Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Kalpsutra Balavabodh

Suri, Shrirajendra · 2011/08

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VIAnाप
कादाम
HARMEHTI
सीयाणामा शो
मंत्री निन्नमानमा शा जुहारमा

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या ननतरंगना ना नया नाणा माकलवा, नदाका वम्युपथवल कर। टपालन। मार। पत्तियारीको Mi, "ाना रगनी गो तामाकीमाटीपुरानी तेरमी गतीने नाके शा लखमाजी नावाजीनी 5 मागकानी तथा विघ्लवाडीमा शेठ मेगाजी मोतीजीनी पहेली उपरथी मगावी लेवा २ गामश्री अमदावादमा पांजरापोलनी थंवर शेव पुनमचद ताराचदनी जकानेथी मलशे ३ गामश्री सुरतमा नानपरा मध्ये शेव चेनाजी वांताजीनी कानेथी मलशे ४ श्रीथायुना पाहाडनी नीचे गामश्री खराडीमा, नार शीतारामजी जवानमहमजीनी उकानेथी वेचाती मलशे ५ गामश्री शिवगजमां शेत मेगाजी मोतीजी श्री जाणावालानी पुकानेथी ६ गामश्री थादोरमा शेठ गोडीदासजी त्रीकमजीनी उकानेथी मलशे ७ गामश्री जालोरमा मुंता धनराजजी लालचदजी माफा वालानी कानेथी मलशे ७ गामश्री अलीराजपुरमा शा जेगजी जवेरचंदनी उकानेथी मलशे ए गामश्री पुनामध्ये वेतालपेठमां शेत जीवाजी थाणदाजीने त्यांची मलशे १० गामश्री सीयाणामां शा केशरीमहल कस्वजीनी कानेथी मलशे ११ गामश्री निन्नमाला शा जहाग्मल गिरनारमहनजीने स्मणी मानतो था पुस्तक श्रीमारवाउदेशमा थावेला गामश्री सीयाणा तया गानाainना १९ सी श्रावक नाश्ना सघ तरफयी, श्रावक रतनाजी वाघाजी गाम श्रीवादोरना रेवासीयें श्रीमुवापुरी मध्ये श्रावक जीमसिद माणकनी पासेथी यथा योग्य ए६ करावीने तया केटलि एक वायदो वधारीने तेमनीज मारफत निर्णयसागरनामक मुशर्यत्रमा मुक्ति कराव्यु डे या पुस्तकने बापवा सवधि सर्व प्रकारनो हक सरकारना कायदा प्रमाणे पावनारे पो ताने स्वाधीन राख्यो ने माटे पावनारनी रजा लीधा विना कोश्य बपावतुं नदी सवत् १ए।४,सने १७७७, शालिवाहन शक १७०ए मिति फाल्गुन छक्क थप्टमी चंवार या पुस्तक खरीदवा माटे प्रथमथी नाम नोधावनार सादेयोने विनति करीयं जेय के था मेयनी जेटली प्रतो पावेली ले लगनग तेटलीज प्रतोना धागलथी मादको थप गयेला ले माटे वाकी योडीज प्रतो शिल्लकमा रहेली , तेथी जे साहेवोए प्रथमथी खरीद करेली । ते साडेवोये जेम बने तेम मुंवश्मा कामाठीपुरानी तेरमी गलीने नाके शा लखमाजी ना गजीनी काने श्रथवा विष्लवाहीमा शेठ मेगाजी मोतीजीनी पहेडीयें रोकडा नाणा नगन मगावी लेवी थमे घणामा घणा ब मदीना पर्यंत नाम नोधावनारनी वाट "वाने वधाता नथी वेवानी या दोय ते साहेबोए नीचे जखेजा जुदा जुवा गा पिरोकरा रुपैया मोरुस्ती मनावी मेवा, सावरपी मगायना ययेला जलतरंगना जेतु चचल , वली विचित्र प्रकारनी सपत्तिजे ने ते पण सर्व वि पत्तिय करी युक्त ने, तथा रूप रसाविक जे झीयोना विलयो ने ते सर्व सध्याना वाद लाना रंगनी पेरे तरत विनाशने पामी जाय तेवा , का मित्र, स्त्री, स्वजनाविकोना समागमथी यये जे मुस्व ते पण सर्व स्वप्नोपम घर जालसमान , वली जे श्र त्यंत श्रानदने धत्पन्न करनारा एवा सुदर पवार्थो दणा जोवामा थाव्या होय, तेज पदा थों कालपरिपाक थइ रह्याथी फरी अम्पकाल पड़ी शोनाहीन थयेला दीवामां श्रावे , एवी रीते प्रत्यक्षपणे था संसारनी व्यवस्थाने सर्व कोइ जाणे , देखे , तथापि प्रा पीना मननी टेव एवी को विलक्षण में के, थजर थने थमर , को कालें महारो नाश थवानो नथी तेमज श्रा, महारां घर , था, महारी लक्ष्मी , था, महारां क्षेत्र, वाही, याग, बगीचा प्रमुख सपत्ति बे; था, अमुक महोटा महोटा महारा स्वजन , था, महारा मित्र , था, मदारी स्त्री , था, महारो पुत्र , था, महारु ऐश्वर्य बे, था, महारी सत्ता में; इत्यादि सर्व काई मदारुंज बे; एवो जे तेना मननो सकल्प के ते घणु करीने को रीते दूर थश् शकतो नथी कारण के श्राशारूपी मोदनीय मनुष्यन मन एटलुं तो वश करी लीघेलु डे के मरता सुधी पण तेनी तृष्णा मद थती नथी, परंतु दिवसेदिवसे वधती जाय रे अदममतानिमा नपणाने लीये तेनो जरामद, दन, लोन, थादिक जे ते पूर्वकत कर्मोदयनी प्रबलताने योगें एक लवमात्र पण कमी यता नथी,ए महोटी खेवनी वात डे कुटुवादिकना सयोग सर्वधि जे दणिक सुख ते ते यद्यपि पूर्व थनतिवार जीव पामी थाव्यो ने, तयापि जेवारे फरी पामे ते तेपारे था, सुख मने दमणा नौज जाणे मन्यां दायनी । एवु समजीने तेमा तीन थइ जाय ठे, पण था सुख थम्पकाल रहीने नष्ट थर जो, यया पुण्य घणु प्रबल हो तो महारा थायुष्य पूर्ण थया सुधी रहेशे, परंतु पठी तो अवश्प ए सुस्पषी महारे वियोग थवानो वे एपो छन विचार निरतर जेना थत करणमा थतो होय ते क्षणिक सुखोमा सुब्ध न थाय, एवा कोई विरलाज दीनामा श्रावे ने झानदृष्टिये विचारतां जे विषयसुख ने तेपण उपचारथी मानी लीघेला , परंतु पारमा र्थिक रीतें जोता तो ते 5 खरूपज ठे, ससार वधारवाना हेतु , नरक तिर्यचादि गति । मां व्रमण करावनारा , श्रारमधर्मन थाबादन करनारा , एवा कल्पित सुखोनी श्ण करनारा जीवोन ससाररूप समुश्मा थनेक प्रकारना 5 सह 5 ख सदन करता मुबकी खाता थनता कालचक व्यतीत गया तो पण तृप्ति पाम्या नहीं ए सर्व प्रव ल मोहनीयर्नु माहात्म्य जाणवु ए मोदनीय गर्म जे वे ते ज्ञानावरणादिक बाते कर्मो मां प्रधान ने माटे एनी उत्तर प्ररुति थावीश ने माइली अनतानुवधि क्रोध, मान, मा या ने लोन ए चार प्रति जे ने तेनो जेवारें दक्षदीय तेवारें जीवने हायक सम्पक त्वनी प्राप्ति थाय अथवा ए चार प्रतिनुं जेवारें झायोथाय तेवारें क्षायोपशमिक स म्पकत्वनी प्राप्ति थाय, अथवा ए चार प्रतिनो जेवारें उपशम थाय तेवारे जीवने उपसम । सम्यक्त्वनी प्राप्ति पाय एवी रीतें ए प्रण प्रकारना सम्यक्त्व माहेलु कोइ पण सम्पकत्व प्राप्त पाय सेवा - श्रीतीपंकर देवनो प्रकाशेजो जे पुरुधर्म सेनेसाम्यो एम . कदेवाय ते पाम्याथ। तेन स्वयमेव साइचारा सत्पन्न थाय . यापारा- था, महारो देह मे ते क्षणनगर , विनाश शील , एनो विनाश करवा माटे घणा रोगाविक शत्रु तत्पर थरदेला , माटे एने वधार टफी रहेवानो, नरोसो न राखता जे का माराथी थाज शुनरुत्य यतु होय ते काल उपर न राखु, परतु, श्राजज करु, चार दिवस पागल किंवा पाउल पण थवश्य मने ए मुफी जशे तो एना योगेकरी दु जेटलो प रोपकार करी शक तेटलो तो एमाथी लाज लइलेद'३ मातो एकाइ महारु यवान नथी, माटे महारे एमाथी जे सार काहाडी लेवानुं जे ते नहीं कादी नेता तेने शावास्ते व्यर्थ गमावू एवं तत्व ग्रहण करी मनरूप मदिरने विपे विवेक रूप दीपकने प्रकाश करतो सहर्तन, उ दारवृत्ति, सद्गुरुनो समागम, सस्तगति, सवयता, सधर्मनिष्ठा, परोपकारबुदि, इत्यादि व नम प्रकारना विचार तेना मनमा प्रवेश करे तेना योगे तप, जप, पडिक्कमण, पोसह, व्रत, नियम, पूजा, प्रनावना, तीर्थयात्रा, साधर्मी वास्तव्यादि अनेक गुनरुत्यो सेवन करी वेवट धनधान्यादिक नवविध वाह्य परिमद तथा क्रोधादिक चौद प्रकारनो थन्यंतर परियद वे तेनो त्याग करी पंचमहावत थावरी, चारित्र ग्रहण करी कृतकृत्य थाव ए मदारु मु ज्य कर्तव्य वे एवा विचार तेना मनमा निवास करी रहेला होय , ते प्राणी गुन श्वानुरूप पोतानुं वर्तन राखी, थतकाल पर्यंत यथाशक्ति सत्कर्मो करी, सर्व मुखे मगल वोलावी, था, सृष्टिमा पोतानी कोर्निने यमर करनारो थाय ले पनी ते धनवान दो किंवा निईन हो। एवा पूर्वोक्त नियमपूर्वक था हुँमाधवसर्पिणी रूप पंचम कालने विपे चालनारा मनुष्य रुप रनोनी सख्या घणीज स्वप जाणवी यद्यपि पूर्वोक्त उदारवृत्ति, सदयता, परोपकारखुक्षि इत्यादि शुनरुत्यो तो धन्यवर्शनीम पण थनेक जीवो करे ते खरा, परंतु सम्यक् ज्ञान न होवाची ते मात्र तेमने सांसारिक सुरक नुं कारण रूप थाय , पण थारमधर्मनी लखाण विना परंपरायें मोक्ष प्राप्तिना हेतु रूप थता नथी, केम के तेमना धर्म प्ररूपकपण सर्व राग वेपनी वृत्तिवाला, तेथी ते सत्प कहेवाय नहीं, सत्यधर्म तो जेने राग पिनो यनाव थइ गयेलो जे, एवा श्रीतीर्थकरदेवनो प्ररूपेलो ने तेज जाणवो ए वात श्रनुनवसिम , ते विपे थाशका तथा समाधान कर वाने थान्दानी सरखी प्रस्तावनार्मा स्थल थापत् व्याजवी कठेवाय नही त सत्यधर्म पामवानी अनिलापा करनारा विवेकी जनोयें प्रथम तो गुरुथादिकना मुख थकी थनेक प्रकारना शास्त्र श्रवण करयामा दरदमेश तत्पर रहेतुं जोश्ये शास्त्रो सनिलवा, तया जे शास्त्र पोताने वांचवा नणवां योग्य होय ते पोते पण वाचवों तथा नगवां कदापि सांसारिक धंधा रोजगारना प्रपंचथी जो वधारे अवकाश न मली शकतो दोय तो नित्य बे घडी, चार घडी पर्यंत जेटलो अवकाश मली शके, तेटलो वखत शास्त्र श्रवण करवं, त्यारपली ते श्रवण करेला श्रुतनु मनन करतु, त्यारपडी तेनुं निविष्यासन करवु ए शास्त्र प्रवण, मनन, निदिध्यासन जे वे तेज पूर्वोक्त सम्यक् दर्शननी प्राप्ति कराववानां शुन हेतु , माटे ते सपादन करवा सारु ज्ञानप्रद बने जीवितने सफल करनारां शास्त्रोसांजलवानो म्यम करवो तेमा कोइ अम्पपुण्यवानने कदापियाजीविकादिकना जयपी सांसारिक प्रपंचना योगेंधव कास न मजी सकवाची जो प्रतिविवस शाम नणदुं वाचवु, बने अषण करई न न सेयरमी - प्रकारना विचित्रोपदेश थापनारा थनेक स्तुतिपात्र ग्रंथोनुं श्रवण न यश् शके तेवारें पोताना पूर्वस्त थसुनकर्मोना उदयने धिकारी पश्चात्ताप करीने पण परमेश्वरे वतावेला श्रीपर्युपण पर्वना दिवसोमां था कल्पसूत्रतो अवश्य सांजलवु एम सांजलवाथी तथा पूर्वोक्त पचा चाप करवाथी पण अनेक प्रकारना पूर्व सचित झानावरणीय कर्मनो बध त्रूटे , ते जेम जेम वध त्रूटतो जाय तेम तेम क्रमे क्रमे श्योपशमनी तारतम्यता थती जाय, तेना योगे शास्त्र श्र वणादि साधन पण सुलन थता जाय, तेथी कालातरे ज्ञानी थवानो थवश्य संनव थाय, ए थनुक्रम श्रनुमानथी निर्विवाद सिम डे था काला प्रथमतो धर्म शास्त्रना संनसावनारा सत्यप्ररूपक निर्मथी साधुनी जोगवा पण कोस्थले को कोइथवसरेज मले डे, तेम बता जो सनलावनार मती थावे तो सांजलनारा मलवा मुश्केल ।। वली दाजना समयमा घणे स्थले तो यतीनो निवास दीगमा थावे , ते यति पण जेटला आवकोने रद्देवाना स्थानको ते सर्व स्थानकोमा मली श्रावे तेम नथी, परंतु तेटला गामो माइला पण जे महोटा मोटा शहेरो ज्यां घणा आवकोनी वस्ति दोय तेवा गामोमा म थावे वे एटले लगनग जेटला श्रावकोने रहेवाना गामो थने शेहेरो थादिक वे ते माहेलाथाशरे शोमां जागना गामोमा यतियोनो निवास दीवामां थावे , दवे ते यतीयो जे वे तेमा पण व्याकरणन्यायादि शास्त्रोमा निपुण थयेला एवातो जाग्येज सेकडे मात्र वे यतियो निकलेवा कठण पडे; घाफीना बाएं रहे ते मांडेला श्री नागना यतियोतो प्रावकने पाहमण करवानी क्रिया सुधां पण समजी शके तेवा न होय, थने ISM पयपि पूक्ति सवारवृत्ति, सदयता, परोपकारखुदि इत्यादि शुनरुत्पो तो थन्यदर्शनीम पण अनेक जीवो करे ने खरा, परंतु सम्यक् ज्ञान न होवाथी ते मात्र तेमने सांसारिक सुरक नु कारण रूप धाय ने, पण थारमधर्मनी उखाण विना परंपरायें मोक्ष प्राप्तिना हेतु रूप पता नयो, केम के ? तेमना धर्म प्ररूपकपण सर्व राग वेपनी वृत्तिवाला, तेथी ते सत्य कहेवाय नहीं, सत्यधर्म तो जेने राग पिनो यनाव थइ गयेजो ने, एवा श्रीतीर्थकरदेवनो प्ररूपेलो तेज जाणवो ए वात धनुनवसिम , ते विपे थाशका तथा समाधान कर हैवाने या न्हानी सरखी प्रस्तावनाा स्थल थापq व्याजबी कहेवाय नही ते सत्यधर्म पामवानी थनिलापा करनारा विवेकी जनोयें प्रथम तो गुरुयादिकना मुख पकी यनेक प्रकारना शास्त्र श्रवण करवामा हरहमेश तत्पर रहे£ जोश्ये शास्त्रो सांजलवा, तथा जे शास्त्र पोताने वांचवा नगवां योग्य होय ते पोते पण वांचवां तथा नगवां कदापि । सासारिक धधा रोजगारना प्रपंचथी जो वधारे अवकाश न मली शकतो होय तो नित्य वे घडी, चार घडी पर्यंत जेटलो अवकाश मली शके, तेटलो वखत शास्त्र प्रवण करवु, त्यारपड़ी ते प्रवण करेला श्रुतनुं मनन करतु, त्यारपढी तेनुं निदिध्यासन करवु ए शास्त्र अवण, मनन, निदिध्यासन जे ने तेज पूर्वोक्त सम्यक् दर्शननी प्राप्ति कराववानां शुन हेतु दे, माटे ते सपादन करवा सारु ज्ञानप्रद धने जीवितने सफल करनारां शास्त्रोसांजलवानो म्यम करवो सेमा कोइ थपपुल्यवानने कदापियाजीविकादिकना जयपी सांसारिक प्रपंचना योगेंथव काम न मली शकबापी मो प्रतिदिवस शाम नणदुं यांच, भने प्रवण करई न बनी - माग्ना विधिम्रोपदेश थापनारा थनेक स्तुतिपाघ्र ग्रंथोनु अगर न थ शके तेवार पोताना पूर्वत थगनामोना सवयने धिकारी पश्चाताप करीने पण परमेश्वरे वतावेला श्रीपर्युपण नाप करवाथी पण अनेक प्रकारना पूर्व सचित ज्ञानावरणीय कर्मनो बध चूटे , ते जेम जेम बध घटतो जायतेम तेम क्रमे कमे क्षयोपशमनी तारतम्यता थती जाय, तेना योगे शास्त्र श्र घणादि साधन पण मुलन थतां जाय, तेथी कालातरे ज्ञानी थवानो अवश्य संनव थाय, ए अनुक्रम अनुमानथी निर्विवाद सिह ने था कालमा प्रथमतो धर्म शास्त्रना सनलावनारा सत्यप्ररूपक निZथी साधुटनी जोगवा पण कोश्स्थले को को थवसरेज मजे , तेम उता जो सन्तावनार मली थावे तो सांजलनारा मलवा मुश्केल ।। वली पालना समयमा घणे स्थले तो यतीउँनो निवास दीगमा श्रावे , ते यति पण तेटला गामो जेटला पापकोने रदेवाना स्थानको ने ते सर्व स्थानकोमा मली श्रावे तेम नथी, परंतु माहेला पण जे महोटा महोटा शहेरो ज्या घणा श्रावकोनी वस्ति होय थादिक ने ते मां जी थावे के एटले लगनग जेटला श्रावकोने रदेवाना गामो थने शेहेरो ते यतीयो जे ले तेमा थाशरे शोमा नागना गामोमा यतियोनो निवास दीठामा थावे , दवे मात्र थे यतियो निकपूर्ण व्याकरणन्यायादि शास्त्रोमा निपुण ययेला एवातो नाग्येज सेकडे पतियोतो आवकने पाखा कठण थइ पड़े, पाकीना थधाएं रहे ते मांडेला थक्षी नागना मिए करवानी क्रिया सुधां पण समजी लाने के तेवा गामोमा माजी थावे ने यी पडिकमणादि क्रिया कराववानी तथा टवा प्रमुखना मंयो व्याख्यानमा वांचवा प्रमु स्वनी कलामा निपुण निकले तेटला यतियो श्रावकादिकोने धर्मोपदेश करे ते पण थोडाज गामोमा समजवू परंतु जे गामोमा यतिनी पण योगवा न मले तेवा गामडाँठमां नित्य ध्याख्यान सनिलए तो दूर रसु परंतु मात्र थारखा वर्षमा महामांगल्यकारी मदोटु पर्युपण पर्व थावे ठे, तेमां रोष दिवस पर्यंत श्रीकम्पसूत्र अवश्य सांजल जोश्ये त्यो सविद गीतार्थ महामुनिराजो के जेने सूत्र वाचवानो अधिकार दे, तेवा पुरुपोना मुखथी कल्पसूत्र प्रवण करवु, ते तो रडूं, परंतु साधारण यतियोना मुखथी सनिलवान पण बनी शके नही एवीरीते श्रीमालवादि देशोना गामोमा घरो स्थले थमारा वोठामा तथा सांजलवामां पण थाव्यु ले जे जे गामोमा वाचनारा यतियो थथवा गीतार्थ झानियोनो संयोग मजे , ते ते गा मोमा सांनतनारा श्रावको पण वधा सरस्खा न दोय केटलाएकने सिक्षांत श्रवण करवानी अभिलाषा होय वे ते तो अवश्य सांजलवा जाय, वली केटलाएक महोटा दिवसो ले माटे हमण थवश्य साजलq एम विचारी जाय, केटलाएक थापणा गाममा श्रापणे चार जण महोटा छेये ते सांजलवा नही जशी तो वीजा पण को सनिलवा जशे नही एवा हेतुथी जाय, तथा केटला एक वाक्षियता देखाडवा महान् प्रतिष्ठित बनवासारु जाय, केटलाएक देखादेखीथी जाय, केटलाएक समजण नही, परंतु मात्र धर्मना दिवस , एवा हेतुथी पण सोनलवा जाय इत्यादिक सांजलवा जवाना अनेक हेतु उता पण सांजलनारानी संस्म्या माप्र दशमो हिसो निकराती सके, अने बाकीना नवमा दिसा जेदना प्राणीतो एवा अज्ञ बोलतानलबामा कोरसमजेमनही तेममे तो बचा दिवसो पम करवामां अमे सां - सारिक मुखनी मोज मजादमाज थानव मानी घरमा वेशी रदेवानु गमे एवा घणा निकली यावे वर्तमान कालनु माहात्म्पज एवं बे के, धर्म प्रवण प्राणीमात्रने दोदिल्लु थाय । तथापि जे गामोमा सविज्ञ गीतार्थनी योगवाश्तो मलेज क्याथी परंतु श्रीपर्वना दिवसोमा कल्पसूत्र वाची शके एवो कोई यति पण मले नही, थने ते गाममा थोडा घणा पण पंजोसपना दिवसोमा कल्पसूत्र प्रवण करनारा तो जरुर निकली थावे,कदापि कोइ गाममा तेवी सख्या न निकली थावे तोपण धर्माध्यक्ष धर्माधिकारी पुरुषोनु साधारण धर्म बे के, तेवा गामोमा पण ते प्रकारनी प्रेरणा करीने थवश्यधर्मनी प्रवृत्ति कराववी जोश्येज हवे तेवा प्रवृत्ति करावनारा धर्मानिरुची जीवो पण थाजना समयमा विरला दीगा थावे जे, तेथी घणा स्थलोमा तो पर्युपण जेवा महोटा दिवसोमा पण कल्पसूत्र बिलकुल वचातुज नथी,अने जे जे गामोमा तेवा सानजनार छानरुची जीवो दोय , तो तेमने ज्यारे को सनलावनारो मलतो नपी, त्यारे ते श्रवण रुचिकर पुरुषो कोइ यतिने तेडीने कल्पसूत्र प्रवण करवानो उ राव करे , परंतु यतियो पण एवा होय ने के, जे गाममा पर्युपणना दिवसोमा रहे ते गाम माथी पांच पचाश रूपैया पेवा करवानी छा राखे एवा होय , तेथी ते श्रवण करनारा जे निकली थावे ते वली वीजा पोताना मित्र, हेतु किंवा सगा सबधि अथवा साधर्मि नाइ उने तेमज तेवा कोई अन्यजनोथी मिलाप करीने पांच दश जणने एका करी महाजनना शेतीयाने समजावी तेमनी मारफत श्रावकोनी पासेथी टीप करावी यतिने थापवा सारु पेसा एकग करे चे, ते एकठा थया पठी यतीने वदार गामथी बोलाववामा थावे जे, जे थावी पर्युपणना थान दिवस ते गाममा रहे थे, थने तेमां कल्पसूत्र वाचवाना दिवसोमा

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होय तो ते पोताने घेरन वेग थकां पण कल्पसूत्र वांची शके तेवाने माटे, अथवा कोई काने बहेरो दोय तेथी वीजानो करेजो उपदेश प्रवण न करी शके परंतु पोतें वांची जाणतो दोय तो तेने पण अंतराय न पडे तेमाटे, तथा घणा न्हाना न्हाना गामोमा मात्र पांच दश घेर श्रावकोना दोय ने तो तिहा कोइ यतिपण वांची सनलावनारो नाग्येज मले' तेवा गा मोना रद्देवासीयोने पण कल्पसूत्र सनिलवानो अतराय न पढे तेवाउने माटे, तथा घणा स्थले प्राधिकाउँ परिचि एटले पडदा थाहा राखीने वेसे ते बाहिर सांजलवाने अर्थे जो उपा सराविकमा जाय तो ते थाहो पढदो वांधीने धन्यस्थानके क्या जर वेशी शके' माटे पोथी होय तो तेपण घरमा वांची शके तेवी श्रावीफाउने अर्थे तथा तरतनी दीक्षित केटलिएक साधवी पण एवी होय , के तेमने जो सुगम बालावरोध करेलो दोय तोज वाचवाने थनुकूल थाय नहीं तो ते वांची शकवाने अशक्य थाय ने तेमने माटे इत्यादि बीजा पण श्रोताउँने विघ्न करनारा थनेक कारणोडे ते सर्व थरचण मटाडवाने माटे घणा मुनिरा जोने, तथा सविज्ञ पक्षीने, तथा श्रीपूज्य नद्यारक थचार्यादिकोने, तेमज घणा यतीयोने, घणा देसोना श्रावको थाज केटला एक वर्ष थया दरहमेस कदेतां आवे डे के, सदेला थी वचाय एवी रीते जो कल्पसूत्रनो बालावबोध करीने पावी प्रसिद कसो होय तो तेथी श्रोता जनोनी उपर मदोटो उपकार थाय, थने पूर्वोक्त दरकतो मटी जाय तेम बता कोश पण थाचार्याविकें तेम कहुं नहीं बेवट सवत् १९३६ नी शालमा श्रीविजयराजें सूरि मालवादेश मांदेला श्री जांबुवा नगरने विपे मास कल्प रह्या दता, ज्या मालवा, मारवाड तथा गुजरात थने पारकर मली चार देशना प्रावको तरफथी चार माणसोए कम्पसूत्र पण पोतानी पासे जेवी प्रत होय तेवी प्रत उपरथी सर्व सनाने यथामति वांची सनलावे त्यारे सानजनारा सनिली सके तिहां कोई कोई पोथी तो संक्षेपयीज वात लखेली दोय , श्रने कोश्मा यतिसंक्षेपथी कोश्मा मध्यमपी, कोश्मा तेथी विशेष तेमज कोश्मा उत्कृष्ट रीतें सविस्तर वात पण लखेली होय जे, हवे तेज गामा एक वर्षे एक यती थावे, थने वीजा वर्षे बीजो यती थावे, तो ते पीजी पोथी लश् यावी वांचे, तेमां वली कोई कयानाग उगोयधिको लखेलो दोय, ते सां जलीने अथवा तेज यती दोयने वीजे वर्षे धीजी पोथी जश्थावीने वांचे तो पण सांजलनारा वधाए प्रवीणतो दोय नही,के जेथी ते समजी जाय जे कल्पसूत्रनो मूलपाठतो १२१६ श्लो कनो , तेनो अर्थतो मात्र थर्थ करनाराऊनी वाक्परचनामा फेर पडे ते नले, वाकी ना वार्य धयो सरखो होय डे परंतु पालथी केटलाएक प्राचार्योये जे कथानाग वधारो , ते कोश्ये थोडो तो कोइ आचार्य घणो नाग वधारयो में; एवी वातना समजनारा थोडा होय, परंतु गया व तो था थमुक कथा सांजली दती तेमां थाटली वात न दती, अने या वर्षे थाटली वात केम वधारे थावी किंवा नीथावी,थथवा गया व था थमुक कथा वांचवामा यावी दती, यने था वर्षे ते कथाज केम न वचाणी ? एवी बाराकाठ करनारा घणा होय माटे तेमना मनमा तेवीअशका मुजवण करी नाखे ने तेथी तेमने महो? विचार थर पड़े ने माटे तेवा गामडीयामां जो एकज प्रकारनु जखेप्नु पुस्तक वर्षोवर्ष वचातु दोय तो तेमने कोई संशय उत्पन्न न पाय तेमने माटे तथा को वृक्ष प्रावक जरावस्थाने लीघे अथवा कोश रोगाविना प्रसंगपी चालीने उपासरा सुधी पण कल्पसूत्र सांजलवा माटे जा सकतो न दोय तो ते पोताने घेरज वेग थर्का पण कल्पसूत्र वांची शके तेवाने माटे, अथवा कोई काने घटेरो होय तेथी वीजानो करेलो उपदेश प्रवण न करी शके परंतु पोतें वांची जाणतो दोय तो तेने पण अंतराय न पडे तेमाटे, तथा घणा न्दाना न्हाना गामोमा मात्र पांच वश घेर श्रावकोना दोय ले तो तिहा कोइ यतिपण वाची संजजावनारो नाग्येज मले। तेवा गा मोना रद्देवासीयोने पण कल्पसूत्र सनिजवानो थतराय न पडे तेवाने माटे, तथा घणा स्थाले प्राविका परिचि एटले पडदा श्राडा राखीने वेसे ते वादिर सनिलवाने श्रर्थे जो उपा सराविकमा जाय तो ते बाटो पडदो बांधीने श्रन्यस्थानके क्या जर वेशी शके ' माटे पोथी होय तो तेपण घरमा वांची सके तेवी श्रावीकाउने गर्थे तथा तरतनी दीक्षित केटलिएक साधवी पण एवी होय बे, के तेमने जो सुगम बालावधोध करेलो होय तोज पांचवाने अनुकूज थाय नहीं तो ते वांची शकवाने अशक्य थाय तेमने माटे इत्यादि बीजा पण श्रोताउँने विघ्न करनारा अनेक कारणो ने ते सर्व अडचण मटाडवाने माटे घणा मुनिरा जोने, तथा संविदा पक्षीउने, तथा श्रीपूज्य नहारक थचार्यादिकोने, तेमज घणा यतीयोने, घणा देसोना आवको थाज केटला एक वर्ष थया दरहमेस कहेता थावे जे के, सहेजा श्थी वधाय एवी रीते जो कल्पसूत्रनो पालाववोध करीने बपावी प्रसि कस्यो होय तो तेथी श्रोता जनोनी अपर महोटो उपकार थाय, थने पूर्वोक्त दरकतो मटी जाय तेम बतां को पण थाचार्यादिकें तेम कहुं नहीं बेवट संवत् १३९ नी शालमा श्रीविजयराजें इसरि मालवादेश महिला श्री जांबुवा नगरने विपे मास कल्प रह्या दता, ज्या मालवा, मारवाड तथा गुजरात थने पारकर मली चार देशना श्रावको तरफथी चार माणसोए थानीने महाराज साहेबने कम्पसूत्रनो सुगम वालाववोध वनाववानी विनति करी ते सांजली महाराज कर्पु के थागत ए कल्पसूत्रनी थात दालो पंमित श्रीज्ञान विमलसूरियें जापा रूपे रचेलीबे, एवं सनिलीये ठेये माटे हवे विशेप सुगम करवानी जरूर नथी, तोपण श्रीसपनी तरफथी विनति करवा थावनारा माणसोयें कहूं, के ते ग्रंथमा थविरावली तथा साधुसमाचारी नथी माटे एक व्यारयान थोबु, श्रने वली वात पण सपथी कहेली के तेथी ते ग्रंथ थपूरो कठेवाय कर्यु ले के, "थधुरु म्यानसो म्यान नहीं, अधूरो नएयोसो नभ्यो नही, ॥ श्रधूरी रसोइसो रसोश्मा नही, अधुरो वृक्ष सो फले नही ॥ श्रघूरो फल पाको सो वरावर स्वाद नही, तिणमु संपूर्ण चादीजे" ते थाप महान्पुरुप गे, परमो पकारी नो माटे श्रीसघनी धपर कृपादृष्टि पूर्वक थमोये करेली थरजी कबुल राखो एवं सांजली महाराजे श्रावकोनी दस्तक चार पांच नमारामाथी घणी जीर्ण पुरातन जखेली चूर्णि, नियुक्ति, टीकादिक पंचांगीनी, वे चार अ६ प्रतो एकठी करावीने कम्पसूत्र नो वालाववोध करवा मांख्यो, ते तयार यया पबी केटलाएक आवकोयें तो ते प्रत उपर थी उतारा करवा मांमघा ते सुमारे पांच पचास उतारा पण थया वली पण उतारा करी प्रतो लखाववानी श्छा पणा जनोना मना हती पण लहिया तरत वखत उपर मली शके नदी तेमज प्रत लखी तयार करवाने पण वरसोना वर्प निकली जाय, एक प्रत पञ्चाश शाप रुपैया खरच करवाथी बनी शके, ते काम वधाने अनुकूल पडे नहीं मात्र तवगर शेत सानु कारोथी पनी शके, परंतु गरिव वाचनाराथी एटला पैशा खरचाय नहीं तथा वाली ते प्रत लखा वीने पठी शोधन करी थापनार पण कोइ मली शके नदी इस्पादिक अनेक प्रकारना विघ्नो लखावनाराग्ने माथे पडवाथी सर्व सज्जनोना मनोरथ पूर्ण थइ शक्या नही। त्यार पठी सवत् १९४२ नी शाला महामुनि श्रीकीर्निचरजी महाराज तथा महामुनि केशरविजयजी ए वे मुनिराजो ते साक्षात् जाणे चोथा धारामांहेला साधुना नमुनानी मू निज होयनी एवा शुरु चारित्रिया, पंचमहाव्रतना यथार्थ पालनारा साधुयें श्रीसीया णानगरमा श्रावी चोमासु कयुं अकस्मात् बनाव एवो बन्यो के गामश्री वागराना रदेवासी श्रावकोंने ते गामना सिरवार साथै कोइ प्रकारनो वांधो पच्यो तेने लीघे तेमने पण पोताना घर मूकीने गामश्री सीयाणा नगरमा थावी रहेतु पडघु एम ते गाममा वे गामोना श्रावकोनो जमाव थयो, श्रने साधु मुनिराजोनी जोगवा पण मली थाव्याथी त्यां घणा आवक प्राविकाठय सम्यक्त्वादि अनेक प्रकारना व्रतपञ्चरकाण कमा तेमा वली ते वखतमा विशेप श्रापर्य उत्पन्न करनारी था वात धनी के, ते गामना रेदवासी क्षत्री, चोधरी, घांची, कुनारावि घनेक प्रकारना अन्यवर्शनी तेमा वली यवन जोको थने ते गामना गकोर सदित पण साथे मली सम्यक्त्वादि व्रत धारण करवा मंमी गया एवी रीतें थनेक जीवो स्यां समकेत पाम्या वट जेनाथी का विशेप व्रत सेवू न बनी शक्यु, तो तेणे मात्र महारे था जन्मपर्यंत सूड न घालवानो, कोयें पंजोसपना थाठ दिवस पर्यंत धान न कापवानो, केटला एके रात्रिनोजन त्याग करवानो, कोश्य थाउम चौदों जी वहिंसा न करवानो, तथा गामना ठाकोरना नाश्यें तो जावजीव हिंसा नहीं करवानो एवा घणाजनोये नियम लीधा तथा नकोरे पोते पोताना घरमा जे बकरा तथा पाडा प्रमुख अनेक जातिना जीवो हिंसा करवा माटे राखेला दता, तेमने पण यनयदान थापी बूटा -BAHARHAARA करी श्रावकोना पंच खातानो जीवरक्षित पांजरापोल तेमां मोकली बाप्या इत्यादि रीते ते घोमासामा घणाज जीवो समकेत प्रमुख थनेक प्रकारना व्रतधारी थया, तेथी महोटो उपकार थयो, थने जैनधर्म यत्यंत देदीप्यमान सूर्य सरस्वो वीसवा लाग्यो तेमज वीजा पण सीयाणा गामना परगणाने थासपास धारे वालये फरता वीश वी श पञ्चीश पच्चीश कोशर्मा थावेला गामोना रदेवासी आवको माहेला घणा आवको पण स्थावर तीर्थ करतां जंगम तीर्थ वांववाथिसरम्यात गुण लान वघारे डे,एवं समजीने त्याहाँ विराजेला वे साधु मुनिराजोनी साये सावत्सरी खमाववाने माटे वदन करवा निमिचें थाष्मा एवी रीते घणा गामोना श्रावको एकग थया, तेवा अवसरे प्रसंगानुसारे मुनिराजोए पण धर्मोपदेशमा शानदान थापवानी तुलना करनार थन्य कोई दान नथी एवं व्याख्यान कां तेवारें सना महिला श्रावको योल्पाके, ए ज्ञानवानतो मुनिमदाराज थी थइ सके , परंतु श्रावकोथी काइ पनी शकतु नथी ते सांजली मुनिमहाराज वो ल्या के, पुस्तको लखावीने जे जे ज्ञान जवानी तथा वाचवानी रुचीवाजा होय तेमने थापवाथी तथा ज्ञानना उपकरण थापवाणी, तेमज ज्ञान नानाराउने थनवस्त्रादिकनु साहाय्य थापवाथी, वीजाने नणाववाश्रादिकथी श्रावको पण परिपूर्ण ज्ञानवान करी शके ने एवात मुनिना मुस्वयी सनिलवा पनी तेज दिवसें रात्रिना वखते श्रावको सर्व एका यया तेमणे एवो तेराव कोके पंजोसण पर्वमा कम्पसूत्र सांचजवाने तथा बीजा पर्वोमां जे जे पर्व ज्यारे थावे जे तेवारे ते ते पर्वनी कथा सांजलवाने घणा प्रावकोने अंतराय परे ने, माटे थापणने प्रथम नागमो तो पूज्य नहारक श्रीविजपराजेयरिये बनावेजा कल्पसत्र नो पालावबोध ने ते उपाववो थने वीजा जागा दीवालिथाविक सर्व पर्वनी कथानो पा लावरोध उपाववो, तथा त्रीजा नागमा वली कोइसर्व संघने उपयोगी अथ दशे ते विचार क रीने उपावी एवीरीतें गामश्री सीयाणा तथा गामश्री वागराना श्रावक पंचो मलीने कबुलात थापीके जे पूर्वोक्त ग्रंथो बगपवातो खरच लागशे ते अमो थापीयं तेनो व्याज लश्यं न दी थने उपायला प्रत्येक पुस्तकनी शो शो नकलो तो निर्यय साधु तथा असमर्थ श्रावको जे वाचवानी रुचीवाला दोशे तेमने मफत थापशु एवो तेराव करीने उपाववा सबधी का मकाजनी तथा शो शो नकल कोने मफत थापवी तेनी तपास करवा माटे शा रतनाजी वाघाजी गामश्री थाहोरना रेवासी श्रावक वे ते घणुज प्रामाणिक, नीतिमान, विवेकी, माह्यो, दयालु, जरोसावार, विश्वासुथने शास्त्रज्ञ माटे तेने थधिकारी तेरवीने प्रथम श्रीकल्पसूत्रनो वालाववोध बापवाना फामने मदत थापवा माटे टीप नरवा मामी तेमा मदतकरनारा आ वकोनी सख्या घणीज महोटी थवाथी प्रावक केसरीमन कस्तुरजी गामश्री सीयाणा वाला ये कहुं के जो वीजा मादक ए पुस्तकोने नारा थशे, तो तमोयें ममावेला पुस्तकोनी संख्या मां फाला प्रमाणे प्रत्येक पुस्तक रास्वनार घणीने पुस्तको कमती थापी ते वात सर्व टीपमा नाम दाखल करनाराये मजुर राखीने सना विसर्जन थइ ते दिवसें श्रीसंघे करेला तेराव ने श्रनुसरीने में था पुस्तक श्रीमुबईमां आवक नीमसिद माणकनी मारफत उपायु ले दवे था अथ श्रीपर्युपणाना दिवसोमा वांचवानो माटे दालमा मदारा दीनामा श्रावेली प्रवृत्ति मुजब केटलाएक श्रावक थने साधुऊनी जे उलटी थाचरणा पंजोसपना दिवसो मां पण सुधरती नथी ते दवे सुधारी सेशे एवी थाशा राखीने प्रथम तेमनी थाचारणा । फदी देखाई बु जे विवसोमा प्रत्येक सम्यकदृष्टी जीवोने परस्परसमा उत्पन्न थयेलो वै रविरोध ते,सर्व मन,वचन कायायेंकरी टाली नाखवो जोश्ये,जे विवसोमा प्रतिक्ष्ण धर्मध्यान मां प्रवृत्ति करवी जोश्ये, जे दिवसोमा हर इमेश संवरनावमा रहेषु जोश्य, जे विवसोमा व नम प्रकारना वैराग्य दशाने स्फुरण करनारा, एवा महान्पुरुषोना रचेला शास्त्र प्रवण करवा जोश्ये, जे दिवसोमा राग हेप टाली शत्रु मित्रने समजावे गणवा जोश्य, जे विवसोा पद् काय जीवोनी जयणा राखवी जोश्य कारणके स्वानाविक पण आवकनो श्राचार ए जे जे को ३ पण कार्य करवू ते जयणायुक्त उपशमनावसदित करवं, तेवारे पंजोसण जेवा सर्वोत्तम प मां तो वस्ती उपशम नाव अत्यंत विशेप राखवानी बावश्यकता ने तेम बता पंजोसण जे वा महोटा दिवसोमा पण थापस थापसमा एक कदे के मदारो गड महोटो तो बीजो कहे शे थमारो गठ महोटो एम गधने माटे ज लडाई करी विरु६ वचन बोली क्लेश सस्पन्न करी नाखे, वजी एक कहेशे के तमे चोथनी सवस्सरी करो बो माटे जैनमतथा विरुड़ चालो वो, वली वीजो कदेशे के तमे पांचमनी सवत्सरी करोबो ते जैनमतथी विरु६ करो बो, एक क देशे तमे उगमती तिथी योगे, तो पीजो कहेशे तमे थाथमती तिथी ब्योडो, तेमज एक कहेझो के देरासरनो था थमुक पूजारो राखवो तो बीजो को अमुकने राखवो, वली सा मिवात्सल्य जीव दयाना उत्तम प्रकारना कार्योने माटे तेमज गोरजीनी पटीने माटे, वास क्षेप नाखवाने माटे पण टीपणी फरती करे ते वखत पण एक बीजानी पासेयी कमती जा स्ती रकम जराववाने माटे में एटलु थाप्युं तो तमे एटल्लु थापो नहीं तो हूँ अमुक रकम नही अापीश, छ पण अमुफज रकम आपीश एवीरीतें एक पीजानी साथे केशकारी वचन बोले घणुछ कहीये, परंतु थारखा वरसना जे वरवर्वाधा होय ते पंजोसण जेया महोटा पर्वना विव सोमा थावी उना करीने कजीयो उत्पन्न करवानु कारण नीपजावे वास्तविक रीतें जोतां श्रावकोने तो गठ ठेज नही जो गठजे तोपए साधु थायी सिद्धांतोमा गध कह्याने पर तु श्रावक थायी को स्थानके सिमांतोमा गछ कह्या नथी माटे गछोने वास्ते लडाइक रीने पंजोसणना दिवसोमा शुक्रिया करवी पडी मूकी तेने बदले कलहकरण रूप किया तो थपश्य नज करवी जोश्ये तेमज वली जेनी मरजीमा जे थावे ते धणी पोतानी अक्षापूर्वक तेटला नाणा टीपणी प्रमुखमा नरी थापे किंवा न पण जरी थापे तो तेथी शुगेरफायेदो थयो' पोते पोतानी उदारतासहित जेम बने तेम शुनक्रियामा वधारे व्य खरचयूँ ते पण पोतानी लघुता वर्शायता उतां खरचतुं, कारण के बनता सुधी जो गुप्त रीते परोपकारमा खरचा तु दोय तो वली घणुज रूई समजवू समजु श्रावकें तो पोतानु नाम राखवानीपण अनिला पा न राखवी, परंतु वेवट कोरीतें बूटी शकातुं न होय, तेवारें पोतार्नु नाम थापवु पडे तो नने; नहिं तो मात्र नामनाने माटे इष्य खरचीने थल्प फल प्राप्त करी लेवू नही चली था कल्पसूनने सनासमझ वाचनारे केवी रीतें वाचवु ते सवधि केटलो एक खोला सो यद्यपि प्रथम था ग्रथना प्रारंनमा लखायलो ने खरो, तथापि वली कांक वाचनारने विशेप नलामण करवानी रजा सश्ये बैये के, प्रथम तो वांचनार जे दोय ते श्रीवीतरागना वचन उपर पूर्ण प्रक्षालु होय, वीजु देशकालने अनुमाने यथाशक्किये कोपण प्रकारनु व्रत करेलु होय, त्री सनासमझ जे दिवसथी वांचे ते दिवसथी मामीने ज्यासुधी पूर्ण करे त्यां सुधी सचिन वस्तुनो त्यागी होय, चोषु वांचे तेटला दिवस ब्रह्मचर्यनो पालनारो होय, एवो पुरुप पोसह थथवा सामायिक लश्ने, बागल शुक्ष वाजोट राखी तेनी उपर कवली स्थापी ते उपरे वट्ट यझा सहित, विनयपूर्वक पुस्तक राखीने पळी सांजलनाराउनी सना एकठी याय तेवारें पीजो एक बाजोट मूकेलो होय तेनी धागज पांच पञ्चीश वायो गीत गाती यकीयावी ने प्रयम ककुन स्वस्तिक मुदली करी तेनी ठपर घोखा शालिनुं स्वस्तिक मुदती करे ते गुंदली करीने वाश्यो तथा माणस सर्व ज्यारे पोतपोताना योग्य स्थानके वेसी जाय त्यार पठी वांचनार जे दोय ते प्रण वार पुस्तकने नमस्कार करे, पढी सनासदित पोते म्नो थश्ने ए क नवकारनो पाठ कहीने “पुरिमचरिमाणकप्पो०" ए मगलापरणनी गाथा सपूर्ण कदीने पनी नीचे घेसी मुख थागज मुखवस्त्रिका राखीने सनासमझ वाचना करे, परंतु उघाडे मु खे वांचे नही ते पण काल वेलाये वांचे ते थावी रीते के सवारना सात वागाथी ते थगी बार वागा पर्यंत वांचे, बने फरी मध्यान्हे धार उपर एक वाम्याथी मामीने साजना चार वागा पर्यंत वाचे एवा प्रकारनो विधि जेटला दिवस वचाय तेटला दिवस दररोज करवो एम करी घराबर मुक्तसर आठ वाचना तो थवश्य पूर्ण करवी बने थविरावली पहावली जो तेटला दिवसमा संपूर्ण न वचा काय तो ते पंजोसणना बीजा दिवसें वयाय तो पण कांदरकत नथी एवी रीतें वांचा कदापि एक वांचनारनो वाचता वाचतां घांटो घेसी जाय, अथवा बीच कोई निमित्त बनी थावे, तो ते स्थाने वीजो जे अकालु वाचनार थावी वेशे ते पण पूर्वोक्त विधिसहित वांचे या सना समक्ष वाचनारनो विधि कह्यो हवे जे पोतानी मेले मना वांचीने धारी राखतो दोय, अथवा पोतें वांचीने पोता नेन सांजलवु दोप, तो तेणे पण मुखवस्त्रिका थारी थापी पवित्र थश्ने अकाल वेला टाली कवली उपर पोथी राखी वाचवू ए शुजफलनी देनारी उत्तम प्रकारनी वाचवानी रीत श्रा ग्रंथमा जे जे स्थानके जे जे विपयो उपर कथा-थावेली, त्या त्यां ते ते कयाऊना संबंध मा जे जे घनाव वनेसा वे तेना चित्रो पण स्थानके स्थानके दाखल करेला ले एवा सर्व म जी चौरासी चित्रोनो समावेश करेलो , तेमा थमारा तरफयी केटला एक चित्रोमा नूलो यये लीले एक तो श्रीमहावीर जगवानने देवानवा ब्राह्मणीनी कुक्षीमाथी दरणी गमेपी देवतायें जे वखत संहस्सा ले, ते वखत जन्मेजा वालकना जेतुं तथा दारादिक थानूपणोये करी युक्त नगवाननुं रूप दर्शावेलु मे ते रोकारो एवी थाकति करवी जोश्ती न हती, परंतु व्यासी दिवस गर्नमा रहेला वालकनो जेवो श्राकार थाय जे तेवी थारुति थानूपणोदित करवानी हती, तथा वली एज गर्न त्रिशला राणीनी कूरखमा संक्रमाववाने वखते पण तेवी ज थारुति करवी जोश्ती इती, वीजु जे वखत नगवान् श्रीवीरस्वामीने ६ महाराज मेरुप वतनी उपर पहुंकवनमा जन्मसंबंधि महोत्सव करवाने लश् गयेला ते वखत शना खो लामा साडीने नगवाना पगनो अगुठो मेरुपर्वतनी उपर राखी जाणे ते थंगुठो मेरुपर्वत ने दावतो दोय ? एवा थाकारमा स्नान कराववानुं चित्र करतुं जोश्तु हाँ, तेने ववले श्ना खो लामा थाहो सुवारी मूकवा जेवी श्राकृति बनीगयेजी डे ए पण चित्रमा नूल थयेली ने तथा वजी केटलेक तेकाणे जे वखत जेवा थत करणना विचारमा जीव होय ते वखत तेनी मुखमुज्ञ तथा शरीरना अवयवो पण तेवाज करवा जोयें तेने पदले तेवी मुखाकृति बने शरीरना बीजा जागोना थवयवो न धनेला जेवा चित्र पण थइ गयेला दीवाना थावे जे ते सवधि थमाराधी थजाणपणे जे जे नूलो विवेकी सज्जनोने चित्रोमा दीनामां थावे ते सर्व नूलोनी क्षमापना चित्र थवलोकन करनारा चतुर जनोनी पासेथी दु मागु था कल्पसूत्र मूल पावे १२१५ श्लोकनी सत्यानुं श्रीनश्वाहु सूरिये मागधी नापामा गद्यरूपें रचेज वे तेप्रथमतो मात्र नाइपद शुक्ल पंचमीना दिवसें साधुजनोज वांचता दता ते संवधि वात प्रथमा थाची गयेली , परंतु जेवारें थानवपुरनगर के जे दमणा वडनगरने नामे उसखाय ते नगरना ध्रुवसेनराजा तथा वीजा पण घणा प्रावक श्राविकादि चतुर्विध श्रीसधनी समक्ष था सूत्र वाचवानी चाल प्रवृत्त थई ते वस्वतथी श्रीपर्वना दिवसोमा प्रत्येक गामोगामे ज्या ज्या श्रावकोनी वस्ति धणी होय त्या त्या साधुजनोए एनी वाचना करवा मामी, परंतु ते वखतमा धाय साधु सस्कृतादि नापामा निपुण दता तेथी ए उक्त सूत्रनी टीका, चूर्णि थाविक संस्कृत नापामां करेली दती ते वाचता दता, तथा पली पण घणा कालपर्यंत वाचनारा तेज नापामा वांचता हता परंतु ते वखते घणु करीने टवा तथा पाजाववोध करवानी जरूर पडती न दती एवीरीतें एक था कल्पसूत्र नही परंतु थग णित मथो जे जैन संप्रदायमा प्रवर्तता दता ते बधाय ग्रंथोनी रचना मागधी अथवा सस्कृत नापामांज थती दती ज्यारें कमे कमे संस्कृत नापाना थन्यासी साधुनी न्यूनता थवा मामी तेवारें घणाएक मागधी नापामा थने सस्कृत नापामां वनावेला ग्रंथोनी अपर पंमित जनोये टवा नरवा मांमधा तथा केटलाएक ग्रंथोना वालावबोध करवा मामघा एवी चाल घणु करीने विक्रम संवत् चौदशेना शतकथी वधारे पडेली दीगमां श्रावे जे तेमां पण घणा मथोनी उपर घणु करीने गुर्जर जापामा मात्र यदार्थ रूपे टबा करेजा तथा केटलाएक ' ग्रंथोना कांक यदार्पथी विस्तार करीने टवा करेला थने केटलाएक मेयोना सस्कृत टीका उपरथी जाणे गुर्जर नापामा टीकाज बनावेजी दोय, एवी रीतना घणा विस्तारपूर्वक बाजा ववोध करेजा दीवामां थावे जे तेमज सस्कृत भाषामा ययेली टीकाउँथी को कोई स्थाले व थवा सर्व स्थळे न्यूनाधिक बालावबोध थयेला पण कोठामा थावे जे एवी रूढी जेम गुर्जर नापामा वधारे पडेजी देखाय ने तेमज दिउस्थानी नापामा थने मारवाड मेवाड वगेरे अन्य देशोनी नापामा तथा एक, वे,त्रण, देशोनी मित्र थयेलीनापामां पण केटलाएक ग्रंथोना टबा थने बालावयोध घनेला देखाय तेने लीघे सस्कृत नापायी अज्ञात रहेला जनोने अथो वांचवाने अनुकूलता थती गई, तथापि अद्यापि सुधि जे कांश पूर्वाचार्योए सस्कृत श्रने मा गधी नापाउंमा थगणित ग्रंथो रचेला ने तेमाना वशदजारमा नाग जेटला ग्रथोना दबा तथा वालाववोध थयेला नथी हजी एएएए मा नाग जेटला ग्रंथो लगनग टया तथा बा लावबोध कया विनाना शेप रहि गयेला तेनो बालावबोधादिक करवानु काम धागल पंमि त जनोना विचार उपर थने मेहेनत उपर श्राधार राखे में एवीरोतें ए कल्पसूत्रना पण जदा छुदा अनेक साधु टया तथा बालावबोधाविक रचता गया तेमां मूलपाठ उपर तो टवा नरेला होय घने पीजी प्रसगे थावेजी वातो तथा कथा ते वालबोध रूपे लखेली होय पण जे प्रतमा मूलपात लखेलो होय ते प्रततो विगयादि त्यागी योगवहन करनारा सा धु सिवाय अन्य कोश्यी वांची शकाय नदी माटे पूर्वोक्त सर्व कोश्ने वांचवाना काममा थावे एवा हेतुथी श्रा प्रथमा मूलपाठ काहाडी नावीने मात्र ते मूलपातना संक्षेपथी अर्थ जश्ने तथा टीकाकारना थाधारथी केटलो एक कथानाग प्रमुख जश्ने श्रीविजयराजेश सूरिये वधो मजीने ५५०० श्लोकनोथासरे वालाववोध रूपे ग्रंथ रच्यो पण तेमांवली घणी कथा तो पजत दतीज नही तेमज यीजी पण पामो पारोजी प्रतो साथे मेजवां केटलिक वातो न्यूनाधिक दोगमा यावी माटे घोजी ये पण कापयशोगाउपानी प्रतोनो थाधार जश्ने तेमा गपनार प्रापक नीमसिह माणेकें पधारो कयो रोधी आपागाग अगीपार हजार लोक सख्या जेटजो थर गयो दजी पण थपिरायणी पवावी यगैरेगा पणी गात वधारे जखपानी हती पण थोडा विवसना व्याख्यानमा पूर्ण थइ शके पानी सेगा जगशी परती मुफी देवी पडी , तथा वली श्रीपार्श्वनाथस्वामीना परिनमा तेमज पीजे पोचतोक स्मारके पन्य प्रतोमा लखेजी वातोथी तदन वीज रोते अने यति संदेपमा महाराज साणे गातो पारखी कादाडी दती ते मादजी घणा स्थले तो फेरवी नाखेजी , परंतु टिपाएफ स्पाराशग दोगथी तथा महाराजने कागज लखी जुधाव मगावपाथी घणा विवस गपगा फागा पडे तेम न वनी शकमाथी एमज रेदेवा दीधी ने तेमज गपनाने घणी शतागपा -माटे पधारे शोधन पण पर्यु नथी, तथापि जेटलु बनी शम्मु तेटतुं यत्किंचित शोधन पण तुं ने ली मारवाड, गुरनर तथा द्विस्थानी मजीत्रण जापार्य मिश्रित या ग्रंथ महाराज ते पनावेनो दतो, परंतु तेमां घाणा पांचनार सादेयोने पांचता कंटालो उपजे कदाचित यथार्य अर्थ न बेगे, तेथी ते नापा समारीने आफशा नीमसिंद माण घाण करी ज गुर्जर नापार्मा जम्मीने नाप्युं ने तोपण दुजी को कोई स्थाने मारगाडादि देशोनी पार्य मिश्रित ययंनी नापा रबेनी दो तथा कोइ कोइ गातो पण अपूर्ण रोजी दरो ते ज पुनमक्ति पाग घणा स्थान दीठामा थारशे ते सर्व पांचनार सड़ानोयं सुधारी वांगk था ग्रंथमा गोधनार श्रावक जीमत्सिदमाकनी नजर चूकषी तथा बुधिनी मंदताषी तथा लखावी मोकलेली प्रतमा लेखकना दोपथी जे जे जूलो वीठामा धावी ते सर्वनु सक्षिपत्र पण गाम श्रीथरादयी पारेख थंवा मोतीच करी मोकप्लेलु , ते प्रमाणे थहीं बापी मुक्युं , तथापि ते दिपत्र फरी पाबु प्रत साथे मेलववाने फुरसद न मलवाथी तपासवामा थाप्यु नथी, तेथी तेमा पण बधी पुरेपूरी चुको दाखल थ गयेली दोय एम जणातु नथी, माटे एवी नूलो सबधि जे कांई खामीयो रहेली था ग्रथने विपे वांचक जनोने दृष्टिगोचर याय तो ते साहेबोये थमारा उपर कृपादृष्टी राखीने सुधारी वाचवी थमे था प्रथमा रही गयेली नूनोसबंधि ययेलो थमारो थपराध तथा बीजोपण जेकांश श्रीजिनवचनविरुप था ग्रथमा लखाण कसु होय ते सर्व मिष्ठाउकड सर्व श्रीसघनी साथे करीये वैये तथा ए ग्रथमा जे वक्रजहादि उपर दृष्टांतोनी कथा श्रावेली, तेमज वीजा पण घणा स्थाने कथा श्रावेली , तेमां दी जुदी प्रतोनी लखावट उपरथी फेरफार दीगमा श्रावशे माटे प्रथम कल्पसूत्र सनिलनारा साहेवोये कोई जगायें कथा विस्तारपूर्वक सांजलेली होय थने ए ग्रथमा सपथी लखेली दोय, थथवा प्रथम को जगायें सक्षेपथी कथा सांजलेली दोय श्रने था जगायें विस्तारपूर्वक लखेली होय थथवा ते कथाना संबंधां पण को वार्ता कोक प्रतमा एक रीतें लखेली दोय थने तेज वार्ता वली पीजी प्रतमा बीजी रीतें लखेली होय तो, ते सर्व जुदी लदी प्रतो लदा जुदा साधुऊना हाथथी बनावेली दोवाथी तेमज जुदा जुदा माणसोना हाथे लखायाथी परंपराये एवा प्रकारनो फेरफार चाल्योज थावे , माटे तेगा तेवा फेरफार जोश्ने कोइ वाचनारे थयवा सानलनारे एमां नूल थयेली डे एम समजीने मनमा सशय थाणवो नही नि सदेह थश्ने एकाग्रचित्तें सांजलवु बनी थमो सर्व प्रावक लाने महोदा उत्साहपूर्वक प्रार्थना करीयें ये के, था कल्प। सूचनी जो वधारे प्रतो न राखी शकाय तोपण प्रत्येक प्रावके एकेकी प्रत तो पोतानी पासें। थाश्य राखवी केमके' था पुस्तका महा मांगलिकना करनारा एवा चौद सुपन जे श्रीतीर्थ कर नगवाननी माताने जे वरखते नगवान कूखमां थावी उपजे जे, ते वखते बीतामा थावे , ते चौदे सुपनानां चित्रो घांज सुशोनित बनावी दाखज करेला , तेमज वली प्रत्येक वर्षमा पंजोसणपर्वना थात दिवस लगण प्रत्येक प्रावक धधो रोजगार सर्व मूकी वेश्ने धर्मसर्वधि जे जे नक्रिया नगवाने कहेली ले ते करवामां तत्पर रहे , तो तेमने तेवा महोटा दिवसोमा यद्यपि गुरु पासेथी सनिलवानी जोगवा मलती होय तो पण फरी पोताने घेर थावी श्रवगाही सेवाने माटे प्रत राखवानी अवश्यकता बे, तेमज जेमने गुर्वा दिक पासे सांगतवानी जोगवा न मले ते सादेवोने तो जरूर वाचवा माटे राखवीज जो यं यमो तो जैन धुने एवी नजामण करीयें ये, के प्रत्येक प्रावके वधाय पुस्तको लस्वा वी तेनो सग्रह करी राखवो जोश्य जो कदापि तेटलु इथ्य खरचवाने सामर्थ्य नही होय तो मात्र थाजना समयमां बापाखानानी कजाथी तस्वेला पुस्तकोना किमतना पञ्चारामा हिस्सा जेटली किमते सारा शोघेजा थने लखेजी प्रतो करता हजार वरजे चडतां एवा पु तको मली थावे तेटला तो जरूर पोताना घरमा रास्ववाज जोश्ये, पण थापणने वांच ता तो थावडतु नथी माटे फोकट पुस्तक राखीने शें करीयें नकामा पही रहो, थापणथी सचवाय पण नदी, उलटी झाननी थाशातना याय, वली कागलो उपर नकामा पेशा को ण खरचे? कागलोतो काले शडी जाशे एवा एवा अनत ससारने वधारनारा कुविकल्प क रीने पोते पण झाननो सग्रह न करवो, अने वीजा वत्ती पांच पचाशने उपर जरल्या मुजव जुठा उपदेश थापीने तेमने पण ज्ञाननो संग्रह करवा न वेवो एवी रीतना उपदेशका प्रावक ममलमा थाज वर्तमान कालनेविपे हजारो माणसो दीगा थावे जे, एवा थसम जस नाश्या हास्य विनोदमा पुस्तकोनो समद न करवा माटे लोकोने उपदेश करवायी धर्मरूप प्रासादनो पायो त्रोही नखाय , तेथी तेमने थनतकाज पर्यंत नरक निगोदाविना 5 ख स दन करवा पडशे, ते जो मने तेमनी मपर करुणा थावे , जे था विचारा मोहरूपी मदि रानु पान करी मदोन्मत्त थइ मायाजालमा फसी पडेला मदिरानी हाफमां श्रावीने पोताने नावे तेम वक्या करे , पण ते धर्मरूप धन साचवी राखवाने माटे मजूपासमान जे धर्मपु स्तको २ तेनो नाश करवानो मजवुत उपाय बतावे , तेथी धागल एना कटुक विपाक नो गववा पडशे माटे तेम न थाय तो सारु ए माटे तेमने सावधान करवा सारु कई ई के एवा असन्य यने परनवे महाकलहकारी 5 खोने उत्पन्न करनारा उपदेशो करवामां दवे तमारे सावचेत रहे जोयें एवो उपदेश तमारे मात्र वचनथी करवानोज वध राखनु एटलुंज नही परंतु तमे तमारा मनमा एवो उपदेश करवानी श्वा पण कदापि काले राख शो नही एथी धर्मरूप वृदनु उन्मूलन थइ जाय कारण के पुस्तको जणवा वांचवाथीज धर्मनु थथवा थधर्मनु जाणपणु थाय , तेनी तमे निर्नर्त्सना करो नगे तो पड़ी बीजो एवो कयो पदार्थ के जेना थाधारे तमाराथी धर्मनु स्वरूप जाण्युं जशे' तेमा वली थाटलो विशेप जे जे केटला एक साधारण गरिष अवस्थाने प्राप्त थयेला व पश्व्यवान् जे होय जे ते तो पोतानी यथाशक्तिये झान पुस्तको उपर प्रतिवर्षे पांच रुपेया खरच करता दीनामां थावे , परंतु जे व्यवान बे तेमने तो जाणे घोर निशा श्रावी गये जी दोय एवी स्थितिमा रह्या थका हान ते वली शं' अने पुस्तक ते ' एटलुं पण जर पता नथी तो पठी पुस्तको खरीद करी पोते लइ वांचवा, वीजा जे निर्दन जनो होय तेम ने यांचवाने माटे मफत थापवा, ज्ञान मारा करी राखवा, एवी वात तो जाणेज क्यांथी। माटे जे प्रमाणे नवा नवा श्री जिनमदिरो कराववामां इष्य खरचर्नु तेमा महोटो लान , ते वातो पण सर्व शास्त्रना थाधारथी जाणी जाय ले तो तेवा शास्त्रोनो समद करी तेना महोटा महोटा नमारा कराववा तेमा तो वली देरासरो कराववा करता पण थनतगुणो लान , तेम बतां ते वातमा थाशातनाविक दूषण काहारी खाडवा थने कोश्नु मन गावद् एना सरखं महोटामा महोटु पाप वजी बीज को नथी जो ज्ञाननो संमद करवामा अाशातना लागशे एवो बोलतां तमारी जीन घटकती नथी तो वली देरासर कराव वामां परा कोई अन्यदर्शनी भावी पुंक प्रमुख नास्वशे तो तेनीपण आशातना था माटे ते पण न करवा जोश्ये एम कडेवामा पण को वखत तमे मर रास्वशो नही ते विचारी जो जो मादे कोपना बागल कुतर्क करी कल्पित वातो बनावीने कद्देवाना कामथी दूर रहेजो प रमेश्वरेतो श्रीजिनचैत्य नवीन कराववा, पोपध शाला नवीन करावी, अने पुस्तकोना नवा नवा नमारो कराववा एत्रण पुस्पक्षेत्र थया,तथा साधु,साध्वी, श्रावक श्रने प्राविका ए चतुर्विध श्रीसंघनु वैयावश्च फरवू, ए प्रमाणे ए सातेक्षेत्र पुरस्पना डे, ते पुनक्षेत्रोमां आव के पोतार्नु न्यायोपार्जित इष्य खरच एवीरीतेंथागमोमा कहेलु , तो ए सात क्षेत्रमाहेज झानना नमारा कराववा, ज्ञान पुस्तकोनो सग्रह पोते करवो, बीजाने कराववानो उपदेश देवो, जे करतो होय तेने अनुमोदन थापवं, जे ज्ञानपुस्तकोनी वृद्धि करतो दोय, जे ज्ञान नवा मां वाचवामा, जणाववामा पोतानो काल निर्गमन करतो होय, तथा वन्यजनोने पण एज उपदेश करतो होय ते पुरुप सर्वमाहे शिरोमणी समजवो, तथा ज्ञानने पोते नए, बीजा जे नपता होय तेमने पोताथी बनतु यथाशक्तियें श्राश्रय श्रापवु, नणनार वाचनारने पुस्तको त ३ थापवा तेने अन्न वस्त्रादिक श्रापवानुं सहाय वेवं, इत्यादिक ज्ञानदि थवामां जे प्रावकें ६ व्य खरच ते पूर्वं कहेला सात पुण्यक्षेत्रो मांदेलु मुख्य क्षेत्र , तो तेवा शुनस्थानकमां कोई अजाणना कहेवाथी थथवा देश कालने थनुमाने घणा पुरुपोमा मान नही मले,एवा हेतुथी श्रयवा लोनदशाथी पोताने इव्य खरचवानो संकल्प न थाय ते तो चूको, परंतु पोते सारासार विचारमा निपुण न दोय तो पण माह्यो पनी पूलवा आवनारने, अथवा स्वनावे चार गपा मारनार वेग होय तेमनी पासे वातो करतां जो पुस्तकसमद करवानी वात निकलेतो कदेके नाइ था काममां थाशातना बद्गु लागे , था तो महापापनु काम डे, एमांतो प्रा एणी मुवी जाय, एथीतो सातमे नरके जवु पढे,अथवा ए पुस्तकोना समह करनारा, बपा वी प्रतिम करनारा, एने थनुमोदन देनारा, एनी प्रशसा करनारा ए सर्व नरकना थधि कारी थाय ते, ए महोटी याशातना करे बे, ए श्रनत संसार लटकशे, एनो क्यारे पण तूटको थवानो नथी, एवी एवी जे चार वातो पोताने वोलता थावडती होय, ते बोलीने वीजा प्राणीने पण पुण्यक्षेत्रमा व्य स्वरचवाने नाकारो करे, तेथी तेमनु पण मन उतरी जाय, वस्ती ते पण वीजा दशजनी पासे जइएवी वातो करे, तेथी पुस्तकनी वृद्धि करवा उपर कोश्न पण चित्त लागे नही तो एवा असत्योपदेश करवायी शं तेने फायेदो थाय ' एयी तो उनदु धर्मना नास्तिपणानो सनव थइ जाय कारण के कोपण धर्मनी प्रवृत्ति करवी थने ते धर्मने महोटा पाया उपर जाववो, तथा ते धर्मर्नु महत्त्व वधारलु तथा ते धर्मने सर्वदर्शननी वचमा दीप्तो करीने प्रकाशित करी राखवु तथा सर्व दर्शन मा मुख्य श्रने श्रेयस्कारी शिरोमणी करवो, तया घणा जनो थापणा धर्मने मान्य करे, घणा जनो थापणा धर्ममा थावी नले, घणा जनो श्रापणा धर्मने अंगीकार करे, घणा जनो श्राप णा धर्मनी प्रशसा करें, इत्यादि धर्मनी वृद्धि करवानुं मुख्य कारणतो ते धर्मसवधि धर्मपु स्तकोज ,थने वीजु तेधर्ममा महोटा विधानोनी सख्या महोटी दोवी जोश्ये ते विहानो थवानो मुख्यथाधार पण धर्मपुस्तकोज ,तो तेवा धर्मपुस्तकोनी श्रवगणना करी,तेने पडतो मूकी,ते नीजे वृद्धि करतो दोय ते पुरुपने सर्व पुरुपोमां शिरोमणी गणवो जोश्ये ते तो दूर रयु प ण उनदु तेने पतित करवा माटे तेना अपर थाशातना लागवाना दूपणोनो थारोप करी तेनी निवा करवी ए से थोडी सरमनी वात ' एथी जो पोताना धर्मनुं निर्मूलपण न थाय तो वली धर्म गमाववाना वीजा एथी वधारे साधनो कोण जे वारु' वास्तविक जोतां तो उक्त पुरुपो जे वे तेज पोते पोताना धर्मने दूपित करी पोताना धर्म रूप प्रासावना यननूत एवा जे धर्मपुस्तको तेनो जडा मूलथी नाश करवानो जाएँ। धंधोज लश् वेवेला ठे एवा प्राणीनी गणनामा तेमने गणवा माटे काइ पण हरकत देखा ती नयी, ते पुरुपो, खरेखरा स्वधर्मनिंदक, स्वधर्मघ्रप्ट, स्वधर्मनाश करनारा, अविवेकी, थन तो कालपर्यंत थपारावार ससारमा परिघ्रमण करनारा, स्वधर्मपी, ज्ञानपी, झाननी हेलना करनारा, धर्मध्वसक, क्रूरपरिणामवाला, अक्षारहित, विनयरदित, एवा जाणवां केमके जेरोशाननो विनय न करो ते वेव गुरुनो विनय पण क्याथी करे ? प्रस्तुत हान ज्ञानीनां निंदक जनोने थाटलो पण विवेक नयी के जमणवार करीन्यातो जमाही, सातमो पापस्थानकजे थर्दकार ले तेने धारण करी, जाणे कोइ नाचतो कूदतो होय तेवा गामा जेवा श्राकारमा वनी जश बकाय जीवोनो थारंन करीने वली तेने पुष्ट क रवा सारु थनुमोदन करे जे जूथा थमुक माणसे नातवरो कसो तेनां करतां मासै जम ण केनु वनी थाव्यु के तेवू थाज विवस पर्यत कोईयें करेलु नथी एम घरोघर वाश्योना टोने टोला मलीने वातो करता दता माटे श्रापणने- तो सद्गुयें वखाप्स्या, थापणे दवे खरचे व घी गया, थापणे महोटा थइ गया, एवीरीते विकारवत यश्ने जाणे दु धर्मिष्ठ महोटो का नी य गयो, थने दवे थाव कीर्नि थर, तेथी माठी गतिये जावानी वीक मटी गइ परंतु ते एम समजतो नथी, के वुदायोना मरणादि पाउल जे नातवराकरी जमण करवां, अने खा या खवराववाथी राजी थवु, नाराजी यदुं, एसर्व चाल निखारी ब्राह्मणोना घरथी चालेली, पण श्रावकोना घरथी चालेली नथी एथी मात्र बकायनो थारन थाय ने अनिमान वघे ए ने कर्म शिवाय जो वान बुद्धिथी अनुकंपा लावीने गरीव 5खी नूखे मरताने जमाडे तो तेयी शाता वेदनीय कर्म वांधी पुस्य उपार्जन करे नदी का था जवे मान मयुं एटलुज फल समजतु, थने पुस्तकोनु वान देवाथी तो लाखो माणसोना मननां परिणाम सुधरे, जे यो तेमनामाथी उर्गुणो दूर थइ जाय, सद्गुणनी प्राप्ति थाय, धर्म पामीने धर्म मार्गमा प्रनि करे, तेथी देवादिकनी गुजगतियोनां सुख नोगवी परपरायें मोक्ष पामे वली दान थापनारने पण वधारे श्रदकार न थावे थने सरलस्वनावी थको ते पण तरतज धर्म पामी परंपराये मोक्ष पामे ए शानदानसमान वीच कोई पण उत्तम दान नयी सर्वदानोमा श्रेष्ठ दान ते ज्ञानज डे, पारमार्थिकपणे मोदनुं साधन ने माटे नावथी अजयदान जे जे ते हा नज दान वे एम समजवु तो दूर रसुं परंतु था ससारमा रह्या थका मात्र साधारण नीति शास्त्र ज्ञानसपावन करवाथी पण केटला गणित फायेदाउँ थाय , ते सर्व को प्रत्यक्ष देखे चे, धर्म, विवेक, नीति, मर्यादा, महापण, चतुराइ, सन्यता, इत्यादि सदावधि सगुणोनु सा धन ते ज्ञानज , था नव, परजव चेगु नवे मुखदाने, तो तेनुं थाराधन करवामां गं वोटु , थाटतुं पण ते समजता नथी ।।। वली केटला एक आवक ना तो कोइने विवाहादि कार्योमा जमणवार श्राविक कर वा पहे , तेमने वासणोनो खप पढे माटे पोतानी महोटाश्ने वास्ते कोइ मागवा थावे तो तेने श्रापवा जोश्य एवा देतुथी केटलीएक जातना ताबा पितल वगैरे धातुना वास योनो समह करी राखे के के जे योजाने मागवा थापवाथी ते वासणो लइ जश्तेना अपर रसोश करे तेमा ठकायनो श्रारंन थाय , ते सर्व कोइ जाणे , वली ते लाडवा प्रमुख जम नारा मनुष्योने पण पारकी रसोश खावायी कोइप्रकारनो गुण प्राप्त यतो नथी, मात्र खाश्पी मदोन्मत्त यश्ने विषय सेवनमा तत्पर थवा शिवाय वीजो कोई विशेप फायदो थतो देखातो नथी थने पुस्तको लइ पोताने तथा बीजाने वाचवा नावाने माटे सग्रदरूपे राखेला हो य तेनाथी वाचनार अथवा राखनार वेदने कोई प्रकारनो श्रारंन यतो देखातो नथी तथा विपयसेवनमा मदोन्मत्त थवाने वदले उजटो तेनाथी निवृत्त थवानो उपदेश मले, तेथी ते यकार्य करवाने वीहीतो रहे, एवा एवा अनेक प्रकारना फायदा थाय ने - एमज केटलाएक विवादादिकमा वरराजाने पहेरवा माटे कोई मागवा यावशे तो जरूर थापवा पडशे एवो सकम्प करीने नवनवा प्रकारना सोना रूपा दीरा मोती थादिकना श्रानू पणो घडावी राखे , तथा वस्वोना वागा सिवरावीराखे , तेम कोश्ने जणवा वाचवाने मा टे झानना नमारा करी राखवा शु दरकत श्रावी नडे बे' पण एवी बुद्धि तो नाग्येज थावे वली केटलाएक घरटी, कोशी, कोमाल, पावडा प्रमुख बकाय जीवोनी हिंसाना थधिक रणनो सग्रह करी राखे । के को मागवा श्रावशे तेने थापवा पडशे तो तेने बदले को वाचवा सारु मागवा थावशे तेने थाप, पडशे ए हेतु माटे झाननो सयद करी राख वामां कांश दरकत जणाती नथी, दरकत मात्र एटलीज डे के ज्ञानना सग्रदयी सजति प्राप्त थवानी परंपरा चालु थाय ने, अने घरंटी थादिकना संमहथी बकायनो धारन थवाने लीधे उर्गतिनी परंपरा चालुज रहे ए विना वीजी कसी हरकत जोवामा श्रावती नयी प्रस्तावनामा यद्यपि नियमतो एवोज के, जे ग्रथनी प्रस्तावना होय ते अथनो साराश देखाडवो जोश्ये, तेने पडतो मूकीने वीजी अन्य वातो लखेली , तथा प्रस्तावना पण एक न्हाना सरखा ग्रथ जेटली लखा गयेली ने, तेमज उतावलथी लखवाने लीघे पुनरुक्ति पण घणा स्यले थयेली ने तेनुं कारण ए के थावातो जाहेर करवा माटे महारा थं त करणमा दर हमेस श्छा रहती इती, परंतु कोई योग्य प्रसग न मलवाथी एमाज लखी मूकीन माहारी वा पूरण करी माटे जेमने सामान्य पणे विपय जोवानी थनिलापा होय तेमने था ग्रथनी थनुक्रमणिका वाचवायी जाणवामां थावी जाशे, थने विशेष स्वप करनाराये था ग्रथने थाद्यथी थत पर्यंत वाची जावु ए महारी प्रार्थना श्रस्तु ॥

AARAMMAR ५ मीधो - १३४ १ - १ १ नारग्यो ॥ श्रथ कल्पसूत्रवालावयोधस्य मुड़ीपत्र प्रारज्यते ॥ पत्रांक एष्ठांक पत्य थ६ शु६ पत्राकटठाक पंचप० थक्ष ६ १६ वागी वींटी २३ ५ १ महाका महाक धींगो २७ १३५ ५ एघारा एंधाण १७ घमी घडी १६ लोखमना लोहखमना २ स्वामी स्वामी लोखंग लोदखम ए मैथिल ४३ मथिल |१४२ ६ कीधि २ कीधो १ ६ श्रृंगार १० मेघजीने शृगार मेघमालीन एन बांव्याथादिक बाटवादिक १६० नारच्या ԱՆ १ ए जासूसना जासूलना (130 १४ नमि नूमि १८ कूपापडो पापढोकू १७१ वही ६३ श १२ वायु वाया १४ थगयफलनाथगधनकुला कुर्म १७६ ५ १५ घणोफेरवो घहोफेरवो २ रीवसी रीहशी १८ १२ गेवरीनी घेवरनी ३ केवलीएक केटजीएक १० गेवरीया घेवरीया न्छ १२ विरफरी फरफरी २४ १ तेने तिरियं १ छकारा २४७ २ योगोघदन योगोदन १०४ १७ कोलो HE २ युक्ता मुक्ता म १ ३ M - 8 - सव १ - ए ६ ककरा कोजी

पृष्ठांक
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अस्य पुस्तकस्यानुक्रमणिका
अनुक्रमांक
विपयोना नाम
१ मंथनी रचना करवानो हेतु
२ श्रीपर्युपणपर्वने विपे ग्रंथ वाचवानो विधि
३ श्रीपर्युपणपर्व तथा कल्पसूत्र बने श्रमणसपर्नु महत्त्व
४ दश प्रकारे साधुनो याचार , तेनुं वर्णन
५ दश प्रकारना थाचार मांदेला कया कया तीर्थकरनी वारें कया कया थाचार
होय तेमनु थाशका तथा समाधानपूर्वक वर्णन
६ जुजड, वकजड श्रने शलपाझे एवा प्रण प्रकारना साधुन थाश्रयी जुदा
जुदा दृष्टातो कह्या
७ दश प्रकारनो साधुने थाचार रूप धर्म उपर वैद्यना दृष्टांत
७ चोमासु पुरुं यया पनी पण तेज गाममा साधुने रहेतु पडे तेना कारणो तथा
चोमामु पुरुं थयानी थगाव साधुने त्याथी विहार करी जपुपडे तेनां कारणो
ए जे गामे साधु चोमासु रहे तिहा उत्कृष्ट तेर गुण थने जघन्य चारगुण जोवा
जोश्ये तेना नाम
१० पंजोसणपर्वनी उत्कृष्टता देखाउवामाटे एकतालीश पदार्थनी उपमा थापीते नाम
११ श्रन्यदर्शनमा पण रुपिपंचमी माननीय ने तेनी कथा
१२ श्रम तप करी कल्पसूत्र सानलवु ते उपर नागकेतुनी कथा

यानुफाक
विपयोना नाम
एछाक
१३ चोद पूर्वना नाम तया तेटलु शास्त्र लखवा उपर मसी केटली जोयें तेनु प्रमाण
१४ कठपसून गावरानी चाल पूर्व थने पाठन केवा प्रकारनी दती तथा तेनासंवघे
श्रावेली वडनगरना ध्रुवसेनराजानी कथा
१५ ए सूत्र वांचयाथी पाप जाय ते उपर दोसाना पुत्रनी कथा
१६ पंजोसणमा साधुयें तया श्रावक केटला धर्म कार्य करवा ते कह्या ठे
१० मगन रूप नवकार मत्र थर्षसहित
१७ श्रीमहावीर स्वामीना पाच कल्याणक उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा थया
१५ श्रासर्पिणी उत्सर्पिणी काल थाश्रयी थारानुं संदेप व्याख्यान
२० श्रीरुपनदेवजीयें कहेला श्रीमहावीर स्वामीना सत्तावीश नव सपथी
२१ देवानदायें चोद सुपन दीना तेने रुपनदत्ते सामान्यथी फल काएं
२२ यतीश लानां नाम तया वीजा, पण सामुश्कि शास्त्रने थनुसारे हाथ पग
प्रमुखनी रेखा थाश्रयी फलाफल कहेला ठे
१३ शकेंना पूर्वनव थाश्रयी कार्तिक शेवनी कथा तथा श्ठ महत्त्व
२३ श नगवाननी स्तवना करी तेमा नमुशुणनो थर्थ तथा तेनी थंतर्गत मेघ
कुमारनी कया,हा प्रथम व्याख्यान पण समाप्त थयेटुंठे
२०
२५ दश थरानी दश कथा वीरनगवान ब्राह्मणना कुलमां उपना ते थाश्रयी
२६ 5 महाराने पोतानो श्राचार विचारी वेवानदानी कुखषी गर्न थपहरीने त्रि
१७
१०
२०
२५
.
शत
३

अनुक्रमांक
G
पए
पए
विपयोनां नाम
पक्षांक
शलानी कुखे संक्रमावानो थावेश दरणीगमेपी देवने थाप्यो तेमा त्रिशला
देवी थने देवानदाना पूर्वनव कह्या बे एमां अन्यदर्शनीमा नागवतना वश
मस्कंधमध्ये घेलवना हरण थवानी कथा पण प्रसगे थावी ने
४६
२७ दरणीगमेपी गर्न पालटन करवा गया तिहां चमादि चारगतिनु प्रमाण
२७ थपदरती वखत नगवान शं जाणे ने न जाणे ते थाश्रयी
२५ त्रिशलाराणीये जे घरमा सुपन दीग ते घरनु वर्णन
३० त्रिशला राणीयें चोद सुपन बीता तेनो विस्तार सहित नाम तेमनी आंतरगत
चार सुपनना वर्णन सुधी वीजु व्याख्यान पूर्ण ययुं डे
५०
३१ सिक्षार्थ राजायें त्रिशला राणीने स्वप्नानु फल सामान्यथी कडूं
५५
३५ प्रनातें राजायें कचेरी शणगारी पोतें मनयुक्ष करी, तैलमर्दन कराव्यु, स्नान
कयु, थान्पण पदेना, मांमवीया प्रमुख प्रेशन प्रकारना पदवी धरावनाराऊनो
परिकर वे जेमने माटे तेना नाम कह्या ते त्रेशमाथी सीमसेढाना वाधाने
पतावनार जे सिंघी पालक थाय बे, तेनुं स्वरूप घताववा माटे कहेली कथा ५७
३३ थाउ प्रकारना सुपन पाठकोर्नु वर्णन
६१
२४ सुपनपाठकोये सर्वजणे ययेसरन थवामाटे कहेली पाचशे सुनटोनी कथा ६२
३५ सुपनपातको सिक्षार्थ राजा पासें श्राव्या हा त्रीजु व्याख्यान पुरु थयुं ६३
३६ सुपन पाठकोयें कहेला नव प्रकारना स्वप्ननुं वर्णन तथा फल

६
६ए
थनुक्रमांक
विपयोनां नाम
पृष्ठांक
३० निराला राणोयें चौव सुपन दीनां तेना फल
६५
३७ थरिहत, चक्रवर्त्याविकनी माता केटला केटला सुपन देखे इत्यादि तथा
त्रीश सारा बने तालीश माग मली बहोतेर सुपनानां नाम
६५
३५ सुपन दीवा पडी कोनी थागल कहेलै अथवा नही कहेतु ते संबंधि कथा
४० बीना पण केटलाक सुपनोनां फल तथा चौद सुपननुं समुच्चय फल
४१ सिधार्थ राजायें मुसिदिना वचन कह्या ते पर गांगातेलीनी कथा कही
४२ श्श्ना ढुकुमथी देवोयें सिदार्थराजाने घेर करेली धनाविकनी वृष्टि
१२ नगवान मातानी कूखमां निचल रह्या, दाव्या पाल्या नही, तेथी थयेनु माताने
उख, पचात्ताप तथा फरीनगवाने थवधिझाने मावित्रोनु ख जाए{ ते उपर गु
एने वववे अवगुण करवा श्राश्रयी कहेली कथा,तथा फरी गर्न हान्यो तेथी मा
ताने उत्पन्न थयेला थानवनु वर्णन
४४ गर्नप्रतिपालन करवा माटे त्रिशला माताजी केवा थाहारादि करे ने ते छ५
१५ मोजा प्रण करवा श्राश्रयी महाराज साथे थयेनु युद
सप
४६ वीर नगवान जन्म, चोवीश तीर्थकरनो गर्नकात,जन्मकुंमली,चोडुं व्याख्यान
छ जगवान जन्म्या ते वखते देवोर्नु थागमन, उपनदिकुमारीये करेलो महोत्सव
१७ सौधर्मादि चोशन ३ करेलो महोत्सव
Hए नगवाने श्शनी शका निवारवा माटे थगुठे करी मेरु चाप्यो इत्यादि
छ।
सस
POPRODNAGAMANG
H
ए

अनुक्रमांक
विषयोनां नाम
पृष्ठांक
५० जगवानना जन्मनी रात्रे सिदार्थराजाने घेर सोना रूपाविनी वृष्टा था
५१ सिझार्थराजाये तोल मापादि वधारीने महोत्सवादि कस्यो
३
५२ नगवाननुं नाम स्थापवामाटे नोजन कराव्या तेनां विस्तारपूर्वक नाम
Gu
५३ नगवानना गुण रूप वलादिनु वर्णन तथा थामति कीहा बने नीशाल गरेए एए०
५५ २२ महाराजना पूब्वाथी नगवानें कहेला नलेना अर्थ
५५ नगवाननो विवाद,नगवानना मातपितादिनां जुदा जुदां नाम
ए
५५ जगवानना मातपिता देवलोक गया पड़ी नगवाने गर्नमां करेला थनिग्रहने
याव कसो, लोकांतिक देवो थाव्या, फरी नदीवर्वनना अनुरोघे वे वर्ष पर्यंत
गृहस्था वासें रह्या, वरपीवान प्राप्यु
५७ नगवाने दीक्षा लेती वखते नदीवईने करेलो महोत्सव पांचमु व्याख्यान समाप्त
५७ दीक्षा जीधा पनी कुमारगामनी वादेर दाजीयें करेलो उपसर्ग
पए कोनाग सनिवेसें यद्गुलनामा ब्राह्मणने घरे पहेल्ल पारण कर्नु
६ नगवानना शरीरे सुगधी लेप हतु तेथी मखी जीवोये करेलो उपश्च
६१ नगवान दुश्त नामा तापसने याप्रमें थाव्या
१०४
५२ जगवान चौमासु रह्या तिहां यदे करेलो उपश्व, बलवनी कथा
१०४
६३ नगवाने निशमां पाम्ली रात्रे तालपिशाचादि दश सुपन दीवा
१०५
६४ थदधवक नामा नैमित्तिकें नगवाननी या करी ते थायी कथा
.
एए

H 9 ܐܐ यनुकाक विपयोनां नाम एष्ठांक १५ जगवान एक वर्षे उपरांत वस्वसहित रह्या पठी वस्वरहित थया तेना कारण थाश्रयी सोमदेव ब्राह्मणनी कथा, एमां दारिश्नु स्वरूपवर्णन करेलुं १०६ १६ नगवाने चमकोशीया सर्पने प्रतिवोध्यो तेनी कथा १० नगवानने नावमा धेठा उपश्व थयो,ते कंबल अने सरल देवताये निवास्त्रो,तेनीकथा१२ ६७ पुष्प नामा सामुश्कि शास्वना जाणकारनी कथा दए नगवाने नालदी पाहामा वीजु चोमासु कस्यु तिहां गोशालो मन्यो तेणे घणा स्थान के अनेक प्रकारना चाला करना ,तेनी कथानगवानने थयेला उपश्चोनी कया ११३ वेश्यायन नामा तापस जेणे गोशाला उपर तेजोलेश्या मूकी तेनी कथा ७१ गोशालो नगवानथी जुदो विचलो,तथा संगम देवे करेला महोटा वीश उपसर्ग ११७ । ७२ जीरणोठे जगवानने पारणु करवा कयुं उतां पूर्णशेठना घेरथी वोहोर्यु १२० ५३ चंदन बालायें थडदना पाकुला नगवानने वदोराव्या तेनी कथा ७४ नगवानना कानमा गोवालीयें स्वीला ठोक्या ते कथा, तथा उपसर्गोनुं प्रमाण १२२ ७५ नगवान केवा थका विचना तथा पारवर्प ने साडा उमदीनामां करेला तपर्नु प्रमाण १२३ ७६ नगवानने केवलज्ञान उपन्या पठी श्रगीथार गणधरना संशयठेवक, गणधर बाव, तथा चतुर्विध श्रीसघ स्थापन १२६ ७ गोतमस्वामि श्रष्टापद पर्वते गया, पन्नरसें त्रण तापसोने दीक्षा दीधी नगवान ना चोमासानी सरख्या गौतम विलाप, गौतम केवलज्ञान इत्यादि १४ ।

थनुक्रमांक १४३ WH विपना नाम पृष्ठांक जस्मपदाधिकार, नगवानना परिवारनी सरल्या, तथा नगवाननुं निर्वाण थहीं सुधी बहु व्याख्यान सपूर्ण थयु, श्रने महावीरचरित्र पण सपूर्ण थयु ए श्रीपार्श्वनाथस्वामीना वश जवनो अधिकार १४६ श्रीपार्श्वनायनु जन्म, तथा विवाद तथा कम तापसनो थधिकार इत्यादि १४ए ७१ पार्श्वनाथ नगवाने दीक्षा लीधी,पढी कलिकुंमतीर्थ थर्पु तेनी कथा, तथा कूकडेसर तीर्थ ययुं तेनी कथा, तथा जगवानने कमरे उपसर्ग कमा तिहा यदिबत्रा न गरी थर तेनी कथा, तथा केवलज्ञान उपज्युं तथा परिवारनी सरन्या निर्वाण १५० ७५ पीनेमीश्वर नगवानना पाच कल्याणिक यादवो थने पामबोनी कथा १५३ ७३ चोवीश तीर्थकरना थांतरा कदीने सातमु व्याख्यान समाप्त कस्नु डे १४४ G॥ श्रीरुपनदेव जगवान्ना तेर जव तथा सात कुलघर थया, तेनी कथा १४६ ८५ श्रीरुपनदेवन्नु जन्म,नामस्थापन,वाल्यावस्यानु वर्णन,तीर्थकरोने स्तनपान करवा नी थने थाहार करवानी रीति,नगवाननो विवाह तथा पुत्र पुत्रीनो परिवार १७३ ७६ राज्पानिपेक, थयोध्यानी रचना, वीका, युगलीयाने थाहारनी कला सीखवी १७४ ७७ थदारलिपि, स्त्रीनी चोशन कला, पुरुपनी बहोतेर कला तथा नगवाने चोटली नी शिखा श्महाराजना कहेवा उपरथी राखी इत्यादि १७६ नमि विनमिनी कथा,श्रेयासे पारणु कराव्यु तिदा वेगु दायनो थयेलो विसवाव १७ ए नगवानने केवलज्ञान उपनु, मरुदेवीजी पण केवल पाम्या तेनुं वर्णन १ए

H
थनुक्रमाक
एष्ठाक
विपयोनां नाम
ए नरतवाद्वलनु युआ, याद्याने दीक्षा लीधी, नरतराजा श्रष्टापवें गया १ए
ए१ श्रीरुपनदेवजीनुं परिवार, निर्वाणमहोत्सव, थाम्मु व्याख्यान समाप्त थ\ २०१
एर स्थविरावली, श्रीवीरना थगीथार गएधर सबंधि नवगठनी वात
२०३
ए३ सुधर्मस्वामी,जबुस्वामी,प्रनवस्वामी,सयनवसूरि तथा यशोनश्सरि एमना चरित्रो २०४
एसंनूतिविजयजी यने नश्याहु स्वामिना चरित्रो, वराहमिहिरनी कथा सहित २०ए
ए५ श्रीयूलिनजोनु चरित्र, श्रीथार्यमहागिरिजी तथा थार्यसुदस्ति तदंतर्गत संप
तिराजा तथा थार्यववसूरि बने थार्य वनसेन सूरिनी कथा
ए६ थार्यसिदगिरिनी कथा तथा श्रीवजस्वामीनी कथा
२१७
ए रोहगुप्ताचार्यना गुप्तनामा शिप्य जेनाथी त्रैराशिक मत निकम्युं तेनी कथा
ए८ प्रिययंथसूरि तथा पांचशे तापसना प्रतियोधक थार्यसमितमरिनी कथा २२३
एए श्रीथार्यरक्षित सूरिनी कथा एमां कांक वजस्वामीनी कथा पण
२२५
१०० वृक्षवादी तथा तेमना शिष्य सिरसेनदिवाकरनो संदेपथी सर्वध
२२०
१०१ त्रण कालिकाचार्य तथा प्रण शिनसरिनी कथा
५२
१०५ थमवोश प्रकारे साधुउनी समाचारी,चोझ बालावे करी कथा सहित कदी २३० ।
१०३ इति नवम व्याख्यान समाप्तम्
२४७
+

॥श्रीशांतिनाथाय नम श्रथ कम्प सूत्रस्य घालावरोध प्राश्नःप्रथम ग्रंथकर्ता था यथनी रचना करवानो हेतु कहे वे श्रीजिनशासनने विपे सर्व पर्वमांहे शिरोमणि श्रीप!पण पर्व ने ते पर्वना दिवसोमा नगर नगरने विपे कल्पसूत्र वचाय पण योग वदन करनारा साधु मुनि राजनेज सूत्र वांचवानो अधिकार प्रीतीर्थकर नगवाने दीयो ने वीजा कोश्यी सूत्रनी व्याख्या याय नही माटे तेवा मुनिराजोनु थागमन सर्वस्थ होतुं नथी तेथी जे गाममा साधुमहाराज विराजमान न होय ते गाम निवासी श्रावकोनें कल्पसूत्र श्रवण करवानो थत राय पडे ते ते थतराय दूर करवाने वास्ते जेम पूर्वाचार्योयें लोकोपकारनें थर्थे पूर्वं थनेक प्रकरणोनी रचना करेजी २ तथा वर्तमान कालमां पण करे ३ ते प्रकरण पण सूत्रोना अर्थ रूपज वे थने तेनु पठन पाठन चतुर्विध श्रीसंघ करे ले तेम तु पण श्रीकल्पसूत्रना वालाव योधने प्रकरण रूपें बनायूँ बु के जे ग्रंथ साधु, साधवी श्रावक थने श्राविका मली चारे प्रका रना श्रीसपने वांचवाना उपयोगमा थावे केमके ए ग्रंथ पण सूत्रों थर्थ रूप दोवाथी प्रक रण सदृश समजवो ॥१॥ ॥ हवे श्रीपर्यपण पर्वने विपे ए ग्रथ वाचवानो विधि कहे जेम जे शहेरमा श्रीमुनिमहाराज चोमासु रह्या दोय थने ते गामना श्रावको एकता थ साधुजी पासेंची सूत्रनी पोयी मागी त श्रावीने एक प्रावकना घरमा राखे तिहां रात्रि जागरण करे पठी पीजे दिवसें श्रावक श्राविका एका थइने एक कुंथारा बोकरानें अवोट वस्त्र पहेरावी हाथी कपर वेसाठीने थथवा थश्वप्रमुख कोई उत्तम वादन कपर वेसाडी ते पोथी एक थालमा राखी ते थाल ते पहेला डोकराना दायमां थापी सर्वने वदाम, साकर पतासा थाविकनी प्रनावना करी वाजते गाजते महोटा महोत्सव पूर्वक उपाशरे श्रा वीन ते पुस्तक गुरुना दाथमा थापे गुरु वाचना करे ते सर्व श्रीसघ सानले श्रने गुरु था गल फलादिक राखे वे ॥ तेम था पुस्तक पण जे श्रावकाविकनी पासें होय तेनी पासेंथी मागीलाचीने पंचे वेरावेला वीजा को श्रावकने घेर सजा तिहां रात्रि जागरण करी पबीबीजे दिवसें सर्व संघ मली पूर्वोक्त रीतें मदोटा महोत्सव पूर्वक पोपधशालामा किंवा पाश्रयमा थथवा कोई श्रावकने घेर जिहों सामायिकादिक करवानी को स्वक्ष निर्मल जगा होय ते स्थानके अथवा वीजी को जीवादि उपश्व रहित जगा दोय के जिहां सर्वस मजी वांच वानो विचार कस्तो होय तेवी जगाने यथाशक्तियें शोनावी राखी होय तिहां श्रावीने शान नक्ति पूर्वक घणाज यन्मयी सर्व प्रकारनी अशातना टाली पोथी को विवेकी सुज्ञ श्रावकना दाथमा थापीने वचाववी थने वीजा सर्वजनोयें प्रमाव, निश, विकथाविकनो त्याग करी विनय पूर्वक त्यां सीने एकाग्रचित्तें सांजलवी ॥ ५ ॥ ॥ दवे श्रीपर्युपण पर्व तथा कम्प पत्र थने अमणसंघ एमनु महत्व कहे जे ॥ लोकातित्पर्वसम पर्व,नचकम्पसम श्रुत॥ नधा मिफसम संघ, स्विरमानि जगधये॥१॥ अर्थ ॥था जगतने विपे दीपालिकादिक अनेक प्रका रना लोकिक पर्व वे तथा घोमासी, प्रोतीर्थकरदेवना पांच कल्याणिक, थष्टमी, पक्षिका थने तीर्थ यात्रादिक अनेक पुरस्य पर्व के ते सर्व लोकोत्तर उत्तम पर्व ए सद्ध पर्वने विपे शिरो मणि चिंतामणि रन सदृश ज्येष्ठ एवु सांवत्सरिक पर्व के एजेम सांवत्सरिक पर्व समान बीज कोश पर्व नथी तेम कल्प सूत्र समान वीज़ कोश्स्त्र पण नथी तथा चतुर्विध श्रीसंघ महि श्रीसाधुमु निराजना संघ समुदायसमान बीजो सघ पण कोइ नथी एटले सर्व पर्वमाहे सर्वोत्तम पंजोसण प व तेने विपे कल्पसूत्र वचाय ते पण एकावशांगादि सर्वसूत्रा उत्तम वे तेम कल्पसूचना वाचना र साधुमुनिराज तेपण चारे प्रकारना संघमाहे उत्तम ले एम ए अरो साक्षात् रन समान जागवा ॥श दवे व्याख्यान करनार पोतानी लघुता पूर्वक श्रीगुरुमहाराज ने श्रीसधनी महत्वता देखा हे वे व्याख्यान करनार कहे के हुँ मंदमति, मूर्ख, अज्ञानी,महाजड बतां पण श्रीसंघनी समद दद थाने था कल्पसूत्रनी व्याख्या करवानु साहस करु दु व्याख्यान करवाने राज माल थयो ते सर्व श्रीसद्गुरुनो प्रसाद श्रने चतुर्विध श्रीसघनु सानिध्यपणु जाणवु जेम थन्य शासनमां कहेलु डे के श्रीरामचंनी सेनाना वांवरायें महोटा महोटा पापाण लश्ने समुहमा रारन्या ते पथरा पोते पण तस्सा थने लोकोने पण तास्मा ते कां पापानो तथा स मुझ्नो श्रने वादराऊनो प्रताप जाणवो नही परंतु ते प्रताप श्रीरामचजीनो जाणवो केमके पधरनो तो एवो सनाव वे जे पोते पण बडे थने थाश्रय लेनारने पण बूडाहे तेम हु पण पटर सदृश उता श्रीकल्पसूत्रनी व्याख्या करुं तेमा माहारो का पण गुण जाणवो नही तेमज पोपयशाला श्रथवा पुस्तकना पानांनो पण कांश गुण जावो नही ए {ण मात्र श्री सद्गुरु थने श्रीसघनोज जाणवो तथा जेम को जरदनावनी जाणवा वाली गीतकला बने नृत्यकलामां विशारद उपनकोडी ताल जरद शास्वनी पारग एवी नर्तकी होय ते गीतगान क रते मृदगध्वनि वाजते नृत्य करे अनेक चक्रगोला फेरवे श्रने दाव नावथा लोकोना मन रंजन करे तेमज कोई गामडीयानी गामडियात एक घेली स्त्री होय तेपण तालोटाना बद प इते पके नृत्य करे तथा जेम कोई महागंजीर समुप दोय ते पण लहेरो थापे अने कोश्क गाम न्दानु तलाव होय ते पण वस्तुमा पाणीया पूरण जरायु थकुं जहेरो श्रापे तेने (पण कोइ निवारे नही तथा जेम शुक्ष दूधमांहे थर्खम चोखा नाखीने खीर राधीयें ते ॥ दवे पण नरायजे अने कूशकानी रावही रांघीये तेपण नरायचे तेमां पण काइ थामर्थ नयी तेम जे एहज स्थानकें एइज क्षेत्रे अनेक गणधर, सपूर्ण श्रुतधर, महाशास्त्रना वेत्ता, नवर- सावतार, महा व्याख्यानना करनारा व्यारम्यान करेथने टुं पण व्याख्यानकरुं तेमांपरस्परस एटलो फेर जाणवो एटले नरदनेदने जाणनारी नर्तकी तथा समुश्यनेमवीरने सहा ते गण धराविक जाणवा अने गामडियात तथा गामनुं तलाव थने कुशकानी रावडी समान मने जाणवो ते ई श्रीसशुरु बने श्रीसघना प्रसादथी माननीय थयो दु जेम कोइपापाण जडवतां तथा ज्ञान विवर्जित बतां पण तेनी ज्या प्रतिमाजी नीपजावीये त्यारे ते सर्व जनोनें माननीय पूजनी य थाय तेनी पेरें श्रीगुरु तथा श्रीसघना प्रसादी हुँ पण माननीय थयोढुं ।। ४ ।। वालाववोध करनार प्रारंना श्रीदेवगुरुने नमस्कार लक्षण मंगलाचरणने थर्थे श्लोक कहेठे, ॥ श्लोक ॥ नवा श्रीमन्महावीरं, गोतमादिगणाधिपान् ॥ कुर्वेद कल्पसूत्रस्य, व्यारा वालो पकारिणीम् ॥ १॥ ५॥ ॥ दवे प्रथम श्रीगुरु महाराजनो थादेश लश्ने जे क्षेत्रमा साधु चो मासुं रहे तिहां चोमासामा नापब मासने विपे पर्युपण पर्व थावे थके मांगलिक निमितें पा च दिवस पर्यंत श्रीकम्पसूत्र वाचे ते कल्प एवं नाम थाचारनुं वे ते साधुनो थाचार दश प्र कारनो ठे,यष्ठक्त ॥थाचेलुकुवेशिय, सयायर रायपिंम किश्कम्मे ।। वय जिह पडिकमणे, मार्स पघोसवण कप्पे ॥१॥ ॥थस्यार्थ ॥प्रथम थचेलक,पीजो उद्देशिक,त्रीजो सय्यातर,चोयो रायपिम,पाँचमो कृतिकर्म,बजे व्रत,सातमो ज्येष्ट, श्रातमो प्रतिक्रमण,नवमो मासकल्प थने दशमो पंजोसण कल्प ए व प्रकारना कल्प एटले थाचार तेना सामान्यथी नाम कह्या दवे विस्तारार्थ कदे ॥ प्रथम जे वस्त्र नही रास्यवा तेने अचेतक कदप कदीयें तिहा श्रीपनवेय नगमान तपा श्रीमदासीर सामीना सापुतो श्वेतमानोपेत जीर्णप्राय वखने धारण करे तेमा मुटीयी चार यागुत नीचो थने गुदाथी चार थायुल उचो एवो साडा त्रण हाथनो चलोटो राग्वे तथा साडाचार हाथनो कपडो राखे तथा पोतानाथागुल प्रमाण एक वेंतनें चार था गुननी मुद्पत्ति राखे एम थई शरीर उघाडु थने थई शरीर ढाक्यु राखे एवीरीतें परेला वस्त्र ते यण पदिया जेग समजवा माटे तेने थचेलक कहीये ते ऊपर दृष्टात कहे ते जेम को एक पुरुष धोतीया बनायनारनें कडं जे महारा धोतीया ताकीदथी थाप केमके हु नागो फरु बु एवु पन व्याहारथी का हवे ते पुरुचे जूना वस्खनु पोतीयु पदेख्नु वे तोपण नागो फरुनु एम कई पनी चीजु दृष्टात कहे ने जेम कोशएक पुरुप पोतीयुं पहेरीने नदी कतखो तेने को में पुन ना तु नदी शीरीते कतखो तेवारे तेणे जवाव थाप्यो के हुँ नागो थक्ने नदी पत्तगो उसी प्रीजु हटात कहे जेम कोएक मोसी जूना वस्त्र पहेरी वणकरनी पासें जश फदेग नागी के थरे नाइ महारां वस्त्र तैयार थया दोयतो मने थाप दु नागी फरुतु एवी रीते साधुन पण जीर्णप्राय जुना श्वेतमानोपेत वस्त्र धारण करते ठते पण वस्त्र रहित थचे नाज कहीये तेम था चोचीसीमा श्रीकपन देव थने श्रीमहावीरने जाजेरा एक वर्ष पठी श्वन पसने थपगमें जावजी पयंत यचैनक पणु हतु थने चोवीसें तीर्थकर थायितो दी दा ती रखने ३ महाराज तेमना रखना कपर देरऽप्य वस्त्र मूके ते जिहा सुधी खनामपर र हे तिहां सुधी सजा फहीये थने पडीगया पठी यचेलक कहीये तथा था चोवीसीमा वीजा श्रीयजितनाथ नगगनथी मामीने श्रीपार्श्वनाथ नगवान पर्यंतना वावीश तीर्थकर मध्यना क देशाप तेने देोषण पख शेष रे घडी यापुष्य याकतो रहे तिहा सुधी रहे वे माटे ते वस्त्रसहि तने सचैलक कहीयें तथा ए बाचीश तीर्थकरना साधु पण झनु एटले मुनमन वाला सरल प्यने वा एटजे पंमित घणा माह्या चतुर होय माटे महोटा मूलना पांच रंग वाला मानोपेत रहित एवां वस्त्र राखे तेथी एनें सचेलक कहीये केमके एने ए अचेलक कम्पनी का मर्यादा नधी माटे एमने ए कल्प थनियत थने पहेला तथा जा तीर्थकरना साधुने ए कल्प नि पत ने एटप्ने निभय वे ए प्रथम श्रचेतक कल्प करो ॥१॥ ॥ दवे बीजो उद्देशिक कम्प हेने जे साधु अथवा साधवीने उद्देशि कखो एवो जे थदाराविक तेने उद्देशिक थाहारादिक फूहीये तिहां मघ्यना बावीश तीर्थकरना वखतमा जे साधु थथवा साधवीने निमित्त को वर्षे जात, पाणी, श्रौपध नेपज्य, वस्त्र, पात्र निपजाव्यां दोय ते तेदज साघुर्ने सेवा न क पण शेप वीजा साधुने ते थाहाराविक नेवा कल्पे केमके तेने थाधाकर्माविक दोप न ला मने पहेल्दा तथा बहेला तीर्थकरना शासनने विपे तो एक साधु थथवा एक साध्वीने थ जे पाकिर्मिक थादारादिक निपजाव्या होय ते सर्वया प्रकारें कोइ पण साधुनें थथवा सा 6 वा कक्पं नही ए वीजो उद्देशिक कल्प करो ॥ २ ॥ ॥ हवे त्रीजो सय्यातरि पिंक २ प कद्देने जे धपाश्रयनो धणी दोय तेने सय्यातरि कही थथवा जे साधुने रहेवानी तरपानी जगा थापे एटले जेनी थाना लेख्ने साधु जगामा रह्या दोय ते घरना खामीन सस्या तरि कहीये तेना घरनो पिंम जे श्रादाराविक वार वस्तु ते सर्व तीर्थकरना साधुउने चोदो रवी कल्पे नही ते यार स्तुना नाम कहेतेश्याहार, पाणी,श्खादिम, स्वादिम,एकपडा, द पात्रा, कंवल, ७ उपो, एसूई, पिप्पलक, ११ नखकतारवानीनेरणी, १२ कानमाथी मेल कादारवानी चाटुश, ए मार चीन तथा वीजा पण तरी कातरणी बने सरपला प्रमुख ते कोई पण साधुनें सेवा करपे नदी ए सय्यातर पिंम लेवामा थनेपणीय अ६ दोफ्नो सनव था य प्रसगादि महोटा दोप कपजे केमके साधुना रागें करी पारणाने उत्तरवारणाने यथै वारं वार जाता थावर्ता थगुक्ष्मान थाहाराविक करीने ते पदस्थ दहिं दूध प्रमुख स्निग्ध वस्तु पण थापे तेथी रसद थाय थने मिष्ठान्नना लोनें तेनु घर न मूके कदापि वेगलो पीजे गामें गयो होय तो पण त्याथी मिष्टान्नने लोनें फरी थावे वली वस्त्रादिक मा ग्यां थकां तेरहस्य तरतज थापे तेणे करी उपधिनी वृद्धि याय वली ते सय्यातरनो पिम लेता थका गाममा फरवाथी बूटे तेथी ते साधुनु शरीर जाउँ थाय वली ते सय्यातरिनो पिंम जेवायी कदाच गृहस्थनें एवो पण जय उपजे के जे उपाय करावे तेने थादारादिक पण थापवा पडे तेने लीघे कोई उपाश्रय पण न करावे थने रद्देवाने कोई जगा पण श्वापे नदी तेयी थाहार शिष्यादिकनो मलयो उर्जन थपडे इत्यादिक दोपना प्रसंगथी सय्यातरिना घर नो थाहार सेयो सर्व तीर्थकरें निपेभ्यो ने कदाचित् को कारणे सय्यातरिना पिंम लेवो पडे तो राजिना चार पदोर क्रिया सयाय करतो जागरण करे पण निश न करे थने प्रनातनु पडि कमणु बीजे स्यानकें जश्करे तो उपाश्रयना धणीनो सय्यातर न थाय थने जो रात्रे निश करे थने प्रजातनो पडिकमणु वीजे स्थानकें करे तो वेगु सल्यातर थाय एटले वेह स्थानक श्रादारादि लेवा न कम्पे तथा १ तृण, माटीनो फु, ३ नस्म, राख, ४ मात्रानुं वामई, तेने माना कहीयें, ५ वाजोट, ६ पाटी पाटला, सय्या, ७ सथारो, ए लेप प्रमुख वस्तु, १० उपधि सहित चेलो एटले वस्त्रादिक सहित चेलो ए दश वस्तु सल्यातरना घरनी सेवी कम्पे ए बीजो सय्यातरिपिंम कल्प कह्यो ए कल्प सर्व तीर्थकरोना साधुने निश्चय होय माटे एने नियत कल्प कहीयें ॥३॥ ॥ दवे चोयो राजपिम कल्प कहें जे मदोटो उत्रपति चकवाविक राजा होय बने जेने सेनापति, पुरोहित, प्रेष्ठि, प्रधान थने सार्थवाद ए पांच वानां होय ए पांचनी साये राज्य करे तेने राजा कहीयें सेना घरनो थादाराविक पिम पहेला तीर्थकरना साधु साध्वीने अने बहेला श्रीवीरनगवानना साधु साध्वीने लेवो कल्पे नदी केमके राजझारा घणा लोक मले तिहां घणो वखत लागे तथा कोक थपमागतिक कहे तथा तिदा हाथी, घोडा, रथ थने स्त्री प्रमुखनें जोतो थका राग उपजे वजी कोश्क चोर फद्दे कोक हे पण कदे इत्यादिक अनेक दोप उपजे वली लोक निवा करे जे था यति थक्ने राज्यपिम जीये ने थन्यदर्शनीयोना शास्त्रमा पण राज्यपि निवारयो ले माटे पदेला भने बदला तीर्थकरना यतियें राज्यपिम न लेवो थने वावीश तीर्थकरना साधुतो रुजु श्रने पमित वे माटे राजाना घरनो निर्दोप थाहार जाणे तेवारे थाहार लीये थने सदोप जाणे तो न तीये माटे तेमने ए कम्पनी मर्यादा नथी ए चोयो राज्यपिम कल्प करो ॥ ४ ॥ ॥ हवे पायमो कतिकर्म फल्प कहे जे वावद् तेने कतिकर्म कहियें ते प्रकारे वे एकतो मनु यावं वी जंघावशावर्नवांदणे वांदवू तिहां श्रीजिनशासनने विपे सर्व तीर्थकरोना साधुऊनी एवी मर्यादा ले के जेणे पहेली दीक्षा लीधी होय ते साधुने पाम्लथी दीक्षा लेनारो साधुवादे पण वाप |वीकरो अथवा राजा बने प्रधान इत्यादिक न्हानो महोटो वे नदी परतु दीका जो दीकरे प्रथम लीधी दोय बने पितायें पाबलयी तीधी होय तो पिता पुत्रने पण वदन करे एम राजा पोताना प्रधानने पण वदन करे तथा सर्व साध्वीयो तो पुस्पोत्तम धर्म जाणीने सर्वे साधनें वदि परंतु न्हानो महोटो जुवे नदी जो सो वर्पनी दीदित साध्वी होय अने एक विव ॥ सनो दीक्षित साधु होय तोपण ते सान्वी साधुने सामी जश्ने दे पूज्य ' पधारो एवीरीतें विनयपूर्वक खमासमणा वेश्ने वांदे, केमके धर्ममाहे मुख्य प्रधान पणु ते पुरुपर्नेज कर्पु बे, माटे पुरुप अधिक वे तेथी पुरुचे स्त्रीने वांदवु नदी, जो साधु थईनें साध्वीने वादे तो पणा दोप प्राप्त थाय केमके स्त्रीजाति तुछ माटे थईकार करे तो तेथी नीय गोत्रने वाघे, वली लोक निंदा करे माटे पुरु– स्त्रीने वांदवु नदी ए कल्प सर्व चोवीशे तीर्यकरोना साधु थाश्रयी नियत जाणवो ए पाचमो कृतिकर्म कल्प कह्यो ॥ ५ ॥ हवे तो व्रतकल्प कहे तिहा प्राणातिपातादिक पांच महाव्रत वे एटले प्राणातिपात, मृपा वाद, यवत्तादान, मेघुन अने परिग्रह ए पांचथी विरमवु ते पांच महाव्रत कहीयें तिहां श्री रुपनदेव थने श्रीमहावीरना साधु तथा साधवीने तोतादृश जाएपणाना थनावथी पांचे महावत व्यवहारथी वे थने मध्य वावीश जिनना वाराना साधु तो परिग्रह व्रतमाहे परिय हित स्त्री जोगर्नु पञ्चरकाण जाणे तथा त्रीजाथदत्तादान व्रतमादेशपरिग्रहित स्त्रीनोगनु पञ्च स्काण जाणे वे एटाने स्त्रीने परियद रूप गणीने पांचमा परिग्रह व्रत सार्थेज लीये , केमके जिहां स्त्री तिहां परिग्रद थने जिहां परिग्रह तिहां स्त्री होय ने माटे यावीश तीर्थकरना साधुनें चोथु मैयुन विरमण व्रत वर्जीने शेप चार महाव्रत जाणवा श्रथवा श्रीरुपनदेव थ ने महावीरना तीर्थ रात्रि नोजन व्रत मूल गुणमांहे गणेबे तेथी रात्रिनोजन विरमण व्रत साये गणीयें तो साधुने व्रत थाय श्रने बावीशजिनना तीर्थे तो रात्रिनोजन व्रत उत्तर गुण मा गणे माटे चारज व्रत जाणवां ए बो व्रत कल्प कह्यो।॥ ॥ हवे सातमो ज्येष्ट कल्प कहे ज्येष्ठ एवं महोटानु नाम तिहा श्रीरुपनदेव ने महावीरना साघुटने तो महोटी दीदा दीघा पड़ सघु वडाइ गणाय ने माटे जेणे महोटी दीक्षा पहेली लीधी होय ते महोटो गाय यने जेणे नहानी दीक्षा तो पहेली लीधी दोय पण महोटी दीक्षा पनी लीये तो ते आगलानी थ पेक्षायें लघु गणाय जेम पिता बने पुत्र तथा राजा श्रने प्रधान तथा शेग्थने चाकर तथा माता थने दीकरी एम श्रनुक्रमें दीक्षा लीये पनी उठामणा यावे महोटी दीक्षा लीये तेवारें मुरल्य प्रकारे तो पिता, राजा, शेत थने माता ए चार मदोटो डे ते नवामा जो अधिक थाय तो तेहज महोटां कहेवाय नहींका पुत्र, प्रधान, चाकर थने दीकरी ए चारे न्हानों ने परंतु ते नगवामा थधिक यइ जाय तो गुरु तेमने महोटी दीक्षा थापी महोटा करे थने वावीश तीर्थकरना साधुने तो ए मर्याद नथी, केमके ते तो वधाये प्रवीण माह्या होय रे तेथी तरत ज नणी लीये दे माटे ते दीक्षाना विवसथीज वृक्ष बने लघु गणाय ने तेथी तेमनामा प्रय म जे दीक्षा लीये तेदज महोटो गणाय, जो पिता बने पुत्र तथा राजा श्रने प्रधान तथा शेव बने वाणोतर तथा माता अने दीकरी ए सद् साथै वीक्षा लीये तो पिता, राजा, शेठ श्रने माता ए चार लोक रीतीयें मदोटा गणाय तथा पुत्र, प्रधान, वाणोतर थने दीकरी ए चारे लघु नणाय तथा महोटी दीक्षाने योग्य प्रधान बने पुत्र दोय तो राजाने तथा पिताने पू बीने महोटी दीक्षा थापे तेथी थप्रीति न कपजें एरीत ए अनियत कल्प वे ए सातमो ज्येष्ठ कल्प करो ॥ ७॥ ॥ हवे थाउमो प्रतिक्रमण कल्प कहे - प्रतिक्रमण ते जे थाव श्यकनु करवं ते जाणवु तिहां प्रथम यने चरम जिनना वारामा तो साधुने अतिचार दोप लागे किंवा न लागे तोपण निमयथी देवसिकादिक पांचे प्रकारनां पडिकमणांकरे यने वावीश तीर्थकरना साधुतो जो पाप लाग्यं वे एवं नाणे तोज देवसिक अथवा राक्ष पडिक माणु सांजे अथवा सवारे करे थने पाप लाग्यं न जाणे तोते पण न करे घाफी पाक्षिक,चोमा सी थने सांवत्सरिक ए त्रण पडिक्कम तो वावीश जिननां वारामा नहीज करे एम ए पण थनियत कल्प वे ए थाठमो प्रतिक्रमण कल्प कह्यो ॥७॥ ॥ दवे नवमो मासकल्प कहे वे पहेला थने वेला तीर्थकरना साधु एक गाममा एक मास पर्यत रहें उपरांत रहे नही मान चोमासाना चार महीना पर्यंत एक गाममा रहे परंतु अन्य दिवसोमां एक मही नाथी उपरांत रहे तो घणा दोपोनो सनव थाय एकतो गृहस्थ सार्थे प्रतिबंध थाय,दलवा पाणु पामे, लोकनो उपकार करी शके नही, देश विदेशनु ज्ञान न थाय, ज्ञानर्नु थाराधन न थाय माटे एक मास उपरात रहेवानी साधुने थाज्ञा नथी कदाचित् निदादिक कारणे रहेनु पडे थथवा विहार करवाने असमर्थ होय तो पण वस्ति पालटण करे, पाटो पलटावे, घर पलटावे थने वेवट सयारानी नूमि पालटण करीने नावथी पण मास फल्प करे जे माटे लो कमां पण केरत ने कास्त्री पीयर नर सासरे, सजमियां थिरवास॥ एता होये थलखामणां, जो मामे थिरवास ॥१॥तिथिने मध्य घावीश तीर्थकरना साधु तो विहार करवानें जो सामथ्र्य वान होय तोपण तेरुजु थने पंमित माटे तेमने मासकम्पनो कांशनियम नथी जो वोप नहीला गतो होय थने जान जाणे तो वेसूणा पूर्वकोही वर्ष पर्यंत पण एकज क्षेत्रमा एकज स्थानकें रही जाय माटे ए थनियत कल्प वे ए नवमो मास कम्प कह्यो । ए॥ ॥ दवे दशमो प' पणा कम्प कहे ते जे एक जगाये रहेवु तेने पर्दूपणा कहे जे ते पंजोसण वे प्रकारना एक तो गृहस्थ जाणे थने बीजो गृहस्थ न जाणे ज्यादा पर्युपण पर्वने पडिक्कमतां थकां साधुलोक पूरे तेवारें रदेवाने विपे वर्तमान योग्य कहे पण पपणा पर्व पडिक्कम्या पड़ी तो कार्तिकी पुनम पर्यत रहेवार्नु निमयधीज कडे तिहां गृहस्थनी थाझा थकी पांच दिवस यावत् रहेq एम पाच पांच दिवस रहेतां पचास दिवसें पंजोसण पर्व करे तिहां कल्पसूत्र गृहस्थ ागज वाचे पनी सीतेर विवस निमयथी रहे एटले जे गृहस्थ जाणे ते तो नादरवा शुदि पांचमथी मामीने कार्तिक मुदि पूर्णिमा सुधी रहे थने बीजो जे गृहस्थ न जाणे ते तो थापाढ शुवि पूर्णिमाथी मामीने नादरवा शुदि पंचमी सुधी जाणवू, केमके कदापि कोई गृहस्थ साधुनें पूजे के श्राप थोमासु रह्या तेवारे साधु कडेके जेवी क्षेत्र फरसना अथवा पाँचदिन डेयें एवो जवाव थापे तेथी थागलना दिवस गृहस्थ न जाणे थने प!पण करना पड़ी तो अवश्य तिजि रहे माटे ते गुहस्य जाणी शके ते जघन्यथी सीतेर दिवस पंजो सण थने उत्कृष्ट ब मदीनानां पंजोसण जाणवा ए कप श्रीरुपनदेव अनें श्रीमहावीरना साधुऊने निमयथी जाणवो घने यावीश तीर्थकरना साधुउने निभय नही ए दशमो पंजोसण कल्प करो ॥ १० ॥॥ एरीतें ए वश कल्प कह्या ते कशे कल्प श्रीरुपनदेव तथा श्रीमहावीर स्वामीना साधुउने निभयथी जाशवा थने मध्य वावीश तीर्थकरना साधुऊने तो ए वशमाथी एक सल्यातर, बीजो चार मदावत, श्रीजो ज्येष्ठ श्रने चोथो कृतिकर्म एटले वांदणा ए चार कप निघयथी दोय ने यने एक थचेतक, वीजो उद्देशिक, त्रीजो प्रतिक मण, चोयो राज्यपिम, पांचमो मासकल्प थने छो पंजोसण कम्प ए कम्पनो निश्चय नदी ए जेवी मर्यादा वावीश तीर्थकरोना साधुऊनी कही तेवीज मर्यादा श्रीमहावि वह खेत्रना तीथैकरोना साधुऊनी पण जाणवी ॥ २ ॥ ॥ इहा कोइ कहेके साधुतो सर्वे सरखाज वे तो तेना थाचारमा नेद केम पग्यो तेने उत्तर कदीयें .ये जे श्रीरुपनदेवजीनी वारें माणस शख श्रने जड दोय ,तेमने धर्म समजाववो घणो कठण थाय ने तथा श्रीमदा वीर नगवाननी वारे माणस वक श्रने जड होय ,तेमने धर्म पाजवो घणोर्सन थइ पडेले भने मध्यना वावीश तीर्थकरनी वारें माणस वर्धा झज्जु थने प्राज्ञ होय माटे तेमनें धर्म समजाववो पण मुलन होय रे थने पालतुं पण सोहेलुं दोय डे एवीरीतें मनुष्योना परिणा मा नेव होवायी कल्पा पण नेव थया के एम जाणवु, परंतु परमार्थथी नेद कां पण नथी मात्र पुरुपोना परिणामना नेव ॥३॥ ॥ दवे प्रथम तीर्थकरना साधु जे कल थने जह दोय ते दृष्टातें करी समजावीयें .यें श्रीरुपनदेवना तीर्थमा कोशएक थाचार्यनो शिष्य मेज चूमिझायें गयो ते घणो वखत लगाहीने पाबो थाव्यो तेने गुरुये पुनघु थरे शिष्य तने थाटलो वस्वत केम लागो त्यारे ते कच्छ पणाथी वोल्यो के स्वामी नाटकीया लोक रमत करता हता ते जोवाने कनो रह्यो हतो तेथी वधारे वखत लागो ते साजली गुरु घोल्या दे वत्स थापणे साधु थश्ने नाटक जोवा छाना रहे नदी एथी पाप लागे डे माटे थापणने ए थक पनीय ठे तेवारे शिष्ये तदत्ति कदी एटले जेम तमे कहो बो ते प्रमाण थाज पढ़ी जोश नही फरी कोश्क विवसें तेदज शिष्य वादिर नूमि गयो हतो ते घणो वखत लगाहीने पाडगे थाव्यो जेथी गुरुये पुढघु जे थाटलो वखत केम लागो तेवारे ते शिष्य वोल्यो के हे स्वामी रस्तामा नाटकणी नाचती दती ते जोवाने कलो रह्यो दतो तेने लीधे असुर थइ तेवारे गुरु योज्या जे तमने पूर्व मनाई करी इती तेम उतां केम जोवाने ऊना रह्या तेवार ते शिष्य जड पणाथी एटले मूर्खपणाथी बोल्यो के महाराज तमेतो नाटकीया जोवाने मना करी दती पण नाटकणी जोवानें तो मना करी दती नही तेवारे गुरु बोल्या दे महानाग्य नाटकपी तो वली नाटकीया करतां पण अधिक रागनुं कारण वे माटे तेतो सर्वथा नदीज जोवी ते सांजली शिष्य वोल्यो हे स्वामी मने प्रथम एवी समज पडीइती नही हवे हूँ क्यारे पण जोश नही इहां कच्छ पणाथी सत्य बोल्यो थने जडपणाथी जो नाटकीथा वा तो नाटकणी अवश्य वळवी जोश्ये एटटुं समज्यो नदी इति प्रथम दृष्टात ॥१॥ दवे वली बीच कोकण देशीय दृष्टांत कहे जे जेम कोशएक कोकणदेशना वाणीयायें वृक्षप णामां कुटुंय परिवार बोडी धर्म पामी वैराग्य वान थक्ने स्थविर पासें दीका जीधी तेने कोकण साधु कहीने सर्व बोलावे एक दिवस ते पंमिल थकी थावी रियापथिका किरिया पडिफम्यो तेने कासग्ग पारतां घणो वखत लागो तेवारें गुरुये पुढघु जो कोकणिक साधु । तमोने एटलो वस्वत कास्सगमा केम जागो ते सांनजी साधु सच पणे योज्यो के हे स्वामीजी में थाज जीववया पिंतवी, गुरुयें पुग्घु तमे केवा प्रकारनी जीवदया चितवी तेवारें साधु बोल्यो जेवारें ढं घेर गृहस्थ अवस्थामा रहेतो इतो तेवारे वर्षाका क्षेत्रमा वृदोनें कापी नाखी सूड करीने जमीनने अमिय पाली शुद्ध करी तेमां धान्य वावतो हतो तेणेकरी महारा घरमा घणुज धान्य नीपजतुं तुं तेयी महारु सर्व कुटुव मुखी रहेतु इतुं बने दवे में तो दीक्षा लीधी ने थने महा रा बोकरा थालसु ले ते खेतीमा कांश समजता नथी माटे जो निरुद्यमी थका निर्धित पणे घरमा वेग दशे अने सूड नही करशे तो धान्य उपजशे नदी तेथी ते वापठा नूखें मरशे एवा प्रकारनी में जीवदया चितवी एम जपणाथी साचु वोल्यो ते सांजली गुरू वोज्या हे न तमे मा ध्यान कसुंठे केमके ए खेतीनो धयो पाप विना थाय नही ते माटे सावधनीयनुमोदना साघुर्ने करवी युक्त नथीमाटे मिछामि मुकर वेनें सुध थाठ ते सांजली साधुयें मिहामि अकर वीधो, ए पी पृष्ठांत कर्पु ॥ २ ॥ ॥ हवे वलीत्री दृष्टांत कहे जे सोरन देशने विपे एक ब्राह्मण रहेतो तो तेनो पुत्र सासरे जवा लाग्यो तेवारें पितायें शिखामण थापी के हे बेटा एकवार दा कहेवी थने एकवार ना कहेवी एवी पितानी शिखामण धारण करीने सासरे पोहोतो त्यां सासु ससरायें पुनघु जे हे नजी' तमे थाव्या तेवारें ब्राह्मण बोल्यो दाजी,फरी सासु ससरे पुत्यु के घेर कुशल खेम ? तेवारें ब्राह्मण योल्यो नाजी, फरी पुब्यु के तमारा पिता देवलोक पहोता तेवारें की दाजी, फरी पुग्घु तेमनी पळवाडे कार खरच खराजात करी तेवारें का नाजी, ते सांजली सासु ससरे का के तमेतो महोटा मूर्ख बो, तेवारें तेणे कार्यु दाजी, एटली वात थया पठी ते सर्व ब्राह्मण मजीने मोकाणे गया त्या जश्ने जुए में तो जमाश्नो पिता जीवतो वेतो वे तेने राम राम जुहार छदारकरीने सर्व मन्या,पली जमाश्ना पितायें पुठशु के तमो सर्वेनु शा कामें थहींथा आवयु थयुं ? ते सनिली सर्वे वोल्याके तमारे ठोकरे तमे परलोक सधाव्या एवी वात थमारी पासें कही तेथी थींथां थाव्या बैयें, तेवारे ते ठोकराना पितायें कपुंके ए गोकरो मूर्ख बे एवा जीवनें पण एटले नोला थने जड एटले मूर्ख कदीयें एत्री दृष्टांत कयुं ॥ ३ ॥ ॥ एवा साधु प्रथम तीर्थंकर श्रीप नदेवना तीर्थ समजवा ए प्रथम तीर्थकरना साधु थाश्रयीत्रण दृष्टांत कयां ॥ ॥दवे चरम एटले ठेला तीर्थकर श्रीमहावीरस्वामीना साधु वक्र थने जड दोय तेना कपर दृष्टांत कहे जे जेम कोएक महावीर स्वामीना तीर्थनो साधु स्यमिदं गयो ते घणो मोडो थाव्यो तेने गुरुये वखत घणो लागवानु कारण पुग्यु तेवारे वकपणाथी कहेवा लागोके वादिर जाय तेने वख ततो लागेज एमां तमें मने [ पूठो गो।। पी जेवारें गुरुयें घणु पूघु तेवारें क€ जे नाट कीथा नाटक करता दता ते जोवा कनो रह्यो दतो तेने गुरुयें कपुंजे यतियें नाटक जोवु | नदी ते तमे जोडे तेथी पाप लाग्य माटे मिहामिजकड लीयो एम कदी मिठामिठकर दीधु, फरी कालांतरें एक दिवस नटहीनु नाटक देखवा कनो रह्यो तेथी घणो वखत लागो माटे गुरुयें तेनुं कारण पूबवाथी वकपणाना योगथी वांका वांका उत्तर थापवा मांमधा पण साधु कहे नही तोपण गुरुयें ज्यारे घएं पूधैं त्यारे घोव्यो जे नाटकणी नाच करती दती ते जोवा क जो रह्यो दतो,ते सनिली गुरु खोज्या में ना कही दती तो पण तु नाटक जोवा केम कनो रह्यो? तेवा रे शिष्य वकपणाथी वोल्यो जे तमेतो नाटकीथार्नु नाटक जोवाने वालो हतो परंतु ते वखत नट डी नाटक जोवाने शा वास्ते वासो नदी ? तो एमां मादारो शो वांक एतो तमारोज वांकडे एम वक्रपणाथी उलटो गुरुने संनो दीपो ए वक्रपणा थानयि प्रथम हु टांत कहूं ॥१॥ ॥ वे वली बीच लोकोक्त दृष्टांत वक्र जडर्नु कदे ने कोइएक शेनो करो घणो जविनीत हतो ते पोताना मा पाप साथै वठवाड कसा करे तेने मा पाप घणं सम जावे तो पण कोर्नु कपुं माने नदी पनी कुटुंवना माणसोयें तेने शीखामण थापी का के मा वापनी सासु तारे बोलतुं नही तेवारें तेणे कर्पु हवे हूँ बोलीश नदी एम करता कोश्एक दिवसें मा बाप प्रमुख सर्व कुटुंब मजी पुत्रने घर सोंपी कांक कामसर पाहेर गयो तेवारे ते बोकरो पितानी शीखामण याद करतो घरनां कमाड जडीने खाटला कपर जश् स्तो,योडीक वार पड़ी ते पिताविक थाव्या तेणे ठोकराने घणा साद कसा तो पण ते बोकरोखाट पर वेठो गे सांस्ले परंतु पोल्ने नही बने कमाड पण उघाडे नदी एम घणो वखत थयो त्यारे तेनो वाप नींत कपरथी चढी घरमा थायो थने जुए में तो पुत्र खाटला कपर वेठो वेगे दसे में तेने या मार थापीने पुग्यं के तने थाटला साद कसा तोपण केम जवाव थाप्यो नदी वलीक माड शावास्ते उघाख्यां नही तेवारे पुत्र करघु जे तमेज मने शीखाव्यो हतो के महोटाने सामु न बोलवू तो महारो एमा शो वाक डे ? तेवारें पितायें कयु के अरे मूर्खा काम होय त्यारे तो घोज जोश्ये ते सानली ठोकरो घोल्यो के दवे दु काम दशे तेवारें बोलीश, फरी एक दिवसें शेव घणालोकोमा वेग दता एटलामा घेर शेगणी रावही बनावीने बोकराने कधुके तारा नापर्ने योजावी लाव तो रावडी शीरावीने पळी मुखेथी काम कपर जाय, त्यारे ते बोकरो । ज्यांदा तनो बाप घणा माणसोनी वचमा वेगे ले तिदा जश् महोटे सावें हेला पाडीनें कहेवा लागोके हे पिताजी' थाज थापणे घेर राबडी थने ते महारी मातायें कपु के एकवार शीरावी जाउँ पठी मुखेंयी काम काज करो ते सानली शेत लला पामीने त्याची उग्यो था गल जर पुननें एकातमा कयुके हे कुपुत्र' था घणा लोकोमा लाज जाय तेवीरीते तु शा वा स्ते योयो तेवारें पुत्र वोल्यो तमेज मने शीखायो दतो तो दु गु करु ' तेवारे पिता वोल्यो के थाज पठी जो एवु काम दोय तो धीरे धीरे वोलवु, बोकरायें कयुके दवे धीरे धीरे बो लीश, एटलामा वली एक दिवस ते शेग्नें घेर लाय जागी तेवारें शेगपीयें शेठने तेडवा सारु टोकराने मोकल्यो ते ठोकरो तिहां थावीने जूए ने तो शेठ घणा लोकोनी वचमा वेगे ले ते गारं पोते दूर कनो रहीने धीरे धीरे वोल्यो घणीवार थया पठी शे तेने जोयो तेवारें शे- पुत्युं के श्ररे तु शावास्ते अहींधा थाप्यो हो तेवारे ते डोकरो शेग्नी पासें जश्ने दलवे हलवे पीरजयी शेतना कानमा कहेवा लागोके थापणे घेर लाय लागी ले ते सानती शेत वोल्यो के थरे मूर्खा घरतो वली गयुं दशे तु हा श्रावतांज केम बोल्यो नही तेवारें बोकरो वोल्पो के तमे सीस्वाप्यो दतो जे धीरे धीरे बोलने तो एमा महारो वांक कोइ नथी एत मारी पोतानीज मूल , पितायें कसुथरे एटलो महोटो थयो तोपण दजी थकल धावी नदी ज्यारे थाहा नीकल्या त्यारे तरतज धूल नाखवी हती तो थामि शांत यश् जात, एतु शेतनु केहेव ते करायें धारी रारब्युं एम करता शीत ऋतु थावी तेवारें प्रनात समयें एनो पिता दातण करवा वेतो वे तेना मुखमाथी धूवाडा नीकल्या ते देखी धूलनो धोयो नरीने बोकरायें पिताना महोडामा नारन्यो सेवारे पितायें जाप्यु जे ए बोकरो खरेखर मूर्ख ते वली एक दिवस पि तायें ठोकराने कसु के था घोडो तरस्यो ने तेने पाणी पीवरावजे यने नवरावी थावजे, बगे करायें कए ये काम तो नही करुं पितायें कयुं नवरावी बावजे पळी ते बोकरो घोडा ऊपर चही तलाव पासें जय घोडार्नु मदोहु वांधी नवरावीने पालो घेर साष्यो पण घोडो तरश्यो हतो माटे थाकुल व्याकुल थतो देखी शेठे पुत्रने मूर्ख जाणीघरमाथी काढी मूक्यो चने कसुके वाटे जाता कोइ मलेतो तेने महोटे सादें जुदार करजे पनी वाटें जर्ता कोश्एक पाराधी पास मामी मृगला एकता करी छनो ने तेने नोकरायें महोटे सादें जुहार कन्यो तेनो साद सान लीने सर्व मुग नासी गया पाराधीये तेने मार थाप्यो यने मूर्ख जाणीने कयुंके हे नमा मार्गे जा उपतो चालो जाजे वजीथागल जार्ता कोझक कोटवाल चोरनी शोध करवा नीकल्मो तेणे नोकराने उपतो देखी चोर जाणी पकन्यो मार मार्यो पनी मूखे जाणी कपुंके घणा माणस दीठामा थावे तेवारें एम कहेजे के तमारे एवं कोई वखते घाशोमा वली धागल जाता कोएक गाममा विवाद ले ते देखी पहेला मूर्खायें कसु के तमारे घेर एतु कार्य को वारे म था जो ए वचन सनिलीने विवाद वालायें व्यो मार चाप्यो पनी डोकरायें कोटवाजना शाखा ववा सपंधि वात फदे बते ते लोकोये मूर्ख जाणी शीखामण थापी कसके दे नोला जेवा ₹ घणा माणस मजे तेवारें एवं कहेतु के तमारे सदा सर्वदा एमज थाजो तेवात याद राखीने ठोकरो थागल चाल्यो मार्गमां को एक देशनो राजा मरण पाम्यो ने तेनी मैययने सजा प तेने ठोकरायें कसु के तमारे सदा सर्वदा एबुज होजो तिहां पण तेणे मार थाप्यो मूर्ख जाणीने मूकी दीघो एम रखडतो रमलतो केटलाएक दिवसें पाबो घेर थायो ए श्रीवीरना साधु उपर वजड वीज दृष्टांत कहुं ॥ ॥ दवे मध्य बावीश तीर्थकरना साधु ते सर्व रुद्ध थने प्राइवे तेना ऊपर दृष्टांत कहे। जेम कोशएक थजितनाथ नगवाननो साधु ते स्थमि लथी घणो थसुरो श्राव्यो माटे गुरुयें तेनु कारण पुग्घु तेवारें सज पणाथी कयुंके नाटकी थार्नु नाटक जोवा कनो रह्यो हतो, गुरु वोल्या जे साधुयें नाटक जोवु नही तेवारे तेणे मिष्यामिकड वेश्ने कस्के दवे कोश्वारे जोवा कनो रहीश नदी वत्ती कोशएक दिवसें बाहेर गयो तिहा रस्तामा नटवी नाचती इती ते जो पंमित पांथी विचार करयो के गुरुयें मुजनें नाटकीथान नाटक जोवा वोठे तो नाटकपीतो वली विशेप रागनुं कारण ले माटे ए मुजने सर्वथा जोवीज नही एदु विचारीने पाडगे थायो ए शर्छ भने प्राइनु दृष्टांत कल्यं ॥१॥ एम ए दृष्टांत जे कयां ते काश् सर्वे साधु थाश्रयी समजवां नही, परंतु कोइएक सा धुना थाश्रयी जाणवां ॥ ॥ हवे थाजना समयना माणस वक्र थने जड ते प्रमाणे थाज पाचमाथारामा चारित्रीया साधु नथी एम पणन कहे कदापि थनानोग पणे अतिचार दोप पणा लागे तेवा पण साधु थाजना समयमा केमके साधु विना धर्म न होय माटे व्यव हार नाप्पमा कर्पु वे के श्रीनगवतना नांखेला शास्वनी जे खरेखरी प्ररूपणा करे तेने साधु कहीयें ॥ तया ॥जो नई नधि धम्मो, नय सामाश्य न चेवय वयाइ । सो समणसघबुनो, कायद्यो समण सघेण ॥ १ ॥ माटे जो पूर्व साधुनी अपेक्षायें हीन कहो तो चले कहो पण पमकालमा साधु नथीज एम न कदीये जे माटे साधु तो धाजे पण ॥ ॥दवे ए दश प्रकारनो कम्प जे साधुनो थाधार रूप धर्म ते त्रीजा वैद्यना थोपध सरखो के एटले जेम त्रीजो वैद्य उपकारी थयो तेम या कल्प पण उपकारी जाणवो ते त्रीजा वैयनी कथा कही देखाडे के कोशएक राजाने एकज पुत्र थत्यंत वजन हतो माटे राजायें विचार करतो जे था पुत्रने रोग श्राव्या पहेलांज एजें दु थोपध कराई तो पड़ी कोइ वारें एनें रोगज थाय नही एम चितवी वैद्यनें वोलावी कK के था नोकरानुं एवं थोपध करो के जेणेकरी एने को वखत रोग न थाय ते वारे वैय पोल्यो के हे राजन् । महारी पासें जे श्रीपध ते एबुले के जे खाधा थकी रोग होय तो जाय थने जो रोग न होय तो वली नवो रोग प्रगट थाय ते सांज ली राजायें कसं के सूता सिंहनें जगाउवा सरखं तादारु थोपध थमारे करवू नथी, एम कही तेने सीख थापी, पनी वीजा वैद्यने पुन' तेवारे ते बोल्यो के हे राजन् । माहारु औपध स्ववराव्याथी जो रोग दोय तो जाय थने जो रोग न होय तो गुण दोप का नथाय ते सांजली राजा घोल्यो जे राखमा घृत ढोलवा जेवु ताहारु औपध अमारा कामनुं नथी एम कदी तेने पण विवाय कसो, पनी प्रीजा वैद्यनें वोजावी पुबघु तेवार ते वोल्यो रे राजन्! महारु श्रोपध एतु वे के जे खवराव्याथी रोग होय तो जतो रहे श्रने रोग न होय तो वली अपर रोग थावे नही तथा बल, बुद्धि, रूप थने तेजनी वृद्धि करे ए वात सांजली राजायें प्रसन्न थइने ते वैपन थोपध नोकराने थपाव्यं अने वेपनें शिरपाव थापी विदाय कसो एवीरीतें । ए कम्प सिक्षति पण त्रीजा वेय समान गुणकारी डे केमके एना श्रवणथकी जे पूर्व कर्म बांध्या होय तप व्याधि दूर थ जाय बने नवा कर्मनो बंध पढे नही सर्व थापा निवारे, मुख सपत्ति करे, चारित्रना गुणनी पुष्टि करे श्रने वली मोझना सुख तरत थापे ए कठप सूत्रने विपे प्रथम श्रोचीर चरित्र जे ते बीज समान बे, श्रीपार्श्वनाथ चरित्र जे ते थकुरो , श्रीनेमीश्वर नगवाननु चरित्र ने ते थड बे,श्रीयादिनाथ चरित्र २ ते शाखा ने, थविरावली ते फन , कथा डे ते मुगध , फल ते मोद , जे ए सूत्रना सर्व श्रधर सानले ते जीव थात जवां मोक्ष जाया। ॥दवे साघु जे गाममा चोमासु रहे ते गाममा ए कल्पसूत्रनी वा चना करे अने चोमासु पूरण थया पड़ी एटले कार्तिकयदि पूर्णिमा थया पढ़ी पण कदापि वर्षाव वरसवायी मार्गमा कादव प्रमुख थया दोय तो वधारे दिवस पण रहे तथा वली क वाच जे गाममा साधु चोमासु रह्या दोय बने हजी चोमासु पूरूं न थ{ दोय तेनी वचमा ते गाममा १ मरकी थादिक रोगोनो उपश्व थाय, २ निदा उर्लन मलती होय, ३ राजा उष्ट होय तेणे कोप कस्यो दोय, ४ कुंपुश्राविक घणा जीवोनी उत्पत्ति थइ होय, ५ सर्प यमि थादिकनो नय उत्पन्न भयो दोय,रोग थने वाद विरमता न दोय,निकपडे इत्यादिक कारणे चोमासामा पण विहार करवानी थाझा अनुयें दीधी माटे विहार करवामां दोप नथी दवे सयम निर्वाह करवानें अर्थे साधुनें ज्यां चोमा€ रहेवू पढे तिदा प्रथम ते खेत्रमा उत्कृष्टपणे तो तेर गुण जोवा जोश्ये तेना नाम कहेने १ जे गाममा चिस्कल कादव घणो न होय, २ जे गाममा येशभियादिक जीव धणा न होय, ३ स्थमिज जवानी चूमि निरवद्य हो य, ४ स्त्री पशु पंझकादिक दोप रहित उपाशरो रदेवानो होय, ५ जे क्षेत्रमा दहिं दूध घणा मलता होय, ६ जे गाममां नरक बने अधावान एवा प्रावकना घणां घर होय, ७ जे गा मा वैय पण निपुण रहेता होय, ७ जिहां ओपध घणं सुजन मलता होय, ए जिहां श्रावकोना घरमा धन धान्य प्रमुखनो घणु संग्रह होय पण को वातनी चिंता न होय, १० जे गामनो राजा अति नक होय यतिउनी नक्ति घणी करतो होय, ११ जिदा ब्राह्मण, ता पस, प्रथा, नरडा प्रमुख पाखंमी लोक जे ते साधुनें अपमान करी शकता न होय, १२ जिहां निक्षा मुलन मलती दोय, १३ जिहां सबाय पठन पाठनादिक सुखें थतां दोय ए तेर गुण वाला गामा साधुयें चोमासु करवं, कदापि एटला योग न बनें तो पण जघन्यथी चार गुण तो थवश्य जोवा तेना नाम कहेले १ मिज नूमि घणीज सारी १८ फास होय, २ जेमा सपाय भ्यान सुखें थाय एवी रहेवाने जगा दोय, ३ जिहाँ श्रीजिनमदिर होय, ४ जिहां गो चरी कडी रीतें मलती होय ए चार गुण क्षेत्रना जोनें चोमासु फरवु एम ए तेर गुण उत्क एथी अने चार गुण जघन्यथी कह्या तथा पांचथी मामीने पार गुण सुधी सर्व मध्यम गुण जाणवा, एतु क्षेत्र जोनें त्यां साधुयें चोमासु करतुं कारण के साधुजन पृथ्वी पीउने विपे नवकक्पि विहार करे तिदा अनेक तीर्थयात्रा करतां, गामेगामे विचरता मिथ्यात्वे पडता अनेक नव्यजीवोना महार करता थकां विघरे ते जेवारे चोमा यावे तेवारे धराममो सजलधारायें वांद पढे तेथी पग पगजे पाणीनो प्रवाद पाने, कोमलकिसलय फूटे,थानकें थानकें अनेक प्रकारना जंतु उत्पन्न थाय ते माटे जीवयन करनारा चारित्रियायें वर्षाकालमा विहार न करचो, एकत्र स्थान रहे, थनेक प्रकारना घोर अनियह करवा, जेमाटे साधुने तो वीशवशा दया ले परंतु श्रीकृष्णमाहाराज जेवा सवावशानी वयाना पालनारा प्रावकोयें पण चोमासामा शोल हजार राजाउंने सनामां पधारवानी ना कही बने पोतें पण सना मांहे नाव्या केमके वाद मांदे घणा कीडी कृयुथादिक जीव दणाय एतु जाणी ठाकोर पोढपाने एवो जवान श्रीकृष्णे कसो त्यांची वेव पोढणी थगीथारस लोकमां प्रसिद थइ एरीतें पक्ष प्रावक पण वर्षाकालें पाप जाणीने देशांतरनो व्यापार न करे माटे साधुनें पण चोमासामा एक ठेकाणे रहे तेचोमासाने विपे पंजोसण पर्वश्रावे थके मांगलिकनें थर्थे कल्पसूत्र अवश्य वाचवु ॥ ॥ दवे पंजोसण पर्व सर्व पर्वो माहे उत्कृष्ट बे माटे एनो म हिमा कहें १ जेम मत्रमाहे पांच परमेष्टि मत्र, २ जेम तीर्घमांदे शत्रुजय तीर्थ ३ जेम दानमादे थनय दान, ४ जेम गुणांहे विनय गुण, ५ जेम व्रतमाहे ब्रह्मचर्य व्रत, ६ जेम सतोपमांद निय म, जेम तपस्या मांहे प्रिय दमन, जेम दर्शनमाहे जैनदर्शन,एजेमक्षीरमाहे गोवीर, १० जेम जलमध्ये गंगानीर,११ जेम पटमादे दीर,१२ जेम वस्त्रमादे चीर,१३ जेम थलकारमांडे चूडामणि, १४ जेमज्योत्रामादे निशामणि, १५ जेम तुरंगमाहे पंचवन्नकिशोर, १६ जेम नृत्यकलावतमांद मोर, १७ जेम गजमांह ऐरावत, १८ जेम देत्यमांहे ऐरावण, १ए जेम वनमांदे नवनवन, २० जेम काठमांहे धवन, २१ जेम तेजवतमादे थादित्य, २२ जेम साहासिक माहे विक्रमादित्य, २३ जेम न्यायवतमाहे श्रीराम, २४ जेम रूपवतमांद काम, २५ जेम सतीमाद सीता, २६ जेम शास्त्रमादे गीता, २७ जेम वाजिनमांहे नंना, २७ जेम स्त्रीमारे रंना, ए जेम मुगधमांदे कस्तूरी, ३० जेम वस्तुमाहे तेज, ३१ जेम पुण्यश्लोकमांहे राजा नज, ३२ जेम फूलमांहे सहस्रवल कमल, ३३ जेम धनुर्धरमाहे थर्जून, २५ जेम इश्यिमांहे नयन, ३५ जेम धातुमाहे सुवर्ण, ३६ जेम दातारमाहे कर्ण, ३ जेम गायमाहे कामधेनु गाय, ३७ जेम स्नेदमाहे घृत, ३ए जेम जलमांद अमृत, ५ जेम झानमाहे केवलझान, ३१ जेम सुखमांद मोक्नु मुख, तेम सर्व पर्वमाहे पंजोसण पर्व महोटु जाणतुं ए नाश्वा वि पंचमी जेम प्रीजिनशासनने विपे माननीय ने तेमज परशासनने विपे पण ए| रुपीपंचमीनो दिवस माननीय नेते पीपंचमीनो सवध कहे ॥ ॥ पुष्पवती नगरीने विपे। नीलकत नामा ब्राह्मण रहेतो दतो तेनी सोमा नामेनार्या हती तथा श्वेव नामे पुत्र दतो ते जन्मथीदारिडी हतो केटलेक कालें तेना माता पिता मरण पामीने एनाज घरमां पिता बलवीयो ययो भने माता कुतरी थर एवामा श्रापक्ष थाव्यो तेवारे घरमा श्ष्य नही तेथी विचार करवा लागो जे माता पिताना प्रास्नो दिवस मदारे केवीरीतें साचववो पनी यजदीयो ते लीने घेर खेडवा थाप्यो तेनु नाटुं लश अध, चोखा, खोम, घृत श्रने गोधुम लश्थावीने खीर रांधी घणा ब्राह्मणोने नोतरु दीर्घं एवामां पूर्वता नवढं पातानु घर देखीने कुतरीने जाति स्मरण शान उपन में तेणे ते दूधमादे उपरथी सप्पै गरल नाखी ते वीती तेवारें कुतरीयें। विचाटुं जे थज्ञाने करीश्रा खीरने ब्राह्मणो जमशे तोमरण पामशे तेथी महा अनर्थ थप डशे ब्रह्म हत्यार्नु पाप लाग ने महारो पुत्र तया वह वे मरण पामशे एम विचारे के एट सामां वगु थावी तेवारे तेने देखता ते कुतरीय सुधमाहे पोतार्नु मोहोडूं घाली उध वोटपुं ते जोइ वळुने रीश चही तेथी तेने मुसजना प्रहारे मार मारी केट नागीने ज्या गायनी शाला ते त्या जश् हेती पाटी दीधी तेथी ते तडफडवा लागी अने ब्राह्मणे बीजो सुध लावी खीर रांधी सर्व ब्राह्मणोने जमाही आनो दिवस साधष्यों पढी बाह्मण थाको थको बाहर गोशालामा खाटली पाथरी सूतो एवामां सध्या समय थयो तेवार धावा विवसनुं शुस्म्यो, तिरस्यो थाकी गयेलो बलव ते पण पेला घांची लावीने तेना स्थानकें पायो एटलामा कुन देवी श्रावीने यमदीया तथा कुतरीना शरीरमा सक्रमी तेवारें कुतरी वलवीयाने कहेवा लागी के श्राज पाम तो श्रापण इतुं श्रने खावानुं ब्राह्मणोने मत्यु एटलुज नदी पण था पापिष्ट विदुयें मादारी केड नांगी नारखी तेथी महाउ खपामु नु तेवारें वलदीयो बोल्यो जे था पापिष्ट धापणो नोकरो पण काय समजतो नथी मने पण बाजें घांची में घेर मोकल्यो दतो तेणे थाखो दिवस घाणीमा फेरव्यो थने धारो पाणी आप्या विना एमज नूखें मरतो यांही श्रावी याधी गयो , ए सर्व वात खाटलापर वेवेला ब्राह्मणे सांजली तेथी तेना म नमा दिलगिरी पेवा थई थने विचास्यु जे थातो महारा माता पिता देखाय ने एवो निर धार करी त्यांयी तीने कुतरीने खीरनु जोजन कराव्यु बने बलवने सारीरीते चारो प्रमुख वायु पनी पोतें पोताना माता पितानी सजति करवाने अय परदेश जश्थनेक तीर्थ करी कोइ महोटा कपीश्वरने पूबवा लागो के महाराज महारो वाप बलदी थयो में श्रने माता कुतरी था ये तेनी रुडी गति केवीरीतें चाय ते प्रकार कहो तेवारें पी वोल्पो जे ए वेड जीचें कपि पंचमीना दिवसें अप्रस्तावे काम कीठा करेली में मैथुन सेवन कमुंडे तेनुं पाप लाग्युं तेना योगें ए यवतार पाम्यां ने माटे हवे तु जेवार ऋषि पंचमी एटले नावरवाईदि पंचमीनो दिवस आवे ते दिवसें बलवर्नु खेड्यु धान्य खाइश नही चोरको चविहारो उप वास करजे कदापि स्वाधा विना रहेवाय नही तो वश मुती थरदना वाकला खाने एटले एम नी सशति यशे पड़ी ते ब्राह्मणे तेमज कीर्घं ते विवसथा लोकोने विपे रुपि पंचमीन नाम प्रसिद अयु डे ए रुपिपंचमीना पर्व श्राश्रयी कथा कही॥ ॥ इवे श्रीपर्यपण पर्व थावे तेवारें महोटो महोत्सव करी जे पुरुप तेलानी तपस्यामां एटले थम्म तप करी श्रीकल्पसूत्रने सानले ते पुरुप नागकेतुनी पेरें केवलज्ञान पामीने मोद मुखने पामे ते नागकेतुनी कथा कहे वे पकांता नगरीने विपे विजयसेन नामे राजा राज्य करतो हतो, ते नगरीमा श्रीकांत नामा शेठ रहेतो इतो तेनी श्रीसखि नामे नार्या हती तेने घणा सपाय करता देवदेवीउनी मानता करता एक पुत्र थाव्यो अनुक्रमे ते पुत्रनु पाजण पोपण करतां केटलोएक काल वीत्यो एटलामा पर्युपण पर्वना दिवसो श्राव्या ते समयमा ते बालकनी थासपास वेठेला माणसो माहोमांद वातो करवा जागां के थापणे सांवत्सरीनो तेलो करीम एटले श्रम तप करी/ ए वास सानजीने पहेला वालकने जातिस्मरण झान उपन्यु तेना योगें पोतानो पालो नव दीतो तेषी वाड्यावस्थामा पण तेरो पोताना मनमा श्रध्मनुं तप करतुं एवो निमय करीने स्तनपान करवु मूकी दीधु तेथी तेनुं शरीर कुमलाइ गर्यु मरणतुल्य अवस्था दी गमा धावी एवी पुत्रनी व्यवस्था जो तेनां माता पिता घणुज 5 ख धरवा लागा तेणे घनेक प्रकारना थोपधोपचार कसा तो पण ते बाजकें स्तनपान को नही एम करता नूखना योगें ते बालकने मूर्धा यावी गई बोकराने मूवेला जेवो देखीने तेना वापनु हैपु फाटी गयु तेथी मरण पाम्यो, तेमज माता पण मरण पामी श्रने वालकने मृतक देखी तेना जातिवा जायें धरतीमो नमासो,पठी वापणा गाममा थपुत्रीयो श्रीकांतशेठ मरण पाम्यो एवी खवर पडतां राजायें ते शेग्नुं धन लेवा सारूं माणस मोकव्या, एवा समयमां श्रध्म तपना प्रनावें करी धरणेनु श्रासन चलायमान थर्पु तेवारें थवधिज्ञाने करी सर्व वृत्तांत जाणी त्या श्रावी वालकनें धमृत संचारे सक कसो थने पोतें ब्राह्मणनु रूप धारण करी ते शेग्ना घरना वा

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३६महाराम
रामाना
बामराना
नागकेतु

रणा धागल मनो रहीने राजाना माणसोने धन लेता घटकाव्यां, राजपुरुपोयें जश राजाने कहूं के ब्राह्मण धन लेवा वेतो नथी तेवार राजा पोतें उतावलो श्रावीने ब्राह्मणने कद्देवा लागो के थमारा राज्यमा जे थपुत्रीयो मरण पामे तेनुं धन राजा लइ जाय एवी परंपरायें रीत माटे तमे शा वास्ते थटकाव करो बो त्यारे ब्राह्मण वोल्यो रे राजन् ! ए शेठनो पुत्र जीवतो वे राजायें का क्यों ने, तेवारें धरपगई ते वालक जमीनमाथी जीवतो काढीने रा जाने देखायो ते जो सर्व लोक विस्मय पाम्या राजायें ब्राह्मणने पूयु के थाप कोण गे थने था वालक कोण बे तथा ए वात तमे केम जाणी' ब्राह्मण वोल्यो दु धरणे नाग राजा तु तेलाना प्रनावथी एनो सहाय करवाने वाव्यो बु राजा बोल्यो ए बाज जनम ताज श्रम तप केम कयु, धरणें वोल्या हे राजन् । ए बालक पूर्व नवमा एक वाणीयोनो ठोकरो हतो त्या बाल्यावस्थामांज एनी माता मरण पामी तेवार एनो पिता बीजी स्त्री पर एयो पढ़ी ते उरमान माता जो बोकरानो थोडो वांक होय तोपण अवगणना करे घण घणु खोजे तथा मारवा कूटवा वगैरे घणुज ख देवा लागी, एम ते बोकरो नित्य प्रत्ये 5 स्व पामतो थको तेनो एक श्रावक मित्र दतो तेनी पासें जई तेणे पोताना उखनी बात कही तेवारे मित्र योज्योके हे नाइ' तें पूर्व नवमां धर्म करो नथी तेना योगथी 5 खी थयो हो एवो उपदेश सांजली तेणे यथाशक्ति तप करवानो प्रारंन को पनी ते थामे चौदशे उपवास करतो थने वीजा दिवसोमा नवकारसी पोरसी प्रमुख तप करतो अनुक्रमें पंजोसण पर्व थाव्युं ते वारें तेणे थम्म तप करवानो निमय विचार करीने रात्रे वणनी फुपडीमां जश् सूतो, एट लामा तेनी नजीक लाय लागी तेवारें श्रवसर जोड्ने अमान मातायें घासनी फुपडी उपर थमि नास्यो तेथी कुंपड़ी चली गई थने ठोकरो पण अनध्याने मरण पाम्यो तेणे अष्टम तप घ्यानना प्रनावी हा थपुत्रीया श्रीकांत शेतने घेर जन्म लीधो श्रने जातिस्मरण ज्ञान पामीने एणे थघ्म तप क, तेथी नूखने योगें मूखीगत थयो हतो परतु जीवतो हतो तथापि लोके अजाण पणे तेने मूवेलो जाणी जमीनमा नमारसो ते में थावी अमृत सचार करी मूर्था कतारी सङ्ग कसो दे राजन 'ए महापुरुप , एहज नवमां मोक्छ जाशे एने घणाज यमयी राखजो, तमोने पण महोटो कपकारनो करवा वालो थाशे एम कदी पोताना गलानो दार पालकना गलामा नाखी घरणे पोतानें स्थान गयो, राजायें ते पालकनें दाथी रूपर च डावी महोटा थायर सहित घेर थाल्यो पनी कुंदुवना लोकोयें शेग्नु मृतकार्य करी बोकरान नाम नागकेतु पाडघु ते वाजपणाथीज जितेंश्यि परम श्रावक थयो, श्रष्टमी, चतुर्दशीनो उप वास करे, चोमासें वह करे बने पंजोसणनो यज्म करे, जिनपूजा, साधु सेवा नित्य करे, एक दिवसे नगरना विजयसेन राजायें कोई पुरुपनी ऊपर चोरीनु जुर्तु कलक थापी निरपराधी तां तेने माखो ते मरीने व्यतर देवता थयो तेणे थावी श्राखा नगरनो विनाश करवा सारु नगर प्रमाणे एक सिमा श्राकाशे विकूर्वी लोकोनें वीवराववा लाग्यो भने राजाने पा?यें मारी मोदोहे लोदी वमतों करी जमीन पर नाल्यो, ते कृत्य जोड्ने नागकेतुयें जाप्युं जे ई जीवता उतां श्रीसंघनो थने श्रीजिनचेस्पनो विनाश केम जो सक्कुं । एवं विचार मना जीवदया थाणी नगवानना प्रासाद कपर चडीने शिलाने दाय श्राडो थापी पडती शिला हाय धरी राखी व्यंतरो पण नागकेतुना तपनी शक्ति न सदन करतो थको ते पोतानी वि कूर्वेली शिलाने सदरण करीने नागकेतुनें थावी पगे लागो यने नागकेसुना कहेवा कपरथी राजाने पण शाता करीने ध्यंतर पोतानें थानकें गयो, पडी नागकेतुनी धणी मानता थई राजायें तेने सन्मान थाप्यं नागकेतु पण पूर्वनी पे घणा तप जप करतो थको विचरे ने एकदा नागकेतुनें जगवतनी पूजा करतां फूलमादे रहेला तंबोली नागें मश्यो तेथी शरीरमा फेर व्यापी गयुं पण शुन ध्यान धरवा लागो तेना योगथी केवलज्ञानकप{ तिदा दीक्षा लीधी, शासन देवीयें यो, मुहपति प्रमुख साधुनो वेश थाप्यो, घणाकाल पर्यंत विहार करी घणा नव्यजीवोनें प्रतिबोध थापी मोक्ष पोहोतो, एवो नागकेतुनोथधिकार सांजलीने जे नव्य प्राणी बहथम तप करीने एटप्ले वेला तेलानी तपस्या करीने श्रीपर्युषण पर्वमा कल्पसूत्र सानलशे ते जीव शाश्वत सुखने पामो इतिश्री नागकेतु कथा समाप्त ॥ ॥श्रा कल्पसूत्र पापन निवारक , मनोवांबित पूरनार , निकाचित जे चार घातिकर्म ले तेनुं जीपनार माटे जव्यजीवें प्रमाद, निशा, विकथा बांमी वेता अथवा तेलानु तप करीने कल्पसूत्र सांजलq तथा श्रीजीवानिगम मध्ये कहूं ले के पंजोसण पर्व थावे त्यारे देवताना ३३ पण नेला थ ने श्रीनदीश्वर छीपने विपे जइ थप महोत्सव करे बे तेम हां रूठा श्रावक, प्राविकायें पण कल्पसूत्रनो या महोत्सव करवो एवा विधियें करी जो कल्पसूत्र सानवे तो बहु लानकारी थाय॥ ॥ ए कल्पसूत्र श्रीमहावीर स्वामीनें बछे पाटें चौद पूर्वधारी श्रीनध्यागु स्वामी युगप्रधान थया तेमने चौव पूर्व माहेला नवमा प्रत्यास्म्यान प्रवाद नामा पूर्वनी मांदेथी वशाश्रुतस्कघ सूत्र तेनु थाम्मु थध्ययन रूप रच्यु बे ते जेम दधिनो सार घृत तेम सर्व शास्त्रनो सार जूत ए सून रव्यु डे हा चोद पूर्व मान कहे जे तिहां प्रथम उत्पाद पूर्व में ते अवाही सहित एक दाथी कलो करीयें तेनो जेटलो दगलो देखाय तेटली साइनो एक -. ढगलो करीये एटली साश्यी लखीये तेवारें ए पहेलो पूर्व जखाय,बीजो अग्रायणी पूर्व घे हाथी जेटली साथी लखाय, त्रीजो वीर्यप्रवाद पूर्व चार हाथी जेटली साथी लखाय, चोधो थ स्तिप्रवाद पूर्व यात दाथी जेटली साश्ये सखाय, पाचमो ज्ञानप्रवाद पूर्व झोल हाथी जेटली | सायें लखाय, सत्यप्रवाद पूर्व पत्रीश हाथी जेटली साश्ये लस्वाय, सातमो यात्मप्रवाद पूर्व चौसठ हाथी जेटली साश्य लखाय, थाउमो कर्मप्रवाद पूर्व एकसोनें अचवीश दायी। जेटली सायें सखाय, नवमो प्रत्यास्म्यानप्रवाद पूर्व वसो उपन्न दाथा जेटली साक्ष्य ज खाय, दशमो विद्याप्रवाद पूर्व पांचसेंने पार हाथी जेटली साथी लस्वाय, थगीथारमो कल्या णप्रवाद पूर्व एक दजारनें चोवीश दाथी जेटली सायें लखाय, पारमो प्राणावायप्रवाद पूर्व ये दजारनें थडतालीश हाथी जेटली साथी जखाय, तेरमो कियाविशाल पूर्व चार हजारनें उन्नु हाथी जेटली सायें लखाय थने चौदमो जोकविसार पूर्व श्राव हजार एकसोनें पाणु हाथीनां प्रमाण जेटली साश्थी लखाय एम चोदें पूर्वनें लखवा मांझीयें तो सरवाले १५३०३ दायीउना उगला जेटली सा जोश्ये परंतु अद्यापि पर्यंत कोश्ये लस्म्या नथी थने दवे को जखशे पण नदी मात्र प्रमाण थापीने श्रीकेवली नगवाने उपमा बतावी ने ए सूत्रथी मान कहुं ॥ दवे ए चोदपूर्वन थर्थ पकी मान कहे ये समस्त जेटली नदी ते सर्वे नवीनी वेलुना कणी या जेटला थाय तथा थसख्याता समु ले ते सर्व समुश्ना पाणीना विन जेटखा थाय तेथी पण थनतगुणो एकेका सूचना पदनो थर्थ जाणवो एरीतें चौक पूर्वना नाम कह्या ॥ ए कल्पसूत्र प्रथम तो नावरवाशवि पंचमीना विवसें रात्रिनुं सांवत्सरिक पहिकमणु कसा पढ़ी थर्दिरात्रि कालपदण फरी श्रीगुरु मना थका मुखथी सूत्रनो पाठ प्रचार करता अने बीजा ॥

साधु सर्व कामस्सग्ग करी सनिजता दता तेमज विवसना साधवीउने पण सजलावता हता ए विधि हतो ॥ ॥ तेवार पछी श्रीमहावीर नगवाननां निर्वाणथी नवशेने ऐसीमें वर्षे पुस्तका रूद थयो यने श्रीवीर निर्वाणषी नवशे घ्यायुमें वर्षे थानवपुर नगर जेने हमणा वडनगर कड़े तेने विपे ध्रुवसेन राजा राज्य करतो हतो तेने अत्यंत वजन सेनागज नामे एक पुत्र दतो ते वैवयोगें मरण पाम्यो एटलामा पर्युपण पर्व पण थायां तेवारें राजा घणो शोकाको त थयो हतो तेषी धर्मशालाने वि पण थावे नदी वली जेम राना चाले तेम प्रजा चाले ए हेतुथी वीजा जे शेठ व्यवहारी प्रमुख लोक इता ते पण धर्मशालाने विपे थावे नही एवो राजाने शोकातुर थयो नाणी, धर्मनी दाणी थती देवीने गुरु ध्रुवसेन राजानी पासें वदाववा गया त्या राजाने कद्देवा लाग्या के हे राजन् । तमो शोकाक्रांत थया जाणीने नगरना लोक पण सर्व शोकाकात थया ने तेमाटे शरीर धनाविक सर्व थनित्य बे, थायुष्य चचल बे, ससार असार वे ए प्रकारना संसार स्वरूपनें तमें जाणोज बो माटे जैनधर्म माहे घणो शोक करवो अयुक्त कह्यो तेषी तमे शोक निवारीने पंचमीना दिवसें पंजोसण जे माटे धर्मशाला माहे पधारो तो श्रीनश्वालु स्वामीयें नवमा पूर्व मदियी ठरेलु श्रीकल्पनामें सूत्र महामंग लिक प्राचीन कर्मना यर्नु करनार ते वांचीये तेवारें राजाने पाँचमने दिवसें पुत्र मरणनो शोक निवर्तावयो हतो थने महोत्सव पण हतो तेषी राजायें कयु के बन्नो दिवस थथवा पोथनो दिवस तेरावो तो महाराणी थावी शकाय पण पंचमीने दिवसें महाराथी यावी श काशे नही तेवारें" अंतरावासेकप्पत्ति" एवो पाउ देखीने कारण विशे गुरुयें चोथनी थाप ना करी चोथ कल्पसूत्र वाचवा कवुल कयु कालिकाचार्यथी उंहरु वलमित्र थने जानुमित्र एपे नाणेज सार्षे वडनगरनो ध्रुवसेनराजा सना सहित धर्मशाला मध्ये थाव्यो तेवार नव वा चनायें करी प्रनावनायें सहित महोत्सव पूर्वक सर्वलोकनी समक्ष श्रीकल्पसूत्र गुरुयें वांच्यु ते दिवसयी चोयने दिवसें पंजोसण थवानी परंपरा चाली ने श्रने केटलाएक गठमां श्रया पि सुधी पांचमनां पण पंजोसण करे तेमज ते दिवसथी महोत्सव पूर्वक प्रनावना सहित सर्वलोकनी समक्ष कल्पसूत्र वांचवानी प्रवृत्ति चाली ते श्रीगुरु परंपरायें आज पर्यंत चाली थावे ने थने ते प्रमाणे सर्वस्थले कल्पसूत्र वचाय ने एना वाचवाना अधिकारी योग वदन : फरनारा साधु थने सनिलवानो अधिकार चतुर्विध श्रीसंघने ॥ ॥ एक प्रता वली थाम कहेज ले के वहनगरमा गुरुजी घोमासु रह्या दता एवामां पर्यपण नजीक थावतार्मा ध्रुवसेन राजानो एकन पुत्र दतो ते दादज्वरें पीडा पामवा लाग्यो तेना योगे राजा चितातुर थयो थको गुरुने वांदवा यावी शक्यो नही थने पर्यपण पर्वमां धर्मध्यानमा प्रवृत्ति करनारा घणा जनो दीगमा न थाव्या तेथी गुरुये तेनुं कारण पुढघु तेवारे राजाने शोकमा पच्यो जाणी गुरु पोते राज सनामां पधाया त्या राजाने धर्मोपदेश थापी समजावीने मदोटा लान नु कारण जाणी मागतिक निमिर्ने कल्पसूत्रनी प्रथम वाचना करी ते सनिजता राजाना पुत्र ने शाता यई एम करतां नव वाचनायें तो सर्व वादज्वर उपशमी गयो तेथी राजायें घणो हर्षवत थश्ने महोटो महोत्सव कसो, धर्मनो मदिमा वृदिपाम्यो, राजायें गुरुने विनति करी के श्रीसघना मागलिक निमित्तें ए कम्पसूत्र वर्पोवर्ष श्रीसघनें वांची सनसावतु ते दिवसथी कल्पसूत्र चतुर्विध श्रीसघनी बागल वांची सनलाववानी प्रवृत्ति चालीने ते रीते दमणा पण आवकोना श्राग्रहथी कल्पसूत्रनी वाचना साधुमुनिराज करे । ॥ दवे ए सूत्रना पांचवा यकी एना थक्षरना महात्म्यनें योगें साधु, साध्वी, आवक बने प्राविकाना कल्याण थाय ए वात नि सवेद के तेनी उपर कथा कहे डे कोइएक मोशीनो पुत्र वनमांहे गायो चा रवा जाय एक समये तेने सप्पै कश्यो तेथी मूर्तीगत थयो ते वात लोकोना मुख थकी सांजलीने मोसी वनमा गइ त्या पुत्रनें मूर्छित थयो देखी, मोदना वश थकी पुत्रनु नाम वारंवार स्मरण करवा मांमधु के रे हंसा रे परमहंस एवीरीते चार पोहोरसुधी पोकार कस्रो, तेथी मोसीना बोकराने फेर उतस्यु, साजो थयो, प्रनातें माता श्रने बोकरो बेदु जण गामा थाव्यां, नगरना जोक सर्व विस्मय थया, त्या मोशीने गारुडीये पूज्यु जे तमोये शो उपाय कस्यो, के जे थकी तमारो पुत्र निर्विप ययो' त्यारे मोशी बोलीजे दु कांश मत्र जाणती नथी थोपध जाणती नथी, पण थारखी रात्रि, रे हंस हंस श्रने रे परमहस' परमहंस।। एवं रुदन कसे तेथी निर्विप थयो में पोकार कसो ते देवतायें सांजल्यो देवना प्रयोगथी बोकरो निर्विप थयो ते सनिली गारुडी बोल्या के ए मत्र सत्य थदना प्रयोगथी मत्र निपजे ठे, तेम था कल्प सिक्षांत वांचता थकां, सांजलता थकां, जन्म जन्मनां पातक जाय डे एवं महोदुं महात्म्य कल्पसूत्रनायझर्नु जाणवु ए कल्पसूत्रने सांजलवा यकी घणा गुण थाय ने, घणा मांगलिकनी वृद्धि थाय जे ॥ ॥ दवे परिसामस्त्येन उपणा सेवना ते पर्यपणा कही ते पंजोसण पर्व थाव्यां थकां साधुयें एटलां धर्म कार्य करवा ते कहे जे १ चैत्य परिवाही करवी एटले सर्व चैत्यने विषे श्रीथरिदतनी प्रतिमानां वर्शन नक्तिनावे क रवां, २ लोच करवो, ३ सांवत्सरि पडिक्कमणु करवं, ४ सर्व श्रीसघनी माहोमाहे खमणा करवा, ५ तेलो करवो एटप्ले थम्मनु तप करलु तथा पांच दिवस सुधी श्रीकल्पसूत्र वाचवु -- । ए पांच वानां कर,एम श्रीतीर्थकर गणधरें कहुं वे वली प!पण श्राव्यां थकां प्राव थाट ला धर्म कार्य करवा ते कदे वे १ थान दिवस सूची थमारि पलावची, २ यथाशक्ति बेला तेला एटले तरुथमादिक तप जपादिक करतु, ३ थान विवस पर्यंत सुपात्रने श्रविछिन्न दान वेवु, ४ सोपारी नालीयेर प्रमुखनी प्रनावना करवी, ५ श्रीवीतराग देवनी प्रतिमानी । पूजा करवी, चैत्य परिवाही करवी, ६ सर्व साधुउने ववन करखु, श्रीसंघनी जक्ति करवी, सचित्त वस्तुनो परिहार करवो, ए ब्रह्मचर्य पालवं, १० सर्व प्रकारना थारन सवधि कमों नो त्याग करवो, ११ पोतानी शक्ति प्रमाणे सन्मार्गे व्य खरचवं, १२ श्रुताननी चक्ति क रवी, १२ थनयदान देवु, १४ कर्मक्ष्य निमित्त कास्सग्ग करवा, १५ प्रतिदिवस उनय टंक पठिकमणा करवां, १६ मोटो महोत्सव करवो, १७ जे कल्पसूत्र वांचे तेने नक्क पाना दिक सहाय थापवो तेनी सुख समाधिनी खबर सेवी थने १७ श्रीसघे मांदोमांदे खमावतु, रए नावना नाववी, २० कल्पसूत्र सर्व श्ररे थक्षर सनिलवु कल्प समान जे नव्य जीव होय ते कल्पसूत्र सानले थने ते विधिपूर्वक सानजनारो पुरुप बारमें वेवलोकें जश वेवतानां सुख जोगवे परंपरायें थाउमें नवे मोक्ष्ना मुख पामे एटला धर्मकार्य करवा ।। इवे हाँ व्यारम्यान करती वेलायें प्रथम मगल रूप गाथा कहेवी ते लवीयें बैयें ॥ पुरिम च रिमाण कप्पो, मंगल वक्ष्माण जिण ति ॥ ईद परिगदिया जिण्दरा, थेरावजी चरित्तमी ।। १ ।। पहेला श्रीरुपनदेव तीर्थकर अने बेला श्रीमहावीर स्वामी तीर्थकर यया तेमा श्रीव मान जिनेश्वरना तीर्थने विपे मंगलिक निमितें ए कल्प सूत्र ने तेमा प्ररा अधिकार कहा ने त्पां प्रथमतो जिनावली एटले श्रीमहावीर नगवानथी मामीने पचानुएवीयें श्रीजिने ॥

श्वरोनां चरित्र कोवाशे, बीजो स्थविरावली एटप्ले स्थविरोनां चरित्र कहेवाशे, त्रीजो चोशन । थालावें करी थघवीश प्रकारनी साधु समाचारि कहेवाशे तेमा प्रथम श्रीजिनेश्वरोना चरि त्रो मांहे ला श्रीमहावीर स्वामी शासनना अधिकारी डे माटे तेमनुं चरित्र पहेलु कहेवाशे एरीतें पीठिका करी ॥ ॥ दवे ए कल्पसूत्रनो थर्थ अत्यंत गंचीर डे एकेका थक्षरनो थनतो अर्थ वे ते सर्व अर्थ कदेवाने दु समर्थ नथी तथापि जेम पूर्वाचार्योयें कहुं बे तेम पण ते महान्पुरुपोना ग्रंथोने अनुसरी गुरुरूपाथी स्वल्प अर्थ करु दु ॥ ॥ हवे जो पण ए कल्पसूत्र पोतेंज सर्व विघ्नोपशांतिने माटे महामांगलिक रूप ले तो पण शिष्यने मगनबुदि दोवाने लीघे जेम लोकिक कार्यना प्रारंनमा पण प्रथम श्रीदेव गुरुचं स्मरण करीने पढ़ी ते कार्यनो थारंन करीयें बेयें तेम था कल्पसूत्र रचवा रूप कार्यनी थाद्या पण सर्व मगल माहे महामागम्यकारी, चौदपूर्वनो सारनूत एवो पंच परमेष्टि मत्रनो उच्यार कराय बे ते जखीयें यें ॥ ॥ नमो थरिहंताण के० ॥ नमस्कार दो विद्रमान श्रीथरिदंत प्रत्ये, नमोसिक्षाण के॥ नमस्कारदो जे थाउकर्म क्ष्य करी मोझ गया एवा सर्व सिम प्रत्ये, नमो थायरियाण के० ॥ नमस्कारदो श्रीथाचार्य जगवान प्रत्ये, नमोध्वयायाण के ॥ नमस्का रहो श्रीउपाध्याय प्रत्ये,नमो लोए सबसाहूण के० ॥ नमस्कारहो थढीहीप रूप मनुष्य लोकनें विपे रह्या एवा सर्व साधु प्रत्ये, एसो पंच नमुक्कारो के॥ए जे अरिहंताविक पांच नमस्कार ने एटले ए नमस्कार पंचक जे ने ते कद्देवो ने तोके सघपावप्पणासणो के ॥ सर्व पापनो प्रकर्षे करी नाश करनार , मगलाणच सवेसि के ॥ सर्व मगजमाहे पढमहवमंगल के॥ प्रथम एटले मुरव्य मगल डे, एरीतें मंगल कदीने हवे मूलपाठनो थर्थ लखीयें , ते कालने विपे एटले चोथा थाराना थतने विपे, ते समय ने विपे एटले ते थवसरने मणनगवत श्रीमहावीर स्वामीना पाच स्थान उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्रमा दोता दवा ते कहे ने एक उत्तराकाम्गुनी नत्रमा देवलोकथी चवीने देवानदाजीनी कूखें गर्नमा श्रावी उपन्या वीजो उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा वेवानदाजीनी कूखथी जश्ने श्रोत्रिशला देवीनी कूखमा संक माव्या, त्रीजो उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा जनम्या, चोथो उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा गृहस्थ पशु त्यागीने साधु पशु थगीकार फर्म्यु, पांचमो उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा थनत अनुपम जेनें बी जी कोई उपमा लागे नही तथा जेनो क्यांय पण व्याघात न थाय एबु, थावरण रहित स मस्त वस्तु प्रकाशक सपूर्णपूर्णिमाना चं समान एबु श्रेष्ठ केवलज्ञान तथा केवलवर्शन नग वाननें उत्पन्न थर्पु ए पांच स्थान उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा थयां तथा स्वाति नक्षत्रमा नगवत निर्वाण एटले मोक्ष पद पाम्या ए पाच कल्याणक सामान्य पणे जगवतना कह्या दवे, विस्तारथी वर्णन करीयें आये ते काजने विपे ते समयने विपे श्रमण जगवान् श्रीमहावीर स्वामी वणकालनो चोथो मास थान पखवारिपुं यर्थात् थापाढ शुदि बन्नी रात्रे महावि जय पुप्पोत्तर प्रधान पुमरीक नामे वशमा देवलोकन विमान ते विमानमा वीश सागरोपमना थारखानो क्य करीने, देवनव त्यागीने, देव संवधि शरीर बॉमीने, तर रहित चवें, चवन करीने एड्ज अचूछीपना भरतक्षेत्रमाहेला दक्षिणरतमा ए श्रवसर्पिणी कालना श्दा थवसर्पिणी कोने कहे जे ते देखाडे जे जे कालमा समय समय वस्तुनी हानि थती होय ते थवसर्पिणी काल कडेवाय थने जे कालमा समय समय वस्तुनि वृद्धि थती होय ते उत्सर्पिणी काल कडेवाय ते प्रत्येक एकेका कालना बल थारा होय जे तेनुं स्वरूप BAHINE संक्षेपथी जखीयें ये तिदा पहेलो मुखममुखमा नाम थारो घार कोडाकोडी सागरोपमनो, तेमां मनुष्य तिर्यचनो त्रस्प पज्योपमनो थारखो दोय, त्रण कोशनु वेदमान दोय, बशेने उप न पांसती होय, कल्पवृदना फल तथा माटीनो वरनी दाल जेटलो थाहार त्रण दिवसें करे, गणपचाश दिवस सुधि जोडलो जनम्यो पाले पनी देवलोकें जाय ए श्रवसर्पिणीनो पहेलो थारो बने उत्सप्पिणीनो बो थारो तेनी स्थिति मर्यादा कही ॥ १॥ ॥ बीजो सुखमा नामे थारो, त्रण फोडाकोडी सागरोपमनो, तिदां मनुष्य तिर्यचनुं वे पन्योपमनु श्रायु, वे कोश शरीर, वोर प्रमाणे घे विवसे थाहार करे, एकसो थहवीश पासली दोय श्रने चोश दिवस पर्यंत अपत्य पालना करी देवलोकमा जाय ए अवसर्पिणीनो बीजो थारो थने वत्सर्पिणीनो पांचमो थारो तेनी स्थिति मर्यादा कदी ॥ २ ॥ ॥त्रीजो मुखम झरखमा नामे थारो, वे कोडाकोडी सागरोपमनो, तिदा युगलीया मनुष्य तिर्यचनुं एक पन्योपमर्नु थायु, एक कोशन शरीर, एकातरे थामला प्रमाणे थाहार करे, चोशन पासली दोय यने अंगण्याएशी दिवस सुधि सतान पालना करी मरण पामी देवजोकें जाय ए थवसर्पिणीनो त्रीजो थारो थने उत्सर्पिणीनो चोयो थारो तेनी स्थिति मर्यादा कही ॥३॥ उपम मुखमा नामे थारो वेतालीश हजार वर्षे न्यून एक कोडाकोही सागरोपमनो तेमां मनु प्पन थापुप्प एक पूर्वकोही वर्पर्नु थने पांचसें धनुप प्रमाण शरीर होय, हां युगलीया न होय माटे जेवखत जेटलुं जोश्ये तेवखत तेटलुं नोजन करे,मरण पामीने चारेगति मांदेली गमे ते गतिमा जाय,कोश्क जीव कर्मक्ष्य करी मोक्ष पण जाय ए अवसर्पिणीनो चोथो थारो थने वत्सर्पिणीनो त्रीजो थारो तेनी स्थिति मर्यादा कदी ॥४॥ ॥ पाचमो उखमा नामा थारो ॥ चोयो एकवीस हजार वर्पनो, तिहां मनुष्यनु सात हाथ वेद मान, एकसो वीशवर्षनुं वायु दोय, मरण पामीने चारगति माहेती गमे ते गतिमा जाप परंतु ए थारामां सर्व कर्म क्ष्य करीने कोई मोक्ने विपे जाय नदी, ए श्रवसर्पिणीनो पांचमो धारो थने उत्सर्पिणीनो बीजो धारो तेनी स्थिति मर्यादा कदी ॥ ५॥ ॥ उखम उखमा नामे थारो एकवीश हजार वर्षनो छे, एमां मनुष्प शोलवपर्नु थायु दोय थने एक दाथनु शरीर होय, विलमा निवास होय, सर्व मनुष्य क्रूरकर्मी, न्यायमार्ग रहित, उर्गतिमा जावा वाला जीव जेमा दोय एवो थवस पिणीनो को थारो थने उत्सर्पिणीनो पहेलो थारो तेनी स्थिति मर्यादा कदी ॥६॥ परीते एव श्रवसर्पिणीनाथने व उत्सर्पिणीना मलीन सुधार थारा थाय तेनो सर्व मती वी श कोडाफोडी सागरोपम प्रमाण काल थाय ॥ ॥ दवे एमाथवसर्पिणीनो सुपम सुपमा नामा पहेलो यारोपण संपूर्ण थयो वली मुखमा नामा वीजो थारो पण सपूर्ण थयो तया सुपम उपमा नामात्रीजो थारो पण व्यतिक्रम थइ गयो थने असम सुसमा नामे चोयो थारोपण घणो वीती गयो एटले तेमाथी पण तालीश इजारने पञ्चोतेर वर्ष थने साहाथात महिना ऊपर एटता वरसें न्यून एक कोडाकोडी सागरोपम बीती गया तेमा एकवीश तीर्थकर श्रीश्दवाक कुलमा यया जेमनुं काश्यप गोत्र हतु तथा श्रीमुनिसुव्रत स्वामी थने श्रीनेमिनाथ नगवान एवे तीर्य कर श्रीविश कुलमा थया तेमनु गोतम गोत्र दतुं एरीतें सर्व मली वेवीश तीर्थकर तो यश चूका थने जेवारे ए थवसर्पिणी संबंधी चोथा थाराना पंचोनेर वर्ष कपर साडा श्राव मही ना शेप काल रह्यो तेवारें प्रथम श्रीनरत महाराजायें श्रीथादिनाथ तीर्थकरने पूर्षु दतु त्यारे श्रीयाविनाथ नगवाने कयुं दतु जे चोवीशमा तीर्थकर श्रीवर्षमान परमेश्वर पाशे ते घा॥ प्रमाणे श्रमण नगवान् श्रीमहावीर मा तीर्थकर ते ब्राह्मण कुमगाम नगरमा रुपनदत्त नामा ब्राह्मण जेर्नु कोहाल गोत्र तेनी देवानदानामे ब्राह्मणी नार्या ने तेनु जालंधर गोत्र ले तेनी फूखनेविपे मध्यरात्रिना समयमा मुत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमा चश्मानो योग होते बते देव सर्वधि श्रादार तथा देवनो नव थने देवनुं शरीर त्यागीने देवानदानी कूखमां श्रवत ॥ दवे श्रीरुपनदेव नगवाने कसं हतुं के चोवीशमा तीर्थकर श्रीमहावीर स्वामी यशे ते वात कया नवनी ले ते जाणवाने थर्थे श्रीमहावीर स्वामीना सत्तावीश नव सखीये जेथे श्रा श्रीजवछीपना पश्चिम महाविदेदने विपे प्रतिष्ठान पत्तनना राजाना गामनी चिंता करवा वालो नयसार नामे चाकर कणवास्यो हतो ते एक दिवसें राजाना दुकुमथी घणां गाडां थने चाकर साथै जश्ने काठ लेवाने थर्थे वनमा गयो तिहां पोते एक वृक्षनी नीचें जश् वेगे यने पीजा चाकर माणस लाकडां कापवानो उद्यम करवा लागा ने एटलामा साथयकी नूला पडेला केटलाएक साधु त्यां थाव्या ते तेणे वीठा तेवारे दर्पवत थको तेमनी सन्मुख जर वांदीने पोताने स्थानकें तेडी लावीने बादार वोहोराव्यो पठी साधुयें तेने धर्मोपदेश था प्यो ते सांजलीने त्या समकेत पाम्यो तेवार पड़ी ते साधु मुनिराजोनें पाधरो रस्तो देखायो ए नयसारनो पहेलो नव जाणवो ॥१॥ ॥जिहाथी समकेत पाम्या तिहाथी जवनी गणती थाय समकेत पाम्याथी बागल तो ससारमा जीवें थनत नव कस्या ते कांइ लेखामा गणाय नदी पड़ी त्याथ। थायुक्ष्य करी अंतसमये नमस्कार सहित मरण पामीने पहेले देवलोकें देव परो उपन्यों ए बीजो नव जाणवो ॥२॥ पढ़ी देवनवमा एक पव्योपमनु थायुष्य जोगवी तिहाथी चवीत्रीजे नवें श्रीरुपनदेव स्वामीनो पुत्र जरत चक्रवर्ती तेनो मरीचि नामे पुत्र थयो तेणे एक दिवस श्रीझपनदेव नगवाननी वेशना सांजलीने दीक्षा लीघी ते वखत वीजा पण जरत राजाना पांचसे पुत्र थने सातसें पोतरा मली वारशें पुरुषोए दीक्षा लीधी,एक दिवस पण काले शरीरमा ताप घणो लागो तेथी ते मरीचिनें मना नादावानी ईछा थई तेवारें तय मनो निर्वाद दोहेलो तेथी दीक्षा पालवाने असमर्थ थने घरे पण जवाय नदी एवु विचारी सा धुनो वेप गंमीने मन कल्पनायें नवो त्रिदमीनो वेश धारण कस्यो लोक पूढे तेवारें एवं कहेजे साधुत्रदमयी रहित वे बने हुँ प्रणदम सहित तु माटे महारेत्रणदमनु चिन्द दो तथा साधु महाराज इष्य थने नावथी लोच करे जे हुँ खोचकरवाने थसमर्थ होवाथी मदारे मस्तकें शिखा थने मुंमन एटले कुर मुम हो तथा साधु सर्व प्राणातिपातादिकथी विरम्या महाराथी तेम पली शकतुं नथी माटे महारे स्यूल प्राणातिपातनी विरति दो तथा साधु शीलेकरी सुगंधित ने यने हूँ तेम नधी माटे मादारे वावना चवन विलेपन दो तथा साधु मोह रहित ने श्रने हुँ| मोहें करी ढाक्यो ढुं माटे माहारे एक बन दाकवा सारु हो तथा साधु पाकायें करी रहि तले हुँ तेम नथी माटे महारे पगें पावडी हो तथा साधु कपायथी रहित ले थने हूँ कपायें सहित बुं माटे महारे कपाश्यां एटले गेरुना रंग्या वस्त्र हो तथा साधु स्नानें करी रहित दे बने हूँ तेम नथी माटे महारे स्वरूप पाणीयें स्नान दो एरीतें नेख जई हाथमा जलक ममल धारण करी प्रछना समोसरणनी वाहेर वेसे परंतु एवो विरूप वेश बता पण जे को ई पूढे तेनी बागल खरे खरी हकीगत कहे श्रने एनी पासें श्रावनारनें शुद्ध साधुमार्गनो अ पदेश थापी श्रीरुपनदेव नगवान पासें वीक्षा देवरावे एवो थको नगवान साथै विचरे एकदि वस श्रीरुपनदेव स्वामी अयोध्यायें पधाला तेवारें जरतचक्रवर्तियें परमेश्वरने ववना करी

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मीशपाय
मरी

पुजे नगवत' या समोसरणमां कोई तीर्थकरनो जीव ? तेवारे नगवान वोल्या के समोस रणमांतो नथी परंतु समोसरणनी यादेर ताहारोमरीचि नामें पुत्र जेरों त्रिदमीनो वेप धारण ग्यो ने ते चोवीशमो श्रीमहावीर नामा तीर्थकर थाशे तथा एज मरीचिनो जीव ते था जरत क्षेत्रमा पोतनपुर नगरें त्रिष्टष्ट नामे पहेलो वासुदेव थाशे तथा श्रीमहाविदेह क्षेत्रमा मूका नग रीये प्रिय मित्र नामा चक्रवर्ती थाशे एवी वात साननीने जरत महाराज दर्पवत यश् श्रीनग गन पासेंयी मरीचिनें वादवानी थाझा लेइ समोसरणमाथी उठीने समोसरणनी बाहेर ज्या मरीचि पेनो ने त्या थाव्या थने त्रण प्रदक्षिणा थापी वांदीने का के हे मरीचि । दु तने तया ताहारा त्रिदमीना नेखन तथा तु वासुदेव थाश्श ते ताहारा वासुदेव पणांने तथा च करी पाने नमतों नथी परंतु चोवीशमो श्रीमहावीर नामें तीर्थकर थाइश माटे तेने वांज ई एम फही जरत महाराज स्वस्यानकें गया पठी ए वात सांजलीने मरीचि घणा थानदथी योज्यो के एकतो महारो दादो तीर्थकर तथा महारो पिता चक्रवर्ती श्रने हुँ पोते पण पहेलो वासुदेव थाइश तया चकरी पण थाइश वली वेस्रो चोवीशमो तीर्थकर थाइश माटे मने गसुदेवादिक यधिक पदरी मलशे तेथीथदो महारु उत्तम कुल एम कहीने पोतानी मुजा ये ताली गेकी महा हर्पवत थयो थको हाथें तालोटा देतो नाचवा लाग्यो, एवीरीतें पोता ना कुजनो मद कखो तेथी नीचगोत्र कर्म बांध्यु जेमाटे १ जातिमद, २ कुलमद, ३ लान मद, ४ यश्चर्यमद, ५ वलमद, ६ रूपमद, ७ तपमद, अने ७ श्रुतमद ए थाउ मरने करतो थको जीव हीन जात्यादिकने पामें हवे कोइएक दिवस मरीचिना शरीरमा रोग ऊपन्यो तेगरें तेनो निन्नवेप देखीने श्रसयति पणाने लीये कोइ पण साधु तेनो वेयावच करे नही ते जोइ मरीचियें मनमा चिंतमु के मने रोग मटी जाय अने सारा था ता एक । प्य करूं के जे मने रोगादिक उपने वैयावञ्च करवा काम थावे एम निर्धारी रास्यु पढी केट लाएक दिवसें तेने रोग मठ्यो थने शरीरे शाता यक्ष, एक दिवसें कोइ कपिल नामा राजपुत्र मरीचि पासें थावी धर्मोपदेश सानजी प्रतिवोध पाम्यो पनी मरीचिनें कड़वा लागो के मने दीक्षा थापो ते सांजली मरीचि बोज्यो के श्रीपनदेव स्वामी पासेयी दीक्षा व्यो तेवारे क पिल राजपुत्र श्रीरुपनदेवजीना समोवसरणमा गयो तिहां प्रचुनें समोसरणमा वेग जो फरी मरीचि पासें थावीने वोल्यो के श्रीरुपनदेवजीतो राज्य लीला नोगवे ने माटे तेमनी पासें तो धर्म कांड पण नयी पण तादारा पासें कांई धर्म के नथी? एवु वचन सांजली मरीचियें तेने यथार्थ कर्पु तो पण बहुल कर्मी पणा माटे तेणे मान्युं नदी तेवारें मरीचियें यादि कपाय, सहित मतिनशथी, मिष्यात्वोदयना योगें, शिष्यना लोनथी, स्वधर्म यापवा विचार जे ए मदारे योग्य ते एम चिंतीने बोल्यो के हे कपिल ! काश्क जैनधर्म महारा पासें पण वे माटे तुं सुखें दीक्षा ले, ढुं तुजनें वीक्षा थापीश एवा प्रकारे पोताना श्रर्थ सारुं कपिलने दीक्षा दीधी ए वस्सूत्र जापण करयुं पड़ी ते कर्मनें बालो\ परिक्कम्युं नही तेना योगथी एक कोडाकोडी सागरोपम ससारमा परिघ्रमण करवा संवधि कर्म उपार्जन कसु पनी ते मरीचि अनुक्रमे पोता घोराशी लाख पूर्वनु बायुष्य नोगवी समाधि मरण करीने ॥३॥ नवें पांचमे ब्रह्म देवलोके वश सागरोपमने थावस्वे देवता पणे उपन्यो ॥४॥ ॥ त्यांनु था युप्य पूरण करी चचीने पांचमे नवें कोनागसन्निवेशने विपे एंशी लाव पूर्वनें थाउखे कोशिक ना मा विन थयो त्यां पण बेत्री तापसी दीक्षा ग्रहण करी श्रायुप्प पूरूं करी मरण पामीने घ ॥ चोथे पाकात पर्यंत संसार परिव्रमण करी॥ ५॥ नवें थूणापुरीमा पुष्पमित्र नामा ब्राह्मण थयो तिहां त्रिदमी तापस थई वदोतेरलाखपूर्व घायु जोगवी ॥ ६ ॥ ॥ सातमें नर्वे पदेले सो धर्म देवलोकें मध्यम श्रारखे देवता पणे कपन्यो॥ ॥ ॥ त्यांचीचवीने यातमे नवें चैत्य स निवेशे सात लाख पूर्वनें यावखे थनियोति नामा ब्राह्मण थयो त्यो पण त्रिदमी तापस थई काल करीने ॥ ॥ नवमे नवें बीजे ईशान वेवलोके मध्यम थारखे देवता थयो ॥ ए॥ त्यांची चवी वशमे नवे मदिराख्य सन्निवेशे उप्पन्न लाख पूर्वनें थारखे अमिति नामा ब्रा मण थयो त्यो पण त्रिदमी पहुं ग्रहण करी मरण पामीनें ॥ १०॥ अगीधारमे नवें त्री जे सनत्कुमार नामा वेवलोकें मध्यम थायखे देवता पणे कपन्यो ॥११॥ त्यांची चवी वारमा नवमा श्वेतांबिका नगरीने विषे चुम्मालीश लाख पूर्वने थारखे नाराज नामा ब्राह्मण थयो यंते त्रिदमी पणु ग्रहण करी त्यांथी मरण पामीनें ॥ १३॥ तेरमें नवें चोथा मा हें नामा वेवलोकने विपे मध्यम बायस्वे देवता पणे उपन्यो ॥ १३॥ त्यांथी चवी घj सप्तार 'चमण फरी वली चोदमां नवें राजगढी नगरीने विपे चोत्रीश लाख पूर्वनें श्रायखे था वर नामा ब्राह्मण थयो त्यां त्रिदमी तापस पहुं अगीकार करी मरण पामीनें ॥१४॥ पन्नरमें नवे पांचमें ब्रह्म देवलोके मध्यम थारखे देवता पणे उपन्यो ॥ १५॥ स्यांची चवी अने वली पण घट्युं ससार 'नमण करी झोलमा नवने विपे राजनही नगरीनो चित्रनदी नामेराजा तेनी प्रियन नामा राणी तेनो पुत्र विशाखानदी दतो थने ते राजानो बीजो न्दानोलाविशाखा नति नामे युवराजा दतो तेनी धारणी नामे राणीनी कूरखने विपे ते मरीचिनो जीव थावी पुत्र पणे उपन्यो, तेनु विश्वनूति नाम मावित्रे वी , ते अनुक्रमें योवन वय पाम्यो त्यारे तेना पितायें परणाय्यो पनी ते प्रतिदिन पोतानी स्त्रीने साईं लई वाडीमा रमवा जाय एक दिवसें चित्रनदी। राजा ना कुवर विशाखानदीयें, विश्वनतिने कीडा करतो देवीने मनमा विचार कसोके जुन। तो खरा जे ई तो राजानो पुत्र बंधने था तो युवराजानो पुत्र तो दु था माहारा वापनी वाडीमा कोर विवसें पण क्रीडा करतो नयी थने थर युवराजानो पुत्र वाडी रोकीने वेगे ठे ए ययुक्त जे माटे हवे हुँ पण माहारी स्त्रीयो सहित श्दा थावीने वाहीमा रमण करु तोज म दारो जमवारो सफल जाणु नदीका महारो जन्म व्यर्थ जाणवो एवो निमय करी ते कुमार पोताना पितानें कम्युं के विश्वन्तीने वाहीमाथी काहाडी मूको तो दु जर ते वाडीमां कीडा करूं तेवारें पितायें कयूं के हे पुत्र को प्रपंच करीने विश्वनूतीने काहाडी तने वाडी था पीस ए प्रमाणे पोताना पुत्रनें संतोप पमाही पनी विश्वनूतीने वाडीमाथी काहाडवा निमित्ते राजायें कपट करी एक पडहो वजडाव्यो के सिदनामा राजाने पकडवा सारु राजा चहे ठे, श्रावो ढंठेरो सनिलीने विश्वनूती थावी राजानें कहेवा लाग्यो जे हे स्वामी तमे पोतेज ते विचारा गरीबहा सिदराजानी उपर ई प्रयाण करो टो' तेने तो दुज वाधी लावीश एम कही लसकर जश्ने विश्वनति, सिहराजा उपर चडाई करी गयो, पाठलथी राजायें विश्वनूतीनाथ त पुरने राजवाडीमाथी काहाडीने विशाखानदीने वाही सोपी दीधी, एम करतां कैटलाएक विवर्से विश्वनूती पण सिवाजानें पकडी लावीने राजाने थावी सोंप्यो तेवारे तेनो लोको घणो यशवाद बोजवा लागा, दवे फरी विश्वनूती पूर्वनी पेठे पोतानी स्त्रीयोनें सार्थे जइ रम वासारु राजवाडीयें गयो तिदा दरवाजा पर विशाखानवीना सुनट पेग हत ते बोल्मा के दो विशास्वानदी पोतानी मीपो ता रमण के मारे याववानो झुकुम नथी, राजायें वारी एन दाधान त सांजली विश्वभूतियें जाए\ जे राजायें महारी साथै कपट कीपुंजे माटे पिकार पडो था ससारनें एम विचारी विरक्त थयो पड़ी मात्र पोतानु धल देखाडवा सारु ते वाहीना दरवाजा पासें एक कॉग्नु फाड दतुं तेने एक मूठी मारी तेथी ते दृछना वहांये को जमीन उपर पडीगयां पनी विश्वनूती वोज्यो के जेटलो वरखत या कोपने जमीन उपर पाडता लागो तेटलोज वखत शत्रुमें मारतां लागे परंतु लोको अपवाद बोले तेनी वीकथी ए काम हूँ करतो नथी एतु कहीने संनूतिविजय मुनिनी पासे दीक्षा लइ मासपणादि घणुज तप कल्प, एक विवसें ते विश्वनूति मुनि विहार करतो करतो मथुरा नगरीमा श्राव्यो तिहां मासखमणनु पारण करवा सारु गोचरीने अर्ये गलीयें फरतां थका कोइएक नवी प्रसूता गाय दती तेणे ढींक मारी तेथी साधु नूमिकायें पड़ी गयो ए अवसरमा एना काकानो दीकरो विशाखानदी तेपण पोताने सासरे एज गाममा थावेलो जे तेणे गोखमा घेतां थकां विश्वनूतिने जमीन कपर पडतो जोयो तेवारें हास्य पूर्वक बोल्यो के दे विश्वनूति जे वज पराक्रमथी तें एक मुष्टीयें करी सर्व कोत पाडी नारयां दता ते तारुं बल सर्वे क्या जतु रघु ? एवु वचन सांजलीने मुनियें उची दृष्टी करी तेने जोयो त्यारे मनमा आईकार थाणीने बोल्यो के थरे दजी पण हास्य करे , तो जो दवे दमां पण महारु बल केटनु बे एम कही पहेली गायने सींगडे पकही थाकाशें नमाडीने नूमि उपर मूकी दीधीने विशा खानदीने कहेवा लागो के अरे तुंतो जाणे जे एन बल जतु रसु दशे पण मदारु बल क्यायें गर्यु नथी वाली कहेवा लागो के जो महारी तपश्यानुं फल दोय तो हूँ परनवमा घणो बल वत थयो थ्को तुजने मारवा वालो था एवो नीयाणो करी कोडी वर्ष पर्यंत चारित्रपाली यते अनशन करी त्याची मरण पामीनें ॥ १६ ॥ सत्तरमे नवें महाक नामा सातमा देवलोकने विपे सचर सागरोपमना प्रणयाम्खे देवता पणे तपन्यो ॥१॥ ॥ तिदायी चवीने बढारमे नवे पोतनपुर नगरमा प्रजापति नामे राजा तेनी धारणी नामे राणीनी कू स्वमा चार सुपने सुचित्त एक पुत्र थयो तेनुं नाम थचल वी तथा वली एज प्रजापति नामा राजानी मृगावतीनामे एक पुत्री थइ ते एक विवसें विवादनी चिंताने ली ते कुमारी नी मातायें तेने शणगारी सुशोनित वस्त्रानूषण पहेरावीने राजा पासें मोकली थने विचाशुं जे ए महोटी कन्या योवन वय पामेली देखीने राजा को कुलवान राजकुमारने परणावी वेशे, प रंतु राजा तो ते पोतानी सुरूपवाली पुत्रीने यावेली देखीने कामेकरी पीडीत थयो थने पोतेज पोतानी दीकरीने परवानीशा करतो थको लोको थपवाद न करे एटलामाटेसनामा येला जोकोनी बागल कहेवा लाम्यो के दे नाश्च जे लोकनें विपेसारामा सारी चीज दोय ते कोनी कहेवाय ? तेवारे सजाजनो बोल्या के जे ठसम चीज दोय ते तमारी कवाय, राजा बोल्यो जे तमारा मुखथी जे वचन निकायुं ते निमयथी सत्प माटेथा सर्वोत्कृष्ट में कन्यारत्न ते हूं वीनाने यापीश नदी एने छ पोतेंज परणीश एम कही ते पोतानी पुत्रीने पोतेंज परस्यो अने तेनी सा ससार संबंधि सुख जोगववा लाग्यो एम करता एक दिवस ते विश्वनूतिनो जीव देवलोकथी चवीने सृगावतीनी कूखें थावी उपज्यो तेवारें मृगावतीयें सात स्वपनां दी पड़ी पूरण नव महीने पुत्र जन्म्यो तेवारे राजायें महोटो महोत्सव करीने ते वा लकनु नाम त्रिप्टष्ट एवं दीघु यनुक्रमें ते वालक मदोटो थयो एवा थवसरमा शवपुर नगर नी पार्से तुंगी नामा पर्वत लेते पर्वतनी गुफामा विशावानदीनो जीव सिह पणे थावी उपन्यो ने ते वखतमां शश्वमीव नामे प्रतिवासुदेव दतो तेनु शालिनु खेत्र ते पर्वतनी नजीक दतु ते शालिना क्षेत्रनो जे रखवालो रहेतो तेने ते सिंद मारी नाखतो दतो तेवार ते श्रश्वग्रीव पोताना सेवक राजानी पर वर्पोवर्ष वारा प्रमाणे दुकुम सखी क्षेत्रनी चोकी करवा मोकजतो हतो एम करता एक वर्षे वारा प्रमाणे ते प्रजापतिराजाने चोकी करवानो ढुकुम थाव्यो ते वारे ते खेत्रनी रखवाल करवा सारुं राजायें पोतें जावा मामघु तेने त्रिप्टप्टें। वारी रारम्यो थने पोते पोतानो अचल नामे नाइ जे गोतमस्वामीनो जीव ने श्रने था नवमां वलदेव थाशे ते सहित क्षेत्रनी रखवाल करवा गयो, तिहां वरन्तर टोप पहेरी रथमा वेशी श्रचलने सारथी करी शस्त्र लाग्ने जे गुफामा सिह रहे डे त्यां गयो एटलामा तो रथनो थवाज सनिलीने सिंह पण गुफाथी बाहेर थाप्यो तेने देखीने त्रिप्टटें विचास्यु जे ए सिड्ने सवा रथ नथी तो महारे पण रथमा बेसी लडवु नदी वली एनी पासे शस्त्र तथा कवच नथी तो मदारे पण शस्त्र तथा कवच नदी राखवां पढी शस्त्र तथा कवचनें रथमा मूकी पोते रथथी देवो उतरी सिदने कईवा लाग्यो के थरे दादीना खावा वाला उठी नो थाने मदारी सामो श्रावीजा एटलु कर्मे के तरत ते सिद पण उतपो भने मुख फाडी साहमो सडवा थाय्यो के तरतज त्रिप्टप्टें ते सिदना होठ पकडी वे कटका करी चीरी नान्यो, तो पण ते सिदनो जीव जाय नदी, तेवारें त्रिष्टष्टनो सारथी सिदनें कहेवा ला ग्यो के हे सिद । जेम तुं मृगराज बो तेम था तादारो मारनार पण नरराज ने माटे तने कोई साधारण माणसें मायो नयी एवी वात सनिली सिह मरण पामीनें नरकें गयो पठी ते सिंदर्नु कलेवर लश् गाममा श्रावी लोकोनी वर्मा कलेवर नाखीने त्रिष्टष्ट बोलवा जागो के था सपश्व करनार सिहने हुँ मारी थाल्यो , माटे हवे महारा प्रतापोथश्वग्राव प्रतिवासुदेव सुख समाधियी चावल खाए वात लोकोना मुखथी सांजलीने श्रध्वनीवने महा कोध उपन्यो तेथी पोतानी सेना जश्ने लडवा थाप्यो ते त्रिप्टष्ट साथै यु६ करता कोइ पण रीतें पोहोची शक्यो नही तेवारें चक फेरवीने तेना उपर नारयुं ते चक्र पण त्रिप्टष्ठना हा थमा यावी येतुं पड़ी तेज चक प्रिप्टटें अश्वनीव उपर चलायुं तेणे जश्थश्वमीवर्नु मस्तक दी लावीने त्रिप्टष्ट थागज हाजर कस्युं ते जोर देवो थाकाश पर रही जय जय शर कदी योल्या के था जरतखेत्रमा ए त्रिप्टष्ट पहेलो वासुदेव ययो पड़ी ते त्रिप्टष्ठ अनुक्रमें त्रए खम साधीने वासुदेवनी राजलीलाना सुख जोगवतां यको एक दिवस नाटक थातुं दतु तेवामा राजाने निज्ञ थाववा लागी तेवारें शय्यापालकनें कयु के मने निश थावी जाय तेवारें ए नाटक करनाराऊने शीख थापी वारी राखजो तो पण ते शय्यापालकें श्रोत्रंश्यिना रसें करी तेमनें गीत गान करता वारी राख्या नही एटतामा त्रिप्टष्ट जागृत थइनें वोज्यो के अरे था नाटकीयाने शा वास्तें रजा थापी नदी तेवार शय्यापाल की के हे प्रनु । प्रोझ्यिना रसें करी छ रजा थापतां चूकी गयो ते सांजली त्रिप्टष्टनें क्रोध घड्यों पढ़ी सी गरम करी तेनो मनो नो रस ते शय्यापालकना कानमा रेडाव्यो तेथी ते मरण पामीनें नरकें गयो एरीते ते वासुदेवना नवा घणा महोटा पापोपार्जन करी चोराशी लाख वर्पनु थायुष्य नोग वीने एशी धनुप प्रमाणना शरीरनो त्याग करी मरण पामीनें ॥ १७॥ ॥ उंगणीशमे जर्वे सातमा नरकने विपे नारकी पणे जश कपन्यो ॥ १ ॥ ॥ स्याथी मरण पामीने वीशमे नवें सिंद पयो ॥२॥ तिहांथी मरण पामीने एकवीशमे नवें चोथा नरकने विपे नारकीपणे

चित्र
बाप्पापासक
मियम
मिटासुदेव
GARH

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जश् उपन्यो ॥ २१॥ त्यांची मरण पामी घय ससार भ्रमण करी बावीशमे नवें स्थपुर नगरे प्रिय मित्र नामें राजानी विमला नामे राणी तेनी कूखने विपे पुत्र पणे उपन्यो मा वित्रं विमल एनु नाम दी श्रनुक्रमे सर्व कलानो पारगामी थयो पितायें तेने राज्य सोप्यु एक दिवस वनमा क्रीडा करवा गयो त्या पाश मांदेथी दरण दोडाव्या तिदा दयाना प्रनावे नक परिणामें करी मनुष्यापु बांध्युं, बेवटे दीक्षा लश्ठम तपश्चर्या करी, चक्रवर्तीनी पदवी उपार्जी अते एक मासा अनशन करी त्यांची चवीनें ॥ २२ ॥ त्रेवीशमे नवें पमिम महाविवेदमा भूका नगरीनो धनजय नामे राजा तेनी धारणी नामें राणीनी कूखे थावी उपन्यो मातायें चौव स्वपना वी पनी पूरण मासे पुत्र जन्म्यो तेवारे मातपितायें महोटा महोत्सव पूर्वक तेनुं प्रियमित्र एवं नाम दीधु ते अनुक्रमें उ खम साधी चक्रवर्तीनी पदवी नोगवी यंते श्रीपोटिलाचार्य पासेथी दीक्षा लश् कोड वर्ष पर्यंत चारित्र पालि सर्व चोगशी लाख पूर्वनें श्रायु पूरण करी त्यांची मरण पामी ॥ ३३ ॥ चोवीशमे नवें शुक्र नामा सा तमें देवलोकें सत्तर सागरोपमने थायुखे देवता पणे उपन्यो ॥ २४ ॥ त्याची चवी पञ्चीशमे जवें एदज जरतक्षेत्रमा उत्रिका नामे नगरीनो जितशल नामे राजा तेनी नश नामे राणीनी कूखने विपे पचीश लाख वर्षने थायुखे नवन नामे राजपुत्र थयो त्यो चोवीश लाख वर्ष सुधी गृहस्थावासें रहीने पती पोटिलाचार्य पासेंथी दीक्षा लइ एक लाख वर्ष पर्यंत दीका पाली जावड़ीव मुधो मास खमणे करी वीशस्थानक तप थाराघ्यु तेथी तीर्थकर नामकर्म निकाचित उपार्जी अंते एक मासन यनशन करी त्यांथी काल करीने ॥ ३५॥ बधीशमे नवे दशमा प्राणात देवलोकने विपे पुष्योत्तरावतंसक नामना विमानमा वीश सागरोपमने श्रा ठखे देवता पणे उपन्या ॥ २६ ॥ पठी त्यांची चवीने मरीचिना नवमां जे कुलनो मद कन्यो इतो ते नीचगोत्रकर्मना उदयथी सत्तावीशमा नवने विपे रुपनदत्त ब्राह्मणनी देवानवा नामे स्वीनी कूखे श्रावी वपन्या वे एरीतें प्रथम तीर्थकर श्रीरुपनदेव नगवाने जरत चक्रवर्तीनी धागल कर्यु दतु जे मरीचिनो जीव तीर्थकर थाशे ते निभयथी थयो॥२॥ ॥ दवे जग वान् श्रीमहावीर देवानवानी कूखें अवतस्मा ते समयने विषेत्रण ज्ञान सहित गर्नपणे था व्या त्या दु देवलोकथी चवीश एवं जाणे पण चववाना वखतनोजे वर्तमान एक समय सूक्ष्म काल माटे ते न जाणे थने त्यांथी चष्या पढ़ी हुँ देवलोकयी चवीने देवानदानी कूखे ठ पन्यो यु एवं जाणे हवे जे रात्रिमा अमनगवान् श्रीमहावीर स्वामी देवानवा ब्राह्मणीनी कूखे उपन्या ते रात्रिमा वानवा ब्राह्मणी सुखशय्यामा कांक सूती कांक जागती अर्थात् थोडीक निशमा रही थकी,उदार कल्याणकारी,उपश्व रहित,धनकारी,मगलकारि शोना सहित एवां चौद मदोटा स्वपना देखीने जागी॥ ते चौद स्वपनानां नाम कहे जे पहेले स्वपने हाथी दीठो, बीजे पन, त्रीजे सिह, चोथे लक्ष्मी, पांच में फूलनी माला, बठे चंद, सातमें सूर्य, थाउमें ध्वजा, नवमें कुंन कलश, दशमें पा सरोवर, अगीथारमें कीर समुश्, वारमें देवविमान, तेरमें रनो नो दगलो राशि, चौदमें निर्धूम श्रग्नि ए चौद स्वपना एवा रूपना कल्याणकारी महामंगलना करनारा देखीने जागी थकी दर्प संतोप पामी, वित्तमा थानद पामी, महोटा प्रेम सहित मन थर्पु, परमहर्प उपन्यो, दर्पने विपे पसरतुंबे मन जेनु, उत्कृष्ट सौम्य मन वे जेनु, जेना मना दर्ष मनास ययो , मेघनी धारायें करी दणाणु एवं कंवय पुष्प जेम विकस्वर थाय तेम जेनां रोमे रोम विकस्वर थयां ले एवी पर थकी पूर्वे दीलेला स्वपनाने याव फरे

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दासी
ऋषभच मामरा
देवामरा
रेयानंदा
मासणी

याव करीने सवाना पलग सुपरथी उसे उठीने पादपीठ थकी पण उतरे उतरीने नही पता वली, नही पीरी, एवी वे गतिनी वचा उहेरती थकी ॥५॥ राजहंसीनी गति सरवी चाल ती थकी जिहां रुपनदत्त ब्राह्मण डे त्यां थावती दवी, थावीने झपनदत्त ब्राह्मण प्रत्ये जय विजय शव करीने वधावे वधावीने नशसन एटले बाजोट उपर बेठी, त्यां मार्गमां थाववानो खेद मटावाने, परसेवो उपशमावीने, बे हाथ जोडी दश नख एकग करी मस्तकें थजली करीनें कहेवा लागी के दे स्वामि' में श्राज रात्रै शय्यामा कांश्क सूता दस्ति श्रादिक चौव सुपना दी ॥ ६ ॥ तेनु फल थशे, कया प्रकारना कल्याणने करनारा थशे तेवारें कपन दत्त ब्राह्मण देवानवाना मुखयी ए, सनिलीने पोताना दयामां घणो खुशी थयो,जेवा पाणी नी धाराथी कदंव पुष्प खुले तेवी तेनी रोमराजि प्रफुल्लित थई ते सुपनोना अर्थ विचारवा लाग्यो विचारीने देवानवा ब्राह्मणीने कहे सदारकारी दे देवाणुप्रिया तमे जे सुपना दी ते म गलकारी , तमे जे सुपनां दीनां तेनुं फल एवं डे के हे देवाणुप्रिया' धननो लान थाशे, पुत्रनो लान थाशे, सुखनो जान थाशे, निये तमारे नव मदीनाने साहासात विवस गया के सुकुमार दाथ पग जेना, दीन थंग रदित, संपूर्ण पांचयि सहित शरीर जेनुं डे, लक्षण, व्यंजन,थने गुणेकरी सहित तथा मानोन्माने करी सहित संपूर्ण जलु शरीर जेनु डे एवो पुत्र थाशे दवे लक्षण कोने कहीये ते कहे ,जे पुरुपनो ज्यारे जन्म थाय त्यारे तेना थंगमा पुरयनी रेखा प्रमुख पडे तेने लक्षण कहीयें।सदर्ज लक्षण इति वचनात्।। तिहां चक्रवर्ती तथा तीर्थकरोने तो एक दजारने थान लक्षण होय थने बलदेव तथा वासुदेवनें एकसोने थाउ लक्षण दोय तथा वीजा सामा न्य नाग्यवत पुरुपोने वत्रीश लक्षण दोय तेना नाम कहेडे १ बत्र, २ वीजणो, ३ धनुष, ४ रय, ५ वजन काचयो, यंकुश, ७ वावडी ए स्वस्तिक १० तोरण, ११ तलाव, १५ सिह, १३ वृक्ष, १४ चक, १५ शख, १६ हाथी, १७ समुह, १७ कलश,१ए प्रासाद, २० मत्स्य, २१ यव, २५ यूप यज्ञ-थग, २३ यांनलो, २४ कमंगल, २५ पर्वत, २६ चामर २७ काच,२७ रसद,२५ पताका ३० लक्ष्मी,३१ माला,२२ मयूर ए यत्रीश लक्षण पूर्वकृत पुस्यना योगवाला पुरुपना दाथ पगना तलीयाने विपे दोय ए थादि वेनें एक दजारने घाउ लक्षण पण एवाज उनम प्रकारना जाणी लेवां तथा वली प्रकारांतरें पत्रीश लक्षण कहे जेना नस्व,पग,हाथ, जीन,होत,तालु थने थांख्योना खुणा ए सात वानां रक्त होय सारा दोय ते पुरुप नाग्यवान जाणयो ते सप्तांग लक्ष्मी जोगवे तथा जेनी काख, बाती, कोट एटले गलानी दडवटी तथा गलानो मस्पो, नाक, नख थने मुख ए वानां उर्चा होय तो ते पुरुप सर्व प्रकारें उन्नति पामे तथा दांत, चामडी,केश,झंगुलीना पर्व पटले थांगलीनी रेखा थने नख ए पांच जेना पातलो दोय सूक्ष्म दोय तोते पुरुप घणो धनवान् थाय तथा नेत्र, स्तननांतर, नाक, गलानो मण्यो थने नुजा ए पाच जेना लाया होय ते पुरुपर्नु थायुष्य मदोर्दु होय घणु धन पामे बने पराक्रमी होय तया ललाट, पेट थने मुख ए त्रण जेनां महोटा होय तो ते पुरुप राजा थाय तथा वली यीवा, जंघा थने पुरुप चिन्द, एत्रण जेना लघु होय दुका होय तो ते पुरुप राजा याय तया घोलवानो स्वर,मूटी एटले नानी थने सत्व ए प्रणजेना गंजीर दोय ते पुरुप टप्वीनो धणी याय अथवा प्रधान याय एम जे पुरुपमा जेवा लक्षणहोय ते पुरुपमा तेवो थाचार पण दोय,जेवु रूप होय तेतुं धन पण होय,जेवो स्वनाव होय तेवो गुण पण दोय ए प्रकारांतरेंवत्रीश लक्षण कही देखाउपां तथा बीजां पण केटलाएक लक्षण कहे ते पन, वज अकुश, उत्र, शख ॥ थने मस्स्य एजेना हाथ पगमा देखाय ते पुरुप लक्ष्मीपति थाय तथा जेना चीका प्रायाना वर्ण जेवा नखहोय ते पुरुप सुखी होय तथा जेना चलकता चज्वल थनारवत् स्नेह निविड एवां पत्रीश दात पुरेपूरा होय ते राजा थाय थने जेना एकत्रीश वात दोय ते जोगी थाय तथा त्रीश दांत वालो मध्यम कहेवाय श्रने त्रीशथी पण उठा दांत जेना होय ते सामान्य पुरुप गणाय जे पुरुप थत्यंत ठींगणो तथा थत्यंत मीधो तथा थत्यंत जाडो दोय तेमज जे थत्यंत उर्बल, थत्यंत कालो श्रथवा अत्यंत गौर वर्ण वालो दोय ए ड ने विपे सत्व पण होय, जेना मस्त कने जमणे नागे सवलो जमरो दोय तो नजाणवो थने थवलो नमरो होय तोश्रन जाणवो ॥ तथा जेना हाथने विपे एक पण रेखा नहोय श्रथवा घणी रेखा दोय ते पुरुपनु थायुप्य थक्प होय तथा जेने देवपूजानी थांगुलीनां बहेला वेढाथी थधिक कांश्क वंची टचली यागुली दोय तेपुरुप धनवान होय तथा तेनी मातानो पच घणो होय तथा जेना मणीबधयी वापनी रेखा तया करतजयी वित्तनी रेखा थने थायुखानी रेखा जेनी संपूर्ण होय ते पुरुपर्नु गोत्र, धन तथा श्रापुखु सपूर्ण दोय थथवा थायुपनी रेखा जेटली श्रांगुली थतिक्रमे तेटली पचवीशी थापुखाना वरसनी जाणवी तथा जेना थंगुठाने मध्यनागें यव दोय ते पुरुप विद्या वत यशस्वी होय श्रने थजवाला पक्षमा तेनो जन्म दोय तथा जेनां नेत्र रक्त दोय तेनु पासु स्त्री मूके नही तथा जेना नेत्र पीला होय तेने धन मूके नदी तथा जेनी नुजा दीर्घ होय तेने श्वर पणु दोय तथा जेनु दृढ शरीर होय तेने सुख घणु होय तथा जेना दाथ पगने विपे कमल, न, थकुश, शख, मत्स्य प्रमुख दोय ते पुरुप महोटा लक्षणवालो, दोय तथा जेना नख राता होय तेने धन, सुख घणु दोय तथा जेना नख उजला होय ते निकुक दोय तथा जेना नख लुखा होय ते थनाचारी होय ॥ ॥वती शरीर मांडे मुख प्रधान ते मुखमा वली नासिका वे ते प्रधान ने वली नासिकामां नेत्र ले ते प्रधान माटे जेना जेवां नेत्र होय तेनो तेवो शाल एटखे थचार पण दोय तथा जेवी नासिका तेदवु थार्य पणु होय, जेवं रूप होय तेवु वित्त होय, जेवु शीयल दोय तेवा गुण दोय सक्तंच ॥ ययाने तथा शीजं, यथानासात थार्जव ॥ यथारूपं तया विचं, यथाशील तथा गुणाः ॥पागंतरें । सर्वसत्त्वे प्रतिष्ठित ॥१॥ इत्यादिक लक्षण जाणी खेवा ए जक्षण का॥ ॥दवे व्यंजनर्नु स्वरूप कहेले जे जन्म्या पनी ' थगमा प्रगट थाय तेने व्यंजन कहीयें जेमके मसो,तिज थने लसण इत्याविक सर्व व्यंजन जावा ते पुरुपर्ने जमणी याजुयें होय तोसारां जाणवां अने स्त्रीने मावी वाजुयें होय तो सारी जाणवी ॥ ॥ हवे गुणनु सरूप कहे जे जेमा सौनाम्य पाणं, उदार पहुं थने धैर्यपणु इत्यादिक दोय ते सर्व गुण जाणवा॥ ॥ हवे मानोन्मान स्वरूप कहे जे पुरुप प्रमाणे पाणीथी नरेली कुमीमा पञ्चीश वर्षो पुरुपने वेसाहवो पनी ते पुरुपना बेसवा थकी जो एक शेण नार पाणी कुमीमाथी बाहेर नीकले तो ते पुरुप मानोपेत एटले प्रमाण सहित जाणवो अने जो त्राजवामां तोलता ते पुरुपनो धर्मजार प्रमाण तोल थाय तो ते उन्मानोपेत पुरुष जा एवो ॥ ॥हा तोलनी वार्ताना प्रसंगमा नारर्नु प्रमाण कढ़ी देखाडे ने प्रथम उ सरसवे करी एक यव थाय, त्रण यवे एक चियोती थाय, प्रण चिमोतीये एक वाल थाय तेवा शोल वाले एक गदीयाणु थाय तेवा दश गदीयाणे एक पल याय तेवा वोढसो पलनो एक मण याय तेवा दशमणनी एक घही थाय तेवी दश घडीये एक जार प्रमाण थाय एवा थईनारे तोलाय ते पुरुप उन्मानोपेत मान रदित जाणवो एरीते पोणा चार मण सन्मानना थाय डे वली जे पुरुपर्नु पोताने थांगले जरता पोतार्नु शरीर एकसोने थात थांगजनुं होय ते । नम पुरुप जाणवो तेम पार थांगलनु मुख होय तेने नवे गुणीये तेवारे १०७ थाय ते मानो पेत पुरुप जाणवो तथा जेनुं उन्नु थंगुलनुं शरीर होय ते मध्यम सम पुरुप जाणवो, जेनुं चो राशी थांगुलनुं शरीर दोय ते हीन पुरुप जाणवो थने श्रीतीर्थकरन तो एकसो वीश थांगुल नु शरीर दोय केमके तीर्थकरने माथे वार यांगजनी वणीप राखडीने गमे दोय तेमाटे एवो सर्व अंगे सुदर, चश्मा समान सोम्य थाकार वालो, जेनुं मनोहर प्रीतिकारी दर्शन के एवा मुरूपवत देवकुमारसमान पुत्रने तु जणीश ॥९॥ ॥ ते पण पालक वाल्यावस्था रहित था। तेवारे ते पोताना विज्ञान नावचीज थाशे ते केवो थाशे ते कहे जे एटले ते पुत्र युवान श्रव स्था पामे थके ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,थर्ववेद ए चार वेद तथा पांचमो इतिहास पुराण शास्त्र, बको नाम कोश निर्घटनाम माला ए सर्व ब ए शास्त्र ने थग उपांग सहित तेना तात्प र्यनो जाणवा वालो थाशे, चार वेदनो नणाववा वालो थशे, जे चूलशे तेने वताववा वालो नूज देखाडवा वालो यशे, जूतु बोलशे तेने वळवा वालो थशे, गुरुनो धारण करनारो यो पारगामी थशे, बगनो जाण थाशे, साठ अर्थ ने जिदा एवा साठ तंत्र शास्त्र तथा कपि लशास्त्रनो जाणनार थशे, गणित शास्त्रनो जानार थशे, थक्षर शिक्षामा निपुण थशे, किया शास्त्रमा निपुण, व्याकरणनो जाणनार, बंद जोडवामां दद, टीकानो जाण नार, ज्योतिष शास्त्रमा प्रवीण एम वीजा पण ब्राह्मणोना शास्त्रोमा परिव्राजकोनां शास्त्रोमां अत्यंत निपुण माह्यो एवो ताहारो पुत्र थाशे ॥१॥ तेमाटे तमे रुहा स्वपना दीवां, जावत् थारोग्य फारी स्वपना तमनें थायां एवं वारंवार केहेतो दवो थने पोते पण अनुमोदना फरतो दवो॥ ११ ॥ हवे देवानदा ब्राह्मणी पनवत्त ब्राह्मणना मुखथी एवा थर्थ सान लीने, तेने मनमा धारी राखीने, दर्प सतोपयुक्त हृदय वाली यह यकी दाथ जोडी, वश नख मेला करी मस्तकें चडावी कडेती दवी ॥ १२ ॥ जे ए वात जेम तमे कही तेमज , दे। देशप्रिय ' ए सत्यज ने खोटी नथी,हे देवापुप्रिय' जे तमे कहो ठगे ते सर्व सदेह रहित एवं कदीने ते स्वपनां रूडा प्रकारे थंगीकार करीने रुपनदत्त ब्राह्मणनी साथे मनोहर मनुष्य सं यंधि सुख जोगवती थकी विचरे वे ॥ १३ ॥ ते कालने विपे शर्के देवताउनो राजा जेना हाथर्मा दैत्योने विदारण करनारूं वज वे जेणेपूर्वना नवमा श्रावकनी पांचमी प्रतिमा सो वार वदन करी तेणे करी शतक्रतु एवु वीड नाम ते पूर्वना कार्तिकशेठना नवनी अपेक्षाथी ले ते कार्निक शेनी कथा कहीये ठेये पृथ्वीनूपण नामे नगरने विपे प्रजापाल नामे राजा हतो ते नग रमा राजानो घणोमानितो थने घणो धनाढय जैनधर्मी,परम श्रावक एवो कार्तिक नामा शेव रदेतो हतोतेणे श्रावकनी थगीथार प्रतिमा माइली पांचमी प्रतिमा सोवार वही तेनु तेथी शत कतु ए, नाम लोकोमा प्रसिभ य{ एम करतां एक समये गेरिक नामा तापस मदिने महिने पारणु करे वे ते परिव्राजकें नगरनी पारेर थावी उतारो कसो तेने राजा थाविक सर्व लोक वांदवा गया पण एक कार्तिकशेठ शुक्ष् समकेति माटे वांदवा गयो नही तेथी तेना मपर तापस क्रोध फरया लागो एवामा ते तापसने राजायें पोतानें घेर जमवाने नोतरुं दी, तेवारें तापसें मनमा विधायुं जे वीजातो सर्व लोक मने वादवा थाप्या पण एक कार्तिक शेठ जैनधर्मी ले ते मने पगे लाग्यो नयी माटे हवे तेने नमार्नु एम चितवी राजाने कहेवा लाग्यो जे हे राजन् । कार्तिक पोतानी पीठ उपर स्वीरनी थाली रास्वीने जोजन करावे तो हूं तमारे घेर जमवा थातु

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राणसमा
राजा
मरिक सापत
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ए यात राजायें कबुत करी तापसने पारएं करवानु कहीने पढी राजा कार्तिकशेठ पासें था वी कड़वा लाग्यो जे महारो गुरु गेरिकनामे तापस महारे घेर जमवा श्रावशे तेने तमे पारसवा थावजो ते सानली शेव घोल्यो के गु सम्यक्त्व धारी ९ माटे महारे ए वात योग्य नयी पण तमारी वस्तिमा र माटे शास्त्रमा “रायानिउँगेण" ए श्रागार जे ते श्रागारे करी तादारी थाहाथी जमाडीश परंतु महारा नक्तिनावें करी जमाठीश नही पनी तापस जमवा थाव्यो तेवारें शेने खीर पीरसी, पण तापस जम्यो नही थने कहेवा लाग्यो जे शेत वासो माझे तो पात्र मूकी जोजन करूं पनी राजाना कहेवाथी शेवें थाढो थवांसो ममियो शेतना हायनी श्रगुलीमा वाटी पेहेरी दती तेमां जिनप्रतिमा इति तेने नमस्कार कसो हवे तापस शेग्नी पीठ उपर उनो उनो खीरनु पात्र मूकी नोजन करतो जाय ने श्रने यागुतीयें करी शे उनु नाक पण घसतो जाय वे ने शेठने चेप्टामा कदेतो जाय ले के जो मुजने पर्गे लागवा न थाव्यो तो हूं था ताहारु नाक कापु ढुं थने हमणा वारंवार तुजने महारा श्रागल नमानु हु एम चेटा करतो तापस पारण करीने पोताने स्थानकें गयो भने पाबलयी गरम थाल शेतनी चामडीमा मली गयो ते घणे करें राजायें बोहान्यो ए रुत जोर शेठे विचास्तु के जो में पहेलांज दीक्षा लीधी हत तो थाज एवी हेलना यात नदी एवं चितवी वैराग्य पामीने शेन एक हजारने श्रात वणिक पुत्रोनी साथै श्रीमुनिसुव्रत स्वामीनी पासेथी दीक्षा लहादशांगी नएी, बार वर्ष चारित्र पाली सौधमै यया थने गैरिक तापस पण थज्ञान तप करी मरण पामीने श्→ वादन ऐरावत नामा दाथी थयो पढी ते देव दायीन रूप करी इश्नी पासे श्राव्यो जेवारें शश तेना उपर चढवा लाग्यो तेवारें ऐरावते देखीने श्रवधिझाने करी जाप्यु के थरे एतो कार्तिक शेठ वे एबु जापी नासवा मांमधो पण २ तेने पकडीने उपर चल्यो तेवारें शर्केडने वीवराववा सारु दायीयें वे रूप कसा ते देखी शिपण वे रूप कसा वली हाथी चार रूप का त्यारे ३ पण चार रूप का पनी इथवधिझानें पूर्वनो नव जोश्दाथीने तर्जना करी चलाया थने की के अरे मेरिक हवे तु क्या लूटी जाश तुपूर्वनो नव जाणतो नथी? जे महारी पीव उपर थाल राखी जम्यो हतो? तो दमणा तु मदारु वादन थयो बो माटे जे पांच्या कर्म ते जोगव्या विना तूटको नयी एवँ सांजली, थपराध समावी मूलग रूप धारण करीने हाथी शांत थयो ए महाराजना पूर्वला नव सर्वधि कार्तिक शेग्नी कथा कदी॥ ॥ चली ते शश्नी सभा तो वे थारख्यो ते परंतु पांचो देव तेश्ना काम करवा वाला ने ते पांचसो देवोनी हजार थारख्यो एना काममा थावे माटे सहस्त्राक्ष एवं नाम दे तथा मदामेघ जेने वशमां ने माटे मघवा एवु नाम दे तथा पाक नामा देत्यने शिक्षा दीधी माटे पाकशा सन ए, नाम के एवो शर्के वक्षिणा लोकनो ठाकुर, स्वामी, ऐरावत जेनुं वादन बे, सुरनो श्व, पत्रीश लाख विमाननो मालेक, रजरहित सह निर्मल एवा वस्त्रनो धारण करनारो, वायमान माला मुकुटमां नवा सुवर्णना कुमल तेरों करी घसीजता एवा गाल ले जेना, वजी महोटी कवि, महोटी काति, मदोर्दु वन, महोटो जश, मदोर्ट माहात्म्य, मदोर्दु सुख, लांघी पु प्पोनी माला धारण करमाथी देदीप्यमान के शरीर जेनुं एवो ते सौधर्म देवलोकमां, सौधर्माव तंसक विमानमा, सोधर्म नामें सनाने विपे, शक्र नामा सिहासन उपर धेगे थको, पत्रीश लाख विमानोमां वसनारा देवो, चोराशी लाख सामानिक देवो, तेत्रीश त्रायत्रिंसक गुरु स्थानीया देवो तथा सोम, यम, वरुण अने कुवेर ए चार लोकपाल देवो, थाउ यममहीपी ते शोजहजार

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...LOD
ईन्द्रमारान
सिंासन उपरथी
उतराने ममस्मर करे।
जमदारामना
सभाना देने

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देवीना परिवार सहित, प्रण परपदा, सात कटक, सात कटकना स्वामी, प्रत्येके एकेकी दिशा मां चोराशी चोराशी हजार करता चार दिशामा मनी प्रणलास्वनें बनीश हजार थारम रक्षा कारी देवो तथा वीजा पण घणा सौधर्म देवलोकना वसवा वाजा एवा देव तथा देवी तेमनी कपर रदाकारी पशु, थमेसर पए, नायक पशु, पोषक पण, सर्वमा महोटाइपण, सर्वने पोतानी थाज्ञा मनावतो थको, सेनापति पण करतो थको, पोतें पाजतो यको तथा महोटा स्वरसहित नाटक, गीत, वाजिन वीणा, करताल थने बीजा पण घणा वाजिब जेवा के मृदंग पडद प्रमुख वाजाउँना शन्द तेणे करी सहित विष्य देव संबंधि लोग जोगवतो थको विचरे ने ॥ १७ ॥ ॥ एवा समयने विपे था प्रत्यक्ष जंवूछीप नामा छीपने विस्तीर्ण एवो महोटो थ विधिज्ञान तेणे करी देखतो थको विचरे ने ते काजनें वि ते समयने विपे अमण नगवत श्रीम दावीर स्वामीने रुपनदत्तनामा ब्राह्मण कोमालगोत्रनो धणी तेनी देवानदानामें नार्या जालधर गोत्रनी तेनी कूखनें विपे गर्न पणे उपन्या देखीने मनमा घणो थानद पाम्यो,श्वयमा घणो वर्ष पसलो, मेघ धारायें दणाणु एवं कदष वृदनु फूल तेनी पेरे रोमांच विकस्वर थयां, प्रधान क मलनी पेरे नयन थने वदन प्रफुमित थयां, नगवतर्नु अवतरतुं देखीने तेना वर्शनथी उत्पन्न थयो जे दर्प तेना वश थकी प्रकर्षे करी चलायमान थया ने प्रधान कहां, ककण, वेरखा वाज्जुवध, मुकुट, कुंमल, दार थने महोटा घरेणां जुमखां प्रमुख जेनां एवो इश ते तत्काल सिहासनथी उठी छनो यनें चलकतो मणिरत्ननो वाजोट ते उपरथी उतरीने जला वैमुर्यरत्न मरकतरत्न, थरिष्टरम, बजनरत्न, तेणेकरीनें निपुण कारीगरे घडेली देदीप्यमान मणिरने ज डेली एवी पावडी (चांखडी) पगथकी उतारी पड़ी थर्खम वस्खनो एगसाडी उत्तरासंग क रीने ये हाय जोडीने तीर्थकर श्री महावीर देवने साहामो सात थान पगलां जश् पोताना विमानमाहे येतो थको मावो दींचण उचो राखी थने जमणो दींचण नूमिकाने विष थापे थापीने लगारेक नमीने प्रण वार मस्तक धरतीय जगाडे जगाडीने वली चोथीवार लगारेक नमीने थोडो उचो थश्ने कडा, कंकण, धेरखा, धानुबंध, फुमणां तेणे करी सहित थनाय ली एवी जाउने सहीने वालीने दशनख नेला करी, वे दाय जोडी मस्तकें श्रजली करीने शस्तवनो पाठ कहेतो दवो ॥१५॥ ॥ तेनो थर्थ था प्रमाणे - नमस्कारदोजो श्री अरिहंत जगवत प्रत्यें, याविनां करवा वाला, चतुर्विध श्रीसघ रूप तीर्थना करवा वाला, श्री सघने तारवा वाला, बीजाना उपदेश विना पोतानी मेले योध पाम्या, पुरुपोमांहे उत्तम, पु रुपोमा सिंह समान, पुरुपोमा प्रधान पुमरीक कमल समान, पुरुपोमां गधदस्ति समान जेम गधदस्तिने देखी वीजा दस्ति नाशि जाय तेम श्रीतीर्थकर नगवानने देखी परवादी रूप हाथी उ नाशि जाय एवा जगवान, लोक मांहे उत्तम, लोकना नाय, लोकना हितकरनार, लोकमा दीपक समान, लोकनेविपे ग्योत करनार, थनयदानना दातार, झान चकुना देवा वाला,मो क्षमार्गना दातार, कर्मथी वीक पामनारा जीवोने शरणना दातार, सयम रूप जीवित व्यना दातार, वोधवीज जे सम्पकत्व तेना दातार, सर्व मरणना मटाववा वाला, धर्मना दातार,धर्म उपदेश देवा वाला,धर्मना नायक, धर्ममा सारथी समान जेमसारथी रयने शुक्ष्मार्गमा लश् जाय तेम नगवान धर्ममार्गथी भ्रष्ट ययेला लोकोने धर्म मार्गमा लजाय एना उपर मेघकुमारनु दृ टांत करे ॥ तत्रयादौ ॥ लोक ॥ पुत्र श्रेणिकधारियोः श्रुत्वा वीरविनोगिर ॥ प्रवुझोप्टो प्रिया स्त्पक्त्वा, मेघोदीक्षामुपावदे ॥१॥ष्यारन्या-राजगृदी नगरीने विपे श्रेणिकराजानी धारिणी ।

नामे राणीनी कूखें मेषकुमार, पुत्रपणे उपन्यो, ते वखत गर्नेना प्रनार्वे करी राणीने एवो दोहोलो उपन्यो के वर्षाकालमा थापरों राजा, तथा राणी, बेछ जण हाथी उपर बेशीने वनमा ज कीडा करीयें? ते अजयकुमारे पूर्व नव संगति देवतानु थाराधन करीने दोहोलो सपूर्ण कसो, पठी नव मासे पुप्रजन्म थयो, तेनो जन्ममहोत्सव करी, खजन कुटुंबने जमाही मेघकुमार नाम पाइघु, अनुक्रमें यौवन अवस्था पाम्यो, तेवारें पितायें बात कन्या परणावी, तेमनी साथै विषयसुख जोगवतो विचरे में, एदवा समयमा राजगदी नगरीयें श्रीमहावीर समोसया, श्रेणिकाविक सर्वलोक वांदवा गया, तेमनी साथें मेघकुमार पण गया, त्या जगवतनी देशना सांगली प्रतिबोध पामी, था। कन्या त्यागी, माता पितानी थाहा लेइ वीक्षा लीधी पड़ी नगवाने पण ग्रहण, थासेवना, साधुनो थाचार शीखववा निमिने स्थविरोने नलाष्यो रात्रिय सथारवानी वेलायें अनुक्रमें सर्व साधुने बेडे मेघकुमार शपिनो संथारो श्राव्यो, तिदा साधु, मा करवाने ठते, तेवारें मेघकुमारने वारंवार पगनी ठोकर लागे, तेथी एक क्षण वार पण निज्ञ न श्रावी, धूलथी जराइ गयो थाखी रात जाग्यो थने विचार करो जे फिदां मदारी मुखशय्या, श्रने किदां था नमिने विषे लोटq, थने वली एक रात्रिमा केटलो उपसर्ग थयो, तो ए कदर्थना दु केटलाक काल मुधी सदन कलं, माटे ए दीया महाराथी तो पले नही, तो हवे प्रनात समयें जगवतने पूबी हुँ महारे घेर जश' दजी का धगडघु नथी एम विचारी प्रनाते उघो, मुदपत्ती लर, जगवत पासें श्रायो, तेवारे जगवत पण मीग वचने योख्या के हे मेघ रुपि' श्राज रात्रिमा तमाराथी साधुना पग न स्वमाया, निज्ञ न श्रावी, तेथी मनमा माटुं घ्यान ध्या{ जे छ प्रजातमा - घेरजाश एवात सत्य ने ' मेधकुमार वोल्यो हा महाराज' सत्य प्रतु वोल्या हे मेघकुमार! ए तमने योग्य नथी जे जणी नरक तिर्यधनांखो तो जीवेंशनतिवार दीवा वे तेनीथागत था उख, कोण लेखामा गणे' एवो कोण मूर्ख जे चक्रवर्तीनी शदि मूकीने दासपणु वांठे ? माटे मरतुं सारं पण चारित्र नग करवो सारो नथी ए चारित्रनुं ज्ञान सहित कष्ट , ते थागज घां फल देनारु थाशे तथा जोके तें पूर्व नवे पण धर्मनें थर्थ घणा थकाम कष्ट नोगष्यां ने, ते पण महाफलादायक थयां ते ताहारा पूर्व नव सोनल था जवथी त्रीजो नवने विषे घेताढय पर्वतनी पासें न देतोशल सहित श्वेत वरों एक हजार दाथणीनो नायक एवो सुमेरुप्रननामें तुं हस्ती इतो, तिहा एकदा दावानल लागो देखी जय पामीने त्यांथी नागे तृपायें पीब्यो चको एक सरोवरमां कादव घणो हतो थने पाणी स्वल्प इतुं तेमा दस्तीना मार्गने अजाणतो पाणी पीवाने पेठो, त्यां कर्दममाहे खूतो, पाटो नीकली शक्यो नही एटलामा एक पूर्व जवनो वैरी वीजो हाथी त्यां वाष्यो तेणे दंतोशलने प्रदारें करीने तुजने दण्यो, तेथी सात दिवस पर्यंत महा वेदना जोगवी, एकशो वीश वर्पनु थायु पूर्ण करी मरण पामी विंध्याचल पर्वतनी नूमिकायें तु चार दंतोशलवालो, रातेवणे, सातशे दाय एीनो नायक, मेरुप्रन नामें हस्ती थयो, तिहा पण एक समये दावानल लागो देखी जाति स्मरण उपन्, तेथी पूर्वनव दीगो, पढ़ी दावानलनो नय टालवासारुं चार गाउ जगें नूमि कार्नु मामलु घनावी अ६ की ; तेमा तृणवेलिमात्र राखतोहतो नहीं उगता पहेलाज उन्मूली नाखतो इतो,एम घ वर्ष वीत्या पड़ी, एकदा वजी महोटो अंगी दावानल लागो, तेवारे सर्व वनचर जीव,थावी मामलामा रह्या, तुं पण तस्कात यावी मामलामा रह्यो, मामलामा तिज जेटलो पण मार्ग रह्यो नही, एवं संकीर्ण थयुं, एटनामां तें खरज वणवाने पग उँचो सी धो, ते पगने स्थानकें निराजी नूमिका देखी एक झरालो तादारा पग नीचेनी नूमियें थावी घेतो पनी पग नीचो मूकतां नीचे शशलो दीगे एटचे तुजने क्या थावी तेथी पग थधर रा ख्यो, थढी दिवसें दावानल उपशम्यो, तेवारे शशला प्रमुख सर्व जीव, पोत पोताने स्थानके गयां, ताहारो पग लोहीयें नराणो तेने नीचो मूकतो थको पर्वतना कूटनी पेरें तु देठो पज्यो त्रण दिवस सुधी नुखपायें पीडातो सो वर्पनु थायु जोगवी दया सहित मरण पामी, हे मेपकुमार ! तु राजकु उपन्यो बो थकालें मेघवृष्टिनो दोहोलो तारी माताने थयो माटे तारु नाम मेघकुमार स्थाप्यं जे वखतें तुजने दाथियोयें मासो, ते वखतें तो तिर्यंचनुं करेलु उख हतु, तो ते उख पागल था साधुना संघटथी तु यं 5 ख घरे ? ते साधु तो जगच में, एमना चरणनी रज तो पुण्यवान् जीवने जागे माटे साघुना पग लागवाथी सुख न थाणवू एवा नगवाननां वचन सांजली जातिस्मरण उपन्युं, तेणें करी पूर्वता नव दीवा, पनी प्रजुने पगे लागी चारित्रने विपे स्थिर थश्ने एवो थनिग्रह जीयो के थाज पनी मदारे ये नेत्रनो जावतो राखवो माटे ते टालीने वीजा शरीरनी प्रश्नपा, गमे तेनु सकट पडे तो पण न क रवी एवो जावलीव सुधीनो अनिमद करी निरतिचार पणे शुभ चारित्र पाली थते एक मा सनी सलेपणा करी विजयनामा थनुत्तर विमानमां देवपणे उपन्यो, तिहाथी चवी महा विदेदा उपनी मोद पामशे, इति मेघकुमार कथा ॥ माटे जगवतने धर्मसारथि सरखा कहियें ॥ ए प्रथम व्याख्यान समाप्त थर्पु ॥ १ ॥ ॥ श्रथ दितीय व्याख्यान प्रारन ॥ वली जगवानने नमस्कार करे ने धर्ममां चार अत कथा एवा चक्रवर्ति समान नगवान ने Marwa थाय नहीं बने श्रीमहावीर देवने केवल झान सपन्या पनी गोशालायें उपसर्ग कसो, त कह , एकदा नगवत श्रीमहावीर स्वामी विहार करतां सावठी नगरीयें समोसना, तेवारें गो शालो पण, हु तीर्थकर ई एम लोकोमा कहेतो थको सावछीयें थाल्यो, ते समय गौतमस्वा मी गोचरीयें गया, तिहां लोकोना मुखयकी एव सान{ जे थाज नगरीमा एक महावीरस्वा मी थने बीजो गोशालो, ए वे तीर्थकर श्राव्या ने पढ़ी सशयवत थने श्रीगौतम स्वामी नगवत पासें थावीने गोशालानी उत्पति पूबी, तेवारें प्रचुयें कटुं के शरवण ग्रामनो रे वासी मखली जरडानीजाति शनिश्चरनो दान लेनारो तेनी मुनश स्त्रीनो ए पुत्र , ब्राह्मणनी गायनी शालामा जन्म्यो तेथी मातापितायें गोशालो नाम पाडघु ने ए निझामागतो दतो ते थावीने महारो शिष्य थयो, बद्मस्थावस्थायें मदारी साथै उनस्थ पणे ब वरस रह्यो इतो,म दारी पासेंथी नणीने कांशएक बहुश्रुत थयो , तेजोलेश्या पण शीरख्यो वीजुबली दिशाचरो पासेंधी निमित्तविद्या शीखीने ए मिथ्या जिननाम धरावे ,परंतु ए तीर्थकर नथी,एवी वात प्रनु पासेथी सांजलीने श्रीगोतमें वीजा घणा लोको पासें वात करी, जे गोशालो मरवली पुत्र , ते वात, गोशालाने कानें गइ, तेवारें गोशालो कोधायमान ययो एवा समय नगवतनो थानवनामा शिष्य गोचरीयें गयो तेने गोशाले बोलावीने कर्पु के दे शानद । तने एक दृष्टात कटु ते सांजल, कोइएक चार वाणीया व्यापार करवाने श्रर्थ विविध प्रकारना करियाणानां गा डां नरी परदेशे पाल्या मार्गमा कोशएक मदोटी बटवीमा पेग, तिदा तृपालागी तेथी उजा उमा पाणीनी गवेपणा करतां पाणीतो क्यांय दीर्नु नदी पण चार वाल्मिक एटले ठवेदीना शिस्थर (टीम) दीवां थने तेना उपर नीला रक्ष गेलो दीवा, तेथी जाएऍ के यहींयां व वश्य पाणी दशे? एवं जाणी एक शिखर फोरपुं तेमाथी घणु निर्मल शीतल जल नीकम्यु, ते सर्वजनोये पीने तृपा नांजी, वली वीजा वासपोमां पण पाणी नरी लीधु, पबी वीज शि खर जांगवा मामधु, तेवार तेमाथी एक वृक्ष वाणीयो बोल्यो के थापणु काम थ, माटे हवे वीजु शिखर फोडशोमा, एम वाया थका पण तेणें वी शिखर फोडयु, तेमाथी सोनुं नीक दरं, तेवारें लोन लागो तेथी जोपण वृदेवो तो पण त्रीच शिखर फोडघु तेमाथी रन नी कन्या वली र घणो वायो तोपण चोधु शिखर फोडणूं, तेमाहेथी महाविकराल नयंकर ह हिचिप सर्प नीकल्यो, ते सर्प दृष्टिवि करी सूर्य सामु जोश्ने सर्वने बाली जस्म कीधा, एक मुशिदाना थापनार सपने दया थाणी जीवतो मूल्यो, ए दृष्टांतें ताहारा धर्माचार्यने एटली संपदा प्राप्त थ तो पण थसतुष्ट थको महारो अपवाद लोको पागल बोलीने मने रोपवत करे ने तेथी हूँ त्यो श्रावी मदारा तेजथी सर्वने बाली नस्म करीश, माटे तु उतावलो जश्ने ताहारा धर्मचार्यने कहेजे, हूँ वृक्षवाणीयानी पेरें मात्र एक तनेज जीवतो मूकीश, ए वात सांगली थानव,मुनि नयांत थयो थको जगवत पासें श्रावीने गोशालाना सर्व समाचार कह्या, तेवारें नगवते कयुके हे थानद तमे गौतम प्रमुख सर्व साधुउने कदेजो जे थहींथां महारो कुशिष्य गोशालो थावशे, ते उपसर्ग करशे माटे तमें कोइ पण तेनी सार्थे नापण करशोमा जो वोलशो तो बाली जस्म करशे तेथी थरहा परदा टली रहेजो ते सांजली सर्व साधु एकांते वेशीरह्या तथापि सर्वानुनति थने मुनक्षत्र एवे साधु, जगवत पार्सेज रह्या, एटलामा गोशालो श्रावीने नगवानने कदेवा लाग्यो के हे काश्यप ! तुं कहे जे जे महारो शिष्य गोशालो ते स्वरी वात डे पण तादारो शिष्य जे गोशालो हतो ते तो मरण पाम्यो अने जेम चक्रवनि त्रण वा समुह थने एक वा घुमहेमवत पर्वत पर्यंत राज्य करे तेम नग वान दानावि चार प्रकारनो धर्म प्ररूपे माटे धर्म चक्रवर्ति कहीये, ससार समुश्मा बता प्राणीने हीप समान शरणागत वत्सल, पाय दणाय नही एवा ज्ञान श्रने वर्शनना घरवा वाला, जेमने बनस्य पणु रघु नथी, पोते राग पनें जीत्या, वीजाने जीतावे, पोते ससार समुश्थकी तस्या, वीजाने ससार समुश्थी तारे, पोतें तत्त्वने जाण्या बे, बीजाने तत्त्वनो वोध करे, पोतें कर्म रहित थया, वीजाने कर्मथी मूकावे, सर्वज्ञ, सर्ववर्शि, शिव एटले निरूपश्व, थचल, रोग रहित, जेनो तनही थने छय पण नही, बाधा रहित, ज्यांची फरी पाई ससा रमा थाव नथी एवं जे सिधिगति नामक स्थानक तेने पाम्या एवा जिनेश्वरने महारो नम स्कार दोजो, जीत्या जय जेमणे एवा नगवतने नमस्कार दो, अमण नगवत प्रामहावीर बेला तीर्थकर, थादिना करनार पहेला तीर्थकर श्रीरुपनदेव स्वामीयें देखाच्या यावत् मो क्षमा जावा वाला तेमने हूं वां तु नगवान तो त्यां गर्नमा बे थने ढुं वेवलोका दु माटे त्यां रह्यां थका थापे मने देखवो एतु कहीने नगवानने नमस्कार करे करीने सिहासन उपर पूर्वदिशानी साहामु मुख करीने वेठो तेवारे शश्नां मनमा एवो विचार उत्पन थयो॥१६॥ ॥ एम सर्वे तीर्थकरोना एक चवन कल्याणक, वीजं जन्मकल्याणक त्री दीक्षा कल्या एक, चोधू झानकल्याएक थने पाचमुं निर्वाणकल्याणक, ए पांच कल्याणकें सदा काले शकस्तव कहे एटले शाजे २ ते स्तव एटले पुणे माटे तेने शकस्तव कहीये ते ३ महाराज शक्रस्तव कहीने रोमांचित थाय, थानद पामे, वली ए पांच कल्याणकें पोश- श नेला यश्ने अघ महोत्सव प्रमुख करीने प्रत्येक कल्याणकनो महिमा करे ए मर्यादा ॥

ते कहे ने महाराज विचाबु जे श्रीअरिहंत नगवत यथवा चक्रवर्ति अथवा वासुदेव अथवा बलदेव ए प्रेसवे उत्तम पुरुप ,ते थतकुल जे कुजाति तेने विपे तथा प्रांतकुल ते थधमाचारीना कुलने विपे तया श्रम्पपरिवार वाला तुम कुलने विपे तथा निर्धन ते इरिडीना कुजने विपे तथा अदातारते रुपएना कुलने विपे तथा चारण प्रमुख नीखारीना कुलने विपे तथा ब्राह्मणना कुलने विपे थाय्या,थावे यने यावशे निश्चयथी ए वात पूर्वथइनथी,वर्तमान कालें थाती नथीथने श्रागामिक काबें पाशे पण नही एटले त्रेशन शिलाका पुरुष तो निधे यकी पूर्वोक्त थत कुलादि कने विपे थाव्या पण नथी, थावता पण नयी थने श्रावशे पण नही ॥१॥ ॥ए पूर्वो क्त यरिदतादिक प्रेश शिलाका पुरुप तो, निम्बयथकी श्रीरुपनदेवजीयें थारछक पणे जेने राख्या तेने उग्रकुल कहीये ते कुलने विपे तथा जेने गुरुस्थानीया पणे राख्या तेने नोगकुज कहीये तेने विपे तथा जेने मित्रस्थाने राख्या तेने राजन्य कुज कहीये तेने विपे तथा प्रजा लो कपणे थाप्या तेने क्षत्रियकुल कदीये तेने विपे तथा दिवाकु कुलने विपे तथा हरिवर्ष देवना युगलीयानो जे परिवार तेने हरिवश कुल कदीयें एवा बीजा पण तथा प्रकारनां विगु जाति ना उत्तम कुलने विपे थाव्या बे, थावें थने थावशे, ए मर्यादा ॥१७॥ । तथापि ए श्रीमहावीर सामी ब्राह्मणना कुलमां थावी कपन्या ए तोकने विपे थछेराजूत वात थइ एटले थनती उत्सर्पिणी अने अवसर्पिणी जेवार व्यतिकमे तेवारें कोश्क कालें एवा श्रछेरा थाय ने तेम था अवसर्पिणीमा पण एवा दश अछेरा एटले थाश्चर्यकारी वातो यये ली एम महाराज विचारे जे ॥ यथामथ ॥१०॥ ॥ दवे अवसप्पिणीने विपे जे दश थोरा थया ते वखाणे त्यां प्रथम को तीर्थकरने केवलज्ञान उपन्या पढ़ी उपसर्ग थाय नहीं थने श्रीमहावीर देवने केवल ज्ञान उपन्या पदी गोशालायें सपसर्ग कस्यो, ते कहे वे एकदा नगवत श्रीमहावीर स्वामी विहार करता सायची नगरीयें समोसना, तेवारें गो शालो पण, तु तीर्थकर छै एम लोकोमां कहेतो यको सावक्षीय श्राव्यो, ते समय गोतमस्वा मी गोचरीयें गया, तिहां लोकोना मुखथकी एवं सानक्र्यु जे थाज नगरीमा एक महावीरस्वा मी अने पीजो गोशालो, ए ये तीर्थकर थाव्या बे पनी सशयवत यनें श्रीगौतम स्वामीयें भगवत पासें श्रावीने गोशालानी कुत्पत्ति पूर्वी, तेवारे प्रष्ठयें कहूं के शरवण यामनो रे वासी मखजी जरहानीजाति शनिश्चरनो दान लेनारो तेनी मुना स्त्रीनो ए पुत्र , ब्राह्मणनी गायनी शालामा जन्म्यो तेथी मातापितायें गोझालो नाम पाडघु ने ए निझामागतो हतोते श्रावीने महारो शिप्य थयो, उपस्थावस्थायें मदारी साथै ब्यस्थ पणे ब बरस रह्यो इतो, म हारी पासेंची नणीने कांशएक बहुश्रुत थयो , तेजोलेश्या पण शीख्यो ने वीजवली दिशाचरो पासेंथी निमित्तविया शीखीने ए मिथ्या जिननाम धरावे ,परंतु ए तीर्थकर नथी,एवी वात मनु पासेथी सानतीने श्रीगोतमें बीजा घणा लोको पासें वात करी, जे गोशालो मस्खली पुत्र वे, ते वात, गोशालाने कानें गइ, तेवारें गोशालो कोधायमान थयो एवा समयें जगवतनो थानवनामा शिप्य गोचरीयें गयो तेने गोशाले बोलावीने कयुं के हे श्रानद तने एक दृष्टांत कहु ते सांजल, कोशएक चार वाणीया व्यापार करवाने अर्थे विविध प्रकारनां करियाणानां गा दा नरी परदेशे चाल्पा मार्गमा कोइएक महोटी थटवीमा पेठा, तिहां तृपालागी तेथी उजा हमा पाणीनी गवेपणा करता पाणीतो क्याय दीनु नदी पण चार वाल्मिक एटख्ने ठदेहीना शिखर (दीम) दीनं अने सेना उपर नीलां वृक्ष टगेला वीर्ग, तेथी जान के अहींयां श्व वश्य पाणी दशे' एवं जाणी एक शिखर फोरपुं तेमाथी घणु निर्मज शीतल जल नीकम्यु, ते सर्वजनोये पीने तृपा जांजी, वली बीजा वासोमा पण पाणीनरी लीधु, पबी वीज शि खर नांगवा मांमधु, तेवारें तेमाथी एक वृक्ष वाणीयो योज्यो के थापणुं काम थर्पु, माटे दवे वीजु शिखर फोडशोमा, एम वाया थका पण तेणें बीजु शिखर फोडघु, तेमांथी सोनु नीक व्यु, तेवारें लोन लागो तेथी जोपण तृदेवो तो पण त्रीच शिखर फोडघु तेमाथी रत्न नी कव्या वली में घणो वाखो तोपण चौघु शिखर फोडधु, तेमांडेथी महाविकराल जयंकर ह ष्टिविप सर्प नीकल्यो, ते सर्प दृष्टिवि करी सूर्य सामु जोक्ने सर्वने वाली नस्म कीधा, एक सुशिक्षना थापनार रचने दया थाणी जीवतो मुक्यो, ए दृष्टांतें तादारा धर्माचार्यने एटली सपदा प्राप्त थ तो पण थसतुष्ट थको महारो अपवाद लोको थागल बोलीने मने रोपवत करे ने तेथी दु त्यां श्रावी महारा तेजथी सर्वने बाली जस्म करीश, माटे तु सतावलो जश्ने तादारा धर्मचार्यने कहेजे, 8 वृक्षवाणीयानी पेरें मात्र एक तनेज जीवतो मूकीश, ए वात सानली थानव,मुनि नयांत थयो थको जगवत पासें थावीने गोशालाना सर्व समाचार कह्या, तेवारें जगवते कझुके दे थानद तमे गौतम प्रमुख सर्व साधुऊंने कहेजो जे थहींयां महारो कृशिष्य गोशालो थावशे, ते उपसर्ग करशे माटे तमें कोई पण तेनी साथै जापण करशोमा जो बोलशो तो बाली जस्म करशे तेथी थरहा परदा टली रहेजो ते सांजली सर्व साधुन एकांते वेशीरह्या तथापि सर्वानुति थने सुनछत्र एघे साधु, नगवत पासेंज रह्या, एटलार्मा गोशालो थावीने नगवानने कव्वा लाग्यो के हे काश्यप तु कहे जे जे महारो शिष्य गोशालो ने ते स्वरी वात ने पण तादारो शिष्य जे गोशालो हतो ते तो मरण पाम्यो थने हु तो वीजो तु मात्र ते गोशालानुं शरीर परीयह सहन करवा सरखं दतु माटे में तेना शरीरमा प्रवेश करतो वे ते सांजली नगवान वोल्या के थरे गोशाला कोई चोर चोरी करी नाठो होय तेनी पळवाडे वादार चढी दोय ते जोड्ने पहेलो चोर नाशी जवाने असमर्थ ठतो एक तरणु लश्ने पोताने दाकवा सारु थाई थापे अने मनमा जारो के दवे मने कोई देखी शकशे नही तेथी / ते बानो रही जाशे। तेम तु पण मदारी थागल केवीरीतें बप्यो रदीश तुं तेदज महारो शिष्य गोशालो हो' एवं सन्तिी गोशालो रोपवाणीने जगवानने कहेवा लागो के थरे तु जीवतो रदीश त्यांसुधी मने मुख थाशे नदी एवा तेना तुछ बोल सानलीने सुनक्षत्र मुनि वोल्या के परे गोशाजा तु पोताना गुरुने सामु बोले ने एतो तुं संसारमा थनता नव भ्रमण करवानें काम करे ने एटलु बोज्यो तेटलामा गोशालायें तेना वपर तेजोलेश्या नाखी तेथी ते मुनि वली जस्म थइ गयो फरी पण जगवानने गोशालो कड़वां वचन कहेवा लाग्यो तेवारे सर्वानुनूति मुनि वोल्या तो तेने पण तेजोलेश्यायें करी वाली जस्म कीधो ते वन्ने साधु मरण पामीने देवलोकमा गया दवे नगवाने गोशालाने कसं के तु चोरनी पेठे कां विपतो रहे तेवारें नगवान ऊपर पण तेजोलेश्या मूकी ते तेजोलेश्या जगवाननें त्रण प्रदक्षिणा थापीने पाठी गोशालाना शरीरमा पेठी तेथी गोशालो दाजयो तेना ताप यकी सात रात्रि सुधी विविध वेदना जोगवीने गोशालो मरण पाम्यो श्रने तेजोलेश्याना तापयी नगवानना शरीरे वेदना थवा जागी, उमदीना सुधी लोही खम जाडो । ययो, रेवती श्राविकानां घेरथी वीजोरांपाक सिंह थणगार पासें मगावी जगवतें खाधो, तेथी शरीरे शाता यह एवीरीत जेनो नाम मात्र लीपायी पण सर्व उपश्व मटीजाय तेमने पण महा पीडा थइ एम तीर्थकरने जिनपद लह्या पठी एटले केवलज्ञान सपन्यापबी सुपसर्ग न याय, ते थयो ए प्रथम थार्य जाण ॥ ॥ वे बीजु थारू जे था वर्तमान चोवीशीमा श्रीमती नाथ उंगणीशमा तीर्थकर स्त्रीवेदपणे उपन्या, तेनो सबंध कहे जे थार्ज छीपना श्रीमहाविदेह क्षेत्र ने विपेसलिलावती विजयमा वीतशोकानामें नगरीनो बलनामें राजा तेने धारिणीनामें स्त्री , तेनो महावल नामें पुत्र डे, ते यौवन अवस्था पाम्यो, तेवारें राजायें तेने पांचसो स्त्री पर णावी, पनी वृक्षावस्थायें पुत्रने राज्य थापी पोतें दीका सर चारित्र पाली मोः पोहोतो, हवे महायल राजा राज्य करे , तेने एक अचल, बीजो धरण, त्रीजो थनिच, चोथो पूर्ण, पांचमो वसु, बो वैश्रमण, ए ब मित्र दता एकदा ते साते जरो गुरु पासें धर्म सांजली दी का जीधी, अगीधार अग जएयां थने ते साते जणे माहोमाहे एवो सकेत कस्खोके श्रापण सर्व जणायें उथम्माविक जे तप करतु ते सरस्नु बराबर करवू पण एक बीजाथी अधिकन्यून तप कोयें करवू नही ते प्रमाणे ते सातेजण सरखं तप करे, तेमा एकदिवस महाबल रुपि ना मनमा एवो विचार थयो के दु एनाथी को अधिक तप करु के जेथकी हु ए सर्वथी अधिक था एवो निश्चय करी, कपटयकी ते ३ जणथी बानो जेवारें पारण करवानो विवस थावे तेवारें ब जणने एम कहे के महारूं तो माथु उखे बेदुधाज पारण करीश नदी तमें सुखे पारण करो बीजे दिवसें वली तेमना सरस्खु तप करे ए प्रमाणे कपट थकी वीश थानकतप कम्युं तेथी तीर्थकरनाम कर्म उपायु परंतु कपटनेलीधे स्त्रीपणानु कर्म बांध्र्यु शेवट सातेजणा वे मासनी संलेपणा करी चोराशी लाख पूर्वनु थायु पाली मरण पामीने वत्रीश सा गरोपमने थारखे विजपंतनामा अनुत्तर विमाने जर कंपन्या, पनी तिहांधी चवी एकथचल नो जीव तो थयोध्यानो सुप्रतिवचनामें राजा थयो, वीजो घरएनो जीव, चपानगरीयें चड़ जसा नामें राजा थयो, त्रीजो थनिचश्नो जीव, काशी नगरीये शखनामें राजा थयो, चोयो पूरणनो जीव, सावधी नगरीयें रुक्मिनामें राजा थयो, पाचमो वसुनो जीव कुरुवेशे श्रदी नरानुनामें राजा ययो, उहो वैश्रमणनो जीव कपिला नगरीयें जितशत्रुनामें राजा थयो, थ ने सातमो महावलनो जीव मिथिला नगरीये कुन राजा तेनी प्रनावती राणीनी कूस्खें श्रावी ममीकुमरी पणे उपन्यो,तेवारें मातायें चौदसुपना दीवा,या शुदि श्रीश्रारशे पुत्रीपणे ज म्या अनुक्रमें योवन थवस्था प्राप्त थर, पबी अवधिझाने करी पोताना व मित्र, जूदे जूदे कारों उपन्या देखी तेने प्रतिवोध करवाने यर्थ अशोक वाडीमा रने जडित घर कराव्यु, तेना उधारणां कराव्या, तेमां पोताना रूप सरखी रहेंजडित सोनानी एक पूतली करावी, हवे म वीकुमरी जे जे वारे नोजन करे, ते ते वारे ते रमनी पूतलीने माथे धारण कराव्यु ले ते वा रणानी उपर एकेको कवल नास्वती जाय थने फरी पाबु दाकणु थापी दीये, एम नित्य करती जाय हवे एकदा श्रयोध्या नगरीयें सुप्रतिवद् राजायें यत्ने वेरे पूजा रचावी , तिहा मननी माला देखीने दूतने पूलघु जे तमें एवो फूलनो श्रीदामक्याहिं पण वीठो ' तेवारें दूत घोल्यो जे हे राजन्! मात्रीकुमरी घणी चतुर ने घणा रूपमय बे, ते जेवो फूल नो श्रीवाम वनावे वे तेहना लाखमा थशे पण ए श्रीदाम नथी दवे पूर्वनवना प्रेमथकी सुप्र तिवराजायें मलीकुमरीनी याचना करवाने कुनराजा उपर दूत मोकव्यो अने कहेबराव्यु जे तमारी बेटी मुजने परणावो ।। इति प्रथम दूत ॥ १ ॥ तेवार पनी चपानगरीना थरहन्नक प्रमुख व्यवहारिया प्रवहण जरी गंजीर पत्तने दीपांतरें चाव्या, एवा समयमा १२ महाराज ! H यरहनक प्रावकनी प्रशसा पोतानी सनाने विपे करवा लाग्या जे धन्य थरहन्नकने, थाज नरत क्षेत्रमा एना समान पीजो को दृढ श्रावक नयी । ते ना वचनने कोशएक मिथ्या वी देवता थण सदतो थको तिहां थरहन्नक पासें थावीने ते देवतायें समुश्मा महोटो उत्पात कसो ते जोर धरदन्नक तो सागारी थपशण करीने निम्बल मनें श्रीचीतराग देवन स्मरण करवा लाग्यो, तेने देवतायें घणोए चलाष्यो थने एवं कर्पु जे तु श्रीवीतराग देवन स्मरण मुकीने दरि दरादिक देवोर्नु स्मरण करय, तो उपसर्ग निवारण करु नहींतर तादारां जिहाज समुश्मध्ये चूहावी देश, एम कही जिदाज समुश्मा चूडाववा लाग्यो, ते जो सर्व लोक एका मनी घरदन्नकने कडेवा जागा जे देवतायें कपुं तेम करो,तो पण परदन्नक श्रा वकनु समकित दृढ , तेथी चलायमान न थयो, ते जोश्ने देवता तुष्टमान थकुंमलानरण नो जोरो थापी, थईनकने पगें लागीने कर के अहो थर्दनक | तमोने धन्य बे,दे कत पुण्य । तमारु जीवितव्य सफल ,तमोने ३६ महराजें सना समक्ष वखाण्या ते अणमा नता में तमारो थपराध कमो, ते महारो थपराध तमें स्वमजो, ते सनिली थईनक बोल्या जे श्व लोक थने परलोकनु साधन एवो श्रीजिनधर्म पामीने वीजो धर्म दु थंगीकार न करूं, तेवारें देवतायें चार कुंमल थाप्यां, यनें पोताने स्थानकें गयो, दवे ते व्यावदारीयो कुशल क्षेमें गनीरपत्तनें गयो तिदा व्यापार करी फरी मिथिला नगरीयें थाव्यो तेवारे देवतायें था पेला चार कुमलमाथी राजाने वे कुंम्ल थाप्या, राजायें मध्नीकुमरीने दीधा, पनी व्यापा रियें पोतानी चपानगरीये श्रावी, तिहां चपागरीना राजाने बाकी रहेला वे कुमल थाप्या राजायें घुजे दे व्यवहारीया' तमें परदेशमा कोइ तमासो दीगे? ते सांजली व्यवहारीयो -- योयो के थमें मालीकुमरीन रूप थमुत दीतु, एवं रूप पीजे क्यादि पण दीतु नथी, पनी चजसा राजाय पण कुंजराजा पासें दूत मोकलीने कडेवराव्यं के तमारी पुत्री मन्त्रीकुमरी मुजने परणावजो ॥ इति द्वितीयदूतः॥२॥ एक दिवसेंमलीकुमरीना ये कुमल नांग्या, तेवारें कुलराजायें सोनी वोलावीने कडं के था कुमलनो जोडो सांधी थापो, तेवार सोनी कुमल जोश्ने योल्या जे महाराज! ए सघाय नहीं एतो देवतानां कुंमल , ते थमें केवी रीतें सांधिय? तेथी राजायें सर्व सोनीठने वेशनिकाल कीधा, ते सोनी वायारसी नगरीयें गया, तेवारे त्याना शख राजायें पू के तमें देश केम बोज्यो' सोनी वोल्या जे महाराज ' मलीकुम रीना कुंमल देवता संवधी , ते थमारा यकी संधाणां नहीं, तेणें करी देश बोडवो पयो यने मत्रीकुमरीना रूपनु वर्णन का, तेवारें वाणारसीना राजायें पण मन्त्रीकुमरी याचवाने श्रर्थे कुलराजाने दूत मोकल्यो ॥ इति तृतीयदूत ॥ दवे रुक्मी राजायें पोतानी पुत्रीने चार महीना सुधी पीठी करावीने दूतने पुग्घु जे हे दूत ! तें धातु रूप क्याही पण दी वे ' तेवारें दूत घोल्यो जे मलीकुमरीने लाखमे अंशे पण ए रूप नथी, ते सानजी, रुक्मी राजायें पण कुंनराजा उपर दूत मोकली,मग्रीकुमरीनी याचना करावी।। इति चतुर्थदूत ॥४॥ दवे कुंजराजानो पुत्र ,तेणें पोतानी चित्रशाला चित्रावी,तिहां चितारे ममीकुमरीनो चंगे दीतो, ते प्रमाणे मन्त्रीकुमरीना सर्वथगर्नु स्वरूप चित्री काठघु, एकदा मजीकुमरीना नाईयें कीटा करता मनीकुमरीन रूप चित्रशालामा जोयुं, तेने रीश चढी तेथी चिताराना दायर्नु अगुंगो कापीन कादादी मुक्यो, चितारो दस्तिनापुरे यदीनशत्रु राजाने मन्यो, तिहां मजीकुमरीन रूप, वर्णन कर, ते सानली तेणे पण ममीकुमरीनी याचना करवा कुंजराजाने दूत मोक यो । इति पंचम दूत ॥५॥ ॥ एक दिवस धर्मचर्चा करतां एक परिव्राजिकाने मलीक । मरीयें जीती, माननुप्टा करी, तेथी ते रीशाणीथकी कपिलानगरीयें जइ जितशत्रुराजाना मुख थागल मनीकुमरीना रूपनु वर्णन कम्युं, तेणे पण ममीकुमरी याचवाने श्रर्थे कुनराजा उपर दूत मोकल्यो ॥ इति पठदूत ॥ ६ ॥ ॥ ए रीतें ब दूत कुंजराजा पासें समकालें था व्या, कुनराजायें सर्व दूतोने कधू के मदारी कन्या कोने थापवानो नथी, एवी रीतें थप मान करी काठी मूक्या, पड़ी ते बए राजा पोत पोतानु लशकर लश्ने समकालें थावी मि थिला नगरीने वींटी लीधी, कुलराजाय पण बादिर श्रावी युरू करवा मामघु यु६ करता दायो थने पागे नगरीमा पेठो, तेवारें मलीकुमरीयें बए राजाउंने कदेवराव्यु के तमें महारा रमघ रमा श्रावजो, पढ़ी ते बए राजा ब धारणामाथी जूदा जूदा थाव्या, ममीकुमरीनी मूर्ति देखी व्यामोद पाम्या, एटलामा मलीकुमरी थावीने ते पुतलीना माथा उपरथी दांकण उघाउछु तेवारे ते सडीगयेला थनाजमा कीडा पच्या दता तेमांदेथी जगध नीकल्यो एटले सर्व जणे मोढा पासे पूगर्बु थापी युथुकार कीधो भने दुखी यवा लागा तेवारें मनीक मरी वोल्यो जे हे नशे था रममय पूतली बता नित्यप्रत्ये एक कवल थाहारना संयोगथी एवी गंध वास थापे थे, तो महारा शरीरमा तो नित्यप्रत्ये शेर धान्य पडे ने तेथी मलमूत्र नो नंमारज जे तेमा तमें ऐ रागांध थया बो' एवो प्रतिबोध करीने पनी पूर्वतो नव संजला व्यो, तेथी ते उए राजाने पण जातिस्मरण झान उपन्मु,पूर्वनव दीग पड़ी ते बए कव्वालाग्या के हवे श्रमने तारो, तेवार मनीकुमरीये की के दमणा तो तमें घेर जा, जेवारें मने के वलझान उपजे, तेवार तमें थावजो, हूँ तमोनें दीदा थापीश, पड़ी ते बए राजा पोतपोता ने स्थानकें गया, ममीकुमरीये पण संवत्सरी दानवापीने प्रणशे राजपुत्र साथें मार्गशिरच विद्यगीथारशने दिन वीक्षा लीधी, तेज दिवसें केवल ज्ञान सपन्यं, पनी ते बए मिथावी श्रीमतीनाथ पासेंथी दीक्षा लीधी ते बए ने गणधर कश्या तेदज नवें मोच गया, ए श्रीमती नाथ स्त्रीवेवें गणीशा तीर्थकर थया, तेमना समोसरणमा स्त्रीनी परपवा धागल बेशती दती अने पुरुपनी परषदा पाम्ज वेशती दती ते स्त्रीवेदें कोई तीर्थकर थाय नदी ते थयु ए पीजु थन्छेलं जाणवू ॥३॥ ॥ त्रीज को तीर्थकरने गर्नपालटो थयो नथी, ते श्राही श्रीम हावीर स्वामीने ब्याशी रात्रि पनी देवानंदानी कूखथी हरणिगमेपी देवतायें थपट्टीने त्रिश ला क्षत्रियाणीनी कूखमाहे घनो धने त्रिशलानी कूखें पुत्री दती, ते महाकुमें देवानवानी कूखे मूकी तेवु कोश्वारे थाय नदी, माटे एत्री गर्न पालटन याभर्य जाणवू ॥३॥ चोयु श्रीवीरनगवाननें जेवारें केवलहान अपन्यु, तेवारें देवतायें मली समोसरणनी रचना कीधी, स्यां घणी मदोटी परपदा ली थइ तेवारें नगवाने धर्मदेशना दीधी परंतु प्रचुनी देश ना सांजलीने कोइ समकेत पाम्यो नही, तेमज व्रत पच्चस्काण पण कोश्ये सीधु नही एरीत वेशना निष्फल गइ, एम तीर्थकरनी देशना कोश्वखतें खाली न जाय ते या वेलाये खासी गइ, माटे ए चोयुं थार्य जाणवु ॥ ३ ॥ ॥ पांचमु जे एक हीपनो वासुदेव दोय ते बीजे ही जाय नही, ते श्रीकृष्णजी झोपदी लाववाने श्रर्थ धातकीरखमें गया तेमज कपिल वासु देवनो शख अने श्रीकृष्ण वासुदेवनो शख ए वे शस्खेशरख मज्या ते पण कोश्वारें मसे नही माटे थामर्य जाणवु तेनी कथा कहे कोपिलपुर नगरा पदराजानी चुलणी पटराणीनी कूखे शेपदी नामे पुत्री थइ तेना विवाद सारु स्वयवर ममप मामयो, सर्व देशोना राजा ते डाव्या हस्तिनागपुरथी पोताना पुधिष्ठिराविक पांच पुत्रने तेडी पांमुराजा पण श्राव्यो, थर्जुने राधावेध साघ्यो तेवारें शेपदीय थर्जुनना गलामा वरमाला नारखी ते वरमाला पूर्वनवमा शेपदीये पाच जरतारनो नीयाणो कसो हतो तेना प्रनावथी पांचे पांमवोना गलामा जश पडी पूर्वला नवमा शेपदीनो जीव नागिला नामें ब्राह्मणीनो हतो तेरो एक दिवस धर्मरुचि मुनिने कडवी तुबडीनु शाक बोहोराव्ये ते मुनिये अनशन करी खाधु तेनां योगथी मुनि मरण पाम्या पनी नागिजा साधुनी घात करनारी ने एबु थाचार्य साधुने गामा मोकजी कदेव राव्युं तेवारें ब्राह्मणे नागिलाने घरमांथी काहाडी मूकी, ते जमती जमती मरण पामीने नरकें गइ त्यांथी थनेक तिर्पचादिकना नव करी एक शेवने घेर घणी स्वरूपवाली सुकुमालिका नामे पुत्री पणे उपनी तेने तेज गाममा एक वीजा शेउना दीकराने परणावी ते रात्रे सुवा गयो त्यां सुकुमालिकानो स्पर्श थतांज तत्काल तेने दाहज्वर उपन्यो तेथी ते पडती मूकी चाल्यो गयो पाठजयी सुकुमालिकाने शोक करती जोक्ने तेना बापे एक निकुकने परणावी| ते पण तेमज मूकी नागी गयो पढी सुकुमालिका 5 खगड़ित वैराग्य पामीने साधवी थर तेने गुरुणायें नाकारो करो तो पण ते वनमा तप करवा गश्त्यां एक वेश्याने पाच पुरुप दाज रीमा रह्या ने तेने जोश्ने सुर्कमालिकायें कषु के महारा तपनो प्रनाव होय तो थागला न वर्मा मुजने पण पांच नरतार दोजो एवं नियाणु कगुं, यते अनशन करी शान देवलोकें गइ त्यांची चचीने थीं औपदी थयेती । ते पूर्वरुत नियाणाना योगें वरमाला पाच जणानां कं उमा पही, देवोयें श्राकाराथी एवी वाणी करी के शेपदी पांच जरतारी उता पण सती ,पांच पांमव शेपवीने परणी दस्तिनागपुरमांथाव्या त्या सुखें रदे, एक दिवस जेनी मुखारुति सोम्य ,परंतु मनमा कपट घणु राखे ठे, वल्कल चीर पहेरे ,जनोई पहेरे , काला मृगना चाम डानो उत्तरासग फरेलो , जेनो जटाजूट महाकांति वालो ने, जे कलह कोलादलनो जगा उनार , एवो नारद कपि आकाशमार्गथी ते पांसुराजानी सनामा बायो, तेवारें पांमवो स हित सर्व सनाजनोयें कना थश्ने थावर सन्मान थाप्यं, परंतु ते नारद जेवारें शेपदीने जो वा गयो तेवारे झोपदीये तेने असयती जाणी वाद्यो पूज्यो नही, तेम उठीने उनी पण थर नही, अने योलाव्यो पण नही, तेथी नारदने रीश चीथने विचार करवा लाग्यो के था शे पनी पांच भरतार पामीने मस्त थइ गइ , तेपी गर्वित थकी बेटी ने तो दवे हूँ एने सकट मां नाटुं एम चितवी, धातकीखमना पूर्व नरत क्षेत्रमा अमरकका नामे नगरी त्यां कपि सवासुदेवनो सेवक पमनान नामे राजा राज्य करे , ते राजा पोतानी सातसें राणीयो सा थे वाडीमा रमतो हतो तेवा समयमा नारद पण त्यां गयो, तेने पमनान राजायें वांदीने पूब्यु के हे नारदजी महारो जेवो अतेसर तेवो अतेमर वीजे फ्यां तमें जोयो , तेवारें नारदजिये जाप्पु के था खियोनो लोलुपी एम जाणीथवसर जोश्ने नारदजी कहेवा जाम्यो, के हे राजन् तु वानां देमका सरखो देखाय , जेम कोइएक समुनो देमको कूवाना वेमकानी पासें थाष्यो, तेवार तेने कूवाना देमकायें पूघु जे तुं किहां रहे जे अने क्याथी याव्यो ठो, तेणे कधु छ समुहमा रहूं हूँ थने त्यांचीज थाप्यो बु तेवारे कूवाना वेमकायें प्रघु जे ताहारो समुह केटलो मदोटो , तेणे कसु घणो महोटो , तेवारें कूवानो वेमको दाथ पग पसारीने बोल्यो के थाटलो महोटो , समुना वेमकायें कहूं एथी तो घयोन महोटो दे, तेवारें कूवानो देमको पोताना कूवानी चारे पाये कूपका मारीने योज्यो के थाटलो महोटो , तो पण तेणे कधू के एनाथी तो घणोघणो महोटो डे, तेवारे कूवानो देमको रोप थाणीने बोल्यो के थरे असत्य वादी तुं श्दाथी दूर जा, मदारी फालथी पण वली को महोटो दशे ? माटे तु छठे बोले , तेम हे राजन् ते पण कूवाना देमकानी पेरें थाटलीज स्वीयो दीदी ने तेथी एनाज वखाण करे , परंतु पांच पी मवनी स्त्री शेपदी एवी वे के तेना एक अगुंगना नखायना रूप सरगुं पण ताहारी को इराणीनु रूप नथी, त्रण लोकमा ए झोपदी समान कोई स्त्री रूप नथी एम कहीने नारद चालतो थयो,पाबजयी पोनर राजा कामे पीडित थको चितववा लाग्यो जे एवी स्त्री विना जन्म निष्फल पण शेपदीने पामवानो कोई उपाय सूज्यो नही तेवारे श्रम तप करी पूर्वनवसंग ति देवतार्नु थाराधन कसं देवता प्रत्ययावी कनो रह्यो भने कहेवा लाग्यो के हे राजन् ! मने कम सनाखोमाटे जे काम होय ते फरमावो, पद्मोत्तर राजायें शेपदी लेश्याववानी याचना करी तेवारें देवतायें कसं ते महासती ने माटे शील नग करशे नही तो तुं फोकट शा वास्ते तेने तेडावे ने तो पण पद्मोनरें घणो दह करखो त्यारे देवतायें पदीने अवस्वापिनी निज्ञ थापी, ज्यां सुती इती त्यांथी दोलीया सहित कपाडीने पद्मोत्तर राजानी अशोक वाडीमा यावी मूकी राजाने कार्य के तें महारा दायें मातु काम कराव्युं , माटे दवे कोइ पण दिवसें तु मने याद करजे नही कदापि बोजावीश तो पण दवे हूं थावीश नही एम कही देवता स्वस्था नकै गयो,केटलिक वार पठी शेपदी निशमाथी जाग्रत थक्ने विचारमां पडी जे दुश्हां फ्यां श्रावी दु। तेवारें पद्मनान वोल्यो के में तुजने मदारी साथें जोग करवा सारुं देवतानी मार फते हों मगावी है, तो हवे तुं महारी साथै विषयसुख जोगव, दु ताहारो दास बुं, तेवारें शेपदी बोली हे देवाणुप्रीय' तु न महीना सुधी महारं नाम लश्श नही, महारी वादार क रवा वाला, पांच पांमव तथा श्रीकृष्ण के तेजो न महीनामा श्रादी थावशे नही तो तु कहीश तेम थाशे, पमनाने पण हा कही थने विचार्यु जे हां एनी खबर सेवा कोण थावनार ? वली जोरावरीथी प्रीति पण नथाय एम जाणी, ौपदीने पोताना महेलमा तेही गयो शेपदीये त्यां जब तप अने पारणे थायधिल करवा मांमधु, हवे प्रनातें दस्तिनाग पुरमा शेपदीने महेलमा वीती नही, तेवारे पामवो घणो शोध कराव्यो पण क्याये पतो लागो न दी, तेवारे पांमवोनी माता कुंताजीयें क्षारिकामा जश्ने श्रीकृष्ण वासुदेवने कसु के हे पुत्र । शेपदीने रात्रि सुर्ता थका कोइ वेव, दानव, राक्षस अथवा विद्याधर थपहरी गयो ,श्रमे सर्व जगा जगायें जोइ पण मली नही तेवारें श्रीकृष्णजी काश्क दास्य पूर्वक योल्या के पांच पांमव एक शेपदीने पण रास्ववाने समर्थ न थया, ढुंतो महारी वत्रीश हजार स्वीयोनी रक्षा करु , ते सानजी, कुंताजी बोल्या के हे वत्स' था थवसरमा हास्य करवा काम नयी तु तरत ौपदीनी स्ववर कराव पठी श्रीकृष्णजीये पण घणो शोध कराष्यो परंतु क्याय खोज पाम्या नही तेवारें चिंतातुर थइ वेग एटलामा नारदपि त्या थायां तेणे थाची रुष्णजीने चितामा वेसवार्नु कारण पूठ' त्यारे कृष्णजीयें कहुं के तमें कोइ स्यानकें जौपदीने दी।' नारदजी घोट्या ते पापणी कोश्साघुर्ने पण वोलावती नदती माटे खमा पहीदशे, तथापि टुंतो कोई उत्तखतो नथी, परंतु धातकीखममा थमरकंका नगरीयें झोपड़ी सरखी एक स्त्री दीती ने पनी कोण जाणे तेहज होयतो दोय एम कढ़ी, नारदजी चाल्या गया पली श्रीरूपणे विधायुं के था कत्त अवश्य कुबुदि नारदज करेलु बे माटें श्रमरकका मांहेज झेपदी दशे एवं जाणी पाझवोंने लइ सेना सहित श्रीकृष्णजी समुप तटें थाव्या, समुश् उनघवाने अर्थ थम्म तप करी लवणाधिप देवताने योजाव्यो ते पण प्रगट थइ वोल्यो के कदो शृं काम में ई करवाने तत्पर तु, तेवारें कृष्णजीयें सर्ववृत्तांत निवेदन करी कत्यु के थमनें धातकीखममा जावु ने, माटे धमारी सेनाने समुश्माथी जवानो मार्ग थापो, त्यारे देवता बोल्यो के तमे शा वास्ते त्या जवानो श्रम करो को हुँ पोते जर शेपदी लावीने तमोने थापीश,वली तमारो हुकुम होय तो श्रमरकका नगरी सहित पद्मनान राजाने समुश्मा नारखी वेलं, तेवारें श्रीकृष्ण पोल्या के हे देव तमे एवाज शक्तिवान हो एमां कांश समय नथी तथापि अमोने पाच पांमव सहित 7 जणने जवानो मारग थापो तो थमारे त्यां जवानी श्वा डे ते सांजली सुस्थित देवे ते उ जणाना उ रथ चालवानो मार्ग थाप्यो पड़ी पामवो सहित श्रीकृष्ण समुह उसे पीने थमरकका नगरीना उद्यानां जश् वारूक नामा सारथीने दूत बनावीने श्रीकृष्ण पन्न नान पासें मोकल्यो तेणे जश् पगनपर पग थापी त्रिवही जलाटे चडावी,कधु के हे पद्मनान । श्रीकृष्णवासुदेवें तमोने कदेवराथू ने के,पामवोनी स्त्री शेपदीने तमे लगया बो ते घणु थ योग्य काम कसु व् तथापि दजी काश्वगन्धु नथी माटे तमे थावी शेपदी श्रमोने यापी जान, तेवारें पद्मनान वोल्यो के छ तमोने पाली थापवा सारुं शेपदीने लश्श्राव्यो नथी, हुतो म दारा यसथी लाग्यो बु माटे तु तादारा स्वामीने जश् कहे के तमारे युद्ध करवु होय तो सुखें क रोड पण क्षत्री बु एम कही दूतने निघ्रबी ने काहाडी मूक्यो,दूतें थावी श्रीकृष्ण श्रागल तेणे कहेली सर्व वात निवेदन करी, श्रीकृष्णे जाप्यु के थसाध्य रोग कांग्रौपध विना जाय नही माटे युद्ध करवा तैयार थया,पद्मनान पण सेना लइ लड़वाने सादामो श्राव्यो,पामवो बोल्या के अमे एनी साथै युद्ध करी/ कदापि जो दारी जयें तो थापे सदाय करवो त्यारे श्रीकृष्णे कए के तमें महोटा योधा बो पण तमारी थावी थाणी सांगततां यका एवु लागे जे के तमारे जीत, कतण थ पडो,तो पण पांमवो श्रीकृष्णनी बाझा लश्यु करवानें गया,पद्मनानें पण मदोदु सशकर जश्ने पांमवो साथै युद्ध कर्पु, त्यो नवितव्यताना वशथी पामको दारी गया ते वारें नासतां था सिंदनाद करो ते सांगली पांमवो दाना जाणी, एकलाज श्रीकृष्ण रथ उपर वेशीने पमनाननी सेनाने मथन करवा लाग्या त्यां धनुपना टकारवयीज पमनाननी सर्व सेना नाशी गश् श्रने पमनान पोते पण नाशिनें नगरमा घुसी गयो नगरना दरवाजा घंधकरी मूक्या, सेवारें श्रीकृष्णे नरसिंह रूप धारण करीने हाथल मारी श्रमरकका नगरीनो सर्व कोट जांजी नाल्यो, सर्व नगर घुजवा लाग्य, घणा महेल पडीगया, पमनान राजा श्री कृष्णजीर्नु एवं पराक्रम देखीने वीदीनो थको शेपदीने शरणे गयो थने कदेवा लाग्यो के दे सति । तुं महारी रक्षा कञ्च, शेपदी वोली दे कगाल में तुजने प्रथमचीज कहेल्ल दतु जे महारी पनवाडे श्रीकृष्णाविक घणा वलवत राजा वादार करनारा दे तो पण तें मान्यं न दी तेतो ठीक पण दर्वे जो तुं जीववानी चाहना राखतो होय तो स्त्रीनो वेश पदेरी मुखमा तृण लश् महारी पडवाडे घेसी रहे एटलु जो मदारु कसं करीश तो दु तुजने पगेलगाडी वश्य केमके श्रीकृष्ण सत्पुरुप जे तेनी बागल जे नमी जाय तेने मारे नदी माटे ताहारे जीवतो रहेवानो ए उपाय बे ते कम, पद्मनाने पण तेमज कम्खु, एटलामा श्रीकृष्ण पण थाव्या, त्यां जूये तो पमनान स्त्रीनुं रूप करी छोपदीनी पनवाडे घेतो , श्रीरुपणे झोपदीने प्रवधू के था कोण घेतो , शेपदीयें कडं पमनान राजा तमारा नयथी नाशिनें मदारे शरणे था

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पिर्स परदे
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व्यो ने एम कही पवियें पद्मनानने श्रीकृष्णने पगें लगाख्यो तेवारें श्रीकृष्ण तेना उपर क्या थाणी जीवतो राख्यो भने पमनानने कझुके थरे तु जाणतो नदतो जे आ झोपदीनी पडवा डे महोटा महोटा वादार करवा वाला ? पण मूल्ना माथामां जेवारें पडे ने तेवारें थक ज थावे , तो दवे तादारूं कार्यं कर्म तें नोगव्यु, शेपदीना प्रतापथी तु जीवतो रह्यो एवु कही थक्षम शीलवती एवी शेपदीने सश्ने पांच पांमव सदित श्रीकमजीपाला वल्या जयनो शरखपुरखो, एवा वखतमा ते खेत्रमा श्रीमुनिसुव्रत तीर्थकर पासें त्यांनो कपिल वासुदेव वखाण सानले बे, तेणे शखनाद सांजल्यो, मनमा शका उपनी जे कोइ बीजो वासुदेव उत्पन्न थयो' तेथी नगवतने पूघु के महाराज ' ए बीजो वासुदेव कोण थयो जे कॅरो महारो शख वजाव्यो नगवत वोल्या के हे कपिल ! एक खेत्रमा वे तीर्थकर आने वे वासुदेव, न थाय पण एतो ज बुद्दीप सर्वधि जरत क्षेत्रनो श्रीकृष्णनामें वासुदेव ताहारा सरखी दिनो धणी , ते पन नान राजा झोपदी वरण करी लाव्यो हतो,तेने लेवाने थाव्योहतो,ते पमनानने जीतीने पाडगे जाय डे,तेरों शखनाद करो,ते सांनजी तीर्थकरनी थाझा सश्ने कपिल वासुदेव तरत तिहाथी नीने पोताना सरखो वासुदेव जोवा सारु समुझ्ने कांवे थाव्यो, पण श्रीकृष्णतो दूर नीकली ग या,मात्र समुश्मा नीली, पानीरथनी ध्वजाउँदेखीने, शखनो शद करयो, तेमा एच जणाव्यु के हे मित्र थाप उना रहो हूँ तमोने मलवा सारूंथाष्यो बुमाटे एकवार पाबा थाहीं थावो, तमारा दर्शननी मने शनिलापा , एवो शखनो शद सांजलीने श्रीकृष्णे पण पाडो शख नो शब्द कसो तेमा भावीरीतें कहेता दवा के दे मित्र' अमे घणा समुनु मुलधन करी गया डे माटे पागा श्रवाशे नही तमे अमारा उपर रूपादृष्टि राखजो एबु कहीने चालता थया BARAMA पालथी कपिल वासुते जद, पगनानने कघु के था तादारी नगरीना गढ मढ कोट केम पिडीगया ? पमनाने कपुंके अहींधा जंबधीपना नरतक्षेत्रनो वासुदेव महारी राजधानी सेवा थाव्यो हतो तेनी साथै महोटु सुक्ष थर्पु तेणे ए गढादिक घोही नास्या , कपिलवासुदेवें कर्यु के अरे अन्यायी मदारी पासें तु जुतुं पोजे जे एम कही घणो निनबीने देशमाथी काढी मूक्यो थने तेना पुत्रने राज्यपाटे थापी कपिल पोताने स्थानकें गयो, पठी पीरुपण पोमचो सहित समुठलंघन करी पमिवोने कडेवा लाग्यो जे ई लवणाधिप सुस्थित देवने मलवा जार्य एटलार्मा तमे नावा लश् गगानदी उतरीने पनी एक जण सार्थे तरत नाव मोकजी वेजो पबी पमिव शेपदी सहित नाव संश् गगानदी उतना अने विचा के जोश्ये तो खरा जे कृष्णजी पोतें एकता गगानदी उतरी थावे के नथी श्रावता एम निरधार करीने नाव मोकली नदी, त्यां श्रीकृष्ण घणो वखत योन्या पण नाव श्रावी नही तेवारें मनमा जाएयुजे पांवो मुंखी गया देखाय एवु विचारी चार जा करीने एक दाथमा सारथी सदित रथ उपाख्यो, एक दायमां शस्त्र राज्या, एक दाथमा घोडाने पकच्या थने एक हाथथी गगा नदी तरवा लाग्या तिहां साडी वास योजन गंगानदी पोदोली ने तेनी मध्य नागमांजेवारें आष्या तेवारे श्रीकृष्ण घणा थाकी गया ते वस्वत गंगादेवीय सहाय थापीने मध्यमां वि कूर्वित थन कर्यु त्यो केटलोएक वखत विश्राम लश्ने वली पोतानी शुजाउँथी गगानदी त रीने तट उपर श्राव्या तिहाँ थागज थावीने ववे तो पांमवो नाव सहित वेग वेग इसे ठे, तेवारे श्रीकृष्ण रीश चढावीने पांमवोने पूबवा लागा के थरे उटो' तमें नाव पानी केम न मोकली ? पांमवो वोल्या, तमारी परीक्षा जोवाने न मोकली, तेवारें श्रीकृष्ण बोल्या के यरे में वे जाख योजन समुश्मघन करी पमनानथी तमे नागा तेने जीती शेपदी याणी थापी, तेवारेमारी शक्ति न दीठी जे दमणा महारु बजजोवा वेग ? एम कदी क्रोध चढावी ने पांचे पांमवोने मारवा सारु जोड्दम कपाच्यो, वली वया थावीने जाण्यु जे महोटो थ नर्थ थाशे' एम विचारी पांचे पांमवना रथ नांगी चूर्ण करना थने कार्यु के जाउ रे पापी दवे मदारी नजरे थावशो नही थने महारा देशमां पण रद्देशो नही एम कही पाचे वाध वने देशनिकाल करना थने जिहां रथ नांग्या, तिहां रथमईन कोट थयो, श्रीकृष्ण पोतानी सेना जर हारकामा गया थने पमिव पण झोपवीने लइ सेना सहित दस्तिनापुर थावी कुंता जीने देशनिकालनी वात कही, तेवारें कुंताजी हारकामा बावीश्रीकृष्णने मीठे वचनें सतोपी पामवोने वोलावी श्रीकृष्णने पगे जगाच्या पनी श्रीकृष्णे थाहा थापी के ज्यां में तमारा रथ नांग्या त्यां तमे पांमवरथनुपुर नगर वसावीने रहो पनी पांझवो त्या श्रीकृष्णजीनी सेवा करता थका रह्या देवट पांमुसेन नामें पोताना पुत्रने राज्य पाटें थापी पांच पांमव धने बही शेपदीयें दीक्षा लीधी, बह, श्रमादिक तप करी चौव पूर्व नणी ते पाचे पामव श्रीश Qजय तीर्थ ऊपर मोदे गया, बने शेपदी पण श्रगीधार श्रग जणी मासनी सखेपणा करी पांचमा ब्रह्मदेवलोकें गई तिहाथी चवी महाविदेहक्षेत्रे मोद पामशे ए रीतें जंन्छीपनो वासु विव, धातकीखममां न जाय, ते गयो ए पांचमु थोरं जाणवु वली केटलाएक श्राचार्य एम कहे जे के ये वासुदेव शस्वेशंख पण नेगो न थाय श्रने हा राखेशख मन्यो, माटे ए पण थशेरू जाणवु ॥ ६ ॥ ४ ॥ वे बधु थार्य कहे बे-मुगलिया मरण पामीने नरकें न जाय, थने थहीं हरि तथा दरिणी, ए वे युगलिया मरण पामीने नरके गया माटे 1920 ए अरूं थयुं तेनी कथा थामने के, जबुदीपमांना भरतक्षेत्रनेविपे कौशवी नगरीनो समुख नामें राजा इतो एकवा प्रस्तावें वसत स्तुयें ते राजा दाथीकपर बारूट पर नग रीनी नजीकना वनमा रमवाने थर्थे जतो दतो मार्गे जतां वीरकनामें कोलीनी वनमाजा नामे नार्या वस्पंत स्वरूपवती ते पोताना घणीने घणी वमन ले तेने देखीने मांदोमाहे सराग दृष्टियें जोतां प्रीतिनाव उत्पन्न थयो तेथी राजा त्यांथकी थागल नाय नहीं तेवारें सुमतिनामा प्रधान कव्वा लाम्यो के हे स्वामि' समस्त सौजन थायां उता तमें थागल केम चालता नथी ते सांगली राजा पोताना प्रधाननी जान थाणीथागल वनमा गयो पण शून्यचित्तथको मनमाहे केवल ते स्वीन चितवन तेथी क्या पण चेन पामतो नी ते जोश्ने प्रधानें बवू के हे महाराज! तमें थाज यावा शून्यचित्त केम देखाउदो' एम फरी फरी घणो थामद करी पुब्धायकी पोताना मननी सर्व वात राजायें प्रधानने कही ते सां नली प्रधान बोल्यो के तमें कांश चिंता करशो नहीं, ई तमने ए स्त्री मेलवी थापीश पठी घेर श्रावी प्रधानें यात्रेयिकानामें परिव्राजिकाने बोलावी सर्व वात समजावी वनमालानी पार्से मोकली, ते पण त्यां जजए ले तो वनमाला पण विरदविव्दलयकी मुखें निश्वास नाव ती कोक वेसे, कणेक ठवे, क्षणेक पडे, ए रीतें महाविरहिणी वेखी तेने ते परिव्राजिका केहेवा लागी के दे वत्से! तु बाज एम 5 खित केम देखाय ? ताहारु सुख मने कहे तो ते खथी तने पार उतारूं ते सांजली वनमालायें गुह्यनी वात कही तेवारें परिव्राजिका बोली के हुँ तने राजानी साये काले मेलवीश, तुं कांश चिता करीश नहीं, पनी ते परिवा जिका दर्पवतयकी त्याची जश् सर्व वात प्रधाननें कही प्रधानें जई राजाने सर्व वृत्तांत सन लामु तेवार पड़ी प्रनातें परिव्राजिका वनमालाने राजा पासें तेही श्रावी राजायें दर्षवत थइथत पुरमा तेने राखी थने तेनी सार्थे ते पंचविध विषयमुख जोगववा जाग्यो दवे वीरक कोली घेर थायो, तेवार तेणे स्त्रीने बीती नहीं पड़ी पाडोशी प्रमुखने तो थको जार्यांना विरदयी घेलो थयो थको श्रास्वा गाममा हे वनमाला हे वनमाला करतो फरतो फरतो एक दिवसें चोमासामा राजाना प्रासाद नीचें थावी नो रह्यो तेवामां राजा पण वनमालाने साथे त गोखमा थावी वेगे राजायें वीरककोलीने देखीने मनमा विचामुं जे में पापिप्टें पारकी स्त्रील जीधी ए अत्यंत लोक विरुद अनार्य कार्य कीर्छ माटे मने पि कार बे एम मनमा घणीज पोतानी निदा करवा लाम्यो थने वनमालायें पण विचामु जे में पापणीय स्नेव्वत जरतारने त्याग्यो ए मदारा विरदथी मंथिल थयो माटे मदारी शीगति याशे एम! बन्ने जण पचाताप करे ने तेवामा अकस्मात् उपरथी विजली पडी तेथी वेव जण शुन ध्याने मरण पामी दरिवर्प क्षेत्रे युगलिया पणे उपन्या त्यां समस्त मनोवांबित कल्पवृक्ष पूर्ण करे हे अने सुखें रहे पठी वीरक कोली पण ते बेगुनु मरण जाणी प्रथितनाव त्यागी, श्रज्ञान तपस्या करी सौधर्म देवलोकें किल्बिपिया देवमा जश् भपन्यो त्यो अवधिज्ञाने जो त्यारे जाप्पु के अरे मदारा पूर्वनवना वेरी तो युगजीया थया , ते त्यांथी मरण पा मीने वजी देवता थशे माटे ए देवता न थाय एवो उपाय करु एम विचारी ते युगलने त्याची उपा डीने चपानगरीमा श्वानुवशनो चमकीर्ति राजा थपत्रीयो मरण पाम्यो छे त्यां नगरनां लोक सर्व थापणो कोण राजा याशे एवी चिंतामा पख्या २ एटलामा ते देवतायें ते युगलीयाने लावीने नगरीना लोकोने सोंप्या धनें कK के ई तमारे माटे ए राजा लाव्यो जु, एने जेवारे, नूख जागशे तेवारे ए कल्पवृक्नां फल खाय , तेनी साधे मांस मेलवीने खवरावजो तथा थाहेहो करवा शीखावजो, देवतायें मनमा विधायूं जे ए मांस नक्षण करशे श्रने मांसना लोलुपी थाशे तेथी मरण पामीने नरके जाशे तो मदारूं वैर वलशे एम चितवी दरि श्रने हरिणी एबु तेनु नाम थापी देवता पोतानें स्थान गयो, लोकें पण देवताना कह्या प्रमाणे तेने मांस मदिरा खवराववा शीखष्यु तेथी ते मांसना लोलुपी थां,पढी ते दरिराजाना पुत्रा दिक जे थया तेनो स्यांधी हरिवश कुल कदेवाणो, ते दरिने दरिणी मरण पामी नरके गया एरीतें युगलीया नरकमां जाय नही ते गया माटे ए बढे धामर्य जाणवु ॥ ६ ॥ जो हवे सातमु अछरूं कहे ने था जरतक्षेत्रने विपे विनेजनामा सन्निवे एक पूरण नामा शेठ रहेतो दतो एक दिवसें पागली रात्र जाग्यो थको मुटुंय जागरण करता मनमा विचार उपज्यो के, महारा घरमा घएं धन परिवार ते में पूर्वला नवमां कोई सारी धर्मकरणी कीधी ने तेना योगयी दु संपदा पाम्यो दु माटे फरी दमणा पण काश्क धर्मकरूं तो वजी थागत पामीश, एम चितवी, प्रजातें स्वजनादिकने पूजी, पुत्रने कुटुंषनो नार सौंपी, पोते तापसी दीक्षा लश्ने एवो थनिमद करसो के जावडीव सुधी महारे बह बह एटले वे वे उपवासें पारणो करवो अने पारणाने दिवसें चारखूणानु पात्रु लग्ने निदा मागवी तेमा पढेक्षा खूणमा जे निदा मले ते जलचर जीवोने खवरावी देवी, पण मदारे खावी नदी तथा वीजा खूणामा जे निक्षा पढे ते पंखीउने खवरावी देवी तथा त्रीजा खूणार्मा जे निदा पडे ते थल्यागतने खवरावी देवी तथा चोथा खूणमा जे निक्षा पढे ते जजमा धोने मदारे पोते खावी एरीतें बार वरस पर्यत तपस्या करी मरण पामीने घमरचंचा राज्यधानीमा घमरेंपणे नुवनपति वेवोमा जश उपन्यो त्यो उपजताज अवधिज्ञानें करी जो तो सौधर्मेश्ना पग पोताना मस्तफ उपर दीवा तेथी महाक्रोध उपन्यो तेवारे सर्व सामानिक देवोने बोलावीने कयु के दे देवो' था कोण उष्ट माग पुरयनो धणी जे महारा मस्तकें पग वेश्ने वेतो , तेवारें देवो बोव्या हे खामी पूर्व जन्मने विपे सपादन करेला पुण्यें करी सर्वना करतांथतिशय समृद्धिथने पराक्रम जे जेनु एवो था सौधर्माधिप ने ए थनाविकालनी मर्याद वे माटे हा तमारे कोप न करवो तमारा सर खा २ पूर्व थगया तेना उपर पण एमज पग रहेता थाव्याचे माटे O म करो इत्याविक देवोये कडं तोपण चमरें को नसो थको बोल्यो के जेनी उपर सोधमै पग राखे एवा पूर्वे थयेला चमरेइते जूदा थने तु जूदो माटे त्या जइ सोधमैज्ने पग पकडी हेठो नाखू, एतु कही थायुधशालामा थावी, परशु शस्त्र दायमा लश्ने सौधर्मदेवलोके जावा लाग्यो तेवारें सर्व देवोये वयॊ तोपण को मान्यु नही, ते वखत सुसुमारपुरने विपे श्रीमहावीर प्रतिमा स्थित रह्या दता तेनु शरण सश्ने साखयोजननुं रूप विकू/ ब्रह्मांम फूटीपडे एवो शन्द करतो, पगथी धरती कंपावतो, दार्थे तालोटा देतो, मेघनी परें गौरव करतो,वीजलीनी पेरें जयकार करतो, ज्योतिष्यचकनें त्रास पमाडतो, देवताउँने जयांत करतो, देवी बीक पाम ती यकी देवोने गले वलगवा लागी एवा प्रकारनो कोलाहल करतो, परिघायुध फेरवतो, ग बकरी थंध थयो थको सौधर्मेऽ सादामो पायो त्यां पोतानो एक पग सौधर्मावतंसक विमान नी पद्मवर वेदिकाने विपे थने वीजो पग सोधर्मसनामा राख्यो तेवारे सर्व सौधर्मदेवलोकना पेवता नयनांत थइने श्हां तिहां नाशीगया चमरें बोल्यो थरे देवो तमारो ३६ क्या ? काली थमावास्यानो जन्म्यो मने बतावो तो हमणा फरसुथी मारी नाखू एतु देवताउँने क दीने मुखमायी थमिज्वाला काहाहतो थको, लावाहोत, कूवा सरखा गाल, खाम सरखा ना कना फोरणां, अनि सरखां नेत्र, सूपड़ा सरखा कान, कुसी सरखा दांत, गलामा सर्प हाथ मां वींीना घरेणा, क्पांकतो दरो वांधेला, क्यांकतो नोलीया घोह बांघेली, कालु रूप धा रण करेलु एवो देवी, देवदेवीय कोलाहल करो, ते कालाहल सनिलीने अवधिझाने जो पुं तेवारे जाए जे एतो चमरीयो बरघो घडो नरेलो सबले बे माटे दवे एने हुँ शिक्षा था पु एम विचारी, इजार देवताउँथी उपडी शके नदी एवं अग्निज्वाला करतुं देदीप्यमान वज चमरीया उपर मूक्युं ते पोतानी उपर थावतुं वेखीने चमरे पीक पामतो थको मायो नीचु थने पग ठचा फरेला एवो थको, त्यांची नागे तेना पाएक घरेणा पख्या, क्याएक पोतें पडतो थको नासवा मामयो पण खनावें घमरेनी नीचे थाववामां शक्ति घणी दोय यने वजने उंचु चहवामां शक्ति घणी दोय तेथी डेढें रही गयुं त्यारें चमरें पोताना लाख योजन वाला विकूर्वेला शरीरनो उपसंदार करी, “शरण शरण” एबुं बोली, कुंपुथा जेवो सूक्ष्म थइने श्रीमहावीरस्वामीना चरणनी वचमा प्रवेश करतो वो एवीरातें वज्जची मरतो घको श्रीमहावीरस्वामीने शरणे वेगे एटलामां शर्के जाए जे चमरीयानी एटली शक्ति न यी जे विना शरणे हा चास्यो श्रावे माटे निमेषी ए श्रीअरिहंतर्नु अथवा थरिदतनी प्रति मार्नु यथवा नावित थणगारनुं शरण लेने हा बाष्यो दशे' तो रखे थाशातना थाय नही ? एवं विघारी अवघिझाननो उपयोग थापी जोयुं तो श्रीमहावीरस्वामीनु शरण ले। श्राव्यो इतो ए० जाणी तत्काल वजनी पाउल श पण चाल्यो ते श्रीमहावीरस्वामीथी चार श्रगुल अप्राप्त थयेला वजनें पाई खेधी लीy कारणके महावीरस्वामीथी चार थांगुल टें वज परिभ्रमण करतु हसु पण तीर्थकरनी थाशातना टालवा माटे तीर्थकरनी पासें वज जाय नही एरीतें चमरेंड्ने श्रीमहावीरने शरणे थायो जाणी गेडी दीपो थने जगवानने कम्यु हे प्रनु महारो थपराध खमजो एवं कही लगारेक दूर जश्ने पगथी जमीकूटीने बोल्यो अरे चमर हवे श्रीवीरनगवाननी रुपायें तु महारोनय म राखजे एवं कही नगवानने वांदी तेमनी थाज्ञा लेश पोताने स्थानकें गयो, चमरे पण नाना प्रकारे जगवाननी स्तुति करी,वादीने पोता नी चमरचचा राजधानीय गयो, त्यां पोताना सिहासन पर उवास थ वेठो स्यारे सामा निक देवे थावी वधाव्यो भने कार्यु के शोच को करो बो तेवारें चमरेंई पोतानी वीतक वात सर्व फही यने कहुंके हे देवाणुप्रियो' ए सर्व श्रीवीरनगवाननो उपकार डे माटे वांदवाने चा लो एम कही सर्व देव देवीयोने लइ महोटी शदि सहित थावीने श्रीमहावीरने वांदी नाट क करी पोताने स्थानकें गयो एरीतें पातालवासी चमरें उचो सोधर्मदेवलोकें जाय नही ते था श्रवसर्पिणी कासें गयो माटे ए सातमु चमरोत्पात नामें श्रापर्य जाणवु ॥ ७॥ दवे थाग्मु थछेरु कहे जे थष्टापद पर्वत उपर सत्कट पांचशे धनुप थवगाहना वाला एक श्री रुपन देव पोतें श्रने जरत विना नवाएं जगवंतना पुत्र, तथा पाठ जरतना पुत्र मली एकसो ने पाठ पुरुष एक समयमा सिदि पाम्या, ते मध्य श्रवगाहना वाला सीफे पण मस्क ट थवगाहना वाला एक समयें एकसोने पाउन सीके, मात्र वेज सीफे अने हा एकसो था उ सिमा माटे ए धाउनु थवेरु जाणवु ॥ ॥ ॥ वे नवमुं अक्षेरु कहे जे श्रीमहावीर देव कोराबी नगरीयें समोसना, त्यां चश्मा थने सूर्य जेनां शाश्वता विमान, ज्योतिषचक मां ते तेज विमानमा वेसीने पश्चिम पोरसियें श्रीमहावीरने वांदवा सारु थाव्या, थर्दि था फोरएफ एवं कहे वे के उत्तर येक्रिय विमानमा वेशीने बाध्या, परंतु तेम न जाणवू ए मूलगें विमाने घेशीनेज वांदवा श्राव्या ते, मूलगें विमाने कोश्वारे न थावे अने हमणां श्राध्या माटे ए थछेरं जाणवु ॥ ए॥/ हवे वशमुं श्रसंयती, थारंनी, परिग्रवत, श्रब्रह्म चारी गृहस्थना वेपें रहेला, तेनी पूजा, सत्कार ते श्रसयतिपूजा नामें वशमुथछेरुबे, ते श्रा वी रीते के श्री सुविधिनाथना निर्वाण पड़ी केटलोक काल व्यतिक्रम्यानतर दुमावसर्पि पीना दोपने जीचे साधुऊनो विछेद थयो, सर्व साधुकाल करी गया कोसाधु रह्यो नदी, ते वारें लोक बोल्या दवे कोने पूजीये तेवा, रुपनदेवजीनी वारे श्रावक ब्राह्मण कहेवाता तेनो दाखनो त जे स्थविर श्रावक इता, तेनी पासें जश् लोको धर्म पूबा लाम्या ते पण जे जा एता दता, तेवु तेउने कदेवा लाग्या लोक पण तेमने धन वस्त्रादिक देवा लाम्या, तेथी तेज गर्वित थया थका पोतानां मन कम्पित नवीन शास्त्र वनावी कहेवा लाग्या के जे को पृथ्वी शय्या, मदिर, सुवर्ण, रूप, लोह, कपास, गाय, कन्या, थव श्रने गज, अमने आपे, ते थालोकें तथा परलोकें महा फल पामे थने अमेज सुपात्र बश्य एवो उपदेश सांजली लोके तेमने गुरु करी मान्या एवीथसयतीनी पूजा चाली एम केटजाएक काले तो वली साधुनो धर्मज विश्व गयो श्रने जैन विना पांखमी सन्यासी प्रमुख थन्य दर्शनीज पूजाववा लाग्या, प्रथम सदा सर्वदा सयतीनी पूजा यती दती तेथी विपरीतपणांयें करीने श्रीशीतलनाथजिननां तिर्थ घेसतां मु । घि याभर्य चाप्यु, हाजे साधु नहोय थने साधुपणे पूजाय ते थामर्य जाणवुतेमज श्रीतीर्थ करोतुं तीयविच्छेद नथाय ते विशेद थयो ते पण थामर्य जागर्नु ए वशमु थहरु जे ए रीत । ए वश थामर्य था चोवीशीमा ययां वली अनते काळे थशे ॥ १०॥ दवे दश बछेरा कया कया तीर्थकरनी वारे पयां ते कहे ने श्री रुपनदेवना वारामां एकशो ने थान सिह थया ॥१॥श्री शीतलनाथना वारामा हरिवश कुलनी उत्पत्ति थ ॥ २ ॥ श्री मनीनाथ ना वरवतमा स्त्री तीर्थकर थ॥ ३ ॥ श्री नेमिनाथना वखतमां अमरकंका नगरीये श्रीकृष्ण नुं गमन थयुं ॥ ॥ थने श्री सुविधिनाथना वारामा असयती ब्राह्मणोनी पूजा थइ ॥ ५॥ ए असंयतीनी पूजा तो श्रीयादिनाथना वखतमां पण मरीचि कपिलादिकनी सनिलि ये वेयें एम घणु करीने वीजा तीर्थकरोना वारामां पण प्रवाहें थाय ने ॥ ॥ श्रने पांच बछेरां श्री महावीर स्वामीने वारें थर्या ॥ १० ॥ ॥ इति श्रष्ठेरा अधिकार सपूर्ण ॥ ॥ दवे इश महाराज विचारे डे के नगवान श्रीमहावीर स्वामी मादणकुंम नगरें रुपनदत्त ब्राह्मणनी नार्या देवानदानी कूखमा उपन्या ए श्राश्चर्य यां, जे माटे तीर्थकर, चक्रवर्ती, वलदेव अने वासुदेव एमनो जो नीचगोत्रकर्मक्षय न थयो होय, वेद्यो न दोय, नियो नहोय, ते कर्म उदय थावे तेना उदयें करीने श्रीअरिहंत, चक्रवर्ती वलदेव थने वासुदेव ते पण थंतप्रात तुप दरिड़ी प्रमुख कुलमा थाव्या, आवे थने यावशे कूरखने विपे गर्नपणे उपन्या , पजे ने बनें उपजशे पण जे योनी मारगे जन्म पणे निकलq ते को निकल्या पण नथी निकलता पण नथीथने निकलशे पण नदी एटले जन्म्या पण नथी, ज न्मता पण नथीथने जन्मशे पण नही ॥१॥ ॥एवीरीत ने पण ए नगवान श्रीमहावीरस्वामी, मादणकुमनगरमा रुपनदत्त ब्राह्मणनी नार्या देवानदा तेनी कूखमा थाष्या ॥ २०॥ तो दवे महारो ए श्राचार के जे वखते जे दोय ते २ ते वखतें थरिदंत, चक्रवर्ति, बलदेव, वासुदेव ए जो थतप्रांत तुष्ठ वरिछी प्रमुख यावत् ब्राह्मणना कुलोमां थावी उपन्या दोय तो तेने यंतप्रांताविक नीच कुजोमाथी लश्ने, उग्र, जोग, राजन्य,क्षत्री, हरिवश इत्यादिक उत्तम कुलोमा संहावे, ए कुनोमा लावी मूके, नीच कुलमा जनम थवा थापे नही, ए सर्वत्रणे कालना जे होय तेमनी मर्याद ले तो निमें 8 पण नगवान श्रीमहावीरस्वामीने देवानदा ब्राह्मणीनी कूखमाथी जश्ने न्यातक्षत्री, जात सिदार्थक्षत्री, तेमनो काश्यप गोत्र, तेनी नार्या त्रिशला क्षत्रीयाणीनी कूखमा गर्नपणे मूक, एतु तेमना नाम्य प्रमाणे विधारीने महाराज, हरणीगमेपी नामा देव जे पायदल कटकनो मालेक वे तेने वोलावीने एवीरीतें कहूं ॥२१॥ के निमें है देवाणुप्रिया' था वात यश् नथी,याती नथी ने थासे पण नही जे श्रीथरिदंताविक शिलाका पुरुपो ले ते यंतप्रांतादिक नीचकुजोमा थाव्या, थावे धने पावशे ॥ २५ ॥ अने जो कोइ नीचकुलमा यावेतो ते, लोकोमा श्रछेरो कदेवाय, थनता सत्सर्पिणी अवस पिणी कालयी जो कोई अरिहंतादिकोनो नीचगोत्रकर्मनो क्ष्य न थयो दोय, वेगुं नोगव्युं न होय ते उदय थावे तो श्रीअरिहंतादिक नीचकुलमा आवे खरा पण तेनो ते नीचकुलमा यो नि मार्ग जन्म नथाय ॥ २३ बने ए नगवान श्रीमहावीरस्वामी, जवछीपना नरतक्षेत्रमा ब्राह्मणकुंमगामे रुपनवत्तवाह्मणनी नार्या देवानदा ब्राह्मणीनी कूखमा उपन्या ॥ २५ ॥ तो थतीत, यनागत थने वर्तमान ए रोकालें जेवारे जे दोय तेनो ए थाचार जे जे श्री थरिहंतादिक जो नीचकुलमा थावी उपजे तो तेने उमाविक ढंच कुलोा जश् मूकवु ॥२५॥ तेमाटे दे देवाणुप्रिया' तमे जाउ ते जगवान श्रीमहावीर स्वामीनें ब्राह्मणकुमगाम नगरने विपे रुपनवत्त ब्राझनीनार्या देवानदानी कूखमाथी लग्ने, क्षत्रीयकुंम नगरने विपे सिमा थक्षत्री राजा तेनी नार्या त्रिशला कृप्रियाणी के तेनी कूखमा गर्न पणे जर मूको थने त्रिशला क्षत्रियाणीनोजे गर्न वे ते वेवानवा ब्राह्मणीनी कूखमा मूको था महारी थाझा तत्का ल करीने पानी सोंपो अर्थात् ए काम करीने पार्नु मने श्रावी कहो के जे थापे फरमास करी ते काम हु करी थाप्यो ढुं एवं कहो ॥ १६ ॥ ॥ इहां कोई प्रश्न करेके श्महाराजनें एज विचार केम उपन्यो जे देवानदानी कूखमाथी थपदरीने त्रिशलाराणीनी कूखमा सक्रम ण कराववो केमके ते वखतमा वीजा पण श्रेणिक प्रमुख मदोटा महोटा राजा दता तेमने तो सनाया नही थने ए सिदार्थ तो सामान्य राजा दतो तेने याव कसो तेनु छ कारण दो एनो उत्तर एम जे जे सड सद्गुना पोत पोतानां नाग्य प्रमाणे देवोने पण करवानी बुद्धि उप जे , कर्मथी अपरांत करवानी शक्ति देवोमां पण नथी हां पण पूर्वला नवमा त्रिशलारा णीनो जीव राणी इतो थने देवानवानो जीव जेठाणी दतो वन्ने एक घरमा रहेती दती, परंतु कपाय महा वजवान ने जो जीव रुड करवानी चादना करे तो कपाय मातु करी थापे दवे लोनना वशथी जेगणीयें देराणीनो रत्नकरंमीयो चोरी जीधो वेरापीयें सनाल्यो पण लाधो नहीं तेवारे थे जणीयोने घरनी माहोमांहे घणाघणी बोलाचाली थइ तोपण जेवाणी करमीयो थाप्यो नही तेना प्रनावथी कर्म बधाएं ते कर्म देवानदानें उदय थाव्यो, त्रिशला नी देवादार दती तेथी ने पण एवोज विचार स्वानाविक पणे थावीगयो जे त्रिशलारापी नेज पुत्र रत्न देवरावं तेमाटे हे नष्य प्राणीयो तमे जूठ के जे जीव जेई गुनाएन करशे ते जीवने ते, धनामुन मलशे ए उत्तर कहेवू हां कवापि कोइ अन्यदर्शनी पूढे के ए नगवानने गर्नमा जे थाघो पाटो कस्यो ते तमे वीगे तो नथी तेवारें थमे केम मान्य करीये' एवो प्रश्न करे तेने कहेतु के तमारा मतमां पण नागवतना दसमस्कंधना वीजा अध्यने वलदेवनु परावर्न थप वे वली पुराणने विपे पण पुरुपोने गर्न उत्पन्न थया में ते देवताय काढघा ए उपर मांधाता राजानी कथा कहे -विशाला नगरीय वनराजा महाधनवान डे परंतु ते थपुत्रीयो वे माटे पुत्र थवा सारु शोलशे स्त्री परयो तो पण तेने पुत्र थयो नही तेथी ते राजा घणो चिंतातुर थयो जेमाटे शास्त्रमा कां वे के "थपुत्रस्यगति स्ति, स्वगौनेवचनैवच ॥ तस्मात्पुत्रमुखदृष्ट्वा, स्वर्गगतिमानवा ॥ १ ॥ ॥ श्रपुत्रियाने गति न होय ते थवगतियो थाय तेवारे ते राजायें कोकना उपवेशथी थहाशी हजार तापस रुपियोने नोतरीने नोजन कराव्युं तेंत्रीशकोड देवता थाराध्या, तथापि कोश्मा पुत्र बापवानी सकि न वीठी तेवारें अध्याशी हजार रुपियोने पूघु जे स्वामी तमें पेटज जरी जाणो ठो पण मदारूं काम करता नथी एवु राजानुं वोलवु सांजली एक तापस योज्यो जे दे राजन् । ताहारे पुत्र थाय एवो उपाय ढुं जाणु , हूँ सुजने सोनाना कचोलामा पाणी मत्रीने थापु ते पाणी तादारी स्त्रीने पीवरावजे तेथी तादारे पुत्र थाशे पढी राजा पाणी मत्रावीने कचोलो नरी घेर लश्श्राव्यो एटलामा तो सर्व राणीयोये पुत्र सबंधी वात साननीने प्रत्येक जुदीदी राणी राजाने कडेवा लागीके पाणी थमने थापो एम मांदोमांहे नेश थवा जाग्यो, राजायें विचा जे हवे ई कोने पाणी बापु थने कोने न थापु एम चितवी कोइने पाणी थाप्यं नही पड़ी ते कचोखं लेइ वस्त्रे दांकी पाणीयारा उपर राखीने राजा पोताने श्रावासें थावी सूइ रह्यो एटलामा रात्रीय राजाने तृपा लागी त्यारे पाणी मगाववा सारुं पासे कोई माणस हतो नही पण एक दासी तेनी शय्या पासे सूतीहती तेने कहूं के यरे वासी तृपा लागी माटे पाणी सश्याव ते दासीयें जश्मंप्रेलु कचोखं पाणीनुं नरेलु दतु ते पाणी आप्यु राजायें पण थजाणतां पी, ते पाणीना प्रनावथी राजाय गर्न धारण कस्यो दिवसें दिवसें पेट वधतुं गर्यु तेथी राजा ललायमान थयो यको सनामां पण थावे नदी, प्रधाने विचारोजे ए घणु खोदुं काम थयुं पनी राजाने कही पाना अशी दजार रुपीउँने नोतसा थने उक्नो दीघोजे तमे या कम्युं' दवे करार करो पनी पीयें तेत्रीश कोटी देवतानु थाराधनकर्पु तेवा रें इंश्रावी पोताना सेवकोने हाथे राजार्नु उदर विदारीने मांडेथी गर्न काढयो तेवारे सर्वे बोल्या जे एधाची शकशे नही पनी इ३ स्त्रीन रूप करी धवराव्यो क्रमेकमे वधवा लाग्यो तेनुमांधता एवं| नाम दीधु इत्याविथनेक वार्ता ने माटेगर्न पण परावर्तन थाय ने ए वात नि सवेद इति मांधा, तादृष्टांत ॥ हवे ई हुकुम करना पड़ी हरणीगमेपी देवता पालाकटकनो मालेक ते खुशीयश्ने हाथजोडीने मस्तकें र्थजली करीने याज्ञाने विनय सहित प्रमाण करीने महाराजनीषा सेयी निकलीने ते हरणीगमेपी सत्तरपूर्वनी वचमानी शानखुरामा बावीने वेक्रियसमुद्धात करे ते केवीरीते तोके पोताना जीवना प्रदेश शरीरमाथी बाहेर कादाडीने समुद्धात करे स ख्याता योजननो उंचो दमकरे, जीव प्रवेश कर्मपुजलनो समूद दमरूप करीने प्रगट करे ते दम रनमय करे ते रत्न केवी जातिउंना दोय ते कहे जे १ कर्केतनरम, ५ वैमुर्यनीलरन, ३ व जरत्न, ध लोहिताक्षरन, ५ मसारगलरत्न, ६ इंसगर्नरन, ७ पुलकरन, ७ सौगंधिकरन्न, ए ज्योति साररन, १० अंजनरत्न, १९ थंजनपुलकरत्न, १२ जातरूपरत्न, १३ सुनगरत्न, १४थ करत्न, १५ स्फाटिकरन, १५ थरिष्ठरत्न, ए शोल जातिनां रत्न तेना असार पुगलने गंमीने सार पुगस ग्रहण करे ॥ २४ ॥ करीने उत्तर वेकिय धारण करे, मूलरूप तिहांहिंज राखे, न तु रूप करीने, मनुष्यलोकमा थावे, केवीगतिथी मनुष्यलोका थावे ते कहेले एक चमा, वी जी चपला, त्रीजी जयणा थने चोधी वेगा ए चारगतियें करीने चालतां तो केटलोएक काल वीतीनाय तोपण मनुष्यलोकमा थावी शके नही' ते चारगतिनुं प्रमाण कदेठे २७३५० एटले ये जास्व प्रियाशीहजार पांचशेने एशीयोजन बने एक योजनना सात जाग करीये तेवा नाग सुपर एटला क्षेत्र एक मगलु जरतो धावे ते प्रथम चंमा गति प्रमाण जाणषु तथा ५७२५३३ एटले चारलाख बहोतेर हजार बशेने तेंत्रीश योजन थने त्रीश कसा उपर एटला क्षेत्रनं एक मगलु जस्तो चाले ते बोजी चपजागतिर्नु मान जाणतुं तथा १८१६७६ एटस्ने उ तास्व एकसत हजार बशे बघाशी योजन थने चोपन काला अपर एटजा क्षेत्र एक मगर्नु जरतो घाले ते त्रीजी जयणागतिर्नु मान जाणवू तथा ७५०७४0 एटले थात लाख पचास हजार सातसे चालीश पोजन बने श्रदार कला उपर एटला खेत्रन एक मगर्नु जरतो चाले ते चोथी वेगागतिनु मान जाणवू ए चार गतिना प्रमाण कहां दवे ए गतियोना प्रमाणपी जो देवता घाले तो उ मदीना सुधीमां पण या मनुष्य क्षेत्रर्मा यावी शके नदी तेमादे विष्य देवगतियें करी असंख्याता हीप समुत्रम्मघन करतो घको जिहां जबछीपर्नु जरतक्षेत्र तिहा ब्राह्मणकुंम गाम नगर तेमा पत्नवत्त ब्राह्मणनो घर तेमा जिदां देवानवा ब्राह्मणी सुती ने तिहां श्राव्यो, थावीने नगवानने देखी प्रणाम करीने, देवा नदा ब्राह्मणीना सर्व परिवारने थवस्वापिनी निश देने शगुन पुजल दूर करीने छन पुजल (पालीने) प्रक्षेप करीनें कहेतो दवो के दे नगवन् थाज्ञा आपो एवु कहीने,नगवानने पीडा रहित देवनावे करीने हाथमां ग्रहण करी करसंपुटमा जश्ने, जिर्दा कृत्रियळूम नगर त्या सि सार्थ कृत्रिय राजाना घरमा जिदा त्रिशला कृत्रियाशी ले तिहां यानीने तेना सर्व परिवारने

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...
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गमे
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विशमा राणी सूता

थवस्तापिनी निश थापीने शगुन पुगल बाहेर कादाडीने शुनपुगल प्रक्षेपीने नगवाननें पीडा रदित त्रिशलाराणीनी कूखमा मूक्या दशमाहारथी देवे प्रवेश करो थने नानिथी पागे नि कल्यो एवु वृक्षवाक्य डे पनी त्रिंशलाना गर्नमां पुत्री दती तेने त्यांची लग्ने देवानदानी कूखमा गर्नपणे मूकीने जे विशाथी देवता थाप्यो हतो ते विशाये पारो चाल्यो गयो ॥ २८ ॥ तिहा चंमा चपलाविक चारगतिथी अधिक दिव्य देवगतियें करीने तीथिसंख्याता हीप समुश्मांधी यश्ने लाखयोजनना प्रमाणवाला शरीर सरखा पग मूकतो थको उचो जिदा सौधर्म देवलोकमा सौधर्मावतंसक नामे विमान वे तथा शक्रसिहासन ने थने जिहा शश्नामे देवताउँनो राजा ने तिहां श्राव्यो बावीने शघ्ने पानी थाज्ञा सोंपी अर्थात् एम कथुके तमे का ते सर्व काम करी थाव्योतुं ॥ २५ ॥ ते कालने विपेते समयने विषे, श्रमणजगवत श्रीमहावीरस्वामीने वर्षा काजनो त्रीनो महीनो पांचमु पखवादियुं थासु वदि तेरशने दिवसें व्याशीमी रात बीतीग थने त्र्याशीमी रातना वर्तमानमा पोताना दितने जीघे अथवा जगवाननी अनुकंपाने लीघे ई मोकलेला दरणीगमेपी देवता तेणे ब्राह्मणकुमगाम नगरमा रुपनदत्तब्राह्मणनी नार्या देवानदा ब्राह्मणी तेनी कूखमाथी सश्ने जिहां कृत्रियकुंम गामनगरे सिदार्थक्षत्रिय राजा नी त्रिशला कृत्रियाणी राणी ने नेनी कूखे मध्यरात्रिनेविपे उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रां चश्मानो योग श्रायां थको पीडा रहित मूक्या ॥ ३० ॥ ते कालने विपे ते समयने विपे नगवान त्रणझान सहित श्रावी उपन्या तिदा मुजने हाथी संदरण करशे एवं जाणे पण सदरणनी वेला सूक्ष्म माटे ते जाणे नही थने सहरण कसा पढ़ी जाणे जे मने संहरण को एवं जाणे जे रात्रिमा श्रमणनगवत श्रीमहावीर सामीने देवानवानी कूखथी जश्ने त्रि शला क्षत्रियाणीनी कूखमा गर्नपरों मूक्या ते रात्रिये देवानदा ब्रह्मणी पोतानी सुकोमल शय्या मां सूति कांक जागतीने सुपनु थाव्यु के महारा जे महामगलकारी चौद स्वमा हता ते त्रिशलादतियाणी खेची लीघां एटले दरणकम्मा एवु सुपनु देखीने जागी ॥३१॥ ॥ जे रात्रिमा श्रमणनगवत श्रीमहावीरस्वामीने देवानदानी कूखमाथी जश्ने त्रिशलाक्षत्रियाणी वा सिष्ट गोतवाली तेनी कुखमा मूक्या ते रात्रिमा त्रिशला क्षत्रियाणी शय्यामां सूती हती ते शय्यानु स्वरूप थावीरीतें कसु ने तिहां प्रथमतो जेनुं स्वरूप कहेवामा थावे नही एq तो वस वार्नु घर ले ते घर कहे तोक ते घरनी मध्य एटले नींतनीमानी बाजु चित्र चित्रित नेथने नीतनी बाहेरनी वाजुने घसीने धोली चलकावार करी एतु ते घर के जिहां उपरनो नाग चित्राम सहित ने थने जमीननो नाग तो जेवोमणिरमोनो न्योत होय तेवो वे तेथी ते घरा सर्व थ धकारनो नाश थगयो , श्रने नित्य मुयोत रहे वली जेने विपे जमीन पर थनेक मामला मामघा ने एतु थागणु ने वली धागणे सरस सुगधि पांच वर्णना झलनां पुज मूकेला ते ते फूलोनी रचना सहित वे तथा रुष्णागर जलो कुंवरु शिलारस तेनो धूप तेणे घमघमायमान ठे तेणे करी मनोहर ने मुगध प्रधान चूर्णनो गप जिदा, गंधवट्ठी समान ने तिहा पुण्यवतने योग्य जेनु वर्णन करवामां न थावे एवी शय्या ने तेने विपे शरीर प्रमाणे घे पासें उशीसा तकीया राख्या ठे, ने पासे गालमसूरीयां मूकेला ने, वे पासें उची ठे,मध्यमा उमी ,जेम गगानदीनी रेतिमा पग मूकीये ते नीचो जाय तेमजेमां पग मूकता नीचो जाय ते समान नीखाखा बतल सना पटकूल व ते खाट ढाकी, नजी मछरदानीय रचित, रजरास्ववाना वस्त्र लाल रम पीक सुकोमन वस्त्रे दांकी , थाकहानां फल माहेलो कपास तथा माखण ते सरखो ते श

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पन
HARITMALTIM

ग्यानो स्पर्श , नखं मुगधित चूर्ण तथा फूलो जेने विपे विवायां , एवी शय्या ते शय्याने विपे मध्यरात्रिना अवसरमां त्रिशलाक्षत्रियाणी थम्पनिमा सुती ३ ते वेलायें गजसपनाविक चौद सपना देखीने जागी ॥३॥ ॥ तेवारे ते त्रिशलाकृतियाणी ते चौद स्वप्नामाथी पहेले स्वपने हाथी देखे ते दाथी कदेवो तो केचार दांत वालो बे, घणो वैचो बे, जेवा मेघ नां वाटा धोला थाय तेवो धोलो , तथा जेवो मोतीनोहार, क्षीरसमुश्च पाणी, चश्माना किरणो, पाणीना कणीयां, बने रुपानो पर्वत एना सरखो धोलो , वली ते हाथीनाकुन स्थलमाथी मद करे ने तेथी तेना कपोल पासें जमरा गुंजारव करी रह्या ने, ना ऐरावत सरखो महोटो देखाय , ते हाथी मेघनी पेरें गंजीर शब्दें गाजतो थको ने, कुन उत्तम सर्व लक्षणे करी सहित, महोटा पेट वालो एवो हाथी पहेले स्वप्ने त्रिशलाक्षत्रियाणीयें दीगे ॥ ॥ १ ॥ २३ ॥ ॥ तेवार पढी वीजे स्वप्ने त्रिशलाक्षत्रियाणी पन देखे ते पन कहेवो में तोके धोला कमलना समूह सरखो श्वेत , तथा पोताना शरीरनी कांतियें करी सर्वविशा उमा उद्योत करतो थको , तथा घणी शोनाना समूदे करी शोनित एवी स्वांधानी थूनि ने जेनी एवो वे वत्ती तेना शरीरमा पातला केश ने ते केश जाणे तेलें चोपब्धा दोयनदि ? एवा , घणो रुडो स्थिर शरीर बे, वली जिहां जेतुं श्रग जोश्ये त्यां तेवु अंग , जेनुं एटले जिहां पातलु श्रग शोने तिदा पातलु डे थने जिहां जाई श्रग शोने तिदा जा९ थंग में तथा दृढ गोल शोजायमान मलरहित तैलादिकें चोपख्या तीखां एवा वे सींगडा जे जेनां तथा मोती सरखा उजला बरोबर सरखा शोनता दांत के जेना एवो पन ते जाणीयें थनेक मगलनुज मुख होय नदि ? तेने वीजा स्वमामा त्रिशलायें दीगे ॥२॥३॥ ॥तेवार पली जीजा स्वप्नामा त्रिशला राणी सिड्ने देखे ते सिद्द कहेबो ने तोके ? मोतीनोहार, वीरसमुन पाणी, चंडमाना फिरण, पाणीना कणीया, तथा रूपानो पर्वत तेना सरखो धोखं शरीर में जेनुं वली त सिह रमणीक देखया योग्य डे, तथा दृढ रे हाथ प्रमुखना अवयव जेना, वली व वल गोल थने तीक्षण एवी जेना मुखमा वादा तेणे करी मुख शोनतुं ने जेनु, वली कमल सरखा सुकोमज राता एवा जेना दोउ ठे, राता कमलना पत्रनी परें सुकोमल तालबुं है, जान बाहेर काढाडतो थको लपलपायमान करतो यको शोने , वली पीला थने वीज ली सरवा चलकता चचल जेनां नेत्र , वली विस्तीर्ण पुष्ट थने माता एवा साथल जे जेना, स्कंघ जेर्नु दृढ प्ररिपूर्ण निर्मल डे, वली सुकोमल वे जला विस्तीर्ण एवां जे सिंदकेसरा हो सरा एटचे मुखना केश जाणवा तेने थाटोपे करी शोनित चे मुख जेनु, वली जमीन सुपर पनीने फटकारीने वेचु कडं ने पुल जेणे एवा बहानो अंत एटले डेडो काननी वचमा वली सौम्याकारवालो लीला करतो थको श्राकाशमाथी सतरतो थको त्रिशलाना मुख मा पेसतो थको तीण नखवालो सिद त्रिशलायें त्रीजा स्वप्नार्मा दीनो ॥२॥३५॥ ॥ ते वार पठी चोया स्वप्नामां प्रिशलाक्षत्रीयाणी सपूर्ण पूर्णिमाना चश्मा सरखं डे मुख जेयूँ एवी लक्ष्मीदेवताने देखे ते लक्ष्मी किहा रहेने ते कड़े ने मुंचो हिमाचल पर्वत तेनी कपर एक पद्मश्द ते इदा एक कमल ने तिहा रहेवा वाली लका देवता तेनो पगथी लश्ने सर्व अगनी शोनानु वर्णन श्रीनश्याद्स्वामी करे ने केमके प्रायें देवताना रूप वर्णनमां पगोथी वर्णन कर बरे माटेमारी पण पगोपी मामीने वर्णन करे ने, ते सनीदेवीना पग नाजे प्रकारे कर मागणे मानने से रैम्पा मोस सरित पपा पचर्मा पति उंचाप

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बीजेलने सिह
ोये
खलीदेवता

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पठवाडे नम्या एवा ने तथा त्रांवा सरखा नस्व , कमल सरवा कोमल थांगला ने तथा पिमित केल सरस्वी गोल के नीचेनीचे पातलीश्रने उपरउपर जाडी एवी जंघार्पिमियो ने तथा गुमा मांसपी नेरेजा ने माटे गुप्त ने दाड देखाय नही तथा ऐरावत हाथीना सरस्वो जं घानो वचलो प्रवेश सोने ने, सोनानी कटिमेखला ले केडमा जेनी, वली लक्ष्मीदेवीनी मूटी थी लश्ने सन संधी रोमराजी , प्रायें स्त्रीयोना शरीरमा रोमराजी होती नयी तेमां वली देवत्ताने तो सर्वया नहीज होय तोपण कवीश्वर श्रृंगाररस वर्णन करतो वोले , हवे ते रो मराजी कड़वी ने तोके कहलनीपेरे तथा जमरानी श्रेणीनी पेरे श्याम बे, मेघघटा सरखी काली , सरत मलेला थका सुकोमल, मनोहार विनास सहित सरस सूका फूल सरखा को मल , वली नानिममल नलु ने जेनें, मुष्टीमां समाइ जाप एवी कटि बे, पेटमा त्रण सल पख्या तेथी शोनाये मान , वजी सीगोपागमा घरेणा थानूषण पहेरेला जे जेने ते घ रेणा कडेवां ने तोके अनेक प्रकारना मणियोंयें करी जलाने, रत्नोयें फरी सोनामा मढ्या ने, वती स्वयमा वे स्तन बे ते जाणे सोनाना कतरा ज दोय नदि' एवा ने, वजी ते स्तन करी तथा कुंदमालायें करी व्याप्त में तथा ना मोतीयोनां जालीयां तेणेकरी विराज मान सोनेयानी माला फ्पाएक मणिसूत्रनो दोरो तेणेकरी कत शोजायमान बे, वे कानोमाकुं कल वे शोने दे, एवा घरेणाना समुदायथी लक्ष्मी देवतार्नु मुख शोने के, जेम राजा फुटुवधी शोने से तेम लक्ष्मीदेवीनु मुख घरेणाथी सोने ले वली निर्मज कमजनी पाखडी सरखा दीर्घ तीखां थने अणीपाला एवा महोटा नेत्र जेनां वे दायमा कमल बे तेमांची पाणी बटकावती थकी, वली जीलाने वास्ते दायमां कमलवींजणो घरेलो , ते जेवारें कमल लीलाने सारु हतारे तेवार कमलमाथी मुगध नीकले वली लक्ष्मीदेवीने मस्तके वेणीदम घणो निर्मल जखो कालो वे लोबो केड सुधी शोने के एवी के ए नखथी मामीने माथानी वेणीसुध। वर्णन कस्यु एवी लक्ष्मीदेवता पद्मश्दना कमलमा वसती हिमाचजनामा पर्वत उपर वेठी थकी दशदिशाथी शोनायमान वली हाथी थावी सूढमा पद्मश्दथी जल नरीने लक्ष्मीदेवीने स्नान करावे एवी लक्ष्मीदेवताने त्रिशलाक्षत्रियाणीय चोथा वनमा दीती॥ दवे हिमाचल पर्वत उपर लक्ष्मी देवता नो निवास ने तिहां ए देवीनो परिवार केटलुं वे तथा निवास केवा प्रकारनो ने ते कहे जे था नरतखेनना व खम तेना थता उत्तर दिशा तरफ एक चुलहिमवत पर्वत सोनानो ने ते एकसो योजन उचो , तथा एक हजार पावन योजन थने वार कला अपर, एटलो पोहोलो , तेमध्यें पद्मद वे, ते दश योजन उमो, दनार योजन लांवो, पांचशे योजन पोहोजो ने संपूरण जलेकरी नमो शाश्वतो, तेनु तली वजरत्नमय दे, चोफेर पण वज्जमय बे, ते हृवना मध्यनागें एक कमल ठे, ते कमलन नाल दश योजननु दीर्घ , जलयी उपर वे कोश हचु , एक योजन पोहोलु, एक योजन दीर्घ , काश्क जाजेरात्रण योजननी परिधी , वश योजन पाणीमां नाल , तेनु वज रनमय मूल के, रिष्ट रत्नमय मूलनो कांदो डे, नील रनमय नाल , राता सुवर्णमय वादेरना पावडा ठे,कांक जांबूनद सुवर्णमय थन्यंतरनां पावहां , तेमा सुर्वणमय कर्णिका , एटम्ने वचली मोमी ,ते ये कोश पोहोलीथने एक कोश उची डे, तिदा रातां सोनाना केसरां ते कर्णिकामां श्री लक्ष्मी देवीन नवन ,ते एक कोश लांबु, थर्यो कोश पोहोलु यने चदशे चालीश धनुप चंचु ,ते घरनां वारणां पूर्व,दक्षिण श्रने उत्तर एवी प्रण दिशायें , ते वारणां पांचों घनुप उर्चा थने श्रदीशे धनुप पोहोजो ने, वत्ती ते घरमा अढीशे धनुप प्रमाण एक मणिमय पीविका , ते पीठिका उपर नकली देवीनी शय्या , हवे तिहाँ ए देवीना मुख्य कमजनी पांखडियें लक्ष्मी देवीने थानरणादिक मूकवानां वलयाकारें। एकशो ने थान कमलो बे, ते कमलोन सर्व उच नीचपण मुख्य कमलथी थई प्रमाणे जा एवु ए एकसोने घाउ कमलें करी ते मूल कमल वींटेलु , जेम गर्ने करी नगरी विंटायेली दोय , तेम जाणवू, दवे ते मूलगा कमलना बीजा वलयनी पूर्व दिशायें महार्दिक चार देवीने वसवानां चार कमल , तथा वाम कोण, उत्तर दिशा, थने ईशानकोण, एत्रणे विशायें देवीना सामानिक देवताने वसवानां चार दजार कमल डे, तथा श्री देवीनी बन्पतर पर्पवाना जे घाव हजार गुरुस्थानीय देवता , तेने वसवानां थाउ हजार कमल, अग्नि कोणें , तथा मध्य पर्पदाना वश हजार मित्र स्थानीय देवताने वसवानां वश हजार कम ल, दक्षिण दिशायें , तया श्री देवीना बाह्य पर्षदाना किंकर स्थानीय वार इजार देवताने वसवानां वार दजार कमल, नैरुत कोणें , थने श्रीदेवीना हाथी, घोडा, रथ, पायक, म दिप, नाट्य, गंधर्व ए सात कटकना स्वामीने रदेवानां सात कमल, पश्चिम दिशायें ले दवे वली लक्ष्मी देवीना थगरक्षक शोत हजार देवताने वसवाना शोल हजार कमल, ते त्रीजा वलयनी चार विशामांदेली प्रत्येक दिशाने विपे चार चार हजार कमल करता शोल हजार कमल , तथा चोथा वलयने विषे श्री देवीना थन्यंतर शानियोगिक बत्रीश लाव देवताने वसवाना यत्राश लाख कमल , तथा पांचां वलयने विपे श्री देवीना मध्यम चालीश लाख थानियोगिक देवतानां चालीश लाख कमल बे, तथा बा वलयने विपे श्री देवीना थडतालीश लास्व वाह्य धानियोगिक देवतानां श्रडतालीश लाख कमल , एव मूल कमल सहित सर्व मली उ वलयनों एक कोड, वीश लाख, पञ्चाश हजार, एकसो ने, वीश कमल जाणवां ते कमलना मान मुख्य कमलथी मामी थनुक्रमें थर्ड थर्ड प्रमाण लेवा ए सर्व कमलवासी देवता श्रीदेवीनो परिवार जाणवो ए देवी नवनपति माहेती जा। एवी ॥ ए चोएं स्वप्नु कयुं ॥ ४ ॥ ३९ ॥ इहां बीजो वखाण सपूर्ण थयो ॥ ३ ॥ हवे त्रीजो वखाण कहे जे तेवारपनी वली त्रिशलाराणी पांचा स्वप्नमा फूलोनी माला देखे ते मालामा रस सहीत कल्पवृक्ष्ना फूल, तेणे करी घणी मनोहर , वली चंपानां फल, थशोकना फूल, पुन्नागनां फूल ते नागप्रियंगु सरखा ए फूलना काह थाय डे, मोगरानां फूज, मालतीनां फूल, जायनां फूल, जूझना फल, कोलज फूल ते कोइ वेलि विशेपना फूल, कोजना शन, कोरंटना फूल, दमणाना छल, नवमालिकाना फूल, वगुजफ्ना फूल, तिलक्षनां फूल, वासतिकानां फूल, पनकमलना फूल, उस्पलते पुमरीकना फूल, कुंदमयकुंद वृक्षना फज, अगथि याना फल, थाम्रमांजर एवा प्रकारना लोनी घणी सुगध डे जेमा एवी वे फलोनी माला तेनी मनोहर गधयी खेंचाणा थका श्राव्यां एवा जे जमरा नमरीयो तेनो गुजारव शब्द जेनेविपेथ रहेनो ने वली ए येध मालामा सर्व ऋतुनां फूल सुगधा पांच वर्णा ने परंतु तेमां धोलो वर्ण विशेष वे, ते ज्या ज्या जे जे फूल शोने त्या त्यां ते ते फूल गुंथ्या बे एवी वे माला पांचा स्वप्ने त्रिशलादेवीय दीनी ॥ ६ ॥ ३ ॥ ॥ तेवार पली बहा स्वप्नमा प्रिशला देवी चश्मा देखे ते चश्मा कहेवो तोके ? गायना दूधना फीण सरखो उजलो , रूपानां कलश सर खो घोलो वे, वली रुदय नेत्रने वलन, सपूर्ण पूर्णिमाना थधकारने दरवा वालो, वली एकलपक्षमा शोनायमान, कुमुदवननो वोध एटले व्याडवा वालो, रात्रिनी शोनाने करवा

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पारमे स्वप्ने
मेश्मनी
माझा
सानमे सने सूर्य
S
सप्ने प्रमा

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वालो, जलीरीते मजला काचनी परें शोजायमान, आकाश रूप तलावनो ईस वेठ पळे फरी पूर्ण, सर्व ज्योतिपियाना मुखD ममन, थधकारनो वेरी, कदर्पयानो पूरवा वालो, समुनों जजनो वधारवा वालो केमके जेवारें शुक्लपकमा चश्मा कगे तेवार समुश्नी वेल वघे, विरहिणी स्त्रीने चंना उदयथी थधिक विरद जागृत थाय तेमाटे विरदियोने किरणोये करी शोपण करवा वालो, थाकाशनु तिलक, रोहिणीना शवयनें वमन केमके चश्मा रोहि एणोनो जरतार ये एवी लोकोमा केवत ले परंतु रोहिणीतो नक्षत्र ते वने नही एवो पूर्णि मानो चंद त्रिशलादेवीये डा स्वप्नामा दीठो ॥ ६ ॥ ३७॥ ॥ तेवार पनी त्रिशलाराणी, सातमें स्वप्ने सूर्यदेखे ते सूर्य कदेवो ने तोके' थंधकारना पमलने फोडवा वालो, वली रातो वर्ण तेवर्ण कहेवो ले तोके ? राताथशोक सरखो, केशूढानां फूज सरखो लाज ,जेवू पोपट→ मुख लाल होय, जेवी थपि चिणोती लाल होय तेवो सूर्य लाल ने, वली कमजनां वननो उघा डवा वालो बे,तेमाटेज कमजनी शोना करवा वालो ने,ज्योतिप शास्वनो तथा ज्योतिपचक्रना चिन्द सरखो उलखाणनो करवा वालो ,आकाशमा दीवानी पेरे शोने ने, कगतो थको हेम ना समूहने हाथयी गरवन पकहीने काढाडवा वालो, वली पदोनो राजा बे, रात्रिनो नाश क रवा वालो ने, वली उगतीवेलाये तथा थायमति वेलायें वे घडी पर्यंत मुखे दीठामा थावे पठी सुखें वीठामा थावे नदी, वली रात्रिना विचरवा वाला जे चोर थादिक तेमनु ब्रमण मटाडवा वालो, वली शीत टाढाउने मथन करवा वालो, मेरुपर्वतने पाखति निरंतर महोटा ममल सहित नमवा वालो, वजी सूर्यना इजार किरणोये करी सर्वज्योतिपीयोनी प्रना मटी गइ माटे यहां सूत्रकारोजे सूर्यनी हजार किरणो कहे जे ते जघन्यथाश्रित लिम्वे दे अने लोकमा पण सहस्र किरण कडेवानी रूढी डे परंतु सूर्यना किरणोमां तो महीने मदिने वध गट थाय । ये ते या प्रमाणे जे क्षेत्रमा बारसें किरणो, वैशाखमां तेरसें किरणो, ज्येष्ठमां चौदसें किरणो थापादमा पन्नरसें किरणो प्रावणमां चौबसें किरणो, नादरवामां चौदसें किरणो, थासोमा शोलसें किरणो, कार्तिकमा बगीचारसें किरणो, मार्गशिरमा एकहजारने पञ्चाश फिरणो, पौ पमा हजार किरणो, माघमा साडावशसें किरणो, फागुनमा यगीथारसें किरणो, एवो सूर्य जोकोना चदु समान त्रिशलादेवीये सातमे स्वप्ने वीगे ॥ ७ ॥ ३५ ॥ ॥ तेवार पडी था खने, त्रिशलामाता, ध्वजा देखे ते ध्वजा कहेवी ने तोके ' सोनानो जेने दम ते उपर रहेली जे, पांच वर्णना वस्त्रनी ध्वजा , वजी ते ध्वजानी अपर सुकोमल अनेक रंगनां मोरपीब धचा वे ते चोटी सरखा शोनायमान ले तथा घणो श्रीकार , तथा ते ध्वजामा सिदनु रूप लस्युं ने तेणेकरी वली वढुन शोने दे ते सिह कडेवो के जेवो शव उजलो, कुंदन फूल सजलु, जलनो कणीयो उजलो तथा रूपानो कलश जलो होय तेवो श्वेत वर्णे ; जे सिंदने देखीने जोक एवं समजे के या सिद थाफाश मंगल नेदवाने उद्यम करेले के थे' एवी ते सिंहनी मुखाकृति तथा शरीराकति बे, जे ध्वजार्नु वस्त्र वायरानी लहेरोथी थोडं थोडं च लायमान थरी , वली घणो राघो लोकोने देखवा योग्य एवो ध्वज आठमा स्वप्नामांत्रि शला देवीये वीवो ॥ ७ ॥४०॥ ॥ तेवार पठी, नवमां स्वप्नमा, प्रीत्रिशलादेवी, पूरण क जश देखे ते कलश कदेवो तोके ' उत्तम देदीप्यमान बे रूप जेनु,निर्मल जलथी जयो थको घणोज सुंदर , सूर्यममल सरखी जाज्वल्यमानशोना बे जेनी, वली जे कलशनी पासें कमल नी वाटी ते एटले कमलोयी वीटपो थको ले वजी ते कप्तश सर्व मंगलोनो मताववा वालो ने,

चित्र
ध्वजानु
सप्त मातमु
कलशनु
नमु
पग्नसरोवर
स्वप्न दवा,

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वली ते पूरण कलश, प्रधान रनोर्नु फमल तेना अपर धरेलु , नेत्रोने थानद थापवा वालो जे, सर्व विशाउँमा ग्योत करतो यको सर्व जमीनो घर तेनी परें सर्व पाप रहित सर्व शोना सहित लक्ष्मीनो निवास , वली ने कलशने गलामा ब झतुना सुगंधि फलोनी माला , एवो पूरणकुंन नलो रूपामय ते नवमे स्वप्ने त्रिशलाराणी वीवो ॥५॥ ॥ ४ ॥ ॥ तेवार पढी, दशमा स्वप्नामां त्रिशलादेवी पद्मसरोवर देखे ते पमसरोवर कहे थे तोके ? जे सरोवरमां उगता सूर्यथी उघयां एवा दजार पांखडीना कमलो , ते विकस्वरमान कमलनी वासनायें करीने जेनुं पाणी सुगंधमय थयुं , वत्ती ते कमलोनी प्रनायें करीने पाणी लाल पीला रंग जेवु देखाय ने, वजी जे पद्मसरोवर ज लमत्स्य कसपादिक जलचर जीवोयें सेव्युं थक रहूं , वली जे पद्मसरोवरमा कमल पत्र उपर पच्यो जजनो मंटो तेणे करी जाणे नीला थांगणामा मोती जड्यां दोय नदि? एतु वेखाय , वजी ते महोई सरोवर ने तेमा सूर्यविकासी कमल, चंडविकासी कमल, नील कमल, महापम श्वेत कमल, राता कमल, इत्यादिक कमलनी शोना बनी रही ले तेथी घणुज रमणीक थयु , वली ते कमलो उपर प्रसन्नथया एवा नमर जमरीयो श्रावीने गु जारव करी रह्यां ले ॥ मंथा ग्रथ ॥ २० ॥ वली तिहां कादबक इंस, चकवा, राजहंस, ब गला, सारस, एवा पखीयोय करी शोने , थर्थात् ए जातियोना पंखीयो तिहां रहे ने, ए वो पद्मसरोवर त्रिशलादेवीयें वशमा स्वप्नामां दीतुं ॥ १० ॥ १२ ॥ ॥ तेवार पनी बगीया रमा स्वप्नामां त्रिशलादेवी खीरसमुप देखे ते खीरसमुह कदेवो ले तोके' चश्माना किरणोनी जेवी शोना तेवी शोना ते समुश्मा , वली चारे वाजु जे समुश्तु जल वृदि पामे थे, वली तेमाथी चचलथी पण घणा चंचल एवा घणा चा कबोल उठी रह्या जे, ते कनोलेंकरीने पाणी घणुंन पचल थपे ने, वजी मवमद वायराथी चलायमान थया जे कलोल ते समु इना तट उपर थावीने नफाका खा रह्या , तेनो शब्द थइ रह्यो ने जेनेविपे ते कल्लोलोणी समुह शोजी रह्यो , वजी ते कझोल मल्या थका दोडता ने एटले एक कझोलनी पनवाडे बीजो कामोल वोडी रह्यो , पहेलो एक न्दानो कनोज चाप्ले, वली महोटो कझोल पाले, एवी कोलोनी शोना जे जेने विपे, वली जे समुश्मा जलचर जीव कझोल करी रह्या , ते केवा जातिना तोके महामगरमठ, तिमिंगलमष्ठ, जघुमध ते सर्व परस्पर मन्या थका रमत करे तेवारे तेमनां पूबना उजालवाथी यम्प्यु जे पाणी तेमाथी फीण प्रगट थइ ते फीण कस्रो लोथी तणाश्ने किनारापर थावी पडे , तेनां दगला थर गया ३ ते ढगला सर्व कपु रना उगला सरखा देखाय डे, वली जे समुश्मा गगा प्रमुख नदीयोना पाणी पडे ने तेमा चौद चौव बजार नवीयोना परिवार साथे गगा थने सिंधु ए वे जरतत्रनी नदीयो पढे ले एमज चौवचौर बजार नदीयोना परिवार साथै ऐरवतत्रनी रक्ता थने रक्तवती ए वे नदीयो पसे चे तथा थमवीश यजवीश दजार नदीयोना परिवार साये रोदिता थने रोदितासा ए ये नदीयो हेमवतक्षेत्रनी पढे ले तथा बघवीश अघवीश इजार नदीयोना परिवार साये सुवर्णकुला श्रने रूपकुला ए वे नदीयो ऐरस्यवतक्षेत्रनी पडे वे तथा उपन्न उपन्न हजार न दीयोना परिवार साथे दरिकता अने दरिसलिला ए वे दरिवर्ष क्षेत्रनी नदीयो पढे ले तथा उपन्न उपन्न हजार नदीयोना परिवार साईं नरकांता थने नारिकांता ए ये नदीयो रम्यको प्रनी पडे थे तथा पांच पांचलास्वनी उपर पतीश पत्रीश हजार नदीयोना परिवार सा सीता चित्र कीर सपनु सामुन्न

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थने सौतोवा ए घे नधीयो महाविवेद क्षेत्रनीपडे , सर्वमती चोवलाखने बपन्न हजार न दीयोन पाणी जे समुश्मा पढे ने शहां कोई पश्न करे के सूत्रमांतो खीरसमुश स्वममा वीतो एवो पाउ कह्यो ने थने तमे तो नाना प्रकारनी वेलाये वधतो पाणी कहोबो तया नदीयो माद नजे वे एवो कहो तो तेनु यं कारण ले ? तेने उत्तर कहे जे जे खीरसमुश्नो पात कड़वा थकी जवण समुप लेवो कारणके जो जवणसमुश्नही कहेशो तो गगा थने सिधु नदीयो पढे वे ए पात पण सूत्रकारेंज कडेलो डे ते पाठ मलशे नदी माटे श्दा एम समजवु के लवणस मुखं पाणी मोखं वे ते स्थानके त्रिशला माता ए लवणसमुळ पाणी खीरसमुश् सरख देखे ये एवो थगीथारमे स्वप्ने वीरसमुइ त्रिशला देविये दीगे ॥ ११ ॥ ३ ॥ ॥ तेवार पठी वारमे स्वमें, त्रिशला माताये देवविमान दीतु ते कदेवू डे तोके' पुमरीक उत्कृष्ट वि मान ले तेमा उत्तम सुवर्णमणीनां एकहजारने थात थनोये करी विराजमान ने वली ते वि मान याकाशमा वीपकनी पेरें दीपी रसुबे, वयोतमा सूर्यममल सरखी शोला जेनी, चली जे विमानमा सोनानी नीतोर्मा नागफणा खीजा ठोक्या , वजी स्थानकें स्थान विष्यफूल माला, सुवर्ण पत्रेकरी बायमान एवी मोतीयोनी माला जटके , वली ते विमाननी नीतमा मृग दरपना रूप, नादारना रूप, वलवना रूप, घोडाना रूप, मगरमध, नारंमपंखी, गरुड, मयूर एमना रूप, सर्पना रूप, किन्नरदेवोनों रूप, कस्तुरीया मृगना रूप, सर्दूलसिदनां रूप, हाथीना रूप, वनसता, पमलता, एमना रूप चित्रामणमा बे, वली जे विमानमा नाटक यह रहा ते ते नाटकमा जे वाजिंत्रो वाजी रह्या के तेना शब् करी प्राणु एवं ते विमान उ, चली जे विमानमा मेघगाजे तेना सरखो देवउठनीनो शब्द य रह्यो ने तेथी जाणीये व्यें के सर्व जीवलोक संसार ते शब्दथी पूरण कस्यो ने थर्थात् ते शब्द सर्वत्र फेलाइ गयो , वजी ते विमानमा, अगर, कुंदरू, शिलारस, एमना धूपनो मघमघायमान धूप सुगध थ रह्यो , वली जे विमानमा देवोने योग सदाग्द्योत य रहेलो ने, वेवोने योग्य सर्वदा सात मुखनो निवास रूप एवं देव विमान त्रिशला मातायें पारमा स्वतमा दीतुं ॥ १३ ॥४४॥ ॥ तेवार पठी त्रिशलाक्षत्रियाणीए तेरमे स्वप्ने रमोनो ढगजो दीनो तेमा कयां कयां रन वे १ पुलकरन्न २ वचरम, ३ नीलरन, ४ ससाकरम, ५ कर्केतनरम, ६ जोदितरल, ७ मरकतरन्न, प्रवाल रन, ए स्फाटिकरत्न, १० सौगधिकरम, ११ हंसगर्नरन, १५ मसारगमरम, १३ बजनरम, १४ चमनरत्न एवा बीजा पण अनेक जातिना उत्तम रम ते सोनानां मदोटा थालोमा न रेला ते रत्नोनो ढगलो कहेवो तोके ? मेरुपर्वत जेटलो उँचो,थाकाशमा देदीप्यमान एवो रत्ननोनो दगलो त्रिशला देवीये तेरमा स्वप्नामा वीठो ॥ १३ ॥४६॥ ॥ तेवार पबीचोदमे स्वप्ने त्रिशला क्षत्रियागीय निर्धमथमिदीने ते थनि कडेवो ये तोके? घणो उजलो निर्मल पीनो थने लाल वर्ण वालो, वली मधु थने तृतथी सींच्यो थको, निर्धूम धगधगायमान जाज्वल्यमान शिखावालो, वली ते थनिमा थनेक न्हानी शिवाने वजी तेथी कोश्क शिखा थापिकी वली ते थधिकथी पण वली कोश्क शिखा नची केटलीएक शिखा वली घणीज न्दानी एवी अनेक ज्वालायें करी थमनी शिखा मजी रही ते वली जे अमिमां अनेक ज्वा लायो माहोमाहे मली रही , एवा धूम्ररहित थनिनी ज्वाला ते कोश्थाकाश प्रदेशमा चाल ती होय तेनी पेरें घणी चपल थगिनी शिखा त्रिशला देवीयें चौदमां स्वप्नामां दीती॥१॥५॥ था स्वप्नामा पारमें स्वप्ने देवतार्नु विमान कहुं ते जे तीर्थकरनो जीव वेवप्नोकपी चवीने माता

चित्र१६
नेरमा स्वनमा
चौदमा स्वन
रत्वनी राशि
'मा निधूमअग्मिनी शिखा
सगरमा स्पप्रमा
देव रिमान

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नी कूखमा थाष्यो होय तेनी माता विमान देखे अने जे तीर्थकरनो जीव नरकथी निकली मातानी कूखमा श्राव्यो होय तेनी माता पारमा स्वप्नामा जुवन देखे एवो पाउ बे ॥ ॥ एवा चौदे स्वप्नां देखीने त्रिशला राणी जागृत थइ ए स्वप्ना केवा दे तोके? एनजे, सौम्प जला ने, घणु कई वान वर्शन जेमनु, नलु रूप में जेमन, एवा स्वप्नां देखीने त्रिशला माता जागी ते केवी ने तो के ? जेवा कमल वघडे तेवां नेत्र विकसित थयां ले जेना,दर्पना वशथकी सर्वथंग दर्प सदित होर्नु हनु, सर्व रोमराजी वमसित थ ॥ ए चोद स्वप्ना सर्व तीर्थकरोनी माता देखे, जेवारे तीर्थकर गर्नमां थावे तेवारे वेखे, तेम त्रिशलादेवी पण श्रीमहावीर स्वामी कूखमा थाष्या तेना योगें चौद स्वप्नां देखीने शय्यामा जागती दवी ॥ ४५ ॥ तेवार पनी त्रिशला क्षत्रियाणी पूर्वं कह्या एवा चोव स्वप्नां देखीने जागती थकी घणीज पोतानां हृदय मा खुशी थर, सतोप पामी,जेवं मेघनी धाराये करी दणाणु कंदव वृक्नु फूल तेनी पेरे उना सपाम्पा ने रोमकूप जेना, अर्थात् रोमरोम दर्ष पाम्या पड़ी ते स्वप्नाने याद करे जे अनुक्रमें में एवां एवा स्वप्ना दी एची रीते याद करीने से, बठीने बाजोट कपर पग थापीने देवी धतरे छतरीने नही उतावली एटले मनमा उतावल नथी तथा कायाथी चपल पणु नथी, र स्तामा गोकर रहित, विलबरहित, नींत प्रमुखना उठीगणने न खेती थकी, राजहंसी सरखी गतिये करी चालती थकी जिहां सिक्षार्थ कृत्रिय राजानी शय्या ,जिहां सिद्धार्थक्षत्रिय राजा पोदघा , तिहाँ थावी, थावीने, सिदार्थक्षत्रियराजाने एवी वाणीथी जगावती दवी ते केवी वाणी तोके ? जे सिदार्थराजाने वजन लागे, सिदार्थराजा एवी वाणीनी सर्वदा चादना करे, एवी वाणी तथा परहित एवी तथा सर्वना मनने गमती एवी तथा वन्जनपणानी चेतवणी करवा वाली तथा स्वर थरें करी स्पष्ट एवी तथा कल्याणनी करवा वाली एवी तथा वृक्ष नी करवा वाली एवी तथा निरुपश्च थर्थात् उपञ्च रहित एवी तथा धनना जाननी करवा वाली एवी तथा मंगलनी करवावाली, श्रीकार अलंकारादि शोना सहित, हृदयमां कोमल लागे एवी, वली जे वाणी सांजलवाथी मनमा थानव थाय एवी, वली कोमल, मीठी रस पुक्त, जेमा वचन थोडा थने थर्थ घणो एवी वाणीथी त्रिशलादेवी पोताना जरतारने जगा वती दवी ॥४॥ ॥ तेथी सिक्षार्थराजा जाग्यो, स्यारे त्रिशला राणी सिक्षार्थराजानी थाशायी नाना प्रकारना मणिरलथी चितम्रो एवो सोनानो वाजोट मणिरत्नोथी जग्यो ते उपर पलोनी वालीने बेठी, रस्तानो खेद मटाडीने सुखे वेठी, वेसीने सिद्धार्थ राजा प्रत्ये जेवी रीते पूर्वं वर्णन करी थाष्या एवी वाणी करी कहेती दवी ॥ ४ ॥ ॥ हे स्वा मी। निधे हु बाज पूर्वोक्त शवामां कांक सुती कांक जागती यकी, में गज उपन थादिवेश जे पूर्वं कही थाष्या ते चौद सप्नां दीना, देखीने जागी, ते महोटा स्वप्नांन फज जाणु जे काइ फजवृत्ति फलनु पामबु का थाशे ? एवं प्रिरालायें पोताना जरतारने पूरघु ॥ ॥ ५० ॥ तेवारे सिक्षार्थराजा त्रिशलाना मुखथी एवो श्रर्थ सनिलोने, दर्प संतोप पामीने, चिचा थानद पाम्पो यको, प्रीतिकारी परम सौम्य दर्प हृदयमा फेन्यो, जेम मेघनी धारायें बंटायेलु एकंवववृक्ष फून तेनी पेरें सनसित थयो थको, सांनतीने तेनो विचार करतो, पोताना स्वनाव प्रमाणे पोतानी बुद्धि विज्ञाने करी ते स्वप्नोनो थर्य ग्रहण करलो, अर्थ में हण करीने त्रिशलाराणीने मीठे वचने करी एवं कदेतो हवो ॥ १ ॥ ॥ हे देवाणुप्रिया ते मनोहर स्वप्ना दीवां, ते कल्याणकारी स्वना दी, शिवकारी, घनकारी, श्रारोग्यकारी,

चित्र1७
दरबान
रासी
सिदार्थरामा
निशला देवी
SIS
सामाMETIERRERNADIसरमम
SA.44

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घणा दीर्घायुना करवा वाला एवा ते स्वप्नां दीनां ॥ ग्रथाथ ॥ २० ॥ तेन फल यावी रीते हे देवापुप्रिया | तमोने श्रर्थनो लान था, तमोने नोगनो खान थाशे, सुखनो लान याशे, राज्यनो लान थाशे, ए निमें नवमदीना उपर साहासात दिवस गये थके श्रमारा कुत्तमा ध्वजा समान, थमारा कुलमा छीप समान, थमारा कुलमां दीवासमान, थमारा कुलमा पर्वत समान स्थिर, थमारा कुलमा शिखर समान, थर्थात् मुकुट समान, थमारा कुत्तमा तिलक समान, अमारा कुलमा सूर्यसमान, कुलनो श्राधार, कुलनी वृद्धिको करवा वालो, कुजनी कीर्घिनो करवा वालो, कुलना निर्वाह्नो करवा वालो, कुलना यशनो करवा वालो, कुलमा वृदसमान, घणा लोकोने बतायामा राखवाथी कुलनी विशेप वृधिनो करवा वालो एवो पुत्र थाशे वजी सुकोमल ने दाथ पग जेना, संपूर्ण पांचेंक्ष्यि परवडा जे जेनां जण, व्यनन थने गुणे करी सदित, मानोन्मान प्रमाण सर्व शरीर सुवर, चंमानी पेरे सौम्याकार, मनोदर दर्शन करवा योग्य, एवो पुत्र तुजने थाशे ॥ ५ ॥ ॥ ते पुत्र कहेवो थाशे तोके ? वालक अवस्था गमीने जेवारें विज्ञान अवस्थामा श्रावशे तेवारे सर्व कला मात्र देखवाथीज जाणी शे पण तेने शीखाव पडशे नही वली युवान थव स्थामां शूरवीर, महादानेश्वरी, स्वप्रतिझा निर्वादक एटले पोते थगीकार करेली वातना निर्वाहने करवा वालो, सग्राममा वीर एटले पानो नागे नही, जमीन उपर राज्य करवा वालो, घणा हाथी घोडा रथ पायदल प्रमुखनो मालक एवो, राजाउनो राजा थाशे ॥ ५३ ॥ तेमाटे तमे उदारकारी यावत् स्वप्नां दीवां एवीरीतें सिदार्थराजा ने वार त्रणवार त्रिशला राणीने कहे, प्रशसा करे, तेवार पठी त्रिशला त्रियाणी सिदार्थराजाना मुखथी था वात ॥

सानलीने दर्प सतोप पामी, यावत् दाथ जोडीने, मस्तकें थजली करीने, एवं कहेती दवी ॥ ५ ॥ ॥ हे स्वामी ए थर्य एमज ठे, तमे कयुं ते तदत्त , संदेह रहित , जे प्रमाणेमें वांग्योहतो दे स्वामी तेज प्रमाणेमें श्रापना मुखयी ग्रहण करतो, एम हे स्वामी जे तमे कहो : वो ते अर्थ सत्य वे एवीरीतें वारंवार कहेती थकी एम कहीने, स्वप्नानां थर्थने रुहीरीतथी थंगीकार करीने, सिक्षार्थराजानी थाझा लश्ने, नानाप्रकारना मणीये जठित एवा सोनानां पाजोट उपरथी उतीने, नदी सतावली, नही धीरी एवी पूर्वे कहेली रीत मुजव चालती थकी जिहा पोता- शयन घर ने तिहां थावीने एम कदेती दवी ॥५५॥ ॥जे महारे उत्तम स्वमा दीतामा थायां तो दवे महारे सूq नदी, जो सुश्जाउ तो वली कदापि वीजा को पाप रूप खोटा स्वमा श्रावीजाय तो ए रुहा स्वप्नांनुं फल जातु रहे तेमाटे देव गुरु सवधि रूडी मगलकारी, गुजकारी, धर्म कथा कहीने रात्रि पूरण करूं एवु कहीने स्वप्न जागरण करती थकी, पोतें जागती वीजाने जगावती विचरे ॥ ५ ॥ ॥तेवार पदी प्रनात समये सिद्धार्थ राजा कौटुंपिक जे सेवक पुरुप तेमने बोलावीने एम कहेतो दो ॥ ५ ॥ छता वजयी हे देवाणुप्रिय' थाज सारीरीतें वाहिरनी उवमणशाला जे कचेरी में तेने गधोद कथी सींचो,कचरो कांटो काहाडीने साफ करो, लीपो,जीपीने पनी प्रधान सुगंधि पांचवर्णना । न तेना दगला करावो, रुष्णागर, कुंवरु, शिलारस तेना धूप उस्खेवो श्रने सुगधना चूर्णनी। पती उखेवो, सुगधे थनिराम करो, सुगघे वाप्ति करो, गधनी वाटमूको,या काम जीजा कोनी पासें करावो, था महारी थाझा पाली तत्काल सोंपो ॥ ५ ॥ कौटुबिक पुरुप ए सांजली घणाज खुसी यश्ने, दायजोडी तदति करीने, सिदार्थ - राजा पासेथी निकलीने ज्या बाहेरनी सना ने स्यां थावीने गंधोदकादिक बाटपा थादिक सर्व काम राजाना हुकुम प्रमाणे करीने यावत् तिदा सिंहासन मामीने जिहां सिदार्थक्षत्रि यराजा ने त्या थावीने हायजोडी मस्तकें थजली करी कहेता दवा के दे स्वामी जे थापे फरमाथ्यु ते सर्व काम थमे करी थाव्या एम कही थाहा पानी सोंपी ॥ ५५ ॥ ॥ तेवार पठी कांक रातुं धोलु पीलो प्रनात थां, सूर्यविकासीकमल फूल्यां, घविकासी कमल कुम लाणा, उज्वलमनात थयु, सूर्य उम्यो ते सूर्य कडेवो ने तोके? राता अशोक सरखो लाल ,केसुना फल सरखो लाल ने, सूडाना मुख सरखो लाल, थ िचिोठी सरखो लाल, मा मोलीयो जीव थाय ने तेना जेवो रातो घफोरीयाना फूल सरखो लाल, कबूतरना पग नेत्र सरखो लाल, जासूसना फूल सरखो लाल, हिंगलुना ढगला सरखो लाल ए पूर्वे कही जे वस्तु तेवी कोइ परा लाल वस्तु होय तेथी पण थधिक लाल एवो कंगतो सूर्य, कमलाकर नामे तलावने विपे घणा कमलोने उघाडतो थको एवो सूर्य कम्यो, दजार करणनो धिरनार, विव सनो करवा वालो, तेजेकरी जलजलायमान,जेना किरणोथीथंधकार नाश पाम्यो बे, चोरना प्रचारने टालनारो, घालिकानी जाणीये कुंकुनी पीयाली ते सरखो, लाल, ते सूर्यनो नवो ता वडो (तढको) ते तावडे करी जाणे कुंकु सरस्वो सर्व मनुष्यलोक लाल थयो , एव प्रनात थयु, ॥ ६॥ तेवारें राजा शय्याथी उठीने वाजोट उपर पग मूके,वाजोटथी देठो उतरे,सतरीने, जि हां महमयु६ करवानी शाला ते तिदा थावीने,मनयुद्धशालामा प्रवेश करीने,थनेक प्रकारनी मनपुरूनी कला करीने थाका पठी, सो श्रीपधीना पाकनुं तेल, हजार श्रोपधीना पाकनु तेल, सुगध प्रधान तेल प्रमुख वीजा पण तेल जे धातुनी वृद्धि करवा वाला, नवराग्निने दीपाववा वाजा,कामदेवनी वृद्धि करवा वाला, मांसने पुष्ट करवा वाला, वलदि करवा वा जा, सर्व इश्यि शरीरने समास करवा वाला, जेना थन्यगन यकी चामडीमा तेजनी वृदि थाय एवां अनेक जातिनां तेल ते तेलना मसलवा वाला कहेवा वे के घणा चतुर, जेमना हाय पग घणा सुकोमल , ते तेलने मसलतां यको दायना तलांनो जे मल ते शरीरमा स मावी थापे, एवी कियामा वक्ष, परिपूर्ण के हाथ पग जेना, थवसरना जाण, उतावजथी का र्यना करनार, सर्व मर्वन करवा वालामा उत्कृष्ठ, विवेकवत, चुधिवत माह्या, पंमित, मस जता थका दारे नही, एटले परिश्रमना जीतवा वाला इत्याविक गुणना जाण पुरुपो ते केवी रीतें तेल मसले तोके जे थकी दाडने सुख थाय एटले दाडने सुखकारी, मोसने सुखकारी, चामडीने सुस्वकारी, रोमने सुखकारी ए चारेनें मुखकारी एम ए पूर्वोक्त तेल ते उपर कह्या प्रमाणे मसलवाथी राजाने थाक मट्या पठी सिधार्थराना मनशालाथी निकलीने॥५१॥ जिदा मानकरवानुं घर तिहां थावीने सान घरमा पेठा, ते नान घर कदेवु दे तोके' मोतीयोनी जा जीयोना गोखला जे जेमा,विचित्र मणिरत्ने जडित धरती तल ले जेजें,तिहां रमणिक स्नान क रवानो मंझप ने तेमां अनेक प्रकारना मणिरत्नोये करी जच्या चित्र्या एवा अनेक वाजोट वे तेना कपर राजा सुखें येगे हवे स्नान करवानुं जल, कहे ते ते कडे फूलना गधवालु जस्त, चंदन कपूरादि वासित जल, कष्णजन, शुनजल, गंगा प्रमुख निर्मलजल, एवा जलथी कल्याण कारी प्रधान मकननी विधिये मान करे तिदा घणा प्रकारनां जल वहालवा प्रमुख कौतुक करीने कल्याणकारी मानना यतमा कमल सरखा सुंवाला गधवरूपी अंग चूर्मु पढी घयां मोघा वस्त्ररा पहेला, जजा रस सहित गोशीर्ष पवनथी शरीरने लेपन कऱ्या, पवित्र माता पदेरी, +

चित्र ८
हागाने अर्थ नब
सिरा राजा पार पर बेसी सैमादिक
मरमरापेम
करायचे

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वर्ण कुंकुमादि विलेपन कमा पनी मणि जडित सोनाना घरेणा पहेल्या, वली वढार सरो दार, नवसरो दार, त्रीससरो दार, लाया जूमखा प्रमुख घरेणां तथा कनदोरो पहेलो तेथी। सोनवा लागो, गलामा कंठी प्रमुख पहेसा, थांगुलीउमा वींटी, वेड प्रमुख पदेखा, केशोमां- छल प्रमुखना घरेां धारण करयां, रूडा जहाव कहा, जहाव बहेरखा पहेखा, जुजा प्रमुखमा मुजवधाविक पहेश्या तेणेजा थनित थने, तेथी घणु श्रीकार रूपये तथा कानोमा कुंमल पदे खातेणे करी शोजायमान मुख परं, मस्तकें वेदीप्यमान मुकुट घाल्यो, हारप्रमुस्खे करी सुशोनित था वाती जेनी, वीटीयोथी पीजी थयली थगुली जेनी तथा लांबा वस्त्रे करी करो ने उत्तरासग जेजें, अनेक प्रकारना मणिरज निर्मल घणा मूल्यना माह्या कारिगरोनां घड्या देदीप्यमान नजी रचनाये करी एकमां बीजा घरेणां मलेला तेथी मनोदर देखाय ने तथा वीरवलयने पारण कसो ए घरेणो जे शूरवीर होय तेने राजा वझीश थापे डे एटले मान थापवानु घरेणु ते कोक तो कहे जे के ए घरेणु दायमा पहेराय ने वली कोइ कहे। ए वीरव जय कानमा पढेराय दवे घणु वर्णन करीये ते सिक्षार्थराजा साक्षात् कल्पवृक्ष सरखो थयो, जेम कल्पवृक्ष पत्र, पुष्प, फल सहित शोने तेम सिक्षार्थराजा परेणाथी शोने तथा पुरुषोमा समान, कोरंट वृदनां फूलोनीमाला सहित एबु बत्र मस्तकें धरावतो थको, श्वेत चामरोथी वीजातो धको, जिदा लोकोयें मगलिकना जय जय शब्द कस्या , वली १ अनेक गणनो नायक एटले पोताना घरमांजे मनुष्य के तेनो मालक, २ दमनायक देशनी चितानो करवा वालो, १३ दाथीयोनो श्वर ४ राजानो पुत्र, ५ कोटवाल, ६ ममिवीया, ७ कुटुंबना स्वामी, न्हाना प्रधान, महोटा प्रधान, एममलिक, १० मदाममलिक, ११ ज्योतिपी, १३ दरवान, १२ जे राजासायें जन्म्या ते थमात्य, १४ पीठी मईनना करवा वाला, १५ नगरना चोवटीया, १६ चोधरी, १७ वाणीया, १७ शेन, १५ सेनापति, २० सार्थवाह, २१ दूत, २२ वेशनी सिंधीना रखवाला एटाने सिंधिपालक तथा व्यवहारीया, श्यगरक्षक, १४ पुरोहित,२५ वृत्तिनायक, २६ चदिवाइक,२७ थश्यायत, २७ पदुपहिचायत, २५ टाकटमाली, ३० जाली, ३१ फलमाली, २२ मत्रवादी, २३ धनुर्वादी, २४ दमधर, ३५ धनुर्धर, २५ खड्गधर, २७ बत्रधर, २७ चामर घर, ३ए पताकाधर, नेजाघर, ५१ वीवीधर, ३२ पुस्तकधर, ध२ फारीधर, १४ तांबूलधर, ४५ प्रतिहार, ४६ शय्यापालक, ७ गजपालक, ७ अश्वपालक, Uए थंगमईक, ५० थारक्ष क, ५१ मिष्ठवचनबोलनारा, ५२ कथाकहेनारा, ५ सत्यघोलनारा, ५४ गुणना बोलनारा, ५५ समस्याना बोलनारा, ५६ पारसीनापा घोलनारा, ५७ वैयाकरण पाठी, ५७ तर्क पाठी, ५ए साहित्य बंधक, ६० लक्षण बंधक, ६१ बद वधक, ६२ थलकारना जारा, २३ नाटक वधक, श्राही प्रेसठ नाममा जे सिघीपालक कसुं ते राजाना सीमाडीया राजा साथै सीमसेढा नां वांधा परवाथी राजाने विरोध थाय तेवारें सीमकाढी निवेडो करी थापे तेने सिधीपालक कहीये तेना दृष्टांत उपर कथा कहे जे कौशवीनगरीमा जितशत्रुराजा राज्य करे ले तेने प्र धान, पुरोहित, शेत, सेनापति, नमारी, सिधीपाल इत्यादिक घणो परिवार ने सद्गु सक्नु पोत पोताना अधिकारमा सावधान ने दवे कोश्क पुरु राजाने कर्युके तमारा वधा सेवको काम फरे पण सिंधीपाजतो तमाएं अनाज खाइने खोदुं करे ने माटे एनो तपास करवो, तेवारे राजायें सिधीपालकने कयुं के तमे मनचितित इय्य खाउँ बगे थने कार्यतो कोई करता नथी तेवारे सिधीपालक वोल्यो वं महोटा काम करीश्रापु, परस्पर वैरनाव दोय तेने मित्रा करावी MAK श्रापु थने मित्रता होय तेमा विरोध पाडी थापु, थनेक बुद्धिना काम करु, एवा महारामा गुण , पठी राजायें परिक्षा निमित्तें पोतानो पुसमन अरिमर्वन राजा तेनी साथै मेलाप करवा माटे नेटणा सारु एक मावलो सीची थाप्यो ते राजाने यापजो थने वैर टाली श्रावजो एवं कदी सिंधीपालकने मोकल्यो सिधीपालक त्यांयी चालता केटलेक दिवसें थरिमर्दनराजा पासे जइ नेटणु मूकी पगेलागीने कदेवा लाग्यो जे हे राजन् । जितशत्रुराजायें तमोने सलाम कदी थने नेटणं थाप्यु , राजाये ते नेटणु बोडघु तेमाथी मावडो निकल्यो ते कयाख्यो तेमा वली घणे वधनें बांधेली एक सोनानीमावली निकली तेना बंधन बोडयां तेवारे मांदेथी राख निकली तेवारे प्रधाने कर्मु तमारा वैरीयें राख मूकी बे, ते राख चोपड़ी तमे जोगी थाउ, ते सांनली राजा कोधातुर थयो तेवारें सिंधीपालके जाएयु जे राजायें वैर सांध्यु एवु चितवीच स्पातनी बुद्धिये करी कठेवा लाम्यो के दे राजन् । तमे क्लटो विचार म करो, ए राख बढ़ गुण कारी ऐ राजायें पुलघु एमां शो गुण ? सिधीपालक वोल्यो थमारा राजायें यज्ञ कीधो हतो तेना उपर असंख्य दृष्य खरब्युं ते यज्ञ पूरण थयाथी तेनी जस्म तिलक करवाने थर्थे सर्वे राजा ने मोकजी ने एमां कोई विरोध नथी एन प्रनातकालें तिलक करतां जन्मांतरनां पातक टले थने सोनाग्य पामे, ते सांनजीराजा प्रसन्न थयो थने जाए' जे में वैरनावी अवलं विचारधु पण एणे तो वेर टालवा ए उपकार करो ले पनी राजाय ते सिंधीपालकने घणु सन्मान थापी,एक मदीनां सुधी पोतापासे खमावी घणा हाथी घोडा थानरण वेश्परेरामए। करीने शीख थापी, तथा हवे तमारा राजासाथें अमारे परम मित्राने एवो पत्र लखी थाप्यो ए सर्व नेट लश सिधीपालक पोताना राजा पासें श्राव्यो राजाने पत्र दीधो सर्ववस्तु पण थापी तेवार राजा विस्मय पाम्यो,वली राजायें पटराणीने कपुंके तु तादारे पीयरे जा, जेवारें दु नामाकितमुधि का मोकल तेवारे तरत वावजे पण योजा कोश्ना कदेवाथीथाचीश नदी, पनी ते राणी पीयर गइ पालथी राजायें सिंधीपालकने कसुंके महारी राणी रीसाणी थकी पीयरे गले तेने तमे तेडी लावो तो तमारी थकल खरी जाणु, पदी सिघीपाल तीर्थवासीनो वेश करी राणीना पीय रनां गाममा गयो राणीने खवर पडी तेवारें राणीयें तेडाव्यो यने कसुके तुं मुजने मलवा केम नाव्यो तेणे कएं हूँ तीर्यवासी थयो हूँ तेथी ससार सयधि को कार्यमा पडतो नथी, रा पीये कर धन्य ताहारा थवतारने तोपण मने राजाना समाचार कदो तेवारे सिंधीपालक माधु धूणावीने कदेवा लाग्यो के राजायें दमणा कोश्क राजानी पुत्री परवानो थावर कसो वे ते कन्या घणी रूपवती ने तेने पटराणी करवा चामुंडे एवी वात सांजली राणी उतावली पाठी पोताने घेर थावी राजायें पुग्छु तमे तेच्या विना उतावला केम थायां तेवारे राणी रीश थाणीने वोजी जे तमे नवी पटराणीने घेर जाबो तो दवे मुने शावास्ते तेहो एवो चलनो सांजलीराजा विस्मय पाम्यो पनी राजायें सिंधीपालकने तेडावीतनांगीराणीने मनावीराजा दर्प पाम्यो, सिंघीपालकने घणा वस्त्र धानुपण थापी सन्मान्यो ॥ एम सिदार्थराजानी सना मां एवा सिधीपालक यादिवेश्ने शेतनापुत्र सेनापति बुधिवत प्रमुख घणा वेग ॥ इति सिंधीपाल क कथा॥इत्याविक वावीशथीथावि लश्ने त्रेस पर्यंत टीकाकारे जख्या बे एमना परिकरसार्थे प स्वस्यो यको सिक्षार्थराजानानघरची निकलीने सना ममपमा थावे ते ते कहेवो शोने दे तोके ध वसमेघनी घटामा जेवो सूर्य निकले तेनी पेरे शोने के वजी जेवा नम्र पद प्रमुखना तारामा चश्मा शोने तेवो सोकोमा राजा सोने एवो मकानघरथी निकलता शोनायमान थयो थको TATAL.

नरपति, नरोमा इंश, नरोमा वृपन समान, नरोमा सिंहसमान, घणीयधिक राजतेजनी लक्ष्मी यें करी दीपतो यको,स्नानघरथी निकलीने ॥६॥ ॥जिहां सनानी शाताने तिदा चावीने सिंहासन अपर पूर्व दिशानी सन्मुख मोहोई करीने वेगे ॥ १३ ॥ ॥ वेशीने पोताथी उत्तर बने पूर्वदिशानी वचमांनी शानकूणमा बाउ बाजोठ श्वेत वस्वथी ढांकेला श्वेत सरसव अने। श्वेत शन कुंकुथा मगल अर्थे पूजीने थापे थने एक पडबि एटने पडदो बाघे ते पडनि कहेवी तोके नाना प्रकारना मणिरमोथी जडेली ,सर्व लोकने देखवा योग्य, घणामूल्यनी, नला पाटणमा नीपजेली,रेशमना वस्वनी,अनेक चित्रामवाली एटले मृग, वृषन, घोडा, मनुष्य,मत्स्य, पंखी, सर्प, किनर, यष्टापद, चमरीगाय, हाथी, वनलता, पद्मलता, इत्यादिक अनेक रूप जे पडबिमा मांमघा ने एवी पडबी बांधी, (पडबी एटले पडवो जाणवो) ते पडबीनी मांदेली पाजुये, अनेक जातिना मणिरने करी जडित रुडा सुंवाजा गावला सहित मशरुने वस्त्र विशे दाक्यं तेनी उपर श्वेत वस्त्र थागयु, सुकोमल अंगने सुखकारी स्पर्श ने जेनो एवो रूहो एक वाजोउ त्रिशलाकृतियाणीने वास्ते रचावे, रचावीने पनी सिद्धार्थराजा कौटुबिक पुरुपने योलावीने एम कहें ॥ १४ ॥ ॥ के शीघ्रमेव एटले तत्काल हे देवापुप्रिया, अष्टांग महानि मिनना जाण, सूत्रथर्थना घरवा वाला, थनेक प्रकारना शास्त्रमा कुशल, स्वप्न शास्त्रमा कुशल एवा स्वप्न लक्षण पाठकोने वोजावो हां बात यगनां नाम कदे ने तेमां प्रथम फर कण विचार थग तेमां शरीर फरके तेनो विचार जेमके स्त्रीनु माबु श्रग फरके तो सारु इत्या विक वातो जाणवी, वीच स्वप्नविचार श्रग तेमा उत्तम, मध्यम अने कनिष्ट एवा स्वप्नांनो विचार,त्रीजो स्वरविचार श्रग तेमा काली चिडी,रूपारेल,शीयाल प्रमुख बोखे ते मुजव फल कहे वाय, चोपु नूमिकप थगतेमा नमिकंपवाथीजे शुनाशुजफल तेनां कहेनारा शास्त्र ते नौमविया नामे चोयुथग जाणवु, पांचमुमसा, तिल, सप्तण इत्यादिकोनो विचार जेमाले ते व्यंजन विद्या नामे पाचहुं थग जाणवू, बो दाथ पगनी रेखा जोवानो विचार जेमा ने तेजक्षाविद्या नामे बकु श्रग जाणवु, सातमु उत्पातविया ते मलकापात तारा छूटे, ममल ममे श्स्याविकोनो वि चार जेमा ते सातK अंग जाए, थामु अतरिक्षवियानं अग ते ग्रहोना अस्त उद य वक तेना फल जेमा रे ते थामु थंग जाणवू, एवा जाण स्वप्नपाठक पुरुषोने घोलावो एबु सिदार्थराजायें कपु त्यारे ते कौटुंबिक पुरुप सांजलीने घणो खुशी थयो पनी दायजोडी यावत् सानलीने तहत करीने ॥१५॥ ॥ सिक्षार्थक्षत्रिय राजानी पासेयी निकलीने खत्री कुम गामनगरनी वचमाथी थश्ने ज्यां स्वप्न पाठकोनां घर ले त्यां श्रावीने स्वपलक्षण पाठ कोने कहेतो दवो ॥ २६ ॥ ।। हे स्वप्न पाउको तमोने सिदार्थक्षत्रिय राजा याद करे ने तेमाटे दु तमोने वोलाववा श्राव्यो तेवारे स्वभलक्षणपातक सिदार्थक्षत्रिय राजाना कौटुं विक पुरुपनी वाणी मुणीने एटजे तमोने सिकार्यराजा बोजावे बे एवी वाणी सांजलीने, घ णज हर्प संतोप हृदयमा पामवा लाम्या पठी मान महान करीने, पोताना घरना इष्टदेवने पूजीने, शरीर उपर कोतुकने बर्य तिलक बापा प्रमुख करीने, वहीं, मान यने सरसबने मांग लिक माटे करीने हा प्रसस्वप्न प्रमुखनो नाश करवो ए प्रायश्चित्त टाजवू , तेमाटे ते करीने, हा कोइ प्रभ करेके सिक्षार्थराजाना मानना वर्णनमा तो देवपूजा करवी आवी नही बने था निमितियाना संक्षेप पाउमा देवपूजाधावी तो डॉ सियाराजा देवपूजा नही करता र ता? एवं श्वे तेने उत्तर करे ने के बावखत तो सियार्थराजा सणगार करीने सनामा ता हता तेपी तिहां वदी, मान थने सरसवनी पेरे पाठ नथी तेथी जाणवामां यावे ले के निमित्तियाउंने पूबी विवाय करीने पनी पूजा करी दशे केमके सिक्षार्थराजा पण श्रीपार्श्व नाथ नगवानना आवक ने तेथी श्रीपार्धनायजीनी मूर्चि तेमना घरमा अवश्य होवी जोश्यें, वली थागल "णायाकय वलिकम्मा” ए पाठ त्रिशलाजीनाअधिकारमा चाल्यो अथवा कत्ती ये पण ए पाठ सदजनो जाणी नदी जल्यो दोय।। एम पण संनवे के पठी केवती गम्य दवे स्वप्नपातक शुद मांगलिक वस्त्र पहेरीने,घणा मूल्यनां घरेणां पहेरी सर्व शरीर शोलायमान करीने, वली पण सरसव थने दर्न मगज निमिचें मस्तके धारण करीने, बालीने, पोतपोताना घरथी निकलीने, क्षत्रियकुंम गामनगरनी वचमाथी यश्ने, जिहां सिक्षार्थराजानो मुख्य मदेल ने तेने धारणे थावी सर्व एकता थया, पडी सर्व नेला यश्ने मादोमांदे विचार करवा लाम्या के थापणा बकायमां कोने महोटो थाप्यो नथी माटे एक जणने महोटो थापो, केमके वृक्षविना तो थप्रतिवध टोटु वाजे माटे मांदोमाहे स्वप्ननो अर्थ विचारीने एक मदोटाना मुखथी राजा थागल कहेवराव, पण जरो जरों जुट जु बोलवू नदी जो जणे जण जुट वोलवा जाशो तो यादर पामशो नही जेम न्यायशास्त्रमा कामु डे के ॥ यत्रसर्वेपिनेतारः सर्वे मत्सरवादिन ॥ सर्वे ममत्वमिति, तेवसीदति तूंववत् ॥ १ ॥ जिहां सर्वजण अग्रे सर थावा जाय थने सर्व थईकार सहित बोलवा वाला दोय, परस्परें ईर्ष्या करवा वाजा दोय, सर्व महोटा पणाने वागवा वाला दोय तेमनो समुदाय जेम पांचशे सुनट अनादर पामी 5 ख करवा लागा तेम ३ ख करे ते पांचसें मुनटनी कथा कहे डे कोई समयें दो तिहाथी यावीने पांचवें मुनट नेला थइ गया, ते रोजगार करवा सारूं वेशांतरे गया तिहां कोई कोई राजाऊनी पासें वे चार विवस रही रही चाव्या जाय एम करतो एक म दार्दिक महोटा राजाने जश् मल्या तेवार ते राजायें घोडा, वस्त्र, घरेणां, शस्त्र इत्यादिक सामग्री तेमनी पासे वीवी तेमज ते सुनटो सर्वे सुरूपवान हता तेने देखी राजा तेमने सन्मान थापी वोल्यो के तमे कोण बोयने क्याथी थाव्या बो तेवार ते पुरुपोयें राजाने प्रणाम करीने कटुं| के दे राजन् । श्रमे नोकरी रदेवा सारं थाव्या यें यावत् तेमनी वातो सनिलीने राजा प्रमुख सर्व सना खुशी थइ तेवारें राजायें प्रधानने वोलावीने कर्यु के था मुनटो सारा देखाय , था वरुवार , काम पडता समाममा पाला दटे तेवा नथी एवा राजानां वचन सांजली प्रधान वोल्यो के हे स्वामी' ए मुनट देखवामां तो सारा में पण असंबंध केमके एमनामा कोइ मा लेक नथी तेयी काम पडशे तेवारे नागी जाशे तो तमे उसनो कोने थापशो' एई प्रधाने क मुं तोपण राजा समज्यो नही तेवारें प्रधाने जाप्यं जे राजार्नु मन ए सीपाश्योने नोकरी राख वान वे ए, समजीने प्रधाने कर्प हे महाराज' एनी परीक्षा करीने श्रापणे नोकरीमा राखा राजाय पण कभु के मुख्थी परीक्षा करो पढी प्रधाने तेमने को सारी जगा जोड्ने तेमा । तारो थाप्योथने रातनी वखतें एक ढोलीयो, एक गावखं अने एक उसीतुं ते सुनटोने उतारे मोकव्यों चली नोजनाविक सामग्री पण घणी मोकली ते मुनटोये नोजन कम्मु पनी जेवारे सुवा तागा तेवारें ढोलीयो देवीने मांदो माहे पांचसे जण जडवा जाग्या तेमाथी एक बोज्यो| के मेरादादा यहाथा, और मेवी वहाड़े, इस्से मेंसुझंगा तेवारे बीजो योज्यो के एकदिन बनमें सिद वोलाथा, उसका साद घरमें वेबैठे मुनके मेरा बाघाकू सातदिन तक ताप थायाथा, श्स्से मेंही सबसे पटा हु, वल्ली त्रीजो बोल्यो के मेरे पढे नश्याने सेके हुए सचाइस कूपापडो

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चित्रा
ITAL
रामसभा
मिरगई सहिद
विशवादेवी
सिदार्थ राजा
IhwINणाम
निमित्तुप्रकाशक नए
V

एक पांवकी लातसें नाजि मारेथे, इस्से मेंही पठाहु वली घोथो बोल्यो के मेरे मामाने एक दराको दाइ वीयाथा इस्से मेंदी बडाई, वली पांचमो बोस्यो के मेरा मामाने सातसेरकी खीचडी खाश्थी, बो बोल्यो के मेंतो छ गोलीकी गस पीतागु, सातमो योज्यो के मेंतो घरमेंदी जंगल जांता गुथाउमो पोल्यो मेंतो सातदिनतक सोश रहताई जागतानदी, नवमो योज्यो मेंतो विनीसेंनी मरताहूं, दसमो योल्यो में कुत्ता नसे जब जाग जार्ज,एवीरीते एक कहे हूं मुलं, बीजो कदे हू मुवं तु का मालेक नथी, एम थराित्र सुधी लख्या तेवारे तेमां पांच सात जण समजु दता ते योज्या अरे तमे जहाइ मकरो, ए शय्यानीसादामा पगराखीनें बनाये सूश्रदो ए न्याय सर्वने वरावर जाणवामां याव्यो तेथी सर्वजणो दोलीया सामा पगराखीने सूझ रह्या थने पीजी पण सर्व चीनो पाती प्रमाणे वेंची सीधी पडी प्रनात थर्पु तेवार राजाना माणसो जे निगाद करवा रह्या हतां तेणे जश् राजा थागज सर्ववात कही तेवारें राजायें निवजीने स ने शीख थापी, कांधावर पाम्पा नही एवं स्वप्न पाउ परस्पर विचारीने एक जणाने मालेक थाप्यो थने जिदा सिदार्थक्षत्रियराजा ने तिदा थाव्या थावीने सिक्षार्थराजाने जय विजय शद करी वधाव्या ॥ १७ ॥ ॥ इति तृतियव्याख्यान समाप्त ॥ ॥ अथ चतुर्थ व्याख्यान प्रारंजः॥ ॥ दवे ते स्वप्नपातक सिक्षार्थदत्रिय राजाने दाथजोडीने जय विजय शद करी वधावे अर्थात् दाय प्रसारीने थाशिर्वाद थापे थने कइके हे राजा' तमे दीर्घ श्राप प्य वाला हो, घणी थाजीविकाना धणीदो, लक्ष्मीवान्दो, जशवान्दो, बुद्धिमानहो, कीर्ति मानहो, वली सिक्षार्थराजाने पार्श्वनाथ स्वामीनो सेवक जाणीने श्रीपार्श्वनाथजीनी स्तुतिक रीने थशिर्वाद थाप्यो ॥ श्लोक ॥ दशावतारोवः पायात्, कमनीयांजनयुति ॥ किंतुदीपो नहि श्रीप , किंतुवामांगजोजिनः॥१॥ ॥यर्थ दश थवतार जेना तेने वशावतार कदीयें एवा वली मनोहर श्यामकांतिवाला एवा कोण ? तेवारें वीजो को करेके दीप एवु नाम दीवान ने बने दशा एवं वतीनुं नाम दे वली काजलनी श्यामकांति , तेवारे कदे के ए दीवो तो नदी परतु श्रीप एटले श्रीकृष्ण तेना पण वश थवतार थया तेथी कृष्ण दशे केमके कृष्ण काला पण हे थने तेना वश अवतार पण ने, तेवारे कवि कहे बे के दीवो थने श्रीकृष्ण ए वेध नथी तेवारे ए को ले के? श्रीपार्श्वनाथ स्वामी वामादेवीना पुत्र ने केमके ए दानव करीने तीर्थ कर यया श्दा थमरनूतिना जवथी वानव गणवा वली एमनी श्यामकांति पण तेथी पार्श्वनाथ स्वामी ने ते तमारी रक्षा करो एवो थाशिर्वाद सनिलीने सिद्धार्थ क्षत्रियराजायें ते स्वप्नलक्षण पाठकोनें वाद्या, वस्त्राविक देवाथी पूज्या, सद्गुरोकरी सप्या, सन्मान प्राप्यु, बने पूर्व तैयार करेला जे यात नशसन ने तेनी कपर जूदा जुवा घेसाच्या ॥६॥ ॥श्दा कोइ कहेके श्रीपार्श्वताथजीनो प्रावक सिदार्थराजा समकेती में तेणे मिथ्यात्वी एवा स्वप्न । पावकोने केम वांगु' दवे एने उत्तर कहे वे एतो लोकोपचार विनय ने तेतो ससारिक प गानो वे पण पूज्यपणाने तथा धर्मना कामने माटे नथी जेम लौकिका छदार करे तेने पण वदन कहे जे तेम ए पण जाणतुं ॥ तेवारपडी सिकार्यराजा त्रिशलाक्षत्रियाणीने पहिधमा साडे ते पण पोताना दाथमा फलफल खेने घेशे पनी उत्कृष्ट विनयथी सिक्षार्थराजा स्वप्न लक्षण पाठकोनें कहे ॥ ६ ॥ ॥ हे देवापुप्रिया थाज त्रिशलाक्षप्रियागीयें पूर्व वर्णवी थाष्या एवा महोटा गजपनादि चोद स्वप्नां ते यावत् अल्पनिज्ञमा सुती थकी देखीने जागी॥ ३०॥ ॥ तेथी ए चोद स्वप्नावं हे वेवाणु प्रिया का कल्याणकारी फज पाशे ?

॥ तेवार ते स्वप्नलक्षणपाठक, सिमा क्षत्रियराजाना मुखथी ए वर्ष सानजी घ वाज खुशी थया, ते स्वप्नांने हृवयमा धारण कसा, बने थर्ष विचारवा लाग्या माहोमांहे. विचार कसो, ते स्वप्नांनो अर्थ ग्रहण करो, मांदोमांद एक बीजाने पूतीने निश्चय कस्यो, पनी सिक्षार्थराजानीथागल स्वप्नांना शास्त्रोनो विचार कहेता दवा ॥७॥ ॥ ते शास्त्रांतरथी स्वप्नांनो विचार लखे जे मनुष्योने नव प्रकारे स्वप्नां थावे तेमा प्रथम तो जाणेली वात स्वप्नामां यावे, धीजी सानलेली वात स्वप्नामा देखे, त्रीजो दिवसें दीली वस्तु स्वप्नामा देखे, चोपुं वात, पित्त, कफना विकारथी स्वप्न थावे, पांचमो सहज स्वनावधी स्वप्न देखे अथवा मजमूत्रादिकनी पीडाथी स्वप्न देखे, बो चिंतामा पठ्यो थको स्वप्न देखे, ए कारणथी जे स्वप्नां थावे ते निष्फल ने एन कांश गुनागुन फल प्राप्त थाय नदी सातमो देवतानी सान्निध्ययी स्वप्नु वेखे, थाउमो धर्म कर्ममा रहेलो प्राणी घणे धर्म करे तेने धर्मना प्रनावी उत्कृष्ट पु एयने योगे स्वप्नु थावे, नवमो घणा उत्कृष्ट पापना उदयथी स्वप्न थावे ए पाब्ला प्रण स्वप्नां जो प्राणी देखे तो तेनुं गुना न फल अवश्य थाय खाली न जाय तथा धातुप्रकोपथी वा युनु जोर होय तेवारें वृक्ष, पर्वत, ट्रक उपर घडवु तथा श्राकाशमा उमवु एवा स्वप्नां यावे तथा पित्त प्रकोपथी सोनु, रन, सूर्य बने थग्नि प्रमुख स्वप्नांमा देखे तथा श्लेष्म थधिक दोय तेना योगयी अश्व, नक्षत्र, चर, मुक्तपद, नदी, सरोवर, समुश्श्यादिक उलंघणा देखे ते नि प्फल नाणवा वली गाय, बलद, हाथी, महेल, पर्वत, हूंक एमना उपर चज्यो एतु स्वप्न देखे तो मदोटाइ पामे तथा विष्टाविलेपन शरीर देखे तो निरोगी थाय,स्वप्नमां रुदन करे तो दर्षनी प्राप्ति थाय, स्वप्नामा राजा, हाथी, घोडो, सोनु, घसद, गाय,कुटुव देखे तो कुलनी वृद्धि होय, 2004 तया प्रासाद उपर चढीने जाणे जमुंबु ए, स्वप्न देखे तथा समुइ तरुबु एवं स्वप्न देखे तो जो नीचकुलमा तेनो जन्म थयो होय तोपण ते राजा थाय वली दीपक, मांस, फल, कन्या, प स, नत्र यने ध्वजा एटला वाना स्वप्नांमां देखे तो जय पामे, तथा पोताना श्टदेवनी प्रति माने जो स्वप्नमां देखे तो थायुर्वदि पामे तेमज कीर्ति, यश यने धननी पण वृद्धि पामे व ली जे कपास, जस्म, दाड बने बस ए चार श्वेतवस्तु वर्जीने वीजी कोइ पण सपेत वस्तु स्वप्नांमां देखे तो नली जाणवी तथा जे दाथी, देवता, घोडो अने राजा ए चार चीज विना पीजी को काली वस्तु स्वप्नमा देखे तो ते सारी जाणवी नदी तथा स्वप्नमा गायन करे तो रुवन करतुं पडे, स्वप्नमा नाचे तो बदीखाने पडे, स्वप्नमा इसे तो शोचा पडे, स्वप्नमा जणे तो कल थाय, वली जो स्वप्नमां देवता, साधु, ब्राह्मण, राजा, पित, तृपन एटला मादलो को यावीने कोई प्रकारनी वात कहे ते वात थवश्य सत्य याय तथा स्वप्नमां धोलो सर्प जाने मसे तो हजार सोनेयानो लान पाय, वली कोई फम्युं फूल्य वृक्ष तथा रायण वृक्ष तेना उपर पोते चढघो एवं स्वममा देखे तेने घणु धन मजे, वली गघेडो, सेंट, नेंस सो एमना उपर एकलो हूँ चढयो बुं एवु स्वप्न देखे तो ते तत्काल मरण पामे, वली जे पुरुप घोला कपडा वाली घोला चदनर्नु विलेपन करेली एवी स्त्रीने दु जोगबु बु एवं स्वप्न देखे तो तेने सर्व प्रकारनी लक्ष्मी मले, वली जे रातो वस्त्रवाली, रातो चवन कृष्णगध वि लेपन वाली स्त्री जोगबु बुं एवं स्वप्न वेखे तो तेनुं लोदी सुका जाय, वजी जे रजना, सो नाना अने सीसानां ढगता उपर हूँ चल्यो दु एवू देखे तो ते अवश्य समकेत पामीने मोह जाय तथा ने स्वप्नमा वारु प्रमुखनो घरो माणे में पायो ने एवो पोताना बारमा ने माने तो ते समकेत पामीने पीजा नवा मोक्ष जाय ॥ हवे त्रिराजा मातायें जे चौद स्वप्ना दी तेर्नु फल तो था प्रमाणे ले जे प्रथम स्वममा चार तोसलवालो हाथी वीटो ते देख वाथी ए पुत्र महा पराकमी थाशे वली वान, शील, तप थने नाव रूप चार प्रकारना धर्म नी प्ररूपणा करशे, वली चोसन २ तथा गजपति जे राजा ते एना चरणकमजने सेव शे ॥ वली वीजे स्वमे तृपन वीठो तेथी तमोने धर्मघोरी पुत्र थशे एटले जरतक्षेत्रने विपे जेम कर्पणी पन थकी धान्य बीज वावे तेम ए पुत्र बोधरूप धान्यनु बीज वावशे ॥त्रीजे स्वप्ने सिंह दीगो तेथी निर्नय अने शूरवीर त्रण सुवनमा पोतानी थाझा मनावशे एवो ए पुत्र थाशे एटले जेम सिंद होय ते श्वापद जीवोथी विनाश पामतुं एवं जे वन तेनु रक्षण करे तेम एपण सम्पक् प्ररूपणा रूप सिहें करी कुष्टि जे मिथ्यात्वरूप श्वापद जीवो तेथकी नाश पामतु एवं जे नव्यजीवरूप वन तेनुं रक्षण करशे, एटले मिथ्यात्वरूप थापदाथी नव्यजी वोनु रक्षण करशे यथवा थातकर्म श्रने चाउमवरूप श्वापदोनो नाश करशे, वलीत्रण नुव नने विपे पोतानी थाझा मनावशे ॥ चोथा स्वप्नमा लक्ष्मी देवता दीठी तेथीत्रणजगतनी तीर्थकर लक्ष्मीनो जोक्ता थशे एटलें वरसीदान दे दीदापाली केवल रूप लक्ष्मी पामीने थान प्रातिहार्यरूप तीर्थकरनी लक्ष्मीने जोगवशे ॥ पांचमां स्वप्नमां फूलनी वे माला वीवी तेथी सत्पुरुपोने माथे पूज्य पशु नोगवशे एटले जेम फूजनो तोरो मस्तकें धराय ने तेम एनी थाझा पण सर्व नव्यजीवो मस्तके धरशे तथा वे माला दीठी माटे एक श्रावकनो अने बीजो साधुनो एवा घे प्रकारना धर्म कहेशे ॥ हा स्वप्नमां चश्मा दीठो तेथी ए सौम्यवर्शन वालो यशे, शीतल परिणामवालो थशे,जव्यजीवरूप कुवलयनो वोध प्रकाश करवाने चश्मा सदृश

थगे। सातमा सनमा सूर्य दीगे तेथी मिय्यात्वरूप थधकारनो दर्ता थशे तया पोते प्रनाममलें
फरी थरुत थशे॥थानमा स्वप्नमा ध्वजा दीठी तेथी कुखमा ध्वजा समान उसम थाशे तथा
धर्मध्वजायें करी विराजमान थाशे, जगतने चारे दिशायें धर्मध्वजायें करी शोनावशे ॥ नवमा
सप्तमा पूरण कलश वीतो तेथी सपूर्ण गुणी थशे तथा धर्मरुप प्रासाद उपर कलश चडावशे ॥
दशमा सप्तमा पद्मसरोवर दी तेथी जगतना तापने दरवावालो थाशे तया चालतां
थका एना पगताने देवता सुवर्ण कमल थापशे ॥ श्रगीथारमा स्वप्नमा खीरसमुप दीगे
तेथी गनीर हृदय वालो थाशे तया केवल ज्ञानरूप रत्न पामीने चौदराजलोकना जाव
जाणशे ॥ यारमा स्वप्नमा देव विमान दी तेथी देवताउनो पूजनीक थाशे एटले वैमानिक
पर्यंत चार निकायनां देवता एनी सेवा करशे ॥ तेरमा स्वप्नमां रत्ननो राशि दीगे तेथी
देवता घणगढ करशे तिहां वेशी नव्यजीवोने पर्मदेशना थापशे चौदमा स्वप्नमा निधूम
थमि दीठो तेथी वीलिवत थाशे तेजवत थाशे तथा जेम श्रमि कंचनने शुद्ध करे ने तेम
ए तमारो पुत्र थात्माना शुरू सनावनी गुदि करनारो थाशे, नष्यजनोना मन शुद्ध करशे,
कर्ममलने वाली नासशे ॥ तथा ए चौद स्वप्नां दी तेथी चौदराज लोकनो स्वामी थाशे ॥
एवा चोद स्वप्नाथी एवां फल वालो तमारो पुत्र थशे ॥ वली स्वप्न पातको कहे चे के हे देवा
सुप्रिया अमारा स्वप्नशास्त्रमा बेतालीश स्वप्नां सामान्य अनफल दायक कह्यां ने यने त्रीश
स्वमा उत्तम महोटा फलनां देवावाला कहां ले सर्वमली वहोतेर स्वप्नां कहां के तेमाथी श्री
अरिहत यने चक्रवर्तिनी माता, यरिदत थने चक्रवर्ति गर्नमां थाष्या थकां ॥ प्रथा ग्रंथ
॥त्रीश महोटा स्वप्नामांची गज तृपनाविक चौद महोटा स्वमा रेसे अमे
॥४०॥

वासुदेव गर्नमां थावे तेवारे वासुदेवनीमाता ए चौद महोटा स्वप्नां मांदेला कोइ पण सात स्वप्ना देखे ।। ०५॥ ॥ यलदेव गर्नमा थावे तेवारे बलदेवनी माता ए चौद महोटा स्वप्ना माहेला गमे ते चार स्वप्नां देखे ॥ ६ ॥ ॥ ममलिक राजानी माता ए चोद स्वप्नां मांदेलु एक स्वप्न देखे ॥ ४ ॥ दवे वेतालीश मध्यम थने त्रीश उत्तम स्वप्न जे पूर्व कह्यां तेना नाम कहे जे तिहां प्रथम तालीश स्वप्ननां नाम कहे जे गधर्व, राक्षस नूत, पिशाच, बुकस, महिप, अहि, वानर, कटकम, नवी, स्वर्जूर, स्मशान, उंट, खर, मार्कार, श्वान, दोस्थ, संगीत, धीज, नस्म, यस्थि, वमन, तम, कुस्त्री, चर्म, रक्त, यश्म, वामन, कलह, विविक्तहष्ठि, जलशोप, नकप, ग्रहपुर,निर्यात, नंग, नूमकन, तारापतन, सूर्यच स्फोट, महावापु, महातप, वि स्फोटक, मुक्पि ए बेतालीस मार्ग स्वप्न श्रन फल दायक जाणवा दवे त्रीश उत्तम स्वप्नं ना नाम कहे ने थईन, घोछ, दरिकृष्ण, शत्रु, ब्रह्मा, स्कद, गणेश, लक्ष्मी, गौरी, नृप, इस्ती, गो, तपन, चं, सूर्य, विमान, गेह, अग्नि, स्वर्ग, समुह, सरोवर, सिंह, रनरेल, गिरि, ध्वज, पूर्ण घट, पुरीप, मांस, मत्स्य, कल्पडुम, ए त्रीश स्वप्न शुन फलदायक जाणवां ए वधां मली यहोतेर स्वप्ननां नाम श्री वर्षमान सूरिकत स्वप्नप्रदीप ग्रथने थनुसारें लख्यो ने ॥ ॥ हवे जे पुरुप स्थिरचित्तवालो होय, जितेंघिय दोय, पंचेंघिय जेणे वश करेला दोय, शांत मुशवालो होय, वली धर्मरुचि होय, धर्मानुरागी दोय, धर्म उपर अदावत दोय, दयावत होय, इत्याविक उत्तम गुणनो धणी होय, तेने जे स्वप्तुं दीठामा थावे, ते सारं अथवा मानु तरत फले वली रात्रिने प्रथम प्रदरे स्वप्न देखे, तो एक वरपमाहे फल थापे, रात्रिने वीजे प्रदरें स्वप्न देखे तो उमास मांद फल थापे, रात्रिने त्रीजे प्रहरें स्वप्न देखे तो त्रणमास माहे फल थापे, रात्रिने चोथे प्रहरें स्वप्न देखे, तो एक मासमाहे फल थापे, रात्रिना थंतनी वेलेली वे घडीरात्र रहे तेवारे स्वप्न देखे, तो तेनुं फल दश दिवसमादे पामे, सूर्य उगती बेलायें स्वप्न देखे तो तत्काल फल पामे तथा जो मातु स्वप्न दीगमा श्रावे तो पाग मुश् रहेढुं थने कोश्नी थागल कहेतु पण नही तथा उत्तम स्वप्न देवी गुर्वादिक थागल कहे, जो सन लाववा योग्य को जन न मचे तो गायना कानमा पण संजलाववु, नखं स्वप्न देखी पड़ी सुवे तो निष्फल थाय, नलु स्वप्न देखी मूर्ख जन थागल तो सर्वथा न ज कहेवु केम के जेतुं फल सांजवे, तेवू फल पामे पण उत्तम पुरुप बागलज कहे ते उपर मूलवेवन दृष्टांत कहे को एक राजानो पुत्र थणमानितो थको ले तेनु नाम मूलदेव ने पण तेने वान थापवानु घाज व्यसन ने तेथी राजायें तेने काहाडी मूक्यो ते फरतो फरतो कोक गामे थाव्यो पोते मदा धर्मवत जैनमति डे परंतु खावाने नहढे तेवारे शहेरमा याचवाने गयो तिहां फरतां एक वा पणीयांयें जेशने यर्थे घडव संध्या दता ते मूलदेवने थाप्या तेने लश् वाडीमाथाष्यो थने मन मा चितववा वेठो जे कोथतिथि थावेतो तेने नोजन यापीने पनी द्व नोजन करूं एटलार्मा एक साधु पण नून्यो थको त्यां थाष्यो, तेवारे मूलदेवें ते शपिने देखी वाकला वोहोरावी दी घा थने पोते थानदपणे सुश रह्यो तिहां निराबाय पणे वो घमा मे गल्यो एवं स्वप्नु दीहूं, ते स्वप्न देखीने जाग्यो थने वली जे वाडीमा ए मूलदेव सूतो तो तेज बारीमा एक यावानो मन वे ते पावाना चेलायें पण तेहज सप्तुं वीतुं देखीने जाग्यो प्रनातें पोताना गुरुनें कपुं ते वारे गुरुये कयुं जे तु आज गाममा निक्षा सेवा जश्श तेवारे तुजने चश्मा जेटलो महोटो घृतें चोपरेलो रोटतो गोल सहित मलशे ते सांनती चेजो राजी थश्ने निक्षा जेवा गयो ते पाम्यो तेवारे राजाविना कोश्ने चाले नही तेथी पंच एकग थश्न एवा ठराव कखो के पाटवी घोडो, पाटवी दस्ति थने पाटवी प्रधान इत्यादिकने शणगारीने कर्यु जे जेने ए राजा करी थापे तेने राजगादीये साडीयें केमके एम कयाथी पित्रा गोत्राइ जे होय ते थागल कोश बांधो करी शके नही हवे हाथी श्रने घोडो ए वे वाहेर नीकलीने जे वाढीर्मा मूलदेव सूतो वे ते वाहीमा श्रावी हाथीयें गललाट करी मूलदेवना मस्तके कलश ढोल्यो थने घोडे दणद वाट कखो पठी हाथी तेने शूढयी उपाठी पोतानी पीठ उपर वेशाडीने शहेरमा लइ था व्यो, लोकोये तेने राजपाटें थाप्यो माटे सारु स्वप्न दी होय तो उत्तम माह्या पुरुप थागल रुहेतु पण मूर्ख थागल नज कहेतु ॥ दवे उत्तम स्वप्न मूरख श्रागल कहेवाथी जे ख थाय ते श्राश्रयी वणिकस्त्रीनु वीच दृष्टांत कहे , कोइएक वणिकस्त्रीय स्वप्नमाहे समुह पीधो, प्रनातें ७ जाततार । नर पाम, वली जात्रायें जाय, पूजा करें,तेने कुलदि थाय हव, सरोवरें कमल उग्यां देखे,ते कोढ रोगें मरण पामे हाथी, घोडो, गादलु, सिहासन तथा घरना वस्त्र एटलां वानां गयां देखे तो रा जानो नय थाय, दथीयार, थानरण, मणि, मोती, सोनू थने रूपु एटला वानांनो नाश थतो देखे तो तेनुं धन थने मान के वानां जाय, जे पोतानी नार्याने कोई सजाय वे एवु देखे तो तेनी सपदानो नाश थाय, पोतानी स्त्रीने कोइ परानव करे एवं देखे तो क्लेश उपजे, गोतमाहेली स्त्री कोइ लइ जतो देखे तो तेना ना प्रमुख वधीखाने पडे, पोतानो दोलीयो थने घोलुं वस्त्र स्वप्नमां देखे तो पोताने पीडा उपजे, कोई मनुष्यना पगर्नु छ मास नक्षण करुं बु एवु स्वप्न देखे तो राजा थाय, पनसरोवर, समुश्यने नदी उतरतो देखे तो घणु इव्य पामे वली उठे पाणी, गायनुं बाण गोजमां नेलवेलु पीधु एवं देखे तेने यतिसार रोग थाय तेथी मरण पामे, देवमूर्तिनी पूजा करु हुँ, यात्रा करुंडु एवं देखे तेने सर्वप्रकारें वृद्धिथाय, हृदय उपर कमल वग्युं देखे तो तेनु शरीर कोढरोगे विनाश पामे इत्यादि ॥ माटे दे देवापुप्रिया' त्रिशलाकृतियाणीये जे चौद महोटा स्वप्ना दी ते अवारकारी, मगलकारी ले तेनुं फज हे देवाणुप्रिया' थर्थनो लान थाशे जोगनो लान थाशे, पुप्रनो लान थाशे, सुखनो लान थाशे तेमाटे हे वेवापुप्रिया' निधे ए त्रिशला कृत्रियाणीने नव मदीना अने सादासात दिवस व्यतिक्रम्यानतर तमारा कुलमा ध्वजा समान, दीपकसमान, मुकुटसमान, पर्वतसमान, तिलकसमान, कुलनी कीर्चिनो करवा वालो, कुलना निर्वाहनो करवा वालो, कुलमा सूर्यसमान तेजवत, कुलनो श्राधार, कु लना यशनो करवा वाजो, कुलमा वृपन समान, कुलपरंपरानी वृद्धि करवा वालो, जेना हाथ पग घणा सुकोमल वे एवो वली कोश इश्येि हीन नही, लक्ष्ण व्यंजन गुण सदित, मा नोन्मान सहित, सपूर्ण सर्व अग जलो सौम्याकार, वजनकारी जेनुं दर्शन के एवो पुत्र थाशे ॥ ७० ॥ वली ते पालक बाल्यावस्था बोडीने जेवारे विनय विज्ञान पणो मुंवान अवस्था पामशे तेवारे शूरवीर, पराक्रमवत, घणा दाथी घोडा रथ प्रमुख सेनानो मालक, चार श्रत एथिवी सुधी राज करवा वालो एवो घर्ति राजानो राजा था अथवा प्रण लोकनो नाथ धर्मचक्रवर्ति एवो तीपंकर पाशे ॥ ४५ ॥ सेना वास्ते दे देवापुप्रिया त्रिशजाशप्रिया एगीयें यावत् मगलकल्याणकारी, स्वप्नां दी ॥७॥ तेवार सिदार्थराजा ते स्वप्न लक्षण पाठ कोनां मुखथी एवो थर्य सानली करीने हृवयमा दर्ष सतोप पाम्यो थको दायजोडी यजली करीने स्वप्न लक्षण पाठकोने कदेतो दवो ॥१॥ एमज थवानुं ने, हे देवाणुप्रिया एवोज एअर्थ में, जुगे नथी, में वांब्यो तेज प्रमाणे तमारा मुखथी ग्रहण करो, जे तमे कदो बोते सत्य ने एवं कदे था वचन उपर कोश्क टीकाकारे नोजराजानी वारमा एक गागो तेली थयो ने तेनुं दृष्टांत थापेलु डे परंतु ते पाडली थयेलो के थने था वाततो प्रथमनी ने तेथी ए दृष्टांत मलतु नथी पण उपनयनमा मलती वात के वली दृष्टांत दोय ते एक देशीय दोय माटे लो कने थानवने वास्ते जोपण अंतर्वाच्यादिकोमा नथी तोपण लखीमूकीये .यें तयथा ॥ सि वार्थराजा कहे बे के मुसिदिनु कहे ते सर्व स्थानके सिब्ज थाय दे जेम गांगा तेलीने ययु ते गांगा तेलीनी कथा कहे वे कोशएक विद्यार्थि दक्षिणदेशमा प्रतिष्ठानपुर नगरने विषे कोश एक नहनी पासेंथी त्रीश वर्ष पर्यंत विद्या जणीने थहंकारमा थाव्यो तेवारे माथा उपर थ कुश धारण कयो तथा रखेने विद्याये करीने महारो पेट फाटी जाय तेना गर्वथी पोताना पेटने पाटो वांध्यो, वजी जो कोइ वादी महारा साथे वाद करता नाशिने थाकाशमा जाय तो तेने निसरणी उपर चढी नीचो पटकी थापु एवा गर्वे करी एक नीसरणी पण पोतानी पासे राखी, वली वादी जो नाशिने पातालमा प्रवेश करी जाय तो तेने खोदीने वादार काहा टीश एवा थनिमानथी एक कोदाल पण पोतानी पासे राखी तिहां निसरणी तथा कोदाल एक चाकरना माथा उपर थापी तथा वली जो कोई वादी महारा सार्थे वावमा दारी जाय तो तेना मुखा तृण रखावी देवु एवा विचारथी एक माणस घासनो पुलो लश्ने तेनी पवाहे पठवाडे चाले एवा थामवर सहित चालतो थको दक्षिण, गुजरात, मारवाड, मेवाड इत्यादिक देशोना पंमितोनी साथे वाद करी तेने जीतीने सरस्वतीकारण इत्यादि बिरुदा वली पोजावतो थको सर्व गामोना पंमितोने जीततो थको थनुक्रमे मालवदेशमा उक्लेपी नग रीना नोजराजानी सनामा पांचशे पंमित एवी वात सांजलीने ते पमितोनी साथै वाद करवा सारु उरणीय थाव्यो तेने राजायें महोटा थामबरथी नगरमा प्रवेश कराव्यो, रुडा महेनमा उतारो थाप्यो, पठी ते पंमित राजानी सनामां थावी पमितोनी साथे वाद करीने राजानी समझ कालिदास माघ थादिक पांचशे पमितीने जीत्या तेवारें राजाये विचार्यु जे था महोटो थामर्य थयो जे परदेशी लर्ट थावीने महारा सर्व पमितोने दरावी दीधा तेथी पंमितोना माननी दानि य एवो चितातुर थाने क्रीडा करवाने थर्ये जावा लाग्यो मार्गमा जर्ता रस्तामा एक थारल्प वालो एक गांगोतेली घाणी उपर वेठो ने ते घाणीमाथी तेन लइने बीजो एक लदो घडो हतो तेमां नाखे पण तेजनुं एक टीपु मात्र बाहेर पडवा दीये नही एवा काणा घांचीने देखीने राजाये विचास्यु जे था काणानी बुद्धि जूठ केवी ने तो ए को पानी थकलनो तो पारज नही होय एम कहेवु तेज सत्य पनी राजायें तेने बोलावीने पुनघु के थरे तुं नट्टाचार्य सापे संवाद करीश ? तेवारे ते बोल्यो हा महाराज ' 8 वाद करीश एमां महारु ' जवान वे' ए नवाचार्यनी साथे वाद करवो कोई महोटी वात नथी जो जोरावर जबर देखीश तो पण थटपटा न्यायथा तेने जीती लश्श पठी राजायें थादित्यवारने दिवसें नहा चार्यने वोलावीने कयुं के हेनाचार्य महाराजे साधारण नहोदता तेने तमेजीत्या पण दजी मदारा सर्व पंमितोनो जेथाचार्य के तेनी साये जो वाद फरो अने जीतो तो ईजाणु जे तमे खरा पंमित बोतेवार दक्षिण नहाचार्य कहुं दा राजन् । हूं तेनी सार्थे पण वाद करीश माटे ते स्यांचे तेने थाही वोजावी ज्यो तेवारे राजायें नहाचार्यने श्रासन थापी वेसाग्यो पनी कालीवास, क्रीडाच प्रमुख नहोने एकठा करीने कयुं के जा पंमितजीने ला श्रावो तेये जइ गांगातेलीने नट्टाचार्यनो वेश कराव्यो, घरेणां पड़ेराव्यां थने शरीरमा तो ते, प्रथम थीन मातेलो मदोन्मत्त दाथी सरखो ने तेने पालस्वीमां बेसाडी पांचशे पंमितोयें परवस्यो थको राजसनामां लाव्या, राजायें धनी थादर दीधो, सर्व सना उठी उनी यश्ने महोटा सन्मानथी सिहासन उपर वेसाब्यो तेवारे दक्षिण नष्टाचार्यं तेने जोड्ने विचार्यु जे थातो मातेलो ने श्रने हुतो शरीरे ज्वलो तेथी एनी सार्थे वाद करतां पार थावे नही माटे एनी साथै वच ननो कलद करवो नही, मात्र तत्त्वज पूबवु एम चिंतवीने एक थांगुली उंची करी तेवारें नोजराजाना नहें क्रोधकरी वे थांगुली उची करी ते जो दक्षिण नट्टाचार्ये चमत्कार पा मीने पांच थांगुली उंची करी बतावी ते जो गांगातेलीयें मुठी नीडी बतावी तेवारें दक्षिण नट्टाचार्य पोताना मस्तक उपरथी थक्कुश सतारी नारख्यो, पेटे पाटो बांध्यो हतो ते गोडी नाल्यो भने निसरणी तथा कोदाली पण नावी दीधी, तृणनो पूजो बाली नारख्यो, समस्त माननो त्याग करी सर्व सना समक्ष नोजराना नष्टने पगे लाग्यो भने कदेवा लागो के महोटी थापर्यनी वात ले जे मने कोए पण जीत्यो नदी पण तु महोटो पंमित माटे ते मुजने जीत्यो ते जोर जोजराजा विस्मय पामीने दक्षिण नट्टाचार्यने पूठ के तमे केवा प्रकारनो वाद कस्यो तेवारे नट्ट बोल्यो के तमारो नट्ट महाज्ञानवान् ठे कारणके में एनी साथें समस्यायें वाद करो जे था जगतमा एक शिव ने एतु स्थापन करवा सारु एक थांगुली तमारा नहने वतावी तेवारे तमारा नढे वे थांगुली देखाही तेथी। दु समजी गयो के एक मात्र शिवज नयी पण शिव अने शक्ति ए वे पड़ी वली में कपु के इपियो पांच ने तेथी पांच थांगुली वतावी तेवार थापना नवाचार्य मुठीनीडीने वतावी तेथी दु समजी गयो के पांचश्यिोतो स्वरी पण तेने वश राखवी जोश्ये तेवारें में जाएयु जे ए पंमित त्यागी ज्ञानी थने जितेंघिय वे एवीरीते वाद थयो तेमां दु दारीगयो एना समान पीजो पंमित में क्याय पण दीगो नदी एवं कहीने दक्षिणनट्टाचार्य माननृष्ट थयो थको पोता ने वेशे चाल्यो गयो, पाठलथी नोजराजायें गांगातेलीने पूघु के तें केवा प्रकारनो वाव कस्यो थने केवीरीते जीत्यो तेवारे तेली योज्यो के महाराज दक्षिणजष्टाचार्य घणो खराब माणस ने मने कहेवा लाग्यो के ताहारी एक थांख देते फोडी नाखीश एवं मनमा लावीने एक थांगुली चीकरी तेवारें में वे बांगुली उची करीने समजाव्यो के तुंतो एक थांख फोडतो पण रही जाइश परंतु दु तादारी वे थांखो फोडी नाखीश त्यारे मने पंजो देखाडी पोल्यो के हूँ तने थाप मारीश तेथी तादारुं मोदोई फरी जाशे तेवारे में मुनीवाली बतावीके दु तुजने एक मुठी मारीश तो तु पातालमा पेसी जश्श एवी वात तेलीना मुखथी साजलीने राजा प्रमुख सर्व सनाने दसवु थाव्यु बने वोल्या के ए महोटो नाम्यशाली सुसिदिवालो ने ए, कढ़ी वस्त्राविक पढ़ेरामणी थापी सन्मान देई गांगा तेजीने घेर पोचतो कस्यो एनी पेरे सिक्षार्थ राजा कहे के के हे स्वप्न पातको तमे मुसिदि कहो तेथी मदारेतो तमारूं कहेतुं सत्य था एवें सिक्षार्थराजाए स्वप्न पाठकोने कसं कदीने ते स्वप्ननि रुडीरीते धारण करीने ते स्वप्नलकण पाठकोने घणा अशन पान स्वादिम स्वादिमाविक चार श्राहार जमारीने मत फल गंध माता ॥ घरेणाविकें करीने सत्कार सन्मानथाप्मु ते सत्कार सन्मान थापीने घणी याजीविका जीवे तिहां सुधी खाया करे एवी करी दीधी थर्थात् गाम प्रमुख थापीने शीख थापे ॥२॥ तेवारपनी सिक्षार्थ क्षत्रियराजा सिंहासन यकी उतीने जिहां त्रिशलाक्षत्रियाणी पहिलमा वेठी वे त्यो थावीने कदे ने ॥७॥ ॥एवो निमय हे देवापुप्रिया स्वप्न शास्त्रमा बैंतालीश सामा न्य स्वप्ना थने त्रीश महा स्वप्नां सर्व वदोत्तेर स्वप्नां का बे तेत्रीशमाथी चौव महोटो स्वप्ना तीर्थकर अने चक्रवर्तिनी माता देखे बने एज चौव स्वप्न मांदेला सात स्वप्नां वासुदेवनी माता देखे थने चार वलदेवनी माता देखे, एक ममलिकराजानी माता देखे, एवं स्वप्न पाठके कम् ने जे तमे चौदे स्वप्नां दीवां ॥७॥ ॥ते तमारे चक्रवर्ति तथा तीर्थकर दोवावालो पुत्र थाशे ॥७॥ ते पनी त्रिशलादेवी ए श्रर्थ सांगलीने हृदया खुशी थइ यावत् स्वप्नांनो श्रर्थ धारण करीने ॥७॥ ॥ सिक्षार्थराजानीथाशासश्ने नाना प्रकारना मणिरत्नोना बाजोग्यी ठीने ता कीवरहित यावत् राजहंस सरखी गतियें चालती थकी ज्या पोतानुं वन डे तिहां श्रावीने पो ताना मविरमा प्रवेश करती दवी ॥४॥ ॥जे दिवसथी श्रमणनगवत श्रीमहावीरस्वामी ते राजानाकुलमा हरणिगमेपी देवें संहराया ते दिवसथी वेश्रमणनामे महाराजनोजे नमारी जे लोकोमा धनद एवु नाम ते नमारीना ढुकुमना अठाववा वाला एवाजे तिर्यक लोक निवासी वैताढयपर्वतनी मेखलाये रहेनारा व्यंतरनिकायनां तिर्यगजृनक देवता ते शश्ना हुकुमथी घणाजघणा एवा जे जुनाधन घख्या महानिधान ते केवा धन तोके जे धनना स्वामी हीण यगया, जे धनना संचयकरवा वाला घडाववा वाला मरण पामी गया जे, तेमनो को गोत्री पण रह्यो नथी, सर्वथा ते धनना स्वामी विछेद गया, माटवा वाला विछेद गया, माटवा बालानां कुलगोत्र पण विष्वेद पाम्या तेमर्नु धन ते दवे जे स्थानके गालीने मरीगया ते स्थानकोना नाम कहे वे गामधिनां गुण जिदा जता रहे तेने गाम दीये तिदा घडावीने मरीगया ते धन तिहांज रहीगगुं, ते धन तथा जिदा कर नही लागे तेनें नगर कदीये, धूल नो कोट जिहां दोय तेने खेट कदीय, खोटुं नगर ते कर्वट कहीये, शदेरथी वे कोश उपर जे गाम दोय ते ममप कहेवाय, जेने चारे वाजये गाम वसे ते शेणमुख कहेवाय, जलमा अने यजमा थने मार्ग जाय ते पण कहीये, जिदा तापसोनु वसनु होय तेने थाश्रम कहीये, तीर्थस्थानके जे गाम दोय तेने सवाद कहीये, सार्थवादने उतरवानु स्थानक दोय तेने सन्निवेश कदीयें एवा प्रकारनां गामोने विपे सिंघोडाने थाकारें रस्ता दोय तेने विपे तथा प्रिवाटाने विपे, चोवटाने वपे तथा घणा मार्ग जिदा नेला यता दोय तेने चचर मार्ग कहीये तथा चोमुस्खा देवोना मदिरमा, मदोटापंथ वाला राजमार्गने विपे, देवकुलमां, सनामा, पाणीना स्यानकर्मा, वागर्मा, उद्यानमा, वना, वनखममा, एकजातिनां वृक्ष दोय तेने वन कहीये, थनेक जातिनां वृक्ष जेमा दोय तेने वनखम कहीये, मसाणमा, सूनाघरमा, पर्वतनी गुफाउंमा, दोमना स्थानके, पर्वतनी शिजा खोवेली दोय तेमा, वेसवानी शालामा, जोकोने वसवाना स्थानकोमा एटला स्थानके घालेला जे धन ते सर्वजगाठना धन लइ जश्ने सिदार्थ राजाना घरमा नाखो एवो महाराजनो ढुकुम थयो तेवारें तिलोकना वसवा वाला तिर्य गज़नक देवता ते सर्वधन लइ जश्ने सिदार्थराजानां घरमा नाखे ॥७॥ ॥जे रात्रिमा श्रम नगान श्रीमहावीर स्वामी ज्ञातम्लजे सिदार्थराजा तेना कलमां याव्या ते रातिथी मामीने निसागमा, सोनेकरी रुपेकरी पनेकरी शाम्पेकरी राज्यकरी शेकरी वाहनेकरी कटो करी, पालखी प्रमुखेकरी, नमारेकरी, धान्यना कोगरेकरी, पुरेकरी, थतेरजे राणीयोनो परि वार तेरोकरी, देशवासीलोकोयेफरी, यशवातेकरी, घणु घणं वध्या, वृद्धि पाम्पा तथा पणो धान्य गावामां आवे एक चोवीश प्रकारना धान्य तेना नाम कहेडे जव, घय, साति, नीति, साठी, कोश्या, सामो, कांग, राल, तिल, मग,बरद, थलसी, चणा, तिवमा, वाल, सिलिद, राजउडद, वधू, मसूर, तुथर, कुत्तथ, घाणा, कलायरो, इत्यादिक प्रकारनां धान्यपी तथा वीजा पण सोनु, रूप, रज, मोती, मणि, दक्षिणावर्तशख, राजवत, शिला, मुगिया, लाल रन, पराग थाविके करी वथ्या दि पाम्या तथा प्रीति, सत्कार, समुदाये करीने पण घयाज वध्या, क्षिपाम्या, तेथी अमरानगवत श्रीमहावीरस्वामीनां माता पिताना मना एवो दर्प विचार उपन्यो । तए । ॥ के जे दिवसथी अमारे था पुत्रकू। खमो याष्यो ने ते दिवसपी लश्ने अमे सर्वप्रकारे पूर्व कहां एवां सोनां रूपां प्रमुख वस्तु येंकरी वभ्या,प्रीति सरकारें करी घणाघणाज वया, माटे जेवारे थमारे घेर था पुत्रनो जन्म थाशे तेवारे श्रमे ए बोकरानुं नाम जेवा एमा गुण जे तेषु थापी, वृधिपणाना गुणेकरी वर्धमान एछ नाम स्थापन करी ॥५॥ ॥ तेवारे अमानगवत श्रीमहावीर स्वामी पोतानां मातानी छपर थनुकंपा एटचे क्या सावीने विचास्सु जे दु जेवारे गर्नमा दालु चालु तु तेवारे माताने सुख उपजे जे एम चितवीने मातानी कूस्खमां निचल रह्या, हाज्या घाल्या नही, कृप्यानदि, पोतानां श्रगोशंग गोपवी राख्यां एवा धया थका रह्या, हा कवि स्प्रेका करेले के जाणे जगवान् मोदाजाने जीतवासारु एकांते विचार करता रहा ले के' अथवा को परब्रह्म थगोचर ध्यान करे वे केयं श्रथवा कल्याणरस प्रत्यें पोतानाथात्मगुण साधवा ARPAN रह्या वे के ' अथवा कामदेवनो निमद करवाने थथै रूपपरावर्तन विद्या साधता रह्या ले के ? एवीरीतें श्रीनगवान् मातानी कूखने विपे रह्या ते तमोने कल्याणरूप लक्ष्मीने थर्थे था इति ॥ ए१॥ ॥ सेवारे प्रिशलामाताना मनमा एवं थयुं जे महारोगर्न कोई देवता लगयो, ए महारोगर्न मरण पाम्पो, महारो गर्न पविगयो, महारो गर्न गलिगयो, ए महारो गर्न प्रथम हालतो चालतो हतो ते दमणां हालतो पाजतो नथी तेथी जापुढे जे गर्नने कुशल नथी एवं विचारीने मनमा संकल्प थयो, चिंतारूप समुहमा चुन्या, थने हाथ उपर मोदोई धरी नीचीहष्टि राखीने धार्तध्यान ध्याववा लागी, ते थानध्यान था प्रमाणे ते आगला घालावामां कहे जे ॥ १५ ॥ ॥ हवे त्रिशलादेवीनो शोक विचार लखीये यें । यदो एटल्वे स्वेदकारक वचने शोक करे ले के मादारो जे गर्न जतो रह्यो ते द्व निमें थनागणी , हीणापुस्यवाली ई, अनागीयाना घरमा चिंतामणीरन रहे नदी अथवा वारिधीनां घरमा निधान केम रहे ? जेम मारवाडमा कल्पवृक्ष रहे नदी तेम पुष्पहीणने तृपालागे तेवारे थमृत पान करवानी इशा थाय तो ते श्वा केवीरीतें पूरणथाय' वली कहे जे के हे देव, हे कर्म, तुं महा निर्दय बो, निर्जल बगे, सुजने करुणा नथी, अरे पापिष्ट इष्ट थरे निरपराधी लोकने मारवा वाला, सुं मदारो विना मुदे वेरी केम थयो ' तादारों में शो अपराध कसो के जेयकी तें मा हारो मनोरथरूप कल्प वृक्ष ठखेडी नाख्यो, जो में कोई ताहारो अपराध को दोयतो हे पापी तुं प्रगट घश्ने शावास्ते कदेतो नथी ? ते मुजने उखनी स्वाण प्राप्त करी दीधी, ते मु जने घाख्यो थापीने पाबी खेंची जीधी, तें मुजनें दाथमा निधान थापीने पाडो खेंची लीयो, तें मुजने मेरुपर्वत उपर घडावीने पाडी जमीन सपर नाखी दीधी, ते महारा मुखमा था वेजो कोलीयो खेंची लीघो, तेंमदारा निपजेला पाकेला धान्यना क्षेत्रने वाली दी, तें मदारी रसकुपिका नांजी वीधी,तें महारु जहाज नर समुश्मा बावी दीधु,अथवा वली देवने उलनो देवाय / थाय थरे जीव तें पागला नवा एवाज कर्म बांध्या दशे ते कर्म तुजने दमण उदय श्राव्यो वे पूर्वनवा में माताउंनी पासेथी बालकोने दूर का दो तथा गाय प्रमु वनां वाबरुने दूध पीवा दीधु नही, वृक्षनी मालीयो जांगी, सरोवरनी पाल फोडी, वव ल गाव्या, अणगल पाणी पीघां, उंदरोना दिल खोयां, धूजयी जुखां, नोलीयां थने गोहना वरोमा गर्नुपाणी तथा तेल रेन्चु, कीही मकोडाना वरमा छम पाणी रेज्या, पोपट मेना प्रमुखने पांजरामा पाल्यां, तेमनी माताना वियोग कया, चिडा प्रमुख पंखीउँनां माला पा ज्या, मा फोन्या, चूं लीख माखां, जोकोना गर्न उपर क्षेप कसो, गर्न पडाव्या, गर्नस्तनन कराव्या, वशीकरण, उचाटन कराव्यां ताहारो पुत्र मरण पामजो एवा सराप दीधा, पापना मंत्र बने श्रौषध का, कोश्ने विष वीधु, कोश्ना रम चोरी लीधां, कोतुं शील नंगाष्यु, थथवा व्रत खेड्ने जाम्या, कोश्नां गाम बाल्या, महोटा वृक्ष धरतीमाथी उखेडी नाख्या, म होटा तालावनां शोपण करयां अथवा देवश्ष्य नक्षण करयां, जैनमदिर पाख्या, गुरुना थ वर्ण वाव बोज्या, वेवगुरु कपर क्षेप कसो, दान देतांने वर्जना करी, वृदनां फल विदायां थ थवा थनतकाय नक्षण कमां, काचांफज तोच्या घjj कहूँ । एवा मादारे जीवे पाप कसा दशे ते पाप हम मुजने उदय थाय बे के जेथकी महारो थावो गर्न गली गयो, माटे द्रुतो पारविनानी उखणी थइ, जो महारो ए चौद स्वप्ने सूचित गर्न गयो तो हवे'मदारे ससा रमा वीच शु सुख , हूँ राजपाटने करु वधारे झुं कई, प्रणलोके पूजित एवा पुत्र विना A सर्व महारे सुर्नु , दवे हूँ किहाँ जाउ, करु, कोनी थागल जइ पोकार करु, एवा विलाप करती थकी त्रिशला देवी यूथनृष्ट हरणी सरखी थर, हां तिहां जमे, नीसासा नाखे, एवी थष्यवस्थित थयेली त्रिशलादेवीने देखीने सखीयो बवा लागी के हे स्वामिनि थाज तु एवी केम थइ रही दो' थमे तने पूजीये बैये के था इखनु | कारण जे तेवारे त्रिशलादेवी थांस्खमाथी थांशु नास्त्रीने निशासा मूकती बोली के दे सखीयो ! दु तमोने में कहूँ, दु निर्नागणी , महारु जीवितव्य गपुं तेवारे सखीयो बोली हे सखि । थावा श्रमंग लिक वचन म वोल, वीलु सर्व रखं पण तादारा गर्नने तो कुशल नेतेवारे त्रिशला बोली दे सखियो । जो महारा गर्नने कुशज होय तो बीच महारे शंख जे? महारो गर्न जतो रह्यो एजःख वे एवं कहेतां मूर्धा खाइने जमीन उपर पडीगर तेवार सखीयोए चंदनजल बँटका वीने वीजणाये वायरो करी सचेतन करीने फरी पुढघुजे तादारा गर्नने ययुं तेवारे राणी गदगवस्वरथी बोली के महारो गर्न जतो रह्यो एवं सनिली सखीयो पण सर्व दुखी थइ यकी राजाने जइए हकीगत कही तेथी राजा पण इखी थयो, नाटक वाजिन सर्व निपेध कमां, सर्व शोकाकुल यश् वेग के हवे | करीये एवा थया के तेने कांई पण सूजे नदी, तेवारे कोश्क तो निमित्तियाने पूबता हवा, कोइ ज्योतिषीया. जोगीने पूबता दवा अने वृक्ष स्त्रीयो, शांति पुष्टि करती दवी,कुलदेवीने खलना वेती दवी के दे देवीथा वखत तु किदां गई,एवा एवा विलाप करे ये पण त्यां कोई शदी बोले नदी, स्तब्ध थया, सर्व शोफनी राजधानी सरखा थयां था सुथी मुख धोता थका, निशासा खाता था,खे पीठाता थकां, कोश्ने खावं पीतुं पण सूजे नदी एवा स्वरूपे थयां तेवारे थोडी वार पड़ी नगवाने जाएयु के प्रथम वाजिन प्रमुख वाजता हता ते हमणा केम नथी वाजता एबु जाणीवधिज्ञाने जोयु तेवारे सर्व व्यतिकर जाणीने वि चारघु क जु यतः ॥ किंकूर्म कस्पवाबूमः, मोदस्यगतिरीदशी ॥ मुखैर्धातुरिवास्माक, दोपनिप्प नयेगुणा ॥१॥॥ था मोदराजानी गति कहेवी जे में तो गुण कम्मुं तो थांदी उलटुं श्रवगुण ययुं ते उपर कलिकालनुं दृष्टांत कहेले जेम कोश्क पंथी परदेशथी घपु व्यवपार्जन करी पोताने घेर थावतो हतो तेवामा रस्ते चाजता कोश्क थटवीथावी तेमा दव लागो दीठो ते दवा कोश सर्प दाफे बे ते सप्पै पदेला वाट मार्गुने कयुं के मुजने था दवमाथी बाहेर कादाय तेवारे तेणे पाहेर काहान्यो स्यारे सर्प कपुं उनो रहे दु तुजने नक्षण करीश ते पुरुष पोल्यो में तुजने बसतो राख्यो, उपकार कसो, मरणमाथी उगाखो तो उजटो तुंमुजने नक्षण करीश' सप्पै कसु थाज कलिकाल व ने थाजना समयमा गुणनो दोष थाय तेमाटेद्दुतुजने करडीश तेवारे पंथी बोल्यो छ घणा वर्षे घेर जावंबु वली माहारी पासे श्व्य ले माटे घेर जश्मदारी स्त्रीने इव्य थापी तेनी शीस्व मागी श्रावु दु एवो कोल थापी पोताने घेर थाप्यो, स्त्रीने सर्व वात कही शीखमागीने ते पुरुप थटवीमा पाने थाव्यो, स्वीपण पालथी थावी सर्पने स्तुति करी कहेवा लागी जे थदो नागराजा महारा जरतारनु नदण करशोतो मदारी शी वजे थशे, महारे शत्रु पण घणा के तेवारे सपै कर्पु ते शत्रुनिवारण उपाय तुजने बतावीश, तेनी तुं चिंता मकरजे था थोपध महारा राफडा पासे के तेनु मूल जर पापाण अपरे घसीने तेना बांटा वैरी उपर नाखजे तो वलीनस्मथाशे स्वीये ते थोपधी मूलतर, अमृत मुलीने पापाण उपर घशीने सर्प उपर बांटा नाखवा तैयार था तेवारे सर्प योज्यो में तुजने थोपधी देखाडी तो वली मुनेज वाले ने उलटो गुण उपर थवगुण करे ने तेवारे स्त्री बोलीजे गुणनो नाइ दोष ने एq तमेज तमारा मुखथी कहो तो माटे हवे तमारे बोलवु नदी एम कही सपनपर बाटा नाख्या ते बली नस्म यया । ॥ इति कलिकाल दृष्टात ॥ एम विचारी गर्नमांदे रह्या जगवाने एक देशे टचली अगुली द लावीने एक देशे हाल्या तेबारे त्रिशलाजीये जाप्पु थरे महारो तो गर्न बतो बे, बने में फोकट खोटो शोक कसो एतु चितवन करीने कहती हवी के हे सखीयो । महारा गर्नने कुशल ठे, एवी वात दर्पथी कदेती हवी, में थज्ञानयी विलापात करो, महारा नाग्य मदोटा, ढुं धन्य रूतपुण्य, दुत्रणवनमा मान्य, माहारु जीवबु प्रशसनीय, मने जैनधर्म फल्यो, में पूर्व जे धर्म सेप्यो हतो ते प्रगट थयो, महारु जीवg सफल, सखीयो जयजय करवा लागी, थष्ठमगल ममियां, कुंकुमठाव्या, राजाने वधाइ दीधी, राजापण खुशी थयो, वाजिनवाज्या, नाटक मदो त्सव थया, तोरण बांध्या, वंदीजन जयजय शब्द बोल्या, वंदीरखाना बोच्यो,अनेक लोक मल्या, मगलिकनी वातोयें करी कोलाहल यरह्यो, महा दान थाप्यो, ए प्रमाणे थानवथी राजानी राजधानी दर्प रूप थइ, सूत्रकार कहे जे के ते गर्नन कुशल न जाणवाथी सिक्षार्थराजाना घरमा मृदंग, ताल, वीणा, दस्तताल, नाटक इस्यादि लोकवान एवा सर्व कार्य थानव रदित थया हता ॥५३॥ तेथी महावीर स्वामी माताने शोकातुर जाणीने एक देशथी दालता दवा तेवारे त्रिशता हृदयमा दर्प पामीने बोली ॥ ४ ॥ ॥माहारो गर्ने दरण थयो नथी, यावत् गल्यो नथी, था महारो गर्ने प्रथम हालतो न दतो ते दमणा दाले ने, एतु कहीन दर्प पामीने विधरवा लागी दवें श्रमण नगपत श्रीमहावीरस्वामीने विचार थयो जे महारा मा बाप दमणाथीज एवा प्रकारनो मोद करे वे तो जेवारे दु विक्षा आठ तेवारें तो ए घणु ख पामे माटे हवे महारे महारा माता पिता जीवे तिहां सुधी वीदा लेवी कम्पे नदी एवं जेवारे साडाबमहिना गर्नने पया तेवारे नगवाने थनियह लीयो थर्थात् श्रादी साडाबमदीनानो गर्न थयो, साहा उमदीना वीत्या ॥ ए५॥ ॥ तेवार पनी त्रिशलामातायें मान कम्यु, घरे देवपूजा मगल का, सर्व घरेणा थानूषण पहेसां, हवे गर्नप्रतिपालन करवाने अर्थ घणो ठमो थाहार लीये नदी,घणो उन्हो थाहार सीये नही, घणो तीखो सुन मिरचादिकनो बादार जीये नही घणो कडवो निवाविक, पणो कशायेलो दरडे प्रमुख,घणो खाटो ते थांवली प्रमुख,पणोमीगे ते गुडादिक,पणो चोपन्यो ते घी प्रमुख,घणो सूखो ते घणा प्रमुख,घोसूको ते पडला पापडी प्रमुख, पणो लीलो ते फल फूल कंवमूजाविक इत्यादिक नोजन खाय नही, जे नौजन करे ते परा विधि सहित करे, वरपण विधियें करी पहेरें, गधाविक विधियें लीये, माला प्रमुख विधिथी पहेरे, गर्ननी रक्षाने वास्ते पोताने रोग थवा दीये नही, शोक करे नही, मोद करे नही, जय राखे नदी, घणा काम करे नही, जेजे काम गर्नने हितकारी दोय ते ते कामकरे, मानोपेत पथ्यकरती यकी गर्नने पोपे, जे देशमा जे चीज पाचन यती होय, जे कालमा जे चीज गुणकर्ता होय ते चीज वापरे, एवं करे, कोमल शय्याये शयन करे, सुखासनने विषे येसे, उची नीची फरे नदी, इत्याविक गर्न यन करे वली वाग्नट्टादिक मथोमां कडेलु डे ते कदे ने, गर्निणी स्त्रीजो वायई खाय एटले वायुचीज स्वाय तो गर्न कुण्डो थाय, यांधलो थाय, वामन थाय, पित्तकर नारी चीज खाय तो गर्न पडीनाय तथा तेनुं अग पीलु थाय, कफ करनारी चीज खाय तो पामु रोग श्वेत वर्ण वालो थाय थथवा कावरचितरो थाय तथा जो गर्नवाली स्त्री पूण घट खाय अने थांखमा काजल घणु पाले तो बोकरी नेत्र रहित बांधलो याय, धणोतमो थाहार करे तो वायु पो थाय, घणु उनु खाय तो नोकरो निर्वल थाय, मैथुन सेवन करे तो गर्न मरण पामे, घोडा प्रमुख उपर चडे, घणी वोडे, घणी चाले, चालती पडे, पेट मसलावे, खाल प्रमुख नाघे,उंची नीची स्वे, मेडी प्रमुख उपर चढे उतरे, मजहक बेसे, उपवास करे, वमन विरेचन जुलाव लीये एटलां वानां करे तो गर्न पढीजाय, घj रुदन करे तो बोकरो चीपडी पारख वालो थाय, घणा गीत गायतो ठोकरो वहिरो थाय, घणी वातो करे तो लायर थाय, घणु इसे तो मश्करो याय, घणी गालो बोले तो बोकरोलंपट थाय ॥ तथा तुरुतुमा शपथ्य करलु ई खावु ते कहे , वक्रतुमा खूण गुणकारक , शरद ऋतुमा जल गुणकारक , शिशिर झतुमा खाटोरस गुणकारी है, वसत ऋतुमां घृत गोल इत्यादिक गुणकारक ॥ वली को महोटी वृक्षावस्था वाली सश्यर बतावे तेरीते त्रिशलाराणी करे ने ते कहे जे के बाद धीर जयी बोलो, धीरजथी चालो, क्रोध मकरो, पथ्य खाउ, घणो थाकरो घाघरों थने काचली वाधो नदी, घणु दसर्व मकरो, चांदणीमा सूवो नही, केमके अगासें सुवाथकी पुत्र बामो रावणखमो थइ जाय इत्यादिक वली घणु नीचें न चालवं, घणी उंची चडीशर्मा, विवसे सुवायकी बोकरो ठंघण याय, थायी चाय, नख कापवा पकी पुत्र कुशीजीयो थाय, घएं दोडवाथी पुत्र चचल थाय, घणु दसवाथी दोउ, वांत, तालु बने जीन कालां थाय, घणा गीत गावायी बहेरो थाय, वीजणे वायु कसाथी उन्मत्त थाय, थति बोजवाथी वोलको थाय, थति शोक कमाथी उच्चाटीयो थाय, मूर्धायको निर्वृद्धि थाय, अति नय राखवाथी गर्न बीक ण थाय, यति परिश्रम करवाथी मवशक्ति वालो बने थालमु थाय इत्याविक वातो सर्व वडे री कहे ते प्रमाणे त्रिशलाराणी पण गर्ननी प्रतिपालना करे ।। दवे त्रिशला माताने नला मो होजा उपजे ले के पूजा करु,दान थापु, साहमी वास्तव्य करूं इत्याविक मोदोला सर्व सिदार्थ

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चित्र २०
पपरामा
पर्वत
नासीगाया
सैम्प

राजा सपूरण करे, दर्प सहित सन्मान करीने प्रा करे पण एवुन कदेके तुतो बेटी बेठी फद करे ने एवीरीतें मोदोजानु अपमान करे नदी, एम त्रिशलादेवीने अपजता मोदोलानी या सर्वथा तेना मना रहे नही एप्रकारें मटावी थापेबे तिहा रयवाही प्रमुख वनकीहा प्रमुखनां मोदोला तो सर्व सिदार्थराजायें पूषा परंतु एक दिवसें त्रिशलादेवीने एवो मोहोलो उपन्यो के इंशणीनां कुंमत खेंची लग्ने हूँ पहेरु ते मोदोलो राजाथी पूरण थयो नदी तेथी मनमा मणी थइ (अर्थात् खिन्न थइ) तेवारे राजाना पूबवाथी मोदोलो पूरो करवानी वात राणी ना मुखथी सांजलीने राजा कहेवा लाम्यो के ए मोहोलो पूरण करीश पण ए वात महारा दाथमा नथी एटनामा २ महाराजनुं आसन चलायमान थयुं तेवारे २ थवधिझाने जो इने जगवाननी माताने मोदोजो पूरण करवा सारु शणी प्रमुख देवांगनाना समूहने लश्ने क्षत्रियकुंम नगरनी समीपे एक मदार्गम पर्वत ने तिहां शपुरनामे नगर वसावीने पोताना परिवार सहित थावी रह्यो, सिदार्थराजायें सांनम्मु जे ई महाराज थापणा पर्वतमा रहे जे तेवारे सिक्षार्थराजायें श महाराजने कहेवरावी मोकल्यु के अमारी राणीने कुंमल जोश्ये ये माटे तमारी शणीनां कुंमल थापजो ते सनिली कुंमल थाप्यां नदी तेवारे सिक्षार्थराजा सेना जर ६ साथै युझ करवा गयो तिदा महाराजतो जीतवाने समर्थ वे तथापि जाणी दार खाने नागी गया पालथी सिक्षार्थरानायें पोकार करती रुदन करती एवी इशणी अप्सरानां तृदमा वेठेती दती तेना कुंमल सूट्रीने त्रिशलाराणीने थापीने मोहोलो कलो वजी वीजा पण सत्तरनेदी पूजा रचावू, तीर्थयात्रा करु, देवगुरुनी नक्ति करु, सुपात्र दान थापु इत्याविक अनेक मोहोला त्रिशलाने उपन्या ते राजायें पूरण करया ॥ ॥एवी रीतें त्रिशला राणी मोदोजा प्रीजती, सूवे, वेशे, मनीरहे, सघली ऋतुने विपे सेववा योग्य, गर्नने सुखना करनार, एवो जोजन, थाहावन, वस्त्र, गंध, माला प्रमुख लीये, गर्जना दित कारक पय्ये करी वेशकाल योग्य थाहार करती थकी, गर्नपोषण करती थकी पोताना परिजन जे वासी साइली प्रमुख तेमनी साथे विचरती थकी फरती यकी पोताना थावासा रहे ॥ए ॥ ॥ते कालने विपे ते समयने विपे अमराजगवत श्रीमहावीर स्वामी उनालानो पहेलो चैत्र महीनो तेनुं वीजु पखवारिपुं एटले चैत्रशुरू, ते चैत्रगुचनी तेरशने दिवसें नवमहीना उपर साहासात दिवस गया थका हा नवमदीनाने साहासातदिवस गर्नावासनो अधिकार ठे परंतु खो यधिको दोय तोपण पाठ एवो बोले तो तेनी काश्दरकत नथी गर्नमा रइवानो काल तो चोवीशेयतीर्थकरनो था प्रमाणे -श्रीरुपनदेवजी नवमहीनाने चारदिवस रह्या, श्रीयजितनाथजी थान मदीनाने पञ्चीश दिवस रह्या, श्री नवनाथ नवमहीनाने व दिवस रह्या, थनिनदन श्रात महीनाने थवीश दिवस, सुमतीनाथ नवमदीनाने व दिवस, पद्मप्रन नवमहीनाने व दिवस,सुपार्श्वनाथ नवमदीनाने दिवस,चमन नवमहिनाने थाविवस,सुवि धिनाथ श्राव मदीनाने बधीश दिवस, शीतजनाथ नवमहीनाने ब दिवस, श्रेयांसनाथ नवम दीनाने व दिवस, वासुपूज्य थाउमदीनाने वीशदिवस, विमलनाथ थाउमदीनाने एकवीश विवस, थनतनाथ नव मदीनाने ब विवस, धर्मनाथ थाउमदीनाने बदीश दिवस, शांतिनाथ नव मेदीनाने व दिवस, कुंथुनाथ नवमहीनाने पांच दिवस, थरनाथ नवमदीनाने थादि वस, ममीनाथ नवमहीनाने सातदिवस, मुनिसुव्रत नवमदीनाने थाविवस, नेमिनाथ तथा नेमनाथ नवमदीनाने पाठविवस, पार्श्वनाथ नवमदीनाने उ दिवस, श्रीमहावीरस्वामी नवम ॥ दीनाने साहासात दिवस ए चोवीश तीर्थकरनी गर्नस्थिति कही ॥ हवे उंचराशिना सात यहां पहेलो चंयोग होते बते, निर्मल दशदिशा ते वादला थने धूल रजे करी रदित होते उते, जनमति वेलायें अधकाररहित, अमि दावानल प्रमुख उपश्व रहित विशा होते बते, एवा वखतमा पक्कीयो सर्व जयकारी शद बोली रह्यां ने, प्रदक्षिणावर्तसानुकूज शीत मंदमव सुगध सहित एवो पवन नूमिमां चालीरह्यो एप्चीमा सर्वजातिना धान्य नीपज्पा तेना योगें करी दर्पवत पया पकां सर्वदेशोना लोक क्रीडा करता थका विचरी रह्या वे तेकाले मध्य रातिना समया उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रना त्रीजा पाया साथै चश्मानो योग होते बते रोग रदित एवी प्रिशलाराणी ते रोगरहित त्रज्ञान सहित एवा पुत्रने प्रसवती दवी ॥५॥ इति चतुर्ष व्याख्यान समाप्त ॥ यत्र जन्मकुंमली स्थापना ॥ स्वस्तिश्री दि वृदि जयोगि मान्युदयन सवत् बविशे एकापुना वर्षे मासोनममासे चैत्रमासे शुक्ल पक्षे त्रयोदशी तियो नौमवासरे घटी ५५ पल ११ उत्तराफाल्गुनी न क्षत्र घटी ६० भुवयोग घटी ४५ पज ५५ तेतलकणे एव पंचाग मुनो श्री इठ घटी ४५ पल, १५ श्क्ष्वाकुवशे श्रीक्षत्रिय कुंमल पुरनयरें सिकार्यगृहे नार्या त्रिशला क्षत्रियाणी कुदौपुत्ररत्नमजीजनत, पण सुवन दीपक नगवत श्रीमहावीर जन्म्पा तस्य जन्म कुमली स्थापना ॥ ॥अथ पंचम व्याख्यान प्रारंन ॥ जे रात्रिर्मा श्रीमहावीर स्वामी जन्म्या ते रात्रिमा घणा देवता बने देवीयो ते स्वर्गमा जाता थावता जाणे घणाज श्राकृप्त व्याकुल थइ रह्या दोय तेनी पेरें जाणवामा नदी श्रावे एवो तेनो शब्द होतोदवो अर्थात् थष्यक्त कोलाहल शब्दमय होतो दवो एटले जेवारे घणाजनो बोजे तेगारे शवमय थाय पण मालम पडे नदी॥ हवे सूत्रना श्रर्थने थर्नुसार विस्तार सहितजन्ममहा त्सव कहिये वेयें ॥ जे समयमा श्रीमहावीर स्वामीनो जन्म थयो तेवारे त्रण जगतमा ज्योत थयो,वली थाकाशमा देवनी वाग्यांवली नरकना जीवोने पण क्षणमात्र थानव थयो, केम के नगवतना थतिशय थको नारकी जीवने पण मुहूर्त मात्र शाता रहे वली स्थावरजीवोनु पण विशेप वेदन नेवन नथाय तेथी तेने पण सुख उपजे,जन्मती वेलायें सर्व जमीन चम्मासमाननी पेरें यश्रदी,दवे श्रीनगवतनो जन्ममदोत्सव कदेने तेमा पण प्रयम बप्पन्न दिशाकुमारीयें करेलो जन्ममहोत्सव कहे तिहां नगवानना जन्म ययायी उप्पन्न विग्कुमारिकानां थासन चलायमा न थयां तेवारें श्रवधि प्रयुंजी नगवाननो जन्म थयो जाणी, रात्रै तिहां थावे, तेना नाम कहे। वे, रुचकछीपनी वसनारी चार दिशानीथान थाउ, तथा थे विदिशानी चार चार थने मेरुनी कर्व दिशानी तथा गजवंत गिरीनी अधो दिशानी थाट थात, मलीलप्पन्न विगकुमारिका ते राने तिहाथावे, तेमा प्रथम नोगकरा, जोगवती, सुनोगा, नोगमालिनी, तोयधरा, विचित्रा, पुप्पमाला थने थनविता, ए थाठ विगकुमारिका थधोलोकें गजदताकार पर्वतनी हे वस नारी , ते थावीने नगवतने तथा जगवतनी माताने नमस्कार करीने, ईशानकोणे एक सू तिका घर बनावे, एक योजन एटले चार गाठ प्रमाण धरतीने संतृतक वायरे शुक्ष करीने कांटा, कांकरा, दूर करीने सुगधित करे ॥ तेवार पठी मेघंकरा, सुमेघा, मेघवती, मेघमालिनी, सुव रसा, वत्समित्रा, वारीपेणा भने बलादिका, ए थान विगकमारिका कल जो नवन वनना कूटोने विपे वसनारी ते, त्यांची श्रावीने प्रष्ठने तथा प्रज्जुनी माताने नमस्कार करीने ते म् तिका घरने विपे सुगधित पाणीयें करीसहित झलनो वरसाव वरसावीने गीत गाती रहे। तेवार

चित्र २१
पीकाशमा
सूतिका पर
कुमारिष
दिग कुमारिका

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पठी वली नवोनरा, नदा, थानदा नदीवर्दिना, विजया, वैजयंती, जयंती थने थपराजिता, ए थाउ दिग्कुमारिका रुचकहीपनी पूर्वविशाना पर्वतने विपे वसनारीने ते त्यापी श्रावीने नगवान् तथा नगवाननी माताने नमीने मुख देखवाने प्रचंथागल वर्पण दाथमा जश्ने गीत गाती बनी रहे।तथा समाहारा,सुप्रदत्ता, सुप्रबझा, यशोधरा, लक्ष्मीवती, शेपवती, चित्रगुप्ता थने वसुंधरा, ए श्राप दिगकुमारिका रुचकनामा तेरमा वीपनी दक्षिण दिशाना पर्वतने विपे वस नारीव , ते त्यांथी श्रावी जिनने तथा जिननी माताने नमस्कार करीने सोनाना नृगार क जश सुगधित पाणीथी जरी हाथमा धारण करी नगवाननीमाताने स्नान करावे प्रष्ट थागत गीत गान नाटारन करे ॥ तथा स्वादेवी, मुरादेवी, पृथिवी पद्मावती, एकनासा, नवमिका, नश, थने सीता, ए थात रुचक दीपनी पमिम विशाना पर्वतने विपे रहेनारीयो , ते त्यांथी श्रावीने प्रत्रु तथा प्रजनी माताने नमस्कार करीनगवाननी मातानी बागल वायरो करवाने थर्य वीजणा दाथमा लश् उनी रहे ॥ तथा थलबुशा, मितकेशी, पूमरीका, वारुणी, दासा, सर्वप्रना, श्री थने क्षी, ए थाठ विगकुमारिकाउ रुचक छीपनी उत्तरविशाना पर्वतने विपे वस नारी , ते थावी नगवत तथा नगवतनी माताने नमीने जगवतनीधे वालयें चार चार पत्नी थकी चामर दाथमा सश्ने प्रजुने ढोले ॥ तथा विचित्रा, चित्रकनका, ताराथने सौदामिनी ए चार दिग्कुमारिका रुचकहीपनी विदिशाना पर्वतने विपे वसनारी, ते थावीने नगवत तथा जगवतनी माताने नमीने दायमा दीवा ग्रहण करीने उनीरदे॥ तथा रूपा, रूपासिका, सुरूपा थने रूपकावती, ए चार दिग्कुमारिका रुचकछीपनी विदिशिमा वसे , ते थावीने नगवत तया जगवतनी माताने नमीने नगवतनुं चार थगुल प्रमाण नालवर्जीने कापे पड़ी धरतीमांहे खामोखणीने माटे, तेना उपर वैये रत्ननो चोखमो चोतरो करे, तेनी उपर दर्न वावे तेगार पठी सूतिका गृहयकी वेगला एक पूर्वविशे, एक दक्षिण दिशें श्रने एक उत्तर दिशे, एत्रण काणेंत्रण केनीनां घर करे, तेमा सिहासन रचे पनी दक्षिण दिशिना केलीगृहमध्ये जगवत तया नगवतनी माता, ए येगुने लावीने सिहासन उपर वेशाडीने तेमने सुख उपजे एवं सुगधी तेलोनु मर्दन करे, पठी पूर्वदिशिना केलीगृहमा लइ जश् सिदासन उपर वेसाडी स्नान करावे, चंदन ओपन करे, पनी उत्तर दिशिना कदलीगृहमा सिंहासन उपर वेसाठीथरीकाष्ठथी घसीने थमि जगाठी चंदनना काठयी शांति पुष्टि दोम करी, ते दोमनी रक्षा पोटली करी जगवत तथा नगवतनी माता ए वेगुना दायमा यांचे, बांधीने हे जगवान् । पर्वतायुर्नव एवी था शीप थापीने मणिमय गोलावे उठाले पनी तेने वजावीने जगवानने रमवासारु पत्यक उपर वाघीने गीत गान करी लगवत तथा जगवतनी माताने जन्मस्थानकें मूकी पाली पोत पोताने स्थानकें जाय॥ए एकेकी दिगकुमारिकाने चार चार महत्तरादेवी , चार हजार सामा निक देवो , शोल हजार थंगरक्षक देवो के, सात धनीकाधिपति , तथा वीजा पण घणा परिवारें परितृतथकी एक योजनना विमानमा धेशीने प्रष्ठनो जन्ममहोत्सव करवाने जेम थावे, तेम महोत्सव करीने पोताने स्थानकें पानी जाय, ए देवी नवनपतिमांदेली एक पल्योपमापु वाली जाणवी, ए देवीयोनो एज स्वनाव , के तीर्थकरनो जन्म थयाथी प्रथम एमनु थासन चलायमान याय, तेवारें प्रमुनो पहेलो जन्ममहोत्सव ए वेवीयो करे, पनी धीजा शिविक देवो करे इति ॥१॥एम विग्कुमारिकायें महोत्सव करना पढ़ी चोसन शेना थासन चलायमान याय तेवारे श्रीमहावीर नगवाननो जन्म थयो एवें अवधिज्ञाने जाणीने प्रथम सौधर्म

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चित्र २ मोधर्ममा तमा हरपी गोपी वा वीजा देयो घर वमठायेगे .mmII GGAMGAAMIRPAAAAAAAAGRAMMA श, दरणीगमेपी देवताने वोजावी धार योजन पोदोली थने र योजन उची तथा एक यो जन नाली, पागंतरें चार योजननी नाली कहे ॥ उक्तंच ॥ पारसजोयए पहला, मुघोसा घटाइ थचन ॥ चत्तारिय नाला, देवा सयपंच वायेति ॥ १ ॥ एवी सुघोपा नामे घंटा बजाववानो हुकुम थापे, तेवारें हरणी गमेपी वेवता पांचसें देवोनी सार्थे ते घटा वजावे ते घंटाना शब्दथी सौधर्म देवलोकना पत्रीश लाख विमाननी घटा वाजे,तेवारे सर्व देवता साव धान यश् जाय ॥ यउक्त ॥ सुणिकण सखसद, मिलतिनवणाय वितरं पडई ॥ जोइसिर्य सीय नाय, पटेण विमाणिया देवा ॥ १ ॥ एन प्रमाणे इशाने लघु पराक्रमनामा देवता पासे सुघोपा घंटा वजडावे, एम चौसठ २२ सद्गु पोतपोताना देवोनी पासें घंटा वजहावे तेवारें सर्व देवो इश महाराज का कार्य वे एवं जाणीने महाराजनी पासें थावी हाजर थाय पठी सोधर्मे पण पालकनामा देवतायें बनावेल लाख योजननु पालकनामक विमान तेना मध्यनागमा पूर्व दिशानी साहामो सिंहासन उपर वेसे तेनी श्रागत शनी थान श्रयमहिपी श्राव नासन उपर वेसे थने इच्ने माचे पासे चोराशी हजार सामानिक वेवो नशसनो उपर से जमणे पासे त्रण पर्पदा वेसे तेमां वार दजार थन्यतर पर्पदाना, चौद इनार म ध्यम पर्पदाना तथा शोल इजार वाह्य पर्पदाना मजी तालीश हजार वो नशसन उपर वेसे तथा शनी पठवाडे सात कटकना देवो नशसन उपर वेसे चारे विशायें चोराशी चो राशी हजार यात्मरक्षक देवता जजसनो उपर वेसे एवीरीते सर्व चौसठ शशे पोतपोताना विमानमा वेग जाणी सेवा ए प्रकारे सर्व ३५ देवदेवी सदित नदीश्वर ही थावे तेमा केटलाएक देवो नो हुकुम राखवा सारु श्रावे, केटलाएक देवो मित्रना प्रेखा थका थावे, केटलाएक पोतानी देवोऊना प्रेरया थका थावे, केटलाएक तीर्थकरनी चक्ति नावें करी थावे, केटजाएक कौतुक जोग सारु थावे, केटलाएक थपूर्व थामर्य जोवाने थर्थ श्रावे, ते वेवो पोतपोताना जूदा जूवा वादन उपर चच्या थका माहोमांद थापसथापसमां सिहना वाद न उपर चढला देवता हस्तिना वाहन उपर चडनारा देवताने कहे रे के ताहारो दायी दूर राख, नही तो महारो सिंह जवरजस्त ते तारा दस्तिने मारी नारखशे एमज पाडाना वा दन उपर चडेला देवता घोहाना वाहन वालाने कहे जे तथा गरुड उपर थसवारी करनार देर सर्प उपर थसवारी करनाराने कहे ये तया चित्राना वादन उपर वेवेला देवो ते बा गना वाहन उपर येसनाराने कहे वे एम वचन विवाद करता कोडाकोडी देवता सङ पोत पोताना वाहननी प्रशसा करता चाले , तिहां वेवसमुदायें करी थाकाश यद्यपि घणु म दोर्ट ने तोपण सांकडे थई गर्यु, वली मार्गमा कोशएक देवता मित्रने गेडी थागल चाल्या जाय तेबारे तेनो मित्र कहे के थरे योडीवार उना रहो द्रुपण थावु बु तेवार ते वेवता कहे प्रयम नगवानने वादवानो महोटो लान कोण मूके' एतु कहीने चाल्यो जाय एवीरीते जे जवरजस्त दोय ते थागत निकली जाय थने कोशएक नवला होय ते पडता थका वोले जे नाश था मार्ग घणो साकडो वे तेवारें वीजो कोई कदे चुप रहो ए पर्वना विवस साकहाज होय ते कोइ कहे घणु नही बोल खवर पडशे तो मारो एवीरीते थाकाशथी देता उतर ता था जैगरें ज्योतिपीना तारा पासें थाव्या तेवार ताराऊनी किरणो लागवाथी कवित येशा करे पण देवता सर्व निर्कर दे तोपण जरा सहित थया मस्तकमा जाणे १ एवा देवताना मस्तकें ताराना विमान शोनि रह्यां ने ते जागीय

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चित्र २३ पाप प्रमुखमापरे सूतिम पर रूपानो घडोज दोय नदि!! वली शरीरे तारा लाग्या तेना योगें परसेवाना विंडसरखा दिसवा लाग्या एरीते सर्व इंश्थने देवो नदीश्वरहीपमा विमान संकोचीने रदेता दवा ॥ दवे सोध मैं नगवानना जन्म घरने पे धावीने,नगवान तथा नगवाननी माताने नमस्कार करीने, त्रण प्रदक्षिणा थापी नगवाननी माताने कड़े के दे रनकुक्षिधारिणी' हे रत्नगर्ने। हे रत्नवी पक दे माता' पहेला वेगलोकनो छ र ई ते तादारो पुत्र चोवीशमो तीर्थकर ले तेनो जन्म महोत्सव करवा सारंवायोतु माटे तमे काश्मरशो नही एम कदी “नमोस्तु रत्मकुक्षिधारिके तुपं" ए पात नणीने नगवतनी माताने अवस्वापिनी निज्ञ थापीने बीजो नगवान जेवुज वरुप करी मातानी पासे रिलीने ३ पोतानां पांच रूप वैक्रिय बनाया तेमा एक रूपे करी घे दाथे करसपुटमा राखी नगवानने उपाख्या थने एक रूपें जगवतनी पळवाडे रह्यो थको उपर बत्र धम् श्रने बे रुपें वे पासें चामर दालवा लाग्यो, थने एक रूपें वज उलालतो थको नगवाननी पागल चालो, एम वर्धा मली पांच रूप ६ महाराज वेकिय कयां, तेमां वागलो पाठला रूपने वस्वा धने पालो आगला रूपने वरखाणे, एम पांच रूपें करी महाराज, मेरुपर्वत उपर निदां पांमुक वन , तिदा नगवतने लइ थावीने मेरुनी पुतिका दक्षिण विशियें अतिपारुचामला शिलाने तले शाश्वतु सिहासन डे, तेनी उपर नगवानने ठसंगर्मा जश्ने महाराज पूर्व सन्मुख वेग, तेवारे तिहां बार देवलोकना वश ६२, नवनपतिना वीश २६ बतरना बत्रीश ५, थने चश्मा तथा सूर्य, ए वे ज्योतिपीना इश, एम सर्व मली चाय सपरिवार प्रचनेनात्र कराववाने अर्थ मन्या , ते सर्व तथा देव मलीने पोतपोता 'चक देवताउने थाझा थापे के जाउँ एक हजारनेथान सोनाना कलश, तथा एक हजादयान रूपाना कलश, तथा एक हजारने थात रन ना कलश, तेमज चोथा सुवर्णरोप्यमय, पांचमां सुवर्ण रत्नमय, बज रमरौप्यमय, सात मा सुवर्णरोप्यरनमय,थानमा मृत्तिकामय, ए थाd जातिना प्रत्येक एक हजारने थान श्राव कलशो, करता था दजारने घोसन कलश थाय एवा सर्व मली थनिपेक कलशो एक कोडने सात लाख होय तेनो विवरी जखीयें यें नवनपतिना वीश , व्यतरना बत्रीश ६५, वैमानिकना वश इश, तथा बड़ी हीपना एकसोने पत्रीश सूर्य चइ, धरणे नूतानेश्नी वार शणी, व्यतरनी चार शर्णी, चमरेंनी दश शिणी, ज्योतिपीनी चार शिणी, सौधर्म ईशान ए वेनी सोल शिणी, सामानिक वेवोनो एक, प्रायत्रिंशकनो एक, लोकपाल देवोना चार, अंगरक्षक देवोनो एक, पर्षदाना देवोनो एक, प्रजाना देवोनो एक,थने सात कटकना देवोनो एक, एम सर्व मली वशे ने पञ्चाश थनिपेक थाय, ते एकेंक थनिपेकें चोसत हजार कलश दोय, तेवारें चोसन हजारने यदीसो गुणा करता,एक कोडने साठ लाख कलश थाय ए एकेका जातिना कलश, पचीश योजन उंचा धार योजन पोहोला, थने एक योजनना ना लवा वाला जाणवा, एवा कलश, तेमज वली शृंगार, वर्पण, रत्नकरमीथा, थाला, पात्रि का, पुष्प चगेरी इत्यादिक जाना उपकरण प्रत्येके एक दजारने थात प्रमाणे जाणवा तथा मगधादिक तीर्थो जल, गंगा प्रमुख नदीउनां जप्त, पन इदना जलथी कलशानरी लावो थने चाहिमवत, वृक्षधर, वैताट्य, विजय, वक्षस्कार, देवकुरु, सत्तरकुरु, नशाल थने नवनवन प्रमुखना सर्व फल, प्रधान गंध, सर्व थोपधि, पाणी प्रमुख थनिपेक वस्तु पण देवतापासेंथी श्रणावे, तेवारे सेवक वो सर्व हीरसमुपप्रमुखना जलें करी कलशनरी पोताना वयथागत CA. (चित्र पारुपनमा प्रभुनीनो लाप्रमहोरसर देरो रेरे सर हपमन्य रूपे ५५ नगरारे

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घरीने उना रहे ते सर्व विचारे जे महाराज थाहा श्रापे तो कलश ढोलीये ते देवता एवा शोने के के जाणीयें संसार समुछ्ने तरवाने थर्थे कुंन धयो होय नहीं ? एवा शोने में तथा जावरफ्नै तिचेले किंवा पोताना पापरूप मलने धुवे ,श्रथवा धर्मरूप प्रासाद वपर कलश चढावे , के टु' दवे एवा थवसरने विपे, २ महाराजना मनमा एवो संशय उत्पन्न भयो के था नानो बालक थका श्रीवीर नगवान, एटला कलशोनी जलधाराथी महारा खोलामाथी पाय जता रदेशे एवढा जलाभिषेक केम सदन फरी शकशे एई जाणीशनिपेकनो थावे श न देता दवा, तेवारें जगवतें अवधिना बलें करी इश्वं शकित मन जाणीने थरिदतपणार्नु थतुल्य बज जणाववा निमितें खोलामा बेग थकांज बालक माषा पगने थगुठेथी सिदासन फरश्यो, तेवारे शिला कपायमान थइ तेना कपवाथी मेरुजुलिका कंपायमान थर, तेवारें लाख योजननो मेरुकंप्यो, तेना कपवाथी सर्व पृथ्वी कंपी, सकल धरती परदरवा लागी, पर्वतनां शिखर बेटवा लागा, समुह जलकोल पाम्पो चलाचल थयो, ब्रह्मांम फाटवा सरखो शल थयो, सर्व वेचो नय पाम्या, देवांगना नयने लीघे वेवोना गलामा वलगी तेचारें इस कोर्षे धाम्यो थको कहे , के थरे था दर्षना समयने विपे थावो सस्पात विषाद कोरों को ' वली प्रजुना जन्म महोत्सवमा एवां विघ्न करवा वालो था कोणष्ट ले ? एम विचारी हायमा वज्ज लश्ने श्रवधि प्रयुंजीने जोपु तो प्रजनी शक्ति जाणी के एतो जगवाने पोतेज सर्व कम्यं वे में अज्ञानथी तीर्थकर पल नही जाए{ एलु जाणीने २ पगे जागी खमावीने स्तुति करवा लागो। लुजंगप्रयात वेद ॥ सुणो वीर्य बोलुं विशाजो विबुधो, नरें यार यो मली एक गोधों ॥ दो गोधाने लेखवो एक घोडो, तुरंगेण बारें मली एक पामो ॥ दशे पंच महिपो मदोन्मन नागो, गज पांचशे केशरी वीर्य त्यागो॥ हरि वीशशे वीर्य अष्टापरेको, दश लक्ष श्रठापदे राम एको॥ जला रामयुग्में समो वासुदेवो, दितीय वासुदेवें गणी चक्रि लेवो ॥जला लक्ष चकी समो नाग शूरो, वली कोहि नागाधि ३६ पूरो। थनते सुई मली वीर्य जेतु, टची थगुली वीरप्रल वीर्य तेतु ॥१॥ ॥ एम ई वस्खास्या तथा मेरुपर्वतें विचास्यु जे श्रनता तीर्थकरना जन्मानिपेक महारा उपर थया, परंतु मुजनें कोणे पगें फरश्यो न हतो, ते दमणां श्रीवीरें फरश्यो, तेथी हूँ पण धन्य वं एम समजीने जाणे दर्पथी नाच्यो थको चितवे वे जे ढुं सर्व पर्वतनो राजा ते खरे खरो बु वली पांच मेरुमा पण हु महोटो अग्रेसर ते पण खरेखरोदु हवे शश्ना श्रादेशथी प्रयम वारमा देवलोकनो श्रच्युतें मात्र करावे ते पठी अनुक्रमे उतरता उतरता शिविको थनिपेक करे लेना चंद सूर्य मात्र करे एम सर्व थ दीशे थनिपेक थाय पठी इशानेश, नगवानने खोलामा खेश्ने वेसे अने सोधर्मे चार धवल सपनना रूप विकू/ने तेना था सींगडायें करी खीर समुश्ना पाणीनी धारायें अनिपेक करे एवा विधियी सर्व देवो पोतपोतानी नक्ति करी मात्र करावे पबीजगवतनुं शरीर गधक पायें वस्खें लोहीने फूल, यावना चंदन विलेपन, थक्षत ढोकन, दीप, फल, धूप, पाणी, नैवेद्य ए थान प्रकारनी पूजा करीने नगवाननी थागत श्रीवत्स, मत्स्ययुग्म, दर्पण, पूरण कलश, स्वस्तिक, नदावन, जज्ञसन, सरावसपुट ए था मगज रूपाना थक्षतें करी थालेखे, पनी थारति करे, गीतगावे नृत्य करे, वाजिन वजावे, पढ़ी थपूर्व एकसो थाउ काव्यनी रचना करी स्तुतिरूप नावपूजा करे ते करीने पढी नगवानने नगवाननी माता पासे मूके, श्रवस्खा पनी निश दूर करे, वली नगवाननो प्रतिबिंब तिहां प्रथम थापन करेलो हतो तेपण दूर (चित्र२५ मूतिम पर मजगम

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चित्र३६ सिमारामा दासी पामरी मापेरे सौपाई Maitan MAP AUDA समाधान minuTILITn.inricREETIYA करीने रमजडित कुंमल युगल तथा देवमुष्प युगल, त्रिशलामाताने आपीने सुवर्णजडित दडो नगवानने रमत करवाने थर्थे मूकीने तथा बारकोड सोनेयानी वृष्टि करीने वली एज पाठ केठलिएक प्रतोा थावीरीते लखेटु डे के उपर राजहित चं बांधी, रन जडित वे कुंमल तथा श्रीदाम ते रत्नजडित सुवर्णनो वडो ए सर्व उसीशे मूकी बत्रीश कोड सोनेयानी वृष्टि करी पड़ी सौधर्मेन सर्व देवोमा एवो हांको करोने कहे के नोनो देवो जे हुँ कदु बु ते तमे सन्तिी जेजो के जे को देव अथवा अमर दानव, नगवान नपर तथा नगवाननी माता उपर माठी चितवणा करशे तेनो मस्तक थर्जुनवृदनी मांजर नी पेरे था वजयी बेदी नाखीश ए प्रमाणे कदीने नगवानने अयुनाथी थमृत सचार करी सर्व २२ नवीश्वरद्दीपा थावी श्राश्मदोत्सव करीने पठी पोतपोताने स्थानकें जाय तिहां पण श्रधा महोत्सव करे इति देवरुत जन्ममहोत्सव समाप्त ॥ ५॥ दवे सिक्षार्थराजायें क रेलो जन्ममहोत्सव लखे के पुत्र जन्म्या पनी दासीयें जश्ने राजाने वधामणी थापी राजा पोताने घेर पुत्रनो जन्म सानजीने रोमरोम दर्षवत थयो एक मुकुट विना बीजा सर्व शानू, पण जे पोताना थंग उपर दतां ते वासीने थापी दीधा, माधुं धोवरावीने तेनुं वासीपणु दूर कन्, पेढीधरपेढी सुधी स्वाय एटलुं धन दासीने थाप्यु जे रात्रिमा अमनगवत श्रीम दावीर स्वामीनो जन्म थयो ते रात्रिमा घणा वैश्रमण देवनी थाझा धारक तिर्यक्जृनक दे वताउँए, सिदार्थराजाना महेलने विपे रूपानी वृष्टि करी, सोनानी वृष्टि करी, वजही रानी दृष्टी करी, वस्त्रनी दृष्टी करी, श्रान्षणनी वृष्टि करी, नागरवेल पत्र, फल, फूल तथा वीजजे शालि प्रमुख ते सर्वनी वृष्टि करी, माला, गध, वास, सुगधि चूर्ण तथा हिंगलु - प्रमुख रंग थने सोनामोरोनी दृष्टिं करी, ते थगणित वृष्टि करी, कोश्क तेकाणे एवु लखेलु ते के पनर मास पर्यंत त्रएकोड रन वरसावे ॥ एए ॥ दवे देवताये जे घरेणानी सिक्षार्थराजाने घेर वृष्टि करी तेना नाम कहे वे ॥ मुकुट, कुमल, दार, थदार, याच घध, वेरखा, जिसरा, चोसरा, उसरा, सातसरा, श्राउसरा, नवसरा, श्रढारसरा, एकावती,क नकारली, टकावली, रत्नावती, मुकुटावली, चशवली, दीरावली, प्रवाली नक्षत्रावली प्रोणि सूत्र, कटीसूत्र, रसना, रबूप, पशिखर, चूडामणि, कटक, ककण, अगद, मुशनदक, दशम इक, मुश्किा, श्रयुजीय, कदय, पुप्पक, तिलगक, कर्णपीतिक, चत्रक, अजर, मेखला, मुदक, पदक, पडकडि, साकलु, साकली, विशिष्ठ, मोक्तिकनग, उतरी, दोरा, दांसडी, कर्णपाल, सं कपाल, गेययक, हेमजाली, मणिजाली, मोतिकजाली, रमजाली, गोपुष्ठक, सरसृका, म र्मक, वर्ण, वरिका, दांस, जांजर, नेपूर, धूघरा, पागडा, वीबीथा, थंगूथली, बालाजाली, कँ मणा, थकोटा, रूपालदेरिथा, राखमी, गोफणो, फूली, सियो, त्रसंटीउ, प्रोटी, बोरडा, कही, । वेढला, मुरकी, मोती, नरगोहा, नागफर्णा, तुंगल, चपकली, पानडी, उलरा, वाली, मोती सर, तांति, गांदिया, वरघली, पोंची, गलसिरि, टाली, चांदला, थाडी, नवग्रह, मुटी, थं गुठी, वेढ, वींटि, वांकडा, गप, करजालु, मादलिया, कदोरो, खेलमादलियां, पाटीयालो कदोरो, लटकण, मउड, नागली, नाग, नागलो, मोर, वेसण, नथ, कांटो, मयोवय, यां जण, उंगनियां, हिंगलो, कुकुम, एला, जवला, चूडी, चूडली, थर, ककण, कारेजी, साति, पंचमेखला, हायतांकली, सोनानालदेरिया, तावीत, कला, सलियालु, कलाडी, अण्वट्ठ, लोनिथा, कुंची, पाश्न, सातयेवेयक, नवमेवेयक, गपसवींटी, मकोरांस्खजी, वेद प्रत्या - दिक थनेक जातिनां थानरणोनी दृष्ठि करता हवा ॥ वे जगवतने जन्म कल्याणके चौदरा जलोके ज्योत थाय नरफा पण ज्योत थाय तिहां पद्देली नरकें सूर्यसमान तेज थाय, बीजी ये वादलायें दकेिला सूर्यसरखो तेज थाय, त्रीजीयें चश्मा सरखु तेज थाय, चोथीयें वाद सायें ढाकेला चंड सरखु तेन थाय, पांचमीयें ग्रह सरख तेज थाय, बहीयें नत्र सरल तेज याय, सातमीयें तारा समान तेज थाय एम नगवानने जन्मादिक पांच कल्याणकें नरकादि सर्व घौवराजलोक पृथ्वी थाविरुमा सर्वत्र तेज थाय एवीरीतें नवनपति, व्यतर, वाणव्यतर, ज्यो तिषी अने वैमानिक देवतायें तीर्थकरनो जन्ममहोत्सव कक्षा पढ़ी प्रनातसमये सिद्धार्थ राजा नगरना रखवालाने वोलावीने कहेतो दवो ॥१०॥ ॥ हे देवाणु प्रिया तमे उतावला कृत्रियक्त मनगरमा दिवानोने लूटा करीमूको थने तोल मापां वधारो तथा क्षत्रियकुंमनगरनी महिली को रेश्रने वाहेर कचरो कांटो काहाडी साफ करो, सींपावो, तेनी उपर मुगधजलनो बटकाव करावो, त्रिखूणामार्ग त्रएमार्ग, त्रवाटा, चोवटा तथा जिहां घणा मार्गनेलाहोय तेषञ्चर चारमुखमार्ग, राजमार्ग ए सर्व रस्ताने पवित्र करावो, कचरा काटा कादाहीने साफकरावीने रस्ताने बरोबर करो, तथा जेनी उपर वेशीने मुखेपी सर्व लोको महोत्सव जोर शके एवा महोटा मांचायपरमाया धभावो,अनेक प्रकारना रगनी ध्वजा पताका करावी स्थानके स्थानके बधावीने नगर शोना यमान करो, शहेरना मार्गाने लीपावो, धोवरावो, वली गोसीपंचदन, रकचदन, पांचआंगु जीथा बापा देवरावो, घरमांचवनना कलश यापन करावो,चदनकलशघटित तोरणोने घरोना पारणे बंधावो, लावी महोटी श्रने गोल तथा लटकति एवी पुष्पमालाउनो समूह जटकावो, पाचवर्णा फूलोना ढगला करावो, कृष्णागर, नतोकुवर, शिलारस, धूकतो यको घमघमायमान मनोहरगध सुगधगंधित श्रगरवती उखेवो, मनोहर गध करो, वली नाटक करवा वाजा जे पोते नाटक करे ते, रशीनपर नाचे ते, मनयुझकरनारा, मुठीयोथी युवकरनारा, जाम नवा श्या, कथाना करवावाला, रास बोलवावाला, उट यने हाथी उपरथी कूदी जाय तेने प्लवक कहे ते, राजानी वशावजीनां घोलनारा, पाठक कवित कहेनारा, कोटवाला, गुनाछन निमि नना कहेवा वाला, वासनी सुपर नाचनारा, चित्रामणना पाटीया वेखवावाला जेने मख कहे वे ते, तथा चामडानी मसकने वापराथी नरीने वजावे तेने वणयमा कहे जे ते, सुंबिनी वीण यजावनारा, हाथताल देश्ने नाचनारा, अनेकतालना बजावनारा,ए सर्वेने बोलावीने ठेकाणे काणे येसाठी थापो ए सद्गु पोतपोतानी कला लोकोने देखाडे ए काम तमे करो तथा वीजापासे करावो वली दजारो गमे धूसरा एटले विवादना ममपमा घाखे जे ते तथा हजारो गमे मुसल उचा करावीने मदारी थाझा मने पानी सोंपो ॥ ११ ॥ ॥ तेवारे ते कौटुंबिक पुरुप घणाखुशी थश्ने राजाना दुकुम प्रमाणे काम करीने राजानी थाहा राजाने पानी सोंपी ॥ १० ॥ तेवार पठी सिक्षार्थराजा मनयुक्नी शालामां श्रावी, युम करी, तेल मसलावी, मानकरीने सर्व वस्त्र घरेणां माला प्रमुख पहेरीने महोटा तेजसदित, मोदोटावजसदित, सर्व वाजा वाजतां थकां, महोटी दि, महोटीकांति, महोटी सेना; पण वादन, घणो समुदाय, महोटां महोटा वाजित्रे मर्व नेजा समकाले सार्चे वजाच्या, तेथकी शंख, पठद दोल, नेरी, जानर, स्वरमुखी ते काजदी, रणसिंगो को वाजानुं नाम दे मांदलनी जात, मृदंग, देववाजु तेने अनि कहीयें, ए नव जासनां वाजाना शब्द, प्रतिशत तेणे करी सिद्धार्थराजा दर्ष करतो रहे, वली क्षत्रियकुंम गामनगरमा आमुल एटले वश विवस सुधी वाण कोनी पासेची लेयं नदी ।

तया उकर एटले गायो ढोर प्रमुख→जे कर लागे ते दशदिवस पर्यंत न लेवो तथा उक्लिक एटले खेत्र प्रमुखथी जे कर लागे ते दशदिवस सुधी नही लेवो तथा थदिय एटले वशदिवस सुधी कोइ हाटमा मूल्यलश्ने वस्तु वेंचे नदी जेने जोइति होय ते राजानी पासेंथी मफत लइ जाय। तेना पैसा राजाना मारमाथी देवाय तथा थमिष एटले दशदिवस सुधी कोई चीज मापवी नदी तथा थप्नडप्पवेसे एटले दशदिवस लगें कोई राजानो माणस जोरकरीने जोरावरीथी कोश्ना घरमा प्रवेश करी कोई चीज वस्तु लीये नही तथा थदम एटले कोश्य अपराध को होय तेनी पासेंथी गुनाद प्रमाणे दम बेवो जोश्ये ते दम वशदिवस सुधी लेवो नदी तथा कुर्दम एटाने को थपराध श्रम्प कसो होय थने दम वधारे लेवो तेने कुर्दम कहीये ते कुर्दम वशदिवस पर्यंत लेवो नही तथा थधरिम एटले दश विवस सुधी को उधारे जश्ने क्षण करे नही एटला वाना सिक्षार्थराजायें मूक्या बक्षीस कमां वली थत्यंत स्वरूपवान एवी वेश्याऊना नाटक थाते तथा अनेक ताल वाजा सदित नाटक थाते पड़ी उत्कृष्ट मृदग बजाववा सारु सहाकया मृदग जिहाँ ग्रंथामथ ॥ ५०० ॥ ॥ कुंमलाणी नथी एवी विस्तार सदित फूल मालाउँनो समूह ने जिहा, दर्पवान थया थका ते देशना सर्वलोक क्रीडा करे ए प्रमाणे दशदिवस पर्यंत स्थितिपतिका एटले पोताना कुल परपरानी मर्यादा पुत्रजन्मनी ते सिदार्थ राजा क्षत्रियकुम नगरमा करे ॥ १०३ ॥ ॥ तेवार पड़ी सिदार्थराजा दशदिवसनी कुल मर्यादामां जिनपूजामा सो सोनेया लागे तथा दजार सोनेया लागे तथा लद सोनेया लागे एवं जे पूजन तेना निमित इव्य राखे एटले पनी पूजा करावी एवो थनिप्राय करीने पूर्वोक्त इष्य काहाडे वली थाउम, चौदशनो दिवसें पोसद करनारा श्रावकोनी नक्ति करवा निमिने इष्य राखे ते एवा थनिप्रायथोके जाणे पोसह करवावाजाने पारणे सादामी वात्स व्यना काममा श्रावशे वली वीजु पण देवायोग्य इष्य धर्मने थर्थे कम्प्युं एवु इथ्य पोतें सिक्षार्पराजा देतो थको, वीजाऊनी पासेथी देवरावतो थको विचरे ॥ वली पूर्वोक रीतें सो, हजार थने लाख सोनेया प्रमाणे वधामणाने यर्थे नेट लोको जर थावे जे ते लेतो थफो, बीजा कने जेवरावतो थको एवीरीतें दशदिवस सुधी करतो थको कुलमर्यादा करे ॥१४॥ तेवार पठी श्रमण जगवान श्रीमहावीरस्वामीना माता पिता जगवानना जन्मदिवसथी पड़ी थागल पहेलादिवसें तो.कुत्तस्थिति करे थने त्रीजे दिवसें चश्मा तथा सूर्यना दर्शन करावे हमणा थाजना कालमा तो प्रीजे विवसे काच देखादे वे परंतु मूल विधि थावो जे जे गृह स्यगुरु श्रावीने श्रीथरिदतनी प्रतिमा बागल स्फाटिक अथवा रूपानी चश्मूर्ति करावे ते प्रतिष्ठावी पूजीने मामे पठी वालक तथा बालकनी माताने स्नान करावी नला वस्त्र पढेरावी पशेदयनी वेलायें पुत्रने हाथा लश्ने माता सहित पुत्रने वेशादी प्रत्यक्ष चश्मा सादामा वाणी श्रावीरीतें मत्रनणे ते सखे ॥ यईचशेसि निशाकरोसि नक्षत्रपतिरसि सुधाकरोसि योपधिगर्नोसि थस्यकुलस्यविदि कुरुकरु॥ एवा मंत्रनो गुरु उच्चार करे,माता पुत्रने चंमा देखाही नमाडे वली पुत्रने लश् गुरुने पगें लगाडे,गुरु बाशिर्वाद थापे ते थावीरीतें -श्लोक ॥ सर्वोपधिमित्रमरीचिराजी, सर्वापदांसंदरणे प्रवीण ॥ करोतु सिकप्लेपिवसे, सुष्माकर्मि सततं प्रसन्न ॥१॥ ॥ तेवार पठी चश्मानी स्थापेली मूर्तिने विसर्जन करे कदाचित् कालि चौदस, अमावास्या दोय अथवा वादला होय तेषी चश्मा न देस्वाय तो तेज रात्रिये तेज चश्मानी मूर्ति श्रागन तो जरुर करे एवीरीतें तेज विवसनी सांजे जे विपि रोय ते अवश्य चित्र २७ MAIN विशसादेपी पुपये परत ANNEL शाfulila रर्शन करावे पारण

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- करे पनी ते दिवसें प्रनातें सूर्य उदयनी वेलायें सोनानी अथवा त्रांबानी सूर्यमूर्ति करीने पूर्वनीपेरे स्थापन करी ते मूर्तिनी बागल पुत्र सहित मातानें वेसाही गृहस्थ गुरु थावीरीतें मंत्र बोले ॥ व्यर्दसूर्योसि, दिनकरोसि, तमोपदोसि, सहस्रकिरणोसि, जगनपुरसि, प्रसी दास्य कुजस्य तुर्टि पूर्टि मोद कुरु कुरु ॥ ए सूर्यमत्रमचारीने माता सहित पुत्रने सूर्यन दर्शन करावें पठी माता पुत्रने जइ गुरुने पगें लगाडे तेवारे गुरु थाशीर्वाद थापे ते लखीयें। ठेयें ॥ श्लोक ॥ सर्वसुरासुरवद्य , कारयिता सर्वधर्मकार्याणां ॥ न्याधिग सकु, मंगल दस्ते सपुत्राय ॥ १॥ ॥ पनी थापन करेली सूर्यमूर्तिने विसर्जन करे वजी उठे विवसें धर्म जागरण करे, अगीधारमें दिवसें याचिकर्मनिवर्तन करे, माटीना ना नाजन कादाडी नाखे, नवा वस्त्र पहेरे ॥ ॥ दवे धारमो दिवस थाव्या थकां थशन ते थन्न विगय प्रमुख तथा पान ते मीठा पाणी प्रमुख तथा स्वादिम ते वारक टोपरा प्रमुख तथा स्वादिम ते ल विंग पान प्रमुख ए चार प्रकारनो थाहार रंधावे रंधावीने सिदार्थराजा पोताना मित्रोने,न्या तिने एटले पोतानी जातिवाजाने, पोताना पुत्रपौत्रादिकोने, काकाने,ससरा प्रमुखने,पोताना वास दासीयोने, वली सिक्षार्थराजानाज गोत्रवालाउँने, वजी कृत्रियोने तथा गामना क्षत्रि योने, एवा वीजा पण महोटा लोकोने निमत्रण करे अर्थात् नोतरा थापे पनी जगवानने तथा त्रिशलाजीने नान करावे, घरे देवपूजा करावीने पनी विघ्ननिवारवाने थर्थे कौतुकथी काज जना टीलांटवकां करे, मगलिकने थर्थं सरसव, दही, वर्न, चावलनु तिजक मस्तकें धारण करें, नवा वस्त्र पहेरे, वली जेमां नार थप थने मूल्य घणु एवा घणा मूलनां घरेणा पहेरें, पढेरीने नोजननी वेलायें भोजन ममपमा सुखे वेसे वली पूर्व नोतरेला मित्राविकोने यशन, पान, स्वाविम, स्वादिमाविक चार प्रकारना बादार जमाडे हवे तेमा केटलाएक था दार स्वाद करवा योग्य तेना स्वादकरतां थकां यशनादिक मोदक प्रमुख सर्व पीज खवा जाय तथा केटलीएक सेजडीप्रमुख पीज थोडी खाय बने घणी नाखी थापे वली केटली एक खल्चरप्रमुख चीज घणी खाय अने थोडी नाखीवीये एवीरीतें चारे प्रकारनो थाहार साघ मिकादिकोने सिदार्थराजा जमाडता थकाविचरे ॥१०५॥ ॥ दवे यथातरथी नोजननो विधि जरखीयें ये॥केजिपत्रे बायेला मामवा नीचें मध्यान्द वेलायें कुंकुमबटित ममपमा सर्वने येसाम्या, मखमलना पांतिया नास्पा, ते उपर सर्व पवित्रथश्ने श्रावीयेता, तेना पेट पाताले पेठा, थागज स्वर्णरत्ननरित धानोट मेल्या, तिण उपर सोनाना थाल,जमवावाला थया उज माज ॥ कनेमेली कटोरीयां, निर्मल जलसें धोये, माहे मुखडा जोवे, ते कडेवा ले तोके ? फां वाला, कुंवाला, वाला, सुंदाला, अांखे थणियाला, मुबाला, केइ जमाश् केश साजा, इसी पाति धेठी, तिहां पीरसणवाली पेठी, ते घणी रूपाली, नला वस्त्र पहेल्या, शोले सणगार करना, हाथमा महोटी जारी, युवानोंकी निनरो नारी ॥ हायधोवाया, मनमें काम जुराया, पहेला ते फल पिरसे, देख्यासें मन विकसे ॥ ते कडेवा फल पिरस्यां तेनां नाम कहे बखोड मिसरिकीपात, चोपड़ी पारोली, केला रायण लीलांनालियेर बदाम पिस्ता शख धावा थांबा तथा स्याग वाल पक्क, सेवा सेतुत दाहिम नारंगी मीठांलीवु, पाकांकिरणां खारक खच्चर सेव जांबु गुंवा पेमदीयोर लीलीशख बोलेजी सेलडी कांगटा जामफल रामफल सीताफल वीजोरी, इत्यादिक उदार मनथी पिरस्यो, ढेरकीया खातो दीया दp॥ किस्पाक खावे के पिर सवावाजीतेना मुख सामा जो मोहमा पच्या साया जावे, पण पेटफाटे ते नजर न यावे ॥

मालवानी जमीनमां नीपज्या घचं हाथथीमसव्या धोक्ने वल्या जला वलथी मेदो बास्यो तेना पिरस्या खाजां, दांतोमा करे श्रवाजा॥ दवे कहूँ पकवान, खावा थया सावधान ॥ पिरसण वाजी सुहाली, मानकरे रढीयाली, पहेली पिरसे लाडू, जिमे येता जाणे साढू, सिंहकेसरीया मेया, मसाला थधिका नेल्या॥ कसार मगदारा मोदक, किटिया जसरीया दालिया, इस्यामो दक खावे, बूढो मरद हो जावे, यहीपिरसी मुरकी, खावा जीनही फरकी, जलेषी मुखमा घाले, रसना गटफा चाले, पेडापेटमा पडिया, मुखमेलंता गुडिया, मखाणा मुखमा घाले बडबड जाणे धोने, घेवर मुखमां धरिया, खातां घृतवद् जरिया, जीणातारनी फीणी, थाणीसेवा जीणी, वहीथरा दोंग खावे, मनमा दसता जावे, सांकली तिलनी स्वाधी, सिंघोडा सेवसु साधि, थावे साकर सीरो, मोकरा मन थयो धीरो, लापसी थाबी थावे, मेवाखीचडी खावे ॥ श्म अनेक पकवान, जिमे वेठा राजान । वेवमुगंधीसाल, खावा थया छजमाल । मुगदालने नेली, घीसुगधी ठेली ।। खीचडी पतली पोली, थाये कवीशनी एककोली ॥ सालणा मुखमा नावे, जीनवरफरी थावे ॥ मूगीया केर रायमोमी, वालोल, करमदा काचा, केला, चोरानी फली, मुगनी फजी, नीलाचणा, मिरच, पीपल, सागरी, काचरी, वावल्या, करेला, नीमी, तरोइ, वेंगणं, मोगरी काकडी तव्हा तीमसी इस्या जातना साग, जीरा मिरच समनाग ॥ गरम मसाला पडिया, घृतमाहे पहेला उमकिया॥ हिंग वघार मुगधा, खातां तज्या सब धधा ॥ जीनवरफरी दोवे, कलीकवने जोवे ॥ नाजीविणारीमेथीरीचदलेवारी पालखारी सुधारी थेगरी, खाता जीन शोनाधरी ॥ मिसरीमा नेव्यो दूध, पीतां नरही शुभ ॥ नस्योपेट बोल्या सद्गु एम, दवे खावानो नेम ॥ वहीदेखीने मुखडे चाल्यो पाणी, जीराराव शुद्ध तिहां थाणी ॥ करबो खाधो पूर, रापही रायतापूर ॥ मीठा पाणी पीघां, पापरमुख गुरु कीधा ॥ शुद्ध पाणीसें चल करीजें, न मावे पेटमें उत्तर वीजे ॥ वली दीघा पान तयोल, केशरबांटे रंगरोल ॥ दीरचीर मखमल पटंबर, वस्त्रवीधां ते पहिरे सुंदर ॥ फूलमाला पहेरावे, दर्प मने बगुलावे ॥श्रा नूपण पढ़ेरामणी वेवे, एम सिदार्थ जस बद्दु खेवे ॥ इति सिदार्थराजाकृत जन्मोत्सव ॥ एवीरीतें मरुवेशवादिकमा जे नोजन विधि कडेवाय ने ते प्रमाणे लख्यो ॥ दवे वली प्रकारां तर कधगुर्जरादि देशोमा जे प्रमाणे नोजनविधि कद्देवानो चाप्त प्रवनें ले ते मुजव थाहीं लवीयें .यें ए वे प्रकारमाथी वाचनारने जे रुचे ते वाचवू अथवा वेद् प्रकार सजा थागज वांची सनलाववा ते प्रकारांतर यही लवीये .यें ॥ मामघो तोरण सत्तग मामलो, तरत थांगणु बेसवार्नु नवु ॥ तेतो नीलो रजज तणं, तिहां सखरा मामयाँ बासन, सतां किसी विमासण ॥ वली थागज मूकी सोनानी यांमणी, ते केम जाये बामणी ॥ उपर सोनाना थाज, अत्यंत घणा विशाल । विचमा चोस वाटकी, लगार नही जास काट की ॥ गगोदक दीधा थाल, कचोलामें हाथ जाल ॥ दवे सघली पंक्ति बेठी, एटले पीरशण हारी पेती ॥ ते कडेवी ' शोल शणगार सज्या, बीजां काम तज्यां ॥ हावनावनी रूडी, स्वतके हाथै सोनानी चूरी ॥ लघु लाघवनी कला, मन कीप मोकलां ॥ चिसनी सदार, अति घणी वातार ।। बोलती हाथ, परमेश्वर देजो तेदनो साथ ॥ धसमस्ती थावे, सघलांने मन नावे ॥ पहेलो फलहवें पीरसे, सघलांना मन दर्प ॥ एवी ने पिरसनारी नली, मृगनयनी, होंसनी पूरी, धर्मनी शूरी, शीलवति, शक्तिवति एवी पिरसनारीयो ने ते प्रथम फल खावानां जावे ने पाको थांबानी कातली, ते सुरा खाम नली ॥ वली पातला पाका केला, ते खामयं कीधी नेला ॥ सखरा करण, वली पीजा वरण ॥ लीला नारंगा, वीसे महामुरंगा ॥ नी जीरायण, पीरसी नली नायण ॥ वाडिमनी कली, खाता पुगे मन रली ॥ लीवजाने अखोड, खातां पूगे मनना कोड ॥ शखने बदाम, कई कागदीने कश्श्याम ॥ सिलेमी खारेकने खजू र, ते पारश्यां नरपूर । नालियेरी नगरी, ते मालवी गोजी नरी ॥ लींबु वाटाने मीग, एद चां ते कवी न दीग ॥ चारोजीने पीस्तां, लोक जमे दसतां ॥ वली शेलडीने सीताफल, ते पण पारश्यां परिघल ॥ दवे पकवान थाणे, ते केदेवा वखाणे ॥ सतपडा खाजा, ते तुरत कीधां ताजा ॥ सवलाने साजा, जाणे प्रसादनां बाजा ॥ एदवा पवित्र प्रधान, माजवी घन, तेद ने दल्या तेदनी पडनदी, महाचतुरे शोधी ॥ घीये करमोश, तेदनां खाजा घोयें तल्या फुल्या, महाविशाल, एवा सातपुडा स्वाजा, वली फगफगता फेणा, ज्यवर्णा वहीथरां ॥ घृतवर्णीमु वाली, अमृतजेवी जसेवी ।। घीनाघेवर पतासा मोतीचूर मुंदवडा एलचीदाणासहित साक रीया चणा, सांमसाकरनां दहीथरां, अनेक नातिनी सुखमी पिरसे विगुचवलें केजष्या, सा रमित्र खामथी नेलव्या ॥ माहे एलचीना चमत्कार, पढी पिरश्या लाड, जाणे नाना गा॥ कुण कुण तेदना नाम, जमता मन रहे नदी एक ठाम ॥ वली लाडनां नाम कहे जे मो तीश्रा लाड्ड, दलिया लाड, सेवैया लाइ, चूरमांना लाल, तितना लाजु, तिगमुना लाख, मग ना जाह, जगरीना लाड्ड, सिदकेसरीया लाड, कीटीना लाड, तेजाना लाड, खसमसीयाना लाड्ड, जाखरीया जाड, चोंटीया लाड्ड, थडदीया लाइ, थमृतिया जाह, दीना वाढ गले, पूर पपुन्याश्ये ए मले ॥ भोजनने थथै पीरसे, लक्ष्मी एवा मोदक, जातजातना दीसे, जमता वाघे मुखनो वान, तेनां हैयहाहीसे ॥ दातारना दार्थे परीघल, रुपणना दाथ धुजे ॥ वली ॥ योजांथाएया पकवान, जमतो वाघे मुखनु वान॥ण कृण जाति, नव नवि जाति, सखरासाटा, तेमादे नही खाटा । घरफीनी जाति, फीपीनी जाति, मरकीनी जाति, धपिमीनी जाति, सा करीयामोतिचूरनी जाति, मसूरनी जाति, जलेबीनीजाति, सकरपारानीजाति, गोलपापडीनी जाति, हवे थाव्या वडो गुदवडा, फीणी सखरां सोट ॥ तेमाद नही खोट ॥ दहीवडा, फेण वहाँ, मथीयावहां, कांजीयावहां, सालियावहां ॥ पातली सेव, पीरश्यानी रूडी टेव, ताजो युद, तव्यो गुद ॥ कुमलारुत जलेबी, शीरो, लापसी ॥ जिण वीवे दादा गले, स्वर्गद्रुति देव देवी टलवले ॥ वली मीतो मगद, सारो माल नगद । खामनु चूरम, साकरन चूरमु, पढ़ी पी रशी सात्ति, ते जमीयें विशाल ॥ ते कुण कुण नेद, सानला उपजे उमेद ॥ सुगधसालि, सुवर्ण साति, धवली साति, राती साति, नीली सालि, पीजी सालि, मदा सालि, साति, कोमुवि सालि मालवी सालि, कलम सालि, कुंकणी सालि, तिलवासी साति, जीरा सालि, कंद साति, रायनोग सालि, कुवारी सालि, पशयण सालि, निकी सालि, गुरुडा सालि, वजी साबु चोखा थरखम चोखा ने वली खांमधा, सवला बांमधा, दलवा हाथथी सोह्या, नख थकी। वीण्या, उत्तम स्वीयें उया, सुजाण स्त्रीयें उसाया, एवा थणीयाला सुगधि फरदा, उंवा कूर । पीरश्या॥ वली उपर दाल पीरशी, तेनां नाम कहे ,ममोरनी दाल, मुगनी दाल, कायली च णानी वाल, गुजराती तुयरनी वाल, यहदनी दाल, जाजरनी वाल, मनी दाल, वर्णे पीजी, परिणामें सीली, वली परिघलघृत पीरश्या ते कडेवां ' तो के थाजना ताया, एवा गायना घी, नेशनों घी, पीला वरणनों घी, नाकें पीयां घी, मजीतवर्णा घी, दवे पोली पीरसी, ते कहेवी ने ' तो के थाली पोजी, घीमादे जबोली, फकनीमारी फलसी जाय, एकवीश पोजीनो एक कोली थाय ॥ उप्पो । मुरकी मोतीचूर, सेवफिणीसाकर सरस्वी ॥ खाजा खुरमा खाम, प्रिया तिदा पीरसें हरखी ॥ केला तणी कातली, थबरस मूके घोली ॥ घल घल धीनी नाल, पोरसे पातली पोली ॥ साल वाल बगसाजणां, गोरस करवे चित्त उतुं ॥ झपन कहे ए जमण कर्पु, बाकी सपखं एजो वस्तूं ॥ १ ॥ चोला मरटी तेज, साक विण नित्ये सारे ॥ पीरसे नूमी नार, पेट कदो केणी परें तारे ॥ उपर दीली घेश, बास पण पीरसे पाणी ॥ सिंधव नदी ल गार, किछु कहे कर्मनी काणी ॥थाहार सेर यदी तो, सेर सवा दोदिलो लहे॥ कवीपन कहे एजो वस्तूं, जोजन एदने कुण कहे ।। दवे शाक पीरस्यां तेनां नाम कहे बे, नीली मो मीनां शाक, टिंडसीनां शाक, चीनहांना शाक, कोहेला, ककोडां, करमदा, कालिंगडां, केला, कारेला, थारियां, तुरियां, खडबुजा, वेंगण, मोघरी, नींबु, श्रवोलीया, वालोल, चोलानी फनी, सरगवानी शिंग, सांगरी, काचरी, आमला, केरनां फूल, केरडा, लीलां मरचां, लीली पीपर, लीली रायण, खाटा, खारी, मोजा, गया, तव्या, वघाखां, फुगाना, बमकायां, वली पारसी नाजी, ते उपरें सडको राजी ॥ ते कोण कोण जातनी ते कहे जे सरसवनी ना जी, सूवानी नाजी, मूलानी नाजी, चणानी नाजी, चीलनी जाजी, मेथीनी नाजी, थेगीनी नाजी, थफीणनी नाजी, तांदूलनी नाजी, दवे वडीनां शाक कसा तेना नाम कहे २ वाज वडी मवकावडी चूथरावडी घासवडी धारवडी वहीवडी घोलवडी पापडवडी मरियालावडी, जोलेंनीना, घणा वघार मसालाना चमत्कार सबडका देता श्रगुती चाटता मनमा विशेपे नावतां, दवे रायताना नाम कहे जे वारेकना रायता, टोपरानां रायता, खना रा यता, वदाम प्रमुख मेवानां रायता, हवे वहा कर कइ जातना पीरश्यां' ते कहे जे मरचा घणा नांबडा, तव्या चां, कोरां वडा, काजीपोजवहां,पोल वडा, मगनी दालना वठा, चोजानी दालनां रहा,थडनना वडा, दहीवडा, गूववडा, फेणवडा, मेथीया वहां, सालीयावहां, घणे जो जीना, घणे तेलें सीना, मरचांना पणा चमत्कार, थत्यंत घणा सुकुमार, दार्थे लीधा उनले, मुखें पायो तरत गस्ने, घणु गुं कदियें ए वढा एवो तो , के जेने खावाने अर्थ घणा देव देवि पण टलरले ते हवे पलेव पीरसी, ते कहेवी' चोखानी पलेव, जुहारनी पलेव, बाजरीनी पलेव, गहुनी पलेव, दलदीया पलेव, पीपलीयां पलेव, सुनीया पलेव, सबहकीया पलेव, हवे नोजन जमा वचा पीवानां पाणी थावे जे, ते कदे वे साकरना पाणी, शस्वना पाणी, सामना पाणी, गगानों पाणी, पालर पाणी कपूरे वास्यां पाणी, एजचीयें वास्या पाणी, टाढा सीतन पाणी, दीमना पाणी दवे वही थने वहीनां घोल श्रावे, ते कहेवा जे? ते कहे ले गायनां वहीं, नेशनां वहीं, कागा जाम्यां वहीं, मधुरां, सखर्रा, सजीराला, सलवणा जामा, घोल, तेना नखां कचोल, चावलगे जिमता, थया रंगरोल ॥ वली सखरां करवा चरी था एगीने पीरस्पा, ते करवामांहे घणी राइ, जमतां ढील न कां, उपर जीरा लुणनो प्रतिवास, करणहारी पण स्वास ॥ एम नोजन कराव्या पठी एकांते तेदज थाशने रह्या थको ने चलु क राव्या ते चलु कराववानां पाणी केवां थाया, ते करे ने केवडानी वासनां पाणी, काथाना पाणी, कपूरे वास्यां पाणी, चदने वास्यां पाणी, पामले वाया पाणी, सुगंधी पाणी, गगो दकना पाणी, चंदने निवास्यां पाणी, एलचीये निवास्यां पाणी, इत्याविक पाणी करी चक्षु करना पठी एशला प्रमुखथी मुख सोधी दांतोनी शुदि करीने परम सोच्य चया दवे मुख वास दीधा ते कहे ने चांकडी सोपारी, चीकपी सोपारी, ते पण केशर वरणी, करें वा .... चित्र २८ ममुनो नाम नारावी परखने साविने भोमन पति भोजन

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सित, वजी तीखो लविंग, जावंत्री, जायफल, मोटा मोमा, एलची, पाक नागरवेजना पान, ते वली काथा चूना सदित दीर्धा, वजी घणांथावर सन्मान, घर्ण गीत गान, घणां तानने मान, दवे कर कई जातिना कर कई नांतिनां वस्रोनी पहेरामणी करी, ते कहे देवालय वस्त्र, रत्नकंबलवस्त्र, पानडी, खीरोदक, घटा सेला, थधोतर, मूलकसबी, जरबाप, मख मल, चिणीयाँ, बुलबुल, चसम, पाटु, टसरिया, शणीया, नेरव, नारीकुंजर, पदीर, पट सीउली, पंचसश्यां फूलपगर, फूलकारी, दोरीयां, जावर, चादर, नेत्रपट, धोतीपट्ट, राज पह, गजवही, सुवर्णवडी, ईसवडी, कालवडी, जुथञ्चिथा, पटकूल, पट्टवीरसाडी, घाटडी, चीर, कुंमखाव श्रतलशलादि वाराचीनी, पापडीयांचीनी, सथीथा गुथागरी, थासणिया थागराइ, सणालीपट्टणी,मशरु तास्ता, शालु, दोपष्टा, त्रपटा, पास्ता, टुकडी, मुगटां, बायल नारी कुंजर, शाडला, रत्नकवल, चुनडी, घाटमी, इत्याविक पांचरंगी वाघा पहेराव्या, वली काशमीरी केशरना बटणां कीयां, ना नजा मुर्गध बावना चदननां विवेपन कीधां, थरगजा, चूथा, चपेज, फुलेल, केवडो, मोगरो, जाइ, छ, कुंद, मचकुंव, चंपो, मरुयो, दमणो, केतकी अने मालती प्रमुख फूलोनी माला पहेरावी पड़ी वली मुकुट, तिलक, बाजुबध, हार, चीर, वेर स्वा, रत्नावली, मुक्तावली, चशवली, दीरावली, प्रवालावली, सूर्यावजी, ग्रहावली, नक्षत्रा वली, श्रोणिसूत्र, कटीसूत्र, पट्टशीखर, चूडामणि, कुमल, कटक, ककण, थगद, मुश्नदक, दशमुस्क, चक्रक, बजर, मेखला, मुदक, पदक, सांकलु, सांकली, चिचिष्ट, नगउत्तरी, दारा हांशडी, कपाली, मेवेयक हेमजाली, मणिजाली, मौक्तिकजाली, वर्णसरीका, जांजर, नेवर, घुघरा, पीगडां, वीठीया, यगुडी, वालाजाल फुमां, थकोटा,रूपाला, हरीयाराखडी, गो

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सित, वत्ती तीखो लविंग, जावत्री, जायफल, मोटा मोमा, एलची, पाक नागरवेजना पान, ते वली काथा चूना सदित दीर्घा, वली घांथावर सन्मान, घणं गीत गान, घणां तानने मान, हवे का कई जातिना कर कइ नातिना वस्त्रोनी पदेरामणी करी, ते कहे जे देवरुष्य वस्त्र, रमर्कबलवस्त्र, पानही, खीरोदक, श्रटाणां सेला, धोतर, मूजकलषी, जरबाप, मख मल, चिणीयां, बुजबुल, चसम, पाटु, टसरिया, शणीया, नेरव, नारीकुंजर, पटदीर, पट सीजी, पंचसश्यां जपगर, फूजकारी, दोरीयां, जावर, पावर, नेत्रपट्ट, धोतीपह, राज पट्ट, गजवडी, सुवर्णवडी, ईसवही, कालवडी, धचिथा, पटकूज, पट्टवीरसाडी, घाटडी, धीर, कुमरखाव अतलशलादि खाराचीनी, पापडीयांचीनी, सीधा गृथागरी, थासशिथा थागराइ, सालीपट्टणी,मशरु तास्ता, सालु, वोपवा, त्रपटा, बास्ता, टुकडी, मुगा, बायल नारी कुंजर, शाडला, रत्नकवल, चुनडी, घाटमी, इत्यादिक पांचरंगी वाघा पढेराव्या, वस्ती काशमीरी केशरना बटणां कीघा, जसा जला मुर्गध बावना चंदननां विलेपन कीधां, अरगजा, चूथा, चंपेल, फुजेल, केवडो, मोगरो, जाइ, छ, कुंव, मचकुंद, चपो, मरुथो, वमणो, केतकी श्रने मालती प्रमुख फूलोनी माला पहेरावी पबीवली मुक्कट, तिलक, पानुषध, हार, चीर, वेर खा, रत्नावली, मुक्तावली, चंशवली, दीरावजी, प्रवालावली, सूर्यावली, पदावली, नक्षत्रा क्जी, श्रोणिसूत्र, कटीसूत्र, पशीखर, चूडामणि, कुमल, कटक, ककण, थमद, मुश्नदक, दशमुश्क, चक्रक, अजर, मेखला, मुदक, पदक, सांकलु, सांकली, चिचिष्ट, जगउत्तरी, वारा होशही, कपाजी, ग्रेवेयक हेमजाली, मणिजाली, मौक्तिकजाली, वर्णसरीका, जांजर, नेवर, घुघरा, पीगडा, वींबीया, अगुवडी, वालाजाल कुमणा, थकोटा,रूपाला, हरीयाराखडी, गो फणा, मलासीयो, त्रिसंथीयो, प्रोटी, वोरडांकरी, वेढला, मुरकी, मोतीदर, गंगोहा, तुगल, प पकली, पानही, दोनेरताजी, मोतीसर, सरलीया, टीला, टीली, चांदला, बाड, नवग्रह, मु इटी, यंगुठी, वींटी, वांकरूं, गलसरी, डापकरजाली, हेमजाली, मादलीयां, खेलमादलीयां, कवोरा, पाटीथाला कंदोरा, लटकणमोड, नागली, नागला, मोरवेसण, नथवानी, सिदूर, | कुंकुमरीजी, जवलाचूडी, घरचूडी, चूमा, कांकणी, कारेली, लाल, पोंची, मेखला, हाथलां फली, सोना लडेरीया, तावीत, कमला, कमली, वाकडी, वेलीया, जोलीया, श्याविक थान रण परेरायां ए रीतें मित्र, ज्ञाति पोताना कृत्रियो तथा कुटुव, सगा सवधीनी नक्ति विधि घ प्रकारनी कीधी इति नोजन तथा थानरण विधि दवे बालकनु श्रीवर्षमान एq नाम दीघु, से वखाणे वे हवे ते मित्र, न्याती, गोत्री, स्वजन, पितरीया प्रमुखने सत्कार, सन्मान थापीने त्रिशलादेवी तथा सिदार्थराजा एवं कडेवा लाम्या ॥१०॥ ॥जे हे वेवानुप्रियो । चमारे घेर ए पुत्र गर्नने विपे श्रावी उपन्या पनी थमें रूपेकरी, श्रणघडे सोने करी, धान्ये करी, राज्य करी, वाहनें करी, मनुष्पना सत्कार करी, अत्यंत पणा वृद्धि पाम्या तथा सा मत जे सीमाडाना राजाश्रने चवप्रयोतनादिक राजा, ते पण थमारे वश थया तथा श्रमारी चाकरी करवा थाय्या॥१॥ तेथी अमारा मनमा एवं चितव्युं दतु के जेवारे थमारे घरे वाल फनो जन्म थाशे तेवारें ए वालकनुं नाम रूप गुणे करी प्रधान निप्पन्न श्रीवईमान एवो पापी, ते अमारा मनोरथ सिह थया, थमारी श्वा प्रण यश माटे थमें ए कुमारनुं वर्ड मान एर्नु नाम अापीयें यें तमें पण एकुमारने श्रीवर्षमान कुमार एवा नामें बोलावजो एरीते संबंधी सर्वने शिरपार पहेरामणी करीने सर्व सङ्गाननी सावें पालकनु नाम स्थापन कस्यु ॥ १० ॥ पठी ते सर्वने विवाय कमा ॥ इतिश्री वर्धमान नामस्थापन संपूर्ण ॥ ते श्रीव ईमान जगवान् कहेवा बे' तोके सात दायर्नु महोटुं शरीर ले जेनु, वली समचोरस सस्थान बे, सुवर्णवर्ण वेदनी निर्मल कांति ने, वज्ज ऋषननाराच संघयण ने, एवा नगवान् ने दवे श्रीवर्धमान स्वामीनां सर्वमली त्रण नाम थयां ते कदे ने एकतो माता पितायेंथापेलु नाम श्रीवर्धमान नगवान् ले थने बीच रागवेष रहित तपस्यामा खेद सहन करवाथी श्रमण एवं नाम जाणवू थने त्रीजु जे थकस्मात् उपजे ते नय श्रने सिहादिकोना उपश्वथी जे जय उत्पन्न थाय ते नैरव कहीये ए नय नेरवोथी चलायमान थया नदी निर्नय परों रह्या थका नख तृपा प्रमुख परिसहे फरीने दोन पाम्या नदि एम परिसद उपसर्ग सदन कया तथा सर्वतोन प्रमुख प्रति माना पालवा वाला, चारज्ञान सहित, धैर्यवान, अरति रति परिसहने वेतीने रागप रहित पणे सुख उस सदन का तेथी इव्यवीर्य पाम्या थका मोदजवानो निभय कस्यो बे तोपण चारित्र पासवामां तत्पर रह्या एवा वीरपणांनां गुणोये करी देव तायें श्रीमहावीरस्वामी एवं नाम दीधु तथा नगवान् यामल क्रीडा करतीवेलायें देवता कोन पमाडवा श्राव्यो तेनाथी बीक पाम्या नदी ते कथा थागल कहेवाशे तेवारे पण देव तायें महावीर एवं नाम वीधु ॥ १० ॥ ॥ हवे जगवान् श्रीमहावीरस्वामी विवसें दिवसें चंकलानी पेरें वधता था, घणा वासवासीयो साथे परवस्या यकां, थत्यंतरूपवान, मस्तकें जमरानां सरस्खा काला केश ने जेना, कमल सरखां नेत्र , परवाला समान बिंबोष्ट , धोला वांत ने, कमल गर्न सरखो गौर वर्ण , कमलना गध सरखो श्वासोश्वास , सर्व देवताउँना रूपथी पण घणुज रूप जेनु एटले सर्व देवोनुं रूप जो एकतुं करीयें तो नगवानना मावा पगना थगुगनी एक कलाने पण पदोचें नदी केमके त्रणे लोकमां सर्वयी अधिक रूप :- प्रीतीर्थकर नगवान दोय ने तेथी खु गणधर महाराजन रूप, तेयी श्राहारक शरीर वाला साघुनु रूप, तेथी हुनु अनुत्तर विमानवासी देवोनु रूप जाणवु, तेथी हुनु नव मेवेयकना वेवोन रुप, तेवार पड़ी पारमो देवलोक, अगीयारमो, वशमो, नवमो, था वमो, सातमो, बो, पांचमो, चोथो, त्रीजो, बीजो, पहेलो वेवलोक ए सर्व कमें करी एक पी जायी सतरता उतरता रूप वाला कद्देवा तेवार पड़ी जोतिपि वेवो, पढ़ी नवनपतिदेवो, पनी व्यंतर देवो, पढ़ी चक्रवर्चिराजा, पठी वासुदेव, पडी बलदेव, पढी ममलिक सामान्यरा जानु रूप जाणवु ए सर्व थर्नुकमें एकेकयी हीनदीन रूपवाला जावा वली नगवान जाति स्मरण ज्ञानसहित थप्रतिपाति मति, श्रुत थने अवधि माती त्रणाने करी सदित, सर्वथी यत्कृष्ट वेदनी कांति जे जेनी, एवा नगवान थयीह, बलवत, बुद्धिमत, मुरूपी, दिष्यस्वरूप पारी, साहसिक वली रूपाप्ता, रंगीला, रतीयाला, रेखाला, रतीजा, मतिला एवा जगवान र मता रमतां जेबारे थाववर्पना थया तेवा, सरखे सरखा राजकुमारो सार्थे क्रीडाकरता थका ते देशमा प्रतिम पामेली एवी थामलकी कीडा रमवा सारु नगरनी बाहिर एक पीपलीन वृक्ष ते स्पा सर्वकुमारो एकता थइने सर्व बोकरा होडवा जाम्या ते थावीरीतें के वे वे बोकरा साथै छोडे तेमा पहेलो जे पीपलीना वृदने जई पकसे ते जीत्यो थने जे पावल रहीजाय ते दाको पड़ी जे दारे ते पोतानी वध उपर जीतेला बोकराने वेसाडीने जे स्थानकथी होड करीने सोन्या होय ते स्थान पाने जर मूके एवीरीतनी रमत पोताना जेवडा बोकरा साय जगवान करे ये एवामा सौधर्मे सनामां बेवा यो अवधिकाने करी नगवानन महावल

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चित्र करने का मनेसियो पीपभानो एस रमाकरे हाथ जगा जाणीने सनामां कहेवा लागा के, बाजना समयमा जेवा श्रीमहावीर नगवान पलवान ने एवो को वीजो वलवान नथी जो महारासहित सर्वदेवो मलीने तेने कराववा जाय तोपण मरे नदी एवा ले ते महाराजना वचनने यसबदतो थको एवो को मिथ्यात्वी देवता तिहाथी छठीने जिदा नगवान रमेने तिहां थाष्यो भने बोकरानुं रूप करी जगवान साथै रमवा लाग्यो तेवारे जगवान अत्यंत वेगथी होडीने तरत जर पीपलीना फाडने डीने थागत चाल्या अने देवतायें पीपलीना नीचेनी मालीयोमा सर्वत्र फूंकरा करतो एवा सर्पनुं रूप वनाप्यु ते जगवाननी सामो फणाटोप करीने बीवराववा जाम्यो पण जगवाने सर्पने पोताना दाथषी दूर करीने पोतें पीपली उपर चडीगया थने मनमां ते सर्पनो का पण नय थाएयो नदी दवे जेवारे ते देवकत बालक दासो थने श्रीवर्षमान जीत्या तेवारे ते देवरूप वालके पोतानी खाप उपर नगवानने चडावीने तेने बीवराववा सारु सात ताडवृक्ष जेटलु Sघु रूप का तेने जोक्ने वीजा सर्व पालको नयपामीने नाशि गया अने प्रजुना मा तापिताने जा सर्वात कमु तेवारे माता पिता चिंता करवा लाग्यां तेमनी चिता टालवा ने माटे नगवाने वजप्रहार जेवी पोतानी मुष्टि, देवनी पीठ उपर मारी तेथी ते देव थरराट करतो चीश पाहतो थको जमीन उपर पडी गयो पड़ी घणो ललायमान थइ पोतानुं रूप प्रगट करीने कदेवा जाम्यो के देप्रनु! जेवा तमोने महाराजे वखाण्या तेवाज तमे धीरजवाला महावलवान बोए थवसरमा महाराज पोते पण तिहांथाव्या थने ते देवताने नगवानने पगे लगाच्यो देवतायें पण नगवानने पगे लागीथपराध खमाष्यु ते देव मिथ्यात्वपशु त्यागी समकेति थयो पठी महाराज तेने पोतानीसाथै देवलोकमां लगयोति थामलपीपलिकीमा सपूर्ण॥

दवे नगवान थाम्यर्पना यया एटले माता पितायें मोदना वशयकी विचास्नु ॥श्लोक। लाल येत्पंचवर्षाणि, दशवर्षाणिताढयेत् ।। प्रातेपोडशकेवर्षे, पुत्रमित्रवदाचरेत् ॥ १॥ ॥ तया ॥ मातारी पिताशत्रु , पुत्रोयेन नपातितः ॥ शोचते न सनामध्ये, दसमध्येवकोयथा ॥१॥ । थर्य-ठोकराने पाचवर्प रमाडवो रमतकरावदी बने दशवर्पनो थाय तेवारें धाकमा राखवो तथा शोलवपनो जेवारें थाय तेवारे तेने मित्र सरखो जाणवो ॥१॥ ॥ तथा जो पुत्रने नपावे नदि तो माता तेनी वेरिणी जाणवी थने पिता तेनो शत्रु जाणवो केमके जो नणे नहींतो ते पंमितोनी सनामा जेम ईसोनी पंक्तिमा वगलो शोने नही तेमतेपण शोना पामे नही ॥ २ ॥ एवो विचारकरी, सारु मुहूर्त जोश्ने शुनदिवसे पोताना वजन क्षत्रियोने जमाडी| वस्वानरण थापी, केशर कस्तुरीना बांटणा करी, दाथी रथ घोडा शणगारी, गीत वाजित्र सदित महा महोत्सवथी निशालीयाउने थापवा सारुं गोलधाणी मेवा प्रमुख जीधां तेनां नाम कहेवे वरसोला, गुदवडा, खारक, टोपरां,शख, खजूर, सिंघोडा,थरखोड, बदाम, चारोली, नालियर, साकर, सेंव, पेडा, फल, फूल, साकरीया चणा, एलचीपाक, धाणी, गोजधाणी, बीजोरा, चणा, सोनानाखडीया, रत्नजडित लेखणो, रूपानीपाटी, पाननां वीडा प्रमुख यनेक वस्तु सायें लश्ने तथा पंमितने थापवा योग्य वस्त्रानूपण सार्थे जश्ने सोहागणी स्त्रीयो गीत गाती थकी श्रीवईमानने नान करावी शणगार परेरावी हाथी पर वेसाही मेघा मवर उत्र चामरो सदित, याचकोने दान देता थका,नाटस्तुति करता थका, ब्राह्मणवेदध्वनि लणता थका, यशिर्वाद करी वदीजताथकां, नणाववा वाला पंमितनी पासें थाय्या तेवारे पंमित पण सिदार्थराजानो बोकरी सकलदेशनो अधिपति मदारीपासें जणवा थावे बे एवं

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चित्र भणारनार मेता हदबाझराने रूपेश महाराज भएनार निगालिया जाणी थर्दकार थाणी मदोर्ट वासन ममावी शणगार करीने वे मणिबंध, वेषालु, वे कक्षा, घे कान, वे काननी मूलमा, एक ललाटमां बने एक कोटा एवा बार स्थानके तिजक करी पोताना परिवारने सर्व शणगारी वाट जोतो जोतो वेगे ले एथवसरमा इमदाराजनुं था सन पण घ्वजानी पेरे कपायमान युं श्रथवा जलमां चंबिनी पेरे चपन ययुं अथवा हाथीना काननी पेरे चपल थर्पु तेवारे महाराज श्रवधिज्ञाने जोयुं तो नगवान जणवा घेग बे एवं देखी कौतुक पामी चिंतववा लाग्यो के था मोदनीयनो चमत्कार जूठ कहेवो ने माटे मातापिता जाणे जे एने नणावीये पण नगवानतो प्रणाने सहित डे महागनीर ने एने से नवं ने ' एतो नल्या गुण्या स्वयंबु६ , श्रसृतमा वली मीनगश शी करवी ? सरस्वतीने वली पोथी शी देखाडवी ' चश्माने वली यज्वलता शी करवी ? थावाने विपे तोरण बांधवं ? तथा मातानीथागल मोसाल वर्णव करवो तेम एमणे श्रज्ञानना वशथी नगवानने निरर्थक जणवा बेसाच्या ने माटे दवे नगवाननी श्राशातना न दोवी जोश्य एवं विचारी शर्के ब्राह्मणर्नु रूप करी जिहां नगवान नीशालमां थाव्या बे तिदा ब्राह्मणने सिंहा सन उपरथी उगाठीनगवानने उंचा सिंहासन पर वेसाडी प्रथमतो धपाध्यायनीसमी वेशी तेने केटलाएक शास्त्रार्थना प्रश्न पूब्या परंतु उपाध्यायथी बराबर तेनो जवाव थपाणो नही तेवारे वली तेहज प्रश्न नगवानने पूब्धा तेना उत्तर जगवाने नि संवेद पणे बाप्या ते जोश थध्यापक जे नणावनारो ते मनमा विचार करवा लाग्यो के था वातोना तो महारा मनमा पण थाज सुधी संवेद इता में पूर्व घणा पंमितीने एनां यर्थ पूढेला दता पण कोश्ये महा री सकाउनु समाधान कर्यु नही श्रने या न्हाना वालकें महारा संदेद दूर कस्सा ए महोटो थार्य जपायठे वाली पण महाराज जगवाननें शदोनी उत्पत्ति पूबी तेवारें नगवाने सज्ञा सून, परिनापा सूत्र, विधि सूत्र, नियम सूत्र, प्रतिपेध सूत्र, थतिवेश सूत्र, अधिकार सूत्र, यनुवादसूत्र, विनापा सूत्र यने निपात सूत्र ए दश सूत्रना थर्थ सर्व पृथक पृथक् कदी पताव्या, शवसायनिका घतावी तेवारे लोकोये जाए[ जे था कोई परदेशी ब्राह्मण यावेजो वे ते पालकने प्रश्न करे के थने वालक तेना उत्तर थापे ने पण एवा उतरतोथा नणावनार पमितनां मातापिता पण जाणतो नथी एम लोक सर्व थापर्य पामीने विचारवा लाम्यां के थाटलां शास्त्र था वालक ते किदा जल्यो दशे' थनें उपाध्याय पण चमत्कार पामीने कदेवा लाम्यो के थाते कोण ब्रह्मा पोते साक्षात् थाही याव्या डे केयं ते वारे सर्व लो कना मननां सशय मटाडवा सारु महाराज योध्या के थरे लोको था वईमान कुमार ने, एने सामान्य पुरुष जाएशो नही एत्रण लोकनो नाथ , सर्व पदार्थोनो जाण ने, परंतु मदागनीर माटे पूजधाविना उप्सर थापे नही लोकोमा केवत बे के गला ते वाजणा, वाला योला पोलादोल, जाणे थाश्विन बने कार्तिकनो मेघ, जेवोथसति स्त्रीनो स्नेह तथा जेवो शरदऋतुनो गारव तेवो ठालो जाणवो पण जे पमित जे ते तो वांदना मेघ सरस्खा गला बोले नही जे मूर्खहोय ते पोतें पोताने जाणेजे हुँ पमित ढुं एवी लपरायो करे पण एवा महोटा पुरुष जे वे ते विना पूढे बोले नदी एवं कदीने जगवाने प्ररूप्यो जे व्याकरण सर्वधि वराप्रकारना सूत्र तेनी वृत्ति तथा उदाहरण करीने व्याकरण बनायु ते जिनें व्या करण नामा घाउ व्याकरणनीयादिमा पयो पड़ी महाराज पंमित प्रमुख लोकोमा जग वान सर्वज्ञ ने एवं जणावी पोतान रूप प्रगट करीने सर्गमा गयो उपाध्यायें जगमानने पगे लागीने कामु के दे प्रतु' तमे ज्ञानसमुश्बो लुतो थपूर्ण कलशनी पेरेई माटे तमे महारा गुरु तो पठी प्रचुयें उपाध्यायने घट वान आप्यु जगवानना माता पिता घर्ण राजी थयां थको नगवानने हाथी उपर वेसाडी उत्सव सहित गाजते वाजते घरे तेडी श्राव्या इति लेखक शालामहोत्सव समाप्त ॥ ॥ दवे प्रथम महाराज श्रावीने नगवानने नलेना थर्थ पूब्धा वे ते विस्तार दोवाथी उपरे सूचव्या नथी माटे अहीं जखीये नेयें ॥ ॥ श्रथ जलेना अर्थ प्रारंन ॥ श्रीवीरप्रजुने नीशाले वेग जाणीने सौधर्म इब्राह्मणनें रूपें थावी प्रजुने नमस्कार करी सर्वलोकनें चमत्कार उपनाववा निमितें प्रथम जलेना अर्थ पूया थकां प्रबुजीयें था प्रमाणे थर्ष कहा ॥ १ वे लीटी ते जीवन वे राशि बे तेा एक सिफ्ना जीव ते निष्कर्मी थने वीजा संसारी जीवते सकर्मी जाणवा १ जले ते अरे जीव तुं सिक्ना जीवनी रा सिमां जलवानी था राखजे ३ मिहुँ ते संसार रूप गोलाकारें कंफो कूप ले ते मांदेथी निक लवान हि माटे नीकलीस तो सिक्षमा नलीश ४ बिलाडी ते जेम कूवामा वस्तु पडी होय तेने लोढानी बिलाडीथी बाहेर काहाडीये तेम दो संसारी जीवने संसार रूप कूप माथी फाहाडवानी एक देशविरति भने बीजी सर्वविरति रूप बे बिलाडी जाणवी दवे ते सिघना जीव किदो रहे जे ते कदे ५ उंगण चोटी माथे पोटीयो एटले चौदराज लो कना एक अधोलोक बीजो मध्यलोक थने त्रीजो सर्वलोक एवा प्रण नाग ले तेमा उर्ध्व लोकनें चोटीने स्थानके पार योजन विस्तार वाली सीपनारा नामे पृथिवी तिदा एक योजननें चोवीशमें नागें ३२३ धनुपम्पर पत्रीश अगुल जेटला विस्तारमा लोकने मस्तकें थलोकने थही रह्यां थकां सिपना जीव रहे डे ६ ननो वीटालो ते हे जीव ' तुं संसारना कामनोगयो मन या वीटाइ रह्यो हो तेथी अधोगति एट नीचीगति पामीश ममो माउलो ते था ससारजे ते जीवनु थनादि घर तेमा मोदनामे माउलो एटले मोसाली यो वे छ ममा दाय वे सामुवा ते पूर्वे कदेतो जे मोह नामे मोसालीयो चे ते जीवने काम लोग रूप ये लाडवा हायमा थापीने नोलवी राखे संसारमाथी नीकलवा देतो नथी ए सेरीराणी पोकळी ते सिदिरूप राणीने मंदिर चढतां चार कपाय रूप चोकडीनी चोकी रा खीने ते थोकीने वीने फदापि कोई उँचो चढे तोपण तेने घडवा थापती नयी १० पाठी चारकुमावलि ते थगीधारमी पावडीथी पाटो ढोलीने तेने ते चोकडी संसार कूपमा नाखे ११ टाउ ढांट ढोकलो माथे ठोकरो एटले हे जीव ' तु संसारमा धा धाश्ने गर्नावासमां पढीश तिहां ढोकलानी पेरे सीजाइ रदीश वली बोकरां यो ते तादारे मा विटंबना पाडो । माटे जो तु धर्मना चक्रवर्ती महाराजर्नु सिह नगर तेने जोवाने वांबतो दोय तो प्रथम ! तेनो सम्पक्व नामे महामत्रीश्वर ने तेनी साथे मलजे एटले ते तुजनें धर्म महाराजथी मे लाप करावी देशे दवे ते सम्यक्त्व नामा प्रधानना घर सुधी जातां थकां वचमां घाट ले तिहा लूटारा रह्या वे तेने निवारण करवानो उपाय कहे १२ हाथमा मांगडी ते धर्मकथा वार्नारूप यया प्रवृत्ति फरण करी, थपूर्वकरणना शुन परिणाम रूप मगही एटले मदामुगर दायमा जश्ने १३ थाहा वो नाश्हा वडो नाश् कानो एटले राग हेप रूप ये नाश्ठाने पडा डी वेगला करने तथा घीजो पण सात प्रकति रूप चोरनो क्ष्य करी थपूर्वकरण रूप मुमरथी मिथ्यात्वनी गांव नांगीनें एटजे मथीनेद करी थाघो जाजे तिहाँ सम्यक्त्वनामा महामत्री श्वर पांच रूप करी रह्योने तेना तुं दर्शन पामीम पनी तेनी सेवामा रहेता था ते ताहा रामा योग्यता जाणीने थागज धर्म चक्रवर्तीनी घे पुत्रीले १७ डिकेवली इडिधकारु एटले एक वेशविरति नामे लघु पुत्री थने वीजी सर्वविरति नामे महोटी दीकरी ते तुजने पर यावी देशे परंतु जो सम्यक्त्व मत्रीनी सेवा एकाग्रचित्ते सन्मुख रदी करीश तो ते प्रसन्न पाशे केमके १५ श्राप था थांकोडा वढे थांकड फांकोडा एटचे तिहां शका करवा कषाय रूप थांकडा फांकहा महोटा ले तेनी जो तुं संगत करीश तो सम्यक्त्व मत्रीना चित्तमा नर्म पडशे तेवारे ते तादारी साथे दोहेलो थाशे १६. निलीतोडवे कांगेला वडे एटले तिहां वली विषय कपाय रूप अथवा ममता माया रूप एवी थे विषनी वेलडी के तेमादे काम अने नोगरूप वे सर्प सूता तेने जगाडीशमा लेडीशर्मा एम करवाथी स्वामी सुप्रसन्न थयो थको तुजने सिख नगरीये जवानो सथवारो करी थापशे १४ एनवेन धेगाडी एटले समिति थने गुप्ति रूप घे गाडीयोमा वेसाठीने १७ रखवाला बलदिया एटले तेमा झान थने चारित्र रूप वे बजद जोतरी श्रापशे तेने १एवमीयां बे रासही एटले सवर थने निर्जरा रूप वे रासी बांधीने गाउली शिवपुर नगरना मार्ग जणी चलावजे २० क कोकेवडो एटले केवलज्ञान रूप वोलावा विना सिह नगरे पोहोचातु नथी ते केवल ज्ञा नतो थणादार मार्गथी उपजे जे माटे २१ खस्को खाजलो एटले तु चार प्रकारना थाहारनो स्वादी थाशमा रसेंश्यिना जोलुपी थाशमा २२ गगा गोरी गाय वीयाणी एटले ते था दारीने तपादिक मार्ग तेना वतावनारा तो गुरु ने माटे गुरुनी जक्ति बढुमान्य करजे केम के गुरुमहोटा उपकारी ले ससार समुश्तरवाने बोधवीज धर्मर्नु बालवनाविक गुरु थापे में माटे गुरुनु गौरव पशु करजे २३ घघोघरट पलाल्यो जाय एटले थरे जीव तुं घरनो धंधो जे थारंन समारन तेना नारे करी थदर्निश पलाएपो थको वदे ने ते नारथी तुजने गुरु मू । काक्शे २५ ननी थामण वूमणो एटचे गुरुये जे घरनो नार बोडाववा माटे पांच श्रषु व्रत श्रने पांच महाव्रत रूप थनिमद नियमादिक अंगीकार कराव्या ते पालतां थको थामण दूमणो नम चित्तवालो थाने पश्चात्ताप करीशमा २५ चशाचिनीचोपड़ी एटले गुरुदत्त चारित्र धर्म पालवानी चित्ता चौप राखजे २६ सावदियापोटला एटले बनस्थ पणे गुरु समीप श्रुतझात चौदवनी वियानुं पोटखं वाधजे ज्ञाननो अन्यास घणो करजे २ जळोजेसलवा णी एट नियाणशल्य, मायाशय थने मिथ्यात्वशल्य ए प्रणशल्य ताहारा अतरंगने विपे तेने टालवानो वणिज व्यापार करजे २० जसोफारीसारस्वो एटले तु कारी सरखो वनाव राखजे जेम जारीनु मुख साकई दोय श्रने पेट पोहोखं दोय तेम तुं पण पेट महोटु राखजे यने मुखयकी कोश्ना दोप मर्म प्रकाशीशमां एवीरीतें मुस्पने सांकडं रावजे २५ अभीयो । खामोपावे पटलें खामोांवो ते थईचश्मा जाणवो तेना जेवा श्राकार वाली सिमशिला ले ते स्थानकें जावावं तुं निरंतर साधन करजे ३० टापोजिखमेप एटले तुं पोताना व्रत नियम अगड थाखडी जे कां गुरु समीपें लीयां ते खमित करीश नदी अर्थात् पञ्चरकापनी पोल जे वारणा तेने दृढ रावजे २१ तागेवर गामु एटले तुं तोवर ते नांगेलो घहो तेनी पेरें थाश्शां गुरुये आपेली श्रुतिशिवा ते हृदयरूप घटने विपे समद करी राखजे २२ मामामरगांठे एटले तु बाह्य थामबर करी अन्यतर कर्मनी गांठे वघाशमा ३३ ढढा सुणोपूरे पटले तु सुणो ते श्वान तेना पूरानी पेरें वक्रवनाव राखीश नही परंतु सरल स्व ' जाव राखजे ३३ राणोताणोसले एटले जो तुं मोदराणा सार्थे फूजकरे तो ज्ञान, वर्शन, चारित्र - तथा त्रगुप्तिरूप त्रण सेल दाथमा राखजे २५ ततोतावे ते एटले तुं तप जप करतो यको कोश्ना थाक्रोश वचन सनिलीने तप्त तेलनी पेरें तातो थाश्शा २५ या थेरखवा ती पटले कदापि तादारु मन वसवर्ति नथाय तो पण वचन थने काया ए वेनें तो थिरयाप करी राखजे ३७ दडीयोदीवट्टो एटले समकेत वर्शनरूप वीवो तेने हृदयरूप घरमा राखजे वली क्या दमनने दान तेनी थनिलापा धरजे ३७घड़ीयोघाएको एटले तु धन कमाववानु परिग्रह मेलववानुं ध्यान राखीशमां केवल धर्मध्यान तादारा हृदयमा राखजे ३ए ननीयो पुत्लायरो एटले तु नास्तिक मति अंगीकार करीने हृदयमाथी समकेतने पोलु एटले पातखं करीशर्मा ४० पप्पापोलीपाटें एटले पाप थाववानी पोल जे पांचेंशियनां श्राश्रवछार ले तेने सवर रूप कमाउ जहीने वधकरी राखजे पण पोला राखीश नही जेम थदार पापस्थानकनो प्रचार तेमा प्रवेश करी शके नही एवा दृढ मजबुत बंधकरी राखजे ४१ फाफाफगडेजोडे एटले फोकट फांसीया, थक्ष, यविनीत, धनाचारीनी जोडे सगत करी विचरीशमा ४२ वव्या मांदेचांदणु एटले बोधवीजनो वधारो करजे जेम जेम बोध वघतो जाशे तेम तेम हृदयने विपे झानरूप चादणु एटले चश्मा प्रगट थाशे ४३ नमोनारीनेंसको एटले नेंस जेम सूकुं लीलु ना करीने पेटें नारी याय तेम तु पण यावीश वनक्ष बने वत्रीश श्रनतकाय जे क दमूल कडेवाय रे ते पामीने तेनुं नक्षण करी पेटे नारी याशा कदापि देवादिक श्रावीने चलावे तोपण चलायमान थाइश नही माममूकीशमा एटले थईन्नक श्रावकनी पेरे दृढ ता राखजे तथा वली व्रत नियमाविक पालतो थको मनमा मद्दोटो थनिमान धरीशमा, फरी कहे रे ननीयोनाटचूजेतरो एटले जेम चूलानी नाट धगधगती रहे जे तेम तु कोश्ना था कोश थसह्यमर्मवेघाजां वचन सानलीने यंतरंग देयामा क्रोध रूपधानियें धगधगतो रदीशमा एटले कोधाग्नियेनेटीशमा ४४ ममयीयोमोचक एटले थानकर्मने मूकजे मोक्ष मार्ग महोटो तेने श्रादरजे ४५ ययीयोजाहोपेटको एटले ससारमाहे यमजे कांत तेर्नु पेट महो? वे ते सर्वजगतने मास करे ये तोपरा तेनुं पेट नरातुं नथी तेमाटे एनो नय तादारा हृदयमा राखीने धर्मने विपे थाजस करीशमा ४५ रायरोकटारमन्न एटले राग थने क्षेप ए वे महोटा माम तेमां रागना वली वे प्रकार ने एक प्रशस्तराग थने वीजो थप्रशस्तराग ए घेदु ममने जी तीश तो फर्मयी दलवो यश् केवलज्ञान उपार्जन करीने अश्यपद जे मोक्षपद तेनो नोगी यश्श ५७ लानापोडोलातवा एटले लोनरूप घोडानी लातथी वेगलो रहेजे १७ ववाविगणवासवे एटले कामादिक व्यग तेने ताहारा मनरूप घरमा वास पटल्ले वसवा उजे नदी, केमके जो कामादिक ताहारामनरूप घरमा प्रवेश करशे तोथारमाना उत्तमगुण रूप धनने सर्व चोरी ला जशे ४ए शशाकोटा मरडीया एटले असलानी पेरें कोट थने कानथी ढकाश्ने गलीयार थइ वेसी रहीशा पण धर्मने विपे उद्यमी थाजे जे पटलालोकनी गतियाशे तेम तादारी पणयाशे एछ चितवता एकदिवसें फाजरूप पाराधी गतिमा लजाशे जेम ससलाने थाटी से कोट एटले गलु मरही नाखे तेम तुजने पण काल बाहेडी मरडी नाखशे ५० पपाखूणे फाडिया एटले सरु बोलजे खोर्दु वोलीशर्मा केमके एक पण मृपावाद वचन बोलवाथी सर्वगुण अने सर्वव्रतनो नाश पर जाशे जेम कोक वस्खनो कोथलो खूणे फाटो पड़ी तेमा जे वस्तु नरेती होय ते हलवे हलवे निकलतीथकी अनुक्रमें सर्वखाली घई जती रहे तेम ताहारा गुण तपा व्रत जता रहे तथा खूपणेवेशी एटने को नहीं देखे एवीरीते एकांते वेशी पाप करीम तो पण ते पागल पिकका प्रगट चाशे इत्यर्थः ५१ सारसे वंती लोक एटचे जो तुं मोदरा नानी साधे यु६ करे तो वंती एटखे हाथीनी पेरें साहसिक थाजे जेम हाथी सादसिक थको सर्वनी धागल थागेवान थइ किनानां कपाट, गढ कोट सर्वने नांगी नाखें तेम तुपण मोद राजानो मिथ्यात्वरूप गढ जांगी नाखीश ५२ दादोलोदरिऐकलो एटखे तुं मोहरूप पाराधीनां पाशमा परीशमा पण दरण जेम पाराधीने देखी नाशी जाय तेनीपेरें तुंपण फाल मारीने नाशी जाजे परंतु जो मोदना पाशा पख्यो तो संसारना बंधनथी बूटीश नही ५३ लावेजष्ठी दोप शीदार एटले जोतुं मोक्ष्नो थनिलापी थक्ने संसारना बघन बेदीश तो एक मलकमी घने वीजी नावजकमी ए वे प्रकारनी लक्ष्मी तादारे घेर पाणी नरशे एटले जो अनुप्तरविमाने देव! ता पणे अपजीश अथवा मनुष्यनवे नरदेव चक्रवर्ति पणे उपजीश तो नरतादिक जेम इय्य लक्ष्मीना पुरुष जोगवीने सिक्ने विपे जावलक्ष्यी जोगवे ने तेम तु पण पामीश ॥ दवे एवा सिखना सुख केवीरीते पामीये ते धागल कहे जे ५३ वडीयाखाटक मोर पालें बांध्या वे चोर एटले संसारने विपे पट्काय जीवोना थारमाना जे ज्ञानाविक गुण २ तेने छूटवाने माटे राग श्रने क्षेष रूप वे चोर वटा के एटले कजा में तेने पकडी बांधीने तेनुं बीजमात्र का हाही नाखजे के जेथकी कर्मरूप वृक्नी उत्पत्ति फरी थायज नदी ॥ रागोपदोपोयमाबीज ॥ इतिवचनात् ॥ माटे ए घे ने टालीने चारघनघातीया कर्मने टालजे के जेम केवलरूप लक्ष्मी पामे पठी ते केवलश्री जोगवीने थंते चौदमे गुणगणे योगनिरुधी शेलेसी करण करी शुक्ल घ्यानने चोथे पाश्ये कार्मणशरीर बेदी किया रहित यश सिपना जीवोनी राशिमा जलजे के जिम ५५मंगलमदाश्री, देविया परमेश्वरी एटले मंगलिक रूप महोटी नावलक्ष्मी पामीश अर्थात् पोताना थारमानां श्रनतज्ञान, श्रनतदर्शन, श्रनतचारित्र, थनतवीर्य, थारु लघु, घरूपी, अर्खम, अक्षय, अध्यय एवी महामगलिक रूप नावलक्ष्मी पामी साविधनतांगे बजर, अमर, अविनाशि पणे, मदानद, परमानद पद पणे रहीश इतितत्त्व एनजेनो थर्थ समाप्त थयो ॥ वली एनो थर्थ प्रकारांतरे जुदा जुवा महापुरुपोनो करेलो घणा प्रकारनो दीठामा याव्यो डे परंतु थांदी ग्रंथगौरवना नयथी मात्र था एक प्रकारनोज दाखल करो ॥ ॥ इवे जगवान जेवारें बाल्यावस्थायें करी रहित थया अने यौवनवय पाम्या तेवारें मातापितायें कडं मुहूर्स जोयरावीने घण थायर सहित समरवीरनामा सामंतनी पुत्री यशोदा नामे दती ते प्रजुने परणावी घणी प्रतोमा नरवर्मराजानी पुत्री यशोदा परस्या एवा अक्षर लखेजा ने पनी ते यशोदा राणी साय विषयसुख जोगवतां प्रियदर्शना नामे एक पुत्री थइ ते पुत्री लगवाननी यहेननो पुत्र जमाली नामे हतो तेने परणावी एम करतां नगवानने गृहस्थ पणामा थप वीश वर्ष वीत्यां ॥ हवे जगवानना परिवारना नाम सूत्रकार वर्णवे ठे महावीरस्वामीना पिता काश्यपगोत्रीया ने तेनांत्रण नाम ले ते कदे ने एक सिदार्थ, पीजु श्रेयास, त्रीजु यशस्वी दवे नगवाननी मातार्नु वाशिष्टगोत्र में अने तेमना पण त्रण नाम ते कदेठे एक त्रिशाला, वीर्ण विवेदविना, त्रीलप्रीतिकारिणी तथा जगवानना काकानु सुपार्च एवं नाम दे तथा नग वानना महोटा नास्लु नदीवन एवु नाम में तथा पदेन नाम सुदर्शना रे तथा स्लीन नाम यसोवा ने तेनु कोहिन्न गोत्र में तथा नगवाननी पुत्रीनु काश्यप गोत्र के तथा तेनां थणोया अने प्रियदर्शना एवा के नाम से तथा नगवाननी दोहित्री तेनुं काश्यपगोत्र बने शेपवती तथा यशवती एव वे तेनां नाम रे ॥ १.१० ॥ ॥ वे नगवान श्रीमहावीरसामी चित्र ३१ चोरिनु चित्र

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चित्र श्रीमहावीर भगवान् नसोकातिर देव HAINA कड़वा ले तोके सर्वकलाउँमा निपुण ने, नलीरीतें निर्वाह करवा वाला, नला रूपवत, सर्व- गुणे सपूर्ण, सरलपरिणामी, विनयवान, शातराजाना पुत्र, प्रसिद एवाजे सिदार्थराजा तेना कुलमा चश्मा समान, नलो वेद एटले शरीर जेमनु, वजझपननाराच सघयण, समचम्स सस्थान, त्रिशलामाताना पुत्र, महा कोमल शरीर वाला, कातिवत, ममता रहित, दीवानी वांठा करनार, त्रीशवर्प गृहस्थावासें रह्या तेवारे मातापितातो प्रतुनी थकावीशवर्षनी वयमा वेवलोके पदोतां दता ते दिवसें वीक्षा लेवाने माटे पोताना महोटा नाइ नदीवर्डननी थाझा सीधी थने नाश्ने कधू के मातापिता जीवता रहे तिहां सुधी महारे घरमा रहेतु एवी म हारी प्रतिज्ञा इती ते पूरण थइ फरी नाश्नी थनुमतिथी वे वरस घरमा रह्या तेवारे लोका तिक देवो थावीने श्टकारी वजन वाणी करी नित्यथाशीप वेता थका नित्य स्तवना करता थका एवु कहे ॥ १११॥ ॥के हे प्रतु' हवे तमारो थनिग्रह पूरण थयो, ते हवे अनिग्रह सर्वधि वात जखे नगवान श्रघवीश वर्षना थया तेवारे जगवानना मातापिता देवलोके गयां ते थावश्यकनियुक्तिमा तो चोथे वेवलोके गयां एवु लरब्युं वे थने श्रीथाचारांगसूत्रमा वारमे देवलोके गया एवं जस्स्यु ए वातर्नु समाधान करवा सारूं केटलाएक एवी कल्पना करेले के देवोनी धीमली चारनिकाय तो ते चार देवनिकाय थाश्रयी ए चोथी निकाय वैमानिक वेवोनी माटे ए चोथो देवलोक ते चोथी निकाय वैमानिक देवोनी समजवी तो ते चोथी निकायमा वारमो देवलोक यावीगयो तेथीथाचारागा कह्या प्रमाणे बराबर वात मली थावे ने ए प्रमाणे समाधान करे ने पनी तस्वकेवलीगम्य ॥ दवे मातपिता देवलोके गया पढी महोटा नाइ नदीवर्धनने, नगवाने पूरघु के द्वं विदा सच तेवारे नदीवर्मन बोल्या के ना तु दाजया उपर पूरा नाखे केमके मातापिता मरण पाम्यां तेना वियोग रूप वाघ जे बलतरा एटले फोडला तेतो दाला मने कायम तेना उपर वजी ताहारा वियोग रूप पूण नारखवु ते महाराथी सर्यु जाय नही दजीतो माता पितानो शोक पण मठ्यो नथी माटे हूँ दीक्षा लेवानी रजा दमणा श्रापोश नही तेवारें नगवान वोल्या जे माता पिता नाइ बहेन एतो जीवने थनतिवार थयो ते सर्वने मूकीने वली जीवतो एकलोज थावे जे, एकलोज जाय , एकलोज पोतानां करेला गुनागुन कर्मोने जोगवे , एवीरीतें ससारमा कोई कोनो सगो नथी तो दवे कोनो कोनो शोक करीयें घने कोनी कोनी साथै प्रतिबंध राखीये ' फरी नदीवर्मन बोल्या के नाय। एवं तु पण जाणु दूं तोपण दु शंकरु जे महारे मोहनीयकर्मनो वध इजी घणो जारे ने तेथी तादारो विरद हूँ स्वमी शकतो नथी तेमाटे दजी महारा करेवाथी तु वे वर्ष घरमा रहेतो ठीक से दवे उत्तम पुरुपनी चाल बे के उखीयाने देखी तरत करुणा थावे माटे नाइन एवं कहेण सांजलीने कसु के हे नाइ दुवे वर्प रहीश पण नातपाणी सर्व फासु लश महारा वास्ते थारंन करीने कापण वनावQ नही तेवारे नायें कयुं के सुखे एमज रदो श्रमे तमारा वास्ते कांई करी नही तेवारें नग वान फरी पण वे वर्प गृहवासें रह्या ॥ दवे जेवारें नगवान जन्म्या दता तेवारे लोकमां एवी प्रति िथइ इति जे चौव स्वप्न मातायें दीठा माटे ए चक्रवर्ति थाशे, एवं जाणीने श्रेणिक यने चवप्रद्योतन राजायें पोताना कुमरोने वालक ठाकोरनी सेवा करवा निमिन मोकव्या दता ते सद्गु प्रतुने धावा घोर अनुष्ठान करता देखीने विचायु जे ए चक्रवर्ति नथी एतो संयम माही तीर्थकर वे एवु जाणो ते सर्व पोतपोताने स्थानकें गया नगवान पण एवी स्थितिमा - वखत दीक्षालीधी में ते वखत सचिचजलथी मान कस्नु डे केमके एवी मर्याद वे ज दादा सेती वखतन मान उष्णजलथी करलु तीर्थकरने न दोय तेथी प्रतिमाने पण सष्णजल च डावता नथी एवी स्थिति बे पनी वे वर्षमाथी जेवारे एकवर्ष वीयं तेवारें नवलोकांतिक देवो श्राव्या तेनां नाम कहे १ सारस्वत, २ थादित्य, ३ वन्दि, ४ वरुण, ५ गतोय, ६ तु पित, ७ थष्यावाध, अग्नि, ए अरिष्ट ए नव थावीने जो पण नगवान स्वयंबु८ ले तो पण एमनी एवी मर्यादा माटे प्रानुनी पासे थावी जाण करे केवीरीतें जाण करे ते केदे ने जय जयवत दोवो दे समृधिमान दे कल्याणवान तमा नलु थाउ, दे क्षत्रियोमा वृपनसमा न' तमारो जयदोवो बोधकरो बोधकरो बुजो बुनो दे जगवान' हे लोकनाथ! सर्वजगत जी वने हितकारी प्रवनॊ नगवान् । तमे धर्मतीर्थ प्रवर्तावो, ते धर्मतीर्थ सर्वलोकनें हितकारी, सुखकारी, मोक्कारी थाशे एवं कदीने जयजय शब्द कहे ॥११॥ ॥ दवे प्रमण जगवान श्रीमहावीरस्वामीने मनुष्ययोग्य गृहस्थधर्मथी, गृहस्थना व्यवहारथी पहेला, पण अनुपमप योग ते अप्रतिपाति एवं श्रवधिज्ञान थने अवधि दर्शन दोतु ढुं ते यनुत्तर अवधिज्ञान अने श्रवधिदर्शने करी पोतानी दीक्षानो अवसर जाणीने, रूपानो त्याग करीने, सोनानो त्याग करीने, धननो, राजनो, देशनो, वादननो, कोगरनो, नमारनो, अंतेवरनो, देशवासी लो फनो, धन, कण, धान्य, मणिरत्न, मोति, दक्षिणावर्त शख, शिला, प्रवालु, रातारत्नादिक जे पोतानी पासें उता ने हाजर ने ते सर्वनो त्याग करीने थर्यात् तेना उपरथी मन उतारी लीये, सर्व रूपादिक बोडीने जे चांदी प्रमुख धरतीमा वाटेला दोय तेने बाहार कादा डीने ते सहु थापणा गोत्रियाने वांटी थापीने था सूत्रथी वरसीदाननो थधिकार एवो ने के नगवान विधाना दिवसथी एक वर्ष पहेला वरसीवान देवा मांमे ते सूर्यग्याथी मामीन जमवानी वेला सुधी प्रतिदिवसें प्रनातना सवा पदोर दिवस चडता सुधी नित्यप्रत्ये एक कोडनें थाउ लाख सोनेया नगवान दाना थापे थने गाममा एवी उद्योपणा करे के जेने जे वस्तु जोश्ये ते धणी ते वस्तु मागे तेवार जे धणी जे मागे तेने ते थापे ते सर्वशन्ना थादेशयो देवता पूरण करे एवी रीते एक वर्षमा जेटला सोनेया दान थापे ते कहे जे त्रणसो कोड एटले त्रण थब्ज थपसी कोड ने एशीलाख एटला सोनेया एक वर्पमा वान थापे ते सोनेयो एक एंशी रतीनार जेटलो दोय थने तेना वपर तीर्थकरना मा वापनु तथा पो तानुं नाम होय ते बारसो सोनेयानो एक मण करता नवदजार मण सोनैया दिनप्रत्ये दान देवाय तेना थाजना समय प्रमाणे एक गाडलामा चालीशमण नार नाखता बसोने पच्चीश गाडला थाय ते सोनेया शश्ना श्रादेशथी वैश्रमण देवता देवमायायें करी थान समयमा नीपजावीने, तीर्थकरना घरमा नरे, ए दानवेवानो थतिशय , थने तीर्थकरना हायने विपे सौधर्म एवी स्थिति करे के दान देता थकां तीर्थकरनो हाथ थाके नदी थने इशानें रत्ने जडित सुवर्णनी लाकही लश् क्नो रहे ते चोसव इश्वर्जीने वीजा सामान्य देरताउँने दान लेतां वह तथा जे मनुष्पना जलाटमाहे जेवी प्राप्ति दोय जेवू जेने थापतुं पोसाय तेतुं तेना मुखमाथी श्शाने वचन कदेवरावे, तथा चमरेंड बने व ए वे जो तीर्थकरनी मुठीमांदे अधिकष्य थाष्युं होय तो पार्नु पहावी नाखे अने उबु श्ष्य थाप्यु होय तो प्रण करे मागनारनी प्राप्ति माफक पामे तथा नुवनपति देवता चित्र ६६ भगवान् सेना याचक याचक

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नरतक्षेत्रनां मनुप्पने दानलेवा सारूं तेडी थावे अने वाणष्यंतर देवो ते मनुष्यने पाला तेने स्थानके मूकी थावे तथा ज्योतिषी देवता विद्याधरोने दान लेवानी स्ववर श्रापे ए सर्व तीर्थकरना अतिशय जाणवा ए प्रस्तावें तीर्थकरनो पिता महोटी प्रण शाला करावे थांदी | नगवाननां मातापिता देवलोकें गयां ले माटे तेने ठेकाणे एमनो मदोटो नाइ नदीवन ने ते त्रणशाला करावे तेमा पहेली शालायें नरतक्षेत्रना मनुष्यने थन्नपानादिक थापे, वीजी शालामा वस्त्र धापे थने त्रोजी शालामां थानरण थापे दवे तीर्थकरना दाथनां दाननो मदिमा कहे जे चोसम्श्श्ने दानने प्रनावे वार वरस पर्यंत मांदोमांहे कलेश सपजे नदी तथा राजा अथवा चक्रवर्चि प्रमुख तीर्थकरनुं दान लश्ने ते सोनेया पोताना नमा रमा मूके तो चार वर्ष सुधी तेमनो नमारथखूट रहे तथा शेठ सेनापति थाविकने दान मलेतो तेना मदिमा थकी पारवर्ष पर्यंत यश कीर्ति घणी वघे तथा रोगी पुरुपने दान मजेतो तेना प्रनावथी रोग सर्व मटी जाय थने फरी बारवर्ष पर्यंत तेना शरीरमा को नवो रोग पेदा याय नदी इत्यादिक दाननो महिमा जाणवो दवे उ घडी दिवस चच्या पठी दानवेवा मामे ते पोणा वे पोहोर दिवस चच्या सुधी दान थापे एवो पाठ घणी प्रतोमा लखेलो परंतु थामा सूर्यम्याथी ते जमवाना वखत सुधी थापे एवो प्र थम लेख थाष्यो एवीरीते प्रजी वरसीदान रूप वर्षाद एकवर्ष सुधी वरसावीने मनुष्योना वारिन्य रूप दावानलने उपशमावे जे दारिद्री इता ते सर्व धनवत थया, घोमें करी वथ्या, वस्त्रेकरी वध्या, थानरणे करी वथ्या, ए थादिक लक्ष्मी करी सदित थया ए प्रतुना हायनु दानलश्ने जेवारें पोताने घेर पाबा श्रावे तेवारे तेना घरनी स्वीयो सरखी पण पोताना स्वामीने उलखे नदी पड़ी इश महाराज श्रावी उखाण करावे ते वारें तेने सर्व प्रकारनी उलखाण पडे ए प्रतुना दायर्नु वान सर्व नव्यजीवोने मले परतु बनव्यनेंतो ए प्रचना दायर्नु वान सर्वथामलेज नही इति संवत्सरीदान मदिमाधिकार वर्णन समाप्त ॥ ॥दवे नगवान महाराजनो दीक्षा समय जाणीने नदीवन राजा दीक्षानो महोत्सव करवाने थर्थे प्रथमतो कृत्रियामपुर नगरने विपे ध्वजा बंधाची दाट शणगायां, घरघर तोरण बंधाव्यां एवीरीतें नगरशणगारीने पनी चोस इंश्थनिपेक करवा थावे तेवारे विवोना प्रनावथी देवोयें करेला जे थानातिना घनिपेक कलश ते कलश नदीवईन राजाना करावेला थनिपेक कलशमा प्रवेश करी मती जाय पनी नदीवर्षनराजा नगवानने पूर्व सन्मुख बेसारीने देवतायें लावेला जलथी नगवानने थनिपेक करे तेवखतें शदिकदेवो सर्व शृंगार वर्पण दायमा लइ जयजयशब्द कहेता थका बागल कना रहे पढ़ी जगवानना शरीरने जूही पावनाचवने करी शरीर खेपे अमूल्य वस मुकुट, मोतीना दार, कंठसूत्र, केयूर, वालुवक, वदि रखा थने कुंम्लादिक सर्व जातनों थानरण पहेरावे, पुष्पाविके करीने कल्पवृक्ष समान करे पली नवीवर्सनना कदेवायी अनेक सेवक पुरुप पञ्चाशधनुप लांबी,पञ्चीश धनुप पोदोलीथनें उत्रीश पनुप उंची मणिकनक रचित एवी एक मनानामे पालखी बनावे तेमज देवता पण एवीज एक पालवी पनावे ते पालवी दिष्यानुनावे नदीवईनकत पालखीमा प्रवेश करे पड़ी ते पालखी प्रचना मुख बागल मूके प्रखते पालखीमा पूर्व सन्मुख सिदासने थावीने से यने नगवाननी जमणी वाज कुलमा वढेरी कुसमदत्तरिका हंसलक्षण स्त्री साढीलेश्ने बेसे तथा माषी वाजु नगवाननी घाम्पमाता आवी वीराना उपकरण जश्ने असे तथा नगवान नी पळवाडे शोज शणगार परीने एक घणीज स्वरूपवान नली स्त्री बनधरीने वेसे तथा इशानकोणे एक स्त्री जलें पूरण कलश दाथमा जर बनीरहे थमि कोणे एक स्त्री मणिमय विचित्र वींजो करती मनीरहे,ए सर्व स्त्रीयो शणगार करेली युवान अवस्था वाली जाणवी तेवार पठी नदीवर्धन राजानी थाशाथी एक दजार सेवक पुरुषो जेटलार्मा ते शिधिकाने छपाडे एटलामा ते वखतमा शर्केड ते पालखीनी जमणी पाजुनी धागली सपरती तरफनी वाहा उपाडे,तथा श्शानें माषी वाजुनी बागली टपरली वादा टपाडे तथा चमरें जमणी पाचनी पावती तरफनी उपरती वादा छपाडे तथा बलिइ मावी वाजुनी पाबली तरफनी उपरली वाहा धपाडे अने बीजा नवनपति, व्यतर, ज्योतिपी थने वैमानिक देवोना जे २ वे ते जिदा देखे तिहाथी छपाठे, केटलाएक देवउठनी वजावे, केटलाएक पंचवर्ण फूलनो वर्षात करे पनी शयने श्शानें बादने बोडीने चामर ढोले तेवारे शिविकानें बीजा ईए उपाडे एम शिविकाने प्रथमतो मनुष्य उपाहे पनी सुरेश, थसुरेंद, नागें उपाहे बीजा सर्वदेवो दर्प पाम्या थका केटलाएक आकाशे रह्या थका नृत्याविक करे था तेकाणे जेम वनखम फलें करी शोने, जेम पद्मसरोवरमां शरदकालें कमल शोने, तेम देवता थाफाशें रह्या यका शोने से तथा जेम अलसी- वन, कणेरनुं वन, चपार्नुवन, फूखेकरी शोने तेम त्रिय कुंम नगरथी मामीने देवताना नवन सुधी दवदेवीये करीथाकाश सकीर्ण थयुथक्क शोने ले प्रधान पडद री जसरी उनी इत्यादिक कडोगमे वाजिनथाकारों तथा धरतीय वाजी रह्या ले, घरना व्यापारघधा मूकीने मनुष्यना वृद जोवा मल्या , दवे पालखी चालता देवदेवी तथा नर नारी पोतपोतानी खुशी प्रमाणे मनमाथावे तेवाप्रकारना दर्पना वाजा बजावे ,गाय , नाचे नेशन फज मोतीप्रमुखने वरसावे ले ॥ दवे वरघोडामां नगवाननी थागल अनुक्रमे सगुथी पहेनातो थाउमगल चाले,पनी पूरण कलश नृगार चाले,पनी महोटी वैजयंति ध्वजा चाले,पबी त्रधरचाले, पनी मणीपीठ सिहासन चाले,पनी शणगारेजा पण थस्वार विनाना एवा एकसोने थान हाथी चाले, पठी एकसोने थाउ घोडा चाले, पळी एकसोने थान शस्त्रे नरेला रथ चाले, पठी एकसोने थाउ पुरुप चाले, पठी घोडा, हाथी, रथ अने पाला ए चार प्रकारनी सेना पाले, पठी एक हजार योजन उँचो बने न्हानी न्हानी एक हजार ध्वजायें ममित एवो महेंइभ्वज चाले, पठी कुत्तमदा, वाणमदा, तीरपदा, गोफणमहा, हास्यकारिका, कर्म कारिका, वशकारिका, झानकारिका, विनोदकारिका, खड्गधर, धनुर्धर, एवा पुरुपो चाखे, पनी पा टीया धरवावाला पुरुप चाले, पनी घणा चारण नीखारी मागता यका चाले, पनी घणा सय नोगकुनाविकना क्षत्रिय, मामविक, कोधिक, शेठ, सेनापति, सार्थवाद, देव, देवी प्रजालोक चाप्ले, नगवाननी पळवाडे घणी सेनायें परवस्यो थको, बत्र चामर धरावतो थको, घणा आम वर सहित नदीवनराजा चाले, घीजा पण घणा लोक चाले, ते वखत अनेक प्रकारनां वाजा वाजे तेनो शब्द सनिलीने नगरनी स्त्रीयो पोतपोतार्नु काम मूकीने त्यां थावे ते केवी थकी थावे तोके' प्रणवातो स्वीयोने वमन वे एक जगहो, बीजु काजल, त्रीजो सिंदूर वली प्रण वातो वीजी थत्यंत वामन ने एक दूध, बीजो जमाइ, थने त्री वाजु यतः॥ तिलिवि तिया वामदा, कलिकऊल सिदूर ॥ एपुण अतिहि वादा, दूध जमाइ दूर ॥ १ ॥ माटे ते स्त्रीयो वाजानो सद सांजलीने उतावलथी श्रावीयो तेपी कोइएक स्त्रीतो काजल थारखमा याजती इती ते थांखने बदले गालोमा जगावी दीर्घं बने गालोमा कस्तुरी लगा ।

चित्र३४ D.. मरोमानो पर पोको

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उवी ते थांखोमा श्राजी दीधी, केटलिएक स्त्रीयो पगोमा फांजर पड़ेरा नूलीग सेने बदले गलामा करोणाट करतां काजर पढेरी लीधां, केटजिएक स्त्रीयोये गलामा पेहेरवाना घरेणा ते पगमा पहेरी लीधा, केटलीएक स्वीयोये कटीमेखला गलामा पढेरी लीधी थने गलानो हार ते कटीमेखलाने स्थानके केडमां बांधी दीघो, केटलिक स्त्रीयोये चदन घसीने पगे चोपड्यु थने अलतो मस्तकें चोपडी लीधो, केटलिएक स्वीयो अधुम्रान कडे न कस्यु एवी थकी दोड ती थावी, कोश्कतो घाघरा उंदीने चालती थावी तेथी नीचेना जागमा नागीज दीसवा ला गी, कोक वीजी पारका पुरुपनी स्वीयोना बोकरा ते नूलथी पोताना काखमां तेडीने वोही थावी, केटलिएक तो पोताना रडतां बालकने पडतां मूकी चाली थावी, केटलिए पहेरवानुं वस्व ताणी वांध्यु नही तेथी वायराने योगें ते वस्त्र उडीगपुं तेना योगें नववधू बालकुमारी सरस्वी वीसवा लागी, कोइएक स्त्रीये एक कानमायानूपण पहेतु श्रने बीजा काना पड़ेरतां नूलीगइ, कोशएक स्त्री जमी तो रही पण चलु करवु रदीगयुं, कोक स्त्रीये एकज पगधोयो वीजो धोवो रहीगयो, कोश्क कांचली पहेरता वीसरीगइ एवी उतावलथी जोवा नीकली केटलिएक चावल उठाले , केटलिएक नाचे , एवा थामबरथी जगवाननो दिदा महोत्सव थयो ते कया दिवसे थयो ते दिवस कहे वे तेकालने विपे ते समयने विपे श्रमण जगवत श्रीमहावीरस्वामी ते हेमतझतु एटले शीयालानी रुतुनो पहेलो मदीनो पहेलु पखवाहीयु, मागशिरवदि दशमीने दिवसें दिवसनी पाजी बाया एटले पोरिसी दिन रहे एक पदोर दिवस रहे तेवारे तथा मुव्रतनामा दिवसनुं नाम ते विवसने विपे, विज यमुहूर्त श्रावे यके, चनना नामा पालखीमा वेग थका, जेनी धागल पागल देवता बने मनुष्य चाली रह्या डे, शखना वजाववा वाला, सोनानां चकना धरवावाला, दलना धरवा वाला तथा मगल शद वोजवावाला एवा निकु प्रमुख चारण प्रमुख जाट प्रमुख तथा घंटाने वजाववा वाला तेमनो समुदाय ते सर्व थाशीपथापे ॥११॥के हे समृधिवत । तमारो जय जय होवो, हे कल्याणवत । तमोने नइ था, तमारा छान, दर्शन थने चारित्र यतिचार र दित होवो, एा नग मथाजो, नही जीतवामां थावे एटले जीतवाने घणी करण एवीजे शियो तेने तमे जीतो, साघुधर्म पालो, सर्वविघ्न रदित होवो, समविहार करवामां तमा नाम थाउ, रागपरूप चे मनोने तमो दणो, तथा तपरूप धैर्य बने सतोष रूप संगोटाने कसीने श्रावकर्मरूप शत्रुउनु मर्वन करो, उत्तम शुक्लध्याने करीने अप्रमत्तपणे रह्या थका वि चरो, हे वीर । तमें धाराधना पताका ग्रहण करो, प्रणलोफरूप रंग एटले ममनो थवाडो तेमा थंधकार रहित एवं अनुपम केवलान, ते तमे पामो मोक्षरूप परमपद पामवाने के वली नगवाने देखाख्यो जे सूधो मार्ग ते मार्गे तमे जा केवीरीतें जाउ तोके' वावीश प रिसद रूप फोजने दणीने जाउ, दे क्षत्रियोमा तृपन समान, तमारो जय याउ, घणादिवस, घणा पक्ष, घणामास घणावर्प जय पामो वली घे पक्षनो एक मास, बेमासनी एफझतु पाय, त्रण ऋतुयें एक अयन थाय अर्थात् न मासें एक अयन थाय एवा घणा अयन लगें, वली ये श्रयने एक वर्ष थाय ने, पांच वर्षनो एक सवत्सर थाय , एवा घणा सवत्सर पर्यंत परीसद तथा उपसर्गोथी मर नही राखो,वीजली सिहाविकोना बीहामणा जय भैरवोने कमायें करीने सदन करो, तमोने धर्ममा कोइ विघ्न म करो, एबुं कहीने जय जय शद करे ॥११॥ पठी जगवान श्रीमहावीर स्वामी विक्षा मेवा नीकल्या ते वस्वत हजारो नेत्रोपी देखता पका यात् इनारो लोको देखी रह्या के, देखीदेखीने दर्प पामे के, हजारो लोको वचने करी स्तव ना करी ग्यां ने, दजारो लोकोना मनमा एवं ठे के घणा कालपर्यंत ए जीवता रहो, द नाग नोका पितारी विस्तारीने मनमा एपा मनोरय करी रह्या के ए तीर्थकर थाशे तेवारे पनी मेग करी, एमना माति रूप गुण देखीने लोको एवु चितवन करे के ए श्रमारो मामी पा, नारो सोको पोताना जमणाहायनी थागुलीथी देखाडी रह्या ते के ए जगवान गिज्याने पो कहेते यके, दजारो लोकोना एटले हजारो पुरुप हजारो स्त्रीयोथजली सहित नाप जोडीनोडीने प्रणाम करे ने ते जमणा हाय लेते थके, हजारो गमे घरोनी श्रेणी प्रत्ये चान पने यके, का प्रारं जीणा, हस्तताल, वाजिन, गीत, शब्द ते मीग मनोहर जयजय शब्दनी मापे मनापासोफोना सरे करीने सावधान होते थके, सर्व रुधिसदित, सर्व थामयर स रित, मर्नरने मन्ति, सर्वसेना सहित,सर्ववाहन सहित, सर्वसमुदाय सहित, सर्वथादर सहित, मामपदा सहित, सर्वग्रसर सहित, देखवाने मनमा थारे एग सर्वमलाप सदित, सर्वलक्ष्मी सहित, मांगनम महित, सर्वनगरलोक सहित, सर्वनाटक सहित, सर्वतानेवर सहित, सर्वयं नेगर सहित, सांपुष्प गधमाला परेणायें सुशोनित, सर्व वाजाना घोप सहित, महोटी रुदि, धुनि, यन, गदन, समुदाय सहित, महोटा नना वाजा समकाल वाजता थका, शख ढोल, परत कालर, सरमुसी, दुडुम, देउनी प्रमुख राजाना प्रतिशब्द सहित, क्षत्रियकुमपुरन गरनी पमा पश्न निझने, नीफनी करीने निहां शातपडवन नामें उद्यान के तिहां श्रशो कर पाणुन रुई ने, तिदा यारे ॥ ११ ॥ ॥ यावीनं अशोकवरसदनी नीचे पालखी गगे गतीने पानवीयी उतरे उतरीने पोतानां दायथीज घरेणा माला प्रमुख श्रलकारादि उतारे, उतारीने ते घरेणा जे तेमनां कुजमा वडेरी हंसलक्षण स्त्रीते पोताना वस्त्रमा लीये, पठी पोताना हाथचीज पंचमुष्टि लोच करे ते केश महाराज पोते लजश्ने खीरसमुश्मा मूके लोचकरीने चविहारी वह एटले वेलानी तपस्या करे, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रनी साथें चश्मान योग थावे थके एकज शर्के थापेला वेवमुष्य वस्त्र लश्ने, एकला रागप रहित तथा साधुना सथवारा रहित थका व्यथी यने नावथी मुमित थश्ने, गृहस्थपणानो त्याग करीने श्रणगारपणानो अंगीकार करो ॥ ११ ॥ ॥ दवे जे वखतें नगवान सामायिकनो उच्चार करे ते वखतें शर्के सर्व कोलाहल वाजिन प्रमुख बंध करे पड़ी जगवान् नमोसिदाण एतु कहीनं करेमिसामाश्यं इत्यादि यावत्तस्सपडिक्कमामि इत्यादिक कहे हा बीजो गुरु करवानो थनाव के पोते स्वयं चारित्र लीये माटे नंते ए पद कहे नही तीर्थकरनो एवोज कल्प ठे, ते माटे भते पद न कहे, इहां जगवानने चोथु मन पर्यवज्ञान उपन्युं हवे सर्व इश तथा देवो ते जगवानने नमस्कार करीने नदीश्वरधीपे जश् या महोत्सव करीने पोत पोताने स्थानके गया, थने नगवाने पण पोताना नाइ नदीवईन प्रमुखने पूढीने विहार कसो हवे स्वजनादिको पण ज्यांसुधी नगवान नजरे वेखाता हता त्यांसुधी त्यांज मनारह्या पठी जगवानना गुरा याद करता फूरता फूरता पोताने घेर श्राव्या ॥ इति कल्पव्याख्याने पंचमो वस्वाण समाप्त। ॥ वे नगवाने वादा जश्ने पनी विहार कसो ते वखतमा बे घडी दिवस शेष वाकी रह्यो दतो तेवारे नगवान कुमारगामनी वाहेर कामस्सग्ग रह्या ते वखत एक हाली श्राव्यो तेणे पोताना बलदो नगवानने जलाव्या अने पोते घेर जइ जमीने केट लिएक वार रही पाठो तिहां आष्यो एटनामा श्राखो विवस खेरवाची थाकी गयेजा मन चित्र३५ इन्द्र भगवान नंदीय

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चित्र३६ मोनि भगवान् बसरो दीया तो वनमा चरता चरता क्यांय चाव्या गया पनी हालीये श्हा तिहा घणा जोया पण बलद मन्या नदी तेवारे जगवानने पूडवा लाग्यो के वजद क्यां गया ते वखत जगवान मौन रह्या थका काश्पण बोल्या नही पनी ते हाली वनमा जश् श्राखीरात्रि बलवोने शोध्या परंतु तेने वलद जज्या नदी श्रने बलवतो वनमा चरीचरीने पानजी रात्रं पोतानी मेले त्यांज श्रावी वेशी रह्या दालीपण पाडो थावीने जूएले तो बलव त्यांज वेठा ले ते देखीने क्रोध पाम्यो थको घोलवा लाग्यो के दे पापी। हे पाखंमी' था बलद तेंज सताही मूक्या दता ए बधु तादारुज काम करेलु देखाय डे मने थाखी रात्रि निरर्थक जमवू पडयु एम कही दाथमा रासडी जश्ने नगवानने मारवा दोच्यो ते वखतमा इश्महाराज पण अवधिझाने करी जग वानने यतुं उपसर्ग जाए' अने पोते तिवां थावीने दालीने कव्वा जाग्यो के अरे ष्ट तुं जाणतो नथी के था श्रीवर्षमान स्वामी नदीवर्डनराजाना जाइबे, सिदार्थराजाना वे एणे वीक्षा सीधेली ने एमकदीने दालीने दलकारी कादाज्यो पठी महाराजे नगवानने कर्पु के हे नगवान थापने वारवर्ष पर्यंत प्रस्थपणु ने तेमां उपसर्ग घणा यवाना माटे थाप थाझा करो तो दु थापनी पासें हरहमेश रद्दु अने थापनी सेवा करु तथा उपसर्ग निवर्तन करु एवो महारा मननो मनोरथ ने तेवारें लगवान बोल्या देश' था वात थई नथी थातीनथी थने थाशे पण नही जे श्रीथरिदंत नगवत इश्ना सदायथी केवजझान उपजावीने मोक्ष जाय' थरिदंततो पोतानाज उठाणकर्म बलवीर्यथीज केवलझान पामीने मोद जाय एनु सानायु तोपण ई मरणांतिक उपसर्ग टालवा सारु नगवाननी माता त्रिशलादेवीनां यदे नना पुत्र सिद्धार्थनामे वितर तेने श्राझा थापीने नगवान पासे मूकी गयो थाही सिक्षार्थविं तरने मासीनो दीकरो कह्यो पण कोइक स्थानके एने काको करी पण लखेलो ने पनी इश्मदा राज देवलोके गयो अने दासीपण पोताने घेर गयो ॥ इतिदालीरुत वपसर्ग॥ दवे प्रनाता नगवान तिहाथी विहार करीने कोलाग सन्निवेशे गया तिदा वट्ठलनामे ब्राह्मणने घरे कांस्य पाने खीरलश्ने प्रनुयें परमान्ने पारणुं की( पात्र धर्म वताववा सारु गृहस्थनां कांस्य पात्रा खीर लीधी तिहा पांचविष्य प्रगट थाय ए जगवतनो अतिशय ते पांच दिव्य कहे बे एकतो श्राकाशमा ध्वजा विस्तार देवता करे, वीजो सुगंधि जलदेवता वर्षावे,त्रीजो फूल वर्षावे, ४ चोयो वेवउठनी वजावे, पांचमो थदोदानमहोवान एवो ध्वनि करे, प्रकारांतरेक्यांएकतो साडीवार कोड सोनया वरसावे एवा पाउ पांचां दिव्य विपे लखेला हापण कोश्क थाचार्यना मते पाचमुं वरखाण पुरुथर्पु कडेवाय ॥ ॥ हवे प्रष्ठये जेवारे वीक्षा जीधी, तेवारे श्शविकोयें सुगं चितवावना पदनादिकें करीनगवतने शरीरें खेप कन्यो , तेनो गध, चार मास जाजेरा पर्यंत न जाय, ते वासनायें करी हजारो गमे भ्रमराविक मदोन्मत्त थया थका नगवतना थंगोय. गने वेघे , मदोटो उपश्व करे ने कोनी पेरें तो के ? जेम कामी पुरुप कामांध थया थका स्त्रीने श्रालिंगन वेता तेना गलस्थान होगादिकने विपे अनुकूल पणे चुवन करे, मंख मारे तेम नमरापण वासनायें अधघुध यया थका, नगवतना शरीरना थवय कमारे ने ए दृष्टांत का पण थदीया एटलो फेर दे, जे स्त्री तो कामी पुरुपथी दारी जाय, परतु नगवान् तो नम रानो एटलो अघो उपश्व बतां पण वजझपननाराच सघयणना प्रतापथी मेरुनी पेरें अमग रहे वे अथवा वीजे अर्थ अजास्या कामी पुरुष, गध टपर मूर्धा पाम्या थका गध मेवाने अर्य, नगवानना शरीर सायें पोतानु शरीर घसया ताम्या तथा कामी स्त्रीयो थायीने आर्जि गन करवा लागी एम नगवान पासेंथी सुगध मागवा लागा एवो आपसर्ग धार मदीना जाजेरा रह्यो तोपण जगवान मग्या नहीं मेरुनी पेरे अकंप रह्या ॥ ॥ दवे जगवान तिहाथी विचरता मोराक सन्निवेशने विपे सिक्षार्थराजा प्रजुना पिता तेनो मित्र कुलपति, दुर्शत नामा तापसने थाश्रमें थाध्या, तापस पण नगवानने देखी सामो मलवा थाव्यो, तेने जग वत पण इकडा पूर्वपरिचयान्यास थकी हाय पसारीने मल्या, पनी तेना थाग्रदथकी नीराग चित्तयका एक रात्रि तिहां रह्या, फरी प्रनातें विहार करवा लागा, तेवारे ते तापस, पहोंचा उवा सार्थे चाल्यो थने थान मास अन्यत्र विदार करीने चोमासु पोताना थायमें रहेवानी प्रछने विनति करी, घणो थायद कसो तेवारें प्रस्तुयें वेशकाल विचारीने कल्प के एमज था एवु कही पठी चार झाने सहित एवा प्रल ते पृथिवीने विषे विहार करतांजेवारें चोमासु थाप्यु तेवारे ते तापसनी फुपडीमा रदेवाने श्राव्या कुलपतियें तृणपलानु फुपर्छ प्रजुने रहेवा सारु थाप्यु नगवान तेमा रह्या पण देवयोगें वाद न थयो तेवारे गामनी गायो प्रमुख दोर जखें मरता थका फूपडीना तृणखला खावा थावे ते जो वीजा तापसो तो पशुना समूहने हांकी काढे पण प्रष्ठतो मौन पणे रहे कोइ जानवरने तृणखला खातां दूर करे नहीं, एम करता सर्व तृण पशु खाइ गयां तेवारें फुपर्छ उघाई देखी कुलपति बोल्यो के हे देवाणुप्रिया दे प्रश्नु पस्वीउ पण पोताना माला साचवे ने अने तमे तो राजपुत्र थइ पोतानो धाश्रम केम सां चवीशकता नथी' एवी रीते कुलपतिने थप्रीति उपनी देखी जगवाने निर्धायु जे मदारे थदी था रहेतु नहीं, पनो श्राशाढी पूनमथकी पंदर दिवसें एटले श्रावण वदि थमावास्यायें चो मासाना पन्नर दिवस जातां प्रस्तुयें तिहांथी विदार करो तेथी उपच्या नगवतने न चोमासु एवु कहेवाणु तिहां जगवतें पांच अनिमह लीधा, ते कहे एक थप्रीति उपजे तिदा न रहेई बीच ज्यांसुधी ब्यस्थपणु जे त्यांसुधी निरंतर कारस्सग्गमाज रहे, त्रीजु गृहस्थनो विनय न करवो, चोयुं यथा सन मौन पणे रहे, कायायें करीउचु मनाउन रहेतु पण सूनु नही पाचमु सर्वदा दायमा नोजन करवू, एवा श्रनिगद सहित विचरता थका शूल पाणि यदने देहरे अस्थियामे प्रथम चोमार्नु रदेवा पधाया, त्यां थत्यंत उपसर्ग सदन क रीने शूलपाणि यदने प्रति योध्यो, तेनी कथा कहे जे धनदेव नामें सार्थवाद पाचशे गामा मालनां नरी, व्यापार करवा कोइ गामांतरे जतो इतो, मार्ममा वेगवती नामे वढुवालुका नदी वर्षमान गामपासे थावी, तिहां जनालाना दिवस हता तेथी कोइ वलद ते रेती नरेली नदी माथी गाई ताणीने पाली शके नहीं पण ते वलदोमा एक बलव घणो जोरावर दतो तेणे ते पाचशे गाहां नदीथकी उतारी पहेले पार कस्या, परंतु पोते त्रुटी पच्यो, तेथीचाली न शक्यो ते वारेसार्थवाहें चारा पाणीने श्रथै वर्षमान गामना श्रधिकारि शेत,पटेल,गामोद, पटवारी,प्रमुख पंचने ते धोरी जलायो तेने घृत गोल तृण नजादिक सारु घणु धन थाप्यं,वली ते वसदनी चा करी फरवानी घणी जलामण यापीने शेउ तिहाथी चाल्यो गयो पबवाडेथी ते गामना लोकोयें ते पलनी सार सनाल कांइ पण कीधी नही,शेग्नु धन थापेलु सर्व वाटीने खाई गया पी ते घसद जूख पायें पीख्यो थको अकाम निर्जरायें मरण पामीने ध्यतर देवोमा शूलपाणीनामे यद थयो,तेणें अवधिझाने पागल वृत्तांत जोपुं, पडी गामना लोको उपर रूपोथको मरकी विकू: तेथी घणो माणस अनें ढोर मरवा लाम्यां तिहां कोई माणसने वालवावालो पण मले नहीजे को मरे तेने कोलो गामनी घाडेर नारखी जाय तेया त्या दाटकांना सुगतो यह पम्या तिखो बावजाव

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चित्र३७ शसपाएगीय यस्त सिदार्थभ्यंतर भगवान् PAGE ituits4GGC करनारा लोकोयें तेनु अस्थिगाम एवं नाम पाही दीधु पनी घणा माणसोने मरता देखीने गामा लोकें मती तेने थाराध्यो तेवार यक्ष प्रगट था थाकाश वाणीयें करी बोलवा लाम्यो के दु बलदनो जीव कुं, तमें महारु इय्यखाइने काश्पण चाकरी करी नदी तेथी तमे मने कुमरणे माखो वे माटे ई कोप्यो तु तो तमें दवे महारा नामनुं हाडका उपर वेहेरुं करावो, तेमा सपनना रूपं शूलशस्त्र हाथा यापीने मदारी मूर्ति थापो, तेनी पूजा करो तो रोग पण मटशे, श्रने जीवता पण रदेशो नहीको सर्व मरण पामशो एवी वात सांजलीने लोकोयें म रण नयथा तेनी प्रतिमा करी हेरे थापी पूजा करी, तेथी मरकी उपशम थइ दवे नगवान् ते शूलपाणी नामा यक्षने प्रति बोधवाने माटे तेने वेहेरे थाव्या, तेवारे ते यक्ष महाउट , कोश्ने पोताना वेहेरे रात्रं वास करवा थापे नहीं, तेथी ते यक्षना देरानो पूजारो शशी नामें विन दतो, तेणें जगवतने रदेवानी मना करी, तेम वीजा लोकोय पण वासा, तो पण प्रष्ट मौनपणे तिहां रात्रै कास्सग रह्या, ते देखीने यद रूपो थने संध्या समयथी उपसर्ग करवा लागो, तिहां प्रथम तो मराववा सारुं थहास्य क, पढ़ी दस्तीनुरूप करी उदाम्पु, पिशा चनां रूप करी ठरी कहाडी वीवराव्यु, तेमन सर्प थने झक मायो इत्यादि घणा उपसर्ग क रवा ममिया पण जगवत लगार मात्र छोन न पाम्या तेवारें वली मस्तक, कान, नासिका, थांव, दांत, होग, पूर, नख, ए श्राव स्थानकें विविध वेदना थपजावी तथापि जगवतने थ झोन जाणी, यह प्रतिबोध पाम्यो थने प्रनुनी जक्ति करवा लाम्यो, एटलामा सिदार्थ व्यतर थाल्यो, तेणें कडं के थरे शूलपाणि यह था तें / कमु ' तुं नथी जाणतो के ए सिक्षार्थ राजानो पुन ठे, महोटी समतानो मार , नो महाराज जाणशे, तो तने पादिर काढी मूकशे, ते सानली जगवाननी शांतमुज्ञ देखी वली पण यः पोतानो अपराध स्वमायो थने प्रतु थागल गीत गान करवा लागो तिहां ते यक समकेत पाम्यो इति ॥ दवे नगवत पण रा त्रिना चार प्रदर कवर्थना पाम्या तेना में करी कास्सग्गमाज पाबली रात्रं वे घडी निश यावी गई, तिहां निशा दश स्वप्न प्रष्ठयें वीर्ग, ते कदे ने एक तालपिशाच दस्यो, वीजुत जलो कोकिला पक्षी अने त्रीच पंचवर्ण विचित्र कोकिलानु जोई, सेवा करतुं वीनु, चोथी फूलनी माला थे वीती, पांचढं गायनो वर्ग दातो, बहुं पपसरोवर दी, सातमु समुझ जा ये तो वीवो, थाउमुं सूर्य उगतो दीगे, नवमुं थांत्रठे वींव्यो मानुष्योत्तर पर्वत दीगे, वशमु पोते मेरुपर्वतें घट्या एवं वीटो, ए वश स्वप्न देवीने नगवत प्रजातें जाग्या, ते वरखतें लोक पण एवं जाणतादता जे ए साधु रात्रं मरीजशे तेथी प्रजातना जोवा याव्या तिहां जगवाननो वेव महिमा देखीने लोकोयें जगवतने पूंज्या, पणां हर्प पाम्या, यच पण नाटकादिक पूजा सेवा करतो दवो, तेथी लोक चिंतववा लागा जे साधुने उपसर्ग करी हवे गीत गान करे , पु प्पादिकें करी पूजे जे त्यां जोके पण स्वामीनो घणो मदिमा करो, एवा समयने विपे श्रीपा र्धनाथनो प्रावक उत्पलनामा निमित्तियो ते पण तिहां थाप्यो प्रजुने वांया,थने कटेवा लागो जे हे स्वामि ! तुमें पाब्ली रात्रं स्वप्न वीतां तेनुं फल कट्ठ ड ॥ दे प्रनु। तमें जे ताल पिशाच हप्पो, तेथी तमें तरत मोदनीय कर्मने दणशो वली श्वेत कोकिलापंखी दीदगे, तेथीयदोन गुकलयान ध्यावशो पांचवर्णा विचित्र कोकिल पंखीन जोडलु वीर्यु, तेथी हादशांगी प्ररूपशो तथा गायनो वर्ग दोगे तेथी अनुपम चतुर्विध संघनी थापना करशो वली तमें देवतायें सेवित पप्रसरोवर दी तेथी चार निकायना देवता तमारी मेवा कर,वती मेरुपर्वतनी पुस्तिका पर तमे चढ्या एबु दीतु, तेथी तम देवायें रचित सिहासने वेशी, धर्मोपवेश देशो, धर्मनी प्ररूपणा करशो वली सूर्यनु ममज दी, तेथी केवलज्ञान पामशो,तथा मानुष्योचर पर्वत थांबडे वीट्यो दीतो, तेथी जगत्मा जशकीर्त्तिनु ममाण पामशो तथा प्रतापवत देवनिकाये करी सेवनीय थाशो पोतानी मुजाय समुह तस्रो दीगे तेथी तमे ससार रूप समुश्ने तरशो, हे जगवन् ! तमें फूलनी मालानुं युगल वीठु तेनो अर्थ हु नयी जाणतो माटे तमेज उपकार करीने कदो तेवारे जगवत मोन माटे ठप्रस्थावस्थाने विपे वोल्या नहीं,तेथी सिद्धार्थ व्यंतरो नगवानना मुखमा प्रवेश करीने कदेवा लागो के फूलनी वे माला दीठी माटे श्रावकनो अने पतिनो एवें प्रकारना धर्मनी प्ररूपणा दु करीश एवीरीतें फल सांजलीने सर्वलोक नगवानने ववन करी पोतपोताने स्थानके गया दवे नगवाने निरविप्न पणे पन्नरदिवस न्यून प्रथम चोमामु तिहां पूर्ण करीने मेरुनी परे धैर्य धरता समता रूप रसमयथको चोमासीपारणुकरी तिहाथी विदार कसो एप्रथम चोमासु ॥१॥ तिहाथी विदार करी मोराकसनिवेशे उद्यानमांधावी काउस्सग्गे रह्या तिहा नगवाननो महिमाकरवा सारु सिदार्थ व्यतरो स्वामीना शरीरमा सकमीने लोक श्रागल नत, नविप्य थने वर्तमान सर्वधि निमित्त नाखें ये तेथी त्यानां लोक नगवाननी सेवा करवा लागा हवे ते गाममां श्रदठदक नामा निमित्तियो रहे जे ते नगवाननी इर्ष्या करवा साम्यो केमके लोक तेने कड़वा लागा के देवार्य सरखो तु निमित्त जाणतो नथी में काले खेत्रमा सर्प दीगे ते तेरो कही दीधो तया दु जमीने गयो हतो ते कही दीधु तेवारे ते थदबंदक नामा निमिनियो कोधकरी नगवाननु निमित्त जुलु करवा सारु दाथमा तृण लश्ने प्रच्ने पू उवा लागो के दे धार्य था तृण वेदाशे, किंवा नहीं, ते सनिली सिक्षार्थं ना कही तेवारें ते छदवा लागो एटलामा अवधियें जोश्ने नगवतनो मदिमा रास्ववाने ते निमित्तिधानी श्रांगली छेदी नास्वी तेथी तृणानुटपुं नदी निमित्ति विलखो थयो पनी सिदार्थ लोक थागल कपु के ए निमिति घोर , कोई नस्पोनथी एवं वीराघोप कर्मकरनो वश पलनो कांसानो पात्र चोरीने खच्चरीनाक्ष हे माट्यो ने तथा शर्मा ब्राह्मणनो वोकडो मारीने तेनु मांस एणे खाधु , तेना अस्थि एना घरनी पबवाडे योरडीनाकाह नीचे माव्यां तथा त्रीजु दूपण जे एमां ने ते हूँ नही कदीश एनी स्त्रीज केदेशे एवं सानली लोकें सर्ववातसाचीमानी एनी स्त्रीने जर पूब्धु, तेवार ते स्त्री बोली के ए पापिष्ट, पोतानी नगिनीने नोगवे , एवी पोतानी निदानी वातो प्रतिम थयाथी बढ्दक सजापाम्पोथने गाममा फिट फिट ययो थको प्रष्ठपासें श्रावी विनति करी के तमें प्रैलोक्य पूजनीक बो, दु यहींथाज मुखे उदर पूरणा करु दे ने जीतु बु जगवतें थप्रीति जाणी त्यांथी विदार करो ॥ ॥ दवे नगवान श्रीमहावीर स्वामी एक वर्ष उपर एक महीना सुधीतो ३३ श्रापेला देवकृप्य वस्त्र सदित रह्या थने ते वार पनी वस्त्र रहित थचेलक यया हाथमा जोजन करे पण थतिशयना योगथी नागा देखाय नही हवे वस्त्र रहित शीरीतें थया ते कहे जे नगवाने जेवारें वरसीदान दीधु तेवारें सिदार्पराजानो मित्र सोमवेव नामा ब्राह्मण जन्मथी वारिडी ते परदेश धनकमाववा गयो इतो पण क्यांयें धन पाम्यो नही तेवारे वली नगवाने दीक्षा लीधा पठी जेवो गयो तेवो गले हाथे पाडो पोतानें घेर फरी थायो पण एक कोही मात्र कमाइ थाप्यो नदी दारि डीज रह्यो तेवारे तेनी स्त्रीय तेने घणो निग्यो भने कदेवा लागी के थरे निर्नाग्य तु किहां गयो इतो तु जिदी गयो हतो तिहां श्रावोने श्रावो वारिधी रह्यो जेम घडो जिदां जाय तिहां पाणीनरे तथा कपासीयो जिहां जाय तिदा लोढाय तेम तुंपण जिहां गयो तिहां वरिडी रह्यो पण दारिश्य तादारो केडो मूकतुं नथी जेम को वरिही पुरुप धन कमावाने थर्थे परदेशे जवा तेयार थयो तेवारे ते पुरुपं वारिश्चने कहुं के ॥ रे दालिदनियस्कणा, वत्ता क मुणिय, दम देसांतर चलिया, तु थर घरें रदिल ॥१॥ एटले हे वारिश्य हे विचण, तुं एक महारी वात कट्ठ ते सानल जे हवे तु देशांतर जादु थने तुं घरमांज थिरथइ रहेजे एवां तेना वचन सानली दारिश्च वोल्यु ।। पहिवन्नो गिरुथा तणो, थविदह जाण सुजाण ॥ पाता तरें ॥ पालिका सुविहाण ॥ तमे वेसांतर चलिया, तो श्रमे थागेवान ॥ १ ॥ श्रर्थ -दे नाइ सनिलो हु तो महोटानो विनय मूक नही केमके जे उत्तमपुरुष अगीकार करे ते अविचल जाव झीच थंगीकार करे तेमाटे हे नाइजो तमे देशांतर जाशो तो हूँ पण बागेवान थश्ने तमारी साचे श्रागल थागल चालुंड तेम हे निर्नाम्य ताहारी पडवाहे पण एमज दारिद्र्य रहे जे तुं दमणाघरमा थाप्यो बोपण घरमा तो काइपण नथी, खावाने वन्न नथी, पीवाने पाणी नथी, मुखे मरती नेठी कु, क्याथी तादारा वास्ते खावा सारुं लश् श्रावु, घरमां तो शाकमां नाख वाने मिरची थने मी पण नथी, मात्र दारिज लदेरोखे ॥ यत ॥ जिणघर नेंस न रीके पाडो, जिपघर वलव न दीसे गाडो ॥ जिणघर नारि न चूडी खलके, तिणघर वारि ले हेरि लड़के ॥१॥ ॥अर्थ - जेना घरमां नेंस सहित पाडो रीकतो न दोय, वली जेना घरमा बसद थने गाड दीसतुं न होय, वली जेनां घरमां स्त्रीना दाथमा चूडी खलकती न होय, तेना घरमा दारिश लहरें लहकतुं जाणवु ते माटे तु घरमा श्रावीश नदी श्रावीश तो नूखे मरीश अरे दारिद्धी इजी दमणा पण तु नगवान पासें जश तो कांश्क पण मलो एवो स्त्रीना वचन सांचनी ते ब्राह्मण, नगवान पास थाव्यो थने रे हायजोरी दीन स्थितिये । थको दीन बचने करी श्रीवीरनगवाननें पगे लागीने विनति करतो हवो के दे रूपानाथ,' दे परउ खनंजक' हे परमार्थना करनार' हे महारामित्रना पुत्र' हे वारिश्य रूपवेलडीनां छेवक' तुं महारी मूलयकी विनति सनिलीने महारो निस्तार कप, था महारो वारिइरूप वा धव, महारो सहायी,मदारी साथै जन्म्पो, महारी साथै वध्यो, वली परणवानें समय पण महारा पहेला मदारी स्त्री एवं परणी, शं पशु तमारा थागल कई ए वारिघ महारा शरीरनी बा यानी पेरे तथा पोतानी यांघेली कर्मप्रकृतिनी पेरें एक क्षण मात्र पण मदारो केड मूकतुं नथी में धन वपार्जन करवा निमिमें परदेश चालवाने समयें एने घणो घणो वज्यों तो पण ए महारी साज चाल्यो, में गगामा सान कम्नु तो पण एवं मदारी सार्थेज मान कडं, में यमुना, नर्मदा सवधि तीर्थकया तो एणे पण महा। सार्थेज तीर्थका, माटे एना प्रनावथी परवेशमा घरघरने विपे लोकोनी आगल निक्षा मागती वस्वत हुँ तो सर्वने देखें परंतु वारिय वाधवना प्रतापणी व प्रत्यक्ष प्रगट बता पण मने कोई पण देखे नहीं ॥ यकं ॥ दीसतिजोग सिक्षा, अंजनसिक्षा य के वीसति ॥ वारिबजोग सिक्षा, पासेविठिया न दीसति ॥ १ ॥ पुन रपिाजोदारिश्यनमस्तुन्य, सिकोदंतवदर्शनात् ॥श्रईसर्वप्रपश्यामि, नापश्यति कमन ॥२॥ ए "लोकोनो नावार्य कहे जे योगसाधीने सिस्थया तेपण नजरे देवाय ने, वली जे थांखोमा थजन करी थदृश्य थाय एवा सिम जे होय तेपण कोइएक प्रयोगथी प्रगट नजरे देखाय, परतु वारियरूप योगें करीने जे सिस्थया ते पुरुप जो पासें वनारह्या दोय तो पण देखाय नदी ते माटे हे वारिश्य ! तुजने नमस्कार था जे छ तादारा वर्शनयी सिरपुरुप थयो तेथी हुँतो सर्वने देखु पण मनेंतो कोइ पण वेखतो नथी ॥ ॥ ए कारण माटे दे सामी' ते दारिश्च बांधवना प्रसादयी दु परदेशने विपे घणो जम्यो, घणो ण्यम करो, घणा शेठ साकारोनी चाकरी करी पण, ईनाम्य दीन तेथी एक फूटी कोडी मात्र पण धन पाम्यो नही जेवो घरथी गयो हतो तेवोज घेर पाबो थाव्यो तेथी में दजी महारा घरमा प्रवेश न कयो तेनी पहेलोज तेणे माहारा घरमा प्रवेश करतो तेना प्रतापपीथनार्जणी एवीजे महारी स्त्री ते कोप करी मुसललेश्ने मदारी सन्मुख मने मारवाने शेडी थावी तेवारे में जाप्युंजे मग लिक करीने मुजने वधावे वे पण तेणेतो पासें थावीने एवा कवोर अने निष्ठुर वचन बोलवा ममियां थने कमुके हे निर्नाग्य शिरोमणी' अरे जन्मदरिडीथरे निर्गणनाथ थरे ढोलण'इ तुजने धनविना साक्षात् वारिधी रूपनें धुकरु ' तु परदेशे गयो थको पण कां लायो नदी मदारे पण तादारा दारिश्य रूप नाश्नां सहायथी ॥ यत ॥ अननास्त्युदकनास्ति, गृहे नास्ति युगंधरो ॥ शाकमध्येलवणनास्ति, तन्नास्तियनुज्यते ॥१॥ नावार्थ - स्त्री करे के तादारा बांधवना सहायथी महाराघरमा थन्नपण खावाने नथीथने पाणीपण पीवाने नथी, जुवार पण नयी शाकमा नाखवाने मीतु पण नथी एवु कांइ पण घरमा नथी के जेथी तुजने यादरकरी घरमा वेसाडीने जमाई महाराघरमां तो एक दारिश्य लड़के ने वली ब्रा मणी कई रे ढोला, धनेकरीने जगतमा मानीता थाय , पण धनविना जगतमां को कोने पूछतुं नथी, यक्त ॥ पर्ने कुलीना कुलीनानवति, धनेरेवपापात्पुन निस्तरति ॥ घनिन्यो विशिष्टोन लोकेपिकमित् धन प्रार्जयधन प्रार्जयध्व ॥ १ ॥ नावार्थ- धनेकरीने हीणाकुलवालो पण उत्तम कुलवान कहेवाय, वनी धनेकरीने पापथकी निस्तार पामे, धन वान दोय तेज जगतमा महोटो कदेवाय, ते कारण माटे धनउपार्जन करवानो म्यम पुरु पने श्रेष्ट ने वली धनविना जीवतो थको पण पुरुप मडवा समान ॥ यमुक्त ॥ धनमार्जय काकुस्थ, धनमूलमिद जगत् ॥ अंतरनेवपश्यामि, निईनस्य मृतस्यच ॥१॥ नावार्थ- जेवारें रामचजीने वनवास थयो तेवारें विचास्यु जे वसिष्ट शपिने नमस्कार करीने चालीये तिवारे जिहां कदलीवना वसिष्ठ रुपि बेग ने तिहा जइ रामचजीये नमस्कार करयो परंतु वसिष्ट पियें नेत्र उघाडीने सामुं पण जोयुं नदी कारण के रामचजीनी पासें ते वखत घ नको पण न दतु पनी जेवारें लंकाजीतीने चतुरंगिणी सेना लश् धनधान्य सदित पाबा श्राव्या ते वखत वसिट झपि सात थाउ पगला सामा चाली थाव्या तेवारे रामचजी बोल्या के तेहज हुँ रामचं तुं थने था तेनु तेज कवलीवन तथा तमे वसिष्टकपि पण तेना तेज गो परंतु पहेला दु तमारी पासें थायो इतो तेवारें तो तमे नेत्र उघाडीने सामु पण जोयु न हतु थने दमणा उतीने सात याउ पगलां सामा थाव्या तेन कारण तेवारें वसिष्ठजी पूर्वोक्त श्लोक कहेता दवा के हे कानुस्थ,! हे रामचर' एक धननु उपार्जन करो, था जग तमा धनेकरीनेज प्राणी शोने जे, परंतु निर्धनने थने मडदाने काश्पण अतर वेखातुं नथी, ते कारण तुं प्रथम भाष्यो हतो तेवारे निर्धन हतो तेथी में ताहारा सामुं न जोए बने ह मणातो तु सर्व विनूति सहित गे माटे छै सामो घाली आष्यो यु एवं कदीने वली स्त्री कदेवा लागी के दे मूर्ख' धनविना हु तने छ करु ? वली कयूं डे के ॥ पुचायसीसायसमविनता, रीसाय देवाय समविनत्ता ॥ मुरकातिरिरकाय समविनत्ता, मुयादरिदाय समविनता ॥१॥ नावार्थ -पुत्रने शिष्य ए वे घरोवर जाणवा, वली रुपी बने देव ए वे पण घराबर जाणवा, - बली मूर्ख थने तिर्यच ए वे पण समान जागवा, तेम मूवेला थने वारिडी ए पण वे सर खाज जाणवा ॥ वली ते स्त्री कहेवा लागी के थरे नाग्यहीन । श्रीवीरनगवाने वरसीवान यापीने सर्वना दारियड खनो विनाश करो, ते वेलायें तुं परदेश गयो ते तादारे कहेतु थयु के जेम शरख पारुवान समये कागडानी चांच पाकी थावे तेनी पेरे थयु श्रथवा नदी तटे जवासाना झाड तुल्य तुं ययो थथवा रात्रि दिवस मेघ वर्पतां उतां पण पसारावदनां पान डोगराज होय माटेरे श्रनिष्ट रे पापिष्ट' रे पांमुरप्टष्ठ तु श्हांथी जा इत्याविक निशुर वचने घणो निठीने गलइयो देश मने घरथी बाहेर काढायो ते कारण माटे॥थागेंदारिय पाने कारिश्य, मावे जमणे पासि ॥ पिंमियाणीमुज मारण मामघो, तेणे हूं थायो नासि ॥ १ ॥ माटे हे स्वामी महारे थागत पण दारिश्य चाले , पाउल पण वारिश्य चाले वे अने घे गाजुये पण वारिश्य चाले के एम मदारे चारे वाजु दारिश्च चाप्यु श्रावे तेथी ब्राह्मणीय मने मारया मामयो माटे ई नाशिनें तमारी पासें थाव्यो जु थने में विचाप्यं जे श्रीवीर श्रगम्यगतिवत , जो पण दीक्षा लीधी वे तो पण परमकपालु , माटे मुजने निमयथी का इक पण थापशे एवं चितवीने प्रतीति पूर्वक निरधारकरीने तमारी पासें थाव्यो _ माटे म हारा दारिशने चरीने मनोरथ पूर्ण करो पण दे स्वामी एनु मनमा थाणशो नही जे महारा वीदाननें थवसरें सर्वलोक मनवादित दान पामी गगा थने तु काश्पण केम पा म्यो नही एवो विचार थाणशोमां ॥ यत ॥ स्वामिन्कनकधारानि, स्त्वयि सर्वत्रवर्पति, श्रना ग्यछत्रसवन्ने, मयिनायोतिर्विदच ॥१॥ नावार्थ-हे सामी। तमें कनक रूप धारायें सर्वत्र वरस्या पण महारा मस्तक उपरेंथनाग्य रूप बत्र ढंकायं हतु तेथी एफ पिंजुमात्र पण महारे माथे पडघु नही तेवारें एवं विचार्यु जे यत ॥रे मन थप्पा खतिधर, चिताजाल म पाड ॥ फजतनोहिज पामीयें, जित्तो लख्यो लिनार ॥ १ ॥ एम चितवी बेसी रह्यो पण हे स्वामी एकतो तमारु दान न पाम्यो ने वली तमारा दाननो व्यतिकर सांजलीने सामो सुजने महारीस्त्रीयें घरथी काहाही मुक्यो तेमाटे कj के ॥ यत ॥ त्वयि वर्पति पर्जन्ये, सवपसविता उमा ॥ अस्माकमकरदाणं, पूर्वपत्रेषु सशय ॥१॥ नावार्थ - हे स्वामि त मारा रूप मेघवर्पता बतां सर्वजन रूप वृक्ष नवपमवयुक्त थयां थने महारा सरखा थर्क उदोनें पूर्वपत्रनो संशय थयो इत्यादि ललित पल्लवित वचन सनिलीने, कृपासागर नगवत विचारता दवा जे हुँ निर्यथ तु मदारी पासें कांपण नथी थने ब्राह्मणने नही देवाथी इंशदिक सर्वलोक समक्ष प्रार्थना नंग होय ते प्रार्थनां जंग कसाथी लघुता याय ॥ पतः ॥ तणसह यं वस सद्भु पं, तिस लट्ठपंच पक्षणा लगुपं ॥ तत्तोवि सो जङ, पक्षण भगो करनेण ॥१॥ नावार्थ - सर्वयकी तृणलघु ले ते थकी तुप लघु ले थने तृपला तथा तुप थकी पण प्रार्थना करवा वालो लघु जावो अने वाली प्रार्थनानो नंग करवा वालो जे रे तेतो सर्व थकी लघु जाणवो ॥ पुनरपि ॥ परपठणापवत्ति, मा जणणी जण एरिसपुत्त ॥ उपरोवि मा घरिजन, पठण नगो का जेण ॥१॥ जावार्थ:-- परपासें। प्रार्थनानो करवा वालो एवो पुत्र हे माता तुं जणीश नही अने वली प्रार्थना नग करना रमें तो उदरने विपे पण धारण करीशमा ॥ पुनरपि ॥ यांतुांतु वत प्राणा, थर्थिनिष्पर्य तांगते ॥ पमादपिदिगतष्य, कसार्य पुनरीहश ॥१॥ नावार्थ - जान रे महारा प्राण जे थार्थप्राणी व्यर्थ घरथी जाय तेनी साथै तमे पण जा केमके पाब्ज पण तमने कोश्क

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चित्र३८ प्रसार -भगवान् देवदुप्पदाम आपेज ब्राम्हण ALSALEE AMMA दिवसें जावु तो आज तो एवो साथ वली तमोने मलवो मुशकील ने माटे हमणाज जा ॥१॥ इत्यादिक शिष्टाचार थाचारनो विचार जाणीने श्रीमहावीर देव रुपाकरीथरघु देव पुष्य वस्त्र फाडीने ब्राह्मणने देता दवा ए विप्रने चीवर दीधाथी वीजा प्राणीउँने एबु जणावता दवा ॥ यतः ॥ जांसंतितां वेश धन, परि थस्कइ वीर ॥ पितामित्र वाजण जणी, थाधो वीधो चीर ॥१॥ जावार्थ -ज्यांमुधी घरमां संपत्ति होय त्यां सुधी धन, चीवर, थन्नाविकनु दान वेवु, पिताना मित्र ब्राह्मण थरघु चीर थाप्याथी श्रीवीर एवं पूर्वोक्त प्रमाणे जणा वता हवा ॥ १ ॥ हवे ते ब्राह्मण यर चीर लश्ने पोताने घेर गयो तेने चीवर सहित बार णाने समीपें श्रावतो देखीने ब्राह्मणी दार्षित थ थकी तीने सन्मुख थावीचे दाथ जोडी ए वीरीते कदेतीदवी के दे प्राणनाथ। हे मम जीवना' दे महारा देयाना दार, हे कांत' सुजग द्वं तमारी मेघनी पेरें वाटजोती हती थने जेम जल विना माउली टलवले तेम तमारा विना ई टजवली रही दती इत्यादिक मी मनोहर वचन रचना कथन पूर्वक थपूर्वरीतें घणी प्री तियें मान मनन करावी नोजन पान तांबुल पापीने वली घणा सन्मान पूर्वक सुखशय्या शयन प्रमुख सुख उपचार करीने स्त्री घणो प्रमोद पमाडती हवी तेवार पडी ब्राह्मण ते व स्वनी दशीयो बंधाववाने वास्ते तुंनारा पासें गयो तुनारे पण ते वस्त्र तेवु यात्रुट्यु जाणी ने सोमविप्रने कहेवा लागोके हे ब्राह्मण था वस्वनो बीजो कटको लश् थाव्य तो एने सांध्या यका ए लाख मूलनु थाशे तेथी तादारा अने महारा बेगुना दारिश्चनो नाश थाशे तेवारे ते विष पाठो फरीने लोनें वधतो बतो श्रीवर्षमान स्वामी पासें थावतो दवो पण मनमा विचा रवा लागो के दु वारंवार केवीरीतें याचना करु,थतिलोन करवो पुरुपर्ने युक्त नथी थने नग वान पण एवं जाणश जे था विप्र लोनी ने एबु जाणीने लाजनो माखों मौन करी रह्यो पण मुखथी मागे नही ।। यत ॥ लला वारेश मुई, थसपया नई मागिरे मग्ग ॥ विन्न मानकवार्ड, वेहित्तिमग्गिया वाणी ॥ १ ॥ नावार्थ-- सला ते मुखने वारती दवी बने थसंपदा कहेति दयी के माग्य रे माग्य पण मानरूप कमाड देवराणा तेथी थापो एवी गणी मुखथी न निकलती हवी ॥ १ ॥ श्रने जाएयु जे फ्याय पण खंनाउपरथी पडी जाय तो उपादी जश एवीरीतें जेवारें जगवतने दीदा जीघे एकवर्पने उपर एक मास थयो त्यां सुधी नगवाननी पाठल ते ब्राह्मण चाल्यो पनी एकदिवस ते देवपुष्य नगवानना खंना उपरथी वायराना गोटथी उपडघु ते उत्तरचावालागामनी पासें सुवर्णवालुका नदीने कांवे धोरडीना वृक्षना कांटामा ज पडघु तेने विप्रे ग्रहण कऱ्या नगवान पण सिहावलोकन दृष्टियें करी दे खता हवा हा कोकतो कहे 2 के ममत्वे करीने देखता दवा, कोश्क कहे जे के पुनस्था नके पदयुं के थनस्थानकें पडघु तेजोवाने माटे देखता दवा वली कोश्क कहे ते के सहसा स्कारे वेर, कोश्क कहे वे के मदारी पाउल महारा शिप्योने वसपात्र मुजननावे यो के नही चाय एवा कारणथी देखता दवा कटके लाग्युं तेथी नगवाने विचार जे मदारी पळवाडे जे साधु स्वसतानिक थाशे ते सर्व वगुन कपायि कटकी कलहकारी प्राय थसमाधिकारक थाशे मूमा घणा थाशे थने साधु थोडा थाशे एच जाणीनं निर्ममत्वथी ग्रहण न कसु, हवे विप्र पोताना थात्माने धन्य कृतार्थ मानतो थको, सपूरण मनोरथवत थयो थको तुनारा पासें वे खंम सं धावी वणावीने वेंच्युं तेना लह सोनेया थाव्या तेमाथीथी तुनाराने दीधा थने थर्श बाह्मणे राख्या वेगु वारिघ्य गर्दु जावलीव सुधी सुरखी थया श्रानवा रह्या ॥ इति अचेलक दृष्टांत ॥ ॥तेवार पठी जगवाने कपडा राख्यां नदी ते दिवसथीथचेजक थया थने बीजा वीश तीर्थकरोनां देवष्य वस्त्र जावळीव रह्यां दतां केटलिक प्रतोमा वचला बावीश तीर्थक रोना देवञ्ष्य जावळीव रह्यो कह्यां ने तेथी ते सचेलक जाणवा दवे श्रीमहावीर स्वामी चारवर्ष उपर साहा महीना बद्मस्थपणे कायाने वोसरावी कांश शुश्रूषा करे नदी एवाथका विचसा तेमा जे कांश वेवताना करेजा, मनुष्यना करेला, तिर्थचना करेला, अनुलोम थने प्रति लोम एवा वे प्रकारना उपसर्ग थया तिहां जे नाटक देखावां, आलिंगन करवां, इत्यादिक देवाविकोये करेला उपसर्ग ते सर्व अनुलोम उपसर्ग जाणवा अने जे देवादिकोयें जय ब ताव्या, प्रहार करना, कूट्या, मास्या एवा उपसर्ग ते सर्व प्रतिलोम उपसर्ग जाणवा ए बन्ने प्रकारना उपसर्ग सर्व पोतानी खुशीथी सहन करूया पण चारित्रयी जगार मात्र चलायमान थया नही तेमज कोश सपर रागपि पण लाव्या नदी तथा कोश्नी पासें दीन वचन पण बोल्या नही तेमज फोश्नु नय पण जाया नही एवी रीतें अनेकप्रकारना अपसर्ग सदन कस्माते कही वे खाहे ॥ ॥ एकदा जगवान् उत्तर वाचाल सन्निवेशे जातां मार्गे वईमान गामें याव्या,तिदा ए क सुवर्णवालुका,वीजी रूपवालुका,ए वे नदी थावी, ते धतरी धागल चालता एक वकमार्ग वीजो सरल मार्ग, एवा वे मार्ग थाव्या, तिदा लोके निवासा के पाधरामार्गमा सर्पनो जय दे माटे जाशो नही तो पण नगवत वक्रमार्ग मूकीने सरल मार्गे चमकोशीया सर्पने प्रतिबोध देवासारूं चाव्या, ते मार्गमा कनक स्वल नामा वनमा तापसनो थाश्रम डे, तिहां एक महा जोरावर घणो मशीलो चमकोशीयो सर्प रहे वे ते चमकोशिया सर्पने जगवाने देवता कयो, तेनी कथा कहे डे कोक गामने विपे घे साधु गुरु चेला चोमासु रह्या हता ते एक विवसें मास खमणना पारणाने श्रयै वे जणा गोचरीयें गया, त्यां वश्तुने लीधे घणा जीवान। उत्पत्ति थये ते मार्गमा गुरुना पग नीचें सूका मेमकी थावी ते चपाइ मरण पामी तेवार चेलायें फर्मु महाराज तमारा पग नीचें मेटकीयावी ते मरण पामी एवं सांजली गुरु वोज्या घणी मडकी मरेली पडी माटे बीजा कोश्नो पग थाववाथी मरण पामी दशे तेवारें तिहा ते चेलो मौन रह्यो वली गोचरी बालोवता शिष्य वोल्यो के मेडकीनो मिठामि उक्कड व्यो ते सानजी गुरुने रीश चडी थने चेजाने कव्वा लागो जे थरे था मेडकीतो प्रथमयीज मरेली दती, मेंतो मारी नथी चेले घणं कसं तो पण मान्यु नदी तेवारें चेचे विचाखु जे साजें पडिक्कमणामां थालोयण पेशे गुरुये पण सांजें पडिक्कमणामां सर्व थालोयण लीधी, पण मेहकीनी वालोयणा न जीधी तेवार वली पण चेले कयुं जे महाराज मेडकीनी था लोयणा व्यो तेवारें पण गुरुयें रीश करीने तेवोज जवाब थाप्यो फरी रात्रे सथारानी वेलायें कसं के हे महाराज झेमकीनी बालोयणा यो एव सांजलतां गुरुने रीश चही तेथी दायमां पानी मामी सश्ने मारवा दोच्यो रातनी वेला दती तेथी चेलो नाशी गयो, गुरु तेनी पाबल दोच्यो थने उपाशराना थनिलामा श्रथडायो तेथी गुरुद्वं मस्तक फूटयुं त्यांथी मरण पामी पीजे नवे ज्योतिषी देवता थयो त्यांथी चवीने चमकोशी नामें तापस थयो तेना पांचसो शिष्प यया परंतु पोतें घणो क्रोधी दतो तेथी एक दिवसें राजकुमारने वाडीमाथी फूल लेता देवीने दायमां फरसी लश् तेमने मारवा दोव्यो तिहां पग लपसीगयो तेथी मार्गमा एक अंध कूवो थाष्यो, तेमां पयो पोताने फरसीवागी तेथी थातथ्याने मरण पामीने तेदज थामने विपे चोथानवें चमकोशी सर्प थयो , यांख्यमा जहेर घणु ,जे कोश्ने

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चित्र भगवामू देखे, तेने पाली जस्म करवे, घणा तापसोने वाल्या, पीला केटलाएक नाशी गया लोकें पण ए मार्गे जवान बोडी दी, एककोश प्रमाण जूमिमा रहेजा जीवमात्रने वाली नाखेडे त्यां ते सर्प कोश्ने रेवा देता नथी ते सर्पना बिलमपर नगवत कास्सग्गे रह्या, ते देखी सर्प क्रोध थाणीने प्रजुने मख मास्त्रो, तेवारें प्रचना पगमाथी दूध सरस्खु लोदी मांस नीकम्यु, तेने देखी सर्प विचासु जे हूँ जेने सादामु जोट, तेने पण बाली नस्म करु थने एने तो मख मायो तो पण घोल लोइ नीकल्यु माटे ए कोई महोटो पुरुष जे एम चितवीने नगवानना मुख सामुंजोयु तेवारें नगवान् बोल्या के थरे चमकोंशिया चूज बूज तुं नथी जाणतो एवं केतां थकां ते सर्पने विचार उपन्यो जे थावं रूप में क्याक वीलु डे एटलामा मूर्या श्रावी गई थने जाति स्मरण ज्ञान उपन्यु तेवारें पाब्लो नव दीठो, पढी प्रजुने त्रण प्रदक्षिणा देश विनति करी के हे करुणासागर ' दुर्गतिरूप कूपथी तमें मुजने उहयो, पढी वैराग्यपामी पन्नर विवसनु धन शन करी परोपकारार्थे ते सर्प पोताना बिलमाहे मुख घाली अने थाखु शरीर बाहेर राखीने रह्यो पनी ते मार्गे दूध, वहीं, घृतनी वेचनारी थाहिरलोक तेणे ते नागराज सतुष्ट थयो एवं जाणी दूध, दही, घृत, शर्कराविके करी सपने पूज्यो तेनी गधे करी कीही शरीर उपर चही पड़ी विचार, जे मदारा शरीरने फेरवीश तो कीडीयो मरीजशे एबु जाएी शरीर हलाव्यु नही कीडीये ते सर्पने फोली चालणी सरस्वो कीधो, ते सर्प राजथ्याने मरण पामीने थाम्मे देवलोके देवता थयो प्रचु तिहाथी विचरता उत्तर वाचाल सनिवेशे पहोता तिहां नागसेन श्रावकनें घेर परमान्ने पारणु कम्यु, देवतायें पंचदिव्य प्रगट करा तिहाथी विहार करीने नगवान श्वेताविका नगरीये गया तिदा परदेशीराजायें प्रतुनो महिमा men कस्यो । तिहाथी विचरता यका नगवान सुरनिपुरनगरनां मार्गमा गगानदी थावी ते उत्तर वाने अथै घणा लोक सिध्दन स्वास्थानी नावा वेठा तेनी साथै प्रन्नु पण वेवा एवा मा योल्यो तेनुं शुकन जो कोमिजनामे निमित्ति ते नावमा दतो तेणे कसुं के हे धूवड लोको थाज थापणने मरणांत कष्ट उपजशे परंतु था साधु मदारमा पुरुषना प्रनावथी जी वता रही मर नहीं एवामा नगवते त्रिष्टष्ट वासुदेवना नवमा जे सिदने विदामो दतो ते सिह घणा नवन्रमण करीने दमणां वनपति देवोमा मुदंघनामे नागकुमार देवता थयो ते अवधिज्ञाने प्रचने जो पूर्व वैर संनारी यहां थावीने नाव मूबाववानो उपञ्च करवा लाग्यो तेवखत नवा उपन्या एवा कंवल अने सवल नामे के नागकुमार देवता तेणे थावीने एक देवतायें तो नाव मयती राखी बने पीना देवतायें पहेला,सुदष्टदेवनी साथै लडा करी तेमा सुदंष्ट्र दारीगयो तेथी नगवान सुखें गंगानदी ठतमा हवे ए कंबल संघलनी पूर्वनव सर्वधि कथा कहे, मयुरा नगरीमा जिनदास नामा श्रावक रहे जे तेनी साधुवासीनामे स्त्री ते पण श्राविका ने ते पन्ने जगायें पांच अणुव्रतमा चतुष्पद जीवो राखवानो त्याग करेलो ने तेथी दूध वदी जे घरमा वापरवा सारु जोश्ये ते एक थाहिर पासेथी मूल्य थापीने वेंचातु लीये जे तेने लीघे ते धादिरने अने शेगनें मांदोमांहे प्रीति य ते थाहिर सार्थे लेवड देवडनो संतोप व्रतमा, राखेखें दे दवे एकदिवस ते थादिरने घेर विवाद आयो तेवारे श्रादिरे शेत पासेंथी विवाहने माटे केटलिएक चीजो मागी शेते पण तेने चश्या प्रमुस्व सर्व उपकरण तेना माग वा मुजय थाप्या तेथी तेनो विवाद घणो सरिकार थयो तेवारे ते थादिर खुसी थश्ने सर खी थवस्थावाला घणा रूपवत एवा ये बाल वृपन लावीने शेठने घेर बलत्कारें वांधी चा चित्र ४० रसर भगवान्

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ज्या गया त ययाप शनि ता राखवानी वा इती नही तोपण शेवे विचासु जे पाना था पीश तो ए वीजे पयाय वेचशे तिहां एधापडा उखी थाशे, बांध्या रहेशे, नार ताशे, एवं विचारीने पोताने घरें राल्या तिहां तेमने पुत्रनी पेरे फासु घास जज प्रमुख खवरावीने पोष्या कंवल यने संवल एवां वे नाम दीधा हवे शेव पाखीने दिवसे पोसद करे धर्मचर्चा करे पुस्तक वांचे ते वातो सनसतां सांजलतां ते बलदीया घणीज रूडी समजण वाजा थया एवा नाशिक परिणामि यया के शेत जेवारें उपवास करे तेवारे ते पण उपवास करे तृणादिक चारो बिलकुल खाय नही एवीरीतें शुजनावनायें विचरे ने हवे एक दिवस शेठ पोसदमा वेग हता एटलामा कोश्एक शेठनो मित्र यायो ते पुष्ट दृषननु जोडलु देखी शेग्ने पूच्या विना पोताना रथा जोडीने मीर वनमा यक्षनी यात्रायें लइ गयो मार्गमा घणा दोडाव्या तेथी ते बलदोनी नाडियो चूटी पड़ी पड़ी ते गनो श्रावीने पाबा शेठने घेर पांधी गयो पण हाडका जोगी गया तेथी चारो पाणी त्यागी बेठा शेठे पोताना पुत्र जेवा बलदोने खी थयेला देखी घणो विपाद करीने अनशन कराडं चार थाहारना पञ्चस्काए करावी न वकार सनलाव्यं ते वलदीया शुनयाने मरण पामीने नागकुमार देव थया ते नवा उपन्या यका श्रवधिज्ञाने उपयोग थाप्यो तेथी ए कत देखी हां श्रावीने जगवानने थतो उपसर्ग मटाच्यो थने जगवान श्रागल नाटक नाची गीतगान करी पूजा सत्कार करी स्वस्थानकें गया an इति कवल संवल दृष्टांत ॥ एक दिवसें नगवान् विहार करता गंगा नदी यतरतां सूक्ष्मवेलु मांदे प्रतिबिंबित पगलानी श्रेणीने विपे चक्र, ध्वज, र्थकुश प्रमुख सण यया एवामा पाब सपी को एक पुप्पनामा सामुश्किशास्वनो जाण,थायो तेरो मनमां चिंतव्यु जे था कोशएक चक्रवर्ती धनारो जीव ने चक्रवनि विना एवा पग पीजानां न होय ते हमणां एकाकी जाय ले माटे दु जर एनी सेवा करूं, पड़ी ते चरणानुसार तिहा थाप्यो थने नगवानने वस्त्ररदित दिगम्बरक देखीने विचारवा लागो में हूँ सामुश्किशास्त्र फोकट नास्यो बुं जो एवा लक्षणनो धणी निठुकरू एकाकी ले तो ए महारां पुस्तक खोटा जे पाणीमां वोलवा लायक , एम चितवी पुस्तकने पाणीमा बोलवा लाग्यो, इमदारा0 ए वृत्तांत जाए{ तेवारें तिहां थावीने प्रष्नी सेवा साचवी पुष्पनिमित्तिया श्रागल प्रचुन स्वरूप वर्णवी शास्त्र पाणीमा वोलवां न दीर्धा, पढ़ी जगवंतना गुण माम कही इस स्वस्थान गयो, पुष्प पण इंश पासेंथी मणि कन कादिक धन पामी वर्प पामतो पोताने स्थानकें गयो, प्रचुयें परोपकारार्थे गगानदीउतरी वि दार कीघो ॥ हवे गंगानदी उतरीने जगवान बीजे घोमासे राजगृही नगरीयें नालंदीनामा पाहामा वणकरनी एटचे तंतुवायकनी शाला तेना एकवेशने विपे खूणामा थाझा लश्ने रया तिदा प्रथम मास खमण कहुं अहीर्था शरवणयामे मंखली पुत्र सुनशनो श्रगज बहुल ध्वजनी गोशालाने विपे उपन्यो ने तेमाटे तेर्नु नाम पण गोशालो राखेलो ने ते अनुक्रमें नमतो नमतो जगवत पासें थाष्यो, लगवाने तिहां चारमासमा चार मास खमण करीने चार पारणा का तेमा पहेला मास खमणने पारणे प्रजुनें विजयशेठे वीराविक विपुज नोजने पारए कराव्युं तिहां देवतायें पंच विष्य प्रगट कसा पनी ते सरस क्षीराविक कूराविक मोदकादि कनो बादार देखीने गोशालायें विचास्युं जे एने घर घर वोरावे ने माटे तु पण जूदो नि कायें फरीश तो माहारी पण मान्यता वधशे, तेवारे जगवतने जेणे वोदोराव्या तेना पा होशीने घरे गोशाप्लो पण वदोरवा गयो ते देखी पाडोशी दर्प पाम्यो जे महार घरे जग - वान् पधारमा तेथी उठी वेठो थयो पनी वांवीने कभु के दे महाराज' महारे घरे पारणं करो तेवारें गोशालायें वे हाथ पसाबा गृहस्थे उनी उनी रसोई पीरशी थने उँनुं मायूं करी जोवा लाग्यो जे मदारे घरे सोनयानो वाद थाय एम करता वायस थावी माथे वेतो ते वारें मेडा उपरथी गोशालाना दाथ उपर एक पायें देवता नाख्यो ते जोइ शेर्ने विचारयुं जे पाडोशीने घेर तो सोनेयानो वाद वरश्यो भने मादारे घरे तो कोयता वरश्या गोशालाना हाय वन्या तिदायी भवास थइ गोशालो निकल्यो दवे नगवानने बीच पारण नवे पक्कान्ना दिक कराव्यु, त्रीजे मासखमणे त्रीच पारणं सुनवे परमान्नादिकें कराष्र्यु तिदा सर्वत्र पंच विष्य प्रगट थयां ते जो गोशाले मनमा विचारहुँ जे एनी पासें सारविद्या जे घर घर सोनु वरसावे , ए विद्या ई पण शीख माटे एनी सगत करु तो शीखु थने महारी शोना वधे। एम विचारी गोशालो वोल्यो दे नगवान' दुथापनो शिष्य बु एम कही जगवत साथै फरवा लागो, नगवाने तिहाथी जश् चोखू पारण कोजागसन्निवेशे बगुलनामा ब्राह्मणने घेर केवल खीरना नोजने को तिहां पांच दिव्य प्रगट थयां ए बी चोमासु जाणवू ॥२॥ पालथी गोशाले नगवानने वीना नदी सर्व नगरमा फरी जोएं तो नगवान मल्या नदी तेवारे सर्व उपक रण ब्राह्मणने थापी फुरसुम थाने चाल्यो पनी कोमागसन्निवेशे नगवानने देखी बोल्यो के था पनी विक्षा मुजने हो दु थापनो चेलो ए वात जगवाने पण मानी पनी गोशाला सहित नगवान विहार करी एक दिवसें नगवान स्वर्णखलयामें चाल्या, मार्गमा कोइ गोवालीए खीर पकावतां देखी तिहां गोशालो वोल्यो, हे नगवान् । ए खीर थाशे ते खाश्ने जश् माटे यो डीवार वेसो तेवारें सिधार्थ वोल्यो ए वीरनु पात्र जागशे पनी गोशालायें जश् गोवालीयाने फएं हामी फुटशे गोवालीयायें घणा यन कराव्या तो पण हामी फूटी गश्तेवार गोशालो यो व्यो जे थानार होय ते थायज एवं योली दव पकही नियतवादीपणु पठिवज्पु ॥ तिहायी नगवान विहार करी ब्राह्मण गाम गया तिहां एक नद थने योजो उपनद ए वे नाश्ना वे पाहा ने तेमाथी लगवाने नदनां पाहामा पारण कम्युं अने गोशालाने उपनवने घेर वाशी चन्न सातदिवसनी वेस मनी तेथी कोपायमान थाने गोशालो वोल्यो जे महारा धर्माचा र्यना प्रनावथी तहारूं घर वली नस्म था एवं कहेतांज व्यंतरदेवोयें नगवाननुं महत्त्व रा खवा माटे तेनुं घेर वाली नास्यु दवे त्रीने चोमासे घे वे मासनी तपस्यायें प्रनु चपानगरीयें रह्या ए त्रीजु घामासु ॥३॥ ॥ त्यां डेलुं पारण करी कोमाग सन्निवेशे गया तिहां शून्य रहमा कामस्सग्ग रह्या तिहां सिंदो रजपुत चोधरीनो पुत्र विद्युन्मती वासीसाथै निहाकरतो दतो तेने रमतो देखीने गोशालो दस्यो तेवारें तेणे गोशालाने कूट्यो गोशालो प्रचने कहेवा लागो जे मने मार थापेबे माटे तमें एने का वारता नथी प्रचु मौन ने तेथी सिदार्थ बोल्यो के थाज पनी एर्नु हास्पन काम म करीश ए काम करीश तो एवांज फल पामीश तेवार पली स्वामी मोराकसधिवेशे रमणीय नामा उद्याना कास्सग्ग रह्या, त्या कुनारशालामा श्रीपार्श्वनाथना शिष्य मुनिचं सरि घणा शिष्यो साथै रह्या ते साधुने देखी गोशाले पूरघु तमें कोण हो, ते पोल्या अमें साधु ये गोशालो वोल्यो तमें क्या थने महारो धर्माचार्य क्यों ? तेवारे ते साधु पोज्या जेवो तुं , तेवो ताहारो गुरु पण दशे तेवारें गोशालो रुतो थको यो व्यो जे मदारा धर्माचार्यना तप तेजना प्रनावथी तमारो थाश्रम पली नस्म थाठ तेवारे शिप्प बोल्या एथी का थमे मरता नथी हवे थाश्रमवल्यो नहीं तेवारें गोशाले श्रावीने प्र - चित्र ४ भगवान् गोशामो

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ने कहुं के स्वामी थागत जेवो तमारो प्रनाव दतो तेवो दमणों नथी तप तेज घटी गएँ। जणाय वे तेवारें सिक्षार्थ योल्यो अरे गोशाला ए साधुने शाप लागेनही ए साधु नहीं चले, पठी ते पार्श्वनाथना शिष्य मुनिच सरिजिनकम्पनी तुलना करता काउस्सग्गमा पना बे तेने ऊनारें चोर जाणीने मार थाप्यो मुनिने अवधिज्ञान उपन्यु मरण पामी देवलोकें गया तेनो देवतायें महमा कस्यो त्यां अजवाटु थर्पु ते देवीने गोशालो बोल्यो जु साधुना श्राश्रम घले ते महारा गुरु साचा ठे, तेवारें सिदार्थ व्यतरो वोज्यो के,अरे कुपात्र ए तो मुनिचं देवलोकें गया तेनोमदोत्सव थाय ने ते सनिली गोशालो विलखो थयो । ते पनी प्रनु चोरा नगरिये गया तिहां गोशालो गाममांदे देर तो फरे तेवारे त्यांना लोकोयें हेरु जाणी प्रथम गोशालाने(कूप) खोडामाहे पाल्यो पठी जगवतने पण नाखवा लागा, एवामा उत्पलनामा विपनी वेदेन सोम जपतिनामें ते चारित्र त्यागीने सन्यासणी था बे तेणे थावी नगवानने ठलखीने गेडाव्या गोशालाने पण बोडी मूक्यो । तेवार पनी त्यांची विहार करीने चोर्यु चोमासु स्वामी पृष्ठ चं पायें चार मासी तप करीने रह्या, तिहां चोमासु सपूर्ण करी बाहेर पारण कयु ए चो चोमासु जाणवे ॥ ४ ॥ ॥ तिहाथी विदार करी नगवान कर्यग गया, तिदां माघ मासे जागरणना विचसें वारियने स्थविर पाखमिणी नाचे ले, गाय ने तेनी गोशाले दासी करी तेथी तेठए गोशालाने मार थाप्यो वली प्रानुनो शिष्य जाणी मूक्यो । तिहाथी विदार करी नगवान सावजीनगरीयें थावीने काउस्सग्गे रह्या तिहा पितृवत्तवणिकनी स्त्री श्रीनश ने तेने पुत्र जीवला नथी, तेवारें शिववन निमित्तिये तेने पूर्व की डे के मृतक पुत्रनु मांस खीरमा राधीने कोइ निकुकने खवरावजो तो तमारा पुत्र जीवता रदेशे, हवे ते स्त्रीने जेवारे

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मुने कसे के स्वामी थागज जेवो तमारो प्रनाव हतो तेवो दमणां नथी तप तेज घटी गयु जणाय ते तेवारें सिधार्य घोप्योथरे गोशाला' ए साधुऊने शाप लागे नही ए साधु नदी बल्ले, पठी ते पार्श्वनायना शिष्य मुनिचर सूरिजिनकम्पनी तुलना करता कामस्सग्गमा ना ले तेने ऊनारें चोर जाणीने मार थाप्यो मुनिने थवधिज्ञान उपन्यु मरण पामी देवलोकें गया तेनो देवतायें महमा करलो त्यां थजवाखं ययुं ते देखीने गोशालो बोल्यो जु साधुना थाश्रम बजे ने महारा गुरु साचावे, तेवारें सिकार्य व्यतरो बोल्यो के,अरे कुपात्र । ए तो मुनिचं देवलोके गया तेनो महोत्सव थाय रे ते सांगली गोशालो विलखो थयो। ते पनी प्रनु चौरा नगरिये गया तिहां गोशालो गाममाहे हेरतो फरे तेवारे त्यांना लोकोयें देरु जाणी प्रथम गोशालाने(कूप) खोडामाद घाल्यो पठी नगवतने पण नाखवा लागा, एवामा उत्पलनामा विप्रनी वेहेन सोम जपतिनामे ते चारित्र त्यागीने सन्यासणी य तेणे थावी नगवानने लखीने बोडाव्या गोशालाने पण ठोडी मूक्यो । तेवार पठी त्यांथी विहार करीने चोधु चोमासु स्वामी प्रष्ट च पायें चार मासी तप करीने रह्या, तिहां चोमासु संपूर्ण करी बाहेर पार| कां ए चोथु चौमासु जाणवु ॥३॥ ॥ तिहाथी विहार करी लगवान कर्यगलें गया, तिहां माघ मासे जागरणना दिवसें दारिश्थने स्थविर पखिमिणी नाचें बे, गाय ले तेनी गोशाले हांसी करी तेथी तेए गोशालाने मार थाप्यो वली प्रजुनो शिष्य जाणी मूक्यो । तिहाथी विहार करी नगवान सावधीनगरीये थावीने काउस्सग्गे रह्या तिदा पितृदत्तवणिकनी स्त्री श्रीनश ने तेने पुत्र जीवत्ता नथी, तेवारें शिवदत्त निमित्तियें तेने पूर्व कयुं के मृतक पुत्रनु मांस खीरा राधीने कोई निदुकने खवरावजो तो तमारा पुत्र जीवता रदेशे, हवे ते स्त्रीने जेवारे मृतक पुत्र ययो तेवार तेनां मांसनी स्वीर तैयार करी राखी थने यहीं गोशाले सिक्षार्थ व्यतरने पूब्यु के मने थाज केतुं नोजन मजशे? सिक्षार्थे की तनें थाज मनुष्यर्नु मांस मलरो, ते खाइश पड़ी सिदार्थ वचन खोटुं करवा सारु गोशालो आवक वाणीयाने घेर वोहोरवा गयो, मना विचामुं के वाणीयाने घेर मांस दोयज नही एवु जाणी तिहां खीर जमी फरी पाडो श्रावी सिदार्थने कयु के हुँ खीर जम्यो जु सिक्षार्थे कडं तुं मांस जम्यो गे, तेवार गोशालायें गलामा थांगली घाली वमन कम्यु, मांद मांसना कटका दीपा तेवारें गोशालो कोष करीने तेने घेर गयो परंतु ते स्वीयें शरापना जयथी घरनु वारण फेरवी नास्यु दतु तेथी गोशालायें घर लाघु नही तेवारें कद्देवा जाग्योजे महारा स्वामीना तप अनावथी तमारो पाहाडो बली नस्स थाजो तेथी पाटो बन्यो ॥ इति ॥ तिदायी जग वान दरिइ सन्निवेशनी बाहेर कास्सग्गे रह्या तिहां पंथीयोयें नगवानना पग पासें वा सदी पाली तो पण जगवान किंचित्र मात्र सरक्या नही जगवानना पग वलता देखीने गो शालो नाशि गयो ॥ तिदायी गलगामें वासुदेवने वेदरे कास्सग्गे रह्या तिहां गोशालो थारज्यो काढीने वालकोने बीहीवराववा लाम्यो तिहां लोकोयें मास्यो, कूव्यो वायो जगवाननो शिष्य नाणी मूक्यो त्यांथी विदार करीने नगवान यावर्त गाममा बलदेवना मंविरने विपे काठ स्सग्गै रह्या तिहां गोशालायें बोकराउने धीवराववा सारु महोई मरडी वतायुं तेथी करा सर्व जय पामीने पोताना माता पितानी थागल कहेवा लागा तेवारे ते माता पि ता तिहां थावीने कदवा लागा के था चेलाने / मारवो एना गुरुनेंज मार श्रापो एटले फरी चेजाने पायरे मार्गे चालवानो उपदेश करो एवं कदीने जेटलामा नगवानने मारवा तैयार थया एटलामा पलववना मात्तय दल जश्ने लोकोनें बीवराव्या सेवारे सर्वलोक नगवा नने नमवा लागा ॥ पनी तिदायी विदार करी घणा क्लिष्टकर्मोनी निर्जरा करवाने अर्थे जग वान लाटदेश गया तिहां थनार्य लोकोयें घणाज अपव कसा ते प्रलयें सदन कस्खा ॥ ति हाथी पूरणकलश नामें अनार्य गामें जाता थकां जगवाननें मार्गमा ये चोर मन्या ते न गवानने देखी थपकन थयां एवु मानीने खड्गल मारवा शेज्या तेने ६ महाराज वजथी मारी नारख्या केटतिक प्रतोमा इश्मादाराजे ते चोरोना पग पंच्या तेषी ते वृदनी पेरें ति हाज उना रह्या एवीरीतें उपसर्ग निवारण थयो ॥ पड़ी तिहाथी प्रनु योरांगे थाव्या तिहा मामवे धान रधातु देखी गोशालो नीचो थइ जोवा लाग्यो तेने लोकोये चोर जाणी माशो, गोशालो रुठो यको वोल्यो जे महारा स्वामीना तप बलें तमारो ममप बजनो, ते तेमज थयु तेवार पठी नगवत दरिद नीचें कास्सग्गें रझा, तिदां कोई पंथीय बागल भूमिका बाली हती तिहा गोशालानां पग बल्या तेवारे त्यांथी गोशालो नाठो ॥ तेवार पड़ी पांचमु चोमासु प्रनु नश्किानगरीय रह्या तिदा चोमासी तप प्रलय की ए पांचमुं चोमातुं चार मासी त पनु जायतुं ॥ ५॥ ॥ पड़ी पारण करी तिदायी नगवान कुविक सन्निवेशे गया स्यां लो कोयें चोर जाणीने पकच्या पठी श्रीपार्श्वनाथजीनी एक विजया पीजी प्रगफ्ना ए वे सा ध्वियो परिवाजिकणी थयेली तेमणे बोडाव्या तिहाँ गोशालायें जाण्यु जे एनी पबवाडे फरवाथी घणा सुख सदन करवा पढे ले एवु विचारी जगवतथी जूदो विचरो मार्गमा जाता पाचसे चोर मल्या ते मामो मामो कदीने गोशालानी खांध वपर चही यागल पाउन फराववा लागा तेथी इख पाम्यो वली पीजे पण ज्या जाय त्यां तोफान करे, तेवारे मृतक पुत्र थयो तेवार तेना मांसनी खीर तैयार करी राखी थने थदी गोशाले सिक्षार्थ व्यतरने पूघु के मने थाज केवु नोजन मलशे? सिक्षार्थ कर्पु तनें आज मनुष्यनु मांस मलशे, ते खाश पठी सिक्षार्थनु वचन खोटुं करवा सारु गोशालो आवक वाणीयाने घेर वोहोरवा गयो, मनमा विचार के वाणीयाने घेर मांस होयज नदी एवं जाणी तिहा खोर जमी फरी पाठो थावी सिफार्थने कर्यु के ई वीर जम्यो सिक्षार्थे करं तु मांस जम्यो गे, तेवारें गोशालायें गलामा थांगली घाली वमन कम्युं, मांद मांसना कटका वीता तेवारें गोशालो कोध करीने तेने घेर गयो परंतु ते स्त्रीयें शरापना नयथी घरन यार' फेरवी नारपुं दतुं तेथी गोशालायें घर लापु नदी तेवारें कड़वा लाग्योजे महारा स्वामीना तप प्रनावथी तमारो पाहाडो घली नस्स थाजो तेथी पाडो बल्यो ॥ इति ॥ तिहाथी नग वान दरिइ सन्निवेशनी पारेर कामस्सग्गे रह्या तिहां पंथीयोयें नगवानना पग पासें वा सदी वाली तो पण जगवान किंचित्र मात्र सरक्या नदी नगवानना पग पलता देखीने गो शालो नाशि गयो । तिदायी गलगामें वासुदेवनें वेदरे कास्सग्गै रह्या तिहां गोशालो थारख्यो काढीने वालकोने वीहीवराववा लाग्यो तिहां लोकोयें मानो, कूव्यो वायो नगवाननो शिष्य जाणी मूक्यो त्यांथी विहार करीने नगवान श्रावन गाममा बलदेवनां मविरने विपे काठ स्सग्गे रह्या तिहां गोशालायें ठोकराउँने वीवराववा सारुं महोई मरदी यताब्यु तेथी गेकरा सर्व जय पामीने पोताना माता पितानी बागल कहेवा जागा तेवारे ते माता पि ताउँ तिहां थावीने कड़वा लागा के था चेलाने मारवो एना गुरुनेंज मार थापो एटले फरी चेजाने पाघरे मार्गे चालवानो उपदेश करो एवं कहीने जेटलामा नगवानने मारवा सुधाथनक प्रकारना सह निग्रह करना ए ग्नु चोमासु जाणवू ॥६॥ ॥ श्दो बम हीना वाहेर जटकीने गोशालो पण फरी थावी प्रजुने मन्यो दवे ए चोमामु पुरु थया पठी शेपकाल था महीना सुधी नगवान मगधदेशमा विचसा ते था मदीनामा नगवानने कोई पण उपसर्ग थयो नही तेवार पड़ी सातमो चोमासो थालनिका नगरीनी वादिर देव कुनें चारमासी तप करीने रह्या ए सातमुं चोमासु ॥४॥ ।। तिहाँ गोशालायें पलदेवनी प्रति माना मुखमा लिंग घस्युं ते लोकें वीतु तेवारे गोशालाने मार थाप्यो कोश्क प्रतमा वलदेवनी मूर्ति उपर पुरुपचिन्द राखीने सूतो तेथी पूजारायें मार थापी एम पण जखेल्नु बे तिहाथी विहार करी मईनमामे वासुदेवने देहेरे तेमज गोशालायें मूर्ति उपर पुरुषचिन्द कामु तिहां पण मार खाधो पनी प्रलु मन्नागगामे जता रस्तामा कोशएक नवपरिणीतवधूने तेडी जाय बे तेमां वरना दात पादार निकलेला महोटा हता थने वढु काणी दती ते जो गोशालो दसीने योज्यो के था तो देवें सरखी जोड मेलवी थापी ले तेणे गोशालाने मार थापीने वशजालमा नाखी दीपो ॥ श्रा तेकाणे कोक कूटपूतनानो उपसर्ग लखे ले एकदिन विचरता थका जग वान पुरिमताज नगरनी पादेर शकटमुख उद्यानमा कास्सग्गे रह्या ते वखत ते नगरनो व ग्गुर नामा शेव तेनी सुनश नामे नार्या ते घे जणे पुत्र थवा सारुं श्रीमल्लीनाथजीनी मा नता करी हती ते जेवार पुत्र थयो तेवारे उद्यानमा श्रीमतीनाथजीनु नवु मदिर करावीने तिहां नित्य पूजा करे जे हवे जे वखत शेत स्त्रीसहित पूजा करवा श्राष्यो डे तेवखत नगवाननी थागल महाराज वेग ने तेणे नगवाननो महिमा करवा माटे शेठने कयुं के हे शेत जेनी तुं पूजा करे जे ते दु तुजने प्रत्यक्ष देखाई एतु कही शेवने तेडी नगवानने पगे जगायो शेवें।

लोक मार थापे तेथी गोशालायें विचारों जे जगवत साथें रहेज नखं डे एवं जाणी नग चानने जोवालाग्यो दवे नगवत विशाला नगरियें गया, तिहां लोदकारनी शालायें का स्सग्गें रह्या, लोहार पण न महीना सुधी थाजारी दतो, ते पण ते दिवसें साजो थयो , तेथी लोह घडवानां उपकरण लश्ने थाष्यो, प्रजुने मुमा देखी थपमगलिक जाणी घण लश्ने मारवा उपयो, एटलामा ई अवधिज्ञानची जाणी स्यां श्रावी जोहारने निवारो कोक स्थानकें महाराज लोहारने तेहज घणयी मारी नारख्यो एम स्पष्ट लखेलुं वे पनी तिहाथी नगवान मामाकसन्निवेशे याष्या तिहां वनमांदे विनेलेक यादें महिमा करमो त्यांची निकल्या थका शालिशीर्पयामनी वाहेर थावी कास्सग्गै रह्या ते वखतें माघ मासनी ऋतु हती तेमा थत्यंत टादाड पडे ने एवा वस्वतमा नगवाने शीत अपसर्ग सदन कझो ते कहे जे निष्टष्ट वासुदेवना नवा नगवाननी थपमानिती स्त्रीहती ते स्त्री अनेक नवनमती थकी ते वखत कटपूत नामा व्यतरी ययेली के जगवानने देखी तेने क्षेप ठपन्यो तेथी तापसणीनुं रूप करी पोतानी नटामाहे पाणी भरीने परमेश्वरना शरीर सपर बंटयु घणो कतण शीत उप सर्ग कसो एकतो शीयालानी रुतु इती तेमा वली व्यतरियें मेघवृष्टि करी, घणो मो वायरो विर्यो एवा एवा विकट उपसर्ग कसा ए सर्व प्रमाण विनानां पूर्वकतकर्म प्रलना दता ते थाही यावी नख्यां तेने कतण उपसर्ग सहन करीने दूर करना पढ़ी व्यंतरिना उपसर्गयी प्रतु थमग रह्या एवा धैर्यवत प्रजुने जाणी पोतानो अपराध स्वमावीने व्यतरि स्वस्थानकें गश् दवे तिहां सीतवेदना सहन करता थका जगवतने उन्ने त करी यथार्थ लोकावधि झान उपन्यु ॥ त्याथी जगवाने फरी नहुँ चोमासु नझिका नगरीयें कमु तिहां चार महीना

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पण नावेकरी सहित नगवानने पूजीने पठी श्रीमानीनाथजीनी पूजा करी तेवार पनी थान मु चोमासु नगवाने राजगृही नगरीमा कसु तिहां चार मास तप कस्तु पढ़ी चोमासी तपन पारणे पारणु फरीने प्रतु थनार्यदेशमा विचरवा गया डे ए थाम्मु चोमासु जाणवु ॥ ७ ॥ हवे थनार्यदेशमा विचरता थकां नगवाने घणा घणा कठण उपसर्ग सहन करा के थने न वमु चोमासुं पण तिहां थनार्यदेशमांज कसुं ते वली चारमासी तप सहित कहुं वली ति हो रहेवाने जग्या पण मजी नदी तेथी विचरताज रह्या वे ए नवमु चोमासु जाणतुं ॥ ॥ ५ ॥ वली पाठल पण वे मदिना तिहाज थनार्यवेशमा तप सदित विचमा तेपण थाहार विनानुं वे मासी तप य{ ॥ पठी थनार्यदेशमांथी विहार करीने सिदार्थगामथी कूर्मगामें जतां मार्गमां एक तलनु फाड ठतुं देवीने गोशाले नगवानने पूघु के था यंन थाशे के नही थाय नगवानन कर्पु ए तिलना फूल सात ते तेना जीव मरण पामीने एक सांकलीमां शींगमा तलपणे उपजशे ते सानली गोशाले नगवाननु वचन जुलु करवा सारुं ते काहने उखेडीने फेफी दी तेवारें निकट रहेला व्यतर देवतायें चंतव्युजे नगवाननु वचन जुलुम थाजो एq जाणी वर्पाद कयो पठी गायना खुरथी ते तजर्नु फाड चपाणु तेथी धरतीमा पेतु थिरथयुं बने वर्षादना योगें पाईं उठे थ{ ॥ दवे नगवान कूर्मगाम गया तिहां एक वेश्यायन नामा ता पस ले तेनुं नाम वेश्यायन केम पडघु ते कथा कहे ने राजग्रही नगरी अने चपानगरी ए बेनी वचर्मा पूर्वर नामा एक गाम के तेमा कोशवी नामे एक कुटुयी रहे जे हवे ते पूर्वर गा मनी पासें वली एक बीज गाम ते गामनी बाहेर कोक राजानी फोज थावी पडी तेथी गामना लोक सर्वे नाशी गया तेमा एक स्त्री पोताना पुत्र सदित नाराति थकी जाय जे ते स्त्रीने मार्गा चोर लोकोयें पकडी लीधी थने वालक पूर्वरगामने वाहेर पड्यो रह्यो तेने कोशवी नामा कुटुवीय वाहेर जमतो देवीने उपाही लीयो ते कुटुवीने पुत्र हतो नही माटे तेने पुत्रनी परे रा खीने महोटो को थने ते करानीमाताने चोर लोकोये जइ चंपानगरीमां कोई वेश्यानी पा से वेची तेथी ते वेश्यानो धंधो करवा लागी पनी थनुक्रमें ते बोकरो जेवारे महोटो थयो तेवारे एक दिवसें चपानगरीमा व्यापार करवाने थर्थे थाव्यो तिहा पोतानी माता जे वेश्यानो धंधो करे वे तेनी साथै थजाण पणे नोगनोगववा लाग्यो एक विवस तेनी कुलदेवी गाय वाबळानु रूप फरीने रस्तामा श्रावी ती एटलामा ते बोकरो पण वेश्याने घेर जाय ले तेणे रस्ताा वादळानां पूर्व कपर पगदीधो तेवारे वाढडो वोल्यो जूठ माताजी था महारा पूर्व उपर पग थापीने चाल्यो जाय वे पण रस्तो देखतो नथी तेवारें गाय वोली के हे वेटा' तु पर्नु नाम लश्श नही एतो पोतानी सगी माता साथें लोग करता पण कां मरतो नथी तो वली तादारू गं सांजलशे ? ए वात सांजली ठोकरो चमक्यो पढ़ी सर्वहकीगत कुलदेवीयें कही तेयी सांजलीने तापस थयो लोकोये तेनुं वेश्यायन शापि एतु नाम थाप्यं ते काडमां उघे मुखे लटकतो नीचे श्रमि कुम कनो तेमा तापे तेने तेजोलेश्या उपजी ने एवामां तिहाथी नगवान चाल्या जाय ले पठवाडे गोशालो पण चाल्यो जाय वे ते वखत वेश्यायन पोतानी जटाजूटमाथी जूळ निक लीने जमीन उपर पड़ी गयेली ले तेने उपाडीने पाली पोतानी जटामां मूके मे ते जोश्ने गोशालो वोल्यो श्ररें तुतो निष्केवल जुनोज घर हो के मुनिठो' एवु दास्यनु वचन त्रवार पोल्यो एटले वेश्यायनने कोध चज्यो तेवारे गोशाला उपर तेजोलेश्या मुकी ते जो जग वानने करुणा थावी तेवारे नगवाने तेने साहामी सीतलेश्या मूकी तेथी गोशालो बन्यो नही।

चित्र ४३ शासो भगवान् पश्यायन तापस HTHATA

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तपसीये पण नगवाननो प्रताप जाणी नगवाने खमाध्या पढ़ी गोशालायें नगवानने पूघु के तेजोलेश्या केम प्राप्त थाय तेनो उपाय बतावो तेवारें नगवान बोल्या के वेलानी तपस्या करे एटले करीने पारणे एक मुठी थरवना याकुला खाइने तेना उपर एक पसलीनर उष्ण पाणी पीये, सूर्य साहामो ऊनो रहे, एरीते ब मदीना सुधी करे तो मेवट तेजोलेश्या पुरुपर्ने उपजे थांदी केटलाएक कहे ने सिक्षार्थ ष्यतरे ए विधि कह्यो ने गोशाले पण ए सामान्य विधि धारण करी लीयो । हवे जगवान कूर्ममामथी सिद्धार्थपुरेश्रावतां रस्तामा पूर्वे कहेल्नु तलना माउने उगेलुं घनरूप देखी तेने गोशालें विवायु तेमा सातपुज तज दीठा तेवारे सर्व सत्य मानीने गोशाले विचाणु जे थवा वालु होय ते जरुर थाय एवीरीतें मानीजश्ने दृढनिश्चय वादी पयो ए मत निरधार करी लीधो तेवार पदी गोशालो नगवानथी जूदो रह्यो अने सा वजीनगरीयें थावी तेजोलेश्या साधि तेपण सि यश, तथा दिशाचरोनी पासेथी थष्टांग नि मित्त शीख्यो ते जिन नही एटले तीर्थकर नहतो तोपण लोकोने कहे तु तीर्थकर दूं एवीरीतें तीर्थकर नाम धरावतो पोतानी सिकाइ लोकोनीपागल देखाउतो थको नगवानथी न्यारोसा वधी नगरीयें फरे ने ॥ एवामा नगवान पण विचरता विचरता वशमुं चोमासु सावली नग रीये श्राधीने रह्या श्रने तिहां अनेक प्रकारां तप कसां ए दशम चोमासु जाणवु ॥ १० ॥ हवे नगवान चोमासु पुरुं कसा पठी विचित्र त विधरता थका ॥ सक्तंच ॥ दृढनूमि बहु मिधा, पेढाल्नु जाणमागयो नयव ॥ पोलास चेश्यमि, ठिएगरायं महापरिमं ॥१॥ स कोश्य देवराया, सजाग नए हरिसीउ वयर्ण ॥ तिन्निविलोग समझा, जिगवीर मरा चले उजे ॥ २ ॥ सामाणिय संगमन, देवो सकस्ससो श्रमरिसेण ॥ थदाग तुरंतो, मि

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(चित्र४३ भगवानने देसमा उपसर्ग फरेसे या M विहिपडिनिविणे ॥२॥ ॥ इवे जगवान दृढ एटले कठणमिने विपे वगुम्लेष्ठ जिहाँ वसे वे एवा म्लेष्ठना देशर्मा गया तिहां नगवानने कुतरा प्रमुखें करच्या बे एवा वीजा पण थनेक प्रकारना कपण उपसर्ग थया ने ते सर्व सहन कस्या पड़ी एकदिवस नगवान पेढाल नामा ग्रामना उद्यानमा पोलास नामा कोशएक देवनो चैत्य बे तेने विपे थम्मत सहित एक रात्रि महाप्रतिमायें रह्या ठे एवामां शर्के देवताउनो राजा ते पोतानी सनाने विपे रह्यो थको नगवानना धीरपणानी प्रशसा करे बे के जो त्रलोक जेगा थाय तोपण श्रीवीरप्रनुने चलाववाने समर्थ थाय नही एवं प्रधनुं सत्व डे एवु महाराजनु वचन सर्व देवतायें सत्य करी मान्युं परंतु एक संगम नामे सामानिक देव मिय्यादृष्टि थनव्यजातिनो ने तेणे यमर्प थाणीने विचार्यु जे मनुष्यने चजावतुं मगावतु एका महोटी वात नथी एवं चिं तवी माहाराज पासें घोल्यो के हूँ एक क्षणवारमा चलावी थावु एवं कही इश्नां वचन यणमानतो थको घलाववानी प्रतिज्ञा करीने तुरत प्रनु पासे श्राप्यो तेणे थावीने एक रात्रिमा महोटा वीश उपसर्ग प्रनुने कसा तिहा प्रथमतो धूल उडावी धूजनो वरसाद क रीने प्रजुना श्वासोश्वास संध्या, पढ़ी बीजो वजना जेवां मुखवाली कीडीयो विकू:ने प्र जुना शरीरनें चुटाव्युं करडाव्युं चालणी जेवू शरीर कसु, पनी त्रीज वजना जेवा मुखवाला मांस मष्ठर विकूर्वीने प्रजुना शरीरने करडाप्यु, चोथु घीमेल कीडीयो बनावीने चुटाव्यु, पांचम वांठी यनावीने शरीरने करडाव्यु, बतु सर्पना रूप करीने मसायु, सातमु नोजी यानां रूपवनावीने मुख थने नखथी शरीरने विदारण कराव्यु, थाम्मु उंदरोना रूप बनावीने शरीरने करहायुं, नवमु हाथी श्रने हाथीउना रूप करीने गुंढथी उँचा उठाल्या, दशम वांत यने पगयी शरीर मन एटाने शरीरने कचराव्यु, श्रगीथारमु पिशाचोना रूप वनावीने अट हास्य करी धीवराव्या, वारसुं सिहनु रूप करी नख माया, शरीर फाडयुं, तेरमु सिदार्थ पिता तथा जिगना माताना रूप करीने विलाप करतो वोल्पो के दे पुत्र' श्रमे तादारां माता पिता याय्यां नेये माटे तु उख देखीशमां थमारी साथे श्राव थमे तुने सुख करी थापी, चौदमु तीदण चार वाला पंखीना रूप विकूर्वीने प्रजुना कान श्रने मुखनु मांस खवराव्यु, पन्नरमु चौमालना रूप करीने तर्कना करी, सोलमु लाकडा खंधा घाली करीने वेनु पग म पर दामी चडावी उपर वीर रांधी, श्रमियी पाल्या सत्तरमु प्रचंम वायरे करी नगवतने छया उनालीने पाठा नीचे जमीन उपर पटकी दीधा, श्रढारमु कलिकाल वायरो विकूर्वीने जे वायरो नगवानने चक्रनी पेरे नमाडे तेरीतें नमाच्या, ते पनी उंगणीशमु दजार जार प्रमाण लोखमनो गोलो पनावीने नगवानना मस्तक उपर नारख्यो तेणे करी नगवान केडसुधी केट निक प्रतोमा दींचण सुधी जमिमाहे पेसी गया ए उपसर्गथी जो धीजो कोई गमे तेवो बलवान होय तो पण चूरण य जाय पण एतो तीर्थकरनें शरीर वे तेने कांय पण थयुं नही, वीशमु रातनी वस्वतें विवस करी देखाच्यो भने सगमो वोठ्यो के हे वेवार्य । प्रनात थर्पु माटे दवे विहार करो, गोचरी जाउ ते वखत नगवाने थवधिझाने करी रात्रि जाणीने विचायु जे ए देवरूत चरित ने रजी सगमाये देवतानी शदि देखाही देवांगनानां रूप करी दाव नाव दे साडी थनुकूल उपसर्ग कनाथने वली वोल्यो के तमोने जोश्ये ते वर मागो जो स्वर्ग मागो तो स्वर्ग थापु एवं कर्पु तो पण को रीतें जगवान जगारमात्र मग्या नही चलायमान यया नदी एम महाविकट एवा वीश उपसर्ग एक गतिमा संगमे कमा पठी जेवारे नगवान - गाममां गोचरी करवा जाय तेवारे ते घरनो थाहार थाम करी थापे जे जगवानने लेवो कक्पे नही एवो करी नाखे तथा दरदमेश गाममाथी चोरी करीने ते चीज जगवान धागज मूकी जाय तेथी लोक नगवानने मार थापे कलंक घडावे वली जगवाननो चेलो वनीने गामा कोकोइ लोकोनां लिए जोवा जाय जेवारें लोक पूढे के तु शावास्ते थांही थाहोथ वलु जोयां करे ने तेवारे तेने फहेके महारो गुरु रात्रिये चोरी करवा श्रावशे ते माटे ई थाग जयी जोइ राखु बु ते सांजली लोक थावीने जगवाननें मार थापे एवो उपसर्ग थयेलो जो इने नगवाने थनिग्रह करसो के जिहासंधी या उपसर्ग मने थाय बे तिहांसुधी मदारे थाहार पाणी लेवू नही वजी ते संगमो केटलिएक गामनी स्त्रीयो नगवान साथै मलती जे एवं लोक माने तेवु करी देखाडे तेवू बता पण तिहां जगवान एकांत स्थाने रह्या एवा ब मदीनासुधी उपसर्ग कसा तो पण महाराजे तेने उपसर्ग करताने वास्यो नदी केमके महाराज एबु विचायु जे एनें वारीश तो ए कद्देशे के छ तो नगवतने चलायमान करत पण यं करूं के तमे मने वर्जना करी तेथी लाचार थयो एवो थपवाद टालवा सारु ३ तेने कश्पण कसु नही तोपरा जिहांसुधी एणे सपश्व कस्या तिहांसुधी ६ श्वास लीयो नही, मनमा घणोज नवास रह्यो, बीजां पण सर्व देव देवीयो शोका निस्तेज थकां वेशी रह्यो एम करता व मदीनानी अते ते संगमो देवता पोतानी मेप्ले पोतेज दार खाने बोल्यो के दे थार्य तमे सुखेथी गोचरी करो दु दवे बिलकुल उपसर्ग करीश नदी तेवारें लगवाने कथु हु मदारी श्वायें गोचरी जश्श एवी रीतें दारीने संगमो स्वर्गमा गयो, इश्महाराज तेर्नु मुख पण जोयुं नही लाकडीयोथी कुटावी मार मराष्योनें स्वर्गमाथी काहाडी मूक्यो, ते ति यने पगयी शरीर मन एटले शरीरने कचराव्यु, अगीथारमु पिशाचोनां रूप वनावीने थष्ट दास्य करी वीवराव्या, यारमु सिहनु रूप करी नख मास्या, शरीर फाडघु, तेर# सिक्षार्थ पिता तथा त्रिशला मातानां रूप करीने विलाप करतो वोल्यो के हे पुत्र श्रमे ताहारां माता पिता थाष्या ठेये माटे तु सुख देखीशमा थमारी साथे श्राव थमे तुने सुख करी थापी, चौदमुं तीक्ष्ण चांच वाला पंखीनां रूप विकूर्वीने प्रचना कान श्रने मुखर्नु मांस खवराव्यु, पन्नरमुं चझिालना रूप करीने तर्कना करी, सोल, लाकडा खंधा वाली करीने वेढ्नु पग न पर हामी चढावी उपर खीर रांधी, अग्निथी वाल्या सत्तर# प्रचंम वायरे करी जगवतने छंचा उठालीने पाठ नीचे जमीन उपर पटकी दीधा, अढारमुं कलिकाल वायरो विकूर्वीने जे वायरो भगवानने चकनी पेरे माडे तेरीतें नमाज्या, ते पनी उंगणीशU हजार नार प्रमाण लोखमनो गोलो वनावीने नगवानना मस्तक उपर नाल्यो तेणे करी नगवान केडमुधी केट निक प्रतोमां दींचण सुधी जमिमांदे पेसी गया ए उपसर्गथी जो वीजो कोई गमे तेवो बलवान होय तो पण चूरण थइ जाय पण एतो तीर्थकरन शरीर तेने कांई पण ययुं नही, वीशमु रातनी वखतें दिवस करी देखायो थने सगमो पोस्यो के हे देवार्य । प्रनात थयुं माटे हवे विदार करो, गोचरी जाते वस्वत नगवाने अवधिज्ञाने करी रात्रि जाणीने विचास्यु जे ए देवरुत चरित्र वली संगमाये देवतानी शदि देखाही देवांगनाना रूप करी हाव नाव वे खाडी अनुकूल उपसर्ग कसा अने वली बोल्यो के तमोने जोश्ये ते वर मागो जो स्वर्ग मागो तो स्वर्ग श्राप एवं का तो पण को रीतें नगवान लगारमात्र मम्या नदी चलायमान थया नही एम महाविकट एवा वीश छपसर्ग एक रात्रिमा संगमे कमा पढी जेवारे नगवान WA (चित्र भगवान् पूरा शेठन पर भेसो नाउन दांयी निकलीने पोतानी देवांगना साथै लश्ने मेरुपर्वतनी चूलिकायें यावी रह्यो, एनु एक सागरोपम, थायुष्य , थने ए थनष्यजीवनी जाति के एवं कदेवाय एम प्रचुनें वशमा वर्पने विपे घणा उपसर्ग थया पठी प्रायें उमासी तपनु पारण बजगाममा गोपालकनें घरे खीरना नोजने कर्तृ घणी प्रतोमा गोकुलने विपे वत्सपालीनामें वृक्ष स्त्रीय परमाने पारम् कराव्यु कयुं ने तिहां पांच दिव्य प्रगट थयां वली चोस इंशदिकोयें तथा वेवोये थावीने प्रजुने सुखशाता पूर्वी सावठी नगरीयें शर्के प्रतिमामा प्रवेश करीने प्रजुने वाया लोकोये देखीने नगवाननो मदिमा करो ॥ हवे धगीथारk घोमासु नगवाने विशाला नगरीमा कसु, तिहां जीर्णोठे नावना नावी के जगवान जातपाणीनो लान देजो एवीरीते चार मदीना पर्यंत नावना नावी तोपण मिथ्यात्वी पूरणशेठें वासीने दाणे घडवना वाकुला थाप्या ते जश्ने जगवाने तेने घेर पारण कस्नु तिहा पंचविष्य प्रगट थयां तेवारें लोक सर्व पूरणशेठने धन्य ते धन्य ने एम कठेवा लाम्या अने जीर्णशेनें जाप्यं जे हु जाग्यहीण तेथी महारे एवो योग किहांथी मले, एम पचताप करतो रह्यो पनी केटप्लेक दिवसे केवली नग वान ते गाममां पधारमा तेबारें राजा प्रमुखें पूघु के महारा नगरमा जाग्यशाली कोण ? केवलीबोल्या के जीर्णशेठ लाग्यशाली दे राजायें पुघु नगवानने दानतो पूरणरोवें वीव केवली योल्या एणे नावविना दान दी माटे तेने इष्यथी लान थयो ने थने जीर्णशेठे नावथी दान दीधु ने माटे घारमो देवलोकनुं थायुष्य घायु वे ए थम्यारमु चोमासु कयुं ॥ ॥ ११॥ हवे जगवान तिहाथी विहार करीने सुसमारपुरे प्रतिमास्थित कास्सग्गै रह्या तेव स्वतें चमरेन सौधर्म वेवलोके जावू थर्यु ले थने ते चमरेई प्रछनु शरण लीधु ने ए अधिकार चित्र४४ भगवान् पूरण सेवन पर मेसो all नोन पर

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थागत दश थरानी वातमा सविस्तर श्राव। गया ब माट याहा जण्या तपार पबी अनुक्रमें धवनवालायें प्रचने पदिलान्या ने एटले जगवतें कांक कर्म शेष रह्या जाणी कोश वीनगरीने विपे पोप वदि एकमना दिवसें पोतानी श्वाथी एवो थनियद कीधो के के १ इव्य थीतो सूपडाना खूणामां थडदना वाकला राखेला दोय, २ क्षेत्रथी एक पग घरनी मेलीनी मांदेली कोरे दोय अने एक पग मेलीनी बाहेर रह्यो होय २ कालथी सर्व निलुक जोक निदा मागी जाय ते पनी नावथी राजानी पुत्रीहोय परंतु दासपणुं पामेली होय, ५ माधु मुमेनु होय, ६ जेनां पगर्मा वेडीयो पडेली दोय, थम्म तपक दोय ते वली रुवन करती येती होय एवी स्त्री जो वे पोहोर दिवस चडे मध्यान्द पनी निदा थापे तो मदारे पारण क खं एवो अनिमद करीने श्रीवीरनगवान् गोचरिये नित्य 'भ्रमण करे पण क्याय एवो योग बने नही त्या राजाना मत्रीश्वर प्रमुखें अनेक उपाय कस्या पण कोरीतें प्रजुनो श्रनिग्रह पूर्ण थाय नदी एवा अवसरा चपानगरीनो दधिवादन नामें राजा तेनी धारणी नामा स्वीनी व सुमतिनामा पुत्री के तेनुं अपर नाम चदनवाला बे दवे कोशबी नगरीनो सतानिक नामें राजा वे तेणें राज्यविरोघे लशकर ले। चपानगरीने छूटी तेवारे वधिवादन राजा नाशी गयो थने धारणी राणी तथा चदना ए वे को एक सतानिक राजानो पायवल सेवक हतो तेना हाथमा थावी तेणे धारणीने कयुं के तने 8 महारी स्त्री करीश ते सांजली धारणी राणी तो पोतानी जीन चांपीने मरण पामी पड़ी मुनटें विधास्तु जे रखेने था बोकरी पण मरी जाय एवु जाणी तेने विश्वास श्रापीने कोरावी नगरीना चोवटा मांहे ते चवनबालाने वेचवा गयो तेने वेश्या सेवा थावी तेवारे चंदनायें प्रधु तमारो शो थाचार में वेश्या बोली उत्तम पुरुष साथे प्रीति करवी ना मन मान्यां नोजन करवा, एथमारो थाचार ले तेवारें चंदना बोली एम दाराथीन थाय तथापि ते वेश्यायें वलात्कारें खेवा मामी तेवारे शासन देवीयें वेश्याना कान थने नाक वेदी नाल्यां वेश्या नाशी गइपली धनावदनामे शेत जिनधर्मी इतो तेणे मूल थापी चंदनाने वेचाती लपोताने घेर तेडीथाष्यो थने चंदना एवं नाम थापी पुत्री पणे थापी, पण चदनानुंसु रूप देखी धनावदोउनी मूलानामा वाजणी कुहाड स्त्री ले ते मनमा क्षेप राखवा लागी के रखेने ए माहारी शोक थाय' तेमाटे प्रथमचीज का उपाय करु तो सारु पनी एक दिवस शेतना पग पखालतां चंदनाना माथानी वेणी धरतीय पडी तेने शेने उपाडी उंचीफरी ते पेहेली उराचार मूला स्त्रीय दीवी थने मनमा चितववा लागी जे शेव एनी वेषीय मोटो देखाय के मुखथी तो पुत्री कदे ने पण एने स्त्री करी राखशे एमां सवेद नथी केमके हुँ दवे बुढी यश् बुथने ए स्वरूप वती से पनी एक दिवसें शेत कोशएक गामें गया पनवाडे मूजायें चंदनानु मस्तक मूमावी दाथ पगमा वेडी घाली धूसार्नु वस्त्र पहेरावीने बाणा प्रमुखना रडामा वेसाडी पोते परने वारणे तालु थापी पोताने पीयरेंजती रही दवे चदना तो उरडामा वेठी नवकार गणे पोताना करेला कर्मने निवे वे एम करता चोथे दिवसें शेव फरी पोताने घेर थाव्यो तिहां चंदनवालाने दीही नही, तेवारे पडोसी लोकने पूजवा लाग्यो पण पहेली कजीयाखोर मूलानी घीकथी कोई जवाब थापे नदी पठी एक मोकरीयें सर्व वात कही तेवारें शे तालु उपाही र डामाथी बाहेर काहाडी मेलीमां वेसाडीने कसुं के लोहारने धोलावी लावु नु ते ताहारी वेडीयो अघाडशे चंदनायें कयुं हूँ नूखें मरु तेवारें शे यहवना वाकना एक सूपडाने खुणे नाखी पवनाने थाणी याप्या अने कप के सुप्रण दियसनी नखी दो से या बाकरता स्वाजे

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चित्र ४५ राना भगानक Tara 16 फाहावा सार लाहारन तड। थातु ड एम कह। चदनान पूवाला यवस्था सहित उपरे बेसाडी पोते तोहारने तेडवा गयो पबवारे शुक्सम्यक्त्वनी धरनारी चदना सती चिंतवे वे जे कोइ थतिथि श्रावे तो तेने ए वोहारावी थापु एवामा मध्यान्द वीत्या पडी प्रनु पधा सा तेने देखी चंदनवाला दर्पवत थइ थकी बाकजा देवा लागी परतु प्रायें लीघेला थनिय हना चार नेद तो मलता वीग पण पांचमु रुवन वीतुं नहीं तेथी पाबा वल्या तेवारें चदना 5 व धरती थकी रुक्न करवा लागी जे साधु पण महारा हाथनो थाहार लेता नथी माटे मने थि कार से पनी जगवते रुवन करती देखी पोतानो सपूर्ण अनियद थयो जाणी ते थ उवना पाकला लीधा तिहां देवतायें पंचदिव्य प्रगट करनां वेडी नांगीने नेउर थया मस्तकें वेणी पाठी थावी महाराज थाष्या, चंदनानी मातानी बहेन मृगावती ते चवनानी मासी थाय तेना सबधथी संतानिकनामे राजा धन लेवा लाम्यो तेने थे वास्यो भने कसुं के पद नाने दीक्षा लेवानी वखते ए धन काममा थावशे, चंदनायें कमु ए धन धनावद शेग्नें साधीन करो तेने थापीने योज्यो जगवाननी प्रथम साधवी ए चवना थाशे एम कही यश स्वस्थानके गयो थाहीथा पांचदिवसें तणा उम्मासी तपर्नु प्रजुने पारण थयु वली कोश्क प्रतमा एम कहुं के वसुधारानी वृष्टि थापणे घरे थइ एवं सनिलीने मूला पोताना पिय रथी उटति उटति कसति कांचनीने जेम तेम बांधती तिहां श्रावी पठी मदोटो जोलो वाल ती उतावलमा खोला नरीने धन उपाडवा मामयुं ते उपाइता थनिज्वाला ठठी वस्त्र सर्व बली नस्म थया श्याम वदन थइ थकी जाती वी तेने देवतायें तर्कना करी का के ए व्य चदनवालानु के चंदनायें ते धन शेउने थाप्यं शे ते सर्व धन चदनानी दीक्षाना म होत्सवें स्वरच्र्यु ले पठी नगवान पएमाजिलिका गामे कायोत्सर्गे रह्या तेवारे इश्महाराज वा दवा थाव्या थने वोल्या के दे नगवान श्रापने थाटला दिवस पनी अमुक दाहाडे केवलज्ञान उपजशे एवं कहीने गया हवे प्रनु विचरता थनुक्रमें चंपा नगरीयें स्वातिदत्त ब्राह्मणनी शा लायें पारमु चोमासुं रह्या ए वारमु चोमासु ॥१२॥ ॥ पनी तिहाथी पारण करीने जग वान विचारता परमानिक गामें भावी वाहेर म्यानमां कास्सग्गे रह्या ॥ ते श्रवसरमा नग वतना कानमा गोवालियें खीला ठोक्या ते उपसर्ग कहे जे प्रचुयें प्रिप्टष्ट वासुदेवने नवें शय्या पालकना कानमा तरु उष्ण करी नखाव्युं हतु ते कर्म यहीथा प्रजुने उदये थाप्युं, ते शय्या पालक थनेक जवनमण करी दमणां गोपालक थयो , तेथी ते वैरने लीधे तेणे गोवालीये प्रजुने बलद नलाव्या पोते गाममा गयो त्यांथी पाडो थाव्यो तेवारें बलद न दीपा, पनी वनद जोवा सारु चार प्रहर रात्रि जम्यो प्रनातें थायो तो नगवत पासे बजद वेठा दीग, ते वखत ते गोवालीयाने पूर्वनवना वैरथी क्षेप सपन्यो तेथी जगवतना कानमा स्वीला वेसाख्या, जेम को देखे नहीं कोश्ने खवर पडे नही तेवीरीतें वारेरथी कापीने सरखा करीदीधा ते खीला जेना तीर थाय ठे एवा शरकट वृक्ष्ना श्रम कापीने कानमा गोक्या तेथी नगवतने मदावेदना प्राप्त थइ तेनायोगें थत्यंत रुश थगया पठी नगवत तिदन्थी विहार करता मध्यम थपापायें सिदार्थ वणिकने घेर गोचरीयें पधामा तिहां खरक वैद्य धेगे दतो तेणे मार्गानुसारें प्रजुने सशल्य दीना ते वारें शेठने कहेवा लाग्यो के नगवाननें व्यथा ठे.शेठे काएं तो ए व्यथा मटावी थापवानोलान तमे का जेता नयो ? पठी शेत धन वैद्य वेगु प्रजुनी पळवाडे गया तिहां वैये विचार करी ये साणसा लश्ये दोनी वचे वृक्षोनी मालीयो रेसमयी बांधी कान मारती वीनी मामा गफरीने चित्र४६ गायो भगवान् रवीक्षाकनार गोवाप्तीयो

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चित्र ४७) सिक्षा शेठ (मोपधाभो भगवान् रेसमनी वोरीयोथी ये पायें वे वृक्षोनी मालोमां बांध्यां पड़ी ते बेड मालीयो एफज वस्वतें साथैन ढोडी तेथी वेगु काननां स्वीला तरत सार्थेज नीकली श्राव्या एम बुदिना प्रपंचें करी खी लातो काहाच्या पण तेवखते प्रजुने वेदना एटली थइ के ते वेदनाना योगथी दांकमारी अर राट मूल्यो वनमा घोराकार शद थपु तेथी पर्वत फाटी पख्या ते पर्वत दालमा वनणवाड गामनी पासें वे त्यां वनणवाड तीर्थ थयो प्रष्ठ मूपिामी धरतीय पख्या तेने वे पुरुषे व पाही वेसाच्या एम लोको कहे जे परतु तीर्थकरने एवं सजवे नदी ते उपरथी अनुमान क रीयें यें के कायाना व्यापारथी हांक थदशे पण जावथी थयेली जणाती नयी “श्रनत वलित्वात्” ए वचन उपरथी निरधार थाय ने पबी कानोनी उपर व्रणसरोहिणी थोपधील गावी तेथी ते घाव मजी गयो समाधि थइ ते शेव अने वैद्य वेन मरण पामी देवलोकें गया, गोवाजीयो मरी सातमी नरके गयो ए रीते नगवानने ए बदेलो महोटो उपसर्ग गोवालीये कसो हवे जगवानने जघन्य, मध्यम थने सत्कष्ठ एवा प्रण प्रकारना अपसर्ग थया तेमां कया कया जातिना उपसर्गमा मदोटामा महोटो उपसर्ग कयो कयो थयो ते कदी देखाडे के प्रथम जपन्य उपसर्गोमा तो शीत परीसदनो महोटो उपसर्ग व्यंतरीय करो तथा मध्यम उपसगर्गो मांहे सगम देवतायें महोटो उपसर्गकसो, अने सत्कृष्ट उपसर्गोमांहे महोटो उपसर्ग कानमा खीला गेकाणा तथा खीला कादयानो थयो ए रीतें नगवाने बारवर्ष सुधी काया वोसरावी जेम कोइ पुरुप गाय वोदोवाने से तेवे वासने प्रनु वेता पण कोइ दिवसें घरतीये बेता नदी। तेमा मात्र ये घड़ी शूलपाणि यदने देहेरे निशा करी बाकी सर्वकालनिषा विनानु गर्यु एम श्रीवीरपहनें घणा उपसर्ग सहन करवा पच्या अने श्रीकृषनदेव तीर्थकरने एक वर्ष सुधी निदा मनी नदी एटलो उपसर्ग थयो तथा मध्यम वावीश तीर्थकरने स्वम्प उपसर्ग यया ॥ दवे नगवान जेवारे वागार एटले घर तेणे करी रदित एवा थणगार थया तेवारे एक चाल गनी समिति एटले जोश्ने चाले, पीजी नापा समिति एटले विचारीने वोले, त्रीजी एपणा समिति एटले दोप रहित थाहार लीये, चोथी थावाण नममत्त निरकेवणा समिति ए टने नाम मात्रां प्रमुखने जोइने जयणायें ग्रहण करे तथा जयणाये मूके, पांचमी उच्चार प्र प्रवण खेलजस सिंघाणपारिष्टापनिका समिति एटले ग्लो, मात्रो, खंखार घने सेमो ए सर्व निर्जीवस्थानकें परत्वे ए पांच समितियें समता होता हवा पण श्रीतीर्थकरनो थाहार निदार कोश्ना दीनामा थावे नदी, कोश्ना जाणवामांथावे नही, खेल, नाकमल, खंखार, होयज नही केमके एने रोगनो थनाव ठेवली जगवान मन, वचन थने कायाने कुकर्ममां न चलावता दवा मन वचन कायाने जलीरीतें व ववाथी प्रण समिति सहित थया ॥ वली नगवान म नगुप्ति, वचनगुप्ति थने कायगुप्ति ए त्रण गुप्तियें गुप्ता होतादवा, वली नगवान इक्ष्यिोने गो पची नववाह सहित शील राखता दवा, वजी कोष मान माया थने लोनरहित, घणाजशी तल स्वनाववाला, जेमने क्रोधादिक उपशांत थ गया ले एवा , वत्ती जेरो पापने रोधि मू फ्या ने, निराश्रव यया ने, ममत्त्वरहित, धनरहित, ग्रथरदित होवाथी निर्मथ थया दे जेम कांतानो पात्रने पाणी लागे नही तेम नगवान पण निर्लेप स्नेद रहित ,जेम शखने रंग लागे नदी तेवा निरंजन वे तथा कोइ उपर राग नदी क्षेप नदी माटे रागक्षेप रदित, जेमजीवनी गति क्याय रोकाती नथी तेम नगवानने फ्यायजातां गति दणाती एटले नगवानने विदार करवामा को रोकी शके नही,थाकाश जेम निराव ने तेम नगवान पण कोश्नो आधार राखता नथी, वायरानी पेरें थप्रतिबद विहार करें, शरदरुतुना में समान जेनु हृदय निर्मल डे कमलना पत्रनी पेरें निलेप जाणवा, काचधानी पेरें इश्यिोने गोपवी राख्यां , वली खमगी नामनु जानवर थाय ने तेना शिगडानी पेरें एकलाज , पंखी जेम पोतानी पासे काय पण परि ग्रद राखे नही तेम नगवान पण पोतानीपासे कांई पण परिग्रह राखे नही, नारमपंखीनी पेरे थप्रमत्त, दस्तिनी पेरे कर्मरूप शत्रुउँने मथन करवामां महापराक्रमवत, वृषननी पेरे संयमरूप नार निर्वाद करवाने सामर्थ्यवान, सिदनी पेरें परिसद जीतवामा कुदर, मेरुनी पेरे थचल थकंप चलायमान थाय नही एवाडे, समुनी पेरेगनीर , चश्मानी पेरे सौम्पले श्यावत , वली सूर्यनीपेरे दीपतुं तेज जेनु, तपाव्या कुंवनना सोना सरखा जातरूप बे, पृथ्वीनी पेरें सर्व फरस सदन करनार , घृते दोमेला अमि सरखा तेजे करी जाज्वल्यमान , तेथी नगवानने क्यांये प्रतिवध नथी, दवे जेनो प्रतिबंध नथी ते प्रतिवध चार प्रकारनो ने ते कहे प्रथम दृष्ययकी प्रतिबंध प्रण प्रकारनो ने तेमा एकतो मातापिता पुत्रादिक ते व्य यकी सचित्त प्रतियध जाणवो पीजो घरेणा प्रमुखनो प्रतिषध ते व्यथी बचेत प्रतिवध जाण वो, त्रीजो शणगार करेली स्त्री प्रमुखनो प्रतिबध ते मिश्रप्रतिबंध जाणवो एरीतें इध्ययकी त्रणे प्रकारनो प्रतिबंध जेने नथी माटे ममत्व रदित वत्ती बीजो खेत्रथकी प्रतिबध ते गाम, निगर, उहाड, खेत्र,खजा, घर, घरना थांगणं,थाकाश इत्यादिक कोश्नी उपर महारा पणु नथी माटे प्रतिवध नथी,त्रीजो कालथी प्रतिबंध ते समयने विपे, थावलिका, श्वासोश्वास, सातवा सोझासें एक स्तोक, क्षण, सातस्तोफनो एक लव, वे घडी मुहूर्त, त्रीशमूहूर्ते एक यहोरात्रि, पन्नर अहोरात्रीयें एक पक्ष, ये पदें एक मास, वे मासे एक कतु, त्रण ऋतुर्नु एक अयन, ये थय ननु एक वर्प, पाच वर्पनो एक संवत्सर, इत्याविक वीजा पण दीर्घ कालने विपे कोई वखत था अमुक काम दु करीश एवो प्रतिषध नथी तथा चोथो नावथी प्रतिवध ते क्रोध, मान,माया, लोन, नय, हास्य, राग, क्षेप, वचन युद, खोटु कोश्ने कलंक थापवु, चुगली करवी, परना वोप प्रगट करी कडेवा, थरति क्षेप, रति प्रीति, कपटथी वोलवं, मिथ्यात्वराज्य ॥ प्रथाग्रंथ ॥ ६ ॥ ए काम करे तो नावी प्रतिषध को कद्देवाय ते मांहेलो ए जगवानने विपे कांई पण नथी ॥११७॥ ॥ वली ते जगवतें वविना कालविना शेष नाला थने शीयालाना था महीनामा गामने विपे एक रात्रि थने नगरने विपे पाच रात्रि लगण रहेतु एवो विदार कमो एवा यका विचरे तथा जेम कुदाडो चदनने कापीनाखे पण चवनतो उलटो कुदा डानी धारने सुगधज थापे थने जे नही दे तेने पण सुगध थापे ने तेम नगवानने को वासाने वेदे को चदने खेपे ते वेडुनी उपर समान सरखु मन जेनुं वजी तृण थने मणी तथा पाणो थने सोनुं ए वेतु समान जेने, ख बने सुख वेड समान जेने, श्दजोक थने परलोकनी गरज नथी जेने, जीववा थने मरवानी वा नथी जेने, ससार समुश्थी पार थवा वाला, कर्म रूप शत्रुनें मारवाने उजमाल थया एवा थका विचरे ने ॥ ११ ॥ ॥ ने नगवानना उलट ज्ञान वर्शन थने चारित्र ,यादि रहित स्थान विदार पराकम श्रार्जव मार्दव थप उपधी क्षमा निर्लोनता गुप्ति मनप्रसन्नता ए सर्व काम सस्कृष्ट ने साचो संयम तप फरवायी उपचय करेलुं फल निवार्णमार्ग तेने विपे थारमाने जावता थका विचरे एवीरीतें नगवाननें वारवप वीत्या ॥ दवे नगवाने पारवर्पमा जे कांई तप कर्पु तेनी संख्या तथा पारणा करना तेनी सख्या कहे वे एक संगम देवना उपसर्गमा मासी तप तेनुं पारण एक बाळ पांच दिवसें न्यून ब मासी तप तेनुं एक पारण, नव वस्वत चारमासी तप कहुं तेना नव पारणां, वे त्रिमासी तपना चे पारणां, ये बढीमासी तपनां वे पारणा, उ वोयमासी तपना व पारण, वे दोहोढमासी तपना वे पारणां, बार एकमासी तपना वार पारणां, व दोतेर थईमासी तपना पदोतेर पारणां, बसेने गणत्रीश बह तप करयां तेंनां बसेने आप प्रीश पारणां, ए वेलानी तपस्या करतां पन्नरमदीनाने थाठ दिवस तपस्यामां गया, नन तिमा विन थे, महान प्रतिमा दिन चार, सर्वतोनइ प्रतिमा विन वश, ए त्रण प्रतिमानां त्रण पारणां थने तपना दिवस सोल जाणवा तथा एक रात्रिकी प्रतिमा बार तेनां पारणां बार ए रीते सर्व तपना दिवसो मेलवां सरवाले बगीचार वर्ष उ मदीनाने पचीश दिवस एटला सर्व विवस निराहार पणे चनविदारा जाणवा एना यंत्रनी स्थापना नीचें करी तेमा बशेने उगणनीश बह करीबे तेना पारणा घशे गणत्रीश थर्या तेमाथी एक बन्नु पारणु केवली पो थयुं गणीने बाकी वशे श्रवीश पारणा लयां ले तथा वार एक रात्रिकी प्रतिमाने स्थानकें वार श्रम तप जखीने सरवाले ४१६५ दिवस चनविदारा तपना थया थने ३५० दिवस प्रथम पारणा सहित श्रादारना थया सर्वमली ४५१५ दिवस बनस्थपणे रह्या तेना एकवर्षमा ३६० दिवसनी संख्या करतांबार वर्षने साडा बमहीना थाय एरीते जग वाने नित्य जोजनतो रडं पण चोथ तप एटले एक उपवास करीने पण पारण कोई वस्वत कहुं नही थोडामा थोई तप कस्सु ते पण उध्वं एटले बेछपवास→ कमु ॥ यंत्र स्थापना ॥ हवे श्रीवीरचरित्रानुसारें बनस्थपणाना चोमासानी संख्या कहीयें .ये एक अस्थियामें, वीजु नालंदी पाहे, त्रीजु चपानगरीये, चोयुं प्रष्टचंपायें, पांचमुंजशिकायें, बहु पण नशिकायें, ठमासी पूरण ५ केटला एकदरदिव पारणानी सातमुं थालनिकायें, बावमुं राजगद्दी, तपना नाम कस्सा सनीसंख्या संख्या नवमु वजनूमी,वशमुं सावठियें,अगीथा रमु विशालायें, यारमु चपानगरीयें, एरीतें १७० बार चोमासा प्रजुना ययां ॥ दवे तेरमा पंरदिवसूण व मासी १ १७५ वर्षने विपें वर्तमान थका नालानो बीजो चारमासी १०७० महीनो, चोयुं पखवाड्युएटले वैशाखमंदि प्रणमासी ए १८० दशमने दिवसे पालो पोहोर विवस रहे यदीमासी १५० ५ पके सुव्रतनामा दिवसे विजयमुहूर्तमा जं वेमासी २६० ६ निक गामने वारेर उजुवालुका नदीना दोढमासी ए २ तीर सुपर वैयावर्तनामा चैत्यने घणु दूर एकमासी ३६० १२ नही तेम घणु ढकढे पण नही एवा स्था थर्धमासी श १००० ७२ नकें सामक नामे गाथापतिना खेत्रमा शा प्रतिमा, श्रममतप १५ लिवृक्षने नीचे नगवान गोह थासने एट वन्तप २३ए पन ५२७ ले गायने वोदोवा बेसीये तेवा यासने ठ नप्रतिमा १ कटावेसीथातापना लेता थका पाणी र महानश्प्रतिमा १ दित वेलानी तपस्यामा थात्माने जावता सर्वतोनप्रतिमा एवा स्वरूपें रह्या थका उत्तराफाल्गुनी सरवाले ४१६५ नपत्रमा चंमानो योग यावे थके तेथव BH १ १ AA DA सरें ध्यानमा वर्तमान अर्थात् शुक्लध्यान ध्यावता थफा नगवानने जे समान बीज को ज्ञान नथी एवो व्याघात रहित, यावरण एटले ढाकणा रहित, सर्व व्य पर्यायोने पदण करवा वालुं संपूर्ण पूर्णिमानां चश्नी पेरें केवल एंटले एकज पण पीजो को जेने सहाय नही एवं केवलज्ञान थने केवलदर्शन उत्पन्न थर्पु ॥१२॥ पनी नगवान श्रीमहावीरस्वामी श्रर्दन एटले पूजनीय थया, राग क्षेप रहित थया, केवजी थया, सर्व जाण थया,सर्वना देखवावाला थया, सर्व विव, मनुष्य, थसुर लोकना पर्यायोने जाणे देखे, सर्वलोक सर्वजीवोनी थागति, गति, नवांतरमा जावं,थायुप्य, देवलोकादिकोषी चवर्गा, देवलोकादिकोमा जश् उपजवं, ते जीवोने मन, मनमा चिंतवेते, अन्न प्रमुख खाय ते, चोरी प्रमुख करे ते, मैथुनादिक सेवे ते, प्रकटकर्म करे ते, बगर्नु कर्म करे करावे ते, इत्यादिक वातो मांदेली कोई एक पण वात जेनाथी बानी रहे नही एवा झानवान थया जेनी जघन्यथी पण एक कोड देवता सेवा करे एवा थया, ते कालमा मन वचन कायाना योगमा वर्तमान सर्वजीवोना सर्व नाव जाणता थका,देखता थका जगवान वि चरे ॥११॥ ॥दवे जगवानने केवलझान उत्पन्न थया पनी चोसन शेनां थासन चलाय मान थयां तेवारें घोश इइ दिक्षा महोत्सवनी पेरे केवलहाननो महोत्सव करवा श्राव्या ते महोत्सव करीने जांनिकागामनी बाहेर समोसरणनी रचना करी तिदा प्रप्नुयें रोकवार देशना थापी पण ते वेशना निष्फल ग कोश्य मात्र सामायिका विक व्रत पण ग्रहण करखां नदी तथा वेव सर्वे थवति ले तेणे नवकारशी प्रमुख पच्चस्काण पण कयु नदी, "श्वमपियामर्य" एटले ए पण थार्य जाणवु जे तीर्थकर जेवानी वेशना पण खाली गश्तेवारे जगवाने लाननो, अनाव जाणी थागल लान थवानो थवसर जागी तेज वखत तिदन्थी विदार कस्खो यतः कहेता नेमाटे कर्यु के ॥ श्लोक ॥ तत्रादिश्यरुणधर्म, वेवोद्योतेजगनुरु ॥ लानाजावान्मध्य मायाँ, मदीसेनवनेगमत् ॥१॥ ॥श्रर्थ-जिहां केवलझान सपन्युं तिहां नगवान जीत एटले तीर्थकरनो थाचार पासवा माटे एक क्षणमात्र धर्मदेशना थापीने देवोना उद्योतने विपे जग तना गुरु एवा वीरस्वामी लाननोधनाव जाणी तिदायी वार योजन मध्यम पावानगरी तेनो महसेन नामक वन तिहाथावता दवा एटले रात्रि विहार करवानीमर्याद नथीयने एमणे विहार कसो ते कल्पातीत पणु जणाववा माटे जे तीर्थकर याचरे ते कम्पमां दोय तथा कदापि नदी पण दोय परंतु उपस्थ साधु तो जे प्रमाणे तीर्थकरें कल्प कह्यो होय ते प्रमा रोज चाले पण जो तेथी विपरीत चाले तो प्रायश्चित्तने पामे वली रात्रिनो विहार ते जीवनी जयणाने थर्थे वो दे केमके रात्रि कोइ जीव जोवामा श्रावे नही माटे श्हां श्लोफा देवोयोत एवो पात कह्यो ते व्यवहार जणाष्यो अन्यथा तीर्थकरनें तो ज्ञान भयोत सदा सर्वदा वे वली वेवरचित कनककमल उपर पगला वेतां चाजे ने तेमाटे एमनु चालवु सदा रात्रि दिवस सरखं. वे पण एनु दृष्टांत थापीने जे साधु रात्रिये विहार करे ठे ते मुखशीलिया तीर्थकरनी थाझा बादिर डे माडे ते चारित्रयी भ्रष्ट जाणवा ॥ हवे नगवान मध्यमपावापुरीये श्राव्या तिहां शं थयु ते कहे जे जेवारें मध्यम पावापुरीयें वीर प्रनु पधाया तेवारं देवोये विशेप समवसरणनी रचना करी तिहां नगवत पूर्वने वारणे पेसी थशोकवृदने प्रण प्रदक्षिणा वे सिहासने वेसी “नमोतिवस्त” एम कदी धर्मोपदेश थापे यहां मगलाचार जणाववा माटे तीर्थ एवु सूत्रन नाम ले तेने नमस्कार करीने पनी धर्मोपदेश करे हवे एवामा तिदा एक सोमिल ग्रामण यकार्थि यह एटले होम करावे तिदा घणा ब्राह्मणो एकता थयेला ने वली तेना तेच्या थगीयार महा पंमित सर्वशिरोमणि ब्राह्मण याव्या ने यत ॥ थपापायर्या महापुर्या, यशार्थी सोमिलोधिज ॥ तवास्ता समा जग्मु, रेकादशधिजोत्तमा ॥१॥ ॥श्रर्थ:-थपापा नामनी महानगरी तेने विपे रहेनारो सोमिलतामर ब्राह्मण तेणें यज्ञकरवाने अर्थ बगीयार महोटा ब्राह्मण बोलाव्या ते तिहां थाव्या " तेषां नामानि " एटले तेना नाम कहे वे १ फनूति, अग्निनूति,३ वायुनूत्ति, ४ व्यक्त, ५ सुधर्म, ६ ममित, मौर्यपुत्र, थकंपित, ए श्रचलघ्राता, १० मेतार्य, ११ प्र जास ए बगीयारे महापंमित, चोदेविद्यानां जाण, वेदपाठी, महाशनिमानी ने ते एवु जाणे वे के अमारा जेवो जगतमां कोई पंमित नथी तेम सर्वच जे लोक कहे ते अमेज ये हवे ते थगीयारे जणना मनमा जे अगीयार ववालदा सवेद ते कहे जे ॥ पदेला श्नूतिना म नमां जीव बे के नथी एवो संवेद , बीजा अग्निनूतिना मनमा कर्मनो सदेह , जीजा वा पुतिना मना जीव थने कर्म जुदा ले के एक बे एवो सवेद , ए त्रपणे संवेद वाला प्रणे जण सहोदर एटप्ले सगा नाइने एमनुं गौतमगोत्र ने चोया व्यक्तना मना पंचनूतनो सवेद बे, पांचमां सुधर्मना मनमा जे जेदवो ते तेदवो एटले जे स्त्री होय ते मरीने बीजे नवे पण स्त्रीज थाय बने जे पुरुप होय ते मरीने पुरुपज थाय एवो सदेह, बा मंमितना मनमा बध मोदले के नथी एवो सदेह ,सातमा मोर्यपुत्रना मनमां देव डे के नयी एवो संवेद ,याउमा अकपितना मनमा नरक वे के नथी एवो सवेद , नवमा श्रचलनातना मना पुण्य पाप ठे के नथी एवो संवेद , वशमा मेतार्यना मनमा परलोक के नथी एवो सवेद , अगी धारमा प्रजासना मनमा मोद ले के नयी एवो संदेह एवा बगीयारे जगने वेदना थर्थ विपरीत समजवायी सदेह रदी गया ने पोतापासें पंमितानुं वल घणु ले माटे अजिमा नयी वीजानी वात चालवा देता नथी दवे एथगीदारनी पासें जे बात्र नरोजे तेनी सख्या कहे । गाथा ॥ पंचएई पंचसया, मुन्सयाश्मृति उनिगणा ॥ न तु सुथल सयाण, तिस तिस दवाहो ॥१॥ ॥थर्थ - पहेला पांच पंमितोनी पासें पाचपाचसो मत्र नणे ते पाचेना पचीशसो गगन थया तथा बम बने सातमा पासे छुन्सया एटले साहात्र बसें साहाम्रणसे ठात्र नऐ एम वेपना सातसे थया तेवारपनी वली वे युगल एटले थामो थने नवमो ए पहेलो युगत थने दशमो तथा श्रगीथारमो ए वीजो युगल मली चारजएनी पासे प्रणतो त्रासो ठात्र जणे ते चारना मनी पारसो यया एम सरवाले थगीधारेना मली चुमालीशसो गत्रोनो गठ एटले समुदाय थयो एटले धगीथारे पमितीने चुमाजीशसो विद्यार्थिव ते एम घणा विप्र तिहां यहां मल्या 2 ते सर्व यजन, जापन, अध्ययन, थध्या पन, दान, प्रतियह ए पट्कर्म साघे , प्रजातं ब्रह्म गायत्री जपे , मध्यान्हे विष्णुगायत्री जपे, संध्यायें शिवसरस्वती जपे , दवे एा प्रथम उपाध्यायना नाम कहे ने दाकर, शिवकर, इश्वर, महेश्वर, धनेश्वर, सोमेश्वर, शेनकर, सीमकर, क्षेमकर, करुणाकर इत्यादि हवे जानीनां नाम फहे गगाधर, गयाधर, विद्याधर, महीधर, श्रीधर, लक्ष्मीधर, धरणी, धर, नूधर, वामोदर, सुपोदर इत्यादि दवे ववेना नाम कहे महादवे, शिवदवे, रामदके, धामदवे, कामदवे, सदवे, दरदवे, वासुदवे, श्रीदवे, बलववे, धनदवे, चश्दवे हवे व्यासनां नाम कहे वे श्रीपतिव्यास, उमापति, गणपति, प्रजापति, विद्यापति, नूपति, महिपति, ल कमीपति, गगापति, पृथ्वीपति, देवपति, दानवपति, धनपति दवे पंमितोनां नाम कई ने चित्र) यज्ञशाया। पशासाना ग्रामा

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नागार्जुन पंमित, गोवर्धन, गुणवर्धन..विष्ण-कृष्ण मर्कच, गोविंद, थानव, परमानंद, 3 दव, माधव, केशव, पुरुषोत्तम, नरोत्तम दवे जोशीनां नाम कहे विमाश्तजोशी, नीमा इत, रामाश्त, प्रनास्त, गुणाश्त, विख्याश्त, सोमाश्त, धनाश्त, कर्माश्त, धाश्त, देवाश्त, चंशस्त, सूराश्त हवे त्रिवाडीनां नाम कहे जे हरिशर्म, अग्निशर्म, महाशर्म, देवशमे, नर शर्म, सोमशर्म, सूरमर्म, राजशर्म, वासशर्म, गुणशर्म, धर्मशर्म, कर्मशर्म, कुमारशर्म, धन शर्म, जयशर्म, नागशर्म, विष्णुशर्म, शिवशर्म हवे चतुर्वेदीनां नाम कहे जे दरि, दरिहर, नरहरि, नारायण, नीलकंठ, काजकत, वैकुंठ, श्रीकंठ, मुरारि, दरिराम, जगन्नाथ, विश्वनाथ, श्रीराम, रामकृष्ण, शुकदेव, वामदेव, चश्व, स्वयंन् हवे शुकलना नाम कहे वे कमला कर, दिवाकर, प्रनाकर, शकर, यशस्कर, शोनाकर, गुणाकर, रमाकर, श्यामदास, रामदास, गोकुलदास, कृष्णदास, देवीदास, दरवास, धारिकादास, इत्यादिक जुदीजुदी शाखानां नाम वाला ब्राह्मण ते देवलोकनां सुस्व पामवाना थर्थि थया थका यागकर्म करी रह्या ॥ एवा थवसरमा प्रोवीरस्वामी पूर्व सन्मुख घेता यका मिथ्यात्वकर्दम दूर करे एवी मेघसमान गं नीर ध्वनियें देशना थापे ते सांजलवा सारुं वैमानिक देवता श्राकाशें देवनि वजा डता यका थावे , ते निनो नाद सोनली सर्व ब्राह्मण वर्ष पाम्या श्रने चितववा जागा के थमारा यज्ञमत्र कहेवा के जे नवाथकी प्रत्यक्ष देवो थावी मना रहे एवा मन थमे दमणा नल्या जेथी देवो पण थाय्या एटलामां तो जेम चांमालनो पाडो वे गलो मूकीने माणस वीजे रस्ते चाले तेम ते देवो पण विप्रोनो याग ममप मूकीने पीवीरने समोसरणे जावा लागा वली ते देवो मांदो माहे एवं कदेता थका चाल्या जाय जे के जलवी उतावला जश् सर्वदेवने वांदीयें एवीदेवोना मुखनी वाणी सांजलीने इश्चति म नमा श्रमर्प लावीने बीजा ब्राह्मणोनी थागल कहेवा लागो के जूवो नाइ ए थापर्य जेवी वात जे के जे मनुष्यतो अजाण ने मूर्ख माटे नूले पण था देवो ज्ञानवान थश्ने पण नूले जे माटे ए थामय लागे ले के थावो महोटो यज्ञममप देखीने थाघा ते वली किहा जाय ठे वली महाराची उपरांत वीजो सर्वझ ते कोण के जेनी पासें ए जाय ' तेवारे ते ब्राह्म णमांची एक ब्राह्मण कहेवा लाग्यो के हे स्वामी । ए कोश्क महोटो ढोंगी जाती था नग रनी बाहेर याव्यो ने ते इंश्जाल काढीने पोते ज्ञानी थइवेगे ये वीजा लोकोने कहे के के हुँ पारका मननी वात वी जाए इं, एम घणा लोकोने नरमाव्या 2 तेथी देवता पण तिहा जोवा जाय बे एवं सांजनी श्शनूतिने अत्यंत मान सहित क्रोध चढयो तेवारे कहेवा लाग्यो के एवो कोण जे जे महारा उता हानीनु थनिमान धरीने हां थावे ते / मने जाणतो नधी' माटे जूठ जाइए वेवजे नूला ते एदेव पण एनां जेवाज थणसमजु दशे जेवो ए ज्ञानी तेवा ए देव पण जाणवा ॥ यत ॥श्रदोसुरा कथांत्या, तीर्थीश्वश्ववायसा ॥ कमलाकरव मका, मक्किाचंदनयथा ॥ ३॥ ॥थर्थ -थदो इति थार्य जे ए देव यश्ने भ्रांतियें करी जेम कागडा तीर्थप्रत्ये बोडी जाय ने तेम ए पण यज्ञ ठोडीने जाय ठे माटे ए देव का गडा सरखा , वली जेम वेडका समुह तजी जाय ते तेम ए पण समु जेवो यह सजीने जाय ते माटे वेडका जेद्दवा ए देव ने वली जेम मक्षिका चंदनने ठोडी जायतेम ए देव पण यज्ञरूप चंदनन जाय ॥ श्लोक ॥ करना च स करायथा ॥श के जेम छंट नला वृक्षोने बोटीने कांटाना वृक्ष पर जाय सेम ए वेवो पण यज्ञने गोडी चाल्या जाय , माटे उट जेवा , वली जेम वीरना नोजनने मूकीने नूम विष्टा उपर जाय तेम ए देवो पण यज्ञरूप क्षीर नोजन तेने मुकीने विष्टाना जोजन समान श्जालीया पासे जाय ते माटे जम जेवा ए देव ; वली जेम सूर्यना तेजने मूकीने घूड थधारामा जाय तेम यज्ञरूप सूर्यने मूकीने ए देव अधारारूप जालीया पासे जाय जे माटे चूड समान ए देवो रे ॥४॥ ॥अथवा वली एवी पण रीति के जे नूमो माणस दोय ते चूमा पासे जाय जे माटे कसं जे के ॥ गाथा ॥ श्रवा जारिसो चिय, सो नाणी तारिसा सुरावेति ॥ श्रणुसरिसो सजोगो, गाम नमाण च मुस्काए ॥१॥ ॥अर्थ- अथवा वली श्जूति घि तवे के जेदवो ए ज्ञानी ले तेवा ए देव ने तेथी ए वेगुनो सरखो संयोग मन्यो ने जेम मामनट मूर्ख वे तेम गामना लोक पण मूर्ख डे ए पेनो सरखो सयोग मजे ले तेम ए देवता जे जाय रे ते पण मूरख ने अने जे ए ज्ञानी ले ते पण मूरख ने तेमाटे जे पोते जेवो दोय ते पोताना सरखा वीजा पासे जाय एम सरखे सरखा एक बीजानी पासे जाय थावे के ए रीत ने वली गादा ॥ रे हिली विहिनी करेती, मम चडिस पायवे निवे ॥ यदवा तुज न दोतो, सरिसा सरिसेण रचति ॥ १ ॥ ॥अर्थ - को एक माणस कारेलीनी वेलिने लिं वहाना वृक्ष उपरे चढती देखीने वोल्यो के हे सस्विहे कारेली । तु ए निवना वृक्ष उपर च दीश नही केमके तु पोते कडवी बो भने निव वृक्ष पण कडवो डे माटे रे मी ' तु वली यधिक कडवी यश एवु केण तेणे मान्युं नही थने निवना वृक्षनी पर चढती बध थ नही तेवारे ते माणस वोल्यो हे नोली। ए तादारो दोप नथी केमके जगतमां सरखे सररवा मजे तेवारे राजी थाय तेम तमे पण वे सरखे सरखा बो तो एमा कांथाभर्य नथी तेम इदा पण ए देवता यने ए ज्ञानी ? सरखे सरस्खा मख्या वली एवा इजालीयाने जर देवो वादे जे तो शं ए देवो पण ज्ला पख्या न कहेवाय' वलीपण जूति चितववा लाम्यो के महारा जेवा पंमितनी थागल एलोकोने उगे थने ज्ञानी नाम धरावे , ते महाराथी केम सदन करी शकाय? महाराथी तो एनु खोदु अनिमान सपु जाय नही थने ए ढोंगीनो ढोंग पण मादारा शिवाय बीजो को पाधरो करीशकशे नदी माटे हुँ जश्ने एनु थनिमान चतारी नाचु जेम एक थाकासमां वे सूर्य दोय नही वली एक गुफार्मा वे सिंद एकता न रहे तथा एक म्यानमां वे तरवार समाय नही तेम ए पण सर्वज्ञ थने हुँ पण सर्वज्ञ एम को वारे थायज नही ए जालियो तो विवेशे कला शीखी थावेलो ते सर्वइनुं नाम घरावी लोकोने थने देवताउँने जोलवे ने थने हुतो सर्व वियाउँमां निपुण एवो विचार करे ने एवामा प्रलने वांदीने समोसरणथी केटला एक लोक फरी थाष्या तेमने शति पूबवा लाम्यो के बदो लोको तमे जेनी पासे गया इता ते सर्वज्ञ कदेवोक ' तेवारे लोक बोल्या के एनी वात कां कडेवामा श्रावती नथी परंतु तमे पोते सर्वज्ञ नाम धरावीने थमने | पुगेबो, ते सर्वइतो षधी मननी वातो जाणे हे पण तमे तो एटलुं पण नथी जाणता थने फोकट सर्वइ कहे वरावो बो ते सनिली इश्नूतियें जाएयु जे ए निमय मायानु घर ले माटे सर्वलोकतो एने मानवा लाग्या पण जेवारे हुँ जश्श तेवारे ए माहारा थागत वोली शकशे नही, यत ॥ घरसूरा मत पमिया, गाम गमारा गोठ ॥ नरी सनामां बोलता, थरथर धूजे दोउ ॥१॥ ॥ अर्थ - पोताना घरमा तो पधाय करेके थमे शूरवीर ये यने पोताना मवा पण व ।

घाय फहेके थमे पंमित ये वली पोताना गाममांजे गमार दोय तेपण पंच पाय ले परंतु जे वारे पंमितोनी नरी सनामा वोलवू पडे तेवारे तो तेना होगपण थर थर पूजवा ममी नाय ने तेम ए पण सर्वज्ञ एवं नाम वीजानी थागल कहे वे पण माहारी थागज ते बोली शको नही वली पण विचारे ले के जे थनियें पर्वतोने बाली नाख्या तो ते थामिनी थागल वृक्नो श्यो नार' तथा जे वायुयें दाथी जेवाने उडाडी मूक्या ते वायरानी श्रागल पुणीनु जोर चाले' तथा जे नदीमा दावी तणा गया ते नदीमां कीही बापडी शा हिसाबमा गणाय' एम इंश्नूति चिंतवे बे एवामा अग्निनूति बोल्यो के दे नाइ' तमें ए इश्जालीयाने जीतवा माटे एटतो विचार न करो हो, ए फीडी पर कटक श्यो करवो' अलसीयानी कपर गरुडने तेडवो ते ' तृणनी उपर कुदाडो वपाडवो ते शा कामनो, कमजनी नालने कापवा सारु फरशी चपाडवी ते शा कामनी, वेलडी उखेडवामाटे दस्तिनुं | काम पढे । तेम ते विचारा गरीबडा सर्वज्ञ पासे तमे वाद करवा शृं जाशो, मनेज थाझा थापोतो ढुंज एने जीती श्रावु, एवा नाश्ना वचन सांजली शश्नति बोल्यो के दे नाइ' एने में जीतवो डे एनेतो महारा पांचशे शिष्य मांहेलो कोइ एक शिष्य जाय तेपण जीती श्रावे तथापि महाराथी रषु जातुं नथी केमके योई पण शल्य कामनुं नही माटे दु पोतेज जाइश जे कारण माटे वीजा तो सर्व वादी मात्रने में जीत्या डे पण एक ए किहाएक रही गयेलो देखाय ने जेम हाथीना मुखमाथी कोक कण पडी जाय, जेम मग रांधतां कोक करखं रही जाय, जेम पाणी पीलता कोश्क तलनो दाणो रही जाय, जेम श्रगस्ति झपिने समुश्नां त्रण चलु करतां को जलविंच रदी जाय, जेम चणा मुजता को चणो पाहेर पडी जाय, तेम ए पण रदी गयेलो जाणवो माटे हे नाइ ! ए एफने श्रणजीते सर्वने न जीत्या एम लोकोमा "कडेवाय जेम एकवार जे स्त्रीन शील खमन थर्यु ते स्त्री थसती कडेवाय तेम एने जीत्या विना लोकमा महारो यश रहे नदी माटे एनाथी माहारे पोतानेज वाद करवा जवू पढशे अने एने छ दरातुं तोज महारो यश जगतमा रहे, वली पण अनिमानथी शक्ति कहे। ॥ यतः ।। इंदो वादिगणा नोटा , कर्णाटावि सम्मवा ॥ कस्माददृश्यतां प्राप्ता, यूयं मम पुर सदा ॥१॥ ॥अर्थ-अरे कर्णाटादिक वेशोमा उत्पन्न थयेला वाविना तमे महारा बागल केम नथी देवाता' शा माटे थदृश्य थइ रह्या ठो' जावार्थ एवे जे तमे वाय वादियो महारा बागल हारेला गे तेथी कुपी रह्या बो, ते शा माटे के में श्राटला देशोना पंमितोने हराया ते कहेजे-॥ काय ॥ लाटा दूरगता प्रवादिनिवहा मौन श्रिता मालवा मूकस्व मगधागता गतमवा गढति नो गुर्जराः ॥ काश्मीरा प्रणता पलायनकरा जातास्ति लंगोमवा', विश्वे चापि सनास्ति योदि कुरुते वाद मया सांप्रत ॥१॥ ॥श्रर्थ -नोट कर्णाटक वेशना वादि माहारी थागज अदृश्य थया, तो वीजा देशोना वादिउँनो माहारे श्रागल श्यो जार तेज करे , जाट वेशना वाविना समूह तेतो महारु नाम साजलीने दूर जा रह्या, प रंतु कोइ कहो नाव्यो, एटले तेरो एबुं विचास्यु जे जयं तो दारीने पाबु थावत् पडशे एम जाणी दूर जा रह्या तथा एकजास्वने वाट इजार मालव देशना वादि दता ते दारी जवाना नयने लीघे माहारी श्रागल मौनपणु धारण करी रह्या वली मगध देशना दश लाख वादि तेतो महारा थागल मुंगा यया एटले एक वोलपण वोली शक्या नही तथा सत्तर द जार गुजरात देशना-दादि ते मदारी अागले मद रहित थ६ गया परंतु हाथीनी पेरे गाजीने एक शव परा कही शक्या नही एटस्ले दीन थ रह्या इता वली जिहीं सरस्वतीनो वास । एवो श्रीकाश्मीर देश तिहाना वसनारा वादी ते थावीने महारे पगे लागा तथा जे तेजग वेशमा उत्पन्न थयेला नवलाख वादि तेतो मात्र मदारूं नाम समितीने नाशि गया वीजी कां पण बुद्धि तेमने उपनीज नदी वधारे से कहु जगतमां एवो कोइ पण पंमित नथी जे महारी साथे थावीने दमणा वाद करे एटले में सर्वकोश्ने जीत्या पण मने जीतनारो जग तमा कोइ पण नथी तो ए जालीयानो श्यो नार बेहु ज्पांसुधी प्रमादमा , त्यांमुधी ए सर्वज्ञ कहेवाय वे पण जेवारे तु वाद करवाने सादामो थयो तेवारे ए तेज वखत नाशि जाशे जेमाटे कसु के ॥ श्लोक ॥ तावशीति खद्योता, स्तावमति चश्मा ॥ मदिते तु सत्रांशो, न खद्योतो न चश्मा ॥१॥ ॥थर्थ -खजथानो मुद्योत क्पांसुधीरहे के जिदा सुधी चश्मानो उद्योत नथाय त्यांमुधी खर्ड जजदल करी गाजतो चलके परतु चश्मानो उद्योत थाय तेवारे खजुश्रानो उद्योत का पण चाले नही थने चश्मानो ग्योत पण क्या सुधी रहे के ज्यांसुधी सूर्यनो उदय नथाय त्यांसुधी रहे, पण जेवारे दजार फिरणोने धरनार एवो जे सूर्य तेनो उदय थाय तेवारे खजथानो थने चश्मानो ए वेडुनो उद्योत रहे नदी तेम वीजा वादीयोने दाववाने तो एश्जालियो समर्थ ने पण माहारी बागल एनो प्रनाव चाप्ले नही एरोज्यांसुधी मुजने दीठो नथी त्यांसुधी बीजा लोकोने नरमावे तो हवे मदारे फोकट घ रमां वेशीमान करवू ते शा कामर्नु दु पोते तिहां जश्ने तेनुं वल पराक्रम जो के ए शं नस्यो के मुजने एटलां शावतो नलेना पाग्नी पेरेथावडे ठे॥ श्लोक ॥ लक्षणे मम दफ्त्व, साहित्ये सहिता मतिः ॥ तके कर्कशता नित्य, कशास्त्रे नास्ति मे श्रम ॥१॥ ॥अर्थ -लक्ष्ण शा| स्त्रमा महारुं वक्ष्मणु ने एटले लक्षण शास्त्रतो हु सारी पेठे जाणूनु स्त्री पुरुषादिकोना व प्रीश लक्षण रुढीरीते कही देखाई तथा पवार्थना लक्षण तो एवां प्रतिपादन करु के जेमा थव्याप्ति प्रमुख दोष रहे नदी ॥१॥ तथा साहित्य शास्त्र जे काव्यादिक तेतो सर्व माहारे श्रस्वलित जे ॥ ५॥ तथा तर्कशास्त्रमा तो हु एवो निपुण दु के महारा सादामो कोस्ने ज वाब देता थावडेज नही एवा कठण तर्कने ढुं जाणु ई माटे तर्कशास्त्र मदारे करण नथी एतो सदा थकर्कश ने ॥३॥ घणु में कहियें एवु कर्पु शास्त्र के जेमा महारो श्रम न ययो दोय' अर्थात् बदार व्याकरण, कोशनीतो गणतरीज नथी, बंद रमाकरादिक, अलंकार ते काव्यनी शोना अतिशयालकारादिक, नवरसादिक ते वात्स्यायनादिक, धर्मशास्त्र ते सर्व पुराण मीमांसादिक, ज्योतिष शास्त्र ते चूडामणि प्रमुख, वैद्यकशास्त्र कालझानादिक, ए वर्धा शास्त्र महाराणी बजाएया नथी तो ए इजालीयो ते / महाराथी जीते एवोठे माटे हवे हु त्यां जर देव, दानव, मानव सर्वने देखता एने हावीने एनुं सर्वझपणानुं विरुव टाली नार्दू एवो मनमा गर्व श्राणी पांचशे बात्रोने ले जेम जाणे श खेंची जर जतो दोयनी' ते श्यामाटे के जगवाननी देशना प्रथम वाली गश्ते माटे नगवान पार योजन चालीने एक रात्री थाव्या तेथी महाराजे जाए के एमने शिष्यनी प्राप्ति थाय तो रुई थाय ते माटे श्श्नो प्रेमोज जाणे प्रति समोसरण तरफ जतो दोयनी' एवी कवीश्वर घटना करे ने अन्यथातो एमज थनारु ने दवे प्रश्नूति पांचशे प्रसहित परवस्यो थको वाद कर वानी साथी श्रीवीर नगवानना समोसरण तरफ चाल्यो ते वरखते पांचशे बात्रो नूतिनी विरुदावली बोले ले ते कहीयें ये सरस्वती कठानरण एटखे सरस्वतीतो थमारा उपाध्या - यने गलानु सानपण ने अर्थात् सरस्वतीतो सवा एमना कंठमाज वसेजे, वागवावजय जपमा शरण, ज्ञात सर्वपुराण, वादिकदली कपाण, पंमितश्रेणी शिरोमणि, कुमतांधकार ननोमणि, जितवाविवृद, वाविगरुड गोविद, वाविघटमुजर, वादिषुकनास्कर, वादिसमुपथगस्ति, वादि दहस्ति, वाविमुखनजन, सकलनूपालरंजन, पट्लाषावनीमूल, परवा दिमस्तकशून, वादिगो धूमघरह, मर्दितवादि मरट्ट, वादिकंदकुदाल, वादिवतपाल, वादिगजसिद, वादिशिरली, वाविवेश्यानुजंग, शब्दलहरी, गगातरग, सरस्वतीनमार, चौद विद्या अलकार, वादिहृदयशाल, वादियुधमाल, वदुराजसमाजमुकुट, बगुबुद्धिविकट, ज्ञानरमाकर, शब्दविवाकर, महाकवीश्वर, कतशिष्यवृहस्पति, नितिनार्गवमति, कोजंगम सरस्वती, प्रत्यक्षमारती, जितानेकवाक, सरस्वतीलब्धप्रसाद, इत्यादि अनेक प्रकारनी विरुदावली पात्रो बोली रह्या वे बने श्नति चाल्यो जाय जे वली रस्तामा विचार करवा लाग्यो के थरे जुतो खरा के था मूर्ख शु कनु एणे सर्वझपणाना थाटोपथी मने नादक कोध चहाव्यो तो हवे एथी ए मुखी थवानो ने जेम को थनिमां पठे तो बली नस्म थया विना रहे नही तेम एपोपण क वे एम चितवतो चालतो चालतो जेवारे समवसरणनी पहेली पावडी ने तिहां चडोने जोवा लाग्यो ने जोयं तोत्रण गद वीता ते गढ कदेवा बेते कहेडे त्या प्रथम रूपानो गढ जे तेना सुवर्णमय को शीशा ठे, चारदिशायें चार पोहोल ने बीजो सुवर्ण गद ने तेना रनना कोशीशा ने त्रीजो र ननो गढ वे तेना मणिकातना कोशीशा ने एक योजनने विस्तारे के तेनी वचमा अशोकदक्ष उपर प्रण उत्र तिहा सुवर्णन सिहासन ने तेनी उपर स्वामि वेग ते वजूतियें पोतानी नजरे दीग तेवारे मनमा विचागुं जे में घणाय वादी दीग डे परतु थावो प्रकार किहां पण दीतो नथी तो ए ब्रह्मा , ना ए ब्रह्मा पण देवातो नथी केमके ब्रह्माने तो सावित्री नामे स्त्री , हाथमा पवित्री , करे कममज , इंसवादन , पांचमु गर्दननु मुख ने एटलां एं घाण मलतां नथी तेमाटे जागीय बैयें जे ए ब्रह्मा तो नथी, तो छ ए विष्णु ने, ना ते पण नथी केमके विष्णुनेतो लक्ष्मी नामे स्त्री ने, चार दाथ डे, शख, चक्र, गदा थने धनुष ए थायुध , गरुड वाइन डे, वरणे श्याम , ते एघाण एने नथी माटे ए विष्णुपए नथी तो ए ब्रह्मज्ञानी , ना ते पण नयी केमके ते तो थरूपी , वली चश्मा सोने कलायें संपूर्ण वे परंतु कलकसहित ने माटे चंमा पण ए नथी तथा वजी जो एने सूर्य कगु तो सू र्यथी पण एजें तेन तो घणु थधिक डे परतु तेना किरण सष्ण ने ते सष्ण किरण एने नथी माटे सूर्य पण केम संलवे ।। वली इश बे एम जो कढ़ तो ते पण नथी कारण के तेने सहस्रनेत्र वे ते एने नथी वली जो ए मेरु दशे एम कटु तो मेरु कठण जे ते एमां कवणपणु देखातुं नथी माटे ए मेरुपण नथी तो ए सर्वगुणसंपूर्ण सर्वथी थधिक जे तीर्थकर कहेवाय ले ते ए तीर्थकर ने केमके एवा गुण तो तीर्थकर विना बीजा कोशमा होय नदी माटे समस्त पापदर, सर्वलोकना शिवकर, पदकायना रक्षक, अनाथना नाथ, थशरण शरण, तरण तारण, एवा श्रीवर्षमान सर्वज्ञ तीर्थकर जे कदेवायचे ते ए संनवे ने सूर्यनी पेरे तेजवत, चश्मानी पेरे सौम्य, समुनी पेरे दीवे उस्तर, एवा ए ले ते श्रीमहावीर तीर्थकर विना बीजो केम संचवे । । वली पण शनूति श्रीवीर प्रजुने देखीने चितवे वे ॥ काव्य ॥ किंनदी किंमुरारि किमुरतिरमण किंनल किंकुबेर', किंवा विद्याधरोसो किमिद सुरपति' किंविधु किंविधाता ॥ ना नायं न चार्य न खलु न दिन वा नापि नासौ न चैव, तीर्थ कर्तु प्रवृत्तो निजगुणविनवेर्वीरवाधिदेवः ।।

॥थर्थ'- ए महादेव ? अथवा ए कृष्ण ' अथवा में ए बद्रूपवत ने माटे कामदेव 'अथवा ए नलराजा ' थथवा [ एश्नो नमारी कुबेर ? अथवा एं ए विद्याधर' अथवा एं हां ए इश् थाष्यो ? अथवा शं ए चं' थथवा शं ए विधाता ? एवीरीतें कल्पना करीने पळी विचारपूर्वक निर्णय करवा लाम्यो के ए महादेव तो नथी केमके ते तो लगोव्यो बे तथा एनो सुवर्ण सरखो वर्ण वे माटे ए कृष्ण पण नथी वली स्त्रीवर्जित ले माटे ए कामदेव पण नथी वली राजचिन्हे करी वर्जित होवाथी निम्बयथी ए नलराजा पण नथी वली त्यागी डे माटे कुवेर नमारी पण नथी, तथा पादचारी माटे विद्याधर पण नथी, नगरहित ले माटे ३६ पण नथी, कलंक रदित माटे चप.पण नथी, घटना विवर्जित माटे विधाता पण नथी, एतो ए पूर्व जे कह्या ते सर्वथी अधिक लक्षण धारी ले तो ए कोण एम विचार करता जाणवामा थाप्यु जे थरे एतो तीर्थकरवाने श्रय पोताना अतिशयादि गुण रूप धनवडे करीने प्रवाँ बे एवो वेवाधिदेव श्रीवीर जिने जे लोक कद्दे ते एज ने बीजो कोई नथी एम जणाय ले तो हा इतिखेदे एमें का श्रादुक देवा सकटमां थावी पख्यो, दवे दुई करु एनीथागत मारुं मान केम रदेशे ॥श्लोक ॥ कयं मया महत्वं मे, रक्षणार्य पुरार्जितं ॥ प्रासाद कोलिकादेतो, जेतुं कोनाम वांबति ॥१॥ थर्थः- तो वेजे महारु पूर्व महोटापj थ{ ने तेने टुं केम करीने राखीश ? एटले में पूर्व घणा वावियोने जीत्या वे तेथी दुलोकमां प्रसिथयो बु, पंमित वढुं, तो वे मुजने मदारा पंमितपणाने राखवानो उपाय श्यो करवो के जेथकी ए महारी पंमिता लोकोमा कायम रहे। थने जो एनाथी वाद न करु तो लोको कद्देशे के ए वाद करवा गयो दतो ते पालो केम फरी थाष्यो, माटे में ए मूरखा करी तो पण दवे वाद कश्या विना महारे पावू जावु नदी केमके मारे तो हवे ए एकज जीतवो रह्यो ने तो हवे अपने माटे महारो बों यश न गमाववो। जेम कोश्ने एक खीलो जोस्तो दोय तो ते एक खीलाने माटे घाखो प्रासाद नांगी खीलाने काढवा वा नदी एवो मूर्ख कोई दोय नही वजी कदे ॥ श्लोक ॥ सूत्रार्थी पुरुपोंदारं, क खोटयितुमीदते ॥ क कामकलशस्यांश, स्फोटयेत् विकरीकृते ॥३॥ ॥अर्थ- एवो कोण पुरुप दोय जे सूत्र एटले तांतणाने अर्थे दारने प्रोडवानी वांबना करे एटले सूत्रनो तागो जोश्तो होय तेटला माटे दार त्रोडवो एम को वांजे नदी तेम महारे पण ए एकने दाव्या विना महारो यश रूपी दार प्रोडी नाखवो नही ए तात्पर्य जाणवू तथा वली कोण पुरुष नौकरी जोस्ती दोय तेने यर्थे मनोवांनितने पूरनार एवो जे कामकुंन तेना गला प्रमुखने फोही नाखे अर्थात् तीकरीने यर्थं कामकुंनने कोई फोडी नाखे नही तेम छ पण एनी साधे वाद कमा विना जो एमज पाडो फरी जाएं तो कामकून जेवो मादारो यश रूप घट ते फोडी नाख्या जेतुं यह पढे, तेथी हुँ मूल्नी गणतीमां था माटे महारे एम न करवु वली पण कहे ॥ श्लोक ॥ जस्मने चंदनकोवा, वहे प्राप्यमप्यथ ॥ लोहार्थी कोमदानोधो, नोनंग कर्तुमिच्छति ॥ ॥ ॥वर्ष- वली कोण माह्यो पुरुप जस्म एटले राखने यर्थे 5 खे प्राप्त थाय एवा चंदनने वाले एटखे नस्मने अर्थ मलयागिरि चंदनने को चाले नदी तथा एवो कोण मूर्ख होय जे जोखमना कटकाने अर्थे महासमुनी मध्ये नाव एटले वादाण तेने जांगी नाखवानी वांडा करे अर्थात् कोइ पण नांगे नही परंतु जो मूर्ख होय तो नांगी नाखे तेम जो हूं एनी साधे वाद न करूं तो महालं यशरूप मलयागिरि चदन ते बलीने F जस्म थाय तथा महारी यश रूपी नोका महासमुश्मा जांगी नारख्या जेवं मने थाय माटे एवो मूर्ख हुँ न थाउ इति ॥ थथवा ए पूर्वोक्त श्लोकोनो थर्ष थावी रीते मेलववो जे पन्नू तिये नगवानना अतिशय दीग तेथी चितववा लाग्यो जे ए कोई मदापुरुष ने माटे एनी साधे हु वाद करीने अवश्य दारी जश्श तेथी में पण एनी पासें थावीने एक खीलाने माटे महारो यशरूपी प्रासाद नांगी नाखवा जेवी मूरखा करी तथा एक तांतणाने माटे दार प्रोही नाखवानी श्शा करी वजी एक तीकरीने माटे कामकुंचने फोडी नाखवा जेवू कम्युं तथा राखने थर्थे चंदन वाजवा जेतु कहुं तथा लोखंमना कटकाने अर्थे महासमुश्मा महारा संपावन फरेला यशरूपी जहाजने नांगी नाखवा जेवं कर्तुं एम चिंतवी प्रचना वचननो थतिशय जोवा मामपो तो था प्रमाणे वे ते कहे। ॥ श्लोक ॥ सारंगी सिदशाव स्टशति सुतधिया नविनी व्याघ्र पोत, मार्जारी ईसपाल प्रणयपरिवशात्केकिकांता जुजगं ॥वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जंतवोन्येत्पति, श्रुत्वासाम्यैकरूढ प्रशमितकलुषं योगिन कीणमोदं ॥१॥ ॥श्रर्थ-सम परिणामे करी एकाते रहेवायी प्रकर्षे करीने उपशम्यां ने कलुप एटले पाप जेमनां एवा वलीकीण थयो ने मोद जेमनो एवा योगीयोने सुणीने एटले उपशमसहित, पापरहित, मोदरहित एवा जे योगी मुनिराज तेमने सुणीने अर्थात् एवा मुनिनां वचन सांजलीने बीजा जीव पण जेने जन्म थकीज थरस्परस एक बीजानी साथे वैर रदेला ने एवा तिर्यच जीव पण समोसरणमा मद रहित थया थका पोतपोतानां वेरने मे एटले जेनां एवा वचन ले के जे सांजलवा यकी जीवो जन्मनां वैरने पण नली जाय वे ते वैर कोने कोने देते कही देखाडे -प्रतुना समोसर मां थावेली (सारंगी के०) मृगली ते सिंदना पालकने स्पर्शे एटले सिहने अने दरणने जन्मनुं वैर ठे पणदासमोसरणमा तेने वैर मटी जाय तेथीते पोतपोतामा मलीने एका वेग तथा (नदिनी के०) गाय ते (सुतधिया के०) पोताना पुत्रनी बुधिये करीने (व्या घपोत के०) वाघना वालकने चाटी रही वे एटजे वाघने अने गायने वैर तोपण श्दा ते वैर टली गपुं ने माटे वाघना बालकनी पासे बेठी थकी लाह करे जे वली विजाडी ते (प्र एयपरिवशात् के०) स्नेदना वश यकी ईसना बालकने स्पर्श करीने वेठी ने एटले विलाही पण ईसना बालकने मारती नथी वजी मोर यने सर्पने पोतपोतामां वैर ले तोपण ते श्दा प्रचना समोसरा कदेवा थई वेग तोके (केकिकांता के) ढेज देते (जुजंग के०) सर्पनी साथे थेठी ने ए रीते दो एवा प्रकारां वैर ते सर्व जीवोना मटी गयो बे एवो नग वानना वचननो यतिशय देखी श्श्नूति विस्मय थइ रह्यो बे एटलामा जगवान पोल्या के दे ईश्नूति । गौतम गोत्रिया' तुंजले थाप्यो तुंमुख समाधिमा वर्ने ने एतु स्वामिर्नु वचन सानजी इति मनमा तिववा लाम्यों जे ए मदारूं नाम गोत्र किहांथी जाणे ले केमके हुँ एनी साये क्यारे पण मल्यो नथी, तथापि वजी एम विचास्यु जे महारु नामतो जगतमा प्रसिंह ने माटे कोण नथी जाणतो सर्व को जाणेज वे जे हु का थबतो माणस नयी सूर्य किहाँ पण बानो रहे नदी पण एणे मने महारु नाम कहीने जे बोलायो तेनुं तत्व महारा जाण वामा धावी गर्यु के एणे मात्र मने ठगवा सारुज वोलायो जणाय बे परंतु हु कांई एवो थण समनु नथी जे एना मीग वचनयी रीफ पामु पण हु तो जेवारे ए महारा मनमा जीव ने के जीव नयी एवो संदेह रहेलो ने ते कही थापे यथवा ते संर्वेद जांजी थापे तेवारे रीफ पामीने जाणु जे ए खरेवरो सर्वज्ञ में नही को तो मात्र महारी साये एने वाद करवो परे चित्र४८ भगार्नु समशरण Hin मोनमादित्राए गौतमदिवाय एको ET

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तेथी वीहितो थको मन राजी राखवा माटे मीठे वचने करी बोलावे ने तेणे करी ए पोताना मनमा एवु समजतो हशे जे ए महारी साथे वाद करशे नही, पण ते तो दु मानुं नही एई विचारे वे एटलामां फरी नगवान वोल्या हे शश्नूति । जीव के नथी एवो तादारा मनमा सनेह ने ते दे शति । ते वेदना पद जीवने वडापवावाला थने जीवने थापवावाला जा णीने सदेहमा पढयो तो तेहनो थर्थ तुं विपरीत करे ये तेथी तने सदेह रही गयो ने माटे, ते वेदना पदोनो थर्थ पूर्वापर विरोध रहित हु तमोने कनु बु ते सनिल एम कही नगवान पोते समुस्खें वेदनां पदोनुं उच्चारण करे, 2 ते कटेवा ध्वनियों करे ने ते कहे जे श्लोक ॥ समुशेमप्पमान किं, गगापूरोथवा किमु ॥ थाविब्रह्मध्वनि किंवा, वीरवेदध्यनिर्वनौ ॥ १ थर्ष-जेमसमुश्मथन करवा मांमधु होय ते वखते जे ध्वनि थाय तेहवोज ध्वनि थाय के j' यथवा गगानदीनु पूर थावे ते वखते जे ध्वनि थाय तेज ध्वनि थाय डे के सुं' अथवा यादिब्रह्म पनि थायने के शु एवो वीर नगवानना मुखथी ध्वनि थयो तेमा वेदमा जीवसत्ता निपेयपद एवा वे ते कहे वे ॥ थथ वेदपदानि यथा ॥ थर्थ-वेदना पद' एम में “ विज्ञान पन एवेतन्योन्तेन्य समुछाय, तान्येवानुविनश्यति, नप्रेत्यसझास्तीति इति जीवानावनुति ॥ व्यर्थ हे गौतम | ए वेदना पदोनो अर्थ ते था प्रकारें जास्यो के विज्ञानघन एटले विज्ञान समूह जे चेतननो पिंम (सएव के०) तेदज चेतन पिंम ते (एतेन्योन्तेन्य के०) नूतजे एप्पी, थप, तेज, वायु थने थाकाश ए पांच नूतो थकी (समुदाय के०) उत्पन्न यश्ने (ता न्येपानुपिनश्यति के०) ते नूतोनो नाश यया पढ़ी ते विज्ञानघन चेतननो पण नाश थाप तेमाटे (नप्रेत्यसज्ञास्ति के०) परलोक नयी एटले ए पृथिव्यादिक पांच जूतोथी जीव उत्पन्न PANCo- थाय ते थने ए प्रथिव्यादिक पांचनूत जेवारें नाश पामे तेवारें जीवनोपण नाश थइ जाय ते माटे जीव मरण पामीने परलोके जाय के एम कहेतु वृथा डे केमके परलोके जाय एवो जीव नथी तो छ ने तोके छान ले तेदन ए नूतोषी उत्पन्न थाय ने जैम दीपक सपजीने जेवारें विनाशने पामे वे तेवारे तेनो प्रकाश पण जतो रहे थे तेम नूतोनो नाश थये ए जीवनोपण नाश थाय वली प्रयोग पण हा ने ॥ ज्ञाननान्यनवगनौतिफत्वात् दीपवत् ॥ अर्थ -ज्ञान ने ते नूतयकी स्त्पन्न थायठे माटे बीजे नवे जनार नयी एटले बीजा नवमा जवावाखं नथी जेम दीपक वे तेम ए पण जे माटे परनवे जनारो जीव नथी वली प्रत्यक्ष देखीयें ये जे पांचनूततो देखवामा थावे पण जीव वेखवामा थावतो नथी जेवारें माणस मरण पामे तेवा, तेने वालीने राख करीये डेये तिदा हाम प्रमुख तो नजरें दीनामां थावे जे पण जीवनु चिन्ह तो कार देखातु नथी एवो विचार वेदना पदना थर्थयी तने नासे ले के जीव नयी वीच वली ताहारा मनमा एम पण थाय बे के वेदमा एवं पण पद ॥ सवैथयमात्मा ज्ञानमयो मनोमयो वाध्ययमकुर्मय थाकाशमयो वायुमय स्तेजोमय थापोमय' पृथिवीमय कोषमयः थकोषमय दर्पमय शोकमय धर्ममय अधर्ममय इत्यादि ॥ अर्थ -(स के०) ते (वे के०) पादपूरणे अथवा संबोधने (श्रयं के) ए (थात्मा के०) जीव ते ज्ञानमय ए टले झानवत, मनवालो, वचनवालो, नेत्रवालो, एमज श्राकाशमय, वायुमय, तेजमय, जलमय, पृथ्वीमय तथा कोषमय, अकोधमय, दर्पमय, शोकमय, धर्ममय, अधर्ममय, इत्यादिक वेदनां पद देखवाथी तने शका मुत्पन्न थयेली ने के जीव बे के नथी एवो तुने संवेद वे पण हे श्श्नूति। योगीश्वरें प्रत्यक्ष जाणेजो एवो ए थारमा एटप्ले हानीने श्रात्मा प्रत्यक्ष ने जेम परमाणु बोजा सामान्य जीवोने दीवामां थावता नयी पण झा नयत जाणे (श्रनुमानादपि के०) श्रनुमानथी पण ए जीवसत्ता सिह थाय ने ते थ नुमान था प्रमाणेठे-थस्त्यात्मागुपदवाच्यत्वाद्घटवत् ॥ थर्थ - थात्मा शुरूपद कहेवा पणु के माटे जेम घट पद ले ते थसंयोगी पद ले तो एघट नथी एम न कहेवाय तेम थारमा पर जे ने तेपण सयोग रहित पद तेथी एनी पण नास्ति कदेवाय नही जगतमा जे जे पदार्य शुरूपद वाच्य ते ते पदार्थ यसत् नथी थर्थात् सत् के वली शास्त्रमा पण यात्मा फहे ने तो हवे गुजाणीय जीव वे के नथी केमके एक सूत्र जीव कहे थने एक सूत्र नास्ति रहे एए जाणो दे इति । तने सवेद पथ्यो पण ते सदेह खोटो ने, व्यर्थ ने, केमके जीवने नास्ति कहेनारू जे “ विज्ञानघन” पद तेनो थर्थ तु विपरीत करे ने तेथी ए पूर्वापर विरो पने सीधे तने शमा रही वे माटे एनो अर्थ थाम करवो योग्य वे जे विज्ञान एटले झान थने दर्शन ते अनिन्नपणाथकी विज्ञानघन एव जोवर्नु नाम वे तेदज "एतेन्योनूतेन्य" एटले नूत ते पटाविक ने तेने देखी उत्पन्न थाय ने एटले झाता जे विज्ञानघन तेने घटादिक जे झेय ते देखी ज्ञान उपजे वे तेवारे जाणे जे घट ते एहज ए ज्ञान ते (समुछाय के०) उपजीने (ता न्याके०) तेहज झान ते झेयनो उपयोग जावाथी तेमाज नाश थाय (अनुविनश्पति के०) पड़ी ते घटना गोधनो पर्याय करीने विनाश पामे वे (नप्रेत्यसझात्ति के) जे पूर्वती ज्ञानसंज्ञा हती ते रहे नही एटले जे घट दीगे ते घटनु ज्ञान तेह्ज घटा रधुं पण घटनो उपयोग पटमा नथाय परमार्थ ए जे इशजूतिने विज्ञानघननी श्रुतिना श्रर्थयी सदेह दतो के जीव नूतमा उत्पन्न थाय थने नूतमांज नाश थाय परंतु परलोक नथी ए संदेह हतो ते

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टाली, मदनामी, येराग्यपामी, वीश सहस्रमी पावडोय चट।, यावारप्रतुन त्रण प्रदक्षिणा वे, जति पगेलाग्यो श्रने गुचनावथी पाचसो गत्रो सहित दीक्षा लीधी एनुं गौतमगोत्र हतुं माटे गोतम एहवे नामे प्रसिद्ध थयो नगवानना मुखथी चपन्नेवा, विगमेश्वा, धुवेवा ए त्रि पदी पामीन हादशागीनी रचना करी जे माटे कहे जे ।। श्लोक ॥ श्रीवीरमुखतोवेद, पदार्थ मागत्यच ।। प्रव्रज्य त्रिपती सध्या, हादशांगी स निर्ममे ॥ १॥ ॥श्रर्थ -श्रीवीरना मुखथी देवपदनो अर्थ जाणी विदा लेश्ने त्रिपदी पामी वार थंगने रचतो वो ॥ इति प्रथम गण धर ॥१॥ ॥ दवे जूतिये विदा लीधी ए वात एनो बीजो ना थामिनति तेणे सा नजी तेगारे विचारवा लाग्यो के कदाचित् थमि जे जे ते पाणी थर जाय, पापाण नरम यह जाय, पर्वत वायुथी मगी जाय, सूर्य पमिम विशायें उदय याय, चश्माथी थगारा वर्षे, पाणी वे ते श्रमिज्वाता थइ जाय, श्रमृत खाधाथी मरण नीपजे, विप खाधाथी जीवतो थाय, पातालमा पृथ्वी पेसी जाय, मेरु पर्वत चलायमान थाय, समुइ मर्यादा मूकी थापे, एटना गाना धनी जाय तेनी ना नथी परंतु महारो नाइए जानीयाथीदारी जाय ए गात केवारे यने नदी एम चितवना करे ये एवामां समोसरणथी केटलाक चीजा लोको गा मा श्राव्या तेमन श्रमिनूतियें पोताना लाइ सवधि वृत्तांत पूबवाथी ते कदेवा लाम्या के [ पूगे ठो' श्चतितो नगवानना शिष्य यया ए थमे थमारी नजरे जोश थाव्या .ये एतु साननी थामिति विचारवा लाग्यो के मदारो ना अत्यंत माह्यो उतां केम ग्लाय पण विवेछायें रखते वलाइ गयो दशे तो दवे दु त्या जइ ए जालियाने जीतीने महारा नाश्ने पाटो वानी याचु थने एना सर्व पणानु विरुव पण टाली थावु एम कही श्रामपं सहित पांचशे वात्रोना परिवारे परवसो यको विरुदावली बोलावतो यको त्या जश् समवसरणनी पहेली पावठीये पग थाप्यो तेवारे प्रत्ये पण तेने पूर्वजी रीते नामगोत्र कठीने बोलाव्यो यने कर्पु के हे थामिनति । तुजने कर्म डे किंवा नथी एवो सशय ले ते तुं वेदपवनो श्रर्थ जा एतो नयी तेथी सशय रहे ते थावी रीते -अथ वेदपद ॥ पुरुप एवेदसर्वयदलतं यच्च नाव्यं ॥ झ्याविक वेदना पदयी तु जाणे के जीव ने तेदज सर्व ले तो एथी वीच कर्म ते वली जूध केम संनवेएटप्ले कर्म नयी केमके थारमा तो अमूर्ति ने तेने कर्म केम लागे कारण के मूर्तिने अने श्रमूर्तिने माहोमांदे सयोग दोय नदी माटे कर्म नथी वली कर्मथी जीवने सुखश ख पण केम थाय ए पद उपरथी कर्म नथी एम तु माने जे तथा वली कोश्क वेदना पद थाम पण ते जे "पुण्य पुण्येन, पाप पापेन" ए उपरथी कर्म के एम पण दे खाय वे तो कर्म के नयी ए तादारो सदेह डे पण हे अमिनति । ते जे वेदनां पद ते थात्मस्तुतिना ने, परतु कर्म निषेध करनारा नथी केमके थमूर्ति बते मूर्त इष्य साथे स योग तो प्रत्यक्ष देखाय वे थमूर्त थाकाशने मूर्ति वावला तेऊने परस्पर योग थाय जे जे मूर्ति वत ते थमूर्तिने सुख सुख करे ले जेम मदिरापान करनारने अचेत पण थाय ने ते मदिरा मूर्तिवत वे पण यमूर्ति जीव रे तेने मुकावे जे ते माटे कर्म के एम सिम थाय डे वली लोकमा एक मुनाम्य, एक उर्जाग्य, एक सुरूपवान एक कुरूपवान, एक धनवान एक दारिड़ी ए सर्व शुनागुन कर्मविना केवी रीते संनवे ए रीते वेदपदमा पण कर्म सत्ता सिम तेथी कर्म थवश्य छे, इत्यादिक वेदपदना थर्थ सांजलीने थमितिनो पण सशय टख्यो तेवारे यहंकार ठोडी नावसहित पांचशे ठाननी साये दिवा लीधी॥ इति क्षितीय गणधर ॥

॥ ॥ ॥ दवे बीजो नाश वायुति तेणे अमितियें दीक्षा लीधी ते वात सांजली ते यारे चितववा लाग्यो जे महारा ये नायें ए सर्वज्ञानी पासे विदा लीधी तो ते को महात्मा पुरुपोत्तम देखाय के तेमाटे तु पण तेने वो पूछ श्रने सशय पूबी पाप रहित थाट एम विचारी ते पण जगवान पासे श्राव्यो नगवाने तेमज पूर्वोक्त रीते बोलाव्योधने कहूं के हे वायुनूति ' जीव तेदज शरीर एटले जीव थने शरीर ए वे एक ने एवो तुजने सशय जे ते वेदपवना अर्थ बराबर न जाणवाने जी ले ते वेवपद "विज्ञानघनएवेतेन्योन्तेन्य समुशाय” इत्याविक एनो श्रर्थ । पूर्वली परे जाणवो ए पदथी जीव सत्ता दे तो एम जागीय जे जीव दे तो ते जीवनु नोग्य जे शरीर ते जीवधी निन्न बे तथा ॥ सत्येनजन्यस्तपसाह्येपब्रह्मचर्येण ॥ इत्यादि वेदपदनो ए थर्थ वे के सत्य, तप, ब्रह्मचर्य, एणे करीने सयतपुरुष, एह जाणे जे जे जीव शरीरथी जिन्न ने वली प्रमाणयी पण प्रत्यक्ष जीव श्रने शरीर निन्न देखाय ले केमके ए महारु शरीर एम कहेवाय ने तो हा महारु शरीर जे एम कहेनारो जीव दे माटे जीव अने शरीर निन्न ने एवु सनिजी वायुतिय पण दीक्षा लीधी ॥ इति तृतीय गणधर ॥३॥ ॥ हवे चोथो थ व्यक्त पण प्रलपासें थाव्यो स्वामीये कयु के पांचचूत में के नथी ए तुजने सदेह ने ते तुं वेदपदनो अर्थ नथी जाणतो माटे सवेद रहे जे ते वेदपद (स्वप्नोपमवेसकलके०) स्वप्ननी पेठे सर्व एवो थर्थ थाय ने ए पद उपरथी तुं जाणे जे पांचनृत डे के नथी' पण ए पाठ जे ले ते अनित्यता घतावनारो ले परंतु नूतनी नास्ति करनारो नथी वली पृथ्वी देवता, श्रापो वेवता, इत्याविक वेदपद जे वे ते सड नूतनी सत्ता जूवी जूदी कहे जे माटे पाचनूत ने ते प्रत्यक्ष देखाय ने एवं सनिली संशयरहित थ तेणे पण दीक्षा लीधी ॥ इति चतुर्थ गणधर HAMPA -- Arrr- ॥ हवे पांचमो सुधर्म थाष्यो तेने नगवाने कसु के दे सुधर्म' था नवमा जे जेदवा होय ते परनवमा तेहवाज थाय एटले पुरुष मरीने पुरुपज थाय अने स्त्री मरण पामीने पर नवा पण स्त्रीज थाय एवो तुजने संवेद वे ते वेदपव कहे ॥ पुरुपोवैपुरुषत्वमभुतेपन पनत्व ॥ एनो श्रर्थ तुं श्रावीरीते जाणे ठे के पुरुप मरीने पुरुष थाय थने पशु मरण पामीने पगु थाय ए थर्थ तु नित्य जाणे ये परंतु नित्य नथी ए जे वेदपद मे ते कोक जीव थायी वे जो ए पद नित्य होय तो वेदर्मा लखे जे ॥ शृगालोवेजायतेय सपुरुपोवह्यते ।। थर्थ-(प के०) जे पुरुप (वह्यते के) बले ने (स के०) ते पुरुप (शृगालो के०) सीयालीन वे शब्द पादपुरणार्थमा ने (जायते के०) थाय ने एटले जे पुरुप बले बे ते पुरुप मरण पामीने सी थाल थाय ने एमां पुरुप ते सीयाल थाय एम कर्दा माटे पुरुप मरीने पुरुपज थाय एवो संशय रा खवो नही पुरुप मरी सीथाल पण याय इत्यादि सांजली संशय मटावी दीक्षा लीधी ॥ इति पं चम गएधर ॥५॥ ॥ हवे बो ममितजी भाष्यो तेने प्रस्तुयें को बंध मोक्ष के नथी ए तुजने सशय वे ते तुं वेदपदनो थर्थ जाणतो नयी ते वेदपद कहे जे ॥सएपविगुणोविनयध्यते, ससरति वा न मुच्यते ॥अर्थ -(सके०) ते (एप के०) ए (विगुण के०) सत्वगुणादि रहित (विनुके) सर्वव्यापी (नवध्यते के) कमैकरी बधातो नथी (संसरतिवा के) सचरतो नयी एटले चालतो पण नथी (नमुच्यते के) कर्मादि वधनयी बूटतो पण नथी ए थर्थथी तु जाणे वे जे जीवने वध मोक्ष नथी परंतु एम न जाणवु ए वेदपन जे ते सिम वर्णवन डे केमके सिघना जीवोने वंघ मोक्ष नथी पण जे रागादियुक्त संसारी जीवोठे तेने तो बंध बने मोद बेड एवु साननी संशय टाली एणे पण दीक्षा लीधी ॥ इति पष्ट गराधर ॥ ६ ॥ ॥

मगधर ॥3॥ हो सातमो मार्यपुत्र याव्यो तेने अनुयें कर्पु हे मोर्यपुत्र । तुजने देव नथी एवो सदेह ने ते तुं वना पदनो श्रर्थ वरायर जाणतो नथी ते वेदपद थाम ॥ मायोपमान २ यम वरुण कोरादि ॥ एनो थर्य-माया जेम इश, यम, वरुण, श्रने कुवेरादिक ने एनायी तुजने एवो सदेह के के देवादि सर्व मायारूप ठे परतु वस्तुगतें नथी एम तु जाणे ने पण ए मायारूप जे का ते तेतो थनित्यता जणाववामाटे कह्याते थने वेदमा ॥ सएप यज्ञायुधी यजमानो जसा वर्गलोक गठति ॥ थर्थ - यझरूप थायुध ले जेहने ते ए यज्ञ करनारो यजमान त स्कान सूधो सर्ग एटले देवलोकें जाय ए वेदपद उपरथी हे मोर्यपुत्र' देवलोक एम सिम थाप ने पीरीतें वेदपदनो थर्थ सानली मौर्यपुत्रनो सवेद टल्यो तेथी दीक्षा लीधी ॥ इति सप्त ॥ हवे थाउमो अकपित थाष्यो तेने स्वामी का दे थकपित' तुजने ना रकी नयी एवीरीतनो संदेह वे ते वेदपदना थर्थनु रहस्य तुं जाणतो नथी तेने सीधे संदेद | ते दपद कहे ते ॥ नेह वे प्रेत्य नरके नारकास्सति ॥ ए वेदपदना श्रर्ययी तु एम जाणे ने के परलोफमा नारकी नथी परंतु ते श्रर्थ तु खोटो समजे ले एनो श्रर्थ थाम ले ते तुजने कहु तु के (नेह के०) नहीं हां (प्रेत्य के०) परलोकमा (नरके के०) नरकने विपे शा श्वता (नारका के०) नरकना जीव (वैकेनिो एटले नारकीना जीव शाश्वता नथी एम जा पवं, पण नारकी नथी एम न जाणवु केमके वेदपदमा नारकी ते पद कह बु॥ नारको वे पप जायते य शुशन्नमनाति ॥थर्थ - जे शूनु थन्न लीये ते नारकी थाय ए वेदपद उपरथी नारकी वे एवो थर्थ सानली एणे पण दीदा लीधी ॥ इति थष्ठम गणधर ॥ ७ ॥ ॥ हवे नयमो यचलनातजी थाप्यो तेने अनुये कर्यु के ताहारा मनमा पुण्य पाप दे किंवा नथी एवो संदेद ने ते तु वेदना पदनो श्रर्थ विरु६ समजे ते तेने लीघे वे ते वेदपद ॥ पुरुष एवेदङ ।। इत्यादि वीजा गणधरना वेदपदना पाठमा एनो बधो श्रर्थ करेलो बे ते रीते थांदी पण जा यो माटे जीव पुण्ययी सुख पामे थने पापथी 5ख पामे एम पुण्य अने पाप ए वे वेवा वे ए श्रर्थ सांजली संदेह टाली एणे पण दिक्षा लीधी ॥ इति नवम गणधर ॥ ए॥ दवे दशमो मेतार्यजी थाव्यो तेने प्रठयें कसं हे मेतार्य । परलोक ले के नथी एवो तुजने स देद ने तेना उपर वेदना पद जे रीते प्रथम गणधरने का हतां ते रीते सर्व कही देखाच्या वनी ॥ यस्ति परलोक श्लोकस्यान्यथानुपपत्तेस्त्वत्पूर्वजवत् ॥ थर्थ -परलोक वे जो न होय तो था लोक पण केम कहेवाय माटे ताहारा पूर्वजनी परें परलोक पण दे जेम ताहारा पूर्वज ते तोतुं पण ते थने जे पाप करीने मरण पामे ते नरकमा जाय श्रने धर्म करे ते मोदे जाय एवो श्रर्थ सानली तेणे पण विक्षा लीधी थने प्रत्रुनो शिष्य थयो ॥ इति दशम गणधर ॥१०॥ ॥ हवे श्रगीधारमो प्रनासजी थाप्यो तेवारे प्र वोल्या हे प्रनास जने मोक्ष के नथी एवो सदेह वे ते तुं वेदपवनो थर्य वरावर जाणतो नथी तेने लीघे ते वेदपद कहे ॥ जरामर्य एतत्सर्वं यदग्निहोत्र ॥ थर्थ-जे ए (अग्निहोत्र के०) यज्ञ (तत्सर्व के०) ते सर्व (जरामर्यया के०) जावळीव करवो भने ए होमर्मा जीव मरण पामे वे ते पाप रूप ले ते स्वर्गना सुख श्रापे पण तेथी मोक्ष न थाय केमके जावजीव ए करवो कह्यो माटे स्वर्गंज जवाय पण ते विना मोक्ष जावानो उपाय नथी तो मोक्ष केम थाय एम विचारता मोद नथीज एवो थर्थ तुं करे तेथी तुजने संदेह रह्यो डे परंतु ते अर्थ तुं करे ने तेम नयी एनो थर्प यावी रीते वे ते सुजने कनु बुं ते सांजल जे ए अमि होत्र ठे ते जावडीव सर्व पण वे परंतु वा शपथी मुक्तिना थर्थी जे जीवो के तेजए मोदना कारण सारू पण क्रियानुष्ठान करतुं एटले ए होमज सर्वकाल करवो नही परंतु मोफ्नो पण उपाय करवो तथा वली वे ब्रह्म के (परमपरंके०) तेमा एकतो परब्रह्म थने योजो थपर ब्रह्म (तत्रपरंसत्यज्ञानमनतंब्रह्म के०) तिदा परब्रह्म तो सत्यरूप ज्ञान यनतरूप नाशरहित ब्रह्म ने एटले थनत ज्ञानमय ब्रह्म ते पर डे ए अतिथी मोक्ष के एम जाणवु ए थर्थ सांजती एणे पण दीक्षा जीधी ॥ इति एकादशम गणधर ॥ ५ ॥ ॥ एरीते श्रीगोतम स्वामीथी मामीने यावत् प्रनासजी पर्यंत सर्व मती गीधार गणधर थाव्या ते सर्वना म नमा जे जे सशय रह्या दता ते प्रजयें टाल्या तेथी थगीथारे जणे मली पोताना चुम्माली शसो शिष्यो सहित प्रनु पासेथी दादा लोधी प्रजुयें सर्वने त्रिपदी थापी ते थावीरीतें -प्रथम उपरमेश्वा ।। एटले सर्व उपजे जे एम कल्पु तेवारे शका पेदा थाय जे सर्व उपजे ने तो ते जग तर्मा केवीरीतें समाय तेवारे बीजु पद ॥ विगमेश्वा ॥ एटले विनाश पामे जे ए पदमा पण शका उपजे के जो विनाश थतो जाय तो सर्व संसार शून्य थइजाय एम विचारी त्रील पद कहेठे ॥ धुवेवा ॥ एटले ए ससारनी स्थिति निश्चल ने तेवारें जाएयु जे उपजे , विणसे थने रहेनारो ते रहे पण वे एवी ससारनी स्थिति सवा सर्वदा प्रणेय कालमा चालती थाने के एम त्रिपदी प्रनु पासेयी पामीने ए थगीथारेय गणधरे वे घडीमा एटले एक मुहूर्तमा शावांगीनी रचना करी तेथवसरने विपेश महाराज पोते रत्नना थालमा वासक्षेप सेशदाजर पया तेमाथी प्रनुयें मुठी नरीने श्रगीथारे गणधरने माथे श्रनुक्रमे वासक्षेप कसो ए तीर्थनी स्थापना थ देवताए देवनि वगाच्यां श्रने जयनय शदने बोलवा लाग्या॥इति गणधरवाद स्तया गणधरस्थापनाधिकार ॥शा ॥ पठी चदनयालायें जगवाननी देशना सनिलीप्रतिबोध पामीने महामहोत्सव सहित प्रमुपासेथी दीक्षा लीधी तेनी पळवाडे वीजा पण घणा जनोए दीक्षा लीधी घणा प्रावक थया,पणी प्राविका थर, एम चार प्रकारना सघनी स्थापना करी॥ ॥ दवे गोतम स्वामीनो संबध कहे , गौतम स्वामीन उत्कृष्टरूप, प्रथम संघयण, प्रथम सस्थान, थमादिक तपश्चर्या करता थका, धर्मदेशना देता थका, तेजोलेश्यादिक अचवीश लब्धि नाधरनार, चार ज्ञानवत, चौदपूर्वधारी, सुतकेवली थया, जेने दीक्षा थापे, तेने केवल उपजे पोताने प्रनुनपर स्नेह घणो तेथी केवल उपजे नही तेवारें चितष्य जे केम मने केवलज्ञाननी प्राप्ति थाश के नही ? गोतमनी एवी चितवणीजोई श्रीवीर नगवान वेशनामा एवीरीतें बोल्या के जे पोतानी लब्धियें थष्टापद पर्वत उपर चढी चोवीश तीर्थकरनें वांदे, ते जीव तेहज नवें मोक्ष जाय, एवी वीरनी वाणी सानली पत्रीश कोश उचो श्रष्टापद पर्वत ने जेनी श्रात पाव डीयो तेना उपर सूर्यना किरण थवलवीने श्रीगौतम स्वामी पोतानी साब्धयें चढघा, तिहां चोवीश जिनने वांदी जगचितामणि स्तवन जोडी श्रीवयरस्वामीनो जीव तिर्यकर्जूनकनामा सामानिक देव तेने पुमरीकाध्ययनें प्रतिबोधीने नीचे उतना, तेवारें पन्नरशेने त्रण तापस पोथ, वह श्रने थम्म तपने पारणे कदमूल फलादिनु पारण करे, एम करतां चार मास वदि गया वे तेमणे श्रीगोतमने उतरता दीता तेवारे चितष्यु जे थापणे एना शिष्य याश्य तो थ टापद उपर जइ देवने वादीय एम धारी ठीने श्रीगौतमजीने पगें लागा, गौतमें तेमने प्र तियोधिने दीदा थापी पठी मकोलारें थष्टापदें चडावी तापसने देव पदावीने पाठा उतास्मा, तेगारें गोतमजीयें पूठ' के हे शिष्यो ! तमें पारण करशो ? ते वोठ्या दा स्वामी, पढी गौत - मजी पोतानीलब्धियें करी खीरनो एक पडयो सवा शेरनो नरी याव्या बने तापसोने कटुं के उठो पारण करो, तेवारें खीरपात्र वेरखी तापस कड़वा लागा के वीर थोडीने खानार घणा माटे थाटली खीरथी तोखे थांजण याशे' अथवा वधाने एकेा टीखं कराशे पठी, गौ। तमजीयें कयु के हे शिष्यो मामले चालो मदारे पारण करी गुरु पासें जावु जे एम कहीमामले साडी तापसोनो सदेह नांजवाने श्रर्थे वीरना पात्रामा पोतानो थगुगे मेल्यो, तेवारें अक्षीण सब्धियकी पन्नरों त्रणे तापसने पारणां कराव्या, पोते पण पारण कयुं, तिहां पांचशे ने एक तापसने तो खीर जमता जमता श्रीगौतमना गुण चितवर्ता चितवा केवल छान उपन्यु थने पांचशेने एकने प्रचुन समोवसरण देखी केवल ज्ञान उपन्युं तथा पांचशे एक तापसने तो श्रीवीर नगवाननु मुख देखताज केवल झान उपन्यु एम पन्नरशें त्रणे तापस केवली यया तेणे वीरनगवानने वांदी केवलीनी सनायें जावा मामधु, तेवारें गौतम बोल्या हे शिष्यो । तमे उमस्यनी सनायें वेतो थहींयातो केवलीनी सना ने माटे न वेसवु तेवारें वीरनगवान् । घोज्या हे गौतम । तमें केवलीनी थाशातना म करो, ए पन्नरों त्रणे केवली थया जे, ते सां| नजी गोतम खेद पाम्या के जुन ? महारा शिप्य केवली थया पण ई केवली थातो नथी एम घणो घणो चित्तमा खेद करवा लाग्यो, तेवारें लगवाने कयुं के हे गौतम ' तुं खेद म कर, यंते थापणे ये सरखा था ॥ इति गौतम सवध ॥ दवे जगवाने कया कया गामा केटला केटलां चोमासा कसा ते सूत्रकार कहे ठे-ते कालने विपे, ते समयने विपे, श्रमण जगवत श्रीमहावीरस्वामीने थस्थियामनी निभायें वकालर्नु परेलु चोमामु थर्पु तेवार पड़ी चपानग रीमा अने एप्टचपानी निभायें त्रए चोमासां ववकालना थया एव चार तथा विशाला नग रोयें वाणिय गामनी नियायें करीने वार चोमासा वर्षाकालना थया एव सोल तथा राजगृह नगरना नानदीनामे पाडानी बाहेर निश्रायें चोद चोमासां वर्षाकालनां थया एव त्रीश तथा मिथिना नगरीय उ चोमासां कस्वां तया नझिका नगरीयें वे चोमासां कला तथा बाललिका नगरीयें एफ चोमासु कयु तथा सावधि नगरीयें एक चोमासु कसु तथा थनार्य देशमा एक चोमासु क\ एव एकतालीश थयां देखें वेतालीशमु चौमासु मध्यम पावापुरीथपापा नगरी हस्तिपाल राजानी जूनी लेखकशालामा जगातनी मामवी कारकुननी सनामा वकाले रह्या ॥ १२३ ॥ ते घोमासानो पोथो महीनो सातमु पखवाडीपुं कार्निक ववि थामावास्याना दिवसनी राजिना व्हेंडाने विपे, नगवान श्रीमहावीरस्वामी काल प्राप्त थया जाति, जरा, म रण वधन एटले जनमतुं, १६ था, मर तेनु जे वधन तेने छेदीने सिर थया, तत्त्व जा वा वाला पया, मुक्त थया, सर्व उखनो थत करो, संताप रहित थया, सर्व 5 खनो क्य थयो ॥१२॥ पांच सवत्सर माहेनो चश्नामा पीजो सवत्सर वर्ते वे तेने विपे, प्रीतिवईन नामे मास ते कार्तिक मास तेने विपे, नदीवईन नामा पक्ष, यामिवेश्य नामा दिवस तेने विरे तथा क्यांएक उपशम एवं वीजु नाम ए दिवसनु कहे ठे, देवानदा नामा रात्रि क्याएक वीजो निरत्ति एबु नाम पण ए रात्रिनु वे जे लवर्मा जगवत मोई पदोता ते लवनो नाम थर्च के एटले यी नामा लव, मुहूर्न नामा प्राण एटले श्वासोवास, सिनामा स्तोक, नाग नामा करण, साथै सिप नामा मुहूर्त, स्वाति नामा नवनी सार्थे चश्मानो योग होते ते जगवान काय स्थिति नवस्थिति स्वपापीने कानगत यया, यावत् मन सर्वधि शरीर सर्वधि सर्व उ खची र दित थपा ॥ १२५॥ ॥जे रात्रिमा श्रमण नगवत श्रीमहावीरस्वामी कालगत यया ते रा चित्र ५० भगरान् सुवर्ण मने वेग पएा भव्य मीनेने धर्मापदेश देता या निएि। पाम्या समाधिस्य थया

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निये चारे निकायना घणा वेव, घणी देवीयो स्वर्गलोक थकी देता तिळ जोकन विपे छतरया साम्यां तेरो करी तथा या सर्वलोकने विपे जावा लाग्यो तेथी करीने ते रात्रिने विषे आका शमा घणो द्योत होतो दवो ॥१९॥ ॥जे रात्रिय श्रमण जगवत श्रीमहावीरस्वामी काल गत थया, ते रात्रि घणा देव थने वेवीयो थावतां जातां बगुज थाकुल थयां तेथी अध्यक्त कोलाहल शब्द थवा लाम्यो ॥१२॥ ॥जे रात्रिय नगवान श्रीमहावीरस्वामी कालगत थया ते रात्रिमा गोतमजेशनूति थणमार नगवाननो शिष्य तेनुं प्रेमबंधन त्रूटघु तेथी श्रीगोतमजीने केवल ज्ञान केवल दर्शन उपन्यु ॥ १२ ॥ ॥ जे रात्रिमा श्रीगोतमस्वामीजीने केवल छान उपन्यु ते केवीरीते उपन्यु तेनी कथा कदे बे-पोतानो श्रतसमय जाणीने श्रीम हावीर देवें श्री गौतमजीनो पोतानी सुपर निवड स्नेद जाणी ते प्रशस्त स्नेद राग निवर्तन करवाने थर्थ सध्यासमययी पहेला श्रीगोतमस्वामीने देवशर्मा ब्राह्मणने प्रतिबोध करवा सारु पार्श्ववर्ती ग्रामें मोकल्या हता, ते ब्राझणने प्रतियोधथापी तिदा रात्रि रदी प्रनाते पाग वल्या, तेवार मार्गमा केटलाएक देवोने शून्य चित्तें देख्या थने उपयोगथी वीरनिर्वाण सानन्यु, ते चार वजाहतनो पेरें मूर्ण पाम्पा, थोडीवेला पढी सावधान यया, तेवारें मोदने वशे विलाप करवा सागा के हे प्रनो ! तमे त्रण लोकना सूर्य अस्त पाम्या तो हवे मिथ्यात्वरूप श्रधकार पसरवा मामशे ! कृतीर्थरूप घुवडना समूह जागृत यइ गारव करशे रमति 5 कालरूप राक्षस प्रवेश करशे' कुमतिरूप चोर घणा थाशे। जेम सूर्य थस्त थये कमल कुमलाय, तेम चतुर्विध संघरूप कमल वन कुमलाशे जेम चविना थाकाश, जिम दिवाविना मदिर, जेम सूर्यविना विवस, एजेम शोनता नथी तेम तमारा विना ए जरत क्षेत्र शोना रहित थाशे ।

हे वीर तमारा विना दवे सात प्रकारना इति उपश्व प्रवृत्त यशे, हे वीर तमारा विना पा खमी रूप तारा वे वीप्यमान थशे, तमाराविना धर्मरूप चश्माने पापरूप राहु ग्रहण क रो, हे श्री महावीरवेव ! हवे तु कोना पगतलियां उमासतो थको महारा मनना संदेह पू वीश कोने हु जगवान् कही बोलावीश कोने हु नमीश' दे प्रनो हवे मुजने तुम विना पीजो कोण गोतम कही बोलावशे ' दादा ! हे वीर हे वीर ! तमें ए सुं कसुंजे था वखतें मने दूर कीधि, लोकिक पणु पण नही रारयु, ईशं पालकनी पेरे थाडो पेशी थापनो बेदडो प कही रहेत? अथवा ए केवल ज्ञाननो नाग मागत ? " मोक्षमार्ग सकीर्ण थात' अथवा र तमोने का नारलागत ? के मुजने नोलावीने चाल्या गया, हे वीर जे वेलायें पोतानो बा जक वेगलो होय तो पण तेने बोलावीने पोतानी पासें राखवो जोये ते वेलायें उलटो तमे मुजने पोताथी दूर कयो, हे वीर तमे { तमारा उपर महारो कृतिम स्नेह जाण्यो ? हे वीर दुतमारे { थसुखकारी थातो इतो जेथी मने मूकी गया, हे वीर तमे मुजने केम वीसारी मूक्यो, हे वीर तमे श्राजे मुजने महोटा विरह रूप समुश्मा नाख्यो, हे वीर तमारा विना हु मदोटा वियोग रूप वाहमां वाफयो, दवे तमारा विना महारो 5 ख कोण नाजशे, दे वीर हवे समोसरणनी शोना विजय थइ गइ, हवे मुक्ति मार्गनो साथ लाग्यो, हे वीर दवे जेम जल विना माबली टजवले तेम तमारा विना चतुर्विध श्रीसंघ टलवजतो यशे, हे वीर तमारा व चनरूप उपशम जलविना जिनशासन रूप वाडीयो वाग बगीचा सूकाइ जरो, हे वीर तमारा विना समता रूप केतकी सूकाइ जशे, दे वीर दवे नव्यजीवना मनरूप भ्रमर ते किदां जश्ने गुजारव करो, हे वीर हे गुणनिधान, हे जिनशासन नायक, दे नव्यजीव सुख दायक, दे

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सामीमा महोटो थतिशय ह्यो इति गौतम केवलोत्पत्ति सपूर्ण ॥ जे रात्रीय नगवान मोक्ष गया ते रात्रिमा नव मननी जातिना उपन्या, नव लधनी जातीना उपन्या, काशी कौशल्य दे शना मालक गण एटले परिवारना धणी एवाथदारे गए राजा वे ते जगवाननो मामो चेडो महाराजा ने तेना ए बढारे देशना राजा मित्र समान वे माटे मलवाने थर्थ याव्या लेते राजा थमावास्याने विवसें उपवास करीने रात्रे पोसहमा वेता इता पड़ी ते राजाए जगवत निर्वाण पाम्या माटे केवलझान रूप जे नाव घ्योत दतो तेतो गयो तो दवे इय्य उद्योत करी ॥ १२ ॥ एटले पोसह उपवास रूप जे ऽव्य सयोत ते थागला वरसो वरसें ए थमावास्या यावे थके करीछ श्रथवा दवे इव्य ग्योत करएवं विचारीने दीवा प्रमुख इष्य ग्योत कसो ते दिवसथी मंगलिकने यथै महोटु पर्व दीवालीनु थयु ते पर्व नगवान मोक्ष पाम्या, शिवसुख निरुपश्व सुख पाम्या ॥ वली कार्तिक पुदी एकमने दिवसें गौतम स्वामीने केवलज्ञान उपन्यु तेनो दर्प जाणवो भने कार्तिक शुवी बीजने दिवसें नगवाननो महोटो नाश् नदीवन रे ते प्रजुनु निर्वाण सांजलीने घणोज शोकवत थयो तेनो शोक मटा ववा सारूं नगवाननी बहिन सुदर्शनायें पोताने घेर नदीवरीनने तेडीने जिमाख्यो नाश्नो शोक टाल्यो ते दिवसथी लोकोमा नाचीज चाजी॥१२॥ जे रात्रिमा नगवान मोच गया ते रात्रिर्मा कुछ एटले क्रूर वनाव जेनो एवो थग्यासी पद माहेलो त्रिशमो जस्मराशिनामा यह तेनी ये हनार वर्पनी एक नक्षत्र उपर स्थिति ते जगवानना उत्तराफाल्गुनी नामे ज न्मनक्षत्र उपर थाष्यो रे ॥१३०॥ ॥जे दिवसथी जस्मराशि नामा महोटो ग्रद नगवा नना जन्म नक्ष्न उपर थाष्यो ते दिवसथी प्रारजीने निर्णय जे साधु साधवी ने तेमनी घणी पूजा एटले उठीने मुटु थाई थाहाराविक वे तथा सरकार ते वस्वादिकनु वेवं तेनी वृद्धि थाशे नही ।।१३१॥ हा प्रथम जगवानने सौधर्मेई वीनति करी दती के हे महाराज ' तमे मोछ जाउँदो परंतु तमारा संतानीयांने ये दजार वर्ष पर्यंत पीडा था माटे वे घडी जस्म मद वाकी रह्यो बे एटल्नु वे घडीनु थायुष्य तमारु वधारो एटले जस्मग्रद छतरी जाय तो पाउलयी थापना संतानीयां चेला चेजीने शाता उपजशे ते सनिली नगवान योज्या हे एवात त्रणे कालमा न थाय तमे तो वे घडी श्रायु वधारवा कहो बो परंतु एक समय मात्र थायु पण महाराथी वघे नही बेटघु थायु कोश्थी वधार्यु जाय नही ए एमज नावीने जे वे हजार वर्प पर्यंत महारा तीर्थमा शिष्योने बाधा थवा वाली जे तेने कोण वर्जी शके कोश्नु पण सामर्थ्य नथी थने जेवारे जस्मराशी ग्रहना बे हजार वर्ष पूरण थइ जाशे तेवारे निर्म योनी घणीज पूजा सत्काराविक मानता थाशे धर्मनो सदय थाशे, श्रीसंघने दर्ष थाशे ॥ दोदो ॥ घहीन लमे पागली, इ{ अस्के वीर ॥ श्म जाणी जीव धर्मकर, ज्यां जगे वहे शरीर ॥ १३॥ ॥जे रात्रिय नगवान मोक्ष गया ते राप्रिय घणा जीणा मीणा कुघुथा तेंख्यि जातीना जीव तस्पन्न थया ते अवस्या पण नजाय, उदरीने थलगा पण न मूकाय घने साधु साधवीने नजरे नदी यावे सीघ्र चाल्ले तेवारे देखाय ॥ १३३ ॥ ते देखी घणा साधु सा ध्वीयें नात पाणी थादिक चारे थाहारनो त्याग करी थनशन कम्युं तिहां शिष्ये पुग्घु जे गुरु महाराज थावी रीतनो उपश्व केम थयो तेवारें गुरु बोज्या हे वत्स' याज पनी चारित्र सुखे पलशे ॥ १२ ॥ ते कालने विपे ते समयने विपे नगवान श्रीमहावीरस्वामीने नति थादेवेश्ने चोद इजार उत्कष्टी साधुऊनी संपदा थइ ॥ १३५॥ ॥जगवान श्रीमहा चौरस्वामीने चदनवाला प्रमुख उत्रीश हजार सस्कृष्ठी साध्वीनी सपदा थ॥ १३६॥ ॥ जगवानने शवजी तथा शतकजी थादे वेश्ने १५५००० उत्कष्टी प्रावकोनी संपदा था। ॥१३॥ ॥ जगवानने सुलशा, रेवती प्रमुख ३१6000 उत्कृष्टी प्राविकानी सपदा था ॥१३॥ जगवानने केवली नदी पण केवली सरस्वा सर्व थोना सयोग जाणे तेवा केव लीनी पेरेंसत्य प्ररूपणा करवा वाला एवात्रणशे साधु चौद पूर्वधारीनी उल्लष्टी संपदा यह ॥१३॥ ॥ जगवानने तेरशो साधु थवधिझानीनी उस्कृष्टी संपदा थइ ॥१०॥ ॥ नगवान श्रीमहावीर स्वामीने सातसें केवलज्ञानी संपूर्ण केवलज्ञान थने केवल वर्शनना धरनारनी रूष्ठी संपदा प॥११॥ ॥नगवानने जे वेवतानी दिपनावी लीये एवा सातशे वेनियल धिना धरनारनी मलप्टी संपदा थइ ॥१४॥ ॥ नगवानने पांचशे विपुलमति जे थढीहीप वे समुश्मा संझीपंचेंडीय पर्याप्ता जीवोना मनना नाव जाणे एवा विपुलमति मन पर्यवज्ञानीनीउ लष्ठी संपदा य१४३ नगवानने जे देवो थने मनुष्योनी परपदामा वेशीवाद करता कोश्यी दारे नदी एवा घारसे वादिनी उल्लष्टी सपदा थ६॥१४॥ ।। श्रीमहावीरने जे थंते एटले समीपे वासी एटले वसे रहे तेने आंतेवासी कहीयें एवा सातशे शिष्य तस्कृष्टा मोझ गया ए जगवानना पोताना हाय दिक्षित जाणवा तथा चौदशे साधवी उत्कृष्ठी मोक्ष गइ ते पण पोतानी दाथ विदित जाणवी ॥१४॥ ॥ श्रीमहावीरने जे थागामि नवे मोक्छ जावावाला जेमनी गतिर्नु गर्नु थायुष्य एवा उलटा थाठशे साधु विजयादि पांच थनुत्तर विमाने गया ॥१४॥ प्रमण नगवान् श्रीमहावीर स्वामीने वे प्रकारे यंतगढ नूमि या एटले मुक्ति मार्गनी मर्यादा या ते याची रीते के नव जे ससार तेनो यंत करवो तेनी जे चूमिका एटले मर्यादा अथवा कर्मनो थंत करवो तेनी मर्यावा ते थे प्रकारनी पइ ते वे प्रकारनां नाम कहे ने एक जुगांत कत नूमि थने बीजी पर्याय यंतकृत नूमि जाणवी तेमां प्रथम युग एटले कालमान विशेप, थनुक्रमे गुरु शिष्य प्रतिशिष्याविरूप जे पुरुषो तेना प्रमाणे कालमान जाणवू ते थांही श्रीवीर नगवानने त्रण पुरुषना पाट पर्यंत काल सुधी कर्मनो थत थयो एटले वीजा घणा जीवोए कर्म खपायां ते श्रीवीर जगवानना पाटथी मामीने श्रीजंबूस्वामी पर्यंत मोक्ष मार्ग चाल्यो तेमां एक तो श्रीवीर लगवान पोते वीजा तेमने पाटे तेमना शिष्य श्री सुधर्मा खामी त्रीजा नगवानना प्रतिशिष्य थने श्रीसुधर्म स्वामिना शिष्य श्रीजंबुस्वामी एत्रण पाट सुधी मोक्ष मार्ग वह्यो ने तेने युगांतकत नूमि कहीयें बने वीजी पर्याय थत कृतनूमि ते श्रीतीर्थकरने केवल ज्ञान उपन्या पळीनो काज ते थाश्रयी जाणवो ते जगवान श्रीमहा वीरस्वामिने केवलज्ञान उपना पढ़ी चार वर्षे मुक्तिमार्ग वह्यो एटले प्रतुने चार वर्पनो केवल पर्याय थया पली वीजा कोश्क जीवने कर्मनो थत थयो कोइ मुनि मोक्ष गयो एम चार वर्ष बीते मोक्षमार्ग प्रवयों बे, वीजा जीवोने कर्मनो यंत थयो ले ते पर्याय अंतहत नूमि क हीये ॥ १४॥ ॥ते कालने विपे, ते समयने विपे अमण नगवत श्रीमहावीर स्वामी त्रीश वर्ष घरवासे रह्या अने कांक जाजेरा बार वर्प उपस्थ पणे रह्या तथा कांक लंबा एटले साहा उ मासे ठणा त्रीश वर्ष केवली पणे विचमा एकंदर वेतालीश वर्प लगे चा रित्र पर्याय पाली साधुपएं पायं सर्वमती बहोतेर वर्पनु श्रायुष्य पालीने वेदनीकर्म, था सुकर्म, नामकर्म अने गोत्रकर्म ए चार कर्म शेप रह्यां दता ते क्य थयां तेवारे एहज अवसर्पिणी कालने विपे हम मुसमानामे चोथो थारो घणो वीत्यो थने चोथा थाराना त्रण वपने साहा थाउ महीना वाकी रहे थके पावानगरीमा दस्तिपाल राजानी कारकुननी सनामा पोते एकला परतु साये वीजो कोई नही एट वीजा तीर्थकरो सर्व साधुऊना परि- वार सहित मोक्ष गया थने श्रीवीर नगवान तो एकलाज वेलानु तप एटले पाएी रहित रे उपवास चविदारा करीने पलानीवाली वेग थका स्वाति नक्षत्रमा चंमानो योग थावे थके पाठली चार घडी रात रहे थके पञ्चावन्न अध्ययन पुण्य फलना कठेवावाला अने पञ्चावन्न थध्ययन पाप फलना फदेवावाला तथा बत्रीश अध्ययन पूरघा विना कहीने बेरो प्रधान नामा मरुदेवीनु थध्ययन प्ररूपता थका काल प्राप्त थया, उचा गया, जाति जन्म जरा मरणतुं वधन कापीने सिम थया, बुद्ध थया,मुक्त थया, कर्मोनो थत करीने सर्व संताप रहित यया स्वथी लूटा ॥ १४ ॥ ॥ जगवान श्रीमहावीर स्वामि मोक्ष गया पबी नवसे वर्प वीत्यां थने दशमां सैकडानां ऐसी वर्ष थयां तेवारे एटले वीरनिर्वाणयी ए० वर्षे पुस्तक लखाणु थने वांचनामां नवशे व्याणु वर्षे पुस्तक लखाण एवं देखाय ने ॥१४ए । हवे नगवतनुं निरवाण ययुं, तेवारे शिविकना श्रासन चलायमान थया, भगवतनुं पांचमुं निर्वाण कल्याणक जाणी सर्वश्नेगा थश्ने चमरेशविके वावना चंदने करी जगवतनी चय रची, थामिकुमार देवोयें थमि मूक्यो, वायुकुमारे वायरो विकूर्यो, नगवतना मांस सर्व शो पायां पठी मेघकुमार देवोयें वरसाद वरपायो शरीरनी राख वीर समुश्मा नाखी, नगव तनी ठपरती दादा सोधमै सीधी, देवली दादा चमर लीधी, ते वादाने रनमय माष तामा राखी पूजे ए विस्तारे अधिकार श्री जंबुदीपप्रज्ञप्तिा कह्यो , पाथी जो ॥ दवे पुस्तक प्तस्वाणु ते श्रा प्रमाणे के श्रीवीर निर्वाण परी यानीपुर नगरे देवर्षिगणिमात्र चित्र ५ भगनानने अम्निसस्परमवा अदिसा मार 'प्रतीदिश mil भगराननेअग्नि संसार फररामारे पातरवी माथी उनारपा

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- चित्र ५२ M WAT अग्निमस्कार सम्पापी मारमा उगमा करी तमा यी देता दारा अने भस्थि प्रमुख मई जायते केटमाएक गवनी पोरसीमन मा मण प्रमुख सर्व श्रीसघे मलीने सिद्धांत पुस्तकारूद कीघो, एटले आगल तो सर्व सूत्रो था चार्य प्रमुखने मुस्खपाठे दतां पठी धार वर्प काल पच्यो तेने लीघे केटला एक साधु मरण पाम्या तेथी घणा सूत्रपात साधुउने मुखे दता ते विशेव गया, तेवार पनी जेवारे सुगाल थयो, तेवारे सूत्रोनो विनाश यतो देखी साधुनो सघ नेगो थ जेने मुखे जेटलो पात स्म रणमा रह्यो हतो ते सर्व तालपत्र उपर लखी पुस्तकारूढ कस्यो तथा केटला एक एम कहे जे के नवशे एशीमा वर्षी सर्व सिधात पुस्तकें लखवा मामघा ते नवशेने ज्यापुमे वर्षे सपूरण सखाइ रह्या एवं पण देखाय ने यत' ॥ वनदिपुरमिनयरे, देवष्ठिपमुद सयल सहिं ॥ पुठे थागमल दिन, नवसय थसिया वीरा ॥१॥ तथा कोइ एक कहे के सर्कविला चार्य मापुरी वाचना करी पुस्तक लिख्यो वे तथा कोइएक कहे जे के कालिकाचायें चोथनी सवत्सरी नवशेने त्र्याणु वर्षे थापी थने पक्षी चौमासी एक दिवसे थापी एवा केटला एक मतथी बोले - तेनो मुदो केवली जाणे ए वातनो विशेष विस्तार दीपिका प्रमुख यकी जा एवो॥ श्रीवीर प्रजुना शासननु प्रमाण एकवीश हजार वर्षनु कहुं ॥ श्रीवीर प्रजना नव ग एधरतो प्रनु पोते उताज राजगदि नगरीये एक महीनानी सलेपणा करीने परिवार सहित सिदि पाम्या ने थने वीरनिर्वाण पनी वार वर्षे श्रीगोतम स्वामी मोद पाम्या डे, साप्रत पां चमा कालमा जे मुनिराज वर्ने ठे ते सर्व जगवतना पाटे श्रीसुधर्मा स्वामी पाचमा गणधर वेग हता तेनो परिवार जाणवो ते श्रीसुधर्मा स्वामी वीरनिर्वाण पनी वीश वर्षे सिदि पाम्या वे तथा श्रीवीर जगवाननो जन्म चैत्र महीनामां ने अने कार्तिक मासमां मोक्ष गया ने माटें बहोतेर वायु वरावर मलतुं नथी ते धावत घणा ग्रयोमा सवत्सरना दिनमाननो फेर ॥ हवे देखाडी समाधान करे परंतु खरेखरी वात केवली गम्य वे ए श्रीमहावीरना पाच कल्या णक विस्तारे कहां ए वा वखाण पर्यंत श्रीवीर नगवाननोथधिकार जाणवो ॥ इति सुवो पिनी नापाया पष्ठी व्याख्यान समाप्तं ॥ ६ ॥ ॥यथ सप्तम व्याख्यान प्रारंनः॥ पद्यानुपूर्वी न्याययी श्रीपार्श्वनाथ स्वामीना पांच कल्याणक कहे ते कालने विपे ते समयने विपे श्रीपार्श्वनाथ थरिदंत प्रेराठ शिलाका पुरुपमा प्रसिद जेने सर्व मतवाला जाणे एवा श्रीपार्श्वनाथ स्वामीना पांच कल्याणक विशाखा नक्षत्रमा थया ते कटे ने विशाखा नक्षत्रमा देवलोकयी चवीने वामादेवीनी कुस्खे उपन्या, विशाखा नक्षत्रमा जन्म पाम्या, विशाखा नक्षत्रमा गृहस्य पणाने त्यागीने साधु पणन महण कीg, एटले दिक्षा लीधी, विशाखा नक्षत्रमा सर्वोत्कृष्ट केवलझान थने केवल दर्शन उत्पन्न थपु बे थने विशाखा नक्षत्रमा मोझ गया वे इति संक्षेप वाचना ॥ १५० ॥ ॥ हवे विस्तारथी वाचना लखीये 3ये ते का लमा ते समयमां श्रीपार्श्वनाथ पुरुपोमा प्रधान ते छनाजानो पहेलो महीनो, पहेलु पखवा इयु एटले चैत्रवदि चोयने दिवसे प्राणातनामा दशमा देवलोकयी वीश सागरोपमनु था उद्धे पुरण करीने तिहाथी चव्या ते हा जवछीपना जरत क्षेत्रने विपे वाणारसी नगरीमा अश्वसेन नामा राजा तेनी वामादेवी नामे राणी तेमनी कूखे मध्यरात्रीय विशाखा नक्ष मां चंमानो योग होते ठते देव सवधि थाहार, वेव सर्वधि शरीरनो त्याग करीने ॥ प्रथा यथ ॥ ७० ॥ गर्नपणे ठपज्या ॥ १५१॥ ॥ दवे श्रीपार्श्वनाथ जगवान प्राणात देवलोकें कया नवयी श्राव्या ते दविवा सारु श्रीपार्श्वनाय स्वामिना दशनव लखिये यें ॥ था जंबुद्धीपना नरतक्षेत्रमा पोतनपुर नामक नगरनो थरविंद नामा राजा तेनो विश्वनति नामें पुरोदित दतो तेनी थनुरी नामनी स्वीना एक फमत श्रने धीजो मरुति ए ये पुत्र दता पठी थनुक्रमे तेनां माता पिता काल धर्म पाम्यां केटे राजायें कमन्ने पुरोहित पदवी थापी पण ते कम स्वनावे कोर, लपटी, उष्ट मागलक्षणवालो मूर्ख ने तेनी स्वीनु नाम वरुणा ने थने अमरनूति तो सरज सजाववालो नश्कपरिणामी धर्मात्मा आवकधर्म पा लनारो वे तेनी स्त्री वसुधरा नामे थत्यंत स्वरूपवाली थने घणी चपल स्वनाववाली ने एक दिवसे ते कम मरुनूतिनी स्त्रीने देखी रूपे मोह्यो थको लोग करवाने माटे तेने वेत्रण वार वोलावी तेवारे ते स्त्री पए कम उपर राग करवा लागी एक दिवसे कमते प्रधान वस्वानूपण थापीने वसुंधराने पोताने वश करी मांदोमांहे प्रीति बांधी नोग कर्म करवा । मांमधो ते वात कमनी स्त्री वरुणाना जाणवामां थावी तेवारे पोताना जरतारने कद्देवा जागी जे दे नरतार' था श्रत तमे करोडो ते सारु देखातु नथी जो देवरना जाणवामां थावशे तो लोकोमा निवा थाशे एवो पोतानी स्त्रीये कहेलो उपदेश कमते मान्यो नही तेने लीघे ते वरुणा नाराजी था यकी कमठना धनाचारनी वात मरुनूतिने कद्दी तेवारे मरुनूतियें जाएयु जे पोतानी नजरे दीग विना एकाएक स्त्रीयोनी वात मानवी नदी एम विचारी एकदिवसें कपटथी कोक गामे जवानो मिप करीने बाहेर गयो वली कापडीनो वेश करी पागे मरुनतिने घेर एटले पोताने घेर थावी रह्यो ते रात्री तेणे उराचार कमठ थने पोतानी स्त्री वेदुने क्रीडा करतां दी तेवारे कोधकरीने प्रनातें कमग्ना उराचारनी वार्ता अरविंद राजा धागल थावीने कही राजायें कमनने पकही चोरनी पेरे मे दाले करी रासन उपर चडावी नगरमा फेरवी विटंबना करी शहेरनी बाहेर काहाडी मूक्यो अने मरुजूतिने पुरो दित करलो पठी कमठ कुस्खी थयो थको को तापसनी पासेथी दीक्षा लश् वारवपे पर्यत तपस्या करतो पृथ्वीमा जमतो नमतो फरी पागे पोतनपुरनी वाढेर एक पर्वतनी उपर थाची तपश्या करवा लाम्यो पण गाममा न था। गामना सर्वलोक तेने तपशी देखी जो जनाविक थापे प्रशसा करे तेवात मरुनूतियें सांजलीने विचारोजे ए महारो महोटो नाइ डे में एने उख दी तेथी तापस थयो ने माटे हूँ पण जश्ने महारो अपराध खमावी श्रावु एम चितवी घणा नोजनाविक रधावी साधे लश् कमठने खमाववा गयो तिहां जश्तेने पगे लागी पोतानो अपराध खमावी पाटो वले ने एटलामा कमठे मरुनतिने उलखी पोतानो वेर स जारी तेना मस्तक पर एक महोटी शिला नास्वी तेथी मरुजूति मरण पाम्यो ए पहेलो नव कह्यो ॥१॥ ॥ हवे ते मरुजूतिनो जीव थार्तध्यानथी मरण पामीने पीजे नवें विंध्याच लनी थटवीमा सुजातिक नामा हाथी थयो थने कमठनो जीव पण उष्टकर्मना जोरथी ते पर्वत उपरथी उतरता नीचें त्रूटी पख्यो तेथी मरण पामीने तेइज विंध्याचलनी नमिमा पं खीनी पेरे उढतो चाले एवो कूर्कट नामे सर्प थयो दवे एकदा अरविंद राजाये सध्या सम यने विपे पंचवर्णी वादला दोन तेथी वैराग्य पामी दीक्षा ले अगीथार थंग नणी अप्रतप करता थका एकाकी विचरवा लाग्या एकदा सागरच नामा सार्थवादना संघनी साथे थाटा पद समेतशिखरनी यात्रायें गया तिदा विंध्याचल वनमा एक सरोवर देखी सघे तेस्थानके उ तारो कसो एवामां मरूतिनो जीव जे दाथी थयो रे ते पोतानी हाथणीयोना परिवार स दित तिहां सरोवरने विपे जल पीवा सारु थाष्यो तेणे को करी सर्व सपने सपश्च को तेथी सर्व सपवाराना लोक नासी गया पठी साघु काठस्सग्गमा मना हता तेने ते दाथीमा - रवा थाव्यो तेवार मुनिना तपप्रजावधी तिहां यंनाइ गयो ते अलगो छनो पको मुनिने जो वालागो मुनिने जोता थका हाथीने जातिस्मरण ज्ञान उपन्युं तेवारें पूर्वला नव देखी साधुने उलख्या पठी शूढ लावी करी साधुनें पगें लागो मुनिये पण नव्यजीव जाणीने तेने प्रतिबोध थाप्यो तेथी ते दायी समकेत पाम्यो ते जोश्ने वीजा पण घणा लोक तिदा प्रतिबोध पाम्या पठी दाथीयें श्रावक धर्म थंगीकार फस्रो प्रावकना वार व्रतनी थनिलापा धरतो थको सा धुने नमस्कार करी सरोवरमाथी पाणी पीने पोताने स्थानकें गयो साधुजी पण तिहाथी विहार करी सथवारानी पाल चाली यात्रायें गया चारित्र पालीने गुनगति पाम्या दवें मरु नतिनो जीव हाथी ते एक दिवस उनालाना दिवसोमां मध्यान्द समय तृषायें पीडायो थको तलाव उपर पाणी पीवाने थाष्यो तिहां कादवां खूची रह्यो ते वखत पेहेलो कूर्कट सर्प पण तृपायें पीडायो यको उडतो ठहतो तिहां थायो तेणे पाणी पीने पढ़ी हाथीने दीठो तेवारे थागला नव ना वैरनेलीघे हाथीनी उपर चढीने तेना मस्तकमां मक माखो तेथी तेज वखत हाथीने फेर व्यापी गयुं तिहां श्रावकधर्म पालवाना योगें गुनध्याने मरण पाम्यो ए वीजो नव ॥ २॥ ॥ दवे त्रीजे नवे ते दाथी त्याथी मरण पामीने थामें देवलोके देवता थयो थने हाथी पडता सर्प पण चपाश्ने मरण पाम्यो ते दाथीनी घातना पातकथी पाचमी नरकें जई नारकी पणे उपन्यो ए त्रीजो नव ॥३॥ ॥ चोये नवे मरुभूतिनो जीव पाठमा देवलोकथी चवीने जबद्धोपना पूर्वमहाविदेद क्षेत्रमा सुकष्ठ नामा विजयना वैतादय पर्वतनी दक्षिणश्रेणिमा तिलवती नामा नगरीने विपे विद्युतगतिराजानी कनकवती नामा स्त्रीनी कूखे पुत्र पणे उपन्यो तेनुं करणवेग एवु नाम मातपितायें दीधु श्र नुक्रमें युवावस्थायें सुरुपा नामा स्त्री परस्यो, राज्यने पण पाम्यो एकदिवसें मुरुपा राणी सार्थे सुख जोगवां गोस्वमा वेग यो सध्या फूली देखी वैराग्य पामी दीक्षा लीधी पनी वैतादय ना हेमशेल उपर कारस्सग्गमा मना रह्या ते थवसरमा कमतनो जीव पांचमी नरकथी नीकलीने ते पर्वत उपर सर्प थयो ने तेणे साधुने करज्यो तेथी साधुयें काल कीधो ए चोथो नव ॥॥ ॥पांचमें नवें साधु बारमे देवलोके देवता थया थने सर्प मरण पामीने पांचमी नरके गयो ए पांचमो नव ॥५॥ ॥बहे नवे मरुनतिनो जीव बारमा देवलोकथी चवीने था अवधीपना पमिम महाविवेहने विपे गंधीलावती विजयमा शुनंकरा नगरीनो वजवीर्य नामे राना तेनी लक्ष्मीवती नामे राणीनी कूखे पुत्र पणे थावी उपन्यो मात पितायें तेनुं वजनान एबु नामवीधु श्रनुक्रमे तेना पितायें तेने राजपाटें वेसाब्यो ते योवनवयमा राज पालतो थको संसा रिक सुख जोगवे ने एक दिवसें शुभंकरा नगरीना सद्यानमा श्रीक्षेमकर नामा तीर्थकर श्रावी समोससा तेमने वजनान राजा वांदवा गयो तिहां तीर्थकरनी वेशना सांगती ससार थ नित्य जाणी तीर्थकर पासेथी दीक्षा लश् थगीथारे अग जस्या जंघाचारणनी लब्धीना घले करी मुकविजय मांद निज्वलन पर्वत उपर कामस्सग रह्या ते अवसरमा कमतनो जीव पांचमा नरकथीनीकजीने वली वचमा संसारने विषे वीजा पण घण नवज्रमण करी ते पर्व तमा कुरंग नामा निन्न थयो बे ते नि पोताना स्थानकथी बाहेर थादेहो करवा निकल्यो वे तेवारे वजनान साघुने देखी पागला नवना वेरने लीये साधुने देखतांज थपशुकन थ{ जाणी कोष उपन्यो माटे साधुने सामु एक बाण मायु ते मर्मस्थानके लाग्यं तेथी साधु शुनध्यान ध्यावता मरण पाम्पा ए हो नव ॥६॥ ॥ सातमे नवे साधु गुनध्याने मरण पामीने मध्यम ग्रेवेयके देवता परो उपन्यो भने निम मरण पामी साधुनी घातना पापपी सातमे नरकें गयो ए सातमो नव ॥७॥ ॥ थाम्मे नवे मरुनूतिनो जीव मध्यम वेय कथी चवीने या अवधीपना पूर्व महाविवेहमा सुनकर विजयने विपे पुराणपुर नामे नगर तिहां कुशलवादु नामें वासुदेवनी सुदर्शना नामे राणीनी कूखनेविपे पुत्रपणे थावी उपन्यो मातायें चौदसुपना दातां पठी पुत्रजन्म थयो त्यारे माता पितायें सुवर्णयाद् एतु नाम थाप्यं दवे चौद सुपन देखवाना प्रनावथी ते सुवर्णयानु चक्रवर्तिनी पदवी पाम्यो, ब खम साधी चक्रवर्तिनी पदवी जोगवी, वृक्षावस्थामा तीर्थकरनी देशना सांजली दीदा सर वीश स्थानकर्नु तप थाराधन करी तीर्थकर गोत्र पांघ्युं हवे ते साधु एक दिवसें उजाडमा काम स्सग्ग ध्याने रह्या वे एवामा ने निमनो जीव सातमा नरकथी मध्यम शानस्तु पूरण करीने तिहाथी मरण पामी ते उजाउमा दीर गुफायें सिंह पणे थावी उपन्यो तेणे तिदा सुवर्ण वादु मुनिने वीवो तेवारे पूर्वनवना वैरथी सिंहने क्रोध उपन्यो तेथी साधुने विदारी नाख्यो ए थानमो जव ॥॥ ॥ नवमे नवे साधु शुनध्याने मरण पामी दशमा प्राणात देवलोके देवता पणे जश् उपन्याथने सिंह मरण पामीने चोथे नरकें गयो ए नवमो नव ॥९॥ ॥ दवे दशमा नवने विपे मरुनूतिनो जीव वशमा देवलोकथी चवीने श्रीवामादेवीनी कूद थावी उपन्यो भने फमठनो जीव चोथा नरकथी मरण पामीने एक दारिदी ब्राह्मणने घेर पुत्रपणे थावी उपन्यो तेनां मा पाप पालपणामाज मरण पाम्या पालथी दुखी थयो थको लोके तेना उपर दया थाणीने महोटो कीघो अनुक्रमे यौवनावस्था पाम्यो तेवारे निईनपणा माटे स्त्री मली नही तेथी थमर्प धरी पेट नरवा सारु श्रज्ञान तपश्या थावरी तापसनी पळवाडे लागी पंचाग्नि साधवा लाम्यो तेथी ते तापस थमितापणे कमग्नामें विख्यात थयो ति पार्श्वनाथ दश नव अधिकार समाप्त ॥ हवे श्रीपार्श्वनाथ थरिहंत, पुरुषमा प्रधान, प्रण झाने करी सहित माता नी कूखा थाप्या शहां चौदसुपन मातायें दी तथा सुपनपाठक बोलाव्या यावत् गर्ननी प्रतिपालना करी इत्यादिक सर्व अधिकार श्रीमहावीर स्वामिनी पेरे जाणी लेवो ॥१५॥ ॥ ॥ते कालने विपेते समयने विपे पार्श्वनाथ स्वामी शीयालानो वीजो महिनो त्रीज्नु पखवादिपु पोपववि वशमीने दिवसे नव मदीनाने साहासात दिवस गर्नमा गया थका मध्यरात्रिमा विशाखा नक्षत्रं मानो योग थावे थके वामाराणीनी कूखे रोगरदित पुत्रपणे जन्म्या ॥ १५३॥ ॥जे रात्रिमा श्रीपार्श्वनाथ जन्म्या ते रात्रिमा घणा देवता याव्या ॥१५॥ ॥ यावत् चोसत २ जन्ममहोत्सव प्रमुख करवा थाध्या तथा विग्रकुमारिकादि थावी ते सर्व श्रीमदावीर स्वामिनी पेरे श्रीपार्श्वनाथ स्वामीनु नाम लइ जश्ने इहां पण कहेतु पली अश्वसेन राजा जन्ममहोत्सव करीने कदेता दवा के महारी वामाराणीनी कूखे जेवारे ए पुत्र थाष्यो तेवारे वामाराणी झवामा पोतानी पासेथी निकलतो कालो सर्प दीतो तेथी थमारा था पुत्रनु नाम पार्थ होजो एम कही श्रीपार्श्व एवु नाम दी● ॥१५५॥ ॥पांच धावे पालन कराता, पीजना मानी पेरे वृद्धि पामता, माता पितादिकने थानद उपजावता यका अनुक्रमे युवान थवस्था पाम्या तेवारे कुशस्थल नगरना प्रसेनजीत नामे राजाने म्लेष्ठ लोकोये रोक्यो तेनो सदाय फरवा माटे अश्वसेन राजा जावा लाग्यो ते वखत पिताने व नीने पार्धकुमर तिदा जवाने तेयार थया ते जो श्श्महाराजे पोतानो रथ सारथी सहित मक्यो ते कपर सरीने ATAL Tier- ने जोर सर्व म्ह लोको नाही चित्र ५३ भोवो नाभीजापर श्रीपार्धनाथन AL पास गार मगेममा । FOR RZARMADHAN मभागनी HDVERY MaLO Hinu Int म lim ULLULLLL TIOCLOOOL. श्रीपानायनु र

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(चित्र ५४ कम तापस पार्मनाथ Vim गया जगवान तिहा गया सेने प्रसेनजीत राजायँ सन्मान दी। तिहां नीलवर्ण उधी, नवदा थनु शरीर, युवान थवस्था थने एक हजार थान लक्षणधारक, थत्यंत रूपवान, महा फातिवत सुदर देदीप्यमान तेजस्वी एवा श्रीपार्यकुमरने वेखीने प्रसेनजीत राजानी पुत्री प्रजावती नामें दती ते बोली जे हे पिताजी' मुजने पार्श्वकुमर साये परणावो पनी जगवा नन परणवानी श्वा इती नही तो पण राजायें घणो थामद करीने पोतानी पुत्री परणावी ते परणीने पाठा घेर थाव्या प्रनावती राणी साथे मुख जोगवे ले एवामां एक दिवसे वा राणसी नगरीने बाहेर पेलो कमठ नामा तापस थायो तिहां घणा लोको हाथमा पूजापो लइने पंचामि तापतो देखी तापस पासे जाता दता तेने प्रतुयें गोस्वमा वेग थका दीग तेवारे पार्थकुमर बोल्या के था लोको सर्व क्यां जाय जे तेवारे इज्जरी चाकर पासे उनो दतो ते बोल्यो हे महाराज' एक दरिडी ब्राह्मण दतो तेना मा वाप न्दानापामां मरी गया तेथी तापस थइ कम नाम धारण करीने फरतोफरे ते ते हाथायोडे तेने या सर्व लोको पूज वाने जाय ते सनिली जगवान पण तिहां थाव्या त्यां काटमा पलता सर्पने थवधि ज्ञानयी देखी करीने नगवान बोल्या थरे मूढ तपस्वी' था तु दयाविना वृथा कष्ट करे ले, श्रा तादारो श्रम ते दयाविना सर्व मिथ्या वे तेवारे कोध करीने कमठ तापस पोल्यो थरे राजा उना पुत्रोने तप जप करवानी शी परीक्षा दोय तमे तो हाथी घोडाउनी परीक्षा करो तपनी वाततो श्रमेज योगी पुरुपो समजीयें ठेय ए वातां तमे शं समजो? एवं कमतनुं वोलवू सां ननी नगवाने ते श्रमिकममांथी एक वलतु लाकड बाहेर कादाडी तेने कोदाहाथी फाइधु तेमाथी तापे करी व्याकुल थयेलो सर्प नीकल्यो ते सर्प नगवानना मुखने देखीने प्रक्षापूर्वक HOM नगवानना मुस्खथी नवकार पक्षस्काण सांनतीने तत्काल मरण पामी धरणे नागराजा थयो “घणी प्रतोमा तो थनिकुंमाथी चलतुं लाकडुनगवाने सेवकने दाथे वादार काहाडावी कुहा हो मगावी फोडाव्यु थने बलता सर्पने जे नवकार संनलाव्यो बे ते पण सेवकना मुखथी स जलायो जे एम स्पष्ट लखेलु " पनी तिहाँ एकठा ययेजालोको कमठने कहेया लागा के अरे ए अज्ञानी श्रधर्म करे ये जीवोने दणे बे एवो पोतानो थवर्णवाद सांजलीने फम लला पाम्यो, नगवान घरे बाष्या पढ़ी कमठ तिदायी मानघ्रष्ट यश वली थन्य स्थानके जइ घणा हाथी घणा कालपर्यंत विशेष पणे अज्ञान तपश्या करी मरण पामीने नवनपतिमाहे मेघ माली नामा देवता थयो । ॥ हवे एकदा वसतस्तुमा जगवान पोतानी राणी साथै वन कीठा करवा गया तिदा एक सुवर प्रासाद जो तेमां जश् घेता ते प्रासादमा नेमीश्वर नग वाननी नान संबंधी राजीमतीने त्यागी दीक्षा लीधी तेनुं चित्र चित्रेलु जोड्ने वैराग पाम्या हवे नगवान श्रीपार्श्वनाथ अरिहंत वक्ष, चतुर, ननी प्रतिज्ञा वाला, रूपवान गुणवान, नक,वि नयवान, त्रीश वर्प जगण गृहस्थावासें रह्या पनी लोकांतिक देव श्रावीने तेमने श्टकारी वाणी करी कहेता दवा ॥ १५५ ॥ ॥ जयजय दोवो समृधिमान् । यावत् हे कल्याण वान् । एतु कहीने जयजय शद करे ॥ १५ ॥ ॥ पदेला पण श्रीपार्श्वनाथजी मनुष्ययोग्य गृहस्थ धर्ममां पण थवधिकाने करी सहित ३ तेणे करी जाप्यं जे महारे दवे दीक्षा लेवानो अवसर श्राव्यो एतु जाणीने सवत्सरी दान प्रमुख सर्व श्रीमहावीरस्वामीनी पेरे थापीने शीया लानो वीजो महीनो, त्रीज पखवाडियु, पोपववियगीथारसने दिवसें वपोर पदेला विशाला नामा पणाला , देव मनुष्ये ते पालवी उपाडी ए सर्व दीक्षा महोत्सव श्रीमहावीरजीनी RTAमा -- 1 ५५ चित्र ५५ श्रापातीयजी- मराभरपी श्रीपार्चमायाधी पाही दा पेरें यादी पण समजयो परंतु एटखें रिशेप जे गराणसी नगरीमाथी थनें जिहां याश्रम पर नामा ग्यान के जिहां अशोरुटकले तिदा श्रारीने पालखीयो उतरीने अशोकरदनी नीचे पोताना दायथी घरेणा प्रमुख सर्व उतारीने पोताना दाथथी पंचमुष्टी लोच करे लोच करीने यज्म तप पाणीरदित करीने पिशाखा नहनें चंश्योग थावे थके एक वेपमुष्य वस्त्र जेश्ने प्रणसें पुरुपोनी साथै वीदा जीधी, थपगार यया ॥ १५ ॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथ थरि दत घ्याशी वियस पर्यंत नित्य कायाने दोसराीने जेको वेपना मनुष्यना थने तिर्यंचना करेला उपसर्ग होय ते सर्व सदन करे ॥ १५ ॥ ॥ दो श्रीपार्श्वनाथजीये श्रम तपर्नु पारणु कोपट सन्निवेशमा धन्नाने घेर परमान्ने करी कसु तिहां पांच दिव्य प्रगट यया साडी पारकोड सोनेयो वर्णा ॥ ॥ एकदिपस जगवान् विचरता थका कावरी अटवीमां गया, तिवां कलिंगिरि पर्वतनी नीचे ऊमनामा सरोवरनी पासे काउस्तग्गमा रह्या ते स्थानके महीधरनामा दाथी पाणी पीना याष्यो ते नगवानने देखीने जातिस्मरण झान पाम्यो, तेणेफरी पोतानो पूर्वलो ना वीवो जे श्रागला नामां दु हेमजनामा वामनो उजपुत्र इतो महारां सजन कुटुंब महारा उपर दसतां दता तेथी मने चिंतातुर देखीने महारो सुप्रतिष्ट नामा मित्र मने गुरु पासें जश् गयो तेनी पासेथी में श्रावकधर्म सीधो पण थत थवस्थामा महारी वामणी न्दानी कायाने निवतो थको मरण समयें मदोटी काया पामवानुं में नियाएं फटुं तेना योगथी हु महोटी काया पालो दाथी थयोबु एबुं जाणी ते हाथीय नगवानने के मजे करी ज्या ए हाथीनी पात सांजली चपानगरीनो पासी करक राजा तिहा थाव्यो ते टलामा नगरान पिदार करी गया जेथी राजा घणो मुख करवा लागो तेवारें ३ थावीने तिहां नव दायनी श्रीपार्श्वनाथ स्वामीनी प्रतिमा प्रगट करी पडी राजायें तेनी पूजा क रीने तिहां मविर कराव्यु ते स्थानकें कलिकुंम नामे तीर्थ थयु, हाथी मरण पामीने व्यं तर देवता थयो ते चैत्यनो थधिष्ठायिक थइ रह्यो। ॥ एकदा समये राजपुरनो ईश्वर नामा राजा ते श्रीपार्श्वनाथ स्वामीने काम्सग्गमा उना देखी जातिस्मरण झान पाम्यो, तेणे करी पोतानो पूर्वजो नव दीगो तेथी मूर्ण थावी गई पनी ज्यारे सावधान थया त्यारे तेने म पीयें पुनपुं स्वामी तमे मूर्या केम पाम्या ' तेवारें राजा बोल्यो में महारो पूर्वजो नव दीगो जे हूँ वसंतपुर नगरमा एक कोटीयो ब्राह्मण दतो ते रोगना 5 खने जीघे गगानदीमां पडीने मरवा तेयार थयो हतो एटलामा एक चारण मुनियें थावीने मुजने प्रतियोध दीधो - पठी समकेत वासनायी व नित्य चैत्यनां वर्शन करवा जाप तिदा मुजने पुष्कल नामा श्रावके दीगे थने कड़वा लागो के थरे या कोढीयो मदिरमा केम जाय । पठी ते श्रा चकै सुनिने पूब्यु महाराज! ए कोढी मदिरमा जाय तेनो का दोपजे किंवा नथी तेवारें मुनि वोज्या दूरथी नमवामा कांइ पण दोप नथी वत्ती हे श्रावक । ए ब्राह्मण थागामिक नवे राजपुरनगरे ईश्वर नामा राजा थाशे ते श्रीपार्श्वनाथजीने काठस्सग्गे रह्या देखीने जातिस्मरण पामशे माटे हे प्रधान' ते कोढीयो ब्राह्मण मरीने दुश्वर नामे राजा थयो ड, पढ़ी ते ईश्वर राजायें जक्तिनावथी तिहा चैत्य कराव्यो तेमा श्रीपार्श्वनाथजीनी प्रतिमा थापी तिदा कुकुहे सर नामे तीर्थ थयुं । एक समये नगवान विहार करता थका कोइ नगर नजीक तापसनो थाश्रम इतो तेनी पासें व्याख्या एटलामा सूर्य थस्त थयो तेवारे जगवान वटवृदने नीधे एक कूगानी पासें यमग थ्याने कामस्सग्ग रह्या ते अवसरमा पर्वनानो वेरी मेघमाली अ (चित्र५६

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चित्र ५७ LLLLLICE सदा पपानी प्रमा धम देवता अवधिदानने बजे नगवानने हा उना देखी पूर्वनवन वैर संजारी थमप॑ पुस्लो थको फोघे करी उपसर्ग करवा लाम्यो तेणे प्रथम वेतालना रूप करी नगवानने वीवराव्या पण जगवान तेनाथी मखा नही पड़ी सिंदना रूप, वींबीनां रूप, सर्पनां रूप, हाथीना रूप वीजा पण अनेक जातिनां रूप विकूनि नगवानने करडवा लाग्यो मसलवा लाग्यो तोपण नगवान तेनाथी दोन पाम्या नही चलायमान थया नदी तेवारे विशेष क्रोधारुण यश्ने घणो गर्जारव करी विजली विकू तेनी साथे कल्पांतकालनो पवन विकू: ते पवने करी धूलने अमावतो थको श्राकाशने पण बाइ मूक्यु थने धूल साथे मलेला पाणीनी मूसल धारायें वष्टि करी तथा ब्रह्मांम स्फोट सदृश गरिव करो, दशे विशायें वीजलीना कपीया उ त्पन्न करी त्रास पमाडवा लाग्यो तिहां पाणीनु पूर नवी जेवु वदेवा लाग्यु जोरवालु पाणी चदयु, मेघलीनेविपे थाकाश अंधकारमय थइ गर्यु ते वखते नगवानने कठसुधी पाणी उचु श्रावी लाग्यं तोपण मम्या नदी ते समये धररोज्नुं श्रासन चलायमान थयुं तेवारें अव विज्ञान प्रजी जगवानने उपसर्ग थयो जाणीने पद्मावती प्रमुख श्रग्रमदोषीयो सहित तिहां थावीने प्रचने मस्तकें फणाटोपे करी बत्र धषु थने प्रजुना चरणनी नीचे कमलनी रचना करी एप्रकारे वरसावना समूदने बध राखवा मागय करी पोतें शणी सदित प्रनु धागल नाटक करवा जाग्यो पण वरसाद पडतो बध थयो नदी तेवारे धरणे जाण्यु जे प्रलयका जतो दमणा नही तो श्रावा प्रकारनो मेघ केम वरसे ने एम विचारी थवधिझाने जोड़ें तो मेघमाली रुत उपसर्ग जाएयो तेवारे मेघमालीने जलकासो के थरे उष्ठ, पापिष्ट, तनन, थघम, तें आ थकार्य करवा मामघु जे प्रचुयें तो तादारा उपर गुण कसो डे ते क्सटो तुजने थवगुण यह परिणम्यो तेथी तु विपरीत यश्ने एमनी उपर क्षेप करे ये परंतु जग वान पोते तो थतुलवलना घणी तथापि ते दमावत दयालु ले तेतो सहन करशे पण दुता हारो श्रपराधसदन करनार नथी थरे मूर्ख तुजने रुडो अपवेश पण वैरकारी या पब्यो तो हवे तुजने दु तादारी कमाइ देखाडीश, तें स्वामीनी घणी थाशातना कीधी डे पण दवे तु क्या नाशी जश्श एम कही धरणे३ तेना क ज मूक्युं तेवारे जेम वाजने देखी सूडो तथा कबुतर नयनांत थाय तेम कम नयांत थयो यको पोतानी देवांगना सहित नग वान पासें श्रावी तेमना घरगनुं शरण ग्रही नगवानने नमस्कार करीने पोतानो अपराध खमाववा लाग्यो थने कहेवा लागों के दवे बाजपली ? एम नही करीश ते जोइ धरणेई कए के तुं महोटाने शरणे थाव्यो माटे महारो साधर्मि ना समजीने तुने मुकुटुं पढ़ी दश नव वेर खमावी प्रनु पासे नाटक करीने कम पोताने स्थानके गयो भने धरणे पण नाटक करी पोतानी शणी सहित स्वस्थान गयो थाही धरणेई प्रण दिवस पर्यंत जग वानने मस्तकें फणन बत्र रारण्मु तेथी ते नगरी यदिबत्रा एवे नामे करी प्रसिह था ॥ दवे श्रीपार्श्वनाथ स्वामी थणगार थया, पांच समिति यने त्रण गुप्ति सदित थया यावत् यामानुग्राम विचरता थारमाने नावता थका ध्याशी दिवस वीत्या थने घोराशीमो रात्रि दिन वर्तमान उर्ता अनालानो पहेलो महीनो, पहेलु पखवाठियुं चैत्रवदि चो थने दिवसे, विशाखा नक्षत्रे चश्मानो योग थावे थके, पहेला वे पदोरना काल सम पने विपे, धावडी वृदनी देते पाणी रदित चविदारो बन्तप कीघे थके, निर्व्याघात पणे आवरण रहित समम परिपूर्ण जलदलता सूर्य सरखं पर्यु केवलज्ञान थने केवलवर्शन प्रजुन उत्पन्न पयु सेयी सर्व जीवोना नाव जापता थका देवता यका विचरवा लाम्या ॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथजीने एक शुन, बीजो थार्यपोप, श्रीजो विशिष्ठ, चोथो ब्रह्म चारी, पांचमो सोम, उहो श्रीधर, सातमो वीरन, थने थाउमो यशस्वी ए थाउ महोटा गधना धणी एवा गणधरोनी सपदा थइ ॥१६॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथजीने थार्यविन्न प्रमुख शोलहजार साधुनी उत्कृष्ठी संपदा थइ ॥ ११॥ ॥श्रीपार्श्वनाथजीने उत्कृष्टी पुष्प चूला प्रमुख थाइत्रीश दजार साधवीनी संपदा थइ ॥१६॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथजीने उत्कृष्टी सुव्रत थाविवेश एक लाखने चोसठ हजार आवकोनी संपदा थइ ॥१६॥ श्रीपार्श्वनाथनीने उत्कृष्ठी सुनवा प्रमुख प्रण लाखने सत्तावीश दजार प्राविकाऊनी संपदा यइ ॥१६॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथजीने उत्कृष्टी केवली नदी पण केवजी सरस्खा एवा साडा प्रणशे चौद पूर्वधारी मुनिनी संपवा थइ ॥ १५॥ ॥श्रीपार्श्वनाथजीने कष्टी चौदशे शवधि झानिनी संपदा थर, एक दजार केवलीउनी सपदा थइ, बगीचा रसे वेकिय जब्धिवतोनी संपदा यइ, बशे अनुमति मन पर्यवज्ञानीठनी सपदा यइ, एक हजार साधु मोक्ष गया, वे दनार थार्या मोद गर, थारशे विपुलमतिनी संपदा यश, बसे वादीनी संपदा थर, वारसे साधु अनुचर विमाने गया एकावतारी थया, ए प्रचना परिवा स्नु प्रमाण जाणवू ॥ १६ ॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथ पुरुपादाणीने के प्रकारनी थंतगड नूमि थइ तेमा एकतो युगतकतनूमि ते श्रीपार्श्वनाथना चार पाट पर्यंत मोक्ष मार्ग चाल्यो वह्यो, पीजी पर्याय थतरुतनूमि ते नगवान केवल ज्ञान पाम्पा पढी त्रणवर्षे कोश मुनि सिदि पाम्यो एटजे प्रणव मोक्ष्मार्ग चाल्यो ॥ १६ ॥ ॥ते कालने विपे ते समयने विपे श्रीपार्श्वनाथ पुरुपादाणी त्रीशवर्ष पर्यंत घरवासे रह्या थने त्र्याशी दिवस बसस्थपणे रह्या तथा व्याशी दिवसे न्यून सीतेर वर्ष पर्यंत केवल पर्याय पाल्यो परिपूर्ण सीतेर वर्ष साधुपणु पाम्पुं सर्व मती एकसो वर्ष श्रायुष्य पालीने, शेप रहेला चार कर्म खपावी था थवसर्पिणी कालनो उपम सुपमा नामे चोयो थारो ते घणो वीती गयो थने स्वल्प रह्यो ते थवसरमा वर्पादनो पहेलो महीनो वीज पखवाडियुं, एटले श्रावण शुदि धातुमने दिवसे समेतशिखर पर्वतनी सपर मास खमणना चविदारा पाणीरदित तपमा थपसण कीधे यके सेलेसी थवस्थायें योग सवरीने तेत्रीश बीजा साधु थने चोत्रीशमा श्रीपार्श्वनाथ पोते, विशाखा नक्षत्रमा चश्मानो योग थावे थके मध्यरात्रिना समयमा लोवा हार्थे कामसग्गें उना काल प्राप्त थया निरवाण पाम्पा सर्व 5 खथी रदित थया ॥ १७ ॥ ॥ विशेष वात श्रीपार्श्वनाथ चरित्र थकी जाणवी, श्रीपार्श्वनाथ परमेश्वर पुरुपमा बादानी एटले वादेय वचनीय ए विरुदना धरनारा एम प्रत्येक शब्दे जोडी देखाहीये श्रीपार्श्वनाथ स्वामी मोक्ष गया पठी वारसोने त्रीश वर्षे श्रीकल्पसूत्र पुस्तक उपर लखाणु केमके श्रीपार्श्वनाथ मोक्ष गया पतीथदीशे वर्षे तो श्रीमहावीरस्वामी मोक्ष गया ते पढ़ी नवशे एसी वर्षे पुस्तकारुढ थर्यु ॥१६॥ ॥ इति श्रीपार्धनाय चरित्र समाप्त ॥ ॥ दवे पचानुपूर्वीयें करीने यावीशमा श्री नेमनाथ स्वामिन चरित्र लखीय बैये ते कालने विपे, ते समयने विपे थरिदंत श्रीथरिष्ठनेमि तेमना पांचे कल्याणक चित्रा नक्षत्रमा थया ते कहे ने एक चित्रा नक्षत्रमा देवलोकयी चष्या, बीजो चित्रा नक्षत्रमा जन्म थयो, त्रीजो चित्रा नक्षत्रमा दीक्षा लीधी, घोथो चित्रा नाना । केवल ज्ञान उपन्यं, पांचमो चित्रा नहलमा मोह गया इति सक्षेप यांचना ॥ १० ॥ =" ॥

चित्र ५८ साधनी साप पाराम निवएि पापा

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पे चित्रा नक्षत्रमा चष्मानो योग होते ते गर्नपणे थावी उपन्या तेवारें चौदस्वम मा विशेष यांचना कहे ॥ते कालमा ते समयमा श्रीनेमनाथ स्वामी श्रा वा कालनो चोथो महीनो, सातमो पक्ष एदले कार्तिक वदि पारसने दिवसें थपराजित नामा मदा विमान जिहाँ पतीश सागरोपमनु श्रापुरे तिहाथी चवीने था जबूछीपना नरतक्षेत्रनेविपे शो रीपुर नगरना समुविजय नामा राजानी सिवादेवी नामे नार्या तेनी कूरखमा मध्यरात्रिने तायें दी इत्यादिक सर्व वर्णन श्रीमहावीर स्वामीनी पेरें दर्दा पण कहेतुं ॥ ११॥ ते कालने विपे ते समयने विपे श्रीनेमिनाथ थरिदंत वर्पाकालनो पहेलो मदीनो, वीज प खवाठियु एटाने पावणादि पंचमीने दिवसें नव महीनाने साहासात दिवस गर्नमा पूरण थये पके यावत् चित्रा नक्षत्रे पश्मानो योग आवेयके पुत्र पणे जन्म्या, श्हा जन्म महोत्सव प्रमुख सर्व श्रीमहावीरस्वामीनी पेरे श्रीनेमिनाथजीना नामथी कहेवु पढी माता पितायें थ रिष्टनेमि एवं नाम प्राप्, तेनु कारण कहे जे नगवाननी माता शिवादेवीजीयें पन्नरमा स्व ममा अरिष्ट रमनु चक दी तेयी थरिष्टनेमि ए नाम थाप्यं तथा लोकोनां अरिष्ट चूना मटाया माटे थरिष्टनेमि एवं नाम दीधु दवे नगवानने वालपणामां शाणी थावी रमत करावे जे वारें प्रजुने नख लागे तेवारें पोताना अगूगने चूशे ते थगूगमा देवो थावीने थ मृतनो सचार करे परंतु मातानां स्तन चशे नही एवा थनुक्रमे प्रत्रुजी वृद्धि पामता दवा प्र सुना शरीरनो श्यामवर्ण २ तथापि महा स्वरूपवान एकदिवसे श्रीनेमिनाथजी पाजणामां रमत करे ने ते वखते श्महाराजे पोतानी सत्तामाहे प्रजुना वल पराक्रमनी प्रशसा करी ते वात कोश्एक देवताथणसबदतो यको त्यांथावीनगवानने पालणामदियी कपाडीने सवालाख योजन दूर लइ गयो तेवारे जगवाने या कोई देवप्रयोग में एवं जाणीने कांक स्वल्प बल देखाउघु तेथी देवता नीचे थावी पख्यो थने एकसो योजन पर्यंत धरतीमा पेसी गयो तेवारे ६३ थावी धनुकंपा घाणीने देवताने बोगव्यो अने जगवानने पाला पालणामां मूकी स्त वना करीने महाराज पोताने स्थानकें गया ॥ ॥ दवे सूत्रकार पागल एवं कदेशे के श्री नेमीश्वर नगवाने झारिका नगरीमा दीक्षा लीधी तेवारे सांजलनारने धार्शका उपजशे के ज न्मतो शोरीपुरमा थयो अने दीक्षा हारिकामा जीपी ए वात केम मले ए संवेदने मटाव वाने माटे यादवोनी उत्पत्ति कहे ॥ ॥ पूर्वे हरि यने हरिणी ए वे युगलीया थकी दरि वश कुल प्रगट थर्पु, ए वात बागल वश बछेराना अधिकारमा संक्षेपथी लखाइ गइले ते पनी ते रिराजानो पुत्र यव थयो यने तेनो पुत्र वसुराजा थयो तेना वशमा अनुक्रमें या राजा थयो तिहाथी यादववा प्रगव्यो पनी ते यमुनो पुत्र शूरराजा पयो तेना वली एक शोरी यने वीजो सुवीर ए वेपुत्र थया तेमा मोटो पुत्र शौरी ने तेने मथुरार्नु राज्य थापीने सुवी रने युवराज पाटे थापी शूरराजायें चारित्र ली, पढ़ी शोरीराजा पोताना न्हाना नाइ मुवी रने मपुरानु राम्प यापी पोतें कुशावर्न देशमा जइ पोताने नामे शौरीपुर नामा नवीन नगर वसावीने तेनुं राज्य करवा लाम्यो अने सुवीर मधुराचं राज्य करे जे हवे शोरीरानाने अधक, वृष्णि नामे पुत्र पयो अने सुवीरने नोजकवृष्णि नामा पुत्र थयो ते नोजक वृष्णिने वली उग्रसेन नामा पुत्र थयो पनी नोजकदृष्णिये धमसेनने मघुरार्नु राज्य बापी पोते दीक्षा जीधी, वे अधकवृष्णिने दश पुत्र चया तेनां नाम कहे जे एक समुविजय, बीजो श्र होन, बीजो स्तमिस, चोपो सामर, पांचमो हिमवत, उ अचज, सातमो परण, भातमो ५ रण, नवमो थनि थने वशमो वसुदेव ए वशे वशाई फदेवाय हवे अधकवृष्णियें पोताना महोटा पुत्र समुहविजयने शोरीपुरनु राज्य थाप्यु थने एज अधकष्णिनी एक कुती थने वीजी माझी ए वे नामे वे पुत्री थइ तेमा कुंती पांमुराजाने परणावी थने माड़ी वमघोप रा जाने परणावी॥ ॥दा संक्षेपयी पोमवोनी उत्पत्ति कहे , प्रथम रुपनदेवजीनो पुत्र कुरु नामा थयो तेणे कुरुवेश वसाव्यो तेनी पळवाडे तेना पाटें थसंख्यात राजा यया तेमाथी एक दस्ति राजायें दस्तिनागपुर वसाव्यु तेवार पनी केटलोएक काल वीत्याकडे सुनूमनामा चक्र वर्ति राजा थयो तेवार पठी वत्ती घणा राजा थयाकडे एक शंतनु नामे राजा थयो तेनीवे यह तेमा एकतो विद्याधरनी पुत्री गंगा दती तेने गांगेय नामे पुत्र थयो तेनु नीष्मपिता मह एवं पीज नाम लोकमा प्रसि६ थर्पु दतुं अने बीजी राणी सत्यवती नामे इती तेना वे पुन यया एकनुं नाम चित्रांगद बने वीजानु नाम विचित्रवीर्य पड़ी शतनु राजा चित्रांगदने राज्य थापीने परलोक प्राप्त थयो दवे ते चित्रांगद एक दिवसे कोई नीजांगद राजा सार्थे। युरू करता मरण पाम्यो तेवारे विचित्रवीर्य राजा थयो तेनी एक श्रविका,बीजी श्रवालिका थने त्रीजी थवा ए प्रण नायर्या इती तेमा थविकानो पुत्र धृतराष्ट्र थयो तेनी गांधारी प्रमुख थाठ स्त्रीयो इती तेना फुर्योधनादिक सो पुत्र थया थने बीजी अंचालिकाने पांकु नामे पुत्र थयो तेनी एक कुती नामे स्त्री दती तेने एक युधिष्टिर, वीजो नीम थने त्रीजो थर्जुन एत्रण पुत्र थया थने वली बीजी माडी नामे स्त्री दती तेनु थपर नाम पद्मा एतु दतुं तेना एक नकुल थने वीजी सहदेव एवा वे पुत्र थया एम बने स्त्रीयोना मली पांकु राजाना पांच पुत्र थया ते पांच पोमवो कहेंवाणा, दवे विचित्रवीर्यनी त्रीजी स्त्रीथवा इती तेने एक विदूर नामे पुत्र थयो एरीतें पांमवोनो संवध संक्षेपयी कह्यो । ॥ दवे थधकवृष्णिनी वीजी पुत्रीजे। वमयोप राजाने परणावी इती तेनो शिशुपालनामा पुत्र थयो तेने पोको मारो एवीरीतें व्यास्या कग्यापटी यधकवृष्णियें दीक्षा लीची, हवे मथुरार्नु राज्य उयसेन राजा चलावे ने तेनी धारणी नामे राणी ने थने शोरीपुरर्नु राज्य समुविजयराजा चलावे रे तेनी शिवावेवी नामे नार्या वे ते शिवादेवीने नेमिकुमार पुत्र थयो घीजा पण सर्व नाइन एकग नेला रहे जे दवे मधुरामा उग्रसेनराजा सुखे राज पाले ने एक दिवसे ते नगरीनी वाहेर वनमा एक मासी पवासनो करनारो एवो एक तापसथाप्यो तेनो एवो नियम बे के महीनानी अवर को था वोने कहे के महारे घेर पारएं करजो तो तेने घेर पारण करे पण वीजाने घेर पारण करे नही अने जो नोतर्क थापनार धणी जूजी जाय थने तापसने पारणं कराववा माटे तेहवा सारु नही आवे तो वली वीजा एक मासनु पञ्चस्काण करी लीये एवो ते तापस मासिक उपवास करीने वना वेगे वे तिहां उग्रसेन राजा रमवा गयो थने वनमा तापसने देखी राजायें पोताने घेर पारण करवानी वीनति करी पारण करतु कबुल करावीने पोताने घेर थाष्यो परंतु जे दिवसें पारण कराववार्नु दतु ते विवसें विस्मृतिमा तापसने वोलाववा मा एस मोकक्यु नदी तापसे पण सांज सुधी वाट जोइ को बोलाववा नही थाष्यो तेवारे वली वीजा महीनानी तपस्यानो नियम करी लीयो तेवारपनी वत्ती केटलेक दिवसें राजाने ते तापस याद थाव्यो के थरे में था केवु थकार्य कर्यु जे तापसने नोतरीने जमवा तेच्यो नही एम चितवी फरी पण तापसने जमवानु थामत्रण करी थाप्यो परंतु बीजी वार पण । पारणाने विवस जमवा सारूं तेरवाने नूती गयो एवीज रीतें वजी श्रीजे महीने पण नोतलं यापोने जमाडवाने वस्वत तेडवानुं नूनी गयो तेथी तापसें राजा उपर क्रोध करीने विचारो जे या ऽष्ट राजा मने नोतलं श्रापी जाय ने जमाडतो नथी माटे जो मदारा तपनो प्र नाव होयतो दु एने नवातरमा 5 व देवावालो थावं एवु नियागु करी तिहाथी मरण पा मीने उग्रमेन राजानी नार्या धारणीनी कूखमां थावी उपन्यो तेना प्रनावथी राणीने त्रीजे महीने राजानु कालजु सावानो मोहोलो उपन्यो तेथी शरीरे उर्वल यश् तेने घणु घणु राजायें पूगु तेवारे मोहोला सबधि जेवी वात हती तेवी राजा श्रागल कही, पठी राजायें प्रधाननी यफलथी ते मोहोनो पूरण कस्यो राणीय गर्न पाडवाना घणा उपाय कस्या पण गर्न पख्यो नही नेट ना महीना पूरण यये पुत्र जन्म्यो ते जन्मताज राणी तेने कासानी पेटीमां नाग्याने माहे नामाकित मुश्किा मूकीने ते पेटी यमुना नदीमा वहेवरावी दीधी ते कांसानी पेटी तरती तरती मधुरायी शोरीपुर श्रावी एवामां घृत थने तेलनो वेचनार सुन नामे वा णीयो ते यमुना नदीमा स्नान करवा थाव्यो तेणे ते पेटी नदीमाथी बाहेर कादाही सश्ने उघाडी जो तो तेमा वालक दीठो तेवारे ते वाणीयो मुश्किासहित ते बालकने ठानो मानो पोताने घेर लइ थावीने पोतानी स्त्रीने पुत्र सोप्यो भने लोकोने कडेवा लाग्यो के म हारी स्त्रीने गूढगर्न पुत्र थयो तेनुं नाम कस थाप्यं अनुक्रमे ते वालक महोटो थयो तेवारे मस्ति करे लोफोना ठोकराउने मार थापे तेथी लोक थावीने सुनने नित्य उंजना श्रापे तेवारे वाणिये विचायुं जे द्रुतो सामान्य माणस वू थने थातो राजपुत्र ने माटे मदारे घेर ए केवीरीतें रही शके एच जाणी वाणीयायें ते ठोकरो वसुदेव कुमरने जइ सोंप्यो थने कस पण रसुदेवजीनो चाकर थ रह्यो तेमज वसुदेवजी पण कस उपर घणी रुपा दृष्टि राखवा लाग्या एवा थवसरमा वमुराजाना वसमा वृदश्थ राजा यया तेनो पुत्र जरासंघ नामे प्रति वासुदेव प्रण संझनो जोक्का ते राजगृही नगरीमा राज्य करे थने यादव पण सर्वे ते नीज थाझा पाले वे ते जरासंघ राजायें समुविजयनी उपर दूतनी साथै एक कागल लखी मोकन्यो के वेतादय पर्वत पासेनो रदेवासी सिंदनामे पमिपति ते सिंहपुर नगरनो राजा ने तेने जीवतो वाँधी पकठीने जे मदारी पासे लश्यावे तेने हूँ महोरी जीवयशा नामे पुत्री ने ते परणानु थने वली एक नगर जे ते धणी पसंद करे ते नगरनुं राज्य पण थापु एवी री तनो कागल यांचीने समुविजयजी पोतानी सेना तैयार करी सिह नामा पनिपतिने जी तवा माटे चहा करवाने तैयार थया एटलामा वसुदेव कुमरे थावी समुविजयजीने व? थने कंसने साये जा पोते सेन्य सहित ते राजानी उपर चढ़ी गयो तिहां जइ कसने थागे चान करी तेनी साधे पु कसु तिहा कंसे सिंदराजाने बांधी लावीने वसुदेवजीने स्वाधीन फनो पाठलपी समुविजयजीये कोप्टक निमित्तियाने पूजघु जे वसुदेवजी थने जीवयशानुं जोई मजणु के नथी? तेवारें निमित्तिये फर्दा के ए जीवयशा जे जे ते परस्या पली श्वसुरना कुतनो यने पोताना पिताना कुलनो एरीते घेख कुलनो क्ष्य करनारी माटे तमे विचा रीने काम करजो मदारा वचनमा लगार मात्र संदेद जाणशो नदी एच सौनली निमिनियाने शीव थापी विदाय फस्यो अने निमिनियानी वातथी चिंतातुर थयो थको विचारवा साम्यो जे वसुदेवजी जीत्यो ए, सनिलशे तो जरासंघ पोतानी पुत्री वसुवेवजीने थापशे अने से कन्या तो वंने कुजनो क्यकरनारी ने तो दवे थापणने एनो शो सपाय करवो एवो चिं तातुर पको तो एटनामा तो वसुदेवजी पण सिंहराजाने पांधीने समुपविजयजीनी पासे जर आष्यो अने समुशिजयजीने चिंतातुर थयेलो घेखीने पूरा लाग्यो जे तमेश च तामा येवा को ? तेरारें वसुदेवजीने एकांतमा लइ जश्ने समुविजयजीये, जीवयसा वेड फु जना दयने करवाचाली ए वात संललावी तेवारें वसुदेवजी बोल्या के ए सिदराजाने में योध्यो नथी परंतु से योध्यो ने ए वात सांजली समुविजयजी विचारमा पख्या के ए वाणि याना गेकरामा एटलु पक्ष दोय नदि माटे तेनी हकीगत पूवासारु सुना वणिकने यो लाथ्यो तेणे सर्व वृत्तांत को पड़ी ते वाणियानी पासेंथी मुश्किा मगावी कसने थापी सिद राजासहित कसने राजगृहनगरे जरासघ पासें मोकल्यो जरास. पण सने पोतानी पुत्री जीवयशा परणारी वीधी अने वजी कसें तेनी पासेंथी मधुरानुं राज्य माग्युं तेवारे जरास पोतार्नु सबल सैन्य थाप्यु ते लेह में मधुरामा ज पोतानो पिता जे उग्रसेन तेने जीवतो जाली काष्ठना पांजरामा नाखी दीधो भने पोतें मधुरानु राज्य करवा जाग्यो, दवे पोतानो पिता काप्टपिजरमा पञ्यो थको उस नोगवे बे एवं जोश्ने कसनो न्दानो जाइ अतिमुक्तक नामे वे ते संसारथी विरक्त थयो भने दीक्षा लई चाली निकल्यो । ॥ दवे वसुदेवकुमरें। पूर्वनवा स्वीयमन कर्म उपार्जन कसं जे ते पूर्वनवनी कथा कहे जे वसुदेवनो जीच पाउला नवा फोश्एक गामनेविपे नवीपेण एव नामे कुलपुत्र हतो तेनां माता पिता वाल्यावस्थामां मरण पाम्या पठी ते मामाना घरमा रहीने महोटो थयो ते जेवारे युगान श्रवस्था पाम्यो तेवारे कानुं रूप, कुदर्शनी, पिलाडाना जेवी न्दानी यांस, गणेशना जेवु महो? पेट, हा पीना जेया मोटा दांत, उंटना जेग मोटा दोत, वानराना जेवा फान, नासिका चापडी, निखूणु कपाल, एरो कुरुपो देखीने तेने फोइ कन्या थापे नही सर्व स्त्रीयो तेनी निदा करे तेथी चिंतातुर थयो थको मामाना घरमा कामकाज करवू मूकी दीधु, मामाये कयुके म दारी सात पुत्री के तेमाथी एक तुजने परणावीश तु चिंता करीश नही पडी मामायें पो तानी दीकरीयोने एनी साथे परणवायूँ कहुं तेवारे ते साते जणी बोली जे थमे मरी जायें ते कवुल करीये पण ए वांतलाने तो कदापि काले परणीय नदी एवं सांजली ते नवीपेण मरवाने माटे कोशएक पर्वत उपर चढीने त्यांथी पडवा लाग्यो एवामा एक मुनि राजें तेने वो थने कहूं के दे जोला थावा प्रकारे मरवाथी तादाऊं व मटे नदी तिदा प्रतियोघ पामीने चारित्र ली, यने साधुऊनो यावश्च करवानो अनियद धारण करतो वली पोते मासखमणनी तपस्या करे बने साधुऊनो पण वैयावश्च करें एक दिवसें महा राजें पोतानी सनामा ते नदीपेणनी वैयावश्च करवा थायी घणीज प्रशसा करी के एना १. सरखो वैयावच्चनो करनार पीजो को नयी ते वातने एक देवता यणमानतो यको तिदा थाष्यो तेणे थतिसारना रोगेंकरी ग्रस्त थयेजा एवा एक साधुनुं रूप विकूर्वीने एक गामने बाहेर जर वेसाग्यो थने वली धीजा एक साघुनो रूप वनावीने जिदा नदीपेण मासखम गर्नु पारएं करवा लाम्यो ने तिहां मोकल्यो ते कृत्रिम साधु थावीने नदीपेणने कड़वा लाग्यो के अरे, थतिसारना रोगवालो साधु वहार पख्यो ने तेनो यावृत्य कर ते सानली नदी पेण पारण करतुं पडतु मूकीने तरतज ते साधुनी शरीर दिने माटे गामा सूजतु पाणी खेवा सारु फरवा लाग्यो परंतु तेपण ते देवे वेवमायायी थसंजतु करी वीधु सेवा योग्य क्यांय मले नही तोपण मनमा खेद यावतो नची पण उलटो पश्चात्ताप करवा लाग्यो के थरे जूठतो खरा के ई कडेवो जाम्यहीन दुजे आवा मुनिम्नो वैयावा करवाा पण मने यतराय पडवा लागो के पठी एम करतां पाणी पण मयं ते जश्ने साधु पासें बायो ते वारे ते यतिसारी साधुयें रीसकरी लात मारीने पाणी ढोली नास्यं बने कड़वा लाग्यो के बरे मूर्खा थाटलो वखत रहीने केम थाष्यो एम कर्पु तो पण सेना ठपर रोप न कल्यो पनी से सा धुने पोतानी खाँध उपर घडावी गाममा लइ धान्यो तेवारे ते साधुयें देवमायाथी वलीथत्यंत मुर्गधित विष्टा करवा मामी तेथी नवीपेणचें शरीर सपूर्ण मलथी जराश्गयुं तो पण नवीपेशने क्षेप उपज्यो नही एवी तेनीधीरज जोश देव तुष्टमान थइ नदीपेणने वांदीने स्वस्थानके देवलोकमा गयो एवीरीते नदीपेणे पार हजार वर्ष चारित्र पाणु थने घणा ग्रथोमां पञ्चावन्न हजार वर्ष चरित्र पादपु एम कहेल बे यंते अनशन कम्नु ते वखत कोक चक्रवर्ति तेने वांदवा थाष्यो तेवारे चक्रवर्तिनी पटराणीने देखी तेणे नियाशु कम्मु जे हूँ परनवे स्त्रीवल्लन थालं एवु नियाj बांधी तिहाथी काल करी देवलोक गयो अने देवलोकथी चवीने हा वसुदेव थयो जे तेनुं पूर्व करेला नियाणानां प्रनावथी कामदेव जेतुं रूप थ\ ले ते वसुदेव जे वस्वत शौरीपुर नगरमां फरे तेवारे ते नगरनी सर्व स्त्रीयो पोताना घर उघडा मूकी तथा बीजां पण सर्व कामकाज पडता मूकी रूपे मोदी थकी वसुदेवनी पळवाडे फरे थने जरतारनुं कसुं पण माने नही तेषी कोई कोश्ना घरोमा चोर पेसी जाय थने घर पण लूटी चाल्यो जाय एवु कृत्य जोइ ते नगरना रहेनारा सर्व सोफोयें समुविजय राजानी पासे जा विनति करी के गामनी सर्व स्वीयो घर सूना मूकीने वसुदेव कुमरनी पाउल नमे डे माटे जो तमे वसुदेवजीने नदी वर्जी तो थमने बीजे क्या रहेवानी जगा बतावो ते सनिली समुविजय राजा बोल्या के दे पंचो! कहो बो तेम टुं करीश दवे तमे सुखे थापणे घरें जा अने सुखसमाधिमा रहो एम कही महाजनने शीख थापी, थोडी वार पढी वसुदेवजी पण समुऽविजयने पगे लागवा सारु तिहां थाय्यो तेवारे वसुदेवजीने खोलामा वेसाडीने समुविजयजी बोल्या के हे नाइ याज काल तु शरीरमा उर्वल थ गयेलो देखाय ते दु जाणु बु जे तुं श्दा तिदां घणो रखडे के माटे वेलाये कुवेलाये कोई विइ जोइ उल करीने ताहारा रूपनी खराबी करशे तथा वली थापणे राजा ठेये माटे थापणा वैरी पण घणा ने ते कोई उपश्व करे माटे तुं था पणा घरना बगीचामा रम्या करजे पण पाहेर जमवायूँ मूफी थापजे वली बाहेर जम वाथी विया शीखेली 2 ते पण नूली जश्श एवं सांजली वसुदेवजी पण विनयपूर्वक वोल्यो के तमारो हुकुम महारे प्रमाण वे एम कही घरनी वाडीमांहेज रमत करवा लाग्यो एवामा सनालो थाष्यो तेवारे शिवादेवीयें समुविजयजीने माटे चदन घसी तेनी कटोरी नरी ढाकीने वासीना हाथर्मा श्रापी समुविजयजी पासे मोकली ते कटोरी दासी लइ जाय के तेने देखी वसुदेव घोल्यो के था शं दासी बोली दजरने विलेपन करवा सारु चदननी कटोरी राणीयें दीध। वे ते लइ जाचं वं तेवारे वसुदेवजीये ते दासीना दायमाथी बीनवी नई पोताना श्रग उपर चंदननुं विलेपन करी जीधु ते नोइ दासी कोप करीने बोली जे तादारां श्रावा लक्षण वे तेथीज तु वंदीखाने पज्यो हो ते सांजली वसुदेवजीयें दासीने प्रधु के बंदीखानुं ते वजी कर्यु ' तेवारे वासीयें जवाव दीधो नही पण जेवारे घणो दन करीने प्रत्यु तेवारे दासीयें गामना लोको सवधि विचार सर्व कदी संजनायो तेथी वसुदे वजी राजानी उपर तथा पंचोनी पर थमर्प थाणीने राित्रै एकलो घरमाथी बाहेर निकाली गयो, अने विमायुं जे हवेथीए समुविजयजी महारी श्राशा मूकीने पयारे शोध करवा नीकले नही एवो कोई उपाय करु पठी नगरनी चाहेर एक मरवाने वालीने पोलना कमाउ उपर लोदीना थोथी सरस्मु जे हे नगरवासी लोको तमे सनिलो हुँ तमोने तथा महारा महोटा नाश्ने सुख यवाने माटे बली नस्म थयो बु हवे तमे सुख समाधीमा रहेजो एवीरीते लखीने चालतो थयो प्रनाते पोली पोल उघाडी तेवारे मुड बन्यु दी थने वसु देवजीना लखेला थदर वाची समुविजयजीने जइ कहुं समुविजय तिहां थावी ते रुत्य जोर शोकथी मरवा लाग्यो तेवारे प्रधानादि लोको तेने समजावी राख्यो तोपण शोकमा गरकाय थयो यको राज्य करे इवे वसुदेव गामें गामे फरवा लाग्यो ते ज्या ज्यां जाय तिदा पूर्व करेला नीयाणाना प्रनावथी थत्यंत स्वरूपवान कन्या परणे एम क्यांक दश, फ्यांक वीश, क्याक सो, फ्यांक पांचसो कन्याउने परणे ते सर्व विद्याधरराजानी पु घीयो तथा बीजा नूचरराजाऊनी पुत्री तथा शेत प्रमुख महोटा धनाढय जोकोनी पुत्री जाणवी एम सर्वमली वहोंतेर दजार कन्याउने वसुदेवजी परस्यो भने घणी विद्या पण शीरव्यो, एवा थवसरमा रोदक राजानी पुत्री रोहिणी नामे ने तेनो स्वयंवर ममप ममाणो वे तिहा त्रण खमनो स्वामी जरासध आदि वेश्ने सर्वराजा ते स्वयंवर मम थाव्या ने तेमज समुविजय प्रमुख सर्व यादवो पण थाय्या ठे ते रात्रि वसुदेवजीने रोहिणीप्रज्ञप्ति विद्यादेवी श्रावी स्वप्नामा कहूं के हे वसुदेव' रोहिणीना स्वयंवर ममपने विपे तु जा थने तुजने ते रोदिणी परणशे वली रोहिणी शिवाय पीजी पण एक कन्या तु दजी परणीश एम सर्वे तुजने वे कन्याऊनी प्राप्ति हवे थवानी माटे तु का सूतो वो प्रनाते तु तिदा जाजे एम कहीने पठी ते विद्यादेवीयें रोहिणीनी पासें जश् तेने पण स्वप्नामां कयुं के तु मृ दग वजाववावाला कुबडाने परणजे ॥ दवे रोदक राजायें प्रनातें स्वयंवर ममप शणगायो त्या सर्व राजा, राजकुमारो पण शणगार करी पोत पोताना नामना सिंदासनो उपर थावी विराजमान थया एटलामा रोहिणी राजकन्या पण पोताने शरीरे सोल शणगार करी स खीठये करी परवरी यकी दाथमा फूलमाला बेश्ने स्वयंवर मंझपमा थावी तेवारे सर्व राजाते कन्याने देखवा लाम्या अने बहीवारणी प्रतिदारिणी प्रत्येक राजाऊना गुण रूपाविकनो वर्णन करे ये केमके ते रोहिणी सती माटे काचमाथी सर्व देखी शके नदी तेथी प्रतिदारिणीये सर्व राजाउने वर्णवी देखाच्या पण कुलदेवीना वचनने हृदयमा धरीने जे मृदग वगाडनारा कूबडाने रूपें वसुदेव थाव्यो ते एज वसुदेव एज वसुदेव एवो मुदगशद वजावे ने तेने जोड्ने तेना गलामा वरमाला पहेरावी तेवारे कूवडो नाचवा लाग्यो भने मुखथीया रीतें शब्दोच्चार करतो हवो के श्रदो या सर्व राजा करता हूँ अधिक जाग्यशाली हूँ जेमाटे ए सर्व राजा वेग रह्या थने मुजने वरमाला मली गई एवं जोइ ते ममपमा थावेला सर्व राजा ते कन्या उ पर कोध करीने, केटलाएकतो कन्याने निदवा साम्या, केटलाएक कन्याना पितानी निदा क रवा लाग्या अने केटलाएक वोल्या यरे था कूबडाने मारीने एनी पासेंथी वरमाला खोसी व्यो फोकट घीजा उपर रीश करवाथी शं थाय एवं मांदोमांदे कहीने बोल्या के जेना मुनट कूबडा पासे धनेला ते कूबडा पासेंथी वरमाला खोंसी लीये अने तेनीज ए वरमाला पण जाणवी एवं सांजली सर्व राजाऊना सेवक ते कूबा पासें बाष्या तेने कूबडे सोनाना मृदंगथी मारीने जमीन पर नास्वी दीघा तेदेखी सर्व राजा शस्त्र लश्ने मारवा दोच्या तेवारे वसुनेवें सर्व राजाने विम्प करी नागमा कोश्नी नगगे मारीकापी नाती कोल्ने रुममम करी नाख्यो ते जो जरासंध राजार्य रामुरिजमना सादा जो वारेसमुरिजम राजा पकतर, टोप परी धनुप पाण लाग्ने गुम फर यम्पा तेने घेखी रसुदेणे जाणे जे नाश्नी साचे पा उतुं नही तो दो तु मदारू सरूप प्रगट करी रेखाटु नदीतों संयाम थाशे एगो विचारी रायरान रूप त्यागी मृदंग नाखी वेश्ने समुशिजय पासे एक बाण नारयो तेमा रसुदेपनो तमोने नमस्कार के एयु पुर्णमयी श्रदोषी जखेखं तु ते गांचीने समुशीजय स्मिय थयो भने पिचाशुं जे सुदेर मरण पाम्पाने केश परस थइ गयो तो श्रादी पर |फिदायी याथ्यो थातो फोजातीयो मने जोजातोतो नथी एवं रिचारे के एटनामा तो सुरेश पण थारी पगें जागो तेगरें तो समुविजयजीयें सारीपे सारख्यो अने सा यावर राशी थया जरासंध प्रमुख राजा पण गुणी थया, मदोत्सा फरीने सुरेग्ने रो दिणी परणाची तथा यागज पण जेटली स्त्री परण्या दता ते सकुनी दकीगत सो समुविज पजीने फदी पारजपी बहोतेर हजार कन्याने गेली फरी विमानमा घेसाठी जातीने सुर घर न्याया। दो स्नेसने जीघे सुपेराजीने मधुरा नगरीमा फैस पाइयाष्यो त्यो कंस तथा सु पाजी येड मधुरामो रहे ये एकवा पेपकराजानी पुत्री येतीजी, पसुवेने परणा यापीने ते ऐफीजी ने जीपयशा ए ये साथे रमत फरे पण जीआयशा पोताना धापना पवना गोकरी चमत्त ये दो जेरारे कीजीनो विचार मंमाणो तेगारें जीपयशा मदिरापान फरी की जीने पोतानी खाँध उपर पेसाठी नाचे ने एपा श्रासरमा सनोन्दानोनाइ अत्तो नामा साधु थयो ते गोधरी सारु फरतो थफो फेसने घरे श्राव्यो तेने जीपयशायें वीवो सेवारे म बोमन घर थकी मुनिने फंठे रजगीने योजी जे देवारजी! तमे नसायासरमा श्रामागे तो दवे एक राजकन्या तमोने पण परणावीश एतु बोलती थकी सेने मूके नदी तेवारे तेने वीवराववा माटे साधु पोल्या के अरे मूरखणी तुं / नाचे कूवे ने जेने ते ताहारा खांघ उपर वेसाठी ते तेनो सातमो गर्न जे थाशे ते ताहारा जरतारने तथा ताहारा पिताने मारवा वालो थाशे एवा साधुनां वचन सांनजी साधुने कठे वलगेली हती ते मूकी दीधो त्याथी साधुतो विहार करी गयो थने जीवयशाने मद उतरी गयो मनमा शका पडी जे साधुन व चन खोटु थाय नही पठी ते वात एकांते जइ पोताना जरतार कसने कही कसे पण ते वात सत्य करी मानी तोपण ते वचन छतु करवाने थर्थे विचाएं जे था वात कोश्ने जाण वामां नदी थावे तेवीरीतें एनो उपाय करवो एवु चितवन करी एक दिवस वसुदेवजीने कसे राजी कस्यो तेवारें वसुदेवजी बोज्या हे कस | तादारा सुपर हूँ तुष्टमान थयो बु माटे माग माग जे मागीश ते दु थापीश एवं सांजली कस वोक्यो जे हे मित्र तुं तुष्टमान थयो तो देव कीजीना पडेलवेला साते गर्न मने थापजे ते वात वसुदेवजीयें सरल चित्तथी मान्य करी थने कसने कर्मु के हुँ तमोने साते गर्न थापीश एवीरीतें वसुदेवजी वचनथी वधाइ गया, पठी ते वात वेवकीजी धागज कही तेवारें देवकीजीयें अश्मत्ता मुनिनां कहेला वचन वसुवे वजीने सनलाव्यां थने कK के था कस श्रापणा पुत्रोने लइ मारी नाखशे ते सांजली वसुदे वजीने पम्याचाप थयो पण वचने बंधाइ गयो त्यो शो उपाय सत्पुरुषतुं बोलनु फरे नही माटे सत्पुरुचे जे बोलq ते विचारीने पोलतुं दर्वे एवा अवसरमा नदिलपुर नगरनो रेवासी नाग नामे शेत जे तेनी मुलता नामा स्त्रीने मृतवष्ठा दोष ले तेथी से घशा मुवेला पुत्रने जन्म थापे । माटे ते स्वीय थम तपकरी हरणीगमेवी वन धारापन करते देव धीमा हर

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चित्र एप सुखस्मनीने मुनीगेकरी पायो हर गने पीर ना समामा मादजसमाज Mil.INAT गसमा प्रगट थइने घोम्पो जे मने शावास्ते बोलाव्यो तेरारें मुलसा योली के है वेर मुजने मृतक पुत्र थारे वे ते जीवता करी थाप तेवारे देवता बोल्यो कोश् कर्म दूर करवाने दु समर्थ नथी माटे ताहारा पुत्रतो जीवता रदेशे नदी ए वात निश्चयात्मक बे तथापि तारी पुत्रसवधि श्या हु पूरण करी थापीश एवं कहीने देवता जतो रह्यो पनी कर्मयोगें देवकीजी श्रने म जसा ए रेगुने सार्थेज गर्न रह्यो भने सार्थेज जन्म्यो तेवारें दरणीगमेपीयें देवकीजीना जी चता पुनो लावीने सुलसानी पासें मूक्या थने मूला सुलसाना पुत्र ते देवकीजीनी पासे लागी मूम्या ते मूवेला पालकोने सना चोकीदारोये सजश्ने फसने स्वाधीन करया कसे तेमने सिमा उपर पवाठी मारी नारख्या एवीरीतें देवकीजीना ठ पुत्र सुलसानी पासे वृद्धि पाम्या अने सुलसाना मृतक पुत्र देवकी पासेथी लश्ने कंसें मास्या ते देवकीजीयें पूर्वता न रमा पोतानी शोकनां सात रत्न चोरी सीधा इता तेथी शोक दिलगीर थश्ने जेवारें घj रुदन फरया लागी तेगारें एक रत्न तेने पाबु दी) दतु ते कर्मना योगें अनिकयशा, धनत सेन, जियसेन, निहतारि, देवयशा थने शत्रुसेन ए पुत्र देवकीजीना लश्ने हरणीगमेपी वेनें सुलसाने याप्या इये देवकीजीनो सातमो गर्न सात सुपने सूचित पांचमा देवलोकथी चीने देवकीजीनी दूखें श्रावी उपन्यो ते गर्न जन्मतांज लइ जगाने माटे कंसनां मा सो चोकीदार रेवेला दता तेथी देवकीजीये वसुदेवजीने कापुके था सातमो गर्न उत्तम दे माटे कोपण उपाय करीने कदापि एने माटे जुलै घोलवू पडेतो जुतु बोलीने पण थाप पणे, ए गर्न राखो ए गात वसुदेवजीये सनिलीने पठी रसुदेवजी जे वखत देवकीजीने प रल्या हता ते वखत जे देरफराजायें दायजो थाप्यो दतो तेमां गोकुलगाम पण साथे श्राप्यु दतुं ते गोकुलगाममा नवनामें गोप तथा सेनी यशोदा नामें स्त्री ए वे रहे तेपण त दाय जामो थावी गया हतो एटलामा देवकीजीने गर्न थयो ते वर्णे कालो इतो तेने देखी कृष्ण कृष्ण एतु कहीने वसुदेवजी तेने तिहाथी बानो जश्ने निकाली गयो ते वखत कसें वेसाडेजा चोकीदारोने निज्ञ थावीगइ हती थागत जता दरवाजो खोलीने निकन्यो तेवारे उपसेन वोन्यो था कोए के वसुदेवजी वोल्या था तादारूं काछन पांजरु नांगीने तेमाथी तुजने मुक्त फरनार एवं कही बागल चाल्यो मार्गमा यमुनानदीये पण मार्ग थाप्यो ते नदी बहन पीने गोकुलमा जश् यशोदाजीने ते वाजक सोप्यो भने ते वखत यशोदाजीने पुत्री थावी ने ते लइ थावीने देवकीजीने सौंपी पाउलथी कसना पोरायत निशमांची जाग्या ते घोल्या के पुत्र थाष्मो के पुत्री थावी तेवारे वसुदेवजीयें पुत्री थापी ते कसे लईने तेनुं नाक कापीने पाठी वसुदेवनीने यापीथा ठेकाणे धन्यवर्शनी कहे जे के कन्याने पण शिला उपर पहाडी ते वीजती पगइ ए वात मिथ्या ने हवे कंस निर्मित थयो थाणीगम गोकुलमा यशोदाजी वसुदेवना कडेवाथी कृष्ण पुत्रनी पेरे पालन पोपण करे ने कुम पण सुखें सुखें वृद्धि पामे ये हवे देवकीजीने कृष्णजीने देखवानी घणी घणी चाइना रहे पण कसनी वीकने जीघे पन्नर पन्नर दिवसें थथवा महीने महीने थान व वारश के बाज गोत्राट ने श्राज काजली त्रीज ने एवा नवा नवा उत्तर करी करीने गोकुलमा जाय तेने लीये ते विवसो सर्व मिष्यात्वीना पर्व यया पठी तिदा जय देवकीजी श्रीकृष्णने रमत करावे, दूध घवरावे, थने यशोदाजीने कई के ताहारो पुत्र मने घणो वमन लागे ठे एवां वचन कदी पानी घेर आये एरोतें कृष्णाजी पास सीजा करता थका यशोदाजीनां दूप वही प्रमुखना " मामा नोनी नाखे फोरीनाले स्याविष चित्र देनकीना HHHHHHEM सामा मापेने पसुदेवनी भीरुपामेलई गगानदीजनरे इतुं ते गोकुत्तगाममा नवनामें गोप तथा तेनी यशोदा नामें स्त्री ए बे रहे जे तेपण ते दाय जामा श्रावी गया हतां एटलामा देवकीजीने गर्न थयो ते वणे कालो दतो तेने देखी कृष्ण कृष्ण एवं कहीने वसुदेवजी तेने तिहाथी बानो जश्ने निकाली गयो ते वखत कसें वेसाडेला चौकीदारोने निज्ञ श्रावग इती धागत जर्ता वरवाजो खोजीने निकल्यो तेवारे अग्रसेन योन्यो श्रा कोण ने वसुदेवजी पोल्या या ताहार काष्ठर्नु पांजरु नांगीने तेमाथी तुजने मुक्त करनार में एवं कही भागल पायो मार्गमा यमुनानदीये पण मार्ग थाप्यो ते नदी वन पीने गोकुलमा नइ यशोदानीने ते वासक सोंप्यो थने ते वस्वत यशोदाजीने पुत्री थावी ते लइ यावीने देवकीनीने सॉपी पालथी कंसना पोरायत निजामाथी जाग्या ते योल्या से पुत्र थायो के पुत्री थावी तेवारे वसुदेवजीयें पुत्री थापी ते कसे लईने तेनुं नाक कापीने पानी वसुवेवजीने वापी या काणे अन्यवर्शनी कहे ले के कन्याने पण शिला उपर पहाडी ते वीजली थाइ ए वात मिथ्या ने दवे कंस निर्मित थयो थाणीगम गोकुलमां यशोदाजी वसुदेवना कश्वाथी कृष्णर्नु पुत्रनी पेरे पालन पोपण करे ने रुम पण सुखें मुखें वृद्धि पामे जे हवे देवकीजीने कृष्णजीने देखवानी घणी घणी चादना रहे पण कसनी वीकने लीघे पन्नर पन्नर दिवसें थथवा महीने मदीने थान व वारश ने बाज गोत्राट ने श्राज काजली त्रीज ने एवा नवा नवा उत्तर करी करीने गोकुलमा जाय तेने लीधे ते दिवसो सर्व मिथ्यात्वीना पर्व थया पठी तिहां जश् देवकीजी श्रीकृष्णने रमत करावे, दूध धवरावे, यने यशोदाजीने कड़े के ताहारो पुत्र मने घणो वक्षन लागे जे एवा वधन फदी पानी घेर थावे एरोतें कृष्णनी वाट लीला करता थका यशोद ---ग्रामण होती नाले फोनास्से शादि अनेक प्रकारनी रमत करतो विधरजे एकदा वामदेवजीयें देवकीने कलुके तमारे घणी वखत तिहां जार्नु नही कारणके जो फसने ए वातनी खबर परशे तो वली कांक स्पात करशे हवे जेवारे कृष्ण सात था वर्षना थया तेवारे तेने कला शीखववा सारु रोदिणीना पुत्र बलदेवजीने कंसथी बानो मोकल्यो यने ते बानो रहेवानी हेतुनूत कंससंबंधि सर्व दकीगत बलदेवजीने निवेदन करी एम बलदेवजी यने कृष्ण वेगु जण गोकुला नदने घेर रहे डे थने बलदेवजी श्रीकृष्णने विद्या नावे ने सर्व कलाशीखावे के एम करतां श्रीकृष्ण चोदवर्षना थया दवे राम कृष्ण बन्ने नाइन तिहां गोवालीयाऊनी साथे नाचे कूदे गाय वजावे नीला पीला वस्त्र पहेरे,कृष्ण पोताने मस्तके मोरपीस राखे, मुरजी वजावे, गोपीयोनी साथे गाय,थाखो दिवस रमत करे, सांजना घेर थावे एवा थवसरमा वजी एक दिवसें कंसना मना एवी वात यावीके साघुर्नु वचन जूलै थर्यु के नथी थर्पु तेनी चोकसी करवा माटे निमितियाने एब्यु के मने कोई मारनार वे किंवा नथी? ते सांगती निमित्तियो बोल्यो के साधुनुं वचन जूलु नयी तादारो शत्रु कोश्क जगाये महोटो थइ रह्यो वे पण तादारो शत्रु मरण पाम्यो नथी तेवारे कसें पूपुं ते केवीरीतें महारा जाणवामां श्रावे, निमित्तियो बोल्यो जे थरिष्ट वलदने दमन करशे, जे कालीनागने वश करशे, जे ताहारा केशी नामना घोडाने वमशे, जे खर थने मेप नामा खरोने मारशे, जे चंपोत्तर अने पनोचर नामा हाथीउँने मारशें, जे सारंग धनुष्य चढावशे, जे चायरमन थने मुष्टिकमन्न ए पेने मारशे ते ताहारो मारनार जाणजे ए वात सांजली कंसें तेनी निगाद करवाने माटे पडद वजाहाव्यो के जे कोइ सारंग धनुष्यने चढावे तेने मदारी बहेन सत्यनामा हूँ परणा, ए वात सानजी घणा राजा तिहा नेला थया एवा अवसरमा वसुदेवजीनो एक थनादृष्ट नामा महावलवत ते पण धनुष्य घडाववाने जाय वे मार्गमा सांज पटी तेथी रात्रे श्रीगोकुलमा रह्यो तेने बलनर लखतो दतो तेथी तेनी घणी सेवा करी प्रनात थर्पु तेवारे अनादृष्ट वरूनने क देवा लाम्यो के एक वजावो थापो तो मने मपुरानो मार्ग देखाडी थावे ते सानजी यत्त नई श्रीकृष्णने अनादृष्ट साथे मार्ग देखाउवा मोकन्यो मार्गे जता थनादृष्टनो रथ वृक्षोमा थटकी रह्यो से धनादृष्टथी निकल्पो नदी तेवारे कृष्णजीये ते वेद वृक्षोने लात मारी ठखेती नारख्यां थने मार्ग करी रथ बाहेर रस्ते चहाची दीधो तेजो अनादृष्ठीये तेने वलवान जाणी रथमा बेसाडी मधुरामा लश् गयो त्यो जश्यनादृष्टी धनुष्यने हाथ फरसवा लाग्यो दैवयोगथी पालो पख्यो तेवारे तेना उपर लोक इस्या श्रीकृष्ण अनादृष्टीनु हास्य थतु देखी ते धनुप्यने सहेज उपाडीने चडावी लीधु सत्यनामा पासे म्नी हती तेणे श्रीकृष्णने वरमाला पेरावी तेवारे वसु वेवजी थनाहष्टी उपर कोधकरी कड़वा लाग्यो के एने शा वास्ते थांदी सश्याव्यो जा दम णाज पाडगे मूकी आव ते सनिली बनादृष्टी बानोमानो रुमने गोकुलमा लश्याप्यो एटता विवससुधी या वलना महारो जाइ जे एवु श्रीकृष्णना जाणवामां न तुं दवे थनुक्रमें श्री कृष्ण सोज वर्पनो थयो एवा अवसरमा कसें केशी घोडो थने मेप घोडो तथा थरिष्ठनामा वलद ए सर्वने गोकुलमा मोकल्या ते नई गोकुलमा उपव करवा जाम्या तेमने श्रीकृष्णे मारी नारख्या एवा अवसरमा वली मधुरामा कसें मल्लनो थवाहो माम्पो तिदा घणा मन एकता थया ने तेमां एक चायरम अने बीजो मुष्टिकमान ए वे मन पणा बलवान ने ते वखत कसें जाएणु जे घनुष्य घढाववावाजाने में सारीपेठे ठजख्यो नही माटे हवे कोहीतें ते थांदी यावे तो हुँ तेने मारी नातु एवं विधारी एक बाल कंस बेगे रखो ने एवामां श्री रुपपणे सानन्यु जे बाज मझयुम ले ते तु वेखवा जाउ एवं चितवी बलनभने गुरु जाणी पगें लागी घोल्यो स्वामीयाज थाझा श्रापोतो मधुरामा मनपुर जोवा जाउ तेवारे बलन जाण्यं जे तिदा जवाथी कदाच कंसनी साथे युक्ष्य जाय माटे कृष्णने नाश्पणानी वात जणावी थापु एम विचारी वसन योज्यो दे यशोदा' अमोने नान करवा माटे उन्ढे पाणी थाप थमे थाज ममयुम देखवा जश्यं ते वखत यशोदा वीजा को काममां पडी दती तेथी बल ननु वचन सनिम्मु थण सनिल्या जेवु करी वीर्छ तेवारे वजन बोल्यो केम यशोदा तु मदारा नाश्तुं पालण पोषण करवाथी शं राणी बनी बेठी' वासपणु नली गजे थकी महारी वातने गणकारी नदी एवं कदीने श्रीकृष्णने साथे जश् वजन बोल्यो के चालो थापणे यमुनामांहेज नान करीपढ़ी मघुरामां जलं एम यशोवाने कडवां वचन बल नई कहाँ तेथी श्रीकृष्ण नाराजी थयो तेवारे मार्गमा बजन बनाइने मारवा थाविक कस संवधि सर्व वृत्तांत कर्पु तथा थापणे वे नाश्नी माता जुदी चुदी ले परंतु पाप एकज के तने कंसना नयने लीये हा श्रीगोकुलमा राख्यो बे ते वात सांजलीने श्रीकृष्ण बोल्यो के जो थाजने थाज हु महारा बनाइने मारवानुं वैर कंस पासेथी लेउ तोज हुँ खरेखरो रुपण? एम कही मार्ग यमुना नदीमा स्नान करवा प्रवेश कमो तेवारे कालियइदनो काली नाग थाव्यो तेने श्रीकृष्ण पकडीने नाक वींधी नाकमा कमलवेलथी नाथी तेना उपर घड़ी थसवार यश्ने घोडानी पेठे दोडाव्यो वा वात लोकोये जइ मधुरामा एक वीजानी पासे करी कसें पण लोकोना मुखयो सानती जेथाजे नव गोवालीयाना पुत्र कालिनागने दम्यो एटलामांतो राम कृष्ण बेगु जाइ घणा गोवालीयाना वंदे परवचा थका नगरने धारणे याव्या तिदा चपोनर बने पद्मोनर ए ये हायीये तेमने रोल्या तेथी वधा गोवालीया मरवा लाग्या पठी यसन यने रुपणे मली हाथीऊना वतोसल उखेडी नाखी दायीने उपाही दूर फेकी दीधा तेथी हाथी मरण पाम्या पठी रुष्ण पलन वेगु जण ममने थखारे थाव्या तिदा एक राजाने मच वपरथी नीचे पटकीने ते मच सपर बेठा त्यां बलन श्री रुपणने पोतार्नु सर्व कुटुंब वताव्यु वली कस पण वेखाच्यो थने कां के ए कंस थापणोज वे परतु इष्ट ठे एटलामा कसे पण चागरमल थने मुटिकमन ए वे ने युद करवा तयार करखा थनुक्रमे रुष्णजायें चायूर मझने माखो बने बलन मुष्टिक महनने मारी नाल्यो ए रीते वे मन्नने मरण पामेला जो कंस क्रोध करीने बोल्यो थरे सुनटो जेणे ए बन्ने सपने पालण पोपण करी महोटा कया वे ते नद थने यशोदाजी बेगुने पांधी पकडीने शहां लश यावो एटले घाणीमां पीली नखावीये एवु कसर्नु योलवु सान्नी श्रीकृष्ण रोपारुण यया थका कूदको मारीने कसने कहेवा लाग्या थरे उष्ठ महारा उ नाश्ने तें माया ले तेनु हुँ वैर सेतु एम कही कसनी चोटली पकडी, नीचो नाखी देश, मूकी मारी तेथी कस मरण पामी नरके गयो यादवोये मली उग्रसेन राजाने पांजरामाथी वादेर कादाही बूटो करी सनामा तर थावी चेसाच्यो, तेवारे जोकोये जाएं जे था राम थने कृष्ण वेढ्नु वसुदेवना पुत्र ने पठी उमसेन राजाये सोल वर्पनी चमरवाला श्रीकृष्णजीने प्रणसे वर्पनी उमरवाली सत्य नामाने परणावी बीधी दवे याववोये जरासधथी वीक पामीने जीवयशाने घु के कंसने थमिसस्कार करीये? तेवारे जीवयशा वोली राम कृष्ण तथा वीजा पण घया यादवोनी चित्र मसमुह त्तर

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साथे कसने दाद देवाशे तमे चढतो खरा में थाय ? ते सानजी कृष्णजी बोल्या के अरे जारे ॐ ताराथी थवान ने एवं सानली जीवयशा तिहाथी निकली परवारी राजगृहमा पोताना पिता पासे जइ सघाउ माथे रोवा लागी थने क के तादारा जीवतां यादवोये ताहारा नमाश्ने मारी नारख्यो यादव घणा उन्मत्त थया ले ते सांजली जरासप वोज्यो दे पुत्रि तुं धीरज धर जे थवान दतु ते थ{ दवे ए राम कृष्ण वेद्गु महारा अपराधी जे ते बेगुने धावी महारे स्वाधीन करी जाशे तोज यादवो महारा राजमा रही शकशे नहीकांतो दु ए सर्व याववोने मारी नावीश एवी रीते जीवयशाने दिजासो थापी संतोषी पड़ी एक सोमनामा सामंतने यादवोनी पासे जरासघे मोफल्यो ते याववो पासे थावीने समुविजय प्रमुख राजाऊन कदेवा जाम्यो के दे याववो' तमे महारी वात सोनलो के, जे थवावालु हतुं ते था ग{ दवे मात्र एक राम थने बीजो कृष्ण एचे गोवालीयाना बोकरा ले तेने बांधीने म दारी साये श्रापी जरासंध पासे मोकली थापो ए वासोने लीघे तमारा सर्व याववालनो क्ष्य करावो नही, ते सांजली समुविजय बोल्या अरे सोम! तु समजतो नथी जे एवा गुणवान श्रने बलवत पुत्रोने मराववाने थर्थे अमे तुजने थापी वश्ये तो हवे श्रमे वृक्ष थया ते केटला एक काल पर्यंत जीवता रही माटे जे थवान दशे ते यशे श्रमे काश्थमारा पुत्र थापी नदी वसी बलन बोल्या के अरे सोम तुं पिताऊनी पासेथी पुत्रने मागता जजातो नथी यं' थरे दजीतो थमे थमारा एक नाइ मारवार्नु कंस पासेथी वैर लीधु दे परंतु पांच नाव बीजा माचा ले तेनुं वैर जेवू बाकी रघु ने माटे तुं जीववानी चाहना रा खतो होयतो हाथी चाल्यो ना नदीका तने तो दमणाज फल देखाठीश ए सांनजी सो मनामा सामत पीक पामीने जरासंघ पासे गयो पालथी यादवो नय पाम्या थका कोटिक निमिनियाने पूठ के थमारो जय क्या थशे ते विशा थमने यताव तेवारे निमित्तियो योल्यो तमारा कुलमा राम थने कृष्ण महापुरुपो ने वली नेमीश्वर नगवान तीर्थकर माटेत मारो कोइरीते बिगाड थवानो नथी परंतु दाल तमे कृषणने राजा करीने पनी पम्मिमदिशायें जाते मार्गमा जता जता जे स्थानके सत्यनामा, पुत्रन जोडलु प्रसवे ते स्थानके तमारे रही जावु तिहां तमारी वृद्धि थवावाली ले पण श्राही तमारे रदेवु नदी एवं सांजलीने शौरीपुरथी समुविजय प्रमुख अगीथार कुलकोटी यादव नीकल्या अने मथुराथी उग्रसेन प्रमुख सात कुलकोटी यादवो एकता थश्ने सर्व कुटुघसहित सोरत देश तरफ चाव्या दवे तिहां सोम नामा सामतें राजगृह नगरे जइ राजा जरासंधने समाचार विदित कस्या जरा सध पण सैन्य सज करी यादवो उपर चडाई करवा तयार थयो, ते वखत जरासधनो पुत्र कालकमर वोज्यो के जो मदारु नाम काल वे तो ढुं सर्व याववोने कालरूप थइ मारी ना खीश जो यादवो थाकाशमा उँचा गया दशे तो नीसरणी मामीने उपर थाकाशमा जश यादवोनो नाश करीश थने जो याववोयें जमीनमा प्रवेश कस्यो दशे तो जमीन खोदीने छ पण प्रवेश करी तेमने मारीश जो पाणीमां याववोयें प्रवेश कसो दशे तो छ पण पाणीमा प्रवेश करी तेमने मारीश तथा जो थमिमां यादवोयें प्रवेश कस्यो दशे तो हूँ पण श्रमिमा प्रवेश करीने यादवोनो नाश करीश ए, पण लइ पांचशे नाश्यो सहित पिताने नमस्कार फरीने कालकुमरे यादवोनी पनवाडे पडा करी थने जीवयशाने पण जती वखते कडेवा लाग्यो के महारा वनेवीनीन वैर यादवो पासेथील तो महारु नाम काल करी जाणजे .

(चित्र ६२ रोसी उदनगेन जरो सैन्य तेरे जीवयशायें थाशीर्वाद थाप्यो अने कहुं के नाश्तादारूं मृत्यु थाय तो जले थापा यादवोनो क्ष्य करजे ए रीतें जेम थवानु तेम जीवयशाना मुखमाथी वचन पण नीकम्यु दवे पांचसो नाइसहित घणी ताकीदथी कालकुमर चच्यो ते चालता चालता जेवारे या दवोथी एक दिवसना मुकाम जेटले थतरे थावी रह्यो एटलामा श्रीनेमीश्वर तीर्थकर, कृष्ण वासुदेव, राम घलदेव वीजा पण वल्ली तमव मोक्ष्गामी एवा घणा जनो याववाना परि वारमा तेमना पुरस्यना योगें खेंची थकी यादवोनी कुलदेवी थावीने याववोनु मुकाम तथा कालकुमरनुं मुकाम जे जे स्थानके हतु तेना वचसा मध्यनागमा एक पर्वतनी रचना करी ते पर्वतना मार्गमा एक चिता सलगावी ते चितानी पासे वली एक मोशीनु रूप करीने कुलदेवी रुदन करती थकी वेती तेने कालकुमरे थावीने पूडघु के था चितामां कोण बल्या के थने तुं शावास्ते रुवन करे वे तेवारे कुलदेवी बल करी रोती थकी बोली के हे पुत्र का लकुमरना जयने जीघे सर्व यादवोनु कुटुब था चितामा पली नस्म थइ गर्यु ले कोइ पण यादव रह्यो नदी माटे हुँ तेमनी कुलदेवी बु तो हवे मने कोण पूजशे ए कारण माटे मुजने बलु उख लाग्यु तेथी रुवन करुनु ते वात सांजली कालकुमर पोताना मुस्खें करेली प्रतिज्ञा राखवा माटे घणा सामत तथा केटलाएक नाश्योसहित तरवार काहाडीने यादवोने मा रवा सारु थनिमां पच्यो थने बली नस्म य गयो पनी प्रनाते वाकी रहेला जरासधना लश्करमाइला लोको देवमाया जाणीने पाबा फरी राजगृहे जा जरासधने सर्व वृत्तांत कहुं हवे थाही सर्व यादवो मोज मजामा खुशी थया थका पश्रिम समुना तट उपर श्राय तिहां सत्यनामायें नमरनामा पुत्रनुं जोडु जप्पु तेवारे नैमित्तिकना कहेवा प्रमाणे यादवो सर्व तिहांज रह्या पनी कृष्ण महाराज अज्म तप करी सुस्थित नामा लवणाधिप देवर्नु थाराधन करो तेथी देवता प्रत्यक्ष थावी कनो रह्यो तेनी पासेथी श्रीकृष्णे रदेवाने सारु जगा मागी तेवारे देवतायें कर्पु महाराजने पूबीने तमोने जगा थापीश एवु कदीने सुस्थित वेवता २६ महाराज पासे जइ सर्व वात कही ३ धनद नामें मारीने मोकन्यो तेणे थावीने वार योजन लांबी श्रने नव योजन पोहोली एव। एक धारिका नगरी बनावी तेने फरतो थदार हाय उचो थने वार हाथ जाडो तथा नव दाथ पृथ्वीमा ठमो एवो सो नानो कोट वनाव्यो ते कोटने रनना कांगरायें करी शोनित कस्यो वली ते कोटनी धारे वाज्नु फरती स्वाय करी तया वाडी याग धगीचा सहित एवो ते सुवर कोट वनावी पड़ी धन ते हारिका नगरीमा श्रीकृष्णने वसवानी थाहा थापी ते नगरीमा एक सातनूमिवानु कम्प वृक्षोनी वाडीसहित एवं घर श्रीकृष्णजीने रहेवा सारु घनाव्यु वली ते घरनी एक वाज समुविजयादिक दश नाश्ने माटे घरो बनायां तथा ते श्रीकृष्पना घरनी पीजी बाजा वली उग्रसेनयूँ घर बनाव्यु तेनी वानुमां वली वीजा सर्व नाश्ना घर बनाव्यां ते सर्व घरो त्रण दिवस पर्यंत धन, धान्य, वस्त्र, घरेणा प्रमुख उत्तम वस्तुथी जरीने श्रीकृष्णने स्वाधीन करी धनद देवता स्वर्गमा पोताने स्थानके गयो दवे सर्व यादवोये मलीहारिका नगरीमा वास कस्यो तिहां यादवोना कुंवोनी वृद्धि यवा लागी ते थनुक्रमे पञ्चाश वर्पनी मुक्ता थढार कुलकोडी याववोमांयी वधीने उपन्न कुतकोडी यादवोनी वस्ती य एवा अवसरमा राजगृही नगरीमा कोइ रमकंघलना व्यापारीज्य थावीने एवी वात करी के था नगरीमा कांश मात नथी सत्वविनानी निर्धन लोकोये करी नरेली कारण के अमारा रम कंपतिना

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चित्र ६३ धरणी श्रीरभरे जरासंधनु युद क्षेवावाला पण को थावा शहेरमां निकल्या नही बने हारिकामां यादवो वसे ले ते महा सुखी जे एवीरीतें धारिका नगरीनी प्रशसा जरासंधै सानजीने विचास्तु के महारा वेरी दजी जगण जीवता ने माटे हवे एनो नाश करु, एम चितवी सेना जइ यु६ करवा चाल्यो एवामा नारद पीयें जश् श्रीकृष्णने कह्यु के तमारे चेतवू दोय तो चेतजो जरासंध तमारा उपर चही यावे मे ते सांगली श्रीकृष्ण पण सेना तयार करी लडवाने तेनी सामे चाल्या तेणे पंचासरा गामनी पासे भावी पडाव दीधो मुकाम कयुं श्रने जरासधनु लश्कर पण पंचा सरा गामथी चार योजन दूर थावी पोहोप्यं तेमा जरासधनु लश्कर चक्रव्यूहना न्यायथी यने श्रीकृष्णर्नु लश्कर गरुडष्यूदना न्यायथी एवा थाकारे थावी पडाव दीधो ते बेगु ल श्करने मादोमांदे महोटु यु६ थलाखो गमे सुनटो मरण पाम्या डे इत्यादि विशेप थधि फार श्रीनेमिनाथचरित्रावि थनेक ग्रंथोथी जाणी लेवो, थांदी ग्रंथगोरवना जयथी लखता नथी दवे ते वेगु तरफवाला सुनटोनी जडाइ चालतां श्रीकृष्णाने जीतवो थापणने कठण थइ पडशे एवं जरास विचारीने कोई उपाय न सूजतां जरा नामें एक बाण दतो ते श्री रुपणनी सेना उपर नास्यो तेथी श्रीकृष्णनी सर्व सेना मुखें लोही वमती मूर्धा पामी गइ, तेवारे श्रीनेमिनाथजीना कहेवाथी श्रीकृष्ण श्रध्म तप करी धरणेश्ने थाराध्यो धरणे श्रा वीने वागामिक तीर्थंकर श्रीपार्श्वनाथजीनी प्रतिमा श्रीकृष्णने थापी तिहा मगल निमितें श्री कृष्णजीयें सुस्थित देवें थापेलो शख वजाव्यो थने धरई थापेला बियनुं स्थापन कसु तिहां श्रीशखेश्वर एवे नामें तीर्थ थयु ते थाज लगण मोजुद ने कोश्क थाचार्य वली एम पण कहे के श्रीकृष्णजी त्रण दिवस उपवास करी वेग ते प्रण विवस पर्वत श्रीनेमि साथ सामीय समाम कस्यो वली इश महाराज मातली नामा सारथी सहित रथ मोकल्यो ना उपर चढीने नेमिनाथजीये शख वजाव्यो तेथी जरासधनी सेना शिथिल थइ गइ, थने पण दिवस श्रीशखेश्वर पार्श्वनाथनी मूर्तिनो न्दवण पोतानी सेनामा श्रीकृष्णे बांटयु तेथी वीकृष्णजीनी सेना सङ्ग था बेवट कोइ पण रीतें श्रीकृष्णने जीतवानो उपाय जरासंधने बज्यो नही तेवारे श्रीकृष्णने मारवा सारु जरासघे पोतानु चक्र तेना पर चलायु तेथी कांच नीरुष्णूनुं वगडपुं नही पण उल? ते चक श्रीकृष्णने प्रण प्रदक्षिणा थापीने तेमना दा मा श्रावी घेतु पनी तेज चक्र जर श्रीकृष्णे जरासध उपर चलाव्यं तेणे जरासंधनु स्तिक बेदी नास्युं ते वस्वत देवता थाकाशमा वेवटनी वगाडीने बोल्या जे श्रीकृष्ण न मो वासुदेव थयो, ते वात सनिली समस्त जरासघनी सेना यावीने श्रीकृष्णजीनी सेवा हाजर थइ पनी श्रीकृष्ण हारिकामा थाष्या सुख समाधिमा त्रण खमनु राज्य जोगवता तहाँ रह्या से बढ़ोतेर कुलकोठी यादव धारिकामा रहे बे थने साठ कुलकोडी यादवो छा कानी बाहेर रहे बे तथा महापुरुप समुविजयाविक दशे वसार तथा बलदेवाविक पाच हावीर एटले महोटा योधा, तेमज उग्रसेनाविक सोज हजार राजा तथा प्रद्युमादिक साडा । कोड कुमर तथा सांधाविक सोल दजार मीत कुमर यने वीरसेन प्रमुख एकवीस हजार । र तथा महासेनप्रमुख बपन्न हजार वलवत राजा ए सर्व धारिकामा वसे बे वली रु स्मणीप्रमुख पत्रीश हजार राणी तथा थनगसेना प्रमुख अनेक गणिका एवा परिवार सहित परवयो थको महो? राज्य श्रीकृष्णजी करे ने एवा अवसरमा महाराज श्रीनेमि नामजीना मलनी प्रशंसा करी तेवारे ते सजामा फोइ मिथ्यात्वी देव महाराजना वचनने नही मानतो थको गिरनार पर्वत अपर आयो तेणे त्यां मुरंधरा नामें नवीन नगर वसायु तेमां ते देवता पोते थावीने मनुष्यनु रूप धारण करीने रह्यो भने हारिका नगरीना रहे नारा लोकोने नित्यप्रत्ये घएंज 5ख देवा लाग्यो, अपश्व करवा लाग्यो, ए बात सांजली ने महा अनिमाननो धरनार एवो थनादृष्टि ते देवने पकड़वा सारुं गिरनारनी उपर ते वेवें वसावेला नगरनी उपर घडी थाव्यो, तेने देवतायें देव मायायें करी जीती सीधो थने यांधीने पोताना नगरमा लइ गयो, ए वात सानलीने समुविजयजी तेनी साथे लढवाने माटे जवाने तयार थया तेवारें राम कृष्ण वे नाइए समुविजयने वो, यने पोते खडा करवा सारु गया तेने पण देवतायें दरावीने पोतानां नगरमा तर जर बदीखानामा नास्वी दीपा, तेवारें धारिकामा हालकमोल यइ रह्यो थने लोको कहेवा लाग्या के राम कृष्ण वे नाइन दारी गया तो हवे थापणी रक्षा कोण करी शकशे' त्यार पबी सत्यनामाजी प्रमुख स्वीये जइ श्रीनेमनाथजीने क{ के तमे अनत बजी बतां तमारा नाइने शत्रु उख थापे के तो एथी तमारी लाज नाय ले तेवारे नेमीश्वर नगवान एकता रथमां बेशीने शत्रुना न गरने चारे वाजु रथ फेरव्यो तेथी कोगरासहित सर्वे कोट पड़ी गयो तेवारे देवें सिद विनुष्यो ते जोइ नेमिनार्थे धनुष्यनो टंकारव करीने सर्व सिंहोने लगावी दीधा तेवारे देवतायें थं धकार करी मूक्यो, नगवाने ग्योतवालो बाण मूकीने थंधकारनो नाश कसो, तेवारें देव तायें मेघ वरसाव्यो, नगवाने वायरो चलावीने मेघने दूर फस्रो, तेवारे देवतायें अंगरानो व पदि वरसाव्यो, तेने नगवाने पाणीथी चूफावी नारख्यो, पढी नगवाने मोद बाण मुक्यं तेथी सर्व शनु मूर्था खाने पही गया, महाखी थया, तेवारे महाराज तिहां थावीने विन ति करवा लाग्यो, के महाराज ए थज्ञानी वेव ने ते थापना थनत चलने गु जाणे? ते पारे लगवाने रुपा करीने वेवताने बोडी मुक्यो पनी ते देवतायें महोटा महोत्सव सहित श्री रुष्णादिकने हारिकार्मा मोकली दीधा पोते जगवानने नमीने पोताने स्थानकें गयो दवे धनु कमें श्रीनेमीश्वर नगवान त्रणसे वर्पना यया पण परणवानीश्शाराखे नही तेवारे शिवादेवी जीये कर्यु के हे पुत्र! तु एक विवाद करीने महारा मनोरथ पूरण कर तेवारे नगवान घोल्या हे माताजी' कोइ महारा योग्य कन्या दशे तो हूँ परणीश ते वात सांननी माताजी मोन धारण करी रह्या हवे श्रीसमुविजयकुलसणगार, शिवादेवी मात मम्हार, एक दम नेमि, वीजा दृढनेमि, त्रीजा थतिनेमि, चोथा अरिष्टनेमि बने पांचां रहनेमि ए पांच कुमर महिला श्रीअरिष्टनेमि कुमर ते जघुवय सरखा सरखी जोडि, मनतणे कोडि, घणा कुमरे परवस्सा लीलायें रमता नमता श्रीकृष्णनी यापुद झालायें थाव्या, थायुक्ष जोवा लाग्या, तेवारे रक्षपाल वोल्यो तमे लघु वालक बो, माटे अलगा रहो, एनो स्पर्श करवो पण दो दिलो , वोकरडे नाश न पीवाय, महो₹ कार्य ते महोटापाज थाय, ते न सानजतां श्रीथ रिष्टनेमि कुमार श्रीकृष्णना चकने उपाठी कुंनारना चक्रनी पेरे नमायूं तथा सारंग धनुष्य उपाडीने तेने कमलना नालनी पेरे नमाव्यु तथा कौमोवकी नामें गवाने लाकहीनी पेठे उपाठीने पोताना खांधा उपर राखी हवे जेवारे पांचजन्य शख प्रलो तेवारे तेनो शद सांज लीने त्रण नुवन कंप्या, पर्वतना शृंग तूटी टीने पडवा लाम्या, समुजल मुहलता दवा, दस्ती तुरगमादिकना वधन तूटी पख्या तेथी सर्व नागी गया, लोक सर्व बहेरा थइ गया, धरती धूजवा जागी, नगरनो कोट पण प्रज्यो. समऽ हाल्यो. दिग्गजबाम पाम्या. यावत चित्र मी पर भगवान् मायुपशाखा श्रीकृष्ण

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सर्व मूर्धागत जेवा थप गया, सर्व वीक पामवा जाम्या, श्रीकृष्ण, बलन, कंपता दवा थने नयाकुल अया थका चिंतववा लाग्या जे था ते कोण बलवत ? के जेणे सर्व पृथ्वी झोन पमाडी एवी रीते तेमने कां पण जप न थाव्यो, तेथी तरत तिहां थाव्या अने पूजा करी, ते वारे सर्वे बोल्या जे श्रीअरिष्टनेमि कुमारनो ए बल , ते सांजली चमत्कार पाम्या पदी श्री रुष्णे कसं के हे जाइ थापणे बलपरीक्षा करीयें, तो वलित शीजे तेवारे नेमिकुमर बोल्या के जे जूमि जुग्नादिक वाह्य खेल करवू, ते उचम नरने योग्य नही, माटे मादोमाहे एकेकनी नूजावालीने वलपरीक्षा करिये, ते वचन श्रीकृष्णे प्रमाण करी पोतानी नूजा जबावीने कम्युं| के, था मदारी वाह नमाहो तेवारे नेमिकुमार कमलनाजनी पेरे एक थोगुलीयें श्रीकृष्णनी वाद नमावी वीघी पठी श्रीनेमिकुमार पोतानीबाद जबावी तिदा कृष्ण घणु बल करी वान रनी पेरे वनगीने दिच्या तेवारे श्रीनेमिकुमर बोन्या के हे कृष्णजी। तमोने माता देवकीयें पालणे पोढारीने रमाया नदी, ते माटे दवे हुँ तमने विंचोलु, एम कहीने श्रीकृष्णने दि मोलानी माफक हिंचोल्या एरीतें जेम जुगारी वाव दारे, तेम कृष्ण दारी गया एयूँ जोश्ने बलनजी बोम्या के दे नाइ घमरने नारे तरुशाखा नमे नही, पनी कष्ण तथा बसनजी चितातुर थका चितवे के ए पितराइ नाइ थापणाथी अधिक बलवान् ले माटे थापा सर्व राज्य लश् मूकशे कीडी तीतर न्याय करशे एटलार्मा थाकाशे वेव वाणी थइ के थदो रुपण वासुदेव तमे चिता म करशो एतो नेमीश्वर जगवान, बाल ब्रह्मचारी, बावीशमां तीर्थ फर एर्नु थतुली वल डे तथापि तमारो राज्य लेवानी एने गरज नथी थने स्त्री परवानी पण गरज नथी ए तो परस्पा विनाज संसारनो त्याग करी विक्षा सेशे ए वचन सांगली रुष्णजी दर्प पामी पोताने घरे पोदोता दवे एक विवस शिवादेवीजीये नेमिकुमरने निराग। जाणीने गोपीयोने नजामण करी के तमे वसंत रमवाने माटे नेमीश्वरने तेडी जाने एने जेमतेम सरागी करी विवाद करवानो मनावो तेवारे सत्यनामाप्रमुख सोल दजार गो पीयो मलीने श्रीनेमीश्वरने सहस्त्रान वना लइ जश् विचित्र प्रकारना वचनो कहेवा लागी तिहां एक बोली तमे शामाटे परणता नथी तमारो नाइ श्रीकृष्ण सोल हजार स्त्रीयो परस्यो वे अने तमे एक पण परणता नथी तेनुं कारण j' तेवारे बीजी वोली हे जला पुरुप' थावी रीतें युवानपणु को फोकट गमावो बो, परणवामा घणी मजा , त्रीजी वोली परप्याविना मोक्ष पण जर शकशो नही, केमके पनाविक तीर्थकर पण सर्व परणीने मोझ गया ले तो वजी तमे ते कांई नवा मोक्ष जवावाला थया बगे, एक बोली एतो मोल्यो थाशे परणीने / करशे, सत्यनामा वोजो जो नदी माने तो एनो पहलो पफहो, तेवारे जकाणा घोजी ए पूज्य ने माटे एनी साथे जबरा करवी नही, पण परणतुं तो अवश्य जोश्येज, वली सत्यनामाजी योजी एनी पासे का सामर्थ्य नथी कारणके जो स्त्री परणे तो तेने पालवानु काम मुश्केल ते एनाथी बनी शके नही तथापि जो परणी लेशे तो सोज दजारने एनो नाइ पाले तेनी साथें एक एनी पण पालशे एवी वातो सनिलीने नेमिनाथजी कांक दस्या तेवारे सर्व गोपीयो तालोटा थापीने वोलवा लागी जे एणे विवाद मान्यो, मातापितायें पण जाप्यु जे विवाद मान्य कसो एवं समजीने शिवादेवीना कडेवाथी श्रीकृष्ण तथा समुविजयजी प्रमुख राजायें उग्रसेन राजान घरें जश्ने राजीमती कन्यानी मागणी करी तेणे पण खुसीथी कहूं के सुखेथी परणावो पढी वेजगाये विवाहनो महोत्सव थवा मामघो परणवा माटे चित्र ६५ नेमीपा भगरान् परातकीपा करा गया नेनु पित्र

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पूवा लाग्या के One शणगार कराववा लागा पण नेरजी विनयवान डे माटे मातापितानो दर्षनंग करवाना न यथी जो पण निस्टही तोपण मौन धारण करी रह्या दवे जान निकली ते वखत अनेक याववोना कोडो गमे मनुष्य साथे चाल्या, सर्व राजा साथे चाव्या, थनेक वाजा वाजता हाथी पर वेग, चमर ढलता, देवदेवी थाकाशमा चालतां, स्त्रीयो पृथ्वी उपर गीत गाते थके चालता चालता उमसेनना महेल पासे जान थावी तेवारे नेमजी सारथीने था महेल कोनो , सारथी बोल्यो तमारा श्वसुरानो महेल ,थाही विवाह मनाववा तथा जान सबंधि पुक्ति पीजी प्रत अपरथी जखीयें .ये जेवारें वसत मास थाव्यो,तेवारे वत्रीश दजार राणी सहित श्रीकृष्ण वासुदेव श्रीनेमिकुमरने सार्थे लइ वसतकीडा करवा वनमा थाव्या तिहां स त्यनामादिक राणीयोनें नेमिकुमरने विवाद मनाववानो सन्कारी कृष्ण स्थानातरे रह्या, दवे ते अनेक स्त्री मनी थकी श्रीनेमिकुमरने केसर, गुलाब प्रमुख सुगध नीर बांटे, फूलनो वडो हृदयनणी नावें, कटाक्ष याणे वींधे, कामचेष्ठापूर्वक जल गटे, एम घणा प्रकारे दास्य करीने कदेवा लागी के हे देवर। विवाद मानो थने एक स्त्रीतो परणो, जो स्त्रीनु जरण पोषण तमाराथी न थाय तो तमारो नाइ यत्रीश बजार स्वीयोनो नरण पोपण करे , तेम तमारी एक वीनू पण पोपण करशे ? तेनी चिंता करतो नही, पण स्त्री जरुर परणो, स्त्री विना पुरुष शोने नही, को विश्वास न करे, कोई माने नही, वली थगनी शुश्रूषा कोण करे, प्रादुणा प्रदीने कोण साचवे, ते माटे पाणिग्रहण अंगीकार करो, मन मानती कन्या वरो, ए विनति मानो, वघे जेम वानो, नही तर पण नदी बूटो, जोर करी जुठो, थमने वश श्राव्या बाज, करवी दवे केही लाज एवा वचन सांजली नेमीश्वर नीच जोइ रह्या, जे ए स्त्री साये ते वजी श्यो वचनविचार करवो एम चिंति हा ना कांइन कदी, तेवारे स्त्री कवालागी के मान्यो मान्यो विवाह, सद्धने थयो छठाद, श्रीसमुष विजय शिवादेवी राणीने तिणीताल, थापें वधामणी जमाल ॥ दवे श्रीकृष्ण नरिंद, मनने थाणव, उग्रसेन राजान, पासे वहुमान, मागे राजीमती कन्या, सतीशिरोमणि धन्या, उग्रसेन पनणे सघले साज, रहा थाणो ते वरराज, तो वेउ कन्या तास, जग विस्तरे जश वास ॥ दवे समुविजय राजा, शिवादेवी राणी ज्योतपी कोप्नुकना मुखथी श्रावण सुदि बन्नुं लगन जाणी, वांटे वधामणी, तेडावे सगासणीजा नणी, मांमे मोदोटो थामयर, धवल मगल गाये घर घर, पोपे जल नजे पकवान, जुगते चलावे जान ॥ तद्यथा ॥ शोल हजार मुकुटयम बत्राधिपति राजान, घेतालीश लाख हस्ती ऐरावतसमान ॥ वेतालीश लाख घोडा, सुवर्ण साजतेने स जोडा ॥ घेतालीश लाख रथ, शोना पामता पथ, थडतालीश कोडी पायक, शन्नुवल घा पक, नव कोही सामान्य तुरंगम, एक एकथी थनोपम ॥ बन्नु कोडी चिराकदार, नव फोडी नागजियावार ॥ बार कोडी वाजिन वाजे, थवर गाजे, सायकुमरप्रमुख शात सहस्त्र जति कुमर ते पारसीक जातिने घोडे चढया, प्रद्युम्नप्रमुख पंचोतेर सहस्र कुमर महाधीर ते इयरेवा जातिने थवे थारूद थया, थरिमर्वनप्रमुख पांच लाख कुमर ते बदोली जा तिने अश्वे चढ़पा, वीरप्रमुख सात लास्य कुमर ते पाणी पंथा जातिने तुरंगे चढया, साग रचप्रमुख एक लाख कुमर ते कंबोजा जातिने थवे चढपा, अनादृष्टिप्रमुख तेर लाख कुमर रेवाविरुद्ध थया, पालकप्रमुख सात लाख कुमर यष्ठमगल जातिने थवे चढया, मनमिप्रमुख चार लाख कुमर रेमगली जातिने अश्वे चटया, रहनेमिप्रमुख नव लाख छ MAN(चित्र .:.... AGOWNSUMEDYVERY नेमीश्वर भगवाननी जान

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मर चश्मना जातिने यधे चढया, महानेमिप्रमुख पन्नर लाख कुमर अग्नि पंथा जातिने थधे चढपा, एवा यावव कुमर, नोगी नमर, जेदना जाणीता कुल, नालानुं पल, थागलथी चाले, थोई घोले, थोई ठाकुरने नमे, वर्शनीने नमे, परनारी सहोदर, वाचा अविचल, श रणागत साधार, सूर वीर वातार, फूफार रणांगण धीर, रिपुश्वय दल सीर, कसबोई गर काव, केशरीए पागे, लीधीए वागे, कांधाल, मूबाल, नलनला नूपाल, थावे उमह्या, पंथे वह्या, वली वे कोडी सेजवाला, चोराशी कोडी स्त्री गीत गान करे, बपन्न कोडी थलब धजा, वार कोडी नाट विरुवावली बोले, वार कोडी मुखासन पालखी, पन्नर लाख खचर इष्ये नम्ना, त्रण लाव श्रीवत्र, वेतालीस लाख रथ, त्रण कोठि चामर ढले, एंसी लाख नीसान वाजे, सत्तर लाख ढोल वाजे, बन्नु कोडी मेरी वाजे, नव लाख मादल वाजे, पीस्तालीश कोडी उडीदार, शाट कोडी सुरहीया, वडवडा वहीया, मंत्रीश्वर प्रधान, कहियें केता थनि धान, नवाणु कोही सामान्य वहिल, थइ इम जाननी चदिल पहिल, दवे वर राजाने सर्वो पधिनीरे कराव्यु मान, उजुधाब्युं विशेपे वान, मातायें जालस्थले कीधो तिलक, अक्षतनो प्रतिष्ठयो उपर पदक, नव कोडीनो मुकुट, पञ्चाश कोडीनो नवग्रहो, वार कोडीना वे कुंमल, श्रडतातीश कोडीनु रत्ने जडित तिजक, पच्चीश कोडीनी मुश्किा, पच्चीश कोडीना अनेक रत्न जडित हार, वे लाख कोडीनी रमजडीत शांकली, जनोनी पेरे पहेरे, पन्नर कोडीनी चंप कलि, देवदत्त श्रमुलिक पागडी, पञ्चीश लाख कोडीनी कवाय, एकाएं कोडीना वे वहिरखां, पीस्तालीश कोडीना वे बाजुबंध, सत्तावीश लाखनो कणदोरो, पञ्चीश कोडीनो रत्नजडित कणो, त्रिीश कोडीनी वाणही पगरखा, बन्नु कोडीनो थनेकरत्नजडित श्रीफल रूप फूलदडो, थमूना वस्त्र पहेरावी, सकल सणगार करावी, थांख श्रांजी, मुख मांजी, सिर धारयो खूप, शोने सुरूप, थास्यो गजराज, सुवर्णमय साज, मेघामवर बत्र, प्रतिष्ठयो पवित्र, चढयो वर राज, जाणे महाराज, के मुर्निवतो कामराज, शोना समाज, पसलो र्यमगनिनिनाव, गह गह्यो स्त्रीजनसाव, थाकाशे अनेक देव देवागना ३६ शिणी रंना थपत्सरा थावे, मनने नावें, किन्नरी गीत गाये, सरस्वती वीणा वाये, तूवर गधर्व नाचे, सद्गु मन साचे, रुपण बल नइ वशे दशार उमावे, जीर्ण उर्ग जपी जान थावे, जेम ज्येष्ठमास उड़ान, साजन जनने यधिको मान, याचक जनने देतो दान, हुन धवल मगल उच्चार, भावी वर तोरण वार, जोये जोवणदार, धन्य धन्य राजीमती नार, जेणीय वर लाधो श्रीनेमिकुमार, दवे राजीमती गवादमा ती यकी सखीयोने कहे वे के महारो नर्त्तार कहेवो तेवारे सखीयो बोजी था हाथी व पर घेता थका महासचिसहित चाल्या थावे जे ते नेमजी ले तेवारे प्रजुनु रूप देखी मोह पामीने विचारवा लागी के महारो महोटो लाग्योदय थयुं जे नेमजी जेवो वर श्रावीने मुने परणो एम विचारती चशनना, मृगलोचना सखीसदित वार्ता करतां सस्वीयें कर्पु के, ए वर सर्वगुणसपूर्ण वे पण एक अवगुण एवे जे एर्नु श्यामवर्ण , वरतो गोरो जोश्य, राजीमती बोली एतो दूधमांदेथी पूरा काढवा माझ्या श्यामवस्तु मांदे तो घणो गुण ने, नमि, चित्रा वेली, अगर, कस्वरी, मेघ, कीकी, केश, कशोटीन पापाण, मसी, रात्रि, इत्यादिक वस्तु श्याम होय ते ते जगता नजी कहेवाय ने तथा धोती वस्तु कपूर , तेने मरी अंगारा मेल , चित्रा ने रोहिणी श्याम दोय तो शोने, नि केवल गौर तो खुण, अस्थि, हिम, स्वेत कुष्ठ, एमा हे ए वस्वाणवा योग्य ने ? श्यामले वरणे वरप्रशस्य देखी लोचन श्रमीय नराणी, वय

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चित्र ६७ an Ful भोजन प्रापमा माटे का सोया चम नीलो तथा पामगमा रमेग पसीनो नेमने भगवान यूटा करी मूकेने कमल मनश्यां, मनना मनोरथ रूप वेली प्रसरति दवा ॥ ॥ एवामा राजीमतीनी ज मणी थांख फरकी तेवारें शोच करवा लागी थने जाप्यं जे सर्वथा प्रतुनो सयोग न मजे, पठी सखी प्रत्ये कहेवा लागी के महारो जमणो अंग फरके जे ते साजली सखी पोली तु मगलमा थपमगल का वोले डे एवामा प्रस्तुयें पण तोरणे थावतां थकां मार्गमा चतुष्पदा दिक जीवें जया वाडा दी तथा पंखीये नरेला पांजरा दीवां तथा घणा जलचर जीव पा णीविना उचा उचा कुमी रह्या वे तथा थलघरमा हरिण, सांबर, रोज, गेटा, मेंमा, ससला, प्रमुख थनेक जातिना जीव तथा स्वेचरमां कूकूट, तीतर, मोर, सारसना जोडला, राजहंस, कोयल, पगला, सूठा, इत्यादिक जीवो एकठा कयां , तेनी पोकार सांजली तथा एवामां एक हरिण थने हरिणली कोटें कोट जरावी विलाप करता प्रनुने विनति करे ले के दे प्रथ मने था कष्टमांदेथी उगार, श्रमे कार अपराध कीयो नथी, तृणखला मुखे दीये .यें, हे थनाथ नाथ ' प्रजु, राख राख ते जो श्रीनेमिकुमरे दस्ति मावतकने पूब्यु के ए जीवोने शे कारणे रों की राख्या ठे, तेवारें मावत घोल्यो तुमारा विवाद गोरव नोजनाथै राख्या छे ते सांजली प्रजु पोज्या धिक धिक् ए विवाहें सतुं मने था नरकना मूलरूप विवाद जोतो नथी प्रठ दीनद याल सर्व जीवायोनीने बोडावी दस्तिथकी ठतरी र वेसी पाबा वज्या, तेवारें श्रीसमुति जय राजा, शिवा देवी राणी, कृष्णवासुदेव, श्रने वजनाप्रमुख बप्पन्नकुजकोहि यादव रथ थटकाववाने थाहा फया परंतु प्रत्रु कोश्ना वास्या वल्या नहीं थने एनु वोल्या के था सर्व जीवो वधनमा यांध्यां थका महाड व देखे ने तेम हूँ बघाउ नही थने ससारमा पण रखें नही दायीन वाघे जाल्या न जाय, तिहां जायरे जाय यादव राय ॥ एची वार्ता सानती रा जीमती धरणी दली पठी कण एके सचेतन या तेवारें मुखथकी बोली के हे हे हे प्रनु तमें दर्पस्थानकें एश्यो विपवाद उपजाव्यो' एम कदेती हार प्रोडती, वलय मोडती थान रण नाजती, वस्ख मांजती, किंकणीकलाप नोडती, मस्तक फोडती, कृतलकलाप रोलती, नमि लोटती, साजन पाप्पजलें नूमि सींचती, सखीजन अपमानती, जेम थोडा पाणी माहे मावली टलवले तेम विकज थाती, विरदमाती, णे रोवे, पो जोवे, कणे थाकंद करे, कणे नीसास नरे, क्षणे मूळे, क्षणे चूजे, क्षणे फूंजे, क्षणे न सूजे, वजी थनेक उसना पूर्वक वचन कहे वे के दा यादवकुजदिनकर, दा करुणासागर, दे शरणागतवत्सल, दुथपत्ताने एम एकली मुकवी तुमने न घटे, जो सर्वजग जीवनी क्या पालो बो तो मुज उपर का क्या नाणी, माटे थरे निमुर निलक देडातने प्रनु मूकी गया तो दवे तुं शतर्खम को नयी थातो' हवे तु श्यो लाहो लश एवा राजीमतीना विलाप सनिली सखीवर्ग, सलनवर्ग, मातापिताविक क देवा लाग्या के ए निस्प्टहि में श्यो राग करवो तुं एटला विलाप शावास्ते करे ने तहारो का विवाह थयो नथी माटे ए कालो कुरूपो वर गयो तो में थषु ताहारे वजी बीजो रूपवान वर मल माटे हवे अन्य उत्तम वर वरो तेवारें राजीमती बोली ए वचन सनिलवा योग्य नहिं, तमे एवा वचन मुजने म कहो, मदारे तो श्रीनेमिनाथना चरण शरण ने, काली तो कस्तुरी पण थाय उ ते गुणवान वे माटे तेनु मूल्य घj थाय ने थने जे सपेत जसण थाय वे ते निरगुणी ठे माटे तेनो कोइ नाव पण तो नथी तो ए प्रनुजीयें मारो दाय न साह्यो माथे मूकावीश ए प्रतुने नामे हूँ सौजाग्यवती हूँ माटे जो एणे * -- नेली शप्ने नी पदवाडे फरीश पण धीजो वर प

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--- चित्र६८ ENA अशोक पक्षमी नीचे lu सरयास नही एम कही वली गिरनारजीने कहेवा लागी के दे गिरनार मुजने त्यागीने नेमजी जो तादारी पासे थावे तो तु एने पेसवा थापीश नही वली एवो सलानो श्रापजे के तुं श्रवलाने उखणी करीने का थाव्यो अथवा राजलक्ष्मी बोडी दीधी तो जाए जे एतो त्यागवावालानी रीती इत्याविक विकल्प करती, शील पालती थकी पोताना पिता ना घरमा रहे वे एवामा रथनेमि राजीमतीने कहेवा लाग्यो के नेमजीयें तुजने परणी नदी श्रने हु नेमजीनो ना माटे दवे तु मनेज परण तेवारे राजीमती बोली थरे वमेला था हारने सापानी तु चु चाहना राखे 'हूँ तो एक श्रीनेमीश्वर विना वीजानी चाइना कर ती नयी एवं सानली रथनेमि विलखो थइ वेशी रह्यो ॥ दवे थरिदंत श्रीथरिष्टनेमि तोरण थी पाठा फरी घरे थाव्या वधा मली त्राशे वर्प कुमारावस्थायें घरमा रह्या पनी लोकातिक देवो थावी घोज्या हे प्रनु धर्म प्रवर्तीवो नेमिनाथ स्वामी अवधि ज्ञानथी पोताने दीवानो थवसर जाणी वरसी दान देवा मामघु ॥ १२ ॥ ॥ हवे था वर्षाकालनो पहेलो महीनो, यो पखवाडियु, श्रावणयदि उन्ने विवसे पहेला पदोरथी पूर्वविनमा अर्थात् मध्यान्द प हेला, उत्तर कुरानामा पालखीमा वेशी ते पालखी देव तथा मनुष्ये उपाठी यावत् क्षारिका नगरीनी वचमांयी थइने जिहां रेवत नामा उद्यान तिहां थावीने अशोक वृक्षनी नीचे पालखीमाथी उतरीने, पोताना हाथथी सर्व घरेणा थलंकार उतारीने, पांच मुष्टि लोच क रीने, उ नक्त पाणीरहित एटले चविहारा वे उपवासे, चित्रा नक्षत्रे चश्मानो योग होते ठते, एक देवपुष्य वस्त्र जश्ने एक हजार पुरुपोनी साथे दीक्षा लीधी, घर त्यागीने साधुपण थंगीकार की॥ ॥१३॥ ॥थरिदंत थरिष्टनेमि चोपन रात्री सुधी काया वोसरावी यावत् पंचावन्नमे दिन रात यतरे वर्तमान जे वर्षाकालनो त्रीजो महिनो, पांचमु पस्ववाहियु, था शोजविदिनी श्रमावासने दिवसें पाबला पदोरमा, गिरनार पर्वत उपर, वेतस नामा वृक्ष्नी नीचे पाणी रहित थमना तपमा चित्रा नक्षत्रे चश्मानो योग थावे बते शुक्लध्यान ध्या वता यका अनतु केवलज्ञान अने केवलदर्शन उत्पन्न थ\, सर्वनाव जाणता देखता थका विचरे ॥ १७ ॥ ॥ श्रीनेमिनाथ स्वामीने गिरनार पर्वतना सहस्रान वनमां केवलझान छ पर्नु, देवे समवसरण रच्यो, वनपालकें थावी श्रीकृष्णने वधामणी थापी, श्रीकृष्ण महोटी शदिसहित वादवा थाष्यो, राजीमतीपण वांदवा थावी, बीजापण धणा लोक वांदवा श्राव्या, जगवाननी वेशना सुणीन वरदत्तनामा राजायें वे दजार पुरुषोनी साथे दीक्षा लीधी हवे कष्णजीयें पूब्यु के हे स्वामी थापनी उपर राजीमती एटलो मोद केम राखे ये तेनुं कारण मने सनलावो, नगवान वोल्या हे कृष्ण मदारे एनी साथे पूर्व बाउ नवनो सवध के तेमा पहेल्वे नवें व धननामे राजा हतो तेवारे ए मदारी धनवती नामे राणी दती, पीना नवमा वेड जण पहेले देवलोके देवपणे उपन्या, त्रीजे नवे वेवलोकथी चवीने दु चित्रगतिनामा वि पाधरराजा थयो तेवारे ए रमवती नामे महारी स्त्री थइ, चोथा नवमा घने जण चोथे वेव लोके गया, पांचमे नवें देवलोकयी धवी दु अपराजित नामे राजा ययो तेवारे ए प्रियमती नामे महारी राणी थर, बछे नवे घेट्नु जण श्रगीबारमे देवलोके देवता थयां, सातमा नवमां ई शखनामे राजा थयो तेवारे ए सोमवती एवे नामे, मदारी राणी थर, थाम्मे नवे थमे घेछ अपराजित नामा अनुत्तर विमाने देवता पणे जश् उपन्यां तिहाथी चवीने नवा नवा हुँ ---------Hist नानी मनी मंगवानीने जगताने नि

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चित्र PUR रसार पर्वमनपर एक गुफामा रहनेमी साधु काठस्सग करेगे अने नेम गुफामा रानी मनीजी नग्न यईने पोवाना न सकावेरे हाथी विहार करखो थने श्रीकृष्णाविक तथा राजीमतीप्रमुख वृत्तात सानलीहारिकायें गयां, पठी वली एकदा श्रीनेमिनाथजी गिरनार थावी समोसमा तेवारें राजीमतीयें बीजी घणी राजकन्याउँनी साथें दीक्षा सीधी थने रथनेमीये पण दीक्षा लीधी, दवे एक दिवस राजीमती जीने गिरनार पर्वत उपर नगवानने वांदवा जतां मार्गमा वर्षाव वो तेथी राजीमतीना वस्व जीजा गयां तेने स्काववा सारु एक गुफामा प्रवेश कसो तेज गुफामा धागलथी रयनेमि कासग्ग ध्याने रहेजो ने तेनी कां राजीमतीने खबर दती नही तेथी राजीमतीये ते गुफा माहे पोताना नीजेला सर्व वस्त्र उतारी नाखीने सूकववा मुक्या तिहा राजीमतीने नग्न वे खीने रथनेमीनु मन चलायमान थ{ थने कामे पीब्यो थको सलानो त्याग करी बोलवा लाग्यो के दे राजीमती । तमे शा वास्ते तपश्या करीने नकामा शरीरने शोपवो बो श्रावोनी मदारी पासें थापणे वे जण विपयमुख नोगवीयें दमणा युवान अवस्थामा तप करवानो यवसर नथी फरी वृक्षावस्थायें दीका सश्यं थकस्मात् ए वचन सानजी, थगोपाग सवरी, धर्य धरी, दृढता धारण करीने, राजीमती वोली के थरे तने धिक्कार पडो जे तु दीक्षा ग्रहण क रीने एवी वात करे ठे? थरे समुविजयराजाना पुत्रं सर्व सावद्य व्यापार त्यागी साधुपणु थादर्स तेणे मुजने वमी के माटे जे अगथफूलना सर्प ते जो पण तिर्यंच जातीना ने तो पण ते वमेला वस्तुने वांगता नथी तो तुं शुं ते तिर्यचथी पण नीच थाय ने जेमाटे वमेली रस्तुने जोगववा वा वे वमेली वस्तुने तो श्वानादिक वांजे ने माटे तुं तदारु मन काणे राख हूं को रीते तदारे हाथ थाववानी नथीथरे तु जोग त्यागीने फरी नरकें जवानी थ निनापा शामाटे करे ये तो हे महानुनाव ए पापनी थालोवणा लइ फरी सयमनो चम्चार कर नहीको उर्गतिमा पहीश इत्यादिक वचन रूप थंकुशे करी इस्तिनी पेरे रथनेमीने स्थिर कीयो पठी रथनेमी पण पापनी बालोचना जखमावी सयमने विपे स्थिर थइ केवलहान पामी थनुकमें मोक्ष पोहोतो ॥ ॥ दवे श्रीनेमीश्वर नगवानथी राजीमतीजीथात वर्ष उमरमां न्हाना इतां एवु कोश्क थाचार्य कहे जे तथा राजीमतीजी चारसें वर्ष पर्यंत घरवासें रह्मा वली एक वर्ष पर्यंत वनस्थपणे रह्या श्रने पांचो वर्प केवल पर्याय पाली सर्व मली (ए०१) वर्षनुं श्रायुष्य नोगवीने श्रीनेमिनाथजीनी पटेलां मोक्ष गया हां कवि उत्प्रे क्षा करे ठे के राजीमतीजीयें एवु जाए{ जे शिवनारी जे मोक्षरूपिणी स्त्री के तेने महाराथी थधिक रूपवती जाणीने तेना वपर नेमीश्वरजी मोदित थया ने तो दु पहेलाथीज ते स्वीने देखी तो ले एटले मुक्तिरूप स्त्रीय राजीमतीना न रनु मन वश कीर्घ माटे ते पोतानी शोकने जोवा सारु राजीमतीजी पण पकग्रेणी साधि, कर्म स्वपाची पोताना नारनी प इलाज मुक्तियें गई इति ॥ ॥ श्रीअरिष्टनेमि नगवानने श्रदार गत बने थदार गणधर थया ॥ १७५ ॥ वली वरवत्त थावे वेश्ने श्रदार हजार साधुनी सपदा थ६ ॥ १७६ ।। ॥ तथा गुणरूप मणिरत्नना नमार जेवी यणीप्रमुख चालीश दजार साध्वीनी सपदा था ॥ १७ ॥ वली नदीपेण श्रादे वेश्ने एक लाख उंगणोतेर हजार श्रमणोपासक व्रतना धर नार श्रावकोनी सपना था ॥ १७॥ ॥ तथा महासुव्रताप्रमुख प्रण लाखने बत्रीश द जार श्राविकानी संपदा थइ॥१४॥ ॥ वली चारशे साधु चौद पूर्वधर ते जिन नदी पण जिन सरखा एवा सर्व थक्षरानुयोगना जाणनी संपदा थइ ॥ १० ॥ ॥ तथा पन्न रशे साधु श्रवधि ज्ञानीनी संपदा थइ तथा पनरो साधु वैक्रिय लब्धिना धरनारनी सपदा घर तथा पन्नरशे केवलज्ञानी केवलीनी सपदा यइ तथा एक हजार साधु विपुलमतीना पणी मन पर्यव ज्ञानीनी सपदा यश् तथा श्रावशे वादी साधुऊनी संपदा थइ तथा शोलशे साधु पांच अनुत्तर विमाने पोहोता, पंदरशे साधु जगवत थका सिदि पाम्या तथा त्रण हजार थार्यका एटले साध्वी नगवत थका मोके ग सिदि पामी ॥११॥ ॥ए रीते श्रीनेमी वर जगवाननो परिवार जाणवो, थने राजीमती पण प्रजुने हाथे सयम ग्रहण करी प्रधान मोक्षप्रत्ये पामी॥ श्ररिहंत श्रीथरिष्टनेमिने वे प्रकारनी अंतगड नूमि थ तेमा थाउ पाट पर्यंत मोक्षमार्ग चाल्यो ते पुगतरुतनूमि जाणवी तया जगवानने केवलज्ञान उपना पढ़ी वर्षे कोक साधु सिम थयो ते पर्याय थतरुत नूमि जाणवी ॥ १७ ॥ ॥ ते कालने विपे ते समयने विपे श्रीथरिष्टनेमि नगवान त्रशे वर्ष गृहस्थावासे कुमारावस्थायें रह्या, चोपन्न दिवस उग्रस्थ पर्यायें विछा पाली यने चोपन्न दिवसे फणा सातशे वर्प केवल प र्याय पायुं एटले सातसे वर्प साघुपणे रह्या एम सर्व मली एक हजार वर्पनु पूर्ण थायु नोगवीने शेप रहेला चार कर्म खपावीने था अवसर्पिणीनो उसम सुसमा नामे चोयो थारो ते घणो वीत्यो थने थोडो रह्यो ते वखतमा गिरनार पर्वतने विपे, उनालानो चोथो, मास थाउमो पक्ष, थापाढ शुदि थष्ठमीने विवसे गिरनार पर्वत उपरे मध्यरात्रियें, चित्रा न दो चश्मानो योग थावे थके, पाचशे ने बत्रीश साधुउनी साथे, एक मासर्नु चयविदारो पाणी रहित थनशन कीधे ठते, पद्मासने वेठा थका कालधर्म पाम्या ॥ यथायथ ॥ 600 ॥ यावत् सर्व 5 ख थकी रहित थया ॥ १३ ॥ ॥ श्रीपार्श्वनाथ नगवानथी व्याशी हजार सातशेने पञ्चाश वर्ष पूर्वे ए श्रीनेमिनाथ नगवान यया एटले श्रीथरिष्टनेमि नगवान मोक्ष पोहोता ॥ इति पठी चोराशी हजार नवशे नेएंसी वर्षे पुस्तक तवाणु वाचना थइ ॥ १७४ ।। श्रीनेमिनाथ अधिकार ॥ ॥ दवे सर्व तीर्थकरोना वखाण कहेतां यथ वघे माटे थाही एकचीशमा तीर्थकरथी थांतरानो थधिकारज कहियें ये एकवीशमा श्रीनमिनाथ जगवान निरवाण यया पठी पाच लाख वर्ष गये थके बावीशमा श्रीनेमिनाथजी निर्वाण थया थने नेमिनाथजीथी एG० वर्षे पुस्तक लखाणु ॥१५॥ ॥वीशमा श्रीमुनिसुव्रत स्वामी मोक्ष गया पठी उ लाख वर्षे एकवीशमा श्रीनमिनाथजी मोक्ष गया ते पढ़ी ५०ए० वर्षे पुस्तक लखाणु ॥१६॥ ॥गणीशमा श्रीमशिनाथ मोक्ष गया पनी चोपन्न तास वर्षे वीशमा श्रीमुनिसुव्रत स्वामी मोक्ष गया ते पळी ११७४ए७० वर्षे पुस्तक लरसुं ॥१७॥ ॥ थदारमा श्रीथरनाथ मोझ गया पठी एक हजार कोटी वर्षे उंगणीशमा श्रीमधिनाथ स्वामी मोझ गया ते पठी ३५० वर्षे पुस्तक लवाणु ॥१॥ ॥ सत्तरमा श्रीकुंघुनाथ मोक्ष गया पठी एक हजार कोटी वर्षे न्यून एक पन्योपमनो चोयो नाग एटला वर्षे श्रढारमा श्री थरनाथ मोक्ष गया ते पठी एक हजारकोड सपर पांशत लाख चोरासी हजार नवशेने एसी वर्षे पुस्तक लखाणु ॥१ए ॥ शोलमा श्रीशांतिनाथजी मोक्ष गया पढ़ी थी पस्योपमे श्री कुंथुनाथ मोक्ष गया ते पनी एक पज्योपमना चोथा नागनी उपर पसिन लाख घोरासी तू जार नवसेने एसी वर्षे पुस्तक लरपु ॥ १० ॥ ॥ पन्नरमा श्रीधर्मनाथ मोक्ष गया पबी पोणा पज्योपमे उंगा त्रण सागरोपम गये श्रीशांतिनाथजी मोक्ष गया ते पबी पोणा पज्योपम उपर ६५७४एG० वर्षे पुस्तक लस्यु ॥१५॥ ॥चौदमा श्रीथनतनाथजी मोच गया पठी चार सागरोपम गये पके श्रीधर्मनाथजी मोक्ष गया ते पडी प्रण सागरोपम ६५७१७० M सर्व पुस्तक सवाणु ॥ १॥२॥ ॥ तेरमा श्रीविमजनाथजी मोक्ष गया पडी नव सागरी पम गये यके श्रीथनत नाथजी मोक्ष गया ते पनी सात सागरोपम उपर ६५७४ए व पुस्तक लवाणु ॥१३॥ ॥ वारमा श्रीवासपज्य स्वामी मोक्ष गया पनी त्रीश सागरोपम गये थके श्रीविमलनाथ मोच गया ते पनी शोज सोगरोपम उपर ६५०ए० वर्ष पुस्तक सरप्यु ॥ १४ ॥ ॥थगीयारमा श्रीश्रेयांसनाथ निरवाण थया पनी चोपन सागरोपम गये थके श्रीवासुपूज्य स्वामी मोक्ष गया ते पनी तालीश सागरोपम उपर १५०ए० वर्षे पुस्तक लस्यं ॥ १५ ॥ ॥ दशमा श्रीशीतलनाथजी मोच गया पली एकसो सागरोपम तथा वासठ लाख बीस हजार वर्ष उपर एटला वर्ष एक कोड साग रोपममाथी उठा करीये तेटला वर्पे एटने एक कोड सागरोपममाथी एकशो सागरोपम उठा करीयें तथा वली वासन लाखने वीश हजार वर्ष वीजा पण ठंडा करीयें वाकी जेटला वर्ष रदे तेटाने व श्रीश्रेयांसजी निरवाण पाम्या थने ते पनी वेतालीश हजार त्रण वर्पनेसाडा थाउ महिने न्यून एचा गशत लाख वीस हजार वर्षे अधिक एकशो सागरोपम गये थके श्रीमहावीर स्वामी मोच गया, तेवार पठी नवशेने एसी वर्षे पुस्तक लस्युं ॥ १६ ॥ ॥न वमा श्रीसुविधिनाथ मोक्ष गया पठी नवकोडी सागरोपम गया थका श्रीशीतलनाथ मोद गया तेवार पठी वेतालीश हजारने त्रण वर्प तथा उपर साडा थान महिना एटले वर्षे न्यून एक फोडी सागरोपम गये थके श्रीवीर निरवाण थया तेवार पठी नवशोने एशी वर्षे पुस्त कारुढ थयो ।॥ १॥ ॥ थाउमा श्रीचयन स्वामी मोद गया पनी नेनु कोडी सागरोपम गये थके श्रीसुविधिनाथजी मोक्ष पाम्या ते पठी वेंतालीश दजार त्रण वर्पने साडा थान महिने MAPOM न्यून दश कोही सागरोपम गये थके श्रीवीर निरवाण पाम्या ते पनी नवसेंने एशी वर्षे पुस्तका रुटे थयो ॥ १ ॥ सातमा श्रीसुपार्श्वनाथ मोक्ष गया पढ़ी नवसे कोड सागरोपम गये थके श्रीवश्मन स्वामी मोझ गया ते पडी तालीश दजार उपर प्रण वर्पने साठा था मही ना एटले व न्यून एकसो कोड सागरोपमे श्रीवीरप्रष्ट निरवाण पाम्या ते पनी नवसेंने एशी वर्षे पुस्तक लिस्रं ॥ १एए ॥ बज श्रीपमानजी मोक्ष गया पठी नव दजार कोड सागरोपमें श्रीसुपार्श्वनाथ मोक्ष गया ते पठी घेतालीश हजार प्रण वर्ष उपर साडा थान मदीना एटप्ले वर्षे तणा एक हजार कोड सागरोपम गये थके श्रीवीरप्रतु मोक्ष गया ते पनी नवसेंने एशी वर्षे पुस्तकारुढ थयो ॥ २०० ॥ पांघमा श्रासुमतिनाथजी निरवाण पाम्पा पनी नेवु दजार कोड सागरोपम गये थके श्रीपञप्रन स्वामी निरवाण पाम्या ते पबीता तीश दजार त्रण वर्पने सपर साडा थाd महीना एट वर्षे तणा वस हजार कोड साग रोपम काल गये थके श्रीमहावीर स्वामी मोक्ष गया ते पठी नवसेने एंसी वर्षे पुस्तक लिस्यु ॥ २०१॥ चोथा श्रीथनिनदन जिन मोक्ष गया पन। नवलाख कोड सागरोपम काल गये। थके श्रीमुमतिजिन निरवाण थया ते पनी तालीश दजार त्रण वर्पने साहा थाd महीना : उपर एटला वर्षे न्यून एक लाख कोड सागरोपम काल गये थके श्रीमहावीरजीतुं निर्वाण थ{ ते पनी नवसेंने एसी वर्षे पुस्तकारुढ थयो ॥ २० ॥ त्रीजा श्रीसनवनाथजी निर्वाण पाम्या पनी दश लाख कोड सागरोपम गये थके श्रीअनिनदनजिन निर्वाण थया ते पढी उता लोश हलार प्रण वर्प उपर साहा थाउ महिना एटस्ले वर्षे न्यून दश लाख कोड सागरोपम गये श्रीधीर निरवाण पाम्या ते पढी नवसेंने एसी वर्षे पुस्तक लस्युं ॥ ५०३ ॥ वीजा श्री -~- थजितनाथ जिन मोझ गया पढी त्रीश लाख कोड सागरोपम गये थके श्रीसंनवनाथजी मोक्ष गया ते पनी वेंतालीश हजार त्रण वर्पने साहा थाd महीने न्यून वीश लाख कोड सागरोपम गये थके श्रीवीरजिन मोक्ष गया ते पड़ी नवसेंने एशी वर्षे पुस्तकारूद थयो । ॥ २०॥ ॥ पहेला श्रीरुपनदेव नगवान मोद पाम्या पडी पचास लाख कोडी सागरोपम गये थके श्रीयजितनाथ नगवान निरवाण पाम्या ते पनी वेतालीश हजार त्रण वर्ष सुपर साडा थामदीना एटला वर्षे न्यून पचाश लाख कोड सागरोपम गये थके श्रीवीरप्रनु नि hण पाम्या ते पनी नवसेंने एसी वर्षे पुस्तकारूढ थयो ॥ ॥ ए श्रीमहावीर प्रचना निर वाणथी जश्ने पमानुपूर्वीय थांतरा कह्या दवे चोथो, पांचमो थने हो एत्रणे थारानु प्र माण एक कोडाकोडी सागरोपमर्नु ने तेमा वेतालीश हजार पचोतेर वर्पनी उपर साहा थाउ मदीना एटला वर्ष उणां करीये तेवारे चोवीशमा तीर्थंकर श्रीमहावीरजिननो जन्म ययो तेमा पहोंत्तर वर्ष श्रीमहावीर स्वामीन थायुष्य हतुं थने चोथा थारानांत्रण वर्पने साढा थात मदीना शेप रह्या तेवारें श्रीवीर निरवाण थया तथा एकवीश हजार वर्षनुं काल मान पांचमा थारानु जाणवू अने एकवीश हजार वर्षनु कालमान बन थारानुं जाणवु ए सर्वनो सरवालो करीये तेवारें एक कोडाकोडी सागरोपम पूर्ण थाय ॥ ॥ इति श्रीकल्पव्याख्या नाधिकारे सप्तम व्याख्यान सपूर्ण ॥ ॥ श्रथ अष्टम व्याख्यान प्रारंन ॥ एमां श्रीथादिनाथ नगवाननु चरित्र कहेवाय ने ॥ ते कालनेविपे ते समयनेविपे श्रीरुपननाथ अरिहंत अयोध्या नगरीमा थया तेने लीघे एमने कोशलिक कहियें तेमना चार कल्याणक तो उत्तरापाढा नक्ष त्रमा थया थन पाचमो कल्याणक थनिच नछत्रमा ययो रे ॥ २५ ॥ ॥उत्तरापाढा नक्ष यही घणा श्राचार्या कहें वे के पांचशे कूपा घृतना वहोरावी दीधा पड़ी वजी जाए' जे दवे तो घणु देवाणु एवी रीतें शेतना परिणाम घटता देखीने मुनिये कयुं के हे महानुनाव ! हवे थमारे स्वप नथी, परंतु जो थोडीक वार वजीपण शेठनो नाव वधतो रह्यो दत तो केवल ज्ञान उपजी जात पण पाठा परिणाम घटवाने योगे केवल उपन्यु नही परतु समकेतथी पो तानो थात्मा निर्मल करनो पठी वर्षाकाल वीत्यावाद वसतपुरें थाध्या, धर्मघोप थाचार्य पण सार्थवादने धर्मलान वेश्ने तीर्थयात्रा करवा गया धनो पण घणा दिवस समकेत पाली थंते गुनध्याने मरण पाम्यो ए पहेलो नव ॥१॥ ॥ वे धीजा नवमा उत्तरकुरुक्षेत्रे ज पुगती यामा उपन्यो तिहां त्रस्य पन्योपमनु थायुष्य जोगवी मरण पाम्यो ए बीजो नव ॥॥त्रीजे नवें सोधर्म देवलोके देवता थयो एत्रीजो नव ॥३॥ ॥ चोथे नवें देवप्नोकथी चवीने पमिम महाविदेदे गधिनावति विजयें शीतपल राजानी चकांता राणीना महायलनामा पुत्र थया, परंतु महा विपयलोलुपी नोगपुरंदर यया विनयवती प्रमुख घणी राणीयो , तेमनी सायें विषयसुख भोगववामां मना रहे थे, धर्मनी वात न जाणे, सर्वदा गीत, गान, तान, मान, बने नाटकने प्रियकारी जाणे वे एम महामोदनी निझामां काल गमावर्ता एक दिवस नाट कोविक थाय ने ते देखे डे, गोतमा एक चित्त जागी रघु के, ते वखतें सुबुधिनामा प्रधाने रा जाने प्रसिलोधवा सारं एक गाथा कही ते थावी रीतें “सध विजबियं गीथ, सचं नह विडवणा॥ सधे श्रारणा नारा, सवे कामा सदावहा ॥१॥ ॥अर्थः-ए सर्व गीत जे जे ते विलोपात करवा जेवा, सर्व नाटक जे ने ते विटंबना सरस्वां ने, सर्व थानरण जे जे ते नार समान ने, भने ए सर्व कामनोग जे ने ते खापहा एटले जावदायी ॥१॥ ॥ ए गापा सां 9 नती राजा पोल्यो के हे प्रपान! तमें विना प्रस्तावें था वैराग्य उत्पन्न करनारी गाथा केम कही " यत्र सरागस्तत्र विराग कयं यत्र विरागस्तत्र सराग कथ यत्र श्रीरर्थः तत्र शत्री रर्थ कथं ॥माटे हे मत्री! विना प्रस्तावें था वात शाकामनी तेवारें प्रधान वोल्यो में था वात प्रस्तावेज कही , ते थावी रीते के थाज मुजने केवली मल्या तेमपों कk के तमारा रानानुं थायुष्य एक मास शेप र डे माटे हुँ बापने चेतवणी थापु बु एवी वात सांजली राजा चमफ्यो, मरण समान कोई नय नथी, पनी मत्रिने कहेवा लागो के ? तो मोदनिज्ञमा सुतो इतो, तें सुताने जगाव्यो तो खरो, परंतु बाग लागीने कूवो केम खणाय' तेम दवे एक मा सनु थायु रएं, तेमा \ धर्मसाधन थाय । तेवारें प्रधाने कर्य तमे विषाद म करो, एकदिवसन चारित्र पण मोक्षने देवावाप्लु थाय ने अने जो मोक्षप्राप्ति न थाय तोपण देवताना मुखने तोश्रापे एवं सानली पुत्रने राज्य थापीसात क्षेत्रे धन वावरी या महोत्सव करी मुगुरु पासें चारित्र लई चोत्रीश दिवस चारित्र पाली यंते थनशन करी काज करो ॥ ए चोयोनव ॥४॥ ॥ पांचमे नवें ईशान देवलोकें प्रनवनामा विमानने विपे ललितांगनामा सामा निक देवता थयो तिहाँ स्वयंप्रन नामा देवी घणीज वजन ले तेनी साय विषयसुख लो गवतो विचरे , पठी एक दिवसें स्वयंप्रना नामा वेवी तिहाथी चवी तेना विरद थकी मूर्खा पाम्यो, पणो 5 वी थई शोक करतो थको रुदन करवा लागो, तेवारे पूर्वनवनो सुबुदि मत्री पण तिहाज देवता थयो , तेणें प्रतिबोध्यो, तथापि तेनो शोक मव्यो नदी तेवारें मत्री देवतायें कसु तमारी स्त्रीने हूँ जाणु बु तेने मेलवी थापवानो दु उपाय वता, तमे शोक करशो नही, हवे ते स्त्रीनो सवध कहे डे धातकी खमना महाविवेद क्षेत्रे नदनामा वर्मा वेश्लोकयी चवीने गर्नमा थावी उपन्या , उत्तरापाढामा जन्म थयो , उत्तरापाढामा दीक्षा लीधी थने उत्तरापाढामां केवल ज्ञान उपन्यु वे तथा अनिच नक्षत्रमा मोक्ष गया ने॥२०६॥ ॥ दवे प्रथम श्रीरुपनदेवजीना तेर नव कद्देवाने यर्थे गाथा कहे ॥धण मिगुण सुर महबल, लनियंगो वयरजंघ मिगुणेय ॥ सोदम्म विद्य थचु, चकी सब उसनेय ॥१॥ ॥थर्षः-पहेले नवें था जंबूदीपने विपे महाविदेद क्षेत्रमा सुप्रतिष्ठित नामा नगरें प्रियंकर नामा राजा राज्य करे ये ते नगरमा महोटो धनाढ्य धन्नो एवे नामें एक सार्थवाद रहे वे एकदा ते धन्नो सार्थवाह वसतपुर नगरे जवाने तयार थयो तेवारें नगरमां पडहो। वजडाव्यो के जो कोश्ने वसतपुर नगरे जावु होय तो तेणे मदारी साथे थावq तेनो हु नि । रवाद करीश एवो पडद सानली घणा लोक तेनीसाथे जवाने एका थयां, महोटो सथवारो ययो हवे ते नगरमा श्रीधर्मपोप सूरि पाचसे साधु साये रहेजा दता तेमने पण यात्राने अर्थे वसंतपुर जवानी इछा थश्तेथी धन्ना सार्थवादनी पासें थावीने धर्मलान थापी वोळ्या के है सार्थवाह जो तमारी थाझा होय तो थमे पण वसतपुर जवाने थर्थे साथे थावीये तेवारें धन्नो वोल्यो के हे स्वामी सुखेथी महारी साथे पधारो तेवारे श्राचार्य पण तेनी साथे चाल्या, दवे मार्गे जतां एकदिवसें शेठने थांबान नेटशु थाव्युं ते साधुने थापवा मामघु पण साधुयें सचेत जाणी लीधु नही हवे सथवारो इजवे दलवे धीमे धीमे थोडा थोडा कोश दररोज चायो जाय ते तेथीमार्गमाज चोमासुंथावी गर्यु वाद घणो वो, नदी थावीगर तेने लीधे पंपिजनोने चालवानो मार्ग रोका गयो दरिप्रमुख जीवोनी उत्पत्ति यज्ञ, कादव पण घणो पपो तेपी जोक घाजी शके नही तेवारे सपवारो एको थइ संबुमेरा थापीने जंगलौज रखो प्रमे धर्मपोप पाचार्य पण एक पर्वतनी गुफामा निरवद्य स्थानक देखीने पांचसें स सहित माससमणनी तपस्या करी चोमासु रह्या थका धर्मध्यान करवा प्रवर्त थया, एम फरता सथवासना लोको पासे सवल खुटी पडघु माटे सर्वलोक कवमूलफलादिक नो यावर करीने दिवस निर्गमन करवा लाम्या तेथी साधुउने पण पारणे शुक्ष्मान था शरमले नही एम करतां केटलाक दिवस पनी तिहां एक नाट थाष्यो ते शेग्ने खुशी क रवा माटे सुनापित कहीने बोल्यो के हे शेत ! महोटा पुरुप जे वात थगीकार करे ते पार पाहे पण थधवच मूकी श्रापे नही ए वात सनिलीने शेते धर्मघोष सूरीने याद कयुं अने मनमा विचारवा लाग्यो के थरे महारा कहेवा उपरथी साधु महारी साथै श्राव्या धने में तो एक दिवस पण तेमनी सारसनाज कीधी नथी माटे तेउँनो विश्वासघाती दु थयो तो हवे प्रनाते एमनी पासें जश्ने खमत खामणा करु एम चितवी प्रनातें थाचार्य पासे जश् वदना करीने लढाथी पोतानु मुख नीच करी वेठो थने विनति करवा लागो जे हे स्वामी म दारो थपराध तमे खमजो में थापनी कोई वखते पण निगाद करी नथी हे महाराज लोक सर्व संवल क्षीण थयुं दे थापमुजने काइ थाझा करो, हुकुम फरमावो तेवारें थाचार्य योल्या हे सार्थेश थमारा माटे तमे कांई पण चिता करशो नदी, थमारे तो सुखे धर्मध्यान थाय ठे, तमारा साथना योगे थमे घणी अटवी क्लघन करी तेमां तमे अमारी मदोटी वात्सल्यता करी एवं सानली धनो शेठ खुशी थयो भने सर्व साधुऊने थाहारनी निमत्रणा फरी सयवारामा लइ थाय्यो पनी पोतानी पासे गुम थाहार घृतना कूपा हता ते साधु उन घणाज उलटथी वहोरावता यका थत्यंत जावनी वृद्धि थवा मांमी तेथी समकेत पाम्यो यही घणा थाचार्यों कहें के पांचशे कूपा पूतना वहोरावी दीधा पडी वली जाएपुजे हवें तो घणु देवाएं एवी रीतें शेतना परिणाम घटता देखीने मुनिये कहूं के हे महानुनाव । दवे थमारे स्वप नथी, परंतु जो थोरीक वार दजीपण शेठनो नाव वधतो रह्यो दत तो केवल झान सपजी जात पण पाठा परिणाम घटवाने योगे केवल सपन्यं नदी परंतु समकेतथी पो तानो थारमा निर्मल कश्यो पठी वर्षाकाल वीत्यावाद वसतपुरे थाव्या, धर्मघोप थाचार्य पण सार्थवादने धर्मलान वेश्ने तीर्थयात्रा करवा गया धनो पण घणा दिवस समकेत पाली थंते शुनप्याने मरण पाम्पो ए पहेलो नव ॥१॥ ॥ दवे वीजा नवमा उत्तरकुरुक्षेत्रे जई युगली यामा उपन्यो तिहां त्रस्य पन्योपमर्नु थायुष्य जोगवी मरण पाम्यो ए बीजो नव ॥२॥त्रीजे नवें सोधर्म देवलोके देवता थयो एत्रीलो नव ॥३॥ ॥ चोथे नवें देवलोकथी चवीने पश्चिम महाविदे। गपिलावति विजयें शीतषज राजानी चकाता राणीना महाबलनामा पुत्र थया, परंतु महा विपयलोलुपी नोगपुरंदर यया विनयवती प्रमुख घणी राणीयो डे, तेमनी सार्थे विपयसुख जोगववामां मना रहे है, धर्मनी वात न नाणे, सर्वदा गीत, गान, तान, मान, अने नाटकने प्रियकारी जाणे जे एम महामोदनी निशमां काज गमावतां एक विवस नाट दिक थाय ने ते देखे ने, गीतमा एक चित्त लागी रहे, ते वखतें सुबुधिनामा प्रधाने रा मानात तिलोषवा सारु एक गाथा कही ते भावी रीतें "सई वितषियं गीथ, सर्व नह विरमणा॥ सधे यानरणा भास, सधे कामा हावदा ॥१॥ ॥अर्थ -ए सर्व गीत जे से विलोपात करवा नेवा ने, सर्व नाटक जेने ते विटपना सरखां ने, सर्व यानरण जे ते नार समान ने, थने ए सर्व कामनोग जे से सारा टासा ॥

नजी राजा बोल्यो के हे प्रधान ! तमें विना प्रस्तावें था वैराग्य छत्पन्न करनारी गाथा केम कही “यत्र सरागस्तत्र विरागः कथ' यत्र विरागस्तत्र सराग कथं यत्र श्रीरथः तत्र श्री रप कथ। माटे हे मंत्री विना प्रस्तावें था वात शा कामनी तेवारें प्रधान बोल्यो में था वात प्रस्तावेज कदी वे, ते श्रावी रीतें के थाज मुजने केवली मल्या तेमरों का के तमारा राजानु थायुष्य एक मास शेप रसु डे माटे हूँ बापने चेतवणी थापु जु एवी वात सानली राजा चमक्यो, मरण समान कोई नय नथी, पनी मत्रिने कदेवा लागो के हूँ तो मोदनिशमा सुतो हतो, तें सुताने जगाष्यो तो खरो, परंतु बाग लागीने कूवो केम खणय' तेम हवे एक मा सनु वायु र , तेमा धर्मसाधन थाय' तेवारें प्रधाने कसु तमे विपाद म करो, एकविवसनु चारित्र पण मोक्षने देवावातुं थाय ने बने जो मोक्षप्राप्ति न थाय तोपण देवताना सुखने तो थापे ने एवं सांगली पुत्रने राज्य थापीसात क्षेत्रे धन वावरी बघ महोत्सव करी मुगुरु पासें चारित्र लई चोत्रीश दिवस चारित्र पाली यंते धनशन करी काल कसो ॥ ए चोथोनव ॥ ॥ ॥पांचमे न ईशान देवलोकें प्रनवनामा विमानने विपे लजितांगनामा सामा निक देवता थयो तिदा स्वयंप्रन नामा देवी घणीज वजन ले तेनी सायें विपयमुख जो गवतो विचरे , पनी एक दिवसें स्वयंप्रना नामा देवी तिहाथी चवी तेना विरद थकी मूर्या पाम्यो, घणो उखी थई शोक करतो थको रुवन करवा लागो, तेवारे पूर्वनवनो सुब मत्री पण तिदाज देवता थयो , तेरों प्रतिबोध्यो, तथापि तेनो शोक मट्यो नही तेवारे मत्री देवतायें कपुं तमारी स्त्रीने हूँ जाणु ई तेने मेलवी थापवानो दु उपाय बताईं तमे शोक करशो नही, हवे ते स्त्रीनो सबंध कहे डे धातकी खमना महाविवेद क्षेत्रे नदनामा करे एक मामने विपे नागिल नामे एक गृहस्थ महादरिड़ी , तेनी नागश्री स्त्रीयें पूर्वेठ पुत्री तो जरोली ने, कर्यु के वारिडीने बोडीयो घणी थाय, पठी तेणे विचास्युं जे हवे जो महारी स्त्रीने सातमी पण पुत्री श्रावशे तो दु वेश त्यागीने चाल्यो जश देवयोगे स्वयंप्रना देवीनो जीव पण तेने घेर थावी यवतो तेथी वली पण ए सातमी पुत्री नागिलने थइ तेवारें शेठ शेतगणी घेदु ख धरवा लागा धने नागिल सुखे पीहातो परवेश गयो, पनवाडे कुटुवी dए ते पुत्रीनु नाम पारयुं नही अनामिका कही बोलावे, अनागणी माटे कोई परणे पण नही तेथी काठना नारा वेचीने पेट नरे तथा लोकने घेर काम करीने पेट नराई दिवसें कोई धनवतना बालकने मोदक खातां देखी अनामिकायें पण पोतानी माता पासेथी मोवक माग्या, तेवारें मातायें कहुं ताहारो पिता मोदक सेवा गयो रे ते श्रावशे त्यारे श्रा पीश, स्यां सुघी ए श्रतरतिलक नामा पर्वत थकी काष्ठनो नारो लाव पठी रुदन करती जारो सेवा गइ तिहां युगधर मुनिने केवलज्ञान उपन्यु , तेनो इं५ महाराज महोत्सव करे , तिहां अनामिका पण नमस्कार करी बेवी धर्म देशना सांजली केवलीने पूरघु के एवी खनी अवस्था केम पामी? तथा महारे जर्तार प्रमुखनुं सुख काश् पण थयो नही तेनु कारण ' प्रजुयें कार्य तें पूर्व धर्म श्राराध्यो नथी माटे रे जोली धर्म विना मुख होय नही तो हवे जो सुखनी श्वा दोय तो धर्म कर धर्मना प्रनावे देवना सुख पामीयें पड़ी अनामिकायें श्रावकनां व्रत श्रावो उपायें वेठी श्रावकनो धर्म करे तेथी सोकोयें धर्मिणी एवं नाम दीधु साधर्मि प्रावको तेने पारणा प्रमुखनो सहाय श्रापे एम धर्मना प्रजावधी ते सुखी थने पढी बेवटे अनशन करी सुती ने, ते समय ललितांगने स्वयंबुक मत्रिय फर्मु के तमे त्या जइ तमारु रूप एने देखाडो के जेम ए नियाणो करे ते सांजली ललितागे श्रावी पोतानुं अत्यंत कष्ट रूप वेवाडघु ते रूप देखी अनामिकायें व्यामोह पामी नियाणु कझुं के महारे तपस्यानु फल होय तो एनी स्त्री हु थाछ, पनी धनामिका मरण पामी स्वयंप्रना देवी यश् तेनी साथे ललिताग देव मुख जोगववा लागो ए पांचमो नव ॥ ५॥ तिहाथी चवीने बने नवे जंबूहीपें पूर्व महाविदेहे पुष्कलावती विजये लोहार्गल नगरे सुवर्णजंघ राजानी लक्ष्मीवती राणीनो वजजंघनामा पुत्र थयो भने स्वयंप्रजा देवी पण तेदिज विजयें पुमरीक नगरीयें वचसेन नामा चक्रवर्तिनी श्रीमती नामा पुत्री थइ, ते यो वन पामी थकी एक दिवसें चशेवय सनामा चेली बेते समय कोई साधुने केवल ज्ञान उपन्यु ने तेने देवता वांदवा बावे , ते वेवोने देखी एने पण जातिस्मरण ज्ञान उपन्यु तेवारें विचास्यु जे महारो पूर्वनवनो नार ललितांग नामा देवतानो जीव किदां उपन्यो दशे ते मप्ले, श्रने हूँ तेने परण तो सारु थाय, एम विचारी मौनपणे रदी, मातापितायें थनेक उपचार करना पण बोले नही, पड़ी धाई मातायें एकाते वात पूर्वी तेवारें कुमरीये तेने एक कागल उपर चित्राम करी कुंवर थालेखी प्राप्यो, धाश्ये ते चित्रपट राजाने दीधो पनी एना पिता वनसेन चकवर्नीना वर्षमहोत्सवें अनेक राजपुत्रो थाध्या थने ते धाई पण दिवसें चित्रपट ल राजमार्ग वेठी, ते राजकुमर पण जति वरखतें चित्रपटने अपुदार देखतां जाय , तेवारें वजजघ ते चित्रपटने देखी जातिस्मरण पाम्यो भने कड़वा लागो के था चित्र तो महारी पूर्वनवनी स्त्री स्वयंप्रना नामें देवीन चितरेलु उ, ए वात धाइ मातायें श्रीमतीने, कही पठी श्रीमती ते वात सांनतीने वनजंघ कुंवरने परणी मुखे समाघे रहे , घणी प्र। ।

तोमा थाम लस्यु के ते पुत्री तीर्थकरनी सनामां देवोने देखी जातिस्मरण पामी तेणे पूर्वनव जाप्यो तिदां अनामिका अने स्वयंप्रजानो नव देखी विचामुं जे मदारो पूर्वनवनो नार ललितांग केवारीते मले पड़ी पिताये पूब्युं तेवारे सर्व पूर्वनवसर्वधि वात कही चक्क वर्तीयें केवलीने पू{ के एनो पूर्वनव नर्तार किदां उपन्यो वे केवलीये वजजंघ नाम कर्दा पनी पकवर्तियें वज्जजघने परणावी तथा कोश्क कहे जे चित्रपट वनावीने कर्यु के एना व रूपने जे कहे तेने ई परणु पनी वीजा राजाए थनेक प्रकारनी वातो धनावीने कही पण ललितांगनी वात मजे नही परंतु जेवारे वजन कहुं के था मदारी स्वयंप्रना देवीन रूप ने सेवारें चक्रवर्तियें तेने श्रीमती परणावी एवो लेख वे तत्व केवलिगम्य एकदा सुवर्ण जंघे पोताना वनजंघ पुप्रने राज्य थापी पोते दीक्षा लीधी, पठी वनजंघे पण श्रीमती रा गीसहित गोखमा घेणे यो संध्या फ्ली देखीने वली विलय थइ जोइ तेवारे विचायु जे सर्व विलय थवानी वस्तु था संसारमा माटे वितव्यु जे प्रजातें पुप्रने राज्य थापी दीका ले ते समयें पुत्रं पण राज्यने लोने फेरनो धूमाडो करी मातापिताने एटले श्रीम तीसमेत राजाने विपप्रयोगे माचो ए बो नव ॥ ६ ॥ ॥ तिहायो मरण पामी सातमे नवे राजा राणी बेतु उत्तर कुरु क्षेत्रने विपे युगातीयां थयां ए सातमो जव ॥ ७ ॥ ॥या उमे नवें सौधर्म देवलोके मित्रपणे देवता थया ए बाठमो नव ॥ ७ ॥ ॥ तिहाथी चवी नवमे नवे जंबूधीपे महाविदेह क्षेत्रे वितिप्रतिष्ठितनगरे सुविधिनामा वैद्यनो जीवानद नामा पुत्र थयो ते दिवसें ते नगरीयें वीजा पण चार जीव पुत्रपणे अवतया, एक प्रसन्न चंद राजानो पुत्र मदीपर जन्म्यो, मीजो सुनासीरनामा प्रधाननो पुत्र सुदि थयो, त्रीजो ध नाशेग्नो पुत्र गुणाकर थयो, चोथो सागरनामा शेग्नो पुत्र पूर्णनइ थयो, हवे श्रीमतीनो जीव सौधर्म देवलोकधी चवीने ईश्वरदत्तनो पुत्र केशव थयो, ए पांचे जीवानवना परम मित्र एबए मित्र सायें मनी जमे, रमे, सुखें काज निर्गमन करे , एक विवसें जीवानवने घेर ते बए जणा वेग एटलामा एक कोटी साधु गोचरी करवायाप्यो, तेने देखीने ते पाचे मित्र एकता थप्ने वैय पुत्रने कद्देवा लाग्या के अरे वैयतो मतजवीया थाय , जो पुण्यने अर्थे वैठ करता हो तो था साधुनो कोठरोग मटावी थापो तेवारें तो थमे पण जाणीये जे तमे धर्मात्मा बोते सानली जीवानद वेय वोल्यो दे मित्रो । तमे महारी वात सजिलो था साघुनो रोग म टाववा माटे लक्ष्पाक तेल जोशे तेतो महारा घरमा तयार हे पण बीजो रनकंवल तथा गो शीप चंदन स्वपशे ते मदारी पासे नयी मादे जो ए वे चीजो क्याथी पेवा करो तो साधुनी वैयावच्च करीयें ए वात सांजली ते बए जरो मलो श्रदोलाख सोनेया नेला कीधा पनी ते बए मित्र मजी नगर शेठने घेर जइ सोनेया थापीने बोल्या के एक रनकबल घने बीजो गोशीप चंदन ए थे चोज थमने बापो शे- पूज्यु जे तमे एने शें करशो तेणे कार्य के श्रमे साधुनी वेयावय करी ते सांजली शेते विचाटु जे ए बालको दे तोपण जुन कड़वा धर्म बुद्धि वाजा ले अने दु थाटलो महोटो वृक्ष थयो बु तोपण हजी संगण काश् धर्ममा सम जतो नथी एम चितवी ते शेते सोनेया तो धर्मदा वापरी नात्यायने रजकषज तथा गोशीर्ष पवन तेमने थापीने पोते दीक्षा जइ साधुपएं पडिवजीथतगड केवजी थश्ने मोद गयो दवे ते दए जणा श्रीपध लइ वनमा गया तिर्दा मुनि काउसम्ममा उना रह्या छेतेने "श्रनुजानीध्व' एवं कदी चामडा उपर मुनिने सुवारीने जपाक तेज मसक्यु पबी चवननो लेप करी रन कांवला लपेटी दीयो तिहां पहेलीवारमा तो ते सर्व चामहीमा जे कांई कीडा दता ते सवे कांवला थावी लागा तेने गायना मृत कलेवरमा मुक्या फरी वीजीवार तेल मसम्युं तेनी सुपर चदन जगावी रमावलथी वींव्यो तेवारें मांसमांदला कीडा निकली पख्या तेमज त्रीजीवार एमज पूर्वोक्त रीते कम्मु ते वखत दाम मीजीना कीडा निकली पख्या पड़ी रोहिणी थोपध साधुने शरीरे जगाही ते शरीर कंचन सरख करी सूक्युं पड़ी ते बए जणे रत्नकवल इव्य सात क्षेत्रमा खरचीने दीक्षा लीधी निरतिचार चारित्र पालीने काल कसो ए नवमो नव ॥ दशमे नवे ते बए जणा पारमे देवलोकें वेवपणे नर उपन्या गए वेव मित्र थया ए वशमो नव ॥ १० ॥ ॥ श्रीधारमें नवे पारमा वेवजोकथी चवीने जंबुदीपना महा विदेहत्रे पुष्कलावती विजयें पुमरीकिणी नगरीय वनसेन नामे राजा तेनी धारणी नामे राणीनी कूस्खमा ते माथी पांच जण अनुक्रमे पुत्रपणे थावी उपन्या तेमा जीवानद वैद्य जे । धन्ना सार्थवाहनो जीव ते चौद सुपन सूचित मातानी कूरखमा उपन्यो जन्म्या पठी माता पिताये तेर्नु वजनान नाम थाप्यु ए जीव रुपनदेवजी थावावालो ने दमणा चक्रवर्ति पणे उपन्यो जे हवे बीजो राजानो पुत्र महीधरनो जीव ते घालु नामे थयो त्रीजो मत्रीनो पुत्र सुवालु नामे थयो, चोथो शेउनो पुत्र गुणाकरनो जीव, पीठ नामे थयो थने पांचमो सार्थ वाहनो पुत्र पूर्णजनो जीव मदापीठ नामे ययो ए पांच तो नाइ पणे थावी उपन्या थने बहो केसवनो जीव जे पूर्वे निर्नामिकानो जीव ने ते वजी वीजा एक राजाने घरे पुत्र पणे उपन्यो ते वजनाज नामा चक्रवर्तिने घणोज वचन ने तेथी ए एनो साथि थाशे एरीते बए मित्र सुखे रहे जे ये वजसेन राजा तीर्थकर थवाना माटे लोकांतिक वेवोना वचनथी उदास था वजनान नामा पुत्रने राज्य थापी सवत्सरीदान दे दीक्षा लइ घनघातीकर्म क्ष यफरी केवलझान पाम्या तीर्थकर थया ते पुमरी किणी नगरीयें थाव्या वनपालके वज्जनानने धामणी थापी तेया थवसरमा चक्ररत्न प्रगटवानी पण वधामणी यावी तेवारे विचार्यु जे पहेना केनी पूजा करु ? एम विचारतां निरधार कस्यो जे तीर्थकरने पूज्या तो सर्वने पूज्या ए जण लोकना नायथी वली वीजो कोण वधारे गणाय एम चितवी केवल महोत्सव करो, नगरानने वादवा थाव्यो पनी चक्रने पूज्यो थनुक्रमे ब खंम साधी, मुखे राज्य जोगवे ने एक दिवस ती वजन तीर्थंकर समोसखा तेमने वजनान प्रमुख वादवा गया तिहा प्रजुनी देगना सानजी गए जणायें दीक्षा लीधी तेमा पहेलो वजनान चक्रवर्ति साधु थयो ते चौदे पूर्व नएपो यने यीजा पाचे श्रगीथार थग नल्या, वली वाकुनामा जे साधु रे ते पाचसे साधुने श्रादार लावी थापे थने सुवानु पाचसें साधुना पग चापे तथा पीठ बने महापीठ ए ये एकांत तप करे तथा सयाय ध्यान करे, दवे वाद्गु थने सुवानी गुरुप्रमुख सर्वे प्रशसा करे तेथी पीठ थने महापीठ एवु जाणे के जुन काम सर्वने वजन वे जो साधु थया तोपण मतलनी देखाय केमके थमे सद्याय ध्यान करीये बैये तो थमोने को मरासता नयी थने वागु सुवागु एमनी चाकरी करे ये तो तेमनी प्रशसा सर्व करे ने माटे जगत् सर्व स्वार्थी वे पठी वजनाने वीश थानक तप करीने तीर्थकर नामकर्म उपार्जन कसु तथा नगदु साधुये थाहारना दानथी जोगफल उपार्जन कमु तथा सुबाहु साधुयें पगच पीना प्रनावथी वानुवल नाम कर्म उपार्जन कहुं तथा पीठ थने महापी | करवाथी वीवेद वाध्यो थने तो निर्नामिकानो जीव ते श्रेयास कुमर थाशे यंते सर्वे थनशन करी मरण पाम्या ए धगीथारमो नव ॥ ११ ॥ ॥ वारमे जवे बए जण सर्वार्थ सिह विमाने जइ वेवपणे उपन्या ए बारमो नव ॥१२॥ ॥ पनी सर्वार्थ सिह विमानथी तेत्रीश सागरो पमनु थायुपुरण करीने तिहाथी चवी तेरमें नवे वजनाननो जीव ते श्रीरुपनदेवजी थया तथा बाढुनो जीव जरतचक्रवर्मी थयो भने सुवागुनो जीव वाद्गुषल थयो वली पीठ थने म हापीठनो जीव ब्राह्मी बने सुंदरी थया ए पांचे जीव धनुक्रमे मोक्ष जाशे ए तेरमो नव ॥ ॥१॥ ॥ इति रुपन नवते कालने विपे, ते समयने विषे श्रीरुपनदेव थरिदंत ते वना जानो चोथो महिनो, सातमु पखवारिपु,थापाढवदि चोयने दिवसें, सर्वार्थसिद विमानथी, देवतार्नु थायुष्प प्रण करीने चष्या ते था जंछीपना नरतक्षेत्रने विपे श्क्ष्वाकुन्नूमीमा नानि कुलघरनी मरुदेवी नार्या तेमनी कूखें मध्यरात्रिने विपे देव सबंधी बादार, देव संबंधि नव, देव संबंधि शरीर त्यागीने गर्नमां पुत्रपणे थावी उपन्या ॥ २०६ ॥ ॥ श्वाकु वशमा छ पन्या तेथी क्ष्वाकु मि थइ ते केवी रीतें थश्ते कहे जे जे पूर्व सर्वे युगलिया दता परंतु न गर कोई हतुं नदी तिहां युगलीयामां तो कल्पवृक्ष्न मनोरथ पूरण करता हतां तेमां पहेला सात कुलघर थया तेनी उत्पत्ति था प्रमाणे ॥ ॥था अवसर्पिणीना त्रीजा थाराना थता पज्योपमनो थाउमो नाग वाकी रहे बते था दक्षिण तरफनो अर्को जरत तेने ददि पाईनरत कदीये तेना प्रण नाग करवा ते प्रण नाग मादेना मध्य नागमां एटचे विचला नागा पहेला प्रण कुलघर थया तेमा प्रथम कुलघर एवीरीते थयो के पमिममहाविवेदमा वे वाणीया इता ते वेड्नु वाणीया माहोमाद मित्र दता परंतु तेमा एक कपटी इतो बने एक सरजमनवालो दतो ते जेवारें मांहोमांहे इथ्य वांटे तेवारे जे कपटी ने ते सरल स्वनाव वालाने नगीने तेनाथी ठानु धन पोते राखे थने सरल तो कपटरहितपणे व्यापार करे एक विवसें सरलचित्तवालानी स्त्रीने देखीने कपटी मित्र जोग जोगववार्नु का तेवार ते सरजनी स्त्री पतिव्रता वे ते वोली के थरे मर्यादादीन । मित्रनी स्त्रीने वांछे ' एवं कहीने निर्नबना करी याहेर काहाडी मूक्यो पठी ते कपटीयें जश्ने सरलचित्तवालाने कापु के ताहारी स्त्री मने गांठती दती परंतु में तेने नाकारो कसो एवी कपटाई करी पड़ी ते सरल चित्तवालो वैराग्य पामी मरीने इक्ष्वाकुनूमिमा मनुष्यरूपें युगलीयो थयो थने कपटी मित्र मरण पामीने इक्ष्वाकु नूमिमां दायीरूपें युगलीयो थयो केमके जीव कपटाश्थी वगुलतायेंकरी तिर्यच पणाने पामे, एकदा समयने विपे हाथी युगलीये सरलपुगजीयाने दीगो तेथी वे? मांदोमांहे जातिस्मरण झान पाम्या पठी परमस्नेदयी हाथी तेमने पोताना स्कध उपर वेसाडीने रात्रदिवस फसा करे तेमने सपेत हाथी उपर वेगे जोइने वीजा युगलीया बोलवा जाम्या के ए विमलवादन में एवं तेर्नु नाम पाडी दीधु केटलोएक काल गयो तेवारें कालना माहात्म्यथी जेवा कल्पवृक्ष प्रथम हता तेवा रह्या नही तेवार युगलीया लडवा लाम्या थने सद्गु पोत पोताना कल्पवृक्ष थापी वेग सद्ध कोई पोताना कल्पवृक्षमा रहे वीजाने थाववा दीये नदी थने कदापि को थावे तो तेनी विमलवाहननी पासे राव थापवा थावे तेवारें विमलवाहन तेने इकार एवो दम थापे तेथी पुगलीयो मनमा जाणे जे सर्व महारी वात गई एवो जाणी खडे करे नदी ए प्रथम हकार नीति थइ ते विमलवाहनने चयशा नार्या इती, नवशो धनुष्य प्रमाण शरीर हतु ए प्रथम कुलघर ॥ १ ॥ ॥ पठी ते विमलवाहनना पुत्र चदुष्मान् थया तेनी चश् कांता जार्या थने थातशो धनुष्य शरीनु प्रमाण, एनी पण दकार दमनीति थइ ए बीजो कुलघर ॥२॥ ॥त्रीजो यशोमान कुनघर ययो तेनी सुरूपा नामें जायर्या एर्नु सातसा ध नुष्य प्रमाण शरीर जाएवं एनी वखतमां मकार दमनीति जाणवी ॥३॥ ॥ चोथो अनिचर नामा कुलघर थयो तेनी प्रतिरूपा नामे नार्या एर्नु साडा बसें धनुष्य प्रमाण शरीर जाणवु एनी वखतमा म एटलो कहेवाथी मरी जाय माटे मकार मनीति जाणवी ॥४॥ पांचमु प्रसेनजित् नामा कुलगर थयो तेनी पदुष्मती नामें नार्या एर्नु बशें धनुष्य प्रमाण शरीर जाणतुं एमां विकार एटल कडेवाथी ते एवं समजी जाय के मने महोटो देम थयो माटे धिकार दमनीति जाणवी ॥५॥ ॥ो मरुदेव नामा कुनघर थयो तेनी श्री काता नामें नार्या एजें साढा पांचवें धनुष्य प्रमाण शरीरनु मान जाणवु एना वखतमां धिकार वमनीति जावी ॥६॥ ॥सातमो नानिनामें लजघर थयो तेनी मेरुदेवी नामें नार्या एन सवा पांचशे धनुष्य प्रमाण वेदमान जाए, एनी वखतमा धिक्कार एटलो कहे तेवारें ते समजे के मुजने महादम थयो फरीयी जनम पर्यंत ते अन्याय करे नदी एरीतें पदेला तथा वीजा कुलघरना वारामा ढकार मनीति हती थने त्रीजा तथा चोथा कुलघरना वा रामा जघन्यथी दकार थने मुत्कष्टथी मकार दमनीति चाली एटजे घणो श्रन्याय करे तेवारे तेने (म) एटलो कहे तेथी ते एवं समजे के मने मदोटो वम थयो फरीथी कोश्वारे ते अन्याय करे नदी तथा पांघर्मा, उमा थने सातमा कुलघरनी वखतमा जघन्यथी तो दकार तथा मध्यमथी मकार अने मल्लष्टथी धिकार एवीत्रए प्रकारनी मनीति चानु थ॥ श्री रुपननाथ थरिदंत प्रण ज्ञाने सहित मेरुदेवी मातानी कूखे श्रावी उपन्या यावत् मेरुदेवीये चौव सुपना दीग इत्याविक सर्व अधिकार महावीर स्वामीनी पेरे श्रही पण जाणी लेवें परंतु एटलों विशेप जे मेरुदेवीजीये पहेला सुपनामा तृपन मुखमाहे पेसतो वीवो थने । वीजा पावीश तीर्थकरनी मातायें पहेले मुपने हाथी मुखमादे पेसतो वीटो तथा श्रीमहा वीरस्वामीनी मातायें पहेले सुपने सिंह मुखमा प्रवेस करतो दीगो वली श्हां सुपनार्नु फल नानीराजायें पोतेज का परंतु सुपन पातक ते वरखते हता नदी ॥ २० ॥ ते कालनेविपे ते समयनेविपे रुपननाथ थरिहंत उनालानो पहेलो मदिनो, पहेलो पखवाहियुं, चैत्रवदि थान मना दिवसे नवमास उपर साढासात दिवस रात्री गर्नमा प्रतिपूर्ण होते बते उत्तरापाढा नक्षत्रे चश्मानो योग थावे थके निराबाध पणे जन्म्या ॥ २० ॥ ॥ इहां जन्ममहोत्सव शदि कोये थावी कम्धु इत्यादिक सर्व थधिकार श्रीमहावीरजीनी पेठे कहेतु परंतु बंदीखानामाथी केवीने गोही मूकवा तथा तोल वधारवा तथा कुलमर्यादा करवी तथा पूजादिकने अर्थे इव्य रखाववो ए कृत्य ते युगलीयाना वखतमा गाम शहेरादिकना थनावने लीघे इता नही माटे ते कला नथी बाकी सर्व श्रीमदावीर स्वामीना पानी पेठे यांही पण कहे॥२०॥ तथा ते वखत सर्व युगलीया दता तेथी प्रचुर्नु नाम स्थापन करवानुं महोत्सव संबंधी व्यव दार पण चाल्यो नही तेवारें नगवाननी जंघामा रोमनु वृपन सरिखो जंधन दीगो तथा प्रानुनी मातायें पहेला सुपनामां पण वृपन दीठो तेथी रुपन एवं नाम दीधु ॥ वान महा स्वरूपवान थका देव तथा देवीन साये रमत करे, इशणी पोते खोलामा जश्ने रमाडे, दवे मुनदा युगलीयाणी तो नगवाननी साथेज युगलपणे जनमी दती तथा एक युग लीयाना मस्तक उपर ताल वृक्ष फल पडघु तेथी ते बालपणामाज मरण पाम्यो थने तेनी साथे जन्मेली युगलणी जीवती रही दती तेने वीजा कोश युगलीयायें दीठी तेणे ति दायी उपाडीने नानि कुलघरने जइ थापी नानिकुलघरे कर्पु के था महारा पुत्र झपन देवनी सुनदानी साये एपण स्त्री करीी एम कदी तेर्नु सुमगला एवु नाम थाप्युं ते पण जगवाननी साथे वधे ने, नगवाननो सुवर्णमय शरीर दवे झपन देवजी मुणमुण वोजे, थाकता याकता चाने, दशे, तेवारें माता कदेके दे पुत्र तुं शणीने वजन दो थने देवताये दीघेला यमृतनु पान करे ने, मदारी पासे तो रहेतो नथी, मदारा स्तन पण चूसतो नथी, तोड ताहारी माता तु एवो जगता कोण जाणशे? इत्यादिक वातो करी रमाडे ॥ हवे जेवारें नगवान देशेकणा एक वर्पना थया तेवा अवसरमा महाराज जगवान वस स्या पन करवा सारु दाथमा सेलही लश्ने थाव्यो तेवारें नगवान नानि कुलगरना वोलामाहे येता इता ते खोलामादयी सेलही लेवा सारु हाथलांवो करो तेथी जाए{ जे प्रचने सेलडी खावार्नु मन थयुं ते माटे २ तिहा नगवाननो वश इक्ष्वाकुफुल स्थापन कस्यो श्रीरुपनदेवने देवकुरु थने उत्तरकुरु क्षेत्र सबंधि कल्पवृक्षोना फलनो थादार देवताये थाणी थाप्यो ते था दार गृहस्थ पणामा थयोथने घालपणमा तो यगृगमा देवोए सचारेला थमृतनो थाहार सर्व तीर्थकरोने दोय वे यने एक श्रीरुपनदेव विना वीजा तीर्थकरोने तो वालपणु टल्पा पनी महोटा थाय तेवारें पक्क ययेलोथाहार दोय यने संयम लीधा पनी तो सर्व तीर्थकरोने फासुबादार होय हवे नगवान जेवारें लोग जोगववाने समर्थ थया तेवारे सर्व श थने इशणीयो चारे निका यना देव थने देवीयो विवाद करवा पाव्या तेमा शिदिक देवो तो वर राजानी तरफ रह्या थका श्रीपनदेवने वीद बनायो भने शिक्षणी प्रमुख सर्व देवी ए मलीने कन्यानी तरफ पकी सुनवा तथा मुमगलाने वीदणीयो बनावी, सणगार कराव्या, मामवा मामपा इत्या चित्र७० कपनदेवनीने २६ महाराज शेतमी मापेरे मुकुर कुमलापेठे नाभिराना सभामा पेटारे 1.

दिक सर्वप्रकारनी विवाह संबंधी जे रीतीने ते रीती करीने वर कन्याने परणाव्या ति हाथी गुगलीयामा विवाह करवानी रीती प्रवर्त्तमान थइ ते वाजविवस पर्यंत चाली थावे जे दवे श्रीरुपनदेवजीने, सुनदा तथा सुमगला ए वे राणीयो साथे नोग जोगवतां बजाख पूर्व व्यतिक्रम्या तेवारें मुमगलाने जरत अने ब्राझी एबे पुत्र पुत्रीनो जोडलो थयो, थने सुनदाने एकतो घागुवती तथा सुवरी ए वे पुत्र पुत्रीनो जोडलो थयो तथा उगणपचास तो निकेवल पुत्रो नाज जोडला थया एरीते अपनवेव स्वामीने शो पुत्र तथा वे पुत्रीनो परिकर थयो दवे काल ना मदात्म्पथी थनुक्रमें दिवसें दिवसें युगलीयाउँमा कपायनी वृदि थवा मांमी तेवारें दकार, मकार थने धिक्कार ए प्रण जातनी जे दमनीति चालती दती तेने पण लोक वनघन क रवा लाम्या तेने मान्य न करता पोतपोतामां क्लेश उत्पन्न थवाथी श्रीकृषनदेवनी पासे थावी कहेवा लाग्या के थमारो न्याय करी थापो तेवारें नगवान बोल्या दु राजा नथी मदारा पिता नानिकुलघर राजा वे तेनी पासे तमे जाते सांगली युगलीया नानीराजा पासे गया ना जीराजायें तेमने कहुं के तमारो राजा रुपनदेव दोवो ते तमारो न्याय करशे ए अवसरमा महाराजर्नु थासन चलायमान थ{ तेवारें शवधिज्ञानयी जगवानने राज्यपाटे स्थापना क रवा थवसर जाणी माहाराज तिहां थावी नगवानने मुकुट,कुंमल, दार प्रमुख पदेरावी सिंहासन उपर वेसाडी राज्य थनिपेक कसो तिहां युगलीया महाराजना कदेवाथी जल सेवा गया दता परंतु ते राज्यानिपेक यश् गया पली जल लेश्ने थाव्या तेवारें नगवानने स पगार सहित सिहासन उपर वेठेला जोड्ने युगलीयाने विवेक श्राव्यो जे वीजा तो सर्व श रीर उपर शोना थइ रही ये परंतु एक जगवानना पग खाली देखाय ने एबु जाणी पग पर पाणी दोग्य केटली प्रतोमा तो युगलीया मांदोमांद वढवाड करीने नानि कुलघर पासें न्याय कराववा गया नानिराजाये तेमने कहुं के थमे गरढा थया माटे तमे रुपनने जश् कहो ते तमारो न्याय करशे युगलीयायें जश् रुपनजीने कह्यो रुपनली वोल्या मने राज्य थ निपेक करी राजा स्थापो तेवार युगलीयाये धूलनो एक महोटो उँटलो वनावी तेना उपर प्र जुने वैसाही पोते थलिपेक करवा पाणी खेवा गया एवामां नु थासन कंप्युं तेणे थावीने मुकुटाविक थलंकार पड़ेरावी सिहासने वेसाही, वस्त्रविनूपित करी राज्यानिपेक विधि सा चव्यो प्रनु उपर उत्र धारण कम्यु, चामर वीजतो थको महाराज पोते प्रजुनी सेवा करे ने एट सामां युगलीया पण कमलपवना नामां पाणी जरी तथाष्या तिहां नगवाननुं स्वरूप स लिकारविनूपित देखीने चितववा जाग्या के प्रथम नगवानना केवा प्रमाणे जो पाणी एम ।' ना मस्तक पर नास्वियें तो सर्व वस्त्र, थलंकार जीजा जाय माटे स्वामीनो मावो पग लूटो तेना उपर न्दवण करीये एम विचारी मावा पग उपर थनिपेक कीधो तेवारें इस महाराज वोल्या ए युगलीया जला विनीत पुरुपो ने तेमाटे हा विनीता नामें नगरी वसा ववी एवं कदीने वैश्रवण नामें देवने ई नगरी वसावी थापवानी थाहा थापी तेवारें चैत्र । वणे विनीता नगरी बनावी ते केवी रीतनी वनावी तोके पार योजन लाबी, नव योजन पोली, थाठ वरवाजा कस्सा, फरतो महोटो कोट करो, ईशान कोणमा सात नूमि चोखूणो एवो एक महोटो नानिराजाने रहेवा माटे घर वनायुं, थने पूर्व दिशायें जरतने रहेवा सारु सात नूमीनु घर वनाप्यु, थनिकोणमां वागुबलीने रदेवा माटे मदोर्दु घर बनायूं तेनी व धर्मा श्रीरुपनदेवजीने रदेवा सारु एकवीश नूमिनो घर बनायु, एकसो था जिनमदिर । - - वनाध्या, वली राज्यने यर्थे हाथी, घोडा, गाय, ऊंट, वेसर, बलव प्रमुख चतुप्पदोनो सरह कसो थागज तो ए हाथी प्रमुख सर्व जीवो जंगलमा फरता रहेता हता वली केटलाएक जुगनीया थपराधमां थावे तेमने दम वेवामाटे सया एवा नामयी माणसो स्थापन कस्या, केट लाएक गुरुस्थानीया करी तेमने नोगा एवा नामथी स्थापन कस्या, केटलाएक ममताधिप करीने तेमने राजन्य एवा नामथी थाप्या, बीजा पायदत क्षत्रियो एवा नामेंकरी थाप्या एम चार प्रकारना पुरुपोनी व्यवस्था थ६ ॥ तथा वली जे ब्रह्मचर्य पाले ते ब्राह्मण, जे शस्त्र राखे ते क्षत्री, खेती करावे ते वैश्य, चाकरी करे ते शूझ, एवा नाम स्थापन कसा वली ए विनीता नगरीमा चोरासी चौटा कसा तेमा सोगंधिक, गांधी, तंबोली, कंदोई, सोनार, मणि यार, सोनुं वेचनार, माणिक वेघनार, नाणावटी, नाङजा, धान्यषजार, दोसी, चमार, क सारा, माली, घृत बजार, तथा तेल, सूत्र, कपास, नांमा, नाडाश्यादिक बजारो करी अनेक जातना उद्यमी वगेरे यया ॥ ॥ श्रीरुपननाथ स्वामीना पांच नाम थया एक पजनाथ, वीच प्रथम राजा, श्रीजु पहेलो निक्षाचर, चोधु पहेला केवली अने पांच, पहेजा तीर्थकर ए पांच नाम थया ॥ ११ ॥ ॥ श्री पननाथ थरिईत महाचतुर, जली प्रतिज्ञाना पाल नार, जला रूपवत, सर्वगुणसहित, सरल, विनीत, वीस लाख पूर्व पर्यंत कुमर पवे रह्या, त्रे सन लाख पूर्व लगें राज्य जोगव्यो, तिहां राज्य करतां जखवानी कला, गणवानी कला, बदोंतेर कला पुरुपोनी तथा चोशठ कला स्त्रीयोनी, कारीगरोना सो नेद, खेतीकर्मादिक त्रण कर्म त्याविक वातोनो लोकोना हित करवाने सारु उपदेश वझ्ने, सो पुत्रोने सो देशनो जूदोजूदो राज्य थापीने वजी लोकांतिक देवोना प्रतिबोधथी वरसीदान देने, गोत्रीयाने धन वांटो थापीने, उनालानो पहेजो महिनो, पहेल्नु पखवाडियुं, चैत्र वविथाउमना दिवसें, पाबले पहोरे, सुर्दसणा नामा पालखीमा वेसीने, देवमनुष्यसहित, यावत् विनीतानी राज्यधानीमाथी थश्ने, जिहां सिक्छनण उद्यान वे तिहां अशोक वृदनी नीचें पालखी राखीने, ते पाजवीमाथी नीचे उत रीने, सर्व घरेणा पोताना हायथी उतारीने, चार मुष्टि लोध करे, वेलानो एटले बन्नु तप पाणी रहित चविहारो करे बते, उत्तरापाढा नक्षत्रे चश्मानो योग श्रावे यके समकुलना, जोगकुलना, राज्यकुलना, क्षत्रियकुलना एवा कठ महाका प्रमुख चार हजार पुरुपोनी साथें श्वन एक देवसुष्य वस्त्र लश्ने, दीका जीधी, गृहस्थपणो त्यागीने साधुपणो अंगीकार करो ॥ हवे वली जगवाने दीक्षा लीधी तेथी पदेलानी वात घनेली ते जखियें बैयें। जरतनी साथै ब्राह्मी जन्मी इती ते वाद्गुषलीने परणावी बने जे घालवलीनी साथे सुव रीनो जन्म थयो हतो ते जरतने स्त्रीरन करवा माटे राखी एटले युगलधर्म मटाच्यो । हवे युगलीयाने थाहार पचे नदी ते थायी कहे प्रथमतो युगलीया कल्पवृक्ष्ना पत्रादिकनो थाहार करतां हता ते थयोम्य थया, खावा योग्य रह्या नही तेवारें लोक मूल, पत्र, कद, फल श्रने फूलनो थाहार फरवा जाग्या थपक्कशालिप्रमुख काचुं धान्य खावा लाग्या, ते खातांखाता पचे नही, पेटमा उखी थावे तेवारें लगवान् पासे थावी कव्वा लाम्या के थाहार कस्याथी थमा पेट चडी थावे जगवान योल्या जगारेक हाथर्मा मसतीने दाथनी घाफ थापीने खाठतो पची जासे केटजाएक विवस पनी ते पण पच्यो नदी पड़ी कारखा थने हृवयमा राखी घाफ थापीने श्राहार करवा कर्पु केटसा काल पठी ते पण पचवा जाम्पो नदी एवा थ बसरे वनमाहे वंश घासते पासते अग्नि उपन्यो ते देखीने युगजीयायें जाएयु ए कोश्यपूर्व

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चित्र अपभदेव मी सधी नपर सीन मारीना वास बनानीने युगलायाने ग्रापेने तया युगलीया माटीमा पिड नई प्रावी भगवानने रत्न उत्पन्न थरं वे एवं जाणी तेने हाथमा मेवा लाग्या तेथी हाथ वलवा मांमधा तेवारें तेनाथी वीदीता थका रूपनवेवजीने जश् कहेवा जाग्या के हे स्वामि एक अपूर्व रत्न उपन्' ले परंतु तेा क्रोध घणो ने तेथी हाथ लगाहीयें तो वालवाने दोडे बे एविपे क्याएक एतु । पण लखेलु डे के युगलीचाए जश् जगवानने कटुं के को राक्षस सतयो के पबी नगवाने थवधिझाने जोयुं तो थनी उपन्यो दीठो तेवार युगलीयाने कर्यु के तमे एमां तृण लगावीने थग्नि ग्रहण करो तेमा शालिप्रमुख धान्य पचावीने खाउँ तेवार युगलीयाए पसवाहाना ति रणा तोडीने थमि जुदो सप्लगावी, तेमां धान्य नारव्यु ते सर्व बली गर कांपण पालुं दा थमां थाव्युं नही ते जोइ फरी नगवान् पासें थावीने कदेवा लाग्या के ते पोतेज शुरख्यो ने माटे सर्व धान्य खाई जाय ले थमने कांई पण थापतो नथी ते सानली नगवान् वोल्या दु हाथी उपर चढीने थावं तेवारें मने एक माटीनो पिंम थापजो पनी गुगलीयायें तेमज कम् माटीनो पिमल थाव्या ते माटीमाथी जगवाने हामी, कुंमी प्रमुख वासण बनावी थाप्या थने सर्वे रीत पण कदी समजावी जेधावीयावीरीते बनावीने, वासदीमा पचावी एमाधान्य पाणी नाखीने यमि उपर चढावी पाईं धान्य करीने खाउँ एवा नगवानें बतावेला विधियी युग लीया थन्नने पचावीने स्वावा लाग्या तेवारें थन्न पचवा लाग्यं ए जोजनविधि कह्यो। ॥ दवे नगवाने थदार जातिनीजीपी ब्राह्मीने जिमणा हाथथी लखवाने वतावी तेना नाम कई १ ईसलिपी, २ नूतलिपी, ३ यलिपी, ५ राक्षसलिपी, ५ उती लिपी, ६ यावनी लिपी, तुरकीलिपी, ८ कीरीलिपी, ए शवडीलिपी, १० सेंधवी लिपी, ११ माजवी लिपी, १२ नहीलिपी, १३ नागरी लिपी, १४ लाटीलिपी, १५ पारिसीलिपी, १६ थनिमित्तिलिपी, १७ चाणाकीलिपी, १७ मूलदेवी लिपी ए श्रदार लिपीना नाम तथा पीजी पण वेशना नाम लिपीज मके लाटी, चोटी, माहाजी इत्यादिक लिपी जाणवी ॥ तथा गणित जेथांकनो विधान ते सुव रीने नगवाने मावे दाथे करवाने बतायु ते श्या जणी तोके "यंकानां वामतो गति ॥यदाणा दक्षिणतो गतिः” वली नरत महाराजने रूप करवानुं कर्म घतायुं तथा बाहुवलीने पुरुषाविलक्षण यताव्या तथा पुरुपनी पहोंतेर कला घतावी तेना नाम कहे जे १ लेखनकला, २ पठनकला ३ गणितकला, ४ गीत गावानी करना, ५ नाटकनी कला, प तालमाननी कला, ७ ढोल वजाव वानी कला, ७ मृदंग बजाववानी कला, ए वीणा वजाववानी कला, १0 वांसली वजाववानी कला, ११ नेरी वजाववानी कला, १२ दाथी परखवानी कला, १३ घोरा परखवानी कला, १४ धातुवादनी कला, १५ दृष्टिवावनी करता, १६ मंत्रिवावनी कला, १७ पलितविणासनी कला, १७ रनलक्षण, १ए नारीलक्षण, २० नरलक्षण, २१ बंदकरण, २२ तर्फवाद, १३ न्या य, २५ तत्त्वविचार, १५ काव्यकरण, २६ ज्योतिप, २७ चारवेदनी कला, २७ वैद्यकला, श्ए पट्नापाशान, ३० वशीकरण, ३१ अजन, ३२ लिपी, १३ रुपिकर्म, ३४ सुपन, ३५ वाणिज्य, ३५ राजसेवा, ३७ शकुन, ३० जाल, ३ए वायुस्वनन, ४० थमिस्तंनन, ४१ मेघ वविवानी कला, ४२ लेपनकला, ४३ मईनकला, ४४ तर्ध्व जावानी कला, ४५ घट वधननी कला, ५६ घणो फेरवो, धपत्र छेदवो, १७ मर्मनेदन, भए फल खेचवो, ५० पा पीवृष्टि, ५१ लोकाचार शीखवानी कला, ५२ लोकोनी मरजी राखवानी कला, ५३ फल नरवानी कला, ५४ खड्ग पारवानी कला, ५५ बुरीपंधन, ५५ मुशकरण, ५७ लोदघटन, ५७ वंतसमारण, पए काठशेदन, ६० चित्रकरण, ६१ बानुयुआ, १२ दृष्टियुद्ध, ६३ मुष्टियुद्ध, १४ वमयुम, १५ खमयुक्ष, ६६ वाग्युक्ष, ६७ गरुडमन, ४० सर्पदमन, ए नूतदमन, ७. योगध्यान, ७१ वर्पहान ७३ नामावली ए पुरुपनी बहोतेर कला जगवानें बतावी ॥ हवे स्त्रीयोनी घोशन कला बतावी तेना नाम कहे जे १ नाचवानी कला, ५ थादर वेवानी कला, ३ चित्रकला, ४ वादकला, ५ मत्रकला, ६ तंत्रकप्ता, शानकला, विज्ञानकला, ए दमकला, १० जलस्तंननकला, ११ गीत गावानी कला, १२ ताजमाननी कला, १३ मेघट छीनी कला, १४ फलाकष्टीनी कला, १५ वाग्गोपन, १५ आकारगोपन, १७ धर्मविचार, १७ सकुन जोएँ, १५ क्रियाकल्प, २० सस्कृतनापा बोजवी, २१ प्रसादनीति, २२ धर्मनीति, २३ वर्णिकादृष्ठी, २२ सुवर्णसिदि, ५५ सुगधितेल करवु, १६ लीजासहित चालवू, २७ हाथी घोडानी परीक्षा करवी, २७ पुरुषस्त्रीलक्षण जाणवू, ए सुवर्णरमनेदनुं ज्ञान, २० थदार नातिनी लीपी, ३१ तात्कालिक बुद्धि, ३२ वास्तुतिदि, ३३ वैयक्रिया, ३० काम किया, २५ घटघ्रमण, ३१ सारिपरिश्रम, ३४ अजनयोग, २७ चूर्णयोग, ३५ दस्तलाघव, ४० वचनचतुरता, ४१ जोजन विधि, ४२ वाणिज्यविधि, ४३ मुखमजन, ४ शालिखमन, ४५ कथा केदवी, ४६ जगुंथन, ४३ वाकुं बोजवं, 4G काव्यशक्ति, ४ए वेस बनाववो, ५० सर्वप्रकारनी नापा बोलवी, ५१ थनिधानझान, ५३ घरेणा पढेरवा, ५३ राजानी नक्ति करवी, ५४ घरनो थाचार शीखवो, ५५ काव्यकरण, ५६ परने दराववो, ५७ धान्य रांधवु, ५७ केश बांधवा गुथवा, ५ए वीणा वजाववी, ६० विर्तमावाद, ६१ थकविचार, ५२ लोकव्य वहार, ६३ यंत्याक्षरिका, ६५ प्रभप्रहेलिका ए चोशन स्त्रीयोनी कला जगवाने बतावी तथा श्रीरुपनदेवजीना सो पुत्रना नाम थावी रीतें ले १ नरत ५ बागुवली, ३ मस्तक, ५ पुत्रा गारक, ५ मत्रिवेव, ६ थंगज्योति, उ मलयवेव, नार्गवनाथ, ए अगदेव, १० वसुदेव, ११ मगधनायक इत्याविक सो पुत्र जाणवा तेमाथी जरतने तो थयोध्यानु राज्य थाप्यु तथा वाहुवलीने तिक्षशिला नगरीनु राज्य थाप्यु थने वीजा थमा पुनोने थग वग प्रमुख देशोना राज्य थाप्या पनी पोतें चार दजार पुरुपोनी साथे दीक्षा जश्ने विहार कसो हतो ते वखत चार मुष्टी लोच कस्यो हतो थने वीजा तीर्थकर सर्व पांच मुष्टी जोच करे ने तेनु का रण कही वेखाडे नगवाने जेवारे चार मुष्टी लोच करी लीधो तेवारें पांचमी मुवीय व खेडी नाखीये एटला केस पाउल चोटलीमा रह्या एटलामा पवन वाह्यो तेने सीधे ते केसनी शिखा फरकीने पोदोली या तेथी घणीज सोनवा लागी ते जोश्न श्मदाराजे प्रतुने विनति करी के महाराज केशनी शिखा घणीज सारी रमणिक देखाय माटे एमज रहे तो सारु प्र ये पण ते शिखा एमज राखी ते जेम पपश्चमाथी सिंधूनदी निकलती वखते सवा न यो जननी पोहोली ठे थने पनी थनुक्रमे वधती वधती समुश्मा मलता साही बाशव योजननी पोहोलपणे थयनी ने तेम ए चोटली पण मस्तकना थडमाथी नीकलेती ते धागल थागज पोहोलामा विस्तारने पामती दीगमा आवी तेथी पप्रश्ह सिधुनदीना प्रवाहनी पेरे शोना कारी वेखवा लागी तेने लोक जापायें थमा चोटली पण कहे जे हवे जगवान घोर थनिमद धारी थपा थका मामानुग्रामे विहार करतां याकरा परिसद सहन करता थका विचरे ने तिहां जगवानने ययपि बह तप पारण करतुं तु तथापि ते वरखतमा सुपात्र साधुने दान देवानो विपि कोइ जाणतो न इतो निछानो व्यवदार कोइ जाणतो नथी साधु ते अने निक्षा से वली एवो कोइ समजे नदी ते वखत को निशानो मागनार पण ऊनीयामा हतो नही तेणेकरी जिहां जाय तिहां कोई अन्न श्रापे नही तेथी चार हजार साधु तपायें पीच्या थका प्रचने थाहारनो सपाय पूबवा लाग्या पण प्रनु का षोल्या नही मौन पणे रह्या तेवारें कष्ठ श्रने महाकठने पूघु तेणे पण कसं के श्रमे पण कोइ जाणता नथी तेवारें सर्वे विचार करवा लाग्या के श्रापणे प्रथमथीज लगवानने का पूजघु नही थने दवे पाठा घेर जश्ने वेस, पण योग्य नथी तेम थाहार कसा विना पण रस्यु जाय नही तो हवे श्रापणने ए वनवासमा रहेज नहुँ ने एम चिंतवीने गंगानदीना वक्षण तटना वनमा जटिल तापस थक्ने रह्या थने वृक्षमाथी नीचे तूटी पडेला पत्र, फल, छन थाविकनो श्रादार करवा लाग्या तथा वृक्षनी बालना वस्त्र पेहरे बने श्रीरुप नदेवजीन ध्यान करता थका विचरवा साम्या ॥ हवे जेवारें प्रजुयें दीक्षा लीधी हती तेवारे सर्व पुनोने जुदा जुदा देशोना राज्य वडेंची बाप्या दता ते अवसरमा काठ थने म दाफछना पुत्र एक नमि थने धीजो विनमी ए वेगुने नगवाने पुत्रनी पेरे पाक्या दता ते पन्ने जण ते वरखतें क्यांएक वेशांतरें जता रह्या दता पण दाजर हता नही ते जेवारें पाग फरी थाव्या तेवारें तेणे जरतने थावी क' के थमने राज्य केम न थाप्यो जरतें कभु के हुँ तमने थोडोक नाग था( तेणे कर्पु के ताहारा पासेयी न लहीये तेवारें जरतें की जगवान जाणे ने तमे जाणो तेवारे वेगु नाश् नरतनी अवगणना करीने नगवाननी पासें थावी तेमना चरणकमलनी सेवा करीने कहेवा जाग्या के दे प्रनु तमे सर्वने राज्य दी) माटे थमोने राज्य थापो नगवाने तो ससारत्याग करो ले माटे मौनपरो रह्या कांश उत्तर दीधु नदी तेवारे ते पन्ने जण राज्यने थथै नगवाननी पाउल रह्या जिहां नगवान कना रहे तिहा जगा साफ करे, कांटो, काकरो कादाही नाखे, पाणी बटकावे, फूल विडावे, मांस मशकादिक तमाडे, त्रिकाल खड्न धरे एम प्रजुनी सेवा नक्कि करता यका विचरे ने एकदा धरणी जगवानने वांदवा थायो तेणे नमि विनमिने कर्यु के नगवान तो त्यागी ने माटे तमे जरतनी पासे जाउ ते तमोने राज्य थापशे तेवार ते वोल्या जगवान विना थमे बीजा कोई पासेथी राज्य मागीये नही एवं सांजली धरणीं तेमनी नक्तिथी संतुष्ट थश्ने कदेवा लागो के तमे एकमना यश्ने प्रजुनी सेवा करो हो तो महोटाना चरणनी सेवा केवारें पण निष्फल थाय नही तेथी हुँ तमारा उपर निवाज्यो तु माटे जे मागो ते हूँ आपु तो पण तेणे काय माग्युं नही तेवारें धरणी नगवतना शरीर अदृष्टि श्रदृष्टि एटले नगवानना थवतरीने श्रहतालीश हजार विया पाठ गुणताज सिया जाय एवी शीस्वावी थने गौरी, गांधारी, रोहिणी तथा प्रज्ञप्ति प्रमुख शोल देवीयो ते विद्याउनी अधिष्ठायका वे ते थापी थने वैतादघ पर्वतनी दक्षण उत्तर श्रेणीने राज्य थाप्युं पनी विद्या साधी बन्ने नाश्व विद्याधरनी शदि पाम्या त्यारे पोतानो सर्व स्वजनवर्ग लश्ने रथनुपुर चक्रवा लादि पचास नगर उत्तर श्रेणिना तथा गगनवधन प्रमुख शात नगर वक्षण श्रेणीना वसा वीने विद्याना पलथी सर्व परिवार सहित तिदा रदेता दवा पडी ते नाश्मने धरणी कर्यु के दे विद्याधरो तमे सनिलो जे एक तो केवली नगवाननी, पीजी जिनप्रतिमानी, त्रीजी चरम शरीरीनी थने चौथी प्रतिमाघर साधुनी ए चारनी जो तमे श्राशातना करशो भने वली एर्नु वनघन करशो एटजे ए चारने रस्तामा मूकी तेना वर्शन सेवा कमा विना एमन पाया जासो तपा परस्त्रीनी साथे जोरावरीथीनोग जोगवशो तो तमारी विद्या नि फल - थइ जाशे एवी रीते शिखामण थापीने ते शिखामण रजनीत उपर जखीने धरणे पोताने स्थानके गयो पठी नगवाननी सेवानु फल नरतने कहीने शोजजाति विद्याधरोनी थापी दक्षण श्रेणीनु राज्य नमि करवा लाग्यो भने उत्तर श्रेणीनु राज्य विनमि करवा जाम्यो ॥ इति नमि विनमि प्रबंध ॥ दवे जगवान पूर्वकत अंतराय कर्मना उदय थकी एक वर्ष पर्यंत था दार विना रह्या पर्याय शुरू निदान पामता दवा जिहां गोचरीयें जाय तिदा महोटो मा एस जोश्ने कोइ वस्व थापे, को थानरण थापे, कोइ मणी, माणिक यने मुक्ताफजना थाल नरी थापे, कोश्क तो घणी स्वरूपवान् एवी कन्याने शोज शणगारे शणगारीने थापवा तयार थाय, कोश्क तो हाथी, घोडा, रथ इत्यादिक वाहन थापवा थावे, कोई एक धननृत सुवर्णस्थालप्रमुख नचित वस्तु थापवा यावे एम घण घण पदार्थ लावीने लोको स्वामिनी थागत घरे ते सर्व थणखपता नणी स्वामी लीये नही पण अन्न कोइ थापवा थावे नदी एवी रीते एक वर्ष पर्यंत स्वामी निराहारी रह्या पण थाहार विना लगार मात्र मग्या नही दीनपणु श्रायु नही एवी रीतें नगवान विचरता थका एकदा गजपुर नगरे पधास्या तिहां वाहुवलीनो पुत्र सोमप्रन नामे राजा राज्य करे ले तेनो पुत्र श्रेयांस कुमर युवराजा तेणे ते रात्रीये सुपर्नु दीतुं इतुं जे मेरुपर्वत मलिन थइ गयो हतो तेने में अमृतना घडा थी धोश्ने उज्ज्वज शोलायमान कीधो तथा श्रेयांसना पिता सोमप्रन राजाने एवं सुपर्नु श्राव्यु जे कोई एक पुरुपने शन्नुयें घेरी लीयो ते श्रेयांस कुमरना सहाय थकी जय पामी ठूटो थयो तथा ते नगरना सुबुद्धि शेठने सुपर्नु थाव्युं जे सूर्यना सहस्र किरणो पडता हता तेने श्रेयांस कुमरे पाग सूर्यमां थाप्या एत्रणे जण प्रनाते राजसनामां नेला थया तिहां स Cord- हुयें पोतपोताने श्रावेला सुपनानी वात कही तेवारें सर्वना मना एवो विचार भाष्यो के था सुपनार्नु सर्वे फल श्रेयांसकुमरने थाशे अने श्रेयांसने कोई महोटो लान थाशे एम कही सद्ध पोतपोताने घेर गया पनी मध्यान्ह समये गोचरी करवाने माटे श्रीशषनदेवजी घरघ रने विपे फरवा लाम्या तेने लोको पूर्वोक्त रीते वस्त्रानरणाविक वस्तु थापवा लाग्या पण प्रच खेता नथी तेथी जोकोमा कोजादल थइ रह्यो जे जे नगवानतो काश्पण लेता नयी एटलामा श्रेयांस कुमर गोखमा बेठा इता तेणे श्रीरुपनदेवजीने दीठा पली श्वापो करता जातिस्मरण झान पाम्या तेणेकरी पूर्वलो नव वीतो तेवार जाण्यु जे श्रदो ' दुतो ए प्रचनो पूर्वनवने विपे सारथी हतो तिहां में पण दीक्षा लीधी हती तिहां वजसेन तीर्थकरें एवं कर्मु दतुं जे ए वजनान राजर्पि नरतक्षेत्रमा पहेला तीर्थकर थाशे तेज ए प्रतु तीर्थकर, देवोना देव गो चरीयें नमता देखाय ने एम जाणी गोखथकी हेवा उतरीने कर्यु के हे प्रतु लोको साधुने दान वेवानी रीतीमा वाकेव नथी एम कदी पांच थनिगमन साचवी प्रण प्रदक्षिणा दे॥ धामि खमासमणो ववित्रं जावणिजाए निसिदिखाए मछएण वदामि ॥१॥ ॥ एम व मासमण थापी पड़ी श्छाकारि सुदराश्सहदेवसि सुख तप शरीर निरावाघ मुख सजम जात्रा निर्वहोरोजी हे जगवन् नातपाणीनो लान देवा पधारो महारं गृहांगण पावन करो, महारे घरे पधारो, शुक्ष तालीश दोप रहित थाहार वदोरीने महारो निस्तार करो एम हां श्रेयांस कुमर पहेला प्रावक प्रगट थया ते समय शेखहीना रसे नरजा एकशोने थाउ घडा श्रेयांस कुमरने कोक नेट वापी गयेजो ते शुभमान घडा लश्ने श्रेयास कुमरे जगवतने निदा सेवानी विनती करी हा कवी घटना करे बे के दान लेती वखतें प्रजुना वेनु दायनो मांदोमाहे विवाद थयो ते थावी रीते के प्रथम जमणो हाथ गद्गद्वरे करीने श्रेयांस कुमर प्रत्ये कहेतो दवो के थहो श्रेयांस तुं सनिल द्वं श्रीरुपनदेवनो याजन्मनो सेवक जु, में श्री कनदेवजीना प्रसाकरीने घणा महोटा महोटा उत्तम काम करना बे तेणेकरी दु घणो प्रतिष्ठा पामेलो तु ते महारा कर्तव्य तुं निरपेक्ष पणे सांनल प्रथम तो में शाविक देवोने देखता थका जमणे थवेकरीने प्रलने अमृतपान कराव्यु एटले तीर्थकरनी एवी रीतिज ले के पो तानी मातानु तथा थन्य स्त्रीयोन स्तनपान नकरे पण जेवारे सुख लागे तेवारें पोताना ज मणा दायनो र्थगुतो चूसवा मामे के तरतज तेमां थमृतमयी पुजन प्रणमी जाय तेथी कुधावेदनी उपशमी जाय ॥१॥ वली वसस्थापनाने अवसरें में प्रश्ना दाथथी सेल तीनो सांतो महण करीने स्वामीनी वाग पूरण करी माटे वसस्थापवामां पण ई धागेवान थयो ॥२॥ वली में जरतराजाने तिजक करीने विनीता नगरीनु राज्य थापी खं मनो नोक्ता को एटले राज्यस्थापनमा पण जमणे दाज मगलिक कामे टीलु कराय ने ॥३॥ वली जरतनी पेरेज में वागुपलीने तिक्षशिला नगरी, राज्य थाप्यं ॥ ४ ॥ तथा शेप यमा पत्रने पण एज रीते में राज्य थाप्पु ॥ ५॥ तथा सुनदा अने सुमगला ए ये फन्याउने पण हाथ मलाववाने अवसरे जमणे दाये जालीने स्वामीने परणावी दीधी ॥ ॥ वली में एक वर्ष पर्यंत स्वइष्ठित वरसी दान थापीने त्रए जगतना मनोवांबित पूरण कसा केमके दान पण जमणा हाथेज देवाय ॥ ७॥ ॥ वली हुँ बत्र, चामर, चक्र, गदा खड्ग, धनुष्य, अकुश वज्ज थने शखादिक गुज लक्षणेकरी विराजमान थको झोनी रह्यो बु एवा सर्व लक्षण हु (जमणो हाथ) धारण करु तु थने लक्षण जोवावाला लोक पण महा रीज रेखा थादिक सर्व लक्षणने लए ॥ ७॥ वली तीर्थयात्रा, पुत्रप्राप्ति, सोजाग्य, यश कीर्तिनी सूचक रेखाउँनो धारक पण तुज एटले ए सर्व नावोने सूचववा वाली रेखा जो जमणा हाथमा होय तोज तखूप फलनी प्राप्ति थाय जे ॥ ५॥ वली टुं चोखा देखवामा सो धवामा चतुर व्यापारवान बु एटले चोखा गोधूमाविकमाथी कांकरा प्रमुख सोधी काहाडवा ते जमणा हाथचीज पनी शके ॥ १० ॥ वली दानने विपे, जोजनने विपे, वेवपूजाने विपे, परमेश्वरना स्मरणने विपे, प्रीति धांधवाने विपे, बोल तथा कचुलात थापवाने विपे वानने विपे, इत्यादिक शुन ग्रन कार्योंमा महारोज थधिकार ॥११॥ एवी रीते दु सर्वनी उपर ई थने महोटा महोटा कामोमा मदारोथधिकार दे तो कदो था वल्प सेलहीना तुष्ठ रसनी इंग्ल केवीरीतें था वली में ध्यासी लाख पूर्व लगें जगवाननी माथें राज्य साम्राज्य पाठ्यु तो हवे तु दमणा जगवतनी बागल थश्ने केवी रीते याचना कराई तेज कारणथी में खावु, पीएँ, पढेरवु, , नाटक देखवू, इत्याविक कीडाविना मौन धरावीने वन गहन थटवीमा प्रचने नमाया तो दवे था सेजडीना रसने हुँ ग्रहण न करु माटे तमे मावा दाथने कहो तो ते मा गीलेशे एवा जमणा हाथना वचन सनिलीने मावो हाथ बोल्यो के दे निर्लक्ष तु वृथा पोतानी मेले पोताना थारमानी महोटाइ करीने छ प्रशसा करे जे पोताना मुखथी जे पोतानी मदोटा फरे तेमां को गुण दोय तोपण ते लघुताने पामी-जाय बने परनी प्रशसा करवाथी जो निर्गुणी होय तो पण गुणवान् थाय गुणवत दोय तेना गुण तो पोतानी मेसेज प्रगट थाय जेम कपूरनो सुगध, रमनुं तेज थने मणिनुं निर्विपपणु इत्याविक जे गुणो बे ते पोतानी मेजेज प्रगट देखा यावे वे पण ते को कोश्ने थागल कहेवा जाता नधी वली एकाज रहेनारा घे जण होय तेमा H

थी एक जण उनीने पोताना गुण बीजानी बागल वर्णवी देखाडे ते युक्त नथी जेम माताना
मुख बागल मामा वर्णन करते देखाडतुं युक्त कदेवाय नही तेनी पेठे ए पण जाणी लेतु ॥
माटे थदो श्रीश्रेयांस श्रीपन वेवना परपोत्रा महारु पण कर्तष्प जे जे ते तु सांजल परमे
श्वरे जे वे कन्याने परणवानु स्वीकास्यु तेमने सूवा बेसवार्नु ठेकाएं तो मेंज थाप्यं कारण के
स्त्रीयो जे जे ते पतिना मावापासा तरफ सूवे पेशे ने एटले जमणे दाये तो मात्र स्वीन हाथ
नालीने साडी मूकी पण तेमने वेसवा माटे स्थानक तो में थाप्यं ॥ १॥ वली टुं ढाल
धागल राखीने सयामनेविपे स्वामीनु रक्षण करु , थने जमणो हाथ तो खड्ग उपाठीने
पाडो नासी जाय डे ॥५॥ वली ढुं संग्राममा धनुष्यने वागल धारण करीने उनो
रड थने या जमणो हाथ तो तीर लश्ने कानने विषे चुगलनी पेरे पेशे ने ॥३॥
वली याफ गणवानो व्यापार पण मदारी पासे थाय ने एटचे बाफनी वामगति होय ने
॥ ४ ॥ वली प्रामांतरें प्रयाण करता गघेडो पण जो मदारी विशा तरफ थावीने बोले
तो सिदिवायक ने ॥ ५॥ तेमन देव चकली पण मावे पासे यावी बोले तेवार शुन
फलनी सूचवनारी थाय ॥ ६॥ वली प्रथम प्रयाणने विपे प्रथम रात्रीना पहोरमा
सीयालीया पण मदारी दिशायें रह्या थका बोले तो सिदिना करवावाला थाय ॥४॥
वली जे प्राणी रोगादिकें पीडाणो होय ते पण घणु करीने मावे पासे सूवे तो तेने समाधि
कारक थाय ॥ ७॥ वजी मदारी तरफनी चश्नाही वदेतां जे शुभकामनो प्रारंन कसो होय
ते सिविधायक थाय ॥५॥ वली दे श्रेयांस तु सांनज के था पापी जमणा दाथे प्रनुने
परणवाने अवसरे कन्यानो हाथ ग्रहण करो तेवारे पण मने बोलाष्यु नही ॥१७॥

वली कसार पण एणे एकजेज खाधु पण एम न जाएपं जे था महारो नाइ नूरख्यो बे माटे योटोक एने पण वोलावीने खवाड़े एवो विचार कसा विना महाराथी कपट करीने ए एक लोज खाइ गयो तेथीए नि केवल पेट नरो देखाय , फोकट पोताना मुखथी पोताना गु पर्नु वर्णन करे ते ॥ ११ ॥ वली हे श्रेयांस तु सांजल पीजी पण एनी निष्ठुरता कदी देखाई के जे वखत मिष्टान्नपान नोजन करे तेवारें जोजन तो पोते करे बने मक्षिका महारा पासे उहावे तो पण ढुं ते वस्वत मदारी दाक्षिणतायी महारो मदोटो ना जाणीने एने का कद्गु नदी ॥ १५॥ वली ए जमणा दाथमां चतुराश किंवा धीजो कोई गुण पण फार नयी कारण के जे वस्वत मस्तकें पागडी वीटे ने ते वखत एतो जेमतेम वींटी नाखे पण पाठलथी घरोघर थांटा प्रमुख सुधारवा करवानें काम, वरावर रचना करवी, सुदर थाकार करवो तेतो सर्व ढुंज करूं हूँ ॥ १४ ॥ वली था जमणो हाथ जे जे ते जूव टानो रमवावालो वे ॥१५॥ ॥ इत्यादिक दे श्रेयांस हूँ केटलुं तमोने कनु थमारा वे जएना सारा माग लक्षण तथा गुण थने यवगुणने सर्व जगत्र जाणे ने श्रथवा था श्री रुपनवेव स्वामी पोतेंज त्रण लोकना नाथ माटे सर्व जाणे हे एवी रीते थमो वेगु जणने विवाद करता यका एक वर्ष व्यतीत यइ गपुं तेथी जगवान वर्षी तपना करनार यया एम कुंटुयनो विरोध केवारें पण कल्याणकारी न थाय ते माटे दे श्रेयांस ए घणोज दीजो में तथापि वै तदारी दाक्षिणताथी एने समजाईं तु केमके कोइ प्रकारे जेवारें कुंटुवमा विरोध उत्पन्न थाय ने तेवारे संघधीने सबधीज पोतपोतामा प्रतिवोष थापी समजावे ले एम कही मावो हाथ जमणा दायने कईवा लाग्यो के रेनाश् या अवसरे थापणने विवाद

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II. चित्र ७२ LHHHHHHH श्रेयासकुमर भगवानने सेलमीमा रस रहोरावेरे कर घटतुं नथी हमणा स्वामीने केवल ज्ञाननी उत्पत्तिनेविपे तथा तीर्घ प्रवर्तननेविपे थने संघस्थापनाने विपे तमारुंज काम ने एमां बीजा कोठे काम नथी महोटाउने पोतार्ने काम ते पारके थर्थेज थाय ने जेम मातायें पीघेलु दूध ते बालकने यर्थेज थाय डे ते कारणे था वखतें श्रापणने विरोध करवू योग्य नथी एवी रीते मावो हाथ बोली रह्यो तेवारें श्रेयांस कुमर वेगु दायने समजाववा लाग्यो जे अरे मावा जमणा दायो तमे बन्ने जण पोतपो ताना कामा कल्याणकारी को परंतु दमणा तमे मदारी प्रार्थना सफल करो ते थावी रीते के तमे धेनु एकता था के जे थकी जगवानने बार मासना तपर्नु पारण थाय अने महारे पण सत्तम दान थापवाथी ससारसमुइ थकी तरवु थाय माटे तमें जला थइ महारा उपर रूपा करीने वे? जरा जगडो मटावीने नेला यश् जा एवी श्रेयांसनी विनति सनिलीने पन्ने दाथ पसलीने आकारे एका मजी गया तेवारें श्रेयांस कुमरे गुरु नावे करीने सेलहीनो रस वहोरावी दीयो तेनी शिखा राची चडी तथापि एक बिजमात्र पण नीचे पख्यो नदी जो हजारो घडा दाथमा ज्यावाली थापो श्रथवा सर्व समुशेना पाणी नाखो तो पण एक टीपु हाथथी पाहेर पडी जाय नही मात्र शिखा म्वी बदती यावे एवी सब्धि जेवारें प्राप्त ययेली होय तेवारें करपात्री थाय यष्टक्त ॥ माश्य घटसहस्सा, श्रदवा माश्य सागरा सके। जस्से थारिस्स लम्,ि सो पाणिपडग्गहा दोश् ॥१॥ ॥ ए जगवाननी लब्धिनो प्रनाव जाणवो पड़ी स्वामी तिहाज पारण कसुं ते वखत पांच विष्य प्रगट यया एकतो गधोदक फूलनी वृष्टि यज्ञ, बीच वसुधारानी वृष्टि थर, त्रीच्छ वस्त्रनी वृष्टि थर, चोथु थाकारों देव उनी वागी, पांच, “यहोदानमहोदान" एवी उद्घोषणा देवोयें करीश्रा पात्रदानथी श्रेयांस कुमरे मोक्ष फज सपार्जन कर, जिहां जगवाने पारण कर्यु तिहां रममय पीठ करायु, ए नगवानना पारणानो विवस वैशाख शुदि त्रीजनो दतो तेथी थक्ष्य त्रीज एवे नामे ते पर्व जगतमा मान्य थातो वो, लोकोयें प्रशसा करी के श्रीरुपनदेव सरखो पात्र बने सेलडीना रस सरखो शुक्ष थाहार तथा श्रेयांस कुमरना जेवो नाव ए कोई महोटा पुस्पना योगवडे चाय बे॥ यत ॥ रिसदेससमं पन, निरवध इस्कुरससमं वाण ॥ सियससमो जावो, इविध जइ मग्गिय गुजा ॥ १ ॥ श्रीधाविनायर्नु पारसेलडीना रसनु थ{ थने बीजा तीर्थ करोर्नु प्रथम पारएं वीर नोजन थयुं दवे ते वखत श्रेयांस कुमरने लोकोए पूरघु जे थ मे तो नगवान थाहार लेशे एवं जाणता न उता बने तमे शी रीते जाए{ जे नगवान था दार शे तेवारे श्रेयांस वोल्यो के दु नगवानना जीवनी साथे पाठ जव पर्यत रहेलो तेथी दान देवानो विधि सर्व जाj सेवारें लोकोयें बघु के ते थात नव केवी रीते ले वारे श्रेयांसे कसे के पहेजा नवमा जगवाननो जीव ललितांग देव हतो तिहाँ दु एमनी व पंप्रना नामें देवी वृती, पोजा नवमा स्वामी वजधर राजा थयो हूँ तेमनी श्रीमती नामें राणो थर, श्रीजा नवमां अमें वेद युगलीया यया, चोथा नवमां वेड जण सौधर्म देवलोकमा जइ मित्रपणे देवता थया, पांचमा नवा प्रनु वैयपुत्र जीवानद नामे थया थने दु एमनो मित्र थयो, बघ नवर्मा अच्युत देवलोके जश् वेढ्नु जण देवतामा मित्रपणे उपना, सा तमा नवमा प्रचतो वजनान नामे पक्रवर्ती थया तिदा हूँ एमनो सारथी थयो हतो, तिदा तीर्थकरनी पासेंची अमें सद्धयें दीक्षा लीधी, बारामा नवमां सर्वार्थ सिख विमाने में वता पणे पया तिहांची चवी ए नगवान घया अने हु एमनो पोतरो श्रेयांस जुपयो ते वात एटला दिवस पर्यंत कांश पण जाणतो नहतो परंतु थाजे में नगवानने वीवो तेथी मुजने जातिस्मरण ज्ञान अपनुं तेथी में जे सातमा नवमां दीक्षा पाली इती तेनी सर्वरीत मने जाण वामां श्रावी तेवारें में साधुनी मर्यादायें थादार वदोराव्यो, ए महोटा पुरुप , एमने कांध नाविकनी गरज नथी, ए वात सनिलीने सर्व लोकोए साधुने थाहार थापवानो विधि जाणी लीधो दवे नगवानने एक वर्ष पर्यंत चुरख्यो रहेतु पहघु बने थाहार मल्यो नदी ए कया थतराय कर्मना उदयथी थरं ते कही देखाडे जे जगवान पूर्व कोश्क नवमां शेतनो जीव दता ते शेव एक दिवस करसणीयोनी पासें उगराणी करवा गया तिहां ते करसणीय स्खलो कमो इतो तेनो धान कादाडवा सारु ते करसणी पोताना बलदोने धानमा फेरवे ने ते बल द फरता फरता जे वखत नीचें नमीने धानमा मोहोई घाले तेवा, करसणी बलदोना मोहो डाने उपर चावका मारे ते जो शेतने दया थावी तेथी शेते कणबीने कडे के घरे एने तु फोकट शावास्ते मारे ई एमना मोहोडा उपर बीकुं बांधी मूक तो धान खाशे नही पड़ी वधा करसणीम्ये तेमज बीका वांध्या ते बीका बार पोर सुधी वाध्या रह्या ए थतराय कर्म नगवाने वाध्यो हतोतेथा नवा उदय थाव्यु तथा कोश्क थाचार्य कहे बे के जगवाने जेवारें महाविदेह क्षेत्रमा उ मित्रनी साथै चारित्र जी, हतुं ते बएमा श्रीशषननो जीव महोटो दतो ते सपरिवार विहार करता करता कोश्क कएबीना क्षेत्रनी वाढे जाय जे तेवामां ते कणवी पण धान काहाडवा माटे वजदोने फेरवे ने दालरु खेडता वचमा वचा ते बलदो नीचा यह थश्ने धान खाये तेवारे ते कपषी तेने परोणे करी मार श्रापे ते देखी गुरु चितववा लाग्या जे ए कणवी विचारा वलदोने परोणानो मार थापे बे ते करतां जो ए बलदोना मुखे ।

Mr. शोकुं याधी मूके तो कापण धान खाइ शके नही थने हीमघाज करे एवी रीतें मुखथी तो घोया नही पण मनमा चितष्यु दतु पनी ते श्रणथाप्लोयुं कर्मथा नवमा उदय थायुं तेना मनावयो प्रनु एक वर्ष सुधी थाहार पाणी पाम्या नदी ए पागंतर ,माटे कोश्ने पण श्रत राय पाहयो नही एम था थवसर्पिणी कालमां श्रेयांसकुमरथी पहेल वहेलु सुपात्रदान प्र वर्यु ॥ यतः ॥ मिथ्याष्टिसहस्त्रेन्यो, वरमेको जिनाप्रय ॥ जिनायिसहस्रन्यो, वरमेकोर पुवती ॥१॥ ॥ थप्नुवतिसहस्रन्यो, चरमेको महायती ॥ महाव्रतिसहस्रन्यो, वरमेको जि नेश्वर ॥२॥ ॥ जिनेश्वरसम पात्रं, न नूतं न नविष्यति ॥ यतः पाप्रविशेपेण, वेयं दान धनात्मनि ॥॥ ॥ इति नगवत पारणाधिकार ॥ ॥ दवे नगवान विहार करता थकां बद्दु लोदेशमा तिक्षशिला नगरीने उयाने संध्या समयें कासग्गे रह्या तिहां वनपालकें जश्ने वा दुवलिराजाने वधामणी दीधी तेवारें वनपालकने दान थापी संतोपीने पनी मनमा विचास्यु के दमणा सांज पडी थवारु थर्पु वे तेथी थोडा वखता सर्व परिवार नेलो था शके नही केमके त्रए लाख तो महारा पुत्र ठे वली पौत्रादिक थनेक ले तेसर्व एकता थइ शके नही माटे मनातें महामहोत्सवसदित प्रजुने दिवा जलं एम चितवी वेशी रह्यो पढी मनातें नगरी शण गारी घणा थामयरसहित प्रखने वांदवा गयो एटलामा नगवानतो थप्रतिवध विदारी ने माटे वाकुबजी थाव्यानीथगार विहार फरी दूरदेशे चाया गया तेथी बाहुवलीये नगवानने दीना नही माटे घणो खेद करवा लाग्यो कानमा थांगली नारखीने उबस्वरें रुवन कयुं थने प्रजुना वे पग पासें उनोरही पोल्पो हे पाषायादम दे पावाबादम एवी वांग मारी तिहाथी पांग चाली दमणा पण ते समुदायवाला कहे ॥पनी जगवाननी नकि करवाने अये निहां प्रज्जु काम्स्सम्गमा मना हता ते स्थानकें धर्मचक एवे नामे आठ योजनना विस्तार वालो एक योजन कयो, बजार खूणानो हजार पगथीयावालो एवो रत्नमय पोत बांध्यो थून कराव्यो तेनी उपर नगवानना पगला थाप्या थने जाए जे एज नगवान के एवी बुदिथी नम स्कार कन्यो वीजा लोकोये पण तेवोज मदिमा कसो पड़ी पण तिदा थावीने परणामादि विधि साचवतो दतो तिदायी वाद्गुवलीलतपीठनो महिमा चाज्यो एम प्र पृथ्वीतले विहार करें बे॥ हवे जे दिवसथी जगवान दीक्षा जश्ने विदार करी गया ते दिवसथी मरुदेवीमाता नरत महाराजने संना थाप्यां करे ने थने कहे के हे जरत जेम कमलना फूलोनी मालाने ना स्वी थापीयें सेवी रीतें ए रुपनो मुजने डोडीने पायो गयो थने एकाकी वनवासी थयो , नुख तृपायें पीडातो दशे, क्याएक मसाण अथवा गुफाउंमा तपस्या करतो वशे, टादार ताप सहन करतो दशे, वर्षाकाजमां नीजातो दशे, मांस मत्सर झक मारता दो, थरे दुपा पणी हुँ जे पुत्रने थाटलं 5 व थ{ जे ते सनिलु तेम बतां मरती केम नयी माटे महारा जेवी दुखणी क्यांय पण कोई इसे नही, अरे नरत तुतो राज्यना सुखमा लोनाणो बो, महारा बोकरानी खबर पण कादाढतो नथी, तुंतो सर्व प्रकारनी सुवर रसोयो करीने खाय के थने महारो पुततो निक्षा मागी शुका टुकरा खाय में, तुतो सारा मजाना घरेणा गाठां पहेरे में अने मदारो पुत्रतो नग्न फरे , तुतो मुख सय्यायें सूवे ने धने महारो पुत्र कठण कांकरा कांटावाली जमीन उपर सुश रहे डे, घरे जे मधुर गीत गानें करी जागतो इतो ते शृगाला दिकना पृष्ठस्वरें जागतो दशे वली तेनी नूख तृपा अने शरीरनी शुश्रूषानी खबर कोण लेतो दो तथा अण्वाणे पगें चालतो दशे इत्यादिक अनेक-सर्जना थापती रहे , पुत्रनी चिताथी मरुदेवी माताने यांचे पमल थावी गया तेने वली नरतराजा समजावे के माताजी तमे कांश पुस करो नही तमारो पुत्र घणो सुखी जे तेवार फरी माता कहे के मने देखाउ तेने नरत कहे के दवे थोडा दिवसोमां श्रदीथां थावशे तेवार हूँ तमोने देखाडीश एम मरुदेवी माता जरतने घलना देता थका रह्या ॥ दवे श्रीषनदेव अरिहंते एक हजार वर्ष पर्यंत कायाने वोसरावी दीधी शरीरनी शुश्र्पा त्यागी थापी, एमने कांई उपसर्ग थया नही परंतु एक वर्ष थाहार मल्यो नही एटलु कष्ट वीतुं ते कष्टने सदन करता थका, श्रात्माने नावता थका, एक हजार वर्ष वीत्या त्यारे सीयालानो चोयो मदिनो, सातमु पखवाडियुं, फाल्गुनवदि यगीधारसने दिवसें पूर्वान्द कालना समयनेविपे पुरिमताल नगरना शकटमुख नामा ४ यानमा न्यग्रोध वडवृक्षनी नीचे, पाणीयें रहित थध्म तप कीघे थके, उत्तरापाढा नक्षत्र चश्मानो योग थावे यके, शुक्लथ्यानने विचाले वर्ततां थका, जेनी समान बीजो कोई जगतमा पदार्थ नयी एवु थनोपम धनतु केवलज्ञान थने केवलदर्शन उपर्नु तेनायोगें यावत् सर्व ना वने जाणता देखता थका विचरे ॥ १३ ॥ हवे एवा अवसरमां नरतमहाराजनो बायुद्ध शालामा चकरा पण प्रगट थयु तेवारे रुपनदेवना केवलझाननीयने बायुद्धशालाये चकरम सपनानी ए वेढ्नु वधामणी नरतजीने साये थावी ते वेढ्नु वधामणीयांने दर्षदान थापीने विदाय कला पत्री नरतजी विचारमा पख्या के ए वे वधामणी साथे थाव। एमाथी कोनो महोत्सव पहेलो करु एम होकवार विचारीने निमय कस्यो के चकरसतो संसारिक वे थने श्रीतीर्थकरनो केवल महोत्सव करवो ते लोकोत्तर उ वली पिताने पूज्या तो सर्वने पूज्या माटे प्रथम श्लोक थने परलोफनो सुस्वदाइ जे केवलज्ञान तेनो महोत्सव करु पनी चरमनी

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चित्र७३ भरवमहाराजराथीना कधनपर बेग थका मरु देनी ना माताने भगयान गुसममशरण पूजा करीश एम निरधारी श्रीमरुदेवीमाता पार्से थावीने कद्देवा लाम्या के हे माताजी तमे मुजने उजना देता हता ते तमारा पुन थाजे यहींथां पधारमा ले माटे चालो मदारी साथै हु तमारा पुत्रनो महिमा तमोने देखाई एम कही मरुदेवीजीने हाथी सपर वेशाडीने पनी पोते पण वेग वेशीने घणा थामवरसहित तिहाथी चाल्या ते चालता चालतां जेवार समो सरणने दुकहा थाया तेवारें माताजी बोल्या हे जरत था देवसबधि वाजा किदा वाजे , नरतजीये कयु ए वाजा तमारा पुत्रनी थागज वाजे में तोपण माताजीयें मान्यं नदी वली धागज चालतां घणा देव थने देवोउसमवसरणनी रचना करवा थने केवलज्ञाननो महो त्सव करवा पाया ले ते पोतपोतामा एक बोजाने दांकोदाक करी रह्या ले त सानजी वली पण मरुदेवीजीयें नरतने पूg के था कोलादज शानो या रह्यो बे तेवारें नरतराजा बोल्या हे माताजी था तमारा पुत्रनी पूजा करवाने माटे वेव देवी थावे जाय जे तेमनो कोलाहल थाय ले तोपण मतायें मान्य नही वली धागल जातां नरतमहाराजायें कर्मु के हे माताजी था रूपा, सोना थने रममयी एवा त्रण गढवाखं तमारा पुत्रनुं घर तो जू। एनी शोनार्नु दु यं वर्णन करु एनु वर्णनतो कोडो गमे ब्रह्मा पण करी शके नही ए वातने माताजी सत्य करी मानती यकी पोतानो पाखोने हाथथी मसलवा लागी तेथी पटन दूर थइ गया तेवारे खरे खरो समोसरण वीतो तिहा अनेक देव देवीयोने देखी मनमा विचार करो के जुर्मतो खरा था मोदनी विकलता कहेवी ने कुतो जाणती इती के महारो पुत्र खी बने थातो घ णोज सुखमा घेगे ने द्रुतो रडीरहोने थाधली थइ गइ थांखे पटल वली गया थने एणेतो मने सलारी पण नही, महा। तो पनपन करतां जीन पण सुकाइ गश् इती वली जरतने कांना देती हती जे महारो पुत्र नख, तृषा, टाढाड, तडका तथा वाद थादिकनी पीडा खमे में थने सपान्ह तथा वादाने रहित थको एकाकी हुंगर, वन तथा थटवीउमा भ्रमण करे ये तेने मनावी जर थावो थने एतो महारा उखने कोई पण जाणतो नथी, सुखवार्ना पण पूबतो नथी, थाही थाल्यो तो पण मन सवेसो मोकल्यो नही माटे धिक्कार वे ए मोड्ने तो हवे माहारे पण पुत्रनो साथे { काम , हूं कोण बने था पुत्र ते वली कोण, जगतमा । कोइ कोर्नु नथी, सर्व कोइ बापस्वार्थि डे, थरे महारा पुत्रं मने एटर्ख पण कहुं नही जे हु मुखीयो बु, मदारी चिता करशो नदी, परंतु ए शावास्ते एम कहे केमके एतो निरागी एने कोश्नी उपर राग रह्यो नथी थने छतो सरागी दु तेथी मनेतो एवा विकल्प याय एमां कोई ससय नथो तो दवे मदारे पण ए निरागी साथे श्यो प्रतिवध करवो ए एकपरका स्नेहने धिक्कार हो इत्याविक चितवना करी सर्व वस्तु उपर ममत्वरहित थइ यकी मरुदेवीजी माता गुनध्याने अव्यक्त नावना नावता थका केवलज्ञान पामी तेज वेलायें थतगड के वली थश्ने मोक्ष पोहोता हा कवीश्वर कहे ॥ यत ॥ पुत्रो युगादीशसमो न विश्वे, घ्रांत्वा वितो येन शरत्ससहस्रम् ॥ यवर्जितं केवलरत्नमम्य, स्नेहानदेवार्पित मातुरागु ॥१॥ मरुदेवीसमा नास्ति, याऽगात्पूर्व किलेक्तुिं । मुक्तिकन्यां तनूजार्य, शिवमार्गमपि स्फुटम् ॥२॥ अर्थ- ए श्रीपुगाविदेव सरखो पुत्र पोजो कोई विश्वमा थयो नथी थने थाशे पण नही के जेणे प्रप्वीने विपे एक हजार वर्ष सुधी भ्रमण करी कष्ट सहन करीने उपायु कमायु ए q जे केवलज्ञान म्प रम ते प्रयान स्नेह थकी प्रयम पोतानी माताने थाप्यं तेमज मरुदेवी समान कोइ माता पण यह नयो घने याशे पण नदी केमके जे पुप्रने परणाववाने बर्षे मुक्तिकन्या जोवाने माटे वागलथी त्यो गश्के कन्या जोश्ने महारा पुत्रने परणावु एम था थ वसार्पणीमा पहेलवेला श्रीमरुदेवीजी मोक्ष गया ॥ शिदिकें तेना शरीरर्नु संस्कार करी वीरसमुश्मा परतव्यु वली शना वचनथी शोक निवर्तावी, वावीमाहे स्नान करी, जरत म हाराजे हर्ष शोकाकुल थको जर जगवतने वांया हाथी पहेलवेलु केवली नाम प्रवर्त थ{ ॥ दवे प्रथम तीर्थकर नाम थयुं ते कहे ॥जरत महाराज श्रीज्ञानदेवस्वामीने नमस्कार करीने परपदामो बेता, तेवारें नगवाने धर्मोपदेश दीधो तिहा पढेजो देशनामा रुपनसेन प्रमुख पाचसो जरतना पुत्र तथा सातसें नरतराजाना पोतरा सर्व मली वारसे कुमरोयें दीक्षा लीधी एघारसो कुमरोमा मरिचि पण नेलो जाणवो तिहाँ पुमरीकाविक चोरासी गणघरोनी थापना करी तथा ब्राझोयें वाद्गुषलने पूलीने दीक्षा लीधी ए प्रथम साध्वी थर थने नरत महाराज प्रावक थयो तथा मुदरी वीक्षा आती हती तेने घणी स्वरूपवाली जाणीने वीरन स्थापवा सारं बरतें दीक्षा सेवानीथाज्ञाधापीनही तेवार ते श्राविका थइ एम साधु, साध्वी, आवक थने प्राविका ए चतुर्विध संघने थापीने धर्मनी प्ररूपणा करी एटले तीर्थकर नाम थपे ॥ जे वृक्ष्नी नीचे प्रचने केवलज्ञान उपन तेनुं नाम प्रयागवड थर्पु ते वृक्षनी लोकोमा पूजा चा ली दमणा पण प्रयागवड नामें करीने ते पूजाप डे तथा कह थने महाका ए वे तो तापसज रह्या माटे ते वे टालीने वीजा सर्व जक परिणामना धणी जे तापसो य गया दता तेमणे थावी फरीथी दीक्षा लीधी, नरतमहाराज वादीने पाग अयोध्यामां श्राच्या अने ओपन देवे थनेक जीव तारवाने माटे तिहाथी थन्यत्र विहार कस्तो ॥ ॥ हवे जरतराजायें घरे थावीने चकरननो बाइ महोत्सव को पड़ी न एप्वी साधवाने थर्थे नरत महा राज सैन्य सइ चान्यो तेनी श्रागल हजार देवतायें थधिष्ठित चकरम चाल्युं ते जेटले दूर चकरन जर रहे तेटला योजन सैन्य पण चाले, अनुक्रमें गगादेवीना घरने विपे तेणे कयु माटे रह्या तिहां नवी नवी नाते नवा नवा वेशे गगादेवीनी साथे विषयसुख नो गव्या पठी गगादेवीय मार्ग थाप्यो तेवारें तामस गुफा नांगी म्लेष्ठोना देश साध्या एम पद खेम साधीने शाठ हजार वर्षे जरत पाना अयोध्यायें थाव्या वली नमी विद्याधरने घरे पुत्री स्त्रीरन नवं उपन्युं ते नरतजी परस्या दे थने सुंदरीये पण शान हजार वर्ष सुधी थायविल तप कम्युं तेथील थ गइ पढ़ी जरत जेवारें श्राव्या तेवारे सुदरीयें नरतने मोतीयें वधाव्या, सुदरीने पुर्वल देखीने लोको उपर जरत खोज्यो भने कव्वा लाग्यो के तमे एनी सार संजाल कांश करी नही तेवारें लोक बोल्या एणे थायंबिल तप कम्युं तेथी वल यश ने पढ़ी जरत जीयें तेने सयम मेवानी थाहा थापी सुदरी पण दीक्षा जश्ने साध्वी थइ दवे जरतराजा थयोध्यामा सुख नोगववा लाम्यो एवामा थायुकशालानो अधिष्ठायिक पुरुष थावीने नरतने कव्वा लाग्यो के स्वामी चक्र थायुद्धशालामा थावतु नथी तेने जरते पृथु के केम नथी थावतु' तेवारे अधिकारीयें कर्पु तमारा नाश्यो तमारी थाझा मानता नथी तेथी नयी यावतु तेवारें बरतें सर्व नाश्नी पर दूत मोकलीने कडेवराप्यु के जो तमो राज्य करवानी चाहना राखता दो तो सर्वे नाश्च मदारी थाझा मानो, सेवा करो नदीतो राजनो त्याग करो ते सनिली यणा नायें विचाखू जे वापराने राज्यतो पिताजीयें वी ते तो जरतनी चाकरी शामाटे करीयें एम चितवी नगवान पासें गया तेने नगवाने यंगारा करवा वाजानो दृष्टांत थाप्यो, सूयगररांग सूत्रनो वेतालिक थप्पयन संजनायुं तेवारें प्रतिबोध पामीने सर्व नाश्ये दीक्षा जीधी, नगवानना शिष्य थया, ए वात दूतं श्राचोने पर तने कही तो पण चकरन्न थायुमशाजार्मा यावे नदी तेवारें नरतनो मुख्य मत्रीश्वर बोज्यो हेसामी' वीजा तो सर्व श्रापनी थाहा माने जे पण बाहुवली महा बर्दकारनो धरनार ले ते तमारी थाझा मानतो नथी, पोतानी नुजाना वलनु पराक्रम घणु जाणे माटे एने मू लथी उठाडी देवो जोश्य, ए मदोटो रोग देते तमोने व्याधि उत्पन्न करे ने एवं सांजली जर तराजाय सुवेग नामे दूतने सर्व वात समजावीने वाढुवलीनी पासें मोकल्पो ते दूतने जता थका पुठे ठीक यइ, वस्त्रे काटो वलग्यो, रथनी पीजणी नांगी, जमणो रासन बोल्यो इत्यादिक अनेक थपशकुन मार्गमा थया तोपण ते वन, थटवी श्रने पाहाड प्रमुख उमघन करीने बाहुबलीना वेशे पोहोच्यो तेने मार्गनी धूले नखो देखोने गोवालणीयो तथा पाणीदारीयोए पुटपु के तमे कोण तो क्याथी थाव्या बने कोण तमारो मालेक वे तेवारें दूतें की हूँ नर तराजानो दूत तु ते सानली स्त्रियो बोली के जरत ते जे अमारा पढेरवानी कांचनीमा नरत काढीय ठेय ते नरत थथवा वासणमां नरत, किंवा रोग सर्वधि जरत ए त्रण नरततो थमे जाणीय ठेय परंतु ए त्रण विना वीजो को जरत राजा ने एवुतो थमे सोनम्युं पण नथी तेवार दूत थाश्चर्य पाम्पो थने विचारवा जाग्यो के था वाद्वलीनु राज्य पण वेपर वाश्थन जबरजस्त वे एम वातो सानलतो विचारतो विचारतो तिक्षशिला नगरीयें गयो तिहा वरवाजा उपर पोलीये रोंकी राख्यो जेवारे वाहुवलीनी थाझा थावी तेवारें गाममाहे प्रवेश करी राज्यसनामा गयो तेने वागुवा वाखोनी संज्ञा करी थासन उपर वेसाध्यो भने पुलपु के अरे दूत, नरतने पोताना सवाकोड पुत्रादिको सहित कुशल वे' दूत योज्यो हेराजन ।।

- लाखो गमे देवता जेनी चाकरीमा तत्पर रहेला ने तेने कुशल केम न होय, तेने तो कुश सजदे परंतु थाप तेनी चाकरीमा थाव्या नदी तेथी ते सर्व वात निष्फल गणेबे माटे तमे नरत राजानी पासे पधारो थने एटला दिवस नही थाव्या तेनो थपराध खमावो ते पण तमारो महोटो नाश् ते तमारा पितानी जगाये जे माटे तमारो गुनाद सर्व माफ करशे वली थनेक राजाउ तेनी सेवा चाकरी करे जे थने तमोने तो वली अवश्य पूजवा योग्य वेज माटे चालो एवा दूतना वचन सांजली पानुवजी ते वचनोनो परमार्थ जाणी गयो थने जुकुटी चहावी, राता लोधन करी बोलवा लाम्यो के थरे दूत तु मारवा योग्य नथी । माटे तुने मारतो नथी पण न्दाना अशा नाना राज्य जर जीधा बने वली मदारूं पण राज्य सेवा वांद तेथी नाश्नो स्नेह तो जाणीलीधो दवे तुं तेने कहेजे के वालपणामा जेवारे श्रापणे वेगु रमत करता हता तेवार हु तुजने वहानी पेठे महारा हाथमा धरतो इतो ते दिवस जूली गयो गे के | दुतो तेनो तेज बुजे माटे हमणा चाकरी करवानुं करे ने त / तारा राजाने का विचार वे के नथी तेवार दूत बोल्यो रे राजन् जो वे दिवस सुखे जीववानी तमोने वांबा होय थने कुंटुवनी साये प्रयोजन दोय तो तमे एनी सेवा नक्कि करो छ तमोने सत्य कई तु ते सांनती क्रोध करीने बानुवले दूतने धक्का थपावी काहाटी मूक्यो दूत पण पालना वारणाथी निकली पोतानो जीव तइ नाशी गयो ते चालतो चा लतो अयोध्यायें थावीने नरत राजानी थागत धनावी बनावीने बमणी वात कही सनस्तावी तेवार नरत प्रपा रणनना वजडावी चतुरंगणी सेना लश्ने पोते श्रीषन वेवजीनी पूजा जसमाद परेरी, हस्तिरन पर देशी थाल्यो, तेनी पग्वारे सेना सवा फोर पत्र तपा पुत्रना पुत्र जे पोतरा ते पण घणा ने वली चोराशी लाख दाथी, घोराशी लाख श्रव, चो राशी लाख रथ, ब्नु भोट पायक, शोल लाख रणवर वजाइनार, दश कोड ध्वजा, चौद हजार महोटा मत्रीश्वर, बटार कोड महोटा घोरा, पञ्चाश कोड दीवटीथा, चोराशी लाख महोटा नीशाण, नव निधान, चौद रन्न, शोल हजार यक्ष, पत्रीश हजार मुकुटबम राजा, तथा वारांगनासहित घमणी करीये तेवारें चोशठ हजार राजकन्याउ, बत्रीश हजार ना टक, वली वीजा पण घणा विद्याधर, यक्क, किन्नराविक थनेक प्रकारनो परिवार चाल्यो, जरते रणपट्ट मस्तके बंधावीने मुखेणनामा सेनाधिपतिने बागल कम्यो, एवी रीते सेना जश्ने पदयो, थनुक्रमे वगुली देशनी सीमायें श्रावीने लस्करनी पडाव दीपो तेवारें बालुवनेपण ना थाव्यो सांजलीने श्रीश्पनदेवजीनी पूजा करी वजनो सन्नाद पहेरीने, सर्व जगतने त समान मानतो थको ननामा दस्ती उपर वेशीने, नरतनी सादमो लडवा निकल्यो तेनी पळवाडे त्रए लाख पुत्र तथा पोतरापण घणा ने तेमज बार हजार राजा तथा घणा विद्याधरो, अनेक सुनट, हाथी, घोडा, रथ, पायक प्रमुख चाव्या वली पोतानो पुत्र सिंह रथने सेनापति करीने बागल चलाष्यो ते पण जश्नरतनी सेनाने मन्यो तिहां बेड सैन्य एकग मलवाथी धरती धूजवा लागी, समुइ चलायमान थयो, पर्वतना टूक पही गया, जर तनी सेनामा शोल लाख रणव वाजते तेम बानुबलनी सेनामा पण लाखो गमे रणवर वाजते वदीजनो बिरुवावली बोलते वेगु तरफना सैन्यनु मांदोमांद पुक्ष यवा लाग्यु तिदा दापीयें हाथी, घोडे घोडा, रथें रथ, विद्याधरे विद्याधर, पाले पाला एम न्याययुक थवा लाग्य एटलामा मुखेणनामे सेनापतियें पोतानी सन्मुख सिदरथने थावतो वीगे ते वारें सुखणे कएं हुतो नरतनो चाकर बुं थने तु तो घागुवलनो पुत्र बो तेथी तु महारो स्वामी ठो माटे तु पहेला महारा उपर शस्त्र चलाव ते सांजली सिंदरथे तेना ठपर शस्त्र चलाव्यु तेवारें सुखेण सेनानीये खा चलायुं मारगा सिंदरथना ना सिदकेतु ते खड्गने पाही नारस्यु तेथी सुखेपने घणो क्रोध धन्यो तेवारे ते सुखेण वानुपलनी सेनाने विलोवीने वाद्वलनी पासें गयो एवामा थनिलवेग विद्याधर थावी वाद्यलने नमस्कार करीने मुखेपनी सन्मुख लडवा थायो ते वेड जण मलनी पेठे नीख्या थरस्परस मूठीउनु यु६ कम्युं, लाठीयो मारवा युद्ध कर्यु ते वखत सुखेण खड्ग लश्ने सिंदरयने मारवा जाय बे एवामां तो सूर्य यस्त थयो तो एमना संमामा एवी मर्यादा ले जे कोइ पण श्रीरुपनदेवजीनी थाणथापे तो लह नही, बीजी सूर्य अस्त थयो पढ़ी लडवु नही, त्रीजी मेष वरसतो दोय तेवारें ज उनु नही, तेमाटे जे सांज पख्यानी थगाउ मरीगया तेनो तो कोई उपाय नदी परंतु जे धर्म मरेला होय तेमने कांगणीरमना जलेकरी जरत पोतानी सेन्याना माणसोने साजा करे श्रने वाटुंबली तो सोमयशना रुवयना थानरणोना जलथी साजा करे एवी मर्यादा करी जे दवे फरी घीजा दिवसनी प्रनाते युद्ध थवा मामघु तेवारे सुखेण सेनानी थनिलवेगने वे खीने थमिनी पेरे बलवा लाम्यो थने थनिजवेगने मारवा श्राव्यो एटलामा सिहरथ वचा यावी थाहो पख्यो अने सुखेपने सादामो लडवा नो रह्यो तेवारे थनिजवेग जरत राजानी सर्व सेन्याने वलंघन करी जिहां दायीउना त्रण कोट वनावीने जरतराजा सूतो डे तिहां श्रावीने हाथीउँने कांकरानी पेठे समाजी महाविकराल रूप करीने सैन्यर्नु मथन करतो करतो जरतनी पासें भाष्यो जरते जाएयु जे श्राईर विद्याधर ते मदारी सुरत

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पत्र) माज बारवि भरत पहारात श्रावी पास राजानी सर्व सेन्पान PASTीने बाथीउने कांकरानी सारु एम चिंतवी तेना उपर चक मुक्यं ते चक्रने देखी परंतु जहा जाय तिहा 'धक पाउल पागल चाल्गुं थावे तेवारें अनिलवेग वजपिंजर करीने उ मदिना सुधी लवण समुश्मा वेशी रह्यो पण चक माथे नमतुंज रघु ब महीना पठी समुश्माथी गावही वादेर कादाही तेवारें चक्रे ते गावडीने कापी नाखी दवे सूर्ययश बागुवलीनु कटक उलघीने वाट्वल पासें थाष्यो थने कडेवा लाग्यो के मने शस्त्र मारो तेवारे वाद्यजी इसीने बोल्यो थरे तुं इक्ष्वाकुवशमा जलो सूर वीर बो पण हु जो तु जने एक मुठी मात्र मारीश तोपण तुं चूर्ण थइ जश्श माटे जा दूर उनो रहें पड़ी तेने देव तायें कसु के अरे मूर्खा वाढुबली साथे तु शु लडवा श्राव्यो बो नाइकनो मायो जश्श माटे थमे तने वर्जीय बैये के तुं चाल्यो जा तेवारे ते जतो रह्यो एवीरीते बारवर्ष पर्यत पु६ चाम्यु, कोडो गमे माणसो मरी गया, लोहीनी नवीन वहेवा लागी पण को दास्रो नही तेवारें। घणो अनर्थ थतो देखी सौधर्मेश यने चमरें। ए बे व जरतनी पासे थावी कहेवा जाग्या के जगवान तो लोको पालण पोषण करी गया थने तमे माणसोनो नाश करावो बो ए जरत कव्वा लाम्यो जे वाहुवली मदारी आज्ञा मानतो नथी तिहां मुधी चक्र थायुशालामां श्रावतु नथी तो दवे कहो हूँ | करूं' ते सनिली बोल्या तमे वे जान पोतपोतामा युद्ध करो पण वीजा माणसोनो नाश म करावो ए वात नरते कबुल करी पठी ते बेनु श बागु वली पासें श्राव्या थने कड़वा लाग्या के श्रा प्रमाणे युधमां लोकोनो नाश थइ जाय ठे ते करावो नही अने तमे वे नाज पोत पोतामा यु६ करो वागुवलीये पण ते वात मान्य करी पड़ी रे मलीने एक दृषियुक, वीज वाकयुक, त्रीजु वागुयुद्ध, चोथु मुष्टियुक्ष, थने पांच, वमपु६ ए पांच युद्ध करवानो तेराव कमो अने वेदश वन्ने जस्करोने श्रीया दिनाथजीनी वा थापीने दूर करना पड़ी पाणी बटकावी, फूल बिवावी, नूमि सक्ष करीने मुकुट, टोप, सन्नाह पहेरी करी धेनु नाश् सामासामा लड़वाने श्राव्या ते गुमने देवता था काशमा साक्षीधर रह्या थका देखे जे इवे प्रथम नरत थने याद्वली वे नाइ यांखो काहा सीने एक घीजानी सन्मुख दोल्या, थांख मिटावे नही, मांदोमांहे एक बीजाने देखताज रहे, महासूर वीर दे तो पण क्षणमात्र रह्या तेवारें जेम सूर्यनी सामों देखवाथी थांखमा । पाणी थावी नाय तेम नरत राजानी थांखोमां पाणी थावी गपुं ते जो देवता फूलोनो वरसाद वरसावीने योल्या के बाहुबली जीत्यो अने नरत हाम्रो ए प्रथम पु८ ॥ पढी जरतें सिंदनाव को तेथी पर्वत कंपायमान थया अने पाहुघलीयें हाक मारी तेवारें ब्रह्मांम छ टवा जेवो शब्द ययो तेथी परतें पोताना कान ढांकी जीधा ते जोइ वेवता बोल्या के वाद्वल नीत्यो अने जरत दासो ए बीजं पु८ ॥ तेवार पठी यानुयुधमा प्रथम नरत राजायें हाथ लायो कसो तेने घालुपलीयें कमजनालनी पेरे वाल्यो थने घागुवलीयें पोतानो घाद लांवो फमो तेने भरत वालवा गयो पण लगार मात्र चसक्यो नही दिमोलानी पेरे नरत जटकी रह्यो ते देखी देवो पोल्या एमां पण पाहुवली जीत्यो अने नरत दास्रो ए पी पु॥ ते पठी मुष्टीयु६ करवा लाम्या तेवारें प्रथम तो बन्ने नाइ मलोनी पेठे जास्फोट करता । मच्या पठी नरते पाहुबलीने मुष्टी मारी तेथी बाहुबली थोडीशी वार घाखो मीची रह्यो पनी जरतने वरानी पेरे छपारीने बाकाशमा चबाली दीयो परंतु फरी अनुकंपा घाणीने पालो पोताना हायमा पकरी करीने एक मुनी मारी तेथी नरत जमीना पेसी गयो ते ।

जोइ वेवता पोल्या के एमां पण याहुबजी जीत्यो अने नरत दारी गयो ए चोथु युछ ॥ पबी पांच वपु करवा मांमयो तिहा प्रथम तो नरत महाराजे लोदवंम जश्ने बाहुबलने मानो तेथी वाद्वलीनो मुकुट माटीनां घटनी पेरे चूरण थइ गयो भने बागुवली गूमा सुधी जमीनमा पेसी गयो पठी जमीनमाथी बाहेर नीकलीने बाहुवलीयें लोदवंम मायो तेथी जरतनो मुकुट चूर्ण थइ गयो यने नरत महाराजर्नु सपूर्ण सर्व शरीर धरतीमा पेसी गर्यु ते जोश्ने देवता बोल्या जे था युझा पण बाहुबली जीत्यो अने जरत दारी गयो ए पो चर्मु यु॥ एम पांचे पुछ जरत दारी गयो तेवारे चितातुर थयो थको विचार करवा जाग्यो जे महारुं राज्य ए लश मेशे था ते वली को बीजो चक्रवर्ति थयो ले के गुं' एवं चितवीने पठी चकने पोताना दायमां लश् नमाडीने पोतानी करेली प्रतिज्ञानो भंग करी बाहुबली उपर ते चक्र मूक्युं पण पोताना गोत्रमा चक्र चाले नदी तेथी ते यके थावी घालुवतीने त्रण प्रदक्षिणा थापीने पागे जश्नरतना हाथमा श्रावी वेगे एवी रीते जरतें जेवार प्रति झानो नंग को तेवारें पादुवजने अत्यंत क्रोध चडी गयो तेणे करी जरतनी उपर मुष्टी उपाडीने मारवा चाल्यो तेवारे देवता बोल्या विचार करो ते सन्निी बानुबलीये जाए{ जे धिक्कार दे था राजने के जेना लीघे मदोटा नाने पण मारवानो विचार थयो एवी रीते वैराग्य पामीने वागुवचे पोते जरतने मारवा माटे जे मुनी वाली दती ते महोटा पुरुपनी मुठी पाठी फरे नही माटे संवेग थायो तेवारे ते मुठीयें जरतने मारखं मूकी दश्ने पोताना मस्तके लोच करी दीक्षा लश्ने विचरवा लाग्यो तेवारे देवतायें फूलनो वर्षाद वरसाव्यो, जर तराजा विलाप करवा जाग्यो के मदारा सर्व नाश्च दीका जश्ने जता रह्या पली बाहुव जीना पुन सोमयशने तिक्षशिला नगरीनु राज्य थापी नरत राजा थयोध्या नगरीमा थाध्या दवे यागल जता वाहुरली साधुयें विचार जे महारा न्हाना थाणु नानए प्रथम श्री शपन देवजीनी पासेथी दीक्षा लीधेली ने ते केवली यया वे माटे दमणा हुँ नगवानना समासरणमा जईश तो न्हाना नाने ववना करवी पडशे माटे दुथहीथाज कासग्गें रही केवलज्ञान प्राप्त करीने पठी प्रनुपासें जश्श एतु चितवी मनमा अनिमान धारण करीने तिहाज काउसग्गे रह्या थका एक वर्ष वीती ग{ मस्तक उपर वेली वींटा गइ तेने प्रतिबोधवा माटे श्रीरुपनदेय स्वामीय ब्राझी थने सुदरी ए वे साध्वीने मोकली ते तिहा थावीने वाद्गुबलीजीने कहेवा लागी के हे वीरा हे नाश तमे गज उपरथी नीचे उतरो दस्ती उपर थारुढ थयाथी केवलज्ञान उपजे नदी एटखं तेमनु बोलवू सानलतांज जाण गयो के था साध्वीयो केबारे जुतु बोले नही माटे दायीतो महारी पासे नथी परतु यदकार रूप दायीनी उपर दु चढेलो ई एम विचारी माननो त्याग करी तिहाथी पग सपा उसु के तरतज केवलज्ञान पण उपन्यु थने प्रचना समवसरणा जश् केवलीनी परपदामां विराज्यो ए नरत बाहुवलनो सवध कह्यो । ॥ हवे एक दिवसें जगवान थप्टापद पर्वत उपर समोसग्या तेवार नरतमहाराजायें विचास्यु जे वीज तो महाराथी काश्यतु नथी पण या सर्व साधुउने थाहार वहोरावु तो सान पार्मू एवं जाणी पाँचसे गामा मुखडीना नरी लाव्यो थने नगवानने कहेवा लाग्यो स्वामीजी थाजना दिवसे था सर्व साधुउने आहार कराववानुं झुकुम महारे घेर थइ जाय तो घणोज रुडं याय तेवारें नगवाने काएं बाधाकर्मिक राज्पपिम साधु ॐने मेवु कम्पे नदी, वली सन्मुख याहार तर थायो ते माटे साधुठए जीयो नरी एवं जो उन चित्र७५) वाली सोयी

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जरत राजायें जाj जे हुतो सर्व प्रकारे नतिरहित थयो एम शोच करवा जाग्यो ते जो मदाराजे जगवानने पुनपुं के दे प्रतु'थवमद केटला प्रकारना बे? जगवान घोल्या पांच अवमद तेमा एक ईश्नो श्रवमद, बीजो राजेंनो थवग्रह, त्रीजो ग्रहपतिनो थवग्रह, चोयो सागारिकनो थवमद थने पांचमोसाधर्मिकनो श्रवग्रद ए पांच थवयद जाणवा ते सांजली शवोठ्या हूँ तो थापना सर्व साधुउने मदारा सर्व क्षेत्रमा सुखें विचरवानी थाज्ञा श्रापु तु तेवारें जरत महाराज योल्यो के मदारा ब खंम एथ्वीमां दु पण थापना सर्व साधु उने विचरवानी थाझा यापु ई एम करेवाथी नरतने घणो सतोप थयो वती जरतें श्शने पुग्घु के था थाहारनु हवे शं करवु तेवारें श्श् कर्पु तादाराथी थधिक गुणवान दोय तेने ए थाहार जमाहो पनी जरते पण ते श्राहार श्रावकोने जमाख्यो दाथी ब्रह्मजोजन चालु थपुं ॥ दवे लरतराजा सदा सर्वदा श्रावकोने जमाडे बे केटला एक काल पनी जेवार घणा जमनारा थया तेवारें परीक्षा करीने सर्वने सेजाणीनां कांगणी रजनी जनो थापी तथा देव, गुरु थने धर्म रूप त्रण तत्वसबधी त्रण रेखा प्रत्येक श्रावकने करी तिहाथी जनो थापवानी चाल पडी हां श्रीरुपनदेवस्तुतिना चार वेद थया ॥ एकदा नरत राजायें श्मदा राजने पुथु के तमारु खरेखरु रूप कहे ? तेवार ३ एक थंगुली वताची ते महाज्वाला माजाकुल देखीने जरत चमत्कार पाम्यो तिहाथी वॉवर्प श्मदोत्सव चालु थयो ॥ दवे एक दिवसे नगवत विहार करता विनीतायें याव्या नरत वादवा थाष्यो, प्रत्यें देशना थापी संसार- थनित्यपए देखाडघु, जीव कर्मने नारे करी तुबहाने दृष्टांते ससारमा बुढे , जेम तुवहाने माटी चोपडी पाणीमा मूकीयें तो हेतु वेसे, तेम थान कमैं करी जीव नारी थयो थको हेलो से , एवी नगवाननी वाणी सांजली नरत मनमा वैराग्य पाम्यो, ज्ञान दशामा लय लीन थयो एम अनुक्रमे एकदा जरतराजा थारीशा नवना घेता थका थनित्य नावना नावता केवल ज्ञान पामी, मोक्षे पहोता में पड़ी तेमने पाटे थादित्ययशा राजा थया तेणे सोनानी जनो करीने एमज आवक जमाख्या, तेने पाटे महायशा राजा थया तेणे रूपानी जनोड्न करीने प्रावक जमाख्या एम था पाट लगें श्रावक जमाख्या ने तेमा केटलाएक राजायें सूत्रनी जनो करी जमाख्या ने, पनी ते जनोश्ना पढेरनार सर्व ब्रा मण कदेवाणा नरतने पाटे आदित्ययशा, तेने पाटे महायशा, तेने पाटे थनिपल, तेने पाटे वलन, तेने पाटे बलवीर्य, तेने पाटे कीर्तिवीर्य, तेने पाटे जलवीर्य, तेने पाटे दमवीर्य, ए था। राजायें जगवतनो मुकुट पहेलो थने ए था राजा थारीशा वना केवली या मोके गया रे नगवान श्रीरुपन देवजी एक लाख पूर्व पर्यंत विचरीने घणा जीवोने प्रतिवोध्या ॥ दवे श्रीपनदेव स्वामीना परिवारजें वर्णन सूत्रकार करे ॥श्रीरुपननाथजीने रुपनसेन थाने वेश्ने चोराशी गएधर थया, चोराशी गट यया ॥ १४ ॥ ॥ तथा रुपन सेन प्रमुख चोराशी हजार साधुउनी मुस्कृष्टी संपदा थइ ॥ १५॥ ॥ तथा ब्राझी थने सुदरी थावे वेश्ने त्रण लाख साधवीउनी सत्कृष्टी सपना थश् ॥ १६ ॥ ॥ तथा श्रेयांस थादे वेश्ने त्रण लाखने पांच हजार आवकोनी उस्कृष्टी संपदा थइ ॥१७॥ ॥ तथा सुनज्ञ यावे वेश्ने पाच लाखने चोपन हजार प्राविकाउनी सत्कष्टी संपदा थ६ ॥ १७ ॥ तथा चार हजार सातशेने पचास चोद पूर्वधर ते केवली नही पण केवली सरखा साधुनी सल्लष्ठी सपदा था॥१॥ ॥ तथा श्रीरुपननाथ अरिहंतने नव इनार अवधिज्ञानीनी tre संपदा था तथा वीश हजार केवल ज्ञानीनी उत्कृष्ठी संपदा पश् ॥ २० ॥ ॥ तथा वीश हजारने डशे वैक्रिय लब्धिवत साघुउंनी उत्कृष्टो सपना थइ ॥ २१॥ ॥ तथा बार हजार बशेने पञ्चाश थढीहीपमा सझी पंचेंहिय पर्याप्ताजीवोना मनना परिणामने जाणे एवा विपुल मति, मन पर्यवहानना धरनार साधुर्जनी उत्कृष्टी सपदा थर ॥ १२ ॥ ॥ तथा तेट लाज वादी जाणवा एटले बार इजार बशेने पञ्चाश वादी साधुनी संपदा थ ॥ २३ ॥ तथा वीश हजार साधु सिह थया चालीश हजार साध्वी सिम थ ॥ २२॥ ॥ श्रीकृष जनाथ थरिदंत कौशतिकने बावीश दजारने नवशे साधु थनुत्तर विमाने गया, एकाव तारी थया ॥ २२५॥ ॥ श्रीऋषनदेव थरिहंतने वे प्रकारे अतगड नूमि यश तिहां यावत् थसंरख्याता पाटलगे केवलज्ञान चाल्यो, मोक्षमार्ग वह्यो, ते युगतरुत नूमि कहेवाय अने जग वानने केवलज्ञान सपन्या पली बतर मुहूर्त काल वीते को मोक्न गयो एटले अंतर मुहूर्त पनी मरुदेवी माता मोक्ष गया ते पर्यायांतकृत नूमि कदेवाय ॥२६॥ ॥ते कालनेविपे, ते समयनेविपे, श्रीश्पननाथ थरिदंत वीश लाख पूर्व मुधी कुमार पणे रह्या थने त्रेशन लाख पूर्व राज्यावस्थामा रह्या एवीरीतें त्र्यासी लाख पूर्व घरवासे रह्या, सीतेर लाख कोडवर्षनी सपर वली बीजा बपन्न हजार कोड वर्ष बीते तेवारें एक पूर्व थाय एवा व्यासी जाव पूर्व घर वासें रहीने पनी एक दनार वर्ष बनस्थपणे रह्या तथा एक हजार वर्ष उणा एक लाख पूर्व के वल पर्याय पालीने सपूर्ण एक लाख पूर्व साधुपणु पालीने नवोपग्राही चार कर्मनो क्षय करी था थवसर्पिणीनो मुखममुखमा नामा त्रीजो थारो ते घणो वीतीगयो बाकीत्रणवर्ष ने साहा आठ महिना शेप रह्या तेवार सीतकालनो त्रीजो महिनो, पांचमुं पखवाहियुं, माघवदि ॥

॥ यथायथ॥५०॥ तेरसने विवसें थप्टापद पर्वतनी उपर दशहजार साधुनी सार्थे चौद नक्त एटजे 7 उपास पाणी रहित कीघे यके, यनीचनका चश्मानो योग थावे थके, प्रथम पदो रनी पठी वपोरनी वखते, पालखी वालेला वासने वेग थकां, कालगत यया यावत् सर्व दुख यकी रहित यया ॥२२॥ ॥ते थवसरमा शतु थासन चलायमान थ{ तेवारें श्रांखोमा थाई नराणा एवो थको हा श्राव्यो, थावीने जगवानने त्रण प्रदक्षिणा थापी, नमस्कार फरी, योग्यस्थानके वेगे, वीजा पण सर्व शे थावीने वेठा पनी शई वेवोने मोकली नवनवनमाथी चदन मगाव्यं तेनी त्रण चय बनावी तेमां एक नगवानना शरीरने माटे, वीजी गणधरोना शरीरने माटे थने त्रीजी सर्व साधुना शरीरने माटे बनावी वली थानियोगिक देवोनी पासे खीरसमुश्च पाणी मगावी श नगवानना शरीरने स्नान करा प्यु, सर्व वस्त्र परेणा प्रमुख पहेरायां पीत्रण पालखी करी तिहां एक पालखीमा जगवा न शरीर, एकमां गणधरोर्नु शरीर थने एका मुनिनां शरीरने मूकी शुक्ष नूमियें ल जश्ने चितानी पासे पालखी राखी तेमां शर्केई नगवानना शरीरने पालखीमाथील इने चितामा मूक्युं तथा थन्य देवोये वीजा गणधरादिकना शरीरने पालखीमाथी उता रीने चितामा मूक्या तथा शर्केना दुकुमथी अग्निकुमार देवो मनमांदे उदास थया थका चितामा थनि सलगाववा लाग्या, तथा वायुकुमार देवोपण उदास थया थका वायु चना ववा लाग्या, वली वीजा देवो चितामां घृत प्रमुखने सीचवा लाम्या पठी जेवारें मात्र हाडकाज शेप रहे थने यीजो शरीरनो नाग सर्व यलीने नस्म थजाय तेवारें मेघकुमार देवो वर्षाव वरसावीने चिताने पूजावी नाखे, पनी श नगवाननी उपरती जमणी याजुनी वाढा चित्र७६, पर्वनन फरसी साईमा यहागाने साधुननी साधे प्रभुनिर्वाण पाम्या अष्टपद पर्वत

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तीये थने ईशानेश् टपरली माषा यानी माढा लीये तथा चमरें नीचली जमणी वाजुनी माढा लीये थने व नीचेनी माषी बाजुनी माढा लीये तथा बीजा देवता जे ने तेमाथी केटलाएकतो जिननक्तिना वश थकी, केटलाएकतो थापाथाचार में एवं मानीने, केटलाएक तो धर्ममानीने परमेश्वरना थंगोपांगना सर्व दाडका ला लीये पनीश जे स्थानके माग वेवाणो दोय ते स्थानके रत्नोनां त्रण पीत बनावे एटलु करीने सर्व देवो नदीश्वरद्दीपने विपे जश् श्रम महोत्सव करीने पोतपोताने स्थानकें जाय तिदा जश्ने वाढा प्रमुख जे लाथाव्या होय ते पोतपोतानी सनानेविपे वज्जमयी मावलामा जइ राखे, तेने गधमाला विकथा पूजे, धूप दीये, ए प्रकारनो निर्वाण महोत्सव सर्व तीर्थफरोनो जाणी लेवो ॥ इति श्रीरुपननिर्वाणमदोत्सव ॥ ॥ श्रीरुपनदेव स्वामी मोझ गया पली पचाश लाख कोड सागरो पम गये थके श्रीअजितनाथ मोद गया, श्रीषनदेव थरिहंत मोक्ष गया पडी प्रण वर्षने साडा यात महिना त्रीजो थारो शेष रह्यो हतो ते पण वीती गयो पनी त्रणवर्ष ने साडाथान मदिना तथा पर बेतालीश हजार वर्ष एटले वर्षे कणा एक कोडाकोडी सागरोपम गया नतर श्रीमहावीर स्वामी मोक्ष गया एटप्ले ते वखतें त्रणवर्षने साहायात महिना तो चोया श्राराना वाकी रह्या इता थने पांचमा थाराना एकवीस हजार वर्ष तथा बहा याराना एकवीश द जार वर्ष एम वे थाराना मली बेंतालीश हजार वर्ष ते एक कोडाकोडी सागरोपमा बा थयां तेमाटे बेतालीश दजारने प्रणवर्ष उपर साडाथात महिने न्यून एवो एक कोडाकोडी सागरोपम फाल चोथा थारानुं गये थके महावीर मोक्ष पोदोता थने ते पनी नवसेंने एसी वर्ष श्रा पुस्तक देवठ्ठीगणिक्षमाप्रमणे जख्यो थने नवसेंने व्याणु वर्षे सघमां वचाणु ad ॥ ण्वु फ्पाएक सखे ॥२१॥ ॥हां ॥ पुरिमचरिमाणकप्यो॥ ए गाथा मगलिकने थर्थे कहेवी इति श्रीफपसूत्रे घालसुबोधिन्या श्रष्टम व्याख्यानम् कृत राजेंसरिणा ॥ ७ ॥ यथ श्रीस्थविरावली प्रारंन ॥ ते काजमा ते समयमा नगवान श्रीमहावीरस्वामीना नवगछ यने श्रगीथार गणधर थया ॥ २४ ॥ ॥ इदा शिष्य प्रश्न करे ये के हे गुरु महाराज मर्यादातो एवी के जेटला गणधर होय तेटलाज गछ पण दोवा जोश्य परंतु थापतो नय गछ थने थगीथार गणधर फरमावो बो तेनु कारण रों एवो शिष्यनो प्रश्न सांजलीने ॥२५॥ गुरु कहे के के श्रीमहावीरस्वामीना मदोटा शिष्य इति नामा थणगार थया ते गौत मगोत्रीया हता थने पांचसे साधुठने वाघना थापतामाटे तेनो एक गठ॥ एटले जेनी वाचना एक दोय तेने गध कहीयें यहां कोई शका करे के वाचनामां फेर दोय तो | केवलीना क देवामा फेर फार तेने उत्तर कहीये बेये जे केवलीना कडेवामा फेर नथी परंतु केवलीना वचन सानजीने ते वचनोनां गणधरो सूत्रो घांघे ने गुथे तेनी रचनाना शयोमा फेर ले पण वातोमा फेर नथी मात्र शद थनेक प्रकारना ने तेमा रचना करती वस्वते एक गाधर एक जातिना शदथी गुंथे में तो चली बीजो गणधर वीजी जातना शदोथी गुथे ने तेने जीधे रचनाना शदोमा फेर फार होय इति प्रथम गछ ॥१॥ ॥दवे बीजो वचलो जा शिप्य थमिति थगार तेनुं गौतम गोत्र ने अने पांचसे साधुड़ने वाचना थापे जे ते । वीजो गठ ॥२॥ ॥त्रीजो न्हानो नाइ वायुनूति नामे शिष्य डे तेपण गोतम गोत्रनो ते पांचसे साधुने वाचना थापे एत्रीजो गह ॥३॥ ॥ एत्रणे गृहस्थपणामा सगा नाइव चोया यविर थार्यव्यक नामा नारायण गोत्रीया ते पांचसे साधुने वाचना ॥सातमा थापे ए चोपो गठ ॥४॥ ॥ पांचमा थविर थार्यसुधर्म नामा अमिवेसायन गोत्रीया वे ते पांचसे साधुने वाचना थापे ने ए पांचमो गठ ॥५॥ ॥ बहा थविर ममित पुत्र वासिष्ठ गोत्रीया मे ते साडा त्रणसें साधुउने वाचना थापे डे ए बहो गह॥५॥ यविर मोर्यपुत्र काश्यप गोत्रीया बे ते साहा त्रणसें साधुउने वाचना थापे ने ए सातमो गठ ॥॥ ॥थामा थविर कंपित गौतम गोत्रीया बे तथा नवमा थविर थचलघ्राता दारितायन गोत्रीया ए वेड थविर त्रए प्रणसो शिष्योने वाचना थापे ए वेड गएध रोनी वाचना एक ने तेमाटे एनो एक गठ गपीयें ए बन्ने गणधर नाइन डे परंतु तेनी माता एक ने थने पिता वे ने तेथी एमना गोत्र जुवा जुदा कहां ले बागल ब्राह्मणोमां पीजो जरतार करवानी चाल दती माटे घे जरतार कसा कह्या डे ए बातमो गह ॥ ७॥ दशमा थविर मेतार्य थने श्रगीधारमा थविर प्रनास ए बन्ने काँडिन्य गोत्रीया जाइ ले ते त्रण प्रणसे साघुउने वाचना थापे ए वेगुनी वाचना एकज डे माटे एकज गछ कहेवाय ए नवमो गठ ए रीते हे शिष्य श्रमे श्रीमहावीरना थगीथार गणधरना नव गठ कदीये ये ए अगीधारे गणधर हादशांगीना धरवावाला, चौद पूर्वधारी, सपूर्ण श्राचार्य रत्नकर मीयाना धारक एटले हादश अगरूप रमनो करंमीयो तेना धरवावाला, ए अगीथारे गण धर राजग्रही नगरीमा एक मासी धनशन पाणी रहित करीने कालगत थया, मोक्ष पाम्या, सर्व 5 खयी रहित यया तेमां नव गणधर तो श्रीमहावीर स्वामी विद्यमान बतांज मोक्ष गया अने थविर श्नति तथा थविर थार्यसुधर्म एवे गणधरोये तो श्रीमहावीर नगवान मोक्ष गया पनी काल कस्यो बे, मोदे गया ले तथा वीजा सर्व गणधरोना तो शिष्योपण काल करी गया दता कोइ पण शेप रह्यो दतो नही माटे जे कांश दमणा वर्तमान समय साधु विचरे ते सर्व सुधर्म गहना ने याकी कोई गष्ठना नथी बीजा सर्व गणधरोना शिष्यो जे दता ते विछेद गया ने तेथी एक सुधर्म गज रह्यो ॥२६॥ ॥ दवे पट्टावली लखीयें ये श्रीमहावीर स्वामी काश्यप गोत्री दता तेमना पाटे श्रीमुधर्म स्वामी पाचमा गणधर वेग तेमर्नु थनिवेश्यायन गोत्र दतु तेनो सबंध था प्रमाणे ने कुल्लाग सन्निवेस नामा नगरमा धम्मिन नामा ब्राह्मण रहेतो इतो तेनी नदिजा नामे नार्याना पुत्र सुधर्म नामे थया ते चोद वियाना निधान, चार वेदना पारंगामी, पञ्चाश वर्ष घरवासे रह्या पड़ी महावीरनी पासेथी दीक्षा लीधी, पांचमा गणधर यया, त्रीश वर्प पर्यंत तो महावीरवामीना चरणकमल सेवता रह्या, थने श्रीमहावीर निर्वाण पाम्या पली बार वर्ष पर्यत बद्मस्थपणे विचस्या तथा थाठ वर्ष केवली पणे विचना सर्व मती एकशो वर्पनुं थायुष्य पालीने मोद गया ॥१॥ ॥ तेवार पठी श्रीसुधर्म स्वामीना पाट उपर श्रीजंबुस्वामी वेग तेमनु काश्य पगोत्र दतु तेनो संवघ था रीते वे के एकदा श्रीमहावीरस्वामी राजगृही नगरीयें समोसस्या तिहां एक महोटो तेजवत देवता पोतानी चार अग्रमहीपीयो सहित तथा वीजा पण घणा देव यने देवीयोना परिवारे परवसो थको नगवानने वादवा थायो तेवारें श्रेणिक राजायें नगवानने पुग्धू जे हे स्वामी महाराज था देवतानी घीजा घणा वेवोथी अधिक कांति केम थयेली तेवारें लगवाने का के था देवतायें पूर्व नवने विपे दश वर्ष पर्यंत नित्य तप कस्सु तेना प्रनावी ए पाचमा ब्रह्मदेव लोकनेविपे तिर्यक् जुनकनी जातिमा मदार्षिक देवता ययो वे वली पण ए देवता थाजथी सातमे विवसे देवलोकथी चवीने राजगृही नगरीमा रुपनदन शेउनी धारणी नामे नार्यानी कूखमा पुत्रपणे थावीने उपजशे पनी एनो जन्मम होत्सव करीने एनी माता स्वप्नमा जंबुवृक्ष देखशे तेथी एर्नु जंबु एतु नाम थापशे अनुक्रमे युवान श्रवस्था पामशे तेवारें सुधर्म गणधरनी पासेथी धर्मदेशना सानलीने वैराग्य पामशे तेवार कहेशे के दु चारित्र लश्श पण मदारा मातापिताने पूर्वी याव॑ एम कढ़ी पाबो घर तरफ जाय वे एटले मार्गा थावतां जंत्रथी उपडेलो पनर, पोतानी पासेथी निकल्यो देखीने विचारवा लागशे के दमणा जो मने था तोपनो गोलो लागी जात तो दु थप्रतिपणामां म रण पामत, एवु जाणी सुधर्मनी पासे पालो थावीने एकवारतो समकेत मूल जे बार व्रत ने ते घारे व्रत शे तेमा चोथा व्रतमा एटली मर्यादा राखशे के, कदापि मातापिताना कदेवाथी स्त्रीयो परणवी पडे तो तेने पर पण ते स्त्रीयोनी साथें नोग जोगवू नदी एवो त्याग करी फरी घरे थावी माता पिताने कदेशे के मने थाहा थापो हु श्रीसुधर्म स्वामी पासेथी दीक्षा लेन' माता पिता कद्देशे के हे पुत्र दीक्षा पालवी घणी उक्कर ले एवी रीते घणो घणो समजावशे तोपण ए मानशे नही तेवारें मातापिता कहेशे के दे पुत्र थाठ पुत्रीयो साथे ताहारु सगपण करेलु डे माटे तेने परणीने पनी दीक्षा लेजे ते सांनजी जंबुकुमर मौनपणु धारण करी रहेको मातापिता था शेठीयाने कदेशे के थमारो पुत्र वैराग्यवान् थयो ने माटे तमारे दीकरीयो परणाववानी मरजी दोय तो जले परणावो पण ते कन्याउँनो त्याग करीने जो दीक्षा लेशे तो थमारो दोप कहाडशो नही ते सांजल सर्व शेठीया कहेवा लागशे के थमे नही परणावी/ पण ते शेठियाउँनी दीक रीयो कदेशे जे थमेतो जघुकुमरनेंज परणी वीजाने परणवानो त्याग तेवारें शेविया पोतानी पुत्रीयोने कदेशे के एतो दीक्षा बेशे तोपण दीकरीयो कद्देशे के ए दीक्षा लीये तो नले ल्यो पण श्रमेतो एनेज परणीयं पनी से एक रात्रीमा थावे कन्या परणशे बने रात्रिय शय्या उपर वेसीने सर्व कन्याउने कदेशे के हुँतो दीक्षा जश्श केमके था संसार सर्व थनित्य ने, कोइ कोश्ने साथै थावनार नथी, तेवारें स्त्रीयो कदेशे के हे स्वामी तमे द मणा दीक्षा लियो नदी, दमणातो जे ससारर्नु मुख मन्यु बे ते सारी रीतें जोगवीने पनी दीक्षा लेजो, नदीतो करसणीना न्यायें पचात्ताप करशो जेम कोइ मारवाड वेशनो करसणी पोताने घेर गहुँ वावीने पड़ी मेवाडा पोताने सासरे गयो तिहां तेनी सामुयें सारा रोटजा करीने थालमा मूक्या उपरथी काकव मूकी ते काकव करसणीने घणी सारी स्वाविष्ट लागी पड़ी जेवारें शालाने पुनघु के श्रा काकव तमोने किदापी थावी ? तेवारें शालायें कयु के ए थमारा घरमा नीपजे ने बनेवीयें पुबघु केवी रीते नीपजे ' तेवारें शालाये शेलही वाववानो विधि देखायो पठी करसणीय जाप्पु जे मदारे घेर पण ए हु वावीश एम निर्धार करी धेर था वीने प्रथम जे गद्गुन क्षेत्र वाष्यु हतु तेने मखेडी नाखवा लाग्यो तेवारें लोकोये कहूं के श्रा तुं / करे ? तेणे कर्यु के ई एमा शेजही वावीश जोको कदेवा जाग्या के था देशमा पाणी नयी तेमाटे शेलठी थशे नही, तेम वतां जो तने शेलडीज वाववानी वा दोय तो एकवार था गहुँनी करेली खेती ते कपावी ले पड़ी शेलडी धनावजे एवु लोकोर्नु वचन तेणे मान्यु नही थने शेलही वावी ते थोडी सगी एटलामा कूवार्नु पाणी खुटी परघु तेथीजे उगेली शेलडी दती तेपण शुकाइ गइ तेवारें पमाचाप करवा साम्यो तेम तमे पण तुं सुख मूकीने धीजा नवामुखनी चाहना करो बो तो पढी पस्तावशो एवी स्त्रीयोनी वाणी सांगली अब कुमर कहेशे के हुँ पूर्वोक्त दृष्टांते पश्चात्ताप नही करीश परंतु जो नही समजशो तो त मेज पसतावो करशो हुतो ललितांगकुमरनी पेरे तमारा फदा नही पड़े तेनी कथा कहूँछ । ते सानजो एक नगरमा एक शेग्नो पुत्र जजितांगकुमर एवे नामे महारूपवत हतो तेने एक दिवसें ते नगरना राजानी रूपवती नामा राणीचे तेणे दीठो तेवारें एकातें बोजावीने तेनी सापे ससारसयधि नोग विलास करवा लागी एटलामा राजा पण तिदा श्राव्यो तेवारें नयन्त्रात यश्ने राणीये ते लजितांगकुमरने खालमा नाखी दीधो थने विचाझुंजे पनी का हाडी लश्श हवे राणीतो राजानी साथे रमवा लागी गई अने ललितांग खालमा नूखे मरतो कोई अन्य थावीने एग्वाडो नाखे ते खाय थने एग्र्नु पाणी पढे ते पीये एवीरीते चार म हिना पर्यंत ते खालमां पड़ी रह्यो थने जलितागना मा यापे घणोये जोयो पण लाधो नदी तेथी शोक करवा गं एटलामा वाद थाव्यो तेथी खाजा पाणी जराणु ते पाणी कादा उवा सारु खाल खोली ते खालना पापीनी साथे ललितांग पण तणातो तणातो नगरनीम दोटी खालमा जइ पथ्यो तेने लोकोये देखीने तेना मातापिताने जश्कल्धु मातापिता जश्खाल माथी काहाडी घेर सइ थाव्या तिहाँ मुर्मा खाइने पड़ी रह्यो, शरीर पीलु पड़ी गयुं, हाडका नीकली थाव्या, माता पिताये घणा प्रकारना तेलादिक मसली जागतो करो तेवारें कांक सावचेत थयो पनी थोपधोपचार करता करता घणा दिवसे तेनु शरीर सारु य{ तेवारें वली कपडा प्रमुख पदेरीने वजारमा फरवा निकन्यो तेने राणी वेखीने योजाव्यो ते योग्यो हवे तु तमारा फर्मा पई नदी इति ललितांग कथा ॥ एवी रीते श्रावे स्वीयो दी जुदी थान कथा ससारना मुखनो त्याग न करवो ते थाप्रयी जंबु कुमरने कदशे श्रने जंबु कुमर फरी संसारनी थसारता वतावनारी जुदी दी थाठ कथा थाने स्त्रीयोने कदेशे तेवारें स्वीयो प्रतिबोध पामशे एवामा एक प्रनवो चोर पांचशे चोरने साये लश्ने जंबु कुमरना घरमा थावशे ते सर्वने विद्याना बलथी श्रवस्वापिनी निज्ञ थापशे तेथी सर्वने निज्ञ थाची जशे परंतु जंबुकुमरने निश थावशे नही पनी ताला उघाडवानी विद्याथीनंमार खोलीने नवाणु कोड सोनामोरोनी गांवढीयो वांधी तेने लश्ने चालवा मामशे एटलामा जंबु कुमरने पयपि इव्य उपर मूर्धा तो बिलकुल नथी तथापि एवो विधार पावशे के महारे तो प्रनाते दीक्षा लेवी ने थने थाजे चोर लोको इव्य लश् जशे तो लोक कदेशे के जूळ नाश्च एर्नु धन सर्व चोर लोको लश् गया तेथी ए माय मुंमावे एवी रीते धर्मनी निदा थाशे ते वात सारी नही एवं चितवीने नवकार गुणवा लागशे तेथी पांचशे चोरोना पग थनाइ जाशे तेवारें प्रनवाने विचार थाशे के था ते थयुं ! जो जोवा लागशे तो जंबुकुमरने जागतो वे खशे तेवारें प्रनवो जाणशे के एनी पासे को महा जोरावर विया एवं जाणी जंबुकुमरने कदेशे के महारी विया तमे व्यो भने तमारी विद्या मने थापो जंबुकुमर कहेशे के महा। पासें कां पण विया नथी वली पीजी विद्या मने खपती पण नथी मने तो मात्र नवकार मत्रनो श्राधार वे एवो धर्मोपदेश देशे तेवार प्रनवो कदेशे के था नवी परपोली स्त्रीयोनो त्याग करीने तु दीक्षा शा वास्ते लीये ' संसारना सुख नोगवी पनी दीक्षा लेजे तेने जंबु कहेशे के हे प्रनवा ससारमा सुख डेज किदा के जेने दुनोगतुं संसारनु मुख तो मधुर्बिया समान वे तेनी लालचे जीव ससारमा रमले ने जेम को एक पुरुप नूलथी मजारमा जर पव्यो, तेनी पटवारे एक हाथी दोग्यो, तेवारे ते हाथीना जयथी नासतो नागतो एक वदनी शाखामा जइ लटकी रह्यो हवे ते शाखानी नीचे एक कूप तेमा चार सर्प पोतानुं महोई फाडीने वेठेला ; तथा वे थजगर पण महोई फाड) वेठा , तथा वडना थडने दाथी धू गावी रह्यो , तथा जे शाखामा ते पुरुप लटके जे ते शाखाने एक कालो थने बीजो धोलो एगा वे उदरो कापी रह्या , वली तेनी उपर एक मधुमाखीनुं मधपुई डे तेनी मक्षिका व्ही उडीने ते पुरुपना शरीरने चटका मारी रहेली में, एटलामा ते मदुथालमाथी एक मधनु टीपु टयक्ऍ ते पहेला पुरुपनी जीनने जइ लाग्युं, तेवारे ते पुरुपे कंचु जोवा मांमधू तो तेणे वीलु जे मनुयाल माहेथी ए मधुर्विध पढे ; एवु जाणीने ते टीपानी नीचे म होई उपाई राखीने लटक्यो थने टीपाना स्वादमा मन थयो थको पोतानी उपर पूर्वोक्त अनेक जातना ३ ख पच्या ते सर्वे नूली गयो एटलामा एक विद्याधर थावीने कडेवा लाग्यो के हे पुरुप तादारु रुख देखीने मने क्या श्रावे जे माटे थाव महारा विमानमा पेशी जा, दु तुजने खायी काहाडवा वानुवं तेवारे ते पुरुप पोज्यो हे विद्याधर था एक टीपु मधनु महारा मुखमा श्राववा द्यो पनी दु थापनी साथे विमानां वेसी चालु एम एक टीपु थाव्यं पठी वली पण कडं के था वीच टीपु थावे तो चालु ए रीते एकेक टीपाना स्वादमा सोनाणे यको ते विकट स्थानने बोडे नदी, तेवारे विद्याधरे जाएं जे एतो एवोज मुर्ख वे लोनी वे ए का 5 खमांथी निकलशे नही ए० जाणी तेने तिहाज मूकी विद्याधर चाल्यो गयो तेम हे प्रनवा' था जीव संसाररूप श्रट चौमां थायुष्यरूप वृक्ष ने तिहां कुटुवरूप मधुविजने खातो खातो थायुष्य खूटावे के मोहें माच्यो थको रदे , तेने समुरु श्रावीने चारित्ररूप विमानमा वेसवान कहे तेवार स सारी जीव स्वीना जोग रूप मधुर्विमा लोनायो यको संसारमाथी निकलवा वांवे नदी माटे हे प्रनवा था थवसर चूक्या तो फरी ससारमा पख्याने मनुष्य अवतार मलवो मदालन : ने एवा वचन सानजीने प्रनवो चोर पण प्रतियोध पाम्पो बने वोल्यो के हे जबु । इ पण ताहारी सापें दीक्षा लश्श पठी वली जंबुकुमर पोताना मातापिताने प्रतियोध वेशे तथा था कन्या बली पोतपोताना मातापिताने प्रतिबोध थापशे तथा प्रनवो पण पांचशे चोरोने प्र तिबोध श्रापशे एम सर्व मती प्रनातें पांचशेने सत्तावीश जनोनी साथे श्रीजंबुकुमर वीक्षा खेशे एवं श्रेणिकराजाने श्रीमहावीरस्वामीयें कसुं दतुं ते प्रमाणे नवाणु कोड सोनेया धर्मखे त्रोमा खरची नाखीने उत्तम उत्सवसहित पांधशेने सत्तावीश जनोनी सार्थे श्रीजंबुस्वामीयें सुधर्मस्वामी पासेथी दीक्षा लीधी पढी हावांगी नणी श्रीसुधर्मस्वामीनी पाटे घेता, केवल कान पाम्या, पोतानी पाटें प्रजवाजीने वेसाठीने पोतें मोक्ष गया ए श्रीजंबुस्वामी उहेला के वती यया हा कवीश्वर कहे के जवुजातना वाणिया घणा लोनी थाय डे एवं लोक एटला माटे कहे वे के जंबुस्वामीना हाथमा केवलज्ञान रूप धन श्राव्यं ते वीजा कोश्ने थाप्यु नही देखें केवलझान एज पाम्या ने, मोक्ष नगरनो दरवाजो बंध करी वेगा माटे लोनी कडेवाणा ते उपरथी ए जातना वाणीयाने जोनी कडे तथा ए श्रीजंबुकुमर सरखो सोजागी को थयो नदी थने थाशे नदी, शामाटे जे मोक्षरूपणी स्त्रीपण एने परस्या पढ़ी वीजाने परणी नथी तथा एना जेवो कोई कोटवाल पण नही थाय केमके एणे पांचसो घोरोने साधु धनावी दीधा एकवीनी घटना कही हवे श्रीजवुस्वामी मोक्ष गया पठी वश वस्तु विश्व य गइ तेना नाम कहे ये एक मन पर्यवज्ञान,बीजो परमावधि, त्रीली पुलाफलब्धि, पोथुथाहारक शरीर, पांचमी A चित्र 99 पार स्त्रियो सहित प्रोजन स्वामी पाचशे चोर सोना मोरोना पोटमा पाधी माय मई उभाने

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HATE Ikkk bet यज्ञकरमारनामा वे साधु Wiliitilili!i!i!i!ilili (26) पफ श्रेणि, नही उपशम श्रेणि, सातमो जिनकम्प मार्ग, बातमु परिहारविशुद्धि चारित्र तथा सूक्ष्मसपराय चारित्र थने यथारख्यात चारित्र ए प्रण चारित्र विछेद थया ते थाउमो बोल तथा नवमुं केवलज्ञान अने दशमुं मोदें जवु ए दश वानां विछेद गयां श्रीमहावीरस्वामीथी चोशन वर्षे श्रीजबुस्वामी मोक्ष गया एमनुं सर्व मली एसी वर्पनु थायुष्य दतुं ॥ ए पीजो पाट ॥२॥ दवे चीजे पाटे श्रीप्रनवस्वामी कात्यायन गोत्री दता,तेमणे एक दिवस पोताना गठमां तथा श्रीस घमा उपयोग दीधो जे हूँ कोने थाचार्य करुं। ते उपयोग देतां गठमां तथा सघमा को पो तानी पाटे बेसवा योग्य पुरुप दीवामा न थाष्यो तेवारें वन्य मतोमा उपयोग दीधो तेमा सपनवनटने दीगे तेवारें श्रीप्रनवसूरियें वे साधुयोने सीखाचीने सम्पनवने घेर मोकल्या ते सजवने घरे जश्ने पोल्या “थदोकप्टमहोकष्ट तत्व न ज्ञायते पुन " जू था कष्ट करे | वली तत्वने जाणता नथी, एवं सनिली तत्काल खङ्ग लेख्ने सबनव गुरुनी पासे भाष्यो थने खस काहाडीने बोल्यो के थरे मने देखाड, तत्त्व केतुं डे? तेवारें गुरुये विचास्युं जे माथो कपातां तत्त्व कहेवार्मा दोप नथी एम चितवी गुरु घोल्या, थरे तु यज्ञ करे ने ते यज्ञकी लकनी नीचे श्रीशांतिनाथजीनी प्रतिमा बे ते शांतिकारी ने तेनाथी शांति थाय ने परंतु यज्ञयी कांइ पण थर्तुं नथी ते सांजली तेणे प्रतिमा कादाडी प्रतिवोध पाम्यो थने पोतानी स्त्री गर्नवती दती तेने बोडीने दीक्षा जीधी श्रीप्रनवस्वामी त्रीश वर्प गृहस्थ पणे रह्या तथा पञ्चावन्न वर्प पर्यंत चारित्र पान्ऍ सर्व मली पञ्चासी वर्पनुं वायुष्य जोगवी श्रीसयनवने पोतानी पाटे पेशाहीने देवलोक गया एत्रीजो पाट ॥३॥ ॥ दवे चोथे पाटे श्रीसयनवसूरि वहगोत्रीया गर्नवती स्त्री गोडीने थाव्या दता तेने पाउलयी पुत्र थयो तेनु नाम मनक दीधं ते गे करो एक दिवस पाठशालायें गयो तिहां बोकरानी साथै नस्यो तेवारें बीजे गेकरे मेणु मासु के हे नि:पितृक घणो तने जाणीये बेयें तदारो वापतो बेज नही था वात सांजलीने बोकरो उखी थयो थको पोतानी माता पासें थायो माताने पुन्यु दे माता! महारो पिता नथी? त्यारें मातायें कर्पु हे पुत्र । ताहारो पाप नदी ते वजी होय तादारो बाप सयनवजह बोफरायें पुनधुं ते किहां ? तेवारें मातायें कसं हे पुत्र ताहारा बापने जैनना साधुनो लवीने सइ गया तेथी तेणे दीक्षा लीधी ने ए, सांगली जे गाममा सघनव सूरि दता ते गामनी पारेर ते मनक पण थायो तेने सादामा मिलें जाता गुरु मल्या तेमने मनके पुग्घु के महाराज श्हा सर्वनवसूरि बे एवु सानजीयें वे ते कयी जगायें रहे ? गुरु बोल्या ता दारे से काम ले तेवारे मनके पोतानी सर्व दकीगत कही थने कहूं के दु तेमनो पुत्र तु तेने गुरुये पण कोक उत्तर थापीने उपासरे मोकली थाप्यो थने मिजयी पाबा फरी थाप्या तेवारें गुरुये तेने प्रतिबोध दीधो मनके की के मने दीक्षा थापो ते सांजली गुरु वोल्पा महारुं तथा तादारुं पितापुत्रपणु जे जे ते तु बीजा साधुऊने नहीं कहे तो हूँ तु जने दीक्षा श्राप त्यारें मनक बोल्पो हे महाराज इंन कद् ते सांजली गुरुयें दीक्षा थापी पण मनकर्न वायुप्य स्वल्प जाप्यं तेवारें गुरुये सिद्धांतोमाथी सार सहीने वशवैकालिक सूत्र मन फने माटे बनाव्युं ते सूत्र ब मदिनामा मनक जणी रह्यो सर्वश्राचार जणी गयो, ब मदिना फाफेरा चारित्र पालीने देवलोक गयो पनी प्रावको मनकना शरीरने वाग थापी गुरुनी पासे याव्या ते वखत यशोनाप्रमुख बीजा घणा शिप्यो हता ते पण सर्व गुरुनी पासें बेठेला हता तिहा गुरुये श्रावकोने धर्मोपवेश थाप्यो पण गुरुनी यांवोमा थांश थाव्या ते देखीने यशोनसहित सघना माणसो बोल्या हे पूज्य थापना अनेक साधु परलोक जाय डे परंतु थापनी थांस्वमाथीथांस पडता केवारे पण दीग नथीथने थाज थांश केम पच्या ? तेवारें गुरु बोल्या मोदयी थांग पख्या संघे पुत्रु कयो मोह हतो त्यारे गुरु वोव्या एथमारे संसारी पणानो पुत्र हतो परंतु स्वल्प काल चारित्र पाक्युं तेथी मोह श्रावी गयो तेवारे साधू बोल्या महाराज तमे थमने क्यारे पण कधू नदी जे ए थमारो पुत्र तेवारें गुरु बोल्या दु जो तमने एवं कदेत के ए महारो संसारीपणानो पुत्र ने तो पड़ी तमे एनी पासे वैयावच्च करावत नदी तेथी एने शो लान थात' माटे एना थल्प थारवामां एटलो लान जाणीने तमोने में कयु नदी ए तात्पर्यार्थ वे पनी गुरु, वशवकालिकने पाठ सिमांतोमा नाखवा लाम्या तेवारे संघे विनति करी के हे सामी ए थप ग्रंथ ले ते थागल जतां श्रम्पबुद्धि थने थल्पायुषवाला लोकोने घणोज उपकारी थाशे माटे एमज रदेवा थापो ते सनिली दशवकालिक एमज राख्यो पनी सयनवसूरि पोताना पाटे श्रीयशोना सरिने वेशाहीने श्रीमहावीर स्वामीथी थामे वर्षे स्वर्गे गया ए चोथो पाट ॥ ४ ॥ दवे पांचमे पाटे श्रीयशोनश्सरि तुगीयायणगोत्रीया बेग तेना पाटे वे शिष्य वेग तेमा एकतो थार्यसतिविजयजी मादरगोत्रीया थने वीजा थार्य ग्रीनश्वानुस्वामी पार्शण गोत्रीया तेमाथी नभ्यागुजीनो संबध थावीरीते डे के प्रतिष्ठान पु रना रेदेवासी एक वराहमिहिर थने वीजा नयागु ए वे नामे वे ब्राह्मण नाश्न हता तेमणे श्रीयशोनश्वरिनी पासे धर्मदेशना सान्जीने वीक्षा लीधी, चौद पूर्व जण्या पनी गुरुये विनीत पणानो गुण जोइने नश्याहुने श्राचार्यपद थाप्यु थने वराहमिदिरने अविनीतपणाने सीधे थाचार्यपद थाप्यं नदी कारणके जे श्राचार्यपद गणधरोये धारण कर्यु ते श्राचार्यपद जो अविनीत अयोग्यने थापे तो ते गुरु जे श्राचार्य पदनो श्रापनार होय ते पण थनत स सारी थाय हवे नश्वाहुने थाचार्य पद मन्यु जोस्ने वराहमिहिर कोपानल थयो यको ग उथी बाहेर नीकलीने गुरुनी उपर क्षेप घरवा लाग्यो चौवे पूर्व नगेलो दतो तेथी नवीन ज्योतिपना वाराहीसहिंता प्रमुख यथो बनावी साधुनो वेष मूकीने ब्राह्मणनो वेप धारण करी सोकोनी पागल निमित्त कहीने तेनाथी भाजीविका चलाववा लाग्यो तेने लोक पूर्वे के एटल तमे क्याथी जण्या, तेवारें लोकोनी वागत एवं कहे के में एक दिवस नगरनी वारणे लग्न कुंमली मामी ते कुंमलीने नांग्याविना एमज पाबो चाली निकल्यो पनी जेवारें। याद थाष्यो तेवारें नसाही नाखवा गयो थने तिहां जश्ने जोस तो कुमलीमा सिदलमनो स्वामी सिद ते पूबई वधारीने उपर उनो डे पड़ी में लमनी जक्तिने लीघे महारी बाती क तण करीने सिंड्नी नीचे घुसीने लाम नुसाठी नास्यु मदारी जक्ति जोश्ने सिंदनो थधिपति जे सूर्य ते थाप्यो भने महारा उपर तुष्टमान थक्ने बोल्यो के माग माग तेवारें में कहुं मने नक्षत्रादिकनो चार खरेखरो जेवो ले तेवो वतावो पनी सूर्य पोताना ज्योतिपना मंगल चारमा मुजने लई गयो तिहां मने सर्व चार बताया, उदयास्तधक यताव्युं ते ज्योतिपना वलयी हुँ त्रण कालनी वात जाणु दु एवी कल्पित वातो कहीने लोकोमा पूजाय, राजा प्रमुखने निमित्त कदीने खुशी करे धने चमत्कार पमाडे एम घणा लोकोने मिथ्यात्वी कमा एवा अवसरमा श्रीनश्याड्ड स्वामी पण ते नगरमा थाव्या तेमने आवकोयें मदोटा महो त्सवसहित गामा प्रवेश कराव्यो पण वराहमिदिरथी ते सहन थयु नदी तेवारे विचामु जे एर्नु मान खमित करूं तो सारी वात थाय एवु चिंतवी एक दिवस राजसनामा जश्ने राजाने कहेवा लाग्यो के बाजथी पांचमे दिवसे पूर्व दिशाथी वर्षाव श्रावशे ते त्रीजे पहोरे वरसशे था दु कुमाखं करूं , तेना वच्चमां बावन पलनो मानलु पढशे एवं निमित्त कएँ ते वात श्रावकोये वावीने नवान स्वामी बागल कही के हे स्वामी था वराहमिदिरे क देली वात सत्य ने किंवा थसत्य ने तेवारें नश्वानु बोल्या कांक सत्य बेथने काश्क थ सत्य ने केमके पूर्व विशाथी नही पण इशान कोणेपी श्रावशे ते उ घड़ी विवस पाब्लो रहेशे तेवारें पडशे पण त्रीजो पदोर कह्यो ते जूगे कह्यो ने वली बावन पजनो नही परंतु वायु थी सुकाइ जासे माटे साडी एकावन पलनो मत्स्य रदेशे तथा कुमालानां मध्यनागमा नही पडे पण कुमालानी कोर उपर एक वायें पडशे माटे ते वराहमिहिर मिथ्यात्वना योगथी थाटलु तु वोले जे ए वात पण श्रावकोये राजाने कही राजा वोल्यो साच जुन्नी खवर दवे तरत पांच दिवसमां जणाइ थावशे एटलामां पांचमो दिवस याव्यो तेवार वर्षाद वरश्यो थने श्रीनश्याद्नु स्वामीना कहेवा प्रमाणे सर्व वात सत्य यइ तेवारें राजा प्रमुख सर्व लो कोये श्रीनश्वाङ्ग स्वामीनु ज्ञान वखाप्पु थने वरादमिदिरनी का साची का जुती वात पडी गइ तेथी तेनी मानता कमती थवा लागी वली एक दिवस राजाने घेर पुत्रजन्म थयो तेनी वराहमिहिरे जन्मपत्रिका बनावीने एकशो वर्षनु थायुष्य वर्ति काढाडघु त्यारे सर्व लोक थक्षत जश्ने राजाने वधाववा थाव्या श्रन्यदर्शनी योगी सन्यासी प्रमुख सर्व थाशीर्वाद थापवाने थाव्या, परंतु एक श्रीनश्यागु गया नही तेवारें वराहमिहिर रा जाने कव्वा लाग्यो के हे राजन् । तमारे घेर पुत्रजन्म थयो ते नयागुने रुच्यो नदी तेथी थांदी भाशीर्वाद थापवा थायो नदी एवात पण श्रावकोये जश् श्रीनश्वान स्वामीने कही ~ तेवारें नश्याहु पोल्या वारंवार केम जवाय एकवार जश् प्रावक धोव्या केम जाशो गुरु पोया थामे दिवसे रात्रीने वखते विमाडीना योगथी पुत्र मरण पामशे तेवारें देखाडी थावधु ए वात श्रावकोये जा राजाने कदी, राजायें सर्व विद्याहीयोने थाखा गाममाथी वा हेर काहाडी मूकावी तथा विघाडी कोश्ना घरमां थथवा गाममा न थावी शके तेना शे कडो गमें जायता कसा परंतु यामे दिवसे वैवयोगें वासीना दाथयो कमाडनी वसणी वा लकना माया उपर थावी पडी तेथी बालक मरण पाम्यो तेवारे वराहमिहिर बोल्यो बिमाडीथी तो मरण पाम्यो नही पळी गुरुये नसणीनी उपर विबाडीना मुखनो थाकार लाकहामा करेलो हतो ते देखायो तेथी वराहमिदिर लका पाम्यो माटे तिहाथी निकली थन्यत्र स्था नके जश् थज्ञानकप्टथी मरण पामीने व्यंतर देवता थयो तेणे थावी श्रीसघमा मरकीना रोगनो उपश्व कसो तेथी घणा लोक मरवा लाम्या तेवारें आवकोनो अपश्व टालवाने माटे महा महिमावत एवं “व्वसग्गदर" नामे स्तोत्र गुरुयें बनायु तेनो घरघरने विपे गण यो सरु थयो तेथी सर्व उपश्य दूर थइ गयो पनी सर्व श्रावकोना घेरमा जो थोड़े शो काम होय तो पण ते वसग्गहरनो पाठ करे के ते काम पार पडी जाय, एम करता करतां देवट लोकोमा एवी चाल पडी गश् के जो गाय दूध न थापे तो पण उवसग्गदर स्तोत्र गुणे तेवार गाय पण दूध थापती थाय एमज वली कोश्क बाणा वीरावा गश्ते एकजी दती तेनी गणानी पोटली पाडी थापवाने कोबीजो माणस ते वखत तिहां हाजर दतो नही तिवार तेणे पण उवसग्गदरनो पाठ कमोतेवारेंनागें पोते यावीने नारी उपारी तेना माथा ठपर रास्वी दीधी एमज एक सी रोटाना करता ती ती तेनो बोकरो फाटे गयो से रोया प्ताम्यो तेणे जाए{ जे रोटलो बली जाशे त्यारे ध्वसग्गवरनो पाठ कसो के तरत नागराजा यावीने कठेवा जाग्यो के l काम ' स्वोये कर्पु बोकरो रहे जे तेने राखो तेवारे ते बोकराने शौच करावी रोतो रखाव्यो एतु प्रायें सनिलीये .यें एवीरीतें नीच कामो लोको कराववा लाग्या तेवारें नागराज खीजीयो श्रने गुरुपासें थावी विनति करी के दे महाराज संघथी हुँ एक क्षणमात्र पण थलगो रही शकतो नथी लोकोतो पूर्वोक्त दलका दलका काम ते पण मादरी पासे करावे ले तेवारें गुरुयें जाएयु जे ए निर्नाम्य लोको देवने वीजावशे तो सतटोयनर्थ थर पडशे माटे था स्तोत्र नमारी मूकवं युक्त ने तेमने नागेंई कर्प हे स्वामी नाथ थाप बही गाथा नमारी मूको थने शेष पाच गाथाथीज महारे स्थानके वेठो थको सर्व उपाव टा लीश एवं सांजलीने गुरुयें बही गाया नमारीमूकी वली श्रीनश्वाड स्वामीना करेला थावश्य कनियुक्ति प्रमुख अनेक प्रथ दालमा विद्यमान डे ए श्रीनन्याद्गुस्वामी श्रीमहावीर स्वामीथी एफसो सितेर वर्षे देवलोक गया तथा बीजा श्रीसनतिविजयजी जाणवा ए बहो पाट ॥ ६ ॥ हवे श्रीसतिविजयजी माढरगोत्रीया हता तेमना पाटे थार्य यूलिनजी गौतम गोत्रीया थया तेमनो सबंध यावीरीतें बे के पामलीपुर नगरमा नवमो नदराजा राज्य करे ने तेनो शकमाल नामे प्रधान ने तेनी जाउलवे नामा नार्याना वे पुत्र थया एक युजिन थने बीजो सिरियो एक दिवस वररुची नामा ब्राह्मण राजा पासे श्राव्यो तेणे एकशोने थाउ काव्य नवा बनावीने सल्लाव्या एम ते ब्राह्मण नित्य थावीने एकशोने थाव काव्य नवा नवा बनावीने राजा बागल कहे पण जेवारें प्रधान तेनी प्रशसा करे तेवारें राजा दान थापे नहीका दान थापे नही थने प्रधान तो वररुचीने मिथ्यात्वी जाण) तेनी प्रशसा करे नदी तेवारें -- पररुचीन प्रधाननी स्त्री लाउसदेने का स्वीयें प्रधानने कर्यु के ते विचारा नहने काश्क थ पावजो तेवारे प्रधानना मनांतो थपाववानो विचार न तो पण स्त्रीना कदेवा उपरथी राज सनामा कसुं के ए काव्य सारा वे त्यारे राजायें संतुष्ट थश्ने नित्य तेने एकशोने था सोनैया थापा मामपा एम घणाविवस वेतां यया तेवारें प्रधान जाए{ के थावी रीतें तो सर्व धन नाश पर जाशे एवु चितवीने पोतानी सात पुत्रीयो 2 ते एवी बुद्धिमान डे के पदेनी पुत्रीतो एक वार फांद काव्यप्रमुख सानले तो ते काव्य तेने मुखपाठ यइ जाय थने फरी तेनो पाठ कही थापे एमज वीजी पुत्री वेवार सानले तो तेने मुस्खपाठ थइ जाय, त्रीजी त्रणवार, चोथी चारवार, एम यावत् सातमी सातवस्वत सांजलीने पागे कही संनलावे एम साते पुत्रीयो महा चतुरटे तेने सीस्वावी मूक्यं के तमे राजसनामां एवं कहेजो जे ए काव्य जुना डे थमोने थावडे एम कदी मुखपाते संनलावजो प्रनातें वररुची पण नवा एकशो श्राव काव्य व नानि सनामां थावी कदेवा लाग्यो ते वखत प्रधान घोल्यो हे महाराज, थागलना थापणा वडेरा नवराजानी पासे कहेला काव्य वे ते नित्य श्रावी कहे जे ए काव्य तो सर्व मदारी पुत्रीयोने पण थावे वे तेगारें राजायें पुत्रीयोने वोलावी सर्व काष्य कदेवराव्या ते साते ज णीय थनुक्रमे एक बीजानी पाठल मुख पातें कदी देखाच्या तेवारें राजायें नहने निर्नबना करी कादाढी मूक्यो पठी ते वररुचीयें वजी गगानदीमा एक यंत्र नाखीने तेनी सुपर गनो पांचशे सोनोमोरोनो दडो नित्य मूकी थावे थने प्रनाते लोक नेजा करी तिहां जश् गगानी स्तुतिना काय कही कल खटकावे के पांचशो सोनामोरोनो दढो दाथा थावी पडे ते को तक जोडने लोको घोलवा लाग्या के जन राजायें थापवानं बघ का तो पण था पंमितने गगादेवीज इष्य थापे ने ए वात राजायें सांजली स्यारे प्रधानने की के श्रापणे पण जोवा पालीये, प्रधाने कर्पु थावती काले चाली पडी प्रधाने तिहा बाना खूपा माणसो वे साच्या ते जेवारें सांजनी वखते नह सोनामोरोनी पोटकी यंत्रमा राखी थाव्यो तेवार ते बाना घेठेला माणसोये पोटकी काहाडी लश्ने प्रधानने थावी सोंपी दीधी प्रनाते तो राजा प्रमुख सर्व लोको जोवा गया तेवारे ते वररुची पण गंगादेवीनी स्तुति करी घणा जोरथी कल वावे तो पण दायमा कांई थावे नदी तेवारें राजा बोल्यो थाम केम थर्पु ते वखत प्रधाने सर्व प्रपंच प्रगट करी थाप्यो ने पोटली पण बतावी थापीने पानीजहने सोपी दीधी तेथी लोकोमा जहनी घणी निदा यह हवे नमत्री उपर क्षेप करवा जाग्यो एवा अवसरमा प्रधानना बोकरा सिरियानो विवाद ममाणो जे तेवारें प्रधानना घरमा शस्त्रप्रमुख बनेक तरेनी तयारीयो देखीने नहें एक दो बनावी पोतानी पासे जणवा थावनार बोकराने शिखाष्यो ते दोहो कहे जे ॥ नवराय जाणे नही, जे सिकमाल करेसि ॥ नवराय मारी करी, सिरियो रक वेसि ॥१॥ ॥ए दो बोकरा राजाना मद्देल पासे थावीने कहेता थका निकल्या, राजायें नहने पूघु था वात केम नट्टे कर्पु तमे चोकशी करावो सर्व जातिना शस्त्र तयार थाय ने राजायें चोकसी करावी युक्सामग्री जाणीने कोपानल थयो भने निर धार कसो जे सकमालना सर्व कुंटुवने मरावी नाखु था वात सकमाले जागी तेवारें राजा पासें थाव्यो, राजायें सकमालने जो मदोई फेरवी नास्युं तेवारें प्रधान घरे थावीने सि रियाने कदेवा लाग्यो के महारी वात साजल जेवारें हूँ जइ राजाने नमस्कार करु ते वखत तुं मदारूं मस्तक तरवारथी कापी नाखजे ए वात घणीज महेनतथी सिरिये मान्य न करी पठी सकमाले राजाने प्रणाम कसो राजायें मदोई फेरची नास्युं प्रधाने पोताना मु खमा तालपुट विप नाखी लीधो इतो तिहां तिरियो वोल्यो के जे कोई राजानो पी दोय तेने तो मारवून जोश्य एवं कदीने तरवार मारी तेथी मस्तक कपाश् गहुं राजा घणो खेव करीने पठी सतुष्ट था सिरियाने कदेवा लाम्यो के ताहारा पितानो अधिकार तुं ले, सिरियो योज्यो महारो महोटो नाइ युतिन ने तेने अधिकार थापवो जोयें, राजायें पूड़घु ते किहा ठे त्यारे सिरियें कर्पु ए महारो नाश न्दानपणा पोथी वाचवा ठपर कालनिर्गम करतो हतो ते परस्पो इतो पण पोतानी स्वीपासें जतो नदी तेवारें मादारा मातपितायें जाएयु ए ससारनी कला शीखशे नदी एई विचारीने कोश्या वेश्याने कला शीखाववा माटे सोप्यो रे तेने वार वर्प यया वेश्याने तिदादीज लोनाइ गयो ने वार कोड सोनैया खाइ गयो वे माटे तेने वोलावीने थधिकारी करो राजायें यूलिनाने तेरवा माटे ब डीवार मोकव्यो, तेवारें वेश्या वोली राजा पासें मजा केम के जासो तो फरी राजा तमोने मदारी पासें थाववा वेशे नही थने मदारे पण तमारा विना केवी रीते रघु जाशे ते विचार करो जे एक क्षणवार पण तमारा वगर मने चैन पडतुं नथी ते तमे जाणोज हो माटे तमारे जावू नदी तेवारें जिन वोल्यो एकतो महारा पितार्नु मरण थयु के बने बीजो वली राजानो छल्लम थाव्यो ने ते फरी शके नदी तोपए। एकवार तने मालवा माटे तो जरुर थावीश एवं कहीने पोताने घेर थाष्यो तिहां सर्व जहना प्रपंचनी वात तथा पिताना मर एनी वात सनिलीने पती राजापासें थाव्यो राजायें तेने कयुं के तुं प्रधानपद ग्रहण कर यलिन योग्यो विचारीने ग्रहण करीश, तेवारें राजायें कसं तुरत विचारीले पढी अशोक

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चित्र MAL ५विभपनी साधु कोश्या वेश्या नाटक पाडीमा जश्न विचार फरसो के जुर्म था संसारतो मतलबी ठे, महारा पितानी एवी अवस्था यश् माटे राज्यना काममा, था लोकनुं पण सुख नथी थने परलोकमां तो नरकनी प्राप्ति थाय एवो ससार थसार जाणी रत्नकवलनो उँचो बनावी, सोच करी, साधु थश्ने राजाने जय धर्मलान थाप्यो थने तिहाथी निकल्यो राजायें जाएयु जे था व्यसनी माटे वेश्याने घेर जशे एवं विचारीने जोवा लाग्यो तेवा, ते तो कोई महागंधित गलीमाथी थइने गाम पारेर निकली गयो पण सुगंधथी नाक ढांक्युं नदी तेथी राजायें जाए{ जे ए खरेखरो वैराग्यपान पती घुलिन जश्ने श्रीसनूति विजयजीनी पासे दीक्षा लीधी थने राजायें सिरियाने मत्रीपद थाप्', महोर सोंपी हवे चोमासु थावे श्रीथुनिनजी गुरुना थावेशथी वेश्याने घेर चोमासु रह्या थने एक साधु सिदनी गुफायें चोमा रह्या तया त्रीजो शिष्य सर्पवित्रं चोमासु रह्या, चोथो साधु कूथाना वचला काष्ठ उपरे चोमासु रह्या ए चारेमाथी चुनिनजी वेश्याने घेर चोमासु रह्या रे तिहां चोमासु कादाडवु घj कठण के कारण के एफतो वर्षाऋतु वे ते कामनी जगाववा वाली केम के जे कालमा मेघ गरिव करे, वी जनी चमके, मोर योले, पपश्या पिउ पिन करे, एवा कालमा जोगनी वांबा घणी थाय वली रहेवाने चित्रामणवाली जगा, थने स्वावाने पड्रस नोजन नित्य मले, ए सर्व नो गना श्रग मले थने जो स्त्री रागवाली न मले तो सर्व निष्फल थाय परंतु थहीं थुलिन जीने तो कोश्या वेश्या सरखी सर्वमा थग्रेसर रागवाली मली तेणे मदोटा उमेदथी चित्र शालिमा उतासा, थनेक प्रकारना जोजन कराव्या, थनेक तरेना हाव नाव कला, फूल छ पर नाटक कीधु, जोग विलासना वचन बोली, तथापि ए महापुरुपर्नु एक रोम पण मायुं नही सेवट वेश्या बोली जे तु थाटला विलाप करु तु तेनु का प्रत्युत्तर तो श्रापो। तेवारें मुनियें उपदेश दीपो के हे नोली धर्मविना सर्व थवतार निष्फल ने इत्यादिक उपदेश सानलीने कोश्या प्राविका थ, एक राजाना दुकुमदार पुरुष विना वीजा कोई पण पुरुपने घरमा पेसवा देवो नही एवी श्राविका करी चोमासु पूरण थये मुनि गुरु पासे थाव्या थने वीजा त्रण साधु पण थाष्या तेमने तो गुरुये किंचित् पीने कयुं के जले थाव्या दे सकरकारक यने पुनिनश्ने तो थावतो देखतांज तत्काल गुरु उठी उना यश्ने योज्या जले थाव्या अहो उकरसरकारक एदु सानली सिंहगुफावासी साधुयें श्रमर्प श्राणीने विचासु के जुर्व या गुरु पण धनवतना गरनु देखाय ने केमके जे स्वय माल खाश्ने मातो थइ थाप्यो तेने तो यहो सकरउफरकारक एवु कसं थने में ए० कठण तप को तेने तो उफरकारक एट जुज कडं एवं जाणीने यावते चोमासे सिंदगुफावासी साधुयें गुरुने कार्य के हुँ वेश्याने घेर चोमासु करवा जश्श तेने गुरुये कहुं हे वत्स, कामदेवनी राजधानी सरखा घरमा जश् चो मासु करवानुं काम थत्यंत फवण ने तु भ्रष्ट थइ जश्श माटे तादारे जावू नही तो पण तेणे मान्य नही थने कोश्याने घेर चोमासु रहेंवा गयो तिहां एक सामान्य जगा वेश्यायें तेने रहेवा माटे थापी थने तेनी पासे सामान्य वेप करीने वेती तो पण तेनुं रूप देखीने मुनि मगी गयो थने जोग करवानुं कर्पु तेवारे वेश्या वोजीधनविना थमारे कामना नथी, साधुयें कसुं के धन किदांथी लइ थावु वेश्या वोली नेपाल वेरानो राजा रत्नकवल थापे ते लश थावो साधु जोग करवानो मतलवी ययो माटे चोमासाना विवसोमां कीपर घूटतो घुटतो नेपाल देशे गयो तिहांना राजा पासेथी रत्नकंवल लश्ने पालो वन्यो तेवारे रस्तामा चोरोनो सूरो वोल्यो “लक्ष याति” चोरोयें सूडानी वाणी सानतीने साधुनी पासेथी रमकपल खोंची लीयो फरी पाबो राजा पासें जर कहेवा जाग्यो के कंवल चोरोयें जुटी लीधो तेवारें राजायें वांसनी लाकडीमा कवल नावीने दीधो पाबो फरता वली पण रस्तामा सूडो बोल्यो “जद याति" ते चोरोयें सांजस्यु परंतु कंपल दीपगमा न थाव्यो तो पण चोरोयें जाए जेथ मारो सूडो जुतुं वोने नही तेथी मुनिने कसुं दवे तमारो कवल थमे लश्य नही पण सत्य कदो जे तमारी पासें कवल के नथी मुनियें सत्य का, चोरोयें बोडी दीधो, मुनिये रत्न वल लावीने वेश्याने वीधो, वेश्यायें नान करी कांवजयी शरीर खुबीने खालमा पटकी दीधो ते जो साधु वोस्पो हे नोली एवा अमूल्य रत्नकालने वालमा केम नाखी दीये ? त्यारे वेश्या बोली थरे मूर्खा तु पण यं करे । जे था मदालन श्लोकमा थने परलोकमा म खकारी रत्नकवलथी पण थत्यंत अधिक मूल्यवान् एतु चारित्र रूप रत्न ने तेने मलमूत्रे करी नरेलु एवं जे महारुं शरीर रूपनधित खाज तेमां केम नावी थापे ' माटे तुं महाराथी यधिक मूर्ख देखाय ने ए० सांजली प्रतियोध पामी पाडो गुरुनी पासे श्रावीने साधुयें फ रथी चारित्र जीy ॥ दवे एक दिवस राजाना रयकारें कोश्या वेश्याने घणीज स्वरूपवाली सांनजी तेथी तेनी पासे जवानी श्या थइ पण राजाना ढुकुम विना वीजाने वेश्या राखे नही एवो तेनो नियम जाणीने रथकारे राजाने कोइ पोतानी कला वतावीने राजी कस्रो तेवारें राजा प्रसन्न यश्ने योल्यो के माग जे तु मागे ते दु थापु रथकारें कोश्यानी मागणी करी राजायें झुकुम थाप्यो थने कोश्याने रथकार सोप्यो दवे कोश्या नित्य प्रत्ये रथका रनी पासे श्रीषुलिनजीना गुणगान करे ते जो रथकारें जाप्पु जे छ एने कोइ कला व ता, तो ए महारा गुण जाणशे ने महारी स्तुति पण करशे ए चिंतवीने गोरखमा वेशी एफ वाणथी सात केरीनो जुमखो वींध्यो तथा तेनी पठवाडे वली वीजु वाण साध्यु एम एकेकनी पठवाडे पाणो साधीने गोखा घेगा यकांज थांवानी लुंध तोडीने वेश्याने थापी दीधी थने कदेवा लाग्यो के जो था मदारी कला केहेवी तेवारें कोश्यायें एक राश्ना दाणानो ढिगलो करी तेना उपर फूल रास्युं तेमा एक दोरो शीववानी सूझ उनी राखीने तेनी उपर नाटक कल्खु ते नृत्य जोश्ने रथकार अत्यंत खुशी थइ गयो थने कदेवा जाग्यो जे । माग माग हुँ तादारी उपर सतुष्ट थयो दु कोश्यायें कयुं तें कहेवोक तमासो जोयो के जे पकी खुशी याने महारा उपर प्रसन्न थयो' था में जे सूश्नी थणी उपर नृत्य करी बताष्यु एवी कला जो शीस्ववा वेसीयें तो दजारो शीखी शकाय जे तेमज ते जे थाम्रनी लुंव तोडी थापी ए पण शीखवं सहेज ने एमां का कतण नथी थन्यास करवायी वधी कला शीखी शकाय तेवी परंतु महारा जेवी स्वरूपवाली स्त्री पासेनी पासे सनी रहेली इती, पने वली चोमासाना विवस इता तेमज कामने जागृत करनारी एवी या चित्रशाला हती तथा शरीरने पुष्टीना करनारा मन्मथने उत्तेजन थापनारा एवा घणा श्रेयमां श्रेय जोजन मलता दता ते थारोगी ने वली रात्रदिवस मदारी पासे रहेता तेम दु पण तेमना उपर थत्यंत मोहित थई थकी सराग दृष्ठीयें घगुप्रीतिपूर्वक विपयसेवन क रवानी याचना करी रही हती थाटलं बता एक कणमात्र पण जेनु मन घलायमान पर्यु नदी एवी कला श्रीजिनजीनी पासें इती ते शीखवी घणीज कठण ने महा ऊर्जन ने जेनी थागत में घणा प्रकारना चाला कसा तथापि ते महापुरुप किंचिन्मात्र

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चित्र प्राचार्य यूविभप्रमीनी सात वेहेनो CAUGH यूखिभजीये सिड्नु रूप फरसुने मग्यो नही धन्य ने एमना मातपिताने के जेना कुलमां एवो पुरुप उत्पन्न थयो एवो उपदेश यापी रथकारनु मन फेरवीने श्रीषुलिनजी पासें मोकन्यो तेरो जइ वीक्षा लीधी ॥ दवे को श्क समये चारवर्ष पर्यंत काल पच्यो तेवारे त्या सर्व मुनिराजो थग्यार थगना जाणनारा रह्या पण हादशांगीना जाणनारा कोई न दता तेवारे सर्व सघे वे मनुष्य मूकीने श्रीन वाह स्वामीने बोलायो, नयागु स्वामीयें कहुं में प्राणायाम ध्यान चालु कर्पु तेमाटे म हाराथी थावी शकाशे नदी तेमने श्रीसधे फरीथी कहेवराव्यु के दे महाराज जे श्रीसघनी थाहा न माने तेने केवा प्रकारनो वम करवो' श्रीनश्यागुजी बोल्या तेने गठ बाहेर करवो एवी चाल डे पण मने ध्याननो यंतराय थाय बे माटे श्रीसघने एम करवं योग्य डे के न वावाला साधुऊने श्दा मदारी पासें मोकली थापवा जोयें तो तेमने जणवानुं वनीश कशे तेवारें श्रीसघे मली श्रीधुलिन प्रमुख पांचशो साधुउने श्रीनश्यागुस्वामी पासें मो कल्या तिहां गुरुयें सर्व साधुउँने सात वाचना दीधी तेमां बीजा सर्व साधुतो जणवाथी दारी गया परंतु एक पीलिनजी घे वस्तुयें उणा दश पूर्व नणी गया एवामा श्रीथुलि नजीनी सात बनो यक्षा, यक्षविना, नूता, नूतविन्ना, सेंणा, वेणा बने रेणा ए साते साध्वी श्रीसनतिविजयजीनी शिष्यणी ययेली बे ते श्रीथुलिनजीने वांदवा सारु थावी तेणे प्रथम श्रीनश्वास खामीने चांदीने पुडघु के पुलिनजी किहां ले ? गुरु बोल्या पर्वतनी गुफामांहे नरोला पूर्वन गुणा करे ने तेवा, साते जणी तिहां गई तेमने श्रावती जो ज्ञा नना बलेकरी चमत्कार देखाउवामाटे श्रीजिन सिदा रूप करी बेगे तिहां सिदने देखी साध्वी नय पामी थकी फरी गुरु पासें श्रावीने केहेवा लागी के महाराज तिहां तो सिंद dan ( यो वे तेवारें गुरुयें जाएषु एणे विद्या प्रगट करी जणाय वे एम विचारीने वली कधू के दव तमे जाउँ थुनिनजी तिहाज तेवार ते फरी तिहां गइ नाइने देखी दर्पसदित वदना फरी वली गुरु पासें थावाने पूठ्या लागी के महाराज अमारी साथै सिरिये दीक्षा लीधी तेने थमारामाथी यक्षणीय उपवास कराव्यो ते देवलोक गयो पनी यक्षणीने प्रायश्चित्त मेगा माटे श्रीसंघने कयुं तेवारें श्रीसघे कासग्ग करीने शासन देवीने सीमधरस्वामी पासें मोफती सीमधरस्वामीना मुखथी ये चूलिका जश्ने शासनदेवी हा यावी एतु कही गुरुने वांदीने पोताने स्थानके गइ दवे एक दिवस श्रीयुलिनजी पोतानो एक ब्राह्मण मित्र हतो तेने घेर गया तिदा ते ब्राह्मणनी स्त्रीने पुग्घु महारो मित्र किदां वे' स्वीये कj थमने दा रिडीपणु प्राप्त ययु के माटे नीख मागवा गयो तेवारें श्रीघुलिना ज्ञानवलथी जोयं तो एना घरमा वडिलोपार्जित घणु धन नरेलु वीतु पण ब्राह्मणने तेनी खवर नथी माटे नीख मागे वे पठी श्रीपुतिनजीयें पोतानी दृष्टीथी दाटेला धननु ठेकाणु तेनी स्त्रीने बतायुं श्रने पोतें चाव्या गया ब्राह्मणे थावीने पोतानी स्वीना कहेवा उपरथी दाटेला धननु स्थानक जाएj थने विचापु जे पक्का मुद्दा विना मुनिराज दृष्टी थापे नदी माटे तेणे धरती खोदी जोइ तो तेमाथी घणु धन निकम्युं तेना योगें ब्राह्मण मुखी ययो एवी रीते एक सिंदनी विकुर्वणा करी थने वीच ब्राह्मणने धन वेवाडघु एवे वातो थयोग्य करीने वली श्रीपुलि नजी गुरुनी पासे वाचना लेवा थाप्या तेवारें गुरुये क{ के पूर्वोक्त वे काम करवा थकी तमे वाचना जेवाने अयोग्य यया ठो, फूटेला नाजनमा दूध नास्वीयें तो तेरे नही, तेम त मोने पण वाचना दवे देवाय नदी एवं सनिली श्रीपुलिनजी ठदास यया थका श्रीसंघने चित्र साधुश्री रपोटो प्राय रसित सप्रनि राजा त्यार्यरक्षितनीने नमस्कार करने दोय तेने थमे थापीयें निस्वारीयें कहुं के नले तमारा जेवो मने पण करी न्यो ते सांजली गुरुये पण लान जाणी तेने दीक्षा थापीने तेनी श्शा मुजब नोजन करायु थने सहस्ति सूरिये कर्यु के शुभ जाव राखजो एटलामा तेने उलटी थइ तेवारे सर्व साधु तेनो वैयावच करवा लाग्या तेथी निदुयें चारित्रनी यनुमोवना कीधी थने मरण पाम्यो तिहाथी मरीने उदयणी नगरीमां श्रेणिक राजाने पाटे कोणिक राजा, तेना पाटे बदायिन राजा, तेना पाटे नद नामे नव राजानां नव पाट थया थहीसुधी श्रेणिकथी मामी वार पाट थया तेरमे पाटे चश्गुप्त, चोदमे पाटे विज्सार, पन्नरमे पाटे अशोकषी बने शोलमे पाटे अशोकश्रीनो पुन कुणाल थयो ते कुणालनो पुत्र संप्रतिनामे राजा ययो, जनमताज तेना दादायें तेने राज्य थाप्यु ते थनुक्रमे त्रण खंम पृथ्वीनु राज्य जोगवनारो थयो दवे एक दिवस ते सप्र तिराजा गोखमा ठोठे तेणे रथयात्रामा थार्य सुदस्तिसूरि जाय जे तेने वीना तेना योगें जातिस्मरण झान उपन्मु तेथी पूर्वे निकुना नवमां पोते साधु थयो हतो ते सर्व दीनामा थाप्युं तेवार गोखथी नीचे उतरी गुरुने पगे लागीने पुटपुं के हे स्वामी श्रव्यक्त सामायिकर्नु { फल' गुरुये कहुं राज्याविप्राप्ति थाय ते सानली सप्रति राजा वजी विशेप दृढ थाने गुरुने पूछवा लाग्यो के हे स्वामी मने थाप लखो हो तेवारें गुरु सपयोग थापीने वोल्या के तु निना नवा थमारो शिष्य हतो तो हवे तने राज्य मल्यु माटे धर्ममि कर एवं गुरुनु वचन सांजलीने राजायें प्रावकपणु जी, अने सवालाख जिनमदिर नवा कराव्या, सवाकोटी जिनपिंय प्रतिष्ठाष्या, तेर हजार जीर्णोद्धार कराया, पंचाः हजार पीतलनी प्रतिमा नरावी, सातसे दानशाला करावी, देवालयोथी सर्व पृथ्वी शोनायमान करी, कर चित्र) साम्रो परपोदो Wisity सप्रति राजा मार्यरक्षितनीने नमस्कार करे

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गोदाव्या, साधुऊना वेश पहेरावीने पोताना शुनटोने थनार्य जेवा वेशोमां मोकली तिहांना लोकोने समजावीने साधुने अनार्य देशोमां विचराव्या तथा पीजा घृत, गोड, वस्त्र प्रमु खना सर्व व्यापारीउने तेमज कंदो लोकोने कहेवरावी मूक्युं के तमे शुक्ष थाहारादिक मु निउने वदोरावजो तेना पेशा जे थाय ते राजानी पासेथी लइ जाजो पण ए वातनी साधु ठने खवर पडवा वेशो नदी जोको पण तेमज साधुनने देवा जाग्या, साघु पण थप न जाणता थका श्रादारादि लेवा ताग्या, जाणे शुरुज ने एम समजवा लाम्या, एटलामा था र्यमहागिरिजी वोल्या हे शिष्यो था एवो स्निग्ध थाहार नित्य केम लइ श्रावो बो? तेवारें शिष्यो वोल्या श्रमे चोकसी तो नित्य करीयें ये पण एनी मालम पडती नथी वली गुरुयें कर्यु दवे सारी रीते चोकशी करो पड़ी शिष्यो ए गोचरी करतां बोकराउने पुबघु थरे तमने नित्य लाड प्रमुख किहाथी आवे ? तेवार बोकरा पोल्या महाराज सर्व आपणो प्रताप ने थमे पण तमारे प्रतापे लाइ प्रमुख खाश्य यें बने थापने पण वदोरावीयें यें राजानो न मार थस्तूट ते सनिली शिष्यो ए थावीने थार्यमहागिरिजीने कधु थार्यमहागिरिये जाप्पु या राजष्य ठे पड़ी थार्यसुदस्तिने कसुं हे देवाणुप्रिया तमे थाहारनी चोकशी करो ठो के नथी करता थापणने राजष्य थावे ले ते केम? तेवारें थार्यमुदस्ति विना उपयोगथी पोल्या के राजश्व्य तो सर्वत्र , कहो राजश्ष्य क्या नथी? थार्यमदागिरिजी बोल्या भावी शिथिलपणानी वात तमे केम करो बो' थाजे तमे पोतेंज एवु बोलो बो तेवार तो प्रसिक्षपणे दोप लागवानुं थाशे माटे हवे तमारे ने थमारे सानोगिकपणु नथी एवं कहीने अन्यत्र स्थानके विहार करी गया श्दा सुधी तो एकज समाचारी हती थने एकज गठ इतो तथा एक सानोगिपणो थाचार्योनो चान्यो परंतु थांदी श्रीथार्य मुदस्ति सरिथी सोनोग निन्न ययो थार्यमुदस्ति चारित्र पाली देवलोक गया ए आतमो पाट जाणवो ॥ ७॥ ॥ वे श्री आर्यमुहस्तिना वे शिष्य थया तेमा एकतो सुस्थित थने वीजो सुप्रतिबदक एमणे कोटी वार सुरिमत्र जप्यो कार्कवी नगरीमा जन्म्या तेमनो व्याघापत्य गोत्र हतु ए नवमो पाट । ॥ ए॥ ॥ एमने पाटे श्रीथार्य इंशविन्नमरि कोशिक गोत्रीया थया ए दशमो पाट ॥१०॥ श्राथार्य शिविन सरिने पाटे श्रीथार्य विन्नसरि गोतम गोत्रीया थया ए थगीधारमो पाट । ॥ श्रीथार्यदिन्नने पाटे श्रीथार्य सिंहगिरि कौशिक गोत्रीया थया जे जातिस्मरण ज्ञान पाम्या दता ए पारमो पाट ॥ १३ ॥ ॥ थार्य सिंदगिरिने पाटे थार्यववसूरि गौतम गोत्रीया यया ए तेरमो पाट ॥ १३ ॥ ॥धार्यवज्ज सरिने पाटे थार्यवजसेन सूरि उत्को शिक गोत्री थया ए चौवमो पाट ॥१४॥ ॥ एमना चार शिष्य थया एक नाश्त, बीजो मिन, प्राजो जयंत थने चोथो तापस ए चारने नामे एमनी चार शाखा निकली ए पन्न मो पाट ॥ १५॥ ॥ वे तेरमा थार्यसिंहगिरिथी मामीने प्रण पाटर्नु वर्णन कही देखा 'डीये ठेय ते थावी रीते वे के श्रीसिदागिरिनी पासेथी सुनवानो नाइ थार्यसमित तथा वीजो मुनवानो जरतार धनगिरि ए वे जरो दीक्षा लीधी बने सुनवा पोते गर्नवती दती तेने तुववन गामा मूकी दोधी पड़ी सुनवाने पुत्र थयो ते वखतमा पीजी पडोसीनी स्त्री वोली के वाई जो बाज एना पाप धनगिरियें दीक्षा न लीधी इती तो था पुतना जन्मनो महोटो महोत्सव थात पण इमणा तो पिता विना बीजो कोण थावीने महोत्सव करे एवी वात समितीने ते पालकने जातिस्मरण ज्ञान उपन्यं तेवार यालके जाएऍ जे हूं जो महारी मा

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(चित्रांश SH मुनंरा पोताना भरवार धनगिरिनीने ठगेकरो यहोराने झोलीमा नास्त्री माधु सई जायचे ताने राजी राखीश तो ए महारी माता मुजने बोरशे नही माटे को रीते एने कटालो छ पजे तेवो उपाय करूं तो ए मने त्यागी देशे, तेवारें हूँ दीक्षा लश्श एवु जाणी माताने राग कराववाने माटे नित्य रुदन करवान घाटुं क केमके एने तो चारित्र खेवानो नाव वर्ने ने तेवार वालकना रुदनथी माता घणी रहेग करवा लागी थने विधान जे छ था पुनने में करु । कोश्ने थापी देव तो ठीक एवा अवसरमा सिदगिरि थाचार्य तिहां पधाया तेवारें धन गिरि गोचरीयें जवा लाम्या तेने गुरुयें ज्ञान दृष्टीयें विचारीने कयु के थाज तमोने गोच रीमा सचित्त थचित्त वस्तु जे मले ते लइ जेवी, वे धनगिरि गोचरी फरतां फरतां सुनदाने घरे गया सुनवा वोली श्रा तमारा पुत्रे तो मने उजटो संताप करी दीधो बे माटे एने लइ जा साधुयें कयुं हमणा तो तु थापे वे पण पालथी उख करीश, सुनदा वोली हूँ उख नही करु तमे सुखे लइ जा तेवारें धनगिरिजी घणी स्त्रीयोने तथा बीजा लोकोने साक्षी करी पुत्रने सइ कोलीमा नाखी उपासरे थाव्या गुरुयें जोली उपाठी तेमा जार घणो जाएयो तेवारें पोल्या के था ये वज के एतु कहीने कोली उघाडी तो मांदे बालकने दीगे तेनु बज ए, नाम दी) दवे उपासरामां थाव्या पली बाज रुदन करवू बध कर्पु गुरुये सय्यातरनी देवावाली प्राविकाने ते बालक सोंप्यो तेणे पारणामां रास्युं ते जेवारें ब महीनानो थयो तेवारें तिहां शालामा साध्वी नस्या करे ने तेमना वचन सांजली पार पामा सुता मुतां श्रगीथार थग नणी गयो अनुक्रमें जेवारें त्रण वर्पनो थयो तेवारें सुनदा घोली जे हुँ मदारो पुत्र पाबो लश्श तेने संघे कयुं के ए गुरुनो माल ले ते गुंरु जाणे पण श्रमाराथी थपाय नही पड़ी राज दरवारमा गइ तिहां सघनी विनतिथी गुरु पण दरवारमा याव्या राजायें एवी रीते न्याय थाप्यो के जेना उपकरण ए बालक सरलीये तेनो ए पुत्र जाणवो तेवारें मातायें लाडु तथा घुघरा प्रमुख यालकने देखाच्या परंतु यालके तेनी सा। हामु पण जोयुं नही पनी गुरुयें वालकने कईं के था उघो तादारे लेवो दोय तो लइ तेवार पालके यो ग्रहण कस्यो अने नाचवा कूदवा लाम्यो राजायें कहुं न्याय थइ चुक्यो एम कही वालक गुरुने थापी वीधो ते जेवारें थात वर्षनो थयो तेवारे दीक्षा लीधी ते वखत सुनवायें कसु के महारो पुत्र पण तमे जर जीधो तो दवे मने पण दीक्षा थापो, गुरुयें मुन काने पण दीक्षा दीधी ॥ एक दिवस सहायणीना मार्गमा वज पीना पूर्वनवनो मित्र को देव हतो ते मनुष्यनुं रूप करीने वज पीनी परीक्षा करवाने अर्थे कोजानी नीक्षा देवा लाम्यो वज झपीयें जाए{ जे कोलानी शतु तो दमया नथी तो था वखतमा ए कोला क्याथी लायो, ए तो कोई वेवतायें उल कस्यो होय एम जणाय डे माटे देवपिम न लेवो एवं जाण। निक्षा लीधी नही तेवार देवें संतुष्ट थश्ने वैक्रिय सब्धि थापी फरी वलीन नालाना दिवसोमां गेवरनी परीक्षामा देव घालाववा श्राव्यो तेमा पण वजमुनि चलायमान यया नही तेवा, देवतायें थाकाश गामिनी विद्या थापी दवे एक दिवस गुरु तमिल नूमियें गया अने केटलाएक साधु गोचरीयें गया तेवारे वजमुनि बालकीडायी साधुना संथारा दिक चारे वाज मूकी पोते वधमा वेशीने जेवी रीते गुरु वाचना थापे तेवी रीते जूदी जूवी अगीवारे अंगनी वाचना देवा लाम्यो गुरुये पण वारणे गना ना रहीने सर्व वाचनासनिली पठी बालकने कांश पण शका पडे नदी तेवी रीते महोटा स्वरथी निसिदि कहीने गुरु उपास रामा थाप्या तेवारें वजपीये पण पोता करेल्ल सर्व रुत्य समेटी जीर्छ हवे गुरुये ते बाज चित्र८३ अपवर्ष यया परी सुमदाये राजसभामा फरीयाद करी परतु राजाये न्याय करी ते गेकरो अपाच्यु नही

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कना गुण प्रगट करवाने माटे कयु के हे साधु तमे श्दा रहेजो एक गामे जश्ने थावं तु तेवारें साधु वोल्या थमोने वाचना कोण श्रापशे' गुरुये कहुं वज्वरुपी थापशे एवु कदीने गुरु वीजे गाम गया दवे ते साधु गुरुनु वचन प्रमाण करवावाला, विनयवत ने माटे वजमुनिनो विनय करीने वजनी पासे वाचना लेवा लाम्या तेमने वजे पण एवी वा चना थापी के गुरु घणी वाचनाउथी जेटलु जणावे तेटलु वजमुनियें एक वाचनामा न यावी वीधु तेवारें साधुए विघास्तु के गुरु गामे गया तेने जो चार दिवस वधारे लागे तो नीक तेटलामा अमारो था अमुक श्रुतस्कंध पूरण थ जाय पनी केटलाक दिवस वीत्या केठे गुरु थाध्या तेमणे पुग्धु नो साधु तमारे वाचना मुखे थ' साधु पोल्या दा महाराज हवे श्रमारे वाचनाचार्य ए वजन होजो तेवारे गुरुयें श्रगीधारे अग वजने थापीने वाचनाचार्य कस्यो दवे गुरुनी थाज्ञाथी वजमुनि श्री उहायणी नगरीमा नगुप्ताचार्य पासेयी वश पूर्व जण्या पनी श्राचार्य पद पाम्या एक दिवस पाटली पुरमा धनशेठने घरे साध्वी उतरी के तेणे वजस्वामीना गुण थने रूपनुं वर्णन कसु तिहां शेउनी पुत्री रुक्मि णीयें एवी प्रतिज्ञा करी के वजस्वामी विना बीजाने मदारे परणतुं नदी एटलामा वजस्वामी पण पाटली पुरमां बाप्या थने विचारघु के महारा रूपथी लोको कोन पामे .ते नही पामे एटला माटे विद्याना पलथी रूप सक्षेप करी सामान्य रूपथी धर्मदेशना थापवा मामी तेवारें साधुयें लोकोना मुखथी सोनम्युं जे गुरुनी देशनातो थमृत सरखी डे पण रूप तो सामान्य डे ए वात साधुयें वज्राचार्यने कही तेवारें बीजे दिवसे हजार दल सुवर्ण कमल करीने तेनी उपर वेगा अने पोतानुं जेवु मूलरूप तु तेवाज रूपथी देशना दीधी ते जोर सर्व लोक विस्मय पाम्या, धनशेत पण पोतानी मदारूपवाली रुक्मिणी नामा पुत्री यने एक फोड सोनामोरो लश् गुरुनी पासे थावी नेट करवा लाग्यो गुरुये कन्याने प्रति योध थापी धर्म पमाठीने पोतानी शिष्यणी करी ॥ दवे एकदा ववस्वामीय पदानुसारिणी लब्धियें करीने श्रीथाचारांग सूत्रना महापरिज्ञा नामा थध्ययनमाथी मानुष्योचर पर्वत प यंत जर शकाय एवी थाकाशगामिनी विद्या काहाडी वली एक समय उत्तर दिशामां 5 कान पडतो जाणी श्रीसंघने पट कपडा उपर वेशाडीने थन्यस्थानके प्ल जवा तयार थया एवामा तिहां सय्यात्तर वोल्यो महाराज हुँ पण एमनो साधर्मि दूं तेवारें तेने पण पट सुपर वेशाडीने थाकाशर्मा रह्या थकाज स्थानके स्थानके श्रीजिनचैत्य वदावता यका महानिशि नामा नगरीयें गया तिहां ययपि मुगाल तो ले तथापि राजा चौधमतवालो ने माटे तेणे योधदर्शनीना नक्त लोकोना कहेवा उपरथी पंजोसणना दिवसोमां जैनमदिरमा फूल लइ जवा देवा नही एवो वदोवस्त करो ते जोश्ने संघे श्रीवजस्वामीने विनति करी महाराज ननो थटकाव थाय ? वजस्वामी कसं तमे चिंता करशो नही हूं एनो उपाय करूं बु एम कही थाकाशमा उडीने माहेश्वरी पुरीमा इताशन नामा देव तेना वना पोताना पितानो मित्र वनमाली हतो तेने जर कप के तमे फूल तयार राखजो एवं कहीने पनी दि मवत पर्वत उपर गया तिहां पहना कमलनिवासिनी लक्ष्मीदेवीयें श्रीवजस्वामीने वांद्या थने कठेवा लागी हे स्वामी' थापनी वासीने का हुकुम फरमावो तेवारें थाचा कयु पूजाने थर्थ फूज जोश्ये ठेये तिहा लक्ष्मीदेवी देव पूजाने थर्थ जवल कमल लई भावी सती ते दाजर कमां तेने लग्ने फरी पाग वलतां दुताशन वनथी वीश लाख फूल तर विमानमा वेशीने पूर्वनवनो मित्र तिर्यक रॉनक जातिनो देव ते पण थाचार्यनी साथे गीत, नृत्य, वाजिन प्रमुख महोत्सव करतो थको रह्यो ने तेना सहित थावीने पुप्यो श्राव कोने थाप्या थने जैनना चेत्यनो महिमा वधासो, श्रीसंघ पण घणोज थानद पाम्यो, ते नगरनो राजा पण योधर्म मूकी जिनधर्मी थयो । तथा वली एक दिवस दक्षिण मार्गमा जाता थका श्रीवजस्वामीने श्लेष्म यथाव्यु तेवारें साधुनी पासेयी गोचरीमा शंत म गावी ते साधु ज थाय्या तेने पोते कानमां धरी राखीने विचास्नु जे पळी खाणं पण न समां एमज रही गर, स्ववाणी नही ते पहिकमणो करती वस्वते परिप्लेदणां करतां नीचे पड़ी गर तेवारें गुरुये विचाखु जे छ दश पूर्वधर बु तेने थावी नूल ते वजी केम पडी एथी जाप्यु जे हवे महारु थायुष्य स्वल्प रहेल्नु जणाय ले माटे थनशन करवानो विचार करो थने पोताना शिष्य वजसेनने कधू के पार उकाली पडशे तेवारे तु सोपारापुर पाटण जाजे, कोश तने पूढे के सुनिन्छ क्यारे यशे तेवार ताबारे एम ध्यानमा राखq के जे दिवसे लाख मो ज्यनी एक दामी चढे ते विवसथी बीजे दिवसे सुगाल थाशे एवु यतो देखीने जवाब थापजे थमे तो दवे थनशन करी एम कहीने वजसेनने सोपारा पाटण जवाने विदाय कयो, पोतानी पासे रहेला साधुउने जेवार निक्षा नही मले तेवारे विद्यापिंम करीने केटला एकने जमाख्या, पढी पांचशे साधुनने लश्ने थनशन करवाने माटे चाल्या तेमां एक न्हानो चेलो हतो तेने नोजष्यो के तु श्दा वेश हुँ बाबु लु पण ते चेलायें मोदथी कर्यु जे हु तो तमारी पवाडे थावीश तो पण गुरुये समजावीने राख्यो तेवारें चेजायें जाए{ जे गुरु महाराजने थप्रीति न थाय तेम करु तो ठीक एवु चिंतवीने फरी पर्वतना मूलमा थावी तपेली शिला सपर ते चेलायें अनशन करी दीधो, ते पालक हतो माटे सुकुमार पणाथी तत्काल शुन ध्याने मरण पामी देवलोक गयो, देवतायें नेला थइने तेनो मदिमा करो, तेवारें वीजा साधुयें पण विशेप दृढ थक्ने अनशन कमां परंतु मिथ्यात्वी देवो श्रावीने साधुउने थ नशनमा मोदकनी निमत्रणा करवा लाग्या अने बोल्या के हे महाराज श्रा शुरू निर्दोप था हार ते ब्यो तेवारेंसाधुयें जाए{ जे एने थप्रीति ने एबु जाणीनजीकना बीजा पर्वत उपर जश्ने थनशन कमु शुन ध्यानथी काल करीने वजस्वामी प्रमुख देवलोक गया, तेवारें शश महाराजे रथ उपर वेशी पर्वतने प्रदक्षिणा देश सर्व साधुउँने वाया तिहां ते महाराजना र थनी रेखा ममाणी तेथी ते पर्वतर्नु रथावर्त एवं नाम श्रयु तथा तिहांना वृक्ष पण साधुटने नमवाथी नमेला थकाज थाज पर्यंत देखाय ने श्रीवजस्वामी देवलोक गया पनी दशमो पूर्व तथा चोथो बर्मनाराच सघयण विछेद गया तेवार पठी वनसेनाचार्य सोपारा नगरमा जिनदत्त श्रावक तथा तेनी नार्या ईश्वरी नामे जे ए वेडने प्रथम श्री वजस्वामीनो प्रतिवोध थयो दतो तेमने घेर गोधरी गया तिहां देखे तो धान मले नही तेवारें शेठ थने शेग गीय पोताना चार पुत्रो सहित लाख मूल्य धान्पनी दामी चडावीने विचार कस्यो के सर्व थापणे उ जणायें था रांघेला अनाजमा जहेर मेलवी खाइने पनी अनशन करी लेवु एवं चितवी हामीमा जहेर नाखवाने तयार थया के एटलामा वजसेन थाष्या तेमणे ते कृत्य देखीने पुग्धु के, / ? मरवानो उपाय करो जो।। तेवारे शेगणी बोली धन तो थमारा पासे घणु परंतु धान्य मलतु नयी तेवारें वजसेन पोज्या गुरुयें कम्प्युं बे के लाख व्यनी दामी च - मग था ते सांजली शेठाणीने पण पूज्पना वचननी प्रतीति डे माटे बोली के जो सुगाल थ जशे तो था मदारा चारे पुत्र हुँ थापने पापीश ने तमे चा रेने वीक्षा थापजो एवी प्रतिज्ञा करी दामीमां जहेर नाखq बंध कसुं तेवार पली बार प होर गया केडे केटलाक वाहाणो मनड वायराना योगयी डेटे निकाली गया दता ते सारो वायरो वाह्याथी पाग थाव्या तेमा जुवार नरेली दती ते लोकोयें लीधी, मुगाल थयो, ते धान्यथी जगदार थयो तेथी जगधरी एवं नाम धान ययुं एने लोक नापामा जुवार कहे ने पठी शेन थने शेगपीयें एक नागें, बीनो चश्, त्रीजो निर्वृत्ति थने चोयो विद्याधर ए चारे पुत्रोने वीक्षा अपाची थने पोते पण दीक्षा लीधी ते चारे साधुन बहुश्रुत थाचार्य थया तेनी चार शाखा निकली दवे विस्तार वाचनामा केटलाएक कुल, केटलाएक गण, केट लिएक शाखाउँ कहेली ने ते सूत्रथ। सुगम माटे जस्खता नयी सूत्र उपरथीज जाणी जेवु थने थर्थ पण सूत्र वोचे ते प्रमाणे करी देवो ॥ पुणोथळजसनदापुर॥ वजी थार्य यशोननी थागत थविरावली था प्रमाणे जोवी ते कहे जे ॥ थेरस्सपथकजसनहस्सतुंगिया यणगुत्तस्स ॥ थविर थार्य जसन तुगीयायण गोत्रीयाना ए वे शिष्य एवो अर्थ सूत्रनो समजी लेवो पाकी धमे तो मात्र कोक शाखानो सषध जखियं ॥ थविर ब्लुए रोदगुत्ते कोसियगुत्ते ॥ एनाथी प्रैराशिक मत निकम्युं तेनी कथा कहीयें ये श्रीमहावीरथी पांचशे चुमालीश वर्प गया पनी पीरोदगुप्ताचार्यनो गुप्त नामा शिष्य हतो ते शतरंजिका नामे नग रीमा थाव्यो ते वस्वत एक मदोटो वादी पोशाला नामे तापस ले ते पण ते नगरीमा श्राव्यो ते कहेवो वे तो के वींनो, साप, उमर, दरिण, सूधर, काग, धने पंखी ए सात चीजो घनावी यापवानी सात वियानो धरनारो ने तेना मदथी ते सर्व लोकोने एम कडेके महारो पेट फाटीने कवाघ विया वाहेर चानी जाय तेना नयथी में महारा पेट पर पाटा घांधी राख्या दे एवा थलिमाननी वातो करे वली एक जांबूनी माली हाथमा राखे थने लोको बागल एवं कहे के था जंवधीपमा महारी साथे जीतवावालो को नयी एवीरीते ते तापसे थावीने नगरीना राजाने पण कम वजी फडे के तमारा नगरमां को वाद करवा वालो दोय तो सुस्वेयी तेने तेरावीने मदारी साथे वाद करावो नदीका मने जीतपताका थापो तेवारें राजायें पडद वजडाव्यो के जे वाद करवाने सा राखतो दोय ते था पडद रोकी राखे एटलामा ते गुप्तनामा रोदगुप्ताचार्यनो शिष्य गाममां गोचरीय थाव्यो वे ते पडद सानजीने पोल्यो हुँ वाद करीश एवं कदी गुरुनी पासे थावी पउदनी दकीगत कही गुरु पोल्या ए वात ते ठीक करी नदी केमके ते योगी क्रोधी माटे तदारा वपर विद्या च नावशे तेवारें शिष्ये कर्पु थाप जैनी वेग थका ते जितपताका लइ जाय तो पठी आपणी शी विशेपता कहेवाय' एवो शिप्यनो निमय जाएगीने गुरुये तेने सात विद्या थापी वली पण कसं जो कदापि तने कोइ अधिक उपश्व थाय तो था उघो मत्री थापु तु तेने तु फेर वजे तेथी सर्व सपश्च निवर्त यश् जाशे एवीरीते गुरु पासेथी थाझा लश्ने बलश्रीनामा राजानी सनामा श्रावी योगीने कहेवा लाग्यो जे तहारो वाद / ते सांगलाव योगी ठल फरीने वोल्यो थमारा मतमा एक जीवराशि पीजी थजीवराशि ए ये राशि कही ये एवं यो गार्नु वोलq सोनलीने शिष्ये विचार्यु जे था वातनो जो हूँ दाकारो करीश तो एकदेशे के में मदारी वात एने मंजुर करावी, मदारूं मत एपणे मान्यु, तेथीलोको जाणशे के शिष्य दारीगयो meी मागे पण सतर्क करी कम के घे राशि तुं को वे ते सोढुं कहे डे परंतु जीव, यजीव अनेत्रीजो नोजीव एवीत्रण राशि ले तेवार योगी योज्यो तुंनोजीव राशि केवीरीते कहे? शिष्ये तरत एक दोरो वाटीने नूमि उपर नाख्यो ते दालवा लाम्यो त्यारे कधू के जो था नो जीव , एवी घणी युक्तियो लगाडीने संसारमा सर्व मली जीव, राजीव थने नोजीव एत्रण वातो स्थापन करी थापी तेथी योगी दारी गयो पड़ी योगीयें विद्या घलाववा मांमी तिदा प्रथमतो महोटा मंकने मारवावाला एवा वींडी बनाय्या तेवारें चेजायें गुरुये वतावेली वि याना वलथी मोर वनाव्या ते श्रावीने सर्व वींबीयोने वाइ गया,तेवारें योगी सर्प बनाव्या तिदां चेलाये नोलीयां बनाया, योगीय उवर वनाव्या तेवारें चेजाये विनाही धनावी, यो गीयें तीखा सींगहावाजा हरिण बनाव्या तेवारें चेलायें चितरा बनाव्या तेणे थावीने सर्व इरिणोने मारी नारख्या, योगीय सूधर बनाया तेवारें चेलायें सिद बनाव्या, योगीय काक वनाध्या, चेलायें घूर बनाया, योगीय परखी वनाष्या, चेलायें बाज पनाव्या, एमां पण योगी दार वा वेगे तेवारें गईनी विद्या चलावी तेवस्वत चेलाये उघो फेरव्यो तेथी तेनी विद्या नाशि गइ, एरीतें योगी हारीगयो थने चेलो जीत करीने घणा लोकोनी साथै परिवस्यो थको गुरुनी पासें थाव्यो गुरुये पुग्घु केवीरीतें जीती थाव्यो तेवारें त्रण राशि थापी तेथी जीत्यो एवु कर्पु त्यारे गुरु योल्या दे वत्स तें था सारी वात नही करी, जगवानना मतथी तु विपरीत वोल्यो, माटे राजसनामा जश्ने मिष्ठामि उकर्ड वश्थाव थने वादीने जीतवाने माटे जे क्ल युक्ति लगाही तेनो संघमा मिठामि उक्कड वश्थाव, जो मिष्ठामि उकडं नही देश तो जेनम तनो उठापक यश ते सांगली शिष्य बोल्यो दवे महारा मुखथी हूँ केम जो पहुं, महाराथी तो मिठामि उकडं वेवाय नही, में खोटु पोर्बुज थापन कथु ले ! राशितो त्रज डे, गुरुयें कसं के तुं महारी सा पण जो वाद करवा चतो दोय तो चाल राजसनामा जइ था पणे ये वाद करीयें एम कही गुरु पोताना शिष्यने लेश्ने राजानी पासें थाव्या थने कहेवा लाम्या के हे राजन् था महारा शिष्ये वादीने जीतवा माटे जे त्रण राशि थापन करी ते वात जूठी , ए श्रमाकै कर्मु मानतो नथी ने महारी साथे वाद करशे तेनी वचमा थाप सादी घर रहो तो थमे वाद करीयें राजायें कसुं सुखे वाद करो पड़ी ते वेद्गु गुरु शिष्य वाव क रवा जाम्या तिहां ब महीना सुधी वाव कसो १४४४ प्रभ कुतर्कना शिष्ये यापन करी पुग्घा ते सर्व प्रश्न गुरुयें त्रोटी नाख्या तो पण समज्यो नदी राजाने घणो वखत खोवो पध्यो ते वारें राजायें जाएj जे केटला दिवस एना ऊगडामा खोटी था। एम विचारी गुरुने कर्यु हे स्वामी थापर्नु बोलवु सर्व साचं वे पण महारा राज्यसवधि कामकाजा विगाह थाय ठे माटे दवे मने साक्षीथी मुक्त करो गुरुयें कर्पु थावती काले सर्व रगडो मटाडी थापीश एम कही बीजे दिवसें वाव नहेरावीने कुत्रिकापणमा जे वस्तु त्रण लोकमां होय ते मले वे माटे जो तु साचो होश तो नोजीव ए चीज पण मलशे, ते लश्थावीश ते वात चेलायें पण मान्य करी बने राजा लोकोये पण कर्पु के नीक से पनी चेलायें कृत्रिकापण जश्ने जीव, अजीव बने नोनीव माम्या तेवार देवें जीवने बदले तो उदर लावीने थाप्यो तथा थजीव माग्यं तेवारें पर जावीने थाप्यो पनी चेजायें जेवारें कछु के नोजीव लाव तेवारें वेत्रण वार तेहिज पूर्वजी चीज लावीने थापे पण नोजीव थापे नही एवामा श्राकाश वाणी था के जगतमा जीवने यजीव ए वेज राशि वे पण त्रीजी को राशि नथी तेवारे सर्व लोक वोल्या गुरु साचा ग्ररुये शिष्यने कसं केम दवे समज्यो के नथी समज्यो ? जो समज्यो होय तो मिशामिक थाप ते सांनली शिष्य बोल्यो एम कांश लै मार्नु नदी तेवारें गुरुने रीश चही तेथी नस्मनु कुमो तेना माया उपर नाखीने गथी बाहेर काहाडी मूक्यो तेणे जश् वैशे पिक मत थापन कयुं तेमा नव इथ्य, सत्तर गुण, पांच कर्म, त्रण सामान्य, एक विशेप, एक समवाय, ए ल पदार्थ प्रकप्या एना प्ररूपवाथी चौकशे चुमालीश नेद थया तिहां पट्गोत्रथी उजूका पट्ठचासौउजूकमपहचूक ॥ एवा नाम अने गोत्रना मिलापथी नाम स्थापन ययु, हाथी राशिक शास्वा यः इति रोहगुप्त कथा संपूर्ण ॥ ॥ हवे थविर प्रियमथथी मविमशाखा निकली तेनो अधिकार था प्रमाणे ते कहे जे श्रीदर्षपुरनामा नगर जेने दमणा अजमेर कहे जे तेमा प्रणशें जैनमदिर बने चारशे अन्यदर्शनीउना देरा दता तथा श्रा० हजार घर ब्राह्मणोना थने बत्रीश दजार घर वाणीयाउंना दता वली नवसें वाग, सातसें वावडी, सा तसें वानशाला दती तिहां सुनटपाल नामे राजा राज्य करतो तो एक दिवसें ब्राह्मणोये यज्ञ मामयो एवामां तिहां प्रियमंथसूरि पधाया तेणे वासदेप मत्रीने आवकोना दाथमा थाप्यो श्रावकोये जश्ने, यज्ञमा जिहां ब्राह्मणो होम करवाने सारु बकरो लाव्या दता ते यकरानी उपर वासक्षेप नारख्यो तेना योगें ते बकराना शरीरमा श्रविका देवीयें प्रवेश करतो तेवारें ते वकरो तिहाथी ठही थाकाशमा छनो रहीने मनुष्य वाणी पोलवा जाग्यो के थरे निर्दयी ब्राह्मणे तमे सनिलो के तमे जेम निरपराधि जीवोने निर्दयी थने मारी नाखो बो तेम जो लु पण हमणा निर्दय थइ जाय तो तमो सर्वेने मारी नाखु, जेवी रीतें दनुमाने रा क्सोमां करी देखाउ' तेम हु पए तमोने करी देखाई परंतु महाराथी क्यानो गुण दूर थइ शकतो नथी माटे दु तमारी पेठे राक्षसो जेवो निर्वयी थतो नथी तथापि हे पापीयो तमे म हारी वात सजिलो जे तमे विचारा थावा कोमला कोमला पने दणो बो, ते पाउने द एवानुं पाप सान' ' जो नदी सांजव्युं दोय तो छ तमोने कही सनलावु बु ते सजिलो जे पाने मारीये ते पचना जेटला रोम होय तेटला हजार वर्ष पर्यंत ते पचनो मारनारो प्राणी नरकमां पड़ी इस नोगवे ने वली जे कोइ सोनानो मेरुपर्वत बनावीने दाना थापी वीये थथवा प्रवीन दान थापे तेटला वानथी पण अधिक फल जे एक प्राणी मरतो होय तेने धचावे ते जीवने मजे जे माटे मरता प्राणीने बचाववा जेटलु फल सोनाना वानथी तथा पृथ्वीना वानथी दोय नही केमके घीजा सर्व प्रकारना दान जे जे तेनुं फल तो काला तरा खुटी जाय , जोगवाई जाय , परंतु अजयदाननुं फल केवारे पण खूटे नही, सर्वथी श्रेष्ठ फल ते थनयदानन डे एवा तेना वचन सांजली यज्ञ करनारा निर्वय नाह्मण लोको घोल्या तुं कोण बो ? बकरो वोल्यो लै थमि देव बु, बकरो महारो वाहन , तमे पाउँने मारो बो तेना योगे महाड व तमने वेतवा पडशे, माटे तमारा उपर मने घया थावी तेथी उपदेश करवा थाष्यो दुं ब्राह्मणो योज्या श्रमे धर्म थवाने माटे मारीये वैयें, वकरो पोल्यो थरे अष्ठो पञ्चवध करवाथी वली धर्म ते क्याथी थवानो ने ' एतो महोटुं जवरजस्त पापर्नु स्थानक ने जो एनो मुद्दो तमारे पूबवो दोय तो, जैनाचार्य श्रीप्रियमथर रिने पूढो, ते मदारूपापात्र में माटे तमोने समजावी तमारो निस्तार करो तेवारें वा मणो सर्व प्रियमथसूरि पासें पूड़वा थाध्या, तेमणे वया रूप शुक्ष धर्म यताव्यो ते वखत ब्राह्मणप्रमुख घणा लोको जेनी थया, एवा श्रीप्रियमंथसूरि हता एमनाथी मध्यमशाखा मिशा गरि धार्य ममित गौतम गोत्रीयाथी ब्रह्महीपिका शाखा निकली तेनो सबध था प्रमाणे ते कहे ले धानीर देशमा, अचलपुर नगरनी नजीक एक कन्ना पीजी वेना ए वे नदीयो हती, तेनी वचमा ब्रह्म नामा दीप दतो तिहां पांचशें तापस वसता हता तेमा एक तापस पोताना पगमा लेप लगारी पावडीयो पढेरी हरदमेस बेन्ना नदीना पाणीमाथी उतरतो हतो पण पाणीमा मूवे नही जेवी रीते थल सपर सुका मार्गमा पाल्या जय तेवी रीते पाणीमाथी चालीने गामा पारण करवा थावे तेवार जोक तेनी प्रशसा करता थका पोले जे था तापसनी जूठ केवी अथाग तपनी शक्ति बे, एवा जर्ममा घणा लोको मिष्यात्वी या गया थने तापसनी नक्ति करवा जाग्या वली आवकोने कहे के जून थमारा गुरुनो केवो प्रनाव ? एना प्रनावमा कांई न्यूनता नथी एवा उपदेशथी घणा लोको मिथ्यात्वी थता देखीने श्रावकोये श्रीवजस्वामीना मामा श्रीचार्यसमितसूरिने बो लाव्या, सरि याव्या, तेवारें श्रावकोयें पुबघु स्वामीजी था तापसनी केवा प्रकारनी तपशक्ति ले? याचार्य की के तपशक्ति का पण नथी परंतु पावलेपशक्ति ने तेवारे प्रावक लोक सर्व समजी गया, पडी तापसनु बिड उघाई पाडवा माटे ते तापसने प्रावको पोताने घेर नोजनने थथै निमत्रणा करी तेवारें मिथ्यात्वी लोक घणा खुशी थया थने जाणवा जाग्या जे श्रावको पण हवे थापणा धर्ममां थावी जाशे एवं जाणीने आवकोने घेर योगीने लश गया तिदा श्रावकोयें जतिना मिसे करीने पावडी उपर तापसना पग धोइ नखाव्या तेवारें योगीना मनमांतो महोटु उख ययुं पण शरमनो मायो / करे! नाकारो कदेवाय नही पनी कोइ जोजन को कोई नहीं कम्युं बने तरत तापस तिहाथी उनघो तेने श्रावको थावर वेश्ने पाठा तेना स्थानक उपर पोहोचाइवाने साय चाल्या, मनांतो एवं समजता दता जे जो श्य केवी मजा थाप दे पण बाहारथी तेने स्थानकें पोहोचारवार्नु मोज घालीने तेनी साथे वलावा गया सर्व नदी किनारे थावी बना तेवारें तापसें विचास्यु जे थोडोसो लेप दशे तो पण नवी सतरी जश्स एम विचारी नदीमा पग वीयो के तरत कुषवा लाग्यो तेवारें लोकोमा निदा था पनी दया लावीने आवकोये नवीमाथी खेंची पाबो बाहेर काढाब्यो, नदीका तणा जतो इतो, एटलामा लोकोने प्रतियोध थापवाने माटे श्रीथार्यसमित सरि पण तिहां थाव्या थने चिपटी वजाही बोल्या के दे वेन्नाद नदी महारे पडेले पार जावु ले माटे मार्ग थाप ए टर्नु आचार्यना मुखमांथी वचन निकलतांज नदीना वेद्नु कांग नेला मली गया तेवारे लोक विस्मय पाम्या पनी याचार्य तथा पीजा नगरना लोको सर्व मली ब्रह्मदीप गया तिहां तापसोने धर्मोपदेश थापी प्रतिबोध पमान्यो तेवारें पांचसें तापसोये वीक्षा जीधी थने चूर्णना प्रयोगथी तापस नदी उपरथी चालतो इतो परंतु तपस्यानो प्रनाव न दतो एवी वात सर्व लोकोमा प्रसिद यज्ञ, जैनधर्मनो महिमा वृद्धि पाम्यो पनी सघसहित गुरु पोताने स्थानकें थाष्या, तिहां तापस साधुयी ब्रह्मदीपिका नामे शाखा थ६॥ ॥ हवे थविर थार्यस्थंमिलनी पड़ी चौद गाथाउनो थर्थ कहीये यें ॥ गोतमगोत्रीया फव्यु मित्रने वा कु,पीजा वशिष्ठगोत्रीया धनगिरिने वा कुं, काश्क शिवनूति कोशिक गोत्रीया मुहंत अने कृष्णने वांड ॥ १ ॥ ॥ एमने मस्तकें करी वांदीने वली नइ, नक्षत्र थने रक्षित ए प्रऐ काश्यप गोत्रीयाने वांड॥२॥ ॥ तथा एक थार्य नाग गौतमगोत्रीया, वीजा थार्य जेदिल वासिष्ठगोत्रीया, त्रीजा थार्य विष्णु मादरगो त्रीया थने चोथा थार्य कालक गोतमगोत्रीया ए चारने वांछ॥३॥ ॥ गौतमगोत्रीया कु मरसपलिया तथा नश्क तथा स्थविर थार्यदि गौतमगोत्रीयाने द्रवां ॥३॥ ॥ते ।

मने मस्तकें करी बांदीने वली चारित्र झान सहित एवा स्थविर संघपालक गोतमगोत्रीयाने वॉर्ड दूं ॥ ५॥ ॥ वली थार्य हस्ति काश्यपगोत्रीया, क्षमावत समु सरखा धैर्यवत, जे न नालाना पहेला महीनामा एटले क्षेत्रमदिनाना शक्तपदमा कालगत थया तेमने वांड ॥६॥ वली जला व्रत शीत लब्धिसहित जेमना वीक्षामहोत्सवमा वेवतायें थावीने मस्तक उपर बत्र राज्य एवा स्थविर आर्यधर्म ते प्रत्ये वांउं॥ ॥ ॥ तथा एक दस्ति, वीजा धर्म थने । त्रीजा सिंह ए त्रण काश्यपगोत्रीया मोक्षमार्गना साधक तेमने वांठ॥ ॥ ॥ तेमने म स्तकें करी वांदीने पढ़ी स्थिर वे चारित्र अने ज्ञान जेमना एवा थविर थार्य जंबु गौतमगोत्री याने वाई॥॥ ॥ तथा जे कोमल वयवाला अने मानरहित तेमज घणुज मर्नु उ तम ने झान, वर्शन थने चारित्र जेमर्नु एवा नदिक पिता काश्यपगोत्रीयाने वांड ॥१०॥ तथा स्थिर वे चारित्र जेमर्नु वजी उत्तम सम्यक्त्व श्रने सत्व तेणे करी सहित एवा देसि गणि क्षमाप्रमण मादरगोत्रीयाने वां ॥११॥ ॥ तेवार पड़ी वली जे अनुयोगना धारक, सागर जेवा धैर्यवान् गनीर, महा सत्यवत एवा थविर मत्तम क्षमाश्रमण वनगोत्रीयाने वांड ॥१२॥ ॥ पड़ी वली जे ज्ञान, दर्शन, चारित्र थने तप तेमां थिर थयेला, महागुणवान् एवा थविर कुमार धर्मगणी गुणवानने वांड॥१२॥ ॥ वली सूत्र थने श्रर्थ रूप रमेकरी नरेला श्रने क्षमामाईवादिगुणसंपन्न, जेणे सर्व सूत्र पुस्तकारूढ कसा एवा देवर्किगणिक्ष माश्रमण काश्यपगोत्रीयाने वार्ड ॥ १४ ॥ ॥इति स्थविरावजी सूत्रार्थः॥ ॥ दवे यद्यपि शहा था स्थविरावलीमा श्रीथार्यरक्षित प्रमुखना नाम कह्या नथी तथापि ए पण स्थविर सरखाज थया ने तेमनो संबंध लखीये .यें ॥ ॥ दशपुर नाम नगरमा, सोमदेव पुरोदित तेनी रुश नामे नार्या तेमना पुत्र थार्यरक्षितजी परवेश गया, तिहाथी चौरे विद्या नणीने थाच्या तेमने राजायें हाथी पर वेसारी, महोत्सवसहित नगरमा प्रवेश कराव्यो यहाँ सर्व सऊन कुटुब मित्राविक थावीने मल्या परंतु एमनी माता मली नही माताने पगें ला ग्या तो पण माता खुसी यइ नही तेवारे थार्यरक्षितजीयें पूघु माताजी तमे श्रामणा उमणा देखा तो पण कांश दर्प थानद दर्शावता नयी तेनुं कारण महारा उपर कृपा करीने प्रकाश करो। ते सनिली माताजी बोल्या हे पुत्र तु जे विद्या शीखी थाव्यो बो ते सर्व नरकपतननी विद्या ठे कारण के तुं घणा दोमाविक लोकिक कृत्य करवानां शास्त्र नणी थाष्यो दो ते ढुं जैनी दु माटे ए मर्गतिना देवावालाने केवी रीते रुडा करी मानु द्वतो जेयकी ताहारा थात्मानुं कल्याण थाय एवो शास्त्र तु नस्यो होय तो सुबुद्धिमान् करी मानु ते सांनलीने पुत्र वोल्यो हे माताजी थारमाने तारनार कया शास्त्र' ते मने कहो तो हु तेनो पण यन्यास करूं मातायें कपु के दृष्टिवाद नको तेवारें थार्यरचितजीयें जाप्यु जे सर्व मतना शास्त्र जणवा योग्य वे माटे महारे ए शास्त्र पण जणवु पनी रात्रीयें माता जीने व्यु हु दृष्टिवाद क्या नणवा जाउ मातायें कर्पु तोसली पुत्राचार्यनी पासे जइए शास्त्र जणो दवे थार्य रक्षितजीयें महोटे परोडीयें उठीने जणवा माटे प्रयाण फर्मु केट लुक दूर गयो के पोताना पितानो मित्र एक ब्राह्मण शेजहीना साठा हायमा लश्ने थावतो इतो ते साहामो मन्यो तेणे पूठपु तु कोण हो' एणे कर्पु लु थार्यरक्षित , तेवारें तेणे के इंतो तने परदेशथी थाप्यो सनिलीने मलवा सारु थाप्यो ई श्रने था शेलरीना सोना पण ताहारे वास्ते लाव्यो तुं ते सांगली थार्यरश्तेि सेजहीना सांता गणी जोया तो साडा नव संख्यायें यया तेवारें विचाखु जे छ दृष्टिवादना साडा नव नाग नगीश एवु चिं तवी ते ब्राह्मणने कधू के तमे मदारी माता पासें जा ढुं थातुं बु वली तमे माताजीने कदेजो के थार्यरक्षित मने मव्या दता एवं कदीने धागल चाल्यो थने पहेला ब्राह्मणे पण एमनी माता पासें जश् शेलडी थापीने की के तमारो पुत्र श्रार्यरक्षित मने रस्तामा मन्यो ते सांगली मातायें जाप्यु जे महारा पुत्रने शुकन तो सारा थया ए साहा नव पूर्व जणशे एवं मना जाणी लीधु हवे थार्यरक्षित जिहां शिष्य पाठ करे ने तिहां गया थने विचारवा लाग्या जे एमने केवी रीते वदना करु एतु चितवीने सुपासरानी बाहेर वेठा एटलार्मा ढवर नामे कोई प्रावकें, निसिदि कही उपासरामा जश्ने उंचे स्वरे वांदणा देवानी जे इरियाव दि प्रमुख किरिया बे ते कदी ववना करी ते विधि सर्व थार्यरक्षित सीखी गया पबी गुरु पासें थावी तेवाज विधियी गुरुने बांदीने विनयपूर्वक वागज घेता गुरुयें जाप्पु जे श्रा कोई नवो श्रावक ने पण वांदवानो विधि तो वरावर जाणे जे पड़ी ढवर आवकने गुरुयें पुत्युं तेवार ढहरें । लरज्यो जे था गुरुनो नाणेन डे पबी गुरुने फरपुं था तो थार्यरक्षित थापनोजारोज तेने गुरुयें धर्मोपदेश थाप्यो तेवारें थार्यरश्कितें कहुं मने वीक्षा थापो मदारी मातायें तो दृष्टिवाद जवानी थाझा धापी जे तेवारें गुरुयें लोकोना जयथी अन्यस्थानके जश्ने दीक्षा दीधी पनी पोतानी पासे जेटली विद्या इती ते तो सर्वे गुरुयें नणावी वजी थ धिक पूर्व नणाववाने माटे श्रीववस्वामीनी पासे मोकल्यो तिहां जातां रस्तामा उहायणी नगरी थावी तिहा पानश्यप्तसूरि मल्या ते खुशी थया थने वोल्या के तें सारु काम कझुं पण हवे मने दाज अनशन करई जे माटे तुं अनशनने सहाय थापीने पढ़ी जाजे एर्वा गुरुनां वचन सांगली तिहां थनशनमां सहायी थयो, नश्गुप्त सूरिये कर्यु के तुं वजस्ता मीनी पासें नएजे पण तेमनी सघाते रात्रे नेलो रदीश नही जुदा उपासरामा रात्रै रहेजे, केमके जे श्रीवजस्वामीनी साये एक रात्रीज रहे ते जो सोपकमी थामवावालो होय तो पण वजस्वामीनो सायेज मरण पामे ए वात सांजलीने तदत्ति करी संथारो करावीने श्रीव बस्वामीना पासे थाव्यो रात्रं नगरने बाहेर रह्यो थने तेज रात्रीये श्रीवजस्वामीने सुपर्नु थायूं जे महारी पासें पात्रमा दूध नरेलु हतु ते को पाहुणो थावीने पी गयो स्वक्पमात्र शेष रसुं एवामां प्रनातना श्रीथार्यरक्षितजी पण तेमनी पासे श्राव्या तेमने वजस्वामीय पुत्पुं तुं किहांथी थाव्यो' तेवारे सर्व हकीगत कहीने की के छ घीजा उपासरामा रहीने थापनी पासें जणीश वजस्वामीयें प्रयु महारी पासे नणवु ने वीजा उपासरामा रहेएम तने शामाटे करवु पडे ? तेवारें नगुप्ताचार्य कहेलु वृत्तांत तेमने संन्लाव्यु ते सांजली बजस्वामीय उपयोग थापीने जाए\ जे था वात सत्य ठे, महापुरुपर्ना वचन प्रमाण हवे श्रीथार्यरदितजीये नवर्व शास्त्र तो सपूर्ण मुख पाते करी लीधो थने वशमो पूर्व नरो ने, एटलामा माता पिताउने घणा विवस पर्यंत श्रीथार्यरक्तिनुं कोइ पण समाचार न मन वाथी मातापितायें थार्यरक्षितनो न्दानो नाइ फम्युरक्षित ने तेने बोलावीने थार्यरक्षितनी पासें मोकल्यो तेणे थावी कयु के तमे माता पितानी पासे चालो थार्यरक्षितें कयु के चा लीने गुं फरु' तेणे कर्पु धर्मोपदेश थापो, केमके तेमने दीछा लेवानी श्या थवे तेने थायरहितें कहुं तुतो दीक्षा लइले फल्गुरपिस्तें कर्पु दु दीक्षा ले लेठ तु थने तमे तिहां चालो तेवारें फगुने दीक्षा थापोने गुरुने पूठा हवे वशमो पूर्व केटलो शेष महारे नण वाना रहा है। गुरुय कपु हजी घर्ण के तुं उयम कर तेवार तिहांज रदी नावानो उद्यम कस्यो वली केटलाएक दिवस पठी मातापितानी पासें जवान मनमा घj उमग थयो तेवारें फरीथी गुरुने पुढघु महाराज दशमो पूर्व दजी केटलो शेप रह्यो । गुरुये फर्यु दशमा पूर्व→ विठमात्र तो तु शीख्यो थने समुइ जेटलो शेप नएवो रह्यो ले पण उद्यम कर तेवार वली पण नणवानो उद्यम करवा मांमधो पण चित्त बरावर लागे नही, तेवारें कत्यु दवे तो हूं जश्श त्यारे वजस्वामीयें जाएयु जे एटलो पूर्वलो पूर्वनो नाग दवे शेप रदेशे, याकी विछेद थ जाशे, कारणके दमणा वीजो को एटला पूर्वनो नगनार वे नही, एवो मनमा विचार करीने श्रीधार्यरक्षितने मावित्रो पासें जवानी रजा थापी तेवारें येगु नाइन वशपुर नगरे थाष्या, तेमने राजायें महोटा महोत्सवसदित गाममा प्रवेश कराव्यो पठी मातापिता प्रमुख सर्व कुटुपने धर्मोपदेश देश सर्वने दीक्षा थापी, एक पितायें दीक्षा लीधी नदी ते कुटुवना मोदने लीघे तेमनी पासेंन रहे पण दीक्षा जीए नही तेवारें थार्यरक्षितजीयें को तमें दीक्षा शामाटे लेता नथी ? पितायें कसं के मने एकतो म होटु धोती, वीजी जनोश, त्री नत्र, चोथा पगरखा थने पाचमु कममल ए पाच वस्तु विना चाले नही जो ए पांच वाना विना चालुं तो मने सजा थाय तेवारें गुरुयें पांच वाना वापरवानी तूट थापीने पण दीक्षा दीधी पठी गुरुयें जाए{ जे था वृधने तो जरुर तारवो ज जोश्य एवो निश्चय करी ठोकराउँने शीखावी मुक्युं जे, थमे जेवार चैत्यना दर्शन करवा जश्ये तेवारें तमे सर्वे साधुउने वदना करजो, पण एक ए वृक्ष साधुनें वांदशो नही, जेवारें तमोने कहे के थमने कां वांवता नथी ? तेवारें तमे कहेजो के तमे साधु केम कहेवा तमे तो बत्र राखो बो पड़ी गोकराउँए तेमज कम्युं तेवारे वृदे कर के दे वस्सो ' साधु बत्र । नही रास्सै तो महारे पण नही राखq एम कदी बत्र नाखी दी। एमज जनोई, पावही यने कममल सर्वनो त्याग करी दीधो पण कुएं के धोतीयु तो महाराथी मूकाशे नह। तेवारें थार्यरावतजी योज्या एमज रदेवा थापो नले घोट्युं पहेरेलु ने एटलामा एकदिवस एक सा धुयें अनशन करीने काल कस्यो तेवार थार्यरक्षितजीयें वीजा साधुऊने शीखावी मुक्यु के तमे माहोमांहे विवाद करजो पण साधुने परवा माटे उपाडशो नहीं एवं शीखवीने पड़ी पोल्या के था साधुना शरीरने जे परग्वी थावे तेने महालान थाय तेवारें साधुमांदोमांहे। वोलवा लाम्या तेमा एकें कयु दु जश्जामं, वीजाये कसं हुँ लजाउ तेमने देखीने सोमदेव वृक्षसाधु वोल्या जे झं ए कार्य करवामा घणी निर्करा थाय ? गुरु बोल्या दा घणी निर्जरा थाय तेवारे वृक्ष साधु योल्या के ए काम द्रुज करीश गुरुये का हा उपसर्ग घणा ने माटे उपसर्ग सहन करवानी शक्ति होय तो ए काम करवु नदींकां अरिष्ट या जाय तेवारे वृक्ष साधु खोज्या हा, हूं सर्व उपसर्ग सहन करीश, एम कही तेथनशनी साधुना शरीरने उपा डीने लश् पाठ्यो, तिहां याचा आवकोना बोकराउने शीखवी मुक्युं, तेथी गोकरायें दाको करी पाउल पडीने मनु घोतीयं खोसी ली, तेवारें में जाप्यु जे उपसर्ग तो वे पठी थाचार्य सर्व परिवार लाने वृक्षनी पाउल गया, तेने देवीने वृक्ष लजा पाम्यो गुरु बोल्या महोटो छपसर्ग थयो, दवे वीजो घोलपटो जावो तिदा साधुः योल्या, महोटो चोलपट्ट तो जश्ने लश् यावो तो थाय, वृदं कयुं चोलपट्टोज थापो लाजतो गई हवे शृं" एम करी चोलपट्टो परेराप्यो दवे ते तुम गोचरी करवा जाय नदी तेवारें गुरुयें साधुग्ने AAP कही मुक्युं के तमे गोचरी लावी वापशो नदी, ए वृक्ष पोते जइ लश् थावशे एवु कदीने गुरु अन्य गामे चाल्या गया पाब्लथी साधुए पोतपोतानो थाहार लइ थावीने जमी जीधो थने वृक्ष तो जूख्यो वेगे रह्यो बीजे दिवसें गुरु श्राध्या तेमणे साधुउने कj केम रे वृक्ष साधुने थाहार शा वास्ते नही सइ थाप्यु' एवीरीतें कृत्रिम कोप कखो तेवारे सा घु वोज्या ए वृक्ष पोतें गोचरी केम जाता नथी! पड़ी गुरु पोतें गोचरी जवा लाग्या में जाएयु जे थातो गुरुनो थविनय थाय ने एवं चिंतवीने वृक्ष पोतेंज गोचरी गयो तिहां एक शेरने घेर खरा दरवाजाने तो जाए{ नही थने पाबसना धारणाथी तेना घेरमां घुसवा जाग्यो, तेवारें घरना माणसो बोल्यां, साहामा वारणामाथी थावो एतु सांजली वृक्ष साधु वोझ्या थरे लक्ष्मी ते तो मरजीमा थावे ते तरफथी थावे जे तरफयी थावे ते तरफथी सारी जाणवी, एनो का विचार राखवो नही तेवारें शेनें खुशी यश्ने वत्रीश लामु वहोराव्या ते जश्ने वृक्ष साधुयें थावी गुरुने देखाच्या ते जो गुरुयें विचार कस्यो जे वत्रीश शिष्य महारा याशे, वृक्ष योग्यो पहेलो लान थयो ते सर्व साधुउने देवो जोश्ये, एम विचारी सर्व मोदक सा घुउन थापी दीधा फरी गोचरीयें जश्ने वीर जोजन लश्थावी पोते पारण कषु एम ए वृक्षसाधु निक्षामा लब्धिवत थयो, ज्यां जाय त्यां जो ते दातार मदालोनी होय तोपण उ तम नाजन एने वदोरावे एमथनुक्रमे ते साधु गठनो थाधारन्त थयो ए श्रीथार्यरक्षित जीना गधमा त्रण साधु सब्धिवत थया तेना नाम कदे ने एक उर्विलिका पुष्पमित्र, वीजो घृतपुप्प मित्र थने त्रीजो वस्त्रपुष्पमित्र तथा चार साधु महापंमित यया तेना नाम कहे के एक वलिका पुप्पमित्र, बीजो वृक्ष, त्रीजो फल्गुरक्षित थने चोयो गोष्टामाहिल ए चार जाणवा हवे एफ विवसें महाराजें सीमघरस्वामीने निगोद विचार पूबपो नगवाने वर्णन करी संन्लायं तेवारें इ पूरा भरतक्षेत्रमा कोश् एवो विचार कडेवावालो दालमा ? नगवाने कधू श्रार्यरक्षित सरि ले पनी ईश्महाराज वृक्षरूप करी आर्यरक्षितजी पासें था वीने पूडवा जाग्यो के हे महाराज' मदारू थापुष्य दजी केटनु ? तेवारें गुरुयें श्रुतवपयो गया कj के तु पहेला देवजोक्नो ३६ बो पनी निगोदना सूक्ष्म विचार पूज्या गुरुये ते सर्व खुलासापूर्वक कह्या तेवारे महाराज गुरुनी स्तवना करी उपासरानु हार फेरवीने चाल्या गया, शिष्यने खबर पढो जे ६५ बाष्यो हतो हवे वली थार्यरक्षित सरिये बुदिनी हानी यती देखोने सूत्रोना जूवा जूदा चार अनुयोगधार, कला एवा ए थार्यरक्ति स्थविर थया॥ इचे ए प्रमाणे वियाघरगशीय वनवादीना शिष्य सिक्ष्सेन दिवाकर थया तेनो सवध था प्र माणे ने के एक साधु वृक्षपणामां महोटा स्वरथी जणतो इतो तेने देखीने राजा कएं के तुं l मुसलो फुजावीश? जे एटलो छतापलो गोखे तेवारें तेणे सरस्वतीने चोलावी विद्या पामीने चोवटा मदि मूसलो न्नो करी राजासहित सर्वलोकोने देखा फुन्नवित काष्य कई तेथी मूसलो छज्यो ते जो सर्व राजा प्रमुख धमत्कार पाम्या एवो वृक्षवादि थयो तेमणे सबसेन ब्राह्मणने प्रतियोध्यो भने ते सिक्सेने वली विक्रमादित्यराजाने प्रतिबोध थाप्यो, श्रीशत्रुजयनो सघ घ लामो, तेना संघमा एकशोने सोतेर शोनाना देवल चालत्ता वली शत्रुजानो धार कराव्यो तथा श्रीसियसेन सूरिना सहायणी विक्रमादित्य राजायें संवत् चलाव्यो,थागत श्रीवीरजगवाननो स व इतो,ए रक्षवादी बने सियसेन ए पण वेगु थविर यया तथा वलीत्रण कालिकाचार्य थया ने तेमा एकतो श्रीवीरनगवानचीत्रणशेने बहोंतेर वर्षे भया तेमणे श्रीपन्नवणा सूत्र बनायु जेणे सोधमैग्ने निगोदनो विचार कह्यो, कोक श्राचार्य कहे जे के गाथा देखवाथी ए कालिका चार्य वीर संवत्थी त्रशेने वीश वर्षे यया , कोइ कहे बेत्रणरों पचीश वर्षे यया , कोई कहे से के चोथनी संवत्सरी थापवावाला पण एज कालिकाचार्य ने एमां वरु खोदु केवली नगवान् जाणे ग्रंथोमां तो संवत्नो फेर ले. वली वीजा कालिकाचार्य तो पूर्व कालिकाचार्य कह्या तेमना मांमां थाय थने त्रीजा कालिकाचार्य तो श्रीवीरनगवान् मोच गया पनी एएमें वर्षे बने विक्रमादित्यना संवत् ५२३ में वर्षे जेणे चोयनी संवत्सरी करी ते ले तेमां वली कोकोई चूर्णि कार; एवीरीतें जखे ले के केटलाएक कालिकाचार्यना शिष्योयें चोथनी सवत्सरी मान्य करी, श्रने केटलाएक श्रीमुधर्मस्वामीना शिष्योए पांचमनी संवस्सरी मानी तत्व केवली जाणे ए विवादमा तेत नथी स्ववर विना जोर लगाववु मुनासेब नयी इति रहस्य ॥ ॥ वली हरिनश्सूरि पण त्रण थया ने तेमा एकतो हरिन नामा ब्राह्मण हतो ते व्याकरणावि जस्पा पनी प्रतिज्ञा करीके जेनो अर्थ ? समजी शक्तुं नही ते पदनो अर्थ जे कही थापे तेनो हुँ शिष्य था पनी एक दिवस साध्वी गाथा जणे ते थावीरीतें॥ चकिग दरि पणगं, पणग चक्कीण केसवो चक्की ॥ इत्यादि ए गायानो अर्थ ए ब्राह्मणयी यश् शक्यो नही तेवारें जाप्यं जे छ हायो पनी साध्वीने थर्थ पुग्यो तेवारें साध्वीयें कहुं गुरुने पुगे गुरु पासेथी गाथानो थर्थ सचिली प्रतिज्ञा पालवा सारु दीक्षा लीधी, श्राचार्यपद पाम्यो ते थाचार्यै विक्रमसव त्ना ५०५ में वर्षे थावश्यकनियुक्ति प्रमुख ग्रंथोनी टीका करी तथा एमना एक हंस थने घीजा परमहंस एवा नामे घे शिष्य बौधलोकोर्नु मत जाणवा माटे यौधोनी पासें जणवा गया हता तिहां वोघोयें जाप्यु के ए वे जैनी जेवा देखाय बे तेवारें परीक्षा करवा माटे दादराना पग रू थीयाउँ उपर जैनप्रतिमा मूकी दीधी, तेनी उपर पग थापीने वौधनां शिप्यो तो सर्व उतरी गया परंतु इंस थने परमहंस जैनप्रतिमा देखीने प्रतिमाना हृदयमा खडीनी जनोइ करी उतना तेवारें बौधोयें जाए' जे था निधयें जैनी ने श्रने शिष्योने पण खवर पड़ी के ए थापणने जाणी गया वे तेंवारें मरणना जयथी ते वे जण पोतपोतानी जवान पोथीयो दाथमा लश्ने पोताने वेश चालता यया योधोयें राजाना सीपाश्यो ते वे शिष्योने मारवा माटे मो कल्या तेणे जश् प्रथम तो हंसने मारी नारख्यो अने परमहंस जागी गयो परंतु चितोड गढना कोट पासें तेने पण मारी नारख्यो पड़ी राजाना सुनटो राजापासे गया दरिजश्सरि ए वात सांजलीने मदा कोपायमान थया थका मत्रना वलेकरी एक तेलनी कढाइ उफा लीने पठी मत्र जपता जाय थने एकेक कांकरी कढाश्मा नाखता जाय जे वखत कांकरी नाखे ते वखत मत्रना प्रनावथी योधनो एक तपस्वी ते कठाश्मां पडी जस्म थ जाय एम करी १४४ योधोने हल्या तेवारें एक श्रावक गाथा वोल्यो ॥ जजलजलमलोए ॥ एटल्लु सांजलतांज कोध अतरी गयो वली केटलाएक ग्रथोमा एम लस्यं जे के याकनी महत्तरा साध्वीयें एक श्राविकाने लावीने गुरुने कयुं के एणे पंचेंडी जीवनो वध कसो ने तेनो दम थापो टो' तेवारें गुरु वोल्या पंच कल्याणानो थापीयें बेये ते वस्वत साध्वी बोली महाराज' एक पंचेंडीना वधनो एटलो महोटो दम थपाय डे' एतु थाप जाणो बो तो था बोधोने केम मारो तो? तेवारें गुरुनो कोष सतरी गयो पनी प्रायश्चित्त शोधवाने माटे चौदशें ने चुमालीश पंचाशक प्रमुख प्रकरण बनायां ए प्रथम दरिनइ सरिनी सक्षेप कथा कही । ॥ वला वीजा हरिनसूरि विक्रमसंवत्ना ए८३ मा वर्षा घया तेमना शिष्य सिमर्पिगणी दता ते बोधोनी पासे एकवीश वार गया थने थाप्या तेमणे बोधोने प्रतिबोधवा माटे ललितविस्तरा शकस्तवनी वृत्ति बनावी ए बीजा दरिनइ सूरिनी सामान्य कथा कही । हवे त्रीजा दरिनसूरि विक्रम सवत्ना बारसेना सेकामां थया तेमणे बनावेला मुनिप्रति चरित्र थादिक ग्रथो थाजे प्रसिदए त्रीजा हरिनश्सूरि थया तथा वली श्रीजिनन गणिक्षमाश्रमणप्रमुख घणा थाचार्यों स्थविर थइ गया , तेमणे विशेपावश्यकर्नु नाष्य वनाव्युं तेमज वीजा वली श्रीशीलगाचार्य, अनय देवसूरि भने मलयगिरिप्रमुख टीका ठना करवावाला थया ने ए सर्व स्थविरो जाणवा इति स्थविरावली शेषसंवध सपूर्ण ॥ दवे थघवीश प्रकारनी साधु समाचारी जखीयें .यें ॥ ते कालने विपे, ते समयने विपे, श्रमण नगवत श्रीमहावीर स्वामी आपाढ शुदि पूर्णिमाथी लग्ने एक महीनो थने वीश दिवस वरसावना गये यके पंजोसण करे एवो नियम डे हा शिष्य पुजे के चोमासाना पचाश दिवस गया पड़ी पंजोसण केम करे ॥१॥ तेने गुरु कहे जे हे शिष्य गृहस्थ प्रावको पोताना घरने खडी प्रमुखथी धोइ उपर बाया करी, घारे, मठारे, धूप थापे, परनाल प्रमुख पाणीना मार्ग काहाडे स्याविक सर्व काम गृहस्थें पोताने माटे कस्मा होय अने पोते वापरी फासु करी मुक्या होय, ते कारण माटे हे शिष्य वर्षावना पचाश दिवस गया थकां पंजो सण करे थने कदाचित् जो साधु पहेलाथीज कहे के दुं चोमासु रहीश, तो ते गृहस्थ साधुनु निमित्त करीने घर प्रमुखनो थारंन करे ते माटे पचाश दिन गया पन। साधु कहे के थमे चोमामु थांदी करी एम कहे ॥२॥ ॥ एवी रीतें नो नगवान् पोते पचाश दिन गये थके पंजोसण करे तो तेमना गणधर पण पचाश दिन गये थके पंजोसण करे ।

॥यने जो गणधर पण पचाश दिन गया कडे पंजोसण करे तो गणधरोना शिष्यो। ॥३॥ पण वादना पचाश दिवस गये थके पंजोसण करे ॥४॥ ॥जो गणधरोना शिष्यो प चाश दिन गये पंजोसण करे तो यविर पण वविना पचाश विवस गये पंजोसण करे ॥ ॥ ॥जो पविरो, वदना पचाश दिवस गये पंजोसण करे तो जे थाजना समयमां श्रमण निर्मथ विचरे ते पण पचाश दिन गये पंजोसण करे ॥६॥ ॥जो थाज वर्तमान प्रमण निग्रंथ वविना पचाश दिवस गये थके पंजोसण करे तो अमारा थाचार्य उपाध्याय पण पचाश दिवस गये पंजोसण करे ॥ ७॥ ॥जो अमारा याचार्य उपाध्याय पचाश दिवस गये पंजोसण करे तो थमे पण वर्षावना पचाश दिवस गये पंजोसण करीयें .यें रहा थपवाद कहे डे के नावरवा शुदि पांचमना एक दिवस थागल अर्थात् नादरवा शुदि चोथने विवसे पंजोसण करटु कम्पे परंतु नादरवा शुदि पांचमीने उलंघवी कल्पे नदी एटले एकावन्नमे दिवसे सवारी करवी कल्पे नही परंतु उगण पचाशमे दिवसे कारणे करवी कम्पे माटे कारणे चोथनी संवत्सरी करवी करपे पण बनी संवत्सरी तो चपवावे पण करवी न कल्पे ॥ ७॥ ए थाउ थालावे करी पंजोसण करवा थायी प्रथम समाचारी जाणवी ।। ॥१॥ ॥ दवे वर्षाकालमा चोमामु रहेला साधु थने साध्वी तेमने पांच कोशनो चोफेरे थवयद राखवो पण थवग्रदयी धारणे हाथ सूके तिहां सुधी पण तन्तुं रहेवू नही । ए॥ साधु साध्वीने वाले चोमासामा गोचरीने माटे पांच कोश जावु थावq कल्पे ॥ १०॥ ए जावा याववानी वीजी समाचारी जाणवी ॥२॥ जिहां विधाले नित्य नदी वदेती रहेती होय तिहा नदी सतरीने पाचकोश जगण पण जावू थावतुं कक्पे नही ॥११॥यने कुणाला नग रानी पासें ऐरावती नदी ले ते नित्य वहेती रहे पण तेनो पाट घणो पहोलो ने,पाणी स्वल्प ने, माटे एक पग जलमा थने एक पग उचो थाकासें थजमां राखतो उतरे तो चौफेर पांच कोश जावु थावQ कम्पे ॥१२॥ एवी नदी न दोय तो न कम्पे ॥ १३॥ ए नदी उतरवानी त्रीजी समाचारी जाणवी ॥३॥ ॥ दवे वर्षादमा रदेला साधु थने साध्वीने गुरुयें कसं होय के जो साधु तमे गिलाणने थाहार थाणी थापजो तो तेने माटे थाहार लावी वेवो कम्प परतु पोतानी मतियें गिलानने माटे थाहार लावी देवू करपे नदी ॥१५॥ ॥थने जो गुरुये कह होय के तु तदारे माटेज सइ थाव, तो पोताने माटेज लश् थावत् कम्पे पण वीजाने थापवु न कल्पे ॥१५॥ ॥ वली गुरुयें कहुं दोय के तुं गिलाणने थाहार लावी थापजे अने तु पण खाजे, तो लावq थने वेवु वेड कम्पे ॥ १६ ॥ ॥ ए साधुग्ने परस्पर देवा लेवानी चोथी समाचारी जाणवी ॥ ४ ॥ ॥ दवे चोमासे पंजोसण करी र हेला साधु साध्वीने नव विगय लेवी कल्पे नही तेना नाम कहे जे १ दूध, २ वहि, ३ मा खण, घृत, ५ तेल, ६ गोल, ७ सहत, मदिरा भने एमांस ए नव विगय ने तेमा मदिरा, मास, माखण थने सहत ए चार विगय तो सर्व साधुने प्रथमधीज सर्वप्रकारे व.ली होय माटे ते मूफीने पाकीनी पांच विगय जे जे ते घलवान् रोगरहित शरीरवाजाने, खेवी कल्पे नदी थने फारणे लेवी पडे तो सेवाय पण पंजोसणमा देवी नही ॥१७॥ ए विगय निपेध नामे पांचमी समाचारी जाणवी॥५॥ ॥ चोमासु रहेला साधु साध्वी जे दोय तेने कोइ गिलाण कहे के माहारा माटे श्रमुक चीज गृहस्थना घरथी लश् श्रावजो तेवारे ते लाववावाजो साधु गुरुने पुढे हे स्वामी गिलाण साधु थमुक चीज मगावे जे ते लश्थावं ' गुरु कहे केटप्लीक मगावे जे ' तेवारें गिलाणने पूछे थने गिलाण कहे के थाटली चीज जोश्ये ठेय पी वली गुरुने कहे स्वामी' थमुक चीज थाटली गिलान मगावे ने त्यारे गुरु कहे एटली चोज एटला प्रमाणनी लावजे पड़ी ते साधु जेवारें गोचरी जाय तेवारें गि जाणने खपती चीजथी वधारे श्रावक देवा जागे, तेने साधु कहे के एटलीज गिलाणने खपे ने तेम बता वली श्रावक कहेके वधारे लइ जाउँ थापपण खाजो, पीजो, वापरजो, महारा घरमा घणी ने माटे सुखे व्यो तो लेवी पण गिलाना नामथी पोते लश्ने वापरवी नही। ॥ १७॥ ॥ ए गिलाणने स्वपती वस्तु लावी थापवा संबधि बही समाचारी जाणवी ॥ ॥ दवे वर्षादमा रहेला थविर कम्पी साधुउने श्रावकोना घरमा जे नवा प्रावक थयेला दोय तेमने घेर दकोश न्हाना अथवा महोटा साधु जाय बने ते जे काश् मागे ते थापे,पण नाकारो करे नही,न्हाना महोटा साधु साहामु लए नदी पण चोरासी गाना साघुउने दान देवानीज श्छा राखे ते थने ज्यां साधुऊने पण एवो विश्वास दोय के जे चीज क्यांय पण नही मनशे ते एमना घरमां तो जरुर मल एवा श्रावको जे होय तेमना घरमा साधुयें विना देखती चीज मागवी नदी कारण के ते आवक तो दरेफ चीजनुं वान थापq एवी वांडा वालो ने तेथी ते प्रावक एq जाणे जे ए चीन एमने क्याय पण नही मली दशे माटे मा गवा याव्या ने तेथी ते घनारमाथी वेचाती लश्ने श्रथवा श्रणसमजु नवो थयेलो आवक होय तो ते पाहेरथी चोरी लावीने पण साधुने थापे ते माटे एवा घरोमां अपवीती वस्तु साधुयें मागवी नही ॥१॥ ॥ ए यदृष्टयाचनावर्जनसंपघि सातमी समायारी जा एवी ॥७॥ ॥ दवे वर्षावमा घोमा रहेजा साधुम्ये नित्य एकवार नमर्दु अने य PARA हस्थोने घेर गोचरीयें जावं ते पण एकवारज कल्पे पण श्राचार्य,उपाध्याय, तपसी,गिलान, न्दानी वयना शिष्य थने शिष्यणी एटले जेने दाढी मूब श्राव्या न होय एवा लघु वयना शिप्य तथा जेने स्तन न होय एवी जघुवयनी शिप्पणी प्रमुख जे दोय तेमनी वैयावस्य कर वाने सारु जो एक दिवसमा वेत्रण वखत गृहस्थने घेर जवु पडे तो पण तेनी मनाई नयी परंतु पोताने माटे तो एक वारज जवु कम्पे उपरांत जवु कम्पे नही ॥ २० ॥ ॥ तथा एक उपवास करवावालाने, जो एकवार गोचरी गया थका खा पीने तृप्त थ रह्या, पातरां प्रमुख पुठी राख्या, तो फरी वीली वखत गोचरी न जावु थने जो नही धाया दोय तो वीजी वार गोचरीये जावू ॥२१॥ ॥ तथा बेजानी तपस्यावालाने एटले बन्नुं तप जेरो करेलु दोय तेने तो वे वस्वत गोचरी जावं कल्पे ॥२२॥ ॥ थने तेजानी तपस्यावालाने एटले थ म तप करनारने प्रण वार गोचरीयें जावं करपे ॥ २३॥ ॥ वजी त्रण उपवासथी उप रांत तपस्याना करनारा जे दोय तेमने तो मरजीमां थावे तेटला वस्वत गोचरीयें जावु कल्पे ॥ २४ ॥ए गोचरीये जवानी थामी समाचारी जाणवी ॥७॥ ।। वर्षादा रहेला साधु साध्वी जे नित्य जमवावाला होय तेमने श्रीश्राचारांगे कहेला सर्व एकवीशे प्रकारना पाणी सेवा करपे ॥ २५॥ तथा एक उपवासवाला साधुने एक थाटानु धोवण, बीच पाननु धोवण थने त्रीजु चावलनु धोवण ए त्रण प्रकारनुं पाणी से, कक्पे ॥ तथा बन्ना तपवाला साधुने वसनु कूकसानु धोवण,जवनुं धोवण,थने तिलनु धोवण,ए त्रण जात पाणी लेबु कल्पे ॥ तथा यज्म तपवाला साधुने एक सामण, बीच कांजी, थने त्रीच वर्ण पालटेलु उन्ड पाणी एत्रण प्रकारनां पाणी खेवा कम्पे ॥ तथा त्रण उपवासथी उपरांत प चरकाण जे साधुयें करेलु दोय तेमने गणेखें सप्ण पाणी कक्पे ॥ तथा थनशनवाला साधुने एक उपण पाणीज कम्पे तेपण वली बारोढुं दोय ते कम्पे ते पण थोडे थोई पीवु परतु घणु पीयूँ नही, परिमाणसहित पी ए पाणी पीवा सबंधि नवमी समाधारी जाणवी ॥ वदमा रहेला साधु जे होय तेणे मर्याद करी के पांच दात पाणीनी अने पांच दात नोजननी खेवी पण जो पापीनी चार दात मली थने जोजनननी पांच वात मली पण ते पांच दाता जोजन स्वल्प थाष्र्यु ले तेनाथी पूरण पेट नराय नही तेवारें विचार करे जे पाणीनी चार वात मली ने पण पांच मती नथी तो दवे एक दात जो जना मेजवी थापु एम करतुं कल्पे नही जे जेटलुं मन्यु ते तेटलुंज खाश्ने संतोप करवो पण दात थागी पाठी बदल ववत करवी नही तेम वली बीजी वखत गोचरीये पण जावु नदी हवे दात केने कहे जे वोदोरती वेलायें पात्रामा जो मात्र एकज पावलनो दा पो थावी पख्यो तो ते एक दात जाणवी तेमज सर्व थन्न सार्थेज पात्रामा पही जाय तो पण ते एकज दात जाणी लेवी एमज पाणीनु पण वदोरती वस्खतें जो एकज टीपु श्रावी पात्रामा पढे तो ते एकज दात जाणवी थने पाणीनी धारा खंमा न होय, अस्वजित था र वहेता सपूर्ण पात्र जरा जाय तोपण एक दात समजवी परंतु धार खमाया पली वली वीजी धारायें जे पाणी पात्रामा पडे ते वीजी वात कदेवाय ॥ २५ ॥ ॥ ए दात थायी दशमी समाचारी जाणवी ॥१०॥ ॥ तथा वर्षाकाठे जे उपासरामा साधु चोमा रह्या दोय ते जगाथी मामीने सात घर पर्यंत गोचरीयें जवु नही गाममा जमण दोय तो केटला एक प्राचार्य कोने के उपासरा सहित सात घर बने केटला एक थाचार्य कहे डे के उपा नम सरा सहित था घर जगए वोहोर नदी ॥१४॥ ॥ए सांखडी संधि धगीश्रारमी स माचारी जाणवी ॥११॥ ॥ वकालमा जिनकपी साधुने तो फुसार एटले घुथरी मात्र पाणी वर्षे तो गोचरीये जावू नही ॥२॥ तथा थबायो घर एटले थपदांकेतु घर दोय तिहां वदोरवा जावु नदी केमके जो वहोरता बदोरतां तत्काल अकस्मात् वद थावी जाय तो प्रथम लीघेलो थाहार जे काश्क खवाणो दोय कांक रद्देलो दोय ते बन्ने हाथमा ढोकीने वाती नीचे लश्ने जिहा दांकेली जगा दोय तिहां अथवा काहनी नीचे ला जावो पढे तिदा जो थाहारमा पाणी नही लाग्ऍ होय तो थारोगीजातुं अने जो पाणी लाग्य होय तो वावु नही ॥ ३० ॥ ए जिनकल्पी साधुउनी गोचरी थाश्रयी वारमी समाचारी जाणवी ॥ १२ ॥ ॥ वर्षावमा चोमा रहेला पात्रानां धारवावाला साधु थर्थात् स्थविरकल्पी साधुउने तो, जेनी धारा रोकाय नदी एवो श्रखंग धारायें मेघ वर्षे तो गोचरीयें जावं नदी ॥ ३१ ॥ जो कदाच कोश्क साधु गिलान होय अथवा थशत होय एक वे विवसनो ख्यो दोय थने अधिक नूख खमवानी तेमां शक्ति न होय तो ॥ ग्रंथामथ ॥ ११०० ॥ ॥ एक सूतरनो कपडो तेनी उपर मननु वस्त्र उंढीने योडा बाटा पडता होय तो गोचरीयें जावं कल्पे ए थपवाद सूत्र ने तथा रहस्यने घरें गोचरी गया कडे रदीरदीने थोडो थोडो वद वरो तो थाराममा, उपा सरामा, ममपनी नीचें तथा रूखनी नीचे थावतुं कल्पे ॥ ३२॥ तथा गृहस्थने घरें गोचरी गयेला साधुने वर्पाद श्राव्यो तो तेना घरे जे वखत साधु थाव्यो ते वखतथी पहेला जो नात उतस्या दोय थने पनी दाल उतरी होय तो साधुयें जात वदोरवा थने दाल वदोरवी नही ॥ २३ ॥ थने जो वाल पहेली उतरी होय श्रने चावल पड़ी उतस्या होय तो दाज वदो रवी थने चावल बहोरवा नही ॥३॥ थने जो चावल तथा दाल बेतु पहेला उतसा दोय तो पहु नेवा कम्पे थने जो वेनु पठी उतस्या तो वेगु चीज लेवी कल्पे नही ॥३५॥ तथा गोचरी गयेला साधुने थाहार मल्यो वे श्रने वद रहीरहीने वर्पतो दोयतो बागमा, उपासरामा, दा केली जगामा, काउनी नीचें एटली जगायें थावीने बादार खाइ जवु पण थाहारने घणो वख त राखी मूकवो नदी तरत थारोगी पातरा पुढी एकता वाघीने वाद पडतो होय तोपण दिवस उतेंज उपासरामा श्रावq पण रात्रिय वाहेर रहेतां घणा दोप सपजे ने माटे रात्रे तो सपास राथी थल[ रहेवुज नही ॥३६॥ एम वर्षावमा रह्या साधु गृहस्थने घेर गोचरी गया थकांने रहीरही वाद वर्पवा साग्यो तो वागादिका श्रथवा सपासरे थावत् कल्पे ॥३७॥ परंतु पागादिकस्यानके एक साधु थने एक साध्वीने एक स्थानके रहेषु तथा एक साधु थने वे साध्वी तथा वे साधु यने एक साध्वी तथा वे साध्वी थने वे साधु ए चारे नांगायें एकलै रहेखु नदी कल्पे तथा पाचमें नागे वे साधु थने वे साम्ची दोय तेमा एक १६ साधु साध्वी दोय तथा एक लघु साधु साध्वी होय थने जगा घणी मोकली होय जिहां सर्वलोक देखता होय एवी जगामा रहेQ कम्पे एवाज चार नांगा साधुने प्राविकानी साथै कहेवा तेमज वली एवाज चार नांगा सा ध्वीने श्रावकनी सार्थे कद्देवा ॥ ३५ ॥ श्रने पूर्वोक्त पांचौ नागें एकता रहेर्नु कल्पे ॥३॥ था थविरकम्पी साधु साध्वीउँने गोचरी तथा साधु साध्वीने एकत्र रहेवा संबधिनी तेरमी समाचारी जाणवी ॥ १३ ॥ वर्षावमा चोमासु रहेला साधु अथवा साध्वीयें कोई साधुना कह्या विना तेमना माटे थशनादिक चार थादार लाववा नही ॥४०॥ ते शामाटे के तेनी श्ठा दोय तो ते थाहार खाय बने इशा न होय तो न खाय ते माटे कह्या विना थाहार लावयो नही ॥४१॥ ए पूख्या विना वीजा साधुन माटे थाहार नही लाववो ते संवधी चोदमी समाचारी जाणवी ॥१॥ ॥ वादा रहेला साधु साध्वीने जिहां सुधीश रीर जीजेतु दोय तिढा सुधी थशनादिक चार थाहार करवा नदी ॥ ४२ ॥ एम शावास्ते फर्यु ठे, के घणु करी सात ठेकाणा नीजेला रहे , तेमां एक दाय, बीजी हाथनी रेखा, जीजा नख, चोथी नखनी थणी, पांचमा चुंदारा, बघ नीचला हो भने नीचली वाढीनी जगा, सातमा उपरला होउ थने उपरनी मूठगे, ए सात स्थानक वाला रहे ने तिहां सुधी थशनादि चार थाहार न करवा थने जेवार जाणवामां थावे के ए साते काणा थाला रह्या नथी तवन सुकी गया वे तेवारें चार थाहार करवा ॥४३॥था शरीर थालु होय तेवारें थाहार नही करवा सबंधी पन्नरमी समाचारी जाणवी ॥१५॥ ॥ वद वरश्या थका, साधु साध्वीयोने सूक्ष्म थाउ वस्तुउने वारंवार सूत्र ज्ञानेकरी जाणवी थने चहुये करी देखची, पडिलेहण करवी जोश्य, तेना नाम कहे वे एक प्राण सूक्ष्म, वीजु पएक सूक्ष्म, त्रीजु पीज सूक्ष्म, चोघु हरितसूक्ष्म, पाचमु फूलसूक्ष्म, हुं कीडी प्रमुखना थंमसूक्ष्म, सातमु कोली थावडा प्रमुखना घर सूक्ष्म थने थाउमुं स्नेह सूक्ष्म, ए थाना नाम कह्या हवे एने त खवा माटे विशेप खोलासो गुरु शिष्यना प्रश्नोत्तररूपें लखीयें ये तिहा प्रथम प्राण एटले सूक्ष्म जीणा जीणा जंतु काला, नीला, राता, पीला थने घोला एवा पांच प्रकारना रंग गला कुंघुथा जीव थाय ठे, थषुधरी एवु एनु नाम के ए जीव एकस्थानके थणचालता रहे, ज्ञानरहित उग्रस्य साधु साध्वीउने नजरथी देखाय नही माटे ते जीवोने साधु साध्वीये वारंवार सून सानलवे करी जाणता रहेवु, चटुयें करी देखता रदेवु ए प्राण सूक्ष्म कया।

॥४४॥ हवे शिष्य पूढे ठे, हे जगवन् पणग एटले फुलण सूक्ष्म ते कोने कही ' गुरु कहे वे फाली, लीली, राती, पीली थने घोली एवा पांच प्रकारनी फुलण थाय दे, ते जीवो जे वस्तुमा पहे ते वस्तुना रग जेवा दीठामा थावी जाय बनस्थने नजरे नही थावे माटे तेने पण वारंवार देखता तपासता रहे, ए बीजी नील फूल सूक्ष्म कही ॥ २ ॥ हवे त्रीजा वीज सूक्ष्म कोने कहीये' गुरु कदे ते पण काला, नीला, धोला, पीला थने राता एरीते पाच प्रकारना डे शाल प्रमुखना जेवा वर्णवाला थाय ने, तेपण बमस्यने जाणवामा नही थावे माटे तेनी पण वारंवार पहिलेदणा करवी ए बीज सूक्ष्म कहा ॥३॥ दवे चोथा हरित सूक्ष्म कोने कहीये ' गुरु कहे के के हरित एटले नीलोत्री सूक्ष्म थाय जे । ते पण पूर्वोक्त पांच रंगवाली थाय ते पृथ्वीना रंग सदृश होय थने घणी जीपी बारीक दोय, तेने पण साधु साप्पीये घणीज रूडीरी दृष्टी वडे जोइने पडिबेहण करवी, ए हरित सूक्ष्म कही ॥ ॥४॥ पांचा फूल सूक्य कोने कहीयें ? गुरु कहे जे ए पण मीणा फूल ते पूर्वोक्त कालाथी मामीने यावत् धोला पर्यंत पाच प्रकारना थाय ने ते रूखना जेवा एटले रूखनो जेवो रंग थाय तेवा रंगवाला थाय रे ते पण जाणवामां नही थावे, तेनी पण पहिलेदण करवी ए छन सूक्ष्म कह्या ॥ ५॥ दवे व थम सूक्ष्म ते कोने कहीये' गुरु कहे जे तिहां प्रथम मधुमाखीनां इमा, बीजां कुलातरानां मां, बीजां कीडीनां श्मा, चोथां गिरोलीना मा थने पांचमां काळिमाना इमां ए सर्व जीवोनां मां पण सूक्ष्म थाय डे, माटे एने वारं वार जोवा बने पहिलेहण करवी ए थंम सूक्ष्म कह्या ॥ ६ ॥ हवे सातमां घर सूक्ष्म पण पांच प्रकारना ; ते शिप्यना पूलवाथी गुरु कहे जे के एकतो नूमीमां गहश्या स

रखा घर करेला होय ते, वीजा पाणी सुकाइ गया पडी पापडी नूमि सपर पडे ते, त्रीजा विल
घर,चोथा ताड प्रमुख वृक्षोना मूलमा न्हाना न्हाना घर थाय ने ते घर,थने पांचमां नमरानां
घर ए पाचें प्रकारनां घरोनी पडिलरेणा करवी ए घर सूक्ष्म कह्या ॥ ४ ॥ ॥ दवे श्रावमो
स्नेदसूक्ष्म ते कोने कदीये? गुरु कहे जे ए पाणी सूक्ष्म पण पांच प्रकारनो बे, एकतो उसन
पाणी, पीजु देमारानु पाणी, त्रीच घुरि थाय ने ते, चोथु करानुं पाणी थने पांचमु मान
प्रमुखनी थणी उपर जे पाणीनां पिंड रहे जे ते, ए पांच प्रकारनु पाणी ने तेने पण उमस्थे
जाणीने पडिलेहवु जोश्ये ए स्नेह सूक्ष्म कह्यो॥ ॥ ॥४५॥ ए थात सूक्ष्म चीज थाश्री
शोलमी समाचारी जाणवी ॥ १६ ॥ ॥ दवे वावमा चोमासु रहेला साधु साध्वीउने
जेवारें गृहस्थोने घेर गोचरी करवा थाहार प्रमुख लेवाने माटे जावु होय तेवारें था
चार्य, उपाध्याय, थविर, प्रवर्तक, गणि, गणधर, गणावछेदक, तथा जेनी थाहामां
चालता होश्ये तेमने पूबीने पढ़ी जात पाणी प्रमुख सेवाने माटें जावं तेमने एम
कहेतुं के हे जगवन् थापनी थाहा होय तो गृहस्थोने घेर नात पाणी सेवाने वास्ते जाउ
तेवारे ते पूर्वोक्त थाचार्याविको जो जवानी थाहा थापे तो जर्नु नहीकां जावं कल्पे नदी
हा शिष्य पुढे जे के शा वास्ते ? गुरु कहे जे के याचार्याविक जे जे ते उपश्व टालवानां उ
पाय जाणे जे ते साधु थमुक विशा गया तेने घणो वस्वत केम लाग्यो। एटला माटे॥४॥
एवीज रीतें जो श्रीजिनचेत्ये दर्शन करवा जq दोय तथा उमेल नूमियें जवु दोय अथवा
वीजा कोइ पण कामने माटे जवु दोय,गामोगाम विचरतु दोय तोपण पूच्या विना जq नदी
॥ तथा चोमासु रहेजा साधु साध्वीउने जो विगयनो थाहार करवानी हा होय
॥४॥

॥ ४॥ तो याचार्याविकोने पूषा विना विगय खेवी कप्पे नदी माटे श्राचार्याविकोने पूके है महाराज थापनी थाहा होय तो छ दूध प्रमुख विगय गृहस्थना घरेथी लरथावीने थाहार करुं? तेवार थाचार्याविक कड़े के थमुक प्रमाणवानी विगय लावीने आहार करजे रहा शिष्य थाशका करे ? के एमां थाना खेवार्नु यं प्रयोजन ले 'तेवारें गुरु उत्तर थापे डे के विगयादिक खावा के नदी स्वावा, तेथी थता गुण तथा अवगुण ए सर्व प्राचार्याविक जाणे ने माटे पूq जोये ॥ ७ ॥ । तथा चोमासामो कोई साधु पोतानी थारोम्पता माटे थोपध करवानी चाहना राखता होय तो पण वाचार्याविकनें पूर्वीने औषध करवू " तथा चोमासामा कोइ साधु; सारु, कल्याणकारि, उपश्वरहित, धन्यकारि मगनिक करनार, सोनावत तथा महाप्रजाविक एवं तप करवानी चाहना राखतो दोय, तेणे पण थाचार्यादिकने पूतीने पठी ते तप क ॥ ५० ॥ ॥ तथा कोई साघु धनशन करवानी चाहना राखतो दोय, यात्माने जूपे नात पाणीनो त्याग करी पावोपगमन स पारो प्रमुख करे, कालने वाले नही,तेणे पण श्राचार्याविकने पूज्या विना करवु नदी एमज थाहार करवो, उले जावं, मात्री परवववी, सधाय ध्यान करवु, धर्मजागरणा करवी, काव स्सग प्रमुख कर ते सर्व श्राचार्यादिकने पूतीने क्खु परंतु प्राचार्याविकने पूज्या विना पूर्वोक कोई पण काम करलु कापे नही ।। ५१ ॥ ॥ ए वोहोरवा प्रमुख जे कार्य करवां ते सर्व थाचार्यादिकने पूरीने करवा, ते संवधिनी सत्तरमी समाधारी जाणवी ॥ १ ॥ वर्षाकालमा पंजोसण करीने रहेला साधुरीने कोइ उपभी तपावची होप तावामा ना खवी होय तो पोते तिर्दा खबर राखची पासें ऐसई परत पक्षनेतापरे भारदीने गोचरीय जावु नहो, थाहार करवो नदी, चेत्ये जावु नही, वले जावू नदी, सयाय करवी नदी, काउ स्सग्ग करवो नदी, जो एटला काम करवां दोय तो धीजा कोइ साधुने कहे के दे थार्य । मने गोचरीप्रमुख थमुक कार्य करवू , माटे तमे श्रमारी उपधीनी निगा राखो तो गो चरी प्रमुखनु काम करूं तेवारें ते साघु कहे के हुँ निगा राखीश तो गोचरीप्रमुख कार्य करवु कम्पे पण कदापि ते कहे के महारे वीजा काम तेथी वेशी नही शकतो पूर्वोक्त गोचरीप्रमुख करवी करपे नदी ॥ ५५ ॥ ए पघि तावडे तपाववा संबधि बढारमी समाचारी जाण वी॥१७॥ ॥ वर्षावमा रहेला साधु साध्वीउने, एक हाथ संची श्रने बोले नही एटले शब्द नकरे एवी वली मगे नही, फरती काठी वाघेली एवा अय्या विना रहेतु कल्पे नही जो एवा शय्यासन विना रहे तो कर्मवघy कारण थाय वली ते शय्यासनने वारंवार पहि खेदण करखु, तावडे नाखवो, पूजवो प्रमुख जो नकरे तो तेने चारित्र पाल उर्लन थाशे ॥ ५३ ॥ थने ते शय्यासनने जे साधु तावडो प्रमुख थापे, पूजे ते साधु चारित्र सुखें पालशे ॥ ५४॥ ए शय्या प्रमुख ग्रहण करवानी अंगणीशमी समाचारी जाणवी ॥१५॥ चोमासामा रहेला साधु साध्वीने वला मात्रानी प्रण जगा राखवी थने ते जगाउने पति जेदवी परंतु सीयाला थने तनालानी पेठे चोमासामा न रहेतु जोश्ये श्वां शिष्य पुढे ने के शीयाजा भने धनालाना दिवसोनी पेठे चोमासामा शा वास्ते न करवु गुरु उत्तर करे| के प्राय चोमासामा नीजी वनस्पतिप्रमुख जीवो घणा छत्पन्न थयेला होय ते माटे ते नाथी चोमासानो जुदो प्रकार करो ॥ ५५ ॥ ए उजा थने मात्रानी जगा परिहण करवा सवधि वीरामी समाचारी जाणवी ॥ २० ॥ ॥ चोमासामा साधु साध्वीउने प्रण मात्रा राखवा कक्पे तेमां एक तो वला, पीजो मात्रानो, त्रीजो खेल प्रमुखनो एव त्रण जाणवा ॥ ५६ ॥ एत्रण मात्रा राखवा संबंधि एकवीशमी समाचारी जाणवी ॥१॥ पंजोसण करीने रहेला एवा साधु साध्वीउने, गायना केस जेवडा सूक्ष्म केस पण पोताना मस्तके राखवा नही केमके पाच मिनी रात्रे जो मस्तके केस रदी जाय तो कम थावे ते माटे जो कोश्थशक गिलान टाटियो दोय तो तेणे बरीथी मुंमी नाखवा, कतरणीयी कतरवा थने उत्सर्गमां तो लोच करवो तथा जो कतरवा होय तो पाढा पंवर पंदर दिवसें कतरवा, गुरु मासी वम थापवो, महीने महीने खुर मुम फरवो, लघु मासी प्रायश्चित्त देवो, युवान साधुने चार मासे लोच करवो, स्थविरने अने जर्जर थयेला साधुने चकुनो तेज राखवा माटे ठ महीने सोच करवो, थथवा थविर वर्षे व लोच अवश्य करे ॥ ५ ॥ ए लोच करवा थात्री वावीशमी समाचारी जाणवी ॥५॥ ॥ वर्षावमा चोमासु रहेला साधु साध्वीउँने सवत्सरी थया पनी पहेला थयेलो कलह खमाववो पण क्रोध राखवो नही, जे कोई निर्मथ थने निर्मथणी पंजोसण वीत्या पनी कोध करे, क्रोध राखे, ते अनाचारी में एम । जाणवु तेमने वीजा साधुए कहे के हे थार्य ? तमे अयोग्य काम करो बो एवं कहेवाथी नही समजे थने पंजोसण वीत्या पढने कपाय खमावे नदी तो जेम तंबोली सही गयेला पानने बाहेर कादाडी फेंकी थापे तेनी पेरें ते कोधी साधु साध्वीने पण सधमादयी वाहेर काढाही मूकवो ॥ ५७ ॥ ए थधिकरणने नदी मदिरवा सवधि प्रेवीशमी समा चारी जाणवी ॥२३॥ ॥ वर्षाकालमा रहेला साधु साध्वीउने, जो पंजोसणना दिवसोमां कलह थयो दोय, कटुक वोलवु परपुं दोय, हेग कम्मो होय तेवार शिष्ये जइ रमाधिक थाचाय प्रमुखन खमावतु थन थाचाय प्रमुखें शिष्यने स्वमावतु ॥ग्रथाग्रथ ॥१२००॥ ए रीते पोते खमवू, वीजाने खमावबु, पोते सुपशम करवो, पीजाने उपशम कराववो, घणा प्रकारे करी रागपिरहित था, जे क्रोधादिकने उपशमावशे ते ज्ञानाविकनो थाराधक यशे थने जे कोधादिकने नदी उपशमावशे ते ज्ञानादिकनो विराधक थशे, एवं जाणीने निश्चयें पोते उपशम करयो, नगवान् ए उपशमनेज सार पदार्थ कहे जे माटे हे शिष्य उपशम श्र वश्य थगीकार करवो ॥ ५५ ॥ ॥ ए परस्पर स्वमत खामणा करवा सवधिनी चोवीशमी समाचारी जाणवी ॥ २ ॥ ॥ श्दा पाच समिति, प्रण गुप्ति थने चार कपायोना दृष्टांत कद्देवा ॥ साधु साध्वीयें चोमासामा वली विशेपें करीने पांच समिति श्राविक पाजवा तिदा प्रथम रिया समिति पालवा थाश्री वरदत्त मुनिनो दृष्टांत कहे जे एक दिवस श्म दाराजे पोतानी सनामा कडं के थाज जरत क्षेत्रमा वरदत्त मुनि समान को रिया समि तिनो पालवावालो नथी एवी शना मुखथी वरवत्त मुनिनी प्रशसा ययेनी सांजलीने कोक देव परीक्षा करवा सारु थाष्यो तेणे हाथीनु रूप करी सुढमां पकडीने मुनिने थाका शमा ठान्यो भने देवमायायी जमीन उपर न्दानी न्दानी घणी मेडकी विकु: तेवारें मुनि थाकासपी नीचे पडता विचार करवा जाग्या के मने तो मरवानुं जय नथी पण था जीणी जीणी मेडकी मदारा शरीरना पडवाथी मरण पामशे, तेनी विराधना थाशे, एवु जाणीने थाकाशथी पडता थकां पण उपाथी जमीन पूजवा लाग्या ते देखी देवताए जाण्यु के धन्य ने एने जे एवी रीते जीव विराधनाथी वीये ले पनी ते देवता प्रगट थाने साधुनी साथे थपराध खमावी नमस्कार करीने पोताने स्थानके गयो इति इरिया समिती रदनदृष्टात ॥१॥ ॥ हवे नापासमिति उपर सगत साधुनो दृष्टांत कहे जे जे नगरमां गत साधु दता ते नगरनी पार को वैरीराजायें सेन्या लरथाचीने नगरने वींटी लीयो, वारें तगत साधु नगरमांधी निकलीने वारेर थाव्या, तेने शत्रुनी फोजवालायें पुषु के साधु नगरनी मांदेली कोरे केटलिक फोज १ तेवारें साधु बोल्या के घणो सानज्यो काने, जो जोयो थारख्योची (चनुपी), नदी देख्यो सर्वे सांजल्यो, नदी मुल्यो सर्वं वीगे, एवीरीते ब्यो वली पण ज्यारें ज्यारे ते पूजे त्यारे वारंवार एमज बोलवा लाम्यो, तेवारें सेन्याना कि जाएघु जे था जणीनणीने पहेलो घर गयो ,एम विचारी मूकी दीयो ए बीजी नापा मिति उपर दृष्टांत कहो ॥२॥ ॥वे त्रीजी एपणासमितिमा नवीपेनो दृष्टात कहे वसुदेवजीनो जीव पूर्वला नवा नदीपेण इतो, तेणे ग्लानीनी वेयावन करवानो थ मह करो हतो पोते नवे उन्हें पारण करे तेनी में प्रशसा करी, तेवारें कोक देवे श्रावी तिसारना रोगवालो साधु बनावीने नवीपेण पासे मोकल्यो नदीपेण तेना सारु पाणी वा गयो ते देवतायें थक्ष करी थाप्यु, नदीपेणे लीधु नदी, एवी रीते एपणा सोधी ग्जानने खाघे वेसार', ग्लाने तेने अशुचीये खरडघु, देवे स्तुति करी ए कथा था त श्रीनेमिसर नगवानना चरित्रमा जवाइ गरे इति एपणा समिति दृष्टात ॥ ३ ॥ वे थादानादि परिजेदण फरचानी पोथी समितिमा सोमित साधुनो दृष्टात करेले एक वस साधु विहार करने कोई गामें थाष्या तिहा दिवस केटलो ते एवी पराबर सपर उए पडिलेडण करी, गुरुये सोमिलसाधुने कर्पु के तुं पण पडिलेहण कर सोमिल बोल्यो हजी दमणातो पहिलेदण करी तो हवे एटलामा में कांश सर्प चुंसीगयो ' एवु उल वचन बोल्यो पनी जेवारें प्रनातेपहिलेदण करी तेवारें गुडामांहे पातरा बांधेला हता तेमांची को देवप्रयोगयी सर्प निकल्यो दीगे तेथी वीक पामीने गुरुपासें थावी कहेवा लाग्यो महाराज सर्प निकल्यो, तेवारें गुरु वोल्या तु स्तन वचन शामाटे वोल्यो ? हे वत्स एवा पचन तादारे थाज पठी योलवा नही पडिलेहण करवामां तो घणीज निर्जरा में पड़ी ते साधुयें एपो थनियह लीयो जे थाजयी सर्व साधुना वम दु पडिलेदीश, सर्वने दु हाथ था पीश, एवो अनियह पालता ते साधुयें घणा कर्म क्ष्य कस्या इति थादानमनिक्षेपणसमिति दृष्टांत ॥४॥ ॥ हवे उच्चार प्रश्रवण समितिमा मुमताचार्यनो दृष्टात कहे रे सुव्रताचार्यनो एक लघु शिष्य हतो तेने गुरुये कर्पु, थरे मामला कर; तोपण तेणे मामला कीधा नही यने कड़वा लाग्यो युं वादारे उटडा वेगळे के ? पठी रात्रिय वाहेर मात्रु परतववा गयो तेने तिहां कोक देवे श्रावी उटनु रूप करीने वीवराव्यो थने वोल्यो, थरे था गहमा एक पण ममल कसा विना मात्रा प्रमुख करे नही पठी वली एक दिवस ममल दीठो नदी अने रात्रं मात्रानी घणी वाधा थइ पण परते नदी तेवारें देवतायें उद्योत कसो पड़ी ते शिप्ये जगा जोश्ने मात्रा परतवी तेमाटे जे को ममल देखी परग्वणा करशे तेने देवता स हाय यापशे एवो निभयकरी कुलक पण पारितावणिया समितिमा सावधान थयो ए पारिता वणिया समितिनो दृष्टांत कह्यो ॥ ५ ॥ ए पांच समिति साधुयें चोमासामा विशेप पालवी॥ हवे मनगुप्ति वपर काँकुण साधुने काउस्सग्गमा घणी देर जागी तेने गुरुये पुग्यु घणो वखत केम लाग्यो ? साधु वोल्यो, जीवदया ध्यायी, गुरु योख्या केवी जीवदया ध्यायी साधु घाख्या महारा घरमा बोकरा थाल ने ते सूट निदानादिक करशे नही तो धान थोडो नीपजशे, तेथी उखी थशे,गुरुयें कर्यु तमे सावध चिंतष्यु माटे मिष्ठामि कह द्यो साधु पण मिक्षामि उकार देतो वो ॥ इति मनगुप्ति दृष्टांत ॥१॥ ॥ दवे वचनगुप्ति उपर गुणवत्न साघुनो दृष्टांत कहे जे गुणदच साधु; एक दिवस पोतानी ससारसंबंधि धनवती नामे माताने वदा क्या जातो दतो; रस्तामा चोर मन्या, तेणे साधुने पकच्यो थने कहेवा लाग्या थरे साधु या रस्ताथी जान थावशे तेनी थागत तु अमारु नाम लश नही जे था ठेकारों चोरो रहे ने साधुयें कामु दुतो वोलीश नही तेवारें चोरोये तेने बोडी मूल्यो, ते पोताने स्थानके जइ पोताना कुटुंबने वदावीने फरी तेवोज जाननी साये तेहन मार्ग श्राव्यो तेवारें चोरोये जान लूंटी सीधी थने वली वोलवा लाग्या के जू था साधु कदेवो सत्यवादी के पोताना घरना माणसो थागल पण चोर रस्तामा येता ले एवं कयुं नही ते वचन साधुनी मातायें सोनपु; तेवारें महाऽख करती थकी साधुने फहेवा जागी के थरे अष्ट' तें ताहारे हाथे चोरोने माल लुटावी दीघो;तुं केम प्रथमथी योल्यो नही !' पठी साधुने घणो कष्ट यतो देखीने चोरोयें लुटेखें धन सर्व पाबु थापी वीधु; तेवारें जानवाला सर्व स्खुशी थया पण साधु वोव्यो नही, ए वचन गुप्ति उपर कथा कही ॥२॥ त्रीजी कायगुप्ति उपर थईनक साधुनी कथा कहे ठे थईन्नक साधु, विहार करता कोइ स्थानके पालो व तो देखीने विचारवा लाग्यो के जो दु था स्वालमा पग वेश्श तो जीवविराधना थाशे माटे फूलको मारीने थांदीथी निकली जा ए चितवी पासाग hinाग की माटे कोश्क वेवे ते साधुना पग बेदी नाल्या तेथी उखी थयो तेवार देवतायें श्रावी कयु के पागल दवे तमारे एम कोश्वारे पण करवु नदी, जो कदापि जीव मरे तो पण ए केवलीनी थाझा ने माटे उतरीने जावु पण कूदको मारीने जावं नदी इति कायगुप्तिदृष्टांत ॥३॥ ॥ वे वली था पंजोसण श्राव्या थकां सर्वनी साये ख मत खामणा करवा, कारणके स्वमतस्वामणा करवा विना पडिक्कमणाविक किया करवी सूजे नही माटे जो कोश्नी साथै महोटो वैर होय तो पण उवाशराजानी पेरे खमावई जेम चपान गरीमा कुमारनदी नामा एक सोनार रहे थे ते जन्मथी स्त्रीनो लोलुपी , धन थापीने महा स्वरूपवाली पाचशे स्त्री परण्यो वे एक दिवस ते, दासा थने प्रहासा ए वे देवीयोने देखी तेनुं स्वरूप जोई मोहित थयो, तेथी देवीयोने कायु के तमे मदारीसाथें लोग करो देवीयो बोली तुं पंचशेल पर्वत हीपे श्रावजे तो थमारे नोगयोग्य दोश एवं कहीने देवीयो पोताने स्था नके गइ सोनारे गामा थावी पडद वजडाव्यो के जे को मुजने पंचशेलहीपे ला जाय तेने हुँ कोड सोनामोरो थापु ते सनिली एक वृक्ष खलासी (नावनो खेडनार) इव्यनो लोनी ने तेणे जाएj घरना माणसो इय्यतो स्वाशे एवं विचारी वोल्यो के द्व लइ जश्श पली वेगु ज हाजमा वेग जहाज चाल्गुं श्रागल जतां एक वडवृक्ष थाष्यो तेवारे नावख्यो वोल्यो था वडनी उपर तु चढी जाजे थने द्रुतो थाहीथा जहाज पाणीना चकमां बुडशे तेनी साये पीने मरीश पण तु वह उपर वेशी रहेजे, रात्रना जारंग पंखी थावशे तेना पगोमा तहारा शरीरने वांधी मूकजे, ते पंचशेल छीपमा चुगवा जाशे तिहां तने मूकी वेशे पनी तुं तिहा पंधनमुक्त थ दासा प्रहासा देवीउनी पासे जाजे एवं कम्सुं एटलामा ते वादण वहनी पासें थाव्युं, सोनार वह उपर चच्यो थने जहाज नांगी पडघु,नावख्यो मरण पाम्यो, सोनार ति ।

हायी नारंग पंखीना पगमा बंधाइने हासा प्रदासानी पासें गयो, तेनी आगज नाग नागववा माटे याचना करी, देवी वोली था तहारी थराक्ष वेद वे ते देहयी थमे लोग करीयें नही तेवारे ते देवीयोयें फरी तेने चपानगरीमा मूक्यो भने कसुं के जे हमणा श्रमारो देवपति ने ते चवसे तिहां तुं मरण पामीने ते देवनी शय्यामा उपजजे तो तदारु काम थशे तेवारें सोनार पण काष्ठ घालीने यज्ञानकष्ट करी मरवा लाम्यो ते थवसरमा ते सोनारनो मित्र नागिलनामा प्रावक हतो ते पोल्यो, थरे तु थावीरीते मरवानु मकर था प्रकारे वेवीउने माटे मरवु योग्य नथी तो पण तेणे मान्यु नही काठमां पली मरण पामीने दासा प्रहासाना ध्यानयी तेम नो पति देव थयो थने तेउनी साथें नोग जोगवतो रहे ने एकदिवस महाराज, सर्व देव देवी सहित नदीवरही वेवयात्रायें जवाने माटे तयार थया, तेवारें हासा प्रदासानो पति जे देव ने तेनी वपर एवो ढुकुम श्राव्यो के तुं सर्व देवोनी थागत मृदग वजावतो चालजे ते वारें, हासा प्रदासायें ते देवना गलामा मृदग नाख्यो, वे ते मृदंग पोताना गलामाथी कादा डीने फेंकी दीधो थने कसुं के दु मृदग वजावीश नदी एटलामा तो फरी ते मृदग तेना ग सामा श्रावी वाजी गां, फरी देवे फेंकी दीधो, एम वे प्रणवार कम्युं त्यारे हासा प्रदासा योली थमारा जरतारनी एज मर्यादा डे के मृदंग वजाष्या विना ते लूटेज नही “ हासा प्रहा सानो मृवग गलामा पख्यो ते वजावे बूटको” एवी लोकमां पण कदेवत ने दवे ए विद्यु न्माली वेव हासाप्रहासासहित मृदंग वजावतो श्रागल चाले ने तिहा मर्दिक देवोने देखीने पोताना नवनी निदा करे ने एटलामा नागिल श्रावकनो जीव बारमा देवलोकमा उपन्यो , ३६ते पण तिढा आष्यो अने विद्युन्मालीने कटेवा लाम्यो के थरे तुं मने उलखे डे के नथी बन खतो' तेवार देवे उपयोग थापीने कर्यु के दा महारा मित्र नागिल ते घणो ए मने वज्यों पण दु तुष्ठ नोगने माटे व्यर्थ मनुष्य जन्म गमावीने थावा पुरस्यहीन देवोमां श्रावी उपन्यो एं तो दवे महारे शु करवू तेवारें नागिल वोल्यो तु गोशीपचवननी श्रीमहावीरस्वामीनी प्र तिमा यनावीने तेनी पूजा कर के जेथकी तने समकेतनी प्राप्ति थाय पडी ते विद्युन्मालीयें पण तेमज श्रीमहावीरजीनी प्रतिमा बनावीने केटलाएक काल पर्यंत पूजी बेवट पोतानु थ पायुप्य रघु जाएY; तेवार प्रतिमाने पेटीमा नास्त्रीने जहाजोवाला लोकोनी जहाजो थटकी रही इती ते देवतायें देव प्रयोगयी काहाडी थापी थने तेमने पेटी सोंपीने कयु के श्रा पेटीमा श्रीदेवाधिदेवनी प्रतिमा ते ते तमे वीतनय पाटणमा जश्ने उदाइ राजाने थापजो तेवार जहाजना लोकोये ते पेटी लावीने उदाइराजानी सनामा मूकीने कत्यु के था श्रीदेवा धिवेवनी प्रतिमा के तमोने कोई देवतायें मोकली ले ते व्यो तेवारें राजायें जाप्पु जे देवाधि देव तो ब्रह्मानु नाम ठे माटे ब्रह्मानु नाम लश्ने उघाडवा लाम्या तो पण उघडी नही ए मज वली विप्पुना नामथी पण उघडी नदी, महेश्वरना नामयी पण उघडी नही, रा जाने नोजननी वेला वीती गइ पण पेटी उघडी नदी तेवारें राजानी राणी प्रनावती बोली जे “ देवाधिदेव श्रीथरिहंत चीतराग देव दोय तो पेट! उघडजो" एवं कहेवाथी पेटी उघडी पढी तेमाथी प्रतिमा निकली ते लइ देरासरमा थापन करी तेने प्रनावती राणी श्राविका ते नित्य पूजे एक दिवस प्रनावती राणीय पूजाना श्वेतवस्त्र दासीना हाथे मगाव्या वासी ए जानी थाप्या पण राणी पोतानी दृष्टीनी चमताथी लाल वस्ख जाएया,तेथी दासी साथे लडवा लागी पण योडी वार पढी वली तेज वस्त्रने श्वेत वीग तेवारें जाए' जे हवे मढ़ारु था।

युष्य शेप उ मदीनार्नु रघु ले ते माटे राजाने जर कधु के मने थाझा थापो तो दु दीक्षा लेड राजा बोल्यो तुं देवलोक जाय तेवारें श्रने महारे कष्टनी वेला श्रावे तेवारें थावी सांनि ध्य करवानु कवुन करे तो थाझा यापु ते वात प्रनावती मानी पड़ी राजायें थाज्ञा थापी प्रनावतीयें दीक्षा लीधी,सयम पाली थायुष्प पूरण करी देवलोक गई तिहाथीथावी यो गीनुरूप करीने राजाने थमृतफल देखाही जंगलमा लगइ तिदा घणा योगीयो वेग दता तेरा जाने मारवा उनघा राजायें पीक पामीने देवताने याद कस्यो तेवारें देवे थावी राजाने तिहांयी उ पाडीसाधुः पासे मूक्यो,राजायें जाएघु जगतमा खराथाधारजूततो एज ने पढ़ी तेमनीपासेथी श्रावकना व्रत सा प्रावक थयो हवे पूर्वली श्रीवर्षमान स्वामीनी प्रतिमाने प्रनावती राणी वीक्षा लेती वस्वते देवदत्ता दासीने पूजवानु कही गई हती ते प्रमाणे ते वासी नित्य प्रत्ये पूजा करे ने एक विवस कोई गंधार नामे श्रावक सर्व गामोना देरासर वादवाने निकल्यो वे ते वीतजय पाटण थाव्यो, तेणे ते प्रतिमाने पूजी, तिहां ते गधार आवक थजारी ययो तेनी देवदत्ता दासीय चाकरी करी तेथी श्रावकने रोग मटी गयो थने निरोगी ययो तेणे उपकार कर वावाली देववना दासीने वे गोली थापीने कयु के था वे गोलीमाथी एक गोली खा वाथी महास्वरूपवाली था अने पीजी गोली खावाथी जे मनमा चादीश ते पुरुष वश थ जाशे, एवं कहीने गधार आवक जतो रह्यो पनी देवदत्तायें पहेली गोजी खाधी तेथी विष्य रूप थयु तेणे करी सुवर्णगुलिका एवु नाम दाती पडी ग{ वली पीजी गोली खाधीथने यमप्र योतन राजा स्त्रीयोनो लोलुपी में तेने मनमा चादीने धास्यो जे मारो चमप्रयोतन राजा जर तार होजो तेवार गुटिकाना यधिष्ठायिक देवे घायणीमाथाचीचमप्रद्योतन राजानीथागल RATE दासीनु रूप वर्णन करी राजाने दासीउपर रागी करी गयो,पठी राजा थनलगिरि हाथीनी उ पर सारी करीने तिहाँ गयो, तिहां दासीने पोलावी, तेवारें दासी वोली, द्वतो प्रतिमा विना थार्नु नही तेगारें चम्प्रद्योतन राजा फरी पाठो उलयशी थावीने ते प्रतिमा सरखी बीजी प्रतिमा करावी तेने सश्ने वली वीतनय पाटण जश्ने ते नवी प्रतिमा तिहां राखीने देवें दीघेली प्रतिमाने दासीसहित लश्ने उहयणीये चाल्यो थाव्यो दवे प्रनातें उदायी राजायें पोताना हाथीउना मद उतरी गया देखीने जाएषु जे थनलगिरि हाथीनी उपर चडीने चम प्रयोतन राजा श्राव्यो हतो, ते वली सुवर्णगुलिका दासी अने प्रतिमा सश्ने जतो रह्यो एबु जाणाने कोधसहित दश मुगुटव राजाउँने साथै लश्ने उहायणी नगरी सहामु चाल्यो मार्गमा जेसलमेर ब्रह्मसर पासे थाव्यो, पण मार्गमा पाणी पीवाने मले नही तेथी विलखो थयो यको राजायें चितापूर्वक प्रनावती देवीने याद करो तेवारें तेणे श्रावीने तिदां थखूट पाणी करी वीधु ते स्थानके पुष्करज प्रमुख घणा तलायो थखूट पाणी वाला यया एवीरीते उदायिराजए सेना लग्ने उकयणीनी सीमामा श्रावीने मेरा दीधा थने चम्प्रद्योतन उपर दूत मोगली कहेराव्यु के दासी पानी नही थापे तो नले तुं राखजे परंतु थमारी प्रतिमाजी थमोने पाठी थाप एवी मागणी करी, पण चम्प्रद्योतन राजायें प्रतिमाजी वीधी नही थने चौद बीना मुगुटयम राजा साये लश्ने उदायी राजाने सामु लडवा थाव्यो, तेवार तिहां यनलगिरि हाथी विना सहा करवानो तेराव कखो, तोपण चमप्रद्योतन प्रतिज्ञा तोडीने यननगिरि हाथी उपर चढीने सयाममा थाप्यो, पठी माहोमाहे युछ करता चमप्रद्योतन दारी गयो तेने थननगिरि हाथी उपरथी उतारी नीचे नारखी महारी दासीनो जरतार चमत योतन ते एवीरीतनो मान तेनी जलाटमा वेश्ने उदायीराजा प्रतिमा लेवा लाया तो प्रतिमा तिहाथी उठे नही एटनामा थाकाशवाणी थइ जे, प्रतिमा लइ जासो नदी, कारणके वीत जय नगरमा धूलनो कोट पडवावालो ने तेवारें प्रतिमाने तिहांज राखी पोतें चमप्रद्योतनने यांधी सरने चालतो थयो मार्गमा पंजसण पर्व थाव्या उदायीराजायें तिदा पडाव करयो, पंचसण कसा, थाइ महोत्सव कस्या, पोते उपवास करो रसोइ करनाराउने कसु के चंमप्र योतनने जे रुचे ते रमोइ करी जमाडजो एबु कहीने ठदायिराजा पोतानी जिनपूजाविक करणीमा प्रवर्न थइ गयो, रसोइ करनारें चम्प्रद्योतनने पूरघु के थापना सारु केवी रसोई वनावु ? चम्प्रद्योतन बोल्यो जे उदायि कहे ते वनावो, रसोयें कयूं तेमणे तो थाज पंजु सण पर्व के माटे उपवास कस्यो वे ते सनिली चम्प्रद्योतने विचार जे थाज एणे मने जहेर थापवानो विचार राख्यो रे तेमाटे जुदी जूदी रसोई करावे हे एवा नयथी वोल्यो जे तु पण याज उपवास करीश, उदायी राजा अमारो साधर्मी लाइ ,थमेपण एज धर्म पालीये .यें एवं रसोइ करनारे जर उदायी राजाने कसुंतेवारें उदापीयें जाएयु जे एधूर्तताथी बोल्यो खरो तो पण महारोतो साधर्मी थयो माटे एने खमाव्या विना पडिक्कमणु करतुं सूजे नदी एवं जाणी चम्प्रद्योतनन बदीखानामाथी कदाडावी पोतानी पासें वोलावी तेना जलाटे सोनानो पट्ट पधावी खमतखामणा करी सत्कार थापीने पागे श्रयवती नगरीये मोकली दीपो एवी रीतें वीजा नव्यजीवोय पण उदायी राजानी पेरें खमावतु; कोधनो त्याग करवो के जे थकी थाराधकपणु थाय ॥ वलीजो अपराध करीने खमावे नही तो थनर्थनी वृद्धि थाय तेनी उपर दृष्टांत कहे वे एक गाममा कोश्क कुंनार नामानुं गाउँ नरीने वेचवा थायो तेवारे तेनो एक वलव लेवा सारु गामना पूर्न लोक बोल्या जू था एक वनदनी गाडी चाले वे एतु वीजा लोकोये पण सांजस्यु श्रने गाडावावे जाप्यु जे था उष्ट लोको महारो एक बलव खोसी लेवानो उपाय करे ने माटे ए प्रत्यक्ष चोर बे केमके महारा तो वे बलव जे तेने दुपा वीने ए लोको एक यलद कहे वे, माटे कपटी ने एमचितवीते कुनार पोताना ठामहा वेचवामा एकचित्ते तस्पर यइ गयो तेवार वलवीयाने धूर्त लइ गया पली कुनार जेवारें वासण वेची तयार थयो तेवारे जोवा मामधु तो एक वलव दीतो नही पड़ी घणी हांको मारी के थरे महारो वलद कोण लइ गयो।। तेने जोको कव्वा लाग्या के यमेतो एकज बलवनी गाही साजली हती ते सानली कुंजार घणु 5 ख करवा लाग्यो बेवट निराश थश्ने पोताने स्थानके जतो रह्यो पण कोध करीने सात वर्ष लगण खेत्रखला धान्या, एकदा कोइ यक्षनी यात्रामा गामना लोको एकता थया , ते वखत गामना लोकोये पडद वजाव्यो के जे थमारा धानना क्षेत्र वाले रे ते प्रगट था ते सांजली कुंनार पोतानो वेष बदलावीने वोल्यो के जेनी एक वलवनी गाडी तमे वीठी दती ते तमारो धान वाले ने तेवारें लोकोयें जाप्पु जे एनी गा डीनो वसदी थापण लोकोये जीघेलो ने ते वेप बदलावीने बोले , माटे हवे एनो पल दी थापी यो नदी तो फरी धान बालशे, पनी कुनारने घजदीयो थापीने सर्व लोकोयें अपराध खमाथ्यो तेमाटे प्रथम बनता सुधी थपराधतो करवोज नदी एवीज टेव राखवी परंतु कदापि य जाय तो तरत खमतखामणा करी थपराधनी क्षमा मागी खेवी, के जेधी को थनर्थ थाय नही ए कोध उपर कुंजारनो दृष्टांत ॥ १ ॥ ॥ दवे जे पंचसणमां को धनो त्याग नही करे तेने जेम सटेला पानने बाहेर कहाडीने फेंकी थापीयें .ये तेनी पेठे मपथी वाहेर कहाडी मूकवो, तेना अपर दृष्टांत कहे ये एक खेडा गामनो रहेवासी को जाह्मण हतो, ते खेतीनो धधो करे, तेनो दल खेडवामा वलद हांकता दाकता गलीयो यश देशी गयो, तेने उगडवाना घणा प्रयत्न कखां पराणानी मार थापी, पादुयें माखो तो पण उतीने चाने नही, तेवारें ब्राह्मण रीसें धमधमतो ते वसवनी उपर खेत्रना ढंफा नाखवा लाग्यो ते तुंफा नाखतां नाखता यसव थाखो ढका गयो, कदर्थनाथी ते वलवर्नु श्वास रु धाणु तेयी मरण पाम्यो ब्राह्मणने गोहत्यानु पाप लाग्युं, ब्राह्मणे महापुरुपोनी पासेथी प्राय भिन सेवा माग्यु कयु के गोदत्यानो दम थापो, महापुरुपोयें कर्पु ताहारो क्रोध उतनो के नथी चतस्यो' ब्राह्मण वोल्यो दमणा यलदने देखु तो मारी नाख तेवारे महापुरुपोए कर्यु के था पापीने शो दम थापीयें के जेथी ए एच थाय एतो थमच एवु कही न्यात वादार कहाडी मूफ्यो एवीरीतें साधुपण जे कोधने त्यागे नही तो तेने सघ पाहार करी मूकवो ॥ हवे पोताथी थपराध थयो होय तो मृगावतीनी पेरें खमाववो पोतार्नु मन ४६ करीने मिष्ठामिठाई वेवो ते कया कहे ने एक दिवस श्रीमहावीरस्वामी कोसबी नगरी समो सखा, तिहां चर ने सूर्य के मूल विमाने वादवा श्राव्या, चवनवाला, मृगावती प्रमुख तिदा वेवी दती, तेमा चक्नवाला तो सूर्य अस्त थतो जाणी तिहाथी उठी पोताने उपासरे थावी थने मृगावती तो नगवाननी देशनामां मोदित यश यकी तिदांज वेशी रही, पनी सूर्य ने च जेवारें पोताने स्थानकें गया तेवारें थंधकार थइ रह्यो तिहां मृगावतीयें चंदनाने दीनी नही तेषी एक्लीन नय पामती उपासरे थावी तिदा इरियावदि पहिकमि चदनवा साने नमती थकी, पगचपी करती थकी कड़वा लागी के दे स्वामिनी' हु रात्रनी एकली श्दा श्रावी एयी दु थपराधणी थइ माटे थाप महारो ए थापराध खमजो, तेने चदनायें कर्पु दे नई व उत्तम कुलनी उपनी वो माटे तारे एम न करवु मृगावतीय कपुं दवे हूँ एम केशारे पण करूं नही एवु कहेती वारंवार चदनवालाने पगे लागती अझ मनथी खमा वती थकी तत्पर रहेलीने केवलज्ञान उपजी गयुं अने चवनाने तो चपी करावतां निज्ञ श्रावी गइ एवामां अंधकारने विपे सर्प थावतो जाणीने मृगावतीय चदनानो हाथ उपाडीने सथारा उपर मुफ्यो, तेवारें चवना जागृत थश्ने पुरावा लागी के महारो हाथ कोणे उपाख्यो, तेने मृगारतीय कर्पु सर्पनो सघटो थवाने लीधे में तमारो हाथ उंचो राख्यो, चदनायें पूब्धु एवा थधकारमा सर्प थावतो तमारा जाणवामा केवीरीतें थाव्यो' मृगावतीये कसु थापना प्रतापयो । चदनायें कम्यु, । तमोने केवलझान उपन्यु ? मृगावती बोली थापनी रुपायी तेवारें चदनायें जाए{ जे, थरे में केवलीनी थाशातना करी एवु चितवीने वारंवार खमा वती खमावती मिठामिकह देती देती, तेपण केवलज्ञान पामी ॥ एवीरीतें जव्यजीवोये मिठामिठकाड देवो परंतु कुनार थने चेलानी पेरे नही करखु ते कथा कदे ने जेम एक लघु शिप्प हतो त कुंजारनां नामा तावडे सूके तेने कांकरा मारे, ते जोइ कुंजारें कपुं दामा म फोडो, तेवारें शिष्य वोल्यो “मिछामिउकड" ते सानली कुनारें जाप्पु जे हवे नांमा फो डशे नही पण शिप्यतो फरीने तेवीज रीते कांकराथी कुनारना नामा फोडवा लाग्यो भने कुंजार नाकारो करे तेने शिष्य वारंवार मिठामिकड देवा लाग्यो, ते जो कुंनारे पण एक काकरो सर शिष्यना कानमा नाखीने कान मसव्यो, तेवारें शिप्य वोव्यो थरे कान उखे ने ते सांगली कुंनार बोल्यो मिठामिछकड एवीरीतें वारंवार चेलो कहे, थने कुनार मिशामि ।

सुमार्ड थापे माटे ए प्रकारे मिष्ठामिका देवाथी कार्यसिदिन थाय, वारंवार पाप करवा थने वारंवार मिछामिजकड देवो ते काममां न यावे तो मुं करवु ? तोके सासु जमाश्नी पेरें सर्व श्रजिया गलिया करवा, ते कथा कहे ने एक १६ स्त्री इती तेनी पासें घj दृष्य इतु परंतु पुत्र न दतो धने पोतें विधवा घणी जोनी थने कजुस दती धननो समद करे पण पेटमा खाय नही तेने एक दीकरी इती ते कोई कुलवान् बोकराने परणावी पण पोतें लोनी दती माटे जमाइने दायजो प्रमुख का दीवू नही तेथी जमा कचवाणो,नाखुश थयो होली दीवाली प्रमुख कोइ पर्वै जमवा थाव्यो नदी, तेवारें लोको वृक्ष स्त्रीने कद्देवा लाग्यो के थरे पापणी' था तदारो एफज जमाइ ले तेने पण जमाउती नथी। बोकरोतो ताहारे नही तो तदारु था धन ते कोण खाशे अने कोने काम थावशे तेवारें लोकिक रीती साचववा माटे जमाश्ने घणी मनवार करीने वोजाओ, थने कडेवराव्यु के दे जमाईजी एकलाज पधारजो ते सांगती जमाश्ना मित्रो कदेवा लाग्या के बाज तुजने सासु वधु इष्य थापीवेशे पठी जमाइ सामुने घेर एकलो जमवा गयो, तेने सासु खीर पीरसी वली वाटकीमा रुनो पुनडो नाखीने घृत पीरसवा थावी, वाटकी मांहेयी घृत, टीपु टीपु था जीमा पढे पण वधारे पडे नदी तेथी घणी देर लागी सामुयें विचास्नु जे जमाइ हमणा नाकारो करशे, थने जमाश्ये नाप्पु जे था तो मने उगवा यावी ले तेथी सासुनो दाथ प कही वाटकीर्नु महोडं थालीमा उy करी लीधु थने सामुने कव्वा लाग्यो के जीजी घणु थर्पु हवे म नाखो, सामुयें जाप्युं जे, थरे वाटकीतो खाली थइ गइ, घीतो वधु जमाजी खा जाशे एतो ठीक थनही माटे कांश युक्ति करवी एम विचारीने जमाने कदेवा लागी थाज तमे के हे जमाइजी थाजे तमारे थमारे रुस ने ते सर्व नांगो माटे श्रापणे वे नेला वेसी जमीय एम कही जमाश्नी नेली सार्थे जमवा वेठी पण जमाश्नी तरफ थालीन नीचाण वाजु थावेलु हतु तेथी घी सर्वे जमाइ तरफ थइ गर्यु दतु एवं जाणीने सासु उजनानु मिस करीने थांगुली मुघी पोतानी तरफ खेंचती जाय ने जमाश्जीने कलेती जाय के तदारामा एटला वांक के प्रथमतो तुं दोली उपर नही श्राव्यो,पीजो दीवाली पर नदी थाप्यो, त्रीजो थक्ष्यत्रीज उपर नही थाव्यो, एवं घोलती बोलती सर्व घृत पोतानी तरफ खेंची ली तेवार, जमाश्य जाप्पु जे सास्तो घणी समजणवाली देखाय के घीतो सर्व पोतानी तरफ खेंची जीधु एवु जाणी थालीमा दाय फेरवीने वोल्यो, सासुजी। जे थवान दतु ते थयुं पण दवे तमारु थने महारु वेहुनुं मन एक करी ल्यो थलिया गलिया थाज पढ़ी सर्व अपराध ॥ एवं कही थाली उपाडीने घी खांग सहित सर्व खीर जमाइ पीगयो थने वोल्यो दवे थापणु सर्व रुसणु मटी गयु माटे तमें खुशीमा रहेजो ॥ ॥ एवी रीतें धर्मार्थि जीवनें पण को राग र तपज्यो होय ते सर्व खमाववो पण पंजसपमा राग हेप राखवो नही मिशामिडकड दे वो ॥१॥ ॥ वली था पंजुसण पर्वमां कोध, मान, माया थने जोन करवो नदी एनी उपर थनेक दृष्टांत वे पण पंजुसण पर्वने विपे गोचरीमा क्रोध, मान, माया थने लोन ए चार वाना सर्वथा न करवा तेनी उपर दृष्टात कहेतो थको प्रथम कोषयी थाहारादिक लेवा थाश्रयी दृष्टात कहे वे दस्तिकल्पनामा नगरमा एक साधु मासितपने पारणे गोचरी क रवा माटे ब्राह्मणोमां को मरण पामेलान जमण थयुं तिहाँ गयो, तिहा ब्राह्मणो घेवर खाय रे साधु घणो वखत छनो रह्यो पण कोश्य साधुने दीधु नदी तेवारें साधु कोध करीने पोयो जे था थाजना जमणमा नदी थापो तो फरी जमण थाशे तेवार थापजा एव कही चालतो ययो, साधुन बोलवु छतु याय नही एटलामां वीजा मदीनाने पारणे फरी पण कोइक ब्राह्मण मरण पाम्यो तेना जमणमा वली साधु पण पारण करवा माटे गोच रीयें थाय्यो परंतु कोश्ये वहोराव्यु नही, तेवारें वली कोधथी वोल्यो, त्रीजाना जमणमा व होरावजो, एवं कही जतो रह्यो एम वली पण त्रीजा महीनामा कोइ मरण पाम्यो तेना ज मणमा पण बहोराव्यु नही तेवारें साधु कोषथी चोथाना जमणमा वदोरववानु बोल्यो ते शब्द को मोकरो पाल उपर वेठो हतो तेना काने पज्यो तेवारे मोशायें घरना धणीने कषु के था साधुने घेवर थापीने खुसी करो नदी तो वली पण कोइ मरशे एवं समजी साधुने योलावी घेवर वहोराष्यो जेम ए साधुयें क्रोधथी घेवर वदोसो तेवीरीतें कोइ पण साधुयें वहोरदुं नही ॥ ए कोपिम उपर गेवरीया साधुनो दृष्टांत ॥ १॥ ॥ दवे मानपिस तपर से या साघुनो दृष्टात कहे वे कोशलदेशमा गिरिपुष्पनामा नगरने विपे एक सेवोनु पर्व थाव्यु तेवार पुवान साधु एका मिल्या तेमा एक साधु बोल्यो थाजतो सेवैया पर्व वे माटे सेवोला वीशु तेमा वधाइ । परंतु काले प्रनातें खाम घी सहित जे सेवु लावीने सर्वे साधुन्ने ज माहे ते लब्धिवान् जाणवो तेवार वली एक शिष्य थनिमान फरीने बोल्यो जे छ कालें सेवो सपथावीने सर्व साधुउँने जमाई तो महारु नाम फलाणु ते खरे स्वरु करी जाणजो एवो: थनिमान करी वीजे दिरसे महोटा महोटा पात्रा जोलीमा नाखीने गोचरी गयो तिहां एक शेठने घेर सेवो देखीने मागवा लाग्यो के शेवाणीजी थमने सेवो वदोराव पण ते शेगणी लोनणी इती माटे बोजी, अरे जा जा,दूर जा,तुने सेवो नही मले, ए प्रमाणे जलकारीने का दाढी मूक्यो तेवारें चेलो बोल्यो तु जोतो खरी के दु जरुर तादारी पासेंधीज सेवो लइ जाउ तो महारूं नाम साघु जाणजे कोइ पण रीते थवश्य जर जश्श तेवारें शेवाणी योनी, जो तुं सेवो लइ जाय तो महारु नाक ग{ एम जाणजे परंतु मदारु नाक होयतो तुने सेवो लय जवा वेश्श नदी, ते सांनती साधु तिहाथी निकली श्रागल जश् कोश्ने पूघु के था घर कोर्नु ' एना घरनो मालक किहां ले ? तेवारे कोशए कधू, ए देवदत्तनुं घर , ते हमणा पचाय तीमा वेठगे , तेवार ते साधु तिहां गयो थने कहेवा लाग्यो अरे पंचातीयो तमारामा देव दस कोण ते पोल्या में काम ? साधुयें कहुं तेनी पासेथी काइ मागवू बे, पंचातीयो वोन्या थरे ए रुपण पामेथी मागवा चाहे ? ताहारे मागवु होयतो श्रमारी पासेथी माग के जेथो तादार कार्य सरे तेवारें देवदत्त घोल्यो हे साधुजी जे तमे मागशो ते द्व यापीश तेने चेलायें को दे देवदच जेवीरीतें-उ-जणा स्त्रीयोने वश इता, तेवीरीतें जो तु स्त्रीने वश न होय तो हूँ कद्दु के तहारी पासेयी का मात्र ते सांजली पंच पोल्या, ते उ जणा कोण दता! जे स्त्रीयोने वश थया दता तेनी कथा कहो तेवारें चेलो घोल्यो एक कुजपुत्र हतो ते परणीने-पनी स्त्रीने वश थयो, प्रनाते नूख लागी स्त्रीनी पासेथी खावा माग्यु, स्त्री दोजीया उपर वेठी यकीन कव्वा लागी के जो तुं जुख्यो दोय तो चुला माथी राख काहाडी बाहेर नाख, श्यण लाव, चूजामा थमी बाल, माथे हामी चडाव, तेमा पाणी नाख, कोवामाथी चावल लावी तेने सोधी साफ करीने हामीमा नारखी पचावीने त यार कर, तयार थया पढ़ी मने डॉक मारजे तो दु ठतीने पीरसी श्रापीश ए वात सांजली कुलपुत्र बोल्यो तुं कदे ले ते सत्य ने एम कही तहत्ति करीने पूर्वोक्त सर्व काम करवा ला गिवा लाग्यो के शेवाणीजी थमने सेवो हूँ एवो नथी॥ते बोल्यो जे था थाजना जमणमां नही थापो तो फरी जमण थाशे तेवारें थापजो कही चालतो थयो, साधुनुं वोलवु जुतु थाय नही एटलामा वीजा महीनाने पारणे फनी पण फोक ब्राह्मण मरण पाम्यो तेना जमणमा वली साध पण याव्यो परंतु कोश्य वदोराय - त्य करतो जाय प्रजातना नित्य चूलानी राख काहाडवी पडे तेने लीघे थांग वाल एम भोली पठी गर; लोकोये तेनु श्वेतांगुली एवं नाम थाप्यु तेम हे देववत्त तु पण स्त्रीने होय तो हुँ याचना करूं तेवारे देवदन वोज्यो दु स्त्रीने वश नथी । वली वीजा युवान बेचु था तो ते माथी एक वार्ता कही पण वीजी पांच वार्ता संजलाव साघु बो एक कुसपुत्र दतो ते स्त्रीने वश थयो तेने स्त्री ढोलीया उपर बेठी वेवी कहेवा लागी के द्वं गणी नही जावीश माटे तु जर तलाव उपरथी पाणी जरी लाव तो रोटला हुँ बनावी था शि तेपण स्त्रीने वश थयो थको लोकोनी लाजथी, जेवारें पाबली एक पदोर रात्री रहे तेवारें नत्य माथे घडोल पाणी जरी जर थाववा लाग्यो रात्रीना वगला प्रमुख जनावर वीक मीने तलाव उपरथी उडवा लागेराप्य थ तेथी लोकोये जाण्यु; था शं नित्य पश्व थाय ' वगला महारु नाम फलाबारे जाणवामा श्राव्यु जे कुल वगोको एबु नाम पाडी धु माटेस प्रमात्र स्त्री परणीने तेने काम करु? स्त्री ४ तो दोटा महोटा पात्रा जोलीमा नारवीर त्र पाणी नरवा बोनी, अरे जा जा,दूर जा,तुने सेवो नही मजे, ए प्रमः योजी माखीयो उमाह, माखीयो ठहामीने वली पूब्धु दवे करु? स्त्री वोली मलमूत्र परती थाव, ते परती थावीने फरी वोल्यो हवे शु करु' स्त्री बोली दुई रहु दु तु महारा पग माब चपी कर, तेवारें पग माववा लाग्यो ते जो लोक वोल्या, ए स्वीकिंकर वे तेम दे देवदत्त ? तु पण तेना जेवो होय तो हूँ याचना करु नही देवदत्तें कर्पु दु एवो नथी । फरी चोथी कथापू व्याथी साधु कहेवा लाग्यो एक कुलपुत्र स्त्रीने वश थश्ने तेना वस्त्रप्रमुख धोवान कार्य नित्य करे तेनु लोफोये तीर्थस्नाता एवु नाम दीघु एमज पांचमानु नाम गछापरखी जाणवु ॥ दवे व हानी कथा कहे वे एक कुलपुत्र स्त्रीने वश थयो, तेने पुत्र थयो स्त्री कहे बोकराने हंगावी लाव ते नित्य ठोकराने हंगावे, स्नान करावे, ते देखी लोकोये हवनीयो एवं नाम थाप्यु माटे एनी पेरें तु जो स्त्रीने वश न होय तो तदारी पासे याचना करु देवदत्त वोल्यो हुँ तेवो नथी तमे सुखे मागो॥ तेवारें घीजा सर्व पंचायती लोक बोल्या दे चेलाजी, स्त्रीने वश थयेलाना सर्व दोप एमा वे एतु दास्यपूर्वक वोख्या तेवारे देवदत्त बोल्यो हे जगवान् । एतो मदारी दासी करे ने थापने जे चाहना होय ते सुखे मागो तेवारें चेलो वोल्यो घृत श्रने खाम सहित सेवो वहोरावो देवदत्ते कषु चालो दु थापने वदोरावु एवु कही तिहाथी चाल्यो थने सा धुने साथै लय घेर थाष्यो तेने रस्तामा साधुयें कपु के तहारी स्त्रीतो महारी साथै जही के तेने देवदत्ते कयुं तमे घरनी वाहेर ऊना रहेजो हूँ वोलावु तेवारें थावजो पठी साधु याहेर उनो रह्यो, देवदत्त घरमा जश्ने स्त्रीने कदेवा लाग्यो, श्राज ब्राह्मणोने जमवानु कत्यु ते, ते जमवा थावशे का घरमा राधेलु थन्न ' ते बोली सेवों तयार देवदत्ते जाएषु ए स्वी उता तो देवाय नही एवु चितवीने स्वीने कयुं के नीसरणी चडीने उपरथी वृत गोल ल श्रावो ते स्त्री घृत गोल खेवा सारु नोसरणी उपर चडी ते वेलायें साधुने बोलायो साधु घोज्यो देवदत्त था नीसरणी जरा अजगी जइ व्यो तो सारीरीतें वहोरीश, वेवदत्ते नीसरणी दूर करी साधुयें रुडी रीतथी सेवों थने घृत गोलना पात्रा नरी लीघा, स्त्री उपर सनी उनी हांको करवा लागी, के थरे एने का वदोरावे ,था मुमो बे एवीरीतें वकवाद करवा लागी पण जोर चाक्युं नदी साधु पण पात्रा नरीने निकलतो थको नाक उपर थाटली फेरवीने स्वीने जणायु के तहारु नाक कपाश् गयुं एवी संझा करी उपासरे थावीने सर्व साधुयोने जमा ब्या एम जे रीतें ए साधुयें थनिमान करीने थाहार जीयो ते रीतें वीजा साधुयें थाहार लेवो नही ए कथा जो विस्तारें जोवी होयतो पिमनियुक्तिनी टीकाथी जोइ लेवी थाही संक्षेप मात्र लखेजी में 'ए मानपिम उपर दृष्टांत कह्यो । दवे मायापिम उपर थापाटनतिनो दृष्टांत कहे, जेणे राजगदी नगरीमा नटवाना घेरथी रूपपरावर्तन करीने पांच लाख वदोरया ने ए कथा प्रसिमले माटे लखी नथी तेवीरीतें पण साधुयें नही वोहोरखं ए मायापिंम पर दृष्टांत कह्यो॥३॥ ॥ दवे लोनपिंम अपर सिहकेसरीया साधुनो दृष्टांत कहे जे चपानग रीमां उरतवना दिवसें एक साधुयें मासखमणने 'पारणे अनियद लीधो के महारे थाज सिदकेसरीया मोदक वहोरवा पढी घरघर जम्यो पण लाडवा को थापे नदी थने बीजु यन्न तो साधु पण ले नही पनी लाड नदी मलवाथी मुनिनुं मन संक्लिष्ट यज्ञ गर्यु ते थम रात्री जगण घरघर धर्मसान देतो फम्रो लोनना वशथी रात्रनी खवर पा रही नही रात्रीय कोइएक प्रावकने घेर नइ धर्मलान दीघो ते आवक महागनीर ने मातापितासमान ले तेणे रात्रनो धर्मलान समितीने विचामुंजे कोइ कर्मना वशथी साधुन मन मगमग थइ गां ने एवं जाणीने तिहाथी उठयो जश्ने मुनिने वदना करी जोयुं तो साधु महातपस्वी देखाय ने तेने श्रावके पूरघु महाराज थापने से जोयें बैं? मुनियें का सिंदकेसरीया मोदक खपे । प्रावकें कषु सुखे लो, धमारे घेर घणा के निर्दोप डे एवु फहीने सिंदकेसरीया मोदकनो थाल नरी लाव्यो थने मुनिने वहोराष्या तेवार मुनिनु मन काणे थाप्युं श्रावक बोल्यो स्वामी पुरिमाईना पचस्काणनो वखत थाष्यो के नही ? मुनियें उपदेश थापीथाकाशमा नो तो निर्मज तारा, नक्षत्रनी श्रेणिसहित चश्माने जोई चित्त ठेकाणे थावी गपुं तेवार विचायं जे विकार से में था शं कसु । जे तु रात्रीनो गोचरी करवा निकल्यो। महारो साधुनो थाचार किहा गयो । एम पमाचाप करतो थको नगरनी बाहेर यावीने सूत्रोतविधिसहित मोदक परतवतो यको विचारे ने के थरे कर्मने जीततुं घट मुसकीज थरे में था खोटं काम कर्तु धर्मनी निदा करावी, एवीरीतें पमात्ताप करतो करतो शुक्लध्यान ध्यावतो थको पकणी चडीने केवलज्ञान पाम्यो इहां परमार्थ एजे के जेम एणे लोचना वशथी सिंदकेसरीया मो दक वदोया तेम वीजा साधुयें सेवा नदी एवां हां घणा दृष्टांतो वे पण थमे केटला ल खीयें ए सोनपिंग वपर दृष्टांत कह्यो॥ ४ ॥ ए पर्वमा सर्व प्रकारे क्रोधादिक नदी करवा ॥ हवे वर्षावमा पंजुसण करीने रहेला साधु साध्वीयें जीवादिकनी उत्पत्तिने लीघे प्रण उपा सरा राखवा तेमा जे वपासरार्मा पोतें रहे ते उपासरानें तो प्रतिदिवस प्रणवार पहिलेदण क रतुं पूजवो श्रने घीजा ये उपासराने एकवार पूजवा पहिलेदण करवां ए पूजवा पहिलेहवानी पच्चीसमी समाचारी जाणवी ॥२५॥ ॥ वादा रहेंला साधु साध्वीउने पोतानी मरजीमां थावे तिहां जवु होयतो गुरुने पूतीने जावू दिशि घतावीने जावु शिष्य पूजे जे के शा वास्ते पूजवा प्रयोजन कर्मु बे ? गुरु कहे , साधु जे जे ते चोमासा विना शेपकालमा तो सा। मान्य प्रकारना तप करे ने परंतु थोमासाना कालमा घणा प्रकारना विशेप तप करे ले माटे को तपस्वी वल होय भने किहाँ मुठी खाइ पडीजाय तो, जे दिशायें गयो होय ते विशायें थाचार्य याव राखीने निगाद करावे, स्वधर कादाडावे, शोध करावे जे एटलो वखत केम ला ग्यो तेमाटे खधर करावे ते सारु थाचार्यने पूीने पाहार जदूं जोयें ॥ ११ ॥ ए प्रतिजाग रण करवानी बबीसमी समाचारी जाणवी ॥२६॥ ॥ वर्षाकालमा चोमासु रहेजा साधु साध्वीठने थोपय प्रमुख कामने लीये वैद्यनी पासें जदूं पड़े तो चार योजन तथा पांच यो जनपर्यंत पोताना गामथी जे गाम दूर दोय ते गामे जव॑ एटले सोल तथा वीस कोश दूर जश्ने ते गामाथी थोप लइ पाडो फरी थावीने जो पोते रहेला गामनी मांहे उपासरामा दिवस | बतां धावी न शकाय तो तेन गामनी वाहेर थावी रहेतुं पण जे गाममा थोपधादिक लेवा गया ते गाममा रात्रे रहे नही थथवा दिवस बतां गामनी बाहेर न पोहोची शकाय तो मार्गमा रहेतु ॥ १२॥ ए श्रौपचाविक लेवा माटे चारथी पांच योजन जगें जवानी सत्तावी समी समाचारी जावी ॥२७॥ ॥ इत्यादिक संवत्सरीनो थविरकम्प जेवीरीतें कल्पसू प्रा कह्यो २ तेवी विपिथी करे, ज्ञान, दर्शन अने चारित्रनो मार्ग जेरीतें नगवाने को ले तेम करे, नजा प्रकारथी मन, वचन थने कायायें करी फरशे, थतिचाररहित पाले, विधि सहित शोना करी दीपावे, जाव जीव सुधी थाराधे, कांवे पहोचाडे, लोकोमा कीर्ति करे, थाराधीने 'थाहासदित पालीने केटसाएक निर्मथ तो तिदिज नवमा सीजे, तस्वने जाणी, फर्मोथी रहित थइ, सर्वसतापरहित थाने सर्व स्वथी 'लूटे, मोझ जाय, केटलाएक त्रीजे नवें सीजे, यावत् मोद जाय परंतु सात थाउ नवतो उलघे नदी तेमज केटलाएक सातमे तथा यातमे नवें तो थवश्य मोझ जाय ॥ ५३॥ ए चोमासानी मर्यादा पाले ते साधुने जे फन थाय तेनी यावीसमी समाचारी जाणवी ॥२७॥ ॥ ते कालने विपे, ते समयने पिपे श्रमणनगवत श्रीमहावीर स्वामी राजगृही नगरीयें गुणशील नामे चैत्यने विपे श्दा जे यागमा यदनु देदरु दोय ते पागने चैत्य कहीये ते चेत्यने विपे घणा साधुउँमा,घणी साध्वी उमा, घणा श्रावकोमा, धणी श्राविकाउँमा, घणा देवोमा, घणी देवीउँमा वेठा थका अर्थात् नगवान पार परपदामा वेग थका एवो वचने करीने कहे ए कल्पने पालवानुं फल वतावे एवो प्ररूपे, ए पंजुसणकल्पनामा थध्ययन दशाश्रुतस्कंधनो थाठमो अध्ययन, ते अर्थस हित, हेतुसहित, कारणसहित, सूत्रसहित, थर्थसहित, सूत्रार्थसहित, दृष्टांतसहित, वारवार उपदेश करीने देखाहे एवो वे जंबू (मे के०) दु था सूत्र जयागु स्वामीय रब्यु वशाच तस्कया थाउमो थध्ययन करीने रच्यो ने पण वाचना सर्व सुधर्मस्वामी श्रने जवुस्वामीनी जाणवी ॥६॥ ॥ ग्रंथायंय ॥ १२१६॥ इति नवम व्याख्यानम् ॥॥ ॥ इति श्रीकल्पसूत्रस्य घालावधोधिनी नापा समाप्ता ॥ ए कल्पसूत्र दशाश्रुतस्कधसूत्रनो थाउमो अध्ययन ,तिहां पण एर्नु सहिनाण ते ॥ सर्वेषु सूत्रेषु वरप्रशस्ति,र्यस्यास्ति सर्वेष्वतिमुख्यता च ॥ तत्कल्पसूत्रं मम कदपतुल्य, चारित्रकायै शुनगुरुत्सदास्तु ॥१॥ सौधर्मपट्टे सुपरंपरायां, सूरीश्वरा ये च वरा गनूवुः । वदे सदा तान वरसूत्रदान्वा, श्रीरत्नसूरीन्सुमुनींस्तथापि ॥२॥ श्रीमत्क्ष्मादिगुणवान् यशवाशमीशो, जात क्षमागणधर प्रवराम्जकर्ता ॥ चित्रा लता चरणसेवनतत्परानूत् तस्या पि तां हदि गुरु स च नो वधार ॥३॥ देवेंविजयो वद्य ,तछिप्यो बगुकीर्तिजाक् ॥ कल्याणवि जयस्तस्य, प्रमोवध प्रमोवयुक्॥४॥ सोधर्मस्वामिनो गडे, संति राजेंसरय ॥ तेनेयं कम्प सूत्रस्य, वार्ता घालावयोधिनी ॥ ५ ॥ कृता सूत्रपवेर्युक्ता, सर्वसारांशसयुता ।। सायोगोघदन येन, न कृतं तस्य देतवे ॥६॥ थवे स्ववेदनदेके, (१९८०) माघवे च सितेतरे ॥ पवे दिने वितीयायां, मगजे लिखिता त्वियम् ॥७॥ इति श्रीराजेंसूरिविरचितायां प्रारुतनापायां वालाव घोधिनी टीका कल्पसूत्रस्य समाप्ता ॥ श्रीरस्तु, कल्याणमस्तु ॥ सवत् १९४० ना वैशाखवदि बीजना दिवसें वालावबोधिनी टीका संपूर्ण थई ॥ जांबुवा नगरे । ॥जट्टारक श्रीराजेंसू रिकृता श्रीकल्पसूत्रस्य बालावबो, धिनी वार्ता समाप्ता॥ DIS थागलथी थाश्रय थापनार सादेयोना स्मरण करवा योग्य नामो नीचे जखीयें बेयें गामश्री वागरानां प्रावकोनां नाम जी, ए चारे नाश् शेत सबाजीना सुपुत्र सेनार नाम प्रत सख्या ने एमनी सकान गामश्री बालाजीना शा मोतीजी गजाजी थोसवाज एमनी देवल गाममा ने उकान कोंकणदेसना गामश्री पेनमा शा शा मनाजी, जेठाजी, सदाजी, ए त्रणे गजाजी केसवजीना नामथी चाले वे ११ ना शेठ मोटाजीना सुपुत्र ने एमनी शा जताजी, केशाजी, कुशनाजी, पेरा कान तालिकोटमा ने ԵԱ. जजी, धूमाजी, ए पांचे नाई शेठ शा राजाजी, मोतीजी, कुशनाजी, धन्ना खुप्ताजजीना सुपुत्र ने एमनी उकान जी, जखमाजी, ए पांचे ना शेठ दरगा करणाटक देसमो गामश्री निडगुदीमां ने १११ जीना सुपुत्र एमनीमकान तालिकोटमा ५१ शा वन्नाजी कस्तूरच ते शेव चिमना शा नरसिहजी ते शेठ मोटाजीनामुपुत्र ३१ जी हुकुमाजीना सुपुत्र डे एमनी कोला शा चुनीलालजी ते शेव देवराजजीना सु पुरमा कान ले १०० पुत्र जे गामश्री सीरोश्वालाने नामे शा खुमाजी, देवराजजी, कुशनाजी, उजखाय ने एमनीउकान पेनबदरमा २ ४१ नयाजी, नरसिघजी, ए पांचे नाश् शेव कस्तुरजी, गेनानी, चिमनाजी, खमाजी मनरूपजीना सुपुत्र ने एमनी गामश्री ए चारे ना ते शेत चेलाजीना सुपुत्र डे विमाहीमा जुकान, १०० एमनी स्कान गामश्री तालिकोटमा ३५ शा वानाजी, खुमाजी, दकमाजी, वन्ना शा राजाजी, प्रतापजी, सरूपजी, एत्र २ १ १ णे जाइ ते शेठ सवाजीना सुपुत्र एम शा मथुराजी, प्रेमाजी एवे ना ते शेव नी कान विनाडीमा ३५/ गुलावजीना सुपुत्र थाय एमनी कान शा मनाजी, हाजी, नरसिंघजी,एत्रणे चितोरनमा ने ५ जाइते शेव नगवानजीना सुपुत्र ने तथा शा मगाजी ते शेठ चेलाजीना सुपुत्र ५ शा धूलाजी ते शेव पन्नाजीना सुपुत्र ने खुमाजी ते शेव नूताजीना सुपुत्र थाय २ ए वे काका नाइ एमनी उकान गा शा इसाजी ते शेत खंबाजीना सुपुत्र मनी तालिकोटमा ने ५० शा मोतीजी ते शेठ जलाजीना सुपुत्र शा रतनाजी, मयुराजी, चेनाजी, हंसा शा फुशाजी ते शेत धूमाजीना सुपुत्र ५ जी ए चार नाश्ते शेत थमरिंगजीना मु वाश्ना शा मोतीजीनी घरवाली पुत्र एमनीस्कान गामश्री विमाडीमांचे १५ शा गोमाजी ते शेत जिवाजीना सुपुत्र शा जिवाजी ते शेत धुलाजीना सुपुत्र ने गामश्री सीयाणाना श्रावकोनी तरफथी एमनी कान चितोरर्गमा ने २५ शा केशरीमान, हेमराज, एबे ना ते शा खुशालजी, जेसाजी, ए वे ना ते शेव कस्तूरजीना सुपुत्र याय, एमनी शेठ पेयाजीनामुपुत्र थाय एमनी जान कान देवस गाममा जे ५० वणवेशनां गामश्री विजयपुरमा बे आशा जुबाजी ते शेव प्रेमाजीना सुपुत्र शा खुमाजी, नरसिघजी, जालाजी मेना शा कस्वरजी, कुशनाजी ५ जी, मोतीजी ए पांच नाश्ते शेव पन्नाजी शा सेराजी, देवाजी, लखमाजी नासुपुत्र एमनी कान धारवाडर्मा ने ५ शा जेसाजी, खुशालजी ५ - ५ p = r r R शा सुमाजी, जेताजी Hशा लखमाजी, सदाजी शा दीपाजी, खुमाजी ३ शा पन्नाजी, सूरतिंगजी संघवी नरसिंघजी, लालाजी २ शा फताजी, सरखमाजी शा मोतीजी, जूताजी २ शा नयाजीनी, घरवाली सा खुवाजी, परागजी १ शा वगताजी, सदाजी शा रासा, मन्नाजी १ शा नयाजी, खुशालजी शा ताराजी, वालाजी १ शा राजाजी, मनाजी |शा पन्नाजी, केशाजी १ शा पदमाजी, माह्याजी शा केशनाजी, सदाजी १ शा कपूरजी, शहाजी शा मोतीजी, गजाजी १ शा मनाजी, वफाजी शा गुलया, सूराजी १ मुतां फुशा, नथाजी सघवी सुरतिंगजी दोजाजी १ शा दीपाजी, जुताजी शा मोती, नगाजी १ शा हकमा, खुशालजी शा फुशा, गाजी १ शा थवा, गोमाजी शा खुमा, सदाजी १ शा अमरिंग, उरगाजी या वीवाजी, मनाजी, ए वे नाइशेव दे मुता वरदा, गोमाजी वाजीना सुपुत्र जे जे गाम श्रीकानदर शा जूता, पदमाजी वालाने नामे उलखाय ने ते १५ शा फोछ, जखमाजी १ - गामश्री थादोरना प्रावको तरफथी ते शेठ ढुकुमचवजीना सुपुत्र शा वनेचद, केशरमल, ए वे नाश्ते शेव शा प्रेमचदजी, मनजी मोतीजी, ए न्ताजीना सुपुत्र कान श्री मुखश्मा ले २५ त्रणे नाश् शेठ मकनाजीना सुपुत्र एम मुता कस्तूरचद, वाजाजी, ए वे जाइते नी उकान गामश्री पिंजरतमा ले ૫ शेव ठमाजीना सुपुत्र , एमनी कान शेत प्रतापजी, लालचंदजी, पुनमच गामश्री कल्याणीमा में १५ दजी, ते शेत जेठमलजीना सुपुत्र ५ सघव लखमाजी, थानाजी, ते शेव शा राश्चद, शोनाजी रूपाजीना सुपुत्र ठे ५ शा गुलावचद ते गेनाजीना बेटा शेव गोडीदाशनी, वागमलजी ५ शा धन्ना, पनाजी शा पन्नाजी, जुवारमानजी, ते शेठ शा सेरा, रूपाजी फुसाजीना सुपुत्र ५ गामश्री जालोरना प्रावको तरफथी मारी जूताजी, देमाजी, नीमाजी, ए मुता धनराजजी, जसवतराजजी, मुनि प्रणे नाश्ते शेव थचलाजीना सुपुत्र ने ५ लालजी, ए त्रणे नाश्ते मुता लालच शा हंसराज ते शेत नाथाजीना सुपुत्र दजी माफा वालाना गेकरा प एमनी कान गतूलमा उ ५ मुता मुजतानममजी, ते मुता उत्तमच मुता जवानजी, केशरमान, ए वे नाई ते शेव थचलाजीना सुपुत्र ५ जट्टारक नेरचवनी दयालचवजीना चेला . मुंता सूरजमलजी, चंदनमलजी, ए ये नार सीतारामजी जवानमहलजी एम - दजीना सुपुत्र १ नी कान थाबुरोड खराडीमां गामश्री शिवगजनी तरफथी गामश्री निन्नमालना श्रावको तरफथी शा मोतीजी, तुलसाजी, वन्नाजी, पो शा दीराजी, लखमाजी, नावाजी, माजी, हीराचदजी थने रामाजी एब माफावाजा ५ नाइन शेठ मेगाजीना सुपुत्र उकान मु शा केराजी, कानाजी 4 यश्मा मेगा मोतीजीना नामनी ने २५ शा जुवारमन, शिरवारमनजी २ शा लुपाजी, जेठाजी ५ शा गुलावचद, खूपचद २ शा रतनाजी, इट्टानी शा जखमाजी, कस्तूरचंद २|शा पन्नाजी, कलाजी गामकोसीजाव ૨ मुंता केवलचदजी, नगवानचंद ए ये गाम सावहाना श्रावकोना तरफथी ना ते मुंता तोलाजीना सुपुत्र २ शा नथाजी, मनरूपजी पोरवाड गामश्री थरावना आवको तरफथी शा जीफाजी, जोधाजी २ वोरा जीवा, बालु ५ शा महोनदासजी दोसी ला, लालजी २ शा सूराजी, वदाजी वोरा मोतीचंद, चंदाणा ५ शा वन्ना, कमानी दोसी हीरा, वीसदा २ गामश्री हरजीना आवको तरफथी गामश्री धानेराना प्रावकोनी मदत शा सूरतिंगजी, मनाजी मेता तलकचंद, नोजराज ५ शा नवला, 'उमाजी २ शा मूलजी, दानसिघ १ शा चेला, गजाजी । १ - १ शा वन्ना, खुशालजी गामनी खीमेलना पंचोनी तरफथी गामग्री कोसीलावनां पंच समस्त गामश्री गुमो पालोतरानो तेना पंच समस्तनी तरफथी शा नीखाजी, कुशनाजी पाहीवना दोसी कृष्णाजी, वनेचंदजी गामश्री कछ मुदविंदरना रेवासी शा गोकलना जरा गोधावी या जेठानी, जवेरचवजी अलीराजपुर शा दीराचव, कुंवरजी अलीराजपुर झा जीखाना रतनजी घोगा शा केशवजी, लेहेरा जाइ गाम श्रीक राधीपदर वाला शा मोटाजी, वाजी कालीधावाढी शा नगाजी, कुशनाली रेवतरा वाला शा लबानी, कुपाजी धानपुर वाला शा रूपाजी, प्रेमाजी शा लदा, हीरजी श्रमदानगर वाला ५ गामश्री थमदावादमा श्रमदावादनी ५ पांजरापोल वाली जैनसनानी तरफथी शा पुनमचद, ताराचद ५/शा पन्नाजी, थनाजी ५ मा वातानाइ, कमल शा लखमीचंद, जेठा ५ शा मयारामजी ते शेठजी धूमाजीना १ सुपुत्र गामश्री मामवहा B मुता उमेद मनजी, चंदरनाराजी गा १ मत्री एनेराने गुडे शा रिखनाजी ते शेत खुमाजी लखा जीना घेटा गामश्री जूतिना १ शा मोतीजी, नगाजी गामश्री कवला २ | शा लगवान, लवजी कोलीथाकवाला ५ गामश्री मुपश्ना श्रावको तरफथी २ वाइ प्रेमावाइ ते शा नागसी शिवजी २ नेणसीनी घरवाली ५ शेव घेजानाइ, पदमसी शा कस्तूरचद, नानयद त्रांबा कांटे शा योधवजी देवजी जामनगर वाला शेठ गणेसमन, सोनागमन जेन विद्याशाला तरफथी हा सा वृद्धि चद पुनमचद शा कशतुर, वालाजी शा कसतुरचद, तलकचद वशनाली पेठ शा जीवाजी, स्वीमाजी शा गुलावचद, केशवजी या फसाजी, नगाजी मुता नथा, रुपाजी गाम नीमडीना पंचो तरफथी शा हिंछ, जगजी शा केशा, जोदाजी बूडतराना मुता शवाजी, जखमाजी बूडतराना सा ताजी, फताजी शा उमाजी, खाशाजी, राजाजीना पुत्र ५ सा नयाजी, नोपाजी रक्षा नीमा, मोताजी १० शा जेशाजी, गोमाजी १|शा पन्नाजी, नावाजी शा वन्नाजी, शेनाजी ५ शा केवदाजी, खुशाजजी शशा मोतीजी, गुलाबचवजी १ शा खुमाजी, हंसराजजी १) शा दामाजी, साकलचंद १शा इसाजी, जेराजी १शा गुलाबचद, खुमाजी १सा पानाचव, जगन्नाथजी २शा जेताजी, कस्तुरचवजी १(शा मदाजी, विजिगजी १शा लालचंद, गुमनाजी १|शा जवानमन, नयाजी १|शा माणफजी, खुमाजी १/शा सूराजी, जेताजी MONAM KARANA MM APP RA शा दोलाजी, राजी १शा मनाजी, मासिघनी शा मनछाजी, थनेचद १|शा चेनाजी, गजाजी शा मनप्याजी, वनेचद १|शा धुरा, मासाजी शा लालचद, कपूरचद हालाखमी १शा ज्वारमझ, चेनाजी शा न्पासचद,थालमचवजी गाम सादरी ।शा मोटाजी, वीराजी शा दीपाजी, केशाजी १शा जेरुप, सलाजी शा गेना, थोस्वाजी १शा जिवाजी, थाणदाजी शा गेनाजी, तेजाजी १) शा जमनादास, लालजी शा जेताजी, जवाजी २)शा सुगरसी, धरमसी शा ताजी, तेजीनी १) शा उपाजी, कपुरचद कुदी शा वरसिघ, देवसी १ सा थाशाजी, राश्चद कुही शा खुमाजी, दिजी १ शा गोमाजी, जवेरचद कुक्की शा दिज्जी, थमरिंगजी १ शा दोलतराम, चुनीलाल राजगद शा नाना, थोखाजी १ शा जमुजी, चतुरनुज राजगढ शा मोती, पुरुपाजी श्री जावडाना संघ समस्त शा झाजी, मुजाजी १ श्री जांबुथाना सघ समस्त शा जेग, गरनारजी १)श्री वडनगरना सघ समस्त शा खुशालजी, खुमाजी शा दोलतराम, हरखचद राजगढ १५ ५ १ 0 पर

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AVAYAN) DROID ॥जट्टारकश्रीराजेंरिविरचितः॥ कल्पसूत्रस्य वालावबोधः समासः॥

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Kalpsutra Balavabodh

Author
Suri, Shrirajendra
Title
Kalpsutra Balavabodh
File name
Kalpsutra Balavabodh
Text
OCR done
Citation
1882
Published
2011/08
Publisher
Mumbai, Nirnyasagar Mudralaye
Language
Sanskrit
Pages
728
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314080
Barcode
99999990312229.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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