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Aadhunik Kavya Pravratiyan Ek Punarmulyankan
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आधुनिक काव्य प्रवृत्तिया. एक पुनर्मूल्याकन डा० गणेश खरे
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आधुनिक काव्य-प्रवृत्तियां: एक पुनर्मूल्यांकन
डा. गणेश खरे
शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय,
रामनारगांव, म०प्र०
पुस्तक संस्थान
१०१/५०ए नेहरु नगर,कानपुर १२
Adhuuik Kavya Prayratt iyan ek Pudarmulyankari
by Dr Ganesh Khare
Price Rs Twenty five only
पुस्तक
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आधुनिक काय प्रवत्तिया एक पुनमूल्यांकन
डा. गणेश खरे
पुस्तक सस्थान १०६/५० ए, नेहरू नगर, कानपुर-२०८०१२
विवेक प्रिण्टस ब्रानगर कानपुर-२०८०१२
भारत सिल्क स्कीन ब्रह्मनगर कानपुर-२०८०१२
अदुल गफूर एण्ड सस, वनलगज कानपुर
प्रथम, १६७६
पन्चीस रुपये
पुस्तक वध
सस्करण
मूल्य
भूमिका हिवरी-युग के बार हिलो कविता विचार और शिप, दोना हो क्षेत्रों में विधि-आयामी और विकासशो रही है । एक ओर इसन पुरातनता से मधप पिया है तो दूसरी ओर अपने का माधुनिरा और नयी सस्मृति स जोहा है। रचनन परि देश और आज वे बात हुए मूल्य उमम वरी सायरता साथ रूपायित हुए हैं। भारतीय और पापचात्य सस्कृति का अगाति न भी जाधुनिक कविता को अनु प्रेरित क्यिा है, जिसम नयी दधि और विचारणा का माग प्रशस्त हुआ है तथा शिल्प को भी नय आयाम मित्र हैं। इस विविधता कारण ही आधुनिर पयिता का विभिन्न समाक्षा-दरिया स परमा गया है और उम उत और अनुदात्त पक्षो का रेखावित किया गया है। पद्यपि इधर आधुनिक काव्य म सम्बधित समीक्षा याय प्रचुर मात्रा में हुआ है पर वर अधिराश स्व दृष्टि मुवो है यातु मुग्री नहीं । सभी मा ने अपनी दष्टि रा प्रमुख मानार एक हो ति परम अन विरोधी मत निय है कि जिनम उच्चस्तराप छावा और माधवी के सामन, उम विशप कृति के सम्मघम एक घुध मा छा जाती है। यह प्राति प्रमुख प म मनोवज्ञानिय प्रगतिवाती अनियथावादी और अस्तित्ववादी ममीक्षा-दरियों स उत्पन्न हुई है। लेखक और युग-रिवेश की दष्टि सरिसा की का स्वस्थ मूत्यावन बहुन कम ममीक्षा द्वारा किया गया है। हम यहा स्थिति काय-प्रवत्तिया के मूल्यावन और विश्लेषण म भी रही है। विमा भी बाध्य-प्रवत्ति का मूल्यावन उसकी अपनी ही दृष्टि स होना चाहिए, कपर स आगेपिन समीक्षा-मान से नहा । डाक गणेश खरे का प्रस्तुत कृति का मैंन आधत पट्टा है और इस पर अनेर वा-वितक एव चर्चाएं भी हुई हैं। उहान धिना मिमी स्व दृधि से पावद्ध हुए, स्वत प स आधुनिक कान्य प्रवत्तिया का अध्ययन और विश्पण frया है इसी निए व इन प्रतिया स्वरूप-अपन म निर्विवाद रूप से सपत हुए हैं। इस पुन मूल्यारन में उनकी दष्टि मिदा त और व्यवहार, दोनो पर रही है अत उनके निपप प्रामाणिक और वास्तविकता से युक्त हैं । 7 होने आधुनिा काव्य-प्रवत्तियो के विकास-सानों को बरी गहराई म पहा है और उनको परे अधिशार और मूझ यूप के साथ सहन और स्पष्ट रूप म प्रनिष्ठापित किया है। कहना न होगा कि इस नि मे आधुनिक वाय-प्रवत्तिया व वशिष्य और शिल्पगत आयामो का, उनकी व्यापक्ता के बीच म पूण सामन्जस्य के साथ मून्याक्ति किया गया है। यह अति मामयिन पाव्य के स्वरूप और उसकी स्थिति का परिज्ञान वरान मे निश्चित ही समय है । इस कृति वे परिशिष्ट म दिया गया पाश्चात्य काव्य-चितन वस्तुत इस कृति का पूरक है क्याकि इस वश मे विवेचित उपपत्तियो ने हमार आधुनिक काव्य और समीक्षा-मानो को अनेक रूपों में प्रभावित किया है। कुछ हिदी कवि एव समीक्षक तो इनमें आरठ डूध दिखाई देते हैं क्योकि उन्होने इन प्रवृत्तियों को फगन के रूप म बलात ग्रहण कर लिया है। डॉ. गणेश खरे आधुनिक बाध्य के गहा अध्यता हैं। व लगभग अठारह वों से इमी काल रे अध्ययन अनुस घान और नितन में रत हैं। इस दिशा में उनकी इसस पूर्व भी कई कृतियां प्रकाश में आ चुकी हैं जिन्होन अनक मौलिक निष्क्ष साहित्य जगत् को दिय हैं । आशा है उनकी प्रस्तुत कृति का भी साहित्य-जगत में पूर्ववत स्वागत होगा। १५-१-१९७६ डा० सुरेशचन्द्र शुक्ल 'चन्द्र प्राध्यापक, हिन्दी विभाग सी० एम० दुबे स्नातकोत्तर महाविद्यालय बिलासपुर (म० प्र०) दो शब्द याधुनिक काम्प प्रवत्तियों पर हिंदी साहित्य मे अनेक स्वतन्त्र और शोधपरस ग्रप उपलब्ध हैं। समीक्षात्मक स्फुट निवों के रूप म ता इन प्रवत्तियों पर विपुल सामग्री प्राप्त है। काव्यात्मक दाशनिक, साम्मृतिक, पलात्मप या सौन्दयशास्त्रीय, प्रगतिशील, मनोवनानिर यथाथवादी अतियथाथवाटी, अस्तित्ववादी आदि दष्टि- कोणारे इन काव्य प्रवत्तियों के विभिन्न पसा का उदघाटन भी दिया आ चुका है। तुलनात्मक समीधा के माध्यम से भी इन बाध्य प्रवत्तियों के वशिष्टय, सीमाओं और उपलब्धियों का नाम्लन किया जा चुका है। इन स्थितियों म आज किसी नय दष्टि कोण से इन नाव्य प्रवत्तियों के अध्ययन-अनुमधान वे स्थान पर इन विभिन्न दष्टिगों के मध्य सामजस्य विधान की नितान्त आवश्यक्ता अनुभव की जा रही थी। प्रस्तुत कृति पुनमू ल्यानन की इमी दिशा म किया गया प्रयास है। इसम इस शताब्दी की प्रमुख काव्य-प्रवत्तियों- छायावाद रहस्यवाद, हाला बाद, प्रगतिवाद प्रपोगवाद, नयी कविता, अविता आदि पर काव्यशास्त्रीय दप्टिकोण से पुन विचार लिया गया है और तत्सम्ब धी वास्तविक्ताओं का निस्सग दपि स आलक्न किया गया है। इसके परिशिष्ट में आधुनिक हिदी काम को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सप्रभावित करन वाली पाश्चात्य काव्य प्रवत्तियों का भी सक्षिप्त परिचय दे दिया गया है। मरा विश्वास है कि इस कृत्ति से हिंदी साहित्य व विद्या थियो और शोधकर्ताओ का पथ बहुत कुछ प्रशस्त हो सकगा। अत मे मैं अपन मित्र और वधु डा० सुरेशच शुक्स प प प्रति कृतज्ञता जापित कर रहा हूँ जिहांने इस कृति की भूमिका लिखकर मुझ पर अपन अशेष प्रेम भाव का प्रदशन किया है। मूल रूप मे यह कृति आज से ७-८ वष पहले डा. चन्द्र के साथ ही अध्यापन काय करत हुए बिलासपुर में लिखी गई थी अत इसकी रचना प्रिया का जितना अधिक परिज्ञान उनको है, उतना जय किसी को नहीं । इस पुस्तक के साथ उनके सान्निध्य की अनेक स्मत्तियां भी जुडी हुई है अत इस भूमिका-लखन पर उामा पूरा पूरा अधिकार भी रहा है। १-१-७६ गणेश पर काव्य के स्वरूप और उनकी स्थिति का परिज्ञान वरान मे निश्चित ही समय है। इस कृति के परिशिष्ट म दिया गया पाश्चात्य काव्य-चितन वस्तुत इस कृति का पूरक है क्योकि इस अश मे विवेचित उपपत्तियो ने हमार आधुनिक बाध्य और समीक्षा-मानो यो अनेक रूपों में प्रभावित किया है। कुछ हिदी-कवि एवं ममीक्षर तो इनम आठ डूबे दिखाई देते हैं क्याकि उहोने इन प्रवृत्तियों को फशन केप म बलात ग्रहण कर लिया है। डॉ. गणेश घरे आधुनिक काय + गहन अध्येता हैं। व लगभग अठारह वर्षों से इमी काल रे अध्ययन अनुस घान और नितन म रत हैं। इस दिशा मे उनकी इससे पूर्व भा कई कृतिया प्रवाश म जा चुकी हैं, जिन्होन अनेक मौलिक निलकय साहित्य जगत को लिये हैं । आशा है उनकी प्रस्तुत कृति का भी साहित्य-जगत में पूर्ववत स्वागत होगा। १५-१-१९७६ डा० सुरेशच द्र शुक्ल 'चद्र' प्राध्यापक, हिदी विभाग सी० एम० दब स्नातकोत्तर महाविद्यालय बिलासपुर (म० प्र०) दो शब्द याधुनिक काम्य प्रवत्तियों पर हिदी साहित्य में अनेक स्वतन्त्र और शोधपरक अथ उपल ध हैं। समीक्षात्मर स्फुट निवों के रूप म तो इन प्रवत्तियों पर विपुल सामग्री प्राप्त है। काव्यात्मक, दाश निक, सामूतिर कलात्मक या सौन्दयशास्त्रीर, प्रगतिशील मनोवज्ञानिस पयायवादी, अतियपाथवाटरी अस्तित्ववानी आदि दष्टि- कोणा से इन काव्य प्रवत्तियों के विभिन्न पक्षा का उदघाटन भी दिया जा चुका है। तुलनात्मक समीक्षा के माध्यम से भी इन फाय्य प्रवत्तियों के वशिष्टय सीमाओ और उपलब्धियों का भाकरन किया जा चुना है। इन स्थितियों म आज किसी नय दष्टि कोण से इन नाव्य प्रवत्तियों के अध्ययन-अनुमधान के स्थान पर इन विभिन्न दष्टिगों के मध्य सामजस्य विधान की नितान्त आवश्यक्ता अनुभव की जा रही थी। प्रस्तुत कृति पुनमू ल्यारन की मी दिशा म किया गया प्रयास है। इमम इस शताब्दी की प्रमुख वाव्य-प्रवत्तियों- छायावाद रहस्यवाद हाला याद, प्रगतिवाद प्रयोगवाद, नयी कविता, अबविता आदि पर काव्यशास्त्रीय दप्टिकाण से पुन विचार किया गया है और तत्सम्ब धी वास्तविकताओं का निस्सग दृष्टि से आलपन किया गया है। इसके परिशिष्ट मे आधुनिक हिदी काम को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सप्रभावित करन वाली पाश्चात्य काप प्रवत्तियों का भी सक्षिप्त परिचय दे दिया गया है। मेरा विश्वास है कि इस कृति से हिटी साहित्य क विद्या थिया और शोधकर्तामा का पय बहुत कुछ प्रशस्त हो सकगा। अत में, मैं अपन मिन्न और वधु डा० सुरेशच र शुक्न पर प्रति कृतज्ञता नापित कर रहा हूँ जिहाने इस कृति की भूमिका लिखकर मुझ पर अपन अशेष प्रेम भाव का प्रदशन किया है। मूल रूप म यह कृति आज से ७-८ वष पहल डा. चन्द्र के साथ ही अध्यापन काय करत हुए बिलासपुर म लिखी गई या लत इसकी रचना. त्रिया का जितना अधिक परिज्ञान उनको है उतना अ य किसी को नहीं । इस पुस्तक के साथ उनके सान्निध्य की अनेक स्मत्तियाँ भी जुड़ी हुई है अन इस भूमिका-लेखन पर उतरा पूरा पूरा अधिकार भी रहा है । १-१-७६ गणश घर विषय सूची . अध्याय १ छायावाद १७-३८ (अ)- छायावार मर या निर्माण तथा प्रयाग छायावाद यग्य और विराध, द्विवदीयुगीन समाक्षरों द्वारा निर्देशित छायावार को विशषतायें । (आ) मूल सात तथा स्यरूप (१) नूतन जोवन- प्टि, (२) वयक्तिक अनु भूति और राष्ट्रीय चनना (३) मूल्यनिष्ठ बाध्य-प्रवति (४) आध्यात्मिाता और रहस्य भाव। () छायावाद तथा रतस्यवाट (६) विटीयुगीन प्रतिक्रिया, विद्वाह या विकास, (७) समर्मा वन दष्टिाण (८) प्रम-सौ दर्य-मया स्वन्धन्द चतना (९) भाव, भाषा और छत का मुक्ति (१०) नवान मानवाय मूल्या की रचना (११) स्वानुभूत सुख-दुगो की काम-मृप्टि (१२) भारतायता व सनिकट (१३) समृद्ध बसपा-बाहुल्य तथा दाप्त रगा का फनाव (१४) अन न जावन की गहरी सवेदना (१५) प्रथम महायुद्ध म लवर द्वितीय महायुद्ध के बीच की कविता (१९) एर सम्पूण पाव्य-दष्टि और काव्य-गृष्टि (१७) जीवन-मामासा का राय (१८) सनिष्ट पाय प्रत्ति। (इ)-पतन क कारणा का विश्लपण। अध्याय २ रहस्यवाद (अ)-रहस्यवाद क मून सात [१] रहस्यवाद एक अनुभूत्यात्मक सत्ता [२] अनात और जनत सत्ता के प्रति आत्मनिवदन [३] हृदय की ति ५ अनुभूति [५] जड़-चेतन क एकरण की गहरी वास्तविक्ता (५) ब्रह्म के प्रति प्रणय- निवन्न [६] समष्टि मोदय बाध [७] अनुरागजनित जात्म विसजन, [-] अली रिक शक्ति से शान्त और निश्छन सम्बय [९] मान दमयी भावातिरक्ता की स्थिति, [१०] भगवत्सत्ता के साथ एक्ता स्थापित करने की कता, [११] विवक्जय मुस्ता, [१२] अतर्ज्ञान का जाय । (आ)-रहस्यवाद की विविध अवस्थाए [१] परमात्मा के प्रति आश्चय कुतुहल और जिज्ञासा की भावनायें [२] सवज्ञ परमात्मा की नाकी देखना और आत्मा-पर मात्मा के बीच अद्वत सम्ब प्रति दर आस्था [३] दशन-लानसा परमात्मा के प्रति गहरा आपण प्रेम और विरह का अनुभव [४] परमात्मा के साथ जात्मा अनक सम्बधा की स्थापना, [५] आत्म-समपण और पूर्णत तादात्म्य-भावना । (इ)-रहस्यवाद के विभिन्न सापान-साधारण प्राण विश्व प्राण और महा प्राण, सूफा रहस्यवाद में शरीयत, सरीक्त हकीक्त और मारपन । (ई)-रहस्यवाद के भेदोपभेद-[१] ज्ञान और दाशनिकता प्रधान, [२] दाम्पत्यमूलक या प्रेमपरस, [३] सौदयमूलक, [१] भक्ति-उपासना सम्बधी, (५) प्राकृतिक रहस्यवाद । (3)- रहस्यवाद उदभव और विकास [4] वदिक साहित्य में, [ख] उप निपदा म [ग] मध्यकाल म [५] भक्तियुग में। (3)-फारसी रहस्यवाद, ईसाई रहस्यवाद, आधुनिक रहस्यवाद, मध्य कालान तथा आधुनिक रहस्यवाद । अध्याय ३ हालावाद ६६-८८ (अ)-प्रवतक का प्रश्न, (१) हाला भौतिक या पारलौकिक । (आ)-उमर खयाम जीवन-दान और काव्य,-(१) प्राकृतिक जीवन- दृष्टि, (२) दुखवादी जीवन, (३) सुरा-सुदरी का गुण गान, (५) उ मुक्त भोग वाद, (५) जीवन-जगत के कोलाह न स पलायन, (६) इस्लाम धम और सूफी-- दशन। (३) हालावाद क उद्भव काल की विविध परिस्थितिया। हालावाद का -(१) मदु भावो की अगूरी हाला, (२) कलित कल्पना की हाला, (३) दग्ध प्राणा की कविता (४) विश्व विजयिनी मधुशाला, (५) सर्वात्मवादी हाला, (6) सदा सुहागिन मधुशाला, (७) मुक्त भोग (6) भाग्यवाद, क्षणवाद । साग्रह विचारात्मकता (६)-उपसहार। अध्याय ४ प्रगतिवाद (अ)-प्रगतिवाद और प्रगतिशील शद। प्रगतिवाद की प्रेरणा भूमिया- (4) युग चेतना (ख) राजनीतिक स्थितियाँ (ग) प्रगतिशील लेखक संघ (4) प्रगतिगाल पत्र पत्रिकायें (ड) साम्यवादी प्रचारप्रसार, (च) शक्षणिक प्रसार । (आ)- माक्सवाद' । ऐतिहासिक भौतिकवाद । समाजवाद और कम्युनिज्म । प्रगतिवाद और फ्रायडवाद । माक्सवाद और वास्कीवाद । रूसी माक्सवादी साहित्य । (इ) हिदी का प्रगतिवादी साहित्य-(१) माक्सवाद का साहित्यिक सस्क- रण, (२) वगहीन समाज की स्थापना (३) पूजीपतियो का विरोध (४) सवहारा वम के प्रति सहानुभूति, (५) व्यग्य प्रधानता (६) सामाजिक शान्ति का उदघाप (७) नाल निशान का जयगान, (८) नारी मुक्ति का स्वर (९) भौतिक अभ्युदय (१०) रूढियो और जाति पाति का विराध, (११) यथाथवादी चेतना (१२) साहित्य एक उपयोगी क्ला। (१३) खुल गये छद के बध, (१४) जन भाषा वा आग्रह (१५) जनवादी अप्रस्तुत विधान ।
(ई)-प्रगतिवाद पर लगाय जान वाल आक्षप, विमष, । (3)-प्रगतिवाद वा प्रदेय । अध्याय ५ प्रयोगवाद १२६-१६७ प्रयोगवाद न के-न-वाट प्रपद्यवाद । प्रयोगवार के प्रेरणा स्रोत । प्रयम तार सप्तक प्रयोगमूनव दष्टिकोण-[१] वयक्तित कुण्ठायें [२] अपना पथ ढूढन वाले वचन मन की अभि यत्ति [३] जीवन परिपाटिया में घोर वैषम्य [४] भाषा की अपर्याप्तता [५] उलयो हुइ सवेदनायें [६] जीवन की जटिलता [७] यौन वजनाएँ [८] प्रगतिशीलता का क्थ्य [९] भाषा की अनगढ़ प्रयोगशीलता [१०] हा रगो के आवरण स युक्त चिन विधान [११] मुक्त-छद का नया तत्र [१२] नान सीरियस [१३] एक योजनाबद्ध आयातन [१४] आत्म सत्य का अवेषण [१५] परम्परा एक गहग सस्कार [१६] बुद्धि रस की आस्वादनीयता [१७] प्रयाग एर दुहरा साधन [१९] साधारणीकरण एक अत विरोध, [१६] " की नइ रागात्तजा शक्ति की खोज [२०] विभाजित सत्य को समूचा दखने का प्रयत्न । द्वितीय तार सप्तक कवि-भवानी प्रसाद मिश्र घमवीर भारती नरेश कुमार महता --नयी कविता--पारस्परिक अनुबध । नयी कविता की प्रमुख प्रव त्तिया। प्रगीत राय और नयी कविता एक जनविरोध । नयी कविता-विरोध के स्वर (१) अराप्यीयता (२) बुद्धि विशिष्टता-बच्ची अक्ल के कारनाम । तीसरा सप्तक -[१] पूर्वाग्रहरहित अध्ययन की माग [२] न्द्रीयकरण आत्म-मूल्याकन और विश्रापण [३] नय श- नय अथ सम्भारो की आवश्यकता [४] विषय नय' वस्तु मौलिक' [५] नक्ली आलोचक नकली कमोटिया [६] नयी शिल्प दष्टि [.] कवि कर्म के प्रति गभीर उत्तरदायित्व [८] नयी कविता कधि व्यक्ति वा मोक्ष [६] सौ न्य-बाघ बुद्धि का व्यापार । तीसरे सप्तक क रवि और उनका का य-विजयदेव नारायण साही मदन वात्स्यायन सर्वेश्वरदयाल सक्मेना। नयी कविता क न स्वर- १) शिल्प-तन्न की अतिरक्ता, (२) यौन- प्रतीको की बहुलता (३) जलते माय पर सून कुहरे की छाया निराशा (४) पथ हो जायें उप वन नयी आशा (५) इबधा रोते हुए य (६) भदसपन यथार्था नुभूति, (७) कही कोई ठौर नहीं अनास्था (6) क्षण क जीवन में हो त ममय क्षणवाद (९) साप तुम सभ्य तो हुए नही न हाग यग्य (१०) मौलसिरी की गाछ की जार मुक्न अनुपग लखन पद्धति । अध्याय ६ साठोत्तरी काव्य अकविता युवालेसन १६-१७८ [१] बदलत सन्दर्भो म न्य मानद मूल्य [२] बविता मारमा
[ ७ ]
की अमुक्तावस्था [३] नित नये वादों का आन्नालन, [४] सूर्य की नयी
लालिमा नया युग बोध, [2] हम मरणासन्न मनुष्य के प्रतिनिधि,
[६] अब कही कोई यात्रा नहीं गतिहीनता, [७] एक विमालिक
दुघटना, [८] सारे सदा से कटे हुए ऐकातिकता, [९] नागदेश के अधि
वासी व्यग्य [१०] आत्महत्या के विरुद्ध, [११] कुछ भी सही न होने की पीडा,
{१२] भूखी पीढी काम की नग्नता म, [१३] एक कुत्ता रात भर रोता रहा
[१४] केवल पर्याय हाथ मलने का।
परिशिष्ट
१७६-२००
(पश्चिम की क्लावादी काव्य प्रवृत्तियो का सक्षिप्त परिचय)
(१) अन्तश्चेतनावाद (फायडवाद)
(२) प्रतीक्वाद
(३) बिम्बवाद--टी० एस० इलियट-काव्य मूत्य और साहित्य चिन्तन ।
(४) अतियथार्थवार ।
(५) अस्तित्ववाद।
-०-
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छायावाद छायावाद के स्वरूप-विश्लेषण, उदभव और विकास स सम्बधित शोध काय और ममीक्षायें हिंदी साहित्य में अब तक पर्याप्त संख्या में सामने आ चुकी हैं और अव तो इस काय प्रवत्ति के पुनमू ल्याक्न का काय भी प्रारम्भ हो चुका है । श्री सुमित्रानन्न पत और डा० रामदरश मिश्र ने अपनी पुनमू ल्याक्न सम्ब धी कृतियो म जहाँ छायावादी काय की नये दष्टिकोण से लेखन परखने की चेप्टा की है वहा उन समस्त असगतियो को भी सामने ना दिया है जो इस कायादोलन के स्वरूप विश्लेषण एव सश्लेषण के समय विभिन समीक्षका ने प्रस्तुत की थी। यहां हम छाया वाद क स्वरूप निर्धारण तथा उसकी मूल प्रवत्तिया के परिन्शनाय उसके मूल्याकन पुनमू ल्याक्न से सम्बधित विभिन्न परिभाषाओ और “याख्याओ की तात्विक्ता पर विचार करेंगे। 'छायावाद' शब्द का निर्माण तथा प्रयोग छायावाद श द क निर्माण कर्ता श्री मुकुटधर पाण्य का कथन है कि इसे उहोने 'छायावारिता' शट के आधार पर १९२० ई० मे गढा था । उन्ही के शब्ना मे मिस्टिक कविता की वगला भाषा की एक नालोचना में एक जगह उसकी 'छायावा दिता की ओर सवेत किया गया था। मैंने 'छायावादिता से ही 'छायावाद' शद गढा था । या वगला मे मिस्टिसिज्म के अथ में छायावाद वा प्रचनन कभी न था और न है ।' आपन इस नई का य प्रवत्ति के नामकरण के सदभ म श्री पदुमलाल पुनालान वरशी से भी परामश किया था । जापने उस युग की नई कविताओ मे पाई जाने वाली भकि विनय रहम्य अध्यात्म जिनामा आदि की प्रमुखता के पारण भक्तिवाद' नाम सुझाया था । आपकी या मान्यता रही है कि मिस्टिक कवितामो में भक्ति की प्रधानता रहती है और मिस्टिक कवि भी सूफी या हिला के निराकार वादा स तो की तरह भक्त कवि रह हैं। पिही कारणा से पाण्डेय जी को यह नाम १ पत का काव्य-डा. वृ० प्रेमलता वाफ्ना १ २२ पर उद्धत पाण्डय जीवा पत्र २ सरस्वती' जनवरी फरवरी १६७२ श्री पदुमलाल पुग्नालाल बटशी, कुछ ऐतिहा सिक तथ्य, कुछ सस्मरण, पृ ५४ 1-1 आधुनिक राष्प प्रवत्तियां एर पुनमूल्यांकन पम नहीं आया रितु उहती 'श्री गार' म 'घायायाद पर धारावाहिक रूप में निम्ति अपा चार ममीधारमा नियाम पायावाद को मिस्टिसिम का पर्याय पहा है, आध्यामिकता और धम भावाता जिसपे अभिन्न अंग हैं।' उही रे शो 'मायाग'एर ऐमी मायामय मूग यस्तु है रिशरण द्वारा उगमा ठोर ठाव वन परना अमम्भव है पिएगी रपनाओम अपने स्यामाविर मूल्य सो पोपर मोतिर निमार हुआ करत हैं।' उपप स तम्या स स्पष्ट है frन तो इस वाय्य प्रवत्ति पा नामकरण मुविचा रित ग मे हुआ है और न आगम में निहित उमपी विशेषतायें ही उसकी मूल पेतना को स्पष्ट बग्ने वानी रही है। छापावाद या नामार मरते समय पाण्डेय जी के मन ' भरी म्यग्य माय न रहा हो मितु आगे पर यह भारत और माम्य प्रयत्ति द्विवीयुगात ममीणपोय हास्य व्यग्य और विरोध वा गम्भीर रूप में पिार हुई है। यह प्रम १.२१ १० मे प्रारम्भ होरर १९२७ ० तक यगर पारण है। छायावाद प्यग्य और पिरोध जून १.२१६० म गरस्य ममि बागाया भी सर गवा Tमर निवथ प्रसमित हुआ पा जिगये लेया मुशीर बार पतु यह पप माम मा मूल संगर गरस्यतीय तरव। 17 गापार स्यय यानी जी पार गुशिक्षित परियों, मध्य हाने यास यातिाप मा मूग विषय है-एर मायापिन को पतली गोबरविवार आधार पर बनाया गया है । त्रिनाम पर यदिया गमें महा मोगागर है प्रिमरे नीम पया - A यरित है। कोई निगा प्राकी विया पाना है तो अनंत , yrea को परापा प्रपन । वार्तामा ने पामर मरना हरि शिर यान 4 म पहा बातापी नीरया franar 31 प्रतिभा पाfrankऔर अनान गिहै।ग पार्मा म भाग HTE और य भा रवि माल पर गण | freपि सम्राट न जी ने गईमाम प्रयोग । विगायें यमा उही मग प्रार-पारामा या भाव या जागि HTTATTITHHATT11। मरी परमानिnिir छायावाद | १९ बनते है और अक्षर अविनाशी हैं, अनेय हैं अनत हैं अतएव हमे भाषा को यह रूप देना चाहिये जिससे वह नीरव हो जाय । वह क्णध्रुति न होकर हृदयगम्य हा, इद्रि यगोचर न होकर आत्मा से ग्राह्य हो ।' इसी समय के आस पास वख्शी जी ने पत जी से 'मौन निमन्त्रण' और 'शिशु' जैसी रचनायें पुनी थी जिससे उनका दष्टि कोण परिवर्तित हुआ था और वे प न जो की रचनाओ को मरस्वती मे प्रमुख स्थान देने लग थे इस तरह वशी जी के मन मे छायावाद के प्रति जो व्यग्य भाव था वह समाप्त हो गया। मई १९२७ को सरस्वती म जाजक्ल की कविता और पवि' शीपक से एक समीक्षात्मक निबध प्रकाशित हुआ जिसके लेखक मुरवि किंकर थे। यह भी छद्मनाम था। इसके मूल लेखक साधाय महावीर प्रसाद द्विवदी थे । 'आपने लिखा कि' छाया वाद से लोगो का क्या मतलब है, कुछ समझ में नहीं आता । शायद उनका मतलब है, किसी कविता के भावा की छाया यदि यही अयन्न जाकर पडे तो उसे छायावादी कविता कना चाहिए । छायावादी अपनी ही मनस्तुष्टि के लिय कविता लिखाते है। छायावादी गूढाथ विहारी हैं उनम व विलभ्य गुण नहीं है। छायावादी कवि तत्व हता हैं, कवि नही, उनम आडम्बर रचना ज्यादा कवि कम में कुशलता प्राप्ति की चेष्टा कम है । शुद्ध निखना तक सीखन के पहले हो वे कवि बन जाते हैं और अनोखे अनोख उपनामा की लागूल लगाकर अनाप शनाप लिखन लगते हैं। इसी वप सुधा में दिसम्बर अक म मायावादी' उपनाम से छायावाटी पर एक व्यग्यात्मक कविता प्रकाशित हुई जो इस समय तक की समग्र छायावाद विरोधी विचार धारामओ का प्रतिनिधित्व करती है जिसका प्रवतन द्विवदी युग के साहित्यकार एव आचाय कर रहे थे । कविता इस प्रकार है- छापावाद चलाया रिमने है जिसकी यह माया हिदी भाषा में यह पारा शब्द कहा मे आया? कविता जो न समझ म आर्द, छपकर छायावादी बुलू मियाँ यग्य परन के लिए हाय अब आदी मिस्टिसि म' का नाम मारकर हो उसके प्रतिपक्षी छायावाद उसे बतलात हैं साहित्यिक पक्षी। कोइ पूछ नही रहा है क्या है छायावाद १ छायादाद डा० नामवर सिंह, पृ १० ११ स उद्धत २ सचपन साहित्यकार स प्रयाग १८६ ३ सचयन पृ ८६ ४ वही, पृ ९१ ..
२४ / आधुनिक काय प्रवत्तियां एक पुनम ल्यांकन [३] मूल्यनिष्ठ काव्य प्रवृत्ति इस प्रकार छायावाद वे सदभ म 'वयक्तिव अनुमति' वा आशय उसके शाब्दिक अथ से नहीं लिया जा सकता । इस रूप मे वह भ्रान्तियो को प्रश्रय देने वाला है। श्री सुमित्रान दन पत न तो यहां तक लिखा है कि समीक्षको ने स्वानुभूति या वय क्तिक अनुभूति का ठीक ठीक अर्थ ही नही समया । आपक अनुसार महत या उदात्त काव्यो मे इस प्रचुर मात्रा म स्थल होते हैं (जसे मत्यु) जिनकी स्वानुभूति कवि को हो ही नहीं सक्ती फिर भी वह उनका वणन या विवरण इस प्रकार त मय होकर प्रस्तुत करता है जसे कि वह अनुभूतियाँ उसकी निजो हो। वस्तुत ऐस स्थला पर ववि की रचनारमक कल्पना त्रियाशील रहती है और वह सम्भा य अनुभूतिया का सजन वरने म याग देती हैं । इ ही सब कारणा स आपन छायावान काव्य को व्यक्ति निष्ठ न मानकर मूल्यनिष्ठ या मूल्याद्रिक माना है' जो उसका मूल प्रकृति और चेतना के अनुरूप एक उचित अभिधा है । छायावाद का मूल्यनिष्ठ काव्य मानन से उसकी स्वच्छद चतना मूल धातो का सम्बध भी निर्विवाद रूप से राष्टाय चेतना से जुड़ जाता है। [४] आध्यात्मिकता और रहस्य भावना आचार्य वाजपेयी जी ने छायावाद म जिस आध्यात्मिक्ता का स्वरूप परिल क्षित किया है उसकी मूल प्रेरणा धार्मिक न मानकर मानवीय और सास्कृतिक निरू पित की है तथा उसे २०वी शताटी की वनानिक एव भौतिक प्रगति की प्रतिक्रिया कहा है । डा० रामदरश मिश्र का कथन है कि वस्तुत वाजपेयी जी ने आध्यात्मिकता को पहचानने तथा उसकी मून प्रेरणा को निर्देशित करने में भी भूल का है। कथन है कि जहाँ छायावादी का य में राष्ट्रीय और सामाजिव चाना प्रताको और बिम्बा के माध्यम मे यक्त हुई है वही वाजपेयी जी ने आध्यात्मिक स्वर की तलाश की है। यह राप्ती । और सामाजिक चता भी वनानिक मुग ये जाने से निर्मित हो रही थी उसकी प्रतिक्रिया में नही ।' छायावाद युगीन पििस्थतियो की प्रतिक्रिया नही प्रत्युत उनकी एक अनिवाय परिणति है अतएव इस सत्भ म डा. मिश्र का उपयुक्त कथन सत्य है। आपन छायावाद पर आरोपित अध्यात्मवाद, रहस्यवाद आदि के खण्डन के सदभ म डा० नगद्र का अधोलिखित मत उद्धा क्यिा है वास्तव मे अतमु खो दष्टि डालते हुये उसको चापवी अथवा अतीन्द्रिय रूप देने की यह प्रवत्ति हो घायावाद की आपका १ छायावाद पुनमू ल्याकन प त प २८ २९ ३० ३१ । २ छायावाद का पुनमू ल्याकन, ११ ३ वही, पृ १३ छायावाद |२५ मूल वत्ति है । उसकी राभी अय प्रवत्तियो की इसी अ तमुखी वायवी वत्ति के आधार पर याख्या की जा सकती है । आगे आपने लिया है कि जाज के बुद्धिजीवी कवि के लिए वासना को सूक्ष्मतर करना ता साधारणत सम्भव है परतु आध्यात्मिक अनुभूति हाना उसके लिय मह्ज मम्भव नहीं है और यह स्वीकार करने म किसी का भी आपत्ति नही हानी चाहिए कि गत युद्ध के बाद जिन कविया के हदय मे छाया वाद की कविता उदभूत हुई उन पर उस समय किसी प्रकार आध्यात्मिक अनुभूति का जारोप नही किया जा सकता। छायावादी काव्य के मूल स्राता के इस मनोवैनानिक विश्लेषण के बाद भी आपन यह स्वीकार किया है कि छायावादी कवियो मे नतिक और आध्यात्मिक प्रभावी के कारण एक विशेष प्रकार का परिष्कार आरम्भ से ही था। कुछ आध्यात्मिक क्षण तो प्रत्यर' भावुक जीवन म आते ही है। अतएव छायावाट की रहस्योक्तियाँ एष प्रकार से जिज्ञासायें हैं जो छायावाद के उत्तराद्ध में आध्यामिक दशन के द्वारा और भी पुष्ट हो गई हैं । पर तु वे धार्मिक साधना पर पाश्रित नहीं हैं । उनका आधार वहीं भावना कही दशन चिन्तन और आरम्भ म कही पही मन की छत्रना है ।। इस यग के कविया पर नतिक और आध्यात्मिक प्रभावो का कारण भी स्पष्ट है। भारतीय सस्कृति में मानवीय जीवन के सभी उदात्त मूत्य आध्यात्मवाद म ही निहित हैं । छायावादी कपि सास्कृतिक और राष्टीय चेतनालो से सयुक्त रह है जत एव उहोने वही रही तो आयासपूर अध्यात्म दशन को प्रस्तुत कर अपनी रच नाआ म गरिमा लान की चेष्टा की है। छायावादी काव्य म आध्यात्मिकता के समिश्रण या सप्रभाव म युगीन परिस्थितिया न भी विशप योग दिया है । उस समय दश म रामकृष्ण परमहन स्वामी विवेकान - गमतीथ अरवि द महात्मा गाधी, रवीद्रनाथ आदि ने राष्टीयता तथा आध्यात्मिवता का समवित करम अपन दनिक जीवन का एक अग बना लिया था । रवि द श ा म राष्टीयता की भावना एक धम है जो ईश्वर स प्रानुभूत हुई है । वह मर नही मक्ती वयाकि वह अजर अमर ईश्वर ही है। रस राप्तीयता के पीछे अवन में अध्यात्म का स्वर था जो प्राणिमात्र वा समाप्त और स्वत न मानता है । डा० शभुनाथ सिंह पेशाम सामाजिक विष १ बाधुनिर हिदी वविता की मुख्य प्रवत्तियो छायावाद २ छायावाद वा पुनमू ल्याउन प १३ से उद्धत ३ मांसू कामायना के अतिम तीन सग जुही को कती, शफानिया एक तारा नौश विहार आदि रचनायें इस मदभ म द्रष्टव्य हैं ५ नाश-आनल इज्म इज ए रिलीजन दैट वम्स फाम गाइ नाश जानल दम बननाट हाइ विकाज इट इज ए गह-लरविर घोष २६ / आधुनिक वा य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याक्न मताओ से छुटकारा पान म तिय छायावादी कवियो न काव्य कक्षन म प्रच्छन्न रूप से यात्म का सहारा लिया और इस पर उहोने अपने युग तथा वयक्तिा जीवन के जमावा की पूर्ति की। जहा तक छायावाद और रहस्यवाद का प्रश्न है वह छायावान का एक अग तो है चिन्तु पयाय नहीं । इम सदभ मैं डा० नगद्र का स्पष्ट क्थन है कि छायावाद के अन्तगत और भी बहुत सी विचारधागय काम कर रही हैं जिनका आध्यात्मिकता स कोई प्रत्यक्ष सम्बध नहीं है।' [५] छायावाद और रहस्यवाद इन दोनो प्रवत्तिया मे पाथक्स प्रस्तुत करत हुए जाचाय वाजपयी जी न ठी ही लिखा है कि छायावाद व्यष्टि सौदय वाध की भावना है और रहस्यवाट समप्टि सौन्दय बाध की। रहस्यवाद म यष्टि अन्तर भूलव र अखण्ड सो दय तथा समस चेतन की मष्टि होता है । छायावाद के मून विषय है प्रकृति मानव जीवन प्रम और सौ दय नितु रहस्यवाद म परम मत्ता के प्रति प्रम भावना निधन्ति का जाती है । छायावाद म जहा प्रकृति स्वतन रूप से प्रस्तुत हा सरनी है वहा रहस्यवान' में वह आध्यात्मिक सो दय स ही रजित रहती है । छायावाती या य म प्रतीर याना जहा कवि क सूक्ष्म भावो के सप्रेषण में सहायर सिद्ध होता है वहा रहस्यवाद म वह उसकी एक अनिवाय अभि यजना शली बनकर अवस्थित रहती है । छायावाद म कवि भावनाओ की कोई सास्कृतिा दाशनिक पष्ठभूमि हा हा यह आवश्यक नही रितु रहस्यवाद म उह किसी न किसी नशन वा लाधार आवश्यक हुजा वरता है। इही सब कारणों से छायावाद का दह नौरिक तथा मानवीय भूमिका का वाय कहा गया है और रहस्यवा” का अत सत्तात्मा और परोभ वस्तु स गम्बधित भावनालो का। इस तरह अपा प्रगातात्मक अभि य जना शिप, नवीन सौ य वोध, गगात्मक सवदन विस्मय की भावनाओ कल्पना बाहुत्य और मानवीय जावन मूत्या की एकरूपता क कारण रहस्यवाट छायावाद के यापन परिवश मे तो समाहित हा जाता है किन्तु अपने मून और तात्विा नयों में वह छायावाद स पूरी तरह पथर है । उस छायावाद का पर्याय मानना भ्रम का जम दना है । छायावादी परिवेश में पल्लवित हाल का रहस्यवाद प्राचीन हिदी रहस्य वाद से भी पूरी तरह पथ है। मध्ययगीन सता का रहस्यवाद ससार का मिथ्या १ छायावाट युग डा० शभूनाथ सिंह, प ६०६१ २ जाधुनिक हिनी कविता का मुख्य प्रवत्तिया ६ १५ 3 धनिक काय रचना और विचार नाचाय नन्दुलार वाजपयी प ३९४० र आधनिक वाय रचना और विचार आचाय न ददुलारे वाजपयी पृ ३५ छायावाद | २७ मानने वाला जीवन रस वचित, परिपूण ममपणशील और आत्मा तथा ब्रह्म के मिलन की अनीद्रिय अनुभूतिया पर आधारित मोक्ष-कामी है किंतु अस्तित्व घेतना स युक्त आधुनिर रहस्यवाद म पत जी के शब्दो म नय विश्व जीवन तथा विश्व चतय की खोज और जिज्ञासा की अनुभूति के साथ भाव मुक्ति मानव मुक्ति विश्व मुक्ति तथा लोन मुक्ति को हा भावना प्रधान है। स्वन्दरतावादी जादोलन म रहस्यवाद की स्वाभाविक अवस्थिति पर प्रकाश डालते हुए एक अग्रेज विद्वान समीक्षक ने लिखा है कि बौद्धिक जिनासा और सौ दय प्रियता की मूल प्रवत्तिया से युक्त स्वच्छ दतावाद जव दशन का मस्पण करता है तब वह रहस्यवाद और आत्शवाद का पक्षधर बन जाता है । छायावादी कविया म भी जो मूम रहस्य उतना जापात्मिक और मानवतावादी आदशवाद की विशेषताय परिलक्षित होती है वे उसकी स्वच्छ जीवन दष्टि के साथ दाश निर पष्टभूमियो के सार्थो का पल हैं। [६] द्विवेदीयुगीन प्रतिक्रिया-विद्रोह या विकास ? आचाय वाजपेयी जी ने छायावाट यी द्विवेदीयुग की प्रनित्रिया मानकर युगीन परिस्थितियो क स भ म उसके स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया का पराव स खण्डन किया है जबकि तथ्य रसा विपरीन है। छायावाद के प्रमुख आधार का स्पष्टीकरण करते हुए डा० नगद न उस स्थूल व प्रति सूम का विद्राह रहा है। स्थून' शब्द की व्यापकता का स्पष्टीकरण करते हुए नापन निखा है कि इसकी परिधि म सभी प्रकार के बाह्य रूप रग रूटिया आदि सनिहित हैं और इसके प्रति विद्रोह नतिक मढ़िया के प्रति मानमिक स्वातन्य वा विद्रोह और काव्य वे घना के प्रति स्वच्छ कल्पना और टानोक का विद्राह है। या पन जी की यह परिभाषा भी अपर्याप्त तथा एकारी के साथ साथ अस्पष्ट भी प्रतीत हुई है क्यानि इसम मूक्ष्म के अथ वा स्पष्टीकरण नहीं किया गया है। आप ही शाम यदि सूक्ष्म का जय अभिव्य जना वे वचिन्य या चातुय से है तो वह सूक्ष्मता नही कही जा सकती। चैत य या भाव तत्व से सम्बध रखना है तो उस स्यून के प्रति मूक्ष्म का विद्रोह न महार अधिक से अधिक म्यूतका सूश्म म स्पान्तर कहा जा सकता है। वितु इस अथ वो भी आप छायावाद के स्पष्टीचरण के सदभ म परिपूण नही मानत वया यदि सूक्ष्म पवग मिस्टिमिज्म एण्ड १ छायावाद पुरामूल्याकन प० १८ १९ २ रामाटिसिम हेन इट टचज पिलासिपी आइडिज्म --रोमाटिक रिवाइवल, १० १३ ३ सुमित्रानादन पत डा. नगेन्द्र, पृ० २ छायावाद पुनम ल्यारन, पृ. २४ ।
२८ | आधुनिक काय प्रवत्तिया एक पुनमूल्योरन कि आपके अनुसार छायावाट न ता स्थूल व प्रति विद्रोह करता है न उसका सस्कार या रूपातर हा प्रयुत वह नय मूल्य की प्रतिष्ठा परता है'। यहाँ यह तथ्य भा स्मरणीय है कि यद्यपि छायायुगीन कविया न स्थलता का परित्याग तो विया तपापि उनकी समष्टिगत चनना और मू मगत सौ यसत्ता आकाशचारी न हावर स्थूल या यथावष्टि पर ही आधारित रही है जत इस युग म स्यूत और सूक्ष्म के बीच अयो याश्रित सम्बध भी रहा है । इस सभ म डा. रामविास शमां तथा दा. रामदरश मिथ विचार भी उल्लेखनीय हैं VErशर्मा के अनुसार छायावाद स्थूल के प्रति सू'म या विद्रोह नही रहा यह ता थावी नतिकता रूढिवाद और सामती साम्रा यादी बधनो क प्रति विद्वाह था | डा. मिश्र भी स्वीकार वरत हैं कि छायावादाविना न नव जीवन राजार पावर य जीवन मूल्स की स्थापना को और जजर सामतवादा मुल्या को ध्वस्त किया । जापो कामायना म जापावन की व्यक्तिवादी चेतना की सेंज्ञा दी है और उनमें पनम्वरूप हान वाले देव नोक विनाश वी सामती वभव का नाश हा माना है । गमें सदेह रही कि यावादी कविया का चतना या एक अग तलालीन मामती और साम्राज्यवादी शक्तियो रा सथप करता रहा है किन्तु वह प्रकृति पर चसन व्यक्तित्व के आरोप कल्पनाना की समद्धि स्वानुभूत सुख दुखा की अभियक्ति और सूक्ष्म पौत्य-चेतना की सापेभिता म तिशय मद है। यदि हम चामायनी जन-पावन से व्यक्तिवादी चेतना वा प्रतीर मान तो उगवे फलस्वरूप मनु द्वारा रचित नये ससार की तुलना हम छायावादी कवियो की समष्टिगत चतना और नवीन मूल्या की प्रतिष्ठा से करनी होगी और निश्शित ही ऐसा करने पर नये प्रश्न पडे हा जायेंगे Vथा मिश्र जा ने यह स्वीकार किया है कि वतमा समाज के जास्या-जनास्याशीन शकाशीत भहनिष्ठ और निरतर आत्म-मथनशील मनु के जीवन की समस्याओ का सामाधान लाक के बीच नहीं होता लोक स दूर क्लास पर होता है। 'कामायनी को यह सारी रहस्यवादी परिणति माहा है की यात्मक है किन्तु जयावहारिक है भावुक्ता पर आधारित है। यदि इस कथन को कुछ देर के लिए स्वीकार भी कर लिया जाय तो भी यह नहीं कहा जा सक्ता वि समस्त छायावादी का य को यष्टि और समष्टि चतना का यही प्रारूप है। जिस यक्तिवादी चेतना को रामटरश जो यक्तिगत स्वाधीनता और मुक्त चेतना का पर्याय मानत १ छायाबाद पुनमू ल्याक्न प २४ २ सस्कृति और साहित्य पष्ठ ३६ ३-४ छायावाट का पुनम ल्याक्न ५०२१ । छायावाद का पुनमूल्याकन, पृ० ३२॥
छार्यावाद | २९ हैं, यदि उसका रचनात्मक मेनार मनु का जीवन है और उसकी परिणति भावुकता पर जाधारित एव सयावहारिक है तब छायावाद की गरिमा का सारा चित्र हा धूमित पड़ जाता है। - इस तरह छायावाद को द्विवेदी युग की प्रतिक्रिया या विद्राह के स्थान पर उस युग म जीवन के हर क्षेत्र से सहज अत स्फुग्नि होन वाली स्वच्छ द चतना का फन मानना अधिन याय-सगत प्रतीत होता है। यह दूसरी बात है कि उसके विकास म द्विवेदीयुगीन स्थूलता तथा सामत साम्राज्यवादी वध्रना न अपन ढग से महयाग दिया है। समन्वित दृष्टिकोण जभी तक हम छायावाद के स्वरूप विश्लेपण म आचाय वाजपयी तथ डा० नगन्द्र जी की परिभाषाओ का ही मुग्य आधार बनाकर चले हैं । निस्सदेह इन दोना आचार्यों न छायावाद के सौष्ठव और मनोवज्ञानिक पक्षो के उदघाटन म अपनी प्रतिभा का श्रेष्ठ अश समर्पित किया है कि तु जसा कि हमने देखा उनकी परिभाषायें और विवचनायें अपन आप म परिपूर्ण नहीं हैं। उनमें कुछ तो अपरिभाषित पद है और कुछ छायावाद की मून प्रकृति के विरुद्ध तथ्य । डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने परिभाषा का इन जटिलताओ स वचत हुए छायावाद की जो अधोलिखित तीन विशेष तायें निरूपित की है व इस युग की समग्रता को अपने में आत्मसात करने में बहुत दूर तक समय है ।लापो लिखा है कि छायावाद नाम उन आधुनिक कविताआ वे लिए विना विचारे ही ६ दिया गया था- (१) (क) जिनम मानववादी दष्टि की प्रधानता थी , (ख) जा वक्त य विषय को कवि की व्यक्तिगत चितना और अनुभूति के रग मे रगकर अभिव्यक्ति करती थी, (ग) जिनम मानवीय आचारो त्रियाओ चेष्टाओ और विश्वासो के बदले हुए मूल्या को अगीसार करन की प्रवत्ति थी (घ) जिनमे छद अनवार, रम, ताल, तुक आदि सभी विषयो मे गतानुग तिक्ता से बचने का प्रयास था और (ड) जिनम शास्त्रीय सढियो के प्रति कोइ आस्था नहीं दिखाई पन्ती थी। (२) छायावाट एक विशान सास्कृतिक चेतना का परिणाम था। यद्यपि उसमे नवीन शिक्षा के परिणाम हाने के चिह्न स्पष्ट है तथापि वह केवल पाश्चात्य प्रभाव नहीं था, बवियो भीतर व्याकुलता ने ही नगेन भाषा शली म जपने का अभिव्यक्त क्यिा और . १ हिंदी साहित्य, पृ० ४६१-४६२ ।
१० / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्याक्न (३) सभी उल्लेखनीय कविया म थोडी बहुत आध्यात्मिक अभियक्ति की व्याकु लता भी थी। जिन कविया शास्त्रीय और सामाजिव रूढियो के प्रति विद्रोह का भाव दिखाया उनके इस भाव का कारण तीव्र सास्कृतिय चेतना ही थी।' छायावाद प्रमुख छायावादी कवियो को दृष्टि मे छायावाद के तत्व विश्लेपण में छायावार के प्रमुख कविया ने अपना महत्वपूर्ण योग दिया है। यह भी सच है कि जितनी गहराई तक इनकी तत्वाभिनिवेशिनी दष्टि गयी है उतनी दूरी तक इस युग व समीक्षा की दष्टि भी नहीं जा सकी है। अतएव बिना इनके विचारो का समय यह परिच्छे अधूरा ही माना जायगा । [-] प्रेम सौदधमयो स्वच्छद चेतना- श्री जयशकर प्रसाद न छाया वा सम्बध मोती के भीतर छाया की तर लता समानर और उस काति की तरलता का अग ये लावण्य वी सना देकर सस्कृत साहित्य म भा उसको अवस्थिति देखी है । यया 'इम दुलभ छाया का सस्कृत क काय उत्लप कान में अधिा मह व था। इस प्रकार प्रसाद जी छायावाद का सीधा सम्बध मस्कृत की प्रम-सौ दयमयी स्वच्छ-चेतना से जोडकर एक जोर उमके पतक-सास्कृ निक-साहिए या स्त्रो का स्पष्ट करते हैं दुमरी आर छायावाद का पाश्चात्य स्वच्छ दतावाद का अधानु- रण नहन व मीना मह पर भा कर देते हैं। छायावाद म आप अभि यक्ति और अनभूति के बीच पूण तादाम्य आवश्यव' मानत है । ऐसा न हाने पर उसम स्पष्टवाल एव अभि पक्ति म विशृखलता आ जाती है। अनुभूति पक्ष की विशेषताओ पर प्रकाश डालते हुए जापन लिखा है कि नब वहनि विकल काया न मु चति चतनाम की विवशता वेदना वा चाय के साथ चिरव घन म बांध देता है तब वह आत्मस्पश की अनुभूति सूक्ष्म आतर भाव का व्यक्त करने म समय होती है। ऐसा छायावाद किसी भाषा के लिए शाप नही हा सकता। इसके क्ला पक्ष की विशेषताआ का उदघाटन करते हुए आपने उसम ध्वयात्मकता, लाक्षणिक्ता सौ दयमय प्रतीक विधान तथा उपचार वत्रता की अव स्थिति जावश्यक मानी है । प्रसाद जो द्वारा निर्देशित उपयुक्त विशेषताला म जो अमुष उल्लेखनीय बात है वह है-छायावादी स्वानुभूति की विवति का स्पष्टीकरण । आपने एक ओर जहां इसमे वहति विक्ल वायो कहकर इसकी सहज जत स्फुरण शक्ति की ओर सत किया है वही सवदना का चत य पत जा के श दो म वश्व चत य) साथ १-४ काय और क्ला तथा अ य निबध- यथाथवाद और हायावाद पप्ठ १२५ १२६ ।
सायावाद /३१ अनुधित पर उम 'या मस्पश की अनुभूति' की सना दी है जो छायावादी सूम भतर भावो को अभिव्यक्ति को गिमा मात्र प्रस्तुत करने म समय सिद्ध होती है। रहना नहीं छायावाद के पता मम्य धा तथा उसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति के पक्षो को रतनी ममता साथ विसी र विवेचना नहा का। [९] माय, भाषा और छन्द की मुक्ति श्री सयरान्त त्रिपाठी निराशा हयावाद की विस्तृत विवचना नहीं की जितु उसरे । प्रमुख और शक्तिशाली तत्व यी जार मवेत पिया है रि वगभाषा में रखोदनाथ की अवेली शनि पीस कविया का जीवन तथा इद्रजाल देहर साहिर हत्य व से निरनी और फत्री हैं। हिदी म छायावादी कहलान वाले विधी मे गरा धागा हुआ है। पापो यह भी स्वीकार किया है दि भावो की मुक्ति छद की भी मुक्ति चाहती है। यहाँ (खायावाद में) भाषा भाव और छद तीनो स्वतन्त्र हैं। छायावान पे स्वर विश्लेषण के प्रण म पहली बार निराला जी ने काव्य की मुक्त चेतना के साथ मुक्त पा समर्थन किया है जो 27 वाय पत्ति की महती विशेषता और उप भी है। [१० नवीन मानवीय मूल्यो को रचना श्री मुमित्राना पत ने तो पापावाद पुनमू ल्यारन शीपक से एक प्रथ ही ाि है। इसके अतिरिक्त भी आपने अपनी कृतियो मी लम्या लम्बी भूमिकामा म छायावाद र स्मरण विश्लेषण पर निशप बस दिया है। बापन पहनो वार इस काय प्रवत्ति के व्यापा मास्वनिक राष्टीय परिवेशमा उदघाटन परत हुम उस विश्व चेतना र नयो र मानवीय मूल्यो वा प्रतिष्ठाएर पहा है। छायावाद के प्रवर्ती परिमामा परि मेनार " माधम प्रचरित गभी भ्रामर मा यताओ का भी आपने निष्ठा और दरता सय खण्डन घर "मय मृत्यावन की शिक्षा म भी नय मकेत यि हैं । इस परिच्छेन में जगह जगह मापने इन विचाराबी चचा - [११] स्वानुभूत सुख-दुखो को काव्य सृष्टि धामती महादेवी वर्मा ने भी छायावाद की मूल प्रति और उमकी विशेषताला पर विस्तार से विचार किया है । बारने पहली बार इस नाम की उपयुक्तता का स्वी चार वरा ये लिया है कि उगवे (छायावा') जम म प्रथम रविना ३ दधन मोमा तक पहुँच चुर ध श्री सष्टि । दाह्यावार पर इतना बधिर लिया जा चुका १ प्रवध प रािला, १८ ২ গুৰ সনি নিরব " ३२ / जाधुनिक काय प्रवत्तिमा एक पुनमू त्याकन या कि मनुष्य का हृदय जपनी अभियक्ति के लिये रो उठा । स्वच्छद छ म चित्रित उन मानव जनुभूतियो का नाम छाया उपयुक्त ही था और मुझ तो लाज भी उपयुक्त ही लगता है। छायावाद के प्रचलित जनक नामो के मूत सातो का स्पष्टीकरण परत हुय जापने लिखा है कि छायावाद का कवि धम के अध्यात्म से अधिक दशन के ब्रह्म का ऋणी है जो मूत और अमूत्त विश्व को मिलावर पूर्णता पाता है । बुद्धि के सूक्ष्म धरातल पर कवि ने जीवन की पखण्ता (ममष्टिगत चेतना) पा भावन क्यिा हृदय की भाव भूमि पर उसने प्रकृति म विषरी (मूक्ष्मगत) मौ दय सत्ता की रहस्यमयी अनुभूति प्राप्त की और दोनो के साथ स्वानुभूत सुख दुखो को मिलाकर एक एसी पाय सप्टि उपस्थित पर दी जो प्रतिवाद हृदयवाट अध्यात्मवाद रहस्यवाद छाया वाट आदि अनेनामा का भार सम्भाल सकी। छायायुगीन पलायनवत्ति का स्पष्टीकरण करत हुय आपन लिखा है कि यह युगीन आर्थिक प्रश्नो सामाजिक विषमताआ सास्कृतिक दष्टिबाणो आदि स सधप म पराजित हान का प्रतिफ्त न होकर परिभापातीत मन की एक आवश्यक प्रेरणा है। [१२] भारतीयता के सनिकट जापने यह भी स्वीकार किया है कि छायावाद के प्रतिनिधि कवि भारतीय सस्कृति, दशन तथा प्रचीन साहित्य से विशेष परिचित रहे हैं अतएव यह का य प्रवत्ति भारतीय कय की मूत प्रेरणा के निकट है। भारतीय प्रकृतिवाद को आपन दणन के सववार का का य म भागत ननुवाद कहा है और इस सदभ म वदो और छाया वादी का य से मघ रात्रि, चिन्नत सूय प्रकृति और जीवन के चिन्न से सम्बधित समान उद्धरण भी प्रस्तुत क्यि हे और इस तरह नाना की मूल प्रवत्तियो को एक कहते हुय घामावाद म पति नेतना का जीवा की सनातन सहगामिना के रूप म निरूपित किया है ।' जाप हो शटा म छायावाद म यह सववाद अधिक सूक्ष्म रूप पा गया है जिसम जड तत्व से चतन का अभिन्नता सूक्ष्म सौदर्यानुभूति को ज म देती है और यष्टिगत चतना से व्यापक चेतना की एकता भावात्मक दशन सहज १ साहित्यकार की आस्था तथा जय बिघ श्रीमती महादवी वर्मा प ६५ २ वही प ६६ ३ वही पृ७४ ४ वहीं प ७५ ५ वही प ७.
छायावाद | ३३ - कर देती है। निश्चित ही छायावाद में वर्णित प्रकृति की जिन विशेषताओ का स्पष्टीकरण श्रीमती वर्मा न दिया है उनकी आर अय समासको वा ध्यान नही गया है। [१३] समद्ध कल्पना-बाहुल्य और दीप्त रगो का फलाव छायावाद तत्वत प्रति के बीच में जीवन का उदगीथ होन के कारण आपके अनसार इसमें समद्ध कल्पना की सूक्ष्म रेखाजो का बाहुल्य और दीप्त रगो का फलाव स्वाभाविक हा गया है । यही कारण है कि छायावादी वल्पनाएं बहुरंगी और विवि धरूपी हैं। यावाद में दुख और विपाद के तत्वा का स्पष्टीकरण करते हुए आपने यह स्वीकार किया है कि यह करणापी छाया म सौदय के माध्यम से “यक्त होने वाला भावात्मा सववाद हो रहा है । अपने इस क्थत की भी आपने मनावनानिक ध्याच्या प्रस्तुत यी है। आपने लिखा है कि गीत म गाया हुआ पराया दुख भी अपना हो जाता है और अपना भी सवका, इसी से व्यक्तिगत हार से उत्पन्न व्यथा एष सम गित करुणा भाव म एकरस जान पड़ती है। छायायुग का वाव्य स्वानुभूतिमयी रचनाआ पर आश्रित है । अन व्यापक करण भार और व्यक्तिगत विपाद के बीच की रेखा या और भी अस्पष्ट हो जाती है। इम प्रकार श्रीमती वर्मा को न विवेचनाओ ने छायावाद को मूल प्रति और उसक सास्कृतिक दाशनिर मूल स्रोतो के स्पष्टीकरण म बहुत अधिक सहा यता दी है। [१४] अन त जीवन को गहरी संवेदना V इम सदभ म इसी युग के एक प्रमुख कवि डा० रामकुमार वर्मा के विचार भी द्रष्टय हैं । मापन छायावाद का हृदय की एक अनुभूति निरूपित करत हुय लिखा है कि वह भौतिक समार के कोर में प्रवेश कर अन त जीवन के तत्व ग्रहण करता है और उस हमार वास्तविक जीवन स जोडकर हृन्य जीवन के प्रति एक गहरी सये दना और आशावाद प्रदान करता है। अपन इस क्थन द्वारा आपन छायावादी काव्य और जीवन का अभिन्न सम्बध स्थापित कर दिया है। इसी प्रमग मछायावादातर कवि-समीर धी अजय जी न इस तथ्य के ठीक १ वही 11 २-साहित्यकार की आस्था तया अय निवध, ८६-७ ३ घड़ी पृ०.६० ४ वही पृ०८ ५ साहित्य नितन डा० रामकुमार वर्मा ५० १२४-५ । htha ३५ / आधुनिर माय प्रवत्तियां एव पुनमू ल्यारन विपरात बात कही है । आपवे अनुमार महायुद्धोत्तर अव्यवस्था और पराजयवाद ने इस अन्तराल को और भी गहन वर दिया । परत सवदनशील वृतिकार म गहरा अतद्वद प्रकट हुआ। यह अ तद्वद्व उस साधारण जन स दूर ले गया इम दूरी क बोझ न अतमन को नयी तीव्रता दी । उमन नय कवि म एक अभूतपूर्व आध्यात्मिर भ्याकुलता उत्पन्न की। छायावानी का य मुख्या इसी व्यानुनता का अभिक्ति करने के प्रयत्ना का परिणाम था ।' अनय जी न साधारण जन स दरी और अभूतपूर्व आध्यात्मिक ध्यानता जस पदो का स्पष्टीकरण नहीं किया है । यदि दूरा का तात्पय क्लात्मक सोप्टव स है तो निश्चित ही छायावाद वा शिल्प कौशन और भाषा सामथ्य साधारण जन के स्तर से ऊपर उठा है और यति इस दूरी का आशय छायावाद काव्य क जीवन रस से वचित होने और जानाशचारी कल्पना से सम्बंधित है तो निश्चित हा तथ्य दसक विपरात हैं । इसी प्रकार हम दर चुके हैं fr छायावार म धार्मिक आध्यात्मिकता की व्याकुता के स्वर हैं ही नहीं और जो आध्यात्मिवता आई भी है वह न तो साधारण जन की दूरी के बाग से आपात है और न पविया के महा युद्धोत्तर अव्यवस्था और पराजयपाल से प्रगूत अतद दो स । [१५] प्रथम महायुद्ध से लेकर द्वितीय महायुद्ध की कविता छायावाद हिंदी साहित्य म छायावार व स्वरूप विश्लेषण व प्रयास जोर मा अनर विद्वाा समाक्षवा न किए हैं किन्तु उ हान प्रकारात स उपयुक्त विषताओ और परिभाषामा को ही भगीकृत कर लिया है त उनमा विवचनाआ म पाई नयी उल्लेखनीय वात नही दिखाई देती । डा. लक्ष्मासागर वाष्र्णेय ने अवश्य छायावाद की पूर्व स्वीकृत विशपताना यो गिनाते हुए (यया व्यक्तिवाद गीततत्व ल्यात्म क्ता मानसिकता, कवि और उसके राग विराग की प्रधानता प्रकृति पर कवि भापानामा का आरोपण प्रकृति का जभिव्यजना म लाक्षणिक्ता सगीतात्मक्ता आदि ) कहा है कि प्रथम महायुद्ध स द्वितीय महायुद्ध तन की कविता की मुख्य प्रवत्तियां हैं-छायावाद । जापका यह क्थन यद्यपि अस्पष्ट और अति यापर है तथापि इसमे छायावादी वा य प्रवत्तिया की परि सीमाना का बोध अवश्य हो जाता है । यदि आप प्रथम महायुद्ध और द्वितीय महायुद्ध के प्रारम्भ या अ त की बात स्पष्ट कर देते तो निश्चित ही आप इस कथन स छायावाद की दोनो सोमाआ व निर्धारण में महत्वपूण सहायता मिलता। फिर भी छायावाद की सीमाएं हिदा साहित्य में विवाद का विषय नहीं हैं 1 सामा युत् सभा विद्वानो ने परना-स नेकर कामायनी या उपास स लेटर 'युगात के बाप समय का छायावाट की सना स विभूषित किया है। राजनीतिक भाषा म इसे हम १ पुष्करणी जनेय ५०६ २ आधनिक इतिहास डा० ल’मीसागर वार्ष्णेय, पृ० २५६ चनन रूप वत्रता छायावाद/३५ प्रभम महायुद्ध के पत और द्वितीय के लगभग प्रारम्भ तक का समय कह सकते हैं। भारतीय स्वाधीनता मग्राम का पाठभूमि म इमे गाधी जी के राजनीतिक नतत्व का शीर्ष वार भी कहा गया है। [१६] एक सम्पूण काव्य दृष्टि और काव्य सष्टि "मी सदभ मडा. रवीन्द्रनाथ 'भ्रमर तथा श्री नित्यानद पटेल व छायादार मे सम्बधित पुनमू ल्यावन व काय और निप्वप भी उस्लखनीय हैं। डा० भ्रमर ने समवयवादी ष्टि से काय लिया है और छायावाद को एक सम्पूण काव्य-दष्टि माना है । वे इममे कभी रहस्यपान कभी स्वच्छ रतावाद, वनी प्रतीक्वाट, कभी इनसे परे भौर कभी इनके मिश्रित रूपो और प्रपत्तिया को भी देखते हैं और इसी कारण इमे 'एक “यापक और बहुमुखी का य प्रवत्ति' कहत हैं ।' रितु आपकी इन पदावरिया के द्वारा छायावार का कोई भूत रूप हमारे सामने नहीं आता। डा० भ्रमर न निजी रुचि तथा पुनमू त्यावन के दष्टिकाण' वा परिचय देत हुए छायावाद के प्रारम्भ की सीमा को थोडे पीछे कर लिया है। इम सदभ में जाप हिन्दी साहित्य कोश मम्मत अपना तक दत हुए लिखत है कि १९१३-१४ म इदु नामक मामिव पतिमा म उस पद्धति की रचनायें प्रकाशित होने लगी थी जिह छायावाद की नयी धारा के प्रपतन का श्रेय मिला है। दूसरी जगह आप लिखते हैं कि छायावाद का अभ्यु?य १६१६ ई० व आसपास माना जाता है निराला की 'जुही की क्लो १८१६ ई० की रचना बनाइ जाती है। आप छायावाद म प्रारम्भ से ही शलीशिल्प की प्रौटना और दीप्ति मानकर चले है। कामायनी' की प्रकाशन तिथि को आपने १८३५ ई० माना है। आपकी दष्टि से यही छायावाद की दूसरी सीमा है । १९३६ स छायावार का पतन प्रारम्भ हा गया था फिर भी आप १६४७ इ. तर घयावाटी बामो शरी शिल्प म रची जान वानी कविताजा का सिनसिला जारी मानत ह । १९३५-३६ वे बाट के आठ-दस वर्षों को छायावादी वविता को आप उत्तर छायावाद प नाम से अभिहित करते हैं। इस प्रसग म यही टिप्पणी पर्याप्त होगी कि डा० प्रमर द्वारा प्रस्तुत और सस्तुत तग्यो म से अधिश सही नहीं हैं। [१७] जीवन मीमासा का काव्य श्री नित्यानद पटेल ने अपने पूर्व निवदन' म कृतज्ञतापूर्वक पह स्वीकार कर १ छायावाद एक पुनमू ल्पाक्न डा० रवीद्र भ्रमर, ५० २९ । २ वही ५० ४८1 ३ वही पृ. १९२। ४ वही पृ० ४७। - ३६ / आधुनिक काव्य प्रयत्तिया र पुनमू ल्याउन स दिया है कि विशेष रूप से डा० नगेन्द्र, श्री मानव और डा० नामवर सिंह द्वारा प्रत्त आगोर की महायता से ही हम विषय को यथामति विगद पर गये हैं। समर्थ आतो चका को भूल वा स्पष्टीकरण करते हुए आपन लिया है कि 'तधारपित छायावाद युग में प्रकृति सम्बधी जीवन मीमासा मामधी आध्यात्मिय विरह मिलन सम्बधी गांधीवाद से प्रभावित राष्ट्र सम्बधा, सौरिख प्रेम सम्बन्धी, दुप याना सम्पनी, मानवता सम्बना यन्त स गीत निम गये है परतु य राय गीत छापावाद की परिधि में नही आत , आपर शाम छापावाद की गुबाघ परिभाषा गम प्रकार है- सजीवता मवाना एय मानर हाय भावा स अनुप्राणित प्रकृति में -पक्ति का आननस नाब ना अनुरजित चित्रण छायावार है। प्रसार को 'कामायो को आप छायावानी महापाव्य नहीं जीवन मीमामा का महाकाव्य मानते हैं। आप ये अनुसार १९३६ ३ या भा छायावादी धारा बुद्ध कृशता नपुना के साय अय धारामा के माथ गाय यह हो रही है यह खुशी की बात है । छायावाद र पतन की बात में वह बाई तुक नहीं लिया है और उन अनुमार १९३७ में बात की पविताओ म भाव और कला की दष्टि से उनमा अच्छा निवार हुआ है। आपन मर नगपति मरे विशाल (दिनकर) मधुवन की छाती को देखो मूसा गिननी इसकी वनिया (बच्चन) तपा नपाली आखें घमार उटी मस्ती स मत्रमुग्ध प्यासी वसुधा की नामक गीत से पुछ उगहरण देकर यह सिद्ध किया है कि छायावादी प्रभाव मूध य वविया क तन मन म,पर करवे वस गया है-ऐसी अवस्था म उगवे पतन की बात क्या बतुत्री-सी नही जचती. पुस्तक की भूमिका महा0 रामधारी सिंह दिनकर नं. क्या आगू रेवल प्रकृति के व्यि है ? क्या अनुभूति' देवल प्रकृति मा वणन करती अतजगत कोरी प्रकृति कविता है ? आदि प्रश्न उठावर प्रो. नित्यानद जी के विचारा का खण्डन कर देते हैं कि जो छायावाद को वेवल प्रति नाम मानत है ये ठीक ठीक सही राह पर नहीं हैं। इसी 7 घया १ छायावाद नया मूरूपावन नित्यान द पटेल प० १२ । २ छायावाद नया मूल्याकन, प०१७ । ३ वही, प. १ ४ वही, १० १३२ । ५ वही, पृ०२०८। ६ वही, प० २०८। ७ वही पृ० २०८-१२ । - वही प..1 बायावाद | इस प्रकार आजका छायावाद के नय या पुनमू ल्यान के नाम से उसके विश्लेषण सश्लेषण के जो प्रयास हो रहे हैं उनमे वनानिक शाध की तुलना मे निजी दप्टिकोणा और पूर्वाग्रहता की हा अधिक्ना है। ऐसे तथ्य इस काव्य प्रवत्ति के मूल्यांकन के माग म अवरोध और अतविरोध ही उत्पन्न कर रहे हैं। सश्लिष्ट काव्य प्रवृत्ति Vसमग्रन छायावाद एक एसी सश्लिप्ट काव्य प्रवत्ति है जिसमे आत्मनिष्ठता के साथ साथ प्रकृति और मानवीय चेतना का उज्ज्वल सौदय निरूपण, अखिल मानव भावो क सत्य स्वरूपा का विश्लेषण युगीन सास्कृतिक दाशनिक राष्ट्रीय मचेतना के प्रकाश म नव मानवता से सम्बधित नव मूल्यो की शोध सजना और स्वच्छ द जोवन तथा रचनात्मक कल्पना दष्टि स परिपूण एव परम्परा की लीक से हटकर काय कना तत्वा के नूतन और प्रीतिकर प्रतिमानो का प्रयोग मिलता है । इसम सत्य शिव और सुदर पक्षा स समवित एक समय यक्तित्व और मानवीय जीवन का क्लात्मक पुनस जन है छाया नहीं। Vनिराला जा की 'तुरसीदास' तया पत जी की युगवाणी निश्चय ही ये दा ऐसी महत्वपूर्ण कृतियां हैं जो एक युग के अत तथा दूसरे युग के प्रारम्भ प्रप की सूचना देती हैं । 'युगाल पत जी की सौ दय-दृष्टि और प्रकृति चेतना का युगात है छाया वाद का नहीं। Vछायावाद के पतन या पराभव के मूल में चाहे जा कारण रह हों पर उमका ग्रह अथ नही है । १९३८ ई० के बाद छायावादी काव्य लिखा ही नहीं गया। देवी जी वी 'दीपशिखा (४२), निराला जी की 'अणिमा' (४३) के गीत तथा अचना- आराधना (५० ५३) का छायावादी शिल्प और स्वय पत जी ने स्वण काव्य का छायावादी रूविधान इस बात का प्रमाण है कि यह प्रवत्ति प्रगतिशील, प्रयोग तथा नयी कविता की युगीन प्रवत्तियों के तार स्वरो में दबकर और युग चेतना के विरुद्ध छायावादी कवियो के प्रोट ससारो के रूप में जीवित रही है। एक दीपशिखा के अपवाद को छोडार १६३८ वी परवर्ती छायावादी कृतियो म वह तेजस्त्रिय रूप और वभव नहीं दिखाई देता जो आमू 'कामायनी 'पल्लव' गुजन', 'गातिका अनामिका', 'नीरजा' साध्यगीत' आदि कृतिया म दिखाई देता है। दीपशिखा के अपवाद का कारण देवी जी का एक निष्ठ विरह-साधना है जो प्रगति या प्रयोग धर्मी चेतना से पूरी तरह अप्रभावित है। पतन के कारणों का विश्लेषण Vछायावाद पतन कारणों का विश्लेषण करने वालो म छायावादी कवि ही प्रमुख हैं। श्रीमती महादेवी वर्मा ने उसके आत्म पक्ष की पमियो की बोर ध्यान याप्ट दिया और थी पत जी ने उसरी क्लान्चतनामी 4 ३८ / आधुनिक वाय प्रवत्तियां एक पुनमूल्याक्न भोर । देवी जी का क्यन है कि "छायावाद के कवि को एक नये सौत्य लोक म ही यह भावात्मा दष्टिकोण मिना जीवन म नही, इसी से वह अपूण है।' कुछ अन्य विचारका ने छायावाद की कमिया और ह्रास के कारणो पर प्रकाश डाला है । डा० इद्रनाथ महान का स्थन है कि छायावाद वा पथ यक्ति के विद्रोह से और इति पलायन से हुई, विद्रोह म उसका प्रगतिवादी पक्ष व्यक्त हुआ और पलायन में प्रतिक्रियावादी।' (निवध और निबध पृ० २९६) इसम सदह नहीं कि छायावाद म पनायन, कपनाशीलना आत्म ये द्रायता आनि की प्रवत्तिया रही हैं किन्तु य जीवन सघप से पलायन नहीं है और न इस भूमिका पर छायावाद की क्षति हुयी है। छायावाद का चरम शोप कामायनी है इसा के बाद यह युग लगभग समाप्त हो गया विन्तु कामायनी जीवन सघप का काव्य है पलायन या नही उसमे जिस नूतन मानवता का प्रदशन किया गया है वह इच्छा किया और ज्ञान की समरसता पर आधारित है। दिनकर जी छायावाद का पक्तिगत सुख दुख का रोदन' कहत है और जन कल्याण की दष्टि से उसके यक्तिवाद यो निरया मानते है। डा० सूरती छायावाद म अनुभूति की सचाई का अभाव अभिव्यक्ति म अस्पष्टता साधारणीकरण के लिए आवश्यक प्रेषणीयता का अभाव, ययाथ स दूरी, निराशा और भाव की पीडा पवि मन की कु ठाग्रस्त स्थिति आदि अनेक अभावो को देखते हैं और इहे ही उसके ह्रास के प्रमुख कारण निरूपित करते हैं । व उसम सो ग्य और कला के वभव की अति रेकता तथा भीतरी प्राणशक्ति का अभाव भी निरूपित करते हैं । निश्चित ही ये तत्व आशिक रूप से छायावाद के पतन मे सहायक सिद्ध हुए हैं किन्तु युगीन परिस्थितियों और प्रगतिशील वातावरण ही ऐमा प्रमुख उपकरण है जिसके कारण छायावादी कवि ही उस दिशा म उमुख हो गये। प्रसाद जी का देहावसान हो गया और श्रीमती महादेवी वर्मा ने दीपशिखा के बाल कवितायें लिखना ही लगभग बद कर दिया पत जी ने युग का साथ दिया और निराला जी तो प्रारम्भ से ही अधिक बहिमुखी और वस्तुवादी रहे हैं अत युग की आवश्यक्ताओ के अनुरूप आप भी प्रगतिशीलता की ओर बढ गये और इस तरह छायावाद का समापन हो गया।
२
| रहस्यवाद
रहस्यवाद के मूल स्रोत
प्रात काल सुनह ना प्रकाश बिखराने वाला और दोपहर को प्रचण्ड दीप्ति से
चमवन वाला ये स्य क्या है ? य चाद तारे, ग्रह नक्षत्र सव क्या हैं ? इहे विसने
रचा ? क्यो रचा? इनकी निर तर परित्रमा का क्या उद्देश्य है? नर नारी जीवन मरण
निर्माण विनाश क्या, रिमनिए? इद्रधनुप को सुपमा वरकाओ का वज्राघात,वादलो की
भयावनी गडगडाहट और प्रलकारिणी वष्टि कोक्लि वी श्रुति प्रिय ध्वनि और पपीहे
की अविरल पुकारें-क्या ? किसके लिए ? प्रकृति के इन राग रजित रूपो और भया
वह दश्या के रहस्यो न आदिम अवस्था में ही मानव मन म मुग्धता और क्षुब्धता,
श्रद्धा और भय की भावनायें भर दी थी रहस्यवाट के प्राथमिक सूत्र मानव की इसी
आदिम जिज्ञासा भावना म दिखाइ दते हैं।
ऋग्वेद (१०/१२६/६७) के दो सूक्तो में इस सदभ में लिखा है कि- कौन
ठोठी जानता है ? कौन यह सच सच बता सकता है कि इस सष्टि का उदभव
कहाँ स हुआ कसे हुआ ? सष्टि का निर्माण स्वत ही हुना या किसी ने पिया ?
यह सब कुछ वही अतरिवासी
जानता है या वह भी जानता या नहीं
क्सेि पता?"
कामायनी के मनु भी प्राकृतिक रहस्या के प्रति इसी प्रकार की मुग्धता
और जिज्ञासा प्रगट करते हैं-
महानील इस परम व्योम मे
वतरिक्ष में ज्योतिर्मान ।
ग्रह-नक्षत्र और विद्युत्कण
किसका करते-से सधान ।
छिप जाते हैं और शिवलत
आवपण
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म खिचे हुए
४०/आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एव पुनमू ल्याक्न तृण वीरुध लहलहे हो रह विसके रस स सिचे हुए। है अनत | रमणीय कौन तुम यह मैं कम रह सक्ता ? हे विराट । ह विश्वदेव । तुम कुछ हो ऐसा होता मान। (आशा राग) (१) रहस्यवाद एक अनुभूत्यात्मक सत्ता- ऋषि मुनिया दार्शनिका और योगियो ने उस अनत शक्ति का स्वरूप जानने की चेष्टा की पर उमकी अनुभूति तो कर सके अभिव्यक्ति नहीं, इसीलिए रहस्यवाद को अनुभूत्यात्मक सत्ता कहा गया और यह माना गया कि उसे वही समझ सरता है जात मय होकर उमी म लीन हो जाय या अद्वत हो जाये। अद्वतवाद की जब ये रहस्यात्मर भावनायें अत प्ररित होकर अपने सुतीय भावावेग घ साय सागी तिम रूप धारण करती हैं तर रहस्य गीता की सप्टि होती है। रहस्यवाद वी इही विशेषताओ को ध्यान में रपार जाचाय रामचन्द्र शुक्ल ने निसा है- 'नितन क्षन म जो द्वनपाट है यही भावा के भन्न म रहस्यवाद है। यहाँ चिनन व क्षत्र स आशय दाशनिय जगत स है । दाशनिक प्रयो म भी उस अदतवादी परमसत्ता को विराट हा गया गया है उसका ठीक ठीक स्वरूप निधारण नहीं किया जा सका। सभी लोग उस अज्ञय अगम्य जटश्य अमीम अनादि, अनत नेति नेति कहार चुप हा गय हैं । हिन्दी के सवश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि कबीर दास भी उस रहस्यात्मक दीप्ति को कवि कू शोभा नहीं, देख्या ही परमाण वह उठत हैं। रहस्यानुभूति का जाप प्रेम की अक्थ कहानी कहकर उस 'गू गे गुड से उपमित करते हैं । डा० नगेद्र रहस्यवाद क मनोवज्ञानिक पक्ष का उदघाटन करत हुए कहते हैं कि बहिरग जीवन से सिमट कर जव कवि की चतना ने अन्तरग में प्रवेश किया तो कुछ बौद्धिक जिनासाए-जीवन और मरण सम्ब धी प्रकृति और पुरुप सम्बधी मात्मा और विश्वात्मा सम्बधी-का य म आ जाना सम्भव ही था और वे आई , उसक चिंतन स्वरूप रहस्यवादी कविता उदभूत हुई। इस परिभाषा क्थन स रहस्य वादी काय का रचना प्रक्रिया पर तो प्रकाश पड जाता है कितु उसका स्वरूप विश्लपण सम्यारूपेण नही हो पाता। (२) अज्ञात और अव्यक्त सत्ता के प्रति आत्मनिवेदन बाबू श्यामसुदरदास ने अपनी निम्नलिखित परिभाषा मे रहस्यवाद के मूल स्वरूप को स्पष्ट करने की चष्टा की है-जनात और अव्यक्त सत्ता के प्रति जिसम रहस्यवाद /११ भाव प्रकट किए जात हैं, वही कविता रहस्यवाद की कहा जा सकती है । दूमर शब्दा म व्यक्त जगत में पराक्ष की अनुभूति का अभिव्य जन रहस्यवाद है । क्ला की दष्टि स यह एक शली विशिष्ट है जिसम इस विविध चराचर के मूल म विद्यमान वारण भूत रहस्यमयी चेतन सत्ता पर मघरतम व्यक्तित्व का आरापण कर उसक प्रति अनुरागजनित आत्मसमपण की भावना का अभि यजन किया जाता है।' बला क। दृष्टि से रहस्यवाद को एक शैली विशिष्ट नहीं माना जा सकता। वस्तुत उसकी स्वत को एक सास्कृतिक और दाशनिक पष्ठभूमि है, वह काव्य का बाह्य उपकरण नही, प्रत्युत मत करण की एक आध्यात्मिक चेतना के रूप मे वह काव्य मे अभिव्यक्त होती है । इससे अधिक सुलझी हुई और तात्विक परिभाषा गगाप्रसाद पाण्डेय की है। (३) हृदय की दिव्य अनुभूति पाण्डेय जी के अनुसार 'ईश्वर तथा विश्व का सब, इस विश्व की क्रिया शीता का रहस्य उसकी उत्पत्ति उसका विनाश, आदिकाल से मनुष्य को मुग्ध तथा क्षुध क्यि है। इस क्षुब्धता म अशाति का आवेग है। त शातिप्रिय नर समाज इस चिर रहस्य गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहा है, हमारी ससीम चतना जसीम चेतना की निर तर खोज परती रहती है। इसी खोज की मधुर अभि- म्पत्ति काय मे रहस्यवाद का रूप धारण करती है। साराशत रहस्यवाद हृदय की वह दिय अनुभूति है जिसके भावावेग में प्राणी अपने ससीम और पार्थिव अस्तित्व म उस असीम एव स्वर्गिर 'महा अस्तित्व के साथ एकात्मकता का अनुभव घरने लगता है।" इस परिभाषा आरम्भ मे पाण्डेय जी ने मानव की सहज जिज्ञासा, विस्मय मुग्धता और क्षु धता का आभ्यान दिया है जो रहस्यवाद की प्रथम सीढ़ी है रितु केवल जिज्ञासा रहम्पवाट नहीं है उसम जसीम के साथ ससीम के मिलने की उत्कला भी मुनीर काटि की हो, इमका सक्त उन्होने उपयुक्त परिभाषा के अत म किया है। मध्य म उहाने एक विशेष वस्तु की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है । सभी जिज्ञामाकुल क्षुध और मुग्ध व्यक्ति रहस्यवादी नहीं होते, देवल वे ही इस मीमा के अ तगत जात हैं जो शातिप्रिय हैं और चिर रहस्यमयी जीवन मरण, विनाश निर्माण आदि से सम्बधित गुत्थिया के सुलयान म मनोयोगपूर्वर दत्तचित्त हैं । जो व्यक्ति इस नाय म लप नहीं हैं और असीम ससीम वे एकाएर स विमुख हैं व रहस्यवादी नही है । पाण्डेय जो न रहस्यपाद व इन मून तत्त्वो को उपयुक्त परिभाषा में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है रितु व भी उसके सम्यक स्वरूप पा स्पोारण नहीं कर सकत हैं, उनवी उक्त परिभाषा म अति स्याप्ति का दाप है। (४) जड चेतन के एकीकरण को गहरो वास्तविक्ता बाबू गुलावराय के अनुसार प्रति म मानवी भाया का नारोपवा- emamarape ४२ / बाधुनिक काय प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याउन क एकीकरण को प्रवत्ति छायावाद की एक विशपता है और उसके मूत अभूत स तुलना करने वान अकार-विधान म जसे विखरी पलकें ज्यो तक जाल' लहरो के लिए इच्छाआ सी असमान तथा मानवीकरण प्रधान लाक्षणिक प्रयोग। म परिलक्षित होती है । जब यह प्रवत्ति कुछ अधिक वास्तविक्ता धारण कर अनुभूतिमय निजी सम्बध की आर अग्रसर होती है तभी छायावाद खस्यवाट म परिणत हा जाता है। वस्तुत गुलाबराय ने इसम छायावाद को ही विशेषताओ का प्रस्तुत करने की चष्टा की है। छायावाद वा भी वे क्वन वनात्मक पक्ष प्रस्तुत करते हैं। उसके अन रग पक्ष में निहित सास्कृतिक गरिमा को उपेक्षित करके उसकी मानवीकरण तथा लाक्षणिक प्रवत्ति का उल्लख करक वे कहते हैं कि जब ये प्रवत्तियां अधिक वास्तविक होंगी और अनुभूत्यात्मक ढग से अग्रसर हुई ता रहस्यवादी काय की सृष्टि हो जायगी क्ति तथ्य इसके विपरीत है। छायावाद का रहस्यवाद की प्रथम सीढी नहीं कहा जा सकता उसका मनामय मसार पथक है यह दूसरी बात है कि रहस्यात्मक प्रवत्तियां-जिज्ञासा कुतूह आदि भी उमम विद्यमान रहती हैं कि तु रहस्य र साधना की वस्तु है कल्पना की मही छायावाट काय वे मूल म कल्पना का सजनात्मक रूप निहित है जबति बार के का य म उनी साधना प्रमुख रही है। याना बल पर जिस कल्पनाच्छादित रहस्यवान की मृष्टि हागो वह साधक ववि की अनु भूत्यात्मव रहस्य भावनाआ से नातोक्ति नही हो सकता इसलिए कबीर के रहस्य गीतो में छायावाटी तत्त्वा का भाव हात हुए भी विशुद्ध रहस्यवादी प्रवत्तियाँ अभि व्यजित हैं जिह कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। (५) ब्रह्म के प्रति प्रणय निवेदन छायावाद और रहस्यवाद के इस सूक्ष्म जतर को विश्वम्भर मानव ने समझन की चेष्टा की है और लिखा है कि प्रकृति को चेतना प्रदान करना छ यावाद है और ब्रह्म के प्रति प्रणय निवेदन करना रहस्यवाद है। जितु इसम उनका छायावाद विषयक दष्टिकोण अध्याप्ति दाप स ग्रस्त है । प्रकृति का चतना प्रदान करने के अतिरिक्त छायावाद और भी बहुत कुछ है जिसका सकेत करना मानव जा भूल गये हैं। (६) समष्टि सौदय बोध बाजपयी जा के अनुसार छायावार व्यष्टि सौन्य तथा रहस्यवाद समष्टि सौ दय-बोध की रचना है। मानव जीवन की विविध इकाइयो के भीतर आध्यात्मिक सत्य का झलक यष्टि सोन्य-बोध है। जव यही सोदय-वाध अधिक उदात्त होकर व्यष्टि सौदय की सत्ता का अपने म आत्मसात कर लेता है तो वहा भावभूमि समष्टि रहस्यबाद | - बोध बन जाती है अत आध्यात्मिक मोदय-बोध छायावादी काव्य का स्वरूप है, इसी की उदात्त भूमिका पर रहस्यवाद मा आन हाता है । छायावाद प्रथम और रहस्यवाद द्वितीय मोपान है। प्राध्यात्मिक तत्त्व होना में हैं रितु छायावाद में ईश्वर की मृष्टि का आधार लेकर उसके मुदर पक्ष वा चयन करत हैं तथा रहस्यवा' म सुदर असुन्दर घी बात को सुनार एप ममरस भूमिका का उदयाधन दिया जाता है। छायावादी काव्य मानवीय जीवन व सोन्य का व्यक्त करता है, वितु रहस्यवाद ईश्वर मावार होन को आकुलता को लेकर बनता है इसीलिए छायावाद में मानवीय संवेदनाआ की अधिकता है, किन्तु रहस्यवाद म आत्मा-परमात्मा का निर्देश अधिर रहता है । छायावाट म वस्तुमो की स्वतन सत्ता रहती है जबपि व ही नोविक यस्तुयें रहस्यवान मे प्रतीव का रूप धारण करय अभिव्यजित होती है।' वाजपेयी के इस लम्ब उद्धरण से हमार कई कार्य एव साप सपन्न हो जात हैं। ऊपर जो कतिपय विद्वान छायावा” को शली विशेष बहत हैं, उसका निराकरण हो जाता है और छायावाद तथा रहस्यवाद के मूलभूत असर तथा साम्य का भी दिशन हो जाता है । उपयुक्त अश म वाजपेयी जा ने भी छायावार को प्रथम और रहस्यवाद को द्वितीय सोपान यहा है किन्तु सके पूर्व व छायावाद को व्यप्ति सौन्दय बोध और रहस्यवाद को समष्टि मोदय कह चुक हैं। व्यष्टि मोदय-बोध या मान वीय जीवन की उन्नात्त भूमिका पर ही समष्टि सौदय-वाघ अथवा रहस्यवार पी मृष्टि होता है यह तथ्य किसी भी रहस्यवान कवि को कृति म देखा जा सकता है, स्वय वाजपयी जी न भी इस स्वीवार किया है। अतएव यहाँ वाजपयी जी का अथ छायावाद और रहस्यवार को क्रमश प्रथम और द्वितीय सोरान वहन म उसने ऐति- हासिक काल म से नही रहा है और न ऐमा कभी सम्भव भी है। (७) अनुराग जनित आत्म यिसजन श्रीमती महादेवी का रहस्यवाद मध्यकालीन भक्त पषि वी चेतना से कम वितु इस सनी की पक्तिवादी प्रवत्ति से अधिक प्रभावित है फिर भी उनकी रहस्य घेतना साधनात्मक दाशनिक और सास्कृतिक पप्टभूमि को लेकर विकसित हुई है उहाने युग चतना के अनुरूप भारतीय रहस्यवादी भावना का अग्रिम विकास विया है। इस दष्टि से 'रहस्यवाद पर उनके वक्त य विशप मह वपूण हैं। देवी जी के अनुसार जव प्रकृति का जनेररूपता परिवतनशील विभिन्नता म, कवि ने एक ऐसा तारतम्य खोजने का प्रयास किया जिसका एक छोर विसी असीम चेतन म और दूसरा उसके ससीम हृदय में समाया हुआ था तव प्रकृति का एक एक अंश एक अलौक्वि यक्ति व लेार जाग उठा। परतु इस सम्बध म मानव हृदय की सारी प्यास न बुझ सरी क्योकि मानवीय सम्बधा म जब तक अनुराग जनित आत्म विसर्जन का भाव नही घुल जाता तब तक वे सरम नहीं हो पाते और जब तक य मधुरता १४ / आधुनिक काय प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्यांकन मीमातीत नहीं हो जाती तब तक हृदय का जभाव दूर नहीं होता। इसी से इस अनेकरू पना के कारण पर एक मधुरतम यक्तित्व का आरोपण कर उसक निवट जात्मनिवेदन कर देना इस काय का दूसरा सोपान बना जिस रहस्यमय रूप के कारण ही रहस्यवाद नाम दिया गया ।' देवी जी की इस परिभाषा को उद्धत करते हुए डा० गणपतिचद्र गुप्त ने लिया है कि देवी जा ने 'परिभाषा के नाम पर एक ऐसी वहानी छड दी जो क्वन रहस्यवानियो की ही समझ म आ सकती है। मैं रहस्यवादी नहीं हू फिर भी महात्वा जो की सहजता तथा स्वाभाविक्ता को समझ रहा हू । मैं ही क्या उस कोई भी साहित्यिक क्षन म थोडा सा दखल रखने वाला व्यक्ति समझ सकता है। उमम जटिलता न तो भाषा-विषयक है न विचारो की नस्पष्टता सम्बधी ही है। यदि कोई जटिलता है तो मिश्रित वाक्य वियास की। मिश्रित वाक्य वि यास कोई दाप नहीं माना गया हो आशय स्पष्ट होना चाहिए । देवी जी की उपय क्त परिभाषा में उनकी सहज वा यात्मक और आलकारिक भाषा को देखा जा सकता है किन्तु वह तो उनकी भाषा मात्र की विशेषता है क्या पद्य क्या पद्य सवत्र उहाने एक ही प्रकार की मिश्रित इवाई से सम्पन्न का यात्मक भाषा का प्रयोग किया है कोई उनकी मौनिक विशेषता हो न समझे तो इसमें देवी जी का क्या नोप? गुप्त जी की समझ म यह भी नहीं आया कि देवा जी क इस चक्र यूह का प्रथम सोपान कहीं स प्रारम्भ होता है । इस सम्ब ध म मुझे स्तना ही कहना है कि वह उनक भारम्भिव शट से ही प्रारम्भ हाता है और अलौकिक यक्तित्व लेकर जाग उठा इस पावलि के साथ समाप्त हो जाता है । इस प्रथम सोपान से देवीजी का आशय छायावादी काय चेतना से ही है जिमम कवि ने प्रकृति की अनेकरूपता परिवतनशील विभिनता के साथ तादा- त्म्य किया और उसका मानवीकरण करके हमारे सामने प्रस्तुत किया। प्रकृति की इस सचेतनता के मूल म उसकी अपरिमित जिज्ञासाय कुत हल की भावनायें रही है जो इस प्राकृतिक शक्ति की असीम चेतना और कवि की ससीम चतना को अनुबधित करके अभिव्यजित हुई है। इसी के बाद रहस्यवाद का द्वितीय सोपान प्रारम्भ हुआ जिसकी विशपताआ के विषय म काई भ्राति नहीं है । रहस्यवाद की प्रथम और द्वितीय सोपान की विशेषतामा का सूम निराकरण वाजपेयी जी ने किया है जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। (८) अलौकिक शक्ति से शात और निश्छल सम्बध डा० रामकुमार एक साथ बहुत कुछ हैं । वे कवि हैं नाटककार है शाधकर्ता और ममीक्षक हैं । उह रहस्यवादी कवि वहा जाता है और रहस्यवाद के ऊपर आपका गम्भीर अध्ययन भी है। आपके अनुसार रहस्यवाद जीवात्मा का उस नन निहित प्रवत्ति का प्रकाशन है जिसम वह दिय और बलोक्वि शक्ति स अपना शात ।
रहस्यवाद/१५ - और निश्छल सम्बध जाहना चाहती है और वह सम्बध यहाँ तक बढ जाता है कि दोन। म कोई अन्तर नहीं रह जाता।' इस परिभाषा मे आई हुई कुछ पदावतियो मथा, अतनिहित प्रवृत्ति, दिव्य और लौकिक शक्ति तथा उसस सम्ब ध जोडने की आवश्यक्ता आदि भी कतिपय हिदी के डाक्टरो की समझ में नहीं आई हैं वितु तथ्य तो स्पष्ट हैं उनम भाति नहीं है । हो, जहाँ तक जीवात्मा का परमात्मा से सम्बध जोडने की आकुलता का प्रश्न है, इस पर प्रकाश नही डाला गया है, इसलिये वर्मा जी की यह परिभाषा अव्याप्ति दोष से ग्रस्त है। उपयुक्त प्राधिकारिक समीक्षको तथा कवियो वे अतिरिक्त हिदी में हर दूसरे लेखक ने रहस्यवाद की अपनो निजी परिभाषा प्रस्तुत की है। किन्तु यदि उन पर विचार किया जाय ता दे उपयुत परिभाषाओ का ही यत्किचित परिवर्तित रूप हैं। पुनरुक्ति के कारण हम उहें प्रस्तुत नहीं कर रह हैं । अग्रेजी म रहस्यवाद को (Mycucism) कहा जाता है । यह शब्द (MY) मून धातु से बना है जिसका शाबिक अथ है चुप रहना । मिस्टिन या मिस्टिक्ल का ५० मथुरा प्रसाद दीक्षित ने अपने नमाविक कोप मे जो अथ दिया है, वह इस प्रकार है-गूटाय, गुह्य, गुप्त, गोप्य बोर रहस्य । रहस्यवाद या मिस्टिसिज्म पर गम्भीर अवेषण और विवचन का काय करने वाले स्पेसर तथा भडरहिल + मत हम महा उद्धत कर रहे है। (९) भान दमयी भावातिरेकता की स्थिति स्पसर के अनुसार ' रहस्यवाद हृदयमूलक धम है और जब वह पिसी (अनत्त अज्ञात) शक्ति से सस्पशित हो जाता है तब आन दमयी भावातिरेवता की स्थिति का जाम होना स्वाभाविक है। यहाँ तक कि उसके साथ भावात्मक नृत्य और गीत भी उन्ति हो जात हैं। Mysticism as a religion of the heart and when the heart is touched it is natural that there should be divine ecstacies, accom poned even by rapturous dancing and singing - Joyous Misucism Spencer (१०) भगवत्सत्ता के साथ एकता स्थापित करने की क्ला अडरहिन ने रहस्यवाद को मानवीय व्यक्तित्व का विलयन रहा है। उसके अनु सार वस्तुत रहस्यवाद भी उत्पन्न होता है जब साधक या पवि अपने व्यक्तित्वको किसी महत शक्ति म विलान कर देता है । व्यक्तित्व विलयन वे इस यापार में तक नही प्रत्युत श्रद्धा की अतीव आवश्यकता होती है । अडरहिल ने यह बात स्वीकार 1 ४६ / आधुनिक का य प्रवत्तियाँ एक पुनमूल्याकन - करते हुए कहा है कि रहस्यवाद भगवत्सत्ता के साथ एकता स्थापित करने की क्ला है। रहस्यवादी वह व्यक्ति है जिसने किसी न किसी सीमा तक इस एक्ता को प्राप्त कर लिया है अथवा जो उसमे श्रद्धा विश्वास करता है और जिसने इस एक्ता सिद्धि को अपना चरम लक्ष्य बना लिया है । (प्रकिट र मिस्टिसिज्म)। थिआलाजिया जमनिया ने इस तथ्य को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है- "He who would know before he believeth cometh never to true knowledge - Theologia Germania अर्थात वह जो श्रद्धा विश्वास के पव ही विमी वस्तु को बुद्धि के द्वारा सम झने की चेष्टा करता है सत्य के वास्तविक स्प को नहीं जान सकता। भारतवष में भी रहस्यानुभूति को समझने के लिए श्रद्धा को आवश्यक उपकरण समझा गया है। (११) विवेक्जय मूकता जमनी के एक अय महान दाशनिक रहस्यवादी ने अपने प्रयम ईश्वरानुभूति की अनिवचनीयता वी विशद चर्चा के उपरात मेंट आगस्टाइन का अधोलिखित उद्धरण अपने मत की पुष्टि मे प्रस्तुत किया है- 'ईश्वर क सम्बध म किसी यक्ति का सर्वोत्तम क्यन यही हो सकता है कि वह अपने अत विवेक और बुद्धिमत्ता के बल पर उसके सम्बध मे मौन धारण कर ल। (लाइट लाइफ एण्ड व प १-२ ।) इस विवेक्जय मूकता का यही आशय है कि ईश्वर के सम्बघ म जो कुछ कहा जायगा वह कम हो रहगा। नेति-नेति का भी यही अथ है। (१२) अतर्ज्ञान का आश्रय अभीष्ट लक्ष्य तक साधन को पहुँचाने का एक ही साधा होता है और वह अतर्ज्ञान ही है । अथ है आत्मा द्वारा परमात की प्रत्यक्षानुभूति । इस विषय मे डा० रानाड ने लिखा है कि 'अतर्ज्ञान बुद्धि भावना अथवा इच्छा शक्ति का विरोध न न रके इन सबको भेदकर इनके पीछे स्थित रहता है रहस्यवादी साधना म बुद्धि इच्छा शक्ति और भावना सभी आवश्यक हैं बस इहें अन्तर्ज्ञान का आश्रय मिलना चाहिए। रहस्यवाद म अतर्ज्ञान की प्रमुखता के कारण ही उस अनु भूत्यात्मव यापार कहा गया है जिसे बुद्धि के द्वारा न तो व्यक्त किया जा सकता है, न उसका विवेचन विश्लेषण बौर कदाचित इसीलिए विश्व क सभी महान रहस्यवादी कवि रहस्य सत्ता के विश्लपण के समय अपनी उसमथता स्वीकार करके उसे 'गू ग का गुड कह उठते हैं । कबीर न यही किया। रवी द्र ने भी यही किया। प्रसाद जी ने भी अपनी असमथता स्वीकार कर ला! जी० एम० बाट ने (The Intuition of God) में भी यही बात कही है। जन्तान रहस्यवाद / ४७ अतान का स्वरूप विश्लेषण करत हुये उहाने साधक की कठिनाइया की ओर भी सकेत किया है । उही के शदो म रहस्यवादी अपनी साधना में ऐमी राहो से गुजरता है, जहां से काई न गुजरता हो । उसे वह चीज प्राप्त होती है जो केवल परम्परा पालन से नहीं मिल सक्ती, वह है-तीव्र और प्रत्यक्ष अतदृष्टि के एक क्षण मे ईश्वर की अनुरागमयी अनुभूति ।' (पृ. २१) । (आ) रहस्यवाद की विविध अवस्थायें रहस्यवाद में कवि और परमोच्च सत्ता क बीच वही सम्बध होता है जो आराधक और आराध्य, उपासक और उपास्य साधक और साध्य जथवा ज्ञाता और ज्ञेय के बीच होता है अतएव सता ने अपनी साधना द्वारा माध्य को प्राप्त करने के लिए जितनी अवस्थाओ का वणन किया है, उतनी हा जवस्याय रहस्यवाद की भी हो सकती हैं । सक्षेप मे उन्हें हम इस क्रम से प्रस्तुत कर सकते हैं । (१) परमात्मा के प्रति आश्चर्य कुतूहल और जिज्ञासा को भावनायें यह कवि या साधक की प्रथम आस्था है जब वह ईश्वर की लीला स विस्मय विमुग्ध होकर सेवन किसी अज्ञात और महान सत्ता का आभास पान लगता है । प्रम सत्ता के प्रति रहस्यभरी यह जिज्ञासा को भावना प्राय हर रहस्यवादी कवि की रचनाओ म पिल जाती है। रहस्य और विस्मय की भावनाय छायावादी का य की भी प्रमुख विशेषतायें हैं । किन्तु केवल यही अवस्था रहस्यवाद का चरमोत्कृष्ट रूप नहीं है, यह तो उसका प्रथम सोपान है। उदाहरणाथ, प त जी की मौन निमन्त्रण' शीपन प्रगोत रचना म केवल जिज्ञासा कुतूहल की भावनायें ही व्यक्त हुई हैं, एका कारता या त मयता की अवस्था का चित्रण नही है । विश्व के पलको पर सुकुमार विचरत हैं जब स्वप्न अजान । न जाने नक्षत्रों से कौन सदेशा मुझे भेजता मौन । वदिक ऋषि तथा प्रसाद की जिज्ञासागेका स्वरूप हम इस निब ध क आदि म देख चुके हैं । रहस्यवादी काय म यह प्रथम अवस्था आवश्यक रूप स हो यह तथ्य अनिवाय नहीं है । उदाहरणाथ, गुरु के उपदेश से कबीर ईश्वर की जोर आकृष्ट हो जात हैं अतएव उनके पदा में यह प्रथमावस्था विरल या प्राय नहीं के बराबर मिलती है- जानी जानी रे राजा राम की कहानी अतर जाति राम परकासा गुरु मुख विरल जानी-कवीर ।
४८ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमूल्याकन पन्चामि सवभूताना (२) सवन परमात्मा की झाको देखना तथा आत्मा परमात्मा के अद्वत सम्ब ध के प्रति दृढ आस्था अध्ययन चिंतन मनन (आम नान) अथवा गुरु उपदेश के द्वारा जब साधक को जात्मा परमात्मा के बीच अभेद सम्बध वा ज्ञान हो जाता है और जब वह अपन इष्ट को सवन, प्रकृति व कण रण म देखन रगता है तव रहस्यवाद की द्वितीय अवस्था प्रारम्भ होती है । अद्व तावस्था का नान और परम सत्ता का सवत्रिक रूप से दशन-य दा तथ्य इस अवस्था म विशेप आवश्यक होत हैं। भगवत गीता म परम सत्ता को ही इस सप्टि की उत्पत्ति का मूल कारण बताया गया है- वीज तदहमजुन। नतास्ति बिना यत्स्या मया भूत चराचरम । गाना १०/३९ अर्थात ह अजुन, समस्त प्राणियो की उत्पत्ति का कारण मैं ही हूँ। जो कुछ जड चेतन है वह मरे बिना नहीं है । अथ यह है कि जड जगम-सवन ईश्वर की सत्ता विद्यमान है सब इश्वर क अश हैं और कवि या साधक जब इस तथ्य को जान जाता है तब उसक अत करण म उस परम सत्ता के प्रति रागात्मक्ता प्रगाढ होती जाती है। कबीर का निम्न दोहा इस प्रसग म दखा जा मक्ता है- लाली मरे लाल को जित देखू तिन लाल । लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ।। पत जी ने रहस्यवाद की इस द्वितीय अवस्था को अपन एक प्रगीत म इस प्रकार प्रस्तुत किया है- एक ही छबि क जसप उगन एक ही सब म स्पदन । एक छवि के विभाव म लीन, एक विधि के आधीन ॥ एक ही ता असीम उरलास विश्व म पाता विविधाभास ।। (परिवतन) (३) दशन लालसा, परमात्मा के प्रति गहरा आकपण, प्रेम और विरह का अनुभव ईश्वर की सावतिक यात्री देखने ३ अन तर कवि या साधक के अत करण म जो विशेष अनुभूति जागत होती है वह उसक दशन की उत्कृष्ट लालसा है। इस अवस्था विशप म भक्त साधन या ज्ञाता अतकरण में परमोच्च सत्ताप्रति गहरा आक्पण उदभून हाता है जोर वह उसके प्रेम दिरह की विवध अनुभूतिया करन . लगवा है। पनीर अपने पदो म इस अवस्था म 'बर मिलेंगे आई' की रट लगाकर परम तत्व के दशन की प्रायना परते हैं- विरहिन अभी पय सिरि, पथी यूस घाइ। एक सबद कहि पीव का, पदर मिलगे आई। नित्य दशन की यह पिपासा गम्भीर वियोग वणन मे समाप्त होती है । कबीर के पदा म इस स्पिति की अत्यन्त मार्मिक अनुभूतियां मिलती हैं- औसहिया शाई पड़ी, य निहारि निहारि। जीभडिया पाला पडया, राम, पुकारि-पुवारि ॥ आइ न सकों तुझ प, सकून तुज्झ युलाइ। जिग माही लेहुगे, विरह तपाइ-तपाई ।। महादेवा के निम्नाक्ति गीत में उनकी प्रथम मिलनावरया की अनुभूति स्मति और वर्तमान काल की वियाग व्यथा वा स्वरूप देखा जा सकता है- इन ललचाई पलको पर, पहरा था ब्रीडा वा साम्राज्य मुझे दे डाला, उस चितवन ने पौडाका। गई वह अधरा की मुम्वान, मुझे मधुमय पीडा म बोर। गए तबसे वितन युग बीत, हुए क्तिने दीप निर्वाण ! [४] परमात्मा के साथ आत्मा के अनेक सम्बधों की स्थापना यह चनुथ अवस्या है। इस मोपान पर आपर कवि या साधा विविध प्रकार से परमात्मा के साथ अपने सम्बयो की चर्चा करके उसका सान्निध्य पाने के लिए विह्वल हो उठता है । कबीर दास जी न इस सदभ मे विशेष मामिक पद लिये है-- हरि मोर पाव मैं हरि की बहुरिया, या हरि मार मोर भाई हरि मोर पीव हरि बिनु रहि न सके मोर जीव ।। पति-पत्नी अथवा सम्पय जीवन के रूप म हो आत्मा परमात्मा के पारस्परिक मधुर सम्मों का प्रगटीरण सभव है और इसी रूप म हिंदी में इसका प्रकृष्ट स्व. रूप मिलता है। पानी के हृदयादगागे की जितनी अधिर स्पष्ट अभिव्यक्ति पति से हो सकती है, उतनी अय विसी से नही हो सकती, अय सम्बधों म नीति मान, मर्यादा, सामाजिक, धार्मिक व धन, स्पट अभियक्ति पर नियनण परत है। अतएवं ५० । आधुनिक वाव्य प्रवत्तियो एक पुनमूल्याकन जितो भी हिदी के रहस्यवादी कवि हुए हैं उहोने दाम्पत्यरूप में ही अपनी विह्व लता, मिलनोठा व्यक्त की है । सूफी कवियो ने भी यही माग अपनाया किन्तु वहा पर फारसी के प्रभाव के कारण ईश्वर को प्रियतमा तथा आत्मा को प्रियतम या साधक माना गया है। जायसी आदि ने अपने रहस्यवाद म पदमावती को परमात्मा मानकर ही र नसेन रूपी आत्मा से उसकी प्राप्ति के लिए यत्न करवाये हैं। हिंदी मे आत्मा प्रियतमा तथा परमात्मा प्रियतम के रूप में प्रस्तुत किया गया है । ईश्वर के प्रति मार्मिक विरहानुभूति से सम्बधित क्वीर का एक पद हम नद्धत कर रहे हैं बालम माओ हमरे गेनरे तुम बिन दुखिया देह रे । सब कोई कहे तुम्हारी नारी मोको यह सदेह रे। एक मेव व मेजन मोवे तब लग कस नेह रे । अनन भावे नीट न आय गह बन धरे ने धीर रे । --कबीर। गोस्वामी तुलसी जी ने अपने रहस्यात्मक पदा म स्वामी और सेवक के भारों तथा कर्त्तव्यो की अभिव्यक्ति इस प्रकार की है ब्रह्म तू हौं, जीव, तू ठाकुर हौं चेरो। तात मात गुरु सखा, सब विधि हितु मेरो। तू ब्रह्म है मैं उसका क्षुद्र अशजीव हूँ तू ठाकुर है और मै अनुचर हू । तू तात, मात, गुरु सखा सब कुछ होकर मेरा हित चिंतक है। इस तरह विविध प्रकार से उहोने ईश्वर से अपने सम्बधा को स्थापित किया है। सत कवि रदास ने भी यही काय किया है। वे अपने एक पद म कहते हैं- प्रभु जी तुम दीपक जाकी जोति जर दिन राती। प्रभु जी, तुम मोबी हम धागा जसे सोनहिं मिलत सुहागा । आधुनिक युग म निराता जी ने भी तुम और मैं शीर्षक कविता म इसी अद्वत वादी सम्बध को विविध प्रकार के सम्बधो द्वारा व्यक्त क्यिा है तुम तुग हिमालय म और मैं चचल गति तुम विमल हृत्य उच्छवाम और मैं बात कामिनी कविता तुम प्रेम और मैं शाति महादेवी जी ने भी बीन भा हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भा हू' नामक प्रगीत में यही वात अभि यजित की है । इस प्रकार परमात्मा के साथ आत्मा के विविध हम वाती, सुर सरिता ।
रहस्यवाद/५१ स्वरूपो का निर्धारण करना रहस्यवाद को सामाम विशेषता ही है। इस अवस्था विशेष मे लद्वतवादी भावना की अविरल अभियक्ति होती है। यात्म समर्पण और पूर्णत तादात्म्य भावना यह रहस्यवाद की अतिम अवस्था है जहा साधर या कवि पूणत आत्म मपित होकर अपने व्यक्तित्व का विलयन परमात्मा में कर देता है। रहस्यवाद का यही चरम रूप है । साध्य साधक का महामिलन, यश और अशी की एकाकारता या व्यष्टि का समष्टि म पयवमान हो रहस्यवाद का अतिम लक्ष्य होता है जो इसी अवस्था विशेष मे सहज सिद्ध होता है । इस सदभ म क्वीर वे कतिपय पद द्रष्टव्य हैं क्वीर कूता राम का, मुतिया मेदा नाउ । गल राम की जेबडी, जित खीच तित जाउ।। चोर की पूणत आत्मसमपण की भावना अच्छी तरह व्यक्त हुई है। बहुत दिनत थे मैं प्रीतम पाय भाग बड़े घर बैठे आये। मगलचार माही मन राखा राम रसाइण रसना चाखौ। - कहें कबीर मैं कछू न कीन्हा सखी सुहाग राम मोहि दी हा॥ -वीर इस पद म मिलन के अवसर की आन दातिरक्ता का चित्रण किया गया है। क्बोर न कुछ नहीं किया राम ने हा अनुग्रहपूर्वक अपना कर उह अचन सौभाग्य प्रदान किया है। मीराबाई की पदावली में भी रहस्यवाद की इस अवस्था के जगणित मार्मिक चित्र मिल जाते हैं । वे पूर्णत ईश्वर की अनय आराधिका हैं जो कुछ वह देगा, वही लेंगी, जो पहनाएगा पहनेंगी, और यदि वह बेचना भी चाहेगा तो मीरा चुप चाप, प्रियतम के आदेशानुसार बिक भी जायेंगी । समपण की ऐसी अनत भावना और एकात निष्ठा को ऐसी सपन अभि यक्ति अ य रहस्यवादी कवियो मे नहीं मिलती। वस्तुत मीरा का नारी हृदय और वियोगज य उनको वेदनायें सहज निश्चल रूप में उनके गीतों म अभिभक्त हो गई हैं। निम्नाक्ति गीत म उनकी प्रियतम के प्रति अंगाधनिष्ठा और प्रेमजय अन यता का दियरूप देखा जा सकता है मर तो गिरिधर गापाल दूसरा न कोई। दूसरा न कोई, साधो सकल लोक जोई।
५२ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्यावन अब तो बात फैन गई जान सब कोई। मीरा प्रभु लगन लागी, होनी होय सो होई । जो कुछ होना हो, होता रहे मीरा की प्रीति ता एकमात्र गिरिधर से है, वही उनके जीवन अवलम्बन हैं। समाज का उ हे किंचित भी भय नहीं है, कोई कुछ भी कहता रहे पर वे अपने पथ पर अडिग है और वस्तुत कोम्बिर भर्त्सना का पान वनकर भी उलाने वन म निक्ल जाना श्रेयपर समझा, किन्तु अपनी इस विराट प्रीत को वे किचित भी कम न कर सकी। आधुनिक युग में महादेवी के रहस्यप्रगीतो म भी आत्म समपण और एका कारता के अच्छे चित्र मिलत हैं कितु देवी जी मिलन चाहत हुए भी अपने -यक्तित्व का विलयन नही चाहती, इसलिए विरह ही उनका एकमात्र आराध्य बन गया है हो गई आराध्य मय मैं विरह की आराधना ले। उनकी एकाकारता का चरम रुप निम्तावित गीताश में देखा जा सकता है जाकुलता ही जाज हो गई त मय राधा विरह वना आराध्य द्वत क्या कैसी बाधा । डा० रामकुमार वर्मा के रहस्यगीतो में भी यत्र-तत समपण की भावनायें और एकाकारता का आनद जभि यक्त हुआ है किन्तु वे मूलत रहस्यवादी कवि न होकर प्रेम और शृगार के कवि हैं। रहस्य उनकी एक मनोवत्ति रही है और अधिकतर उहोने रहस्यवाद का प्रथम दो तीन अवस्थाओ क ही चिताकित किए हैं। वस्तुत जो रहस्य की मूल साधना समपण और एकाकारता होती है, उस सोपान पर वे पहुँच नहीं सके हैं। ऊपर रहस्यवाट की जिन अवस्थाओ का उल्लेख किया गया है वे प्रमश इसी रूप मे साधक या कवि के अत वरण में जागत हाती है यह वस्तु नहीं है यह उनका एक उदभूत होने का सामा य क्रम है। कवि अपनी प्रतिभा के बल पर जारम्भिक अवस्थाओ का चित्रण न करके भी अपनी साधना के श्रेष्ठ सोपानो पर आ सकता है। (५) रहस्यवाद के विभिन्न सोपान यहा हम दाशनिक और साधनात्मक रहस्यवाद के भी विभिन्न सोपानो की चर्चा कर देना आवश्यक समझते है । ऊपर जिन अवस्थाओ का वत्ता त है, वे अव स्थामें रहस्यगीता म पाई जानी । साधकों ने ब्रह्म की प्राप्ति के लिए साधारण प्राण विश्व प्राण और महाप्राण-ये तीन सोपान माने हैं। प्रथमावस्था में साधक स्वप्राण की साधना मे तल्लीन रहता है द्वितीय अवस्था में साधक की आत्मचेतना रहस्यवाद /५३ समस्त जगत से अपना रागात्मक सम्बध स्थापित करती है और अतिम अवस्था में साधर ब्रह्म म लीन हो जाता है । इहे हम दूसरी पदावली म जागरण, आरमा वा व्यापकत्व तथा समपण और एकानार की स्थितिया भी कह सक्त हैं। सूफी रहस्यवाद में शरीयत, तरीक्त, हकीकत और मारफ्न-~साधना के इन चार मार्गों के आधार पर रहस्यानुभूति की विविध अवस्थाओ को-चार मोपानो मै विभक्त कर दिया गया है। इह हम जिनासात्मक अवस्था, विश्वासपूर्ण अवस्था, विरहानुभूति को तथा आत्मा-परमात्मा के मिलने की अवस्था कह साते हैं। इनमे और उपयुक्त विवेचित हिदी रहस्यवाद की अवस्थायो मे देवल नाम का अतर है मूल वस्तु प्राय एप ही है। पश्चिमी रहस्यवाद मे अवश्य अवस्थाओ का मकेत किया गया है। यद्यपि इनम भी पूणत साम्य है किन्तु वहा पूणतादात्म्य के पूर्व एक गहन अधकार की अवस्था मानी गई है, जिससे गुजरकर और परीक्षित हार ही साधक साक्षात्कार और आत्म विसजन कर पाता है । (ई) रहस्यवाद के भेदोपभेद पाश्चात्य और भारतीय प्राय सभी विद्वानो ने रहस्यवाद के प्रमुख निम्ना क्ति भेद दिए हैं (१) पान और दाशनिकता प्रधान रहस्यवाद (२) दाम्पत्य मूलक या प्रेमपरक रहस्यवाद । (३) सौदय मूर क रहस्यवाद । (४) भक्ति और उपासना सम्बधी रहस्यवाद तथा (५) प्राकृतिक रहस्यवाद । बाबू गुलाबराय जी ने साधनात्मक रहस्पवाद को भी रहस्यवाद का एक भेद कहा है किन्तु उन्होंने सौदर्यमूलक रहस्यवाद को पथर महत्व न देकर उसे दाम्पत्य मूलक रहस्यवाद के साथ सयुक्त कर दिया है और इस प्रकार उनके भी भेदोपभेदो की सख्या ५ ही है । हमने यहा पाश्चात्य विद्वान स्पजन के जाधार पर रहस्यवाद के भेदोपभेदो को प्रस्तुत किया है। [१] दार्शनिक रहस्यवाद स्पजन के अनुसार रहस्य भावना दासनिक तब कही जायगी जब कवि अपनी धारणायें इस ढग से सामने रखे कि वह बुद्धि और भावना को समान रूप से प्रभावित करे। ऐसे लेखक प्रयक्षत बुद्धिवादी होते हैं और उनका मूल सम्बध मत्य से जल मे कुम्भ कुम्भ मे जल है बाहर भीतर पानी। फूटा कुम्भ जल जलही समाना, यह तत्त योग्यानी।
५४ / आधुनिक काव्य प्रवत्तिया एक पुनर्मूल्याक्न कबीर के इस दोहे म दाशनिक रहस्यवाद के ही दर्शन होते हैं। निराला की 'तुम और मैं' रचना भी दाशनिक रहस्यवाद का अच्छा उदाहरण है। दाशनिक रहस्यवाद में जिनासा आश्चय, कुतूहल की भावनायें प्रमुख रहती हैं, इनम तक कम दानिक चेतना और अतिम सत्य को जानने की चेष्टा अधिक रहती है। [२] प्रेमपरक रहस्यवाद रहस्यवाद का मधुरतम रूप प्रमपरक रहस्यवाद म ही व्यजित होता है । पति पत्नी के प्रम की गुह्यता प्रियतमा की प्रिय के वियोग में विरह कातर विदग्ध भाव नायें, निवेदन, द प समपण एकाकार आदि की विविध मन स्थितियां इसी में निर्व्याज स्प से अभिव्य जित हो पाती हैं। प्रेमपरव रहस्यवाद म दिय या अलौकिक प्रेम को ही जीवन की रहस्यात्मक्ता का सुलयाव समया जाता है क्बीर, जायसी मीरा महादेवी आदि की रचनाओ मे रहस्यवाद के प्रेमपरक रूप का निमल और पुनीत रूप अभिव्यजित हुआ है कबीर ने तो अपने नयनो की कोठरी मे पुतली का पलग बिछाकर और पलको को चिक डालकर अपने प्रियतम को बिठाकर रिझाया है। नयनन की करि कोठरी, पुतली पलग बिछाय । पलकन की चिक डारि क पिय को लीन्ह बिठाय ॥ [३] सौदयमूलक रहस्यवाद सौदय को आध्यात्मिकता का भावात्मय प्रकाशन कहा जाता है। अपने प्रिय तम के अविनश्वर सौ दय की यापक पानी प्रस्तुत करके उसके प्रति आकृष्ट होना या सौदर्य को दिव्य रूप और रहस्यात्मक रूप म प्रस्तुत करके सौन्दय मूलक रहस्य वाद को सष्टि की जाती है। यहां प्रियतम का दिप सौन्दय ही साधक की चेतना को उद्दीप्त करके उसे अपरिमित आह्लाद प्रदान करता है प्रसाद जी के 'तुम कनक किरण के अतराल म लुक छिपकर चलते हो क्यो नाम प्रगीत मे सौदयमूलक रहस्यवाद की ही अभिव्यजना हुई है । इस रचना म उहोने उपादान लक्षणा के द्वारा लाज भरे सौदय को प्रस्तुत किया। वे सोदय की स्थूलता को न दखकर उसकी अती द्रिय या वायवीय दियता का वणन करते हैं और उसके अन्तराल में निवास करने वाला अरुणिम सौदय चेतना की रहस्यात्मकता को वे कुतूहल और विस्मय की दष्टि से देखते हैं। [४] भक्ति और उपासना सम्बधी रहस्यवाद रहस्यवादी चेतना का चरम परिपाक भक्ति और उपासना मे ही होता है। भक्ति और उपासना की भावना के कारण ही रहस्यवादी काव्य का सृष्टि भी हुई, अनम्य प्रेम और अपूर्व आस्तिक्ता, श्रद्धा और भक्ति की भावनायें इस प्रकार के रहस्यवाद | ५५ रहस्यवाद म अपने उत्कृष्ट रूप म अभिव्यजित होती हैं। नवधा भक्ति और उपासना की विभिन्न पद्धतिया का समावेश भी भक्ति और उपासना सम्बधी रहस्यवाद मे होता है । सूर, तुलसी और मीरा के पदो म भक्ति और उपासना-परक रहस्यवाद की श्रेष्ठतम अभियक्ति हुई है। जाधुनिक काल में भक्ति और उपासना की भावना की जगह आस्तिक्ता शेप है, इसलिए प्रेमपरक रहस्यवाद के दशन तो महादेवी जी के गीता म मिल जात है किन्तु उनके गीत भक्ति उपासना के अन्तगत समाहित नहीं किए जा सकते । वसे स्फुट रूप से प्रसाद, निराला और महादेवी के गीत भी इस प्रकार की विशेषताओ से समन्वित है पर वे अपवाद ही रह जायेंगे। (५) प्राकृतिक रहस्यवाद ईश्वर की सौ दय छवि समस्त सृष्टि म देखन, परमात्मा के प्रति अपने विविध प्रकार के सम्बधो की नियाजना तथा त मयता और एकीकरण की अभिव्यक्ति के मूल म प्राकृतिक जगत के प्रतीका का ही सहारा कवि को लेना पड़ता है और कही वही प्रकृति के माध्यम से ही व उस परमसत्ता की झाकी प्रस्तुत करने लगते हैं, एसे स्थलो पर प्राकृतिक रहस्यवाद की सृष्टि हो जाती है। इनमे से प्राकृतिक प्रतीक योजना का बाहुल्य तो सभी रहस्य कवियो में मिलता है कि तु विशुद्ध रूप से प्राक तिक रहस्यवाद की सृष्टि आधुनिक युग की देन है। यह प्रकृति छायावाद का ही अग्रिम चरण है। छायावाद प्रकृति का सचेतन रूप में देखता है रहस्यवादी-छाया वादिया न उस सचेतन सत्ता को परमसत्ता के रूप में निरूपित किया है। प्रसाद, निराला, पत और महादेवा के अनेक प्रगीत इस श्रेणी म आ जाते हैं । प्रसाद का 'हे सागर सगम अरुण नील', 'कामायनी' के आशा' सग मे-'महानील इस परम व्योम म अतरिक्ष में ज्योतिर्मान' बाला अश निराला की जुही की वली महादेवी की, रूपसि तेरा धन कश पाश' या 'रूपसि । तेग नतन सुदर, आलोक तिमिर सित असित चार आदि प्रगीत इस प्रसग मे उदाहरणस्वरूप देख जा सकते हैं । आचाय रामचन्द्र शुक्ल ने रहस्यवाद के केवल दा हा भेदो की चर्चा की है- (१) भावात्मक रहस्यवाद और (२) साधनात्मक रहस्यवाद । वस्तत रहस्यवाद के जिन भदोपभेदो की चर्चा ऊपर की गयी है वे भावात्मक रहस्यवाद की ही शाखायें है। साधनात्मक रहस्यवाद म योग और मकाण्ड की साधना प्रमुख होती है । गारय कबीर के कतिपय पद महायाना बौद्धों, शाक्तो और तातियो का रहस्यवाद इसी प्रकार का था। श्री रामजालाल वधोतिया न हिंदी साहित्य और विभिन्नवाद' शीष की अपनी रचना म साधनात्मक रहस्यवाद का उदाहरण ५६ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमूल्यांकन इस प्रकार प्रस्तुत किया है- अवधू जागत नीद न वीज । वाल न खाइ, पल्प नही व्याप, देही जुरा न छीज । उलटी गग समुद्रहि सौखे ससिहर सूर गरास । नवगिह मारि रोगिया बठे जल मे व्यय प्रकास । हाल गह्या प मूल न मूय मूल मह्या फल पावा। बोवई उलटि शरप को लागी, घरणि माहारस खावा । बठि गुफा म सब जग देश्या बाहरि वछू न सूय । उलट धनिक पारधी मारयो यहु अचरज कोइ बूझै । साधनात्मक रहस्यवाद में योग सम्बधी गुह्य बाता की भरमार होने के कारण बुद्धिजय उत्तरवासियो वे अतिरेर और कम काण्डो के आधिक्य के कारण नीरसता अस्पष्टता गुह्यया नग्नता, अश्लीलता तथा वौद्धिकता आ गयी है । इसी कारण बहुत समय तक तो बौद्धा, तात्रिको शाक्ता का यह काव्य साहित्य का अग हो नही माना जाता रहा है कि तु उसमे भी, (भले ही सामित मात्रा म सही) रसास्वादन की क्षमता है, और अनेक लोग परकर आज भी उसमे त मयता का अनुभव करते हैं, अतएव अब वह भी साहित्य की श्रेणी में परिगणित किया जाने लगा है। डा० गणपतिचद्र गुप्त ने रहस्यवाद के उपयुक्त मभी भेदा को औपचारिक अप्राकृतिक और अनावश्यक कहा है और उसने अपनी मौलिकता का परिचय देते हुए रहस्यवार को निम्न दो रूपो मे विभक्त किया है - (क) यथाय रहस्यवाद और (ख) काल्पनिक रहस्यवाद । प्राचीन सत कवि-कबीर दादू को उहाने यथार्थ रहस्यवादी वहा है और आधुनिक कवि-प्रसाट पत निराला आदि को काल्पनिक रहस्यवादी। उनके इस आनि से मतलब क्या महादेवी से है, स्पष्ट नहीं होता। उनके अनुसार सच्चे रहस्य वादी जीवन के अन तक रहस्यवादी रहते हैं कितु काल्पनिक रहस्यवादिता का रग समय के साथ फीका पड जाता है जसे पत और निराला के साथ हुआ। गुप्र जी का यह विभाजन बहुत दूर तक समोचीन है किन्तु विषय की स्पष्टता के लिए हमे इनका विस्तत विभाजन करना ही पडगा । उपयुक्त भद रहस्य वाद के विभिन्न अग न होकर भेद विभेद ही हैं। यह दूसरी बात है कि कभी कभी एक भेद की कतिपय विशेषताएं दूमरे म भी समिश्रित दिखाई दे जाती हैं । (उ) रहस्यवाद उद्भव और विकास [क] वदिक साहित्य मे परमोच्च सत्ता विषयक जिज्ञासा भारत वष म अत्य त प्राचीन काल से मिलती रहस्यवाद / ५७ है । भगवे में प्राकृतिक रहस्य के प्रति वौद्धिक जिनामायें अत्यधिक मात्रा में मिलती हैं । इसका एक उद्धरण हम आरम्भ म उद्धन भी कर चुके है। यहां पर हम अथववेद का एक उदाहरण वदिक जिज्ञासा का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए दे रह हैं- क्व प्रेप्मन दीप्यत ऊध्वो अग्नि क्व प्रेसन पवत मातरिश्वा यन्न प्रेप्स तीर भियन्त्यावत स्कर्म न हि क्तम स्विदेव स । अथववद १०-७-४ जय यह सूय क्सिकी अभिलाषा में प्रकाशमान है, यह पवन कहा पहुचने की इच्छा से कहाँ प्रवहमान है य सव वहा के लिए जा रहे हैं वह आश्रम बताआ, वह कौन सा पदाथ है ? इस प्रसार वदिक वाग्मय मे रहस्यवाद की प्रथमावस्था जिज्ञासा, कुतूहल, विस्मय आनि भावनाओ की अच्छी अभि यक्ति हुई है। (ख) उपनिषदो मे उपनिषदा म इस मूल सत्ता के अवेषण का गभीर दाशनिक प्रयत्न है । सनसे पहले उनम जात्मा को जार अमर, चिरतन और सावदेशिक तथा सावरालिम माना गया । एतरेय उपनिषद का यह कथन इस स दभ म उल्लेखनीय है- पहले यह जगत एक मात्र आत्मा ही था। उसके सिवा और काई क्रियाशील वस्तु नही थी उसने यह सोचा कि मैं लोको की रचना करूं।' इस प्रकार इस जगत क नाना यापारा और वस्तुमो के मूल म आत्मा को सत्ता को मानकर उसकी अखण्डता और सावदशिकता प्रतिपादित की गयी। भौतिक शरीर के नष्ट हो जाने पर भी उसे अमर माना गया । वह जादि अत से रहित अनादि, अनन्त और शाश्वत कही गयी और इसका ज्ञान केवल अतनान के द्वारा ही सम्भव माना गया । मुण्डकोप निपट म इस अतर्नान के सम्ब ध म इस प्रकार कहा गया है- 'सत्यन लभ्यस्तपसा ह्येप आत्मा सभ्यग्नानेन ब्रह्मचर्येणनित्यम् । बत शरीरे जातिमयोहि शुभ्रो य पश्यति यतय क्षीणदोषा । (३-१-५) अर्थात् सत्य, तप, सम्यक मान, ब्रह्मचय स इस अ त न या आरमदशन की उपलब्धि होती है। तब साधक अपने शरीर के भीतर ही शुभ्र ज्योति के दशन करता है। आत्मदशन को इस साधना को बहुत जटिन और कठिन बताया गया है। ऋपिया न इस क्षुरस्य धारा अर्थात छुरे की धारा के समान पना कहा है। इस आत्मनान की प्राप्ति के लिए याग का भी सहयाग लिया जाता है । कपोठनिषद और मुण्डकोपनिषद मे इस विषय म कहा गया है कि इद्रिया, मन, हृदय या कल्पना से परमब्रह्म का रशन सहज नहीं है उसे प्राण वो उध्व करके और ब्रह्म ना अनवरत ५८ / आधुनिक का य प्रवत्तियों एक पुनमू ल्याकन ध्यान करप ही पाया जा सकता है। रहस्यवाट म योग का यह प्रयोग हि दी क सिद्धो नाथा एव सन कविया न किया है। यौगिर प्रियाओ और साधनाओ का आत्म नान की प्राप्ति म सहयोग आवश्यक वतार सिद्धो, नाथो न इस परम सत्ता का गुह्य बना दिया और उस प्राप्त करन के लिए गुह्य साधनाआ मा प्रयोग भी करन लगे। यह साधना अतराभिमुखी थी जिसम लौकिक विधि विधाना का काई स्थान नहीं था। इसलिए भी इमे गृह्य कहा जाने रुगा था। इसक ठीक विपरीत परमब्रहा की प्राप्ति के लिए समाज म एक अन्य साधारण उपासना पद्धति भी प्रचलित था जिसम सामाजिक विधि विधानो का याग तथा इसम लोक धम की प्रतिष्ठा के साथ ब्रह्म की उपासना और प्राप्ति पर बल दिया जाता था। भक्त कवियो न इसी दूसरा सहनोपासना वानी पद्धति का अवलम्बन लिया और ब्रह्म के अन दशन करन का प्रयास पिया । इस भक्ति पद्धति म अन यता का भाव सर्वाधिक अपेक्षित था। यह पूणत प्रम और श्रद्धा पर आधित थी। (ग) मध्य काल मे गुह्य साधना तन और याग के अतिचार से कुछ ही दिना म भ्रष्ट हो गयी। उसका आवरण ओढकर ढोगियो ने ऐस सप्रदायों की स्थापना का जिसम बाह्म आचार विधानो को एकतम उपक्षित कर भरवी चक्र तारा, कृत्या आदि का तात्रिक उपा सना पर बर देकर उच्छ खलता और अनतिकता का नग्न प्रदशन किया गया। दक्षिण म देवदासी की प्रथा भी इसी तानिन साधना की उपज थी। धारे धीरे एक ब्रह्म टूट-टूट कर अनक देवी देवताआ म बिखर गया और तानिक इन देवी-देवताओ को प्रसन करने के लिए नर-चलि, पशुबलि भी दन लग। इस समपण का उद्देश्य यह था कि य नर या बच्चे प्रभु स प्रेम कर आज म उसी की साधना में रत रहे किन्तु इस बमकाण्ड का भयकर दुष्परिणाम भारत को भागना पडा । इस प्रकार वदिक कालीन शाश्वत ब्रह्म सत्ता को जिज्ञासा वेदातो ( वाल) म आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। तत्पश्चात आगमो म उस मानवीय भाव नाना का सानिध्य मिला और अत म योगियो, तानिको के ह थो म पुती फ्लती हुइ वह अतत भरवीचक्र दवदासी आदि की साधना म परिणत हाकर नष्टभष्ट हो गयी। (घ) भक्ति युग मे भक्ति काल युग म सूर तुलसा, मीरा नादि की उपासना साकार ब्रह्म की उपासना है । क्वीर आदि मा कवि निराकार ब्रह्म का लकर चले हैं। सूफी कविया न साकार ब्रह्म का ही अपनी साधना का लक्ष्य बनाया है। इन सभी व मूल प्रेरणा स्रोत उपनिषद् और आगम पुराण रहे हैं । अतएव रहस्य भावना का तात्रिका के - रहस्यवाद | समान विकृत रूप इनम नहीं मिलता। सूफी कवि पारमी रहस्यवाद से प्रभावित रहे हैं। विषय की स्पष्टता के लिए यहां हम इस युग के प्रमुख रहस्यवादी कवियो के रहस्य-विषयक दृष्टिकोण तथा उनकी प्रमुख विशेषताओ को सक्षेप म प्रस्तुत कर ऐतिहासिक क्रम विकास की दष्टि से कबीर का नाम सदप्रथम आता है। ये हिन्दी के प्रथम और अन यतम रहस्यवादी मवि है। कबीर 'राम की बहुरिया' हैं और उनके राम घट घट के बासी है । सम्पूर्ण जगत उनकी आभा से प्राप्त है । उही के वियोग में द तडपते रहते हैं। एवलिन अडरहिल न वन हडरड पोयम्म आप कवीर' की भूमिका में भाव विदग्ध होकर लिखा है कि 'पबीर उन इन गिने सर्वो स्कृष्ट रहस्यवादियो की काटि में हैं जिनम सत आगस्टाइन स्यसत्रु तथा मूफी कवि जलालुद्दीन समो प्रमुख हैं। उहान वह प्राप्त किया जिसे हम ईश्वर के प्रति एक सश्लेषणात्मक दष्टिकोण कह सकते है । उहाने दि य तत्व व पक्तिगत और “यक्ति निरपेक्ष, अतर्यामी और सीमातीत गत्यात्मक एव स्थयात्मक पक्षी तथा दशन के निरपेर ब्रह्म और भक्ति के परम विश्वसनीय सखा के पारस्परिक चिर विराध का अत कर दिया। उ होने वाहत अमगत दीख पड़ने वाली इन धारणाओ को एक के पश्चात एप लेकर यह सामजस्य पैरा नहीं किया वरन आध्यात्मिक चेतना की एसी ऊंचाइयो पर पहुँच कर क्यिा--जमा कि रूयसवय न कहा है -वे सब घुल मितवर एकाकार हो जाती हैं और जहाँ व पूण पूरक तत्त्व से दोग्न पडत हैं। उपयुक्त उद्धरण के द्वारा क्वीर की रहस्य भावना पूरी तरह स स्पष्ट हो जाती है साथ ही उनका महत्त्व मा विज्ञापित हा जाता है। मीरा की रहस्यभावना सत कविया की रहस्यभावना स बहुत साम्य रखती है । सत कवि रैदाम उनके गुरु ही रहे हैं। किन्तु मारा सगुण कृष्ण स्प वी उपासिका हैं। सत कवियो ने निगुण ब्रह्म को अपनी आसना का लक्ष्य बनाया है ययपि क्धीर के पदो मे सगुण निगुण दोनो या सम वय है। सूली ऊपर सेज पिया की आदि पक्तियो में मीरा ने भा निगुण ब्रह्म का सकेत दिया है। तुलसी और सूर मे सावनिक रूप स रहस्यभावना नहीं मिलती य भक्त कवि अधिा हैं। भक्तों के अयतम लक्षण इनके वाय म मिस्त हैं। विहनता, अशरण भरणता, देय अनुनय विनय और उद्धार वी कातर प्राथनायें इन कविया के पदा म सर्वाधिक हैं। देशव कहि न जाये का कहिए' जादि तुलसी के पदो म रहस्य भावना का भी परिपार मिाता है पर इन्होने दाम्पत्य परिणय वाली रहस्य पति का अवनम्बन नहीं लिया। सूर न भी कृष्ण की लीलायो का हा सर्वाधिक वणन किया है। हाँ यवतन्त्र, यथा रास प्रकरण, राधा का कृष्ण के हृदय में अपनी प्राया देखवर है. / आधुनिक का य प्रवत्तिया एक पुनमूत्यापन मान करना, कृष्ण का यशोदा मां का मुह खालकर अपना विराट रूप दिखाना, उनका बहुनायारव आदि से सम्पचित पदा म रहस्यवाद का गम्भीर रूप दिखाई देता है । जायसी आदि प्रेममार्गीय मूफी कवियो का रहस्यवाद सत कवियो से पथक्ता लिए हुए है । उनका रहस्यवाद डा. भटनागर के अनुमार भागवत के प्रेम मूलक रहस्यवाद जसा है। जहाँ जीव और ईश्वर विषयक शोध का अन्त हो जाता है ठीक वही से इनका रहस्यबाट प्रारम्भ होता है और फिर वह जीव बोर ईश्वर का सम्बध्र मस्तिष्क की वस्तु न रहकर हृदय की वस्तु हो जाता है । उम ममय जीव ईश्वर के सम्ब ध म एक मधुर भावना की सृष्टि होती है । इस भावना म परस्पर वा आक्पण और तीव्र मिलनाकाक्षा है। इस आपण का स्त्री-पुरप के पारस्परिस आक्पण के स्पक द्वाग उपस्थित किया जाता है। इस पर फारसी रहस्यवाद का अधिक प्रभाव पड़ा है। (ऊ) फारसी रहस्यवाद फारस म दस्लाम का प्रभुत्व हो जाने पर भी वहा के धार्मिक कट्टर पथिया न इस्लामी धर्म को ग्रहण नही किया था। मुहम्मद साह्य आत्मा और परमात्मा म वही सम्बध मानते हैं जो वदा और मालिक का हाता है। यह सम्बन्ध पगम्बर के द्वारा स्थापित क्यिा जाता है। इस्लाम म गम्बर की माता का उल्लघा कुम माना गया है। इसलिए उसम रहस्य जसो भावना उपासना को अधिक स्थान न मिल सका किन्तु फारस म परम्पग स च ती आती हुइ प्राचीन गुह्य साधना का प्रभाव इस्लाम से पहले विद्यमान था जत इन गुह्य साधनावादी सतो ने अपनी साधना का क्रमबद्ध रखा । सूफी सता ने इस्लाम की कट्टरता का विराध कर इसी गुह्य साधना, सुरा-प्रेमो माद तथा उससे उत्पन्न चमत्तार को आत्मभूत कर मधुर भाव से खुदा की उसना प्रारम्भ की। पारस में इस मधुर भावना के प्रवतक वायजीद बुस्तानी को माना जाता है जा इस्लाम ६ खलीफा अली के अनुयायी थे । बतिपय विटान इस फारसी मधुरोपासना पर ईसाई रहस्यवादी सता का प्रभाव मानत हैं जा शामी रहस्यसाधना से प्रभावित थ। वसे तो खोजने पर इस्लाम धम रहस्यवादी भक्ति-पद्धति सून हजरत मुहम्मद के तापसी साधना, रात्रि जागरण, प्रत प्राथनाला आदि की महत्ता तथा उपयोगिता म भी मिल जाते हैं आरम्भिक सूफी इस्लाम से एक होकर भी चले है कितु हिजरी की दूसरी शताला में सत रविया (वसरा की एक महिला) को रहस्य वादी प्रेमोपासना की प्रचारक कहा गया है । तीसरी शताब्दा म इस्लाम के ईश्वरवाद के विरोध म सर्वेश्वरवाद का उदय हुआ इन सूफी मता ने अह ब्रह्माऽसि की तरह अनहलक' (मैं ही खुदा हू) का नारा लगाकर विश्व के कण-कण म उसकी अलो सिस सत्ता के दशन किये। आगे चलकर सीरिया म अन् सुलेमान अल दारानी ने रहस्यवाद | भान और आनद के माध्यम से रहस्यानुभूति के सिद्धात की पूण प्रतिष्ठा की। अ तक इस उपासना पद्धति मे ईश्वर के प्रति भक्ति-भावना का प्रदशन, उससे मिल की रहस्यात्मक अभिव्यक्ति-लौकिक प्रणण और सुरापान की शब्दावली मे होर थी। इरान के अन याजिट (८७४ ई.) ने मर्वेश्वरवाद को सिद्धातत स्वीकार कर फन का सिद्धात प्रतिपादित किया । तीसरी सदी हिजरी म सूपी सम्प्रदाय निर्मित । गया था। इ हाने कुरान की अपने ढग से व्याख्या विवेचना करके खुदा को भी सूप मान लिया था । मौलामा रूम, हाफ्जि, उमर खय्याम, गजाली, रूमी निनामी साद जामी जादि यहा के रहस्यवादी कवियो मे अग्रगण्य है। फारसी रहस्यवादी कविर पर जब इस्लाम का अत्याचार वढा तो ये भारत की ओर बढन लग। भारत दाशनिक चितन-मनन तथा विचारधाराजा से य कविगण पहले ही प्रभावित हो चु थे क्योकि खलीफा हारू रशीद के समय यहा के जनेक दाशनिक ग्रथ पारस गये थे इन सूफी सत कविया को गैद्ध की करणा, अहिंसा और प्रेम-भावना, भागवत ध की माधुर्योपासना आदि न बहुत आकृष्ट किया था। भारत में शा त वातावरण रहबर मूपिया ने अपनी साधना जारी रखी। शेख मुइनुद्दान चिश्ती, सरमद आ ने इस परम्परा को आगे बताया और हिदी म जायसी, कुतबन, कासिक शा मझन, उस्मान आदि ने अपनी प्रेममार्गी रहस्य साधना से समनकृत अनेक कृति प्रदान की है। ईसाई रहस्यवाद यूरोप म रहस्यवाद के प्रारम्भिक बीज हम यूनान के कवियो और दाशनिक म मिनत हैं । पाइथोगारम नाशनिक होता हुआ भी रहस्यवादी था । आरभिक रहस्य वाटी मकाण्डो को दिया करत थ । प्लेटो ने आरफिरो के वाह्य और वमकाण रहस्य साधना का मजाक उडाया है और कतिपय अच्छी वस्तुओ को उनसे ग्रह भी किया है । प्लटो को भी रहस्यवादी कहा जाता है । उसके सिंयोसिअम म रहस्य नुभूतियो का प्रतीकात्मा रूप प्रस्तुत है। उसके शिष्य प्नोटिनस की गणना विश्व महान रहस्यवादिया में की जाती है । उरव यूरोप के रहस्यवारियो पर उसका व्याप प्रभाव पड़ा है। ईसाई धम के प्रवक्ता ईसामसीह पा समस्त जीवन ही रहस्यवादी भूमि पर प्रस्तुत है । स्वय याइविल रहस्यवाद की एक उच्चतम कृति मानी गई है। इस 'एपिशिल्स नामक अश में ईश्वर के प्रत्यक्ष साक्षात्कार की विव' अनुभूति = वणन है । ईसाई धम के अगत रहस्यवादी सन साधक आरम्भ से दिखाई देते हैं इस प्रकार सुप्रसिद्ध दाशनिय और रहस्य गती प्लाटिनस तथा न यप्लेटोवादिवो विचारो की गहरी छाप पड़ी है। डायोनाइसन, जान स्वोटस एपिता, केरवा १ १२/आधुनिर पाव्य प्रवत्तियां एष पुरामूलाग्न 1 बर्नाड, मास्टर, एपहाट, हालर, मृगा, टरगा मार निभानस खूनो, सारससिस, बाएम, दान, र म ब रोजा सासरे प्रागिरा, मदम गुयो मामिनाज आश्रिी परिगणना प्रमुप ईगाई रहस्ययारियामा जाती है। पश्चिमा रहस्यवाद पा पर प्रकाश मा ए आपाय माताराम चतु यदा न रहा है कि ३० ६० पू० यहूदी पितो न राप्रपम रहस्यवाद वा तत्व पलाया । ११वी-१२वी गाणी मध भिषामा उपर और मनुष्य बाघ आगन प्रान प्रयागारमर सक्षण दीवान घलाई । मसागी बसत पारिसन प्रमा ईसा और उस ससार र सिए प्रम मदिरता मा बनुभव किया जा वर सम्मत आस्मानामा पवित्र सृष्टि ५ रुप मशियाई पटता है और जहाँ सब भाई बहन ह। जात है ---(समाक्षा शास्त्र) । यूराप म पटवा राना स सार १५या शतान सय साधनारमर रहस्यवारमा प्रभाय था जिसम यूनाना दानिकाय विचारा का पूरा-पूरी छाप थी । सन्त असीसा मधुर भाव या उपासना । प्रचार किया। इसका मूल कारण तिपय विद्वान भरपी प्रभाय मानत हैं पारि उस समय राम पर अरमानाप्रभुत्य पा । रयार साथ ही यहां गूका रम्यया । धारणा भी पहुंचा हागा । पियो को ता ईमाई रह स्ययादियो भा माधुप भाव का उपासना पद्धति पर बल दिया तक एवरनाम्ब, योटस पर सपथ शनी वासिंग आदि मधियाइसी सास पर पसार अपन रहस्यकाम्पा की सृष्टि ।। इन पर १८या आता दाम सन्त अगरी तथा वर्नाटकी उस तुरीयावस्था (Trance) का प्रभाय पहा गया है जिसम साधन ब्रह्म की अनुभू तिया यो विविध प्रतावा द्वारा प्रस्तुत करता था। आगे चलकर अग्रजी कविया पर पास प्रतीयवादी आ दाला या भा प्रभाव परा । बोटस वाडल पर आदि प्रती यात्म ईसाई रहस्ययाद स कुछ अशा म रवोद्र ने भी प्ररणा प्ररण यी है और रवीन्द्र के माध्यम से पाश्चात्य ईसाइ रहस्यवाद पा प्रभाव हि दो व जाधुनिक रहस्य वातापाव्य पर पड़ा है। आधुनिक रहस्यवाद जाधुनिर रहस्यवाद व विपय म आचाय शुक्ल का रहना है कि उसका उत्पत्ति सेमेटिक भावना स हुई है अतएव वह विदेशी वस्तु है । यस भा शुक्ल जी यो माव्य म रहस्ययाद रा चिड है । रहस्यवादी विचार धारा का वे काय म काई स्थान नहीं दते । इसीलिए रहस्यवादी वियो या व सहृदयतापूवर मूल्यांच न नहा बर सर है । भाधुनिक रहस्यवाद को विदशा वस्तु कह र व उसव | उपेक्षा करत है मितु इस सम्बध म प्रसाद जाया कथन है कि रहस्यवाद (जनहलवाद) समटिव धम भावना के विरुद्ध है एव ईसा मसूर और सरमद काय अद त भावना रा प्रभावित ५' । आधु निक रहस्यवाद के विषय में भी उनका अभिमत उल्लखनीय है । व पहत हैं कि - रहस्यवाद / ६३ "वतमान हिदी म इस अद्व त रहस्यदाद की सौदयमयी “यजना होने लगी है। वह साहित्य म रहस्यवाद का स्वाभाविक विकास है। वतमान रहस्यवाद की धारा भारत की निजी सम्पत्ति है इसमे सदेह नहीं है।' इस सदभ मे जाधुनिक युग की प्रमुख रहस्यवादी कवयित्री श्रीमती महादवी वर्मा व विचार भी उल्लेखनीय हैं । उन्हाने लिखा है कि 'आज गीत में हम जिसे नये रहस्यवाद के रूप मे ग्रहण कर रहे है उसने पराविद्या की अपार्थिवता ली, वेदात के अद त की छाया ग्रहण की लौकिक प्रेम से तीव्रता उधार ली और इन सबको कबीर के साकतिक दाम्पत्य भाव सूत्र मे बाधरर एक निराले स्नह सम्बध की मृष्टि पर डाली जो मनुष्य के हृदय को आलम्बन दे सवा, उस पार्थिव प्रेम से ऊपर उठा सका तथा मस्ति प्व' को हृदयमय और हृदय को मस्तिष्क्मय बना दिया। प्रसाद जोर महादवी जा के उपयुक्त वक्त यो से यह स्पष्ट है कि जाधुनिक रहस्यवाद विदगी वस्तु ही प्रत्युत भारतीय रहस्यवाद की ही परम्परा का अग्रिम विकास है । भले ही उमकी मूल वस्तुयें भारतीय हो रितु' छायावादी सभी कवि अपन प्रारम्भिक काल म रवीद्र की रहस्य-चेतना मे प्रभावित रहे हैं मन प्रत्यक्षरूप से रवीट के माध्यम से उन पर पाश्चात्य रहस्यवाद वा भी यूनाधिक प्रभाव पड़ा है इस अस्वीकार नही दिया जा सकता । फिर आधुशिय रहस्यवाद ठीर वहा रहस्यवाद नहीं है जो कबीर या मीरा का है, प्रत्युत वह २०वी शतादी की वयक्तिक चेतना से प्रभावित है। युगीन चतना के जनुसार स्वरूप निर्धारण के कारण जाधुनिक तथा प्राचीन रहस्यवाद मे पर्याप्त अतर आ गया है जिम सक्षेप मे इस प्रभार देखा जा सकता है। प्राचीन और आधुनिक रहस्यवाद हम वह चुके हैं कि भारतवप म उपनिषत वणव, सहजिया, सूफी आदि सम्प्रटाया और दाशनिक विचारधारामा के माध्यम से रहस्यवाद को एक अक्षुण्य परम्परा रही है कि तु मध्यकार में जाकर वह मारा के पश्चात लुप्त प्राय हा गई। आधुनिक युग व कवि इन परम्पगआ से सविन रहे हैं। साथ ही इन पर वगला माध्यम से पश्चिमी स्वच्छन्दतावादी ववियो के रहस्य दशन का भी प्रभ व पडा है जिससे उनकी रहस्यात्मक वत्ति को अधिक समद्ध और युगानुकूल होने का अवसर मिला है । आधुनिक रहस्यवाद मे जाध्यात्मिक विकास की भावना का जो विकास हुआ है उसके मूल मे वबीर रवी द्रााध और पाश्चात्य ईसाई रहस्यवाद का प्रभाव परि लक्षित है। रवीद्रनाथ न क्योर को पाश्चात्य रहस्यवादी थियो म विशेषकर, शैली प्रासीमी प्रतीक्वाद और वाइविल स पर्याप्त प्ररणा ग्रहण की है। इस पश्चिमी प्रभाव के आगमन स भारतीय रहस्यवाद को अमिय परम्परा म २०वी शताब्दी मे विधेय भिन्नता आ गई है। हिंदी के नव रहस्यवादी रवि मध्ययुगीन कभीर जायसी, ६४ / जाधुनिक काय प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याक्न आदि की तरह मत मता तरा को प्रस्तुत नही परत । वे ब्लेक, शेली और वड सवय की तरह नमाम्प्रदायिर और मुक्त है। प्राचान रहस्यवादी कवि असीम सत्ता का अनुभव एव लक्ष्य एस व्यक्ति या आत्माम्नति की चरम स्थिति के रूप म करते हैं वितु जाधुनिक युग की प्रमुख रहस्य क्वयित्री महादेवी एक जार रहस्यवाद को वौद्धिा धारणा की वस्तु कहता हैं और दूसरी ओर ये एक सव यापक सत्ता के प्रति मधुरतम व्यक्तिवाद के भारोपण की बात करती हैं । नवीन रहस्यवाद के विवचन का उनका यह एक बौद्धिक प्रयास है । इस युग म रहस्यवाद को जनुभूत्यात्मक मातवर भा उस बौद्धिक मानन पर जोर दिया गया। प्राचीन रहस्यवाटी किसी न किसी एग सम्प्रदाय स सम्बधित रहे हैं जिनम मृष्टि सिद्धात और तत्व दशन की निश्चित मा यतायें रही हैं। वाजपयी जी के शलो म कबीर मे साधना के उपादाना म नतिक तथा व्यावहारिक पक्षा का समय सम्पूण जीवन दशन का समाहार कर देता है जो यक्ति की वस्तु न रहकर समाज की वस्तु हो जाता है। महादेवी जी वी रहस्य-वस्तु वयक्तिक सवेदनाना स सीमित है। उपास्य के प्रति आनरिव उत्मग जह का जवसान स्वायमयी वत्तियो का तिराधान आदि की जगह महादवी म 'स्व' वा सुरक्षा सतम जात्मनिवेदन और उपालम्भ की व्यजना है जो उ ह प्रचीन रहस्यवादियो से भिन्न कर देती है। दूसरे वे भाव की जगह दाशनिक विचारधारा का महत्व दती हैं। इसी वौद्धिकता तथा 7वीता ने उनके रहस्य को नवीनता दी है। बुद्ध की वरणा मा महारवी की करुणा और वेदना से भिन्न रही है । युद्ध की उपल ध प्रतिमानो में महान सिद्ध के लक्षण दिखाई दत हैं । उनम चिन्ता तथा अव साद की रेखायें नही मिनती कि तु पाजपयी जी के जनुमार महादेवी के चित्र गीता म एक विरत्त और चितित मुद्रा मिलती है । प्राचीन रहस्यवादी रवि जलवारिक और सज्जाप्रिय नहीं रह कि तु देवीजी की रचनामा म २०वी शता नी की नारी सुलभ जाति बहुत दूर तक मिनती है । नवीन रहस्यवाद का यह कलात्मक सभार जहा उमको एक प्रमुख विशेषता है वहा यही वस्तु उस TT य की भाव निष्ठा और गाभीय को भी बहुत कुछ कम कर दती है। प्राचीन रहस्यवादी विया म जहा जह का पूण विसजन और जागध्य के प्रति पूण जात्म-समपण है वहा महादेवी जो जपने यक्तित्व की रक्षा के साथ प्रेम की परिपूर्णता को सिद्ध करना चाहती ह अपान व मिलन चाहता हुई भी मिलना स्वीगार नहीं करती। यह उनकी विलक्षण आक्षा है। वे विरह के लिए विरह की उपासिका हैं । प्रश्न हा सकता है कि उनका विरह साध्य है या साधन । सामा यत विरह का लक्ष्य परम सत्ता के मधुर रस का अनुपान है किन्तु दवीजी मिलन म यक्ति
रहस्यवाद / ६३
सत्ता खोन के बदल चिर विरह म उस तथा उसके साथ अपना प्रेमानुभूति को जमर
बनान को साधिका हैं । सम्भवत विरहाग्रह इसलिए है कि यक्ति सत्ता दिव्य प्रेमानु
भूति का अनिवाय साधन है, दुख इसलिय वरेण्य है कि वह विरहमयी प्रेमानुभूति का
स्वाभाविक लक्षण है । किन्तु महादेवी जी विरह को अपने प्रिय के इतने पास ले गई
हैं कि दोनो की प्रथक सत्ता ही मिट गई है-
वह रहे आराध्य चि मय
मण्मयी अनुरागिनी मैं
इस प्रकार विरह ही उनका साध्य हा गया है ।
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३
हालावाद
(अ) प्रवतक का प्रश्न
हि दी साहित्य में हातावाद के प्रवतन का थेय श्री हरिवंशराय बच्चा को
दिया जाता है किन्तु बच्चन इस श्रय को स्वीकार नही करत : वेवर प्रवतक ही नही
वे जपन आपका उसका अनुार्ता भा नही मानत । इम सम्म म मैंने उनसे एक मेंट
वार्ता में प्रश्न किया था जिमका उत्तर देते हुए उ हान कहा कि मैंन अपने प्रारम्भिक
या म म पाच पार हाला प्याला शव का उपयोग कर गिया ना लाग मुद्दा हाला
वादी समझने लग । शारा प्रयोग करना गुनाह नहीं है जिन्तु उनका मून मन्त य
समझे बिना गलत जय नगा लेना अवश्य गुनाह है । उन्हान कहा कि मैंन हाला प्याला
को साधारण अथ मे ग्रहण नहीं किया वस्तुत व प्रतीक हैं और एक व्यापन तथा
उनात्त भूमिका से सम्बघित हैं । जिस प्रकार कालिदास के काव्य में एक जगह वसत
आम्रमजरियो के द्वारा तपण करता है और तुलसीदास की दाहावली म चातक
पानी से तदवत मैंने हाता से ईश्वर के प्रति अपनी-श्रद्धा भक्ति की भावनाओ ना
अध्य दान देकर तपण काय किया है
मेर अघरो पर हा अतिम
वस्तु न तुलसीदल, हाला,
मेरी जिह्वा पर हो अतिम,
वस्तु न गगाजल हाला ।
और चिता पर जाय उडला
पावन घत का, पर प्याला
घट बघे अगूर लता में,
मध्य न जल हो, पर हाला।
प्राणप्रिये, यदि श्राद्ध करा तुम
मेरा तो एसा करना-
पीन वालो को बुलवाकर
खुलवा देना मधुशाला । (मधुशाला पदाव, ८२, ८३)
हालावाद/६७ -- हाला भौतिक या पारलौकिक श्राद या तपणा काय हाला से किया गया, यह तो अभिमा य है, पर क्या यह हागा आनन्द और भक्तिपूर्ण जीवन की साधनामय भूमिका है ? या भौतिक हाला है ' बच्चन जी ने 'मधुशाला' के सम्बोधन मे इस विषय पर प्रकाश डाला है। उन्होंने लिखा है "आज मदिरा लाया हूँ-मदिरा जिस पीवर भविष्यत के भय भाग जाते हैं और भूतकाल के दारुण दुख दूर हो जाते हैं जिसे पान पर मान अपमानो का ध्यान नहीं रह जाता और गौरव का गव लुप्त हो जाता है जिसे ढाल पर मानव अपने जीवन की व्यषा, पोडा और कठिनता को कुछ नहीं समझना और जिसे चखार मनुष्य श्रम, सकट, सताप सभी को भूल जाता है । आह 1 जीवन की मदिरा जो हम विवश होकर पीनी पड़ी है, क्तिनी बडवो है । कितनी । यह मदिरा उस मदिरा के नशे को उतार देगी, जीवन की दुखदायिनी चेतना को विस्मति के गत म गिराएगी तथा प्रबत देव, दुर्दम काल, निमम कम और निदय नियति वे र कठोर, कुटिल भाषातो से रक्षा करेगी। उनके इस कथन मे यह स्पष्ट होता है कि उनकी हाला साधारण नही असाधारण है । वह तामसी नही सावित्री है। किंतु क्या हम बच्चन जी के इस कथन को प्राप्त वावय मान लें? उहान तो यह भा का था कि मैंने दस पाच बार हाला प्याला लिख दिया तो लाग उन्मत्त होकर मुझे हाला वादी कहन लगे पर उनको 'मधुशाला 'मधुबाला' और 'मधुक नश' को खोलकर देख लीजिए शायद ही ऐमा एकाध बध मिले जिसम य श द न हा हमारा प्रयोजन भादो की न्यूनता अधिक्ता स नहीं हैं पर प्रयोगा वो भी मैं कोई महत्व नहीं देता। नधीन, प्रमाद और महादेवी ने भी अनेक स्थाना पर हाला प्याला शब्दो का प्रयोग किया है किंतु उहं कोई हालाचाना नहीं रहता है । अप्रेजी म वडसवथ ने अपने को कभी स्वच्छतावादी शब्द से अभिहित नहीं किया है तो फिर भी वह स्वच्छता वाद का एक प्रमुख कवि और चिंतक है। पत को पल्लव' की भूमिका हि दो म छायावादी काव्य की ' मेनीफेस्टा वही जाती है किन्तु उमम मा छायावाद' शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है। मतलब मह मि शब्द नहीं अथ वा महत्व है । उपयुक्त उदरण में आगे ही उनकी एक पक्ति है-- (कि मदिरा) क्षीण, क्षुद्र क्षण मगुर दुर्वल मानव के पास जग जीवन की समस्त आघि न्याधिया के क्रूर वठोर आघाता से रक्षा करेगी। इस वाक्य म हाला के भक्ति-रूपिणा रस की गध रही है वह लौफिक हाला ही है। मानव जीवन तो उस महत शत्ति को प्राप्त करने का एक सशक्त साधन है, बिना उसके साधना ही सभव नहीं फिर उस क्षीण, क्षुद्र, दुवल कहना उसके लौकिर पक्ष को ही उभारना है, बच्चन जी की व्याख्या के अनुमार तो हालावाद की सारी प्राचीरें हिलनी हुई नजर आती हैं । यदि वह रहस्यवाद का एक अभिन्न मग है, ता फिर उस वदनाम करने का जो वाम किया गया है, वह २८ । आधुनिक काम्य प्रवनियां एर पुनर्मूल्यांकन निंदय है, और यदि हाला को रहस्यात्मक आवरण देवर बच्चन जी अपन क्टु निराशा, और सघपपूण जीवन की अपस ननाओ को छिपाना चाह रहे हैं तो यह उनके कवि का दुराब है । यहा यह भी प्रश्न विचारणीय है कि क्या हालावाद की कोई प्राचीन परम्परा है, यदि है तो उसका स्वरूप क्या रहा है लौकिक या पारलौकिक ? दूमरा प्रश्न यह है कि हिंदी साहित्य में केवल वच्चन जी ही उमकी भोर क्या आकृष्ट उसका ग्रहण समर्थन और पल्लवन करने के मूल म उनके जीवन तथा समाज की मन स्थितियां का योग रहा है और जब बच्चन जी उसे आध्यात्मिक और साधनात्मक रहस्यवाट की उदात्त भूमिका पर ग्रहण करते हैं हाना प्याला म आत्म निष्ठ हैं तब चार पाच वप के अल्प काल म ही १ मधुगीता को छोडकर लौकिक वियोग गीतो की सजना के लिए क्यो उमुख हुए । रहस्यवादी कवियो के माव्य में इम प्रकार अचानक ही दिशा तरण नहीं होता । कबीर, मीरा रवीद्र, या महादवी मा नाम इस सम्बध में स्मरण किया जा सकता है । मधुकलश के पश्चात बच्चनजी मधुधारा को छोडकर लौकिर जीवन की भाव विदग्ध धारा म सतरण करत हैं । 'निशा निमन्त्रण एकात सगीत सतरगनी आदि के पश्चात वे बगाल के अकाल पर गवेध शोक प्रगीत लिखते हैं गाधी जी के अहिंसा दशन से प्रभावित होकर खादी के फूलो का निर्माण करते हैं और स्वतनोत्तर काल में समसामयिक जीवन की उथल पुथल स सम्बधित तथ्यो को भी प्रगीतो म ढाल रह हैं । लोक लयो को गहीत करके ग्राम्य गीत भी लिख रहे हैं । उनका यह दिशातरण या विकास इस तथ्य बा द्योतक है कि हालावाद उनके जीवन मे रहस्यात्मक भूमिका की निष्ठा बनाकर नहीं आया था वह क्षणिक भावा माद या जो तूफान को भाति आया और चला गया। यह सत्य है कि हानाबाद के प्रवतन के द्वारा बच्चन जी को जहा अपरिमित ख्याति और यश मिता, वही उह कटु समीक्षा का गरल पान भी करना पड़ा जिसके सकेत अपने गीतो में एकाधि स्थान पर स्वय बच्चन जी ने दिए हैं। बह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा'-शीषक पक्ति उपयुक्त तथ्य की हो निदशक है। यदि बच्चन जी ने लाक् भय कारण मध धारा को छोड़ा तो भी उनके व्यक्तित्व का दुबलता ही ज्ञापित होती है यदि वस्तुत उ हाने हाला प्याला मधुशाला और मधुबाला को रहस्य को उगत्त भूमिका पर ग्रहण किया था तो उहें केवल लोगो के प्रवाद से छोड देना यह तथ्य आत्मनिष्ठा के अमाव की ही सूचना देता है उह रुककर इतजार वरना था जाज नहीं तो थोड समय पश्चात निश्चित ही उनके रहस्यवाद का समझने वाले पदा होने पर बच्चन जी यह प्रतीक्षा नहीं कर सके। ये सारे तथ्य इस बात के ज्ञापक हैं कि उहाने हालावाद को रहस्यवाद की भक्तिपूण निष्ठा से नहीं अपनाया, उसके मूल में दाशनिक, जद्वनवादा विचारधारा की जगह उनके जीवन की विभिन्न मन स्थितिया ही अधिक उवर रही है। फिर इस पार प्रिये तुम हो मधु है उस ?
हालावाद । ६९ पार न जाने क्या होगा ? जसे विशुद्ध लौकिक गीतो म रहस्यवाद की छाया खोजना तथ्य को युठलाना होगा । अपनी 'मधुशाला', 'मधुवाला' तथा 'मधुबलश कृतियो मे जगह जगह बच्चन जी ने हाला प्याला के जीवन और विश्व व्यापी रूपक प्रस्तुत किए हैं । इनके द्वारा आत्मा परमात्मा की अभि यजना हा जाती है, कित रहस्यकाय के लिए रूपक योजनायें कलात्मक उपकरण मान हैं, प्रमुख वस्तु हृदय की जीवन पापिनी रागात्मक निष्ठा होती जिसरा जभाव बच्चन जा के गीतो मे दिखाई देता है। - बच्चन जी अभिनव स्वच्छन्तावादी कवि हैं। स्वच्छ दतावादी कवि रचनाओ मे अपनी नात्माभिव्यक्ति को ही प्रमुखता देता है । ऐसी रचनाआ म भावनाभी की सुतीव्रता, कल्पना का प्रक्ष और प्रमावाविति के गुण सबसे पहले देखे जाते है, विचार या जीवन दान का पक्ष बहुत पीछे आता है । जहाँ तक सुतीय भावनाओ की सवध और अग्वितिपूण निश्चल अभिव्यजना का प्रश्न है हिन्दी म बच्चन जी की ममता बहुत कम कवि कर सकते हैं किन्तु जहाँ तक उनके जीवन देशन का प्रश्न है डा. नगढ़ के शा म उनके समान किसी भी महत्वपूण और प्रतिभा सम्पन्न कवि न खोखले विचार प्रगट नही किए । अर्थात उनकी हाता सम्बधिनी जा विचारधारा है वह व्यावहारिक रूप से जीवन म वरण्य नहीं है। वह जीवन सघप से पलायन निराशा अनास्था आदि का प्रतीक है। यह व्यक्ति-वेद्रित निवतिमुखी जीवन दशन है। 'आ) उमर खैयाम जीवन, दर्शन और काव्य बच्चन जी के हालावाद की मूल विशेषताआ के निदशन के पूर्व हम उनके कवि गुरु उमर खयाम के काय की विशेषतायें जान लेना आवश्यक है । उमर खैयाम पारस देश के कवि हैं । उनका पूरा नाम गयासुद्दीन अबुलफतह उमर था। ये इन्द्रा हाम के पुन्न थे। खयाम के शब्नाथ के विषय म मतभेद है। इसका शाब्दिक अथ हैं खेमा बनाने वाले पर कतिपय लोगा का क्थन है कि खयाम उनका उपनाम था। बच्चन जी का इस सम्बध म क्थन है कि हो सकता है उमर खयाम ने पारिवारिक पेशे के ही नाम पर अपना उपनाम रख लिया हो उमर खैयाम की जो कवितायें उपलर होती हैं वे सब रुबाइया ही है। खयाम का उपनाम इस विचार से ग्रहण क्यिा जा सस्ता है कि यदि शब्दो का खेमा खडा करता है रुबाई के चार डमो पर भावो अथवा विचारो का तबू तानता है। उमर खयाम की जम तिथि के विषय मे भी मतभेद है। अधिकाश विद्वान उनका जन्म ग्यारहवी सदा व मध्य म मानत हैं। उनका देहावसान बारहवी सदी के १ उमर खैयाम को रुवाइया, बच्चन, अनुवा, पृ० ९६, (परिचय) - ७० / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एव पुनमू ल्याक्न तीसरे दशक मे माना गया है । इस प्रकार उनकी आयु ७०-८० वप की रही। उमर खयाम अपन समय क सुप्रसिद्ध गणितन ज्योतिषी और मौलिक चितव रहे हैं । वे स्वा त सुखाय कवितायें भी लिखत थे । उनको कविता की प्राचीनतम पाण्डुलिपि उनकी मत्यु के ७५ वप बाद तयार का हुई प्राप्त होती है । इस सकलन म लगभग २५० रुबाइया है । उमर खयाम ने अपनी रुबाइयो मे धार्मिक और साम्प्रदायिक सकीणता तथा व टटरता का विरोध किया था, साथ ही उहान उनम इस्लामियो की सनक, बहम, पाखण्ड और आडम्बरो की भी अच्छी चुटकी ली थी। फलत समाज तथा साहित्यका के बीच से उनकी उपक्षा की गई और उनक कवि रूप को लाग लगा तार ७-८ शता िदयो तक भूले ही रहे। १९वी शतादी म अग्रजो ने पूर्व की क्ला कृतियो और पाण्डुलिपिया स यूरोप के अजायबघरो को भर दिया। वही पर इस शताब्दी के मध्य म प्रोफेसर कोवल तथा उनक मित्र फ्टिजजेरल्ड के द्वारा उमर खयाम की रुबाइया का प्रकाश में लाकर उनका उद्धार किया गया। फ्टिजजेरल्ड के द्वारा अनुवाद को गई उमर खयाम की ७५ रुवाइया का प्रथम सक्लन १८५९ ई० में प्रकाशित हुआ । यह सस्करण केवल २५० प्रतियो का निकला था किन्तु फिर भी यह सस्करण न बिक सका और प्रकाशक ने इसकी प्रतियाँ रद्दी में डाल दी । वही से दा अग्ने कवियो की दष्टि इस पर गई । उहोने इसकी बहुत प्रशसा की। किंचित समय म ही यह कृति लोक-प्रिय हो गई । १८६८ म दूसरा १८७२ मे तीसरा और १८७६ म इसका चतुथ सस्करण प्रकाशित हुआ । इन विभिन्न सस्करणा म फ्टिजजरल्ड ने अनेक सशोधन परिमाजन और रुबाइयो की सख्या में वद्धि भी की है पर विद्वानो ने उनके प्रथम सस्करण का ही सवश्रष्ठ माना । अब तक तो उमर खयाम की रुबाइयो के अगणित सस्करण निकल चुक है और ससार की प्राय हर भाषा में उसके अनुवा भी हो गय हैं । उमर खयाम सोसाइटो भी बनी है और उनके यक्ति त्व, कृतित्व से सम्बंधित प्रथित माना में शोध-काय भी किय गय है। [१] प्रकृतिवादी जीवन दष्टि Vउमर खयाम ने अपनी बाइयो में प्रकृतिवादा जीवन दष्टि को व्यक्त किया है। मनुष्य के जन्म के पूर्व न कुछ था और न मत्यु के पश्चात कुछ रहेगा । जो कुछ है वह यही मानव जीवन है। यही हमारा भाग्य है। इसमें भी कोई वस्तु स्थायी यही है । पल पल म सभी कुछ परिवतन होता जा रहा है प्रम सुख सुदरता सभी अल्पस्थायी उपादान है । जीवन म जब तप्ति यही नहीं मिलती, तब तष्णा क्यो? आशा आकाक्षा श्रम, सघप वासना चिता प्रेम, त्याग, सेवा आदि सभी निरथक हैं। १ उमर खयाम का स्बाइयाँ बच्चन, अनुवाद पृ० ९७ (परिचय) हालावाद ) ७१ 1 [२] दुखवादी जीवन दशन अत खयाम जगत से पलायन करने, जीवन से उदासीन हाने और चेतना को विस्मति मे डुबाने की बात करते हैं । इसीलिय रुवाइयत सुखवादिया की फ्लिासफो न होकर दुखवादियो की फिलासफी है । उमर खयाम ने प्रकृतिवादी जीवन दृष्टि से ही मद्य की मादक्ता, नारी की कोमलता और अनन्त मानव वासनाओ का चित्रण क्यिा है । जीवन को वे क्षणभगुर मानते हैं और मदिरा पान करके जीवन की भूख का मिटाने का आदेश देते हैं- "उठो मेरे शिजो नादान बुझा लो पी पी मदिरा भूख नहीं तो तन प्याली की शीघ्र जायगी जीवन मदिरा सूख ।' या- 'नही है क्या तुपको मालूम खडी जीवन-तरणी क्षण चार बहुन सम्भव है जा उस पार न फिर यह आ पाय इम पार । अनुवादक बच्चन जी [३] सरा सुदरी का गुण गान उमर खैयाम जीवन की पार लौक्क्तिा का पुजारी नहीं था, उसके लिए यही जीवन सब कुछ था अतएव उसकी रुबाइया लौकिक प्रेम के धरातल पर ही लिखी गई है उनम सुरा सुन्दरी दोनों का मणि काचन योग है- धनी सिर पर तरुवर की डाल, हरी पावा के नीचे घास । वगल म मधु मदिरा का पान, सामने राटी के दो ग्रास सरस कविता की पुस्तक हाथ और सबक ऊपर तुम, प्राण । गा रही छेड सुरीली तान । मुझे अब मरु नादन उद्यान । व प्यारी मदिरा का पान करके नशे में चूर चूर होना चाहते हैं जिसस भविष्य के भय दूर भाग जाय और अतीत के दारण दुख नष्ट हा जाय । उह क्ल पर भी किंचित आसक्ति नहीं है। - ७२/ आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एवं पुनमू ल्याकन [४] उ मुक्त मोगवाद जीवन वे वतमान का स्वच्छ द भोग बरा के लिए व लालायित है । स्वग, घम, कम सभी रास्ताा का अ न अ धकारमय और निराशा से परिपूर्ण है। विद्वान जो बातें करते हैं व भमपूण और अविश्वसनीय है क्यारि जीवन म वैवल एक ही बात सत्य और निश्चित है कि जो सुमन आज सूख गया है, वह फिर कभी हरा भरा नहीं हो सकता । इसीलिये व प्याले पर प्याला ढाल रखें इतनी मदिरा पान कर लेना चाहते हैं जिससे जम मरण ही नही अन्यायपूर्ण बाता का भी विस्मरण हा जाय । तर शक्ति को उहाने क्शा, बद्धा, वध्या समझ र त्याग दिया है और सरस मधुर और सुकुमार सुर वाना से अपना नाता जोडा है। अपन ही मान विमान में विषय म उनका क्थन द्रप्ट य है- Pशनो का मीया सिद्धात गणित विद्या सीखी दे ध्यान खपाया ज्योतिष में मस्तिष्क बढाया जड जीया कानान । जगत की ज्वाला से मैं तप्त जलाशय नान-विवन अनेक मगर सब छिछले, उथले क्षीण मिना वम प्याला गहरा एव । ४१ । [५] जीवन जगत के कोलाहल से पलायन इस पश्चात व जगूरी मदिरा की अमित प्रशसा परत हैं। वह बड़ी ही वीमियागर, चतुर और सुजान है जो मलिन जीवन शीश को शीघ्र ही कचन सा द्युतिमान बना देनी है व जगत के कोलाहल से पलायन करत हैं उह यय के बाद विवाद करने वाले न तो विद्वानो से काम है और न जीवन के निरचा यगडो को ही वे याद रखना चाहते हैं व अपनी सुर बाला स कहत हैं- चला जग कोलाहल से दूर करें हम तुम एकात निवास । उडायें हम भी उन पर धूल हमारा जो करते उपहास । ४५। वठकर प्रेयसि मरी गोद क्रो माणिक मदिरा का पान। कम जार नियति का वे मानवीय जीवन की शतरज का खिलाडी कहते है, हालावाद/७३ जो संसार की बिसात खोलकर और खानो मे निशक्त मनुष्यो को बठाकर दिनरात क्रीडा कर रहे हैं। अत मे, उमर खयाम ने भी अपने तपण की प्रिया मदिरा के द्वारा ही सम्पन्न कराने की बात कही है-- प्रिये मदिरा से देना सीव अधर मेरे होते मृत म्लान मरू तव मदिरा से ही प्राण कराना मेरे शव को म्नान । भगूरी पत्तो से ढक देह उन्ही पत्तो की शया डास लिटा देना मुथको चुपचाप किसी मधुमय उपवन के पास । ६७ इस्लाम धम और सूफी-दशन उमर खपाम सूफी कवि हैं । पारसी सूफी कवियो म इनके अतिरिक्त मौलाना रूम और हाफिज का नाम विशेष उल्लेखनीय है । फारम इस्लाम धम का अनुयायी देश है । इस्लाम में शराब का पान निषिद्ध है कि तु सूफी कवियो ने इस्लाम धम की भतिशय स्टटरता के विरुद्ध एक नवीन प्रेमपरक उपासना पद्धति निर्मित की जिसम परमात्मा के प्रेम म पूणत निमग्न रह्न की साधना प्रमुख है । यह प्रेम साधना अपनी परिपूर्णता और तलीनता मे मदिरा की मादक्ता के तुल्य है । सूफियो के इम दिव्य प्रम में सुरा सुदरी के समान प्रेम का गहरा रंग है । इस प्रक्रिया के द्वारा उहोने वस्तुत इस्लाम धम के कठमुल्लेपन का तीव्र विरोध किया है उसके बाह्याडम्बरो, हरियो और जडता की भत्मना की है । उन्होन मदिरा की मादव ता वा प्रेम की चरम साधना का स्पर दिया है जिस स्तर पर पहुँच र उहे 'इनाम' हाता है। हनाम था तदाकार पूर्ण स्थिति म रह और मृदा' का विभेद मिट जाना है और जीव और परमात्मा एकागर हा जात है । यही एकाकारता उनकी साधना का एकमेव लक्ष्य है। मूपिया की यह एवावारता भारतीय अद्वतवानी दान में चहत पास है । प्रेम रूपी मदिरापी मादकता का हो य सच्चा भक्ति उपासना बह्त है और इसकी मन मूति वहां पर साता है जिमन उसरी प्रताति की हो । दरिय एक सूफी कवि शिपा है- 'मजा शराम वा स पहूँ तुझमे जाहिर हाय पम्पल तूने पीहा नहीं। पाररावा मूफी इषियो पर शाम व घरटर धमविलमियों ने अपना ७४ | आधुनिक काय प्रवृत्तियां एवं पुनमू ल्यापन यत्यागार दिए हैं । जिसके कारण अधिश तो देश छोडकर भाग गये, अधिकार सूनी पर चय दिए गये । गिनको सूली पर चढाया गया, उनमे मसूर का नाम विशे प्रमिद्ध है । इम मन चक्र ने उल्टा प्रभाव छोडा और सूफी काव्य मे मदिरा, प्याल सारी मीना ( वोतल ) मधुशाला आदि के प्रताको की सर्वातिशयता होता गई इहोने इन लौकिक प्रतीको वे माध्यम से जीवन के कोलाहल और अयायों को मू ईश्वर प्रेम की मादकता में मस्त होकर अपनी अनोरिव स्वत बता और त मयत का जाख्यान किया। ये प्रेम पग के अनय पुजारी थे। इनमा विश्वास था कि पर मात्मा हृदय की निम नता साविक्ता और उसकी उदासता के द्वारा प्राप्त होता है रोजा नमानादि बाह्याचारो के द्वारा नहीं। इसी प्रकार इस्लाम में यह माना गय कि पुला और वदे में एकात्मभ वही हा सरता पर सूफा इस ताकार परिणिति के लिए व्यग्र प और प्रेम की मादाता के द्वारा उहाने यह काय सुलभ माना । प्रर दिश प्रेम की एकाग्रता और मदिरा यी मारा अपने चरम प म ही स्त की मूवर जहा रहुचकर पनि जपने नीवन ली नाना व्याधियो को भूतक निदद हो जाता था। इमीपिए गूपी कवियो ने प्रतिनिधारमा पद्धति से शराब के अपने काव्य म प्रतीकार रूप में ग्रहण किया। शगव का नशा उम ममय सौगुन हो जाता है जवकि वह साकी व हाया प्रत्त पी जाय अतएव सुरा के सा सुदरी का भी प्रयोग उ होने प्रमुखता के साथ किया। क्षणभगुर प्याला प्याली कं उहोन मानवीय जीवन माना और सुरा सु -री को प्रेमपूर्ण उपासना । तरह नौकिक प्रतीको स्थाओ या उपवरणो को कर रहा। उनके द्वारा पारलौकिक ध्य जनाओ को प्रस्तुत क्यिा है। यह रूपात्मकना या अयोक्ति सूपी काय पी एवं प्रमुख शनी है जिस जायसी कुतवन जानि हिली साहित्य के मध्यकालान सूफी व विय में भी प्रचुरता के साय देवा गाता है। मौज मस्ती मादक्पूण त मयता और रच्छत मनोवत्तिक गीता को गान मे फारसी पियो म उमर खयाम ने मर्वाधिक रयाति प्राप्त की है। उनकी स्वाग्यो म प्रकृति सी जीवन नदि का इतना मनोरम और मानवतापूर्ण अभिनव और जावपणपूण ढग म प्रकाशन हुँना है जिसकी सत्ता विश्व क साहित्य म नहीं मिलती। टसी ए सनकी रुवान्या का ससार भर के लोगा न समार दिया है और उह विश्व यापी अक्षय ख्याति मिनी है। च पुराने हार भी चिर नवीन है। पश्चिमी जगत म जद किसी प्रकार को अपना धाटा पूरा करना ना है तब वह उमर खयाम की रबाइयो का नया मस्करण छाप देता है और इमम उमका धाग पूरा हो जाता है। (इ) हालावाद के उदभव काल की विविध परिस्थितियाँ हिटी साहित्य म मूफी वाय का परम्परा रही है रितु बीसवी शदी म ।
हालावाद | ७५ उमर खैयाम का प्रभाव फारसी स सीधे न वापर अती व फ्टिजजेररड के अनुवाद के माध्यम स बाया है। गवप्रथम १०२७-२८ ई० में सरस्वती में उमर खयाम की कुछ रुबाया का अनुवाद प्रकाशित हुमा । उन पर टीका टिप्पणी हुई । हि दो पायकों क तरुण हृदय को उन रुवान्या का मादक्ता ने भर दिया और वे थोडे ही समय मे लोकप्रिय हो गयी। उमर खयाम वी स्वाइया के द्वारा यजित आध्यात्मिक प्रम को तो हिदी पाठक और पवि नहीं समझ सके पर उनकी प्रकृतिवादी दष्टि जोर अन त वासनामो की पूर्ति करने वाली सुरा सुदरी की मादक्ता उह भी इष्ट प्रतीत हुई अतएव वे उन काइया को आदश मानकर का य रचना करने लग । विषय वस्तु की समानता तो मिल गइ पर उमर खयाम या कवि-प्रतिभा और प्रेमपूण जीवन व्यापी साधना व वहां से लात, अतएव व उसकी गहराइ म प्रविष्ट न हा वर केवल उसके प्रतीको यो उपकरणो का ही अनुकरण कर सके । उमर खयाम ने जो गहराई अपनी कूजा नामा' म प्रस्तुत की वह हिदी विया मे केलव मिट्टी का प्याला प्याली क्थन तक ही सामित रह गई। जो बात उमर खयाम के अत वरण स निकनी थी, जो मस्ती और अलोषिक खुमार उसको जात्मा का अजेय धन था जो स्वच्छ 'दता और जीवन-दशन उसकी अनुभूतियो वा सुरभित पु ज था, वह हिदी कनिया मे अयाचित न होकर सप्रयाम और जनुकरण वा प्रति फनन है, यही कारण है कि जोहातावाद उमर खयाम के रमिक यण्ड स निक ना वह प्रमो, माधव, चितक, पाठक और विविध ममाजा को मग्न करता हुआ विश्व व्याणी हा गया, वह असाधारण होत हुए भा माधारणीवृत हो गया पर हि या हायान अपन चार पांच वर्षों में। अल्पवयम ही अपनी लौकिवता के यमार म डबा नष्ट हो गया। यह र य है कि उसपी प्रसिद्धि यश और पौति का भा हितासमार म एकवण-युग मन है-मिर भी उसके भातर निहित मानवीय दुरसताना छिछनी क्षणिक मस्ती र वासना, निराशा, कुण्ठा, आदि से परिपूण उदगारो ने उसे बहुत समय तर जी नही लिया और उस अनुवर्तामा ने भी इस जाग्न नर्शन से उपर उठकर और मानव जोगन के वास्तविर दशन को पहिचान र इसे उपक्षिन पर दिया। महादा ये हातावादी कविया में हरिवशराय बच्चन पद्मवात और हृदय नारायण पाण्डय हृदयेश का नाम विशेष प्रसिद्ध है। इनम भा बच्चन सर्वोपरि हैं। मर ययाम का ग्बाइया व हिना अनुवार व पश्च त मोतिय प स आपन मधु शाला (१९३३) मधुवाना (१९३६) और मधलश (१९३८) नाम स तीन वृतिय की सजना की। उनके हृदय की मस्ती से जल और थल गगन और पवन सि और वसुधरा, स्वग और नरक जट और चेतन निशा और दिवस वन और उपवन सर और सरिता, मिलन और विरह प्रणय और मधप साशा और निराशा, जाम और जीवन, काल और पम-सभा यस्तुयें जिनका अस्तित्व इस विश्व म है-माला, उमर ७८ | आधुनिक पाय प्रवृत्तियां एव पुनमूल्याकन -- ध्याला मधुशालागय आगारित" हो उटी। उनकी इस विश्व-प्यापीमरती से न मानम डोर उठा और अन्य कवि उनके समक्ष निस्व हो गये। हालावाद का अर्थ व वन और बच्चन का अर्थ हातावाद हो गया। यद्यपि अपगो 'मधुशाला' के 'सम्यो धन मे उन्होंने मनिग को भक्ति रूप में ही प्रस्तुत किया है-'मरी मटिरा तरे चरणो म फिर भा चढ़ गई। मैं स पुष्ट हूँ। भक्त की मश्राि -विनम्र भक्त की मदिग-भगवाा के अधरो पर नहीं चरणो में ही पढ़नी उचित है। पर हर दखती है। यह क्या ? तेरी आमा म यह मतवालापन कसा? उ मत्तता सी? मस्ती कसी तेरे अधर हिन रहे हैं । तू मुमारा क्यो रहा है ? क्या तू कुछ कह रहा है ? क्या यही कि- पीवर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार दिया क्या मदिरा से , क्या तू मरी मदिरा पान कराने की अभिलापा से ही प्रमत्त हो उठा? धय सू और ध य में ? ' कितु यच्चन जो की यह पति रूपिणी मदिरा उनके आध्या त्मिक जीवन की साधनामय पुगार न हार देश कान यी विविध परिस्थितियो और उनके जीवन की मघपपूण वरनाओ स उग्भूत है । अतएव हानावार के स्वरूप को ममषन के लिए हम नाकारीन परिस्थितियां भी देखनी होगी। हालावाद का उम्भव विकास और पराभव छायावादात्तर युग म हुआ है । हम वह चुके हैं कि १९२८ ई० के पश्चात छायावादा पाय मे विघटन के तत्त्व प्राट होने लगे थे और काय धारा स्पष्ट रूप स दो धारामा म विभक्त होने लगी थी। एक छायावादी और दूसरी यथावा।। यया रवादी का यधारा भी दो भागो म विभक्त थी। प्रथम वह जा छायावाद की शियिस्ता दवलता और क्षयी भावनालो को ग्रह्ण वर अन सर हो रही थी आर 'द्वतीय वह जो समाज को शोपित शोपत्र रूपो में विभक्त करके शोपित का पक्ष ग्रहण कर उनके प्रति अपना सहानुभूति प्रक्ट पर रही थी और शोषको को मानव जीवन की I कार उनकी निता और उपेगा कर रही थी। यह काव्य धारा १६३५-३६ ई० म प्रेमनद जी म नतत्व म सम्पन्न हुई । तखाऊ के प्रगतिशील लखो की सभा के पश्चात प्रगतिवाद दे रूप में परिणत हा गयो। प्रथम प्रकार की यथाथवादी वस्तु और शली के अनुक्र्ताना में बच्चन अचल और नरेद्र शर्मा प्रमुख हैं । इहे हि गे साहित्य की लघुत्रयी कहा जाता है । ये अभिनव स्वच्छ । दतावादी कवि हैं जिहोने मधुचर्या की मादक भावनाओ और भोगवाद को सर्वाधिक प्रश्रय दिया। इनमें से बच्चन जी पर उमर खयाम की निराशावादी विचार धारा का - १ २ मधुशाला सम्बोधन पृ०९ पृ० १०० " हालावाद /७७ हे आपा प्रभाव पडा, पतायन, कोलाहल से दूर, एका तता, मादक्ता आदि को उहोने छाया वार की पमिक काव्यधारा से ग्रहण किया और हातावाद का,प्रबतन किया। अचल और नरेद्रशर्मा प्रकृतवादी शनी को ग्रहण करके जीवन की नग्न वासना स्थूल सौदर्य, अहम यता और भाग को सर्वाधिक महत्व देते हुए अपनी परिणति मे प्रगतिवादी हो गये । बच्चा जी भी प्रगतिवादी हुए पर उनका यह प्रगतिवाद बहुत देरी से आया । राजनीतिक दष्टि से १९३० से १९३५ ई. तक का समय निराशा और असफलता का काल है । गोर'मेज वाफे म असफल हो गई थी और राष्टीय आदोलन मे भाग लेने वाले प्रातिकारियो का निदयतापूर्वक दमन किया जा रहा था। स्वत न्त्रता प्राप्त हो सकेगी, इसकी आशा निकट भविष्य में धमिल पड गई थी और जनता समझने लगी थी कि अब काग्रेस समाप्त प्राय हो गई वि ! नेतागण असफल होकर भी निराश नहीं हुए थे, वे स्वत जता का स्वप्न देखते रहे और सघष मे सजग रहे । फल यह हुआ कि १९३७ के आम चुनाव में काग्रेस को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और उहे शासन की बागडार सभालने का भी अवसर मिला वित हर जगह हस्त- क्षप के कारण उहे अपना परिपद भग भी करनी पड़ी। ऐसे निराशा और अवसाद के समय पर माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन, प्रसाद, निराला, पत, प्रेमच द्र आदि कवि और कथाकारो ने जीवन म आशा और आस्था भरी वाणी ही व्यक्त की। उहाने अपनी कृतियो के द्वारा राष्ट्रीय जागृति के सदेश दिए। प्रसाद की लहर के प्रगीत, कामायनी का दाशनिक सदेह और चन्द्रगुप्त ध्र वस्वामिनी आदि नाटक नवीन आशा और जागति को ही वाणी का उदघोप परत है। निराला की वह ताटता पत्थर', भिभुक', 'राम की शक्ति पूजा' पत के युगा त' के प्रगीत आदि भटकत हुए समाज दे मानस मे दृढता, अपराजेयता, आत्मनिष्ठा, अाति सघष आशा, मफलता राष्ट्रीय जागति आदि भावनामा यो हो उदभूत करते है। प्रेमच द व महा उपयास 'गोदान का नायक होरी जीवन मे बिना किसी समयौता को दिए, सधप रत रहकर ही अपने प्राणान्त कर देता है। स्वय छायावाद जव वीणा थि', मासू', 'पल्लव और 'परिमर की कल्पना और सौदयमयी भूमिका छोहबर मानव जीवन का मागतिक गुजन करने लगा था और दार्शनिक 'ज्योस्त्ता के रूप में चरमोत्लप पर अवस्थित था तथा कामायनी' के घवन यान द शिखरो पर समरस जीवन की चेतना जागृत हो रही थी, तब बच्चन के कठ से निराशा पलायन, दुप, भाग, विासादि से परिपूण मधुचर्या के गीत कसे निक्ले, एक आश्चर्य का विषय है । तत्कालीन समाज में निराशा उदासी, असफलता का साम्राज्य पा, यह सत्य है एसे हो समय मे उमर घमाम की मौज, मस्ती से युक्त हवाइयो ने जनता को मादरता के सागर में निमग्न किया और उस मधुदेश में जनता अपने जीवन के पोलाहल को भूलने का प्रयास ७६ / आधुनिय बाध्य प्रवत्तियां एक पुनमूल्यापन करने लगी, यह तथ्य भी ईपन प स सस्य माना जा सकता है नितु दश व दुप और निगा के समय प्रलायन भाग बनास्था और मदिरा की बातें बता एक पलायनवादी तत्त्व है जिसके कुरण और पल्लवन था उत्तरदायित्व तत्कालीन परिस्थितियों मे अधिक रचयिताओ य वयक्ति जावन म निहित है। अपन जीवन ये सधुप और असफ नतानो सक्ति निराश जीया म इहाने पराजित भागवाद और भूरी मस्ती को जन्म दिया । एष दुपा निराश शक्ति का दुधी निराश से प्रेम और सहानुभूति जल्दी हो जाती है। तएव उमर पयाम की विचारधारा, यश, पीति और विभूमि ने इनवा पय प्रशस्त पिया। पहले यह मदिरावाद बच्चनादि की हृदय पय अनुभूतियों से प्रभावित होकर निकला रितु याट म जय उससे याति, मिली, तो हालावाद पर कवितायें लियन का काय एव शोर और अनिवायता मे बदर गया यही कारण है कि बच्चन जी की प्रथम कृति मधुशाला म जा सरसता मुकुमारता और मस्ती है वह उनकी किसी भी परवर्ती मधु पनि म नहीं मिलती।' मधुशाला' की एक लाख से अधिक प्रतियाँ भी बिक चुकी हैं यह तथ्य भी उसकी लोकप्रियता का सूचक है। मधुबाना, और मधुर श म पिचारधारा अधिर जाग्रह के साथ व्यक्त की गई है और मिट्टी का तन मस्ती वा मन क्षण भर जीयन मरा परिचय आदि रानाआ म जीवात्मा परमात्मा जीवन गत व सम्बध की दाशनिक विचार पारामो को भी प्रग करने की चेष्टा की गई है। बच्चन की मौज मस्ती म मिमी प्रवार की कमा नहीं है । यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाय तो कही कही तो उमर पयाम भी इस क्षेत्र में उनसे पीछ छूट जान है वि तु उनकी यह भोगजय मस्तो का यावहारिन रूप स जीवन म तिनी उपादयता है ? इस प्रश्न पर जब सुधी विद्वाना न विचार किया तो उनके वासनाज य उद्गाग या तीनतम रूप में विरोध किया जाने लगा। समाज ने उन पर भगुरिया उठाइ । प्रतिक्रियावश क्छ समय तो बच्चन जा न ममाज की चिता न करवे और तेजी से ध्यग्य उपहासो मे भरे हुए मधुगीनो की सृष्टि की पर आधात पर आघात सहन परत करने उनका कवि हृदय भी विचलित हो गया भार थवर उहोने अपने हाथो से मधु क्लश, दूर फेंक दिया। फिर रीते हुय इस क्लश म हाला उह भरने की शक्ति नहीं हुई। कदाचित वे अपने जीवन दशन क खोखलपन को समझकर उससे ऊपर उठ चुर थे या अलग होकर अपनी प्रथम पत्नी के देहावसान से उत्पन्न वियोगज य हलाल का पान करने लगे। आशपर्य है जब कवि को अपने जीवन के रिक्त पान को मदिरा की मादकता से भरसर समरसता प्राप्त करनी थी, तब वह निशा निमन्त्रण 'एकात सगात और सतरगिनी के विरह गीतो मे आकुल अतर' लकर गोता लगाता रहा। बच्चन जी के काव्य विकास का यह एक विरोधाभास है। जिस समय उ होने मधुगांता की सृष्टि प्रारम्भ की, उस समय उनके जीवन हालावाद | का महा सघष काल था। परिवार के भरण भोषण का प्रश्न उनके सम्मुख था। १९२७ ई० मे सुश्री श्यामा के साथ उनका परिणय हो गया था। १९२६ ई० मे उहोने साहाबाद विश्वविद्यालय में वी० ए० उत्तीण किया। १९३० इ० मे उ होने गांधी जी के सत्याग्रह आदोलन से प्रभावित होकर उसमे सत्रिय भाग लिया। १६३२ ई० म आजीविका के लिए उह दनिक 'पायोनिपर मे जिला चिहरिया के सवाद दाताओ का काय करना पडा । इस समय बच्चन जो दोपहर की चिलचिलाती धूप म एक कचहरी में दूसरी कचहरी जाते सवाद नोट करते और अपने जीवन के सघष से उत्पन्न निराशा दुख और थकान को गुनगुनाप र एक काल्पनिक मस्ती से भरा करते । १९३२ ई० में वे अभ्युदय के मपादकीय विभाग म सम्मिलित हुए और ३४ म वे वही गाल विद्यालय म दिदी में शिक्षक हो गये। ३६ ३४ ई. मे ही उन्हाने उमर ययाम को स्वादयो का अनुवाद करन पश्चात अपनी मधुशाला' की रचना की थी। उनके जीवन की उपयुक्त परिस्थितियो को देखकर हालावाद के प्रेरणा स्रोता को सहज ही समझा जा सकता है कि वह तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक आदि परिस्थिनिया की उपज है बच्चन जी के तत्कालीन जावन ने उसका मधुमिंचन किया है । १९३७ ई. में उनकी धम पत्नी का देहावसान हा गया जिसका मर्मातक प्रभाव उनक जीवन पर पड़ा और वे सहसा ही मधुगीतो को छोडकर दूसरी और मुड गय इस ममय उनकी आयु तीस वष की था। १६३८ मे उहाने एम० ए० किया और १९३६ मे ची0 टी0। इसी वर्ष में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अग्रेजी विभाग में अध्यापक हा गये। १९४२ ई० में आपका श्रीमती तजा से द्वितीय विवाह हुआ। १.५४'इ० में आपने व मित्रज विश्वविद्यालय से डाक्टैरट ली और दिसम्बर १९५५ स आप भारतीय विदेश मनालय में विशेषाधिकारी के रूप में काय करने लगे । व तत हम उनके समग्र काय विकास का उनके जीवन की उपयुक्त विभिन्न घटनामो स पथक कर ही देख सरत । प्रगीत वाय पाववि के पति व से अला फरक देपा भा नहीं जा सरता।। हालावाद का स्वरूप बच्चन जी का उपयुक्त कृतिया स्पुट प्रमाता के मरन है। मधुगाला म परिशिष्ट की ४ अपदियो को गिला र कुल १३९ अष्टपदिया हैं। पदी का प विधाम एक्सा है और प्रत्या वध की बतिम पक्ति में मधुशाता शट की पुनरुक्ति हाती है। जो समस्त पद मे मादकता और सरसता का संचार करती है। प्रत्या वध अपन में स्वतन्न और पूर्ण है । पूर्वापर रूप से उनम कोई सम्पत्र नहा है। फ्टिजजेरल्ड ने उमर खयाम की ६७४ म्याडया में से जिन ७५ रुघाइया का प्रजा म जनुवाद करके प्रस्तुा किया था वे आमपूण होत हुए भी अपने क्रम में एक स्था को प्रस्तुत करती थी। बच्चन जी ने 'मधुशाना के प्रथम मस्करण में उमर खपाम री ममता पर अष्टपदिया ही प्रस्तुत की थी। इनमें भी एक गाया के सम्म तत्त्वा की योजना ८० । आधुनिक काव्य प्रवत्तियो एक पुनमूल्याकन - वाला। आज परस्पर और विविध भावनाओ के बीच तारतम्य भी बठ जाता था। (१) मृदुभावो की अगूरी हाला 'मधुशाला' के यारम्भिक पद में वे पहले अपने प्रियतम को सबोधित करते हुए कहते हैं कि मैं अपने मदुभावा के अगूरा को हाला बनाकर लाया हूँ। इसका पहले तुम्हें भोग लगाऊगा फिर ससार उसका प्रसाद पायेगा। उनकी मधुशाला सबसे पहले प्रियतम का ही स्वागत करती है । इसके पश्चात वे प्रियतम से अपना अद्व त सम्बध विज्ञापित करत हैं - प्रियतम तू मेरी हाला है। मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमे भरकर तू, बनवा है पीन मैं तुझका छक, छलका करता मस्त मुझे पी तू होता एक दूसरे का हम दानो मधुशाला । (२) कल्ति कल्पना की हाला कवि रूपी सादी भावुकता रूपी भगूरलता से कल्पना का हालाखीचकर लाया है। वह कल्पना के हाथो से ही उसे पान करता है । यहाँ पर क्ल्पना शद विशष महत्वपूर्ण है। हाला कल्पना की है जीवनानुभूति रहस्यसाधना या दानिक मतव्य की सूचक नही । कल्पना श द का अनेक बार प्रयोग करके कवि बीच बीच में यह सजग करता जाता है कि मेरी हाला भौतिन नहीं, काल्पनिक है। मधुशाला के अत म भी कवि ने पति कल्पा शर वो रखार उसकी अयथाथता उदघोषित की है पलित कल्पना का ही इसन पाला मान दुलारो सही रखना इस मरी सुकुमारी को विश्व तुम्हार हाथा म व सौंप रहा हू मधुशाला । उमर खयाम ने यपना हाना को भा भी कल्पित नहीं कहा, इसका मत य यही है कि बच्चन का हालावाद जावन की गहन रहस्यानुभूतियो से अनुवधित 7 होकर काल्पत भावो माद है । मधुशाला के पथ क पथिका को सवाधन करक भी वे कहते हैं सदा उठाया हातावाद | ८१ । मुख से तू अविरत क्हता जा मधु मदिरा मादक हाला, हाथो म अनुभव करता जा एक ललिन कल्पित प्णला। घ्यान दिए जा मन में सुमधुर सुखकर सुदर साकी का और जब मदिरा पीने की अभिलापा ही हाला बन जायगी, अधरो की जातुरता म ही प्या ना जाभाषित होने लगेगा ध्यान करत करते जब स्वय साकी हो जाओग और जब हाना प्याना, साकी का अस्तित्व न रहेगा, तब मुझे मधुशाला मिल जायगी। [३] दग्ध प्राणो की कविता इसके पश्चात उन्हाने मधुशाला का मागीतिक चहलपहल मधुबाला का इद्र धनपी शृगार उसके नाज नखरे आदि का चित्रण किया है । हाला मधुशाला के गुणा का भी उल्लेप उहोंने किया है उनकी हाला सामारिक हाना स पथक है, वह जगती की शीतल हाला नहीं, ठडा प्याला नहीं वह तो जलत हुए प्याले म ज्वाला की सुरा है दग्ध प्राणा की कविता है । बच्चन की मधुशाला साम्प्रदायिक वातावरण से ऊपर है वह केवर उमी पीन वाले का सागत करती है जो सारे धम प्रथो को जना चुप हो मदिर मस्जिद गिरजे की चहारदीवारी से निकल आया हो और पडित, मोमिन और पारिया के सकीण जाल को नष्ट भ्रष्ट कर चुका हा। [४] विश्व विजयिनी मधुशाला इसके पश्चात उनका कथन है कि जिसने विकपित हाकर मधु का प्याना पान नहीं लिया, उपका जोवन निरया है । मधुशा ना को व कालानीत कहत हैं । मदिर मस्जिट नष्ट हो जाय, वदे-बडे परिवार और राज्य स्लट जाय पर पीन वाले और मधुशाला नाद नहीं हो सकती। मधुशाला नित्य नवेली है। विश्व विजयिती है । वह स्वग नो मे मोपी वसुधा पर अवतरित हुई है मासारिक दुष्प उसे स्पा तक नही कर सकता वह नित्य प्रति दिन को होली और रात को दीपावली का महोत्सव मनाता है। उनकी इस प्रकार महिमा-गान करन के बाद बच्चन का क्यन है कि परस्पर मिलत समय अब जयराम न रहार 'जय ममाना वे उन्चारण द्वारा अभिवादन क्यिा करो। [५] सर्वात्मवादी हाला बच्चन जी ने विश्वन्यापी विराट स्परा की मृष्टि वरत हुय प्रकृति के कम पण म मधुशाला के दशन भी दिये हैं- ५२/जआधुनिक काय प्रवत्तिया एक पुनमूल्यांकन क्सिी जोर मैं आखें फ दिखलाई देती हाना क्सिी ओर मैं आखे फर्स दिखलाई देता प्याला । विसी आर मैं देख मुझको दिखलाई दती साकी, क्सिी ओर देखू , दिखलाई पहती मुझको मधुशाला । सूय सि धु बलि विटप तग तारक समीरण, उपवन, रमाल, माजरी, मधु ऋतु, अरण ऊपा सध्या, जधकार शशि योगिराज कृष्ण की बशी राग रागिनियाँ झकृत वीणा चित्रकार लोल लहरें मानसरोवर चञ्चल नदियां लहराते खेत आदि सभी उपादानो म उहे मारक हाला प्याला साकी और मधुशाला ही लिखायी देती है। [६] सदा सुहागिन मधुशाला बच्चन जी मदिर मस्जिदादि से मधुशाला को तुलना भा करत हैं और उसे सदा सुहागिन कहते हैं । मन्दिर मस्जिद आदमी आदमी के बीच में बरभाव बताते हैं पर मधुशाला उनम मल कराती है । वे मधुशाला को पावन तपोवन का रूप भी दत हैं । वे हाला के मूल स्रोत भी वदिक न था म खोजते हैं । वेदा मे वह सामरस थी वारुणी थी वह वेद विहित है सदा मे पूज्य रही है। मधुशाला समानता का पाठ पढाती हुई, जनता के मानस को बदलने के लिए सौ सुधारको का काय अकेली ही सम्पन्न करती है । अज्ञ विन रव राव आदि क्सिी म भी वह भेद नहीं करती। इस तरह वह साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है। [७] उ मुक्त भोग उमर खैयाम की तरह वच्चन जी भी क्ल पर विश्वास नहीं करते । वतमान जीवन ही उनके लिये उपभोग्य है । वे लिखत हैं- कर । क्ल पर विश्वास क्यिा क्व करता है पीने वाला, आज हाथ में था वह खोया क्ल का कौन भरोसा है । (पद ६१) खयाम की ही तरह उहाने भी अपनी सुमुख प्रेयसि को सम्बोधन करके यौवन मधुरस की मधुर मादक हाला का अनवरत रूप से पिलाते रहने की कामना की है। - ।
हालावाद | - । भणिक जीवन या दुःख और सम निराशा में व्याप्त माम्राज्य की ओर भी उनकी दृष्टि गई है। जगन म 'आने के साथ ही जान' का क्रम प्रारम्भ हो जाता है, जम लेते ही मनुष्य मरना प्रारम्भ कर देता है। स्वागत के साथ ही विदा की तयारियां होने लगती हैं और जीवन की मधुशाला खुलते ही बद होने लगती है। इस प्रकार तृप्ति की जगह मधुशाला अतप्ति को ज म देती है । युझने की जगह प्यास और तीव्र हो जाती है। [८] भाग्यवाद क्षणवाद बच्चन भाग्यवाद का भी समर्थन करते है ।लाय हाय पाव पटकन पर कुछ होने-जाने का नही क्योकि भाग्य म जो मधुशाला लिखी होगी, वही प्राप्त होगी, अयपा नहीं । वे मानव को मिटटी का प्याला रहते हुये उस क्षीण, क्षुद्र, क्षणभगुर और दुवल कहत हैं जिसवं भीतर कटु मधु जीवन की हाला भरा है । एक पद म उहोंने मधुशाला के अपने प्रतीक को भी स्पष्ट किया है । उनकी मधुशाला वह नहीं है जहाँ मदिरा बची जाता है, प्रत्युत जहा पर मस्ती को भेंट मिला करती है वही पर उनकी मधुशाला है । अर्थात मधुशाला मतवालेपन या मधुरता की सूचा है। जाकी रही भावना जती' के अनुसार वे यह भी कहत हैं कि मधुशाला हाला प्याना और साकी प्रत्यक व्यक्ति की रचि २ जनुरूप अथ और मादकता का सचार करत हैं- जितना ही जा रसिब उसे है उतनी रममय मधुशाला (१२८वा पद) या- जिमी जसी रुचि थी उसने वसी देखो मधुशाला । (१३१वा पर) अन्त म बच्चन जा ने मधुशाला की निर्माण प्रक्रिया का भी समेत दिया है जो विशेष ध्यान देने योग्य है । मधुमाता सहज हा नही निर्मित हुई इसके निर्माण में न जाने कवि क क्तिने अरमान और मन के महल ढह गये हैं । तब कही जाकर इसका यह स्वरूप बना सका है। मधुशाला म आद्यन्त कवि कल्पना का सहारा लेकर उसने स्वरूप का विशद प स आख्यान करता है। उसके बीच-बीच मे उभर खयाम के स्वरो को प्रतिध्वनि है । इसके मूल म कोई गहन दानिक और आध्यात्मिक भूमिका न होकर वैयक्तिक जीवन के करुण अवसाद को भूलन का प्रयास है, जीवन के निरा शामूलक भाग्यपरक, क्षणभगुर और नियतिवादी स्वरूप की अभिव्यजना है। बच्चन जा ने मधुशाला को जहां विश्वव्यापी रूपको म प्रस्तुत किया है, वहा उनकी रसमयता प्रौढ प्रतिभा और मौज मस्ती भरा जीवन दृष्टि का निस्सदेह प्राबल्य है, किन्तु यह उपक्रम जीवन साधना का परिणाम न होकर क्ल्पना प्रवणता का ही कौतुम पूर्ण सेल ८५ आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्यांकन है । यही कारण है कि मुनिश्चित जीवन-दशन के अभाव म यह ख्याली मस्ती बहुत समय तक टिक नही सकी। साग्रह विचारात्मक्ता हम कह चुके हैं कि मधुगाना की अपेक्षा बच्चन जी की मधुवाला और मधु कलश' म अतिरिक्त बौद्धिकता है । साग्रह विचारात्मकता के प्रवश ने इहें पहली कृति के समान रसपशल नही बनन दिया । लोक प्रियता इह भी प्राप्त हुई है और प्रत्येक कृति के दशाधिक सस्करण निकल चुक है कि तु हमारा मतव्य यह है कि जो भावप्रवणता और कल्पनाकुलना मधुशाला' म है, वह इन कृतियो म अपने प्रकृत रूप में नहीं दिखाई देती। द्वितीय बात यह है कि इन दोना मे मधुशाला की विचारधारा प्रतीको उपमानो और रूपको का ही आवतन है । विचारा या भावो का नयापन बहुत ही स्वल्प है । हाना प्याला साकी और मधुशाला क जिन गुणो का उल्लेख बच्चन जी न मधुशाला म किया है उही का किंचित श दो के हेरफर द्वारा कथन इन कृतिया म भी किया गया है। विषय वस्तु और बलात्मक उपकरणा + आवतन के कारण बच्चन जी की परवर्ती कृतिया की लम्बी लम्बी रचनाला म वह सरसता मस्ती और जीवन की उत्फू ल्लता भी नहीं आ सकी है जो मधुशाला की अष्टपदिया मे विद्यमान है । मधुशाला म जहाँ कवि प्रतिभा का स्वाभाविक स्फुरण है समासहीन सहज श दा म जो कल रव और श्रुतिपेशलता है तथा जन साधारण की भाषा की जो जीवनी शक्ति है वह भी परवर्ती काल म विचार बोझिल होकर बहुत कुछ श्रमसाध्य और अलकरण प्रधान हो गई है । भाषा म कलात्मक्ता का प्रवेश तभी होता है जब भावनाओ का प्रवग अपेक्षाकृत कम हाता है । बच्चन जो की लोकप्रियता के मूल में जनरुचि क अनुकूल उनकी विचारधारा के साथ परिष्कृत जनभाषा का भी अपरिमित योग रहा है। मधु शाला' का भाषा उनकी आदश भाषा है जिसके निर्वाह का उन्होन आद्यत प्रयास क्यिा है। मधुबाला म उन १५ लम्बे प्रगीत हैं । मधुवर्षिणी मधुबाला का सौ दय भी कलित कल्पना की रगीनी से निर्मित है- यह स्वप्न विनिर्मित मधुशाला यह स्वप्न रचित मधु का प्याला स्वप्नित तष्णा स्वप्निल हाता स्वप्ना की दुनिया म भूना फिरता मानव भाला भाला। मधुबाला गीपक रचना का य. चिंतन विशिष्ट उपसहार है । यह उसी हालावाद |८५ प्रकार का विचारत्मक मथन है जो पत जी के 'एक्तारा' शीषर प्रगीत के अन्त मे उपल ध होता है । मधुवाला क रूप, गुण सोदय, प्रकृति आदि का उल्लेख करत-करते वे मानव जीवन की स्वप्निलता और निरथक्ता का जाख्यान करने लगत हैं। मालिक मधुशाला भी ससार का पाठ पढ़ाता है-क्टु जीवन म मधुपान करने का, ससार के गेदन म गान करने का और मादकता के सम्मान करन का। रितु यह वैयक्तिकता, ससार निरपेक्ष रिचारधारा क्या जीवन के लिये उपादेय है २ मादकता का सम्मान किया जाय, पर ससार के रोदन म खुशियाँ मनाना और जीवन की घटुता को सपष से पलायन कर मधुपान के द्वारा भुला देना-यह सदश क्या ग्राह्य है ? 'मधुपायी में बच्चन जा अपनी वयक्तिक तुष्टि की ही चरम मत्य मान लेते हैं- कल्पना सुरा ओ साकी है पाने वाला एकाकी है, यह भेद हम जब ज्ञात हुआ क्या और समझना बाकी है ? वे क्षणवाद को भी दान के रूप मे ग्रहण करते हैं और 'मधुशाला के धो पर चढकर, अपने जीवन के क्षण क्षण को मादक्ता से भर लेन का उपदेश देते हैं।' प्पासा' शीर्षक रचना मे उमर खैयाम की कूजा नामा' की विचारधारा ही स्पष्ट है । इसम भी वे वाद-विवाद तर-बितक को छोडकर एबमान आनन्द करने का संदेश देत हैं । 'हाला म हाला को विश्वव्यापी मादकता का अक्न किया गया है। प्यास' में निराला के 'तुम और मैं की तरह हाला और जीवन की प्यास के बीच अद्वत सम्बध दिखलाया गया है । एक दूसरे को परस्पर एक दूसरे की नितान्त आवश्यकता है। प्याम हाना से मिलकर पूणकाम हा जाती है, हाला प्यास से मिलकर साथक हो जाती है- तेरी मुझको आवश्यक्ता आवश्यक्ता तुझको मरी तुझसे मिल पूण चला बनने बस इतना ही मेरा परिचय । 'आत्मपरिचय उनकी एक विशिष्ट रचना है । इसम उन्हाने मात्मपरक शली म अपना परिचय दिया है । इस परिचय म उनका मोज मस्ती भरा वैयक्तिक जीवन दशन व्यक्त हुआ है । व बहत है कि मैं जग-जीवन का भार ढो रहा है फिर भी अपने जीवन स प्यार करता हूँ। म स्नेह-सुरा का पान करता हू और ससार का भी भी ध्यान नहीं करता। मैं ससार र गीत न गाकर अपने मन में गीत गाता हू । मुझे १ मधुबाला, मुराही, पदाक ११ ५६ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याक्न यह जपूण ससार अच्छा नहीं लगता मैं स्वय अपना स्वप्नो का ससार लिए पिर रहा हू। दीवानो के वेश मे, नि शेष रूप से मादरता लिए हुए मैं मन मोजो पर मस्त बहा करता हू । लाख यत्न करने पर भी किसी ने आज तक सत्य को नहीं जान पाया मैं अपन सीखे हुए ज्ञान विनान के बोझ को भुलाना सीप रहा है और ससार को मस्ती का सदेश देता है। (ई) उपसहार 'मधुवाला की उपयुक्त रचनालो की विचारधारा लगभग वही है जो मधु शाला क सागर म स्फुट रूप स सतरित है। मधुक्लश म मा प्रकारान्तर स यही यस्तु है। हां उनकी इस वयक्तिर वासनात्मक विचारधारा के विरुद्ध दिए गये आघातो के उपशमन का प्रयास उसम अतिरिक्त है। बच्चन की य अनुभूतियों और विचारधारायें हिदी पाठको की प्रकृति के विपरीत थी। वे अपरिचित थी और भारतीय काय परम्परा से भी मेल नहीं खाती थी। साथ ही सामाजिक जीवन की दष्टि से वे अस्वस्थ और सविकार थी। इसलिए उनका सर्वाधिक विरोध हुआ भौर उह कवि की निराशा जय प्रतिक्रिया के द्वारा उदभूत कहा गया। कवि ने धार्मिक साम्प्रदायिकता के साथ खुला विद्रोह किया है, मदिर मस्जिद और गिरज परा का द्वप और घणा का प्रचारक कहा है और मदिरालय को साम्यवाद का निक तन, पर क्या मधुशाला वरेण्य है ? इस विद्राह की सामाजिक उपान्यता क्या है ? मस्तानापन जीवन म आवश्यक है पर क्या वह हाना की कल्पना से ही सभव है? मदिरालय की शरण म ही मुवारक होता है ? क्या वयक्तिक तप्ति ही अलम है, सासारिक जावन का मठता निस्व है। यदि इस सारा की सारी विचारधारा को रहस्यवाद की सामग्री मान लिया जाय और मधु और मधुशाला को सूफी कवियो की तरह पधिनी' मान लिया जाय तो भी इसमें रत्नसेन' को साहमिन और साधना पूण यात्रा का अभाव है। मैं नहीं चाहता कि बच्चन जी के मधुगोता पर दशन और रहस्य के आवरण चढाकर उनकी आत्मा का हनन किया जाय। वे लौकिक जीवन की मौज मस्ती स परिपूर्ण सरस सुन्दर और भावना प्रवण गीत हैं उनमे मानवीय भीवन की ताजगी और उत्फुल्लता निहित है। उ हे उनके प्रकृत रूप में ही ग्रहण किया जाय। वे सरस काव्य के उदाहरण हैं ! वाद के कठघर तो का य क स्वच्छद रसपान में बाधक ही होते है । रहस्यवाद की वतु ल परिधि म आकर बच्चन के गीतो की लोकप्रियता नही बढेगा उनकी विचारधारा उमर खयाम की तरह फिर भी निराशा और पलायनवादा ही कही जायगी, वस्तुत उनके मधुगीतो में दाशनिक विचारधारा का महत्व न होकर मानव की प्रकृत भावनाआ तथा मस्ती का आह्लाद है, जो उमर खयाम भी रुबाइयो की तरह कभी कम न होगा। हाला, मधुशाला और ?
हालावाद | ८७ मधुबाला ता बहाना हैं उनकी कल्पना के द्वारा जो मस्ती प्राप्त होती है वह मान वीय जीवन की सक्रियता के लिए सुख दुप, राग विराग, घणा द्वेष, आशा निराशा, सफनता असफ्नता आदि के द्वद म अचल, अप्रभावित रहने के लिए अतीव आवश्यक है। यह विधायक वस्तु उनके गीता म विद्यमान है और लोग उनका मधुपान कर अपने जीवन की क्टुता का रचन र स्वस्थ और निर्विवार हो जाते हैं। बच्चन के गीतों की यही साथकता है। उनके गीत जीवन मदेश और आगे बरत रहने के लिए महान कवियो की भाति उन्बोधन नहीं देते वरन् सम विपम परिस्थितिया म मस्त रहने का जाग्रह करते हैं। कवि जीवन से यक्कर भागा नही है उसकी पूर्णता को उसने अपने स्वप्ना की माता के द्वारा भरने की चष्टा की है और इसी चेष्टा में उनके निराश उदास जीवन म मस्ती का एक नया ससार ही वस गया है। प्रसाद जी के जीवन म भी एक मारक मस्ती थी, बनारसी रग था, जिसने उन्हें आन दवादी और समरस बनाया। यही मस्ती निगला और नवीन के परखड जीवन में भी थी, पर इनमे से किसी ने भी हाला का गुण गान नहीं किया, ऐकातिम तृष्णा और स्वप्निल मादकता के क्षणवादी गीत नही गाये । उनका काव्य उनके कममय जीवन की क्रियायें श्री प्रतिक्रियायें नहा । वन्चन जी ने स्वप्नित मधु व द्वारा अपने जीवन के रिक्त पान को भर कर उसका प्रशस्ति गान दिया है। जायसी की नागमती सूर की राधा, मीरा और महादेवी की तरह बच्चन ने अपनी परमशक्ति हाना और कवत्य धाम मधुशाला के वियोग में आखो से गगा नही वहाई, अथुआ की अजलि नही चटाई । मधु मधुबाला और मधुशाला के साथ उनका रागात्मम सम्बध न होकर कल्पनाकुल और बुद्धि विशिष्ट सम्बध है। उह केवल मस्ती से काय है जो असाधित है। पर यह मस्ती क्या ? सिनिए ? उत्तर है मस्ती के लिए मस्ती। यह दशन भी वक्तिकता स ग्रस्त है। जो मस्ती निष्प्रयोजन है वह पिस काम की ? यदि वहा जाय कि सांसारिक जीवन की विषमता को भूलने के लिए? तो यह एक पलाय नवादी जीवन-दशन है क्योकि मादकता की मस्ती में मस्त हो जान पर भी ससार की विषमता दूर नहीं होने की ? पत जी ने बच्चन की इस मदिरा प्रभूत मस्ती की बहुत प्रशसा की है और कहा है कि यह अमत सजीवनी है जिसे मत्यु भी पान कर जीवित हो उठती है यह मस्ती जीवन चत य की मस्ती है वह शिव सौ दय तथा आनद की प्रतीक है वह जीवन के जात्मिक उल्लास से प्रसूत है, वह अलौकिक शक्ति का रूपान्तरण है। वह राग के पीछे छिपा चीत्कार कह देगा किसी दिन । हैं लिये मधुगीन मैंने हा खडे जीवन समर में। १ ८८ | आधुनिक का य प्रवत्तिया एक पुनमू ल्याक्न बच्चन के आरम्भिक का य मे वासना का उदगार न होकर साधना का उदगार है। आप बच्चन जी के हालावादी या मधुवादी काय का उसी धरातन पर चत य का य भी कहते हैं। बच्चन तथा पत जो वे अत्य त मुहृद सम्बध रहे हैं और निश्चित हा पत जी यहाँ तटस्थता से काम न लेकर पूर्वाग्रहा से प्रभावित हैं। बच्चन जी की इस क्षणिक या अल्प स्थायी मस्ती को हम कभी भी पत जी की अतश्चेतनावादी रचनाआ की तुलना म नही रख सक्त, क्योकि चेतानाकाव्य के लिए जो दाशनिक-सास्कृतिक धरातल की अपेक्षा होती है, वह काल्पनिक नही हो सकता, यक्तिनिष्ठता' तथा एकान्तिक्ता' की विशेषतायें भी इस दिशा मे बाधक होती हैं, जो बच्चन जी मधु पर्वी गीतो की आधार शिलायें हैं।
४ -- | प्रगतिवाद 7 [अ] 'प्रगतिवाद और 'प्रगतिशील' शब्द - "प्रगतिवादी उपयुक्त दोनों शब्दो को पर्याय-स्प में ग्रहण करते हैं वितु इस सदभ में प्रश्न हो सकता है कि क्या प्रगतिगामिता के तत्त्व वेचल प्रगतिवाद मे ही निहित हैं ? या विश्व के अय साहित्यिक वादो मै भी हैं ? अथवा प्रगतिवाद मे उनका प्रक्ष है और इतरवादो मे विरलता ? साहित्य समाज की क्रिया-प्रतिक्रियाओं की मखरित वाणी है । परिवतनशीलता समाज का सहज और शाश्वत धम है इसलिए हर देशवाल विशेष मे सामाजिक, राजनीतिक मानसिक आदि पष्ठभूमियो के अनुरूप साहित्य भी बदलता रहा है या कहे प्रगतिशील रहा है । यह कोई जड या निर्जीव वस्तु नही जो अचल हो, प्रगतिहीन हो, उसकी चिरतनता और शाश्वतता समय, का साथ देने मे निहित है । इस दष्टि से कौन सा साहित्य प्रगतिशील नही है ? जब सब कुछ गतिशील है तब उसे 'वाद' की सीमा मे जकडकर जड़ बना देना, उसके साथ अयाम करना है । 'वाद एक देश-काल विशेष और समाज की सन स्थिति के प्रक्ष को घोषित करता है वह अपनी सीमाओ मे बदी रहता है पर साहित्य परिस्थितिया के अनुरूप अपनी वादी-कंचुली त्यागकर तय साचे में ढल जाता है। यह दूसरी बात है कि साचे की रूपाति के निर्माण मो स्वदेशी वातावरण या विदेशी विचारधारायें अथवा दोना ही सक्रिय हो । पर पूणत उत्खात करके कोई भी वस्तु एकाएक अपरिचित परम्पराहीन और अनुवर स्थान म नही लगाई जा सकती। यहाँ हम रेखना यह है कि प्रगतिवाद की प्रगतिवादिता क्या है और क्या वह स्वदेशी वस्तु है या विदेशा से आयात की गई है ? Vछायावाद को पोड स हिन्दी में जो नया साहित्यिक आदोलन उठा, वह प्रगतिशील होते हुए भा एक सम्प्रदाय विशेष को वादात्मक सीमा में आवद्ध है । यहाँ शील और 'वाद का विवाद है । प्रगति दोनो म है पर एर की प्रगति 'शीलता' से युक्त है और दूसर की उससे विरहित । शील' स हीन हो पर प्रगति वाद का रूप धारण कर गई है और एक विशष जीवन-सदेश को इप्ट मानकर अग्रसर हुई है पर मानवीय जीवन की प्रगतिशीलता योडे ही समय में उस जीवन-दशन ६०/माधुनिक साय प्रवृत्तियां एक पुनमू ल्याक्न अतिरेक कर गई और प्रगतिवाद हिदी-माहित्य मे इतिहास बनकर रह गया । यह एक विचारात्मक प्रवेग था जो तत्कालीन परिस्थितिया से आत्रात होर वात्याचक्र की भाति उठा और हालावाद को तरह चार-पाच वर्षों में ही अपने प्रक्ष पर पहुचकर समाप्त हो गया । पर हालावाद म जहा जीवन के प्रति पलाया, निराशा, मौज मस्ती आदि का जीवन-दशन था वहां प्रगतिवाद जीवन की धमठता का वध निनाद है । सघर्ष की पु जीभूत वाणी है नयी आशा-आकाक्षाओ का राग है, पाति की ज्वाला है पूजीवाद के द्वारा शोपित प्राणियो के प्रति महानुभूति प्रदर्शित करने वाला भौतिकवाद है । प्रगति पा तात्पय यहां पर केवल गोपित वग की प्रगति से है । मानवीय जीवन की सर्वागीण प्रगनिशालता इस वैचारिक दशन म नहीं मिलेगी। भारतीय आध्यात्मिक प्रगति, काप घम और माक्ष म सवधित जीवन या उन्नयन प्रगतिवादियो का उद्देश्य नही अब उनका प्रस्थान बिदु है । अथ का समान वितरण और समाज से विषमता का अपमारण उमा मलथ्य है । प्रगतिवाद को पारलौ विव उन्नति से कुछ भी मन नब नही वह एक विशुद्ध लौविक और सामाजिक जीवन दशन से सम्बधित एक राजनीति र विचार-धारा है । प्रगतिवाद और प्रगतिशील के इस अतर को भूलकर अनेक प्रगतिवादी अपने को प्रगतिशाल ही कहते हैं । 'शिराना और पत जी की कुछ रचनाओ को भी प्रगतिवाद की मीमा में परिगणित किया जाता है । इसम सदेह नही वि कुकुरमुत्ता में निराला जो की प्रगतिशीलता व्यक्त है और युगात', युगवाणी और ग्राम्या में पत जी ने उस युग की प्रगतिवादी वाणी को प्रस्तुत किया है पर य पवि प्रगतिवादी वचारिक्ता पो प्रस्तुत करते हुए भी अपनी दष्टि अथ पर केद्रित नही करते । भौतिक उन्नति को ही जीवन का सवस्त्र नहीं मानते । य भारत की आध्यात्मिक और दाशनिक परम्परा से अनुबधित कवि हैं । भौतिक उन्नति की अपेक्षा ये मानसिक और आत्मिक उन्नति पर--विशेष बल देते हैं । यही कारण है कि प्रगतिवाद का श्रीगणेश करके भी पत जी माक्मवाटी विचारधारा का समवय गाधी जी की सत्य-अहिंसामयी आध्यात्मिक विचारधारा से करत हैं और जब इस काय में कृतकृत्य नहीं होते तो अरवि द--शन की जोर मुड जाते हैं। निराला जी प्रगतिवादिया पर भी कठोर यग्य करत है । उनका कुकुरमुत्ता' शापिता का प्रतीक है और गुलाब पूजीपतिया का पर इस कृति का, व्यग्यात्मक सदेश यही है कि मानवीय जीवन-दशन और समाज का उभ्युदय न तो पूजीपतिया के, द्वारा सभव है और न कुकुरमुत्ता की सस्कृति के द्वारा हम इन दोना से ऊपर उठना होगा । जपन चतुथ याम म निराला जी भी यह प्रगतिवादी दष्टि छोड़कर प्राथापरख जाध्यात्मिक गीतो की सजना करते हैं। इस प्रकार निराला और पत जी पूणत प्रगतिवादी नही है व प्रगतिशाल कवि है। प्रमचद जी भी प्रगतिवादी ा हाकर प्रगतिशील लेखक हैं। केवल शोपित प्रगतिवाद/६१ मंग का ही वे पक्ष न लेकर मानवता के उन्नयन की बात करते हैं। इस तरह निराला और पन्त की तरह उनका भा समस्त साहित्य मानवतावाद की उदात्त भूमिका पर थाधन है। प्रगतिवादी लेखप और अवि भी मानवतावार की सरगम बजाते हैं पर उनकी मानवता का अर्थ है पूजीपतियो के द्वारा उत्पीडित जनो के प्रति मानवीय सहानुभूति से युक्त भावना का ज्ञापन या बौद्धिक स्तर पर समानानुभूति । इस तरह इन श दो म एक सूक्ष्म तर विद्यमान है जिस पर हमें ध्यान रखना आवश्यक होगा । यद्यपि इस अतर को डा. नामवर सिंह देवल बौद्धिक विलाम कहते हैं और इसे निरथर बतात हैं । क्सिी का कम या अधिक प्रगतिवादी या प्रगतिशील बहना भी आपको पसद नही और प्रगतिशील साहित्य को आप 'अग्रेजी' प्रोग्रेसिव लिटरेचर' का हिती अनुवाद क्हत हैं । 'प्रोग्रसिव लिटरचर' म प्रगतिवादी साहित्य के ही तार स्वर हैं । उहोने लिखा है कि यह विरोध प्रच्छन्न विरोध-भावना से किया जा रहा है किन्तु प्रगतिवादी ह'ने के लिए उस जावन–दशन मे पूण निष्ठा तो आवश्यक है । यदि उसका अभाव हो या अति न्याप्ति हो तो भी क्या हम उहे प्रगतिवादी ह ? ऐसा कहना उनके साथ याय न होगा अतएव यह अतर लेकर चलना ही श्रेयष्कर होगा। प्रगतिवाद की प्रेरणा भूमियां [क] युग-चेतना प्रगतिवाद को माक्स्वाद से प्रभावित एक विदशी वस्तु भी कहा जाता है । पर हम कह चुके हैं कि जब तक हमारे अ त करण और वातावरण म युग-चेतना की सबटनशीलता न हो नो हम बाहर के प्रभावो को ग्रहण ही नहीं कर सकते । छायावाद के भी पूर्व, पश्चिम म माक्सवाद का प्रभाव फल चुका था। १६१७-१८ भे रूस म जनक्रान्ति हो चुका थी और अमिक वग के हाथो म दश की बागडार आ गई थी। उस समय भारत में प्रगतिवाद क्यो न पदा हमारे इसका सीधा उत्तर यही है कि उस समय हमारे दश का मानस उन प्रभावा का ग्रहण करने के लिए सक्षम नहीं था। उस समय नेश म ब परिस्थितिया ही नहीं थी जिनम प्रगतिवादी तत्त्वों का उदभव और उन्नयन हो पाता । हमार देश में इस शना दी के आरम्भ से हो औद्योगिक प्रगति प्रारम्भ हुई है । प्रथम दो दशको तक यह प्रगति बहुत ही कम थो अतएव शोषक-शापितो की समस्या बहुत स्वल्प था धीर धीरे औद्यागिक प्रगति वीव हुई और समाज मे अग्रजी साम्राज्यवाद और भारतीय सामतबाद के साथ- साप पू जीवाद और व्यक्तिवाद का तीव्रता से विकास हुआ। यत्तिवाद वी वय क्तिकता, छायावादी काव्य मे आत्मनिष्ठा के रूप म अभिव्यजित हुयो है। इस समय देश अपनी स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए संघप-कर रहा था। स्वतन्त्रता प्राप्ति का तात्पर्य था साम्राज्यवाद और सामतवाद से मुक्ति । १६२८ ९२ / आधुनिा काय प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याकन । अवस्था पूंजीवाद ने अपना विकराल रूप नहीं दिखाया था अतएव इस समय तक समाज में सभी वग-पूजीपति और रक, स्त्री पुरुष मिलकर स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील थे कि तु १६२८ २ नासपास पूजीपतिया ने अपने-कल-कारखानो-मे थामिक मजदूरी का शोषण तीव्रता से प्रारम्भ क्यिा फ्लत मजदूरो ने सगठित होकर पूंजीपतियो के विरद्ध आदोलन प्रारम्भ किये । अपनी आवश्यक्ताओ और सुविधाओ की माग की उनकी पूर्ति न होने पर हडतालें की। इस समय तक भारतीय समाज शोषक और शोपित इन दो इवाइया मे वट गया था । समाज का मानस इस ममय ऐसी सवेदनामय से गुजर रहा था जबकि उनपर वाह्य साम्यवादी (कम्युनिस्टिक) विचारधारा अपना प्रभाव सहज ही छोड़ सकती थी। जत इस समय १९२७ ई० में सब प्रथम भारत मे कम्युनिष्ट दल की भी स्थापना हुई। [ख] राजनीतिक स्थितियाँ अखिल भारतीय कानस का दष्टिकोण भी १९३५ ई. तक आते आते विशुद्ध राजनीतिक न रहब र जार्थिक प्रशा स परिवद्रित हो गया था। १६५६ में लखनऊ में भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के अध्यक्षीय अभिभाषण मे प० नेहरू ने कांग्रेस की नवीन नीतियो पर विस्तार से प्रकाश डाला था और नसके बाद से काग्रेस सस्था शोपित किसान मजदूरो का पक्ष ग्रहण करके समाजवाद की ओर अग्रसर हुई। इसके पूर्व ही १६३४ म काग्रेस सोसनिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी जिसन समाजवाद को अपना लक्ष्य बनाया था। भारत-र-सव प्रथम प्रगतिवादी विचारधारा का प्रभाव बगाम प्रकाशित होने वाले प्रगति' नामक पन पर दिखाई दता है । इसके सम्पादक थे बुद्धदेव वसु और अजितदत्त जो ढाका से इसको प्रकाशित करते थे । १६३४ ई० में लगभग कम्युनिस्ट पार्टी को गर सरकारी ठहराया गया और उसे भग करने के आदेश हुये वितु इसके सदस्य परोक्ष रूप से लगातार अपन सिद्धा तो का प्रचार करत रहे । देवली कम्प जेल म सरकार ने राजनीतिक चेतना वाले आतकदादिया को हत्याओ और नशस कार्यों के माग से हटाने के लिए मावस तथा तेनिन का साहित्य पढने के लिये दिया। इस काय ने कम्युनिस्ट विचारधारा वे प्रसार म परोक्ष रूप से विशेष योग दिया। [ग] प्रगतिशील लेखक संघ १६३५ मे लदन के गावरस्टीट के ननकिंग रस्तोरा म अतरराष्ट्रीय संस्था 'प्रगतिशील लेखक सघ' की एक शाखा की स्थापना हुई। इसमें मुल्कराज आनन्द और सज्जाद जहीर भी सम्मिलित हुये थे। इस संस्था का उद्घाटन समाराह मान्स के प्रसिद्ध उपयासकार ई० फारेस्टर की अध्यक्षता में सम्पध हुमा था । इसी वर्ष पेरिस में भी ई. फारेस्टर की अध्यक्षता में 'प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन नामक प्रगतिवाद | ६३ भन्तरराष्ट्रीय सस्था का प्रथम अधिवेशन हुआ था। भारत मे मुल्कराज आनद और सज्जाद जहीर के ही प्रयत्नो से एक शाखा खुली जिसके प्रथम अधिवेशन का नेतत्व प्रेमचद्र जी ने किया और द्वितीय का महपि क्वीद्र रवीद्र ने भारत मे इसका प्रथम अधिवेशन लखनऊ मे १९३६ मे हुआ था। अपने अध्यक्षीय भाषण मे प्रेमचाद,जी ने यह दढतापूर्वक उदघोषित किया था कि आज लेखको के समक्ष जन साधारण के सामाजिक और यार्थिव अभ्युदय का लक्ष्य होना ही चाहिए । उ होने रात्साहित्य के लक्षण निरूपण करते हुए कहा कि 'हमारो कसौटी पर वही साहित्य परा उतरेगा जिसमें उच्च चितन हो स्वाधीनता या भाव हो, सौदय का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयो का प्रकाश हो जो सबमे गति, सघप और बेचनी पैदा करे सुलाये नही क्योकि और अधिक सोना मत्यु का लक्षण है।" इस अवतरण ' म प्रेमचन्द्र जी ने प्रगतिशील साहित्य के मूल उपकरणों की व्याख्या कर दी है । इस अभिभाषण में आपने यह भी कहा था कि नीतिशास्त्र और साहित्यशास्त्र का लक्ष्य एक है-पेवल उपदेश विधि म अन्तर है। मुझे यह कहने म हिचक नहीं कि मैं और चीजो की तरह साहित्य को भी उपयोगिता की तुता पर तौलता हूँ। फूलो को देख- कर हम इसलिये आन द होता है कि उनसे फ्ला की आशा होती है ।" इस अश मे प्रेमचन्द्र जी साहित्य या कला को विशुद्ध सौ दय की वस्तु न मानघर उसे एक उप योगी कला के रूप म ग्रहण करते हैं किन्तु उनके अनुमार प्रत्येक लेखक स्वाभाविक रूप से प्रगतिशील होता है अतएव 'प्रगतिशीन लेखक सघ' इस नामकरण म प्रगति शील शम् निरथक है। आराम मे प्रगतिशील लेखक सघ को रवीद्रनाथ और शरच्चन्द्र जस लेपको का भी आशीर्वाद मिलता रहा है । इसका तात्कालिक उद्देश्य तेजी के साथ विश्व म फैलने वाली पासिस्टवादी विचारधाराका विरोध करना रहा है किंतु बाद मे माक्स चादी दर्शन से पूणत दीक्षित होकर यह प्रगतिवाद के नाम से हिदी म अवतरित हुआ। माक्र्सवादी सिद्धान्तो का उल्लख प्रेमचद ने अपने अध्यक्षीय भाषण म नहीं किया था । यहाँ तक कि उ होने प्रगतिशील शत पर आपत्ति की थी जिसकी चर्चा की जा चुकी है। इसके विपरीत डा० शिवदान सिंह चौहान ने मार्च १९३७ वे विशाल भारत' में भारत म प्रगतिशील साहित्य की आवश्यक्ता शीपर एक लेख लिया और आर्थिक परिस्थितिया और वग-सघष के बीच साहित्य को रखकर उसकी परीक्षा करने का प्रयास किया। इस निव ध म मावसंवाद वग-सघष और भौतिकवाद की विस्तत चर्चा की गई है और समसामयिव माहित्य को पूजीवाद की हासो मुखी प्रवृत्तियों का प्रतिपलन बहा गया है। उन्होंने लेखक वर्ग से यह आग्रह भी किया कि के वर्तमान साहित्य से ऊपर उठकर वगवादी साहित्य की सजना करें।
१४ । आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एव पुनमूल्यांकन -है कि 'हमारा साहित्यिक नाग कला क्ला के लिय नहीं, वरन पला ससार को बदलने के लिये है। इस नारे को वुलट परना प्रत्येक प्रगतिशील साहित्यिक का पज है।" -[घ] प्रगतिशील पन-पनिकाय -/ प्रगतिवादी माहित्य की प्रथम झलक हमे जुलाई १९३८ मे प्रकाशित होने वाले 'स्पाभ' मासिक पत्रिका मे मिलती है। इसक' सपादन यो सुमित्रान दन पन्त तथा नरद्र शर्मा ने किया था । यह कालाकार से प्रकाशित होती थी। इसके प्रथम अब ये सम्पादकीय मे पन जी ने प्रगतिवादी साहित्य को उदघोषणा की । मापने लिखा कि 'इस युग की वास्तविक्ता ने जसा उग्र आकार ग्रहण कर लिया है उससे प्राचीन विश्वासो में प्रतिष्ठित हमारे भाव और कल्पना के मूल मिल गये है । श्रदा अवकाश मे पलने वाली सस्कृति का वातावरण आदोलित हो उठा है और काव्य की स्वप्न जडित आत्मा जीवन की कठोर आवश्यक्ता क उस नग्न रूप से सहम गई है अतएव इस युग की कविता स्वप्नो में नहीं पल सक्ती । उसकी जडो को अपनी पोषण सामग्री धारण करने के लिये कठोर धरती का आश्रय लेना पड रहा है।' (स्पाम जुलाई १९३८ वष १ अक ११) प्रगतिशाल साहित्य के विकास में रूपाभ' का महत्वपूर्ण योग रहा है। किन्तु यह पत्रिका दो वर्षों तक प्रकाशित हुइ और इसके बाद बद हो गई। १९३८ के अत म पत जी की युगवाणी प्रकाशित हुई जिस प्रगतिवादी साहित्य की प्रथम सशक्त धाणी कहा गया। इसम प त जी के गद्यगीत हैं । इन रच नाओ ने तमा रूपाभ म प्रकाशित प्रगतिवादी वविताजो ने जन मानस को आकृष्ट किया और इस प्रकार व्यापक स्तर पर प्रगतिवादी रचनायें लिखी जाने लगी। इसी समय उच्छ खन' शीपक एक अरपजीवी पत्रिका का भी प्रकाशन हुआ जिसपर प्रगति वाद के साथ अन्तश्चेतनावाद का प्रभाव था। १६४१ मे डा. शिवदान सिंह चौहान काशी से प्रकाशित होने वाले था प्रेमच द्र जो के मासिक पन हस के सम्पादक हुये तब से इसम भी व्यवस्थित रूप स प्रगतिवादा दणन की विस्तत याख्यायें और तदिन पयक रचनायें प्रकाशित होने लगी । इसो समय हिन्दी साहित्य के पूना अधिवशन के अध्यक्षीय पद स वक्त य देत हुये भाचाय न ददुलारे वाजपेयी जा ने प्रगतिशील माहित्य श्री आवश्यक्ता, महत्ता आदि का जोरदार शब्दो म समथन किया था कि तु बाद मे जब प्रगतिशीलता वादवद्ध हुई तो आपने उसकी निदा भी की [s] साम्यवादी प्रचार प्रसार १९३८ से द्विताय विश्वयुद्ध प्रारम्भ हो गया था जिसका प्रभाव विश्व भर के लेखक बग पर पड़ा । इसी समय के आस पास सर स्टफ्ड त्रिप्स भारत आये और प्रगतिपाद| उनकी इस यागा पश्चात कम्युनिष्ट पार्टी पुन वैधानिक घोषित पर दी गई त साम्यवादियों को मरने सिसालों के प्रचार का मुक्त अवसर मिल गया | १३४३ १० में बगार पा अपार पहा जिसम बात यनमाओं के पश्चास एगमग ५० लाय पत्तियों की जान गई । इस भीषण पटना में प्रभावित होर सम्पूण भारत में साहिरिपर जन पीहा के लिये महती सवेदना पारने सनर मानस मे पाल के इस बाल वो दुरपस्या और मूत्र कारणों-बग्रेनों भी पाय और गोषणपून नीति को ममाप्त करने की अन्य भागमायें आपत हुई। इन परिस्थितिया ने भी तारा मीन साहित्य में परियनन पर उसे प्रगतिशील पनिया । [च] क्षणिक प्रसार डा. राम अवध विदेगी रे अनुसार हि साहित्य म समाजवादी या प्रगति धोल विचारा ये बदने वा एर आतिहार विश्वविद्यालयों में दाग होने याना शिधर प्रसार मा है । Tय युयर विश्वविधारय म नई विचार धारामा स परिचित और प्रभावित हुय । मावर्गवाद साप ये पाप माविश्लपण तथा प्रतीमवानी विचार धाराओं से मा अपन वाध्य म प्रथम दन सगे। प्रगतिवारी मधो पर मारा तथा मेनिन पी विचार धारा का सर्वाधिष प्रभाय पहा है । रितु इसी समम् १६४३ ६० म प्रयोगदाद मा जम हो गया जो. पाश्चारय प्रतीयवादियो-यलन, मला घेतरी, रिस्के ईयटा, इलियः सामह आदि का विचारधारा से प्रभावित रहा है। आरम्भ में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद साय-साप विकसित होत रहे हैं पर परवर्ती पाल मे प्रयोगवाद ने प्रगतिवाद को दवा दिया। इस भूमिया का आशय यह है कि हिंदी साहित्य में प्रतिवाद का उद्भव और विकास सहसा हो नहीं हुया, परन यह युग की पुकार पी । उस युग की परिस्थितियों में देयत प्रगतशील और प्रगतिवादी साहित्य ही पनप सकता या और पनपा भी और जय रामाज तथा देश की परिस्थितियो में परिवतन हुआ, प्रगतिवाद वो छोडवर माहित्य प्रयोगवाद रूप में हमारे सामन धाया। [आ] माक्र्सवाद प्रगतिवाद वो सम्यक ढग से समझन पे लिये हम उस पर सर्याधिक प्रभाव डालन वाले भावमवाद का स्वाप जानना आवश्यक है । इम सम्बघ म डा. रागय राघव का कथन है कि महान नखत प्राप ही अपन भीतर प्रगति तत्व धारण परता है। प्रगति जन कल्याण है, क्तिनी अधिव, वितना कम इसका निर्धारण, प्रगतिशीलता के मानदण्ड पर सकते हैं । प्रगति समार म सदव रहा है जीवन में भी, साहित्य मे मी, वितु अब हम जिस प्रगतिशीलता रहते हैं वह सामाजिब तक - क - १६ / आधुनिक काम्य प्रवृत्तियां एक पुनमूल्यांकन विश्लेषण आधार पर स्थित है और उसी के आधार पर हम किसी माविको तत्कालीन राजनीति में सापेक्ष रूप से रखकर उसकी आलोचना करते हैं। इस नयी भावना का जन्म कार्ल माक्स से हुआ, जिसने वग-सघप की वज्ञानिक जानकारी प्रस्तुत की । माक्स, ऍगिल्स, लेनिन स्टालिन तथा माओत्सेतु ग ने साहित्य पर अपने-अपने विचार प्रकट किए हैं। उनकी विवेचना का आधार दद्वात्मक भौतिवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद की क्सौटी रहा है। -(प्रगतिशील साहित्य के मानदण्ड ।) यह उद्धरण हमो यहां सप्रयोजन अवतरित किया है। डा० रागेय राघव एक प्रति ष्ठित प्रगतिवादी समीक्षक हैं। उहाने अपने इस पथन म स्वय उन प्रभावो का उल्लेख कर दिया है जो प्रगतिवाद पर पड हैं अतएव इम सम्बध मे किसी विवाद को विशेष गुजाइश नही रह जाती। माक्म के दशा का आधार दद्वात्मक भौतिकवाद है। डायलेक्टोक्ल एक पुराना गम है । यूनान में यह दशन शास्त्र की एक ऐसी गली थी जिसमे दो विरोधी दल तक-वितक और पण्डन मण्डा द्वारा अपने अपने पक्ष का समथन करते थे। किन्तु आधुनिक युग म हागल न इस श’ को नये अर्थ में प्रयुक्त किया है । वह उसे दूद्ववादी विकासात्मक प्रक्रिया के रूप म प्रस्तुत मरता है। उसकी दष्टि से विकास के लिए परस्पर विरोधी तत्त्वा का मिलन अताव आवश्यक है। इसे वह स्थापन, प्रतिस्थापन और समन्वय (थीसिस ऐदी थीसिस और सिनथसिस) बना है ।--यथा-कोई वस्तु 'म है तो उसका विरोधी ब उत्पन्न होगा। विकास के लिए इनमे परस्पर द्वन्द्व-या सघप होगा, जिसके फलस्वरूप उनका समन्वय 'म म होगा। यहां अ' स्थापना, 'ब' प्रतिस्थापना और स समवय कहा जायगा। इसके बाद फिर स' का विरोधी ड' का उदभव होगा दोनो का दद होगा और सम वय होगा किसी तीसरी वस्तु मे। इस प्रकार समार म दद्वात्मक पद्धति से विकास का क्रम चलता है। बाल माक्स अपने प्रारम्भिक काल में हीगल की इस द्वाद्वात्मक प्रक्रिया से प्रभा वित रहे हैं कि तु हीगल का दशन परम भाव का दशन है जिसे वह ब्रह्मा, विश्वात्मा या निरपेक्ष प्रत्यय आदि कई नामो से अभिहित करता है। माक्म को इस निरपेक्ष ब्रह्म की सत्ता पर कोई आस्था नहीं थी। वह पूणन भौनिकतावादी था अतएव उसुन होगल की दद्वात्मक प्रक्रिया को तो ग्रहण किया पर उसके चरम प्रत्यय का विरोध करके भौतिर पदावों में ही अपनी निष्ठा नापित की। अथवा यो क्हें कि उसने मूल तत्त्व क्सिी परमाच्च सत्ता को न मानकर पाय को ही सर्वाच्च माना Nमाक्स के अनुसार पदाथ गतिही। न होकर सहजत गतियुक्त है। उस सचालित करन के लिए किसी बाह्य सत्ता या निरपेक्ष ब्रह्म की आवश्यस्ता नहीं है। इस मा यता के द्वारा माक्स का दशन हीगल का प्रतिरूप हा गया है। इस वपरीत्य को ही लक्ष्य करके यह कहा गया है कि हीगल अपन सिर के बल खडा था पर माक्स ने उसे जमीन पर खडा प्रगतिवार / ९. कर दिया। माक्स न हीगल के दशन को जमीन पर जरूर खडा क्यिा विन्तु हम यह दखना हागा कि माक्म की यह जमीन क्या है ? क्या वह इतनी दढ है जहाँ निश्चित तापूर्वक खडा रहा जा सके ? इस तथ्य पर हम बाद में विचार करेंगे। हीगल के परम भाव ( एवमूल्यूट आइडिया ) का खण्डन मावस के पूर्व एक अप जमन दाशनिक फायरचाख ( १८०४-७२) ने किया था और भौतिकवाद की स्थापना की थी। उसरा क्थन था दि वस्तु के बिना उसका ज्ञान या बोध शक्य नही अतएव सबसे पहले पदाथ की उपस्थिति आवश्यक है तत्पश्चात उसके ज्ञान की। इसी सिद्धान्त के आधार पर उसने यह प्रतिपादित किया कि ससार के विकास म पहला स्थान पदाथ का है। मनुष्य समाज भी उसी पदाथ के द्वारा विकसित एक शृखला है। पायरबाख के अनुसार मानवीय समाज पदार्थों के वातावरण का परि णाम है पर मावस कहते हैं कि मनुष्य में उस परिवेश को बदलने की भी शक्ति है। फायरवाख प्रकृतिवार का समथक है कि तु भाक्स का कहना है कि मनुष्य की चेतना का निरूपण केवल ऐतिहासिक और आर्थिक परिस्थितिया को ध्यान में रखकर ही दिया जा सकता है। हीगल और फापरबाख दोना इस प्रकार के दाशनिक हैं जो अपने दशन में वग सघष का काई उल्लेख नहीं करते। यह काय सबसे पहले एक अग्रेज चिन्तक चाल्स हाल ने किया है । उसके अनुमार मनुष्य की सभ्यता और मस्कृति में अभ्युदय के साथ ही सम्पत्ति शोपन और शोपित वर्गों की उम्भावना हुई। इही कारण वग-सघप की भावना भी उत्पन्न हुई। उसकी दष्टि मे पूंजीपति, शासकादि अपनी स्वाय की भावनाआ की पूर्ति के लिए युद्वादि करते रहे हैं स्वाथ और प्रभुत्व कामना के कारण ही अधिकार और अधिकारी के भेद उत्पन्न हुए हैं। उसका यह भी कहना है कि यदि आज गरीवो शोपितो के हाथ में शासन के सूत्र सौंप दिए जायें तो समाज और देशो के बीच होने वाले युद्ध बद हो जायें और वर्ग सघष भी समाप्त हो जाय । जनरल्याण और मानवीयता की रक्षा के लिए वग सघप का नष्ट करना आज एक परमावश्यक काय भी है। माक्म ने अपनी साम्यवादी विचारधारा की प्रेरणा रूप म उपयुक्त हीगल, फायरवाख और हाल को ही प्रमश द्वन्द्वात्मक पद्धति, भौतिकवाद और वग सघप की विचारधारामा को ग्रहण किया है। उहोने सृष्टि के विकास म निहित ऋणात्मक और धनात्मक दो प्रकार के विरोधी तत्वों की सत्ता मानी है। इनके सघष का नाम ही उस अनुमार जीवन है। इन विरोधी पदार्थों के दद से चतना उत्पन्न होती है। जो जीवन का आधेय है। हम कह चुके हैं कि माक्स पदाथ को ही सर्वोच्च वस्तु मानता है। उससे इतर वस्तु या निरपेक्ष ब्रह्म की सत्ता का खण्डन करता है। उसके ९८/ आधुनिक काम्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्यापन अनुसार चेतना दो विराधी पदार्थों के द्वद्ध का प्रतिफ्लन है। इस कारण हा उस दर्शन को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद कहा जाता है। जिम प्रकार माक्स मसार वा मूल तत्त्व पाय ( मटर ) मानत हैं उसी प्रकार समाज व्यवस्था का मूलाधार वे आयिक यवस्था कहत हैं। उनके अनुसार जीवन के लिए आवश्यर वस्तुआ की उ पाचन शक्ति के विकाम के अनुरूप समाज में भ्यक्तियों का पारस्परिक सम्बध स्थापित होता है। उपाटन व सगठन आधार पर ही समाज का सम्पूर्ण जाषिक दाँचा तयार होता है जिस पर मनुष्य की समस्त कार्य प्रणालियां राजाति धमनीति और साहित्य जाधित हैं । इस विचार-प्रणाली में अनुमार मारमवाटी इतिगस की अथमूलर व्याख्या करते हैं। माक्स के अनुसार समाज में आजाल विषमता का कारण अब का असमान रूप से वितरण और जीवन की आवश्या वस्तुआ के उपान पर कुछ पूंजीपनियो का स्वामित्व है। समाज का यही सगटन दुःख क्लप और विषमता का जनक है । इसने समाज को दो भागो म विभक्त कर दिया है-गोपा और नापित। इन दाना में वग-सघप प्रारम्भ है। यह वग सघप तभी शा त हागा जबकि समाज म आथिक व्यवस्था मामाजिक ढग की हो । यह तभी सम्भव है जबपि पू जावाद को समाप्त बरके घमिका किसानो के हाथो म उ पाटन शक्तिया कल कारखान आय और उह उनके श्रम का यथोचित लाभ और मूल्य मिले। यह काय फेवन प्राप्ति के माध्यम से ही सम्भव है। यह प्राप्ति भी तभी प्रारम्भ होगी जब वग मघष अपने चरम रूप को पहुंचे और यह काय तभी हागा जब समाज म वग चेतना का ज गति का काय जोरो से किया जाय । इस प्रकार पूजीवाट और शापका का विरोध शोषिता के प्रति सहानु भूति, उनकी गुण गाथा वग मघष की भावना प्राति की बुल र आवाज आदि का नारा लगाना माक्मवाद के प्रमुख सूत्र वन और इह इसी रूप म साहि य में भी अव तरित किया जाने लगा। हम कह चुके हैं कि यह एक भौतिकवादी जावन दशन है । उस अनुयायियो के लिए भौतिक जगत ही एक मात्र स य है । आध्यात्मिक विकास ईश्वर की सत्ता उपासना आदि पर इ हे वाई आस्था नहा । भौतिक जीवन का उपभाग ही इह इष्ट है। किसी स्वप्निल सुख या काल्पनिक नाक में सुख और आदर्शों की प्राप्ति के लिए भटकना ये शिरथक और पलायन की प्रक्रिया समझते हैं। अथ इनके लिए प्रस्थान और गत य दोनो हैं। वह समाज की सब विषमताओ का जनक है अतएव उसके समान वितरण पर नियन्त्रण रखना इनका राजनीतिक नारा है। इस प्रकार माक्स ने विशुद्ध भौतिक ससार की विषमताओं से परिपूण जमीन पर खह होकर उसकी विसतियो में सामरस्य लाने के लिए मानव-मानव के बीच का अतर पाटकर वग प्रगतिवाद । ९९ T - हान समाज की स्थापना करने के लिए अपनी विचार धारा को प्रस्तुत किया। मार्क्स के पूर्व सकहो दाशनिक हा गये हैं पर क्मिी ने इतनो शक्ति के साथ समाज की विषमता का मूल कारण जथ के अममान वितरण को नहीं बताया और न उसे अप सारण करन की ऐसी क्सिा विधि का ही उल्लख किया। मावस के समान किसी दाशनिक ने अपने दाशनिक मिद्धात की पुष्टि समाज के ऐतिहामि विकास के सदम मे भी प्रस्तुत नही को। ऐतिहासिक भौतिकवाद माक्स के अनुसार मनुष्य अपनी आदिम अवस्था मे साम्यवादी ही था। उस समय वह क्वीलो या झुण्दा म रहना था और भोजन-शिकारादि की तलास मे एक साथ यहाँ वहाँ घूमा करता था। इस समय क्सिी की कोई -यक्तिगत मपत्ति नहीं थी। जो वस्तुयें इनके पास थीं उन पर सबका समान अधिकार था। धीरे-धीरे भबीलो ३ जीवन मे स्थायित्व आया और व खेती का काम करने लगे। खेतो पर शन शनै “यक्ति विशेष का अधिकार माना जान लगा। यह अधिकार भावना कुछ समय के पश्चात व्यक्ति व्यक्ति और क्वीनो पीता के बीच सघष का कारण बनी जिसका अन्त परस्पर युद्धो म हुना। युद्धो मे पराजित व्यक्ति 'दास के रूप में रखे गये और उनसे खेतों तथा अन्य गह कार्यों को लिया जाने लगा। पहले ये दास भी सामाजिक सम्पत्ति माने जाते थे पर बाद में ये भी व्यक्तिगत हा गय। क्वीला मे सशक्त व्यक्ति मुखिया होता था। धीर धीर बलिष्ठ व्यक्ति अय क्वीलो पर अपन अधिकार क्षेत्र को व्यापक परके उनका नेता बनने लग जो बाद में राजा के रूप म हमार सामने आये और इस प्रकार कई कबीलो को मिलाकर राज्य बन । राज्यो के बाल साम्राज्य बने। इसके विस्तार के लिए भी निरतर युद्ध हात रहे और इस प्रकार आदिम अवस्था का साम्यवादी समाज दो भागो मे-शामक और शासित में विभक्त हो गया। अनेक शताब्दियो तक यही यवस्था चलती रही । राजा के पास धन सग्रह होता गया। धीरे धोरे धनी यक्ति व्यापार और उद्योग की ओर अग्रसर हुए। इस वाय से उनके पास और धन एक्व हुआ और शासक वर्ग में व्यापारियो का यश और प्रभूत्व बढा। व्या पार के द्वारा और अधिक पतियो का शाषण किया जाने लगा और कम से कम मजदूरी देर श्रमिको से अधिक से अधिक काम लिया जान लगा। इस प्रकार जो निधन पे थे और अधिक निधन हुए और जो अमीर ये उनके पास और अधिक धन संग्रह हो गया । अय के अमम न वितरण न अन समस्याओ को जम दिया। धीरे धीरे धनी घनी और राय राज्य के बीच सघष प्रारम्भ हुए। धनी से और अधिक धनी होन की हाड मे सरडा युद्ध हुए। अ यायो और भ्रष्टाचारो का प्रवर्तन हुआ। कहने सुनने के लिए तो लोगो ने 'दास प्रथा' समाप्त कर दी पर वह बन्द न होकर २०० । आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनर्मूयाक्न प्रन्छन रूप से और अधिक बढ़ गई। माक्स की दष्टि से समाज के अतस्तल मे निहित यह विषमता एक मात्र अथ के असमान वितरण से प्रारम्भ हुई और उसके सुधार के लिए अब एक मान्न वगवादी विचारधारा का प्रचार तथा प्राति ही आवश्यक है। इस प्रकार पूजीवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप माक्सवाद का जन्म हुआ। पूंजीवाद के विष से विश्व का समस्त श्रमिक वग अभिभूत था । अतएव योडे ही समय मे माक्र्स की उपयुक्त विचारधारा का प्रभाव विश्व भर में फल गया । १९१० में रूसी साम्यवादियो ने जारशाही के सिंहासन को उलटकर के साम्यवादी पणतत्र की स्थापना की । पूर्वी योरोप के अधिकाश देशा में भी धीरे धीरे साम्यवादी राज्य स्थापित हुए। कहा जा चुका है कि अनुकूल परिस्थितियो के अनुरूप भारत में भी १९२७ मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई जो रूस के सकेतो पर अपना कार्य परती थी। समाजवाद और कम्युनिज्म कम्युनिस्ट श- कम्युनिज्म से मम्बधित है। यह माक्स के पहले से प्रचलित या पर एक विशिष्ट राजनीतिक सस्था का स्वरूप दते हुए १८४७ म माक्स तथा ऐंजिल्स ने कम्युनिस्ट लीग' की स्थापना की थी। १८४८ में इसका मेनिफेस्टो प्रका हुआ था जिसमें ऐंजिल्म का क्यन था कि कम्युनिज्म सवहारा वग (प्रोलेटेरिएट) की मुक्ति का माग बतलाने वाला सिद्धा त है। एमाइक्लोपीडिया विटानिका म कम्युनिज्म शट की जो ध्याख्या की गई है वह इस प्रकार है कम्युनिज्म समाजवाद (सोसलिज्म) के ही अतगत एक विशिष्ट आदोलन है जिसका लक्ष्य भी वही है उत्पादन के साधनों पर से व्यक्तिगत स्वामित्व हटाकर एकाधिपत्य का उमूलन । कम्युनिज्म री अपनी विशेषता इस बात म है कि इसके अनुसार इस उद्देश्य की पूर्ति का पर मान साधन क्राति है । समाजवाद क्रान्ति को ऐतिहासिक और सामाजिक मवरोधो को दूर करने के लिए अन्तिम उपाय के रूप में अस्वीकार नही करता पर कम्युनिज्म काति को अनिवाय समझता और खुले आतक पर आधारित सवहारा वग की तानाशाही को ही समाजवादी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का साधन मानता है।" इस अवतरण में समाजवाद तथा कम्युनिज्म का पार्थक्य भी स्पष्ट हो जाता है। इसी संदर्भ में हम यह भी देख लें कि माक्म और ऐंजिल्स न अपन आपको समाजवादी न कहकर कम्युनिस्ट क्यो रहा है ? इसका स्पष्टीकरण मेनोफस्टो के संस्करण में किया है जिसे देखन पर हम सहज हा मह जान लेंगे कि आरम्भ से ही कम्युनिस्ट लोग को क्या रीति-नीनि रही है । ऐंजिल्म ने लिखा है कि सन १८४७ में समाजवादी माधारणत एक ओर तो बाल्पनिक व्यवस्थाआ(यूरोपियन सिस्टमस) 1 हिदी काम्य में प्रगतिवाद पृ. २६ स उद्धृत ।
प्रगतिवाद १०१ से चिपके रहने वाले व्यक्ति समझे जाते थे और दूसरी ओर सुधारक जो पूजी मुनाफे को कोई खतरा पहुचाये बिना तरह-तरह से सभी सामाजिक अयायो को दूर ५ करने की बात कहत थे। ये दोना सरह के लोग श्रमिक वर्ग के आदोलन से दूर रहते वाले और सहायता के लिए शिक्षित वग का मुह जोहन वाले थे। इनके विपरीत श्रमिक वग का जो भी अश देवल राजनीतिक क्रातियो की निस्सारता से भली भांति अवगत हो गया था और जिसने आमूल सामाजिक परिवतन की आवश्यक्ता घोषित की वह अपने को कम्युनिस्ट कहने लगे । हमारा विचार आरम्भ से यह था कि श्रमिक वग के उद्धार का काय निश्चित रूप स स्वय श्रमिक वग का ही होना चाहिए अत इन दोनो म से हम कोन सा नाम ग्रहण करें, इस विषय मे हमारे लिए कोई असम जस नहीं रहा । प्रगतिवाद और फ्रायडवाद प्रगतिवाद पर जो बाह्य प्रभाव पडे उनमे कम्युनिज्म के अतिरिक्त ईषत मावा म मायड के अतश्चेतनावाद का भी नाम लिया जाता है। हिदी मे यशपाल अज्ञय, जनेद्र, इलाचन्द्र जोशी आदि ने यह तथ्य स्वीकार किया है। यशपाल तो हिन्दी के सुप्रसिद्ध माक्सवादी लेखक हैं । 'माक्सवाद' शीप अपनी कृति मे आपने एवं स्थल पर लिखा है कि 'स्त्री पुरुष और विवाह के सम्बध मे माक्स बाद समाज के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के विचार से पूण स्वतनता देता है परन्तु उच्छ खलता और गडबड या भाग को पशा बना लेन को और उसके साथ अपनी वासना के लिए दूसरे व्यक्तियो और समाज की जीवन यवस्था में अड़चन डालने को यह भयकर अपराध समझता है । आपने इस कथन का समथन लेनिन के पन्ने द्वारा किया है कि तु जो लेनिन के वास्तविर शद हैं उन्हें विकृत करके ही उद्धत पिया गया है और एक तरह से अन्तश्चतनावाद तथा माक्सवाद का आवश्यक सम्बघ निरूपित किया गया है। सत्य इसके विपरीत है। यशपाल जी ने धागे लिखा है कि स्त्री पुरुष के सम्बध म माक्मवाद का रुख लेनिन की एक बात से स्पष्ट हो जाता है । लनिन ने कहा पा कि स्त्री-पुरुष का सम्बध शरीर की दूसरी आवश्यक्ताओ भूख, प्यास, नीद की तरह ही आवश्यक है। इसमें मनुष्य को स्वतनता होनी चाहिए परन्तु प्यास लगने पर शहर की गदी नाली में मुह डालकर पानी पीना नहीं है। उचित है स्वन्ध गिलास से स्वच्छ से स्वच्छ जल पाना।" स्वच्छ गिलास के इस सिद्धान्त द्वारा तप्ति की बात का खण्डन डा. राम विलास शर्मा न वडी ही मममता पूवर क्यिा है । उहोंने व पक्तियां भी उद्धत की हैं जहा इस प्रकार की चर्चा की गई है । लेनिन का क्यन है वि यौन जीवन म साधा रण पुदरत का ही कमाल नहीं करना होता बलि सास्कृतिक विशेषताओ पर भी विचार किया जाता है विच या नीच स्तर की हैं। निस्सदेह प्यास बुमानी १. हिन्दो काम्प म प्रगतिवाद, पृ. २६-२७ से उन्त ।
१०२ । आधुनिक काय प्रवत्तियो एक पुनमूयाक्न - 810 शर्मा चाहिए लेकिन उसका सामाजिक पहलू सबसे महत्वपूर्ण है। पानी पीना बशक किसी का निजा काम है लेकिन प्रेम म दो जिन्दगियों का सम्बध होता है और एक तीमरी नयी जिन्दगी पदा होती है । इससे उसम सामाजिकता का सवाल उठना है जिससे समाज के प्रति इत्तय्य पदा होता है।' यह भी लिदत है कि 'एक कम्यनिस्ट की हैसियत से मुझे पानी के गिलास की थ्योरी से जरा भी हमदर्दी नहीं है, हालाकि उस पर 'प्रेम की तप्ति' का सुदर लेविल लगा हुआ है । कुछ भी हो प्रेम की यह मुक्ति न तो नयी है न कम्युनिस्टिक है। ( प्रगतिशीन साहित्य की समस्यायें।) लेनिन आप कम्युनि म के संस्थापकों म स एक वरिष्ठ विद्वान और निष्ठावान हैं अतएव इस सम्बध में हम आपरे उपयुक्त क्थन के आधार पर ही माक्सवाद के साय यौन भावनाओ का सम्बध सामाजिस्ता के निवप पर देखना होगा। प्रेम की सप्ति' ही स्त्री पुरुष के समागम द्वारा अलम नही प्रस्युत यह एक समाज से सम्बर्वा धन वस्तु है वह भावात्मा नही वौद्धिव जगत की वस्तु है। स्वच्छत रूप से 'पानी पीने का सिद्धात समाज विराधी और गर माक्मवादी है। इसी तथ्य का उदघाटन डा. रामविलास शर्मा ने अपनी 'प्रगतिशील साहित्य को समस्यायें शीपक पुस्तक म विस्तार के साथ किया है । डा० शर्मा प्रगतिवाद के अधिकारी विवचा और समीक्षक है अतएव उनका क्थन भी इस सदभ में देख लेना अप्रासागिक न होगा । उनके अनुसार प्रगतिशील साहित्य नारी की स्वाधीनता का पक्षपाती है। वह सम्पत्ति जाति और धम के विचार से दिए हुए विवाहा को वदी पर देश के युवक युवतिया के प्रेम को बलि देने का कड़ा विरोधी है। वह उनके प्रेम परन के अधिकार और जीवन म एक साथ रहने और सघप करने के अधिकार का समथन करता है । जब तक प्रेम नै अतिरिक्त विवाह के लिए जाति घम सम्प्रदाय, सम्पत्ति आदि की शते रहगी, तब तक समाज में यभिचार, वैश्यावत्ति आदि व्याधिया भी रहगी । लेकिन य याधियां शुद्ध ग्लास से शुद्ध जल पीने की थ्योरी से दूर नही हो सकती। यह माक्सवाद के विपरीत सामती पू जीवादी नतिकता पा प्रतिपादन होगा। इस प्रकार शमा जी ने प्रेम विवाह, शुद्ध ग्लास से शुद्ध जल पीने आदि की वस्तु को भी आर्थिक भूमिका पर रखकर देखा है । ये फ्रायडवाद के अनुसार मनुष्य की अतृप्त तप्ति स सबंधित वयक्तिक वस्तुयें नही हैं । जब तक पूंजीवाद सामतवाद रहेगा, तब तक समाज से व्यभिचार, वश्यावत्ति बादि की याधियां समाप्त नहीं होने की और इस प्रकार नारी और पुरुष के सम्बध म याप्त अधिकार और अधिकारी की यह विषमता समाप्त नही हा सक्ती । पुरुष ने समान नारी को भी प्रकृति के सारे वरदान मिले हैं। वह भी मानवी है । समाज मे जीवन क सारे कार्यो म समान रूप प्रगतिवाद | १०३ में भाग लेन का उस पूर्ण अधिकार मिलना पाहिय पुरुष उस वधन म रम, घम, सम्प्रदाय, जाति या अर्थ का आधार बनाकर उसके साथ दुव्यवहार न करे । इसीलिय प्रगतिवादी श्रमिक के साथ-साथ नारी वग को स्वतन्त्रता वा मा उदघोप तीव्रता साथ करते हैं । नारी सातत्य सम्बधी विचारधारा या प्रतिपादन पत जी ने अपनी प्रगतिशील रचनाओम प्रमुपता साप दिया है। इस प्रकार माश्मवाद जनवादी विचारधारा का प्रवता है, प्रायडवाद वयक्तिर माम भावनाओं की संतप्ति तक सीमित एक व्यक्तिवादी विचारधारा है। विषय की स्पष्टता के लिय इस अन्तर का हम विचित विस्तार से दसना हागा। मायमवाद के समान मायडवाद भी भौतिकवादी विचारधारा है । जिस प्रकार मारगवादम आसार पदाप (मेटर) एकमय सत्य है, उसी प्रकार फायडवाट अनुसार काम भावना (लिविडो) मानव जगत की पेद्रीय वस्तु है। पदाथ ही जिस प्रकार सपप द्वारा चेतन बनकर गतिशील हाता है तदवर घाम भावना या यौन भावनायें ही मानवीय जीवन का सचालन करती हैं। ये यौन भावनायें य यातये हैं, जि में व्यक्ति अपन सासारिक जीवन में धर्म जाति मम्प्रदाय आदि द य व पारण तृप्त नहीं कर पाता और ये प्रथियों रूप म उसके अवचेतन में समाविष्ट हो जाती है। इस प्रकार यौनवाद अन्नश्येतनाबाट पर भाधारित है जिसम कुण्ठामा तस्तिया वा अतिरव है पितु गावसवाद व्यक्ति से नही समाज वे अयदय जन बरयाण की भावना से मम्ब धित वस्तु है। इस यदि हम चानावाद कहता प्रायडवाद का अयचतनावाद वह सक्त है । मारवाद का रग म च विशात मानव ममूह तथा उसम याप्त विषमताओ का अपसारण करना है । यौनवाट यति व मानम म ध्यान पालो की सप्ति से सम्बधित है । अनप्त बासनालो की तप्ति जिसका प्रमुख काय है । इसम व्यक्ति के जीवन में व्याप्त अ नद डा को मिटाने का भी प्रयास नहा प्रत्युत उराकी क्ला, कृतित्व आनि त म व्याप्त कुण्ठाना वा दखन रामझने और उना स्पष्टीकरण करने का वाय निहित है । प्रगतिवाद जहां प्राचीन कला और मरति व अभ्युदय सूचक वस्तुआ का पूजीवाद तथा मामानवाद का प्रनिमान कह करव' उह नष्ट भ्रष्ट करने की बात करता है वहाँ यौनवाद के अनुमार समस्त बलायें और सास्कृतिक अभ्युदय के उपादानी म कलाकारो और समाज की तप्त काम वासनानो का प्रच्छन्न प्रकाशन हुआ है । फायडवाद के अनुसार व्यक्ति स्वप्न के द्वारा भी अपनी अतप्त पुण्ठाओं को तप्त करता है । वाध्य कला और अ य सनित व लायें भी उसकी अतृप्त कुठाना का मुम्वरित वाणी है। फ्रायडवार के अनमार व्यक्ति अपनी अवचेतन मन म दमित काम भावनाओ की प्रक्रिया स्वरूप हो, उह विरेचन करन के हतु .... क्लाओ का सहारा लेता है। यह प्रतिक्रिया माक्मवाद म भी है वहा पर पूजीयाट और साम तवाद को प्रतिक्रियास्वरुप अग्रसर होते हैं और उहु.
१०४ । आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याक्न के लिए वगवादी चतना का प्रसार करत हैं । इस प्रकार प्रतिक्रियायें दोनो म हैं किन्तु फ्रायडवाद में जहां वेवल विश्लेषण है वहां प्रगतिवाद म विश्लपण से आगे चलकर नये समाज की रूपरेखा का साकारता प्रदान करने के भी प्रयास हैं । प्रायड वाद एक अभावात्मक विचारधारा है वितु माक्सवाद विधायक । प्रथम के समक्ष जन कल्याण की कोई भी भावना नही है पर दूसरा जन कल्याण को अपना लक्ष्य बनाकर चलता है । फ्रायडवाद दमित काम वासनालो की चर्चा से आरम्भ होता है और उनका विश्लेपण करके समाप्त होता है, हर काय के पीछे उसे एक मान दमित कुण्ठाय ही दिखाई देती हैं और एक प्रकार स वह दमित कुण्ठावाद बन जाता है। हिंदी म अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी जनद्र आदि इसे अपनाकर चले हैं और प्रयोगवाद तथा नयी कविता की यह एक मूल चेतना रही है किन्तु यह वस्तु माक्सवाद के सिद्धान्त के विरुद्ध है अतएव प्रगतिवादी साहित्य में यह सिद्धान्तत न आवरके केवल यथा थवादी शैली के रूप मे दिखाई देता है । कुछ कविया तथा लेखको ने स्त्रियो क मासल सौदय को नग्न रूप म चित्रित किया है पर यह काय प्रगतिवादी निष्ठा को ज्ञापित न फरक रवि या कलाकार की अतप्त कुण्ठा को ही यक्त करता है । प्रगतिवादी काय में इस तरह अश्लीलता वस्तुगत स्प म न आकर यथाथवादी शैली के रूप में प्रवेश पा सका है। माक्सवाद और वात्स्कीयाद माक्सवादी साहित्य पर नात्स्कीवाद का भी प्रभाव माना गया है। वात्स्की रूस के एक सुप्रसिद्ध साहित्यिक नता हैं । अनय और यशपाल ने उनकी अनेक स्थानो पर प्रशमा की है । ये दोनो वात्स्की से बहुत दूर तक प्रभावित भी हैं किन्तु वात्स्कीवाद एक वामपक्षीवाद है । उसकी वस्तु योजना पूणत प्रतिक्रियावादी होत हुए भी उसम माक्सवाद के मौलिक उपादानो का विरोध और अभाव है। माक्सवादी क्राति को अपना अन्तिम शस्त्र समझते हैं पितु वात्स्की को क्रान्ति पर विश्वास नहीं था अतएव उसका साहित्य पाठको के हृदय में जाति की कोई भावना प्रज्ज्वलित नही करता । वह वग-चेतना की उत्पत्ति मे सह्योग भी नहीं देता । डा० रामविलास शर्मा जी ने वात्स्कीवाद का वामपक्षी भाषा मे शेखचिली के स्वप्न कहा है। इस विषय को स्पष्ट करत हुये और प्रगतिवादी निष्ठा की दढता का उघोपिन करत हुय उन्होंने आग लिखा है कि 'जो लेखा पूजावादी यवस्था से लोहा लेने लगे हैं और शोषण व्यापार खत्म करके समाजवाद लाना चाहते हैं अगर दे साहित्य की तरफ अराजनतिक्ता और सिद्धान्त हीन दष्टिकोण अपनाते हैं, यानी अपनो कला पर राज नीतिक सिद्धान्तो का अकुश नही मानते ता वे शुद्ध प्रतिक्रियावादी की हिमायत नहीं करते तो और क्या करते हैं प्रगतिवाद /१०५ 7 रूसी माक्सवादी साहित्य हिनी प्रगतिवाद पर मावस की विचारधारा के अतिक्त रूसी माक्सवादी साहित्य का भी प्रभाव पड़ा है जनएव स प मे उमदी चर्चा करना यहाँ आवश्यक है । इम चर्चा से यह भी स्पष्ट हो जायगा नि विदेशी माक्सवादी साहित्य को क्या विशेषतायें रही हैं और हि टा प्रगतिवार उमम क्या समता विषमता रखता है। स्मी शान्ति के पूर्व रूम म दो प्रकार के कवि थ-भविष्यदवादी और बिम्ब वानी। (फ्यूचरिस्ट और मजिस्ट) । इनमे स विम्बबादी तो अपने यक्तिवैचिन्यवाद कारण अल्पावी रह । प्राप्ति के पश्चात भविध्यद वादी कविया को भी कोई आवश्यकता नहीं रह गई, क्यारि अब काव्य माहित्य म सुनियापित्त रूप स मावमवाली विचारधारा को प्रस्तुत किया जा लगा था । सत्तारुढ पार्टी के द्वारा लेखको तथा कवियों स यह आग्रह किया गया fr वे पार्टी के सिद्धाता का प्रचार कर राज्य की योजनानो को सफल बनायें । अर्थात साहित्य को प्रचारात्मक रूप में प्रथय दिया गया । एक रूसी कवि वेजी में सी न वहा है कि पहले मैं मा सवानी हू और फिर और कुछ। I carry my membership card not in my pocket but in myself ---Bezymensky मामाको स्वो टस बल एक मुप्रसिद्ध कवि हैं। उनकी एक बविता का हट माशन न अग्रजी मे अनुवाद किया है जिसका कुछ अश हम यहां ले रहे हैं- 1 Hurl myself into communism From the heights of Poetry above because without it for me There is no love I am a Soviet Factory manufacturing happiness अर्थात मैं वाच्य का उदात्त भूमिका से कम्युनिभ के वाच कूद पडा हूँ क्योरि उसके अतिरिक्त मुझे अयन प्रेम-भावना नहीं प्राप्त हाती । मैं सोवियत क लिप सुख उत्सादन करने वाला कारखाना है। मायास्त्री समान इस युग 4 सभी कवि का य वा उच्च घरानत योग्यर यम्युनिज्म को राजनीतिक विचारधारा को अपनाकर उसका प्रचार-प्रसार अपनी रचनाआव माध्यम से करन लगये।
१०१ / आधुनिक काव्य प्रवत्तिया एक पुनमूल्यांकन इसका फन यह हुआ कि सोवियत देश का साहित्य अ य वस्तुआ वे समान योजनाबद्ध हो गया और उसका विकास स्वतन्त्र ढग स न हाकर कृत्रिमता के साथ प्रचारात्मक और उपयोगी वला के रूप म हुआ। इस विषय में ग्लेब स्टूव का निम्न क्थन प्रमा णाथ प्रस्तुत किया जा रहा है- Literature in Soviet Russia like everything else is planned It is artificially reared and looked after it cannot develop free and untraminelled -Soviet Russian Literaturey By Gleb Struvr यहा यदि काडवल की चचा न की गई ता यह वक्त य अधूरा रह जायगा। काडवेल ऐस प्रथम साहित्यिक समीक्षक है जि होने माक्मवादी समीक्षा पद्धति को जम देकर साहित्य का नया मापदण्ड निधारित किया। आप अग्रज थे। वास्तविक नाम Sprigg था। आप स्पन के गहयुद्ध में १६३७ म मारे गये। अपने इल्यूजन एण्ड रिमलटी नामक ग्रथ में जापने एतिहासिक भौतिकवाद का आधार ग्रहण कर काय के उदभव और विकास का समीक्षा के है तथा उसका आधार बौद्धिक राष्टीय, जातीय आदि न मानकर आर्थिक माना है- Poetry is regarded then not as something racial national genetic or pecific in its essense but as something economic -----Illusion and Reality P7 काडवेल यह भी कहत ह कि यह समय की माग है कि कलाकार को क्ला क्षेत्र मे शोषितो का नेता हाना चाहिए- It is a demand that you an artist become a proletarian leader in the field of art -Illusion and Reality (इ) हिन्दी का प्रतिवादी साहित्य इस प्रकार हिदी म जब प्रगतिवाद का आ दोलन प्रारम्भ हुआ उस समय तक पाश्तात्य जगत म 7 देवर काय म वरन समीक्षात्मक मापदण्ड , रूप में भी माक्सवाद का समावेश हो चुका था। हिदी के तरुण प्रगतिवादी लेखको ने उहे पढा और उनसे प्रेरणायें ग्रहण पर अपनी काय रचनायें प्रस्तुत की । म कह चुके है कि इस समय देश की परिस्थितियां प्रगतिवादी विचारधारा के विकास के अनुकून थी, अतएव हिटी में प्रगतिवाद के नाम स एक विशाल जादोलन हा चल पड़ा। इस समय न केवल काव्य वरन साहित्य की सभी विधाो म मावसवादी विचारधारा का समावेश हुआ।
प्रगतिवादे / १०७ युग के प्रगतिवादा विषा म नागाजुन, रागेय राघव, भगवतीचरण वर्मा, दिनकर, त्रिलोचनशास्त्री, राम विलास शर्मा, शिवमगल सिंह सुमन', भारत भूपण अग्रवाल शमशेर बहादुर सिंह, केदार नाथ अग्रवाल, नरेद्र शर्मा आदि के नाम विशेष प्रसिद्ध हैं। प्रगतिवादी कथाकारो म राहुल सात्यायन, निराला, रागेय राघव, यश पान कृष्ण चटर अमत लान नागर, नागाजुन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। समीक्षक और निवधकारो म दा० रामविलाम शर्मा, यशपात शिवदान सिंह चौहान, प्रकाश चन्द्र चपली मिह डा० नामवर सिंह आदि के नाम जनगण्य है। ववियो की सूची म मैंने श्री पत और निराला का नाम नही जोडा है। हम कह चुके हैं कि पत जी प्रगतिवाली कवियो के पुरोधा रहे हैं। इसी प्रकार निराला जी न भा इस जाति यन में अपना महत्वपूण अध्य दान दिया है। किन्तु समसामयिक प्रगतिवादी धारा के य छायावादी कवि प्रातिपथिक रहे हैं, उसके अनुकूल इन्होने अपने को ढाला पर अपनी निष्ठाआ और मूल दाशनिक चेतना का नहीं बदल सके अतएव प्रगतिवादी गान गाकर भी य उसस कुछ विशिष्ट हैं। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का द्योतन कराने के लिए प्रगतिवादी शद छोटा पडता है । म कवि माक्स वाद को आर्थिक भूमिका पर न खड होकर-भारतीय आध्यात्मिक चतुफलो की भूमिकाओ पर खड हैं अथ उनके लिए सवस्व नही जीवन का एक हिस्सा है अय के आगे चलकर के ये मानवीय धम, काम और मोक्ष तक की लम्बी यात्राएँ भी करते हैं जबकि प्रगतिवादी अय की सीमा से बाहर निकलना गुनाह मानत है क्याकि ऐसा माक्म का कहना है। उनका कहना आप्त वाक्य है। पार्टी के सिद्धान्त-वाक्यो को यथावत न मानना या क्ला पर राजनीतिक सिद्धान्तो पा अकुश स्वीकार न करना शुद्ध प्रतिक्रियावाद है माक्सवाद के प्रति विद्राह है जो मावसवादियो को सह्य नहीं। पत जी अपनी रचनामा म माक्मवाद या ऐतिहासिक भौतिकवाद को प्रश्रय देत हैं और माक्म का भी गुणगान करते हैं- धय माक्स चिर तमच्छन्न पथ्वी के उदय शिखर पर तुम जिनन के ज्ञान चक्षु से प्रस्ट हुए प्रलयकर ॥ कितु बाद में वे स्वय भौतिकवाद या माक्सवाद के साथ भारतीय साध्यात्मि क्ता के समावेश करने का प्रयत्न करत हैं। इस सम्बध म आपका ही क्थन है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद और भारतीय दशन मे मुषे विसी प्रकार का विरोध नहीं जान पड़ा क्योकि मैंने दोनो का लाकोत्तर कल्याणकारी पक्ष ही ग्रहण किया है। मार्क्सवाद के अदर श्रम-जावियो के संगठन वग-सघप रखने वाले बाह्य दृश्य को जिसका वास्तविक निणय आर्थिक और राजनीतिक पातियां ही कर सकती है, मैंने १०८ / माधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनर्मूल्याक्न अपनी कल्पना का अग नहीं बनने दिया है।' इस दष्टि स हम पत जी को अद्ध मावम वादी ही कह सकते है। उ हाने माक्सवाद का केवल विधायक पक्ष ही ग्रहण किया है उसके विध्वसक पक्ष के वे समय और गहीता नही रह है। पतनी भी यन तन्त्र क्रानि की चर्चा करते हैं और प्रतीक-रूप म पावा कणा की वष्टि की आदामा करते है फिर भी उनकी जाति का अय पूजीवाद और साम तवार को ही केवल नष्ट भ्रष्ट करना नहीं है। उनकी प्राति समाजवादी ममाज या गाँधी दशा में रामराज्य की स्थापना से सम्बंधित है। निराला का बादल राग भी क्राति का विप्लवकारी राग है किन्तु उहें भी प्रगतिवादी नहीं कहा जा सकता। व्यग्य और हास्य स सम्बधित उनकी अनद रच नाये हैं जो कुकुरमुत्ता' बला और नये पत्ते मे सकलित है। इन रचनाओ म उन्होने पत जी की ग्राम्या की ही भाति श्रमिक-मजदूर वग के प्रति सहानुभूति, पूजीपतियो की नशमता ग्राम्य जीवन का चित्रण आदि से सम्बधित वस्तुओं को अपना प्रतिपाद्य बनाया है कि तु इनकी य रचनायें युगवाणी की तरह प्रगतिवादी नही हैं। इनम प्रगति-चेतना हाम्य यग्य का अग बनकर शरी रूप में अवतरित हुई है। विषय-वस्तु राजनीतिक प्रचारात्मक और सिद्धा तनिष्ठ न होकर का यात्मक सवेदना से युक्त मानवीय एव सास्कृतिक है। काय की उदात्त भूमिका स ये दोना ही महाकवि अपनी आँखे मूदकर माघार। स्की की भाति कम्यूनिज्म के क्षत्र में कूदे नहीं हैं वरन इन्होन युग को वाणी का साथ दते हुए भी अपनी परम्परा और कवि- ध्यक्तित्व की पूरी पूरी रक्षा की है। ये प्रगतिवादी हाकर भी उसकी सीमा से अपर हैं। कुकुरमुत्ता मे तो निराला जी प्रयोगवादी और प्रगतिशील लेखको पर करारा व्यग्य भी करते है। वे पिपत है- कही का रोडा कही का (लिया) पत्थर टी० एम० एलीयट ने जसे दे मारा परने वाला ने जिगर पर हाथ रखकर कहा कसा लिख दिया ससार सारा देखने के लिए आंखें दबाकर जसे सध्या को विमी ने देखा तारा जस प्रोग्रसीव की लेखनी लेत नही रोरे रुकता जोश का पारा। प्रगतिवादी काव्य की विशेषतायें [१] माक्सवाद का साहित्यिक सस्करण प्रमुखत प्रगतिवादी काव्य, माक्सवाद की राजनीति विचारधारा का साहि प्रगतिवाद / १०६ त्यिक संस्करण है कि तु कवि राजनीति की एक विचारधारा से सना अनुबधित नही रहते, ऐसा होना उनके व्यक्तिल और स्वतन्त्र चि तन की पराजय होगी अतएव हिंदी में प्रगतिवाद के नाम से पई प्रभार की रचनायें हमारे सामने जाती हैं। सुविधा की दष्टि स इहें हम चार प्रमुख भागो में विभक्त करके देख सकते है- प्रथम वे रचनायें हैं जो राष्ट्रीय स्वत ब्रता से सम्बंधित हात हुए सामाजिक विषमताओ को चित्रित करती हैं। इस श्रेणा म हिनार का नाम हम ले सक्त हैं। आपकी रचनाओ म राष्ट प्रेम के उद्गार, स्वत नता की पुकार, अतीत गौरव और वतमान युग की दुरवस्था का चित्रण, देश की स्वत जता तथा विषमता को मिटा देने आह्वान भोर उदबोधन राष्ट्र नायको को प्रशस्तिया तथा गरीबा श्रमिको, मजदूरो की विप्तावस्था और सेठा-साहूकारो की निममता का नाय्यान क्यिा गया है। द्वितीय प्रकार की व रचनायें हैं जो माक्स के एतिहासिक भौतिकवाद का तो ममथन करती है वितु उनम कम्युनिस्ट पार्टी के बन्धनो को पूणत स्वीकार नहीं किया गया है । पत जी इसी श्रेणी के प्रगतिवादी कवि है। ततीय प्रकार की वे ग्चनाएँ है जो न तो माक्स के सिद्धातो का अनुवत्तन करती हैं और न पार्टी के अनुबधो का निवाह किन्तु यथाथवादी शली अपनाकर श्रमिक या सवहारा वग के प्रति सहानुभूति प्रक्ट की हैं। द्वितीय प्रकार की रचनामा म जहा माक्सवादी विचारधारा का बधन ईषत मात्रा में है और वस्तु सम्बधी उपकरण प्रचुर मात्रा में हैं वहा इन रचनाओ मे बौद्धिकता का अश तिरोहित हो गया है । वस्तु सम्मधा य उपकरण प्रथम प्रकार की रचनाआ म भी मिलते हैं किन्तु वहाँ राष्ट्रीय स्वातन्य भावना अतिरिक्त रूप मे विद्यमान है जिसका इन ततीय और नितीय प्रकार की रचनाओ म लगभग अभाव है। इस श्रेणी में निराला जी के प्रगति शील प्रगीतो का रखा जायगा। चितुथ प्रकार की व प्रतिवादी रचनायें हैं जहाँ माक्सवाद के सिद्धात वाक्य और पार्टी के बधन-दोना को स्वीकार किया गया है। कम्युनिस्ट पार्टी की रीति- नीति का प्रचार करने के कारण ऐसी रचनायें साम्प्रदायिक हा यी है। जब प्रगति वाद पर एकापन का दोप लगाया जाता है तव इन रचनाआ को ही ध्यान मे रखा जाता है। प्रगतिवाला काव्य की य चार उपधाराएँ एसी नही हैं जो वही परस्पर मिलती न हो । किन्ही विही रचनाओ मे एक धारा का कवि दूसरी धारा का भी स्पश कर लता है अतएव यह विभाजन आयात नहीं है । इतना अवश्य है कि उपयुक्त उपधाराय अधिक्तर अपनो ही सामा म प्रवाहित होती हुई प्रगतिवाद को व्यापक्ता प्रदान करती हैं । 'प्रगतिवाद नाम प्रमुखता के कारण ही पडा है अन्यथा इस युग की ११० / आधनिक पाय प्रवत्तियाँ एक पुनमू ल्यांग्न काव्यधारा में कई प्रमागत और नवोदभूत धाराओ का जल सम्मिलित है। एक ओर मथिलीशरण गुप्त सियारामशरण गुप्त गोपालशरण सिंह नपाली आदि के द्वारा संचालित द्विवेदी युगीन काव्यधारा इससे मिलती है दूसरी ओर प० माखनलाल चतुर्वेदी और नवीन जी को राष्ट्रीय काव्यधारा दिनकर जी के रूप म नयी शक्ति प्राप्त करती है । तीसरी आर छायावादी काव्य धारा अपना स्वरूप बदलकर पत और निराला के रूप में अपनी मानवीयता और विश्वात्मक दष्टि का ज्ञापन करती है। चौथी ओर इस युग वी धरती से भी प्रगतिवादी विचारधारा के उत्स फूटकर इस समय के काव्य को सवेदना प्रदान करते हैं और साथ ही माक्मवादी विचारधारा को पल्लवन का अवसर प्रदान करते हैं। [२] वगहीन समाज की स्थापना प्रगतिवादी काव्य की एक अय विशेषता समाज का नया स्वरूप प्रस्तुत करना है । माक्सवादी वगहीन समाज की स्थापना म विश्वास रखत हैं । पत जी ने भी अपनी एक रचना में अपन विचार इस सदभ म इस प्रकार प्रस्तुत क्यि हैं- रूढि रीतिया जहाँ न हा आधारित श्रेणि वग म मानव नहीं विभाजित धन बलसे हा जहाँ न जन श्रम शोषण पूरित भव जीवन के निखिल प्रयोजन । सस्कृत वाणी भाव, कम सस्कृत मन सुदर हो जन-वास वसन सुदर तन । -ऐसा स्वगघरा में हो समुपस्थित नव मानब सस्कृति किरणो से ज्यातित ।। -नव सस्कृति [३] पूंजीपतियो का विरोध माक्सवादियो की तरह पत जी भी पूंजीपतियों को भला-बुरा कहते हैं और उनके अन्तिम समय की सूचना देते हैं। प्रगतिवादियो ने जिन बुरे शब्दो से पूजी पतियों को आड़े हाथो लिया है उनकी एक झला पत जी की निम्न रचना मे दोखिए- वे मशस हैं वे जन के श्रम बल से पोषित दुहरे धनी जोक जग के भू जिसस शोपित नही जिह करनी श्रम से जीविरा उपाजित नतिक्ता से भी रहते हैं अत अपरिचित । दी ही निरकुश निमय क्लुपित, कुत्सित गत सस्कृति के गरल, लोक् जीवन जिनसे मृत ।
प्रगतिवाद | १११ जग जीवन का दुरुपयोग है उनका जोवन अब न प्रयोजन उनका अतिम हैं उनके क्षण। [४] सवहारा वग के प्रति सहानुभूति प्रगतिवादी काव्य की एक विशेषताथमिक वग की दुरवस्था का चित्रण करना तथा उनके साथ सहानुभूति प्रक्ट करना है। भव अयाय घृणा से पालित श्रमिर को पत जी लोक जाति का अग्रदूत, वर वीर, जनादत, प्रक्षालित, जीवन को शिल्पी आदि विशेषतामा से विभूषित करते हैं। कृषका की विपन्नावस्था का चित्रण भगवती चरण वर्मा की "मसागाडी" शीष रचना में विदग्धता के साथ देखा जा सकता है। कवि लक्ष्मी के परम भक्त व्यापारी, जमीदारो के प्रति घणा का भी प्रकाशन करता है जो निपर निरामिष सूरखोर' और मनुष्य का उष्ण रक्त पीने वाले हैं। उनके अनुसार पशु के समान काम म पिसन वाले भूखे नग्न किसानों तथा मजदूरा के कालो पर ही राजवाय सधा हुआ है । यमिक किसानो या शाषित वग के प्रति व विया न अपनी सहानुभति के प्रकाशन का काप मार्मिक कथा प्रसगा की नियोजना द्वारा भी किया है । 'सियारामशरण गुप्त जी के आख्यान-प्रगतिशील प्रगीत इसी श्रेणी के हैं। नागाजु न की प्रेत का बयान' शीषर रचना भी इसी श्रेणी वो एक श्रेष्ठ रचना है। इसमें भूख से मरकर एक मास्टर प्रेत बनता है और नरव के मालिक यमराज के समक्ष मास्टर नचाकर लम्ब चमचो सा पचगुरा हाप रूखी पतली किट किट आवाज में अपना पूरा पता करेमों की पत्तियों को खाने को आधी वात व्याधि आदि कहता है- और और और और भले नाना प्रकार की याधिया हों भारत म वितु मितु भूख या क्षुधा नाम हो जिसका एसी पिसी व्याधि का पता नहीं हमफो। जहा तक मेरा अपना सम्बप है सुनिए महराज- तनिक भी पीर नही, दुख नही दुविधा नहीं सरलतापूवर निकले थे प्राण सह न सी आत जब पचिश का हमला ११२ / आधुनिक पाय प्रवत्तिमा एक पुनमू त्यावन इम व्याग रचना म भारत में शिक्षा वा दुरपया या पिनय दिया गया है। [५] व्यग्य प्रधानता यग्य प्रधानता प्रगतिवारी कार यो ए मामा पविणारी है। इस युग ये व्यग्य ययिरों म नागाजुन का ताग विगा प्रगिद्ध है । आपन नहर जो की अनजा- प्रियता पवर्गीय योजनाआ आदि पर अत्यात नाम व्ययनित हैं। बुध उपहाण यहाँ प्रस्तुत है। वतन वचार पडित नहा फूल नहीं समात हैं । यशर्मी की हा है फिर भी बात रडा वनात हैं। अग्रेजी अमगी जामाकी मा म है शामिन । फिर भी पापू ना ममाधि पर पायक पूरा हात हैं । यहाँ पर भारत का वशक नीति पर पात किया गया है। भारत का तट स्थना कीनाति वल दिखावा है अग्रजा और मसिनो सत्रण लेन में कारण भारत जनस दवा है। नागाजु । जो 7 उपय 7 या मम्मी तथ्य का उदघाटन किया है। अयन नाप देश का पाजनाजा पर ममाघात करते हुए यहत है- जाटो को कविता फूटा पा सात म हाग कर। पाच साल में पहनेंग रह पन जो यूना भूल । पाच गान म पात्रा भया गम माजा दस पह साल। जपन हागथा स सागरा पिन हा आपा म धूल । यहाँ कवि ने दण की याजमामा का निरथक्ता और सामयिर समस्याओ हल मे उन क्षमता वा स्याम्घाटन मशत शाम दिया है। [६] सामाजिक प्राति का उदघोष प्रगतिवादी काव्य मजोवाट समाजप्रति तावतमाशाश भी यक्त किया गया है। दिनकर जा ए जगह निरात है श्वास को मित्रता दूध वस्न भूख वा बकुलात है। माँ को हरटी स चिपा ठिटर जाडो को रात वितात है। युवता IT जा बमन पच जव याज चुकाय जात है। मानिक जब तन पुललो पर पानी मा द्रय बहात है। यह क्षाभ भग आकाश दरित पानित वग के प्रति भी यन-तव व्यक्त हुआ है। अचल जो एक स्थान पर निखत हैं- . वह नस्ल जिस कहत मानव कीडा सजाज गई धोती बुझ जाती तो जाश्चय न था हैरत है पर क्स जीती ?
प्रगतिवाद | ११३ अवल जा शोषण पीनाव पर पनपन पान ममाज का चियडे चिथड रन के लिए भी उद्योधन करते हैं। व नियत है- हो समाज चिथडे-चिथडे गोषण पर जिसकी नीव पडी। कुछ अ य पवि तो पूजीपतियो को 'उल्लू हरामी के पिल्ले ये पूजीपति' जसे शो से अपना उग्रतम आरोश -यत्त करत हैं। निराला जीन 'वान राग और पत जी ने गा कोकिल बरसा पावा कण शीपक रचनामो म सामाजिक क्रान्ति का उदघाप रिया है। [७] लाल निशान का जयगान प्रगतिवादी पवि मनपा यहाँ की साम्यवादी शासन पद्धति की जय गाथा भी गाते हैं और उसके विरोधिया को मजदूरो, किसानो आदि का दुश्मन वहत है। व वम्युनिस्टा के लाल निशान का दुनिया के हर क्षेत्र म देखन के इच्छुक है-- खोलो लाल निशाना हो सब लाज नहान लार ग है दात साथिया सब मजदूर दिसाना पी वहा राज है पचायत का दहा नहीं है बारी लाउ स काश्मन, साथी दुश्मन सब इमानो का दुश्मन है राव मजदूर का दुश्मन मभी किसानों का -नरेन्द्र शर्मा [८] नारी मुक्ति का स्यर नारी की परवशता तथा दुदशा पी आर भी प्राय सभा प्रगतिवादा कविया की दृष्टि गई है और उहोंने उमवी मुक्ति र गान गाय हैं । गत जी की रचना का कुछ शि यहाँ उगहरण-रूप में प्रस्तुत है-- योनि नहीं है रे मारी, यह भी मानवी प्रतिष्टित । उसे पूर्ण स्वाधीन करो दह रहे न नर पर अरित । खोगो है मलला युगा की, यटि प्रदेश स तन स, जगर प्रेम हो वन उमगा हा पविन वह मन से। [९] भौतिक अभ्युदय प्रगतिवादी वाध्य भौतिय अभ्युदय स ही सम्बधिन रहा है। इश्वर, धम मम्प्राय आमिवदिया पाको आस्मा नही रही है। नवीन नोन अपनी पद पाक्लिा म इस प्रसग म विधा है जिजिम दिन मैंन ए भिगारी का लप पर जूठे पत्तमा को चारत हा देगा उप दिन मरी इच्छा हुई कि आज जमतपति का ही गला ११४ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एव पुनमू ल्याक्न क्या न घाट दिया जाय जिसन मनुष्य वा यह क्षुरतम रूप दिया। अय करिया का भी इम सम्बध में विश्वास है कि ईश्वर जमी कोई भी वस्तु इस संसार म नही है क्योकि आज तक न तो उसने कुछ क्यिा है और न उसम कुछ भी करन का सामथ्य है। [१०] रूदियो का विरोध प्रगतिवादी व वि दिया तथा जाति पनि रा भी विरोध करत है। नरेन्द्र शर्मा जी की एक कविता वा कुछ अश इस सदभ म दृष्टय है-- मैं हिदू हू तुम मुसनमान पर क्या दोना इसान नहीं । मैं तुम्ह समझता रहा म्लेच्च तुम मुझे वणिक और दहवानी। सदियो हम दोना साथ रहे यह बात न अब तक पहिचानी। दानो ही धरता के जाये हम जनचाहे महमान नही । [११] ययायवादी चेतना प्रगतिवादी काय की महत्ता मामयिक सघपपूण जीवन प्रति सजगता तथा विषमतापूण जगत की यथाय ममस्याओ का वाणी दन में भी निहित है। समाजवादी पथाथवाद की चेतना इस वाद की प्रमुख वस्तु रहा है। सामाजिा चेतना की प्रपना के कारण कवि की वयक्तिाना को काई महत्व नहीं दिया गया है । [१२] साहित्य एक उपयोगी कला काय को भी उपयागा क्ला के रूप म ग्रहण किया गया है और वगवादी विचारों के प्रमारण का उस एक सशक्त माध्यम बनाया गया है। काव्य कल्पना-ला स उतरकर बिल्कुल समाज के यथा र जीवन-स्तर से धुन मिर गया है। छायावादी काव्य में वस्तु तथा शिल्प टाना ही दष्टियो से समाज तथा काय म एक पाथक्य था। प्रसाद, निराला पत और महादेवी व प्रगोन तामाय जनता के लिए नही रिगे गये पर प्रगतिवाद काय सामा य जनता कृपर मजदूर शोपित वग का हो काय रहा है। वस्तु योजना की दष्टि से अभी एक विषय छूट गया है जो छायावाट का प्रमुख आदान रहा है किंतु प्रगतिवादी जीवन-सघप में इतने अधिक उलय रहे कि उह उसकी आर दष्टिपात करने का अवसर हो न मिला---दट विषय है प्रकृति । अतएव प्रकृति का प्रयाग प्रगतिवानी काय में विरलता के साथ मिलता है। नागाजुन केदार नाथ अग्रवाल आदिन अपनी अपनी रचनाजा में यत्र-तन्न प्रकृति र आलम्बनगत प्रगतिवाद | ११५ शोभन और सवेद्य चित्र भी प्रस्तुत किए हैं। अतएव प्रगतिवाद काव्य मे प्रकृति के चित्रण सवथा उपक्षित नहीं हो सके हैं । यहाँ हम कदारनाथ जी की एक प्रकृति रचना प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमे खेत की लहराती फ्मल का चित्रण करत हुए उहोंने रूपक के माध्यम से स्वयंवर वा एक दश्य उपस्थित क्यिा है- एक बीते के बराबर, यह हरा ठिगना चना, बाधे मुरठा शाश पर बाटे गुलाबी फूल का सजकर खड़ा है। पास ही मिलकर उगी है बीच में अलसी हठोली देह की पतली, क्मर की है लचाली। सिंदूर तिलक्ति भाल इसी प्रकार मिथला की अमरायो का सलिष्ट चित्रण नागाजुन ने भी अपनी रचना में क्यिा है । प्रगतिवादी पविया के प्रवृत्रि चित्रण की यह विशेषता है कि उ होने छायावादी प्रकृति के अवयवा का छोडकर सवथा नय रूप मे उस प्रस्तुत किया है । यह रूप प्रगतिवादा जीवन चेतना के पूणत अनुरूप है। [१३] खुल गये छद के बध प्रगतिवादी काय के कला पक्ष से सम्बन्धित विशेषताओ को हम एक साथ पत जी की निम्नाकिन पक्तियो म दख सक्त हैं- तुम वहन कर सको जन मन म मरे विचार वाणी मेरी चाहिए तुम्ह क्या अलकार । तुम रूप कम से मुक्त, शब्द के पख मार कर सको मुदूर मनानभ मे जन के विहार । खुल गय छद के ब ध प्रास ३ रजत पाश । अव गीत मुक्त औ युगवाणी बहती अयास ।। अर्थात जन-मन में वाणी का प्रसार करना प्रगतिवादी कवियो को इप्ट रहा है अतएव भाषा को अलकार की कोई आवश्यक्ता नही रह गइ। भाषा जनवादी विचारा के अनुरूप जन भाषा के रूप म प्रस्तुत हुई और उससे अलकारा के आवरण उतार दिय गये। छद के वध टूट गये और गीत मुक्त होकर युग वाणी का प्रसार करने लगे। भाषा के क्षेत्र म छायावादी लक्षणा और व्यजना का प्रप इस युग नाओ मे नही मिलता । शब्द-विधान सामाय जीवन स्तर को ध्यान में रखकर प्रस्तुत या या की रच ११६ । आधुनिक वाच्य प्रवनियां एक पुनमूल्यावन किया गया है । इस प्रकार न कवन विचारो वे क्षेत्र में वरन् भाषा के क्षेत्र में भी यह काव्य जनता के पास आकर उमम पुत्र मिल गया है किंतु मामा य भाषा और सरल अभिव्यक्ति का नय गलत नहीं समझा जाना चाहिय। यदि भाषा दरिद्र हा तो श्रेष्ठ काष्य की रचना हो ही नहीं सकती। इसी प्रकार जनता की सीमित शद-राशि वो ही बद्रित कर साहित्य रिया जाय तो उसम मूएम मनोभाया की व्यजना नही हो मक्ती । इमोलिय भारा की सरलता और सुबोधता की आवश्यक्ता का प्रतिपादन करने के उपरात भी डा. रामविलास शर्मा को निधना पडा कि भाषा व विसी. आरश को हा अमर नहा पहा जा सकता। भावा और विचारा व अनुकूल ही भाषा का स्पम्प हाना चाहिए। [१४] जन मापा का आग्रह जन भाषा का आग्रह करन के कारण प्रगतिवादा या य म विपुल माना म प्रामाण प्रामाण शना का भी समावेश हा गया है और भापा विशुद्ध न हाकर शज तत्सम और तद्भव शशीका मिश्रित स्प है । ग्रामीण शन। कुछ उदाहरण य हैं-छिन धनि, पगही आधाना, पोत करों चनाचवना, विरमना छापना छिपाना सात कुसाइत बाजू चिर-परे सर्राता अर्राता नर्शता आदि । वही वही तो गारिया तक को प्रस्तुत कर दिया गया है। वही वही शुद्ध तत्मम शस्ट भी मिल जात हैं वितु एस उदाहरण विरत ही हैं । प्रभाकर माचव की एक कविता का कुछ अश यहा जवलोपनाथ उद्धत है- यदा सहरत चाय कूर्मो अगानीव सवश गीता म यह स्थित प्रन का लक्षण । तुम हो जीव विलक्षण। बड़ी उम्र ही वच्छपराज तुम्हारी । करी पाठ सिवार-सनी यह पृथुल देह, गति शिथिल । इसी प्रकार पत जा की प्रगतिशील बविताओं में भी तत्सम पदावलिया का v जाधिक्य मिलता है। निराला जी क कुकुरमुत्ता' की भाषा प्रगतिवादो वाव्य की आदश भाषा माना जाती है । उदाहरणारूप में उसका कुछ यश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है- अबे सुन वे गुलाब, भूल मत गर पाई खुशबू रगोआव । खून चूसा खाद का दूने अशिष्ट, प्रगतिवाद / ११७ डाल पर इतरा रहा कंपीटिलिस्ट । क्तिनो को तूने बनाया है गुलाम माली र रक्खा पिलाया जाडा घाम । [१५] जनवादी अप्रस्तुत विधान अप्रस्तुत विधान भी प्रगतिवादी का य का जन सामा य है । एक तो अलबरण करन का उहे कोई मोह नही रहा यथाथ जगत को बाता को कवियों ने निर्व्याज रूप मे प्रस्तुत क्यिा दूसरे जिन उपमानों प्रतीका या विम्बा को उहोने ग्रहण किया, वे छायावादा पवियो की तार कल्पना को विशाल उडा। स सम्बधित न हाकर श्रमिका के दनदिन जीवन से सम्वधित है । प्रतीय ऐस है जो सहज ही जनता समझ सके और जिनकी शक्ति और ताप अभीप्ट अथ की प्रतीति करा सके। छायावादी प्रतीको म जो मसणता, स्निग्धता और सौदय चेतना विद्यमान है वह प्रगतिवादी काय में नही है यहाँ जीवन के सघपमूलक उपादाना से प्रतीको को नये सिरे से उठाया गया है जन-वादी विचार और जन भाषा के साथ प्रतीक भा जनवादी ही हैं। यहाँ पर कुछ प्रगतिवादी प्रतीक दिये जा रहे हैं-' कोयल की खान की मजदूग्निी सी रात' सफेद कासा की झण्डी," ढेला सी बडी बडी आखें, रहा की टोकरीका जीवन'' रहू की दो से जलत हैं बिजली के बल्व सूनी सड़को पर लाल-लाल, 'पूट' बतन सी तिरस्कृता मानवता' लखनी ही है हमारी पार, घरा है पट, सिंधु है मसिपान आदि । यहाँ जितने भी उपमान हैं व सब सामा य जावन की सामान्य वस्तुयें हैं और उपामानो को प्रतीकात्मक्ता स वस्तुस्थिति की यथाथता का बाध कराया गया है। निश्चित रूप से यहा पर उपमाना म नयी प्रगतिवादी चेतना के अनुसार नयापन है और ये प्रतीक अथ को पूर्ण शक्तिमत्ता के साथ उदघाटित करने में ममय हुय है किन्तु सवन ऐसा नहीं हो सका है । कही-कही असाहित्यिक और भोडे उपमान और प्रता भी आ गय हैं जो का य को उसके उदात्त, सवेदनीय स्तर से स्खलित वर देत हैं जस पूंजीपतियों को उल्लू हरामी आदि के पिल्ले कहना एसा हो एक चिन्त्य प्रयाग है। अलकारा म उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा का अधिक प्रयोग किया गया है मानवीकरण में भी शोभन प्रयोग प्रगतिवादी काव्य म मिलते हैं। स्वयवर एक एसी ही रचना है जिसे हम पहल देख चुके है । यहा पर वेदारनाथ अग्रवाल की एक अन्य कविता उद्धत कर रहे हैं जिसम मस्त वसती पवन की चचलता की चर्चा है-- चढ़ी पर महुआ पपाथप मचाया गिरी धम्म से फिर ११८ / आधुनिक काय प्रवतिया एक पुनर्मूल्याकन बोकिल की कू चढी आम ऊपर उमे भी यकोरा क्यिा वान म । उतर कर भगी में हर सेत पहुंची- इस गीत म बिम्ब योजना का भी स्वरूप देखा जा सकता है गिरी धम्म से फिर म ध्वनि मूलक प्रतीकात्मरता है और महुए के जमीन पर गिरन का विम्ब हमारी जाखा के सामने आ जाता है। विया कान मे कू मे श्रुतिपेशल प्रतीक है । की ओर यहा सकेत है । यह चिन भी अतीव शोभन है। गहुआ मे लहर मारना लहराते हुए गहू के खेता की प्रतीक है इसम चक्षुगोचरता विद्यमान है । उपयुक्त पति के परत ही लहरात पेत हमारी आँखों के पामन मूत हो उठते हैं। बिम्ब विधान की एक अन्य विशेषता यह है कि सारे विम्ब खेत-खलिहानो, किसान और मजदूरो से सम्बधित जनवादी है । प्रकृति से सम्बधित उपयुक्त प्रगीत मे बिम्ब विधान सौन्त्यमूलक है पर यथाय जावन से सम्ब िधन है वह काल्पनिक लोक की वस्तु नहीं। पूस मास की धूप सुहावन घिम हुये पोतल सी पाडुर स्तन पायी नीरोग गौर छवि शिशु के गाला जसी मनहर पूस मास की धूप सुहावन । (नागाजुन) उपयुक्त पक्तियो मे पूस मास की मुहावन धूप के प्रति उपमा और उत्प्रेक्षाय हैं ये भी प्रगतिवादी उपकरणो से सम्बंधित हैं। इनम भी चिनात्मकता विद्य मान है। अयोक्ति का भी प्रगतिवादा पवियो न बहुत प्रयोग किया है। पत की स्वीट पी के प्रति केदारनाथ अग्रवाल की कोयने आदि एसी हो रचनायें हैं। प्रगतिवाद में शलिया की दष्टि से प्रधानत चार शलिया प्रयुक्त की गई हैं- वर्णाना मक उद्बाधनात्मक, विचारात्मक और हास्य तथा व्यग्य मूलक । वणनात्मक शली प्रगतिवादी काव्य म यथायवादी शली वा ही सस्करण है। इस क्षत्र में निराला तथा ईपत मात्रा में पत जी ने अच्छी सफलता प्राप्त की है । निराला ने विपुल मात्रा में यथाथवादी शब्द चिना की उन सपूर्ण परिवेश में प्रस्तुत किया है। य चित्र प्रामीण जावन व मार्मिक अश हैं और इन स्थला का वर्णन करते हुये निराला वस्तुत 'माम्य गीतो की वर्णनात्मकता को प्रस्तुत करन लगत है। कुत्ता भौंक्न लगा' डिप्टी प्रगनिवाद | ११६ साहव आय, 'वह मूज कूटता है' आदि ऐसी ही रचनायें है। यहा हम उनका एक ग्राम्य रेखा चित्र का उदाहरण दे रहे है- सडर के किनार दूवान है पान की। दूर एक्कावान है घोडे की पीठ ठाक्ता हुआ, पौरपरश एक बच्चे को दुजा दे रहा है पीपन की डाल पर कूक रही कारिल मान पर बलगाडी चली जा रही है। इस रेखाचिन मे तत्कालीन परिस्थिति का सूक्ष्म चिन्न अक्ति दिया गया है। पत जी की 'ग्राभ्या म धोदिया, चमारो आदि के नत्यो में भी यह वणनात्मक शली अपने प्रकप पर देखी जा सकती है । कथात्मक प्रगीता में भी इपत् मात्रा म इस दखा जा सकता है। प्रगतिवादी विचारा का प्रचार-प्रसार करन कारण प्रगतिवादी पायम उदवाधन शली की प्रमुखता है । इस गली क कई उदाहरण वस्तुगत विशेषताजो के निदशन के समय हम दे चुके है । जहाँ प्रगतिवादी कवि का य क माध्यम से अपने सातिक विचारा का प्रस्तुत करते हैं वहा विचारात्मा शली का प्रयाग हुआ है । परत की युगवाणी' इस शली में उदाहरणा से भरा पड़ा है। यग्य और हास्य शला प्रगतिवाला काय को एक सामाय और सावनिक विश्नपता है । प्राय सभी कवियो न इनका प्रयोग किया है । हास्य शली का लक्ष्य विशुद्ध मनोरजन रहता है रितु व्यग्य मनारजन व जागे घर कर जात्रमण भी करता है। उसकी प्रकृति विश्वषणा मय और समीक्षात्मक होता है । इसका पल्लवन काव्य की भाव-भूमिका पर न होकर बौद्धिक भूमिका पर होता है। निराला, नागाजु न भारत भूपण अग्रवाल जाति को व्यग्य योजना म अधिल रापलता मिली है। छन्द और काय रूपो के क्षन्ना में भी प्रगतिवादी काव्य अपनी विशिष्टता रखता है । इस यग मे मुक्त छदा का सवाधिन रूप स प्रयोग किया गया । परम्परा से आगत छन्दो की विरलता मा बनिष्कार हा है। मुक्त छ दो मे लय का सभार और निर्वाह प्रमुख वस्तु रहती है किंतु नयात्मक्ता का निराला की अपक्षा अभाव है और रचनायें, गोत गद्य क रूप म हा अधिक्तर लिखी गई है। छद इसके लिए जुम्मदार नही है । विचारा का भाग्रह और प्रचारात्मकता, तथा व्यग्याधिक्य ही छद के विधा तक सिद्ध हुए हैं । जहाँ कोमल सस भावनाओ का प्रवाशन है वहा मुक्त घट म भी गीत के समान तरलता और सरसता है। केदारनाथ अग्रवाल क स्वयवर तथा Alies
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प्रगतिवाद | १२१ ७ शाति की अपेक्षा सघप म निष्ठा, अहिंसा की अपेक्षा हिंसा में आस्था । ६ काति को एक मात्र अस्त रूप में ग्रहण भरना, जिससे वग कटुता ती भावनायें अधिक गहरी हुई हैं। ९ इसका आत्यतिक लक्ष्य शारीरिक सुख, आर्थिक विषमता का अभाव, वग हीन समाज की रचना। १० अधिकाश प्रगतिवादी लेखक समाज के दलित वग के प्रति मौखिक सहा नुभूति का विज्ञापन करते है । ११ अतिशय शृगार चित्रा म काम वासना की प्रमुखता, नारी का सौन्दय पासल और कामुकता से भरा रूप चित्रित । १२ वस्तु परक्ता की सर्वाधिक्ता, स्वानुभूतियो का अपक्षाकृत अभाव । युग चेतना की अनुभूति क्म, देश के श्रमिका की दुरवस्था का आखो देखा चित्रण अधिक है। १३ सत्य, शिव और सुदर की अनुभूतियो पर विश्वास नहीं । "सुन्दर, शिव, सत्य कला से कल्पित भाव मान, वन गये स्थून जगजीवन से हो एक प्राण"-पत। १४ क्ला के तत्वा का ह्रास हुआ है और प्रचार भाव।। के कारण बुद्धि तत्त्व की अधिकता है। १५ काव्य कला की शिथिलता तथा अपरिष्कार विद्यमान है। प्रगतिवादी समीक्षा म समाजशास्त्रीय पन अधिक साहित्यिक्ता कम है। १६ कवि ग्रहण मूल प्रेरणा पर ध्यान न देकर सिद्धातो वा अघानुकरण करते हैं जिससे काव्य को सहजोक्प नहीं मिलता। १७ मानवता की चर्चा करके भी प्रगतिवाद सर्वहारावादी है समाज के सभी वर्गों के प्रति उसके पास शुभाकाभायें नही हैं । इन आक्षेपो मे से कुछ ६ निराकरण में सदभ म प्रगतिवाद के अधिकृत विद्वान और समीक्षक डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि मावसवाद पर जो एकागी हाने या दोप लगाया गया है वह वस्तुगत सत्य नही। उन्होन प्रगतिवाद की मल विशेषता का ज्ञापन करत हुय इमी संदर्भ म लिखा है- वह यह मानता है गिजा साहित्य युग की मजीव अनुभूति और प्रगतिशील विचारो का व्यक्त नहीं करता वह निर्जीव हो जाता है उनका यह कथन तो हर साहित्य की मल विशेषता है पर प्रश्न यह है कि क्या प्रगतिवाद यहा वाय व्यावहारिक रूप में करता है । हम देख चुके हैं कि सामाजिक्ता की शखध्वनि करते हुये भी वह सवहारा को ही समाज मानता है, वही इसका इष्टदेव है, और जा उसका विरोधी या विजातीय वह उनकी निम् मता का पान है भल हा वह दूध का धुला और गगा जल सा पावन हो । उनका तन्त्र १२२ / भाधुनिक नाव्य प्रवृत्तिया एक पुनमूल्याकन स्वरचित है इसी को वे समाज का निक्ष मानते हैं। यदि उन्हें मावस के सिद्धातों के अनुगत होन की स्वत त्रता है, तो दूसरे उसे न मानने के लिए भी स्वतन हैं । पर यह व्यक्ति स्वतन्त्रता वे सहन नहा कर पाते, फिर एवावी दष्टि नहीं तो क्या समरस है? ईश्वर मे उनकी आस्था नहीं इस अनास्था से मुझे कोई चिड नहीं है । जो समाज उसे मानता है वह उनकी अपेक्षा अधिक उन्नतिशील भी तो नहीं? स्वय भारतीय दशन की विविध धाराओ के प्रवतका म से लगभग आधे दाशनिक नास्तिक रहे हैं, भौतिक्ता की चरम लक्ष्यता भी नहीं अपरती, प्रगतिवाद धर्म की रूढि का पण्डन करता है इस पर भी मुझ कुछ नही बला, जीवन म निर तर मघर्ष करत रहना, इसमे भी कोई बुराई नही है वगहीन ममाज भी बुरा नहीं प्रांति हो यह सब कर सकता है वतमान समाज की विपन्नावस्था और पूजीपतियो की अधिकार लिप्सा तथा स्वाथवद्धता की अपरिवतनशीलता को देखत हुए यह भी क्सिा हर तर स्वीकाय है पर क्या ये सब व्यापार काय क विषय हैं ? क्या यह साम्यवाद राजनीति के तन का एक अभिन्न अंग नही ? क्या साहित्य वो राजनीति का अग बना देना समाचीन होगा? क्या साहित्य का यही प्रयोजन है ? क्या ये ही विचार प्रकट करना साहित्यिक सौदर्य और कलात्मकता है ? निश्चित रूप से नहीं है। राजनीति समाज तन्त्र है, उसके विकास के लिए सुख सुविधाओ का सचय वरना आन्तरिक व्यवस्था और बाह्य आक्रमणो से रक्षा करना उमकी अधिकार सीमा है । साहित्य -यक्ति के हृदय की वस्तु है, यह जन मन को चयक्तिकता से मुक्त करके एक उदात्त स्तर पर पहुचाकर, उहें आह्लाद प्रदान करने वाला काता सम्मित रूप से नान विनान, आदेश उपदेश और सदेश को प्रस्तुत करने वाला है। दोनो के पथ भिन्न हैं। एक आर कल्पना का आह्लादक सौ त्य है दूमरी और जीवन का दुधर्प यथाथ सघष है दोना के पथक क्षेत्र हैं एक नहीं। फिर एक कर देना साहित्य की चिरतन गतिशीलता को झुठलाना नहीं है । सिद्धान्त रूप से कर भी निया पर क्या सवन ऐसा कर सकना सम्भव है ? यदि ऐसा है तो वेदारनाथ अग्रवाल के स्वयंवर' तथा वसत पवन की चचलता से युक्त श्रीडाओं म बौन सा माक्म का दशा भरा हुआ है ? कौन सी प्रगतिगामिता है? क्या वहाँ कल्पना का सौदय ही हम सवेश नही बनाता? यह सवेदना पत जी के माक्म स्तवन म क्यो नहीं मिलती। यदि उसे समा य जनता को सुनाया जाय तो कदाचित ही एकाध श समझ सक? तब क्या यही प्रगतिवादी दष्टि और उपलधि है ? राजाोति माहित्य से प्रेरणा ले साहित्य राजनीति की चेतना ग्रहण करे किसी को कोई आपत्ति नहीं किन्तु इहे अपनी मर्यादालो का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। राजनीति और साहित्य को एक समझने वाली साम्यवादी दृष्टि निश्चित रूप से चिन्त्य हैं । इस आधार बनाकर यदि प्रगतिवाद पर आक्षेप किया जाता है तो कोई अपराध प्रगतिवाद | १२३ नहीं किया जाता, असत्य का पथ ग्रहण नही किया जाता । श्लील अश्लील की पहचान के लिए यहा मैं मगला माहन की एक प्रगतिवादी रचना प्रस्तुत कर रहा है। इसम यथायवादी शली है, या कवि के हृदय की नग्न वासना और क्या ऐसे चित्रण साहित्यिक हैं ? इसका निणय स्वय कर लीजिएगा- उस धान के कटे हुए खेतो के उस पार भस के पीछे एक काली सी किसान कया। नाटे से बरगद की घनी उस छाह मे पास मे माटा सा लट्ठ लिए एक युवक भस की पीठ पर कुहनी टिकाए हुए देखते ही देखने चिकाटी काटी उसने छातिया मसल दी और मैं यह नहीं कहता नि प्रगतिवाद एसे उदाहरणो से भरा हुआ है, पर उदाहरण मिलते तो हैं, अपवाद ही सही, क्या वह विपय वासना सामाजिक चेतना का फल है ? या केवल वस्तुस्थिति के यथाथ चित्रण के नाम पर प्रस्तुत किया गया है । प्रिये अभी मधुराधर चुम्बन गात गात गूथे आलिंगन । सुने अभी अभिलापी अतर मदुल उराजा का मृदु कपन । --नरेन्द्र शर्मा। नरेद्र शर्मा की उपयुक्त पाक्तयां भी इसी प्रसग म विचाराथ देखी जा सक्ती हैं। सयाग शृगार के इसस भी मादा चिन्न प्रसाद की परिरम्भ कुभ वी मदिरा, निश्वास मलय के झोक, मुखच द्र चांदती जल से मैं उठता था मुंह धोके ' आदि पक्तियो मे तथा निराला की होलो रचना म मिलते हैं पर उन पर प्रतीको का सुन हला आवरण है । वे नग्न और निलज्ज नहीं हैं। एक ओर प्रगतिवादी रूस में पानी बरसे तो भारत में छाता लगाकर चलने वाले हैं दूसरी ओर शीश महलो मे खस की टट्टियो से सुमज्जित प्रकोष्ठ म मटक्ती सोपा-सेटो म वठकर ग्रोप्म में आतप से झुलसते हुए किसान की बदना के गीत गात हैं। पया यह विरोधाभास नहीं है। उनके गीतों से कदाचित एक भी किसान और मजदूर वा भला न हुआ होगा, देश के मजदूरो को आज भी यह पता नही किडा पर पत निराला, रामविलास शर्मा, नागाजु न, शीन या अन्य किसी ने प्रगीत लिस है? शायद उनसे पूछो तो वे इनका नाम भी न बता पायेंगे। इसी स्थिति में यह मौखिक और बौदिर सहानुभूति का आरोप व्यय नहीं कहा जा सकता, भले ही यह आरोप आरपनि न हो। बला-पक्ष की शिथिलता और अपरिष्कृति को तो स्वयं ग. रामविकास १२४ / आधुनिर काय प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्यान - शर्मा जी ने स्वीकार किया है अतएव इस विषय पर तक देना, अनावश्यक है। (उ) प्रदेय दुरलतायें और कमियां तो हरवस्तु मे पाजन पर मित्र हो जाती हैं, विकास के लिए उसका होना आवश्यक भी है । प्रगतिवाद मे भी ये हैं और प्रचुर माता म हैं कितु उसका सौरस्य कमियो मे निहित नहीं है, उसकी विशेषताए और उपल ब्धियाँ युगातरकारी हैं। इमानिये दोषा का विवेचन करके प्राय सभी समीक्षको ने उसका माहात्म्य भी उदघाटित किया है । यहा हम हिदी के चार प्रतिष्ठित जालोचको के मतो को इस सदभ मे उद्धत कर रहे हैं। जिनके द्वारा प्रगतिवाद का समुचित समादर और प्रदेय स्पष्ट हो जायगा। इन समीक्षका में से दो स्वच्छ दतावादी हैं एक प्रगतिवादी और एक अतश्चेतनावादी । स्वच्छन्दतावादी समीक्षका मे एक सौष्ठन वाली और दूसरे मानवतावादी हैं। प्रगतिवादी समीक्षक डा. शर्मा को छोड़कर शेप मभी आचाय प्रगतिवाद के कट्टर समीक्षक हैं कि तु उहोने अपने एकागीपन का परि चय नही दिया, गुण तोप दोनो ही उनकी दष्टि में रहे हैं। सौष्ठववादी समीक्षक आचाय वाजपेयी जी के अनुसार साहित्य क सामाजिक लक्ष्यो और उद्देश्या का विज्ञापन करने वाली यह पद्धति साहित्य वा बहुत कुछ उपकार भा कर सकी है। उसन हमारे युवको को एक नई तजस्विना भी प्रदान की है और एक नया आत्मबल भी मिला है। हम यह भी नहीं कहत है कि प्रगतिवादी समीक्षा न हि दी को कुछ दिया हा नही । उसने दो वस्तुए मुम्य रूप स नी हैं । प्रथम यह कि काव्य साहित्य का मम वय सामाजिर वास्तविक्ता स है और वही सारित्य मूत्यवान है जो उक्त वास्तविकता के प्रति सजग और सवेदनशा 1 है। द्वितीय यह कि जो साहित्य सामा जिक वातविक्ता स जितना ही दूर होगा वह उतना ही बारपनिक और प्रतिक्रिया वादो कहा जायगा । न केवल सामाजिक दष्टि से वह अनुपयोगी होगा, साहित्यिक दष्टि से भी हीन और हासो मुख होगा। इस प्रकार साहित्य के सौष्ठव सम्बधी एक नई माप रेखा और एक नया दष्टिकोण इस पद्धति ने हम दिया है जिसका उचित प्रयोग हम करेंगे।" मानवतावादी समीक्षक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का क्थन है कि "इसके सिद्धा त और उद्देश्य बहुत सुदर हैं लेकिन य लोग कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं, यही जरा खटकता है। प्रगतिशील आ दोलन बहुत महान उद्देश्य स चानित है। इसम साम्प्रदायिक भार का प्रवेश नहीं हुआ तो इसकी सम्भावनाएँ अत्यधिक हैं। भक्ति आदोलन के समय जिम प्रकार एक अदम्य, दढ आदशनिष्ठा दिखाई पड़ी थी, जो समाज के नए जीवन दर्शन से चालित करने का सकल्प वहन करने १ साहित्य विवेचन, भूमिका-~वाजपेयी जी - प्रगतिवाद | १२५ के कारण अप्रतिरोध्य शक्ति के रूप म प्रक्ट हुई थी, उसी प्रकार यह आन्दोलन भी हो सकता है। श्री इलाचद्र जोशी जी का मत है कि "प्रगतिवाद ने बाह्य जगत वे जीवन सधप की ओर हमारी चेतना को उ मुख पर साहित्य का बहुत बड़ा उपचार किया है। यह बात हम किसी भी हालत में नहीं भुलानी होगी।" 'उपयु पर तीनो विद्वान प्रगतिवाद की समीक्षा करते हुए मुक्त कठ से उसकी उपलब्धियो को स्वाकार करते हैं। हा० शर्मा ने अपने प्रगतिवाद-सम्बधी विश्लेषण के उपरान्त जो निष्कर्ष दिय हैं वे भी उपयुक्त निणयों से भिन्न नहीं है। उनका कहना है कि 'प्रगतिशील साहित्य युग की माग को पूरा करने वाला साहित्य है। उसकी शक्ति इस बात में है वि वह समाज के वास्तविक जीवन के निकट है। इस प्रकार हिन्दी साहित्य म प्रगतिवाद एक युग प्रतिनिधि और युगान्तकारी आदोलन है। अनक दुव नताएं रहते हुए भी उसकी सामाजिवता और जीवन की सनिस्टता उसे अक्षयता और लोकप्रियता प्रदान करती है। यह आदोलन केवल काव्य म ही नहीं, कहानी, उप पास, नाटक, निवघ, समीक्षा आदि साहित्य के सभी स्पों म हम एर साय दिखाई देता है। इसन जो मानवीय जीवन की सामाजिक ययायवादी दष्टि प्रस्तुत की, वह साहित्य तथा समाज के उन्नयन का एक नया दिशा बोध है । साम्प्रदायिक भावना स हीन प्रगतिवादी के प्रतिमान स्वस्थ और समुज्ज्वल साहित्य के प्रतीक हैं। R १ हिन्दी-साहित्य -प्रगतिवाद प्रगतिशील साहित्य की समस्याय । २ ४ | प्रयोगवाद 1143 - 1953 भूमिका १९४३ ई. से लेकर आज तक के इन वर्षों में प्रयोगवाद और उसकी आत्म जायें नयी कविता, अकविता "युवा कविता आदि पर बहुत वाद विवाद हो चुके हैं। प्रशसा-स्तुति भी अच्छी मात्रा में हो चुकी है । प्रयोगवादियो और नयी कवितावादियो को प्रबोधन आदेश उपदेश और योजनाए भी दी जा चुकी हैं । यदि किसी अप्रयोग वादी समीक्षक ने उस पर विचार किया तो दोपो की असीम सूची तयार कर भी या किसी प्रयोगवादी समीक्षक ने अपना और अपने मिन्ना की काय साधना का विश्लेषण किया तो कुकरमुत्ता की भाति अपनी आत्मस्तुति म पने रग डाले । गुलाब का भाति परम्परा पोषका को काय-जगत के राहु केतु कहा और अपने को युग का अधिकृत्य प्रतिनिधि सिद्ध करने का प्रयास किया। इस मघप का उपशमन आज भी नहीं हो सका है। किन्तु आज आरम्भिक तनावपूण स्थिति भी नहीं है। तार सप्तक' के स्वर भी बनझना कर सम पर आ गये हैं और पुराने समीक्षक भी नई कविता और प्रयोगवाद सम्बधी अपने पुराने मतो का सशाधन करने लगे हैं। समय भी ना गया है जब हम तटस्थ रहकर इस साहित्यिक आदोलन पर पुन विचार करें। • हिंदी साहित्य मे प्रयोगवाद की प्रथम अनुभूति अज्ञेय जी के द्वारा सपादित प्रथम तार सप्तक' (१६५३ ई०) से मानी जाती है । इसवी प्रकाशन योजना के मूल मे दो सिद्धात थे-प्रथम सहयोग अर्थात भाग लेने वाला प्रत्यक कवि पुस्तक का साझी होगा और द्वितीय संग्रहीत कवि सभी ऐसे होगे जो कविता को प्रयोग का विषय मानते हैं जो यह दावा नहीं करते, काव्य का सत्य उहाने पा लिया है केवल अन्वेषी ही अपने को मानते हैं। उहोन यह भी कहा कि तार सप्तक किसी गुट्ट का प्रकाशन नहीं है क्योकि सग्रहीत सात कवियो के साढे सात अलग अलग गुट्ट हैं उनके साढ़े सात व्यक्तित्व हैं। फिर भी वे यह दावा करते हैं कि "सातो (यानी तार १ तार सप्तक प्रथम, पृष्ठ ५। २ " प्रयोगवाद | १२७ सप्तक सात कवि) अदेषी हैं। काव्य के प्रति अवेषी का रष्टिकोण उन्हें समानता वे सूत्र मे बाघता है बल्लि उनके एक्त होने का कारण ही यह है कि वे किसी एक स्कूल के नहीं हैं, क्सिी मजिल पर पहुंचे हुए नहीं हैं, अभी राही हैं-राही नहीं, राहों के अवेपो।" प्रथम तार सप्तक के प्रकाशन से सम्बधित इस तथा-क्या से यह शात होता है कि प्रयोगवाद-कोई योजनावद्ध आदोलन नहीं है । उस समय उसका कोई निर्दिष्ट रूप भी नहीं था। तार सप्तक के कवि किसी एक स्कूल के भी नहीं हैं। वे काव्य सत्य के अन्वेपी हैं और काव्य को प्रयाग का विषय मानत हैं-केवल ये दो बातें उनम समान हैं। इस तरह अनेय जी यहाँ क्सिी वाद का प्रवतन नही करते, वश, काय्य को प्रयोग का विषय मानते हैं । क्तुि इसी पर विवाद उठ खडा हुमा और शमशेर बहादुर सिंह, अनेय आदि प्रयोगवाद को वाद के रूप में मानो के लिए प्रति वाद करते रहे, तभी श्री नलिन विलोचन शर्मा, केशरी कुमार तथा नरेश ने (न-के- न वाद) प्रयोगवाद का मनीफेम्टो-उद्घोपणा पन प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने निम्नाक्ति दस सूत्र मय फक्किका के प्रस्तुत किये- प्रपद्यवाद या नकेनवाद प्रपोग दश सूत्री प्रयोगवाद के घोषणा पत्र का प्रारूप । (१) प्रयोगवाद भाव और धजना का स्थापत्य है । (२) प्रयोगवाद सवत व स्वतन्त्र है। उसके लिए शास्त्र या दल निर्धारित नियम अनुपयुक्त हैं। (३) वह महान पूवतियो की परिपाटियो को निष्प्राण मानता है। (४) वह दूसरों से भी अधिा अपना अनुवरण वजित समझता है । (५) उसे मुक्त का य नहीं स्वच्छद काव्य की स्थिति अभीष्ट है ।(') (६) प्रयोगशील प्रयोग को साधन मानता है, प्रयोगवाद को साध्य । () (७) प्रयोगवाद की इक वाक्य पदीय प्रणाली है । (१) (८) उसके लिए जीवन और कोप कच्चे माल की खान हैं। () प्रयोगवादी प्रत्येक प्रयुक्त शब्द और छ द का स्वय निर्माता है। (१) प्रथम तार सप्तक के कवियो में आधे प्रगतिवादी है- प्रभाकर माचवे, गिरजा कुमार माथुर और रामविलास शर्मा, गजानन माधव मुक्तिबाघ नेमिचद्र और अज्ञय-प्रयोगवारी तथा भारत भूषण अग्रवाल प्रगतिवाद और प्रयोगवाद को सधि के कवि हैं। ।
१२८ । आधुनिक काव्य प्रवृत्तियां एक पुनमूल्यांकन (१०) प्रयोगवाद दृष्टिकोण या अनुसंधान है। हस्ताक्षरित नलिन विलोचा शर्मा येसरी कुमार नरेश फविकका (१) Verse Lifre Vers Lifre भाष्य के लिए दखिए-दष्टिकोण' मासिक के द्वितीय भक का प्रयम निबध । (२) तुलना कीजिए परिवशील और चारित्यवाद, प्रगतिशील और प्रगति वाद के साथ। (३) Veru-Voco--Visual-method (४) जस चित्रकार वण योजना का मूर्तिकार प्रस्तर खण्ड का। जब इन दस-सूत्रो को आधार बनाकर कविता लिखी गई तो वह अपनी विल क्षणता और प्रयोगो की बहुलता के कारण वौद्धिक हो गई। वह परम्परा स विच्छिन्न, अह केद्रित कुठाओं निराशाओ और तप्तियो से युक्त विचिन गोरख धधा बन गई। इस विच्छ बनता अस्त पस्तता और चौद्विक्ता को ही इन पवियो ने आस्वाद्य बताया। प्रतिफल यह हुआ कि यह नोनवाद जन्म लेते ही अपनी आत्म घुटन से पीडित होकर जल्दी ही समाप्त भी हो गया। अक्षय और उनके सहयोगी मिना ने प्रयाग को अतिम लक्ष्य न मानकर अपने को प्रयोगशील कहकर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया । यहाँ प्रयोगशील' और प्रयोगवार में लगभग वही अतर है जो 'प्रगतिवार और 'प्रगतिशील' मे है । जिम प्रकार प्रगतिशीलता प्रगतिवाद से किंचित भिन्न होकर भी एक ही वतु ल परिधि में साहित्य सजना करती है तदभव प्रयोगशीनता भी प्रयागवाद की परिधि से मिल कर ही कायरत थी। प्रयोग आदि काल स हात रहे हैं सभी कवि नये प्रयोग करते हैं पर अनय, शमशर, गजानन माधव मुक्तिबोध आदि कवि काय को प्रयोगा का विषय क्षन मानकर चलते हैं। प्रयोग-माध्यम स वे काव्य सत्य पाने के लिए लाला यित हैं । इस राहावेपण म उ होने भी सहस्राधिक वेढगे प्रयोग लिए, यहाँ तक कि प्रयोगशीलता को ही अपनी मनोवत्ति बना ली। प्रयोगवाद के प्रेरणा स्रोत यहाँ प्रश्न है कि यह प्रयोगवादी या प्रयोगशील मनोवत्ति एकाएक कसे जागत हुई ? क्या देश की तत्कालीन विविध परिस्थितियां इस मनोवत्ति की उदभाविका हैं ? इस प्रयोगदशसूत्री में पहली बार 'प्रयोगवाद का मौलिक शील निरूपण हुआ- नरेश, प्रकाश, पटना २५१०५७ १ प्रयोगवार | १२९ या यह मनोवत्ति हालावाद के समान दिया के वयक्तिक दुखद जीवन की प्रतिनिया है अथवा यह विदेश से आयात की हुई वस्तु है ? या इसके सूत्र हमारे साहित्य मे विद्यमान थे वाह्य प्रभाव और कवियो के मनोयोग द्वारा वे उन्बुद्ध होकर प्रगतिवाद के समान ही एक आदालन के रूप में हमारे सामने आये । जहां तक देश की विविध परिस्थितियो का प्रश्न है १६४२ ४३ का समय देश में व्यापक राष्टीय आटोलना का समय था और उतनी ही शक्ति के साथ उसका दमन भी किया जा रहा था। इसी समय वगाल का अकाल पड़ा, जिसकी चर्चा प्रगतिवाद के सदभ में की जा चुकी है। ये परिस्थितियाँ दुखत और करुण थी, पर इस समय देश के कवियो ने वग घटना से प्रभावित होकर अपरिमित माता में गोर सहानुभूति, क्षोभ और यग्रेजा की नीति की समीक्षा करते हुए प्रगीत लिखे। उनकी वाणी में आक्रोश था। जनता क लिये अमीम दर और देश की स्वतन्त्रता के लिए बलवती चाह थी फितु यह व्यक्तित्व के विखण्डन करने वाली परिस्थितियां नही थी, अहकेद्रित, निराशा घुटन अनास्था, कुण्ठाओ की प्ररणा इन परिस्थिनिया न निश्चित रूप से नही दी । प्रयागशीलता का जन्म इस भूमि म नहीं हुआ। इन प्रमुख घटनाओ के बार देश की स्वत यता प्राप्त हुई और विस्थापितों की समस्या उठ खडी हुई। देश के विभाजन से, साम्प्रदायिक झगटो स-पुन स्वतन्त्रता की प्राप्ति का आनद दुखद हा गया किन्तु ये परिस्थिनिया भी यक्ति म सघप मे पलायन उनासी तथा निराशा के बीजो का वपन करने वाली नहीं रही। देश की स्वतनता पर कवियो ने अपनी प्रसन्नता का अध्य चाया और जब वापू का हत्याकाण्ड हुआ तो श्रद्धाजलिया चढाई गइ । निश्चित ही वापू की ह्या मानवता और देश की आत्मा की पर शोक-विह्वल उन गार ही कविया के मुख से उदगीण हुए, प्रयोगशीलता की मनो वत्ति उत्पन्न नहीं हुइ । इसके बाद पचशील का सवल लेकर भारत की अतर्राष्ट्रीय प्रभुत्व-याना का अभियान प्रारम्भ हुआ जिसका उपसहार भारत-चीन सीमा युद्ध में रूप म हुआ। यह कोई भी नहीं मान सकता कि देश की पचणीरता हिदी काव्य म प्रयागशीरता का पर्याय बन गई है । फिर इस आदोलन के प्रेरणा-स्रोत कहा है ? जन परिस्थितिया जनुवर थी, ता यह क से फूला फ्ला? क्या समाज की मन स्थिति के प्रति का यह वस्तु ला दी गई है? इम सदभ म प्रयोगवादा मूक नहीं हैं। उनका कथन है कि द्वितीय महायुद्ध J का वरदान विश्व को अतरसपप के रूप म मिला । नान विनान के विकास से समाज में बौद्धिकता आई वयक्तिक चेतना के अतिरव ने उन्हें आत्मद्रित बना दिया, अणु बम्वो की भाति यक्ति व व्यक्तित्व का भी विखण्डन हुया और सश्लिष्टता टूटकर प्रखर गई । जीवन को अनवरुद्ध धारा पण्ड-खण्ड हा गई। व्यक्ति क्षण क सुख में ही हत्या थी, १३० / आधुनिक काय प्रवृत्तियाँ एक पुनमू ल्याक्न . परमता की अनुभूति करने लगा, जीवन के सघष ने उनकी भावनाओ और सवेदना पु जो को सुखा दिया और वह बौद्धिक हो गया, जीवन की असफलताएँ, निराशाएं, कुण्ठा और अतप्तिया-बढती गई इहे वाणी देने के लिए नये प्रयोग वाछित थे, अतएव समीक्षको के विरोध करते हुय भी प्रयोगवादी काव्य रचा गया, जिसमें उप युक्त सारी वस्तुए प्रतिबिम्बित हुई । निश्चित हा स्वतन्त्रता के पश्चात हमारा जीवन अधिक उलझा है क्रिया व्यापारो मे भी कुछ विखराहट आई है, ज तरसपप और बौद्धिकता भी विचित वढी है, पर इतनी नही कि उसम अक्ले ही एक साहित्यिक आन्दोलन के प्रवतन करन की शक्ति हो । आज का समाज छ'यावादी या प्रगतिवादी समाज से निश्चित कुछ अधिक प्रशुद्ध है, महगाई, बेकारी खाद्य समस्या, उत्तरदायित्व हानता बढती हुई जनसख्या आदि के कारण उसमे जटिलताए भा आ गई है, उनके व्यक्तित्व भा अशत सघप पी ज्वाला म पिघले हैं पर आज भी उसम वह मनोवत्ति नहीं जो इस युग के काव्य की है । प्रगतिवादी युग म कवि और जाता अनुभूति और अभि यजना क एक पथ से गुजर रहा था पर आज काव्य जन सवन्ना और अभिव्यजता दोना हा उपकूला पर समाज से पथक होकर चल रहा है। समाज न उसका बहिष्कार भी क्यिा उपेक्षा और निंदा भी की पर कवियो के साहसिक प्रयास बद नहीं हुये। यह दूसरी बात है कि प्रयोगवाद की प्रयोगशीलता अब जन सवेदना के निकट आती जा रही है। श्री लक्ष्मीकात वर्मा इस सदभ म मनुष्य मनोवनानिक सत्रमण' के कारण सामाजिक एवं संस्कृतिक मूल्यो क विघटन की बाते करत हैं और इह ही प्रयोगवादी काव्य के मूल प्ररणा स्रोत मानते हैं किंतु महासमरात्तर य स्थितिया जितनी पश्चिमी ससार के लिये सत्य हो सकती हैं उतनी भारतीय समाज लिये नहीं वस्तुत प्रयोगवादी कवि कुछ तो स्वय सनस्त रह हैं और कुछ मात्रा म उहे पाश्चात्य क्लावादी आदोलनो का सहारा मिल गया अत वे इस दिशा म विशेष सत्रिय हो उठे। इस पुस्तक के परिशिष्ट मे सक्षप में उन पाश्चात्य का य प्रवत्तियो का सक्षिप्त परिचय दिया गया है जिनसे हिंदी के प्रयोगवाती नये कवि, अकवि आदि विशेष रूप स प्रभावित हुए प्रथम तार सप्तक प्रयोगमूलक दृष्टिकोण [१] वैयक्तिक कुण्ठायें प्रयम तार सप्तक (१६४३) प्रथम कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपने प्रेरणा स्रोतो को स्पष्ट करत हय लिया है जीवन म निम्न मध्यवर्गीय प्रयोगवाद । १३१ मास्टरी पल्ले में पड़ी है। मेरे बाल मन की पहली भूख सोदय और दूसरी विश्व मानव का मुख दुख-इन दोनो व सघष मेरे साहित्यिक जीवन की पहली उलझन थी। मेरी विकास स्थिति म मुझे घोर असतोष रहा है। मानसिक द्वद मेरे “यक्तित्व मे बदमूल है । यह मैं निकटता से अनुभव करता आ रहा है कि जिस क्षेत्र में भी मैं हू वह स्वय अपूण है और उसका ठीक ठीक प्रगटीकरण हा नहीं हो रहा है । फलत गुप्त अशाति मेरे मन के अन्दर घर क्येि रहती है।' [२] बेचैन मन की अभिव्यक्ति इस प्रसग म मुक्ति बोध जी का कथन है कि 'मेरी ये कवितायें अपना पथ ढूढने वाले धेचैन मन की अभि यक्ति है । उनका सत्य और मूल्य उसी जीवन स्थिति में छिपा है।' उपयुक्त उद्धरणो को पढकर यह अच्छी तरह से देखा जा सकता है कि प्रयोग वादी काय की रचना के निगमन स्रोत कहा हैं-देश की समसामयिक परिस्थितियो म या कवि विशेष के वयक्तिक जीवन म । और इन निजी जीवन की अशात, निराश उदास परिस्थितियो में किस प्रकार के उदात्त काय की सजना सम्भव है । [३] जीवन परिपाटियो मे घोर वैषम्य प्रयोगवाद के सूत्रो के सकलनकर्ता 'अज्ञेय' का दष्टिकोण भी इस सन्दर्भ में देख लेना आवश्यक है । वे यह मानकर चलते हैं कि पहले 'काव्य एक छोटे से समाज की थाती थी। उस समाज के सभी सदस्यो का जीवन एक रूप होता था, अत उनकी विचार सयाजनाओ के सूत्र भी बहुत कुछ मिलत जुरते थे कोई एक शाद उनके मन में प्राय समान चित्र या विचार या भाव उत्पन्न करता था । आज काव्य के पाठको को जीवन परिपाटिया म घोर वैपम्य आ गया है। एक ही सामाजिक स्तर के दो पाठका की जीवन परिस्थितियां इतनी भिन्न हो सकती हैं कि उनकी विचार सयो, जनाओ में समानता हो ही नही । ऐसे श द बहुत कम हैं जिनम दानो के मन में एक ही प्रकार के चित्र या भाव उदित हो। यह आज के कवि की सबसे बड़ी समस्या साधारणीकरण और कम्यूनिकशन (निवेदन) की समस्या है । और कवि को प्रयोगशीलता की आर प्रेरित करन वाली सबसे बड़ी शक्ति यही है।" [४] भाषा की अपर्याप्तता इस प्रसग में अज्ञय जी का क्थन है कि-"भाषा को अपर्याप्त पाकर विराम सकेतो से अको और सीधी-तिरछा लकीरा छोटे बड़े टाइप से, सीधे और उलटे अक्षरो से लोगो और स्थानो के नामा से, अधूरे वाक्यो से सभी प्रकार के इतर साधनो से कवि उद्योग करने लगा कि अपनी उलझी हुई सवेदना की सृष्टि को, पाठकों तक अमुण्य पहुँचा सके।
१३२ । आधुनिर काय प्रवत्तियां एक पुनमू याक्न [५] उलझी हुयी सवेदनायें अपने जीवन की उलझी मवेताओं की अभिव्यक्ति में कवि को पूरी सफलता नहीं मिली- जहा वह पाठक के विचार सयोजक सूत्रो को नहीं छू सका, वहा उसे पागल, प्रलापी समझा गया या अय का अनथ पा लिया गया । बहुत से लोग इस बात को भूल गये कि कवि आधुनिक जीवन की एक बहुत बड़ी समस्या का सामना पर रहा है-भाषा की क्रमश सचित होती हुई सतक्ता की चुल पाडकर उसमे नया अधिक व्यापक अधिक सारगर्भित अथ भरना चाहता है और अहकार के कारण नहीं इसीलिये कि उसके भीतर इसकी गहरी माग स्पदित है इसलिये कि वह “यक्ति सत्य को “यापक मत्य बनान का सनातर उत्तरदायित्व अब भी निभाना चाहता है।' [६] जीवन की जटिलता उन्होने भापा समस्या को आधार बनाकर इस क्षेत्र में व्याप्त अस्पष्टता दुर्बोधिता आदि के विषय म भी अपना वक्त य दते कहा कि 'जीवन को जटिलता को अभियक्त करने वाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ अलौकिक' अथवा दीक्षा द्वारा गम्य (Croteic) हो जाना अनिवाय है किंतु वह उनकी शक्ति नही विवशता है धम नही आपदधम है। इनस Tोई पूछे कि कवि अपनी विशेषतालो को क्या समझ पाय है ? यदि समझ गय है तो वे क्या नही स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करते, क्यो नहा अपन अनुभूत सत्य को स्पष्ट रूप स व्यापकता में लालते । जटिलता को जटिन अलौविक रूप म प्रस्तुत करना-ववि धम न हैं यह उनकी विवशता नही, दष्टि बोध की कमी है फिर जटिलताए भी क्या हैं, जरा उनका भी स्वरूप उन्ही के शब्दा म दखिए- [७] यौन वजनायें आधुनिक युग का साधारण यक्ति यौन वजनाओ का पुज है । आज के मानव का मन यौन पल्पनाओ से लदा हुआ है और सब कल्पनाय दमित और कुठित हैं 1 उपमान सब यौन प्रतीकार्थ रखते हैं। और इस आतरिक सघप के उपर जसे काठी वसकर एक वाह्य सघप भा बठा हुआ है जो पक्ति और व्यक्ति का नही यक्ति समूह और यक्ति ममूह का वर्गों और श्रेणिया का सघप है। व्यक्तिगत चेतना के ऊपर एक वगगत चतना भी नदी हुई है और उचितानुचित की भावनाओ का अनुशामन करती है जिसस एक दूसरे प्रकार की वजनाओ का पुज खडा होता है और उनके साथ ही उनके प्रति विद्रोह का स्वर जागता है।' यह वक्त य युग अतश्चेतन के विश्लेषण को छाया है । अनय जी के अनुसार यौन पुजो और वगचेतना के संघर्ष की जटिलता ही यक्ति का सत्य है । उनके ही शौं म कवि का यह क्थ्य उसकी आत्मा का सत्य है । यह भी कहना ठीक V प्रयोगवाद | १३३ होगा, कि वह सत्य व्यक्तिवाद नही, व्यापक है और जितना ही व्यापक है उतना ही काव्योलपकारी है ।" जब अनेय जो की दष्टि से दमित कुण्ठित काम वासनाओ की 'सामूहिक अचेतन' से सथप की जटिलता को ही जटिल, दुर्बोध, अलौविक वाणी मे प्रकट करना-कवि धम है तो इस सदम मे मुझे कुछ नहीं कहना । [८] प्रगतिशीलता का काव्य यहां हम अज्ञेय जी की एक प्रयोगवादी कविता प्रस्तुत कर है हैं जो उनके कवि सत्य की हम सही सही सूचना देगी जिसकी वे इतनी वकालत कर रहे हैं । इस प्रसग मे उनको 'धेयधन गन्हा वाली कविता बहुत उद्धत की जाती है किंतु 'बाहु मेरे रुके रहे' शीपक रचना भी क्या बुरी है-इसमे उनका 'सुरति श्रम" देखिए- क्सिी सूनी वाटिका की दूब से आवत विस्मृता सी, स्मरण की नीरव उसासो के सिरिस से परस से भी सिहर सकुचाती बीथिका के उभय तट मालच से अवलम्बिता दो लताओ के प्रलम्बित अकुरो स प्राण दोनो के व्यथ करके शब्द पदाथ को स्वर को भूलकरके प्रस्फुटन, विक्सन, फलागम अहेतुक आश्वासना से बस, झुके रहे। बाहु मरे घेर कर तुमको रके रहे। यहाँ साधारण श दो और प्रतीको वे प्रयोग में कवि की विवशता देख लीजिए यदि वह ऐसा करता तो लोग उसकी काम-कुठाओ का समझ लेते और समझ लेते तो जटिलना कहा रहती? आधुनिक जीवन में उसका रहना परमावश्यक है। केवल इसलिए अनेय जी ने यहाँ श्रमसाध्यता के द्वारा, नये प्रतीका शब्दों और पदो को गढ़ कर अपने कवि-सत्य की रक्षा को है। यही उनका साधारणीकरण प्रेषणीयता और कम्युनिकेशन का रहस्य है। इसी सग्रह में कुछ ऐसे कवि भी हैं जिह यह कवि-सत्य, और कत्थ इष्ट नहीं । जो इस प्रकार के काय को या तो उच्छवास कहते हैं या Patterns, जो जीवन की प्रगतिशीलता में आस्था रखते हैं और उसका अथ-कलाकार के व्यक्तित्व को सामाजिकता म देखते हैं व्यक्तित्वहीनता मे नही जिहे मनुष्य के मानवीय रूप से प्रेम है पशु रूप मे नहीं। जिनमें जीवन की भौतिक परिस्थितियों १ हम लोगो का एक मात्र श्रम है-सुरतिश्रम, उस अन्त्यज का एक मात्र सुख है-मथुन सुख-'वग भावना' । 3 १३४ / आधुनिक काय प्रवत्तियाँ एक पुनमूल्यांकन और मन स्थितियो को मोडने और उनसे उपर उठने की शक्ति है, उनमे रमने की विवशता और अशक्तता नहीं जो जीवन की जटिलताओ को खुलवर कहते हैं उन पर अस्पष्टता का चिलमन नही डानत जो ऊपरी अहम यना ना सा स्वरूप जानकर पुकारवर कहते हैं- अपने मन का पहचान गया है वह स्वरूप लगता है वितना पोछा अपना क्षुद्र प्यार क्त्तिना दुबल बाना है अपना अहवार । -नेमिचद्र ममता के बधन ।। नेमिचद्र भारत भूषण अग्रवाल प्रभाकर माचवे, गिरजाकुमार माथुर और रामविलास शर्मा इसी श्रेणी के कवि हैं । नेमिचन्द्र जी का कथन है कि जिस दिन कवि सचेष्ट भाव से अपनी चेतना को पूणरूप से सामाजिक बना सकेगा, उस दिन कविता फिर अपने प्राकृत रूप मे निखर उठेगी। भारत भूषण अग्रवाल केवल मावस वाद को ही उन्नति का रहस्य मानते हैं कि तु उन्होने अपने को स्वप्नदर्शी और पला यनवादी कहा है । उन्होने लिखा है कि ससार को मचा मानकर उसम कम करना क्योकि वास्तविक क्षमता और सामथ्य का अपक्षा रखती है, इसलिए मैंने कवितायें लिखकर माना रवप्न में अपनी अभिलाषायें पूरी की और ससार को मिथ्या सिद्ध क्यिा । कम से पलायन ही मेरी कविता का स्पदन रहा। जापकी प्रयोगशीलता का एक उदाहरण यहा दिया जा रहा है- नव विचार, नव नान रीति, नित-नित नवीन जोवन के स्वर पर प्राचीना अब भी है वाणी की वीणा इतना ही नहा- अप्सरा बना डाती तूने षोडष-वर्षीया रूपवती वह पढ़ी लिखी लडकी पागल तू सुनता रहा मधुर नूपुर ध्वनि यद्यपि बजती थी चप्पल । अपने कवि से [९] माषा की अनगढ प्रयोगशीलता उपयुक्त कविता में आधुनिक अघी प्रगतिशीला पर व्यग्य है। 'वाणी की वीणा' अच्छा प्रयोग है किंतु इसकी तुलना मे 'मधुर नुपुर ध्वनि को चप्पल ध्वनि मे सुनना सुरुचिपूर्ण नही है। विशेषता यह है कि अस्पष्टता, दुर्बोधता भावाभिव्यक्ति मे बटिलता कही नहीं मिलती। यही वस्तु प्रभावर माचवे की रचनाओ म मिलती ८ प्रयोगवाद / ९३५ हैं। वे 'कविता और पाठा के बीच में सीधा भाव विनिमय' मानने के पक्ष मे हैं। उनके अनुसार "व्यक्तिगत जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जो अत्यधिर सामाजिक आशय से गभित रहत हैं। उनम मानव और प्रकृति, प्रकृति और सस्कृति के सतत सघप के गति चित्र ऐसा अशाक्न होता है कि उसकी पुनरावत्ति असम्भव है । पविता गत मौलिकता का अप यहा अशावन है। वह अशावन है सामाजिक परिपाश्व में व्यक्ति की मानसिक प्रभाव प्रक्रिया वेदना-सवेदना, प्रगति-अति आदि का प्रामा णिक बिम्ब-चित्रण ।' शत-शक्तियो म अभिधामूला लक्षण की अपेक्षा वे व्यजना शक्ति पर विशेष आस्था रखते हैं। भाषा मे नय प्रयागो के वे ममथक हैं और इस क्षेत्र में निराला', 'नवीन' तथा नरेन्द्र शर्मा का अपना आदश मानते हैं। व्यजना शक्ति को महत्ता तथा प्रगतिशील दष्टिकोण को अपनाकर चलने के कारण आपने व्यगो की रचना में विशेष सफलता प्राप्त की है-'दशोद्धारको से' शीर्षक रचना का कुछ अश उदाहरण रूप म यहाँ देखिए- बाहर अध नग्न पीडा भीतर जीडा लबरज हरम करुणा के जागन में नेता दे थोडी सी भेज शरम । यहा करुगा के आगन म थोडी सी शम' भेजने का नवीन शोभन, सवेद्य और प्रगतिशील प्रयोग है । पर सामा य रूप से माया-योजना अनगढ ही है। [१०] हल्के रंगों के आवरण से युक्त चिन विधान गिरजा कुमार माथुर वस्तु विधान का अपेक्षा टेक्नीक को विशेष महत्त्व देवर चलते हैं । प्रथम तार सप्तक के कविपो मे शिल्प योजना पर इहाने ही गम्भारतापूर्वक विचार किया है। स्वयं अपने चित्र विधान की विशेषतानी को उदघाटित करत हुए आपन लिखा है कि वातावरण के चिक्षण म मैंने डिटेल ( Detail ) मे रगो का आधार विशप रूप से रखा है कितु मैं चित्र को सदा हल्के ग्गो की छाहो के आवरण मे लिपटा पसद करता है क्योकि यथाय चित्र के सभी डिटेल में क्ला की दूरी से देखता रहा हूँ। मेरा यह विश्वास है कि अत्यधिक गहरे रगो का प्रयोग क्ला म प्राचीनता (Mediaeval Frast) का द्योतक है। क्लासीक्ल विषया पर गभीर सली. ( Grand Sagle) मलिको भविताओम मैंग गहरे रग प्राचीनता लाने के लिए रक्खे हैं । यहा मैंने आधारभूमि विशालकाय कर दी है और डिटेल कम । डिटेल मैंने रोमानी कविताआ मे ही अधिक भर हैं। माथुर जी ने शब्द-याजना पर भी प्रकाश डालते हुए लिखा है कि वे रोमानी कविता वा हि दुस्तानी के छोटे और मीठी ध्वनि वाले शब्दो म निखना पसन्द है और बलासीवर कविताओ में आयगुण (Aryanism) लाने के लिए रागा १३६ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्यावन और गभीर ध्वनि याले शब्द रखते हैं। इस प्रकार वे श वियास वे पातावरण को रूप भावानुकूल बनाने के पक्ष में हैं। यहाँ हमने एक विशेष अभिप्राय से उनको चित्र और शन्न विधान सम्बन्धी मा यतायों को प्रस्तुत किया है । वह अभिप्राय कवि की प्रयोगमूलक दृष्टि से अनुबधित है । यह नये प्रयोग न केनवादियों की भांति अनगढ़ या मात्र प्रयोगो लिए न करके वस्तु व्यजना के परिवेश और प्रकृति को व्यजित करने के लिए ही करता है। इस भूमिका पर माथुर जी ने जितने भी नय प्रतीक विम्ब या शब्द प्रयोग क्यि हैं, वे विशेष रूप से मार्मिक और रोचक हैं । यह फूल चादनी, रूप प्यार आंसू के अनगिन ताजमहल की ठहरी गूंज असम्भव सपनो की सुन्दर मिठास स्रष्टा तक मिटता कलाकार मिटने से पर गीता के इन पिगमिडो इन धौलागिरि सुमेरुआ पर मिट जाती स्वय मत्यु आकर । अधूरा गीत । यहा इम प्रगीत में आँसू के अनगिन ताजमहत रागो की ठहरी गूज गीतो के पिरामिडो धौलागिरि सुमरुआ पर मत्यु वा मिटना मुटर मिठास' आदि नवीन प्रतीक प्रयोग हैं। ये अपनी सकेतमयता, प्रकृत और ऐतिहासिक विशेषताना से अधूरे गीत की जथगमता को विज्ञापित करने मे समथ हैं। इसी प्रकार उनक अन्य प्रगोता म वायु की सामो भरी एकात खिडकी ठडा द्वीप -कवि की मन स्थिति को उनासी निराशा व्याकुतता स्मृति विरह दग्धता आदि सचारिया की सूक्ष्म अभिव्यजना में सुदक्ष हैं। एसे प्रयोग हमे माथुरजी के पहले प्रगतिवान और छायावादी कविया म भी नहीं मिलते। [११] मुक्त छद का नया तन श्री माथुर जीव मुक्त छद सम्बधी विचार भी प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि मुक्त छद का मने सम्पूण विधान रचा है ! मुक्त छद को दो भागो मे विभक्त किया है-वणिक और मात्रिक तथा इनके रूपा तर । वणिक में मैं कवित्त के विरामो को उनक रूपान्तर सहित लेकर चला है। यह आवश्यक नहीं रक्खा कि कवित क पूण विरामा पर ही पक्ति समाप्त हो अपितु अध विराम भी शुद्ध माने हैं जब तक वे अनुच्चरित वण (Unaccented Syllable ) पर समाप्त साथ और 'रातो जगा सूना पलग यहां हम प्रयोगवा ! १३७ न होकर उच्चरित (Accented) पर समाप्त हात हो। इस भाति कवित्त व दिरामा का लकर क्तिने ही प्रकार की मुक्त छत पक्तियों निर्मित की हैं। सवये के विरामी पर स्थित एक नय प्रकार का बहुत सगीतमय मुक्त छर लिखा है--( आज है बेसर रग रग का)। एक कविता में एक प्रकार का मुक्त छद प्रयुक्त होना आवश्यक सम झता हू। यदि उच्चरित वण वि पास (Syllable) से पक्ति आरम्भ हुई तो समस्त पक्तियां उच्चरित से हो प्रारम्भ होनी चाहिए । विरामात पक्तिया म यह नियम अनि वाय कर दिया है। धारावाहिनी पक्तियो में भी प्रथम पक्ति का अघ विराम द्वितीय पक्ति में लेने का नियम रक्खा है। पक्तियों के विरामो की ध्वनि मानायें पूणत सम एव शुद्ध होना अत्यत आवश्यक समझता हू। इन नियमो के विरुद्ध लिखा गया मुक्त छद अशुद्ध मानता हूँ। इम लम्ब उद्धरण का हमन कवल यह प्रदर्शित करन के लिए उद्धत किया है नि प्रयोगवाती वह जाने वाले कवि मुक्त छन्दा का सचेष्ट प्रयोग करत हैं। इस सम्बन्ध म व अपने पहल स कतिपय विशिष्ट नियम बनाकर चलते हैं। तात्पय यह कि इनके छन भावनाओ के मांचे म ढले न होकर पहल से निर्धारित नियमो के अनु सार बन है । माथुर जी ने अपने मुक्त छ द के त न म ही कविताएँ ढालने का प्रयास दिया है अथात छन्द प्रमुख और वस्तुगत सवेदनाए गौण हा गई हैं। ऐसा सवय हुआ है एसा मरा न ता कहना है और दुराग्रह ही है, वही कही ऐसा अवश्य हुआ है और माथुर जी अपन मुक्त-छन् विधान के सकल्पबद्ध आग्रह म् मूल वस्तु की उपक्षा वर वठ हैं। इस प्रकार प्रयम तार सप्तक में सबसे अधिक काय करा-पक्ष की बारीकिया पर मायुर जी ने हा ध्यान दिया है । (१२) नान सीरियस तार सप्तक के छठे कवि रामविलास शर्मा हैं। आप पहले प्रगतिवादी समा नोचक हैं बाद में इसा काव्य धारा के एक कवि । आपकी सारी कविताएँ पढन पर कवि का आत्म कथन सिद्ध हो जाता है विवह इन कवितामा की रचना म 'सीरियस नहीं रहा। इस सग्रह म सालिन प्राय सभी कविताए प्रगतिवादी हैं। जिनमे कही कवि क्राति का फमत काटन का स्वप्न दखता है (काय क्षत्र) और वही जन सत्ता की विशाल नगरी निमाण करन का उदबोधन देता है (कवि)। चांदनी, 'प्रत्यूष के पूध बता मिलहार गुरुदेव को पूण्य भूमि म' आदि रचनायें वणनात्मक है। य सामा य है, विशषता कुछ नहीं है । सत्य शिव सुदरम में मामिक व्यग्य है । इसी म इक्निाव जितावाद वदेमातरम और हाथी घोडा पालकी जय हैयालाल की जमी ध्यग्य और हास्य परख पदावलो का प्रयाग किया गया है। परिणति मे कवि की प्रत्येक अनुभूति म आत्मा का बाध किया है और 'इंडिया का ताप', १३८ / जाधुनिक काव्य प्रवृत्तियां एक पुनमू ल्याक्न किसान कवि तथा उसका पुत्र' समुद्र के किनारे आदि रचनाआ में यह विनापिन किया है कि दुप के इम कोसाल में 7य का स्वर ही ऊंच उठ रहा है मागर की प्रत्ये लहर सामा के यवन ताड रही है। उनकी पत्तिया इस प्रकार हैं दुख के इस हह हहर म भी ऊचा उठता है जय का स्वर, सीमा ६ वधन ताड रही है सागर की प्रत्येक लहर । शमा जी नी सभी रचनायें विचार प्रधान हैं और उनके प्रगीता म प्रगतिवादी गद्यात्माता भी निहित है । वतमान जीवन के प्रति असतोष और भविष्य म आस्था के स्वर ही प्रमुखत उनक प्रगीता से मुखरित हात हैं । प्रगतिवादी चेतना और काव्य के विषय म बहुन कुछ कहा जा चुका है नतएव यहां उसकी पुनरुक्ति करना दोष माना जायगा। इम सप्तक के अन्तिम कवि अज्ञय हैं । आपके विषय में कछ नर्चा हम प्रारम्भ मे कर चुके हैं। प्रारम्भिक कवि मक्ति बाध और अतिम अनेय-दो ही इस सग्रह के ऐम कवि हैं जिन्हे हम प्रयागशीत कवि वह सस्त हैं। शेष सभी प्रगति वाली मना-ष्टि को लेकर चनन हैं। (१३) प्रयोगवाद एक अयोजनाबद्ध आदोलन हिंदी साहित्य में जा यह प्रवाद पर पड़ा है कि प्रथम तोर' सप्तक स प्रयागवाद का प्रारम्भ हुआ, यह मिथ्या है । वस्तुल जनय जी इस प्रकार की रचनाआ के समान हैं । आरम्भ में उनका इस प्रकार का कोई दष्टि कोण भी नहीं रहा । द्वितीय तार सप्तव की भूमिका में उगने जिस बात पर मबस अधिक धुमा फिराकर चचा की है वह यही है कि प्रयागवाद के प्रवत्ता का बाय मेरे मत्ये मन्ना मरे साथ लयाय करना है मैंने उसका प्रवतन नहीं किया। हम भी यह स्पष्ट रूप स मानते हैं कि योजनाबद्ध रूप से अनय जा । प्रयागपाद का प्रवतन नही दिया । वस्तन १९३६ ई० म जब लदन म अतिययाथवाटी चिना की प्रदशनी हुई थी उमा चर्चा विश्व स्तर पर समाचार पत्रों म भी हुई पी उसी समय के जास पास नलिन विलोचन शर्मा ने प्रतीक बहुल कुछ रचनायें लिखी थी। धीर धारे प्रतीकों की बहुलता के प्रति नये कवि आकृष्ट हुए और व पाश्चात्य जत्याधुनिक विचारधाराओं से प्रभावित रचनाय लिखन लगे। इस काय मे उनके वयक्तिक जीवन की असतोप पूण मन स्थिति निराशा उनासी और अतृप्तियो न भा याग दिया, फ्नत जिन प्रतीका का उहान प्रयोग दिया व वौद्धिक स्पष्ट और यौन भावनालो से सम्बधित हो गये । इस प्रकार की पवेषणशीलता और प्रयोगमूलफ्ना अज्ञेय जो प्रयोगवाद | १३६ तथा मुक्ति वोध जी के काव्य म पहले अधिक दिखाई दो, अतएव इनके माध्यम से प्रयोगवाद का प्रवतन भले न हुआ हो पर सूत्रपात अवश्य हुआ है जिसे कोई अस्वी कार नहीं कर सकता। प्रथम तार सप्तर हिदी साहित्य में विशेष चर्चा का विषय रहा है और अज्ञय जी के काव्य को देखकर लागा न इम प्रयागवाटी मनावत्ति की तीव्र निंदा और विरोध किया है । अनय जो न इसीलिए द्वितीय तार सप्तक की भूमिका मे लगाय गय प्राय सभी आरोपो वा खण्डन कर अपनी सफाई पश की है। दूसरा सप्तक (१९५१ ई०) [१४] प्रयोगवाद आत्म सत्य का अ वेपण प्रयोगवाद के सदभ में अज्ञेय जी कहते हैं कि प्रया का काई वाद नहीं है। हम वादा नहीं रहे नहीं है । न प्रयोग अपने आप म इप्ट या साध्य है। ठीक इमी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं है कविता भी अपने आप मे इष्ट या साध्य नहीं है । अत हम प्रयोगवादी' कहना उतना ही साथ या निरथक है जितना हम कवितावादी कहना' । उनका कहना है कि कवि आत्म सत्य का अवपी है, बविता भात्माभिव्यक्ति करने का माध्यम है । इस माध्यम को अपनी आवश्यकता के अनुरूप श्रेष्ठ रूप में प्रयुक्त करने का उसे पूरा अधिकार है । वे यह भी कहते हैं कि बिना माध्यम की विशेषता उसकी शक्ति और उसकी सीमा का परखे और आत्मसात किए उस माध्यम का श्रष्ठ उपयोग हो ही नही सक्ता । उपयुक्त दोना वक्तव्य ही ऐसे हैं जिनस साहित्यिक जगत म मतभेद नही रखा जा सकता। कविता का कोई वाद नहीं होता, यह बात भी सच है और वह माग्यम है, इस भी स्वीकार करने में हिचक नही होनी चाहिए पर प्रश्न यही समाप्त नहा हा जाता। कविता का लारजनकारी स्वरूप भी कुछ होता है । वयक्तिक्ता और प्रतीक बहुलता उसके नित्य लक्षण नहीं उसका अस्तित्व कवि सापेक्ष न हाकर जन-सापेक्ष है, अतएव कविता रूपी माध्यम एसा हा जो मूत वस्तु को आवत न करके उस स्पष्टतापूर्वक और सुगम रीति से पाठमा तक पहुँचा सके । जनेय जी इस पक्ष की ओर दष्टिपात नही करत जबकि उनकी आलोचना का दष्टिकोण उनक काव्य का यही पक्ष विशेष रहा है। [१५]पराम्परा एक गहरा सस्कार परम्परा की चर्चा करते हुए आय जी वहत हैं कि 'जो लोग प्रयाग की निदा करने के लिए परम्परा की दुहाई देते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि परम्परा, कम से कम कवि के लिए, कोई ऐमा पोटली वाधकर अलग रखी हुई चीज नहीं है जिसे वह उठाकर सिर पर लाद ले और चन निकले । (कुछ आलाचका के लिए भल ही १ दूसरा सप्तक, भूमिवा पु० ६। २. तदेव ।
१४०/ आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एव पुनमूल्योक्न . जैसा हो ।) परम्परा का नवि के लिए कोई अथ नहीं है, जब तक वह उस ठोर बजाकर तोड मरोडकर देखकर आत्मसात नहा कर लेता, जब तक वह एक इतना गहरा सस्कार नहीं बन जाती कि उसका चेष्टापूवा ध्यान रखकर उसका निर्वाह करना आवश्यक न हो जाय । कवि तो निरकुश हात हैं वे स्वय अपनी लीक और परम्परा का स्वय निर्माण करत हैं यह एक मामा य तथ्य है। परम्परा एक जड नही समाज के साथ क्रियमाण वस्तु है। प्रश्न पुरानी परम्परा के त्याग से उतना मम्बधित नहीं है जितना नई बनन वाली परम्परा के समाज द्वारा ग्रहण से अनुबधित है। कोई भी चार कवि या साहित्यिक मिनकर नई परम्परा का निर्माण नहीं कर सकते, नई परम्परा वह है जो जनता द्वारा जात्मसात कर ली जाय यदि वह जन सामा य के द्वारा समर्थित और गहीत नही होती तो वह व्यक्तिक विचार धारा हो सकती है परम्परा का स्वरूप धारण नहीं कर सकती। यहां कई प्रश्न एक साथ उठाये जा सकते हैं । क्या सामा य जनता को नई मस्कृति का प्रतिमापक माना जा सकता है सामा य जनता का अर्थ क्या है ? क्या यह सम्भा नहीं है कि तत्कालीन समाज नयी परम्परा को न समझ सर पर कुछ समय में लोग अपन सस्कारो का परिमाजन करके उसे ही मा यता देने लगें? इस प्रश्न को अज्ञय जी ने भी उठाया है और छायावाद क उदाहरण दिया है। अपन प्रौढ और वभवकाल मे छायावादी काव्य जनता द्वारा ग्रहीत नही किया गगा कि तु वही बाय आज महत्वपूण और अपूर्व माना जान लगा है। क्या प्रयोगवादी काव्य के विषय में भी यह बात सत्य नही हो सकती? इस अतिम प्रश्न पर हम किचिन गहराई में जाकर विचार करेंगे । छायावाद का प्रमुख विरोध हुआ था उसकी छगत स्वच्छ दता, परम्परा से हान प्रस्तुत योजनाओं तथा नूतन पदावलियो । कारण । विधि कर्ताओ म द्विवेतो युगीन सस्कारों के यक्ति और आचाय 4। ये काय को उपयोगिताबाद की कसौटी पर देखना चाहते थे पर छायानाद म भावात्मक सौदर्य का निरूपण प्रमुख माना गया था स्थूरता का परित्याग करक सूक्ष्मता वायवीयता पर मानवीकरण की प्रत्तियो के साथ आत्माभिव्यक्ति को सर्वाधिक महत्व दिया गया था। एक दष्टि से काय क वस्तु और शिल्प दोना ही परम्परागत पक्षों का छायावादी काय मे कायाकल्प हुआ पर क्या उसकी मल मवदना बदली? परम्परामिद्ध भावात्मकता के स्थान पर कोद अ य वस्तु आई ? उत्तर है नही। पात, और शाखायें बदनी हैं पर जो मूल वस्तु रसात्मकता है उसका तिरोभाव कभी नहीं हुआ। [१६] बुद्धि रस प्रयोगवादी रसात्मकता की जगह बुद्धि रस की अनोखी बात करते हैं । बुद्धि एस की भास्वादनीयता के लिए अभी तक हमारे सस्कार नही बने, हो सकता है आगे प्रयोगवाद /१४१ - बन जाय या स्वय यह वम्त जन निरपेक्ष हाकर मर जाय, जो कुछ भी हा, जव तक हमार सस्कार नही बले, जब तक हम प्रयोगवादी काव्य पढन स किसी प्रकार का आह्लाद प्राप्त नहीं होता, एक बार से द्वितीय बार पढन की इच्छा नहीं होती, तब तक ता हम इस विलक्षण वस्तु का विराध निस्सकोच भाव से कर सकते हैं । जहा तक इसके वस्तुगत और कलागत उपकरणो का प्रश्न है यदि इनम किंचित भी सवेदनशीलता है अथ स्फीति का सामथ्य और श्लीलता है, तो हम ऐसे प्रयोगो का सहप स्वागत करेगे । हम अज्ञेय जी के इस क्थन से पूणत सहमत है कि "प्रयोग निर तर होत आये हैं और प्रयागो द्वारा ही कविता या कोई भी क्ला, कोई भी रचनात्मक काय, आगे बढ सका है। किंतु यहा प्रयाग का अथ रचनात्मक काय से ही है, असफल प्रयोगो से नही सफ्न प्रयोगो से है जिसे स्वप अनय जी स्वीकार करत हैं । प्रयोगवाट का जब भी विरोध क्यिा जाता है, तब उसके सफल प्रयोगा के कारण नहीं, प्रत्युत असपन प्रयोगो के कारण ही किया जाता है । १६४३ स १९५३ ई. तक प्रयागवादी रचनाआ का प्रयागकाल रहा है, जब असफल प्रयोग अधिक और सफल बहुत कम हुय है । १९५३ ई० के आसपास नयी कविता प्रयोगवाद की प्रोड स पना हुई जिममे प्रयोगो का नयापन है किंतु उनमे साथक्ता अधिक असाथवता कम है । स्वय अनेय जी क काव्य में इस तथ्य के प्रमाण मिलते है । नयी कविता के समी क्षको तथा कविया ने भी स्वय प्रयोगवाद की १० वप की यह जीवन यात्रा प्रयोग- मूलक ही मानी है ।। [१७] प्रयोग एक दुहरा साधन अनय जी ने स्पष्ट लिया है कि प्रयोग का हमारा कोई वाद नहीं है। प्रयाग अपने आप मे इप्ट नहीं है वह साधन है और केवल प्रयोगशीलता ही किसी रचना को काव्य नहीं बना देती। इसी और ऐसे कई आधारी पर व अपने थापको प्रयोग वादी' कहलाना पसद नही करत । किंतु प्रयोगवाद नाम अप इतना अधिक साहित्य म प्रचलित हो गया है कि काई अब उसे मिटाना भी चाहे तो असम्भव है । फिर इस नाम की कुछ दूरी तर साथक्ता भी सिद्ध की जा सकती है। स्वप अनय प्रयाग को काव्य का दुहरा साधन' मानते हैं । उही र शदा म 'प्रयोग द्वारा कवि अपने सत्य को अधिक अच्छी तरह जान सकता है, और अधिक अच्छी तरह अभिभ्यक्ति कर सकता है । वस्तु और मिला दानो हो क्षत्र म प्रयोग फ्ल प्रद होता है। जब प्रयोग की इतनी अधिक महत्ता है तो निश्चित रूप स ववि को कवि सत्य जानने क पूर्व प्रयोग सत्य जानने वाला बनना पड़ेगा। इस तरह न सही 'प्रयोगदादी' पर प्रयोग की बतु ल परिधि के बाहर वह नहीं जा सकता। प्रयोग से इसे युक्ति नहीं, फिर वह प्रयोगवादी नहीं तो और क्या हुआ ? देवल प्रयोगशीलता ही इन पविया के बाध्य १४२ / आधुनिक याय प्रवत्तिया एव पुनमूल्यापन का सृजन भले 1 करे पर पिना प्रयागशीलता के वे एक पग लागे भी नहीं बढ सक्त । ऐसी स्थिति म उह वाई प्रयागयादी कहता है तो चिढना नहीं चाहिए । हम कुछ दूर तक ही जनय जी वा यह क्यन ठीक मारते हैं कि 'प्रयागा या महत्त्व वर्ता के लिये चाहे जितना हो सत्य का योज, लगन उसम चाहे जितनी उत्कट हो सहृदय के लिए वह सब अप्रासगिक है। किंतु यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कवि सत्य का जानने का साधन होने के कारण प्रयोग तो इस काव्य की रचना प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग ही बन जाता है, सहृदय को भी पहले प्रयोग की आत्मा ही समझनी होगी तभी वह कवि सत्य के स्तर तक पहुंच सकता है, बिना प्रयोग को समझे कवि सत्य का आस्वादन सम्भव नही पिर गहीता पक्ष में भी प्रयोगा वा उपक्षणीय कस मान लिया जाय। अनेय जी प्रयोग का महत्व न देवर उसक' द्वारा की गई शोधा के परिणाम को देते हैं । वे यह भी कहत हैं कि अभी हम अ वेपी है बवि सत्य के खोजा हैं। उन्ही की इन उक्तियो को आधार बनाकर हम-यह निष्कप सरलतापूर्वक निकाल सकते हैं कि उन इस प्रारभिक काय मकवि सत्य का अभाव है और-असफ्न प्रयोगो की अधिकता है क्र्ता के लिय इनवा जितना चाह महत्व हो सकता है किंतु सहृदय के निक्ट ये सब अप्रासगिक है। [१८] साधारणीकरण अतविरोध जनेय जी साधारणाकरण का भी प्रश्न उठाते हैं और कहत है कि न केवल सप्तक के कवि उस मानकर चलत हैं प्रत्युत इसी से प्रयागो की आवश्यक्ता भी सिद्ध करते हैं। उहाने लिखा है कि युग के साथ राग वही रहने पर भी रागात्मक प्रणालिया बदल गई हैं। उनकी दष्टि से इसलिये आज साधारणीकरण की पविक लिए महान समस्या है। या तो वह यह प्रयत्न ही छोड दे सीमित सत्य को सीमित क्षत्र में सोमित मुहावरे के माध्यम से अमि यक्त करे-यानी साधारणीकरण ना करे पर साधारण का क्षेत्र सकुचित कर दे-अर्थात एव अतविधि का आश्रय रे या फिर वह वहत्तर क्षेत्र तक पहुचने का आग्रह न छोड और इसलिये क्षेत्र के मुहावरे से वधान रहकर उसस बाहर जाकर राह खाजने का जोखिम उठाय । इस प्रकार वह साधारणी करण के लिए हा एक मवुचित क्षेत्र का साधारण मुहावरा छोडन को बाध्य होगा- भथात एक दूसरे अतविरोध की शरण लेगा ?--इसी द्वितीय-अविरोध का वरण करना अनय जी कधि के लिए आवश्यक मानते हैं । इसी को वे एक उदार और यापक दष्टि भी कहते हैं । वस्तुत यह निरूपण एक काल्पनिक दस्तु है कवि के सामने यति नये युग के अनुस्प बाई साधारणीकरण की समस्या है तो उस उ होने अपने दुर्योध प्रयोगों के माध्यम से सुलझान की जगह उस उलझाई ही ज्यादा है।
प्रयोगवाद | १४३ [१९] शब्द की नयी रागोत्तेजक शक्ति की खोज वे भापा के प्रश्न का भी छेरते हैं और कहते हैं कि निरतर प्रयोग से शब्दो का 'चमत्कार मरता रहता है और उनका चामत्कारिक अथ अभिधेय बनता रहता है। या कह कि कविता की भापा निरतर गद्य की भाषा होती जाती है ! इस प्रकार कवि के सामने हमेशा चमत्कार की सष्टि की समस्या बनी रहती है-वह श दो को निर तर नया सस्कार देता चलता है और वे सस्कार क्रमश सावजनिक मानस में पठकर फिर ऐस हो जाते हैं कि-उस रूप म-कवि के काम के नही रहत ।' कवि नित्य नये शब्दा का प्रयोग करे, पर शब्द भी तो साधन है, उनका लक्ष्य चमत्कार की सप्टि करना नहीं हैं जबकि प्रयोगवादी कवि शब्दो के साथ चमत्कारिक क्रीडा करते हैं । उहोने यह भी लिखा है कि 'जब चमत्कारक अथ मर जाता है और अभिधेय बन जाता है तब उस शब्द की रागात्तजक शक्ति भी क्षीण हो जाती है। उस अथ से रागात्मक सम्बध नही स्थापित होता । कवि तव उस अथ की प्रतिपत्ति करता है जिससे पुन राग का सचार हो पुन रागात्मक सम्म ध स्थापित हो । साधारणीकरण का अथ यही है। किंतु साधारणीकरण का यह भ्रामक निरूपण भी है। साधारणीकरण के लिए आवश्यक यह नहीं होता कि अनजान नये दुर्बोध प्रतीको और नय अप्रस्तुता वी भीड खडी कर दी जाय यह काय वौद्धिक व्यायाम की जरुरत रखता है, जब तक उन प्रतीका और नय प्रयोगो का अथ न समझ लिया जाय तब तब उनके साथ साधारणी करण हो ही नहीं सक्ता इस प्रकार यहाँ साधारणीकरण भावात्मक नही प्रत्युत एक बौद्धिक प्रक्रिया हो जाती है । साधारणीकरण के लिए आवश्यक होता है कि प्रतीको या नय प्रयोग सुपरिचित हो वे परम्परा से छिन्न भिन्न न होकर उससे अनुबधित हो, वे वयक्तिक न होकर सावजनिक हा वौद्धिक न होकर भावात्मक हो, तो उनके साथ जनता या सहृदय वग जल्ला ही तादात्म्य स्थापित कर सकता है । सुगेय गीतो तथा राष्ट्रीय गाता म इसी प्रकार के उपभानो का प्रयोग आवश्यक होता है। इस तरह के परिचित उपमानो का प्रयोग नये परिवेश म हान के कारण उनम मावत्ति का प्रश्न नही उठता। माग यह कहा है कि काव्य मे परम्परा से बाहर के एक भी उपमान न हो हम परम्परावद्ध उपमानो का आग्रह भी नहीं करते सिंफ यह कहना चाहते है fक जिन नए प्रतीको का प्रयाग किया जाय व हमार जीवन म चुने गय हा जिह हम गत दिन दखत हैं जिनकी विशेषताना म परिचित हैं । अपरिचित और दूर की फोडी को प्रस्तुत करने वाले वुद्धि प्रसून प्रता साधारणीकरण म विपाता होत है। [२०] विभाजित सत्य को समूचा देखने का प्रपत्न आधुनिक युग का विशेषीकरण यी प्रवत्ति का मित्र परये अनय जी न कवि के लिय साधारणीकरण की समस्या को और अधिक जटिल बताया है। उहान लिखा १४४ | आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनमू ल्याक्न " है कि आज कवि वा काय समूचे नान विज्ञान पी विशेषाकरण की प्रवत्ति का उलाधकर उससे ऊपर उठकर, कवि को उसके विभाजित सत्य को समूचा देखना और दिखाना है। पर सत्य यह है कि प्रयागवादी कवि अवेपी ही रहे हैं, सत्य उह मिना ही नही, जिसका वे साधारणीकरण करते सलिए वे इम सवस्वीकृत परम्परा को हो सरेह की दृष्टि से देखकर और उस जटिल कहकर अपने काय पर आवरण डालने का काय करत है । स्वय अनेय जी ने यह स्वीकार किया है कि ये (दूसरे सप्तक के) पवि भी विराम स्थल पर नहीं पहुंचे हैं, लकिन उनके आगे प्रशस्त पथ है और एक आलोक्ति क्षितिज रखा। हम उनके इस कथन को आप्त वाक्य मानकर चल रहे है। इस सप्तक के पविया के विषय म उहोन जो जय बातें कही है उन्हें भी हम स्वीकारते हैं । उहान लिखा है कि यद्यपि सव कवियो म भाषा का परि माजन और अभिव्यक्ति की सफाई एक सा नहीं है और अटपटे पन की यात्री यूना धिक मात्रा में प्रत्येक म मिलगी तथापि सभी का एसी उपलब्धि हुई है जो प्रयोग का सायक करती है। दूसरे सप्तक के कवि दूसरे सप्तक मे निम्नाक्ति सात कवि हैं-सब श्री भवानी प्रसाद मिश्र, शकुन्तला माथुर हरिनारायण व्यास शमशेर बहादुर सिंह नरेश कमार मन्ता रघुवार सहाय और धमबार भारती । अपनी भूमिका में अनय जी ने लिखा है कि इन मात म मे कोई भी हिदा जगत का अपरिचित हा एसा नहीं है लकिन किसी का कोई स्वतन्त्र कविता सग्रह नहीं छपा है जत यह कहा जा सकता है कि प्रकाशित कविता ग्रन्थ के जगत म ये कवि इसी पुस्तक के साथ प्रवेश कर रहे है । प्रथम तार सप्तक स लेकर द्वितीय सप्तक तक प्रयोगवाद का प्रयोगकार रहा है । दूमर सप्तक क सभी पत्रि प्रयोगवादी का य के रचयिता हैं इनम प्रगतिवादी और प्रर वविया का प्रथम सप्ता की मिश्रण यही है क्तुि प्रत्यक कवि का अपनी वयक्तिक विशेषताय हैं। ये कवि अपने सत्य का बहुत अशा म विनापित कर सक हैं । यहाँ सत्य स मारा मतनव प्रयोगवादी सत्य स नहीं है अपितु मानवीय जीवन की मार्मिक सवदनाना स है। हमारे जीवन की परिचित पर का य म अपरि चिन अनुभूतियो को इहोने नूतन और नथवान समय और शाभन प्रतीका के माध्यम स पक्त क्यिा है यह यात म कर चुक हैं कि ऐसे प्रयोग सवन नहीं मिलत किंतु जितन भा हैं वे प्रयोगवादा का य की उपलघिया हैं । यहा हम एम कुछ का यात्मक यशा को उताहरण स्वरुप प्रस्तुत कर रहे हैं जिनक माध्यम म प्रयागवाद का विक सित सवदनीय योर साधारणीकृत स्वरूप देख सकते है। श्री भवानी प्रसाद मिश्र का एक कविता वू द टपको एरनभ से म आकाश प्रयागवाद | १४५ झुक्कर झराखे से से बू दो व टपकन पर अनव उत्प्रेक्षाये की गइ हैं ये अप्रस्तुत अपने आप में एक एक स्वतन बिम्ब का निर्माण करन म सक्षम हैं, प्रतीक अथ को व्यक्त करम में उरयन न डालकर उस व्यापर और सुग्राह्य तथा चिनात्मक बना दत हैं- वून टपका एक नभ स पिसी ने वि जस हँस दिया हो, हँस रहा सी जाख ने जस क्सिी का बस दिया हो ठगा मा कोई क्सिी वी आय दे रह गया हो उस बहुत से रूप को रोमाच राके मह गया हो। इम रचना के सारे प्रतीक यौनवादा हैं वितु फिर भी कुण्ठा, जतप्ति, निराशा उनासा का वातावरण न हाकर राम एक सहज प्रसन्नता है प्रतीको म अनगढता नहीं है । मामा यत रचना मवेद्य है । भवानी प्रसाद जी वो सारी रचनायें स्पष्ट है, अथगत दुराव और प्रतावो की वोधता यही नहीं मिलती। प्रतीवो की ताजगी और शक्तिमत्ता का एक अय उदाहरण मैं घमवार भारती पी कविताआ म से दे रहा हूँ । उनका चुम्बन' शीपक मुक्तर देखिए- रप दिय तुमने नजर म बादता को साध पर, आज माथ पर, सरत सगीत मे निर्मित अधर, जारती के दीपका वो मिलमिलाती छह म, वासुरी रखखी हुई ज्या भागवत के पष्ठ पर । यहाँ सरत मगीत से निमित जधर और भागवाव पप्ठ पर रखी वासुरी के प्रस्तुत विशेष मागिक और संवद्य हैं । यहा प्रयागो का कवि सत्य के उदघाटन म रामथ रसम्म दिखाई देता है। सगीत स निर्मित बधर कहने म अनक व्यजनायें-- गरसना, गुन गुगाहट, ति मधुरता आदि निहित हैं । नजर म बारला को साधन म सरसता स्निग्ध और प्रेममयो दष्टि चोधित होती है। भागवत के पष्ट पर रखी बासुरी स पवित्रता उत्त और याध्यात्मिक प्रेम की व्यजना भी हा जाता है। भारती क दीपका की शिामिनाता घाह स दिशुद्ध प्रेममयी निष्ठा और त ममता को ध्यजमा हो रही है। मुक्ता माध्यमिक नही लौविस प्रम वो व्यजना करता है frन उगम प्रेम की व्यापाता, उत्ता, परिनता, त मयता आदि भावानाय प्रतीका के माध्यम म व्यजित हा रही हैं। . - --- oranariaTim १४६ / आधुनिक पाय प्रवत्तियां एर पुनमू ल्यारा यहाँ मैं नरेशकुमार महता की 'चाहता मन शोपक रचना सभा कुछ पक्तिया उद्धत कर रहा हूँ। इनम भी प्रतीका को नई चहन पहल देखिए, केवल कलरव ही नही, उनमे अथ दाप्ति भी दष्टव्य है- गोमती तट दूर पेंसिल रख सा वह चारा झुरमुट शरद दुपहर के पोलो पर उडी वह धूप की सट जल के नग्न ठडे बदन पर कुहरा का लहर पीना चाहता है तुम यहा बठी हुई थी अभी उस दिन । राव सीबन लाल चिक्ने चीड सी वह बाह अपनी टेक पध्वा पर यहा । कौन जाने धूप उस दिन को कहाँ है जा तुम्हारे कुतता में गरम, फूनी धुली, धौली लग रही थी। चाहता मन तुम यहाँ बठो रहा उडता रहे विडियो सरीखा वह तुम्हारा श्वेत आचल । - उपयुक्त प्रगीत म अनुभूतियो की सवदना कम नये प्रतीकों का आक्षण और विम्ब विधान अधिक है । रखाकित उपमान हिदी म नये हैं शाभन हैं और अथ स्फीति म सहायक हैं । ऊपर हमने तीन कवियो की तीन रचनाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। इनम जा आस्वाद्यनीयता के तत्व हैं वे शिल्पगत अधिक हैं, वस्तुगत कम, इसीलिए ये रचनायें सुदर होती हुई भी हमारे हृदय पर अक्षय प्रभाव नही डालती। किन्तु फिर भी प्रयोगवाद को इहे हम उपलब्धिया कह सक्त हैं। जिस बौद्धिक्ता नीरसता जटिलता, और खुरदरेपन की चर्चा प्रयोगवाद के सद्धातिक निवे चन में की जाती है वे बातें हमे व्यावहारिक रूप से प्रयोगवादी काय मे कम ही मिलती हैं । इसका आशय यही है कि वाय रचना कि ही विशेष पूर्व निश्चित प्रतिमाना के आधार पर नहीं हो सकती जहा जहा ऐमा हुआ भी है, वहाँ वह नीरस जटिल दुर्बोध और उपेक्षणीय हा गया है । प्रयोगवाद् ने छुट शिल्प बिम्ब, प्रताकादि के क्षेत्र मजा नवनिर्माण का काय किया है उनका प्ररप.हम नयी कविता के रूप में दिखाई देता है । वस्तुत नयी कविता के लिए प्रयोगवाद ने भूमिका और खाद का काय क्यिा हो प्रयोगवाद | १४७ पारम्परिक अनुबन्ध नयी कविता के स्वरूप और विशेषताओ पर चर्चा करने के पूर्व यहाँ प्रयोग वाद पर जो परम्पराहीनता का आरोप लगाया जाता है, उस पर विचार कर लेना चाहते हैं । इस सदभ म अनेय जी का मत हम ऊपर दे चुके हैं। उनकी दृष्टि से परम्परा का क्या अर्थ है, यह भी स्पष्ट किया जा चुका है। हम तो यहां वेवल यह विचार करना चाहते हैं कि क्या प्रयोगवादी का य पूणत परम्पराहीन है, या परम्परा के मूक्ष्म ततु उसमे विद्यमान हैं ? इसके फूलने फ्लने मे बाह्य प्रवत्तियां सक्रिय रही हैं, कवियो को मन स्थितिया भी तदानुकूल वातावरण के अनुरूप थी, अतएव इस प्रकार के साहित्यिक आदोलन को विकसित और युग प्रतिनिधित्व रूप धारण करने में सरलता हुई यह बात कही जा चुकी है । यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो प्रयोगवादी काय की एक दर्जन से भी अधिक ऐमी विशेषताय हैं जो हम छायावादी हालावादी तथा प्रगतिवादी काय मे ईषत रूप से मिल जाती हैं। उदाहरणाय, वैयक्तिक चेतना, व्यक्तिवादी दष्टिकोण, अपने सुख दु ख का इतिहास पलायनशीलता, निराशा, उदासी आदि का चित्रण, परम्परागत रूढियो का तीव्रतम विराध, नवीन भाषा और छदा का निर्माण-मुक्त छद का प्रवतन और अनुवतन नए प्रतीको और अप्रस्तुतो का प्रयोग, प्राचीनो की उपेक्षा आदि प्रवृत्तिया छायावादी काव्य में हमे क्माधिक मात्रा में दिखाई देती हैं । इसी प्रकार भौतिकवादा दष्टिकोण, यथाथवादी शली, वग, विशेष का आग्रह बौद्धिकता, जन सामा य और अनगढ़ भाषादि का प्रयोग हम प्रगतिवादी काव्य मे पात हैं । क्या यह सभव नहीं है कि परम्परागत काय की ये ही प्रवृत्तिया प्रयोगवादी काव्य मे अनुकूल परिवेश पाकर उदबुद्ध हुयी हो ? उदबोधन में सहायक परिस्थितियां और प्रेरणायें बाहर की थी, जिनका स्वरूप हम देख चुके हैं ! जब इतनी अधिक प्रयोगवादी काव्य की मूल प्रवत्तियां क्रमागत कान्य मे मिल जाती हैं, तब यह कहना कि यह परम्पराहीन है कोई अथ नही रखता । यह बात अवश्य है कि छायावादी काव्य तथा प्रगतिवादी काव्य में ये प्रवत्तिया अपना-सिर नहीं उठा सकी हैं, परण उनका अस्तित्व था, इस अस्वीकार भी नहीं दिया जा सकता। प्रयोगवाद आसमान से उडार नहीं आया और न वह अचानक बिजली की कौंध ही है वह काव्य म अनेक वर्षों से अवदमित प्रवत्तियो के समयानुकूल विस्फोटन का प्रतिफल है जो कि पूर्ववर्ती काय की एक प्रतिक्रिया के रूप मे उदय हुआ। पहले उमका स्वरूप असगठित और अलक्षित था, पहला सप्तक इसका प्रमाण है किंतु दूसरे सप्तक मे वह "यवस्थित हुना और शिल्पगत निर्माण की ओर से सवेदनाओ की ओर प्रत्यागत हुआ और १९५३ ई० में यह अपने प्रयोगवादी आवरण को त्यागकर नयी कविता के रूप मे हमारे सामने आया । यदि इन तर्कों के बावजूद भी कोई यह मानने को तयार न हो नि प्रयोगवाद की जडें छायावादी, हालावादा और प्रगतिवादी काव्य घेतना में विद्यमान हैं, तो इससे कोई भी मुह नही विचका सकता कि नयी कपिता १५८/ आधुतिय वाव्य प्रवत्तियाँ एप पुनमू ल्यौवन ) और प्रयोगवाद के पीछे आज जगभग २५ वष की सुताध परम्परा है, इतनी लम्बा परम्परा हिदी काव्य इतिहास में न तो छायावार की है, और न प्रगतिवाद का। हालावाद तो चार पाच वर्षों में ही अपनी चिर मस्ती यो वठा। इमलिए नये काव्य के विषय म परम्पराहीनता वा प्रश्न पहले ता उठाया जा सकता था पर आज वह निरयक हा गया है । नये वाव्य की अपनी एप नीर बन चुगी है भले ही वह अच्छा न हो पर उस नी को कोई साज मिटाना भी चाहे तो भी नहीं मिटा सक्ता मत एव अब आवश्यक यह हो गया है कि "म इस जीव की परीक्षा तटस्य हारर करें। विद्वाना ने यह साहित्यिक परीक्षण काय विपुल मात्रा म आरम्भ भी कर दिया है और वचारिक मथन स जहा नय काय या विशेषतायें प्रकाश म आ रही है वहाँ नया काव्य भी अपनी अटपटा चाल छाडार अधिक गम्भीर और वयस्कता पी आर अग्रसर हो रहा है । यहाँ हम सब नयी पविता क सद्धातिर प्रतिमानो को देखन के पश्चात उमकी विशेषताजा और सामाा पर विचार करेंगे। नयी कविता प्रयागवादा काव्य का प्रमुख पनिका प्रतीक थी जिसका प्रकाशन इस शताब्दी के छठे दगद के प्रारम्भिक वर्षों में हुआ। १६५३ ई० म नये पत्त नाम स एक अय पत्रिका निकली। इसका सपादन पहल प० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने लिया बाट म लक्ष्मीकान वर्मा ने भी इसके सपादन म सह्योग दिया। १९५४ ई० म नपा कविता शीपक पत्रिका निकनी । इन पनि याआ प द्वारा हिनी साहित्य में पहला बार नयी कविता का आधिकारख रूपयक्त हुना। प्रथम तार सप्त से प्रती तक प्रयागवाद की उपला यात्रा है, नय पत्ते म इसा शिल्पात्मक उपाधव जाधार पर नयी कविता' की प्रयम अनुभूति हुई और नयी कविता स उसका नौढ स्वरूप दिखाई दिया । नयी कविता के सभी कवि समाक्षको ने यह बात स्वीकार गे है कि प्रयोगवाद नव लेखन की भूमिका मात्र है। उसकी प्रति म बहुत कुछ अस्थिरता के तत्त्व थे । उसक तत्त्वावधान म नये प्रयोग किए गये हैं। इनम से कुछ मफ्ल प्रयोगो के आधार पर नयी विना की नीव पडी। इसके पश्चात रुक्ष्मीवात वर्मा न नया कविता के प्रतिमान' शीपक एक समीक्षात्मा ग्रय लिखा । दसम उहोो विस्तार के साथ नयो कविता की विशेषताआ मलानयन किया है। १६६० ई० के आसपास रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने भी हिंदी नव लेखन के नाम से एक पुस्तक लिखी। इसमे १६६० के पूर्व तक के प्राय सभी नयी कविता मबधी प्रतिमानों और विशेषताजा का परोक्षरूप स नालेखन हा गया है। प्रतएव इस कृति को हम नयी कविता की मद्धातिक मा यताओ क निरूपणाथ एक प्रामाणि कृति मान मरते है । चतुर्वेदी जी नयी कविता के सद्धातिक प्रतिमानो प्रयोगवाद | १४९ से आरम्भ से हा सबद्ध रहे हैं अतएव इस क्षेत्र में किसी को आपत्ति नही होनी चाहिए। १६५६ ई० मे अनेय जी के सपादन मे ही 'तीसरा सप्तक प्रकाशित हुआ। इसकी भूमिका में भी उहाने नयी कविता की प्रमुख विशेषाओ और समस्याओ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। अपनी 'आत्मनेपद शीपक कृति मे भी उन्होन 'नयी कविता' पर विचार किया है। डॉ० धमवीर भारती की 'मानव मूल्य और साहित्य कृति भी नयी कविता की महत्वपूर्ण समस्याओ और विशेषताओ पर प्रकाश डालती है। हम नयी कविता की विशपताओ के अनायन करत समय यथास्थान नया कविता के इन कवि समीक्षकों की सामग्री का भी उपयाग करेंगे। नयी कविता पर इधर हि दी में प्राय सभी समीक्षा ने भी विपुल मात्रा में विचार किया है जो नया कविता सकाप से सवद्ध नहीं हैं । इस सदम म इन नये पुराने समीक्षा का मत भी विचारणीय है । इस उपल ध सामग्री को भी हम अपनी विवेचना का अग बनायगे और अत म इस मतवादी चर्चा को छोडकर हम 'नयी कविता' को व्यावहारिक समीक्षा प्रस्तुत करेंगे। नयी कविता की प्रमुख प्रवत्तिया प० रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने हिदी नव लपन' म 'नयो कविता' की जिन प्रवत्तियो का उल्लेख किया है वे इस प्रकार हैं (१) नयी कविता नितात आधुनिक है । आधुनिकतम होना उसकी प्रथम अनिवाय शत है। (२) एर पूणत नवीन, सुनिश्चित तथा रामात्मक दष्टिकोण होना उसकी दूसरी अनिवाय आवश्यकता है । पूणत नवीन हाना, इसलिए कि परम्परागत दष्टि- कोण सारहीन जड तथा खोखला हैं । (३) नयी कविता मे सामा य वस्तुआ तथा अकिंचन परिस्थितियों से रागात्मक सम्बध होना बहुत जरूरी है। (५) उसम गहरे तया तीखे व्यग्य (सटाइज आयरनी) की प्रवत्ति भी हो, कित व्यग्य ऐसा हो जो जीवन के प्रति रागात्मक दष्टिकोण दे सके । (५) नयी छद-याजना, शब्दो के ध्वगात्मक प्रयोग तथा आतरिव जयों का समवय भा निनात अपेक्षित है। (६) विखर भाव चिनो तथा मुक्त साहचय का निम्सोच रूप स प्रयोग होना चाहिए । (७) उसम एक नय पापर तथा उतार मानवतावादी दृष्टिकोण को वित गित वरन का अथक प्रयास होना बहुत आवश्यक है। (८) सामाय जन जीवन के प्रति एक अनिवाय मन हो। -- १५० । आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनद्यांकन (१०) नयी कविता का धरातल काफी हद तक बौद्धिक हो। बौद्धिक होना ही माधुनिक युग की अनिवार्यता है। (११) नयी कविता में वतमान से असंतोष तथा भविष्य म अस्था हो । (१२) आवग, आवेश उत्साह, दया-नयी पविता मे अनावश्यक हैं। (१३) शिल्प को दष्टि से खुरदरापन अनगढपन, वक्रीट के पलस्तर की तरह-नयी कविता म बहुत आवश्यक वस्तु है। (१४) नयी कविता- गद्य कविता हो। उसम जीवन की स्वाभाविक भाषा का प्रयोग हो। (१५) वयक्तिक भाव चिनो की योजना करना नये वि के लिए अनिवाय शत है। (१६) नयी कविता की सप्रक्त अनुभूति के लिए पाठक का कुछ प्रशिक्षित होना आवश्यक है। (१७) नये कवि के लिए कविता को रचना प्रक्रिया यथेपर जटिल होती है और वह बौद्धिकता से सप्रक्त होती है। (१८) सृजन के क्षण उतने विशिष्ट नही, जितने नयो कविता के आस्वादन के क्षण महत्वपूर्ण और विशिष्ट होते हैं। (१६) नयी कविता म क्षण का महत्व होता है। उसम ये नतिक प्रतिमान है और नया सोदय बांध होता है । (२०) नये कवि अनिवाय होते हुए भी आधुनिकता को यत्नज मानते हैं । (२१) प्रेम और भृगार की जा नग्नता और अश्लीलता का प्रदशन परम्परा से अनैतिक अथवा कुठाग्रस्त माना गया है, उसे नये कवि नतिक मानते हैं। (२२) कक्टस नये कवियो की सौदय चेतना का प्रतीक है जो ऊपर स देखने पर कटीला होता है कि तु भीतर रस प्लावित रहता है। (२३) सामा य तथा अकिंचन क्षणा को उनकी सपूर्ण असगति में अकित करने की चेष्टा नयी कविता का आधुनिकतम भाव वोध है । (२४) डा० जगदीश 'गुप्त अथ की लय नयी कविता की अनिवाय वस्तु मानते हैं । अन्त्यानुप्रास और कविता को आभ्यतरिक शाब्दिक लय योजना का वे उपेक्षित करने का आदेश देत हैं । (२५) डा० धमवार भारती के प्रयास से इधर पिछले दिनो से धुरी हीनता का आदोलत या ऋद्ध युवक को एक नयी स्थिति भी नयी कविता की एक अनिवाय विशेषना के रूप म जुड गई है। (२६) नय कवि और समीक्षका का कहना है कि यो कविता का विकास अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समान रूप से हो रहा है ।
प्रयोगवाद । १५१ - अभी नई भविता की इन सैद्धातिक विशेषताओ की सस्या को और भी बढाया जा सकता है किंतु ये भी अपर्याप्त नहीं हैं । आचार्यों ने सत्काव्य के जो जो लक्षण बताये हैं ठीक उनके विपरीत नई कविता की उपयुक्त सद्धाति मा यतायें हैं । या दूसरे शब्दो मे कह, कि प्रगीत का य का विरोधी रूप नई कविता है । यहा हम अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए प्रगीत काय और नयी कविता की परस्पर तुलना के कुछ पक्ष उपस्थित कर रहे हैं । प्रगीत काव्य और नयी कविता प्रगीत काव्य म भावात्मकता अनिवाय वस्तु है नयी कविता में उसे कोई स्थान नही । अपरिमित भावावेग दीप्त प्रगीत काय का एक दूसरा सत्व है नयी कविता में यह भी उपेक्षित है । भावाविति प्रगीत का एक अन्य महत्वपूण तत्व है नयी कविता उससे भी रिक्त है । वहा अवित नही विखराहट को महत्ता दी जाती है भावावेश के असामा य क्षणो में जहां प्रगीतकार पुरातनता आधुनिकता का विभेद भूल जाता है, वहाँ आधुनिकता को यत्नज स्प से प्रस्तुत करना नये कवि का महत्वपूण उत्तरदायित्व है । प्रगीतकार की रचना प्रक्रिया सहज स्वाभाविक और अमिधित कोटि की होती है वहा नयो कविता म वह दुर्गम, जटिल और मिश्रित हाती है । प्रगीत काय के साधारणीकरण मे कोई बाधा उपस्थित नही होती, पर नयी कविता म साधारणीकरण के क्षण विशेष महत्त्व पूण होते है उसके लिए पाठका या श्रोताओं को प्रशिक्षित होना आवश्यक होता है । प्रगीत में जीवन की विशेष मार्मिक अनुभू तिया और भावनायें अभिव्यजित होती हैं ये भावनायें उदात्त और विश्वात्मक होती हैं। उसमे व्यक्ति वैचिन्यवाद नही होता पर नयी कविता म क्षणो का महत्व है । नया कवि अपन जीवन के हर क्षण की वस्तु का काय म अमर कर देना चाहता है, विश्वात्मक्ता नहीं यह व्यक्ति वाचन्यवाद को महत्व देता है। प्रगीत का य म सगीतारमक्ता एक अनिवाय वस्तु है किंतु नयी कविता में उसकी पूणत उपेक्षा है । अन्त्यानुप्रास, शानिय अनुरणन और सुनिश्चित लय योजना और छद विधान को भी नयी कविता प्रश्रय नहीं दती वह अथ की लय' की पोषक है। अयं एक अमूर्त और निराधार वस्तु है वह चाक्षुष और थुतिपर न होकर मानसिक वस्तु योजना है वह लय की सत्ता मानना नई कविता' भी विलक्षण सूझ है । लय जीवन का एक प्रकृत तत्त्व है। भावनाआ के उद्रेक काल से लेकर उनकी अभिव्यजना काल तक वह विद्यमान रहती है भावनायें या अनुभूतिया ख्यात्मक ही होती हैं क्तुि नइ कविता में उनका महत्व ही नहीं है, फिर लय पहा से आयगी? प्रगीत काय का शिल्प पभ भावानुभूतियो के अनुसार मृटल, कोमल और श्रुति माघुय पूर्ण होता है । उसके शब्द सागीतिक होने के कारण हृदय में १५२ / आधुनिर काव्य प्रवत्तियां एप पुनमू पान और यह तक प्रतिगुजित हात रहत हैं रितु यो यविता गदरती है उमका शाब्रिय पण खुरदरा होता है-वरीट की भाति और उगव प्रतीव और सौदर्य वाध पेवटस की भाति पटीने होत है। जाव भातर भल हो रम हो (जिराम सन्द है) किंतु उसे निगलन यी प्ररिया ही अमभव नहीं तो क्प्टसाध्य जयश्य है । इम तुलना रा वाई यह न समझे कि मैं नई कविता का विराधा गिद्ध करने का प्रयास कर रहा है कि भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वान प्रगीत काप्य ये जो सव स्वीकृत तत्त्व मान हैं और जा परम्परा स अनुमोरित है उनया नई कविता म अभाव ही नहीं विराधा स्वप भी है । नयी कविता वा जा कुछ स्वरूप है वह तो सभी देख रहे है मुस इस प्रमग म यही कहना है कि नई कविता की सारी भूमिका और मा यतायें नई हैं परम्परागत स्वीकृत तत्त्वा व पनि उगम विद्रोह भावना है और जब नया कविता पर परम्पराहीनता का आरोप लगाया जाता है तब इस मूल म यहा प्टिकोण निहित रहता है । परम्परा निश्चित प स अनय पी शला म गठरी नहा है जिम नये कविया पर लाट दी जाय क्तुि यह भी सत्य है विनय कति निरे गा को कविता कहार जनता को धोया भा नदी दे मवत । अन्तर्राष्टीयता नय कवि समाक्षको वा यह कथन है कि आज इस प्रकार वा कविता जतर्रा प्ट्रीय स्तर पर निखा जा रहा है। हमारा यह कहना है कि अतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसका विराध भी हुआ है और हो रहा है । इस मदभ म एथानी ध्वट ने लिखा ह कि आधुनिकता को मह व दना एक कृतिम मनोवृत्ति है। कोई भी यपि काव्य प्रणयन क समय यह नहीं कह सकता कि मैं नया निषू गा या पुराना । इसी प्रकार जीवन का विखरान्ट भी नये वाव्य क निय पातर वस्तु सिद्ध हो रही है। उसपी परिधि गीमित से सीमित तट होती जा रही है । गद्य और पद्य को भाषा में भी तात्विक जतर है जिस कोई भी सहृन्य अस्वीकार नहीं करेगा। बुद्धि विशिष्ठता नयी कविता का बौद्धिकता का भी विश्वव्यापी विरोध हुआ है। पश्चिमी समाज बुद्धिजीवा है अतएव वहा के काय म बौद्धिकता का प्रवेश जाश्चय जनव नही १ प्रयोगवाद के सदभ म मन परम्परा के प्रश्न पर विचार किया था और कहा था कि इस काप वी कतिपय प्रवत्तिया हम छायायानी, हावा और प्रगतिवादी का य म मिल जाती है किंतु यह कथन कतिपय प्रवत्तियों की परम्परा स सम्ब धित है नइ कविता या प्रयागवाद को सद्धातिय स्थापनाआ स नही । प्रया गवाद और नइ पदिता के प्रतिमान तो प्राचीन का य का एकम विरोध करक चले हैं।
प्रयागवाद /१५३ कहा जा सकता किंतु भारतीय जीवन कभी भी वृद्धिवादी नहीं रहा, यहा अभी इतनी भौतिक समद्धि मा नहीं हुई कि यक्ति आत्मकेद्रित होकर अपने आप म एक द्वीप बन जाय और उसे दूसरे के अस्तित्व का बोध भी न हो। दूसरो के प्रति यह उदा सीनता और उपया की भावना इग्नैण्ड में सत्य हो सकती है किंतु भारत में इतनी जन निरपेक्षता अभी नहीं आई और उसका न आना ही सौभाग्य का लक्षण है किंतु नय कवियो ने अपनी बुद्धि के द्वारा उसे बल्पित अवश्य कर दिया है। यह तथ्य उसी प्रकार का है जिस प्रकार मास्को म पानी बरसने की खबर सुनकर विश्व के कट्टर माक्सवादा पानी न बरसने पर भी छाता लगाकर निकल पड़ते हैं चाहे उनके यहा पाना बरसे या नहीं इसका कारण यह है कि न मही, यहा-वहा तो बरस रहा है । ठीक यही वस्तु प्रयोगवादी कवियो की रही है । ये पश्चात जीवी कवि पश्चिम की हर बात की नकल करना चारत हैं, चाहे वह अच्छी हो या न हो ममयोचित हो या न हो । यह क्या उनम प्रति नहीं है जो पाश्चात्य प्रेरणायें ग्रहण करके अनुकरण और अनु- वनन का भूमिका से ऊपर उठकर अपना कुछ रेने म ममथ हुए हैं, जस अज्ञेय जी धमवीर भारती जानि। बौद्धिक्ता भी बुगे न कहा जाती, यदि कवि अपन चितन के द्वारा कुछ नई वस्तु इस ससार को प्रदान करते । प्राचीन भारतीय और पाश्चात्य प्राय सभी समीक्षा शास्त्रियो न ता इस बात पर विशेष बल दिया है कि कवि को दाशनिक होना चाहिए हमार यहा उस परभू स्वयभू भविष्यद्रष्टा ब्रह्मा आनि वहा गया है । इन राज्ञाओ में द्वारा काव की बौद्धिक चिंतन का ही विशिष्टता का द्यातन किया गया है किंतु नये कवि इस क्षन्न म नही आत । उनकी गौद्धिमता की छानबीन करत हुय डा० रामविलास शर्मा न लिखा है कि नई कविता की बौद्धिक चेतना वा दोष यह है कि वह विचारा का इद्रिय बोध स मयुक्त करने भावना स अनुप्राणित करन माणिक और प्रभावशाला बनाने क बदले उह कथन मान रहन देती है । नया ववि साच सावक र बहुधा दूसरा की रचनायें पावर विचार हो नहीं करता, वह भावा का भी सोचता है साचकर उसकी भावसत्ता नष्ट कर देता है, किरा उपमाना से टन मोचे हुए भावो को संजोय, यह भी साचता है और इस मोच विचार म रस अतर्धान हो जाता है। भावानुभूति वे बदल उसके पास साच विचार ही रह जाता है। यदि नयी कविता में गम्भार चितन होता जनगढ हान पर भी उसमे दानिक विचार हात, व्यक्ति अथवा समाज की समस्या चित्रण होता तो भी साहित्य वो उसकी दन महत्वपूर्ण होती । पठि नाई यह है कि वौद्धिकता की दुहाई दने पर भी उसमे बच्चा अबा कारनाम ज्यादा निखाई देते है चितन के नाम पर दूर को बोडी लान का प्रयास ही अधिक होता है। जनास्थावादी पण्डित कता' शीपर निवघ-आस्था और सौदर्य, डा. रामविलास शर्मा " १ १५४ | आधुनिक काय प्रवत्तिया एक पुनमू ल्याक्न नई कवितावादिया को छोडकर शायद ही कोई शर्मा जी व उपयुक्त कपन १ प्रति अपनी अनास्था प्रगट करेगा। जिस ववि साय की चर्चा अनेय जी बार बार सरत रहे हैं उसकी क्लई भा उपयुक्त वक्तव्य से धल जाती है। तीसरा तप्तक [१] पूर्वाग्रह रहित अध्ययन को पांग तीसरे सप्तक यी भूमिका मे अ य जी ने नयी कविता से सम्बधित जो बातें कही हैं उ ह भी हम यहां विचाराथ प्रस्तुत कर रहे हैं । उहारे लिखा है कि नई कविता को शास्त्रीय आलोचको स सहानुभूतिपूण तो क्या पूर्वाप रहित अध्ययन भी नहीं मिला है यह मावश्यक हो गया है कि स्वय उमके आलोचव तटस्थ और निमम भाव स उसका परीक्षण करें। दूसरे शब्दो म परिस्थिति की माग यह है वि कविगण स्वम एक दूसरे के आलोचा वनकर मामने आवें। इसी प्रसग को उहोन और आग बढाकर लिखा है कि नई कविता अगर नस काल की प्रतिनिधि और उत्तरदायी रचना प्रवत्ति है और समकान वास्तविकता को ठीक ठीक प्रतिविम्बित करना चाहती है तो उसे यह विगुण दायित्व स्वय जाग बढकर आद लेना होगा । कृतिकार के रूप म नमे कवि वो साथ साथ वकीन और जज दानो होना होगा (और मपादक हाने पर साथ साथ अभियोक्ता भी 1 ) [२] के द्रीयकरण आत्ममल्याका विश्लेषण इस प्रकार ये पवि का जाज रचना ग्ने का ही वाय नहीं है अपनी रचना को वकालत बसा विश्पण और मूल्यापन करने का भी दायित्व आ गया है। स हित्यिक दायित्वा का यह ने द्रीयकरण जात्म मूल्याया और विश्लेषण-केवल नई कविता की ही विशेषता हो मक्ती है सत्ता य का लक्षण नहीं है । अपनी नावश्यकता के समय हा कविगण अपना रचनाओ के विश्लेषण का काय करत है। यति रचना अपना मूल मत य नहीं कह पाती तो निश्चित ही यह रचना वा दाप और कला स्मक्ता का अभाव है इस अस्वीकार नहीं किया जा सक्ता । नये कषि से जानने है और उस पर आवरण टालने के लिए उसकी याख्या क तार स्वर झकृत करत हैं। कविता वह है जो एक कहे और दूसरा समझ जाय पर नयी कविता की स्थिति यह है कि स्वय पवि कोही उसको स्पष्टता के प्रति मदेह है । [३] नये शब्द नये अथ सस्कारो की आवश्यकता नयो कविता की प्रयोगशालता के भाषा सम्बधा पहले जायाम पर चचा करत १ तीसरा सप्तक, भूमिका प ११ २ तदव, प १२ प्रयोगवाद | १५५ - - हुये अनेय जी ने लिखा है कि वह "भाषा सम्बधी प्रयागशीलता को वाद की सीमा तक नही ले गइ है-बल्कि ऐसा करने को मनुचित भी मानती रही है। यह माग 'प्रपद्यवादी' ने अपनाया जिसने घोषणा की वि चीजा का एक मात्र सही नाम होता है और वह (प्रपद्यवादी कवि) प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और घद का स्वय निर्माता है । वे यह भी कहते हैं कि शब्द जपने जाप म सम्पूण या जात्यतिक नहीं है, किसी शब्द का कोई स्वयभूत अथ नही है । अथ उमे रिया गया है वह समेत है जिसमे अथ की प्रतिपत्ति की गयी है प्रत्येक शद का प्रत्येक समथ प्रयोक्ता उसे नया सस्कार देता है। इसी के द्वारा पुरा गद नया होता है-यही उसका क्ल्प है जिहोने शब्द को नया कुछ नहीं दिया है वे नीक पीटने वाला से अधिक कुछ नहीं है-भले ही जो लीक वह पीट रहे हैं वह अधिक पुरानी न हो। इस वक्तव्य द्वारा अनेय जी का भाषा सम्द धो दष्टि करण स्पष्ट है। वे नय शब्दाव निर्माण पर, उसके नय अर्थ सस्कार पर बल देत हैं और जो ऐसा नहीं करता उसे लीकवादी कहत हैं। कृतित्व वा क्षत उहोने लास्वाद और अलावाद की सीमा रेखाआ के बाच का माना है और कहा है कि क्षेत्र बहुत बड़ा है और कोई इस छार के निकट हा सकता है तो काई उस छोर के!" अजय जी के इस दष्टिकोण से असहमत नहीं हुआ जा सकता मित यह उनका दप्टिकोण है, अधिकाश नई वविता ी भाषा वा सत्य नहीं है। नयी कविता की भापा यत्र तत्न क्वल लीक का ही नहीं, उनके वक्त य का सीमा रेखाओ का भी अतिरेक कर गई है पितु उ हाने यह कहार इस बात का परिमाजन कर दिया है कि 'नय कविया मे एसो की संख्या कम नही है जि होने विषय को वस्तु सम झने की भूल की है और इस प्रकार स्वयं भी पथभ्रष्ट हुए हैं और पाठक। म भी नया कविता के बारे म आर आतियो के कारण वन हैं । [४] विषय 'नये' वस्तु मौलिक" काव्य विषय और वस्तु म पाथवर करते हुए वे लिखते हैं कि विषय केवल 'नये' हो सकते हैं, मौलिक नही-मौलिकता वस्तु से ही सम्बध रखती है। विषय सम्प्रष्य नही है वस्तु सम्प्रेष्य है । नय (या पुराने भी) विषय की कवि की सवेदना पर प्रतिक्रिया और उससे उत्पन्न सार प्रभाव जा पाठक श्राता ग्राहक पर पड़ते हैं और उन प्रभावों दो सम्प्रेष्य बनान का व विधा योग (जो सम्पूण चतन हो सकता है अशत चेतन भी और सम्पूर्णतया अरचतन भी)-मौलिकता की कसौटो का यही क्षेत्र है । यही कवि की शक्ति और प्रतिभा का भी क्षेत्र है-क्योकि यही दवि मानस की पहुँच और उसके सामध्य का क्षेत्र है। वस्तु की सम्प्रेषण की शक्ति प्रयोगवादी और नयी कविता म स्तिना सामप्य है इसकी चर्चा हम कई स्थलो पर पहले पर चुने हैं, उसकी पुनरुक्ति आवश्यक नहीं है। 1 १५६ / आधनिय वाय प्रवत्तियाँ एव पुनमू ल्याकन [५] नकली आलोचक नकली कसौटियां अनेय जी आलोचको पर ध्यग्य परत हैं और कहते हैं कि 'नवरची पविया से कहीं अधिक सख्या और अनुपात क्लो आलोचको वा है-धातु उतना खोटा नही है जितनी कि कसोटियां ही झूठी हैं। जब अज्ञेय और उनमें सयायवादी यह मान पर चलते हैं कि केवल उनको नयी रचना और नय प्रतिमान ही एक मात्र सत्य हैं शेष झूठ हैं तो मुझे इस आरोप के उत्तर में कुछ नही कहना । [६] नयी शिल्प दष्टि शिल्प, तब या टक्नीर के बारे में भी दो शत पहना अजेय जी ने आवश्यक समाना है । वे लिखते हैं कि वास्तव म नयी वविता ने भी अपने का शिल्प तव सामिन रखना नही चाहा न वसा सीमा स्वीकार की और फिर इस वक्तव्य के आग लिपत है कि नया कवि नयी वस्तु को ग्रहण और प्रपित करता हुआ शिल्प के प्रति भी उनासीन नहीं रहा है धयादि वह उसे प्रेषण सपाटकर अलग नही करता है। नयी शिल्प दष्टि उसे मिली है यह दूसरी बात है कि वह सबमे एप मी गहरी न हो पा सब देख पथ पर एक सी सम गति से न चम सक हा। उनक इस वक्त यस स्पष्ट है कि ना पवि ने शिला को अप्रमी सीमा भले न स्वीकार को हो गितु शिल्पा ग्रह स यह मुक्त भी नहीं रहा है। [७] काव्य फम के प्रति गम्मोर उत्तरदायित्व अमेय जी इस सान के कविया के प्रति भी लगभग वही बात दुहराते हैं जो वे द्वितीय और प्रथम सप्तक में कह चुके है । व लिखते है कि ये कवि क्सिी मम्प्रदाय के नहीं है न सबकी साहित्यिक मा यताएं एक है न सामाजिक न राज नीतिफ न हा उनकी जीवन दष्टि म ऐसी एकरूपता है। वे यह भी लिखते हैं कि 'प्रयोजनीय यह है कि सकलित कवियो मे अपने कवि कम के प्रति गम्भीर उत्तरदा यित्व का भाव हो, अपने उद्देश्या म निष्ठा और उन तक पहुँचने के साधनो के मदुपयोग की लगन हो । जहाँ प्रयोग हो वहा कवि मानता हो कि वह सत्य का ही प्रयोग हाना चाहिए । यो काव्य मे सत्य क्योकि वस्तु सत्य का रागाश्रित रूप है इसलिए उसम व्यक्ति वचित्य की गुजाइश तो है ही, बल्कि व्यक्ति को छाप से युक्त होकर ही वह काध्य का सत्य हो सकता है। नाडा और लीला भाव भी सत्य-हा सकते हैं-जीवन की ऋजुना मा उ है जम देती है और सस्कारिता भी। दखना यह हाता है कि सत्य क साथ खिलवाड या पलटेंशन मान्न न हो। १ १ तीसरा सप्तष, पृ० १९ प्रयोगवाद | १५७ * [८] नयी कविता कवि व्यक्तित्व का मोक्ष अयन अज्ञ य जी काय मे रचयिता के यक्तित्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि उसका महत्व रचना करने की त्रिया की तीव्रता मे और क्ला की माध्यमिक्ता के परिष्कार में है। उनके अनुसार काय म कवि का यत्तित्त्व नही, वह माध्यम प्रकाशित होता है जिसमे विभिन्न अनुभूतिया और भावनायें चामत्कारिक योग म युक्त होती है । काव्य एक व्यक्तित्व की नही एक माध्यम की अभिव्यक्ति है। टी एस इलियट के स्वर मे स्वर मिलाकर वे यह भी कहते हैं कि कविता भावो का उमोचन नही बल्कि भावो से मुक्ति है वह व्यक्तित्व की अभिव्यजमा नहीं बल्कि “यक्तित्व से मोक्ष है । इसे हम उनका नियक्तिकरण का सिद्धान्त वह सकते है । कलाकार का तटस्थता की यह चर्चा उन्होने आत्मनपद म कई स्थानो पर की है । [९] सौदय बोध बुद्धि का व्यापार-अज्ञेय जी मूल्यो की भी चर्चा करने लगे हैं और लिपते है कि यदि यह कहना उचित है कि मूल्यो का स्रोत मानव का विवा है । तो यह कहना ठीक है कि सौदय बोध मूलत बुद्धि का व्यापार है। उनकी दष्टि से कलात्मक सौदय के मूल्य सामाजिक मूल्यो से अधिक गहरे और स्थायी होते हैं । ल्यमयता और वक्रता को उन्होने कना क मूल्यो के प्रमुख उपादान माने हैं जो अभिव्यक्ति पक्ष स सम्बन्धित हैं। श्लील-अश्लील विषय में आपका कथन है कि ये देश काल और समाज बद्ध हैं। प्रत्येक समाज और सामाजिक स्थिति के अनुरूप इन रूप बदलते रहते है अतएव इनके कोई स्थायी प्रतिमान नहीं है । यह सामाजिक नतिकता का प्रश्न है साहित्य का नहीं। साहित्य मे ये सु दर और असुदर रूप में प्रस्तुत रहत है । शिव और सुदर को आप पर्यायवाची मानते हैं और कहत है कि जो सुपर है वह अनतिक नही होगा। साहित्य मे सत्य के प्रतिपादन पर आपका विशेष आग्रह है। मानव मूल्या की भा आपने चर्चा की है पर कम । इस विषय पर डा० धमवीर भारती ने गम्भीरतापूर्वक विचार क्यिा है और आधुनिक युग व बदले हुए मानव मूल्यो का प्रस्तुत क्यिा है। इन्हीं नय मानव और कलात्मक मूल्यो को नया कवि अपनी नई कविता मे प्रस्तुत करना अपना इष्ट काय समयता है । मूल्य प्रकरण के सम्बध म मुझे यह रहना है कि जिह आधुनिक युग के मूल्य ठहराया गया है, उनके निरूपण मे सामाजिक मान्यताओं के प्रति विद्रोह की भावना निहित है। उनकी नैतिकता युगनद्ध न होकर बहुत कुछ वैयक्तिक चेतना की उपज है । वे यपाय नहीं, आरोपित हैं। नये कवि जिह मूल्य कहकर अपनी कविताओ म प्रस्तुत कर रहे हैं द क्वल उनकी दष्टि स हा मूल्यवान हैं, जनता के लिए उनका कोई मूल्य नही । ऐसी स्थिति में क्या य मूल्य जन निरपस १ 'मानव मूल्य और साहित्य' मे।
१५८ | जाधुनिन काय प्रयत्तियों एक पुनमूल्यांकन और कवि सापेक्ष नही है ? जब नयो कविता की नौव ही कमजोर है तब उस पर निमित होने वाली इमारत कितने दिन रुक सकेगी ? नयी कवितायें समय में प्रवाह में ठहर ही पा रही हैं, वे दुलदुलो वी भाति पत्र पत्रिकाआम प्रकाशित होते ही विलीन हो जाती हैं । किंतु भल ही इनका कालजयी अस्तित्व न हा अस्तित्व तो है ही, हम उसकी कमजोरिया और मदातिक मत मतान्तरो पर ध्यान न देकर उसका विशेषताना पर ध्यान देना है, और एक ऐसी ठोस सजनात्म भूमिका का निर्माण मरना है, जिसके आधार पर भविष्य की कविता की रचना की जा सके। तीसरे सप्तक के कवि और उनका काव्य तोसरे सप्तक मे जितन कवि हैं, उनक प्रयाग और सदेश-पिछल कवियो स बहुत कुछ ठोम है, किंतु य कविगण भी सिद्ध नहीं हैं साधक और प्रपन ही हैं । इस सकलन म प्रयाग नारायण त्रिपाठी कीति चौधरी मान वात्स्यायन केदारनाथ सिंह कुवर नारायण विजय देव नारायण साही और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कुल १४३ के लगभग कवितायें सगहीत हैं । ये सभी कवि नयी कविता के प्रमुख स्तभ मान जाते हैं। यहां हम इनम से २-३ कवितानो के उन्ाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं ताकि प्रायोगिक रूप स नयी कविता की विशेषताओ पर प्रकाश पड सक। एक कविता है 'चांद की चाह जिसे मैं बिना किसी चुनाव के यहा प्रस्तुत कर रहा हूँ कहना चाहिए कि बस यो हो बद पुस्तक खोलकर उसे यहा उद्धत कर रहा है- सुनिये जनाब मेरी एक दिवक्त है, एक मिनिट दीजिए इतना कष्ट कीजिए मुश्किल मे जान है, आप भी इनसान हैं सुन तो लीजिए। X x इधर तीन दिनो से लटते ही खार पर तीव्र इच्छा होती है- शून्य को पकडकर मुट्टियो मे माच लू । नारगी से चादको रसभरी से तारों को w re प्रयोगवाद | १५६ केवडा म बसी हुइ किरनो को पजो म पक्डकर कस कर निचोड' सारा रस खोच लू। गटता हथेली में जो नही कुछ बाहरी केवल मेरी ही उँगलियो का नाखून क्या कहूँ? खुदा के वास्ते मुह न बनाइय कोई रास्ता वताइये। कविता विजय देव नारायन साही की है और इसमे आतरिक विवशता भरी कमस का मार्मिक और सवेद्य चित्रण है। चांद को नारगी तारा को रसभरी और बवडे में बसी हुई किरना व प्रयोग मे नयापन और स्पष्टता है । रचना भावात्मक और आवशमयी है । दौद्धिक चेतना इसम नयी है । शिल्प भी तयारमक और प्रवाहमय है उसम खुरदरापन नहीं है । नयी कविता के सारे प्रतिमानो पर या तो यह कविता खरी नहीं उतरती, या फिर वे इसके मूल्याक्न के लिए अपर्याप्त हैं। इसका विषय भी नया है और सप्रेष्य वस्तु भी माधारणीकृत है अतिरिक्त व्याख्या और वकालत करने की भी कवि को जरूरत नही पडती । सामाजिक मूल्यो की भी अवहलना नहीं है और सौदय बोध बौदिक भा नहीं है। एक दूसरी नयी कविता देखिए-शोषक है असुरपुरी में दस से छ इच । कविता लम्बी है पूरा काय रूपक है । हम यहा मशीनो के उवाच के ही कुछ वश प्रस्तुत कर रहे हैं- हम ईश्वर हैं आटामेटिक पोर पोर मे घुस अदश्य ही स्थूल जगात जालित करते हैं। हम हलधर हैं हरक्युलीज हैं अरणि हस्त अगिरा राम हैं विद्युजय अयस त्रिशूल घर प्राय सृष्टि का ताटव करते १६०/ आधुनिक का य प्रवत्तिया एक पुनम ल्यावन सिम्बन मूत्र विचरते डम-डम-डम डम डम डम डम डम । आदि यह रचना मटन वात्स्यायन की है। यन्त्र शाला म्पी असरपुरा का यह प्रत्यक्षदर्शी और भुक्तभोगी चित्रण सवथा मशीनी सभ्यता के अनुरूप है। मशीन क जीवन म सरसता कहा? बौद्धिकता, स्पीत शद विधान और सदभमयता तथा निराला व कुकुरमुत्ता की तरह आत्मस्तवन, एक मीया व्यग्य ही है । ये सब वविता को मार्मिर बनान में सहयोगी सिद्ध हुए हैं । इमी रचना के आरम्भ म कवि न धन धक खच खच, धक् धक् खच खच पदावली वी कई बार आवत्ति से मशीना की चल की आवाज वी ध्वयात्मक्ता प्रस्तुत कर दी है । बीच-बीच म भी शाब्दिक अनुरणन से मशीनें बोलता हुई सी प्रतीत हान लगती है। जब एक नयी कविता म नय साल के उपलक्ष म वितरित की जान वाली शुभ वामनाआ का स्वरूप भा देखिए- नये साल की शुभ कामनायें । खेतो की मडो पर धूल भरे पावा का, कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाव का, पाकगीतो का बला की चाल का करघ का कोल्हू का मछुना के जाल का, इस पकती राटा का बच्चा शार का चौक की गुन गुन का, चूल्ह की भार को, काट क गुलाब और जूडे क फूल का हर नन्ही याद का हर छाटी भूल का नय सान की शुभ कामनायें। पदाचित यह कविता भा नय कविता क निवप पर चाखी न उतरंगी, क्योकि इसमें वह सब नहा है जिस अजय जी तथा नय रवि समीक्षक वा य म आधुनिक बाध की दुवोधता के नाम से जवतरित करना हित है । यह रचना सर्वेश्वर दयाल सक्सना की है। उनकी सभी कविताजा म आस्था का स्वर यकृत है । जन चेतना का वस्तुगत और शिल्पगत स्वरूप तो उनकी उपयुक्त कविता म दया ही जा सकता है। उपर उद्धत सभी कवितायें नयी कविता के शुभ विवास की सूचक है और उनक सम्मुख निश्चित रूप स मगलमय भविष्य झारता हुआ दिखाई देता है। नयी कविता के नये स्वर (१) शिल्पत न की अतिरेक्ता नयी कविता पढन का श्रम-परिहार ही नहीं करवा रही वही मनोरजन भी - । प्रयागवाद/१६१ करती है एक उदाहरण दखिए- प्रेम की जेडी ( हाय (नही चन जागते ही क्ट गयी रन ) (प्रेम यानी इश्क यानी लव ) A+A . (अरमानो के गाल पर चाटा परवरी का काटा) ( मुह वन म घाटा 11) यह तीर निभुज आश्चय वोधक चिह और प्रश्न चिह की सूत्रात्मक कविता है। श्री सयनशफीउद्दीन को इस लिखत समय क्दाचित जद्धविराम, पूण विराम कोलन, समीकोलन ऋण गुणा भागाति के चिह स्मरण नही आय नही तो इनका प्रयोग भी इसम क्यिा जा सकता था । यह है शिल्प की जतिरेक्ता का दृश्य जिसक आधार पर नयी कविता का नरुनामी मिली है। इसके अतिरिक्त नयी कविता की जिन विशषताा पर विकृति के आरोप लगाये जान हैं, उह भी इसी प्रसग म देख लना चाहिए तानि इसके उभय पक्ष हमारे सामने स्पष्ट हो सकें। (२) यौन प्रतीको की बहुलता सो रहा है योप अधियाला नगे की जाघ पर डाह से सिहरी हुई यह चादना चोर रा से उझर कर झाब जाती है। -जनेय-हरी घास पर क्षणभर, प० ४८ १६२ / आधुनिक काव्य प्रवृत्तियां एक पुनमूल्याकन इन पक्तियों में यौन प्रतीको की अधिक्ता है । चित्रण अधकार और उसम धीरे धोरे आने वाली चारनी का है किंतु यहाँ रूपक है कि अधियाला रूपी नायक नदी रूपी परकीया को जाघ पर सो रहा है । स्वकीया चादनी डाह स सिहरी हुई उसे चुपके चुपने झार जाती है । यहाँ बिम्ब तो निर्मित हुआ है कि तु इतना स्पष्ट नहीं है जो वस्तु को सप्रेष्य बना दे । इस प्रकार के यौन प्रतीवो का प्रयाग अज्ञेय जी ने अपने काव्य में विपुल मात्रा म प्रिय हैं । प्रात धूप की जरतारी जोढनी लपेटे अभा अभी जागी खुमार से भरी नितात कुमारी घाटो इस कामातुर मेघधूम क औचक आलिंगन म पिसकर रति धाता सो मलिन हो गई। -भारती-सात गीत वर्ष प० १३७ भारती जी की उपयुक्त पक्तिया म प्रात पालीन बला मे एक घाटी का चित्रण है। इसम भी यौन प्रतीको का सुनकर प्रयाग है । (३) जलते माथे पर सूने कुहरे की छाया निराशा जलते माथे पर सूने कुहरे की छाया टूटती पसनिया म रीता गूजता दद खाली जेवो म हाय दिए सामय्यहान बिल्कुल यों खोकर हम सभी उतर कर आय हैं इस घाटी मे । -नयी कविता, २०६२ धद २ इन पक्तियो मे जीवन के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण इष्ट य है। मैं हू ननी तर की रेत अपितह लकिन किसी भी क्षण पावो तले से वह जाऊगा। -भारती, सात गात वष धमवीर भारती की इन पक्तिया म भी निराशा उदासी अनास्था, विवशता और असहाय मनावत्ति अक्ति है । यही बात उनकी निम्न पत्तियो में भी देखिए- मैं चला जा रही है ऐसे जसे लहरा पर विवश लाश बहती जाये। -ठडा लोहा ।
प्रयोगवाद | १६३ (४) पथ हो जाय उज्ज्वल न्यो आशा निराशा ही नयी कविता का सत्य नहीं है उसमे आस्था, विश्वास और स्वर्णिम भविष्य की झाकी भी है- 'राग जाय दिशाओ मे बिखर पथ हो जाय उज्वल और उस पल स्वग का गधव आए उतर बस इतनी प्रतीक्षा मुझे भा है तुम्ह भी है । -अजितकुमार-दो बात और एक तक । (५) इन्द्रधन रौदे हुए ये अनय की कविता का श्रष्ठत्व भी उनके यौन प्रतीको और क्षणभगुर निराशा बादी दष्टि मे न होकर आस्था में है। इद्रधनु रौदे हुए ये,' 'आगन के पार द्वार तथा अरी आ करुणा प्रभामय म उनके यक्तित्व की तटस्थता, कलात्मकता और आस्थावादी जीवन दृष्टि की सुकर अभि यजना हुई है। उनकी कल्पना की पहच को अ य कवि नही पा सके हैं। अनेक आरोपो के रहते हुए यह मानना ही पड़ता है कि वे एक प्रतिभा सम्पन्न, बहु अध्ययनशील जोर चिंतक कवि हैं। जीवन की वतमान नीहारिकामा को भेदकर उनकी दष्टि अतराल तक पहुचो है और वहाँ मातियो का सचयन किया है, यह दूसरी बात है वि मातिया के साथ कभी कभी कीचड भी आ जाती है, पर महत्व कीचड का नही, मातियो का ही हाता है, अज्ञेय जी के काव्य का मूल्याकन उनकी कमजारिया के आधार पर न हाकर उनका अच्छाइयो के आधार पर ही होना चाहिए । कवि म अभवता और निद्व द्विता भी है । वसे नये प्रवियो का एक यह सहज गुण है, जिस बात का अन्य व्यक्ति सामाजिक शोलवण नही कहना चाहते, यद्यपि उससे अभिज्ञ हैं उन अश्लील और अग्राह्य वस्तुभा को भा इन कवियो ने के की चोट पर कहा है । य वस्तुयें जीवन का यथाय तो हा सक्ती हैं, किन्तु कला का सत्य इनसे परे हैं । कला दुगध और विकृतिपूर्ण वातावरण के यथाथ चित्रण म न होकर उसके उदात्त पक्षो को प्रस्तुत करने में निहित है। किन्तु यथाथ को यथाय रूप में प्रस्तुत करना, य कवि अपनी ईमानदारी का तकाजा मानते हैं और यही मनोवत्ति काव्य का छायावाद और प्रगतिवाद के कगारी स बीचकर समाज और व्यक्ति के हृदय की दुबलताना क निरे चित्रण तक ले गइ है- (६) मदेसपन यथार्यानुभूति मेरे मन की अधियारी कोठरो म अतृप्त आकाक्षा की वेश्या बुरा तरह खास रही है। 1 -जगदीश गुप्त १६४ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्यापन या अब म अथवा त्वचा तनती गई। गभस्थ शिशु बनून की तरह फूलता चना गया। --निवप, प. १७३ अब ३,४ निकटतर धमती हुई छन आड म निवेद मूत्र सिंचित मूत्तिा के वत्त में तीन टागा पर सटा नन ग्रीव धय धन गहा. -अज्ञेय । ऐसे चित्रणो म यथाथता हो सकती है पर क्या वे बना वे शिव और सुदर तत्त्वो के भीतर परिगणित किये जा सस्ते हैं पनि का अपनी पत्नी के प्रति सोधन भी देखिये- अब तुम ढल चुकी, अब तुम चार चार बच्चा की मा हो -शरद देवडा । यह भी आज क कतिपय नये पारिवारिक जीवन का पयाय हा सक्ता है पर कला म तो यह भदेगपन ही है । पारिवारिक जीवन का वास्तविक सौन्दय इसम निहित नहीं है। ऐसी रचनायें पढने वाला पर शुभ सस्कार नहीं डाल सक्ती, उनके हृत्य का उदात्त नहीं बना सकती । नयी कविता को इस दुव नता से कार उठना ही हागा । जब तक जीवन का विधायक सदेश नये कवि नही देने, तब तक उनकी कविता जन मानस का अग नही बन सती दुबलतालो से तो यूनाधिक रूप मे सभी ग्रस्त हैं, महत्व उनका नही है महत्व है उस शक्ति का जो उह दुवलताओ मे ऊपर उठाने मे योग दे सके नयो कविता इस शक्ति और सदेश से बहुत कुछ विरहित है। ऐसी स्थिति म नये कविया को अज्ञेय के आस्थावादी पथ का अनुसरण करना चाहिए- हमम तो आस्था है कृतज्ञ होत हम डर नहा लगता कि उखड न जावें कहा -इद्र धनु 'आगन के पार द्वार में जनय जी ने एक कविता मे कवि और काव्य का पारस्परिक सम्बध स्पष्ट करते हुए जो कुछ लिखा है उससे वतमान जीवन की विषमता पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। कविता इस प्रकार है- 1 मैं कवि हू द्रष्टा, उ मेदा सघाता प्रयोगवाद :१६५ मर्यवाह, मैं कृतव्यय। मैं सच लिखता हूँ लिख लिखकर सब झुठा करता जाता है। तू काव्य सदा वेष्टित यथाथ चिर तनित भारहीन, गुरु बयप। तू छलता है पर हर छल में तू और विशद, अघ्रान्त अनूठा होता जाता है। -(पृ० ५७) इस दष्टि से नये कवि के लिए नया काव्य एक भानुमति का खेल होता जा रहा है । यह चिन्त्य दष्टि है 1 नये कवियो को इसके भी ऊपर उठना होगा । (७) कहीं कोई ठौर नहीं अनास्या नयी कविता की माय प्रमुख प्रवतियो मे एक नास्तिक्ता मोर आस्थाहीनता है । यह बोद्धिकता की अतिरेक्तापूर्ण उपज है । धम और ईश्वर हमारे जीवन में दो ऐसे में रहे हैं जहाँ मानसिक दष्टि ने मानव समाज बण्ड-खण्ड होता हुआ भी अषण रहा है किन्तु अब यह आधार शिला न होने के कारण वह निराधार हो गया है। - लगाता है, वही कोई ठौर नही, आज का मनुष्य गर्म से धरे देकर निकाला हुआ ऋषि पुत्र" -राजेन्द्र विशोर स्थितिया अनुभव तथा अय पविता पृ०१९ यह ठीरहीनता न तो नयी कविता के लिए शुभ वस्तु है और न मानव को। यहि सचमुच आज का ममाज निराधार है तो कवि का दायित्व है कि उसके लिए किसी न किसी आश्रय का निर्माण करे, तापि यह डूबने और रसातल जाने से जप "नहीं नहीं भय होगी रे जय, खुल पायेगा द्वार अरे तुम्हारी बधन डोरी टूटेगी हर बार। मार निराधारता और बास्थाहीनता के विषम क्षणो में भोपनिने १६६ / आधुनिक काय प्रवत्तियां एक पुनमू ल्याकन नाथ की उपयुक्त पक्तियो (हिटी रूपातर-हसकुमार तिवारी) के स्वरों को दुह राना होगा यदि वह ऐमा नहा करता तो मानव समाज तो ठोर पा ही लेगा नयी कविता को वही ठौर नहीं मिलेगा। (८) क्षण के जीवन मे हो त मय भय महत्वपूर्ण वस्तु क्षणवादी दष्टि है । यह भी क्षणभ गुर है। जीवन को क्षणो के सुखा मे नही, साधना म देखना है। यह अस्तित्ववादी मनोष्टि व्यक्तिवानी है । क्षण अपन आप में सपूण, स्थायी, और सत्य नहीं हैं । फिर क्षण के जोवन म त मय हाने का सदेश (अज्ञेय) समाज विरोधी है। खग युगल, करा सपन प्रणय क्षण के जीवन म हा त मय । यह भोगवादी जीवन-दष्टि है। इसी कारण भाग उपासना का नयी कविता मे आधिक्य है- आह । मेरी श्वास है उत्तप्त धमनियो मे उमड आई है लहू की धार- प्यार है अभिशप्त तुम कहा हो नारि! --अज्ञेय तार सप्तक प०७७ या तुम्हे किस तरह बाध सब गी सुख की सीमा है तुम्हारी राह म सदा ये दो उरोजा के शिखर म तान सकूगी। -सफेद चिडिया-विनोदचद्र पाण्डेय पासना का प्रकृत स्वरूप भी देखिये - मुझे तो वासना का विष हमेशा बन गया अमत वशते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आवाद। मेरी जिदगी बरवाद - इन फिरोजी होठो पर । -भारती, द्वितीय सप्तक । इस प्रकृतवादी दष्टि के कारण नयी कविता में विरुषता आ गई है जिसकी चर्चा हम कर चुके हैं।
प्रयोगवाद | १६७ (९) साप तुम सभ्य तो हुए नहीं i-न होगे घ्यग्य नयी कविता म व्यग्य सृष्टि भी उल्लेखनाय है-व्यग्य प्रतीत म अशेय मी की साप तुम सम्य तो हुए नहीं, न हाग वाली रचना दष्टव्य है। यह दीप अमेला स्नेह भरा है गव भरा मन्माता, पर इसको भी पक्ति वो दे दो। अज्ञेय जो की उपयुक्त रचना को नयी कविता या मनीफेस्टा कहा जाता है । इसम समष्टिवाद की यजना की गई है। नये काव्य का उपलब्धि में इसकी भी नरिगणना की जायगी। कीर्ति चौधरी की निम्नाक्ति कविता भी इस प्रसग म देखी जा सकती है- मैं मानू तो अभियक्त मुझे करनी है जन मन की वाणी मेरी प्रतिभा यदि कल्याणी ता दद हर सुख सौख्य भरे यही नहीं दि अपने तन , मन के दुख ददों म लिए भर। -कवितायें कीर्ति चौधरी, पृ० ८७ (१०) मौलसिरी की गाछ की ओर नयी कविता में यत्र-तन अतियथाथवादियों को मुक्त अनुपग लखन पद्धति का भा प्रयोग मिलता है-- मदान के किनारे घाली पटरी के उस मौलसिरी गाछ का बोर जिसके नीचे की खुडढी घास म बठकर एक दिन दो आने की विलायती मलाई की बफ खाई पी। यहा भावधार प्रवाह उखडा, असम्बद्ध और स्वचारित भावनाजों की घोतक है। प्रपद्यवादी इस शली को विशेष प्रयुक्त करते हैं किंतु यह पद्धति मनोविश्लेषण के लिए तो उपयुक्त हो सकती है क्ला के क्षेत्र म यह विकृतियो का ही सृजन करती है। काव्य मे मुक्त अनुषग पद्धति उपेक्षणीय है यह बात मैं नही कहता, किंतु यदि इसका प्रयोग सहज भाव बोध के रूप म किया जाय, तो यह पद्धति उत्कृष्ट प्रगीतो के सुपन १६८ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एव पुनमू ल्यापन मे साधक होती है। कीटस को Ode to Nightingale एक एसी ही उत्कृष्ट रचना है जिसकी मौलिक प्रति म शायद ही कही एकाध शब्द परिवर्तित किया गया हो । पर नयी कविता में इस पद्धति के द्वारा सहज सौ दय और भाव बोध को प्रस्तुत न करके अवचेतन मन की स्वप्नावलियो को अक्ति करन की चेष्टा की जाती है। यह भी प्रकृतिवाद की क्ला के क्षेत्र म एक अनधिकार परिणति है। तीसरे तार सप्तक की भूमिका मे अज्ञेय जी न यह तथ्य स्पष्ट कर दिया है 14 नई कविता में प्रतिभा सम्पन्न कृतिकारो का अनुधावन करने वाली स्वल्प पूजी वाला 'प्रतिभायें अनेक हा गई हैं, जिनके कारण उसका वास्तविक स्वरूप भ्रातिया से भर गया है । हमे उनके इस वक्तव्य पर सतोष । है कम से कम दे भ्रातिया का अस्तित्व स्वीकार तो करते हैं ।
६ साठोत्तरी काव्य : अकविता, युवा-लेसन
[१] बदलते सन्दर्मों में नये मानव मूल्य
आज युग-याध, आधुनिकता, युवा लेखन की समस्यायें जादि विषयो पर जब
चर्चा की जाती है तब उमका सीधा सा अथ होता है-इस युग के मानव की समस्यायं ।
इमे दूमरे शब्दा म हम यो मह सकते हैं-बदलते हुए सदर्भो म मानव के नए मूल्य
युगान जावन मूल्यो और वस्तु स्थितियों का निम्नावित कविता म अच्छा चित्रण
किया गया है-
हम बरगद वे झूमत हुए वनें
हम मनबुझी चिनगारी से भीतग्रस्त
हम गधहीन अगरबत्ती,
हम धुल घुल जलने वाली एव मोमबत्ती,
हम गुलदस्ते म सजे हुए फूल,
हम सरिताओ के डूबे हुए कूल
हम मीठी नीम पी टूटी डगाल,
हम भूरत से खसी हुई माल
सहरों पर लहरें, जीवन गति मद
सीपियों में पल रहे घोघे और शख
जीवन म खून से नाखून आज एम्ब है
हम सब मीनारावे टूटे हुए सम्बे हैं,
आज का मानव आश्रयहीन भीतग्रस्त, गधहीन, जलनपूण, आडम्बरमय,
जावन की आपा में टूटा, वसित, क्षुधित, अनन्त भावनाजो और वासनाओ को सजोये,
हिंसक और खण्डित व्यक्तित्व वाला है । उसका यह विकास या रूपातरण सहसा नहीं
भाधुनिक जीवन की विकासशील यातिक स्थितियो य कारण हुआ है। काव्य कभी
जावन निरपेक्ष नहीं रहा, वह सापेशित वस्तु है अतएव उसम इस प्रकार का चित्रण
उसक जीवत होने का लक्षण है ।
काव्य के य ही स्वर विविध पो म विभिन्न युवा कविया की कविताओ में
हम आज आत्यतिक्ता के साथ प्राप्त होते हैं । युवा पीढ़ी का तात्पय साठोत्तरी
१५० / आधुनिए वाय्य प्रवृत्तियां एव पुनमू परिन पीढ़ी से लिया जाता है । इन बविया के सामने आधुनिक युग योधों की विकरालता अधिक तनी के साथ प्रगट हो रही है । आज अधिर तेजी साय यानिस्ता, बौदि पता, शिक्षित बेरारी असंतोष, सोम, प्रणवार, पक्षपात, शोपण, मानसिक, दास तायें और व्यक्तित्व का विखण्डन घढ़ रहा है। प्रयोगवादी कवियो को इनका सामना इतनी तजी के साथ नहीं करना पड़ा था । व तो राहो वे अथेपी ही रहे, नये रवियों को राहें मिली पर जीवन की अस्थिरता तथा ज्वड पावडता आदि म कारण ये रवि 'अधे युग' के 'यागन के पार द्वार नही मोज सये और जब ये द्वार पल तो उनके हाथ मे नयी कविता निपल चुकी थी। उन्हें प्राप्त हुमा-अविता पा परिवश । [२] भकविता आत्मा को अमुक्तावस्या सद्धातिर प म अकरिता या एटी पोयट्री या अप है-वह रचना जा वस्तु और शिल्प योजना पी दृष्टि रा परम्परागत अब म पविता नहीं है। यह वयिता है क्षणिक सवेदनामी म । वह बारमा का अमुक्तावस्या का दूसरा नाम है। उसम रस के स्थान पर नसताप है सविद् विधाति पी जगह साम और रचना वाम पर विखन और विद्रोह में स्वरो वा ऊहापोह है । यह धुरीहान टूटो, पगु या परम्पराहीन पीटा अपने वियलाग का ही जीवन की समग्रता मानवर चला है, यह यात्मरत पीढ़ी अपने को हा सृष्टि का मूल वेद्र ममगने लगा है। [३] नित नये यादो का आदोलन अपविता के युग म जितने कवि आय वे अपने साथ अपना एक वाद लेकर भाए । वादहीनता का नारा लगान वाले ये कवि होनवादी बने और यादो पा एक नया बादोलन हिदी काध्य के क्षेत्र म उमडा है । यह भी ठोसवादी बनी कमी ताजी या टटकी, कभी प्रतिवद भी सचेतन कभी अचेतन, पभी दिगम्बरवादी, कमी भूपीपीढ़ीवादी, कभी आत्मरतिवादी पभी ययुत्सावादी कभी अवारवादी और कभी अपवाग। इन अववियो के लिए पटे टयूब को फ्ट पट या टाइपराइटर की अनर्गल टिप रिप ही मधुर संगीत और अनजाने छन्दो की गुन गुन बनी और इहोने अर्द्ध व्याज या सयुक्त यजनो की अनवरत पुनरुक्तियो के द्वारा अजीव गरीववादी अवि ताओ की रचना की। धन ऋण विराम पूर्णविराम, रिक्त चिह अवतरण चिहा मादि को लेकर मनोरजब चित्र काय भर लिखे गय अर्थात् इस पविता की एक प्रमुष विशेषना बनी एन केन प्रकारेण पाठको को भड़काने की प्रवृत्ति । निश्चित ही आज युग बाधो को नकारन की सामर्थ्य रिसी में नहीं है पर समझदारी ही विशेष हो गई हा यह वात भी नही है । [४] सूय की नयी लालिमा नया युग बोध कुछ युवा कदियो ने विवेर के साथ युग चिनो को प्रदर्शित किया है जिनके साठोत्तरी काय अपविता, युवा लेपन | १७१ माध्यम से हम भाज की वस्तु स्थिति का बोध करन के साथ साथ क्लवी आने वाली कविता का भी पूर्वानुमान कर सकते हैं । वितायो वे पहाडो से घिरे लालटेन की रोशनी म अभरा पर झुके, ओ सिर । जरा पूरव की खिडवी तो योल आकाश रग गया है सूरज की लालिमा से। श्री किरण जन का यह 'नया युग बोध' है । उनका कवि अक्षरो के ससार से परे, की खिडक्यिा खोलपर पूर्व म उदित होन लाले बाल रवि की को देखन का यात्माद्बोधन कर रहा है। खिडकी खोलकर पूर्व की ओर रगे हुए आकाश को देखना ही उसका नया युग बोध है। यही वह नया आयाम है जो युवा पीढी को विकास की नई दिशा दृष्टि प्रदान करता है । आज सचमुच युवा पीढ़ी को पूर्व म अर्थात् भारतीय सस्कृति सदभ म उदित हान पाल नए सूय का स्वागत करना है । सूय जो आस्था का प्रतीक है, अधे युग को समाप्त करने का सकल्प है, भटको को राह देन वाला, बेकारी का काम और शिथिल भुजाओ तथा पद पखो को मुक्त आकाश प्रदान करने वाला है । वतमान के प्रति असतोप की भावना और नए मोडा को आशा की दृष्टि स दयना-यह आस्थावाद नए काव्य को सजावनी प्रदान करने में कृतकाय हो सकता है। [५] हम मरणासन्न मनुष्य के प्रतिनिधि एक बय कविता में हम का विश्लेषण देखिए- हम आतक, विप्लव पडयन्त्रो और कालावजारी में सायेदार यानिक हैं हम हमारे फण भी दूसरों को निगलने के लिए हरदम उठे रहते हैं पर क्या होगा उस भगवान का जो हमारे सबके हृदय मे मरणासन्न पडा है वही हम उसकी लाश भी मदिरो को नीलाम न कर दें। अर्थात् आज हम वह सभी कर रहे है जो एक मनुष्म र सामारे।
१७२ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमूत्याक्न सबके हृत्य मे मनुष्यता मरणासन्न स्थिति मे है । कम से कम हम उसकी लाश मदिरों में नीलाम पर पसे वसूल न करें। म मनुष्यता की लाश ढो रहे हैं में यह अवबोध होना जीवन रचना की एव दिशा है । सम्भव है, सजीवनी मिलने पर वह हमारे जीवन म पुनरुज्जीवित हो सके । वर्तमान जीवन को स्वीकारते हुए भावी आशा की यह सूक्ष्म किरण नए काव्य का विकास के नए सोपान प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हो सकती है। [६] अब कहीं कोई याना नहीं-गतिहीनता वतमान जीवन की गतिहीनता और निरर्थक्ता का चित्रण करते सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक जगह लिखा है- अव कहा हाई याता नहीं है, न अथमम, ने अथहीन, गिरने और उठने के बीच में कोई अतर नहीं। मनुष्य आज अपने पेद्र पर वडी तेजी साथ घूम रहा है, इतना तेजी के माय कि हर वस्तु पारग तो गया है और वह भी दूसरा के लिए अपना रग और आकार खो चुका है पर उसकी ये परिश्रमायें उसे यहां ले जा रही हैं ? विकास कहाँ हो रहा है। मनुष्य जहा बा तहां है कोई अथमय उपलद्धि उसके पास नहीं । उही की एक दुघटना कविता देखिए- [७] एफ विकालिक दुघटना एक अदश्य इमारत मेरे उपर गिर पड़ी है जो 'नही है उसके बोझ से मैं दव गया है। एक अदश्य नदी मुझ पर फल गई है जो 'नही होगा उमकी धार में मैं वह गया है। एक अदश्य सडक मेरे नीचे से निकल गई है जो 'नही था' उसकी चपेट से मैं कुचल गया हूँ। अर्थात भूत, वतमान और भविष्य इन तीनो की निरथक सम्भावनाओ से आज का मानव कुचल रहा है। जो न था, न होगा और है-फिर भी त्रस्त आज का मनुष्य केवल सम्भावनानी के कारण शान्ति प्राप्त नहीं कर पाता । यह अस्थिर मन स्थिति युवा पीढी के लिए घातक सिद्ध होगी। हम असमथतामा के नहीं व्यथ सम्भा वनाआ के पाटो म पिस रहे हैं । [८] सारे सदनों से कटे हुये इमो बात को कुछ वदले हुए सदर्भ मे शेरजग गय ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है- साठोत्तरी काव्य अनविता, युवा लेखन | १७३ सारे मसूबे रख आए हैं ताक पर हम सूने आगन से धूल ढके दपण से जीन हैं। एक वक्त गुजर गया, अपने से वात नहीं कर पाये मरने को मिलता अवकाश नही, हम ऐसे जीवन से भर आये या ही दुघटना से घटे हुए सारे सदर्भो से कटे हुए जीत हैं । यहाँ वतमान जीवन के प्रति क्षोभ है, ऐकात्तिक्ता और अतिशय यस्तता है। जीवन से ऊब और सदर्भो से कटन की अकुलाहट है । युवा कवि और आगे बढकर इन क्टे सन्दर्भो का जाड सक्ने म समथ हा सकते हैं । उनके समक्ष अभी इस दिशा म भी पर्याप्त अवसर है। [९] नागदेश के अधिवासी-व्यग्य बबिता की एक और सशक्त विशपता है उसकी व्यग्य क्षमता । जहा व्यग्यकार निर्वयक्तिकता के गुण से युक्त हैं वहा निश्चित हो उनके व्यग्य प्रभावशाली और तिलमिलाने वाले बन गये हैं, शेष स्थानो पर उनम रूखापना और गद्यात्मक्ता है । यहा हम कुछ स्वस्थ व्यग्य कविताआ के उदाहरण दे रहे हैं जिनसे युवा कवियो को इस दिशा में नई दिशा सकेनो का अवबाघ हो सके। आज हम सब नागदेश के अधिवासी हमारे चारो ओर नाग ही नाग हैं कुछ काले हैं कुछ कवर कुछ अजगर हम उन्हें दूध देकर पाल रहे टेककर माथा सिर पर उठा रहे ? यहा नाग भ्रष्टाचार का प्रतीक है । भ्रष्टाचार का विरोध न करना, चुपचाप विषपान करना भी एक भ्रष्टाचार है। इस तरह आज हम प्रत्यक्षत भने ही भ्रष्टाचार न करें, किंतु सक्रिय रूप से उसका विरोध न करने के कारण उसे प्रोत्साहन अवश्य दे पाक के सदभ में विमलेश का अधोलिखित व्यग्य भी युगीन जीवन की विड म्बनाओ को अच्छा तरह प्रस्तुत करता है- जाओ, दो आने का तेल लामो, और टूटी कमर पर मालिश कराओ १७४/ आधुनिय' काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनरयावा क्योकि तुम्हारे हिमायतियों ने पट्टी तुम्हारी कमर पर बाधने पे बजाय अपनी आखा पर बांध ली है अपने पन म भी देखो रितती धाधली है। आज का अपनापन भी विसगतियां से भरा हुआ है और साठोत्तरी काव्य दही के विश्लेषण का प्रयास है। [१०] आत्महत्या के विरुद्ध डा. देवराज की 'आत्महत्या का एक प्रसग यहाँ और दुष्पव्य है । ६ छोटी कविताओ में विभक्त यह आपकी एक लम्बी सी कविता है जिसका अतिम अर्पात उप सहारात्मक यश यहा प्रस्तुत है- तुम्हारी खुदकुशी करने की बात मेरे दोस्त, न मुझे पसद है न तुम्हारी भाभी को। फिर भी कानूनी पाबदियो के बावजूद यह मानना ही पडेगा कि एवं जनतनी नागरिक होने के नात अपने जीने मरने के जिम्मेदार तुम हो न कि इस या उस लोक की सरकार । इन पक्तियो द्वारा आज के आदमी के बीच औपचारिक्ताहीन सम्बधों और सवेदनाहीन बौद्धिकता पर अच्छा प्रकाश पडता है । अगर दोस्त आत्महत्या करता है, तो कवि की पत्नी को नाहक ही दुख होगा उसे कितना कुछ राना पडगा, महज इसी लिए वह आत्महत्या न करे यह तक भी कम वजनदार नही । यह व्यग्य भुगीन मान वीय सम्बधो की विक्लाग स्थितियो को अनावत कर रहा है। यह इसे हम बौद्धिकता कह सकें, तो यह साठोत्तरी पीढी को एक प्रमुख विशेषता मानी जा सकती है । [११] कुछ भी सही न होने को पीडा साठोत्तर युग मे न सही होने की स्थितियो के भी जो चिन अक्ति किये गये हैं वे भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं- लोग देश के उत्तर से दक्षिण तक, और पूरव से पश्चिम तक कुछ भी सही न होने को तनी हुई रश्मियो में लटके हैं 1 लटके हैं ।। लटके हैं ।।। भूख से मरते तडपते, लोगो को कहा गया वे लोग अधिक अन्न उपजाने के महान काय मे लगे हैं, आदोलन नही करते हैं सठोत्तरी माप अवविता युवा-लेखन / १७५ और ये रम रोगानदार मुखड़े पांद के टुकहे अपन लिए पूरी पणा तयार कर चुके हैं और लोग उन पर पेझिशर नाव साफ करते हैं 'नाव साफ करते हुए लोग भून दिये जाते हैं गोलियो से व्यवस्था, कानून और अनुशासन के नाम चढ़ाकर वाफेह सर दर्द करता है क्या यह देश उ हें सौंप कर हम कही न जायें ? -कुतल कुमार जन। कुछ भी सही न होने को यह पीडा गलत भापणवाजी,बानी के चाँद से टुकडे मुखडे, अनुशासन के नाम पर अत्याचार, वासा के भीतर त्रास, तमाम आदों के नकाबो के पीछे-पीछे झूठा के द्वारा फैनाई गई अव्यवस्थायें और हर मन को अधी सहमी बदबूदार गुफायें अब आज विसी का भी अजनवी नही हैं साठोत्तरी पीढी उन्हें अपना इष्ट बना पर चल रही है किन्तु यह वह्ना नितान्त भम है रि उसम जीवन दृष्टि का अभाव है, वह कोरी समकालीन है, आधुनिक नही, उसम एतिहासिक चेतना नही उसका सारा सपप एक अच्छे मानव के लिए ही है, उसका यह आत्म सप एक ऐसा महाभारत है जहाँ युद्ध के बिना मुक्ति नहीं कोरवा की विशाल वाहिनी के बीच सैकडो अभिमन्यु आज कुचले जा रहे हैं किन्तु यह कम गौरव की बात नहीं कि वे सघपरत तो हैं। पौराणिक सदों और ऐतिहासिक चेतना सम्पन्न कीतिलता की ये पक्तियां यहाँ उदत की जा रही हैं--"जल म उपजे और उसके कोचह का चूसकर पनपने वाले ओ कमलकुल श्रेष्ठ ! शेषनाग पद पर सुशोभित हो मनिया की तरह क्या तुम भी जन विदेह बन गये ? तो अब मेरा अभिशाप लो क्ल ही दलबदल काई अगस्ति, तुम्हारे इस सागरमा अचमन कर जायेगा और तुम्हारा पाला हुना घमचो सा शेष- नाग, अवमर पाकर तुम्हें ही डम जायेगा। (आज तुम हो, कल इस शम्या पर कोई दूसरा आ जायगा ।) इन सारी कविताओ को दपत हुए यह नहीं कहा जा सकता कि म कवि कहे जाने वाले रचनाकार सदों से कट है, वे जावन विकास की शृखला से जुड़े हैं, वे भुक्तिवादी नहा, मुक्तिवादा हैं च्युत सस्कृत नही ऐसा उह मानने या भ्रम पाला गया है। (१२) भूखी पीढी काम परिवेश मे फशन परस्ती,अध-अनुकरण,अज्ञान और जात्मप्रदशन के मोह मे अ कविता आदो सन म ऐसा भी बहुत कुछ लिखा गया है जो देय है कुत्सित है जीवन की अति-यथार्थ स्थितियो का नग्न वत्त है, प्रतीरात्मर और पटेसिया को असगतियो से भरा १७६ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमूल्यांकन हुआ है । विशेषरूपेण काम के क्षेत्र म भूषी पीढ़ी ने जिस नग्नता का इजहार विमा है वह निदनीय है । यथा, शुमा दे रजस्राव से कुल्ला धरना, पतित रज (लिवर) मे म्नान करने, उसकी एयरपडीशड ओदरी म सोने, फटिलाइज्ड होने और इससे भी अधिक खुले शड और चिन साहसिकता के नाम पर भले हो किन्हीं की प्रशंसा रे पान हो किन्तु व्यक्ति सत्य होते हुए भी कविता के सामाजिक परिवेश में ये अनपेक्षित हैं। आक्रोशी मुद्राओ में भी कुसौंधारियों को अश्लील गालियां देना न तो सवेगो का विवेकीपरण है और 7 भावों का बौद्धिवीकरण। अपवियो का यह ब- यक्तित्व औ म मानवीय रूप निश्चित ही साटोत्तरी पीढी का एक प्रमुख स्वर रहा है कि तु है वह उपेक्षणीय ही। (१३) एक कुत्ता रात भर रोता रहा न जाने कहाँ खो गई मेरी नदी जिसम मैन नावें चलाई थी' (अपिता अग्रवान) मैं फिर दहकूगा ढलते सूरज की तरह और छाडू गा अपनी रक्तामा लहरो पर, पेडो पर, चट्टानो से निस्ल वहते झरनो पर (सुरेश ऋतुपम) आदि म जो रामाटिक दृष्टिकोण और भावी जीवन के स्वप्ना की रूप रेखायें हैं (रोमानी) थे भी परम्परा से जुड़ी हुई हैं कटी नही चिर परिचित प्रतीको यो उठाकर कही गई ये वातें भी सहज ग्राह्य हैं। एक कुत्ता रात भर रोता रहा, मेरे आसपास और मैं सोता रहा, फिर दिन भर में हाफता रहा, रोता रहा और वह कुत्ता कीचड मे पूछ दबाय सोता रहा (अशोक अग्रवाल)-इस कविता मे दिन मे आदमी को फुत्ते के स्तर पर हाफ्ना और रोना और फिर रात को कुत्ते का रोना-और इस तरह मानवीय जीवन की यह अनवरत क्रियाशीलता भी सहज ग्राह्य है। वितु बजरग विश्नोई जैसे अ कवियो की भी कमी नही जिनकी कविताओ का अर्थ (अ-नथ)समझाना सरल नहीं- माओ तम्ह दिखायें बिजली के लटर आ से गरतो रगीन रोशनियो को साजनो करवट के नीचे काठ के मर पर सामने से सरत रेखाओं सी उग आई दो घारी कटारो के इस चमचमाते ज्यामिनिक वन को (१४) फेवल पर्याय हाय मलने फा एक दूसरा कविता वा उनाहरण देखिए- एक इच भूमि जहाँ रहन पे लिए नही कोई कुछ भी अपना पहने र लिए नही, सचाई पर पर्दा डालकर मैं अपना दश उस कहता हूँ घुए को गात बनाकर मैन गाया है एक बार सुना झूठ अव तक दुहराया है साठोत्तरी पाव्य अपविता युवा लेखन/१७७ । अथ कुछ नहीं दिन भर चलन वा केवल पर्याय हाप मलन का अपने हाथो दुघ को मारकर रोज रोज नई मौत सहता हूँ पह 'एक देश गीत' है । आधुनिक युग के अपने देश पर इसमे मार्मिक ध्यंग्य समाहित है । जिस देश में अपना कहने नायर कुछ भी नही, रहने को छप्पर नही तन ढारने के लिए वस्त्र नही, घाने पो दानानही वही हमारा देश है । जहाँ कोई बात नहीं करता, बात नहा सुनता, कोई स्वजन नहीं, सब शोषण में मग्न हैं वह हमारा देश है । जहा के प्राचीन वभव और जय स्मतिया को दुहराता रहा, जिसे अनन्त वो भी सहारा देने वाला हिता रहा, पर जो अपने देशवासियो को भी जीने की सुविधा न दे सका वही हमारा दश है। निश्चित ही ये व्यग्य आंखें खोलने वाले एव अंधविश्वासों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करने वाले हैं । इस अथ मे नयी पीढी अघ युग को नगरी वाणी और नय स्वर परिवश प्रदान पर रही है। इस दिशा मे आगे बढार अभी बहुत कुछ ऐसा ही अजित किया जा सकता है। युवा लेखक आज अपनी अधियाश शक्ति विक्ल चीत्कार अत्मसघष, घुटन,क्टु वातावरण से ऊब, छटपटाहट, अनास्यामयी जीवनी शक्ति तथा अतृप्त काम पिपासाओ के चित्रण में लगा रहा है। निश्चित ही आज इनसे विद्रोह की जावश्यकता है। पर ये उपादान अपने आप में साध्य नहा अच्छे जीवन की धि के साधन हैं । किन्तु हमारा आज का युवा वग पतझड की गध ग्रीष्म का उच्छवास मरूभूमि की तपन और जीवन की वितृष्णा का प्रतीक बन रहा है। वस्तुत आज के जीवन की गति विधिया इतनी विक्ट नहीं हैं जितनी कि वे प्रकर की जा रही हैं। ये सुख दुख पहले भी आख और मन के खेल रहे हैं और आज भी सभव हैं । निश्चित हो आज शहरा के जीवन में अपूव परिवतन आया है कि तु अभी उनके सुधार की सम्भावना है। अभी भी 'यागन के पार द्वार' खुले हुए हैं ताव के पार' टिकाने के लिए अभी भी जगह है, 'मूनी नाव अभी भी मनु के होने की सम्भावनाआ से भरी हुई है चांद का मुख टेढा अवश्य दिखाई देने लगा है किन्तु जभा भी अवेले कण्ठ की पुकार' में शक्ति है काठ की घटिया अभा मा बज सस्ती हैं भी भी पात्मजयी' आत्महत्या के विरुद्ध हैं और वे इन विषय परिस्थितियो को अधिकार में कर सकते हैं। युवा लेखको को क्वल सनाहीन दशक नही बनना है वरन इसके जागे बर कर उहें अपने परिक्षेत्रो म नये आयामों की शोध करनी है। उनके द्वारा शोधा गई दिशायें ही नये काय को विकास की सम्भावनायें देंगी और युवा कविया को इतिहास में पन्नो म स्थान मिल सकेगा अयथा बाज का समस्त लेखन परस्पर और आत्म सधप मे घट पिस कर समाप्त हो जायेगा।
१५८ आधुनिक काय प्रवृत्तियां, एक पुनमूल्यांकन युवा लेखक युयुत्सा की भावना को भी अधिक प्रश्रय दें पर यह भावना व्यक्तिगत तथा सामाजिर स्तर पर अवमूल्यन, कंपनी और भरनी मे विभेद, मोहभग, असतोष, विर्तव्य विबोध, अधेरापन, भटकाव, अनुत्तरता, सकीणता, यांविरता, विद्रोह के घोललेपन, अतियथार्पता आदि के विरुद्ध हो। आज का युवा लेखर एक बधे हुए मुहावरे में भी बघता जा रहा है, उसे आगे बढकर इन सकीर्णताओं को तोडकर सपषमपी पर निर्मल जीवन धारा की सजना मे अपनी शक्ति ध्यय परना है।
परिशिष्ट Mas [यहा पश्चिम को उन कलावादी काव्य-प्रवृत्तियो का सक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है जिनका छायावादोतर हिदी काव्य- प्रवृत्तियो पर गहरा प्रभाव पड़ा है । ] अतश्चेतनावाद Founs सिगमड फ्रायड (१८५६-१९३९ ई०) इसके जनक हैं। इनके अनुसार जीवन के सभा कामो के मूल में 'काम वासना' प्रमुख वस्तु है । बाल्यकाल मे यह काम वासना मातृरति (Osprdus Complex) के रूप में परिणत हो जाती है। बाल्य कालीन ये ही अतृप्त काम-वासनायें आगे चलकर यक्ति का चरित्र निर्माण करती हैं। फायड के अनुसार मनुष्य का मानस मुख्याश म अवचेतन है, और ईपत् मात्रा में चेतन । अचेतन मस्तिष्क मे ही वे काम वासनायें छिपी पडी रहती हैं, जिनकी पूर्ति व्यक्ति अपन दनदिन जीवन म सामाजिक्ता, राति रिवाज, धम या समाजभय के कारण नही कर पाता, अपने चेतन मस्तिष्क के द्वारा व्यक्ति इन सामाजिक और सास्कृतिक वधनो की विरोधी वत्तियो का दमन कर देता है किन्तु ये बाम वासनायें मरती नही प्रत्युत अचेतन मस्तिष्क म जाकर अपने प्रकाशन का समुचित अवसर खोजने लगती हैं। सुअवसर पाकर ये ही मनोयाधियो, स्वप्ना, दिवास्वप्नो, साहित्य, क्ला नादि के रूप मे व्यक्त हा जाती हैं। क्ला के रूप मे जो काम वासनायें व्यक्त होती हैं उनम और स्वप्ना मनोपाधिया के रूप में व्यक्त होने वाली दमित वत्तियो मे कोई तात्विक भेद नहीं है, हा एक को कुरुचिपूर्ण और दूसरे को सुरुचिपूर्ण कहा जाता है। कला म कलाकार अपनी कल्पना द्वारा अपनी अतप्त, कुठाआ को छदममय आवरण दे देता है जिससे उनका प्रकाशन बिना हिचक दे दिया जा सके । यह छन्म पूण आवरण देना ही कलाकार की सजनशीलता का रहस्य है । यही छद्ममय प्रकाशन कला मे उदात्तीकरण के नाम से पुकारा जाता है । यही छदममय आवरण कुठाओ, काम वासनाओ का कलात्मक रूप कलात्मक सौदर्य कहा जाता है जो पाठको के आहार का कारण है । यह प्रेषणीयता भी दमित काम भावनाओ की पाठक में उपस्थिति के कारण रस पेशल होती है। पाठक या श्रोता अपनी ही दमित गयो की छाया जब दूसरी जगह देखता है, तो वह आह्लादित हो उठना है। कार अपनी अचेतन पापानुभूतियो से परिचालित होकर काव्य-सजना मे हम १८० / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनम ल्याकन - माध्यम से वह अपनी दमित काम वासनाआ का प्रगटीकरण करके उनके दश से मुक्ति प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार फ्रायड के अनुसार क्लागार का मानस कण रहता है और काय मष्टि जात्मापचार का एक साधन है। इस प्रकार काम भावना या (लिविडो) को फ्रायड जीवन व्यापिनी शक्ति मानता है, जिसस छोटे बडे सारे मानवीय क्रिया-व्यापार परिचालित होते हैं। एडलर और काल युग भी अतश्चेतनावादी विचारक हैं वितु ये फ्रायड से किंचित'मतभेद रखते हैं। एडलर विकृत काम वासना को मूलभूत शक्ति न मानकर हीनता की भावना (इनफारियर कामप्लेक्स) को सवस्व मानता है। यह शारीरिक या अय हीननाआ के फलस्वरूप बाल्यकाल से ही व्यक्ति के अवचेतन में बदमूल, हो जाता है । उसी के निवारणाथ, क्षतिपूर्ति के रूप म व्यक्ति के जीवन मे सत्ता और मह वाकाक्षाओ का सृष्टि होती है । साहित्य और विविध क्लायें, हीन भावना की प्रथि से उत्पन्न क्षति पूनि का साधन है। वालक मे बुद्धि विकास के मूल मे भी यही वस्तु रहती है । अभाव की अनुभूति यक्ति को ग्लानि से भर देतो है प्रतिक्रिया स्वरूप व्यक्ति उस अभाव या हीनता की भावना को नष्ट करने के लिए अग्रसर होता है। एर के अनुसार जो यक्ति जितना अधिक मेधावी या प्रतिभा सम्पन्न होगा उसके हृदय म उतनी ही अधिक ग्लानि या आत्महीनता की अथिया होती हैं। आत्म ग्लानि ही प्रभुत्व सत्ता को उग्र करती है। इस प्रकार व्यक्ति शक्तिशाली प्रतीत होते हुए भी वस्तुत शक्तिहीन होते हैं। उसकी क्षतिपूर्ति का प्रयत्न वयक्तिक स्वाथ परायणता और जहकार का हेतु होता है। इस प्रकार का लखक अधिक प्रतिक्रियावादी और स्वच्छटनावादी होता है। एडार का यह भी कहना है कि साहित्य क्ला, शिक्षा, मनोविज्ञान आति का लक्ष्य यक्ति या क्लावार की मिथ्या अहमूलकत्ता को नष्ट करके विश्व बधुत्व या सामाजिक भावना का विकास करना भी है। दस्तोयेवस्की न यही काय करके साहित्य सजना के क्षन में महानता प्राप्त की। युग जीवनेच्छा का मानवीय जीवन के विकास की मूल धुरी मानते हैं । उनके अनुसार जीवनेच्छा ही पत्ति में जीवित तथा बमर रहने की प्रबल भावना का सृजन करती है । यह बासना लो वित्त और पुत्र- इन तीन मार्गों से अभि यक्त होती है। साहित्य और क्लाय सना जीवित तथा अमर रहने की लालसा के ही प्रतिफनन होते हैं। युग ने काम वासनाओ तथा होनता की अथिया को जीवनेच्छा म ही समाहित कर लिया है । उनके अनुसार जीवनेच्छा ही इन दो रूपो मे अभि यक्त होती है । इही को आधार बनाकर उहोंने आत्ममुखी और बहिमुखी -यक्तित्वो का विभाजन भी किया है । अ तमुखी व्यक्तियो म प्रभुत्व कामना प्रमुख रहती है बहिमुखी मे काम वासना । प्रथम शासक या नेता हाना चाहता है, दूसरा शासित। प्रथम, अपने को । 2 परिशिष्ट । १८१ सबसे अधिक महत्व देता है, दूसरा, दूसरो को। ये दोनों ही वासनाएँ प्रत्येक व्यक्ति में रहती हैं किन्तु किसी में कोई कम, कोई अधिक या प्रबल रहती है। इस प्रकार युग का मत समवयवादी है ये काम-वासानाआ को फायड की तरह दमित न मानकर अविकसित मानते हैं । युग कलाकार के हृदय में दो विरोधी प्रवत्तियों का दद्व मानते हैं । एक ओर उसका व्यक्तिगत जीवन और वैयक्तिक-सुख साधन है, दूसरी ओर सजना की उदात्त प्रेरणा है। इनके परस्पर द्वन्द्व से कलाकार विकल रहता है, क्ला मे 'सामूहिक अचेतन' को मूत्र प्ररणा काय करती है। यह 'सामूहिक अचेतन' -यक्तिबद्ध न होकर प्राणि मान स सम्बन्धित कल्याण-भावना है। चेतना इसी सामूहिक अचेतन से उत्पन्न होती है। युग के अनुसार जब किमी व्यक्ति या युग की चेतना समय के अनुकूल नहीं रहती तो उसकी क्षतिपूर्ति के लिए सामाजिक अचेतन सजग रहता है। इस मनोविश्लेषणवाद से प्रभावित साहित्य में यथाथवादी शली वा अनुगमन करके जीवन की कुण्ठाओ, दमित काम वासनाओ, निराशा, उदासी, विथ खलित मन स्थिति को काय का वयं बनाया गया । इस प्रकार यौन विचारो और दमित वासनाओ तक कलायें सीमित हो गई । लेखक अपनी विलासिता की पूर्ति करना अपना क्त्तव्य समझने लगे और साहित्य के प्रमागत सभी प्रतिमान उपक्षित हो गये । जो वाय अभी तक छमवेश में होता था अब वह खुले आम और नग्न रूप म होने लगा। फलत दुवल, अतद्वंद्व प्रधान और चरित्रहीन पाना और नायको यो प्रश्रय दिया गया, उह साहित्य का नायक्त्व दिया गया और वैयक्तिक काम वासनाओ की पूर्ति को सवस्व मानकर क्षणवादी मनोदप्टि पो चरमता प्रदान की गई। क्षणो क सुखो में ही जीवन का सार समझा जान लगा। बलावार अचतन रूप से नही प्रत्युत सचेतन होकर अपनी पापानुभूतियो का प्रकाशन करने लगे। कवि की सत्ता अत्यत ऐकातिक और मनो मयी हो गई। वयक्तिक्ता और अवचेतन की दमित, सडी गली वस्तुआ को वाणी देना ऐसे कलाकारो का चरम लक्ष्य बन गया। परत एस साहित्य का देश-विदेश सवन्न गहरा विरोध हुआ। रोजेस फ्राई ने लिखा है कि प्रायड के सिद्धात केवल अधम साहित्य को ही चर्चा करने मे समथ है उत्तम साहित्य उसकी पहुच के परे है। यह एक क्लावादी सिद्धात है । हिदी के सभी प्रयोगवादी कवि इस मत से प्रभावित प्रतीकवाद प्रतीक्वाद का जम फच काव्य मे उन्नीसवी शदाब्दी के अतिम दशको मे हुआ। बोडे ही समय में इस कलावादी सिद्धा त का प्रभाव साहित्य तथा क्लाजो के सभी अगोपागो पर गहराई के साथ पडा । प्रतीकवादी फंच कवियो म बोदलेयर, वलेन, मलाम रेम्बो, एरी द रेये वहेरेन, गस्ताव वान, क्लोदल, सुस्त, वार्लेरी आदि प्रमुख हैं।
१८२/ आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनमूल्यांकन इन पवियो का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ा है। जर्मनी के रिल्वे, रूस के ब्लोक, आयरिश कवि योटस, मेरिया वे हाथान और विटमैन तथा इ ग्लण्ड के टी०एस० इलियट उनमे से कुछ प्रमुख हैं। इलियट अमेरिका के थे पर इग्लैण्ड में आकर बस गये थे। जिस समय प्रतीक्वाद आदोलन के रूप में जन्म ले रहा था उस समय फास मे कतिपय दुघटनाओ के पश्चात् तीसर गणतत्र (१८७० ई.) की स्थापना हो चुकी थी। शिभा का यापक स्तर पर निशुल्क रूप से प्रचार हो रहा था। इस समय समाज आभिजात्य वग तथा विस्तत जन साधारण के रूप में विभक्त था। साधारण वग नव चेतना के प्रकाश से पुरोहितवग तथा उसकी दुवलताओ से पूर्णत अभिन हो रहा था । इसम आभिजात्य तथा पुरोहित वग के प्रति प्रतिक्रियाएं होने लगी थी। आभिजात्य वग भी इससे सजग हो रहा था और अपना प्रभुत्व कायम रखने तथा जनता म समादर पाते रहने के लिए प्रयलशील था। उमने प्रतिक्रिया स्वरूप अनेक धार्मिक स्कूत खुलवाय जिनके द्वारा उच्च धार्मिक शिक्षा का प्रसार कार्य प्रारम्भ हुआ। इस प्रकार एक ओर जन सामाय वग था और दूसरी और पुरोहित वग । साहित्य के रूप म जब य वग ढले तो उनसे एक ओर यथाथवाद का प्रवतन हुआ और दूसरी ओर प्रतीक्वाद ना ! एक के जनक थे एमिल जोता और दूसरे के मलामें। जोलान भौतिक विज्ञान का जाश्रय लिया और स्थूल, भौतिक पथाथ और प्रकृत वादी प्रवत्तियो को जन्म दिया । मलाम ने यथाथवाद या प्रकृतवाद का विरोध करते हुए सूक्ष्म अमूत सौन्दयपरक और प्रतीक्वादी वत्तिया का प्रथय दिया। तत्कालीन जन सामान्य की मनोवृत्तियो का सबल लेकर प्रकृतवाद फास की धरतो की उपज थी । वह भागस्त कौन गिने तेन और रेने असे समीक्षा तथा साहि त्यिको की मनावत्ति का सहज विकास था। इसके साथ ही प्रकृतवाद समसामयिक शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान विकासवाद और भौतिक विज्ञान से सम्बधित नई शोधा से प्रभावित भी हुआ था। ईपत मात्रा में इसन इतिहास सम्बन्धी नये अनु सधानो से भो प्ररणा ग्रहण की। प्रकृतवाद ने यथायवादा शली का अनुगमन पिया। सामाजिक मनोवत्ति की प्रमुखता के कारण यथाथवाद ने कविया की व्यक्तिनिष्ठता तथा उनके व्यक्तिक सदनो को नही उभरने दिया। प्रतीक्वाद प्रकृतवाद के विरोध में प्रतिक्रिया स्वरूप विकसित होने के कारण उनकी सभी मूल प्रवत्तियो का विखण्डन कर अग्रसर हुआ। उनने यथाथवाद की जगह रहस्यवादी शली को गृहीत किया और तत्कालीन पारनशनिज्म ( Parnassha nism ) का विरोध किया। प्रतीक्वाद न अपने देश से बाहर की विचारधाराओ से भी प्रेरणाएं ग्रहण की। कांट पिख्ते, लिग हीगल, शापेनहावर आदि उनकी प्रमुख परिशिष्ट | १८३ प्रेरणा के स्रोत रहे हैं। पारनेशनिग्म धारा के कवि-गातिया लेकात, हरदिया आदि यथाथ वस्तुमूलक्ता को लेकर अग्रसर हा रहे थे। मलाम ने उनका विरोध तथा अपने प्रतीक्वाद का समय करते हुए लिखा है कि 'पारनेशन-कवि विषय वस्तु को उसके यथाथ रूप म ग्रहण करते हैं और उसी रूप में हमारे सामने प्रस्तुत भी कर देते हैं। इस प्रकार उनमे रहस्यवृत्ति का अभाव रहता है। रहस्य के कारण विषय वस्तु को समझने के प्रयल में धीरे धीरे विश्वाम करो का जा समोहक आनन्द हम प्राप्त हाता है उससे हमारा मस्तिष्क वचित रह जाता है। रविता का आन द तभी मिलता है जबकि हमे सतोष हो कि हम उसकी वस्तु का थोडा थोडा करक अनुमान लगा रहे हैं पर तु स्पष्टतया क्थन कर देने से कविता का तीन चौथाई आन द नष्ट हो जाता है। हमारी मनस चेतना को वही प्रिय है, जो सकेत करता हो सचेत करता हो।" मलामें के इस सिद्धान्त के अनुसार जिस प्रकार के काय की सजना हुई, उसम क्थन स्पष्ट न हो कर अस्पष्ट रखा गया और प्रतीको की बहुलता जान बूझ कर रखी गयी। प्रतीकवाद का प्रारम्भ बोदलेयर के द्वारा हुआ था पर उसकी शली सम्बन्धी विशेषताए वीलिर्स ( Villiers del isle Adam ) की एसेल' ( Axel ) नामक कृति से प्रकाश म आयी। बोदलेयर एडगर एलन पो के सौदयवाद से प्रभावित हुआ है। प्रतीकवादी अपनी सवेदनाआ तथा भावनाआ को प्रतीको के माध्यम से व्यक्त परते थे अतएव इन्होंने प्रतीक योजना की विविध शरियो का अनुवतन किया। इनके सिद्धान्त अतविरोधा से भर हुए हैं। इनके अनुसार हमारी अनुभूतियां एक दूसरे से सश्लिष्ट, गतिशीत और अग्राह्य होती हैं । इ ह न तो ठीक ठीक शदा में व्यक्त किया जा सकता है और न स्मरण-शक्ति के द्वारा ही स्मन किया जा मरता है। माम के अनुसार अभिव्य जना की यह प्रक्रिया त्वरित होती है। इतनी त्वरित कि अनुभूति और अभिव्य जना मूलत दो पथक वस्तुएँ म रहकर एकमेव हो जाती हैं। इम प्रश्लिष्टता के कारण काव्य के वस्तु और शलीगत भेद नहीं किए जा सकते। फिर प्रत्येक रवि की सवेदनाओ तथा अनुभूतियो म भी पाथक्य रहता है अतएव उहें पूरे परिवेश म रूपायित करने के लिए रवि को नई शलियो का अवलम्बन भी लेना पडता है। नये विम्ब और नये प्रतीको का बाहुल्य इमी कारण उसकी रचनाओम हो जाता है। मलामें यह भी कहता है कि अनुभूत विपय अपनीय अनुपम और त्वरित होन के कारण उसका ज्यो वा त्यो प्रस्तुतावरण असम्भव है। कवि देवल उसका समेत भर कर सकते हैं। वे अभिव्यक्त नही केवन यजित हो सात हैं। इस प्रकार अन्तमन की मूदम से सूम सवेदनायें ध्वनिया, प्रतिध्वलिया और रहस्यपूर्ण समेत हो उन पाम्योपादान बनें वीर अस्पष्टता काब गयं विशे १८४/आधुनिक काव्य प्रयत्तियाँ एक पुनमू ल्याक्न पता मानी जान लगी। इहोंने ध्वनि तथा सुगध की अजीब-अजीव धारणाएँ भी व्यक्त की। प्रतीववादियो ने रोमांचो वो अशेष महत्व दिया तथा अतर और वहिजगत की धारणाओ, भावनाओ और बौद्धिवचेतनाओ धो उपेक्षित कर दिया। ये प्रकृति का प्रत्यक्ष स्वरूप मिथ्या मानते थे । वास्तविक सृष्टि उ होंने अमूर्त और अपार्थिव मानो, अन जिस समार की इन लोगो ने मृष्टि की वह हमारा जीता-जागता ससार न होकर -दुबलताओ विभ्रमो निराशा पुण्ठा, उदासीनता, "मित दुश्चेष्टाओ का असामाजिक ससार है । ऐदिर चेतना इनकी प्रमुख वस्तु योजना है। १८८५ ई० से लेकर १८९२ के बीच में विपुल मात्रा मे प्रतीक्वाटी रचनाएँ लिपी गई । इस समय अवेले पेरिस से जगभग एक सौ प्रतीक्वादा पनिकाएं निकलती eft farae ATECH Edourd Dugardın, Teodor de Wyzwa Remy de Gourmount आदि समीक्षक और प्रतीकवादी पवि इस आदोलन के मूल्यो और विशेषताओ का विनापन कर रहे थे। सबसे पहले १८ सितम्बर १८८६ को 'फिगरो' नाम पन म प्रतीकवादी अग्लोचक मोरोआज ने प्रतीक्वाट के उदय की उदघोषणा की थी कि तु आगे चलकर यह आलोचक प्रतीक्वाटी धारा को छोडकर शास्त्रीयता की ओर लौट गया । प्रतीक्वाद के पुरस्कर्ताआ मे से प्रमुख गेटलेयर के अनुसार काव्य का नति क्ता से कोई सम्बध नही है । नतिकता का आग्रह काव्य शक्ति की क्षीणता का कारण होता है । काय काय के लिए है और इसके बाहर उमका कोई प्रयोजन नही है । Poetry has no end beyond itself, if a poct has followed a moral end he has dismissed his poetic force and the result is most likely to be end' प्रतीक्वाद का एक अ य कवि वर्लेन ने भी काव्य में किसी भी उत्तरदायित्व का बधन स्वीकार नहीं किया है। वह निर्वाध रूप से आत्मपीडन, परपीडन आदि “यूरोसिस के सभी लक्षणो का प्रदशन का य में करना चाहता था। इस सन्दर्भ में उसका कथन है कि स्नायु व्यतित्रम के रोगी की भांति मैं वयस्क जीवन के उत्तर दायित्व को अत्यात कठोर समयता हू और एक दूसरी वाल्यावस्था में पलायन पसद करता हू प्रतावादी वग्नर व संगीत से भी प्रभावित रहे इस सम्बध में मलाम का कथन है कि काय एक प्रकार का सगीत ही है। वह हमारी इद्रिय चेतना को जागत करता है और मन की अमूत तरगो को झकृत । मलामें एक ऐसे संगीत का १ Literature and Psychology लूक्स द्वारा उदत अश परिशिष्ट / १८५ स्वप्नदर्शी था जिमके स्वर ग्रह उपग्रहों से झकृत होकर बारात्मा म सौदय-चेतना भर दते थ। ध्यक्तित्व का दष्टि से सभी प्रतीकवादी कवि दुबल अप्राकृतिक, अधार्मिक, अस्वस्थ और आत्मकेद्रित रहे हैं। वे अनतिक कुत्सित और घणास्पद कार्यों में भी लिप्त रहे हैं । वर्ले के जीवन म पाराव, कविता जल, अस्पताल और दुष्टतापूण काय ही प्रमुख थे। प्रतीक्वाद के ही एक समथ कवि रिम्बो ने एक बार उसे अपन पूर्व आघातो का प्रतिकार लेते हुए निदयतापूवर मारपीटकर एक गड म डाल दिया था। वाल्देयर भी चरित्रहीन था। गोर्वी के श दा म फास को वह ऐसी विषाक्त और निराशा से परिपूर्ण रचनायें दे गया जिनके कारण वह अपने जीवन काल मे विक्षिप्त और मरने के पश्चात कवि कहनाया और बाद मे विस्मरण कर दिया गया। माडन राइटर एण्ड हिज वल्ड' म जी० एस० फेशर ने रिम्बो और के प्रति अपना अभिमत देते हुए लिखा है कि 'मनार्मे की तरह वह (रिम्बा) क्या कर रहा है, इसका न तो उसे शान था और न वह जानना हो चाहता था। वह शराबी की तरह मस्त होकर अव्याहुत रूप से बोलता जाता था और उसने काव्य तथा जीवन को एक तो क्यिा पर विघ्रम और अव्यवस्था को जाम देवर।' लापोग भी प्रतीक्वादी निकाय का एक प्रतिनिधि कवि था। उसकी चतुर उक्तिया भास्थाहीनता और वत्तमोजी एवं होशियार स्कूली लडके समान कही गई हैं । कोवियर भी इसी सम्प्रदाय का एक प्रमुख कवि है । विल्सन न उसके सम्बध म लिखा है कि वह दिन भर सोता और रात्रि भर जीवन की अनुभूतिया एकत्र करता था और कविताएं निखता था। परिस मे, वेश्याओ से उसकी विशेष मती थी यानि अपन समान वह उहें भी समाज से बहिष्कृत समझता था। लाफाग और कोबियर दोनो तपदिक के मरीज थे और प्रमश २७ और ३० वष म मर गये। फ्रासीसी काय म इस आगेनन रे पूर्व भी प्रतीको का प्रयाग हुआ था। ईसाइ मत के परम्परागत प्रतीक थे रितु वे सरल मुगम और जन सामाय थे जित प्रतीकवादी कविया ने अपनी रोमाचकारा अनुभूतियो को सावे तिषता के लिए जिन प्रतीमा का प्रयोग किया व पूणत नवीन, बुद्धि विशिष्ट, दुरूह और जन निरपेक्ष थे। फत यह हुआ कि प्रतीक्वार साहित्यिक जगत से जल्दी ही मर गया। इसी प्रतीक वाद का अनुग्रहण कर हिनी के प्रयोगवादी कवि अग्रसर हुए थे फ्लित उनका काव्य भी बुद्धि विशिष्ट प्रतीकात्मा, अस्पष्ट रोमाचपण और अमृत अनुभूतियो की साकेतिरता से भर गया और बल्य कान म ही काल क्वलित हो गया। विम्मवाद बिम्बवाद क प्रवतका म टी० एस० एम का नाम प्रमुख है । अंग्रेजी साहित्य ।
१९६/आधुनिक काव्य प्रवृत्तियों एक पुनमू ल्याक्न में इसका प्रचलन इजरा पाउण्ड के द्वारा हुआ। टी० एस० इलियट भी इसम उन्ना यको मे एक प्रमुख कवि रहे हैं । बाद में राड और लारेंस जसे कवि भी इस आन्दोलन मे दीक्षित हुए हैं । विम्बवाद १६०८ मे एव साहित्यिक मादालन रूप म प्रचलित किया गया था। पाउण्ड बिम्बवादी (इमेजिस्टस) शब्द के आविष्कारण हैं। उनक अनुसार जिसके द्वारा निमित्त मान में बौद्धिक तथा सवेगात्मक जटिलता का प्रकाशन हो जाय, वह बिम्ब है। सम इमेजिस्टस पोयटस गीर से सन १९१४ में बिम्बवादियों का पहला सकलन प्रकाशित हुआ इसम उहोने अपन आदोलन से सम्बधित निम्नाक्ति माय ताओ को उदघोषित क्यिा- (१) विषय का प्रत्यक्ष प्रतिपादन (डायरेक्ट ट्रीटमट आफ दी सबजेक्ट) (२) प्रस्तुतीकरण की मित ययता (एकोनामी आफ प्रिजेटशन) (३) विश्व का सिद्धान्त (दि डाकट्रिन आफ दि इमज) (४) व्यवस्थित लय प्रयोग (दि यूज आफ आर्गेनिक रिदिम) ये लोग सामाय भापा और सम्यक श दो प्रयोग पर विशेष बल देत थे सम्यक शब्द से इनका आशय उस शद से था जिसका स्थान उसका कोई अप पर्या यवाची या समलकृत श द ग्रहण न कर सके । ये कठिन किंतु स्पष्ट कविताएँ लिखन रे पक्षपाती थे। सुन्दरतम और ध्वयात्मक होते हुए भी बिम्बवादी अनिश्चित विशेष ताओ को प्रथय देने के पक्ष मे नही थे। नवीन लयो के निर्माण पर ये विशेष जोर देते थे और उनका यह भी एक सिद्धात वाक्य था कि प्राचीन लयें पुराना मनादशाओं पी द्योतक हैं अतएव उनका प्रयोग कभी न दिया जाय । इन मा यताओ के कारण विम्बवादियो की भाषा सक्षिप्त, सूच्य और चिना- स्मक हो गयी है । टी० एस० इलियट के वेस्ट लण्ड म इसी प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है पर इस प्रकार की कविताओ को लिखने म पाउण्ड तथा हिल्डा डूतिट को विशेष सफनता मिली है । ये कवि क्षणिक मनोदशाआ को काव्य म ‘यक्त करन की चष्टा करत रहे हैं । अल्पमात्रा मे इन पर प्रभाववादी चित्रकला का भी प्रभाव पड़ा है। अनेक कमजोरिया क रहते हुए भी विम्बवाद न भाषा तथा शलो के नवीन प्रयोग कर का य के रूपात्मक बधनो की रूढ़िग्रस्तता से मुक्त किया है । अतुकात तया मुक्त छ दो की अवतारणा की। काव्य तथा संगीत मे सामजस्य स्थापित करने An image is that which presents an intellectual and emotional complex in an instant of time --Ezra Pound The Trend in Modern Poctry P 81 प परिशिष्ट /१७ का प्रयास किया और सौदयवाद की प्रतिष्ठा की । यह सिद्धान्त भो क्ता के लिए क्ला को मानने वाला सिद्धान्त है। पीटस, जेम्स ज्वायस, गड रटीन, प्रस्त, वेलेरी, रिल्ले, हिटमन, एलेक्जेण्डर ब्लोक, सेंडबग आदि जसे कवि भी इससे प्रभावित टी० एस० इलियट इलियट के आरम्भिक कवि-गुरु फा सीसी प्रतीक्वादी कवियो मे से जूल लाफोग और कौवियर रहे हैं जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विषय मे पिछले निवध म मकेत दिया जा चुका है । एडमड विल्सन ने विस्ता कौबियर को रोमाटिक कहा है जो 'उदास मन, अस्वस्थ दिमाग, तेजा से काम करता हुआ, कराहता हुआ, अश्लील मजाक करता हुआ, नम्बरी कदियो के कपडे पह्निकर अपने को प्रसन्न किया करता था।' लाफोग भी जीवन का अस्वस्थ पक्ष लेकर आगे बढ रहा था। इन दोना के अतिरिक्त इलियट गोतिए और इजरा पाण्ड से भी प्रभावित रहे है । गोतिए झास के प्रमुख रोमाटिक कवियो मे से एक था जिसकी विचारधारा क्षयशील और उच्छ खलता से भरी हुई थी। इजरा पाउण्ड का एक लेखक ने 'अन्तरराष्ट्रीय आवारागद' की सज्ञा दी है जिसक डा. रामविलास शर्मा ने मुक्त स्वर स समथन किया है । दि क्रियटिव एक्स पीरिम टस मे सी० एम० बावरा न पाउण्ड के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करत लिखा है कि निस्सदह पाउण्ड मे कोई ऐसी वस्तु है जो हमे उसस दूर ठलती है । उमका अगाध विद्वता का दावा उसके अपने निर्देशनो से सिद्ध नहीं होता। उसकी कविता म जिस व्यक्तित्व के दर्शन होते है, उसस सहानुभूति भी नहीं होती। उसके पर्य की गति अक्सर काना को अप्रिय लगने वाली होती है । उसकी रचनाओ पर नकला तह भडव की छाप रहती है जो भद्दा लगती है मानो कवि सर्वज्ञ हो । उसके राजनीतिक विचार विक्षुध और पाशविक हाते हैं और इनस उसे गद्दार का नाम मिला है जिससे किसी को ईर्ष्या नही हो सकती। (आस्था और सौन्दर्य पष्ठ २२६ से उद्धत) ० रामविलास शर्मा जी के अनुसार पाउण्ड जैसे लेखर पूजीवादी सभ्यता की वह सडाद है जिहें इग्लड और अमरिका व साधारण पूजीवादी लेखक भी सहन' नहीं कर पात । इलियट पर ऐसे ही लेखको दा प्रभाव पड़ा है जिसको गुरु मानवर हिन्दी के प्रयोगवादी रवि अग्रसर हुए हैं। डा. शर्मा जी ने इनिक्ट के वेस्ट रई' का भी विश्लेषण किया है और अपना मनप देत हुए लिखा है कि इलियट के स्वप्न उस पुरुषायहीन व्यक्ति के स्वप्न हैं जिसकी गिनती न जीवित व्यक्तिया म हा सक्ती है और न मतका म 1 इलियट ने बौदिक्ता को बड़ा हिमायत पा है । सकेत से अपन प्राण्ड बान की घाषणा की है मेकिन इस M १८८ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनमू ल्याक्न बजर प्रदेश से निकलने लिए मिवा यात्राएं वरन + और कुछ टाटका के उसके पास कुछ नहीं है। न तो उसको कविता पूजीवादी समाज की विषमताओ का चित्रण बरन में समथ है न उसकी बौद्धिकता, समाजवाद की और एक भी कदम उठाने को नयार है। इलियट रुग्ण वल्पना का कवि है। उस एन्दन-विज पर चलते हुए सब आदमी मुर्दे लगते हैं । इस वरपना म मानवता-विरोध में विपल कीटाणु हैं । इस कल्पना के सहारे वही भा स्वस्थ जीवा व चिह्न दिखाई ही नहीं देते । (आस्था और सोय, प० २३२) ० शर्मा ने यह भी प्रमाणपूवक सिद्ध कर लिया है कि इलियट के Prufrock and other Observation (1917) नामक ग्रय के अनेक वाक्य हिन्दी म प्रयोग वादा कविया के सिद्धात वाक्य बन है। यथा And Indeed there will be time To wonder Do I dare? and Do I dare ? And in short, I was afraid X X It is impossible to say What I mean! इलियट के वस्ट लड मे विविध भाषाओ के अपरिचित सन्दम आय हैं । क्लिष्ट सन्दभता क कारण वह प्रथ दुर्दोध हो गया है । पहली बार जब पाउण्ड ने इमे काट छाट कर इलियट को दिया था तो स्वय व भी उसको नही समझ पाये थे। क्लिष्टता, अस्पष्टता और प्रतीकात्मकता इस सीमा तक है कि प्रथ से अधिक पष्ठ सन्दर्भो के विश्लेषण रूप म म त मे जाडे गये हैं । वेस्ट लड का अत शाति शाति शान्ति इस भारतीय उपनिषद के वाक्य से होता है। यही पक्तिया सम्पूण कृति ने खोखलेपन को एनवीन आशा और आस्था में परिणिन कर देती हैं। यह मानना पडेगा नि विविध प्राचीन भाषामों का इलियट का गम्भीर भभ्यमन था । सस्कृत के पुराण, मागम निगमो का भी उसने व्यापक रूप से पारायण किया था और यापक मध्ययन के माधार पर ही उसन अपने अनेक सदभगत प्रतीकों का सचयन किया था पर परवर्ती कवियों तथा हिंदी के प्रयोगवादियो न जिन प्रतीकों का प्रयोग दिया है, वे अध्ययन को विस्तत भूमिका पर साधत न होकर फशनगत रूप मे ही सर्वाधिक रूप मे व्यवहृत हुए हैं। वेस्टलड मे प्रथम महायुद्ध के पश्चात हारे थव, उदास, निराश यूरोपीय जीबन का खाख नापन प्रशित किया गया है । आदमी विक्तव्यविमूढ़ है । महा जा ? है परिशिष्ट | १८९ क्या करे ? वह स्वय नही जानता। इलियट इसम विम्बात्मक शैली का प्रयोग करते हैं और एक के बाद दूसरा चित्र चल-चिन की भाति चलता चला भाता है। इनमे परस्पर कोई भी ऐतिहासिक या किसी अवितिपूण विषय वस्तु का क्रम-विधान नहीं है। सब कुछ अयवस्थित विश्र खलित, बीच बीच में कवि विभिन्न कवियो के उद्धरण भी देता चलता है। इसमें इनियट ने तिरेसिपम (Trresias) नाम का एक अद्धनारी पान भी उपस्थित किया है। पविता के बीच-बीच में अनेक स्त्री-पुरुष स्वर श्रुति गोचर होते हैं जो यक्ति की अतश्चेतना के विभिन्न स्वरो के प्रतीक हैं। पूरी रचना व्यग्य प्रधान है और दष्टिकोण विघातक है। सजनात्मक या विधायक दष्टिकोण यदि कुछ कहा जा सकता है तो अतिम पक्ति ही है जिसकी चचा ऊपर की जा चुकी है । इलियट की यह कृति अग्रेजी में ही नहीं विश्व म चर्चा का विषय रही है और इसी कृति के माघार पर उहे विश्व यापी यश और कोति भी मिली है। उनके कृतित्व की अन दुबलताएँ हैं किन्तु उन पर ध्यान न दर यदि हम उनके नाटककार और समीक्षक-रूप पर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि उहान साहित्यिक ससार को केवल खोखलापन ही नहीं दिया कुछ ठोस वस्तुयें भी दी हैं । उन्होने एक ओर आई० ए० रियडस के समीक्षा सिद्धात ( मनोवनानिक मूल्यवाद ) की कमियो को निकालकर उसकी पथक रूप से समीचीन व्याख्या की, दूसरी ओर कवि और कलाकार के लिए परम्परा का ज्ञान आवश्यक सिद्ध किया । उनका कथन है कि प्राचीन साहित्य के अध्ययन से परिष्कृत समीक्षात्मक सवेदनो का उदभव होता है, साथ ही आग आन वाली पीढ़ियो की रचनात्मक प्रतिभाओ को मूल्यवान प्रेरणाएं भी मिलती हैं- • No poet nor artist of any art has his complete meaning alonc His significance his appreciation is the appreciation of his relation to the dead poets and artists' Selected Essay P 15 इलियट ने काव्य सर्जना के विकास म कवि व्यक्तित्व के पूण विलयन या निर्वयत्तिक्ता को पूर्णत पनिवाय मानते हैं । इस सम्बघ म उनका क्थन -प्टव्य है- The progress of an artist as a continual self sacrifice, a con tinual extinction of personality" Selected Essay P 17 वे अतिशय भावुकता और व्यक्तिनिष्ठता को वाय का विघातक तत्व मानत हैं। आपके अनुसार श्रेष्ठ पवि रचना प्रक्रिया के समय अपन स्व' को निमूल्य पर उस व्यापक समष्टि मे मिना देता है। यह सारा कार्य कवि की भावना को सुनीता वस्था म सहज ही हो जाता है, यदि को कोई चेतन प्रयास नहीं करना पड़ता।
१६० / माधुनिर काय प्रवृत्तियां एक पुनर्मूल्याकन इलियट ने काय म शुद्धि तथा भावना के सतुलित सयोग की भी चर्चा की है। काव्य को वह सवेगो की अभियक्ति न कहकर उनका पुन सृजन कहता है । आत्माभिव्यक्ति न कहकर उस 'आत्म' का उदात्तीकृत या सशोधित रूप कहता है । अपने वस्तुमूलक प्रतिरूपता (आवजेक्टिव कोरिलेटिव) सिद्धात का प्रतिपादन करते हुए आपन कहा है कि आत्मगत सवेगो का अधिक से अधिक निरपेक्ष, निलिप्त और वस्तू मुखी चित्रण हो । सवेगो का विवरण न देकर उनका अभिनयात्मक चित्रण क्यिा आय, इससे पाठक की आस्वाधनीयता पर कोई कलात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। काव्य व्यापार को इलियट चितन विशिष्ट या बुद्धि प्रसूत न मानकर रागा त्मक वस्तु कहता है- The fuction is not intellectual, but emotional Selected Fssay P 138 कविता की भाषा के लिए उसने सवेद्यता तथा अप्रस्तुतो विम्बो प्रतीको आदि की योजना के पीछे युग की जीवित समसामयिक्ता का आलोक आवश्यक प्रतिपादित किया है । वह अयोक्ति-विधान को काय के लिए आवश्यक वस्तु मानता है। उसके इस विचार पर मास के प्रतीक्वादियो का गहरा प्रभाव पड़ा है। अपने सुप्रसिद्ध प्रथ-ह्वाट इज क्लासिक' शोषक निबध म उसने महान कलाकार की महत्ता का निर्देशन करते हुए यह स्पष्ट विज्ञापित किया है कि वह देश माल की सम्पूण चेतना का प्रतीत होता है। वतमान का उपासक होते हुए भी वह अतीत का मम और भविष्य का स्वप्न दष्टा होता है । उसके अनुसार महान कृतियो की रचना तभी सम्भव है जबकि एक उन्नत सभ्यता हो समद्ध भाषा हो और स्वय कवि या कलाकार उन्नत और सवेदनशील हो । इस प्रकार वचारिक जगत म इलियट का प्रदेय निश्चित ही मूल्यवान है। मौलिक चिन्तन के क्षेत्र मे उसे नव युग का सुकरात' कहा गया है। अग्रजी वाय म उसके आगमन से पर युगातर हुआ है । किन्तु हिन्दी के प्रयोगवारियो ने उसके कृतित्व का ठोसपन ग्रहण न करके वेस्टलण्ड' का खोखलापन, दुर्बोधता सदभमयता और अस्पष्ट प्रतीक्गमता ही ग्रहण की है। अतियथाथवाद अतियथाथवाद का जम भी अन्य विचारधाराओ के समान प्रान्स में ही हुआ पा। यहां के कवि और कलाकारो से प्रभावित होकर इ ग्लण्ड मे भी इसे प्रश्रय दिया गया । इसके उदभव और विकास के कारण पर प्रकाश डालते हुए एक प्रसिद्ध मनो वनातिक समीक्षक एफ० एल० लूक्स स लिखा है कि प्रथम महायुद्ध की राजनीतिक तथा सामाजिक चहल-पहल के पश्चात फ्राम म लगभग ७० वप से चले आने वाल पलायनवादी और रोमाटिक लेखको ने अपनी परम सीमा पर पहुंच पर अतियथार्य ।
परिशिष्ट / १६९ धाद को जम दिया। १९१६ में प्रथम महायुद्ध के काल में दादावाद का जम हुआ। इसमे मला तथा जीवन वे प्रति पूणत विद्रोह की भावना थी। अपनी वयक्तिक कुण्ठाओ और समाज निरपेक्षता के लिए यह बदनाम था। ये ही प्रयत्तियां जब और अधिक उग्र हुई तो कुछ व्यक्तियो ने दादावाद का अतिक्रमण करके १६२२ मे अति यथाथवादी उदघोषणा कर दी। इसकी दार्शनिक पष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए हबट रीड ने लिखा है कि हीगल के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त के द्वारा यह ज्ञात हो जाता है कि जीवन और समाज का विकास किस प्रकार प्रत्येक क्षण होने वाले दो वस्तुओं के परस्पर द्वद्ध से हो रहा है। इस दद्वात्माता को क्लायित करना ही अतियथाथवाद है। रीड ने यह भी उद- घोषणा की कि द्वद्वात्मक प्रक्रिया के सहारे हम एक ओर अतीत की क्ला के विकास को समझ सकते हैं दूसरी बोर वतमान युग की विद्रोहिणी कला की तात्विक्ता भी देख सकते हैं। अतियथाथवाद परम्परा का विद्रोह करके चलता है और विगत चार शता न्दियो के साहित्य और कलाजय कार्यों को तो वह सामन्तवाद और पूजीवाद का प्रतीक कह कर घृणा की दष्टि से देखता है। इसकी द्वितीय विशेषता यह है कि यह वाद काय ना को बौद्धिक बना देने का विराध करता है। काल्पनिक तत्वो की उपस्थिति को अनिवाय प्रतिपादित करने के कारण यह वाद कलाकार को पूणत स्वतव मानता है । इसका सिद्धान्त वाक्य है कि कवि या कलाकार की भावना धारा पर किसी भी प्रकार का वस्तुगत या शिल्पगत बधन नही लगाया जा सकता। क्ला को वह कवि की सवेदनाओ और चिन्ताआ का अवरुद्ध प्रकाशन मानता है। फिलिप सोपोल (Phillipe Saupault) तसा आद्रे बेतन (Andre Bre ton) ने प्रसिद्ध मनोवज्ञानिक प्रायड के मनोविश्लेषण का विवचन करते हुए यह उन्पोपित किया कि यदि विना विमी सोच विचार के स्वगत ( Monologue ) के रूप मे लगातार अटूट क्रम मे यक्ति अपनी सवेदनाओ को शब्द रूपा में प्रस्तुत करता जाय तो इस असम्बद्ध श-रचना के द्वारा उसके अवचेतन मस्तिष्क पर महत्वपूर्ण प्राश पडेगा । ये श द चिन्न एक और भाव-बिम्ब के रूप प्रकट होगे और दूमरी ओर व्यक्ति के अन्त जीवन के सानुकूत हागे । वस्तुत यह फ्रायड के समोहन, (हिपनाटिज्म) प्रक्रिया की व्याख्या थी। इसी प्रक्रिया के अनुसार १६२१ ई. मे अग्रजी म दि मगनेटिक फील्ड शोषक रचना वा प्रकाशन हुआ जिससे प्रेरणा-ग्रहण करके वहाँ यति यथाथवाद का प्रचलन तेजी से हुआ। मास में अतियथाथवादी आदोलन का सबल अनुभूति बोदलेयर की बोवे' शोषक रचना की अतिम दो पक्तिया के द्वारा हुइ। वसे यहां के सभी प्रीयादी १६२ / आधुनिर काव्य प्रवत्तियाँ एक पुनमू ल्याउन कवि लावीमेन रिम्या मनाम आदि प्रतियथायवादी रचना प्रक्रिया का प्रश्रय दर हो भले हैं और १८७०ई० से हो यहा इस यात व स्पष्ट संकेत मिल जात हैं। किन्तु अतियथाथवादी शर का प्रयाग पल यहा अपोलनियर में प्रभावित होकर किया गया। इसने यह शन्द ए ऐमी वस्तु के लिए प्रयुक्त किय था जो भौतिक यान्त्रिव तथा लाचन गोचर वास्तविस्ता क रहा। आद्र तन इम आदोलन व परिचालन रहे हैं और उनके सहयोगियो म पिनिप, सूपोल, लुई आरागा पानी ह यूने रेनबल, ई. मेसस पाल ऐलुमर आदि विशष रूप म उल्लेखनीय है । इन लोगो के प्रसार और प्रचार वा प्रमुख पत्र लितर स्यार था । सवप्रथम १६१६३. म रिवोल्यूशन सुररियलिस्त की स्थापना की गई । यही १६३० मसूरिय- निज्म तथा सविस दला रवाल्यूशन के रूप म परिणत हा गया। ने ब्रतन ने १९२४ तथा १६३० म अपन दा पापणा-पत्रो द्वारा अति पाथवाद के मौलिक सिद्धान्तो वी उदघोषणा की। उसने सबप्रथम द्वात्मक भौतिक वाद का अनुसरण किया । वह इतिहास का भौतिकवादी दृष्टिकोण (मटेरिपनिस्टिन रसेप्सन आफ हिस्ट्री) प्रमुख मानता था और सामाजिक प्राति की आवश्यक्ता का प्रतिपादन करता पा विन्तु मार्म ऐजिल्स भाति क्वल अर्थिन दष्टि नाय का जीवन विकास का प्रस्थान विदु मानना वह एक भ्राति मानता था। इस तरह एक आर वह माक्सवाद का समर्थन करता है और दूसरी तरफ उसका विरोध । हन ने भी येतन के विचारो का समर्थन किया है। उसक अनुसार दद्वात्मक भौतिकवाद क जनुसरण के द्वारा एजार मतियथाथवाट वा पाय कातिकारा कार्यों के द्वारा सामाजिक और राजनीतिक दष्टिकोण का सामन रखकर बुजआवगा विराध करना है और दूसरी ओर जावन के उत्पादन और जनुत्पादन म विश्वास करना है। उसन अतियथाथवाद की अखण्डता का भा विज्ञापन क्यिा है कि उसका बाई यश पथक नही रिया जा सकता। जपन विभिन्न काय पापारा को मिलाकर वह एक है और इसी सश्लिष्ट स्थिति म उमको महत्ता है। उसन यह भी लिखा है कि लचक में उद्देश्य को ध्यान में रख विना अतियथाथवादो कविता का रसास्वादन नही दिया जा सकता । अतियथाथवाद के लिए यक्ति और क्ला अ यो यायित है अभिन्न है। अपनी सामाजिर मनोवत्ति के द्वारा अतियथाथवाद मानव की मुक्ति चाहता है और इस काय क लिए अपन समस्त साधनो का प्रयोग करता है। इस प्रकार अतियथाथवादी कम्युनिज्म स प्रभाषित हाते भी उससे अपना तव पथक रचत हैं । इन दोनो के परस्पर सम्बध का स्पष्ट करत हुए ज्या पाल साव ने लिखा है कि इनका सम्बध कवल बौद्धिक धरातल पर है। अतिपयायवादी स्वत चालित लेखन प्रक्रिया तथा समोहन अवस्था विशप को ही महत्व देकर चलत हैं। उनक अनुसार इमो प्रक्रिया के जवान बन द्वारा मध्यरग विकेन्द्रित हो सस्ता है। m परिशिष्ट | १९३ नियथाथवाटी जात्मगत तथा वस्तुगत सभी प्रकार का वस्तनो को नष्ट करने का प्रयास करता है । जा कुछ है उम मवमा विनाश करके एक महान शाति की ओर अग्रसर होना नया लक्ष्य है । इनका मत है कि जर जन मरण, सुख दुख, सत्य मिथ्या भूत-वतमा प्रपणीय जपणीय सभी अपना विरोधी भाव त्याग दगे, तभी मानवता के सभी अनविराधो का उपसहार होगा। यह स्थिति परम होगी । इसी के लिए सामाजिक कालिया जायाजित की जाती हैं। अतिय पायवाद की सामाजिक पति का यही स्वम्प है। प्राचीनता कला मस्कृति जादि के उपादाना के प्रति प्राति करने उह नष्ट करने का नारा माक्मवाद का भी है कि तु विनाश के बाद निर्माण की जार प्रत्यागत है । वगहीन समाज उमरे अनुसार आदश समाज है । अतियथाथ- वाट इमा कपत प्रथम विनाशवाना अश ही ग्रहण करता है निर्माण वाला नहीं। अनियथार्थवादी जनुभवा को चतुय आयाम भी कहा जाता है जो मूलत मानमिा विकृतियो में सम्बधित वस्तु है । १९२८ इ० मे अतियथायवादियो ने जा मानिन चारकोत क उमाद सम्पचीज वेषण के प्रकाशन को पचासवी जयनी मनाकर उमे अपन गुट्ट का एक ममर्थ लेखक स्वीकार किया था। १६३६ इ० लदन म अतियथाथवादी चिन्ना की एक प्रदशनी की गई। इसका परिचय-पन्न सप्रस्तुत करते हुए हवट रीड ने कहा कि इतनी अधिक अपरिचित विशप गाना से युक्त आगलन का महत्व समयने म असमय समाचार पन्ना ने मजार घणा और अपमान का सेना लेकर इसका सामना किया। यहा यह उल्लेखनीय है कि इस समय तक अतियथाथवादा विचारधारा का प्रभाव विश्व यापी हो गया था और उमने कना को अय शाखामा को (चिन्नादि को) प्रभावित कर लिया था। इन सभी माध्यमा स अनिययायवाला कलाकार स्वत चालित लेखन शली का सहारा लकर अपन मन की अ यवस्थित और असगत कल्पनाआ स्वप्ना दिवास्वप्नो तथा फैंटेसीमा यथावत रूप में प्रकट करना अपना धम मानन लग थ। अतिययाभवानी बलामा को मूलन स्वप्न से सम्बंधित किया गया है और स्वप्न को प्रकति की अपरिहाय नावाज कहा गया है जिस पर यक्ति की इच्छा अनिच्छा कोई प्रभाव नही डाल सक्ती । यह भी कहा गया कि व्यक्ति की मूल चेत नता और वास्तविक्ता का आवाम पद स्वप्न ही है उही में द्वारा हम उसके व्यक्ति त्व और कृतित्व की ययाथता को गमझ सरत हैं । निगूढ भावो और सवन्नाओ की यजना पक्ति के वेवल स्वप्न ही कर सक्त है। हबट रोड न क्ला और स्वप्न की प्रक्रिया दो पहा और परस्पर तुलना करना भी कठिन माना। उमने यह भी माना कि यदि हम अपने स्वप्न दूसरो से कह सकें तो हम नगातार रूप से भोनकर कविता तिखा सकते हैं । यह वत य रीड ने अपने मिय, ड्रोम एण्ड पोयम्स शीप निबध में प्रस्तुत किया गया है। इसी बात को कुछ दूसरे १ ह्वाट इज लिटरेचर, के चतुथ अध्याय ।
१९५ / आधुनिक काय प्रवत्तियों एर पुनम ल्याउन शब्गे म जार्जी ह्य ने ने इस प्रकार प्रस्तुत हम नन हैं मितियथाथ वादी कृतित्व पूर्णत विचारा म्वचारन पर आश्रिा है और आरमा स्त्रय धपन अवतन की आवाज मुाती है । यदि या वनामार इस रिना किमी तर वा पार पहचाप हुए ज्याचा त्या उतार दता है । हा ने का यह यत्तव्य रोड द्वारा गान्ति मूररियलिज्म नामा मृति म अपन र निराधम प्रस्तुत किया गया है । अतियथाथवादी उत्तम बाम्य रचलिए नद्रा (म) की अवस्था पा छोडकर और कोई मानमिा नवस्था उपयुक्त नहीं गात । गैह वह स्वापार रिया है कि उमसी मभा रचनायें त दायी महज अवस्था म ही रची गई हैं। अतियथायवादी यह मौकार रूप से मानकर चलत हैं कि व्यक्ति की प्रातिर यावश्यक्तायें किसी भा प्रकार पाप स सम्पचित नही हैं। उनका दमन करना हो विकृति का नरण है । इमीलिए उनका कथन है कि व्यक्ति की आरिम और मौलिज प्रवत्तिया के प्रशन पर काई बधन न गाया जाय। मोलिप वत्तियां स्वयं ही प्रकाशित हार, ( दिन जायगा जब तपा हार) नष्ट हा जायगी । इसी आधार पर नतिक मा यतामा + वे एक्दम विरुद्ध हैं । उनका यह बदमून विश्वास है कि आधुनिक युग म नतिकता एवटा पापना वस्तु है। अनियथाथवाट पिता की प्रयागात्मपति पर भी अमित बा दता है और वह लगन के रिमी भी रूा को तब तर विद्यतनहा गानता जर तय कि यह कलाकार के आत्म प्रसाशन म बाधा न हो। यात्म प्राशन से तात्पर्य यहां कलाकार के व्यक्तिव मनिहित अन्तविरोधों व पायन स है । इन मतविराधा का ही यथावत चित्रण अनि ययायवाट की मौलिा शत है। इन अविराधा का सामनम्य नाकार अपन पल्पना लोक' म करता है। इस तरह अतियथायवाद म एकात वाल्पनिक पक्षा की प्रापता हो जाती है । इम काय की मपन्नता के लिए वह प्रचलित मिथ्स का भी सहारा लेना है जो सृजन साय तथा अभिव्यजना म साधा हाती है। यही कारण है कि जति ययायवादी काव्य म स्थानीय अवदान मालामा (मिम्म) को प्रचुरता मिलती है । अतियथाथवाद को हवट रीड ने वला + क्षत्र म रोमाटिक सिद्धात वहा है। देबीज इसका पूण समया परत हैं। डेवार या यह भी कथन है कि वस्तुत यह आदोलन इग्मण्ड म मास से न आकर यही जमा और विकसित हुआ है। हा साइक्स डेवीज का इस प्रसग म स्पष्ट वथन है कि इमण्ड का १६ वी शतrटी का स्वच्छतावाद ही बीमवी शता दी की परिस्थितिया और मन स्थितिया में अनुमार अतियथार्थवाद म ढल गया । उहोने लिखा है कि अतियथाथवाद ऐतिहासिक शक्तिया द्वारा स्वभावत एव अनिवायरूपेण यही पर उदभूत हुआ। यह प्रेरित नहीं हुआ किया गया । यह सहसा विसी दवी प्रकाश से उत्पन्न नहीं हुआ वरन अय सभी परिशिष्ट ||१६५ मूल्यवान जादोलनो की भाति इन समस्याओ के एक निश्चित स्पष्टीकरणो के द्वारा जमा है जो हम एतिहामिा क्रम से उम सस्कृति द्वारा प्राप्त हुई हैं, जिसमे हम पैदा हुए हैं 'हिरी म प्रयोगवादी भी अपन को बहुत कुछ प्रभावित कहकर यही की परिस्थितियो से उदभूत रोमाटिक काय चेतना का अग्रदूत कहते हैं। वितु जिस प्रकार इग्जण्ड में यह विचारधारा के च स आइ, तद्वत हिदी म भी यह वही की वस्तु है । अंग्रेजी म इसे पहले सुपर रियलिज्म कहा गया किन्तु जो शब्द प्रचलित हुआ वह फासीमी 'सुररियलिज्म ही है, यद्यपि अतियथार्थवादी आदोलन को प्राय सभी विशेतायें 'सुपर रियनिग्म पद के द्वारा ही व्यक्त होती हैं। मूलत प्रेरणा फास की ही रही है इग्लण्ड की कतिपय परिस्थितिया का समान वातावरण पाकर दे वहा पल्लवित जल्दी हो गई । पर भारत म जिस नकनवार' पर अतियथाथवाद का गहरा प्रभाव पड़ा उसे पल्लवित होन के लिए जनकूल परिस्थितियो का अभाव ही रहा है इसीलिए उसम णिक्ता रही है । हिदी काय म यह एक उमाद था जो आधी की भति आया और वसा ही चलना बना। अतियथाथवाद वी दुबलताजो को स्पष्ट करने के पूर्व हम एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे अतियथार्थवाद का सिद्धात और व्यवहार दोनो ही रूपों म देखा जा सके । जो कविता म य- उद्धत कर रहा हू उसे जाम य ने अपनी टेड आफ माडन पोयट्री म उद्धत की है। कविता इस प्रकार है- - 1n There is an exploison of genaniums the ballroom of the hate There is an extremely unpleasant odour of decaying meat arising from the depetalled flower growing out of her ear her arms are like pieces of sand paper or wings of leprous birds in tus and where she sings her hair stands on end and lights itself with a mill on Little lamps like glow-worms You must always write the last two letters of her christian name Upside down with a blow pencil' -Gascoynes-And the Seventh Dream in the Dream of Isus " १९५/ माधुनिक काव्य प्रवत्तियाँ एव पुनमू ल्यापन इस कविता म शुद्ध मानसिर स्वचालित (प्योर साइयिय आटोमेटिग्म) शली का प्रयोग किया गया है और यदि वा नक्ष्य है अवचेतन म छिपी हुई विलिया को प्रस्तुत करना तथा जगम्बधित विम्ब योजना द्वाग पाठरा वा आतरित घरना। इस प्रकारको रचनामो वा इग्न म गवम पहले बडा विरोध दिया गया। बिरोधका ये प्रीस्टले। आशभक अवस्था म अनियथाथवादी रचना वा यहा पणा उपेक्षा आदि की प्टि स दवा या जिममी चर्चा स्वय हवंट रीड न की है। उनके कथन को हम पहल उद्धत कर आय हैं । स्वचालित लेगन, लोग क्याओ तथा प्रचलित अवाना का सहारा लेने व वारण अतियथाथवादी रचनाएँ स्वय म अवस्थित हो गई हैं । उ हें पढकर पाटन क हत्य पर काई ममाहित प्रभाव नहीं पड़ता। मिमी विशिष्ट और अवितिपूण सवरना भी जागत नही होती। विम्ब योजना ननी क्षण स्थायो है कि उममे विराा मूत वस्तु को वल्पना अगम्भव नही तावष्ट साध्य और मौद्धिक अवश्य हो जाती है । डास मरा ने अपनी बिर याजना । विशेषताओ का उल्लेख करत हुय लिखा है शि में अपनी कल्पना म एप सगात्मा निम्ब उन देता हू (यह बिम्ब अतश्चेतना स सवग की तीव्रता व धारण उटता है) स्य उग विवक पर परखता हूँ । इस प्रकार एव के पश्चात दूसरा, तीसरा, विश्व बनना और मिटता जाता है । मेरी रचनाओ मे छ ट छाट विम्ब मिमी एव वे दाय विश्व के चारा ओर नही घूमत अपितु एव के बाद दूगर विम्ब म परिणत होत र त है। एक विम्ब और दूसरे विम्ब में निर्माण पुननिर्माण और विनाश तण विरोध का सम्व ध होता है।' विम्ब योजना की यह निमाणात्मक प्रक्रिया अस्पष्टता और अव्यवस्था की जननी सिद्ध हुई है । इस प्रकार अतियथाथवारिया ने कला के क्षत्र म अराजकता को प्रश्रय दिया है । इसी कारण ये न तो लोकप्रियता प्राप्त कर सके है और न समाज म श्रदा सम्मान और स्थायित्व ही जिन पर सके हैं। इनके चिन्न और सवेदनायें अस्पष्ट और दुर्बोध होन के कारण साधारणीकरण का स्तर भी प्राप्त नही कर सकी है। अतियथाथवादी मस्तिष्क के बाह्य प्रकाशित भाग का अ यवस्था का ठोस रूप कहते हैं । इस प्रकार मूलत यह आदोलन काव्य मे क्रमबद्धता का विरोध करक उमके स्थान पर अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला आदोलन रहा है। प्राचान और पर म्परागत वस्तुओ के उमूलन का भी अतियथाथवादी नारा लगाकर चल हैं। यह भी उनका विद्रोही कार्य है । समाज के मा य नियमो, रीतिया, नीतियो और नतिक प्रति मानो म भी इहे कोई आस्था नहीं यह तथ्य भी उनकी राजक्तावादी मनावत्ति पा घोतक है। “विता का स्वप्न से घनिष्ठ सम्बध जोडना भी अतिशयात्तिपूण काय है । ईषत माता म भले ही स्वप्न काय प्रेरणा का कारण हो जाय पर यह एक सावनिक सत्य नही है । कालरिज को 'कुबला खा की रचना करने के लिए प्रेरणा स्वप्न लोक परिशिष्ट | १६७ स मिली थी पर सभी रवि तो स्वप्न से ही प्रेरणायें ग्रहण नहीं करते । इसी प्रकार त द्रा की अवस्था विशेष म की गई रचनायें कवि की वैयक्ति मन स्थितियो की ही अभियजना करेंगी, सामाजिक दप्टि से वे स्वस्थ और उदात्त हो, यह आवश्यक नहीं है । मूलन यह अतिवयक्तिक प्रयास है। अतियथाथवानी आ दोलन एक गुट तक ही सीमित रहा है और अग्रजी के अतियथाथवादा कवियो की रचनाएँ दियू एपाक्लोप्स (The New Apocalypse) के नाम स १८३९ तथा १९४१ मे उसी प्रकार से आई हैं जिस प्रकार हिन्दी में प्रयोगवादी पविया 'तार सप्तक' आय हैं । अस्तित्ववाद अस्तित्ववाद यूरोपीय जगत की एक अत्याधुनिक साहित्यिक प्रवत्ति और दाशनिक विचारधारा है । इसके आरम्भिक स्रोत हम जमन दाशनिक सरल और हैडेगर तथा डनिश पिक्गाड (१८१३-१८५५ ६०) की निन्तना धारा म दिखाई दत है । साहित्यिक क्षेत्र म सबसे पहले इसका अवतरण मास म ज्या पाल सान (१९०५ ई.) ने किया । १६४३ ई० वे आस-पास अस्तित्ववाद एक आन्दोलन के रूम म प्रचलित हुआ। यह भी एक भौतिक और निरीश्वरवादी सिद्धान्त है । इसके अनुसार मानव जीवन निरुपाय अवश और निरथ है । उमम यदि कोई वस्तु मूल्यवान है तो वह क्षण है । प्रत्यक क्षण ही अतुलनीय है । जब मनुष्य पूणत विवश और यत्नहान हो जाता है तभी उसक जीवन में वास्तविक अस्तित्व का बोध प्रारम्भ हाता है और इस निस्पायता को नष्ट करने के लिए अस्तित्ववाद मानवीय स्वत बता का प्रबल समथन करता है। इसका सिद्धात वानय है Existence preceeds essence ' अर्थात अस्तितित्व स्थिति तत्व के पूर्व रहता है । यहा अस्तित्व से तात्पय मानवीय मम समूह है जो निरुपायता की स्थिति के बोधम हैं और तत्व उसकी मौलिक प्रकृति के बोध के लिए आया है । अस्तित्ववाद की और भी कई परिभाषायें प्रस्तुत की गई हैं। यहाँ हम उनम से दो तीन उद्धत कर रहे हैं ताकि इस बार का मूल स्वरूप अच्छी तरह से समझ लिया जा सके। जूलियन बैद्रा के अनुसार अस्तित्ववाद भाव तथा विचार के प्रति जीवन का विद्रोह है। एमानुएल मौनियर की दष्टि से भावों और वस्तुओ के अतिवादी दशन के विरोध म मानवीय दशन ही अस्तित्ववाद है । एलेन अस्तित्ववाद को पर म्परागत दशन की दृष्टि न कहर अभिनता की दृष्टि कहता है । इसका आशय यह है कि अस्तित्ववाद म जीवन की समस्याओं पर विचार मुक्त-भोगियो की आर से होता है। अस्तित्ववादी यह मान कर चलते हैं कि व्यक्ति के सामने उसके जीवन को - १६% / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनमू ल्यक्नि . सबसे बड़ी चुनौती मत्यु है। जम के साथ उसका भी जन्म हो जाता है। मनुष्य उसका कुछ भा नहीं कर सकता । मनुष्य उसके सम्मुख लचर और प्रयासहीन है अतएव मत्यु और जम के वाच के अल्प काल म ही वह अपने जीवन को एक पूण मूल्य प्रदान करने की चेष्टा करता है । मत्यु क्व आ जाय इसका भी तो कोई टिकाना नहीं अतएव जीवन के प्रत्येक क्षण को चरम मानकर उसका मास्वादा करना उसका स लक्ष्य हो जाता है। जीवन को पूण मल्य प्रदान क प्रश्न को लेकर अस्तित्ववादी २-३ भागो म विभक्त हो गये हैं । एक वग है जो ईश्वर म निष्ट रखने वाला है और मानवीय जीवन को उसके साथ एकाकार करक जीवन की चरम सन्यता प्रतिपादित करता है। विक्गाड, यास्पस आरि सी वग के प्रतिनिधि अम्रित्ववादी हैं । उनक इस मत को विश्चियन अस्तित्ववाद कहा जाता है । Existentialism from within 7 एलेन ने इसकी विस्तत याख्या की है। दूसरा वग ईश्वर में आस्था नहीं रखता । वह पूणत निरीश्वरवादा है। इसका प्रतिनिधित्व सान्न करत हैं । इसकी -याख्या उहाने वाट इज लिटरेचर म ता वी ही है, उनका समम्न साहित्य इसका भाष्य है। अस्तित्ववाद का एक पक्ष वह है जो राजनीति से सम्बद्ध रहता है । स्वय सान अस्तित्ववाद वे राजनीतिक मन य के प्रति स्पष्ट नहीं हैं किंतु इमवी विस्तत याख्या अल्बट मुअल ने अपनी सुख्यात नि ल होमे रिवाल्त म प्रस्तुत का है। अस्तित्ववाद का स्वरूप समझन के लिए यहा हम सक्षेप में सात्र के साहित्यिक काय पर एक दष्टिपात करेंग। वे एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कलाकार है । उनये प्रबुद्ध व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण उहें १९६४ का नोबिल पुरस्कार भी दिया गया किंतु इसे उहोंने अस्वीकार कर दिया । एक अच्छे उपयासकार क साथ-साथ ये कहानीकार और नाटककार भी हैं । मौलिक रूप स वे प्रज्ञावान चिंतक तो है ही। कुछ समय तक सम्पादन और अध्यापन काय भी बरसे रहे हैं । आपके नाटको मे इन 'द फ्लाइज' रिसपेक्टेबिल प्रास्टीटूट, 'लूसीफर एण्ड दि लाड इन दि मेस कीन नादि विशेष प्रसिद्ध हैं। दि रोड टू प्रीडम आपकी प्रसिद्ध उप यास माला है । इसमे आपने १६३८ से ४० तक की मास की पतितावस्था का चित्रण क्यिा है। 'इटमेसी आपकी बहुचर्चित कहानियो का संग्रह है। आपके साहित्य म जितने भी पान्न आये हैं वे सभी लगभग एकाकी निष्क्रिय जड हारे यके उदास-हताश हैं। सान ने मानव प्रकृति को मौलिक, आदिम और पाशविक रूप मे अकित किया है। आपकी शली यथाथवादी है जा प्रकृतवादियो से मिलती जुलती है । प्रकृत शला का अनुसरण करने के कारण सान अपन साहित्य म 1 ममरा परिशिष्ट | १९६ - यौन सम्बधा का खुला चित्रण किया है । इम क्षन मे वे मनुष्य और पशु के बीच कोई अतर नहीं रखते । आपके लिए ये सारी मूल प्रवत्तिया अतियथाथवादी कवियो की तरह ही जीवन की प्रकृत आवश्यरतायें हैं जिन पर किसी प्रकार का नियमन नही क्थिा जा सकता। इसी प्रकार सान पानो क चेतन नहीं अचेतन मन का चिन्नण क्रम बद्ध रूप से करत हैं । यह क्रमवद्धता इतनी विशृखल और अयवस्थित होती है कि पाठन उसे समझ ही नही पाता । कही एक वाक्य परिस से सम्बधित है तो दूसरा म्यूनिख से तीसरा जय किसी स्थान से । उनके कथन कथा पुजो वे वहताकार होत हैं । चित्रपट या पलेशवर शिल्प योजना और जेम ज्वाइस के अतकथन की पद्धति वा उन पर विशप प्रभाव पड़ा है। आप निरतर उपमाओ से खचित चित्रात्मक गद्य भाषा का प्रयोग करत है । यहा उदाहरण रूप में आपकी भापा का कुछ अनुवाद रूप दिया जा रहा है- ऊपर निजन स्टशन एक बडे श्यामल बुलबुले के समान था, धूल और धुए स भरा शराब और पसीने की गध जोर चमकती रल की पटरिया से भरा।' यह यथाथ है कि जिस चित्रफलक को लेकर सान्न चले है वह विस्तत और बहुग्गी होता है उदामी और निराशा की उसमे गहरी नालिमा रहती है। वस्तुत दो महायुद्धा के बीच के जीवन का वे अपन साहित्य म रूपायित करन की चेष्टा परत हैं। आप सभी पान शतरज के मुहरो की भांति ही शिकजो म ग्रस्त हैं जिनका काइ स्वत त अस्तित्व नहीं होता। इटामसी शीपक कहानी की नायिका इसी प्रकार सी है । जापका पान मैथ्यू आपके सघपमय जीवन का पूरा पूरा प्रतिरूप माना गया है । सान्न की ही तरह उसका भी ज म १८०५ मे पेरिस म होता है। सान की हो भाति उस भी माता पिता प्रा सीमी है और शिक्षा दीक्षा भी परिस मे ही होती है । सान की तरह ही वह भी वही पर दशन का प्रोफेसर नियुक्त हाता है और द्वितीय महायुद्ध के आतप से तपकर वह बाहर निकलता है । मैथ्यू सान की ही भाति इधर उधर भटकन वाता असहाय दुरल और उदासी के वातावरण स भरपूर है। भूलो, अटकावा, भटकालो वे रहते हुए भी सान अपने जीवन मे प्रगतिशील शक्तियो का साथ रत है किंतु मानवीय जीवन और समाज का तटस्थ चित्रण होने के कारण सान की कृतिया मे विचिन्न अवसाद और जसहायता का चित्रण मिलता है। स्वय मैथ्यू अनिश्चित अत द्वमय बंधचरा है । उसका आधा जीवन यो ही बीत जाता है और अमानवता अनक रोगो से वह उत्तीडित है। वह स्वयं सोचता है कि वह मनुष्य के समान दिखता है या नहीं? य, अवसाद की चरम सीमा है। जावन के विषय म सात इटीमेसी कहाना म अपन विचार प्रगट करत हुए कहता है कि बाढ तुम्ह बहा ले जाती है । यही जीवन है । हम न समझत हैं न निणय दे सकते हैं। केवल वह सक्त हैं।"
१६८ / आधुनिक काव्य प्रवत्तियां एक पुनर्मूल्यांकन सबस बडी चुनौती मत्यु है। जम के साथ उसका भी जम हो जाता है। मनुष्य उसका कुछ भी नही कर सकता । मनुष्य उसके सम्मुख लचर और प्रयासहीन है अतएवं मत्यु और जाम के बीच के अल्प काल म हो वह अपने जीवन को एक पूण मूल्य प्रदान करन की चेष्टा करता है । मत्यु क्व भा जाय, इमवा भी तो कोई ठिकाना नहीं, अतएव जीवन के प्रत्येक क्षण को चरम मानकर उसका आस्वादन करना उसका सलभ्य हो जाता है। जीवन का पूण मूल्य प्रदान क प्रश्न को लेकर अस्तित्ववादी २-३ भागाम विभक्त हो गये हैं । एक वग है जो ईश्वर म निष्ट रखने वाला है और मानवीय जीवन को उसके साथ एकाकार कर जीवन की चरम रक्ष्यता प्रतिपादित करता है। विकगाड यास्पस आदि इसी वग के प्रतिनिधि अस्तित्ववादी हैं । उनके इस मत को क्रिश्चियन अस्तित्ववाद यहा जाता है । Existentialism from within 4 एलेन ने इसकी विस्तत व्याख्या की है। दूसग वग ईश्वर मे आस्था नही रखता । वह पूषत निरीश्वरवादा है। इसका प्रतिनिधित्व सात करते हैं । इसका व्याख्या उहाने ह्वाट इज लिटरेचर में ता की ही है, उनका समस्त साहित्य इसका भाष्य है । अस्तित्ववाद का एक पक्ष वह है जो राजनीति से सम्बद्ध रहता है । स्वय सात्र अस्तित्ववाद के राजनीतिक मत य के प्रति स्पष्ट नहीं हैं किंतु इमकी विस्तत व्याख्या अल्वट के मुअल ने अपनी सुख्यात कृति ल होमे रिवाल्ते में प्रस्तुत की है। । अस्तित्ववाद का स्वरूप समझने के लिए यहाँ हम सभेप म सान के साहित्यिक काय पर एक दष्टिपात करेंगे। व एक बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कलाकार हैं । उनके प्रबुद्ध व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण उहें १९६४ का नाबिल पुरस्कार भी दिया गया किंतु इसे उ हाने अस्वीकार कर दिया । एक अच्छे उपयासकार के साथ-साथ वे कहानीकार और नाटककार भी हैं । मौलिक रूप से वे प्रनावान चिंतक तो है ही। कुछ समय तक सम्पादन और अध्यापन काय भी करत रहे हैं । आपके पाटको में इन कैमरा, 'द फ्लाइज' रिसपेक्टेबिल' प्रास्टीटूट, 'लूसीपर एण्ड नि लाड इन दि मेस कीन आदि विशष प्रसिद्ध हैं। दि रोड टू फीडम' आपकी प्रसिद्ध उपन्यास माला है । इसम आपने १६३८ से ४० तक की मास की पतितावस्था का चित्रण किया है। इटमेसी आपको बहुचर्चित कहानियो का संग्रह है। आपके साहित्य म जितने भी पान आये हैं व सभी लगभग एकाकी, निस्त्रिय जड हार थक, उदास-हताश हैं। सान न मानव प्रकृति को मौलिक, आदिम और पाशविक रूप म भक्ति दिया है। आपकी शली पथाथवादी है जा प्रकृतवादियो से मिलती जुलती है । प्रक्त शली का अनुसरण करने के कारण सान अपन साहित्य म परिशिष्ट / १९६ - यौन सम्बधा का खुला चिक्षण किया है । इस क्षन मे वे मनुष्य और पशु के बीच कोई अतर नहा रखने । आपके लिए ये सारी मूल प्रवत्तिया अतियथाथवाटी कवियो की तरह ही जीवन की प्रकृत नावश्यबताये हैं जिन पर किसी प्रकार का नियमन नही किया जा सकता। इसी प्रकार सान्न पानो के चेतन नहीं अचेतन मन का चित्रण प्रम बद्ध रूप से करते हैं । यह क्रमवद्धता इतनी विशृखल और अव्यवस्थित होती है कि पाठन उसे समय ही नहीं पाता । कही एक वाक्य पेरिस से सम्बंधित है तो दूसरा म्यूनिख से, तीसरा जय किसी स्थान से । उनकै क्थन कथा पूजा के वताकार होत हैं । चित्रपट या फ्लेशवेव शिल्प योजना और जेम ज्वाइम के अतकथन की पद्धति का उन पर विशेष प्रभाव पड़ा है। भाप निर तर उपमाओ से खचित चिनात्मक गद्य भाषा का प्रयोग करत हैं । यहा उदाहरण रूप में आपकी भाषा का कुछ अनुवाद रूप दिया जा रहा है- ऊपर निजन स्टेशन एक बडे श्यामल बुलबुले के समान था, धूल और धुएँ से भरा, शराब और पसीन की गध और चमक्ती रेल की पटरियो से भरा।' यह यथाथ है कि जिस चित्रफ्नक को लकर सात्र चल हैं वह विस्तत और बहुग्गा होता है उदासी और निराशा की उमम गहरी नीलिमा रहती है। वस्तुत दो महायुद्धा के बीच के जीवन का वे अपन साहित्य म रूपायित करने की चेष्टा आपके सभी पान शतरज के मुहरो की भाति ही शिकजो मे ग्रस्त हैं जिनका कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नही हाता । इटामसी शीपक कहानी की नायिका इसी प्रकार की है । आपका पान मैथ्यू आप सघपमय जीवन का पूरा पूरा प्रतिरूप माना गया है । सान की ही तरह उसका भी जन्म १६०५ में परिस म होता है। सान की ही भाति उस भी माता पिता का सीसी है और शिक्षा नक्षा भी परिस में ही होती है। सान की तरह ही वह भी वही पर दशन का प्रोफसर नियुक्त होता है और द्वितीय महायुद्ध के नातप से तपर वह बाहर निकलता है । मैथ्यू सान की ही भाति इधर उधर भटकने वाला, सहाय दुबल और उदासा के वातावरण से भरपूर है। मूला, अटकावा भटकालो रहते हुए भा मात्र अपने जीवन म प्रगतिशील शक्तियो का साथ दत हैं किंतु मानवीय जीवन और समाज का तटस्थ चित्रण हान के कारण सान की वृनिया म विचित्र अवसाद और असहायता का चित्रण मिलता है। स्वय मैथ्यू अनिश्चित तद द्वमय अधकचरा है । उसका आधा जीवन यो ही बीत जाता है और अमानवता । अना रोगो स वह उत्पीडित है। यह स्वप सोचता है कि वह मनुष्य क समान दिखता है या नही? यह अवसाद की चरम सीमा है । जीवन के विषय म सान इंटीमेसी' कहानी में अपन विचार प्रगट करत हुए कहता है कि वार तुम्हें बना ले जाती है। यही जीवन है । हम न समझते हैं न निणय दे सकत हैं । वेवल वह सकते हैं।
२०० /गापि पाग प्रयसिया पुनम रन
'ग प्रसार र यत्ता मागवीय गतिमान रत है, कार र
गिराते हैं। मो मायया या गागपनापन मिग्रात हैं।
कोइगर श्याएना आपचाधर पसार गम प्रगटन।
जारियो, विरातिया और जीया गादुरलमानोप मापार है यानिय एक
समीक्षयो उ माहित्यमा पिस्याा पााहिरण पहा है । एमा गामि
जान यो प्रेरणा मिलकर उसग विरत की भावना जागति हो। य
नाम पर जीयन को पिम्पना का यह पित्रण साहित्य का यि माण नही
रास्ता जस्तियवार या इमीजाधार पर अनर सगीक्षमोन विराध रिया
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