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चरित्र
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चरित्र
विमल मित्र
राजपाल एण्ड सन्ज, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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प्रथम ? विख्यात कथाशिल्पी विलियम फॉस्नर को कुछ वर्ष पहले साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। पुरस्कार-समा मे दिया गया उनका भापण अपनी सारगर्भिता के कारण चिरस्मरणीय बना रहेगा। हम सब जब आज अपने अस्तित्व की समस्या से ही परेशान बने हुए है तब भला आत्मा की ममस्या पर लिखने की गरज किम होगी भय ही भय छाया है आज चारों और, और भय भी एक नही, अनेक हैं। मृत्यु का भय, विनाश का भय, मिट जाने का भय । आज के जोतरण लेखक है वे हृदय की समस्याओ को छोड़कर देह की दलदल में फंस गये हैं, हाय, यह नश्वर देह हो जैसे सब कुछ हो! मनुष्यता, धर्म, महत्व, मर्यादा, दया, महानुभूति, त्याग आदि विषयों पर लिखने की चिन्ता किसे है ? इन सबपर अगर अब कोई नहीं लिखता तो क्या होगा लिम्बकर? क्या होगा व्ययं परिश्रम करके ? विलियम फॉकनर ने उस सभा मे तरुण लेसको के संदर्भ में कहा था • 'यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए उसे (एक तरण लेखक को) कि भयभीत होना बहुत बड़ी हीनता है और उसे भय को भूल जाना चाहिए सदा के लिए। प्रेम और सम्मान, सहानुभूति और आत्मगौरव, करुणा और त्याग---नेवल इन्ही सार्वजनीन स्थिर सत्यो को उमे अपनी कार्यशाला में म्यान देना चाहिए । उसकी कथा भंगुर और अलीक है इसके बिना। जब तक वह ऐमा नहीं करता, एक अभिशाप की छाया में होता है उमका श्रम । क्योकि वह प्रेम के विषय में न लिखकर वासना के विषय में लिखता है, ऐसे पराजय के विपर में लिखता है जिसमें कोई किसी मूल्यवान वस्तु को नहीं खोता, ऐसे विजय के विषय में लिखता है जिसमें आशा की एक किरण तक नहीं होती और मयमे बुरी बात तो यह है नि उसकी रचना में सहानुभूति या करणा नाममात्र को भी नहीं होती।"हृदय की बात नहीं लिखता वह, वरन् (शरीर को) ग्रन्थियों की बात लिखता है। अपने आसपास के लोगों को देखकर तभी मैं सिर्फ फॉकनर की बातों पर गौर करने लगता हूं। कहां, इन आदमियों के बारे में तो कोई नही लिखता, मेरे इर्द-गिर्द जो लोग हैं उनके बारे में । तकलीफें बरदाश्त करना ही तो बड़ी . वात नहीं है, टिके भी तो रहना पड़ेगा। फॉकनर ने कहा था : 'मानव के अस्तित्व का अंत में नहीं मानता।' फिर आगे कहा था : 'मनुष्य अमर है यह कहना सरल है चूंकि उसका अस्तित्व कायम रहेगा। मेरा विश्वास है कि केवल मनुष्य का अस्तित्व ही नहीं कायम रहेगा, वह विजयी होगा।' आज की इस तबाही के माहील में ये बातें फिर से दिमाग में ताज़ा होने पर अच्छा लग रहा है। जिनके बारे में लिखने जा रहा हूं सहनशीलता की अन्तिम सीमा तक पहुंचकर भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इन्हें मैंने अपनी दैनन्दिन जीवन-यात्रा में पाया है, या किसीसे इनकी कहानी सुनी है, या फिर इन्हें अपने बचपन के अनुभव-भांडार से ढूंढ निकाला है। ये न महापुरुप हैं, न महात्मा। आप और मुझ जैसे चारों ओर हाट-बाट-दफ्तर में फैले-फूटे मेहनत- कश लोग हैं। जितना इनके जीवन को देखा है उतना ही मन ही मन श्रद्धा- निवेदन किया है इनके प्रति । ये सब ही विलियम फॉक्नर के चरित्र हैं, और इन्हींको लेकर वनी है हमारी आज की दुनिया। इन्हींके लिए आगे बढ़ रही है यह दुनिया। इनका न अंत है, न विनाश । अपनी ही कोशिशों से ये जिन्दा हैं, और हमेशा जिन्दा रहेंगे भी। क्रमश: अब इन्हीं चरित्रों की कथाओं को आरम्भ करता हूं। मेरी बहुत दिन से इच्छा थी कि जहाज़ी सफर पर कोई उपन्यास या कहानी लिखू । लेकिन इधर फेरी-स्टीमर के अलावा जहाज़ पर चढ़ने की खुश- किस्मती कभी नहीं हासिल हुई। एक बार स्टीमर पर चढ़ा था मोकामा घाट से सिमरिया घाट तक। करीब घंटे-भर की यात्रा थी। अब वह स्टीमर की यात्रा नहीं रही। इस पार से उस पार जाने के लिए अब पुल बन गया है। अब हावड़ा स्टेशन पर मिथिला एक्स- प्रेस पर सवार होकर सीधे बरौनी जंकशन पहुंचा जा सकता है। उसके बाद वहां से जहां तबीयत हो चले जाओ। दरभंगा, मुजफ्फरपुर, रक्सील, नेपाल, लखनऊ। फिर बड़ी लाइन से एकदम देहरादून तक। और एक मतवा एक दोस्त की बरात में वराती बनकर भाग्यकुल गया था। भाग्यकुल के सफर में काफी वक्त बिताना पड़ता है स्टीमर पर। बड़ा अच्छा लगा था स्टीमर का सफर उस वार। खास तौर से दोस्तों की एक ६ जमान थी माथ इसलिए। नीमरी बार चहा इस बार। एकाएक एक विज्ञापन पर नजर पड़ी। सुबह का अखबार खोलते ही उम विज्ञापन को देखा। लिखा था : 'एम० एम० हैदरी', इसके बाद तारीख ३ अक्टूबर, १६६६ सोमवार को ४२ २० खिदिरपुर डॉक से पोर्ट देनेयर की ओर रवाना होगा। शाम के पाच बजे से रात के सात बजे तक और रात के सात और आठ बजे के अंदर मुसाफिरों की डाक्टरी जाच का इंतजाम किया गया है। सामान की जाच दिन के चार बजे होगी । डाक्टरी जाच ठीक रात के आठ बजे खतम हो जायगी।' . . हमेशा का यायावर हं में। बहुत आकर्षित किया विनापन ने मुझे। तबीयत हुई जाकर देखू क्या हो रहा है, वहां कौन लोग जा रहे हैं, कैसे है वे सब ! उस दिन कोई कामकाज नहीं था, चला गया जहाज घाट पर । लगा कि जैसे विदेश के किसी स्थान पर चला आया हूं, कितने आदमी है, कितना सामान है ! तरह-तरह के लोग, तरह-तरह की समस्याएं। चारों ओर घूम फिरकर देखने लगा। लेकिन जहाज पर चढ़ने का मौका नहीं मिल रहा था। पता नहीं क्यों गया था उम दिन मैं जहाज घाट पर। बीच-बीच में ऐसा काम कर बैठता हूँ मैं। जब लिखने-पढ़ने का काम नहीं रहता, जब सिर्फ आराम करने को जी चाहता है, तब सड़कों पर घूमता फिरता है। कभी विक्टोरिया मेमोरियल चला जाता हूं, कभी कलकत्ता की किसी वस्ती के जुए के अड्डे में जा पहुंचता हूं। ऐसा भी हुआ है कि किसी-किसी दिन श्मशान में चला गया हूं और यहां का चक्कर लगाया है। ऐसे वक्त अमूमन मामूली पोशाक होती है मेरी। इमसे बहुत सुविधा होती है । तब कोई मुझपर गौर नहीं करता, लिहाजा मुझे मयपर गौर करने का मौका मिल जाता है। मयको वात तब ध्यान मे मुन भीमकता हूं। एक जगह पहुंचकर देखा कि बहुत भीड़ जमा है। और भीड़ के भीतर महा-मुनी हो रही है। क्या बात है जानने के लिए करीब जाकर जने मैंने शोका, हैरत मे आ जाना पड़ा मुझे। वहीं बेचू है न हम लोगों का?
पर उसके पास नहीं जा पा रहा हूं भीड़ के मारे। चारों ओर भीड़ है सब होड़ लगाये हुए हैं पहले डाक्टरी जांच कराने को। बड़ा अचरज-सा हुआ। इसी वेचू से ही तो चिट्ठी मिली है मुझे कल । बेचू ने लिखा था : 'दादा, दो-एक दिन के भीतर लौट आऊंगा, कहकर स्त्री-पुत्र-पुत्री को आपके जिम्मे छोड़कर चला आया था। किन्तु भगवान की क्या लीला है, समझ नहीं पा रहा मैं पिछले बीस दिन से बेहद वीमार होकर अब वर्दमान सरकारी अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा हूं। पता नहीं कब मेरी बीमारी दूर होगी। आप मेहरवानी करके मेरी स्त्री और बच्चों को देखिये, वे कहीं भूखे न मर जायं । मैं ठीक होते ही फौरन आकर आपको इस बोझ से मुक्त करूंगा। आपके इस ऋण को तो मैं नहीं भर पाऊंगा, पर आपके चरणों में अपना मस्तक नवा पाऊंगा, इसी आगा को लेकर यह पन समाप्त करता हूं। कष्ट देने के लिए क्षमा मांगता हूं। नमस्कार। जो शख्स वर्दमान के अस्पताल में विस्तर पकड़े हुए है, वह इस जहाज़ घाट पर डाक्टरी जांच के लिए कैसे आ सकता है, समझ नहीं पाया। तब क्या वेचू नौकरी की कोशिश में पोर्ट ब्लेयर चला जा रहा है ? अच्छी तरह से पहचानने के लिए मैं और सामने चला गया। अब कोई शक नहीं रहा कि वह वेचू ही है-जिसकी स्त्री-पुत्र-पुत्री मेरी हिफाजत में हैं। पास तक पहुंचना मुमकिन नहीं हुआ। फिर भी जितना पास जा सका उतना ही पास जाकर पुकारा, 'वेचू-चेचू' मेरी ओर देखा वेचू ने। देखते ही डर के मारे फक पड़ गया उसका चेहरा। दरअसल वेचू ने क्यों वह चिट्ठी लिखी थी, और क्यों वह विना किसीको कुछ बताये जहाज़ पर सवार होकर चला जा रहा था, इसे मैं पहले नहीं समझ पाया था। बेचू यानी वेचूलाल प्रामाणिक को बहुत ज्यादा अरसे से न जानने पर भी काफी अरसे से जानता था। मैं और वेचू एक ही दुकान से सिगरेट खरीदा करते थे। रास्ते के मोड़ पर थी सिगरेट की दुकान, एक मकान की दीवार के एक बड़े-से आले में । हर रोज सुबह दफ्तर जाते वक्त लिया करता था एक पैकेट । दुकानदार पहचानता था मुझे । लगातार पिछले दस वरस से उसी दुकान से सिगरेट खरीदता चला आ रहा हूं। चुनांचे बह मुझे मेरा पैकेट देकर ही दूसरे ग्राहको की ओर ध्यान देतापा। इसी तरह एक दिन उस दुकान पर गया था। देखा कि वे भी खड़ा है। पहले उमे मिगरेट न देने में बेचू चिड गया। बोला, 'मुझे पहले सिगरेट न देकर तुम उन्हें दे रहे हो, जबकि मैं कितनी देर में खड़ा हूं!' दुकानदार बोला, 'उनकी बात ही अलग है, वे मेरे दम माल के बधे खरीदार हैं, जानते हैं इस बात को।' वैचू ने मेरी ओर देखा । दम साल पुराने खरीदार की ओर अच्छी तरह देना। मैंने भी वेचू की ओर देखा। फिर दुकानदार से बोला, 'दो, दो, उन्हें ही पहले दो न।' वैचू वोला, 'नहीं, नहीं, आप ही लीजिए पहले, मुझे कोई जल्दी नहीं है।' मैं बोला, 'नहीं, तुम पहले आये हो, तुम ही पहले लो भाई।' आंसिर में फैसला हो गया : मैंने ही पहले सिगरेट लेकर दाम चुवाया। इसके बाद जान-पहवान गयी। मैं बोला, 'वहां रहते हो भाई ?' किसी खाम मकसद से नहीं पूछा था मैंने । यो ही पूछा या, कुछ न कहना अभद्रता होगी इमलिए। पर वह शदम मेरे प्रश्न को मुनकर जमे एकदम नाथ-मा हो गया । बोला, 'हम लोगो के रहने का क्या ठिकाना ! सिर पर एक न-भर है । बस... इसके बाद उसने पास की गली के भीतर एक मकान की ओर इशारा किया। एक सस्ता मैस था वह । बोला, 'आप कहा रहते हैं ? अपना पता बताया मैंने भी। इसके बाद मैं दफ्तर चला गया था। दुकानदार ने शायद मेरे बारे में कुछ बताया होगा। क्या कहा या नही जानता। हो सकता है कुछ पढ़ा-चढ़ा के ही कहा होगा। जो मैं नहीं हूं, शायद वही कहा होगा। एक दिन वेचू एक-व-एक सीधे मेरे घर चला आया।इनवार था उमदिन । थोड़ा आश्चर्य हुआ वैचू को देखकर।
- बेचू वोला, 'क्या बात है दादा? कल मैंने आपको नहीं देखा ?' मैंने कहा, 'कल में दफ्तर नहीं गया था, तबीयत ठीक नहीं है.' बेत्रू बोला, 'तभी मुझे फिक्र हुई कि दादा को क्या हो गया । अधीर से भी पूछा था कि दादा आज सिगरेट खरीदने नहीं आये।' अधीर यानी दुकानदार। अच्छा लग गया वेचू मुझे उसी दिन से-क्योंकि किसीकी तबीयत खराब होने की बात सोचकर उसके घर हाल जानने सब लोग नहीं जाते। वोला, 'चाय पीओ।' वेचू दांतों से जीभ दबाकर बोला, 'नहीं दादा, चाय नहीं पीऊंगा मैं.' बेचू ने बात इस तरह कही जैसे मैंने उसे जहर खाने को कहा हो। मैंने कहा, 'चाय नहीं पीते हो तुम ?' वेचू बोला, 'पीता क्यों नहीं, लेकिन अभी मोड़ की दुकान पर से पीकर आया हूं।' ऐसा आदमी मैंने पहले नहीं देखा था। चाय पीने वाला चाय का लोभ इस तरह संवरण कर सकता है, मैं नहीं जानता था, खास तौर से बेचू जैसा आदमी जो एक मेस में रहता है, दुकान पर चाय पीता है। . उस दिन वेचू ने बहुत देर तक बातें की मुझसे । घनिष्ठता थोड़ी और बढ़ी। इसके बाद अक्सर मुलाकात होने लगी । वक्त मिलने पर सुबह या फिर शाम को भी आता। बहुत तरह के काम की बातें करता।- बातें करने का तो मर्ज़-सा है जैसे बेचू को। मैंने कहा, 'अपनी फैमिली ले आओ बेचू, कितने दिन और रहोगे मेस में इस तरह....' बेचू बोला, 'फैमिली ले आने पर देस की जायदाद की देखभाल कौन करेगा, दादा?' 'देस में क्या तुम्हारी बहुत जायदाद है ?' वेचू कहता, 'धान-चावल, शाक-सब्जी, पोखरा-मछली-सब कुछ तो है । देखभाल न करने पर लोग लूट मचा देंगे।' मैं कहता, 'तो देश में जव तुम्हारी इतनी सम्पत्ति है तब तुम कलकत्ता के मेरा में क्यों पड़े रहते हो ?' वेचू जवाब देता, 'दादा, यहां क्या यों ही पड़ा हूं? देश में सब कुछ है, - .. सिर्फ कंश रपया नहीं है वेचू को जवान मे ही मुना था कि वह नकद रुपयों के लिए ही अटका पडा है कलकत्ता मे। कोई बंधी नौकरी नहीं करता था वह क्योकि वधी नौकरी में उसका मन नहीं भरता था । यह बहुत दिन पहले की बात है। लड़का, लड़की और स्त्री को देश में छोडकर एक दिन चला आया था कलकत्ता। इसके बाद कभी बड़े बाजार मे दलाली की है, और कभी सड़को पर फेरीवाल का काम किया है। यह सब करके अपनी हालत मुधार ली है वहुत कुछ। दंस में रूपये भेजता है और यहा रहकर कमाता है । वंचू कहा करता था, 'दादा, आपको दुआ मे बैंक में भी अब कुछ इकट्ठा हो गया है। कुछ और हो जाने पर पोडी-मी जमीन खरीदूगा, फिर रहने लायक एक मईया डाल लूगा। वस, इसके बाद फैमिली ने आर यही रहूगा। गाव में रहने पर बच्ची की नालीम नहीं हो पाएगी ठीक तरह कुछ अरमे वाद मैंने देखा कि वेचू ने जो कुछ कहा था, किया भी है उमने वहा । अच्छी आय हो रही थी तब । देखा कि कपड़ेलते अच्छे पहनने लगा है। बीड़ी छोड़कर अब हमेशा सिगरेट पीता है। एक दिन मुलाकात होने पर पूछा, 'क्या हाल है बेचू ? लगता है मजे में हो अव। बैचू हंसने लगा। बोला, 'हा दादा, आपकी कृपा में अब कोई कमी नहीं है मुझे !' "तब मायद जमीन खरीदोगे अव वैचू बोला, 'वेहाला की ओर एक जमीन पमद की है दादा। दो कट्टा उमीन है, दक्षिण की और रास्ता है, चारो तरफ खुला है।' "किम हिमाव में मिल रही है ?' 'चार हजार रुपये फी बट्ठा । इमसे कम पर देना नहीं चाहता। मैंने कहा, 'बहुत अच्छा सौदा है, यरीद डालो। बाद में कीमत और भी बढ़ेगी।' वेचू बोला, 'केवल आपका आशीर्वाद चाहिए, दादा। फिर मुझे फिक किम बात को... इमी तरह धीरे-धीरे बैचू ने मेरा विश्वास अर्जन किया था। जब भी वह आता था बड़े विनम्र भाव से अपनी आर्थिक उन्नति की वान मुनाता था। और मैं भी उत्माहित किया करता था उमे। .
आखिर वह ऐसा करेगा इसका कतई गुमान नहीं था मुझे। एक दिन ऐसा हुआ कि वेचू मेरे यहां फिर आया। बोला, 'दादा, आपके मकान के पीछे एक कोठरी खाली पड़ी है, उसे मुझे दे दीजिये रहने को मैंने कहा, 'मेरे मकान के पीछे कहां है खाली कोठरी ?' 'क्यों, वह जो गली से दिखलाई पड़ती है, कोठरी ही तो है वह ।' मैं बोला, 'वह तो कोयले उपले रखने की कोठरी है।' 'मेरा काम उसीसे चल जायगा। आपके घर और कोई मेम्बर भी तो नहीं है।' मैंने कहा, 'फिलहाल मेम्बर नहीं हैं, लेकिन मेरी बहिन वगैरह तो आ सकती हैं, तब क्या होगा ?' 'तब मैं घर छोड़ दूंगा, दादा।' 'छोड़ दोगे ?' वे बोला, 'मकान बनवा रहा हूं न अपना । जब तक मकान पूरा नहीं हो जाता तब तक के लिए अगर आप थोड़ा टिकने की जगह दे दें मुझे तो बड़ा उपकार होगा मेरा । आपको मैं किराया दूंगा, एकदम फोकट में नहीं रहूंगा, दादा।' आखिर तय हो गया इसी मुताविक । एक दिन वेचू दंस से स्त्री, लड़का-लड़की ले आकर हाज़िर हो गया। सामान भी था कुछ साथ । सबको लेकर पिछवाड़े की कोठरी में चला गया। दफ्तर जाने से पहले देखा कि वेचू ने काफी अच्छी तरह जमा लिया है। चूल्हा मुलगाया जा चुका है । कोयले से धुआं निकल रहा है। जाकर मिला वेचू से एक बार। वैचू की स्त्री मुझे देखकर चूंघट काढ़कर वहां से हट गयी । लगा कि सुंदर है उसको स्त्री। दो छोटे बच्चे हैं, लड़का और लड़की। मुझे देखकर दौड़ा आया वेचू । गमछा पहने तब वह भीतर कुछ कर रहा था। बोला, 'अरे दादा है, आइए.'' मैं तब दफ्तर जा रहा था। लिहाजा हक नहीं सकता था अधिक समय । तो भी बिलकुल न स्वाना भी उचित नहीं था। मैंने कहा, 'मैं भीतर नहीं आऊंगा। यों ही चला आया देखने कि कोई असुविधा तो नहीं हो रही है।'
'अरे कहां हो' यह देखो दादा आये हैं “कहाँ चली गयी ?' वैचू वही में अपनी स्त्री को पुकारने लगा। छोटी-सी तो कोठरी है, उनमें से वैचारी स्त्री जायगी कहा ? वह पाम ही चूंघट का चुपचाप खड़ी थी। छोटा बच्चा और बच्ची मैरी ओर देख रहे थे अचरज में। 'चुपचाप खडी क्यों हो जी, देखो न, कौन माया है।' फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोला, 'बहुत अच्छा घर है। कोई अमु- विधा नहीं है हमें।' अमुविधा न हो तो ही अच्छा। और अपने मन में मोचा कि वेचू फ्यादा दिन तो रहेगा नहीं । अपना मकान तैयार होते ही चला जायगा। इस दरमियान जितने दिन रहता है, रहे। इसके बाद मैं दफ्तर चला गया। ज़िन्दगी में मैंने किम्म-किम्म के आदमी देमे है। लिहाजा मेरी धारणा थी कि मैं आदमी पहचानता ह । वैचू मुहल्ले के ही एक मेस का वाशिदा था। सुबह से शाम तक दताली करके दो पैसे पैदा करता था। वैचू कहता, 'आमदनी तो अच्छी ही होती है दादा, लेकिन रपये वचा नहीं पा रहा हूँ" मैंने कहा, 'तुमने जब परिवार की जिम्मेदारी ली है अपने कार नव यह कहने मे तो काम चलेगा नही, म्पये बचाने ही पडेंगे तुम्हे .' बैचू ने कहा, 'सिर्फ दलाली में ही तो रपये नहीं आने । देम की अमीन- बाग-पोखरे की भी तो आमदनी है, और इसकी अदायगी के लिए तो वहीं जाना ही पड़ेगा मैं बोला, 'जाना वहा भी, वीच-बीच में जाकर ले आना रपये । वेचू बोला, "अकेला आदमी दोनो ओर कैसे देख सकता है ?' तभी मैंने पूछा, 'तुम्हारे मकान का क्या हुआ वेचू ने कहा, 'इंट का भाव पूछने को गया था दादा, एक सौ पच्चीस रूपया हजार बता रहा है" "क्या इरादा है, तब ?' बेनू ने जवाब दिया, 'यस्मिन् देशे यदाचार-भाव फ्यादा है इसके लिए काम थोहे रुका रहेगा। हर रोज अब वेचू से पहले की तरह मुलारात नहीं होती है। . १३ - - मने वाले दो कमरों में मैं रहता हूं। एक सोने का कमरा है, दूसरा रूम । और ढके बरामदे में रहता है मेरा परिचारक, नहीं परिचालक, सब पूछा जाय तो पांचू ही सव कुछ है मेरा। मैनेजर-कुक-भृत्य मिला- सब कुछ, वही मेरा मालिक है और मैं उसके अधीन हूं। मेरे यहां सपरिवार वेचू का चला आना पसन्द नहीं किया पांचू ने। हमारा नल-बाथरूम आंगन की ओर था। वेचू की स्त्री और बच्चों के आने पांचू की आजादी में खलल पड़ रहा था। पांचू को मैंने सारी बातें समझा :। मैंने बताया कि कुछ ही दिनों के लिए आए हैं ये लोग, अपना मकान बनवा हे हैं; उसके पूरे होते ही चले जाएंगे फिर। मेरी बातें सुनकर चुप पड़ गया या पांचू । और वेचू ने भी पांचू से कहा था, 'हम लोग तुम्हारे वाबू के यहां हैं इससे कहीं यह मत समझ बैठना कि हम सड़क पर के वाशिन्दे हैं। ईस्ट वेंगाल के रिफ्यूजी नहीं हैं हम । वर्दमान जिले में हम लोगों का घर-मकान है। खेत-खलिहान सब कुछ है। यहां कलकत्ता में रोजी है, इसीलिए रह रहे हैं। नहीं तो हमें इस सड़े-टूटे घुड़साल में रहने का शौक नहीं चर्राया है कोई।' पांचू से यह सुनकर मैंने उसे सान्त्वना दी, 'तुम उसकी बातों का कोई खयाल न करो, जो चाहे कहने दो उसे।' पांचू बोला, 'हमारे यहां ही रहता है और फिर यहां की ही बुराई करता है, यह अच्छा नहीं लगता मुझे।' मैंने कहा, 'तुम इन बातों का ख्याल न किया करो।' पांचू ने कहा, 'ख्याल कैसे न करूं, सुनना तो मुझे ही पड़ता है।' वहुत समझा-बुझाकर ठंडा रक्खा था मैंने पांचू को। आखिर पांचू भी तो इन्सान है ! इतने दिन अकेले वह पूरे मकान पर राज करता आया है, अब वह किसी गैर आदमी की वेकार की वातें क्यों सहने लगा? पांचू ने एक दिन कहा, 'औरत उतनी खराब नहीं है वावू, उस वेचू वाद का ही है सारा कसूर...' मैंने पूछा, 'क्यों?' पांचू वोला, 'उसकी औरत कोयला-गोहरी खरीदने के लिए पैसामांगती वे वाबू पैसा नहीं देता। कहता है, उन्हींका कोयला-बोयला लेकर फिलह काम चलाओ, बाद में मैं लाकर दे दूंगा उनका कोयला मैंने कहा, 'हमारा कोयला लेते हैं क्या वे ?' पांचू वोला, 'पहले मांगकर लिया करती थी। सिर्फ कोयला ही १४ बालू-परवल, मसाले वगैरह, अव चुराकर ले जाती है।' 'चुराकर क्यों?' 1 पाचू ने कहा, 'हर वक्त तो मैं रहता नहीं है घर मे । कैसे काम चलेगा मेरा सब समय घर रहने पर राशन लाने जाता हू, सौदा ने बाजार जाता है। आकर देखता हूं कि तरकारी की डलिया में से आलू कम गए हैं। उम दिन आकर देखा कि दूध की कड़ाही मे आधा दूध ही गायब हो गया है एकदम।' मैं चुप रहा पाचू की बात सुनकर । कहना भी क्या ? वैचू को देखकर कुछ नही पता चलता। सामना हो जाने पर उसकी स्त्री भी बड़े श्रद्धाभाव से घूघट काढ़ लेती है। मैं बोला, 'उनकी हालत क्या बहुत सराव है ? क्या ख्याल है तुम्हारा पांचू ?' पांचू चोला, 'बहुन सराव है याबू, वह औरत तो एकाध दिन विना खाए ही रह जाती है। 'कयों ? माती क्यों नहीं है ? तबीयत खराब है क्या' बुधार-उखार है गया? भूख नहीं लगती ?' पाचू ने कहा, 'नहीं वाबू, राशन के चावल खरीदने के पेमे ही नही होते उन पाम।' 'फिर?' पांचू ने कहा, 'पहले मैं ही चावल-दाल दे दिया करता था। लेकिन किनने दिन देता? हमी लोगों का पूरा नहीं पड़ता। इधर तो अक्सर चावल आता ही नहीं उनके यहां, बाजार से मिर्फ अरवी का शाक खरीद लाते हैं और उमी- को उबालकर खाने हैं।' लेकिन येचू को देखकर पाचू मे सुनी याती पर यकीन करने का जी नहीं होता। देखना कि वेचू अच्छा मला सा-पीकर पान चबात-चबाते वाहर निकल रहा है। फिर उसी मिगरेट की दुकान पर जाकर सिगरेट खरीदकर घुमा उड़ाना । मुझे देखने ही विनम्रता में नमस्कार करता। 'निकल रहा हूं दादा, अब और मेरे कुछ कहने के पहले ही कहता, 'चलता हूं दादा रोजमर्रा के गश्त पर" इसी तरह कई माल बीत गए। इस बीच न वेचू का मकान बना, न और प - कहीं गया वह ! मुलाकात होने पर वेचू कहता कि और ज्यादा देर नहीं है । जल्दी ही काम शुरू कर देगा। लेकिन उसकी 'जल्दी' होती नहीं है। पांचू से जो खबर सुनता हूं उससे मुझे डर लगने लगता है। आखिर क्या मुझे अपनी आंखों के सामने फाकाकशी से किसीकी मौत देखनी पड़ेगी ? एक दिन बुलाया मैंने वेचू को। मैंने कहा, 'मुझसे छिपाओ मत कुछ भी, वेचू । सच-सच बताओ, तुम्हारा इरादा क्या है ? बड़े नेक खयाल से मैंने तुम्हें अपने मकान में पनाह दी थी जिससे तुम्हारा भला हो। पर तीन साल गुज़र गए, अभी तक न तुम्हारे मकान का कोई पता है, न मेरे यहां से तुम्हारे चले जाने के ही आसार नज़र आते हैं। अब असली वात क्या है यह बता दो मुझे!' मेरी बात सुनकर वेचू जैसे आसमान से ज़मीन पर आ गिरा। बोला, 'क्यों दादा, यह बात क्यों कह रहे हैं ? क्या कसूर किया है मैन ? मैं तो जी-जान से चले जाने की कोशिश कर रहा हूं।' मैं बोला, 'आखिर वह काम होगा कब ?' वेचू ने कहा, 'मैंने तो आपसे कह ही दिया है दादा, कि जल्दी ही चला जाऊंगा कोई इन्तजाम हो जाने पर। एक भी दिन ज्यादा नहीं रहूंगा इसके " बाद - - मैं बोला, 'यह तो मैं तीन साल से सुनता आ रहा हूं। मैं तुमको और नहीं रहने दे सकता यहां।' वेचू ने कहा, 'लेकिन दादा, मैं तो कोई असुविधा नहीं दे रहा हूं आपको।' मैं बोला, 'कौन कहता है असुविधा नहीं दे रहे हो ? पूछो पांचू से कि हम लोगों को असुविधा हो रही है या नहीं। पास ही खड़ा था पांचू । वह बोला, 'आप लोग विना खाए रहेंगे और हम लोग भरपेट खाएंगे, सबसे बड़ी असुविधा तो यही है हमारी।' मैंने कहा, 'अगर तुम अपनी बीवी-बच्चों को खाना नहीं दे सकते तो शादी क्यों करने गए ? फिर परिवार क्यों बढ़ाया? तुम्हारे दो मासूम बच्चे हैं, उन्होंने क्या कसूर किया है जिसके लिए इतनी तकलीफ दे रहे हो उन्हें ?' एका-व-एक रो पड़ा वेचू। हाथ जोड़कर बोला, 'आपको अपनी अंदरुनी हालत तो नहीं बता सकता, . दादा। रोजगार की हालत बड़ी खराव है। बड़ी.बुरी हालत है बाजार की।
" ऐमी हालत पहले कभी नहीं हुई थी। बड़े बाजार में खरीदारों से आमरही नहीं है । लोहे का बाजार बन्द है। लोगों के पास से ही नहीं हैं तो सरोगे पा, और फिर दलाली वहां में होगी' आप तो नौकरी करते है दादा, हा लोगों की हालत का सही अन्दाजा नहीं लगा माने।' मैंने कहा, 'इन सब बातो को मुनकर मुझे क्या फायदा होगा वैदू, तुम्हारे मकान छोड़ देने पर ही मुझे राहत मिलेगी।' आकुल हो उठा वेचू। इसके बाद थोड़ा स्कर बोला, 'तो और कुछ दिन नहीं रहने देंगे?' में बोला, 'नहीं।' 'नव हम लोग कहा जाएगे? मड़क पर रहेंगे क्या 'तुम लोग जहां तबीयत हो रहो, मुझे क्या ?' 'ठोर है।' कहकर वेचू अनिच्छा के साथ उठ खड़ा हुआ। इसके बाद एक बार फिर पीछे मुड़कर बोला, 'तो यही आपका आखिरी फैसला है, दादा' मैंने कहा, 'हा।' बेचू बोला, 'ठीक है, तब यही होगा। यह कहके वेचू अपने वायें हाप नी हथेली पर दाहिने हाय मे एक घूना मारकर चला गया। उसकी इस हरकत को पांचू ने भी देखा, और मैंने भी। शुरू में मैं कुछ समझ नहीं पाया था। समझा कई दिन बाद । इधर कुछ दिन मे वैचू नहीं दिखलाई पड़ रहा था। पाचू से पूछा, 'वैचू नहीं नजर आ रहा है, कहां गया, कुछ पता है ?' पाचू ने कहा कि वह भी नहीं जानता कुछ भी। एकाएक एक घटना घटी एक दिन । हक्का-बक्का बना दिया इस घटना ने। महमा जमे जवान बद हो गई। ऐसी घटना भी सम्भव है क्या ? इस युग में सम्भवतः कुछ भी असम्भव नहीं है। खबर मिनी मुझे एक परिचित वकील मित्र से। और इसके याद ही मेरे नाम नोटिस आया अदालन से । नोटिम में लिखा था कि मैं येच उर्फ बेचाराम प्रामाणिक को गैरकानूनी तरीके से मकान से निकात देने की कोशिश कर रहा हैं। वह मेरा बहुत पुराना किरायेदार है। पयादा किराये के लालच से मैं उसे निवाल वाहरं करने के लिए उमपर तरह-तरह के जुल्म कर रहा है। उसके पानी का नन काट दिया है, बिजली का कनेक्शन काट दिया है, वगैरह । बहुत- से आरोप हैं। ।
मेरे उस वकील मित्र ने सारी बातें बतायीं मुझे। उन्होंने पूछा, 'तुम किराया नहीं लेते उसने?' मैंने कहा, 'नहीं, गरीब आदमी है, दलाली करता फिरता है। किराया देगा कसे?' लेकिन किराया न लेना भी जुर्म है।' मैं बोला, 'तो किसीपर रहम भी नहीं कर पाऊंगा क्या?' वकील साहब ने कहा, 'नहीं; कानून कहता है कि कोई भी बाहरी आदमी अगर कई साल तक बिना किराये के रहता है तो मकान का वह हिस्सा उसकी जायदाद हो जाएगी।' 'यह वात! 'हां, कानून यही है । कितने दिन से है वह तुम्हारे मकान में ?' वोला, 'करीब तीन साल से।' वकील मित्र बोले, 'अभी हटाओ उसे, इसी दम-और एक क्षण की भी देर न लगाओ।' मैंने कहा, 'हटाऊंगा कैसे? वह तो केस कर चुका है मेरे नाम ।' 'कब इतने दिन क्यों नहीं हटाया ?' उसकी स्त्री है। दो छोटे बच्चे हैं, उनका खयाल करके ही नहीं हटाया था। नहीं तो वह अगर अकेला होता तो कभी का मारकर भगा देता।' वकील मित्र चिन्तित हो उठे मेरे लिए। बोले, 'औरत का मामला है न, अगर वह शिकायत कर दे कि तुमने उसकी मुदतीन्त्री के जील-भंग की चेष्टा की है, तब तो तुम्हारे खिलाफ फौजदारी का मामला आ सकता है।' बत हो गया मैं। बोला, 'तब क्या होगा भाई अब ? वकील महोदय बोले, 'देखता हूं क्या किया जा सकता है, दस रूपये दो तुम मुझे। जो कुछ करना होगा मैं करूंगा। लेकिन फरियादी क्या तुम्हारे यहां है अभी भी मैंने कहा, 'नहीं, अगर वह होता तो भुरता बना डालता मारते-मारले।' दोस्त ने कहा, 'नहीं-नहीं, खबरदार, इन वक्त मारपीट मत करना। तब तुम्हारे खिलाफ फोरन फौजदारी का मामला बन जाएगा। हरगिज न करना ऐसा काम। , N . मैं बोला, 'कोई डर की वात तो नहीं है ?' दोन ने कहा, 'अभी यह कैमे वह मरताह अदालन का मतलब ही है छिछोरोपी जगह । अपनी नवीयन में क्या कभी कोई भला आदमी कचहरी जाना है ' बदमाग, गुण्डे और जुआचोगे की जगह है कचहरी । और मे ही चोट्टे है ये यकील। अगर उन्हें पता चल गया कि असामी पैसे वाला है तो उमने जोक की तरह चिपक जाते है- दोम्न की बात मुनकर डर गया मैं। दोन्न रपये लेकर चला गया। जो कुछ करना है वहीं करेगा अब । मैंने आंगन की ओर देखा। बेचू की स्त्री आराम से गिरम्ती का काम- काज किये जा रही है। दोनो वच्चों को नहलाकर खिलाने बैठी है। उद्वेग का चिह्न मात्र नहीं है उसके आचरण में। मैंने पांचू को युलाया। कहा, 'जाओ तो पाचू, उनमे जाकर पूछो कि वैचू कहा है, और अगर कही गया है तो कब लांटेगा?' पांचू गया । जाकर क्या कहा उसकी स्त्री से पता नहीं। लौटकर बोला, 'मुगिदाबाद गए हैं वेचू बाबू ।' 'मुशिदाबाद ? कमा करने गया है वहा "यह नहीं बता गए है।' 'क्व आएगा, यह वता गया है 'नहीं, यह भी नहीं बता गया है।' अब और क्या करना मैं। दूसरे की भलाई करने जाकर जो झमट आ पडा है निर पर, उमे मना ही पड़ेगा। मैंने जो अपराध नहीं किया है उस अपराध का मारा दायित्व माये पर लाद दिन पर दिन कचहरी जाऊगा और वकील नजिस्ट्रेट का शिकार बनूगा, यही है वीमवी सदी के पेनल-कोड का मभ्य विधान । वह जो हो मो हो । जो होने वाला है उमे मैं कैसे रोक मरता हूँ? मैं मुहल्ले के खाम-मास लोगो मे पूछता कि मैं कैमे इस मशट से छुटकारा पा मरता है, इसका प्रतिकार क्या है। मुहल्ले में प्रायः सभी लोग जानते थे कि मैंने वेचू को अनुग्रहवग ही आश्रय दिया है । वहुत-मे लोग जानते हैं कि वेचू मे मेरा बहुत पुराना परिचय नहीं था। वह मेम में रहता था, बड़े वागार की खाक छानता फिरता पा। .
- रथीन बाबू नाम के एक भले आदमी मेस में वेचू के साथ ही एक ही कमरे रहते थे। उन्होंने कहा, 'तभी मैंने सोचा था कि आपको मना करू, लेकिन फिर चा कि शायद वेचू सुधर जाय । इसलिए.चुप रहा।' मैंने कहा, 'आजकल आदमी की भलाई करने पर भी अपना सत्यानाश ता है, इसीका सबूत मिला है मुझे साहब !' एक शख्स ने कहा, 'अरे साहब, उसे मकान में जगह देने के पहले हमें एक वार यूछा तक भी तो नहीं था आपने।' मैंने कहा, 'दो दिन के लिए आंगन के एक कोने में थोड़ी-सी जगह दूंगा, इस मामूली-सी बात के लिए आप लोगों को क्या पूछता?' एक आदमी बोला, 'जानते हैं, यह वेचू रोज़ चोरी-चोरी मेरा हेयर आयल लगाया करता था, एक दिन पकड़ भी लिया था मैंने रंगे हाथ और एक आदमी वोला, 'मेरे तो अव भी साढ़े सात रुपये निकलते हैं उस- पर, जानते हैं ! दस साल पहले उधार लिए थे।' धीरे-धीरे जो सूचनाएं मुझे मिलने लगीं उनसे यही लगा कि उससे इतना हेलमेल करना, अपने घर में आने देना, यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। ऐसे गर्हित चरित्र वाले व्यक्ति से कोई सम्पर्क नहीं रखना चाहिए था मुझे। वेचू सिर्फ दुष्ट ही नहीं था, झूठा भी परले सिरे का था। जितने दिन मेस में था उतने ही दिन उसने रुपये-पैसे के मामले में गड़बड़ी की है। मेस का सामान खरीदने जाकर हिसाब में हेरफेर किया है। 'साहब, चोरी तक की है वैचू बाबू ने, यही है कि हम पकड़ नहीं पाए कभी।' एक आदमी ने कहा, 'आप कचहरी-वचहरी के झमेले में न पड़ें। कचहरी जाने पर आखिर में यह सावित हो जाएगा कि आप ही दोपी हैं, और वह निदॉप है।' में कहा, 'वजाय इसके एक काम कीजिए, आधी रात को उसे बीवी-बच्चों के साथ जबरदस्ती घर से बाहर निकाल कर दरवाजा वन्द कर दीजिए।' सलाह देने वाले आदमियों की कमी नहीं है हमारे इस प्यारे देश में लिहाजा तरह-तरह की सलाह देने लगे सब । फिर उनमें से खुश हुए मुझे आफत में फंसा देखकर। , रवीन बाबू कुछ लोग JAIPUR-302004 इघर में किंकर्तव्यविमूढ-मा हो गया। कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था कि क्या कर। अदालत में दिन पर दिन, महीने पर महीने मुकदमा चलने लगा। वैचू नहीं था, लेकिन वेचू की तरफ से एक वकील लगातार परवी किए जा रहा था मुक्दमे की। कव किम बिना पर पैशकार को घूम देकर तारीख डलवा लेता, मुझे जैसे आदमी के लिए यह सब खबर रखना नामुमकिन है। मैं अपने काम देखू या मुकदमे की पैरवी करू? आखिर में हालत यह हो गई कि मैं बिलकुल हारने के करीब आ गया। अदालत में यह साबित होने ही जा रहा था कि में वेचू में हर महीने पचास स्पये बतौर किराये लेता है, लेकिन इनकम टैक्स से बचने के लिए रसीद नहीं देता ! और पानी की तरह रपया खर्च होने लगा मेरा। अन्त में एक अच्छा वकील किया मैंने। अच्छे वकील का मतलव ही है बदमाश वकील। बदमाश विना हुए अदालत में न नाम कमाया जा सकता है, न रपया। लेकिन और चारा ही क्या था मेरे लिए? कांटे से ही कांटा निकालना था तव । बेचू से लड़ने के लिए मुझे भी बदमाश बनना था। उनी दिन मुझे पहली बार अहमास हुआ कि दुनिया में भलमनमाहत से यकर और कोई बेवकूफी का काम नहीं। इसके बाद जब मुकदमा डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत में गया तब प्रमाणित हो गया कि केम एकदम झूठा है। लेकिन तब तक मेरे करीब चार हजार रुपये गचं हो चुके थे। और इसमे भी और बड़ी बात यह हुई कि इम अरने में मेरी उन के पांच माल निकल गए थे। इसके बाद हुआ इंजेवगन का मेला। यानी अदालत की इजाजत लेकर पुलिस की सहायता में बैचू के परिवार को मकान में पदेड़ देना। वहुन गटाने लगी यह वात । पिघलने लगा दिल । पाचू बोला, 'नही बाबू, इममे माया-ममता दिखलाने में काम नहीं चलेगा, पुलिम आकर जव धक्का देकर बाहर निकाल देगी तभी होग दुरस्त होने उनके।' मैंने कहा, 'मुहल्ले वाले क्या कहेंगे मुझे।' पाचू ने कहा, 'इन सब बातो को सोचने पर हमें ही धोया खाना पड़ेगा। २१ . - . मन्त में शायद हमीं लोगों को चला जाना पड़े इस मकान को छोड़कर किसी किराये के मकान में।' और उधर उन लोगों की हालत तव और भी शोचनीय वन गई थी। बेचू की स्त्री अकसर रसोई ही नहीं बनाती थी। खाने का सामान ही नहीं रहता था। दोनों बच्चे भी विना खाए रहते थे। मैंने ही पांचू से चावल-दाल भेज दिया। कोयले उपले, नमक-तेल, सब कुछ दिया। पांचू को बुरा तो लगता, लेकिन आखिर वह भी तो इन्सान है। बड़बड़ाता रहता, कुछ कह नहीं पाता था। आंखों के सामने आदमी के विना खाए तिल-तिल करके मरने का दृश्य कौन देख सकता है ? सारा इंतजाम जब खतम हो चुका था तब एक घटना घटी। अगले ही दिन भोर के समय पुलिस आने वाली थी। उन सबको मकान से निकाल देने के लिए। इसके ठीक पहले दिन एकाएक वेचू आकर हाजिर हो गया, न जाने कहां से। एकदम पैरों पर लोट गया आकर। बोला, 'मुझे मारिए दादा, मुझे मार डालिए।' गुम्से से मेरा सारा बदन जल रहा था। जी में आया कि जूते मारकर बेचू का चेहरा बिगाड़ दूं। लेकिन गुस्सा बड़ी बुरी चीज़ है। गुस्से से इन्सान हैवान बन जाता है। सीलिए तबीयत पर जब करके किसी तरह अपने को संभाल लिया। मैंने कहा, 'मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहता हूं वेचू, मेरे सामने से तौरन दूर हो जाओ बेचू ने कहा, 'आप जो कहेंगे दादा, मैं वहीं करूंगा। आपको शक्ल दिखलाने की लियाकत अब नहीं है मुझमें।' 'तुम्हींने आखिर मेरे खिलाफ झूठा मुकदमा चलाया ! यही था तुम्हा मन में?' वेचू चुपचाप रोने लगा मेरे पैरों पर सिर रखकर । उसके आंसुओं से में पर भीगने लगे। मैं अपने पर और काबू न रख सका। पैरों को हटाते ही उसका सिर सीमेंट के कड़े फर्श पर आ गिरा। तो वह उसी तरह पड़ा रहा वहां । मैंने कहा, 'इस तरह पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। कल सवेरे तुम - २२ आएगी। बताओ, तुमने मुझपर झूठा मुकदमा क्यों चलाया '' वैचू ने कहा, 'यकीन कौजिए दादा, कगाली नष्ट कर देती है मति को, मेरे माथ भी यही हुआ है। मेरी नौकरी-बौकरी कुछ भी नहीं है। और कोई चारा न देखकर मैंने आप में शरीफ आदमी कोनग किया। मेरे पाप या अन्त नहीं, नरक जाने पर भी इसका प्रायश्चित नहीं होगा।' मैं बोला, 'इन बेकार की बातों में मुझे वलाने की कोशिश न करो, मेरे मामने से चले जाओ।' बेचू बोला, 'दादा, जो आपकी तबीयत आए कहिए मुझे। मेरी बीबी और बच्चों पर रहम पाकर आप इस वार मुझे माफ कर दीजिए, नहीं तो मैं आपके मामने ही जहर खाकर मर जाऊगा।' मैं बोला, 'आसिर तुम चाहते क्या हो' क्या तुम चाहने हो कि वीबी- बच्चों को लेकर मेरे ही यहा रहो विना किराये के और मेरे ही खिलाफ मुकदमा चलाओ वैचू ने कहा, 'दादा, मुझे सिर्फ एक और चांम दीजिए।' 'किन बात काचाम" 'बदमान में मैं अपनी जगह-जमीन बेचकर आपका मय उधार पूरा कर दूगा, इसके बाद आपका मकान छोड दूगा। आपने इतने दिन हमें परदास्त किया है तो कुछ दिन और वरदाश्त कीजिए। यही मेहरवानी वीजिए मुझ पर, मैं और कुछ नहीं चाहता।' मैं बोला, 'तुम अपना वायदा पूरा करोगे इमरी क्या गारटी है ?' बेचू ने फौरन जवाब दिया, 'अगर मैं अपना वायदा पूरा न करू तो मुझे आप गिन-गिनकर मौ जूते लगाइए।' मैंने भी मन ही मन सोचा कि इसके बाद मैं कर ही क्या सकता है। अगर वेचू के बीवी-बच्चों को रास्ते में निकाल दू तव भी क्या उमे मील मिनेगी? फिर वैचू को बदमाशी का नतीजा उसके वेगुनाह बच्चे क्यों भोगे? उन्होंने क्या चमूर किया है ? मैं समझ गया कि वैचू के बेहाला मे जमीन मरीदने की बात भी झूठी है। घोवाघडी है सब। मुझे अब तक घोगा ही देता आया है वह । मैंने कहा, 'बब तक लौटोगे तुम जगह-जमीन वेचकर' 'मुझे सात दिन का और समय दीजिए दादा। सात दिन के भीतर में मय कुछ वेच-बाचकर लौट बाऊंगा। फिर एक पान-बौडी की दुकान योन नगा ३ ता में।' बोला, 'तुम्हारी जो तबीयत में आए सो करना, उससे मुझे कोई य नहीं। तुम खाते हो या भूखे रहते हो, मैं देखने नहीं जाऊंगा।' वैचू ने मेरे चरण स्पर्श किए। इसके बाद चला गया। फिर उसने क्या | मुझे पता नहीं। सुना कि अगले दिन ही वह भोर की ट्रेन से वर्दमान गया है। पुलिस का दल सुवह आया। मैंने उन्हें लौट जाने को कहा। पुलिस का ची एक सौ सतासी रुपया मैंने पहले ही जमा कर दिया था कोर्ट में । यह कम वेकार चली गयी। जो भी हो, मैंने वेचू को एक आखिरी मौका दिया। इसके बाद भी अगर वह वादाखिलाफी करता है तब मजबूरन मुझे भी कोई कड़ा कदम उठाना पड़ेगा। उस दिन यह प्रसंग वहीं समाप्त हो गया। मैंने सोचा कि सिर्फ सात ही दिन की तो बात है। देख ही लिया जाय एक हफ्ता ! लेकिन हुआ वही जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। सात दिन बीत गए, तवह दिन बीत गए। सात महीने बीत गए। कोई खबर नहीं मिली बेनू की। इधर वेचू के बीवी-बच्चों के मुंह का कौर जुटाता रहा मैं, उनकी उपेक्षा नहीं कर पाया। उनके मारे पांचू के भी नाक में दम आ गया। बोला, 'बाबू, तभी कहा था मैंने इन्हें निकाल बाहर करने को, अव क्या किया जाए इस पाप का? पांचू जुबान ने तो जरूर इस तरह कहता था, लेकिन करता उनका सब कुछ था। रसोई बना देता था, ज़रूरत पड़ने पर दोनों बच्चों को नहला तक देना था। फिर उनको डांटता-फटकारता भी। और मैं? आजिज आकर मैंने इसपर गौर करना छोड़ दिया था।न जाने कहां का एक अदना आदमी अपने परिवार का सारा बोझ मुझपर लादक रफूचक्कर हो गया और मुझे आजीवन उस दायित्व का वहन करना पड़ेगा यही वदा था शायद मेरी किस्मत में। कैसे छुटकारा मिलता मुझे इससे? लेकिन एक दिन एक चिट्ठी मिली वेचू की। उसने लिखा है कि एक च और लम्बे अरने तक चलने वाली बीमारी में गिरफ्तार वह वर्दमान के अस्पताल में पड़ा है। उसकी इस हालत का ख्याल करके मैं बुरा न मान उसके वीवी-बच्चों की परवरिश कर। भगवान भला करेंगे मेरा। चि . - ૨૪ अन्त में लिखा है कि दो-एक दिन में ही आ रहा है वह । जगह-जमीन-भाडे, जो कुछ थे उसके, मय वैच चुका है। आकर वह मेरा मब ऋण चुका देगा। मैंने जब इतने दिन इनजार किया है तो कुछ दिन और करूं। वगरह, वगैरह चिट्टी पाकर समझ में नही आया कि क्या कर वेचू की बात पर यकीन करूं या न करूं। कुछ नही तय कर पाया। नव सब बन्नुओं पर में मेरा विश्वाम हट गया था। वास्तव में मंमार पर ही मेरी आम्या शिथिल होती जा रही थी क्रमश. । मानव-समाज में प्रारम्भ करके राष्ट्र, सरकार, कोर्ट-कचहरी, अर्थ, परमार्य- मव पर में आस्था यो रहा था। लिहाजा इस चिट्ठी को भी कोई महत्त्व नहीं दिया मैंने। और हम्बमामूल इसके बाद भी एक माल बीत गया। एक माल और बीतने को हुआ। इस दरमियान वैचू की स्त्री भी हमारे घर की मदम्य वन गयी। एक ही चूल्हे पर सबकी रसोई बनने लगी। वच्चों को मुहल्ले के एक म्कूल मे भरती कर दिया । लेकिन जिस तरह मैं हमेशा मे गिरनी चलाता आया हूँ, उमी तरह गिरस्ती में अनासक्त भी बना रहा हूं। कभी मैंने वेचू की स्वी को न कुछ कहा, न उसमे कुछ पूछा। उसके पति की प्रवंचना के लिए कभी कोई उलाहना भी नहीं दिया। - मैंने पूछा, 'इसके बाद क्या हुआ भले आदमी बहुत देर में सुना रहे थे यह कहानी। वोले-देखिए माहब, बहुत पुराना है यह मेरा निनने का मौक। पर में बैठे-बैठे का मिलने पर विभिन्न विषयों पर पहानिया लिया करता हूं। हालाकि मेरी यह कहानिया छरती नही है कहीं भी। छावाने की कोई वाम चेप्टा भी नहीं करता। लेकिन जब कभी मांगा मिलता है. इमी सिलामले में मानव चरित्र के अध्ययन की दृष्टि में जगह-जगह घूमना-फिरता हूं। पर तव मुझे वहा पता या नि मेरे घर में ही कहानी मौजूद है। उन दिन जहाज घाट पर भी गया या मानव-चरित के अध्ययन को प्रेरणा मे। वहा वेचू को देखकर हैरत में आ गया । • फिर छलाग मारकर उसके सामने पहुंचकर उसका हाथ पकड़ लिया। ।"
वेचू भी मुझे देखकर चौंक पड़ा। पकड़े जाने की ग्लानि से एकदम सन्त ड़ गया। मैंने पूछा, 'कहां जा रहे हो? आओ..' कहकर उसे खींचते-खींचते बाहर ले आया। वोला, 'तुमने सोचा था मेरी आंखों में धूल झोंककर सीधे पोर्ट ब्लेयर भाग के जान बचाओगे। चलो, घर चलो।' वेचू ने कहा, 'दादा, मुझे आप चालीस जूते लगाइये, पर छोड़ दीजिए। पोर्ट ब्लेयर में एक नौकरी मिल गयी है मुझे, इस मौके को गंवा देने पर मुझे क्या फिर मिलेगी नौकरी?' 'लेकिन तुम्हारे वर्दमान की जमीन-जायदाद के रुपयों का क्या हुआ ?' वेचू त्रुप रहा। मेरी बात का कोई जवाब नहीं दे सका । उसी हालत में खींचते हुए मैं उसे घर ले आया। सचमुच वड़ा कमजोर हो गया था वह। मेरे साथ चलते-चलते लगा जैसे हांफ रहा हो। पर उसने अपने व्यवहार से ही मेरी दया-ममता-सहानुभूति को खोया है। ऐसी परि- स्थिति में फिर उसपर दया करने का प्रश्न ही नहीं उठता। घर ले आकर मैंने वेचू से कहा, 'जाओ, अपनी वीवी-बच्चों को लेकर अभी मेरे मकान को छोड़कर चले जाओ। इसके बाद चाहे पोर्ट ब्लेयर हो, अन्दमान हो, जहन्नुम हो-जहां तवीयत हो चले जाना, मैं कुछ नहीं कहने जाऊंगा। खैरियत इसी में है कि तुम दूर हो जाओ यहां से...' वेचू घर के भीतर चला गया। तीन साल बाद पति-पत्नी में मुलाकात हुई। मैंने सोचा कि थोड़ा मौका मिलना चाहिए उन्हें आपसी विचार-विनिमय का। बहुत दिन बाद बच्चे भी मिले है बाप से। शाम तक भी अगर चले जाएं तो भी अच्छा। और नहीं तो ज्यादा से ज्यादा कल सुबह तक रहें यहां । रात को बाल-बच्चों को लेकर कहां जाएगा? वेचू को घर के भीतर दाखिल कराकर मैं अपने पढ़ने के कमरे में आक बैट गया। एकाएक पांचू आया मेरे कमरे में। मैं बोला, 'क्या चाहते हो, पानू ?' पांचू ने कहा, 'मैं कुछ नहीं चाहता बाबू, बेचू बाबू की स्त्री आपसे मिल नाहती है।' ०६ 'वैचू की स्त्री मुझझे मितना चाहती है ? क्यो" पांचू को पता नहीं इमका । इसके बाद पाचू वा इशारा पाकर घूघट काढे वैचू की स्त्री मेरे पैरों पर आ गिरी। मैंने कहा, 'क्या हुआ? चले जा रहे हो न तुम लोग' म्त्री बोली नहीं कुछ। उमी तरह पैरों पर मिर टिवाये रोती रही चुपचाप। बड़ा मंकुचित होने लगा मैं मन ही मन । अपने पंगे वो मीच भी नहीं ने पा रहा था। इतनी मजबूती मे पकड़े हुए थी वह उन्हें । मैं बोला, 'मैं अब और तुम लोगों को अपने यहा नहीं रहने दगा। जहां तुम लोगों की खुशी हो, चली जाओ। तुम्हारे पनि यो मैं पक्द लामा हू, अब मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं रही। यम जाओ लेकिन तो भी उठी नहीं वह औरत। उमौ तरह पड़े-पडे धीमी आवाज मे बोली, 'मुझे बचाइए आप। मैं उसके माय नहीं जाऊंगी।' 'नहीं जाओगी, मतलब? अपने पनि के माम नहीं जाओगी तो और किसके माय जाओगी? उम औरत ने उसी तरह नीची आवाज मे जवाब दिया, 'वह मेरा पति नहीं भ 7 हैरत में आ गया मैं। 'पति नहीं है ! बेचू तुम्हारा पति नहीं है । नव कौन है वह ?' भाराम में पीठ टेके हुए वंठा या मैं दुसी पर, मीधा तनकर बंट गया अब । बोला, 'क्या कहा तुमने तुम्हाग पनि नहीं है।' 'औरत बोली, 'नहीं।' 'नहीं का क्या मतलब ?' औरत ने कहा, 'बह मेरा कोई नहीं है।' 'कोई नहीं है?' बडा रहम्यजनक लगा उम औरत का व्यवहार मुझे। इतने दिन बाद क्या कह रही है यह औरत । 'तब ये दोनो बच्चे भी नहीं है वैचू के ?' 'नहीं !' म्नंभित हो गया है। इतने दिन तक मानव-चरित्र का गहरा ब परके अन्त मे अपने ही घर में इतनी बेवकूफी पर बैठा?
- पांचू से मैंने पूछा, 'क्या मामला है बताओ तो? तुम कुछ जानते हो?' पांचू बोला, 'जी, मैंने पूछा था इनसे । ये वेचू के बड़े भाई की स्त्री है. 'तो वेचू के दादा कहां हैं ?" पांचू ने कहा, 'एक खून के मामले में काले-पानी की सजा हो गयी है. उन्हें 'अच्छा !' पांचू ने कहा, 'तव से वेचू वावू पर आ पड़ा है भाभी का भार । आदत से ही आवारा है वह, बेकार इधर-उधर घूमना ही काम रहा है उसका। एका- एक भाभी की जिम्मेदारी सिर पर आ पड़ने से बहुत मुसीबत में पड़ गया है। - 'इसके बाद? भले आदमी ने कहा, 'इसके बाद और क्या होता ? जैसे कहानी का अंत होता है, जीवन का भी तो अंत होता है। फिर मैंने उस स्त्री और उसके बच्चों का खयाल करके वेचू को एक नौकरी दिलवा दी। उसने अव अलग एक मकान ले लिया है किराये पर, वहीं उसने अपनी भाभी और भतीजों को रक्खा है।' कहानी खतम करके भले आदमी बोले, 'यादवपुर के बाजार के पीछे एक कम किराये पर का मकान मिल गया है वेचूं को। मैंने मकान-मालिक को गारण्टी दी है। और जितने दिन वेचू के दादा सजा काटकर काले पानी से वापस नहीं आ जाते उनकी ज़िम्मेदारी से भी बरी नहीं हो सकता मैं।' चुप हो गए भले आदमी। यह तो हुई मामूली दर्जे के एक आदमी की मिसाल। यानी जिसके न चूल्हा है न चक्की, एक वोट जरूर है । लेकिन यही सव नहीं हैं। और भी एक दर्जा है आदमियों का जो ऊंचा है इनसे। इनमें से हरएक का वोट तो एक ही होता है, पर रोबदाव में पांच के वरावर होता है वह। बड़ी शक्ति होती है इन लोगों में, पृथ्वी कांपती है इनके पदचाप के नीचे। आते-जाते थे लोगों से सलाम की ख्वाहिश करते हैं। इनका कभी विनाश नहीं होगा, ध्वंस नहीं होगा। ये लोग भी अपने प्रयल से आत्मरक्षा करके जीवित हैं और हमेशा जीवित भी रहेंगे। इनको कभी मैंने दूर से देखा है। कभी वेहद करीव से। लेकिन इनको पहचानने में कभी गलती नहीं की है मैंने। अपरिसीम उदासी- नता होती है इनकी मनुप्यों के प्रति, पर आवश्यकता पड़ने पर बड़ा लगाव भी हो जाता है उन्हीं मनुष्यों से इनका। - लेकिन घरती इनके लिए भी उतनी ही बेरहम है जितनी हमारे-आपके लिए। इस देरहम धरती की छाती पर किसी तरह जमे रहने की स्वाहिश में ही ये कभी उदासीन हो जाते हैं, कभी दयावान । कभी आदमियों की हिमायत करते हैं, कभी खिलाफत । जैसे भी हो, इन्हें टिके रहना ही पडेगा। नहीं तो यह धरती बनी ही क्यों है ? (अब इन्ही में से एक शख्स की कथा कहता हूं :)
द्वितीय पार्क के पास से गुजर रहा था। इस मुहल्ले में आने के बाद इस पार्क के पास होकर ही मुझे आना-जाना पड़ता था। देखा जाय तो और कोई रास्ता भी नहीं था इसके अलावा। एकाएक माइक्रोफोन की आवाज़ आई कान में। कोई भाषण दे रहा था। बड़ा गरमागरम था भाषण। चुनाव का प्रचार चल रहा था । करीव ही था चुनाव का दिन । इसीलिए मुहल्ले-मुहल्ले में, पार्क- पार्क में सभाएं हो रही हैं। लोगों की अच्छी-खासी भीड़ जमा हो जाती है इन सभाओं में । और लोगों की बात आने पर हमारे मुहल्ले के नाटक की बात याद आ जाती है । कुछ लोग रक्वे जाते थे विग्स के पास । उनका काम था नारा लगाना । कभी 'हर हर महादेव' का जोर-जोर से नारा लगाते थे, कभी 'अल्ला- हो अकबर' का। इन्हें ही कहते हैं 'लोग'-हमारे देश की जनता। ये ही लोग कांग्रेस की मीटिंग में भी जाकर भीड़ लगाते हैं, फिर कम्यूनिस्टों की मीटिंग में भी। इनके मीटिंग का मतलब मीटिंग ही होता है। गेज़मर्रा की तरह मैं चला ही जा रहा था। एकाएक वक्ता के गले की भावाज कान में आयी । मौसा जी बोल रहे हैं न ? नक गया। मेरे वही मौसा जी थे। एक ज़माना था जब पोस्ट मास्टर जनरल के पद पर थे। कितनी गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे तव ! लोग कहते थे, 'पी० एम० जी० हैं तेरे मौसा जी? तेरे सगे मौसा हैं ?' में किसी तरह उन्हें यकीन नहीं दिला पाता था कि हो सकता है मैं गीय हैं, लेकिन अमीर पी० एम० जी० जगदीश मुकर्जीयानी पोस्ट ऑफिस की दुनिया के मुकर्जी साह्न का सचमुच मेरे मासा होने में क्या बाधा है। नंगे मां की सगी बहन के साथ शादी हुई थी मुकर्जी साहब की। पर तब हम लोगों की जो हालत थी उसे देखकर किसीका इस बात पर यकीन न करना ही मुनानिय था। वे पहले, पी० एम० जी० अगर तेरेसगे मौसा है, तो ये अपनी साली के लडके को एक नौकरी क्यो नही दिलवा देते?' दात तुक की थी। मचमुच मेरी मा के अपने बहनोई थे। और उसी मां या बेटा, मैं, तब बेकार था। एक अदनी-सी नौकरी के लिए लोगों के दरवाजों का चक्कर लगाता फिरा हूँ । किमीने उम्मीद नहीं दिलाई थी तब, न किमीने डाढम बधाया था, न नमल्ली दी थी। यहा नक कि इन्ही मौमाजी जगदीश मुकर्जी ने एक मार्टीफिकेट नक देने से इन्कार कर दिया था। क्यो? इमलिए कि मैं काग्रेमी हू। और आज वही मौमाजी नौकरी मे रिटायर होकर चुनाव लड़ रहे हैं। पार्क में खड़े होकर भापण दे रहे है। हजारो आदमियो की भीड में खड़े होकर देशसेवा की बातें कह रहे हैं। अजीब-मा लगा सोचने में। बचपन की बातें याद है । मा मे मौसीजी की बातें सुनता था। कभी-कभी उत्सव-अनुष्ठान के मौको पर जाता भी था मा के माथ उनके यहा। किसीको भी पहचानता नही था तव । पर इतना जरूर ममा जाता था कि ये लोग बड़े आदमी है। छोटे-छोटे मौसेरे भाई-बहनों के कपडे-जूते मारे कपडे-जूनो से कही अच्छे होते थे । हम लोग उनके घर जाने तो थे, पर वहा जाकर हमे मकुचित बने रहना पड़ता था। लगता था जैसे हम अवाछिन हैं, बिना बुलाये आ गए हैं। मन ही मन गुम्मा आ जाता था मा पर। मां को कहता, 'मा, तुम्हारी भी ऐसे ही किसी बडे आदमी के घर शादी क्यों नहीं हुई ?' मां हंमती थी । कहती 'धत्, ऐमी वात नहीं कहा करने।' मैं कहता, 'तुम्हारी अगर किसी बडे आदमी के घर शादी होती तो हम लोग भी अच्छे-अच्छे कपड़े पहन सकते, सब हम लोगो की भी खूब खातिर करते, हम लोगों के मकान के सामने भी उसी तरह का एक बड़ा फूलो का बाग होता। तब मोमाजी के सामने जाने की हिम्मत नहीं होती थी हम लोगों की । एक तो ये पोस्ट मास्टर जनरल, बहुत बड़े अफसर, तिमपर प्रकृति के गंभीर । जब पाम से गुजरते थे, हम लोग डर के मारे दूरहटके उनके लिए रास्ता छोड़ देते थे। लेकिन मौसीजी हमारी वडी खातिर करती थी। मेरी मां की बड़ी बहन धी। हमारे जाने पर खुश होती थी मौसीजी। मेरी मां को नाम लेकर । ३१ थी। मां का नानथापंजिनी। मीनी कहतीं, 'पंकजिनी का बडालड़का बहुत अच्छा है।' कर मैनी मोर देवकर कहती, 'क्यों रे, शान हमारे यहां रहेगा? कल. दंगी तेरी मां के पान। रहेगा?' रहने की तबियत तो बहुत करती थी। लेकिन नंकोत्र भी होता यानन में। मकान की तरह सहन भाव नहीं आ पाता या नावानी के घर। वहां बार, सामान-असबाब वगैरह इतना साफ-सुथरा और नजानंबरा रहता कि फर्श पर चलने में ही नंकोत्र होता था। कहीं गंदा न हो जाय , ही कोई चीज़ टूट न जाय, कहीं दाग न लग जाय किसी में। पर उत्सव-अनुप्फान के मौके हर रोज तो आते नहीं थे। लिहाजा मांजाजी सीसीजी से कभी-कभार ही मुलाकात होती थी। अर्थात् पांच-जाल में एक या दो बार। यह वह युग था जब आत्मीय-स्वजन से मनुष्य का स्नेह-प्रीति का सम्बन्ध बटूट था । लोग मौका मिलते ही अपने सगे-सम्बन्धियों से मेल-मुलाकात करने जाते थे। पारम्परिक आना-जाना चलता था। पर हम लोगों की बात ही मलहदा थी। मौसी-मोता और हमारी हालत में इतना ज्यादा अंतर था कि उनके यहां जब खुशी होती तब हम नहीं बाजा सकते थे। उनका मकान एक अभिजात इलाके में था, और हमारा एक गरीबों के मुहल्ले में। हम लोग जब स्कूल में पढ़ने ये तव किसकी कैसी हालत है, इन बात पर गौर नहीं करते थे। मित्रता पर आर्थिक दशा के भेद का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। यह शुरू हुआ थोड़ा और बड़ा होने पर। जब यह भेद समझना शुरू किया मैंने तब काफी बड़ा हो गया था। तव पढ़ाई खतम करके नौकरी की कोशिश में दर-दर की खाक छान रहा था। मौसाकी थे पी० एम० जी०। पोस्ट मास्टर जनरल । चाहते तो एक नौकरी जरूर दिलवा सकते थे। बहुत जगहों का चक्कर लगा चुका था तव । सब सिर्फ एक ही बात क करते थे : 'बड़ा खराव वक्त है, नौकरी खाली नहीं है कहीं।' हालांकि यह बात नहीं थी कि किसीको नौकरी न मिलती हो। म के आसपास के दो-एक लड़कों को नौकरी मिल भी गयी थी। कैसे उन्हें न जी मले नहीं पता। नौकरी पाना कितना कठिन है, इसे तब मैंने नि ।
अच्छी तरह समझा था, उत्तनो अच्छी तरह बाद में कभी नहीं समझा। उन्हीं दिनों एक दिन पिताजी ने कहा, "अपने मौसाजी के पास एक दिन क्यों नही चले जाते ?' में बोला, 'मोमाजी मुझे नहीं पहबानते।' पिताजी ने कहा, "क्यों, अभी तो उम दिन मुबोध बाबू की लड़की की शादी में गए थे, तब मुलाकात नहीं हुई थी क्या।" मैंने कहा, 'मुलाकात हुई थी, लेकिन बात नहीं हुई। 'वात न भी हुई हो तो क्या हुआ, प्रणाम तो किया था न उन्हे ?' बोला, 'नहीं, प्रणाम नहीं किया था।' पिताजी मन ही मन अप्रसन्न हुए। जवान से बोले, 'यही तुम लोगो की मवमे बड़ी गलती है। क्तिने गण्य- मान्य व्यक्ति हैं, उन्हें प्रणाम करने में क्या बुराई है ? तिसपर जब वे इतने बड़े अफसर हैं।' मैं मिर नोचा किये अपराधी की तरह खड़ा रहा । पिताजी फिर कहने लगे, 'तुम लोग आजाल के लड़के हो, ठीक तरह बड़ों की इज्जत करना नहीं सोये हो। उस दिन तुम्हें कहा गुमान था कि नौकरी के लिए एक दिन उन्हींक पास जाना पड़ेगा। उस दिन अगर थोडा प्रणाम कर रखते तो आज नौकरी की बात कहने मे असुविधा नहीं होती।' पिताजी हमेशा मुझे अच्छे-अच्छे उपदेश दिया करते थे। उस दिन भी दिया। मैं पिताजी के सामने अधिक नहीं बोला करता था। मेरा चुप रहना पसंद नहीं करते थे पिताजी कोई खास । पिताजी कहा करते थे, 'दुनिया को क्या तुम इतनी सीधी जगह समझने हो? महा अगर तुम चुप बैठे रहोगे तो कोई फूटी आंखों में भी नहीं देनेगा तुम्हारी और । सबके साथ मिल-जुलकर रहना पड़ेगा, सबको प्यार करना पड़ेगा, सबको अपना बनाना होगा तभी सब तुम्हें तुम्हारी यापत्ति में मदद इन बातों का कोई जवाब नहीं होता, तभी मैं जवाब नही दिया करता पा। पर बड़ा वष्ट अनुभव करता था मन में। एक घटना घटी एक दिन । पिताजी के ही एक परिचित मित्र ने मुझे सेण्ट्रल एक्साइज़ के एक बड़े अफसर चटर्जी साहब के पास भेज दिया। बड़े सज्जन व्यक्ति निकले चटर्जी साहब । गरीव जानकर उपेक्षा नहीं की मेरी। एक अर्जी भेजने को कहा। किस तरह अर्जी लिखनी होगी उसका भी एक मसीदा बना दिया। अन्त में बोले, 'लेकिन इसके साथ, वेदा, एक और काम करना पड़ेगा तुम्हें।' पूछा, 'क्या? मैंने 'एक कैरेक्टर सार्टीफिकेट ला सकोगे ?' 'किससे लेना होगा?' 'किसी फर्स्ट क्लास गवर्नमेण्ट गजेटेड ऑफिसर से।' मैं बोला, 'विना सार्टीफिकेट के नहीं मिलेगी नौकरी ?' चटर्जी साहब बोले, 'चारों ओर आजकल कांग्रेस का आंदोलन चल रहा है। कांग्रेसी ट्राम-बस फूंक रहे हैं, वम-बारूद-गोली छोड़ रहे हैं, इसीलिए अव बहुत चुन-चुनकर लिए जा रहे हैं आदमी।' विनम्रतापूर्वक बोला मैं, ‘पर मेरा तो किसी गजेटेड अफसर से परिचय नहीं है।' 'सगे-सम्बन्धियों में कोई फर्स्ट क्लास गजेटेड अफसर नहीं है ?' मैंने कहा, 'नहीं' । कहकर ही यकायक मौसाजी का नाम याद आ गया। बोला, 'ठीक है मैं कैरेक्टर सार्टीफिकेट ले आऊंगा।' मन में संदेह जरूर था लेकिन सोचा था, कुछ भी हो, हैं तो सगे मौसाजी ही, तब कोई न कोई रास्ता निकल ही आयेगा। घर आकर पिताजी से कही यह बात मैंने । पिताजी ने कहा, 'तब अपनी मां से कहकर देखो, वे अगर कोई इंतजाम कर सके।' मां रसोई में थीं। पिताजी गए उधर । म भी साथ-साथ गया। पिताजी बोले, 'सुनती हो, तुम एक दिन इसे लेकर अपनी दीदी के यहां जा सकती हो?' मेरी मां बड़ी सीधी-सादी स्त्री हैं। मां को इन बातों में कभी कोई एतराज नहीं होता। मां की बहनों में आपस में मेल भी बहुत था। बहनें अक्सर मिल भी लेती थीं एक-दूसरे से। मां ने सब बातें सुनकर कहा, 'ठीक है, चली जाऊंगी, दीदी से कहूंगी। - । ३४ - दीदी जीजाजी मे कह देंगी। पिताजी ने कहा, 'तुम्हारे जीजाजी की जैसी प्रकृति है, क्या वे सार्टिफिकेट देने के लिए राजी हो जाएगे' मा ने कहा, 'राजी क्यो नही होगे? मुझे तो पहचानते हैं जीजाजी। दीदी की शादी के वक्त में ही पहले-पहल जीजाजी को पसंद करने गई थी पितानी के माय । तव जीजाजी छोटे ओहदे पर थे। दीदी के माय शादी होने के बाद ही तो धीरे-धीरे तरक्की होना शुरू हुई थी।' पिताजी ने कहा, 'तब यही तय रहा।' मा ने कहा, 'मैं जीजाजी से जो कहूंगी वे वही करेंगे--जीजाजी टालेंगे नहीं मेरी बात ।' मन मोचा, चलो काम बन गया। पी०एम०जी० अगर सार्टिफिकेट दे तब फिर फिक्र किस बात की! अगले दिन रविवार था। रविवार को अवश्य हो घर रहेंगे मौसाजी। मा को भी रविवार को काम कम रहता है। मा खाना बनाकर मुझे लेकर मौसाजी के घर गई। अमीर आदमियों का मुहल्ला है। थोडा टिपटाप बनकर ही गए हम दोनों। मकान के सामने दरवान खड़ा या यथारीति। मां को देखकर कुछ नहीं बोला। भीतर चले गए हम लोग। मां बिलकुल सीधे जनाने में चली गई। मौमौजी मा को देखते ही आगे बढ़ आई। 'अरे पंकजिनी, लड़के को लाई है न साथ ? आ आ, तेरा लड़का कितना बड़ा हो गया है रे।' बड़ी खातिरदारी हुई हम लोगों की। मां के लिए चाय आई । मेरे लिए रसगुल्ला, सन्देश, भमोमा-कचौड़ी। मोमी जी बोली, 'क्यों री, तू लड़के को खाने को नहीं देती है क्या? इतना दुवला क्यों है यह मां ने कहा, 'वह क्या घर मे रहता है कि उसे खाने को दूंगी 'घर में नहीं रहता! कहां जाता है ?' मा ने कहा, 'कहां जाता है, वही जानता है। सुबह थोड़ा-सा नास्ता करके निकल जाता है, फिर लौटता है दोपहर के एक बजे। तब लोटकर ठडा भात खाता है ! खाकर फिर निकल जाता है।' " " ! 2 y मीतीजी ने मेरी ओर देखकर पूछा, 'क्यों रे, कहां जाता है तू इतना? कहां घूमता रहता है तमाम दिन ?' मैं बोला, 'हम लोगों का क्लब है, क्लब में दोस्तों से गपशप करने जाता . --- । 'तो क्या इतनी बातें होती हैं वहां कि तुम्हें खाने तक की याद नहीं रहती? क्या बातें करते हो तुम लोग ?' मां ने कहा, 'दिन-रात तो दोस्तों के साथ ही रहता है। दोस्त लोग ही सब कुछ हैं जैसे इसके, हम लोग कुछ भी नहीं ! इसीलिए तो सोच रही हूं कि किसी नौकरी में लगाकर शादी कर दूंगी, तब आटे-दाल का भाव पता चल " मां के इरादे को सुनकर मौसीजी हंस. पड़ीं। वोलीं, 'हां, तुझे भी एक सहारा मिल जाएगा, तू भी और कितने दिन हाय जलाकर खाना पकाती रहेगी बता।' मौसीजी जानती थीं कि हम लोग गरीब हैं। इसलिए उनके मन में इस प्रकार की सहानुभूति थी मां के प्रति । सगी बहन हैं, एक ही साथ एक ही मां- वाप के पास एक ही घर में पालन-पोपण हुआ है। लेकिन शादी के बाद एक बहन बन गई अमीर, और दूसरी और भी ज्यादा गरीव हो गई। ऐसी दशा में एक की दूसरी के प्रति सहानुभूति होना ही स्वाभाविक है । पर मां को मैंने कभी भी मौसीजी से ईर्ष्या करते नहीं देखा। कहता, 'मां, तुम कुछ भी कहो, है वे लोग घमंडी।' मां कहतीं, 'क्यों, कहां देखा तूने उनका घमंड ? देखा नहीं तूने कितना हंस-हंसकर बातें करती हैं मेरे साथ।' मैं कहता, 'तुमसे हंस-हंस के बातें करती हैं तो क्या हुआ, मुझसे तो कोई बातें ही नहीं करता। 'अरे, यह क्या कहता है ? इतनी तो बातें की तुझसे । तुझे रस- गुल्ला, संदेश, समोसा-कचौड़ी-इतना सब खिलाया ! इतना झूठ बोलता है तू। सचमुच, मौसीजी की बुराई करने पर मां को बहुत बुरा महसूस होता था। सह नहीं पाती थीं मां मौसीजी की बुराई। पर मैं जानता था, मौसीजी, मौसरे भाई-बहन सब हमारी हालत पर तरस खाते हैं। वे हंस-हंसकर बातें तो जरूर करते थे, किन्तु लगता था कि उस हंसी के अंतराल में उनका निःशब्द मैं - - , व्यंग भी है हम लोगों के प्रति । उनके व्यवहार से भी व्यक्त हो जाता था प्रकारान्तर से कि हम लोग गरीब है और वे लोग अमीर। मौमीजी की वडी लड़की शानू अपनी साडी और गहनो का इस भौड़े ढग से प्रदर्शन करती थी कि हरएक की नजर उनपर पड जाए। 'यह देख री पंकजिनी, शानू के लिए ये कगन बनवाए हैं, बता तो डिजाइन खुशी से फट पडती मा, 'वाह, बहुत बढ़िया डिजाइन है दीदी। किसकी पसन्द है बनाओ तो, तुम्हारी या शानू की।" शानू कहती, 'मा क्या खाक पसन्द करेंगी, मेरी पसन्द है। माने तो डाय- मण्ड-कट डिजाइन पसन्द किया था, अनन्नास वाला यह डिजाइन मैंने ही ढूढ- कर सेलेक्ट किया है। विगलित होकर मां भूरि-भूरि प्रशमा करने लगती, शानू की। कहती, 'वाकई दीदी, तुम्हारी शानू बेटी की पसन्द निहायत अच्छी है।' *मुझे लगता, यह खुशामद की बात है मा की। और यह भी मन मे आता चूंकि मौसीजी अमीर हैं तभी मा ऐमे खुशामदी लहजे मे बातें करती हैं उनसे । जमे उनमें कोई खरावी हो ही नहीं सकती, जैसे उनका सब कुछ अच्छा घर लौटकर मैं नाराज होता । कहता, 'मैं फिर कभी तुम्हारे साथ उनके घर नहीं जाऊंगा मां, कहे देता है।' 'क्यो, क्या हुआ? क्या किया मैंने ?' 'उनका सब कुछ अच्छा है और हमारा सब खराव, क्यो ?' मा हंसकर कहती, 'हे भगवान्, मैंने क्या कभी यह कहा है कि हमारा सब खराव है?' मैं कहता, 'तुम तो खाली उनकी तारीफ ही करती रही। शानू की तारीफ की, मानू की तारीफ की। लेकिन मौसीजी ने क्या मेरी एक भी वार तारीफ की?' मां कहती, 'अरे, तू इन छोटी-छोटी बातों पर गौर करता है ? वड़ा पगला है, इन बातो पर कही गौर किया जाता है ? लोगों की तारीफ करने पर वे खुश होने हैं, नही जानता?' 'तब क्या तुम वेवजह लोगों की तारीफ करोगी?' मां पूछती, किसकी तारीफ की मैंने बेवजह ?'
? 'क्यों, शानू को तुम खूबसूरत कहकर खुशामद नहीं कर रही थीं ? गान सचमुच खूबसूरत है ? खूबसूरती है किधर उस चपटी नाक वाली लड़की -- ?' वाकई शानू देखने में मौसीजी की तरह नहीं थी, विल्कुल माताजी की रह थी। मौसाजी की भी नाक चपटी थी । इसपर भी बड़ागरूर था मौसीजी की बड़ी लड़की के मन में। लेकिन मेरी मां ने इसी लड़की को हमेशा खूबसूरत कहकर उनके प्रिय- पात्र बनने की कोशिश की है। मुझे यह अच्छा नहीं लगता था। मां कहा करतीं, 'हमेशा लोगों में अच्छाई देखनी चाहिए, उनकी तारीफ करनी चाहिए, इससे वे खुश होते हैं।' मां का यह सुझाव मुझे कतई पसन्द नहीं था। खास इसी वजह से मौसीजी के घर से मैंने कोई सम्पर्क नहीं रक्खा था। और मीसीजी तो दरकिनार, किसी उत्सव-अनुष्ठान या शादी के मौके मौसेरी बहिनों से मुलाकात हो जाने पर उनसे बोला तक नहीं हूं। उन्हें दूर से देखकर ही कतरा गया हूं। और मौसाजी की तो बात हा अलग है। वे पी० एम० जी० हैं। पोस्ट मास्टर जनरल । उनकी धारणा थी कि उनसे ऊंचे ओहदे की नौकरी दुनिया में किसीने नहीं की। और इन्हीं मौसाजी के पास अपने एक काम की सिफारिश के लिए जाना पड़ेगा, यह मैंने कभी नहीं सोचा था। उम दिन जब मैं गया, मां भी मेरे साथ गई थीं। गेट के भीतर जाते ही यथापूर्व मौसीजी दौड़ी आई। बोलीं, 'क्यों री, वर हाल है तुम लोगों का? आ-आ, वैठ...' मैं पीछे था। मंकोच से सिमटा हुआ। मां ने कहा, 'दीदी, जीजाजी कहां हैं ? उन्हींके पास आई हूं.' 'क्यों, जीजाजी से क्या काम है तेरा?' 'इस लड़के के लिए जीजाजी से एक सार्टिफिकेट लूंगी। इसकी नोकरी के लिए चाहिए।' मौसीजी बोलीं, 'लेकिन जीजाजी तो नहीं हैं रे, वे तो टूर पर च . हैं 'कब लौटेंगे?' परमों।'
" मां ने कहा, 'नत्र तुम्ही योड़ा कह रखना दीदी, इस सार्टिफिकेट के मिलने ने बड़ी मुविधा हो जाएगी मेरे लड़के को। कितनी जगह क्तिनी कोशिश की, कितने देवनाओ की मन्नतें मानी, लेकिन कुछ नही हुआ । अल में बड़ी मुश्लि में भले आदमी ने एक नौकरी देने का वायदा किया है। पर एक सखारी अफसर का सार्टिफिकेट मांग रहे हैं और जीजाजी भी तो एक सरकारी अफसर हैं दीदी।' मौसीजी ने वायदा किया कि कहेगी । मा को भी निश्चय हो गया कि मुझे अव नौकरी मिलके ही रहेगी। लेकिन चूकि मोमाजी घर पर मौजूद नहीं हैं, तव चारा ही क्या था। मा ने बार-बार मौसीजी में कहा था, 'तुम कही भूल न जाना, जीजाजी को कहा दीदी।' मौसीजी ने कहा, 'कहती क्या है तू ' मैं भूल जाऊगी तेरे लड़के की नौकरी की बात क्या मैं कभी भूल सकती हू काम की बात इतनी ही हुई, इसके बाद बैंकार की बातें शुरू हुई। दोनों वह्नों में मुलाकात होने पर अन्तरग बातें होती ही हैं। बाहर आकर मैंने कहा, 'अगले दिन भी तुम्हे मेरे साथ आना पड़ेगा।' मा ने कहा, 'क्यों, सारी वातें तो मैं वता आई हूं तेरी मोमीजी को । अव डर किस बात का है तुझे? देखा नहीं कितनी खातिर की दीदी ने तेरी।' मैंने कहा, 'खाक खातिर की ! उन्होंने तो अपनी अमीरी ही दिखाई !' 'कहता क्या है रे, कव दिखाई अमीरी?' मैं बोला, 'क्यो, वह जो ठडा शरबत पिलाया, वह तो यही जताने के लिए न कि उनके यहा रेफ्रिजरेटर है मां ने कहा 'बड़ी टेढी नज़र है तेरी, इतना वढिया शरबत पिलाया वह भी नही अच्छा लगा तुझे।' मैंने कहा, 'सिर्फ रेफ्रिजरेटर की ही बात नहीं, उनकी हर बात मे दिखावा होता है। हम लोगों को उस कमरे में ही ले जाकर क्यो बैठाया' 'अरे, यह भी कोई बात हुई ? वहीं उनके बैठने का कमरा है।' मैंने कहा, 'लेकिन वे खुद क्या उस कमरे मे मब समय बैठते है ? वह कमरा तो उसी तरह सजा-संवरा माली ही पड़ा रहता है। कही गन्दा न हो जाए इसलिए वे उस कमरे में नहीं जाते।' मा ने कहा, 'इसमे क्या हुआ। ठीक ही तो है, ज्यादा इस्तेमाल करने में . 20 र गन्दा हो ही सकता है।' मां से ज्यादा बातें करके शक्ति का अपव्यय करने की तवियत नहीं थी तब मेरी। मां इन बातों को नहीं समझती थीं। मेरी मां वास्तव में एक सरल और निष्कपट स्वभाव की स्त्री थीं। हर आदमी की बात पर यकीन कर लिया करती थीं सहज ही में । इस विश्वास-प्रवणता के लिए मां को जीवन में अनेक आघात और कष्ट सहन करने पड़े हैं। हालांकि मौसीजी मां की सगी बड़ी वह्न हैं, फिर भी उन जैसी चतुर-चालाक स्त्री मैंने कभी नहीं देखी। शानू और मान, मांसीजी की दोनों लड़कियां भी उन्हींकी तरह थीं। वे कभी ज़बान से यह जाहिर नहीं करती थीं कि वे अमीर हैं और हम गरीब । लेकिन किस्मत का खेल कि उन्हीं मौसीजी के घर मुझे जाना पड़ा। और जैसे इन अपमान के प्रतिकार का भी कोई उपाय नहीं था मेरे पास । उधर चटर्जी साहब से मैंने वायदा किया था कि यथासमय कैरेक्टर सार्टिफिकेट ला दूंगा। पर सहसा उसी बुधवार के दिन एक दुर्घटना घटी। अगले दिन अखवार में वह खबर निकली थी। बड़े विस्तार से उसका वर्णन किया था स्टाफ-रिपोर्टर ने । जिस ट्रेन से मौसाजी लौट रहे थे वह अकस्मात् डिटेल हो गई। कई डिब्बे उलट गए। बहुत-से लोगों की मृत्यु हो गई । बहुत- से हताहत व्यक्तियों का नाम-पता छपा था। उनमें मौसाजी का नाम न पाकर घर के लोगों की चिन्ता और बढ़ गई। दफ्तर से लौटकर पिताजी ने ही सबसे पहले खबर दी। बोले, 'जानती हो, आज बारिमाल एक्सप्रेस का एक्सीडेंट हो गया मां यह खबर सुनते ही रो उठीं। 'हाय राम, यह क्या कह रहे हो? जीजाजी तो इसी ट्रेन से आनेवाले पिताजी ने कहा, 'मुझे नहीं पता इसका, लेकिन दफ्तर से लौटते वक्त सुन कि कलकत्ता में टेलिग्राम आया है कि इस दुर्घटना में करीब डेढ़ सौ आद मारे गए हैं..." यह सुनकर मां स्थिर नहीं रह पायीं। जल्दी से रसोई और घर का क खत्म करके छोटे भाई को साथ लेकर मौसीजी के यहां चली गई। वहां भी तव खबर पहुंच चुकी थी। बारिजाल एक्सप्रेस किसी ब्रिज उलट पड़ी है। पोस्ट ऑफिस से टेलीफोन के जरिये यह खबर दी गई । ४० मौसीजी को। पर पूरी खबर अब तक नहीं आयी है । मौसीजी, शानू, मान- मब भय में आतंकित होकर वैजवान बन गए हैं। यह दौलत, टीम-टाम, शान- शौकत-सब कुछ ही तो उन्ही मौसाजी की नौकरी की बदौलत ही है। यह मोमाजी ही अगर नहीं रहे तो सब बेकार है । मुझे याद है मिर्फ इमी एक दिन मौसीजी के घर उनका धन, मान, ठाठ- बाट-मब-कुछ तुच्छ बन गया था। शायद उमी एक दिन मौसीजी को एहसाम हुआ होगा कि हम और वे एक हैं, हममे और उनमे कोई भेद नहीं है। अगले दिन मुबह ही खबर आ गई कि नहीं, मौसाजी विमी संकट में नहीं पडे हैं । वे मही-सलामत हैं। जो बारिशाल एवमप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई है वे उसमे नहीं आ रहे थे । वे आ रहे हैं वाद की ट्रेन मे। अगर किम्मत को माना जाए तो सब कुछ मानना पड़ता है। मोमीजी के यहां मे मा यह खबर लेकर वापस आई। उसी दिन मा काली घाट के मन्दिर में पुजापा चढाने गईं । जैसे मा की ही एक विपत्ति दूर हुई। मोमीजी मे भी मां ने कहा, 'तुम भी कालीघाट जाकर पूजा कर आओ दीदी।' मैंने उसी दिन सेंट्रल एक्माइज के चटर्जी साहब के घर जाकर मुलाकात की। मारी बातें उन्हे ममझाकर बताई। चटर्जी साहब बोले, 'ठीक है, कोई हर्ज नहीं। वे जब लौट आए तभी दे देना मार्टिफिकेट, कोई जल्दी तो है नहीं।' चटर्जी साहब को हो सकता है जल्दी न रही हो, लेकिन मुझे तो यो जल्दी। मैं तो ज्यादा दिन बेकार नहीं वंठा रह सकता था। और कितने दिन मा-बाप में जैववर्च के पैमे लेता रहूंगा? मेरे दोस्तो में तब करीब-करीव मवको नौकरी मिल चुकी थी। कोई मर्चेण्ट ऑफिम में घूम गया था, कोई कलकत्ता कॉर्पोरेशन मे। सुभाष वोस, आज के नेताजी, तब कॉर्पोरेशन के मेयर थे। वे चुन-चुनकर कर्मठ युवकों को कॉर्पोरेशन के दफ्तर में नौकरी दे रहे थे। लेकिन वे भी मर्जी के मुताबिक सबको नहीं दे पा रहे ये नौकरी। सिर्फ जो जेल गए हैं, या जिन्होंने स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया है, या जो काग्रेस के स्वयसेवक बने हैं, छाट-छाटकर उन्हीको दी नौकरी उन्होंने। कॉर्पोरेशन के निःशुल्क प्राइमरी स्कूलो में अध्यापक की नौकरी वुरी नहीं थी। उस जमाने में अच्छी ही थी। तलव थी ४१ तीस रुपये, और साथ में ढेर सारी छुट्टियां । इसके बाद अगर ट्यूशन की गई तो और तीस पये पैदा कर लेना भी मुश्किल नहीं था। हम लोगों ने उस समय अव की तरह ही सरकार के खिलाफ लड़ाई की थी। इस जमाने की लड़ाई तो सीधी है। अब तो कांग्रेस का मतलब ही है सरकार । नव कांग्रेस थी सरकार की दुश्मन । तब कांग्रेस का मेम्बर होने पर सरकार की वक्रदृष्टि का भय रहता था। खुफिया पुलिस पीछे लग जाती थी। तब हर महीने में लाठी चलाना सिखाने के क्लव थे। सिर्फ लाठी चलाना ही नहीं, युदती लड़ना, छुरा चलाना भी सिखाया जाता था और साथ ही निपिद्ध पुल्त भी पढ़ाई जाती थीं। जिन पुस्तकों को सरकार ने जब्त कर लिया है ये हाथों-हाथ इनमें घूमती रहती थीं। विशेष रूप से शरतचन्द्र की 'पथेर दावी' लुका-छिपाकर हराक मेम्बर को पढ़ाई जाती थी। और अब की तरह 'सिने क्लब' नहीं थे उस समय । 'सिने-क्लव' ही नहीं, तब सिनेमा भी बहुत कम आया करते थे। कई अंग्रेज़ी सिनेमाघर थे, वहीं हमारे कुछ शौकीन दोस्त सिनेमा देख आया करते थे। जो उन दिनों सिनेमा देखते थे हम उन्हें हिकारत की नजर से देखते थे। उन समय हम लोग स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकें पढ़ा करते, अश्विनीकुमार दत्त के ग्रंथों का अनुशीलन करते । उन महापुरुषों को हमने अपना आदर्श बनाया था जिन्होंने देश या आदर्श के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया था। लेकिन इतना सब करके भी ब्रिटिश सरकार को भगाया नहीं जा सका मुल्क में। वजह, रुपयों की खातिर मजबूरन हमारे बहुत-से साथियों को सरकारी नौकरी कबूल करनी पड़ती थी। और एक बार सरकारी मुलाजिम हो जाने के बाद उनका हमसे मिलना-जुलना एकदम वन्द हो जाता था क्योंकि ऐसा न करने पर पुलिस की लंका लिस्ट में नाम चढ़ जाने का अंदेशा था। गंरजोहो, इसी दरमियान प्रबर मिली कि मीताजी कलकता वापस लौट आग है। दरिन न इसी वक्त मां की तबियत खराब हो गई। पिताजी ने कहा, 'इससे क्या हुआ, अकेले ही जाओ न तुम । तुम्हारी मौनीजी नो पहचानती है तुम्हें । शरमाने को गया बात है?' तो भी जाने गी तबियत नहीं कर रही थी मेरी। लेकिन चारा भी पया था? जाना तो पड़ेगा ही। .
धीरे-धीरे घर से निकला। मा ने हिम्मत बंधाते हुए कहा था, 'जाकर मौसीजी और मौसाजी दोनो को पर छूकर प्रणाम करना, समझा?' रास्ते में मेरे एक चाचा से मुलाकात हो गई। मेरे सगे चाचा नही, पिताजी के एक मित्र । एक जमाना था जब पिताजी उनके साथ एक ही मेस में रहा करते थे। मुझे देखते ही खडे हो गए। बोले, 'क्यो, तुम मुशील के लडके हो न" बोला, 'हा, चाचाजी।' कहकर मैंने उनके चरण स्पर्श किए। पिताजी के साय मैंने उन्हें बहुत बार देखा था। सरोज बाबू को पैर छूकर प्रणाम करने में मुझे थोड़ी भी हिचक नहीं मेरी सारी बाते सुनकर वोले, 'यह बात है ? तुम्हारे जब मगे मौसाजी हैं तो बहना ही क्या, अगर वै सार्टिफिकेट न दें, तो मुझमे कहना मैं दिलवा दूगा तुम्हे सार्टिफिकेट।' मैंने कहा, 'मौसीजी ने कहा है कि सार्टिफिकेट दिलवा देंगी वे मोमाजी से।' सरोज चाचा वोले, 'मुशील से कह देना कि एक दिन कभी हमारे यहा आए, बहुत दिन से मुलाकात नहीं हुई है उससे । बडी इच्छा है उसमें मिलने की.. मैं बोला, 'लेकिन चाचाजी, आप भी थोडा माल रखिए। बहुत दिन में नौकरी की कोशिश कर रहा हूं, कुछ नही हो पा रहा है।' मरोज चाचा बोले, 'पर कहां, मुझे तो तुम्हारे पिता ने तुम्हारी नौकरी की बात कभी नहीं कही। मैंने कहा, 'पिताजी को सब बात सब ममय याद नहीं रहती।' 'ठीक है, तुम एक दिन मुझसे मिलना और एक दरख्वास्त दे जाना। फिर मैं देखूगा क्या किया जा सकता है।' तव और ज्यादा ठहरने का मौका नहीं था। सरोज चाचा को भी जल्दी थी। मुझे भी वक्त में मौसीजी के घर पहुंचना था। खर, एक आशा बंधी मन में। अगर मौमाजी से कोई भरोसा न मिला तो सरोज चाचा को ही पकडू गा। उन्होंने तो खुद ही आशा बंधायी है। यही सब सोचते हुए मैं फिर चलने लगा मौसीजी के घर की और । । ..
आज भी जब मैं उन दिनों की बातें मोचता हूं तो मौसाजी के लिए अफ- मोग होता है। हो सकता है अब मौसाजी को वे बातें याद न हों। याद रहने पर क्या आज वे इन बुढ़ापे में कोट-पेण्ट उतार कर खद्दर की धोती-चादर पहन-जोड़कर इलेक्शन में खड़े होते ! गोगाजी का भाषण तब भी चल रहा था उदात्त स्वर में : 'देश का भविष्य आप लोगों के हाथ में है। देश का मतलब ही है देशवासी। आप लोगों पर ही भारत के भविष्य की मुरक्षा निर्भर है। आज चारों ओर जो यह खाद्याभाव है, चारों ओर जो यह अशान्ति है, इसके मूल में है हममें आत्मविश्वास का अभाव । आप दृढतापूर्वक निश्चय कीजिए कि हम अपने देश पर चीन के दांत नहीं जमने देंगे। ईश्वर के नाम पर शपथ कीजिए कि आपको जैसे अपने बीवी- बगे पाने है बन ही प्यारा यह हिन्दुस्तान भी है। इस देश का अपमान आप लोगों का अपना अपमान है। आज आप लोग उन सब महापुरुषों को याद कोजिए जिन्होंने देश के लिए अपने जीवन की बलि बढ़ायी है। याद कीजिए राष्ट्रपिता गांधी को, याद कीजिए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को, याद कीजिए बुदीराम, यतीनदान, बाधा-यतीन आदि शहीदों को । मैं जानता हूं कि आपकी भूख मिटाने को अन्न, नन ढकने को वस्त्र कांग्रेस सरकार मुहैया नहीं कर पाई है। लेकिन सरकार तो आप ही लोगों ती है। भारत के साढ़े सात लाख गांव- वासियों का कल्याण ही तो चाहती है सरकार। इन्हीं करोड़ों ग्रामवासियों के कल्याण की कामना करके ही तो जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, और इन्दिरा गांधी ने व्यक्तिगत स्वार्यों का परित्याग करके देश की सेवा में जीवन उत्सर्ग कर दिया था और कर दिया है। देश में अन्नाभाव देखकर ही तो इन्दिरा जी ने चायन याना छोड़ दिया है, यह बात आप अवश्य जानते होंगे। जो लोग नहीं जानते हैं, उनकी जानकारी के लिए बता रहा हूं कि आज के प्रफुल्लमेन आदि श्रद्धेय नेता भी देश की दुर्दशा की बात सोच-सोचकर चिन्ता से व्याकुल हो रहे हैं। आप लोग भी देश से प्रेम करते हैं, आप लोग भी मातृ- भूमि को कल्याण-कामना करते हैं। अगर आप लोगों का देशप्रेम सच्चा है तो न बार आप लोग कांग्रेस को वोट देकर अपने श्रद्धेय नेताओं के हाथों को मजयन कीजिए...... मैं दुगड़ा होकर मोमाजी का भाषण सुन रहा था और मन ही मन गोग रहा था कि हमें या रोऊ। - मौसाजी पहने थे खद्दर की घोती और कुरता, कंधे पर यो खद्दर की तह की हुई चादर। और वह कितने साल पहले की घटना होगी? वह जो मैं उस दिन सार्टी-. पिकेट लेने गया था मौसाजी के घर? कम से कम तीस साल पहले की बात तो अवश्य ही होगी। इस तीस सारा के अरमे में बहुत-सी घटनाए घट गयी हैं। शानू की शादी हो गयी है भारत सरकार के एक ऊचे अफसर के साथ । मानू की भी शादी हो गयी है एक मुन्सिफ के साथ । मुन्सिफ अब प्रमोशन पाकर डिप्टी मजिस्ट्रेट हो गया है। आश्चर्य, कितने परिवर्तन हो गए हैं इस ससार मे। शानू का एकमात्र लड़का महा मे हायर सेकेण्डरी पास करके अमेरिका या इंगलैण्ड में कही पढ रहा है। मानू के दो लडके है । वे भी बचपन में ही दार्जिलिंग मे पढते थे। अब अमेरिका के किमी इजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे हैं। अगर देखा जाय तो मौसाजी की जमी हुई गृहस्थी है। लक्ष्मी-सरस्वती दोनो ही मौसाजी के दरवाजे पर वधी है। सेहत भी अच्छी है। सिर्फ बाल सफेद हो गए हैं कुछ और कोई परिवर्तन नही हुआ है। और परिवर्तन होगा भी क्यो ? जिन्दगी में उन्हे न कोई बड़ी तकलीफ पहुंची है, और न कोई बडा सदमा उठाना पड़ा है। छोटी उमर से ही नौकरी मे सिर्फ प्रमोशन ही मिलता गया है। और इस तरह तरक्की पा-पाकर गीढी- दर-सीढ़ी ऊपर चढ़ते गए है। इसके बाद नौकरी के अंतिम दिनों में रायबहादुर' बने । फिर सन् १९४७ में अग्रेज चले गए भारत छोडकर । अग्रेजो के चले जाने के बाद अगर किन्हीको कुछ फायदा हुआ है तो सिर्फ मौसाजी जैसे कुछ आदमियो को ही हुआ है। और इसके बाद? इसके बाद एक दिन सबको हैरत में डालकर मौमाजी 'पद्मश्री' बन गए। मैं मीटिंग के सामने खड़े होकर सिर्फ इन्ही वातो को सोच रहा था। सोच रहा था कि क्या इस मीटिंग में एक भी ऐसा आदमी नहीं है जो मौसाजी की इन झूठी बातो का प्रतिवाद करे, इन वाती का जवाब दे । लेकिन देखा कि मीटिंग के चारो ओर पुलिस का पहरा है. भी भी बहुत-से पुलिसमैन सादे लिबास में मौजूद हैं। मुझे मौसाजी की वे बातें याद आने लगी। .
- भायना भी मेरे प्रनि । इसकी वजह यह थी कि मेरे मौसाजी पोस्ट मास्टर जनरल है। और निर्फ पोट मास्टर जनरल ही नहीं, राय साहब का खिताब भी हासिल कार चुके हैं। यह यह जमाना था जब किसीका रिश्तेदार मगर सरकारी अफसर होता तो उसे गाने सुनने पड़झे थे। इसीलिए जब तक कोई खास जरूरत नहीं होती पी, अपने माताजी का परिचय नहीं देता था मैं। किसीके पिता, चाचा, या ताल अगर गलारी नौकर होते तब तो बात ही नहीं थी। मगर चोरी-चोरी कांग्रेसको नंदा सत्र देते थे। मुझे याद है, पिताजी ने एक बार पच्चीस रुपया चंदा दिया था कांग्रेस फड में स्वागत समिति की सदस्यता का चंदा था यह । नीद देते समय पिताजी ने कहा था, 'मेहरवानी करके मेरे नाम की रसीद नगा, मुझे सीद नहीं चाहिए।' जो मजन नंदा वसूल करने आए थे उन्होंने कहा, 'क्यों ? डर क्यों रहे हैं आप बहुत लोग तो मेम्बर बन रहे हैं आजकल ।' पिताजी ने कहा था, 'बनने दीजिए, न जाने कब किसे पता चल जाएगा, मुसीबत में पड़ जाऊंगा तब मैं। चारों और आजकल पुलिस के स्पाई धूम रहे हैं। सचमुच नब ऐसी ही भयानक अवस्था थी देश की। कांग्रेस का नाम सुनते होगांतिप्रिय लोग भय मे सिहर उठते थे। लेकिन भीतर ही भीतर कांग्रेस से गुहम्मत भी कर दे। और मैं, उनी जमाने का एक बेकार युवक, जा रहा था राय साहब मौसाजी मे माटीफिनोट मांगने ! नीने मंग-पढ़ी-घंटा की मांगलिक ध्वनि तव भी जारी थी। पूजा के धूप कीगंध आ रही थी नाक में। मौसाजी के कामरे के सामने पहुंचकर देखा कि वे कोने वाली आराम-कुर्सी पर लेटे अववार पढ़ रहे हैं। मुझे नहीं देख पाए वे। बदन पर गाउन है, पायजामा पहने है । पर में हैं हिरन के चमड़े की चट्टियां । नमल में नहीं आया क्या करूं। बहुत देर तक यहां गड़े रहने के बाद, मैं कमरे के अन्दर चला गया। मरे यार उसी हालत में नुपचाप पत्थर की मूरत बना बड़ा रहा । एकाएक मुलपर नजर पड़ते ही वे बोल उठे, 'कोन हो तुम? क्या चाहते ।' मैंने डरते हुए कहा, 'मैं भवानीपुर से आ रहा हूं।' 'भवानीपुर से ? क्या मतलब ?' मैं बोला, 'आप मेरे मौसाजी लगते हैं, मुझे आपने पहले भी कई वार अवश्य देखा होगा।' 'मैंने देखा है तुम्हे ? तब और ज्यादा सोचने का वक्त नही था। मैंने कह डाला, 'पंकजिनी को पहचानते हैं आप? वे मेरी मां हैं। मैं उन्हीका लड़का हू मुझपर रहम खाकर शायद इतनी देर बाद पहचाना उन्होंने । घोले, 'ओ यह बात है, आओ बैठो।' थोड़ी हिम्मत बढी मेरी। मैंने उनके सामने जाकर उनके हिरन के चमडे वाती चट्टियो की धूल लेकर माये पर लगायो। बोला, 'मौसीजी ने कुछ नहीं कहा है आपसे" 'किसके बारे में, बताओ तो?" मैंने कहा, 'एक नौकरी के लिए दरख्वास्त भेजूगा मैं, साय में एक कैरेक्टर सार्टीफिकेट देना पड़ेगा। इसी सार्टीफिकेट के लिए मैं आपके पास आया है। परसों भी आया था मां के साथ तय आप थे नही, टूर पर गए थे।' 'सार्टीफिकेट ?' वोला, 'हा, करेक्टर सार्टीफिकेट।' न जाने क्या सोचने लगे मौसाजी मन ही मन । इसके बाद बोले, 'लेकिन मैं न तुम्हें पहचानता हू और न तुम्हारे कैरेक्टर के विषय में जानता हूं, करेक्टर सार्टीफिकेट कैसे दे सकता हूँ फिर?' मैं बोला, 'लेकिन आपने मुझे देखा तो है।' 'तुम्हें देखा है ? कहां देखा है ? कव देखा है ?' मैंने कहा, 'मेरी चचेरी बहन की शादी की ज्योनार में आप गए थे, वहां मैंने आपके चरणस्पर्श किए थे।' गम्भीर स्वर में मौसाजी बोले, 'मेरे चरणस्पर्श तो हजारों आदमी करते हैं, इसलिए क्या उन सवको याद रखना पड़ेगा?' बात ठीक भी है। वाकई जो मशहूर और बड़े आदमी हैं उनके लिए क्या मुमकिन है मबको याद रखना? क्या करता, तब दूसरा रास्ता पकड़ा मैने ।
- मने पहा, 'लेकिन आप अगर मार्टीफिकेट नहीं देंगे तो मुझे नौकरी नहीं मिलेगी।' मानाजी बोले, 'नो मैं तुम्हें पूठा सार्टीफिकेट तो नहीं दे सकता।' में कुछ कहने जा रहा था, मौसाजी ने रोक दिया। बोले, 'चुप रहा, तुम नब अनाड़ी छोको दुनिया के हालचाल से तो वाकिफ हो नहीं, तुम लोग कैसे ममनोगे कि हम जैन हाई गवर्नमेंट ऑफिसर्स की कितनी ज़िम्मेदारी होती है। मुल्क को तो जहन्नुम रसीद किए दे रही है तुम्हारी कांग्रेस ? चूंकि अंग्रेज मनकार अभी कायम है, तभी चल रहा है मुल्क ! नहीं तो कभी का खतम हो गया होता, यह जानते हो ?' मैं क्या जवाब देता इसका, सिर्फ चुप बना रहा । मोमाजी ने फिर कह्ना शुरू किया, 'वह जो तुम लोगों का एक नेता वन गया है, गांधी, बनिया का वच्चा, स्कूल-कॉलेज के लड़कों को वर्गला रहा है बिना किमी तुक के । वे भी स्कूल-कॉलेज छोड़कर नमक-सत्याग्रह में शरीक हो रही है। अरे बाबा, नमक की कीमत ही क्या है ? कितने पैसे का नमक खाते हैं हम प्रतिदिन क्या हुआ, नुप क्यों हो, बताओ? यंगमैन हो तुम लोग, तुम्हीं लोगों को तो जवाब देना है।' मेरे जवाब का इंतजार किए बिना फिर मौसाजी ने अपने दिल का गुवार निकालना मुक किया। लगा जैने बहुत दिनों से जमा हो रही थीं ये बातें उनके मन में । कहने लायक कोई आदमी नहीं मिला था, इसीलिए चुप थे इतने दिन । अब मुझे नामने पाकर ज्यालामयी वाणी निःसृत होने लगी उनके मुंह से । बोने, 'जो यह गांधी है, वैसे और एक है-~-जवाहरलाल । साहब लोग अब मेरे सामने उन्हें गाली देते हैं तब मुझे शर्म के मारे चुप रह जाना पड़ता है, यह जानते हो? मुझे बुरा लगता है। आखिर में भी तो एक हिन्दुस्तानी हूं। में उनने पूछना है, तुम लोगों ने पढ़ना-लिखना किससे सीखा? किसने तुम लोगों को अंग्रेजी सिग्रायी ? अंग्रेजी सीखी है तभी तो तुम्हारा दिमाग इतना गरम हो गया है। जिन अंग्रेजों से अंग्रेजी सीखी है, फिर उन्हीं अंग्रेजों को गाली देह हो तुम लोग? यह अगर नमकहरामी न हो तो किसे कहा जाए नमक- हामी, बताओ?' इम बाद जमे एकाएक नजर पड़ी मुझपर। लगा, मुझे जैसे अभी देखा उन्होंने । बोले, 'तुम्ही लोग तो हो आजकल के लड़के, तुम्हीं लोग तो हो गांधी महागज के चेले.
" मैं प्रतिवाद करने जा रहा था, 'जी..' 'तुम चुप रहो। बानता हू, क्या कहोगे तुम ! नौकरी ढूंढ़ने के वक्त हम लोगो की खुशामद करने हो और दूसरे वक्त देशभक्ति का राग अलापते हो तुम लोग । मैं पूछना है, 'वदे मातरम्' का नारा लगाकर जेल जाने से क्या फायदा होगा। इस मुल्क को छोड़कर क्या अग्रेज कभी जाएगे, सोचा है तुमने? क्यो जाएगे, बताओ तो? क्या तकलीफ है उन्हें कि जायेंगे ? क्यों, बताओ न तुम्हारे माथियो का क्या स्याल है मैं बहुन देर से चुप बैठा था। अब और चुप रहना मम्भव नहीं था। बोला, 'मैं कुछ नहीं जानता।' मोनाजी नाराज हो गए। बोले, 'तुम नही जानते ? तुम लोग यगमन हो, नुम लोग नहीं जानोगे तो कौन जानेगा तुम लोग अगर एकमत होकर काग्रेस वालो मे कह दो कि उनकी वात तुम लोग नहीं मानोगे, ब्रिटिश सरकार की आज्ञानुमार चलोगे, तब तो सारा अझट ही दूर हो जाए । अमल बात क्या है जानने हो, यह अग्रेज जाति कितनी महान जाति है, इस बात को तुम लोगी का वह गाधी नहीं समझ रहा | अरे बाबा, और गोली चलाकर अग्रेजों को नहीं भगाया जा मक्ता- इस वान को निश्चित जान लो।' एकाएक मामीजी अन्दर आयी। 'लो, यह प्रसाद लो।' कहकर मौसाजी को प्रसाद और चरणामृत दिया। मुझे भी दिया थोडा-मा प्रमाद। मैंने उसे भक्तिपूर्वक माथे से लगाकर मुह में डाल लिया। मौसीजी चली जा रही थी, लेकिन जाने में पहले मेरी ओर देखकर वोली, 'अपनी मा में एक दिन आने को कह देना, समझा। मैं उसे खबर नहीं दे पाई थी झंझटो के मारे। चारो ओर हज़ार झमेले हैं मेरे..' कहते-कहते मौसीजी चली गई अपने काम मे। मौसाजी इतनी बडी एक दुर्घटना मे बच गए, अतः एक बड़ी चिन्ता दूर हो गई, एक भारी सकट टल गया। लेकिन इसका अमर रहेगा और कुछ समय तक। उधर से ध्यान हटाकर मौसाजी ने कहा, 'तो तुम क्या चाहते हो मुझे बताओ...' इतनी देर बाद काम की बात आने पर थोड़ा उत्साहित हो उठा मैं। बोला, 'एक कैरेक्टर मार्टिफिकेट 'करेक्टर सार्टिफिकेट?'
मन कहा, 'लेकिन आप अगर सार्टीफिकेट नहीं देंगे तो मुझे नौकरी नहीं - मामाजी बोले, 'तो मैं तुम्हें झूठा सार्टीफिकेट तो नहीं दे सकता।' में कुछ कहने जा रहा था, मौसाजी ने रोक दिया। बोले, "चुप रहा, तुम नद अनाड़ी छोकरे दुनिया के हालचाल से तो वाकिफ हो नहीं, तुम लोग कैसे नमझोगे कि हम जैन हाई गवर्नमेंट ऑफिसर्स की कितनी ज़िम्मेदारी होती है। मुल्प को तो जहन्नुम रसीद किए दे रही है तुम्हारी कांग्रेस ? चूंकि अंग्रेज नन्कार अभी कायम है, तभी चल रहा है मुल्क ! नहीं तो कभी का खतम हो गया होता, यह जानते हो?' मैं क्या जवाब देता इसका, सिर्फ चुप बना रहा। मांसाजी ने फिर कहना शुरू किया, 'वह जो तुम लोगों का एक नेता वन गया है, गांधी, बनिया का बच्चा, स्कूल-कॉलेज के लड़कों को वर्गला रहा है बिना किमी नुक के । वे भी स्कूल-कॉलेज छोड़कर नमक-सत्याग्रह में शरीक हो रहे हैं। अरे बाबा, नमक की कीमत ही क्या है ? कितने पैसे का नमक खाते हैं हम प्रतिदिन ? क्या हुआ, चुप क्यों हो, बताओ? यंगमैन हो तुम लोग, तुम्ही लोगों को तो जवाब देना है।' मेरे जवाब का इंतजार किए बिना फिर मौसाजी ने अपने दिल का गुवार निकालना गुन्न किया। लगा जैसे बहुत दिनों से जमा हो रही थीं ये बातें उनके मन में । कहने लायक कोई आदमी नहीं मिला था, इसीलिए चुप थे इतने दिन । अब मुझे सामने पाकर ज्वालामयी वाणी निःसृत होने लगी उनके मुंह से । बोले, 'जने यह गांधी है, वैसे और एक है-जवाहरलाल । साहब लोग जब मेरे सामने उन्हें गाली देते हैं तब मुझे शर्म के मारे चुप रह जाना पड़ता है, यह जानते हो? मुझे बुरा लगता है। आखिर मैं भी तो एक हिन्दुस्तानी हूं। में उनसे पूछना है, तुम लोगों ने पढ़ना-लिखना किससे सीखा ? किसने तुम लोगों को अंग्रेजी मिखायी ? अंग्रेजी सीखी है तभी तो तुम्हारा दिमाग इतना गरम हो गया है। जिन अंग्रेजों से अंग्रेजी सीखी है, फिर उन्हीं अंग्रेजों को गाली दे रहे हो तुम लोग ? यह अगर नमकहरामी न हो तो किसे कहा जाए नमक- हमानी, बताओ?' इसके बाद जैसे एकाएक नज़र पड़ी मुझपर। लगा, मुझे जैसे अभी देखा उन्होंन । बोले, 'तुम्हीं लोग तो हो आजकल के लड़के, तुम्हीं लोग तो हो गांधी महाराज के चेले. ...'
" में प्रतिवाद करने जा रहा था, 'जी...' 'तुम चुप रहो। जानता हू, क्या कहोगे तुम । नौकरी ढूढ़ने के वक्त हम लोगों की चुशामद करते हो और दूसरे वक्त देशभक्ति का राग अलापते हो तुम लोग । मैं पूछना है, 'वंदे मातरम्' का नारा लगाकर जेल जाने में क्या फायदा होगा? इस मुल्क को छोड़कर क्या अग्रेज भी जाएगे, सोचा है तुमने? क्यो जाएगें, बताओ तो? क्या तकलीफ है उन्हें कि जायेंगे ? क्यों, बताओ न तुम्हारे माथियों का क्या हयाल है मैं बहुत देर मे चुप बैठा था। अब और चुप रहना सम्भव नहीं था। बोला, 'मैं कुछ नहीं जानता।' मौनाजी नाराज हो गए। बोले, 'तुम नही जानते ? तुम लोग यगमन हो, तुम लोग नहीं जानोगे तो कौन जानंगा तुम तोग अगर एकमत होकर काग्रेस वाली से कह दो कि उनकी बात तुम लोग नहीं मानोगे, ब्रिटिश सरकार की आज्ञानुमार चलोगे, तब तो मारा झमट ही दूर हो जाए । अमल बात क्या है जानते हो, यह अग्रेज जाति कितनी महान जाति है, इस बात को तुम लोगी का वह गाधी नही समझ रहा है। अरे बाबा, वम और गोली चलाकर अग्रेजी को नहीं भगाया जा सकता-- इस बात को निश्चित जान लो।' एकाएक भौमीजी अन्दर आयी। 'लो, यह प्रमाद लो।' कहकर मौमाजी को प्रसाद और चरणामृत दिया। मुझे भी दिया थोडा-मा प्रमाद। मैंने उमे भक्तिपूर्वक माथे से लगाकर मुह में डाल लिया। मामीजी चली जा रही थी, लेकिन जाने मे पहले मेरी ओर देखकर वोली, 'अपनी मा से एक दिन आने को कह देना, समझा। मैं उसे खबर नहीं दे पाई थी झंझटो के मारे। चारों ओर हजार झमेले हैं मेरे ' कहते-कहते भौमीजी चली गई अपने काम मे। मौसाजी इतनी बडी एक दुर्घटना से बच गए, अतः एक बडी चिन्ता दूर हो गई, एक भारी मकट टल गया। लेकिन इसका असर रहेगा और कुछ ममय तक। जधर से ध्यान हटाकर मौसाजी ने कहा, 'तो तुम क्या चाहते हो मुझे बतानो..' इननी देर बाद काम की वात आने पर थोड़ा उत्साहित हो उठा मैं। बोला, 'एक कैरेक्टर सार्टिफिकेट 'कैरेक्टर साटिफिकेट?' It मैंने कहा, "लेकिन आप अगर सार्टीफिकेट नहीं देंगे तो मुझे नौकरी नहीं मांसाजी बोले, 'तो मैं तुम्हें झूठा सार्टीफिकेट तो नहीं दे सकता।' मैं कुछ कहने जा रहा था, मौसाजी ने रोक दिया। बोले, 'चुप रहा, तुम नब अनाड़ी छोको दुनिया के हालचाल से तो वाकिफ हो नहीं, तुम लोग कैसे ममनोगे कि हम जैसे हाई गवर्नमेंट ऑफिसर्स की कितनी ज़िम्मेदारी होती है। मुल्क पो तो जहन्नुम रसीद किए दे रही है तुम्हारी कांग्रेस ? चूंकि अंग्रेज सरकार अभी कायम है, तभी चल रहा है मुल्क ! नहीं तो कभी का खतम हो गया होना, यह जानते हो? मैं क्या जवाब देता इसका, सिर्फ चुप बना रहा। माताजी ने फिर कहना शुरू किया, 'वह जो तुम लोगों का एक नेता बन गया है, गांधी, बनिया का बच्चा, स्कूल-कॉलेज के लड़कों को वर्गला रहा है बिना किनी नुक के । वे भी स्कूल-कॉलेज छोड़कर नमक सत्याग्रह में शरीक हो रहे है। अरे बाबा, नमक की कीमत ही क्या है ? कितने पैसे का नमक खाते हैं हम प्रतिदिन ? क्या हुआ, चुप क्यों हो, बताओ? यंगमैन हो तुम लोग, तुम्ही लोगों को तो जवाब देना है।" मेरे जवाब का इंतजार किए बिना फिर मौसाजी ने अपने दिल का गुवार निकालना गुरु किया। लगा जैसे बहुत दिनों से जमा हो रही थीं ये बातें उनके मन में। कहने लायक कोई आदमी नहीं मिला था, इसीलिए चुप थे इतने दिन । अब मुझे सामने पाकर ज्वालामयी वाणी निःसृत होने लगी उनके मुंह से । बोले, 'जने यह गांधी हैं, वैसे और एक है-~-जवाहरलाल । साहब लोग जय मेरे मामने उन्हें गाली देते है तब मुझे शर्म के मारे चुप रह जाना पड़ता है यह जानते हो ? मुझे बुरा लगता है। आखिर मैं भी तो एक हिन्दुस्तानी हूं में उनसे पूछता हूं, तुम लोगों ने पढ़ना-लिखना किससे सीखा? किसने तुर लोगों को अंग्रेजी सिखायी? अंग्रेजी सीखी है तभी तो तुम्हारा दिमाग इतर गरम हो गया है। जिन अंग्रेजों से अंग्रेजी सीखी है, फिर उन्हीं अंग्रेजों को गार दो हो तुम लोग ? यह अगर नमकहरामी न हो तो किसे कहा जाए नमः हरानी, बताओ?' इसके बाद जैन एकाएक नजर पड़ी मुझपर। लगा, मुझे जैसे अभी दे उन्होंने । बोले, 'तुम्हीं लोग तो हो आजकल के लड़के, तुम्हीं लोग तो हो ग महागज चले ? । - - तुम लोगो सम मैं प्रतिवाद करने जा रहा था, 'जी' 'तुम चुप रहो । जानता हूं, क्या कहोगे तुम । नौकरी ढूढने के वक्त हम लोगों को खुशामद करते हो और दूसरे वक्त देशभक्ति का राग अलापते हो तुम लोग । मैं पूछना हु, 'वदे मातरम्' का नारा लगाकर जेल जाने में क्या फायदा होगा? इस मुल्क को छोड़कर क्या अग्रेज कभी जाएगे, सोचा है तुमने क्यो जाएगे, वताओ तो? क्या तकलीफ है उन्हें कि जायेंगे? क्यो, बताओ न तुम्हारे साथियों का क्या न्याल है मैं बहुत देर में चुप बैठा था। अब और चुप रहना सम्भव नहीं था। बोला, 'मैं कुछ नही जानता।' मोमाजी नाराज हो गए। बोले, 'तुम नहीं जानते। तुम लोग यंगमैन हो, तुम लोग नहीं जानोगे तो कौन जानेगा? तुम लोग अगर एकमत होकर काग्रेस वालो मे कह दो कि उनकी बात तुम लोग नहीं मानोगे, ब्रिटिश सरकार की आज्ञानुमार चलोगे, तब तो सारा झझट ही दूर हो जाए। अमल बात क्या है जानते हो, यह अग्रेज़ जाति कितनी महान जाति है, इस बात को का वह गाधी रहा है। अरे वावा, वम और गोली चलाकर अग्रेजो को नहीं भगाया जा सकता- इस बात को निश्चित जान लो।' एकाएक मौसीजी अन्दर आयी। 'लो, यह प्रसाद लो।' कहकर मोमाजी को प्रसाद और चरणामृत दिया। मुझे भी दिया थोड़ा-मा प्रमाद। मैंने उमे भक्तिपूर्वक माथे से लगाकर मुह में टाल लिया। मौसीजी चली जा रही थी, लेकिन जाने से पहले मेरी ओर देखकर बोली, 'अपनी मा में एक दिन आने को कह देना, समझा। मैं उसे सवर नहीं दे पाई थी झंझटों के मारे। वारो और हजार झमेले हैं मेरे ..' कहते-कहते मौसीजी चली गई अपने काम में। मौसाजी इतनी बडी एक दुर्घटना मे बच गए, अत' एक बड़ी चिन्ता दूर हो गई, एक भारी मकट टल गया। लेकिन इसका अमर रहेगा और कुछ समय तक। उघर मे ध्यान हटाकर मौमाजी ने कहा, 'तो तुम क्या चाहते हो मुझे बताओ... इननी देर बाद काम की बात आने पर थोड़ा उत्साहित उठा मैं। बोला, 'एक कैरेक्टर मार्टिफिट.." 'करेक्टर सार्टिफिकेट?' ५१ ? मैंने कहा, 'हां, सेंट्रल एक्साइज डिपार्टमेंट में एक क्लर्क की जगह खाली है। यहां के बड़े साहब मिस्टर चटर्जी ने एक दरख्वास्त देने के लिए कहा है और साप ही किमी गवर्नमेंट ऑफीसर का करेक्टर सार्टिफिकेट भी मांगा है।' मोगाजी लव मुनकर बोले, 'लेकिन तुम्हारा कैरेक्टर कैसा है, यह तो मैं ' नहीं जानता, तब तुम्हें कैरेक्टर सार्टिफिकेट कैसे दे सकता हूं मैं ? मैं बोला, 'क्यों, आप जानते तो हैं मुझे..' मौसाजी हैरत में आ गए। बोले, 'क्या कहा ? मैं तुम्हें जानता हूं ? कैसे ?' मैंने कहा, 'नहीं जानते हैं मुझे आप ?' मौनाजी ने कहा, 'यह पहली मर्तबा तो देख रहा हूं तुम्हें, कैसे जानूंगा तब मैं तुम्हें ?" 'मुझे न जानते हों न जानें, लेकिन मेरी मां को तो जानते हैं आप। मैं पंकजिनी का ही तो लड़का हूं।' 'नो तुम्हारी मां को जानना और तुम्हें जानना एक बात है ? क्या कहते हो जी छोकरे तुम ?' एक अवज्ञा की भंगी से मेरी ओर देखते रहे मीसाजी। 'अजीव लड़के हो तुम ! तुम्हें न जानता हूं न पहचानता हूं, और कैरेक्टर मार्टिफिकेट देदं?' मैं बोला, 'पर इतनी देर से तो बातें कर रहा हूं आपसे, मुझे आपने इतनी देर तो देव ही लिया।' मोमाजी बोले, 'सुनो वात इसकी, इतनी-मी देर देखकर ही क्या किसीके करेक्टर के बारे में जाना जा सकता है ? भीतर ही भीतर तुम कांग्रेस के मेम्बर हो या नहीं, मुझे कसे पता चलेगा ? तुम वम-गोली वाले आतंकवादी नहीं हो, यह भी मंसे जानूंगा मैं ?' मैंने कहा, 'अगर यह बात होती तो मैं खद्दर पहनता' 'मुलने मार्टिफिकेट लेने आए हो, तो क्या तुम खद्दर पहनकर आते ? ऐसा करता है कोई ? दूसरे वक्त तुम सदर पहनते या नहीं, में कैसे जान सकता - में बोला, 'मैं सचमुमें खद्दर नहीं पहनता, यकीन कीजिए।' मोमाजी बोले, 'देशो, मैं हं पोस्ट मास्टर जनरल । अंग्रेज़ मेरी सूरत देख- कर तनख्वाह नहीं देते, सीरत देखकर देते है। क्या सभी कांग्रेसी गुण्डे खद्दर पहनते हैं ?
मैंने कहा, 'मुझे कुछ नहीं कहना है।' 'हा, मेरी भी यही सलाह है कि यहा तुम कुछ दिन आते-जाते रहो जिससे मैं तुम्हें अच्छी तरह पहचान लू । तभी मैं तुम्हे कैरेक्टर सार्टिफिकेट दे सकूँगा।' इसके बाद मेरे कहने को और कुछ न रहा । मैं बोला, 'तब क्या होगा? मोमाजी ने कहा, 'होगा क्या, मैं तुम्हें कैरेक्टर मार्टिफिकेट नही दे सकूगा। मुझे एक काम है, तुम अब जा सकते हो।' क्या करता, उठ पड़ा। मुझे याद है कि आते वक्त मैने जान-बूझकर मौसाजी के चरणम्पर्श नहीं किए थे। जो वडा सट्टा हो गया था मौमाजी के व्यवहार मे उस दिन । मन में भोचा था, जिन्दगी में नौकरी न मिले, फाका करना पड़े, सो भी अच्छा, लेकिन ऐसे आदमी के पास किसी हालत में नहीं जाऊंगा फिर कभी। । अगले साल मोमाजी 'रायबहादुर' बने । उस उपलक्ष्य में कालीघाट के मन्दिर में पुजापा चढ़ाया गया। एक बडा समारोह हुआ घर पर । आत्मीय- स्वजनो को भोज में सम्मिलित होने के लिए निमन्त्रित किया गया। और उसके अगले माल शानू की शादी हुई एक ऊंचे सरकारी अफसर के साथ । और कुछ दिन बाद मानू की भी शादी हुई। बहुत से लोग आए दावत मे । संकड़ो रुपए की आतिशवाजी जलाई गई। मेरे पिता, मा, छोटे भाई उस जशन में शरीक हुए और भरपेट खाकर घर लौटे । जय-जयकार होने लगा मौसाजी का। जैसे-जैसे मौमाजी की पदोन्नति होने लगी, वैसे ही मौसीजी के शरीर पर गहने भी बढने लगे । दामादो की दशा भी और अच्छी होने लगी धीरे-धीरे । एक दामाद विलायत गया सरकारी काम से, साथ गई उसकी बीवी। और इधर हम लोगो को दशा बिगड़ने लगी क्रमशः । मेरी छोटी बहन की टायफायड रोग से मृत्यु हो गयी। खबर पाकर मौसीजी मेहरबानी करके हमारे यहा आयी। उम हालत मे भी मा अपनी दीदी को देखकर इतनी खुश हुई जैसे कि आममान का चाद हाथ लग गया हो। उन्हें देखकर अपनी बेटी का शौक भी जैसे मुझे एक कोने में बुलाकर कहा, 'सुन उम नुक्कड़ की दुकान पर मे मन्देश और ममामे ले आ। दीदी कभी नहीं आती-आज आयो हैं, उनका कुछ भूल गयी। ५३ नलार नो करना ही चाहिए।' मानीजी मां की नगी मां-जायी बहन है । पर तो भी चूंकि वे अमीर है, तभी गायद हम लोगों के लिए मेहमान जैली हैं। मैंने कहा, 'वे कार क्यों मिाई-नमकीन लाने जाऊं, मौसीजी क्या तुम्हें प्यार करती है ? मां ने कहा, 'छोः, ऐसी बात नहीं कहते, मेरी सगी बड़ी बहन हैं। एक दिन हमारे यहां आयी हैं, अगर हम आदर-सत्कार न करें तो वता, क्या सोचेंगी मन में।' । मैं बोला, 'लेकिन मेरी नगी बह्न मर गयी है। यह मिठाई खिलाने का मोका तो है नहीं। फिर, मौसीजी ने क्या कभी सन्देश नहीं खाया है ?' मां ने कहा, 'नहीं रे, उनके यहां जाने पर दीदी कितना खिलाती हैं, कितनी गातिरदारी करती है; करती हैं या नहीं तू ही बता .....' और ज्यादा वहम नहीं कर पाया मां से । आखिर में मोड़ की दुकान पर ने मिठाई-नमकीन ले आया। मां उन्हें प्लेट में सजाकर मौसीजी के सामने ले आयीं। बोली, 'लो दीदी, घोड़ा मुंह मीठा कर लो। तुम तो कभी आती ही नहीं।' मानीजी बोली, 'मेरे लिए व्यथं में क्यों इतनी तकलीफ करने गयी तू ?' कया उन्हान गिलाग के पानी से हाथ-मुंह धो लिए। फिर बोली, 'मिठाई- नमकीन दिला रही है तो भई, थोड़ी चाय भी बना दे।' मां व्यन हो उठीं। मोनीजी ने कहा, 'और एक काम कर, दो समोसे भिजवा दे मेरे ड्राइवर को, और थोड़ी चाय भी।' यह महकर अपनी प्लेट में दो समोसे अलग रख दिए। एक तो मानीजी की खातिरदारी, तिसपर मानीनी के ड्राइवर की भी मानिन्दारी करनी पड़ेगी, यह अमह्य हो रहा था मुझे। पर मां का ख्याल करके गहना पड़ा। अमीरों में रिश्तेदारी कितनी तकलीफदेह होती है, इसका एहसान मुझे उसी दिन हुआ। मौनीजी बोली, 'मेरे ड्राइवर की चाय में तीन चम्मच चीनी डालना, वह पोड़ा चीनी अधिक पसंद करता है। इसके बाद मुझपर नजर पड़ी मातीजी की, 'क्यों जी क्या कर रहे हो आजपन्न ?' ५४ मां बोली, 'एक नौकरी मिल गयी है विलू को। आजकल नौकरी मिलना क्या सहज है दीदी, बडी नकलीफ मह केकाली मैया की कृपा में मिली है यह नौकरी । नुम आशीर्वाद दो दीदी, कि बिलू अपने काम में अपने बडे माहब को खुश कर सके . ... "" मौसीजी ने कहा, 'बड़ा लाइ-चाव करती है तू अपने बच्चो का । तेरे जीजाजी कह रहे थे, पंकजिनी बच्चो का पालन करना नहीं जानती।' 'यो दीदी, मैंने क्या किया' में कहा लाइ चाव करती हू अपने बच्चों का?" मोमीजी ने कहा, 'नही रे, जमाना बडा खराब हो गया है अव । यह जो नासपीटी काग्रेस है, इसने सारे माहौल को ही खराव कर दिया है। तेरे जीजाजी को फूटी आखों नहीं सुहाती यह काग्रेस । वे कहते है कि अगर आज- कल के छोकरो को कांग्रेसी बनाना है तो काग्रेमी ही धन जाय बिलकुल, नौकरी. चाकरी का नाम तब जवान पर न लाए। मेरा बडा दामाद विलायन गया है, जाने से पहले हम लोगों को प्रणाम करने आया था । तेरे जीजाजी ने दामाद मे कहा, 'बेटा, तुम्हे मैंने योग्य समझकर ही अपना दामाद बनाया है, मेरी प्रतिष्ठा का ध्यान रखना । देखना, माबों के सामने मेरा मिरन नीचा होने पाए भोमाजी की यह मबमे बड़ी कमजोरी थी। कमजोरी कहो तो यह कमजोरी ही है, गम्बिशन यही नो एम्बिशन। दोनों है ये। छोटी उमर में ही इम एक ही वस्तु की साधना की घी मौसाजी ने। वह थी अग्रेजों के प्रति भनि। निरंतर प्रार्थना की थी कि श्वेताग प्रभुओं के प्रति उनकी भक्ति अचला बनी रहे। इसीलिए जब मौका मिला है, अग्रेजी भाषा को अच्छी तरह मीखने को कोशिश की है। अंग्रेजी लिखना और वोलना। और अपने आसपाम जो अग्रेजी जानते थे सिर्फ उन्हें ही वे आदमी समझते थे, और मवको गधा। और उन अंग्रेजों की जो निन्दा करी थे, उनपर जो बम-पिम्जोल का वार करते थे, ऐसे लोगों से हृदय से घृणा करने थे। कहते थे, 'ये इनसान हैं, या हैवान ?' इस अंग्रेज-प्रीति के लिए मौसाजी को आत्मीय-स्वजनों के लाछन मुनने प: हैं, पड़ोमियों के व्यग्य सहने पड़े हैं। जब 'रायसाहब' में 'रामबहार' । । + बने, उन्हें उम्मीद थी कि उनके रिश्तेदार, दोस्त वगैरह आकर उन्हें मुबारकबाद दंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी तबियत थी कि दरवाजे पर एक बोर्ड लगवाने, पीतल का बोर्ड जिसपर नाम के आगे 'रायबहादुर' बड़े-बड़े अक्षरों मेलिना रहे। लेकिन आखिरकार ऐसा नहीं किया, शायद सुमति आ गयी थी सन-गम्बन्धियों के रूप को देखकर। पर मनचाहे दामाद पाने के बाद उनका दिल फिर चंगा हो उठा था। मैंने भी दामादों को देखा है। जैसे समुर हैं, बिलकुल वैसे ही हैं दामाद भी। नमुरगी तरह ही सूट-टाई-विभूपित । ससुर की तरह ही स्नॉव । ससुर की गरह ही भारतीयता के घोर निन्दक। संयोग की बात, ठी। उसी समय मेरे पिताजी की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पहले नग दवाई, डाक्टर और अर्थाभाव से पागलों जैसी हालत हो गयी थी मेगे। समझ नहीं पा रहा था कि रुपये की फिक्र करूं या पिता के जीवन की। पिताजी की बीमारी का हाल सुनकर मौसीजी एक बार देखने आयी थीं उनकी मृत्यु से पहले । आकर ही वोलीं, 'कौन देख रहा है ? कौन-सा टापटर?' मां ने कहा, 'हमारे इस मुहल्ले के ही पुराने डाक्टर हैं। बहुत दिनों की जान-पहचान है...... नामीजी ने कहा, 'छी-छी, तू बड़ी बेवकूफ है । लेकिन तेरा लड़का तो पहा-लिगा है, उने तो समझ से काम लेना चाहिए था। मुहल्ले के बंगाली आरटर को क्यों दिवाया? तेरे जीजाजी सुनेंगे तो बहुत नाराज होंगे।' मैं तय पिताजी के सिर पर आइस-बैग लगा रहा था। मां ने आकर कहा, 'अरे मुन, दीदी बुला रही है तुझे, आ सुन आ। दे, में लगा रही है आन-बंग...' मुझे गुम्ना आ गया। बोला, 'अब बुलाने की क्या जरूरत है ? तुम्हारी दीदी के उपदेश गुनने का वक्त नहीं है मेरे पास । जाओ, कह दो उनसे तुम कि में भिनाजी मे गिर पर आइस-बैग लगा रहा हूं..' दब्बू स्वभाव की है मां। बोली, 'छी-छी, ऐसी बात नहीं कहते । मांसी लगती है तेरी। आपत्ति-विपत्ति में तो लोग आते ही हैं, और ऐसे वक्त नहीं आयेंगे तो कब आयेंगे? दे, मुझे दे आइस-बैग.....' निताजा उठना पड़ा मुझे। पारा वाले कमरे में जाकर मौसीजी को पैर पर प्रगाम किया। - - मोमीनी दोली, 'वस बेटा, वम करो। तुम्हारे पिता की बीमारी की खबर सुनकर चली आयी। तुम्हारे मौमाडी ने तो पूछ-पूछकर मेरा सिर खा डाला । कल में मुझमे बार-बार पूछ रहे हैं कि कैसी तबीयत है उनको । तुम भी तो एक बार जाकर खबर दे आ सकते थे। मेरा मन भी तो छटपटाता रहता है." न इन बातो के भुनने का ठीक वक्त था वह, न इनका जवाब देने का। चुनांचे चुप रहा मैं। मामीजी ने कहा, 'वठो वेटा, वैटो । नुम्हारे मौसाजी खुद ही दौड़े चले आ रहे थे, मैंने ही मना किया। मैंने कहा, 'हाई ब्लड प्रेशर हैं तुम्हे, तुम मत जाओ। मैं ही गबर लिए आती हू ।' वे वहा वैचेन हो रहे होगे, मेरे पहुंचते ही दौडे आयेंगे। दो सौ तीम है ब्लड प्रेशर उनका, डाक्टर ने हर तरह की परे- शानी और फिक्र से बचने को कहा है। लेकिन तुम्ही बताओ बेटा, इनसान विना फिन-परेशानी के कभी रह सकता है ? यह जो तुम्हारे पिता बीमार हैं, क्या यह फिक्र की बात नहीं है।' फिर बड़े अन्तरंग भाव से पूछा, 'कौन-से डाक्टर तुम्हारे पिता को देख " बताया, 'सहारराम बाबू ।' मौमीजी ने पूछा, 'बगाली डाक्टर है मैंने कहा, 'हा। हमारे मुहल्ले के नामी डाक्टर हैं, अच्छी प्रक्टिस है, पिताजी को देख भी रहे है बहुत दिन में।' 'इनकी फीस कितनी है?" बोला, 'सबसे सोलह रपये लेते हैं। हम लोगो से बहुत पुरानी जान-पह- चान है इमलिए फीस लेना ही नहीं चाहते। हम चार रुपये देते है...' मोमीजी ने कहा, 'तुम्हारे मौसाजी में यही एक ऐव है कि वे देशी डाक्टर कतई नही पसद करते। कहते है-~'पक हैं ।' मेरी समझ में नहीं आई वात। मैंने कहा, 'दमी डाक्टर से क्या मतलब है आपका मोमीजी ने कहा, 'तुम्हारे मौसाजी कलकत्ता के पासशुदा डाक्टरो के पास बिलकुल नहीं जाना चाहते। उस बार मेरे दांतों में दर्द हो गया था। मैंने कहा कि 'मामूली दांतो के दर्द के लिए विलायती डाक्टर के पास जाने की जरूरत नही। वकार साठ रुपये ले लेगा। तुम्हारे मौसाजी ने मेरी एक नहीं सुनी। ले गए चौरंगी इलाके के एक खास विलायती डिग्री वाले डाक्टर के पास । " ५७ ? ८ ऍटकर माल ये ले लिए उसने...' फिर थोड़ा रखकर बोलीं, 'नहीं बेटा, काम ठीक नहीं कर रहे हो । क्या नाम बताया, सहायराम बाबू न? तो उनकी डिग्री देसी है या विलायती ?' मैंने कहा, 'यहीं के मेडिकल कॉलेज को एम० वी० हैं।' मांगीजी को जमे बड़ा सदमा पहुंचा मेरी बात से। चोली, 'नहीं वेटा, तुम किसी लंदन की डिग्री वाले डाक्टर को दिखाओ। बाप की जिन्दगी का सवाल है। कितनी तकलीफें झेलकर उन्होंने तुम लोगों की परवरिश की है, सोचा है इसे तुमने ? और रुपया? बाप बड़ा है या रुपया ? बताओ? मैं का जवाब देता? चुप रहा। सोचा कि शायद अव छुट्टी मिल जायगी। लेकिन मौसीजी की बातें ही नहीं खतम होतीं। 'तब तुम्हारे मौसाजी को जाकर क्या कहूं, बताओ तो?' मैं बोला, 'मैं क्या बताऊं...' 'नही नहीं, तुम समझदार लड़के हो। मैं अगर जाकर यह कहूं कि तुम देनी बापटर में इलाज करा रहे हो, तब वे अपने हाई ब्लड प्रेशर में अभी दोनले आयेंगे यहां मैं एकान्त भाव में मन ही मन यह प्रार्थना कर रहा था कि मौसीजी हमारे पहा अब और मिनट-मर भी न सके । मांसीजी के चले जाने पर ही जैसे मुझे गहन मिलेगी। ये अमीर रिश्तेदार मुसीबत में तो हमारी कोई मदद करेंगे नहीं, बल्कि उल्टे और मुसीबत में डालने के लिए ही जैसे हमेशा आमादा मालूम होते है। एनसे बेहतर होगा बेटा, अगर एक काम करो, तब हाई ब्लड प्रेशर लेकर तुम्हारे मांगाजी की यहां आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम्ही खुद चलो उनके पाम एक बार मेरे साथ गाड़ी तो है ही, ज्यादा देर नहीं लगेगी आने-जाने मे। जिन शारदार को तुम्हारे मौसाजी कहें उसे ही दिखाओ। विलायती डिग्री वाले डाक्टर पैसा जम्र ज्यादा लेते हैं, पर हैं. वे ही अनली डाक्टर, रोग दूर करना वे ही जानते है । यह देखो उस अंग्रेज़ डाक्टर ने मेरे दांतों को बिलकुल ठीक कर दिया। उनने लये तो उम्र ज्यादा लिए थे लेकिन उसके बाद से मेरे दांतों में कोई और शिकायत नहीं है, अब मैं मजे में मुरगी की टांग चबा-चबा- परगानी ..." मेरे कानों में तब मीमीजी की बातें नहीं जा रही थीं। खाली पिताजी का - । समान आ रहा था। थोड़ी ही देर र इन्हे एर युरा सा सितारोहै। हमेमरी कीन जाने निरनी सन्मार हैं। और मिगसेनहो गिलानी है। महापरामयाबू कह पर 2 दिन में तीन बार बार देने के लिए. उनके पास भी जाना है। फिर अपने पार जो योडेसे सोपेदे पर वार हो गए हैं। इधर-उधर ने उधार लेकर काम बना रहा है। जो सो से मेरी महायता कर रहे है वे सब मेरे ही तबके के मामूशी आरमो हैं। मोगालोको नरह अमीर नहीं हैं। लेकिन इतना सब करके भी पूरा नहीं पा रहा है। दसर के वो-जापरेटिव बैंक से भी बल कुछ रुपरे उभार सेना पदेगा लगता है। मेरे दिमाग में तब ये मव गतें घूम रही थी। याद है उम दिन बड़ी मुश्किल से नजात मिली थी मौसीमी को गिरला मे। सहल में नहीं। शायद होग मे आने पर मुझे पितागो दूक रहे थे. उस ममय। मैंने कहा था, 'जा रहा हू मौसोनी, कुछ रामाल न करे लेकिन बात यही मतम नहीं हुई। जव सक पिताजी जीवित रहे तब तक मोमोजो मुझे इमी तरह परेशान करती रही। सिर्फ यही कहती रही, 'यह इलाज ठीक नहीं हो रहा है री परमिनी, अपने लड़के को डाक्टर बदलने को कहनही तो आविर पागा, कहे देती हूं.' और इसके पश्चात् पिताजी की मृत्यु के बहुत दिनो याद न Yोगीशी का उलाहना मुनना पडा है कि मैंने ही पिताजी की पिन पिरिणाम कराने मार डाला है। मौसाजी पिताजी के श्राद्ध में आये थे। कि आना पड़ा है इसलिए आए थे । आये थे मवके बाद में और गये गवरो पहने । लेकिन गयो मगनी वातचीत से जता गये कि वे रायबहादुर और पी० एम० मी० है । उम दिन भी वे मूट-दाई मे ही आये थे। अपनी विशाग कारगर. कर सभा को आलोकित किया था। चारो ओर भीड देवर और मिगीको पहचान न पाकर स्वगतावित की थी, 'यहा, विसू पाहा है." मुझे ढूढ़ते-डूढते ही भीतर आये थे। शराफत ये गाने में उगह देगा ही करीब पहुच गया था। सामने जाकर कहा था, 'आइये मोगाजी." मुझे देखकर जैसे वे निश्चिन्त हुए। कहा था, 'नहीं, अंदर मही भाग 1 ५६ शेने हो? नुन्हारी मां रती है ? बोला, 'मा, अंदर आन, बहुन कातर हो गयी है मां..' होगी ही, कातर होना ही स्वाभाविक है। लेकिन मैं अंदर नहीं आ मग अपनी मां को यह देना कि मैं माया था। तुम कुछयाल न करना, सुविलंब हो गया घोड़ा ! आज मर जॉन दुई आये थे न, इसी सिलसिले में कर पारी बीवन हाउस में...' कर जान बराहट कौन हैं हमे कहीं में न समझ पाया होऊं, इसलिए उन्होंने रही मनमा दिया, 'मर जॉन वुडहंड कीन है, जानते हो? बंगाल के गवर्नर लिंटिय, दिल्ली के वानराय की एकनीक्यूटिव कौंसिल के मेम्बर, बड़े महान व्यक्ति है, बहुत पुरानी जान-महत्रान है मुझसे, मैं जब राजशाही में बिन्त विवरण देने लगे अपने कार्यकलाप और उच्च पद-मर्यादा के बारे में। मैंने कुछ मुना, कुछ नहीं मुना। बोले, 'जानने हो, सर जॉन बुद्धहंड को मैंने देखा था सन् १९२१ में, मोनी, कितने पहले की बात है। लेकिन देखते ही पहबान लिया मुझे उसने। न देने ही बोला, 'हेलो, मुनर्नो.. ' और उसके बाद ही गायद खयाल आ गया वक्त का । बोले. 'ऑर नहीं, नलता है। मेरे यहाँ आना तुम एक दिन । तुम आते यों नहीं हो र?' मैंने कहा, 'दफ्तर के बाद फुरना ही नहीं मिलती बिलकुल...' नानाजी ने पूछा, 'हां याद आया, तुम्हें वह नौकरी मिल गयी थी? वहीं गरमाज टिपार्टमेंट की नौकरी?' बोला, 'हो..." 'आगिर में भापद कैकटर मार्टिफिकेट की जरूरत नहीं पड़ी होगी ?' 'हा, नकल पड़ी थी...' मीनाजी ने पूछा, 'मारिफिरत फिरत लिया या ?' मर कहा, 'मेरे पिताजी के. एक दोन थे, जिन्हें हम लोग मरोज चाचा. हामने थे। उन्होंन ही कलकता के पुलिस कमिश्नर ने सार्टिफिकेट दिलवा लिन मिनर में? या नाम था उसका ? चाल टेगट ?' 'नहीं, ग्रेटले साहब।
मौसाजी बोले, 'वेडले ? बेंडते फ्रेंड या मेरा। तदन जाकर भी वह मुझे चिट्ठी लिखा करता या। तो वेडने ने तुम्हें सार्टिफिकेट दे दिया? तुम्हें पहले में जानताया क्या?" मैं बोला, 'नहीं' 'तव?" मैंने कहा, 'मुझे नहीं जानता था, लेकिन सरोज चाचा को जानना था। मरोज चाचा के एक बार कहते ही सार्टिफिकेट दे दिया।' मौसाजी तब तक अपनी गाडी के करीव पहुच चुके थे। वोले, 'जानते हो, बड़ा रिस्की है यह । अनजाने आदमी को करेक्टर सार्टिफिकेट देने में वडा खतरा होता है। उन लोगो का क्या है, वे राजा की बिरादरी के हैं। वे जो कुछ करें सो योडा। मुसीबत तो है हम लोगो की 'कह- कर गाड़ी पर सवार हो गए। और मैंने भी राहत की साम ली। . बहुत दिन पहले की बात है यह । इसके बाद बहुत पानी बह गया है हावड़ा निज के नीचे में । बहुत-मे परिवर्तन हुए हैं इसके बाद । मन् १९४७ वी पन्द्रह अगस्त को अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए। रिटायर हो गये हैं मोमाजी एक मोटी रकम की पेन्शन लेकर । पेन्शन को उसो रकम को कम्यूट कराके एक मुस्त जो स्पया मिला उमसे यादवपुर में एक बगीचेवाला बड़ा मकान बनवाया है। दूर चले जाने की वजह से अब मुलाकात नहीं होती। लेकिन आज जो परिवर्तन मैं अपनी आंखो के सामने देख रहा हूं उसने सचमुच ही मुझे हतवाक् कर दिया। समझ गया, मौसाजी को आने वाले चुनाव में काग्रेंस का टिकट मिल गया है। उनका भाषण उस समय भी चल रहा या भावपूर्ण स्वर में : 'हम लोग बंगाली है, हमें गर्व है वंगाली होने का, हमें गर्व है इस बंगभूमि में जन्म लेने का। और अगर आप लोग मुझे वोट देंगे तभी मैं आप लोगों की सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर सकूँगा, तभी मैं इस प्रदेश के निवासियो की आशा-आकाक्षा- स्वप्न को सफल बनाने की चेप्टा कर सकूगा। मेरी अपनी कोई क्षमता नही है। जैसे आप लोग चलायेंगे, वैसे ही चलूगा। आप लोग ही मेरे चालक होंगे । और मैं कुछ नहीं चाहता--सिर्फ यही चाहता हूँ कि मुझे वोट देकर आप लोग कांग्रेस को विजयी वनाइए । जय हिन्द"" मन ही मन सोच रहा था कि मौसाजी अब इतनी अच्छी देसी भापा (बंगला) कंसीव गये ! पाद है मौनाजी उस बार चुनाव में पन्द्रह हजार वोटों से जीते थे और आविर में कई नाल के लिए मिनिस्टर भी बने थे। जब वे पी० एम० जी० थे तत्र पान मार्टिफिकेट के लिए जाना पड़ा था और वैरंग लौट आना पड़ा था। लेकिन उनके मिनिस्टर बनने पर कभी उनके पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। और चूंकि जरूरत नहीं पड़ी, तभी अपनी दृष्टि में ही में अपनी मर्यादा को अक्षण बनाए रख सका। . घृणा हो गई है मुझे मनुष्य पर। न जाने कितनी बार मनुष्य की उपेक्षा भी की है, न जाने कितनी बार। चोट भी खाई है बहुत बार मनुष्य के हाथों मे, नी भी मनुष्य पर ने आस्या नहीं हटी है मेरी। तमाम आदमी अच्छे होंगे यह उम्मीद करना जितना गैरवाजिब है, उतना ही यह गुमान करना गैर- मुनानिय है कि तमाम आदमी गराव हो गए हैं । लाखों स्वार्थी-लोभी व्यक्तियों के नाथ ही नाथ केवल एक व्यक्ति के महान् त्याग के दृष्टान्त से मुझे बारम्बार प्रेरणा मिली है, सान्त्वना मिली है--यह क्या कोई कम उत्साह की बात है, काम आयामन की बात है। उनी प्रकार के एक व्यक्ति का दृष्टान्त ही तो इतिहास को पिछले करोड़ों मान में आगे बढ़ाए लिए जा रहा है। बंच में न जाने कितने आदमी अक्सर इधर-उधर दिखलाई पड़ जाते हैं। किन इस तरह उन्हें देखने का मौका हासिल नहीं हुआ था। यह देखना नहीं था, या या दर्शन। इसीका नाम दृष्टिपात भी है। आत्मरक्षा के लिए उसने बहुत-न गहित काम किए थे। हमदर्दी का भी बेहद नाजायज फायदा उठाया था। लेकिन सवाल यह है कि अगर बेचू जैसे आदमी न होते तब क्या दुनिया जननी? और मांसाजी? मौसाजा की मक्कारी की शायद कोई इतिहा नहीं थी। नहा गालीनता को बनाए रखने के लिए बार-बार उन्हें नाना प्रकार की आत्मप्रबंगना का सहारा लेना पड़ा है, तरह-तरह के बहाने बनाने पड़े हैं। नोभी माताजी को मैं कौमे दोप दे सकता हूं? जिस समाज का वे प्रति- निधित्व करते है वहां आत्मप्रवंचना ही आत्मरक्षा करने की रीति है। जह जारमा बिकी हुई है वहां नहन शालीनता एक ढोंग मान्न है। इस ढोंग वे एभवेश को त्यागकर वे आदमी कैसे बन सकते है। मौसानी जैसे आदमी हैं तभी श्रेणी-मग्राम का पथ भी प्रशस्त है । और समग्र समाज की तरह समग्र मानव-जीवन ही इन सग्राम का कुरक्षेत्र बन गया है। तभी देखता हूं कि इस मंग्राम के कारण ही मनुप्प का अस्तिल बना है, और बना रहेगा।
तृतीय । अब एक और मंग्रामी की बात कहता हूं। बहुत ही मामूली आदमी था पह, बह केदार । फेदार योस ! एक ही दफ्तर में हमारे साथ काम करता था। बड़ा बेगस, बड़ा गरीद, बड़ा वेचारा। हर दमतर में ही एक-दो ऐसे आदमी होते है जिनकी कोई तरणकी नहीं होती। वे जिस तनख्वाह पर नौकरी शुरू करते हैं, अन्त में उसीपर रिटायर भी होते हैं। उनमें कोई लियाकत है या नहीं, हमे साबित करने का कोई मौका ही नहीं मिलता उन्हें । संसार की अनेक विडम्बनालों से संतप्त होकर वे ऑफिस के निश्चिन्त आश्रय में आकर भी विम्बित होते है। मेरे दिल में बेहद हमदर्दी है इनके लिए। न जाने क्यों उनके साथ बहत जमादा आत्मीयता अनुभव करता हूं मैं। लगता है इन्हींके लिए गायद दुनिया आगे बढ़ रही है। ये लोग हैं तभी बाहरी चकाचौंध पैदा करने वाली टीम-टाम को अब भी कोई ध्र व सत्य मानने की भूल नहीं करता। इनके जीवन में भी कितनी अज्ञात ट्रेजेडी होती है, कौन जानने की कोशिश करता है उमे? उस नियमित जीवनयाना के अन्तराल में इनकी कितनी गंभीर समस्याएं छिपी रहती हैं उनका पता बाहरी लोगों को न लगने पर भी मुझे लगाना पड़ता है। ये ही मेरी चिन्ता के विषय हैं। ऐसे कितने बेशुमार केदार योग अपने अस्तित्व को बनाए रखने की चेष्टा में निरन्तर संग्राम किए जा रहे हैं, इमे हम नहीं जानते, नहीं जाना चाहते। लेकिन जान सकने पर खुशी होती है। जानने पर ही उपलब्धि होती है कि मनुष्य अमृत है, मनुष्य मर नहीं - दरजगल इम केदार बोस की बात में भूल ही गया था इतने दिन । फैदार बोस का प्रसंग उठा उसके बेटे रूपरतन बोस की बात पर । कारण, मेदार बोल के इन पुत्र को जन्म के बाद मैंने ही उसका नामकरण किया था रमनन वोम की गगी राबू के मुंह ने उसका नाम सुनकर चौंक पड़ा। मान? क्या नाम बताया?' 'गगरनन योन।' गगी बाब योने, 'वही हम लोगों के जो केदार बोस थे उनका लड़का। - " अब एक भारी सरकारी अफमर है। केदार बोस याद है न मेरे चेहरे की ओर देखकर गशो वावू को अचरज हुआ। वोले, 'क्या मोच रहे है । केदार वोस को नहीं याद कर पा रहे हैं। हमारे दफ्तर का वही डी ग्रेड का केदार बोम । मेन्यूअल माहब ने नाराज होकर निमका दानजिट सेक्शन में तबादला कर दिया था। आपमे ही तो केदार बोस की ज्यादा घनिष्टता थी।' मैं शशी बाबू को बात का क्या जवाब देता । उस केदार वोस को ही अगर नही पहनानूगा तो किसे पहचानूगा ? गशी बाबू कहने लगे, 'यही नो उनका सबसे छोटा लडका है । लेकिन नाम बडा बढिया रक्खा है, रूपरतन बोस।' इतनी देर बाद मैंने कहा, 'आप ठीक जानते है कि यह केदार धोस का मवमे छोटा लडका है" आश्वयं। वास्तव में आश्चर्य की ही बात है। इतना आश्चर्य सम्भवतः मुझे कभी किसी विषय में नहीं हुआ। अब तक ससार मे इतनी घटनाए, इतनी दुर्घटनाएं देखी हैं, पर ऐसी घटना जैसे इससे पहले संसार में कभी नहीं घटी थी। मैंने फिर पूछा, 'आप ठीक जानते है हम लोगो के उमी केदार बोम का लड़का है ?" शशी बाबू बोले, 'वाह, मैंने पता जो लगाया था। 'तो आप उसके पास क्यो गए थे ?' अरे, गया था मैं अपने लड़के को नौकरी के लिए। मेरा मझला लडका पास करके बैठा है, सोचा कि रूपरतन वोस इतना बडा अफमर है, अगर इम मामले में कोई मदद कर दें। तो क्या कहा उसने जानते हैं। कहा कि अपने लडके को आप आर्मी में भरती करा दीजिए । बलकों करते-करते बंगाली जाति बरवाद हो गई। शशी बाबू को आखिरी दिन तक नौकरी करके फिर एक्सटेन्शन मिल गया था। लेकिन अधिक उमर में शादी करने की वजह से मभी दाल-बच्चे नाबालिग थे। लड़कियों की शादी और लड़कों की नौकरी के लिए उन्हें हर- दम परेशान रहना पड़ता था। रास्तै-पार्क, वस-ट्राम में मुलाकात होने पर अपनी गाया मुनाया करते थे। लड़कियो के नौशो की आलोचना करते। साधारण मध्ववित गृहस्यों की दुश्चिन्ताओं ने विधान बना दिया था उन्हें ।
इतने दिन इन्हीं वातों की सविस्तार चर्चा किया करते थे मुझसे। आज एका- एक केदार बोस और उसके सबसे छोटे लड़के रूपरतन बोस की बात उनके मुंह से मुनकर मैं हैरत में आ गया। मुझे याद है कि मृत्यु के कुछ दिन पहले भी केदार वोस से मुलाकात हुई थी मेरी। गाड़ी से जा रहा था सड़क पर । एकाएक पीछे से अपने नाम की पुकार सुनकर जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, देखा कि एक गाड़ी के भीतर केदार वोस बैठा है। लेकिन बात होने से पहले ही ट्रैफिक सिगनल में हरी रोशनी जल उठी और गाड़ी चल दी। सिर्फ चलती हुई गाड़ी से चिल्लाकर बोला, 'आना एक दिन ।' मैं अचरज में पड़ गया था केदार बोस को कार में बैठा देखकर। तमाम जिन्दगी केदार बोस गरीवी से लड़ता रहा है । बाल-बच्चों को खिलाने-पहनाने की फिक्र में घुलता रहा है। केदार वोस मेरे सामने अकसर रोया है अपने दुर्भाग्य को स्मरण करके । उसी केदार बोस को जीवन के अन्तिम दिनों में कार में चढ़ते देखकर मुझे खुशी ही हुई थी। चलो अच्छा हुआ, केदार बोस की हालत सुधर गई। नहीं तो ऐसी गाड़ी पर कैसे सवार होता? विलकुल नई चमचमाती है। शशी वावू की बात से आज रहस्य का समाधान हुआ। शशी बाबू ने कहा, 'वात यह है जनाव, भाग्यवान का बोझ भगवान ढोता है। नहीं तो मैन्युअल साहब ने जिस दिन केदार बोस का ट्रानजिट सेक्शन में ट्रान्सफर कर दिया, उस दिन क्या हमने सोचा था कि उसके भाग्य में इतना । सुख वदा है ?' मैं बोला, 'आप परतन वोस से मिले कैसे ?' शशी वावृ वोले, 'अरे, मैं क्या जानता था कि वोस साहव हमारे केदार बोस के लड़के हैं। मैंने सोचा था बोस साहब और कोई वोस साहव हैं। बोस साहब क्या समझते हैं कोई मामूली अफसर हैं ? भारत सरकार का जितना रेक्रूटमेंट हो रहा है, वोस साहव ही उसके हेड हैं। खबर मिली थी कलकत्त में नया कमीशन आया है। पार्क स्ट्रीट में सव उम्मीदवारों का इम्तहान लेग वह । इम्तहान तो हजारों लड़के देंगे। कितने अमीर आदमियों के लड़के है हम जैसे गरीवों के लड़कों को कमीशन क्यों पूछेगा? तभी पहले से कहक थोड़ा इनफ्लुएन्स करने गया था, अगर इस तरह काम बन जाए":...' आश्चर्य ! फिर सोचने लगा अपने मन में, आश्चर्य । इसीको आश्च . ६६ " ।' जनक घटना कहते हैं। तब केदार बोग खुद ही क्या जानता था इमे' केदार बोस के रोने का वह दृश्य जैसे मेरी आंखों के सामने फिर आ गया। एकदम फूट-फूटकर रोने लगा था केदार वोस उस दिन। रास्ते में जमा लोगो के सामने शर्म-हया त्यागकर मचमुच फूट-फूटकर रो पडा था केदार बोस उम दिन। केदार घोम उस दिन अपनी लज्जा की बात को और किसीसे न कह पाकर एकदम मेरे पास चला आया था। उमने कहा था, 'भाई, वरवाद हो गया मैं । क्या होगा अब मैंने पूछा था, 'आदिर वात क्या है ? कदार बोस ने कहा था, 'तुम भाई, मुझे किसी तरह इस बार बचा लो, नहीं तो मर जाऊंगा में एकदम बोला, 'यात क्या है ? क्या हुआ है तुम्हे ?' केदार ने कहा, "दफ्तर खतम होने के बाद चले मत जाना आज, मत्र बताऊगा तुम्हे मैं।' लड़के वालों में भरा-पूरा घर था केदार बोस का, हालाकि कभी मैने उमको अच्छी हालत नहीं देखी । वरावर एक न एक अझट लगा ही रहता था उसका । श्याम बाजार की एक गली के एक छोटे मकान में थी उसकी गिरस्ती। केदार बोस कहता था, 'भाई, बडी मुश्किर में पड़ गया ह, दो रपये उधार दे सकते हो ?' इमी तरह कभी एक रूपया, कभी दो रपये, यहा तक कि आठ आने तक उधार लेने से वह संकुचित नहीं हुआ है। दफ्तर के चपरासियों तक से वह उधार लेना था। केदार वीस दफ्तर आता था एक थैला लेकर। दफ्तर खत्म होने के बाद बड़े बाजार से थोड़ी-बहुत शाकभाजी खरीद ले जाया करता था। इसके बाद पर जाकर लड़के-लड़कियों को पढ़ाने बैठना था। कहा करता था, 'मास्टर रखने के पैसे तो है नही भाई, तभी अपने शरीर से जो कुछ बनता है, किए दे रहा हू और केदार की बीवी की सेहत भीतव खराब थी। बेहद दुबली-पतली थी। लेकिन मुबह से शाम तक बिना खटे भी कोई चारा नहीं था उसको। हर साल बच्चे जन-जनकर आखिर में एनीमिया हो गया था उसे। अच्छे डाक्टर को दखाना और ठीक से दवा-दारू करना केदार वोस के बस की बात नहीं थी। हम लोग सब कुछ जानते थे। हम लोग कहा करते थे, 'हर साल बिना नागा तुम्हारे बच्चे क्यों होते हैं, केदार ?' केदार कहता, 'क्यों होते हैं इस बात को तुम लोग कैसे समझोगे भाई। मैं तुम लोगों को इसे नहीं समझा सकता।' हम लोग इसे समझने की गरज भी नहीं महसूस करते थे। गरीव आदमियों को यही एक बीमारी होती है, इसे हम सब जानते थे। इस विषय पर अधिक बात करके केदार वोस को हम परेशान नहीं करते थे। अगर ऐसा करते तो केदार वोस और लज्जित होता, और तकलीफ पाता। लेकिन उस दिन केदार बोस का चेहरा देखकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ। बोला, 'रुपये चाहिए? केदार ने कहा, 'नहीं भाई, वैसे रुपयों की तंगी मेरी ज़िन्दगी से कभी नहीं जाएगी, वह मेरे मरने के दिन तक रहेगी मेरे साथ ।' 'तव फिर और कौन-सी नई विपत्ति आ गई ?' केदार वोस बोला, 'दफ्तर से निकलते वक्त बताऊंगा।' निदान, उस दिन दफ्तर से बाहर निकलकर केदार वोस ने कहा, 'अव सुनो, तुम्हें बतला रहा हूं, भाई। तुम्हें मैं सब बता दिया करता हूं, इस बात को भी नहीं छिपाऊंगा। और क्या फायदा होगा मुझे न कहकर। भाई, मेरी स्त्री के फिर वच्चा होगा। वोला, 'ऐं ! फिर ?' केदार बोस सिर नीचा किए चलने लगा। कोई जवाब नहीं दिया मेरी . . वात का। मैंने पूछा, 'कुल कितने हैं अव तक ?' केदार बोस ने कहा, 'इसे लेकर सात हो जाएंगे।' सात ! डेढ़ सौ रुपये में सात वच्चों के भरण-पोपण का दायित्व लेना मज़ाक नहीं। मैंने केदार बोस के चेहरे पर नज़र डाली। बड़ा करुण लग उसका चेहरा। यों ही सदा केदार वोस का चेहरा करुण ही वना रहता है कोई न कोई समस्या उसे परेशान किए ही रहती है। तिसपर एक और न वढ़ती समस्या आ जुटी है यह । फुटपाथों पर फेरीवालों की भीड़ रहती है, खास तौर से बड़े वाजार फुटपाथों पर। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए अपने माल को वि ६८ रक्या है सारी आमद-रफ्त की जगह पर। हो सकता है पुलिस में उनका सम- झौता हो गया है, इसलिए उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। भीड से अपने को बचाकर चलते-चलते केदार बोम फिर कहने लगा, "भाई, समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं। हर साल क्यो इनने बच्चे होने है, यह भी समझ में नहीं आना।' बोला, 'तो अब क्या करने का इरादा है ?' केदार बोस ने कहा, 'इसीलिए तो तुम्हे बताया है । यह मब बातें हरएक को तो बनाई नहीं जा सकती।' कुछ देर सोचने के बाद मैंने कहा, 'तुम्हारी स्त्री क्या कहती है ?' केदार बोस बोला, 'स्त्री तो साली मेरा ही मुर देखती है । कहती है, 'तुम्हारे ही कारण यह दुर्गति हुई है।' भाई, तुम्ही वताओ, क्या मेरे अकेले का ही है मारा कसूर इस बात पर हमने की उमर नही थी तव मेरी। केदार की बात सुनकर हंमी नहीं आई, गुन्मा आया। मैंने कहा, 'तुम कैसे हो केदार ? दफ्तर में इतना झंझट चल रहा है, मुल्क को हालत बिगडी हुई है, तुम्हें शर्म नही आती इस वक्त बच्चा पैदा करते ? तुम आदमी हो या जानवर?' केदार बोस ने मेरी ओर विषण्णभाव से देखा । बोला, 'मेरे गाल पर थप्पड़ मारो भाई। काश, थप्पड़ खाकर भी अगर अक्ल आ जाए।' कहकर उमने छलछलाती आखो मे मेरी ओर पुनः देखा। उसने कहा, 'खुदकुशी करके शायद छुटकारा पा सकता है इस पाप में। लेकिन खुदकुशी कैसे की जाती है मैं नहीं जानता, और न हिम्मत ही है मुझमे इमे करने की। कहकर रास्ते की उसी भीड़ मे रोने लगा केदार वीम। बड़ी ममता जगी मेरे मन में केदार वोम को इस दशा में देखकर राकेदार वोस को इम समय डाट-फटकारकर भी क्या होगा? उम दिन और ज्यादा बातें नहीं हुई। अपनी चिन्ता में ही डूवा था केदार बोस । मुझमें थोड़ी मात्वना, थोड़ी महानुभूति, थोडी महायता पाने के उद्देश्य ने ही उसने सारी बात बताई थी मुझे, उलटे मिली उमे फटकार । घर जाते हुए मन में पछतावा हुआ। वजाय केदार वास की मदद करने के उमको नुकमान ही पहुचाया मैने । कहाँ सचमुच ही खुदकुशी न कर डाले ! कही यम के पहियों के नीचे न डाल ले अपने को! ।
रात को घर लौटकर छटपटाने लगा मन ही मन । फिर निकल पड़ा। पत्नी ने पूझा, 'अव कहां चले फिर?' बोला, 'एक काम है। घण्टे-भर में लोट आऊंगा' कहकर चल दिया। . याव है, तत्र का कलकत्ता ठीक अब के कलकत्ते की तरह नहीं था। मत्र जिस तरह अभाव है, तब भी या अभाव । दुःख-दारिद्रय, अभाव-अभियोग सदा से हैं, सदा रहेंगे। उन तीन पये मन चावल के जमाने में भी केदार वोस की तरह लाखों बादमी अपनी गिरती मुश्किल से चला पाते थे। उस सनय भी अन्न के अभाव में मिदनापुर इलाके में हर साल अकाल पड़ा करता था। मन्त्रवार में यह खबर पढ़कर आतंकित हो उठते थे हम। और यह भी याद है कि उस विपत्काल में हम पार्को में मीटिंग किया करते थे, अंग्रेज सरकार को गालियां देते थे। हम सोचा करते थे कि अंग्रेजों के चले जाते ही फिर रामराज लौट आएगा हमारे यहां। केदार बोस हमारे उस युग का शिकार था। पर अंग्रेजों में चाहे जो दोप हों, बच्चे को जन्म देना तो मां-बाप काही अपराध है। अंग्रेज तो आखिर हुकुम देकर हमने जबरदस्ती वच्चा नहीं पैदा करवाते थे। इसीलिए मेरा सारा गुस्सा जा पड़ा था केदार बोस पर। रात काफी देर हो गई थी तब। अन्दाज़ से पहचानता था मैं केदार बोस का डेरा। गैस की रोशनी टिमटिमा रही थी। उसी मल्प प्रकाश में बड़ी मुश्किल से मैंने केदार बोस के डेरे का पता लगाया। दरवाजा खटखटाते ही किसीने आकर खोल दिया। देखा कि एक छोटा- सा लड़का है। पीछे-पीछे और भी कुछ कम उमर के लड़के-लड़कियों की भीड़ आ बड़ी हुई। 'कोन हो ? कान हो तुम ?' मैने कहा, 'क्या यह केदार बाबू का घर है ? वे हैं घर पर ?' एकसाथ सब बोल उठे, 'हां, हो । कौन हो तुम ?' उन बच्चों का यह वस्ताव मुझे कतई पसन्द नहीं आया। उनमें शिक्षा- दीक्षा का अभाव पाकर, उनकी अगालीनता देखकर मुझे बुरा लगा। केदार वोस भी क्या कर सकता है ? अपनी डेढ़ सौ रुपये की तनख्वाह में इससे ज्यादा करने की मांकात ही कहां है वेचारे में ? मकान का किराया है, इतने बच्चों के खाने-कपड़े का बोझ है, फिर सबके ऊपर है हारी-बीमारी।
किसी औरत के भीतर मे चिल्लाने की आवाज आई, 'कोन है रे भोंदू ? कौन आया है ?' कहते हुए वह औरत वाहर आई। स्तम्भित हो गया मैं उसका चेहरा देखकर । बीमार कहने पर लगेगा कि उमकी हालत का बयान घटाकर किया गया है। मारा रक्त-मास जैसे शरीर के बीचोदीव केन्द्रीभूत हो गया था जिममे विकट आकृति बन गई थी उस स्त्री की। उस दिन मैं वहा अधिक देर तक नहीं रुका, इममें मेरा कमूर नहीं है। सचमुच बसह्य हो गया था मेरे लिए वहा ठहरना । केदार वोम को देखा है मैंने, उसकी गरीबी का अन्दाजा लगाने की भी कोशिश की है। लेकिन वह गरीवी इतनी पनी है इसका मुझे गुमान तक नही था। 'आप कहाँ से आ रहे है ?' किसी तरह कहा मैंने, 'हम लोग एक ही दफ्तर में काम करने हैं।' जब मैं गली के बाहर निकल आया तब ही सचमुच जमे मैंने राहत की मांस ली। वह अंधेरी-घुप्प कोठरी, वह मांतक दारिद्रय जैसे मेरा दम घोटे दे रहा था। तब भी मुझे लग रहा था जैसे केदार बोम की स्त्री की प्रेतमूर्ति मुझे ग्रसने दौड़ी चली ना रही है। मैंने बाहर के ट्राम-वे पर आकर मुक्ति का अनुभव किया। लेकिन आखिर केदार बोम कहा चला गया? उमे जिस हालत में मैंने छोड़ा था उममें आत्महत्या का प्रयल करना अस्वाभाविक नहीं होगा। क्व का निकला है दफ्तर में, तो भी इतनी देर हो रही है घर लौटने में ! रास्ते के मोड पर सडा रहा कुछ देर, यही से तो वह अपने घर जायगा। लेकिन जब उसका कोई सुराग न मिला तब फिर चलने लगा अपने घर की ओर। घड़ी देवी। रात के दस बजे थे। एकाएक एक जगह आकर देखा कि विलकुल केदार बोस ही जैसे खडा है कोई। रास्ते के बिजली के खंभे की और मुह किये एक विज्ञापन पढ़ रहा है। हो सकता है कि कोई दवा का विज्ञापन हो। पीठ पर हाय रखकर बोला, 'क्या बात है केदार? यहा क्या कर रहे हो ?' केदार पीछे मुडा । मैं चौंक पड़ा। बोला, 'माफ कीजिए, मैंने सोचा था केदार बोस हैं आप." कहकर सलज्ज भाव से क्षमा मागकर फिर अपने घर की ओर चल पड़ा। - अगले दिन दफ्तर में पहुंचते ही पहले ट्रांजिट सेक्शन में गया। देखा कि केदार बोस बैठा है उदास । मैंने कहा, 'कल तुम्हारे घर गया था मैं । कहां थे तब तुम ? केदार बोस बोला, 'पता है मुझे ।' 'आखिर थे कहां तुम इतनी देर? कहां गये थे ?' केदार बोस चुप रहा। मैं भी और वात न बढ़ाकर अपनी जगह चला 1 । लेकिन घर जाने से पहले फिर जाकर पकड़ा मैंने केदार बोस को। एक- एक करके सब जब घर चले गये, तव हम दोनों वाहर निकले । उस दिन की तरह वातें नहीं कर रहा था आज केदार बोस । मैंने पूछा, 'क्या निश्चय किया?' केदार बोस ने कहा, 'कल एक जने के यहां गया था।' 'किसके यहां?' थोड़ा हिचककर केदार वोस बोला, 'एक डाक्टर के यहां।' 'डाक्टर के यहां ? किस डाक्टर के यहां ?' केदार बोस ने कहा, 'तुम्हारे चले जाने के बाद मैं घर की ओर ही जा रहा था। लेकिन भाई, मेरे पैर उधर नहीं बढ़ना चाहते थे। सोचा कि जाकर होगा भी क्या ! जाकर उन नालायकों को ही तो देखंगा। एक ही बच्चे को खिलाने की सामर्थ्य नहीं है, उसके ऊपर इतने बच्चों का बोझ कैसे संभाल सकता हूं? और फिर एक और आ रहा है “यही सब सोचते-सोचते घर की ओर न जाकर वाग बाजार के नाले की तरफ चलने लगा। जगह परिचित है मेरी, काफी निराली जगह है। सोचा कि इस निराले स्थान में जाकर वैलूंगा कुछ देर, दिमाग ठिकाने आ जायगा शायद तव...' 'फिर?' 'बाग वाजार की ओर जा रहा था कि रास्ते में इलेक्ट्रिक पोस्ट पर लगे एक छोटे विनापन पर नजर पड़ी। इसका नाम किस्मत है भाई.। इतने अंधेरे में मुझे वह विज्ञापन नहीं नज़र आना चाहिए था। शायद भगवान को दया आ गयी थी मुझे दुःखी देखकर। हो सकता है भगवान ने सोचा हो कि बेचारा बड़ी तकलीफ में है, उसे बचा लिया जाय । फिर बाग बाजार नहीं गया। जल्दी से पता एक कागज़ पर नोट करके बस पर चढ़ गया। कहां बाग बाज़ार और कहां मानिकतला।'
7 " 'तो मानिकतला गये? इतनी रात को' केदार वीस बोला, 'न जाता? तब अगर मुझे कोई जहन्नुम में भी जाने को कहता, तो भी मैं चला जाता-पीछे नहीं हटता इसके लिए भी।' 'इसके बाद ' इसके बाद मानिकतला गया। पर मकान दूद निकालना क्या मामूली बात थी? अली-गली में घूमते-घूमते परेशान होकर आखिर में डाक्टर का मकान मिला । लेकिन तब काफी रात हो चुकी थी। डाक्टर बाबू को पुकारू या न पुकारूं, सोचने लगा। इतनी रात गये पुकारने पर शायद बुरा मानें । पर फिर मोचा, डाक्टर के लिए रात और दिन का पा सवाल है ?आखिरकार दरवाजा खटखटाते ही एक आदमी ने दरवाजा खोल दिया। * मैंने कहा, 'डाक्टर बाबू हैं ?' 'उस आदमी ने कहा, 'नहीं, वे कॉल पर गए है।' - - 'कब लौटेंगे. + . • " उसने कहा, 'इसका कोई ठीक नहीं। आप कल आइए। थोड़ा और जल्दी आइए कल।' 'ममझ गया डाक्टर बहुत नामी है। यानी मुझ मे मरीजो की पमी नहीं है इस मुल्क में । तब मै और क्या करता, वापस लौट आया। कह आमा कि कल दातर खतम होने के वाद आऊंगा। तभी वहा जा रहा है।' मैंने पूछा, 'डाक्टर है तो अच्छा ?' केदार बोस ने कहा, 'यह तो नहीं जानता मैं। सिर्फ बिजली के खभे पर चिपक विमापन को देखकर गया था। आओ, चलो न मेरे साम ।' याद है, उम दिन केदार वोम को मैंने अकेला छोडना मुनासिब नहीं समझा था। अर्थात् यही कि उसकी विपत्ति में थोडी सहायता करना चाहा था । अन्त में उसके साथ मानिातला गया था मैं। उस डाक्टर की बात भी याद आ रही है आज । वह डाक्टर था भी वैसा ही डाक्टर ! आज भी शक होता है कि वह डाक्टर था या वंद्य । मुझे लगा कि शायद वह वैद्य था। वैसे वैद्य भी तो डाक्टर ही होता है। अगर वह अपने को डाक्टर कहता है तो कोई उसे दोप नहीं दे सकता। घर के भीतर घुसते ही मुझे शुबहा हुआ था। डाक्टर बाबू एक वडा- सा हुक्का पी रहे थे। मंकुचित भाव में केदार बोस ने अपने केस को बताया।
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डाक्टर ने पूछा, 'कितने महीने हो गये ?'
केदार बोस ने कहा, 'जी, सात महीने ।'
'बहुत देर कर दी है आपने। पर मेरे पास जब आ गए हैं तब डरने की
कोई बात नहीं रही अव । पहले आये होते तो काम सहज में हो गया होता।
अब आपका खर्चा कुछ ज्यादा पड़ जायगा, यही बात है...'
'कितना पड़ेगा खर्चा ?'
डाक्टर ने कहा, 'कुल चार सौ रुपये देने पड़ेंगे । और पहले अगर आये
होते तो पचास रुपये में काम हो जाता......'
'चार सौ रुपये ?'
केदार बोस जैसे वज्राहत होकर ज़मीन पर बैठ गया। बोला, 'इससे कम
में नहीं होगा ?'
डाक्टर ने कहा, 'गड़बड़ तो आप ही कर बैठे हैं, नहीं तो गुनाह की यह
सज़ा नहीं भोगनी पड़ती।'
केदार बोस ने कहा, 'अव कितना देना पड़ेगा?'
डाक्टर ने कहा, 'जैसे-जैसे मैं दवा दूंगा वैसे ही आप रुपया देते जायेंगे।
एक शीशी दवा की कीमत सौ रुपये है। लगता है चार शीशी में ही हो जायगा
काम । और आपकी किस्मत अगर अच्छी हुई तो दो शीशी में ही दूर हो,
जायगा रोग।'
स्त्री को ? अगर आखिर में कोई खराबी हो गयी तो क्या होगा? केदार बोस ने कहा, 'लेकिन मेरे लिए अब इसके मिवाय और कोई रास्ता नहीं। किसी और को मैं जानता भी तो नहीं हूं।' 'और रुपयों का क्या इतजाम होगा? रपये हैं तुम्हारे पास चार मो रुपये कहां में जुटाओगे? कल ही तो कहता है सौ रुपये चाहिये । दे सकोगे ?' केदार वोस बोला, 'सौ पैसे भी नहीं हैं मेरे पास, सौ रुपये तो दूर की वात है।' 'तब क्या करोगे? स्त्री के गहने बेचोगे' केदार बोम ने जवाब दिया, 'स्त्री के गहने हो तव तो।' "लेकिन तब क्या करोगे 'करूंगा और क्या । चोरी करूंगा। राहजनी करूंगा। मूल बात यह है कि जैमे भी बने, मुझे कल रपयो का इतजाम करना ही पड़ेगा। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है मेरे लिए। तुम दे सकते हो कुछ ?' मैं बोला, 'कुछ दे सकता है, लेकिन उमसे तो तुम्हारा काम चलेगा नहीं।' केदार बोस मिर नीचा किए मेरे माय-माथ चल रहा था। मम्भवत अपनी चिन्ता मे बचल हो गया था उसका चित्त । मेरी वात का कोई जवाब न देकर चुपचाप चलता रहा। अंत में बोल उठा, 'जो भी हो, चार सौ रुपये का इलजाम मुझे करना ही पड़ेगा.. उस दिन और ज्यादा बातें न हो सकी। बातें करके फायदा क्या होता ? उत्तने रपये भी तो नहीं थे मेरे पास कि मैं उसकी सहायता कर सकता। केदार बोस की हालत और हम लोगों को हालत में तव ऐमा कोई खाम फर्क भी नहीं था। फर्क मिर्फ इतना ही था कि केदार वोम के बालबच्चो की नादाद ज्यादा थी। आखिर में दफ्तर के एक चपरासी से दो सौ रपये उधार लिए केदार बोम ने । मैंने जमानत दी। और बाकी रुपये उसे उधार के तौर पर दफ्तर के कुछ लोगो ने मिलकर दिये । केदार बोस अगले दिन ही वंद्यजी को रुपये दे आया और दवा भी ले आया। मुझे भी बहुत कुतूहल हुआ। मैंने पूछा, 'दवा सिलाई तुमने अपनी स्त्री को? केदार बोस ने कहा, 'खिलाने की दवा नही है भाई, लगाने की है । दवा . लगाने पर बहुत जलन होती है, लगाना नहीं चाहती मेरी स्त्री।' मैं बोला, 'लेकिन न लगाने से काम कैसे चलेगा?' केदार बोस ने कहा, 'मैंने भी तो यही बात कही है स्त्री से। मैंने कहा है कि इतनी कीमती दवा है, थोड़ी तकलीफ बरदाश्त करके लगाती रहो।' 'तब क्या कहा उसने ?' 'कहेगी क्या भाई ! सब कुछ तो देखता हूं अपनी आंखों से। वाल-बच्चों की एक पल्टन है मेरी गिरस्ती में, ऐसी गिरस्ती में आराम से लेटी तो नहीं रह सनाती वैचारी। गिरस्ती तो वीमारी की बात सुनेगी नहीं। लिहाजा अकेले ही सारा काम करना पड़ता है, रेस्ट विलकुल नहीं मिलता।' मैं वोला, 'इसी तरह तो काम करती आई है अव तक वह केदार ने कहा, 'पहले परिश्रम किया है क्या इसलिए हमेशा कर सकता है कोई? वच्चा जन-जन के उसके शरीर में क्या अब कुछ बाकी है ? फिर मैं अच्छा पौप्टिक भोजन भी तो नहीं दे पाता। वैसी औकात होती तो भी एक बात थी।' 'वैद्य क्या कहता है ?" 'कहता है कि सब ठीक हो जायगा। हजारों मरीज़ उनकी दवा लगाकर फायदा उठा रहे हैं, तव मेरी स्त्री को क्यों नहीं होगा ? मुझे तो बहुत भरोसा मिला है भाई । मैं कान पकड़ के प्रतिज्ञा करता हूं कि और कभी ऐसा काम . नहीं करूंगा, यही अन्तिम पाप है मेरा। बहुत नसीहत मिल चुकी है मुझे।' केदार बोस को देखकर भी लगा कि सचमुच वह थोड़ा आश्वस्त हो गया है अपने मन में । काफी हलका महसूस कर रहा है पहले की बनिस्वत । मैं भी और कुछ न कहकर अपनी सीट पर चला आया। वह हलका मह- मन कर रहा है यह अच्छी बात है। केदार वोस की मुसीबत में शिरकत नहीं कर पाया था इसलिए अफसोस था मन में । केदार वोस का अगर कुछ भला हो जाता इससे मेरा यह अफसोस भी थोड़ा कम हो जाता। मेरी दुश्चिन्ता इसीलिए थी। देख रहा था कि दिन-ब-दिन केदार बोस जैसे सूखता चला जा रहा है। बेहरे, मन, सेहत सब तरफ से लाचार मालूम होता था। दफ्तर आता, अपना .. काम करता और मुझसे बचकर न जाने कब चुपचाप घर चला जाता। उस दिन एकाएक मैंने उसे पकड़ लिया। मैंने कहा, 'क्या खवर है ? कई दिन से तुम्हें पकड़ने की कोशिश कर - रहा था।' . " केदार बोला, 'जी अच्छा नहीं है। 'क्यों ? क्या हुआ? वैद्यजी की दवा में फायदा नही हुआ केदार बोस ने कहा, 'तकलीफ मे छटपटा रही है मेरी बीवी-मो नहीं पाती तमाम रात, मैं भी नही मोता...' मैं बोला, 'वैद्य क्या कहता है। केदार बोस ने कहा, 'दवा वदल दी है।' 'क्यों ? उस दवा से कुछ नहीं हुआ " 'वैद्यजी ने कहा कि एक और अच्छी दवा दे रहा हू इस बार । योडा और ज्यादा कीमती।' 'तकलीफ कम हुई 'नही भाई, और बढ़ गयी लगती है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं ।' कहकर निराशा मे टूट-मा गया केंदार बोस । मैंने कहा, 'चलो, मैं भी वैद्य जी के यहा चलूगा तुम्हारे साथ ।' केदार योस की हिम्मत बढ़ाने के लिए ही मानिकतला गया था मैं उम दिन । याद है, वंद्यजी ने दिलासा ही दिया या उम दिन । कहा था, 'इण्डिया- भर से मरीज आते हैं साहब, और आप लोग कहते हैं कि मर्ज अच्छा नहीं होगा? अगर यह मर्ग ठीक न हुआ तो मैं इलाज करना ही छोड़ दूंगा।" मैंने पूछा, 'तब तकलीफ क्यो हो रही है ?' वैद्य जी ने कहा, 'रोग होने पर तकलीफ तो थोडी-बहुत होगी ही साहब । बच्चा पैदा करने की क्रिया मे जब मजा लूटा है, तब उमे खतम करते वक्त अगर थोड़ी तकलीफ बरदाश्त नहीं करेंगे तो कैसे काम चलेगा? और जब एक-दो महीने का था तब क्यो नही आयें ? अव मर्ज पुराना पड़ गया है।' केदार बोस चोला, 'इस तकलीफ को अगर थोडा आप काम कर देते। वैद्यजी ने उसी दिलासे के ढंग से कहा, 'जरूर कम होगी, इतना अधीर होने से कैसे चलेगा काम?'' वैद्यजी से ज्यादा बातें करने का वक्त भी नहीं मिलता था। बाहर के कमरे में भीड़ लगी रहती थी मरीजो की जो अंदर जाने की ताक में बैठे रहते। एक मरीज के बाहर निकलते ही फौरन दूसरा यंदर जाता। तनिक भी ठहरना नहीं चाहता था कोई । क्या इतने आदमियों को यही एक समस्या यो ? क्या सबकी ही केदार बोस जैसी समस्या थी? . ७७ ने पर वहुत जलन होती है, लगाना नहीं चाहती मेरी स्त्री। मैं बोला, 'लेकिन न लगाने से काम कैसे चलेगा?' .. केदार बोस ने कहा, 'मैंने भी तो यही बात कही है स्त्री:से। मैंने कहा. क इतनी कीमती दवा है, थोड़ी तकलीफ बरदाश्त करके लगाती रहों।' 'तव क्या कहा उसने ?' 'कहेगी क्या भाई ! सब कुछ तो देखता हूं अपनी आंखों से। वाल-बच्चों की एक पल्टन है मेरी गिरस्ती में, ऐसी गिरस्ती में आराम से लेटी तो नहीं रह सकती वेचारी। गिरस्ती तो वीमारी की बात सुनेगी नहीं। लिहाजा, अकेले ही सारा काम करना पड़ता है, रेस्ट विलकुल नहीं मिलता।'- मैं वोला, 'इसी तरह तो काम करती आई है अब तक वह::'.. केदार ने कहा, 'पहले परिश्रम किया है क्या इसलिए हमेशा कर सकता है कोई ? बच्चा जन-जन के उसके शरीर में क्या अब कुछ बाकी है? फिर मैं अच्छा पौष्टिक भोजन भी तो नहीं दे पाता। वैसी औकात होती तो भी एक बात थी।' 'वैद्य क्या कहता है ?' 'कहता है कि सब ठीक हो जायगा। हजारों मरीज़ उनकी दवा लगाकर फायदा उठा रहे हैं, तव मेरी स्त्री को क्यों नहीं होगा ? मुझे तो बहुत भरोस मिला है भाई । मैं कान पकड़ के प्रतिज्ञा करता हूं कि और कभी ऐसा क नहीं करूंगा, यही अन्तिम पाप है मेरा। बहुत-नसीहत मिल चुकी है मुझे। केदार वोस को देखकर भी लगा कि सचमुच वह थोड़ा आश्वस्त हो है अपने मन में । काफी हलका महसूस कर रहा है पहले की बनिस्बत। मैं भी और कुछ न कहकर अपनी सीट पर चला आया। वह हलक सूस कर रहा है यह अच्छी बात है। केदार बोस की मुसीवत में शिरक कर पाया था इसलिए अफसोस था मन में । केदार बोस का अगर कुछ हो जाता इससे मेरा यह अफसोस भी थोड़ा कम हो जाता। मेरी इसीलिए थी। देख रहा था कि दिन-ब-दिन केदार बोस जैसे सूखता चलाज चेहरे, मन, सेहत सब तरफ से लाचार मालूम होता था। दफ्तर आ काम करता और मुझसे बचकर न जाने कब चुपचाप घर चला जात उस दिन एकाएक मैंने उसे पकड़ लिया। मैंने कहा, 'क्या खबर है ? कई दिन से तुम्हें पकड़ने की .. - T रहा था।' " " केदार बोला, 'जी अच्छा नहीं है 'क्यों? क्या हुआ? वंद्यजी की दवा से फायदा नहीं हुआ ?' केदार बोस ने कहा, 'तकनीफ से छटपटा रही है मेरी बीवी-मो नहीं पाती तमाम रात, मैं भी नहीं सोता..' मैं बोला, 'वैद्य क्या कहता है। केदार चौस ने कहा, 'दवा बदल दी है।' 'क्यो ? उस दवा से कुछ नहीं हुआ 'बंद्यजी ने कहा कि एक और अच्छी दवा दे रहा हू इस बार । थोडा और ज्यादा कीमती।' 'तकलीफ कम हुई 'नही भाई, और बढ गयी लगती है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करू ।' कहकर निराशा से टूट-सा गया केदार बोस । मैंने कहा, 'चलो, में भी वैद्य जी के यहा चलूगा तुम्हारे माय ।' केदार बोस की हिम्मत बढ़ाने के लिए ही मानिकतला गया था मैं उस दिन । याद है, वंद्य जी ने दिलामा ही दिया था उम दिन। कहा था, 'इण्डिया- भर से मरीज आते हैं माहर, और आप लोग कहते है कि मर्ज अच्छा नहीं होगा? अगर यह मजं ठीक न हुआ तो मैं इलाज करना ही छोड दूगा।' मैंने पूछा, 'तब तकलीफ क्यों हो रही है।' वैद्य जी ने कहा, 'रोग होने पर नकलीफ तो थोड़ी-बहुत होगी ही साहब । बच्चा पैदा करने की क्रिया में जब मजा लूटा है, तब उसे खतम करते वक्त अगर थोड़ी तकलीफ बरदाश्त नहीं करेंगे तो कैसे काम चलेगा? और जब एक-दो महीने का था तब क्यो नही आये ? अब म पुराना पड़ गया है।' केदार वोस बोला, 'इम तकलीफ को अगर योडा आप काम कर देते.' वैद्यजी ने उसी दिलाने के ढग से कहा, 'जरूर कम होगी, इतना अधीर होने से कमे चलेगा काम वैद्यजी से ज्यादा बातें करने का वक्त भी नहीं मिलता या। बाहर के कमरे में भीड़ लगी रहती थी मरीजो की जो अंदर जाने की ताक में बैठे रहते । एक मरीज के बाहर निकलते ही फौरन दूसरा अंदर जाता । तनिक भी रहना नहीं चाहता था कोई। क्या इतने आदमियो की यही एक ममस्मा थी? क्या सबकी ही केदार बोस जैसी समस्या थी?
यह सब क्या आज की वात है ! कौन जानता था कि वही केदार वास अपने लड़के की खरीदी गाड़ी पर चढ़के घूमेगा! कौन जानता था कि केदार बोस एक दिन शशीपद के काम आयेगा ! तव की सातें सोचने पर भे में ही आ जाना पड़ता है आज, विस्मय में हतवाक् हो जाना पड़ता है। हालांकि आज जब 'लूप' के बारे में अखबारों में पढ़ते हैं, उसका विज्ञापन ते हैं, तब उस जमाने से आज की तुलना करने की तबियत तो होती ही । आज के केदार बोस क्या उस जमाने के केदार बोसों की बनिस्वत खुश ल हैं ? आज के केदार बोसों का जीवन क्या शान्तिमय है, सुखी है ? आज शशीपद के मुंह से रूपरतन वोस की बात सुनकर सबसे ज्याद चंभा मुझे ही होना चाहिए। याद है, श्मशान में खड़े होकर भी केदार बोस विलख-विलखकर रोया या। . उसने कहा था, 'मैं भी और ज्यादा दिन नहीं जीऊंगा भाई, मुझे भी जल्दी ही लाकर चिता पर सुलाना पड़ेगा।' मैंने यथारीति उसे सान्त्वना दी थी। श्मशान जैसे शोक का स्थान है, वैसे ही सान्त्वना का भी। श्मशान का शोक तो प्रकृत होता है, किन्तु सान्त्वना कृविम । मैंने केदार बोस को उसी तरह सांत्वना दी थी, जिस तरह दी जाती है, जिस तरह देने की रीति है। पर वह सांत्वना यदि उस दिन मैं अपने-आपको देता तो ज्यादा अच्छा होता । श्मशान में ले जाने के पहले के एक महीने का अरसा केदार वोस का किस तरह कटा था, अब इसे सोचने पर भी सिहर उठना पड़ता है। तब के दुःख- दर्द का हाल और सब के जानने पर भी वह रूपरतन बोस तो उसे नहीं जानता। रूपरतन वोस आज सरकार का रेटिंग ऑफिसर है। उसे फौज में रंगरूट भरती करना है, ज्यादा से ज्यादा, जितना हो सके । भारत सरकार की सैनिक शक्ति की वृद्धि न कर सकने पर रूपरतन वोस की नौकरी नहीं रहेगी। पर वह रूपरतन बोस तव कितना-सा था? हाल ही में पैदा हुआ था वह । मैं कैंसर अस्पताल में केदार वोस की स्त्री को देखने गया था। अन्त में उस वैद्य की दवा लगाकर केदार बोस की स्त्री को कैन्सर हो जायगा इसकी कल्पना तव कौन कर सकता था शोक का प्रभाव क्रमशः दूर हो जाता है, एक अज़ीज़ की मौत का सदमा भी कुछ अरसे वाद वरदाश्त होने लगता है। लेकिन बरदाश्त करने की यह ? . ७८ ताकत पहले-पहल देखी थी मैंने केदार वोस में। याद है स्परतन बोस नाम मैंने ही रक्खा था। केदार बोस ने कहा था, "विना मा के सड़के का इतना भड़कोला नाम क्यों रक्या भाई ?' मैंने कहा था, 'क्या हर्ज है, लड़के की वजह से तो तुम्हारी औरत नही मरी है, वह मरी है तुम्हारी वजह से । तब वह क्यो भोगे तुम्हारे लिए?' श्मशान में जब चिता धाय-धाय जल रही थी, तब केदार वोस चुपके-चुपके गंगा के घाट की ओर चला जा रहा था। किसीने नहीं देखा उसे । मैंने उसका मोटा किया। किनारे के करीब जाते ही मैंने उसे पीछे से पकड़ लिया। केदार वोस पीछे मुड़ा। मैं वौला, 'कहा जा रहे हो?' केदार बोस ने कोई जवाब नहीं दिया । आखें फाडकर मेरी ओर देखता रहा। मैंने कहा, 'छोः शर्म नहीं आती तुम्हे तो भी जवाब नहीं दिया केदार वोस ने। मैंने कहा, 'भूल क्यो रहे हो कि तुम्हारे इतने बाल-बच्चे हैं ? मात-मात जीवन तुम्हारा मुह जोहे वैठे हैं ?' उस दिन सही तक । मैं वापस लौटा लाया उसे फोरन । लाकर अन्त्येष्टि क्रिया हो जाने के बाद उसे खुद उसके घर पहुचा आया। . " . और, इसके बाद? इसके बाद लुके-छिपे केदार बोस एक दिन फिर शादी कर बैठा । यह बात उसने मुझे नहीं बतायी थी। तब उसने हमारे दफ्तर की नौकरी भी छोड़ दी थी। प्रॉविडेंट फण्ड का रुपया पाने के लिए नौकरी छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था उसके लिए । उधार लिया रपया आखिर कितने दिन न देता। मुझे भी और वक्त नहीं मिला केदार वोस से मिलने का । वर्तमान जगत् मे हमारी स्थिति विच्छिन्न द्वीपो की तरह है। पारस्परिक सम्पर्क बनाए रखना भी दुष्कर होता जा रहा है विभिन्न कारणो से। मेरे कान में मिर्फ पही यात आई थी कि केदार बोस ने प्रॉविडेंट फण्ड के कई हजार रूपये निकालकर फिर शादी कर ली है। और अन्त में एक दिन उसे दूर में उस - . में देखा था पर वातें नहीं हुई थीं। मैंने सोचा था शायद उसके किसी : की होगी गाड़ी। और यह भी खयाल आया था मन में कि उसकी हाली वाकई एक खुशी की बात है। खुद वह अपनी हालत न दुरुस्त कर | तो क्या हुआ, बेटे की खुशहाली ही वाप की भी खुशहाली होती है । और इतने दिन बाद शशी वावू के मुंह से रूपरतन बोस का नाम सुनकर कर केदार वोस की याद आ गयी। मैं बोला, 'रूपरतन बोस ने क्या कहा ? नौकरी दी आपके लड़के को ?' शशी बाबू ने कहा, 'भई, एक बड़ा मजेदार वाकिआ हुआ। 'क्या हुआ ?' थोड़ा अचम्भा हुआ मुझे। शशीपद बाबू बोले, 'मेरा लड़का पढ़ाई-लिखाई में बुरा नहीं है, उसका स्वास्थ्य भी अच्छा है। उसका जो इम्तहान होने वाला था, उसके पहले नाम मान का एक इन्टरव्यू होने का नियम है । इसी सिलसिले में मैं गया था, जाकर मैंने केदार बोस का नाम बताया।' 'वताया आपने?' 'हां, मैंने कहा कि आपके पिता केदार वोस महाशय और मैं एक ही दफ्तर में नौकरी करते थे।' मैंने कहा, 'तो आप केदार वोस का नाम क्यों लेने गए ?' शशी वाबू ने कहा, 'मैंने सोचा कि उसके पिता का नाम लेने पर शायद मेरे लड़के को नौकरी मिल जाए। पर भाई, फल उलटा हुआ।"यही वात कहने तो आया हूं।' 'क्या हुआ फिर ?' 'एकाएक रूपरतन वोस चीख उठा : 'निकल जाइए यहां से, अभी निक जाइए।' चीख सुनकर दफ्तर के तमाम लोग दौड़े चले आए। कहां मैं अच करने गया था कि खराब हो गया सव। मेरी समझ में कुछ भी नहीं आय मैं क्या करूं, यह भी नहीं निश्चय कर पायो। चपरासी ने फौरन मेरे आकर कहा : 'निकल जाइए।' इस तरह ज़िन्दगी में कभी वेइज्जत नहीं हुआ था, भाई।' 'फिर ?' 'फिर बाहर आते ही सब मुझे समझाने लगे। वे वोले-~-~आप साहब के पिता का नाम क्यों लिया? जानते हैं उनकी माता की मृत्यु न वोस साहब ही उत्तरदायी हैं।' मैं तो यह सुनकर चौंक-सा पड़ा ..
कुछ जानने हो क्या इस विषय में" मैं बिलकुल नभी कोई जवाब नहीं दे पाया। सोचने लगा मन मे । दफ्तर के लोगों को इस बात कापता कैसे लग गया और किसीके जानने की बात तो यह है नहीं। अकेलें मेरे और केदार वोस के अलावा और तो कोई नहीं जानता था यह मब बात। फिर मुझे मब याद आने लगा। उस दिन गाडी में क्षण भर के लिए दिखलाई पड़ने के बाद एकाएक एक दिन केदार वोस मेरे यहा आ धमका। ..तब रात बहुत हो चुकी थी। केदार बोस का चेहरा देखकर मैं हैरत में आ गया। मैंने पूछा, 'क्या हो गया है तुम्हे ?' उतनी रात को मेरे घर,आकर केदार बोस धुरी तरह रोने लगा। फिर बोला, 'मेरे लड़के को सब पता चल गया है भाई। मुझे इस बात का कतई गुमान भी नहीं था कि इतने दिन वाद उभे मारी बातों का पता लग जाएगा।' मैंने पूछा, 'किस लडके की बात कह रहे हो। रूपरतन की" केदार बोस ने कहा, 'हा तुमने जिस लड़के का नाम खखा था। वह अव इण्डिया गवर्नमेंट का एक बहुत ऊंचा अफसर है। मोचा था, लडका अच्छी नौकरी कर रहा है, जीवन के अन्तिम दिन मुरा से बीतेंगे। और कोई लडका तो कुछ नहीं कर पाया। न जाने, भाई, कैसे एकाएक लडके को सब पता चल गया है। वह जान गया है कि मेरी ही वजह से उसकी मां को कैन्सर हुआ था। उस दिन मुझे एक-व-एक उसने कहा, 'आप तो मेरा जन्म नहीं चाहते थे, तब मेरे पैसे से क्यो खा रहे हैं मेरे पैसे से खाने मे आपको शर्म नहीं आती ?' अशी बाबू ने कहा, 'इसके बाद? मैंने कहा, 'इसके बाद काफी देर तक मा केदार बोस मेरे यहा। गत वद रही है देखकर मैंने उसे समझा-बुझाकर घर भेज दिया। मैंने कहा कि अगले दिन उसके घर जाकर लड़के को समझाकर कह दूगा सब। लड़के के जन्म से मम्बन्धित मारी बातें तो मैं जानता ही था। उसका नाम भी मैंने ही रक्या था। लिहाजा मैंने सोचा कि सेरे कहने पर वह सारी बातें समा जाएगा।' शशी बाबू उत्कंठित होकर सुन रहे थे सब । बोले, 'इसके बाद ? आप 4 गए?' मैं बोला, 'हां, गया। लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला । मेरे पहुंचने के पेस्तर हो सर खतम हो गया था। मैं मुबह के नौ बजे उसके घर ग।
जाकर देखा कि वहां चारों ओर पुलिस छाई हुई है। सुना कि केदार बोस ने पिछली रात को ही आत्महत्या कर ली है।' सम्भवतः जनसंख्या बढ़ी है, हो सकता है जनसंख्या और बढ़ जाए, मनुष्य का पारस्परिक सम्बन्ध और जटिल और कुटिल हो जाए। पहले कृपि-निर्भर था मनुष्य, अब यन्त्र-निर्भर हो गया है। यन्त्र की तरह जीवन भी यन्त्रणा- मुखर हो उठा है। शायद अब यन्त्र से उसे और मुक्ति नहीं मिलेगी। मनुष्य ने यन्त्र-सभ्यता को स्वीकार कर लिया है, पर उसकी नेमत जितनी मिली है सम्भवतः उससे अधिक यन्त्रणा ही मिली है उसे, यद्यपि मनुष्य ही उस यन्त्र का स्रष्टा है । मनुष्य जो कुछ सृष्टि करता है, प्रयोजन होने पर एक दिन फिर उसका विध्वंस भी कर सकता है। जो मनुष्य नगर गढ़ता है, एक दिन वही उसे नष्ट भी करना चाहता इसीमें है मनुष्य का कृतित्व । मनुष्य मनुष्य है तभी उसके अपने हाथ में है उसकी मुक्ति । जिस तरह मनुष्य मनुष्य का शत्नु है, उसी तरह मनुष्य ही फिर मनुष्य का मित्र भी है। जो मनुष्य दुर्मति से अपनी हत्या करता है, वही मनुष्य फिर मृत-संजीवनी का आविष्कार करके मानव के आरोग्य का पथ प्रशस्त कर देता है। एक ऐसे ही आदमी को देखा था मैंने एक दिन। चारों ओर से साजिश से घिरे रहकर भी उस शख्स ने न जाने कैसे अपने बचाव का रास्ता खुद ही निकाल लिया था। पहली मुलाकात हुई थी ट्रेन के कम्पार्टमेंट में । अब उसी शख्स का हाल सुनाता हूं चतुर्थ . ट्रेन जब दिल्ली में चल दी नमी देखा था, लेकिन उतना सबाल नही किया था। काफी भय चेहरे के एक भले आदमी ट्रेन पर चढ़े। मेरे कम्पार्ट- मेट में दो वर्ष ये माली वर्थ पर वे बैठ गए। अनूमन ऐसी हालत में अपनी तरफ से मैं किसी परिचय नहीं करता। इलिए बावजूद उनकी मौजूदगी के जैसे मैं बाहर की ओर देख रहा था, वैमे ही देखता रहा। किन्तु पुतहन एक सापातिक विप है। यह किमी तरह अगर एक बार अन्दर चला जाता है तो फिर खैर नहीं। वह फूटकर निकलेगा ही। थोड़ी ही देर बाद भले आदमी काफी घनिष्ठ हो उठे। बोने, 'कहा तक जाएगे - आप? माधारणतया यह प्रश्न भद्रता-विरद्ध है। तभी थोडा खाई से ही जवाब दिया, 'कलकत्ता?" ' पर उत्तर मुनार भले आदमी ने और भी पनिक होना चाहा, 'अच्छा हुआ माहब, तमाम राना एक्साथ जाएंगे, मुह बन्द करके तो नहीं रहा जा 'सरता।' कहार अपनी पोगाक खोलकर रख दी । लुगी पहनकर महज़ होकर बैठे। फिर जूते मोलकर ट्टिया पहनी। इनके बाद निकला टिफिन करियर । कटोरिया करोने मे मजाकर बोले, 'अगर कुछ खयाल न करें, आपने भोजन कर लिया क्या?' दोला, 'जी हा, भोजन कर चुका हूं' कहकर प्रमग को समाप्त कर देने की गरज में दुमरी ओर देखने लगा। वह भने आदमी बोले, 'देवा है लड़के को करामात, कितना धाना दे दिया है बूढे वाप के माय। एक आदमी का खा सकता है इतना? मुझे राक्षम नमझ लिया है क्या ? देखिए, देखिए न घोडा इधर...' देवना ही पडा मुझे उधर। देखा कि डेर मारी पूड़िया है, आलू दम है, मुर्गी करी है, मटन कटलेट है, चॉप है, रसगुल्ला पेड़ा-जलेबी वगैरह है। भले आदमी बोले, 'आज सब नहीं खा पाऊंगा, कुछ कल के .
. दूंगा।' फिर थोड़ा रुककर बोले, 'लड़के ने सोचा है कि वाप का कर खुश कर देगा। पर लड़कों को यह नहीं पता कि उनकी भलाई देख- ही पिता खुश हो जाते हैं । आपका क्या खयाल है ?' मैं वोला, 'यह तो है ही.. 'हालांकि साहब, यही लड़का पहले विलकुल दूसदी तरह का था। एकदम री वात नहीं मानता था-वाह ! आलू दम तो वड़ा बढ़िया बनाया है, कई ऐसी सब्जी मैंने बहुत दिन से नहीं खाई।' बड़े अजीव लगे भले आदमी। पहले से वैसी जान-पहचान न होने पर भी थोड़ी ही देर में उन्होंने मेरे साथ बड़े अंतरंग भाव से बातचीत का सिल- सिला जमा लिया। साधारणतया आदमी जब खुद वाप बनता है तभी औलाद की कीमत समझता है। मैंने सोचा, शायद इकलौता लड़का है, नई नौकरी मिली है उसे दिल्ली में, तभी इतनी खुशी है वाप के मन में। या हो सकता है कि लड़का भी वाप को वहुत चाहता है। शायद सभी बाप अपने वेटों को चाहते हैं, लेकिन सभी बेटे तो अपने पिताओं को नहीं चाहते। यहां हो सकता है कि वाप के प्यार के साथ बेटे के प्यार का सामंजस्य स्थापित हो गया है। यही तो आनन्द की वात है । इसी सामंजस्य के होने पर ही संसार में जीने का मानन्द मिलता है। इसके बाद भले आदमी ने सूटकेस से एक एलवम निकाला। एलवम में लड़के की विभिन्न अवस्थाओं के चित्र थे-एकदम एक दिन-एक महीने की उमर शुरू करके इस समय की उमर तक के। भले आदमी बोले 'यह देखिए, बचपन में कितना सुन्दर था मेरा लड़का।' मैं चित्र को देखू, या पिता के चेहरे पर खेलती आनन्द की छटा को देखू, तय नहीं कर पाया। पर मुझे बड़ा आनन्द मिला देखकर। इस युग में जव पिता-माता और सन्तान के सम्बन्धों में दरार पड़ गई है, तव ऐसा अनाविल आकर्षण देखकर आनन्द तो होगा ही। काफी देर तक देखने के बाद मैंने सिर्फ एक बात कही। क्योंकि कुछ कहना अशोभनीय होता, इसीलिए कहना पड़ा। मैंने कहा, 'आप सचम बड़े भाग्यवान हैं साहव । मेरी बात सुनकर आनन्द से एकदम विगलित हो गए भले आदमी वोले, 'ठीक कहा आपने। मैं भी वीच-बीच में यही सोचता हूं और इ सौभाग्य के लिए भगवान को धन्यवाद देता हूं। अभी उस दिन अखवा F ८४ देवा कि एक सड़के ने बाप पर मुकदमा मतापगहै।' मैंने पूछा, 'क्यों" 'यो ? जायदाद के लिए। मैं बोला, 'आजकल हमारा समाज हो ऐसापन गया है। एक-दूसरे को यदा नही करत हम । कोई अगर हममे से ऊचा उठ गावा है, उसे मेल खेल प्रकारेण नीचे उतारने की ही चेष्टा करते है हम ।' भले आदमी मेरी बात में एकाएक अपने मत का समर्थन पाकर IT पड़े। बोले, 'ठीक कहा है साहब आपने, बिसनुन ठोक कहा। तो अपने लड़के को यही सीख देने आया है। मैंने उससे कहा कि गुरो तो भोकगे ही, लेकिन इसलिए क्या कारवा का रहंगा? मापीर का यह दोहा पो जाते है गुगामा रात हो चली थी। पाने या पषत होते ही फिर उन्होंने अपना दिगि. करियर निकाला । मैं डाइनिंग-कार में चला गया। इसके बाद खाकर लोट जाने के बाद भी मुझे छुट्टी गही रिलीयो ही यर्थ है कम्पार्टमेंट में । लेटे-लेटे भी उनके लड़के की महागी गुगनी पड़ी। और इमी दरमियान न जाने फय मुझे नीद आ गई। सब जग पुगार पर भी मुझे कुछ नहीं मुनाई पड़ा। इम तरह बस में, ट्रेन मे, प्लेन में न जाने कितने अमीय लोगों माग. पहचान होती है । लेकिन कौन याद रखता है कितने लोगों की? अम्मन्त जगत् मे लौट आने के बाद गन पुछ भूल जाना ही मान form है। तभी मैं भूल ही गया था हग मुलाकात की यात को। लेकिन फिर याद दिला दी मुकात ने। सुकाल मेरा बहुन पुगना दोम्न है। एक-एक गुफाल का हा 'कही में एक शरणार्थी लड़की को शादी करके पर से आया । गुफामा हैं, घर से निकाल दिया था। मास्वना दे रहा था में उगे। पयागम्भव 4 गंगशा fr जीवन में क्या ममी मुखी होते है ? कितने ही यादी है कि पाग पर दौन है, लेकिन हो सकता है कोई औलाद न हो । नयाit गिन को दुखी नहीं करना चाहिए। गव प्रकारची परिनियों मांगी महना ही बुद्धिमानी है। मैंने उमेट्रेन में मिले उग भयं आरपी की falm देते हुए कहा कि उनके जीवन की कोई गाय नहीmal.र.
वगैरह कुछ भी नहीं जुटा पाए। पर उनके लड़के को दिल्ली में एक तनख्वाह की नौकरी मिल गई है। और वह लड़का बाप पर जान देता ? . , इस बात को सुनकर एकाएक सुकान्त सांप की तरह फुफकार उठा। ला, 'कौन ? किसकी बात कह रहे हो ? हमारे दीनू दा की ?' याद है, स्टेशन पर उतरते वक्त कोई एक नाम बताया था उन्होंने । लेकिन बाद नहीं था स्पष्ट रूप से। सुकान्त वोला, 'हां, हां, उनका पूरा नाम है दीनानाथ भट्टाचार्य । गन एण्ड शेल फैक्टरी के सव-हेड हैं। पाइकपाड़ा में रहते हैं न ?' मैं वोला, 'हो सकता है। पता मुझे यही दिया था, कहा था उधर जा. पर मुलाकात करने के लिए।' 'हां, विलकुल दीनू दा ही हैं। मैं जव पाइकपाड़ा में रहता था, तब मेरे पास वाले मकान में ही तो रहते थे। बड़े 'डियर' आदमी हैं, लेकिन किस्मत के खोटे हैं भले आदमी।' 'किस्मत के खोटे हैं ? क्यों?' मैं सुकान्त की बात सुनकर हैरत में आ गया। सुकान्त उन्हीं भले आदमी की बात ही तो कर रहा है ? सुकान्त बोला, 'उनका हुलिया कैसा है वताता हूं : सिर पर खिचड़ी बाल, सांवले रंग बदन का, मुंह में सामने का एक दांत नहीं है। क्यों ठीक मिल रहा है न हुलिया ?' मैं बोला, 'हां, ठीक।' 'तव वे हमारे दीनू दा के अलावा और कोई नहीं हो सकते । एकदम ट्रे मार्क वाला चेहरा है उनका। सचमुच बड़े मज़ेदार आदमी हैं, बड़े भोज विलासी। एक-एक दिन चार-पांच मुर्गियां खरीद डालते थे, और हम स- वुला-बुलाकर खिलाया करते थे। बड़े हरदिलअज़ीज़ शख्स थे भाई दीन तव । इसपर उस शख्स की छाती के भीतर एक आग हमेशा जलती थी. वड़ा आश्चर्य हुआ मुझे सुकान्त की बात सुनकर । बोला, 'क्यों ? सुकान्त बोला, 'बड़ा लम्बा किस्सा है यह।' मैं बोला, 'होने दो लम्बा किस्सा, सुनाओ तुम, मैं सुनूंगा।' ता, 'लेकिन वक्त लगेगा सुनाने में कोई काम मैंने कहा, 'सुनाओ न तुम, में मुनूंगा।' बहुत रात हो गई थी तव । यही तो होगा कि और अधिक हो जाएगी रात। घर लौटने के लिए रास्ते में बहुत रात होने पर भी टैक्सी मिल ही जाएगी । मेरा खाना तैयार करने के लिए घर में कहलवा दिया मुकान्त ने। फिर बोला, 'तुम आराम से बैठ जाओ, तब तक चाय मगवाता है।' शनिवार की रात थी। अगले दिन किसी काम की जल्दी नही थी। पर • पर्चा इतनी रसीली चीज होती है कि सुकान्त का किस्सा मुनते-सुनते कर खाया, क्या खाया, और कद खाना खतम हुआ, यह याद नहीं । दत्तचित होकर मुन रहा था किस्सा । कहा से, कैसे, किस सिलसिले में बात करते-करते कंमा एक ऐसा प्रसंग आ गया कि एकदम और ही एक जगत् मे चला गया। कहानी जब खतम हुई तव करीव आधी रात का वक्त हो गया था। एक टैक्सी लेकर घर चला आया। ? लेकिन इतनी रात को घर लोटकर भी नीद बिलकुल नहीं आयी। वरवर्ट बदलता रहा बहुत देर तक । एक बार उठकर खिड़की खोल दी, फिर धोडी देर बाद वन्द भी कर दी। लगा कि उन्ही दीनानाथ भट्टाचार्य की वह हाहा- कार-मिश्रित हमी मुनाई पड़ रही है। जमे भोर के समय नीर से उठार ही घर के सामने खड़े पुकार रहे हैं, क्यो जी मुकान्त, अभी तक सो रहे हो क्या उठो उठो...' नुकान्त को हमेशा की आदत है देर तक मोने की। इच्छा न रहने पर भी उठ पड़ता था। फिर आखें रगड़ते हुए वाहर आता । दीन दा तब मारे दिन के लिए तैयार मिलते। दीनू दा कहते, 'इतनी देर तक क्यों सोते हो जी" पर मुशान्त कुछ नहीं कहता था। मुकान्त जानता था कि मारी रात नहीं मोये है दीनू दा, तभी इतने सवेरे उठ पड़े हैं ।। हो सकता है, तमाम रान झगडा किया है दोनो ने। दोनो ने यानी दीनू दा और उनकी स्त्री ने। एक विचिन ढंग का प्रगड़ा चलता या दोनो में। लेकिन रिम वात के लिए अगड़ा होता, इमें बाहर से नही समझा जा सकता था। बाहर के लोग पर में आने पर एकदम स्वस्थ स्वाभाविक परिवेश पाते थे। मुकान्त अपनी स्त्री से कभी-कभी यूछता, 'अच्छा बनाओ तो, ये आपम . ८७ किस बात के लिए करते हैं ?' कान्त की स्त्री वड़ी सीधी-सादी थी। रसोई करती तो रसोई ही करती बुरा नहीं मानती थी तनिक भी। और जब बातचीत करती तव वात- ही में लगी रहती, और किसी ओर उसका ध्यान नहीं रहता। इतनी ल हो जाती वातचीत में कि चूल्हे पर रक्खी दाल-भात-सब्जी जल जाती। । उस जून भोजन नहीं होता। हंसते-हंसते सुकान्त कहता, 'नाः, देख रहा हूं कि तुमने शादी करके मुझे ई फायदा नहीं हुआ। सुरभि कहती, 'तब तो तुम्हारी स्त्री दीनू दा की स्त्री की तरह होनी राहिए थी, आटे-दाल का सारा भाव मालूम हो जाता।' मध्यवित्त बंगीय समाज के दैनन्दिन घात-प्रतिघात की कहानी है यह। जैसे नुकान्त कभी गौर नहीं करता था इसपर, वैसे ही सुरभि भी नहीं करती थी। लेकिन एक दिन शायद मामला तूल पकड़ गया। दीनू दा अकस्मात् सुकान्त के मकान की ड्योढ़ी पर आकर धीरे-धीरे खटखटाने लगे, 'ओ सुकान्त, नुकान्त...' सुकान्त और सुरभि गहरी नींद में बेखबर सोए हुए थे। एक-व-एक पुकारे जाने पर अकबकाकर उठे और दरवाज़ा खोल दिया। लेकिन उस वक्त भी दीन दा के चेहरे पर मीठी हंसी झलक रही थी। वोले, 'वड़ी मुसीबत में फंस गया हूं, भाई।' 'इतनी रात को क्या मुसीवत आ गयी दादा? भाभी की तबियत खराब हो गयी है क्या ?' दी दान वोले, 'अरे धत्, तबियत खराब हो गयी होती तब तो मेरी जान वत्र गयी होती। बहुत ज्यादा ठीक है उनकी तवियत, यही तो मुसीवत वन गयी है मेरे लिए। घर से बाहर निकाल दिया है तुम्हारी भाभी ने मुझे।' 'क्यों? क्या किया था आपने?' दीनू दा गंभीर बनना तो जैसे जानते ही नहीं। हंसते-हंसते बोले, 'कुछ कुछ किया तो जरूर ही होगा, नहीं तो झूठ-मूठ थोड़े ही निकाल दिया जाने दो इन बातों को, अव तुम्हारे घर रात-भर सोने की जगह तो मिल जा न? जगह हो या न हो, इस वक्त मुझे सोने तो देना ही पड़ेगा भाई। सरदी है वाहर-हाथ-पैर जमे जा रहे हैं ठंड से।'
. उसी वक्त रात को दीनू दा के लिए बिस्तर बिछा देना पड़ा। मुकान्त ने कहा, 'शायद यहां तकलीफ हो आपको।' दीनू दा बोले, 'क्या कह रहे हो जी तुम, यह राजशम्या है मेरे लिए। 'लेकिन आप मकान से क्यों चले आये, यह नहीं बताया आपने ?' दीनू दा ने तब कम्बल मे मुह छिपा लिया या। उमी हालत में बोले, 'बताया तो कि तुम्हारी भाभी ने मुझे घर मे निकाल दिया है।' 'आखिर क्यो निकाल दिया है, उसकी भी तो कोई वजह होगी।' 'वजह क्या होगी जी? योंही ! का योही आदमी आदमी को घर से नहीं निकाल दे सकता 'बिला बजह निकाल देंगी क्या' दीनू दा वोले, 'अब फौरन नुम यहा में अपने कमरे में चले जाओ। बहू- रानी न जाने क्या सोच रही है अपने मन में।' कहकर चुप हो गये । उस दिन और कोई बात नहीं हुई। बहुत रात हो गयी थी। लेकिन अगले दिन उनका एक दूसरा ही रूप नजर आया। जैसे पिछली रात को कोई अनहोनी बात हुई ही नहीं थी, कही कुछ भी व्यतिक्रम नहीं हुआ था। फिर रोज की तरह थैला-भर के शाक-मजी लेकर बाजार से । लौटे हैं। मुकान्त को देखकर वोले, 'चार मुगिया से आया हूँ, जानते हो। आज रोन्ट बनाऊंगा मुगियों का-खाओगे न?' यह शरुम हमेंशा न जाने क्यों बड़ा अजीब लगता था सुकान्त को। और अशोका भाभी भी न जाने कैसी हैं ! क्यों झगड़ा करती है, यह भकेले में पूछने पर भी कोई संतोपजनक उत्तर नहीं मिलता था। जव कि उनका वाहरी व्यव- हार बहुत भद्र होता था, आवरण स्वाभाविक । मुकान्त के दीन दा के घर जाते ही भानी मामने आकर पूछती, 'आओ देवर जी, क्या खाओगे ? फाउलकरी, या मीट चॉप?' मुगान्त को अचरज होता ! वह कहता, 'क्यो भाभी, आपने होटल घोला है क्या?' अशोका भाभी मुसकराती थी। कहती, 'वह है, उन्हीसे पूछो न, ये हो जानते हैं।' मंद मुसकान खेलती रहती दीनू दा के चेहरे पर। सुकान्त कहता, 'बहुत रिश्वत मिलती है शायद दोनू दा आपको?' e - दीनू दा कहते, 'अरे नहीं भाई, बजार जाते ही नालायक सव इस तरह पकड़ लेते हैं कि बिना खरीदे उनसे छुटकारा नहीं मिलता।' अशोका भाभी कहतीं, 'लेकिन दाम तो तुम्हींको देना पड़ता है, फोकट में तो दे नहीं देते वे तुम्हें। कीमत लेते वक्त एक नये पैसे तक की रियायत नहीं करते।' दीनू दा मुसकराते हुए कहते, 'अरे यह बात नहीं, गरीव आदमी हैं सव। हम लोग अगर उनसे न खरीदें तो वे खायेंगे क्या?' अशोका भाभी ताना मारकर कहती, 'सच्ची वात क्यों नहीं कहते कि तुम्हें ही अच्छा लगता है यह सव खाना । तुम्ही भोजन-भट्ट हो।' सुकान्त कहता, 'सचमुच दीनू दा, अशोका भाभी ठीक कहती हैं। आप भोजन-भट्ट हैं, जरूर कुछ हद तक ।' अशोका भाभी अपनी वात का समर्थन पाकर कहती, 'तुम्हीं बताओ भाई देवर जी, ऐसे पेटू आदमी के साथ गिरस्ती कैसे निवाही जा सकती है ? जिन्दगी में और कोई काम नहीं है, और कोई स्वाहिश-खुशी नहीं है, सिर्फ पकाओ और पकाओ। दिन-रात फकत खाना पकाते-पकाते ही मेरी यह उम्र तममा हो गयी। अशोका भाभी की इस बात में शायद उनके दुःख के मूल कारण का एक आभास था। पर इस प्रसंग को सुकांत उनके सामने नहीं उपस्थित करता था, इसकी चर्चा करता घर आकर। सुकान्त कहता, असल वात क्या है जानती हो वाल-बच्चे नहीं हुए हैं न, भी शायद इतनीअशान्ति है उनकी गिरस्ती में ।' सुरभि कहती, 'लेकिन वाल-बच्चे होते क्यों नहीं हैं ?' इसके वाद वात आगे नहीं बढ़ती थी। दुनिया में न जाने कितने आदमियों की कितनी तरह की समस्याएं हैं जिनकी कोई इन्तिहा है ? तो भी जिस दिन सुरभि उस मकान में जाती, देखती कि अशोका भाभी दत्तचित्त होकर रसोई में लगी हैं। एक चूल्हे पर गोश पक रहा है, एक पर चावल और एक हीटर पर कड़ाही में पूरियां तली जा रही है। अशोका भाभी कहतीं, 'यह देखो भाई, भुत की गिरस्ती में जुतीहूं।' सुरभि पूछती, 'क्या यह सब दादा के खाने के लिए वन रहा है। या और किसीके आने की बात है?' 'अरे, आयेगा कौन? वे खायेंगे और मुहल्ले के किसीसे अगर मुलाकात हो जायगी तो उसे भी साथ लाकर खिलायेंगे।' 'लेकिन क्या इम खाने के मामले पर ही आप लोगों में अगहा होता है भाभी . " अशोका भाभी कहती, 'तो झगडा क्यों न करूं? शादी होने के बाद से ही मिर्फ खाना पकाकर जिन्दगी गुजारना किमे अच्छा लगता है ? न एक सिनमा देखना, न थियेटर देखना। अपना कोई सगासम्बन्धी भी तो नहीं है कि कहीं जाकर कुछ दिन आराम से रह आ सकू । अभी दफ्तर में आयेंगे, आकर हाय- मुंह धोकर नाश्ता करेंगे, फिर खाट पर चित्त लेट जायेंगे। इसके बाद जो कुछ पकाया है उसे चखेंगे, फिर रसोई को अच्छाई-बुराई पर विचार करेंगे।' 'इसके बाद? 'इसके बाद और क्या होगा? तमाम दिन खटने के बाद विन्नर पर पड़के खर्राटे भरेंगे । सारे दिन सिर्फ बाजार जाने, खाने और खटि भरने के अलावा और कोई काम है तुम्हारे दादा चा?' सुरभि कहती, 'तो उम दिन सोते हुए आदमी को जगाकर आपने आधी रात के वक्त घर मे थाहर क्यो निकाल दिया था अशोका भाभी जवाब देती, 'निवाल क्यों न देता दिलकुल पास ही इम तरह खर्राटे की आवाज होने पर किमीको नीद आ मक्ती है कभी मेरे पास भी तो शरीर नाम की एक चीज़ है । या कि मैं आदमी नहीं ह ? यह जो पूरे दिन बेगार मे जुटी रहती हू, मछली-गोश्त और रोस्ट, चॉप-नटलेट बनाती है, इसमें भी तो मेहनत होती है। सारे दिन खटने के बाद मुझे भी तो नीद आ सकती है, इमे तो तुम्हारे दादा देखेंगे नहीं। उनके सटेि के शब्द मे श्मशान का मुर्दा भी हरवर जग उठ सकता है, जानती हो? मुरभि अशोरा भाभी से जो कुछ सुनती थी, आकर फिर मुकान्त को बता मुकान्त कता था, 'तो तुमने पूछा क्यों नहीं कि आप लोगों ने डाक्टर को दिखलाया है बाल-बच्चे न होने के लिए?' 'छी:, कसी बातें करते हो। वही यह बात भी पूछी जा सकती है स्मिीसे?' इसके बाद और कोई बात नही होती थी। इमी तरह मुकान्न ने एक विचित्र परिवार के पड़ोम मे कई साल पाइकपाडा में गुजारे थे। और इसके याद वे लोग चले आए ये भवानीपुर में। देती थी।
इसके कुछ दिन बाद ही सहसा सुकान्त ने एक खबर सुनी। शायद सुकान्त के दस्तर के किसी आदमी ने ही नाकर खबर दी उसे। वह बोला, 'अपने दीन दा की खबर सुनी है सुक्रान्त बाबू?' 'कौन दीनू दा?' 'अरे, पाइकपाड़ा के आपके पुराने पड़ोसी, दीनानाथ भट्टाचार्य । उनकी स्त्री ने दीनू बाबू को घर से बाहर निकाल दिया है।' यह कोई नई खबर नहीं है मुकान्त के लिए। यह घटना तो पहले भी देख का है मुकान्त बहुत बार आधी रात को घर से बाहर निकालकर फिर भोर के वक्त अंदर आने दिया है। उन गन्य ने कहा, 'नहीं, इस बार घर में नहीं घुसने दिया है आपके दीनू दाको।' 'तब कहां गये दीनू दा ?' उसने कहा, 'यह तो मैं नहीं जानता।' उन शन्स ने और कितीसे यह बात सुनकर सुकान्त को बतलायी थी। ने किन मुकान्त के मन में गड़ गयी थी बात । घर आकर उसने सुरभि को बतायी यह बात । अगर अशोका भाभी ने वीनू ना को घर से निकाल ही दिया है तव दीनू दा गये कहाँ ? दीन दा के चले जाने के बाद अशोका भाभी अकेले अपना बत्र कैसे बना रही हैं ? किराये का वह मकान अशोका भाभी के ही नाम पर लिया हुआ था। लिहाजा उन मकान में अशोका भाभी को रहने का हवा तो है। लेकिन किराया कहां से देगी नशोका भाभी? अशोका भाभी का नहानी तो नहीं है। एक छुट्टी के दिन मौका डूंडकर नुकान्त पाइकपाड़ा जा पहुंचा। सुकान्त बृद जिम मकान में रहता था उसमें एक नया किरायेदार आ गया है। अगला मकान ही था वीनू दा का, लेकिन उस मकान का चेहरा एकदम वदल गया है। नामने की ओर एक नया कमरा बन गया है। उसरर एक झूलता वरामदा है । एक नता अपनी डालियों और पत्तियों को फैलाती हुई दीवार के सहारे दूसरी मंजिल तक पहुंच गयी है। मकान-मालिक दूसरी मंजिल पर रहता था। नीचे की मंजिल किराये पर उठा दी थी अशोका भाभी और दीनू दा को । सुकांत ने दूर ने देखा कि मकान-मालिक का लड़का सामने घूम-फिर रहा है। शायद वाग की देखभाल कर रहा है। लेकिन भीतर जाकर पूछने में संकोच हुआ । 'इसके बाद?
सुकान्त बोला- इमके बाद जब मैं समझ गया कि दोन दा उम मकान में नहीं हैं तब वहा और नहीं ठहरा। अच्छा भी नहीं लगा मुझे वहा टहरना । एक जमाना था जब मैं उस मकान में कितना जाया करता था, कितना गप लडाया करता था, न जाने रात-दिन का कितना वक्त गुजारा है उसमें, यह मारी वा पाद आने लगी। लेकिन तो भी भयाल आया कि आखिर अशांश भाभी कहा अलीगयी उनका तो मायका भी नहीं है। उसी मनोदशा को लिये घर लौट आया भाई। घर लोटले ही मुरभि ने पूछा, 'क्या हुआ? कोई खबर मिली ? अगोका भाभी में मुलाकात हुई' मुझे कोई जवाब देते न देखकर सुरभि का अचरज जैसे और बढ़ गया। मुझसे पूछा, 'वोलते क्यों नहीं ? क्या हो गया तुम्हे ?' ----नो पारने मार भी नहीं गयी कहा ? ' है भाई? 'मुलाकात नहीं हुई का क्या मतलब ? मकान में क्या कोई और किराये- दार आ गया है ?' मैं बोला, 'नहीं।' 'तव?' मैंने कहा, 'पुराना मकान-मालिक मर गया है, उसका लड़का ही बन गया है अब मकान-मालिक । वही अव कार-नीचे, पूरे मकान को इस्तेमाल कर 'तव अशोका मामी कहाँ गयो? उन्हें भी निकाल दिया है क्या मकान- मालिक ने?' मैं बोला, 'पता नहीं।' असल बात यह है कि इसके अलावा मैं जवाब भी क्या देता। वहीं दीनू दा, वही अगोका भाभी। वही रोज-रोज का प्रचुर भोजन, वही आधी रात को दीनू दा को घर में निकाल देना-यह सब तब भी मेरी नजरों के मामने पूम रहा था। जो मानक मबर मुझे मुहल्ले के लोगों में मिली है उसे कमें बताऊं मुरभि को। मैंने पूछा, 'मुहल्ले के लोगों में क्या मुना या तुमने?' मुस्कान्त वोला, 'बड़ी दर्दनाक वान है वह भाई।'
मैं बोला, 'क्या है ? सुकान्त ने कहा, 'सुनो तव...! अपने अंधेरे कमरे में आंख मूंदे लेटे-लेटे जैसे उसी घटना को देखने लगा मैं साफ-साफ। उस दिन भी आधी रात का वक्त थीं। तब सुकान्त वहां से मकान छोड़कर चला गया था। एकाएक धड़ाम से दीनू दा के मकान का सदर दरवाजा खुल गया। और इसके बाद एक तेज आवाज़ सुनाई दी: 'निकल जाओ, निकल जाओ घर से, अभी निकल जाओ" असहाय भाव से दीनू दा ने कहा, 'वताओं, कहां जाऊं मैं इतनी रात को.." अशोका भाभी ने चिल्लाकर कहा, 'मैं क्या जानू तुम कहां जाओगे ? दीनू दा ने कहा, 'बड़ी सरदी है बाहरं, ठंड लग रही है"... 'तुम्हें ठंड लग रही है, तो मुझे क्या! तुम निकल जाओ!...... पाइकपाड़ा की धनी वस्ती वाले मुहल्ले के सभी पड़ोसियों ने सुनी थीं यह सब बातें। वाकई बड़ा दर्दअंगेज़ दृश्य था यह । सरदी की उस रात में सिर्फ एक चादर-भर थी भले आदमी के बदन पर । शीत-निवारंण का वही एकमात्र सहारा था। थरथरा रहे थे तब सरदी से दीनू दा। अंतिम चेष्टा के रूप में दीनू दा ने करुण भार से कहा, 'आज रात-भर घर में रहने दो मुझे, कल भोर के वक्त ही मैं चला जाऊंगा-सिर्फ आज रात-भर...' अशोका भाभी शायद आखिर में दीनू दा को रात-भर रहने दे देती। लेकिन तभी मकान-मालिक का लड़का भीतर से निकल आया। बोला, 'खवरदार, अब फिर उसे घर में मत घुसने देना, एक मर्तवा अगर अन्दर घुस जाएगा तो फिर नहीं निकलेगा। फौरन निकाला दो। मुहल्ले के लोगों ने भी सुनीं ये बातें। अव उनकी समझ में आ गया कि सारे मामले के पीछे एक और आदमी है। 'आप क्यों एतराज़ कर रहे हैं ? मेरी स्त्री है यह मेरा घर है यह, मैं घर का किराया देता है।' 'आप किराया देते हैं ? कभी नहीं, किराया तो अशोका भाभी देती हैं ? अशोका भाभी के नाम पर मकान किराये पर लिया गया है. : 'लेकिन चूंकि मैं नौकरी करके कमाता हूं तभी तो मेरी स्त्री किराया दे पाती है। मेरी स्त्री का क्या कोई निजी रोजगार है ?' 'चुप रहिए ! ज्यादा बोलिए मत, नहीं तो.अभीपुलिस को खबर कर दूंगा। हूं । इसके बाद न जाने कैसी अजीब-सी आवाज होने लगी। शायद कुछ मार- पीट या हाथापाई हुई। इसके बाद सब कुछ निस्तब्ध हो गया। उस जाहे की रात में कोई वाहर नहीं निकला। फिर कब रात बीती और मवेरा हुआ,क्मिी- को पता नहीं चला। सवेरे गत रात्रि के विपर्यय का कोई चिन्ह नहीं दिखलाई पड़ा। किसीने नहीं देखा फिर दीनू दा को कई दिन तक। मिर्फ कई दिन ही। इसके बाद फिर दिखलाई पडे दीनू दा। वही पहले की तरह दीनू दापान चबाने- चबाते हाथ में थैला लिये बाजार चले जा रहे है । वाजार से बिलकुल पहले की ही तरह मुर्गी खरीद रहे हैं, गोरत सरीद रहे हैं, मछली खरीद रहे हैं । खरीद- कर फिर पहले की तरह ही उसी पुराने मकान में घुस रहे हैं ! लेकिन नहीं, उस मकान के सामने वाले सदर दरवाजे से नहीं, पीछेवाले दरवाजे से घुस रहे हैं । खड़की से। धीरे-धीरे आखिरकार मब साफ हो गया। और छिपी नहीं रही बात। अब भी इस मुहल्ले के लोग रोज़ दीनू दा को देखते है। दीनू ना हाथ मे भेला लेकर बाजार जाते है । मुर्गी खरीदते है, गोदन सरीदते हैं, मछली खरीदते हैं। इसके बाद पिछवाड़े की खिडकी में होकर अन्दर जाते है। और मुना जाता है कि भीतर जाकर चूल्हा जला के रमोई गुरू कर देते हैं। अपने हाथ मे ही अपनी रसोई बनाते है । इसके बाद आराम से बैठकर मजा ले-लेकर खाते हैं। 'तव लड़का ? भले आदमी लडके की बात कह रहे थे, वह लड़का कहा मे आ गया?' 'वह लड़का तो अशोका भाभी का है।' 'इमका मतलब?' हैरत में आ गया मैं मुकान्त की बात सुनकर । किस्मा सुनते-सुनते बहुत रात हो गई थी तब । अब शायद टैक्सी भी नहीं मिलेगी। वाहर रास्ते की ओर देखा मैंने । सामने की पान-बीड़ी-सिगरेट की दुकान ने भी अपना ढकना डाल लिया था । करीव के मकान का रेडियो वाफी देर हुए बन्द हो चुका था। मुकात ने कहा, 'अब रहने दो, वाकी विस्मा बाद मेक्सिी दिन सुना दूगा।' मैंने कहा, 'नहीं, तुम सुनाओ। चाहे जितनी रात हो जाए, पूरा किस्सा मुनकर ही जाऊंगा । वह लड़का किसका है वताओ?' सुकान्त बोला, 'बताया तो कि अशोका भाभी का।' तो भी मैं कुछ नहीं समझ सका। बोला, 'तुम्हारी अशोन भी या रहती कहा है ? लड़का हो कैसे गया उन्हे ?' १५ सुकान्त ने नीची आवाज़ में कहा, 'भाई सुरभि को भी मैंने यह सब बातें नहीं बताई है। सुनने पर तकलीफ होगी उसे। उसी मकान-मालिक के लड़के से ही अशोका भाभी ने शादी कर ली है।' 'ऐं !' 'हां । दीनू दा को तलाक देकर मकान-मालिक के उसी लड़के से शादी कर ली है अशोका भाभी ने । शादी करके उकी मकान में रहती हैं।' मैं और स्तम्भित हो गया। वोला, 'उसी मकान में? उसी एक ही मकान में?'. 'हां, उसी एक ही मकान में मकान-मालिक के लड़के के साथ रहती हैं। पहले जहां दीनू दा रहे थे, वहीं। जिस विस्तर पर दीनू दा सोते थे, उसी एक ही विस्तर पर अब मकान-मालिक का लड़का सोता है। अशोका भाभी अब उसी की बीवी है। अब अशोका भाभी के बहुत-से बाल-बच्चे हुए हैं। बड़े आराम से हैं अब वह, पूरा मकान अपने नाम करवा लिया है। एक कार भी खरीदी है, जिसपर चढ़कर घूमती है, सिनेमा जाती है, न्यू मार्केट जाती है।' 'और दीनू दा कहां हैं ?' सुकान्त ने कहा, 'दीनू दा उसी मकान में है, लेकिन पीछे की ओर एक कमरा लेकर ! किराया देते हैं कमरे का! चाहे जो हो, अशोका भाभी का हृदय है बड़ा उदार । दीनू दा से ज्यादा किराया नहीं लेती। सिर्फ पचास रुपये लेती हैं जो किराया पहले दिया करते थे दीनू दा। हालांकि अगर चाहती तो अशोका भाभी कमरे को सौ रुपये किराये पर किसी और को दे सकती थी।' मैंने कहा, 'तो तुम्हारी अशोका भाभी का लड़का दीनू दा के पास कैसे चला गया?' मुकान्त ने कहा, 'यही तो वात है। तभी तो कहा था मैंने कि अशोका भाभी का हृदय है बड़ा उदार। अपने बड़े लड़के को दे दिया है दीनू दा को। दीनू दा ने ही अशोका भाभी के बड़े लड़के को पाला-पोसा है बचपन से। लड़का भी उसी तरह दीनू दा से बेहद हिल-मिल गया है। पढ़ने-लिखने में बहुत तेज़ रहे हैं दीन दा। उसे दिल्ली में उन्होंने एक नौकरी भी दिलवा दी है। स्वयं नौकरी से रिटायर होकर दिल्ली में उसी लड़के के पास रहकर ही जिन्दगी के आखिरी दिन गुजारने का इरादा किया है दीनू दा ने ।' तमाम रात जब नींद ही नहीं आई तब भोर होते विस्तर से उठ पड़ा।
.." । मोथा कि एक बार भने आदमी से मुलाकात हो कर आऊ । हावडा स्टेशन पर उतरने ममय उन्होंने अपना नाम-पता दे दिया था और कहा था कि उधर जाने पर उनमें मिलना न भू। जैसा कि शराफत के नाते कहा जाता है। पना दूदकर मचमुच ही वस पर सवार होकर पहुंच गया मैं पाहापाड़ा। मकान के सामने एक सज्जन खड़े थे। बहुत सुन्दर स्वास्थ्य था उनका, बड़ा आगपंक व्यक्तित्व । मेरी बात मुनकर बोले, "उम खिड़की के रास्ते सोय पिछवाडे चले जाइए, वही रहते हैं दीनानाथ भट्टाचार्य ।' मामने वगिया जैसी थोड़ी जगह है, जहा करोटन के पेड़ हैं, फूल के पेड हैं। एक तंग रास्ते में मैं पीछे की ओर गया। दूर से ही देखकर मुझे पहचान लिया मले आदमी ने। बोले, 'आइए आइए। ओ.,आपने यहा आने की तकलीफ गवारा की है, यह देखकर मुझे बही खुशी हो रही है, आपको क्या गाने को दू बतलाइए मैं बोला, 'कुछ नहीं ग्राऊगा। इधर आया था, तभी आपकी बात याद आ गयी । आपको शायद ड्यूटी पर भी जाना पड़ेगा।' दीनानाथ बाबू बोले, 'ड्यूटी पर जाने की बात क्यो कह रहे हैं, आज तो इतदार है।' मैंने कहा, 'जो भी हो, मैं कुछ नहीं खाऊगा, अभी चलूगा।' दीनानाथ वायू धन हो उठे। बोले, 'यह नहीं हो सकता। आप पहली मतंबा मेरे घर तशरीफ लाए हैं, कुछ माकर ही आपको जाना पड़ेगा।' कहकर पास की रसोई में जाकर प्लेट में दो चॉप ले आए। बोले, 'मेरे अपने हाथ के बनाए हैं, एतराज न कीजिए।' 'आपने वनाए है। इतने मवेरे बनाया कब आपने ?' दीनानाथ बाबू ने कहा, 'अरे माहब, मेरा लडका भी तो यही कहता है। मेरा लड़का मेरे हाथ की बनी चीजें बहुत पसन्द करता है न । कल रात को कच्चा ही तैयार करके रख दिया था सत्र । आज सवेरे चार बजे उटकर चूल्हा जनारा है, फिर इन्हें मेंका है। चार चाय के साथ या चुका हूँ, फिर पासार गया हूं। शाम की चाय के साथ चार और खाऊगा।' 'लेकिन मुझे देने में आपको कम पड़ जाएगेन ?' 'मार भी क्या बात करते है, क्या आप समझते हैं कि मैं थाने की चीजें गिनकर बनाताह ? अरे, आपको चाय देना तो भून ही गया यह कैसी मुसीबत में फंस गया मैं ! भले आदमी को उस दिन देर .
ते हुए । दिल्ली से ट्रेन में आते वक्त । फिर यह आज । भले आदमी इतना व हो जाने पर भी इसी मकान में रह रहे हैं, खा रहे हैं, इतना हंस-बोल रहे -----यह देखकर चकित हो गया मैं। एक बार इच्छा हुई सुकान्त की उस शोका भाभी को देखने की, लेकिन तव मौका नहीं था उसका। वहुत-सी इधर-उधर की बातें होने लगीं। पर मेरा असली कुतूहल नहीं मिट पाया। एकाएक मेरे मन में आया कि कहूं : आपने किसी डाक्टर को क्यों नहीं दिखलाया? अपना इलाज क्यों नहीं करवाया आपने? लेकिन कहने जाकर भी जवान पर आकर अटक गई बात । क्या ऐसी बात किसीसे कही जा सकती है ? क्यों उनकी स्त्री आधी रात को घर से निकाल देती थी, क्यों उन्हें छोड़कर उनकी स्त्री ने एक दूसरे आदमी से शादी कर ली, क्यों उस शख्स से शादी करने के बाद से उसके लगातार इतने बाल-बच्चे हुए- इन बातों की चर्चा मैं किससे करता और सुनता भी कौन ! तब वे चॉप, कटलेट, मुर्गी, गोश्त, मछली वगैरह की बातें ही बड़ी दिलचस्पी और चाव के साथ कर रहे थे। 'इधर आने पर फिर कभी आइए मेरे यहां।' मैं वोला, 'आऊंगा। दीनानाथ बाबू बोले, 'जल्दी ही आने की कोशिश कीजिए । अगले महीने मैं रिटायर होकर लड़के के पास चला जाऊंगा, वहीं रहूंगा। उससे पहले ही . आइए।' - जिस वात के ना कहने का मैंने निश्चय किया था वही बात एकाएक मेरी जवान से निकल गयी। बोला, 'आपकी स्त्री क्या लड़के के पास रहती हैं ?' क्षण-भर के लिए अकबका गये दीनानाथ बाबू । बोले, 'क्यों?' 'यों ही, खुद ही खाना पकाते हैं न आप, तभी पूछा। वे शायद दिल्ली है रहती हैं ?' 'नहीं, उनकी मृत्यु हो गयी है।' कहकर निलिप्त भाव से उन्होंने ए चॉप मुंह में डाल लिया। दीनानाथ भट्टाचार्य की तरह न जाने कितने आदमी अनादर और धिक्क को हजम करके इस संसार में जीवित हैं, इसका हिसाव किसने रक्खा है। जीवित रहने के आग्रह में अमित साहसी हैं ये लोग । बार-बार खींचती है , तो भी मृत्यु को भी चकमा देने में सक्षम हो जाते हैं ये। जीवन असह्य हो जाता है तब इसका एकमात्र सहज प्रतिकार मृत्यु ही होता है मृत्यु, तो भी को ही एकमात्र मित्र के रूप में देखते हैं तब ये । नेपोलियन जब नेपोलियन नहीं बने थे, अमह्य हो उठी थी तब उनको जीवन-यनगा। जीवन-यंत्रणा मल- यंत्रणा में भी अधिक भयावह होती है, जिसका अनुभव लॉर्ड नाइव ने किया था। कितने अनजाने मनुष्य जीवन-यनणा मे संतप्त होकर छटपटा रहे है, उमका इतिहाम बिखरा पड़ा है साहित्य के पृष्ठो मे, कापका और वाल शाक की रचनाओं में। यतणा के प्रति कितना मवेदनशील होने पर महान नेगक बना जा सकता है, इस बात के प्रमाण है काफ्का और बालजार । किन्नु बिना यंत्रणा के जीवन में आनन्द ही क्या ऐसे बहुत मे उदाहरण है जहा यत्रणा नहीं है पर जीवन है। यत्रणा के आकर्षण से मृत्यु की कामना करते हैं वै । ये लोग जीवित होते हुए भी मृत है, सवल होते हुए भी स्याणु हैं । ऐसे ही एक मृत व्यक्ति को यक्षणा का साक्षी था मैं । केवल मैं ही नहीं, और भी बहुत-मै थे। पर यत्रणा के आकर्षण से उसमे जीवन के प्रति एक प्रचण्ड आग्रह उत्पन्न हो गया था, यह भी देखा है मैंने। मृत्यु मे मन्त्रणा या अनुभव होना भी अच्छा होता है और जीवन में यत्रणा मिलना भी वाहनीय होता है। ऐसी हालत में किसकी ताकत है कि धरती पर से इनमान को हस्ती को मिटा दे ? इमीलिए विलियम फॉकनर ने कहा है 'मानव का कभी अन्त नहीं होगा, आई डिक्लाइन टु ऐक्सेप्ट दि एण्ड ऑफ मैन ..' ज्सी कहानी को सुनिये अव :
पंचम यही एक खरावी है रेलवे लाइन की। यह खरावी भी है, साथ ही अच्छाई । एकदम मकान के आंगन के बीच में होकर रेलवे लाइन चली गयी है। लिपरी-डिस्ट्रिक्ट के सभी स्टेशनों का यही हाल है। भागा, मौजूदी, महूदा, न्द्रपुरा-इन सभी जगह यही एक नियम चालू है। रेलवे के वाबू अपनी बीवी-बच्चों के साथ रेलवे लाइनों के बीच में इधर-उधर छूटी हुई जगहों में बने क्वार्टरों में पुश्त-दर-पुश्त रहते आये हैं। अव हो सकता है यार्ड-फोरमैन है वाप । इस छोटी नौकरी से प्रमोशन पाकर यार्ड-मास्टर के पद तक पहुंच जाता है वह । लिहाजा लड़का, नाती, दामाद सव रेलवे की ही नौकरी में जाएंगे। फिर वे इसी रेलवे की नौकरी से ही एक दिन रिटायर होते हैं। इसके बाद एक दिन उन्हींके लड़के-नाती-पोते-दामाद फिर रेलवे की नौकरी में जाएंगे। इसी तरह वंश-परम्परा से शाखा-प्रशाखा फैलाकर सारे जिले पर राज करेंगे। ये लोग पहले हैं 'रेलवे-मैन', बाद में 'मैन'। यह सब इंजिन की आवाज़ से सोते हैं, फिर इंजिन की ही आवाज़ से जागते हैं। ऐसा अद्भुत मानव-समाज तुम्हें ढूंढ़े नहीं मिलेगा कहीं। इसीका नाम है रेलवे-कॉलोनी। 'भों!' इस 'भों' की आवाज़ को सुनते ही वे समझ जाते हैं। 'कहते हैं : 'थर्टी-थ्री अप आ रही है रे...' 'थर्टी-श्री-अप' में कितने डिव्वे हैं, कैसा इंजिन है उसका, कहां से आ रही है और कहां तक जाएगी-सब जानते हैं वें। रेलवे मैन के बच्चे रेल की लाइन पर पलकर ही बड़े होते हैं, फिर रेल की लाइन पर ही अपनी गिरस्ती विछाते हैं । फिश-प्लेट, स्क, नई, वोल्ट, स्लीपर, गैंगमैनें, हमाल, डेड एण्ड वगैरह वहुत-से ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ बाहरी आदमी नहीं जानते, जानते हैं सिर्फ रेलवे मैन के बच्चे। यार्ड में शन्टिग होते वक्त कभी इस, कभी उस फास में होकर वैगन के नीचे से निकलकर लम्वे रास्ते का शॉर्ट-कट निकालना रेलवे मैन के बच्चे ही जानते हैं। रेलवे के इन्हीं क्वार्टरों में शायद रहते हैं गार्ड, ड्राइवर, कंट्रोलर, या मास्टर या लोको-शेड के टाइमकीपर।
याई-फोरमैन मुब्रह्मण्यम् बाबू के परदादा चिगलपेट मे पैदल चलकर पहले- रहल इम अचल में आये थे। आकर उस समय के मद्रासी पकाउटेंट नर- महम् बाबू के घर म्हरे। उन्ही नमिहम् बाबू ने अपनी लड़की की शादी उनके साथ कर दी और साहबी से कहकर इमी चन्द्रपुरा में उमें नौकरी भी 'दलवा दी। और वह जो धारा चली थी, ककी नहीं है अभी तक । उभी जानदान का सुब्रह्मण्यम् वाबू अब पार्ड-फोरमन बनकर यहा विराजमान है। रटायर होने से पहले यह मुब्रह्मण्यम् बाबू भी फिर अपने लडके नाती-दामाद को नौकरी में घुसाकर निश्चिन्त होगा। लोहे के ग्रिल लगे छोटे-से बरामदे मे मे टाइमकीपर बाबू की बीवी ने दरवाजे को थोडा खोलकर पुकारा 'ओ गोविदराजन दीदी-ओ गोविन्द. राजन दीदी!' तमिलनाडु का गोविन्दराजन यहा नया लोको-लर्क बनकर आया है। उसीकी नवविवाहिता स्त्री के लिए था यह सम्बोधन । स्त्री का नाम जानना ही कौन है ? किमीके जानने की बात भी नहीं। पति के नाम पर ही स्त्री मा नाम अक्सर रख दिया जाता है। आन्ध्र देश की लड़की है तो क्या हुआ, धड़ल्ले मे बंगला बोलती है । वार बड़गपुर में काम करता है, वहीं पालन-पोपण हुआ है। गोविन्दराजन की स्त्री ने कहा, 'मुझे इस नाम में वर्षों पुकार रही हो, दीदी? मेरा नाम नहीं है, क्या ?' टाइमकीपर वाबू की स्त्री बोली, 'होगा क्यों नहीं, मेरा भी तो अपना नाम है। पर मुझे उस नाम में क्या कोई पुकारता है ' भई, मैं नो यहां आर अपना नाम ही भूल गई हूं।' इसके बाद दरवाजा खोलकर उमे अन्दर बुलाती है। नयी बहू है। मुहल्ले के किसीये तब तक अन्छी तरह परिचय नहीं हुमा था। ?" टाइमकीपर बाबू की स्त्री ने कहा, 'मेरे हाथ का पान नो मानोगी तुम गोविन्दराजन की स्त्री सिमटी-मी बैठ गयी चटाई पर। बोली, 'दीजिये न आप, पान पाने में क्या हर्ज है ?" टाइमकीपर बाबू की स्त्री वोली, 'बहुत-म लोग नही खाते हैं न, तभी पूछा घाम लोग ब्राह्मण नहीं है न ।' 'ब्राह्मण नहीं है तो क्या हुआ,नयी यह को टाइमकीपर बाबू की लगती है। बहुत दिन से रेलवे कॉलोनी में रह रही है वह । उसी छुट- जब वह खड़गपुर में पैदा हुई थी, तभी से। उसका नाम है गोदावरी। पुर में बहुत-सी बंगाली लड़कियां सहेली थीं उसकी। उनके साथ पढ़ी हैं में, उनके साथ बैठकर ताश खेली है और गप्पें हांकी हैं। बंगाली परि- से उसका यह संपर्क नया नहीं था। 'आपको मैं क्या कहा करूं, दीदी ?' 'मुझे ?' - ' टाइमकीपर बाबू की बीवी को हंसी आ गयी इस सवाल को सुनकर। यहां आकर गायत्री जैसे अपना नाम तक भूल गयी है। कलकत्ता की लड़की है गायत्री, यहां के टाइमकीपर भुवन मजुमदार से शादी होकर जैसे एकदम बंदिनी बन गयी है। स्कूल में ज्यादा पढ़ नहीं पायी थी गायित्री। मामा कहते, 'ज़्यादा लिख-पढ़कर क्या होगा बेटी? इससे बेहतर है खाना-पकाना सीख लो, जिसकी जरूरत पड़ेगी ससुराल में। गायत्री वोली, 'भई, मुझे तुम टाइमकीपर दीदी कहा करना।' 'धत्, यह मैं कैसे कहूंगी, शर्म लगेगी मुझे।' 'लेकिन यहां सब मुझे इसी नाम से पुकारते हैं। तुम्हें अगर शर्म लगे तो गायत्री दी कहना 'वाह, कितना अच्छा नाम है आपका, गायत्री ! मेरा नाम बड़ा खराव 'क्या नाम है तुम्हारा ?' 'गोदावरी !' 'क्यों, खराव नाम है ? गोदावरी तो एक प्रसिद्ध नदी का नाम है-गंगा, गोदावरी, कावेरी...' रेलवे कॉलोनी में स्त्रियों में इसी तरह जान-पहचान होती है। इसी तर एक-दूसरे के घर आना-जाना शुरू होता है। इसी तरह घनिष्ठता होती है फिर इसी तरह झगड़ा, लाग-डांट, मारपीट, खून-खरावा भी होता है। इसी तरह आत्मीय परम आत्मीय बनते हैं, फिर आत्मीय ही परम बन जाते हैं। कॉलोनी जितनी छोटी होगी, घनिष्ठता, मित्रता, शत्रुत्रा च ही निविड़ होगी। एक दूसरे के घर की खबर लेकर पर-चर्चा के उद्दे में नौडा जायगा।
" 'ओ भाभी, मृनी है तुमने यह नई खवर ?' "क्या खवर है रे, पूटी" कण्ट्रोल-कनकं देमाई बाबू की स्त्री रमोई-घर में ग्राना बना रही थी। नई खबर को गध पाकर हुलम उठी। इम पूटी नाम की लड़की के पास बहुत-मी चटपटी खबरें रहती हैं। किमीके किमी भेद की बात का पता लगते ही घर- पर जाकर कह आती है। किस पर की बहू के पर भारी हुए, किम घर की विधवा युढिया रसोई घर में चोरी-चोरी मछली खाती है, दफ्तर में किसके पति पर किनना जुर्माना हुआ, या किस गृहिणी के पति को ऑफिस में ग्रेड मिला -सब जानती है पूटी। पूंटी ने कहा, 'मुझे क्या गरज है भाभी, दूसरो की बातो मे मिर खपाने को?" 'अरे, क्या हुआ है बता न ?' पूंटी ने कहा, 'लोको-शेड का जो नया क्लर्क आया है गोविन्दराजन- जानती हो न?' देमाई-गृहिणी बोली, 'मैं कैमे जानूगी? कव आया 'यही पिछले ही महीने तो आया है, वी-टाइप क्वार्टर में ठहरा है- तुम्हे कुछ भी नहीं पता रहता भाभी.' 'तो फिर भया हुआ?' 'उमीकी नई दुलहिन के साथ हमारे टाइमकीपर वाबू की धीत्री की बड़ी रन्त-जल हो गयी है, जानती हो।' 'एकाएक इस मदामी औरत से इतनी रन्त-जन्त कैसे हो गयी?' पूंटी कम उमर की लड़की है तो क्या हुआ, उसके पेट में दाढी है। इस रेलवे कॉलोनी मे उद्भिद् की तरह वढती जा रही है सबकी नजरों के सामने। न जाने कब पढ़ाई-लिखाई मतम करके सरस्वती माता से सब नाता तोड नुकी है ! जब मिर्फ वह कोई खबर मिलते ही इस पर से उस घर, इस मुहले से उम मुहल्ले में घूमती-फिरती है। उम दिन भी आई थी गोदावरी। दोपहर को मौका मिलते ही दसर से आकर घर खाना खा जाता है गोविन्दराजन । इसके बाद गोदावरी को कोई काम नही रहता 1 छोटा-मा क्वाटर है दरवे की तरह। घर में एक तालि दिया जाय तो हिलने-डुलने की कोई जगह नहीं रहती। पीछे की ओर आगन है तीन हाय-वाई-तीन हाथ। उधर अधिक देर नहीं कि TET सामने की ओर बरामदे में आने पर यार्ड नज़र आता है--विशाल रेलवे यार्ड। उस यार्ड में से दो-एक लाइनें वेतरतीव इधर-उधर से छिटककर एकदम मकान के आंगन में आ धुसी हैं। वह थर्टी-श्री अप यहीं से छूटती है। यहां से चलकर सीधे महुदा तक चली जाती है। इसके बाद वह ट्रेन उसी महूदा में दो घण्टे रुककर फिर सीधे यहीं चली जाती है। सीधे जाती है और आती है। मिक्सड् ट्रेन है यह । इसमें छह माल के वैगन हैं और दो मुसाफिरों के डिब्बे । 'चन्द्रपुरा से छूटकर हर स्टेशन पर मालगाड़ी कटती है और जुड़ती है। मुसाफिर चढ़ते हैं और उतरते हैं। इस तैतालीस मील का फासिला ते करने में ही जैसे थर्टी-श्री अप की जान निकल जाती है। एक-एक स्टेशन पार करती है और हांफने लगती है। थर्टी-श्री अप के इंजन को जैसे हांफी की बीमारी है। जव मुन्नूस्वामी हिसिल की रस्सी को खींचता है, तब उस इंजिन के सिर से थोड़ी सफेद स्टीम बाहर निकल जाती है। और साथ ही साथ लगातार एक आवाज निकलती रहती है : पी-ई-ई-ई। बहुत पुराना इंजिन है। मुन्नूस्वामी भी बहुत दिनों का ड्राइवर है। खलासी से फायरमैन हुआ था। इसके बाद एक दिन फायरमैन से ड्राइवर भी बन गया। पर खुश नहीं है मुन्नूस्वामी । मिक्स ट्रेन चलाकर ही जिन्दगी गुजारनी पड़ रही है उसे । मुन्नूस्वामी कहता है, 'यह साला भी कोई इंजिन है, यह तो खच्चर है।' फायरमैन रशीद कहता है, 'एक तो है मिक्सड् ट्रेन, तिसपर है ब्रांच लाइन-इसके तो मां-बाप ही नहीं है रे।' रात के आठ बजे थर्टी-श्री अप लंगड़ाते-लंगड़ाते आकर इसी गोविन्द- राजन के घर के सामने के आगन को पार करके एकदम डेड-एण्ड साइडिंग में जाकर खड़ी रहती है। माल के डिब्बों को मार्शलिंग याई में छोड़ देता है मुन्नू- स्वामी। बाकी दो मुसाफिरों के डिब्बों को इसी गोविन्दराजन के क्वार्टर के सामने छोड़कर फिर इंजिन को लेकर शेड के भीतर रख आता है। बहुत दिनों से चला आ रहा है यह क्रम । थर्टी-श्री अप जिस दिन से चालू हुई है, उसी दिन से चला है यह क्रम । भोर के पांच बजे यहां से रवाना होकर बीच में डिब्बे काटते-जोड़ते महुदा पहुंचना। फिर उसी दिन रात के आठ बजे लौटकर दोनों बोगियों को काटकर रखना। टाइमकीपर बाबू है भुवन मजुमदार । थोड़ा आरामतलब आदमी है।
" आरामतलब होने की वजह से ही घोडा खुदगर्ज है, और खुदगर्ज लोग जैसे होते हैं भुवन मजुमदार भी वमा ही है। लिमपर है रात जगने को नौकरी। तमाम रात जगरर नाइट ड्यूटी करके लौटने के बाद मिजाज यों ही वहद बिगड़ा रहता है। घर के अन्दर पर रखने ही धधक उठना है। कहता है, 'शरबत कहां है ? मेरे लिए शरवत नहीं बनाया गायत्री अचम्भे में आ गयी। वोली, 'शरबत विमा भरवत ?' 'यह क्या कहा नहीं था मैने कि एक गिलाम भबन बनाकर रखना ? म→ का शरबत ? देख रहा हूं तुम्हें मेरी किमी बात का खयाल नहीं रहता।' गायत्री शरमिन्दा हो जाती है। भुवन मजुमदार बोला, 'सयाल रहंगा भी क्यो? मैं माला घटने-मटते मर रहा है, इसमें तुम्हें क्या वास्ता ? कुछ भी हो मुझे, तुम्हारी बना है।' गायत्री बोली, 'क्या वह रहे हो तुम? मुझे तुम्हारा प्रयान नहीं रहता।' 'मेरा खयाल करते-करते तो तुम एकदम मरी जा रही हो तव तक एक गिलास मछे का शरबत लेकर गायत्री मामने जा बडी हुई। रोटे-छोटे बच्चों ने तब उस छोटे-पे क्वार्टर में भगदड शुरू कर दी थी। उन्हें पता तक नहीं है कि वे वशं इम घरनी पर आए है, कौन उन्हें घग्नी पर लाया है। वे सिर्फ इतना ही जानते हैं कि एक शरम को 'बाबा' कहना चाहिए, और एक को 'मा'। उमसे ज्यादा दिमी और मम्पर्क की बात उनके दिमाग में नहीं आती। दिमाग मे लाना भी नहीं चाहते। एक तो शरवत की प्याम, उसके ऊपर नाइट ड्यूटी। टी०एन० मात का उत्पात चल रहा है कई दिन मे। अपना मिजाज और काबू में नहीं रख पाया भुवन मजुमदार। लडके की ओर देखकर चिल्ला उठा, 'निक्लो मब यहा मे, भागो।' "उन्हें डांट क्यों रहे हो वताओ तो, वे तुम्हारा या विगाड़ रहे हैं ?' 'क्या बिगाड़ रहे हैं ?' भुवन मजुमदार ने जैमे गायत्री मे ही जानना चाहा-'बत्रा नहीं बिगाड़ . यानी वे क्यों इस दुनिया में आये, भुवन मजुमदार ने जैन इमरी कैफियत तलब की गायत्री से। गायत्री वोली, 'गुस्मा आने पर देखती हूँ तुम्हारा दिमाग ठिकान नहीं रहता । लो, पकड़ो गिलास, मुझे और भी काम है।'
। कहकर गिलास को आगे बढ़ा देते ही भुवन मजुमदार ने सामने खड़ी एक लड़की को पकड़कर एक तमाचा जड़ दिया---'मर हरामजादी, मर क्यों नहीं जाती।' एकाएक मार खाकर लड़की जोर से रो पड़ी। भुवन मजुमदार आपे से बाहर हो गया। मार के ऊपर मार जमा वैठा। 'मर, मर, मर मुंहझाँसी, मर जा.' एकाएक भुवन मजुमदार जैसे जल्लाद बन गया एकदम । गायत्री और वरदाश्त न कर सकी इस काण्ड को । सीधे झपट पड़ी भुवन मजुमदार के ऊपर । मजबूती से दोनों हाथों से जकड़ लिया उसे । इसके बाद लड़की को गोद में लेकर, उसकी आंखें और मुंह आंचल से पोंछकर भुवन मजुमदार की नजर की ओट में ले गयी। इन रेलवे कॉलोनी के अजीब आदमियों की भीड़ में कव किस घर में कौन-सा नाटक तैयार होता है यह किसीसे छिपा नहीं रहता। आदमियों की घिचपित्र है और मकान भी सटे हैं एक-दूसरे से। तभी हो सकता है कि जैसे आदमियों के मन में भी लगाव पैदा हो जाता है। पूंटी रोज-रोज आकर घरों में घुस पड़ती है। घर-घर घूमना ही उसका काम है। घूम-घूमकर खबरें फैलाती रहती है नमक-मिर्च मिलाकर। इस घर की खबर देसाई-गृहिणी को पहुंचायेगी। देसाई-गृहिणी के घर की खवर लाकर फिर भुवन मजुमदार की बीवी को देगी। उन दिन भुवन मजुमदार के घर आकर पुंटी अचरज में पड़ गयी। बोली, 'अरे, भाभी, तुमने अभी तक नहीं खाया !' गायत्री वोली, 'वैठो, मछली की भाजी बना लूं मैं तव तक।' 'अच्छा, आज मछली मिल गयी तुम्हें ? कहां मिली?' इसके बाद बातें करते-करते नीची आवाज में वोली, 'जानती हो भाभी, कल गोविन्दराजन बाबू के यहां क्या हुआ था ?' 'क्या हुआ था रे? 'तुम किसीसे कहीं कह मत देना भाभी, किसीको पता नहीं चला है अभी तक। 'तू बता न, मैं किसीसे नहीं कहूंगी।' पूंटी ने कहा, 'गोविन्दराजन वा कल वेहद शराब पीकर घर लौटे थे- जानती हो!
। 'तुझे कैसे पता बला?' इन तरह की बातों का पता ओली प्टी को तग जान और रिसीको गसगे, ऐमा नवमुच नहीं होता। यहां कोई भी बात छिपी नही रह सरतो। एकपर में अगर कोई घटना घटती है तो दूसरे घर के आदमी को उगनो टोह लगना ही म्वाभाविक बात है। दूसरे लोग उमड़ी फिर चर्चा करेंगे आपरा में। दरा आदमी मिलकर गुज-गुज, फुस-फुम करेंगे- इसीमे तो मशा है। किमी के यहां अगर कोई घटना न घटे तो ये लोग किसके सहारे रहेगे' मे जियगे ' रेगने कंपनी ने भी शायद यही सोचकर ये क्वार्टर इतने एक-दूसरे से सटारर बनाये हैं, जिसमे यहा के लोग पर-चर्चा करके जिन्दा रह सकें। पर-चर्या में मशगूल रह सकें। किस घर की बहू पति की नाइट ड्यूटी की आड़ में मया करती है. किस घर के मालिक चोरी-चोरी शरायखाने से शराब पीकर आते है, इन बातों को जिससे मब जान जाय इसलिए शायद रेलवे पम्पनी ने यह इंतजाम किया है । इन सब बातो में फंसे रहने पर वे तनख्वाह बढाने के मामले में दिरा- चम्पी नहीं लेंगे। हडताल भी नही करेंगे । पुस्त-दर-पुस्त इगी सरह ये याद- विवाद में जीवन बिता देंगे। और कंपनी का यह उद्देश्य पूरी तरह मायंक हो गया था। वहां जव उस माहौल में मैं पहुचा तय चन्द्रपुरा मे बहुत तवीलिया हो गुणी थी। बहुत कुछ अदल-बदल गया था। कटोल क्लर्क देगाई यायू फे याम पक गये थे तव । देसाई वायू की स्त्री भी दुबली हो गयी थी तीन-चार माल-पलो कीमा बनकर। उस पूटी को भी शादी हो गयी थी इग दरम्यान। यह अपने दूल्हा के साय खड़गपुर चली गयी थी। इसके याद एक दिन माग का गिदूर, हाय पा लोहा' (लोहे की चूडी) और शाया (शप की चूडिया) गोर फिर मायरे लौट आयी है। और गायत्री भाभी? उमी गायत्री भाभी की कहानी ही तो गुनाने वंठाई। भुवन मजुमदार छुटपन मे अच्छा विद्यार्थी था। युद्ध के पहले का युग था यह । तव एम.ए. पास करके तीस रपये महीने की नौकरी पाकर लोग अपने को भाग्यमानी मानते थे। वही कोई वेकन्सी नहीं रहती थी, कहीं कोई भी नौकरी नहीं ग्रासी 1. समान में मुहागिन स्त्रियों को यह पहनना पड़ता है। .
होती थी। कहीं कोई मरता भी नहीं था। उसी युग में भुवन मजुमदार मुहल्ले के किसी आदमी की सिफारिश से इस मामूली नौकरी में घुस पड़ा था। शुरू में इधर-उधर थोड़ा तबादला हुआ था। इसके बाद इस चंद्रपुरा में आकर इस तरह खूटी गाड़कर बैठ गया कि उसके तबादले की बात ही नहीं उठी। भुवन मजुमदार तव जैसे वहीं मुस्तकिल हो गया। इसके बाद नौकरी पाने का मतलव ही होता है शादी का रास्ता साफ होना। गायत्री नाम की लड़की के साथ शादी भी हो गयी एक दिन। मां न हो, वाप न हो, तो भी थी तो लड़की। कसा हुआ वदन था तव उसका । तब नौकरी पर से लौटकर इस तरह खर्राटे भर कर सोता नहीं था वह । तव वीच- बीच में प्यार की बातें भी किया करता था गायत्री से। भुवन मजुमदार कहता, 'मेरी इस मामूली-सी गिरस्ती में तुम कतई नहीं फवती हो जी।' प्यार-भरी बातें सुनकर सचमुच विगलित हो जाया करती थी तब गायत्री। अव तक हमेशा चाचा की गिरस्ती में खटकर दिन काटने के बाद एकाएक प्यार-दुलार पाकर अपने को कृतार्थ मानने लगी थी। होने दो छोटा- सा क्वार्टर, होने दो कम तनख्वाह की नौकरी, होने दो रेलवे का टाइम-कीपर तो भी उसे लगा था कि संसार में शायद सुख भोगा जा सकता है जीवित रहकर । इस घर या उस घर से अकसर निमंत्रण मिलता रहता था। उसे नये- नये गहने बनवा दिया करता था तब भुवन मजुमदार । तनख्वाह के सौ रुपये किर वह वीवी के हाथ पर धर देता था। कहता था, 'यह लो।' गायत्री भी रुपयों को लेकर माथे छुआती, फिर छोटे टिन के ट्रंक में रख ती। चन्द्रपुरा में हफते में एक दिन हाट लगता था। तीन रुपये के आलू-प्याज़ रीदने से ही पूरा हफ्ता चल जाता था। फिर मछली खाते हो तो ठीक, नहीं निा चाहते हो न खाओ। खाने का ज्यादा शौक गायत्री को कभी नहीं था। मा होते-होटे ट्रंक भर जाता था नोटों से। भुवन मजुमदार के दफ्तर चले तेि ही सब काम खतम । तक जहां जी चाहे, आओ-जाओ। देसाई बाबू की ती थी, लोको-क्लक गोविन्दराजन वावू की स्त्री थी। और थी पूंटी। वह भी एक ज़माना था गायत्री का जब वह ताश खेलकर, पान खाकर, गप्पें हांककर वक्त जाया किया करती थी। लेकिन धीरे-धीरे जैसे सब कुछ पलट गया चन्द्रपुरा में । जो कंट्रोल-क्लर्क - । १०८ । - था वही कंट्रोलर बन गया एक दिन । नत्र उमो देमाई वायू की स्त्री भी बदल गयी। दो सौ रुपये तनख्वाह पाने वाले कट्रोलर की बीवी नव मीधे मुह बातें ही नहीं करती थी और अच्छी-अच्छी माडिया सरीदती थी, गहने परीदती थी। नव देसाई-गृहिणो के घर जाने पर बैठने तक को नहीं वहती थी। पान भी नहीं देती थी खान को पहले की तरह । मो ये ननस्वाद पाने वाले टाइमकीपर की वीवी को बैठने और पान याने देनी भी कैम? और आखो के सामने गोविन्दराजन आया था लोको-क्लर्क बनकर। तनरवाह थी पचास रुपये। उसी गोविन्दराजन को भी एक सौ पचहतर रपये तनख्वाह हो गयी एक दिन ! गोविन्दराजन की बीवी जो इतना आया करती थी, वह भी पति की ननख्वाह बढ़ने के साथ ही माय मे तबदील हो गयी। पहले दोपहार को इमली के पानी के माथ चावल याकर पान चबाने-चबाने आकर काफी देर तक गायत्री में गपशप करली थी। आखिर में उमने भी तारीवन छोड दिया आना। गायत्री खुद भी गई है गोविन्दराजन वायु के यहा। 'क्यो भई, तुम तो बहुत दिन में नहीं आ रही हो मेरे घर' कोई जवान में जो कुछ कहे, लेकिन अमलियन हो ही जाती है जाहिर। जब इनने दिन में है चन्द्रपुरा में, तब कौन कंमा है नही जानेगी गायत्री। यहां के मवको पहचान लिया है गायत्री ने। चन्द्रपुरा के सारे लोगो की तनख्वाह बढ़ गयी, भुवन मजुमदार की तनस्वाह क्यों नहीं बढती ? तब बच्चा हो गया था। भुवन मजुमदार ने बडे लाड़ में उसका नाम रखा था नपन - हालाकि "बोका' (बच्चा) कहकर पुकारते ये दोनो । और उसके अगले साल ही हुई गोकी । खोकी पानी पद्म ! पद्मरानी। और यह जी गुरुआत हुई फिर उसने जैसे खतम होने का नाम ही नहीं लिया। हर साल बच्चा जनने पर किसीनो मेहत ठीक रह सकती है ? भुवन मजुमदार नाइट ड्यूटी से लौटकर विस्तर पर पड़ जाता या वैनबर, उमकी नीद खुलती थी दिन के चार बजे । इसके बाद उसे चाहिए होती चाय। सिगरेट। गिरस्ती में किमीको गाने को मिले या न मिले, उमै मिगरेट चाहिए ही। नड़के-लड़कियों में भरा या घर। घर यानी एक कमरा। उसी एक ही एमरे में तो था मब कुछ। उमीमें ही वंदना-माना-सोना। फिर जहा चहा निगरंट की राख फेंककर गंदा क्यों किया जाता है उमे ? राख फेंकने के 1 एक टिन का डिब्बा तो साथ रक्खा जा सकता है। मामूली सिगरेट को राख को लेकर कई दिन वाक्युद्ध शुरू हो जाता था। भुवन मजुमदार कहता, 'मेरा घर है, मेरी जहां तवियत होगी राख फेंकूँगा, इसमें तुम्हारा क्या ?' गायत्री कहती, 'घर तुम्हारा हो सकता है, लेकिन साफ तो मुझे ही करना पड़ता है।' 'अगर साफ करना पड़ता है तो करो।' 'लेकिन कब करूं मैं सफाई, तुम्हीं बताओ। मुझे क्या पल-भर भी फुरसत मिलती है वैठने की?' इतनी वहस, इतनी झखझख का वक्त या धीरज कुछ भी नहीं होता भुवन मजुमदार के पास । कहता है, 'देखो, इतनी फालतू बातें करने का वक्त नहीं है मेरे पास.." कहकर फिर एक नयी सिगरेट सुलगाता और जली दियासलाई की सींक को फर्श पर फेंक देता। इसी तरह चल रहा था इस घर में। हो सकता है इसी तरह सबकी गिरस्ती चलती हो। पति-पत्नी में झगड़ा होता है, मेल होता है, कभी-कभी बातचीत तक बन्द हो जाती है। तो भी गिरस्ती जिस तरह चलनी चाहिए उसी तरह चलती है । कुछ बाल-बच्चे हो जाते हैं । उम्र बढ़ती है । झगड़ा, मान-अभिमान, अभियोग भी चलता रहता है। इन्हें लेकर कभी कोई खास ज्यादती नहीं करता। लेकिन गायत्री को न जाने क्या हो गया। कभी ऐसा काम किसीने नहीं किया चन्द्रपुरा में। यह जो इतने लंबे अरसे से पुश्त-दर-पुश्त देसाई, गोविन्दराजन, भुवन मजुमदार का दल, जो आदियुग से इस कालोनी में रहता आया है, उनमें से भी किसीने इसकी कल्पना नहीं की थी। यहां तक कि मुन्नूस्वामी के बाप-दादा जो इस अंचल के लोको डिपार्टमेंट में काम कर गये हैं, उनमें से भी कोई नहीं सोच पाया था कि ऐसा होगा। फायरमैन रशीद, रशीद के खान्दान में भी किसीने कभी नहीं सोजा था कि ऐसा हो सकता है। ऐसा ही था यह वाकिया.! दरअसल थर्टी-श्री अप वहां से छूटती थी भोर के समय । यानी स्टेशन के प्लेटफार्म से ट्रेन चलती थी सुबह के छह बजे । लिहाजा ऐसी हालत में भोर के पांच वजे ही मुन्नूस्वामी को लोको-शेड में हाज़िर हों जाना पड़ता। वहां से ११० - इंजिन निरासर ने जाना पड़तामाडिर, शरदर्स- बानी हि नगर रात पडे रहते हैं। वही गाडरी साईसो. . पोछहोती है. वैटरी की जान होती है। बैटरीकोजार करोजगार मार्टिफिकेट देता है। इसके बाद मुन्नमामी और रशोर नगर हाजिर होते है। वहीं भूवन मनुमदार के बार रे सावन । पहा आकर गाड़ी के माप जोड देने है इरिन को। हिरनी भोर मादार ने ही शुरू कर देता है गाड़ी को सीचना। यही मिलमिना बहुत अरसे में चला आ रहा है। इम नियम को सभी जानते हैं चन्द्रपुरा में। मुन्नमामो भएर दिन में TR थर्टी-भी अप और धर्टीटू डाउन को चलाता आ रहा है। उन भी मिार हिज हो गया है यह टाइम-टेबल । और मिर्फ मुन्नूस्वामी हो नरो कोतर चन्द्रपुरा में रहते हैं, सब जानते हैं । वह देमाई बाबू, गोदारी, पूटी. गोकर. राजन, भुवन मजुमदार, गायत्री में लेकर कोई ऐमा नहीं है पहा मोगशाला हो। लेकिन उम दिन पर्टी-श्री अप के इंजिन को स्टाटं देते ही एकरो चीख सुनाई दी । मुन्नू स्वामी ने सुना, रशीद ने भी। फौरन मुन्नूस्वामी ने घच् से ब्रेक लगा दिया। मजगता का परिपा उमने ब्रेक लगाकर। न लगाता तो और भी क्षति हो जाती। पर जितनीला हो गयी वह भी कम भयंकर नहीं थी। उम इंजिन के नीचे से कोई चिल्ला उठा : 'अरी मैया, गर गरी।' एक्सीडट एक्सीडेंट ही होता है। प्लेटफार्म में अगर कोई ट्रेन से दव जाता है तो अस्पताल से दर माता है, नर्स आती है, स्ट्रेचर आता है। ट्रेन के छोड़ने में देर हो जाती है। पदोग में, हेड क्वार्टर में खबर जाती है। इसके बाद ययागमय तहकीकात परती है पुलिस । और इसके बाद एक दिन सारी चीज दफन भी हो जाती है मेगानूम। आदमी का दब जाना और गाय-भस-बकरी का दव जाना परावर माना जाता है। दोनो ही हैं रन-ओवर केस! लेकिन इस बार दूसरी ही तरह का था केग। सरदी के मौसम में सुबह के साडे पाच का मतलब रात ही होता है। रेगये. कॉलोनी की रात । गरज यह कि कंट्रोल ऑफिम तो सारी रात ही घुला पता है । दिन-रात चौबीस घंटे ही ड्यूटी होती है । और लोको-शेर से ते .
दिन-रात घर्घर आवाज़ निकलती रहती है। उस आवाज़ के साथ ही साथ थर्टी-श्री अप के इंजिन की स्टीम छोड़ने की हिस-हिस आवाज़ भी शामिल है मुन्नूस्वामी जो उस चीख को सुन पाया यह भी शायद किस्मत की ही बात है। ब्रेक लगाकर ही मुन्नूस्वामी इंजिन से नीचे उतर आया। उतरकर उस अंधेरे में ही घटना को देखकर होश उड़ गये उसके । 'रशीद।' फायरमैन, खलासी, ड्राइवर सवने एकसाथ नीचे झुककर देखा। एक पैर विलकुल कट गया है। सिर्फ शरीर से लगा हुआ है, किसी तरह । और वह जगह रंग गयी है खून से । रशीद ने पहचान लिया अंधेरे में ही। वोला, 'अरे, यह तो टाइमकीपर वाबू की स्त्री है।' तव भी शायद थोड़ा होश था गायत्री को। गले से कराहने की आवाज़ निकल रही थी। ची-चीं करके कह रही थी, 'अरे मर गयी-मर गयी रे !' दौड़ते-दौड़ते जाकर रशीद ने ही कंट्रोल-ऑफिस में डिप्टी को वह खवर दी थी। डिप्टी की ड्यूटी तव खतम होने वाली थी। रात के आखिर में तव चाय पीने का वक्त था। और तभी आ गया यह झमेला! नन्दी वावू था डिप्टी की ड्यूटी पर। पूंटी का बड़ा भाई है भोला नन्दी। यहां आकर पहले पिता सत्य नन्दी रेलवे की नौकरी में घुसे। बहुत दित पहले की बात है यह। तव बेचाराम बाबू थे यहां के टाइमकीपर। उसी वेचाराम वाबू ने सत्य नन्दी को कहा था, 'तुम्हारे खान्दान में कभी किसीने रेलवे की नौकरी नहीं की, मैं कैसे तुम्हें रेलवे की नौकरी दिलाऊं?' सत्य नन्दी ने कहा था, 'आप साहव से कह दीजिए कि मैं आपका भांजा वैचाराम बाबू ने कहा था, 'भई, यह कैसे हो सकता है। साहब को तो हो सकता है कुछ पता नहीं लगेगा, लेकिन यहां के वंगाली बड़े खुराफाती हैं, वे जाकर सारी बातें बतला आयेंगे साहब को।' जो भी हो, आखिर में सत्य नन्दी को नौकरी मिल गयी थी, पर दूसरे रास्ते से। सिर्फ नौकरी ही नहीं मिली, वही सत्य नन्दी यहां का चीफ कंट्रोलर बन गया और उसी वेचाराम वावू को हलाकान होना पड़ा उसके हाथों।
यह किम्सा बाद मे सुनाऊंगा। उमी सत्य नन्दी के बेटे भोला नन्दी ने ऐन नमी गरम चाय लाने को कहा था चपरासी में। एल्यूमिनियम का गिलास लेकर चाय लाने चला गया था चपरामी। और जेब से एक मिगरेट भी निकालकर सामने ही रख दी थी भोला नन्दी ने। चाय की चुम्को लेकर ही मिगरेट जलाने का इरादा या उमका। ऐसे वक्त पर्टी-श्री अप का फायरमैन रशीद खबर ले आया-'सर, एक्सीडेंट हो गया है ।। एक्सीडेंट का नाम सुनते ही कट्रोल ऑफिम का सिर चररा जाता है। बात कान में जाते ही भोला नदी चौंक पड़ा,'कहा हुआ है एक्मोडेट" दम नम्बर साईडिग में। 'क्या हुआ है ? डिरेलमेंट 'नही, एक आदमी कट गया है---एक औरत । 'कहां की औरत है ?' 'यह तो नहीं जानता,मर।' भोला नंदी को तव धून का दौरा होने लगा था। तमाम रात ड्यूटी करने के बाद एक्सीडेंट की खबर पाकर किसका जी ठिकाने रह सकता है। पूछा, "तो जिन्दा है या मर गयी ?' 'मर, अभी ची-ची कर रही है।' मर जाने पर कोई खाम झमेला नहीं होता। लेकिन जिन्दा रहने पर बड़ा बहुत बढ़ जाता है। फर्जअदाई की कार्रवाई लयी हो जाती है । डाक्टर को अस्पताल मे टेलीफोन पर सुबर देनी पड़ती है, हेड आफिस में अरजेण्ट मैमेज भेजना पडता है, कॉपी यानी नवल भेजनी पड़ती है चीफ मेकेनिकल इंजीनियर को। अकेले उसे ही नहीं, एक गड्डी नक्लें भेजनी पड़ती है हजारो आदमियों को। पारा चढ गया भोला नंदी का। धतेरे एक्सीडेंट की ऐमी की तमी । अब थर्टी-श्री अप फजीहत में पड गई। लाइन-क्लियर दे दिया गया था उसे फैमिल करना पडेगा । महूदा खबर भेजनी पड़ेगी कि थर्टी-ग्री अप तीन घटे नेट जाएगी आज। 'तो तुम लोगों ने उस औरत को पतम क्यों नहीं कर दिया एकदम ? सारा झंझट खतम हो जाता। रशीद मुसकरामा। डिप्टी कंट्रोलर के इस गुस्मै का मतलब वह , है। वह जानता है कि सारी रात ड्यूटी करने के बाद इस तरह का गुस्सा कुदरती होता है। एक-एक नामने का टेलीफोन बज उठा। भोला नंदी ने टेलीफोन उठाकर कहा, 'हेल्लो.' उघर मे पूंटी की आवाज सुनाई पड़ी, 'दादा, गजब हो गया।' 'श्यों, क्या हुआ? कहां से बोल रही है तू ?' हांफते हुए पंटी बोली, 'यही गोविन्दराजन बाबू के घर से । भुवन मजुम- दार की स्त्री गायत्री भाभी ने आत्महत्या कर ली है दादा !' 'किसने आत्महत्या की है ?' जैसे स्पष्ट सुनते हुए भी बात पर विश्वास करने की तबियत नहीं हुई उसकी । दिमाग चकरा गया भोला नंदी का। 'किसने आत्महत्या की है ?' 'हम लोगों की गायत्री भाभी ने।' 'गायत्रीभाभी नं! भोला नंदी के हाथ में रखी सिगरेट ज़मीन पर फस् से गिर पड़ी। यह सब घटना बहुत दिन पहले की है । मैं जब चन्द्रपुरा में पहुंचा तब पूंटी विवाहित होकर खड़गपुर चली गई थी। वहां से विधवा होकर लौट भी आयी थी फिर मायके । चन्द्रपुरा के कंट्रोल ऑफिस में तव और आदमी ले लिये गए थे। बलर था नव में। ड्यूटी के बाद कहीं जाने की जगह नहीं थी मेरी । सिक्सटीन डाउन के चले जाने के बाद प्लेटफार्म भी खाली हो जाता था । न कोई क्लब श्रा, न कोई इन्स्टीट्यूट । नाम के लिए एक इन्स्टीट्यूट था ज़रूर, लेकिन उसमें हम जैसा कोई नहीं जा पाता था। वहां गाई और ड्राइवरों का जुआ चलता था दिन-रात। मैं रहता था बंगालियों के एक मेस में । वहाँ एक कमरे में चार आदमियों के रहने की व्यवस्था थी। मुंबह बिस्तर लपेटकर प्लेटफार्म चला जाता था चाय पीने । यहाँ बैठकर अखबार देखते-देखते काफी देर हो जाती थी। तब दपतर जाने की जल्दी पड़ती थी। हम लोगों का दफ्तर कुछ दूसरे ही ढंग का है। कभी सुबह आठ बजे से ट्यूटी होती है, कभी शाम के चार बजे से । फिर कभी रात के बारह बजे से । ११४ - जपने की माला की तरह घूमती रहती थी आठ घटे को यह ड्यूटी। रेलवे के लोगों के माय रेलवे की बातों के अलावा और क्या बातें करता? मुबह मे रात तक मिर्फ रेलवे की ही बातें होती। भोला नंदी तब रेंगते-रेंगते चलकर चीफ कंट्रोलर बन गया था। कहता था वह, 'अरे, तुम लोग तो अब म्बराज के जमाने में रेलवे की नौकरी में आये हो, ब्रिटिश जमाना तो देशा नहीं तुम लोगो में।' ब्रिटिश जमाने में रेलवे की नौकरी कितनी पराव यी उमका निस्सा सुनता या नन्दी वावु की जबान में। जानते हो, कैलापन माहब थे तव चीफ कंट्रोलर, मैं या डिप्टी । एकाएक थर्टी-ग्री अप का इंजिन रुक गया। मैंने नाइट ड्यूटी करके तभी सिगरेट जलाने पहले चाय मंगवायो थी। अकस्मात् मुना कि रन-ओवर केम हो गया है. आदमी दब गया है। वह जो तपन मजुमदार है, उसकी मा आत्महत्या करने गई थी थर्टी-श्री अप के इंजिन के नीचे। भुवन मजुमदार तब टाइमकीपर की नौकरी से रिटायर हो चुवा था। तपन को लगा दिया था गाई की नौकरी में।' मैंने पूछा, 'क्यों? आत्महत्या करने क्यों गयी?' भोला नन्दी ने कहा, 'मतिभ्रम ! मति न मारे जाने से कोई ऐसा करता है ? और हम लोगो की मुमोबत !' पूछा, 'क्यों ? आप लोगो की मुमीयत क्यो ?' भोला नन्दी जवाब देना, 'अरे वावा, तुम लोगों ने तो उस जमाने मे नौकरी नहीं की है। कलाधन माहब बात-बात में हम लोगो को 'ब्लडी यास्टर्ड' पह- कर गाली देते थे। सुभाष बोस तक को उन दिनो 'नही वास्टर्ड' कहकर गाली देता था वह, हम लोगों को सुना-मुनाकर । हम लोगों को चुपचाप गहना पड़ता था सब।' उन दिनों की बातें मैंने बाद में दूसरे लोगों के मुंह से भी गुनी हैं । तब लड़ाई का जमाना था। दिन में दस मिलिटरी स्पेशल छूटती थी। मब जाती यी कोहिमा की ओर। अंग्रेज़ लड़ाई मे हार रहे थे। और रेलवे के एंग्लो- इण्डियन मुलाजिमों पर यापात हो रहा था। उस समय सब रोज रात को सुभाष बोस का भापण टोकियो रेडियो से चोरी-चोरी मुना करते थे। सव साह्न गुस्से के मारे लाल-पोले हुए जा रहे थे एकदम । जवाहरलाल नेहरू को कैद कर लिया था अंग्रेजो ने, महात्मा गाधी को भी कारागार में ११५ । था। लेकिन इतना सब होने पर भी एंग्लो-इण्डियनों का गुस्सा दूर नहीं हुआ। सारा गुस्सा वे निकालना चाहते थे हिन्दुस्तानियों को गालियां देकर। हिन्दुस्तानियों को भद्दी-भद्दी गालियां देने पर ही जैसे अंग्रेज़ लोग लड़ाई में जीत जायेंगे। इसलिए वात-बात में फाइन करते, वात-बात में गाली देते। थर्टी-श्री अप के एक्सीडेंट की रिपोर्ट की कॉपी सबको ठीक तरह नहीं पहुंचाई गई थी, इसी वजह से भोला नन्दी पर भी दस रुपया जुर्माना हो गया था। एक दिन मैंने भी पूछा था गायत्री मौसी से, 'मौसीजी, आप आत्महत्या करने क्यों गयी थीं?' तपन मजुमदार कहता, 'दिमाग खराब हो गया था मां का।' गायत्री मौसी चिल्ला उठती, 'तू चुप रह रे ! मेरी तकलीफ को समझा कभी किसीने ! अगर समझा होता तो यह दुर्दशा होती मेरी !' कहकर विस्तरे पर पड़ी-पड़ी विलख-विलखकर रोती गायत्री मौसी। रुकना नहीं चाहता था उनका वह रोना। भुवन मजुमदार तव टाइमकीपर की नौकरी से रिटायर होकर लड़के की कमाई पर जिन्दगी गुज़ार रहा था। उसका खास काम था स्त्री की सेवा करना। ? मौसाजी कहते, 'वेकार क्यों रो रही हो तुम? शांत हो जाओ न ।' मौसी कहती, 'रोऊं क्यों नहीं? वह कहता है कि मेरा दिमाग खराव हो गया था। ऐसे नालायक लड़के को भी अपनी कोख में धारण किया था मैंने।' गायत्री मौसी के इस तरह रोने के तपन के घर के लोग आदी हो गए थे। कभी-कभी इस बात को लेकर लड़के-लड़की मज़ाक भी उड़ाते थे उसका। 'अच्छा मां, तुमने कैसे इंजिन के तले सिर दे दिया? डर नहीं लगा तुम्हें ?' कितनी बार इस सवाल का जवाब देना पड़ा है गायत्री को, उसका कोई हिसाब नहीं। पन्द्रह-सोलह साल पहले घटी थी यह दुर्घटना। रेलवे के एक्सी- इंट सेक्शन में वह फाइल शायद अब भी मौजूद होगी। उस एक्सीडेंट के बाद सवने मिलकर अर्जी भेजी थी कि यार्ड की इस जगह को रेलिंग से घेर दिया जाए। आदमी तो आते-जाते ही हैं, गाय-बकरी भी तो हरदम धूमती फिरती हैं। उनके कटने से भी कम नुकसान नहीं होगा। सबके दस्तखत होकर दरख्वास्त हेड ऑफिस चली गई। हेड ऑफिस से इन्सपेक्टर आये मुकर्जी साहव । इन्जी- नियर-एटिस ! सब देखा-सुना। आसपास में सव स्टाफ क्वार्टर्स हैं । छोटे-छोटे , - इन पगंदो मे ही तो आदमी तमाम दिन नहीं बैठा रह सकता। छोटे-छोटे लडके-लडकिया मामने के आगनों में गेलते हैं। मकान के कुत्ते-बिल्ली भी उधर ही घूमने फिरते हैं। मामने पानी का एक कल लगा दिया है रेलवे कम्पनी ने, वहा भी मुहल्ले के बहुत-मे आदमी पानी लाने जाने हैं। मुकर्जी माहब ने मारे दिन इन्मपेक्शन-कारमै खाना-पीना किया। मंध्या के ममय शायद बरफ की जरूरत पडी थी। विस्की साथ ही थी, वरफ सप्लाई किया टी-स्टाल वेंडर नरान नं । चरफ की कीमत नहीं ली नगन ने । मुकर्जी माहब के चपरामी मे उसने कहा, 'अपने माहव मे कहकर जगह को घिरवा दो भाई, मेरी बरफ का दाम बमूल हो जाएगा।' इतना सब करके भी कुछ नतीजा नही निकला। थर्टी-टू डाउन उमो सोलह साल पहले की तरह नब भी रात के नौ वजे वहां आकर खडी होती। फिर वही खाली गाडी मवेरे के माडे पाच बजे धर्टी- श्री अप नाम लेकर वहा मे रवाना होती। अब भी वह जगह विना धेरै के खुली पड़ी है। किसीको उस पार जाने की जरूरत पड़ने पर वह लाइन पास करके जाना है। सारे दिन ली पड़ी रहनो है नाइन । लाइन पर कोई दाल की घडिया मुखाने के लिए रगते है। लाइन के पत्थरो के फामली पर धाम उग आने पर पालतू गाय-बकरी चरने जाते हैं उमे । सारे दिन वह जगह आगन का काम देती है। सिर्फ रात के वात ही वहा थर्टीटू डाउन चुपचाप सडी रहती है पहले की तरह । तपन ने एक दिन दिखलाई थी वह जगह। हमते-हंसते कहा था, 'यही है वह जगह । इसी जगह मां का पैर कट गया था।' बचाव की बात यही हो गयी कि एक पैर को लेकर दुर्घटना ममाप्त हो गयी। नहीं तो इजिन के पहिये छाती पर होकर भी जा सकते थे। तब इस तरह सारी ज़िन्दगी मोये रहकर गुजारने का कष्ट नहीं सहना पड़ता। मिफं एक पैर कैसे पटा?' तपन बोला, 'मा ने तो आत्महत्या के लिये लाइन पर सिर रख दिया था।' ' किलिये आत्महत्या करने गयी थी गायत्री मोमी?' तपन हमा। बोला, 'और किसलिए, पिता जी में झगड़ा करके।' सचमुच भुवन मजुमदार से गायत्री मोमी का झगड़ा हमेगा में चलता १११ आया है। जिस दिन शादी हुई थी, शायद उसी दिन से ही। 'किस बात पर होता है झगड़ा?' तपन वचपन से देखता आ रहा है मां-बाप को। अभ्यस्त हो गया है वह इस प्रतिदिन के झगड़े का। तपन ने कहा, 'पिताजी के सिगरेट पीने पर मां को उसकी बू नहीं सुहाती, इसी वात पर कभी-कभी खूब झगड़ा होता है, झगड़ा न करने पर मेरे माता- पिता का खाना ही नहीं हज़म होता। 'अव भी झगड़ा होता है ? तपन बोला, 'हां, अब भी।' जो लोग आस-पास के मकानों में रहते हैं वे जानते हैं यह बात । एकाएक कहीं शोर सुनते ही कहते हैं, 'लो फिर शुरू हो गया उनका.' 'शुरू होने का मतलब था लगातार दस घंटे तक चिल्ल-पों मचते रहना। पड़ोसी आजिज़ आ जाते थे। गोविन्दराजन बाबू ने एक दिन अधिक सहन न कर पाकर तपन को बुलाकर कहा था, 'अपने मां-बाप को थोड़ा रुकने को कहो न, हमारे मासूम वच्चे सो नहीं पा रहे हैं।' तपन कहता, 'अभी नहीं रुकेगा यह..' 'नहीं रुकेगा?' तपन ने कहा था, 'पिताजी खा-पीकर नाइट ड्यूटी करने जायेंगे, तब रुकेगा।' 'किस बात के लिये इतना झगड़ा होता है ?' तपन बोला, 'यह तो नहीं जानता।' दफ्तर में मुलाकात होने पर भी लोग भुवन मजुमदार से पूछते, 'रोज़- रोज़ किसलिये आप लोगों में इतना झगड़ा होता है ?' टाइमकीपर वाबू हंसता। कहता, 'झगड़ा करने की तबियत होने पर क्या कारण खोजने की जरूरत होती है साहब ? कारण अपने-आप उग आता है।' वास्तव में सबको अचरज होता था टाइमकीपर बाबू के आचरण से। इतना झगड़ा होता था कि उस शोर से कान के पर्दे फटने को होते, लेकिन फिर भी ठीक वक्त पर दफ्तर में हाज़िर होता था भुवन मजुमदार।' 'कहिये, आज खाना खाकर तो आये हैं टाइमकीपर बाबू ?' . - भुवन मजुमार तब पान चबा रहा था। बोला, 'क्यों ? माना की नहीं पाऊगा?' 'मवेरे ही से मर्द-औरत का झगडा पाल रहा था, कब आप लोगों के यहा पाना बना, और कद साया आपने' अचरज की तो बात है ही। कोई-कोई कहता, 'क्यो आप लोगों में इतना झगड़ा होता है, बताइए तो भुवन मनुमदार बहता, "क्या प्रगडा ही होता है मिर्फ, हम लोगों में झगड़ा भी होता है, मुहब्बत भी होती है और बिना मुहब्बत के ही बाहर साल बच्चे होते हैं हमारे " जब मिजाज ठीक रहता तय गायत्री मोमी का पही दूसरा होता तय बहती, 'छो छो, कैमे हो जी तुम लोग ' तुम लोगों के दफ्तर में क्या यही काम होता है, और कोई काम नही है नुम लोगों को ?' भुवन मजुपदार कहता, 'तो मैं क्या करू बनाऔ? कोई ऐमा नही है जो तुम्हारी करतूत न जानता हो-मारे चन्द्रपुरा मे शोर मच गया है। तुम्हे मरने को ऐमी क्या पही थी। तुम्हे थोडा भी डर नहीं लगान की नाइन पर सिर रखने में? सचमुच गायत्री मौमी को मुद भी अचम्भा होता था कि रेल की पटरी पर गिर रखने का साहस कैसे पा गया था उममे । मुझे भी बहुत कुतूहल होता पा । जब गायनी मौसी के घर जाता था तब विछोने के पास बैठकर बातें करता था उनमे बहुत देर तक। एकही पर पा गायत्री मौसी का एक ही पैर मे लंगडाते लंगडाने चलती-फिरती। वहीं बनते हुए गिर न पड़ें, इमनिये उनका हाथ पकड़ लेता था मैं सभी-रभार। कहता, 'मैं तुम्हें पकड़ रहा हूं मौमी, चलो।' 'धत्, छोड़ देतू!' वकर दीवार के सहारे मोसीखुद ही चलती। में देखता था कि उम एक पैर ही कितनी सहूलियत से चलने का अभ्यास हो गया है मौसोनी को। पैर एक ही था, लेकिन गले की आवाज में मौ के बराबर थी। बिस्तर पर लेटे-लेटे ही झगड़ा करतो यो भुवन मजुमदार के साप । उसी तरह मेटे-लेटे ही चिल्ला उठती, 'यो जी, तुम फिर तमाखू पी रहे ०९ भुवन मजुमदार नव रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा था । बीटी-निगरेट गरीदने के पंगे नहीं थे। एक नारिवल में हगो में तमागू पीता था। उस तमापू का धुआं नार में जाते ही मौनी को खांसी आ जाती थी। कहती, 'क्यों जी, नुम फिर तमागू पी रहे हो ?' न्त्री को नाक में धुआं न जाए इसलिये भुवन मजुमदार थोड़ी दूर घर की चीनट के बाहर बैठकर तमाय पीता था। कहता, 'मैं आंगन में बैठकर तमान पी रहा है, यह भी सहन नहीं हो रहा है तुम्हें ?' 'यह तो कहोगे ही तुम, मेरी तकलीफ को देगने की तुम्हें गया पड़ी है !' भुवन मजुमदार कहता, तो रन्मान एक ही दिन में नट से कहीं अपने नगे की आदत को छोड़ सकता है ? 'तुम्हारे नगे की लत के मामने मेरी तकलीफ कुछ नहीं? मेरी नाया में जन्नन हो रही है।' भुवन मजुमदार तब आंगन में उट पड़ता। कहता, 'ठीक है, मैं तब बाहर मैदान में जाकर पीता है। मोली महती, लेकिन फिर भी अपनी जिद नहीं छोड़ोगे, मग आदमी में पाला पड़ा है, भगवान !" 'भुवन मजुमदार भी तो आगिर इन्सान है। उमे भी तो गुम्मा आ सकता है। कहना था, 'मागे जिन्दगी तुमने मुझे जलाया है, अब बुढ़ापे में थोड़ा आराम ने बैठकर नमागू पिऊं, यह भी तुम्हारे मारे नहीं हो सकता।' 'तो पियो न, जितना पी गको पियो तुम तमायू, मैं क्या तुम्हें मना कर रही हूं कि तुम नमाय मत पियो ? लेकिन मेरी नाक के पाम धुआं छोड़े विना क्या तुम्हें सुग नहीं मिलता?' असहाय भाव मे मेरी ओर देवकार भुवन मजुमदार महता, 'देय नह हो बंटा, देख रहे हो, मैं तुम्हारी मीनी की नाक के पास तमापू पी रहा था, तुम तो गवाह हो, तुम्हीं बताओ तो. गायत्री मौसी भी चुप नहीं रहती थी। कहती चीं, 'चुप रहो तुम, गवाह भी अच्छा मिला है तुम्हें, चोर का गवाह छिछोर ही होता है।' तब लड़के-लड़कियां काफी बड़े हो गये थे। नपन रेलवे में गार्ड हो गया था। लड़की पद्मरानी की शादी की बातचीत चल रही थी। जगह-जगह ने . १२० रिश्ते आ रहे थे। यह उसी वक्त की बात है। घर में दिन-रान झगड़ा होता था। भुवन मजुमदार रिटायर होकर घर में बैठकर तमाखू पीता और बीबी में झगडा करता । ठीक तभी खबर मिली कि भुवन मजुमदार की स्त्री के फिर बच्चा होगा। देमाई वावू तब तक रिटायर नहीं हुए थे। भुवन मजुमदार को तेजी से रास्ते पर जान देखकर देमाई वावू ने पूछा, क्यो, दाइमकीपर बाबू, इतने सवेरे कहा जा रहे हैं ?" देसाई बाबू चन्द्रपुरा में रहने रहने नछी बगला मीय गये थे। भुवन मजुमदार जल्दी में या तब । बोला, 'तिवारी के पास जा रहा हू, थोड़ा जल्दी मे हूँ।' 'तिवारी ? तिवारी कौन है " सिवारी था लेविल क्रॉसिंग का गेट-कीपर। लेकिन प्रॉसिंग के पाम ही थी तिवारी की खोली। 'वही जो हमारे लेविल क्रॉमिग का गेटमैन है। उसके यहा में बकरी का दूध गाने जा रहा हूँ, आज एक लड़का हुआ है भाई मेरे।' यह खबर नई भी है और पुरानो भी। भुवन मजुमदार को पैर कटी बहू के फिर बच्चा होगा, बुढापे में टाइमकीपर बाबू की स्त्री फिर गर्भवती हो गई है. यह खबर चन्द्रपुरा के रेलवे मुहल्ले में किमीको जानना वाकी नहीं था। लेकिन रात को कत्र उसकी बीबी ने बच्चा जना, कद दाई बाई, पद नाल काटी गई, किसीको कुछ नहीं पता चला पडौस में। पत्र हुआ सडका? कितने बजे?' 'हाई बजे रात को?' 'तपन की मानो ठीक है?' 'हा भाई, देखो न बुढापे में बच्चा जनकै मुझे मुभीत्रत में डाल दिया। योड़ा आराम से बैठकर हुक्का तक पीने की फुरसत नहीं है । अव बकरी के दूध के लिए दौड़ना पड़ रहा है।' उसी दिन में रोज मदेरे रेलवे लाइन पार करके भुवन मजुमदार बच्चे के लिए तिवारी के यहाँ से बकरी का दूध लाने जाते। गोविन्दराजन बाबू की स्त्री गोदावरी खबर पाकर आयो। गायनी मौसी बोली, 'यह देखो भाई, तुम्हारे इस आदमी की करतून, हा .
मांस जला वाला मेरा एकदम।' गोदावरी बोली, 'एक तो तुम्हारी मह हालत तिमपर ग यात...' 'तुम्हीं लोग बताओ भाई, मैं क्या दिन-पान यों ही अगदा करती है ?' 'अगदा ही अगर होता है, दिन-रात तो फिर मेल गाव होता है ?' गायत्री मौनी बोली, 'मेल? मेल तो नहीं होता। 'तो बिना मेल हए बच्चे की हो जाते है ?' गायत्री मौनी को दोनों आने छनम्ना मानीं । बोली, 'मुझे क्या गौर चरांया था जो रेल की पटरी पर सिरने गई थी! नालीफ बन्दास्त बाहर होने पर ही मान मुदनी गाने गाना है, भाई।' गोदावरी बोली, 'ना दीदी, ऐसा माम और कमीन करना जिन्दगी में। इतने नये लड़कियां हैं तुम्हारे, क्या एक बार भी उन्हें इनकी याद नहीं आयी ? नका गमाल करके भी तो तुम्हें नमनदायी वलनी चाहिए थी।' गायत्री मांनी पाहती, 'मेरी जैनी झालन अगर किनी औरनी होती तो उसका दिमाग खरान हो जाता, भाई, यह तो मैं जो जिन्दा अभी तक उनकी, उन बन्नी की बात सोनकर यहाद पर लगाया मुझे" आज की बात नहीं है वह। एक जमा हो गया। लेकिन बातचीत के दौरान घूम-फिसर सिर्फ यही प्रमंग चना आता है। किमी दांत गिर जाने पर जिस तरह यार-बार जीन उमी ग्रानी जगह जागर गिरे हुए दांत को हूंढ़ती है, गायत्री मानी के साथ भी जमे यही बात है। नव सिर्फ उसी हिस्से को नुनना चाहते हैं। पाव वायटी० टी०एम० ऑफिस फा हेड रनर है। उसकी मास आई मुलाकात करने । इधर-उधर की बातों के बाद पर काटने की यह बात भी आ गयी। 'क्यों इस तरह आत्मघात करने गयी थीं आप? थोड़ा भी डर नहीं लगा आपको?' गायत्री मौसी बोली, 'मैं कितनी तकलीफ में हूं, दमे याहर का कोई नहीं समझ सकता।' 'तकलीफ किसे नहीं है भाई, दुनिया में जिन्दा रहना ही तो एक मुनी- बत है ! लेकिन तो भी हम चुपचाप सब कुछ सहते हुए जी रहे हैं। नहीं तो क्या हम लोगों की तबियत नहीं करती मरने की? कभी-कभी तबियत होती जरुर है, फिर बाल-बच्चों का मुंह जोहकर भूलनी जाना पड़ता है जब , । इसके बाद थोडा स्ककर पूछा, 'किस जगह में कटा है, देखू ।' सब सुन रक्खा था पात्र बाबू की साम ने पहले में। तो भी चाक्षुप प्रत्यक्षा की इच्छा हुई। गायत्री ने पैर से साडी को बिलकुल हटाकर दिखाया। बोली, 'यह देगिए।' पात्र बाबू की सास पर के कटे म्यान को नीचे झुककर तेज निगाह डाल. कर अच्छी तरह देखने लगी। असल में इसे देखने ही आई थी वह । पन्द्रह- मोलह माल पहले का कटा है। पहले वह पर मुगोल-मुडौल था। भुवन मजुम- दार से जब शादी हुई थी तब बहुत दिन तक उमके पैरो की प्रशंमा करता रहा था वह । उसके वाद वाल-बच्चे जन-जनकर और कोई आकर्षण वाकी नहीं रहा उममे ! उमर बढ़ने के साथ-साथ चमडी ढीली पड़ गयी है अत्र, सिकुडन आ गयी है और दाग पड़ गए हैं उसपर । दुर्घटना के बाद पहले छह महीने तक नो उसे बिस्तर पर लेटे ही रहना पड़ा था। वेड-पैन इस्तेमाल करना पड़ता था। अस्पताल की नर्म ने भी पूछा था, 'आपने हिम्मत केमे की इस काम को करने की?' वञ्चे, बूढे, अडोसी-पड़ोसी समने यही एक सवाल हजार बार पूछा है। पान बाबू की सास ने भी यही सवाल पूछा। गायत्री मौसी ने कटे हुए पैर को दिखलाकर कहा, 'यह देखिए, एकदम यही पर होकर पहिया चला गया था।' 'भगवान ने ही बचा दिया है आपको, नहीं तो ऐसी हालत में कोई वचता है ! तो आप शायद चिल्ला उठी होगी?' गायत्री मौमी बोली, 'पहले तो मरुगी यह तय करके पटरी पर मिर रख दिया था लेकिन जैसे ही इजिन ने चलना शुरू किया, वैसे ही चीखकर खडी हो गई मैं । बाल-बच्चों को याद आ गयी थी न...' पान वाबू की सास दरअसल यही किस्सा सुनने आयी थी। उसने पूछा, 'इसके बाद? गायत्री मौसी ने कहा, 'सौ-सौ आवाज़ निकल रही थी इंजिन मे तब, ड्राइवर मेरी चीप मुनता कैसे? मैं तब तक छिटककर लाइन मे बाहर चली आयी थी.. 'गजब ! फिर? फिर क्या हुआ?' "फिर मेरे इस पर पर होकर इंजिन का एक पहिया चला गया।'
. 'बहुत लगा होगा? गून निकला होगा?' सवाल पूछार पात्र बाबू की सारा ने फिर गुद ही वाहा, 'ओह, लगेगा गयों नहीं! हमों लोगों की हनिया से जब थोड़ी उंगली कट जाती है तब कितनी तकलीफ होती है। आपका तो पूरा एक पैर ही गट गया-~मला तालीफ नहीं होगी !' 'म नो तभी बेहोश हो गयी थी, गुछ नहीं मामूस हुआ मुझे। सात दिन वाद होश आया मुझे। होश आने पर मैंने देगा कि ये सिरहाने बैठे हैं और मेरा नमा तपन पास बैठा है।' • नवको गुनाया जा चुका है यह फिम्मा । चन्द्रपुरा में जब कोई नया आदमी आता है वह कभी न कभी यहां आकर यह निम्मा जमर गुन जाता है। पुरुष लोग नुनते है भुवन मजुमदार में, और स्त्रियां गुनती है गायत्री मांगी में । जिम्मा कहते समय अगर छोटे बच्चे करीब होते हैं, भुवन मजुमदार नहता है.---'T तुम लोग बुट्टों को पान बैठे-छे गया बेकार की बातें गुन गई हो ? जाओ, तुम लोग बाहर चले जाओ। बाहर इतना बड़ा मैदान पड़ा है, जाओ नलो न वहां ।' कहकर छोटे बच्चों को भगा देता है। लेकिन मेरी बात अलहदा है। गायत्री मौसी के बड़े लड़के से दोस्ती होने के बार में उनके घर का आदमी जैगा बन गया था एकदम मिनुल अंतरंग। तपन को गार्ड की ड्यूटी गारनं काफी दूर-दूर के मुकामों पर जाना पड़ जाता। और मेरी ची आठ घंटे की ड्यूटी। आठ घंटे की ड्यूटी के बाद मैं क्या करता? मैं तपन के घर जाफर बैठता। लड़कियां एनामेल के रूप में चाय लाकर देती, मैं उस चाय की चुस्की लगाते हुए बैठे-बैठे गपशप किया करता गायत्री मोसी से। किन्तु मानव-चरित्र और उस मानव-नरित्र का विश्लेषण, हैं दोनों ही आश्चर्यजनक ! चन्द्रपुरा की रेलवे कॉलोनी में ही क्या कम परिवर्तन हुआ है उन कई सालों में। स्टेशन के प्लेटफार्म बढ़ाए गये, याई बड़ा हुआ। पहले यार्ड में पन्द्रह जोड़े थे लाइनों के, फिर यहां और तीन जोड़ी पटरियां विधायी गयीं। लेकिन वहां से आदमी नहीं तबदील हुए। पूंटी पहले जिम तरह घर-घर जा-जाफर खबर फैलाया करती थी, तब भी वैसा ही करती थी। तब पूंटी विधवा हो चुकी थी। भाई भोला नंदी के परिवार में रहकर बहुओं से झगड़ा करती, रसोई वगैरह के काम में हाथ बंटाती, पर मुहल्ले में गश्त लगाने की अपनी पुरानी आदत को नहीं छोड़ पायी थी। - १२४ देसाई बाबू के घर जाकर कहती, 'क्यो भाभी, क्रा कर रही हो? अरे, अभी कपड़े नहीं बदले तुमने?' इसके बाद आवाज़ को नीचा करके कहती, "जानती हो भाभी, टाइम. कीपर वावू की बीवी की करतून 'फिर क्या हुआ री" 'फिर टाइमकीपर वावू मे झगडा किया है।' 'क्यों" । 'यह तो पता नही, बहुत चिल्लाहट की आवाज आ रही थी हमारे घर । कुछ नहीं सुना तुमने 'नहीं तो! 'अरे, क्या कह रही हो' हम लोगो के तो कान के पर्दे फटे जा रहे थे, इतनी चीख-पुकार मची हुई थी। आखिर में उनके घर गयी मैं । जाकर पूछा कि क्या हुआ है भाभी? क्यो इतना झगडा कर रही हो' इमपर भाभी बोली कि झगड़ा क्यो न करू ? मेरा एक पर चला गया, इममे भी तुम्हारे दादा को साध नही पूरी हुई, मार ही डालना चाहते है अब मुझे। कहते है कि फिर जाकर रेल की पटरी पर मिर रख दो और मरकर मेरा पिंड छोड दो। सचमुच भुवन मजुमदार उस दिन बहुत ज्यादा उत्तेजित हो गया था। आपिर कितने दिन वरदाश्त कर सकता है इन्मान ' हरएक के बरदान की एक हद होती है । भुवन मजुमदार अपने रिटायर्ड जीवन में निश्चितता- पूर्वक घर बैठकर हुक्का नहीं पी मकता, क्योकि गायत्री मौसी को तमापू की बू पसंद नहीं। भुवन मजुमदार अपने घर में बैठकर बातचीत भी नहीं फर सकता--इमसे गायनी मौसी के आराम मे खलल पडता है। भुवन मजुमदार घर मे बाहर जाकर भी कही अधिक समय तक नहीं रह सकता--हगी गायत्री मौसी की अवज्ञा होती है। तब वह वेचारा क्या करे ? लिहाजा झगड़ा करने के सिवाय और कुछ नहीं रहता मारने को अन्त में जब झगड़ा करते-करते मिजाज बिगड जाता है, सब मारे गुम्गे के चिल्ला उठता है भुवन मजुमदार। कहता है : 'तब तुम्हारे लिए क्या मैं अपनी जान दे दूं, बोलो ?' गायत्री मौसी कहती है, 'तुम यो जान दोगे, सुनूं ? जिरो जान देनी है वह तुम्हारे सामने मौजूद है !' भुवन मजुमदार ने यहा, 'तुम क्यों जान देने जाओगी, मैं ही दे दगा १."
जान... 'तुम क्यों जान दोगे? तुम्हें क्या तकलीफ है ?' 'तो तुम्हें ही क्या तकलीफ है ?' 'मेरी तकलीफ अगर तुम समझते तव मुझे फिम ही क्या होती ?' 'जिन्दगी-भर मुझे तंग करके भी तुम्हारी हविश पूरी नहीं हुई ?' "भगवान बैठे हैं ऊपर, इतना झूठ मत बोलो। ज्यादा यूठ बोलने पर तुम्हारी जीम गल जायगी, कह देती हूं।' 'तो मैं झूठ बोल रहा हूं या नुम झूठ बोल रही हो?' गायत्री मोसी बोली, 'मुझे डर किस बात का है ? किसका डर है कि मैं झूठ बोगी ? मैं क्या तुमसे डरती हूं ? मैंने पया कोई गलती की है जो मैं किसी में हर जाऊं? 'तो सारी गलती क्या है मेरी ही है ?' 'तुम्हारी गलती नहीं है तो क्या मेरी गलती है ? पांच जनों ने पूछ देखो किसके लिए मेरा पैरा कटा है ? किसके लिए में रेल के पहियों के नीने सिर रखने गयी थी?' तुम फिर जाओ न रोल के पहियों को नीचे गिर रखने। पहली बार एक पर गया था, अबकी बार सिर ही चला जाय, तुम्हारी बातें और नहीं मुननी 'पड़ेंगी मुझे तब ! कौन रोक रहा है तुम्हें ?' इसके बाद और चुप लेटी नहीं रह सकी गायत्री मौसी। धड़ में चादर फेंककर पड़ी। साड़ी को ठीक कारक विस्तर ने नीचे उतरी। बोली, 'ठीक है, जा रही हूँ मैं । मेरे मरने से ही अगर तुम्हें चैन मिल जाय तो मैं जा रही हूं, मैं ही अगर तुम नवकी आंख की किरकिरी होऊं तो दूर हुई जाती ।' कहकर सत्रमुच ही गायत्री मोती उठी। फिर लंगड़ाते-लंगलात दरवाजे की ओर बढ़ी। नुवन मजुमदार बोला, 'कहां जा रही हो ?' गायत्री मौसी विना कुछ जवाब दिये दरवाजे से बाहर निकलने को हुई। 'मुवन मजुमदार जल्दी से हुक्का रखकर पकड़ने गया गायत्री मोती को। पूछा, 'यहां जा रही हो तुम ?' 'मैं जहां भी जाऊं, तुमसे मतलब ?' भुवन मजुमदार ने फौरन गायत्री मौसी का हाथ पकड़ लिया। 'छोड़ो, मेरा हाथ छोड़ो।' - । - "तुम कहा जा रही हो, बताओन?' 'मैं जहा भी जाऊ, तुम्हें उसमे क्या मतलव ?' 'मुझे उममे मतलव नहीं, क्या कह रही हो तुम? तुम्हें अगर कुछ हो गया तब लोग तो मुझे ही दोप देंगे।' 'तुम्हे कोई नहीं दोप देगा, तुम्हें कोई नहीं दोप देगा। तुम तो दूध के धोये हो, सब दोप मेरा है । मारी हत्या की जड तो मैं ही हूँ। मैं ही हू पाजो औरत, मुझीम है सब ऐव।। 'छी, पागल मत बनो। वात मानो, चलो चुपचाप लेटी रही । आओ।' 'मुझे छोड़ दो तुम !' भुवन मजुमदार ने तय कसकर पकड़ लिया था गायत्री मौसी को। 'छोडो, मुझे छोडो। मैं फिर रेल के पहियों के नीचे गिर रक्यूंगी। मुझे इस बार कोई नहीं रोक सकेगा, इस बार कोई नहीं बचा सकेगा। जो मुझे वचाने आयेगा वह हरामजादा है। उमे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी, यह मैं पाहे देती हूँ।' एकाएक गोरगुल सुनकर मुहल्ले के सभी लोग चले आये। गोविन्दराजन वायू की स्त्री गोदावरी आई । भोला नन्दी की विधवा वहन पूटी आई। कदोल क्लर्क देसाई बाबू की स्त्री भी चली आई। गाई की ड्यूटी करके ऐन तभी लौटा थाबड़ा लड़का तपन । घर, के मामने लोगों की भीड देखकर उमे भी तारजुत्र हुआ । बड़ी तड़की पद्म की शादी हो गयी थी, वह ममुराल पत्रधरपुर वली गयी थी तभो, नहीं तो वह भी रोक सकती थी अपनी मा को। और वासी जो छोटे-छोटे लड़के-लड़किया थे, वे यह दृश्य जन्म में देखते आ रहे थे :घर के भीतर इतने लोगों को आने देखकर अपना मेल बद करके मुह बाये मामने होते तमागे का लुत्फ उठाने लगे। ऐमी घटना गायत्री मौनी के जीवन में यही नहीं थी अकेली। बहुत बार पति-पत्नी में मामूली-मामूली वात पर झगड़ा हुआ है। वहत बार ऐसा हुआ है, वहुन बार इसी तरह आत्महत्या करने गयो है गायत्री मौनी। लेकिन हर वार ही वाधा मिली है। जिस दिन भुक्न मजुमदार की मार साल की उमर में सामान् स्ट्रोक में मृत्यु हुई, उस दिन भी वैसा ही हुआ। इम आकस्मिक घटना में स्तंभित हो गये मद। उधर गायत्री मोमी ने चौखकर सारा चन्द्रपुरा अपने सिर पर उठा लिया।
..... . . 'हाय राम, मैंने कौन-सा पाप किया था कि तुम मुझे इस तरह मार गये? मैंने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा उसका वह रोना-चिल्लाना रुकने का नाम नहीं लेता था। एक दिन गायत्री मौसी ही खुद मरकर अपने पति को सबक सिखाना चाहती थी। और पिछले इन सोलह वरसों से गायत्री मौसी ही सबके लिए वोझ वनकर जिन्दा है । पति चला गया, यह भी देखना पड़ा उसे अपनी आंखों से। कोई भी गायत्री मौसी को दिलासा देने नहीं आया। सिर्फ उसका यह ढाड़ें मारकर रोना दिखावटी है या असली, जैसे इसीका जायजा लेने आये थे लोग। जवान से सबने कहा, 'क्या करोगी दीदी, होनी को कौन मेट सकता है।' गायत्री मौसी रोती हुई बोली, 'मैं कब जाऊंगी, तुम लोग बता दो भाई मुझे 'यह कौन बता सकता है, दीदी ? तुमने तो सबसे पहले जाने की कोशिश की थी, क्या जा सकी ?' गायत्री मौसी ने कहा, मैं तभी क्यों नहीं चली गयी, क्यों तब डरकर पीछे लौट आयी, नहीं तो क्या मुझे आज यह दिन देखना पड़ता ?' 'होनहार को क्या टाल सकता है कोई ? यदि मनुष्य यही कर सकता तो वह देवता बन जाता । संसार में तब दुःख-दर्द वाकी नहीं रहता।' गायत्री मौसी कहने लगी, 'उस आदमी को मैंने जितनी तकलीफ दी है उसका हिसाव नहीं। जिन्दगी भर जलाया था, अब किसे जलाऊंगी ? अब किसके साथ झगड़ा करूंगी ? कौन है मेरा? कौन मेरे झगड़े की वकत करेगा?' कहकर फूट-फूटकर रोने लगी गायत्री मौसी। जिन्होंने गायत्री मौसी को अक्सर झगड़ा करते देखा था, उस दिन उन्होंने ही फिर गायत्री मौसी को विलखकर रोते भी देखा। देसाई बाबू की स्त्री बोली, 'पति के मरने पर स्त्री रोयेगी नहीं तो क्या हंसेगी?' पूंटी ने कहा, 'तो टाइमकीपर वाबू को उसने कितना जलाया था, यह . क्या नहीं देखा है किसीने ?' गोदावरी वोली, 'लेकिन पहले ऐसी नहीं थी गायत्री भाभी, पहले इस तरह झगड़ा नहीं किया करती थी टाइमकीपर वावू के साथ ।' पूंटी ने कहा, 'तुम ख़ाक जानती हो, भाभी। हमेशा की झगड़ालू है गायत्री भाभी, मैं वचपन से वैसा हा देखती आ रही हूं. उसे, झगड़े के शोर से उनकी .. - १२८ छत पर चील-कौआ तक नहीं बंठ पाने थे।' पर मैं इन सब बातो को मुनकर और इन घटनाओं को देखकर भी गायत्री मोमी के बारे में स्थिर निर्णय नहीं कर पाया। मुझे लगता था कि जैसे हम मव उनके बारे में किसी गलतफहमी के शिकार हो रहे हैं। इस गलती को बाहर से कोई पकड नहीं पा रहा है, रास्ता भी नहीं है पकड़ने का। नपन मे पूछा था। नपन मोमी का ऐमा लड़का था कि इन बातों में मत- लब ही नहीं रखता या कोई। वह सिर्फ नौकरी करना जानता था और हो- हल्ला करते हुए घूमता । पूजा के समय ड्रामा मे मशगूल रहता। और जब वक्त मिलता तब वह विस्तर पर पड़के खरटेि भरता। पूछने पर कहता, 'हरेक आदमी एक खास तरह का स्वभाव लेकर पैदा होता है, क्या होगा मेरे कहने से ? कोई मानेगा मेरा कहना?' मैं खुद जाकर गायत्री मामी को कहता या, 'आप सब तरफ नजर को डालती हैं ? क्या जरूरत है आपको ' गायनी मौसी महती, 'मुझे तकलीफ होती है देखकर,तभी कहती हूं। मुझे का शौक है चिल्लाने का 'आंखें बंद किये रहिए न आप।' गायत्री मौसी कहती, 'आखें बंद किए रख सकती तो अच्छा ही होता बेटा, तब तो और झंझट ही नहीं रहता लेकिन मैं आखों के सामने फिजूल- खर्ची-चरबादी नहीं देख मकती।' भुवन मजुमदार जितने दिन जिन्दा था, उतने दिन वही व्यक्ति प्रधान लक्ष्य था गायत्री मौसी का । भवन मजुमदार की भूल-त्रुटि-अवहेलना-गलन हो उसके दिन-रात के अभियोग के विषय थे। भुवन मजुमदार से झगड़ा करके ही किसी तरह दिन काट देती थी। पर भुवन मजुमदार की मृत्यु के बाद भी गायत्री मौसी अपने झगड़े को वृत्ति को उसी तरह चलाती रहेगी इमकी बल्पना कोई नही कर पाया था। गायत्री मौसी तपन की बहू को दिखाकर कहती, 'ऐमी बहू पर सायी हूँ बेटा, जो मुझे थोड़ा शान्ति से रहने तक नहीं देती पर में।' तपन की शादी एक रेलवे के आदमी की लड़की में ही हुई यो। रेलवे की नौकरी किमे कहते हैं उसे वह अच्छी तरह जानती है। रेलवे क्वाटर रिम चिड़िया का नाम है उसे भी यह बखूबी पहचानती है। टाइमकीपर बाबू फी उसने बहुत-देखें है । लेकिन टाइमकोपर बाबू की स्त्री जैसी स्त्री कभी नहीं १२६ देखी। ऐसी सास की भी कभी कल्पना नहीं कर पायी थी वह । पहले उसने चुपचाप ही सब कुछ बरदास्त करना चाहा था। सोचा था, सास हमेशा तो ज़िन्दा रहती नहीं है किसीकी, लिहाजा चुपचाप वरदाश्त ही करती रहूं। लेकिन ससुर की मृत्यु के बाद गायत्री मौसी का सारा रोप जाकर केन्द्रित हो गया पुत्रवधू पर। गायत्री मौसी विस्तर पर लेटे-लेटे ही पुकारती, 'वहू, सरसों का तेल गरम कर दो तो।' तपन की बहू तव शायद रसोई करने बैठी थी। तपन अभी फौरन टिफिन- कैरियर में खाना भरके ड्यूटी करने जायगा। योंही तब उसे देर हो चुकी थी। गायत्री मौसी फिर चिल्लाने लगी वहीं से। बोलीं, 'ओ बहू, तेल गरम करने में क्या एक जुग लगता है ?' तपन का खाना टिफिन-कैरियर में भरकर बहू तेल गरम करके ले आयी, तव एक टांग की लात चलाकर गायत्री मौसी ने तेल की कटोरी को फेंक दिया। फर्श, विस्तर, चटाई, असवाव सब तेल से चिकना हो गया। बोली, 'बहुत हो गया, और ज़रूरत नहीं है तेल की। बहुत सुख पा लिया मैंने । अपने सुख की परवाह ही करो तुम लोग, मेरे सुख की फिक्र करने की ज़रूरत नहीं।' कहकर गायत्री मौसी ढाड़ें मारकर रोने लगीं। . । प्रत्येक चरित्र की एक परिणति होती है। कोई चरित्र किसी नाटकीय मुहूर्त में अपनी परिणति का मार्ग ढूंढकर पूर्ण रूप से अपनी अभिव्यक्ति करता । ग्राफ की तरह एक नीचे के विन्दु से हिलोरा लेते हुए उठकर ऊपर के एक शीर्प विन्दु पर पहुंचकर समाप्त हो जाता है। और इसका उलटा भी देखा है मैंने। पहले ही एक नाटकीय चरम सीमा की सृष्टि करके लगातार एक-एक करके नीचे की ओर उतरता रहता है। इसके बाद न कोई उतार-चढ़ाव रहता है, और न कोई घात-प्रतिघात । गायत्री मौसी के अंतिम जीवन में भी ठीक यही घटित हुआ। वही छोटा घर, वही छोटी रेलवे कॉलोनी, वही छोटी परिधि का जीवन । वचपन से ही पराये घर में पालन-पोपण हुआ। तनिक भी स्नेह, प्यार, माया- ममता के आस्वादन का अवसर नहीं मिला उसे चाचा-चाची की गिरस्ती में।
। वडे अरमान लेकर आयो थो चन्द्रपुरा में वह टाइमकीपर भुवन मजुमदार की दीवी बनकर । जिम भुवन मजुमदार की तरक्की नहीं हुई, जिमको तनख्वाह नहीं बढी, जिसके जीवन में नाममात्र को भी आशा-आकांक्षा नहीं थी, जो अपनी नौकरी को ही एक मधवा स्त्री की माग के सिदूर की तरह प्राणपण से जकडकर जिंदा रहना चाहता था, उसी व्यक्ति के घर आकर गृहिणी बनकर हर साल मिर्फ बच्चों को जन्म देती रही है। जन्म देना न चाहने पर भी मजबूर होना पड़ा है जन्म देने को। उसकी इस यातना को समझने वाला कोई नहीं था शायद चंद्रपुरा में। अगर होता तो वह गायत्री मौसी को समझता। गायत्री मौसी को समझकर कम से कम थोडी हमदर्दी तो दिखाता, गायत्री मोमी के लिए आमू वहाता। अन्त में सचमुच ही गायत्री मौसी की दुर्दशा चरमसीमा पर पहुच गयी थी। मी यहू ने गायत्री के साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसे चन्द्रपुरा के सब लोगों ने देखा है । सव गवाह हैं उस घटना के । पिछले जमाने में न जाने कितने नाटक हो गए इस चन्द्रपुरा मे, इस चन्द्रपुरा के हर क्वार्टर मे। पर किसीने लिपिवद्ध नहीं किया है उसका इति- हाम। अगर कोई करता तो शायद चन्द्रपुरा का रेलवे पाई ही मुगर हो उठता । भोला नन्दी की बहन पूटी, कट्रोल क्लर्क देसाई बाबू, देमाई वाबू की स्त्री, डी० टी० एम० ऑफिम के हेड क्लकं पान वायू, पान बाबू की सास, गोविन्दराजन बाबू, गोविन्दराजन वायू की स्त्री गोदावरी, सब बोल उटने । लेकिन इस जगह इतनी बातें नहीं कहना चाहता । उसके लिए और विस्तृत परिपट चाहिए। और अधिक समय । यहा सिर्फ मैं गायत्री मौसी की ही बात कहने बैठा हू । टाइमकीपर भुवन मजुमदार की स्त्री गायत्री मोसो। गायत्री मौसी को चैन नहीं मिला जिन्दगी-भर। उसकी इस करुण कहानी को सुनाने जाकर और भी बहुत से लोगों की बातें शुरू कर दी हैं मैंने। लेकिन और नहीं, अब इस कहानी के अंतिम पर्याय पर आता हूँ। पूरी तरह नहीं जानता में इम अंतिम पर्याय को। मब पुछ देय पाने के पहले ही एकाएक एक दिन मेरा तबादला हो गया चन्द्रपुरा से। तबादले पर जाने में पहले मैंने जो कुछ देखा वह भी बड़ा मर्मातक था। तपन की उस बहू की बात कह रहा था। शुरू-शुरू मे तपन की बहू भी बहुत बरदाश्त करती थी। बहुर । १३१ - सादी थी बेचारी। दंगल-भर देवर-ननदों की जिम्मेवारी के साथ सव जुल्म और गाली-गलौज चुपचाप हज़म करती आई है एक लंवे अरसे तक । लेकिन एक इन्सान और कितना वरदाश्त कर सकता है ? आखिरकार यह बहू भी मुंहफट हो गयी। जली-कटी सुनाने लगी। इस बहू ने भी एक दिन कहा, 'एक बार आत्महत्या करने गयी थीं आप, एक बार और जाइये न, हम लोगों को राहत मिल जाय तव।' चिल्ला उठी गायत्री मौसी। वोली, 'ऐं ! छोटे मुंह बड़ी बात कहती हो, इतनी हिम्मत !' तपन की बहू ने कहा, 'उमर बढ़ रही है, क्या मुंह अव भी छोटा रहेगा?' गायत्री मौसी वोलीं, 'आने दो आज तपन को, तुम्हारी सारी मस्ती झड़वाती हूं। मुझसे ज़वानदराजी करती हो तुम इस तरह ?' तपन की बहू बोली, 'आप क्या करेंगी मेरा? मुझे पिटवायेंगी क्या ?' गायत्री मौसी ने कहा, 'अपने लड़के से शादी कराकर तुम्हें घर लाई हूं मैं, और तुम्हींने मुझसे इतनी बड़ी बात कह दी ?' 'मुझे क्या अब भी आप वही नई-नवेली दुलहिन समझती हैं ?' 'देखो वहू, जवान संभालकर वात करो, कहे देती हूं।' 'क्यों, हमेशा आपके पति ने आपके जुल्म सहे हैं, इसलिये क्या समझती हैं मैं भी सहूंगी?' गायत्री मौसी इसके बाद अपने पर काबू नहीं रख पायी। उस एक पैर से ही विस्तर छोड़कर उठने की कोशिश करते-करते चिल्लाने लगीं, 'तुम निकल जाओ, निकल जाओ कहती हूं, अभी निकल जाओ मेरे मकान से...' तपन की बहू भी जवाब में उसी तरह चिल्ला उठी, 'मैं क्यों निकल जाऊं? यह मेरा क्वार्टर है। अपने क्वार्टर से निकलने की मुझे क्या पड़ी है ? आप ही निकल जाइए, आप ही निकल जाइए इस घर से। अगर आप नहीं निकलती तो मैं ही आपको बाहर निकाल दूंगी अपने घर से।' यह कहकर सहसा उसने अपने देवर-ननदों को पुकारा, 'ओ नन्ही, इधर आ तो, पकड़ो तो सब मिलकर इस बुढ़िया को, चलो वाहर निकाल दें.' आखिरकार सचमुच सब मिलकर गायत्री मौसी को जबरदस्ती घर से वाहर निकाल देने को उद्यत हुए। - मुहल्ले के सब लोग चले आये थे हालागुल्ला मुनकर! 'अरे, क्या कर रहे हो तुम लोग यह क्या कर रहे हो?' भोता नन्दी की विधवा बहन पूरी भी बाई थी तमाशा देखने । चूंकि अकेले तमाशा देखने में मजा नहीं आता इमलिए पूटी दोदकर जाके कंट्रोल- कनक देसाई वावू की ग्वी को बुला लाई। इसके बाद गोदावरी भाभी को भी बुलाकर दिखाने लगी। डी० टी० एम० ऑफिस के हेड क्लर्क पान बाबू की साम भी खबर पाकर दोडी चली आयी। इधर कुछ दिन मे यह गठिया के दर्द से हिलइल तक नहीं पा रही थी । 'मंया रे,' 'दैया रे' करके गिरस्नी के सव लोगो के नाक में दम कर रखा था। लेकिन एक बहुत मजेदार खबर पाकर जैसे उसका सारा दर्द हवा हो गया। तपन की बहू तब तक एकदम मरपन्नी हो गयी थी। कह रही थी, 'मुझसे कहती है कि मैं घर से निकल जाऊं। आप लोग पाच जनी मौजूद है, आप ही कहिये कि यह मेरा घर हैं या इनका। रेलवे कपनी ने यह क्वार्टर हम लोगों को दिया है या इन्हे पात्र बाबू की माम ने कहा, 'कुछ भी हो बहू, हैं तो वे तुम्हारी सास ही, उस साम से कही इतना दुव्यवहार किया जाता है गोदावरी बोली, "रहने दो बहूरानी, बूढी हो गयी हैं, बुढ़ापे में थोड़ा आदमी ऐसा हो ही जाता है। एक दिन तुम भी बूढी होओगी, तब समझोगी बुढ़ापे की मुसीवत ।' तपन की बहू की तब शर्म-हया सब दूर हो चुकी थी। बोली, 'अब तो मान लिया बूढी हो गयी है, लेकिन हमेशा तो वे वूही नहीं थी, तब क्यो सताया करती थी मेरे मसुर को? मेरे ममुर जल-जलकर मरे हैं। उन्हें तो मरकर नजात मिल गयी इनके हाथों से, अब मुझे जलाकर, मारफे खुद बचना चाहती . . । खर, तुम छोड़ दो, वहू । छोड दो इन्हे, देख नहीं रही हो आज एकादशी का दिन है, एक दाना नहीं पडा है वैचारी के पेट में।' ऐसी हालत में जो कहना चाहिए या वही पहा मुहले वालों में। तपन की वह भी, जो उसे पहना था, वहीं लगी। तपन के भाई-बहन भी भाभी की और थे। उन्हें भी मजा मिल रहा था। अपनी-अपनी राय पेश कर रहे थे बचपन में अपनी मा को उन्होंने सिर्फ लेटे-लेटे पिता में झगड़ा करते देखा है। मा के विषय में शुरू में ही उनकी धारणा अग्रता और असम्मान की रही है, वे ५३ मां की आत्महत्या की व्यर्थ चेष्टा की बात सुनते आये हैं। उनमें से हर एक जानता है कि कैसे मां आत्महत्या करने जाकर भी आत्महत्या नहीं कर सकी। उनकी दृष्टि में उनकी मां केवल व्यर्थता का प्रतीक बन कर ही जिन्दा है। भाभी के आने के वाद से ही शायद उन्हें पहली बार एक सच्ची मां मिली। इसलिए वे प्रारम्भ से ही अपनी भाभी की ओर है। आज की इतनी अशोभनीय घटना में भी तभी उन्हें मज़ा के अलावा और कुछ दिखलाई नहीं दिया। और गायत्री मौसी? गायत्री मौसी की मर्मातक व्यथा की ओर शायद किसीकी दृष्टि नहीं गयी उस दिन । यदि क्षमता रहती तो शायद उस दिन भी गायत्री मौसी चालीस साल पहले जैसी मनोवृत्ति लिये थर्टी-श्री अप के सामने जाकर रेल की पटरी पर लेट जाती। एक दिन जो करने जाकर डरकर भाग आयी थी एक पैर खोकर, उस दिन शायद फिर उसकी पुनरावृत्ति करती चरम अपमान की परिणति के रूप में । लेकिन तब न वह उमर थी, न खून में वह गर्मी । तब तो स्त्री का एकमात्र सहारा वह पति टाइमकीपर भुवन मजुमदार भी नहीं था, जिसके जिन्दा रहने पर कम से कम इस वेइज्जती से वच जाती गायत्री मौसी। उस दिन तपन के क्वार्टर के सामने उस हालत में खुले आसमान के नीचे गायत्री मौसी के उस निग्रह को देखकर मेरी आंखों में आंसू आ गये थे। लेकिन अचरज के साथ गौर कर रहा था कि गायत्री मौसी की आंखें । विलकुल सूखी हैं । विमूढ़ भाव से केवल देख रही हैं सबकी ओर । जैसे अपनी दशा की उपलब्धि स्वयं ही करना चाह रही हों। जैसे समझ रही हैं गायत्री मौसी कि उनका और कोई नहीं हैं। न पति, न बेटा, न वेटी, न पतोहू । कोई नहीं। बिलकुल अकेली हैं। इस अकेलेपन में वह पहली बार अनुभव कर रही हैं कि उनके अभियोग, अभिमान और तिरस्कार का लक्ष्य जो व्यक्ति था वह अब नहीं है। हो सकता है आखिर तक उनकी कुछ और दुर्गति होती उस दिन । लेकिन एकाएक उसी वक्त तपन के ड्यूटी खतम करके लौट आते ही सारे नाटक पर यवनिका पड़ गयी। टप-टप् आंसू गिरने लगे गायत्री मांसी की आंखों से एकाएक । रोते-रोते कहने लगीं गायत्री मौसी, 'अरे वेटा तपन, देख तेरी बहू ने १०४ मेरा क्या हाल किया है, अरे देख नू, देख..' और तपन भी गायत्री मोमी का वमा ही बेटा है । वह भी छुटपन में अपने माता-पिता को देखता आ रहा है । देखते-देवत उमरी नज़रो में मय दाय पुराने हो चुके हैं । बोला, 'चलो, चलो, भीतर चलो, मैं पकड़ रहा ह तुम्हें ।' गायत्री मौसी को पकड़कर भीतर ले गया वह । गायत्री मोमी भी बेटेवा हाथ पकडे लगडाते-संगडाते मारे तमागे का अन्न करके अन्दर चली गयी। वास्तव में जैमें तपन में राग-विराग नाम की कोई वस्तु नहीं थी। उसने इस घटना को भी जमे सहज-म्वाभाविक मानकर ही ग्रहण कर लिया था। तपन ने कहा था, 'धत्, यह सब तो हमारी गिरम्नी में हमेशा मे होता आया है, होता रहेगा भी। इन वानों पर मिर खपाने में वही काम चलता तपन जैसे इन लडाई-झगडे की घटनाओ को प्रतिकार के बाहर की यग्नु ममझकर निश्चिन्ततापूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था और वेवल अपने अस्तित्व को बनाये रखने को ही परम मार्यक्ता मानने लगा था। इसके बाद में और अधिक दिन चन्द्रपुरा में नहीं रह गरा। चन्दाग में मारे नाटक से विच्छिन्न होकर चक्रधरपुर चला गया था। जिम तरह इतिहाम की शिक्षा है, व्यक्ति के चरित्र में भी उमी प्रभार की एक शिक्षा मिलती है। मंमार में लोग विभिन्न घटनाओं की बारा विभिन्न प्रकार से करते हैं। भले-बुरे का विचार करते हैं, दोपगुण का निय करते हैं । ऐसे लोगों की दृष्टि में गायत्री मौसी में जो भी दोप हो, पर मैं प्रारम्भ में ही उसे उनके प्रति अन्याय मानता आया है। गायत्री मौसी को भी जीवन में मुख पाने का अधिकार था, हा या। लेकिन वह अधिकार उलंकों नहीं दिया किनीने ? इसके लिए कौन उत्तरदायी है ? बहुत दिन बाद जब कुछ दिन के लिए एक बार फिर चन्द्रग में गया था, तब तपन में मुलाकात हुई थी। तब भी वह उमी गार्ड की नौकरी पर ही या। योडी उमर बढ़ गई थी उमकी। वाल पाना शुरू हो गये थे। लेकिन चेहरा पहले ही की तरह हंगमुन था। उमने पूछा, 'माना वहा साया तुमने ।' बोला, 'पान वाबू के यहा, जबरदम्नी दिला दिया।' 'रात को कहा मानोगे?'
''ला लूंगा कहीं।' पीछे पड़ गया तपन । बोला, 'आज रात को मेरे घर खाओगे, भूल न ना कहीं।' मैंने कहा, 'लेकिन तुम तो ड्यूटी पर जा रहे हो, तुम तो घर रहोगे हो।' तपन बोला, 'मैं नहीं रहूंगा तो क्या हुआ, कुंज है, मेरी वहन है।' 'मेरे लिए तकलीफ की क्या ज़रूरत है, भाई ? तुम्हारी स्त्री की परेशानी ढ़ जायगी।' तपन ने मेरे चेहरे की ओर देखा। पूछा, 'तुम्हें पता नहीं ?' वोला, 'किस वात का?' 'मेरी स्त्री की तो मृत्यु हो गयी। बड़ा अचरज हुआ मुझे। बोला, 'अच्छा! क्या हुआ था उसे ?' 'होगा क्या ! आदमी मरते नहीं हैं क्या? हमेशा जिन्दा रहते हैं क्या आदमी ?' जैसे कोई खास बात नहीं हुई है, ऐसा भाव दिखलाया तपन ने। मैंने देखा कि तपन में कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ था। 'और तुम्हारी मां का क्या हाल है ?' 'मां उसी तरह है।" आंखों के सामने जैसे मैं गायत्री मौसी को देखने लगा। जैसे अक्षय, अजर, अमर आयु लेकर पृथ्वी पर आयी है गायत्री मौसी। एक दिन जिसने अपनी आयु को समाप्त कर देने की चेष्टा की थी, वही व्यक्ति आयु का दास वना जीवित है-यह भी क्या कम विडम्बना है ! तपन ने कहा, 'अव झगड़ा करने को कोई आदमी नहीं है तो सिर्फ मेरे ही साथ झगड़ा करती है।' कहकर हो-हो करके हंसने लगा तपन । इसके बाद वोला, 'लेकिन मेरे साथ झगड़ा करके तृप्ति नहीं मिलती मां को। 'क्यों?' 'अरे, मैं घर में रहता ही कितनी देर हूं। मुझे तो वीच-बीच में गाड़ी लेकर पूरे दिन ही वाहर रहना पड़ता है-घर में रहूंगा तभी तो झगड़ा करेंगी। माज इतने दिन बाद गायत्री मोमी की याद आने पर थोड़ा कुतूहल हुआ मन में। तबियत हुई कि जाकर देव जाऊ क्या हाल है उन मया। गायत्री मौसी ने क्या फिर कभी आत्महत्या की चेष्टा की थी पिछली बार की तरह ? या अब भी क्या जमी एक पर को लेकर झगडा करने के लिए प्रतिपक्ष को दृढ़त-बूढते हैरान होके बिस्तर पर पडी कराह रही है पहले की तरह ! जीवित अवश्य है गामनी मोमी। जिमको अभी आयु शेप है उसे कौन मार सकता है ? क्या गायत्री मौसी की क्षमता के अन्दर है आयु भी यंत्रणा में सहज ही में मुस्ति पाना ! . हो सकता है यही जीवन हो। जिन्दा रहने की स्वाहिश रह्ने पर भी जिस तरह जिन्दा रहना मुमकिन नहीं, उमी तरह मरने की स्वाहिश होने पर भी क्या मरा जा सकता है ? इसी मरने-जीने के द्वह को ही तो जीवन-मंग्राम कहते हैं। बाहरी आघात तो नियत जीवन को अस्त-व्यस्त करना चाहेगा हो, अन्तर का जीवन ही सर्वदा उसरा प्रतिरोध करेगा। यह आपात और यह प्रतिरोध, यह अत्याचार और यह प्रतिकार, यही सब तो है मनुष्य का इतिहास। अनादि युग से इमी इतिहाम ने ही मनुष्य को आज वर्तमान स्तर पर लाकर पटका है। मनुष्य को मिटा डालने की चेप्टा नयी नहीं है। उस आदिकाल में सर्वप्रथम आदिम मनुष्य को आत्मरक्षा के लिए जिस तरह अन्द्रोशा आवि- कार हुआ था, आज भी हो रहा है उसी तरह । तत्र तीर-धनुष का आवि. कार हुआ था, अब उनसे भी अधिक भयकर मारणास्त्रों का हो रहा है। वहाना वही एक है-आत्मरक्षा, पर वास्तविक उद्देश्य है हत्या। और हत्या का प्रसंग आने पर अभय की बात आ जाती है। जितना भय है संसार में, उतना ही है अभय । एक चंगेजसा या तैमूर लंग आया है और साथ ही साथ आये हैं ईसा मसीह, बुद्ध, शंकराचार्य । मनुष्य ने एक हाय में खड़ा उठाया है, और एक हाय उठाया है अभय मुद्रा में। भारतवर्ष की देव- देवियो की मूर्तियों में उस युग के मनुष्यों ने इसी अमृतवाणी गो मुद्रित करना चाहा था। उन्होंने कहा था . मनुष्य को मृत्यु नही हो सकती। दरअसल उन दिनों के आदमियों मे और आज के आदमियों में कोई फर्क नहीं है। उस समय भी जिस तरह भय था, उसी तरह अभय भी था। तब चंगेजवां थे, ईस मसीह थे। आज भी हैं चंगेजखा, पर उनके साथ हैं उन्यू० २
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एच० ऑडेन, कार्ल सण्डवर्ग, विलियम फॉकनर ।
इसके वाद जिस आदमी की कहानी कहने जा रहा हूं वह भी थे ऐसे ही एक
अभयदाता, मिस्टर बमफील्ड आई० सी० एस० । बीस साल पहले वही मिस्टर
वमफोल्ड थे बंगाल के गवर्नर के होम सेक्रेटरी। बड़ी हृदयग्राही कहानी है
उनकी। भारत स्वतन्त्र होने के बाद केवल एक बार वे यहां आये थे। तभी
मुझे उनके विषय में पता चला।
इसी कहानी को प्रारम्भ करता हूं अव :
षष्ठ बहुत दिन बाद मिस्टर वमफील्ड भारत में आये । वहुन दिन बाद पानी करीब बीस साल बाद । इस बीम साल के अरसे में कितना रहोबदल हो गया है हिन्दुस्तान में, कितना उलट-फेर हो गया है ! और यह तो होगा ही। मर जान एण्डरसन जब वगाल के गवर्नर थे नत्र के आई० मी० एम० है मिस्टर बमफील्ड । वंगाल के गवर्नर के होम मेक्रेटरो। इसी मेंट जॉन चर्च के वरिस्तान में ही जूली को दपना गये | मिस्टर बमफील्ड । जूली थी मिमेज वमफील्ड । अन्तिम दिनो मे बहुत डर गयी थी जूली । जब मिस्टर वमफील्ड मिदनापुर के मजिस्ट्रेट थे तब रात को नीद नहीं आनी थी जूली को। एक-एक करके बहुत-मे मजिस्ट्रेटो की हत्या हो गयी थी इस मिदनापुर में ही। तभी जूली कहा करती थी, 'चलो डियर, म लोग इण्डिया छोडकर होम लौट चलें।' चटगाव की आमरी पर हमला हुआ। ईस्ट बंगाल में एक के बाद एक करके अंग्रेज अफमर आतकवादियो की गोलियों के शिकार होने लगे। तर बंगाल मे कोई अफसर पोस्टिग नहीं लेना चाहता था। जमाना वाकई बहन खराब था। अफसरों के चपरासियों तक पर यकीन नहीं दिया जा सकता था। उस जमाने में भी मिस्टर बमफील्ड अन्त तक अक्षत देह से जीवित रह- कर नौकरी कर गये । और सिर्फ नौकरी ही नहीं, नौकरी के माय इक्जत भी हासिल की थी। एम० वी० ई०, ओ० बी० ई० वगैरह खिताव मिले गि से। सिर्फ वह एक ही नुकसान हो गया था उनका। एक दिन जूली की मृत्यु हो गयी कलकत्ता में एकाएक। मेडिकल कॉलेज के डाक्टर वाहान भी नहीं वचा सके उसे । ओ डियर, डियर। इतनी बड़ी क्षति को भी अतनोगत्रा महल कर लिया था मिस्टर बमफील्ड ने। एक दिन सेंट जॉन चर्च वी मिमंदी को रब में जूली को मुलाकर नौकरी छोडके चले गये ये साव। इसके बाद फिर नही आये थे भारत में। इस दरमियान बरतानिया की सरकार हिन्दुस्तान छोडकर चत उसे भी आज उन्नीस साल हो गये । नाइंटोन इयमं । एक इन्सान . ।
में उन्नीस साल का अरसा क्या कुछ कम होता है। एकाएक एक धक्का लगा वदन को। जेट प्लेन भारत की भूमि पर उतरा। मिस्टर बमफील्ड ने धीरे-धीरे कमर की बेल्ट खोल डाली। तव तक वह जेट प्लेन लुढ़कते-लुढ़कते एक जगह आकर स्थिर हो गया। मिस्टर वमफील्ड ने कांच की खिड़की में से बाहर की ओर देखा। कुछ भी नहीं पहचान पाये। बहुत दूर कतार बांधे कुछ लोग खड़े हैं। आश्चर्य ! उन्हें रिसीव करने कोई नहीं आया है आज, कोई भी नहीं। नो वडी! हालांकि एक ज़माना था जब उनके आसाम या दिल्ली से आने पर उनके ऑफिस के वाबू लोग आकर 'सियालदह या हावड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़े रहते थे। इसके बाद जव वे ट्रेन से उतरते थे, तव सवमें छीना-झपटी मच जाती थी उनके सामने आने के लिए। उन्हें 'विश' करने के लिए, उनकी नज़र में पड़ने के लिए। एक दिन मिस्टर बमफील्ड की इच्छा पर ही वहुत-से भारतीयों का उत्थान-पतन निर्भर करता था। वह भी एक जमाना था। भारत की संभवतः कोई क्षति नहीं हुई । भारत स्वतन्त्र हो गया है। पर मिस्टर वमफील्ड की क्षति हुई है, पेंशन की मोटी रकम पर व्यतीत करना पड़ रहा है अपना एकरस जीवन । जूली नहीं । जूली कैलकेटा के सैंट जॉन चर्च की सिमेट्री में अब भी सोयी हुई है। - 'पूअर जूली! वही कलकत्ता है। दैट ओल्ड कैलकेटा। इस रास्ते से बीस साल पहले बहुत मरतवा गुज़रे हैं मिस्टर वमफील्ड। इस दमदम जेल में कई बार उन्हें आना पड़ा है। कुछ कांग्रेसियों को यहां दमदम जैल के अन्दर वन्द कर रक्खा गया था। सिर्फ क्या इस दमदम जेल में ही । उस अलीपुर प्रेसिडेंसी जेल में भी जाना पड़ता था उन्हें-जहां सुभाष बोस बन्दी थे। सब याद आने लगा मिस्टर वमफील्ड को। सरजॉन एण्डरसन बड़े गुस्सल गवर्नर थे। जाति के आस्ट्रेलियन और अच्छे क्रिकेटीयर भी थे। जेल में हंगर स्ट्राइक कर रहे थे तब कांग्रेसी नेता सव। वह सुभाष बोस, 'दी स्प्रिंगिंग टाइगर', किसी तरह खाना नहीं खा रहा था। मिस्टर बमफील्ड ने जाकर रिक्वेस्ट की उनसे । कोई फल नहीं हुआ। एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गए। बड़ी वेचैनी में कटे मिस्टर वमफील्ड के ये दिन । रात को नींद नहीं आयी। एक आदमी भूखा रहेगा और वे सोयेंगे, यह कैसे संभव है ! अकस्मात् । .
गाड़ी तब होटल के सामने आकर रुक गयी थी। होटल के वॉर दौड़े आये। इसके बाद मिस्टर वमफील्ड उमी पुराने होटल में दाखिल हुए। इस होटल में आये हैं पहले भी। एक जमाना था अब यहा बहुन-मी पार्टियां हुई हैं, बहुत-से डिनर हुए हैं। बहुल दार नाना पडा है उन्हें पहा । लेकिन वह जमाना गुज़र गया है । अब उन्हें किमीने 'विग' नहीं किया। किमीने आगे बढ़कर रिमीद भी नहीं किया। अपना नाम बताया उन्होंने । उनका नाम दर्ज कर लिया गया जिस्टर में । टू हण्डेड टैन । दो सौ दस । दो सौ दम नबर के कमरे में उनके रहने की व्यवस्था हुई। ट्रेवेल एजेन्सी के माध्यम से पहले ही सब कह रक्खा गया था। सारी व्यवस्था पूरी कर रक्खी गयी थी पहले से ही। कोई अमुविधा नहीं हुई मिस्टर धमफील्ड को। अपने कमरे में आकर चारो और अच्छी तरह देना मिस्टर यमील्ड ने। काफी सजा हुआ था कमरा, एयर कण्डिशण्ड । इसके बाद उन्होंने खिड़की खोलकर बाहर की ओर देवा । बडी मुहावनी धूप निकल आयी है बाहर। लवली मन् । दूर पर गवर्नसं हाङग को देखने की कोशिश की उन्होंने । कुछ नहीं बदला है कहीं। जैसा पा वैमे ही है । मिर्फ जूली ही नहीं है। जूली इज एवमेण्ट । मिस्टर बमफील्ड टेलिफोन स्टैण्ड की ओर गये। । । वालीगंज की ओर से एक गाड़ी उत्तर की ओर जा रही थी। जिस दिन ऑफिस रहता है उस दिन गाड़ी नियम से टोक सुबह के नौ बजे आती है। इस बड़े होटल के सामने से गुजरकर फिर थोड़ा आगे बढ़कर वापी और मुद्र जाती है। मिस्टर दैनी गाड़ी के पीछे की सीट में चुपचाप बैठे रहते हैं, और रहीम वड़ी होशियारी से सबको वचाकर सामने से आता है गाड़ी वो। बहुत दिन का पुराना ड्राइवर है रहीम । चालोम साल पुराना ताइमम है उना। मिस्टर बैनर्जी की गाड़ी चलाने में पहले वह और बहुत-मे मोटर-मालियों का बहुत मारी व्यक्तिगत और गोपनीय क्रिया-कलापो का मूक साक्षी रहा है, जिन्हें जानना और किसी के बस की बात नहीं। र मावलाये और गरे ।
रहीम बोला, 'सलाम रामप्रसाद भइया।' रामप्रसाद ने पूछा, 'वैनर्जी साहब का मिज़ाज कैसा है आज रहीम हव!" . रहीम बोला, 'साहवों का मिजाज कभी दुरुस्त रहता है रामप्रसाद ? हवों का मिज़ाज कभी दुरुस्त नहीं रहना चाहिए।' 'क्यों भइया, दुरुस्त क्यों नहीं रहना चाहिए ?' रहीम ने कहा, "मिज़ाज दुरुस्त रहने पर तो.साहबों का रौव ही नहीं मानेगा कोई रामप्रसाद ।' 'बड़ी अजीव दुनिया है भइया, ताज्जुब की बात है।' इसके बाद करीव की एक पान की दुकान पर जा खड़ा हुआ रहीम । सही मानों में दुकान नहीं कहा जा सकता है इसे। दो वांस के डंडों पर टाट का छाजन टांगकर पिछले कई महीनों से चालू हुई है यह दुकान । गैरकानूनी दूकान है यह। गैरकानूनी है दुकान तभी खैरात करनी पड़ती है। पुलिस कान्स्टेबल या राइटर्स विल्डिंग के दरबान-चपरासियों को मुफ्त पान-बीड़ी की भेंट देनी पड़ती है। रहीम वहीं जाकर बैठ गया। फिर बोला, 'ज़पित्ती वाला पान दो भइया लेकिन बहुत दिन पहले जब रहीम शुरू-शुरू में आया था इस नौकरी में, व ऐसा नहीं था। साहवों का ज़माना था वह । साहबों के ज़माने में इस तरह पान-बीड़ी का इस्तेमाल नहीं चल पाता था। गाड़ी की स्टियरिंग पर बैठा रहना पड़ता था। एक बार एक साहब ने ड्राइवर को बुलाया, गाड़ी छोड़कर कहीं चला गया था तव ड्राइवर । चपरासी के आकर ढूंढ़ने पर ड्राइवर नहीं मिला था। फौर नौकरी से वरखास्त हो गया वह । वेकार हो गया वेचारा। इन सब वाकियों को जानता है रहीम, सिर्फ रहीम ही नहीं, सब जान हैं। ये सब किस्से उन दिनों बॉय-वैरा-चपरासियों की जवानों पर फिरते र थे राइटर्स बिल्डिंग में, इनपर नुक्ताचीनी होती थी, बहस चलती थी। साहव अच्छा है, कौन साहव खराव है, यह जवान ही ज़बान पर फैल' था तमाम चपरासी-ड्राइवरों की जमात में। इसके बाद उस बार वह वाकिया हुआ। वही खून-खरावा । राइटर्स वि में घुसकर ही लोमैन साहब को मार डाला स्वदेशी वालों ने । खून का चलने लगा बेचारे लोमैन साहब के मुंह से । १४४ छोटा या तव रहीम। चारों ओर पुलिस की सीटी बज उठी, भगर गुरु हो गयी पिय के सामने। गोली चलने की आवाज आने लगी कान मे। पाप के साथ तमदार में नौकरी की कोशिश में लगा पा रहीम । सेमिन सग नही रहो पी गोस। बाप कहता था, 'लगेगी, लगेगी, तेरी नौकरी हरगेगी।' पहले दफ्तर में चपरासी की नौकरी की कोशिश पी जगके माप । पार चपरासी था, लड़के को भी चपरासी ही होना था तय। लेकिन बहुत कोगिश करने पर भी रहीम को जप गौतारी नहीं firitre बड़ी ठेस पहुची बाप को। आखिर मे कोई दूसरा चारा न देवकर याप ने उगे गोटर मारीशीको भेजा। तब मोटर-ड्राइविंग सिगाने के इतने रसूल-फॉरोग नहीं थे। गती. उसकी खुशामद करके स्टियरिंग पर बैट-बैटकर तगाया हासिल करता गाता । फिर एक साहब आया। उसका नाम था बमपीस पारम। गri छोटे लाट माहब का होम-गेटरी। उगीगी मेग पाहय को गाभा गया रहीम। छोटे लाट साहब के जनानपाने में गया पा रहीग का याग, शाही को भी ले आया था। देखने में गजब की गूबसूरत थी मेम साहय, उसी यमपीला गाय की • मेम । उसने पूछा, 'यह कौन है ?' करीब ही खड़े एक बैरा ने कहा, 'इगफा याप पोर्मन मायामाग चपरासी है।' मेम माहब ने पूछा, 'यह क्या करता है?' वंरा ने कहा, 'हुजूर, यह मोटर साइविंग जानता र मोहीमही मिल रही है इमे।' तब तक वाप भी या गया था वहा। मेम साहब को देयने ही याप ने बड़े अदव गाकर गलाम किया। "तुम्हारा लड़का नोकरी करेगा? 'नौकरी मिरन पर ना मंगे जिन्दगी व आगगी हुनबालना एक वमीला हो जाएगा।' १४४ दखा जाए ता उसा दिन स हा नाकरा मिल गया रहाम का, ड्राइविग लाइसेंस तक नहीं देखना चाहा। पूछा तक नहीं कि लाइसेंस नया है या पुराना। जव साहब घर लौटे तव पोर्टिको के पास खड़ा था रहीम । साहब को देखकर समझ गया कि उसीका नाम बमफील्ड साहव है। विना कहे-सुने सीधे सलाम ठोक दिया रहीम ने। साहब ने पूर्ण था, 'कौन हो?' रहीम ने सामने जाकर कहा था, 'आपका नौकर, हुजूर !' उसकी बात सुनकर वमफील्ड साहब को अचम्भा हुआ था पहले। आज से पहले तो साहब ने उसे कभी देखा नहीं था। लेकिन मेम साहव ने वहां आकर सारा मामला साफ कर दिया था। कहा था, 'मैंने उसे अपना ड्राइवर रक्खा है आज से।' 'ड्राइवर? क्यों, वह ड्राइवर कहां गया?' मेम साहब बोलीं, 'उसे मैंने डिसचार्ज कर दिया है।' 'बाई ? क्यों?' मेमसाहब ने कहा, 'ही वाज़ ए मोस्ट डिसओविडियेट फैलो, मोस्ट अनपंक्चुअल ।' साहव ने और कुछ नहीं कहा, दोनों भीतर चले गये बातें करते-करते। साहव के दिमाग में तव एक तूफान उठा हुआ था। बहुत-से बखेड़े फैले थे तब बंगाल में । स्वदेशी वाले पिस्तौल चला रहे थे अंग्रेज़ों पर। बहुत-से साहब उनकी गोलियों के शिकार हो चुके थे। और मुल्क का हाल भी खराब था तव । अंग्रेज यकीन नहीं करते थे हिन्दुस्तानियों पर । बहुत जांच-पड़ताल के बाद नौकरी में लिये जाते थे देसी आदमी। बंगाली वावुओं के पीछे पुलिस के गुरगे लगे रहते थे। वे लोग तव 'वन्दे मातरम्' का नारा वुलन्द करते थे। वन्दे मातरम् ! यह नारा याद है रहीम को अभी तक । रहीम के बचपन में पार्क की सभाओं में बंगाली वावू लोग 'वन्दे मातरम् कहकर चिल्लाया करते थे। विलायती कपड़ा जलाते थे। गांधी महाराज का जुलूस निकालते थे। और एक नामी आदमी था तब-उसका नाम था सी० आर० दास । जब रहीम बमफील्ड साहव को गाड़ी में लेकर जाता था, तब वीच-बीच । ! । १४६ । । मे कुछ और माह्व भी रहते थे, पुलिम के बड़े साहव भी रहते थे यहुन-गे मौतों पर। वे अंग्रेजी में बातें करते रहते थे आपम में। रहीम की ममह में कुछ नहीं आता था। लेकिन बीच-बीच में उनकी जवान पर आये दोनाक आदमियों के नाम, दो-एक चीजों के नाम मुनकर समझ जाता था। गाधी वा नाम, कभी मी० आर० दाम का नाम, कभी 'वन्दे मातरम्', कभी पिस्तौल को गोली। वे दिन ही अलहदा थे। लेकिन हमेशा साहब को नहीं ले जाना पड़ता था। गाड़ी में कभी-कभी साब और मेम साहब दोनी चढते । अधिकतर मेम मार ही चहनी थी। घडी खूबसूरत थी मेम साहय । रहीम गाड़ी चलाता और मेम माहव पोहे की मीट पर बेटी रहती । तर कलकत्ता की सड़को पर इतनी गाड़िया नहीं चलती थी। गाडी देखने पर सड़क पर लोग हट जाते थे। तव माह्व-मेमों के प्रति भक्ति थी बगानियों के मन में। साथ ही डर भी था। मेम साहब होटल में जाती। होटल में जाकर क्या करती थी यह नहीं देख पाता या रहीम । इसके बाद जव नौटती तव अक्सर बहुत रात हो जाती थी। भीतर जाकर या तो नाचती यी, या साना खाती थी। इसके बाद जब गाड़ी में आकर चढ़ती थी तब उनके बदन मे भराव की बू आमा करती, लेकिन शराब के नगे में कभी अपना काबू नही योती भी मेम साहब। उसी नशे की हालत में मेम साहब वरूशीश देती थी रहीम को। तब रपये की कीमत थी। कभी-कभी एक-दो रपये तक दे डालती थी बख्शीश में। मेम साहव कहती थीं, 'यहीम, साहब को कुछ न बताना।' किन रहीम क्या नहीं कहेगा साहब को, यह नहीं बताती थी। वागीय देकर रहीम का मुंह चन्द कर देती पो सिर्फ । लेकिन दिन-ब-दिन मेम साहब का यह वैहिसावपन का रक्या तूल पकड़ने लगा। आखिर यह वेहिसावपन नहीं था तो या क्या ! बहुत मान रहने ये तक साहब ऑफिस के कामकाज में । और तब काम भी बहुत था ऑफिम में। सारे कलकत्ता मै तब धरपाड़ का जोर था। पुलिस कमिश्नर की हत्या का पड्यान कर रहे थे क्रान्तिकारी। साहब को वात-बात पर बाहर जाना पड़ता था।
- आज ढाका, कल मैमनसिंह, परसों वारिसाल । वारिसाल ही तब सबसे ज्यादा गरम था। साहब की कमर में हरदम रिवाल्वर बंधा रहता था। इसी तरह साहब हिल्ली-दिल्ली घूमा करते थे। लेकिन बाहर से बहुत दिन बाद लौटकर अकसर पाते थे, मेम साहब घर पर नहीं हैं। साहब सबसे पूछते, 'मेम साहब कहां हैं ?' कोई नहीं वता पाता कि मेम साहब कहां हैं, और जानने पर भी मुमकिन नहीं था बतलाना। धूस देकर सबका मुंह वन्द कर रक्खा था मेम साहब ने और उधर शायद रहीम मेम साहब को लेकर डायमण्ड हारबर के रेस्ट- हाउस में जा पहुंचा होता। मेम साहब अकेली नहीं होतीं, साथ एक साहब भी रहता। जैसे इस वक्त वैनर्जी साहब को ले जाता है रहीम, उसी तरह । बैनर्जी साहव के साथ कौन रहता है, किसके साथ बैनर्जी साहव डाक बंगले में रात विताते हैं, बैनर्जी की मेम साहव को यह बतलाने की वर्जना है। हालांकि यही वैनर्जी साहब तव छोटे ओहदे पर काम करते थे सेक्रेटरियट में। वमफील्ड साहब के कमरे में घुसने की हिम्मत ही नहीं होती थी वैनर्जी साहब की। उन दिनों सेक्रेटरियट के चारों तरफ पुलिस के कड़े पहरे का प्रवन्ध रहता था। बाहर का कोई भी आदमी बिना परमिट के अन्दर नहीं जा पाता था। लोमैन साहब की हत्या के बाद से ही यह नियम लागू हो गया था। रहीम का भी एक आइडेंटिटी कार्ड बना। रहीम ने एकाएक साहब के कमरे में जाकर देखा कि वमफील्ड साहव बैनर्जी साहब को बुरी तरह डांट रहे हैं। किसी अनजाने आदमी को वैनर्जी साहब ने आइडेंटिटी कार्ड दे दिया था। 'तुमने विना अच्छी तरह जांच-पड़ताल किये कार्ड क्यों दे दिया ? ह्वाई? 'मुझसे गलती हो गयी है, सर।' 'नो नो नो.. सहसा बमफील्ड साहब ज़ोर-जोर से सिर हिलाने लगा-'नो नो-नो.' फिर कहा, 'गलती हो गयी है कहने से.ही तुम्हारा यह संगीन कसूर माफ नहीं हो सकता। अंग्रेज सात समुन्दर तेरह नंदी पार करके क्या हिन्दुस्तान में झूठमूठ के लिए आये हैं ? हम लोगों को किसी पर यकीन नहीं है। हम लोग १४८ ब्रिटिश हैं, एशिया में हमने माम्राज्य बनाया है अपनी शक्ति और बुद्धि के बल से । हमने किसीपर विश्वास नहीं किया, न विश्वास करते हैं, करेंगे भी नहीं. ? बैनर्जी साहब ने अपना दोष स्वीकार करके कहा, 'मैं जानता है, सर।' 'देन हाई, उम आदमी को तुमने आइडेंटिटी कार्ड दिया ? हाई ? (यू मो हिम" बैनर्जी माहब चुप रहे। 'जानते हो पुलिस कमिश्नर की रिपोर्ट में उम आदमी को वाप्रेम का म्पाई कहा गया है 'नही मर, मुझे नहीं पता था, गलती के लिए माफी मांगता है।' गरज उटै बमफील्ड माहब, 'इण्ठिया में बहुत-सी जानिया है, जानते हो मवमे ज्यादा हम लोग किममे डरते है ! वह है यह वगावी जाति। हालाकि तुम भी बंगाली हो वैनर्जी, लेकिन हुकूमन के काम में सबको दुवार देने में तो काम चलेगा नहीं। सव वगालियों को अगर छोड़ दें तो काम कैग चलायेंगे हम ? तभी तुम जैसे कुछ बंगालियों की हुकूमत के इतजाम के लिए ले लिया है । नुम लोगो को रपये देकर काम कराये मे रहे हैं। तुम लोगों में गे रिगीरी 'रायसाहब' या 'रायवहादुर' बना दिया है, किमीको 'लार्ड बना दिया है। जैसे लार्ड मिन्हा । वट वी डोट बिलीव यू पीपल' बनर्जी साहब ने कहा, 'लेविन मर, मैंने ही पद दम आनकवादियों से पकडवा दिया है, फामी भी हो गयी है आको।' 'नो मिर्फ दमट्टी को ? मुना है दैट मुभाष बोमन आन्मी ए टेररिस्ट।' बनर्जी माहय ने कहा, 'हा मर, मैंने भी मुना है यह ।' 'तो उसे नहीं पकडवा माने?' बनर्जी माहब ने जवाब दिया, 'क्यों नहीं मर, थोड़ी वोगिक करने पर यह भी कर मगा। मेरा मुयाल है मर, आल वेंगोलीज आर टेररिस्ट्स । नमान बंगाली टेररिस्ट है।' 'हाफ डू यू नो दैट ? तुम्हें कमें पता चला इमा?' बनर्जी माह ने कहा, 'मुझे मब पता है मर, मुझे उम्मीद है कि एक दिन मरको पकड़वादूगा, जितने लोडर हैं काग्रेम के, मी' 'टीक है, जल्दी करो, दैट एंज क्विाली ऐज पामिवर जितनी जल्दी हो म पकडवा दो मवको। अधिक दिन और में यह टेनगन नहीं वरदात कर १४६ , पा रहा हूं। देखो बैनर्जी, अभी नयी शादी करके आया हूं इस होम-सेत्रोटरी का काम करने, मेरी होम-लाइफ नहीं है कोई, मैं होम-लाइफ एनज्वाय नहीं कर पा रहा हूं। इस कांग्रेस पर काबू पाकर मैं थोड़ा आराम ने घर में रहना चाहता हूँ। मिसेज वमफील्ड इज टायर्ड ऑफ दिस सर्विस । मेरी इस नौकरी से परेशान हो उठी हैं मिसेज़ वमफील्ड।' इसके बाद एकाएक रहीम को देखकर बमफील्ड साहब ने पूछा, 'बाट रहीम, क्या चाहते हो?' रहीम बोला, 'हुजूर, मेम साहब ने यह चिट्ठी दी है।' रहीम जानता था कि मेम साहब की चिट्ठी में क्या लिखा है। मेम साहब ने लिखा है कि रहीम को लेकर वे बहुत दूर घूमने जा रही हैं, या तो डायमण्ड हारवर या फालता, या रांची, या हजारी वाम, या और कहीं। कुछ अच्छा नहीं लग रहा है और मेम साहब को। कब लौटेंगी, ठीक नहीं। कुछ ख्याल न करना डियर, आई एम फोलिंग वेरी लोन्ली । चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते वमफील्ड साहब की नाक से एक गहरी उसांस स्वतः ही निकल गई। और किसीने उसपर भले ही गौर न किया हो, रहीम ने देख लिया था उसे। लेकिन कर भी क्या सकता था रहीम ? वमफील्ड साहब की वीबी को तो बहुत दिनों से देखता आ रहा था रहीम । न जाने कहां के एक साहब के बच्चे को साथ लिए गाड़ी पर चढ़ती थीं मेम साहब और रहीम हवा से बातें करता हुआ गाड़ी चलाये जाता था। कहां जायेंगे दोनों, यह भी निश्चित नहीं रहता था। मेम साहब कहती, 'जिधर तुम्हारी खुशी हो चलाओ रहीम, जिधर तुम्हारी मरजी हो।' रहीम किसी दिन जाता था सीधे ग्राण्ड ट्रंक रोड होकर पश्चिम की ओर, किसी दिन उत्तर की ओर, किसी दिन दक्षिण की ओर। उधर बमफील्ड साहव का मिजाज वैसे ही कड़ाहो उठा था। देश की दशा जैसे-जैसे जटिल होती जा रही थी वैसे-वैसे ही उग्र बनती जा रही थी साहब की प्रकृति । इसी हालत में एक दिन साहब घर लौटे। आते ही पूछा, 'मेम साहब कहां हैं ?' शक तो बहुत दिनों से हो रहा था। साहब को लग रहा था कि उसकी आंखों की ओट में जिस तरह बैंगोली टेररिस्ट्स उनके साम्राज्य के खिलाफ १५० माजिश कर रहे हैं, वैसे ही बड़ी पोगीदगो मे जैसे उसकी फैमिली लाइस में भी कोई माजिग बन रही है। रान बड़ी मूनी मालूम हुई मिस्टर बमफील्ड को उम दिन । उमे लगा जैमें वगाली टेररिस्टम उमकी रात को नीद, दिन की शान्ति, परमी स्त्री-पब कुछ हीनकर भाग गए है। 'रहीम कहा है " रहीम मेम माहव को गाडी में लेकर गया है हुजूर।' 'ठीक है। और कुछ नहीं कहा यमफोल्ड साहब ने। और किमीको कोई हुकुम नहीं दिया बेंगाल गवर्नमेंट के होम-मेटरी नै। फिर एकाएक एक काम कर बैठा। एकाएक गवर्नर को टेलीफोन कर बैठा। मर जॉन केसो तब गवनर थे। 'येम बमफील्ड ? हाट इज इट?' वमफोल्ड ने कहा, 'योर ऐक्मोलेन्मी, अभी-अभी एक मीग्यिम यवर मिल है मुझे।' 'वमा खबर है ?' निम्दर वमफील्ड ने कहा, 'मुबर मिली है कि कलकता में एर अररा- इजिंग होगी आज।' 'अपराईजिंग ' कलकत्ता में ? आज? बाट डू यू टॉक' "येस, योर एक्नीलमी। मुझे एक कॉनफोशल मोम में सबर मिली है कि कलकत्ता के बाग्रेमी एक अपराइजिंग करेंगे, आजही। उन्होंने तय किया है कि आज रात को गवर्नम हाउस में बम फेंकेंगे। 'अच्छा! आर यू स्योर " मिन्टर बमफोल्ड ने कहा, 'दमीकी नयाने में लगे है वरना के तमाम कांग्रेमी।' अचम्भा हुआ मर जॉन केमी को। वोले, लेकिन गाधी तो मुझने मिलकर कह गए हैं कि आखिर तक नॉन-बायोलेंट रहगे वे लोग। मिस्टर बमफील्ड ने कहा, 'मिस्टर गान्हि इज ए लापर 'यह कैम हो माता है ? लार्ड इरविन ने तो मुझमे एमी बात नहीं रही है। लार्ड इरविन ने तो मुझसे कहा है . गान्हि इज ए गुड मैन ।' मिस्टर वमफील्ड वोले, 'बेकिन मेरी सबर दूसरी तरह को जाम पेक्ट ऐन अपराइजिंग।' 'तव क्या करोगे? क्या करना चाहते हो?' मिस्टर वमफील्ड वोले, 'मैं करफ्यू डिक्लेयर करना चाहता हूं।' 'करफ्यू ?' 'येस, योर एक्सीलेंसी। 'लेकिन कब से कब तक?' मिस्टर वमफील्ड ने कहा, 'करफ्यू अभी शुरू करना चाहता हूं, इसी क्षण और सिचुएशन देखकर हटा लूंगा।' 'ऑल राइट। सर जॉन केसी अपने होम-सेक्रेटरी की बात नामंजूर नहीं कर सकते। तभी फोन कॉल चला गया पुलिस कमिश्नर के पास । खवर गयी रायटर को, ए० पी० आई० को। खवर गयी ऑल इण्डिया रेडियो को। खबर फैल गयी दुनिया भर के शहरों में-गांवों में जनपदों में । खवर थी : कलकत्ता में कांग्रेस पार्टी लड़ाई के मौके का फायदा उठ कर गवर्नर्स हाउस पर हमला करना चाहती है। इसलिए सब जगह करफ्यू जारी करना पड़ा। कलकत्ता शहर में यों ही तव ब्लैक-आउट चल रहा था पूरी तरह। अकाल पड़ा हुआ था बंगाल में। गांवों से झुंड के झुंड लोग चले आ रहे थे कलकत्ता के लंगरखानों में। 'मांड़ दो, मांड़ दो', कहकर चिल्लाते थे अली- गली में। यह उसी वक्त की कहानी है। रहीम तव वमफील्ड साहव की मेम साहब को लेकर रांची के रेस्ट हाउस में था। मिसेज़ बमफील्ड तमाम दिन एक छोकरे साहव के साथ शराब पीती है, नाचती है, गाती है। रांची के होटल का दिन तव रात में तबदील हो जाता, कभी फिर रात भी दिन वन जाती। मेम साहब की जवान लड़खड़ाने लगी थी तव । इसके बाद जब एक दिन नशा टूटा, तव खयाल आया कि कलकत्ता नाम की एक जगह है भुगोल में, मिस्टर वमफील्ड नाम का एक पति भी है मेम साहब का। और इसके अलावा सभी तरह के नशे का एक अन्त भी तो होता है, सभी प्रकार की मदिराओं में एक अवसाद भी होता है। तव फिर हांक हुई रहीम की। तब फिर होश हुआ मेम साहब को।
पुकारा, "रहीम।' रहीम हाजिर था हुजूर में। बोला, 'हुजूर । मेम माहव बोली, 'चलो।' . 7. रामप्रसाद बोला, 'भइया दुनिया बदल गयी।' एक पुराना और समझदार आदमी होने के नाते ड्राइवरी की जमान में बड़ी इज्जत थी रहीम की। रहीम बोला, 'दुनिया का तुमने अभी देखा ही क्या है रामप्रमाद? दुनिया तो मैंने देखी है। देखा भी बहुत है मैंने, जाना भी बहुत है।' तभी बहुत देखकर और बहुत सुनकर अब चुप पड़ गया है रहीम । तभी बनर्जी की मेम साहब जब खोद-खोदकर माहब के बारे में पूनी हैं तब चुप रहता है रहीम । बहुत बशीश पाकर भी कुछ नहीं कहता है, मिर्फ करता है, 'मुझे पता नहीं हुजूर । एकाएक लगा कि डलहौजी स्क्वॉयर में चारों ओर जैसे बड़ा शोरगुन मच गया। रामप्रमाद बोला, 'क्या हुआ भझ्या रहीम भी जपत्ती वाला पान चबाते-चबाते मब देख रहा था। बोला, 'शायद गोली चली होगी।' 'गोली? कहां?' यह इलहौजी स्क्वायर की चिरचरित घटना है। कोई गौर नहीं करता इसपर । गोलो चलती है और काम भी चलता रहता है। कलकत्ता शहर की तरह ही अनिश्चित जीवन है डलहौजी स्क्वायर का। लोग काम करते-करते एकाएक सुनते हैं शायद श्याम बाजार में गोली चली है, या धर्मतला में। हो सकता है मरने की भी खबर आती है कान मे, घायलों को अस्पताल में भेजने की खबर भी मिलती है, लेकिन इसपर सिर नही पपाता कोई। फिर अगले दिन नियमित जीवन जैसे चल रहा था यैसे ही चलता रहता है। सहसा बैनर्जी साहब का चपरासी दौड़ते-दौड़ते आया । बोला, रहीम ! साहव बुला रहे हैं तुम्हे-साहब वुला रहे हैं फार थे।' 'साहव बुला रहे हैं ? क्यों ? साहब कहीं जायेगे क्या?' !
'यह तो नहीं पता, अभी बुलाने को कहा है।' आखिर हुआ क्या है ? साहव तो इस तरह कभी नहीं बुलाता है रहीम को। कहीं जाने की जरूरत पड़ने पर साहब खुद ही चला आता है। 'गोली चली है क्या भैया?' 'मालूम नहीं।' 'तव इतना शोरगुल क्यों हो रहा है आस-पास में?' 'क्या मालूम।' रहीम जल्दी से मुंह का पान थूककर राइटर्स बिल्डिंग के भीतर दौड़ा गया। उधर ऑफिस के अंदर एकाएक फिर मिस्टर वमफील्ड से मुलाकात हो जायगी, यह नहीं सोच पाये थे वैनर्जी साहब । फोन आते ही वैनर्जी साहब ने रिसीवर उठाया। बोले, 'कौन ?' ऑपरेटर वोला, 'सर, होटल से मिस्टर वमफील्ड आपसे बात करना चाहते । 'कौन बमफील्ड?' 'ये सर, बहुत दिन वाद इण्डिया आये हैं। पहले वे थे बंगाल गवर्नमेंट के होम सेक्रेटरी...' 'मिस्टर वमफील्ड ! यह कहो। गिव हिम इमीडियेटली, लाइन अभी दो उन्हें।' और उसके बाद ही वही गम्भीर आवाज़ सुनाई पड़ी टेलीफोन पर । वही अतिपरिचित आवाज । एक दिन जिस आवाज से कलकत्ता शहर चौंक पड़ता था। 'आरय वैनर्जी ?' गुड मॉरनिग मिस्टर वमफील्ड ! आप कब आये ?' मिस्टर वमफील्ड वोले, 'मैं तुमसे एक बार मिलना चाहता हूं वैन ।' मिस्टर बैनर्जी बोले, 'मैं ही आऊं सर आपसे मिलने ?' मिस्टर वमफील्ड वोले, 'नहीं, मैं ही आ रहा हूं-बट ह्वाट इज दिस? इतना हल्ला-गुल्ला क्यों हो रहा है ?' मिस्टर बैनर्जी वोले, 'सर, आप तो सब जानते हैं, कलकत्ता का तो यही हमेशा का हाल हैं।' 'अच्छा, मैं भा रहा हूं।' कहकर मिस्टर वमफील्ड ने फोन छोड़ दिया। 'यस, ..
और थोड़ी ही देर बाद सीधे चले आये राइटमं विडिग में। आतंही बोले, 'हैलो, हैलो, हैलो मिस्टर बनर्जी बड़े हो गये, 'बदा मौभाग्य है मेरा, आपरी नदिपन कमी " बमफील्ड साहब बोले, 'मम् द्रवल चल रहा है तुम लोगों का वनों ? हमारे जमाने में जो ट्वल था अव भी धैसा ही है क्या? थोडा भी कम नहीं हुआ? 'नही मर, अब भी कम नहीं हुआ। वल्लि और बढ़ रहा है यह।' मिस्टर वैनर्जी बोले, 'मेरी वजाय आप ही ज्यादा अच्छी तरह बता माने हैं इसका सबब, मर।' 'लेकिन मैं तो बहुत दिनों से आउट-ऑफ टच ह । हुआ क्या है हाराज दी ट्रबल ? बताओ मुझे तुम।' मिस्टर बनर्जी ने कहा, 'ट्वल की बात अगर कही जाय तो वह एक लवा किम्मा हो जायगा, वह भी मुनाऊगा मैं आपको। जानते है मर, नमाम दिन यही बात मैं सोचता हू कि ह्वाट इज दिम ? क्यों हो रहा है ऐमा ? मोवा. सोचते दिन-रात कट जाने हैं, मुझे कोई समाधान नहीं मिलता।' 'हाऊ इज योर वाइफ ? मुम्हारी पत्नी कैसी है।" बैनर्जी साहब बोले, 'पत्नी से पिछले सात दिन में मेरी मुलाकात नहीं 'इसका मतलव बनर्जी साहब वोलं, 'मुलाकात करने का वक्त ही नहीं मिला। बदत-मी फाइलें लेकर घर जाता हूं, रात को भी घर पर काम करता है।' 'अच्छा! म्हारी स्त्री तो तुम्हारे साथ ही मकान में रहती है न ?' "स, तो भी मुलाकात नहीं होती।' स्तंभित-मे हो गए सुनकर बमफील्ड साहव । बोले, 'ड्यू नो बैनर्जी, आई कमिटेड दी सेम मिन्टेक। मैंने भी यही भूल की थी।' मिस्टर बनर्जी बोले, लेकिन क्या करूं, बहुत काम है। यह देगिए न, शायद याज ही करपयू डिक्लेयर करना पड़ेगा।' 'करफ्यू ? क्यों?
एकाएक रहीम कमरे में आया। आंकर वमफील्ड साहब को देखकर हैरत में आ गया। रहीम हो न?' रहीम ने बहुत दिन बाद साहब को देखकर सिर झुकाके हिन्दू कायदे से सलाम किया। और फिर बोला, 'आप अच्छी तरह है, हुंजूर?' मेम साहब कनी हैं, यह भी पूछने जा रहा था। लेकिन वात जवान से निकलने जाकर भी अटक गयी। वहां खड़े-खड़े ही रहीम जैसे सारी दुनिया की ही परिक्रमा कर आया। यह वही वमफील्ड मात्र हैं। उने याद है, तब गाड़ी लेकर लौट रहा था रहीम रांची से। पीछे की सीट र थी शराब के नशे में चूर मेम साहब और साथ में था वही छोकरा साहब ? गाड़ी हावड़ा स्टेशन के पास आते ही रात हो गयीं। संधेरा छा गया वारों ओर । रास्ते की सारी रोशनी वुझा दी गयी थी। थोड़ा डर लगने लगा रहीम को । वह क्या हुआ? ऐसा क्यों हुआ एक जगह पुलिस ने आकर गाड़ी रोक दी। 'हून देवर ? गाड़ी में कौन है ? रहीम ही ने जवाब दिया, 'वमफील्ड साहब की मेम साहब । बैंगोल गवर्नमेंट के होम-सेक्रेटरी।' 'घर नहीं ला सकते । करफ्यू है उधर ।' लेकिन वमफील्ड साहब का नाम सुनकर और मेम साहब का चेहरा देख- कर पुलिस ने आखिरकार गाड़ी छोड़ दी। अंधेरा ही अंधेरा था कलकत्ता की सड़कों पर। बड़ा बाजार होकर आ रहा या रहीम । बड़ा डर लग रहा था रहीम को। एक और जगह पहुंचने पर एकाएक एक कड़कती हुई आवाज सुनाई पड़ी, 'हून देअर ?' रहीम के कुछ जवाब देने के पहले सामने खड़ी एक दूसरी गाड़ी पर से उतरकर एक सार्जेण्ट चला आया वहां । फिर भीतर झांककर ही उसने फट् से कमर में बंधी पिस्तौल निकाल कर मेम साहब की ओर निशाना साध के लेकिन जिस बात को कोई नहीं जानता, उसको किसीका न जानना ही १५ अच्छा है। रहीम भी तब पागत की तरह हो गया पा। सामने की और नजर जाते ही देवा पाकिर गाए और है, धमफील्ड माहब खुद है । करफर मे निाने मेम साहर पोको - एक बैनर्जी साहब उठ पड़े । रहामा सपना भी टूट गरा। बनर्जी साहब बोले, 'रहीम गाडी तैयार करो, पगा।' इसके बाद बमफील्ड साहब की ओर देयमार पोरे, 'निगर, Rो आपका वह पुराना कलकत्ता दिपलाऊ, देड ओलया औरयोग मिस्टर वमफील्ड भी उठ पड़े। पोले, 'सेलिर्जी, आई .in जो भूल की है तुम न करना मेरी तरह यह भूल । पगिती माता मेरी तरह। नहीं तो आपिर मे बुढ़ापे में मेरी जो हापा नही भी होगी। कण्ट्री हमेशा रहेगा, उगगी ममग्याए भी गागी, ना gran मानमिक गान्ति नष्ट हो जाने पर यह फिर गही मोटेगी। मेरी fail. भर तब निरुद्देश्य घूमते रहना पडेगा।' चमफील्द माहब की बात सुनकर बनर्जी गााय अ आ गई। बोले, 'आप क्या कह रहे हैं, मेरी गमा में नही आ res।' यमफील्ड माहब बोले, 'तच सुनी, ग यान को कोई नही ATTIT जॉन कमी भी नहीं जानते थे। मैंने ही अपनी ग्रीी fm करफ्यू डिक्लेयर कर दिया था। फिर गया परदा हो गया मागास ड्रेस पहनकर । उस दिन मैंने अपने हाय ही अपनी ग्रीमा गोभी जा" यो वनजी माहव आज भी है मटेरियट में, मिटायगर भाग दुनिया में कहीं न कही हंगे। उनके न होने पर भी कामना गट की मिट्टी में दनरी म्बीरी का मारा है। यही नहीगraritam मन्त्र चरित्र ही बहीन कही रिनानगी मन में भी मापद पृथ्वी के रिमांकाने पात्र मदन जगदमीntrant दिला रहा है। गगन में, आप ही। मित रही सभी बनने कान में महल। किरनीवन में मदद। म्दन भरका कलर माह पहरामांग aniri पाटीपालना और बद गायनgramirar AN 1" के कारण कोई और दूसरा रास्ता चुन लेंगे । और केदार वोस ? केदार तो मरके जिंदा हैं। लेकिन रूपरतन बोस ?जब तक रूपरतन बोस जियेगा तव तक रूपरतन वोस में ही केदार बोस का दारिद्रय् अक्षय-अमर होकर उजागर वना रहेगा। इसीलिये वह वात अच्छी लगी थी मुझे । वही विलियम फॉकनर की कही हुई वात । मनुष्य मर नहीं सकता, मानव जाति का अंत नहीं हो सकता। तपन की मां तो मरना ही चाहती थी, लेकिन क्या मर पायी ? और यदि मर जाती तो पृथ्वी से क्या मनुष्य का निशान मिट जाता ? मृत्यु मनुष्य को वारंवार प्रलुब्ध करेगी, आघात करेगी, इन्सान को मिटाना चाहेंगी, पर मनुष्य ने भी उसी मृत्यु से बचने के लिए अमृत का आविष्कार किया है। मनुष्य ने ही कहा है : येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् । यह अमृत ही मनुष्य को मृत्यु की नश्वरता से सर्वदा रक्षा करता आया है। सर्वदा रक्षा करता रहेगा। मानव का अंत नहीं होगा, मानव का विनाश नहीं होगा। मृत्यु चाहे जितना मनुष्य का चिह्न मिटना चाहे, वह अजर-अमर-अमृत है । विलियम फॉकनर ने इसी शाश्वत सत्य की ही पुनरावृत्ति की है अपने नोवेल पुरस्कार-सभा के भाषण में : 'आई डिक्लाइन टु एकसेप्ट द एण्ड ऑफ मैन ।'
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