1018 मीटरिक टन है जो पृथ्वी के मकल भार का 024 प्रतिशत है। पृथ्वी का सकल मात्रा भार 1591 x 1018 मोटरिक टन है। पध्वो पर मिलने वाला 972 प्रतिशत जल समुद्र म ही निहित रहता है तथा शेष 28 प्रतिशत ठोस रूप मे रहता है। वास्तविक्ता में जो जल भूमि-तल पर तथा वायुमण्डल में विद्यमान है, विश्व के 46 अरब लोगों के लिये सकल जल संसाधन का 0 031 प्रतिशत ही है। महासागरो के विषय में कहा जाता है कि यह पृथ्वा तल का प्राचीन स्वरूप है जबकि यह विश्वास क्यिा जाता है कि पृथ्वी 4 5 अरब वष महासागर-भोगोलिक पर्यावरण/97 पुरानी है तथा महासागरो की आयु 3 अरव वप है । जल तथा भूमि के बीच स्थान अपनी सीमामा को निरतर बदलते रहते हैं । इसका मूल कारण हिम नदियो के हिम रा पिघलना है। महासागरा के थिचल क्षेत्र किसी समय सूखे स्थली क्षेत्र रहे हागे । एमा भी अनुमान है कि 20,000 वप पूर्व महा- सागर आज के स्तर से 130 मीटर नीचे था। एगिया व उत्तरी अमरिका उस समय में पृथ्वा के एक हो भूभाग ये तथा उनके मध्य स्थलीय पुल था जो जब बहरिंग जल डमरु मध्य तथा चुकुची सागर के रूप में विद्यमान है। ममस्थलीय आकडे- पृथ्वी का क्षेत्रफल--510x105 वग कि मी महासागरो का क्षेत्रफल-361x10° वग कि मी (708 प्रतिशत पृथ्वी का) पथ्वी का माता भार-591x1018 मीटरिक टन महासागरो वा मात्रा भार-1419-1018 मीटरिक टन महासागरो का आयतन-1368x1018 लीटर वगाल की खाडी तथा अरव सागर का क्षेत्रफल--10312x106 वग कि मी (समस्त महासागरो का 29 प्रतिशत) भारत का क्षेत्रफल-3276x106 वग कि मी (318 प्रतिशत सागरो के अतिरिक्त घर हुए) भारत व भारतीय सागर :- भारत भूमि का क्षेत्र फ्ल 3 276x106 वग किमी है जो समस्त पृथ्वी का 0 64 प्रतिशत है। बगाल की खाडी व अरब सागर को सयुक्त कर सागर क्षेत्रफल 10 312x108 वग कि मी है जो विश्व के सभी महा- सागरो के क्षेत्रफल का 29 प्रतिशत है। इस प्रकार हम देखते है कि भारत के चारो जोर स्थित सागर क्षेत्र भारत क स्थलीय क्षेत्र का 3 गुना है । यह भी सत्य है कि यह सारा क्षेत्र भारत का नहीं है। नियमानुसार प्रत्येक देश के लिये उसके सागर तट से 200 नाटिवल मोल (370 कि मी) का ही क्षेत्र उसका हो सकता है और वह देश अपने ही क्षेत्र मे जविक (मस्य आदि) तथा अजविक' (खनिज तेल आदि) के ससानो को अपने उपयोग में ला सकता है । ऐस मागर क्षेत्र को एकाकि आधिक सभाग l exclusive economic zone) कहते हैं जिसके द्वारा उम देश के ही जहाज अपना व्यापारिक साज-सामान एक ओर से दूसरी और ला वलजा सात है । इस आधार पर भारत के अधिकार क्षेत्र म 205x10 वग पि मा सागर आता है जो सम्पूण भारत के सबल क्षेत्रफल का 615 प्रतिशत होगा। भारत का सागर तट भी लगभग 6000 कि मा लम्बा है जिसम अनक नदियो का समागम होता है और 1645 धन 98/पर्यावरण प्रकृति और मानव वि मी स्वच्छ जल बह कर आता है। इसका लगभग 15 प्रतिशत वगात की खाडो मे ही गिरता है। भारत के चारो ओर स्थित सागर में सन् 1984 में 16 8 लाख टन मत्स्य उत्पादन हुआ था तथा प्रतिवप मत्स्या को पक्डन की दर 10 प्रतिशत बढ रही है अर्थात प्रति दम वर्षो मे मस्स आपेट दो गुना हो जाता है। भारत के चारों ओर सागर-तटीय प्रदूषण की स्थिति सन 1981 में भारत की जामख्या 7500 लाख थी नथा 1880 ताप लोग अर्थात भारत की आबादी का 25 प्रतिशत सागर तट या समीपी क्षत्रो म ही वसता है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अपने जीवनाधार सागर पर ही निभर रहता है । भारत में सागरतटो पर स्थित महानगरो का घरलू अपक्षय 120 लीटर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति की दर से सागर में प्रवाहित हो रहा है इस आधार पर प्रतिवप लगभग 41 घन कि मी अपाय सागर में जुडता है 1 066 से 0 06 धन कि मी क्रमश बम्बई व मद्रास व दरगाह के द्वारा ही जुड़ जाता है। सागर तट पर बडे बडे उद्योगो म निकलने वाले अपशिष्ट भी समुद्र में ही छोड जाते हैं । यह भी अनुमान है कि भारत में सागरा म मिलन वाले अपशिष्टो म 10 प्रतिशत केवल औद्योगिक उत्पादन है। इसका सीधा जय है कि अतिरिक्त 041 धन कि मी अपशिष्ट सागर के साथ जुड जाता है। अकल बम्बई महानगर ही 2310 लाख लीटर अपशिष्ट प्रतिदिन सागर म भेजता है । इस दर से 05 किग्रा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से यदि गदगो सागर में मिलती है तो एक वप में भारतीय सागरो मे लगभग 33x10 टन ठोस अपशिष्ट व अशुद्धिया अ त मे सागर में पहुच जावगे। इसी प्रकार यह भी जनुमान है कि सागर में जितनी भी नदिया मिलती है, सभी अपरदो का 5 प्रतिशत सागर तक वहा लेपर आती है। महानदी गगा के अपने स्वयक डेल्टा में स्थित उद्योगो के कारण अपने वापिस 370 धन पि' मी या 0 344 धन कि भी अपरद समुद्र मे गिरता है । कहना होगा कि 1083 धन कि मी भारतीय नदिया द्वारा सागर में प्रतिवप आ मिलता है। भारत म जीवनाशियो वा उपयोग भी भारी मात्रा म किया जा रहा है जो औसतन 55,000 टन प्रतिवप है। इसी प्रकार 125,000 टन सरपित कपडे धोने का डिटर्जेट पाउडर, द्रव सावुन तथा 5x106 टन उवरको को प्रतिवप काम मे लिया जाता है। यह तो साधारणतया विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इनके 25 प्रतिशत भाग तो अवश्य ही समुद्र मे मिलता होगा। सभी को जोड कर, इन अनक वर्षों में बहुत विशाल मामा म अपशिष्ट सागर मे ममा गये हैं। । महासागर-भौगोतिक पर्यावरण फारस की खाडी से अरब सागर में होकर कच्चा पनिज तेल व उत्पाद विदेशा को जाता है-तेल वाहर जहाज प्राय पश्चिमी गोलाद मनफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर सूदूर पश्चिम में जाते है। इस प्रकार पूर्वी गोलाद में भी जापान आदि देशा को जाने वाले जहाज भारतीय सागर तट के साथ श्रीलमा हाकर जाते हैं। सन 1985 में विश्व के खनिज तला का आवागमन 12640 लाय टन का था, इसका 43 प्रतिशत भाग अर्थात 4470 लाख टन तेल व तेल पदार्थ अरव सागर के माग द्वारा ही पहुचाये गये थे । तल के विखरने व खाली टेकरो के धाने के परिणाम स्वरूप 750 स 1000 टन तेल प्रतिवप भारत के पश्चिमी तट पर ही विखर जाता है और टार को गोलियो के रूप म सागर-तल म सग्रहित होता रहता है। प्रदूषों से खतरा जव यह प्रदूषक समुद्र में गिरते हैं तो रासायनिक व जविक प्रतिक्रियाओ के कारण परिवर्तित होत है और कभी-कभी कम और भी अधिक विनाश- कारी पाथ बना देते है। कुछ प्रदूपक एसे भी हात है जिनमे किसी प्रकार का परिवतन नहीं होता और उह स्थायी प्रदूषक (biomaginfications) कहते हैं । कभी कभी कुछ प्रदूपक' जधिक वधन के कारण अधिक भयकर रूप धारण कर जाते हैं । इनम कुछ भारी धातुओ के कारण भी धनते है । भारी धातुऐं तरने वाली शवालो (पादप प्लवक) के द्वारा स्वागीकृत होरर भोजन शृखलाआ के अ तगत ज तु प्लवको मे पहुचते है जि हे छोटी मछलिया और तदुपरा त बडी मछलिया भक्षण कर लेती हैं। जववधन का एक उदा- हरण पारा है जो जल म नानोग्राम स्तर पर सम्प न होता है तथा मत्स्य मे मिलीग्राम स्तर पर । इसा बय है पारा सागरीय पर्यावरण म मत्स्य द्वारा एव मानव मे भोजन के द्वारा पहुचता है। यहो क्रिया म य दूसरे प्रदूषको को भी हो सकती प्रदूपक सागर में मानव द्वारा बड़ी मात्रा में अपने अपक्षय द्वारा उत्मजित होता है। किसी भी एक व्यक्ति को प्रतिदिन 2-3 लाटर जल की आवश्यकता होती है परतु सागर में जो वास्तविक आपतन अवशिष्टा या पहुँचता है वह कई सौ गुना अधिक होता हैं । मानव अपशिष्टो मे वाब- निक पालीफास्फेट का अनुपात बहुत बड़ा होता है । इसी प्रकार कावनिक नाइट्रोजन घटक भी फी ऊचा होता है । जल म अपशिष्टो म फास्फारस नाइट्रोजन के भार में भी 2-5 गुना अधिक है । ये फास्फोरम व नाटटोजन जीवाणु की उपस्थिति म अकावनिक पदार्थों में परिवर्तित हो जात है और जलीय आरसीजन का भी प्रभावित करते हैं। यह कावनिक लवण पारप. जमा के पापण म उपयागी सिद्ध होते है और लगभग 10 प्रतिशत पादपा 100/पर्यावरण, प्रकृति और मानव का उपभोग जन्तु प्लवको द्वारा हो जाता है । दूसरा 10 प्रतिशत वर्गर स्टे ही सागर-तल म एकत्रि हो जाता है तथा शेष 80 प्रतिशत सडकर व टूटकर घुली हुई आक्सीजन को प्रभावित करता है, परिणाम स्वरूप विपला हाइड्रो. जन सल्फाइड बन जाती है तथा जल में अकाबनिक लवण छोड दिये जाते हैं। जब इस तल म ज्यो-ज्यो जल वह कर बाता है तो पोषक युक्त जल तल से सतह को ओर ऊपर उठकर आता है और पुन सतह पर शवाल समूह (algal blooms) बनने लगते है । इस प्रक्रिया को सुपोषणीकरण (eutrophication) कहत हैं । यह क्रिया अपने आप म वारवार दोहरायी जाती है। थाहतमल (sewage) के साथ अनेक प्रकार के हानिकारक जीवाणु यथा कालीफामस, और रोगवाहक शुक्राणु भी मौजूद होते है । जब इन सूक्ष्म- जीवियो की मात्रा आवश्यक्ता से अधिक हो जाती हैं तो जल नहाने, तरने और अ य दूसरे मनोरजन के उद्देश्यो के योग्य नहीं रह जाता है। सागर-तलोय पेट्रोलियम हाइड्रोकाब स अपने माध्यमिक रूप में रहते हैं जो भौगर्भिक परिवतना म मीथेल व कावन-डाई-ऑक्साइड आदि उत्पन करते हैं । यह सदैव प्राकृतिक पहिगमन के द्वारा ही वहा तक पहुच पात हैं। अनेक प्रकार के हाइड्रोकाव स प्राकृतिक रूप में भी समुद्री जीवो म पाये जाते हैं। खनिज तेलो के आवागमन की गति बढ़ जाने के कारण, तेल का कुछ अश निखर जाता है और सागरीय पर्यावरण में यह एक प्रमुख प्रदूपक होता है जिसका तात्कालिक दुष्प्रभाव समुद्री पक्षियो की मृत्यु है । इसी प्रकार तल को पतली परतें समुद्री क्रस्टेशियन्स के सवेदी जगो को आवरित कर देती है और भोजन हेतु उह अयोग्य बना देती है, साथ ही अपने हिंसको से बचाव की क्षमता को भी समाप्त कर देता है, इनकी प्रजनन क्षमता भी क्षीण पड़ जाती है । तैलीय पदाथ मोलस्का समुदाय-मोतीसीप घोघे आदि वय तलीय जीवो को भी भारी नुकसान पहुंचाती है और वे जीव मानव क भोजन के अयोग्य हो जात हैं। गत् 15-20 वर्षो म अनेक विपले भारी धातुओ को साद्रता भी कई सौ गुना बढ़ गई हैं। उदाहरण के लिय सीसे का टेट्राईयाइल जो पदाल व साध समिधित होता है, वायु के द्वारा सागर की सतह पर एकत्रि ह न लगता है। केवल इसी प्रक्रिया म महासागरा म सीस की साद्रता लगभग 500 गुना बढ़ गई है। पारे के बढ़ते प्रयोग के कारण जापान म विश्व-प्रसिद्ध मिनीमाता रोग' मानव द्वारा मत्स्या का उपभोग करन से हाना है। धातु की मादता बढ़ जाने के कारण अयोग्य तथा मदबुद्धि शिशुना का जम होता है। केडमियम विप के शरण गुर्दे नष्ट हो जात है, मूब म विपत प्रोटोन व हडिया मे केल्सियम पहुचन पर-इटाई-ईटाई रोग उत्पन्न हो जाता है। महासागर भौगोलिक पर्यावरण/101 अभ्य अपक्षयी धातु तत्व-तौवा, जस्ता, आरनेनिक आदि को भी समुद्री मछलिया, सीपियो व जतु प्लवका म सग्रहित होते देखा गया है। डी०डी०टी० तथा पो०सी०बी० आदि जो बहुक्लोरिनेटेड हाइड्रोकाव स को थणी में पाये जाते हैं और स्थायी प्रदूषक है जब सागरीय पर्यावरण म पठते हैं तो इनम पिसी प्रकार का रसायनिक परिवतन नहीं होता। वह दोनों हो कुछ प्लवका कस्टेशियन, मोलस्क व मछलियो म जमा हो जाते हैं। पक्षी वग जव ऐसे जीवा का भक्षण करते हैं तो देखा जाता है कि उन पक्षिया के अण्डो के क्वच बहुत पतले होत हैं और एस अण्डो से शिशुओ का बाहर निकलना सम्भव नही बनता। इसी तरह से सागरीय पक्षियों को सख्या में भारी गिरावट आ गई है। भाज मानव ऊर्जा के अया य साधना को ढूढने में लगा हुआ है क्योकि सजा के सचित साधन यया कायला व पट्रोल आदि तेजी से खप रहे हैं । अणुशक्ति तथा ताप कर्जा का विकास हो रहा है। इन विधियो में जल तापमान को ठण्डा करने में सागरीय वनस्पति व जन्तुओ की भारी हानि होगी। रेडियोधर्मी अपशिष्टो के सागर मे पहुचने पर तो और भी वीभत्स नतीजे सामने मा सकते हैं । यह सत्य है कि सागरा मे दिन म दो वार 'ज्वार' उठता है और जल कई मीटर की ऊजाई तक उठ जाता है जिससे प्रदूपको का घातक प्रभाव अधिक नहीं दृष्टिगत होता। भारतीय महासागर में ज्वार का वेग अधिक नहीं है, केप कैमेरीन के समीप तो ज्वार का उठाव 1-2 मीटर का ही है जबकि खम्भात की खाडी में 8-9 मीटर तक होता है। 102/पर्यावरण, प्रकृति और मानव सागर-प्रदूषण तथा निवारण सार विनानी जैक येसकुस्तू ने दम वप पूर्व, साढ़े तीन वर्षों मे 2,48,000 किलोमीटर की समुद्र यात्रा से लौटने के पश्चात एक हो वाक्य मे उत्तर दिया था कि सभी सागर अब मृतप्राय होते जा रहे हैं। गत दस वों में सागरो यो वास्तव मे मत्यु के निक्ट ला खडा किया है। भूमध्य सागर के विषय मे भी कुछ इसी प्रकार को अभिव्यक्ति की गई है । वह इतना दूपित हो चुका है कि अब वह सागर नही रह पर मात्र एक गन्दी पील' बन गया है। समुद्र तट पर बसे नगरो व गावो का मलमूत्र व कूडा सदियो से समुद्र मे ही विसर्जित होता आया है, उसमे रहने वाले जन्तु विजित पदार्थों का सेवन कर लेते है । कुछ पाय जैव रसायनिक क्रियाओ द्वारा जन्तुना के खाद्य में बदल जाते है । थोडा अश ऐसा भी बचा रहता है जो ठिकाने नहीं लगाया जा सकता है ऐसी स्थिति में सदिया से ही वह 'कूडादान' बनता रहा है। कुछ वर्षों पूर्व तक सागर को पित नहीं कहा जा सकता था--जीव-ज तु स्वछ दता पूर्वक विचरण कर रहे थे, न तो दम घुटने से उनकी मत्यु होती थी और ना ही जहरीले पदार्थों को पाकर। परतु गत कुछ वर्षों म सागर मे समाये अपशिष्ट काफी मात्रा मे ऐस हैं जिह समुद्री जन्तु सीधे ही नहीं खा सक्ते । जव रसायनिक स्यिाओ द्वारा हानिप्रद पदार्थों मे भी शीघ्र विघटन नहीं हो सकता। ये पदाथ स्थायी हैं और लम्बी अवधि तक सागर तल में पड़े रहत हैं । यही कारण है कि आज सभी सागर प्रदूपित है । आइये, यह भी देख लें कि इन नत सागरो में कितना पारा, कितना सीसा व स्तिना जहर हमने जाने अनजाने घोल दिया है। पृथ्वी के 71 प्रतिशत हिस्से को घेर सागर सालाना 50,000 टन से भा अधिर पारे के घातक यौगिको को अपन मे समेट रहा है। यह हलाहल उह मिल रहा है कृपि तथा उद्योग के काम में आन वाले पदार्थों से। इनम से बहुत तो पारे के कावनिक यौगिको के रूप मे होत हैं जो क्वकनाशियो बऔर उत्प्रेरको की भाति प्रयुक्त होते हैं । जल के साथ घुलकर वर्षा जल के साय बहार नदी, नालो व महानदियो से होत आखिर सागर में समाहित हो जाते हैं, कुडादान म फेंक दिय जाते हैं। पारे के यौगिक अत्यन्त विषले तथा स्थायी होते हैं, इनमे कुछ अविघटित स्थिति में 50 100 वप तक जल मे पडे सागर-प्रदूषण तथा निवारण/103 -पारा रह सकते है तो कुछ 'मेथिल पारे' में बदल जाते है जो अत्य त घातक विप है। खायी जान वाली मछलिया तथा अन्य जतु पारे के योगिको का जब भक्षण करती है या व जव भोजन शृखलाओ द्वारा उन तक पहुचते हैं- ऐसे दूपित जन्तुओ द्वारा मनुष्य तक पहुंचता है-वह अधा हो सकता है, मस्तिष्क को हानि पहुंचाता है, तत्रिका रोग उत्पन कर सस्ता है और तत्पश्चात मत्यु तक हो सकती है। जापान को मिनीमाता खाडी मे पारे का सुरक्षित अक कही अधिक हो गया है। सीमा ऐसा ही दूसरा तत्व है जो औद्योगिक प्रगति के नाम पर सागर को प्रदूषित कर रहा है। इसके यौगिक भी समुद्रो मे भारी मात्रा मे पहुँच रहे हैं । सवमा य है कि प्रति वप लगभग 1,50,000 टन सोसे के योगिक विभिन्न क्रियाओ द्वारा सागर में धकेले जा रहे हैं। केवल उत्तरी गोलार मे ही गत 45 साल में सीसे का ए टोनाक 01-02 म्यू-ग्राम से बढकर 07 म्यूग्राम/प्रति किलोग्राम हो गया है। सीसे को इस बढी हुई मात्रा का सागरीय जीव ज तुओं पर क्या असर हुआ है, हमे इसका पूरा नान नहीं है पर तु वह निश्चिय ही घातक है। केवल पारा व सीसा ही नही, अनेक कीटनाशक भी तीव्र गति से सागर तक की दौड में भाग ले रहे हैं। हर देश हर सम्भव कोशिश कर रहा है, चढती जनमस्या के लिये खाद्यान उत्पन्न करने की तथा विभिन्न किस्मो के रसायन प्रयोग कर, पसलो के नुकसान पहुचाने वाले कोटो व जीवाणओ को नष्ट करने का उपाय कर रहा है। इसम कोई शक नहीं है कि इन रसायना मे हानिकारक कीटाणुओ को नष्ट कर उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान क्यिा है पर तु बोनस के रूप मे प्रदूषण भी दे दिया है। यह प्रदूषण केवल जल, थल, वायु तथा नदियो तक ही सीमित नहीं रह कर सागर तक भी पहुच गया है। कीटनाशको मे सर्वाधिक उपयोग डी०डी०टी० का हुआ है जिसके विघटन से डी०डी०ई० बनता है। निश्चित ही सबसे अधिक प्रदूपण डी०डी०ई० के कारण हाता है । भोजन शृखलाआ के माध्यम से यह मासाहारिया के शरीर में एकत्रित होता रहता है। अधिक साद्रता के कारण यह मछलियो के लिये घातक सिद्ध हुआ है। पक्षियो की सख्या पर भी इसका प्रभाव पड़ा है तथा मानव में ऐसे मासाहारियो को खाने पर सर, त्रिका रोग रक्त कैसर जस रोग उत्पन्न हो जात हैं। दूसर कीटनाशक डिलड़ीन, एल्ड्रीन हेप्टाक्लोर आदि भी प्रदूषण फलान में योग देत है। इन सभी के कारण सागर तट पर मछलियो की सख्या में भारी वमा आ गई है। 104/पर्यावरण, प्रकृति और मानव प्लास्टिक भी प्रदूषण फैलाने को दौड मे किसी से पीछे क्यो रहे ? यह धातुओ से बहुत सस्त है अधिक उपयोग मे आने लगे है । काम मे लेते हुए उनकी कठोरता वढती रहती है रग बदरग हो जाते हैं और टूट जाते हैं तब हम उहे फेक देते है । सोचना है क्या हमने इनसे हमेशा के लिये छुट्टी पाली । नही उ होने तो हमारा पोछा पाड रखा है। वे तो हमारे पर्यावरण को अवश्य ही आगे दूषित बनाने वाले है। यह पदाथ बहुत देर से तथा कठिनाई से ही विघटित होते है । वायु, जल, मृदा, सूक्ष्म जीव जैसी प्राकृतिक शक्तिया भी इहे आसानी से आत्मसात नहीं कर पाता। कुछ नोगा का कथन है कि प्लास्टिक के एक डिब्बे की उम्र मिस्र के पिरामिडो से भी अधिक हो सकती है । निश्चय ही इनके ढर भूतल पर वढते जायेंगे, कालान्तर मे इ हे सागर मे ही प्रवाहित होना है । यह भी सागर-प्रदूषण के महत्वपूर्ण कारक है । प्लास्टिक, रबर, रेजक आदि बडे पमाने पर उपयोग मे आने लगे है, जिह रसायन शास्त्रियो ने पी० सी० बी० (पालीक्लरीनेटेड बाइफोनायल ) नाम दिया है, सागर को विस्तृत रूप मे प्रदूपित कर रहे हैं । विश्व का खनिज तेल का कुल उत्पादन सालाना 250 करोड टन है। 180 करोड टन स अधिक तेल समुद्री मार्गों से ही ढोया जाता है । इस काय मे लगभग 20 से 50 लाख टन तेल सागर की सतह पर ही बिखर जाता है । यह तेल ढोने के समय नहीं बिखरता वरन् सागर से तेल खनन के समय भी विखरता है। आज जधिक से अधिक देश सागरो मे तल निकालने के प्रयत्न में लगे हुए हैं। भारत भी इस दिशा मे प्रगति कर रहा है । वम्बई के समीप बोम्बे हाई' से 'सागर सम्राट' की सहायता से तेल प्राप्त किया जा रहा है क्योकि तेल का मूल्य बढता जा रहा है । सभी राष्ट्र अपने इन प्रयत्ना में तेजी ला रह हैं । परिणामस्वरूप सागर पर विखरन वाले तेल की मात्रा में भी निरतर वृद्धि होती जा रही हैं। सागर पर बिखरने वाले तेल मे बहुत सारे परिवतन होते हैं। उसके हल्के अश वाष्प बनकर उड़ जाते हैं। इससे वह गाढा तथा भारी हो जाता है। धूप व आक्सीजन उसे (बुहलक पालिमरित) करते रहते हैं जिसके कारण वह और भी गाढा तथा भारी होरर 'टार' की छोटी-छोटी वाली गोलियो के रूप में बदल जाता है। तल की कुछ मात्रा जल म भी घुल जाती है । कुछ अश सूक्ष्मजोवियो के द्वारा विघटित भी होता है, ऐसे हाइड्रो कारखाना को ऊर्जा के लिए इस्तेमाल करते हैं । यह भी प्राय देखा गया है कि तेल के हाइड्रोकाव स समुद्री जीवो के शरीर म पहुच जाते हैं और लम्बे समय तक भी टूटते नही है । जब कोई अन्य जीव इनका भक्षण कर लेते हैं तो अविघटित रूप में ही यहा पर भी विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार एक के बाद दूसरे, सागर-प्रदूपण तथा निवारण/105 तीसरे व चौथे जीव के शरीर मे पहुचते रहते है और जब हम उन जीवो को खाते हैं तो यह हाइड्रोकावन कसर जस घातक रोग उत्पन कर देते हैं । तेल के सागर सतह पर विखराव के कारण वडी संख्या मे जीव-जन्तु मर जाते है। समुद्री पक्षो भी भारी संख्या मे मरते देखे गये है। समुद्री जीवा की हानि का अनुमान कुछ वप पूव ब्रिटेन म किया गया था, उस सर्वेक्षण के अनुसार केवल इगलड के तट पर ही तल प्रसार के कारण 1,00000 पक्षी प्रतिवष मर जाते हैं। तेल की बड़ी मात्रा सागर तल मे भी पहुचती है और काफी समय तक वहा रहता है। यहा पर सूक्ष्म जीवो पर तेल का प्रभाव अवश्य ही पडता है क्योकि इस बात की पूरी सम्भावना है कि वहा तल अ य घातक पदार्थों में बदल जाता है। भारत के सागर तट पर अभी उतने प्रदूषण नही हुए हैं जितने अधिक प्रगतिशील राष्ट्रा के हो चुके हैं । हमारे तटीय रमणीय स्थल अपक्षाकृत स्वच्छ हैं। हमारे सागर जल म इतना सीसा, पारा वीटनाशक औपधिया तथा रेडियोधर्मिता प्रवेश नहीं कर पायी है जितनी यूरोप के सागर जल मे पायी जाती है। वगाल की खाडी व अण्डमान सागर क जल व जतुआ मे खनिज साद्रता अभी सुरक्षित अक तक ही पायी जाती है। अरब सागर के पश्चिम भारतीय तट पर परमाणु रिएक्टरो, परमाणु विजलीघरो, बोम्बे हाई के तेल-कूपो व उवरक कारखाना के कारण प्रदूषण तेज गति से बढ रहा है तथा उसे रोक्ने की भरसक कोशिश भी की जा रही है तावि' हलाहल से सागर जहरीला नहीं बन पाये । परतु एक बात अत्यन्त गभीर है, खाडी देशा के तेल वाहक जहाज सुदूर पूर्व तथा दक्षिण पूर्वी देशो को भारत के पश्चिमी तट को छूते हुए निक्लत हैं। तल ढोने का यह मार्ग बहुत प्रचलित है तथा विश्व मे जितना तेल ढोया जाता है उसका 60% भाग इसी माग से ढोया जाता है । निश्चय ही तेल तो बिखरेगा हा । मानसून की हवाएं इस तेल को पश्चिमी तट तक जाने म भारी सहयोग भी दती है। नतीजा यह निररता है कि हमारे पश्चिमी तट पर खनिज तल क विखरने से बनी टार की गोलिया की सख्या बहुत बढ़ गई है। एसा अनुमान लगाया गया है कि एक वप म कई हजार टन टार की ऐमी गोलियां पश्चिमा सागर तट पर या जाती है । यह हमारे बहुत से रमणीय स्थानो यो दूपित करन से वाज नही नाती। भारत के अनुम धान पोत गवेपणी' ने पता लगाया है कि अरब सागर के तटवर्ती भागाम 20 मीटर की गहरायी तक 32 5 म्यूग्राम/ प्रति किलोग्राम टार की गोलिया मौजूद हैं। इन 40 वर्षों में परमाणु तथा हाइड्रोजन बमा के कइ परीक्षण हुए हैं जो प्राय समुद्रा म हो क्यि गये हैं-इनसे सागर म रडियाधर्मी पदार्थों की 106/पर्यावरण प्राति और मार माना बहुत अधिक बढ़ गई है। स्ट्राशियम-90 तथा सोज़ीयम-137 के नये समस्थानिक सागर जल पर फैल गये है। काबन-14 तथा ट्रीटीयम की मात्रा भी आवश्यकता से अधिक हो गयी है। यह तत्व समुद्री जोवो के शरीर मे मचित हो जाते हैं और जब इन तत्वो की सा द्रता जल की तुलना मे हजारा गुना हो जाती है तो अवश्य ही जीवो के लिये घातक बन जाती है। जिस जीव के शरीर म यह साद्रता बढ जाती है। वह स्वयं ही प्रभावित नहीं होता बल्कि उसकी जीनी सरचना बदल जाती है और उत्परिवतन (Mutatations) उत्पन हो जाते हैं तथा उनकी आने वाली पीढिया तका प्रभावित हुए बगैर नही रहती। जब रेडियोधर्मी पदार्थों दुपित जीवो का मानव द्वारा भक्षण किया जाता है तब वे पदाथ मानव शरीर में प्रवेश कर उह भी अनेक व्याधियो का शिकार बना देते है। सागर मे रेडियोधर्मिता बढने का एक अन्य कारण यह भी है कि रेडियोधर्मी अपशिष्ट, बिना उपचार किये ही तथा बगैर सोचे-विचारे ही सागर की भेंट कर दिय जाते हैं । प्रसिद्ध निदेणक रामान द सागर द्वारा निदशित 'रामायण' का एक प्रकरण इसी सदभ मे उपलब्ध है, जव श्रीराम अपनी पत्नी सीता को प्राप्त करन लिये श्रील का जाना चाहते थे, सागर को लाधना वाछित था और तभी लका पहुचा जा सकता था। श्रीराम ने सवप्रथम सागर देवता की आराधना की थी और देवता ने प्रकट होकर सागर पार जाने के लिये श्रीराम से कहा भी था कि यदि वे चाहें तो जल का शोषण कर सागर मे माग बना सकते हैं। परन्तु श्रीराम ने सागर देवता से यही अनुरोध किया था कि वे सागर की अपनी मर्यादा को तोडना नही चाहते । उहोने केवल यह चाहा था कि सागर केवल अपने प्रचण्ड स्वरूप को बदल कर शात रूप धारण करले ताकि सागर मे सेतू का निर्माण सभव हो सके। यदि राम स्वय भी मानवीय मर्यादा को त्याग कर चाहते तो सागर जल का अवशोपण कर सकते थे। इसका आशय है कि स्वय श्रीराम मर्यादा में रहे और उहोने यह भी नहीं चाहा कि सागर अपनी स्वत नता, अनन्तता, विशालता व मर्यादा का निर्वाह छोड दे। इस बात मे सत्य पर एक आवरण छाया है कि उस काल मे भी मानव पर्यावरण के प्रति कितना सवेदनशील था। यदि आज भी मानव उसी के अनुरूप अपने कर्तव्यो के प्रति सजग रह तो बहुत सारी प्रदूपण सम्बधी समस्यामा से निजात पा सकता है। माता- Taman ध्वनि-प्रदूषण तथा नियन्त्रण प्रदूपण क्यों ? - प्राकृतिक पर्यावरण मानव-जीवन का एक अभिन्न अग है, जत मनुष्य का रहन सहन, खान पान, वेशभूपा, स्वास्थ्य तथा अन्य गतिविधिया उस वाता- वरण का ही परिणाम है जिसम वह रहता आया है रिचाडवक, मिनिस्टर तथा फुलर ने यथाथ ही कहा है कि "मनुष्य वही कर सकता है जिसकी अनुभूति उसे प्रकृति करा सकती है तथा जो प्रकृति के नियमो के विरूद्ध है वह वदापि नही होगा।' परन्तु प्रकृति न तो क्रूर है और न ही निष्ठर, वह ता नियमा- नुकूल चलती ही रहगी। प्रकृति के यह नियम एक सतुलित विधि स चक्र के रूप में पलत है जिह आधुनिए वज्ञानिका उत्पादक सजव, उपभोक्ता तथा विघटक चक्र के नाम से पुकारते हैं । भारत मे अनादि काल से ही इस समझ लिया गया था, उ है देवता स्वरूप ब्रह्मा विष्णु तथा महेश पह कर सम्बोधित किया गया और पूजा जाने लग । मोट रूप मे चक्र कम इस प्रकार है-पथ्वी पर जीवन के अश के रूप में प्रतिस्थापित होना, आकार ग्रहण करना तथा मृत्यु को प्राप्त होना। प्रकृति का यह सतुलन-क्रम शाश्वत है परन्तु अपने आपको प्रकृति विजेता पहने वाला मानव जाज अपने वाहुवल व वुद्धिवल से प्रकृति पर विजय की कामना स प्रकृति के नियमित सतुलन चक्र को नासमझ बनकर अस तुलित बनाने पर तुला हुआ है और नाना प्रकार को कष्टदायिनी समस्याआ के भ्रम जाल मे उलय गया है । अनेक प्रकार में प्रदूषण जल, वायु मृदा एव ध्वनि प्रदूषण एव विकार वडी तीव्र गति से इस प्राकृतिक पर्यावरण में निर तर बढ रहे हैं, जिसस समस्त विश्व जातक्ति है । इसी सदभ म हम ध्वनि प्रदूपण की समस्या पर विस्तार से विचार करेंगे। ध्वनि प्रदूषण-नाशय एव कारण प्रदूषण का तात्पय है जल थल व नभ के पर्यावरण म अनेक प्रकार के अवाछनीय भौतिक, रासायनिक तथा जविक परिवतन होने से जो समूच जीव- घारियो, वनस्पति तथा अविका के लिये हानिकारक हो । अत ध्वनि प्रदूषण का आशय वातावरण मे छोडी गयी या उत्प न की गई एसी 'भावाज ध्वनि व धुन से है जो अवाछनीय होन के साथ प्रतिकूल व हानिकारक प्रभाव उत्पन करती है। 108/पर्यावरण, प्रकृति और मानव औद्योगीकरण तथा शहरीकरण की दौड ने आज छोटे-बड़े नगरो को जाम दिया पर तु उनका विकास उचित ढग से नही होने के कारण, नगर- शहर आवासीय बस्तिया व्यावसायिक तथा औद्योगिक क्षेत्र एक खिचडी सी बन गये हैं । स्कल कालेज, अस्पताल, रेल्वे स्टेशन, सिनेमा घर, कारखाने, मदिर, बस-स्टैंड बाजार तथा हमार आवास स्थल एक दूजे का हाथ पकड खडे है । इसका दुष्परिणाम यह हुना है कि मोटर गाडियो की पो पो रेलगाडियो की सीटी व घडघडाहट कारखानो मे मशीना की घडघड, सिनेमा- घरा से लाऊड स्पीकरो की कण भेदी ध्वनियो ने वातावरण को ध्वनि प्रदूषण से आच्छादित व आदालित कर दिया है। समय-कुसमय म विज्ञापन करने वालो की वकश आवाजो ने तो गली माहल्लो के शात वातावरण को ग जाकर रख दिया है। मोटर गाडियो के हान, खुदाई के य व, मिलो व कारखाना के सायरन, विवाह व जाम के समय बजाय जाने वाले दोल-वाजे धार्मिक व राजनतिक जलसा की भरमार, चुनाव प्रसार, वायुयानो की घडपडाहट जसी आवाज जा कानो के पर्दे तक फाड दती हैं- ध्वनि प्रदूषण होता है। वज्ञानिका द्वारा की गई खाजो से पता चला है कि महानगरो के निवासी मानक सहनीय श्रवण ध्वनि से कितने अधिक ध्वनि प्रदूषण-'शोर' के साय में जी रहे हैं। 'शोर का माप डसीवल में किया जाता है । ध्वनि को मापने की इकाई डेसीबल (dacibel-db) है- यह माप की निरपक्ष इकाई नही वरन् सापेक्ष इकाई है जा ध्वनि को आवतता (I) का निर्देश स्तर (Io) वा अनु पात जो log पर आधारित है। जब ध्वनि व दाय 0 0002 माइनोवार (dynes/cm ) या ऊर्जा (10-16ra ts) होती है जो ध्वनि केवल सुनी जा सकती है। I bel=Log 10 तथा dectbel=10 Log10 lo इनवी मा यता है कि 75 डेसिबल से अधिक शोर हानिकारक होता है। 140डेसिवन शोर व्यक्ति को पूण या सवदना होन तथा पागल बनान के लिये काफी है । इस प्रदूषण से लोगा की प्रवण शक्ति पमजोर पह बातो है, बहरापन, तनाव चिडचिडापन, महिनाजो मे गभपात, हृदय रोगो म यदि, रक्त चाप की समस्या, काय करने व सोचन की क्षमता म रमी शार प्रदूषण पा परिणाम है। जमन यज्ञानिक डा. जानसन ने 'शोर व मानव शरीर पर उन प्रभाव' विषय को लेकर लम्बे समय तक अनुस धान के पश्चात बताया रिजर मोर के कारण मनुष्य क शरीर को चिराएं समुचित हो जाती है साप ही मूक्ष्म शिरानो म रक्त वा परिवहन मुस्त पड़ जाता है वो भरार पर पातक प्रभाव छोड़ सरता है। lo . অনি বল এগা সিধঃ मानक ध्वनि-सहजी श्रवण योग्यता तीव्रता-75 डेसीवल बम्बई --90 जैसीवल कलपत्ता --85 डेसीवल दिल्ली --80 उसीवल कानपुर ~80 डेसीबल। हाल ही में प्रकाशित स्टॉक एक्सचेंज की रिपोट से ज्ञात हुआ है कि वम्बई स्टाफ ऐक्सवेंज के वातावरण म शोर 90 decibel है तथा वहां लोग पागला की भाति व्यवहार करने लगत है जो मूलत ध्वनि या शोर प्रदूषण का परिणाम हो सकता है। कानपुर नगर में भी 'शोर व दुष्प्रभाव' पर डा. वीरेन्द्र कुमार के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि शोर की तीव्रता दिस प्रकार से घातक सिद्ध होती हैं । कानपुर में मोटर गाडियो के अतिरिक्त शोर का दूसरा स्त्रोत मशीनें हैं जो कारखानो म रात-दिन चलती हैं। इन भारी मशीनो से इतना शोर होता है कि यह श्रवण क्षमता से बहुत अधिक है। जो लोग वस्त्र उद्योग प्रतिष्ठानो के नजदीक रहते हैं इससे बहुत दुखी है । कारखानो मे शोर का स्तर विभि न मशीनी विभागा म 69-105 डेसीबल तक रहता है । शोर की अधिकतम तीव्रता 105 सीबल कपडे बनने के शड मे रहती है। इस स्थान पर कायरत श्रमिक या तो अपनी धवण-शक्ति पूरी तरह खो चुके है या मानसिक तनाव से ग्रसित हैं। निय व्रण के लिये सुझाव । शोर हमारे वातावरण को कोमलता को तोडकर पर्यावरण को दूपित करता है तथा यह प्रदूषण देखा नहीं जा सकता, वेवल मानव ज्ञानद्रियो द्वारा महसूस क्यिा जाता है अथवा वातावरण म फली अदृष्य अनिच्छित ध्वनि को शोर कहते है । यद्यपि वैज्ञानिको के लिये एक महत्वपूण समस्या है, इससे बचने के लिये कुछ उपाय खोज लिये गये है। तीन विधियो से इस प्रदूषण को रोका जा सकता है (७) स्रोत की शोर क्षमता कम करके। (1) ध्वनि के माग में बाधा उत्पन्न करके तथा (u) ध्वनि सुनने वाले को सुरक्षा प्रदान करके। उपरोक्त म शोर को क्षमता को कम करना ही कारगर सिद्ध होता है। घने बसे इलाको नगरी म ट्रको, मोटर साइकिलो की सख्या कानून द्वारा कम कर शोर की तीव्रता को कम किया जा सकता है। मशीनो से उत्पन्न कान-फाड शोर मोटर गाडियो, वायुयानो, छाट वाहनो आदि म उच्च शक्ति 110/पर्यावरण, प्रकृति और मानव

No text on this page.

भू-ओजोन प्रदूषण भू मोजोन प्रदूषण भूमि तथा जल को भाति वायु बावरण भी पृथ्वी का अभिन्न अंग है पथ्वी के चारो और लिपटा वायु का आवरण, उसी के साथ निरतर घूमता रहता है। इस प्रकार पथ्वी के बाहरी भाग पर तीन प्रमुख मण्डल- जल तथा वायु । यह पथ्वी के तीन परिमण्डल कहलात है। भूमि वाले भाग को स्थल-मण्डल, जल भाग को जल-मण्डल तथा वायु बावरित भाग को वायु-मण्डन रहते हैं। स्थल मण्डल सामा यत 60 कि मी मोटाई का शला से मिलकर बनता है । समुद्र, सागर झीलें, नदिया, तालाव तया पृथ्वी के भीतर छिपा जल आदि सम्मिलित होकर जल मण्डल का निर्माण करते हैं। वैसे तो वायुमण्डल भूतल से 1,600 किमी की ऊचाई तक फैला हुआ है किंतु इसके सम्पूण द्रव्यमान का 99 प्रतिशत केवल 32 किमी की दूरी तक ही पाया जाता है। पृथ्वी के गुरुत्वावपण बल के कारण वायुमण्डल पथ्वी से जुड़ा रहता है। वायुमण्डल मे आक्सीजन की उपस्थिति से भूतल पर जीवन की उत्पत्ति तथा वृद्धि सम्भव हो सकी है। भूतल के निकट वायुमण्डन का घनत्व अधिक्तम है, ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ पनरव भी पटता रहता है। वायुमण्डल में भी चार विभिन्न परतें बन जाती है (1) सबसे निचली परत क्षोम मण्डल है जो मोसम सम्ब धी सभी घटनाओ को प्रेरित करती है। इस परत में बढती ऊचाई के साथ प्रति 165 मी पर 10 सेल्सियस को औसत दर स तापमान घटता रहता है। विषवत रेखा पर क्षोभ मण्डल को सीमा 18 20 कि मी पो ऊचाई तक तथा ध्रवीय प्रदेशो में 8-10 कि मी को ऊचाई तक है। (1) दूसरी परत समताप मण्डल है जिसमें तापमान एक समान व स्थिर रहता है जा आगे ऊचाई के बढ़ने के साथ धीरे धीर बढता है । इस मण्डल मे ताप बढने के कारण सौर परावगनी विकिरणो (ultranolet rays) मा ओजोन द्वारा अवशोषण होता है। समताप-मण्डल में वायु अत्यन्त शुष्क होती है तथा क्षाभ मण्डल के बागल व सनपन धाराएँ इसम सरलता के साथ प्रवेश नहीं करती है। (1) दोनो उपरोक्त मण्डलो को विभाजित करने वाला मण्डल शात मण्डल (tropopanse) है। 11/पयावरण प्रकृति और मानव (iv) समताप मण्डल म ही ओजोन से युक्त एक अय परत ओजोन मण्डल का निर्माण करती है । भूतल से 20-25 कि मी को ऊचाई पर ओजोन मण्डल सर्वाधिक है । इसमे 75 कि मी तक ओजोन प्राय नहीं के बराबर रह जाती है । भूतल से लगे क्षोभमण्डल में 10 कि मी की ऊचाई तक आजोन को माना नगण्य होती है। जव सौर पैरावैगनी किरणे वायुमण्डलीय ऑक्सीजन के साथ किया करती है तो ऑक्सीजन का प्रकाश विघटन होता है तथा ओजोन की उत्सति होती है। यही कारण है Fि भूतल से 20-25 किमी को ऊचाई पर (1012-1013 जणु / धन से मी सघनता) ओजोन की परत पायी जाती है । यह परत सौर परावगनी किरणो का बवशोषण र लेती है तथा जाव-जगत को इन घातक किरणो से रक्षा करती हैं । यह पहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि वायुमण्डल सौर विकिरणो से बचाव के लिए एक कवल के रूप म काय करती है । समताप मण्डल मे बोजोन का अभाव जीव जगत को सूप की प्रचड किरणो व गर्मी द्वारा निदयता से भून सक्ता है। ओजोन एक सक्रिय गैस है जो धुआ, काजल के वण, वायु मे मिश्रित काबनिक पदार्थो के साथ शीघ्रता से किया करती है। मोटर वाहनो नाप बिजली घरी कारखानो रेलगाडियो तथा वाययानो से निपली काबन डाइ- आक्साइड तथा कावन मोhi ऑक्साइड के द्वारा पर्यावरण प्रदूषित होता रहता है जिसका अर्थ है जानोन की मात्रा म अत्यधिक कमी। इस प्रकार माजोन मण्डल का प्रदूषित होना स्वाभाविप' लगता है, साथ ही यह भी सुस्पष्ट है कि ओजोन हमार जीवन के लिये क्तिनी महत्त्वपूर्ण है । अत पर्यावरणीय प्रदूपण के कारण ओजोन मण्डल भी आवश्यक रूप में प्रदूषित हो जाता है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं (७) रासायनिक कारण प्रयोगशालाओ मे रासायनिक प्रतिक्रियाओ से उत्प न पलोरीन व नाइट्रिक आक्साइड गैसें भू-ओजोज प्रदूषण के लिये उत्तरदायी हैं। (2) पराध्वनिक वायुयान -इन वायुयाना मे उच्च ज्वाला तापमान पर दहन प्रक्रिया के अतगत नाइदिक आक्साइड निक्लती है जिसस ओजान की मात्रा में भारी कमी हो जाती है। गैस का तापमान जितना अधिक होगा नाइट्रिक ऑक्साइड का उत्पादन भी उसी अनुपात म वढता जायगा। (3) हेलो कावन -ओजोन मण्डलीय ओजान की मात्रा म बमो का कारण उद्योगो मे उपयोगी फ्लोरो क्लोरमीथेन भी हो सकती है। इस घातक रसायन का उपयोग एयरोसोल स्प्रे, रेफारीजरेशन, वातानुकूला तथा ठोस प्लास्टिक अवयवा के निर्माण में किया जाता है। फ्लोरो-क्लार मोधन, Lधापन डाई आक्साइड की भाति अवरक्त किरणो (infra red rays) को । भू-ओजान प्रदूषण/113 - आत्मसात एव विमजिा परती है जिससे वायुमण्डल का ताप पट जाता है। 50 वर्षों म वह यातरी दर 05 से मो है। इससे मौमम परिवतन पर अत्य धिर प्रभाव पड़ता है। (4) उवरक -नाइट्रोजन युक्त उवरक जा उद्योगा में तयार किय जान हैं मोजोन पर्यापरण प्रदूषण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी हैं। भारत म चीसवों मटो म ऐरा उर्वरका का उत्पादन अधिक हो प्रचलित हुआ है । लत आजोन प्रदूपण या हाना स्वाभाविक है । (5) ज्वालामुखी विस्फोट -ओजोन के घनत्व को कम करने वाला एक और प्राकृतिक कारण शक्तिशाली ज्वालामुखी उदगार (Volemic erruption) है। अधिशत 50 किमी की ऊचाई तक उदगारित वादल समतापमण्डल म प्रवेश कर जाता है। यह उदगार वायुमण्डल को दो प्रकार से प्रभावित करत हैं -(1) क्षोभमण्डल मे उदगार-वायु धुध को परत बन जाती है जो सोर पिपिरण का पारेपण कम कर देता है और वायुमण्डल को शीतल बना देता है । (2) समताप मण्डल मे क्लोरीन की मात्रा इतनी अधिक हो जाता है पि आनान प्राय समाप्त हो जाती है । (6) सौर प्रोटोन -मानव प्रयुक्त साधना को अपक्षा प्राकृतिक स्रोत कभी इतने अधिक शक्तिशाली होते हैं कि मनुष्य का उन पर नियत्रण नही रह जाता है । आज की मात्रा को कम करने वाले एम कारक भी मौजूद हैं। मूय के तेज के प्रकाश पश्चात ब्रह्माण्डीय किरणे (cosmic rays) तथा सौर प्रोटोन विसजित हाते हैं तो यह प्रोटोन समताप मण्डल तथा मध्य मण्डलो के भीतर प्रवेश कर वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का विखण्डन करने लगत है । इस प्रकार आक्सीजन तथा ओजोन की शृखला-प्रतिक्रिया (chain reaction) के द्वारा नाइट्रिप-आरमाइड बनकर ओजोन मण्डल प्रदूषित होता रहता है। भू-ओजोन प्रदूषण के कारण जैविक, पारिस्थितिक तथा जलवायविक वातावरण मे भारी विभिन्नताऐ उत्पन हो जाती हैं। ओजोन को आधारभूत कमी से पथ्वी सूर्य को परावगनी किरणे अधिक मात्रा मे पहुचन लगती है फ्लस्वरूप त्वचा करार, उत्तक वधन, एल्बुमिन निर्माण तथा स्कदन किया रुक जाती है। पेड-पौधो की प्रकाश-संश्लेषण दर म परिवतन आ जाता है । भू-मण्डल पर तापमान तथा वर्षा की दशाओ मे बदलाव उत्पन्न हो जाता है। आधी तूफान आन को आशकाएं बलवती हो जाती है । आजोन प्रदूपण तथा उसकी कमी के कारण मानव त्वचा पर कुप्रभाव आनुवाशिक लक्षणो म बदलाव, रजक्ता, आयु लिंग भेद, स्थान परिधान तथा जीवन ढग भी प्रभावित होत हैं। पाले लोगो की अपेक्षा श्वेता म मादा की अपेक्षा नरा में तथा उत्तरी जथामा की अपेक्षा दक्षिणी अक्षासो पर इन विक्रिणा का प्रभाव अधिक पड़ता है। - 114/पर्यावरण प्रकृति और मानव पर्यावरण तथा पीडकनाशक रसायन गत कुछ वर्षों मे, विश्व मे चारो जोर, पीडक नाशियो (pesticides) और विणेपकर कीटनाशियो (Insceticides) का प्रयोग अपनी चरम सीमा पर पहुच गया है जो सरलता से बाजार में उपलब्ध होते हैं और किसानो द्वारा असावधानी के साथ उपयोग में लाये जा रहे हैं, आज समस्त मानव जाति के लिये भारी सकट का कारण भी वन गये हैं, मानव स्वास्थ्य पर इनका घातक प्रभाव पड़ रहा है। आज तो यहा तक' कहा जाने लगा है कि पोडकनाशियो के निरन्तर प्रयोग से स्तनधारियो व पक्षियो को तो सरलता के साथ मारा जा सकेगा, रितु कीट समुदाय को नही, जो थोडे से समय में हो इतनो पीढियो को जम दे देते हैं कि वे क्सिी भी ऐसे नये आन वाले रसायन के प्रति अपन मे आनुवंशिक अनुकूलन' पर सकते हैं या फिर 'उत्परिवर्तित होकर इन विषो को प्रभावहीन कर देते है । पिछले 30-40 वर्षों मे ही अनेक नये रसायनो के निर्माण तथा उनके उत्पादन से मनुष्य के हाथ में बहुत से प्रभावी पीडकनाशी कारक आगये हैं और यह पदाथ विभिन्न नाशक-जीवो' को रोकने व नष्ट करने में साथक सिद्ध हुए हैं । यह रसायन कोटनाशो (Insecticides) कवकनाशी (fungicides), 71FFTRIT (herbicides) Taarten (weedkillers) garansit (rodent killers) आदि लेबलो से बाजार में उपलब्ध हैं। अब तक लगभग 1000 ऐसे रसायनो को तैयार किया जा चुका है। इनमे भारत लगभग 40 प्रकार के पीडकनाशी विदेशो से आयात करता है तथा 44 का अपने यहा पर ही निर्माण कर रहा है । इनमे कुछ ऐसे शाक्नाशक भी है जिहोने समस्त वियतनाम के वनो को निष्पत्रित बना दिया है और जि ह अब सयुक्त राज्य अमरिका में निषेध कर दिया है। कुल मिलाकर 250 प्रकार के पोडे मकोडे, कवको, शाको, पीडको, खरपतवारो तथा कुन्तक प्राणिया आदि को नष्ट करने के लिय लगभग 44,000 टन रसायनो का प्रतिदिन उपयोग किया जाता है और ऐसा विश्वास किया जाता है पीडकनाशियो की यह माता अभी और भी बढ़ेगी। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि सम्पूर्ण विश्व में बहुत सारे नाशक जोव (pests) हैं जो फसलो तथा उपयोगी पादपा को समूल नष्ट कर देते हैं और उनसे प्राप्त उत्पादनो को बरबाद कर रहे हैं। यह पसल बाने से लेकर उसबै पकने क्टने और यहा तक की उनक भण्डार तक पीछा नहीं छोड़ते हैं। पर्यावरण तया पीडकनाशक रसायन/115 कहने का तात्पय यह है कि वे खेत, के खलिहान तथा अनाज के गोदामा तक छाये रहते है और मानव के सीमित उत्पादक साधनो को भारी हानि पहुंचा रहे हैं । ऐसी परिस्थितियो म मनुष्य जपने इन सूक्ष्म शत्रुआ-कीट-पतग, फ्यूद, खरपतवार, चहे मूपा' व कृमियो से लगातार लोहा ले रहा है तथा उनस सम्वधित समस्याजा का समाधान, अपन वनानिक तथा तकनीकी नान आधार पर कुछ सीमा तक कर रहा है। इस दिशा म उसने आशातीत सफलताएं भी प्राप्त की है । अनेक प्रतियोगी शाक्नाशक व कृपिनाशक जीवा को नियत्रित करने या उ हे नष्ट करन म मानव की सफलता, बीसवी शताब्दी का एक महान वैनानिर आश्चय है। सन 1920 म अमेरिका म जहा एक विसान 8 व्यक्तिया के लिये अन पैदा करता था, वहा 90 वों के पश्चात अव वह 30 व्यक्तियो से भी अधिक का पट भरने लगा है, और इस उपलब्धि का श्रेय वतमान पीडवनाशिया को ही दिया जा सकता है। लेकिन आज वस्तु स्थिति यह बनती जा रही है, अनेक नाशक जीव सिर उठा रहे हैं और उहाने समस्त मानव जाति को भी परेशानी में डाल रखा है। एक ही सिरके के दो पहलू हात हैं- सर तथा पैर खाटा व परा इसी प्रकार से पीडकनाशिया के सम्बध मे भी रचनात्मक तथा विनाशकारी पहलू सामने आते हैं । इस वात मे कोई सशय नहीं रह गया है कि पीडकनाशक आधुनिक कृषि-विज्ञान के परमआवश्यक तथा समयाकूल भाग बन गये हैं। आधुनिक पीडकनाशका के साथ कृषि को जानिकतम तकनीकिया, उ नत विस्म के बीज व नये-नये उवरका के उपयोग से कृषि उत्पादन म भारी वडि हुई है। कृपि के अभीष्ट लक्ष्यो की प्राप्ति की दिशा म पोडपनाशियो ने निभर याग्य और दीघकालीन साधन प्रदान किये है । यह कम खर्चीले हैं तथा इनके प्रयोग से थोड ही प्रयत्न म जविक दक्षता भी साध्य है। कुछ परिस्थितियो मे तो नाशक जीवा की रोकथाम के लिये इन रसायना के अतिरिक्त दूसरा विवल्प मो नही है। मानव जाति को अनक सनात्मक बीमारिया को दूर करने म भी रासायनिक वीटनाशिया ने महत्वपूण यागदान किया है । भारत, श्रीलका वर्मा तथा कुछ एशियायी व अफ्रीकी दशा म डी डी टी के निरतर प्रयोग से मलेरिया जसी महामारी का लगभग उ मूलन कर दिया गया है। इही विशिष्ट वारण वश मसार के सभी भागाम पीडकनाशिया का वडी माया म उपयोग पिया जा रहा है। सन् 1947 में भारत की स्वत नता के पश्चात स ही अनक समस्याएं उठ बडी हुई। दश का तीय गति से बढ़ती हुइ जन सरया क सदन म सावना पड़ा है-यह आर्थिक रूप म आग बढ़ा भी है तपा 21वी शतालीम प्रवण करन वाले विकासगोल -शो की श्रेणी म भी आ गया है परतु जन सख्या विस्पाट की समस्या राई साधारण नहीं है। भारत का नागदी विश्व जावादी 116/पर्यावरण प्रकृति और मानव पो 154 प्रतिशत है जबकि उसका क्षेत्रफल केवल 2 प्रतिशत ही है । सन् 1971 मे भारत की जनसख्या 5479 लाख थी जो 1981 में बढकर 683 8 लाख हो गई, इस प्रकार 1359 लाख जनसख्या वद्धि केवल 10 वर्षों में ही हो गई थी। ऐसी स्थिति में भारत को अपने देशवासियो के लिये अतिरिक्त भोजन, मकान, कपडा शिक्षा व्यवस्था तथा अन्य ससाधनो को जुटाने को आवश्यकता पड़ी है। भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा 60 प्रतिशत जनता अपने जीवन के लिये भूमि तथा कृषि-योग्य उद्योगो पर ही निभर रह सकती है। भारत अपने यहा खेती के लिये 491 प्रतिशत खेतीहर मजदूरो को नौकरिया देने की व्यवस्था करता है जबकि अमेरिका में 3 प्रतिशत खेतीहर मजदूर है। सारणी खेतीहर थमिका की सख्या का प्रतिशत 1 सयुक्त राज्य अमेरिका 3 2 ब्रिटन 6 3 कनाडा 9 4 जमनी 10 5 जापान 30 6 भारत 491 स्पष्ट है कि भारत को अपनी बढती हुई आबादी को देखते हुए खाद्यानो का उत्पादन बढान को भी अधिक आवश्यकता है और उसे अन्य देशा से कृषि तकनीको को ग्रहण करने की महती आवश्यकता है। बढती हुई जन-सख्या को भोजन मुहय्या कराने तथा सतुलित विकास के लिय भारत सरकार ने सन् 1960 म खाद्यान्न उत्पादन की दिशा म स्वपूर्ति हेतु मेक्सिको से 'हरित प्राप्ति का गुरु-मन प्राप्त किया। कृषि में तकनीकी परिवतन सिंचाई साधनो मे वृद्धि, उवरको तथा खरपतवारो मे नियत्रण तथा नये उनत किस्म के बीजो की सहायता से उस स्तर तक पहुचा गया है कि कृषि उत्पादन मे भारी वद्धि हो सकी है, वह इस दृष्टि से सम्पन हो गया है। भारत अब लगभग 350 लाख टन अतिरिक्त खाद्य पदार्थों का उत्पादन कर उह विदशा मे निर्यात करन में भी सफल रहा है। खेती मे नये तरीका को अपनाकर व उर्वरका तथा जीवनाशियो की सहायता से अनाज उत्पादन कर इस ओर काफी आगे बढ़ गया है । खेतो मे जीव नाशिया के उपयोग से जनेक लाभ भी हुए हैं यथा--भोजन पदार्यों का हास कम होना, फसलो की सुरक्षा, मानव व बय प्राणिया म कोटा के पर्यावरण तथा पीडकनाशक रसायन/117 द्वारा सक्रमण होने वाले रोगो में भारी अभी तथा पाय पदार्थों की गुणवत्ता म विस । नितु इस तस्वीर का एक दूसरा पक्ष भी है और वह जीवनाशियो के इन लाभो के विरुद्ध इनके कारण पर्यावरण गुणवता म भारी कमी भी आई है क्या पारिस्थितिक सतुलन में भी बदलाव आया है। अमेरिका तथा यूरोप के देशा म जीवनाशियो के उपयोग से पारिस्थितिर विनाश अवश्य हुआ है पर तु भारत में अधिक लोगा, उच्च जनसख्या घनत्व, यून ससाधनो और भूमि-प्रसार के अभाव में विनाश को गति अधिक रही है। जीवनाशियो का इतिहास 1000 ईसवी पूर्व तक जाता है। होमर ने यह जानकारी दी थी कि अनेक रोगो के लिए गधक का उपयोग लाभकरी सिद्ध हो सकता है । 1939 में डा पाल मुलर ने एक शक्तिशाली कीटनाशक औषधि-डी०डी०टी० की खोज कर इस क्षेत्र म तहलका मचा दिया था। इसके तत्काल बाद तो भय कई जीवनाशियो की खोज हो चुकी है । सन 1970 तक ऐस जीव नाशिया को सख्या 32000 थी और अन्य 1000 रसायन पौगिक थे जिनका उपयोग केवल सयुक्त राज्य अमेरिका मे ही किया जाता था। आज अमरिका में उच्च सफल कृपि एक उद्याग है जिसमे लगभग 65000 व्यापारिक रसायन प्रतिवप पर्यावरण म प्रवेश कर रहे हैं। इसम कुछ कारसिनोजनो की सम्भावनाएं हो सकती है। भारत मे जीवनाशिया का उपयोग 1948 से होने लगा है जिसका मूल उद्देश्य देश मे मलेरिया रोग का उमूलन था। डी०डीटी तथा वी०एच०सी० के उपयोग से मलरिया में भारी कमो आयो और उसकी मफ्लता के कारण यह औपधिया 1950 से भारत में ही बनायी जाने लगी। हरित क्राति के शुभारम्भ से नये प्रकार के बीजो को खरपतवारो से बचाने की आवश्यकता भी अनुभव की जाने लगी और इसके पश्चात तो जीवनाशिया का उपयोग निरन्तर बढता हो गया । वतमान म 46 जीवनाशियो का विभिन फैक्ट्रियो मे देश मे ही निर्माण किया जाने लगा है। सन् 1966 तक विश्व का जीवनाशियो का उपभाग 25030000 लाख टन था जो 1980 तक 41550000 लाख टन हो गया जिसकी वापिका वद्धि दर 4 प्रतिशत की गई है। अब भारत म ही 116,281 टन जीव- नाशियो का निर्माण हो रहा है जिनमे 93 689 टन कोटनाशक, 13084 टन कवकनाशी, 1394 टन मूपरनाशी, 5736 टन खरपतवारनाशी व 2378 टन फ्यमीगटस है । विश्व अनुपात में यह 19 प्रतिशत है । इन जीव- नाशियो को आथिको को समयना अत्यन्त आवश्यक है। विकासशील दशो म साधारण किसान इन रसायना का उपयोग व खर्चा बर्दाश्त नहीं कर सकता । अमेरिका जस विकसित राष्ट्र म~एक हेक्टेयर भूमि में एक किलो- 118/पर्यावरण प्रकृति और मानव ग्राम जीवनाशी के अनुसार 218, 450 क्लिो कैलोरी को आवश्यकता होती है जो 3 8 अरब लीटर पेट्रोल के समक्ष हैं क्योकि 80 प्रतिशत जीवनाशी पेट्रोलियम उद्याग पर ही आधारित है। वर्तमान में भारत मे ही 123 प्रकार के जीवनाशियो का उपयोग सरकार द्वारा किये जाने के आदेश प्रसारित किये हुए हैं, जिसका उपयोग 1420 लाख हेक्टेयर भूमि के लिये किया जाता है। सन् 1970 में यह खपत 19,000 टन से बढकर 1985 में 98216 टन हो गयी और अनुमान है 1990 तक यह खपत 119172 टन हो जायेगी। सभी जीवनाशियो मे कोठ- नाशको की खपत 80 प्रतिशत, 10% कवकनाशी तथा 7% खरपतवार- नाशी व अन्य 3 प्रतिशत है। भारत में लगभग 5000 प्रजातिया जीवाणुओं तथा कवको की हैं इस कारण जीवनाशियो का होना बहुत जरूरी है । इनकी 1000 प्रजातिया भारत मे हमेशा से खतरा बनी हुई है व 4000 कीट प्रजातिया फसलो को भारी नुक्सान पहुचाती हैं । अटवाल (1984) के पवन वर्षा वायु वाष्पीकरण विखराव वीज उपचार भाप- पादप अनाज छिडकाव पपक्षय जीवनाशक फल सब्जी 'छिडकाव निर्माण काय मानव पैस्ट नियायक धुलाई छिडकाव प्राणी डेयरी उत्पादन मलमूत्र मूक्ष्म जीव जलीय जातु अनुसार भारत मे सन् 1983 मे 518 अरव रुपये मूल्य का नुकसान हुआ पर्यावरण तथा पोडकनाशक रसायन/119 था । यदि वार्षिक हानि का अय प्राणियों के साथ मिलाकर आकलन किया जाय तो यह नुकसान कई परब रुपया म पहुचगा । सन् 1930 म जीवनाशियो की खोज के पश्चात् इन रसायना का उपयोग निरन्तर बढा है और मानव समाज मे रोगो व खरपतवारा क विरुद्ध रसायनो के युद्ध को एक मुहिम-सी छिड़ गई है। सन् 1962 में महिला रश्वेल कासन द्वारा लिखित पुस्तक 'साइलेंट स्प्रिंग' में इस दिशा में हुई जन-जागरण की सम्भावनाना पर प्रकाश डाला गया है। यह नितात सच भी है कि जीवनाशी सम्पूर्ण विश्व म तीव्रता से प्रयोग में आ रहे हैं तथा जल वायु, मृदा के साथ प्रवाहित होकर दोबारा प्रसारित होते हैं। यह भी देखा गया है कि यह अ य विषले पदार्थो में परिवर्तित होकर मत्स्य, व यजीवो तथा वनस्पति को भारी नुकसान पहुचा रहे हैं। सन 1962 में ही जव डी०डी०टी० को फसलो के अनेक रोगा के लिये अचूक व मलेरिया के विरुद्ध एक प्रभावशाली प्रतिरोधक माना जाता था तभी इस अमेरिकी महिला शाधरर्ता रश्वल कासन ने चेतावनी दे दी थी कि इस औषधि का छोटा-सा कण भी यकृत को भारी हानि पहुचा सकता है और कासन की यह चेतावनी अक्षरस सही भी निकली है । पश्चिमी जगत मे डी०डी०टी० पर पूर्ण प्रतिबध की घोषणा की जा चुकी है परतु भारत मे जाज भी उसका उपयोग धडल्ले के साथ किया जा रहा है । इन पीडक- नाशको से होने वाले वातावरणीय दूपणो तथा असतुलन पर विश्व भर में अनक परीक्षण किये जा चुके हैं और तत्सम्ब धी जनेक आकड भी उपलध है यथा-वेरी (1963), रुड (1964), गोल्डमन (1967), मूरे (1967), बिल्सन (1968), व बेसलर (1968)। परिस्थितिया का प्रभावित करने म मनुष्य काफी चतुर रहा है परन्तु कीट भी कम नही पड़ते हैं। मानव म बहुत से रोगकारक जीवाणु जाजक्ल ऐसे उत्पन्न हो गय हैं जो प्रतिजविका (Antibiotics) को ही अपना भोजन बना लेत हैं और अब इन औषधिया का असर ही जाता रहा है। रोगकारी कवक तथा कीट वग भी इसी प्रकार समय पाकर विप प्रतिरोधी उप-जातिया म विकसित हो गये हैं (बोवल 1972) कि उन पर डी०डी०टी० बादि का भी असर नही होता है। अब तक करीव दोसौ से अधिक कोटा की प्रजातिया इन रसायना के प्रति प्रतिरोधिता पदा कर चुकी हैं । अव यह अनुभव होने लगा है कि पीडकनाशिया के निरतर उपयोग से मानव एक हारी हुई लडाई लड़ रहा है। आज विश्व के बाजारो म दो प्रकार के पीडकनाशता की विक्री होती है - (1) अकावनिक पीडकनाशक (1) कावनिक पीडस्नातक । 120/पर्यावरण, प्रकृति और मानव (1) अफावनिक पीडकनाशक -इसमे मूलत आरसेनिप युक्त पदाथ आत हैं जो कि कई दशो तक व्यापक रूप में इस्तेमाल होते रहे थे और यह भूमि म अत्यत मद गति से विर्षाटत होते हैं अर्थात् ये दीपस्यायो पदाय अनेक वर्षों तक अपना प्रभाव रखते हैं और हानि पहुगत रहत है। इनका निरन्तर उपयोग, भूमि में इनकी मात्रा को बढ़ाने में सहायक है और यह पादपो को आने वाले कई वर्षों तक हानि पहुचाता रहता है । जव इन रसायना की क्षमता 75 पी पी एम से अधिक हो जाती है तो इनका जहरीलापन प्रक्ट होन लगता है। एक वर्ष के लगातार छिडवाय से इनकी क्षमता 1000 पी पी एम तक हो सकती है। यह रसायन उपापचय सब धो क्रियाओ व श्वसन क्रिया म विकृति ला देते हैं । (1) कावनिक पीडकनाशक -~~-सन् 1940 से पूर्व तक अकावनिय पीडवानाशको का उपयोग होता रहा था परन्तु बाद में कावनिक रसायना का प्रयोग निरन्तर बढ़ता रहा है और पर्यावरण भी उसी के अनुरूप विषाक्त होता जा रहा है । इनके दो कुल देखने को मिलते हैं (अ) कावनिक फास्फेट (ब) क्लोरीनेटेड हाइड्रोकाव स (अ) कामिक फास्फेट -इन यौगिको मे पैराथियन, मेलाथियन, क्लोरथियन व काडड्रिन आदि प्रमुख हैं। यह विष कोलीनस्टरेज ए जाइम जो कि तविका आवेगो के सचारण के लिये आवश्यक है, उसके निराधक हैं । थे मुख्य रूप से सूत्र-युग्मन को साधारण क्रिया को व द कर देते हैं। ये सभी रसायन गभीर रूप से प्रभावी विपो की श्रेणी म रखे जाते है और स्नायु- तत्र का कुप्रभावित करते हैं। विषाक्तम की दृष्टि से पराथियम मानव के लिये सबसे अधिपः पातक सिद्ध हुआ है। कायनिक फास्फेट वातावरण व जैविक उत्तका में तुलनात्मक रूप से कम टिकाऊ होते है और जिन प्रदेशो में छिडके जाते है वहा पर ये लक्ष किये गये नाशक जीवा के साथ अय प्राणिया की विस्तृत मृत्यु का कारण बनते हैं। इनके विशिष्ट लक्षण यह है कि ये वातावरण से दूर तब प्रसारित नहीं हो पाते और ना ही वातावरण व उत्तको मे लम्बी अवधि तक सचित ही हो पात है। इस प्रकार ये क्लोरीनेटेड हाइडोकावस की अपेक्षा कम घातक है। (ब) क्लोरीनेटेड हाइड्रोबस -इस कुल में डी०डी०टी०, क्लोरडिन, डाइल्डिन, एण्डिम, एल्ड्रिन, हेप्टाक्लोर, टोक्सापीन, लिनन, मायूरान, साइमेजिन, डायोक्सिन, पिक्लोरैम, कैकोडायलिा' अम्ल व वी एच सी इत्यादि सम्मिलित हैं। तुलना में यह रसायन अपने रासायनिक स्थायित्व के साथ विभिन्न वर्गों के प्राणिया के बडे समूहो-समुदाया पर इन विषा की गहरी छाप रहती है। यह वातावरण मे सचित होते रहते हैं और आहार पर्यावरण तथा पीडकनाशक रसायन/121 ” खलाओ के सहारे जीवमण्डल मे वायु तथा जल के माध्यम से प्रमाणन परते हैं और अत मे मनुष्य के भोजन तक मे पाये जाते हैं । चार वप पूर्व तमिलनाडू के कृपि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर की अध्ययन रिपोट म यह रहस्यात् घाटन किया गया कि सम्पूण राज्य म गायो व मातामा के दूध के नमूनो म बीच सी के अवशेष पाये गये थे। दूसरी ओर बाजारो म उपलब्ध सब्जियो मे जो ताजगी नजर आती है वह वास्तव में उन पर डी डी टी एव वी एच सी के प्रभाव के कारण होती है। कहना न होगा कि सब्जी उत्पादक इस मामले म सबसे बडे अपराधी हैं । बुस्टर (1969) ने भी परीक्षणो के पश्चात् इसी प्रकार के रहस्यो- द्घाटन किये हैं। यह विप रसायन वायु तथा जल की धाराओ के साथ समस्त वातावरण मे प्रकोण हो जाते हैं तथा ये क्लोरीन युक्त हाइड्रोकाव स विश्व के अनेक भागो जीवोय-समुदायो वा तेजी से निम्नीकरण कर रह हैं । यह भी सिद्ध हो चुका है कि यह रसायन मूल्यवान जलीय खाद्य प्राणियो को डिभक अवस्थाओम नष्ट कर दते हैं। यह सागरीय पादप प्लवका के प्रकाश-सश्लेपण को भी सदमित करते हैं जिस कारण वायुमण्डल के पसाय सतुलन पर गम्भीर प्रभाव पडता है । पी कान (1967) तथा हिक्की व एण्डरसन (1968) ने भी इन रसायना के विषय मे कुछ इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये है । यह कीट- नाशक पक्षिया में अण्डो के खोला के निर्माण में बाधा डालते हैं तथा यह प्रभाव स्टीरायड हारमान के भग होने से उत्पन होता है और अत म भगुर अण्डा की उत्पत्ति होती है जो चूजो के अण्डज उत्पादन से पूर्व ही टूट जाते हैं। मनुष्य के हार्मोन स तुलन पर तो इन रसायनो का प्रत्यक्ष प्रभाव देखने को नहीं मिला रितु मानव उत्तको मे उनको सा द्रता का स्तर इतना ऊचा हो जाता है कि भविष्य में पसर व नाशक उत्परिवतन अवश्य ही सामने आ सकते हैं। शाक्नापक रमायना में दो समूहो पर भी अनुसन्धान व परीक्षण दिये गये हैं। पहल समूह जिनम मोयूरान तथा साइमेजिन सम्मिलित हैं, प्रकाश- सश्लेषण यो किया म रुकावट डालते हैं और ऊर्जा के भाव म पादपो के लिये मत्यु कारस बात हैं। दूसरा समूह 24 डाइक्लोरो फिनाक्सी एसिटिक अम्ल तथा 2 4,5 ट्राइक्लार पिनाक्सी एसिटिक अम्लो का होता है जो सम्भवत् पादपो या निप्पत्रण (detonation) वर दत हैं। एक य य रसायन 23,6,7 दारलाराडाइजो-पी-डायोक्सिन जिस प्रचलित रूप में डायो- विमन भी कहत हैं यह रसायन यहुत की यून माना जयवा साद्रताआ पर 122/पर्यावरण प्रकृति और मानव भी गभ-विस्पणकारी (foetus deforming) होता है। यह भी देखा गया है कि सामान्यता कारखानो मे 2,4 5 ट्राइक्लोर फिनाक्सो ऐसिटिक अम्ल बनाने वाले मजदूरो की त्वचा मे पिटिकाकार (acneform) परिवतन दृष्टिगोचर होन लगते है। पिक्लोरैम भी एक ऐसा ही रसायन है जो शावनाशी मृदा मे दीघकाल तक स्थायी रूप में वना रहता है । श्री जगजीतसिंह न० भा०टा० ने 1987 में अपने प्रकाशित लेस मे पीडकनाशक रसायनों को लेकर अनेक घटनाओ का राष्ट्रीय परिपक्ष मे उल्लख किया है जो निम्न प्रकार है (1) गत तीन दशको मे भारत में कृषि क्षेत्र में प्रगति के साथ कीटनाशक औषधियो की खपत बहुत बढ गई है । आज वह 2300 टन सालाना से बढकर 66000 टन सालाना हो गयी है । यह कहा जाने लगा है कि भारत म कीटनाशको की खपत अमेरिका व यूरोप की तुलना में अधिक है। भारत मे मानव उपयोगी वमानो मे डी० डी० टी० का स्तर सबसे अधिक है । इसका सभावित कारण यह हो सकता है वि खायो के भण्डारण के समय चूहो व कीटो से उनकी रक्षा के लिय काफी अधिक डी० डी० टी० का छिडकाव कर दिया जाता है क्योकि अनाज को बचाने का सबसे अच्छा साधन इसे ही माना गया होगा। (2) कीटनाशक दवाओ से विषाक्तता के कुल मामला मे से एक तिहाई मामले केवल भारत में ही होते हैं और किसान ही इसका सबस बडा शिकार हुआ है । भारत के दो कपास उगाने वाले राज्यो मे किसान व उसके बच्चो म अ धापन, विकलागता, कैसर तथा यकृत रोगा का पता चला है । आध- प्रदेश सरकार ने इसे स्वीकार भी किया है कि सा 1985 मे गू टूर तथा प्रकास जिलो के 10 कृषि ग्रामो क प्रत्येक समूह मे कीटनाशमो की विपाक्तना के 75 मामले सामने आये हैं । (3) भारत म 400 से अधिक कीटनाशक उत्पादन करने वाली फक्ट्रिया मौजूद हैं, जिसम लगभग 25 000 कामगार काय करते हैं। कानूनन इन सभी कामगारा को ओवरकोट, दस्तान, गमबूट्स तथा क्नटोप का उपयोग करना अनिवाय है परतु वस्तुस्थिति इससे बिल्कुल विपरीत है। इण्डियन इस्टीटयूट आफ मनजमेट अहमदाबाद ने 1980 म इस रहस्य पर से पर्दा उठाया कि केवल 50 प्रतिशत कामगार ही सरक्षित वस्नो वा उपयोग कर रहे हैं 20 प्रतिशत कामगार तो काय के पश्चात अपने हाथ तक नहीं पाते और उनम से 80 प्रतिशत सावुन का उपयोग ही नहीं करते। अहमदावाद के हो एक अय सस्यान~ नेशनल इसटिटयूट ऑफ ऑक्यूपेशनल हेल्थ द्वारा किये गये अध्ययन से पता लगा है कि पाच फाम्मू- पर्यावरण तथा पीडकनाशक रसायन/123 लेशन इसाईया के 160 पुरुप पामगाराम से 73 प्रतिशत कामगारा म विपातना के लक्षण विद्यमान 4135 प्रतिशत कामगार माडिया-वस्कूलर' और 'गस्ट्रोइटसटाइनर गेग शिकार थे तथा एक ही अन्य इकाई के 40 पामगारा म 'बाय पी जलन' की तकलीफ पाई गई। दक्षिण भारत म तिरूपी नगर के मीटनाशय विशेषता यथन है कि "फास्फोरस की । ग्राम मात्रा भी मितली, उववाई, डायरिया तथा फालिज पा कारण बन जाती है।" श्रेष्ठ एव विस्तृा रूप मे पात रसायन डी डी टी केन्द्रीय तरिका सस्थान को प्रभावित पर पम्पन तथा ऐंठन उत्पन्न कर देता है। यह बसोय उत्तको म सचित हो जाता है तथा जब प्राणी द्वारा वसा निपल भाग म प्रयुक्त कर लिये जाते है तो डी डी टो रक्तवाहिनियो म आ जाता है और घातक प्रभाव डालता है । जलीय र स्थलीय दोनो ही वर्गों के प्राणी क्लोरोनेटेडहाइड्रो- पारनम के प्रति अत्यधिक मवेदनशील होते हैं। अकशेरुती व कशेरुकी दोनो हो रन विषले रसायनो स प्रभावित होत हैं। मत्स्य व पक्षी कुछ अधिक प्रभावित हाग जववि स्तनधारी कम मात्रा में होते हैं। जैसाकि कुछ निश्चित रेडियो समस्थानिक क्षय होकर अय रेडियो समस्थानिको को वनात हैं उसी प्रसार कुछ क्लेरोनेटेड हाडो कावन्स भी बनाते है यथा -एल्ड्रिन, डाइल्ड्रिन, डी डी टी-डी डी डी डी डी ई । वातावरण से यह पीडकनाशक जीवित मिल्लियो की सहायता से सक्रिय रूप में प्राप्त कर लिये जाते हैं या फिर पाचा नलिकाना द्वारा ग्रहण कर लिये जात हैं । वातावरण से ही प्राणियो म प्रवेश कर लेने पर इनका सा द्रता अनुपात यई हजार गुना बढ़ जाता है और इनका विप समान प्रभावशीलता के आधार पर शरीर का भाग बन जाता है। रेडियो समस्थानिको के समान ये भी खाद्य शृखलाओ के सहारे स्थाना तरित होते है । जानवरा के उत्तको में इनका सचय कुछ कारका से प्रभावित होता है जसे योगिक स्थायित्व, आहार शृखलाओ के नापसी सम्बध, प्राणियो मे टन ओवर का समय तथा उनके द्वारा उपायचयिक क्रियाएँ । साथ हो वायु तथा जल की सहायता स य दूर दूर तक भी पहुचा दिये जाते हैं। भारत में डी डी टी के उपयोग से मलेरिया रोग से मरने वाला की सध्या 750,000 वार्षिक से घटकर केवल कुछ हजार रह गई है। श्रीलका म भो मलेरिया से मरने वाला की सख्या जो 1946 में 28 लाख थी 1961 मे घटकर केवल कुछ सौ ही रह गई । इतनी आश्चयजना सफलता के वावजूद डी डी टी विशुद्ध वरदान नही रही और ससार के कुछ देशा ने तो इनक उपयोग पर प्रतिब ध लगा दिया है। डी डी टी सपने स्थायित्व व अघुलन. 124/पर्यावरण प्रकृति और मानव ।

शीलता के कारण उपयोग किये जाने के 10-15 वर्षों तर भो वातावरण तथा मृदा मे समाहित रहती है। अपने वसाप्रिय गुण के कारण वह वसा उत्तमो म सहित रहती है और आहार शृखला के अतिम पद तक अपना माग वनाय रखती है। इस प्रकार डी डी, टी ने एक ओर तो इतन लोगो को जीवर- दान दिया है जितना अभी तक सभी चमत्तारी औषधिया ने सम्मिलित होकर भी नहीं किया होगा। दूसरी ओर यह मानव, मुर्गिया व अन्य प्राणियो के लिये प्राण घातक भी सिद्ध हो रही है। इसवा अनियनित विखराव तथा जविक प्रभाव स्पष्टतया विदित हा चुका है और निश्चिय हो गया है कि डी डी टी सम्पूर्ण जीव मण्डल में उत्तरी ध्रव से दक्षिणी ध्र व तक बिखरा पड़ा है तथा कीटनाशक विप पर्यावरण का एक सामा य हिस्मा बन गया है। वायुमण्डल म पाउडर के रूप म छिडकाव स यह प्रशा त महासागर का वायु मे मुन्य धूल के रूप मे भी पाया जाता है और वाष्पित होकर वायु, वर्षा के जल, बफ और यहा तक को दक्षिणी ध्रुव पर निवासित पेंगुइना को वसा का हिस्सा बन गई है । (टेटन व रुजिका 1969) । राबट एल रुड (1964) ने भी इमी भाति की घटना का उल्लेख किया है । अमेरिका मे जब एक विशिष्ट जाति को डरयुक्त चिंटी को मारन हतु 2 पौड डायल्ड्रिन या हेप्टोक्लोर प्रति एक्ड के हिसाब से 25 लाख एकड क्षेत्र मे छिडकी गई तो कुछ समय के उपरान्त मलिया, मुर्गे मुगिया व जगली तथा पाल्तू पशु बड़ी संख्या में मरने लगे कि तु चिटिया ज्या की त्या जीवित रही। करने का अथ केवल यही है कि इन सभी ज्ञात पोडक्नाशक रसायनो के घातक परिणाम ही समस्त मानव जाति के समक्ष आय हैं । अब अपेक्षा का जाती है कि इस भयकर प्रदूषण से किस प्रकार बचा जा सकता है तथा पारितन्त्र अथवा विश्व पर्यावरण की अखण्डता व मन्तुलन को कायम रखा जा सकता है। इन विषम परिस्थितिया मे नाशक जीवो पर नियत्रण का आधार क्या हा, एक महत्वपूर्ण प्रश्न है ? जविक नियंत्रण (Biological control) सभी प्रकार के जीवधारिया मत्स्य पक्षो स्तनधारी व बनस्पति के उत्तवो में पीडनाशका, कीटनाशका व शाक्नाशको आदि की उपस्थिति के आधार पर यह प्राय सिद्ध है कि यही उनकी मृत्यु का कारण भी थे। अब यह भी ज्ञात हो चुका है जीवनाशियो के निर तर उपयोग मे मानव पर्यावरण विक्षिप्त हुना है तथा अनक अहितकर प्रभाव भी दसे गय हैं जमे 1 उन जीवो को मृत्यु हो जाना, जि हमारना नहीं था तथा जीवनापा का बचा रहना। 2 भाजन-शृखलाओ मे जीवनाशको का संग्रह व साद्रता की निरन्तर वृद्धि । ४ पर्यावरण तथा पोडक्नाशप रसायन/125 3 खरपतवारो म जीवनाशियो के प्रति निरोधक्ता विकसित होना। 4 प्रजनन क्षमता में यूनता था जाना। 5 जलीय वातावरण पर कुप्रभाव। 6 वनस्पति पर प्रभाव । 7 विष का उत्पन होना। 8 वायु तथा जल के माध्यम से जीवनाशको का विश्वव्यापी प्रकोणन । केवल डी डी टी के उपयोग के कारण अमरिका म वाल्डईगल, भूरे पेलिकान तथा पेरोग्राइन फाल्कन की 1960 70 के बीच भारी कमी हो गयी थी । वनस्पति तथा ज तु दोनो के हो शरीरो मे जीवनाशको का भारी जमाव था । प्रयोग द्वारा यह निष्कप निकलता है कि मत्स्प जल के द्वारा 0265 पी पी टी , डी डी टी का अवशोपण करते हैं और जिह 1 000000 को साता म उनके शरीर से प्रयुक्त किया जा सकता है। यह भी अनुमान है कि इन रसायना का 'जैविक सग्रहण' सरल गणितीय आधार पर नही होकर रेखागणितीय आधार पर हाता है । यथा -जव सग्रहण की प्रक्रिया होती है तो वह चारो दिशालो से ही होती है। कहने का आशय यह है कि पादप व सब्जिया जिनका हम उपयोग करते है दूषित जल में पाय जाने वाले मत्स्य जल जिममे लोच्छ रसायन घुले रहते हैं, वायु जिसमे हम श्वास लेते हैं तथा मृदा जिसका हमारा ज म व मत्यु का नाता है, सभी इन रमायनो से प्रदूपित हैं। आज नये-नये पीडकनाशक व कीटनाशक रसायनो की खोज के परिणाम- स्वरूप नेक ओझल समस्याएँ उठ खडी हुई है। इन रसायनो का हवाई छिडकाव किया जाता है जिस पर भारी द्रव वहन करना पड़ता है तथा यह केवल जीवनाशका को ही नष्ट नहीं करते साथ ही उपयोगी जातियो को भी समाप्त कर देते अनेक जातिया इसके प्रयोग से सवेदनशील भी बन गई हैं । इसलिये अब यह नितात आवश्यक हो गया है कि समस्या के समाधान के लिये 'प्राकृतिक नियत्रण विधिया अर्थात जविक निय प्रण का ही प्रयोग किया जाय । जविक नियंत्रण के अतगत मानव द्वारा जावनाशका से बचने के लिये उनके प्राकृतिक शन्न आया ही अपनाना होता है जो या तो नाशको को दवा देते हैं या उहे नष्ट कर देते है । वसे जा जविक निय प्रणो क अनक सम्भावी तरीक है पर इनम दो हा प्रमुख हैं। (1) कोटनागिया पर नियन्त्रण तथा (1) खरपतवार या पादपनागिया पर नियत्रण जधिक नियत्रण म जात्रमणारी शव कोट वग से सगत हो सकता है अथवा रागवार मूक्ष्मजीव भी हा सरता है, कशेरुकी व अरोकको जा 126/पर्यावरण, प्री और मानव

नाशको को खा लेते है, वे भी हो सकते है। इसके लिय पांच विभिन्न विधिया
का उपयोग किया जाता है
(1) ऐसे स्थानो से जहा परजीवी व परभक्षी बड़ी संख्या में पाये जाते है
तथा परिवर्धित होते हैं एकत्रित कर लिया जाता है, लाने व सग्रहण के
पश्चात उ ह छोड दिया जाता है।
(2) आतिथ्य प्रदान करन वाले काटो को भी एकत्रित कर सग्रहित कर
लिया जाता है और परजीवियो तथा परभक्षिया द्वारा उन्ह मरवा दिया
जाता है।
(3) परजीवियो तया परभक्षियो को प्रयोगशालामो में पालना और
आवश्यकता पड़ने पर उह छोड दिया जाना।
(4) परजीवी तथा परभक्षी साधारणतया रोग के पीटाणुओ के ले जाने
वाले कारण हैं जो बाहर से आयात होते हैं।
(5) बध्यीकरण (Sterilization) नर तकनीक द्वारा।
पर्यावरणे तथा पीडकनाशक रसायन/1

पर्यावरण तथा विकिरण के खतरे मानव की तकनीकी क्षमता के विकास से रेडियोधर्मी पदार्थों को उपयोग में लाकर जो परमाणु ऊर्जा ताप आणविक विस्फोटो के रूप में काम म ली गयी है उस के कारण वायुमण्डल रेडियोधर्मी पदार्थों से परिपूर्ण हो गया है, और विकिरण का स्तर निर तर बढता जा रहा है। परमाणु ऊर्जा अथवा परमाणु विकिरण आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति मे एक दोधारी तलवार बन गई है । हजारो की संख्या मे बनाये गये परमाणु अस्त्र तथा प्रेक्षापास्त्रो ने पृथ्वी के सम्पूण जीवजगत को महाविनाश के कगार पर ला खडा किया है, वही दूसरी जोर ऊजा विकिरण का बिजली के उत्पादन, कृषि, चिकित्सा, धातु कर्म व अ य क्षेत्रा म भी व्यापक प्रयोग किया जा रहा है । पर तु इनके साथ ही परमाणु विकिरण के अनेक खतरे भी सामने उपस्थित है। इसीलिये वज्ञानिक, दाश निक लय आदि परमाणु ऊर्जा साधना पर पूर्ण प्रतिव ध लगाने की माग रयत आय हैं। सही अर्थों में देखा जाय तो बिजली उत्पन्न करने वाले परमाणु रिएक्टर वास्तव मे परमाणु जस्त तो नही है पर तु उनके साथ भी खतरे तो अवश्य ही जुड़े हुए हैं । गत तीन दशका म रिएक्टरो के कारण अनेक दुघटनाएं हुई हैं। आज मुख्य मसला परमाणु विकिरण के मानव-जीवन पर पड़ने वाले दूरगामी दुष्परिणामो का है। इस विकिरण से केवल परमाणु ऊर्जा के सभालने वाले लोग ही प्रभावित नही होते वरन् अनक वेवमूर लोगों को भी भुगतन पडत हैं। परमाणु विकिरण ऊर्जा एसे साधन हैं जो विकिरणो के रूप में होते हैं परतु प्रयाश यो भाति दिखाई नही पडत । साधारणतया अरप्य रिरणे ही विकिरण' हाती हैं। विकिरण के प्रकार इम शतादी के दूसरे दशरम रदरफोड ने प्रयोगाय माध्यम स मित्र पिया कि परमाणु भिन स तीन प्रकार के विरिण होत हैं और प्रोम यणमाला व प्रथम तान अक्षरी के आधार पर इनका नामकरण, तथा रिणे पिया गया है। पारिस्थितिरीप प्टि स यह महत्वपूण नायनकारी विरिरण हात है। ० तथा B विहिरणो म परमाणविर या बधारमाणविस सपा का सरिताएँ हाना है । जिस किसी से यह कण टारात हैं उसा पर अपनी ऊर्जा स्थारित पर दत है । इस कारणहणियामय (Corpuscular) विरिप बहत हैं । 128/पर्यावरण, प्राति और मानव (अ) (अल्फा) क्ण हिलीयम परमाणु का केद्रीय भाग है तथा यह तत्वो के परमाणविक परिमाणो पर असर डालते हैं । वायु मे कुछ सेंटीमीटर चलते हैं तथा कागज के द्वारा या मानव त्वचा के मत स्तरो से रोके जा सकते हैं। पर तु इस प्रकार रोके जाने पर वे भारी परिमाण को स्थानीय आयनन सम्पन कर देते हैं । अल्फा कणो मे 2 प्रोटोन व 2 यूट्रोन आधारभूत कण होने के कारण, इन पर (+) विद्युत आवेश होता है । एक अल्फा कण मे 2 इकाई धन आवेश व 4 गुणित भार होता है अत यह शरीर मे अधिक दूरी तक प्रवेश नहीं कर सकते। (4) B (बीटा) कणयह कण तेज चाल वाले इलेक्ट्रास होते है । यह काफी छोटे होते हैं जो वायु मे कई फुट या उत्तको म कई सेंटीमीटर दूर तक गमन कर सकते हैं, तथा अपनी ऊर्जा लम्बे रास्ते तक प्रदान कर सकते हैं । नाभिक के प्रोटोन व यूद्रान जब एक दूसरे मे बदलत हैं तब इन विशिष्ट इलेक्ट्राना का जन्म होता है । परमाणु नाभिक जब अधिक उत्तेजित हो जाता है तब वह गामा किरणो का उत्सजन करता है । बोटा कण (-) विद्य त भावेश युक्त होता है व इन कणो का वेग प्रकाश के वेग से कुछ कम हो होता है। (स) । (गामा) किरणें-- इनका परिमाण वणीय नही है वरन् किरणे हैं । गामा किरणे एवं समस्त सम्बधित एक्स-विकिरण को विद्युत-चुम्बकीय विकिरण कहत हैं । प्रकाश की भाति इनकी तरग-दध्य बहुत कम होती है । यह वृहत दूरियो तक गमन कर सकती है तथा द्रव्य सरलता के साथ चल सक्ती हैं और लम्बे मार्ग तक अपनी ऊर्जा मुक्त करती हैं। इनका असर किरणा को मात्रा एव ऊर्जा तथा स्रोत मे प्राणी की दूरी पर निभर करती है। साराश में कहा जा सकता है कि 8 व किरणो मे प्रमश भेदन क्षमता बढ़ती हैं पर तु आयतन को साद्रता व स्थानीय हानि कम होती है। सवप्रथम रडियम के परमाणु नाभि मे स्वत विकिरण होने का अध्ययन किया गया था इस कारण यह रेडियोधर्मी विकिरण कहलाता है । सरचनात्मक बाधार पर यह दा प्रकार के होते हैं (1) कणीय विकिरण-1,8 व यूदान किरणें, इनमे भार होता है। (2) विद्युत चुम्बकीय विकिरण-प्रकाश फिरणे, एक्स किरणें गामा किरणे व परावगनी किरणें । प्रभाव आधारित विकिरणो को भी दी रूपा म देखा जाता है । (1) आयनारी विश्रिण तथा (2) अन आयनयारी थिरिरण । - - पर्यावरण तथा यिधिरण/10 पर्यावरण तथा विकिरण के खतरे मानव की तकनीकी क्षमता के विकास से रेडियोधर्मी पदार्थों को उपयोग म लाकर जो परमाणु ऊर्जा, ताप जाणविक विस्फोटा के रूप में काम म ली गयी है उस के पारण वायुमण्डल रेडियोधर्मी पदार्थों से परिपूर्ण हो गया है, और विकिरण या स्तर निर तर बढता जा रहा है। परमाणु ऊर्जा भयवा परमाणु विकिरण आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति मे एक दोधारी तलवार वन गई है । हजारो की संख्या मे बनाये गये परमाणु अस्त्र तथा प्रेक्षापास्त्रो ने पृथ्वी के सम्पूर्ण जीवजगत को महाविनाश के कगार पर ला खडा किया है, वही दूसरी ओर ऊर्जा विकिरण का विजली के उत्पादन, कृषि, चिकित्सा, धातु धर्म व अ य क्षेत्रो म भी व्यापक प्रयोग किया जा रहा है। परतु इनके साथ ही परमाणु विकिरण के अनेक खतरे भी सामने उपस्थित हैं। इसीलिये वैज्ञानिक, दाश निक, लपक आदि परमाणु ऊर्जा साधनो पर पूर्ण प्रतिब ध लगाने की माग रखते आय है। सही अर्थों में देखा जाय तो बिजली उत्पन्न करन वाले परमाणु रिएक्टर वास्तव मे परमाणु स्त्र तो नही है परतु उनके साथ भी यतरे तो अवश्य ही जुड़े हुए है । गत तीन दशका म रिएक्टरो के कारण अनेक दुघटनाएं हुई है। बाज मुख्य मसला परमाणु विकिरण के मानव-जीवन पर पड़ने वाले दूरगामी दुष्परिणामो का है। इस विकिरण से केवल परमाणु ऊर्जा के सभालने वाल लोग ही प्रभावित नहीं होते वरन अनेक बेकसूर लोगो को भी भुगतने पडते हैं । परमाणु विकिरण ऊर्जा के ऐसे साधन हैं जो विकिरणो के रूप मे होते हैं परन्तु प्रवाश की भाति दिखाई नही पडते । साधारणतया लहप्य किरणें ही विकिरण हाती हैं। विकिरण के प्रकार इम शताब्दी के दूसरे दशक म रदरफोड न प्रयोगो पे माध्यम स सिद्ध दिया कि परमाणु नाभिक से तीन प्रकार विकिरण होत हैं और ग्रीक वणमाला के प्रथम तीन अक्षरो के नराधार पर इनरा नामकरपा १, 8 तथा किरण किया गया है। पारिस्थितिकीय दृष्टि से यह महत्वपूर्ण आयनकारी विषिरण हात है। तया 8 विकिरणो म परमाणविक या अधोपरमाणविक वणा की सरिताएँ हाती । जिस रिसी से यह कण टारात है उसी पर अपनी ऊर्जा स्थाना तरित कर देते हैं इस कारण रह गणियामय (Corpuscular) विविरण रहते हैं। 128/पर्यावरण, प्रवृति बोर मानव (अ) (अल्फा) कण हिलीयम परमाणु का के दीय भाग है तथा यह तत्वो के परमाणविक परिमाणो पर असर डालते हैं। वायु मे कुछ सेंटीमीटर चलते हैं तथा कागज के द्वारा या मानव त्वचा के मृत स्तरो से रोके जा सकते हैं। परतु इस प्रकार रोके जाने पर वे भारी परिमाण को स्थानीय आयनन सम्पन्न कर देते हैं । जैल्फा कणो मे 2 प्रोटोन व 2 यूट्रोन आधारभूत कण होने के कारण, इन पर (+) विद्य त आवेश होता है । एक अस्पारण मे 2 इकाई धन आवश व 4 गुणित भार होता है अत यह शरीर मे अधिक दूरी तर प्रवेश नहीं कर सकते। (ब) B (बीटा) कण-यह कण तेज बाल वाले इलेक्ट्रा स होते हैं। यह काफी छोटे होते हैं जो वायु मे कई फुट या उत्तको में कई सेटोमीटर दूर तक गमन कर सकते हैं, तथा अपनी ऊर्जा लम्बे रास्ते तक प्रदान कर सकते हैं। नाभिक के प्रोटोन व यूद्रान जब एक दूसरे में बदलते है तब इन विशिष्ट इलक्ट्राना का जन्म होता है । परमाणु भिव' जब अधिक उत्तजित हो जाता है तब वह गामा किरणो का उत्सजन करता है । बीटा कण (--) विद्य त आवेश युक्त होता है व इन कणो का वेग प्रकाश के वेग से कुछ कम हो होता है। (स) (गामा) किरणें इनका परिमाण वणीय नहीं है वरन किरणें है । गामा किरणे एवं समस्त सम्बधित एक्स-विकिरण को विद्युत-चुम्बकीय विकिरण कहते हैं । प्रकाश की भाति इनको तरग-दैर्य बहुत कम होती है । यह वहत दूरियो तक गमन कर सकती है तथा द्रव्य में सरलता के साथ चल सकती हैं और लम्चे मार्ग तक अपनी ऊर्जा मुक्त करती हैं। इनका असर किरणो को मात्रा एव ऊर्जा तथा स्रोत म प्राणी की दूरी पर निभर करती है। साराश में कहा जा सकता है कि ap47 किरणो मे क्रमश भेदन क्षमता बढती हैं पर तु आयतन का सा द्रता व स्थानीय हानि कम होती है। सवप्रथम रेडियम के परमाणु नाभिक मे स्वत विकिरण होने का अध्ययन किया गया था इस कारण यह रेडियोधर्मी विकिरण कहताता है । मरवनात्मक जाधार पर यह दो प्रकार के होते हैं (1) क्णीय विधिरण-1,8 व यूटोन किरणें, इनमे भार होता है । (2) विद्युत चुम्बकीय विकिरण-प्रकाश किरणें, एक्स किरणें गामा किरणे व पराबगनी किरणें । प्रभाव आधारित विकिरणो वो भी दा रूपा में देखा जाता है (1) आयनकारी विकिरण तथा (2) अन-आयनकारी विकिरण । पर्यावरण तथा विकिरण के खतरे/129 आयनकारी विकिरण यह विकिरण प्राय शक्तिशाली होत हैं क्योकि परमाणु से टकरान पर उह आयनित करने की क्षमता रखते हैं अर्थात जब थायनकारी विकिरण क्सिो परमाणु से टकराता है उसा बाह्य इलस्ट्रोन अपनी कक्षा से गहर निकलकर वाहर ना जाता है और इलक्ट्रोन जभावी होन के कारण परमाण धन आयनित हो जाता है तथा इलेक्ट्रोन ऋणात्मक कण के रूप म अलग हो जाता है और आयन-युग्म बनाता है। इस प्रतिनिया को ही आयनीकरण कहते हैं। उमा तथा प्रकाश फिरणा के प्रभाव से परमाणु आयनोकरण में परमाण के बाहरी इलेक्ट्रान अपनी पक्षाओ को बदलने लगते हैं, परन्तु रेडियोधर्मी विकिरण इतना शक्तिशाली होता है कि वह परमाणुओ के इलेक्ट्रोना को उनसे पूर्णतया अलग कर देता है और तब वह परमाणु विकि- रण आयन का रूप ले लेते है, साथ ही विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियामा का पदशन करने लगते है। यह विकिरण वस्तुओ को रासायनिक व्यवस्था के बदलने में समर्थ है और विकिरण मे यह आयनकारी प्रभाव नहीं होता। सभवत विपिरणो द्वारा जीव द्रव मे होन वाली हानिया का मुख्य कारण भी आयनोकरण ही है। यह हानि अवशोपी पदार्थों में उत्पन्न आयन-युग्मो की सख्या का समानुपाती है । आयनकारी विकिरण मूलत पथ्वी पर उपस्थित रेडियोधर्मी तत्वा द्वारा ही निकलते हैं तथा कुछ विकिरण अतरिक्ष द्वारा भी आते है। इसलिये तत्वा के वे समस्थानिक जिनसे आयनकारी विकिरण उत्पन्न होता है, रेडियो मूक्लिओसाइड्स अथवा रेडियो समस्थानिक पहलात हैं। आयनकारी विकिरणो की श्रेणी मे साधारणतथा गामा) किरणे व x-किरणा की गणना की जाती है। यह वास्तव मे विद्य त-चुम्बकीय तरंगे होती है। x-किरणो म न तो आवेश ही होता है और न ही भार । जब B किरणे अथवा इलक स युक्त धाराएँ या कैथोड किरणें किसी बाधा पर टकराती ह तो इलेक्ट्रोन की गतिज ऊर्जा x किरणो में परिवर्तित हो जाती है जो अत्यत शक्तिशाली तथा अतभेदी होती हैं। सन 1895 में यह खाज जमन भौतिकशास्त्री रोजन ने की थी। मतभेंदी विलक्षणता से शरीर के भीतरी गो, विशेषकर हड्डियो के चित्र उतारने में इनसे यासानी हो जाती है क्योकि यह त्वचा तथा मासन भाग दोनो को सरलता से भेद सक्ती है परतु हड्डियो को नहीं। इनका तरगदध्य बहुत छोटा~0 1 एगस्ट्रॉम से 100 एगस्ट्रॉम होता है, इसलिए इनकी म त दी क्षमता भी उतनी ही बढ जाती है। इनका उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया 1 130/पर्यावरण, प्रकृति और मानव 7 (गामा) किरणें भी एक्स किरणो के समान ही होती है परतु अधिक शक्तिशाली है । इनका तरगर्दध्य और भी छोटा होता है ( 00001 एग- स्ट्राम से 0 1 एगस्ट्रॉम तक)। स्पष्ट है कि गामा किरणे x-किरणो को तुलना में अधिक भेदनशक्ति रखती है। इसकी उत्पत्ति परमाणु नाभिक से होती है । नाभिक की बातरिक हलचल के कारण अथवा विघटन के परिणाम- स्वरूप हो गामा विरणा का उद्गम हाता है । न्युट्रॉन आवेशविहीन यण है जिसमे एक युनिट भार होता है यह स्वय आयनीकरण नहीं करते परन्तु जिस भी पदाय को भेदत हैं उन उत्तको म या रेडियोधर्मों पदार्थों में रेडियोधर्मी लक्षण प्रेरित कर दते हैं। अवशोपित ऊर्जा के विशिष्ट परिमाण के लिये गामा किरणो का तीव्रगामी यूट्रॉन दस गुना नया मदगति वाला यूट्रान पाच गुना हानि पहुचाते है। अतरिक्ष किरणें-अतरिक्ष विकिरण माधारणतया कणिकामय व विद्य त-चुम्बकीय घटको के समिश्रण होते हैं। इनकी तीव्रता जीव-मण्डल म यून होती है पर तु अन्तरिक्ष यात्रा के समय वीभत्स स्वरूप प्रस्तुत करती है। मादाम क्यूरी की पुत्री आयरोन व दामाद फ्रेडरिक को सन 1934 मे प्रथम बार जानकारी मिली कि विभिन्न तत्वो पर यदि ऐल्फा कणो की बौछार को जाय तो उनके नाभिक अस्थिर होकर नये समस्थानिक बना देते हैं और परमाणु विकिरण भी उत्पन्न करते हैं। ऐसी स्थिति में सभी तत्वो से एक या उससे अधिक समस्थानिक तैयार करना सभव होता है। परमाणु अस्त्रो के विस्फोट में बड पैमाने पर रेडियो-यूक्लि-आसाइड्स उत्पन्न हात हैं जो जल, थल तथा वायु मे प्रसारित हो जाते हैं। नाभिक विखण्डन के कारण उत्पन होने वाले यूट्रोन कण आगे भी रेडियो न्यूक्तिमोसाइडस का जन्म दे सकते हैं अतएव जोव-जगत पर इनका पातक प्रभाव पडना निश्चित है। अन्तरिक्ष किरण भी मृदा एव जल मे उपस्थित प्राकृतिक रहियोधर्मो पदाधों से निकलने वाले विकिरण पृष्ठभूमिक विकिरण का निर्माण करते हैं जिनक प्रति आधुनिक जीव-जन्तु अनुकूलित है । वास्तव म आनुवंशिक तरलता (Gnetic fluidity) कायम रखन के लिय जीव-जगत इही पृष्ठ भूमिक विकिरणा पर निभर है । जीव-मण्डल के विभिन्न भागा मे यह पृष्ठभूमि 3-4 गुना तक परिवतन ला सक्ती है। विकिरण मापन एय मानक विकिरण मम्य धी घटनाओ के अध्ययन के लिय दा प्रकार मापन की आवश्यकता होती है (i) होने वाले विघटन की दृष्टि से रेडियाधामिक पदाय के परिमाण का मापना तथा (1) अवशोपित ऊर्जा की बट स विकिरण मात्रा का मापन जो बायनन अथवा हानि पहुंचाने में समय हो । पर्यावरण तया विकिरण के खतरे/131 रेडियोधर्मी पदार्थ के परिमाण का मात्रक क्यूरी (Curre-ca) होता है। पदाथ के इस परिमाण को एक क्यूरी माना गया है जिसम प्रति सकिंड 37x10° परमाणुओ का विखण्डन होता है । उदाहरण के रूप म रेडियम का एक ग्राम क्यूरी (CI) होता है जिसमें प्रति सकिंड 37X100 विकिरण निकलते हैं। एक क्यूरी म विभिन्न पदार्थों के भिन-भिन भार होते हैं । जविकष्टि से निम्न छोटे मानको का प्राय प्रयोग किया जाता है यया- मिली क्यूरी (ma) =10-ci माइक्रो क्यूरी (m Ci)= 10-6ca जैनो क्यरी (n Ci)=10-°CI पाइको क्यूरी (PCI)= 10-12CI विकिरण की माता (radiation dose) के मापन का मायक रैड (Rad) होता है, वह मात्रा एक रंड मानी जाती है जिसम प्रति ग्राम उत्तक 100 अग ऊर्जा अवशोषित हो। रोए जन (R) एक प्राचीन मात्रक है। जहा तक प्राणियो पर प्रभावो को देखा जाता है रोए जन तथा रड एक से होते हैं । रोएन्जन अथवा रंड कुल माया के मात्र हैं। एक इकाई समय मे प्राप्त किया गया परिमाण माता दर (dose rate) कहलाता है। इस प्रकार यदि एक प्राणी 10mR (माइकोरोएन्जन) प्रति घण्टा प्राप्त कर रहा है तो 24 घण्टो की अवधि मे कुल मात्रा 240mR या 0 24R होगी। सन 1980 मे अन्तर्राष्ट्रीय विकिरण मापक आयोग ने नये मात्रको री पेशकश की थी जो शनै शन प्रयोग मे आ रहे हैं। अवशोषण के मानक हैं- 1 (Gray)=100 रैड (rad) 1 सीवाट (Stevart)-100 रम (rem) रेडियोधर्मिता के मानक है 1 वक्वरेल (Bacquerel}-27 पाइको क्यूरी (pcs) रेडियो न्यूक्लिमोसाइडस अध आयु एव ऊजी- एक तत्व के अनेक समस्थानिक हो सकते हैं जिनम कुछ विकिरण उत्स- जित कर सकते हैं । ऐसे समस्यानिको का रडियो-यूक्लिओसाइड या रडियो समस्थानिक (radio-isotopes) कहा जाता है । प्रत्येक रडियो यूक्लिओसाइड की एक निश्चित अभिलक्षणिक दर हाती है जो इनकी अध आयु से प्रदर्शित होती है। अपनी रेडियोधर्मिता का आधा अश खोने म एक रेडियो समस्यानिक द्वारा लिया गया समय उसको धजायु अवधि (Half life period) कही 132/पर्यावरण, प्रकृति और मानव जाती है । केल्सियम 45 को अर्धनायु अवधि 160 दिन होती है । यह अवधि वातावरणीय कारको द्वारा प्रभावित नही होती है। एक रेडियो समस्थानिक वा ऊर्जा विकिरण अवश्य ही भेदन क्षमता को प्रभावित करता है। जितनी ऊर्जा अधिक होगी जैव द्रव की उतना ही अधिक सम्भाव्य खतरा बना रहेगा। रेडियो न्यूदिलओसाइड्स व पारिस्थितिक महत्व- पारिस्थितिक दृष्टि स रेडियो समस्थानिको मे प्राय 01 से 50 mey के बीच ऊर्जा होती है, उहे निम्न तीन समूहो मे वर्गीकृत किया जाता है (1) प्राकृतिक रूप में पाये जाने वाले रेडियो यूक्लिनोसाइड्स । (2) उपापचयी महत्त्व के तत्वा के समस्थानिक। (3) यूरेनियम जैसे तत्वो के विखण्डन से उत्पन समस्थानिक । उपरोक्त मे तीसरा समूह ही सर्वाधिक विध्वसकारी सिद्ध होता है क्योकि नाभिकीय विस्फोट में तथा नियतित नाभिकीय क्रियाओ में इही विखण्डन समस्थानिको का भारी परिमाण मे निर्माण होता हैं । यह न तो उपापचपिक महत्त्व के तत्वो के समस्थानिव होते हैं और न ही जीवद्रव क आवश्यक घटक' ही। यह आसानी के साथ जोव भू रासायनिक चक्रा में प्रवेश कर जाते हैं तथा आहार- खलाओ मे साद्रित हो जाते हैं । अनेक विखण्डन समस्थानिको वा अपक्षय होता है और सतति समस्थानिक बन जाते हैं। यह अधिक शक्तिशाली तथा विध्वसकारी होते हैं । स्ट्राशियम व सीजीयम इसके मूल उदाहरण हैं जो भोजन शृखलाओ में घर कर जाते है । विकिरण सवेदनशीलता-- अव यह सवविदित हो चुका है कि कोई भी घटक-जीव का अग अथवा सम्पूर्ण जाव अथवा पूर्ण समष्टि जो तेज गति से वद्धि रही है, निम्नस्तर के विपिरणो से प्रभावित हो सकती है तथा निम्नस्तर की पुरानी मात्रामो को मापना बहुत कठिन काय है क्योकि इनके कारण लम्बी अवधि के आनु- चशिक एव बाह्य-प्रभाव रष्टिगत हाते हैं। स्परो एव ईवास (1961) ने सिद्ध कर दिया है कि उच्च वर्गीय पादपो की सवेदनशीलता कोशिका के द्रक- गुणसूत्रा अथवा डी एन ए को रेडियाधर्मी आपनन की सोधी ही समानुपाती है परतु उच्च वर्गीय जन्तु ऐसा कोई सीधा सम्बध कोशिका आकार तथा सवेदनशीलता मे नही बनता। परन्तु विशिष्ट अगो पर तीक्ष्ण मानाओ का प्रभाव अधिक घातक होता है। स्तनी समुदाय निम्न माताओ के प्रति अधिक सवेदनशील होता है क्योकि रक्त उत अस्थि-मज्जा म बहुत तीव्र गति से विभाजन करते हैं। । पर्यावरण तथा विविरण के खतरे/133 यह सच है कि पष्ठ भूमिक विकिरण मात्राओ के प्रति जीव म लगाव उत्पन हो जाता है और ऐसे विकिरण के तीन मुख्य स्रोत हैं -(1) जनरिक्ष किरणें (1) जविक ततुओ मे पोटेशियम-40 तथा (1) वाह्य विकिरण जो भूमि व जल मे रेडियम विखण्डन से आते है । यह भी सही है कि वगिकी की दृष्टि से, विभिन्न समूहा की विकिरण सवेदनशीलता के लिय काइ सामाय नियम का प्रतिपादन नहीं किया जा सकता, फिर भी इतना तो अवश्य है कि स्तनपायी सबसे अधिक विकिरण सवदनशील तथा सूक्ष्म प्राणी सवस अधिक प्रतिरोधी होते हैं। सभवत् इसी बात को देखकर लुई (1958) ने प्रस्तुत किया कि "यदि मानव रेडियो जैविक आधार पर अपनी सुरक्षा कर लेत है ता कुछ हर-फेर के साथ शेप प्रकृति स्वय की सुरक्षा कर लेगो। भूमि, सागर व अन्य रेडियोधर्मी प्रदूषण, जहा मानव वास्तव में नही पहुचा है उनका मानवीय जीव सहायक सस्थान पर कोई प्रभाव नहीं हुना है । रेडियोधर्मी अवपात (Radio active fallout) परमाणु विस्फोटो के बाद भूमि पर गिरनेवाली राख अथवा परमाणविक धूल रेडियोधर्मिक अवपात कहलाता है। अवपात मुख्यत परमाणविक अस्त्रो के प्रकार पर निभर करता है जो दो प्रकार के होते हैं--(1) विखण्डन बम तथा (2) सलयन बम । विखण्डन बम (fission bombs) - इनमे यूरेनियम तथा प्लूटोनियम जैसे भारी तत्वो का विभाजन होता है फलत ऊर्जा एव विखण्डन उत्पाद मुक्त होते हैं और वातावरण में फेक दिय जात है। यह काय मटिन (1944) के अनुसार निम्न प्रकार प्रस्तुत किया गया है जब यूरनियम सूईया म धीमी गति से चलन वाले यूट्रोन को प्रवाहित किया जाता है तो यूरेनियम परमाणु विखण्डन कर वेरियम व निष्टान परमाणु बनाते हैं साथ ही प्रत्यक परमाणु विखण्डन के माथ अतिरिक्त युटान व 200 mev ऊर्जा उत्पन्न होती है । यह क्रिया शृखलाबद्ध क्रम में चलती है। 2 सलपन बम (furon bombs) इनम हाइडोजन तत्व के समस्या- निक इयुटोरीयम जैसे हल्के तत्वा के सलवन से भारी तत्व यथा हिलीयम तत्व बनता है और ऊर्जा एव न्यदा म मुक्त होते हैं। सलयन की क्रिया को आरम्भ करने के लिये विखण्डन क्रिया का ही उपयोग किया जाता है क्योकि सलयन यमा में अत्यन्त उच्च तापमान को आवश्यक्ता हाती है। मामा म तया सलयन बम अथवा तापनाभिकीय अस्त्र यम विपण्डन उत्पाद और अधिक यूटोस उत्पन्न करत हैं । ग्लस्टोन (1957) क अनुसार नाभिकीय 134/पर्यावरण, प्राति और मानव अस्त्रो की 10 प्रतिशत ऊर्जा अपशिष्ट नाभिकीय विकिरणो मे निहित होती है जिसके कुछ अथ का जीव-मण्डल मे विस्तृत प्रकीर्णन हो जाता है। तत्पश्चात् यह रेडियो यूक्लिओसाइड्स लोहे. सोसे, सिलिका, धूल तथा जो बुछ भी समीप में स्थित होता है, उससे सयोग कर लेते हैं और अपेक्षाकृत अविलयशील कणों का निर्माण कर देते हैं। इन कणो का आकार अलग- रला होता है। छोटे कण पाटप-पत्तियो के साथ चिपक जात है और पत्तियों मे विकिरण जनित हानिया उत्प न कर देते हैं, तब इनका शाकाहारी अन्त- ग्रहण भी करत हैं। इस तरह के अवपात प्रत्यक्ष रूप में शाकाहारिया तथा प्राथमिक उपभोक्ताओ के पोपण स्तरों में प्रवेश कर जाते हैं। छोटे परमाणु शस्त्रा के अवपात साधारणतया सीमित होते हैं । यह वायु के माथ सकरे रेखीय रूप मे निक्षेपित होते हैं । स्ट्राशियम 90 तथा सीजीयम 137 जैसे कुछ अत्यत सूक्ष्म पण विस्तृत तौर पर प्रसारित हा सक्त हैं व वर्षा के माथ दूर दूर पृथ्वी पर गिर सक्ते हैं । इसके अतिरिक्त भी रेडिया- मिता का सम्पूर्ण परिणाम नाभिकीय परीक्षण के स्थान स दूरी के साथ साथ कम हो जाता है । अत्यन्त शक्तिशाली मैगाटन' अस्न द्रव्य को समताप मण्डल म भी फेंक दत हैं जिसके फलस्वरूप सभी स्थाना पर विश्वव्यापी सदूपण तथा विश्व-विस्तृत अवपात हो जाता है जिसका प्रभाव भी अनेक वर्षों तक रहता है। एक विशिष्ट क्षत्र द्वारा प्राप्त किया गया अवपात उस क्षेत्र की वर्षा का लगभग समानुपाती होगा। इसका एक विशेष उदाहरण अमरिका से मिलता है जिसमे सन 1965 तक स्टाशियम 90 का अवपात नमो लिय क्षेत्रा में 200 mC/वर्ग मोल तथा शुष्क क्षेत्र मे 80 mC/ग मील पाया गया था। सीमूर (1959) तथा पोलम्बो (1961) ने भी कहा था कि रेडियो- धर्मी अवपात के उन तत्वा के अधिकतम परिणाम समुद्री जन्तुआ म स्थाना- तरित हो जात है और कावनिक पदार्थों क साथ मिलकर जटिल सम्मिश्रण तैयार करते हैं जैसे कोबाल्ट-60 लोट-59, जस्ता 65 एव मैंगनीज-54 प्रशात महासागर म विस्पोट रे कारण सागरीय ज तुनो में पहुच गये थे। इसी प्रकार पिलयशोल रेडियोधर्मी अपशिष्ट स्ट्रीशियम-90, एव सोजोयम- 137 के अधिपतम परिणाम स्थलीय पादपा व जन्तुओ म भी पाये जात है । कुछ रेडियो यूक्लिसोसाइडस से Cc-144, Pr-144, Zr-95 तथा Rh 106 विविक्त या कोनोडो के रूप में भी सान्द्रित रहत हैं। रेडिया- “यक्रिोसाइन्स को जो परिणाम बाहार शृखलामा म पवेश करता है अत म मानव पारीर में भी पहुँच जाता है। इसी प्रकार वायु द्वारा प्राप्त किये गये परिणाम पारिस्थितिको तवरी सरचना तया जीव-भू-रामायनिर चका को प्रकृति का भी प्रभावित करते पर्यावरण तया विकिरण के सतरे/135 है। यह कोई भी नहीं बता सकता कि रेडियोधर्मी धूल के यह कण क्तिनै हानिप्रद हो सकते ह यह स्पष्ट है, कि अय प्रदूषणो की भाति यह कोई वास्तव म अच्छा काय नही कर रहे है। अपशिष्टों से मुक्ति वायन बग तथा हेनोण्ड (1971) दोनो ही वैज्ञानिको को अभिव्यक्ति है कि नाभिकीय ससाधनो की ऊर्जा कभी समाप्त होने वाली नहीं है, परतु इस ऊर्जा के अत्यधिक उत्पादन से वातावरण मे उत्पन होने वाले दोषो के कारण उनका सीमित रखना अनिवाय है। नाभिकीय स्रोतो की इस ऊर्जा का असीमित, स्वतन व स्थायी प्रयोग करने के वातावरणीय दुष्प्रभावो को यूनतम करने के पर्याप्त साधन खोजने होगे क्योकि यह विध्वसकारी प्रभाव रेडियोधर्मी अपशिष्टो से तथा ताप के भारी परिमाणो के द्वारा होते है और वाप के कारण तापीय-प्रदूपण (thermal pollution) उत्पन होता है। रेडियोधर्मों अपशिष्टों का वर्गीकरण यह तीन प्रकार के होते हैं --(1) उच्च स्तरीय (2) मध्य स्तरीय तथा (3) निम्न स्तरीय । (1) उच्च स्तरीय अपशिष्ट इन अपशिष्टा को जीव-मण्डल मे कहीं भी मुक्त करने के घातक परिणाम होते हैं, इसी कारण इह अतविष्ट ही रखना पड़ता है। इह प्राय भूमिगत तालो म सग्रहीत करना होता है। परमाणु ऊर्जा के प्रयोगो का वजित करने के कारण सग्रह-स्थाना की भारी समस्या आ पडी है और अब उह तालो मे संग्रहित करने क नय साधनो अथवा विकरपा पर विचार किया जा रहा है। (अ) वो को उपयुक्त ठोस रूपोम परिवर्तित कर उह भू-स्तरो मे गाडा जा सके। (ब) शहरी लवणो वी सदाना म द्रवा व ठोसो का सग्रहण किया जा सके। उच्च स्तरीय अपशिष्टो द्वारा उत्पन्न होने वाला ताप इस समस्या को अत्यन्त जटिल बनाये हुए हैं। (1) मध्यस्तरीय अपशिष्ट इनको रेडियोधर्मिता इतनी उच्च होती है कि स्थानीय अ तविष्टि आवश्यक हो जाती है परन्तु यह रेडियोधर्मिता इतनो थोडी होती है कि उच्च स्तरीय व दीप थायु वाले घटमा का अलग करना एक सप आयतन के साथ निम्न स्तरीय अपशिष्टो बसा व्यवहार करना सम्भव होता है। (1) निम्न स्तरोय अपशिष्ट -यह ठोस द्रव तथा गैस, जिनके प्रति इसाई आयतन म बहुत थोडी रेडियोधर्मिता हाती है, आयतन म इतने विस्तृत 136/पर्यावरण, प्रकृति और मानव होते हैं कि इह पूर्णतया भविष्ट करना साधारण बात नहीं है। इसलिये इनका कुछ प्रकोणन वातावरण मे करना पड जाता है । यह प्रकोपन कुछ इस प्रकार व दूर से करना पडता है कि मुक्त हुई रेडियाधर्मिता के कारण पष्ठ- भूमि की रेडियोधर्मिता से खास वृद्धि न हो या फिर वे आहार-शृखलाआ म साद्रित न हो जाय। प्राणियो पर विकिरण प्रभाव जसा इस अध्याय मे पहले भी व्यक्त किया जा चुका है कि पष्ठ भूमिका विकिरण अन्तरिक्ष किरणो, सजीव कोशिवाओ मे विद्यमान पोटेशियम 40 तथा रेडियम या चट्टाना में पाये जाने वाले रेडियो यूक्लिओसाइडस वाह्य विकिरण के द्वारा आते हैं। प्राणी वग प्राकृतिक तथा पष्ठभूमिक मात्राओ के परिणाम के प्रति अनुकूलित होते है, नाभिकीय विस्फोटा तथा नियनित नाभिकीय क्रियाओ से उनके परिणामो मे जभिवद्धि होती है । इन प्रभावो को दा शोपको के अन्तगत अध्ययन किया जा सकता है (6) कायिक प्रभाव व (1) आनुवाशिक प्रभाव । () कायिक प्रभाव - इन प्रभावो को जीवो की बाल्यावस्था से मृत्यु पयत नक देखा जा सकता है। जतु उत्तको पर एसे कायिक प्रभावो का निम्न वणन किया जा रहा है (क) रक्त निर्माण करने वाले उत्तक - रक्त कोशिकाओ का निर्माण अस्थिमज्जा, प्लीहा व लसिकाय अगो मे रक्तकोशिकाआ क पूर्वगामिया द्वारा होता है। यह पूर्वगामी विकिरणो के प्रति अत्य त सवेदनशील हाते है और शीघ्र हो नष्ट हो जाते हैं फलस्वरूप रक्त कोशिकाजो का अभाव दृष्टिगोचर होने लगता है। यदि शरार का केवल एक ही हिस्सा विविरणा के प्रति अनावरित हो तो अप्रभावी उत्तको मे रक्त निर्माण करने वाली कोशिकाओ को पहले रक्त मे तथा वहां से नष्ट हुए भागो मे ले जाया जाता है जहा इसका सवधन होता है । अब यह नष्ट हुई कोशिकामा का प्रतिस्थापित करती है। एसी परिस्थितियो मे तो विकिरण यदि शरीर के एक ही हिस्स पर अनुप्रयुक्त किये जायें तो सहनीय होगे। विकिरण के बाद कुछ ही घटो मे लसीकाणु लुप्त होने लगत हैं, तश्पचात श्वेताणुओ को बारी आती है और वे समाप्त होन लगत है । विकिरण के 4-5 सप्ताह के पश्चात् रक्त प्लेटलेटस को सख्या में भी भारी कमी आने लगती है। इन कोशिकाओ की संख्या म कमी के कारण रक्तस्त्राव हो सकता है। विकिरण के 6-7 सप्ताहो के पश्चात् लाल कणिकाएं भी सख्या में कम होने लगती है जिससे अरक्तता नामक रोग हो जाता है। पर्यावरण तथा विकिरण के खतर/137 (प) स्वचा प्रभाव -विपिरणारे पारण सचा पतली हो जाती है क्योकि उसके गीच स्थित याजी-उत्तक नष्ट हो जात है और रक्त वाहिनिया यवरुद्ध होन लगती हैं। इन परियतनो या सामूहिर प्रभाय त्वचा या सर है। त्वचा के अतिरिक्त जग-रोम भी प्रभावित हुए बगर नही रहत, यह भूरे रग ये पडने लगते हैं और अन्त म लुप्त हो जात हैं। (ग) प्रजनन प्रपियो -प्रजनन योशिराएँ विकिरणो के प्रति अधिक सवेदनशील होती है, यह नष्ट हो जाती हैं तथा विकिरण द्वारा स्थायी व जस्थायी म व धीय वृत (Sterlized) हो जाती हैं । इसम अतिरिक्त भी जनन योशियालो मे उत्परिपतन प्रकट होन लगते है जो अगली सततिया म भेज दिय जाते हैं। (4) जठराव नलिका -आहार-नाल के भीतरी बस्तर भी विपिरणों के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं जिससे आता पी गतिशीलता विक्षुब्ध हो जाती है, स्त्राव भी कुप्रभावित हुए वगर नही रहता और आता के भीतरी भागो मे घाव पड जाते हैं। अनावरण के कुछ ही पाटो के पश्चात जी मिचलाना व हाना बारम्भ हो जाता है । तत्पश्चात डायरिया निजलीकरण, तथा जीवाणुओ या आरमण बारम्भ हो जाता है। (ड) नेत्र प्रभाप विकिरणो के पारण विशेषकर नेत्रा के ताल खराब हो जाते हैं। यह अपारदशक हो जाते हैं जिससे मोतियाबिंद जस रोग उत्पन होते हैं । बानिया, रेटीना, व क्जक टिवा काफी मात्रा मे विकिरणा यो सह सकते ह पर तु भ्रूणो म रप्टिपटल (retina) आसानी से प्रभावित हो जाता है जिससे न धापन आ जाता है । (च) तत्रिका तन प्रभाव --- 10000 रोए टज स या अधिक तीव्र विकिरणो के प्रभाव से भी तत्रिकालो म दोप उत्पन हो जाते है जिनसे कुछ ही समय में प्राणिया की मृत्यु हो सकती है। (छ) अस्थिया प्रभाव विविरण की सूक्ष्म सो मात्रा से भी दाता व ककाल की वृद्धि रुक सकती है। परिपक्व दात व अस्थिया विकिरण के प्रति प्रतिरोधी होते ह । इससे अस्थियो मे विद्यमान खनिज तत्वा को भारी हानि उठानी पड़ती है । अस्थिया का नक्रोसिस अथवा अस्थि विभजन हान लगता है। (ज) सवहनी तव प्रभाव ~~ उच्च विविरणशीलता के कारण रक्त वाहिनियो के भीतर अस्तर को कोशिकाएं मर जाती हैं और बाहिनिया टूटने लगती हैं और अवरुद्ध होने पर पर पड़ती है जिससे उनमे क्षीणता उत्पन हो जाती है। - 138/पर्यावरण, प्रकृति और माना - - (स) अत स्वावी अयि प्रभाव प्राय सभी थिया थोडे से विकि- रण के प्रतिरोधी होती हैं और सूक्ष्म मानाओ से भी उनम ऐसे परिवतन हो जाते हैं कि उनका काय ही बन्द हो जाता है जिसका सम्पूर्ण शरीर पर घातक प्रभाव पड़ता है। (ञ) वृक्क प्रभाव यह भी विकिरणो के प्रति प्रनिरोधा अग है परतु 500 से 1000 सेण्टजस की उच्च मात्राओ से ही इनमे क्षीणता का प्रभाव दिखाई पड़ता है, इनका वृक्क कार्यिकी पर घातक प्रभाव होता है। (2) फुस्फुस प्रभाव यह अग विकिरणो के प्रति काफी सवेदनशील कह गये है। थोडी-सी ही मावा के कारण निमोनिया तथा अधिक विकिरण को उपस्थिति मे फुस्फुस कैसर जैसा मयानय रोग हो जाता है । उपरोक्त सभी प्रभाव प्राणियो को अवश्य ही मृत्यु के कगार पर ला खडा कर देते हैं । मृत्यु का प्रमुख कारण रक्त-निर्माण करने वाले उत्तको का नष्ट होना रक्त स्राव व अरक्तता ही है । मस्तिष्क को हानि तथा घातर जी स भी मृत्यु के लिये उत्तरदायी होते हैं। (ब) आनुवंशिक प्रभाव - ऐसे प्रभाव वस्तुत अगली पीढियो मे प्रक्ट होते हैं । इनका अध्ययन निम्न विदुआ के अतगत किया जा रहा है (क) जीस प्रभाव आनुवशिक द्रव्य मे विकिरण, उत्परिवतन उत्पन करने मे समथ है। 10 प्रतिशत आनुवशिक उत्परिवतनो का कारण, प्राकृतिक विकिरण है तथा शेष कृत्रिम विक्रिणा के द्वारा ही प्रेरित रहते हैं । (स) गुणसूत्र प्रभाव - यह स्पष्ट देखा गया है कि विकिरण गुणसूनो को तोड़ देते हैं और टूटे हुए गुणसूना के अण कुछ ही मिनटो म पुन जुड भी जाते हैं । परतु कभी-कभी ऐसा नहीं भी होता है और इस विधि मे गुणसूत्रो के कुछ खण्डो की जी स सहित कमी रह जाती है और आने वाली सताना मे बहुत से लक्षण अदृष्य रह जाते हैं । विकिरणो के दुष्प्रभाव से गुणसूत्र चिपचिपा भी जाते हैं तथा एक गुच्छा-सा बन जाता है और कोशिका विभाजन के समय उनका अलग हाना सभव नही बन पाता । अत विकिरण कोशिका विभाजन क्रिया को रोक देते है। यह यूक्लिक अम्लो सश्लपण की प्रक्रिया में भी शिथिलता ला देत हैं । पारिस्थितिकी तन पर विकिरणो का प्रभाव बुडवन द्वारा 1962-1965 के मध्य किये गये प्रयोगा से पारिस्थितिकी तन स्तर पर विकिरणो के प्रभाव को सरलता के साथ समझा जा सकता है। इस प्रयोग म एक ओक-पाईन वन मे गामा उत्सर्जी रख दिया गया था जिसे प्रतिदिन 20 घन्टो तक अनावरित छोड दिया जाता था, फ्लस्वरूप एक - पर्यावरण तथा विकिरण के खतरे/139 - पुरानी विपिरण प्रवणता पा निर्माण हो गया। इस प्रवणता का परिसर सात से 10 मीटर की दूरी पर 1000 रंडस से 140 मीटर की दूरी पर पृष्ठ भूमिा विकिरण के ऊपर इतनी अधिर वदि तर था, जिसे मापना पठिन था। यह विषिरण 2 वर्षों तक जारी रहा। दूसरे वप इसी वन म, विकिरण प्रवणता के अनुमार पाच अणुक्षेत्र देखे जा सक्त थे (1) मुख्य ये द्रीय अणु क्षेत्र जिसम कोई उच्च पादप जीवित नहीं रहा । (1) सज जा एरप्रसार की पास होती है, दूसरे अणु क्षेत्र म येवत यही जीवित रही। (n) अगला अणु क्षेत्र जिसे झाडी अणु क्षेत्र भी कहा जाता है, इसम संज पास तथा माडिया तो जीवित रही परन्तु योक व पाईन के वक्ष नष्ट हो गये थे। (iv) इसके पश्चात चौथा प्रतिचालित ओपवन अणु क्षेव था जिसमे सज, नाडिया व अनेर नाक वक्ष तो जीवित पाय गये परतु पाईन वृक्ष यहा पर भी नहीं थे। (v) पूण जोर-पाईन वन जिसमे कम या सदमित वद्धि अवश्य दिखाई दे रही यी लेकिन किसी भी प्रकार के पादप पूणरूप से समाप्त नहीं हुए थे। इन प्रेक्षणो से सिद्ध होता है कि सैज घास विकिरणा के प्रति सर्वाधिक प्रतिरोधी होती है तथा यह प्रतिरोध इन अनुक्रम मे कम हाता रहता है- संज, झाडिया, योग व पाइन वक्ष । अतिम सदस्य विकिरणा के प्रति सर्वाधिक सवेदनशील होते हैं । इससे यह भी निप्पप निकलता है वि समुदाय-अनुक्रमण (Community succession) को प्रारम्भिक अवस्थाएं चरम समुदाय की अपेक्षा अधिक प्रतिरोधी है तथा वक्ष चरम-समुदाय को निरूपित करत हैं । इस कारण वे विकिरणो के प्रति कम प्रतिरोधी होते है। सजीवो की विकिरण को प्रति तुलनात्मक सवेदनशीलता आशिक रूप मे पाये जाने वाले गुण सूया म विभिनता के कारण होती हैं । इसका मुख्य कारण है शाकीय समुदाय मे भूमि के ऊपर जनावरित जीवभार बहुत तुच्छ होता है और इस कारण वीजा या सुरक्षित भूमिगत भागो से अकुरण द्वारा अधिक शीघ्रता से सभल जाते है । विकिरण के प्रति विभेदक सवेदनशीलता का बड़ा पारिस्थितिक महत्व है। कभी कभी अनवरत अनुतरित होन से एसे अनु- कूलन व समायोजन हाने लगते है कि सबदनशील जातिया या स्ट्रेस या प्रजातियो के प्रारूप विलुप्त हो जाते हैं। साथ हो विकिरण प्रतिवल से समप्टि की परस्पर मुख्य प्रतिक्रियाएं भी बदल जाती हैं । 140/पर्यावरण, प्रकृति और मानव उपयोगी विकिरण (1) अनुज्ञापक कुछ विकिरण अत्यत घातक तथा विनाशकारी होते हैं परतु पूण सावधानी तथा नियत्रण बरतने पर जनेक रेडियो-समस्थानिक चिकित्सा एवं कृषि में उपयोगी होते हैं | a, B तथा ? विकिरणो का उपयोग चिक्त्सिा के साथ-साथ शरीर में विभिन तत्वो के स्थान तथा गतिविधिया का पता लगाने के लिये किया जाता है। अत शरीर मे रेडियो-समस्थानिकों को औपधि अनुनायको के रूप मे काम मे लिया जा सकता है। समस्थानिको की उपस्थिति गिगर काउन्टर द्वारा ज्ञात की जाती है जो एक ऐसा सवेदी यान है, जो बहुत ही सूक्ष्म विकिरणो के विषय मे भी पता लगा देता है । जब समस्थानिको का टेसर-अनुज्ञापक के रूप मे अध्ययन होता है तो इस बात का ध्यान रखना आवश्यक हो जाता है कि उसको मात्रा इतनी छोटी हो कि वह शरीर पर किसी प्रकार का प्रभाव न डाले। रेडियो आयोडीन-131 का प्रयोग थायराइड प्रधि को जाच करने म तथा हृदय की गतिविधियो की जाच करने के लिये किया जाता है । रेडियो कोबाल्ट-58 का प्रयाग विटामिन B12 के अवशोषण, रेडियो आर्सेनिक-74 का मस्तिष्क टयूमर का पता लगाने तथा रेडियो सोडियम 24 का उपयोग रुधिर परिसचरण का पता लगाने के लिये किया जाता है। वतमान मे अनेक रोगो के उपचार में रेडियो- समस्थानिको का उपयोग सफलता के साथ दिया जाने लगा है। कसर का रेडियो कोबाल्ट-60, को सहायता से इलाज किया जाता है । आयोडीन-131 निर्वाधित थायरोयड के लिये फास्फोरस-32 का रक्त में लाल कणिकाओ की अति तथा रक्त म श्वत कणिकाओ की अति (ल्यूकेमिया) के उपचार के लिये होन लगा है । मस्तिष्क व प्रोस्ट्रेट प्रथिया के लिये रडियोगोल्ड-198 की महायता की जाती है। (3) कृषि-आलू प्याज व अन्य फला तथा सब्जियो का विकिरण कर, बगैर शीत सग्रहण के सामान्य तापक्रम पर, रडियो समस्थानिको की सहायता से एक वष तक सुरक्षिन रखा जा सकता है । पि क्षेत्र मे हानि पहुधाने चाले कीडा को भी विकिरणो द्वारा व ध्य कर दिया जाता है जिनसे उनके वशज ही उत्पन नही हान पात। आधुनिक समय मे परमाणु बिजलीघरो तथा रिएक्टरों के लिये दो बुनियारी इधनो यूरेनियम व योरियम का उपयोग किया जाता है । रिएक्टरो के भीतर जब यूरेनियम-235 विसण्डित होता है तो परमाणु-कणो के तोत्र वेग के रूप म ऊर्जा पदा होती है । इस ऊर्जा से भाप बनती है, जेनरेटेर गति करते है और विद्युत उत्पादन होता है । (2) औषधि पर्यावरण तथा विकिरण के पतर/141 वातावरण मे विकिरणो का भविष्य परमाणु शक्ति हमारे समक्ष तीन रूपो म प्रयुक्त होती है । परमाणु तया हाइजन वम इसके विध्वसक स्वरूप हैं जबकि परमाणु ऊर्जा तथा रडियो- समस्थानिय उसके रचनात्मक आधार है। जसा विदित हो चुका है कि परमाणु बमो के विस्फोट के कारण क्षण भर में ही ताप, प्रकाश तथा विकिरण के रूप मे अपार शक्ति का विमोचन होता है और विशाल क्षत्र मे सब कुछ नष्ट हो जाता है । यूरेनियम, प्लूटोनियम आदि तत्वा के नाभिकीय विखण्डन अर्थात परमाणु शस्त्रो या आणविक रिएक्टरो मे कृत्रिम रेडिया धर्मी विकिरण उत्पन्न होते हैं तथा कृत्रिम रेडियोधर्मिता के यही नये साधन मानव जाति के लिये प्रलयकरकारी सिद्ध हो रहे है। 6 अगस्त सन् 1945 को सयुक्त राज्य अमरिका ने जापान के हिरोशिमा नगर पर मानव इतिहास का सबसे क्रुर दाव खेला जोर परमाणु बम के रूप मे ताण्डव पारम्भ किया। लगभग एक लाख व्यक्ति काल ग्रस्त हो गये और हजारो भवन राख के मल्वे मे वदल गये । वतमान में तो हिराशिमा पर डाले गये बम से भी हजारा गुना ज्यादा शक्तिशाली परमाणु आयुध बना लिये गय हैं तथा अकेले अमरिका के पास इतने आणविक आयुध है कि सम्पूण मानव जाति का नाश हो सकता है । परमाणु विस्फोटो के कारण रेडियोधर्मी धूल का ऐसा विशाल वादल बन जाता है कि जो आग के गोल सदस्य दिखता है उसमे लगभग 200 प्रकार के समस्थानिक रहते है जो वायु जल तथा मदा विश्व के सभी भागो मे गिरते हैं और मत्यु का नगा नाच आरम्भ कर आजकल ऊर्जा पूर्ति क लिय, परमाणु शक्ति से परिचालित विद्युत घरो की संख्या में निर तर वृद्धि होती जा रही है । परमाणु भट्टिया के अधिकाधिक उपयोग से वातावरण म विकिरण को मात्रा मा उसी अनुपात में बढती जा रही और अपशिष्टा को फेंकन की समस्या भी बलवती हो रही है। वातावरण में प्रदूपण की दर में भी अभिवद्धि हो रही है। समस्थानिका का प्रयोग भी किसी प्रकार कम नहीं है, अत यहा सावधानी बरतने का विशेष आवश्यकता है। जब रेडियो यूक्लिओसाइडस बातावरण म विमुक्त होते हैं तो उनका प्राय प्रकोणन तथा तनुकरण हो जाता है परतु यह ज तुओ म जाहार शृखलामा म स्याना तरित होकर सादित भी हो सकत है तथा जल मृदा, वायु तथा अपशिष्टा मे सचित भी हो सक्त हैं। यदि प्राकृतिय विघटनाभिक क्षय की दर की अपेगा उनका निवश अधिक हा। जतुओ एव वातावरण में विद्यमान रेडियो-ममस्थानिया ने अनुपात को प्राय साद्रता वार माना जाता है। 142/पर्यावरण प्रावि और मानव आण्विक ऊर्जा का एक अन्य वातावरणीय दुष्प्रभाव तापीय प्रदूपण होता है। जीवाश्म इधन से अण्विक शक्ति पर विस्थापित हो जाने से वायु-प्रदूपण काफी हद तक कम हो जाता है, परन्तु जल-प्रदूपण विशेषतया तापीय प्रदूषण बढ जाता है । सभी शक्ति सय तो म यात्रा का ठण्डा करने के लिये जल का ही प्रयोग किया जाता है। आण्विक शक्ति सय तो म जल सतह के और भी बडे क्षेत्रो की नावश्यक्ता होती है क्याफि जल सतह में भी ठडा करने की क्षमता अधिक होती है । ठडा करने वाली मीनारा जैसी शक्तिमय युक्तिया स बावश्यक स्थान म कमी की जा सकती है लेकिन उनका व्यय काफी होता है। ठडा करने के लिए महासागरा पर निभर रहना भी काफी मनमोहक लगता है परन्तु महासागरो को भी जब एसा क्षेत्र नहीं समझना चाहिये जहा मानव के सभी पशिष्ट फेंके जा सकें। जलीय पारित न पर तापीय प्रदूषण के निम्न लिखित हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं। (1) जल के तापमान म वृद्धि होन से विषैले पदार्थों के प्रति प्राणियो की प्रभावशीलता बढ जाती है अर्थात् वे कम प्रतिरोधी हो जाते हैं । (1) उनके जीवन चका मे प्रान्तिक अवधिया (Stenothermal span) लम्बी हो जाती है। (ii) वधित तापक्रमो के कारण सामार शवाल समष्टिया कम वाटनीय नीत रहित शवालो द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है। (iv) जैसे-जैसे तापक्रम बढता है जतुजी को अधिक आक्सीजन की आवश्यक्ता होतो है परन्तु गम पानी म जामीजन कम हाती है। इस तथ्य की भविष्यवाणी तो सभी व्यक्ति करते हैं कि तापीय प्रदूपण एक अत्यत गम्भीर स्थानीय विश्वव्यापी समस्या होगी परतु सावजनिव' उष्मा स तुलन पर इस प्रदूषण का अतत क्या प्रभाव होगा, इस विषय मे विशेषज्ञ एक मत नहीं हैं। । पर्यावरण तथा पिकिरण के खतरे/143 पर्यावरण-प्रशासन एव प्रबन्ध वतमान म तीन शब्द प्राय हमारे काना म टकराते रहते हैं-पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन तथा उनका सरक्षण। पर्यावरण क्या है ? मानव क चारा ओर की सम्पूर्णता ही पर्यावरण है। मानव के चारा आर की वस्तु क्या है और विससे बनी है ? इस आस-पास म भौतिक, रसायनिक, जैविक व सामाजिक कारक होते हैं। अत मानव पर्यावरण इन सभी कारका का सफल योग है। दूसरा शब्द ससाधन क्या है ? संसाधन आस-पास के प्रत्यक तत्व के रूप में एक घटक है और इन्ही घटका के आधार पर मनुष्य अपने लिये आरामदायक तथा महत्वपूर्ण जीवन का विकास कर लेता है। इन ससाधना को दो | णिया में वर्गीकृत किया जाता है--एक प्राकृतिक संसाधन जिनके अतगत वायु, जल भूमि, जविक, घटक, कर्जा, इधन व अय कच्चे माल सम्मिलित हैं तथा दूसरे मानव निर्मित ससाधन जिनके अन्तगत सासकृतिक वाशिकी, मानव जनसख्या सामाजिक व आर्थिक सरचना व कुछ अन्य क्रियाएँ सम्मिलित है। इस प्रकार प्राकृतिक ससाधन इस ग्रह पर जीवन की कुञ्जी है जिनके अभाव मे पथ्वी पर जीवन सभव नहीं हो सकता। इस प्रकार हमारी मारी क्रियाएँ व अत क्रियाएँ प्राकृतिक मसाधनो को चारा ओर से घेरे रहती हैं और हमारी सभी उपलब्धिया प्राकृतिक संसाधनो के ही उत्पाद हैं । भोजन जो हम खाते हैं जल जो हम पीत हैं वस्त्र जो हम पहनत हैं, मज कुर्सी जिन पर बैठकर आराम करते हैं मकान जिनमे रहते हैं तथा छोटी मशीनो से लेकर कम्प्यूटर जि हे हमने विकसित किया है, वास्तव में हम प्राकृतिक साधनो के ही उत्पादा को अपने लिये उपयोग में ला रहे हैं। शिशु जस ही ज म लेता है उसे श्वसन हेतु ससाधनो के एक घटक ऑक्सीजन की आवश्यक्ता पडती है, वह मृत्यु पयत जो कुछ भी उपयाग में लाता है प्राकृतिक संसाधनो की ही देन है। कहने का सीधा तात्सय यह है कि इस पथ्वी ग्रह पर जो कुछ भी हम देखते है, सब कुछ प्राकृतिक सम्पदाएँ ही हैं और उन सभी के सरक्षण' का भी उतना ही महत्व है। हम भूमि जल या तक को लवणाय जल, खनिजा, मृदा, घासस्थलिया वन, जन्तु-जीवन, दुर्दात वय ज तु, गो-ऑक्सीजन कावन डाई-आक्साइड, नाइट्रोजन व अन्य सभी का सरक्षण चाहत है। एसा क्या ? क्योकि यह सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हमारे लिये मूल्यवान है और इसीलिये उनकी रक्षा हमारा लक्ष्य व क्तव्य है। हमारे उद्देश्य की पूर्ति केवल इसमे निहित नहीं 144/पर्यावरण, प्रकृति और मानव रहती कि इन प्राकृतिक सम्पदाओ की एक लम्बी लिस्ट बना ली जाय । आवश्यकता इस बात की है कि हम यह अवलोग्न करें कि हमारी आवश्य- कताओ के अनुरूप किस वस्तु को प्राथमिकता देनी है और उसी क्रम में उनका सरक्षण भी। दूसरे शब्दो मे हमारा मूल समाधन हमारा सम्पूर्ण पर्यावरण हो है। हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह होना चाहिये कि मूल ससाधन पर्यावरण को सम्पूणता का ही सरक्षण करें। ससाधना को अलग अलग कर इसके विषय म नही सोचे, जसे-लकडी, जल, वायु, मृदा आदि । यदि शब्द 'सरक्षण' का विश्लेषण किया जाय जो पारिस्थितिमी का 7 एक मूल आधार है तो सरक्षण की अवधारणा क्या होगी क्या यह केवल मान ससाधनो को जमाखोरी' है जो एक सामाजिक बुराई है ? क्या आप एक तालाब पर इश्तिहार लगा देग 'यहा मछलिया नही पक्डे और मछलियो का सरक्षण कर लेंगे इसी प्रकार घास के मैदान में यहा धरना मना है ' लिखकर चारे का सरक्षण कर सकेगे। नदी पर पानी नहीं पिये' वन में 'पेड नही काटे" की पट्टी लगाकर सरक्षण कर लेंगे। इसी प्रकार क्या थाक्सीजन का सरक्षण होगा कि "आक्सीजन उपयोग न करें" क्योकि यह पर्यावरण मे कम होती जा रही है। यदि ऐमा होगा तो समाज हम असामाजिक तत्वो को धणी मे ला खडा करगा। हमन अपने जीवन म सदव यह अनुभव किया है जब कभी किसो उपभोक्ता का किसी वस्तु का अभाव होने लगता है तो यापारी उन वस्तुओ की जमाखोरी आरम्भ कर देते है और समाज की दृष्टि में वे गिर जाते हैं। एसी स्थिति म उचित यही होता है कि ये वस्तुएँ सरक्षित रह, उनका सहा उपयोग हो तथा उनकी उपलब्धता को देखते हुए साधना को ईमानदारी स काम मे लिया जाय । इसमे सन्तुलन को महती आवश्यकता है क्योकि जोव सस्या वद्धि भी एक महत्वपूर्ण कारक है । यदि इनमे से किसी भी एक पारव की अवहेलना हाती है तो निश्चय ही सन्तुलन बिगड जाता है और ससाधनो मे कमी होन लगती है । इसलिये सरक्षण का मूल उद्देश्य है जोव-मण्डल में ससाधना को उप- लब्धता की निर तरता को बनाये रखना, उपभोक्ताओ की आवश्यकतालो को ध्यान मे रखना तथा साथ ही बरावर देखना कि ससाधन पूण सुरक्षित है आवश्यक्ता आने पर पूरी क्षमता के साथ जीव-मण्डल को उपलब्ध हो सकेंगे तथा उनका ह्रास नहीं होगा। इसके मूल म यह बात है कि सरक्षण- दाता को अपने उत्पादन व उपज बढाकर सही दिशा देनी होगी और यह स्पष्ट श दो मे कहना पडेगा कि ससाधनो अर्थात सम्पूण पर्यावरण का 'प्रय ध' परना होगा। ससाधन सरक्षण को सही अवधारणा पर्यावरण सम्पूणता के प्ररथ में है न कि एक घटक का अलग-अलग मरक्षण । पर्यावरण प्रशामन एप प्रवध/145 चन पर्यावरण घटयो , अतगत जीव-मण्डन के सभी आवश्यक प्राकृतिक संसाधन सम्मिलित है, पर्यावरणीय प्रय घ समाधना की उपलब्धता व सुरक्षित भण्डार पी बार अवश्य ध्यान केंद्रित करता है-यह आशय भी नहीं है कि सचय की भावना को पूरी तरह तिलाजलि दे दी जाय, क्याकि बनेर वार देया या मिलता है कि समाधा' पी पमी आने लगती है, उस समय ऐस सुरक्षित मसाधना (buffer stock) का उपयोग किया जाता है। यह सबथा मम्गव नही हो सस्ता कि जीव-मण्डल म एसे साधनो क उपयोग पर पूर्ण प्रतिय ध लगा दिया जाय। पर्यावरण म सभी पटक आवश्यक व अतसम्बधी है और इसीलिय समग्र पर्यावरण को कल्पना ही उचित भी है। पर्यावरण के उचित प्रबध हेतु हमारा ध्यान वेवल साधन को उपलब्धता पर हो केन्द्रित नहीं हो सरता, उनी गुणवत्ता व साख्यिकी उत्पादन भी है तभी पर्यावरण सही दिशा में प्रियाशील रहगा अन्यथा अस तुलन की समस्या उत्पन्न होगी। इस विषय को स्पष्ट समझन के लिय घरेलू उपयोग में आने वाल साधन का एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। जब रसोई घर म खाना पक रहा हाता है तो जा रतन आग पर गरम हो रहा रहा है उस ढका नहीं जाता, यह एक' पाम बात है। नहाने का गम पानी करन के लिये यदि उसे ढकान द्वारा ढर दिया जाय कर्जा का अपव्यय कम होगा और न ढकन पर अधिक आग की आवश्यकता होगी। सोचिये इधन को क्तिनी माना करोसिन तेल, पाना पकाने वाली गस, लकडी अथवा कोयला कुछ भी हो । जब बरतन को ढका नहीं गाना क्षय हाता है । यह केवल हमारी असावधानी या नासमयी के कारण होता है। घर मे जल का क्षय भी हमारी अपनी शिक्षा व अना. नतावश होता है। पात से हो जल का उपयोग आरम्भ हो जाता है जा दर रात तक चलता है हाथ धात, प्रश करत, नहात बतन धाते नल को खुला छोड दिया जाता है और जल निर तर बगैर कारण वहता रहता है, उसकी आवश्यकता नहीं होती और इस प्रकार जीवनोपयोगी जल संसाधन का दुरुपयोग व क्षय होता रहता है। अवश्य ही इस दिशा में कुछ इस प्रकार के प्रबंध किये जा सक्त हैं कि जीवनोपयोगी इस प्राकृतिक सम्पदा का क्षय रोका जा मकता है। इन अभिव्यक्तिया के पष्ठ म एक ही निष्कप निकलता है कि प्राकृतिक सम्पदाओ के सरक्षण को पर्यावरण समग्रता के वृहद रूप में देखा जाय और उसके अनुकूल ही आचरण किया जाय । विश्व में जनसख्या तीव्राति से बढ़ रही है और प्राकृतिक सम्पदाको के कोश खाली हो जायगे-अतर्राष्ट्रीय स्तर पर जीवन मूल्यों का ह्रास आरम्भ हो जाएगा-इन क्यनो में केवल सच्चाई ही छिपी है। मानव अपनी सभ्यता के विकास की दुहाई देकर तथा अपनी 146/पर्यावरण, प्रकृति और मानव आहार शृखलामओ को स्थापित करने के लिए प्राकृतिक पारित तो तर को रूपारित करने में लीन हैं। इन रूपातरणा के परिणाम अत्यत गभीर होते हैं जिह पारिस्थितिक पिच्छत (Ecological boomerangs) कहते ह । वातावरणीय रूपान्तरण का यह अनात हानिकारक प्रतिफल है जो अनुमानित लाभो को ही हानि नही पहुचाता वरन् वीभत्स समस्यायें भी ला खडी करता है-अफ्रीका म जम्बेसी नदी पर विद्युत उत्पादन हेतु एक बाध का निर्माण किया गया परतु उसने अनक अज्ञात समस्याआ को जन्म दे डाला । आरम्भ मे आयोजको का विश्वास था कि बाध से जो मछली उद्योग होगा वह कृषि के लिये भूमि से होने वाली क्षति को पूर्ति कर देगा पर तु यह अनुमान गलत सिद्ध हुआ। यील के बडे तट के कारण--यहा मी०सी० मक्खी का आवास बन गया पशुजो म गम्भीर रोग उत्पन होने लगे, मृदा का अपरदन भो निश्चित था, आस पास का विशाल क्षन दलदल म रूपा तरित हा गया और लोग स्थान छोडकर अयन जाने लग। एक बडे गम्भीर सामाजिक प्रोत्थान का आरम्भ हो गया। पहले जव नदी मे बाद आ जाती थी तो प्रतिवप निम्न भूमि मुफ्त में ही सिंचित होकर सम्प न हो जाती थी। अब बाध का निर्माण इस प्रकार आपेक्षित हानिकारक ही सिद्ध हुना। भूमि अव उवर नही रही तो महग उवरको का प्रयोग किया जाने लगा, आयात माव- श्यक हुआ और व्यय भुगतान की कठिनाईया जाने लगी। रहना होगा कि प्राकृतिक ससाधनो के याजनाहीन उपयोग से ऐसे परिणाम भी अवश्यम्भावी हैं। रूपातरणा की ऐसी योजनाया म पूर्व सावधानीपूर्वक अध्ययन की नावश्यक्ता है । यह पूर्व मे ही पक्का कर लेना चाहिए कि योजना के द्वारा मनुष्य को शुद्ध लाभ होगा । मानव स्वय इस जटिल पारित न का एक' अग है इसलिय पृथक योजनाओ की अपेक्षा समग्र पारित प्र का अध्ययन,प्रशासन प्रवध एव रूपा तरण यावश्यक है। अयथा पिच्छत सुरसा की भाति मुह फलायेग तथा बाद म समस्याओं को सुलझाना मानव के वश में नहीं रहेगा। प्राकृतिक सम्पदाआ की सुरक्षा तथा प्रबध का निम्न वि दुनो के द्वारा अध्ययन किया जा रहा है (1) खनिज सम्पदाएँ एव प्रबंध (1) कृषि एव वन-प्रवध (m) वन्य जीव प्रबंध (iv) भूमि एव मृदा प्रबंध (v) चरागाह प्रबंध (1) जल कृषि एव सागर कृषि प्रवध पर्यावरण-प्रशासन एवं प्रव/441 (३) पनिज सम्पदाएँ एय प्रवध पूर्व स ही गलत अपधारणा राय परती रही है कि पृथ्वी पर खनिजो को इतनी विशाल माया मोजद है कि शताब्दिया तर उनका दोहन करने पर भी उनम पनी आने वाती नही है तथा व पर्याप्त मात्रा म विद्यमान हैं । यदि यह पनिज मसाधन समाप्त हान लग जाय तो उह बचाने का कोई अय रास्ता भी नहीं रह जाता । इस सम्ब ध म क्लाउड (1969) न दो सपल्पनाएँ अभिव्यक्त की हैं। (अ) जन-सांख्यिकीय सन्धि (Demographic Quotient) इसे लब्धि (भागपल) द्वारा दर्शाया गया है तथा सम्पूण रूप में उपलब्ध संसाधन जनसख्या घनत्य प्रति व्यक्ति उपनरोग ज्यो-ज्यो यह लब्धि या भागफल नीचे गिरता है, आधुनिक जीवन स्तर भी गिरता जाता है तथा यह बहुत तीव्र गति से नीचे गिर रहा है क्याकि उपभोग के बढ़ जाने से उपलब्ध सभरण भी कम होता जाता है। उपलब्ध ससाधन का पुन चरण अथवा अन्य विधिया द्वारा नियमित करने पर भी स्थिति तब तक खराब होती रहेगी जब तक जनसख्या व प्रति-भ्यक्ति उपभोग बढता रहेगा । अमरिका जैस विकसित देश में तावे जसे घोहे धातु का भी प्रति व्यक्ति उपभोग सन 2000 तक बढार अनुमानत तिगुना हो जावेगा। जोद्योगीकृत देश न तोखनिजो की दृष्टि से और ना ही जीवाश्म इंधन की ओर से आत्म निभर हैं। प्राय राष्ट्र अविकसित देशो की सम्पदाआ का ही बेरहमी से उपभोग कर उनका शोषण कर रहे हैं । अविकसित देशो में भी इन ससा- धना के सुरक्षित भण्डार सीमित ही हैं और उ ह किसी भी प्रकार बढाया नहीं जा सकता । और यह भी निश्चित है कि स्वय अविकसित दश जब इन सम्पदाा या प्रयोग आरम्भ कर देंगे तो इन भण्डारो की कमी और भी अधिक अनुभव दी जाने लगेगी। (I) मि शेषण यक (depleting curve) -- क्लाउड (1969) का हो क्थन है कि असीमित खनन, प्रयोग व उत्पादना को फेकने को प्रवति के कारण कुछ खनिजो के शीघ्रातिशीघ्र बीत जान का खतरा बना हुआ है और यदि प्रकृति निर तर चालू रहा तो जस्ता, टिन सीसा, तावा आदि कुछ धातुओ को खाने सन 2000 से पूर्व ही खाली हो जावेगी। इसी प्रकार युरेनियम 235 व प्राकृतिक खनिज गैसें भा तब तक खत्म होने के कगार पर होगे । पुन चरण के माध्यम से तथा कम उडाऊ प्रयोग से इस अवक्षय का कुछ समय अवश्य हो रवाया जा सकता है। 148/पर्यावरण, प्रकृति और मानव कहने का तात्पय यह है कि ससाधनो के उपभोग पर कठोर नियन्त्रण तथा प्रतिस्थापन या जहा भी सम्भव हो एक पदाथ के एवज में अपेक्षाकृत दूसरा पदाथ जो अधिक मात्रा मे उपलब्ध हो, उसका उपयोग करें। दक्ष पद्धतियो के माध्यम से पुन चत्रण का अपक्षय का समय और भी अधिक बढाया जा सकता है। अपक्षय को निलम्बित भी किया जा सकता है यद्यपि उमे पूणतया रोका नहीं जा सकता। यह भी सवमान्य है कि पुन चरण के बाद भी अपक्षय तो अवक्षय होगा हो । प्रो० क्लाउड ने विनान की राष्ट्रीय ऐकेडमी (सयुक्त राज्य अमेरिका) म अध्यक्ष पद से सम्बोधित करते हुए यह उदघोपणा की थी कि अत में जनसख्या वृद्धि पर नियन्त्रण अति आवश्यक है तथा पुन चरण का दक्षतापूर्वक नियावण करने से ससाधना का अच्छा प्रवध सम्भव है। (2) कृषि एव वन प्रय ध -पारित व की मम्पूर्णता की दृष्टि से मनुष्य के लिये कृषि एव वन प्रबध के अ तगत भोजन तत्वा के अतिरिक्त अन्य कई उत्पान्न सम्मिलित हैं । जहा शितोष्ण कटिव धीय प्रदेश का सवाल आता है वहा खाद्य-उत्पादन के अनेक सीमाकारी कारको पर उवरको, सिचाई साधना व नाशक जीवो के नियत्रण के माध्यम से तकनीकी उनति कर व आनुव शिव' वरण द्वारा फसलो का स्थापत्य कर लिया गया है पर तु शितोष्ण प्रदशा वा कृषिशील्प विनान उष्ण पटिव धोय प्रदेशा में लागू नहीं किया जा सरता। उष्ण कटिब धीय प्रदेशो म आज भी कृपि के तौर-तरीके अविश्वसनाय । अपूण मान जाते है, ऐसी हालत में पारिस्थितकीय अवधारणामा पर आधारित पूर्णतया नवान सिद्धान्तो व नियमो का अपनाने की महा आवश्यक्ता है। कृषि उत्पादन म अभिवद्धि 'हरित बानि' या मूर आधार मित्र का औधोगीकरण है जिसस बढी मात्रा म आथिर महायता, मि मा:- निक उवरका व उनका नियत्रण तथा विशेष प्रान RT प्रजातियो तथा उप जातियो की आवश्यकता है Raiया मे विना सोचे विचार यदि उत्पादन का बदान कामना इससे अत्यन्त गम्भौर व जटिल परिणाम रिकामा प्रकार पर्यावरणीय व मामाजिक पिछीका लागानिक युग म बई तो प्राय निश्चित हा गया है छिरिम प्रहार अपनीमारनम पारा पगुना स मम्पन्न हो रही है, उमा पाम ATM मत्री वा " बमरिता म हाती है, उसममा मुना मारा त्मारक' हाता है। मरिन अम पर श्रीराम मा, ममान जा मो गुना राना है।

हरित क्राति के परिणाम स्वरूप सामाजिक दुष्परिणाम बहुत अधिक मात्रा में उत्सान हो जाते हैं । जब से कृषि का यत्रीकरण हुआ है, प्राय यह देयन म आया है कि छोटे किसान व मजदूर गावा को छोडकर महरा की ओर भागने लग हैं जहा उह अपनी आजीविका चलाने में भारी कठिनाइयो का सामना करना पड़ता है तथा रहने के लिये मकान भी नहीं मिल पात । अब छोटे-छोटे खेतो को मशीनीकरण के अवगत विशाल एव विस्तृत रोता म परिवर्तित किया जाता है तो जो लोग इन खेता का प्रयध करते हैं, सम्पनि बढ़ाकर धनाढय हाने लगते हैं परन्तु अधिकाश लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने को बाध्य कर दिये जाते हैं, और गरीवी व अमारी के बीच खाइ बढ़ती ही रहती है जिस पाटना टेढी खीर बन जाती है । ऐम ही दुष्प- रिणामा से निजात पाने के लिये छाटे-छोटे खेता को ही यदि सुधारा जाय तथा कृषि के यात्रीकरण पूर्व ही जन संख्या वृद्धि पर नियत्रण कर लिया जाय तो अच्छे परिणाम निकल सकते है । वनो का प्रवध भी अत्य त महत्वपूण काय है । चूकि वनो द्वारा अधिकाश उत्पादन वास्तव में अतीत में सचित वद्धि का सस्यावतन (Harvesting) होता है त एक प्रकार से मनुष्य इस प्राकृतिक ससाधन का खनन कर रहा है। ऐसी अवस्था में यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वन-उद्योगो को वना को वार्षिक वद्धि के अनुपात मे स तुलित करना होगा। जो लोग वनो के प्रवध से सम्बधित है, उनकी मा यता है कि जन-सख्या धनत्व में वद्धि तथा रेशा के प्रति व्यक्ति उपयोग में बढोतरी के कारण बन उत्पादनो की माग भी अवश्य ही बढ़ेगी । इसलिये वृक्षो के क्षेत्रा का विकास तथा रेशेवाले पापो की खेती क विषय में गम्भीरता से सोचना होगा और इनकी खेती करना भी अनिवाय होगा। लेकिन इस प्रकार से उत्पादन बढाने का तात्पय यह होगा कि-(1) वन प्रबध कर औद्योगीकरण को बढावा देना और ऊर्जा के ध्यय म बढोत्तरी वरना । (1) एक धान-सस्कृति तथा क्म अवधि वाले मस्यावतन द्वारा एक ही जाति विशेष को फसल उगाना-आज जो नय वन लगाये जा रहे हैं उनमे वद्धि दर बहुत तज गति की है जबकि प्राचीन वन बहुत धीमी गति से अभिवद्धि करते हैं । (11) पादपो की अधिक मात्रा म रशे उत्पादन करने वाली उपजातियो का कृतिमवरण (artificral selection) जो उवरका की उच्चदर पाडकनाशको के अनुप्रयोगो तथा उनसे उत्पन्न सावनिक प्रदूषण और अन प्रकार के रोगो के फलने के खतरे बढते है तया (iv) सम्भवत् इनका गुणवता में भी भारी क्षति होती है। बहुत सारे वन-प्रबधको की मा यता है कि वना के साथ फसला जसा व्यवहार नही करना चाहिये क्योकि वन मनोरजन के स्थल क्यजीवा के लिय 150/पर्यावरण, प्रकृति और मानव आवास स्थल, वायु एव जल-औसारे के रूप में उपयोगी सिद्ध होत हैं तथा यह काय बहुजातिय व बहुआयामी वन कर सकते हैं जि हे निर तर बहुत थोडी सो माना मे काटा भी जाना चाहिये । मानव की अनेक वातावरणीय आवश्यक्ताओ की पूर्ति तथा पोषण पर व्यय की दृष्टि से कृत्रिम-वक्ष-खेत तथा प्राकृतिक रूप म विकसित बहुआयामी धन दो पूर्णतया भिन्न पारितत्र हैं । जय संसाधनो की भाति कागज एव दूमरे व य उत्पादन के पुन चक्रण, तथा कठोर एव निर्यात मरक्षण ही एक मात्र ऐसो विधिया हैं जिनकी सहायता से व्यक्तिगत उपयोग को कम किये वगैर भी वनो की प्रति व्यक्ति माग कम की जा सरती है। इन विधिया के द्वारा ही भूमि को वृक्षो की फसल से ढकना एव गम्भीर दुष्परिणाम उत्पन्न करने का खतरा मोल लना यावश्यक हो जावेगा । अगर वक्षो की फसले उगाना नितात जरूरी भी हो जाय तो उहे अच्छी कृपि चे उपयुक्त समतल, उवरक भूमि तक ही सीमित रखा जाय । ऐमी भूमि जहा मृदा एव जल की दशाएँ गहरी तथा कृत्रिम-सवधन का लम्बी अवधि तक पोपित न कर सकें तथा ढालू भूमि के लिये प्रकृति से जनुकूलित वन ही सबसे उत्तम आवरण हात हैं। (3) व 4 जीव प्रबध -प्रकृति द्वारा पृथ्वी पर वनस्पति, वय प्राणी एव मानव के बीच सतुलन स्थापित किया हुना है, अय प्राकृतिक ससाधनो के समान ही वन्य प्राणी भी प्राकृतिक सम्पदा हैं । मभी बना मे शाकाहारी व मासाहारी वन्य जीव निवास करत है । कुछ ही समय से इस शब्द का प्रयोग आरवेटी तथा समूर युक्त पृष्ठव शियो क लिय किया गया है । प्रकृति ने इनके मध्य एक शृखला बना दी है जिससे इनकी संख्या निश्चित वनी रहती है और प्रकृति द्वारा प्रदान की गई इस शृखला से किसी भी घटक के नष्ट होने से पूरे प्राकृतिक चक्र वा सतुलन बिगड जायगा । यदि मामाहारियो का ज्यादा तादाद मे आसेट किया गया ता शाकाहारियो की मख्या बढ़ने लगगी और इन पर नियंत्रण समाप्त हो जायेगा और इस सख्या वद्धि के परिणामस्वरूप ये हमारे बना व कृषि को नष्ट करेंगे और यदि वनो को नष्ट क्यिा गया वा वन के साथ-साथ शाकाहारियो व मासाहारियो के जीवन को खतरा उत्पन हो जायगा। इस कारण प्रकृति द्वारा प्रदत्त सभी घटका का प्राकृतिक स तुलन बनाये रखना अनिवाय है। माज के प्राकृतिक स तुलन में निश्चित ही बदलाव की स्थिति उत्पन हो गयो है प्रकृति प्रदत्त वरदान भी कम हो रहे है और जो लाभ हमे मिलन चाहिय वह नहीं मिल पा रह है जो प्राचीनकाल में प्राप्त थे। जगलो मे एप अजीव सो वीरानी छा गई है। यय जन्तु या तो नष्ट हो रहे हैं या उसे पर्यावरण-प्रशासन एव प्रय' . विलुप्तीपरण हो रहा है, पारण उनके आवास ही नष्ट किये जा रहे है। मनुष्य ने अपने क्षणिक मनोरजन के लिये इनका शिकार कर इनके लिय पतरनाक पुनोती प्रदान कर दी है। जनसंख्या वृद्धि स वनो वा बरहमी स उपयोग पिपा गया, वही मनोरजन में लिय पर पीता के बावेट स उनकी सध्या म निरन्तर हास हुआ है। आहार के लिये घरगोश, हिरल तीतर आदि का भी शिकार किया गया और इनको सम्याम भारा कमी जाई है। इही कारणा समाज प्राकृतिक सतुलन बिगडा है। वम ज तुमओ के उचित विकास के लिये जरूरी है मि इनक आवास- स्थला या इस प्रकार प्रवध किया जाय जहा उह प्रजनन, भोजन, स्वभाव के अनुसार, अनुकल वातावरण प्राप्त हो सके। भारत सरकार व राज्य सरकारें भी इस दिशा में अदम उठाकर वन्य-अतुमा के आवास स्थला के सुधार, भोजन की आपूर्ति वय-जीवा को सख्या में बढोत्तरी तथा विलुप्त हो रही जातियो के सरक्षण के प्रति जागरूक हैं उसने अनियनित शिकार पर रोग लगा दी है और कुछ कानून भी बना दिय जिनका कठोरता से पालन करने पर प य जीवा को सरक्षण प्राप्त हो सकेगा । यह पूर्णतया सही है कि हम वन वय जीव एव वातावरण सरक्षण के माध्यम से पर्यावरण प्रदूषण से कारगर और साथ वचाव कर सकेंगे और यही मानवता की सच्ची सेवा भी होगी। (4) भूमि एव मदा प्रबध ~भूमि पर मदा का एक स्तर होता है। यह स्तर विभिन्न स्थाना पर अलग-अलग होता है । पथरीली भूमि, पहाडी क्षना म जहा मदा का स्तर कम होता है वही मदानी व नदी क्षत्रो मे इसका स्तर मोटा होता है। भूमि की उवरता लिये अनिवाय है कि उसम निश्चित मात्रा में नमी मौजूद हा । नमीयुक्त भूमि में पादप एव ज तुओ के मरने बाद वे सडने तथा गलने लग जाते है और भूमि में आत्मसात हो जात हैं । एसी जीवाश युक्त भूमि को ही हुयुमस' कहत हैं। भूमि में हुयुमस जितनी अधिक मात्रा में होगी भूमि उतनी ही अधिक उपजाऊ होगी। प्रकृति म इस प्रकार की हयुमस बनने म अनेक वष लग जाते हैं पर तु भूमि के अनुचित प्रयोग से इसकी गुणवत्ता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। मृदा के इस अवगुणन को भूमि कटाव अथवा अवक्षय नाम दिया गया है । किसान अपनी अज्ञानतावश या किही दूसरे कारणो स निरतर एक हो प्रकार को फसल बोता है जिससे भूमि म लवणा व अघ जावश्यक तत्वो की माना मे ह्रास होता है। अत भूमि अनउपजाऊ या बजर बन जाती है। भमि म होन वाले ऐसे भी बदलावा को अवक्षय कहा गया है । इन गतिविधिया को रोकन के लिये यह जरूरी है कि भूमि पर लगातार एक ही प्रकार की 152/पर्यावरण प्रकृति और मानव खेती नही की जाय और फसलो को बदल-बदल पर उगाया जाय । इसी प्रकार भूमि में मृदा का स्तरीकरण कम हो जाना या उनका नष्ट हा जाना 'भू अपरदन' कहलाता है-यह अपरदन तेज वाता, आधी, वर्षा, वाढ आदि के कारण से होता है जिससे मृदा एक स्थान से उडकर या बहकर अ यत्र चला जाती है । फलस्वरूप भूमि की गुणवत्ता व समतलता समाप्त हो जातो है साथ ही तेज गतिशील पवन, रेगिस्तान के प्रसार म योग देते है । भूमि के अपदन को रोकने के लिये आवश्यक हो जाता है कि भूमि पर सधन खेती कर भामि को निर तर विकसित किया जाय । इस प्रकार पादप- जडो म मृदा वधी हुई रहती हैं । पेडो से लगातार गिरने वाली पत्तिया भूमि- साद होकर मृदा स्तरा को सुरक्षित रखती हैं। भूमि के अहितकारी उपयोग क कारण उह पुन स्थापित करने का भार तो वहन करना ही पड़ता है, साथ ही इसक कारण मृदा-ससाधनो की भी स्थायी हानि होती है। जैस कम वर्षा वाला घासस्थलियो म यदि हल चला दिया जाय और गेहू को दें तो वहा अस्थायो मरुस्थल का निर्माण अवश्यमभावी है । दूसरी ओर घासस्थली को बनार रखा जावे और उस पर पशुओ का साधारण रूप में चरने दिया जाय तो मरुस्थल प्रसार की सम्भावनाये कम हो जाती है। कृषि योग्य अच्छी मृदा वाले समतल क्षेत्रो म पसलो को बदल-बदल कर बोना पट्टीदार खेती, ढालू क्षेत्रो म कटिवत मेड, कृषि की जाय तो 'भूमि का सरक्षण हो सकता है। 5 चरागाह प्रबध चरागाहो सम्बधी प्रवध के विषय में भी जानकारी लेना लाभदायक हागा । प्राकृतिक चारागाह लम्बे समय में विकसित हुए है और उनका मानव तथा अन्य प्राणियो द्वारा विभिन प्रकार से उपयोग हुआ है । अत चारागाहा की ऐतिहासिक अभिमुखता विचारणीय है। विश्व क घासस्थान क्षत्रों को नष्ट होती सभ्यताओं के अनुक्रम स सिद्ध होता है कि इन सम्पदाआ के प्रति भी मनुष्य का व्यवहार अनुचित रहा है । वह अपने कठोर परिश्रम से बनाये गये कृतिम चरागाहो को नष्ट करन की कभी नही साचता, फिर भी उसे उस प्राकृतिक चरागाह के जव कारणो एव प्रभावो को समझन में कठिनाई होती है जिस उसने स्वय बनाया है। चरागाह प्रवधा को इस ओर विशेष ध्यान देन का आवश्यकता है (1) घरने वाले प्राणिया के लिये चराह की वाहन-क्षमता को निर्धारित करना ताकि प्राथमिक उत्पादकता व साल उत्पादकता की प्रतिशतता जिस प्रति वप हटाया जा सके तथा घास पादपो ने फिर भी उत्पादकता बनाये रखने का तथा मौसम की प्रतिकूल अवस्थाओ, यथा वात-प्रवाह के प्रतिबल का सहन करन का सामथ्य बना रह । - पर्यावरण प्रशासन एव प्रद/153 (1) प्राथमिक उत्पादक्ता वर्पा को लगभग अनुपाती है । वार्षिक सरल उत्पादकता के थाधे से कम भाग का पशुओ द्वारा उपभोग होना चाहिये और यह गणना महत्वपूर्ण है कि निश्चित वर्षा से क्तिनी मात्रा भार म मास का उत्पादन होगा। और इसी के अनुासर प्राणिपा की संख्या निश्चित की जा सकती है। (11) वर्पा का वार्षिक वितरण, चारे की किस्म खाने की दर व वृद्धि आदि परिकलण अत्यत जटिल है, परन्तु चरागाह प्रब धर' यह अवश्य ही बात पर सकते है कि चरागाह का उपयोग ठीक प्रकार से हो रहा है अथवा नही और यह निर्धारित करने के लिये पारिस्थितिक तन-मूचक सवस अधिक व्यावहारिक साधन है । "हासक' कहलाने वाले पादप इस काय में सराहनीय रूप से लाभदायक हात हैं । चरागाह से उनका लुप्त हो जाना अतिचारण (overgrazing) का समय रहते 'चेतावनी सूचक' होता है। यदि अति- चारण यात न किया गया तो खाने के योग्य अपतॄण तथा मरस्थली झाडिया उगने लगेगी और त मे मानव निर्मित मरुस्थल का उदय होगा। जति चारण से ही चूह व मुपको को समष्टिया व टिडियो पो सख्या बढने लगेगी। (iv) चरागाह-प्रवध के क्षेत्र में दीघ-कालीन चारण के अध्ययन को विशेष महत्व दिया जाता है । अति संग्रहण के कारण अल्पकालान आर्थिक लाभ, यथा अधिक मास तो उपलब्ध हो जाता है लेकिन चारस व चरागाह दोनो को गुणता नष्ट हो सकती है और इसी कारण गुणता को बनाये रखने के लिये अधिकतम सग्रहण दर अनुकूलनतम नहीं होती। जल्पकालान लाभ वास्तव में वातावरण को दीघकालीन हानि के कारण ही होता है। (v) चारको द्वारा भूमि को रौंदने के कारण मृदा का सहत होना महत्वपूर्ण है । जव बड़ी संख्या मे चारक सम्बी अवधि के लिय चरागाह में छोड दिये जाते हैं तो मृग बघ (Sodbound) जाती है और चारको व हटा दने पर भी उत्सादरता कम ही रहती है। एसी घटनामा यो रोगन के लिय चरागाहो के बावतन की आवश्यकता पड़ती है, चारया या विभिन्नता भी लाभदायक हा माता है क्यापि इमसे पादपा की सभी जातियो तथा सभी अवस्थाया का स तुलित उपयोग होना है। 6 जल कृषि एय सागर कृषि प्रबंध मत्स्य पाला, उस पि एव सागर रपि वा एक महत्वपूण श है। प्राय विश्व के सभी भागाम मछलिया या भाजन निय उपाहाता है। मरस्य उद्योग या मलियारो समष्टिया र मुरघ स मम्मी धन है जो व्यापारिपटि म पाया जाना है तथा व जातिया जा जाउट म प्रयुक्त होता 154/पर्यावरण, प्रति बोर मानव - है । आखेट म प्रयुक्त सर्वोत्तम मछलिया मामाहारी होती है और यह लम्बी आहार-भूखलाओ के किनारो (edges) पर उत्पन होती है जत इनके प्रति एक्ड उत्पादन भी सीमित रहता है । जव मछलिया का सस्यक्त्तन किया जाता है तो उनकी आहार-शृखला में कम से कम चार स्तर पाये जाते है-~-पादप प्लवक, कीट व कस्टणियन उपभोक्ता, छोटी मासाहारी, चारा मछलिया एव बडी मासाहारी पिकार मछलिया। यह मछलिया मछुआ द्वारा आसानी म पकड ली जाती है, लेविन प्रबध की दृष्टि से तालावो एव झीना मे मलिया की एक स तुलित समष्टि को बनाये रखने का प्रयास दिया जाता है ताकि मनुष्य को निर तर उत्पादन प्राप्त होता रहे एव उसके लिए जलाशया मे उसे केवल अकावनिक उवरक डालने पडे और भोजन व मछलियो वे निवेश की आवश्यकता नहीं रहे। शिकार मछलिया के तालावो का निमाण पारितन को सरल करने के लिये किया जाता है अर्थात इन तालावो मे घटक स्तर कम कर दिये जाते हैं, उनम वाछनीय घटक प्रत्यक्ष रूप में मौजूद रहे। इस स्थिति को सुचारु रूप से निर तरता को कायम रखने के लिय जलाशय का आकार, गहरा, निपेचन दर व मत्स्य समष्टि का आकार, अनुपात व जातिय-सगठन स घटको का सोमाकरण करना आवश्यक होता है । रोमन (1952) का कथन है कि प्रति इकाई क्षेत्र म मछलियो के उत्पादन की तुलना वडी, गहरी झीलो तथा छोटी पिथली श्रीलो मनही की जा सक्ती । वडी व कृत्रिम झीलें प्रारम्भ मे मछली पकड़ने की दृष्टि से अच्छी होती है, परन्तु कुछ समय के उपरान्त वे ठीक नहीं रहती। छोटी झील सस्ती होने के साथ अधिक दक्षतापूर्वक प्रवध की जा सकती है। योजनाबद्ध विकास से पयावरण के गुणों तथा सुदरता का सरक्षण होगा तथा इसस मनारजन के लिये व प्रदूषण की कमी के लिये भी काफी स्थान शप रहगा। यह विकास निम्नलिखित विधियोस सम्पन्न हो सकता है (1) गाव व नगर के चारो और नापसी स्थला के समूह का विकास हो तथा प्रत्येक दो समूहो क मध्य वक्षो को एक पट्टी हो । (1) मरिता, घाटियो, नाला, झीलो व कच्छ क्षेत्रो को अपशिष्ट पदाथों के फेर जाने वाले क्षेत्रा को अलग रखा जाय और घरो से मुक्त रखा जाय । यह सुनिश्चित है कि प्राकृतिक रूप म खुला म्यान मनुष्य के पर्यावरण का एक अनिवाय अग है । यथोचित प्रदूषण रहित निवास स्थान ही जन-सस्या धनत्य निर्धारण का माप-दण्ड होना चाहिये, भोजन नही। मंगहाग (1969) ने वहा पा कि ' अनियनित विकास, जो विवव के अभाव म पल रहा है, हप्य भूमि कापामघर में प्रदूषण से भ्रष्ट कर देता है तथा वह सब पर्यावरण-प्रशासन एवं प्रवध/155 - नाशिक रूप मे नष्ट कर देता है जो सु दर व यादगार लायक है चाहे प्रत्यक घर या उपविभाग वितन हो सुदर ढग क्यो न सुसज्जित किया गया हो। पर्यावरण एव नतिकता आज राजस्थान नहर से जबरदस्त जल प्रदूषण हो रहा है पारिस्थितिक सतुलन भी विगड रहा है, परन्तु सरकार फिर भी उस काय म प्रगति की सोच रही है क्यापि प्रदूपण व पर्यावरणीय अस तुलन से उत्पन हाने वाले खतरो से अधिक दुपदायी राजस्थान नहर का न होना है। अत समाज के हित म क्येि गये बाय को अनैतिक नहीं कहा जा सक्ता । वज्ञानिका द्वारा भविष्य मे सम्भावित खतरो को दृष्टि म रखत हुए केवल वतमान पूर्ति को ही सर्वोपरि समझना, अनैतिक कहा जा सकता है क्याकि कालातर म यह मम्भावित खतरे लाभ की तुलना म अधिक भयकर परिणाम दे सकते हैं । आज मनुष्य में प्रकृति को दास बनाने की इच्छा उसके दिमाग में मण्डराती है । यदि मनुष्य ने प्रति को मशीनो के माध्यम से अपन ढग से नियति करने का दु साहम किया तो आगे चलकर इसके परिणाण और भी भयकर होगे। सारी मानव सभ्यता ही नष्ट हो जायगी, प्रकृति का इस प्रकार दोहन अनैतिक कृत्य है। मा अपनी स तानो के लालन-पालन एव प्रगति हेतु स्वय कष्ट सहन करती पायी है ना कि आत्म हत्या कर । मा की हत्या से सतान अनाथ की भाति हो जाता है, ठीक उसी प्रकार से प्रकृति के विध्वस से मान- वता दुबल होती जायगी। प्रावुनिक काल म नैतिकता तथा अनतिकता लोग अपने ही ढग से परिभापित करते हैं । प्राकृतिक विनान, तकनीकी को भला बुरा कहने वाला की सख्या म निर तर वद्धि हो रही है और आज माग यह है कि विनान के अवेक्षणो का मानवीयवरण एव सामाजीकरण करने की आवश्यकता है। 156/पर्यावरण, प्रकृति और मानव बदलती हुई मानसिकताएं और पर्यावरण सन्तुलन 20वी सदी के अन्तिम चार दशकों में हमने अपनी 'पृथ्वी' को अन्तरिक्ष से झाक कर देखा और जनमानस पर इसा व्यापक प्रभाव पड़ा। हमने अनुभव किया कि 'पथ्वी' ब्रह्माण्ड का केन्द्र नहीं हैं अपितु सौर मण्डल का, बुध, मगल, शुक्र, वहस्पति व शनि ग्रहा के समान एक सदस्य है। अतरिक्ष से यह 'पभ्वी एक छाटी व कोमल गेंद-सी दिखाई पड़ती है, जिस पर मानवीय कृतिया व त्यो पा ही नहीं वरन् बादलो, महासागरो, मृदा तथा हरियाली के शिल्प-सोदय का आधिपत्य है। यह नयी वास्तविकता इस शताब्दी के नये विकास से अधिक सकारात्मकता से जुड़ गई हैं। अब हम विश्व में पहले की अपेक्षा सूचना तथा सामग्री का तेजी से सम्प्रपण कर सकते हैं । अपने समाधनो का अल्प विनियोग कर अधिक अनाज अधिक वस्तुओ का उत्पादन कर सकते है। हमारा तकनीको नान और विज्ञान हमें प्राकृतिक तन्त्र को देखने व समझने के बेहतर तरीके दे मकता है। अब हम मानव कियाओ तथा प्राकृतिक नियमो के मध्य सामजस्य स्थापित करने में अधिक क्षमता व दक्षता रखने लगे हैं। अब हम विश्वास के साथ अभिव्यक्त कर सक्त हैं कि हम अधिक समृद्ध अधिक न्यायवादी और अधिक सुरक्षित होने जा रहे हैं और हम सभी का भविष्य अधिक उज्ज्वल है। इसमे किसी प्रकार का सदेह नहीं है कि आज हमने अनेक सफल र भाशातीत चिह्ना यथा-शिशु मृत्यु-दर मे क्मी, जीवन सम्भावनाओ ती वृद्धि शिक्षित क्यस्को का विश्व में बढता अनुपात, जनसंख्या की वृद्धि को तुलना म विश्व में बढत उत्पादन प्राप्त कर लिये हैं किन्तु उन उपलब्धियो के उत्पादन साधनो ने ऐसी प्रवृत्तियो को बढ़ावा दे दिया है कि यह घरती उमके निवासी मुदाध समय तक सहन नही कर सकते। इन प्रवतिया को परम्परागत रूप मे 'विकास' की असफलताएँ तथा मानवीय पर्यावरणीय व्यवस्थाओ की कमिया कहा जायगा। विकास का एक पक्ष यह है कि पूण जनसंख्या के आधार पर पहले की अपेक्षा अब विश्व मे अधिक लोग भूखे सान हैं और मर भी जाते हैं। इनकी सख्या तीव्र गति मे बढ़ रही है जिसे जनसख्या विस्फोट (Population explosion) को सना दी गई है। इमो के परिणामस्वरूप सख्या की दष्टि से शिक्षा को सुविधाएँ, शुद्ध पेयजल की बदलती हुई मानसिक्ताऐं और पर्यावरण संतुलन/157 - उपलब्धता, सुरक्षित आवास, प्रति व्यक्ति धन को माना म हास हो रहा है । धनी व निधन देशा के मध्य गाई घटन के स्थान पर चौडी होती जा रही है तथा इस बात की सम्भावनाएँ भी निरतर बढती जा रही हैं कि वतमान प्रवृत्तिया, मानव बाचरण और सस्थागत व्यवस्थाएं इस प्रक्रिया पो उलट भी सकेंगी। इही आधुनिक सफलताआ व असफलताला य वशीभूत होर मानवीय मानसिकता बदलती जा रही हैं। एसो मानसिकतामा प्रति सावधान व सचत होने की आवश्यकता भी है क्योकि- (1) प्रतिवप 60 लाख हक्टेयर उपजाऊ भूमि शुष्क अनुपयोगी मरुस्थला म रूपा तरित हो जाती है। तीन वप के पश्चात यह भूमि लगभग सउदी अरघिया के क्षेत्रफल के वरावर हो जायगी। (1) प्रतिवप 110 लाख हक्टेयर भूमि के वन नष्ट हो रहे हैं और तीन दशक म यह भूमि लगभग भारत के क्षेत्रफल के बराबर होगी। इस वन का अधिकाश भाग निम्न श्रेणी के सतो म रूपातरित हो जाता है जो क्सिानो की आजीविका के लिय अपर्याप्त है। (1) यूरोप मे अम्लीय वर्षा के कारण वनो तथा झोला का लगातार विनाश हो रहा है जिसस किसी भी राष्ट्र की वास्तुकला धरोहर नष्ट हा जाती है, इसे वहन क्षत्र की मृदा अम्लाय हो जाती है और उसके सुधार की कोई उपयुक्त प्रणाली नहीं है । (iv) जीवाश्म इधन के जलाने मे वायुमण्डल म काबनडाई-आक्साइड को मात्रा बढ़ जाती है जो विश्व के तापमान को निरतर बढ़ा रही है । एक अध्ययन के अनुसार सन् 2020 तक कावन-डाई-आक्साइड का स्तर दुगुना हो जावेगा । अत विश्व का तापक्रम 30 सेल्सियस बढ़ जायेगा और 2100 तम तापक्रम 6° सेल्सियस बढ जायगा जिससे सारी ध्रुवीय बफ पिघल जायेगी तथा नदियों में बाढ को स्थिति होगी । आगामी 21वी सदी के आरभ मे ही यह 'ग्रान हाउस प्रभाव" विश्व के औसत तापमान को इतना बढा सकता है कि हमे विश्व के कृषि उत्पादन जनो को बदलने की भावश्यक्ता पड़ सकती है। सागर जलो का स्तर भी बढ़ सकता और अनेक सागर- तटीय नगर पूर्ण रूप से जल मग्न हो सकते हैं। पथ्वी के बहुत बड़े भू-भाग पर बाढ का प्रकोप हो सकता है तथा राष्ट्रीय अथव्यवस्था चरमरा सकती है। (v) वायु-मण्डल को बाह्य परत-ओजोन रूपी सुरक्षा कवच है- औद्योगिक गैसा के प्रवहन के कारण ओजोन मण्डल को इतना खतरा हो सकता है कि मानव तथा ज तुओ के लिये घातक हो सकता है । इसस कसर 158/पर्यावरण, प्रकृति और मानव - रोग बढेगा और महासागरो को आहार-शृखलाएं तथा भूजल स्तर पूर्ण रूप मे विपला बन जायेगा जिस पुन शुद्ध करना सम्भव नही होगा। मानव मस्तिष्क मे अब यह अनुभूति घर करती जा रही है कि पयावरणीय समस्याला तथा आर्थिक ममला को अलग करना असम्भव हो गया है। विकास' काय आधारभूत प्राकृतिक संसाधनो को नष्ट कर देते हैं तथा पर्यावरण अध पतन से आर्थिक विकास रुक जाता है और इमी का गम्भीर परिणाम हमे देखने को मिल रहा है-'गरीबी का अभिशाप'। विश्व के पाचो महाद्वीपों म विकास को वतमान प्रकृतिया अरक्षित तथा निधन व्यक्तियो की संख्या बढाने के माथ-साथ पर्यावरण पतन मे भी सलग्न है। फिर मानव विचारधारा इसी प्रश्न को लेकर सोच के घरे म आ पडतो है। आगामी सदी म जब विश्व जन सख्या द्विगुणित हो जायगी और पर्यावरण इसी प्रकार स्थिर होगा, बागे विकास किस प्रकार होगा आधिक प्रगति को नवीन प्रौद्योगिकी के कारण प्रेरणा मिली है, साथ हो प्रदूषण के नये रूप और विकास के क्रम को बदलने वागी जीवो की नयी प्रजातियो का पृथ्वी पर जैसे सतर प्रौद्योगि की ही देन है । विकासशील देशा में पर्यावरणीय साधनो पर आश्रित और भयकर प्रदूपण फलान वाले उद्यागो पा तजी से विकास हो रहा है। इन देशो में प्रगति को बडी आवश्यकता है पर तु साधन सम्पन्न राष्ट्रा म इन प्रभावो को पटाने को क्षमता भी यूनतम है। आज हम पारिस्थितिकीय तनावो जैसे मृदा जल साधनो, वायुमण्डल व वनों के अधोपतन या हमारे आर्थिक विकास पर पड़ने वाले प्रभावा की को ओर भी ध्यान देने को मजबूर कर दिये गये हैं । स्थानीय ससाधन-आधारो के क्षीण हो जाने पर इसका विस्तृत क्षेत्रो पर भी घातक प्रभाव पड़ सकता है। पत्तो म रहन वाले पिसाना द्वारा वनो का विनाश किया जाता है जिसस मदानी खता में बाढ का स्थिति बन जाती है। मोद्योगिक प्रदूषण स्थानीय मछवारा स उनका शिकार छीन रहे हैं। अमेरिका तथा एशिया में तो वनो के विनाश के फलस्वरूप प्रलयकारी बाटें आयी हैं। अम्लीय वर्षा तथा रेडियोधर्मी धूल योरोप का सीमा के आर-पार फैल गई है। विश्व वा चढ़ता तापमान और ओजोन परतो के नष्ट होने जैसी प्रवत्तिया विश्व स्तर पर उत्तर कर सामन ना रही है। विनाशकारी रसायनो का व्यापार धडल्ले से पार रहा है और वे निरकुश हो विश्व के समस्त भाजन पदार्थो म मित्त रहे है । आगामी शताब्दी मे जनसध्या या दवाव भी भारी पड सकता है। स्पष्ट है कि मन कुछ वर्षों म जीवन के लिये मस्टपूण पयावरणीय पटनाएँ सम्पूमा विश्व पर छा गई हैं। पूर्व म विभिन्न विश्वव्यापी दुवात्तिकाओ ने जनमानम को शरमार डाला है। पर्यावरण सक्ट ऊर्जा सकट व विकास बदलती हुई मानसिपताएँ पोर पर्यावरण सतुलन/159 सक्ट के भयावह काले बादल सिर पर मडराने लगे हैं। यह सभी विषमताएँ मूल रूप मे समस्त पृथ्वी को पर्यावरणीय समस्यायें हैं जिन पर समय रहते विचार करना तथा उनसे उभरना अति आवश्यक है। अनेक विकासशील तया अविकसित देशो म अन्तर्राष्ट्रीय संगठन अथ- सम्ब धी पर्यावरणीय व्यवस्था में समस्याएँ उलझा देत हैं और गतिरोध उत्पन कर देते हैं। इसका ज्वलत उदाहरण है सम्पूण अफ्रीका महाद्वीप । यह ताजा दुखातिका आर्थिक एव पारिस्थितिक अ त श्यिाओ की विनाशी भीष्ण सहारण विभीषिका को वास्तविकता है। तीव्रता से बढ़ती जनसख्या व छोटे किसानो की आवश्यक्तायो पर देरी से और बहुत कम ध्यान दिया गया है तथा इस गरीब महाद्वीप से दने की अपेक्षा लिया अधिक गया है। अफ्रीकी देशो द्वारा ऋणो का भुगतान नहीं हो पाता और उह अपने उत्पादनो के विक्रय पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस कारण उ हे लूटा जा रहा है । वे लोग अपनी बहुमूल्य भूमि का अत्यधिक उपयोग कर उसे बजर भूमि व रेगिस्तान म बदले जा रह है । उनके लिये उचित दाम लेकर अपना सामान बेचना कठिन हो रहा है तथा वहा के पारिस्थितिकी तत्र पर अधिक दवाव बढ रहा है । दानदाता राष्ट्रा स सहायता भा अपर्याप्त रहती है । यही स्थिति लेटिन अमेरिकी देशो की भी है। ऋण सक्ट के कारण उनके प्राकृतिक ससाधनो का उपभोग, उनके स्वय के विकास के लिये नही वरन विदेशी साहूकारा के आर्थिक आभारा की पूर्ति मे हो रहा है। सत्य है कि गरीब देशो की अपने अल्प ससाधना के निर्यात की मात्रा वढाने पर भी अपनी बढती हुई गरीबी को स्वीकारने हेतु बाध्य होना पडता है। लेटिन अमेरिका, एशिया, मध्यपूर्व व अफ्रीका में पहले से ही पर्यावरणीय स्तर में गिरावट राजनैतिक अस तोप तथा अन्तर्राष्ट्रीय तनाव का कारण बन गई है । हाल ही मे अफ्रीका की शुष्क भूमि कृपि मे हुआ अधिकाश विनाश किसी सेना के हुए हमले से भी अधिक विनाशकारी है और यह घर फूक नीति सावित हुआ है। आज विश्व में स्थिति यह है कि पर्यावरण मकट से ग्रस्त अधिकतर सरकार अपनी जनता को आक्रामक रगिस्तान की अपक्षा हमलावर सेना से सुरक्षा प्रदान करने में अधिक पैसा खच कर रही है। सम्पूर्ण विश्व में संय बल पर कुल दस खरव डालर प्रतिवप खच होता है और यह निरतर बढ़ रहा है। बहुत से देशो म सक्ल राष्ट्रीय उत्पादन का इतना अधिक अनुपात सेना पर व्यय होता है जिससे सामाजिक विकास की सुविधाओ का भारी हनन होता है। वनानिक अनुस धाना स पात होता है कि एक घोटा-सा नाभिकीय युद्ध ही शीतल तथा अधरी नाभिवाय सर्दी उत्पन्न कर देगा जो 160/पर्यावरण, प्रकृति और मानव जन्तु व पादप पारिस्थितिकी तन को पूणरूप से नष्ट कर देगा और विरासत मे प्राप्त हुई पृथ्वी को वीरान तथा मानवरहित बना देगा। इस वतमान पथ-भ्रष्टता के परिणामस्वरूप भावी पीढी के लिय वैकल्पिक मार्ग तेजी स बन्द हो रहे हैं। अम्लीय वर्षा, विश्व का तापमान, ओजान परतो का अध- पतन, विस्तृत मरुस्थलीकरण तथा अनेक प्रजातियो का विलुप्तिकरण जस भयावह परिणामो को पृथ्वी पर अनुभव किये जाने से पूर्व प्राज के नीति निर्धारण करने वाले लोग ही मृत्यु को प्राप्त हो जायेग । इसलिये जनसख्या वृद्धि, खाद्य सुरक्षा, जातियो तथा प्रजातियो की हानि आनुवशिक ससाधन, ऊर्जा उद्योग तथा मानवीय आवास आदि क्षेत्रो पर ध्यान केन्द्रित कर, उनके उपचार हेतु कुछ अनुश शाऐ प्रेपित की जाती है। मानव-ससाधन एव जनसंख्या विश्व के अनेक भागो मे जनसख्या विस्फोट हो रहा है तथा उपलब्ध प्राकृतिक सम्पदा द्वारा उनका पोपण सम्भव नहीं है। यह जन संख्या वृद्धि दर इतनी अधिक है कि आवास, स्वास्थ्य रक्षा, खाद्य समस्या तथा उर्जा प्रापूर्ति के क्षेत्र मे सुधार की यथोचित व्यवस्था करन म असमथ है। वास्तविक समस्या यह रहती है कि जासख्या सम्बद्ध ससाधनो से किस प्रकार सम्बधित हो और जनसख्या समस्या से पार पाने के लिय प्रयास, गरीबी को मिटाने का होना चाहिये । जनसंख्या वृद्धि की दर पर अकुश लगाने के लिय प्रभावी कदम उठाने हागे ताकि जनसख्या 6 अरब पर जावर स्थिर हो जाय । शिक्षा-सुविधा नौकरिया तथा गभ निरोधक अम्लो की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है। आहार सुरक्षा-शक्ति एव पोषण हेतु अनाज उत्पादन वद्धि की तुलना में प्राज विश्व म जन सख्या वृद्धि अधिक तेज गति से हो रही है। प्रतिवप पर्याप्त भोजन न पाने वालो की संख्या बढ रही है। विश्व कृषि पर्याप्त भोजन सामग्री जुटाने में असफल रही है । एसो भी स्थिति देखने को मिलती है कि एक क्षेत्र मे भोजन उपलब्ध नहीं होता जहां उसकी प्रावश्यकता होती है। अधिक उत्पादन के लिये मृदा द रसायन का अति उपयोग करने का प्रयत्न किया जाता है-रसायना क प्रयोग से जल तथा भूमि-प्रदूषण की समस्या बढ जाती है जिससे प्रामाण संत्रा का ह्रास होता है। इस कारण विकासशील देशा को फसला म उत्पादन बढाने के लिये अधिक प्रभावी व्यवस्था की यावश्यक्ता है तथा वितरण प्रणाली पर विशेष ध्यान देन की आवश्यकता पड जाती है, इसम राजनीति को स्थान नही मिलना चाहिये। बदलती हुई मानसिकताएँ और पर्यावरण सतुलन/161 रामका प्रामीण विरास भी इस महाग रागा। 16 फैसिम पंटरी रिपरिणग्निाम गायधमनानन माटरी बहुत बड़ा- पाय पिया जा रहा है। मानया गापा निराधार है सपा भय भोगियर लिया जाया र माय गावापान रा मामजस्य गि प्रसार हा मरगा ? ममुस राज्य माराम गत स वर्षों म गोरा उITI 5टा प्रति हटपर मवार 23 टा प्रति हाटयर हो गया है पर्वात 53 प्रतिम यरह है। जमनी में भी यह यदि दर 77 प्रतिशत था जबपि मजदुराग मम्या पाया पट गई है। 20वीं रात तर विधा आपा ९ अरव हाने या अनुमान है पोर मााज उपामा मात्रा भा टुगुना हो जायगी जबपि बाज स पचल 4 प्रतिशत हो पिर भूमि गृषि पार्यो , उपयोग म लाया जापगी । रहन मा तात्पप यह कि प्रति हस्टेपर उत्पादन का मावा भी घर जावगी। सन 1970 म प्रतिहाटेगर मोमत उपज रयत 26 नागान रिय पापो हाती धी परतु 17 पाल गन् 2000 र यह स्टेयर अपना यही हम उपज से 4 व्यक्तिया पट पान समेगा । परन्तु इमस मावरा म तुष्ट ही हो जाना चाहिय कि विश्व में हर व्यक्ति निय यथष्ट जनाज उपनन्ध हो नपगा। जल्दी ही मारयता दानप र प्रसार या पनीररण व सिंचाइ क साधनो म निय वित परा हागा। विशपपर प्रमोगा व एमिया महादीपा म गुप्ता जर्यात मूग ये सारण स्थिति डरावनी हो जायगी। रूस चीन इजरात न यह प्रयत्न क्यि हैं गा भारत में भी यार बरगिस्तान प्रसार मो रोक्न प्रयास हो रह हैं। गदिमा म इदिरा गाधी नहर का निर्माण एक महान उपलब्धि है। पादप व जतु प्रजातिया, पारिस्थितिक तस्य विकास हेतु साधन भूतल पर आज धनेक पादप व जनु प्रजातिया तनाव की स्थिति म जी रही हैं, तथा तीव्रगति से विलुप्तीकरण की ओर अग्रसर हो रही है, ऐसा पृथ्वी पर पहले कभी नही देखा गया । यह आवश्यक हो गया है रि इस प्रक्रिया का सपना होगा । जीवमण्डल तथा पारित को सामा य व सम्पूर्ण प्रियाशीलता के लिए जीवो म विविधताओं का होना जरूरी है क्यापि वय प्रजानियो को प्रातुवशिर तत्व विश्व आधिको में प्रति वप उनत नसलो, नवीन औषधियो व उद्योगो के लिये च्चे माल रूप म अरबी डालराया महत्वपूर्ण योग देत है । इस उपयोगिता के अतिरिक्त भी वाय जीवो के सरक्षण के नतिम नसर्गिक, सास्कृतिक तथा विशुद्ध वानिक पहलू भी है । बत व य जीवो की विलुप्त हाती प्रजातियो तथा नष्ट होते हुए पारित तो को सुधारने के कार्यों की समुचित व्यवस्था, राजनैतिक आधार पर उसे एका जार्थिव व ससाधनीय मुद्दा बनाना होगा। 162/पर्यावरण प्रकृति और मानव ऊर्जा का पर्यावरणीय व विकास हेतु विकल्प विनाशरहित विश्व की कल्पना ही विकास की सीढी है, इस प्राप्त करने के लिये सुरक्षित एव पूर्ति योग्य ऊर्जा पथ का होना निता त आवश्यक है जिसे हम आज तक नहीं खोज पाये हैं। ऊर्जा प्राप्ति की वद्धि दर बराबर घटती जा रही है। इन परिस्थितियो में प्रोद्योगीकरण कृषि विकास तथा बढती हुई जन-सख्या के लिये अधिक ऊर्जा की जरूरत होगी। आज सहारा के मरुस्थल मे वहा के नागरिका की तुलना में औद्योगिक बाजार का एक औसत मनुष्य 80 गुना अधिक ऊजा का उपयोग कर रहा है अर्थात विकासशील देशो में प्राथमिक ऊजा उपयोग को समुचित मात्रा मे बढाने की व्यवस्था की जानी चाहिये । सन् 2025 तक विकासशील देशो को ऊर्जा उपयोग की दृष्टि से औद्योगिक दशो के स्तर तक पहुचने के लिये विश्व ऊर्जा उपयोग को 5 गुना बढाना होगा । परन्तु पारितत न ऐसा करन म समथ नहीं होगा क्याकि जीवाश्म ईधन ससाधन पर्याप्त नहीं है। यह तभी सभव हो सकता है जब अयोग्य ईधन की पुनन विनिकरण पद्धतियो की खोज की जाय । विश्व तापमान तथा पर्यावरणीय अम्लीयता की चेतावनिया प्राथमिक ससाधनो की आधुनिक स्थिति पर आधारित ऊर्जा उपयोग का शायद ही दुगुना कर दे । इसलिये आर्थिक विकास का कोई नया युग, अतीत के विकास की अपेक्षा कम ऊर्जा निभरतावाला होना चाहिये । विकासगीर देशा म लाखा लोग जलाऊ लक्डी के अभाव में रह रहे हैं जो कि विश्व की आधी मानव जाति के लिये मुख्य धरल ऊर्जा का साधन है और जिनकी सख्या निर तर बढ रही है। लक्डी की कमा वाले देशा को उनके कृषि क्षेत्रों को इस प्रकार विकसित करना होगा कि अधिव” से अधिक मावा मे लकडी तथा पादप ईधन प्राप्त किया जा सके, पर तु यह सम्भव नही लगता। दूरगामी भविष्य में मानव प्रगति को बनाये रखने के लिय सुरक्षित पर्यावरणीय सुदढ़ जीवा त ऊर्जा पय आवश्यक है और विश्व ऊर्जा सरचना के लिये, जीव का काय करन वाल पुनवीनी कुन ससाधनो पर आधारित निम्न ऊर्जा पथ विकमित करने हागे । वैकल्पिा ऊर्जा का विकास इस गरज से भी करना होगा गि विद्युत ऊर्जा के लिये पायला, पेट्रोल व जल को आवश्यक्ता हातो है मौर उनकी कमी के कारण कोयल ५ पट्रोन की पूर्ति नही होगी। आज जन्य दशो को भांति भारत में भी अणुऊर्जा पैदा करना आरम्भ कर दी है परन्तु भारत जस गरीब देश के लिय महगो और प्रदूषण से भरी है। हम सन् 2001 तक 16 0000 मेगावाट विद्य त-शक्ति का आवश्यकता पड़ेगा, और इसके निय सौरऊर्जा पवन ऊजा, जन-ऊर्जा तया वायोगैस जैन साधनो को जुटाना होगा जो अपे।। सस्त तथा प्रदूषण - बदलती हुई मानसिकताएँ और पर्यावरण सतुलन/163 रहित सिद्ध होगे। साथ ही उन्नत विस्म के निर्धूम चूल्ह तथा उनत विद्य त शवदाहो का भी विकास करना होगा जिसम महती आवश्यक्ता इस बात यी है कि पर्यावरण प्रदूषण रहित बना रहे । (1) सौर ऊर्जा-सम्पूण ब्रह्माण्ड के अनेक सौरमण्डला म से हमारा मौर मण्डल भो एक है जिमका केद्र विदू सूय है । यह हमसे 15 करोड पिलोमीटर की दूरी पर है तथा उसका व्यास 13 लाख 12 हजार किलो- मीटर है । इसका वजन पृथ्वी से 3,30000 गुणा ज्यादा है तथा आकार मे यह पृथ्वी से 110 गुणा बड़ा है । सूय अनको गसा का भण्डार है जिसकी परत 16,000 किलोमीटर माटो हैं। यह मूय प्रतिक्षण अपनी 56 करोड 40 लाख टन हाइड्राजन को जलाकर 56 क्रोड टन हिलीयम म परिवर्तित कर देता है । अनुमानत यह प्रनिया गत 5 अरब वर्षों से चल रही है। वैनानिको के मतानुसार हाइड्रोजन के नष्ट होन और अपनी ऊर्जा को वितरित करने का यही प्रम यदि बना रहे तो और यह गति 150 वप तक चलती रही ता भी मूय जपनी ऊर्जा शक्ति का केवल एक प्रतिशत से भी कम मच कर पायेगा । इमसे सूर्य की प्रचण्डता का सहज ही जनुमान लगाया जा सकता है जो कभी भी क्षीण नही होने वाली ऊर्जा साधन के रूप म सदव प्रयुक्त होती रहेगी। वतमान में इजरायल ऐसा देश है जहा दैनिक जीवन में एक परिवार मे गेर ऊर्जा का ही उपयोग हो रहा है। ज तरिक्ष उडान मे निरन्तर ऊर्जा मिलती रहे इसलिय सौर बैटरियो का निर्माण किया गया है जो अन्तरिक्ष यानो को ऊर्जा प्रदान करती है । लेकिन भूतल पर सूय की किरणें 9 10 घटे तक ही उपलब्ध होती है जत अब ऐसी बटरिया का विकास करना होगा । यह मौरताप का अवशोषण कर लम्बे समय तक उसे सुरक्षित रख सकती है । अाजकल गावो मे विद्युतीकरण, टेलीविजनो का सवालन, पखे तथा मगीने चनाने के लिये तथा खाना पकाने के लिय सौर-चूल्हो का प्रयोग निरतर बढता जा रहा है । भारत में यह प्रयोग बहुत उपयोगी सिद्ध होगा, इममे किसी प्रकार की अतिश्योक्ति नही हैं। (2) निधूम चूल्हे -भारत में अपने परम्परागत धूल्हो जिनम लकडी हो जलायी जाती है, इसका दूसरा विकल्प नहीं है अत इन परम्परागत चूल्हो को ही उन्नत कर लेना एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा । ऐसे चूल्हो मे धूमा नहीं निक्लता, इस कारण ग्राखो पर कुप्रभाव नहीं पडता तथा रसोई घर भो गदा नहीं होता। आग की लपटा के कारण फफडो की बीमारिया स भी सुरक्षा मिलती है । उनत विस्म के चूल्हो 10 पडो को काटना भी रोका जा सकता है क्यापि इनमे अ य चू-हो को अपेक्षा कम इधन हो खच 164/पर्यावरण, प्रकृति और मानव होता हैं । देश मे वतमान में ऐसे लगभग 18 लाख रहे लग चुके हैं। भारत सरकार ने अपने विशेष कायक्रम के अनुसार सातवी पचवर्षीय योजना मे 2 करोड, पाठवी योजना में 4 करोड तथा नवी योजना काल मे 9 कराड निधूम चूल्हे लगाने का लक्ष्य रखा है। (3) बायोगस सयन -गोबर के अतिरिक्त सीवेज, तरकारिया, झूठी पतलें, जल कुम्भी, मल-मूत्र आदि से बायोगैस तैयार की जा सकती है । भारत सरकार ने इस ऊर्जा प्राप्ति की योजना 1980-81 म स्वीकृत की थी। गोबर के कण्डे द्वारा 11 प्रतिशत केरोसीन तेल द्वारा 48 प्रतिशत ताप शक्ति प्राप्त की जाती है गोवर गैस द्वारा 60 प्रतिशत ताप क्षमता का उपयोग किया जा रहा है। बायोगस से इंधन व खाद दोना ही प्राप्त हाती है । यह अनुमान लगाया गया है कि भारत मे पैदा होन वाली गोबर से केवल यदि गैस बनायी जावे तो समस्त ग्रामीण परिवारो की इधन की समस्या हल हो सकती है और चूल्हो मे लकडी जलाने की आवश्यकता भी नही पड़ेगी । वतमान म सिफ 30 प्रतिशत गोबर ही जलाने के काम आता है। यदि इसे जलाया न जाकर गैस तयार की जाये तो 69500 लाख लीटर कैरोसीन तेल की प्रतिवप वचत की जा सकती है। गोबर गैस म 55-56 प्रतिशत मीथेन गैस होती है। जो अधिक ज्वलनशील, गधहीन, रगविहीन और साथ ही विषैली भी नहीं होती । इसमे 30-40 प्रतिशत कावन-डाई- भाक्साइड, 5-10 से प्रतिशत हाइड्रोजन तथा 1-2 प्रतिशत नाइदाजन विद्यमान रहती है। ऐसा भी अनुमान हैं कि एक व्यक्ति को भोजन बनाने के लिय 350-400 लीटर गस प्रतिदिन जरूरी है तथा इसके लिये 10 किलोग्राम गोबर की आवश्यकता होगी। वायोगैस सयत्र से उपलब्ध खाद की उवरता, खड्डे की खाद से 43 प्रति- शत अधिक होती है । इस खाद मे नाइट्रोजन 18 से 2 5 प्रतिशत फस्फोरस 10 से। 2 प्रतिशत एव पोटाश 06 से 18 प्रतिशत होती जवकि गाबर की खड्डे वाली खाद मे नाइट्रोजन 05 से 07 प्रतिशत, पोटाश व फोस्फारस 05 प्रतिशत ही होता है। (4) पवन चक्किया --यूरोप के कई देशो में कुछ शताब्दियो से ही पवन चक्कियो का उपयोग किया जा रहा है। भारत म भी कर्जा प्राप्ति के साधनो के रूप मे वातो जथवा पवनो का प्रयोग प्रारम्भ हो गया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार केवन वायु वेग से ही मारी दुनिया के विद्य त स्टेशनों द्वारा उत्पादित विद्य त ऊर्जा का 10 गुना पंगा करना सभव हो सकेगा। अमेरिका मे नासा तथा जमनी की सरकारें पवन- चक्कियो के पुनर्जीवित करने में लगी हुई हैं लेकिन इनका पुर्नागमन क्या उर्जा का साथक हल पेश कर सकेगा? इसमें सशय है । जमन ऊर्जा की खपत की बदलती हुई मानसिक्ताएं और पर्यावरण संतुलन/165 10 प्रतिशत मापूर्ति के लिये जमनवासियों को योरोप के समूचे उत्तरी सागर तट पर 40,000 प्राधुनिक हवाई टरवाईनों का निर्माण करना होगा और ऐसी हर टरवाईन 1 मेगावाट ही उत्पन्न कर सकेगी। (5) जल विद्युत ऊर्जा सय व नदिया पर विशाल वाध बनाकर जल-विद्य त प्राय विश्व के अनेक दशो में प्राप्त होने लगी है तथा नौद्योगिक देशो ने ऐसी उनति के कोई अवसर अब नही छोडे हैं और तीसरी दुनिया म तो इसके विकास की सम्भावनाएं असीमित हैं। कुछ अय न समाप्त होने वाले वैकल्पिक स्रोतो मे ज्वारभाटा (tides), सागर जल के परिवतनशील ताप तथा भूतापीय ऊर्जा जैसे साधनो का अधिक से अधिक उपयोग किया जा मकता है 1 अन्य वाल्पिक साधनो के पक्षधर तो यहा तक कहते है कि सुर- क्षित शक्ति के अन्याय भण्डार आज भी मौजूद हैं जिनका दोहन बहुत लम्वे असे तक किया जा सकता है यथा धरती तक पहुचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा ही हमारी ऊर्जा सम्ब धी वापिक आवश्यक्ता से 000 गुनी अधिक है। विश्व का सालाना जीव-भार (bromass) उत्पादन भी 75,0000 लाख टन कच्चे तेल के बराबर है। यूरोप ने जीवभार पद्धति पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा उत्पादन समस्या भी भिन नही है । ब्राजील (दक्षिणी अमेरिका) में अब तक 7,00,000 मोटरगाडिया गर्ने से निर्मित इथेनाल से चलने लगी है । ब्राजोल का 2 प्रति- पात क्षेत्रफल ही इतना बडा हैं कि उसमे यूरोप के बेल्जियम, आस्टिया व स्वीटजरलैंड तक समा जाय, पर तु या घनी आबादी वाले देश निटेन व जापान मे इथेनाल गान्ति सभव है। ब्राजील में तो गन्ने की तीन फसले बोई व काटी जा सकती है, पर यूरोप के मध्यवर्ती भाग मे जलवायु इसके लिये उपयुक्त नहीं है । भारत इस दिशा में अवश्य कुछ कर सकता है। (6) परमाणु ऊर्जा --वतमान म यह स्पष्ट हो चुका हैं कि बडे स्तर पर परमाणु ऊर्जा का प्रयोग ही आगे आने वाले वर्षों में ऊर्जा-आपूर्ति के टेढे मढे विवादो का हल प्रस्तुत करेगा। यह भी सौ-फीसदी सही है कि पर. माणु ऊर्जा की उपेक्षा करना राजनीतिक स्तर पर ब्लैकमेलिंग को निमत्रण देना है । विरोधिया को मान्यता है कि परमाणु शक्ति इतनी खतरनाक है कि उस क्सिी भी प्रकार यायोचित नही ठहराया जा सकता। यह भी सत्य है कि इसके दुरुपयोग की आशकाएँ बहुत अधिक हैं । युद्ध काल में शत्रु परमाणु वमो का उपयोग कर सकता है भोर रिएक्टरा को दुघटनाग्रस्त भी कर सकता है जो जवश्य ही घातक सिद्ध होगे-एक ऐसी ही दुघटना लाखो की लोगा जान लेवा हो सकती है। लेकिन साथ ही सोचने की वात यह है कि इस प्रकार उससे मिलने वाली भारी सुविधाओ से भी वचित रहन का खतरा मोल ले रहे हैं। किसी भी 166/प्रति, पर्यावरण और मानव विकसित देश मे यदि दो दिन भी विजली गायव हो जाय तो चारो ओर तहलका मच जाता है। प्रशीत घरो तथा रेफ्रोजेनरेशन में रखी लाखो व करोडो की खाद्य वस्तुएं नष्ट हो जाती हैं । अस्पतालो में जन-जीवन पर पत्रिक उपकरणो की चूक के कारण घातक प्रभाव पड़ता है । गायो का दूध मशीनो के माध्यम से दुहा जाता है, डेयरी फार्मों पर मशीनो से दुही जाने वाली गायो, भैसो के धन फट जायेंगे । ऐसे संक्डो व हजारो उदाहरण दिये जा सकते हैं । बहुम जिली इमारता म लोगो का अपने कार्य पर पहुचना दूभर हो जाएगा। ऊजा प्राप्ति के लक्ष्यो म खतरे तो हैं ही परतु इसका तात्पय यह कदापि नही हो सकता कि हम अपने उन लक्ष्यो की ओर से पूर्णतया विमुख हा जाय । सोचा जाय कि जल विद्युत ऊर्जा ही एक मात्र कम खतरे वाला विकल्प हो सकता है और परमाणु ऊर्जा के सभी सयत्री पर रोक लगा दी जाये तो ऐमा नहीं हैं । जहा तक कम खतरनाक' होने का दावा किया जाता है तो वास्तविकता यह है कि वाधा के टूटने व दुघटनाओ के कारण मानव जीवन का जितना विनाश हुआ है, इसी साधन से हुग्रा है। वाध बार-बार टूटते रह हैं तथा भविष्य म अब नहीं टूटेंगे, इस बात की कोई भी भविष्य- वाणी नहीं की जा सकती है । आज जितने भी बडे बडे, विशाल जलाशयो का निमाण किया जाता है, खतरे उतने ही अधिक बढ़ जाते हैं। फिर आण्विक ऊर्जा के आसन खतरो से डरने की आवश्यकता नही-नारे तो समस्त तथा कथित 'हानिरहित व सुरक्षित' माध्यमो के विरोध मे भी लगते रहे हैं और लगते रहेगे। बहरहाल आवश्यकता इस बात की है कि हम खतरो के साथ जि दा रहने की अनिवायता को तो स्वीकार कर ले । हमको एक ही समय मे भाति-भाति के खतरो के साथ रहने को बाध्य होना पडगा क्योकि कोई भी ऐमी तकनीक अभी तक ज्ञात नही हो सकी है जिसे हानि- रहित अथवा सुरक्षित' कहा जा सके । औद्योगीकरण-अल्प ससाधन व अधिक उत्पादन ऐसा अनुमान है कि सन 1950 की तुलना म माज विश्व में औद्योगिक उत्पादन 7 गुना अधिक हो गया है तथा 21वी शताब्दी के प्रारम्भ होने तक वतमान जनसख्या वद्धि की दर को देखते हुए विकासशील देशो मे उत्पादन व उपभोग को औद्योगिक देशो के समान स्तर पर लाने के लिये उत्पादन की मात्रा में 10 गुना वद्धि की आवश्यक्ता होगी। विकसित राष्ट्रो मे जिस नवोन तकनीको का विकास किया गया यह है, वे अवश्य ही अधिक उत्पादन बढती दक्षता और घटते प्रदूषण का वास्ता देती है, परन्तु यह तकनीकी नये विल रासायनिक पदार्थों व अपशिष्ट पदार्यों तथा अकल्पनातीत वडी दुपटनाओ के खतरो से खाली नहीं हो सकती। ऐसी कोई गारन्टी नहीं बदलती हुई मानसिकताएँ और पर्यावरण सतुलन/167 मिल सकती कि औद्योगीकरण से मानव केवल उन्नति की ओर ही जग्रसर होगा और वह भी विनाश रहित । विश्व के राष्ट्रा को अनुचित औद्योगीकरण की कीमत को चुकानी ही पडेगी और बहुत से विकामशील देश तो अनुभव भी करते हैं कि उनके पास न तो पर्याप्त ससाधन हैं और न इतना समय व धन है कि जल्दी ही कोई तकनीकी परिवतन ला सकें, पर्यावरण को अभी विगड जाने दें और बाद मे उसम सुधार कर लिये जावेंगे। मानव जीवन में आवश्यक्ताओ की पूर्ति जिन उद्योगो से हो सकती है, ऐसे उद्योगो मे धन लगाकर समुचित विकास की महती मावश्यक्ता है अ यथा धन का अविरल प्रवाह ही रुक जावेगा। इसके रिया वण मे औद्योगिक राष्ट्रो से सूचना व सहयाग की भारी आवश्यकता होगी। शहरीकरण को चुनौतियां- इस बात मे कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि इक्कीसवी शताब्दी का ससार मुख्यत 'शहरी विश्व' हागा क्योकि विश्व को लगभग आधी आबादी शहरा मे रहने लगेगी। ऐसा अनुमान है कि 70 वप के पश्चात, विकासशीस देशो को शहरी आबादी 10 गुणा बढ़ चुकी होगी जो कि 1920 मे लगभग 10 करोड थी और माज एक अरब हो चुकी है। सन् 1940 मे 100 में से एक व्यक्ति दस लाय या अधिक आवादी वाले शहर में रहता था सन 1980 मे 10 म एक व्यक्ति शहरा मे रहने लगा है तथा वष 1985 से 2000 तक ऐसे शहरो मे वतमान एक अरब लोगो का 3/4 भाग और बढ़ जायगा। साफ दिखाई दे रहा है कि आगामी कुछ वर्षों म विकासशील राष्ट्रो को अपनी उत्पादन क्षमता 65 प्रतिशत तक बढ़ाने की आवश्यकता होगी और शहरी- सेवाएं आवास व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान देना होगा वरना अभाव की विक्ट तथा विकराल स्थितियो का सामना होगा । जन-सख्या विस्फोट और शहरीकरण के कारण सरकार के समाने कर्जा ससाधन प्रशिक्षित व्यक्ति, भूमि सेवाये और मानव जीवन को सुख सुविधाओं सम्ब धी आवश्यकताएँ यथा स्वच्छ जल, शिक्षा, अस्पताल सेवाएं आदि की समस्याऐं रहती हैं। दूसरी ओर असख्य झुग्गी झापडिया कुकुरमुत्ते के समान बढ जाती हैं। भीड बढ जाती है जिसके कारण संग्रामक रोगो के प्रसार के आसार भी बढ़ जाते हैं जो अस्वास्थ्यकर पर्यावरण को जन्म दता है । औद्यो- गिक राष्ट्रो म शहरी सभ्यता का उदय होता है जिसम विगडता हुआ सोदय, पर्यावरण अवनति, अन्त नगरीय क्षरण व टूटते हुए मानव रिश्ते प्रमुख हैं। विश्व के समक्ष प्रदूषण की समस्याएँ -खाद्य सामग्री को कमी प्राकतिक सम्पदा के चूकते स्रोत प्रदूषण का विकराल भूत और ऊर्जा सस्ट की चीख पुकार के बीच सास लेना तथा निमरता आगमी सोचन को वाध्य है कि अब हम अपनी जानी-पहबानी दुनिया में नहीं बल्कि अनगिनत सक्टो व दुश्चितामा 168/पर्यावरण, प्रकृति और मानव से घिरे घर मे कैद होकर रह गये हैं, हमारी स्वच्छ दता कभी को समाप्त हो चुकी है। प्रश्न यह है कि क्या सचमुच इन सारी समस्याओ और चितामो का कोई वास्तविक आधार है, या यह केवल एक मानसिकता बनकर रह गयी है ? क्या हमारे पास अपनी ही कृत्य उन समस्याओ का कोई जवाब है ? 1 हम अपनी ही धरती की खनिज सम्पदा को स्क्य लूट रहे है ? 2 हवा, पानी तथा मृदा (मिट्टी) में जहर घोल रहे है ? 3 प्रतिक आवासो को तहस-नहस कर, लाखा की सख्या म पादप और ज तुमो को बेघर कर रहे है तथा उनको लुप्त होने की ओर धकेल रहे हैं ? 4 ऊर्जा की कमी का अनोखा तथा विकराल रूप देखने को मिलने वाला है 5 हम जिस डाल पर बैठे है उसी को काटने का प्रयत्न तो नहीं कर ? इस सदभ मे प्रसिद्ध अमेरिकन पारिस्थितिकवेत्ता फोलिक्स पार पंटूरी ने इसे केवल (निरो) मानसिकता कह कर सम्बोधित किया है और तथ्या पर आधारित आश्वासन दिया है कि इन सक्टो से किसी भी प्रकार घबराने की आवश्यकता नहीं हैं, यहा केवल प्रवध (management) तथा प्रशासन (administration) की आवश्यकता अधिव' महत्वपूर्ण है। सन् 1920 मे भूगभ विनानियो ने ससार के तेल भण्डारो का अनुमान लगाते हुए उसकी मात्रा 60000 लाख टन आकी थी परतु आज वहा जाने लगा है कि 600,000 लाख टन का उपयोग कर लेने के बाद भी नात तेल मण्डल मे 870,000 लाख टन तेल के भण्डार बचे हुए हैं । अज्ञात तेल होजो की खोज की जा सकती है। उनमे 1,500,000 लाख टन तेल और भी मिलने की सम्भावना है। कुछ लोगो का कथन है कि सुरक्षित तेल भण्डारा का अनुमानित सार तो और भी अधिक है जो यूनतम 2,700,000 लाख टन से अधिकतम 6,500,000 लाख टन हो सकता है। यह भी कहा जाता है कि तैलीय-बालूकाराशि और तल-चट्टाना में भी 7,000,000 लाख टन तेल के भण्डार छिपे पड़े हैं। इनका 1 भाग तो बिना अतिरिक्त व्यय के आज भी प्राप्त किया जा सकता है। प्राकृतिक खनिज गसो के विषय मे भी इसी प्रकार की याशावादी अभि- व्यक्तिया की गई हैं। एक अदाजा यह है कि हम लगभग 200 000 लाख टन गैस का अब तक उपयोग कर चुके है । सुरक्षित भण्डारा में 1,800,000 लाख टन में 4,000,000 लाख टन गैस अव भी मौजूद है । याउन कोल तथा पिटकोल की अनुमानित राशि तो और भी उत्साह वर्धक दिखायी पडती हैं । 4 बिलीयन टन रे सुरक्षित भण्डारो म तो इतना कोयला छिपा पड़ा है कि पूरी दुनिया इसे 500 वो तक बिना हिचक उपयोग म ला सकती है। बदलती हुई मानसिकताएँ गोर पर्यावरण रातुनन/169 औद्योगिकरण का बालपन के 70-80 वर्षा म पर्यावरण को जितनी हानि हुई है उसके उपचार यो जटिल तरनाक मी सम्पन्न दशा के पास है। भने हो इम उक्ति म पिराध पा आभास मिलता हा परतु 'स्वच्छ' तरनी' का माग प्रौद्योगिक सम्पन्नता एव तस्नीकि विकास से ही प्रशस्त हा सकेगा। इसके रास्त वियाम यता से नहीं निरसत हैं। 90 प्रशस्त कावन-डाई- पापसाइड उत्सना का पारण केवल तेल, कोयला व गम को जलाना है और गत 15 वपो म तो बौद्योगिय देशो म ऊर्जा को ग्रपतनी 50 प्रतिशत बढ़ गई है परन्तु वायुमण्डन म सल्फर-डाई ऑक्साइड को माना स्थिर बनी हुई है । धूल की मात्रा भी गत वर्षों म लगातार घटती रही है। सन् 1970 म जमनी के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र शहर म 250 हजार टन धूल जमी हुई यो परन्तु 7 वप पाद इस धूल की मात्रा क्वल 150 हजार टन रह गई और यह प्रम अब भी जारी है। रहना सही ही प्रतीत होता है कि विगत 15 वर्षों से जल-प्रदूपण भी घटने की स्थिति में है। इसका अर्थ यह नहीं निकाल लेना चाहिये कि हमारी नदिया व झीलें स्वच्छ बनती जा रही हैं । इमी सदा म एक अप उदाहरण और भी मिलता है । सन 1963 में श्री लगा देश में डी० डा० टी० का प्रयोग निपिद्ध कर दिया गया था क्याकि विश्व भर के आवडे यह दर्शा रहे थे Fि कीटनाशी पेड़ पौधो, ज तुओ तथा मानव-जाति के लिये पातर हैं। भोजन तत्वो के साथ डी. डी. टी. जव- उत्पादो यहा तक की मां के दूध में भी मकेन्द्रित हो जाता है और बहुत उपयोगो कोटो का भी विनाश कर देता है । यह सभी जाकडे अपने स्थान पर सही थे । इसका असर यह हुआ की सन् 1963 के पश्चात मलेरिया के रोगियो की संख्या निर तर बढ़न लगी । सन 1969 मे यह सख्या 10 लाख तक पहुंच गई और इनमे से 1/3 लोग मृत्यु का जालिंगन कर कालग्रस्त हुए। डी० डी० टी० स्वास्थ्य के लिये हानिकर अवश्य था पर तु अब तक इसके कारण कोई गम्भीर नुक्सान या मौत की खबर नहीं मिली थी। अतत श्री लवा की सरकार ने डी० डी० टी० पर लगाई निषधाज्ञा को हटा ली। इस सबका निष्प यह है कि वायु जल, मिट्टी, वनस्पति, जीव-जदु तथा आकाशीय रिश्ता म सतुलन स्थापित करने हेतु किया गया काय नतिक मूल्यों पर खरा उतरता है जबकि अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु प्रकृति के सन्तुलन को विध्वस करना बनतिर काय है । मनुष्य विश्व का सबसे अधिक चिंतन शील एव प्रकृति की अनूठी शान है । प्रकृति ने जीव-ज तुओ, वनस्पति, नदी- पहाड, वायु जल खनिज सम्पदा आदि की रचना की है। अत मानव-समाज वा यह पावन कर्तव्य है कि प्रकृति की विविध मायामी देन का विवेक सम्मत सतुलित उपभोग करता हुआ हमारे समाज और राष्ट्र के भौतिक-आध्यात्मिक विकास में युगानुकूल अपनी महत्वपण भूमिका निभाये। 170/पर्यावरण, प्रकृति और मानव दुलभ - Rare पारिभाषिक शब्दावली प्रकशेरुकी-Invertebrates जस्ता-Zinc प्रकावनि--Inorganic जलवायु-Cimate aftaly -- Abiotic जीवमण्डल-~Biosphere अपरद-Detritus जीव-भार-Biomass अपमाजब-Detergents faru-Bacteria अपशिष्ट-Waste जैव-गैस सपत्र--Bio gas plant अवसादी--Sedimentary अन्तरिक्ष-Space डिभक अवस्था-Larval Form अम्ल-Acid नाभिकीय-Nuclear अवशोषण-Absorption नियत्रण-Control पाहार पडी-Food Link fac970-Defolation माहार जाल--Food Web पर्यावरण--Environment आहार शृखला--Food Chain स्थायित्व-Homoestasis आत्रशोथ-Gastro-Intestinal पारिस्थितिक त प-Ecosystem इधन-Fuel पारिस्थितिक अनुक्रमण-Ecological उत्पादक-Producer Succession उत्परिवतन--Mutation पारिस्थितिक विकास-Ecological उत्पत्ति--Origin Evolution उपभोक्ता-Consumer पारिस्थितिक परिवधन- उवरक---Fertilizers Ecological Development ऊष्मीय--Thermal पारिस्थितिक स्तूप-Ecological ऊर्जा प्रवाह-Energy Flow Pyramids ऊजा स्तूप--Pyramid of Energy परजीवी--Parasite क्वकनाशक-Fungicides पारितत्र-Ecosystem कशेरुकी-Chordates पुन निविष्ट Feed Back कावनिक-Organic पुन चक्रण-Recycling कायिकी-Physiology पिटिकाकार-Acneform कीटनाशक-Insecticides पीडकनाशक-Pesticides कृषि-Agriculture प्रकाणन-Dispersal क्रियान्वित-Operate परिवधन-~-Development खरपतवार-Weeds प्रकाश सश्लेपी- Photo-synthetic चक्र--Cycle पोषण-स्तर-Trophic Level चारण---Grazing प्रदूषण-Pollution जनसख्या-Population प्रदूषक--Pollutant पारिभाषिक शब्दावली/171 प्रशीतन-Cooling प्रवाहो जल-Lotre Water मृतोपजीवी-- Saprophyte मासाहारो-Carnivore रक्ताल्पता-~-Anaemia रेडियोधर्मिता-Radioractivity रेडियो-समस्थानिव-Radio. Isotopes रूपा तरकारी-Transformers वन्यजीव-Wild Life वध्याररण--Stenlization विघटक-Decomposer विस्फोटर-~Explosion शासनाश-Herbicides शायाहारी--Herbivores सवाल-Algae स्यूल शारीरिपो-Anatomy समष्टि-Population समुदाय-Community स्वपोषित-Autotrophic सतुलन-Balance स्वास्थ्य-Health मम्पदा P-Resources ससाधन सागर-Ocean सोमा-Lead माद्रता-Concentration स्थिर जल-Lentic Water सरक्षण-Conservation सौर अभिवाह-Solar Flux स्तनधारो-Mammal हृदयरोग-~-Cardio-Vascular 172/पर्यावरण, प्रकृति और मानव

No text on this page.

No text on this page.

सर्वोत्कृष्ट पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में राष्ट्रस्तरीय प्रथम पुरस्कार प्राप्त संस्थान अभिनव प्रकाशन स प्रका- शित विज्ञान एव ललित साहित्य, किशोर एव वाल- साहित्य एव नवसाक्षरा के लिए सचित्र पुस्तकें मगाकर सत्साहित्य के प्रचार-प्रसार में अपना मूल्यवान सहयोग दीजिए। अभिनव प्रकाशन पहली मजिल 56 कचहरी रोड, पोस्ट बाक्स न 118 अजमर-305001

Paryavaran Prakriti Aur Manav

Author
B. L. Garg
Title
Paryavaran Prakriti Aur Manav
File name
Paryavaran Prakriti Aur Manav
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Abhinav Prakashan Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
177
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551220
Barcode
4990010031982.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
MAgsczHd6Fj
Download PDF

Paryavaran Prakriti Aur Manav