Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sanmati Tark Prakaranam Khand 1

Aacharya Sen Divakar · 2011/07

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ट
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प्रकाशक:-विठ्ठलदास मगनलाल कोठारी, गुजरात विद्यापीठ कार्यालय, अमदावाद.
मुद्रक:-रामचंद्र येसू शेडगे, निर्णयसागर प्रेस, नं. २३, कोलभाट लेन, मुंबई.
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प्रकाशकनुं निवेदन
डान र १९७९ मनासि नित करेटा
(मान!ि पोट) का मंदिर का दो माग
इसका मत नमूद करने का सुसजती सर
मसान मदन कुमार ने तो. लकारेर पुरानातदेला
रानी गाने , सरे को एक पाय रे मोटा मोटा मानो
रुपात देर ना माना TET अने अल मनो
कर बिमारी माना करन ने बननो मार डानी
डादले नुमाई की.
मदिरा बरहेटा, *सारी ला, बापरता त मंडकना
पाहा पायीदपालपदवीना मंगै ना!! समा बेदलो सच को हतो,
दे सस, रे बार बार बने पर कराये जर मर मिटर दे गये
-tar TETी लिना मंडळे दालो, न ने
Tठ पाहीलात पसादारी दातुन पना समन-कानडे इन
साल मसौदर, मरती केटश हल्लासित विजोना तो
दोन मार सरा नमकी मुसहर बना मददगार दरी या
हिनने स्टोर पर रोता हर अने ते काटे देनने ११९ मतनना बानो काला हवा.
देवन आसानी सरा.रा. श्रीकाटाल मेमचंद मोदी भारत माती.
जगदे बाहर जगरन सडक बने देता होनी भारताती
दान फिटने लोपटेफनो कार मानामा रे .
मकारक
भारसं. १९८०
गुजरात निदाउडर

संशोधनोपयुगाना लिमितादर्शाना समेताः। १० प्रति ग. . "" भनन्ननाय नमन्दिरमारागारीमा औ० (वि०) धीमहिनयानन्दमूरिसुनकगंगा प्रपतंकीमान्विनियामारामहगला पं० म्यासभीगुलापविजयपुधारमहगता पं० श्यामभीगम्भीरविजयामाहसंमहगना घचालनमाण्डागारीया टेलामाण्डागारीया पूर्णचन्द्रनाहरमाण्डागारीया पादपरप्रामसभाण्डागारीया भा० भावनगरसंपमाण्डागारीया माण्डारकरमाच्यविद्यासंशोपनमन्दिरीया मां० माण्डलप्रामस्थमाण्डागारीया पाडीपार्थनाथमाण्डागारीया श्रीमद्धिचन्द्रपुस्तकसंग्रहगता साणन्दप्रामस्थभाण्डागारीया हालामाईमाण्डागारीया " या भां० या. सा. हा. श्रीमत्रियानन्दमूरिपुस्तकसंग्रहगत पुस्खकरपम्, प्राचीन मा.वि नामा निररेशिनरीनं पावि०'इति नाना। २ चचलनभाण्डागारीय पुस्तकस्यम्, तत्र पूर्ण चं. पू.'पति नाप्ता, भपूर्ण तु..ति नाना म्यपारेशि ।

टीकागतानामुलेखानां स्थानसंकेताः । भाषेद-आ. पत्या आचारामधन्। अन्धेर-अलनि। मिनिम्मम् (मामांसाइनन् ) नत्यापापिगमरम्। अमेनिस्तनापति पारसनन् (गौतम) न्यायपातिकम्। प्रामरतिमा। पन्या न्यायदा महामामादिप मीमा पोपर धास्वाभा. चाकमा महामारलभादि। मीमांसानिन (मिनिमन्) उदयोग पायपदीयम्। पालापनमाम् (मामा) कासमा गनिमास | शविरम् () पम् (AAR) मोरवानिपम् । (हार) शोबार मारास स्सिा . सत

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मादानिरसनम् ।
संगनिरसनम्।
आमपरिमाणवादः।
रोग्भुित्वस्यापनम् ।
सानो निमुन्यं निरस्स देहमानग्यव्ययस्थापनम् ।
एसद्रमामयसाधनम् ।
मुफिसरूपवादः।
मुन्टो सात्यन्तिकरिशेषगुणोच्छेदस्य स्थापनम् ।
मुक्ती मात्यन्तिकाविशेषगुणोच्छेदस्य निरसनम् ।

संपादकीय निवेदन अनेक उपयोगी विषयोनो उहापोह करती विस्तृत प्रसावना तो प्रस्तुत ग्रंथ संपूर्ण छपाई रमा पछौज लखी शकाय, असारे तो आ संक्षिप्त निवेदनमा मुख्य पात्रतोतुं सूचन करवान है (क) अंपर्नु पिशिष्टत्व अने (स) प्रकाशननी योजना. (क) प्रधनी विशिष्टता निम्नलिखित पे पायतोथी जाणी शमशे (१) मंथकार भने (२) ग्रंपर्नु पासाभ्यन्तर वरूप. (१) ग्रंथकार (मूळकार) समयः मूळना कर्ता आचार्य सिद्धसेन दिवाकर 2. जैनपरंपरा प्रमाणे तेओ विक्रमनी पटेली शताब्दीमा गई गएला मनाय छे. तेभो दिगम्बराचार्य कुन्दकुन्द अने समंतभद्र ए यन्नेना पहेला यया होय तेवी संभावनानां वेटलांक फारणो छे वेमज श्वेताम्बर भने दिगम्बरनो पंथभेद थया पहेलो पण वेमो थपा होय तेम मानवानां फेटोक कारणो छे. तेथी विक्रमनी पहेली शताब्दीमां मओ ययानी जैनपरंपरा पर गम्भीरपणे ऐतिहासिकोए विचार करवो जोईए. अत्यारे फेदलाक ऐतिहासिको तेओने विकमनी पांचमी शताब्दीमा मुझे छे. स्थान, जाति अने धर्म: तेजोन जन्मसान विदित नधी, पण उन्नयिनी अने तेनी आजुयाजुए तेओए जीवन गान्यु होय एम जणाय हे, तेपी सेभोना मंथोनी रचना पण तेज प्रदेशमा धयानो समय हे. देओ जाते माह्मण अने खुलपमें वैदिक हता, पण पाठयपी तेमणे जैनाचार्य वृद्धवादीनी पासे जैनदीक्षा लीधी हती, योग्यताः दिवाकर असाधारण जेन पार्शनिक अने संस्कृत पाउन भाषाना विद्वान् हता एटलंज नहि पण तेओ मध्यकालीन प्रधान भारतीय दार्शनिक विद्वानोमांना एक हता, एम तेभोनी कृतिभोज कही आपे छे. तेमनी विचारमा उदारता, प्रतिभामा स्वतनवा, ज्ञानमा स्पष्टता, गधपधलेस- नमा सिद्धहसता भने घस्तुस्पर्शमां सूक्ष्मवा तथा विविध दर्शनोना मौलिक स्वरूपमा निष्णातता, एयधुं तेओनी बोडी पण उपलब्ध कृतिभोमा पास्यवाश्यमा जोनारने नजरे पडो. कृतिओर उपलब्ध कृतियोमा संमति मूल प्राकृत छे. एकवीस पत्रीसीओ, न्यायावतार सथा कल्याणमंदिर संस्कृत छे. कल्यागमंदिरमा तीर्थकर पार्श्वनाथनी स्तुति छ. न्यायाववार ए संस्कृत जैन साहित्यमा पद्यध मादि वय होई ममस्त जैन तर्कसाहित्यना पाया पे छे. पत्रीसीओ स्तुतिरूप होवा छतां तेमा दानिक विषयो छे. वैदिक, बौद्ध भने जैन ए समकालीन समम भारतीय दर्शनोनुं स्वरूप से पत्रीसीमोमों छे. मा पत्रीसीओज पदर्शनसमुथय अने सर्वदर्शनसंग्रहनी प्राथमिक भूमिका रे. सिद्धसेननुं पीज नाम गिन्धहसी' हवं वेओए आचारांगना प्रथम अध्ययन पपर विवरण उल्यं हतुं, जे 'गन्धइलिविवरण' कहेवाय थे, माजे ते सालब्ध नयी. टीकाकार टीकाकार अभयदेव, श्वेतापरीय रानगरमा भएल प्राममूरिना शिष्य होई दामा सकामांबई गया है. सेमोनी जाति, जन्मसान आदि शान नीलेभोनी पीजी कति पलप के

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सचापदार्थनिरसनम्।
संयोगनिरसनम् ।
आत्मपरिमाणवादः।
आत्मनो त्रिभुत्वस्यापनम् ।
आरमनो निमुन्यं निरस्य देहमानत्यव्यवस्थापनम् ।
दस द्रव्यात्मकस्वसाधनम् ।
मुक्तिस्वरूपवादः।
मुक्की आत्यन्तिकविशेषगुणोच्छेदस स्थापनम् ।
मुक्ती मायन्तिकाविशेषगुणोच्छेदस निरसनम् ।
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संपादकीय निवेदन अनेक उपयोगी विपयोनो उहापोह करनी विरास प्राश्ना तो प्रस्तुत ग्रंथ संपूर्ण पाई गीन ससी काय. भसारे को मा संशिम निवेदनमा मुगए थे पायनोनुं बन करपार्नु है (क ) ग्रंथन विशिएत्य भने (R) प्रकाशननी योजना. (क) पनी विशिष्टता निजिपिच पे पापनोधी आणी शारे (१) पंधकार भने (२) अंपर्नु पासाभ्यन्तर रूप (१) ग्रंथकार (मळकार) समयः मूएना कर्मा भारार्य सिद्धगेन दिवाकर ले. अनपरंपरा प्रमाणे मोशियनो पहेली गादीमा पई गएडा मगाय से. तेभो दिगम्पराधार्य पुदमन्द भने ममंद ए बनना पहेलोपया होय क्षेत्री भावनागा फेटलाफ पारणी के समान वेणाबर भने दिगम्बनी पंप या पहेलो पण देमो थया होय रोग भानवानो पेटलांक कारणोते. पी विप्र मनी पहली भो पपानी नपरंपरा पर गम्भीरपणे ऐतिहामिकोए विधार परवो भोईर, मतपेला ऐतिहामिको सेभोने विक्रमनी पापभी दामादीमा मूो . खान, जाति अने धर्म: तेश्रो जन्मस्थान पिदिल गयी, पण मयिनी भने ऐनी माग हेमीप जीवन गायु कोष एम जणाय , मेथी लेओना योनी सपना पक्ष सेन भईसमो पायो are भी जाते आपण मो इतिहमा पाप गरी नापारी पाहे जैनदीधा लीधी हती. पोपवा:यार भमाधारण जमदानिक भने म माह माना मदिन सेभो मध्यकालीन प्रधान भारतीय शासनिक विदामोमांना पानी भोगादी मापे ऐ. होमनी विधारमो भारता, प्रतिमा सना ER RETRATn. ant सिमा भने पो सूक्ष्मता ना निविभागोवा मौदिक दrat feeren र भोगी मोदी पण ARE Nोगो पायायमा ओनारने गरे हतियो: are विमा संमति RITED. एसजीम धीमीयोमार या पाल्यापमंदिर रोग से, बाबासमदिरा नाकर पारी म. सद Hrrrrr दिलो पर मादि मंच हो मत 7 mimitran Rd. सभी एशिरूप दोरा Cart निमियो, कि RE TEST ARE AIR दर्शनोई से जाम . भा भोग NRITTER मनी भाविक भूमिका निसेनाली' arerite RTE were free releasettोन दोकामार र सte And L Rar nhat, रेकी RRC Ratnी भुत नधी. अलबव तेभो बादमहार्णवना कर्ता कहेवाय छ, 'पण संमति उपरनी टीकाना । वादो जोतां फेटलाफ एम पण माने छे के 'तत्त्ववोधविधायिनी' टीकार्नुज चीजें नाम वादमा हो. गमे तेम होय पण अभयदेवसूरि दार्शनिक विपयना असाधारण विद्वान् हता, तेमा संदेह नथी. (२) ग्रंथन याद्याभ्यन्तरस्वरूप वासस्वरूपः प्रस्तुत प्रथमा मूळ- भने टीका ए ऐ अंशो छे. मूळनुं नाम संमति टीकार्नु नाम तत्त्वयोपविधायिनी छे. मूळ प्राश्त मापामां मने टीका संस्कृत भाषामा छे. मूळनी रचना आर्यापद्यमय भने ते प्रण मागो (काण्डो) मा यहेंचाएली छे. टी रचना गद्यमय छे. मूळर्नु परिमाण १६७ गाथामो जेटलं छे. पहेला काण्डमा ५४, पीजामां भने श्रीजामा ७० गायामो छे. टीकार्नु परिमाण २५००० लोक जेटलुं छे. आभ्यन्तरस्वरूपः मूळ अने टीका पनेना विपयो दार्शनिक छ, परंतु से यया दार्श विषयोनी पर्चा तेमा भनेकान्तदृष्टिए करयामा भाषी छे. वे रीवेज अनेकान्तरष्टिन सरूप, प्यामि तथा नी उपयोगिता सिद्ध करवामां भावी छे. वेधी प्रस्तुत पंधने भनेकान्तर पार्शनिक ग्रंप कहेवो जोईए, मूहनी प्रतिपादनसरणी भागमाश्रित एतां सर्कसंगत है. मां जैनागमसिद्ध समभंगी, मान, दर्शन, द्रव्य, पयाय विगेरे पदार्थोन धार्मिक पद्धतिए पृथक्करण करी अनेका सप पनारयामां माथ्यु ऐ भने से पण प्रधानपणे भागमिक प्राचीन जैनाचार्योने मिला टीपानी दोगी पिटकुल जूही . सेमा अन्य दर्गनोना निरसननी दृष्टि मुख्य छे. मूळ जेटलु , दटी टीका विशाळ . टीकाबारे जे जे विषयना पादो टन्या , ते ते विषय र बलते भारतीय ममम दर्शनीमा जेटमा मत मतान्तरो अने पक्ष प्रतिपक्षी हना, सेमयानी वि मोध करी है. सभी आ टीकाने विक्रमनी दामी शताब्दी गुधीना दर्शनविषयक या संग्रहम्यान कही एकाप. मंपनी मुख्य टि अनेकान्नन महरप रिपारीने टीकाकारे पादपति विद्वत्तापूर्वक पोटदी जे विषयमा पार सर करपानो दोष, विषयमा सोपी पदला सिद्धान्तपीय पंगटो सो पहेलो पहार आदी पोनानी मन मारे, सारवार मिसान्नी भोछो येगळो। पीओ पर भारी पोताना मलने स्वामी प्रथम पनी गनिमी दूर करे ऐ; सारयार मि अनसनाले हलो त्रीतो पार आनी पीना पानी मूठो गुधारे , भने ए को मा सामान्यादी मिलादी मावी प्रतिपक्षीनुं मन्नत्य शोधी मनेन रष्टि विपद जो मानो ओईर, बसावे छे. माती वारपाल गोटवेयी दोवा कोई पनि पर सामान, अन ए बी पनपार व शो को मार, भने बांगर, नाम र थी दौसानी प्रतिपादन गर भनेकी र माय माताजी छाप, मां कोई पारि र पुन मदन म भनुम्मे र रामा ir, अनेक मां पर मनपरभोईवर प.

. फे टीकामा मेंफडो दानिक ग्रंथोन दोहन जणाय , तो सामान्य रीते मीमांसक मन मोकयातिया, नालन्दा विश्वविद्यालयना आचार्य शातिरक्षितकृत सत्त्वसंप्रद उपरनी व पंजिका भने दिगम्बराचार्य प्रभापाना प्रमेयफमलमात अने न्यायकुगुचंद्रोदय सन्यो प्रतिविम्य मुख्यपणे आ टीफामा छ, सेवी रीते वादिदेवसूरिनो स्वाद्वादरमाकर, मूरिनी सादादमंजरी, उपान्याय यशोविजयजीनी नयोपदेश उपरनी नयागृततरंगिणी भने शासवार्तासमुपयनी टीका मारि पानी कृतिमोमा संगतिनी टीकार्नु प्रतिविम्य छ; संमतिना अभ्यासके संमतिदीकामा प्रतिविम्य पाहनार अने संमतिटीका प्रतिबिम्ब शीलनार मुफ पझे प्रफारना मन्यो जोया पटे. (ख) प्रकाशननी योजना मध्यम कालीन दर्शनसाहित्यमा संमति मूळ अने वेनी टीका, ए यनेनुं आकर्षक स्थान छे; समज टीकामा दार्शनिक साहित्सना इतिहास अने दार्शनिक विद्वानोना इतिहासनी पुष्कळ सामग्री मळी राफे सेम छे. आधी विशिष्टवाने लीज मा संस्थाए प्रस्तुत प्रन्यनी शुद्ध आवृति तैयार करवा विचार करेलो छे. जोफे संमति उपर पणी टीकाओ होवानो उल्लेस छे, छतां एक श्वेताम्बराचार्य मालवादित अने पीजी दिगम्बराचार्य सुमतिशत होपातुं निश्चित प्रमाण मळे हे. पण प्रत्यारे तो सेमांनी एफे उपलब्ध नी. तेथी भने विस्तृत उतां महत्त्वनी होवापी अभयदेवनी टीकाज प्रसिद्ध करवानें संस्थाए पसंद कयु है. प्रस्तुत टीका पणी विस्तृत, गहन अने संस्कृत भाषामां होपाधी, मूळ ग्रंथ टुंको, प्रसा भने प्राय छता साधारण जिज्ञासुमोधी पण अपरिचित रहो छे, अने दरेक पोताने तेनो अधिकारी मानवां अचाप छे; परी हकीकत तेवी नथी. जो संक्षिप्त पण सरल टीका होय, अगर मापामां विषेषक अनुयार होय हो संमति मूळ कोई पण साधारण अभ्यासिने पाहा यई शके तेवु छ; मा हेतुयी संमतिनो अनुवाद करवानी कल्पना मंदिरे पसंद करी, पण ते अनुवाद कर्या पहेलो तेनुं भने तेनी टीकार्नु संशोधन करी नारायुं, ए पण उचित जणायुं. आ फारणपी असारे मंदिरे नीचे प्रमाणे योजना विधारी रासी :- सटीक मूळ प्रधनुं प्रण भागमा प्रकाशन करखं; पोया मागमा मूळ प्रथनो अनुवाद, भने समा सटीक पंथने लगता उपयोगी परिशिष्टो, प्रस्तायना, विस्तृत अनुक्रमणिका विगैरे आपां. आयोजना प्रमाणे माने अदी पर्ष थयां काम पालतां पहेलो भाग प्रकाशित थाय छे. मुफ जोवाना दृष्टिदोषपी के कंपोझिटरोना दोपथी जे भूलो रही गई हशे से पधी परापर जोई रिपत्रमा भापवान तो आगळ बनशे, एम जे जे भूलो अनायासे नजरे पड़ी गई, मात्र वेज शुद्धिपत्रमा भापेली के तेथी आ शुद्धिपत्र अधुज ऐ. अमे अभ्यामिओने विगवीर डीए तेओ ने नानी मोटी कोई पण भूल जए, तेनी पृष्ठपतिधार भमने सूचना आपे. अमे तेओल देवी सूपनाने साभार प्रकट कर. भा संशोधन कार्यमा उपयोगी याय माटे अनेक हलसिसिव प्रतिमो हिंदुसानना जता मागोमांपी मळी. सापनी पण संहित प्रतिमो के. आपली प्रतिमोर्नु विगववार तिरे पादयो मविष्यनी दी प्रसारनामो जनाधारो. मलारे वो दे प्रति + नारं तेना मालिकोने धन्यवाद आपीए डीए. प्राप्त प्रतियोगांधी केटलीकनां नाम वाचक तेश्रोना संकेतपरिशिष्टमां जोई शकतो. प्रस्तुत विभागमा टीकाकारे प्रथना के प्रयंकारना, नामपूर्वक अगर नाम मियाय, अपूर्व के पूर्ण जे जे उदेसो कर्या छे ते पधानां स्थानो अमे इच्छा अने प्रयत्न छता संपूर्ण रीते आणी शम्या नथी. छतां उल्लेसोना जे स्थानो अमे नोंध्यां छे, तेना संकेतोर्नु स्पष्टीकरण मा माग माये आपवामां आवे छे. जे उल्लेखोनां मूळस्थानो नथी मण्या मोनी पासे खुल्ला चौरस कोष्टको राखेला है. अभ्यासिओने विनंती , के, अमे उल्लेसोनां जे जे सानो आन्यां मां तेओ मुधारवा जे जूए अगर नहि मळेल स्थानवाला उल्लेखोना स्थानी लेओना ध्यानमां आवे तो तेओ अमने ए पg लसी जणावे. अमे तेओना श्रमनी पहुन कीमती नोंघ लईशु. प्रस्तुत भागमा पहेली गाया अने तेनी संपूर्ण टीका आवे छे. तेनुं परिमाण लगमग साडामाव हजार श्लोक जेटलु हो, तेमा जेटला मुख्य विषयो आव्या छे ते वयानो विस्तृत अनुक्रम तो ठेवटेज अपाशे. असारे तो आ भागमा आवेला मुख्य पादो अने तेने अंगे फराएला विभागोनी भने वचे याचे प्रसंगथी आवेला ध्यान देवा योग्य सास विषयोनी नोंघ विपयानुकमा आपेली छे. एटले या विषयानुक्रम, ए टीकागत मुख्य मुख्य वादो अने तेना भन्नर्गत मुख्य मुख्य विभागो तथा प्रासंगिक उपयोगी विषयोनी नोंध मात्र छे. पाठांतर विगैरेनी समजः आ प्रथना संशोधन माटे अमे लगभग २५ प्रतिभो. भेगी करी हती, तेमाथी १७ प्रतिओनो उपयोग करेलो छे, एनां नामो प्रतिओना संकेतोने सष्ट करतां जणावेलां छे. ए प्रतिओमांनी चारेक प्रतिओमा फोईना करेला टिप्पणो पण हता, ते टिप्पणो, पाठांतरों अने अमे पण फेटलेक स्थळे टिप्पणो आपेलां छे ते अधू अमे प्रत्येक पानानी नीचे लीटी दोरीने आपेलु छे. जे जे प्रतिमाथी टिप्पण लीधेला छे ते ते प्रविनां नाम ए टिप्पणो साथै आपेला छे. प्रतिनां टिप्पणो । 'मा निशान बच्चे मूकेला छे. अभो भयर्नु पृ० २५० ३८ मा० टि० - एटले आत्मारामजीनी प्रतिमा मावेलु टिप्पण. पाठांतरो मोटा अक्षरमा (पालु अक्षरमा ) मूफेलां छे. क्यांय याय अमे फेवळ अशुद्ध पाठांतरो पण मूफेल हे ते एटटा माटे फे, लेखफ के घाचक विगेरे फक अक्षरोनी समानताथी भने पोतानी असावधानता विगेरेनां कारणोयी फेवी फेयी जाननां पाठांतरो वधारी मूफ छे ए जाणी शकाय, संभव हे के, 'प्रथमां क्या क्या प्रकारे मशुद्धिभो षधे छ भने फेया फेवा पाठभेदो पाय, तेनो इतिहास लसनारने आयां अशुद्ध पाठांतरोनो पण उपयोग पाय. जे टिप्मयो थमे करेला छे ते माटे फY निशान करेलु नथी. पची प्रतियोमा टीकानो पाठ लेखक (एहिया) विगैरेना दोपथी अमुख आँ गयो ऐ एम जो मां अयानुसंधान के पाक्यरचना आदिधी जणायुं त्या त्या ते पाठ फायग राणी मुधारया जेटलो माग (पाट के अशर) .) भारा निशाना मूकेलो. भमे एका फेटला पाठोने शुद्ध पाखामा प्रमेयकमउमान मो रुपयोग विशेष करेलो . भने क्याप पयाय प्रशमरतिपकरण, . पास्यापनमाय एका पीना पर प्रपनो आपर टोमेटो ९. जे जे म्प३ ए पाठ सुधारेतो धे परे ए गुपारी जे प्रपने भावारे करवामां माम्यो से से प्रयनो पाठ निशानमा नाना अमरोमा गोलो छ भने माय ते ते प्रथना प्रपंजिन मानले. जे विशेष मार पाठोने अमे मुधारी नयी शम्मा ते पाठशे पासे ? आमंगचित गूछे भने पेटला पंडित पाटोनी नीचे 'ए पाटो लगभग हिन तागे' सीन पर करेटी. भागना परेक पारमकमा पोसो बोगतवार पूर्णपक्ष राम पादेलो भने पती उधरपक्षमा ते पूर्वपक्षनी प्रत्येक दडील गंडन करवामां आरे हे. उपमोजो पूरी जे ने दी मंन करवामां भारेलु ए दरेक लीन्द्र पूर्वपक्षमा बोसो भारी हे हेर्नु मन गुपया अमे परेक वरपक्षना पानानी मीपे भीटी दोरीने पूरभनी से मे लीनां परिभो आगेड, जे जीवापी प्रत्येक निजामु उत्तरपनने बांपनी दबने पूर्वमनी पर हमेय दलीलोने गहेलाधी पार समजी करो. भा परोतां मां शारे 'ममे भा यात पहली वही है सर , करे शटे ए पाने हाकारे कहेली दोष से मां पर निनो पर आप पेटलेक पले भमे प्रतिसाद विषयमी आदिमा भाग लिनो बने में उपयोग करलो रे भने ए पान एटले { । मानिगान माम दुगना करने एटा माटे फे, जो या कोई विपपना प्रतिमा व दीजी पghीयो एक प्रांगेपाले सीपभोगांभादि जागीचाप भी च ५५० १५...... या पहेलो भाग पार या जमने पर translim fearlie * मगिर धीपविजयजीए पीज गिती महायता tree wोगा. चादाम संपादकीयं निवेदनम् 1 विवेचित विविध विषया विस्तृवा प्रस्तावना तु न प्रासकाला समप्रम्य प्रन्यस्य प्रकाशनान् प्रारु, अतः साम्प्रदामिह (क) ग्रन्थस विशिष्टता (स) प्रकाशनस योजना चेति वस्तुद्वयमेव प्राधान्येन प्रदर्शयितुं सनीहामहे । (क) सत्र (१) अन्यस कर्वन (२) पासाभ्यन्तरसरूपं घ वर्गयित्वैय सदीया विशिष्टता प्रतिपाचवे। " .. (१) अन्यस्य कर्तारः (मूलकाराः) समय:-मूलरूस प्रोवारसत्रमयन्त आषा: सिद्धसेनदिवारा विकमीपप्रथमशवादीबसिन इन्स्यगम्यते आरम्परिप्रगदेन । आचार्य सिद्धसेना दिगम्बराचार्याभ्यां दुन्दकुन्द-समन्दमदारयां मार, अंगम्बर-दिगम्बरसम्प्रदाययोः पार्थक्यान मार पास इति सम्भावनायाः सापारत्वेन पाएपरिको गवेषनापियरेविहासिकोपेक्षणीयः । इशानीन्तनास्तु केचिदेतिहासिकालागापापार किमीयरधमाकागारोन सम्प्रपारपन्ति । मान-साति-धर्माः परि भाषायांगां नागापि जन्मादित्यानानि परिनिमितानि वयाऽपि मारपांगा पीपा पा रामपानी सनायिनी तेषां विहारभूमिरिति परम्परातः भरणा नदीयाः पापोडी र प्रदेवियतन्मान इति सम्माध्यते । भाचार्यमिद्धसेना यपरि माया प्रामगा, इसपर्मेन परिपतवानी बहुश्रुतलपारिसमनन्तरमापार्यशादिनामन्तवामिलेन जैनी रामहीपरः। प्रतिमा:-भारागिना जैनदर्शनरम्परेनियन रिघुने गरि विग्मु गन्यता मग ममेर, पातु ममाटीनादिक-पौद्ध-अनादिममममारतीयानपारदसिविकाग- मारकी दीयाः हाव एक गाभियः । तेन प्रामाविशारला, पानिमा पसारा रसना, बस्नुमानिमुखी बारिता, गाणीया दर्शनोपनियोपिला, पानापारी मामा साया प्रशिकार्य तदीया ति। इतर-मिदमे देर र धिायमापानि । बर संमविवार वार, पायावतार, नाममन्दिाम्, पमितिम वार्षिशिकाः | सही मदाय निरममायन प्रति ग्यामाता अगाई. কম নম্বর ব্য। কাশবং ইয়োথ सो परराष्ट्र मीर: INR मुशाभी भी frART Irfar मरहाटमा ergon (RTriri: महामाये मनमा wakinadan भन्दा पर Int rastrita सचिमुरम्प् । - .

टीकाकारा: टीकाया रचयितारः श्रीमदभयदेवसूरयः श्वेवाभरराजगरछीयप्रद्युमरिशिष्यत्वेन प्रसिद्धा विक्रमीयामशतानीभाजः । वेपो जन्मस्थान-जातिप्रभृति नैव विदिवम्, अन्यास्तु वकवयो न भूयन्ते। यद्यपि पादमहार्णवसकृतिलेन पयचिदुल्लिसितो भाति तथाऽपि दीर्घातिदीपंवादमालाजटिल प्रस्तुतां टीकामेष पादमहार्णवत्वेन कल्पयन्ति केचिरित्यास्तों यावत् । किंतु भीमभयदेवमूरीणामसाधारणे दारांनिकवैदुष्ये नैव विद्यते संशयलेशः । (२) ग्रन्यस्य पाधाऽभ्यन्तरखरूपम् पासं सरूपम्-मूलं संमविसंघर्फ प्रातार्यापद्यमयं काण्डत्रयविमर्क सप्तपष्टपुत्तरशत- संख्यकमायापरिमितम् । टीका प वरवयोपविधायिनी' संशिता संरकवचमयी पचविंशतिसहस्र- संख्यकसोकपरिमिता वर्तते । आभ्यन्तरं वरूपम्-विषयोऽस्य प्रन्यस्यानेकान्तप्रधानो दार्शनिको वैदिवव्यः । मूलकार्जनदर्शनमात्रप्रसिद्धान् नय-सप्तमनी-मान-दर्शन-द्रव्य-पयांयादिपदार्थान अवस्था- पयितुं ताकिपडत्या बानेर पदार्थान् विशदीकृत्यानेकान्तस्वरूपं प्रविष्ठापितम्, तप प्रधाननया स्वतीय पुरातनान आगमिकान मिलक्ष्यीत्यैवेति मूलकारीया शैली। टीकाकारीया चान्येव, नैरत प्राधान्येन दर्शनान्वरीयप्रषादनिरसनमुदिश्य दार्शनिस्वादसंग्रहालयप्रत्यय टीका निरमायि । सः घयदा कधिदपि दार्शनिको विषयश्चर्पयितुमुपगम्यते तदा सद्विपयायलम्यिनः सर्वेऽपि पक्षकार प्रमेनोपतिठमानाः स्वं खं पदं स्थापयितुकामाः पूर्वपूर्ववादिस्थापिवं प* दूपयन्ति । पर्यषगाने सिद्धान्ती सावादी प्रागुपन्यतान् सर्वानेष पक्षान् ययासंभ ममीक्ष्य सिद्धान्वं मादुरो ईदया प प्रतिपादनमा प्रस्तुता टीका सर्वविषयस्पर्शिनिर्णायकसमापतिसमशतामनेकस भूषिता स्वतन पर्चापरिषद स्मारयति । মীনামামিনাকষানি- নাৰিশ্ববিত্তবানায়াবিন प्रदीयफमलशीलतपत्रिका-दिगम्बराचार्यमापन्द्रकृतप्रमेयकमलमार्तण्ड-न्यायकुमुदचन्द्रोदयः तीम् सपूर्षपतिनो मन्यान विम्वत्वेनाश्रयमागेपा टीका स्वोत्तरवर्तिमिः पारिदेवमूरिकतम्या: कर-महिपेणमूरियतसादादमसरी-वाचायशोविजयकृतनयोपदेशीय-शानशामगुरदीय मृतिमिर्मर्षियत्वेनामितेति टीकामेनां विशुभिरमयेऽपि से प्रन्या अवस्पटम्याः । (ख) प्रकाशनपोजना। मुसमदर्शनविदाससाममोकनया गृणीयमध्यमकालीनता निरमयान्यवमाया प अन्यमणे संशोग्य प्रकारानं शिशीतिमनया संस्थया । অবমানান্তু ঘী মরিয়া ঘষ: শষাঘাষাইন, दिगम्बराचार्य मुमविकतारदेन संम्पका उग्य उम्पन्ने नान्मासाम् । उपलभ्यते भाभी सोयेति व भारतीयपेन निर्धारिता। দিলীম মেমা নানয়ম ছিল না। RE: संहरनभिधारि मता ins

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ছিঃ ভাগ মগ থমথ্যা মামলা রুমাঃ-যনি শ্ৰীঘাষণা শনিয়া মুনা বাদাম। ধময়া, খাড়া যা লাক্তনমূম, যম যায়না। যে কি পথ খুন বিমাথােম। ' খাটিমােঃ' বি গান টি । দাষ ত্তৈ ই থাক দুধ বা খাতে মণি পুষী নিনি, বর- মশ খ মহিমান সুলেই যুবমথিল্পনা মম্বা ফ্রী নিয়ে যুদ্ধ অথই যা দুর্ঘস্থায় সুচিঠি যা ঘুম স্কন্ধ মাথা নষণায় প্রমাঘলা ধলা- ধকে খুগ্ধ ধ ধ নিয়াম যা রিয়াৰী সৰা দেয়বাংলা সুখী ময়াে নাম। শা ধ ধ য মনলামি দির গল্প যুত্ব পানি খালি কবুল্লানি ঋণ যথাঃ হােৰি। হ মৰিম বিষয় নিন সনালয় স্ব গণি সামান্য ভগামী চাষামো খা যায়বিয়া বা, স্বামী ও খলাগাননামানী রাষ্ট্র সলিব না। {সালে বিদ্যম, অন ব} মুকায়ে বিঃ নিমিটি, মুল {} যুবামে সাশ বিঃ ‘পূবৰমুখ বিশ গরি না মিষ্টি। যখ খাল ২৫ এ ৪. पृ. ५९५. ३२ इति। জন্ম মম মাম হীনা সম্ববাৰিবিৰাকা বিশ্বমিঃ মুহাঃ সহি যারনিমিনুষ যখনুখি হয় ৪ লা ঘয়। सुखलाला ঘাময়।

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{ অনু। श्रीसिद्धसेनदिवाकररचितं संमतितर्क-प्रकरणम् । বললাম-বয়ানন-ব্যাঘৰীসঅনুবিদিন तत्त्ववोधविधायिन्याख्यया व्याख्यया सहितम् । মুঠিয়ামীলমৗয়। মাধ্যময়ী বৰ নিগম # { মধ্যবিধি মঠ মােঠ ধা। নাবিল মানুষ অনানু ॥ a # মানুষ মাখামায়িশা যা। মদিনা মহা নাম থান বিদ্যা। -মামাশ্ববমিষঘনিনা সিবেমালদিশা দশনায়লালেখাৱাৰ-গােখলেয়ৰ ৰাখি। मदोरपिमपमकामानां पातरजोरापमधिगुणं भवयानां मेन VIDE-१५ ধামা, পশুখমীক্ষা' বি মা মাঘী মামামামামাম- মহিলনাযাযামিন শিখা নমূনাম- লেগে রুমানঃ “ছিঃ শিশ্নঃ খবি মামা মাসােমিকায় দিন " র ** =""""" মাবিল'- - ''='। ="' *** • • •ৰবসনসমামা " "': '... * -- ":". ন... : সাধু গানামণি *** : """ । •". : এ ব্যাথা , যাই সাতাশেশব খাবমূরি-মাগা-মাং রাখে পাবি গামা- বিনিশাখা হামলৗথম প্রথম। বিয়াম খ্রিলাল মখলিশ।}}} সমা খায়া ঘামিও না, ধোকা - ১ খে বা খাল সনদ বা গান্তনু, দিলিশ, মাগনষ্ট মেমরি, খণপিছু। রাম)। ২-সি.? ।। । । .

२ प्रामाण्यवाद। -- [खताप्रामाण्यपक्षः] अप्रादुर्मीमांसका:-अतथास्यमकाको हास्यापार प्रमाणम्, तस्यायनयान प्रामाण्यम्, तर स्वतः उत्पचौ, स्वकार्य यथावस्थितार्थपरिष्वेदलक्षणे, स्वसाने च कसामनीचतिरिक्तगुणादिसामध्यन्तरममावान्दर-स्वसंवेदनमहयानऐसत्यान् । ५च प्रामाण्यं स्वत उच्यते इति । अत्र च प्रयोगः- ये यन्ना प्रत्यनपेक्षास्त तर- यथाऽग्रिकला कारपसामनी भारोत्पादने, अनपेक्षं च प्रामाण्यमुत्पत्ती, स्वायें, मत [ परतःप्रामाण्यपक्ष: अत्र परताप्रामाण्ययादिना मेरयन्ति~अनपेक्षत्वमसिद्धम्। तयाहि-उत्पचौ ठा विज्ञानोगदककारमयतिरिक्तगुणादिकारणान्तरमापेसम, तदन्यप-व्यतिरेकानुविध १० तथाच प्रयोगः यत् चक्षुरायतिरिक्तमाया मायायुविधायि पद तसापेशा, पणा चाराधनिरिक्तमावा-भावानुविधापि च प्रामाण्यम् इति समायहेतु, तसादुलती स्वशाय च सापेक्षयान् परतः । तपाहि-ये प्रतीक्षितप्रत्ययान्तरोदया न हेस धर्मका यथाऽभामाण्यादयः, प्रतामिनप्रत्ययान्तरोदयं च प्रामाण्यं तत्र इति रिया तथा पती व मापेक्षयान् परतः तयाहि-ये सन्देह-विपर्ययाऽध्यासिततनरस्ते परतो- १५ स्थितस्वरूपाः, यया स्याप्यादयः, तपा च सन्देह-विपपंयाऽभ्यासितस्वमायं केगधि मामाग्यमिनि स्वमायहेतुः । पूर्वपट:-१) उत्पत्ती प्रामाण्यस सम्बसाधनम् ] सत्र मायदुदम्-मामाप्यं विमानोलाकारणत्यनिरिदयमादिकारणसम नदार, रोगमायावादमय प प्रमाणतोऽनुपदयः । नयादि न तायन् मपक्षध २०६गवार गुनान प्रदातुं समर्थम् शान्दियनेन्द्रियाणां तगानामपि प्रतिरागुमनः । मनियमान नियनलगाया ानुमानम्य प्रतियसन निगमलेनोमा मनियमन्दियानगुनः गद ग लिस? आहोमिनमानेन इनि परमप्रिभितगुमराहमसायाधमादकमायुपगम्यने तरयुक्तम् । मामलामादसायरायभायात् गविनितांत" भान समाराया प्रदीरने, दमनमः पातमा पनि FOR! मलितपम पीतालिममरम F: दम परमानन , माता मायापतीति । य प्रमाणाम् .नार पटकन माना जा १.orm. Hari प्रपत्र माद पनाम | अपाशा भारमनंटनपरिम. - errTIMETHEIRRE पर यायो नानुमान Fr ... पहा! arriageTARTAmare "नयमनातannr र निगममा मात्र writy Farmint. . 1 . . .rai. Kn:*. kigort... REE

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४ प्रामाण्यवाद। - ५ तरसाधन एप गुंणविकल सामग्रीलक्षणात् कारणाद् विमानमुत्पद्यते तत एव प्रामाण्यमति 'गुणपयक्षुरादिभायाभावानुविधायित्वात्' इत्यसिद्धो हेतुः। अत एयोपसी 'सामायालग- मैपेक्षत्यं नासिद्धम्, अनपेशत्वयिएखस सापेक्षत्वा विपक्षे सहायान् तनो व्यायत्रीमानो हेनुः स्वसाध्येन व्याप्यते इति विषद्धा-उनैकान्तिकत्वयोरण्यमाव इति भवत्यतो हेनोः स्वसाध्यमितिः । अर्थतथात्वपरिच्छेदरूपा घशक्तिः प्रामाण्यम् । शादायश्च सर्वमायानां स्वन एव भवन्ति, नोत्पादककारणकलापाधीनाः। तदुकम्- "स्वतः सर्वप्रमाणानां प्रामाण्यमिति गम्यताम् । नहि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन पार्यते" [सो० पा० सू०२, सो ४७] पतच नैध सत्कार्यदर्शनसमाश्रयणादमिघीयते, किंतु यः कार्यधर्मः कारणकलापेऽस्ति स एवं १० कारणकलापादुपजायमाने कार्य तत पयोदयमासादयति; यथा मृत्पिण्डे विद्यमाना मगदयो घटेऽपि मृत्पिण्डादुपजायमाने मृत्पिण्डरूपादिद्वारेणोपजायन्ते । ये पुनः कार्यधाः कारणेघवि. धमाना न ते कारणेग्यः कार्ये उदयमासादयति तत एव प्रादुर्भवन्ति, किंतु स्वतः, यया घटस्यैवोदकाहरणशक्ति, तथा विज्ञानेऽप्यर्थवयात्यपरिच्छेदशतिः चक्षुरादिषु विज्ञानकारणेप्रवि. घमाना न तत एव भवति, किंतु स्वत एप प्रादुर्मयति । किंचोक्तम्- "आत्मलामे हि मायानां कारणापेक्षिता त्। लम्धात्मनां स्वकार्येषु प्रवृत्तिः स्वयमेव तु" | [लो पा सू०२, लो२४८] तयाहि- "मृपिण्ड-दण्ड-चक्रादि घटो जन्मन्यपेक्षते । उदकाहरणे तस्य तदपेक्षा न विद्यते"। [ 1 इति । अथ चक्षुरादेविज्ञानकारणादुपजायमानत्वात् प्रामाण्यं परत उपजायत इति यद्यमिधीयते, २० तदम्युपगम्यत एव । प्रेरणाद्धरपि अपौरुपैयविधिवास्यममवायाः प्रामाण्योत्पत्यम्युपगमात् । तथाऽनुमानबुद्धिरपि गृहीताविनामावानन्यापेक्षलिङ्गादुपजायमाना तत पब गृहीतमामाण्या उपजायत इति सर्वत्र विज्ञानकारणकलापयतिरिक्तकारणान्तरानपेसमुपजायमानं प्रामाण्यं स्वत उत्पद्यते' इति नोत्पत्ती परतःप्रामाण्यम् ॥ - [पूर्वपक्षः-(२) कार्ये प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वसाधनम् ] नापि 'स्वकार्येऽर्थतथाभावपरिच्छेदलक्षणे प्रवर्तमान प्रमाणं स्वोत्पादककारणव्यतिरिवानि. मित्चापेक्ष प्रवर्चते' इत्यमिधातुं शक्यम्; यतस्तनिमित्तान्तरमपेक्ष्य स्वकार्य प्रयत्मानं किं संवाद प्रत्ययमपेक्ष्य प्रवर्तते ! आहोस्वित् स्योत्पादककारणगुणानपेक्ष्य प्रवर्चते ? इति विकल्पद्वयम् । तत्र यद्याधो विकल्पोऽभ्युपगम्यते, तदा चकलक्षणं दूपणमापतति । तथाहि-प्रमाणस्य स्त्रकायें प्रवृ. सौ सत्यामर्थक्रियार्थिनां प्रवृत्तिः, प्रवृत्ती चार्थक्रियाशानोत्पत्तिलक्षणः संवादः, तं च संघारमा ३० पेक्ष्य प्रमाणं स्वकार्येऽर्थतथाभावपरिच्छेदलक्षणे प्रयत इति यावत् प्रमाणस्य स्वकार्ये न प्रवृ. तिर्न वावदर्थक्रियार्थिनां प्रवृत्तिः, तामन्तरेण नार्थक्रियाज्ञानसंवादः, तत्सद्भायं विना ममाणस्य तदपेक्षसे स्वकार्य न प्रवृत्तिरिति स्पष्टं चमकलक्षणं दूषणमिति । न च भाविनं संवादप्रत्ययमपेक्ष्य A णय तिन अय कार्ये प्रथ- मन्याप्रम्-...।१यं हेतुः पृ.१,पं .। ३ एलर 'यामध्यन्त रानपेक्षतम्' पृ. २, प.।। "सर" (नसमाप्रयगार) गु.टि.। ५ वा. रिना सर-मासादयन्तिन ततपर-बलारिपाठ.। "दि भागः सामलामा सकालमरेशन्त, पटौ है मतिरादि सम्मनि एर भोट, नोराही पापनमरि सोसना गुनार, दररका कारणमरेरा मामतात विश्पनियये मनरेशमेर" वि-छोवा कायाम् (ो. दा. सू. १, को..)। समिधान शायम्-मा• । तपेक्षस्यका-गु.। - अपने भाण्डे-- संते. तदपि स्वकारणागुणमानापेक्षमित्यनवस्थासमवतारो दुर्निपार इति । अथ प्रमाणकारणगुण- शानं कारणगुणानानपेशा प्रमापारणगुणपरिसदलक्षणे स्वकार्ये प्रवर्समे, तर्हि ममापामपि स्थकारणगुणज्ञानानपेक्षवार्थपरिच्छेदलक्षणे स्वकार्य प्रतिप्यत रति वर्षे प्रमाणससकारणगु. पशानापेक्षणमिति न स्वकार्ये प्रवर्तमान प्रमाणमन्यापेक्षम् । तदुक्तम्- "जाप्तेऽपि यदि रिभाने तायमापोऽधधार्यते। यावत् कारणत्वं न प्रमाणान्तराद् गतम् ।। तर मानान्तरोत्पादः प्रतीक्ष्यः कारणान्तरात् । यापनि परिच्छिा शुद्धिस्तावदसरसमा । तसापि फारणाद्धर्न शानस्य प्रमाणता। सस्थाप्येवमितीत्यनुन कचिघरतिष्ठले"ति [लो० पासू० २, सो०५२-५०१० सेन से प्रतीक्षितप्रत्ययान्तरोदयाः' इति प्रयोगे तोरसिदिः । तस्मात-स्वसामप्रीत उपजा. समानं ममापमयापारम्पपरिच्छेदशचियुकमेपोपजायत इति स्वकार्येऽपि प्रवृत्तिः स्वतः इति स्थितम् ॥ पूर्वपक्षः-(३) निधये प्रामापस स्वतस्त्वमापनम् ] मापि प्रमाण प्रामाण्यनिधयेऽन्यापेक्षम् । तापेक्षमाणं किं कारणगुणानपेक्षसे आहोखिन १५ संपादम् ! ति पिकापरयम् । तत्र यदि स्वकारसगुणानपेक्षत इति पक्षः कसीक्रियते, सोऽसंगत स्वकारगुणानां प्रत्यक्ष-तत्पूर्षकानुमानामावेनासत्यस्य प्रागेव प्रतिपावनात् । अपामिपीपते- यो यः कार्प विशेषा स स गुणवत्कारपबिशेषपूर्वक, यथा मासादादिविशेष, कार्यविशेषप पदापस्थितापपरिद प्रति स्वभावहेनुरिति, पतदसम्बद्धम्। परिच्छेदस्य चयापस्थितार्थपरि. ठेवस्वासिता । तपादि-परिरथ पपापस्थितीपंपरिच्छेदत्य कि शुभकारकासन्यरधन! उन २० संवादित्वेन! माहोस्विर यापारहितत्वेन ? उतविद् अर्थतधारयेन! ति पिकताः । तत्र पदि गुमपत्कारपजन्यत्वेनेति पसा, सन युवा इतरेतराध्यदोषमझाद । तपादि-गुपयाकारण अन्पावन परिच्छेदस्य पधापस्थितार्थपरिच्छेदत्यम्, तत्परिच्छेदमाप गुपपत्कारजन्यायमिति परि. स्फुरभितरेतरामयस्पम् । अप संपादिपेन शानस यपापस्थितार्पपरिच्छेदस्य रिसायने, लय पायापकासहस्सात्र पर्श दुनिधारत्यान् । तपाहि-न पाएर विज्ञानस्य यथायस्थितार्यपरिच्छेस.२५ लामो विशेष सिम्पति, न तापत् तरपूर्षिका प्रवृत्तिः संयापार्थिनाम्, पापपन प्रवृतिन तापद नियासंघाद, पापप न संपादोन तापदू विज्ञान पधापस्थितापरिजेपन्यासितिरिति पराका मसहप्रागेव प्रतिपादितः। अथ पाधारहिनन विहानस पधापरित्यमम्पयसीयते, तर प्पसरतम्। स्थाrयुपगमपिरोधाद। सदभ्युपगमपिरोपय-यापारिहर दुसमापन्य साधन. रापमान पोऽनङ्गीकरणाद। पासपुरया तदनशनलसपस तु विहानगरिदिशादिश्य.३० स्वेन तययस्यापपरपानुपपरे । अधार्यतपारवेन यथापस्थितार्थपरिषदलसषो विशेरो विहान भवस्थाप्यते, सोऽपि न युवा इतरेतरामपोपप्रसाद । सधादि-सिरेऽयंतचामा नदिहानथा. तयामायपरिदयसिरिरिस भातपाभावसितिरिति परिस्फुटमितरेतपतम्। तम कारणगुणापेक्षा मामापतिः । अप संपादापेक्षा प्रामाण्यविनिया, सोऽपि म पुन्हा पता संशाहानं कि समानमावीयमायुपगम्यते ! आहोरिषद मिप्रजातीपम् नि पुनपरि विपास २५ दूपम् । तत्र पदि समाजातीय संपायकमन्युपगम्यते, तावापि ययानम्-धिमेसन्तानमा धम् । मिसवानरमपं था। यदि निमसम्मानमम समानजाती नामान्तर संवादरनिन्द भ्युपगमा,अपमप्यनुपमा अतिनसमा । अतिस-देपालपटविहान प्रति पटर- निशनस्यापि मंपादकरयसअप समामसन्तानमयं समानतातीपं सनातरं सारसम्म गम्यते, सात्रापि पकायम्-किंतर पूर्वमापाभिमतरिानीवारिपप! निभविस्यम् । १ असोगपरम्-१.१ ५ ११।१०-२०१५-पस्थितरित्रपर, *..

६ प्रामाण्यवादः। इति । तन योफार्थयिषमिति पक्षा, सोऽनुपपा एमार्थविग्याने मंयाध-संगफयोगवि. पात् । तथाहिएकविषयत्वे सति पया प्राननमुरारकालमापिनो विशमीकमन्नानप्रमयन्य समानजातीयस्य न संवाद तथोत्तरकालमाग्यपि न स्यात् । किंय, तदुत्तरकालमात्रि ममान- जातीयमेकविषयं कुत्ता प्रमाणत्येने सिद्धम्-यन प्रथमस्य-मामायं निश्यायपति ? तदुत्तरका 3लभाविनोऽन्यस्मात् तथाविधादेयेति, चेत्, तद तस्याप्यन्यसात् तयाविधादेव त्यनवस्था । अथोत्तरफालभाविनलथाविधस्य प्रथमप्रमाणात प्रामाण्यनिश्चया, .ताई प्रयमस्योत्तरकाल. मापिनः प्रमाणात् तनिश्चयः, उत्तरकालभाविनोऽपि प्रथमममाणादिति तदेयतरेतरामयत्वम् । अथ प्रथमो-तरयोरेकविषयस्य-समानजातीयत्यै सन्तानवाविशेषेऽयस्त्यन्यो विशेषः, यतो विशेषाद उत्तर प्रथमस्य प्रामाण्यं निश्चाययति, ने पुनः प्रथममुत्तरस्य, स.च विशेषः इत्- - रस्य कारणशुद्धिपरिक्षानानन्तरमाविरयम् । ननु. कारणशुद्धिपरिक्षानमयक्रियापरिमानमन्तरेण न सम्भवति, तर च चक्रकदोषः प्राक प्रतिपादित. इति नायक्रियाशानसम्मयः सम्भव या तत एव प्रामाण्य निश्चयय ,संजातत्याद यर्थमुत्तरकालभाविनः . कारणशुद्धिज्ञानवि. शेपसमन्वितस्य पूर्वप्रामाण्यापगमहेतुत्वकल्पनम् । तर समानजातीयमेरुसन्तानप्रमवमैकार्थमु. तरज्ञानं पूर्वमानप्रामाण्यनिश्वायकम् । अथ भिन्नार्थं तद् ज्ञानं पूर्वगानप्रामाण्यनिश्चायकम् , तद- प्ययुक्तम् एवं सति शुक्तिकायां रजतमानस्य तथामूर्त शुकिकाशानं मीमापनिधायकं स्यात् । तन समानजातीयमुत्तरमानं पूर्वज्ञानस्य मामाण्यनिश्वायकम् । अथ मिन्नजातीयं प्रामाण्यनिश्चाय- कमिति पक्षः, तत्रापि वक्तव्यम्-किम् अर्थक्रियाज्ञानम् ? उन अन्यन् ।। तत्रान्यदिति न बकायम्, घटज्ञानस्यापि पटकानप्रामाण्यनिश्वायकत्यप्रसङ्गात् । अधार्थक्रियासानं संवादकमित्य युपगम', अयमपि न युक्ता अर्थक्रियामानस्यैव प्रामाण्य निश्चयाभावे प्रवृत्याधभावनचक्रकदोपेणासम्भवात् । अथ प्रामाण्यनिश्चयाभावेऽपि संशयादपि प्रवृत्तिसम्भवानार्थक्रियाज्ञानस्यासम्मयः, तर्हि प्रामाण्य: निश्चयो व्यर्थः। तथाहि-प्रामाण्यनिश्चयमन्तरेण प्रवृत्त: 'विसंवादमाग मा भूवम्' इत्यय- क्रिया प्रामाण्यनिश्चयमन्वेपते, सा च प्रवृत्तिस्तनिश्चयमन्तरेणापि संजानेति व्ययः प्रामाण्य- 'कुतःप्रामाण्य- योन्याश्रयदोशः तथाभात्र प्रदेशः किनियन्धनः । तदुक्तम्- *"यय प्रथम शानं तरसंवादमपेक्षते । संयादेनापि संवादः पुनर्मग्यस्तथैव हि ॥ [ कस्यचिनु यदीप्येत स्वत एवं प्रमाणता । प्रथमस्य तथाभावे प्रदेष केन हेतुना? ॥ [ श्लो० वा० मु० २, श्लो० ७६] संपादस्याथ पूर्येण संवादित्वात् प्रमाणता। अन्योन्याशयभाधेन न प्रामाण्यं प्रकल्पते ।। इति। अधापि - स्यादर्थक्रियाज्ञानमर्धाभावे नष्टमिति न तत् स्वप्रामाण्यनिधयेऽन्यापेक्षम, साप. नशानं तु अमायेऽपि दृष्टमिति-तत् प्रामाण्यनिश्चयेऽर्थक्रियाशानापेक्षमिति, एनप्यसङ्गतम्। ५अर्थक्रियाज्ञानम्याप्यमन्तरेण स्वादशायां दर्शनान्। न च स्यम-जाप्रशाऽपस्ययोः कश्चिविशेषः प्रतिपादयितुं शक्यः। अधार्थक्रियामानं फलायाप्तिरूपत्यास स्वनामाण्य निश्चयेऽन्यापेक्षा, साधना विनिमांसि पुनर्गन नार्थनियायातिरूपं भयति तत् समामाण्यनिधयेऽन्यापेक्षम् । तथाहि- जलायमासिनि जाने समुपन पाना-उधगाहनाधिनः किमेतरशानायमासि जलमभिमतं फलं सापयिप्पति, उत म' इति सातारा तत्प्रामाण्यविचार प्रसाद्रियन्ते पाना-ऽवगाहनाया. माणमेय गु.। २.५-५० १५. यामम् टी. २... । अस्मिनंद 4.01 ५सानाको तत्रा एनदेव की "मरा भE:"-(पृ. 140 hि filtrय उदलेसि, समापि - परिने मारिसमाने भोगादि एक एष मामाको मः। -पस्यायाint, T..पुन ममपंशिपापातिक न भपति तद्-.। P ] ] प्रथमे फाण्डे- माप्तिशामे व समुत्पऽपाल्पालयात तमामाण्यविचारणाय मनः प्रणिदधति, मैतत् सारम्। अपातफटत्यात्' पम्यागुत्तरयात् । तपाहि-पया से विचारकन्याजलशानापमासिनो जलम्प सिचम् ! उतारसत्यम् ?' इति विचारणायां मनास्लपा फलगाननिभासिनोऽध्यर्थय सायाs- सायनिवारणायां प्रयन्ते, अन्यथा तवमवृत्ती तदधमासिनोऽर्थस्यासत्याराक्षपा तानस्याs. पस्तुविषयस्यमाप्रमाणतया रायमानम् न तजलापमासिमवर्तकपानप्रामाण्यव्ययस्थापकत्वम् १५ ततधान्यम्प तत्समानरूपतया प्रामाण्यनिधपाभायात् कथम् 'अर्थपियार्या प्रतिनिधितमामा. पया मामात्' इत्यभ्युपगमः शोभना । किंच, मिाजातीय संवादफनानं पूर्यस्य प्रामाण्यनिधायक मायुपगम्यमानमेकाम् ! मिना पा! । यफार्थमित्यन्युपगमः-स न युक्तः, भयन्मतेना घटमानत्यान् । नयाहि-रूपशामा भिजातीयं स्पादिगानम्, तत्र च स्पर्शादिफमामाति न रुपम्, रूपसाने तु रूपम्-ग स्पर्शादिकम्-गाभाति, कर-स्पर्शयोध परस्परं भेदः, न घाय:१० ययी रूप-स्पर्शमानयोरेको विषयतयाऽभ्युपगम्यते, येनैकयियं मिनजातीय पूर्वज्ञानप्रामाण्य- व्ययस्थापकं भवेत् । अपि च, एकाविषयत्वेऽपि कि येन खरूपेण ध्यपस्थाप्ये शाने सोऽर्धः प्रतिभाति, कितनेय व्यपस्थापके ? उतान्येन । तत्र यदि तेनैवेत्यम्युपगमः, सन युक्तः। ध्यपस्था. पकय तापधर्मार्थविषयत्वेन स्मृतिपदममाणस्येन व्यवस्थापकरवासम्मयात् । अय रूपान्तरेण मोऽयला विसाने प्रतिभाति नन्येयं संघाघ-संपादकपोरेकविषयावं न स्यादिति दिनीय एय १५ सोऽभ्युपगतः स्यात्, स घायुक्तः संघम्यापि मिन्नयिपयस्यैकसन्तानप्रमया विजातीयम माण्यध्यपस्यापत्यमसङ्गात् । तथा कि तत् समानकालमपंक्रियामानं पूर्पकानप्रामाण्यनिधा. किम्! आहोस्विद् भिन्नकालम् । यदि समानकालम्-कि साधननिर्मासिकानमादि। उत माहित इति पुनरपि निकायम् । यदि तनादि, तदसत्। मानान्तरम्य चक्षुरादिलानेयमतिमासनात्, प्रतिनियतरूपादिपिपयरवेग चक्षुरादिनानानामभ्युपगमात्। अथ तदमादि, गतदि तमाममामाण्य-२० निधायकम् , सदाहे ततधर्माणामध्यप्रदात् । अप मिनकालम, तदप्ययुतम्। पूर्वमानस्य राणिकरवेन माशानुपरफालमावियिभानेऽप्रतिभामगात्, मासने पोतरविज्ञानम्मागियरवे. मामामाण्यप्रसनितलहादपावन न तरमामाण्यनिधायकरपम् । तदप्राहकं तु भित्रकालं सुन न निधायफमितिम मिनकालमप्येकमन्तान गिनजातीयं प्रामाण्यमिधायकामितिम यापेक्षा पूर्वप्रमाणमामाण्यनिययः । तेन समायपि य पदापं प्रत्यनपेक्षा।' इति प्रयोगे नोनासिद्धि- ঘান্তি বিঘিলাকাবাবরিয়ানমনই গিযঈন আলী इति प्रमाणसिन । यता न पूर्वानान प्रकारेण परताप्रामाण्यनिशयः मम्मपति, ततो ये राम्देह- विपर्ययविषयीरलाग्मतस्याति प्रयोगे प्याप्त्यसिद्धिः। हेमोधासिमता मर्पमाणभृतां प्रामाणे सद-विपर्ययाभापात् । तपादि-काने ममुरपत्रं सगाम् 'अयमः' इति निधयो भपति, ग घप्रामाण्यम् सद, विपर्यये पामरयेप युक्त। तदुनाम्- "प्रामाण्यप्रणात् पूर्व स्यमय मंग्थिनम्। निरपेक्ष यकायें "सो० पा० ०२, मो०८३] ग्यानिधयो दि ममाणकार्यम्-ग घ तंत् प्रमाणान्तरमह घासन इनि म्यते-- चन संवाय-विपर्ययविषयाये सम्मपतीति। अप प्रमाणा-प्रमाणपोपरपसी मुल्य कमिति न संपार-विगंगादायन्तरेण यो मा एपा-मामापनिधयः, सदगम् । अप्रमाणे मनापादयस्य भौपिनी पापा-मारपदोरमन्य বা সমমাংখি। মাল ও ঘীমাথা পান্নোমাখা।। শেখ এ गपोशनात् तत्रापि पाहा, साऽपि ग गुमा निशाना सामान : निगृतः । च तापेशाता यम.मामाच्यगतिः, अगम्या पसारनीयम, पादर मसलाय... प. उ.-'...। দি ४ प्रयोगोऽरम्-१.१,६.५। ५ "अनि. मारा"-at-f प्रोग-१.१,५.१४॥ "मामा प्रमात् पूर्वम्। “ अमिनो एeit me Rat पतमाम प्रसारपसा..... गदिदापक-पु.॥

८ । " इति। प्रामाण्यवाद। स्थाप्रामाण्याराहायच्छेदे पर बागरा-अपनानानपेक्षणाय समाधि परत्र पाध्यमानप्रत्ययसाधादमामाण्यावा, तम्यां सत्यां सूनीयनागापेक्षा होगा प्रथमहानर्सयादि, तदा तेनन प्रथममानप्रामाण्य निघयः क्रियते, किंतु द्वितीयमानेन यत् प्रामाण्यमाशक्षितं तदेय सेनापाक्रियते, प्रयमय तु सत पय प्रामाण्यमिति । प्रचं ५कचिर संशयोपची चतुर्थशानापेक्षायामय मेय न्याया। तदुताम्। "पयं त्रिचतुप्मानजन्मनो नायिका मतिः। मायसे साययिक स्वतः प्रामाण्यम" ति लोक या मू०२, मो० ६१] यत्र च दुएं कारणम्, यत्र च याधकमस्ययः-स एय मिथ्यानस्थया-त्यस्याध्ययमेर विषयः । वा र्थशानापेक्षा त्यम्युपगमधादत उता, नतु तदपेक्षाऽपि मायतो विद्यते । अर्थ हनीपमानं द्विती. १० यशानसंपादि, सदा प्रथमस्याप्रामाण्यनिधयः-सतु-तत्यतोऽभ्युपगम्यते पय किंतु द्वितीया यदप्रामाण्यमाशद्वितंतत् सेनाऽपाक्रियते, न पुनस्तम्य द्वितीयमामाण्यनिधायकवे व्यापारः। या त्यम्यस्ते विषयेऽर्धतात्याका नोपजायते तत्र यलादुत्पापमानाका तत्कनुरनर्थकारिणीत्यावे. दितं पाकिस्ता- "आरादेत हि यो मोहादजातमपि बाधकम् । स सर्यव्यवहारेपु संशयारमा क्षयं प्रजेत् ॥ न चैतदमिशापमानम्, यतोऽशनीयेऽपि विषयेऽमिशहना सपनाया-उनेयमामिपरिहारार्थि- नामिटा-निष्टप्राप्ति परिहारसमर्थप्रवृत्यादिव्यवहारासम्मयाद न्यायमाप्त एवं क्षयः, स्त्रोप्रेशिन- निमित्तनियन्धनाया आशङ्कायाः सर्वत्र भावात् । प्रेरणाजनिता तु बुद्धिरपोरयत्वेन दोषरहितात् प्रेरणाक्षणाच्छदादुपजायमाना लिङ्गा २०ऽऽत्तोका-क्षवुद्धिवत् प्रमाणे सधैन स्वतः। तदुक्तम् - • "चोदनाजनिता पुद्धिःप्रमाणं दोपवर्जितः। कारणैर्जन्यमानत्यालिगा-तोता-क्षदिवत्" । [लो० या० स० २, सो वस्मात् स्यता प्रामाण्यम्, अप्रामाण्यं परत इति व्ययस्थितम् । अतः सर्वप्रमाणात स्वतः ५ सिद्धत्वाद् युक्त कम्-'स्वतः सिद्ध शासन नाता प्रकरणात् प्रामाण्येन प्रतिष्ठाप्यम्' । वं स्पयुक्तम्-'जिनानाम्' इति, जिनानामसत्त्वेन शासनस्य तत्कृतत्वानुपपत्तेः उपपत्तावपि परतः प्रामाण्यस्य निपिद्धत्वादिति ।। [उचरपक्ष:-(१) उत्पची प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वनिरसनम् ] अश्मतिविधीयते, पसायदुक्तम्- 'अर्थतथामावप्रकाशकी शासृदयापारा प्रमाणम्', तरयुष्मा २० पराभ्युपगतशातृव्यापारस्य प्रमाणत्येन निपेत्स्यमानत्यात् । यदप्यन्यदन्यायित यथार्थप्रका कार्य प्रामाण्यम्, तद्योत्पत्ती स्वतः, विज्ञानकारणचक्षुरादिव्यतिरिक्तगुणानपेक्षत्यात्' तर मामा प्यस्योत्पत्तिरविचमानस्सारमलामा, सा पेनिहतुका, "देश-काल-समावनियमो न स्त्" स्यन्यत्र प्रतिपादितम् । रिंच, गुणययभुरादिसझाये सति यथास्थितार्थप्रतिपत्तिरीया, तदभावे नहर तितुका ध्यवस्थाप्यते, आयय-व्यतिरेकनियन्धनत्यादन्यत्रापि तुफलमायण, अन्यथा दोर- १५ पगागपन्यय-व्यतिरेफानुविधायिनी मिथ्याप्रतिपत्तिरपि स्वतः सात् । तथाऽभ्युपगमे "यस्तुपाद विविधयान संमयो दुष्टकारणात्" [लो या सू० २, श्लो० ५४) इति यो व्याहतमनुपश्येत । यदपि 'अस्ससाक्षाधितगुणसद्भाये प्रत्यक्षाप्रवृत्त तापूर्वकानुमान मावि तहमादकरयमाण्यापारात् धुरादिगतगुणानामगरयात् तदापप-ध्यतिरेकानुप्रियापिर अप हत्तनीय-मा० ।-पावा- पारवाया-म । ....... प. १,५०१॥ 14.२,५.. MAINA- भ्याल-संशयास--" • "मम प्रिपा मिन प्या-न-संशय:ति भिम् (म)मा टि. १८४] इति। -नामि-परिहारगर-.।

मपम पाण्ड- মানায়াখাযযু, মলম। অমামায়াবহ স্বীয় নানযামু। বাড়িীঘিনায়াসিনা দি ম্যান সালে অনুমান করায় মা ইল, নিনাদিযেন গণময়খি ইন্তু সবহারামঃ। মানু স্নান, নানর ঘূরিমনিন্মবিরমমন্বষণামাত্ত, ভিমরিয়শঙ্কর র স মাস ঘাই দ্বিধলাম, এমানষে খাদ্যানবাৰন মনিয়াবিলম- ৬ বাংলা মামামাধামুই নাগিন ই ধানমিনি গান শেষবা বহালৰিষ্কাৰবিয়ানামােখামাখ্যমন্বষী মন । যদি अप कार्यप पापापलगयात्मकेन तेषामधिगमः' इत्यादि 'पतो न लोक प्रापशो विपर्यपहाना. দুবাই মােক্ষমূনিমীনি কিন্তু বাবা যেময়ামি, বন মন্ত্রী আমবয়ামোমীন জামায়ানােই অন্তবেই মাঘ মামামা! সেই ভযয়ানীব। যা ধা নিখােৱন বীথয়ামামনিটি সখ্য বালমথি গণবিষমুহামাৰ সমমামামা আমাগময়ী হবে। ধন বাহু! সানিনিবিহীযgয়ক্ষা বিষয়ববীয়ানামালিনমণ নবি স ব ঘন নি তৃg: ~মা হই মুমিন মারা যাইনি।ন জনৰ বীৰামাৰ ঠৗী অবিটি নি রামগনিয়া ব, বিনিময়ে মাথা নাইমাট সফখ মামামেবি মামা বাহ। যখনি দ খ নাই কাশি হরি, ষায় দীঘামাইদিৗলাইন নাম্বা হয়ে নিয়াে। এ অব খানখানাঘানাম মামাবাবা হিমন ক্লানি মুখ: তি’ নিগালমালাম, মণি সাহাসিমাবণ বীৰ নাম-ঠিয়ায় মীর খামায়ামান পর ম্যাম আবিষ্যদাষ বয়ানুগপি, টি পূণামূহিমাস সাহ মান দিয়াননানুহায়নানামখীয়ায় মারি। ৰথ অশ্বশক্তিমা মাগম অ ন লখেছিষামযৗষধী মামায়াময়ষষমায়বৈনে হায়ক রি পাথর যুব গণষিদীয়মা মেনিনি। বৈদিক খতিঃ সামান্য কম বা হয় মাসব্যানমাৰ সন, বাঘাবান, যেমমিখন বিশ্ববিদ্যাথা সারা নৈথি ফরমালযি ঘর না। যদি হয় সব নিয়মনটিই খে মাল বিল ( থিমামনি, শাহি মখমায়। নন ইমাম মেথি মানা যায় যে খাল। ববি ft বিষয়াবায়েলি * নিয়হিয়- ধমন্ত ভিত্তি জীবি। ভর্কি , মামামামামাঞ্চিামি গ প্ৰমবিবিবেকিনিনি স ক্লিগিরিনুষঃ। মইনলিমিঃ চার যা মোঃ ফায় বীর্য সরানাে, ল যুলাঘামিমণ মাছ খে গাষঃ লনিখো, বয়। যােগামিমধ্যক্ষাখা মাখন্দীশাখা সংবৗ মিমইনু। মনি, থামলামঘৰী ম মালামা, নিপা ধরেনাথ অষ্টিগবলে মাথাৎ, মাখামযিমাৰ মনমোখামাখি • • ২৫। কােথা,,। ' t'ৈ ৪ে পদে 'অ' ধ প া খে থাকেন নিই এ মা। * । • • • খান-, বি, • । • •• ? - ও । ৭। “? *ৈ * * ইu ,মা , ছ,r, &} সুম, ক (এ, । এই গেম ও । এলমােহনা १० . . . - 1 निसामानरया। धमागधनगमप सतयुष्म, जाति पाये परमालावोगा पारतनयमपि न सता, निराशंगवार समतोऽपि गोमममम्पैरन, तस्यादेव जामा म देश-काल-पनियमं प्रतिरोन्। शशि शिशिर कमिटीयेतना पर काम शिशपथमनायपा। सर्वप्रतियायायियेशियमनायो नेमा गनिन् कदानिरनिगमेरित :५तिनियतशक्तियोगिता मायानां प्रमाणमिता ग शान् । यतिरेकाऽयतिरेकाननु शीयां युन, परसर नलस्वर निका पात्र जन्म प्रति ति, हेऽपि १०सम्पक प्रचक्षते, सिद्धसाध्यतादोगत, प्रामाण्यमपि न स्वतः स्वाद, नहि 'तपयुत्पत्रे जाने विसंपादनत्ययादुरारकालमायिनः प्रोपपते इति कस्यचिदम्युपगमः। यदा र गुणवत्तार जन्यता प्रामाण्यस्य शक्तिमस्य माकनन्यायादयस्थिवा तदा फथमौत्सगिंकत्यं तस्य कारण प्रमषेषु मिष्याप्रत्ययेप्पमापात्, परस्रव्ययस्वरूपाणामेकासम्भया ! मार "गुम्यो दोवा शाममायस्तदमायाद् अमामाण्यदयासायेनोसोऽनपोदित पयाले" इति पर्चः परिफरगुप्रायम् । १५इतवैतरचोऽयुजम्, विपर्ययेणाप्ययोद्धोषयितुं शश्ययात् । तयादिदोषेभ्यो गुणानामभाषत. दमाया प्रामाण्यव्यासनाप्रामाण्यमीरसनिकमास्त इति मुरतो ग प पक्रीमयति । किंच, 'गुणेभ्यो दोषाणाममाय' इति न तुच्छरूपो दोगमायो गुणव्यापारनियोधः। तत्र ध्यतिरिकाऽयतिरिकायिकरपद्वारेण कारकव्यापारस्यासम्मयात् भवन्दिरनभ्युपगमाघ । तुच्छा भावस्थाम्युपगमे घा- "भाषान्तरविनिर्मुको भाषोऽत्रानुपलम्मवत् । अभावः संमतस्तस्य देतोः किं न समुद्भया?" पति पचो न शोमेत । तस्मात् पयुदासवृत्या प्रतियोगिगुणात्मक एव दोपामावोऽमिमेवा, ततश्च गुणेन्यो दोषामायः' इति वटा गुणेभ्यो गुणाः' इत्युक्तं भवति । न च गुणेभ्यो गुणाः कारणानामात्मभूता उपजायन्ते इति, स्वात्मनि क्रियाविरोधात् स्वका २५रणेभ्यो. गुणोत्पत्तिसमापदमावादमामाण्यवयासत्वमपि मामाण्यमभिधीयते ततश्च गुणेभ्यः प्रामाण्यमुत्पद्यत इत्यभ्युपगमात् परतः प्रामाण्यमुत्पद्यत इति प्राप्तम् । ततय स्वायांव: योधराकिरूपप्रामाण्यामलामे घेत् कारणापेक्षा, कान्या स्वकार्य प्रवृत्तियां स्वयमेव स्यात् नायुक्तमुकम्- "लग्यात्मनां स्वकार्येषु प्रवृत्तिः स्वयमेय तु" इति। ३० घटस्य जलोदहनव्यापारात् पूर्व रूपान्तरेण स्यहेतोउत्पत्तेर्युक्तं मृदादिकारणनिरपेक्षस का प्रचिरिति, अतो दिसामुदाहरणम् । उत्पत्यनन्तरमेव च विज्ञानस मागोपगमाद तो न्या रमनो दृसिः स्ययमेय! तदुतम्- "नहि सत् क्षणमप्यास्ते आयते पाऽप्रमाऽऽन्मकम् । येमार्थप्रहणे पसाध्याप्रियतेन्द्रियादिवत् ।। हेन उन्मय विषये धुर्तयापार उच्यते। तदेव च प्रमारूप तरती करणं चपी" ०या० सू०४, लो०५५-५६] इति । सत्र मति-. । २-निषेधय पर-गु.। समानमेतन् पदया, अशोऽपि भनेन पोन- "तुम्मा गुम्यो दोपालाममारसदमावतः । अप्रामाण्यद्वयामर देनोरमनिमोदितः" [ो. वा.सू.२०१५ पदार्थान्तरेन विनिर्मुस-मित्र इति या भूतो भाव पा.- पुनाकारनिरिभ्यते इस मा सम्परामा, यथा पानुपलंभो पटातिरस्य प्रशदेलसम्मो पर्यसति, तथा दोका (ऽभावो) भारतरे पर्यायी पलाय"•दि.1 ५"मयमायः-नदि गुणेभ्यः प्रामाण्यमुपसायते, * समया, देन दिमामाभ्यायाम न मामानं सा एलोमायते, विध्यागमे सनम्वे याबाद भाषा• भावी.हि.स्वकार-गु.। पृ. ४५.in - মামলায় প্রচারণায়াম ৪ লামা বা ব্যায়েলথ স্কুল स्वागत अतिरिति किगर कार्य पर साधारममा मतिः स्वयमेषरयुप्यते । या पानवाया मानमेष करोतोयुनं सार सायुकम् । प्रमाण. मनापन नियमतिकारपसान चिनिधपा विपर्ययानायला. अमाया गुपपपारादिकारणमम मामापं पातासियामिति 'अप पाराविशाकारण-'५ पायुततया स्पितम्। मारपेयविधिपापमभापातु पुणेः पताप्रामाण्योगपायुपगमो ग युक्ता, अपरिपेय- सब प्रतिपादयियमाताहरूममाषाविषयावेनासायात्, पत्येषि भयभीत्या तस्य गुण स्वार तपाभूतमेलाममापा पुरे कम परत:मामाण्यम् ! किग, अपौरपेपरये मेरा. परसो गुपयापुरपणीतसाकिस्पापुतान निश्चित प्रामाण्यं गुणाध्यपुरुषप्रणीतापमापा. ततरम सादा तथा क्ष- प्राणाजनिता बुद्धि प्रमाण योपार्जितः । फारणेन्यमानावाशिमोकासधिपत्" [ोपा०२,१४ाति त्यसोकषं पठितया- मेराजनिता पुद्धिपमा गुणजितः । कारजन्यमानापालिलामोतयुधियन् ।। अप प्रेरणापापसापायपेयाये पुपपप्रणीतरपाध्या या गुणा यातालपा सदाधिता दोपण अपि ततम सातायामासापि प्रेरपाया थावतापात् स्वतः सिमुत्पत्ती प्रामा. ज्यम् । मन्ये सति गुण-दोपाभयपुरुषमयीत(सत्ययावृत्ती प्रेरणा प्रामाण्याSAIमायोग्या. पचाया प्रेरणाजनिता पुद्धिप्रामाण्याsमामाण्यरहिता मातोति । ततध--- २० प्रेरणाजनिता धुरिन प्रमाण न धाममा। गुण-दोपविनिमुंजकारणेभ्यः समुभपास् ॥ त्पमपि मापनासो पठितभा अपप यथा- "वोप सन्ति न सातीति पौरपेयेषु चिन्त्यने । दे फरमापातु दोपाईय नास्तिना" [ इस्पयं लोक एवं परितस्तथैवमपि पटनीय गुणाः सन्ति न सन्तीति पौरपेये चिन्त्यते । धेरै फरमाया गुणाप नालिमा नप पापि गुणा प्रामाण्यहेतुत्यनारायन्ते तत्रापि गुणेन्यो दोपाभाय इत्यादि पक. धम्, विहितोतरस्यात् । अपि च, अपाप्पेयरवेऽपि प्रेरणायाम स्वतः स्वविषयप्रतीतिजनकपा-३० আয়--ত্বা মবিন বীনকোরিয়া--কিন্তু সুমিষ্মকামিয়া विर्भूतविशिएसंस्कारसम्पपेशामाः । ते घपुरा सधैं रागादियोपामिभूता एप भपताऽभ्युपगता, सरकत संस्कारो म पपार्थ:--अन्यथा पौरपेयमपि पचो या स्यात्-अतोऽपारपेयस्यास्यु: पगमेऽपि समयपपुरषदोपरवामामायसनापार मेलापासपोरयाणाम्युपगमो गशमानमनः करोति। तदुधामू- "असंस्कार्यतपा पुरिमा सर्पपासानियता! संस्कारोपामे प्य गजमानमिदं मधेत्" पदप्यमापि पाउनुमानपुतिरपि एहीताप्रिनामापानन्यापेश इत्यादि बरपाया अविनामा. घनिषयस्य गुणल्यात, तदानिधयस्थ विपरीतनिधयस्य च दोपत्यार तदेपम् उत्पत्ती मामापयं गुलापेटरवाद परता इति स्थितम् । ११.r.Rोवागिदिदीरस्परपना बोकेर समोम मा 11.1.4.11 ܢܙ -- १२ प्रामाण्यवाद। [ उत्तरपक्ष:-(२) कार्ये प्रामाण्यस स्वतस्त्वनिरसनम् ] यदप्युक्तम् 'नापि स्वकार्ये प्रवर्तमान प्रमाण निमित्तान्तरापेक्षम्' इति, तदप्यसंगतम्; यनो यदि कार्योत्पादनसामप्रीव्यतिरिक्त निमित्तानपेक्षं प्रमाणमित्युच्यते तदा सिद्धसाधनम् । अथ सामध्येफदेशलक्षणं(ज)प्रमाण(ण)निमियान्तरानपेक्षम्, तदप्यचाया एकस्य जनकन्यासमयात्-~ ५"म छकं किंचिजनकम्, सामग्री घे जनिका"[ इति न्यायस्यान्यत्र व्यवस्थापितवान् । किंच, नार्थपरिच्छेदमा प्रमाणकार्यम्, अप्रमाणेऽपि तस्य भावादा कि तहि ? अर्थतधात्यपरिच्छेदा, सचे न शानस्वरूपकार्य:, भ्रान्तहानेऽपि स्वरूपस्य मापात् तत्रापि सम्यगर्थपरिच्छेदः स्थान् । अथ स्वरूपविशेषकार्यों यथापस्थितार्थपरिच्छेदः इति नातिप्रसस्ता स स्वरूपविशेषो यतयः-- किमपूर्वार्थविज्ञानत्यम्, उत निश्चितत्यम्, आहोस्सिद् याचारहितत्यम्, उतस्विद् अदुध. १० कारणारग्धस्यम्, किं पा संपादित्यम् इति ! तन यधपूर्वार्थविज्ञानत्वं विशेषा, सन युक्तः कैमिरिकशानेऽपि तस्य भावात् । अप निश्चितत्वम्, सोऽप्ययुक्तः परोक्षमानवादिनो मतोऽनि- प्रायेणासंभवात् । अथ पायारहितत्यं विशेषः, सोऽपि न युक्त यतो याघाविरहतत्कालभाची विशेषी, उत्तरकालमावी घा! न तावत् ताकालमाधी, मिथ्याशानेऽपि तत्कालमापिनो याघा. विरहस्य भावात् । अयोत्तरकालमावी, तत्रापि पतन्यम्-किं हातास विशेषः, उत अशातः। तत्र ३५न अधाता, अशातस्य सत्त्वेनाप्यसिद्धत्यात् । अथ शातोऽसी विशेषः, तत्रापि वक्तव्यम्--उत्तर- कालमावी याधाविरहा कि पूर्वज्ञानेन प्रायते, आहोस्विदुत्तरकालमाविना ? तत्र न तावत् पूर्व- झानेनोचरकालभावी याधायिरहोशातुं शक्या, तखि स्वसमानकालं संनिहितं नीलादिकमयमासयनु, न पुनः 'उत्तरकालमप्यन वाधकप्रत्ययो न प्रवर्तिप्यते' इत्यवगमयितुं शक्नोति; पूर्वमनुत्पन्नाथ कानामप्युत्तरकालयाध्यत्वदर्शनात् । अयोत्तरक्षानेन शायते, शायताम्, किंतूत्तरकालमावी याचा १० विरहः कथं पूर्वज्ञानस्य विनष्टस्य विशेषो मिमकालस्य विनष्टं प्रति विशेषत्वायोगात् ? किंच, ज्ञाय: मानत्वेऽपि केशोण्डकादेरसत्यत्वदर्शनाद याधाऽभावस्य छायमानत्वेऽपि कयं सत्यत्वम् ? तज्ज्ञानसा सत्यत्वादिति चेत्, तस्य कुतः सत्यत्वम् ? न प्रमेयसत्यत्वात्, इतरेतरामयदोपप्रसङ्गात् । अपरयाधाऽभाषठानादिति चेत्, तत्राप्यपरयाधाऽभावशानादित्यनवस्या । अथ संवादादुत्तर कालभावी याधायिरहः सत्यत्वेन ज्ञायते तर्हि संवादस्याप्यपरसंवादवानात् सत्यत्वसिद्धिा, तस्या २५प्यपरसंघादशानादित्यनयस्था। किंच, यदि संघादप्रत्ययादुत्तरकालमादी पाधाऽभायो शायमानो विशेषः पूर्वहानस्याभ्युपगम्यते तर्हि शायमानस्वविशेषापेक्षेप्रमाणं स्वकायें यथावस्थितार्थपरिच्छेद लक्षणे प्रवर्चत इति कथमनपेक्षत्वात् तत्र स्वतःप्रामाण्यम् ! अपि च वाधायिरहस्य भयदभ्यु पगमेन पर्युदासवृत्या संवादरूपत्यम्, 'याधावर्जिवं च झानं स्वकार्येऽन्यानपेक्षं प्रयतते' इति हपता संयादापेक्षं तत् तत्र प्रवर्चत इत्युक्तं भवति । किंच, कि विज्ञानस्य स्वरूपं घाध्यते, आहो. ३० खित् प्रमेयम्, उतार्थक्रिया इति विकल्पत्रयम् । तत्र यदि विज्ञानस्य स्वरूपं याप्यत इति पक्षा, स न युक्तः, विफल्पस्थानतिः। तथाहि-विज्ञानं यापमानं किं स्वसत्ताकाले यापते, उत्त उत्त- रफाटम् । तत्र यदि स्वसचाकाले याभ्यत इति पक्षा, सन युक्तः। तदा विमानस्य परिस्फुटरूपेण प्रतिमासनात् । न च विज्ञानस्य परिस्फुटप्रतिभासिनोऽभायस्नदेयेति य शक्यम्, सत्याभिमतः विज्ञानस्याप्यभायमसदाद। अयोत्तरकालं याप्यत इति पक्षः, सोऽपि न युक्ता, उत्तरकालं तस्य ३५स्थत पय नाशाम्युपगमाद् न तत्र पाधकल्यापार सफला-"देयरक्ता हि किंशुकाः" । अथ प्रमेयं वापर यम्युपगमा, सोऽप्ययुसरा पतः प्रमेयं पाध्यमान कि प्रतिमासमानेन रूपेपर यायते, 'उमितिमासमानरूपसहचारिणा स्पर्शादिटसणेन इति विकल्पनाइयम् । तत्र यदि प्रतिमासमानेन १.४५.२५ । १सघज्ञानस्वरूप-म., क., हा., मा.। ३मन्याप्रम् ४..लो. "वेदै देशवधितो यहानमुराणायदे । भतः परोक्षं तत् सर्व प्रमाणे दोपवर्जितम् ॥ पौषेयत्वार, मतोऽन्यर रिषि. माम मवैदिसाशयः" गु.टि.। ५ "पवनयापति मा वंकुर रजक ! रणने । वक्षः सन्ति शुष्ठमा देवरा सिरिजकं प्रति विरदिनीवाश्यम्" गु.टि.। १ पृ.१५.१लिपित 'अप अप्रति. मासमानेन रूपेण' इस्युप्रेशर, देवलं पा.' डीव 'उत मतिभासमानरूपसहचारिणा' इति सम्यमानं समय सम्मानित 'मतिमासमानेन प्रतिमासमानकासहचारिणा' इति पायो गवेर-स एक पपात्र मग - । ।

अपमाडे- ট, যা মনিমামান খান, বা হানাহমাদিত समय अपामतिमामानेन कोष बापत इति मतम्, पप्पयुक्तम्। अप्रतिमासमानस * বিমানঘাম, ল ছালামাইলামাথা, নিমা। গবাগিয়া चारले, मनु साऽपि रिमुग्धा मते, उतामुखधा ! पपुत्पमा, म तर्हि पायते। तस्याः सत्यवाद । अपारा, साऽपि न पाया अनुत्पमापारेष। यि, अर्थक्रियाऽपि पदार्याइन्या, ५ সিয়া মাই মনামসমাই। অমই থ ‘বাঘাথলির विशेषगपनत्या गायिरहोऽपि विमानस विरोध । अपातुष्टकारपारग्धरयं विशेषः, सोऽपि म पुकार पलसायात विशेषत्यमसिलम्, मातरमे या कुतोऽएकारणारपायं भापते । सन्यसादरकारपारपार विहानादिति पेत् अनयस्था संपारादिति पेद,मनु संवाद प्रपारपारम्भर विशेषोऽन्यसाएकारणारभार संपारमत्वया निकायत इति १० सैपानयस्था भपता संपत इति । चि, जानसमपेसमराकारणारण्यायपिरोपमपेय स्वकार्ये शानं मयतमाम कपंन तत् तत्र परतः परं भपति ! तपा, कारणदोगमापा पदासरा भपदभिमाण कारपगुपः, सतप 'अरकारमाएपम्' इति पदता 'गुपयकारणारधम्' इत्युकं स्पति । कारगुजाय प्रमान सकार्य प्रपरमानेनापेक्ष्यमापनिमायकप्रमाणापेसा अपेक्ष्यन्ते, तरपि मां कारपगुणनिधयापेक्षं सपा प्रवर्तत इत्यनयस्यादपर्ण "जातेऽपि यदि विहाने १५ तापमाऽपार्यते" स्यादिना प्रन्येन परपले आसमानं स्वपधाय हत्योत्थापनं भवता प्रस. बम् । अपादुटकारपजनितस्यनिषयमन्तरेणापि हानं स्वार्षनिधये बकायें प्रचयिते, तदसत्। संशावादिपिपपीतव प्रमापस स्वार्थनिधायकत्यासंभपाद, अन्यथाऽममाणसापि स्वार्य निधार- कात्वं सात् । तपादुकारपारम्पत्यमपि विशेगो भयभीत्या संभषति । अप संपादित्य विशेषत, सोन्युपगम्यत या किंतु संपारमत्दयोपतिनिधपमन्तरेण समझातुं शक्यते' रति प्रतिपाद-२० पिम्पमापरयात् तदपेसममा स्वकार्य मपर्वत रति तत् सत्र परत: स्यात् । अत एप निरपेक्ष. स्थल असिद्धत्यात् पूर्वोकन्यायेन ये प्रतीक्षितप्रत्ययान्तरोदयाः' इति प्रयोगे' नासिनो हेतुः । "तपूपिंविधान निमितं पापयतितम् । अनुशारपारचं प्रमाण लोकसंमतम्" [ पति, दापि निरस्तम्। पोर्तम् 'यदि संवादापेक्षं प्रमाण वसाय प्रवर्तते तदा चक्रकासगः' तदस इतन्। 'पपापस्थितपरिण्टेदस्वमायमेतत् प्रमाणम्' इत्येवंनिधपलक्षणे स्वकार्य यथा संर दापे ममा प्रपने म प बरोरलया प्रतिपाइपिम्पमागत्यात् । पदपि 'अय गृही कारपगुमायापनियानम्, तदपि परसमपानभिसतां भवतः स्थापयति, कारपगुणप्रहमा भमा सका अपर्वते' इति परमानम्युपगमात् । पपोकैम् उपजायमानं ममामयपरिक रातिपुरम्'ाति, ताघिसंपादित्यमेय अपंतपात्यपरिच्छेदशति-तप परतोहायते-त ममा खकाय प्रवराति तत् तत्र परता स्पिवम् । [उत्तरपथः-(३) नियये प्रामाम्पस स्वतस्त्वनिरसनम् ] 'नापि प्रामापं स्वनिधयेऽन्यापेदरम्' रत्यु यन्, तदप्यसत्। पतो निधयस्ता - निनिमित्ता, उत सनिमित्तः इति कल्पनामयम् न तापधिनिमित्ता, प्रतिनियतदेर स्वमायामापरसहाद। सनिमियत्वेऽपि स्वनिमित, उत स्वयतिरिटनिमित्ता! स्थानिमित, स्वसंविदितमामानम्युपगमार मीमांसास अप समतिरिकनिमित्त मन्तप्रिमि कि प्रत्यक्षम्, उठानुमानम् अन्यस तनिधायकस्सासम्मयाद ! हर सन, ददयुटम् प्रत्यक्षलवर मापारायोगात्-सीन्द्रियसंपुले रिपये समापारादुर मसाप समते, न पेन्द्रियापामपरोसनालामेन फलेन, तत्संबेदनस्वारे गि सकनेबार बार 'मना स्वकारपगुपनिमायकं स्वभरपगुणनि का १३.५६.५। भासपमान ४ एत्योरपाटन मा.. "पृ.४.१७ प्लेनैप पपुलम- - १४ 'प्रामाण्यवादः। योगो येन तयोर्यधार्थत्वस्वमायं प्रामाण्यमिन्द्रिययापारजनितेनं प्रत्यक्षेण निधीयतें, नापि मनो व्यापारजेन प्रत्यक्षेण, एवंविधस्यानुभवस्थाभावात् नापि तयोत्पादकस्य ज्ञातृव्यापाराश्यस्य यया. त्वनिश्शायफत्वं प्रामाण्यं वाद्येन्द्रियजन्येन मनोजन्येन या प्रत्यक्षेण निश्चीयते, तेनं सहेन्द्रियाणां सम्पन्धाभावात् । न चेन्द्रियासम्बद्धे विषये ज्ञानमुपजायमानं प्रत्यक्षयपदेशमासादयतीत्युक्तम् । नाप्यनुमानतः प्रामाण्यनिश्चयः, पूर्वोक्तस्य फलयस्य यथास्थितार्थत्वलक्षणप्रामाण्य निश्चये, लिङ्गामापात् । ज्ञातव्यापारस्य तु पूर्वोनफलतयस्वभावस्वकार्य लिङ्गसम्भवेऽपि न यथार्थ निधायक त्यलक्षणमामाण्यनिधायकत्वम्। यतस्तल्लिङ्ग संवेदनाख्यं यथार्थत्वविशिष्टं तनिश्चये व्याप्रियेत, निर्विशेषणं घा! प्रयमपक्षे तस्य यथार्थत्यविशेषणप्रणे प्रमाण पकन्यम्, तच न सम्मवतीति प्रतिपादितम् । निर्विशेषणस्य फलस्य प्रामाण्यप्रतिपादकरवे मिथ्योशानफलमपि प्रामाण्यनिधायक स्थादित्यतिप्रसनः । तत्रैतत् स्यात् पूर्वोक्तं फलद्वयमर्थसंवेदन-अर्थप्रकटतालक्षणमनुभयानिधी. यते, यया तस्स स्वतः पूर्वोक्तस्वरूपनिश्चयस्तया यथार्थत्वस्यापि, यथा हि तत् संवेद्यमानं नीलेस. घेदनतया संवेद्यते तथा यथार्थत्यविशिष्टस्यय तस्य संवित्तिः नहि नीलसंवेदनादन्या यथार्थत्वसं. वित्तिः। यद्येयम्, गुक्तिकायांरजवानेऽपि अर्थसंवेदनस्वभावत्वाद् यथार्थत्वमसकिा स्मृतिप्रमोपा. दयस्तु निपेत्स्यन्ते इति नानुमानादपि तत्मामाण्यनिधयः। किंच, प्रत्यक्षाऽनुमानयोः प्रामाण्य. निधयनिमित्तत्वेऽभ्युपगम्यमाने स्वतःप्रामाण्यनिधयव्याइतिप्रसङ्ग, तभान्यनिमिचोऽपि प्रामाण्य: निधयः । यदुक्तंम् नापि मामाण्यं स्वनिश्चयेऽन्यापेक्षम्, तस्यपेक्षमाणं किं कारपगुणानपेस इत्यादि, नदनभ्युपगमोपालम्भमात्रम्। म एसदभ्युपगमः यदुत स्वकारणगुणझानात् प्रामाण्यं पिजायते, कारणगुणानां संवादप्रत्ययमन्तरेण ज्ञातुमशक्यत्यास, संवादमस्ययात् तु कारणगुणपरि. शानाम्युपगमे तत पय मामाण्यनिधयस्यापि सिखस्याद् व्यथै गुणनिश्चयपरिकल्पनम् , मामाय- निधयोनरकालं गुणभानस्य भायान् तनिधयस प्रामाण्यनिश्चयेऽनुपयोगाथ। नाप्येकदा संपादार गुमान निधिस्य अन्यदा संयादमन्तरेणापि गुणनिश्चयादेव तत्प्रमयस्य मानस्य प्रामाण्यनिधयः इति पर रायम्, अस्सन्तपरोक्षेषु चक्षुरादिपु कालान्तरेऽपि निधिनप्रामाण्यस्यकार्यदर्शनमन्तरेण गुमाएतनिधेिनुमाश्यस्यात् । न च क्षणक्षयिषु भाषेपु गुणानुवृत्तिरेफरूपैय सम्पयति, अपर- महफारिभेदेन मिनरूपत्वात् । संयादप्रत्ययापार्थक्रियामानलक्षणात् प्रामाण्यानिशयोऽभ्युपगम्यत पप-"प्रमाणमयिसंपादिज्ञानम्"[ रति प्रमाणलक्षणामिधानात् । न पसंयादिश्यलक्षणं मामापं स्वत एष डापत इति शश्यमभिधातुम्, यता संयादित्यं संवारमत्यपनगनशक्तिः ममापसानघ पार्यसनमन्तरेण कारणशक्तिनिवाश्या।यवाह-"न प्रत्यक्षे कार्य कारणमाप- पतिः"। इति । तस्मादुनरसंयादप्रत्ययात् पूर्वम्य प्रामाण्यं व्ययस्याप्यते । ग प संपा दमदार पूर्व प्रामाण्यायगमे मंचामत्यपस्याप्यपरमयादात् प्रामाण्यायगम इत्यनस्यामरा हा प्रामाण्यावगमामाय रति यहं युक्तम्, संयादमन्यया मंगदावनाएयापेक्षागार सोमवम्यामागम व अपमस्यापि संवादापेक्षा मा भूदिति परथम. पतामय संचार सनकालमेर गामापम; उदमारे नम्प तदेय मसात् । अर्यत्रिपानानं तु गागादिसंपादि, अय. शिपाटग्यम्यान र स्थविरसंवेदनमेर प्रामाण्यम्-सय-स्यता सिग्रमिति मान्यापेक्षा । বল নিধন'শোবি েমঘমা। আঙ্গিবাঙামানিয়া ५मयमालारानवम्याश्यनारा पति परथम, अर्थविधानमा क्रियायुमणमायानाथे। গোল্লাখানি নির্থান্ধােন দেখলাম, এনিলৈ মুখাগিয়া निषयोजनमानसमार-यपाअक्रियाशिमयतिरिनारयविनाय निवादिता, ना. মা, দিন, কামাল, মিনুগাল, মানুষ पा, गयानात, आहोलिन् नियादिपिनाकियामागार्षिक नियोगमा- पार वालिमा-नरनिरामयामगि समानता मनितानुमदान र नानाविरोधारिममितिम तयामिति सामानिदिनानिwिarma Raatml निशाने परममि.,.,.. मार्स पर... •ninistrati. मायिक .....।

২ ও नुशामिन CREEने मंगते মালামাল শিলি সন, স কী সূলই ভয় ও বিড়ানােই, খুন- মন ম ম নামধাম । ভাল ছি! নামা ঘাম মবিননামার মানুষে এ মন্তব্য: বাঃ, শাখা, বন হবেন, তাদের বিদাযৗসি কৰিছিল । স শোননি বা বিমা বে। যা-নন না ভয়ানমনি-মাননা }। মান সমান, না ভাই মেসি ল র ই নানা নানা ম্যায়ন ঘ 'নিশা ধরে বিলাসবহুলামন মিনা * খান, না fkলন, গ য গ'ল শিবা পূব এছ টি খুন “নিয়ার মান নিয়ে লারাও অনিতা কে বি । বৰ, “হিহিনিবিষ্টননি এনামুনি : কষ্ট বুকে বন্ধু মানের কয় যাবি মানানসই নি যায় বলিয়া মামুলিবার নােৰি ৰাষামনি, সা ন দি मेरे कमरे मोजता नियो' ले । पा गहरदर्शना डन दीरता নিৰ্মী মেয়ে মাথাননামানিয়ান ঘষিয়ান্তাননা-২ প্রঃ মানি, মলিন পর এক নিকাহ ‘ব পীঠ{ {ব। খ্রন চালুর দাবি, এলা আর ঘটলেমইনানীষা। মনাম ৫ নামঘৰী-নাল বিহাইয়ানমায়াবিমান নিবনামধামে ছিয়াৰ গনি ঘানা এনাল্যানমঘমােনানা থষ্ট গবে মা ঘাম, এস বনবন করা যাবেনা। নার্ষিয়াসিনি মাৰিছোেষাঘসিমানিয়াল গানগয়াযিদস্যারলো বিমান বলো । দু এ বু নিখিলগাবি খাঘমামালায়ালা বাবাঘলনামাযবিবালেখ্যমন: বিষয়গুলি মূঘির -সুয়ারে এখন সানি নভেমামাবাদ (নি। ওয়ান' ছবি, হেনস্তার ওষযন মানামু'র রে: ক যে মামা নিবেই বর- । E ত্ব । বিস্তাবঃ - **৫। শি? ** মিয়ানমার - •~ , ३०व्यतिरेकेणापि प्रत्यक्षात् प्रवृत्तिदृश्यते इति तदा तत्कार्या सा कमान मयति? तथाहि-प्रतिषण दोशारं न विकल्परूपानुमानल्यापार संघद्यते, अथ च प्रतिमासमाने पस्तुनि प्रवृत्तिः सम्रपट प्रामाण्यवाद। श्रोप्रधीरममाण सादितरामिरसाने" मो० ० २, लो 3] इनि, तदप्ययुक्तम्। गीतादिविषयायाः धोत्रयुद्धरर्थक्रियानुमयकारयेन स्तर पर प्रभावित तथा चित्रगतरूपयुद्धरपि म्यत एष प्रामाण्यसिद्धिा, अर्थक्रियाऽनुमकारबार । गरव-पार्वत रसयुद्धीनां त्वर्थक्रियानुमयरूपत्वं सुप्रसिद्धमेय । यदप्युकम् 'मिमेकाविषयम्, निविष्य. ५संपादशानं पूर्पस्य प्रामाण्यनिश्चायकम्' इत्यादि, 'तप्रेकसातयत्तिनो विषयवयश कप-सी लक्षणस्यैकसामध्यधीनतया परस्परमव्यभिचारात् सर्टीदिनानं आपदयम्यायामभियान्ति स्पांदिव्यतिरेफेण असमय मिन्नविषयमपि स्वविषयामायेऽप्यारोमानापडाना नामाई निश्चाययतीति न तत्संगत पयम् (गतमेय) । अत एव रूपायर्याविनामा यिस्याद् धनीनां वशेष शङ्कायां क्वचिद् वीणादिरूपप्रतिपत्ती तविशेषशकाव्यात्तदूपदर्शनसंवादादप प्रामाण्यनिक १०सिद्धो भवति । यथोक्तम् 'कि संबादशानं साधनेचानविषयं तस्य प्रामाण्यं व्यवस्थापयति, न मिन्नविषयम्' इत्यादि, तदप्यविदितपराभिप्रायस्याभिधानम्, न हि संपादमानं तहाइकत्वेन तास प्रामाण्यं व्यवस्थापयति, किन्तु तत्कार्यविशेषान, यया धूमोऽग्निम् इति पराम्युपगमः । या संवादशानात् साधनशानप्रामाण्यनिश्चये चादूपणमन्यायि', तदप्यसङ्गतम्। यदि हि नया मेवसंवादझानात् सार्थनशामस्य प्रामाण्यं निश्चित्य प्रयत तदा स्यात् तद्दूषणम्, यदा १५दर्शने सत्येकदा शीतपीडितोऽन्याय तद्देशमुपसर्पस्तस्पर्शमनुमपति, रूपालना या केचित् तार घहेरानने; तदाऽसौ पहिरूपदर्शन-स्पर्शनज्ञानयोः संबन्धमयगच्छति पयस्वको भावः एक तप्रयोजननिर्धकः' इति सोऽयगतसंपन्योऽन्यदान-पासदशायामनुमानात् 'ममाय रूपप्रति भासोऽभिमतार्थक्रियासाधना, एयरूपप्रतिमासत्यात्, पूर्वोत्पन्नयंकपप्रतिमासवस्' इत्यलाद साधननिर्मासिज्ञानस्य प्रामाण्यं निश्चित्य प्रवर्तत इति कुतधकचोधायतास?"अभ्यासदायामी २० साधनशानस्यानुमानात् प्रामाण्यं निश्चित्य प्रवर्तते" इत्येके । न च तशायामन्वय-व्यतिरेक व्यापारस्यासंवेदनान्नानुमानन्यापार इत्यभिधातुं शक्यम्, अनुपलक्ष्यमाणस्यापि तदापारस्थान गमनीयत्यात् अफसाद धूमदर्शनात् परोक्षामिप्रतिपत्ताविया, अन्यथा गृहीतविस्मृतप्रतिषधस्थापि तदर्शनादकस्सात् तत्प्रतिपत्तिः स्यात् । न चाध्यक्षय साधनधानस फरसाधनयतिरिति कर मध्यक्षेऽनुमानप्रवृत्तिः इति चोधम्, उदयमानप्रदेशपरीक्षानिसहरिया तनननशक्तरप्रत्यक्षता २५अनुमानप्रवृत्तिमन्तरेण निश्वेतुमशक्यत्वात् । तदुक्तम्- "ताये हरेषु संबित्सामर्यमाविनः । स्मरणादमिलापेण व्यवहारः प्रवर्तते"[ इति। अपरे तु मन्यन्ते "अभ्यासायस्थायामनुमानमन्तरेणापि प्रवृत्तिः सम्भवति" । अथ अनुमाने शामि प्रवृतिया, तदभावे न दृष्टा इत्यनुमानकार्य सानन्येव सत्सम्यासदशायां विकल्पस्वरूपानुमा इति । अथादायनुमानात् प्रवृत्तिदृष्टेति तदन्तरेण सापयामति नन्येयमादौ पालो घनाद व्यवहारो टटः, पश्चात् पालोचनमन्तरेण कपुरस्थितपस्नुपर्शनमााद् भवति इति पाध्यम् । यदि पुनरवमानव्यतिरेकेण सर्पदा प्रवृत्तिन भवतीति अवकमनुमानमेवेत्यभ्युपगम- ३५वपासति प्रत्यक्षेण लिङ्गमहणामापात् तत्राप्यनुमानमेय तनिश्चयव्यवहारकारणम्, निधययतिरेकेण मोदयमासादयतीत्यनयस्थाप्रसङ्गतोऽनुमानस्यामनं चित् . . पा.' विना सर्वत्र 'अपि। १ पृ..पं. ५सापनविषयं तस्य पु.। सापनमामाण्य--. । सापतम्य मामाण्य-गु.॥ ९भत्र 'पशेमनुमति' इति पूर्वोतमन्वेयम् । माघे (५)पा। ११मन्यामम्-सो...। २वाइयमानस्य उप-म., क .. ७. ५. १५/. १. सायनस्य फट..

अपने पारडे- बारामावस्यायां प्रदर्श स्वत पय पदारद अनुपम् । अनुमानं नु नादार- ति-प्रतिरन्धलिनियायलेन ससागपजायमानत्यादेव तापपलियु संगदमय- बोदवा मागेरमाणामासानिवदेन विधीयतेऽतान एव तयादि-पद्पत उपजायते तत् सारातियुकन्, तपा-प्रद सार्पस, अनुवादर पे प्रतिवदेखिदर्शनमारापानं ििानले शनि निधोपत इति । म प्रति नियनिन यिी महारोज ५ मार, मदिरानेन समरे सनात् । तपाहि-मायाम्पमिचारनियन पत्रा. देग मानस प्रतियः, अपमिवारय मान्यतालते, संघ च मानस मापनसटिर- नसनम्- "अपंसासम्ममापा प्रलोऽपि ममापना। प्रतिपरम्नमापस तनु वे समंदयम्"[ पति। हमार म्हं प्रति परमामायापार सारते । अनुमान प्रामा प्रतिनिनिषा बता ससाभिचारलापन उत्रनन प्रसससिया न परतलामापनिपरे पर चोदयापठार वझे तु संवादात् मागपदिल्लनिः अगानिमा पनि गंवादावाना माग नस मामायापयनिलियुना। अन उत्ती, मका, तो घ मारमन्यमा विशादि. बार ये गाई प्रत्यनपेक्षाः' इति प्रयोगे ऐनोरनिधिः । यस सन्देह- विदिय-१५ सामान परलो नियदो पयस्मिनोऽता मर-मिर्पयासिनन पोगे , पायमिति । पाप्पुरम् 'समारभूनां मापं प्रति सन्दर-मिपंपामाशामिलो ऐद' man समरिमामादिनापामपिपिले मेरे. मानातीनां शिमंशाददगाबा महान एरमेय कान, नानि NHAIYAनि अन्य पारेर सिन्नर तापमहादिरोगामदेहाने सियसनासनीति नामा दिE:- बासिनेरतिमामि तिमपनो नो THIRTrtel पनि नामासपोएत्यं स TREET'मा महOTE हारेपनि नपिचर मो-रो farmins सिये समायोति प्रदर्शिता Agit rare. PATRO पाप्मन परे मोला NEER. RAI दमाशोEN. Item नगर मोरा दिवस, माया freeminence रिपोसिमलेर मानि उ ना ! Fमान पिसारा मासान् । मना curr free, THATANEPRETATURES एम सिमा xिrform ITE- पति ETTETTET RATE INTERESTERRORISTIANET feree maharastram . . stered are n rrrrr Evenmitra-terrowse {m}AARTerrerrerstarremierrer - ARTHATANT Tre mehtare re-entreritam १८ -प्रामाण्यवाद। निश्चयनिमित्तत्यासम्भात्, न शन्यकाला अनुपलब्धिरल्यकालममायनिधयं विदधाति अतिप्रस. हात् । नापि प्रवृत्युत्तरकालभाविनी थाधकानुपलब्धिलनिश्चयनिमित्तम्, प्राक् प्रवृत्तेः 'उत्तरकालं याघकोपसम्धिन भविष्यति' इति अयोग्दर्शिना निधेतुमशक्यत्वेन तम्या असित्यात् । नापि प्रत्युत्तरकालभाविन्यनुपलम्धिस्तदेय निधीयमाना . तत्कालमावियाधकामावनिधयभ्य निमित्तं '५मयिष्यतीति यतुं शक्यम्, तत्कालमायिनो निश्चयम्याकिश्चित्करन्यप्रतिपादनात् । किंच, पाधकानु पलब्धिः सर्वसम्बन्धिनी किं तनिश्चयहेतुः, उताऽमिसम्यन्मिनी इति पुनरपि पक्षद्वयम् । यदि सर्यसम्पम्धिनीति पक्षा, सन युक्त तथा असिद्धग्यात्-न हि सर्व प्रमाता पाय नोपलमले' इति अर्याग्दर्शिना निचेतुं शक्यम् । अथात्मसम्यन्धिनीत्सम्युपगमः, सोऽप्ययुस्ता आत्मसम्यः धिन्या अनुपलम्धेः परचेनोवृत्तिविशेरनैकान्तिकस्यात् । तन्न बाधाऽभावनिधयेऽनुपलम्पिनि। १०मित्तम् । नाऽपि संघादो निमित्तम्, भवदम्युपगमेनानयस्याप्रसङ्गम्य प्रतिपादितयात् । न च याघाऽमायो विशेषः सम्यमत्ययस्य सम्मयति इति प्रागेय प्रतिपादितम् । कारणदोगमायेऽव्यय- मेय न्यायो पक्षम्य इति मासायपि तम्य विशेषः। किंच, कारणदीप यायकामाययोभयदभ्युपगमेन कारपगुण-संपादकसत्यपरूपन्यमा प्रतिपादनात् तनिधये तस्य विशेऽन्युपगम्यमाने परतः प्रामा. प्पनिधयोऽभ्युपगत एव स्थन्, न च सोऽपि युक्ता मनयस्यायोग्य भवदभिप्रायेण प्रात प्रति. १५पादितस्यात् । यदप्युक्तम् एवं वियतुरमान'-त्यादि, तकस्य ज्ञानस्य प्रामाण्यम्, पुनरप्रामा- पयम, पुनः प्रामाण्यम् सयस्थात्रयदर्शनाद पाप, तापमादी पाऽयस्थात्रयमारहमानस कार्य परीक्षकसमापपापेक्षा पेनानयस्था न सात् ! यदप्युक्तम् 'अपेक्षाः' इत्यादि सदस्य मगतम्। पनो नापं एलरायदार प्रस्तुनो येन कतिपयमत्ययमा निमप्यते । म दिप्रमानमरतरेप पापकानानिधिः, न पाहाण्या प्रमाणं भादमिमायेण सम्मयतीत्युनाम् । तपा कारण २.दोमानेऽपि पूर्य मावासाम्य कारणदोनशानातरापेक्षा कयमनयस्यानिधिः! कारणको पसनम तरकारपदोपमादकमानामात्रमात्रता प्रमाणप्यार मात्रालयस्या । पाह- "पदा मनःप्रमाणायं तदाऽन्यभय मृग्यते । निती दिनिप्यार दोगनानादयततः" [ो पा० १०२, सो०५९] इति, लपानुदोयम्, मागेप पिदिलोतरापात् । न न दोपासना दोगमापा, गाम्यपि वोपे समान सम्मान | सामागोलारमामयपरियेग मिल्याप्रत्ययोपारमोयं दिकर्ष निमि- परिनिमिणमिनियोग, ग चाग्निपत्यात समपि नोपसत्यने । म वयोमानेन म्या देव पिता निररमा दोगमायने व यावापेक्षायां सामयम्या मात्र प्रतिपादिना । तारिनिरा पाई महेन- "टार प्रमाण मानगि स्थितम् । पापबारमारानाभ्यो तपोयने पपीने:पि मित्रानवण्या राज्यो प्रामादि समय प्रतिक्षितम् । मसारमानेन यामाम्येन सापने। मिलामामामात्र" Jtri - “মানবিলাষী খলখযেখায়লা শাস হললাম, पोको पन:- - . ... -. । अगातिg....... . गप्रमा11.

} } ৭ } kot } ময়ই কাট- पापाप्रलपलादियान्यायापारम्। যৗনইমাণবাহ পূবনমখীন { সমাধি বিধারে বাধা বিধান। আর তৃণাত্বক নিবর। { মাথায় রাখি। সবী সমবাইন পুত্বে মাগনা ! | অয়ালমান খান খই। মুনময়ায় বিমাৰ মৰঃ খায়নে ततो निरपवादयान नेनपाएं पीपसा। গ্রাম ইন এর মুলমাই | • যে গয়ালম্বি মাহিম। মারবাইন শা ছাগলঃ ॥ } নি। - বা গান মম- প্লামারি ধরিনো, ধীনেসিয়াছিনানান "ম তিনমকি ধরে রাখা সাক্ষায়। শহু পূর্ব থরেগামা খুন নিয়ে বানান নিশেলিৰিল দুনিনু বই। ( ঈণা সামান্যাদানঃ মতাে মামায আঘনিমামি মহাস, যা ঘামমায়া। পারিবানি প্রবাহুখারমানশ্বমাৰৰ । ft, সলোমন সঃ প্রামামি মামাখামখানা মথনা, ঘানানয়ন পান স অন্ত নাই স ৰিবি, থিসামামিৗণি বৰ কাইত না। যখালেনিৰ কাম সব প্রমাণ, প্রয়া যিময়াঘামেই নয়, ইয়োকনি সন্নিীর নাহিয়ানম নমৰি ঋপিতা। সয়াবিইমঘমাংশ লােহা গৃহস হলােই দেয়বিষমাণ মেই ই বিশ্ব। এ লাখ বাঘ !ি ধরুল মান্না নিখেলোথাম, যায় প্রমাণ নিয়মা দ্বীদাখানখালী খাদাব খান মিনু। মাথঃ যি সাবং যুদ্ধঃ বয়ান ইনাম। নয়মাৱন লাগনিয়াদাওয়াং-এরী। ময়মনীষ কুমিনারি বানু, ববি। নদিন বিদ্যাস তে ইনুল~ ধই সময় শামা য" { খ গ ৫} বল তুলশী গুলেশমা মারা যান বামহা মেমং ষঃ বিঃ জীৱনশ-সমযেৰ বিষ নিশ্যি -জলিসেথেনি শমী হৈ মই গান যায়। যায়াতে , *গ >> {}, মনে " २० ध्यमाग्यवाद। . [शाल्यापारसैवासिदिः] किंच, प्रमाणे सिद्धे सति कि तत्मामाण्यं सता, परतो या' इति चिन्ता युनिमती, भा म्युपगमेन न तदेय न सम्भवति । तथाहि-मारल्यापार प्रमाण भपताऽभ्युपगम्यते', न सामी पुनः तदाहकममागामायात् । तपाहि-प्रत्यक्षं या उद्वाहकम्, अनुमानम्, भन्या प्रमाणा. ५न्तरम् । तत्र यदि प्रत्यक्ष सहाहकमम्युपगम्यत तदाऽमापि पकनम्-स्वसंपेहनम्, पारोन्द्रिय अन्, मनःप्रम या न तावत् संवेदनं तहादकम्, मयता समात्यानभ्युपगमार राग । नापि पावन्द्रियहम्, इन्द्रियाणां स्वसंग्वेज्य शानजनकरयाम्पुपगमादामच हातमापारेज गद तेग संबन्धः, प्रतिनियतकादिविण्यत्वात् । नापि मनोमन्यं प्रत्यक्ष शानुमापारलगप्रमाणमा हाम्, समानीलमायाम् अनभ्युपगमाय । अपानुमान तबाहकमभ्युपगम्यने, समयगुणम्। १० पदोऽनुमानमरि "मांतरधरौदर्शनाराभिरष्टेऽ' युधिः" एपेशागमम्युपगम्यते । मंदम्पधानमंहग्यम्युहासेन निरमसाणोऽभ्युपगम्यते । यत उनम् - "संपन्धोगिता. रम्यवानो गनगनामावनिवन्धनम् । यो है सारारम्पंगतयोगेम्पगमकमा, भेद विदम्पनला। ममेरे या गानारितिकाल एप सायटापि प्रतियात् कथं गापगमा माती या पम्मिन प्रतीयमाने या प्रतीयते तत् ततो मिसम्, यथा घरे मनीयमा मन परेन् सापनीतिले सायं ता तत् ततो मिममिनि कई me !, पारगम्ममापोरयुपगम्यनेमा ताराविक বীমা নম, খানপম মনামীয ই मनपानिमानिसमायेन निधितम्, मानिएर भियता निध. TRATHIति, साई मिनिसीयमाने पर निसीयो' सादिषाकर्ण " पुर, प्रामाननीयमेर शनिपानिपतान विधिसमिति माता ए. TETTE thrriagो माति । नापि तपशिलाणा यो गापगम order.N: पलारे प्रति गमका यार । अपराशाये पा. पारितोयलारोनि दिपेनिसियविमान Triपागनी बापमाणामाया तमो गापूति मिति referra mm मा कार्य भूमो हुमगुमाकापमा मिनार" TRो मानाय प्रणा निया rfere rrrrrrrrrianमारी मानमितिमrt ht reitent in it. Affaiनिकामागोमन waternie Treal fauमालHari: गति। - जामानिमा - REFTER- Thila-TMETHIममा Mera मारमनमानमा नाम मनमाम् । गाftwarginोमा wrrrrr fitn। “म्म। Faमा -- न TK.5*' - সুষম চাই- কার্যাগমাধ্যবিষয়খালী খী পরি। নিবনিখমাখা বিমান। 1 শ্রেনিমা এর নামীচিয়ে। नियमास् फेयलादेप न किचिनानुमीयते" ॥ }াৰি। सच संपन्धः किमापयनिधयारेण प्रतीयते, उत व्यतिरेकनिधयारेण इति विकरद्वयम् । ५ নখ যদি মযম বিশিষ্ট, গাবি - মাগৰিশ্ৰষ, বাৰমাৰ ( বিন মায সয়লাবনিয়া, সায়া বি কাম নাই বি মায়া', অ গ্রামা যে মালামাল মাইল খান ,বাচ্চাকেইন সহ ধুময় নিবি অন্য হাসিমাখ। নাবি খামালোই কােথায় নীঃ মান্না মরণ ফাৰ কথা, লার্থীািবান ময়মণ বিষয়ক মারিয়া ৪নং ষ মাথা। লাথি ঘর্ষনীন সংঘ যুবা ইলীঃ শায়ঃ জয়ী সিনুন, সঘামায়ণ বসােব, যশাই যে শাবলগীযষী দিল । নান্যাল দ্বিয়, অনুমান নিয়িশষেইমমঘয়াম। যা ঘয মেমষি, বুৰীৰ। অনুমানা বমিলিয়-সাঘাথায় থীবি মাী মবিন খ মানমমিকি মালালাময়রি। গল্প ও ঘলিয়া ৪ানােবাই যা খুশি নাযিলগঃ বখা নিখ খয। পাবি যদি কৰিবালৈ, অমী খনিকে ‘ বামাই নৈীসাথrঘন ঘমুসলমা মাখঃ মা মদিয়ব, রােমাঘবিযবিঘা, কানামা, অমাকামগবাধা যায়। সামাঙ্গিযমাকসমাগনিফ, সহীবাস। খালনিয়াবি বন্ধ সৗদি যুবরাবধান কিম, হীন্তি আমায়মানযামুনি থমযু সঙ্গ যায়। বয়, ন ন যুক) যমৗগােবি থকাশ-সঃ বিদ্বোমীলিম, যদি কােনো ছবি। বর অােখমঃ মসলাগাথনিয়াজনিন যােব না যা সলমাখিয়ায়, ও বন্ধ। যত ঘী বরিশাখা, য গ যুক্ত। যথনীলিবিননালিসাখা। সব আমলেরিযই বোমা, অনুস ঘাঘঘিমাদারি যােগমনশাহজরি বা, কােনো না খােয়াখা মাখ মাথা, কালাে, আকাথ, হিতেবিসি বাংলা হাছিবন্ধাবসামিম, সবুদ। মাথামবিই বিখই আমি বিলিযাযাবর মাধ্যমেথএখানে ছু গানথেমাথাব্যাথা ল গ ন যাব সলিমু খালা तीति मात्र स्वमायापलम्गश पापामापि कारणानुपलम्मामराम्यामापनि বির কালাই খালাম। ঘামানিয়াযান মাস। সবি vার্য নিয়নশ্বাসো মা বিখাশােনু। প্রায় আবােরা নি লােৱাৰি । সoিাব। মাথা प्यापकभापे पाप्पामापसाभकोऽयुपगम्यते । म प प्रासापान ঘি গরু, মানবাহযেমষিহ স বনৌ বিবিvিত্র বিশ সহশালা--এখী ঘিাহিরে মা বানশালী নিমাই খাম-থে মিলিগ্যা। বিক্ষোর্থে শিং মাই নিয়মানুষ করবাে। {শাধা মাথ- ••। ২ ৪ ৪ २२ मानायरा।। स्थितिलक्षणा, सोऽपि लक्षणय मरुपयस्वीपमयमरूपम्य दृश्यन्यान्युपगमनियो रपयवायुः पगमनिमित्तप्रमाणनियरधनो न प्रदानसाध्यविषये संमपनि, दन्न ततोऽपि प्रस्तुत मितिःनन्न साध्यस्गमाचनिश्चयोऽनुपलम्मनियन्धनः । साधनामायनिधयोऽपि मारल्यानुपजम्मानिमित्ता, उन- दोषयात् । दृश्यानुपलम्मनिमित्तत्येऽपि न स्वमायानुपन्तम्मन्ननिमिनम्, उदिष्टविण्यामाषयर. ५हारमाधकन्वेन तभ्य व्यापाराभ्युपगमात् । अनुदिष्ट विषयन्येऽपि 'यत्र यत्र सायरामायनत्र तत्र साघमामायः' इत्येयं न ततासाधनामायनिधयः, तनिधयश्च नियमनिययनुरिति नम्बमावानु। पलम्भोऽपि तनियमहेतुः मापि कारणानुएलम्मः, यतः कारणं शावृयापार पवार्थप्रकटतालमा पस देतोर्मयताऽभ्युपगम्यते, न चासो प्रयासमधिगम्य इति कुनस्तस्य सम्पति (तं प्रति ) कार- पत्यागमः । इति न कारणानुपलम्मोऽपि तदमायनिध्यपहेतुः। व्यापकानुपलम्मेत्ययमेव न्याया, १० यतो व्यापकत्वमपि पूर्वोक्तहेर्ने प्रति मायापारम्ययाम्युपगन्तव्यम्; अन्यथाऽन्यन्य व्यापकन्ये साध्यविपक्षाद व्यापकनिवृत्सिद्वारेण नियतमानमपि साधनं न सान्यनियनं सात् । अप यया सत्वलक्षणो हेतुः क्षणिकन्यलक्षपसायव्यतिरिक्तमम-योगपद्यस्यम्पपदार्यान्तरव्यापकनिवृत्तिहा- रेणाऽक्षणिकलक्षणाद विपक्षाध्यायमानः स्वसाप्यनियनस्तथा मानोऽपि हेनुमविग्यति, अस- भ्यगेतत् । यतस्तथापि यद्यर्थक्रियालक्षणमत्वन्यापके क्रम-योगपये कुतश्चिन् प्रमाणान् हानिक १५सिद्ध मयतस्तदा तन्निवृत्तिद्वारेण रिपक्षाद व्यावनमानोऽपि सत्यलक्षणों हेतुः स्यसायनियनः स्यात्, अन्यथा तंत्र व्यापकत्यनिश्चये यश्यन्तरे मणिकाक्षमिकरूपे तम्पारायमानन्वेन तद्या- व्यस्यापि नैकान्ततः क्षणिकनियतत्वनिश्चयः। न च प्रश्नसाध्येऽयं न्यायः, तस्यासन्तपरोसत्वेन हेतुव्यापकमायान्तराधिकरणत्यासिद्धेः। नन्न व्यापकानुपलम्मनिमित्तोऽपि विपक्षे साधनामायनि- श्वयः । नापि विरुद्धोपलम्धिनिमित्तः, महतसाव्यस्यात्यलपरोक्षत्वेन तदमतिपत्तौ तदभावनियन. २० विपक्षस्याप्यप्रतिपत्तितस्लन सहार्थप्रकारानलक्षणम्य हेतोः सहानवस्थानलक्षणविरोधासिद्धः। पर- स्परपरिहारस्थितलक्षणस्तु निरोधोऽन्योन्यव्यवच्छेदरूपयोरप्रकाशनाऽप्रकाशनयोः सम्भवति, न पुनरर्थप्रकाशन-अशातृव्यापारयोः, अन्योन्यव्यवच्छेदरूपन्यामावात् । नापि शातृव्यापारनियत- स्वादर्थप्रकाशनय साध्यविपक्षण निरोध इति शश्यममिधातुम्, अन्योन्याश्रयदोरमसतेः । तया- हि-सिद्धे तनियनत्ये तद्विपक्षविरोधसिद्धिः, तन्सिद्धश्च ननियतत्यसिद्धिरिति स्पष्ट पवेतरेलराश्रयो २५दोपः । तन्न विरुद्धोपलब्धिनिमित्तोऽपि विपक्षे साधनामावनिश्चयः । अथादर्शनशम्देन अमावास्यं प्रमाणं व्यतिरेकनिश्चयनिमित्तममिधीयते, तदप्यनुपपनम् ः तम्य ननिमित्तत्वासम्मवात् । तथाहि- निषध्यविषयप्रमाणपञ्चकस्वरूपतयाऽऽत्मनोऽपरिणामरूपं घा तदभ्युपगम्येन, तदन्यवस्तुविषय. ज्ञानरूपं या गत्यन्तराभावात् । तदुकम्- "प्रत्यक्षादेनुत्पत्तिा प्रमामामाव उच्यते । ३० साऽऽत्मनोऽपरिणामोया विज्ञानं वाऽन्यवस्तुनि" लोभ्यास०५, अमावपश्लो०११] तप यदि निषेध्यविषयप्रमाणपञ्चकरूपत्वेनात्मनोऽपरिणामलक्षणममाशल्यप्रमाणं साधनामावनि- यतसाध्यामावस्वरूपव्यतिरेकनिधयानिमित्तम्' इत्यभ्युपगमः, स न युक्ताः तस्य समुद्रोदपलपैरि- माणेनानैकान्तिकत्वात् । अयान्यवस्तुविषयविज्ञानस्वरूपममावास्यं प्रमाण व्यतिरेकनिश्चयनिमित्त मिति पक्षः, सोऽपि न युक्त विकल्पानुपपत्रः । तथाहि-किं तत् साम्यनियतसाधनस्वरूपादन्यद् ३५पस्तु, यद्विपयं शानं तदन्यज्ञानमित्युच्यते ?-यदि ययोकसाधनस्यरूपयतिरिक पदार्यान्तरं तदा थकव्यम्-तएकसानसंसर्गि साधनेन सह, उतान्यया इति। यदि यथोक्कसाधनेनैकसानसंसर्गिददा तद्विपर्यशानात् सिध्यति यथोनसाधनस्यामायनिक्षयः प्रतिनियताविपया, किन्तु 'यत्र यत्र साध्या- भाषस्तत्र वापरतया साधनस्याप्यमापः' इत्येवंमूतो व्यतिरेकनिधयो न ततः सिध्यति सर्योपसं. दारेण साधनामापनियतमाध्यामायनिधयय तो साप्यनियतत्यलक्षणनियमनिधायक पनि नैक . पृ.११.१३ २ अन्यथा तळ्यापस्पृश्य-गु.। ३ अत्याप्रम्-श्री... | ४ "गनुदोर की पसानिए समुद्रौदपलपरिमाणेन । ५ समुद्रशेदकपरिणामेन है। "एमबन्धिानमरमर धिम्मारकम्" (Th नियमेन) गु.दि.। -नियम्य हेनोः' या, वा० मिना गर्वत्र निश्चयनोःम.

प्रथमे फाडे- २३ मानसपिदागरोपसम्मानभायापार प्रमाणात तिरेकनिया | अप तरसंसर्गिपदा. मायग्लभाममायाएयं प्रमाण सायाभाचे साधनाभाष निभनिमितम् , तदप्यसम्मम्। अतिस-गदि पराधीतरोपसम्ममासादापस्य तदनुस्ययोग्यतापातेन सहयज्ञानासंसार्मिणः पदान्तरमामापनिया, अन्यथा महोपसम्भार नियामापनिषपः स्यात् । अय सपाभूतसाप मान्यतापमाप, तापिपयं ज्ञानं सदस्यानम् , सनिपटे साधनामापनिधपनिमित्तम्। मनु तदपि भान पा साध्यामापत्र साधनाभाय स्वयं प्रपर्सते, उत 'कचिदेव सायामाचे साधनाभापास्येयम् सय पचापा, सन युनत योनासाधनवियितारायंप्रदेश-फारसप्रत्यसी. करणमरेप एपंभूतमानोत्पापसम्भयात् । सर्पदेशप्रत्यक्षीकरणे | फालादिषिप्रधानन्तप्रदेशम. स्वीकरण भाषादिपपद्धितरपदासासाकरलाल स पप सदी सादिस्यनुमानाभ- पसभामसाधर्म पापम् । अव द्वितीयपक्षाभ्युपगमः, तदा भयति तता प्रतिनियने १० भने सायाभाचे साधनाभायनिधया घटपिपिलमत्यसप्रदेशप घटामापनिधयः-तुि तपाभूः तात् मापाभाधे माधनामापनिधयानतिरेको निधितो मयति । साधनामापनियतसाध्याभा- पम्य पापसंहारेण निधये ध्यतिरेको निधितो भपति; अन्यथा~यय सायामाये साधनामायो मयति तप साधनसनाऽपि न साध्यमिति न साधने सायनियतं सादिति व्यतिरेकनिध- पनिम्तिो देनी साम्पनियम निधासात् सन्न नितीयोऽपि पक्षः। अथ न मक्तसाधनामा-१५ पक्षानं तदिविनासमस्तपदेसोपलम्भनिमित्तम्-ग्रेन पूर्वोतो दोष-किन्तु तनिषयममागचकनिपू. तिनिमितम् । तदुक्तम्- "प्रमाण पत्र पस्तुरूपे न जायते । परनुसत्तापयोधाय तत्रामाचप्रमाणता" [लो या सू०५, अभावप० सो०१] नन्यनापि पसास्यम्-कि सर्पदेश-कालापस्थितसमलप्रमाएसंपम्धिनी सप्रिवृतिस्तथानसाधना-२० भाषानिमित्तम्, उत प्रतिनियता-कालापस्थिनारमसम्पधिनी ति कल्पनाइयम् । 'वर थपापा पारपना, सान युगा सपाभूतापालसित्तासिसत्यात् । न चालिसाऽपि तथाभूतमाननि, मिसम्, अतिप्रसार-सस्यापि तपाभूतज्ञाननिमि स्यात् फेनचित् सह मस्यासत्ति-विक्ष. पर्यभायाम्। अनभ्युपगमापनदि परेशापि प्रमाणपञ्चकनिवृत्तेरसिमाया अमापशाननिमितता. न्युपता, छापामस्वैप प्रमाणपकनियरमापसाधनत्यतिपादनात- "गरया गरया नुतान देशान् पापों मोपलभ्यते। साम्पकारणामापासनित्यवगम्यते" [लो० पासू०५, अर्या०प ००३० इत्यभिधानात् । म घेलियादियदहाताऽपि प्रमाणपकनितिरभाषानं जनयिष्यतीति सत्यममिधातुम् ममान. पञ्चकानियोस्तुमाया मनुष्यापाया जनकारपम्, भाषरूपताप्रसना-पपलक्षमा भाष ३० स्थात्म सर्वसंपम्धिनी प्रमाणपत्रनितिषिपक्षे सापनामायनिपनियन्यनम्नाप्पारमय- धिनी ससिमिसम्, पता साऽपि कितावारिधी, अतीताऽनागतकालमया पान पूर्षा, तथा गहालिनरेशपरिसंपयानेनामशान्तिकस्यात् । मोसप, सादारिपकस्सारमनस्तविसेरसम- धात् अतिदरपाया र आत्मसंपनियन्यपि प्रमाणपञ्चनितिलसानोपसिनिमिसम्म अन्यबस्थपिहानटाणमप्यमापास्प प्रमाणे मतिरेकनिधयनिमितम् । प्रिसद्गशाइ अभावप्रमाणनिरसनम् ] "गृहीत्या परतुसमा स्मृत्या ध प्रतियोगिनम् । मानसं मालितासानं जायतेऽशनपेक्षया" [शेपासू०५, अमापसो०२०) 1युपगम्यने ।।

२४ प्रामाण्यवाद। त्यमायप्रमाणोपत्ती निमित्तमनिपादनम्, तर यिभ्यनारमा प्रतियोगिमंगटण हम, आदोस्थि अमंगता यद्यायः पमा, सन युका प्रतियोगिसंगष्यस्यन्तरण प्रत्यत्रण प्रहणे प्रतियोगिनः प्रत्यक्षेण धम्म्यन्तरे प्रहणार नामायानपत्रमाण वर तदमानमाहरवेन प्रवृत्तिा प्रवृती या प्रतियोगिमात्रेऽपि तदमायनादकत्येन प्रामविपर्यस्तरमान मामाग्यम् । अप ५प्रतियोग्यसंमयस्त्वन्तरमहणं तदा प्रत्यक्षेणय प्रतियोग्यमाय गृहीतवात् वयामायाम्यं प्रमाण प्रपर्वमानं ध्यर्थम् । अथ प्रतियोग्यसंगृपनाऽयगमो पस्यनरम्गामाचप्रमाणसंपायनहिं तदस्य मायाण्यं प्रमाण प्रतियोग्यसंग्रप्रयासयन्तरपणे सति प्रयर्सने, तदसंगृष्टतापगमध पुनरप्यमाय: प्रमाणसंपाय इस्पनयस्था । तथा, प्रतियोगिनोऽपि सरणं कि धमरन्तरसंगृपम्य, अयासंमृश्य! यदि संसृष्टस्य तदा मामायप्रमाणप्रसिरिति पूर्वयद्वाच्यम् । अयासंगृष्टस सरणम्, गनु प्रत्यक्षेण १०पस्यन्तरासंपएस प्रतियोगिनो प्रहणे तथाभूतस्य तस्य स्मरण नान्यया प्रत्यक्षेत्र पूर्वप्रवृत्तेन घस्त्यातरासंगप्रतियोगिप्रहणे पुनरप्यमायप्रमाणपरिकल्पनं व्यर्थम्- "पत्यसंकरसिद्धिध तत्प्रामाण्यसमाथया" [लो या मु०५, अमायप० लो०२० इत्यमिधानात् तदपतस्य परिकल्पनम्,तच प्रत्यय मन मिति तस्यध्ययंता अयात्राप्यमायप्रमाण संपाचा प्रतियोगिनो यस्त्वन्तरासंग्रतामहस्तहिं तथाभूतमतियोगिह तथास्तस्य तस्य सरणम् , १५तत्सद्भावे घामायप्रमाणप्रवृचिा, तत्प्रवृधीच तम्यासंपृष्टतामहः, तहहे च स्मरणमियेचं चकत्रो भवन्तममुयनातिनापि यस्तुमात्रस्य प्रत्यक्षेण प्रहणमित्यमिधातुंराश्यम्, तपाऽभ्युपगमे तेश्य वस्त्र. न्तरस्यासिद्धेप्रतियोगिनोऽपि प्रतियोगित्वस्य, इति न प्रतियोगिनो नियतरूपस्य सरणमिति सुतराम- भाषप्रमाणोत्पत्त्यमायः। किंच, यदि अमायाख्यं प्रमागमभायग्राहकमभ्युपगम्यते तदातमेचे प्रतिपाद- यतु, प्रतियोगिनस्तु निवृत्तिः कयं तेन प्रतिपादिता स्यात् ? अथामावप्रतिपत्ती तन्निवृत्तिप्रतिपत्तिः, २० ननु साऽपि निवृत्तिा प्रतियोगिस्वरूपासंस्पर्शिनी, ततश्च तत्मतिपत्तौ पुनरपि कथं प्रतियोगिनियुः तिसिद्धिः तमिवृत्तिसिद्धेरपरतनिवृचिसियभ्युपगमे अपरा तनिवृत्तिलयाऽभ्युपगमनीयत्यन- घस्था ! किंच, अमावप्रतिपत्ती प्रतियोगिस्वरूपं किमनुवर्तते, व्यायचंते या? अनुवृत्तौ कथं प्रतियो- गिनोऽभावः? व्यावृत्ती कचं प्रतिषेधः प्रतिपादयितुं शक्यः ? तद्विविक्तप्रतिपत्तेस्तन्प्रतिषेध इति चेद, न तदप्रतिमासने तद्विविकताया एव प्रतिपत्नुमशः । प्रतियोगिप्रतिमासाद् नायं दोष इति २५ चेद, कतर्हि विधाने तस्य मतिमासः? यदि प्रत्यक्ष, न युक्तः, तत्सद्भावसिझ्या वनिवृत्यसिद्धः । सरणे तस्य प्रतिमास इति चेत्, न तमापि येन रूपेण प्रतिभाति न तेनामावः, येन न प्रतिभाति न सेन निषेधः, तदेवं यदि प्रतियोगिस्वरूपादन्योऽमावस्तथापि तत्यतिपत्तौ न तनिवृत्तिसिद्धिः। अनन्यत्वेऽपि तत्प्रतिपत्ती प्रतियोगिनः प्रतिपन्नत्वादन निषेधः । अपि च, तदू अमावाल्यं प्रमाणं निश्चितं सत् प्रताभावनिश्चयनिमित्तत्वेनाभ्युपगम्यने, आहोस्विद् अनिश्चितम् इति विकल्पन- ३० यम् । यद्यनिश्चितमिति पक्षा, स न युक्तः स्वयमव्यवस्थितस्य खरविषाणादेरिव अन्यनिश्वायकरना योगात् । इन्द्रियादेस्त्वनिश्चितस्यापि रूपादिशानं प्रति कारणत्यानिश्वायकत्वं युक्तम्, न पुनरमा पममाणस्य, तस्यापरमानं प्रति कारणत्वासम्मवात्। तदसम्मवश्व-प्रमाणामाचारमकरवेनावस्तु। स्यात्। पस्तुत्येऽपि तस्यैव प्रमेयामायनिश्चयपत्येना युपगमाईत्वात् । नापि द्वितीयः पक्षा, यत. स्तनिश्चयोऽन्यस्मादमावास्यात् प्रमाणादम्युपगम्येत, प्रमेयामावाद या! तत्र यदि प्रथमपक्षा, स ३५न युरूप अनवस्थामसङ्गात् । तथाहि-अमायममाणस्थामायप्रमाणासिथितस्थामायनियायकत्यम्, तस्याप्यन्यामापप्रमाणादत्यनयस्था । अथ प्रमेयामायाद तनिशया, सोऽपि न युक्तमतरेतराम यदोषप्रसङ्गात् । तपाहि-प्रमेयामायनिश्चयार प्रमाणामायनिश्चयः, सोऽपि प्रमाणामावनिधयाइ तितरेतरामयत्यम् । मापि स्यसंवेदनात् प्रमाणामापनिधया, तस्य मयताऽनभ्युपगमा) तन अमायादयं प्रमाणं सम्मपति । सम्भवेऽपि म तत् प्रमाणचिन्ताई मिति प्रतिपादितम्, प्रतिपादपि। "प्रतियोगिशम्देन संशावर "गु.रि.। सथाभूत सरणम् .हा., मा.. सम्य यस्यन्तरत्यासिनो (बी)म प्रतियोगिनी नियतकपस्य सर-. । ४ अत्र 'भशिः' इति अप्याहार्यम् । ५अमावमेव ।

प्रथमे कापडे। प्यते च प्रमाणचिन्ताऽपसरे सत्रया तमामाचप्रमाणादपि विपक्षे साधनामायनिधयः मतोग भदर्शन निमितोऽपि प्रलयतिरेकनिश्चयः, तमायादून प्रयतसाये मस्त तोनियमलमप. संयधनिधयः। मचान्यय अतिरेकनिश्चयमतिरेकेणान्यतः पुतधित् तनिश्चयः, नियमलक्षणस्य संयन्यस्य पपोकान्यय-व्यतिरेकाचनिरे के.णासम्भवात् । तथाहि य पप गाधनम्य सायसङ्गाये पर भाषः ५ अयमेव तर साध्ये नियमः, मायामाये साधनस्थायश्यतयाऽभाव एयरः अयमेय पा सभ्य हा नियमः। अतो यदेवान्यय व्यतिरेफयोर्यपोक्तलक्षणयोनिधायक प्रमाणं तदेव नियमम्वर. सम्पन्धनिधायकम्, सविधायकं च प्रहलसाप्यसामने हेतोन सम्भवतीति प्रतिपादिनम्। तभानु मानादपि शाहव्यापारलक्षणममाणसिदि। अपापि स्यात् पाहपुकारले.पुण्यापारयरफलं एम्-अन्यथा सिदस्खमाधानकारकापामेकर যায় যেমনঃ অঃ কেঃ--াসনাননা স্বাস্কেনি भिमतपारजनिका चापारम्यरूपा मियाऽभ्युपगन्तवा इति प्रहलेऽपि भापारमिद्धिरिनि, पनद सम्परमा विकरूपानुपपतेः । मयादिव्यापारोऽभ्युपगम्पमानः किं भारतन्योऽन्युरगमगले, आहोस्विर अजन्यः इति विकरपद्वपम् । स यपजन्य इति पक्षा, गोऽयुका पतोरजन्योऽपि कि भावरूपोऽन्युपगम्यते, माहोस्यिद् अमायरुप पपमापकप यायुपगमः, मोडमयुनः। यतोऽ.१५ गापडपाये तम्या प्रकारालणपजनकार न सान्, तर पारजनमारविरोधात अविरोपा पाहार्थिनः कारकाधेपणं वर्ष मात्, सत पवाभिमफलनियज्यिमदारिदं समात्नमामाप. रुपो धापारोऽभ्युपगन्तव्यः अप मायापोऽभ्युपगमविषयः, तदाऽत्रापि धनाध्यम्-शिमग निया माहोमियर अनित्यः इति । तत्र यदि नित्य रति पक्षा, सोपान निषभाषामागाराग:- धादीनामप्पर्धनप्रसा, एमाभापा, ममामाप्रामा कारण पाप गुर. भगम् । अपानिप इस्मभ्युपगमः, पोलीफिका मजन्य मापानिपान केनगिरनामग माम् । भय थरेत्-मपेपाभ्युपगतः, तत्रापि घमास्यम्-कि कालानन्यायी, उस दिन पालतरस्थापी, तदा "शणि दिमकालान्तरमपतिने" । ती : परिमाक्षेत । कारपारक्षेपणं यात्रापि पो फलाधिनामसनम्, विपासनापजादभापत मापाराभ्युपगमे तमाल पापत् तलमापि निपत आवाधारपिनाम INTENT.९९ झापादराय-मुर्शदीमामभाषा यात् । अपणिय पनि पक्षा, मोऽपि म पुन: Net प्यापारमार्धमतिमासाभाषा अपगमार्थप्रतिमा मजगात् माता म NEl. पादिक्षणेषु प्यापापनापं दरोगा, अजन्यावं तु तस्यापरवारजन्यामान, मजलि वारसा मापनस्वदेश-काल-पप्रतिनिपमाभायभायतायाः प्रतिपादनान्। बिप, अरnि: जन्यध्यागराभ्युपगमे तनयार्थमतिमासस्यापि तवेष भाषा गायभाषा, NIER.. पाrmyामा पार ।अप जम्यो पापाराति पक्ष पिने,नापि पिम्- किमती जम्यो व्यापार त्रिपाssrमका, उत तनारमक: तितर पदि FER TRA गुना सभापि विकारापानतिनः जाहि-सापि किया पगारिमका, . frrent यदि पदामिका सामनो जिमलायादार काराणां पापनापिकासो न । पदर्थोऽयं प्रयासरनरेष पतं भवतैषम्पुपगा। अपापरिEिT form पापारस्वभाषामा तपाभूतापार परिस्पाताभाषपना परसनामारोपा भRAT. सिधा मिपा कारण-पलापातलिनी परिरममाया Ren मागोपापारिपी नि तपाः रसारिपत्यमभ्युपग पुनमणि vिो प्पा । नापि तमाम दुला, air in IFertia. भिम थापा गोपाल गोधाममा पा! पद: मामाकTrjपुला । अपारोपावभार, मापमपि herry रोपामापाभा-पितापिरोया दु:-कामारिन बोधमिधानान्। तप अरोधसमायोऽपि TO RE, असा प्रथमे काडे- समायः, उस धर्ममा पनि पुनरपि कनानाम् धर्मिनरूपये मागान प्रमाणान्तरण यमिगुनम् । धर्मम्ममाय पेऽपि धर्मिणो शानिरिको व्यापार, निरिका, उभयम्, अनु- घेति पत्यारोपिकल्पाः ।म तायातिरिना, सत्ये मंपचामायेन गातुर्यापारः' इति व्यपर tীগ। জানি না সা না সাবা। সায় দিবি। ५माभ्युपगमनीयः । अनुमापनम्नु अन्योऽभ्यध्यवराणामेकविधानेनापरनिषेधादयुक्त प्रतिपादितम। सिंग प्या भाषजन्यायाभ्युपगमे नमनने प्रयतमानानि कारकाशित अपरायापारमानि प्रशन्ने उन ननिरपेक्षागि नि विकल्पवयम् । यद्यायो विकरा, समापारजननेऽपि नरपव्यापारमाग्भिः प्रवर्तितव्यम नजननेऽयपव्यापारयुग्मिा प्रयत्तितः मिस्टनस्थितेनं फल जननन्यापारोतिरिनि नफलम्याप्यनु पनिप्रमहाद्न व्यापारपरिक १०३यः । अथ अपव्यापारमन्तरेणापि फल जनकव्यापारजनने प्रबनने इति नायं दोषः, त प्रस्तव्यापारमन्तरेणापि फल जनने प्रतियन्त इति किमनुपलम्यमानयापारकरानमयासेन किंच, असी व्यापार फल जनने प्रपर्तमाना किमपरव्यापारसन्यपेक्षा, अथ निरपेक्षः इत्यत्रा करपनादयम् । तत्र यद्याधा कल्पना, सान युक्ता; अपरापरव्यापारजननक्षीणाक्तित्वेन व्यापार स्थापि फलजनकरयायोगात् । अथ व्यापारान्तरानपेक्ष एष फलजनने प्रवर्चते, तहि कारकाणा २५व्यापारनिरपेक्षाणां फलजनने प्रवृत्ती न कश्चिन्छक्तिव्याघातः सम्माध्यते । अथ व्यापारस व्यापारस्वरूपत्वानापरव्यापारापेक्षा,कारकाणां त्यच्यापाररूपत्वात् तदपेक्षा का पुनरियं व्यागरस व्यापारखमावता? यदि फलजनकत्यम्, तद् विहितम्रतिक्रियम् । अथ कारकाश्रितत्वम्, तदा मिन्नस्य तजन्यत्वं विहाय न सम्भवतीयुक्तम् । अथ कारकपरतन्त्रत्वम्, तदपि न अनुत्पन्नस्या सत्वात्, नाप्युत्पन्नस्य, अन्यानपेक्षयात् । तथापि तत्परतत्रत्वे कारकाणामपि व्यापारपरतन्त्रत २० स्यात् । अथैवं पर्यनुयोगः समावप्रतिनियतस्समावन्यापर्तकः इत्ययुक्तः, तथाहि- एवमपि पर्यनुयोगः सम्भवति-घहेर्दाहकस्वभावत्वे आकाशस्थापि स स्यात्, इतरया वहेरपि स: स्वादिति । स्यादेतत् यदि प्रत्यक्षसिद्धो ध्यापारस्वभावो भवेत, सघन तथेति प्रतिपादितम् तत एवोकम्- "स्वभाधेऽध्यक्षतः सिद्धे यदि पर्यनुयुज्यते । तत्रोत्तरमिदं युकं न हटेऽनुपपन्नता"॥ [ तन्न व्यापारो नाम कश्चिद् यथाऽभ्युपगतः परैः । अथानुमाननाघवे स्यादयं दोषः, अत पवार्थापचिसमधिगम्यता तस्याभ्युपगता । ननु दृष्टः श्रुतो वाऽर्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यहरकल्पनाऽर्थापत्तिः, तत्र का पुनरसी भावो व्यापारम्यतिरे केण नोपपद्यते यो व्यापार फल्पयति? अर्थ इति चेत्, का पुनरस तेन विनाऽनुपपद्यमानता! २०नोत्पत्तिः, स्वहेतुतस्तस्याः भावात् । फिंच, असावधः किम् एकमातृव्यापारमन्तरेणानुपपद्यमानस्तं कल्पयति, उत सर्वज्ञातव्यापारमन्तरेण इति वक्तव्यम् । तत्र यदि सफलज्ञातृभ्यापारमन्तरेणेति पक्षा, तदा अन्धोनामपि रूपदर्शनं स्यात् तयापारमन्तरेणाथाभायात् सर्वेक्षतामसङ्गध । अथ एफशात- घ्यापारमन्तरेणानुपपत्तिस्तहिं यावदर्धसद्भावस्वायत् तस्यार्थदर्शनमिति सुतायभावः । अथ अर्थध: मोऽर्थप्रकारातालक्षणो व्यापारमन्तरेणानुपपद्यमानतं कल्पयति ननु साऽप्यर्थप्रकाशताऽर्थयों ३५यर्थ एव तदाऽर्थपक्षोलो दोषः। अथ तयतिरिका, तदा तस्य स्वरूपं वक्तव्यम् । तस्यानुभ्यमा नता सा ति चेत्, ना पर्यायमात्रमेतत्, म तत्स्वरूपमतिपत्तिरिति स एप प्रभा । किंच, प्रका. शोऽनुभवध शानमेव, तदनपगमे तत्कर्मतायाः सुतरामनगम इस्यप्रकाराता-अशुभुपमानते स्वरूणानधगते कथं बातृश्यापारपरिकल्पिके ? किंच, अर्थकारातालक्षणोऽयंधोऽन्यथा- सुपपनस्यनानिश्चितस्तं फायति, आहोस्सिा निश्चित इति? तर यंद्याध: .फरपा, .स ४० न युक्ता अतिप्रमहात् । तथाहि-यनिधितोऽपि तथात्वेन स तं परिकल्पयति सदो यथा ११.१५५.४.. १.पा.,पू., मा. मिना रात्र अव्यतिरित। २.१.पं.६. पू.बा• ना प्रवर्तन्ते मायं। ध्यापारजनननिरपेक्षाणां भा., गु, हे., मान, पृ. १५ पं.१५.१.१.२४॥ .. १.५.५॥ ९ पा. पू., पा. पिना राग तदन्याना। •वमापमाय: मा.. "'तदा पया तं परिकासपति' इस पाद. बा... पिमा नगरि । -- না। হয়নি ঐ শিবির থেমে যায় ব্যাথা খা নিলীমি মন বিনামুথবমান নিশি। যহিকারি শাহ পালাবি মিয়া নিলি মােহাই লা, থ থ ঘাথমির খায়ানিধি শানুলমিন মাখােনা বিষয়। মানুশানন নিন ব ম বাহেব, বা গম- লায়মানুগনিময় ঘাছেমরি টা লিংগাশি বঙ্গ বিষয় নিঃশ্লীলমানিঃ বাহ, দ্বাবিধিমামুন বি যুব সমাণ লুথামী বিবি। বায়ামলিমায় যেমনা খায়াবলিঃ, মাথাদি যায়- সুরঃ মমালা পা সরিঃ গ গিমনুলমা, ব্যঙ্গ সুম। বাঘিনী মেশিখেনি, ৯মর্মানি লক্ষানিবাহিরি নাবালুঘায়মান নিয়নি, হযuহানুমুষমামলাযথমঘ হ হহ মহাখাই ইংরাদোনশুনিয়র ই এই ফ্যান ঘামাননি যথা, যুগ্ৰাথা, মাখনুমান্ধ ও মিন মিমি অনুমাননিয়ান নিয়া লে যান নাথানে লাগালেনুমাননিয়ম। স্বার্থ “যাই সুৰ বাষেই মানষী৫ে মি" st, নমনেময় হয় নাযায় কি কি গুমরিয়মাবাদ, বর বুখীন হরি নাম! সাম৭ি ফণমাথাই কিমঘন ঘাটে ঘন বন কলম। সবিনৰ যিমান समयतालिपेर मा इन्द्रियादेलदुपारकस सभापार धर्य तत्परिकल्पनम् । क्रियामन्तरेण কােয়াখা নিশ্বাঃ বান্ধবীর ঈ, বিবিনামহল ৫ লাদা রে শমু। বিষয়বস্তানি বাকি যা নিয়ে গা ব্যাঙ্কেন্ধকাবাব বি এনধি হয়ে যায়। ফিনান্ধোন নষঘা মধু নিনিষ বদাৰিমাণৰ যেময়ী হানায়, নিহাল। সখ চিনীয়া যুবাই, মামি বুকা ৰীৰ বেৰন বহু মানু রাসূলাবালিরুষ মানামনি, মা বইন হাল থওঁ না? ধ ঃ বুয নিখাঁনমার নতুনছেন। কিন্তু, আমাৰমাণা না, মায়া, মাথায় যখম ন মিন বিবি মনিমাবি। ওয় যায় নাদিনি বিগিনা, ন বা নিঃী , বাবা কিকি ধামঘর্ষ, বং থার্থ দ মিশরীয় সাহি-মুঠি গ্রাঃ বিমাঃ নামি’ (রি , ন . - F মাথা কােথায় অনুবি, মন সব বিষয় নি সাইন। ফরম ষবাথামব থাঙ্কোেলনবিবি ল ন মিঃ যা যা কথা প্পোন্নালাল। কী বধ মহর্ষি কষ্টদায়মাববননামায় কাম-বাস্তু সই হয়, হৈমদ। রাবি ইলা মার খানুমম, ময়শ্বাঘাহেব। মিরা হাশনেমাঘমাকিম বিমাঘাবার দিঘীরনী বযহেমর্থি। যথারি-মহাকালীঘলয়া-কৗধে মনিমালি; অথ শম • ••• • • • । • • • । লাম-এ। ৭ ।। সাত বিৰাখাে শহ 'বনুষ ধাঃী , पनि पाओस • ২ । মৰ ‘খ’ রেখে যায়' - ১ ---- ১৯. (২) २८ प्रपमे काण्हे- तहेशापसरवस्थास्यातासत्यस्य चासत्प्रतिभासे कशिद्विशेषा, यथाऽन्यदेशाधपस्थितमाकार र धि भ्रमनिमित्ताद् मानं दर्शयति तथा अविधायशावत्यन्तासन्तमपि न पसंपति। तथा कर्य शुन्ययादाद मुक्तिः तया परतःप्रामाण्यमपि मिप्यारयाशवाय कस्यचिज्ञानस्य वापर मायावेषणा पतम्यम्, तदन्वेषणे च सापेक्षत्वं प्रमाणानामपरिहार्य विपरीतल्याती, ततो ५कस्यचिद् शानस्य मिध्ययम्। तदमायानान्यदेश-कालाकारार्धप्रतिमास: नापि पाधकामा पेक्षा । म्रातामिमतेषु तु तथाग्यपदेशः स्मृतिप्रमोपात् । तयाहि रमतम्' इति प्रतीत दम्' इति पुरोग्यपस्थितार्थमतिमासम्, 'रजतम्' इति पूर्वावगतरजतसरणं सारदपादे कुन घिनिमित्तात्, तच लरणमपि स्वरूपेण नायमासा इति स्मृतिप्रमोप उच्यते । यर सरामि' पर प्रत्ययला स्मृतरप्रमोर, यत्र तु स्मृतित्वेऽपि मरामि' इति रूपामवेदनं कुतधित कारणान १०रमृतिप्रमोषोऽभिधीयते । अलिन् मते 'रजतम्' इति यत् फलसंधेदन त प्रत्यास रातः किया स्मृनेः ! पदि प्रत्यक्षालय तदा यया दरम्' इति प्रत्यक्ष प्रतिभाति तया मतम इत्यपि, ततध नुस्ये प्रतिमासे 'एक प्रत्यक्षम, अपरं सारणम्' इति सिंहतो विशेष! अधोगाम 'मरणम्यापि सतनपानयगमात् सेनाकारेणायगमः' तत् + रजतम्' पत्राप्रतिपत्तिरेष! ना चागुपगम्यमानायां कथं स्मृतिप्रमो? अन्यथा मर्णयवस्थागमपि सान् । अप १५ति तर प्रत्ययामायामामी, मनु म्' इत्यत्रापि यतमम्-किमामाति! पुरोऽस्पिन गुतिः मिलि पेन्, मनु सिं प्रतिभासमानहरोना रात्र प्रतिभाति, उ समिहितरग! प्रतिमा ममालान नपाउगुपगमे म स्मृतिप्रमोर, मुक्तिकाशकले दि गतिशिरे प्रतिगाममा मोसमरपनमायना! महि घरमहणे पटम्मरणमभयः । जय मुनिका-सयो सारमा अमितीमारे सतरणन, माननियमान येऽव्यकिमिकराया। पाहमापारणधर्मापा. Priyगि प्रतिमानित कथं गडसम्म्मरणम् ! अन्यथा संयंत्र मगार सामान्यमा ৪ লাগি মণি, শাখাগলামী সং 'লগ সুপি শিম খালা। গিসােনার সিগনালাবি অবিশ্বাসী মুখ বলা সাধাপগাসাস মলি লাল। কামিলামিশান কানামণি শাি নয় সে গলিস্কোয়ালিশ। পাণি १५ मिणा मारणानामात् 'प्रमोषः लामो गुन । marriप्रतिमातीनि तमोगम्यते, मन्ये शार-पलाशय मरारमन्यमान नियानिनिता। यात्राप्रतिपलोग, जलमणमा माममा। समार्गम- अगममप मामाया ITTITERTAIगाना ना माननमार मतम पत्र परमार, TANTARY Pratimain मनुभयमान मनिप्रमोशमा माग Finger गमान वस्तुमा AT TARAT TATAR मामामाप am..m, नियमान मगर म. धामणगी ममानम । नमामिrati Huit- रेग्मी मन्दिरमा गमनाrarit मारदापमानमारमा प्रति मिनी FER, बराममूनिमTARATHITI पात. TERIATARINEETTER: Talk- Prerityानं पाnि.fuitml -warranमामा Anmol auri rani HITRA MITTAL *** ...Irrir TAMATT are पर refrent Arm, प्राग ইবাৰীৰৰণীগ। २९ গলায়মন্ড, মায়াবি বলল- সন্ধালীশানীষী, খাষযোৱাৰ ও প্রতিমাখা জায়গায় না নীলা এয়াবান সন্ধ্যায় বা সমীঃ যায়। এখীপংকামনা বাসনা, শয়ঙ্কম, রবিবার বানাতে স্যষয়াবা বয়ঃ, পূর্বয়ান মুনিমঘনার বই থিম। ষখা বঘা কালৰ বিৰীযগং। খানায়েছি বলা মী, না যিয়বস্তানিঃ ৫ বা পরিমাপঃ। খৰা দ্বিী সাল্কারাে যদি খায়বিক, বর্ম प्रत्यक्षसाकाररक स्मृतिमम्बन्धी! तरसम्बन्धिर पा तस्या प्रत्यक्षरूपतेय स्यात् न स्मृति- বসা। চার থ খুবিবা সেবনবিধি ন নিক নামনিমাম মানে, যা সয়ায় মনিমামলা। বাবি খাসীন যথাঃ মুনিরা বাবা, অধী ঘাঘবযঃ যমনিমালাঘাবাৰমাহযী, নখুনখালা রিকাবনা। নখাঘিমবয হই হই-ই সম', নতুন ‘সোয়বিমাঃ মনি' নি। মধ মুনিময়ীধনা মালগ্নেয়নুষ যুদ্ধ জামা নামণি হয়। স্বাধীন रिति स्थितम् । {বাধযামু। দুখ লু বিধিবখাল যদি সাগবেই বা সাবা শাখা গিথামান্য লেঃ ধ খাস মাথাই যা নারায়ন মার্কিন সিমাবখানাঃ গ্রামিনাসা -যমী ভাগ বিষয়ক (বি টিনাল ‘র’ সদস্তুরাগমমিন রাম। ল আশ্ব যম-যদি সিন সিনসিন বি সিমিয়ামামাব- বখা মায়াবনামীফয়ারি মামলম সিমিন --- মিনি ঘন ঘষা খেলামখনিৰোনামঃ হায়্যামাই ময় গায়ে বিভিনুমমি। বনু খুযথ মন্ততে নির্য। থা~ 'भदं मिसणसमहमायरम अमयसारस्य। নিবযান বা রিমিক’ মাখা * } মাঘী যুগাযুগল যায়। তাহসাবলমমেঘনা হুম, ধাম থেমে গাইন, থিসান বিশ্বাস চায় যখন আমরা “খাবিহ না যাবি লাগবে। দ যা যা মযে, মহিমাযিী”। {ষা- বা মা } ফাধি ঘরে, রাবেয়াৰীষয়ী যুগাননি ধ ম । মাঘ, হাসাঘাইঘামাবি নাম প্রকাশনা সময়। ৰীষয়ছি। খ-িমিথিবং মাসল সিইনুষ, = খ গ যা মাখব না k মখমনামে, সে মমাখাইয়া যাই থয়াখমাল্লা, মে। মালামা ভা, মায়াই তবে, এ বিধায় এমনু। সুমা মোঃ এম - } prশ , এই সমী"। • না (}, { }-লাগাই । । । । মাসে ম*. • ' ' ।

सभमे काग- प्रमाणायाम्युपगमेऽपि यानम्-किमभायममा मानविनिमुंमIR. मा ম? এমবি ফি বা নকিনিলামৰম, সাবি। নিধি ঘলবিনির্মালয়ামু রি? প্রথম সামাবিলায়, খান মা মাঘ মানবনিমৰি ৰ মাহা। নিপমালাবিন নাকি শাল মাম, লামালীৰ নল সায়ন নিখায়। মলয়ানমখি যা বলো বিশ্ব মান্নানামমাণ , না ঘিী। বাধহস্তানামা সমাম মাখমালানি ঈ, খাবি খুন- মিশানানা মা, নশ্বয়াৰ-মামী, নবী বা মালামাল লন, শাদি। নানী, লামাল ক্লাইন চাকা {নাবী সমাধ্যামা মমালামা মামামালামূখা (f লামশ মামীসেমাম স্যা। সমানী ঘাইকৈ মামাবলমালি’, গইল দাবি বলমান মাদা বাসনালী িল আসি। সব ই খুদা মনি, শাণ সাপ। , মশামা ft আমি সুন, সা? যদি ক্লাস সলাগো মা? মা, raপশা । নমঃ.nী। গণমান, এ মামলা । মামাশ্বনান, 'কাগ মাল- শাসন বি ১মাসাধি সমাগপাশামাল TE.लिपिमान निषा मापे 'मासी * পু। ৭ দশা সালা মাসাটিশ : সকালাম ( sষয়ামীপনি? লাস। মাথা শাশমাংশ , , ॥ এশা', এস - লবণ সামাখা সপ *** , , পাগল পাগল লােগ? * সম্পল খালাল শিমলাপালীপ । * 1 *** মাশণ পশন গয়াশা জানশালা গল। এখগাপালণণ - শাখল। লসিক নাশপাশি শাখানদান লী। * | f"'"। । । * * * }াপার **** এ এ এ এ fাসাপাত্মাণ : পণ ।। শাশ:শামণ। পাপ ৯। ” na r wrশণ - ৪r? ৫া ও নবাস। ”~ ~ পশ * পাক শ শ শা?*|| না না। পাশাপায় *** *:মাবাগণ। পাস শাখা। • এক শ + + - * * - + বৈশাখ। ৪া পথে সমাগুয়ানামা, শিম খামায়ামাখা, মামা মাঠে মুখরােনামঃ। এ মায়ানীব, দাবি না- আয়মাস এ গাথাম। গ গম, মামা, মাদাগাস্কা শ। মা বাবা যায় ঘুমাবার খামায়াম, ফায়ার সুমাই শনাঘ! মাথাই খাদ্যম, ন্যায়বাব যা কিছু । সেমি নবি-গ্নিসামান্য। সর মামিবি সুখখনিবি নামঘমালা =""":: ** --- • " "w a + uহাস, ল অনাবিস্কায়াহইস সাবনাযuাম সাধ যথা সখি মন র ব সামান্য কানা ময়ুৰ যায়নিয়ান “মামী খুশান তুমি যা মামনিসিয়াম, যিমান। হমেদাষ"{দিনীপু-৫}নি যুগ "भाविप # ২, বাদ মাগবি। যাবে। {মৗ০ বা ২ • {{৭৭ এবি ব্যাথার ঘাস্থিনিস মলা বাড়ি। গাখনুমানা, সামান্থা। ~ “সীমানায় ভাষা যায়নি। ফাকা। এর কাঠ মােঃ মাহফ” { বীমা শিরি, শা আশ শোনামাবি মালাম। দিল, যি কামনা মহেমেময়যুকধানী কোথুথনিঃ কার বলায়, আলীনামী বা যমুনা ঘর, এর নমুন। যদি খামুন মিয়া। মাথার যায়ৰিযথা লৈ। মূলাবামি-সাবাহানা দিয়া } L ৫ ০ এমন মনমে। ১৫ নখ সাবিনাশ ঘা ফাকা নববর্ষ থের, স খ দিদাবনা, পায়খাসল খানাযা, না শুনখােমুক জাতী গালি মরি হল মমালামাস? যয়ন সয় বাথষয়াবলিঃ হিমননভাষায় মায, না, মুসাল্লামাখা ‘সসীমানা নদিষয়মিউনিহি', লোময়ীশাল। সময়খামুসন্ধামাকাবিলমূল বেথষ্যৰ বিষাণননি। নাৰি সামৰি, সেসময়হীদ ইযসলখা * খবৰ • {} • }} । মালায়সি ৰিং এর পূর্ণ। । বাসায় থাগুণ র অনাগ বা সখি খাসমহল মানষ কৰিা নানু বক্ষে শিকার ক্ষমা হয়। প্লে হাসেম, সাধাশনা' এই ৰ বইঃ সুখ। ভূমিকাwেখালঙ্কায়াশ, •, মা, মা, গ। ৬ ল থাঃ সুখীঘঃ ‘ন বংশ সাফা কবিনে মিথামফিবিই সমীকাষীয়বান ও বনান। -লামায়নবি সীমাবদঘন খ ইনানয় । বাথর- • নানয়মে না, যা। “মলায়" এ• ঠি। • • • দুই বিগ । ওয়া • গুছিঃ • ম ম স প বাঃ। যাই ই-শা,খা। এখায় এ ৪-এ। শ ষ্ট মমলা প্রধান, বা যে- আমায়মমা শাফি। দাবি মিণিষাবাংঘ এ মামামিন" , -।

प्र १ प्रयन पाण्डे- मनारदिवासादर मदिः प्रामाण्यमभ्युपगम्यते; समुपगमे या पोपोरदो कारदराई दरनिगारि दयासि पन्ने- मनाने [मुग्वेद अप०८,१०, २०११] "टाठानि निसितानि | यह उ० स०१, ग्रा०४, सू०१०! पास इनहोदा" [यह० उ० अ० २, मा० स०१] कायादार दमितिः । नारमानात् तसिदिः, यदि हि चोदनासदृशं वायनरीकको विम्पिादनदा नन्मादोरमानेन वेदस्परिपेयन्यमुपमानान मिदं स्थान पर हिरन पुग्णालयात न तसिद्धिः । नात्ययांपते, अपायथयतिरेदेवानुमा ई परिकामावात् । नालामायामावलमो धोऽनुपपयमानो वेदसार १०ते, मानि स स भागदपीरूपत्वं साद । न चासौ तानि टन्निपादाद । समानान्तर पुरुषस करभ्युपगमान् पुरुगनां च सॉकी अनि सवार यस वत्र समयाद नाडामागभाउभने र रूप में मानदोगसदस पुरुषल करमावादमामा समागमको एक इटः पुरता पुरसमा मति प्रमाणादिति चेत्, तोगार २. टि. मादरेवरायदोमसलाद । तयाहि-अर्यापति युवा पतिसिदा पायर्यापतित पुलाभायसिमितीतोपर को जी। साहित्यमानाम्यामावलक्षणो टोपसाटदा., रातले वा पुरानार! रेवा जे सरकः । पर रूपले, असमान्तीि. रमाइला तिर सरंमा ६॥ त . म मिापते 1. . - [. रसारित ।

} বাণীযোগী। মামনি খালী নিহঃ। -নয় বগিতে "নি। আখ মরম-সুখী মুখ যিমাণ প্রাণ হারান বিমীলানীরবিলি বিহাের, # দুনিয়ায় যত্ন জিবিম্বিমেহবংকি মালখিবৰ, শক। মায়ের হাল पोप्रतिपादि साततया या प्रतीयमानो पायकरयेनाम्यवसीयते शिवकरन तथा. ত্ব নিববি-~-এ দুই মামী মহা মন খা যায় নি। খি, খাই । যায়বিধ মাল পাবঃ বাবু। মরশমি, যুবমনিরবধা ব, খা যায় বৃনয়নবালা য়াসহ স খ মুখব্যায়াম যা যা , মৰি, tafামেলামহােয়্যা বালা এ নিয়োগ্রার । ম এ মান-কাযেলযষণ যে মা নম, যেখা-সাের্মী- ঘৰ সংবয়ামবিঃ। সবমিছিলে না যায়মানুষ। যুকান, মোবিনামামামা। মা শান শানাকা, শহীম সমনি মিনিয়াহু। আন এখন খামানিয়ান বি মিয়া, নিন মামার বাঘ রোয়িধনী বহু মামিয়া। খি, কি খাবী যায় জ, কর কিনা। ন যায় গাধা, নিনােনযুথায়খা। যাবি যতীনা খায়, বিশ্ববাঃ। যথাবি-শতাবিবিষিষ্ট কাম ঘাম, শুষ যামিকাযাঃ অস্ত্র লু কাং যবিবিহিঃধঃ, দামামুলি । খা निस्पस सति। । বটিয়মঘলন, , সম সময়গাথা, দ ধ্যা ঘল স্কাই বাতায়ান মঞ্জিল, বাঘগা বাগবিমাথনিতিমা। রীরিমারামাধরা পানিস্বার্থ । { দুধ-নিলৰ নিয়ন। প্রশ্ন বিবিখা, মুখ থাকি , বিষ ধুনঃ প্রয়ােগ-২৭ আমবাহ, শমাই নিধি বানি বয়োগােষধান্ত প্রিয় জায়গায়, ঋকিংবহাৰি ধূইয়াবাসলামবাথরূম । tি খুলানাম বিবিবিবাহিঙ্গা নির্যয়। বানিয়াখালিয়ানা নমালিনামানাে হল ঃ খষী wী, নয়াদের মা- মিলালাম। দ ব ানুষমাযখীন ফলম, রাহল গাধা মানায়। মধ্য গয়া ৱিী (যি মহিবহিঃ জি খুল্লাহ। নিয়ে বিশ্লোঘা বয়সে ৰি যামাঙিবে গম এ, ই মহামায়াকান্নাবল। ও আন্যাবিলি মিথিৰ মৰ বাবা মুখমু-বধা হামামামায়াকান্নাই মামা বিধবা মাযহাবা মুমুযাধি-খোদিমাখা মাখমার ঈদ ঘিাথলিমাবায়ােগ্য- ধূমঘালয়ঃ মানব যে, বাবা যখন বাবা-মা অধিগলিতােনা বা सक्षपतीति सरपपा मधिभविष्यतीति पराम, बसमतीलेरमापार-मदिराप "মি ধর বই সমুই । ৰাৰ খেৰ, ৭ বৎম। খালা , , {} মুখ • • •। ৫ বাই ৮ प्रथमे फाण्डे- नितलिङ्गि-याच्यप्रतिमासे माफ सामान्य प्रतिमासः पश्चाद व्यक्तियतिमास इति क्रमप्रतीत्यनुमयः। 'नच लक्षणा संभवति इति प्रपञ्चनः प्रतिपादयियाम इत्याम्नां तावत् । एवं सामान्यविशिष्टः धूमादिलिदस्य गमकरवपद् गरवादिविशिष्टगादियाचकत्ये न किञ्चिनियन्वेन, तदमावेऽपि धूमा. दिभ्य स्वार्थप्रतिपत्तिसंमपात् । अथ धूमादी सामान्यमा संभयान पूर्वोतन न्येन गमकन्य ५ मस्तु, सादे तु न किंचित् सामान्यमलि यद्विशिष्टस्य शदम्य वाचकमायः बादलमिति चेत्, म; गोशब्दस्य दादत्य विशिष्टस्य स्ववाच्ये न संयन्धमहः । न च शब्दत्वमपि गादिषु विद्यने गोश दत्य-गरवादीनां तु सत्ये फा कथा । शेट्रवादीनां त्यमायो घन्तिरग्रहणे यान्तरानुसन्धा- नाभायात् । यत्र सामान्यमस्ति तकमहणेऽपरस्यानुसन्धान दृष्टम् यया शालेयग्रहणे पाडले. यस्य, धर्णान्तरे च गादी गृहमाणे न कादीनामनुसन्धानम्, तन तत्र शब्दन्यादिसंमया, पनदयुतम्। १०यतः किमिदमनुसन्धानं मयतोऽमितं यद् वर्णान्तरे गृघमाणे धर्णान्तरस्य मालीति प्रतिपाद्यते । यदि गादी पर्णान्तरे गृपमाणे 'अयमपि वर्णः' इत्यनुसन्धानामाया, नदयुतम् एवंमतानुस: न्धानस्यानुभूयमानन्धेनामायासिद्धः। अथ गादी चान्तरे गृद्यमाणे 'अयमपि कादिः' इत्यनुमः स्थानामायान्न सामान्यसद्भापस्तदाऽसत्पमिदमुच्यते, शायलेयादायपि व्यक्यन्तरे गृहमारे 'अयमपि याहुलेया इत्यनुसन्धानामावाद गोत्वस्याप्यमाया प्रसका अय तत्र गोगा' इत्यनुगः १५ताकारप्रत्ययस्यायापितस्य सद्भावाद् न गोत्यासत्यम्, पनदू गादिप्यपि समानम्-तत्रापि यो पर्णः' इत्यनुगताकारस्यायाधितस्य प्रत्ययस सनावात् कथं न वणेषु वर्णत्वस, गादिषु गाया शादै शब्दन्यस्य संभयो निमित्त समानयत् ? तथाहि समानासमानरूपा सलिए शचित्र 'समाना' इति प्रत्ययोऽन्येति, अन्यत्र व्यायते यत्र च प्रत्ययानुवृत्तिस्तत्र सामान्य अवस्था मान्यत्र, सा च प्रत्ययानुवृत्तिर्गादिष्यपि समाना इति कथं न त सामाग्यव्यवस्था ! यदि पुनः २० गादिप्यनुगताकारलायसत्त्वेऽपि न गत्वादिसामान्यमभ्युपगम्यते ताई शायलेयादिष्यपि न गोत्र सामाग्यमभ्युपगमनीयम्, न दि तत्रापि तथाभूतप्रत्ययानुवृत्तिमन्तरेण सामान्याभ्युपगमेऽ निमित्तमुपक्ष्यामः । अक्षजन्यत्यम् अयाधितत्यादि च प्रत्ययस्योभयत्रापि विशेषः समाना। यदि पानुगताऽयाधितामप्रत्ययविशेषविषयत्वे सत्यपि गत्वादेरमायः, गादेरपि व्यायचतधाम समस्ययविषयस्यामायः स्यात्, ततय का दर्शनश परापत्यानित्यवं साध्येत? अप गादी भोत्र: २५ मारल्यानिमिचोऽनुगतः प्रत्ययो न सामान्यनिमित्तः, तदप्ययुक्तम् श्रोत्रप्रायन्यसातीन्द्रियवेना नगमे निमित्तानदणे तानिमित्तानुगतप्रत्ययस्य गादायमाप्रमहा । न च प्रत्समिसया गांदी. नामेकावसिद्ध इनियन्यनम्य से गन्यादिमामान्यामा रति युक्तमभिधानम्, गायकरपाटि काया नपुनीश-नयादिस्यिय तण्या मान्यात् । अथ दलिलपुनदिने नखशिखाको प्रायमिनाया पाधिययन मारतायं न पुनगांदी, तत्र मत्यमिनायाः किं वायकम् ! अन्तराडे: २. नमिति धन्, मन गावामप्यतरालपनि समानम् । अथ दलितपुनपदित नखशिखरामा पनिमितमनरा दर्शनम्, न गादायमायनिमितम्, कि पुनरवादाननिमित्तमिति पतयम् । क्रिमा एमय अमियनरमापः अप कपम मिश्यनियंदमायादलराले गावप्रतिपतिः पर्णादिसंस्कारः । अथ कोऽर्ष पांदिसंभात ! भाम-अनामयोगपून कोटयन पाना तात्यादिमयोग-विभा- . प्रनिनिगलपणापमिन भेदमापादयता यमुवमर्माण पर्शनेन्द्रियाण. मग घ नदार प्रेरणान् कानुमानन, देशाला सम्योपलपत्यपाउनुपपरा मान निलपगलादेश, महाराणी यापूनामानयन पर पगाकार, भोकाल, भारत, ननु पर्णरोग में वायुमिशिान नननिHिIE योपान्तराले हान न जनपनीति ४. मनिपानिमिया, एकामे ani HT HOTTENT पासवारिका मा परि ....पणामुक्षमीपण:.,.,.।

घेदापौरपेयवपरीक्षणम् । मयुपगन्ताश, गम्या अपि ततो भेदेऽनयस्याअभेदे मयमय शनिः कश्चिदभिमाऽम्युपगमनीया पदि पारम्पर्यपरिश्रमः परिहतो भवति । धास्युपगमे घनिमतियाने पर्णस्वरुपमेय राइ मिनमायारण प्रतिषनं भवति। सराध कर्ष मानित्यत्वम् । पकेनापि शक्तिप्रतिवाधापनपन. बारेण विजानजननामयारिमाधन वर्णम्बसपमेयापि वितं गपशीति कम पर्ण पकन- पन्यम् ! ग्यापासविधानअननस्वरूपो यो यदि तेनैव स्वरूपेणापतिष्ठने तश सदा सदा ५ मासिकानमा, सदा सजननस्वमायस्थ भायात्। 'सहकार्यपेक्षा च नियस न भषति' इति प्रतिपादयिष्यामः शशमने पाग सत्यभाषतेति प्रथममपि माग जनयेत, यो दिपा जनपति मस तसगनस्वभाषा, पपा शालिनी ययारमनया समननस्यभायम्, न जनयति च पों माभिमनपायभिमगोऽपि सर्वदा स्वमतिमासिमानमिति न सर्वदा सजननस्वमायः । तस्वमा. पाभावे चौतरफालं तदेयानित्यायमिति समभिन्यक्तिकल्पनम् । मपि च, पोमिनिपसे फोष्टयेन १० पायुना पाय गमभिर्माता पाशन वर्णविभागोऽपनीतावरणः हमलायत एय भवणं स्यात् । समस्तर पर्षम्मेति सण्डस्त प्रतिपत्तिः सात् । अय पर्णस्य निरषयत्वादे कत्रोत्सारितापरण: सापनीतापरणति नायं दोषलाई निर्विभागस्यादेवकवानपनीतापरणः सर्वत्र सधेति मनागपि अपर्ण न स्यात् । सपेश सोमना पर्षस्य परिसमासत्यात् सामस्येन भयणाभ्युपगमे वर्णस्या- भापकन्यम् अनेक घ दुनियारम् । यदि धैकामियतो निर्षिभागत्वेन सपत्रामिव्यक्तस्तथा५ सर्पदेशायस्थितस्तम्य प्रवर्ण म्यात् । यदप्युष्यतेल्यधेयोत्पधमानोऽयमुत्पतिवादिनां पर दिगा. दीनामयिमागादयिमतादिगादिसंघन्धिान स्वरूपेणासपेगतोऽपि सर्वान् प्रति मयनपिन सर्वर- पगम्यते किन्तु परसमीपयती पर्ण उत्पमस्तनवासी गृधते तथाऽसत्पक्षेऽपि स्यता सर्थगतो. ऽपि पणों म सरस्थैरवगम्यते किन्नु पदरीरसमीपस्थोऽभिव्यकस्तरेषेति पत्रकम्पनिसभि. पानाऽसमिधानरतं धर्षस्य श्रवणम् अभवणं च युक्तम् । एतदेयाद-- "यर्थयोत्पपमानोऽयं न सरयगम्यते। दिगदेशाधषिमागेन सर्धान प्रति भयमपि । तय पत्समीपस्थनास्था यस्य संस्कृतिः ॥ तेरेप पते शम्मो न दूरस्थ कञ्चन"। इति, लो०या० सू०६, मो. ८४-८६] तदपि प्रलापमात्रम्यतो यदि व्यका पाययो यौष संनिहितास्तत्रय वर्णसंस्कार पुस्तदा २५ स्वादप्येतत्, किन्तु तयाभ्युपगमे धणे सावयवस्यम् अनमिव्यवस्वरूपादमिव्यक्तस्वरूपस्य च भेदादनेकर धस्सात् । सोरममा संस्कारे- "मउरीरसमीपस्नादः स्याद् यस्य संस्कृतिः। पंपा धूपये प्रापस्नया दूरगतैनं किम्"[ उत्पसिपरे तु अयापकत्याद् यासमीपपता पर्ण उत्पन्न स्तनेयासो गृह्यते न दूरस्थैरिति पुदम् ।३० "दिग्देशापविमागेन"रति सातीयासतम्, अरिमागस्य कस्यचिडू यस्तुनोऽसंभवनानम्धुपग- मात् । सिंच, म्यापकरणेन पोनामेकोऽयरणापापे समानदेरास्वेन सपामनास्तत्वार युगपत् सर्ययपधुतिय स्यात् । अथापि स्थान प्रतिनियतयर्णभूषणान्यथाऽनुपपत्या व्यकभेदसिमे। प्रतिनियतया प्रतिनियताऽऽयारनिराकरणबारेण प्रतिनियतवर्ण संस्कापट्ग युगपरसर्पपर्ण. भुतिदोरा, सादेतर पदि म्यअकानां पायूनां भेदः स्यात, स चाधारकभेदनियन्धनः, अन्यया १५ सदभेदमिमायारकापनेतरखेन पुतो मम्मे ! आपकोदोऽपि वर्णदेशमेदनियन्धनः, अन्यथा समानदेशानां यकस्यापारकं तवापरस्यापि इस्पाधारकोदो न स्यात् । देशभेदोऽपि पोनाममापपरये सति सात, पापरवे तु परस्सरदेशपरिहारेण वर्णानामपस्थानामापार राभेदः । न चाध्यापकरयं वर्णानामभ्युपगम्पते मपनिरिति म देशभेदः, तदभायामापारकमेडा, सयसत्याप यजक रति युगपरसम्पर्षभुतिरिति सदयस्थो दोषः । मायापारकोणाम वर्णपि ४० दालप्रतिप-पु.। रास्तु पाट..रा०, चन्छ, प्रतिष्प्रेर, अन्य पर्णपिधायकी मन्नु, भा• प्रती 'पूर्वोसोगमाय इति यापम्' दोषाभाष रति पम्' रवि पाउ। ܢܚܝܙ प्रथमे फाण्डे . . -पदायारकापनेतृत्वेन ... "ग्नुं शक्यम्, एत पवममि- तन्न वर्णसंस्कारोऽमिभ्यः तिरिति पक्षो युकः। नापि श्रोत्रसंस्कारोऽमिष्यक्तिरिति पक्षो युक्तः, तस्मिन्नपि पक्ष सकृन् सं. ५स्कृतं श्रोत्रं सर्पयर्णान युगपत् रणुयात्। नानादिना संस्कृतं चक्षुः सनिहिनं स्वविषयं किश्चिन् पश्यति किञ्चिति धम् । अथ व्यक्षकानां धायूनां मिनेषु कर्णमूलावययेषु वर्तमानानां संस्का. राधायकत्वेनापित्या प्रतिनियतवर्णश्रवणान्यथाऽनुपपत्तिलक्षणया प्रतिनियतवर्णनाहकत्वेन सं. स्काराधायकत्वस्य प्रतीतेकपर्णग्राहकत्वेन संस्कृतं श्रोत्रं सर्पवर्णान युगपद गृहातीति । तथाहि- पायपीयाम्दपक्षे यथा गकारादेनि पत्यर्थ प्रयनप्रेरितो धायुनर्नान्यं वर्णमुत्पादयति तथाऽसन्पोऽ. १०प्यन्यवर्णग्राहकभोप्रसंस्कारे समयों नान्यवर्णनादकोषसंस्कारं विधास्यति । येषां तु ताल्वादि- संयोग-विभागनिमित्त शब्द इति पक्षस्तेषां यथाऽन्यगकारादिजनकैः संयोग-विमागैर्नान्यो वर्षों जन्यते तथाऽसत्पक्षेऽपि नान्यवर्णमाहकभोत्रसंस्काराचायकन्याकप्रेरकरन्यवर्णप्राहकोत्रसंस्का राधायकवायुमेरणं फियत इत्युत्पत्त्य-मिव्यक्तिपक्षयोः कार्यदर्शनान्यथाऽनुपपत्या समः सामथ्र्य भेदः प्रयत्न-विवक्षयोः सिद्धः । अतश्च यदुक्तं फैश्चित् "समानेन्द्रियप्राष्वियषु थाकेषु न दृष्टो १५ नियमः" इति, एतदयुक्तम् अर्थापत्तेईष्टान्तानपेक्षयात्, दृश्य तैलाभ्यक्तस्य मरीचिमिः, भूमेस्तू वकसेकेन गन्धामिव्यक्तिभेद इति कथं न व्यजकनियमा? तदुकम्- "व्यक्षकानां हि घायूनां मिन्नावयवदेशता ॥ जातिभेदश्च तेनैव संस्कारो व्यवतिष्ठते । अन्याय प्रेरितो घायुर्यथाऽन्यं न करोति यः॥ तथाऽज्यवर्णसंस्कारशको नान्यं करिष्यति । अन्यैस्ताल्वादिसंयोगेर्नान्यो घणों यथैव हि ॥ तथा वन्यन्तराक्षेपो न ध्वन्यन्तरसारिभिः। तस्मादुत्पत्य मिव्यत्यो कार्यार्थापत्तितः समः। सामर्षभेदः सर्पघ्र स्यात् प्रया-विवक्षयोः" । इति, [लो० पा० सू० लो०७१-८३] पतदसंपद्धम् । इन्द्रियसंस्कारकाणां व्यअकानों समानदेश-समानेन्द्रियप्राधेप्यषु प्रतिनियतथि: पयमादकत्येनेन्द्रियसंस्कारकरवस कदाचिददर्शनाद नहाजनादिना संस्कृतं चक्षुः सनिहितं स्वविषयं किश्चित् पश्यति, किञ्चित्युपलम्धम् । तथा पाघिनिराकरणद्वारेण घेलातैलादिना संस्कृतं श्रोत्रं स्वप्राधान् गकारादीन् वर्णानविशेषेणैवोपलममानमुपलभ्यते; एवं प्राणादीनीन्द्रि याणि स्यम्य संस्कृतानि स्वविषयप्राइकरयेनाविशेषण प्रयत्मानानि प्रतीयन्त इति प्रकृतेऽभ्यः पमेप भ्यायो युक्तः । यश लाम्पत्तस्य मरीचिमिा, भूमेस्तूदकसेफेन गन्धामिव्यतिरिति यज्ञ प्रति नियमो दर्शिता सोऽपि विषयसंस्कारकटयजकातिनियमः नेन्द्रियसंस्कारकप्याकमतिनि. पमा विषयसंस्कारकेप्याययं नियमो मिनदेशेषु दर्शितः न समानदेश-समानेन्द्रियप्राशेपु । तत इन्द्रियसंस्कारकपु समानेन्द्रियमाये समानदेशेऽय प्रतिनियतविषयमाहरवेन इन्द्रियान्तरविषय. मादकावन च इन्द्रियसंस्कारफरयस्थादर्शनाद असन्तासंमयिनो मापसिसामात् कल्पना युक्ता कारफाणां तु प्रतिनियतकार्यकररयसाम्यत्राप्युपलाधेः प्रतिनियतयोत्पादनसामध्यभेरस हास्यादिप्यासिता कम्पना संभाव्यत पप । किंय, इन्द्रिय संस्कृर्य ध्यान यदि पधापस्थित पप्रादरवनेन्द्रियसंस्कार विम्यात् तदा सकलनमस्लटव्यापिनो गाये। प्रतिपतिः शात, नपासीरामपायचा, मतस्विर्णस्यकपतिमास रति नरमपरिधि सोपरिका रोऽप्यमिन्यतिः । नाप्युभपसंस्कारोऽमिप्यतित, प्रोकरशोकदोपरानात् । म भाग्यप्रकार संसापेऽमिप्यक्ति रामपति, तर ममियरसंगमा नानमित्यधिनिमिचोरतराले गादीनाम २५ - t.,... बसाय....पं.

पैदावारुषेयत्वपरीक्षणम् । सुपर कि दलितनगशिवरादिषिोभायनिमित्त इति नपुनजोतनादिविधापान्तरा. सादानेन गादिप्रत्यानिशापा यापमानरपादप्रामाण्यम् । अथ सवितपुनरदिनकररहसमाविषपापा अपि प्रत्यमितायातसामान्यपिपपरपेन नाप्रा. मायम, तस्याद्विपयतयाऽशायमानत्यात्। न घायं प्रकारो गादिविषयमस्वमिसाया सम्मयति, तयाभूतरेशादिग्घिय गादिभेदविषयायाधितप्रतिमामाभाधेन तद्धदासिनो'समानानां भायःसामा ५ न्यम् ति मग तत्र सामान्यीपासम्भवान्, असदेतत्। गादिधपि 'पूर्वोपलम्गादेः सका. साद अयमरः महान् फर्कशः मधुरो पा गादिः'त्यपाधितासजमतिमाससमान भेदनियाधः ममामापसम्मपस न्यायानुगतरवार । म प पपा तुरगजयस पुषयारोपात् 'पुरुषो पाति' इति प्रत्ययः पपदेशध तथा पत्रकारनिगतस्यास्प-कशादेगांदाघुपचारात् तथाप्रत्ययः पपदेशात्पन्धुपमा पम्, तथाऽभ्युपगमे पाहीके गोप्रत्ययपद गादिप्रत्ययस्य प्रान्तत्वेन १० गादिस्वरूपासिनिममहात्। नहि ब्रान्तप्रत्ययसंवेधा निचन्द्रादयः स्वरूपसंगतिमनुभवन्ति । न पाल्प-महत्यमत्यययोन्निर अप-महरने पर गादिविषये अभयस्थितस्वरूपे न पुनर्गादिको पर्षः, तत्मत्ययस्थानान्तत्वात न चान्यविषयमत्ययस मान्तरघेऽन्यस्य तथाभावोऽतिप्रसङ्गादिति घई युकम्, यतो पपप-महावादिधर्मव्यतिरिक्तस्स गावित्याहितशेष निशीधिनीनाथस्य प्रत्यय. पिपत्तं स्यार तदेव तदू युज्यतापि पकमा न च स्यमेऽपि तर्मानयासिनो गादिः केनचित् १५ प्रतीपत इति कर्य सस महत्यादिधर्मरहिनस्य सरूपयवस्था ! अत पव महत्त्वाविधर्मयुक्तस्य सर्वदा प्रतीयमानत्वाद् गादेन तद्धर्मयुक्ततया प्रतीयमानस्य उपचरितप्रत्ययविषयता। तदुतम्- “यो ग्रन्यरूपसंपः संवेधेतान्यपापिया। समान्तो न तु तेष यो नित्यमुपलभ्यते" ति। ता व्यकपमापारोपादुपचरितप्रत्ययविषयत्वं तथाभूतम्य गादेः, सर्पभावानामुपचरितमत्स्य-२० विषयत्वेन स्वरूपाभाषप्रसङ्गात् । म च यजक मदीपादेरल्प-महत्त्वभेदाद व्ययस घटादेरस्प- महत्त्वमेदमतिभासोरएः । अप व्यवसायमानुकारित्वं बाये उपलभ्यते । तपाहि-एकस्वरूपमपि मुस खड्ने मतिविम्यिनं दीर्घम्, आदर्श धनुलम्, नीलकाचे गौरमपि श्यामं व्यञ्जकधर्मानुकारितया प्रतिमासविषयमुपलभ्यत इति प्रश्तेऽपि तथा सात् , एतदप्पसङ्गतम् शन्तमात्रादासिक, तस्य हिसाय-साधनप्रतिपयसापकप्रमाणविषयतया साध्यसिद्धाघुपयोगो न स्वतन्त्रस्य, अन्यथा--२५ "एक एप दि भूनारमा भूते भूते व्यवस्थितः"[अमृतबिन्दु-उपनि०प० १२, पृ०१५] त्यादिश्टान्तमारतोऽतयादिनोऽपि पुरगतसिद्धः शम्दस्वरूपस्याप्यभाषात् कस्योपचारा महत्याविभतिभाल स्युपते! मुखादीनां च छाया पडादौ संकान्ता तनमानुकारिणी प्रतिभाति न मुखादयः । न च गादीनां पाया व्यकम्यनिसंत्रान्ता तधर्मानुकारिणी प्रांतमातीति शल्यं धातुम् सदस्य भवनाऽत्येनाभ्युपगमात्, अमूर्तस्य च मृत्तम्पनी छायाप्रतिबिम्ब.३० नारसंभवात् । मौनामेध हि मुखादीनां मुझे आदादी छायाप्रतिविम्यन नामू नामात्मा- दीनाम् । अरटे चपनी पाया मतविम्बिताऽपि न गृधेने कथं तधर्मानुकारितया प्रतीतिपि. पया! न च बने सम्पमतिभासकाले श्रवणप्रतिपतिविपयत्यम्, उभपाकारप्रतिपत्तेरसंवेद- नाद तम परके पनो प्रतिविम्बिता गकारादिष्टाया प्रतिभाति । मायभूनें गादौ पनिमाया- प्रतिदिग्वन युतम्, अमूर्ते आकाशदी घटादिष्ठायाप्रतिविधनानुपलम्बेः । तदयुतमुक्तम् ३५ 'महादी दीर्घमुखादिप्रतिमासपद् अल्प-महत्यादियुक्तवादमतिमास' रति, बसन्त बान्तिक- योपम्यार । अतोऽयाधितमहत्यादिभेदमिषगादिप्रतिमासार गादिमेदसिदेस्तभियन्धनस्य सामा- यस गादौं सद्भावाए समिपन्धना प्रत्यमिशा दलितोदितनसशिखरादिग्विध पादायभ्युपगमः नीया। मत एष धूमादीनामिवानित्यत्वेऽपि गादीनां सामान्यसनापना सत्यागमस्प समवाद २ "सामान्यपिसासारापमानत्वप्रयोगमायामामाभावरूपः" गु• रि• । -प्रान्तिये .गु.॥ ४ प्रतिषिम्पसापा, गु.॥ ५ परी' मार्यम् । ६.१. 4.५॥

“प्रधर्म काण्डे न परार्थशदोधारणान्यथाऽनुपपत्या तनित्यत्वकलाना युक्का, तदूं गत्यादिविशिष्टये गादेरवि. चक्षित विशेष स्थान सत्यवगमेन न किश्चिमित्यत्वेन । यथा गोत्यादिविशिष्टस्य गोचक्तिमा प्रस्य धाच्यत्वे न कश्चिदोषलवद्धावकत्वेऽपि, तद् अर्थप्रतिपादकत्वस्य अन्ययापि सम्भवाद 'दर्शनस्य परार्धत्वाद् नित्यः शब्दः' इत्ययुक्तममिहितम् । यत् पुनरुक्तम् 'सदृशा नाग्रहणादन ५सादशादर्थप्रतिपत्तिः ति, तत्र यदि सदृशपरिणामलक्षणं सामान्यं बके साहदर नमितं तदा तस्य यथा व्यक्तिविशेषणस पाचकर तथा प्रतिपादितम् । अय अन्यथाभूतं सादृश्यमत्र विव. दिनं तदा तख पाचकरयानम्युपगमात् स एय परिहारः। यत्तूक्तम् 'वर्णानां निरययवादन भूयोऽवयवसामान्ययोगलक्षण साहसस सम्भवः' तदत्यन्तासङ्गतम्। पर्णानां भाषावर्गणा. रूपपरिणतपुरलपरिणामस्वैप सावयवत्वात् । अप पोहलिकाये वर्णानां महती अदृष्टकल्पना प्रमज्यने । तथाहि-मानस्य श्रवणदेशाग. मनम्, मूर्चि-स्पर्शादिमत्वं च अनुपलम्मान परिकहानीयम्। मेयां च मृत्ति-शशांना सताम- प्यनुतता कल्पनीया, त्यगमाह्यत्वं च परिकल्पनीयम्। ये चान्ये सूरमा मागास्लस्य कल्पन्ने हेगं च राइकरणलायां सर्वयाऽनुपलम्यमानानां कथं रचनाक्रमः क्रियताम् ? उपलभ्यमान. स्वेऽपि फीशा रचनाभेदाद गकारादियण मेदः १ यत्येन च विना कयं ययययानां परस्प. १५रतः संश्लेषो वर्णनिप्पादक यद्यपि च कशित की निपादिता घणालयाप आगछता कयं न पायुना दिसपः १ लपूनां तदवयवानामुदकरदिनियत्यनाभावात् निवद्धानामप्यागच्छ पृक्षा पमिहतानां मिलेपो लोष्टयत् । न चैकराइयेकोषप्रयो मन प्रतियइत्यादन्यैर्ग भोतम देशव्यवस्थितानामपि प्रयणमुपपद्यते, प्रयनान्तरसामरत्न पुनर्निफममासम्म म धैरुगो शादापेक्षयाध्यान्तरपर्णनानात्यकल्पनायामस्ति प्रयोजनम्, पालादेय गोशदादर्यप्रतीते। मतो २० गादिवर्णनानारयम परिकल्पनीयम् । न पैकय गोशम्दापयशिनः सशं वि गमनं पुज्पत इस्सने कारस्परिकारसना शाद । तदुक्तम्- "सदस्यागमनं तावर परिकस्यते । मूर्ति-सादिमयं च तेगममिमपः सताम् । स्वगमायमग्ये च मुरुमा भागाप्रकासिता मरदयमानानां कथं पवनानमः।। की रचनामदार वर्णमय जायताम्। द्रवत्वेन पिना घर्गसंषः कस्यतां कथम् ।। आगच्छनां च विलेन भय वायुना कपम्।। स्पोपपता होने विषयान परमपिन् । पृभापमिहनानां विसोवर मन परमोचनाम्यर्ग र पुनः भुतिः। मधाचारदरवीनां नानात्वस्याग्नि कारणम् । पर गए गमनं विश"सोपा, मो. १९१० *। এ-ঘাৰীৰ বাথাপেত্বিকালে এ कर दस्याने वायुशा पटनीय नि म भूगारिक शरार, मापन परिकलामा मल- triti सादुरटरमाना परिनाम, थापारका निमिता पाय प्रमा दरम्यान यामना पनीया TITIRIT যাসে । সুশ ন মপি কাপাসি খেলেশ যথাঃ ........... Prima......maari-1............मन (-2 १० . .. घेदाऽौरुषेयत्वपरीक्षणम्। शेकापंच शादश अग्रगुणप्रतिषेधमलावे प्रमाणोपपनं फरिप्यात त्याला शापत् । यत् जन्तर शदादर्थप्रत्ययस्याभिदितं तद धूमालिमालिझिमत्ययेन प्रत्युतम् । प्रत्यादिविशिष्टमा पांचवस्यमयुनम् गरयादेः सामान्यसासम्मपात् तद् अनन्तरं निरास्तम् । यत् पुनरकर्म दिव्यतिमा गत्यादिविशिष्टं नोपपपते, सम्य सामान्य-विशपयोरन्यतरत्रान्तमांवे एकर पाच- अनित्यत्यासहाए अग्यवानन्ययात् पावकरयायोगात्' एतसारम्। व्यक्तिमात्रय सामा- ५ विशिएम्य पूर्व पाचारपव्ययस्थापनात, ता एक धकयोऽवियसितासाधारणदिरोगा सामा- विशिष्ट्यनिमारशामियाः। किंच, कि पर्यानां नित्यत्यमभ्युपगम्यते, उत वर्णक्रमस्थ, आहोस्थित् पर्णामिन्यतः, कि या रात्कमयो तर न तापदमिप्यतनित्यत्यम् , नस्या निपिसवान। अनिषेधेऽपि पुकरमयारिता पायुजन्यरवेनापीरोयायामम्मपात् । माप्यभिष्यक्तिमय, अभियपत्यमाये नरकमस्याप्यभायात्, १० नापारयन्ये तस्यापि पारपेययात् । अयं पारपत्रस्यानादिसिद्धा नचिकादायतमा सपुरोः परिप्रहार पुरगणां स्वानच्यामायापीरुपयन्यमुच्यने । नदुनम् - "पत्ता नदि फ्रम कधित स्वातगयेण प्रपद्यते। पपेयाय पदक थियेन पियक्षनि । परोऽप्येयं ततधामा संपाधयमादिता। तेनेयं प्यपहारान् म्यापकोटमध्येऽपि नित्यता। पक्षता प्रसिध्या ना पुouri स्वतन्त्रता" [लोक या मू०१, मो० २८८- २९. पति, पतसंपरम्। मोरयरपप्रतिपादकप्रमाणशामिसत्यान् । मग पर्णशमन्यापारपरपमन्युए. गम्यते, तदप्यचाय पर्णानां निस्वरयन फालयन तनुपरपर, प्यापकायेन देशालार गुनार सीमुनाफलमालाप अस्यासंगयात् । এই গানামামগিব, যথাসমু, “ এই কি সে খুব पेदिका" इत्यमिधाना पालोमायनशानमपि प्रमाण मादिति तदानुसार माना प्रमायने । साफिर पापये यो दिसंबाद कपिलप भयनीया न प्रामानि । मय साकिस-दिपायो दोभ्युपगम्यने, तपा (नया) गादिसमधिनायारपुरगमार पपु-१९ থাল ল ক খার্থিবান, সব বিন মধশা বা মসিহাহা मापि पेवार्थमतिपादयामपीय पेरम्याल्यानमेषगता सिमं येन तो शापतिपनि. फादानुमान बेरशदार्थ प्रकपनमपि तमेवान्युपगमेनुपामिनि न पेशाममिति नादिनि म पैदिक-शिवरायोमास्युपगमा धेषानिति सोशिकार परिमापि वापरामपु. या पाकित-दिकरादयो सदस्यमाविशेष, सानातिपाद.. अमुपाय पुरणायपणे मम्पत (पमाने )अपरो पिणे विचत तो दिया ग. परयार, सॉस पोरया। स्युः । सपा नियोगे पात्यायनमुभयोरपि । परिवार যুব মরিব , য ব ংঃ নিলালমৰি এৰি पादधाता, अनामि योगावरपिएममा स्थान | अता पारपारगुमादारीपत। যি সবিশযোধিফিয়া কাপেয়া, বামনা-নাবিলা जीव-प्रागारापा, मनिपरचमाshfaryविमिति प्रयोगशा पातशेहेनु, परिवाना रखमा मसत उपला मायसिनNिE NE, अनिमय .. 11............. REETसससलो HT.PART -2 Mahire शहर RANI, पंग ने ये भो Fir Engin.11.पं. (..)। पितो.... रिजोगाईमा दिएरपा-1 प्रथमे कारडे- . . रुप-मासादादिपु पुरापूर्वकन्येऽमा साम्यधर्मलक्षणस विशेर सिमाया। स्वरूपासिनत्यम्, पदिकीपु यचनरचनासु विशेषग्राहकारमाणामायेन तस्यामाकान् ।। मायामायलक्षणो विशेषता इति शफ्यममिधातुम्, तयाभूतम्य विशेष पेयत्यानिराकरणात्। याशो हि विशेष उपलभ्यमानः पोस्यायं निराकरोति .५स्थामायाद विशिष्टत्यमुच्यते, न पुनः सर्पया विशेगमावान्। एकान्तेनाविशिष्टन्य पात् । अप्रामाण्यामावलक्षणध विशेषो दोषयन्तमप्रामाण्यकारणं पुणे निराकरोति, पन्तमप्रामाण्यनियर्तकम् । न च गुणवतः पुरुषस्यामायात् अन्यस च सेन विशेषेण . सिरमेयापीरुपेपत्यं धे इत्यभ्युपगमनीयम्, अपौरपेयरयम्य नियतवाद। मामाण्यामापलक्षणस्य विशेषस्याभावप्रसवात् । न च गुणवतः पुरयम्यान्येन" १० मिति तथाभूत विशेषशामायाद नासिद्धो मररचितयचनरचनाऽविशिष्टयलभणी हेतुः । येषु प्रासादादिपु ..चि... स अथापीरपेयेप्याटमपि नररचितरचनाऽविशिष्टत्वं तत्र विरोधाभावादाशयमान ध्यावृत्तिकरयादनकान्तिकम्, ना अपौरुषेयेष्वपि नररचितरचनाऽविशिष्टत्यस्य भावे निश्चितेपु प्रासादादिपु समदपि तस्य सद्भायो न स्यात्, अन्य हेनुकस ततः १५मावे घा तहेतुक एवासाविति नापीरुपये तस्स सदावः शनीयः। अत एव न विरुवा धर्मत्वे सति विपक्ष एव पृत्तिर्यस्य स विरुद्धा, न चाय विपक्षे वृत्तिरिति प्रतिपादितम् । कालात्ययापदिष्ट-प्रकरणसमाऽप्रयोजकत्वानि देतोदापाः सम्भवन्ति । तथाहि- मयाधितकर्मनिर्देशानन्तरप्रयुक्तत्वं हेतोः कालात्ययापदिष्टत्वमुच्यते, न च यत्र भूतो हेतुर्धर्मिणि प्रवर्चमानः स्वसाध्य व्यवस्थापयति तत्रैव प्रमाणान्तरं प्रवृत्तिमासादयन् २० धर्म व्यावयति एकस्यैकदैकन विधि-प्रतिषेधयोर्विरोधात् । तन वाधाविनामावयोः इति न कालात्ययापदिष्टत्वमविनाभूतस्य हेतोदोपः संभवति । रीतधर्मसाधकस्य प्रकरणचिन्ताप्रवर्तकस्य तत्रैव धर्मिणि सद्भाव उच्यते, न भूतहेतुसाधितधर्मणो धर्मिणो विपरीतत्वं संभवतीति न विपरीतधर्माधायिनो हेत्वन्तरस चिरिति न प्रकरणसमत्वमविनाभूतस्य हेतोदोपः । अप्रयोजकत्वं तु २५णामन्यतमरूपाभावः, न च प्रकृते हेतौ तदभाव इदि दर्शितम् । अथाऽनुमानलक्षणयुकस प्रस्ट मानस्यापौरपयवसाधकस्य सद्भावात प्रकरणसमता स हेतो,अनुमानवाधित या पार दोषः, प्रत्यनुमानं च दर्शितम्-- "येदाध्ययनमखिलं गुर्पध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनवाच्यवादधुनाऽध्ययनं यथा"[लो घासू०७, शो० ३६६] ३०न चैतदाराष्ट्रनीयम्-एयविधे प्रत्यनुमानेऽभ्युपगम्यमाने कादम्यादीनामप्यपीयेयावसिनि पतस्तेषु वाणादीनां का निधया तथाहि कालिदासतारसंमयादीनि काव्यात अविगानेन सयन्ते । अर्थ येदेऽपि कसरणमस्ति, तथा चाचा हिरण्यगर्भ येाना कt सन्ति, अपरे अएकादीन कापीन्, सत्यम, अलिन त्यविगीतं यया भारतादिषु, तया जिन घालणसानुमयो मूलम्, न च धेरै करमरण केनचित् ममाणेन महानुभयो व्यवस्थापन ३५शक्या, पदपि फांसदोषप्रतिपादकं धनं कथित तम्-हिरण्यगः समपसंता" [मा अ० ८० १०, ए० १२१ ] इस्पादि, तदपि मनायादानां भूपमाणेऽयं प्रामाण्यायोगाइ * तरसद्भापावेदकम् तदुतम्- "भारतेऽपि मदेव फस्मृत्वा तु पाप्यते । धं तस्मृतियां न सायादनियन" [ो. पा० मु०७, सी० ३५, ४.पदप्ययुनम्। यतः मित्र प्रतिसाधनग्य : किमानाप्पापम्, उन बर्ड मामापयामाससमोर... पिना सत्र। निधित' एमासा-गु'। पु.., पमिकी.... ५५० 1 .

- पापागोपापरीक्षणम् । र! सिर पर निरोग्योपा गुरमीतोपरतिगामा, कम्मरणविशिष्टो पा! PER निधिको मारनारिपपि भापारनकाग्निसायम् । सिंध, # याभूतानां बामपनपूर्वक मानानामेपापमयायमापनपूर्णक साधयति, -पाननानाम् ! यदि तपाभूनानो तदा निसगाधनम् । अपायाभूतानां तदा सप्रियेशादि. भोजनानामेव साधपति ग घ सिधमाधनम्, मर्यपुष्यापामतीन्द्रियाएं. ५ गानिमान्दैन अनादिया प्रतिपाइकप्रेरणाप्रयाणामनेहायात्। स्यादेशदू यदि पानामुतातिपादने मामापामायः सिदामाद. पापता गुणयनुरमापे तहरीर रातदोपरपोलिया मापपादं प्रामापमिनम्। तपाभूतां व प्रेरपामतीग्निपदर्शनानि- पिता अपि गत सपने पुतलपाभूतप्रेरणादायासामयन सर्पपुगणामीसारयसिद्धि- पर लियापन मस्सा ! अपम गुपपापवरतामेन घोइनाया अमामापनिवृतिः फिन्स्यपा.१० रपेरान, सतो मापं दोष मनु त पुनरपारपेपत्यं चोदनाया अपगतम् ! यदन्यतोऽनुमानात तदाता एयापारपेयरपतिदेय मरतमनुमानम् । अत एपानुमानाचेत्, मन्यतोऽनुमानादपीय- पेपरमिला प्रेरणा मामायामापः, तरभाषाप तयाभूतप्रेरणातत्यासामणेन सपुर- पजामीपसिद्धिरितीतरेनरामयदोपसमायः। अतः रिपतमेतत्-तपाभूतानां तथाभूनाम्पयः कसाधने लिस्साधनम्: तप निर्पिशेषणो देवः मातनोऽपारपेपर साधयति । अथ सविरोपणो १५ द. यात सामनदा सिसय केपलस गमत्या पिशेयोपादानमनर्थकम् । भयतु रिशेपमेय गमकर सपंया अपौरपेयरपमिल्या नः प्रपोजनमिति घेत, असदेतत् । यतः कालर विशेष किममापा प्रमाणम्, अर्धापतिः, अनुमानं पा! यद्यमाचारयमिति पा, मम युनः समापनमापस मामायामापाम् । चि, मदुपलम्भकममापशनिवृत्तिनिय- पनामसतिरस्युपगम्पने भपता "ममा यत्र" [सो. पा. सू०५, अमाव० लो०१]२० लासनिभानाद, न च ममा धेरै पुरपसायाऽऽदकस नितिः, नररचितरचनाऽपि. शिल्पस पौरपेपत्यतिपादयरवेनानुमानस प्रतिपादनात् । न यास्याऽभामाण्यममिधातुं शक्यम्, एनोसामामापं रिम् अभापमापयापितान, उत सामायिनामावियाभावेन ! तत्रन सापदमाममायापितत्वेन, पदोपप्रसाद । तपाहि-न पायदभापप्रमाणप्रवृत्तिर्न तायद प्रस्तुगानुमानपापा, पापन समाधान तापत् सदुपलम्माप्रमाणनियुत्तिः, यावय न तस्य २५ नितिन सायन् विना अमाषालयमात्तिः, तदभवृत्ती घ नानुमानयाधेति दुरुत्तरं घारम्। तमामायममायापिताया प्रस्तुतानुमानस्थामामाप्यम् । न चायापितस्वमनुमानमा माग्परिपन्धनम्-तापगमे त प्रामाण्यमेव न सात् । तस्य निधेनुमराश्यत्यात् । तपाहि- सामायो मानुपटम्मानिधोपने, विधमानयापक प्यपि पाधानुपलम्मस भागत् । नापि पाथ. कामारहाना, यतस्तदपि शानं यदि तदेय पायकामा निधायपति तदान तत् प्रामाण्यनि-३ पन्धनम्। तपाभूतानस्य संभपापडेप्यपि मापात् । अप सर्पदा तपाघकाभाचे निधायपति, तदमदन पूर्व वाघमर प्रवृतम्, नाप्युत्तरकालं प्रपतिप्यते' इत्येषभूतस्य मानस्वार्वानाशा. मनाबाद। मारे पा तस्वष सर्वशत्याहम प्रेरय धर्म प्रमाणम्' इत्यन्ययोगध्ययन तद्विषयत. सामाण्यापारपोपपत्तिः साद-किन्नु निधिवस्वसाध्याविनाभूतलिममषस्यम् । खसापा- धिनामापनिमायब पौरपेयान कार्यकारणभायनिधायम्, सदेष ८ वसायविपर्यये तस सद्भापायाम, तस्य चने हेतो सस्पेन दर्शितवाद न तरममयस्साए मानसामानापम्। अत पप स्वसायाविनाभारित्याभाधेन तस्य अप्रामाण्यम् इति दितीयोऽ पोन युटा तनामावाल्पं कलश प्रमाणम् अपौरपेयत्वसाधकम्, नापि पौरपेयत्यय कम् । अप अर्यापतिःकसरपम्, तदप्यसतम्, अर्धापसेतुमानेऽन्तर्मावर प्रतिपादयि मानयादा तापयास पास पितत्यात् । अपानुमानम्, तदप्यसगतम्। 'अपौरपो कसरात' इत्येपंपोगे तोधिकरमत्यदोगात् । अय अलर्पमापकर्नुकत्यात इति हे योगान धिारणपोषस्तहि असर्यमापकत्वं मारतादिपु निधितात्रेयपि विपत : १५.१५:५० २१.११.११ । संभव भरे ..पं.

. -- ४२ अपने काले- कारितफयम् । सय भागमालो पर्नु मनात नको मानमर्गमापन माया मानहानिकाम, मा पाकर गाय माता प्रमाणारेनानायुगमात् । मायुपगमे या पिचः सरला यात्' इति प्रनिवापिसो भन् भयतोऽप्यसिहा पार । अपगविगानं करोपिनियन मरणाममन्यम् । नया ५पेचिद् दिरण्यगर्मम्, अपरेशान येदम कन सरन्दीति कविशानिनितिः । मन्त्र कविरिप्रतिपदिशेलारणमेपासर लादत्र, न कमानमरणम्। अन्यथा कादन নাম বিবিধিমালালাশন মাষণ প্রাকার पुनरल्यमेशान्तियं प्रशतद्देवो शप वेदे का विशेषविप्रतिपत्तियन कमानेऽपि प्रिनिपनिरिति तत्र कसरणमण्यम्, कादम्पयादीनां तु विश पर भित्रतिपतिनं कर्नुमात्र, सेन तर कर्नु: १०सरणय विपक्षमा उत्साया मासयंमापदंश ते पन इति-नानकान्तिमन्वन् । ननु वडे सीगताः कर्षमा सारित मीमांसकत्येवं कर्ममापि सिनिपनेदि कसरण निया वदा परसरणयद अलर्यमालककरयमन्यसत्यं साद, विप्रतिपचारिशेषाम्। तया च पुनरप- सिसोदितुः । एतेन 'सत्यम, घेदे कलरणमतिम स्थनिगीतं, या मारतादिषु' इति निरस्तम् । यदप्युसम् 'तथा सिमुलं घटे करसरणम् । तपशानुभयो मूलम्, न चासो वत्र तद्विपयन्वेन १५पियो' रति, सदप्यसातम्, यतः किं प्रत्यक्षेप सदनुभवामायान वत्र तच्छिन्नमूलत्वम् , उत प्रमाणान्तरेण? तर यदि प्रत्यक्षणेति पक्षस्तदा धनयम-किमयन्संबन्धिना प्रससंग तत्र तनु- भयामायः, उत सर्पसंगन्धिना तत्र तदनुमधामायः? यदि भवरसंवन्धिना, तदाऽऽगमान्नर वत्कर्टप्राहकत्येन भवत्मस्पक्षस्यामवृत्तस्तकलरणस्य छिनमूलत्वेनालयमापवर्तकत्वस्य मात्रा- दनकान्तिकः पुनरपि हेतुः । अथ सयंसंवन्धिना प्रत्यक्षपाननुभवः, असायसिस; न धर्वाग्दशा २० 'सबैपामत्र वग्राहकरयेन प्रत्यक्षं न प्रवृत्तिमत्' इति निश्च शत्यनिति तत्र तत्लरमस्य दिन- मूलत्यासिद्धः 'असर्यमाणकर्तृकत्वात्' इत्यसिद्धो हेतुः । अय प्रमाणान्तरेण तदनुमगमावः- तत्रापि चकव्यम्-आगमटक्षणं किं तत् प्रमाणान्तरमभ्युपगम्यत, उत अनुमानस्वरूपम् अपरथ प्रामाण्यासम्भवात् ? तत्र ययागमलक्षणेन तदननुभव शत पक्षा, स न युक्तः, "हिरण्यगर्नः सन. वर्चलाने" [ऋग्वेद अष्ट,० १०, सू० १२१ ] इत्यादरागमस्य तत्र तत्सद्भाबाऽवेदकख संमः २५वात् । न च मन्त्रार्थवादानां स्वरूपार्थे प्रामाण्यामाय इति वठं शक्यम्, यतो मन्त्रार्थवादानां स्वाभिधेयप्रतिपादनद्वारेण कार्यार्थोपयोगिता; तेषां तत्रामामाण्ये विभ्यर्धाङ्गताऽपि न सान। अथानुमानेन तब तदननुभवः, सोऽपि न युक्तः अनुमानेन तत्र तदनुनवस प्रतिपादितवान् । अथानुपलम्भपूर्वकमसर्यमाणककत्वं यद्यस्लामिहेतुत्वेनोव्येत तदा पूर्वोत्तप्रकारेणासिद्धत्वाऽन कान्तिकावे स्याताम्, न तु वत्कर्षनुपलम्भपूर्वकमलयेमाणककत्वं हेतु किन्तु तद्मावपूर्वकम् । ३० नन्यत्रापि यदि उद्भावः प्रमाणान्तरात् सिद्धस्तदाऽस्यानुमानस्य वेयर्यम् । न च तदभावांत- पादकमन्यत् प्रमाणमस्तीत्युकम्। अलादेव अनुमानात् तद्भावसिद्धिलदाऽवोऽनुमानात् तद्ः भावसिद्धी तत्पूर्वकमसयंमाणककत्वं सिम्पति, सिद्धौ चातोऽनुमानात् तदभावसिद्धिारती: तरेतराप्रपदोपात् तद्यस्य सविशेषणस्याप्यस्य हेतोरसिद्धयम् । अथ मतं यत्र सिकरपु भाववसर्यमापकर्ट कन्वं तत्र कर्नुः सरणयोग्यता नास्तीति निधिशेषणसाने कान्तिकस्वम्। यदि ३५कीनां तु रचनानां सति पौरुषेयत्वेऽवयं पुरुषस्य कर्नुः तदर्यानुष्टानसमयेऽनुष्ठाणा सणं. स्थाव, ते हि अरष्टफलेषु कर्मस्वेवं निर्विचिकित्सा प्रवर्तन्त यदि तपां वद्विषय. सत्यन्वनिधयः तस्रा: प्येवंमावो यदि तदुपदेष्टः सरणम्, यथा पित्रादिप्रामाण्यवशात् स्वयमदृष्टफलेपपि कर्मम वहु- पदेशात् प्रवन्त-पित्रादिभिरेतदुपदिष्टं तेनानुष्ठीयते-एवं वैदिकम्पपि कर्मस्वनुष्टीयमानेषु तप स्मरणं सादाने चामियुकानामाप पैदार्यानुष्टाहपां प्रणिकानां कर्नुः सरपमान्त, अतः स्मरण ४. योग्यस्य कर्तुरस्मरणात् अपरिपेयो वेद एवं चाय हवयः-कः मरणयोग्यत्वेऽपि सति असः माणकर्तृकत्वात् अपरिपेयो दः । न च विधस्स हैतो सिद्धकदकपु भाषेषु वृत्ति, अती मानका तिका यत्र पौरपेयरयं तत्र सविशेषणो हननं संभवतीति रित्वमापन धियने, पिसे यमाला ....... ५.३।३.१.४.६.२३३ वरपे भो । rg.१९ ६५ पृ. १७५.१८-पृ.१५.। ६ "मन्वैस्य-सचिमा".भा दि.। ।

मर्षum watsमर धि उपले भRT सपिरोपमा प्रदिपाये पस्तुन्यप्रतिा, मापिस লাই। নাম। রাত যায়নিতো কােথায় গুটি গুলিঃ- मात्र गरेशे प्रेम मिति थापा मन्तरेऽपि गर्नुकरणोपाये पति अर्यमापकान्यानो सहाराधकप्रमाणाभानपनापसंभवात संदिग्धपि. पसमातिशापादकान्तिकायर सदयस्थायात् । किन, विपक्षविगादि विशेष विपक्षा ५ बारीमान माविशेषमादाप निपसत ति युनम, न प पोमवेयरमेन सह कर्नुः सरपोपपस्य समागमानलक्षण, पररपरिहारस्चिनसोपा पिरोधः सिप सिलीपा तत पप साय. सिमानारयात् इति विशेष्योपासनं अर्धम् । यत्नम् 'तरानुष्ठानसमयेऽपश्यं. ঘা উৰিানামনিসিমান্নাঘনঃন্নিা কৰি আন নামজে যাও, ন साभिपुनानामपि नास्ति' इति, न आगमान्तरेऽपि समान नधेति चिन्त्यता स्वयमेव न घायं १० निकमा-मनुतारोऽमितानुष्ठानसमय ताकनारमनुस्मृस्पेर प्रपन्ने, न दि पाजियादि. মামেরিকানিয়াহুমায়ানম নাঘর লাকগণনা पागिन्यादिकमनुस्मृत्येय प्रान्त इति टम्। निधिनतरसमयानां कलरमयतिरेफेशापविल म्येन 'गति' सारिमाधुरादारपदानात् । तत् स्पिलमेतर--सचिरोपमहापि 'असमयका शाया' रति देतोशंदिगंपन्धिनोऽनेकान्तियम्, प्रतिवादिसंबन्धिनोऽसिदत्यम्, सर्यसंप-१५ चिनोऽपि तदेवेति नास्लादेतोरपारपेपत्यसिदिः । अतोऽपाययप्रसाधरममाणाभापादासन- स्यावासम्म पनि सर्पसीनत्यं नामुपगम्यते तदा प्रामाण्यमपि न पाता तथा च 'धर्म मेरा प्रमाणमेप' ययोगमपच्छेदेनायधारलमनुपपतम् । अपप्रेरणाप्रामाण्यसिस्य सर्पसः प्रेरणामनारगम्यते तदा "चोदनप च भूतम्, मपन्तम्, मरिष्यनम्, ऐश्मन, व्ययहितम्- एपंजातीयरममपगमयितुमलम्, गान्पम् सिनेन्द्रियम्" इत्याभिधानमसातं मामोतीत्युभ-२० पतः पाशारज़मीमांसकम्य । तम् स्थितमेतद् आचार्यज मीमांसकापेक्षया प्रसगसाधनमेतदुपन्य- नम्-परि मिसासनमभ्युपगम्यते भपद्लिदा जिनानां तत्-जिनमतीतम्-अभ्युपगन्तव्यमिति । [राज्ञवादः] [पूर्वपधा-सर्वसत्तानिरसनम् ] अप भपतु प्रेरणाप्रामाण्यपादिनां मीमांमशानामेतत् मसगसाधनम्,ये तु नमामाण्यवादि.२५ मधाशलान् प्रति, स्वप्रतिपत्तौ पाभयना कि प्रमाण न च प्रमाणाविषयय सद्व्यवहार विषपत्वं गुनम् । नयादि देश-काल-स्यमापरिप्रकर्षयन्तः मदुपलम्भकममाणविषयमायमना- पना भाषा मरे प्रेक्षायतां सदयपहारपधावतारिणः, यथा नापृछादयस्तपावेनास्युपगमचि. पा, नया च समनपस्नुथिलारप्यापिकानसंपरसमन्धिता पुरति सदस्यपहारमतिरोधफलाs. नुपलधिः । न चासिझे हेतुः । सधादि-सकलपार्धसाक्षात्कारिमानानालिद्वितः पुरुषः३० भन्दमधिगम्योपा अम्युपगम्येन, अनुमानादिसंपोषाहन तायदप्पागोच, प्रतिनियत- सनिहितकपादिविपरनियमितसाक्षाकरणस्वभाषादि पारादिकरणापारसमासादिनारमलामा मलयोन परस्य संवेदनमात्रमपि शायदालम्बिनुं क्षमा किमत पुनरलाधनसातीनानागन- पर्ममार-मादिस्यमापसालपदार्थसाक्षाकरिसंवेदनविशेषम्, तदयासिनं पा पुगसम् गादि- पये पधुरादिकरणपतिस्प बाम अमृत्यसम्पा! मम्भ पाऽन्यतमवरणनितस्यापि३५ भाना पारिसबालविषयमान संभया दोपेन्द्रियपरिकल्पना पपीन पक्ष्मादिसम- नादापहामन्तरण प्रत्यक्षप समाधारकरणमसमानमरणम्, मासाहले नमायापि सद्गन मामा रहे पतसमाध्यामिताgraविनाaanand माप्यमानता सकलदासप्रतिपति, अनुम: ini: ::..': एपमासादर प्रमातामामोति प्रतिपन्याय .." ..:". ११.४१.२५६ १-परिलम्धिन भवति'-4.....गु.। ममापयहित-t., . "पोदना हि भूवम् , भवनम्, भविपन्नम्, मानम्, मादन, विकसन-दर- पार्थ समन्दि नाम्पर विचार"-कोमा...१,१.३,५.१५ ।

सपने को- गृपने गानुमानेन ! मा, नाम: निनिमिहेनुशीयालेयाम गामिना EPITTी तुं मान्यनुपामेन नाम', गाम्नाग मागे-गोगगनतिनः। म गालामानापमानमनुमान प्रमामागारी, मिrritm. ওঃখি ম মশ: মান্নানপাগালাগালাম। মাগী সামলার শপ संवेदमा अनुमाननियन हेतुपर्णम् । म गानुमानगोदाममनोगमा, हेर. पमधमंगायगममगारेगानुमानसीर पर्मिमाहामारणेम गानिसमयी देनुः प्रतिनि. गरपानिएसियुरिति नामुमाननोऽपि ममप्रतिnिe frri मायावती दोमानि गुगांसियाले भगिद-भिमाइमेकानिकलानाम् । तपादि-मममा माघे २०भापयमों देगु, उमागापधर्मः, माहोनिमयधर्म:! तत्र यदि मारमनवामिनः । अथा. मायधर्मांगदा मिला, मारे गामापामाभिगागोन मिनार अगोमय. धर्मसोममाप्यमिमारिन सामागने मेलानियमितिम राहलममरामायने कधित राम्या देगु सामपनि । मपि ल, ययनिगमा गित गालामार्गमः गाणेमिनानदा तर तप्रतिनियतागमा मो भयताम् । जग प्रतिनियम पर पलाईन समारभ्युपगम्यने नदा ५तरमापने प्रगुनम देतोरपारापनामाग रामानुत्यामपारसापारणानेशान्तिकादमा. धकरयम् । यि, यत पर देनोः गिनियतोऽईन गरेमात पय शुशोऽपि म मादिनि कुनः प्रतिनियतरायंगीतागमायणमुशासिम मम पिन् सजमापको देनुः । अय म पदा कम्पचित प्रपा प्रमेपाषान् अगदियनिति तरसाधनदेवुमनाया, तदमत् । यतोत्र f मालपदाधमाधारकाकमानपक्षापं सपाना माध्ययनाऽऽभिप्रेम, आहोम्बित प्रति १० नियत विषपाने कमानप्रत्यक्षायमिति फरानामयम् । यद्याचः पा, मम युता, प्रतिनियनपा दिविषयमाहकाने शमयमयक्षस्येन ध्यामम्पास्यादिरशास्तमिति प्रमेयायलक्षणस्य नोयरल. म्माद् देनु वियरत्य-सायनिकलाटान्तदोपदयामातत्यान् । अथ दितीयः, सोऽप्यराङ्गना मिड साध्यतादोषममहात् । तथा, प्रमेयायमपि तुरयेनोपन्यमानं किमरोपमेयच्यापिनमाणप्रमेयरय ध्यक्तिलक्षणमन्युपगम्यते, उत असदादिप्रमाणप्रमेयस्यव्यनिस्वरूपम्, आहोस्विन उभयति. ५साधारणसामान्यस्वभापम् इति विकल्साः। वत्र यदि प्रथमः पक्षः, स न युक्तः, वियादाध्यामि तपदायेंषु तथाभूतप्रमाणनमेपत्यम्पासियत्यात्, सिद्धत्ये या साध्यस्यापि हेतुयत् सिद्धत्वाद प्यर्थ हेतूपादानम्, तपाभूतप्रमाणप्रमेयत्यस्य हटान्तेऽयादिलक्षणेऽसिद्धः संदिग्धान्यपध हेतुः स्यात् । अथ अस्सदादिप्रमाणप्रमेयत्वं हेतुस्तदा तथाभूतममाणप्रमेयत्यय विवादगोचरेवती द्रियेप्यसंमयादसिद्धो हेतु: सिद्धी पा ततलयाभून प्रत्यक्षत्यसिद्धिरेय स्यात् तत्र यावियाद ०ति न देनूपन्यासः सफलः । अयोभयममेयत्ययनिमाधारणं प्रमेयत्वसामान्य हेतुरिति पक्षा, सोऽप्यसङ्गतः, अत्यन्त विलक्षणातीन्द्रिय-इन्द्रियविषयप्रमाणप्रमेयत्वसनियसाधारणस्य सामा न्यस्यासम्मयात्। न हि शायलेय कस्यक्तिद्वयसाधारणमेकं गोत्यसामान्यमुपलम्धमिति प्रमे यत्वसामान्यलक्षणो देतुरसिद्ध इति नानुमानादपि सर्पशसिद्धिः । नापि शब्दात्, यतः शम्दोऽपि तत्प्रतिपादकोऽभ्युपगम्यमानः किं नित्यः, उतानित्य इति कल्पनाद्वयम् । न तावद् नित्यः, सर्वसयो- ५धकस्य नित्यस्याऽऽगमस्याभायात्। मावेऽपि तत्प्रतिपादकत्येन तस्य प्रामाण्यासम्मयाद कार्येऽयें तत्मामाण्यस्य व्यवस्थापितत्यात् । अथानित्यस्तत्प्रतिपादक रति पक्षा, सोऽपि न युक्तः, यतोऽनि. सोऽपि कि तत्प्रणीतः स तदयवोधकः, अथ पुरुषान्तरमणीत इति विकल्पवयम्। तत्र न सर्पन प्रणीतः स तदययोधक इति पक्षो युक्ता, इतरेतराश्रयदोपप्रसङ्गात् । तथाहि-वाणीतत्वे तस्स प्रामाण्यम्, ततः तस्य तत्प्रतिपादकत्यमिति व्यक्तमितरेतराधयत्वम् । नापि पुरुषान्तरप्रणीतस्तद- • पयोधका, तस्योन्मत्तवाक्यवदप्रमाणत्वात् तन्न शब्दादपि तस्य सिद्धिः। नाप्युपमानात् तत्सिद्धिा, यत उपमानोपमेययोरध्यक्षत्ये सारश्यालम्बनं तदभ्युपगम्यतेन चोपमानमूनः कश्चित् सर्पसत्वेन प्रत्यक्षतः सिद्धो येन तस्सादृश्यादन्यस्य सर्पसत्यमुपमानात् साध्यते, सिद्धौ पा प्रत्यक्षत एप सर्प १ प्रमेयकमलमार्तण्डे । “सर्वसावे साध्ये भावधर्मों हेतुः, अमावधर्मो वा स्यात्, उभयधर्मो या प्रथमपझे असिख, माये मसिद्ध तममम्य सिद्धिविरोधात्"-पृ. ६८ पं० १५ । २साध्यत्वेऽभि-मा० । तोऽवः। ३..

मशवाद। शम सियानोपमानादपि तसिलि। मधेशममारमन्तरेणानुपपद्यमानस्य प्रमाणपटकाविहात; पार्षस्य कस्यचिदभाषा गार्यापतेरपि सर्पक्षमापसिद्धिा घागमप्रामाण्यलक्षणयार्थ राम. ग्तरेणानुपपद्यमानय तस्परिकल्पत्यम्, अर्तीन्द्रिये स्वर्गाथें तत्प्रणीनत्यनिश्चयमन्तरेण सस्य मामाण्यानिक्षयात्। अपौरपेयत्यादपि प्रामाण्यसंभयात् कुतस्तम्य तमन्तरेणानुपपयमानता? तमापितितोऽपि तसिद्धिा । अमापापप तु प्रमाणसागापसाधारयेन व्यापाराद्न तरस. ५ जापसाधकरयम् । म घोपमानाऽर्थापत्य-भाषप्रमाणानां भयता प्रामाण्यमभ्युपगम्यते इति ग भ्यस्तरिसमितिदुसम्-- "सको दृश्यते तायदानीमसदादिभिः। दशेन धैकदेशोऽस्ति लिहं या योऽनुमापयेत् ॥ न चागमविधिः धिमित्यः सर्यसयोधाः। १० न च मप्रार्थयादानां नारपर्यमयकल्पते । न चागमेन सशस्तदीपेऽन्योन्यसंभयात् । मरान्तरप्रणीता मामाण्यं गम्पते कथम्।।" [लो० पा० सू०२, श्लो० ११७- ११९-१९८] ततो 'ये देश-काल-'स्यादिप्रयोगे नासिद्धो हेतुः । सापहारनिषेधश्च अनुपलम्भमात्रनिमित्तः१५ अनेकधानेन अन्यत्र प्रयतित इति अवापि तरिमित्तसद्भायात्मपतयितुं युक्तः। {अप 'यधाऽस्माकंतरसद्भापाऽऽयेदपंप्रमाणं नास्ति तथा भवतां तदभावाऽऽवेदकमपि नास्तीति सध्यपहारपदभापव्यवहारोऽपि न प्रयतपितयः । तथादि-सर्पविदोऽभायः किं प्रत्यक्षसमधिगम्यः, प्रमाणान्तरणम्यो या तत्र न तापत् प्रत्यक्षसमधिगम्यः यतः प्रत्यक्ष सर्पशाभावाऽऽदफमभ्युप: गम्यमानं किं सर्वत्र सर्पदा सर्पः सर्वशी नइत्येयं प्रयतते, उत चित् कदाचित् कधित् सर्पशो२० नास्ति' इत्येवम् इति कारपनाद्वयम् तत्र यदि 'सर्घष सदासर्वः सर्वशोन' इति प्रत्यक्षस्य प्रवृत्तिस्तहिं नसघशामाया नमानपतपय समस्यात्नधि सकलदेश-कालव्यवस्थितपुरुषपरिपत्साक्षात्करण- मन्तरेण तदाधारमसत्यमपगन्तुं शक्यम्, तरसाक्षात्करणे च फयं न तज्ज्ञानयतः सर्पसत्यम् ? रति नायः पक्षः। द्वितीयेऽपि पक्षन सर्वथा सर्पज्ञामाषसिद्धिरिति न प्रत्यक्षात् सर्थशाभावसिद्धिः। अथ न प्रपर्तमान प्रत्यक्षं सपेक्षाभाषमाधकं किंतु निवर्तमानम्। ननु यदि निखिलदेश-का-२५ लाधारमालपुरुषपरिषदाधितानन्तपदार्थसंविधापकम् कारण पा तत् स्यात् तदा तनिवर्तमान सथाभूनं सत्यं व्यापतयेद् नान्यथा, अंतयाभूतनिवृत्ती तनिवृत्तेरसिद्धः, तथाऽभ्युपगमे पास पर सर्पस इति न सेन तनिषेधः । किंच, प्रत्यक्षनिवृत्तियदि प्रत्यक्षमेय तदा स पव दोपः । अथ प्रत्यक्षादन्या तदाऽसी प्रमाणम्, अप्रमाणं घा! अममाणत्वे नातः सर्पशाभाष. सिद्धिः । प्रमाणरये नानुमानत्यम्, सर्वाऽऽमसंयनिधन्यास्तनिवृत्तपासयमसिद्धाऽनका-३० प्तिकरपदोपदयसद्भावात् । न च तुच्छा तनिवृत्तिस्तदभापशापिका, तुच्छायाः केचित् सह प्रतियधामाषेत सर्वसामय विरहेण चापकत्वासम्मयात् । तम प्रवनमानम्, निवर्तमानं पा प्रत्यक्ष समापं साधयति । प्रमाणान्तरगम्यत्वेऽपि तदभावो न तापदनुमानगम्यः, तदमाय. साधकानुमानाभायात् । अप विषादाभ्यासितः पुरुषः सर्पो न भवति, पक्मृत्वात, रध्यापुरुष- पत्रस्यनुमानं तदभापसाधकम्, नपत्र कि प्रमाणान्तरसंवादिनोऽर्थस्य धपत्य हेतुः, उत तदि-३५ परीतस्य, आहोस्थित् धक्तत्वमात्रमिति घनव्यम् । यदि 'प्रमाणान्तरसंवापस थपढ़ायात्' इति हेनुस्तदा विपद्धो हेतुः, तथाभूतथागत्यस्य सर्वशे पप भायात् । अथ 'प्रमाणान्तरयिसंपादि- मोऽर्षस्य यक्तृत्पात् रति हेतुस्तदा सिद्धसाधनम्, तपाभूतस्य धनुरमर्षशत्येनालाभिरण्यभ्यु. पगमात् । अथ घपतृत्वमा देता, न तस्य साप्यविपर्ययेण सर्पशवनानुएलम्धेन सहानयस्थान- रक्षणस्य, सदध्ययच्छेदस्यमाषेन च परस्परपरिहारस्वरूपस्य च विरोधस्यामाया न तनो व्यापृ.४० चिसिद्धिरिति न स्पसायनियतत्यम्। तदमायाम स्वसाध्यसासकरयम् । अप सर्पो पना नोप- लम्प रति ततो व्यावृत्तिसिद्धिः, मा सर्पसंपन्धिनोऽनुपलम्मयासंभपात्-सर्पस एप घतृत्वमा. १.४.२६॥ २ तपाभून भात, सस्ते महंगमरेण या स नए मीलीग मानः सम्मिनोगत मन्ना अप म मनिमायार सगंध-धनोऽनुनम्मर भरः मनु पंजाTT निसर: प्रमाणात पेन, सम र तामायमिरा बम्। पानुमान बसमतोनगदोयमना-निनोऽनुमानान्समामा timrrit मामामागदोनोरिंगातो मानिःसार नमानसमा म सामाग्री नितीनगर। मनु या समानुसम्ममानदि सामानोति. मगत प्रादुनरादरनिल माननम्म सीमो मिनिमोगरतोषिक पुनःदिग्पनिमाधिकार लोम्नामापरिनिः? मासिम्धिनोनुमानजीर मानिसमा दम्म मतिमनुनापने कानि। म गांभूगापिसद्धि भागने न सिमामारपोर माइति तामाTILAT कम्मरममा मनग्यापिका दोरममान त सानुमानोगताना भारमिनिगमानुग्नम्मामीर पEHAAR मा वाताति Pram.गामापरतारे पायगापा मग, मी mrita नामामानापमानः is पानिकी PETI मप्रमाणे प्राणाप्रपाभिमाभापार me TRENT Pyram मी गामा: ग. 7 IritTamfrritair Trry Prrrrrrrrrrrints Ramtirina Ti Er. krt::mirmTTीमाति-- * IrritTITोगा। Raftarना मार गुर्ग गा" ॥ [ITTE Jatin PITTAMIL, AM Parm: ETAMIT नाम तामामितिमा TTARI मा. -rrrrrrikTiraimaratiनति, प्रगया - *Trmगापमानमा मारमा मामिला t: भमा-५, मान. rrrrrr-manामान •wer TETTrwar मान17 MIT RIFTTHATARI PATErr raw माMAMRITTमनी.. भारतwinARANTHRITIS नाममा * Treaterial Meri maatrnar.mml, reritTT Maitrakar. xT मा : * **! 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Amritware भारत Termiafe* * * * AP * Etv mart *- -* . - ২v বাঃ। মায়ানুলাল মুযানিমিয়ঃ ২, ৩ টে যম, বান, কায িািিছঃ । নাকি বিঘা মামনিমিৗখানি জনি সায়মনথল ঘুষ নিধিবা-কিন্তু বিষযম যেঙ্গমানিমিয়া বয় যায় মমমমপিমহল। সীমানাশ দাগ সমিনুলঘ, খাবধা কায়ানুষমাশামযুথামা যায় ব্যাথামুখঘামান নাম্বার ন যায় । খনি, খা যায়নি বায়যোবােয়াহাবাগণমালাম যোগদান্নহিবি। বয় হয় যমু-~- সাবিনামাগ্নি থাম সব গঠি। স মায়াবী শবত্বা ন কাম্য तेन संपन्धलायां संयन्यतरो भुषम् । বায় মনঃ বানুমান”{ মা মা দু , আখালি মা -}াবি, শয়িণেবয়সুখটখথিৱকােনো বিষয়। ম ব স ঘূর্ণমানুষ মানামঃ কি মালমসমাধ, ঘি মাখামমাথায় বি? যয় ধরা বনবি নাম~~ মধু লঘমি ম মমাগ মাধ মিণি মাধ্যবধানুষ সয়া নিয়াবি, জাবি ছানার্মিয়? বম যা পালংখাবমান কিন্তু যা হাযমনিখানলাগা নিৰ কৰি ঠিয়াঃ। স্নায় ছিলাম, এম মুঃ নবি ঘর্মটি নিশিঘ্যানুধমান খে মায়ামৰ সামনি। ঘ নয়নানিখ্রিঃ ৪ মারমিযি ইসি ৮নি। খ মিশু ৭ ০ "'"। মা বাবার বানিয়েনিয়মাবলম; সবখা ‘মর্থমনকালাম, মানুষ শী: বানিয়ে মিথামাথা ক ব খান হায় ৬ মামলমনিবময়ানমার। এ ঘ মাখালি ঘামণি ৰ ময়ই মানব মনাননাহালুযায়ল বিল ২ বাম রিফর্মী মে যেবহানা যাথ্যনুমাননিযুশন্ত খুব, খা যায়মমরিলুষমুহনুমানাহ যনি খেলার মালামাঝি সমাণৰয়াৰ যিয়াইন। নিয়মঘমী ভিজা বাধা নখয়াল নবনিমুয়ায় বন্যায়মূনাথানিয়ে মাখব পূর্ণ সামা! ও মসালাখান্তেমালমাখা সমান । মা মানিয়ার নিবযানুস খাবয়ব মাখানে নিয়াঘাঁহৰষমষ্টি যাবি যখময়ঃ ঈশান্তা মাগোণাস্তায় নামায় ময়লাইহি নিম্নমাগাল , বিশ্ববিয়ানামনি! বগ থানীcখলাম কয় মাথমির বয়া, হ ম বর নানামুখাৰ ঘৰোখিৰিৱৰি ৰা-২ ইনফান্ধি। অববিয়ানামনি হয়, মায়ের বর বয়ান ঘছি খ্রিঃখ বঘিবা সে এখামুখি হয়-ব্যয়বনুরাে জিলিল থাম, সায়ন নিয়েকিষামাঠিমার! বার মাই- কানামাখা কিম্বয়ায় বিষয়াৰ বনান বয়ামাখামাখমু, যুক) প্রং-কালঘেষাঘাথে বেয়েবিয়ে বাজারে বিধিৰ বিখ্যা-০ মহান শথির বলা য়ামাহামনিমৰ যুকম, বয়- কামি মরী , ••• • • प्रथमेकाडे- নাঙ্গাগাটা অন যে যাণন সামান্বামঃ গাৰ। যশি पुरमान्याम्गित रिभिरतपय मट्रिगर मानं ठानमान समामागोमागा. सुमा दाम्माना नहमावावगमे कनिपरपुरामनिमपस्थितष समयमामाला म मरंदा मयुगानमा पनिझमाधनम्, मसाभिरपि कुंचित् कमगिर. ५सरगम्बरमादा अप ममत्यारन्मलामावलशियं पातालमान ताजापि ft 'मटामा गर्वः मनोन' देसाप्रपर्समे, उन पनि कहानिsrt सोम' मदर नगरपामः, मालीश-कालपुरुगसागरकरणे सापारम्प तामाएमा मारवाद प्रोगामार तदाधार घरामावस्येष, तसार बरे भए परमावनिका सपतियः पादराम सत्र पाराशाभानिमिरिति गरेपनि मनिनिमारगनम्' इत्यादि प्रतिनिदिमिति नामापमानाशी गन्तुं युका मार पर तयतिरिभिATM मशरिकोभिधानम् । गेम 'मनियमांगगिपंग मरिममा सा प्रपती. सपने मामा मारिसमा भागभिदिनाकमोन प्राणी -माभिमान गईमे मतिप्रतिगार युनिजाममिति पणा माग। मासाभिमान भगतो जेमिना-". 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मवार प्रोगजर ग मायाम. गापि सरयाच्यम् । प्रसासाधनानिमायेध 'यदि अोपण पातिकमाऽप्यभिहितम्- "यदिपरभिः प्रमाणात सर्पस फेन पार्यते । पोन मु प्रमाणेन सयको येन रयते। नून सपना सर्वत्रसादीन (सर्यान रसादीन) प्रतिपयते ॥ বুড়ান মল যম্রাণীখান। संप्रति सोशल तथा कालान्तरेयभूम्" । [लो० मा० . २, सो عیه पुनरप्युनतम्- "येऽपि मातिशया प्रशा-मेधादिभिरता लोकतोकान्तरस्येन न त्यतीप्रियदर्शनात् ॥ पाप्यतिसयो १ स स्वार्थानतिलानात् । दूर-रश्मादि स्थान रूपे थोत्रवृशितः" [ सो पाए १०२, सो० ११५] रस्त्यादि। ঈসাক্ষাৰ অনুমাগিমাইকায়াৰিংলালিম' ‘ধমানীঘােষয় যাইঘীমা ২৫ मोपमेयभूतपुरुषपरिपसाक्षाकरणे उपमानं प्रयत्तते त्यादि दूषणाभिधान घसपेशवादिनः स्वजा. स्पावितरणमात्रामेष । अतः 'अतीन्द्रियमविदोग प्रत्यक्ष प्रतिमारेण निवृतिमारेण मामाघ- রামুল ইয়ারি মামাছিলেমু। यथानुमानेन सपंक्षामायसायने दूषणममिद्वितम् प्रमाणान्तरसंघाययस्य वक्तृत्वात् यादि. तर धूमादड्पनुमानेऽपि समानम् ! तपादि-तत्रापि पहुं शक्यते-~कि साय.२० धाकधी धूमो देवाधेनोपयन, उत मिसंपन्धी ? नत्र यदि सापर्मिसंबन्धी देतुलदा सस्य शान्तेऽसंभवादनाघयदोषः । अप हटान्तमिसंबन्धी, सोऽसिया) अशान्त. घमिधर्मश साम्पधर्मिण्यसंमयात् । अयोमयसाधारण धूमायसामान्य हेतुस्तदा सस्य विप. क्षेनी सिरोपासिद्धः सन्दिग्धपिपसमावृत्तियत्वेन स्वसाधागमकायम् । अप विपननी पूमानुपलम्मार पिरोधसिदिने सन्दिग्धविषसमात्तिकत्यम्। नम्वत्रापि पानसर्य-२५ संपन्धिनोऽनुपलम्मासंमयान् अनमी देशान्तरे कालान्तरे पा केनचिद धूमयोपलामात् । सदुपन्धिमता कस्यचिदमायान सर्पसंपन्धिनोऽनुपलम्गम्य संमय इति चेत्, फेन पुनः प्रमाणेनानाजी धुमसरयाकपुरुषामायः प्रतिपमा । पधन्यतः प्रमाणात, सत पयानमेधूमय ध्यातिसिद्धय ससंयापपलम्मलक्षण विपझे धूमविरोधसाधक प्रमाणस्यामिधा. मम् । अथ तत्संभपाय सं. भवः, संभव मस्य in marणिशंपरनेकाधिकरवात् । - एक्वत्वलक्षणस, मादकमिति पेद३५ ....": भापलदमाघे धागाय যে , এফ এ সুমা থানায়। মনু বিষয় যা যা रागादिमरयस्य माये एष धक्तत्यय भाया स्वारमन्येय , रमाये घामाघ एपोपलादाय. विमाननानुएलम्मतो हात रति कम विपर्यये सर्पक्षत्वे वीतरागमे या पपवायलापस्य हेतो. যন্ত খাবধাষেধাজমুন্না বার্যে প্রমাণ বন্যায়নিক -ता भा.। २१.१५.१४।३.४६५.२४-11.५५.१९ ५५.४५ विपर्ययविरोधसा-मो. -भायाचि-trat "भप२० .

। गिलपि यदुकानाम: - HIM नायगामायाद-:-- Faगारा हा +2 . mar३:17गसदमा Yी प्रानालगनकारना"tin 7.-- RANोग बनवाया सात टन्न भणीम्पति music माया परिया--- पापमोजमनादर गया yोलियामा m . मोगादिश arerature ARपार ru PARAN प्रयाग Intn..." मिमानम य-It im.. निरनमान का , तरतामा मिसागर. पETTEAme kriyar anti "१५ mins * Yati * * NATURES ruRArya . न গাে।। এই ও যা প্রতিষ্টিনিন ঘরে মামা । মায়াবি সন্তা- না মিষ্টি বা ন্যামু, খাবশাখা প্রয়াঙ্কা। যন্ত দি ৰ বিনিময়াবেনির মােজ, ভরাখার নিয়ম কাহীঘি যান নিম, নিয়মান। গ যা মেঘম, যু। ঘাম মবি- নিযহাবিবিঘশ্বাইন মম ঝালং এমবিমাথাব্য । অ তে “বধি ৭ বলি” বাদ পায় বী। খালনি রিনি বহালকাঠি-ব্যানালা মাখামাখি লক্ষ্যমই সীমাথায় মাথায় মঙ্গলময়রিয়ন ইসমাঘৰ নি, যৰি মান্না। এমন কি যায় কৰি নিৰিখর- বিগত মনিনিষীবান্ধায় আমরা চার মায ন ৪ ঘধবাবিবা মৎ। ন ত বর্ষিয়ালমা ইন নানা বয়ামায়, तरसमधे पा सकलपदार्थविषयमानस्य नित्वात् किमभ्यासमयासेन! सिंच, तदभ्यासपक াম যাই ঘামবিমরিনিলেয়মন&িথবষোনায় নার্ষিীয় যা যা থাকঃ বিশিইন মাগৰিয়াবা মাঘ মৰিনিষরকাঘালমাখামা যাবলম্বা বয়ীনুমকি। ষষবানী ঘর্মীনামৰ এখয়ায় যাযামাঘিনকি খ যথা, চায়নকারীমনসামায বাঙ্গি ও तिनियमान असदाइय एप व्यहारिणति, पतापसमीचीनम्न सत्सम्यासे मत्पप्यन्यतो पा নৈী। তিনীযিনি অবহিষ ঘষেই চােখে না মানি। কি, ওয়ান লিনিয়াহু স্যান, যা অগন্ধি শাখায় কাবিয়ান প্রণয়গীরি খনিসাবট কালায়ন্তৰি অন্তৰৰৱী মন্তর বিক ল ভিীবী দি ফয়ী মুক্তিয়মঃ। প্রশ্ন নিন কাল, সন্তু ছাত্র লীলেন মামা বাধযিয়াম, মই ও গল্পখামুনাঘাষাণবৈষী मुपहाअत एपोलम- সৰ বৰমা ফি ন ধ নামী বিনা"। {ৗকা বা ফু ৭, ২০ {২}রি। গ ঘ গনির খামারি ন নয়ন দক্ষ নেয়, এই ইলোরও বন্ধানী যময়। আর যা-~“ঘাষণা মূৰ মফ” যাবি, মথ না এৰীবি খুলবে। সনুমাননিয়ানন যৰি ন যমযমু, অমাৱাৰি বিন সয়াবিনাপোলগাল বল ধর আবি, বিয়ের গ্রাম মাধবায় খননম্ মিনুমানির মান যতমমরিখে। ব্ধি, যযাশঘয়াল গৰি পঘিমুখর বা সামৰি ধৰিথমন- বামিম, সায়মাপ্তীময় সশস, সময়ানু’ নুমানামহীনামৰি মাধ্য। মোঃ আনুমানির বনিবথামঃ বনানয়া ইন্নী যু। সামান্নান মাবিবি খাবিথ গুনগুনমাগমৰ সানফয যীবিকানকথামা- বা বায়না মরি, খােয়া যানবালা গুম-খীসীমা- যুগ্নল যায়। সব সন্নান ফিহিন্নিায় গাফি নম্বৰঃ কামাল বিশ্ব। যথারীশীযথাসমূয়ানি মিথিলােগাইয়মময়নি কো যিয়ানায়নামাইকান নিবনামমষিয়াৰি, ৰীয়াগোয়নি, মায়ানমারে হায় বিঃ সাধনা। গ-ারিমজাইবি মাধ্যামাই বিমান । এরশাবি বাবাকেয়া নদিয়ানৗযায়-শাশা নামঘাষ पारवायगमो म राणादीनामिति पगाय आपारका ति न सदिगमोऽपि सपिशिवालय এমন। খান। * ২ ।। বায়েক ।•* খ । শিষ্ট ষম। শঙ্কোশায়া।

प्रयने काग्डे- किंच, सवेदन सनमानेन कि ममलावार्थप्रहणम्, उन शनियम, आहोम्बिा नमूनकतिपयपदार्यप्रणम् ! ना पापसानापियन यम्- मेष समागम, माना योगायन ! तर यदि कामेज नहाणम युनम गतीमानापमाननामगिमापन স্নানাগালিমাদিস নাম শামস' যুগ গনসাগপাশাপাশি ५६नमम्युम्पने नागपत : माहीनामेशमाने अनिमामामपाद रोको या निगम ना ... समismir दारिम्पोनर शनि 11 'मी पानम् नोहर महाग्रात+अजान rum refr IT ITTIfhu, माया १.पासमा रमामाग-1 • In RTI अपसगारिणी राम गा"TIT किमान : पादडर नमानमा an ने मार्ग मनुरीलाम' fantamin Tirt that रोगा #TTHI I. Titm HTTER १.in AT TMTfrTITTHITITISमानित From tuोमानिNITIनिनानि •irmfuilm । भा TITTIfग पानTrirsमी A ने लिपमेन मी 'ग Trimeोणाराantar irrrrrrrarTTTTTrm पपने ARE wratri rrrrrrr grat TTMATART Pाल । HITY rrrrrt+TTET' नाशाल treerम गा. arrerfer. IT REntent in forter Tar, ATTIT. WE मानपानमा HTTTTIAtIn RT MARATHI TRafram, Alt ....... ... Ram RitmuTut RAMMITTE rr. *. kinandan1 MITTI MAT rrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr martinen ETTE. Arrrr rasir MAINPATIL Irrrrrrrr antri amirman Terrrrrrrrrr TETTE. TREATrantan HarrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrAmमा Ferrarwarift-tarmer AMARTHA * rrrrrrrrrrrrrrr- ramarth .

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प्रया- 1 पानिमाग गरियामागम निमार्ग दोषागार पानिमामानम्तो पनि गाणे निताने गमागमनमानेगामापाननिनि परम प्रतिमागम मेनियन अगापि गश्यामपिनाग मेण, मग क्रममात्रि मागनिमाने mer:मा गान गागानं सामानलाक्षादिका ५ममाम्नानि मामामागम ATMगा ग कालाम्गामान" [ इति । यह माना नहायानम्नवारिणा महकारिद्रयं मयिकलाकशानं शन. यति सपनामा भान पतिभागात कारणामावनिधयो मरिष्यति, तदप्यमा যম। সালসল সম্বসিস সলাশ নামানােমঘোষা- না থামনগলনা । যা মাগিরীশষ সমমাৰীৰিমৰ १०जानिश्चिममा मग्णादेग्नपेक्षणीयन्यात परिमलम्मरणामयपनम्य लोचनम्य 'सुरमि चन्दनम् दयविषये गन्धादी मानसनर न्याय नत्रापि नन्जनात्यधिगवान् । अथ नरम्मरणसव्यपेक्षलोच. मध्यापारानन्तरं 'कार्यकारणभूने पसे वस्नुनी इत्येतदाफामानर्मवेदनान कार्यकारणभावावगमः रात्रिकरसमस्यशनियन्धनो व्यवस्थाप्यने मन्वय परिमलम्माणमहकारियाापारानन्तरमावी 'मुरमि मलयजम्' इति प्रत्ययः समनुभूयन :ति परिमलयापि चक्षुजप्रन्ययविषयत्यं स्यात् । अय १५परिमलस्य लोचनाविषयवाद् नायं प्रत्ययस्तन. किन्तु गन्धमहचरिनरूपदर्शनप्रमवानुमान- .. स्वभायः, तदेतत् प्ररतेऽपि कार्यकारणभाये लोचनाविषयत्वं समानम् प्रत्ययस्य तु तदस्यवसा यिनोऽपरं निमित्तं कल्पनीयम्; तन्न प्रत्यक्षतः सविकल्पकादपि धूम-पाययोः कार्यकारणत्वा. धगमः । मानसप्रत्यक्षं तु तदयगमनिमित्तं भवता नाभ्युपगम्यते । अपि च, कार्यकारणमायः सर्पदेश-कालायस्थिताखिलधूम-पावकयक्तिकोड़ीकरणेन अवगतोऽनुमाननिमित्तवामुपगच्छति, २०न च प्रत्यक्षस्यति यस्तुनि सविकल्पकस्स निर्विकल्पकस्य वा व्यापार संमवतीसंसकृत् प्रतिपा. दितम् । किंच, न कारणस्य प्राग्भामित्वमात्रमेव बौद्धानामिय कारणत्वम्-येन वस्य कारणस्वरूपा- 'मेदात् तत्स्वरूपमाहिणा प्रत्यक्षेण तदमिनस्वमायस्य कारणत्वंस्थाऽप्यवगमः, केवलं कार्यदर्शनादु. चरकालं तनिधीयते-किन्तु कारणस्य कार्यजननशक्तिः कारणत्यम्। सा च शक्तिर्न प्रत्यक्षावसेया अपि तु कार्यदर्शनसमवगम्या भवता परिकल्पिता । तदुक्तम्- "शक्तयः सर्घमावानां कार्याऽांपत्तिगोवतः"[लोण्यासू०५, शून्य लो०२५४) ततः कथं प्रत्यक्षात् कारणस्य कारणत्वावगमः? अय कार्यादेव कारणस्य कारणत्वावगमो भवतु कि : नदिछन्नम्। ननु कार्यात् कारणस्य कारणत्वावगमेऽनुमानाच्छक्त्यवगमः, तत्र च तदपि कार्य लिङ्ग- भूतं यदि कारणशक्तिमयगमयति तदा शक्ति कार्ययोः प्रतिवन्धग्रहणमभ्युपगन्तव्यम्। स च प्रतिव- धावगमो न प्रत्यक्षादिति प्रतिपादितम् । अनुमानात् तदयगमे इतरेतराश्रयाऽनवस्थादोषावारोs- ३० प्रापि समानः । अर्थापत्तेस्त्वनुमानेऽन्तर्भावः प्रतिपादित इति न प्रसिद्धानुमानस्यापि प्रवृत्तिर्भवद- मिमायेण । अथ यतिगतधर्मानुविधानाद् धूमस्य तत्पूर्वकत्वं कुतश्चित् प्रमाणात् प्रसिद्धमिति धूम- त्वस्य तत्पूर्वकत्यव्यातिसिद्धिः अन्यथा घूमादन्यसिद्धेः सकललोकप्रसिद्धव्यवहारामावः, अनुमा. नामावे प्रत्यक्षतोऽपि व्यवहारासम्भवात्तहिं पचनविशेषस्यापि यदि विशिष्टकारणपूर्वकन्यं तत एव प्रमाणात् प्रसिद्ध वियादाध्यासिते बचने वचनविशेषत्वात् साध्येत तदा कोऽपराधः? यदप्युक्तम् 'पक्षधर्मत्वनिश्चये सति देतोरनुमान प्रपते, न च सर्ववित् कुतश्चित प्रमा णात् सिदा इत्यादि, तदप्ययुक्तम् । यतो यदि सर्पविदो घर्मित्वं क्रियेत तदा तस्यासिदत्वाद स्यादप्यपक्षधर्मस्यटक्षणं दूपणम् यदा तु पंचनविशेषस्य धर्मित्वं तस्य विशिष्टकोरणपूर्वकत्वं साध्यामेनोपक्षिप्तं तदा तत्र तद्विशेषत्वादिलक्षणो हेतुरुपादीयमानः कथमपभधर्मः स्यात् । न चापक्षधर्मादपि देतोरुपजायमानमनुमान प्रमाणे मयताऽभ्युपगच्छता पक्षधमत्यामापलक्षणं ४०दूषणमासजयितुं युक्तम् । अन्यथा- भयमावरमाध्ये एवं प्रदर्शित. "क्षपिका हिसा, नरपन्तरकालमरस्थास्यते इति"-पृ.०५० २४ का। २४. ३३५. २९ तथा पृ• ४१६.१३। ३-त्यस्थायगमः पा., वा, प. विना सर्वत्र । कारणे वान, बा.पू. ५-६ पृ.१५. २५-३५। .१.४६ पं० ३६.८ . ५०६ -- - } গাে।। ** লেন ধুয়াশা। সময় থাক" { দােগানুয়াগ দ্বগো । যখৰি ‘ায় । গাই গল' না, সব ল ল গণি থাকা । গাকা, ঘাগা, মিথাই এলগলি দ্বিবীক্ষা পাব । প, স লা লীল, প্রণ। খাবি ‘নিবাঃ খণি না মৎ।' (, গম, যুগ। সানি লিনিয়ায় এ গান গা গাথি রামাণকা নিয়ে মি মাথতৈয়ান , প্রাণি হিভিমায়ে শিবিশেষ বিমাননি। “ এ পৈাখি বানাখনৰ মথ না লাগ’ সিম, সা: জাজ দেবিদ্বার মুল সমাগবিঘাথাখানামমঘল বাঘিন্নাথ ই বাংলাচবি ঘিছি। বাংলা, ' ধর্থবিখ্যঃ য য়ৈ মধা, শব্দগম লিখাষকা গামাদণনপি মাথগিমালা। বাসনিম, 'ওঁ থাস্বামি মা, মা, মা দাখি' ী যুদ্ধ ওয়ামিন ' শো, লাপামম। এ বিঘানায়। বিভিঃ । স্বর্ণ পদ্ধদ্বন িিিগতা,মীৱি ৰাষায়গাrি লিংগ শাল মেণি বলukল ধান লাল মলল মানেনা বি বা লাল লি:। কার মােঃ মখমণ বাবা মা মারিনি। মা এখামার কান্না নিশােব। সময়খি ইন্ত গালাম থে? তা মায়াবি নে বনান। ঠি-প্রশ্নবি ( ২০ আমা লাব্বান, ধন ঘােমিম, খাষা মাম। দক্ষ বা না, ঘামমাত, মাখমাল সালমাৰা মুৰীপঃ প্রায়েম, দ রায় মামনি বাবা। খামশ খামাম, সার্বি ময়ানময়ানমার বিধান পানি নিয়ে যায়। এ সময়- মাখোমাখিময়মানলি ন মাননীগনমাধ্যমটি ২৬ শানঘামান্যখ শনময়ানমালমনিখা বানুমানমপি, সাদী মহিঃ- এখন যদি মালিঃ, মল ও ময়নামাই, যাই অামারামানিনিরন্তমান পিবিধি ঘৰেহণাথ। খ বাগবাতিল হত্যাধমেঘ মহান- ঘরানমেন্যায়বেনিযুশয্যায়ােবষিহী ল মনুমান খনিবিদীপা খাদ্যবিশ্বিবিখানাখশ যঘনমিনি पेऽपत्यानपेटायनियकस्यमापन कथं नामपियसामान्यभपः प्रमेयापं तु पथाहत. বানি খারিবিয়াম, আমায। ঘ ‘নাবিল্লা দিহি'যােগিরি বাহিবে না বিমাহীয়ায়ারিখে।য ‘ব ই-কা-খামিয়াবী লাবিহী দুঃস,এস, মাসলঃখমলানিবিষয়াবনাময় মোঃ খেলানিয়াহু। গান গাথানিয়ানুবনির্মিলীননবায়নযােৎ ঘি। আর যথার্থ বল্লাঘ মা গালি না মঘনা যমথামবি मास्ति' स्यादि यावत् 'ममामाघमामिमायण समय पशप्रतिक्षेपप्रतिपादकं युतिमालममिहि- 'বি যম, অন্য যমঃ “বেয়ী যেন নাম্বানী" [ী আ বু , মী ৫৩] যোনি নামমাথনিধিবিধানন্তা, য ফ্যাবিসমাথা- । • ৫। {{ r i ।। ।। ।। • • 10. nt. 01 -साभ्यधा भी, पा०, मां-पिना। ५. ४. पं. १३ । धूमावलक्षणे •, জা , মা।। * এ ।। • ৭ ৭৭। * ৭ * 8-15। • *৭ য। • ৮। ৬৭ ।

प्रथमे काडे- प्रवृत्तिप्रतिपादनं तत् तदभावावेदकस्वतन्त्राभावास्यप्रमाणाभ्युपगमव्यतिरेकेणासंभव मिथ्यावादितां सूचयति । यदप्यादि तथा च प्रसङ्गसाधनामिप्रायेण भगवनो जैमिने.. इत्यादि, तदप्यसङ्गतम्, यतः प्रसङ्गसाधनस्य तत्पूर्वकस्य च विपर्ययस्य व्यायव्यापकभावमिको व्याप्याभ्युपगमो घ्यापकाभ्युपगमनान्तर्गयकः व्यापकनिवृत्तितो व्याप्यनिवृत्तिरवयंभाविनी ५प्रदर्यते तत्र यथाक्रमं प्रवृत्तिः, अत्र तु प्रत्यक्षात्यम्य सत्संप्रयोगजत्वेन, तस्य च नरवेन, तस्यापि धर्मादिकं प्रत्यानिमित्तत्वेन क व्याप्यव्यापकमावावगमो येन प्रसन- प्रवृत्तिः स्यात् ? नक्तमेवैनन् 'स्वात्मन्येष' सत्यम्। उक्तं नतु युक्तमुक्तम् । अयुक्ता चक्षुरादिकरणग्रामप्रभवं प्रत्यक्षं सन्निहिनदेश-का ग्राहक सर्वत्र सर्वदा चेति न व्याप्यव्यापकभाषणाहकं प्रमाणमस्ति, १०शतविप्रकृष्टस्यार्थस्य ग्राहक संपातिगृधराजप्रत्यक्षं रामायण-भारतादी धूयते, तथैदानीमपि गृध्र-पराह-पिपीलिकादीनां चक्षुः-धोत्र-प्राणजस्य प्रत्यक्षस्य रूप-शब्द-गन्धादिपु देशविप्रहेषु प्रवृत्तिरुपलभ्यते, तथा लयिन . त्वस्य पूर्वदर्शनसंपन्धित्यस्य च सरणसन्यपेक्षलोचनादिजन्य प्रत्यमिशानक्षमाधत्यं स्थितेऽर्थे भवताऽभ्युपगम्यते; अन्यथा- "देश-कालादिभेदेन तदाऽस्त्ययसरो मितेः । [सो पा० ० ४, सो०२॥ "इदानींतनमलित्वं नदि पूर्वधिया गतम्"1ो या ए०४, सो० २३५) - मिगत परम्पयनजाति 4 . .. २० "-..."..." "संप परमानं च गृबो पशुरादिमिः"। [को० पासू०४ सो०० বি এন ব্রিা লান্ত, যথাপযিকা-নামাঙ্কিায়ন পপি पादरपि प्रहसमा प्रमासाधन-तविर्यपयोरणनित सयमेष प्रतिपारिता मात्र मात्र दोर कासपिटाप्राहकायेन इन्द्रियामत्या प्रतिपापिनुमामामिरमिन त हमापारम्भः । अवमानकारतरावर विशेष्ये गुरोरसिमियागापरतनिरोगी २५न्द्रियेऽपि पूर्पकालरांनादायभने, अन्यथा यचडीraat 'पूरए पनामिलिसिया. सारन मिशान नारायन, नागमविसरणा विशध्ये किमायो वाहण पणि. दुतिय मापय न्यायमयीनियन, मनु धर्मादः किमतीप्रिपामारनम, इस मावान आहोमियत पात्र मा पक्षा, अग्rिate এ ewযুগলমান যথিনশ্বাস, মাঘিমারো পাঞ্জাগিৱমাঃশি কালি १.मानस मागअपायाममारप्रतिमागा, तागतम्। गापामा इल-गुमान पद मामा नiafग्निपाय र पत्रानयागादिना भरणाम लिक प्रगतिमिलमाRAA Hirineपाम:!जया, धादियादिशोगाला मुटम्टा पारिदिपारम्पतिमा REME | FA, गायो यदि मूसान परामपंथा मा uiforme ARदिरापासवारि कनिन् नारिको हो! ফেলানা ভাই দলমগণ ধামখাসা पुनम, मनुष्य शर्ममारिवारमा पशु: मुमादिमागमा • भार..... प्रा. wtar.ki.rahmir isk. KETE..., "..... Trimur.kirtu.44 Frike. x.rrrr.e.antra ....... * ফল মানুষ টি গাইবি -কামালিশ গুলি পুশীল লাশ দ্বারা মাকে গিলানি ও খoি, গোলাগা। চা খাই। “পে নিশ্চিমবিবিখানাপিনাকেই দায় দাবি। খুব ময় গুগল গাণিবিদ্বী-বাংৗ মুখরি মীম। হাে ও মধ্য এসি ই, ঈদ মােলায়াখা কাগজ লেংকমুখী ভ্রাতা যুগমীপবাসি, ববি কেয়াভেনিয়া, গাব না। অনাদিমপাগলাখো পায়নি মালাযিল বাব-মান্নাহাঙ্গিমালারিরি গ এগিয়ে এগিরি - লন। ভবন “বিনিময়াঃ ৰা" [ী অাখ ৭, সবো? ভিৰিখনি নামাথমিমাইন ধুলিসামাল নিছেন, বিগ বা স্বাদ মিশেখা। 'কি সময়েষাখল পথাগােটি মাথায় কি যমান। নবাব-মাহি য ব - মাখামনে মা নীলা হো पापन् 'सिदा प्रतिपायो महत्व परस्पोरि धूमयोरिप' इति पन्तम्, तदारयुगामा गतोऽ. ঘন-ঘকৃষি আমি-ধূমীঃ প্রাধ্যায়েমনখলায় খোলাল খামাণ। { ঘড়িই ধূমী গলমাই গল বেলায় মাধ্যমিকাথায় কিন্তু “ব্যার্থ মূল্পী মুনমুঃ ই অমানুষি।” { স আলী বিনামগষয় কিন্তু বিহি সমানুথশাখা মাখা। সুবহানষ মা ময়য়াখানম, হত্ব থাকাকালিমবি গবে ঘন, সাপ্লযিভাষাযথমথমাণাষি। কবির মধ্যে মাথা মু, কাশি এগুগলমা। আয়ন যা কাদামিমনাম দি মাইক সুখ দুখুমা দ্বিনাথ সহ লাস্কা খাবো। শাড়ি-গুন্য। মামালিশান যামু-ঘাষণপ্রিয়া মাহি নগ্ন দি হ্যা, যা যা ত্রৈ, ষষ্টী বা মই লাহে সবেধতা নিষেধ। মদ গায় মুখ ঘষে মন কাখ্যাপ্লিখানথেমানল ঝাষা দিবি নিয়ে। খাবি যদি সময় বন্ধ মাখম, রামায়ন, গদ্যোগেৰে বং নিয় বাবার যা হয় না, হয় কাকে নিয়নুষ। প্রশ্ন বাথরুম হলে এবং যথাযুকম। যথা, মনোমুখী সংখলা~- যথ বন্ধান প্রধান প্রণু জ্বা ৫ বছর যাবা বমি বা হল, য লেশিল্পে ফ্যাখমু। প ঘটি-বাঙাবিপিআর বনী মুবাশ্বনী কুমার মী, যা ধাপ গুণগুণামঃ। যুগানা মন্ত্রণমাবিয়ব কার্যাজেন্তু নিয়ন্ত্রি বাধামো খা। নাই ভিয়ান মলা মানচি আখি আইন, আই पत्येन, अाएपदेनुपम्येन पामत ! ताप IAL TRI, तो जम्परपात, "रादेय म অম্মদ } গ্যা, গণ গ গগগাবানুগ বল ঘ ফাবি- স্বস্টন বিদ্যা। নাসবৈশপ, শিশবএল না, সহযেইহম, সামহিষাস-মিণি। শিক্ষা প্রাণাের্থ নারী ববি। গ্নিল গুথ , পপিআপ, পাখি গ ানি পাাশি, গল বিনিময় কম্মি মালি প্রবাসী। এ ব্যাখা খুলা থামীলখি ফাই গা মাঘমামী: খ খান শাহিম। গায়ে মাহী যান্ধিান এই খাম আমি যখন বানুগগিয়া ফিলিথিয়াম ৪০ গয়া আন যিনি! দ খা খানিক অন্যথায় খুন হয় + ১ = {।}ধু• ১ • ১১। ৭০ ৭। * খানুপুতিন। । শ चप्रमाणे मा., प. ६ कार्य पनि । पारपरसभापोभा। तदेयं भार ૧૮ प्रथमे फाण्डे- पारंपर्यणाग्निजन्य धूमस्य । किंच, यथा देश-कालादिकमन्तरेण धूमशानुगतेस्नापेक्षा प्रायने तथाऽग्निमन्तरेणापि धूमस्यानुत्पत्तिदर्शनात् तदपेक्षा केन वार्यते? तदपेक्षा य तमाशा पण चादृश्यमावे एव धूमस्य भावात् तजन्यत्वमिष्यते तथा सर्पदामिभारे पय धूमय माना तजन्यता किं नेप्यते ? यावतां च सन्निधाने भायो दृश्यने तावतां हेतुत्वं सर्वेषामित्वयादिमाम ५मीजन्यत्या धूमम्य कुतोऽग्निश्यमिनार ? न चायं प्रकारोऽमवंशव-यत्ययो संभवति, अमर्यभन्यधर्मानुविधानस्य पवने आगा। तथाहि-यदि मधमन्यादन्यन् पर्युदामवृत्त्या क्रिश्चिचममन्नत्यमुच्यते तदा तसर्मानुरिधानाल नाम तजन्यता पचनस्य । नहि किञ्चिन्मयनरतमभायान पचनश नाममाय उपाय हि-किधिमन्य प्राष्टम अत्यल्पनिशानेषु कम्यादि नव नेषु वचनप्रधुनेकर उपनापने र १० प्रसज्यप्रनिषेधवृत्य सवैभन्याभायोऽमय तकार्य न नहालानरहिने मुशरे तमोर लम्मा स्था, न च कदाचनापि तन् नत्रोपलभ्यते । भानातिशययत्सु च सकाशानन्याग्याम्पु गगनभ्यातिशयभायो दृश्यते इति मानकर धनुरिधानदर्शनात् नकार्यता त-मम्येयाश्यातिगामीगतमुमिगधाविभापिनो-पयोग प्रत्यशाऽनुग्लम्मान व्ययस्था यने । अनागार्माविमानमेष कार्यकानागमति १५मितम् म पुनरम्यय-यतिगापिधानमारम । नाम मार्ग मोकुतभुत का माना । ८८ पनापन EिFarm 1 साप माना जगा जमुरुमेय तन माहित गा fontT IT गिरिशानगिरोगा Liv lavaniranjinik -real- । अपनIRTrm Hit It Luna । Hallarynital 4 नाना. HITHAT Hin ... नामगिmit rrian RTRATHI Imium तपासण/काप beldudalakofter Lobo dokonur In Port bort lie awrane naam II गुना नाम AMIT AT T-Time TRY isten kluruk kuar lu klikt -luukk 2 to impulitika dakikatika kipihiti bankabla kiya httrakankshakikin naukaram.ma.net vjktankaine hirintinenthuanataitreetinchantet Uninthinkuntysternimiriamine NRSHA - يمة القسم المطتم عمل هه یه : هغسط : به فلذالعملیاردها دليل مبللسداوندا با مقدملية nyatarankariganatantrintinepati Ratnapaaiintinutanniaktartictionarinacter nayifairsankashtaministratikaakistartime nitikdamaniankan tandartista McCENuri Lattimes kaks kehati beatakwish kunglig ka gisting lalaki atramihan na ht, alatta bajaj a halakt SELE ALIKU Aigtig ha i à 2 lectures de twist tuhandete das y medio ambiente e demaisha yetu yeyote ile organe per te -torr.....rat. . ... FREE র্যয়। যবিস্কলিং। দারিসন ঘূম ঘী শাবঃ নাগােবি মন নি বিমান শিমুল। সথ মানাল পর্যন্ত নির্মল বা সনা বিমমি থাই দ খল বিৰ বৰ, না নামনুনাশবা? মহমদল খ মালয়িাযথ নিন শায়খ ম না, বলনামায়াবি না সে ৰ্থি মৰি যামু, ফা ব্যাধনাগাের মানুষলি, সিন্ধাৰ শাৰ সিমানাঘা সস এ মামাব গ পথীঃ মাহালনাবাদ, সনুমানায় মন ন্যাপ, অনুমান যা লুনি দিশা সাল। বসা বা ন মায়ােত অাৰ , নাসা। লালমির ব্য, ন্যায় সত্য, কাঘাষ জানে গত নিশাখো ন মিম। কি নৱী: খালেমা: মালি, মিথ্যা ঘৰৱশ rিশমা। সাহালি এক লাখ পাল কাহ ম শ য় য়যামসং যখ সুশ নালি বা ধন্যদিন মল্লিশ, সী বা ব্যাখখামার মালি। মার্বি গলামিরা প্রায় সম্বী বা মা বা, দিঘি। নাকি মিগ, নবী কার্যালস্যান্নাল। না বলা বাবামুসহাহহালনাগালেন সন্তান, ভাসালো গো কা। ল মিন্বার্থ হয়ে গিয়াছে এই গণ তালমিমি যা গুন, ঘামান্য মাখামাখি গাঁথম গাগা মা শার্থনৈ লাময়লা শশানোমান বাপু। মি মামধামােবাশ্বায়সা ধার্যখালি মগ মাথাগার শিম খালগাথা ই গ গাঘিমালঘু মুসিয়াসমীন পৰি মশেম, যিনিমাবিয়াল নিশাতেথিলাগামলিমায় কান লাবি না। যিয়ালাইকারিমিদি এ সুম, নামে - মাখলাৰি নিমাগনিশিয়ান মিথ্যা মাগণমাশল খাবার মায়াখমান খায় । ৬ গ্রাম এলাকা শিক্ষা মুমিনেনুমাননিযুগ, ঘ বিরুমাশয়, কাপ। পো বা লা কম নল শিথিয়াশা সয়াস, শ এপিলােমানের লেলিনবাদামেল , শিখমনুনাগারখনাপিনাকাৰিামায়ণয়শখবহণ সে লেয়াশ যে মহাস থ (শ সনেমালিশল। সে গালিবান যখনকাল না. খ শাখা । বোমায় মাখনুমালখুশি মতো। কিন্তু হয় , দাখিবলৈ না। এ খাম ধনিয়া মানুষ কি হল? এ দ্বাঘাষণা খাথি, খাশে খালি গা মা নিসা। নবজয় খাবার খান, আধ খাবেগ, লা ম * ১; নু” ন স * } ৰ এখি যে, না , কালেমা, অমাসামোয়ায় শুনলাম গণ এই নয়। এ জন্য * গণ যুব সং, কামাখা গাল মাল বলে। । সে তবে বাশ শীল, গণ , , ে গ প না । খাল - प्रथम पाण्डे दिजनितं यद्यतीन्द्रियविषयम्' इत्याधयादि, तदपि प्रतिक्षितम्, अनन्द्रियार्थप्राहकवम्यान्यनिक विषयमादकत्यस्य च प्राक् प्रतिपादनान व्यवहारोच्छेदाभारम्य च दर्शिनोत् । अतीन्द्रियेऽपि कालादी विशेषणभृते चक्षुगदेः प्रवृत्तिप्रतिपादनाय इतरेतराश्रयन्यदोषम्यायनकाशः पूर्वपति- पादित । सदमानजनितमानपत्रं तु नरेनराश्रयदोपप्रसङ्गापदिनमाययुकम्, कारपरो कर ५संमयाम्। अन्यमगणीतागमनमवत्वेन शाम्य कथमितरतगयन्त्रम् ? तदागमप्रणेनुरप्यन्य- सर्पक्षप्रणीतागमपूर्वकन्येऽनयस्था स्थान् सा चेप्यत एव; अनादिन्यादागम-समपरमगया: यदप्ययादि 'शब्दजनितं मानमस्पष्टामा, ताजानवतः कथं सकलजन्यम्' इति, तथ्यमङ्गलम्। न शब्दानितेन मानेनाभ्यासानासादिनशयन सकलमोऽभ्युपगम्यते येनाय दोर स्यात्-किन्न मानिनननमल्ययना । अन एवं प्रेरणाजनितं धानममतादीनाम- .' इति यदुक्तम् , तदपि निरस्तम् अयाम- यधर्मादिपदार्थसंबन्धानवगमाद् लिङ्गम्यानवगतसाध्यसबन्धस यस धादिमायानुमाएका । 'लिङ्गजनिनवेऽपि तलानसातीन्द्रि- संभवात्' इत्यादि यत्, तदप्यसङ्गतम् ; अवगनधर्मातीन्द्रियमाध्यसंबन्धस्य हेतोः प्रमिशात् । तथाहि स्वविषयग्रहणक्षमस्य मानस्य तदनाहात्य विशिष्टव्यसंबन्धपूर्वक पीनहत्पूरपुरुषानम्वर व मुमिद्धमिलित सकटनन्यान्युपग- मेऽस्मदादीनामपि तन् स्यात्, भावनावादात् नर्देशय तु कामादायनुनाशमान शमशवम् तन्वानस्य तद्वद् उपष्टुनन्यमानेः' इति, नाप्यचारू, यतो भावनालामा वैशमनुमवतीत्यनावमा- मानयाद न सालानधर्माणां माध्यमिण्यामचनं युक्तम् तथाऽभ्युपगमे सकता 'रजो-नीहाराद्यावरणापाये वृक्षादिवशनवद् रागाद्याधरणाभाव मयमान tants, च रागादीनामाधारकायं सिद्धम्' इत्यादि, तदप्यमगनम कुबाटीनामप्यत्यय-व्यतिरेकाम्यामाधार- फन्यासिद्धः। तथादि-सत्यम्यसपनिमामस्थाहणे न यादीनामावास्यम्, निश्छिद्राराम २५ यस्थिनेनापि भाव्यतीन्द्रियाद्यर्थम्पानरायणाभा प्रमाणानामवादिन उपलभा दुयादीनां स्यायरमन्ये तदर्शनमर्मभन्येय स्यान्, तथाप्रतिमामेनाइट्राय:पि कुख्याठीना नायारकत्वम् । या प्रातिमंशानं जामदयम्यायां शाद-लिशानन्यापागमाय:पि भ्यो माता में आगन्ना' इत्याचार मुलायमानमुपलभ्यने तर कुस्मदीनां कथमायारकत्वम' कय या विज्ञान नातीन्द्रियविशेषणमूग- श्वलनकालाययभामवयम अनिन्दियनम् च नानम्ग या गमादिपराधमाशात्काग्न्यिं न मियम पैन मशानम्मानभाये यासाभान्द्रियादिमकलपदार्थमाशावरण स्पष्टय य न शान् साति मेयत: । अपय मादपदार्यप्रणयमायमान इन्द्रियाटिजन्यमहत पय प्रमिनियागादिया परस्पनियमोसमीय, प्रानिमादी सदाय नमामा । गालमहान पानान्द्रियमिति कय "येति मानिसमा cer" 'इम्यादि तथा “यत्रात्यनिदायो " [ोपा, मो. ११४]यादि ria अमन म शानबागेरजेवहानवमाया कभिन् प्रतिनियतो कपादिका सा १५ममनिलमदावदितम् । अप गगाडीनामापायपि कयमानि सपा, गं पायामानमविद डान पदनादालापानिय प्रावस्याम् मेरा नाम्यामानानि मार्यम्। यतो यदि गगातीला मारवादिनमात्र, निन्यायमाम्पियं पागं मान, मानो या परिमानं १.५.4.10...4.11.24.11.4.4.1 ............ ..."."पृ.१५.१५.......... .................-१५॥ 111.111." -दिमागे विमादीनामापारल-for- १४....KRITA-मारनाम।

सर्यवाद। नित्यत्वं पा संभाव्येत, तद्विपक्षम्य या स्वरुपतोऽमानं अनभ्यासघ स्यात् संदेनर म्यादपि, यावता रागादीनां शानापरणहेतुन्नावरणस्वरूपत्वं सिद्धम् निघते निस्पत्यम्, तत्समाये सर्पसमाम्य प्रतिपादयिष्यमाणप्रमाणनिधितस्याभाषममहात् । नाप्यास्मिकत्यम्, अत एप । न चैपामुरंपादको हेतु यगतः, मिथ्याज्ञानसतजनकन्वेन सिखस्यात् । न च तम्यापि नित्यत्वम्, अन्यथाऽविक सकारणम्य मिथ्यानानस्य भाषे प्रबन्धप्रवृत्तरागादिदोपसभावात् तदातस्येन सर्पपिदिानस्वाभायः ५ धादिति स पय दोषः । आसिफत्वेऽपि मियाानस्य हेतुव्यतिरेणापि प्रवृत्तेस्तत्कार्यभूतरा. गादीनामपि प्रवृत्तिरिति पुनरपि सर्पशशानाभायः अहेनुकस्य च मिष्यामानस्य देश-काल-पुष- पप्रतिनियमाभायोऽपि स्यादिति म चेतनाऽचेतनविभागः । म च सप्रतिपक्षभूतस्योपायस्योप- रिक्षानम्, मियात्यविपक्षवेन सम्यगमानस निश्चितत्वात् । तदुल्क सिध्यासनस्यात्यन्तिकः भयः सयाहि-यदुत्करतारतम्यान यस्सापचयतारतम्यं तस्य विपक्षमावस्यागमने भवत्यात्य-१० स्तिका क्षयः, पयोष्णस्पर्शम्य तथाभूतस्य प्रकरंगमने शीनम्पर्णस्य तथायिधस्यैय, सम्यादानोप- घयतारतम्यानुविधायीच मिश्यामानापचयनरतमादिमाय इति तदुत्करेंऽस्याऽऽस्यन्तिकमयसमा पार तत्काभूतरागापनुत्पत्तरापरणामायः सिद्धः । गगादिविपक्षमतवैराग्याभ्यालादू या रागा- दीनां निर्मूलतः सय रति कयं नायरणाभायः? न घलानो-दकतापादियदस्यस्यमानस्यापि सम्पशान-वैराग्यारेन परमकर्षमाप्तिरिति १५ इतस्तद्विषये मिथ्याशानाभाया रागादेरात्यन्तिकोऽनुत्पत्तिलक्षणः क्षयलक्षणो पाऽभाव इति पई युक्तम्, यतो लानं हि पूर्वप्रयासार्य यदि व्ययस्थितमेष स्थाव सदोत्तरप्रया- सापरापरलानातिशयोपत्ती व्यापारात् भघेतानण्यापनपेक्षितपूर्णतिसपसदायप्रयक्षान्तरमा प्रकाशित न घेयम्, अपरापरप्रयतस्य पूर्वपूतिरायोत्पादने एपोपसीनशक्तिवात् । अपनत् सात-पदि तत्रापि पूर्वप्रथमोत्पादितोऽतिशयो न व्यवस्थितः सात, सस्किमिति प्रथममेष २० पापला पिर्तव्यं तापम सापति। तानाम्यासापेक्षणान् पूर्वप्रयदाहिनातिशयमभाषेऽपि न एनप्रकर्षमातिरिति पपा तस्य व्यस्थितोत्कर्षता तथा जानस्यापि भविष्यति, ना पता सेप्मादिना प्राय भारीरस्य साम्पाद, पायाला पितव्यं न ताय प्यायामानपनीनमाऽनासा. दितण्टुभाषा कायो लक्ष्यति। अभ्यासासादित समक्षय-पटुभाषस्तु पायता पितष्यं तापा यतीस्वभ्यामस्नर समयोजनः । ज्ञानस तु पोऽभ्यासममासादितोऽतिशयः सोऽतिशयान्तरोपनी .:::: F.:: :.-:-.. " :-.:................... .:.": ": "" माभ्यासासराशो येन ध्यपस्थितोपर्पता सम्यापि न स्वादिति पर युताम्, तत्र पूधाम्यामजनि- तसवारस्योगरत्रानुवृत्त। अन्यथा शाखपरापनादिषयर्यप्रसान् । नापि यदुपयतारतम्या- सुबिभायी पदपचयनरतममापस्तस्य तद्विपक्षणकगमनासयन्तिका क्षयः पत्र प्रयोगमा लभिचार उमापयितुं सपा किल-निम्यापीपंधोपयोगात् मार्पतारतम्यानुमपयतस्तरतम भाषापपीयमानस्थापि सेप्मणो मान्तिकशप रति-पतला निम्याचाफ्धोपयोगसंष मोक-१५ निद्या आशपिjापा, तदुपयोगेऽपि सेप्मपुटिपारपानामपि तदाऽऽसेएनात्अन्यधारपोर. योगापारीप पिनाशा स्यात् । चिविरमाशाल पातुदोषसाम्पापादनाभिमगार प्रसस्त. प्रतिपारितापयोपयोगसोसिधातुरोपमापविधाने एप पापान पुनलय निम्लने, अण दोगातरयाताये भरणापारिति म मा नयाभूतनानशानिशा देतुः । म प सम्पमा सामीमायेऽपि पुनर्मिप्पाानस्यापि भयो भविष्यति तदाब ए सायरामानम्मेति पर युकम्,५० पतो मिटाने रागादी या दोपरांना, तद्विपोप सम्यगधार पराम्पदाणे गुलसनाद तर देता का, ५., . पारनुका साप - मति १०. ५-धोपचारपो-., T... एयः . । सामीमां। .

६२ पुनरभ्याममागिर्मगार प्रापि मिरमान-गामायने पर गंगान- देन तयोः प्रकाय दोन मर गये या गुणानं येन पुनम्नमामामारेर मिप्यान-गगादेगपगिभानामधानाजण मानय गर्यविन्धिनः कथं प्रत्यनक CANTT न पुनः पादरनिनिमि "-":.........--:::: ;:"::प्युगची निनिनम् अन्य प्रवृती, यथा गोराळा गमनं गुप, jizzinet-नम्-अन्यथा यदि यरेक प्युत्पत्ति निमितं मदेय प्रगनायपि गला गन्नाथामेर गरि गोगप्रनिःभ्यान न शिवायाम् - महिघ्यावीच गमनरिणामयति गोरादः प्रवर्ग-थावापि प्रवृत्तिनिनिममदापात् प्राम- प्यपदेशः संभयस्येय । यहा यदेय प्युपमिनिमिर्म तवेग प्रत्तायन्यस्तु तयापि तच्छदपाध्यता- १०यालय मामायः। तथादि-अभुन'मयंपदार्यान् मानारमना व्यामोतीनि गुणनिराममायणा अक्षा आरमा, तमाधितम् उपाययेन तं नि गमिति प्रत्यक्षमिनि व्युपत्तेः । अग्युपगमदारे चाम्यासपशात् प्रामप्रकाशानेन म प्रतिपादिनम् । न स्वनामयमयुगमा हिल मानापावारकपातिकर्मयनुश्यक्षयोद्नारोशेयस्यनिन्द्रियशष्ट लिगसाक्षात्कारिमानवतः म- सत्यमभ्युपगम्यते । यथोक्तम् 'यद्यतीतानागतयत्तमानाशेषपदार्थसाक्षाकारमानेन सर्वनम्नदा अमेणातीता- नागतपदार्थवेदने पदार्णनामानन्सान शानपरिसमातिः' इति, तदयुतम् । तथाऽनम्युपगमा शास्त्रार्थे प्रामेणानुभूतेऽप्यस्यन्ताभ्यासान क्रमेण संवेदनमनुभूयते तदापि स्यात् । यदष्य- म्यधायि 'अथ युगपन्सर्पपदार्थवेदकं तमानमयुपगम्यते तदा परस्परविरुद्धानां शीतोणा- दीनामेकमाने प्रतिमासासंभयात समोपासादि, तदप्ययुक्तम्। यतः परस्परविरुद्धानां किम- २० कदाऽसंभवः, किंवा संभवेऽप्येकशाने प्रतिमासनं मयता प्रतिपादयितुममितम् ! तर ययात्र- पक्षः स न यता जलाउनलादीनां छायाऽनपादीनां चकदा विधानामपि संमवात् । अर्थक, साल. विरदानामा स्यात्' इत्याद्या नराम्, 1-30... २५ संवेदनात् । यच्चोकम् 'यदि युगपत्सर्वपदाग्राहक तासानं तदेकक्षण पय सयपदाय": द्वितीयादिक्षणे किञ्चिरज्ञ एव स स्यात्' इत्यादि, तदप्यत्यन्तासंबद्धम्, यतो यदि द्वितीय पदार्थानाम् तज्ज्ञानस्य चाभावः स्यात् तदा स्यादप्येतत्, न चैनत्संभवति, तथाऽभ्युपगमे द्वितीयक्षणे सर्वपदार्थाभावात् सफल संसारोच्छेदः स्यात् । भ्यर्धायि 'अनाथनन्तपदार्थसंवेदने तत्सवेर नखापरिसमाति इत्यादि, तदप्ययुक्तम् । अत्यन्ताभ्यनशास्त्रार्थशानव युगपदनाधनन्तार्थमा ३० गस्तमानस्यापि परिसमातिसमवात्अन्यथा भूत-भविष्यत्-सूक्ष्मादिपदार्थप्राहिणा प्रेरणाजनि तज्ञानस्यापि कथं परिसमाप्तिः? तत्राप्यपरिसमाप्त्यभ्युपगमे चोदना भूतं भवन्तं भविष्यला इत्यादिवचनस नैरर्थक्यं स्यादिति। यदपि परस्यरागादिसंवेदने सरागा स्यात्' इत्यादि तदप्यसङ्गतम्। नहि परस्थरागादिसंवेदनाद् रागादिमान् भवति, अन्यथा श्रोत्रियद्विवस्थापि स्वमानेन मद्यपानादिसंघेदनाद मद्यपानदोषः स्यात् । अथाप्यरसनेन्द्रिय वानमिति ३५नायं दोषस्तहिं सर्वमानमपि नेन्द्रियजमिति कथमचिरसास्वाददोपस्तत्रासज्येत? रागादिसंवेदनाद 'एगी' इति लोके व्यवहारः किनबहनाकामनाथमिटीपस्वसंविदितस्याशि एश्ययहारकारिणः स्वात्मस्वमायस्योत्पत्ते, न चासौ तति कथं स रागादिमान पदपि 'अप नियुक्तरवेन सर्वपदावेदनम्' इत्यादि, तदप्यचाय यथा उपलब्धिलक्षणमा सनिहितदेशादार नुपलब्धः अपरमत्र नालि' इति इदानींतनानामियत्तानिश्चयस्तथा सशसापि स्वशक्तिपरि ४० दास्। अन्यथा पदादीनामपि कचित् प्रदेशेऽमापनिययेऽपरमकारासंमयात् सकलन्यवहारविलोप ततोऽत्रा-बा..,.,मा ३ पृ. ५२ . पृ. ५९: पं.स. १३० ५ पृ.५१५.1 पृ.५३ १.१ "-दनाचतार्थ-म ••४१०४२ १.१. लापत्यं स्व-का-। "स्वारमा स्यमा -३.५.३ ४०.५३६.

मर्पया। ] गम् । 'पापापयोनिप्रधानपदार्थजातम्' यदि अपि अयुनम्, सफरूपदार्थमत्यप्रतिपादन मात् । अत एप- "को ये कपमा म्याद अमति प्रतिपरि । माप दाहो न समिः कचिद रटो न दाहा" हमपत्र सम् "कि सारयात, अध किधितरपार इति, मोभयथापि हेतुः । पदि सावत् सर्पसत्यारिति देत्यर्थः परिकल्प्यते सदा प्रतिक्षाकदेशो देतुरतिम एका कर्थ हि तदेय साध्यम तऐप हेतुः। अथ किधिसत्यादिति हेतुला पिरनाम्यान्। कहि किनिमय सास्वेन विराई सर्पवरष साधयम् । अघ रयमा हेतुम्तदानशान्तिकः, शायमात्रय किश्चिमरयेनाप्यनिरोधात् इति, तदपि निरस्तम्, सामान्येन 'सर्पगरयात् स्पस्स हेतुत्या विशेषेण तज्ञापस साम्पत्यार सामान्य-विशेषयोध मेदय कपचित प्रतिपादयिष्यमाणत्या सामान्येन सर्यास्यस्य चानुमान.१० पपदारिमति साधिनस्यात् । एतेन 'सूरमाऽन्तरिरारार्धाः कचित् प्रत्यक्षाः प्रमेयरवात्' स्त्र प्रयोगे प्रमेपत्यतो दूपणापन्यतं पूर्षपक्षयादिना सदाप निरस्तम्, मर्षसूक्ष्माऽन्तरित. पदार्थानां प्यामिप्रसाधनानुमानप्रमाणेन पा सकन सामान्यतः प्रमेयस्यस्य प्रजापितापात् । पंप 'प्रधानपदार्पपरिक्षानं न सफलपदार्थज्ञानमन्तरेण संभाति' इति, तत् सर्पसयचनामृ. तस्यास्वादसंभयो भपतोऽपि वपश्चित् संपन इति लश्यते । तथाहि तवचः-- "जे एगं जाणा" [आचा०प्र० धु० अाय० ३, २०४ सू० १२२] त्यादि । सन्मतानुसारिमिः पूर्वाचार्यरप्यपमयों न्यगादि- "पंको मायस्लत्वतो येन यः सय भाषाः सर्वधा न हयाः । सं भापाः सर्पपा येन हटाएको भाषस्तरवतस्तेन ए" [ अस्थायमर्ष:- सविधा पाधिदेकोऽपि पदार्थस्तत्यतो द्रष्टुं शपया, एकस्यापि पदार्थस्यानुगत-२० मावृत्तधर्मद्वारेण साक्षात् पारंपर्येण पा सर्वपदार्यसंपन्धिस्वभावत्यात्। तत्स्वभावाऽवेदने च तस्याऽषेदनमेय परमार्थतः ततस्तज्ज्ञानं स्वप्रतिमासमेय घेत्तीति नाथों रिदितः स्यात्, केपलं तामिमानमात्रमेव लोकम्य । अप संपग्धिस्वभाधना पदार्थस्य स्वरूपमेव न भवति, यत् केपलं प्रत्यक्षमतीनं सन्निहितमा स एव पस्तुस्वमाया, संघन्धिता तु तत्र परिपारिपतघ पदार्यान्तरण नसंमयतया । तथा चोदाम्- "निष्पसरपराधीनमपि कार्य स्वहेतुना। संपध्यते फल्पनया, किमकार्य कवचन !"[ तदेवदयुचम्। पयं हि परिकल्प्यमाने स्वरूपमात्रसंवेदनादू अद्वैतमेव प्राप्तम्, ततः सर्षपदार्थाभावे प्याराभाषः। अप व्यपहारोच्छेदभयात् पदार्घसद्भायोऽभ्युपगम्यते तहि सर्वपदार्थसंबन्धि- ताऽपि साक्षात् पारंपर्यण प पदार्थस्वभाषोऽभ्युपगन्तब्या, अन्यथा साक्षात् पारपर्येणे याऽन्यप-३० दार्थजन्यसनकतालक्षणसंपन्धिताऽनम्युपगमे सध्यावृत्पनुगतिसंपन्धिताइनभ्युपगमे च पदास्य- रूपाप्यमायः । तरपदार्पपरिहाने च तद्विशेषणभूना सत्संबन्धिताऽपि शतिव, अन्यथा तसा तस्परिमानमेष न स्यात्। सत्परिझाने च सफलपदार्थपरिझानमनदादीनामनुमानतः, सशस्य प साक्षात् तज्ज्ञानेन सकलपदार्थहानम् । लोकस्तु प्रत्यक्षेण कश्चित् कस्यचित् प्रतिपत्ता । तथाहि- धूमसाप्यग्निजन्यतया प्रतिपत्ती यापादिव्यापृतधूमस्यरूपप्रतिपत्तिः, अन्यथा व्यवहाराभाषः ।३५ तथा नीलादिप्रतिमासस्य पायासंबन्धितयाऽमतिपती पाधाप्रतिपत्तिरेष स्यात् । तस्मात् . संबन्धितयेय पदार्थस्वरूपमतिपत्तिः, तथ संयन्धित्वं ममेयमनुमानेन प्रतीयतेऽभ्यासदशायामल. दादिमिर पत्र क्षयोपशमलक्षणोऽभ्यासस्तथ तस्य प्रत्यक्षतोऽपि प्रतिपत्तिरिति कपं न प्रधानभूत. पदावेदने सकलपदार्थवेदनम् एकवेदनेऽपि सफलयेदनस्य प्रतिपादितत्वात्। १ पृ. ५२६.101२ कम् "सत्यात् सर्पस रति किंसर्प-मा.।३ पृ.॥५.१८४-यत्वस्य ६-मा५.५६५.३९ पृ. ५१६.101 • नयास प्रान्तमागे तु एवमुपलभ्यते "ए मा रावभावसभाषः स भावा एकमावणभावाः । एको भावतस्थलो देन स्टः म भावासस्वतस्ठेन इति- लि.पु.१) सनशानं कॉ. गु.। -चाड-मा। १५-स्य बाप्पवासा-मो.। प्रामाण्यपाशा-या.।-समाप्याद्यान्मी" पत्र तुक्ष-मो• IRH. पं.

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TERE परेकी का 'घिनपुरले निमारने नपा पारेर घिन मांगबेर घोरे दहा रोपिरोपः पुट से असले दाग दिशा बदामन रिसा! दरतमानसरदार टिइने निशिनर मांगेपलेले हेट दानव-कोररपचन-1. परररररा सभनी सदि नामापनिजे। सतन. वा मरिन्मादपटे माट- "मुनादेश सवेर- इन् नरहरन्नुमन्ट इन्टर इन्टरविन्दरिन्दर-रन्दै २५ उसकन्दर शान्देर रेसर- मानविन रडता दरल्य T सदर सदन हन्दन्दनुस् निद्रवमाटर डाक कलादान पर पुकार Rew मामालमत्तानमा प्रथमे काटे समासामीप्रमागत्ययं ग्यात् । भगानिकलगामनीमयं प्रत्यक्षं शिकलमामीप्रमयान् सरमार गिलक्षणमिनि गाय दोषा, गदापि ममानम् । गादि-सम्यगजातनश्यांदू ययनात् या गट-गुटणादियिष विरायाविणानगुरपयो का सम्यगयपनयनोनयार मिलतणमेव ।' ययाय विशिष्टमामप्रीममयम प्रणक्षम्म ग चि मियार ति सभ्यापियादित्य याय ५गतमम्यगर्थयमोमपगापि गट-मुष्टयापिपिपयविमानम्गति गिदमशरिर्मयादित्यलक्षण विशे. पणं प्रपनहेतोः गाय लिहपूर्पकर विशेषणमसिसम्, गट-गुष्टमादीनाममादीन्द्रियाविशयन नतिरय. गाभिमत्तम्गाप्यर्थम्यागपक्षाविषयत्यान्न प्रतिपत्तिः प्रतिगणी पाडसादादीनामपि नलिह- पर्शगार पचन विशेषमन्तरेणापि प्रहो-गरागादिप्रतिपशिः म्यात् । न हि साम्ययातलि हानिय १० येऽस्यादिप्रतिपा पचविशेषापेक्षा र ग भपति चाम्मदादीनां ययनविशेषमन्तरेण कदा t पूर्वपत्यविशेषणासिसिरिति पर युनम् , उपदेशपरम्पराममयत्ये गट-मुष्ट्याविप्रतिपादकपचन. १५विशेषम्य पारमान-शामिप्राय-पचनाकाराल दोपः श्रोतुळ मन्दयुखिरय-विपर्यसदिय-गृहीतपि. गरणः प्रतिपुर दीयमानम्यानावा काले मूलतधिरोच्छेद एव सात् । तथाहि-इदानीमपि चिद ज्योतिशासादिकमशानदोषावन्यनोपविशन्त उपलम्पन्ने, अन्ये सम्यगयगढन्तोऽपि दुष्यामिमा यतया, अन्ये पचनदोपादव्यनामन्यथा घेति तथा थोतारोऽपि सचिन मदयुनिस्योरादुनमपि यधायनायधारयनित, अग्ये विपर्यस्नयुद्धयः सम्यगुपविष्टमप्यन्ययाध्यधारयन्ति, केचित् पुन: २० सम्यक्षरिक्षातमपि विस्मरन्तीत्येयमादिमिा कारण प्रतिपुर दीपमानम्यतायतं कालं यायदा. गमनमेय न म्गाधिरोनिछपरयेन, आगच्छति चा तमादन्तरातरा विछिमा सुश्माविपदार्थसा- क्षारकारिज्ञानयता फेनचिदभिव्यक इयतं कालं यायदागच्छनीयम्युपगमनीयमिति नानुपदेश पूर्वकरयाविशेषणासिद्धि मापन्यय-व्यतिरेकाम्यां गए-मुवादिकं साया तविषयययनविशेषप्रयन पस्यचित् २५संभपति येनानग्यय-प्यतिरेकपूर्पकरय विशेषणासिद्धिः स्यात्, यतो नान्यय-व्यतिरेकाम्यां महो- परागी-शायाइयो भातुं शक्यन्ते, प्राममये शिलीनो या महो-परागादीनां दिक- प्रमाण-फल-कालादिपु नियमामायात् । द्रव्यशकिपरिमानाभ्युपगमेऽन्यय-व्यतिरेकाम्यां यायन्ति जगति प्रयाणि तान्येका मीलपित्यकम्य ररा-करकादिमेदेन, कपादिमात्रामेदेन, पाल-मध्य. माधवम्यामेदेन, मूल-पत्राधययय मेदेन प्रक्षेपो-शाराभ्यामेषोऽपि योगो युगमा प्रेणापि ग ३०मा पार्यते किमुतानेक इति कुरास्ताम्यामोषधशतपयगमा? तेन मानन्यय-व्यतिरेकपूर्पकरय- विशरणम्पासिमिमापि मए-गुष्टयादिविषयपचनविशेषस्यापीयपेयरया विशिष्टभागपूषारयस्या सिरसिया प्रस्तो देवा, अपौरपेयस्य पयगय पूर्वमेष निपियस्यात् । माप्यसाक्षात्कारिणानपूर्यकरयेऽपि प्रातपयनविशेषासंभवादमेकास्तिका, सविशेषणस्य देतो. विपक्ष सत्यस्य मतिपिरमात् । शत पप म पिस्ता, विपक्ष एय पत्तमानो यिग म पास्य पूयोंक.. মালৈষয়ৰয়ায় বিষয় বিশ্ব যুলিশ! য ম ই-বয়ানােবন तरपूर्पकरयसिदिरतो देतो, तत्र तस्य संपावात्। धादिपदार्थसाहारकारितानपूर्वकरयसिधिस्तु पषं स ग संपादामापात्। म, तत्रापि तस्य संयादात् । तथाहि-योतिशाबादेहो- परागादिक विशिष्टपर्ण-प्रमाण-दिग्यिमागादिविशिष्ट प्रतिपमान: प्रतिनियतामा प्रतिनियत. शिलिंगा प्राणिनां प्रतिनियनकाले प्रतिनियतकर्मफलमसूयकरयेम मतिपयले उपतर- "नक्षत्र-प्रदपजामदनिश लोककमपिसिसम् । प्रमति गुमायुगमधिलं प्रकारापत् पूजागतम्" [ तो योनिशार प्रदो-परागादिकमिपभोऽधायपि प्रमाणातरसंवारतोऽपगमपति सेन दो. पराणादिषयाविशेषमा धर्माधर्मसाक्षाकारितामा कापमपि सियमा रिसायो राहदाया- विरोसा-म... ] मारः। पात्कारमानपूर्वभावमपि सिसिमासादयति । नहि धर्माधर्मयोः सुख-दुरसकारणत्यसाक्षात्कार सहकारिकारमारोपपदार्घ-तदाधारभूतसमतमानिगमसातारकरपमन्तरेप संभवति, सर्वपदा. धानों परस्परप्रतिक्षामादेपदार्पतधर्मतिपत्तिधसकन्दरहार्यप्रतिपत्तिनान्तरीयका प्रावप्रतिपा. दिता । अतो मपति सालपदार्थसाक्षात्कारिकानपूर्पकत्वसिद्धिरतो तोचनविशेषस्या सिद्धी ष तत्प्रसेतुः सामान्तरितराननार्थताक्षात्कार्यतीन्दिपमानसम्मत्समन्वितस्य कर्यन सिधिः! नाम्येन पतस्यम्-सामोक्ति-तरावृत्तिवचनदोरनभिधानाद पूनना नामात्र साधनदोष, प्रतिमापचनेन प्रयोजनामावाद । अथ पिरनिर्देश प्रतिमापचनम्। ननु स एव किमर्थ! साधयमयोगादिप्रतिपसः। तपाहि-असति सापनि यो धवनाविशेषः स साक्षात्कारि. मानपूर्वक इत्युळे किमयं साधवान प्रयोग, उत वैषम्यंशानिति न भायेत, उमयं सकारात- पचनविशेषन्वेन साक्षात्कारमानापकत्वे साये साधम्र्यवान्, असाक्षाकारितानपूर्वकत्वेन १० पचनानिशेपत्वे साये बैधर्मावानिति । हेतु-विरूदाऽनकान्तिकपीतिश न सात् । प्रतिनापूर्वक नुप्रयोगेशदविशेष माक्षात्कारिधानपूर्वका विशेषत्वाद् इति हेतुमायः प्रतीयते, असाक्षा- कासिनपूर्णको पचनविशेषत्वाद् इति विरुद्धता चक्षुरादिकरजनितमानपूर्षको पचनविरोपवाद पिशान्तिकचम्। देतोश सप्पै न गम्पेत, सस सारापेक्षया अवस्विरसति प्रतिहानि- दशेऽपय समुदायोपचाराद साधो इति पक्षाति तत्र प्रवृत्तस पचनविशेषत्वस पक्षधर्म-१५ त्यम्, सापधर्मसामान्येन च समानोऽर्थः सपक्ष इति तब पतनानस सपशे सत्वन्, न सपक्षोऽ- सपा वसपोरसत्वं प्रतीयते । वदिदननालोचिताभिधानम्। तपाहि-पो पचनविशेषःस साक्षात्कारिकानपूर्वक रलेलावन्माभिधाय नैव कधिहाले सिन्न हेतोधर्मियुपसंहार करोति । तत्र यदि पवनविरोमाय नए-मुस्पादिविषयो यवनसंदर्म इति व्यात् तदर माधर्मपत्नयोग- प्रनीतिः, अपासाक्षात्कारिझानपूर्ववेत्यभिदायात् तदा वैधम्र्यरत इति संपन्यवचनपूर्वका २० पाथर्मत्वधरनात् भयोगदपावतिः विवामिनसायाधगतिमा हेतु-शिरमानकान्तिका अपि पक्षधर्मवक्षनमापन प्रतोदन्ते, यदान संपन्यवयनमपि फियते तदा कयामतीतिः! तपाहे- यो पवनपिरोपास साहात्वारिकानपूर्वक ल्युट हेनुरवगन्यते, विपीयमानेनानधनानस माने। दोपपनविशेषः सोऽसाक्षात्कारमानपूर्वक ल्युके विर, विषयमा यो पवनपिरोस बारादिजनितमानपूर्वक रति अनैकान्तिकामयसापः मनिवाए ।वया, प्रेमपमपि तोम्पनर एप, पतो भाप्तिदर्शनमाले मारमो धर्मः सापनपा अवगम्यते: पत्र नुमायो पो विदा. सीमूने धर्मियुरसंहिपते स समुदादरातमा पक्ष इति तसंतस मामधर्मस पक्षधर्म- स्थापतिः । माच हामि पनि पदायिते स सापधर्म सामान्येन समानोऽर्थः सपानीपत इति सपशे ममप्यास्यते । समयप बारशनिवृत्ती बाप्पनिवृत्तिशरतीयते सोऽसपल रति असपोऽप्यसत्वमपि निधीद रति नायः प्रतिज्ञापचनेन । तदाह धर्मशीतिः--"यदिनी-३० तिरपाम स्वाद सर्व गोमेव, सच पक्षधर्मसंपन्दपवनमात्रा प्रतिकारवनमन्तरपापिनी- तिरिति कस्तोपोगः"? [ पदापनिमायने नैरसमनुभदति तदा तदापुति- पचनस्य निगमनलाक्षस मुनरामनुरोग रति न प्रतिमापदनमपि महतसाधनम न्यूननादर ऐपल तस्मनिपापयास ससानापिनामनस तो सावधर्मियुपसंहारमामारेष मिनार अपराम्प समादेन पुनरमिधान निभहस्थानमिति भनिहादिपरन पाइयाद शियमाने सानिमापनि । पनपन नुलो समयप्रतिपादनाष दम्पनिति तारितः पातिपादने पुनपटतालसर रोष रति न सहनमिभानेऽपिम्पूर्व सापनापमानः सर्पदोपदे तत्थान साधनारद मला मासायसिस स्वसायाविनामूनपरेनुः सामिपुरादिदम्पो पारापासारिखमापा बाधा- ये गापासूधापपदेन सानदेवनार पमिति वारि-समनिसासमन्यनेन new सापाचन स्वसापास देतो साम्रपपिहार सूचिको समति: 11 ... २-पास रतिरादि।

प्रथमै काण्डे हेतोः स्वसाध्यव्याप्ति प्रसाघति । यत्र तु प्रस्तप्रयोगादी रटान्तधर्मिणोऽपि सत्वं तत्र रातध- ५मिण्यपि प्रवृतं तत् प्रमाण सोपसंहारेणेप तस्याप्रसाधकमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा रसान्तमिशि हेतोः स्वसाध्यय्याप्तायपि साध्यधर्मिणि तस्य तदच्याप्ती न ततस्तत्र तत्मतिपसिः सात, इष्टापा मिण्येय तेन तस्थ व्याप्तस्यात्। पहिव्यतिर्विद्यमानाया अपि साध्यधर्मिणि साध्यप्रतिपत्तायनुपयो गात् सादृश्यमात्रस्याकिञ्चित्करस्यात् । अन्यथा 'मुहं मुघर्णम्, सत्यात्, रजतयन्' इत्यत्रापि शुर- स्वप्रतिपत्तिः म्यान् । अथात्र पक्षस्य प्रत्यक्षयाधनम्, प्रत्यक्षयापितकर्मनिर्देशानन्तरमयुनन्येन देतो १०कालात्ययापदिष्टय या दोपा, तदयुनम् याचाऽपिनामाययोर्यिरोधात् । तथाहि सत्येय सायप्र. मिगि साध्ये हेतुघर्तत इति तस्य तदायिनाभायः, तरप्रतिपादिससाध्यधांभाषध प्रमाणतो पापा, साप्ययममायाऽमाययोधेकत्र धर्मिण्येकदा विरोध इति नेतहोपादम्य साधनम्म दुष्टयं किन्तु साध्यधर्मिणि साध्यधमांविनाभूतत्वेनाऽनिययः। स च पहिरोतिमाण हेतो सारपसापकाया: पगमेऽन्यत्रापि समान इति नानुमानात् कचिदपि सायनिधयः स्यात् । अतो रसातमिणि १५प्रवृनन प्रमाणेन प्रयाप्त्या हेतोः स्वसायाविनामायो निधयः । स च निधितायिनामायो पत्र घर्मियुपलभ्यते तत्र स्वसाध्यमविद्यमानप्रमाणान्तरणाधनं निधाययति, पचाय समा. वाददाणे साम्पे पचनविशेषलक्षणे साध्यमिणि विशेषत्वलक्षणो देतुः। प्रतियम्घासाप चाय देतो मागेर हटानमणि प्रमाणे प्रदर्शितमित्यभिप्रायघतय आचार्यणापि 'कुसमपयिसासणं' इनि सू 'क' (स्यनेन रानगवनं विदितम्, न च पश्ययनाएपोपः चितः । मनु मायामारतोय धोकप्रकारेण राधमासिनि पुगस्तविशेषसिमिःधादिया मर-गुष्टवादिविण्यययनविशेषमा अत्मयंगणातत्यं पयनविशेषरयात् नियति तणा पुमारिमपं. सरायमपि तत एप मेग्मतीति कुतलविशेषसिसि मय नष्ट-गुष्णादिनिवारको पयगति मोगरामन पनि प युकम्, युरशासनारियपि तम्योलम्मा इसारामा पूरि 'मिदरयाण' इति । अभापगिमाया-प्रशानुमानारिप्रमाणविषयान प्रतिपारिता : २५ मेन परियार सनिधिता नि सिमा 'अयंते' इति अयां इस्पाते, शासन प्रतिक्षाम् अस्मशशासनमेय म युद्धादिशामनम् । अतो पयनशियल नोणि हत्या नगमपि सपंडाय येन विपासायसिदिन गा! या पागमारतरे प्रमाण হান মুপিথালিসামখানা পিস্তল কি নােম থাকা শিখসি। भयदा "गिरायांनाम्' लिनेन तुर्गधन विहितमायाग-शिवा प्रमाणावरतो ३.सिना, पंचांग-मुरादया, वामनं प्रतिपादक यतो वापशा प्रथममनो निगा , पान मंपिना प्रयोगाः ति:-प्रयोग-प्रमाणावादियोमन-Tele. মালশিংমাদাসানুদখানা মান। ও গুনাবলি শাসকস সানগৰখন নি বাগি থামি লাশ মাংশনেমাখা বিশি, লাল যা যা ধার্যাপথল্লিশ মিডিয়া কােল্পনিংগালিগায়া- যায় শপথামিমাঘ মামাবাশেখা শাখা FATHIमानमानी प्रतिभाrgirit मारो प्रमाणात झामनुमोना है' - ६९ J -- परमवाद। "अन्यथाऽनुपपत्वं यत्र सर पेश किम् ! मान्यपाउनुपपनत्वं पत्र नत्र पेण किम् !"T इत्यादिपवनसंग प्रतिपादिन रति मम्बानेन आपापापिन रतनननं विहितमा प्रयोगे। 'इसमयपिशासनम् इति च अत्र घ्यायाने पुसादिशासनानामसर्यवमनीतत्वमतिपादकरदेन हास्यम् । तपाहि-कुत्सिताः मसापचापितकान्तस्वरुपार्यप्रतिपादकत्वेन, समपाः फपिलादि. ५ पीतसिद्धानास्तेराम् “सन्ति पञ्च महाभूया" (सू०प्र० ४० प्र० अ०म० उ०, गा०७] सादिवचनसंदर्भाविप विरोधाभावकत्वेन 'विशासनम् विस यतः अतो मार शानमेष जिनानां शासनमिति भपल्यतो विशेषणात् सर्प विशेषसिनिरिति स्थितमेतजिनशासन द्वादशा तत्वादेष लिई निषितमामाप्यनिति । [ईश्वरतरूपवादः] सरपरस्तबगनादिन-मा-चुनभुम् सर्पसनदीतं शासनम्, तन्मयीनत्वाप तत् मना- पति । त्वयुटम् 'राग-द्वेषादिकान न जितपन्त इति जिना' । सामान्ययोगिन प्वर- यतिरिका पलतसोगिनःन पुनः मासनादिमजगन्ना पितया च पनअति:- “हा-कर्म-दिपायरपराम्रा पुरविशेष योगदपा०१,२०२४] इति । अनेन म्मेष रागादिलक्षरमाधुरहिनन्वं सहजीनास प्रतिपादिनम्न पुनपिसमापनारम्यास-१५ पापारा शासियल पेन गादीन सभापारेष जितपन्तः' इति पयः सार्यकं तदिषयन्वेन साद । तपासायरप्युरम्- "मानमति यसऐप च जगत्पते । राय धर्मख सह लिई चतुष्पम् । इहालाह- "भवलिणाण' रति, भवन्ति नारक-तिरंग-नरामरपयनोरन्ते मालिनोऽ-२० स्मिमिति मयः संसार: तक्षेतुन्याद् गगाइयोऽध 'भादेनोपचापद् विधक्षिता में जिन- पन्न इति जिनाः। उपवाराभयमे चे प्रयोजनम्-न विस्तारले रागादी अधस्ते तन्कास संसारस्य अपरायो विधानुमिति प्रतिपादनम् विकारणभूतगणादिस चोपायः तिपादिनः मार तदुपायेन च विपारागादिजपदारेप सार्वभूतस्य पर अयः संमति मान्ययेति । र मान्यतिरेरेमोरेयसिद्धिः अन्दयोपेपर निस्तुकल्येन देश-काल-समातिनिपोरसा-२५ दिति समरिनानीश्वरत्वम्, न का कम्पचित् स्वाद । प्रतिपादितधापन:- "दिवं सत्त्वमसत्त्वं यालोरल्यानपेतनाम् । अपेक्षानो हिमापानांकासचिनन्यसंभवः ।। स्वादिना न्यन धर्मकीर्तिना। तब रागादिसाधि समापन परस्पेति पुरम् । (मानसिकी परलोकपर्वा] [क्षि:-परलोक प्रत्यायानम् ] अब सहस्सासिनतानुमारिका स्वभावसतिमझानादिधर्मस्लासिनस स्पापोभारत- पादन उन तारा साहाय्यानुलिमिति मन्यानाः प्राहु-युदईन रत् 'स्वमामगिर নামিবিষয়ে নানি-নবনিৰনাশ হল मानिनोऽनिधिति' लालमनिहिला, परसोतमारे समानापात् । तपादि-परलोडसहा-३५ पारेर ममा पदसम् अनुमानम् अपनो का ननाम्पीय अन्दर मान तेनानि । र पात घटस्यम्-मपतोऽपि सति साम! दो नामनिसाति- परमाला तइमार निभाने किन्तु परोन्यामानुरोगाव शिने । कर प "सव पनुपोपारादेष सुमति हो ने वापरमिति। १.५.६.१२.२७६.२.३... tvx.३.११.पु...। ३० ७० ५ प्रथमे,काण्डे- स च परोपन्यलप्रमाणपर्यनुयोगः तदभ्युपगमस्य प्रनादिद्वारेण विचारणा न पुनः स्वसिद्धममाणो. पन्यासः, येन 'अतीन्द्रियार्थप्रतिक्षेपकन्येन प्रयतमानं प्रमाणमाश्रयामिद्धत्यादिदोषदुष्टत्रेन कर्य प्रवर्तते' इत्यस्मान् प्रति भवनाऽपि पर्यनुयोगः क्रियेन । अत एव परलोकप्रसाधकममाणाभ्युपगमै परेण ग्राहयित्वा तदभ्युपगमस्थानेन प्रकारेण विचारः क्रियते- तत्र न तावत् परलोकप्रतिपादकन्वेन चक्षुरादिकरणन्यापारसमासादिनात्मलाभ समिहिनप्रति- निमतरूपादिविपयन्यात् प्रत्यक्षं प्रवचते । नाप्यतीन्द्रियं योगिमत्यन्नं तत्र पर्चत इति य वाक्यम्, परलोकादिवत् तस्याप्यसिद्धेः। नाप्यनुमान प्रत्यक्षपूर्वकं तत्र प्रवृत्तिमासादयति, प्रत्यक्षामवृत्ती तत्पूर्वकस्वानुमानस्थापि तत्राम वृत्तेः । अथ यद्यपि प्रत्यक्षायगतप्रतियन्धलिङ्गप्रभवमनुमान न तत्र प्रवर्तते तथापि सामान्यतो; १०तत्र प्रयत्तिप्यते, तदपि न युक्तम्। यतस्तदपि सामान्यतोहएमवगतमतियायलिलोद्भवम्, आहोस्तित् अनयगतप्रतिवन्धलिङ्गममुत्यम् । यद्यनवगतमतियन्धलिडोद्यमिति पक्षा, स न युक्तः, तथाभूत लिगमभवस्य स्वविषयव्यभिचारेण अभ्यदर्शनानन्तरोभूनपज्यावाप्तिविकल्पस्येयाप्रमाणन्यात् । अय प्रतिपन्नसंपन्धलिङ्गममयं तत् तत्र प्रयन्त इति पन्ना, सोऽपि न युक्तः प्रनियन्यागमस्वरतत्र लिङ्गस्यासमवान् । तथाहि प्रत्यक्षम्य तत्र लिनसंपन्यागमनिमित्तस्यामायेऽनुमानं लिहसंबन्ध- १५प्राहकमभ्युपगन्तव्यम् । तत्र यदि तदेय परलोकसदायावेदफमनुमानं स्वविपयामिमनेनानागमो. त्पादकलिङ्गसंवन्धप्राहकं तदेनरेनराश्रयत्यदोषः । अयानुमानान्तराद् गृहीतप्रतियन्यालिहादुपजा- यमानं तद्विपयं तदभ्युपगम्यते तदाऽनवस्था । तथा, समभ्यनुमानमसान प्रस्यसिद्धम् । तथाहि- गृहस्पतिसूत्रम्- "अनुमानमप्रमाणम्"" इति । २० अनेन प्रतिझामतिपादनं कृतम्, अनिधितार्थप्रतिपादकन्या( त्यान् सिद्धप्रमाणामामयदिति हेतु. चन्तायभ्यूयो। विश्ययियारेण याऽनुमानप्रामाण्यमयुनम्-धर्म-धम्युमपस्वतप्रसाधने सिद्धमाश्यता यता, अतो विशेषणशिष्यभायः साय: । प्रमेयविरपिपयां मां कुर्वन् प्रमाणं प्रभागनाममुने । इतरेतरायचिसमय समुदायोऽत्र प्रमेयः, तदपेक्षया च पक्षधमन्यादीनामन्यतमम्गापि यात्रा २५सिद्धिः ! मदि समुदायधर्मता देनाः, नापि समुदायेनान्ययो व्यतिरेको या, धर्मिमात्रापेशया पक्षधमत्ये साध्ययमारक्षया च प्याली गीणनेति । उकंच- "प्रमाणस्यांगीणयानुमानादर्थनिधयो दुलंमः" । ति। धर्मिघमनामहणेऽपि न गौणनापरिहारः, प्रतीयमानापेक्षया गीण मुख्यध्यपहारम्प गिन्याया। समुदायध प्रतीयते । एकदेशाधयणेनापि प्यमयुनम्, प्यास्यमिद्धः महि मत्तामाणाधिनामागे १० गमः मपि स्यपगतः, अन्यथाऽतिप्रमशात् । स य मकलसपा-विपक्षापीकरणे दुनिशानोड रापविदा । न चार पोरन दारणम्, मनशोऽपि एमाझ्या व्यमियागन् । अत एर्णन दर्शनादर्शनमपि । मनाम्- "गोमानिग्येय मन्यन भायमस्वता:पि क्रिम् !" [ ति। देश-दापयामेन च मायानां मानापावामादनाभ्यासःतचा- "सपम्या-देश-वालानाम् [पाप.प्र.का.को. ३२] म्यादि । आरब- "अधिनामारसंघायस्य प्रदीतुमरामपवान् । दस सामान्य नियममाया माय-परामदासमपान, सिमानुमान-पिरोयो सत्र यामिद-:.., मा., मा. गोग-मा, मायालय पर मदरसम्म न. 1.1. भमय-. । ना-41............. Rathor- अम्बाश-पातामां मेहर मिना निषु । मारानामगुमानेर मानिरनिपुर्वमा । नाति पुरंगा. "irs."n.free ५ ] घरम्यरूपवान 1 द, प्राविध पिगसायभिचारिणा न्यादि षणमाल नद् अनुयोपनीयमेष, यतोऽनिधिता- त्या "अनुमानमप्रमाणम्" इन्मनुमानाऽप्रमाणनामनिरादन कृते रमजाल मृत. हायान् । नतोऽनुमानम्मानमाणादीन्द्रियपरलोकमायमतिरादने कुतस्ना प्रनिः! अवेदमेव जन्म पूर्वमन्मालामन्तरेषन युनामिनि उन्मालालमण परलोकमर सिद्धिरियों, कैमियमधापतिः, अपानुमानं पा! न तावदापतिः, नलसणामागन्, ": धुमो याधीऽन्यथा नोपरयों" मीमांसाद० १०१, पा०९, परमा) हिनम्या सणं विप्रसारिप्यने । न तु जन्मालामन्तरेण नोपपतिमदिदं उन्मनि मिनमः पिनमामीमात्रणम्योपपण, तन्मात्रटेनुकन्ये चान्यगनायामनिममता अप प्रशा-मेधादयो अम्मादापण्यापूर्वका रथः कयमनपूर्वकामयेयुः नारपूर्वको मनपू मनरेल पदाचिदपि मपन्नुपराधः, नदप्यमम् । अग्निामावसंपन्या-पानन्यामिल.. य अन्योल भनिएतुमन:शामिदिनमामिपनि निमितं टि प्रमुस्लम मद्धिमान जलयोर्चिना पहिमामय पर धूमम् इति प्रत्यक्षमा मनोनिगुंनाः मनी न पूमोपि : प्रायमाऽमुपलभायां सिम नि पुनम्नग इमान्नेन जन्मालामनगर तो तिरिरमानग्यमाया: दिनविषपनामुपयाग्नि, वा म महापान मदप गिनि कपमन्यया पयायाम नि! अप योगनारपमनोज कचं मातापिपिलम सम्मान र समिधागे नारे गदा पारणानुमपमेय कार्पम्, मेन पिरणापि मातापिरहार पनि प्रभाHिere मदपल्या दरमुपसापेत, माचिन् नाकागानुमारित मारो गादेवाधर गोमपान तथा धिपशा विषय, पिन ना. जय नापि पिपरा पूर्षविषयामामालोण भरे गम ram पासमतोणेति पदापि भएपम |मा कारचारामागे I PART मानापि मातापितरोग विभागमुरमायनाम | NET पाकिसwer in जागो गया पतितापि मातापित्यारित पनि म मे पायाम | पिर योगसिलामादेष मण: प्रमोपनिनि म मायाvir meif समरि मातापिता पधमात्रौष पागो तापामपिरोधान्। अधानाधनम्न मामालितमाभिप पोरने.मानुपविmart पगि, मिनाभगिर्यनुराधानार, गदगुलम। "पाविमोऽभाषात् पालोषाभाषः । मार মানে আম মমমরি। সমান শামীয় নি । লেখাগৰিখলাপি ই নিহি, নদিয়ায় শেখ भयपहासमापि मासिद्धी माप inw, परमाधिोकारणभारः परसिर, मोनुभम्भाr गिरल साम्देन अन्मानाntent अETITTE हते. पिपास विशिम्पने समारोपनमritem रमेन पारिदिया शिपि treet माने लोकालिमाधनम् KTET लिवियाक মামা মিলি দাম। RANAपिरिति, PRETTE * पु.म. साताEि TYPE RATANT मेह.... FREron. * ७२ प्रथमे कारडे- 'भव' शदव्युत्पतिरसंसशिन्यमिधातुं युका । डित्यादिशन्दव्युत्पमिनुल्या नु यदि क्रियेन तदा नास्माभिरपि तत्प्रतिपादकप्रमाणपर्यनुयोगे मनः मणिधीयन इति पूर्यपक्षः। [उत्तरपक्षा-परलोकस्य व्यवस्थापनम् ] अनोच्यते-पहुंफम् पर्यनुयोगमात्रमलामिः क्रियने प्रति, नत्र कम्यम्-पर्यनुयोगोऽपि क्रिय- ५माणः किंममाणतःक्रियते, उनाप्रमाणतः? यदि प्रमाणनस्तदयुक्तम्, यतम्न कार्यपि प्रमाण प्रत्यक्षम्, उतानुमानादि? यदि प्रत्यक्षम् तदयुक्तम् , प्रत्यक्षस्थापिचारकन्वेन पर्यनुयोगस्यम्पपिचाररचना- चतुरत्यात्। न च प्रत्यक्षस्थापि प्रमाण युक्तम्, मपदम्युपगमेन तलमणासंभवात् । तदसंमयश्च स्वम्प- व्यवस्थापकधर्मस्य लक्षणयात् । तत्र प्रत्यनस्य प्रामाण्यस्वरूपव्यवस्थापको धर्मोऽनिसंचादिवट- १०क्षणोऽभ्युपगन्तव्यः । तथाविसंचादित्वं प्रत्यक्षप्रामाण्येनाविनाभूतमभ्युपगम्यम्, अन्यथाभूतान् तनः प्रत्यक्षप्रामाण्यासिद्धेः सिद्धी या यतः कुनश्चिद् यन् किञ्चिदनमिमतमपि सिध्येदित्यतिप्रमहास चाविनामावस्तस्य कुतश्चित् प्रमाणादवगन्तव्यः, अनवगतमतिबन्धादर्यान्नरमतिपत्तीनालिकरद्वीपवा- सिनोऽप्यनयगतप्रतिबन्धाद् धूमाद् धूमध्वजप्रतिपत्तिः स्यात् । अधिनाभावागमश्वासिलदेश-काल- व्याप्त्या प्रमाणतोऽभ्युपगमनीयः अन्यथा यस्यामेव प्रत्यक्षव्यक्ती संवादिन्य-प्रामाण्ययोरमावरगनत १५स्यामेवाविसंवादित्वात् तत् सिध्येत् न व्यत्यन्तरे, सत्र तस्थानवगमात् । न चावगतलक्ष्यलक्षणसंवन्या व्यक्तिर्देश-कालान्तरमनुपर्चते, तस्याः प्रत्यक्षव्यक्तेनदैव ध्वंसाद् व्यत्यन्तराननुगमात् । अनुगमे या व्यक्तिरूपताविरहात्अनुगतस्य सामान्यरूपन्चात् तस्य च भवताऽनम्युपगमादाअभ्युपगमेवा नसामा- न्यलक्षणानुमानविषयामावप्रतिपादनेन तत्प्रतिक्षेपो युक्तः । स च प्रमाणतः प्रत्यक्ष लक्ष्य-लागयो याप्त्याऽविनामावावगमो यदि प्रत्यक्षादम्युपगम्यते तदयुक्तम्, प्रत्यक्षम्य सनिहितस्वविषयप्रतिमा- २० समात्र एव भवता व्यापापम्युपगमात् । अथैका व्यक्ती प्रत्यक्षेण तयोरविसंवादिन्य-प्रामाण्ययोरवि. नामावावगमादन्यत्रापि एवंभूतं प्रत्यक्षम् प्रमाणम् इति प्रत्यक्षेणापि लक्ष्य-लक्षणयोाप्त्या प्रतिष- न्धावगमस्तईन्यत्रापि 'एवंभूतं शानलक्षणं कार्यम् एवंभूनशानकार्यप्रभवम्' इति सेनैव कयं न सर्वोपसंहारेण कार्यलक्षणहेतोः स्वसाध्याविनाभावावगमः । येन 'अनुमानमप्रमाणम्, अविनामाव- संबन्धस्य व्याप्त्या ग्रहीतुमराम्यत्वात्' इति दूपणमनुमानवादिनं प्रति भवताऽऽसन्यमानं शोमते । २५किंच, अविसंवादित्वलक्षणो धर्मः प्रत्यक्षमामाण्यलक्ष्यव्यवस्थापकः प्रत्यक्षप्रतिवद्धन्वेन निधेयः; अन्यथा तत्रैव ततः प्रामाण्यलक्षणलक्ष्यव्यवस्था न स्यात्, असंबद्धस्य केनचित् सह प्रत्यासत्ति-वि. प्रकर्षाभावात् तद्वदन्यत्रापि ततस्तद्ययस्थाप्रसनः । तथाऽभ्युपगमे च यथा संगादित्वलक्षणो धर्मों लक्ष्यानवगमेऽपि प्रत्यक्षर्मिसंपन्धित्वेनावगम्यते तथा धूमोऽपि पर्वतैकदेशे अनलानवगनाथपि प्रदेशसंपन्धितयाऽधगम्यन इति कर्यम् ‘समुदायः साभ्यः, तदपेक्षया च पशधर्मत्वं हेतोरवगन्त- ३०च्यम्, न च पक्षधर्मत्याप्रतिपत्ती साध्यधर्मानलविशिष्टत प्रदेशप्रतिपत्तिः प्रतिपत्ती या पक्षधर्म- त्यानुसरणं व्यर्थम्, तत्प्रतिपत्तेः प्रागेव तदुत्पत्तेः । समुदायस्य साध्यन्वेनोपचारान् तदेकदेशपर्मि- धमत्वारगमेऽपि पक्षधर्मत्वावगमाददोपे उपचरितं पक्षधर्मत्वं हेतोः स्यादित्यनुमानम्य पोणत्यापत्तेः प्रमाणस्थागौणत्यादनुमानादर्थनिर्णयो दुर्लभः' इति चोद्यावसरः? प्रत्यक्षप्रामाण्यलक्षणेऽपि क्रियमाणे- ऽस्य सम्य समानत्येन प्रतिपादितत्यात् । यदा चाविसंयादिन्यलक्षण-प्रत्यक्षप्रामाण्यलक्ष्ययोः सर्यो. ३५पसंहारेण ध्याप्तिरभ्युपगम्यते, अविसंघादित्यलक्षणय प्रामाण्यव्यवस्थापको धर्मनामीक्रियते पूर्यो- कन्यायेन तदा कयमनुमानं नान्युपगम्यते प्रमाणतया? सथाहि-'यत् किश्चिद्राएं तस्य यत्रापिनामाय. स्तद्विदम्नम्प तद् गमकं तत्र' इत्येतायन्मात्रमेवानुमानस्यापि लक्षणम् । तच प्रत्यक्षमामाण्यलक्षणम भ्युपगताऽभ्युपगम्यने देपानानियेण । तया, प्रामाण्यमप्यनुमानस्यान्युपगतमेष, यतो यपापिसं. वादित्यलक्षणं प्रत्यक्षम्य प्रामाण्यम् अनुमानस्यापि तदेय । सदुक्तम्- ११.६९.३८ । २-हानुगतम्य मा.म., मा• विना सर्वत्र। -मायमस्याडम्य-बा.म., मा ...4.18-३५। ५-चात् तदन्यत्रा-मा• बिना। "कथं नोचाइमरः । इति दरम्पः संमा मा. मो.टि.......प्र.पृ.पं.1-गतमेष देया-मा विरतरूपतः। "अम्मासंभवेऽभाषान् प्रत्यक्षेऽपि प्रमाणता । प्रतिपस्वभावस तनुन्धे समयम्" [ इति। अर्थासंभषेऽमाया प्रत्यक्षम्य संपादस्वमायः प्रामाण्ये निमित्तम्, सच साध्यायभायेऽभापिनो लिहावुपजापमानवानुमानसापि समान इति कथं न तस्यापि मामाण्याभ्युपगमः? सिंच, अयं चार्वाकः प्रत्यक्षेप्रमाणावादी यदि परेभ्यः प्रत्यक्षलक्षणमनपयुध्यमानेभ्यस्तत् ५ प्रतिपादयति नदा तेषां मानसंबन्धियं पुनः प्रमाणादधगच्छति। न नायन् प्रत्यक्षात-परयेतो. धृत्तीनां प्रत्यक्षतो प्रातुमशक्यत्यात्-कि नाई स्वात्मनि भानपूर्वको व्यापार-व्याहारी प्रमाणतो निधित्य परेवपि तथाभूततानात् तत्संघन्धित्यमययुध्यते ततस्तेभ्यस्तत् प्रतिपादयति । तथाऽभ्युपगमे च प्यापार-माहारादेलिस्य मानसंपन्धिस्यलक्षणस्यसाधाव्यभिचारित्वं पक्षधर्मत्वं धाभ्युपगर्न भवतीनि कामनुमानोपापम्पार्धा अरूयमसिलम्-येन 'नालाभिरनुमानप्रतिक्षेप १० क्रियते किंतु शिलक्षणं यदनुमानवादिमिलिङ्गमभ्युपगतं तन्न लक्षणभाग भवतीति प्रतिपाद्यते पति पचा शोभामनुभयति-प्रत्यक्षलक्षणप्रतिपादनार्थ परचेतोत्तिपरिमानाभ्युपगमे विलक्षणहेत्वभ्युपग- मस्यावश्यंभापित्यप्रतिपादनान् ! अथ नालाभिः प्रत्यक्षमपि प्रमाणत्वेनाभ्युपगम्यते येन 'तलक्षण जयनेऽवश्यंभावी अनुमानप्रामाण्याभ्युपगमः' इत्यस्लान भति भवद्भिः प्रतिपात-यत्तु “प्रत्यक्षमेवैक प्रमाणम्"[ इति यचनं तत् तान्त्रिकलंधणालक्षितलोकसंव्यवहारिमत्यक्षापेक्षया, अत एष १५ लक्षणलक्षितप्रत्यक्षपूर्वानुमानस - "अनुमानमप्रमाणम्" इत्यादिग्रन्धसन्दर्भणामामाण्यप्रतिपादन विधीयते न पुनर्गोपालापनलोशन्यपहारपनाचतुरस्य धूमदर्शनमात्राविर्भूतानलप्रतिपत्तिरूपस्य, नेतयामा तस्यापि महानमादिधान्नधर्मिप्रवृत्तप्रमाणावगनलमाध्यप्रतिबन्धनिधितसाध्यमिघ. मंघमथलोद्भूतत्येन मानिकलक्षणलक्षितप्रत्यक्षपूर्वकरयर पस्तुनः प्रदर्शितत्यान् । एतत् पक्षधर्म स्यम्' 'पं चास्य धूमय याति' इति साङ्केतिकस्यपहारस्य गोपालादिभूलोकासंभायिनोऽकिश्चि २० स्मरत्वात् । प्रत्यक्षम्य चाविसंघादिन्यं प्रामाण्यलक्षपम्, नद् यथा संभयति तपा परतःप्रामाण्य व्यवस्थापयतिः 'सिद्ध' इत्यतापदम्याण्यायां दर्शित न पुनमध्यते । तत् खितमेतत्-न प्रत्यक्षम्य मपदमिप्रायेण प्रामाण्यव्ययस्थापकलक्षणसंभवः तद्भाये षोऽनुमानभ्यापि प्रामाण्यमसिसिरिति न प्रत्यर्भ पर्यनुयोगविधामि । माऽप्यनुमानादिकं पर्यनुयोगकारि, अनुमानादेः प्रमाणन्धेनानभ्युपगमात् । अयालामियंपप्य २५ तुमानादिकं न ममापनयाऽभ्युपगम्यते तथापि परेण नत् प्रमाणनपाऽभ्युपगतमिति तसिझन मेन परसा पनुयोगो विधीयते ननु परम्य तत् प्रमाणतः प्रामाण्याभ्युपगमविषयः, अधाशमापना? यदि प्रमाणन तदा भवतोऽपि प्रमाणपिश्यस्तत् म्यान्। नहि प्रमाणनोऽभ्युपगमः फस्यचिद् भपति कस्य विप्रति युक्तम् । अथारमाणनोऽनुमानादिकं प्रमाणनयाऽभ्युपगम्यते परेण तदाऽप्रमाणेन मन पर्यनुयोगों युक, अममाणस्य परलोकसाधनयन् सन्माधाममाणपर्यनुयोगेऽप्यमामप्यान् । अथ सेन ३० प्रमाणलक्षणाररिज्ञानात् तन्प्रामाण्यमभ्युपगतमिति तस्सिनिय तेन परलोकादिसाधनामिमनममा पर्यनुयोगः नियने मन्यमानान् तत् परम्प प्रमाणान्नामिमनमन चाहानादन्ययावेनाभिमन्य. मानं वस्तु तामाभ्यामर्थशियां निपपति। अन्यथा विपश्यनामन्यमानं मदौरधादिकमपि तान मारपिनुपामेन दीयमानं स्वकार्पकरणक्षम वात् । अय नास्मामिः पालोरामाभप्रमाणपर्यनुयोगो. अनुमानादिना स्थान प्रसिद्धभामाण्येन, परायुपगमायगतमामाण्येन पा वियते कि नदि यदि पर-३५ लोकादिकोऽतीन्द्रियोऽर्थः परेणाभ्युपगम्यते मदा त्यतिपादशं प्रमाणे पनत्यम्, प्रमाणनियन्मना हिममेयायपस्थितिः, तस्य च प्रमाजस्य नाशपायभवेन द्विपयामिमतस्याप्यभायः' इत्येवंविचा रखालक्षणः पर्यनुयोगः विपत पनि न स्वतन्त्रानुमानोपन्यासपशपायमियादिनसणदोषापमा सहस्पतिमतानुमारिणाम्। नन्धयमप्पनया भया भपता परलोकापतीन्द्रियार्थप्रसाधनमापन- योगे प्रमामाधनाण्यमनुमानम् तद्विपपया ए म्यवार्थप प्रतिपादिनं भवति । तपाहि-मा. 1-धित्वलन-वि.। -हापसभि-., ३ . . पं. १५-४.१५.१.१५ ६.१ ५वाड-मा.,.,मो.। स...

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ईश्वरस्यरूपवादः तम्मादिभरयाय, अत्राभ्युपगमे परलोकवादिनः स्वपक्षमनायाममिरमेश मन्यन्ने, “नदिनु पिलम्" इति म्यायान् । यधेय दि निधयम्पा मानापिन-जन्मानियद्धयमिशिनजन्मार्ग- नभ्यामनायामुपालन्धेः अभ्यासदायां च पक्षधमन्यायनुमग्णयान्यवान्या घेदनात् मिदमनु. माननीनाय परलोकम्य । अधेतरेतराभयदोगदमानं नाम्यविध विषये न्युम्येन, नन्येवं मति मर्षमेदाभावतो म्यवहारोप इति नदमनभ्युपगमना व्ययभागधिनाध्ययमनुमानमभ्युपगन्नत्यम् । पोन प्रत्यर्पयामापेऽप्यनुमानग्य प्रामाण्यं प्रतिपादिनम् । न चानुमानपूर्वकन्वानोराय-१० दोषानुषः, सम्पयनरेनगमयदोरम्य ध्यपहारप्रवृभितो निगमरणात् । पदप्युनाम् 'अनुमानपूर्वकन्येऽनयाग्राममहानानुमानप्रवृभिः नि, नायगानमः एवं हि पनि प्रत्यगृहीनेमा विप्रतिपमिविषये नानुमानमनिमन्तरेण निगार निवारा प्रयास स्थामा पुनरप्यांनाः गन्यतापनेपा प्ययहागच्वनि व्यवहारमलान मानपाया Alt. पित इति । अग्युपगमपादन घेतानाम् । अन्यथा याार्थव्यवस्थापनाय प्रयक्ष प्रगत । मा. . सिनतोयामिप्रसाधनार्थ याचिद् मनेन निशियम, अग्येशुपविक अगदिमाग. पारगम्यम, अपरेल मानमम्, काशिद प्यानिप्रणोपयोगिनानमभाषा प्रयासानुम्मा सोनामिजोहाष्यं पोरं प्रमाण तत्र शामियत शनि कयमनुमानम प्रनियाधानाय मो. सरायदोपत्रपनिः पादोश्यादिना प्रति अपना पैन। पदनाम् पर्वमप्यनुमागमगान पनि प्रमाणन्येनापिसम' पाहि. नायगतमा परिम.. गुमानमात्रामामायं भवना प्रनिरादयितुमभिप्रेनम् "अनुमानमनमाणम" wr, मा माणिक्षेपः, अतीन्द्रियार्थानुमानप्रतिगो थान गुमानमात्र निधो पुमा, दारोदामका पता प्रनिम्ति कोविदा भागविगीने नियत: Arinter पर्षम्मान गर्षम्यागरा | सं. धाग्येन- "म्पयामितो भूयो मागन्तुमति" কাশ। দিগ্নি প্লা শিথী নিশি খান। এ বিষয়লিমায় पाप्यं वापिसमिः परिवदितम् जामध प्रापणारामाREmer.sh यतेसामान्यद्वाण प्रतिपण्याचमार देशादिपगिधागे, पापा, नापियन पामर सपा प्रापि गामान्यपकायान् । सामान्यापमितिमार्ग च मामारे पापा TRARIER. देगातम्'तिमापये पिरणापामा पूर्षपूरीनाम हयापिपपपानाम- सम्' इति प्रायपो भयावामान्यमा पापमगुगतामानिमादविवादमा पिता नदेयं निपतरायमर्यात प्रतिपादयतुपा सत् प्रतिपानि | Terment जाषित् स्पिनरोप पक्षमता, सता गधागपूती सामाभ्यापER पर far কি লাথি বােয়ালমনিলি মুখাম থামবিষয়ঃণ্ডি পৃবি WRAPIRITaरकारकाणां पूर्वदर्शगानाममाधान त्यगुताम्, rastri Ram सपने tirsयमिप्यतः सत्तामा पापो - मनोपियामासनिपामा पहिलो पुरnt winer चविनुषामात् । पापले पिपणे वापर पतिपत्तिापि प्रामागाभपणेनाम: Nirgin- हामारले गरिमा, भपायागार पिसमा भनिति दिनु मापित... 1 -साधिता, म.. .........................। Arrrr.ki.or.10-RR(R) मिति...reet wr.......Art-IRTANTRA.....

है ७६ प्रग काले- संयन्धप्राहकमातुः व्याने समागणावगमान्" तथा च यत्र यति देशका विभिनाना ब- नामनयमासाऽनुपपत्तिः, अन एकर क्षणे योगित्वं प्रतिबन्धग्राहिणः। एनम् यस्मादविशिष्ट तर लोके अर्थान्तरदर्शनात् अर्थान्तरमुहद्धप्रतीनी ताफिकाणां निमितचिन्तायां पराधमत्वाया धानम् । अतो ग सानिकलक्षणप्रतिक्षेपोऽपि । उत्पमप्रतीतीनामस्तु प्रामाण्यम्, उत्साघमतीतीनां तु अतीन्द्रियाऽरट-परलोक-सज्ञा गुमानानां प्रतिक्षेप इति चेन्, तदसस्, यद्यनयगतसंबन्धान प्रतिपत्तनधिय॑तदुच्यते त धूमादिश्यपि तुस्यम् । अथ गृहीताविनामायानामप्यतीप्रियपरलोकादिप्रतिमासानुत्पत्वेरेव च्यते, तदसत्; ये हि कार्यनिशेषस्य तद्विशेपेण गृहीताविनामायास्ते तस्मात् परलोकाय गच्चन्या अतो न झायने केन विशेपेणार्तीन्द्रियायांनुमानमतिपः? सायर्याविरोपेः १० च्याप्यगता नियतता प्रयोजिका न व्यापकगता, अतः समन्याप्तिकानामपि व्याप्यमुखेनैव प्रति पत्तिः । नियतताऽयगमे चार्थान्तरप्रतिपत्ती न यापा, न प्रतियधा, एकस्य रूपमेदानुपपत्तेः ततो न विशेषविरुद्धसंमयः नापि विरुद्धायमिचारिण इति यदुक्रम् विरुद्धाऽनुमान-विरोधयं सर्वत्र संभवात् कचिच्च विरुद्धाव्यमिचारिणः' इति, एतदप्यपास्तम् । 'अविनामावसंपन्धर ग्रहीतुमशक्यत्वात्, अपस्था-देश-कालादि मेदात्' इत्यादेश पूर्वनीयाऽनुमानप्रमाणत्वेऽनुपपत्तिः १५ परोक्षस्यार्थस्य सामान्याकारेणान्यतः प्रतिपत्ती लोकमतीतायां पौद्धरतु कार्यकारणभावादि लक्षण प्रतिबन्धस्तग्निमित्तत्वेन कल्पितः। तदुक्तम्- "कार्यकारणभावाद्वा स्वभायाद्वा नियामकात् । अविनामावनियमोऽदर्शनाश न दर्शनात्" [ ] इत्यादि। तथा- "अवश्यंभावनियमः कः परस्यान्यथा परैः। अर्थान्तरनिमित्त या धर्म वाससि रागवत्" [ ] इति च। तथाहि-चित् पर्वतादिदेशे धूम उपलभ्यमानो यद्यग्निमन्तरेणैय स्वात् तदा पापकधर्मानुवृत्ति- तस्तस्य तत्कार्यत्वं यनिश्चितं शिशिष्टप्रत्यक्षाऽनुपरम्माभ्यां तदेव न सादित्यहेनोस्तस्यासमात् कचिदप्युपलम्मो न स्यात्, सर्वदा सर्वत्र सकारेण चोपलम्मः स्याता अहेतोः सर्पदा सस्यात् । २५ स्वभावश्च यदि भावयतिरेकेण स्थान ततो भावस्य निःस्वभावत्यापत्तेः स्वभावस्याप्यमापतिः । तत्प्रतियन्यसाधकं च ममाण कार्यहेतोविंशिएप्रत्यक्षाऽनुपलम्मशब्दवाच्यं प्रत्यक्षमेय सशसाधक- देनुप्रतिबन्धनिश्चयमस्ताये प्रदर्शितम् । स्वभावतोस्तु कस्यचिद् विपर्यये याच प्रमाणं व्यापकानु पलब्धिस्वरूपम्, कस्यचित् तु विशिष्टं मत्यक्षमभ्युपगतम् । सर्पया सामान्यद्वारेण व्यतीनाम् मत पपरावृत्तव्यक्तिरूपेण पा तासा प्रतियघोऽभ्युपगन्तव्यः अन्यथाऽप्रतियवादन्यतोऽन्यप्रतिपत्ताव. ३० तिप्रसगात् । प्रतियन्धनसाय च प्रमाणमयश्यमभ्युपगमनीयम्। अन्यथाऽगृहीतपतिबन्धावाद- न्यतोऽन्यप्रतिपत्तायपि प्रसङ्गस्तदयस्य एव ! या गृहीतप्रतिपन्योऽसावर्ष उपलभ्यमानः साय- सिद्धिं विदधाति समर्मता तस्स पक्षधर्मत्यस्वरूपा, तशाहकं च प्रमाणे प्रत्यक्षमनुमान था। तदुरू धर्मकीविना- "पक्षधमंतानिधयः प्रत्यक्षतोऽनुमानतो था" लोकमसिद्ध-तानिकलक्षणलक्षितानुमानयोमेंदामायावतीन्द्रियपरलोकापसापसायमपि संवेति तरमामाण्यानम्युपगमे रहलोकस्यापि अभ्युपगमाभाषपसन व मित्र निर्षियर. काम, मानसम्, योनिप्रस्यसम, ऊहोया प्रतियानिधायकम् प्रतिबन्धोऽपि निपतसाहपर्यटक्षणः कार्यकारणमावादियां' इनि चिन्ताऽनोपयोगिनी, घुमादग्निमतिपत्तिपत् प्रमा-मेगादिविहारका विगनिजामातरविहानसमापपरलोप्रतिपसिमिधः । अतोऽनुमानामामाग्यप्रतिपादनाय २० - ما २५अतो ११....१-१५ । ४ परे। ५-रविमिया-पु.५...

- पा पूपावादिना या युक्लिजारपस्न ततिर दरम्यमा प्रतिपरमुपा म दायते पधारयभयात्। पपुणम् 'परसोफे प्रत्यास्यामरापलियम् इएसम्माययाऽनुपपरपा परलोकप्त. भापति, सदापि न सम्यक् पूर्वानुसारेण सर्पस निपतमत्पपा मगृत्तानुमानप्रतिपादनात् । अदिनाभावसंपन्धम्प प्रहीतुमसत्यापात्रानुमानमिति पता नग्येचं पदेयान शम्पायं घा फस्य केन दोपामिधानम् । तसात् संभयहारकारिणा प्रसशेष ऊद्देन पा प्रतियत्यसिद्धिरिति कर्य मानान् परलोमिद्धिः? पायुक्तम् 'मातापितृसामग्रीमागेदजन्मसंभपास तमन्मयतिरिकाभूतपरलोफसाधनं युक्तम्' इति, तदपि प्रतिधिनिमेया ममनन्तरप्रत्ययमानेष मत्यय प्रत्यक्ष भाषा समादिप्रत्ययय प्रसाद पाहायगिशिरपिरति पौधाभिमतपक्षनिधिप्रसङ्गोऽनस्तत्वात् । यदपि प्रत्यादि म सहित दिमाशविरपया प्रत्यारस देश-कालमाया प्रतिपन्धमहामार्यम्' इति तदपि न विभिदा १० ६ सति अतिससिदित विषयस्येन प्रत्यक्ष स्वYAN पर प्रवृत्तिमसमरति तदेव पौसापमिमतं वसंबेदनमात्र सर्पचवहारोच्छेदकारिप्रसमामिति प्रतिपादितस्यात्। समालोकत्रयहारप्रवर्तनक्षम. सविकाराप्रपक्षपलाइहाल्पप्रमाणापा देश-कालयाप्त्या ययोक्तलक्षस्य देतो मतिपन्धन हने प्रवृत्तिानुमानाति न मादतिः प्ररतसाति एतदपि निरस्तम् 'केचित् मजादयः' इत्यादिनच शा-मेधादयः शरीरसभाषान्तर्गता इत्यादि चोपं युक्तम, तदन्तर्गतस्येऽपि परिहारसंभवादन्यः१५ पन्सतिरेकाम्यां तेषां मातापित्रोः पिशरीरजस्यत्वस्य पितशरीरं (1) सहि हेतुभेदाप मेदो मातापि. शरीरादपत्यमादीनाम्। अयमपरोपहरातिमतानुसारिष एव दोषोऽस्तु यः कार्य मेदेऽपि फारले. मे नेष्यति । अलान हप-विवादापने कामिनधर्माकान्तस्य विज्ञानसान्तमुखाकारसया प्रेयस्य रूपरसगन्धादियुगपाधि-यालामारपौवनवृद्धावस्थापनेकफमभाषिविरुद्ध धर्मापासितत- वीरादेवोधन्द्रियामपत्रिभानसमधिगम्याद मेदः सिर एव । विस्मधीपासः, कारणवश २० पदार्यानां मेक सधशलानलपोरिय शरीर-विज्ञानयोविंधत एवेति कथं न सयोः तदेवा. सम्पमेदे मलाईतयादापत्तलदवस्प पर पियादितचतुएयाभावापरया व्यवहारोच्छेदः। अधया मातापित-पूर्वजन्मकसामग्रीजन्यमेतत् कार्यम्, तत्र (तम) दोषोऽध्यतिरिकपोऽपि विज्ञान- शरीरयो । पूर्वमप्युक्तम् 'पिलरमाइरपन्यय-यतिरेकाम्यां मातापिएशरीराद विज्ञानमुपजायताम्। महि कारणकारमेष सफल कार्यम्' रति, तदप्यमान पत्तो नहि कारणपिलक्षण कार्य न भरती २५ युध्यते, अपितु तइन्धय-पतिरेकानुविधानाद तरकायस्वम् । तपाहियद् यशिकायय-व्य. तिरेकानुविधापि तम् सत्कार्यमिति पयस्थाप्यते, यथा अगुप-कर्पूरोर्णादिदाबाहापापकगत. मुपमिगन्धापन्ययमतिरेकानुभिधायी घूमस्ताकार्यतया व्यवस्थिता, एकसन्तत्यपतितशालसं. জাযৱহােৰষয়ানমষিনিরমিখাৰ ৰ সয়া- ঐশ্বরিয়ানমিনি কার্য । दरकार्यमभ्युपगम्यते । तदनम्युपगमे धूमादेरपि प्रतिवद्गपादिकार्यस्ख तरकार्यरषाप्रसिद्धिरिति ३० पुनरपि सकलापहारोष्टेदः। "तसाधष संस्कार नियमेनागुपर्तने । तथास्तरीय चितमतधितसमाधितम्" । [ प्रतिपादितय प्रमाणत: प्रतिनियतः कार्यकारणभाषः सशसाधने कुसमयपिसासणे' प्रतिपमा कुन्निनं पुनरिहोपते। योऽपि शालूमशाग्लेन समिधारः 'यथा गोमपादपि दाटक, कधित् समानताती. पादपि सास्काईप तथा केचित् प्रवा-मेधादयस्तादम्यासार, हेचित् तु रसायनोपयोगा, १५... १.१.४।५• . ३४। ...। .. ५.२४ प्रशादय इति इत्यादि मां..., मां-। " .७.१४ १.पू. ५१ ५ .।"-पावस्य प.यवस्थापि-म• 1 ११-जामे 1-सा दोषो-पु. । १४ एन म दोषो -1 १५-उमतिरेफरोपि रा.,.। १६.०५. पाम्पेत ११.५७५.३० J

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ईश्वरखरूपमादः। क सस्यापि न घास्य प्रत्ययम्य पापारदिनस्यापूर्यार्थ विषयस्पाक्षजपिपयायमासरोषासन्दि. धरूपस्य निधितम्पत्येन प्रतिभापमानम्य स्मृतिरूपा अप्रामाण्यं पा प्रतिपादयितुं युवाम् । अतोऽस्यामपि प्रनीतापमासमानण्यापरोक्षय युना न ममापान्तरणम्यता । पदया:-अस्त्ययमयभामा किन्यस्य प्रत्यक्षता चिन्या प्रत्यक्षंहीन्द्रियव्यापार शानम् । तपाचोर मद्भिःन्द्रियाणां सासंप्रयोगे युद्धिजन्म प्रत्यक्षम्" [जैमि० अ०१-१-४] प्रत्य. ५ क्षतिपयत्यात् तदर्षन्य प्रत्यक्षता न तु साक्षात्, अनिन्द्रियजम्वेन । तत्र घटादेवहिन्द्रियमान विषय रक्षेत सर्वलोकनीताऽयक्षता नरपेयमारमनः । अधयमुपेत-मात्मनो घटादितुक्या मत्यसमा, घटादेहि इन्द्रियानविषयत्वेन मा स्पषस्थाप्यने, म स्वारमा कस्यचित् प्रमाणम्य विषयः । कथं हाई प्रत्यक्षः न जानविषयमा भरक्षा अपि स्वपरोक्षरयेन प्रतिभापना प्रत्यक्ष उच्यते। सच केपलम्य पटादिमतीसम्मगतमा पारसाधन मा प्रतिपादितम्, एतदप्यमन्, यतः अपरमानमिति कोऽध:- चिगम राता, आहोस्वित् स्यातीतो पारायदि विगम्य सधारमप्राशनमुच्यते तदा सानो যথা। ন খান্নামী-সবী ছোটগাঁ ন কল, যবনযাধি গিগাবিন্দ गुप्रसियं शतान्येपणं त्यते । नप दादि याता, संत्र दिमजातीयालोकानसरोगे सनीनी यसकारावर पयस्यापिनं कोधिन् ग स्पिन्द्रियामाधयम्। नरमायन्ये 'गंगा प्रदीपारयः' इति पाप्मतामियाधामामपि मरमनीसिप्रगतमा तम्मा का पारायः। पणु आलोकान्तरनिरपेक्षरयं सत् कम्यचिद्विषयमा काधिम् सामग्री प्राविनिमय नान्यत्रापि प्रसनिपोरने । अथ हितीय पक्षा, मोऽसयुना मांगाव-मद धित पाः पतंकपः करणरूपो था बामनि कर्मणीय मध्यापारो रानमेयायाम मानित प्रमाणपतरामाधार ! एकप टिकादिकरणापर्य(पापस्थामेर मेरे पति मोरः। य, प्रमाणाविषयरधेऽप्यपरोक्षनेश भापित कोऽ! हानया लाभास. ममिति चेत्, घटादयोऽपिपिएमपनया प्रतिविvant अनो यर यार अमानवि. पपऽप्यपीयो रति गहनाविषयता ममा तपादि-रातमा ARTATISTHETI, घटादा प्रमेयता शेयता पटाविकपना तो यथा तम्य पणापमापनाTSAPANATTA সংশি। অযুখানায় ঘা, ক্যাবিছিল মন্বয়লাথি মন্দিরে रि. लक्षणात पमपम्पा पमाणेषनापायला गपिन् प्रत्यक्षामिकामा सापेनम्यादा लोप्रमाण फाऽपि वेदनांगमरमा । नामा. दोष निन्, नया चोलाम- "पितिविसितयप वेमसंचनया"। पमान माफ भनिक्षिणम्, म प्यरूपापमा प्रमाणाविषयना।कि, एवं यमाने मातरम्, पविपि परिणत भानु, नयी पापुलम्, एमाप विषयापमामगि #TTAR! अपोपेतपारसना घमघमासमानय, बोधगये दुपदादिपरचमाननीतिमान | पा. प्रनिमारा प्रमाणवेन पाधापना 'परमई पण परपामिति नियनि- परप्रतानिया पनीया। थाऽपि धिमाणपतीतिभवानोना मा.पि मानाय An Re:- 'घामद पग पक्ष्यामियामपगनी f गप बनाम, माटोति मावि दिनप! गोगमा म कधिदरमा मात् निरिणय समेग्नम्युममा अन्मामे या ममतातिविधयर, पलं सारमारगुपारपति परमाताति। एवं महार पारणमाजमणीयले. भ प पोः प्रतिगोबाला परमार दासो नि परिदिपपलमामासमिनियापिकनिक १-पपिपर -१... RRENTीनारा-4... mar. ketirit-reart.karateiaापारपसारामोद पुलम् .. -मायुरपति नपा दोष ....... २०१५-दिए.. -...-...!

Brea समय पूरा अभ्यया बोरिषमा 2 TITANषानामति भावाभिम' निर्णम TRES ८० । -- दियानिमितम्" [तन्यार्थ... सु०१५] इतियायममुख्यपयनात् । तेन या पिते. अपमे काण्डे- भासनम्' इति पर्यनुयोगे मूकत्यं परिहारमाहुः, व्यपदेष्टमशस्यत्वात् । ननु 'अहम्' इति प्रत्ययः सर्वलोकसाक्षिको मैयापनोतुं शक्यः । अनपहवे. सविषयः । घा? निर्चिपयता प्रत्ययानामयाधितरूपाणां कथम्? सविषयत्वेऽपि प्रमावप्रतिभासे कवियोग प्रत्ययः न मत्ययापहवः न चास्य निर्विषयता किन्तु देहादिव्यतिरिक्तो विषयवनायभासमान ५त्माऽस न विषयः न च सातत्यनावभासमान इत्युच्यते । कम्नहि विषयः शरीरमिति यूमः। तथार- 'कृशोऽहम् स्थूलोऽहम् गौरोऽहम् इति शरीराधालन्यतः प्रत्ययरस्य समानाधिकरतोऽवसीय नन्येय संख्यादिप्रत्ययरप्यहवार समानाधिकरणता-मुख्य दुःण्यामिति था, अनोज पेर विषयता ययोच्यते 'गोरोऽहमित्यादिसामानाधिकरण्यदर्शनाच्छरीगलम्यनत्यम्' इति, तपायी चार्यम्-गौरादीनां शरीरादित्यतिmar हएं तद्वच्छरीरादिगनानानपि युक्तं पर र्यदेतदू मम गौर रूपं मोऽहमिति माने .० ३.१ पं०२३] अयमर्थः-शरीरेऽहकार औपचारिको न तासिका, यथाऽयमितत्कार्यकारिण्यत्यति देऽहयारो गौणः योऽयं सोऽहम्' इति, पयं शरीरेऽपि । यो निमित्ताद अयमेतमिरंतुमयमंतिक नामको इदंताप्रत्ययविण्येऽहारतत पय दापि आत्मविषयस्याहारो नोपचार: १५दंप्रत्ययासंमिनाहंमत्ययप्रतिभासित्वात् प्रमाता शरीरादिव्यतिरिक्तः ।. 'ममायमामा इति किन भयति प्रत्यया भवतीति यमुच्यते केवळ शप ret पनदेय कथम् ? 'ममेदं शरीरम्' इति प्रन्ययोपादानात् 'ममायमान्माति प्रस्पयाभाग ! ननु मत्ययम्य संभवः । प्रापि ममप्रत्ययप्रतिभामयादात शोधारणा सेन थाप पनि यानी गुमादियोगः शरीरयष्यने । नेपा, सुसादियोगाभाया मिश्याप्रत्ययोऽयं सुपमा २०न रतालापनः । असो व्यवस्थितम् मातमतिमासादर्शनात् प्रतिभासे पादारी पनामागनाम देहादिग्यनिरितम्या प्रत्ययविषयताः शरीरसच मारपेनायभासमानगापि प्रमाण मिला पुद्धियोगनिषेधामियाप्रत्ययालय तु म्यानन्येऽन्य भि HARYA रिया सिध्यतीपारि तदप्यमान मया जैमिनीया सासंयोग पुगन्द्रियाणा पुटि मानिन्दियतनामयदोषो नागा जिनमतामारिणाम, महामन्तिमसमेत प्रया जि प य विमानमिन्द्रियानिप्रियानिमित्त प्राणिमान्, विषारी भनयमाप्रमाणानामा Hamar EिTETTमा मनानिमिति कोऽथी form TwiuTHETANTHREATENTION : र ना Reli, HARIRAMPATimes AmirritatsAR RECIPAHI मिनि मोहवा NET HTTERY TEAMERITTEN MERMITTERTAWAHTHAT earts ra. THEATRA Tree free marathi NEEPARMINATHMARATran traार विनमन। wr wrrential me refrittent :

গলাধঃ। शीमद्धिमा यस मालि सभामगाशयमपि नालि, सा पहावारिति पति- परसनापादप्रकाशकवलक्षणायेतोः सप्रकाशफापं विशागय किमिति न सिरिमा. शादयति । यतनम् कस्यचिदमा फाचित् सामग्री, रोग प्रकाश प्रकाशान्तरनिरपेक्ष पप साहिणिसाने प्रतिभाति राय युवामेप, यथा दि ससामील उपनायगानाः प्रदीपालोकादयो र समाजातीयमालोकान्तरे स्वमाक्षिणि ज्ञाने प्रतिभासमाना अपक्षन्ते तथा स्वसामग्री उपायमानं विमानं म्यार्थप्रकाशस्यमापं स्वमसिपसी न ज्ञानान्तरमपेक्षते। प्रतिनियतरपार स्थकारणायमजन्मनां भायातीनाम् । पशु प्रदीपालोकादिकं सगातीयालोकान्तरनिरपेसमपि म्वप्रतिपतीशानमपेक्षते तत् नगासागरयात् भानस्य च तद्विपर्ययस्वभावत्या युनियुगामिति 'नपत्र : समायोऽन्यत्रासअपितुं युक्ता पति पूर्वपवनो निसारतया पयस्थितम् । अपालोशस्य तदन्तरनिरपेक्षा प्रतिपत्तियरसम्धेति न तारान्तयमार शानथापि शानान्तर-१० निरपेक्षा प्रतिपत्तिः, अरस्यात् म्यारमनि क्रिया विरोधापा नन्वेषगुपलभ्यमानेऽपि परतुनि यार. त्वम् विरोधयोध्येत सदा म्यामपद पदादेपि पाधय ग मादक मानम्, अइएस्पात जास्य HTोगावत्यपि परतः मोगतमा न पश्यना समुपजायते । (मथासावयेयं पाई. समर्थः जई घस्तु न पता प्रकारासे, विधानपन्, जडत्यदानिप्रसहात् । गापि परतः प्रकाशमानम्, नील गुसानिध्यतिरिकास विज्ञानस्यासंघेदनेनासपात् । अप नीटस्य प्रशास' इति प्रकाशमाननीलादिष्यतिरिक्तसात्मका:, अन्यथा मेदेनोस्था प्रतिपत्ती संघदनस तत्प्रतिभासो न स्यात् ननु न नील-तवेदनयोः पृथगवमासा प्रत्यक्षसंभपी,, प्रकाशपिषिक्तस्य नीलादेरगनुभरात् तद्विवेकेन च घोधस्याप्रतिभासनात् । न चाध्यक्षतो विकेनाप्रतीयमानयोनील-सत्संपिदो दो युक्तः, विधेकादर्शनश मेदविपर्ययाश्रयत्वात्। नील- तरस्यरूपयत् । अयापि कल्पना नील-तरसंपिदोभेदमुलिखति-नीलस्यानुभवः' इति नन्यभेदेऽपि २० भेदोलेपो र यथा-शिलापुधवास पपुः नीलस पा स्वरूपम्' इति । अप तत्र प्रत्यक्षा दो भेदो बाधक रति न दोलखा सत्यः स तहिं नील-संयिदोरपि प्रत्यक्षारूदोऽमेदोऽस्तीति म मेकरना सत्या । तदेषं नीलादिक तुषादिक च स्वप्रकाशयपुः प्रतिभातीति स्थितम्, समातिरिचय प्रकारास्थानतिमासनेनाभायात् । मवतु पाध्यतिरिको बोधस्तथापि न तद्राहा नीलादयो युनाः। तथाहि-तुल्पकालो पा९५ योधस्नेपा माशा, भिन्नकालो धा! तुल्यकालोऽपि परोक्षः, स्वसंविदितोपान तापत् परोक्षा, यतः "अप्रत्यक्षोपलम्भस नायिः सिष्यति"। इत्यादिना स्वसंचिदिनत्यं ज्ञानस माधयन्न पनपक्षं निराकरिष्यामः नापि हानान्तरवेद्या, अनवस्थादिदूषणयात्र पक्षे प्रदर्शपि. प्यमाणत्वाम् । स्वसंधेदनपक्षे नु यथाऽन्जनिटीनो घोधः स्वसंविदितः प्रतिभाति तथा नत्काल स्वमपातापपुणे नीलादयो यहिशसंबन्धितया प्रतिभान्ति प्रति समानकालयोनील-तत्संवेदनयोः३० स्वत प्रपोः प्रतिमासनात् सव्येतरगोषिपाणयोरिघन घेण्येवफमायः समानकालस्वापि पोप नीलं प्रति प्राहकाये नीलस्थापि संमति प्राहकतामसह। समानकालप्रतिभासा:पिशेषेऽपि धुद्धिनीलादीनां प्रहणगुरचयतीति प्रालिका, नीलाश्यस्नु पाहाः, नंतदपि पुकम्। यतो नील-गोषयतिरिनान ग्रहणनिया मतिनाति । तथाहियोधः सुवास्पीभूतो हदि, पहिः फुटमुद्धाममानतनुस मीलादिराभाति नत्यपरा प्रहणक्रिया प्रतिभास-३५ विषयः । तद्नयमासे घन तया स्याप्यमानसपा नीलादः कर्मना युक्ता भयतु पानील-योधव्य. तिरिका चिपा तथापि कि सध्या अपि स्वतःमतीतिः, यद्वाऽन्यतः तर यदि स्यतो प्रक्रिया प्रति- भाति सपा सति घोषः नीलम् महणकिया घेति यं स्वरूपनिमामेककालं प्रतिभातीति नपर्ट- फर्म-क्रियाव्यवहतिः अपान्यतो प्रक्रिया प्रतिमाति ननु तत्राप्यारा प्रहभिया उपेया-अन्यथा सस्था पाहताऽसिं-पुनस्तत्राप्यपरा कमतानिपन्धन निया उपयेत्यनयस्था तपाहणप्रियाए.४० राऽस्ति, तास्वरूपाऽनयभाममात्। तनमानःसंवेदनम् पहिलादिरं च स्वप्रयागमयेति । १४.७५६.१७। २-रवाद युनामि मा । ३.५ ५.1 -गाऽस्य प्रतिपको मो-विना सर्वत्र । ५-६. परलु प्रसाश-0.1 (-पि संप्रति पा., बा, मा. रिना रात्र ।

:२ प्रथमे काण्डे-, स्वसंचित्तिमात्रयादः साधीयान् यदि तन्तिनिलीनो बोधो नीलादेन योधक किन्तु म्यप्रकाश पवासी तथा सति नीलमहं थेमि' इति कर्म-कर्तृमायामिनिवेशी प्रत्ययो न भत्रेत, विषयस्य कर्म- फतभावस्थामावात् । ननु विषयमन्तरेणापि प्रत्ययो डट एय, यथा शुविकायां रजनायगमः । अय पाधकोदयात् पुनभ्रान्तिरसी, नीलादौ तु कर्मनादेनं बाधास्तीति सत्यता। नन्यत्रापि योध-नीलादे ५ स्वरूपासंसकस्य यस्य स्यातयोगलम्मोऽस्ति पायका कर्म-कर्टमाओलेसम्पाययक्रिमस्या मान्तनि. पन्धनम् । नहि भ्रान्तिरपि निर्धीजा भवति ननु पूर्वम्रान्तिरेवोत्तरकम-करीमावावगतेनियन्धनम्। पूर्वघ्रान्तिकर्मसादेरपि अपरा पूर्वम्रान्तिरित्यनादिम्रान्तिपरम्पग, कर्मतादिर्न तत्त्वम् । ' अथवा 'नीलम' इति प्रती तिस्तापनमात्राध्ययसायिनी पृयक, 'अहम्'रत्यपि मतिरन्तम्लेगम, 'महन्ती मिना, 'वेभि' इत्यपि प्रतीतिरपरव; ततश्च परस्परसंमकप्रतीतिभिनयं क्रमवत् प्रति. माति न फर्म-कर्तृमावा, तुल्यकालयोस्तस्सायोगात् भिन्नकालयोरप्यनयमासनान कर्मतादिगतिः फश्चित् संभविनी । अथापि दर्शनात् प्राक् सन्नपि नीलारमा न भाति तदुदये च मातीति कर्मता तस्य, मतदपि साधीयः, यतः प्राग् भावोऽयंस न सिद्धः। दर्शनेन स्वकालावधेरर्थस्य प्रहमाद् दर्शनकाले हि नीलमामाति न तु ततः प्राक, तत् कथं पूर्वमायोऽर्थस्य सिध्येत् तस्य दर्शनस्य पूर्यकाले विरहार ! न च तत्काले दर्शन प्रागर्थसनिधि व्यनति, सर्वदा तत्प्रतिभागमसगात् । अथाऽन्येन दर्शनेन भागः प्रतीयते, ननु तदर्शनादपि प्राक् सद्भायोऽर्थस्थान्येनारसेय इत्यनयस्या । तमाम् सस्य नीलादेदर्शनकाले प्रतिभासनान्न तत्पूर्व सत्ता सिध्यति । अथापि 'पूर्वराष्ट्रं पश्यामि' इति व्यवसायात् प्रागः सिष्यति, प्रागर्थससां विना दृश्यमानस्य पूरन एकत्वगतेरयोगाम् । केन पुमरेकत्वं तयोर्गम्यसे---रिमिदानीन्तनदर्शनेना. पूपदर्शनेन था? न तायत् पूर्वदर्शनेन, तत्र तत्कालायधेरेयाधम्य प्रतिमासनात् । नहि सेन सम तिमासिनोऽर्थम्य पत्र्तमानकालदर्शनव्याप्तिस्वमीयते, तत्काले माम्मतिकर्शनादेरमाणात् । न चासत् मनिभानि, दर्शनस्य स्तियत्वमसात् । नापीदानीलनदर्शनेन पूर्यदर्शनादियामिनीलादेर पसीयते, नदसमकाले पूर्वकालस्यास्लमयात् । न चालमितपूर्वररांगादिसंपर्शमयतरति प्रत्यक्षम्, नितपस्याप्रसादय । तस्माद् 'अपास्नतत्पूर्यगादियोगं म यस्तु शायराने, पूर्वएना तु स्मृति सिसति' मंदपास्नम्, एनोसाभायात् । न च स पणापम्' इति प्रतीतिरेका, 'स' इति स्मृतिरुपम्, 'अयम्' रति नु शशः सम्पम्। तारोक्षाऽपरोसाकारल्याकम्यमाची प्रत्ययी, तार मस्तस्यसिमित अचानुमानात् प्रागभायोऽधग सिम्पनि माक सत्तां विना पधारनायोगादिति, सदप्यमन्। पारः पधादांनस्य प्रारमायाः संपन्धो न गि, मारमत्तायाः कश्चिपचिन पासिया सत्रया याम पवादमानं निभ्यलि येन तनम्नरिसदिः । अब यदि प्राग मनरेग पसनमुदयमा सादयति नया सति नियामामायाम् गत्र सदा सांगा सर म, मायमपि दोग, निपठधामनामशान गंवेदननियमात् । तथादि-यमायस्था यामनायलाशंग देश- पासाकारनियमोटर नि नाममायामपि मत पयामा युनः । अयं न सता तिला नापि सहान् मंसित्तिनियमति न विचिया, सम्मान धिापि गीला मार समापिदि। आप पूर्वसनाविरद सिंप्रमानम् ? मानुलिधिरेल प्रमालयरिना कालाप শাসন মন্তব, নয় সবার ধানাথ ধা মলিগালা কায় ধর্ম কৰণ পিমানি ন * লাল, যথা না ঘামান্নান মাস মূল যাকোযা, নারান সানা রিমালিন পূসি, সয় । - १ ........। PAR ... भारत (IT) -मवा (mri), ...

वरखरूपमा अपनीले तहसननिरनापि परहाशि प्रतिभातीति साधारणतया प्रारम्। मिशान स्वमा. धारणतया प्रकाशम्, नैतदपि युक्तम्। यतो नीलम्प न साधारणतया सिद्धः प्रतिमासा, मस्तक्षेण स्वातिभासिताया पपापगते नहि नीलं पररशि भतिभातीत्या प्रमाणमस्ति, पररशोऽन. पिगमे नीलादेनदेयताउनधिगतः। -यय हि स्वमन्ताने मीलदर्शनात् तदा ५ दाना 'ात् तद्विपर्य दर्शनममीयते, नेतदप्यस्ति। तद्धि सहाव्यवहारदर्शनादुपजायमान स्वर- सरतां परम्प प्रतिपादयेत्, पधापरथमदर्शगात् पूर्वसदृशं दहनमधिगन्तुमीशो न तु समेघ पूर्षदएम्, सामान्येनान्वयपरिच्छेदात् । नपानुमानतोऽपि प्राधाकारकता। मनु मेदोऽप्यस्य न सिद्ध एप प्रतिभासदे सति फधमसिना परप्रतिभासपरिहारेण स्वप्र-१० तिभासान स्वप्रतिभासपरिहारेण च परमतिभासोन् विवेकस्वभावान् व्यतिरेवयति अन्यथा तस्वायोगादी ततः स्थ-पारस्य नीलादेः प्रतिभासभेदा व्यवहारे तुल्येऽपि भेद पप; इतरथा रोमाञ्चनिकरसहकार्यदर्शनात् सुखादेरपि स्व-परसन्तानभुयस्तत्त्वं भवेत् । अथापि सन्नानभेदात् सुरखादे दा ननु सन्तानमेदोऽपि किमन्यमेदात् । तथा घेदनयस्था। अथ नस्य स्वरूपमेदादू मेवः सुखादेरपि ताहि स एवास्तु, अन्पया मेदासिद्धन धन्यमेदारन्य १५ मिसम्, अतिप्रसङ्गात् । नीलादेरपि स्व-परप्रतिभासिनः प्रतिमासेमेदोऽस्तीति नेकता। अय देशैरवादेकत्वम्, गनु देशस्थापि स्व-परस्पण्यानन्तरोक्तन्यायाद नैकता युक्ता । तलाद् प्राहकाकारपए प्रतिपुरसमुद्भासमानं नीलादिकमपि मिप्रमेय । तचककालोपलम्माद् प्राहकपत् स्वरकाशम्। अथ माहफाकारपिपरपाद् वेदको नीसाकारस्तु जडत्वाद् प्राधा, अनोज्यते-किमि २० पोषस्य चिदूपत्यम् । यद्यपरोक्षं स्वरूपं नीलादेरपि नहि तदस्तीति न जडता । अथ नीलादेरपरो. शस्वरूपमन्यस्माद भवतीति मातम्, ननु योधस्यापि म्यस्वरूपमिन्द्रियादेर्भवतीति मा स्यात् । अप यद इन्द्रियादिकार्य न त घेधम्, नीलादिकमपि तर्हि नयनादिकार्यमस्नु न तु माम् । अपापि पोधो पोधस्वरूपतया नित्यो नीलादिकस्तु प्रकाश्यपनयाऽनित्य इति प्राधा, सदस्यसम्। स्तम्मादेनयनादिसलादुदेति रूपमपरोक्षस्यम्, तद् अनिलः स्तम्मादिभवतु, मास्तु २५ कथम् ? नहि यद् यस्लादुरपयले तत् तस्य धम् अतिप्रसङ्गात् । तस्मादपरोक्षस्वरूपारस्तम्भादयः स्वप्रकाशा घोषस्तु नियोऽनिलो पा तत्काले फेवलमुन्नाति न तु घेदका, योरपि परसरं माध-प्राहकतापरः। अप नीलोन्मुखत्याद पोधो ग्राहकः, किमिदं सदुन्मुखत्वं नाम पोधस्यो यदि नीलकाले सत्ता मा नीलस्यापि तरकाले समस्तीति नीलमपि पोग्रा घेदकं सात् । अथान्यदुन्मुखत्वम् तत् ताई ३० स्वरूपनिम पकास नीयं स्वरूप भवेत् । तपादि-तस्य तदुन्मुखत्वं तमापास, सच व्यापारी यदिनीले व्याप्रियते तदा तत्राप्यपरो धापार स्यनयस्था। अपन माभियतेन सहलान बोपस प्राहकान्य नीलादेस्तु प्राधरयम् । अथ धापारथापरण्यापारबतिरेदेणापि नीलं प्रति व्यापूतिरूपता, सह सदूपत्वात्। ननु नीलस्यापि"स्वं स्वरूपं पियत रति यो प्रति महायाभूतिः सात् । --- H .. पोषस्य मादकत्ये नीलादेस्तु प्राधान्य सिद्ध शक्तिपरिकल्पना युना, शके कार्यानुमेपत्यात् नदसिद्धी 1-मानस्यहर-हा-1 -सात् पो. गु ... -सात् गु., चं-- ४-चात् 41 -सदार मेदो-भीमा.। (-कत्वात् तदेक- भामा । तन-गु-। - चिदूपत्य बोधस्य य-भार, मा.। १ अन्य दुम्मुर्भा, मt.. 1. हनीपस्वर-कागु. 11-पि स्वरूभा.म.॥

प्रथमे काण्डे- तु सरपरिकपनमयुक्तम्, इतरेतराश्रयप्रसङ्गात् । तथादि-चौघस्य शनिविशेषमिनी प्रति प्राहकत्यसिद्धिः तरिसद्धेश तक्षक्तिसिद्धिरिति व्यमितरेनराश्रयत्वम् । तान घोघरा नीले प्रति ग्राहकस्यसिमि तसा व्यतिरिकेऽपि योधेऽभ्युपगते सहोपलम्भनियमात् स्वसंवेदनमेव युनम् । परमार्थवस्तु सुखादयो नीलादयधापरोना इत्येतावदेव माति, नियकारस्तु चोपः स्वमेऽपि ५नोपलभ्यत इति न तस्यं सन्नाय इति कथं तस्यार्थग्राहकत्वम् ! अन एव ते प्रमाणपन्ति-रह खलु यत् प्रतिभाति तदेव सहायहतिपयमवतरति, यया हदि प्रकाशमानपुः सुखम्, न तत्काले पीडाऽनुदासमाना समस्ति, विशतिरेप च नीलादिरूपतया सफलतनुभृतामामातीति स्वमायहेनुः । तदेषमर्थप्राहकापसाप्यसिद्धेः जडस्य प्रकाशविरुद्धत्याच नाथंग्राहकत्वमपि बोरट्या युक्तम् } अथ यहिदेशसंघद्धस्य जहस्यापि नीलादेरनुभयान नीलादिप्रकाशस्य तद्ग्राहकन्वमसिद्धम् , १० नाप्यनुभूयमाने स्तम्मादिके जढे प्रकाराविषयत्वविरोधोद्धापन युक्तिसंगतम्। प्रत्यक्षसिदस्यमा वस्तुनि तद्विरतस्यमायादफस्यानुमानस्य प्रत्यक्षबाधितकम निर्देशानन्तरप्रयुककालात्ययापदिष्ट त्यदोषदुएदेतुप्रयत्नानुमानाभासत्वात् । न च प्रत्यक्षसिद्धे स्वमात्र विरोधः सिष्यति। सत्यया , हामस्थापि जानत्यनिरोधमानिः मन्येवं नीलादिसंबेदनस्यापि हदि स्वसंवेदनविषयतपाऽनुमान स्वसंविदितत्वमसिद्धम्, नापि स्वात्मनि क्रियाविरोधोनावनं युक्तियुक्तम्। अनुभूयमाने पिरोधा .१५सिद्धः । अस्वसंवेदनहानसाधकरत्रेनोपन्यस्यमानस्य च हेतोः प्रत्यक्ष निराकनपक्षविषयावेन न साप्यसाधकत्यमित्यपि समानम् । किंच, संविदितमानानभ्युपगमे 'प्रतीयतेऽयमों पहिशसंपन्धितया' इत्यत्र प्रतीदेश्यरः । स्थापिकाया अप्रतीतत्वेनाऽव्ययस्थिती व्यवस्थाप्यस्यार्थम्य न मयस्थितिः स्यात्। गहि स्वयम व्यवस्थितं खरविषाणादि कम्यचिद् व्यवस्थापकमुपलाधम् । अय प्रतीतेरमंविदितत्थेऽपि एकार्य: २०समतानन्तप्रतीतिभ्यवस्थापितत्वेन नाम्यवस्थितत्वं तर्हि तदेकार्थसमतानगरमतीनपि अपरतयाभूतप्रतीत्यत्ययस्थापितये नाऽर्थव्यवस्थापनप्रतीतिभ्ययस्थापत्यमिति पुनरपि तयाः ताऽपरा प्रतीतिः प्रतीतिव्ययस्यापिकाऽभ्युपगन्तयेत्यनयम्या । अय प्रतीतिव्यवस्थापिका प्रशीतिः स्थसंविदितत्वेन स्वयमेव व्ययस्थिति नायं दोषस्तव्ययस्यापिकाऽपि मनीतिलथा कि नान्यु पगम्यते न्यायस्य समानत्यार? अथ प्रतीतिरप्रतीताऽपि प्रतीत्यन्तरव्ययस्थापिका साई प्रथम २५तीतिरप्यव्ययस्थिताऽप्यर्थव्ययम्यापिका भविष्यतीति "नागृहीत विशरणा विशेपे युधि:"[] इति पचः कयं न परियेत ? 'प्रतीतोऽपः' इति विशेष्यप्रनिपनी प्रतीतिविवरणागयगमेऽपि शिष्यप्रतिपयम्युषामा । अपि घ, परि नदेकार्थसमयेनमानान्तरप्राय मानमर्धमाकम युपगम्यते तदा पूर्णपूर्षगानोः । पलम्बनम्यभापानामुमगेनामानानाममयरममुक्तविषयान्तरसंचारो मानानां ग यात, विषया. सानिधान:पि शानदमनमा सजायममतमातरमेनानिनिहितमास्य विषयहर' सङ्गापात् । यस्वाह-निपयोपलम्मानिमित्तमात्रनिरसी मनीतिविशेषणम्या मिरपार मानपत्रानंदनदेय न मंगवदनं, मादनमानाम युगमात् एसप प्रतिपादितम् । চাণ , মালদ্বানিলা খালি রান্নানযাফেগাস্কারা गया थायमानरत् वापि तस्येयान्यनाननिरिका विषयमापिगमे नियति सानि पासादमपि भारतिमासं मान्। अधकनियाये सत्यपि रदिपायामा सपिये प्रतिपनिमेट, मलिनामनीयम, ता परि गाना শয়া বলি ধাৰাব নিৰ ল য়ায়না না না থামাতে নাম , যা নানান বিষয় না। গা গুখি সনদর্শােন্ত -दिदियरातिR Rs सापट पदिशा था, '• *. fit rate Aftent., .

भरतपEI ८५ मायुपगम्यते! पण स्पमतिमासामायामासापनमीपते। गनु पदमापस्नाससंगतिपिर हा, सदभायम स्फुरप्रतिमासामायादिति सोऽयमितरेतराध्यदोरातसाद विषयमेनियन पर शागमतिमासभेदापसायोऽभ्युपगन्तव्यः स वैकषिपपरसादाऽयक्षज्ञानयोर्न संगच्छते। अपोन्दे पस्तुरूपायभासेऽपि म सफलतगतविशेषाभास त्यस्पष्टप्रतिमासं सत्यं प्रत्यक्षापमासिनो विशेषस्थामियामस्य तमामतिभासनात् तदेव मिमविषयायं सादापक्षयोः ५ प्रसक्तम् । अपोभयत्रापि व्यक्तिस्वरूपमेकमेय नीलादिस्वं प्रतिभाति पिशवाऽविशदी घाकारी हानात्मभूनी नन्नयमसंबविण्ये प्रतिमासमाने तत्कालः परवायभासोहानायभासाति मासम्, विशिघसामनीजन्यस ज्ञान विशदत्वात्, तदघमासबतिरेकेण तु अक्षसंपनीलम- तिमासकालेऽन्या भपदम्युपगमेन पैरामप्रतिमासानिमित्तासंमयात् । अप व भवतु विशदज्ञानप्रतिमासानिमिस एप तय पैशाप्रतिभासयबहारस्तथापि न स्वसंवि.१७ दिततमानसिद्धिः तदेकार्पसमवेतमानान्तरवेपत्वेऽपि तम्यवहारस्प संभवान। पककालापमास. यपहारस्तु लघुत्तिवान्मनसः क्रमानुपलक्षणनिमितः उत्पलपनशतातिभेदयत् । नन्वेयं सत्यह. विपशनापमासोऽपि कमायभासे सत्यपि तत पय क्रमप्रतिभासानुपलक्षणहत इति 'सदसधर्मः सर्पः कस्यचिरेकरानमत्यक्षा, प्रभेपत्यात्, पञ्चालिघर' इति सर्वसाधकमयोगे सान्तस साध्यमिलताप्रसक्तिः । तथा, समलसदसद्धर्मप्राहकेगा सर्प विमानेन ज्ञानारमा १५ गृहते, उत नेति ! यदि म गृह्यते तदा सस्प प्रमेयस्वे सति सेनैव प्रमेयत्वलक्षणो हेतुर्य- मिवारी, अप्रमेयत्वे तर मागासिनो हेतुः । अप सर्पक्षशानेन सर्पपदार्धमाहिणा आत्माऽपि रयत इति नानकान्तिका नन्ग्रे सति ययेश्वरशानं ज्ञानरवेऽप्यारमानं स्वयं गृहाति न घसा स्यात्मनि भियाविरोधः तथाऽसदादिभानमप्येवं भविष्यतीति न कश्चिदू विरोधः शिश, एपमन्युपगमे 'सानं शानान्तरमाधम्, प्रमेयत्वात् , घट्यत्त्यत्र प्रयोगे ईश्वरज्ञानस्य २० प्रमेयर सत्यपि मानान्तरमाहत्यामापात् नयानेकान्तिका प्रमेपत्यात्' इति हेतुः। तसात् सागस्य मानान्तरमाऽनेकदोपसंमघात् ससंविदितं शानमभ्युपगन्तव्यम् । सानहरूपधारमा, अन्यथा मिलानसमापादाकाराय तस्य शास्त्वं न स्यात् । न चाका शायतिरेण ज्ञानमात्मन्येष समवेतमिति सस्पैच सातत्य नाकासादेरिति पर युकम्, समयापस नियेसमानत्वात् । सानप स्वसरिदितत्वे सिदे आरमनोऽपि तव्यतिरिकस्य लह सिद्धमिति २५ यायन ससंघेदन प्रत्यक्षसिद्धत्वमात्मनः ! सष प्रपमर्पक्षस दुष्टत्पम् । दिनीयपसेऽपि येदुतम् नहि कधित् पदार्पः फरूपः करणरूपो या स्वात्मनि कमणीय समापारो र रति, तदपसहनम्। मिभञ्यापारमतिरेकेणापि आरमनः कर्तुः प्रमापस मानस्य ससंविदितत्पप्रतिपादनात् । एकस्वैर व लिङ्गादिकरणमपेल्यावस्थाभेदेन यथा ममाहवं प्रमेयत्वं च मयनिरिएरवनाभ्युपगम्यते तदाऽप्येकस्यात्मनः अनेकधर्मसद्भायात् ३० प्रमादय-प्रमाणन्ध-प्रमेयत्यान्यविस्तानि कि नाभ्युपगम्पन्ने तत्तदर्मयोगात् तचदस्यमायस्मस प्रमापनिधितत्वेनाविरोधात् ! पोचम् 'भ्रमावाविषयरवेऽप्यपरोसतेत्यख भाषितस्य कोऽर्थः' रसादि तरसारम् शादया प्रमागत्वेन च स्वरूपावमासनस्य प्रतिपादितस्थान घ घटादेः :- रस्वविदितस्य युतम्। अन्यस्वमायगनुपपरोपकम् इन्द्रियमापारे सति दारीराद् व्यक्ति राधेनु-N, T• बिना। दादा , गु.। अप मपनु, मां, मां. 1-4 झाना-गु.। ५-सहा समोर, मो, वा., . विका। सवर्णमाका, मा. १. बिना। -मरूपमा-को भो.दा.. सा. ५.७५ पं. "पस पिपस सात पक्ष । १५.१८ ...९.१.२१.६.११ ......७.५१.७१५.१७॥ .

- प्रथमे फा- नम्य विषयस्यैव फेयलस्यायभासनम्' इति तदत्यन्तमसागतम् विपयत्येव तदयमाससंवेदनसापि,-- ध्ययस्थापितस्यात् तदमाये विषयावभास एप न स्यादित्यस्य च । अतः प्रमानवमास उपपन्न एव; नंच 'कशोऽहं स्थूलोऽहम्' इति शरीरसामानाधिकरण्येनास्य प्रत्ययम्योपपत्तेलवालम्बनता, चक्षुरादिकरणव्यापारामाये शरीरस्याग्रहणेऽपि 'अहम्' इतिप्रत्ययस्य सुवादिसमानाधिकरणत्वेन ५परिस्फुटप्रतिभासविषयत्येनोत्पत्तिदर्शनाबू न शरीरालम्बनत्वमस्य व्यवस्थापयितुं युतम् । न च । 'शोऽहमें' इति प्रत्ययस्य भ्रान्तत्वे 'ज्ञानयानहम्' इति शानसामानाधिकरण्येनोपजायमानस्यापि प्रत्ययस्य भ्रान्तत्यं युक्तम्। अन्यथा 'अग्निर्माणवकः' इति माणवकेमिप्रत्ययस्योपचरितविषयस्थ भ्रान्तत्वेऽग्नायपि तत्प्रत्ययस्योपचरितत्वेन ब्रान्तत्वं स्यात् । अथ तत्र पाटव-पिगलत्यादिलम- णस्योपचारनिमित्तस्य सदावाद् भवति तत्रोपचरितः प्रत्ययः न चात्रोपचारनिबन्धन किञ्चिदम्ति, १०तदप्य सङ्गतम्। संसात्मिना शरीराघुपस्तत्वेन तदनुबद्धस्योपभोगाश्रयन्येनोपभोगकर्तुत्यस्यात्रायु. पचारनिमित्तस्य सद्भावात् । दृष्टश्च शरीरादिव्यतिरिक्तेऽप्यत्यन्तोपकारके स्वभृत्यादाघुपचरितल. निमित्तः 'योऽयं भृत्यः सोऽहम्' इति प्रत्ययः। न च मुखादिसामानाधिकरण्येनोपजायमानस्यैवाहप्रत्ययस्योपचरितविषयतेति पहुं शक्यम्, - अग्नायमिप्रत्ययवदवाधितत्वेनास्खलदुरूपत्वेन चास्याऽत्र मुख्यत्वात्। गौरत्यादेस्तु पुलधर्मत्वेन १५चाहन्द्रियग्राह्यतया अन्तर्मुखाकारानिन्द्रियाहंप्रत्ययविषयत्वासंभवात् । न च गौरत्यादिरूपाश्रयः भूतस्य प्रतिक्षणविशरारुत्वेनाभ्युपगमविषयस्य शरीरस्य 'य एवाहं प्राय मि एवान् स ययाहं . वर्षपञ्चकादिव्यवधानेन स्पृशामिति स्थिरालम्पनत्वेनानुभूयमानमत्ययविषयत्वं युक्तम् । अन्यथा रूपविषयत्वेनानुभूयमानस्य तस्य रसाचालम्बनत्यं स्यात् । न च सुखादिवियात्मकात्मालम्पनत्वे किश्चिद् बाधकमुत्पश्यामः येन तद्विषयत्वेनास्य भ्रान्तत्वं स्यात् । नापि तत्र तस्य स्खलनुपता येन २०पाहीके गोप्रत्ययस्येवोपचरितत्वकल्पना युक्तिमती स्यात् । तसादबाधितास्खलदूरुपाऽहंप्रत्ययमा हात्वादात्मनो नासिद्धिः। शेषस्तु पूर्वपक्षनन्यो निःसारतया न प्रतिसमाधानमहतीन्युपेक्षितः ॥ न चात्र यौद्धमतानुसारिणेतद् वक्तुं युज्यते-अहंप्रत्ययस्य सविकल्पकत्येनाप्रत्यक्षत्येन न तमा धन्यमान्मन इति, सविकल्पकस्यैव प्रत्यक्षस्य प्रमाणत्वेन व्यवस्थापयिष्यमाणन्यात् प्रत्यक्षविषयत्वेऽपि विप्रतिपत्तिसंभवेऽनुमानस्यावतारः। न च 'सिद्ध आत्मन एकत्वे तत्प्रतिबद्धोऽनुसन्धानप्रत्ययः २५ सिध्यति, तत्सिद्धी च ततस्तस्यैकत्वम्' इतीतरेतराभयदोपावनार 'य पयाई घटमद्राक्षं स एवेशनी तं स्पृशामि' इति प्रत्ययात् प्रत्यभिभाप्रत्यक्षस्वरूपादात्मन पस्त्वसिद्धः। न चात्रतत् प्रेर्यम्-प्रष्टरूपमात्मनः स्प्रष्टरूपानुप्रयेरोन प्रतिभासते, आहोस्थिदननुप्रयेरोन! यद्यनुप्रवेशेन तदा प्रष्टरूपस्य स्पष्टरूपेऽनुप्रयेशात् स्मरूपतवेति न इष्टरुपता तथा च 'अहं द्रा- स्पृशामि' इति कुन उभयावमामोलेरयेकं प्रत्यमिज्ञानं यतस्तदेकन्यसिद्धिः १ अथाननुप्रयेशेन तदा ३०दर्शन-स्पर्शनावमामयोमदात् कुन्त एकं प्रत्य मिनानम् ? नहि प्रतिभाममेदे सत्यप्येकत्यम् , अन्यथा घट-पटप्रतिभासयोरपि तत् स्याम् । अथ प्रतिभासस्यात्र मेदो न पुनस्तद्विषयस्यात्मना, पुनः पुनस्तस्याभेदः? न तावत् प्रतिभामाभेदात् तस्य मिनायेन व्यवस्थापितत्यात् । नापि म्यता, स्थतोऽ. चापि विवादयिषयन्यात् । अथ दर्शन-स्पर्शनावस्थामेदेऽपि चिद्पस तपस्यानुरमिभन्यामा दोषः, तदप्यमगतम्। यतो दर्शनायम्याप्रतिभासेन तसंबद्ध मेयावस्थातरूपं गृहीतं न स्पर्शनज्ञानमं- ३५पन्धि, सत्र तदयस्थाया अनुत्पन्नावनाप्रतिभासनात् । तदप्रतिभामने च तदापित्येनापस्थातुरप्यानि भासनात् । नापि स्पर्शगमतिभासेन दर्शनायस्थाच्यामिरयस्थातुरपगम्यने, पर्शनमाने दर्शनम्य मिनटन्येनाप्रतिभासनात्। प्रतिभासने चाऽनाचयस्थापरम्परामतिमासप्रसङ्गीन घमागययाऽम तिभागने तदवम्याम्याग्यिस्थानुरयगन्तुं गया । यय येन रूपेण प्रतिभाति तन सेनय मदियभ्युए गन्तव्यम् यथा नीलं नीलरूपतया प्रतिमाममानं रोनेय कोणाभ्युपगम्यते । दर्शन-पानशानाभ्यां ४. ध स्वसंवन्धित्यमेशाषम्यानुगृहाने इति तदप पपासारम्पगन्तस्य रति कुतोऽयम्यामिति । पनो नीलमतिमामऽप्यपं पर मायम्-रिमेकनीलामपरमाण्यमासोऽपातालपरमाः 1- गोरोऽहम् -मा. गां। -TET-मा., मा., -, का। परी st, 'मin, RTI-मासान्तमा, मो.। .

- ईपरम्परूपारा मानानुन मतिभागि, उमानुप्रशेन । यनुप्रयोग मनीशामपामाण्ययभागाना- ममगारानगंधेदरम्यकपरमाणुरुपयम, नाप पामनुभयान दुनो मारमानसंघरनसिद्धिः । माननुप्रयदोन सदा मी मानपरमारमामानामालाकारपानां प्रतिभागनार पुनः पलमेक- मंगवानारंवेदनं प्रतिनीस्मानपरमापसभाम मिनाया ! अप स्वसंपेदनासभासमेरे सत्यापि न सतिभान नीलभारमा भेद ननु कुतो नीलगानमाभेदः मिलावसंवेदनामेदानु, म्यतो या! ५ पनि मसंबेदनामेवा, मनम्। अमेय पावस्थापिनल्यान् । अब स्थान पय तदभेदः तदप्ययु. साम्। तस्यावासिन्यान्। पा, परि दर्शनावम्याप पर्शनारम्यान प्रतिभानीति नदयस्थान्याशिदर्शनमानेनापस्यातुन मही या नन्दे मदतिभागने तेन सदस्यामिरपि फ प्रहीतुं सपा ! सदप्रतिभासने 'तन मरस्वादमपं पातम्' स्येतदपि महीनुमाश्यीय । न पनद्धिविनाप्रतिभासादेय नव्या- १० मितियेति प युनम् तदमतिमासने तदिपितामीपाहणान् ।नय तपश्यामिस्तस्य स्वरूपमेय' पनि नमानेन तदम्पम्पमाहिमा तदभिसम्परुपातम्यामिपि गृहीतषेत्ति युक्तम् , नामावल्यम्ग सर्पमा समानत्यान्न बायाधिकप्रत्ययविषयमन एकत्यमसिलम् । न चाकात्यायपसापश फिश्चिमाधमलि, तदाधकान सभायमानर प्रमापस यथास्थानं निपेत्म्यमानत्यान् । मयनु याऽनुसन्धानप्रन्ययलक्षणादेतोलदेकन्यतिशिलपापि भतरेतरामयदोषः, यतो मेर-१५ स्वप्रतिपदमनुसन्धानमन्यापधरानद्वारेण निधीयते-येनायं दोषः सान्-अपि त्वनेकत्वेऽनुम- धानन्याममवार तनो पानमनुसन्धान मदेवरवेन च्याप्यत इस्यकमन्ताने मरणाचनुसन्धान दर्शनानुमानतोऽपि तत्तिद्धिः । न च मेदे दर्शन-मरणादिमानानामनुमन्धानं संभवति। अन्यथा যদ্বানুম অব লাগান মানু। अथ देवदन-यमदत्तयोरेकमन्तानाभायासानुसंधानम्, यत्र खेका सन्तानस्तत्र पूर्वाऽप-२० रसायोरल्यन्त मेदेऽपि भवत्यानुमन्धानम्। ननु मन्तानन्य यदि सन्नानिभ्यो भेदः एकचं च तमासाम्दान्तरेण म एवामाऽमिहिनो यमनियमनुसन्धानम् । अघ सन्तानिभ्योऽमिशः सन्ता- मलदा पूर्वोत्तरमानक्षमानो सन्तानिशदयाच्यानां देवदत्त--यादानवहत्यन्तभेदात् तदामिनस्य मन्नानापि भेद पनि कुनोऽनुसन्धाननिमित्तन्यम् ! अथैर्कसन्ततिपतितानां पूर्वोत्तरमानस- मानिना कार्यकारणभावाः भेदेऽप्येकसन्तानत्यम् नशियनशानुसन्धानमत्ययो युक्तः, न पुनर्देव-२५ दन-पादनमानयोः कार्यकारणभारः, अनम्ननियन्धनमन्तानामावनिमित्तालयानुसन्धानाभावः। ननु देवदानानं यादोन यदा व्यापार-बाहागनिलिङ्गलादमीयते तदा तद यादत्तानुमानजनक भवः मीति कार्यकारणमानिमित्तामन्लान निवन्धनाऽनुसन्धानप्रसक्तिः स्यात् । अथ स्वमन्ततायुपादानोपादेयभावेन मानानां जन्यजनकभावः मिन्नमन्तनी तु सहकारिभायेन तनाव इति नाऽयं दो ननु के पुनरिदमुपादानन्यं यदभायाद् मिसमन्तानेऽनुमन्धानाभाय:? यन्३० बसन्नतिमिट्टी कार्य उनपत्ति तदुपाशनकारणम्, पया मृत्पिण्डः स्वयं निवर्तमानो घदमुत्पादय- वीनि म घटोन्पनागदानकारअधयाऽपरम्-अनेकम्मादुरपद्यमाने कार्य स्वगतविशेषाधायक ननु, नन्वेयं निमित्तकारणम् । ननु प्रतिक्षणधिनगरवकस्वभारपायांपर्यायम्धिनमानम्यमावेषु सकृपादानोपदियभाव एष न ध्यपस्थापयितुं समयः । नयाहि उत्तरमान जनयन् पूर्घशानं किं नएं जनपति, उतानम्, उभयरूपम्, अनुभवरूपं या न सावभटम् , 'चिरलरनपस्येपानन्तरनष्टम्पायवि.३५ पमानन्वेनोत्पादकत्याविरोधात् नायनए, अपानामगरसहान् । नाप्युभयरूपम्, एकस्वभावस्थ पिस्तोमरपामम्मवान् । नाप्यनुभयरूपम्, अन्योन्यपरच्छेदपाणामेकनिषेधस तदपरविधानना- म्तरीयकन्धेनानुमयरूपताया अयोगात् । अप यदि घ्यापारयोगान् कारणं कार्योपादकमभ्युपगम्येन तदा सादर्य दोप-यदुन नस्य व्यापारासम्मयान् कथं कार्योत्पादकत्यम् , यदा तु मानावमात्रमेव कारलस्य कार्योन्पादकाय नदार कुत पतदोषाधम! नन्तलिसम्युपगमे भाग्मारिनोऽनेशलादुपजायमाने का पुनोऽयं विभाग:-- १ रनोमनाम में अपरनलीन मानारमाबदामन निसर्प। -सनेन सदा., भौ.मना। -मनेति तद-गाना-।, ३-तलरमा, भो। ४-पासंताने पति-गु.। ५ . पाविना मी ६ चिरंतर-ग्रे., गु..

rforman- प्रयने काई- दमयोपादानका ... काणानुनिहितान्याय-गानी मल्यमापयति नायर दुरवसेषम् । अयामिदिन नकारण यम्य लक्षणं गदयगमात् कथं तत् दुग्पसेयम् । सत्यम्, उनम् न तु कचिद ५नुगमे सर संभवति । नाप्ययमातुं शश्यम् । गयादि-यत् म्यगतविशेगधायकत्यमुपादानत्यमुक्तं तन् बिगतकतिपयविशेषगवार- आदोस्थिम् मालविशेगधायकन्यम् इति ? नत्र यदि प्रथमः पहा,मन युक्तः रयिंभमान स्थान फस्यासदादियिमानस्य नं प्रयुगदानमायनमहात् । तथा, मपम्यापि रूपानं प्रत्युपादान सनिः, नस्यापि स्वगनकतिपयविशेषाधायकन्यात् । अन्यथा निगशारय योयम्य मान प्रत्यवि १. 'रूपस्यायं प्राइको न रसादेः' इति ततः प्रतिकर्मण्यवम्यान मान् । स्पोगदानन्ये च : परलोकाय दसो जलाअनिः म्यात् । किञ्च, कतिपयविर्शानायक ग्रेनोपादानवे एकम्यय पान तत्कायांनुगत-व्यायुनानेकथर्मसम्बन्धिन्याभ्युपगमे विदयमांचामोऽभ्युपगतो भवति । यया युगपदाव्यनेकविनयधर्माभ्यासेऽप्यकं विमान तथा प्रममाव्यनेकनरर्मयोगे किमि नाभ्युपगम्येत? अथ सफल विशेषाधायकत्वेन, न तर्हि निर्विकल्पकात् मयिकत्यकोपत्तिः । न च निरिक योरप्युपादानोपादेयत्वेनाभ्युपगतयोलगायः भ्यान्, नया च कुनो रुपाकाग समननपर कदाचिद् रसायाकारम्यान्युपादेयन्येनाभिमनस्योत्पत्तिः? अथ विमानसन्तानयात्याभ्युपगमा नाऽयं दोषा-मेन मयस्य स्यमहशस्योत्पत्तिः-नर्य दर्शने एफस्मिन्नपि सन्ताने प्रभातनानात्वास तथा 2 गयाऽश्यदर्शनयोमिनिसन्तान २० रेकेन हटेऽर्थेऽपरस्यानुसन्धानं न शान्, देवदत्त यमदत्तसन्तानगतयोरिवान्येनानुभूतेऽन्यत दृश्यतेच- "गामई मातवान् पूर्वमश्यं जानाम्यई पुनः" [लो०या० सू०५, आन्म सो०१२८ किया सकलस्त्रगनाविशेगधायकन्ये सवांमनोपादेयमानसणे तस्योपयोगाद् अनुपयुकसारस्व यस्याभावाद् योगिविनम् रूपादिकं चैकसामन्यन्तगर्ने प्रति न सहकारित्वं तस्यति सहक २५कारणामात्रै नोपादेयक्षणव्यतिरिकाकार्यान्तरोत्पादः। अथ येणं कारणमेव कार्यतया परिणमति सेषां मयत्ययं दोपणे त्यस्माकं प्राग्मावमा कारण मम्युपगच्छनाम् । नन्वापि मते येन म्यपण विज्ञानमुपादेयं विमानान्तरं जनयति से रुपमेकसामध्यन्तर्गतम्, उत स्वभावान्तरेण? नत्र यदि तनय तदा सामपि भागमुपादेय म्यान्, तत्स्थमायन्यन्यात्। नदुसरझानक्षपयत् । अयं स्वमायान्तरेण तदोपादानामिमनं भ- ३० द्विस्थमायमामन्यते । यथा चोपादान सहकारिम्बमायापरययोगलथा लोक्यान्तर्गनान्यजन्यकार स्तगपेनया तस्याजनकत्यमपि स्वभावः ततधेकत्यं धानक्षणस्य यथोपादान-सहकार्य जनसल्याने दियधमाप्यासितस्याभ्युपगम्यते तथा हेच-विषादायकवियत्तात्मनस्तन्मन्तानस्याप्यभ्युपगतामा अयोपादान सहकार्य जनकन्यादयो धास्ता करानाशिनिपापिनापन्य तस्य संवेदना यसानिमिति न तेस्लदपनीयत इति मतिस्तात्मनोऽप्येकायं मस्तानमामिधेयनया प्रतिमा ५म्याधेनाभ्यशसिद्ध झमयदर्ष-विपादादिकार्यदर्शनाऽभुमीयमानतासानन्याऽनकायमा पनयं गया ।मन्न स्थानमालयमांधायान्यमुपादानायं मयाभ्युपगमेन सहनम् । मापि सन्ता- मनिय कायॉरपादकम्यम्यमायम्, नयाभ्युपगमे मानसन्माननिय परलोकामायममा अथ गमनम्तरप्रत्यपन्यमुगदानत्यगुच्यते । মধ্যষ্টি-মশঃ, সালাম, -स्वानुगमे , मा. भो ... मोरयान-मा., भी। सद निशिकोपति. -पत्रिकायो-ना• RPI .खाना--, म । 1. 'मास्मा मां-पा, for-माया-मा, मा. 18षादिविष- 4.-Tीपमा तर barot नुापमान काम- राशाने या .

ईश्वरस्वरूपवादः। मन्ययोः जनकः । न चैतद् मिप्रसन्तानादिति न सत्रानुसन्धानसंभवः । नन्वत्रापि समत्वं कार्यण पशुपादानरचे प्रत्ययस्य तदा पत्तप्यम्-किं सर्पधा ममत्यम्, उतरदेगेन! यदि सर्यधा सदसत्, कार्य-कारणयोः मर्पया तुल्यत्वे यथा कारणस्य माग्भानिय तथा कार्यम्यापि स्यात् तथा च कार्य-कारणयोरेककालत्या न कार्यकारणभावः, न होककालयोः कार्यकारणभावः सम्येतरगोवि- पापयत् । नधा, फारणामिमतस्यापि स्वकारणकालता, तस्यापि स्वकारणकालतेति सकलसन्तानन्- ५ पमिदानी समस्तं जगत् स्यात् । अथ कक्षित् समानता, तथा सति योगिमानस्याप्यस्सदादिभाना- लम्बनम तदाकारत्येनकमन्तानत्यं स्यात् इत्यादि दूषणं धोकमेव । अथानन्तरत्यमुपादानत्यम्, ननु सनिकालपमे सजगत्क्षपानन्तरं मिक्षितक्षणे जगद् जायत इति सर्वेषामुपादानस्यमित्येकस. मानत्वं जगनः । देशानन्तये तशनुपयोगि, देशव्यवहितस्थापीहजन्ममरणचित्तस्य भाषिजन्मचित्तो- पादासनायुपगमात् । प्रत्यपन्यं तु नोपादानन्यम्, सहकारित्वेऽपि प्रत्यपन्यस्य मायान् । नन समन-१० लरमत्ययस्वमप्युपादानन्यम् । न च प्रतिक्षणविशरापु भावेषु कश्चिद् एकान्वयमन्तरेण जनकन्य. मपि संगमहले किमुनोपादानादिविभागः' इति क्षणभङ्गभङ्गप्रतिपादनायसरेऽमिधाभ्यामः। अत्र केचित् तुल्येऽपि जनकन्ये स्व-परसन्तानगतयोर्विमानयोग्पादानन्धे कारणमातु:-"म्वम. न्तता पेनितं माने जानान्तरजनपम्, न त्वं परसन्नती अनो जनकन्यन्यतिरिनाम्योपादान कारणवे निमिना संभवादियभूनादेनुपदमावाद् व्यवस्था" । अम्यापि व्ययम्यानिमित्तत्वमयुनम्, नहि १५ बानमंसंवेदिनं प्ययस्यां लभते । संधेदन हिमानानां म्वन पधेप्यने, नप स्वमन्तनिपतिने एव पर- सन्नतिपतिनेऽपि नुल्यम् । सानान्तरयेद्यन्यं तु न शाक्यैरभ्युपगम्यते भानमा नियमन नि नायम- प्पतिप्रमापरिहार न च स्वमन्नतापपि स्वसंविदितमानपूरकता भानम्प सिक्षा, भूपचन्योनर- पारमाविज्ञान तथान्यानयगमान्। यतो विधानपूर्वकन्धेऽपि तत्र विप्रतिमा पादिनः पुनः पुनः संविदितमानपूर्वकत्वम् ! नतत् म्यान् विमानपूर्वकन्वानुमानेन निधयान् कविप्रनिरनिः १२० तपदसितम् 'तघाती सभ्रातीयोन्पत्ति' इति, एतदमत्। अनजातीयादपि भागनामुपनिर्ग नाम्, पया घुमादेः। पेप्पा:-"महा-साराभेदेन भावानां विजातीयोत्पत्यसंभवादेनददरमम् गमपि सरा माहाविवेको नाममातगोवर, कार्यनिरुपयायामपि तयोपियो भन्नलानुपर- रिदार । यः पुनरुच्यने-"सर्प ममानजातीयादुपादानादम्पतिः, आयम्गापि मारणम्योपादा-२५ मलेन प्ययम्पापिता कशालता अण:" तापि मजातीयन्यं न विपादीनां समादिपूर्व परवेन पा मनातीयन्यम्, धमत्योपलशिलापयधपूर्पकायेन था! प्राच्य रिमोदानी पिसानी निगोरसम्यादुपजायमान । उतारिकापेऽपि मानतानामयपानां पमन्य मोकिम्, पारिभाषिक या परिभाषायानावदयमाविषयः । लोकेऽपि नाकारम्पम्भिवानामानां मेर धूमन्यव्यवहारकामाक्षेपापिलोकमसिनत्यपहागनुमरकं युक्त पार्नुमा मात्र मानीयातुनिः।१० समाओपने-धामपस्यायो विमानाभाये तपस्यात पुनस्योनापारी रिमिन भवेत् 'न मया मिशिदपि पेसितम्' 'स्मृतिहीयमनुभवपूर्षित, अतो पेनानुमोनार किशिपयने नामपस्यायां तम्यापर समापोऽभ्युपगन्तया एतत् मुसालमान शशि. तिनं मा पनि एपना पत्यवेदन पोध्येत, सम्पादन पा! पवने मस्त निधो न दुः। सापावेदन नुपरदिनाभ्युपगमे रोमारिनम् । मलास्दिानीमेप मनोसामनदास्यागी सदानमःमधेएने। अम्नु धाममा विभान तथापि जयासिरिमामा, समरम्नरम अमान्यानिलियुपगम्यमाने मोनालिगमे नया व पानं मारपली मसनम्तमपन्य रेप वासलापसमादेन अपन' म । अप जरय- ममनमायादणे पाः भारपरिकार, अरिपन न प दिसपना भास्सिामनपर किमिमानी माया मानानुनि मेन्युरने पनि ! र Tu..ति-.... नागादि.VE ... r. ...भारम-... -वाशिवं शेर-... दश - शारिरिला-.. नग्नापरले ir.

Frier Tarat वर्ष rartarfram मनन rearrettrariet ranfri.ITATrir TTAIT Teri मिति TAP immatram. Timire, ने च HTTrrfiपितम्। ग. Araria मानना नो नाameriयो मिनी-fromrajHrinting-fe काम- गांनुपान गनिम MIRRiti IIT-Frani. free mir TETH, न गोणी मार। म मात्र भागभाग नानिमः । तर कामानि मामा मानमानसोनधिकार परमादन "गुनिगि मगमगात, अन तो नि: [ বা দু লাহানী ৮ শে না ; নমিননামান, আগন্নি, गारमा मानिनादानमा प्रागे ममागनिमयान । যা -মূঢিাকা বিয়ানামাইন লাগােনা নমনিমামি, समयस्यापा रिमानामागाहसमानार्गमा । नादि-न तापत् सुन पर तपस्यामा विधानामा पेगिता निभानानामा साग तय मानयाद न तदयम्यापी भदमाय । नापि स्थितनमा योग. काल-IIT-बमाघानुनाधीनां विदनि धोंडज पियेण्यापागा अगम्य नरमायापमामान्यापोगात्न यामात्रयन् तनावयापि मस्या २०मयम्यापामप्रतिपतिः, मामनि" परिदिनविभानातिनानन्येन निश्चितम्य मानापानसरोष्य- साकारविशेगदम्गाइयम्यापामुपलम्पमानलिममा समायेनानुमानप्रीत्युपत्तेः । जाप्रदास्यासमत पासन्ततिपतिनघेनोसाम्मदादिमियोनालियनोद्नानुमानमन्तरेणाप्रतिपत्तेः । न किञ्चि तिनं मया रति लग्णादुराकालमाविनलदपस्थायामनुभवानुमाने कि पस्यमयेदनम् स्वरूपामवेदन पा' इत्यादि यद् इषणममिहितम्, तथ्यमारमा जामध्यस्थामायिन्यपिदिनगन्तृणपर्शानाच '२५ विकल्पममयगोदर्शनादिपूत्तरकालमापि न मया किशिदुपलक्षितम्' इति स्मरणलिबलोइमतानुमा नयिपयेप्यप्यम्य समानन्यान् । न च स्वसंविदितपिशानयादिनोवापि ममानो दोष इति यई युकम्। "यस्य यायती मात्रा" [ अति स्वसविदितमानम्याभ्युपगमान् । यच 'ममनन्तरसहकारित्वाचनकयमयुक्तत्वमेकक्षणे मानम्पासम्यते इति प्रतिपादितम् ता. भ्युपगम्यमानत्वेनादूग्णम् । अतः पर्यापर्यव्यवस्थितहर्ष-विपदाधनेकपर्यायव्याप्येकामध्यतिरेकर ३० मानयोः स्वमन्तानेऽप्यनुसन्धाननिमित्तोपादानोपादेयमायासंभवाद् न परसन्तानपदनुसंधानप्रत्ययः स्यात्, श्यते च अनोऽनेकत्यव्यावृत्तादनुसन्धानमत्ययादपि लिहादात्मसिद्धिः। अथापि स्याद् गमकन्यं हि देनोः म्बसाध्याविनामावग्रहणपूर्वकम, तद्रहणं च धय॑न्तो, न चावकार्नुकत्वेन साध्यमिव्यतिरिने धम्यंन्तरे प्रतिसन्धान व्याति: येन निमन्धानादेकर कर्ताग्नुमीयेत । अय भूपे क्षणिकतासाधकस्य सत्तास्यस्य हेनोर्यया धय॑न्तरे व्यायाहणेऽपि ३५गमकता तदस्थापि, एनदचामा तस्य हि क्षणिकतायां प्राक् प्रत्यक्षेण निश्चयानिश्चयविषयेण च प्यामर्दर्शनाद् विपक्षात् प्रच्यावितस्य याधयमाणेन साध्यधर्मिणि यदयस्थानं तदेव स्वसाप्येन ध्यातिग्रहणम् । अत पयाम्य हेतोः साध्यधर्मिण्येय व्यामिनिश्चयमिच्छन्ति । ननु व्याप्ति साम्यनिधय- योनियमेन पौर्यापर्यमभ्युपगन्तव्यम्, व्याप्तिनिश्चयस्थ सायप्रतिपाङ्गत्यात् अत्र तु साभ्यर्मिणि, व्यातिनिधयाम्युपगमे साध्यप्रतिपत्तिकालोऽन्योऽभ्युपगन्तव्यः, न चासावन्योऽनुभूयते; अस्त्येवर १-यरवेजननं वि-वा., वा। २ पृ. ८९ पं. २१ । ३त्यादि, तदपि न मां. ब. ४.७५.२०५८१.१४ । ६ पृ.८९५०२६। संभवीत्यभिधायि वि., मा०, कागुन संभयतीस्पमिधा-मा०, भो । ८ पृ. ४९५.१४-दोऽपि मा। १. पार्थे सिदो-गा। --निसंधि-मो. १२-रोत्तानाकारल्यां। १३ पृ.८१ पं. ३।। १५-पतेःका-कां। १४ पृ. ८८ -4..

ईश्वरसरूप कार्यदेतो, पम्पचित् स्वभाषदेतोरपि असनु पापका प्रमाणाद् विपार प्रच्युतस्य यदेष साध्य धर्मिणि स्वमाययातया प्रहणं तदेय साध्यप्रणम् । म चास्थप हेयम्, यतो विपक्षाद व्याय- सिरेयान्पयमाक्षिपति । इपास्तु विशेष:-कस्यचिद् हेनोर्यासिविषयप्रदर्शनाय धर्मिविशेषः प्रदेश्यते, अम्र तु 'यम् मत् तत् मणिकम्' इति धर्मिविशेषाप्रदसनेऽपि धर्मिमामाक्षेपण व्यामिप्रदर्शनम् । तश सत्यं कचिद् व्यवस्थितमुपलभ्यमानं क्षणिकताप्रतिपस्यहम्, अतः पक्षधर्मनाऽप्यत्रास्ति, न पायम् । ५ अशाप्येनमेष न्यायं चिदाहुः । कपम् ! सप्र हि ध्याएकस अंमयोगपद्यस्य निवृत्या विपक्षात् तभिवृत्तिः अपि प्रमादनियतताया व्यापिकाया अभावाद् विषक्षा प्रतिसन्धानलक्षणस्य देतो. निवृतिः। अथ तर याप्रमाणम्य प्राप्तिःप्रत्यक्षेण निधीयते-प्रम-पोगपद्याभ्यामनियाकरणस्य प्रत्यक्षेण निधयात्-अप तु कधम् ! अत्रापि प्रमानियमपूर्षकत्येन स्वसन्तान पप प्रतिसन्धानस्य ध्यातिनिश्चयात कथं न तुल्यता! अथ भूयात् 'प्रमानियतता' इत्यस्य भापितस्य कोऽर्थः । यदि पर भरण्यन्तरेणकीकत्यं सायं म्यपदिश्यते तन्य प्रत्यक्षेण निधयाभ्युपगमे कथं याधकप्रमाणापसेयता ध्याः १ नैतत्, प्रमातृनियत- तामहणं मैककात कन्यपहणम्। म एप हि भाषा वेशादिनियततयाऽषसीयांना व्ययहारगोचरतामु. पयान्ति, ममातुरप्यवसाय पपमेय ६दयते-दानीमनाइम्' । पपं देशाधसंसर्गयत् प्रमानन्तरासंस. गोऽपि निधीयते । तथाहि-देश-कालनिवन्धननियमय व्यतिरिकपदार्थासंसर्गस्वभावनियतमति-१५ आदोस्विदन्यथा' इति, अथ च प्रत्यक्षेण याधकस्य व्याप्यवसाये पश्चाद् घ्यापकानुपलगया मूल. देतोयातिसिद्धिः पयमेककाईकन्यानवसायेऽपि प्रमातृनियततया प्रतिसन्धानस्य स्वसन्तती व्याति-२० निश्चये सत्युत्तरकालं विपक्षे व्यापकस्य प्रमानियतत्पस्याभाषादेकवर्तकत्वेन प्रतिसन्धानस्य च्याति- सिद्धिः। एपमनभ्युपगमे अहम् अन्यो या' इति प्रमात्रनिधये प्रमेयानिश्चयाद् अन्धमूर्फ जगत् स्थान् । औपचारिकम्य प्रमादनियततया प्रतिमासविषयन्येऽनात्मप्रत्यक्षत्वं दोपः। तबैतन् स्वास्-अस्त्ययं प्रभातृनियमनिधयः। स तु स्वसन्नती किमेकककत्यरतः, उतस्वि. निमित्तान्तरलो युक्तः । तकस्यां सन्तती हेतु-फलभायलक्षण प्राक् मदर्शितम् । सत्यम्, प्रदर्शितं २५ ननु साधितम् । तथाहि तत्थतः प्रमानियनो मान्यस्त इति नैतावत्प्रत्यक्षस्य विषयः नच प्रमाणा- न्तरस्थापि । तदि अस्मिन् विपये उध्यमानम् अनुमानमुच्येत, तदपि प्रत्यक्षनिषेधातिपिलम् । न च क्षणिभ्यम्यवस्थापने हेतु-पलभायरतो नियम इत्यभ्युपगन्तुं युक्तम् , तस्योपरिष्टात् नियमानत्यात् । मचात पय दोगर एकककन्धरतोऽपि न नियम इति या शक्यम्, स्वसंवेदनमत्यक्षसिद्धत्वस्य तत्पूर्घकानुमानसिद्धत्यप चात्मनि प्राए ध्यपस्थापितत्वात् । अभ्युपगमवादेन तुक्षणिकत्यव्यवस्थापक:३० सत्यहेतुतुल्यन्यमनुसन्धानप्रस्थयतोवर्शितम्। न तु क्षपिकाबपद् आत्मकत्यस्य मत्यक्षासिद्धत्वम् येनानुमानात् तेजसियभ्युपगमे इतरेतरायदोपप्रसङ्ग भेर्यत । अतोऽध्यक्षानुमानममाणसिद्धत्यात् परलोकिनः "परलोफिनोऽभावात् परलोकाभाषः" इति सूत्र निःसारतया व्यवस्थितम् । यदम्युष्यते शरीरान्तर्गतं संवेदनं कथं शरीरान्तरसंचारि जीयतस्तापनदारीरान्तरसंचारोः परस्मिन् मरणसमये भविष्यतीति दरम्ययमेतत् सदपि न युक्नम्। यतः कुमारशरीरान्तर्गताः पाण्डि-३५ स्थादिषिकरपा धूमावस्थाशरीरसंचारिणो रयन्ते जीयत पय, चपलसादिशरीरापस्पाधिशेषाः पार घिकागधा तात् कथं न जीपतः शरीरातरसंचार अथैकमेवेदं शरीरं याल-कुमारादिभेदमिनम, अन्मान्तकारी मु मातापियन्तशुकदोणितप्रभयम्-शरीरान्तरप्रमयम्, एतदप्ययुक्तम्। पाल-पु.मा. मारपापि मेदात् पया चपाल-कुमारदारीएचपलतामेदस्तयणादिसरीरसकारी उपलभ्यते ता १ मामय योगप-या., ., गुरु, क.। २-मानव्यय-बा, गु.। ३-करचे नि-1, 7.। -अपभापः था. बा. ५-माएनि-मो.। -मानुनिया-मा...-मावनिपत-पा., . . स्पदोष मा. बिना। पृ. ११ । ततातिसि-बार, माबिना। १.१.१.२९। ".१.१४॥ -- * प्रथमे काण्डे-- '- J निजजन्मान्तरसारीरप्रमयश्चपलतादिमेदः परभवभाविजन्मशरीरसंचारी भविष्यतीति तनों न माता पिशुका-शोणितान्याय जन्मादिशारीरम् अपि तु स्वमन्तानदारीरान्ययमेव, वृद्धादिशरीरयन् : अन्पया, मातापितशरीरचपलतादिविलक्षणशरीरचेष्टावन्न म्यान् । अयेहजन्मबाल-कुमारावस्थामेटेऽपि प्रत्य मिमानाद् एकत्वं सिद्धं शरीरस्य तदयस्थाच्यापकस्य तेन न तदृष्टान्तबलादत्यल मिन्ने जन्मान्तरः ५शरीरादी मानसंचारो युक्तः, तदसत्। पूर्वोनरजन्मशरीरमानसंचारकारिणः कामंपशरीरयात एव कथञ्चिदेकत्वसिद्धः। तथाहि-मानं तापदिहजन्मादायन्यनिजजन्मझानमम प्रसाधितम्, तम्य चेहः जन्मयाल-कुमाराद्ययस्थामेदेषु तदेवेदं शरीरम्' इत्यापितमत्यभिशाप्रत्ययावगनैकापाययिषु संग- रदर्शनात् पूर्वोत्तरजन्मावस्यास्त्रपि तयाभूतानुगामिरूपसमन्वितासु तम्य संचारोऽनुमीयते । न चासदादीन्द्रियसंवेद्यरुपायाश्रयस्यौदारिकशरीरस्य जन्मान्तरसराद्यवस्थाऽनुगमः संमयति, तर १० तदैव च दाहादिना सोपलव्धेः । अतो जन्मदयायम्याध्यापकस्योप्मादिधर्मानुगतस्य कार्मनगरीरस्य विज्ञानसंचारकारिणः सद्भावः सिद्धः। पूर्वोत्तरजन्माषस्थाध्यापकस्यायस्यानुस्लवस्थाभ्यः कश्चिन- मेदाद् मातापितारीरविलक्षणनिजशरीरावस्याचपलताद्यनुविधाने उत्तरावस्थायाः कथं नावस्थान: धर्मानुविधानम् ? "तस्माद् यस्यैव संस्कारं नियमेनानुवर्तते । शरीरं पूर्वदेहस्य तत् तदन्ययि युनिमत्" । [ 'अथ पूर्वापरयोः प्रत्यक्षम्याप्रवृत्त कार्यकारणभावः, अनुमानसिद्धावितरेतराश्रयदोषः' इति, तदपि प्रतिविहितम्, एवं हि सर्वशस्यत्वमायातमिति कस्य दूपर्ण साधनं या केन प्रमाणेन ! इइलो कस्याप्यमावप्रसतेरिति प्रतिपादित्वात् । अथ कार्यविशेषस्य विशिष्ट कारणपूर्वकन्यसिद्धी यथोक्तयकारेण भवतु पूर्यजन्मसिद्धिः, भावि. २० परलोकसिद्धिस्तु कथम् भाविनि प्रमाणामावात् ? तत्रापि कार्यविशेगदेवेति घूमः । तथाहि-कार्य- विशेषो विशिष्टं सत्त्वमेव, तश्च न सत्तासंबन्धलक्षणम् तस्य नियमानत्वात् । नाप्यक्रियाकारि त्वलक्षणम्, सन्ततिव्ययच्छेदे तस्याभायमसहात् । तथादि-दाग्द-बुद्धि-प्रदीपादिसन्नानानां या दोऽभ्युपगम्यते तदा तत्सन्ततिचरमक्षणसापरक्षणाजननादसत्यम्, तदसत्वे च पूर्वपूर्वक्षणाना मर्थक्रियाऽजननादसत्वमिति सकलसन्तत्यमायः। अथ सनसन सजातीयक्षणान्तराजननेशि २५सर्पक्षसन्ताने स्वग्राहिमानजनकन्येन समिति नाय दोषः, तदसन् । स्वसन्ततिपतिनोपादेयमानः पत्ये परसन्नानपर्तिस्वप्राहिमानजनकत्वस्याप्यसंमवात् । नापादानकारणत्यामाये महकारिकारणात्य प्राचिदप्युपलब्धम्। तमभावे पा एकसामध्यधीनस्य रूपादे रसतस्नन्समानकालमारिनोऽम्पभिया.. रिणी प्रतिपतिनं स्यान्, रुपक्षण स्त्रोपादेयमणान्तराजननेऽपिरसमन्नतीसहकारिकारण येन ग्स क्षणजनकन्याभ्युपगमात् । तन्मदायेऽपि तत्समानकालमायिनो रूपादरमायाम् । तभोपादानशारणा- ३० मावे सहकारिन्यस्यापि समय इति स्वसलत्युच्छेदाम्युपगमेऽक्रियालमणम्य मस्यभ्यासम्मय इति उत्पाद-व्यय-भाग्यलक्षणमेय पत्तमभ्युपगन्तव्यमिति कार्यविशेषणातायधोकमकारमातीनका लयदनागतकाटसंबन्धित्यमप्या'मनः मिसम् । यदप्युनम् 'यघागममिद्धत्यमामनः, तमा या प्रतिनियतकर्मफयसंयन्धानरिमोगुणगाने तदानुमानवपर्यम्' इनि, नदी मूमेश्वरचेष्टितमा नहि सम् ति निकाणमामालापान २५वानु प्रतिशेतुं पुनम् : नदि आगमसिद्धाः पदानि प्रत्यापि प्रतिशगो युगः पदापि मन्महाउनुमानाधिपये बायें आगमनामाग्यमादिमिस्नम्प प्रामाण्यमभ्युपगम्पो-तकम् "आनामा किया:यंत्यादानयंयमतदानाम्-'मि. १-२-1] नि, सदपुटम। यतो पण प्रदाननीने शिप्रतिनिधिय:नुमानमपि प्रवृतिमागायतीति मनिशदिन तथा प्रत्यनाउनुमाननियामला या प्रतिनियमसंयम समर -.। पापितम.। भवनमा- . मानसिमषि-., 4. ka५ दिगति गर्य-मी., मा.। 12. पा..!

] धरारूपवादः। किमियागमय प्रति भ्युपगमस्य विषया! न घागमभ्य सत्राप्रामाण्यमिति.पएं गुनम्, सर्यम- प्रणीतत्वेन सन्मामाण्यस्य व्यवस्थापिनन्यात् । प्रतिनियतकर्मफलसंबन्धमनिपावभागम:- "यहारम्भपरिप्रदत्वं च नारकर" [तत्वा० अ० ६, २०१६] इत्यादिना पानकमुरयेन धीरनोऽम्पैथानुमानविपयत्यं प्रतिपादपिनुकामेन । यथा च कर्मफ. लसंवन्धोऽध्यान्मनोऽनुमानादधीयते तथा यथास्थानमिहय प्रतिपादयिष्यामः । आरमस्यरूपमति- ५ पादकः प्रतिनियतकर्मफलसंपन्धमतिपादकधागमः- "एगे आया" [स्थाना प्रथमस्था० सू०१] "पुयि दुधिषणाणं दुप्पडिफतार्ण कडाणं फम्मा" इत्यादिका सुप्रसिर एष । नदेयं प्रत्यक्षाऽनुमानाऽऽगमप्रमाणप्रसिद्धस्याद् नारक-तिर्यग-नराऽमर- पर्यापानुभूतिस्वभाषस्यात्मनः, न 'भपादयुत्पमिः अर्थाभापास् डिस्यादिशब्दव्युत्पत्तितुल्या' १० इति स्थितम् ॥ [पूर्वपक्षः-जगतः ईश्वरकृतत्वस्थापनम् ] अत्राहुयायिका:-श-कर्म-विपाऽऽशयाऽपरामपुरुषाभ्युपगमे "नित्यं सत्यमसत्वं या" इति दूपणमभ्यधायि नत्र नभित्पसत्यप्रतिपादने नाला काचित् क्षतिः, प्रमाणतो नित्यज्ञानादि- धर्मपलापान्वितस तस्याभ्युपगमात् । मनु युक्तमेतद् यदि तधाभूतपुरुषसद्भावप्रतिपादफ किश्चित् प्रमाण स्यात, सद्य नास्ति । साहि-न प्रत्यक्ष तथाविधपुरपसमायावेदकमसदादीनाम् । असद्विलक्षणयोगिमिस्तस्यायसाय इत्यत्रापि न किशित् प्रमाणमस्ति । यदा न तत्स्वरूपग्रहणे प्रत्यक्षप्रमाणप्रवृत्तिस्तदा ततधर्माणां नित्यहानादीनां सोययातघन संभवति । नानुमानमपि युक्तम् पनन्स्वरूपावेदकम् , प्रत्यक्षनिषेधे तत्पूर्षकस्य तस्यापि निषेधात् । सामा-२० न्यतोरटम्यापि नात्र विपये प्रवृत्तिः, लिस्य कस्यचिन् नन्प्रतिपादकस्याभावात्। कार्यत्यस्य पृथि. प्याधाधिनस्य फेयाचिन्मतेनासिनि च संस्थानवासस्य तस्माधमन्यम्, प्रासादादिसंस्थानेभ्यः पृषिष्यादिसंस्थानस्यात्यन्तलक्षण्यास संस्थानशाप्दयाच्यत्वेन चातिमसक्तिर्दर्शिता "यस्तुभेदमसिद्धस्य सन्दमाम्यादमेदिनः" [ इत्यादिना । ससानानुमानं तत्साधनायालम् । २५ नाप्यागमः, नित्यस्यात्र दर्शनेऽनभ्युपगमान् । अभ्युपगमे या कार्यार्थप्रतिपादकस्य सिद्ध यस्तु- म्पन्यापतेः । नापीश्वरपूर्षकस्य प्रामाण्यम्, इतरेतराश्रयदोपप्रसङ्गात् । अनीश्वरपूर्षकस्यापि संभा- प्यमानदोपन्येन प्रमाणनाऽनुपपत्तः। तस्यान्येभ्यरपूर्पकन्वे तम्पापि सिद्धिः कुन ति पनव्यम्, तदा मिशीन तस्य प्रामाण्यम्, अनेकेश्वरप्रसादोपभा भवतु, को दोषः यत एकस्यापि साधने घयमती. पोन्मुकाः किं पुनर्यहनामिनि पेन्, न कश्चिम् ममाणाभावं मुफ्त्वा । तनागमनोऽपि तन्प्रतिपत्तिः।३० पषं स्वरूपासिसी कथं तस्य कारणता! अशा-पदुनम् न तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणम्' नदेयमेघ । यदपि 'सप्रकारम्यागमय न तम्स्य- रुपादने घ्यावृतिः' तोच्यते-आगमायापारेऽपि समस्यरूपसाधकमनुमानं विद्यते । आगमायापि सिद्ध लिङ्गदर्शनन्यायेन यथा प्यातिन्नथा प्रतिपादयिष्यामः । प्रत्यक्षपूर्वानुमाननिषेधे सिद्ध- साधनम्, सामान्यतोशनुमानम्य तन्त्र व्यापाराभ्युपगमात् । नन्यनुमानप्रमाणतायामयं विचारो३५ युनारम्मः, तस्य तु प्रामाण्यं नानुमन्यन्ने चायांका इति, एनद्यानुदोयम्। अनुमानमामाण्यस्य म्ययस्थापितन्यात् । पतूतम् धिप्पादिगतभ्य कार्ययस्थापतिपतेन तस्मादीभ्वरायगम' सर पृपिन्यादीनां योद्धः कार्यन्यमभ्युपगतं ते करमेयं पदेयुः। येऽपि चाकाचाः पृपिम्यादीनां कार्यरयं नेच्छन्ति नेपामपि २ प्रतिमहत्वं नार-मा.। ३ "पुरा पोराणा दुरिगाणं दुष्परिना का पाका सम्मा" स्मादि-मातारामकथाम + १.४.पं. 1-विपाकसू ५.३८ दि., पं. 11 ४.६९५.२७॥ ५-साधे पा- गामा, बा। प्र.प.पं.१५ ३.पु.पं. २९। प्र...। - .. प्रयमे कार- विशिष्टसंस्थानयुकानां कथमकायंता ? सवै संस्थानयन्, कार्यम् , संच पुरुषपूर्षकं दृष्टम् । वेऽध्याहुः- "संस्थानरान्याच्यायं केवलं घटादिमिः समानं पृथिव्यादीनाम् न सत्त्वतोऽर्थः कश्चिद् प्रयोगलः समानो रेयने" । तेषामपि न फेयलमत्रानुगतार्थाभायः किन्तु धूमादायपि पूर्षापरण्यक्तिगतो मेष कघिदनुगतोऽर्थः समानोऽस्ति। अय त यस्तुदर्शनायानकल्पनानिमिनमुन्नम्, अत्र तथाभूतस्य प्रतिभासमाभायात्रानुगना कल्पना। तथाहि-कस्यचिद् घटादेः क्रियमाणस विशिष्ट रचना कार्यकां कन्यापि घट-प्रासादादेस्ता रचनाविशेषस्य कर्टपूर्वकन्यप्रतिपत्तिः, पृथिव्यावस्त संस्थान कदाचिदपि करें. पूर्वक नायगतम्। नापि ताहरा धम्र्यन्तरे एकतक ईव पेंटादी मन् पृथिव्यादिगतम्य संस्थाना arma प्रो - विnिibटन मा. अयत मेनन। - .. उन्देर । तस्मात् गुपनानामस्त्येय पृधियादिसंस्थानमत्य-कार्यन्यारेलोधामधमतापगमः, अन्युटामानां नु सिमानुमाने प्मादायपि मास्ति। उसे छ, भनु मासावारिसंस्थानेभ्यः पृपियादिसंस्थानमा पलायं तथापि कार्यल शारिमिः पृषिमादीनामि, कार्य च कर्म-करणादिपूर्य रयम्। अतः काया बुद्धिमः कारणहरयानुमानम् । अप कर्वपूर्वक कार्यस्पस्य संस्थानयरवस्य पतलापान ततः मागमः ! ए प्लापियामायामापतिमा या संस्थानं तदर्शनाम् कदा मोऽपि सावशिशिनं कारयेऽपि रामानवार कयं गमकता। ययमनुमानोमा) २.पूमादिपनि पयापिघमारादिसामग्रीमायामायानुप्तिमन् तपानिपमेय पनि पर्वतोरि गरेन मादलतो याRE याममातं तयारियमेव भूमारि सहि कायायपि तथापि পৃবিনাশিন & পর গত্ব পৃথিসামিসাবিনা হানা লিলি, থাই পিনিয়াল মাদিলীবি মানিয়ে। পা গাশ सुमोमानातिय गुलम्, पूमावपि शन्दगामाम्य प र नशा रामापिना। ৰ খাদমানবো, নবাবি খায় শান্তি বিশ্ববি হোসেন শিবা বিনামপিপনি যা পিসা বা বিশাল सलमान पनाममाया थापन गायरा - REETrini मायानां मुगलसग तामिनि तानि .TPामसारा निहापागमायो" ! এই সাৰসমৰস নামধাবিকাগোসায় যায়। যথা: विमानारमनी परंना मारामामायना भपिशनि, नामापिनाक माया मनीपान । यदोमायनि:-- "दामा प्रत्यासीनुमाननी चा"! न-भि मनमानिनामानुमानाप्रम " पानी पी" [. razilोनीयानामानामा लय नंग मनमानी जानती रगाव. अमावा रामापानमा बम सन परत दरापाप artTHIR, THINTurfat rrenा पर TiriyarthimitTTETANA ] - - - META REntre TANTRIEm. tPIRe Pantheme metinorite arrantipur, kh; TERATir karnt TAITERATUEntri.mytri Parimantri mrritualitaramit amit Trek retri amriTRAT ARTIME Twinm. MIT परेर Futra News Nrirrn. माने ru merentrtain Timi नाम: me TIRTrjalAniti mmmmmmmnavin annENTRIENTA: माले ATTITERATोगा." Rimi, arram at rafeMarat were milirera Cinerantri Terrestmemily-reat Printamani memपुगिammalentinenemiriNTRITTET kermartinikPageपापि मानल Com पाम सिमा नादि गा Meritereer in JerrentRAI परिमापापमान rait Raire arun or mere Aarilant it fraid m-रमारपोieomfrom my naferent परियार पामिति पयपि murm ti पराले मिपा विपना शमिमाविण पोलमापन भाग्य शनिवारी पार पेतुरमनियानि । II-HITYARI rurnनिनिमिधार मायो पा. माथे मिया, मेनुमानिसः । मन्कम् 'T স্নায় মােহন * নং যুগ, মtিuাকা এ या मम् ferra-mपिधानमा नेपा मागिरिकार समिति, पल पल भर्माधर्मोरपिग पारपास। एकसयोपारामार-अदि शिशिमगपति या कामाविष पुग्मगाथ थानाTUREnterसयोपनि विशेष प्रतिनि मापे, रोपभोपाना माधारणErrenायमाएमा राणादिभिरपर पुनि प्रतिष भापरियादम्युगगनयर, जानमति पूर्णमेरिया मासिक पम्पपिसि | अपायकायेगारप-अतिरेकाननु ता, पल भूगपाशियतिरेक पायरादिना कायमेयरमान्य भादसावायम् । अप जगविष्यमा शरण पिना मोगरते रति पतिमना मनि भूमपामाधारणरयानोऽरल्यविविध कार्य पनापासपिरणामसिंगोमयुर या कारण मोपप नि तन् परिकार पने सपा में कमा दिना पगम पारनामे धापयदिए पाहणेन খো খেযুমিলায় ५ समेत गान. कार तोरनम्मान् । सबभारिकता मा . मान पायाः सहकारिमा प्रतिनि: पात्र दिनमा माती मिला। मोनुलनामा, उपमु माहेरोलिनामगारमारतो निNि Tranti समिनिगाभिना तामिमीको उके या . अभिगमन HTTPiraram ham रोने ना । पुमोल मन ITIEEETrmi मनाममा मागणीनां सोमragentrit. in पान मा पोनर्गमममा. आयोतिर मार ParaTी समिति गमतः । Ter.मनापागलाmarriITH MAITRITTTTT कामगारेजकालका ror,rinीपराजिता:AmITrmirriमिनि.निमोनि -rrrTTARATIRATIf भूगारी गोल Arra T RITTENTATTITणनि-क- कार: rrrrrrrrrMITTणेनानिमामाक! 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Primatta निगुना ना गमागो -rrrrrrrrrr Antarमानो perma.mmmना रोजीनामामारी Prary artmRatanAR - ""tin Ramanaम" [ •rrrrrrrrtermart.नानापमानानिmati mrathurrar Trainfanfanthfmait *** Trrrrrrr ITTAITamjnit Kamwranman ATTERNatarin नामiram net NErriMg Triraram Rana | Farmirmirrit :Matrimurartharthi Trn Part xix fhukirn mare ."_rr ke ray 03 Fat.141 ५ धारूपवार विमला ताई सहा कार्यमार पुशिमकारणपूर्वकरयेन पारेपपि रास्तेनीमतेमपं: कृत्रिमपानसम्पाधी राशियापपिए: फनी पापि पूषोनाविशेषणानां धर्मिविशेषण समिधारा सतिपयसापायेऽपि ग पिस्ता । निराजोदि हेतुः सात्यविपर्ययकारियाद भपति । गमेपो सापता, बुद्धिमाकारणपूकरपमारवासातो साम्यरमेनेएरपाए । यथा पवितरोपपिलादीनामपत्य तथा "सिद्धान्तमन्युपेत्य सहिरोपी पिरमा" [न्यायद. १० १, आ०२, १०६] हस्य सूत्रे निणीतम्। বেসবল-সুধাৱনীঃ ব্যাথায় খুবি যাব বিপঃ सामने, उत वर्षदेतोः स्वसाध्यसिदिमतिपन्या क्रियते । न सापत् पयों विकरपा, यदि नाम तत्रापरेण हेतुमा विसामान ए कि वापता पंसदेतो साध्यसिद्धिपिघातायथा मातफरमेन १० सम्मानित्यापतिको हेयन्तरेण गुणत्पसियापपि न पूरा सतिस्तदापि अयोसरो विकल्प तपापि स्वसापसिरिप्रतिपन्धो मापभापमदर्शनेन मियते, थायभायम तुरूपानामन्यतमा माक्षेन । मच धर्मिविशेषविपर्ययोझापनेन फसचिदपि कपणाभाष: करपते । पहेतुरूपामा- पासिझायगमकायम् । तर विशेषविपदना। पिरोपातु धर्मियः गम्पन्ते । तप प्रमालान्ता फिसंशम् । यथा गन्यापुर देयलयतिरेकिनिमिया दहापि कापायात पुद्धिमत्कारणमासिनी मसकप्रतिषेधात् कारण विधापसिद्धिः केपलमतिरे किनिमित्ता! तपाहिकार्यरवार रिमरकारणमासिसौ मसताना कृषिमशान-शरीरसंपदत्यादीनां धर्माप्रमालान्तरेण माधोपपती विशिष्टयुद्धिमरकारमसिसिपी-२० सिरेशियलात्" इति देचित् । अन्ये मन्यन्ते-"पत्रापयतिकिणो देतोने विशपतिरिस्ता तरपूर्वकात् केपलमतिरेकिलो ... पाक्षपः अन्यपाल याप्तरसंभवात्, तपापि माप्तिप्रणयेलायां सामान्यरूपया तदापान विशेषरूपेणेति रिसेपायगमो मान्यप अतिकनिमित्ता, अपितु पक्षधर्मस्यरतः । अत एए "मत्यु. . H . । .......... ...ANIMALI सप ५क.पात, ५५ पदा३० पसपमरपसार विशेषसिभिस्तदा म विशेष विष्वादीनामा "सम्पयसामर्षादपि विरोपसिनिम्" अपे मन्याडे । तपा, धुममात्रस्य परिमाणमाप्तिः एवं पुमरिस यथिविशेष रति धूमविशेषमतिपतीन दिमामान्यपानुस्मृति किन्तु पति- पिनोवेल पपिसिएकापस्यदर्शनास पारामासानुस्मृति: फिन्तु तथाविधकाधिोपजनाकारपरि. पानुस्मृतिः धनुस्तापपपसामदेिष कारणपिशेमावेचिरिति न पिरोपषिपदापका५ पतेषां पसापां युकापुरकर यूपयो पिचापिम्पन्तीति नालाकमा निः) सपंया पिशोप- विपरस्पादूपरवालाभिमतिपय नदिएयरक्षणपोलोचनया। प्रसवानी व विशेष ART पातपापया, अन्वपचतिरेकिमलयालम्पतिरेकिषलावा पक्षधर्मरयसामध्यन पा, कार्यविदोपस कारपश्शेिन्धिताइन पाना भवपते। सर्पमा प्रस्तुत वोन ध्यायसिदि। 1-पाएको १५पाको... ३" नम्"Rft-नो विरो-मा. प.-1 . - . . पारणे कामाम, rrrrrART RAM , मागित् महमालि गरrint Traftपायाशा विपिन पर प्रति नितम् । मानव सम्पनान. जन्मगु ग्यारेणुगोगिनान IEERHITो निशितानिनुनिया मनु निविषनिगा भनिनामपिनिrrism, Thणापर फग्रह मावा- -------------- पतिरेकाये पहिष्यमायो.. यत्र पहिग्दर्श तिन नियम तो धूमोऽपि प्रियनिकगार महा। अप घुमा कार्य हुममुजा, सगरमाये मम्मानुययनसम्म सद्भाय नाना ननु सत् कार्यमत्रोपसम्पमान किमिति कारणमनोकरी माशः कारणम्य करानाउनुमा मृत्युतिमा पदमा मादीन प्रति कगानिमायागुलम्माम्यामिनि पेट, मुभिमनोऽपि साम्या कारणरयरमा पदपालभिन्नुस्यमाया पलादिमामा घुमादिजन्यमानो या मलामन्त. १५रेज कदाचिदपि न मयसि-महानिमसदा-जमा मर्षमुम्पत्तिमन् कर्म-कर्म-करणपूरक टम्। तस्य सरदापि मशादर्शनात् नम्रन्यनारसमायः, सम्पयनमायनिधिमायन्यतमामाऽपि कर मायः! किंग, अनुपलभ्यमानका स्थायरेणु कमुग्नुपलम्मा शरीराधमायान् नत्यमत्यान, यत्र भारीरम्य कर्गमा तत्र फुलाला प्रत्यशेणयोपलामा, अननु चतन्यमात्रगोगदानायधिष्ठानात् कर्य प्रत्यक्षव्यापृतिः नाप्येता पनायम् शरीरायभायात् नदि करनाऽपि न युना, कार्यम्य गारेण १० सह प्यभिचारदर्शनात्-यथा शरीरम्प प्रति-निनी सपंचतनः करोति, घ कार्यभूते न चारान्तरेण सरीरप्रवृत्ति-निवृसिलसणं कपि पेतनः करोति तेन तमा व्यमियारः। अथ शरीरे पय एष्टन्यान् करोतु मान्यत्र, तमा यतः कार्य शरीरेण विना करोतीति नः सायम्। तत् स्य शरीर. गतमन्यारीरंगसं येति नानेन किश्चित् । पौनेतदपि पराटनं यदाटुरेके- "अचेतनः कथं मावस्त दिच्छामनुपत्तने" [ ५अचेतनस्य शरीरादेपत्मेच्छानुयत्तित्यदर्शनात् । चातनम्य तदियाननुत्तिनोऽपि प्रयतप्रेयर परिहार इति वक्तव्यम्, यत ईश्वरस्यापि प्रयनसदायेन काचित् क्षतिः। न च शरीरामायान् कथं प्रयत इति वक्तुं युवाम्, शरीरातराऽभावेऽपि शरीरस्य प्रयक्षमेयत्वदर्शनात् । तत् कत्तुंः भारीप. भावादअष्टोत्पत्तिषु स्थायरोपमहणम्, न तत्रादर्शनेन इतोऽर्य मिचारः। येऽपि "प्रत्यक्षाऽनुपल. म्मसाधनं कार्यकारणभावम्" आहुस्तेषामपि कस्यचित् कार्यकारणमावस्य तत्साधनन्वे यथेन्द्रि १० याणाम् अरष्टस्य च ती बिना कारणत्यसिद्धिस्तथेश्वरस्यापि । अतो न व्यायमायः । अत पय न संपतिपक्षताऽपि, नैकलिन साध्यान्यिते हेतौ स्थिते द्वितीयस्य तथाविधस तत्रावकाश पस्तुनो दैरुप्यासंभवात् । नापि याधः, अबुद्धिमत्कारणपूर्षकत्यस्य प्रमाणेनाप्रहणात्। साध्यामात्र हेनोरभावः म्या ध्यव्याप्तस्वादेय सिद्ध। नापि धर्यसिद्धता, कार्यकारणसङ्घातस्य पृथिव्यादे नग्रामम्य च तदाधयत्वेन हेतोर्यया प्रमाणेनोपलम्मस्तथा पूर्व प्रदर्शितम् । अतोऽस्मादी. नापि हेनोविशेपविरुद्धता, तद्विरत्वे हेनोविशेषणेऽभ्युपगम्यमाने न १ - भवेत्, प्रसिद्धानुमानेऽपि विशेषविरुद्धादीनां सुलमत्यात् । ययाऽयं धूमो दहनं सा शायच्छिन्नयहपमायमपि साधयति । नहि पूर्वधूमस्येतद्देशायच्छिन्नेन घहिना व्याप्त कालाधयच्छेदेन हेनोर्विच्छता वक्तव्या । अथ देश-कालादीन विहाय परिमाण हेनोन्द ] प्रमाणामाघात १सप्रति-मो०, मा., वा। २ पृ. १४-१५ १७ चरखरूपवादः। विरुद्धता ताई तहत् कार्यमारस युदिमत्कारपपूर्वकरवेन पासयंद्यपि इयान्वेनीबरोऽसर्वशः रुप्रिमशानसम्बन्धी सारीरुधियादुपविष्टः फनी तथापि पूर्वोतविशेषणानां धर्मिविशेषरूपान प्पमिचारात् तविपर्ययसापकत्वेऽपि न विरुद्धता । दिलो हि हेतुः सापविपर्ययकारियाद् भवति। न घसेपो साम्यता, धुद्धिमाकारणपूर्यकत्यनारसासातोः सापरवेनेटरयाद । यया चविशेषविरुद्धादीनामपणस्य तथा "सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोपी विर" [यापद०१०१, आ०२, २०६ इस्पर मुत्रे निर्जीवम् । इतकतरपणम्-पूर्वसारतोः स्वसाप्रतिदावृत्तरेप पूर्वसिद्धसैर साप कि नियम सायने, उत हेतोः वसापसिद्धिप्रतिबन्धः क्रिप! न तार पूजा विकता, पदि नाम तत्रापरेण हेतुना विशेषापान इतं किं तापता पूर्वस्व हेतोः साध्यसिरिरिघात ? यथा रुतवन १० सदस्यानित्यरसिद्धी हेत्यन्तरेण गुपत्वसितापपि न पूर्वन्य प्रतिस्नादापि अयोत्तरोरिकल- स्तथापि स्वसापसिदिप्रतिपन्यो भात्यभावप्रदर्शनेन त्रियने मात्यमाप हेनुम्मापामन्यतमा. भावना न च धर्मिविशेषविपर्ययोद्भावनेन कस्यचिदपि रूपानावः कम्पनि च हेनुरूपाना- पासिद्धायगमफरयम् । तत्र विशेषविस्ता। वितोपास्तु धर्मिया स्वरूपसिदाचरघालं प्रमाणा----- पगम्यन्ते । तच प्रमानान्तरमागमः पूर्वं हेलावन्तरं च। फिसतम्। पपा गन्धावपटाया तत्साधनकरणमासि- श्रेषयतिरेशिनिमित्ता उहापि कार्यत्वात् बुद्धिमत्कारपनामसिंदी सानियाकार- शिसिदिश पलमतिरेरिनिमित्ता। उपाह-कार्यत्वा बुदिमधारममामिदा सहालां त्रिमशानदारीरसंबरवादीनां धमाा प्रमाणान्तरेण पापोपतो विशिइदिनबारसिदि. तिरेकियलाद" रति केचित् । अन्ये मन्यन्ते- पाम्ययमतिकिलो सोनं शिसिरिट ठपटरिये पिसिस्पिन, पपा माणादिपु, अनु पूर्वलादतोपिरामिडो न होयन्दनियादा भूमस पहिनाऽम्बर-मतिरेपसिना 'अबदेश यतिः रवि साधनसार विटिरवन्द अतिरेकामा, तपोवासायमिन पग्निा:समवाद-पपिचानियाले साटासदार- मा भन्या मामेरसंभवाद, तथापि भासिमसापां सामान्दार विशेषपेमेति शिवरायगमो नान्दप मतिरनिनिया, सरिनु पर। सारा स्मृतिमनुमानम्" मादुर पर पसरटन सुस्मितारपमाप माप्तिपिझादपि भारपारिशमादिभिः पवमादालनदन् दृषिमा कसरी नियमेनासावाभिमानसंदीगरप्टः सर , संद पाचर्मरयपसार विरोसिस्लिदान विसरियामा "अम्मदसामामि विशेषसिरिम्" अरे करनेदेर एवं शुमविशेषस पहिरिपेयानि पूजिविसर पनि विरोजिदिरावरांना सरकारनुस्लडिग्नुिका मनुस्मृतिगदानुस्मतादरखावट नेपा पुटर स्रो विवापिमर्द रतन पिपाविस सरिस्पनाबाला भारत, अम्बपरिटिजन्सरविरमा कारगिन्धिवारका मान्छे, सांपरिंटर पाया. मन्द - ....

प्रयमे काण्डे- प्रसकानां विशेषाणां प्रमाणान्तरवाया विपविरुद्ध नाऽनवकाश इत्युक्तं तत्र कतमय प्रस- तस्य विशेषस्य फेन प्रमाणेन निगतिः शरीरसंबन्धम्य तायद्याध्यमायन, शरीरान्तररहितशा- प्यात्मनः स्वशरीरधारण-प्रेरणक्रियामु यथा । अथा मन प्रयायत्त्वाद धारणादिक्रियासु शरीरा- धाधारासु कर्तृत्वं युनम नेश्वरम्य तदरहिनन्यान नया च भवतां मुख्यं कर्नुलक्षणम्- "मान-चिकीपा-प्रयत्नाना ममयाय करा' [ इति। केनेश्वरस्य तद्गह्नित्वात् प्रयत्न निषेत्र सन ' आन्म-मन पयोगजन्यवान् प्रयक्षस्य विरम् तदसंभवान कारणाभावात् ननिषेधः । बुद्धिम्नहीश्वरे कथं नम्या अपि मन मंयोगजन्यतैय ? साऽपि मा भूत् का नः क्षति.' नंनु तदसत्व न बन्या काचिन् । मा.पि भवतु, तदभावे कस्स विशेष शरीरादिसंयोगलक्षणः साध्यते । अत एवान्यरूक्तम्- १०"नातीन्द्रियार्थमतिषेधो विशेषस्य कस्यचित् साधनेन निगकरणेन वा कार्य:-तदभावे विशेषसाघ- नस्य तन्निराकरणहेतोर्याऽऽधयासिद्धत्वात्-किन्त्वतीन्द्रियमर्थमभ्युपगच्छंस्तत्सिद्धी प्रमाणे प्रष्टव्यः । स चेत् तत्सिद्धौ प्रयोजकं हेतुं दर्शयति 'ओम्' इति कृत्वाऽसौ प्रतिपत्तव्यः। प्रमाणामावादेवासी नास्ति, न तु विशेषाभायात्" [ ] तस्माद्शान समवायोऽस्तीश्चरे, ते तु ज्ञानादयोऽस्मदादिक्षानादिभ्यो विलक्षणाः, पैलक्षण्यं - १५योगात् । तमेश्वरशरीरस्य कर्तृविशेषस्य व्यार, नाप्यसपंसत्यं विशेषः कुलालादिषु नरिसद्धापपि. एयान सथिदा फर्म कुलालादिना फश्चिदसर्पयित्, परमेषयद या फरोति अन्यथा तक्रियाऽयोगात् । सर्वशत्यं च २० स्थकार्यस्य सर्व ज्ञानारयुपादानादि सर्यस्य पयय -- अन्ये त्याहु:- t "द सिद्धि। 14 पा किश्चित प्रमाणासियतो मुत्या। यह.. सायकं किशित प्रमाणमुत्प २० आगमोऽप्यलिन् "साथिमी + सरा सोंग उसमः. पो: तथा भुलियतप्रतिपादिका : ७६ "विश्वमारत कानुपपा ... । २ भर रियल मरिह for tr"परः शुभ ।

। } সকিনানানা, মালা গাথা। -মাগনগন শ মামা ল বৃশিন সাগ। এ-িরিপূী বুল কালা দয়াই মাগিয়া ঘসন। ঠিকাথায় মাখন লম্বা * শু, পয। ধনি বিশ্বালা। যদি গানিস্তান গাথম,দিশাযার নিয়নি। যা নিয়ে বিদে-নিদিষ্ট্রপৰি ' এ দিমিলি শাহ। নয়া বিঘিঘাথশাবিখানিসচায়ৈ টা থে, যালেখি যাই লা, থানা সাদ বিমীমান্থারি। যথা, সানামমামাই “দাবা আথ, ঘুমাঃ বৃথি, কামলা"শাহিঙ্গান বিল শাশ্বনবিধা এশি-মিমিন র বহি ঈদগ মন সময় ণ বিশ্বাস যুম। সব পাখী যায়যায়ীই নিমপূখিনা অনিষ্ট সিনি -গান সমান দাগা দিয়া বা দিঘিািিমনি, ঋণ frনাহু তাযলিশ। এ খাসা মামা ‘গলঃ গুথ" বেমানামবি বাঘা শা, স মুই খায়ালে। যন্ত্র ডি ই ঘাঘ মালদা নয়ানো, বনা র গান । দয়ামনিন টিখিলি বামদিবি না মাখ মুলিয়নিয়াদি বিমাথা বয়ঃ! মিলে ও ধাধা গুণে গান বানামগ্রিপ্তাঘলা খো গোলামুযাফায়েণগদান মিয়া। ষ বা শাবি প্রকায় বিনা দীঘানাকালেমান ঘঘ ধিন ববি। লাঠি লবামদিনি মহানামঃ বধি”। মেঘ সবি-রানা পরিশোমাধব মার মা, বাবামা সখিবরাষা। এসে কাষৰু কৰ বাষণ চালায়। বস্তু নয়নােগ * ঘ মিয়া বর যিয়ারাঘমার বিশ্ব ফিমিনি গ্রনথিয়া যথা সেফোস ! সন্তু লঘশ্ন ধামখীঘরে বঙ্গেরিলা মালামাথা মালামাই, ঘী মম মাগঃ। বিশ্ববাংলা য, খোঁ খালােম্বাই ই সপ্ত আয়? যিবধায়াখমনিমিঃ, স া মামা, বি বা বিল্লাহিনিনিরক্ষর কার্যয় কষ্ট লাৱাৰ অনা গবা? কিহ, শেষ প্লানিং খ্রিথমবাসা তো। স খ মা সিরিয়ানিদুয়ায়ী বিষ্ণঃ, মায়া। যা লিঃ বিন বা ঘি গম্বা ও খায়াবীসনানান মনি যান। চাষী হলে ব্যবসা- এী মিহি র যে স্থান, মায়া” {ষয়া গ ৪ পরিনি। হিনিশা। ঈীর গল্প, যা মাঘ মপি। অব ম্য-“ধ্যেই মাথা লিঃ। সবই বা দিক সালি নমঃ বিবাহ সূর্থে , পা ও গল্প বধ্যবিয়া । গঃ যুণীqেগী খাব বখঠিয়ামীলাব বাঘ দেখি না পেনি"{ ৰি। ইযথােমাবাবাবি, যথা কাল কোথায়, বা যা বিশ্বের সব, যাবধি বা পাৰিবি থালাথি (হিৰ} যাব" }xরি কবি। নী মন--“থা মুমু মাখন গনী পালরবি বছ: কষ্ট নাৰি ৰারি প যুবই গুম" মাথাঃ কবি মনির। বগ্নিমিথামবি গম্বা ॥ ও মাগনা, • ঘি। বিহীন মা, • • গনোটি ताविधानाति के अन्यत्र नम्य नेस्यात्यपियान तिके-मा.. T? ঋ, আ• • সার্থক।

प्रवमै काण्ड: दूषणम्-"सएजेंव शुभमेयकमनुकम्पाप्रयोजितः" [ श्लो० धा० सू०५, संवग्या० मो० ५२] इत्येवमादि, यतः कर्माशयानां कुशलाइकुशलकपाणां फलोपभोगं बिना न क्षय इति भगवान धगच्छंस्तदुपमोगाय प्राणिसगै करोति। उपमोगः कर्मफलस्य शरीरादिकृतः, कस्यचित्तु अशुमय कर्मणः प्रायश्चित्तात् प्रक्षयः । तत्रापि स्वलेन दु.खोपभोगेन दीर्घकालदुःखप्रदं कम क्षीयते, ५न तु फलमदत्या कर्मक्षयः । येषामपि मनं सम्यग्नानाद् विपर्यासनिवृत्ती तजन्यक्लेशाये काशयानां सद्भावेऽपि सहकार्यभावान्न शरीराद्यापकता, तत्रापि कुशलं कर्म समाधि घाऽन्तरेण न तत्त्वनानोत्पत्तिः, तयोस्तु संचये प्रवृनस्य यम-नियमानुष्ठानेऽनेकविध खोत्पत्तिः, अत. कधं केवलमुसिम्पः प्राणिमर्ग.? नारक-तिरंगादिसोंऽपि अरुतप्रायधिः सानां तत्रत्यदुःखानुभये पुनर्विशिष्टस्थानावातावभ्युदय हेतु रिति सिद्धं दु-सिमाणिसृष्टायपि १०करुणया प्रवर्तनम् । तन्नासर्वशत्वं विशेष । नापि कृत्रिमझानसंबन्धित्वम् , तमानम्य प्रत्यर्थ नियमाभावान् । यद् मानमनित्यं तत् शरीरादिसापेक्षं प्रत्यर्थनियनम् तानस्य तु शरीगग्रमावे कुतः प्रत्यर्थ नियतता ! मयतु तज्ज्ञानं प्रतिनियतविषयम् न तम्य प्रतिनियनविषयोऽस्माकं पक्षक्षतिः। कथं न क्षतिः! तस्य तथाविधवे युगपन् स्थावरानुत्पादप्रमहः, नदनुत्पादे च कर्तृपासिदिः, तद- १५सिद्धी कय रात्रिमज्ञानसंबन्धिताविशेषः ? अथ युगपकार्यान्यधानुपपत्या प्रत्यनियता. मनेका बुद्धिमीघरे प्रतिपद्येन तत्रापि सन्तानेन या नयाभूना बुद्धयः, युगमा भयुः । प्राच्ये विकल्प पुनरपि युगपत्कार्यानुत्पादप्रमहः । युगपदुपसी या युद्धीनां शरीरा दियोगस्तस्यैपितव्यः, सच पूर्व प्रतिक्षिप्तः । अथ कार्यम्य यहत्य-महापाशं पदयो पुचिमन्तः कचरो भयन्तु, न त्येकः सर्यशः सर्पशक्तियुक्त। नन्येतस्मिन्नपि पसे घरानेकल्यमसनः, २०मयतु, को दोरः ! व्याहतकामानां स्वतन्त्राणामेफस्सिन्नऽप्रवृत्तिः। अप तन्मध्येऽन्येपामेका. यत्तता सदा स एयेभ्यरः, अन्ये पुनस्तरधीना अनीभ्यः | अथ स्थपन्यादीनां महामासादादि. करणे कम तनदापि, मतदेयम्। तत्र कस्यचिदमित्रायेण नियमितानामेकमयमा न पत्र पहनां नियामकः कपिदस्ति। सतावे या स पये सायं यस्य यस्य विशेषरा सापनाप पा निरोपतये पा प्रमाणमुच्यते तस तस पूर्वोकेन न्यायेन निराकरणं कसंयम् । इस २५पिपयिपदता ईश्वरसाधकस। प्रमा-विपर्यययोरप्यातिः। प्रसारस प्यायभायातू, तामूलस्यात् तविषयमा तय एरियातहतमा पप नितारवादकाकरसमुच्यने शाक्यस्तदपि क्षर्णमामले प्रतिक्षितम् । यदपि माता मिना न कम्यं तदपि मान-चिकी-प्रयतालक्षणय व्यापारसोकरयानिराशनम् । थानिसकारणात प्रमाणडयमुपयलं नसिद्धये-- २. "महाभूतादियन ननाधिष्टितं माणिना गुपदासानिमिभम, गदिमाया, मुांदियत् । पदा, पृषिमादीनि महाभूतानि पुसिमकारणाधिष्टिनानि स्वामु धारणाचागु किया अपने, भनिष्पन्या, पाम्पादिय"न्यायवा००४१७] इति । मधिकर्णस्नु नमियर प्रमाणद्वयमाह--- ‘াবধারা বিলথিলেমারা মিয়া, প্রাথমিক पिदिलान, पादियन्ः मेघग परमाणयः"। इति । नत्र मन- मानेन्द्रियामां प्राप्तं मदर-नेकदवाय-पापधिकारणात पृषियुगकरदनाशक विविध शान्द्रिपनायम्! समा बाप्यादि, यम्मा महायमनसाय बागमपापा. विभोरधिारनियले, दयवादी मालिा पोलाम्- "परदेशवारायालयः" [ Jan०४-1-1] "स्वागना पारापनुपीयः" [वि. 0-1-01 Nilam. समान, मापी पटरियमादिति । झापे तु वा दिया २-पाटान... मन...। And (1.truttream R५-प्राविम... - १०७ रूपयादा। प्रत्यक्षप्रायम्" सन्ति । द्वीन्द्रियग्रात्यापेक्षया तुं रूपसमवायाभोवादनुपलपिरिरयुक्तम् । तत्र सामान्येन हौन्द्रियप्रासापास पुझिमरकापणपूर्पकरयसापने सिद्धसाध्यतावोषः, घरादिषु उभयसिपिंपादाभावात्। अभ्युपेतबाधा ध, अपयाकाशादीनां तयाऽनभ्युपगमाद, हेग व निसायात प्रत्यक्षादिक्षाया। अलद विमस्पधिकरणमापापमप्रहम् । विविधा मतिबिमति चिमतिपचिरिति यायत, तस्या अधिकरणमायापलं विवादास्पदीभूतमित्यर्थः । पपंच.सति ५ शरोरेन्द्रियमुवनादय पयार पक्षीहता इति नाण्यादिप्रस । कारणमात्र पूर्पकत्वेऽपि साम्ये सिसाम्यता मा भूदिति बुद्धिमाकारणाहणम् । साहसं प्रति मनुषर्यानुपपने सिरसाध्यता अध्यतिरिक्ता हि बुद्धिः प्रधानात् सासरुध्यते, म च सेनेप तदेय तब भवति । स्वार- म्भाणामपयपानां सविषा:-प्रचपात्मकः संयोगः तेन विशिष्ट ध्यपच्छिन तलावस्तस्मात् । अपययसनिपेशविशिएवं गोत्यादिमियभिचारीत्यतः स्यारम्भकमहणम् । गोत्यादीनि तुइपार-१. मापयसामियशेन विशिष्यन्ते न स्यारम्भकाययपसरिशेनेति । तेन योऽसी सिमानस पर रत्येकम् । द्वितीयं तु तनु-मुवन-करणोपादानानि चेतनायेतनानि चेतनाधिष्ठितानि सका. मारमन्त इति प्रतिज्ञानीम, रूपादिमरवाद , गद् या रूपादिमत् तत् तत् घेतनाधिष्ठितं स्यका. रमते, यथा तरयादि, करादिमा तन-मुक्न करणादिकारणम्, तलायतनापिधित स्पर मारमते । योऽसी घेतनस्तनु-मुपन करणोपादानादेरधिष्ठावा स मंगवानीपर इति । उद्योतकरस्तु प्रमाणपति-- "भुवननियः प्रधान-परमाय-या: स्यफायर्योत्पमापतिशयधुद्धिमन्तमधिष्ठातारमपेदान्ते, स्पिरया प्रकृते, तन्नु तुर्णादियत्" [न्यायया०४०४५७] इति । प्रशालमतिस्थाद- "सांदी पुगणां व्यपहारोऽन्योपोरापूर्वकाउत्तरफालं प्रयुधानां प्रत्यर्थ नियतया, गम-२० বিবাঘালা কমায় খামিরদিঘী থানবী যথা মাখাইয়া” ति प्रयुताना प्रत्यर्थ नियतस्यादिति प्रपुदानां सतो मार निपतरयादित्यर्थः । पदेशपूर्पकर स सगावी ध्यपहारा सपरा प्रलयकालेऽपमानातिराय इति सियम् । খাবি পূখীয়গৈ বনু খনাঘুষালি- "धुरिमरवारमाधिषितं महाभूतादिकं व्य मुग दुबनिमितं गपति, अननत्याद, कार्य-२५ पाद, विनाशिरपान, रूपादिमायाद, यासादियद" [न्यायपा० १०४... इति। अप भवत्यलायेनुकदम्यादीवर सजगदेवत्यसिद्धिा सर्पशाय तु कथं तागिरम् पेनासोनियमायुक्षकामाना भविविषयतां यायाजगरकरणसिद्धरेषेति मम तथा पार মরসানিয়া "पः कार्योपानो-पकरण प्रयोजन-संमदानपरिक्षामात्" दियो यश it मपति पतम्योपादानादीनि जानीते, पया पुलाला कुण्डादीन कर्ता, तनुपादानं गृटिपपदम, .. रणानि पहादीनि, प्रयोजनमुकादरणादि. कुटुएन ए संमदान जानीत स्यात् सिझमातथे. पर सकलभुषनानां कर्ता, समानानि परमायादिसणानि, नदुपकरणानि धर्म-ए- कालादीनि, मयारोपकरणानि सामान्य-रि-मथायलसणानि, प्रपोजमगुपमोगम, संप्रदान संशयपुरुषान् जानीत रति, अतर सिसमय सत्यमिति । अत एप मारता मेरापम्-१५ रासपूर्णवर शिलादीना राय हायविकलो ता, ऐनुय पिरा, असामधेन মারা যায় মিহনা, কিকবকাই ইনখা, মানুষ মাষ্ট पार्मणा गिरसाधनमिति, पता सामान्यन स्वपापादानो-पर-नाशिक सायने हर स्पादित पुरानो-करपालिन् लोक- ११.१...३१ पेतनानि ऐन,... ROMदनापेवनामिल: राब प्रदरममा "मनु-भाग-yनि पेन र ४५ प्र.४। - घम-tot.,.,मो• पिना! धमाधर्म-दर- ।

१० १०२ प्रथमे.काण्डे- प्रसिद्धं कथमन्यधाकर्तुं शक्यते अपहोतुं घा! न तु फर्मणा सिद्धसायता, तय सकलजगतन कार्योपादानाधनभिज्ञत्वात्। तदभिशत्ये या तस्यैय भगयतः 'कर्म' इति नामान्तरं कृतं स्यात् । हो त्यत्र चिन्तितमेष । तदेपं सकलदोषरहितादुकहेतुकलापाद् भानापतिशययाणयुक्तस्य सिस घ शासनप्रणेतृत्वं नान्येषां योगिनामिति भवजिनानां शासनम् पति अयुक्तमुक्तमिति भितम् ५ाति पूर्वपक्षः॥ [ उत्तरपक्षः-जगतः ईश्वरकृतत्वनिराकरणम् ] अत्र प्रतिविधीयते यत् तावदुक्तम्-'सामान्यतोरएशनुमानस्य तत्र व्यापाराभ्युपगमार प्रत्यक्षपूर्वकानुमाननिषेधे सिद्धसाधनम्' इति, तदमहतम्, सामान्यतोस्टानमानसापि तसा पकत्वेनाप्रवृत्तेः । तथाहि-तनु-भुयन-करणादिकं धुद्धिमत्कारणपूर्वकम्, कार्यपार, घटादिपर इत्यत्र धम्यंसिद्धराश्रयासिद्धस्तायत कार्यरयलक्षण हेतु। (तथाहि-अवयविरूपं तावत् तन्यादि अयभासमानतनु न युक्रम, देशादिभिमस सन्यारे। एएलयकस्यानुपपत्तेः । न हानेकदेशादिगतमेकं भयितुं युतम्, बिरुद्ध धर्मायासम्म मेलामा देशादिभेदस च पिरधर्मरूपस्यात् । तथाप्यमेरे सर्वत्र भिन्नत्वेना युगगो T-मपि मेदोषरतिसझाव नहि भिन्नत्येनाम्युपगते तत्राप्यन्यत् भेनिपन्धन मुम्पयामः । प्रतिभासमेशा १५दर मेरे पति थे, न किल्लधर्माभ्यास मेकमतरेण प्रतिभागस्यापि मेगातः । 'भयपनी एको न भरति, धिमायासिनयात्' स्येत मतपसाधना उस राजमापनमिति' हा मतमा गुनम अपयति प्रमाणागियन देतो, सागिरो. प्रमाणगिनो पा तयतिपादकमाणाधिनशानम्तरप्रयुतायेन तम বাঘাবাস। গ ঘ লাশস্বী যিনি কি নবাবী এই २.गुल्म.पाण# प्रमाणोनी गिम ताप्रमाण: ' प्रमाण मातापि नगर प्रमाणिक्षमान पानिशान'मा मन कतिपय देतो गपा: मानपानानिnिe to Trयाधयागिय । म गम TH । माउपिजिनीया मामो पत्र भागममनातीय, पाय 17 HIMin परमBr-herपमाTimeTime tuttam+मोगामामापि ५ममा गामाग mmm PM गया। पाय TermI way train INITIHITAदिग. Preralim 11TMमान पgana THEMATH 1 MAI IM1 गार" IPL In 1 411matefun. armir Van गान - TATHI ROMuषमा it RHITrafriIRTAITERATTrm. HTTP air terriamirmiri si fir! গণনাশ নম্বর পাশাপাশি বিমান दारनामामामा माननाभिferter- १५ सलाम: manu TERTAITTEFERE नवागमरमानिसमा मेरमाभाftle or IITT Pragarma rammaमनाना mamifARTATI Arrare, नगा भामम्नAmTHITLEMEmain * PrimarARMirathe. rrrrrrrrrमम्। ग * শিবোৰ ‘নখন গাধা” (ইবি ২০ -- } : বন্যস্থ নিইঃ প্রথাগাদাস' বি গণমান সঙ্গীশ বিমিখাতে হিমালদগামা সৃষ্টি থানীয়বি কায়। যমালামাকাবিনীযই বৃথাৰুথালমিটি দু হায়, সমানী যযাতি বিশ্বব্যৱহল। হাই-সাইমন্বযবধনী। # মেথি, ৫ হাৰি বাঘটি থামািধিগম, গন্তব্যে যা স্থানথিয়া। সময় থাই দিম। ঘাম এব বায়য়াৰ সন্ধে ঈশাধনী মনি বমািনৗ, আম ও বায়ানা যোনীমাম ইয়া, সাকোহ্মবাদিয়া। বড় বাসেবি মানায়। পাখি ক্ষিক, আরো বীথি মানা মরি মনি।মাবিব ই ইয় যাবেন বনমানসেবি মিল্লাল কাব্য दीना मेरेनोपरन्। तपादि-समानशा अपि भाषा पाताsतपादयो मित्रतनया यह प्रयन्ते। अपमपपरिनिर्मातः । तमापपपीतन्यादिमियोऽस्ति । ফর মলম মক্কায় সম্বসারমামালৈখিনি দুনিমার বা ব ই সিমালামােয় শামহঃ অষই। সহি মহামুনীগঠিদানৗযষধিমত্ত বশী , মরিসাবেক যুগানাইয়ামিয়ায় বিমা। ও দেববি- সংবা নষ্ট হাতীবানাইযবর খাতায়ালমুমি। নয়, স্ব বৈষধাবলী । নবাব শালীকানন, বই নিষিদ্ধ গানৱমাননা। রান্নৱিমান বিদ্যা। নাবি কালীন মানা, গাভীৱালায়মাধিয়ানমাননা; কি বমেরিনার মরিকাঘল সঠিমানি বা ধাহফিলঃ হ স মৰাত-২৬ যখন যা বক্তিনিয়ানী ওয়াদি বি বাকৈয়া সন্তু হিমঘকোথা ষমাশী, আমি বিবামি যা থঃ, মক্তি- বয়্যিদায়ঘনি মামৗরি, বারে ষাকেয়ামইল মরিভলাহ। ; কোষ যয়, খাবার বায়ার্ন মিষ্ট, অথছ বিকেবিনে মাধব ময়নুযায়ামবধষঃযুকমনিমাল বিমানবমনিমাম ২ এছাখতেবীঃ) প্রযুৎ স্বান্ধিয়ান গাভীয়ানা মিনিমাই বাষ। খs. মামা বহমনিমাই বুরকিনাখযবিবাহান্নানীয়, খং উঠিক মান ঠিমারি য ব রহমাষ হবাগমাঃ এ্যথা বিব, घमासध्यतिरेणापि ज्ञानमतिमासमेटे महानापमासमेदो हारसयोरपि भेदण्यवस्थापक না। যাঘবন্তিকামীম মাঘ, যাযাদায় ৪ নালাবিন- সুমন। যা বহি থানায় যা যথাকব মনিমা। মাথায় বিমাষনা- ঘাঙ্গা যায়। দ্বিকক অথবষী থ মুখ সকিম মানি। প্রধানমৰামায় রে। ফোকামনি কাকাকাবে গছি সবিনষ্টমেয়া, অনিয়ার সমনিসষমঙ্গযদিনী কম अपामतिमासेऽपि मतिमातीति पर युक्तम्, उदोपप्रसहात । খি, কি বিষযয়ঃনিমাই নি স্বয়ং নিমাখনাই, সাহাবিশ্ব স্বম, সামবয়সৰিম। যা , স খ্রকা সমমাকানাকানিনিখো, प्रतिभासेऽपि समस्तापयवमापिमा स्तम्माप्रपयरिनोऽप्रतिमासनात्। अपमितीय पक्षा, सोऽपि ৪ খ্রক মাছ- শাবনাথষরিমাণমনবিনীমারমাখা । কায় মুবাযথ বি অথবা খুব বেথাম, যখন যুক্ত। যখনমান মাখি সময় বসালমাঘবমলানন বানিয়েবিনারীর অগা, জামে শয়ন্ধেহেযাদি নাক গুলো ব্যারিস। যা মন বল জার वा-१-मासिसतासभा 4. ५ . प १०४ प्रथम पाण्डे- तत् सेनेष रुपेण सदिति व्यवहारविषया-यथा नीलं नीलरूपतया प्रतिमासमानं तेने सविषयः, अग्मिागमाच्ययययसंबन्धितया चाश्यययी प्रतिमातीति स्वमायहेतुःसन भायिव्यवहितावयचाऽप्रतिमासनेऽप्यव्ययहितोऽययवी प्रतिमातीति पर शायम्, तमतत्वेनाप्रतिमासनात् । यस्मिश्च प्रतिमासमाने यद रूपं न प्रतिमाति, तन् वतो। ५घटे प्रतिमासमानेऽप्रतिमासमानं पटस्वरूपम् । न प्रतिमाति च बिस्वरूपे प्रतिमासमाने परमागभायचयसंयन्यवयविस्वरूपम् इति कर्यन तत् तथाऽप्यभेदेऽतिप्रसङ्गा प्रतिपादितः। नापि परमागभाव्यवययाऽवयविवाहिणा गमागमाव्ययपवसंयन्धित्वं तस्य गृघते, तर तदवयवानां प्रतिमासात् ... प्रतिमासेत नाग्मागभाव्ययययसंबन्धिः तेषां तामतिमासनात् । तदप्रतिमासने व १०न्धिरूपस्याप्यप्रतिमासनात्, व्यायाप्रतिपत्ती वद्यापकत्यस्याप्यप्रतिपत्तेः । नापि सरणेन परभागमाययययसंयन्ध्यवयविस्वरुपमहः, प्रत्यक्षानुसारेण सरणय प्रवृत्युपपत्तम तबाहकत्वनिषेधात् । नाप्यात्मा अर्धा-परमागावययव्यापित्यमवयविनो प्रहीतुं मात्रेण तस्य तदाहकत्वानुपपत्ते, अन्यथा स्वाप-मद-मूछाचवस्थास्वपि किन्तु दर्शनसहाय तथ दर्शनं न अवयविनोऽवयवयाप्तिमादक प्रत्यक्षादिकं संभवतीति १५ दिसम् । अथार्याग्मागदर्शने सत्युत्तरकालं परमागदर्शनेऽनन्तरसरणसहकारीन्द्रियज पयायम्' इति प्रत्यमिताशानमध्यक्षमवयविनः पूर्वापरावयवव्याप्तिप्राहकम्, तदयुक्तम्। ज्ञानयंतद्विपयस्य प्रत्यक्षत्यानुपपत्तेः । अक्षानुसारि हि प्रत्यक्षम्, न पयवाहणे व्यापार संमयति, व्ययहिते तेषां व्यापारासंभवात्। संमये ना पृष्ठादी प्यापारा स्यात् । तस तदनुसारिणोऽयक्षरूपस्य प्रत्यामिनामानय तत्र व्यापार २० स्मरणसहायस्थापीन्द्रियस्याविपये व्यापारः संभवति, यद् यस्याऽविषयः न तत् तन . . मपि प्रयसते-पथा परिमलसरणसहायमपि लोचनं गन्धादी, अविषयध व्यग्रहितोऽक्षा भागमायययवसंबन्धिस्यलक्षणोऽययविनः स्वभाव इति नामजस्य प्राहफरयम् । न च स एवायम्' इति प्रतीतिरेका, 'सति स्मृतेः रूपम्, 'अयम्' इति स्वरूपम् । वत् परोक्षाऽपरोक्षाकारत्यार नेकस्यमायायेतो प्रत्ययो । अथ 'स पयायम्' २२१करणतया पती प्रतिमात इति एकं प्रत्यामानानम्, न, आकारमेरे सति सामानाधिकरण्याप्ययसायेऽप्येकायानुपप । अन्यायाकारमेव पथ मेदः, स यात्रा इति कायमेकत्यम्! रिश्व, 'स' याकारा 'अयम्' इस्याकारानुभयेशेन प्रतिभाति, अननुप्रवेशनेति? यदि अनुप्रयेशेग, 'स.' साकारस्य 'अयम्' इस्याकारे अनुप्रविष्टत्यादमा अपम्' इस्पातार एय कंपल माम इति कुतः सोऽयम्' स्पिका प्रत्यमिधा! अय 'अयम्' २०'साइलेवमिनुभविष्टलदा 'रा' स्वैप मापन 'अयम्' इत्यपि इति कथमेशा प्रय अप 'स एप 'अपम्' याकारी परस्परानमविष्टी प्रतिभातलपारि मिनाकारी मिनाविपर्य प्रसपापिति कपकाया एका प्रत्यमिता प्रतिमासमेवर शिपमेश्यपस्थापकरपात ! ग मासमापि विषयामेरा, प्रतिमासामेव्यतिरेकेण विषपामेवग्यपस्थायां प्रमाण मिना पगम: म्यानपाय सर्प सप्रेम तिप्पेत् । तन प्रत्पमिशालोऽव्ययायेकरयमः भनुमा অবিরান্নার মনির সঙ্কল্প নিখ ওর এখ। মাহে पेपरलाये निधो विधापन त्याला ताप । भय 'परो घटः' इनिद्रयातीतिरति वयवस्यतिहिणी सत्यममापोऽपवित पदासाःपिसावपशव्यवसापः मामाधापीय मारपति प्यम्, पल्या मननियनमवान् पिसारासार पारपपिडपमापुरगम्यत ४.नागरिक निमानित पापाका प्रतिमासोन्यासारण পেয়ে যা বিমান বাস দেখায় ভাসিন অনুষ . 4 T•it.. -सारित ম্বিয়া। ** : বৌম্বয়া দিবাে। •••"।'': 'বেবি ময়লা- "" - " আঃ, হাড়ি यो मायादिनि सस मेदादेकना तन्यादीनांमतिदन्तु । समाययविरुपी याद्योज्योति अधापयपिनोऽभावे तदपथानामपि पाण्यादीनां दिग्मेदादिवियरधर्मायामा मेर हद ५ ধানমঘবাধীন কর হ ৪ প্রায় মা খায় না, বা ২ বিমান বেষয়াদি। খুলুম নিয়াকিব মিমানঃ কানি। এই মােঃ মেঘনি, নাই এমেয়া। নাবি ধনুবিঃ হুমঘ, মাখলা- ভাষায়লামা হন। এ খাবাকে মুহাৰি, মই মন- ৭। খ ঘা ইতনগ্ন খুদে রান্না করি না। থানায় নিমাৰী- যারা মা, বেনামি খাবয়ববাজাের বা এ নিরবি- যায়। ফিস, ঘামালীথি নাযিম্মান্ধতা মাথায়। সদ্য - “অন যুবতী বলৌঃ কামা" { কানামৰি নানাইয়া বেলি, গ ঘানা। সম্রাগ ঘ ম বেমবা হান্নাম বি মনিমালামাযান মাঘলাখা। চায়। argয়মাৱৰি নিৰীয়া বাঙাগালে বসেগুন বা সাকোনায় নতুনা খানম বাকা ন বধিনি, সাবি এমবিমানসিক বাঘা মায়া কামাইব। এই নায়বিমামো থােগনাম aষধ নিমামেইন এবষনঘ্যঃ বিধান হো গই এগোসল পা ঘামাই বাবস্থায় মীরমযান মাহী। যারাখস ঘামিয়েরান্তি থানাযানসালি পা, ইমামস, ধ যুগলবন্ধু বাঘাঘট ন নয়, বাঘসমাধানামমিখনোলা থামলি নি বেলা। ধৰ বলি মাৰিথৈইথযনিৗবিষয়ছি । {দয়া, মুমিনুলেম মি খনির ‘মি'ৰি গল রোধ নুহখি, তার মা বাবা ফজখাই বলবি নখদ্মাণ: যুগান্ত যে বাসি খ, গ, খাগই বিয়ে ‘ব বলে মায়া'র ঘাম না। মাথা ব্যাধি , দ যাবি বাসই বেশি যেমথাংলাথি খাধিকার বিখ্যা। ঘষামাজাইমস দ, প পানি বা শাখাটিপি খ. সাখামাখি ধৰি শল মারা যায় : ন লালু। ঘমাই মাথা, অল্প বিপ্লবি না শালান পুষেশিকানলং বসাবাশ, বিমি কম নীলাম! না হয় নি ধ, বিয়ে নিয়েই না। আমাকে সুনিনি , , কালৈ ৰ ধলম, sংবিধায়া। এ হিয়াৰ খোৱা খাবি খালি হন হন মা ম-বে খামুখার্ষি মনোবি শিশী খল নুয়াদে पापानिपत लामो मुलाहिराति ! अप METEET নৈৗবাদ সন্তে শাহেবি দেখলাম লাবিবি খাদিমিয়া আলিম। “নামে, খাসিং, অনীকার্য দেখেতে {:- ( -) प्रयमे फाण्डे- भपदभ्युपगमेन । अथ आत्मत्याविशेषेऽपि नदानमा अमदाद्यात्मभ्यो विशिष्टोऽभ्युपगम्यने ताई कार्यस्याविशेपेऽपि घटादिकार्येभ्यः स्यावगदिकार्यमतकन्येन विशिष्टं कि नाभ्युपगम्यने? तथा च न कार्यत्वादिलक्षणो हेतुग्नुपलम्पमानकतकः म्यावगदिमिग्यभिचारी स्यात् ! अप तबुद्धी तदात्मनोऽनुप्रवेशम्नदा बुद्धिमाप्रमाधाग्यन्यमभ्युपगन्नन्य भयनि । नथा चासदादिबुझे। ५रपि तद्वदाधारविकलग्न मतुवासभवाद घरादावपि बुद्धिमत्कारणत्यम्यासिद्धत्वात् साय: विकलो दृशान्तः । अथ अम्मदादिदिभ्यो वृद्धिले ममानेऽपि नदुग्यानाश्रितस्यलक्षणो विशेषोऽभ्युपगम्यते नर्हि घटादिकार्यध्य पृथियादि कार्यभ्य कार्यन्वे ममानेऽपि अकतपूर्यकत्व लक्षणो विशेषोऽभ्युपगन्तव्य इति पुनरपि कार्यग्यलक्षणों हेतुम्नीय :यभिचारी। किंच, असौ नबुद्धि, मणिका, अक्षणिका या इति वनव्यम । यदि क्षणिकति पक्षः, १० तदाऽऽन्मानं समवायिकारणम , आन्म-मनासंयोग बासमवायि कारणम्, तच्छरीदिय निमित्तकारणमन्तरेण कथं द्वितीयक्षणे तस्या उत्पनि ' तदनुपनी च अचेतनस्याप्या धिष्ठितस्य कथं भूधरादि कार्य करणे प्रवृत्तिः धारयादेरिबाचनमय पगमात्? ततश्चेदानी भूरहादीनामनुत्पत्तिमा पायगुम्यं जगत् स्यात् । अप कारणमन्तरेणापि नदुद्धरम्मदादिबुद्धिवैलह ( तिर गुपगम्यते नन्येय १५भूधरादिकार्यस्य कि नाभ्युपगम्यते इति 1 किच, यदीशबुद्धिः- निरपेक्षवोत्पत्तिमासादयति तर्हि मु.int विनि स्पत्स्यते इति न बुद्धि मुसादिधिकल .. म्यात् । अथ अक्षणिका नगुद्धि:. दरम्यक्षणिका कि प्रत्यक्षादिप्रमाणविरोधाभासदादि ४ि५.. विरोधादेव. 2 २०. P इत्येतत् । ফাবিযালিকষাঘামধাঘন্ধ पगमवाघभ्य तस्य मंमया २५ शिक्षणिकन्यानुमानणानेकदोपतुष्टयं तथा इयतदप्यारमा तापत्। एथापा, फरवलक्षणोशिशेषता म्य! ति पुमरपि बुद्धिमाकारणपूरकरयता १०मारपण्याल्यानादि । तमंनिशामनाप्रयुन अनुमानाधिनत्यं पा ... था, 'कायंत्यानति मनायममये प्राणियfromमुनगारमानमर्थव म.. বাম গান সম্বলি शिमुदीपन मागमता' समाविक RITY: सरजमसमायोति सापन TEArति:

इति ईश्वरस्वरूपवाद। पार्य-कारणयोरपलम्मे सति पतत् स्यात् 'पदमा कारणम् कार्य घेदमस्य' इति । परस्य तदुपरम्भा प्रत्यसना, उपलम्भशारणमुपलम्मविषय इति नैयायिकानां मतम्-"अर्थयन् प्रमाणम्" [पारया मा००१,६०२] स्यत्र भाष्ये “ममात-प्रमेयाभ्यामर्थान्तरमन्यपदेयाश्यभिचारिव्य- घसायामशाने फर्मध्येऽर्थः सहकारी विद्यो यस्य तद् अर्थयम् प्रमाणम्" प्यारयानान् । न घासन सहकारि, 'सह करोतीति सहकारि' इति व्युत्पत्तेः । न चासत्रावि- ५ जसमं पानस्यान्यस या कारणम्, विरोधात । अपि च, इन्द्रियार्थसनिकपीत् प्रत्यक्ष ज्ञानमुत्पत्ति- मन्, कार्य-कारणादिना घन्द्रियसनिक संयोगा, सोऽपि वा नासता अन्यते इति चिन्त्यम्। संयोगाभाये घ स्पादिनेन्द्रियस्य संयुतसमचाया, रूपत्यादिना तु संयुक्तसमयेतममपाय इति सर्च दुर्घटम् । एनेन द्रव्यापादिसामान्पर्मबन्धोऽपि तस्य निरुपितः । तन्न तन्यादिविषयमध्यक्षम् । अत पप नानुमानमपि । तदेवं परविषाणादिवत् कार्य-कारणावरगुपसम्मान युतमेतत्-दारीपदेः १० कारणमस्ति, नरामादेरिति । यदि पुनलनु परणादिः सन् धाभ्यागुमादिपरिहारेणेति मतिः, तत्र पुतः स पप सन् ! पारणसमयायान, सोऽपि पुनः सचान, अन्योन्यसंध्या-तरसमपापात् सत्यम् अतध तरसमयाय रसित मागसप्तः सत्तासमपायात् स एप सन्निति पेन्, कुना मा मतामयायान्। मनु ताममायकाले प्रागिय भ्यरुपमयपि 'भाग' ति विशेषणमनर्थकमित्यादि म पनामम् । १५ असतशा गसाममयाये परमादेरपि संभवेत् अविशेषाम् । 'प्रारति घविशेषणं शामिल प्यपदा परेणोनाम्, मत्सायन्धसमये घसम्यादा स्वारसत्यामाये फस्ततो विशेष: अपमति पिणे:-कमरोमादिषमत्यन्तामत्, इनाम् पुनः व्ययं न मन् मायमन्डल एप समाधान 'नदेय सत्'एयुच्यताति, तदेवमहामनो भयतः कोऽयो भाषने ।तपादि-नाम निपचनात् तम्य महासंयन्धात् मागमाय उना, मानसिपेधावरण यादम्य । नान्यनत्यमिधानानु भारः२० आरस्पानिपेधरुपापा भायम्य रुपानभायात् । मधेय घेयाकरणानां न्यायः-"जो मनिधी प्रालय गमयमा" ति, फषमायणा नेदं निगमपं जीपपरीरम् , माणादिमशान पर मेराम्यनिषेधामम: सिपेत् । अनपेचित् अपने-मयं प्रयोगः शियतेऽपि न पामक जीपीगम्, प्राणादिमागम्" पनि । सरप्येयं प्रयोग कुपनि मामकरयामायो नियमेन प्राणादिमायामाम माग अन्यथा पमियागार निधन-दम्युपगमे घेदमययं पनल्या-जोपरे मादिगाणं मनापमान प्यामापं निधर्मपति, पप नियमाना पराप्य नामपन्याभापमादाय मिले, इमापा नाग यासोम न्याना पलिपियसमाने पानिपतन मन नदप्यम, पचा निषभमा. मेऽपि मदीप अनिवसमानः पटा दिन मेन प्यम नियनने प्राणादिमायामा निधनमानेऽपि समयाभाष पनि नियसने रति पेत, तपिपलायपि यदि रामपं न गिपनि म . मायो निपलते, पामयामायाभावेऽपि तदमापस्य तपस्यया । सिध्यतीनि धेन, आपातमिदम्- "जी प्रतिषेधी प्रश्नम गमयन" [ लिया पदमपि पुनम्-'मेर रिम आर. गरम् , माणादिमापात् नि। अग्पेनु मन्यन्ते-"अन्यत्र र धर्मः प्राधिर्मिणि विधीयते, निधि (नि पचनात् वपन घटादी समयमाणाशिमाघेन पा एम.प निwि ५ गारिमायामाक्षेन, म पुनः पामक विधीयते स्थापना" तिने पास प्रतिपार प्रतिविपनाति भपतु पूनम्, पापि नप्रिपेधसामा परिवार में काम मात्र स्पिा-पदादि मैगामपनिषधोन गरि मनोमाको मेगामापोऽपि गुआममोऽस्यावाद भारतरण पर, पुनरप्रिपरम्, सुनापि प्रिपरमा यमियपानिधो गया नया पति अमरदानागप.. रिपेयपि, परि माम पदी मेयम्पyar निमिदम्य निपिन ला पाने पाति पापाला निपिता मालादिमानादिति पंन्, पुरमनद परिदमा सारस्परिक ना अतिरिय सालशिक्षा पम्। सपा समरिन् रिमादेन -- ११० प्रथमे काण्डे स्वाभायो नैराम्यव्यापको बिखः, ततः प्राणादिमत्वभावात् तदभावो निवर्तते, पहिमावादिन शीतम्, स च निवर्तमानः स्वव्याप्यं नैगम्यमादाय निवर्चने, यथा धूमामायः पावकामावमिति । दत्तमत्रोत्तरम्-यदि नैगम्यामायः सामको न भवेत् नदयर्थ नराम्यमिति । भवतु तर्हि नैगम्य निषेधः सात्मका, तथा सति 'सत्तासंबन्धात् प्राक न्यादिनी (दिना) सत्' इति पचनान् तदा ५तस्य सत्यमुक्तम्, 'न सन्' इत्यभिधानादमन्त्रमिनि बिरोध । नतोऽमदेव तदन्युपगन्तव्यमिति न चभ्यामुतादेस्सनु करणादेर्विशेष. भवन्धेय नथापि तन्वादेरेर मनासंयन्धान सत्तम् न पररशारे तथादर्शनादिति चेत्, उनमत्र नथादर्शनोपायाभावादिति । [प्रामङ्गिकं मनापदार्थनिग्मनम् ] अपि च, सत्ताऽपि यदि अमती कथ ननो बन्ध्यामुनादेग्विापरम्य मन्त्रम् ? सती घेद् यदि १० अन्यसत्तातः, अनवस्था। स्वतश्चत, पदाथानामपि म्बत पव मन्त्र म्यादिति व्यथै तत्परिकल्पनम् । किञ्च, यदि स्वत पर सत्ता सनी उपयते नदा प्रमाण वनाध्यम । अथ म्बन मना मती-सत्संपन्यात् तन्यादीनां सत्त्वान्यथाऽनुपपने-नहान्योन्यसंश्रय - नम्मंबन्धात तन्वादिमन्त्रे सिद्धे सत्तासस्य सिद्धिः, ततस्नन्संबन्धान् नन्वादिमत्त्वसिद्धिरिति व्यनामितीनगश्रयन्यम् । अथ समा स्वतः सती, सदभिधानप्रत्ययविषयत्यात्, अवान्तरमामायादियन न इत्यादिना व्यभिचार:-द्रव्यादिपि १५'सद् द्रव्यम्, सन गुण . मन कर्म इन्यव मभिधानमन्ययरियो भवति, न चामी परेण स्मनः सन्नम्युपगतः सनाप्रकल्पनयफल्यप्रमहात। न न हव्यादी तद्विपयाय परापेक्षं न मनायामिति यतुं युनम, तम्यामपि तदपेक्षन्धमभवान् । अथ नत्र तम्य तदपेशन्ये सिं तदपरमिति धनाध्यम्। नन्वेन द्रव्यातायपि ममानम । तत्र मनि घेन्, अत्रापि द्रव्यादिकम् इति नुत्यम्-ययेय दि सत्तासंबन्धात् द्रव्यादिक मन् न स्वत. तथा द्रव्यादिस्वरूपमस्यसंग्रग्यात् सत्ता मती न स्वतः । २०यादः स्वमगमत्यं नानि तेनायमदोगा, तदस्लिचे को दोष इति याच्यम् । ननु तम्या (सम्प) स्वतः सत्वेऽपान्तरमामान्यामायप्रसहो दोषः, मनु स्वतोऽमस्ये परविषाणादेरिप मुतांतेदभाय दोषः। अपि च, यो दि तत्र गत्तासंबन्धं नेच्छति स कथमयान्तरमामान्यसंयन्धमिरेत् ! म पात्र प्रमाणं सतोऽमन्तो ध्यादयो नायान्तरमामान्यमिति । अथैनर-द्रप्याइयो न स्वतः मला, अयानरमामान्यपस्यात, यत् पुनः म्यतः सत् न तद् अनरसामाग्ययत्, यथा सामान्य-विरार- २५समयाया नि व्यतिरेकी देनुः, नेतन्। यदि हिदम्यादयो धर्मिणः कुलधित प्रतीतिगोवा. धारिणेन्मलो भन्लि [सं कयमयान्तरमामान्यसंयन्धमिवेत? म पात्र प्रमाण मनोमन्नो दग्यादयो नापालामामान्यमिति । अधेतत्-द्रयादयो म म्यनः सम्तोऽयानरमामाग्यवाया, पत् पुनः स्वतः पत्न तदवान्नामामान्यया, यथा] मामाम्यमतीनिः सायं गायती म्यत नि अनिशम् तदमयरियारायने घेद (मारिणम्मतो भयन्ति तदा कम ताप्रतीतिः म्याण २०ायपली 'न म्यवस्मन्नम्न' पनि प्रतिक्षा गदमस्थापिगं याधते । न घेर) मत्रोत्तरम् न स्याः मलने प्रतीनिविषयाः हिन्नु मनासंबन्यादिति, यतो 'न स्वयममग्नालामाधार दिया मन्ति' युनाम् । यि, यादरेकाग्नेन या मिनाम्ययानरमामाम्यानि कयं तस्य नानिमः याध्यान्नामामान्यवरादिनि हेतुः गिनाया? अय नपापि नगानि (तम्येति), मापागापि म्युरिति मामाग्यममशात् परिछपरन् (गामाम्य गमाय-विशेग्य) इनि पेनिशंनम २५पुनम् । यदि मनम्म्यादी नानि गमतानि नाम्ना नानि म मामाम्यागिदिनि, तर मम्प नत्र ममतानि रनि समायेन सानानि यः गन युगमा निषित स्वाभिमतमानमायामनु या ममयायः तथापि पत्र म्ये, गणे, गर्म पापम, गणमा पर्म पाशामामामाय तय धियादीनि, रुपवाटीन, गमन यादीनि पारिपालि मानसम्माति, समवायोनिय मामायण मण गगनाला मादिषापोगनानीति भावादिनांगांतति चना. . fre। मामा (प) art- 4 गामा- . मा. II र 0.html ति प्रति प्रतिमा-ग.। गर.r.kr . . या मानमिवाराम निपणी- पापिया nai it ग्रास विगानिस मारेगारम्, नया एपागिशाला। {গাল্লাামিমাবিশ্বগাখা মাখা পথ খোলানস সং पानामा पापप्रतिमागशेला प्रापायुनी परिपुरा व्यगिपिपेरेन लान मातागि पर पाम, अनुगनाशाप्पाला प्रत्यभानुभागना। न धानु. ५ नागरागुण्यतिराग पुरिनेमदिपिण्यापतिरेण प्रतीनिमययने, गीदादिग्य. नानापि मानहाल । अमिलियामधिधिष्योिणापि सोमामि. मातिरदेनि नापमनरेगापि मिनधरनुपनुगतामा गुणितीनि माया, सयुममा मिरिकनीती दि प्रतिभागमान शोषणकाधिक-बाणदोपरिमानावतरयम्। माने दुमपप्राययोपा मापि पाणदोमानमिनि मादिको विमानम्ग मिष्यायम्।१० गादि-विभिप्रेयपि घर-परिप्यपु म मा नि अमेवाहियाती प्रतीतिलयमामादयगि न मामी भानामरादा विपर्ययगुणयन्ती लपले गर्दा गर्ने घर-पादिपु 'गत् गति रमाला पदागुपरपयन्नी च प्रतीनिः परपि प्रमाणमभ्युपगम्यते । यगो -"प्रामाण्यं यहाण" !ि नदेयमग्यितम् अनुगताका वि पुसियानापानीस्पनधिगतं साधापमुखियन्ती मुखापरिनिधितामा पाधाऽयोगात् प्रमाणम् । माघ अमान्यय-प्यतिरेका-१५ गुम्पारिना मन्यतम् । गादि-शिलारितटोयनस्य घर-पटादिसु लामामा सत्तामुहिपती यत् सन् नि मनीतिः, दमाये घन मयनानि तदम्पय-प्यनिएकानुविधायितया कथं न प्रत्यक्षम्। तसाद पहुए प्यापु नुस्यापारा युरिकतामयम्पनि । यपात्र विभिनेषु घटादिपु प्रतिनियतमेक मनुगतमा संप जातिः। अप पनिप्पतिरिमा जानिरपेयने न प यनियर्शनषेलापां नपसंम्पर्शविषयव्यतिरिनायपुर-२० परमनुगतिक प्रतिमातिन् पर तम् सामान्यम् । नेतदस्तिः यस्लादगृहीतम तम्यापि तनुभृतः प्रथमानानि पस्नु हितीये तुन्यापनामनुगाति धुलिः कचिदेय न सत्राप्रतिपरयन्यता च सर्वत्र भेदयपहारनियन्धन मुल्या-काले.पि परमाध, प्रतिपस्यन्यता आतायपि विद्यत इति कथ ममा मिमालि! नयादिपनयाकारयिषेपेन विशश्मनुगतिरुपता भाति तद्वियकेन घ प्यायू. रुपति कथं निम्यरूपाद् मिनायभासिनी जातिभिन्ना नाभ्युपगमविषयः अर्धयन्द्रियापमेपल्या माति-प्यान्योरेकता रूप-मादी तु मिन्द्रियप्रायत्याद् मेवः, तद. प्यमहनम्। पन एथेन्द्रिपमालामपि पानाऽऽतपादियं ममानदेशच मिनं प्रतिमातीति मिन्नयपुर भ्युपेयने नया प्रतिनियनेन्द्रियविषयमपि जानि-दयनिय मित्रम्। मिनप्रतिमासादेय। तथाहि- घटमम्मरणापि परमहणे 'सन् मन् ति पूर्वमतिपना सत्ताऽयगतिरंगा यदि तुध्यतिरेप सती जातिः हासत्वेऽपि तदण्यतिरिना च, तथा मति व्यनिरूपयन् तदननुगतिरपि व्यरत्यन्तरे पर ज्येन । मनीपते घ पद्पना युगपद् घट-पादिपु परस्परवियित्नातनुष्यपि सर्वदा । तेनेकरूप जातिः, प्रत्यक्ष तथामूनाया एक तम्या प्रतिभामनान्। सम-वियोरपि तस्यामेय संपन्धप्रणमि ताभ्यामपि सा प्रतीयते । तदेयं प्रत्यक्षादिप्रमाणापसेयत्वात् सप्तायाः न तरािकरणाय प्रसार धनानुमानप्रवृत्तिरिति ।। असदेवत्। पनो मध्यनिदर्शनघेला स्वरूपेण पदिारलया प्रतीतिमयनरन्ती जातिममाति, घट-परवग्नुवयमतिमाससमये नदेय मधयम्पितमूनिर्भिमाऽभिधा पा जातिरामाति, तदाका परम्य प्रातया पहिग्नाप्रतिभासनात् । यहिनाशायमास पहिरर्थव्यवस्थाकारी, नान्तरायम यदि नु मोऽपि ययस्थाकारी म्याद नथा सति हदि परियर्समानयपुपः मुसादेरपि प्रतिम पहिानययम्या पालथा घ'गुग्गाधामफाशदादपः' इति साहयदर्शनमेय वात् । अथ लिगकारो पाहारूपतया न प्रतिभातीति न पहिरमी, आतिरपि तदिन यहीरूपतया प्रतिभा यदीरुपाऽभ्युपगतम्या, यतः कल्पनामतिरपि दर्शनहरमेय पटादिरूपं यदिलिखन्ती नदिरं -सामान्यमा- मक्षापा- २-२ च प्रत्य-पा०, वा बिना। T . 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प्रथमे फाण्डे- २० प्रनिमाति, न तु तहानिरिकायपुर जानिमुद्द्योतयति । तन नदयसेया:पि यदिजीतिति । कमाने यहिपकारामानवपुपोऽपि हि केगोण्डकादयो न तथाऽभ्युपेयाने, याप्यमानमानवियत्र जानिस्तु न यहीरुपनया कचिदपि जाने प्रतिभातीति कथं सा सत्याभ्युपगमविषयः? बुद्धिरेव घट-पटादिपु प्रतिभासमानेषु सत् मत्' इति तुल्यतनुरामाति । यदि तहिं न पाया जाति ५युद्धिरपि कथमेकम्पा प्रतिमाति नहि वहिनिमित्तमन्तरेण तमाकारोन्पत्तिमती मा पुश' फेनोच्यते थहिनिमिचनिरपेक्षा जातिमतिरिति, किन्तु पहिजोतिन निमित्तमिति, श्राशास्तु काश्चिदेय जातिबुद्धनिमित्तम् । ननु यदि व्यकिनियन्धनाऽनुगताकारामतिः, तथा सति यथाख मुण्डव्यक्तिदर्शने 'गोर्गीः' इति प्रतिपत्तिरदेति तथा गिरिशिखरादिदर्शनेऽपि 'गोगोंः' इत्येतदा प्रतिपत्तिर्भवेत् व्यक्तिमेदाविशेषान्, तदयुनम् ; मेदाविशेऽपि खण्ड-मुण्डादिश्यकिय गौ १०इत्याकारा मतिरुदयमामादयन्ती समुपलभ्यत इति ता एव तामुपजनयितुं समयां इत्परमीयरे पुनर्गिरिशिखरादिषु 'गोर्गीः' इति मतिऐति न ते तनियन्धनम् । यया च आमलकीफला यथाविधानमुपयुक्तेषु व्याधिविरतिलक्षणं फलमुपलभ्यत इति तान्येय तद्विषो समर्थानीयसी भेदाविशेपेऽपि न पुनस्रपुप-दध्यादीनि । अब मिप्यपि मापु 'सत् सत्' इति मतिरस्ति, ति धेपु च भावेषु यदेकन्वं तदेय जातिः, तत्रोच्यते तदेकर घर-पटादिषु किमन्यन्, उनानन्यन १५ तावदन्यत्, तस्याप्रतिभासनादित्युक्तः । नाप्यनन्यत्, एकरुपाऽप्रतिमासनानुन हि घट्स पर चैकमेव रूपं प्रतिभाति, सर्वामिना प्रतिद्रव्यं मिनरूपदर्शनात् । तसादप्रतीतेरमिताऽपि जातिनादि बुद्धिरेव तुल्याकारप्रतिमासा 'सत् सत्' इति शन्दश्च सयत इति तदन्यय एवं युकान जायन्य तस्यादर्शनात् । न च बुद्धिस्वरूपमप्यपबुद्धिस्वरूपमनुगच्छति इति न तदपि सामान्यमित्येका तजातिवादो मिथ्यावादः। अपि च, अनेकव्यक्तिन्यापि सामान्यं तद्वादिभिरम्युपगम्यते । न च तद्यापित्यं तस्य केनति ज्ञानेन व्यवस्थापयितुं शक्यम् । तथाहि-सन्निहितव्यतिप्रतिमासकाले जातिस्लाकिसंस्पनिरी स्फुटमवभाति न व्यस्यन्तरसंबन्धितया, तस्यास्तथाऽसनिधानेन प्रतिमासायोगात् । तदप्रतिभा च तन्मियताऽपि नावगतेति कयमसनिहितव्यतयन्तरसंवद्धशरीरा जातिवमाति । यदेष परिस्फुटदर्शने प्रतिभाति रूपं तदेव तस्या युकम्, दर्शनासंस्पर्शिनः स्वरूपस्यासंभवात्। सं. २५था तस्य दृश्यस्वभावाद् भेदप्रसन्हात, तदेकत्ये सर्वत्र मेदातिहतेः अनानक जगत् स्यात् । दर्शन गोचरातीतं च व्यत्यन्तरसंबद्ध जातिस्वरूपमप्रतिमामनादसत प्रतिभासने या तस्य तत्संवाद व्ययहिनव्यक्यन्तराणामपि प्रतिभासप्रसङ्ग इति सफलजगप्रतिमासः स्यात् । अय मत सन्निहिनव्यक्तिदर्शनकाले व्यन्यन्तरसंबन्धिनी जातिन भाति यदा तु व्यच्यन्तरं दृदयते । तदर्शनवेलायां तद्वतन्वेन जातिराभातीति साधारणस्यरूपपरिच्छेदः पचान् संभंयनीति, ता ३० पयादान्यपदर्शने कथं न तस्यालद्यापितामहा? असदेतत्, यतो व्यक्त्यन्तरदर्शनकाले तत्परिंगनमेय जातेः स्वरूपं प्रतिभाति न पूण्यक्तिसंपनिया तम्याः प्रत्यक्षगोधरातिप्रान्तन तन्मदरम्यापि रूपम् तदतिकानयात् । तत् फ सनिहिता सन्निहितव्यक्तिसंबद्धजातिपागमा अथ प्रत्यमिसालादनेकस्यनिसंयन्धित्येन जातिःप्रतीयते, मनु फेयं प्रत्यमिता? यदि मन्यसम कुतस्तरमेया सातिरेकानेकव्यक्तिभ्यापिनी प्रत्यक्षा? अब नयनव्यापारानन्तरं समुपतापमान ३५प्रदामिना कयं न प्रत्यक्षम्! निसियामान्य व्यतिरेकानुविधानात प्रत्यायं तर मुत्यम्, असादेनन्। यदि अक्षता प्रमिशा तया सति प्रथमायकिनका पय समस्नायटित संपरजातिकारिष्टदोरन । अयता स्मृतिराहकारिरिहान तत्यायगतिः, या न हिलीय पशिदर्शन का पूरानादिनसंस्कायोधसमुषमातरमृतिमहिनामिन्द्रिय समान जनयति ४. जनयितुमीमा पूर्वप्ना, असमिधाना। शनि दर्शन परिसरमाने तदप्यमनः पतः सरजमरियमपि लोयन पुरतिदिनापामेष की तस्वजातीय प्रतिनि ध्यात्यलोधगे। अधेन्द्रिपति रामभयापिनी यादिति नागो संभानगारिणी, पुलस्तु कप्ता पाहा...,rrr.fr ईश्वरसरूपवादः। स्मृतिगमपायीति चक्षुषा परिगतेऽर्थे तदुपदर्शितपूर्यव्यक्तिगतां जानि संधास्यतीति, तदसत्। यतेः सोऽपि न स्वतन्त्रतयाऽर्थमाहफा किन्तु दर्शनसहायः । यदि पुनः स्वतन्त्र एषार्थप्राहकः स्यात् तथा जानिप्रतिपत्तिः स्यात् । तस्मादात्माऽपि दर्शनसहाय तत्रसंधास्यनि: नन्यत्रापि स्मृतिः परिहनपुरावास .. सन् कथं पुरोवत्तिनि अप्रवर्तमाना स्वविषयान सामान्यादीस्ता संघटयितुं क्षमा? तदस्मृत च संघटनं कथमात्माऽपि कर्तुं क्षमः । तथाहि-दने सति द्रष्टरि तम्य स्वरूपे जाते तभिमझ न स्मृति- कृतं लम्प माति । यदि तु भाति तथा सति द्रहरूप पचासौ, न सर्ता । अथ सर्तरुपे प्रस्वरूपम नुमाविष्टं प्रतिभाति, नथापि सतधाऽमी न द्रष्टा । अथ द्रष्ट-सरस्वरूपे विविक्ते भातः, तथा सति १० तयोर्भेद इति नैकत्यम् । तथाहि-स्वरूपं दग्यिपयावभासि प्रतिभाति, सस्वरूपमपि पुंसः स्मृति विश्यमयतीर्णमयभाति तत् कुतः पूर्वापरयोजाति-रूपयोः संधानम् ? यत् पुनरुनाम् 'स्मरतः पूर्व दृष्टार्थानुसंधानादुत्पद्यमाना मतिश्चक्षुःसंयत्वे प्रत्यक्षम्' इति, एत-' दप्यमत् नेन्द्रियमतिः स्मृतिगोचरपूर्यरुपमाहिणी, तत् कथं सा तसंधानमात्मसात्करोति १ पूर्पट- एसंघानं हि नत्प्रतिभासनम्, तत्प्रतिभाससंबन्धे चेन्द्रियंमतेः परोक्षार्थग्राहित्यात् परिस्फुटमतिमा-१५ सनम् असमिहितविषयमहणं च, तन् कुतस्तयोरेफ्यम् ? अथ परोक्षग्रहणं स्वात्मना नेन्द्रियमतिः संस्पृशति, एपं तर्हि तद्विविपतेन्द्रियमतिरिति कथं तत्संधायिका सामग्री अग्युपेयते ? यदि च स्मृतिविरयस्वभावतया दृश्यमानोऽर्थः प्रत्यक्षबुद्धिमिरघगम्यते, तथा सति स्मृतिगोचरा पूर्वस्व- मायो घर्तमानतया मातीति विपरीतस्यातिः मय दर्शनं भवेत् । अथ यत् तदा तत्राविद्यमान. मधमति भानं सम विपरीतख्यातिः, प्रत्यक्षप्रतीतिस्तु पूर्वसंधानादप्युपजायमाना पुरः मदेव २० पम्नु गृहती कथं विपरीतल्यातिर्भवेत् ! ननु पूर्णरुपमाहितया तस्याः सदर्थग्रहणमेय न संभपतिः स्मरणोपनेयं हि रूपं प्रतियती धर्तमानतया प्रत्ययुद्धिर्न प्रनिभासमानवपुषः सत्ता साधयि- तुमलम्, प्रत्यस्तमिनेऽपि रपे स्मृतेग्यनागन् । तदनुसारिणी चाक्षमतिरपि नदेवानुमन्ती ग सत्तास्पर - परिहरन्ती यर्तमाने परिस्फुटे धर्मत इति सदेव सदनों यता जातिः समस्ति । यदेय दिहितीयव्य-२५ नातीति न तत् सत् । ततधानेकव्यनिव्या- पिकाया जानेरसिद्धिरिति न तर लिङ्ग-शब्दयोराप प्रवृत्तिरिति न ताभ्यामपि तत्प्रतिपत्तिः। यथा च प्यक्तिमिनाऽनुस्यूना जातिन संभवति तथा यथास्थानं प्रतिपादयिष्यत इत्यास्तां तावत् । सदेयं सत्चा-समयाययोः परपरिकल्पितयोरसिद्धः 'प्रागसतः कारणसमवायः सत्तासमयायो या कार्यन्यम्' इति कार्यन्यस्यासिद्धत्वात् स्वरूपासिद्धोऽपि कार्यत्यलक्षणो हेतुः }। अथ ध्यादेष दोगे यदि यथोक्तलक्षण कार्यत्वं हेतुत्येनोपन्यस्तं स्यात्, यारताऽभूत्या भवनल- क्षणं कार्यरचं हेतुन्वेनोपन्यम्न नेनायमदोषः। नन्वेयमपि भू-भूधरादेः कथमेयंभूतं कार्यन्यं सिद्धम् । अप यदि अब विप्रतिपतिविषयता तदाऽनुमानतम्नेषु कार्यन्य साध्यने, तशानुमानम् भू भूधरायः कार्यम्, रचनापत्यान, घटादिधन्' इति कथं न तेषु कार्यत्यलक्षणो हेतुः सिद्धः । अमदेनन्, यतोऽ- प्रापि भयोगे भू-भूधरादेरययविनोऽसिद्धेराधयासिद्धः रचनायत्त्वान्' इति हेनुः, सदसिद्धपं घ प्राक३५ प्रतिरादितम् । किश्च, { किमिदं रचनापत्यम् यदि अवययमनिवेशो रचना तद्वत्यं च पृषि-यादेस्तदुपाय. विशेषणो रचनावस्यादिति हेतुः। तथा, प्रतो हेतुः। ..! उच्यते, तद्माकप्रमाणामायान् ४० पाधकममाणोपपतधातथाहि- [प्रासनिक संयोगस निरसनम् ] "संख्या-परिमाणानि पृथक्यम् संयोग-विभागी एण्याऽपरम्वे कर्म च पि(द्रव्य)ममायामा भुपाणि" [ धैशेषिकद०४-१-११] १-यमाने परो-गु। २-दाति एनहि त-गु.। १.१.२५. तिगतं रूपं.

पय । तथाहि-कश्चित् केनचिन् 'संयुने द्रव्ये आहर' इयुको ययोरेव न्ययोः संयोगान पवाहरति न द्रव्यमानम् । किश्श, दूरतरवत्तिनः पुंसः सान्तरेऽपि यने निरन्तरम्पावननिर्मा १५तस्माच्चैत्रस्य कुण्डलसंयोगः प्रतिपिष्यत । तथा, 'चैत्रः कुण्डली' इत्यनेनापि विधिशस्तर फुण्डलयोरन्यतरविधानम्, तयोः सिद्धत्वान् पारिशेप्यान् संयोगविधानम् । तलादर कर चैत्रसंवन्धिकुण्डलं निपिध्यते विधीयते वा न संयोगः । न च संबन्धन्यतिरेकेष वैशया +4+l, अस्खलन्प्रत्ययन्नानुपचारितत्वात् । न चैत्रकार २५नासंवन्धिनोः, हिमवद्विन्ध्ययोरिवासंबन्धिनो संवन्धानुपपत्तेः न चासंबन्धिनोभिन्न संबन्धानुपपत्तिरिति धतुं शक्यम्, यतश्चैत्र-कुण्डलयोः किं संबन्धिनोः स संबन्धः, उनासंदिग। मिन्नं संबन्धित्वं शक्यं विधातुम्, विरुद्धधर्माध्यासेन भेदात् । नापि मिन्नम्, तमन्ना कल्पनेऽनयस्थानसहान् । संबन्धिनोस्तु संबन्धपरिकल्पनं व्यर्थम्, संबन्धमन्तरेणापि तसा दयन्ति तथा सदयस्यायुना अगादिकमपि कार्य निष्पादयिष्यन्तीति व्यर्थ मंयोगदानम्नदाता परया से संयोगापा शनिः तदसारम्यतो यथा विशिष्टामस्थायुनाः नित्यादयः योगमा निधनदि संयोगाभ्युत्पादनेण्यपासंयोगनिम्यतिरेण नामी प्रपसंत लग संवोगा पसिन्याः परिकरणनम् । अथ संयोगशनियतिरेगन कायोत्पादने कारणहारः प्रताप नन विभिशषस्थानिकंग पृथित्यादयः योगशनिमपि निमपितुं क्षमा यामाग नामम्तयागदिवं. नियंपियन्तीनि व्यर्थ योगानस्तदनगदग्गिा पसलम। पम्ति शिन्यादर निमार्य दोरा, फोलनायपि योगनाला शापना। सारथिनागनादाराग्यनयातोसिमानामपाम्पनरकमादिगाहा संपोमा [न्यायवा० पृ० २१९] इति, ननिरस्तं द्रष्टव्यम्। संयुकद्रव्यस्वरूपायभामन्यतिरेकेनासमोर स्वरूपणासंयन्धित्यप्रसङ्गात्। मिन्नस्य तत्कृतोपकारमन्तरेण तत्संबन्धित्यायोगा। तो यतनम् 'विशिष्टायम्यान्यतिरेकेण क्षितिजोदकादीनां नारसनकत्वम्, मा गति अथ तामन्तरेणापि रानिमुपातित अधकार- नि पननाम् इदमयनुगमयम संयोगय परेण प्रत्यक्षमागवारगतम्। न व समयम्नुहयानिमालकाले प्रतिमा तारिकमा प्रयोगो बहिनाहरूपना दिना भाति, नापि कल्पनायुजी पनुदान विपनदोहगं चालाम् .in संयोगसम्पनुनानि । मदेवमुरलन्धि संयोगम्यानुएलपरमावः, गाविषाणयन् तेन यदाद उद्दयोनकर:- "यदि संयोगो नागिरं मयेत् तदा क्षेत्र-पीजोदकादयो नियिंशिष्त्यान् कुर्यः, न चैवम् , तसान सर्वदा कार्याऽनारम्मान क्षेत्रादीन्यरोत्पत्ती कारमान्तरमाक्षात मृत्पिण्डादिसामग्री घटादिकरणे कुलालादिमापेक्षा योऽसौ क्षेत्रादिनिरपेक्ष्यः स संदेश सिद्धम् । किञ्च, असी संयोगो द्रव्ययोविंशमान प्रतीयमानन्यान् तनोऽयांन्नादन भन्दा रुदयमासादयति, सेयं मिथ्यावृद्धिः दर्शनस्य गवये 'गीः' इति विभ्रमो मयां कुण्डली' इत्यनेन प्रतिपेषवाक्येन न प्रत्यक्षे निर्विकल्पके सविकल्पके पाऽप्रतिमासस्य प्रतिपादिनन्यांत् । २० प्रत्ययहेतुत्वात गमन्तरेण संयु सिनी बुद्धि एव संपन्धिस्यरुपत्यात् । १५परिकपनीया, नत्राव्यपरेसनयस्या । varपोरगानीनशिशेनिमापति मार पोगा, २० सरसरूपयांदा ११५ सत् साधाममाणाभापाय। यस्तु संयुगे द्रव्ये एते' इति, 'अनयोऽयं संयोगः' इति स मेदान्तरमतिोपाप्रतिक्षेपाभ्यां तथाऽयस्पोत्पतयस्तुप्रयनियन्धन पय, मातोऽपरम्य स्वसिदिः । न चारापिकाये तयोः स संयन्धी युनः। तत्रसंपन्धमा समयायस्य निपित्यान् पमानन्याय । न च नजन्यत्यादमी तत्संबन्धी, अक्षणिकत्ये अनन्यविरोधस्य प्रतिपादयि. जन्यान् । क्षणिकावेऽपि तपोरेकमामध्यधीना नैरन्तयोत्पत्तिरेय, नापरः संयोग इति 'रचना. ५ त्इत्यत्र तोपिोषणस्य संयोगविशेषस्य रचनालक्षणाऽसिद्धेस्तनो विशेष्याप्यसिद्धि स्यापासियम् । अय पृथिव्यादेो कार्यत्वं पौद्धम्युपगम्यत एयेति नासिद्धत्य तैरम्प हेनोः प्रेरणीयम् । मन्यत्रापि पभूतं युद्धिमपूर्णफत्वेन देवकुलादिप्यन्यय-व्यतिरेकाभ्यां ज्या कार्यत्वगुपलब्धम् पदभियाद. नोऽपि जीपदेयकुलादापन्नम्यमानं लौकिकपरीक्षकादेस्तत्र सतयुद्धिमुत्पादयति-ताइगभूनस१० इत्यादिपु कार्ययम्याऽनुपलम्रसिद्धः कार्यदलक्षणो हेतुः । उपलम्मे या सत्र ततो जीर्णदेयकुला- पियाऽक्रियादर्शिनोऽपि नगुद्धिः स्यात्। न हन्यय-ध्यतिरेकाभ्यां सुयियेचितं कार्य कारणं मियरति, ताऽहेतुशन्यप्रमात् । अतः क्षिरयादिषु कार्यत्वदर्शनादक्रियादर्शिनः कुलबुद्धपनुः पपत्तर्यद् युधिमकारणायेन व्याप्त कार्यन्यं देवकुसादिपु निधितं तत् तत्र गालीत्यसिद्धो हेतु फेवलं कार्यचना प्रति तत्र न च प्रवृत्त्या परस्परमर्यान्तरत्येन व्यवस्थितोऽपि धर्मः शम्दमात्रेणाऽमेदी १५ हेतुन्वेनोपादीयमानोऽभिमतसाध्यसिद्धये पर्यामो भवति, माध्यविपर्ययेऽपि तस्य भावापिरोधान्। पया यमीरे धमिगि कुम्भकारकतत्यसिद्धये मृद्धिकोरमा हेतुत्वेनोपादीयमानमिति। यद् युद्धि मरसारणयेन पातं दयालादी कार्यन्यं ममापनः प्रसिद्ध तप क्षिल्यादापसिझम्: यय मित्यादी कार्यत्यमा हेतुन्येनोपन्यासमानं सिद्ध नत् माधविपर्यये पाचप्रमाणाभायात् संदिग्धव्यतिरेकत्ये- मानकालिशम्न नतोऽमिमतसाध्यसिद्धिः। नन्देनन् कार्यसमं नाम जात्युत्तरम् । तथाहि-'हतकरयादनित्यः शम्दः' इन्युने जातियाचयापि प्रेरपति-किमिदं घटादिगतं स्लान्य हेतुन्वेनोपन्यलम्, किया शादगतम्, अयोभयगतमिति ! आये पसे देनोरसिदिनन्यधोऽन्यत्र पर्नते। द्वितीयेऽपि साधनविकलो हटान्तः । तीयेऽप्पे- ताप दोषाविति । एतय कार्यसमं नाम जात्युत्तरमिति प्रतिपादिनम्। यथोनाम्-"कार्यत्यान्यत्वले. शन या माध्यामिनिदर्शनं नत् कार्यममम्"। रति, कार्यन्यमामान्यानित्यन्यमाघ.२५ फवेनोरन्यारोऽभ्युपगते धमिमेदेन विकलानवर बुद्धिमत्रपवेशित्याद पार्यत्वमात्रेण साम्येभीष्टे धर्मिमेदेन कार्यत्यादेविंकल्पनात्, अमदेनत् । यता सामान्येन कार्यत्वानियत्ययोपिपर्यये पाभर. माषपनाद् म्याप्तिसिद्धी कार्यन्वसामान्य शादादी धर्मिण्युपलभ्यमानमनित्यवं माघयतीति कार्यन्य. मात्रय नेत्र हेनुग्वेनोन्यासे धर्मविकल्पनं यत् तत्र शियेन तत् सर्वानुमानोच्छेदान कार्यसमजा. स्युनरनामामाश्यति न स्येवं मिसाघुद्धिमत्कारणत्ये माये कापन्यसामान्य हेतुल्येन संभपति, तस३ रिपर्यये याधरमाणामागत् मन्दिग्धविपक्षभ्यानिकत्येनाऽनशान्तिकत्वात् । यप सिमकार. पपूरन प्यास चालादी कार्यन्यं प्रतिपरम्-यदभियादशिनोऽपि जीनामाहादी एनयुधिमु. पादयनि-तम् नमासिक्षमिनि प्रतिपादिनम्। अपि च, पति अब पापानित्यकाबुद्धिमत्कार मित्याः पारमयेनामिनं कार्यन्यना. देतो तथा मति पदादी प्रान्तपमिति तत्पूर्वकवेन कार्यत्यस्यानिधयान सायविश्लोरान्तः पिजय हेतु स्यात्, अनित्यपुस्पाधाराव्यापानेका पूर्वसन्धन पाय कापन्यस्य पटाई निधयान् । सदुद्धिमाकारपत्यमासापापेनामिप्रेमियादीनदि नियाल्यापार-सापक पूर्यकल्पतरण निगम लित्यारागिनवासिटि अप पुस्मितारमन्यमामान्यमेष शिल्या: साम्यते, तप पक्षमतापला सिसिपिरोगधार लिपति निर्पिदोषण मामान्यम्पामभयान अनियमानयता रिणः सियादिपिनिर्मापमानादिनम्वेन पटादाघुपमापन विशेपर पु मरवारपयसामान्यापार तासभात् । नन्वेयं सामान्यादान यद् घटादी पनिम्य -दानमतिसंपादic.i-भेदातर प्रतिष्पापांक -यो यु-भ...। १.१.१. ४-बारव्यमा--..-पतिरेकि-कान TV २.१४-१ कि सामना .....। - ৪ টি, লবণ মালীয় নিপ মানানসম, সুমিতাল-শামস খায় । না বা বাসমণিশিক্ষণ চা ল না মুন্নিাণকামারামাশা চা- অ স নিশি: যা মামণিবিলমিল ( 6। . যী ১ম খুগামমালামাস * * মন প্রমাণ = গাখ খুৱমাাপা খুশি ‘াশি মাল মালা? নাকি? ৭ aa , * * * । মা বা কাপ। খালা খাইনি এখ fা ফীল মল শাহী দক্ষিণ স, দু: খনী তুমি, শামা মাশাল ৯ । মা বাপ াগী থৈ আঁধ প। গান সোহাগ, এ পদ ধূ * * * * * গান। বাগান ** ৮। ৪ শিশী, শরি কাপশা নিই * * * *** * * irশাখn if fং কথred ཙ་ཙa tfanཙམ་ནས་གདནfi། གཟiniqཀ༣༥6* riw tit । শশশশ শ' শণ বক্ষণগণনা শপ + ৭ + * * * * * * * * * খে * * * ** fি rশীলিপাই গা ধৰিা ধন , ৫ * * * * * *২ শ +ft, Www ৫ * * * * শেখ না। * মিশাধনা ? লা জয় * * * * * * * * * *, * ২ * * * * * * * * * * । প প ঋলা মণ ফf *** ** ** ** ৬rt;;প, # ; পাঁj, ft;1 {{+++ ৫ ++ '* * * * * * * শকি ****** *** *** fire ৫। ক) : এ. ১০৫' ?? #f• ? *** ** ***** Tre , t} *** {br 11 * * * * * * **}} + * * * * * * *** ** ১০:১৭ ? ## ৮ ৮৯৫ *** *** *৫.১ : ৭ + p. + প ৫০ , সুখ ? *F = ++ . .

শালা।। पिम् । म पिसावादियरीपरस्ये गयपि कमगररयम् । भगवादिनप्पोपारेण शम्या. सुपलमादिति पत्। गनु पपा शरीराधे सत्यपालादिशरीरविलक्षणं पिशाचादिलक्षणं शरीरमा सुपलम्यायनान्युपगम्य तथा धादिविस्तारणं भूयदादि कार्यरघे सत्यप्पशर्यकरयन # माप- गम्यते ! सथाऽभ्युपगमे ध पुनरपि प्रतो हेतुमिवारी । सदेयमसिमायाऽनेकान्तिकरय-विग. सपशेषपुरत्या मामादेतोः प्रस्तुतसाध्यसिमित न यारुम् 'पृषिम्यादिगतस्य कारवस्या ५ मतिपसन सस्मादीपराधगमसि, तदू युजमेयोताम्। परम् 'एपियादीनां पाई कायमभ्युपगतम् कयमेष पदेयुति, सदसारमा प्रयत. सापतिहिनिपधग काय तेप्पसियत्यप्रतिपादनात् । यधामापि येऽपि घार्याकारतेपो पापस्य नेप्छन्ति सेपामपि शिशिष्टमंस्थानयुगाना धमकार्यता' ति, तदध्ययुक्तम्। संस्थानयुक: रपस्यासिमायादिदोषदुएयप्रतिपादनाते । स्थानशापाच्या फेपलं घटादिमिः सामान्य १० पृथिवादीनाम्, न यः कथितयोगतः समानो नियते' सदेपमेषा यानाम् 'धूमादापपि पूर्वापरमविगतो मेष शशिनुगतोऽधः समानोऽस्ति' इस्यादि, सदसहतम्। घरादिसंध्यागेम्पा पृधियादिसंस्थानस्य लक्षण्येन देतोगसिसत्यमतिपादनात् । पदप्युकम् 'व्युत्पन्नानामरस्येष पृथिव्यादिसंस्थानपरव-कार्यरयादेतोधर्मिधर्मनाऽपगमा, अापुरपमानां नु मसिद्धानुमाने धूमावायपि नास्ति' इति, तदप्यपाल यतो यधनुमाननिमिचहेतुपक्ष-१५ धर्मप-प्रतिपन्धलक्षणां प्युत्पतिमाश्रित्य प्युरपना अभिधीयन्ते तदा पृथिव्यादिगतसंस्थान-कार्य- स्यादी घटादिसंस्थानलक्षपये प्रतिसाप्यसाधके व्युत्पत्तिन केाशिदपि भवति, यधोक्साध्य. च्यामध्य पृथिव्यादी संस्थानापरमापात् । माथे या शरीरादिमतोऽसदादीन्द्रियमावस्यानित्ययुद्धपा- दिधर्मकलापोपेतस्य परादी संस्थानादिहेनुध्यापफरवेग प्रतिपक्षस्य कर्नु पृथिव्यादी सतः प्रतिपतिः स्थात्, न दिनुव्यापकमपहायाऽव्यापशय विरुद्धधर्माकान्तस्याऽपरस्य साध्यधर्मस्थ प्रतिपत्तिा २० सापयर्मिणि पोतलक्षणलक्षितहेतुपलसमुत्थेत्यनुमानविदां व्ययहास । कारणमात्रप्रतिपत्ता तु ततः तत्र न विप्रतिपत्तिरिति सिइसाप्यता । अथ हेतुलक्षणग्युत्पत्तिव्यतिरिका व्युत्पत्तिमाभित्य 'युत्पपानाम् इत्युध्यते तदा 'पेनचित् सम्रा जगम् सृष्टम्' इति निर्मुलदुरागमाहितधासनानाम- स्वष पृथिव्यादिषस्थानपा-कार्पश्चादेतोधर्मिधर्मशाऽधगमादिः। न च तथाभूतधर्मिधर्मताधवग- मात् सायसिद्धिः, येदे मीमांसमस्याऽसर्यमाणकर्दकत्यादेः धर्मिधर्मताऽयगमादेयथाऽपौरुषेय-२५ पिस्थ । 'अव्युत्पन्नानां तु प्रसिद्धानुमाने धूमादायपि नास्ति' इति युतमेप, असामिरप्यभ्युपगमात् । यk 'प्रासादादिसंस्थानादेलक्षण्येऽपि पृधिध्यादि संस्थानादेः कार्यत्वादि पृषिष्यादीनामि. प्यते, कार्य च फर्स-फरण-कर्मपूर्वकं टम्' इत्यादि, तदप्यसङ्गतम् । यतो यदि नाम घटादेविशिष्ट पार्यस्य कर्तपूर्पकरप्रमुपलापं नेतापताऽविशिष्टस्यापि भूरहादिकार्यस्य फर्टपूर्षकत्यमायुपगन्तुं युगम् । अन्यथा प्रविधीलक्षणय कार्यस्य रूप-रस-गन्ध-स्पर्शगुणयोगित्यमुपलम्धं भूतत्वे सति, ३० पायोरपि रुयोगिएमभ्युपगमनीयं स्यात्, तत्वादेष । अधात्र प्रत्यक्षादियाधा, स भूगहादिकार्य- प्यपि समान इति प्राा मतिपादितम् । यसूत्रम् कर्वपूर्षकस्य कार्यस्वादेस्तलक्षण्याद् न सता साध्यायगमः' इत्यादि, तत् सत्यमेव तलक्षण्यस्य प्रसाधितरोत् । अत एप सिद्धम् 'याहाधि. धामापामाधानतिमत् सप्रियेशादि इत्यादिनन्धप्रतिपादितस्य दूपणस्य कार्यत्यादी समिती. श्वरसाधक हैनी समानस्याद् न कचित् सरसाधफता। 'यषमनुमानोच्छेदमसाा, धूमादि ३५ पथाविधमायादिसाममीभाषामाषानुपृत्तिमत् तथाविधमेतद् यदि पर्षतोपरि भवेत् स्यात् ततो पक्ष्याययगमा स्यादिकास्तु पूर्वपक्षप्रन्या पूर्व मेय पिहितो।। पथा पधाभूतोऽधूमपातो धूमोऽननिध्यायसनाऽशिना ध्यातो विपर्यये पाधकममाणय. सादधसितो गिरिशिखरादायुपसम्यमानस्तद्देशमनिसामान्यमनियततार्ण-पार्णाधसिम्पतिसमाधि- पु. ९३ ५.१०।११. ९६.३८ । ३ पृ. 11५ पं." ५१. 104.१६पृ. ५४६.३ पृ. ९४५.३। 4 ...पू.१४.१५७पृ. 1.04.१५ ११ पृ.९४ पं.१ IT.tr १४ पृ.५४ पं. १५१.१४.१५ १७.६५.७॥

সম কা- যমন্তব্যবি; নং ফাধাৰ্থ মুমিকালশনাল গাদ বিশ্ব বাঘমালদ্বগ মিষ্টি কিন্তু মাে(মা) চার বৎ নানিয়িন, সামাল নিয়োগ মামনুমাৰি ধন্য মহামাৰী গুনলাম্যানিনি। सेनं 'पृथिव्यादिगतकार्यन्यदर्शनात् कर्षदर्शिनस्तदप्रतिपक्षियत् शिप्पयादिगतपाurila ঘূৰি বৰিবি কাশীনায়কৰিী মনী যা মঃ। যদি কাৰ শ্বমানানানা রাবিনামায় শীতামিবিশ্বদিহি । মুনি বন্ধ কার্যমামা ঘূখিমামলা(না)তিমালা প্রণ प्रतिपत्ती किमायासम् ! कारणमात्रमतिपसिस्नु ततस्तत्र भवत्येक, "मुनिशेषितं काय कारण মিন্যানি" হিনি যাহা চা বদ্ধ ঘশ্বাস: মনি স্কার্যকালী {গা বা শিয়া নযমান সমান । ঘ ল গায় নাদমাশ থাঃ- মা নাপাসি যুক্ত ঘন, দুলাবি হয়শা , শান্ত। [নাৰি যাৰ কাষ সুবিমলা: শামান্য রাশি। যয় ‘দয়বি ঘিরি ব্যবধায়ানষ যা বিনামনগর বিঃ স্বাধীন বিলাযি fাশ বিনা মনি (৬াণিষা। যা ব খান ঘসেম। দু দিন থানা নুন স্বাদমাধা' বা যা নিমেথ। গা মা ঘাম-“যথা -বিকাশেম্বীথিবীণা কাফি খা মা- fuসাগলো, ১াস' সাখা. মতিয়া এনবিশ্বাস। শাফাই দলশান। যখন শিব ধ্যানাবলিঃ ইস • মামলা গালাগান' বাঁশ, পাগলিনীঃ পশন। হয় [ন ঘাষণঃণি মালামাল ফাগ শেi ৪ লাগা' সি, টি শন ল : গামিলি পvশা। যখন গামা হাপানিয়া স্বা, গামাপা মাপালপ, গফরগ গণনি।'' লশ, সমাপি বা কম গ র কথা ? ফাখুময় র স। পর শাখাখা সারা g, +: না! খ এমার্গ পিৎকালাম। * পথ-নিবাৰণ সংশিশলগসাইফ- কুশ শi ; মা'! খালি মাখা সামগং, পায়। গ- ** গণ ৭৮ লাৰুণা চালবাস - ল' ** : পপ গাণাপাৰি। ৯। খ কল' ** মগ, লঞ্চ পাপা? * * * ম নানুগ ধপ (sar শ ২৭ মণ ফি শপ : শাকিব খান নি। গল। খ গণনাগাসাঃ ***** : :-* ব শ *, *শী না। *** ল ৮r,rশাশ। শাৰ - Y¢ ? **** ***** ** ** ***???? == ৪ ईपरम्नरप तरायपत्यम् । अथ पद यत् कार्य सत् तद् उपादानापमियकतपूर्वकमुपलाधं घटादिषत् पृषि पायपि कार्यम्, सेन तदपि नदमिश्कर्षपूर्वक युक्तमिति नेतरेतराभयदोन मनु घटादिका कसुरपि कुलालादेयंदापि सर्वथा घायुपासनाधमिगत्यं सिदं स्यात् तदा युज्यताप्येतद परमान चतम्याऽपि घटातुपादानोपकरणादेः परिमाणाऽयययसंपेयरयायनेकधर्मसाक्षात्करणमानमलि, वयं सिद्धम् (!)। (क)चिमाशपरिमानं नु चेतनत्वेऽस्यापि तदाधारस्य पा सत्तस्य तदहए. ५ निपतितफलोपभोक्ता प्रतिनियतवारीराधिष्ठायशम्य विद्यते इति ब बतिरिकापरमानयतो महेश परिपत्रनम् । न चायमेकान्त:-सर्व कार्य तदुपादानापनि नेर फत्री नित्यंत इति। स्वाप-मदा घस्थायां शरीरायचयपप्रेरणस्य कार्यस्य तदुपादानामिमानाऽभावेऽपि तत्तत्वनोपलधेः। यंशोकम्-'न चाएजातेषु स्थायरादिपु तामहणेन प्रतिक्षेषः, अनुपलब्धिलक्षमातत्या. दयन्' रति, नदप्पचायः यतो यदि तस्स शरीरसंयन्धरहितस्य कायमभ्युपेयने तम युक्तिसन:: तम्, नरसंयन्धानिस गुलामनय जगत्मात्यानुपपत्तः । अयशान-प्रया- निर्या-ममया- यामायाद मुतामनोऽकन्ग पुनः शरीरसंबन्धामापादिति विमो हतः, तरयुक्तम् मानादि. समयापन पारनाम्युगगन नाऽपि निपिसत्यात् । तलाउरीरसंपन्मादेर तस्स अगरयम- भ्युपगन्तपम् कुलालस्येव घरवाईत्यम् । तत्संपन्धाधेदम्युपगम्यने फन तस्वोरलम्घिटसमार- रपम् ! कुलालादेरपि शरीरमंपन्धादेव उपलब्धिलक्षणमामयम् न पुनः नवन्पादितम्गरमनो१५ यायम् । तशोऽपि शरीरगंगनिधन्य धारयुपगममामिाधिसमानुपी. स्ताकर्नु न्यापरारिप्यमापः सिख इति कथं कार्यरमणो नुभितारी! आधारयं तप्प रमतस्तन सदपिनोपत्तभ्यत इत्ययमदोषः। नरमपि सम्मिन् सति स्पापराविषं जातम् प्रति प्रतिपत्तिमा भून्, तपोऽन्यमान्य)शापमावेऽपि पपा मान्द्रिय न्द्रियस्थाऽमाचे रूपादिशानं नोपजायते तथा पृधिकादिफारममावस्येऽपिकदाचित् नगरदिर २७ सत्यापरादिकार्य नोपजायत इति व्यतिरेकात् मनीतिः किन स्यात् ! पो पत्र नियमेन संनिहितमिति चाना):पं दोगलाई युगपनाविषुत्रिलोगाधिकरणे मापुर पालमपर गुसन सापपवर मदेश्वरपपुषोऽपि युगपारपालन्याधिः संमयति । अमृतारे दिमादामा शमेय तउरीरम्, नम्प तच्चीवनावाप्पसिदधात् । अध यापन्ति प्रममादीरादिकापाधि तापन्ति सपाविधानि नउरीराणि पारयन्ते नाद तरी सात अगदापरितमिति मागवि.२५ फारसननम् तदुरपतिदेवामापाद्, मापि माहेश्य चिन् यतिम धिता निति मम्मीराणां पादाभिधानमयात् । अपि प, नान्यपि कार्याणिपापप्पलाद मरम्। सनस्लरकरणे सायास्याऽपराणि पशरीराशि कपनीयानि, पुमा पाररि (नि) भामर. गातो मुक्तिः । सारीरमापारसहायोऽप्पसी स्थापराविका पनाति बपिj दुनम्, भने- पदोपमात्। माऽपि सत्तामा वेगासी स्वकार्य करोनीति पापितुं घुषम्, भारीपन पगदाद। अप मारपमिमनामीभ्यरो निमिसमारपम्, नस्य कारपर सकाकारपरिकाने मान्दपा. हरपरिहान(भान(पा)निस्यारोमेनियाhrमारे जानुने (म) अकस्म मत रिकाममिति पेन, म सकलनुपालविषय मामिलमन्दिर हार्म, संभवति इद्विपाल पुगपसाप मशिकभाषा। दिमिर पावि.३५ मायुपगम्पने, तगार- “খোয়াখাখ পরমোন্তা মানে না १० १, २, ४] पान..., .. .। -म्-न पुन ... सिर पनि... that 'm greater wiry Trt - पनि पारि.....:

साविशेषणप्रिया N RAINITIATRE सानिमामा प्रमाण" मा TRENT पार प्रशिवाने बने मामा जी मनिमदिन.मामारि मामा कलाम सामRARTHERE ५. 'मर करोति महार' माNिTSHTRaniree का मितिसमति मागप्रमियोrimary र) मेxिATARITAITITRA Tert- नारी र मापा पोष ए. मारामागुण गुरु । की. मी गाinger AT EMAITHESENTERTrenitarimritiirants Frma | Harr होता mut air हा *HTTTTTTTETirailer Turint. It ima Trmer. The maitsaretarinary htra.MEETITLEDITrinr कारभार WHAT KATTETTE REMRAPATTrirary karerai+METAITHEMATRE ***rrrrangemein IITTARITI AT THEART #Frerakarmirmir TIERTISTimiterferinar is my treat an et an antram RAT TIRTHAmrittent ***** ManALETTTTTTTTTTTARTER * * * * * HAVETTEfroinniy HTTPHITTER - Read try antarratTRY ATTITE ****Kriparture Eart IITi Tumhirom Mm rat marathi trani antertair water Pottern Rrtramstrati EMANTari Amit AtET 2 day. Ir. Timitramala मा timist - Pex HTRA AHEARTHERE * * * * * TRITrnama ** **, **rie AIN Iran treatent astak क W .

ईशसार लरेच सद्गमयप्तीपमवादितम् । गधा(d) नुसामानक के स्थावरेषु कर्नुलुपलाभा पारीरापमायात, नस्यमा' स्यादि, तदा प्रतिक्षितम् । उसोतररयो । यदायुनेम् 'चैतन्य मारेपोपादानाधिछानाम् क प्रत्यक्षागतिः । तसंगतम्। तयोगदानाविधायकस्यश বিশ্বনাথ, লােবি বল বন ঘনঘিাষণাধি মুন্তাখান বন্ধ मिकरूप्यो दर्शनाधिशेषात् । यधापर्धापि कार्यवशारीरेण सहमभिचारो रयते, स्वशरीरापपयानो हिशरीरातरम. स्तरेणापि प्रवृत्ति-निवृमी फेयलो विदधाति' रति, सरपयुक्तम्। यतः शरीरसंपन्यनतिरेकेण घेत- मम्य म्पशरीरापयषेपन्या या कार्यनितकावं न एमित्यन्यत्रापि सत् मसन फापानीपमित्येताय. म्मामेव प्रतिपापने, न विपरमारीरसंपापपरिकल्पनमोपयोगि। यदि च शरीररहितस्यापि तस्य भ्रहादिका बापार परिकाप्यते तदि मुसापि तदन्तरे शनसमयापिकारस्त्यपरिकल्पन'. किन प्रियते ! सपाऽभ्युपगमेन बान-मुजादिगुपर हितारमस्वरूपास्थितिमुक्तिः संभवति रति तदर्थमीभ्यराराधनमसंगतमासम्पत। यदपि 'कार्य शरीरेण विना फरोतीति नमाग्यम्, तत् • तिरेकेष कार्यकरणारी "अचेतनः कथं मायस्त- ": रादेवारीपसंपदेच्छा.१५ भाषानुपर्ननाऽदर्शनात् । सदसंपरस्पेडाया अप्यभावात् मुक्तस्येष कुतस्तदनुघर्तनमचेतनकाय? अप पिडादारीरसस्थानो परिकल्भ्यते, किमिति भूरुहादिकं कार्य कर्दविकलं एमपि न कल्पनी प्लेन परस्यापि प्रयनसमावेन काचिन क्षति' इति निरस्तम्, शरीरामाचे मुक्तात्मन इध प्रयनासंभवात् । अपरराररहितस्वशरीरावयवरणमयक्षसद्भावोऽपि न शरीरामाचे प्रयलस. भाबादकर, सर्पया शरीररहितस्य तस्य चिदप्यदर्शनात् हटानुसारिण्यय करना भवन्ति ।२० ततः स्थायरेषु शरीराभायाद् न तत्कनुरनुपलब्धिः किन्तु कर्तुरमायादिति कथं न ः कार्यवादे. हतोयभिचारस! न च यथाऽस्पेन्द्रियख चाऽन्वय अतिरेकयोः कार्यकारणभायभवस्थापकयोरभावेऽपि कारणत्यसिदिच्यतिरेकमात्रा तथा महेश्वरस्यापि ततस्तस्तितिः, तस्स नित्यव्यापकत्वाभ्युपगमेन ध्यतिरेकामयात् । अतो न व्यासिसिद्धि कार्यवादेस्त सापकत्वेनोपन्यलय हेनो। 'अत एव न २५ सत्प्रतिपक्षताऽपि, कलिन् सायान्विने देती थिने द्वितीपस्य तथाविधस्स तप्रायका इति सत्यम्, किन्तु स्थापुसायास कार्यरयादेः साध्यान्वितत्यमेव न संभवती.ते प्रतिपादितम् । ययो- कैम् 'नाऽपि बाधा, अधिमशरणपूर्वशत्या प्रमाणेनाऽमहणान्' इति, तदसामतम्। बुद्धिम- स्कारणपूर्वकरयाभाषप्रतिपादयस्य प्रमाणपारादापहयोपत्तौ सद्भायात् । अधाङ्कपदिकर्तुरती- न्द्रियवाद् न प्रत्यक्षा सदभावसिद्धिः, ना प्रत्यक्षात् तदभावाऽसिद्धारभ्यनुमानस्य तत्र तदभाष-३ माहफस्य भावान् । तपाहि-पद् ययान्वय-बतिरेको नानुविधत्ते न बत् तत्कारणम्, यपान पटादयः कुल्लालारणा, नानुविदधति चारादयो पुदिमकारणान्धप-यतिरेकापिति बाप- कानुपलधिः यच यकारणं तत् तथान्यय-पतिरेकावनुपियत्ते, पथा घरादयः कुलालयाम चोपलास्पिनरकारपसभिधाने प्रागनुपलम्पसारादेवपलम्भस्तरभाषे चाऽपरकारपसाकस्पेऽपि যমান্য ব্যয়-অবিশ্ববিয়ানাক্কিাযালামু। अपारादिकर्तुगालघिलक्षणमानत्यस्याऽभावाद् न प्रत्यक्षेप सभावाऽभाधमतीतिरिति माइरादेस्तदन्वय व्यतिरेकानुविधानस्पोरलम्भिर्युका । ना मा भूत् तदन्यय तिरेकानुविधानो. पन्धिा, पतिरेकानुविधानोपलधिल युना, यथा रूपाऽऽलोक-मनस्कारसारल्पेऽपि कदाचित शिभानकार्यानुत्पत्या कारणान्तरस्यापि तर सामध्यमयीयले, यध तत्कारणान्तरं सा इन्द्रिय शदिः, तदभाषा रूपानं न संशातमित्यनुपरम्पस्वभावस्यापि कारपस्य व्यतिरेक कापानुमिपी-४० १५. पं. २ पृ. ९९...। ३-त्' प्लपि प्रो.। ४.९.३। ५ पृ. १६६. १८।६१.९६५० २.। "पृ. १९५० ११। “ पू. ९९० १४॥ ९.१५. १.४.पं. 111 प्र ... २५॥ १ पृ. ११५.१। -यस्पर-१०भी।

---- मयमाडे- यमान उपलते न होपसधिमा तिरेकोपरादिमिनीधीनार হফিলংকালোরিবিকাঠিন্যধিশাখা খাব}ামেনমোহন কনিয়শ্বয়াইন লকিমিয়া খলিফারুসিয়ানশান্তা, = নিকোৰিয়াল; বল নিকাশন সনিষাঙ্গিয়নাস্বাবিলি - ५ धम्, तथापीरस्य शान-प्रया-चिकीसमवायोऽनुरादिकार्यकरणे यामय আমাথা পবিগান শাহ। अथ तत्समयायम्यापि पर्यत्र मयंदा भायात् नायं दोषः, गानस्य नित्यत्यमापन तद्विशेपणागामी परमान-प्रय-विक्रीपादीनामनित्यत्वात् अध्यापकल्याय व्यनिरेका लभ्येत । अथ तस्मानादेरपि नित्यम्याद नाय दोष मयंदा तझंडरादिकायोत्पतिः १० सहकारिणामसन्निधाना नेति चन्, गने सेऽपि तानापायतनमानः किं न सयं यन्ते ? अथ नैव ते तदायत्तोपचयलहि तरेव कार्यवादितुरनैकान्तिः । तामह सपेदा खोत्पत्तिदेतूनां सकार्याणामसभिधानादन सयंदोरपद्यन्त इति चेत्, अनव अपरापरसहकारिप्रतीक्षायामेवोपक्षीणशनियात् तस्मानादेः प्रस्नकार्यकर्तृत्व न स्यात् । अतः सुदूरमपि गत्या कचिदयस्यामिच्छता नित्य सहकारिणाम् अतदाय १५पाऽभ्युपगमनीयम्, तायतोत्पत्तिकायस्याऽपि तानादियतिरकेशान्युत्पत्तिर- इति वृथा तत्परिकल्पना। निसावे पा पुनरपि सहकारिणी तमानादीनां च नित्यत कायोत्पत्तिप्रसङ्गः । तदेवं तनानादीनां च नित्सवात् सदा कार्यस्योत्पत्तिरनुत्पत्तिय नित्यास्तग्नानादयोऽभ्युपगन्तन्या, तथा च सति तदन्यसामग्रीसाकल्येऽध्यायनर चित् स्यात् । सकलतदन्यसामग्रीसन्निधानानन्तरमेय तानासन कार्यानुराति २० सामग्रीसाफल्मेऽपीति चेत्, सहकारिकारणसंभवास्तहि तज्मानादयः प्रासा अन्य त्पत्तिनियमाभायात् सहकारिषु सत्स्यपि कदाचिदकरायनुत्पत्तिः स्यात् । ते न स्तरक्षानाधरिता एवं तज्ञानादि जनयन्तोऽरादि जनयन्ति किमन्तगडतम्झाना तज्ज्ञानादिसहकृता एव तस्मानादिकं जनयन्तीत्यभ्युपगमे तस्मानान्तरं सहरू न्यमेजन्यात्या (?) तदनन्तरमनुत्पद्यमान कार्यमपि तन्मानादिकं तदनन्तरं । २५इत्यायातः स एव कारणान्तरसाकल्येऽप्यङ्करादिकार्याधनुतिप्रसङ्गः, सहकारि- धन्तरोत्पची स एव प्रसङ्गः अनयस्था च । तस्यां चाऽपरापरमानोत्पादन एवं सर्पदोपयोगान कार्य कदाचिदप्युपयोगो भवेत् । सहकारिभिः सह तन्नानादिकं नि मदिति चेत् तहि सहकारिणा तज्ज्ञानादेचकसामध्यधीनस्यमभ्युपगन्तःशम्। अन्यथा तथैकसामग्रीलक्षणं कारण तज्ज्ञानादिमिल्यजनितमजनितं घातजनयति ? [ने २० तथैय कार्यत्यादेतोयमिवारियमसङ्गात् जनितं तसानादिकमभ्युपगन्तव्यम, तर सह नियमनोत्पद्यमानं तदेकसामयधीनत्यमभ्युपनन्तरं सामध्यधीन स्यात् । सा तमानान्तरेजोपादिती व इति विकल्या पूर्वोक्तदोषडयामागनन्तरोत्पत्तिनि- सहकारितुमिरेकसामध्यधीनतया सात् तथापि सकसामग्री तन्मानान्तरेण प्रेरित लम्युपेयम्। अन्यथाऽचेतनस्याचेतनामधितिय यास्यादेरिव जनकस्यासंभयान, ३५च र्यात् सामग्रीनिशेषात् प्रागतिरं नियमेनोत्पद्यमान इमिरेकसामन्यधीनं क्षी प्रांगनन्तरं नियमनोत्पत्तिन स्यात् । सामरितमरितं या जनयतीति दोपहपप्रसाः, सेनेम दो परिजिहीर्पता म तरसानापुरपसिः तदनन्तरं सह मावा पगलम्या, तदनन्तर सह प्राग्यानरमुग्पत्तिनियमामा चारादिकार रेफानुविधानमुपट येन, न चोपलभ्यते, क्षियुदक- मोगादिकारणसामग्रीसंनिधाने -ज्यो तमहोबा , वा० पिना। २-कायें नानुरि-वामा पिना। 1-मजन्यम्यो । -मि... पिरा एविधानतः पा समायः। मनीष * पर्धानं त्यमभ्युपतीना गा. नाम। ९-सातिमा, या माग art नि-ना। ३ मेरिन याज.. | १३ अपर सही .

. ম্বিনে। पाउससि अगादिकास्ययापमापदर्शनात् । अतसागवानापनुविधानस सरकारपत्यम्पारमा अपलम्मात् तारणन्याभायोऽरादिकार्यवानुमीयते । अतो पापा प्यापकानुपता पुति मत्कारणामुमानथा पुद्धिमत्कारणानुमानेमेष पापकानुपलधिः कलान पायते! लोदलेल्यं पत्रम्, पाधिय. स्या काटयदित्यनुमानेन प्रत्यक्षं तस्य सदलेल्पस्यमादक किन पास्यते इति ममानम् । प्रत्यक्षण ५ सहिषयस्य धाधिन्याष सेन तर पापत रति पेर, बुद्धिमत्कारणस्थानुमानस्यापि साह मापका- नुपलया विषयस बाधितत्वात् कथं तदाधकरपम्। थुद्धिमत्कारणत्वानुमानेनेय ब्यापकानुष. सम्प्रेषिपयस्य पाधिताया तापायमिति चेत्, न पाधियावानुमानेन तदलेल्पापप्राइस महापापितविपयत्यासतदायकस्वमित्यपि पहुं शश्ययात् । अय तदनुमानस्य सदामासरवाद् न प्रकृतप्रत्यक्षाविषयपापपरयम्, नतत् । इनरेतरामपदोपप्रसनात् । तथादि-प्रत्यक्षपाधिनमिष १० पापात् हनुमानन्द दामासत्पम्, तर नाभासत्यात प्रत्यक्षस्य सदा(दया)पितविषयस्येनाऽ. सदामासस्यात् तद्विपयापकस्यम् इति अक्तमितरेतराभयत्यम् । अधानुमानायाधित विषयत्व. निपन्धनं न सम्प्रत्यक्षस्थाऽतदामासत्यम् कि तहिं स्वपरिच्छेदाध्यमिवारनियन्धनम्। नन्वेयमनु. मानसापि वसायाऽयमिवारनिपन्धनं नासदामाससमयभ्युपगमविषयः ! अधाऽयाधि. रुचिपपरवे सति तश तदेव स्वसाध्याऽममिचारित्वं परिसमाप्यते । नन्वेषमा धिताविषयस्यस्य १५ प्रतिपद्यमशन कचिदपि स्वसामाग्यभिचारित्ववानुमानेऽतद्दामासत्यनियन्धनप प्रसिद्धि न हिवाधाउनुपलम्मा पायाभारः, तस्य विधमानयाधययनुत्पनयाधकमतिपत्ति भावात् । अप या पाचसहायता प्राम् पाधकानुपलम्मेऽप्युत्तरकालमवश्यंभाविनी पाधकोपलब्धि, यब तुम कदाचित यायकोपसम्धिस्तर न सहावा, असदेतत् ग हानिशा पाधकाऽनुपलम्म. मापन कदाचनाप्यत्र पायकोपलधिर्भपिम्पति' इति मातुं शक्यम्, स्वसंघधिनोऽनुपलम्भ-२० स्थानशान्तिकत्वाद, सर्पसंपन्धिनोऽसिद्धत्वात्। न याचित् 'सबैजाप्यत्र पाधकं नोपलभ्यते उपलप्सते या रस्त्यासानु क्षमा नाऽपि धायकामाशोऽभापप्राहिममाणाघसेपः, तस निपित्यान् नियमानत्वाप । न चाक्षातो याधशामापोऽनुमाना पक्षधर्मत्यादिवत् । न च स्वसाध्याय- भिचारित्वनिमयादेय पायकामापनिधयः, तनिश्चयमन्तरेण त्वदभिप्रायेण स्वसाध्यायभिचारि. स्वस्तापरिसमातरवेन निधपायोगात् । तस्मात् पसधमत्वाऽन्यय-अतिरेकनिक्षयलक्षणस्वसा-२५ पाविनामावियस प्रमतानुमानेऽपि सझापात् प्रत्यक्षपद न तसापि तदाभासत्यम् । अथ विषये पापकरमावाभावात् पापिपत्यानुमानस नान्तयाप्तिरिति सदाभासत्वम्, पवं तहिं कार्यरषानुमानेऽपि विपर्यये पायाममाणामाचा ध्यायमापतस्तदामासत्वमिति न व्यपकानुए. लधिविषयवाशना । अप मत्य नानुमानेन पायत इति लोहलेल्पत्वानुमानस न तदलेल्प स्थमावासस्पक्षपायकाता, कयं सहिं देशान्तरमाशिलिजनिताऽनुमानेन स्थिरचन्द्राग्राहिम-३० स्वक्षस्य पाया! अय तस्य प्रत्यक्षामासत्याइनुमानेन पापा, ननु कुतस्तस्य तदामासत्यम्। अनुमानेन पापितविपपत्यादिति घेद, ननु तदेवेतरेतराभयत्वम् अनुमानेन दाधितविषयस्यात् हरा तदामासत्यम्, वस दामास र सेन अपाधितविषयास्वादनुमानशास्तदामासन तनिषपयापकत्यम् रति परमितरेतराभयन्यम् । तलात स्वमाधात्यभिचार एवं सत्र मामा. ज्यनियन्धनम् । स प्यापकानुपलम्पी पक्षधर्माऽन्यपव्यतिरेकस्वरूपः प्रमाणपरिनिधितो विधते ३५ रति तथा एप स्वसाध्यतिपादकास्पेन प्रामाण्यम् न पुनर्वनिमत्कारणानुमानस्प, तत्र स्वसाध्या. पमिलारामावलतिरयात् । मच व्यापशानुपलाधापपि पक्षधर्मत्वाऽन्वय-व्यतिरेषानिधयस वसायामनिवारित्यनिध- पलक्षणस्याभाप इति यई युक्तम्, पतोध्यापकानुपलायेलायत् पक्षधापत्यनिधया मागेवोक्तः। विपस पापकममाणसायाद अन्वय-अतिरेषापपि ताऽवगम्येते, तत्कारणेपु हि कुम्मादिपुर दम्पय-व्यतिरेकानुविधानस्थोपराधिस्तदनुपलाधिक प्रमाणम् । अपरा तत्कारण तदाब य व्यतिरेकानुविधानेन मानम्, सदभाषे तत्कारपन्यासंभवात् तदभावेऽपि भपतन कारण वे सर्च पृ. १५.३१.१ पृ.१.८५.। पृ .१५.१३ । ४-षेपिस-ब . प्रयमे काण्डे- सयंस कार्य कारणं च स्यात्, म कचित् कार्यकारणभावव्ययस्था, अन्यय- हि कार्यकारणमायग्यपस्थानिबन्धनम्, तदभावेऽपि कार्यकारणभावं कसयतः किमान्य स्थानियन्धनं स्यात् इति ? अतोऽतिव्याप्तिपरिहारेण कचिदेव तदभाये कार्यकारणभावो नाभ्युपगन्तव्य इत्यन्वयम्पतिरेकानुविधानेन कार्यकारणमा मार ५स यत्रोपलभ्यते तत्रान्वय-व्यतिरेकानुरिधानसंनिधापनेन तदमा यात गुमानसिकर रेका तसिधान्ययोऽपि सिख तथाहि-य एवं सत्र सयामाये साधनामारनामो मार रेकः स पर साधनसद्भायेऽययंतया साज्यसभायस्वरूपोऽन्वय रति म्यापकानुनः पर स्वान्वयम्यतिरेकलापः सामाध्यमियारा प्रमाणतः सिधान कार्यपारेरपनि संभवति, यापत्ये सत्यय-यतिरेक्योरभापस विपर्यये याप्रमाणभात तर १०दिनन्या। अपि च, युसिमकारपये तन्यादीनां साये तद्विपर्ययोऽयुधिमकारणाः परमार ग नेलो शुधिमकारपसायन्यागृत्तिनि मिसकात्यादिनिवृत्तिप्रतिपादनमामि मिर घरारंपरियनिराकरणेन मिनिटापरमाणुरूपस्या । न तेभ्यो एनिमाला दिलासयमावृत्तिः प्रत्याः सिमा, पुलिमकारणनिमित्तमारपमादकर प्रयाग १५मामामाग रात्र प्रत्तेः, परमायतरासंगारमाना व त्यानाशीभागार मात्तिनमा गाधनभ्यातिप्रतिपत्तिः । नानिमहारणे कायापार मानको नतिमिलि संपग्निोन परतोगतिशकालिका गिनतो गातोया परिसिद्धि मा परमा कामिण तेनु मामा ततो पापमानः रात माणलपति, कानाधिमाकारणावेन मिति गरिमाणितणभयान् । अप नियमोपचारेर कार्य : Tagममाकरणकायेन नावारतोमिया मामी जारमा बाटो हेशिकारणायेगापित सिमानामा पीप PARTIATIY ME, रामायण MEETभार गाणनिशाना सानाsairat मनकामा मदीनामभिमकाणगामागि friATHI inनिशान लगान' rmirikमामा, MANIMAtth -TERI मनमाना मा mit REME TREATMERI HIT time arTTTTERam RINTHIMITEmainta • nirmir fime, HARI HIT AfrHATI ETRIT PERHariyar frift HTTARARIArt: TETTTTTTTTTTMerfire Errrrr armru at haram TT orr arrafana baum, wetty ** TahraRT 4 Trarth wift Nasir Narmatkari TIRTE we enerateftrianfrari Ary war Terringranatrajisamme N . - पार - vi. THE IN" rms, न पार :... :: ----- remanार ENTR, -::::: गिपनि गी! RTE निर्मित पाकानिमा ५ ने । मामासापासम्म एप परम्पभिः । पेरनि कामनीवर শিম মিযী শ অ গুণ। ৯ণ মানিনিধি মাতা গা গামূল না। এমন ‘খোসা सारे नियम मापने माहोनि पूर्षदेतो. विEिR यात निलम. पो परिमाणमा देगन सिवाद. TAITानोलादीपले ना न दियविपनपानियेन धिमाकारमपंपासा. पप अप घरादा दिमाग पगार न देनुमोपदीयो, तत् মারিটি গ গম গুলাে কি কি বল भासपाwिarगुमनापि पापा देनो गापमापकरपम्पामातः मोदय आशियासिसयादेश साम्पासिरिलारपलनिपातः। पण पारनिस्वामिनी देवनाष गुणागतिक्षापपिग पूस नि' रति, या गुणाय याधिनायादिधर्मयुगपगुमने हमारे मिदिमासादयति तदा খিমনি নয় মােমো বা ল নুনে সবাই কাসিম गुपयममपापा ममाति रमतारनन्तायरियेन तन संभपति ।म पतवाभितर पाकिमपन्, रविवादिपि सरपमहादित्यादि आभपातापसिायं देतोः प्रतिपाद-२० महिनामिनि म पुनरप्यो । तपोगदाकारमापनि.म्यतिरिकम्प समास्थितेजन्य मपति हामभये पनि सारयत ति मतिपापियामा | मिसीपेतु किसे गय पनिविशेषवियोमापनेम कम्पपिपि मापः कप्यते' इति पदुकम्, तदप्यमातम्। एनो पपसाराम लिधितो लियादी सिद्धिः पात् तदा युरपेताऽपि पम्- मिपिशेषविपर्ययोमापनेन न पानिनुपामाय रति, मपाभूतस्य न पर्मियोग प्रशनसा-२६ धमारपान रति प्रतिपादितम् । अत एपागमा देवन्तरा पानता विशेषसिदिः, युधिमा स्थापि पम्पिा पित्यादिकम्येनापियान । ततः 'रापाऽन्वयम्पतिरेसिपूर्व केयलायतिरे। शिश नप पान्यापतिरेरित पधगंवारसदार पिरोपमापनम्' इति प्रतिपादन दुरापास्तम्, पार्पमिती समितपसि रोल्मारिलायात् । अग एप 'य हरयम्भूना पुषिम्याद पत्ती नियमनाउमापत्रिनमानसपी शरीरदितः सर्पस एक इत्ययं पदा पिरोपसिमितवा गरिदोषस्मिानामा पनि निःसारतया पपस्थितम् । यसम्हारीरसंबन्ध ताप यात्पमायेन सत्र निराहतिः शरीरातारहिताऽप्यात्मनः neभारत-रशियामु पथा व्यापारनयपरस्सापि मित्यारिका' रति, तदपयुक्तम् अप. सगररहितावेप्याना शरीरसंपदर तसारमादिकाईन्योपसम्धेरीधरम्पापि शरीरमवस्यय कार्यकरयमभ्युपगम्प्यमिति प्रतिपादितत्वात् । यदि पीरसंपन्धामावपि चम्प शित्यादि-३५ कार्यकन्यं गदा तय्यम-ति पुनम्नन् नत्र हान-विशी-अपमानां समयायः तन्नोन मेशति घे. म समपापम्प निषिद्धयोत् । न च पुग्मकारादी सर्गरमंथन्धन्यनिरकमान्य कपट पलम्पमितीवरेऽपि तदेय परिपनीयम्, रानुसारित्या परसनाया न घरम्यानरसेन हान-विधी-प्रयवानामपि सद्भापः चिदप्युपटश इति चलपि नदनाव:मायम्युपग- १५.९७६।। ११. ५.२.८३१...... -निटिलर...- ६ धर्मशिय विन्दर। नपर.,र. 47... ५-पूर्वर-पा, r... १.१.१.५ ......।

प्रयमे काण्डे- न्तव्यः । वाहि-शानादीनासुरपत्ताधारमा समयायिकारणम्, आरम-मनःसंयोगोऽसमातिर णम्, शरीरादि निमिसकारणम्। न च कारणत्रयामाये परेण कार्योत्पत्तिरभ्युपगम्यते निवासस पापिकारणाम-मनासंयोगादिसद्भाय ईश्वरेऽभ्युपगत इति न ज्ञानादेरपि तत्र भावः । अयासमघायिकारणादेरमावेऽपि तत्रज्ञानाद्युत्पत्तिस्तहि निमित्तकारणेश्वरव्यतिरेकेबारा ५किमिति नोत्पचिर्युक्ता ? अथ शानाधमाये सदनधिष्टितानां फयमचेननानां तदुपादानादीनां प्रति पास्यादियदचेतनस्य चेतनानधिष्ठितस्य प्रवृत्यदर्शनात् । प्रवृत्तावपि निरमिनायाणां देश-काला- ऽऽकारनियमो न स्यात्, तदधिष्ठितस्यैव तस्य तनियतत्वदर्शनाद । नन्वेवं चेतनस्यापि चेतमान नधिष्ठितस्य कर्मकरादेरिव स्वाम्यनधिष्ठितस्य कथं प्रवृत्तिअथ स्वामिन एवान्यानमितिमा चेतनस्य प्रवृत्तिरुपलभ्यते, किमङ्खरादेरकृष्टोत्पत्तेरुपादानस्य तदनधिष्ठितस्य सा नोपलम्यने जा १७घटादेरुपादानस्य तदनधिष्ठितस्य तत्करणे प्रवृत्तिोंपलभ्यत इत्यङ्करायुपादानस्यापि तदपिहितोष सा प्रसाध्यते तर्हि कर्मकरादेरपि स्वाम्यनाधिष्ठितस्य सा नोपलभ्यत इति स्वामिनोऽप्यपरतमा न्तराधिष्ठितस्य सा साध्यताम् । यदि पुनः स्वामिनोऽप्यधिष्ठाता चेतनो महेशः परिकरप्यते वार्षि तस्याप्यपर इत्यनवस्था। न च चेतनस्याप्यपरचेतनाधिष्टितस्य प्रवृत्यभ्युपगमे भवेतनं चेतनाधिष्ठितम्' इति प्रयोने १५ अचेतनम् इति धर्मिविशेषणस्य 'अचेतनत्यादेः इति हेतोधाव्यर्थमुपादानम्, अचेतनतनवासि चेतनाधिष्ठितस्य प्रवृत्त्यभ्युपगमै व्यवच्छेद्याभावात् । न चाचेतनानामपि सहेतुसनिधिसमाला दितोत्पत्तीनां चेतनाधिष्टातृव्यतिरेकेणापि देश-कालाऽऽकारनियमोऽनुपपना, तमियमस्य महेश पलायातत्यात्। अन्यथाऽधिष्ठातृचानतोऽपि स न स्यात्। तमानस्य सर्वाचेनाभिठायो सणिकत्ये च-ताशेयत्वमेय तदधिष्ठितत्वम्-तेषां सर्यकालभाविकायें तदेव प्रवृत्तिरिति एकम साये पुनरप्पनम्तरका -तिपयाचेतन विषयो। संसार प्रसकानी अप नित्यं मामा नम्येवं 'क्षणिकं शानम्, अमरादिप्रत्यक्ष सति निमुदयविशेषगुणत्यान, शमया' इत्या प्रयोगे। २५मदेशमानेन देतोयमियारः। अथ 'तमानादिश्यतिरेके मति' इति विशेषणानाय दोषः, न, विपक्षविद विशेषतोलतो च्यायतकं भवति, अन्यथा नघायसंकल्यायोगात् । न चाक्षणिकन्येन तातिरिका सिम, विरिपसापि निरोधस्थानयोरसिद्धः। न च रिपक्षाविरदविशरणोपादानमात्रेण गोग्यमिवारपरि दार, अन्यथा न कधिर हेतुयमिधारी मात्, सत्र व्यभिचारविश्ये 'एमतिरिनामतिपति ३.विशेषणम्योपादातुं सत्ययात् । न प नैयायिफमोनाक्षणिक ज्ञान गमयति' "अपमानम्" पारा मा० 7.१] नि यपना अर्थकार्यशानं तदिनयमभ्युपगम, भयममा भीतीनागना यप कमपग्यविश्यं शानं तत् सममापि, यया दगदतारिकानं मालादिगोष. रम्मपपिपिपर पेश्वरमाममिति म्यमातुः । प्रमसाधनं पेदम, नामवामिदना देतोनामीपाधेि पापागागामापार ३५च्या पाभावामिन अमरसायनायकायोति यमरयम्, म भाषा नियाद-परि मना दियभट म्यामान सनिमांग अनेरासिसमय मयि | जयरा কালিৰিনাৰাং স্নান, বিশ্বমলান্তি এ মামার पर भीवानामपि निवियपादित विषपाधापाnिel समारोप दियदे नविण्यत्यमन्तीमापासनाधिष्ठिामाvिerRET सानो पुनानिमाया विकार ARMY, ARISTRATION: सामाजियाबो मः, iranरया मTTEE१ Ter re-mfarer RTI what Rake Preraturtern imurari- . . .

धरहार गुगपर गधेत् । स्यादेगस, मेयरघुपादिकमेप केवलं कारणम् अपितु गांऽधमादिशार. कारणमपेश्य तत् सत् करोति, मिमिएकारणम्यादी परघुपादेतो धर्मादे: सहकारियाणा धकल्यादपिपलकारणापमसिसम्, असदेतत्। यदि दिगण हफारिभिः कधिपकार पियेत सदाला सहकारिगण्यपेक्षता, यापता नित्यापात् परेरगाधेयातिशयाय में किभित् तम्य साहका- रिया प्रामव्यरित किमिति तत् नयाभूनान अनुपफारिणोऽपेक्षता फिश तेऽपि सदफारिणा मेति सतनं न महिना भयग्नि यदि तजन्या अपरस्यसमिधिहेतुसहकारियकस्यादिति परम्, सेपामपि तारांनिधिसहकारिणां मरायतोत्पत्तीनां तदेय समिधिप्रसो कथमगिरता st अय नित्यन्ये तद्युययादिक सहकारिकारणगुरपाय पधादरादिकार्यगुपजनयसीत्यम्युपगम. परसफारिमनने एयोपसीणशक्तिन्यात् तम्य गावरादिकार्यमगनार । मधातजन्या एए मिश्धिर्मादिमहकारिणः अतोऽयमदोष मन्येय तोप 'गधेतनोगदानरयात्' इति हेतुरनेशान्तिका १० यात्. मतलवायत्तसंनिधयो धर्मादिसहिफारिण इति माविफलशारणापात्यो गुरसिखः। मचानकान्तिफोऽपि, भयिकमाणपानिमसहार, अधिकलकारणगाप्यारपती सपंर्दया. नुत्पनिमसद्गाप विशेगमागन् । एतेन यदपि उद्घोतकरणोनाम्-"यद्यपि निरयनीयरायं कारण. मविकलं भायानां समिहिन तथापि न युगपगुत्पति, परम्प पुगिपूर्वकारित्यात् । यदि दीपर मतामात्रेयाऽयुदिपूर्व भाषानामुत्पादक म्यात् गदा म्यादेतपोधम्। यदा तु पुद्धिपूर्षे करोति१५ सदा न दोषः तम्य स्वेच्या कार्येषु प्रवृत्तः, अतोऽनकान्तिवतेय हेतोः" । ति, तदपि रिलम्नदि कार्याणा कारणभ्यशामापामायापेक्षया प्रगृति-निपुगी गयतः पेनाऽमतिपयसा. मध्येऽपीचराग्ये कारणे सदा गमिक्षित नहीयेच्छाऽभायाद न प्रपन , किनहि कारणगतमामी- मायामायागुविधायिनो भायाः । मयादि-हायतोऽपि कर-चाणादिण्यापागक्षमान पुलालादेर समयाद नोगायन्ते घटादयो भाया, ममयांच वीजादेशनिच्छायनोऽपि मगुणधमाना उपलभ्यन्तेजा-२० যায়। নয় বuা কাঘাঁ ফার্ষীবাশ্বাত্তমবিষয়াদি বাশ্বিন মাথা ঘামিবি तटीयामनुपकारिणी मामिच्छामरेक्षन्ते येनोत्पादफालया पुगायोपपेरी पनि रविफल. कारणयमान्मनो दर्शितं भवेत् यदि युगपत् भयेयुः। म चापपरस परतुषमार्यम्य काचिदपे. शाऽस्ति येनेच्छामपेक्षेत न प पुद्धिविशेषव्यतिरेणापरेच्या सम्य संमयति । बुद्धिमयरम्य यदि निन्या पापिया थाऽभ्युपगम्येन तदा मैयाऽचेतनपदार्थाधिपाची२५ भपिणतीति किमपरतदाधाऐयरामपरिकारपनया । अथानाधिनं तमान न संभयतीति तथा ग्मपरिकाराना ननु तदात्माऽप्यनाधितो न गंभयतीति अपरापरायपरिकल्पनपाउनन्तम्यरमसा। द्रव्यन्यान् सम्याऽनाभितम्यापि समायः न देःगुणापात् इति नायं योगा। मनु पुनातम्या गन्यम्। नत्र समयतत्यादिति नोमरम्, तस्यानिधयान् । नदाधेयरयात् तम्या तापमयेसरपमिति न्, ननु पनितत् मतीयते! न तापदीवरेण, सेनामिना बानम्य चाऽपदणाम् इदमत्र पमघेतम्'९० तिमय प्रतीमेरपोगान् । सनशान मत्र गमपेतन्यमेय गद्ग्रहणमिस्वपि मोतरम्, भन्योन्यसं. प्रयान्-सिदे दिमत्र' इति महणे नत्र पमपेतस्यासिडित, अम्पाय महणसिदिरियायोग्याश्रयः। तपारनम्मानमामनि समवेतमयति, ययात्मीयमपि शानमामनि ध्ययरिशतं न येति स सपंग- दुपादान-सहकारिफागणादिकमयगमयिष्यतीति का दातुमईसि गापि सम्मानमति स्याणापाई समवेतम्'ति, नाग्मनोऽयदनात् गाधाममहणे 'वं मम मम निम्' इति ३५ प्रतीतिः समपति । न सतत् आमानमध्यपति, अरबसंविदितायाभ्युपगमात् । मघापर नमादक नित्यं ज्ञानं तोवरयापि समयसि-येनकेनपा पदार्थजातमयगमपति, भपरेण मुसम्मानम्- समानकालं पायदप्यमाथिसजातीयगुणमयस्यान्यत्रानुपलधेलप्रापि तापनासंभवात् मापने पाऽमरादिकार्य शल्येन अस्तु याययोग शाम तथापि तयोमानयोरम्य. तरेण स्यप्रणविधुरेण म खापारम्प, म सहयाम्य, गायत्या गोचरम्य प्रणम् । तथाहि-10 पार स्वप्रणपि मान्यप्रणम्, पथा पाणिपिy मानम, मनोज गह- चाम्यापदणात् कथं तेनाम्य प्रणम् ! तेनापि प्रणविरहितना पाने सदेव पनाम्याम् इति म 'पस्यचित् प्रणम् इति म तगमवेतस्येन नद्रगुणायम, नापि तदादा प्यायं निशिगुण: उनमेनर म्यागानिक "मायार सानिया वगरे १. १tr ५ २० १२८ प्रथमे फारडे- ति। तल्लाभिलवुनिपूर्वकन्येऽङ्कगदीनां किमिति युगपदुराहो न मयेन भरपर मारपी सदा समिहिनन्या! अनियुझिसम्पपेक्षाघरस्गधेतनाभिधाययेन जनिधारा नित्यत्वेन तबुद्धरपि सदा सम्मिदिनचम् अविकलकारयोः सर्पदा ममिहितयार युगमा याँपत्तिनमः । तसार 'बुद्धिमत्यात्' इति शिपमतिभिकरमेया ति नाऽनकालिया। न चापि हिन्दना, सपने भाषा। न चैयं मपति तलापियायोग-परा मगति न तत् तदानीमविकलकारणम्, यया कुलाबस्थितपीलापरवापामनुपमापनाना न मपनि दायाँपत्तिकाने सर्व विभ्यम् इति म्यामानुषिमय गिमगाना नमानादेया कारणाने किन कारणवानुमते मसाधिन पात् । तन निलामा मात्र विकी टमनगम या नित्य कर्मलं युनम् । दमागरमधर्मर कुम्भकागती करण्यापारमेन जीनेभारे कनया अन्यमानाः। तप कनिन् करादिगारेण कारकप्रयोगायनाम्भा TRAIN दिमान-मोदला. मार्ग पागणारेण-गग सामिना कर्मकगविमोचन सपरेन गया जाना शरीरापानकपणभारम्, हिyिan-T-प्रमा सागरिकाम, गरीMAMMITTrirail १. गारनितिन त कमायमिति प्रमा माimagो तागायः कपागा IM प्रमावि. बानाग ता कणा-येन -पिपरिभाष मार Brea afterकानिजमाने शरीराला farmire रनामामाhिt Arriam "TTAfrrentinममा ममानिनoriety rritTETTE vশ ও মায়াপুৰfীপ: r গসিপাল', 'pলখা friTTA प्रनिगान् । तामा- 'मन गुणनितिनगे। NIREETERINTExfr:"n[ •rtm HTTrntra THATITणाल tra Time Prerarma मा tirti irrort raman immigrAHARAMInitiat मागणETITTEE Ima- + frनि airmirmir urity in am Ratantra. FETIMA मा ATT, news Pimprroran xar arti antr प्राणाt trimentpedh Timrain-r, Frtainr+TTIfATTA Retri HTTA ETAMERITriram rartun ध . । ३ ईश्वरस्वरुपयार पाचशेपानवलक्षणमवत्यसिद्धिा यशोनम् क्षेत्रमानां नियताविपपमहणं सर्पषिदधिष्ठिता नाम, यथा प्रतिनियतशम्दादिविश्वप्राइफाणामनियतविपयस विधिष्ठितानां जीवीरे इत्यादि, सरप्यसतम्। यतः शादिविषयप्राहकापामिति शान्तत्वेनोपन्यासो यदीन्द्रियाणां तदा तेषां करणत्या पेदनलक्षणक्रियाऽनाधयत्वात् कप नियतमादिविषयग्रहणम्! मप ग्रहणाधारत्वेन न तेषां निनादादिविषयमहणं किन्तु करमत्येना नन्वेयं क्षेत्रमानामपि विषयमहणे करणत्यम् न ५ बत्यमिति घटादि कुलालफर्दकं तत्कारणशविपरिमानेन न सिद्धमिति कुनस्तयान्तात् क्षिया- वानाधारकर्दकत्यं सिदिमुपगच्छति यदि पुनहानसमवायेन चक्षुरादीनां नियनविषयाणां फर्ट- वेऽप्यनियतविपयाऽपरक्षेत्राधिष्ठितत्वमहीशियते तहि चेतनानामपि क्षेत्रज्ञानां नियतविरयाणां यथा परोऽनिपतविषयतनोऽधिष्ठाता तथा तस्यापि प्रतिनियतविपयत्वकल्पनायामपरोऽनियत- दिपपस्तदधिष्ठाताऽभ्युपगन्तव्यः, तथाप्यपर स्यनवस्थाप्रति तया, चेतनानामपि क्षेत्रज्ञानांर० पदा धेननोऽधियानाभ्युपगम्यने तदा 'अवेतन घेतनाधिष्ठिनं प्रवर्तते, भवेतनन्यात् धास्यादिधन् इति प्रयोगेऽधेतनमहर्ष धार्मि-हेतु विशेष नोपादेयं स्थान् , व्यवच्छेद्याऽभावान् । यमुक्तम् 'भयावनिष्ठा यदि तत्समाचप्रमाणं किश्चिदलि, लापन पयाऽनुमानसिद्धयात्' पति, तदप्यमानम्। पनः प्रमाणमन्तरेण हेन्यामाग पोशम्य सिद्धिरम्युपगम्यते अपरस्यापि सन. पप सा नाभ्युपगम्यते ! प्रमाणसिद्धत्यं तु नापतोऽपि नास्ति, अनिएगा तन्प्रसाधान्य प्रमाण-१५ स्थामामाण्याऽमजनाद् । पदयुम् आगमोऽप्यस्मिन् पस्नुनि वियन इत्यादि तप्ययुक्तम्। मागमस्य समीतन्धन प्रामाण्यम्, नत्रामाण्याच तस्तरिमदिरितीनरेलराधयममचे। नित्यम् स्यागमय प्रामाण्य पेशेषिकना युपगतम्, परफरपनापेपथ्यममहान् । नापन्यपालनवागमात् समिति, नापि तस्तन्येन मामाण्ये नरेतरामपदोगम् । अपरेवाप्रणीतापगमकल्पनेऽपि नदेष परम्पमित्पनियाममतिसरेयं स्वरूप आगमप प्रामाण्येऽपि मननवासिदिशा यानम् नम्पब सत्तामा प्यविषयप्रहणप्रसाना गानामधिष्ठायता यथा परिशीना सुषमानाकारमहणतानां परिवप्रकारा:' तयुतम्। मतामात्रेण सचिनप्रकासम्पापि र काधिपापाभयान-दसंभरमाकाशादापि नामात्रस्य माया मशिना - शिस्नु गाविसमा विशिष्टपस्थानकान नभिधायफायम, नपे भरोपीवार पर स्त्य गश नमानाप्रमति माघ पण मालामामाथितिरेऽपि काका तपेया-२५ মন্যাকিব সনি কফিন্যাকামোয়েস, গাং বম । भर नम्र कापचे गस्पयननिधितष पपाय प्रवृत्तिना जगादानादपि समितिमा मभिरिनि पगियारी अधिष्ठातमापरणेनोपपम्पमारोनय पेतुः। अपिष, समाज तम मभिधापकाये गगनभेष म पापम् रवि शEE. देनोलमिपंपमापना विषमन्यम् । न प पदिपमानगमायामर तय मापं मा.. रिति पई पुनम्, समयास निषिसम्याए । मरवार नियापनासारापि मापसकाम सम्पाया:शिरेऽपि समपापिनाक्शि पिचई पम्, सवि. मिमाया गरशेऽपि नागदिति सिरिया माधिपायर हानायुपयोगि, आलो सदरमामा परिनन् । সুম খান বিমা নাম মা, বাবা, तर गाद पोलम् 'पा पुनथापनामिप दिन तर Nिew सभालादि सामानम्। यतो न सरापनालिशा R रस्म पानी पागरिमापर सम्मापि निदेशनम्दापका मुगा नगरपुर रिमामन सा गुमिः मोर! नगरेगा रे लिन नमापिप र मिशिमोर सामादिमिनिमलोपादियालया। 11.42.14 प्रथमे काण्डे- यनम् 'विपयासकारणा रागादयः, विपर्यायद्यायमंनिमिनः, न च भगयन्यत्रमः' इनि. तदप्यसारम्। अधर्मयदू धर्मभ्यापि तदनोध सम्यगगानादेम्नप्रासमयस्य प्रतिपादितवान् । यशोनंम् 'गंगादय इष्टानिष्टसाधनेषु विषयेपूराजायमाना दृष्टाः, न च भगवनः कश्चिदिष्यानिष्टमायनो विषयः, अवाप्तकामत्यात्' ति, तदप्यसारम् । यतो यदि पानिएमाधनो न तम्य कचिद्विषयः कर ५तर्हि पूर्वफर हेयोप: नुपपत्तेः । अनाप्तकामन्यमप्यनीश्वरत्वेन व्याप्तम्, ईश्वरस्यानानकामन्यायोगाद् इति यत्र बुद्धिपूर्षिका प्रवृत्तिरिप्यते तर हेयोपादेयजिहासोपादित्से अवश्यमीकर्तव्ये, या च ते तानासकामन्यम्, १० यत्र च तत् तत्रानीश्वरत्वम् इति प्रसङ्गसाधनम् । ईश्वरत्वे चावासकामत्यम्, अवाप्तफामन्याश्च न हेयोपादेयविषये तानोपादानेच्छा, तदमावे न युद्धिपूर्विका प्रवृत्तिरिति प्रसङ्गविपर्ययः। अत एव स्वतम्रसाधनपक्षे यद् आश्रयासिद्धन्यादिहेतुदोषोद्भावनम् तदसंगतम्, व्यातिप्रसिद्धिमात्रम्पवा- प्रोपयोगात्। सा च प्रतिपादिता । 'या तु प्रवृत्तिः शरीरादिसर्ग सा क्रीडायो, अवाप्तकामानामेव च क्रीडा भवति' इति यदुतम् तदसंगतम्, 'रतिमविन्दतामेय क्रीडा भवति, न च रत्यर्थी मगवान्, १५दुःखाभावात्' इति वार्तिककृत प्रतिपादितत्वात् । यत्रोक्तम् न हि दु:खिताः फ्रीडासु प्रवर्तले इति, तत् प्रक्रमानपेक्षं वचनम्। दुःसाभावेऽपि फ्रीडावतां रागावासतिनिमिष्टसाधनविषयव्य- तिरेकेण तस्यासंभवात्। यच्च ‘कारण्यात् तस्य तब प्रवृत्तिः' इत्यादि, तदप्यनालोचिताभिधानम्। नहि करणावतां यातनाशरीरोत्पादकत्वेन प्राणिगणदुःखोत्पादकत्वं युक्तम् । न च तयाभूनकर्मसध्यपेक्षस्तथा तेषा २० दुःखोत्पादकोऽसौ निमित्तकारणत्वात् तस्येति वई युक्तम्, तत्कर्मणामीश्वरानायत्तत्वे कार्यन्वेच तेनैव कार्यत्वलक्षणस्य हेतोय॑मिचारित्वप्रसङ्गात् । तत्कृतत्वे वा कर्मणोऽभ्युपगम्यमाने प्रथम कर्म प्राणिनां विधाय पुनस्तदुपभोगद्वारेण तस्यैव क्षयं विदधतो महेशस्याऽप्रेक्षाकारिताप्रसक्तिन हि प्रेक्षापूर्वकारिणो गोपालाद्योऽपि प्रयोजनशून्यं विधाय वस्तु ध्वंसयन्ति । तन्न करुणाप्रवृत्तम्प कर्मसव्यपेक्षस्यापि प्राणिदुःखोत्पादकत्वं युक्तम् । किञ्च, प्राणिकर्मसव्यपेक्षो यद्यसौ प्राणिनां २५दुःखोत्पादक इति न कृपालुत्वन्याघातस्तर्हि कर्मपरत त्रस्य प्राणिशरीरोत्पादकत्वे तस्याभ्युपगम्यमाने घरं तत्फलोपमोत्कृसत्यस्य तत्सत्यपेक्षस्य तदुत्पादकत्वमभ्युपगन्तव्यम्, एवमदृष्टेश्वरपरिकल्पना परिहता भवति । यथा प्रभुः सेवामेदानुरोधात् फलमदो नाऽप्रमुस्तथा महेश्वरोऽपि कमांपेक्षाल. प्रदो नाप्रभुः' इत्यप्ययुक्तम् । यतो यया राशः सेवाऽऽयतफलपदस्य रागादियोगः नैपुण्यम् सेवा यत्तता च प्रतीता तथेशस्याप्येतत् सर्वमभ्युपगमनीयम्; अन्यथाभूतस्यान्यपरिहारेण कचिदेव ३० सेवके मुखादिप्रदत्यानुपपत्तः । तदेवं कर्मपरतन्त्रन्ये तस्थानीशत्वम्, करुणारितस्य कर्तृन्ये "एजेश शुभमेव सः” इति वार्तिककारीयपणस्य व्यपस्थितन्यम् । यश नारक-तियंगादिसर्गोऽप्यतः प्रायधित्तानां तत्रत्यदुःखानुभये पुनर्विशिष्तस्थानावाप्ती अभ्युदयहेतुरिति सिद्धं दुःसिप्राणियष्टायपि करणया प्रवर्तनमारास्य' इति, तदपि प्रतिविहितमेयः यतः कम प्राणिनां दुःसमदं विधाय तत्फलो. पभोगविधानद्वारेण मयनिमित्तं प्राणिनामभ्युदयं विधतस्तस्याशुचिस्थानपतितगृहीतप्रशालिन ३५मोदकस्यागविधायिनो नममानयुदित्यमसत्तिः अपि च, यदि प्राणिकर्मपरयशस्लेशं दुरगादिक तत्मयनिमित्तप्रायश्चित्तकरूपमुपजनयतीत्यभ्युपगमतदा तत्कर्मकार्यत्यं तस्य प्रसक्तम्-तत्रतोप- कारामाचे सदंपशाया भयोगात्। उपकारस्य च तत्तस्य तदेदे तेन संबग्धायोगात्, अमि. प्रम्प तत्करणे तम्य फरणमिनि फयं न तत्कार्यत्यम् ? अथ पन यदा यत्र फर्मादिक सहकारिफारणमासादयति तेन सह संभ्य तत् तदा तत्र गुला- ४०दिकं काय जनपति, कार्यकारिग्यमय सहकारियमिति र कार्यन्यलक्षणलग दोष मनु कर्मा दिगहकारिमय्यपेनः कापंजननम्पमायस्तम्म कमांदिमहकारिगनिधानाद् यदि प्रागप्यस्ति तदा १४.९.पं.२३॥ २१.११.२६॥ १३.......१८॥ पृ.१९. ...: पं. ११। -कर्म-(-), मा. बिना । २१: ......1 "....। ११..६.२१॥ . . - ।

শিখবে। १३१ इफारिसमिधानेऽपि सस्पेगैयाऽमी कार्य निर्नयति, पररूपेण जनकन्ये सर्पम्प मरूपणानन. रयान कार्याऽनुनपानमातस्य चाविषालम्य तजननसमावस्य मायादुगरकालमाविसमस्न- गोन्पत्तिस्नदेव म्यात् तथाहि-यद् यदा यजननमम नत् तदा तद् जनयन्येय, पथाऽन्त्यायस्यामाने बीजमकरम, अजनने पानदा तम् तद् जननस्यभायमेव न म्यात्, तजननस्वभावध कर्मादि- सामध्यमग्निधानेऽप्येषस्वभावतयाऽभ्युपगम्यमानो महेश इति स्वमायहेतुः अय कर्मादिमामध्यभाये ५ तरखमायोऽप्यसी विपक्षितकार्य न जनयति, न तहि तननकस्यमायः यो हि यदा यन्त्र जनयति मसजनकमायो न भवतिः यथा मालिपीजं ययाङ्करम्य, अतजनकमापि तस्वभावत्येऽतिमसः, जनयति च फांदिसामध्यभावे वियतिनं कार्यमा ति व्यापमाऽनुपलब्धिः । अथ यादि. सामध्यभाये स स्वभायलपक्षकार्यजनकन्यलक्षणो नास्ति ताई म्यभायभेदात् फयं न तस्स भेदः अपरम्प नप्रियन्धगम्यामायान् ! मथा च प्रमयय॑नेशमगदिकाय नाक्रमकेभ्यरविहिनम् इति १० नेकपं नस्य सिदिमामादयति । तन्न सान्याऽगरिकत्यादिधर्मयोगस्तम्य मिसिगुपदाकने । 'नापि एप्रिममानसंयन्घित्यं नमानस्य प्रत्यर्थ नियमामायात्' इत्यादि यदुनम्, तदपि निरस्नम्। निस्यसपंपदार्थविषयमानसंबन्धित्यम्य नत्र प्रनिपिसन्याम् । पर 'यथा म्पपत्यादीनां महाप्रापादादिकरणे एकामिप्रायनियमिनानामस्मयं नापि यदि शियापनेकफार्यकरणे पहनां नियामक कधिदेकोऽग्नि, म एययाः' एयुनम्, नदप्यमानम्।१५५ पतो नापं नियमः-एपनेय मय कार्य निर्वननीयम्. एफनियमिनयां यामिरिनि अनेकपा मापक न्यदर्शनात् नियादि-पाधिदेक एकवायंग्य विधाता उपलभ्यो यथा कुपिन्दः अधिगम पर, पचिक एवं पाना कार्याणाम् पथा घट-गयोदश्चनानामेकः कुलालः, अनिदनेको नेकमा या घट-पर-कटादीनां पुलालादिः, पचिदनेकोऽप्येकम्य पग नियिकोडनाने पुर. समानः।म प्राणादादिलक्षणेऽप्यनेकम्मपन्यादिनिध्ययंतयेकानधारनियमिगानां न तप३० ध्यापार उपलाया, प्रनिनियतामिमापाणामयेकम्बधागऽनियमिताना मानिधान् इति मकाकर्ता भिरपाठीनां सिरिमायादयनि । अत पन मनियापना पशयगिशिपिय पुणः । देयं नित्यम्यादिविसरमाकल्यसाधकानुमानासंभपान्तपिपमाधान प प्रमाणाधना भापान न पितोपविण्यावा? अप गदिमधुरिमायाया पkि fami বাধহয়নি সদা গন ন বিধিমালায় খাশসম নিধি সাংবা पिंपवायम्, माध्यपिपर्पयगाधनान् । म पनपाभून न न दिया निधं निte নিকােংশ বিশেষ বালি বিনামিখানা। থানায় অমি क्षिापादागिन्यम् सामान्यमा यिनकान्तिकत्यम् इति प्रतिपादितम् । पषु पदामाधन पोपपागेप्यनुमानेप्यसियादिदोरः समानः इति पायपणनय नायपि पिलानि इति प्रायुधाय पूणणे मद्देश्यामाप निस्वार्ष मादिमिभ्युपगम्यने न पानि मार्ग- इति प्रतिपादयिष्याम: पर 'पिपादिमाभूतानि माए शियागु पुरिमवारणाधिष्टिनानि प्रग्ने, अनिल আবাহিনি, না লালায়িত্বক্ষেত্রে সৈী নাঘ মামনি খিদ্ভিালি, অযু মবুৈদানন্ম নানা বাহবাতি नित्यम् षप्येषम् एपनाया । अप पुरनिदधे सम्पपि धिमधिनि समिधाम पर प्रतिविEिTTET पालोनियाद समानम् मयादि-पासमरिया पुस्मिाधिति () पास सिkि মালয়বিধান। মন্তিম শাঁথান = mari दिला, निरश्मिाधिनिन मानि! माये सिemen, सिपण निधार, पापियामादिनि । म पापमापोरायपुरे पोयम् । ११...............

। अपमे काटे ययं स्थित्या प्रवृत्तः' इति साधनमुनम्, सधान्यदपि र वान्यम्-परंभापातामुपमा राऽपयनितया समाधमपि न सितिरलि इति कुलः सिया प्रवृत्तिःलार प्रतिवाणियो हेनुः अनेकान्तिाधेयरपैय यतः सोऽपि समयमु कार्येषु सिन्या प्रवर्ग अनामी - पताऽधिष्टितः अनपस्यापमहान् । अप 'अचेतनधे सति' इति सविशेषनो देनुरुपादीने र मालामतिनोपन्यस्तस्नुपापि संदिग्परिपन्यासिकतयाऽनेकानियमनियम-यो परिपाखेतुं निधनयति तदेश न्यायम् यत् पुनर्षिी संदेहं न पापनि न मकरसम्. पूर्योनामासिद्धतादो सपिरोग्णवेऽपि तस्यस्य पर। योगम् 'सm इत्यादि सत्रापि 'उत्तरकालं धुतानाम्' इतर पिरोजगमरिजम् । तपाहि नामन्मने मायाले सगुनमान-स्मृतयो दिननु करणाः पुरुष तिष्ठन्ते किल्गमागगदिपु समानानियो १० देशनिकाले: येन प्रतिनिनिरपादिपिाकरांपर्तगीकमाणले सोधायला नि माम् । विगपिता र आमामराल्गुग्यान र संभाल मार निरालं प्रबुदानाम्' इति गिरोषणमतिमम् । अनेकाधि हेतुः सपिरिमाया गियार frस. गोषमारे गाये शिमला, नाराहारगायो १ गभालागो गागो तानमामिला. अ men गारिका मा पा गए jीमा निगमोगलासमय IN aftem हलो गालागी निमा गुनो, after fer, PO unfrare. कोणाला-"पानमनापान Instateria HTTAR" (PITATURMतितकी माrtel TAIM MantraMITE म. Mero frra हेतु। मयेरकाशित निगमपागापyyy frframare नाला भिरामपाल) TER mari लान IITनाने का पहा rearrafataram mom नेमार माना minatir faunt frfatiनि मैनात भामहे | गागा प्रशमनियनfarTTETran air. It want tim AARATI tanाला ENTITATIRTIMIATT*intimaframta TWITfree from , TIMIMIT TIMITra yam Tanwr Amit TharRate arta T A gra Naif AIRTETr PR FrtermanarthITAL Ime FOOT PHATTA: mmm * Prem ! NO OPATTERTYmrore mrat rwww ramr writyatrin am Ya Prate rx raferreri ५ भागरिश पोभने । अपेक्षा गा mपेग होगा प्रनिपानिमामागिता, CIA कनेतिरोपण पायो निmational purum मित्यापादिभमंगाका पगमालाम्यामापा "-पर्म- विष पुरविशेष ईशाः" [मोगर० ० १ १०९५] पाहि गर्षामान भितो भपगगगारिमाण नागमणेनारोलिमा मिसाल धितम भापजिमा मिति । मा पहिरो भवनिधनानादिजेता दासगणेगपागपति, समानता স্বামী: গামাই থামথা। ১ ধিংষ থামান্য হাসিবী अमपापपर्गानिकारणम् दिगिर गरपषि यार भयसि सरगरविकार - स्थापित पम्, पपपीनिष पायानिगायापार गर्गम मागेप राप्रपाको नापं याना रागलेशाशिरपुरमीतपेन काफि मागाय,१० कपिदिएपीनाय रागद गरि: 'टाणमणोपमसुधमुपगपाण' ति । भामिल प्राय: यपि समतामतिपधिपतिकर्मपतुपापापिगमेपालगो जिनालयापि पो. সানিলিয়ন মাধ্যবিঙ্কিম মাথা ঘামিয়াঘা, नापि गणादिलमायापार सीतामामामाण्यम्, विपर्यापदेतोपातिाणोऽस्यामगाए । . अप कर्मचारतिनिमितापम्, भगोषणापोवापि समस्पनाशयार हाशमे पागप-१५ HEATमाधियात् कर्मयापारपर्गमाविशारापादिति । अयप्पा-शिएशिराफ लामसपायामाननमानगुगापायासिता गुलामानोऽस्मिमिति सार्ग मोकापलक्षणं लिशियो. অনু, সঠিক মা মাবিনি যােগাযােগ ব্যাবস্থা --मासानाम्, पहा म्यानमगुपमा २० "" रोन शासनप्रणे. ... - 1 . स . -- 4 "TE पत्र सिन्ति प्योमपत् तापपता"[ पराण पुर्नया गिरा माह पूरि:- 'ठाणमगोपमसुमुपगपाण' भर घ स्थालमनुपमपम्-प्रकर्षण भपुगरापा२५ गतानाम्-उपगनानामिति पारपेयम् । भयश "पुजानो मपानां पिरोपगुणानामातिय मानो ति" ! इति मनःपपछेपार्षमावाण-ठाणमणोयमसुमुधगाणं' इति भगुपयस्तम् । अस चापमर्ष:-मिगतिः स्थानं म्परुपमाशिम अनुपमागम् 'उप' इति रामालफर्मक्षयानमारमध्यपधार गतानां HITATम्-मोलेपपस्पायरममायोपारेषभूतमनगएपसभायमानः कधिनग्यभूत २० सार्प मानामिति वापत् । [आत्मपरिमाणवादः] [पूर्वपक्षा-मात्मनो विभुत्वमापनम् ] अगाधिकार समेतवनुषा, भागो विरगतिशियागातिनिगि. संभषात्, कर्मा परीभाष गुगारमा गुणातयनिमितामयापिकारणागापेनोरपाप.१५ संभपात, निश्परा पानपशापविस्थापलामेनासपात् । मधामनो विमुरमरियम्, अनुमानात् तपादि-पुराधिकरण मयं शिशु, নিয়েই কান্নাকাঘিয়ম; ধংখা নিযেই রাহামানব शान सत् तर विभ, पण आकाश, ताप पुरपधिकरणं प्रणम्, सावधिभुगप +-तारो नि भवति जिनाम. पिना। पदापविधि(स्पनिकरानमा, .

प्रथमे काण्डे- घुद्धेर्गुणत्यासिद्धतुविशेषमासिद्धया देतोरसिद्धिरभिधातुं शक्या, युद्धिगुणयमानुमानात् सिदः। तथाहि-गुणो घुद्धिा, प्रतिषियमानद्रव्य-कर्मभावे सति सत्तासंपन्धिरयान। यो यः प्रतिभिषमान द्रव्य-कर्ममावे सति सत्तासंयन्धी स स गुणः यथा रूपादिः, तथा च थुद्धिः, तलाइ गुणः । । च प्रतिपिश्यमानद्रव्य-कर्मत्वमसिद्धं युद्धः। तथाहि-पुद्धिव्यं न भयति, एकदवान, या ५यद् एकद्रव्यं तत् तद् द्रव्यं न भवति यथा रूपादि, तथा च पुद्धिः, तसाच नद्रव्यम् । न चायमसिद्धो हेतुः । तथाहि-एकदव्या बुद्धिा, सामान्य-विशेषयत्वे सत्येकेन्द्रियप्रत्यक्षात या यत् सामान्य-विशेषयत्वे सत्येकेन्द्रिय प्रत्यक्षं तत् तद् एपदव्यम्, यथा रूपादि, तथा पुलि तसादेकद्रव्या । न च एकेन्द्रियप्रत्यक्षरयात्' रयुष्यमाने उरामा पमिचारः, तरीकेन्द्रिया- स्यक्ष-वे विवादात् । नापि यायुना, तत्रापि तस्मत्यक्षत्वस्य यियादास्पदयात् । तथापि रूपयादिना १० व्यभिचारः, तमिवृत्यर्थ 'सामान्य-विशेषयने सति' इति विशेषगोपादानम् । न प रूपयात फरणप्राशनया छोन्द्रियप्रायता, चक्षुरिन्द्रियस्य चक्षुषा रूपं पक्ष्यामि' इति व्यपरेशातीला फरपत्यसिद्धिः, मनसस्यान्तरार्थप्रतिपत्तायेयाऽसाधारणकरणस्यात् । अथया एकदमा पुद्धि सामान्य-विशेषयरये अगुपयर घ सत्यवानुषप्रत्यक्षरयार, शादयत् । तया, ग कर्म पुगिः संयोग-विभागाकारणस्यात्, यद् यत् संयोगविभागाकारणं तत् तत् कर्म म भपति, पथा पानि १५ तथा च युदिा, तस्मात् ग फर्म। संसार सिखः प्रतिषियमानद्रव्य-कर्मभायो । मम सवासंपन्धिरयमसिद्ध पुद्ध, तर ' सति प्रत्ययोरपादात् । न च तामिमान सिद्धा, रामेवमतिपादकप्रमाणसनापात् । तपाहि-यस्मिन् भिधमानेऽपि यस भियते तत् ततोऽपांतरण पया भिपमाने पणादायभिषमानो पेहा, मिघमाने प यादी ग भियते सत्ता, अध्याती रात्र 'सत् सत् ति प्रापयामिभानवर्शनात्। अन्यथा तश्योगात् । सा य मुगिरीपदा, मगर २.पिभिसम्पमप्रतीते। तपाहि-यतो पत्र विशिष्टप्रपा रा रोग संपमापा गोपन मपनि पपुमा तारस्तम्या, सतरतया संपवेति । 'प्रतिजिपमामा-कारयान' रघुपमा सामाग्पादिमा नियारलमिप सत्तासंग्धिापात् ति यम् । ' पायुपमाने द्रय कर्गम्यागमेकातस्तभिपये प्रतिविमानस्थ-कमाये सति' नि विसरता नदेयं मनोनुमामार युदगुणनिति अपमान २१४लागमनानालामालमत्यक्षात मागिदम्। निणगंगाममः 'अजाणा, शासपर हनुमामानिमामलो पिणे मणमायानगुणाविधानमा लिनुमानित। मार, रामा:TRIमापि nिgi, frगुणावृणुगतान নিষি, দুশমানবিশাখীক্ষা। লাথি মারা। बाNिATimनानापान्तति माहिनाको देनोगता [HIT:-आमनो freviनिम्ण माणगाना | अमरगंजरिद्वारमनविद्वानfornate १ प्रFिATHEM. परममा गालि गुण प्रमाariLRMIRana मिशन शिक्षण मार्गमितानिmraat मागमा गनिममा मामलामा मत मेरा गानाTARI मा मATurmerim TET Exaxatariants. I winni र प्रयोजन Entert: TATAP HATTA At rintinir uTENT'fiemy rik Titan . . .

मगार!पादाम्य विकासले कति भाग पमान ! सानोमामा दम्मा मदन मामा-मानेगाना नाना नानापानी ना. मग दोन नाम कानी पुलि, म्बनिदिनकासकाइमान्दारे निशान । दरबारमारे, ५ दूरद बालदिप दुर मार दुसयामास्मिर माकोसले, उपाय समानद पुरन्दरमादानलमा, दिदन्दर शानिए In पारेलयामानान दायामाने मान्य न कनिधनन्, सदार. सरन्याहारस्वादमान, मानसि। नपाउरेल पस्तु पनि समिति, प्रतिमा १० हमारा मन भन्दै समाते उमा विगविरले । पुरानो तिरे दशमांशुमो नारालेमा समन् । टच दादर तरारमिते मिनादलवे साद' मरसिदि, इमिरेटर-नावि सदावर टावल विरेठरामपदम्। ह, नमकन्द दुनामदार भासदारामादल, नया बन्ने दुनिल साइनासदारिन भरिकार पनि ददरदेश (कारियाद दादा देरन्तरदिनु २० सिदिमा नमामिल हद अन्दरोसालिम ८ भन्ने देनदानासने नाल्दादमा न्यानो सदा पदमाद नावापुरचनाद कारें दो रन सम्म बन्दुमने सिनेविदास देहमान सदस२९ जिन्दा दुद मापन दिनुवन्द नारी सुटला देदे मागे नाले मांसदले पद! माडलिद कराने का रिन्! जान बार- भनिरहेदुन्ना समानुपाहिद से दाई वरू: पालामा कामदार दिन- मान्यतेन परदे परम्. पावापुर शिरमिरगद कास्टिला दमदारमितरूपस ३५ Parenादावन अस्टमिन्द। परमपना दिले पार सादिष्ट लागेर मात्र समानार सरासर निस कारवाई र नुसार पोन्दिरोमानदार इस पुरते : 1.६.३५ ३ २ ...:१ - प्रथमेशारडे-- विशेषणागिमो वः प्रसनः। साप-सामनवमीकमयाकाल माघम्यष्टाना, न सबसदापरलमानगुणाधिधानत्य साधनधर्ममा, निमुन्यातपायधर्मस तामि। अपमानाधिकरणं इत्यं निमु. नित्यत्ये गन्यम्मदापरलमानगुनाधिष्ठानवान्, आभ- पत्' इत्यतो ट्रेनोस्ला विमुत्यम पिने सापकिलो शन्तः । नापि साधनविकतः, ५सलवादिप्रसशशब्दगुणाधिष्ठानत्यम्य राम मिमस्यात् चाडम्यासदादिनन्यान्वम् गुमन्त्र पाऽसिमम्, भोपचापारणायक्षसी मादय परिस्फुटरूपतया प्रतिमामनान् निषिध्यमान द्रष्यामन्ये सति मत्तासंग्रन्धिरयार, पृधिशादिवृत्तियाकममाणसावे सति गुनसाऽऽधिनतो. माकाऽऽभिवत्यसिसंधान साधनकलनाकासम्म । असदेवत्। मिड़े चान्मनों विभुग्ने तनिदर्शनादाकारास विमुत्पमिति, तस्मिधामनो विमुत्वसिसिरिनीतालरामयदोपप्रसार १०मायाकाशस्य त्रिमुत्पमिद्धिरिति मायनिकलता सदयस्वैर । यश पादस्य गुणवसाधकमनुः भानं तत्र 'सत्तासंपन्धित्यात्' इति हेती सत्तायाः तत्संयमित्यतो समनायस्य चामिद त्यादसिद्धता, मतिपिण्यमानद्रव्यस्ये सति' इति विशेषणस्य चामिद्धता, दम्य इयत्वात् । [प्रासङ्गिक शब्दस द्रव्यात्मकत्वमापनम् ] तथाहि-द्रव्यं शम्दः, क्रियायत्त्यात, यद् यन् क्रियावत् तत् तद् दयम्, यथा भार, १५तथा च शब्दा, तसाद् द्रव्यम् । निष्क्रियत्वे धोत्रेणाग्रहमसरः, तेनामिसंबधात् । तथापि ग्रहणे प्रोमस्यामाप्यकारित्वसतिः। तथा च 'प्राप्यकारि चः बान्दियत्वाद, गिन्द्रिः यवत्' इत्यस्य धोरणानकान्तिकत्वमसक्तिः । संवन्धमपनायां या प्रोत्रं या सददेशं गत्वा शब्देनाभिसंवन्येत, शम्दो या श्रोत्रदेशमागत्य तेनाभिसंबनयेत! न तावर प्रथम पक्षा, स्वधर्माऽधर्मामिसंस्कृतकर्णशकुल्यवरुद्धनमोदेशलक्षणोरा शम्दोत्पत्तिदेगे निष्क्रियत्वेन तथा २०प्रतीत्यभावेन च गत्यसम्मवाद । गत्यभ्युपगमे या विवक्षितब्दापान्तरालपर्तिनामन्यान्य- शदानामपि ग्रहणप्रसङ्गः, संवन्धाविशेषात् । अनुवात-प्रतिवात-तिर्यग्वादेपुर प्रतिपरसप्रति पत्तीपत्प्रतिपत्तिमेदामावप्रसङ्गम, श्रोत्रस्य गच्छतनत्कृतोपकाराययोगात् । नापि सदस्य प्रोगदे. शागमनसम्भवः, गुणवेन तस्स निस्क्रियत्वोपगमात् आगमने वा सक्रियत्वाद् द्रव्यत्यमेय। अथापि स्यात् न आद्य एवाकाशतद्वेशुमुखसंयोगात् समचारयासमवायि-निमित्कारंपा २५दुतः शब्दः थोत्रेणागतः संवैग्यते येनार्य दोषः सात्, अपि तु जलतरङ्गन्यायेनापरापर चाकाश दिलक्षणात् समवायऽसमयायि-निमित्तकारणादुपजातलेनानिसंशयंत इति । नन्येवं पापादयोऽपि पूर्षपूर्वसमानजातीयक्षणप्रभवा अन्ये एव लश्येषामिसंयन्तं इति किं नाभ्युपगम्यते । तथा च क्रियायाः सर्घनाभाय इति क्रियावद द्रव्यम् इति लक्ष न छचित व्ययतिष्टेत । अथ प्रत्समिशानाद् घाणादा नित्यप्रसिद्धर्ने कल्पना । नन्वेवं देऽपि मा ३०भूदियम्, तत्राप्येकत्यप्राहिणः प्रत्यमितानस्य 'देशदत्वोधारितं शम्शणोमि इत्येवमाकारेणोप- जापमानस्याऽयाधिवस्वरूपस्यानुभवात् । न च दनपुनातरेशनसादिशिव सहसापपरो. त्पत्तिनियन्धनमेनत् प्रत्यभिज्ञानमिति यहं सत्यम् पापादावपि तस्य तपान्याविरोधात्। अप शदे यापासझायात् तथा तत्परिकत्सनम् न घाणादी, शिपयात् । मनु न सदैकल्यविपर्य प्रत्यक्ष तापस बाधकम् , समानविषयत्वेन तस तदापकस्यायोगात् । क्षणि- १५कत्यविषयं तु शदेऽन्यत्र या रियादगोचरचारीति न तदाप युक्तम्। न चानुमान प्रत्यमिशन. पापम्, प्रत्यमिझानस्य मानसनस्पसायान्युपपमा देर नुर्मानाशाखामभवन्यायाध मुपलाधम्, न पुनएमा सम्प। अपवादकायमाहकारत्यभिप्राप्रत्यक्षम्य तमामासत्वानुमान स्थिरचन्दादिग्राहकस्येव देशालासिनिवानुमानयर पाप भविपति, कर्य पुनरम्य प्रसशामासयम् । अनुमानेन वाधनादिति पेन, नेनाप्यनुमागम्य गायनाइनुमानामामवं ४० िनशा भयानुमानयापितरियार नहरमानदायकम्। अनुमानमध्येकदाधित विषयवाई नास पापामिनि प्रसनम् । भय सापारिनामापिनि जानिनावामानुमानमेवनायम् एशा- आत्मपरिमाणवार त्यानुमानमपि नामताप्राहिमत्यसवाप्यं न स्यात् । अथ पक्षे पर व्यभिचारा न .विनाभूतहेनुप्रभारयमेकशासाप्रमपत्यानुमानस, तत् सदाणिकन्यानुमानेऽपि समानम् । न च शक्षगिकत्यप्रसाधकमनुमानं पराभ्युपगमे संभवति । यप क्षगिका सदः, मल- प्रत्यासत्ये सति विभुद्रयाविशेषगुणस्यात्, यो योऽसदादिमत्राशत्वे सति विमुद्रयाविशेषगुणः बक्षणिका, यथा मानादिः, तथा घरादा, तस्मात् क्षणिकः' इत्यनुमानम्, तदेकवाखामभव. ५ तुमानय मानसप्रत्यक्षामिमतप्रत्यभिसानयापितकर्मनिर्देशानन्तरप्रयुक्तरसात् कालात्ययापदिए- तुममयापार न सायमिशिनियाधनम् । किश, धमांवर्षिभुदयविशेषगुणत्येऽपि न निकस्यामिति लोय मिचा। तम्यापि पक्षीकरणे सर्वत्र व्यभिचारविषये पक्षीकरणादून कधि हेनुयभिचारी सात् 'अम्मदादिप्रत्यक्षरये सति' इति च विशेषणमनर्षकम् , व्ययच्छेद्याभायात् । धर्मादेः सगिकरने चस्वोपतिसमयानन्तरमेय ध्यस्तत्याद् म ततो जन्मान्तरफलमाप्तिः। शन्दा राम्दोरपतिपद१० धर्माधर्मारपतापम्युपगमयाधा 'परस्य अनुकलेप्यनुकुलाभिमानजनितोऽमिलापोऽमिलपितुः राभिमुमनियाकारणमारमविशेषगुणमारामोति, अनुफलेप्यनुलाभिमानमनिताभिलापरवान् गान्मनोऽनुफुलाभिमानमनितामिलापयन्' यस्य च विरोधः, यतो योऽसो परावाले. प्यनुलाभिमानानिमामिलापोत्पादित आत्मविशेषगुणो मामापभिलपितुराभिमुराक्रिया रणम्, तत्समानतत्कारणत्यात्, पथ सक्रियाकारणम् मासी पयोमामिलापेमारण्य इति ।१५ तया, 'प्रयक-नियनका पिच्छा-उपनिमिमा धमाधी, अययधानेन हिनामिविषया. स-परिहारहेतोः कर्मणः कारणरपे सन्यारम विशेरगुणत्या, प्रपतंक-नियनकमयमय' पत्र নৈসমিনা, মাশকমেৰামৰিমানে বিনাশিমাদি-বিশৈীল। कारणाये मस्यामविशेषगुणात्येऽपीडा-ग्रंपनियामापा । किश, धादिया अपपाल. कारपतिप्रमथ ततो म पात्योपनियन धर्मादधर्मापति सम्म सनिकायम जन्मान्तरे ततः फलमिस्पक्षणिकर गया युपगनयमतरतेनापभिचारी हेतु अशासादिप्रत्यक्षरपविशेषणविशिस्य विभुदयविशेषगुणरया पापमपात् म पनि पारस, अगतता विपसानिदि विशेषणं ततो नियति, पणत्यतिता फादाचित्यायं निपतंपति। न चास्मादिप्रत्यायमक्षणिपायपिगम्, अक्षतिपपिमामाया मापान, मो यथाऽस्मदादिप्रत्यक्षा अपि फेचित् क्षणिका प्रदीप, अपरेसनामामा-५ दामपामदादिमा अपि विभुदयविशेषगुणाः पेचित् शशिकार, अपरेशनिका मपियनीति খিথিলাধূলিয়াছাঙ্কিা । মা বাদামি বাধলবিলি মি पपिशेषणापाणियोऽदरांना ततो पात्तिसिशित, गदर्शनामधनः परोपा. दिनाऽनकान्तियार, सन्धिोऽसिरपार । म व हरयापपप दोषः समाना, नन विपरी देनो समापपाधयममाणभाषान् महतनोध तामापा । परि पुनर्षिक নৈীলমাধব নীমূৰিথালি "वेदाण्यानं सर्य तदापयमपूर्वकम् । वाप्ययनपाप्ययात् भगापद पपा" मोबा.सो. বেলাব বিখগালী জাখিঘিদ্বিধাবোন মাখা । धर्माधरिधाग्यापम 'रेयातं मन्युपता पधारो परमer, मायुपरागपाशान, या परत प्रापण सा गाम, पाS শশা ও বাবা, মা ধনায়' (ঘাম না, পােষ্ট पाप्यनुमाने पता थिय शिशिरगायेता मासागर मदुरासदेल তাছাই বাহু বাধাগ, লেঃ ক kuari army परतापममारगुणमानिः नापनेताह मनाम पगारपरमायुपगम पानिपती का दान कर শয়ালে থিয় ইংণে নিশিং শ্লোগান जापान)n-r..! ... .

। २३८ प्रथमे काण्डे यदि तेनेपानुमानेन, अन्योन्याश्रयदीप:-व्यातिसिद्धापनुमानम्, ततश्च व्याप्तिसिद्धिरिति । मानान्तरेण तत्प्रतिपत्ताभनयस्था प्रमाणान्तरेण च तत्प्रतिपची पेशेषिकस्य हे प्रमाणे, नया चत्वारि प्रमाणानि रति प्रमाणसंख्याध्यायातःग ततो मानसप्रत्यक्षेण व्याप्तिपत इत्यम्युपगन्त तथा च प्रयत्नसमानगुणस्य समाकर्षकस्य, तत्समाप्यमाणस्य च पश्यादेस्तन्प्रत्यक्षम्वमित्यमा ५प्रत्यक्षत्वं धर्मादेरपि परैरन्युपगन्तन्यम् । यदि पुन: 'याशेन्द्रियप्रभयासदादिप्रत्यक्ष प्रति हेतुर्विशिष्यते तदा साधनविकटता दृष्टान्तस्य, सुखादेलयाऽप्रत्यक्षरयात् । विमुद्रा यदि अनाकासमसदाधमत्य विवक्षितं तदा तदर तहणसाप्यसदायमस्यनत्यमिति 'अल प्रत्यक्षत्वे सति' इति विशेषणासिदिहेतोः, गुणिनोऽप्रत्यक्षाये तद्विशेषगुणस्याप्यालय प्रतिपादितत्वात्। किचा सिद्ध हि शब्दे गुणे तदाधारसिद्धि-गुणस्थाधारमन्तरेणानवस्थानात्-तत्सिर तदाधारस्य नित्यन्ये सत्यसदादिमत्यक्षराब्दगुणाधारस्बेन बिमुद्रव्यन्यसिद्धिः तस्सियस क्षणिकन्यसिद्धिः क्रियायत्यप्रतिपेन द्रव्ययामा साधयेत्, ततश्च गुणन्यम्, ततो कि च्याग्नितत्यम्, ततोऽपि क्षणिकन्यम्, इति चक्रमासस्येत साधनान्यच साधा पुमेरपि विम्यान्मविशेषगुणन्यासिद्धः। न च शदृष्टान्तन तत् साध्यते, तसापाप्यसि १५६तरेतरामयदोषासहतः । न च विम्यात्मविशेषगुणो मानम्, तत्कार्यन्यान, राष्ट्यत्' इस नुमानात् तस्य तद्विशेषगुणन्यसिद्धिः, कायंत्यम्येभ्यरनिराकरणे परमसियासित्वेन प्रतिप धात इतरेतरामयदोषस च तदपस्यत्वात्-सिद्ध दिशद घिमुद्रपिशेन्गुणन्ये स्यम, ततो शानस्य तरिसद्धिः, ततश्च शब्दस्स तत् इति कथं नेतरेतरायदोषः इति सापनपि रातः तया साध्यमिकलश, बुद्धः दाणिकन्यासंमया तपात्ये या तस्यान सनः संहक २० वदमायाम सालम, तदमापाचन प्रत्यमिक्षादिव्ययाः। न हि विनष्टात् कारपार का अन्यथा चिरतरपिनादपि ततस्तमसात् । अनन्तरश कारणये सर्यमगत कारणमागर अधका समयापिमाननम्तर ताकारणम्, गाजानामनो मेदे समपापस सयंत्रापि प्रनिपिशवाय एकार्यसमपापिल्यखियम् । बिमष्टाय फारणात् कथमनग्ता कार्यम् ये त कार्यकारणमापनियाधानन्यन कश्येत? म दित कारणम् नापि तत् सम्म का २५नयमार एप मारा । म दि यमायऽपि या मरति सत् सग कार्पमितात कारण- पस्या, अनिता । विनश्यदयम् कारणमिति घेन, माइपि विगापश्यया यदि मिया तारा तदमियरमामायादगार विनमयदयपम्' इति कुतो पपी अनिगादेष! उपकारे या मोऽपि यदि तनो व्यतिरिन, अनिमहोदनयम्याका নিয়ে বিশেষত্ব হল না । নামৰ্থি যধিলঘট কালো ऐन प्रापि विनयरम्यालयानेन! मिनरपवा पेन् तो कुपार अन्या । मोपोन्नाभूना विवादावस्या कलनीया । सपा सर्मियाधामा, भाna सरकारसम्मः प्रमः अनम्या १ ला पाविनायोगानेनोगत বিশাল সয়লারসন, মাস।বিমল ধান যি पदमिन पाम्, विदिनानखान । आगामिना ATTAl- मंगला, विनयं साकार पगेनीतिको मनपरा : থা: সকাল -ালখালসাবিলা কাবা मारावादरमपिम्। rexगनारायणामसमरम्मा -frm पारिवानामा परामरामायिनि नया tram दिन में मगन Manars में T AREPTETTER TRA Tremrathi । বাবা সরাইলখাফিয়, পবিশ্ব প্র নম্বর। সবোথাম জানালদিতি, ওয়ণগাসাস ২ নিষেশ্বিনা । সে ফাইনঘামু। সব সুবিদিশলৈ বি সামি বিবি, -কাতল বিয়া লীলালিসিপি ই স দা গাম নবি ও মাঘ, পিয়াস। হয়ে ধমনস দ বুধব স যথাবি । মবনাম মায়া লার্নিামৈথি শাক, লাম্বাসি মাথাবলাম মমি , সহ বাস মসঃ ইনপমান খ গ ঘদিনে * শীল। গ িমা বাথ সল্লামসীমান্না। চাষাৰ নাই। বাৎসপি, ইলালদিনি এশিয়া সমাপনিরি। শ খানসইমিং ফুলা যায় না। প্রায় স প স ম বি বিয়ায় ৯, লালমাটিনি মামীলগি , মবি শ্যা মাৰি সাবিখামালিয়া। সম্বল সাদী , গাা সাদ লবি দিয়ে। গ থাঘি বা দে - মাখালানি না বা সমাজ বা মনি বিগামা র ব্য। लिया गनिमेय माका मा मा भयन नाविक पार krrierritor, কোথায়। ধার ধর্থ গাখামাখা লন , , , , লাগিল বিশা। ফিগাইবি স্বনি শখি না সথা যা। আমি থাকায় এর নিশি লা riহ্ম স্ট বিধি লস। প্রিলি দাম দগ গুলশ। পুর - * দ্বাদু পানামা এল বিকিনি গাৰ ৰস, শাখা। এখন দু গুগগা পনি, খে, গ + ণ , বাঙালি, সখা প্রথম, সয়ং খাম'শিখা প্লা ঘন বা গযলামি শ vা আলা । সি rি , r = ।। পথিম ম বা । প্রায় ২ কে লা, এ মাখালা-খুi ধাগ, গয়নায় গিয়ে এই, মন খান্না মাখামাখি কথা। * গ। গাথা মনলৈ লয়, গাধা :v ।। মাথা ন কে . * * * ফু ইথিবি গাে গায়খম। গালে ক্ষম। লাশীল যে শখts গান । বা বিশাখা ({ , শ ম স + মঙ্গল’ এ পাই নিয়ামাখা লা প । সালাই, খ, বি হই, মই । Frণ গুণানি । এই ই- খাজা বাবা খা? ৫ **** শিখা, এ বি । - * ৎ? , r, ঋণপণ লক্ষণ t. গেল , r: ' বা ৫ मममे काण्डे- इयत्तानबंधारपान हि अयं महान मान्दः' इत्यययन 'स्या समधारपनि यथाप्रपाली पदराऽऽमरफ-विल्यादीनि पति यवं राश्यम्, यतो याव्यमत्र का पुनरियं शनल मारमा तीयता घा? अयान्तरजातिविशेषा, कथम् ! गुणवृत्तित्वात् शरदत्ययम् । पनदेवानं मनाना । परमर्पिणीलुपयेन "गुणे मायादू गुणत्यमुकम्" [पैशेषिकद० अ०१, आ०२२ सू० १३ ५वस्यायम:-'यो यो गुणे पर्नते स स जातिविशेषः यथा गुगत्यमिति, अमदेनन् या शम्दस्य गुणत्वसिद्धियेन तत्र वर्तमानत्यानातिविशेषावं मन्दस्यादेः। अद्रव्यवादिति चन, नाति फपम् ? अरुप-माहत्यपरिमाणाऽसंयन्यात्, मोऽपि गुगत्यात् । मनु तदेव पूर्वोक्तं चक्रक्रमेनन् । न गुणत्यात् तस्याल्प-महत्वपरिमाणासंयन्यं घूमः येनायं दोपः स्यान्-अपि तु द्रव्यानरखदिक तानयधारणादिति चेत्, न; यायोरियत्तानयधारणेऽन्यल्प-महत्यपरिमाणसंबन्धसंभवादनेकान्त, १०न हि विस्व-पदरादेरिप यायोरियत्ताऽयमायसे । पायोप्रत्यक्षत्वात् इयत्ता मत्यपि नावाने, न सदस्य विपर्ययात्, न उक्तमत्र 'स्पर्शविशेषस्य घायुरयात्, ठस्य च प्रत्यक्षयात्' इति । इक्ज चेयं यदि परिमाणादन्या कथमन्यस्यानयधारणेऽन्यस्यामायः? म हि घटानधारणे पटामाणे युक्ता । परिमाणं घेत् ताई "इयत्तानयधारणात् परिमाणं नास्ति' इति किमुकम् ? परिमाणं नास्ति परिमाणानयधारणात् । तसिनाप-महत्यपरिमाणायधारणे कयं न तदयधारणम् बिवावायपि १५ तत्प्रसङ्गात् ? मन्द-तीमामिसंयन्यादल्प-मदत्यप्रत्ययसंमये मन्दयाहिनि गहानारे 'अल्पमेनर' इति प्रत्ययोत्पत्तिः स्यात्, तीमग्राहिगिरिसरिनारे महत्' इति च प्रतीतिप्रसग न चैवम्, तमाल मन्द-तीग्रतानियन्धनोऽयं प्रत्ययः अपि वप-महत्वपरिमाणनिमित्तः, अन्यथा घटादापति नियन्धनो न स्यात् । घटादीनां द्रव्यत्वेन तनियन्धनत्वे परिमाणसंमयात् तत्प्रत्ययस्य शब्दस्यापि तथाविधत्वेन स तथाविधोऽस्तु, विशेषामायात् । कारणगतस्यास्प-महत्वपरिमाणस्य शो २० उपचारात् तथा संप्रत्यय इत्यपि चैटदयमापितम्, घटादायपि तथा प्रमद्वान् । अपरे भन्यो "यथा अश्वजयस्य पुरुष उपचारात् 'पुरयो याति' इति प्रत्ययस्तथा बाकगतम्याल्प-महत्वाचे शरद उपचारात् साम्दोऽल्पो महान्' इति च व्यपदेशः", वदप्यसायम्:शब्दामियनेरपीरुषेयत्व निराकरणे प्रतिपित्वात् । ततो घटादाविधाल्प-महत्वपरिमाणसंपन्यः पारमार्थिक शदे लि सिद्धं गुणपत्वम्। संयोगाथयत्याय, तदपि पायुनाऽभियावदर्शनात्-संयुक्ता पय दि पश्चिादयो यायुनाइम्पेन याऽमिहन्यमाना दृष्टाः, तेन च दमिधातः पश्यादिधदेव देवदत्तं प्रत्यागच्छतः प्रतिकूलेन घायुना प्रतिनिवर्ननाद, तदप्यन्य दिगयस्थितेन ध्रयणात् । मनु गन्धादयो देवदत्तं प्रत्यागच्छन्त- स्तन नियत्यन्त, न च तेषां तेन संयोगः निर्गुणत्यात् गुणवेन, न तद्वतो द्रव्ययय तेन निवर्तनम, फेपलानां तेषामागमन-प्रतिनियर्तनाऽसंभयात् निष्क्रियत्वेनोपगमात् 1 केवलागमन प्रतिनिध २०तनसमये था द्रव्याधितत्यमेवेषां गुणलक्ष योहन्येत । न घानापि नेनो निरन्नम्, आकाश सामनत्य-सर्पगतायेन तदसंमगात अन्यस्य चानम्युपगमात् । तस्माच्छब्द एप सेन संयुग्यो साक्षादिसम्युपेयम् । गुणत्येन पासपोगे चकमकम् । न चासंयुक्कसप तेन नियतनम्, सर्वस्य निधनप्रसङ्गात् । प्रतिक्षणं सदाच्छम्योपनिः पूर्वमेय निरस्ता। पकादिसंख्यामपन्धियाय गुणय त्वम्, तदपि 'एक दादा पदयः पति, ३५रत्ययदर्शनात् । न पाधारमंत्यायास्तत्रोपचारात् तथा ध्यपदेश इति यर युनम्, आकाशा धारावायुपगमा सम्पचकायान् 'एका वादा ति सदा प्रत्ययममताम्। कारणमात्रय संख्योपचारे 'पदया' पनि प्रत्यया स्यात्, सस यस्यात् । विषादयोपचारे 'गगनाकार- मोम'सदा पथ्यपदेशभाशो गत्यु, गगनादिवसाप विषपरोकयात्, पयादिलक्षणम्प वियर पहत्वात् 'पको गोवानि म्यपि प्रत्ययः व्यपदेशो पान म्यात् । पचाउविरोध ४० न्योपदार नि पारमि, संस्थापयाविरोधात् । अत्रापि गुणात्य प्रियायत इति " 1.11५६.१.1 12.१४. गाई-festi सबलानि-., at..

। .. . . wimmitTARATI १४१ PRERE I मनासिवाद गुप्पागो द्रमा 'मलिनियमा. सापि । neोमपम, TET, FIR नि ! पप, पम् शित नोvिeer art. xfram। 'एकपाशी गुपियानपादि- गि सरोका हे गुन्यमोगीप गारिको देगु, ५ पिrane एस भाषा सपशप भारद्रयापदपत्यम्' दानिश माप-मिपिपात विभागापा-भमानापियामि सगन् । पे, गुमाये गिर गगने पत्र मान सम्म मि मिति, मरिसमेत प्रायोति गुमामिद्धितिintrosपयम् । पर पुनम पाप: WITB, मामान्य विशेरपा पति पावधिपापागल १० गादिष. नगि प्रानुमानेग प्राधि-भादमा :, असमाधिपाये गति rmirent. दिपा पापियामागिरम् | म गुप्यमाने परमा भागेपनि सप्रिय मामिलाये frirmireTR | सदादि। মানুষমান থামিনিয়াপুয়া। राधा नामापरि पति यापेsपि पालि पनिवारय,५५ गरतमा मरिदिप -TITI पासिं तरिति पेन, र भवेत् । वा पयतेन पि() इति गमरमत्यक्षता 'तरो मारना शीतो यायुमें गतिमानलमा रयताम्. सि गरल चालवादिभिः मसीयमाना-२० पापा सामान्यतिरपारेऽपि द्वारा सम्मारिपिलपितन्द्रियान्तरेण सरमतीतो शादि तपा महीन मिना ! तयाअनुपलमोऽन्यत्रापि समानः । 'देशान्तरे বা আমি , বাঘিন্নাই নবি বিশ্বালা, पादिषन् रति , असल र गुणा निरियार 'विशेषगुणरयास ऐसा गन्दामापत्या प्रतीतिनिरोधात्यालामेतत् । पारंपनियास परिपममासंपपिरत ति देनुस्तदानकात्तिक सामान्य समयापारिभिा एवं प्रतिषियमागम-यमंगाधे शिधापूत सजापभित्येऽपि মায়ানি। এ ২ আঃ কামান, খিলাবিৱিৰি মনি पारिकाधीन् । अL 'निजामाधिपात्' विगुलशनभिामयामाग्रेन पर- विपासादीप दापि हामंपनियासियः । पमु मिसासरे हसंभात साम-३० वरिषचन्ये पदामा प्रयोगायमुपयलम् । सत्र परंप गाय का देय पधपेतन- पापि का सरा पेतनायेगनेगु सारस्परिपपामार मार सित्तासंपम्धिापम्, म य यहेप पेनला मनपापेनन, तमाशापरणान्या मापादिति राािम सामाग्य प्रतिगादपिप्पनी निर्णयामः । पंपस गुपयासि नित्याचे समायापलम्पमानगुणा- बिधानन्पासिंस्करण, सापनरियोस्रान्तरले सितम्। एलेनेदमपि प्रत्युरुम् मान परमगदरतपसमवेतम्, निशेषगुमर पति प्रदेशस्ति- स्पान, दाम् । अत्रापि शान पराममहशेषतरणसमयेताचे सति सादरस तरिसधिः, सरिधि मानश परममहाशयसमधेतरपतिद्विरितीवरसायोपागपशान्तान्तरमलि पतोऽन्यताप्रतिसरयमदोषान् । शानश चारमनोऽपति शिवे सपापिारम्, 'य पलाएर सिरिष तम् साथमायं पधारमस्यरूपम्, आरमारसिरि तिम्, समस्तनापति ग४० १४.६.१२। पू ...पू.१.१५.१.....। ५५. 1.11.4.101-गावामनाये त-दि.11.-परवेघ गु.,मा.। १-पयाशिन्याये -पयविषयो। हो। १६.१-१.. १२.

-- १४२ प्रथमे काण्डे-- प्रदेशवृत्चित्यम् । तथापि तवृत्तिले ज्ञानेतरस्वमायतयाऽऽरमनः अनेकान्तसिद्धिः। व्यतिरे यात्मगुणत्वयदन्यगुणत्वस्याप्यप्रतिपेधाद् विशेषगुणत्वासिद्धिः । व्यतिरेकाधिशेपेऽप्यारमन र गुणो मानं नाकाशादेरिति किंरतोऽयं विशेषः ? समयायरत इति चेन्, नः तस्यापि वाभ्यामन्तिरत्वे तदवस्यो दोषः, व्यतिरेके समवायस्य सर्यपाविशेषाद न ततोऽपि शिः। ५व्यतिरेके तस्वय अभाव इति न ततो विशेषः । न च समयायः संमयति रति प्रतिपादिनम् ।। चात्मनो व्यापित्ये नित्यत्ये च मानादिकार्यशारित्वमपि संभवति। तस तत्कार्यरयादपि तविशेषगुगो मानम्। म चारमनः प्रदेशाः सन्ति येन प्रदेण्यत्तित्यं ज्ञानस्य सिहं स्वास्। कल्पिततत्पदेशामुपगमे च तदचित्यमपि हेतुः फरिपत इति न फरिपतात् साधनात् साध्यसिरियुला, सप्तर सर्वसिद्धिपसगात् । सन्दिग्धविपक्षम्यागृत्तिकन्यं च हेतोः विपर्यये थाधकामापास्यापि १०समानमिति। तया, स्वदेहमात्रयापकन्वेन हर्ष-विपादाधनेशरियतात्मकस्य 'अहम्' इति स्वसंवेदनप्रसा सिस्वादामनो सिमुत्यसाघकन्येनोपन्दस्यमानः सर्प पय हेतुः प्रत्यक्षाधितकमनिशानगर- प्रयुका देन कालास्यापदिएः । सप्रतिपक्षधार्य हेतुरिस्यसत्प्रतिपक्षावमप्या लक्षणममिनम् । मदेवमात्रामप्रसाधकध प्रतिपक्षहेतुरय प्रदर्शयिष्यते । नन्नातोऽपि हेतोरात्मनो पिभुषसिरिः! पदाम्मनो विमुन्यसाधन धिनुपयलम्-"अष्टं स्वायसंयुन आभयान्तरे कर्म भारमने, पादारये सति क्रियादेतुगुणत्यात्, यो प एकदम्याये सति क्रिया देनुगुणः यस ग्याभपसंयुम भाभपान्तरे पमं आरमने पथा घेगा तथा चारप्टम, तसात् तदपि साभपसंयुगे मामपानो फर्म भारमो इति। न शामिद क्रियानुगुणत्यम्, 'अरोकारवालनम्, पापो नियनम्, अणु-मनमोधा कम देयदत्तविशेषगुणकारितम्, कार सति देयत्तमोर- २०बारबरा, पान्यादिपरिपादयत्, एकदम्यत्यं चैकम्पारमनलदाममात, समारन. दिवोरगुष्यातसदर ' যখন ঘুমান নিমাচোদা "बियामुगुमला' पुनम् । 'शिपाईनुगुणरया मयुष्यमाने मुलहस्तसंयोगेन लाभ मंदुलनामादिगमनहेतुना यामधारा, नित्ययम् एकद्रयाये सति' इगि विशेषणम् । पदये गति लिनुपात युध्यमाने सायासंगुनसोहारिप्रियाहेगुनापमान ६५माराशिम्पर्यम् 'गुगन्यान्यमियानम्" [ সেটি নামিবিয়াখাইন এ গায়ামাখামাসথামালাম। दमाई' it friyi मिम्मिन् ये मयुनाया, उसनर रामपापा तत्र पयायः S: युनः गोगगुनारा गुणगायादश्यामसने. मियानुगुणण्यापेम MEETTA अरदिया नयाग महकायमा मासागर स, परिणाभूतगंवोपमाः। म पार पाया तो पाया, मागमता समायय मित्रा निगाया, पिशा कापEIN पाप an प. पनि गोधा मारिनोनुभयान, या गुग-गुमानिmar पर सादा परमाणुः। वायरिमांना gri rift infin मा मायब मनायनशामनियापार-italirfri. मरासियामि। मोबानगरम- गुगल गान mer wati IRRITAIL. मग MEMirritrakti FEATREATERNMETHEATRE mrria warrantietirinte: • • • • . . . • nir... htttitutine at art - आत्मपरिमागयावः। पदेशा यदि ततो मित्रास्ते पेपि म तर पर्तते स्पिनरस्था। अभिभात् उनो दोषः। पक्षे परपाद पर समधितः म्यादित्यात्मना सदाहरम्य पशिदनन्यमाप एप एकदमय- विमुन्या गुणानां तदध्यतिरिकात्मनोऽप्यविभुन्यमिति विपससाधकत्यादेपद्रव्याय जय हेतुविधोरणय विपदरवम् । प्रिया हेतुगुणत्या' स्यापि यदि देवदनसंयुक्तात्मप्रदेदो पर्तमानम दीपान्तरपतिपु ५ फलादिपु देवदनं प्रत्युपसर्पपयन्सु क्रियाहेतुः, नदयुतम्। अतिदूएवेन टीपान्तरपतिमिले. मान मिसंपन्धिरयेन तत्र क्रियाहेनुत्यायोगान्, तथापि तदनुल्वे मषेत्र हात, अधिशेगा। नमिसंपन्धादिपेऽपि यदेच योग्यं तदेय सेनारम्यते न ममिति नातिप्रसन, नागभुपोऽ. प्यकारित्वेऽपि यदय योग्य तक्षेप तहाएमिति यदुक्तंः परेण-"अप्राप्यकारिन्थे मभुगे प्पपस्थितस्यापि प्रहमप्रसनः" [ त्ययुक्तं स्याम् । भय स्वाथयसंयोग-१० संपन्धसम्भयात् 'भनभिसम्ममात्' इत्यसिद्धम् । तपाहि-यमान्मानमाधितमरएं तेन संयुक्तानि दशान्तरपतिमुक्ताफलादीनि देवदनं प्रत्यारप्यमाणानि, ना सम्पाऽऽकमसलान् मेनाभि- सम्पन्धाविशेषात् । न प पदरऐन यान्यने सत् सेनारप्यत इति कल्पना युनिमती, दयदर- भारीपरम्भापरमानांतरासन्यत्वेनाइनाकर्षणप्रसा। नामाकर्षणेऽतिनमनःप्रतिपादित एप। पाप कारवायाधिशेपे परदेशादी मचिहितमेर दण्डादिकं घटादिकाय जनपति १५ स्यन्यत्ययुपगमनपा पागन्द्रियन्याविशेषेऽपि स्थगिन्द्रियं मामममयमामयति लोशनं स्यन्यधेत्यभ्युपगमः किन युना। मापि मान्तरपति गुमादिसंयुनान्मप्रदेश धनमान र प्रन्युपमर्पणतुः, फिरगनुपरणे। तपादि-यया पायुः स्वयं देयर प्रत्युपमर्पणवान अम्रेणं नवादीनां प्रयुग्मनहेगुना पपरमपि तं प्रायुपसर्पन सायमन्ये प्रत्युरमर्पणहेतुः, ना मत्याएर मुगादेरपि तप. मायुपसर्पणागिरोधा घमाएपरिकलानम् ! नपाम्पुरगमे यू पर यदन प्रारमनिता देशातगुणाएं प्रयुपमर्पणारति हेतुनेकान्ति: अरऐनया वायुपप गEिR गुणाय पापते। दापयधापगपरम्मोत्यशायाम निमिनार नदुत्पनी ममतम्, गाय. परमित्यनपस्था, अन्यथा काऽपि पिमराणनिमितपरिकलनया! घरातरान्स न्युएसपंगे सप्परन्तर प्रत्युपसत्पदरारान्, गपिनमानियनपस्या। अप तस्वमेध तत् तेषान प्रायुपारपणे हेतु, दपि न युनमा भन्दा प्रपमाहापानाने तपादर्शनान्, गदि प्रयमो प्रासादियुगाम्मादेशम्य एप सानिधानांगादि देषद मुखं प्रति प्रापपन ८'अम्तगतप्राय फस्यमा । यपिseries মধা ঘনম। যথারিখি, মা মথাবধানন্ত্র দিবসেশন সহয়াে হয় নানযুপময়য হয় (ব) সাংবাসি शिपातुः पपेपम्, र चित्रता पदमाणां शियानुगुणानां माधयमयुगामंयुतदाधिकार मुम्पेन मेप्पो विधिनिया भावानाम् । पारिति मोलरम्, अपETERNET. দল যায়গিলােফাবিয়সল - অংঘ মল আঘযুবন্ধিহায়েনা। দ্বিতগান হলে লালে দ্বিধায়খানা, মা মর্থিখৈ, বিমাঘীনা = पप्पपापंतपय मात्रयाच गपातिथिमहामा देगादिशदिनापिकनिदितिम्पायरतापिपरrt যিনি কালী বলাই লাগাম সে প্রেম । সবিতা। কমি দুবাই খসি বিশ্ব'rশ বাজাতে। १.सनि. १R OR HER१.३.३४-म ......-1 परो- PARTreer arrartheatr"t: पर.....! " प्रासादियत् प्रयासधर्मणाऽऽयः पश्यादयः, किं वा रुयादियदखनादिमधर्मणा ससंयुकेन ट्रायेण रति संदिग्धं 'गुणयान्त्येतत् साधनम् । सपरिस्पन्दान्मप्रदेशमन्नरेण प्रामाधाकर्षण- ज्यामामनि गत्र सदा गमिहिन समयनि दानो 'देय प्रयुपमान्तः'ति घर्मिविशेषणम, "परमारशः' इति नयधर्मः, 'यस प्रत्युपगमस्या' इति साधमयमं, परम्य पद. . १४४ प्रगगे फाहे- एनेन यदुतं पण-"अमेगायकानालयमामलोहने मुवामो : सरिमयानुः" [ ] इनि निरनम्, गयंत्र कार्यकारणमाम्य न्यायम्य महटमेय कारणं स्यात्, यस शरीर गुसं दुम चोपादयति तदरमेय वयं हेतुरिति = म्मकायययप्रियासंयोगादयः। अपि च, तदरम्य कयं तपेतुन्यम् । तन्य मावे ना ५यादिति चेत्, किं पुनरयस्कान्तमसमयमाय एवं तक्रिया या येनगं तर कारणत्या ततो न धानुमारेण तपम्यस्यबाटस तं प्रति तस्त्रियानुनम् । मयन- इनोरनैकान्तिकन्यम्। अथ सर्वत्रादृष्टस्य पृत्तिस्तहि सदयक्रियाऽनुन्यम् । यदृष्टं यद् द्रव्यमुत्पादयति तः क्रियामुपरचयतीत्यम्युपगमे शरीरारम्मकेषु परमाणुए तनः क्रिया न भ्यादिन्युतम् । नवर १० मप्यस्य सिद्धमिति "भियानुगुणत्या प्रत्यासिहा हेतुः। अथ 'अदृष्टं गुगः, प्रनिरिः द्रव्य-कर्ममा सति सत्तासंयन्धियात, रूपादियन्' न च प्रतिषिध्यमानद्रव्यत्यमसिद्धम् । तथा सत्तासंबन्धित्यस्य चेति । यदपि तहणन्यसायनमुक्तम् देवदत्तं प्रन्युपसर्पन्तः पश्चादयो दे न द्रव्यमदृष्टम्, एकद्रव्यत्यान्, रूपादिवत्' इति, असदनन् एकद्रव्यवसानिधनाप्रतिपादन विशेषगुणाकृष्टाः, तं प्रत्युपसर्पणवत्यान, प्रासादियन्' इति, तदध्ययुनम्; यतो यथा नति १५गुणेन प्रयत्नाप्येन समाष्टास्न प्रत्युपमपन्तो ग्रासादयः समुपलभ्यन्ते तथा नयनाउनादि विशेषेणापि समारष्टाः ध्यादयस्तं प्रन्युपसर्पन्तः समुपलम्पन्न एव, ततः किं प्रयत्नमध परेणापि-नयनाअनादिसधर्मणा विधागाचचारणादयः समाष्टा देवदत्तं प्रन्युपमर्प केनचिदारष्टाः पश्यादया, उन नयनाअनादिमधर्मणा' इति संदेह, रायते हेवमनुमानमारचा तं प्रयुपसर्पणवस्यात्, स्यादिवन्' । २ प्रयत्नसधर्मणो गुणस्यामावेऽध्यानादेरपि तद्दष्टमवदीयहतोरनकान्तिकत्वम् । ने चात्रानुमीयमान अथ तदमावेऽपि प्रयनादपि तद्दष्टरनेकान्तिकब प्रयतसधर्मणो हेतोः सद्भागव्यमिचारः, अन्यत्राध्यानादिसधर्मणोऽनुमीयमानश समावेना भिचारप्रसङ्गात् । तत्र प्रयत्नसामर्थ्यादस्य वैफल्येऽन्यत्राप्यसनादिसामा वैफल्यं समान अथाशनादरेय तहेतुत्वे सर्पस्य तस्यायासक्तिन चालनादी सत्यप्यविशिष्टे तक सर्यान् प्रति सदागमनम्, ततोऽवसीयते तदविशेषेऽपि यकत्यान तन्नति तदपि कारणम् ना, २५नादिमागम्' इति । तदेतत् प्रयतकारणेऽपि समानम् न हि सर्व प्रयत्नयन्तं प्रति प्रासा थविशेषात् । ततः प्रयनवदानादेरपि तं प्रति तदाकर्षणहेतुन्यात् कथं न संदेहः ? अवनारे २० ताकारण न पीमितानन्य सीमा मदानावस्या कारणान्यम्, नतः संदेह एप फारणयामिपरिहारेणान्यकारणम्यकपने भयनोऽनयस्याक्ति अथानाटिकमदृष्टमहकारिया देनोः प्रयलम्यापि देपदसविशेषगुणम्य परं प्रत्यासित्वात् साम्यविफलता चार प्रान्तम् । पथ 'यद् देवदत्तं प्रयुपमपंति' ल्युत तर का पुनरसी देवदत्तरादयाच्या ' यदि शरीरम् गदा दारीरं मन्युपमर्पणान् शरीगुणारा पवादय हयामाविशेषगुणाचे राज्ये शरीरगणाः ध्या गायनान् मिस नः शयामा, ममाप्यमापदादेश-कालायां सदाऽमि संकया न नि कम्यचिदुषणम् , मान्य प्रायन्यशोषणदर्शनात् अन्याय प्रत्ययकालम, थार प्रयाशनिपारामजान भयं निगव्यापिया 'चिनिमेय। *पसर्गरम्युनआगमा मातम्यापि मियायापियन प्रभागनियार यसागर., 4. जाई...1.1.1 ५१ १.५.11. विधि-...। • 7.1.4.11 कापिभिगि-7...। -शि- আগাথা। पात्। महि घटयुनमाया मेपोदी मनिहितम् । माहारगुना मामांशो देवदाना, सपाल्पनिक, पारमार्थिको घा! कारपनिकये 'कारपनिकामप्रदेशगुणासट पायादयः, सामना रमप्रदेश प्रायुपमर्पणपापा' इति महणालामपि कानिकत्यं माधपेन् । तया न गोगमा तहमानः प्रेत्यभायोऽपि म पारमार्थिकः म्यारम हि कविगण पायक पासका या दाहादिकं पारमार्थिक एम् । पारमार्थिकावेदान्ममता सेऽपि यदि मनोऽमिप्रास्तामय में ५ इति न पूर्णानदोपरिहार मिप्राधेम् नदि सद्विगुणाराः पश्याइप ति सेगमेवामन्यम राक्तिरियन्यात्मपरिकल्पना मां ने वन टीपानरपतिमिमुंगादिमिः संयोग इति 'भाएं स्याभयसंयुनेऽन्यत्र कियाईनु' इति ध्याहतम् । संयोगे पा आन्मपा पनिगो ज्याधान: अय देवामप्यपरे शरीरसंयुनाः प्रदेशाः देयदत्तरादपाया, नाप्यनन्तपूपणमनयावाकारि । अधा. स्मानमन्तरेण कम्य ते प्रदेश पुरिति नन्देयार माग्मेपरयुपगमनीयम् ! मन्यनगरभूगाये १० मात्मनः कयं तस्य है' इनि पपदेश ! अप तमा धर्ननात् नया प्यपदेशा, न सदेवत्। तथाऽभ्युपगमेऽययविपरभाविदूपणावकाशात् । यथा पसेणं सपणत्यं तथा प्रतिपादिनम् प्रतिपादयिप्यते घेत्याला तापम् । तप परस्य देपदमाशयाच्यः फधिदस्ति पं प्रत्युपसर्पयतः पश्यादयः स्वमियानोर्गुणन्यं साधयेयुः। भनो नेतदपि साधनमात्मनो विभुल्यममापकम् । पदापि सपंगत आमा, सयंत्रोपलभ्यमानगुणत्या, आकाशपम्' इति साधनम्, तदप्य १५ पाय; पतो यदि 'स्वशरीरे सयंत्रोपसम्यमानगुमायाम्' इति हेतुलया सति सय ततस्तस्य सगनत्यसिद्धपिरलो हेन्यामासः । अध स्वशरीरयन् परमारे अन्यत्र पोपलभ्यमानगुमन्य हेतु- स्तदाऽसिरः सपोपलम्मामावान् न हि घुमादपालद्गुणास्तथोपलभ्यन्ते, अन्यथा ममर्पक्षता. मसता अपनगरे उपलम्या युद्धपादयो नगरान्तरेऽप्युपलभ्यन्ते, मनुष्यजन्मपजन्मान्तरेऽपीति. कुपं न सत्रोपलभ्यमानगुणन्यम् ! ना पायोरपि स्पर्शविशेषगुण एकत्रकदोपलग्धोऽन्यत्रान्य.२० दोपलभ्यमानलसापि सर्पगतत्य प्रसाधयेत्, अन्यथा मेनेय हेनोव्यभिचारः । अथ तांस्तान दशान प्रमेण गतस तस्य तग उपलभ्यते, भात्मनोऽपि राधेय तहुणस्योपलम्भः रति समान पदयामः । न च तहत् तस्यापि सक्रियत्ययसतरयुक्तमेयं कपनमिति वाच्यम्, एन्यात् । अथ लोटश सतो मूर्तत्यप्रसारस्तम्य दोषः । ननु फेयं मूर्तिः१ असएंगतद्रप्यपरिमाणं सेति घेत नायं दोषः, असर्पगतारमपादिनोऽभीटत्यात् । रूप-रस-गन्ध-स्पर्शवयं सेति घे, न२१ ताप्ती मूर्तिमा मनः सक्रियत्यं साधयति, व्याप्त्यमायात्। रुपादिमन्मूर्त्यमावे सक्रियत्यात् । 'यो यः सक्रियः म रूपादिमन्मूर्तिमान, यथा रस, तथाचा.मा, तस्माद् रूपादिमन्मूर्तिमान' इति कयं न प्याशिसंमयः ! अगदेतत्। मनमाऽपि व्यभिचारात् । न च तस्यापि पक्षीकर- पम्, 'कादिविशेषगुणानधिकरण सद् मनोऽर्ष प्रकाशयति, शरीरापर्थान्तरत्ये सति सर्पर जानकारजन्या, यात्मयत्' इत्यनुमानविरोधामहात् । न च सक्रियत्यं रूपादिमन्मूर्त्य ३० मान विष्द पतः तनस्ताग्निपर्तमानमात्मनि तथाविधां मूर्ति साधयेत् । न च तथाविधमू- निरहिनेऽम्यादी तददर्शनाम् सिया विरोधा, एकशाखामभवत्यस्याप्यन्यत्र पक्षेऽदर्शगा वि. रोसिविप्रमत्तः । पक्ष एवं प्यभिचारदर्शनान् सा तत्र नेति चेत्, ना सक्रियरधयापि तथा व्यांगधारा समानः, पसारन एपाल्मनि रूपादिमन्भूतिरहिते गदर्शनात् । अनेनेव तत्साधना न अभिचार इत्येषनाग्वामभयायानुमानेऽपि समानम् । प्रत्यायाधितकर्मनिर्देशाग-३५ म्तायुकन्धेन कालात्ययापदिष्टत्यमुभयत्र तुल्यम् । सा सक्रियत्यमात्मनो रूपादिमन्मूर्तित्वं साधय- तीति व्यवस्थितम् । भय समियत्ये तशानिरस्त्यम् । तपाहि-'यत् सक्रियं तद् अनिस्यम् , यथा लोहादि, तथा घामा, तस्मादनित्यः' इति, एलपि न सम्यग् परमाणुभिरनेकान्तिकन्यास्। कशिदनित्यन्यस्य- १ १४४ पं .। २ पृ.१४२५०१५। ३.पू. पं. २।४ पृ. १.१५.१ ॥ ५-भावेऽपि न भी, मा०। ६-तः तनिय-आ०, २०, ६० 1 रहिनाम्य-आ०, पि., हा०, कांक, भ. -स्पधा प-मो०, भाक-याए-2 -पक्तिम-या, या विना। + १०.१७ शत प्रथमे काण्डे- एवात् सिद्धसाधनं च। पर्याप्मनाऽनित्यत्यय लोशदावत्यसिद्धग्यात् माध्यमिकलता रवन्नन्न। सन सर्वनोपलभ्यमानगुणल्यमान्मनः सिद्धम् । अपरे सपत्रोपलग्यमानगुणन्यमान्मनोऽतोऽनुमानात् माधयन्नि-'देवदत्तोपकरणम्नानि मंणि-मुक्ताफलादीनि दीपान्तरसंमूतानि देवदत्तगुणतानि, कार्यन्ये मति देवदत्तोपशरकत्वान् । ५शकटादिषत् । न च तदेशेऽसन्निहिता एव तहणालान् म्युलादयितुं समयाः, न हि पटरनेट सन्निधानयन्तलन्तु-तुरि-कृषिन्दादयः पटमुलादयितुं क्षमा आन्मगुणानां व नगमभियान न तहणिसन्निधिमन्तरेण संमवि, अगुणयमाता, ततस्तस्यापि नद्देशन्यम्"[. अमदेनंत तत्कार्यत्वेऽपि तेषां न 'अवश्यतया कार्यदेशसग्निधिमद निमिनकारणम् इति नियम उपलन्धि- गोचरः, अन्यदेशस्थापि ध्यानादेरन्यस्थित बिपायपनयनकार्यकत्यस्योपलग्निविषयत्यान् । तना. १० तोऽपि सर्वत्रोपलभ्यमानगुणत्यसिद्धिरित्यसिद्धो देतुः। एतेन 'विभुत्वाद् महानाफाश तथा चात्मा' इति निरस्तम्, विमुत्यस्यात्मन्यमिद्धेः। नथाहि- समूत्तयुगपत्संयोगो विभुन्यम् । न च सर्पत्तिमद्युिगपसंयोगस्तस्य सिद्धः । अयेकदेशवृत्ति- विशेषगुणाधारत्वात् तस्य सर्वमूर्युगपरसंयोग आकाशस्येव सिद्धा, असदेतत् एकदेशवृत्ति विशेषगुणाधिष्ठानत्वस्य साधनस्य समूर्तिमसंयोगाधारतस्य च साध्यस्साकाशेऽप्यसिद्धेस्मरः १५विकलो दृष्टान्तः। न चात्मदृष्टान्तादाकाशे साध्य-साधनोमयधर्मसम्बन्धित्यं सिद्धमिति शक्यं घवम्, इतरेतराभयदोपप्रसङ्गात् । यदपि 'विभुरात्मा, अणुपरिमाणानाधिकरणाने सति नित्यद्रव्यत्यात्, यद् यद् अणुपरिमाणा- नधिकरणत्वे सति नित्यद्रव्यं तत् तद् विमु, यथाऽऽकाशम्, तथा चात्मा, तस्माद् विमुः इति, तदप्यसारम् तन्नित्यत्वासिद्धदेतोरसिद्धत्वात्, अणुपरिमाणाधिकरणस्वस्य च विशेषणस्यात्मनो २० द्रव्यत्वासिद्धरसिद्धिः, तदसिद्धिश्च इतरेतराश्रयदोपप्रसक्तेः । तथाहि-अणुपरिमाणान्यगुणम्य गुणात्वे सिद्धेऽनाधारस्य तस्यासम्भवादात्मनो गुणवत्वेन द्रव्यत्वसिद्धिः, तत्सिद्धौ च तदाश्रितत्वेनाशु- परिमाणात्यगुणस्य गुणत्वसिद्धिरिति व्यक्तमितरेतराश्रयत्वम् । न चाकाशस्याप्यणुपरिमाणानधि- करणत्वे सति नित्यद्रव्यत्वं विभुत्वं च सिद्धमिति साध्य-साधनविकलो दृष्टान्तः । न चात्मदृष्टान्त. यलात् तस्य तदुभयधर्मयोगित्वं सिद्धमिति घई युक्तम्, अत्रापोतरेतराभयदोषप्रसङ्गस्य २५व्यक्तत्वात् । अपि च, अशुपरिमाणानाधिकरणत्वे सति नित्यद्रव्यत्वं च भविष्यत्यविमुत्य च, विपक्ष इतोधिप्रमाणासरन ततो व्यावृत्त्यसिद्धः सन्दिग्धानकान्तिकथ हेतुः । न च विपक्षे हेनोरदर्शनं पायक प्रमाणम् , सर्वाऽऽत्मसम्बन्धिनस्तस्यासिद्धानकान्तिकत्वप्रतिपादनात् । अपि च, आत्मनः स्वदेहमात्रव्यापकत्वेन मुख-दुःखादिपर्यायाफ्रान्तस्य स्वसंवेदनाध्यक्ष- सिद्धत्वात् तद्विभुत्वसाधकस्य हेतोरध्यक्षवाधितपक्षानन्तरप्रयुक्तत्वेन फालात्ययापदिष्टन्यम् । ३० अन्यस्य च 'अहम्' इत्यध्यक्षसिखस्य प्रमाणाविषयत्वेनाऽसत्वादाथयासिद्धो हेतुरिति । अनया दिशाऽन्येऽपि तद्विभुत्वसाधनायोपन्यस्थमाना हेतवो निराकर्त्तव्याः, अस निराकरणप्रकारस सषु तत्साधकहेतुपु समानत्यात् । तमात्मनः कुतधिद्विभुस्वसिद्धिः । अयापि सात् यथासाकं तद्विभुरपसाधक प्रमाणं न सम्भवति तथा भयतामपि तदपिमुत्त- साधकममाणाभाष इति नानुपममुसस्थानोपगतिस्तेषां सिद्धेति तदवस्थं चोद्यम्। न हि परपक्ष ३५दोपोगायनमात्रतः स्यपक्षाः सिद्धिमुपगच्छन्ति अन्यत्र स्वाक्षसाधकत्यलक्षणपरप्रयुन हेतु विरुद्ध तोहायनात्, न चासो मयता प्रदर्शितति, न सम्यगेतत् तदमायासिद्धः। तथाहि-'देवदत्तारमा देपदचारीरमायापका, तय व्याप्त्योपलभ्यमानगुणस्यात्, यो यर यात्योपलभ्यमानगुणः म तन्मात्रध्यापका, यथा देवदत्तस्य गृहे पय व्यास्योपलभ्यमानभास्वरमादिगुणः प्रदीपः, देयतारीर एष ध्यायोपलम्यमानगुणस्तदारमा' इति । तदात्मनो दि मानादयो गुणास्ते च १० नदेह पर ध्यास्योपलभ्यन्ते, न परदेदे, गाप्यन्तराले। अत्र चितोरसिद्धनामुन्नाययन्तः "शरीरान्तरेऽपि तदशनामध्ययिनि तहणा उपलभ्यन्ते हस्पमिदयति । तपाहि- देयंदसागनाई देयदत्तगुणपूर्वकम्, कार्यरमे सति सदुपकारस्थान -तन्फाप-बा...शिना । २-रण्यपस्थित-बा-या। . .

५ दयत् । कार्यदेगे भाग्यपरिमायाः घ सलिहितं कारणं तमनने चामियतेऽन्यथाऽतिमसङ्गादिति ताना भावदेश तत्कारपतहामितिधा, नदन्तराले घ प्रतीयग्ने । नयादि अनेकार्थग्यलनम्, पनाह पपनं तहणपूर्वकम्, कार्याधे सति तदुपकारफत्यान, परसादिवत् । पत्र पता प्रतापप्पगुमीयत इति 'स्वदेव एष देवदशात्मा' इति प्रतिमा अनुमानवाधिता । उनुमानवाधिनकर्मनिदेशानन्तरप्रयुक्त वेन कालाम्ययापदिणे हेतुः" । ननु क्षेत्र देवपत्ताग्मगुणा ये ताना तदन्तराले च प्रतीयन्ते। यदि मान-दर्शन-मुग्न- पसभापा:-"मपनिनो गुणाः" । इति चयनात्-इति पक्षा, सन युका जान-दर्शन-सुपानि यदनमणि मतदानामजन्मनि मानियमाणानि प्रतीयन्ने नापि राणामाप मेरो प्रतीतिगोरराणि । पौर्य तु शनिः मियानुमेपा, साऽपि तदेव पवानुमायते, नत्रय महिलभूनपरिस्पानदर्शनात् । तम्मा तदानादेनियसी देवदासम्म माया दुदिना सान्. ततस्तामानादेलदेव एय सरकार्यगनधिमुग्यम्य प्रती। प्रत्यक्षतः समाधिनामनिसानन्तर. प्रयुनायेग कालापापदिएः कार्पर गति मदुपकारकायात्' पनि हेनुः । अध धर्माश्चमी तदानादिका निमिनं तणा, तदयुतमा न धर्माची दामनो गुणी, अपेतनम्यान, सदादिषन् । ग गुग्पादिगा यभिचार, नरेनोग्पना-अनि मा. অবসবাসর আগা মিমসাইনঘাষ ষে পথনামাও पर तमामगोऽनुभयानु, भन्यथा मुग्यारे। म्ययमननुभयात् अनयत्वादोरमारात् अन्यमानेगा. प्यतुमपे गुपग परलोकमरयतामसनिः । प्रसाधिन पेनन् माद। ग धागिमगा अपेकनरयान्' इति देनोः ! तपादि-अननी ती. भागविदिनारा चुम्मपन् । म घुमाउस प्यमिधारा, Ren गारंवेदगाणाधना-आमचामिग बुद्धिा भई महणाामापात्, पन् स्वाहणारम नगपति ग त अर्थप्रणाम, पपा . म्यतिरेपी हेतुन স ম থমঘমায়া বীর নল এ সেলােদাে ** पगाव्यम्, नयो रूपमादणारकाम्ये गुण्यादाशिए पियादामापसमा । अनि पानी अनुमानो. पन्यामान्यधानुपयोरता घलौकिक-पक्षियो प्रसार कम पी पिदम् । मचाविकारपोधगिपरयात् एयप्रणामकान्येऽपि तयापिपाशविकासादिवा९ि५ লামিন। সখা-গিয়াবিথই এ জায়গা নিধ দ্ধিসুনিধি বিশ্বব্যথা। ল অখিল বিশ্ববাসী সেল एनाप समयपहार नि, परतापमये कार्यमगागा तर मानी मदनग्न दृष्टि सन्यास एप गानानि नलगाना गा! अध योरपनायेऽपि तडामगुणावे को विरोधः! अपना पेला परे पेनमपतवारमा परमात्यात भरपपादयोगान् गाषिन् । पापोर भाषादामयासिस, मामतातयो मि। तालमा सारा सामा निमातगर्भाधाममा मानिमिना, अपने कति तrans, wrest धामप्रपेशवन् , योगापार पविशेषो धर्मादिति । मशिन पूर्णारिलायन रानागाभारा समशिनम मनिट मारी अनिलमिnि, RRE. Time पापransar अनुमाना लिपिनियमित ARE গণিফেটেবিগলিসামলাতে ...nic.to: Antry-r.... 1.रगुती । - अपमे फाण्डे- कर्स पूर्यफरवेन माक् प्रसाधितत्वात् नात्र प्रयोगे घ्यायसिसिः । अत पप स्तनादिप्रसामिला सिद्धिमासादयन् सलमागानं गमयति तदापि सरणम्, तप मुगादिमाघनपदार्यदर्शनम् । 'कारणश्यतिरेकेण कार्योत्पत्ती सम्म निनुकन्यप्रसक्तिः' इति अब विषयाधर प्रमाणं व्याति निश्वायर्फ प्रदर्शितम् । अपूर्वप्राणिप्रादुर्भावे च सयोऽप्ययं व्यवहारः प्रनिमाणिप्रसिद्धः उमादेन, ५तजन्मनि मुखसाधनदर्शनादेरमायास्। न हि मातुरदर पय स्तनादेः मुखसाधनत्वेन दर्शन यतः प्रत्यप्रजातस्य तत्र सरणादिव्यपदारः सम्भवेदिति पूर्वशरीरसम्बन्धोऽप्यान्मनः सिद्धः। नं च मध्यावस्थायां सुखसाधनदर्शनादिममेणोपजायमानोऽपि प्रवृत्यन्तो व्यवहारो जन्मा. दायन्यथा कल्पयितुं शश्या विजातीयादपि गोमयादेः कारणाच्छादकाः कार्यस्योत्पत्ति- दर्शनादिति वक्तुं शक्यम्, जलपाननिमित्ताइविच्छेदादावायनलनिमित्चत्वसम्भावनया तर्थिनः ३०पायकादी प्रवृत्तिप्रसन्नात् सर्घव्यवहारोच्छेदमसक्तेः। अथ 'देहिनो देहाद् देहान्तरानुप्रवेशस्तदमिलापपूर्णकः, गृहाद् गृहान्तरानुप्रवेशमन्' इत्य तोऽन्यथासिद्धो हेतुरिति न द्रव्यविशेष साधयति । तदुक्तं सांगतः- "दुःखे विपर्यासमतिस्तृप्या पाऽवयकारणम् । जन्मिनो यस्य ते न स्तो न स जन्माधिगच्छति" [ ५५ति, असदेतत्। इह जन्मनि प्राणिनां तदमिलापस्य परलोकेऽभावान ततः स ति युक्तम् । नापि मनुष्यजन्मा हीनशुन्यादिगर्मसम्मयमभिलपति यतला तत्सम्भवः स्यात् । तदेवं धर्माधर्मयो- स्तदात्मगुणत्यनिषेधात् तनिषेधानुमानयाधितमेतत् 'पावकायलनादि देवदत्तगुणका- रितम्' इति । यत् पुनरुतमें 'गुणपद् गुणी अप्यनुमानतस्तदेशेऽस्तीत्यनुमानवाधितस्वदेहमात्रयापकात्म- २० कर्मनिर्देशानन्तरप्रयुकत्वेनाद्यो हेतुः कालात्ययापदिएः' इति, तदपि निरस्तम्। तत्र तत्सद्भावा- सिद्धः । यथान्यत् 'कार्यत्वे सति तदुपकारकरवात्' इति, वत्र किं तदुपपूर्वकल्याभावेऽपि तदुपकारकत्वं दृष्टं येन 'कार्यत्वे सति' इति विशेपणभुपादीयेत सति सम्म व्यभिचारे च विशेषणो. पादानस्यार्थवत्त्वात् ! कालेश्वरादौ दृष्टमिति चेत्, न; कालेश्वरादिकमतहुणपूर्वकमपि यदि तदुपकारकम्, कार्यमपि किञ्चिदन्यपूर्वकं तदुपकारक स्यादिति सन्दिग्धविपशव्यावृत्तिकाद- २५नैकान्तिको हेतुः। सर्पशवाभावसाघने वागादियनिर्विशेषणस्यैव तस्यामिधाने को दोपः। व्यभिचार कालेश्वरादिनेति चेत्, न; नित्यैकस्वभावात् कस्यचिदुपकाराभावात् । अपि च, शत्रुशरीरमञ्चसामावस्तद्विपक्षस्योपकारको भवति सोऽपि तणनिमित्तः स्यात् । तदम्युपगमे धा वत्र कार्थत्यासम्भवेन सविशेषणस्य हेतोरवर्तनाद् भागासिद्धो हेतुः । अतहणनिमित्तत्त्रे तस्यान्य- दप्यतहणपूर्वकं तदुपकारकं तदेव स्यादिति न तहसिद्धिः। ३० यस् पुनः 'प्रासादिषत् ति निदर्शनम्, तत्र यदि तदात्मगुणो धर्मादिहेतुः, साध्यवत्प्रसङ्गः । प्रयतधेत, न, वत्स्वरूपासिद्धेः-शरीराद्यययवमविशनामात्मप्रदेशानां परिस्पन्दस्य चलन- लक्षणफ्रियारूपत्यान्न गुणत्वम्, तत्वे वा गमनादेरपि तत्त्वात्न कर्मपदार्थसद्धायः कचिदपीति न युक्त 'मियाय पति द्रव्यलक्षणम् । निष्क्रियस्यात्मनो न स इति चेत्, कुतस्तस्य निष्क्रियत्वम् । अमत्यादिति चेत्, प्रत्यक्षनिराकृतमेतत्-प्रत्यक्षेण हि देशदेशान्तरं गच्छन्तमारमानमन्मपति ३५सोक तथा च व्यवहार:-अहमद्य योजनमा गत'नच मनः शरीरं घा तयवहारविषयः, • तस्यादप्रत्ययायेचस्यात् । तदेवं परस्य साध्यविकलं निदर्शनामिति स्थितम् । तेन यदुक्तम् 'यसात् तदात्मनो गुणा अपि दूरदेशमापिनि तदानाने अन्तराले योपलभ्यन्ते तसात् सिदं तस्य सयंत्रोपलभ्यमानगुणत्वम्, अतः 'सर्यगत आत्मा, सत्रोपल. म्यमानगुणात्यात् आकारापन्' इत्यनुमानयाधिता तदात्मस्यशरीरमानप्रतिज्ञा' इति, वन्निर ४० नम्। सर्पको सपंगतामप्रसाधकहेतूनां पूर्वमेर निरस्तन्यात् । अतो न स्वदेहमात्रम्यापारम: असाधकदेतोरसिदिः । नाप्यनुमानेन तत्पक्षयाधा। मघ तदेहव्यापकत्वेनैवोपलम्यमानगुणोऽपि 12... ११ । ३न सुम-मा., मा.11.10५. १३।४ पृ. १४४६. १॥ ५१.१४॥ (पृ.१४.11 पृ. १४.पं. १ “पृ.१. पं.१.९पृ.१७५.४। .

भान्मपरिमा मा गगो निगदेशवासियो मात् सविरोधात गन्दिपरिणायाधियाइनेका. कोः इति पुणम्। पारवादापपि सामाषमा प्रतिनियादेशसमायगदारोगहे. सादि-पद पया प्रतिमाति तत् तव राज्यपालपमरति, यथा प्रतिनिया देश SEISEरमा प्रतिभासमानो घसादिकोया, शन्य प्रतिमासमानियत देश कालाssnा. रपपिरोषाणोऽपि पायुः सर्वगत लामघात्र मापसापा, घरेण सहा परोयोपणना। ५ पदिक पदेदेकदेशरियता, कसं तर सर्पन एवादिगुणोपराधिः । इतरथा पर्यत्री- বষমাখাবি খাকৈখনাে মায়া লা। এ ঘটল ময়মকানু বয় নখ सोपसन्धिः, युगपत् तत्र सर्वत्र खारेजयोफ्लम्मात् । न पापोंगपयामिमाना, अन्यत्रापि तपासतार दिपक पदादिप्येकापरपति: मापुरतेसुंगपत् सयपपप- प्पु प्रतीयते इति । अत पर सीगतोऽपि तर्फ निसानं करपयधिरता, मत्यपयपमोगरा.१० दिसपने सन्तानान्तरयत् पारसमसामा अनुस्यूतकमतीतिपिलो रात्र शरीरे मम मुषा रति । अप युगपनापिभिरेकारीरपरिभिरनेकनिरंशपिकाससंवेदनोपरामर्शविप मनादयमदोष, अमदेता। अनेकोपावानस परामर्श पिकसम्यकरपसगधे पापांकाभिमरीक- रोल्पपदेशभागनेकपरमाणुगदानानेकविरंगनभाषेऽपि तदिकपसम्भपात् । ततो यदुक्तं धर्मफीसिना तंति "अनेकपरमाणाानमने पेर विज्ञानं सन्तानास्तरयकपरामश-१५ या" ति, सत्तन्यम मापितं स्यात् । या 'सापपर्यभारीरम् प्रत्ययययमनुभविस्तारमा सापयः स्यात्, तथा, पटपत समान- जातीयारपसाप त बिनासर्याय स्वाद पति, सदपि म सम्या घटादिना व्यभिचारात्- घरादिदि सायरपोऽपि न तनुपत् प्राकमसिमसमानजातीयकपालसंयोगपूर्षका, मृरिपकार अपममेष स्थाययापारमनः मादुर्भयादिति निरूपविश्यमाणपात् । अपि प, यदि तवामना, कपचिदिना प्रतिपादयितुमिः समानातीपाययवारप्रयात् तदा सिमसाधनम्, तदमि. असंसायंपस्यारिगारोन तपतपा तस्यापि नटत्यात् । अप सामना सर्पया नाश, स घरादाप- प्पसिराति साग्यविकटो शन्तःयदि तदपजोगयालारमा भागेकान्तेनाऽसंस्तपाइपयपैरा रम्येस सदा स्तनादी प्रवृत्तिर्न स्त, तमिलाप-प्रत्यभिशान-मरण-दर्शनादेरभायात् । तदार फायपधानां प्रारसता पिपयदर्शनादिकमिति चेत् तादि सेपामेय तददातवेलायां तन्वन्त मेय सत्र प्रवृत्तिास्थानात्मना, सरणापगायात कारणामने तथापि सर्वत्र सास हारपसंयोगिना कामपर संपुज्यते" ति पचनात् न तस्य विश्वानुमया दिकात वाया प्रक्रियामा समायनिरेथेन निषेधात् । सय कारणगुणप्रामेण सत्र नादयो गुणा पर्यम्से, तेऽपि मागसन्त एप जाय एयमपि न किंचित् परिहतम् । एतेन "अपयवेषु किपा, मिपातो विभागा, ततः संयोग हतोऽपि द्रव्याधिनाशा" । ति परस्याकृतं पूर्वमयासे तथा तदिनारो आ सरणाधमापसमाभिरलम् । न चायमेकाला-फटकाश फेयरमाये फुर्तथि भागे विभागः, संयोगपिनास बनाता पुनस्तापपा केपलागतदनन्ता फर्म-संयोगफमेण प्रमाणगोवरधारी। केवल सुपर्णकारच्यापारात् करका केगरीमायं पश्यामा प्रत्यक्षविरोधः । नदि पूर्व विभागः ततः संयोगपिनाशरसि, सानुएलक्षणात -पन्य- बा.। -भिरेपश-मा, मो.। ३-सानामा-मामी-- आ.चिना । म पन्ने प्रमेहामा एवं पाठ:-"ययुगम् मारय परीरम् प्रसवयवमनुप्रति सात् सपाय पटादिषद समानमातीसारयवारभ्यत्वम्, पमानमावीमा चारपानापामवाभिमा বালভি যা ব সাহিয়োনী বিমান বনায় যমুখামেনিধি 4.1 ५-पवियरलता प्रान्तस्य मा ...1 परिपृतम्। बाल, प. মখাশখানাৰ শিমুল-"বাধিকাথা যাসীশালান-খয়স immenारम्भदेषानुस, यो रिभाषा, बिगामा सयोगपिना • १०१ मलेन तमाम मुगमाला सन्मान दिदीको पैसा नाय । ददो नातान्टिमेहेनिसान मावतः मोगरहिवान शनबादिरहिनामा सिदाम्पादित रित सा नम्- 'टागमगोयननुहनुयगया पति [निकाह [यः-स्ती आपतिकविरगोलंदन मापन] पनि अन्तिमबुद्धाविगिगुमोदगिदिट जाला मुक्तिः ति. उदानः जय दयाभूटमुक्ति विवाद प्रमानिने । तयाहि नानासमोरगुल मटोन मुच्छिपने, सन्तानवान, योर मन्नानः स मोल्दिन्छस्ट, सपाटीदार ट्रेक १०चा सन्माना, दलाइन्समुच्छिम्ने इनि । सन्तानविय च दादा हमादितु मार परमनंदपालिदानाय त्मनाननिदि पर्मिन हसालतिस्पन्दना विप पजामादावस्ती अन्टिन्दामासः, कियोस्थाको सामानकोट- परन्नादन शखयापदिन बारं सदा ति पहाबाद मनाइन्। न च निनुदिनारामद्विपमा मन्तानन्दे हेतुच्या पदः सन्दिपडे इट. टन्थ- १५मानर शिवानन्यवच्छेदनेर निन्ददन्वेन सदनन। उ व समकाल नियामाननिवृत्तौ सानप्प गुटिकादी-नच निनामानेना युदरकादमादिना सन्मानस विरोधः सम्वति, सन्तानोटिफिशिटवादापया हि सदभालाइ निम्नानसन्तान नव नियामानात् सन्मानानमन्नानस्ल, उस समायवन दीपल्वाद-नियन च नि उन्मूलवाद् रागाइयो न भवन्ति बारमानारे कासानुनादाद, एमापना व दारूमा २.प्रवृचिदिने, वदनाचे च धनाधनदोरखपति, भारपायांबोरीमा भरत सचिवोच तपोपटत्वज्ञानाव। द्रुतम- "स्पैशांति समिनिसादुले रुपान् । हादतनिसारिमसाइलेटमा नसो. ३७१ अयोपनोगादपि प्रक्ष "नानुनं हीरते कर्म कलोटिसरनि' [ २मोस्ति, व्या च विस्तादादुनपरित्रायें कई मामादन् ! उन्मगार मनुनादरम्यान मपिन्ति-पूर्वनाम्युनोनावाले, बाद, परन् नि तन्नद्रानोमादेव कोरडे, पारधारं कन, ठया चैव कने, दलादुपनोमादेव सोनेइति । ने भरोसा करे पीटरसायनाशत् संसाप्नुच्छेदः, सनाविलासवानलाइम्सान लादिवयुगपशपरतापवानापनल कर्नान्नपेचिदिनचनिसामाननितानुसत्पाद- ३०विघ्टस समान्दपेन्पत्यनुरातः । न च नियामानानाने निवारवासमा मोजानादर तदुपभोग विदा कर्मा समानुपादिदो तदारा वृदः देशोदेशदातुरऔर घाधावर, माननवादारतिद्वारेमावाद मंदिनो मायग्निरोग्यस्त रवि स्वास्यन् न नु साक्षात् । न चैटू पान-टवातिना विराटनमाना इतर तपनोगादिति, मानन करिनारी प्रसिद्धौदाहरजानाशात् । न च निमानानजन्तिसंभारस सामरिमो माया निधनानान्यपि काम न उन्लान्तरमले इत्पम्पुरमवार, अनुवादितास टक्षस कार्यवस्तुनोसपाभित्पन्नम्मत। अप बनागडयोमाधोपतिर्मनिरपेटलिनो नित-नैमिनिकानुन म्यन्! मल. सारपरिहापाठदुरन्- “निन्द-निदिकरय कुलो रिवहन् । मानं न विमटीग्रन्यासन मुशायद पालिटेनर... २१.११.२६.11.1 म.-11- सपना- मा. - ৬ সুবিন্যা। বাল্য নিঃস্বৰ মন না। देवलं काम्स निषिध प्रणितिरेषतः" । } “নিশ্ব-মিষ্টি ভানুয়ারি। স্কা ৰ দুৰ্ষৰ বহু দু-নিহিষী" { } তাঁস যুব বিশ্বাসের নিয়গিষ্টিনন্তনুখ্য ন খান খাসি আম, বিলাল বা থলিনয় দিবাধিটি যানানিশমু। গলাদিম্বিনায় গুলিবঘন্য, যা সদাৱা৷াষা। চায় মাথা ব্যাথা ছুষের ঘন ঝোলকমপ্লব ঘর মাগোল। কাল বিলম্বনা দিয়া লখা থানামত্মবি। স মনঃ নাযিসুনাম্বয়ামাহ খান, প্রল স্বাগতা “প্লিামা আ” {০ , ০ ২ ০ ২}নি। স ও মাস্তায় নাখোয়া দ্বিয়ামামখিগিনীলপিপিল্যবি, যা দেহের সকাশসহােগ সনে খামার যানিলিয়ানবাগ দুৰন, এরাবি সামান্য বাসায় গাঁথানবিদ ন সা ধুম্বয়ম্বন ফলােয়বিদাৰিও না মানি, ম্ব গাঃ মামু- গান গা ক ব মানিবেশ"। { ति, '' निच सुपर প্রণা যোনিয়াৰণ স উন্মায়, যারা অমান্য মা প নিয়মিশনু। হা আনা মা নিয়া যুগ য গ যামামলাবি বিমানি শনি মবিয়ানা ঃ পূর্বমান্নাকাসিদে কী আ ন মণিমানি। মান্য গত সপু লাকি ৪ ম্যাধি সম্যকার গঠি সানাল্পঘিাষালয়া দুনিয়া মনিমালা থামানসম্মমায়ানি। ঔষধ প্রয়াস। কবি সাপিয়াকোন ইমেমালা সুপঃ গনিদ্রা। ময়ায় এ মােনায়েমশষে যুগ। এখন তা প্রায় এলাকা, সালম্বিশান্ত মনুর মােহান্ত 'বাবে বৰ দুৰন না’ সি প্রশ্বাব দিলো । দি, চিল শাসঘাঘাথারমিথিৰ সৰু-সমনিকা- ক খ বিশ্ব-নিশুমান ল ম বিশ্বে অং সানাই বান্ধৰি বিবৃষ্টিনন্দ বিশ্ব স্বায়ত্ববাদবি না শুধু, য় ব্যায়ামনি। বি , এগৰ নন যা বিশ্বাঘা HT ATTRAN गोचरमर परदा मयेन् । प्रप पाइन एदिना नियएण. মগ বাধা সিদ্যপ্তানুন, রাহিলা মনিষা সমুঘলবন খাপ । ৰ যুগৰ খাব, আনস। ম্যােখা লতে নিরাময় কোন ফি ল লল এলি য়ে। স ম ঘাস সিসিম্বল। সখাকে না বা সাথি ) ফল বিশ্লেখিলাে বিনা পু, শাহি নিশাত্মাগণ। এই খােদ্ধা পিয়া মিয়ানমায় শান্ত সাগশাৰী নমিশেল পিন, সিবা মধৰি সিপাখা গাৰু ? - প্লামা বিশ্বাস। পিয়াস সালাম, মহিলা প্রঃ খ প্রাণ পিল খায়। মামলা দ্বি- লা টি শালা, মাৰ নিৰ। ব্যান্ড সাদা শি। ঘ-** A}***} ৭E কেন এ प्रयमे कार- युपगमे तदपहादिगालं न साए । क्यादि प्रतिगन्धविणार तुपकारक एपेनि शान्लेन निरागसंवेदनप्रतियन्धक शरीगदेलहिंसानाभायः। भयानित्यं तत्संबेदनं तदा यस्यायां तमोपरिकारणं यायम्। मप योगनयमांपेक्षा पुग- पान्ताकरणसंयोगोऽसमयापिकारणम्, ना योगजधर्मशायनिग्यतया विनाशे अपेक्षाकारणाना. ५यात् । अयाचं योगजधर्मादुपजातं विमानमपेश्योत्तर विमानं सम्मायोत्तरमिनि मन्नानवम्, तमा प्रमाणामायाम् । तथा च शरीरसम्पन्धानपेक्षं विमानमेवामान्तःकरणर्मयोगस्यापेक्षाकारण- मिति न टम्। न च एपिपरीतं सायमनुभातुम् । आकस्मिकं तु कार्य न भगन्दर । अय मतम्-शरीरादिरहितस्यापि तस्यामयम्शायां योगजधर्मानुग्रहान् गुरासंवेदनमुपचने । तथाहि- मुमुक्षुप्रवृत्तिरिष्याधिगमा १०तेषां शास्त्रीय उपदेश...": :::: "नोमयमनर्थकम्"[ एतचायुक्तम्। प्रमृत्युपदेशयोरम्यपासिद्धत्वात् । भवेत् साध्यसिद्धिर्ययोक्ताईनुद्वयात् योकान्ले- नेप प्रवृत्तेयपदेशस्य चयधिगमार्थत्यं भयेत्, तयोस्त्यन्यथाऽपि दर्शनात् नामिमतमा यसा- धपत्यम् । तथाहि-आतुराणां चिकित्साशास्त्रानुष्ठायिनामनिष्टप्रतिषेधार्थी प्रवृत्तिईश्यते उपदे. १५राध, अतः कपमिष्टप्राप्त्यर्थता प्रवृत्युपदेशयोः किश, इष्टानिष्टयोः साहचर्यमवश्यम्भावि, अनो यदीपाधिगमा प्रवृत्तिलदा यलात् तस्यामयस्थायामनिटसंवेदनमापतति, न हीष्टमनिष्टाननुपर्क कचिदपि विद्यते। तस्मादनिष्टहानार्थायामपि प्रवृत्तानिष्ट हातन्यम्, तयोविवेकहानस्साराश्यन्वान् ! किचा हटयाधच तुल्यः। तथाहि-यथा मुत्ययस्थायामनित्यं सुममतिक्रम्य नित्यमुपेयते प्रमाणशून्यं तद्विपद्धं च तथा शरीरादीन्यपि नित्यसुखभोगसाधनानि घर कल्पितानि, एवं मुक्तस्य नित्यमुखः २० प्रतिपत्तिः साध्वी स्यात् । अथ शरीरादीनां कार्यन्वात् कथ नित्यता प्रमाणबाधितन्याच्छरीरादीनां नित्यत्यमशक्यं साधयितुम् ? नन्वेतत् सुखेऽपि समानम्, दृष्टस्य सुखस्योपजनाऽपायधर्मकस्य सवैकल्यं प्रमाणयाधितत्वात् कथं परिकल्पयितुं शक्यम् । अथ स्यादेष दोषः यदि दृएस्यैव सुसस्य नित्यत्यमसामिरुपेयेत यावता सुटसुखव्यतिरिक्तमात्मधर्मत्वेनामिमतं नित्यं ततश्च कथं विरोधः? असदेतत् तत्र प्रमाणाभाधादित्युतत्वात् । यदप्यनुमानं तत्सिद्धये प्रदर्शितं तदपि प्रवृत्तेरनिष्ट- २५प्रतिषेधार्थत्याकान्तेनामिमतसाध्यसाधकम् । मा भूदनुमानम्, भागमस्तु नित्यसुखसाधास्तस्यामवस्थायां भविष्यति, तथा च पूर्वमुक्तम् "विज्ञानमानन्दं ग्रह" इति, असदेतत् तदागमस्यैतदर्थवासिद्धेः । अयापि कथञ्चिद् नित्यमुख. प्रतिपादकत्वं तस्याभ्युपगम्यते तथाप्यात्यन्तिके संसारदुःसाभावे मुखशब्दो गौणः, न तु नित्य- मुराप्रतिपादकत्वाद् मुख्यः । अथ कथं दुःखामावे सुखशन्द उपेयते ? लोकव्यवहाराद्धि शब्दार ३०सम्बन्धावगमः, सुखशब्दश्च दुःखाभावे लोके अनवगतसम्बन्धः कथमागमे दुःखाभावं प्रतिपादयति ? नैप दोपः; न हि लोके मुख्य पधायें प्रयोगः शब्दानां किन्तु गौगेऽपि । तथाहि-दुःखामावेऽपि सुखशब्दं प्रयुञ्जाना लोका उपलभ्यन्ते; यथा ज्वरादिसन्तप्ता यदा चरादिभिर्विमुक्ता भवन्ति तदाऽमिद्धति 'सुखिनः संवृत्ताः समः' इति । किञ्च, इष्टाधिगमार्थायां च मुमुक्षोः प्रवृत्ती रागनि- पधना तस्य प्रवृत्तियेत्। ततश्च न मोक्षावाप्तिः, लेशानां बन्धहेनुस्वात् । अथ पदेत् यथा सुखरागनियन्धनायां प्रवृत्ती रागस्य बन्धनहेतुत्वाद् मोक्षाभावस्नया दुस्सा भावार्यायामपि, सत्रापि दुःसे तत्साधने धा दोषदर्शनाद द्विपस्तदभावाय प्रवर्तते । यया च रागलेसो पन्धनहेतुलथा देपोऽपील्यविशेषः । यचोतंम् 'दुःसाभाथे मुखशब्दप्रयोगात् समाय एष सुसम्' तयुक्तमः युगपत् सुगन्दु.खयोरभयाम् यथा प्रीमे सन्तापतपस्य कचिच्छीते हदे निममार्थकायस्याः निमो मुखमन्यत्र दुःखम् । अथ मतम्-यत् तदर्थे निमरी तद् दुःखाभारः ४० सुखम् अन्यत्र दुःममिति, तहिं नारकाणां मुसिन्यासह चिन्नरके दुःखानुभवादन्यानरकसम्यन्धि- दुःसाभापाथ । तथा, अनेकेन्द्रियद्वारम्य दुःखस्य केनचिदिन्द्रियेण दुसोत्पादेऽन्येनाजनने सुसिन्ध- -पारी-भा, मा०, मा, बा । या. मा. भ. 1, 4.1, सू. २२ । ३-ससुखमतिपतिरुपे- #.गु.पृ. १५.५.१५५...पु. १५.पं. 11 ७.४.पं.११ . मुनिरासरूपवाद प्रमा, अपि ध, अखिममापि पिशिविषयोपभोगात सुरई सत्र कथं समायः सुखम् । पत्रापि दुःखसंवेदनपूर्वयमा भुरो भोजनप्राप्ती हप्तस्य सद्विनियुत्तेःतायन-पानयोविशेषात् गुख. विशेगेन भन, रयते च लौकिकानां तदर्पमादिपिरोपादानम्। अन्यथा येन पेनचि भल. माण पशुगनित्ती नाप-पानविशेष लौकिका उपाइदीरन् । मुगस्य व भावाल्यात् साति सापत्वे समाधनविशेगे युज्यते, दुःसाभावस तु सर्योपाख्याविरहलक्षणत्वात् कि साधनविशेषेण ।.५ पेप्येयमुपागमन "यदाऽपि पूर्ण दुगं नास्ति तदाप्यमिलाएर दुःखस्यभाषत्वान् तभियईपा- समारं मुरगम्" तेऽपि न सम्यक् प्रतिपमा यनोऽनभिलापस्य विषयविशेषसविसी न सुसिता म्याद, दृश्यते नस्यामप्ययस्थायां रमणीयविषयसम्पर्फे हादोत्पत्तिः । तदनन् स्यात् ययामिलापः स पय विषयोपभोगेन सुखी नान्यः, तदभिलाप निवृत्यैव विषयाः पुरायिनारोऽन्यथा यदेकस्य सुपसाधनं तदविशेषेण सर्वेषां स्यात् । यदा तु कामनिवृत्या सुसित्यं० तदा पम्यैवामिला यत्र विषये स पय तस्य सुमसाधनं नान्यः, अतच यदुक्तम् 'अकामस्यापि चिद्धिपयोपभोगे सुपित्य नाय कामाख्यदुःखानिवृतिरेय सुखम् तदयुक्तम् तत्राकामस्यापि विशिष्टविपयोपभोगात् कामाभिग्यतो तरिवृत्तेरेप सुखत्यादिति । पनदययुकाम। यतो नापश्यं विषयोपभोगोऽमिलापनियईणः । यथोकम्- "न जानु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । विरा मावस्य भूप एवामिवर्द्धने" [महामा० आदिप० अ०७१, श्लो० १२] तथा तत्र भगवना पतञ्जलिनाऽप्युक्तम्-"भोगाभ्यासमनुवर्धन्ने गगाः, फौशलानि चेन्द्रियाणाम्" [पात यो० पा० २, सू०१५मासमा पनि । अपि च, अन्यथाप्यभिलापनिवृत्तिा यथा विषय दोषदर्शनान, तत्रापि भवतां मते विषयोपमोगतु मुएं भवेत् तुल्ये चाभिमताफलामे मुसविशेपो२० न म्यान् अभिवानिवृष्परविशेषान् । 1. तदननीचीनम्। न हि मला दुःसाभार एव मुखम्-तथा च मापना तत्र नामिहितम्- "न सर्पलोशमाक्षिक सुन प्रत्याख्यातुं शर्यम्" तथाऽम्पायुक्तम्-"न प्रस्पारमवेद मीपम्प सुखस्य प्रतीतेः प्रत्याख्यानम्" [ एवं चानभ्युपगतस्य पक्षस्योप (पा) लम्म, माने नु मुख प्रतिपादने दुःखाभाषमा सुखशम्दो ननु सुसे एव, तस्य प्रमाणतोऽनुपपत्तेः । तथा च मुतस्य नित्यमुखामियको प्रत्यक्षाऽनुमानयोनिषेधे आगममात्रमशिष्यते तस्य च गौणत्वे ३० नाप्युपपतन गुपरस्य मुखस्य मम्मयः । नित्याखाभ्युपगमे परिकलादपम्-कि तर आत्मसरूपं स्यप्रकाराम, उतस्थित नतिरिक प्रमाणान्तरप्रमेयम् । पूर्वसिन विकणे आमम्वरुपयत् स्वभकाशसुससंवित्तिः सर्वदा भोन्। ततध पर मुनायोगविशेषः । सतत् स्यान्-अनाविधालादिनत्वात् स्वकासानन्दसगिनिने संमारिणा, पदा तु यज्ञादनादेश विधातरयस्थापगमतदाच्छादशामावान् स्वप्रकाशानन्दसंधेदनम् ,३५ ঘসান আল মামা যন্ত্র যম ব ইমনাভ্যাস। येऽपि मनिपेदिरे "मेघादिनामवितृप्रशासविताथासमकारापाडाय" तेऽपि न मम्पर संचरते न स्यमकाराम मेघादिनाऽऽपरपम्। आवृतये हि सेनाको पोशिश भरेयने परिशेषः तलान कस्यचित् सप्रकारावानिःश भपि ध, मेधादेस्तनोs. १ अपि पानी म...विता । २-पदुःयाम्पसमा । पासप म- 1 २.. ५.। ५मयों भायो ति: "मुखं प्रभारनी हरीणाम, पति- प. मा..v,1,सू.५ मुराणम्"-मादा...,.,. २.१.४.१।५ प्रतिपच-4.-यानेना-र। स... J .१५४ प्रथमे काण्डे- न्तिरत्वादावारकत्वं युकम्, अविद्यायास्तु तत्यान्यत्वेनानिर्वचनीयत्वेन तुच्छस्वभावत्वात् । स्वप्रकाशसमा आनन्दे आवरणशक्तिः । तत् सर्वदा स्वकाशानन्दानुभवमाप्तिः धर्माऽधर्म निताम्यां च सुख-दुःसान्यां सह युगपत् संवेदन प्रसक्तम् न चैतद् दृश्यते तस्मान पूर्वो विकल्प नाप्युचरः, तत्मतिपादकस्य प्रत्यक्षादेनिपिद्धन्यान् थाधकस्य च प्रदर्शितयात् । अनस्तर • ५तिपादक आगमः प्रमाणविरुद्धार्थप्रतिपादकत्वाद्रीणत्वेन ध्यारयायते शास्त्रदृष्टविरशान्यवास्यरत पतधाभ्युपगम्योक्तम्, ने तु सुखस्य योधस्वभावताऽपि विद्यते तत्स्वभावतानिराकरणात् । यथोक्तम् 'सुसरागेण प्रवृत्तस्य मुमुक्षोर्यथा वन्धप्रसङ्गस्तथा देपनिवन्धनायामपि प्रवृत्तावर श्यम्भाषी यन्धा' तदयुक्तम्। मुमुक्षोद्वैपामावान् स हि विषयाणां तत्वदर्शी सेवारोपितं सुला तत्साधनत्यं या तस्वशानाभ्यासादन्यथा प्रतिपद्यते । एवं च सस्थाऽऽरोपिताकारमियानानम्या : १० तायुत्तरोत्तरकामावादपयर्ग उच्यते,न तु तस्य दुःखसाधने द्वेषः किन्त्यारोपिने सुखे तरसाधने । तत्यमानाभ्यासाद् रागामाया न च स एव द्वेषः, तस्य रागाभायसव्यतिरेफेण प्रत्यक्षेण सरूपसंशित अन्यथोपेक्षणीये घस्तुनि रागामाचे देपा स्यात् न चैन एम, तस्मान्न मुमुक्षोपनियन्धना प्रवृत्तिः भवनुया,तथापि न तस्य यन्धा, देपो हि स बन्धहेतुर्य उत्पन्नः स्वविषये याग-मनः कायम मानविपक्षां पुरुषस्य प्रवृत्तिं फारयति; तस शास्त्रविरुद्धार्थाचरणेऽधोत्पत्तिद्वारेण शरीरादि १५प्रहणम् नियन्धनं च दुःसम् । अयं तु समक्षोविषयेषु द्वेषः सकलप्रवृत्तिप्रतिपन्यिायाधमाधम योरनुत्पती शरीराधमायाप्न फेयलं न बन्धाय किन्तु सात्मघाताय कल्पते । तदिदमुक्तम्-"महा निस्ससुरागस्थामतिकूलत्यम् । नास नित्यसुखामाया (नित्यपुसमायः ) प्रतिकूल इत्यर्थः पपेयं गुगाम्य निसं मुग मयति अयापि न भयति, नासोमयोः पक्षयोमोक्षाधिगमामावः" [पारस्या- मा०म०, मा०, मूत्र २२, पृष्ठ ४५] मनेन र भाग्ययाक्येन न मुक्तस निस्याससंवित्तिरूपेयते तस्याः प्रमाणयाधितन्यान-भिन्न गया पाशाखमारग्धं तम्योपपत्तिरनेन प्रतिपाद्यते, यापयसामाग्यात् । तनि किशिदापनि पानापा निरादपदापि तारपर्यशक्तरन्यत्र भाषान भूपमाणीपर पान्यायपिभिः परियशने विषमालादिपारगन् । तन परमानन्दमाप्तिमोक्षः। भारि विशुममानोपति, रागादिमतो निशानात् तद्रहित तमोपरगोगान् । तपादि- २५पमा पोपा पोधाता मानानरेनर मेगादिरपिम्यान, तादाम्यात्, विपर्यये तरमापत्रमा न पिलवाधिकारणात् पिलमणकार्यस्योपतिर्शनात पोधार पोषणपति प्रमाणमनि, शा र भामण भानाम्नरदेनु म पूर्वकालमायिन्यं ममानमातीययमेकमनाना या हेतु, यमि- मापन। तपा-कादयं तसमाना: ममानजानीयायं च सन्तानाम्तमानमयारीनि। मेरा पूरा नाममान गातीयपि न वियक्षितज्ञान हेनुम्यामिति । एकमातामापं चागत- १.नैन पदयगतीति। সথ বলে তােমাৰ গানে। এখামখেয়ােনা হলো पावसामानं च प्रायम्याशनगन। नये मरणासनमानगमरमाननुपरे FETE वा मनानालायम, नियमनोरमावान् । अपेमा হলান রিপন, গুলল কাস্থ মানি। বাবা দিবানিশি १२. हा मितिमामामथान् । नयाहि-तारापति विहान TTIfAlre पाणिािन दिया। पचम ममायानमा माययावानं पाणम्' लि, () CTATriml দশ মধশাল সি পাশ মখলিলঘিষাল শাখা। • TAG grum प्रतिणि गाt *. mirfinition or"t* +: .......... * Print. Araritra Aror trrrrton मुक्तिम्यरूपयार ६५५ मिदनामिभूत विशेष इति चेत्, असदेनत्। तस्यापि समसया ताबारम्येनामिमायकरया- योगात् । पतिरेके तु रूपादिपदार्यानामेय गत्यात् तास्वरूप निरूप्यम्, अमिभवध यदि मिनाश:, न विमानस्य सस्वम् विनाशस्य या निर्हेतुकरयम् । अथ तिरोभावर, म मिशानश सन 'सरसत्तेय संघेदनम्' त्यभ्युपगमे तस्यानुपपधे। अतः सुपुमापस्थायां विज्ञानासत्येनान्यज्ञानस्य समा. यादेकसानसन्तानत्वं व्यभिचारीति । योदम् 'पिशिएमायनापशाव् रागादिविनाश' इति, असदेतत्। निहतुकस्यात् विनाशस्या- ग्यासानुपपतेध । अभ्यासो सवस्थिते ज्यातरि अतिशयाधापकत्यादुपपद्यते न क्षणिके ज्ञानमात्रे इति । अत एव न योगिनां सालभरपनायिकलं पानमुत्पद्यते । न प सन्तानापेक्षयाऽतिशया, तस्यैयासम्भया अधिशिधाद् विशिष्टोत्पतेरयोगाए । तथाहि-पूर्वस्मादविशिष्टादुसरोत्तर सातिशयं कपमुपजायत इति चिन्त्यम् । यप 'संतानोच्छितिनिधेियसम्' इति, सब निसुकतया पिनाश.१०. योपाययेयय॑म्, अयासिनत्यादिति । अन्ये तु "अनेकान्तमायनातो पिसिएप्रदेशेऽभयशरीरादिलामो निःश्रेयसम्"[ ] इति मन्यन्ते । तथा च नित्यभाषनायां प्रहा, अनित्यत्वे च प इत्युभयपरिहारार्थमनेकान्तमा- पना इति, एवं सदादिप्यपि योग्यम् । प्रत्यक्षं च स्यदेश-काल-कारणाधारतया सत्यम् परदेशादिपसायमित्युभयरूपता । तथा, घटादिर्मदादिरूपतया नित्यः सर्घायस्यास्पलम्भात्,१५ घटादिरूपतया घानियस्तदपायात्, पषमामाप्यारमादिरूपतया नित्यः सर्पदा समापात, सुखादिपर्यायरूपतया चानित्यस्तद्विनाशाह । एवं सत्र स्वकार्येषु फलम्यम् कार्यान्तरेषु चाकर्ष- त्यमित्यूवम् स्वरादामिषेयत्वम् शब्दान्तरानमिपेपत्यं चेति । तदेतदसाम्प्रतम्, मिप्यासनस्य नियसकारणायन प्रतिषेधात् । अनेकान्तज्ञानं च मिध्येय, पाधकोपपतेः । तथाहि-नित्यानित्यन्बपोविधिप्रतिपेयरुपत्यादभिन्ने धर्मिणि अभाषः । २० सदसस्वादेरपीति । यदम् 'घटादिगंवादिरूपतया नित्यः' इति, अमरेतत्। मुद्रूपतायास्तवोs. तिल्यात् । तथाहि-धरादर्यान्तरं मृदूपता मृत्यं सामान्यम्, तम्य तु नित्यरवे न घटस्य तथाभापानतोऽन्यत्वात्। घटस्य तु कारणाद् विलयोपलधेरनित्यत्यमेव । यवम् 'स्वदेशादिषु सचं परदेशादिप्यसत्यम्' तदिग्यत एय, इतरेतरामायम्यान्युपगमात् । तथाहि-तरसिन् देशादावितरस्य घटसाभाषो नानुत्पतिर्न प्रध्यस, तत्र तस्य सदाऽसत्यात् । सप्ये नु स्वदे-२५ मादिपप्यनुपलम्मप्रसः। एपमात्मनोऽपि निस्सत्वमेय, मुख-दुःखादेस्तहगत्येन तनोऽपान्तरस्य पिनारोऽप्यविनाशात् । 'कार्यान्तरेषु पाकरीत्यम्' न प्रतिषिष्यते । तथाहि-यत् पस्यान्वय- ध्यतिरेकाम्यामुवानी व्यानिपत प्रत्युपलम् तत् तस्य कारणं नान्यस्येत्यम्युपगम्यत एय। एवं शादानभिधेयरवेऽपि 'म सर्प सपंराख्दामिधेयम्' त्यभ्युपगमान् । न धानेकान्तमापनातो विशिष्ट शरीपदिष्ठामेऽस्ति प्रतिपन्धः। न धोत्पसिधर्मणां शरीरादीनामक्षयत्यं म्याम् । तथा, मुना-३० पप्यनेकान्तो म पायर्यत इति मुक्तो न मुकति स्यात् । एपं च सति स एप मुका संसारी घेति प्रसनाम् एपमनेकान्तेऽप्यनेकान्ताभ्युपगमो दूषणम्, पस्तुनः सदसदूपताऽनेकान्ता, तस्थाने पाताभ्युपगमे कान्तरमपिप्रसकम्। पर्व निस्थानिस्वरूपताव्यतिरिनं परूपान्तरमित्यादि पाच्यम् । साम्ये तु "आरमैकल्यवानात् परमात्मनि लया संपते पति यने । तयादि-आत्मघ परमार्थ- सन्, ततोऽस्येपां मेरे प्रमाणामापात प्रत्यक्ष दि पदापांनां सन्नापमाहकमेय न मेदस्य रस्यविद्या ३५ समारोपित एवायं मेरा"[ रति मन्यते, तदप्यसत्। आन्मेकापडानस्य मियारूपतया निम्पससाधकरयानुपपनेः, मिथ्यार धारमाधिकार एय पक्ष्याम: । पपं सदावहानमपि मिप्यारपतया म निधेियससाधनमिति अध्यम् । पपा से मिप्यारूपता तथा मनिपार- यिष्यामः । समानुपमसुखायस्यान्तरप्राभिलक्षणामस्वरूपं मुक्ति, तरसमाये वायरममाणावर संगात्। विशेषगुणोपरिशिष्टामस्थम्पनिसमाये च प्रदसित प्रमाणमिति । १-नसना-, मा., भा.। २-भायोगाभ्यासा-भाग, पो. शियोमामा- 1.. .१५॥ ४.१.4.11 ५....।

अपने काले [ उपरशा मुक्ती आलन्तिकविशेषगुगोस निरमनम् ] . जमीनपीने-मनालम् 'नगनामा मोरगुमानो सानोमारियो गी. अप पुकाविशेगुना मा प्रतिमिनार समाTTER तामीमारियांपरेल सीतिरगानTTTTTTTTTE योमर मिलना सासिन पुनराभE TETAIो। मि. समान हेतुपेनोपायमान परि सामाभिधेन तामा सोने सगासमानतोकेगापरसामान्यभामा - TATA सरसर मेगपुनः सम्मान पर-पकमा समन् ति भा गलागार यी सानोपा तामीरे मरने Pint ETर सालो मा Inter मा Trmiri दिन समिति प्रतिवरियो CAT TETTE लिजम, सरोः पम निरिणाम M TRAIrism riftsशारिरिता पुणे HTTRITIATsh filam Part ToR ARTISTRATAPITEmfarak Trt tी विभाtant farpur | MITMrtifi मानो AREnt rrrrrrITART AT TIMI !! HTTTTTTTTTTTT TO मापाEिRE work Termir Miramittो TWITTuri पातTTITIRHITE TI, गोt mirritattra THAT A नाति नाart *Primarit. ITAMT को नाra torri. warTAIM Mafirent ANTATE RETR141 * my wantra In HIMerm तापरणे मा miraim virya krant artery RT THAT Teaning it in grritो, Pistry ren at nint amirrrrr at ATTAMITRA • * -MENS EMEET HTETRIM ....tagrtaimer ** Ramni. . . . tream - KanciaTY NEHATTHA.At artun *+++N *4NE " KE AN + H hter अधिसरूपवादः । अथ समपाययुस्या समायः प्रतीयत इस्य युपगमा, सोप्यतुपपासा समयायवृद्धरनुपपत्ते नदि एने तन्तपः, अयं पटर, अयं समपाया पति परस्परनिवि: त्रितयं पहिनाकारतया बलांचित् प्रतीतापुमाति तथानुभषाभाषाम् । अनुमानेन प्रतीयते, अयुक्त मेनन् । प्रत्यक्षामाये तत्पूर्वकम्यानुमानस्थाप्यपुत्तेः । सामान्य. सोएएमपि नात्र पस्तुनि प्रवर्तने, तत्प्रभवकार्यानपत्ताधेः। न च युधिरेय समयायापिका-५ 'यह तन्तुषु पर पति प्रत्ययः सम्बन्धनिमित्ता, अपाधितेहप्रत्ययस्यात्, 'द फुण्डे दपिरति प्रत्ययपत् इति, निशानुपपत्तेः । तपाहि- निमिनमाश्रमनेन प्रतीयते, उत सम्बन्धः? यदि निमितमा तदा सिरसाध्यता। अथ सम्पन्धः, स संयोगः, समयायो पा? संयोगप्रतिपचाप भ्युपगमयामा समयावानुमाने सम्बन्धव्यतिरेकीन शान्यस्य सम्बन्धे सत्यन्यस्य गमत्वम्, अतिसात् । नहि ऐपदशेन्द्रिय-घटसम्यन्धे यादतेन्द्रियं रूपादिकम करणत्वात् प्रकाशयदर एम् । तम समधायः कस्यचित् प्रमाणस्य गोचरः। न च तस्य समधायिभ्यामसम्यद्धस्य सम्बन्ध- रूपता। न च नरसम्बन्धनिमियोऽपरः समयायोऽभ्युपगम्यते अभ्युपगमे याऽनपस्थामसहः। विशेषणविझोप्यभारस्थापि तत्सम्पन्धनिमिवस सम्बन्धाभ्युपगमेऽनवस्थादिकं दूषणं समानम् । म चासम्पन्धस्यापि तस्स सम्बन्धरूपत्वाइपरपदार्थसम्बन्धमत्वमिति धाच्यम्, विहितोत्तरत्वात् । न च समवायखान्पस या पकान्तनित्वस्थ कार्यजनकत्वं सम्मपति, नित्ये क्रम-योगपधाभ्यामर्थ-१५ किया विरोध प्रतिपादयिष्यमापात्वात् । न च सदभाचे पदाचीनो सस्यम्, सत्तासम्बन्धिरवेन तह निपिईयाभिषेरथमानन्याय दे समपायामापात् सन्तानत्वं बुयादिसन्नानेथुन वृश्चिम सिमिति सन्तानन्यलक्षणो हेनुः कपं नाऽसिद्धः! अयोपादानोपादेयभूतयुध्यादिलक्षणं प्रयाहरूपमेष सन्तानत्वं हेतुत्वेन विवक्षितम्। नन्वेवं सस्प तपाभूतस्यान्यवाननुश्वरसाधारणानकान्तिकत्वम् अभ्युपगमविरोधच । न हि परेण२० पुद्धिक्षणोपादानोऽपरा सर्य एष बुद्धिक्षपोऽभ्युपगम्यते पकसन्तानपतितः । तयाभ्युपगमे या मुंहावस्यायामपि पूर्वपूर्वयुस्युपादानक्षपादुत्तरोतरोपादेयधुद्धिसाय संभवान घुद्धिसन्तानसा- त्यन्तोदः साया सम्मपति, ययोनहेतुसद्भायपाधितत्वात् । अथ पूर्वापरसमानजातीपक्षपामयाहमा सन्तानत्वं नायमदोषःनन्वेषमपि देतोरसा धारणत्वं तदयस्थम् । नकसन्तानरूपमन्यानुयायि, यतेवर्यपत्यन्तनगमात् अनुगमे या२५ सामान्यपक्षमा पूषाको दोपस्तदवस्था अनशान्तिका पायजपरमाणुरूपादिमिः तथाविध. सन्तानत्य र सद्भावेऽयसन्तोदामाचात् । अपि च, सन्तानत्वमपि भविष्यति अत्यन्ता. सुन्दधति विपर्यये तोर्याधाममापामाधेन सन्दिग्परिपसमावृत्तिकत्वादनकान्तिकः । विपक्षेऽदर्शनं च नोर्शय प्रमा प्रागेष प्रतिक्षितम् । रियाय देतुः, शब्द-बुद्धि-प्रदीगादिपप्यस्यन्तानुच्छेदयन्स्पेय सन्तानत्वस्प भावात् ।३० न कालनिरपेम्पिवानिन्येप्पयशिपायारित्यरस सर्व सम्नवतीति प्रतिपादयिष्यमाणत्वात् । न च प्रदीपादीनामुमर परिणामो न प्रत्यक्षारत्तावता 'ते समान सन्ति' इति व्ययस्थापयितुं आफ्यम्। अन्यथा परमाणनामपि पारिमाण्डत्यगुणाधारनया प्रत्यक्षतोऽप्रतिपलदूपतयाऽस- सरस अय देषां सपनयामानान् प्रतिपत्त यं दोषामनु सा अनुमानात् पतिपत्तिः मपि मुल्यायपादि स्थुलकार्यप्रतिपत्तिस्तापासूश्मकारणमनरेपाऽसम्मधिनी परमाणुस-३५ सामवयोपपत्ति तथा मापश्चितिदर्शन पूरफोटिस्थिनिमन्तरेणासम्मविना साधासोति प्रति- पादयिप्पने। Rध पस्तस्थापि प्रदीपस्य विकारान्तरेण स्पित्यम्युपगमे प्रत्यक्षबाधा, पारिस्थ संजलि माम्बरकपाभ्युपगमेऽपि सदाभोपरतः। अधोमश मास्सएकाधिकरणलेोदमा- আগৰমঘাষহ বনিমমানাই হাৰাশপিঙ্ক করি विपस्यभामतरेष मिति: मम्भवतीत्यनुमानतः दिन फल्पने तस्सन्तत्यनुदेश अन्यथा ४. सन्तानचरमराणा समानरानावनामा पूर्वानामपि सवार दिमित्यापि समितिमीपाएम्बय पुमादिसायमलयामाप इति नानुमानप्रति गरमा 1.11 . . . . अपत्यप-.. ५वापा..

१५८ प्रयमे काण्डे- च्छब्द थुद्धि-प्रदीपादीनामपि सरो नात्यन्तिको प्युच्छेदोऽभ्युपगन्तव्यः अन्यया विवनिताऽपि सत्याभाया-इति सर्वत्रात्यन्तानुच्छेदयत्येव सन्तानत्वलक्षणो हेतुर्यर्तत इति कथं न विरुद्धः। विपरीतार्थोपस्थापकम्यानुमानान्तरस्य सद्भावादनुमानबाधितः पक्षा, देतोवा कालावयाप दिष्टत्वम् । यथा चानुमानस पक्षयायकत्वम् अनुमानवाधितपक्षनिर्देशानन्तरं प्रयुकवेन हेनोवों ५कालात्ययापदिष्टत्यं तथाऽसत् प्रतिपादितमिति न पुनरुच्यते। अथ किं तदनुमानं प्रशतप्रतिशाया याधकं येनापायमुक्तदोषः स्यात्? उच्यते, पूर्वापर : स्वभावपरिहारायाप्तिलक्षणपरिणामवान् शब्द-युद्धि-प्रदीपादिकोऽर्थः, सत्वात् कनकन्यादा यावान् कश्चित् माघस्वभावः स सर्यः ताशमावस्त्रमाववियर्तमन्तरेण न सम्भवति- तथाहि- तावत् क्षणिकस्य निरन्वयविनाशिनः सत्वसम्मयोऽस्ति, स्याकारानुकारि ज्ञान- १० मन्यता कार्यान्तरममाप्याऽऽरमानम् संहरतः सकलशक्तिविरहितस्य व्योमकुसुमादेरिव सस्था- नुपपचेः। तारशस्य नहि कार्यकालप्राप्तिः, क्षणमहभङ्गमसकेनापि फलसमयमात्मानमापयतस्त जननसामध्ये चिरतरविनएस्येय सम्भवति। न च समनन्तरमाविनः कार्यस्योत्पादने कारण स्वसत्ता फाल एप सामर्थ्यमानोति, कार्यकाले तस्य स्वभाव (घा) विशेषात् ततः प्रागपि कार्योत्पत्ति प्रसङ्गात् । तस्मिन् सत्यमवन्नसति स्वयमेव मवन् अयं मायः तत्कार्यव्यपदेशमपि न लभते। १५न हि समर्थे कारणे प्रादुर्भावमप्रामुवत् कार्यमिवरद्धा कारणम् अतिप्रसङ्गात् । न च समनन्तर भावविशेषमात्रेण तत्कार्यत्वं युक्तम्, समनन्तरप्रभवत्वस्यवासम्मयात्-तरेतराश्रयप्रसके-प्रति प्रतिपादितत्वात्। उपचरितं चैवं तस्य कार्यत्वमितरस्य च कारणत्वं स्यात् अक्षणिकवत् । तत्कारणमात्रे सत्यभयन्तं प्रति पुनः कारणस्य भावाभावयोनं कश्चिविशेषः, ततोऽक्षणिकादिय क्षणिकादपि २० सत्वादिर्यस्तुस्वभायो व्यावर्त्तत एव न बाणिक पव म-योगपचाभ्यामर्थक्रियाविरोधः किं तर्हि क्षणभङ्गेऽपि । तथाहि-ग तावत् कार्य-कारणयोः प्रमः सम्मयति, कालमेदात् जन्यजनकभावविरो. धात्, चिरतरोपरतोत्पन्नपितापुत्रवत् । न हि ताशयापेक्षापि सम्भवति, अनाघेयाऽमहेयातियः यत्वात्, अक्षणिकवत् न हि किञ्चिदतिशयं ततो नासादयत् भावान्तरमपेक्षते यतः क्रमः स्यात, जन्य-जनकयोराधेयाविशेपत्येऽपि न क्रमसम्भवः, कामिणोः कालमेदाद तत्यानुपपतेः। योगपतु २५तयोहेतुफलमावतयैयासम्भषि, समानकालयोहिन हेतुफलमायः सव्यतरगोविपाणयदपेक्षानुपपते।। अत पय एतकरयादयोऽपि हेतयो घस्तुस्वभायाः परिणामानभ्युपगमयादिनां न सम्मपन्ति । तथाहि अपेक्षितपरब्यापारो हि भावः स्वमायनिष्पत्ती तक उच्यते, साच परापेक्षा एकान्तनित्यः । पकान्ताऽनित्येऽप्यसम्मपिनी तदपेक्षाकारणशतस्यमापविशेपेण विपक्षितयस्तुनः सम्बन्धोऽपि मोपपंघेत, स्वभायमेवमसक्तेः । अमेदे याऽपेक्ष्यमाणादपेशकस्य सर्वथाऽऽत्मनिप्पत्तिप्रसनात् । अतः ३० स्वभापमिन्नयोः प्रत्यस्तमितोपकार्योपकारकस्यमापयोमाययो सम्पन्धानुपपत्तेः 'अस्पदम् इति प्पपदेशभ्यागुपपत्तिः । यदि पुनरपेक्षमाणस्य तदपेक्ष्यमाणेन व्यतिरिकम्पकारान्तर क्रियेत, तमः म्पन्धव्यपदेशा समाप्युपकारान्तरं कल्पनीयगिस्यनयस्था सालण्योमतलायलम्पिनी प्रसग्येत तमानित्यानित्यपक्षयोग्यमियालक्षण सत्यम कामसम्मपतीति यत् किश्चित् सत् शतक पासत राय परिणामि, इतरथाऽकिश्चिरकरापस्तुरयासमामललारविन्दिनीकुसुमयन्- ३५मन् एमको पा राब्द-युधि-प्रदीगादिरिति शिक्षा परिणामी । सायं यात्रिपाकारित्यमेय, सम्या निरिसरयास, चायन्तीच्छेयरमु न सम्मरस्येय, ततो व्यापसमानो हेतु अनत्यम्लोच्छे.. दयाम्मेय संभवनीति कम पायमानीय प्रसास देतोरनेयो. परयमतिपादना! र थारप्रतिपयमयमा। तथादि-'युपादिसम्तानो भात्यमोटछेश्यान, सर्वप्रमाणाः ४. पगम्यमानरयोदल्यान, यो दि सत्रमाणानुपम्पमानतयोमेको ग स तायेगोरेया, पपा 1.frri शि-म, मt. RAHIमायापा.. -पपिपरी--मापामापषि- समयानावि., .., मा., मा. । ५-पमनरेन-tit. If१५0411 -frana... पर मा-मte, it ..पथमे to, nt..

] मुमिन्दाना १२९ पानिमामागुडसपादिमनारा, समास दुस्पादिसन्तानः, तलामात्यन्टोच्छेदचा इति • कपंन सतिपमत्वं सन्नानन्या लनुमान! न मनुनानुमानत पर सन्तानोच्छेदस्य मदीदी मनापानुपरम्पमानवयोन्टेदस्वामिन, सन्तानत्यमापन मप्रतिपक्षत्वान् । नधान्य प्रतिमामाधन प्रमाण निडे मन्लानत्वमापनम्य सन्प्रतिपक्षत्यम् अस्य च सत्र विकसने विक्षितानुपरम्पः प्रविपक्षमापनस प्रभात्यमिति घाव्यम्, मवदामिनाये मरम- ५ विपन्नदोपसोझायनान्। परमार्फतरनु यथाऽयं दोषो न भवति तथा प्रतिपादितम् प्रति. पाइपिप्यते वा सन्तानवोल्वमिदानिशान्टिक-विस्मृत्वान्यतमदोषदुएन्वेनासाधनत्वम्, , सच प्रतिपादितमिललमतिसमन, दिङ्मानपत्त्या प्रयासस्य। पर निनुकविनासनिषेधात् सन्तानोन्टे हेनुर्वाच्यः' इत्यादि, तदसतम्। सन्यायाना विपर्यवहानच्यावृतिमामेण धर्माऽधर्मयोलत्कार्यश च शरीरादरमायेऽपि सफल-१० पदार्थविषयसम्यामानानन्सानिन्दियशमसुखादिसन्तानस्य निवृत्त्यसिद्धः । न च शरीरादि निमित्तकारणमाममनःसंयोग चासमयायिकारणमन्तरेण न मानोत्पत्तिः, परलोकसाधनप्रस्तावे "सारम्य संस्कार नियमेनानुपर्नते। उन्मान्तरीय चिनश्चितसमाययम्" इति पापन डानस मानोपादानवनिपाइनान् । अन्यथा परटोशामायसना: नित्ययात्मन १५ समगयिभारमन्वन हानादिक प्रनि लिपिदयाद आत्ममनःसंयोगस्य पाऽसमवायिकारपस्य प्रतिपल्टयमानन्यान् निदिन्याच मपोगन्य निमिक्षारणम्य पार प्रतिनियतव्येन सरीपद्यमावेऽपि देश-काटादेगाननी शानादिम्बमायम्पोमरमानावस्यामरठया परिषमतः सहकारियमम्मयात् । विरमानं च शरीगदिनिमिसकारणविकन्दमप्यभ्युपगत्यति-तत्रानेऽपि नित्यत्यय प्रतिपिई- ज्यान पुनमुंत्ययम्यायामारमननसमापति सुस्थितम् नैदायित्व पर पर्नम् 'आरण्यकार्पयोधमाधमयोयामोगगन पक्षया मंचिनयोश तत्वज्ञानाम् इत्यादि, उदापि न साम्। दपमोगान कर्ममा अक्षये तपमोगममपरकमेनिमिणशामिन्दारपूर्वकमनो- यार-पापभ्यागरम्यकपर सम्मपाइपिष्ट कारण अनुपलरकर्मणा सभापार कपमान्य ति कर्मक्षयः सम्पशन नुमिप्यामाननिवृरादिकमेण पाशियानिभिरक्षणधारित्री- पहितम्यागामिकमांनुत्पत्तिसामध्ययन मशिवमंमयेऽपि मामय संमायत पय-पपोज.२५ साग मारितालानुपसी समयर पूर्वमहादिपमेऽपि सामर्यमुपसत्यम्-विन्दु परिमामिजीवाजीपादिपरविषयमेव सम्यम्हानं न पुनरेकालनिल्लानित्याग्मादिविरपम्। मम्म विपरीतार्थमारकरन निप्यास्योपाः। पपा चान्तपादिपरिकलित मान्मापयों मरांमपति ठपा दयास्थानं निवेदयिष्यने । मियासानस प मुकिवन्य परमापि नेण्यात एक अतो पदम् "ययामि" सातिन सयंमंधरचारित्रीपतिसन्यामानावरकमा मामन्यु.३० पगम्यते, तत् मिरमेयसापितम्। परोपमोगारामतपेनुमाननुपन्यानम्, नत्र देशागामि मंतिम समय गम्प. मानादिदेय सचिनरपे:पि परिपालयितुं युक्तमिति प्रतिपादित समापनस्तारे । उगमो. गा पाये नामाकर्मपा प्रगुप्तरसमसंयोगासनं नामयो निगम. আমি বোকামিনীর সমাগলাম। আমি पोहावन का तानानुसारेण परमेष पाप्यं म पुनरम्यने प्रयासमपान् । এ মাথিশাল মে,ি শিমু, মালাই 1-शिरा....१५५ ६.५. १५...। हो रहा वाहिर, मग म.७३... ११ -रप-"-अपने मिर-... १....* -12.1 पोर-..। १.१. १५...॥

१६० प्रथमे फाण्डे रुयायुपभोगामम्भवात् , सम्मवेऽपि चावश्यंभावी ऋद्धिमतो भवदमित्रायेण योगिनोऽपि प्रचुरतर धर्माधर्मसंभयोऽतिभोगिन इय नृपत्यादेः, बंद्योपदेशप्रयर्तमानातुररष्टोन्तोऽप्यसता, तस्यापि निरुग्मायामिलापेण प्रयत्तमानस्यौषधाचाचरणे पीतरागत्वासिद्धेः । न च मुमुक्षोरपि मुक्तिसुम्बा मिलापेण प्रवर्तमानस्य सरागत्वम्, सम्यग्मानमतिवन्धकरागविगमस्य सपेशत्यान्यथानुपपत्या • ५माक् प्रसाधितत्वात् । भयोपमाहिकर्मनिमित्तस्य तु यार-युद्धिशरीराऽऽरम्भप्रवृत्तिरूपस सातजनकम्य शैलेदयवस्थायां मुमुक्षोरभाषान् प्रवृत्तिकारणत्वेनाभ्युपगम्यमानस्य मुखामिया पस्याप्यसिद्धेन मुमुक्षो रागित्वम् । प्रसिद्धच मयतां प्रवृत्यभायो भाविधमाधर्मप्रतिबन्धकः । यच भाविधर्माधर्माम्यां विस्तो हेतुः स एव सञ्चितॆतन्क्षयेऽपि युक इति प्रतियोदितम् । अत एव सम्यग्नान-दर्शन-चारित्रात्मक पर हेतुर्माधि-भूनरुमसम्बन्धमतियानकत्वाद् १० मुक्तिनाश्यपन्यकारणं नान्य इति । तेन यदुकम् 'तत्वशानिनां कर्मविनाशस्तवमानान्' इति, तयुक्त मेय। यत्तु इतरेषामुपमोगात्' इति, तदयुक्तम्। उपमोगात् तरक्षयानुपपत्तेः प्रतिपादि. तस्यात् । येतु 'नित्य-नैमित्तिकानुष्ठानं फेयलमानोत्पत्तेः प्रात काम्पनिपिद्धानुष्ठानपरिहारेण शानावरणादिदुरितक्षयनिमित्तस्बेन केवलशानप्रातिहेतुत्येन च प्रतिपादिनम् नदिष्टमेयालाकम् । फेवलशानलामोत्तरफालं तु शैलेश्ययस्थायामशेषकर्मनिर्जरणरूपायां सर्वप्रियाप्रतिपेध एयाम्यु १५पगम्यत इति न तन्निमित्तो धर्माधर्मफलमादुर्भायः, प्रवृत्तिनिवृत्रात्यन्निक्यास्तत्क्षयहेनुन्यसि । यद्योकम् 'विपर्ययज्ञानध्यसादिक्रमेण विशेषगुणोच्छेदविशिष्टात्मस्वरूपमुख्यभ्युपगमे न तवमानकार्यत्यादनित्यत्वं याच्यम्' इत्यादि, तदप्ययुक्तम्, विशेषगुणोच्छेदविशिष्टात्मनो मुतिरूपतया प्रतिपिद्धत्वात्, पुद्यादेर्षिशेपगुणत्वस्यात्यन्तिकतत्क्षयस्य घ प्रमाणशाधितन्यात् । गुणयतिरिक्तस्य च गुपिन आत्मलक्षणस्यैकान्त निस्यस्य निपेत्रामानन्यात् तस्य युमादिविशेष २० गुणतादाम्यामायोऽसिद्धः । पंथे 'मोक्षायस्थायां चैतन्यस्याप्युच्छेदान्न एतबुद्धयस्ता प्रान्त इलयानन्दसमस्या एय मोसोऽभ्युपगन्तव्यः' इति, एतत् सत्यमेव । ययं 'यथा तस्य चिसमायता निस्सा तथा परमानन्दसमायताऽपि' इत्यादि, तदयुक्तम्। चिम्पमायतायाः अप्येकान्तनित्यतानम्युपगमार। भामम्वरूपता मु चिकूपनाया आनन्दरूपतायाध कथंचिदभ्युपगम्यत पय । यंग मनन्यायन २५भुती भ्रषणम् "विमानमानन्दं प्रल इति, नदपि नाम्मदभ्युपगमयाधकम, समस्तक्षेपापापिनो भानावपपिरम्प घानन्दम्ग स्यामंविदिनभ्य मुफ्यवस्थाया मकलकर्मगदितारमप्रसादेन कचिदमीटग्यार। यपि यदायियानितिः तदा स्वापानिपनिः य मोक्षः' इति, नापि युक्रमेय, मा. विधपारमार्थिकर्ममयाहापानापियाम्यग्निनिमः म्यागानिपमिलामोशागामाभारणार । १०मा एप 'आनन्दं प्रत्यो क न मोक्षमिव्यायने न्येतदपि गाम्मापातमिमुशहानि, अमिता स्वरशिदितानन्दम्यापनया नदयम्यायामामन उपतन्युपगमात् । यय पणाममो महापं निलो गुमर' यानि, तदसाम्। निपगुम-महापारेगामाध्यतिरिमायेन तसमयेन पाप्रमाणयापिर. स्वादनन्युपगमाईग्यान । मन पय मंगागम्यायामपि नित्यगुगम्य तकनग व गायन गंसार मुश्रसपस्थयोपिरोप: स्यादि यमनमत्र को उपन्यानं तदनम्युपगमादेय निगलम्। पानिपत्यापितम्यामवस्था मुलापतापक्षाकारणं पनपा शास्त्र भाममनयोगः पानाम्यायन' स्यादि तायातम् शान गुलाधिपगारेयवेन মালিশ: স্নাক্ত নিথাকি, মালিবাগ বালাখাকােনাল मनन् । नयाद-मेन्द्रियागराकाणमा शिनगुणपन पर र य... "गी परगार....। . .................... ........नि. 17.1.14.। "2. 1५1 t......... "... ..marat.. ..........

मुविसरूपात देयरिपपायेनानियतविश्यम्, पचाउमापूनमधुरात्रिकरणमामा, 'समती तयम्' प्रति मलाक्षेषण भ्यासिमसाधक था । न चापाप्यात्माऽन्ताधारणपोगम्य शरीरापेक्षा. प्रमहरतस्य व्यापार प्रति पकं गुनम्, मन्ताकारणसाशुपरिमाणदव्यरुपस प्रमाणाधितर- नम्युपगमाईग्यात् संयोगा व निपिवयात् । शरीरादीनां तु शानोत्पसिषेलायां सविधानेऽपि हण-दोगन्मय व्यतिरेकामुविधानस्य तलानेवपलम्भाधापेक्षाकारणरय कारपयितुं युकम्, सथापि ५ पाल्पनेऽतिमतः । देश-कालादिकं च विगुलशानणमापयिनः शानान्तरोत्पादने प्रपर्तमान: सापेशाकारण म प्रतिपिण्यते मुश्त्यपस्थायामपि, शरीरादिकं तु राम्यामपस्यायां कारणामापा. देयानुप नापेक्षाकारणं भपितुमईति । यदि च शेन्द्रियशरीरापेक्षाकारणमन्तरेण सनादेप गिनायुपेयेत नारायाभूतापेसाकारणजन्यमानस चक्षुरादिधानसेष प्रतिनियतविण्यत्वं स्यादिति 'सदसर्गः कस्यचिदेकनानामना, प्रमेयत्यातू, पञ्चालिपल्' त्यतोऽनुमानानुमीयमानं सर्पश-१० पानमपि प्रतिनियतविपयत्यान सर्पविषयं शात् । पदि पुनस्तग्नानं सफलपदार्थविषयस्याम् । तजन्यं "अयत् ममाणम्" [चारशा मा००१, ०२] ति पचनात् सेन्द्रियशरीरापेक्षाफा- रणात्यं पायुपगम्यते अन्यथा सर्पविषयत्यं न स्यादिति तदि गुपत्यपरथायामपि देहायपेक्षा- कारणाजन्य कि नाभ्युपगम्यते ! साधितं चानिन्द्रिय सफलपदार्थविषयमध्यक्ष शान सशसाध नप्रनाये रति न सेन्द्रियशरीरापेक्षाकारणजन्पत्याभावे समान प्रतिनियतविपयत्याभाषाभाष १५ पपायुपगन्तुं युनः। अपि च, सकन्दपदार्थमागत्य भानस्य स्वमाया, स च सेन्द्रियदेवापेक्षाकारणस्यस्पायरणे. नामामेऽपपरकायस्थितप्रज्ञादयपदरप्रकाराकसभापप्रदीप प तदापारलशरायादिना, तदपगमेनु प्रदीपस्य स्वप्रकाश्यप्रकाशक हास्यायमासिसमिति कयमावरणभूतसेन्द्रियदहाभा तदप- स्थायां भानस्यमापः नेत! अन्यथा मदीपावारफरारायाधमा प्रदीपस्याप्यमाया प्रेरणीयः २० स्यात् । परावादेरावारकास्य प्रदीपं प्रत्यजनकायमानीयम्, तथाभूतमदीपपरिणतिजनकल्या. प्रायादेश, अन्यया तं प्रत्यायारकत्वमेय तस्य न स्यात् , पेरिणामस्य च प्रसाधपिप्यमाणग्यात् । उपलभ्यते ॥ संसायपस्थायामपि धामीचन्दनकल्पस्य मुमुक्षोः सर्प समवृत्तेविशिएप्यानादि- ध्ययस्थितस्य सेन्द्रिपशरीरल्यापासन्यः परमाहादरूपोऽनुभयः, तम्येय भायनायशादुत्तरोरारामय स्थामासादयतः परमकातिरपि सम्माध्यत पयेत्येतदपि सर्पसाधनमालाचे प्रतिपादितमिति न पुनरुच्यते परमातस्यानन्दरूपतारमनः सापभूता तद्वियायफ.फमक्षपात् तस्यामपस्यायामुपाते। पान्तनित्यस स्थविरलिनरुपण्यामनो पस्किनुग-दुम्योपमोगोऽप्यनुपपला, एकस्यभाषस्य तत्र मायापरित्यागे मिन्नसुख-दुपारंवेदनोत्पादेऽप्यावास्येय तदनुभयाभायात् । तत्समयेन तदुर स्यादिकं तु प्रतिक्षितवान पत्तव्यम्, 'सान घोत्तरमानोत्पादनखभावम्, पप यसमा तत् गनुपादनेन्यापेक्षम्, यथान्या वीजादिकारणमाममी अरोत्पादने, तरसमायध शानक्षण उशानक्षणोत्पादने' इति समायदेव, अन्यथाऽसी तास्यमाय एव न सान् च संमागमस्यामानान्त्यसम्योत्तरमानजननखभापत्यमनियम्, तथान्युपगमे सनासंथर सत्यम्य निपिग्वान् सदजनफायेन तस्माननियाकारिपात् अयस्तुत्वापत्तेस्तजनकस्याप्या বাবল্লামাববিলানাহলুখ। থানয়িানবধি দলানাযোনিশ জননাঙ্গা क्षणायग्नुपमति नन्वेयं रमादरेककालम्य कादेरप्यामिचार्यनुमान साभयचितसम धनक्षणमुनियादिनो पारम्प न स्यात, कादिरस्पक्षणय पिशातीयफायजनकरधेऽपि कार्यानारम्भगंभयान । मध्यधीनरवेन प-मयोनियमेन कार्यद्धारमा ব্যায়াম ( স লা 'ধীগিখানাযীবি মানামা भेगमानुपयोगिनभ्यायनोपयोगधरमक्षण! अपयोगे पी मानान्तरप्रत्यक्षपादिनोड 1.1.1 पृ .५.14 मो... (14. १५७.११५५१-दस्यमा-आ.

* - प्रयमे काटे- कम्य स्वविषयमानजननाममर्थम्यापि ज्ञानमार्यमानजननमामय न मा मयाब चिन्तनमुसीदेत् । अय म्यमन्तानवनिकाशननसामध्यया मिनगमानयनिकारजननमः मपि नेप्यो ताहि सधार्थक्रियामामा दिनयेनानन्यभन्यासस्नुल्यममनिः । मयाविध- धस्तुत्ये सर्पयाऽर्थमियारहिन माणिसम्यापि पस्नुन्यप्रमनिः। तथा य मरवादयः भमिक ५ साधयेयुः अनेकान्तिकवान् । तसार सराध्यचित्तसन्माननिरोपलशगापि मुनिर्षिशेष साग्मसरूपयाऽनुपपना। निराध्वचित्तसन्तत्युत्पत्तिलक्षणा स्यम्युपगम्यत एवं, केवलं मा चित्तसंततिः मा युक्ताः यसो हि मुच्यते नायद्धः। नव निरन्वये चित्तसन्ताने पदम्य मुचिः संनयति, हान्यो पद्धोऽन्यथ मुच्यते, सन्तानन्या पद्धव मुक्तिरमापनि येत्, यदि सन्नानार्यः १०मार्थसंस्तदाऽऽत्मय सन्तानशब्देनोनः सात्, अय संवृतिसन् तदैकस्य परमार्थसतोऽसत्ता पद्धोऽन्यश्च मुच्यत इति यद्धम्म मुफ्त्यय न प्रवृत्तिः स्यात् । अयात्सलनानात्वेऽपि रद्धा- क्षणानामेकन्याध्ययसायान् यद्यमामानं मोचयिष्यामि' इत्यमिमन्यानयतः प्रवृसेनायं तदिन नेरात्म्यदर्शन मिति कुतस्तशियन्धना मुक्तिः ? अयास्ति नैरास्यदर्शन शानसन्कार- न ताकत्याध्ययसायोऽस्यलदूप इति कुनो यस मुस्त्यर्थ प्रत्तिः स्यात् ? क्या १५"मिथ्याध्यारोपहानार्थं यतोऽसत्यपि मोरि" [ J इत्येतत् लपते । तसाद विज्ञानक्षणान्ययिनि जीवे बन्ध-मोक्षयोलदर्य वा प्रवृत्तेनुपपत्तेः सान्यया चिसन्ततिर गन्तव्या । न च 'यलिन व्यावनमाने यदनुवर्तने तत् तत एकान्ततो निनम् , यया घटे व्या मानेऽनुवर्तमानः पटा, ध्यावर्तमाने च ज्ञानक्षणेऽनुवर्तते चेजीवस्ततस्ततो मिन्न एवं'-अन्द २० विरुद्धधर्माध्यासेऽपि योकान्ततो भेदो न स्यादन्यस्य मेदलक्षणस्याभावादभिन्नं सकलं जा स्यात् इत्यतोऽनुमानात् व्यावृत्ताऽनुवृत्तयो दसिद्धर्न सान्दया निरावधचित्तसन्ततिर्मुक्ति वक्तुं युक्तम्, असति तत्र पूर्वापरमानक्षण-यापके आत्मनि स्वसंविदितैकत्वात्ययस्य प्रत्यक्षस्य पपचे। मयात्मन्यसत्यप्यभ्यारोपितक(कत्व) विषयःप्रत्ययःप्रादुर्भविष्यति, अयुक्तमेतत् साल नुमानात् क्षणिकाचं निश्चिन्वतः समारोपितैकत्यविषयस्य विकल्पस निवृत्तिप्रसङ्गात् निश्चया २५ मनसोर्विरोधात्, अविरोधे था सविकल्पकत्सावादिनोऽपि सर्वात्मना प्रत्यक्षेपार्थनिधये- समारोप बिच्छेदाय प्रवर्त्तमानं न प्रमाणान्तरमनर्धकं स्यात् । निवर्चत पपैकन्यविषयो । ल्पोऽनुमानात् क्षणिकत्वं निश्चिन्यत इति चेत्, तहिं सहजस्याऽऽभिसंस्कारिकस्य च स- दर्शनस्याभावात् तदेव तन्मूलरागादिनिवृत्तेमुक्तिः स्यात् । न घायमेकन्यविषयः प्रत्ययः प्रतिसल्यानेन निवर्तयितुमास्यत्वान्मानसो विरुप २० तथाहि अनुमानयलात् क्षणिकत्वं विकल्पयतोऽपि नैकत्वमत्ययो निवर्तते, शस्यन्ते तु भी सहानेन निधारयितुं कल्पनाः न पुनः प्रत्यक्षबुद्धयः । तस्माद् यथा अश्वं विकल्पयतोऽ गोदर्शनान गोमत्ययो विकल्पस्नथा क्षणिकत्वं विकरायतोऽप्येकत्वदर्शनात्रैकग्यमत्सयो विकल्प नाप्ययं प्रान्तः, प्रत्यक्षयारोपस्यापि भ्रान्तत्वमसात् । याताभ्यन्तरेषु भारप्वकत्यप्राहकत्वेनैयारे प्रत्यक्षेणानुत्पत्ति(प्रत्यक्षाणामुत्पत्ति)प्रतीतेः, तथा च प्रत्यक्षसाम्रान्तत्वविशेषणमसम्भव्येव स्थान ३५ तस्लादेकायमाहितः स्यसंवेदनमत्ययाऽम्रान्तस कश्चिदेकत्वमन्तरेणानुपपानुगतरूपाभावः। नाप्यनुगत-ध्यात्तरूपयोरेकान्तिको भेदः, तन्दप्रतिपादकस्यानुमानस्य तदभेदनादकत्य- मस्पपशापितत्वात् । न च प्रतीयमानस्य रूपस्य निरोधः, मन्यथा ग्राहल-पादक-संविचिदा विसाध्यासितस्य मानस्याप्येकत्यतिरोधा सादाता, एकनीलमणस्याप्येकदा सपरकार्य पत्यानरत्यविदधर्मशायासितकन्यविरोधसक्तिः। नेयायियेनापि प्रतीयमाने पनि ४० पिरोपोगापन विधेपम्। अन्यथा स्थाणुरयं पुरतो या त्याकारण्यसमुतिसंशयास्परस्पाध्येक विचमाराम्यता - १-भय-मो. भी.। १-मागेपिरि-भा.दा.। 'मिग्वेषु सनम भरे गा प्रातिपटीने." पृ.९१., पं. ८ ॥ ३ पत्र परे प्रमेय. मा ईशः पाह" যমীন : ঘামী এম আমমনাযৗবনে', বি বিম্। থানা এলসাঘমামা। দু 'দুঃমিবিয়াছিনাথ, সহকারি চুপি' বানান ‘শিবিমােনাখাড়াবিনামালামনিনেনিউমাঘ নিবো न्यानिकोलायनं मानिनिघेनारोग्यासमाहिलारपेशधिगमाधिशेन ने तर নগৰকালিকাশ। ল গানাহমষ ঘষে-মায়ানী মানুষী যারা ঃ ৫ प्रपनन्ते, "मोझे मरेप सत्र निरो मुनिमनमः" বোনা। যয় ‘বিয়ালমান নে মােয়ামাখমানবাহন' সামৰি, নন- तमामुपापापामा ताफल्मनोपरा नयन किशित मनीति प्रतिपादितम् । , ঘোখিমা ' শােন শখি লিবীদারি নি। गपि नित्याग्वाभ्युपगमेन विकल्पापम् स्यानिदिनं तदप्यानरमादेर निगलन्। रियल বাঘা নামা। যা অনৰিাৰ মাঘমাদন যা খাবােটিক নিয়মাসে মাসুম মাজিলিপি। নাম জানা ঘি মাসিমা মেশিন খাল নীল নাগমামলাই বিনির্যাস। র ‘নিয়াবি খাল বিলীয়ানা ঘামা খৰি -৬ fe' লােহি, বি মণিসিম সাসমীনাম স্বাধীন বা শাখা। বাসায় মা মামির ‘ন লন্ত বা মাবি মানাম কেমন যা তখনি শাে, বি মন “সাংবায় নিষনায় বেশি। এর মানে সে उपे सन्तागान्तरि जानजनक नियमलोगभाग र दिमित যে, নিবামৈৗমায়ুন । ঘ মুন্নাথ বিতাম আমার এ বিশা’ , s বিপিন র শ মাখা কােপিনা। যা-লিকা বি ত্রিপল খালেন মাখমা ক কাম্য শুধুমঘাষামােগ্রাফি নিস নন। চামনি দালায়হানবি না মানলে মন সিমান-সয়া দিবসগাহাম কাে সুল চিলা' নানুপৰিল মিস - - मामिप्यनुनामि मा माविमति पानामा মুখ নামবিষয়া নালাগেনা, গ্যা হায়েযায়। এ কারণে স্থা দিয়াৰী ন । মেথি সাহা না মামা বলেলাম, যার যা বলয় বা নলক মানবীয় সূর্য। হৰি ৰাষণা দেয় না মি ফুল নামা খাল বালকনি, দেশ, মা গঠন না। তাই } १६४ प्रयमे बार- धर्मिण्यमारल्यनेकानसिम्र याकमुपन्य नद् अाधामय प्रतीयमाने वस्तुति सिशः। न येमेर रूपेण नित्ययविधिगनेर प्रनिनिधि-नायकराविरोधा . निगुस्युनाकारतया नित्यन्यविषयांवृत्ताकारतया मप्रतियः। मानवी योत्रिधि-प्रतिषेधयोरेकर विरोधः, अनिमात् । न चानुगतामाग्योः सामान्यति .५याऽऽत्यन्तिको भेदः, पूर्वोत्तरकालभाविपर्यायतादाम्या म्यिन्यानुगताकारभ्य बाड़ा स्थास्यायाधिनप्रत्यक्षप्रतिपत्ती प्रतिमासनाम् । योदम् 'घटादिमृदादिम्पनया नित्य इत्या मृदुपतासाम्लोप्रान्तरत्वान नलो पटो मृदूपता हि मृत्यं सामान्यमर्यान्तरम्, तम्य नित्य न घटम्य तयानायलनोमयान घ कारणाद् बिलयोपलधेरनित्यत्यमेव' नि, अयुक्तमेनन, सामान्यम्य विशेगडयांना १० पत्तेः समानासमानपरिणामामको घटायोभ्युपगन्तव्यः । तथाहिन तारन् बामगार भूता मृत्वज्ञातिः सत्ता या, स्वाश्रयैः संबन्धामावान समजन्मात् प्रागसद्भिरपि माया से तिप्रसङ्गात्। स्वत एव सद्भिः सत्तासंयन्धकल्पनायेयस्यां । समनापस्य सवैगनवाद ! न्तरपरिहारेण ध्यपत्यन्तरेव सर्वगतस्यापि सामान्यम्य संयन्ऽतिममपरिहागया युगा च प्रत्यासत्तिः प्रत्येक परिसमात्या व्ययत्याममूना घाभ्युपगम्यमाना कर्य समानपरिमामाति १५सामान्यस्य कल्पना न निरस्येत् गुल्लादिवथ स्वाश्रये खानुरूपरत्ययादिहेनोः सामान्या प्रत्ययादिवृत्तिनं भवेत्? सामान्या नु स्वत एव सदादिप्रत्ययादिविषय द्रध्यादिपु का परतश्चेदनवस्था । अनध्यारोपिततद्रूपं च तन्प्रत्ययादिवृत्तातिप्रमशः सान् । तद्रूपाप्यार तत्प्रत्ययादिश्चान्यत्र भ्रान्त पर प्रसक्तः। समवायमपि च ताप्यमेव समवायिनोः पक्ष्यामः, अन्यथा तस्याप्याश्रितनया संबन्ध २० कल्पनाप्रसङ्गात् तत्र चानवस्थायाः प्रदर्शितचात् । विशेषणविशेष्यमावसंबन्धे न्यारत कर वस्था । समवायात् तन्संबन्धकल्पने इतरेतराश्रयत्वम् । अनाधिनस्य तत्संबन्याम्यतिम तस्य स्वतः संवन्धे या सामान्यस्यापि तथाऽस्तु विशेगमायान् । सति च अलुद्वय मा 'इदं सदिदं च सत्' इति समुचयात्मक प्रत्ययोऽनभूयने, न पुनः, 'इदमेवेशम् इति: द्विवक्षितैकव्यरत्याधेयरूपस्य च सामान्यसाशेषणयग्रहणासंभवान कदाचनापि तस्स से २५ प्रहर्ण स्यात् । तद् व्यक्त्यनाधेयरूपासंभवे तगतरूपादिवत् तन्मात्रमेव म्यान् । स्वायत सामान्यवादस्तु परिणामसामान्यवादान विशिष्यते, प्रत्याश्रय परिसमाप्तन्यसान्यथानुपपत्त्या ज्यसंयन्धशून्येवपि द्गव्यादिषु पदार्थादिप्रत्ययान्वयदर्शनाच । नाप्यन्यस्य व्यावृत्तिः, स्वलक्षणगतायाः प्रत्येकपरिसमातायाः परिणामसामान्यादभिः व्यावृत्तेः। तदाश्रयान्यानेफव्यक्तिसा-- मान्यस्त्रि ३० तसिंयाधस्तुभूते शब्दप्रतिपादिते त" वृत्तिरपरिफस्पितरूपे कथं सात् ।।. प्रयतेत । न च विकषितस्य सामान्यस्थावस्नुभूततया केनचिद् घट्येन साम्प्यमलि, सन सारुप्यम्य किं दृदय-विफल्यकीकरणाचोयुत्या ? तदेय दृश्य सामान्यमाने प्रतिमासते, । मासाथ तय तिरिति कि न स्फुटमेगाभिधीयते अवस्यारस परतुना सास्यासमवान् ? फिश, श्य-विकल्ययोरेकीकरणं दृश्ये विकल्प्यस्थाप्यारोपा, स च गृहीनयोरगृहीतय यदि गृहीतयोग्लदा सस्य-विकल्ययोभदन मतिपत्तन ये विकल्याप्यारोप नहि घर- पयांचाता-आ.,., दा., दा., गु.। मेयरमलगान?-पर्यायतादा-त्य पाळी दस्यते-2 १३ २५. १५५६.१२। गपितम- गयारोपपति तात्मन्या. पा.1 ४ धाऽभ्यु- वि० प्रती समोधितम् । • १५.५.११| - या स- माघ । गुदया-का। ज्यभ्यम्पे-या, 4. भा., म ..-यक्षिमे) कि- मा १७ यायिता म्य-मा- ., म.ना पक्षणे मला परि- प्रिना गपितम् । सणे airtri- कृतिपरि-2..नि .-- -पायो-मा.मां.) ३-माना ध्य-का-। ..

सुटिन মিয়ত্ৰেথস সনিমাৰমানবাহযোগ্য, অনিমা। মানবীঃ ঘন্ট, अतिप्रसमायमच श्ययुद्धी विकस्य प्रतिमाति, नापि विस्दबुद्धौ पन्नाला यमतिमासमानयो रुप रसपोरिय परसरामारोप, मालनियन्धनधान्यापारः इरभ्यो पस्यपरखनोध माल-पसीपयोरिय साकलामारतो मापापेर विदिशारिटन्। म रायपसापिविकरयकुमाद पर सदम्पारोर, तदुर सारिपत्याची ५ पपचरनन्नरमेप तस्या धस्तुवकपमाहिसविकलापपवन सरस्थापिटवारा की मेनापि परिच्छिमानेऽपान्तरल्यावृत्तिरुपेनको सामान्य प्रयोगशालाकानि- माविषयमनुमानम्, अनपपराइबस्तुमानवियतारित देव परिणामाम् । अनुभ्यने च मानाया निशानुमानेर-अदिदिक प्रमानान्तरानभ्युपगमात् । तपादि-प्रत्यार पानेन सारिन ने धादिमावनिपतिदर्शनम् भिरारने बानपरिधानापन्न, भावे सदाभवाननु चदि ममानिसलान्, बन्दुर सामान दिनापानन्या इचिनिरहर पर नामानि, नप दोषः निम्न पटलिपनामटरमना मन्ना इन्टर কি আ বান্নের ঠিকা মূলে प्रतिसरन्पन्चान् उत्तम प्रतिस्पतरोधर तिरिन्टेन पंपरफान्नवादतिरेपनि नानेमन्टग निकलना पारि स्वादिपु म परदेशाविरन् इन्टुन्टन्युरो पपमा मादि. दरमा टरेट प्रभावर निस्मन् । असद निराश पादि मामा पोदमले दहा सदर मियाद पता नाम 'भाभादेन मेद पर न टन्दिर भन्योन्यामाः मनसते । कमिटर मादी प्रद निभानाव संम्वाद र मिमोमियो का मन कामन्द्रसमस रोपियन सहापामारमा असर गराई were: मगामाराससमाप्रमाणे Poarina free, wirect क्षाम, दाम अनि म Reindia TIMERes reciatimes ARTICEREATretirizrryncr: manatrim • Fri, ur reprent . Haripre- प्रथमे काण्डे - धर्मिण्यभीयः' इत्यनेकान्तपक्षस याधकमुपन्यस्तं तद् अबाधकमेव, प्रतीयमाने यम्नुनि विर सिद्धः । न च येनैव रूपेण नित्यन्यविधिस्तेनैव प्रतिवेधविधि:-येनेकन्याकयाविरोधास्या किं तहानुस्यूताकारतया नित्यत्वविधावृत्ताकारतया च तम्य प्रतिषेधः। न चान्यधर्मनि योर्विधि-प्रतिपेधयोरेका विरोधः, अतिमसात् । न चानुगतच्यावृत्ताकारयोः सामान्यति शेषण .५याऽऽस्यन्तिको मेदः, पूर्वोत्तरकालभाविवपर्यायतादाम्येन स्थितस्यानुगताकारस्य याऽऽध्यारि स्वार्थस्यावाधितप्रत्यक्षमतिपत्ती प्रतिमासनाम् । यश्वेदम् 'घटादिर्मदादिरूपतया नित्य इत्यत्र मृदूपतायास्ततोऽन्तरत्वान्न ततो घटो नि मृदूपता हि मृत्रं सामान्यमर्थान्तरम्, तस्य नित्यन्ये न घटस्य तथामावस्ततोऽन्यत्वात् - च कारणाद् विलयोपलम्धेरनित्यत्वमेय' इति, अयुक्तमेतत्। सामान्यस्य विशेगदर्यान्नरमा १० पत्तः समानासमानपरिणामान्मको घटायर्थोऽभ्युपगन्तव्यः । तथाहि-न तापत् स्थानयादर्यान भूता मृत्बजातिः सत्ता या, स्वाश्रयैः संबन्धामायात्-वसंबन्धात् प्रागसगिरपि साश्रयैः संबन तिप्रसङ्गान्, स्वत एव सद्भिः सत्तासंबन्धकल्पनायेयोन् । समयायम्य सर्वगतत्याद्र न्तरपरिहारेण व्यक्त्यन्तरेव सर्वंगतस्यापि सामान्यस्य संयन्धेऽतिमसङ्गपरिहारायाभ्युपगम्यम च प्रत्यासत्तिः प्रत्येक परिसमाप्त्या व्यक्त्यात्मभूता याभ्युपगम्यमानाकर्ष समानपरिणामातिरिग १५सामान्यस्य कल्पनां न निरस्येत् मुलादिवश साये स्वानुरूपप्रत्ययादिहेतोः सामान्यात समा प्रत्ययादिगृत्तिर्न भवेत् ? सामान्यस्य तु स्वत एय सदादिप्रत्ययादिविषयत्ये द्रव्यादिषु काम परतश्चेदनयस्या । अनध्यारोपिततद्रूपे च तन्नययादिवृत्तायतिमसमा स्यात् । तदा योग तन्प्रत्ययादिधान्यन प्रान्त एवं प्रसक्तः । समयायमपि च तादूप्यमेय समयापिनोः पक्ष्यामः, अन्यथा तस्यायाधिवतया संपन्याट २० फरानाप्रमहात् तत्र धानयस्यायाः प्रदर्शितत्वात् । विशेषणविशेष्यभायसंयन्धेऽप्यपरलकरने पम्या । समयायात् तत्संयन्धकल्पने इतरेतरामयत्वम् । अनाधिनस ससंयन्धाऽयतिप्रमा तम्य म्यतः मया या सामान्यस्यापि तथास्तु विशेषाभायात् । मति व परतुदये गणित दं गदिदं व सन्' इति सण्यामा प्रत्ययोऽनुभूयते, न पुनः मेयरम्' इति : विपशिनेकण्यायाधेयका सामान्यायमणाभवान कदाचनापि या संपूर्ण २५ प्रणं मात् । तर व्यायनापेयापासंभो समादियत् सन्मानमेय मा | पास गामान्यपादस्तु परिणामसामान्ययादार विशिष्यते, प्रत्याभ परिसमान्यस्यान्यपानुपपरा परंपराग्येप्यपि प्रन्यादिपु पदायाँदिमस्ययावन्यपदरांनाच । লস লিঃ, কয়লাবাহা লিমাখা; বাগােয়ালি म्यानः । दाणाग्याने तिगाधारणा पुरिपरिकाित्ति: मागायमित निधान्मने मानिाति तयारि गाभानिकियार्थिनां लग निरिनि कयं मान- विजय) योगीकाणेन प्रती गायुगा नाम पिकविता गामायणापा मनगि मेन गारपति, गाणे নগয়েশ্বলােপাথালা সংহে দাশগান মিল, পশ্ন- মাশায় পথ সুপদি fল দেখি শাশ্বপাল থানা শানু fra, शकिरीका ये किला गृहीतयोगीयो af irrar-रिपादन प्रकिय frIITTI परमार HTT. Fr....... SARITATEringraft मा::ktisha) wrr • ५.१.१ naynitam Pre-- -- ratogirl ferred: .., ari gharti fe rrrrrheen gr ३.मरवा दम-t..

मुतियRITRA मिसम्यरूपतया प्रतिभासमानयोरेकलापरवायारोपः, अतिसाद नायगृहीतयोस सभापति, सनिप्रसमादेव। पुसौ विक प्रतिभाति, नापि विकरमधुनी दस्यम् । न कधुना पतिमासमानयो रूप-रसदोरिष परस्परापारोप. सारस्पानिधनधान्पत्राप्यारोपः उपलायो पत्यवस्तुनोध मोल-सरविरामयोचि सारयामाचतो नामारोप इति प्रतिपादितम् । नब साम्यवसानिविकरमधुमपाद व तदप्यारोप, सहदे सरसावरियासानायव्यवस्थापकत्वो- ५ रहेननरमेव तथा वस्तुसकामाइिसरिकल्पापरूपत्वेन व्यवस्थापितस्यात् । तथा, अनुमा- मेनारिपकिमानेऽन्तरम्यावृत्तिरूपेऽनरूपे सामान्य पहियवृत्तयोग पर । नातदूपन्यात्ति. मारिनुमानम् अनुपपस्तुमाविषपचादिति चेत्, के तर पस्तुमाधमन्यत्र समान परिमाना! अनुभूयते च सामान्यम्-अलिङ्गसत्याभानुमानेन-अरिसंपादित्वाद प्रत्यक्षमाणेन प्रमालान्तगनयुपगमात् । तपादि-प्रत्यक्षेपंप हानेन शाखादिरिमागमपरिजिन्दताऽपि दीपति १० हेरो शादिनारतिपतिदर्शनम् सनिराकरमे वानुमतिरोधःन च साम, समानपरिषांना मा तदसमगद । ननुबपादि समानपरिपामा सामान्य, तस पस्तुनः सजागीयादपि परिमानार् निमय तान्यानवयान निदरहीन संपन्धेन शन्देन रिन पाऽन्यस्य ज्ञानीयस प्रतिपादनं नमोनि, नेप दोष, मिनरेऽपि वस्तुतस्तसिनाभितदेवादिदे समानपरिजममारे सदस हिमा का तापमाप संडेतितवान् संपन्धं पृहीतवतोऽन्यत्रापि सपरिमानमांजेज मेद-१५ प्रतिस्तरउन्मादात् सत्ता प्रतिपत्पविरोधाल दो। प्रतिसादपिप्दने च नित्यानित्लापनेकान्त सपम्मानपादमतिपेनेति नानेकान्तमान मियाज्ञानम्। যৰি মাৰি মাৰ ইয়াৰ সুবীর যে না भगवान् स्वादि, सदप्पपुरन्तरेतरामापर पपस्यमेरे पपिना पटोत्पसिम्पकार या मापस्य पिनबार । अप घराद् मियोऽभारलदा रादीनां परस्पर मेहो न सात् १२० घामावा पटोनमति तदा पटो घर ष साद, पदावा स्टार पटामाचार निपचार माता तथा पारपिसाद यामापा भिमारेषा माप्दे पनि मानमान मे रायते कर्तुम् , तर निभाऽनिधमेदारतिक्षिारयाद । म पानिधाना- मायोकामा समपति । नापिएरसरभिधानामभान मेद निपटे, स्वम्प एष मिना मुपतेः । नापि मेदाम्पहार नियो, दतो मापानामानीपायोपचिप सनोमा सप प्रकारे प्रतिमारनारेय मप्पपहारहेन तेन "एस्पसंगरमिति: AHINधिता" । निरिम्नम् । विश, मायानापोदो नामापनियन- सनरान्सहार। मप दो दलदा भावानामपि स सादिति किमामान लिन बिरिलेन ? निपोऽभियोगदपनापासमति । म पामार पाडल, चार सामान्यसा सपाटा रसोर-. भाटापारादिना सर्व तपारपरदेश-कासाकापदिनापि, या सतिसाद परेशादिषसते न सोलर पम् अप परेशादिर योगदान सास्सि दासपामापनि: अपप्रेष सायं हरेष पसायमनशमपि रासाये पसरगनुप्रयपतरासपासर अप सो पसलहा सामान मास्य-पादि समापासार ससा हा मार परमदिर.१५ निपारितसरा, सिप । म प सनिलिन समिति पापम्पमसात् । ৬ মাঘষিয়া ঘা ক্লাসে বা মা, সব অমৈণ TIMERITरि परमार शाम REET ranामिनोलाम! afterriere arerin Arr.। काम.. - EP..! - मधमे काण्डे-- धर्मिण्यमायः' इत्यनेकान्नपक्षम्य याधकमुषन्यस्नं तद् अबाधकमेय, प्रतीयमाने परतुनि विरोध सिद्धः। न च येनैव रुपेण नित्यन्यविधिस्तेनैव प्रतिपेयविधिः- येनकन्य(क)विरोधः मान-- किं तानुस्यूनाकारतया नित्यचविधावृत्ताकारतया च तसा प्रतिषेधः। न धान्यधर्मनिमित योविधि-प्रतिषेधयोरेका विरोधः, अतिप्रसहान् । न चानुगतन्याहत्तालाग्योः मामान्यनिरोगपत- :५याऽऽत्यन्तिको मेदः, पूर्वोत्तरकालमारिसपेयर्यायतादाम्येन स्थितत्यानुगताकारस्य याहाऽऽपारिमा- स्वार्थस्यायाधितप्रत्यक्षप्रतिपत्ती प्रतिमासनात् । पदम् 'घटादिद्दादिरूपतया नित्य इत्यत्र मृदूपतायारलनोऽर्धानात्यान तनो पदी नित्या, मृदूपता हि मृत्यं सामान्यमान्तरम्, तम्य निसचे न घटम्य सयामारस्ततोऽन्यत्यान् पदमा घ कारणाद् विलयोपलधेरनित्यन्यमेव' इति, अयुक्तमेनन् । सामान्यम्य विनगदयोन्जरल्यानुर- १० पत्तेः समानासमानपरिणामामको घटाययोऽभ्युपगन्तव्यः । तयाहि- तार माभपादनांना भूना गृत्वजातिः सत्ता या, साश्रयः संबन्धामायान-स्यमयन्धान प्रमझिापि सारायः रामः तिमसमानु। स्वत पय सन्निः मत्तासंपन्यकरपनायेयध्यान् । ममयायम गर्यगतम्याद पर न्जरपरिहारेण स्यात्यन्तररेय मर्यगनस्पपि मामान्यमा संपन्धेऽतिनगरपरिहागाभ्युपगम्यमाना प प्रत्यामत्तिः प्रत्येक परिसमाभ्या व्यायामभूता पान्युपगम्यमाना कयं गमानपरिणामानिनियम १५ सामान्य करानां न निरन् गुहादिया मानये स्वानुरूपनत्यपादिदेनोः गामान्य गादि प्रस्यादिनिन मरे! सामान्य तुसन पप सदादिमन्ययादितिया हमादिपु कन? पग्नधेदनयम्या । भनारोपिततद्रूपं च तमसयादिसायतिमा मात्। समागील तमायादिधाम्यत्र माल एयरानः। মৰামৰি ন বাসদ বিলীঃ ঘাম'। প্রথা বাদাসিধা ६० नागात् गर पानपम्या प्रतिगात् । निरपिशवायन অধ্য। মা সান সীসাথষম। নালিল সমানিয়া। am REE या गामायापि तानु विशेगमात् । गति च पराये गरिने गिदिन' प गन्' पनि गर्नुपणाम प्रापयोनुभूपने, मंगति; ter বিসদালাল মাপাসােসবাগ জানি গো প্রদ । সৰু পক্ষপনাস্তামি সাথি লাগা । মায়া सामरिकामपामायालाम विशिष्ण, प्रभा परिममायापपानुपाया सामा मायाकल्यादित राधादियशापयानाथ । সকাল পশি, প্রশাসঃ মুপাগলে লাগিলা मायामानानिमाया बुधिािनाति नामानि म मनिपानि सामाग्यमाnिelifiliat Amit मिति () पोनी गोgarm frie AIRTIममातिन ति, मनावका arentinानणारा गामापाने प्रभाग PATTwiगानिधीने IITTITargना HTTE frre from maintain ME MAtm frrrrTTITI werरी * * • r. a..storimar Kargirit..., init.org-THERE . . । *6.

मुसियापार जिसनया प्रतिभागमायोरेकाम्या पराप्यारोपः, अतिप्रसमाम् । पाध्यगृहीतयो म संभपति, अतिप्रसहाय ! पुसी निकर प्रतिभागि, नापि विपरययुशी रयम् । न चैकयुमा मातिमानमानयो रुप-एमपोरिय परपराध्यारोष, सारस्यनिधनधनशान्यत्राप्यारोपः उपलग्यो धस्थरस्तुनोध मील-रविगणयोरिष साप्पामायतो माभ्यारोप इति प्रतिपादितम् । नच स्वायसापिविकल्प्यधुपाद पर तदस्यारोपा, समुझे सशपरिणामसामान्यव्यवस्थापकायो ५ पपरिनन्तरमेष तस्या परसपमाहिलाविकाक्षरुपायेन व्यपस्थापितापात् । गधा, अनुमा- मेनापि परिस्सियमानेऽन्तरम्यातिरूपेऽनरूपे सामान्ये यहिपृश्ययोग पपा मातभूपध्याति. मात्रविषयमनुमानम्, शतरूपपरापमाषपिपपत्यादिति चेत्, ति सद् पम्नुमात्रमन्य समान परिणामात् ! अनुभूयते च सामाग्यम्-भलिजन्याभानुमानेन-भपिसंपादित्यात प्रत्यक्षप्रमाणेन प्रमाणान्तरानभ्युपगमात् । तथादि-प्रत्यक्षेणेष कानेन मारादिविभागमपरिहिन्दताऽपि पीयसि १० दो शादिमात्रतिपत्तिनम् तमिराकरणे घानुमपपिरोधः । न च सारश्यम् , समानपरिणामा भाषे तदसंभयात् । ननु चयदि समानपरिणामा सामान्यम्, तिथ पस्तुना सजातीयादपि परिणामाद विमततपाऽन्यत्रानन्ययाद कचिद् दीतसंपन्ग शदेन लिन पाऽन्यस्य सजातीयस्य प्रतिपादने नमामोति, नैप दोषः, विमनेऽपि परततस्तसिमानाभितपेशादिमेदे समानपरिणाममात्र सदस्य लिव या तापमानष संशतितत्यात संपन्धं गृहीतयतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममात्रेण भेद-१५ प्रतिपरजन्यापात् तत्तया प्रनिपत्याविरोधात दो। प्रतिपादपिण्यते च नित्यानिस्थापनेकान्त रूपं परन्धेफान्तपादसिधेनेति मानेकान्तमान मिप्याज्ञानम् । पदपि 'म्वदेशादिषु सत्यं परदेशादिप्यसत्यं पस्तुनोऽभ्युपगम्यत एप इतरेतरामापस्याभ्यु. संगमान्' त्यादि, सम्प्पयुक्तम्। इतरेतराभाषय घटपस्त्यमेरे घटपिनाशे पटोत्पत्तिप्रसमात् पस प्रभाषस पिनष्टत्वात् । अय घटा मिसोमायस्तदा घटादीनां परस्परं भेदो न स्यात् ।२० पदादि घटामावरूपः परो न भवति तदा पटो घर पप स्यात्, यथा था घटस्य घटाभावाद् मिपायाद् घटरूपता सपा पटादेरपि स्यात् घटाभापार मिनत्यादेय। नाप्येप परस्परामिनाः 'नाममावेन भेदः शमयते फर्नुम् , तस्य मिनाऽमितमेदकरणेऽकिकिरपात् । न चाभिधाना- मन्योन्यामाः संभवति । नापि परस्परभिमानाममावेन मेवा मियते, स्वहेतुभ्य एथ मिधाना. मुस्पतः । मापि भेदण्यपदार पियते, यतो भाषानामात्मीयरूपेणोत्पतिरेप सतोमेदः, सच २५ अपने प्रतिभासनादेय मेदव्यवहारतः तेन "पस्यसंकरसिद्धिध तरप्रामाण्यसमाधिता" रति निरस्तम्। किश्व, भाषाभाययोर्भदो नाभापनियन्धनः, अनपस्थाप्रसहात् । भय सरूपेण भेदस्तदा भाषानामपि स स्पादिति किमपरेषाभाषेन मिन विकल्पितेन ! तोकान्त- 'मिमोऽमिसो घेतरेतरामाया संमति । नधाभाप एयान्यापोहस्य, घटादेः सोरमपरयमसात् । तथाहि-यथा घटम्प स्वदेश-३० काटाऽऽकापदिना परवं तथा यदि परदेश-कालाकादिनाऽपि, तथा सति स्वदेशादित्यपत् परदेशादित्यास कार्य न सोरमकस्यम् । अप परदेशादिषषत् खपेशादित्यमपि तस्य गास्ति तदा सर्पधाभायमसतिः अप यदेष स्वसस्यं तदेष परासस्थम्। नन्वेषमपि यदि परासरये ससस्यानुप्रयेशस्तदा सर्पधाऽसत्यम्। अथ व्यसाये पसरपस्य तदा परासस्थामायात् सर्षा. रमकरयम्-यपादि स्वासस्वासस्थाए स्वसस्य तस्य तथा परासायासापात् परसरयमसक्तिर-३५ निधारितसरा, अविशेषान् । नच पास कल्पितरूपमिति म तधिपूतिः परसस्वास्मिोति याच्यम्, स्वासस्वेऽप्येपंसात् । अप नामापनि वृपा पदार्थों माया प्रतिनियतो पा भपति, अपितु स्वहेनुसामप्रीत उपजायमानः स्यस्वभापनियत पयोपजायते। तपैयामामभाविनायो पिपयोक्रियमाणो म्यपहारपधमतार्यम क्रिमिनरेतराभाषकरुपनपा! किशिन फेयले स्वसामनीतः स्वस्समापनि ३ - 1-गामा-पा। -मानतोऽपि पि.। - सामान्यपरि-मो. मा• r-मतिपत्ति- ५-पामभा-दा.. -माजामेवा। ५-सपटाभान्दा...। १. पदा मी., मो. .

१६४ प्रयमे काण्डे- धर्मिण्यभावः' इत्यनेकान्तपक्षस्य बाधकमुपन्यस्तं तद् अबाधकमेव, प्रतीयमाने घरनुनि विरोधा- सिद्धेः। न च येनैव रूपेण नित्यत्यविधिस्तेनैव प्रतिपेयविधिः-येनेकन्य(का)विरोधः म्यान्- किं तहनुस्यूताकारतया नित्यत्यविधावृत्ताकारतया च तस्य प्रतिषेधः। न चान्यधर्मनिमित योविधि-प्रतिषेधयोरेकत्र विरोधः, अतिप्रसङ्गान् । न चानुगतव्यावृत्ताकारयोः सामान्यविशगएन :५याऽऽत्यन्तिको मेदः, पूर्वोत्तरकालमाविस्सपर्यायतादाम्येन स्थितस्यानुगताकारस्य थाहाऽऽयामिक स्थार्थस्यावाधितप्रत्यक्षप्रतिपत्ती प्रतिभासनात् । यचेदम् 'घटादिर्मंदादिरूपराया नित्य इत्यत्र मृभूपतायास्ततोऽन्तिरल्यान तनो घटो नित्या, मृदूपता हि मृत्त्वं सामान्यमर्यान्तरम्, तस्य नित्यत्वे न घटस तथामावस्ततोऽन्यन्यात् घटना च कारणाद् विलयोपलम्धेरनित्यत्वमेय' इति, अयुक्तमेनस्। सामान्यस्य विशेगदर्घान्तरल्यावर १० पचः समानासमानपरिणामामको घटाचर्थोऽभ्युपगन्तव्यः । तथाहिन तायन सामयादयांन्तर- भूता मृत्त्वजातिः सत्ता घा, खाश्रयैः संबन्धामायाव-स्ससंबन्धात् प्रागसद्भिरपि साश्मयः संपन्धे । तिमसहान्। स्वत एव सद्भिः सत्तासंयन्धकल्पनायेयान् । समयायम्य सर्यगत याद् ध्यपल्य. न्तरपरिहारेण ध्यपत्यन्तरेय सर्पगतस्यापि सामान्यस्य संयन्धेऽतिप्रसङ्गपरिहागयाभ्युपगम्यमाना च प्रत्यासत्तिः प्रत्येक परिसमात्या व्यक्त्यान्मभूता पाभ्युपगम्यमाना कथं समानपरिणामातिरिक्त १५सामान्यस्य कल्पना न निरस्येत् शुक्लादियय साश्रये सानुरूपनत्यपादिहेतोः सामान्या समाहित मत्ययादिगृत्तिनं भवेत् ? सामान्यस तु स्वन एव सदादिप्रत्ययादिविश्यमादिषु कामदे। परतवेदनयस्या । अनम्यारोपिततदूपे च सरत्ययादित्तायतिमसः सा । तपापोगी तन्मस्पयादिद्यान्यन भ्रान्त एव प्रसतः। समपायमपि च ताप्यमेय समयायिनो पक्ष्यामः भन्यया तसायाधिनता संयन्मान्तर २० फायनाममात् तत्र पानयस्थायाः प्रदर्शिनन्याम् । विशेषणपिशेयभायमंधल्यारताना पम्या । ममयापात् तत्संबन्धमल्पने इतरेतराभयत्यम् । मनाधितस्य तसंवग्धोगतिनगर। सम्र म्पतः संबधे या सामान्यस्यापि तयाऽस्तु विशेगमापात् । गनि न परतुदये गतिदिन मदिदं च सन्' इति समुंथपामका प्रत्ययोऽनुम्पने, न पुनः समरेशम् इति समय शियनिक पात्यायसाप सामान्यम्यारोपापाहणासंमयान कदाननापि ना संपूर्ण २५ मा । तर व्यायनाघेयम्पासमय तातपादिया तन्मात्रमेय माम् । नागपंगत सामान्यपारस्नु परिणामसामान्ययादान विशिष्यते, प्रत्याधरं परिममाययापचा नामा ग्यायन्यायपपिण्यादिपु पदायाँदिमयपाग्यपदनाय । मापन्या यामि, पलनणगता मारिणमाया, परिणाममामाल्यारमिता ध्यानमालाम्पानरनिगाधारी पुशिलरिवनितानातीपमानित गामालमियो निभानुमते राम्दानियादिने नापिये मामाग्यमावियशितना ना बुदिरालणे मान्य-शिल (प) योरेलीकाणेन प्रानी गाउमा मरान प्रविरिल गामायायम्नुमा नविन दोन गारगमन गरेमा এপপল ft দোষখালী নয় সামান্য মাপ, শস্য मानव नितिन रमेगामिपायो माया पाना गाया fr क्षरयातीrrit fromin योगीयोग। पनि दिन प्रनिनिन रोNिTS पालो ....... r.....यादा intrum..., - - ...) . '- मुत्तिमारवाद। भयपनया प्रतिभाममानयोरेकम्मापरवाण्यारोपः, भतिममहान् । मायगृहीतयोः स भपति, मनिप्रमहादेय। धरपघुमी फिरप्यं प्रतिभाति, नापि विकरप्ययुद्धी पम् । म कयुद्धा पतिमालमानयो रूप-रसपोरिप परस्परामारोपा, पायनियरधनधान्यायारोपः उपलायो यामपस्तनोय मीर-परपिपाणयोरिष सामप्याभायतो नाप्यारोप इति प्रतिपादितम् । न घ पापसायिधिकरप्पधुप्रपाद पय तदापारोपा, समुद्धः साशपरिणामसामान्यव्यवस्थापत्यो- ५ पपरेरनन्तरमेप तम्या पस्तुखरूपप्राहिस विकल्पकायक्षरूपत्वेन व्यपस्थापितन्यात् । तपा, अनुमान नेनापि परिजियमानेऽन्तरल्यावृतिरूपेऽनपरूपे सामान्य पहिमपत्ययोग पर । नानपश्यावृत्ति मानविषयमनुमानम्, अतदूपपराहतपस्तुमात्रविषयत्यादिति चेत्, किस परतुमाप्रमन्यत्र समान परिणामार! अनुभूयते च मामाम्यम्-अलिगमापानानुमानेन-अविसंपादियात् प्रत्यक्षममाणेग ममाणान्तरामभ्युपगमात् । नधादि-प्रत्यय सानेग शासादिविभागमपरिच्छिन्दताऽपि दधीयसि १० दो वृक्षादिमामेतिपतिदर्शनम् तभिराकरणे घानुभयपिरोधः । न च सादपम्, समानपरिणामा भावे तदसंभवात् । ननु च यदि समानपरिणामा सामान्यम्, साथ पस्तुनः सजातीयादपि परिणामादू विभवतयाऽन्यत्रानन्ययात् पनि गृहीतसंपन्धेन शम्न लिकन पाऽन्यस्य सजातीयस्थ प्रतिपादन न प्रामोति, नैप दोष, विभतेऽपि पस्तुतस्तलिननाधितदेशादिमेदे समानपरिणाममारे शब्दस्य रिप या तापमात्रस्यैर संकेतितापात संयन्धं एडीतपतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममणि भेद-१५ प्रतिपत्तरसन्यत्यात् तत्तया प्रतिपत्त्पविरोधाम दोषः । प्रतिपादयिष्यते च नित्यानित्यापनेकान्त. रूपं धमकान्तपादप्रतिपेनेति नानेकान्तज्ञानं मिस्यामानम् । यदपि स्वशादिपु सत्त्वं परदेशादिपसत्यं यस्तुनोऽभ्युपगम्यत एष इतरेतराभाषस्थाम्यु. पंगमात् त्यादि, सदस्ययुतम्। तरेतरामापस घटवस्त्यमेदै घटविनाशे पटोत्पत्तिप्रसमात् पटा प्रभाधव घिनएन्यात् । अथ याद् मिमोऽमायस्तदा घटादीनां परस्परं मेदो न स्यात् ।२० पदादि घराभाषा पटो न भवति तदा पटो घर पप स्यात्, यथा या घटस्य घटाभावाद् भिमन्याद् घटरूपना सपा पटादेरपि स्यात् घटाभावात् मिन्नत्यादेय । नाप्येषां परस्परामिक्षा 'नाममायेन मेदः समपते पर्नुम् , तस्य मिनाऽमित्रमेदकरणेऽकिश्चित्करस्यात् । न चाभिधाना. मन्योन्यामापः संभवति । नापि परस्परभिनानामभावेन भेदः क्रियते, स्वहेतुभ्य एघ मिलाना- मुरपतः । नापि मेरम्पयहारः क्रियते, यतो भाषानामात्मीयरूपेणोत्पत्तिरेष सतोमेद, सच २५ प्रत्यक्षे प्रतिमासनादेय भेदध्यपहारहेतुः, सेन "पस्त्वसंकरसिदिध तस्मामाण्यसमाधिता" ति निरस्तम्। किश, माधाभाषयो दो नाभापनियन्धनः, अनयस्थानसशात् । 'अय स्वरूपेण मेदस्तदा मायानामपि स स्यादिति किमपरेणाभाषेन मिन विकल्पितेन ? सबैकान्त- 'भिन्नोऽभिगो घेतरेतरामायःसंभवति । न धामाप एयान्यापोहस, पटादेः सस्मिफरयमसझाए । साहि-यथा घटस्थ स्वदेश-२१ काessकारादिना सर तथा यदि परदेश-कालाऽऽकारादिनाऽपि, तथा सति स्वदेशादित्यय परदेशादित्यप्रसचेः कथं न सरिमवस्वम् । अप परदेशादिश्ययत् खपेशादिश्वमपि तस्य नास्ति सदा सर्पयाऽभायमसक्तिः। अप यदेय स्वसर सदेष परासस्यम्। नन्वेयमपि यदि परासत्वे स्वसरवानुमवेशस्तदा सपासपम्। अथ स्पसस्ये परासरपण सदा परासरयामाधात् सर्षा- मकरयम्-यथा दि स्वासस्यासस्यात् स्थसत्यं तस्य तथा परासस्वासश्यात् परसरयमसतिर-३५ निपारितप्रसय, अधिशेषात् । न घरासरर्ष कपितरूपमिति न भितिः परसस्यात्मिकेति पाध्यम स्वासानेऽप्येपंप्रसमा । अप नामापनिवृया पदार्थो भावरूपः प्रतिनियतो या भपति, अपितु स्वहेतुसामप्रीत उपजायमानः स्वस्यमापनियत पयोपजायते। तथैवार्थसामर्पमापिनापशेष विषयीक्रियमाणो व्यपहारपथमयसार्यने किमिनोतराभाषकरुपनया! न किश्चित् केपछे स्वसामग्रीता स्वस्यमापनि-४० 1-रुपामा-या.। ९-मानतोऽपि दि.। - सामान्यपरि-भाग, मो.। -मतिपत्ति - ५-पामभा-पा.। -तुनल-मा., म.। -माणामेया। न्स्य पटाभा-वा-या। . यदा, भा. -- 'अयमे काण्डे-- धर्मिण्यभावः इत्यनेकान्तपक्षस्य याधमुपन्यस्तं तद् अगाधकमेव, प्रतीयमाने परतुनि विरोधा- सिद्धेः । न च येनैव रूपेण नित्यत्यविधिस्तेनैव प्रतिपेयविधिः-येनैकन्य(कत्र)विरोधः म्यान-- किं तनुस्यूताकारतयां नित्यन्यविधावृत्ताकारतया च तस्य प्रतिपेधः। न चान्यधर्मनिमित- योविधि-प्रतिषेधयोरेका निरोधः, अतिमसात् । न चानुगतव्यावृत्ताकारयोः सामान्यविशरूरत- ५याऽऽत्यन्तिको मेदःपूर्वोत्तरकालभाविसपर्यायतादाम्येन स्थितस्यानुगताकारस्य याहाऽऽपारिमा सार्थस्यायाधितप्रत्यक्षमतिपत्ती प्रतिमासनात् । यशेदम् 'घटादिर्मंदादिरूपतया नित्य इत्यत्र मृदूपतायास्तनोऽन्तरत्याप्त ततो घटो नित्यः, मृदूपता हि मृत्यं सामान्यमर्यान्तरम्, सस्य नित्यन्चे न घटस्य तथामावस्ततोऽन्यत्वात् पाश च कारणाद् बिलयोपलम्धेरनिस्सत्यमेव' इति, अयुकमेत सामान्य विरोगादांन्तरन्यानुर. १०पतेः समानासमानपरिणामान्मको घटायोंऽभ्युपगन्तव्यः । तथाहि-न साधन सामगदर्यान्तर- भूता मृत्यजातिः सत्ता या, स्वाश्रयैः संपन्धाभावात्-ससंबन्धात् मागसद्भिरपि साशयः संयन्धे तिप्रसमात्। स्वत एय सन्निः सत्तासंपन्धकल्पनायेयात् । समयायम्य सर्पगल या पाप ग्लरपरिहारेण स्यात्यन्तररेय सर्यगतस्यापि सामान्यम्य संपन्धेऽतिप्रसङ्गपरिहारायान्युपगमनाना च प्रत्यामत्तिः प्रत्येक परिसमाप्त्या व्यक्त्यात्मभूता पाभ्युपगम्यमाना फयं समानपरिपामानिरिकार १५मामान्यस्य फरपनां न निरस्ोत् गुहादियध साभये सानुरूपप्रत्ययादिहेतोः सामान्यात सहार प्रमादिगृत्तिन भये! सामान्य स्थल पर मदादिमलयादिपियो पारिषु का मगर परतधेदनपस्या - मनायारोपिततपे व तमसपारितापतिप्रसनः सात् । तगारोपेऽपि तनपानिधान्यत्र नाल पय प्रसनः । समयमपि प ताप्यमेय समापिनोः पश्यामः भन्यथा तस्यायाधिनतरा संपधाग्ला २०पनानपनाप तत्र पापण्यापाः प्रदशिनगर । पिरोपणनियमायबापानेऊन पम्या । गमापन तगंयाधमाने इतरेतरामपत्यम्। भनाभितण तोवपाययतिमा त REE पापा मामायणापि तथास्तु शिरामायाम् । गनि प पानुध्ये गणेि रगति m' ति पामकः प्राययोऽनुभूपते, न पुनः दरम्' इति प्रेमर লিখলেখাপ হ নামাবাকামলাম কষাণি বা বাগান २५ मा स्पायनापमार्गमरे तमागादिया तम्मात्रमेय मान । मानगांगल. सामाम्यवाद परिणाममामाग्पाला विशिणी, प्रत्याभयं परिणमाषणमा गाRT- ग्दारियादेगरिमादिषु पदार्यानियल्पाम्पपासुनाए। मापन पनि मागताः प्रकारममा पfromमामागिता সম্পূর্ণ। লক্ষ্মীপসিকাগ সুবিলিপিসোশীল গনি १.सिपम्दमत मनिपानि पिरे गामापेममानिमिrin भागो भान यEिT P) पोरान मनी गांगुगा उदय, frrianा मामातुमनामा नविनयेन नामनि, गोपा सरयाशि-friनगरेलगामामा , IT भारनिनि भागनिधी प्रसारण ITratri freefireer ना mirrai मलिनं firm reी प... .. r......tratime-titm01-1....., * :qrts, Tinant, .. मप्र:Truth * मुक्तिरारूपवान पलया प्रतिभागमायोरेपाम्याऽपराधारोपः, अतिप्रमात् । मायगृहीतयोः स संभपति, अतिप्रमहादेयमययुगी विकरायं प्रतिभाति, नापि विश्वयुद्धौ पम् । न घेकयुद्धा पतिमानमानयो रूप-रसपोरिय पररसरापारोपः, सारयनिसन्धनाधान्याभ्यारोपः उपलायो यस्यवस्तुनोध मील-सापिएणयोरिप मारप्याभापतो मायारोप इति प्रतिपादितम् । न घ या पयसायिविकारस्यधुगुरपाद पय तदायारोपा, तनुस लशपरिणामसामान्यव्ययस्थापकरयो- ५ पपसेरनन्तरमेय तसा परतुण्यरुपमाहिसविकल्पकाध्यक्षरूपत्वेन व्यपस्थापितस्यात् । तथा, अनुमा- मेनापि परिच्छिद्यमानेऽपान्तरण्यावृत्तिरूपेऽनपंरुपे सामान्ये पहिषपुरपयोग एप । मातभूपश्यावृत्ति- मात्रविषयमनुमानम्, अगदूपपरावृत्तपथमात्रविपयत्यादिति घेत, कि त परतुमात्रमन्यत्र समान. परिणामा ! अनुभूयते च सामान्यम्-अलिझमत्यासानुमानेन-भविसंयादित्वात् प्रत्यक्षममाणेन प्रमाणान्तरानभ्युपगमात् । तथाहि-प्रत्यक्षेणेय मानेन शाखादियिभागमपरिस्छिन्दताऽपि दधीयसि १० देने पृशादिमाप्रतिपत्तिदर्शनम् तभिराकरणे बानुभवविरोधा। न घ सायम् , समानपरिणामा भावे तदसंभवात् । ननु घ यदि समानपरिणामः सामान्यम् तस्य घस्तुनः सजातीयादपि परिणामादू विभसतपाऽन्यत्रानन्ययात् पचिद् गृहीतसंपन्न शदेन लिन पाऽन्यस्य तजातीयस्य प्रतिपादन नमामोति, नेप दोपः, विभोऽपि पस्तुतस्तसिननाभितदेशादिमेदै समानपरिणाममात्र शब्दस्य लिङ्गम्य या तापमानतीय संपतितन्यात संपन्धं गृहीतपतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममाण भेद-१५ प्रतिपरजन्यत्यात् तत्तया प्रतिपस्यविरोधात दोषः। प्रतिपादयिष्यते च नित्यानित्यापनेकान्त. रूपं घस्पेकान्तपादप्रतिपेधेनेति नानेकान्तमान मिथ्याशानम् । यदपि 'स्वदेवादिपु सत्यं परदेशादिप्यसत्यं पस्तुनोऽभ्युपगम्यत एप इतरेतरामावस्या यु. संगमात्' इत्यादि, तदप्ययुनम्इतरेतरामायस्य घटपस्त्यमेदे घटविनाशे पटोत्पत्तिप्रसदार पदा प्रभाषस पिनष्टन्यात् । अयं घटाद् मिन्नोऽभाषस्तदा घटादीनां परस्परं भेदो न स्यात् ।२० यदा हि धामापरुपा पटो न भवति तदा पटो घट एप स्यात्, यया या घटस्य घटाभावाद् मिनन्याद् घरुपता तथा पटादरपि स्यात् घटाभावाद मिन्नत्वादेव । नाप्येषां परस्परामिमा 'नाममावेन भेदः शाम्पते फर्नुम् , तस मिनाऽमिनभेदकरणेऽकिश्चित्तरस्यात् । न चाभिधाना. मन्योन्यामाषः संमपति । नापि परस्परमिन्नानामभावेन भेदः प्रियते, स्वहेतुभ्य पथ निभाना. मुरपतः । नापि मेदव्यवहारः प्रियते, यतो भाषानामात्मीयरूपेणोत्पत्तिरेव सतोमेरः स च २५ प्रत्यक्षे प्रतिभासनादेष मेदध्यपहार देता, तेन "यस्त्वसंकरसिशिष तमामाण्यसमाथिता" । ति निरस्तम्। किच, मायामापयोर्भेदो नाभाषनियन्धनः, अनयस्याप्रसङ्गात् । "अय स्वरूपेण मेदस्तदा भावानामपि स स्यादिति किमपरेणाभाषेन मिन विकल्पितेन । तत्रैकान्त- 'भिषोऽमियो तरेतरामायः संभवति । न चामाय एघापापोहस्य, पदादेः सर्यात्मफस्यप्रसाद । तथाहि-पथा घटस स्वदेश-१० कालाकारादिना सव तथा यदि परदेश-कालाकारादिनाऽपि, तथा सति स्वदेशादित्वयत् परदेशादित्यप्रसक्तः कथं न सस्मिकन्यम् । अप परपेशादित्ययत् स्वपेशादिग्वमपि तस्य नास्ति तदा सर्पधाऽमायमसक्ति अप पदेय स्वसरचं तदेष परासपम्। नन्वेयमपि यदि परासरचे स्वसत्यानुप्रवेशस्तदा सधंधाऽसत्यम्। अथ स्पसर परासस्यस तदा परासरयामाया सा. रमवारपम्-यथा दि स्वासस्थासस्यात् स्यसत्वं तस्य तथा परासाबासस्यात् परसायमसक्तिर-१५ निधारितप्रसरा, अविशेषात् । म च परासस्य कल्पितरूपमिति न तभितिः परसस्यास्मिदेति पाध्यम्, स्वासोऽप्पेघप्रसमात् । अथ नामावनिवृपा पदार्थों भावरूपः प्रतिनियतो था भपति, अपितु स्वहेतुसामग्रीत उपजायमानः स्वस्वमापनिया एपोपजायते। तपार्थसामर्पमाविनाभ्योग विषपीक्रियमाणो म्यपहारपधमयतार्यमे किमितरेतरामावकरपनया! म किश्चित्, केपलं स्वसामग्रीतः स्वस्यमापनि.१० -गामा-मा.। १-मानतोऽपि पि.। - सामान्यपरिभा, मां। -प्रतिपनिदर्श- मो. ५-लाममा-बा। तुमन-Rio, it. -माणामेन्वा । सपटाभा-पा.बा.. १. पनामा, १६४ प्रयमे भागे- धर्मियभावः' इसनेफानामा पाधकमुपयन तद् अपायकमेय, प्रवीरमाने यम्नुनि विगया. पिन गयेनेय कोण नित्ययविपिम्ननेर प्रतिनिधिः-येनकन्य(क)विरोधः म्यान्- Erfar.I, चान्यधर्मनिमिण- मामान्यविशाल पाद्याच्यामिक . . : यंदम् 'घटादिदादिपाया निस्य इन्यत्र मृदूपतायास्ततोऽयान्तरल्यान ततो घटो नित्यः, मृदूपता हि मृत्यं सामान्यमयान्तरम्, तम्य नित्यन्ये न घटम्य तयामावस्ततोऽन्यन्यान् घटम्य घ कारणाद् बिलयोपलधेरनित्यन्यमेव' इति, अयुक्रमेनन्। सामान्यस्य विशेषादर्यान्तरल्यानुर- १० पत्तेः समानासमानपरिणामान्मको घटायर्थोऽभ्युपगन्तव्यः । नयाहि- तावत् स्वानयादर्थान्तर भूता गृत्यजातिः सत्ता घा, साश्रयः संयन्धामावान-ससंयन्धात् प्रागसगिरपि पाश्रयः संबन्धेड- तिप्रसगात्; स्वत पय समिः सत्तासंबन्धकल्पनायथ्यांन् । समयायम्य मांगनत्याद् ध्यान्य. न्तरपरिहारेण व्यपत्यन्तररेय सर्वगतस्यापि सामान्यम्य संयन्वेऽनिममनपरिहारायाभ्युपगम्यमाना च प्रत्यासत्तिः प्रत्येक परिसमात्या व्यक्त्यात्मभूता उपगम्यमाना कथं समानपरिणामानिरिक्तम्य १५सामान्यस कल्पनां न निरस्येत् शुक्लादियश्च साश्रये स्वानुरूपप्रत्ययादिहेतोः सामान्यात् सदादि प्रत्ययादिवृत्तिर्न भवेत् ? सामान्यस्य तु स्वत एव सदादिप्रत्ययादिविषयवे दयादिषु का प्रपः? परतश्चेदनवस्था - अनध्यारोपिततद्रूपे व तत्प्रत्ययादिवृत्तावतिप्रसगः सात् । तद्रूपाध्यारोपे:पि तत्प्रत्ययादिश्चान्यत्र भ्रान्त एव प्रसकः। समयायमपि च तादूप्यमेव समयायिनोः पश्यामः; अन्यथा तस्यायाधिनतया संबन्धान्तर- २० कल्पनामसद्गात् तत्र चानवस्थायाः प्रदर्शितवान् । विशेषणविशेभ्यभावसंवन्धेऽध्यपरतत्कल्पनेऽन. वस्था । समचायात् तत्संवन्धकल्पने इतरेतराश्रयत्यम्। अनाश्रितस्य तसंवन्ययेऽप्यतिप्रमङ्गः । तस्य स्वतः संबन्धे या सामान्यस्यापि तथाऽस्तु विशेषामावान् । सति च वस्तुद्वये सन्निहित 'इदं सदिदं च सत्' इति सर्मुच्चयात्मक प्रत्ययोऽनुभूयते, न पुनः 'इदमेवेदम् इति; संमर- द्विवक्षितकाव्यरत्याधेयरूपस्य च सामान्यस्याशेपाश्रयग्रहणासमवान कदाचनापि तस्य संपूर्णम्य २५ ग्रहणं स्यात् । तद् व्यक्त्सनाधेयरूपासंभवे तद्गतरूपादिवत् तन्मात्रमेव स्यात् । खाश्रयमर्यगत- सामान्यवादस्तु परिणामसामान्यबादान विशिष्यते, प्रत्याश्रयं परिसमानन्यस्यान्ययानुपपत्या सामा न्यसंबन्धशून्येप्यपि ट्रन्यादिषु पदार्थादिप्रत्ययायन्वयदर्शनाच । नाप्यन्यस्य व्यावृत्तिः, स्वलक्षणगतायाः प्रत्येकपरिममाताया. परिणाममामान्यादमिन्नन्यान् व्यावृचः। तदाश्रयान्यानेकव्यक्तिसा ३० तसिंथावस्तुभूते शरदप्रतिपादित त भिगमनम् गान ?। :: तिया केनचिद् श्येन साम्प्यमाल, सनार या 'तदेय दृश्यं सामान्यज्ञान प्रतिभासते, तत्प्रति भासाश सत्रय वृत्तिरिति किं न स्फुटमेवाभिधीयन अवस्त्वाकारस पस्तुना सामन्यासंमान् ? किञ्च, दय-विकल्पयोरेकीकरणं हाये मिकरन्यसाध्यारोपः स च गृहीनयोरगृहीतयोग! यदि गृहीतयोलदा रदय-विरय्ययो देन प्रतिपचन रपये विकल्याध्यारोपः, नदि घद-पटयो. १पर्यायाना-मा., वि., हा., का., गुः । प्रमेयमारमान-पयांयतादा-इव पाटो त्यते-.१११ ६ .. २पृ. १५५पं. ११ । ३-माता ध्या। ४ चाऽभ्यु-इति प्रिटी ममापितम्। ५-या- रोपिमन्य गा.प्यारोपपति तन्त्र-या, मा. । पृ. १५७५.१२. .. या सगाई चास- श•। गुदया-वा.। -यस्याये-4, था., मार, गो.। 1.-पक्षित नि.गो. मा.. -याधियां स्य, ग.दिना । १२-दाणे प्रनिः परि-fr ..भिम ! -दाणे पनि परि-.,.,मणे वृतिः परि-., दि.1 ११ रसी-f.1 कमायो... मा।

मुतिसहसवारः । १६५ मिनस्तापनया प्रतिभासमायोरेफरसाऽपराज्यारोपः, अतिपमहात् । नाप्यगृहीनयोः म संभपति, अतिप्रसङ्गादेय । न परो विकरप्यं प्रतिभाति, नापि विकल्प्यधुनी रयम् । न चैकरमा पप्रतिभागमानयो रूप-रसयोरिष परस्पराम्यापेपा, साइपनियन्धनधान्याभ्यारोपः उपलायो घल्पयस्तुनोध नील-खरपिपाणयोरिय सारूप्यामायतो नाभ्यारोप इति प्रतिपादितम् । मघ पायपसायिविकल्प्ययुशुपाद पर तदप्यारोपः, तनुः सपरिणामसामान्यध्ययस्थापफरयो.५ पपत्तेरनन्तरमेय तथा परम्पर्कपमाहिरा विकल्पकाप्यरूपरवेन व्यवस्थापितस्यात् । तथा अनुमा मेनापि परिच्छिपमानेऽर्थान्तरन्यावृषिरूपेऽनयरूपे सामान्य पहिपत्ययोग पथ । नातपश्यावृत्ति मात्रषिषयमनुमानम्, अनदूपपरावृत्तपस्तुमात्रपिपयत्यादिति चेत्, किं तद् पस्तुमासमन्यत्र समान. परिणामात् । अनुमयते से सामान्यम्-मलिङ्गजत्यासानुमानेन-अविसंवादित्वात् प्रतासममाणेन ममाणान्तरानभ्युपगमात् । तथादि प्रत्यक्षेणेय सानेन शाखादिविमागमपरिटिजन्दताऽपि दीपसि १० दो प्रक्षाविमाप्रतिपत्तिदर्शनम् तधिरापरणे बानुमयविरोधः । न च सायम्, समानपरिणामा. भावे सदसंभयात् । ननु प यदि समानपरिणामः सामान्यम् तस्स पस्तुनः सजातीयादापि परिणामा विभत्तालयाऽन्यत्रानन्ययात् चिद् गृहीतसंपन्धेन शन लिन पाऽन्यत्र समातीपा प्रतिपादन म मामोति, मैप दोषः, विमोऽपि पस्तुतस्तलिननाश्रितदेशादियदे समानपरिणाममा दल दिगम्य पा तापमात्रस्येच संकेतितत्यान् संबन्धं गृहीतयतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममणि भेद-१५ प्रतियोरजन्यन्यात् ततया प्रतिपत्याविरोधात दोषः। प्रतिपादयिष्यने न नित्यानिस्थापनेकाल. रूपं परवेफान्तपादमतिपेनेति नानेकान्तमान मिप्याानम् । यदपि 'स्वदेशादिपु सत्यं परदेशादिप्यसरय पस्तुनोऽभ्युपगम्पन एप मरेलरामावस्या पंगमा स्यादि, मध्ययुत्तम्। तिरेताभाषभ्य घटपस्यभेरे घटविनाश पटोत्पतिमा परी प्रमायश घिनगर । अथ घटाद् मिन्नोमापना परादीनां परमरे मेदो मा २० याद घामावर पटो न भवति तदा पो घट पप मान, पथापा पर पटाभागार मिभन्याद पटरुपता तथा पटादेरपि गान् घटाभावान भिमायादेवा गामिभा. 'मामभाषेन भेसपयत्ते कानम्, म मिनामिनभेदकरणेऽपिकिरयान । म पाभिमाना. मम्पोन्यामाशः संभवति । नापि परपरमिभानामभाषेन मेदा मियो, बतुभ्य पर मिधाना- मुस्पा । नापि मेदम्पयहार मियते, पतो भाषानामामीपहरेणोपनिष खलोमा ५५ अस्पो प्रतिमापनादेय भेदप्यपदारमु, तेन "परम्परपासिविध ARCIATum" ति निरस्तम्। किश, भाषाभायपोमदो मामापनिबन्धनः, अनयर मए पापेज मेदाला मायानामपि सस्यादिति शिमपरलाभाषेन मिन पिसिन Amm. मिमोऽभितो तरोतराभापा संभपति । म पाभाष पाग्यापोहस, पादः परमपरवप्रसार। सपाति-पास मरें-1. कालापारादिना एवं सपा पनि परदेश-कालादिमाऽपि, सपा सति सारिप- परदेशादिपप्रपा पधं मसारमपास्यम् । अप परदेशाविरन् सरेशारिरि समाहित सदा सपंचामायप्रसमि: 1 अप परेप स्वसाधं तदेष परासापामशेवमपि पति पराम धारायागुताला पासपम्। जप स्वक्ष परामरा पORINTAIर गर्मा ramयम्-पपाद प्यासपातायात वस स सपा पयसामा परसाद निपारितसप, अपितरोणात्मक परासारपितरूपनितिन ति सहित पापम्, मासपेमलकान् । भय माभापनिताका पराणे भारतमा प्रतिनिको पामरति, अपि उपायमान सभापरिया कोपमापक याममारिमपि पापREATERfलरामायया frrer Retar ----मापि, * AIRTEEH... -- .

- १६४ प्रथने काण्डे-- धर्मिण्यभावः' इत्यनेकान्तपक्षम्य याधकमुपन्यस्तं तद् अवाधकमेत्र, प्रतीयमाने वस्तुनि पिरोधा: सिद्धेः । न च येनेय रूपेण नित्यत्वविधिस्तनव प्रतिषेधविधिः-येनेकत्य(क)विरोधः स्यात्-- किं तहनुस्यूताकारतया नित्यत्यविधावृत्ताकारतया च तस्य प्रतिषेधः। न चान्यधर्मनिमित- योविधि-प्रतिपेधयोरेकत्र विरोधः, अतिप्रसङ्गान् । न चानुगतन्यावृत्ताकारयोः सामान्यनिशान .५याऽऽत्यन्तिको भेदः, पूर्वोत्तरकालभाविवपर्यायतादाम्येन स्थितस्यानुगताकारस्य याद्याऽपारिमक- स्थार्थस्थायामितप्रत्यक्षप्रतिपत्तो प्रतिभासनात् । यवेदम् 'घटादिमुदादिरूपतया नित्य इत्यत्र मृद्रूपतायास्तनोऽर्थान्तरन्यान ततो घटो नित्यः, मृदूपता हि मृत्त्वं सामान्यमांन्तरम्, तस्य नित्यचे न घटस्थ तथामावलतोऽन्यन्यात् घटस च कारणाद् बिलयोपलधेरनित्यत्वमेव' इति, अयुनमेनन, सामान्यस्य विशेगदानरत्याला १० पत्तः समानासमानपरिणामान्मको घटायर्योऽभ्युपगन्तव्यः । तथाहि-ज तारत् म्याथरार्यान्तरः भूना मृत्त्वजातिः सत्ता घा, स्वाथयेः संबन्धामावाद-ससंबन्धात् प्रागसद्भिरपि म्यानयः संबो:- तिप्रसङ्गात्; स्वत एव सद्भिः सत्तासंबन्धकल्पनायेयध्यान् । समयायम्य सवंगतन्याद् यान्य न्तरपरिहारेण व्यरत्यन्तररेय सर्यगतस्यापि सामान्यस्य संबन्धेऽतिप्रसङ्गपरिहारायाभ्युपगम्यमाना च प्रत्यासत्तिः प्रत्येक परिसमाप्त्या व्यक्त्यात्मभूता पाम्युपगम्यमाना कर्य समानपरिणामातिरिना १५सामान्या कल्पनां न निरस्येन् गुहादियश्च स्वाभये स्वानुरूपनत्यादिदेतोः सामान्यान् सदादिः प्रत्ययादित्तिनं भवेन्? सामान्यस तु स्वत एष सदादिमत्यादिविण्यन्ये द्रादिषु का ! परतधेदनवस्या । मनध्यारोपिततद्रूपं च तत्प्रत्ययादिवृत्तायतिप्रसङ्ग स्यात् । तदुपाचोरोपेऽपि तन्प्रत्ययादिधान्यत्र भ्रान्त पय प्रसक्तः । समयायमपि प साप्यमेय समयापिनोः पश्यामः भन्यथा साप्याभिलतरा संयन्धान्तर २० करनामसङ्गात् तत्र घानयस्थायाः प्रदसितम्याम् । विशेषणपिशेष्यमायर्मयान्यारतकानेऽन यम्या । समयायात् नसंबन्धकल्पने इतरेतराश्रयत्यम् । भनाधिनस तत्राधान्यतिनमः। तर पतः यापे या सामान्यम्यापि तथाऽस्तु विशेषमायान् । सनि य पस्नुहये समिहिने 'वं गदिदं च सन्' इनि समुण्यामका प्रत्ययोऽनुभूपने, न पुनः इदमेवेदम्' इति समय द्वियधिनयन्यायकाय च मामान्यम्पादोपालपणासमयान कदाचनापि तय मंपूर्णग्य २५प्रद भगत् । तर यसपनाधेयरुषासमय नगादिया नग्मामेप मार । मानपगा सामान्ययारस्तु परिणामसामान्यपादान विशिष्यते, मरवानपं परिगमागल्यमाययानुपात सामा म्यवग्यसन्देपपियादिषु पदायांदिवल्ययाचप्यपदनाय । মাল পানি, মাসাঃ দুলালমাথা কামলাগলামি नामयाग्याननिमा-:-.-. निभायातुमने दमनिरानि :": .."."..' .. पनिरिकलिन यं मगा!... . . 1-.-:..." शान शितित्य मामाग्यभारम्नुमाता नविता , मारा সব দেব- বিধামণাত্মা? হে মান্নান মrিণা, সম্মান ল্যায়ন লিৰি দি মেন্যানিশ লা ধনা সাবা fr. R-farminine गोलियांग। समानता सम- नियोजन प्रतिनिशिरारती " . :: . पगा.. n.rat... -गगनाnirutt. •म.ten. Tara Meria-..... ".gri Tarfrariet, a Rurti ति •r, gr... first expert.it मुरिमाल्पा भिवापतया प्रतिभासमायोरेकम्मापाप्यारोपा, तिममहात् । मायगृहीरायोः म संभपति, अतिप्रमहादेव । न घरदायुनी विकर में प्रतिभाति, नापि विकरायपुदी यम् । न कयुमाः पातिमासमानयो रुप रमपोरिष परपरायारोपः, सारयनियन्धनधान्यप्राध्यारोपः उपलग्धो घरचयरनुलोम मील-सरविशणयोरिष साप्यामायतो नाण्यारोए प्रति प्रतिपादितम् । म यायपामिविकरप्ययुमुत्पाद एप समारोपा, तमु सशपरिणामसामाज्यव्यवस्थापकत्यो ५ पपत्तेजनारमेष तम्या पस्नुसरूपमादिसविकल्पफायरूपावेन ध्यपस्थापितायात् । तथा, अनुमा मेनापि परिसिमानान्तरल्यावृत्तिरूपेऽनर्थरूपे सामान्य प्रदिप्पत्ययोग पप । मातद्रूपन्याधि मात्रविषयमनुमानम्, अनदूपपरासपस्तुमात्रविषयत्वादिति चेत्, कि त घस्तुमात्रमन्यत्र समान. परिणामातू! अनुभूयते च सामान्यम्-अलिजायात्रानुमानेन-अपिसंपादियात् प्रत्यक्षममाणेन प्रमाणान्तरानम्युपगमार । तपादि-प्रत्यक्षेणेय सानेन साखादिगिमागमपरिच्छिन्दताऽपि दधीयसि १० देशे पुलादिमाषप्रतिपतिदर्शनम् तमिराफरणे धानुमयाविरोधानघ सायम् , समानपरिणामा. भाषे तहसंमयात् । ननु चपादि समानपरिणामः सामान्यम्, तस्य पस्तुनः सजा यादपि परिणामादू विभवतयानन्यपान चिन रावीतसंपन्धेन शादेन लिन थाऽन्यस्य जातीयस्य प्रतिपादन नामोति, मेघ दोषः, विभतेऽपि परततस्तसिमानाधितशादिभेदे समानपरिणाममा शब्दस्य लिङ्गम्य या मायामाप्रपैय संकेतितत्यात संपन्धं गृहीतयतोऽन्यत्रापि तत्परिणामांत्रण भेद-१५ प्रतिपरजन्यवाद तत्तया प्रतिपायविरोधात दोषः। प्रतिपादयिष्यते च नित्यानित्याधनेकान्त. रूपं पस्देशान्तवादप्रतिषेधेनेति नानेकान्तमान मियाज्ञानम्। यदपि स्वदेवादिषु सरपं परदेशादिप्यसत्पं पस्तुनोऽभ्युपगम्यत एप इतरेतरामावस्या यु गमा त्यादि, सदस्ययुक्तम्। इतरेतरामायस्य घदपस्त्यमेदै घटविनाशे पटोत्पत्तिप्रसाद पटा यभावस पिनष्टयात् । अब घराद् मिनोऽभापत्तदा घरादीनां परस्परं भेदो न स्यात् ।२० पदादि घटाभापरूपः पो न भवति तदा पो घर पय स्थात्, यथा या घटस्य घटाभावाद् मिलत्याद् घटरूपता तथा पदादेरपि स्यात् पहाभायार मित्रत्वादेय । नाप्येषां परस्परामिना- 'नामभाषेन मेदर वाफ्यते पर्नुम्, तस्स मिमाऽमिन्नमेदफरणेऽकिशित्करवात् । न धाभिधाना- मन्योन्यामायः संभपति । नापि परस्परमिभानामभावन मैदः क्रियते, स्वहेतुभ्य एष मिनाना. मुपचेः । नापि भेदव्यपदारः प्रियते, यतो भाषानामात्मीयरूपेणोत्पत्तिरेप सतोमेद स १२५ प्रत्यो प्रतिमासनादेष मेदग्यपहारहेतुः, तेन "यस्त्वसंकरसिदिश तत्मामाण्यसमाश्रिता" पति निरस्तम् । किश, भाषामाषयोमदो नाभायनियन्धनः, अनवस्थामसात् । 'अथ स्वरूपा मेदस्तदा भाषानामपि स स्यादिति किमपरेणाभापेन मिन पिपरिपतेन ! तोकान्त- 'मिनोऽभिमो घेतरेतरामावा संभवति । न धाभाष पान्यापोहस्प, घटादेः सर्वात्मकत्यप्रसाद । तपादि-यथा घटस्य स्वदेश-३० कासाऽकारादिना सर्य तथा यदि परदेश-कालाऽकारादिनाऽपि, सपा सति स्वदेशादिश्यपत् परदेशादित्यप्रसक्तः कथं न सर्यारमफत्वम् । अथ परदेशादिधयत् स्वदेशादित्वमपि तस्य नास्ति तदा सर्वपाऽभापत्रसक्तिः। अप यदेष स्वसस्य नदेय परासस्यम्। नन्वेयमपि यदि परासरये स्वरारानुप्रयेशस्तदा सर्पयाऽसरवम् । अप स्यसरये पपसरयस्य तथा परासरयामावात सर्या- मिरयम- यथा दि स्वासस्थासत्यात् खसत्यं तस्य तया परासत्यासत्पात् परसरप प्रसकिर-३५ निधारितमसप, अविशेषात् । न च परासरवं कल्पितरूपमिति म तनिधिः परसरयास्मिकेति पाध्यम्, स्यासस्वेऽप्येषप्रसमात् । अप माभायनिवृत्या पदार्थो भायरूपः प्रतिनियतो पा भपति, अपितु स्वहेतुसामनीत उपायमानः स्थस्वमायनियत एपोपजायते तपासामध्यमाधिनायक्षेण विपीक्रियमाणो म्यवहारपधमयसार्यने किमितीतरामायकल्पना म किझिन, केयले खसामग्रीतः स्वस्खमापनि... १ कपामा-चा.। २-मानतोऽपि वि. - सामान्यपरि-मी., मो.। ४-मतिपत्तिदर्श- मा०। ५-लाममा-बा.। -सुनन-मो, मो.। -मापामे-या। • यदाकी-भी- [ -सरपटामाका.पा., 'प्रथमे काण्डे-- धर्मिण्यभायः' इत्यनेकालपक्षस थाधकमुपन्यस्तं तद् अयाधकमेय, प्रतीयमाने पस्नुनि विरोधा. सिद्धेः। न च येनेय रूपेण नित्यन्यशिघिस्तेनैव प्रतिपेयविधिः-येनेकन्य(कर)विरोधः पातु- किं तहानुस्यूनाकारतया नित्यन्यविधांकृत्ताकारतया च तस्य प्रतिषेधः। न चापधर्मनिमित योविधि-प्रतिषेधयोरेका विरोधा, अतिप्रसङ्गात् । न चानुगतव्यासामारयोः सामाग्यपिशरकत ५याऽऽत्यन्तिको मेदः, पूर्वोत्तरकालमाविम्वपर्यायतादाम्येन स्थितस्यानुगताकार याशापारिमा स्थास्यायाधितप्रत्यक्षप्रतिपत्ती प्रतिमासनाम् । योदम् 'घटादिशदिरुपनया निस्स इत्यम मृदूपतायास्ततोऽर्थान्तरन्यान्न ततो गयो मिन्यः मृदूपता हि मृत्यं सामान्यमर्यान्तरम्, तर नित्यत्वेन परश तथामावलमोऽम्पन्यान् परम प कारणाद् दिलयोपलम्बेरनित्यन्यमेय' इति, अयुक्तमेतत् । सामान्यस्य निरोगांन्नात्यानुर १०पनेः ममानासमानपरिणामान्मको घटायर्योऽभ्युपगन्तव्यः । तथाहि-ज साप मारमारांना भूता गृत्यतातिः सत्ता या, साभयैः संबन्धामायान-स्यसंपन्धाण प्रागसद्धिपि भायेः संशाधे. निमसहात्। सन एष मभिः राधासंपन्यापनायेयध्यांत् । मायापम मपंगतपार म्नगपरिहारेण पपत्यन्तरेय सर्पगनस्यापि सामान्यम्य संयन्धेऽतिमगरपरिवागायुगणमाना मप्रन्यामनिः प्रत्येक परिसमाम्या पात्यात्मभूना पौम्युपगम्यमाना कर्य समानपरिणामाजिश सामान्यमा कानां न निरत् गुहादिया साध्ये सानुल्यमादिदेतो सामान्य शादि प्रमादिगिनं मोन। सामान्य शुसत पा गवादिनस्यादिविषपये द्रागादिपु का। पातनपना- नारोपितत नामसावितापतिमा शान्। तपागल सम्पयाधिपात्यत्र घान्त पाप्रमनः। गमगीन तारण्यमेष रामपापिनोः पयामः, भग्यचा नायाधिगयामाधार .नागडा गरमागमाः प्रदर्शितयात् । विशेषणविशेषमाययापन पारधाराने तोरात्रायम्। मनाभिन गांवनिप्रगा PRTी मागापि तदानुशेषामापान | नि ध पाये गमिटने ' नि सनामका प्रायसोनुभूगने, पुन' गरि fাশাপ লােখলাধাগগগা বালনগি বল মে । শনাগলামি সাথি মাগী পাল। পাগলা er গমনাগপাল্প পিসি, মাথায় খামাগলায় पावभाियनियरगंनाच । अन्यमा म, मानाः प्रणेकामा मानिन सम्मानिमामानी :- "...r for mrity, मी : Share on: • PM a wfrfirst मानना remier गया FrmirmirrTTET ear Fri, HTrrify गरम पापा Trariral frx fornita O fremovitt, og at Tatrani! ki ghrrierifmvaram nrn. . T " reart thin...* , •rry ₹ गुजिरवा पिपया प्रतिभाममानयोरेफस्याऽपरवापारोपः, अनिमसमा । मायगृहीतयो स संभपति, अतिमहादेपन परपयुक्षी विकर प्रतिभाति, भापि विकल्प्याची इश्यम् । म कयुद्धा. पप्रतिभासमानयो कारमयोरिय परस्पराज्यारोपा, सारदपनियन्धनमान्यताप्यारोपः उपलायो पस्यपरतुनोच पील-परविषाणयोरिष साहायाभापतो नाप्यारोप इति प्रतिपादितम्। नय श्यायपगायिविकारप्यपाद पप तभ्यारोपा, साधे सहपरिणामसामान्यव्यवस्थापपरयो ५ पपसेरनन्तरमेय तस्या पस्तुखरूपप्रादिसविकल्पकाम्यक्षरूपत्वेन व्यवस्थापितरयात् । राधा, अनुमा मेनापि परिच्छित्रमानेऽपान्तरयावृत्तिरूपेऽनर्धरुपे सामान्ये यदिधपुरपयोग पथ । नातपश्यावृति- मानविषयमनुमानम्, असदूपपरापूरावस्तुमात्रविषयस्यादिति चेन्, कि तदुपरखमात्रमन्य समान. परिणामात् ! अनुभूयते च सामान्यम् अलिहाजन्यानातुमानेन-अविसंधादित्यार प्रत्यक्षममाणेन प्रमाणान्तरानन्युपगमात् । तधादि-प्रत्पशेणैय कानेन मासादिषिमागमपरिन्दिताऽपि दधीयसि १० देशे वृक्षादिमानमंतिपत्तिदर्शनम् ननिराकरणे चानुभयविरोधः । न च साश्यम् , समानपरिणामा. भाषे तदसंभवात् । ननु च यदि समानपरिणामः सामान्यम् तस्य यस्तुनः सजातीयादपि परिणामाद विमनातयाऽन्यत्रानन्ययात् पविद् प्रदीतसंयम्पेन शम्न लिन पाऽन्यस्य राजातीयस्थ प्रतिपादन न मामोति, नप दोष, विभते.पि परततस्तसिनाधिनदेशादिमेदे समानपरिणाममात्र सदस्य लिङ्गम्य पा तापमाणस्येप संकेतितन्यात संपन्धं गृदोनयतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममात्रेण मेद-१५ प्रतिपत्तरसन्यरयात् तत्तया प्रतिपत्यविरोधाल दोषः। प्रतिपादयिष्यते च नित्यानित्यायनेकान्त. रूपं पस्कान्नयादतिधेनेति नानेकान्तमान मिथ्यानानम् । यदपि 'स्वदेशादिपु सत्य परदेशादिध्वसत्य पस्तुनोऽभ्युपगम्यत पप इतरेतरामावस्याभ्यु- मा' स्यादि, तदप्ययुकम्। इतरेतराभायम्य घटपस्त्यभेदे घटपिनारे एटोत्पत्तिमसात् पटा. पभाषा पिनष्टन्यात् । अयं घटाद् मिनोऽभायस्लदा घरादीनां परस्परं मेदो न स्यात् ।२० पदा दि घटामाररूप: पटो न भवति तदा पटो घट पप स्यात्, यथा या घटस्य घटाभावाद् मिमायाद' घटरूपता तथा पटादेरपि म्यात् घटामाया मिनत्यादेष । नाप्येपां परस्परामिना 'नाममायने मेदः दास्यते कर्तुम्, तश मिनाऽमिनभेदकरणेऽकिश्चित्वरत्वात् । न चामिन्नाना- मन्योन्यामायः संभवति । नापि परस्परमिभानामभावेन भेदः मियते, स्यादितम्य एप मिन्नाना. मुक्तः । नापि मैदग्यवहारः मियते, यतो भाषानामात्मीयरूपेणोत्पत्तिरेय सत्तोमेद, सच २५ प्रत्यक्षे प्रतिमासनादेष मेदस्यपदारता, तेन "वस्थसंकरसिदिध तत्मामाण्यसमाथिता" ति निरस्तम् । किज, मायामाषयोमदो नामावनिपन्चनः, अनवस्थामसनात् । 'मय स्वरुपेण भेदस्तदा भाषानामपि स स्वादिति किमपरेणाभाधेन मिन विकस्पितेन ! तनैकान्त- मिन्नोऽमिनो तरेलरामाषः समवति । नधाभाष पधान्यापोहरा, घरादेः सर्यात्मपत्यप्रसङ्गात् । तपाहि-पपा घटस स्वदेश-३० कालाकारादिना सर तथा यदि परदेश-कालाऽऽफारादिनाऽपि, तथा सति स्वदेशादित्यवत् परदेशादित्यप्रसस्ते कर न मारमफरयम् । अथ परपेशादिश्ययत् स्वदेशादिश्यमपि तस्य नास्ति सदा सपंचाऽभापमसतिः। अथ यदेष स्वसरपं तपेय परासस्थम्। नन्वेयमपि यदि परासत्ये स्वसस्यानुप्रवेशस्तदा सर्पयाऽसरयम्। अप स्वसस्य परासरपर सदा परासरथाभायात् सर्यो रमकरयम्-पथा दि खासस्थासस्थात् स्वसत्यं तस्य तथा परासरयासरपार परसरयासक्तिर-३५ नियारितसरा, अविशेषात् । न च परासरपं कल्पितरूपमिति न तभितिः परसपास्मिफेति पाध्यम्, स्यासस्वेऽप्ये राहात् । सपनामापनिता पापों भायरूपः प्रतिनियतो या भयति, अपितु स्वदेसामनीत उपजायमानः स्यस्यमापनियत एपोपजायते, तपैवार्थसागर्यमाविनापरोण विषयीप्रियमाणो म्यवहारपधमपसार्यों फिमितरेतरामाधफरपनया गकिश्चित्, केप स्वसामप्रीतः स्यस्यमायनि-४० जपा-१-मानतोऽपि 1- सामान्यपरि-t०, मा.। -प्रतिपनिदर्श- मो. -स्तुमस्त-मो., भो.। -मात्रेणामेना। ५-यपरामाचा.,मा.। १. यदा मो. मो. [ ५-गाममा-ना..

प्रथने कारडे- অনিমা নোলার আঘকথা স্ব সঘনষ, এনামান হানি খি; বি। ন ন নন ফল নিয়লিৰৰ মানবাধিক-অনলৰিীমা না- fি লালবাসে নিরলবিঘলীয়ায় মন মনিব ন সময় বীৰা-বিষয়াগ বিছি, সনিময়া। ঘামলাকাযীঃ সামশা- বাবলি সব, তুষারকোমাসিমাখায়ান মিসানার বাংলা सार्ययायाधित प्रत्यक्षप्रतिपत्ती प्रतिभासनाम् । पदम् 'घटादिमंदादिरूपाया निस्स इत्यत्र मृदूपतायावतोऽधानल्यार तनो पो नि " মূছুন ছি দূৰ ৰামানঘাম, বল নিয়ৰ ন ন সমাসী গয়া ফাসাে নিবনিময়' (নি, গমন। আমার খোলা ঘরঃ সমানীনমানবিলাসাম যখালেদাকে। মথা~ি-৭ মাঘ মায়া, মুদা সুনিঃ কন্যা খা, মাদষয়ামায়া-মায মাহৰি হয় , নিমমুরাপ। ল হ মনি শাহানাঘা। লমখাল খন্দা প. नरपरिहारेण सत्यनारेप मांगनमपि मामान्यमा संयोतिप्रगपETमाना এ নালিঃ ময় মিনা শামমুলা মানাই মানববিয়ামানিয়ে নাম না । নিম বিম্ব কায়ই যাবেন না কি মহিদিন নইমােল গন হপ নিবিষ্ট ফি খা? ধমেম্বা। মহীবন সমকাহিগাবিননা । দুঃখ নমামিন এলাকা। মা ল না মধ্যবিলী: দাম মধ্য লাসামগণ গ্যাস মা ন লক্ষ মাস। শিলমানকে । কল্পনা না শীঘশ। নাসিল । • : দুই পা হামালা খালু বিশ্বাস। দি খ যশু খি * * * * * মুখ্যম। মাথামুণ, পুনঃ ‘মা’ কৰিণ শিক্ষাবল লামাখশালায়মগাষ্ট ফানা িশ শূফ ৯ । * সালাম শান্তি পাগল । পাশা হিয়া মামলায় ছিল, মাসই বশমাশাপাধ্যায়- সংশয্যা লাঘলপাখানায়। শশল্প , গোপা: পাপ, পাগলা vশন • মোকসেসf ffলাশীপ, সfr. ****** সাপ শামাখা 'ift শে দুই ** না শ} সে {ি } * ৪। শর এক ন র হ লনশণশপথ প ব শ্যালি, ৫ পা । # ft-frশৃশশুশপ? *rrrrrণ ন* * *** ** $2. শ শ ** গণ- * * --নন এ সি!” । ** ** **** * ***** এ কি ? *প: * * * * * . * : • * * * * * & • • * * * * * * * ৭ मुरिसरूपवारः भिजवरूपतया प्रतिभानमानचोरेकस्याऽपरमायारोपा, मतिमसमाद । नाप्यगृहीतयोः ससमपति, अतिप्रसङ्गादेव।नच ययुद्धौ विकल्यं भतिभाति, नापि विकल्प्पयुद्धौ रपम् । न चैकयुद्धा पानिमासमानयो रूप-रसपोरिय परस्पराभ्यारोपः, सारस्पनिबन्धनधान्याभ्यारोपः उपलायो पस्वयस्नुनो नील-सरविषयोरिय मारुप्पामायतो नाप्यारोप प्रति प्रतिपादितम् । नघ हरपाध्यघसापिविकल्प्यघुमुवाद एप तयारोपः, समुद्धः सपरिणामसामान्यच्यवस्थापत्यो- ५ एपत्तानन्तरमेय तथा यस्तुसरूपमाहिसविकल्पकायक्षरूपत्वेन ध्यचस्थापितत्वात् । तपा, अनुमा. नापि परिधिसमानान्तरल्यावृत्तिरूपेऽनरुपे सामान्ये पहिरपयोग पप ! नातदूपत्याधि. माविषयमनुमानम्, अतदूपपरावृत्तपस्तुमात्रपिपयत्यादिति पेत् किं तद् वस्तुमाधमन्यत्र समान परिणामाद ! अनुभूपते च सामान्यम्-अलिङ्गजन्यानानुमानेन अविसंपादित्यात प्रत्यक्षममाणेन प्रमाणान्तरानायुपगमात् । तथाहि-प्रत्यक्षेप मानेन शाखादिषिमागमपरिन्दिताऽपि दर्षापसि १० देने पृषादिमा प्रतिपत्तिदर्शनम् सनिराकरणे पानुभयविरोधः । न च सापम् , समानपरिणामा भाषे तदसंभवात् । ननु प यदि समानपरिपामा सामान्यम्, सस्स पस्तुनः सजातीयादपि परिपामाद विभवतापमानन्ययात् निद् गृहीतसंपन्पेन मादेन रिन घाऽन्यस्य तज्ञातीपा मतिपादनं न प्राप्नोति, नए दोरः, निमत्तेऽपि पस्तुतस्तस्मिन्ननाधितशाहिमे समानपरिणाममात्र सदस्य बिहम्य पा सायन्मावस्यैष संरेतितन्वाम् संबन्ध गृहीतवतोऽन्यत्रापि तत्परिणाममांग मेर-१५ प्रतिपरजन्यन्यात् तत्तपा मतिरस्पविरोपाल दो। प्रतिपादमिप्यते च नित्यानित्यानेकान्त रूपं परवेकान्तपादप्रतिषेधेनेति नानेकान्तभानं मिप्यासानम् । पदपि स्वादिषु सायं परदेशादिश्वमयं पस्तुनोऽभ्युपगम्यन एप इतरेतरामापराभ्यः पगमात् सादि, तदप्ययुत्तम्। इतरेतरामाषम्म घटपस्यमेदै घरयिना पटोत्पनिमा पा. पमायस्य धिनस्यात् । अयं घटा मिनोऽमापनदा घरादीनां परस्परं भेदो २ मा २. पदादि घटाभाषा पटो न भवति तदा पटो घर एष शश, याचा पटव सामापार मियाद पररुपता तथा पटादेरपि स्यात् घामाघार मिनन्याय । नाप्ये पनि 'भामभान पेदा सस्पते पर्नुम्, समिधानिसमेकरणेऽकिरियापाभिमाना. मन्योपाभायः समपति । नापि परस्परनिभानामभाधेन मेदः प्रियते, सोनुप एप मिया मुरपती । नापि भेदम्पपधारा कियने, पतो भाषानामामीपणोपनिष सलीमे ९५ प्रहरी प्रतिभामनादेष भेदम्पयहारदेनु, भन "पापसंकरसिद्धिप EMITRAभिला" रति निररतम्। किश, भाशमारपोरो मानियनसमपरमारगा। 'अपमाण मेदरलदा मापामामपि सादिति किमपजामान मिन रिटेन मियोऽभिमोपेतरेतराभाषः समपनि । म पामाप याम्यापोहस, सारे समस्यामा नयादा Ntv-. NASSEदिन पर सपा परिरमालारादिनापि, सासनिक परेशादिषस रूपं ममत्कथम् । पारिवादियमार नजि तदा सर्पपामायमसपिपरेष सतरेष पपसायम्भोगमपि सरिरमाणे भरापानमसला पानाम् सपथसाद पसरवत सदा परमात मी. मामा RTREE मा न त सामान परमार विधाEिRRAO, अविरोधात् । म SARM सिपाहि समिति पनि पापम् बालासार। गए मामाचा पापों भारनिनियमो का मान, कला SIMILAR भारनिपत एपोपमापले, मपेशामानान महाशिलाभानिमाई

Sanmati Tark Prakaranam Khand 1

Author
Aacharya Sen Divakar
Title
Sanmati Tark Prakaranam Khand 1
File name
Sanmati Tark Prakaranam Khand 1
Text
OCR done
Citation
1885
Published
2011/07
Publisher
Ahamdabad, Puratatv Mandir
Language
Sanskrit
Pages
198
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
314135
Barcode
99999990310863.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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MEkuh4FQ3I9
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