Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kratiwas Ramayan

Awsti,pandit Nand Kumar · 2010/10

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Front matter

प्रकाशक
श्री प्रभाकर साहित्यालोक
श्रीरामरोड, लखनऊ
प्रथमावृत्ति-जून, १६५६
मूल्य-छः रुपया
मुद्रक
श्री चंद्रिकाप्रसाद जिज्ञासु
समाज सेवा प्रेस
समादतगज रोठ, लखनक

अनुवादक का वक्तव्य मंगलमय भगवान् की दया, पूर्वजों की अनुकम्पा और गुरुजनों के आशीर्वाद से मुझ अकिञ्चन ने, आज से लगभग ५०० वर्ष पूर्व अवतीर्ण, बंगभाषा के महाकाव्य "कृत्तिवास रामायण" के हिन्दी-रूपान्तर को प्रस्तुत करने का साहस किया है । पाठकों के लिये भी यह कौतूहलजनक है । प्रश्न उठ सकता है कि हिन्दी में रामचरित्र पर तुलसी की अमर रचना 'रामचरितमानस' के अखंड और अखिल भारतीय साम्राज्य के रहते एक नवीन रामायण की रचना करने की आवश्यकता क्या है ? इस जिज्ञासा के समाधान और महासन्त कृत्तिवास तथा उनके सुललित और सर्वांगपूर्ण इस महाकाव्य का, पाठकों के समक्ष, कुछ परिचय प्रस्तुत करने के हेतु, हिन्दीकार के नाते यह वक्तव्य देना आवश्यक प्रतीत हुआ है । संस्कृत के उत्तरकालीन साहित्य और संस्कृतेतर भारत की क्षेत्रीय तथा जनपदों की अन्य विपुल भाषाओं मे प्राप्त धार्मिक अथवा सांस्कृतिक प्रायः सारे साहित्य पर व्यास के जयग्रन्थ (महाभारत) अथवा रत्नाकर (वाल्मीकि) की रामायण का प्रभाव है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि रचित 'वाल्मीकीय रामायण', रामचरित्र पर उपलब्ध रचनाओ में सर्वप्रथम काव्य + है। इसी के आधार पर बृहत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न भाषाओं में कालिदास, कृत्तिवास, तुलसीदास आदि सरस्वती के अनेक वरद पुत्रों ने समय-समय पर मर्यादापुरुषोत्तम राम पर अपनी-अपनी भावना के अनुरूप काव्य-रचना की है। उल्लेखनीय है कि गोस्वामीजी के 'रामचरितमानस' के रचना-काल से लगभग सौ वर्ष पूर्व “कृत्तिवासी रामायण" का आविर्भाव हुआ। उसके रचयिता संत कृत्तिवास वगभाषा के आदिकवि माने जाते हैं। प्रारम्भ में संस्कृत के अभि- मानी पण्डितों ने कृत्तिवास की रचना का बड़ा उपहास किया। उन पर चारो ओर से आक्षेप और प्रहार होने लगे । किन्तु परम स्वाभिमानी, संस्कृत और बंगला भाषाओं के समानरूपेण विद्वान, महापण्डित कृत्तिवास की दृढ़ता और ओज के समक्ष उन पण्डितो का मिथ्याभाव टिक नहीं सका। थोड़े ही समय में जनताजनार्दन के हृदय को मुग्ध कर इस महाकाव्य ने चिरंतन साम्राज्य के लिए अपना स्थान बना लिया। वग-भाषा-भाषी प्रत्येक परिवार में आबाल-वृद्ध-वनिता सव इसके अनवरत गान में आनदित होने लगे । वैसे मार्ष वचनो से यह आभास मिलता है कि च्यवन ऋषि एव उनके अनुवर्ती वशजों ने समय-समय पर रामायण का गान किया है और उन्ही को परपरा में आगे चलकर उत्पन्न रत्नाकर (वाल्मीकि) द्वारा रामचरित्र का जो सस्करण हुआ, वही आजकल की प्रचलित "वाल्मीकीय रामायण" का कलेवर अथवा कलेवर का आधार है। * वृहत्तर भारत मे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, वलख, बरमा, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा हिन्द महासागर के द्वीपपुञ्ज भी सम्मिलित थे ।

४ अनुवादक का वक्तव्य पुत्र 'नृसिंह' ओझा संत कृत्तिवास का समय गोस्वामी तुलसीदास जी से लगभग एक शताब्दी पूर्व होने के बावजूद उनका जन्म स्थान, कुल और वश-परिचय असदिग्ध और सुविख्यात है। सन् ७३२ ई० में बंग-नरेश 'आदिशूर' द्वारा, यज्ञ के लिए कान्यकुञ्ज देश से आमंत्रित और फिर बंगाल में ही बस गये पॉच ब्राह्मण-प्रवरों में सुपूज्य भारद्वाज गोत्रीय 'श्रीहर्ष पण्डित से तेरहवी पीढ़ी में 'माधवाचार्य का जन्म हुआ । माधवाचार्य के 'उत्साह', उत्साह के 'आयित', आयित के "उद्वव', उद्धव के 'शिव' और शिव के हुए, जो सुवर्णग्राम के अधिपति महाराज 'वेदानुज' के प्रधान मंत्री थे। आज से लगभग ६२५ वर्ष पूर्व वेदानुज-काल में अराजकता उत्पन्न हो जाने के फलस्वरूप नृसिंह ओझा ने सुवर्णग्राम का परित्याग कर उस समय के अति समृद्धिशाली 'फुलिया' ग्राम में जाकर निवास किया। कृत्तिवास के 'आत्मपरिचय' तथा इतिहास के विद्वानों के मत से प्रकट है कि 'फूलिया' धन-धान्य पूरित और मनोरम पुपोद्यानों से प्रफुल्लित, गगाभागीरथी के उत्तर-पूर्व तट पर, श्रीमानों एव प्रकाण्ड पण्डितों का उस समय प्रमुख पीठस्थान था । फुलिया, वेलगड़े, मालीपोता, सिमला, नवला, प्रभृति पञ्चग्राम संगठित होकर 'फूलिया-समाज' के नाम से प्रसिद्ध थे । कृत्तिवास से पूर्व और पश्चात् इस जागती भूमि ने अनेक भारतप्रसिद्ध विद्वानों एव साधकों को जन्म दिया। स्वय कृत्तिवास के अति पवित्र कुल में ही 'अन्दामंगल' आदि के रचयिता 'भारतचन्द्र गुणाकर', सुविख्यात स्मार्त और नैय्यायिक धासुदेव सार्वभौम', ओझा ( उपाध्याय ) वंश के प्रथम 'मुखोपाध्याय' : उपाधिधारी 'श्रीगर्भ', 'रामचद्र विद्यालकार', 'सर आशुतोप मुखर्जी' और अभी कल ही हम से विलग हुए, राष्ट्र के लिये प्राणोत्सर्ग करनेवाले 'स्व० श्यामाप्रसाद मुखर्जी' आदि नररत्नों ने या तो इसी पुण्यभूमि मे जन्म लिया अथवा 'फुलिया के मुखर्जी के पुनीत परिवार का होने के नाते अपनी कुलीनता का गर्व करते रहे हैं । यहीं पर उल्लेखनीय है कि भारत के सुवर्णकलश साहित्य- मम्राट वकिमचंद्र चट्टोपाध्याय से आठ पीढी पूर्व उनके पूर्वज अवस्थी गगानन्द भी 'चटर्जीवश' के अतिकुलीन 'फुलिया घराने के आदिपुरुष थे और फूलिया के ही निवासी थे। आज कालस्रोत के प्रवाह मे पडकर "फुलिया" गंगा से काफी दूर हटकर एक माधारण प्राम मात्र रह गया है। सत कृत्तिवास की यादगार उनका 'दोलमञ्च' आज भी एक टीले की शक्ल मे वहाँ विराजमान है। अन्तु उसी फलिया में नृसिंह ओझा ने सुवर्णग्राम से आकर निवाम किया। नृसिंह ओमा के गर्भश्वर', गर्भश्वर के 'मुरारि', मुरारि के तृतीय पुत्र 'बनमाली' और इन्ही बनमाली की पत्नी मालिनी' के गर्भ से उत्पन्न छ पुत्र और एक कन्या में कृत्तिवास कदाचित् पेट थे । इस प्रकार इस पुनीत वश के प्रथम बगवासी 'श्रीहर्ष' में २२वा पीडी में सन्त कृत्तिवाम ने जन्म लिया। कृनिवाम ने बरचित 'आत्मपरिचय' नामक प्रवन्ध मे अपने जन्मदिवस के संबंध मंदम प्ररार लिया है "मादन्यवार घोरपनी पृण माघ मास । तापि मध्ये जन्म लइलाम फत्तिवाम " +- ५ अनुवादक का वक्तव्य इसके अनुसार पंचांग में ठीक शुभ क्षण खोजकर तथा अन्य विविध तथ्यो एवं तर्कों के आधार पर अनेक वंगीय विद्वानों के सहयोग से पण्डितप्रवर अध्यापक योगेश- चन्द्र ने १४३३ ई० ११ फरवरी, रविवार माघ सक्रांति, रात्रिकाल को कृत्तिवास का जन्म- काल माना है । उन्हीं विद्वद्वर के मत से ४७ वर्ष की आयु प्राप्त होने पर १४८० ई० में संत का निर्वाण-काल और १४६७ ई० से १४७२ ई० के मध्य के पाँच वर्षों को रामायण कृत्तिवास की रचना का समय माना जाता है। कृत्तिवास के संतान होने का उनके 'आत्मपरिचय' में अथवा अन्यत्र भी कहीं उल्लेख नहीं है। कृत्तिवास के पितामह मुरारि ओझा व्यास और मार्कण्डेय के समान विद्वान् एव तपस्वी थे। उनके सात पुत्र और बहुसंख्यक पौत्र-प्रपौत्रों का विपुल परिवार अतुल पाण्डित्य, कीर्ति और ऐश्वर्य का यशस्वी केन्द्र था। वारह वर्ष की अवस्था में कृत्तिवास, गंगापार किसी ( अज्ञात-नामा) सर्व गुणनिधान गुरु के पास पढ़ने जाने लगे। कृत्तिवास ने स्थान-स्थान पर उनको महातेजस्वी कहकर व्यास-वाल्मीकि से तुलना की है । अध्ययन के पश्चात् सरस्वती के वरद पुत्र कृत्तिवास ने गौड़ेश्वर के प्रमुख सभापण्डित का पद प्राप्त किया। उस समय बगाल मे अनेक राजा-महाराजा सब गौड़ेश्वर करके प्रसिद्ध होते थे। कृत्तिवास के आश्रयदाता गौड़ेश्वर का नाम अज्ञात है। इन्हीं गौड़ेश्वर की प्रार्थना पर 'सन्त' द्वारा रचित ललित महाकाव्य आज 'कृत्तिवास रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। 'कृत्तिवास रामायण' सात काण्डों में समाप्त जनसाधारण के लिए सुबोध अति सरल पयार छन्दों में वर्णित 'पाञ्चाली गान' है। महाकाव्य को पढ़ने पर यह निश्चय प्रतीत होता है कि कृत्तिवास छन्द, व्याकरण, ज्योतिप, धर्म और नीति के अगाध पण्डित थे । भापा सरल अलकार-अनुप्रास से युक्त तथा भाव और कवित्व-कल्पना से परिपूर्ण है। पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आचार का पूरा ज्ञान और संस्कृत-भाषा पर सर्वाङ्ग अधिकार है । राम-नाम में परम आस्था और विष्णु-शिवशक्ति के स्वरूप में उनकी समानरूपेण भक्ति थी। 'कृत्तिवास' द्वारा हस्त-लिखित रामायण की प्रति अप्राप्य है । यदा-कदा प्राप्त प्राचीन पाण्डुलिपियों और सर्वत्र गाये जानेवाले पाञ्चाली गान के सग्रह बहुधा एक दूसरे से भिन्न भी पाये गये हैं । अत प्रस्तुत रामायण प्रन्थ के विषय मे निश्चय रूप से यह कहना असम्भव है कि कृत्तिवास की प्रस्तुत रचना में कितना अंश प्रक्षिप्त है। फिर भी 'वगीय साहित्य परिषद-जैसे भापा-देव-मदिरों में संगृहीत रामायण की अति प्राचीन लगभग ४०० पाण्डुलिपियो का निरीक्षण करके, श्रीरामपुर मिशनरी के प्रधान पादरी श्री के साहव के अनुरोध पर, विद्वतमार्तण्ड स्व. जयगोपाल तर्कालंकार के प्रयास से सन् १८०२ ई० में "श्रीरामपुर मिशन प्रेस" से सर्वप्रथम 'रामायण कृत्तिवास' का परिष्कृत संस्करण प्रकाशित हुआ। तब से अनेक विद्वानों ने समय-समय पर उसका परिमार्जन किया और आज बाजार में उपलब्ध रामायण उन्हीं प्रयासों का पुष्कल परिणाम है । भले ही उनमे कोई-कोई अश प्रक्षिप्त हों, किन्तु वह पवित्र ग्रन्थ कृत्तिवास की रचना करके मान्य है।

wr । अनुवादक का वक्तव्य 'कृत्तिवास रामायण' बगभाषा-भाषियों की रग-रग में ओतप्रोत है। धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, पण्डित-मूर्ख, प्रत्येक सम्प्रदाय, समाज और वर्ग के लिए समानरूपेण वह आनदकारी है। सस्कृत में कालिदास और हिन्दी में गोस्वामी तुलसीदास के ही समान बंगला में 'कृत्तिवास' अजर-अमर और उनकी 'रामायण- रचना' सर्वकालानुयायी, सर्वतोगामिनी तथा सर्वतोव्यापिनी है । भाव सुस्पष्ट और भाषा प्राञ्जल, सरल और रोचक होते हुए भी अतुल पाण्डित्य-पूर्ण है। 'कृत्तिवास रामायण' का कथानक प्राय. वाल्मीकीय रामायण के अनुसार है, फिर भी स्थान-स्थान पर अन्य पौराणिक अशों का भी पर्याप्त समावेश है। गोस्वामीजी के मानस की तुलना मे आख्यानो की अत्यधिक प्रचुरता कृत्तिवास रामायण की अपनी विशेषता है। कृत्तिवास द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों में रामायण के अतिरिक्त 'योगाद्यार बन्दना', 'शिवरामेर युद्ध', 'रुक्मांगटेर एकादशी' प्राप्य हैं । बँगला भाषा के इस महाकाव्य के रचयिता की सर आशुतोष मुखर्जी ने भी भूरि-भूरि वन्दना की है, और उसी कुल में जन्म पाने के नाते अपने को धन्य माना है। अस्तु, प्रात स्मरणीय सन्त कृत्तिवास और उनकी 'रामायण' का संक्षिप्त परिचय देने के पश्चात् ऐसे 'सुधाभाण्ड' को हिन्दी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर अधिक लिखने का प्रयोजन शेष नहीं रहता । असख्य कथारत्नों से अलंकृत, सर्वरसपूर्ण इस महाकाव्य से राष्ट्रभाषा के भण्डार की श्रीवृद्धि करने की लालसा इस अकिंचन के मन में जागृत हुई। इस मनोरथ के जागने पर, सन् १९१६ ई० में स्टीम प्रिन्टिंग प्रेस लखनऊ द्वारा प्रकाशित 'कृत्तिवास बालकाण्ड' को देखा। उसके सबध में जिज्ञासाएँ की जिनसे विदित हुआ कि मेरे पड़ोसी एवं सजातीय, साहित्यमूर्धन्य स्व० पण्डित रूपनारायण पाण्डेयजी ने प्रसिद्ध साहित्यप्रेमी न्यायाधीश स्व० वा० कालीप्रसन्न सिह के आग्रह पर यह रचना की थी। जो वाद मे वा० कालीप्रसन्न सिंह के नाम से ही प्रकाशित हुई। स्व० पाण्डेयजी से चर्चा करने पर उन्होंने मुझे उक्त वाते वतलाई । अनुवाद के सबध में भी उन्होने बताया कि "कृत्तिवास बालकाण्ड” के हिन्दी अनुवाद से ही बॅगला भापा के हिन्दी-अनुवाद प्रस्तुत करने का कार्य उन्होंने आरम्भ किया था। और शायद इसी कारण बॅगला का प्रारम्भिक अभ्यास होने से कृत्तिवास रामायण का हिन्दी भाषा में प्रस्तुत बालकाण्ड, मूल ग्रन्थ का अनुवाद न होकर एक स्वतंत्र-सा प्रन्थ बन गया । उनका वह बालकाण्ड स्वतंत्र रूप से निस्सन्देह उनकी विद्वत्ता एव प्रतिभा का परिचायक है । स्व० पाण्डेयजी हिन्दी के प्रतिभाशाली कवि, सस्कृत भाषा के प्रकाण्ड पण्डित तथा श्रीमद्भागवत के पुश्तैनी विद्वान् थे । और कदाचित इसीलिये वे कृत्ति- वाम रामायण के आधार को लेकर भी अन्य मे श्रीमद्भागवत, योगवाशिष्ठ, अध्यात्म- रामायण, रघुवग, मल्यपुराण, मार्कण्डेयपुराण आदि से विविध विपयों को प्रचुर मन्या में लेकर एक स्वतंत्र बृहत्काव्य की रचना निर्माण का लोभ संवरण न कर सके। .

अनुवादक का वक्तव्य ७ यहाँ तक कि वह अन्य मूल कृत्तिवास के आदिकाण्ड से कई गुना बढ़ भी गया। यह प्रन्थ वा० कालीप्रसन्न सिह के नाम से छपा । पाण्डेयजी का नाम उसपर नहीं दिया गया है। आज उसके संस्करण प्राप्य भी नहीं हैं। अत: यह विचार कर कि स्व० पाण्डेयजी की उक्त रचना से 'कृत्तिवास रामायण' के न तो ७ काण्डों की पूर्ति होती थी और न आदिकाण्ड की ही, हिन्दी के इस अनमोल प्रन्थ को प्रस्तुत करने की मेरी अभिलाषा दृढ़तर हो उठी। बंगला रामायण की प्राञ्जल और सुबोध भाषा ने मेरे कार्य को सरल किया। गोस्वामीजी के रामचरितमानस के प्रमुख छन्द "दोहा-चौपाई" मानो रामायण के स्वरूप ही समझे जाते हैं । इसलिए कृत्तिवास के हिन्दी पदानुवाद को भी मैने दोहा- चौपाई में ही रचना आरम्भ किया । यह पुष्कल कार्य १६५३ ई० में आरम्भ हुआ परन्तु मध्यम वर्ग की पारिवारिक एव अन्यान्य कठिनाइयों के कारण लगभग ६ वर्षों वाद आज केवल आदिकाण्ड प्रकाशित होकर पाठकों के सामने प्रस्तुत हो सका है। द्वितीय खण्ड प्रेस में दिया जा रहा है । इस दूसरे खण्ड मे अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा तथा सुन्दरकाण्ड हैं । तीसरे खण्ड में लंका और उत्तरकांड सपूर्ण होकर पाठकों के सामने प्रस्तुत हो जाये तो भगवान् की असीम अनुकम्पा से जीवन सफल समदूंगा। हिन्दी-काव्य में १६ चौपाइयों की एक कडी रखी गई है। और इन कड़ियों को कहीं एक, कहीं दो, 'दोहा-सोरठा' से जोड़कर एक-एक विराम की क्रमसंख्या दी गई है। एक कठिनाई अनुवाद करते समय मेरे सामने और थी। बंगला भाषा मे संस्कृत के अनुसार प्रत्ययों से क्रिया का भी काम लिया जाता है । हिन्दी मे वह सुविधा कम होने से मैटर "लाइन टु लाइन" जाने में कठिनता होती थी। दूसरी ओर मेरा सतत प्रयास था कि हिन्दी का कलेवर बँगला की अपेक्षा बढ़ने न पाये । इस कठिनाई को किसी प्रकार पार किया। कथानक और भावचित्रण में कहीं ही ऐसा अवसर आया है कि हिन्दी और बॅगला-पाठों में कुछ अन्तर प्रतीत हो। उनका उत्तरदायी सर्वरुपेण हिन्दीकार है । हिन्दी-अनुवाद काव्य-भाषा और व्यजना की दृष्टि से कहाँ तक सफल हुआ है, यह सहृदय पाठको के देखने की वस्तु है । उदार पाठकों से प्रार्थना है कि ग्रन्थ में मेरी त्रुटियों को क्षमा करते हुए सत कृत्तिवास के सुधा-सलिल का पान करें। पुस्तक को मुद्रण के हेतु देते समय एक नई समयोचित भावना जागृत हुई । बंगला मूल को नागरी लिपि में हिन्दी-रचना के साथ-साथ देने से हिन्दी पाठक को मूल बंगला-काव्य के पढ़ने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा। बंगला भापा जैसी सरल, मधुर और संस्कृतमय है, उससे दो ही एक आवृत्ति कर लेने पर मूल काव्य समझ में आने लगेगा। इस प्रकार बंगला भाषा का ज्ञान और क्रमश: बॅगला भापा के अन्य ग्रन्थों को पढ़ने की अभिरुचि भी उत्पन्न होगी। दूसरी ओर बॅगला भाषा-भाषी अपने पवित्र सद्ग्रन्थ को हिन्दी-लिपि में पाकर राष्ट्रलिपि को सीखने और फिर क्रमश. राष्ट्र-भाषा के साहित्य और विशेष रूप से गोस्वामीजी के 'रामचरितमानस जैसे अद्वितीय महाकाव्य को पढ़ने-समझने में भी अनुरक्त होंगे। इस प्रकार अनुवादक का वक्तव्य राष्ट्रभाषा को अखिल देश में व्याप्त करने और विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय भाषामो को एक राज्य से दूसरे राज्य तक प्रसारित कर सुपाठ्य और सुबोध बनाने के पुनीत राष्ट्रधर्म मे मुम जैसा साधारण नागरिक समुचित अनुदान देकर धन्य होगा। उगला उच्चारण को नागरी लिपि में देने की समस्या की ओर भी ध्यान गया । कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त प्राम-ग्राम, नगर-नगर और प्रान्त-प्रान्त में, मैं देखता हूँ, एक मूल भापा कश्मीरी, पजावी, कौरवी, सौरसेनी, अवधी, मागधी, मैथिल, बॅगला, उड़िया आदि अनेक भाषाओं में परिणत होती चली गई है। किन्तु हिन्दी के राष्ट्रभापा एय देवनागरी लिपि के राष्ट्रलिपि स्वीकृत हो जाने से भाषा और लिपि मे यथासाध्य एकरूपता को प्रश्रय देना आवश्यक कर्त्तव्य-सा बन गया है। अतएव बंगला कविता को देवनागरी लिपि में लिखते समय 'योड़' को 'जोड' एवं 'याय' को 'जाय लिखना उचित समझा गया, फिर भी सर्वत्र उसी शैली का अनुसरण किया गया है जिसे स्वय बगाली लेखकों ने अपनाया है, अर्थात्, जलवायु से प्रभावित भिन्न उच्चारण की ओर ध्यान न देकर शब्दो को शुद्ध-रूप मे लिखना । बॅगला वर्णमाला का उच्चारण ओकारान्त होने पर भी बगाली लेखक 'जल' और 'चक्षु' ही लिखते हैं यद्यपि पढ़ने- वाले उन्हें 'चोख' और 'जोलो' पढ लेते हैं। हमने भी इमी मार्ग को ग्रहण करके मूल बॅगला का अक्षरान्तर-मात्र कर दिया है। इस सबंध में प्रात परामर्शो का सादर स्वागत पूर्वक अगले काण्डो के छपते समय उन पर विचार किया जायगा । अब दो शब्द अवशेष हैं। इस बड़े कार्य मे यदि मेरे गुरुजनों और सहृदय मित्रो द्वारा उन्माह मुझे प्राप्त न होता तो कदाचित मैं थककर कहीं बैठ जाता । मैं उनके स्नेह और सहृदयता का आभारी हूँ। नवलकिशोर प्रेस वुकडिपो लखनऊ के वटवारे के बाद उसके एक पक्ष के मैनेजर श्री कीशलकिशोर श्रीवास्तव, खेमराज व्येंकटेश्वर प्रेस के सर्वांगीण लेखक विद्यावारिध स्व० प० ज्वालाप्रसाद मिश्र के यशस्वी सुपुत्र हरद्वार-निवासी प. महावीरप्रसाद मिश्र और प्रतिभासम्पन्न साहित्यकार मथुरा- निवासी श्री राजेश जी दीक्षित हमारे उन मित्रो मे प्रमुख हैं । स्व० श्री रुपनारायण जी पाण्डेय का आशीर्वाद मुझे प्राप्त था। उन्होंने मेरे छपे कुल, फार्मो को देखकर प्रशसा की थी और मेरे उत्माह को दुचन्द कर दिया था। पुन्तक के मुद्रण के दौरान में समाज-सेवा-प्रेस के व्यवस्थापक तथा लेखन- मुद्रण-प्रकाशन के समग्ररूपण कलाकार श्री चद्रिकाप्रसादजी जिज्ञासु ने मुद्रण के माथ-माथ पृत-मशोधन का कठिन भार भी अपने ऊपर लेकर हमारे इस कार्य को जितना सुगम किया यह उल्लेखनीय है। हमारे कार्य की सपन्नता में उनको निश्चय श्रेय है। पुनश्च डा० श्री भगीरथ मिश्र, एम० ए०, पी-एच० डी०, रीडर हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय ने अपनी मम्मनि और भूमिका देने का अनुग्रह किया, उनका भी हनन है। रानो गटग, मनऊ अकिचन नन्दकुमार अवस्थी ।

भूमिका आधुनिक भाषाओं में लिखित रामकाव्य की परंपरा मे कवीश्वर कृत्तिवासकृत बँगला रामायण का आदिम कृतियों में स्थान है। कृत्तिवास का आविर्भाव-काल पद्रहवीं शताब्दी विक्रमीय का प्रारभ है । और उनकी रामायण का रचना-काल पंद्रहवों शताब्दी का मध्यकाल है। वे महाप्रभु चैतन्य के पूर्ववर्ती माने जाते हैं महाप्रभु का जन्म १४८६ ई० (१५४२ वि०) माना गया है। दोनो का ही क्षेत्र नवद्वीप ( नदिया) है । नवद्वीप के फुलिया नामक ग्राम में कवीश्वर कृत्तिवास का जन्म हुआ था। कृत्तिवास की कृति में चैतन्य का उल्लेख या प्रभाव नहीं है, जबकि महाप्रभु के शिष्यों ने कृत्तिवास का उल्लेख किया है। अत: निश्चित है कि कृत्तिवास का समय चैतन्य से पहले का है। वे गोस्वामी तुलसीदास से लगभग एक शताब्दी पूर्ववर्ती ठहरते हैं। इस दृष्टि से आधुनिक भारतीय भाषाओं में लिखित रामकथाओं में कवीश्वर कृत्तिवास की रामायण अग्रगण्य है । कृत्तिवास की रामायण में आल्यानों और वर्णनों की प्रचुरता अपनी निजी रोचकता और सांस्कृतिक विशेषताओं से सम्पन्न है। यहीं पर यह कह देना आवश्यक है कि रामचरितमानस के समान ही कृत्तिवासकृत रामायण लोककंठों में बगीय क्षेत्रों मे गूंजती है। यह बात गला के आदिम कवीश्वर का सांस्कृतिक महत्व स्पष्टतया सिद्ध करती है । इस महत्व से सपन्न ग्रन्थ का केवल बॅगला-भापी क्षेत्र में सीमित रहना उचित न था । इसी से प्रेरित होकर इस उ नुवाद करने का प्रयत्न हुआ । कृत्तिवासीय रामायण सप्तकाण्ड के अन्य भाषाओं में अनुवाद के प्रयत्न तो मुझे बात नहीं हैं, परन्तु इसके लिए एक महत्वपूर्ण प्रयत्न सुप्रसद्ध माहित्यिक और न्यायाधीश स्वर्गीय वायू काली सन्न सिंह के द्वारा किया गया था। यह सन् १९१६ ई० की बात है जबकि इस प्रकार के 3 नुवादों का केवल साहित्यिक महत्व था और शुद्ध साहित्यिक अभिरचि और निष्ठा रखनेवाले लेखक और प्रकाशक अपनी उदारता और साहित्य-प्रेम से प्रेरित होकर ही से कार्य करने थे। तब हिन्दी भाषा को आज का गौरव प्राप्त न हुआ था। अत उसमें अन्द . - किवीश्वर कृत्तिवास के जामका के सबध मे विभिन्न विद्वानो के भिन्न-भिन्न मत है- प्रफुल्ल चन्द्र वद्योपाध्याय १३५५ ई० लोक्यनाथ भट्टाचार्य १३९० ई०, नगेन्द्रनाथ वसु १४०८.१४२० ई०, डा० दीनेशचन्द्र सेन-१४४० ई० के आसपास मानते हैं । पर इस सक में मतैक्य नही है। * ऐसा प्रतीत होता है कि चैतन्य महाप्रभु प्रेरित भक्ति एव कीर्तन का प्रचार व प्रसार, उस समय के समस्त वगाल प्रान्त में पूर्ववर्ती 'कृत्तिवास राम यण' के गायन मे आप्लावित और विभोर जन-समुदाय की अभिरुचि उस ओर जाग्रत रहने से ही, घर घर में व्याप्त हो गया। -अनुवादक १० भूमिका के भाषाओं के अन्यों का अनुवाद केवल साहित्यिक गौरव से ही संपन्न था। परन्तु आज इस प्रकार के अनुवाद-कार्यो की अनेक चटयों से आवश्यकता है। आज हिन्दी, भारत राष्ट्र की राष्ट्र-भाषा है। अन्तन्तिीय आदान-प्रदान को माध्यम के रूप में वह स्वीकृत हो गई है। अत: ऐसी दशा में विभिन्न प्रान्तीय भापाओं के साहित्यिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक तथा अन्य ग्रन्थों का अनुवाद हिन्दी मे होना एक उनिवार्य आवश्यकता बन गई है। इस प्रकार के अनुवादो से हम विभिन्न प्रदेशों में व्याप्त भारतीय सांस्कृतिक एकता और चिशिष्टत्ता का ज्ञान प्राप्त काले हैं, और अपने को एक दूसरे के अधिक निकट अनुभव करते हैं। अत: जब आज से ४०-४५ वर्ष पूर्व दासता के युग में ऐसे कार्य सम्पन्न किये गये तो आज तो और भी द्रुतगति से इस प्रकार के कार्य होने चाहिए । इसी मावना से प्रेरित होकर कृत्तिवासकृत बैंगला रामायण का श्री प्रभाकर साहित्यालोक लखनऊ से प्रकाशित यह अनुवाद लखनऊ नगर-निवासी पंडित नन्दकुमार अवस्थी द्वारा प्रस्तुत किया गया है। बंगला में कृत्तिवास रामायण मुद्रित और हस्तलिखित अनेक उपलब्ध मस्करणों मे प्राप्त सक्षेप और विस्तार को देखने से प्रतीत होता है कि कहीं कही प्रक्षिप्त अशभी है। विस्तृत सस्करणो मे कहीं- कहीं शृंगारिक वर्णन ऐसे मिलते हैं जो नित्यपाठ के लिए अनुपयुक्त समझकर हटा दिये गये हैं। पाठों में भी संशोधन कर आधुनिकता लाने का प्रयत्न अनेक चिद्वान् वालो पसदकों और लेखकों द्वारा हुआ है। ऐमी दशा में बहुसस्करणशील इस ग्रन्थ के विविध अनुवादों में भी अंतर मिलना असंभव नहीं। यह अन्तर स्वर्गीय बाबू कालीप्रसासिंह जी और श्री पं० नन्दकुमार जी के अनुवादों को मिलाने पर भी देखने को मिल सकता है, जिनमें प्रथम अधिक स्वतंत्र और द्वितीय अधिक प्रामाणिक है। मेरा अपना विचार है कि अनुवाद-कार्य मे और विशेषकर पद्यानुवाद में शब्दश. अनुवाद करने का प्रयत्न अधिक रोचक और उपयुक्त नहीं होता । भाव और वर्लन के सौन्दर्य को अक्षरण बनाने के हेतु अनुचादक अनुवाद्य ग्रन्थ की राजावली और वाक्यविधान के पीछे नहीं पड़ता, फिर भी उसका यह पुनीत कर्तव्य हो जाता है कि कोई भी भाव, जहाँ तक हो सके, छूटने न पाये । भ वो को छन्द और अलंकार की शैली का वन्धन ही काफी कठिन है, फिर यदि उसके मार्ग की लोकों को शब्द और चाक्यरचना भी निर्देशित करने लगेंगे, तब तो फिर गाडी लीर-लीक ही चलेगी और उसमें भाक्-सौन्दर्य का निर्वाह बड़ा कठिन हो जायगा। परन्तु, कर्म कमी ऐमा भी होता है कि अनुवादक इतनी स्वतंत्रता ग्रहण कर लेता है कि जो भाव और प्रसंग मूल ग्रन्य मे नहीं हैं उनकी भी मयोजना कर देता है। जो प्रमा उमे अधिक रुचिकर लगता है, उसे वह बहुत बिन्तार दे देता है और जो पा रचता है उसे अति मंक्षिप्त करता है, यहाँ तक कि कभी-कभी छोड़ भी देता। । अनुवाद के नाम पर इस प्रकार के भी प्रयत्न देखने को मिलते मे कार्य का ता अनुवाद कहे जा सकते है, यह एक प्रश्न भूमिका ११ इस संबंध में प्रस्तुत अनुवाद-कार्य, जो श्री नन्दकुमारजी द्वारा संपन्न हुआ है, एक अधिक संयत प्रयत्न है। इसमे मूल से अधिक कोई प्रसंग जोड़े नहीं गये, साथ ह यह भी ध्यान रखा गया है कि मूल में प्राप्त भाव और प्रसंगों में से कोई छूटने न पायें। प्रस्तुत अनुवाद और स्व० कालीप्रसन्न सिंह जी के अनुवाद को मिलाने पर ऐसा लगता है कि सिंह जी के संस्करण में अनुवादक ने कृत्तिवास द्वारा वर्णित वृत्तान्तों में ही अपने को सीमित न रखकर अन्य आधारभूत ग्रन्थों में प्राप्त विवरणों को अपने अनुवाद में बढ़ा दिया है। इस समय प्रात और प्रामाणिक माने जानेवाले जो सस्करण हैं उनसे मिलाने पर ऐसा लगता है कि माव, वर्णन, प्रसंग, क्रम आदि सभी क्षेत्रों में स्व. कालीप्रसन्नजी के अनुवाद में स्वच्छन्दता ग्रहण की गई है और अनुवाद में अधिक स्वतंत्र अन्य जैसा लगने लगता है। पर यह बात प्रस्तुत अवस्थीजी के अनुवाद के संबंध में नहीं कही जा सकती। कृत्तिवास की रामायण वाल्मीकीय रामायण का अनुवादमात्र नहीं है और न पूर्णतया उसको आधार बनाकर ही यह लिखी गई है। रामचरितमानस के समान ही विविध संस्कृतग्रन्थों का यथाप्रसग आधार ग्रहण किया गया है। इस प्रकार कृत्तिवास के स्रोत-ग्रन्थों मे रामायण, श्री मद्भागवत, मूल रामायण, अद्भुत रामायण, अध्यात्मरामायण, मार्कण्डेयपुराण, कालिकापुराण तथा अन्य पुराण और उपपुराण ग्रन्थ जिनका ययास्थान उपयोग कवीश्वर ने किया है। इन समस्त आधारो से आख्यानों की भूमिका देकर रामकथा का स्वरूप कृत्तिवास ने खड़ा किया है। इस प्रकार पौरा- णिक प्रभाव इस रामायण पर काफी मात्रा में परिलक्षित होता है। प्रस्तुत कृत्तिवासीय रामायण का अनुवाद, अनुवाद की सीमाओं और मर्यादाओं का पालन करते हुए किया गया है और प्राय: मूल के अनुरूप ही है। अनेक स्थानों पर वर्णन बड़े रोचक और प्रवाहपूर्ण हैं । उदाहरणार्थ एक चित्रण यहाँ पर दिया जा रहा है जिसका सरस प्रवाह मूल से भी अधिक मधुर और रमणीय है। विश्वामित्र के उपवन का प्रकृतिचित्रण तथा कुमार 'रोहित' का निश्शंक और सरल बाल- स्वरूप देखिये:- गेंदा गुलदावदी सुहावन । गुल हदी गुलाब वेला बकुलकुसुम चहुं फूला। हरसिंगार कुंवर मन झूला ॥ शेफालिका सुकेसर प्यारी । चम्पा जवा विरंजित क्यारी ।। पारिजात पिंशुक कहुं तोरै । कह वल्लरी सुमन झझकोर कहुँ मल्लिका जुही मदमोनी । कलिका कछुक कुंवर चुनि लोनी ।। प्रस्तुत ग्रन्थ में कहीं-कहीं ढूंढने पर ही नगण्य संक्षेप और विस्तार देखने को मिल सकते हैं। सर्ग, काण्ड और छन्दों आदि का प्रयोग भी मूल कृत्तिवासीय रामायण के अनुसरण पर ही इसमें किया गया है। प्रस्तुत मूल में काण्डों का विभाजन, प्रसंगों के सकेत और कहीं-कहीं शीर्षक आदि दिये हैं। ठीक वही परिपाटी प्रस्तुत हिन्दी-अनुवाद में भी अपनायी गयी है। और इस प्रकार कृत्तिवास द्वारा मनमावन ।

१२ भूमिका । लगे हैं। मैं प्रयुक्त बॅगला के पयार, त्रिपदी, लाचाडी आदि के लिए इस अनुवाद में दोहा, चौपाई, चवपैया आदि छन्दो का प्रयोग किया गया है । मूल के अनुरूप ही अनुवाद में भा विविध छन्दो के जाल मे मुक्त रहने का प्रयत्न किया गया है। इससे कथा का वर्णन प्रवाहपूर्ण और सरस हो उठा है ! अनुवाद की भापा रामचरितमानस के अनुकरण पर अवधी ही रखी गई है। अवधी में संस्कृत के शब्दों का समावेश है और आवश्यकतानुमार ग्रामीण बोलचाल के शब्दों को भी अपनाया गया है । भापा की इस नीति के कारण जहाँ एक ओर अनुवाद साल और सुबोध हो गया है, वहाँ कहीं-कहाँ ग्राम्य शब्द अलग भी जान पड़ने समझता हूँ कि इस प्रकार की त्रुटियो का माजन आगामी अन्य मरकरणों मे कर दिया जायेगा। प्रस्तुन अनुवाद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें केवल रेन्दी-अनुवाद मात्र ही नहीं है, वरन् अनुवाद की पक्तियों के साथ-साथ अनुवाद्य ग्रन्थ की मल पक्तियाँ भी दे दी गई हैं। मेरी समझ में किसी भी महत्वपूर्ण कृति के अनुवाद मे या पद्वति बडी रोचक और उपयोगी है। यह पद्धति विशेष रूप से उन लोगों के लिए मतोपकारी है जो दोनो ही भाषाओं को जानते हैं। बॅगला मूल देवनागरी में मालता पूर्वक दिया जा सकता है। जहाँ तक मुझे है इस प्रकार मल के मा। इम ग्रन्य के अनुवाद का यह प्रथम सराहनीय प्रयास है और इसके लिए लेखक बधाई का पात्र है। उमका परिश्रम श्लाघनीय है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनुवादक का यह प्रयत्न उसकी निष्ठा, लगन, दृढता और परिश्रम का परिणाम है। यह मैं जानता हूँ कि श्री नन्दकुमारजी अवन्थी साहित्यिक अभिरुचि के व्यक्ति हैं और उनका प्रधान ध्येय साहित्य और राष्ट्रभापा की सेवा का ही है, जिमके लिए उन्होंने यह बृहत् सकल्प किया है। अभी आदिकाण्ड ही प्रथम जिन्द में सामने आ रहा है, परन्तु द्वितीय खड मे अधिक काण्ड आयेगे और इस प्रकार जहा तक मेरी सूचना है, कृत्तिवासी रामायण का सम्पूर्ण प्रामाणिक अनुवाद पहली बार ही हिंदी में उपलब्ध होगा । अवस्थीजी के अनुवाद लगभग तैयार हैं, केवल मुद्रग को प्रतीक्षा है। मुझे विश्वास है कि वे सभी शीघ्र ही प्रकाशित होंगे। साथ ही यह मेरी बढ़ आशा भी है कि वे आगे भी इस प्रकार के साहित्य प्रकाशन के कार्यो द्वारा राष्ट्रीय एव मास्कृतिक एकता को दृढ़ करने का कार्य करते रहेंगे। भगीरथ मिश्र १० जून, १९५९ ई. रीडर हिन्दी-विभाग लखमक विश्वविद्यालय ध्यान , - विषय-सूची ९ ७८ 0 विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या अनुवादक का वक्तव्य ३ पद्मा नदी उपाख्यान व सगरवंश- भूमिका-डा. भगीरथ मिश्र उद्धार विषय-सूची १३ गंगाजी की प्रार्थना आवरण चित्र-परिचय १५ मौदास (कल्माषपाद) उपाख्यान शुद्धि-पत्र १६ राजा दिलीप का अश्वमेध तथा रघु मगलाचरण १७ द्वारा इन्द्र को बदी बनाना प्रन्थ-परिचय १७ राजा रघु की दानकीर्ति ६० आदिकाण्ड राजा अज का विवाह-दशरथ-जन्म ६४ नारायण का चार अश जन्मप्रकाश १८ दशरथ का राज्याभिषेक ६६ ब्रह्मा-नारद और रत्नाकर मिलन २२ दशरथ-कौशल्या विवाह १०० रत्नाकर को राममत्र-दीक्षा २७ कैकेयी का विवाह १०२ वाल्मीकि नामकरण, रामायण-रचना सुमित्रा का विवाह १०४ का वरदान २८ अवध पर शनिवष्टि के रण अकाल नारद द्वारा रामायण-रचना का तथा दशरथ की इन्द्र पर चढ़ाई १०७ आभास देना ३० दशरथ-जटायु मित्रता ११२ चन्द्रवश का वृत्तान्त ३२ गणेशजन्म उपाख्यान, शनिवष्टि- निवारण ११३ राजा दण्ड आख्यान राजा हरिश्चन्द्र आख्यान दशरथ के द्वारा अधमुनि-सुवन वध ११७ ३८ राजा दशरथ को अधक मुनि का शाप १२२ सगर-वंश आख्यान ५३ अश्वमेध-चन आरभ और सगर-वश- त्रिजटा मुनि उपाख्यान १२३ विनाश निपाद (वामदेव) की जन्मकथा १२५ दिग्गजो का वर्णन सम्बर असुर का वध १२७ गंगा-जन्म कथा एव सगरवंशोद्धार सम्बर युद्ध में घायल राजा दशरथ की कैकेयी द्वारा परिचर्या तथा वर उपाय ६० भगीरथ-जन्म कथा प्राप्ति ६२ १३० गंगा को मर्त्यलोक में लाने का दशरथ का नखबण अच्छा करने भागीरथ-प्रयास ६४ पर कैकेयी को द्वितीय वर-प्राप्ति १३२ ऐरावत-दर्प-चूर्ण शृंगी ऋषि की उत्पत्ति-कथा १३३ महादेव के द्वारा गंगा का वेग धारण ७२ राजा लोसपाट के यहाँ अकाल- जल, सुनि का गंगा-पान निवारमा-हेतु शृंगी ऋपि को छल मुनि काण्डार उपाख्यान से ताये जाने की कथा १६५ ५८ १४ विषय-सूची विपय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या १६० राम-निपाद सवाद अकाल-निवारण तथा राजा लोमपाद यज्ञों में विघ्नकारी राक्षसों के विनाश द्वारा पालिता दशरथ-कन्या शांत हेतु राम को लाने के लिए का शृगी मुनि के साथ विव ह १४३ विश्वामित्र का प्रस्थान १६२ दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ १४६ दशरथ द्वारा राम के स्थान पर भरत तीरसागर मे नारायण मे देवताओ को देने का छल १६५ की, रावणवध-हेतु, जन्म लेने की विश्वामित्र के कोप में अयोध्या का प्रार्थना १५० जलना १६७ सीता के रूप मे लक्ष्मी का जन्म १५६ राम-लक्ष्मण का यज्ञ-रक्षा हेतु प्रस्थान १६८ यज से उत्पन्न चरु के पान से रानियों राम द्वारा ताड़का वध २०१ का गर्भ धारण अहल्या-उपाख्यान २०५ .श्रीगम-जन्म २०८ भरत-लक्ष्मण-जन्न का जन्म १६३ राम द्वारा तीन कोटि असुरों का राम-जन्म से आनन्द १६५ २१० रावण को आशका और दूत शुक- सहार तथा यज्ञ की पूर्ति सारन का राम की खोज मे जाना १६६ सीता-स्वयवर के लिये विश्वामित्र देवताओ का वानरो के स्वरूप मे सहित राम-लखन का मिथिलागमन २१४ देवताओं के निकट सीता की वर- जन्म १७० रामादिक का अन्नपारान व नाम- याचना २१७ करण १७१ राम द्वारा शिवधनुभग २१८ दशरथ-सुवनी की बालक्रीड़ा विश्वामित्र का दशरथ को लाने के १७२ शस्त्र-शास्त्र अध्ययन लिये अयोध्या प्रस्थान १७४ २२१ जानकी-विवाह के हेतु शिवधनु दशरथ का वारात सजाकर मिथिला प्रदान १७८ २२४ जनक की वनुभंगप्रतिज्ञा १८१ जनक द्वारा वारात की खातिर व समस्त राजा तथा रावण का धनुभग २२५ में असफल होकर पलायन शुभ लग्न को टालने के लिए चन्द्रमा राम का गगास्नान तथा निपाद- का नृत्य द्वारा सबको मोह लेना २२८ १८७ शाखोच्चार २३२ भरद्वाज मुान में राम को देवी परशुराम-दर्प-चूर्ण २३६ चनुप-यारण प्राप्ति १६१ राजा दशरथ का अयोध्या-आगमन २४५ को पयान दशरथ की अगवानी दशरथ युद्ध आवरण-चित्र परिचय (ऐरावत-दर्प-चूर्ण-पृष्ठ ७०) दिलीपनन्दन भगीरथ की अतुल तपस्या के फलस्वरूप पुण्यसलिला गंगाभागीरथी ब्रह्मलोक से चलकर कुमार भगीरथ की अनुगामिनी होते हुए अकस्मात् धतूरे के फूल के सदृश सुमेरु पर्वत के एक विक्ट गहर में फंसकर बारह वर्ष तक भटकती रहीं। अपने पूर्वजों ( सगर-वंश) के उद्धार के लिए आकुल और आतुर भगीरथ की विनती पर गंगा ने पन्य-अवरोध की विवशता बताते हुए, ऐरावत को लाकर पवत के गह्वर को भेदकर मार्ग निकालने के सुझाव को रखा। भगीरथ ने इन्द्र से आजाले, ऐरावत से, विशाल दन्तों द्वारा पर्वत-भेदन की प्रार्थना की। गर्व के वशीभूत मदांध ऐरावत ने अपने पास गंगा के एक रात्रि निवास करने की शर्च पर कार्य स्वीकार किया। हताश भगीरथ के लौटने पर गजेन्द्र का निन्दनीय प्रस्ताव जानकर, भागीरथी ने एक रात्रि छोड़ साव रात्रि ऐरावत के समीप रहना स्वीकार किया, यदि वह गंगा के वेग में अपने को स्थिर रख सके। मूमते हुए मत्त दन्तीपति ने सुमेरु गइर में विकराल दन्तप्रहार से ' चार स्थानों पर छिद्र किये, जिनसे वसु, भद्रा, श्वेता और अलकनन्दा नाम से चार धाराएँ वह चलो । धरागामिनी धारा के प्रचण्ड प्रवाह मे मदांध ऐरावत का विशाल शरीर डूबने- उतराने लगा। नेत्र, मुख और सूड में जल भर गया । मन की हीन भावना को त्याग, 'त्राहिमाम्' कहते हुए गंगामाता के चरणों में गिरकर ऐरावत ने निस्तार पाया और भाग खड़ा हुआ। गंगा की माहिमा से मुग्ध भगीरथ, पुनः शंखघोप करते हुए, माता मदाकिनी सहित, कौलाश की ओर चले।

१४ विषय-सूची विपय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या को देने का छल १६० राम-निपाद सवाद अकाल-निवारण तथा राजा लोमपाद यज्ञों में विघ्नकारी राक्षसों के विनाश द्वारा पालिता दशरथ-कन्या शांता हेतु राम को लाने के लिए का शृगी मुनि के साथ विव ह १४३ विश्वामित्र का प्रस्थान દર दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यन १४६ दशरथ द्वारा राम के स्थान पर भरत क्षीरसागर में नारायण से देवताओ १६५ की, रावणवध-हेतु, जन्म लेने की विश्वामित्र के कोप में अयोध्या का प्रार्थना १५८ जलना १६७ सीता के रूप मे लक्ष्मी का जन्म १५६ राम-लक्ष्मण का यज्ञ-रक्षा हेतु प्रस्थान १६८ यज से उत्पन्न चरु के पान से रानियो राम द्वारा ताड़का वध २०१ का गर्भ धारण अहल्या-उपाख्यान २०५ 'श्रीगम-जन्म २०८ भरत-लदमण-शत्रुन का जन्म १६३ राम-जन्म से आनन्द राम द्वारा तीन कोटि असुरों का १६५ २१० सहार तथा यज्ञ की पूर्ति रावण को आशका और दूत शुक- सारन का राम की खोज मे जाना १६६ सीता-स्वयवर के लिये विश्वामित्र देवताओ का वानरो के स्वरूप मे सहित राम-लखन का मिथिलागमन २१४ देवताओं के निकट सीता की वर- जन्म १७० रामादिक का अन्नप्राशन व नाम- याचना २१७ करण १७१ राम द्वाग शिवधनुभग २१८ दशरथ-सुवनी की बालक्रीड़ा १७२ विश्वामित्र का दशरथ को लाने के शस्त्र-शास्त्र अध्ययन १७४ लिये अयोध्या प्रस्थान २२१ जानकी-विवाह के हेतु शिवधनु दशरथ का बारात सजाकर मिथिला प्रदान १७८ को पयान २२४ जनक की वनुभंगप्रतिना १८१ जनक द्वारा बारात की खातिर व समस्त राजाओ तथा रावण का घनुभंग २२५ में असफल होकर पलायन शुम लग्न को टालने के लिए चन्द्रमा राम का गगा-स्नान तथा निपाद- का नृत्य द्वारा सबको मोह लेना २२८ १८७ शाखोच्चार २३२ भरद्वाज मुान मे राम को देवी परशुराम-दर्प-चूर्ण २३६ चनुप वाण प्राप्ति १६२ राजा दशरथ का अयोध्या-आगमन २४५ दशरथ की अगवानी दशरथ युद्ध H आवरण-चित्र परिचय (ऐरावत-दर्प-चूर्ण-पृष्ठ ७०) दिलीपनन्दन भगीरथ की अतुल तपस्या के फलस्वरूप पुण्यसलिला गंगाभागीरथी ब्रह्मलोक से चलकर कुमार भागीरथ की अनुगामिनी होते हुए अकस्मात् धतूरे के फूल के सदृश सुमेरु पर्वत के एक विक्ट गवर में फंसकर बारह वर्ष तक भटकती रहीं। अपने पूर्वजों ( सगर-वंश) के उद्धार के लिए आकुल और आतुर भगीरथ की विनती पर गंगा ने पन्थ-अवरोध की विवशता बताते हुए, ऐरावत को लाकर पवत के गह्वर को भेदकर मार्ग निकालने के सुझाव को रखा। भगीरथ ने इन्द्र से आज्ञा ले, ऐरावत से, विशाल दन्तों द्वारा पर्वत-भेदन की प्रार्थना की। गर्व के वशीभूत मदांध ऐरावत ने अपने पास गगा के एक रात्रि निवास करने की शर्त पर कार्य स्वीकार किया। हताश भगीरथ के लौटने पर गजेन्द्र का निन्दनीय प्रस्ताव जानकर, भागीरथी ने एक रात्रि छोड़ सात रात्रि ऐरावत के समीप रहना स्वीकार किया, यदि वह गंगा के वा में अपने को स्थिर रख सके। - मूमते हुए मत्त दन्वीपति ने सुमेरु गझर में चिकराल दन्तप्रहार से ' चार स्थानों पर छिद्र किये, जिनसे वसु, भद्रा, श्वेता और अलकनन्दा नाम से चार धाराएँ वह चलो । धरागामिनी धारा के प्रचण्ड प्रवाह में मदाध ऐरावत का विशाल शरीर डूबने- उत्तराने लगा । नेत्र, मुख और सूड में जल भर गया । मन की हीन भावना को त्याग, त्राहिमाम्' कहते हुए गगामाता के चरणों में गिरकर ऐरावत ने निस्तार पाया और भाग खड़ा हुआ। गंगा की माहिमा से मुग्ध भगीरथ, पुनः शंखघोष करते हुए, माता मदाकिनी सहित, कौलाश की ओर चले। A - ६ ३ ५ १ ह 3 शुद्धि-पत्र पाठकों से सानुरोध निवेदन है कि पुस्तक हाथ में लेते ही सर्वप्रथम अशुद्धियों को लेखनी से सुधार लें ताकि पाठ विरस न हो:- पृष्ठ पक्ति अशुद्ध शुद्ध १६ १६ रघुत्तमम् रघुत्तमम् २३ तबहु तबहुँ २५ तव तब ३७ १३ सहपि सहर्ष ४१ देखो देखौं ८३ वसन दिक वसनादिक ६ अश्वमेध अश्वमेध १२ अनॅट आनट ११५ टानी ठानी ११७ वर्घा वर्षा १२७ २ निस्तार निस्तार १२७ अवधदुलार अवधदुलार १३४ १२ पयत पियत १३६ ११ सवरन सुवरन १३७ ६ नर्मदा नर्मदा १४१ ३ हाथों मे ४ हाथों मे १४१ ४ दाढी-मूछ । ५ दाढ़ी-मूछ । १४३ जाइ जोइ १४३ नर्धन निर्धन १४८ चक्रवान चकवान १५० अनल अनल २६५ वस त्रास १७५ मवारी सॅवारी १८० ११ h अर्घ्य ४ किम किमि २०० ११ अनाहर अनाहार २०३ १२ विचारे विचारे २११ हकारा हुकारा ०१३ १३ हात होत इनिराइ मुनिराई ३ जाही जाही ०५ ४ ३ us M

C
श्रीगणेशाय नम
कृतिवास रामायण
( हिन्दी पद्यानुवाद, बंगला मूल महित)
मङ्गलाचरण
श्लोक-यं ब्रह्मावरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-
दे. मांगपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः ।
ध्यानावस्थिततद्गतेनमनसा पश्यन्ति यं योगिनो
यम्यान्तं न विदः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ १ ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थमाधिके
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते ॥ २ ॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यातिहरे देवि नारायणि नमोस्तुते ।। ३ ।।
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्यमगतीनां गतिः प्रभो।
मंमारार्णवमग्नानां प्रमीद पुरुषोत्तम ॥ ४ ॥
(प्रन्य-परिचय )
दोहा-विघ्नविनाशन गजबदन, ऋद्धि-सिद्धि की खानि ।
मंगलवाणी भारती, जय मगवती भवानि ॥ १ ॥
रामचरित - अमरित - सलिल, पाप - नसावनहार ।
वाल्मीकि मुनि श्रादिकवि, कीन्हेउ जग विस्तार ॥ २ ॥

१- कृत्तिवास रामायण विविध भाव भाषा भरे, धर्म अर्थ अरु काम । मुक्ति, नीति अरु प्रीति के, अनुपम छन्द ललाम ।। ३ ।। मोड पुनीत विरदावली, रघुवर काव्य अनन्त । युग-युग सों गावत रहे, मुनि मनीषि अरु सन्त ।। ४ ।। कालिदास वाणीवरद, अमर गिरा-अवतस । बुधजन काव्य-विनोद हित, रचेउ ललित रघुवंस ॥ ५ ॥ देवनागरी-बाटिका, मानस-पुहुप विकास । सुरभित भारत भूमि चहुँ, धनि-धनि तुलसीदास ।। ६ ।। सजल स्यामला चंग की, उर्वर भूमि पुनीत । जहँ चैतन्य-रवीन्द्र सम, जन्मे जन-नवनीत ।। ७ ।। भक्ति-काव्य के स्रोत जहँ, प्रगटे चण्डीदास । तहाँ सरस धारा वही, 'रामायण कृतिवास' ॥ ८ ॥ कोकिल-कूजित सुधामय, अनुपम काव्य सुवास । रचेउ, धन्य ! तुम धन्य मुनि ! महासन्त कृतिवास ।। ६ ।। भारतीय भाषा-प्रमुख, सकल रसन की खानि । देवनागरी माहिं सोइ, रचहुँ जोरि जुग पानि ॥ १० ॥ माव रहित, भाषा विरस, कतहुँ न काव्य प्रवीन । हत-उत के सत्संग सों विवस, प्रेरना लीन ।। ११ ।। कान्यकुब्ज-द्विज-गगन विच, अपर प्रभाकर भास । जनमि, 'प्रभाकर' प्रवर किय, कुल-उपमन्यु प्रकास ।। १२ ।। विदित 'अवी' श्रास्पद, बीते वरही माख । विक्रम चौमठ, शत-उनिम, पाँच कृष्ण वैशाख ।। १३ ।। रानीकटरा-लखनऊ, संज्ञा 'नन्दकुमार' । तनय-दयाशकर, जनम, मम परिचय विस्तार ॥ १४ ॥ निर्गुण-मगुण अनन्त छवि, जड-जगम जगरूप । बन्दि मफल, रचना करहुँ 'कृत्तिवाम'-अनुरूप ।। १५ ।। जतन भगीरथ, अल्प बल, ता लगी यह साध । गुनी-मन्त-मज्जन मकल, छमहिं मोर अपराध ।। १६ ।।

१६ आदि काण्ड आदि काण्ड ( हिन्दी पद्यानुवाद) नारायण चार अश जन्म प्रकाश सुखद सकल लोकन अति पावन * धेनु-लोक वैकुण्ठ सुहावन विटप कल्पतरु अचरज नयना * मन-बाञ्छित अनन्त फल दयना चन्द्र-सूर्य जहँ सतत प्रकासा * भुवन दिव्य जगदीश दिव्य जगदीश निवासा नेतपाट' युत सुभग सिंहासन * नारायण विराज वीरासन एक अंस प्रभु अस मन लाई * चारि अंस प्रगटैं रघुराई राम भरत लक्ष्मण रिपुसूदन * यहि विधि चतुर्मति मधुसूदन (बॅगला मूल) श्लोक-राम लक्ष्मणपूर्वज रघुवरं सीतापति सुन्दरं। काकुत्स्थं करुणामयं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ॥ राजेन्द्र सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्तिम् । वन्दे लोकाभिराम रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ।। दक्षिणे लक्ष्मणोधन्वी वामतो जानकी शुभा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं नमामि रघुत्तमम् ।। रामाय रामचन्द्राय रामभद्राय रसुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ।। नारायणेर चारि अशे जन्म प्रकाश गोलोक वैकुण्ठपुरी सवार उपर * लक्ष्मीसह तथाय आछेन गदाधर तथाय अद्भुत वृक्ष देखिते सुचारु * जाहा चाइ ताहा पाइ नाम कल्पतरु दिवानिशि तथा चंद्र सूर्येर प्रकाश * तार तले आछे दिव्य विचित्र आवास नेतपाट सिंहासन उपरेते तुली * वीरासने वसिया आछेन वनमाली मने मने प्रभुर हइल अभिलाष * एक अंश चारि अंश हइते प्रकाश श्रीराम भरत आर शत्रुध्न लक्ष्मण * एक अंशे चारि अंश हैला नारायण १ निरन्तर । २ प्राचीन वस्त्र, अलौकिक । वेधसे ।

कुतूहल स्वामी प्रथम भेटे २० कृत्तिवास रामायण रमा सीता अभिरामा * घर जोरे कपि करहिं प्रनामा चवर भरत सत्रुघ्न डुलावत * कनक छत्र सौमित्रहिं भावत यहि छवि प्रभु बैकुण्ठ विराजा * पहुँचे तहँ नारद मुनिराजा भक्ति सने श्रीहरि-गुण गावत * वीणा मंजुल तार वजावत पंचायतन सरूप निहारी * सिथिल गात मोचत दृग वारी चकित रूप अद्भुत नव हेरी * नारद डगर' लीन शिव केरी त्रिकालज्ञ शिव अन्तर्यामी * हरिहँ सकल पंथ चतुरानन * लखि विरंचि हुलसे मुनिपावन तिन सन करि सब कथा प्रकासा * लै विधि चले शिखर कैलासा उमा सहित सोहत जहँ शंकर * चन्देउ तिन्हैं सहित विधि मुनिवर कस विरंचि ? कस तपोधन ? मुनि अस पुलकित गात । हरपि शंभु पूछेउ कवन हेतु आगमन तात ॥१॥ सुनि ब्रह्मा मृदु गिरा उचारी * सुनहु कुतूहल अति त्रिपुरारी परमधाम गोलोक सुहावन * परमेश्वर त्रिभुवनपति पावन लक्ष्मीमूर्त सीतादेवी बसेछेन वामे * स्वर्णछत्र धरेछेन लक्ष्मण श्रीरामे चामर ठुलाय तारे भरत शत्रुघ्न * जोड हाते स्तव करे पवन-नन्दन एइरूपे बैकुण्ठे आछेन गदाधर * हेनकाले चलिला नारद मुनिवर वीणा यत्र हाते करि हरिगुण गान * उत्तारेल गिया मुनि प्रभु विद्यमान , रूप देखि विह्वल नारद चान धीरे * वसन तितिल तार नयनेर नीरे हेनरूप केन धरिलेन नारायण * इहा जिज्ञामिव गिया यथा पंचानन भावी भूत वर्तमान शिव भाल जाने * ए कथा कल्बि गिया महेशेर स्थाने एतेक भाविया यात्रा करे मुनिवर * उत्तरिला प्रथमेते ब्रह्मार गोचर विधातार लये जान कैलास शिखरे * शिव के बन्दिया परे बन्दिल दुर्गारे निरखिया दुइजने तुष्ट महेश्वर * जिनासा करेन तवे तोटेर गोचर कह नत्मा कह हे नारद तपोधन * दोहे आनन्दित अद्य देखि कि कारण बत्नेन विरिञ्चि शुन देव भोलानाथ * देसिलाम गोलोके अपूर्व जगन्नाथ aau. नाम मेटे नाम उचारन आदि काण्ड २१ तिनकर चारि अंश कर रूपा * नव प्रगटेउ कस आज अनूपा । 11 विधि' सन सुनि सब कहेउ त्रिलोचन * लखेउ जु छवि, तुम पाप विमोचन । गये बरस सो साठि हजारा * सोइ सरूप, प्रभु लै अवतारा निसिचर नाह प्रचण्ड दशानन * तेहि विनासि भुवि-भार उतारन अवधपुरी अति रम्य विशाला * सूर्यवंश दशरथ महिपाला तिन कहें तीनि नारि छवि-अयनी * तिन सुभघरी सुमङ्गल-दयिनी 51 चारि अंश प्रगटहिं मधुसूदन * राम भरत लछिमन रिपुसूदन , राम, सत्यपितु पालन हेतू * गवनहिं बन सिय-लखन समेतू 1 सियहिं उधारि वहिं खल रावन * सीतालुत लव-कुश मनभावन गोवध आदि अधम जे पापा * राम संतापा राम भवसागर तारन * मुक्तिदेन पातकी हॅसि विधि कही सुनहु वृपके * अवनि' कहहु अस को अघहेतू , करहु प्रतीति, ६ शंभु कह वानी * भूतल' एक देखिलाम पूर्वे ते केवल नारायण * चारि अंश देखि एवे किसेर कारण ब्रह्मा वाक्य शुनिया कहेन कृत्तिवाम * सेइरूप इहकाले हइने प्रकाश ये रूपे पाछेन हरि गोलोक भितर * जन्म निते आछे पाटि सहस्त्र वत्सर रावण राक्षस हवे पृथिवीमण्डले * ताहाके वधिते जन्म लेवेन भृतले दशरथ घरे जन्मिवेन चारिजन * श्रीराम लक्ष्मण आर भरत शत्रुध्न एक अंश नारायण चारि अंश ह'ये * तिन गर्ने जन्मिवेन शुभक्षण ऐये जानकीसहित राम लझ्या लक्ष्मण * पितृसत्य पालनार्थे जाइदेन वन सीता उद्धारिवे राम मारिया रावण * ल श नामे हवे सीतार नन्दन मनुष्य गोहत्या प्रादि जत पाप करे * एक बार रामनामे सर्व पापे तर महापापी ह'ये यदि राम नाम लय * संसार समुद्र तार मुक्ति लाभ हय हासिया बलेन ब्रह्मा शुन त्रिलोचन * पृथिवीते हेन पापी आछे कोन जन धूटि बलेन मम वाक्ये देह मन * मध्यपये महापापी आछे एक जन १ ब्रह्मा । २ उद्धार करके । ३ शकर । ४ पृथ्वी । ५ पाप का रूप । ६ विश्वास । ७ पृथ्वी पर। अधम अजानी २२ कृत्तिवास रामायण राममत्र तहि दीजिय जाई * तासु प्रभाव मुक्ति जग पाई को अस नर ? सोचन लगे, विधि नारद धरि ध्यान । 'रत्नाकर' मुनि च्यवन-लुत, है पातकी महान ॥२॥ लूटै वधै वधै पथिक वनचारी * दस्युवृत्ति, रुचि पापाचारी मुनि-विधि' चले संत के भेखा * विटप चढ़े रत्नाकर देखा पथिक घात ताकै मग ओरा * विफल आजु दिन बीतेउ मोरा 1 हरपेउ निरखि पाप अनुगामी * लूटौं वसन, हतौं दोउ स्वामी लौहदण्ड लै सो तेहि मारा * तासु विफल विधि कीन्ह प्रहारा मायावस, कर अस्त्र न उठई * सठ कौतुक मन चिंतन करई छेउ सहित सनेह सनेह विधाता * को तुम कवन प्रयोजन ताता लूटहुँ वसन हरहुँ तव प्राना * मम नितनेम न तुम अनुमाना | मम वध किये कतक धन पावै * कवन लोभ नित पाप कमावै सौ रिपु हने जु पातक अहही * एक धेनु-बध सोइ नर लहही तारे भिया रामनाम देह एक बार * तवे से नितान्त मुक्त हइवे संसार विधाता नारद तॉरा भावेन दुजन * पृथिवीते महापापी आछे से केमन च्यवन मुनिर पुत्र नाम रत्नाकर * दस्युवृत्ति करे सेइ बनेर भितर , विरिञ्चि नारद दोहे संन्यासी हड्या * रत्नाकर काछे दोहे मिलिल आसिया विधातार माया हैल रत्नाकर प्रति * सेइ दिन सेइ पथे कारो नाहि गति उच्चवृक्षे चड़िया से चतुर्दिके चाय * ब्रह्मा नारदेरे पथे देखिवारे पाय भावे मुनि रत्नाकर लुकाइया बने * संन्यासी मारिया वस्त्र लइव एक्षणे विधाता नारदे लये जान सेइ पथे * लोहार मुद्गर तोले ब्रह्मारे बधिते ब्रह्मार मायाते तार मुद्गर ना चले * मायाते मुद्गर बद्ध तार करतले ना पारे मारिते दस्यु भावे मने मन * ब्रह्मा जिज्ञासेन वापू तुमि कोन जन रत्नाकर बले तुमि ना चिन अामारे * लइब तोमार वस्त्र मारिया तोमारे ब्रह्मा बले मारि मोरे कत पाव धन * करियाछ, जत पाप कहिन एखन शत शत्रु मारिले जतेक पाप हय * एक गो बधिले तत पापेर उदय १ मार और ग्रह्मा ।

- - 3 अघ आदि काण्ड २३ सुनु सठ शत गोवधहिं समाना * लिये एक अबला कर पाना शत नारी सम विप्र-विनासा * टारे टरहि न सो अघ-त्रासा' एक ब्रह्मचारी वध करई * शत द्विज हनै, न अन्तर परई एते पाप वरन बहुरासी * अगनित पाप वधे संन्यासी विचरैं जहाँ जहाँ संत बनवासी * चारि. कोस महि सो जनु कासी सुनि सब सीख तबहु मन भावे * तौ पातक मनमौजि कमात्र छद्मभेस विधि-बैन सुनि, जड़ कीन्हेउ परिहास । तुम सम केतक सन्त मुनि, नित उठि करौं विनास ॥३॥ कह मुनि, यदि मम-वध तव प्रीती * मारहु अवनि विलोकि पुनीती' पिपीलिका जह कीट-पतगा * जुरै न लोभ सुगंध-प्रसङ्गा गदा घात मम गात निपाता * कुचिलें कीट कवन सिर घाता हे हतबुद्धि कुफल इन केरे * भागीदार कौन तेरे लूट-पाट क्रय-विक्रय जेता * कहेउ दस्यु पुनि दर्प समेता विलसहिं मातु-पिता अरु गृहनी * भागीदार सकल कह विरञ्चि तव मति बौरानी * ते तव पाप-युक्त ! कस जानी एक शत धेनु वध जेइ जन करे * तत पाप हय जदि एक नारी मारे एक शत नारी हत्या करे जेइ जन * तत पाप हय एक मारिले ब्राह्मण एक शत ब्रह्म वचे जत पाप हय * एक ब्रह्मचारी वधे तत पापोदय ब्रह्मचारी मारिले पातक हय राशि * संख्यानाई कत पाप मारिले संन्यासी जेइ पथ दिया गति करेन संन्यासी * आड़ेदी चारिक्रोश सम पुरीकाशी से पाप करिते जदि थाके तर मन * करह ए पाप सब कहिनु एखन शुनिया कहेन दस्यु रत्नाकर हासि * मारियाछि तोमाहेन कतेक संन्यासी ब्रह्मा बलिलेन जदि ना छाड़िवे मोरे * भाल स्थल देखिया हे वधइ आमारे जथा कीट पतङ्गादि पिपिलिकागन्धे * लोभे ना आइसे मृत खाइते आनन्दे मारिवे दण्डेर बाहि पडिब भूमिते * पिपीलिका मरिचेक मार चापेते ब्रह्मा वलिलेन पाप कर कार लागि * तोमार ए पातकेर केवा हवे भागी मम करनी १ पाप का दुखमय भोग । २ पवित्र । ? चीटी ।

मत - २४ कृत्तिवास रामायण 1 पातक, तब पुरुषार्थ विशेपा * करै-भरै सो जग यहु लेखा नहिं प्रतीति तो जाहु निकेतू * जो परिजन साझी तव हेतू तो पुनि लौटि करहु वध मोरा * तरु ढिंग वैठि, लखहुँ मग तोरा भाई जुगुति,' दस्यु मन चिन्तय * रहै कि भागि जाय मुनि, संसय दे भरोस तेहिं पठयि विधाता * लावहु पत्नी-पितु-माता कछु पग बढ़े, लखे पुनि तरुतर * करत जहाँ विश्राम संतवर ।। प्रथम जाय पितु सन रत्नाकर * कहा, सुनहु मम विनय गुनागर हरहुँ द्रव्य नित करि नरघाता * सेवहुँ सकल स्वपरिजन ताता यहि विधि सुत के जे अपकर्मा * भागीदार अहौ, पितु पितु धर्मा जनक छोभ, सुनि सुत वयन, बोले जड़ मतिहीन ! पुत्र-पाप पितु लहै, अस, शास्त्र-मंत्र को दीन ॥४॥ रत्नाकर बले जत ल'ये जाइ धन * मातापिता पत्नी आमि खाइ चारिजन जिज्ञामा करिया तुमि प्राइस निश्चय * तोमार पापेर भागी तारा जदि हय जेबा के वेचि किनि खाइ चारिजने * आमार पापेर भागी सकले ए क्षणे गुनिया हासिया ब्रह्मा कहिलेन तवे * तोमार पापेर भागो तारा केन हवे करियाछ जत पाप आपनार काय * आपनि करिले पाप आपनार दाय नितान्त ग्रामारे वध कर तवे तुमि * एइ वृक्ष तलेते बसिया थाकि आमि हरिप विपादे दस्यु लागिल भापिते * बुभिलाम एइ युति कर पलाइते नमा बले सत्यकरि ना पालाब आमि * माता पिता दारा सुते पुछे एस तुमि अत.पर जाय दस्यु फिरिफिरि चाय * भावे बुझि भांडाइया संन्यासी पलाय प्रथमे पितार काछे करे निवेदन * आदिकाण्ड गान कृत्तिवास विचक्षण रामनामे रत्नाररेर पापक्षय मनु प मारिया श्रामि जत धन यानि * प्रामार पापेर भागी हो किना तुमि पुग्ने वचन शुनि कहिले च्यवन * हेन कथा तोमाय वलिल कोन जन कोन मान्ने गुनियाछ के कहे तोमारे * पुत्र-कृत पाप केन लागिवे पितारे ܝܚܚܚܝ - । Farad आदि काण्ड २५ पिता सुवन कहुँ सुत पितु-रूपा ॐ जगत-चक्र यहि भॉति अनूपा तब शिशुकाल' कठिन श्रम धारी * पोपण किय पितु-धर्म विचारी अनुचित-उचित जु मैं तब कीन्हा * ताकर कुफल न तो कहें दीन्हा जरठ भयउँ, शिशु-सम असमर्था * सब विधि अब तैं युवक समर्था पितु समान पानन करु मोरा * जनक रूप तैं, मैं शिशु तोरा सो पालन मिस, कर नित हिंसा * कस अपराध. मोर अवतंसा सुनत जनक' कर यह खर' गन * संस नवाय दुखित अज्ञानी अति 'विनम्न बरनेउ ढिग-जननी * पापमयी निज . दैनिक करनी वॉटहु मातु मोर कछु पापा * नतरु मिटै किमि मम संतापा सहेउँ 'कलेस गर्भ दस मांसा * मम पोपन तव धर्म प्रकासा सोइ पालन तै कृत पसुवेसू * तव पातक मोहिं . किमि लवलेसूप लोचन लचे दस्यु मन पीरा * साहस जोरि गयौ तिय" तीरा हिंसा-वृति मम नित्य कमाई * बिलसहु सुमुखि सकल सुख पाई अज्ञान वाजक तोरे कि कहिन कथा * कक्षु पिता पुत्र हय पुत्र हय पिता जखन बालक छिले पिता छिनु आमि * एखन वालक आमि पिता हैले तुमि जखन बालक छिले ना छिल यौवन * बहुदु.ख करि तोमाय करेछि पालन जत करियाछि पाए पनि संमारे * से सब पापेर भाग ना लागे तोमारे एवे पिता हइयाछ पुत्रतुल्य आमेि * कोनरूपे आमारे पुपिवे नित्य तुमि मनुष्य मारिते तोमा बले , कोन जन * तोमार पापेर भागी हव कि कारण शुनिया-बापेर कथा हेट माथा करे * कॉदिते कॉदिते कहे मायेर गोचरे सत्य करि आमारे गो कहिवे जननी * आमार पापेर मागी हवे कि अापनि जननी कहिछे क्रुद्धा हइया अपार * एक दिवसेर धार के शोधे आमार दश मास गर्भे धरि पुपेछि तोमाय * तव कत पाप पुत्र ना लागे अमाय शुनिया मायेर वाक्य माथा हेट कैल * पत्नीर निकटे गिया सकल कहिल जिज्ञासि तोमारे प्रिये सत्य करि कत्रो *आमार पापेर भागी हो किनाहो १ पिता । २ खरी, कटु मत्य ! ३ नित्य कर्म । ४ तनिक भी लगाव । ५ पत्नी । नाचन न्वन्तत सरन २६ कृत्तिवास रामायण तो पुनि पाप बटाबहु मोरे * सुनि तिय विनय कीन्ह कर जोरे जेहि मुभ घड़ी गहेउ मम हाथा * मम पालन माथे तव नाथा पोपन-मरन हेत नरवाता * केहि आदेश करहु नित ताता पाप-पुन्य सुख-दुख महौ, आजीवन पति संग । पालन हित पातक करहु, लगहि न मोरे अंग ॥१॥ धीरज छट विकल रत्नाकर * किमि अब तरहुँ विपम भवसागर नरघाती पातकी अपावन * अहह वृथा बीतेर मम जीवन मुद्गर-लौह हन्यो सिर माही * गिरेउ अचेत च्यवनसुत ताहीं चलेउ मॅभरि पुनि दृग भरि आँसू * विटप तरे जहँ मुनिन निवासू । करि दण्डवत जोरि जुग पानी * करहु सनाथ दास निज जानी पूछउँ तीय-पितु-माता * कोड न अंस-अघ' लेइ विधाता दिव्य ज्ञान जो मुनि मों पावौं * सफल जनम करि, पाप नसावौं यर' नहाइ करि अग पुनीता * श्रावह अस विधि कही सप्रीता शुनिया म्वामीर वाक्य कहिछे रमणि * निवेदन करि प्रभु शुन गुणमणि विधाता करिछे मोरे अङ्गिर भागी * अन्य पाप निते पारि ए पाप तेयागि जसन करिले तुमि आमारे ग्रहण * सर्वदा करिवे मम रक्षण पोपण श्रार जत पाप पुण्य माग लागे मोरे * पोपणार्थे पापभाग ना लागे आमारे मनुप्य माग्तेि केवा बलिल तोमाय * ण्डमात्र जानि श्रामि पालिवे अामाय । शुनिया मायार कथा रत्नाकर डरे * केमने तरिव प्रामि ए पाप सागरे डविन पापेते अामि कि हडवे गति * कॉदिते लागिलदस्यु स्मरियादुप्कृति लोहार मृद्गर निज माथाय मारिया * पडिल भृमेते तवे अचेतन हैया उठिया मुनिर पुत्र भाविल अन्तरे * सेड महाजन यदि मोरे कृपा करे एट मावि उभयेर निकटते गिया * कहिल ब्रह्मार पाय दण्डवत् हैया एक-एके जिनामिनु या मे मवाकारे * मम पापभागी केह नाहिक संसारे ग्रापनि करिया कपा दिले दिव्यज्ञान * ए सकल पापे किसे हव परित्राण कहि नेन पितामह मुनिर कुमारे * करिया श्राहम म्नान तुमि सरोवरे मनाना। • गेपर।

२७ आदि काण्ड रत्नाकर - सरवर ढिंग गयेऊ * जलचर विकल, शुष्क जल भयेऊ. अगम सलिल नित, सो जलहीना * अधम दीठि' मम सो कस कीना दम्यु गलानि, मने बहु त्रासा * बरनेउ कथा लौटि विधि पासा बोतेउ पाप, च्यवनसुत तारन * नारद सो मत करि चतुरानन नीर कमण्डल ते सिर डारी * महामंत्र मुनि देन विचारी ब्रह्मा निकट आइ तेहि काना * 'राम' नाम कर दिय बरदाना करत पाप नित, जड़ भइ रसना * 'राम नाम' निकसत तेहि मुख ना लखि कौतुक विरञ्चि चितलागी * किमि कहि सके राम हतभागी मारत जन बीतेउ जनम, 'मरा' शब्द अनुकूल । तेहि पलटे सक 'राम' कह, अस सोच्यो जगमूल ॥६॥ मृतकहिं कहत कौन विधि नागर' * 'मडा-मडा' बोलेउ रत्नाकर 'महा' न कहु, जपु 'मरा' निरन्तर * होई 'राम' उदय उर-अन्तर काठ सुखान विटप" दिखराई * ककस कहत ? पूछत मुनिराई शुनिया चलिल दस्यु सरोवर पाड * शुकाइया गेल जल दृष्टिमात्र तार शुष्क स्थले मरे मीन मकर कुम्भीर * कहिल ब्रह्मार काछे ना पाइया नीर छिल ये अगाध जल एइ सरोवरे * मम दृष्टिमात्र गेल शुकाये अन्तरे शुनिया कहेन ब्रह्मा सङ्गी तपोधने * हइयाछे पूर्ण पाप तरिवे केमने कमण्डलु जल छिल दिलेन माथाय * महामन्त्र मुनि तारे करिबारे जाय निकटे आसिया ब्रह्मा कहे तार काने * एक बार राम-नाम बल रे बदने पापे जड जिह्वा राम बलिते ना पारे * कहिल आमार मुखे भो कथा ना स्फुरे शुनिया ब्रह्मार बड चिन्ता हैल मने * उच्चारिवे राम-नाम ए मुखे केमने मकार कहिले अग्रे रा कहिले शेपे * तवे वा पापीर मुखे रामनाम आसे ब्रह्मा वलिलेन तारे उपाय चिन्तिया * मनुष्य मरिले बापू डाक कि बलिया शुनिया ब्रह्मार कथा बले रत्नाकर * मृत मनुप्यरे मडा बले सब नर मडा नय मरा बलि जप अविराम * तब मुखे 'बाहिरिवे तवे रामनाम शुष्क काष्ठ देखिलेन वृक्षर उपरे * अंग लि ठारिया ब्रह्मा देखान ताहारे १ दृष्टि, नजर । २ ब्रह्मा । : समझदार । ४ हृदय के भीतर । ५ सम्वा वृक्ष । ६ किन प्रकार ।

२८ कृत्तिवास रामायण करि अनुमान, जतन बहु कीना * 'मरा' काठ, मुनिसुत कहि लीना 'मरा-मरा' तेहिं शब्द सुहावा * सगुन राम मानहुँ सो पावा पुलकित रोम, नैन स्रव नीरा * रटनि एक, नहिं चेत चेत सरीरा उलटै जापु जपत अविरामा * पलटि भयो सो राम-रामा अनल पाय जिमि भसम कपासा * राम नाम सब पातक नासा राम-नाम लखि अमित प्रभावा * चकित विरञ्चि' मोद अति पावा ब्रह्मा द्वारा रत्नाकर का वाल्मीकि नाम तथा रामायण रचने का वादान बोले, सुनहु तपोधन ज्ञानी * सदा वचन-शिव अमिट बखानो रत्नाकर समाधि लवलीना * वत्सर साठि सहस जप कीना एक नाम, इक थल, एकासन * अडिग जपत तन चुनेउ कीटगन विरहित मांस अस्थि अवसेसा * माटी जमि, जिमि पिण्ड विशेसा कण्ट कॉस कुस जमत द्वह पर * तेहि विच राम नाम निसिवासर बीते साठि सहस जब वत्सर * कमलासन' हेरेउ रत्नाकर धरती ऊँचि, जापु सुनि परही * मानुप-तन न विधिहिं कहुँ लखही बहुक्षणे रत्नाकर करि अनुमान * वलिल अनेक कष्टे मरा काष्ठखान मरा-मरा बलिते आइल राम नाम * पाइल सकल पापे दस्यु परित्राण तुलाराशि जेमन अग्निते भस्म हय * एक बार राम नामे सर्व पाप क्ष्य नामेर महिमा देसि ब्रह्मार तरास * आदि काण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवास ब्रह्मा त क रत्नाकरेर वाल्मीकि नाम आ गमायण रचना करणेर वरदान ब्रह्मा कह शुनह नारद तपोधन * जे कहिल मिथ्या नहे शिवेर वचन रामनाम ब्रह्मा स्थाने पेये रत्नाकर * सेड नाम जपे पाटि हाजार वत्सर एक नाम जपे एक स्थाने एकासने * सर्वाङ्ग खाडल बल्मीकर कीटगणे मांस खाइया पिण्ड करिल मोमर * हइल कण्टक-कुश ताहार उपर खाडल सकल मांम अस्थिमात्र थाके * वल्मीकर मध्ये हनि राम नाम डाके बमार मुहत्त पाट हाजार वत्सर * पुन. प्राइलेन ब्रह्मा जथा मुनिबर मेगाने ग्रामिया त्रत्मा चारिदिक चाय * मनुष्य नाहिक किन्तु रामनाम है J ديدنيين रत्नाकर न आदि कारण २8 पिण्ड बीच मुनिलुत जपत, जानि विधाता लीन्ह । सात दिवस वरसैं जलद, इन्द्रहि आयसु दीन्ह ॥७॥ अविरल' जल मत्तिका बहाई * शुभ्र अस्थि-तन विधि दरसाई । सुनि विधि-टेर चेतना जागी * दौरिः दण्डवत किय अनुरागी । कियो मुक्त मोहि, दै हरि नामा * पुलकित पुनि पुनि करत प्रनामा तजि' नाम विधाता * वाल्मीकि । जग किय विख्याता तैं सुत सात कोएड सुखकारी * राम-रुचिर-रचना अधिकारी राम नाम किय तोहिं अति पावन * रचहु चरित सोइ गाइ सुहावन विद्याहीन पिंगल-ज्ञाना * केहि विधि रचिहौं राम-पुराना । । वाल्मीकि कर सविनय वानी * सुनि, प्रबोधि, बोले विधि ज्ञानी । 11 सरस्वती तव गिरी निवासा * सहज काव्य तह - होइ प्रकासा जो बरनै तैं छन्द ललामा * सोइ जग जनमि, करैं श्रीरामा दै वर, गमन कियो विधि, देशा * वाल्मीकि हिय हरप विशेपा राम नाम शुने मात्र पिन्डेर भितर * जानिल इहार मध्ये- आछे मुनिवर आज्ञा करिलेन ब्रह्मा डाकि पुरन्दरे * सात दिन वृष्टि कर पिन्डेर उपरे वृष्टिते गलिया गेल मृत्तिका सकल * देखिल केवल अस्थि आछे अविकल सृष्टिकर्ता करिलेन ताहारे आह्वान * पाइया चैतन्य मुनि उठिया दॉडान ब्रह्मारे कहिल मुनि करिया प्रणाम * मोरे मुक्त केला तुमि दिया राम नाम ब्रा बले तब नाम रत्नाकर छिल* आजि ह'ते तब नाम वाल्मीकि हइल वल्मीकेते छिला जेई सेइ ए विधान * सात काण्ड कर गिया रामेर पुराण जेड़ राम नाम हैते हइलो पवित्र * सेइ ग्रन्थ रच गिया रामेर चरित्र जोड हाते बले मुनि ब्रह्मा विद्यमान * केमन हइचे ग्रन्थ मन पुराण केमन कविताछन्द आमि नाहिजानि * शुनिया विधाता तारे काहिछेन वाणी सरस्वती रहिवेन तोमार जिह्वाय * हडवे कविता राशि तोमार काय श्लोकछन्द पुराण करिवे तुमि जाहा * जन्मिया श्रीरामचन्द्र करिवेन ताहा एत वलि ब्रह्मा गेल आपन भवन * आदिकाण्ड गान कृत्तिवास विचक्षण १ लगातार । २ मिट्टी । ३ वल्मीक अर्थात् दीमको मे व्याप्त मिट्टी के ने निकलने के कारण ब्रह्मा ने रलाकर को वाल्मीकि नाम दिया । anari प्रगटत ३० कृत्तिवास रामायण नारद द्वारा वाल्मीकि को रामायण की रचना का आभास देना वाल्मीकि एकदा विटप तर * जपत राम, तहँ सुखद सरोवर एक क्रौञ्च पच्छिन की जोरी * विलसति जहाँ निपट मदभोरी व्याध-बान-हत खग निस्संका * आकुल गिरा धरनि, मुनि अंका 'अहह राम !' मुनि वचन उचारा * मुग्धकाल पच्छी किन मारा विन अपराध कीन खग हिंसा * अस कुकर्म ! मम रहत नृसंसा नरक बास पाचै अधम, शाप दियो भरि शोक । शाप देत वानी प्रगट, छन्दवद्ध श्लोक ॥ ८ ॥ जो न होत मुनि कहें यह शोका * तौ कस पुण्यश्लोका 'मा निपाद'' पद अमित अनन्दा * मुनि लिखि लियो चतुष्पद छदा । मर्म न विदित, चकित निज वचना * तब लौ भरद्वाज आगमना दोउ गुरु-शिष्य मनन-आसीना' * सुनी उतै नारद-मधुबीना वाल्मीकि मुनि काज सँवारन * नारद क] पठयो चतुरानन नारदकर्त्तक वाल्मीकि के रामायण रचनार आभास प्रदान एक दिन से वाल्मीकि सरोवर कूले * राम नाम जपे वसि सुखे वृक्ष मूले क्रौञ्चक्रौञ्चीवसि तथा आछेवृक्षतले * एक व्याध सेइ पक्षी बिन्धिलेक नले विन्धिलेक सेड पक्षी शृङ्गारेर काले * व्याकुल हइया पडे वाल्मीकिर कोले रामे म्मरि बले मुनि काणेदियाहात * जीवहत्या कैलि पापी आमार साक्षात् शृङ्गारे मारिलि पाखी बडइ कुकर्म * पापिष्ठ नारकि तुइ नाहि तोर धर्म विना अपराधे हिंसा कर पक्षीजाति * बुझिलाम तोमार नरके हवे स्थिति एतक बलिया मुनि शाप दिल ताके * एई शोके एक श्लोक नि.सरिल मुखे शोक हैते श्लोफेर हइल उपादान * मा निपाद बलि तार हय उपाख्यान चारि पद छन्द मुनि लिखिलेन हाते * लिखिया श्रापनि मूल ना पारे बुझिते भरद्वाज मन्निधाने करिला गमन * गुरु शिष्य बसिया बाछेन दुइजन ब्रह्मा पाठाइया दिल तथा नारदेरे * वाल्मीकिरे उपदेश करिवार तरे ननुपद अनुष्टुप घर मा प्रथम चरण जिमम गम का पुण्य चरित बाल्मीकीय जायण में मारम्भ हुआ है । यह पद अपम्मात् उनरे शार निमत पटा। पिनार करने में तीन । मुख मे आहत पक्षी को 57 आदि काण्ड ३१ आगे करि बन्दना, विनय रस पागे * रचना धरी देवमुनि नारद ताकर मर्म बुझावा * वाल्मीकि मन अति सुख पावा रामचरित वरनौ वरनौ यहि छदा * मानवरूप सच्चिदानन्दा रामभक्त, सब विधि सब लायक * वरनौ तात ! चरित रघुनायक सूर्यवंश दसरथहि निकेतन * राम भरत लक्ष्मण रिपुसूदन तीन गर्भ, जन्मैं चारित जन * यहि विधि चतुर्मूर्ति नारायन मिथिला जनक जनमि वैदेही * चाप भजि हरि ब्याही तेही पितु-आयसु धरि कृपानिकेता * बन गवने सिय-लखन समेता तह सिय-हरन कियो दशग्रीवा * पुनि मित्रता सुकपि सुग्रीवा बालि-हतन सग्रीवहिं राज * खोज्यो सिय, कपि सकल समाजू भुजा वीस वधि लक दसानन * लौटि अवधपुरि कीन्हेउ सासन वरनी रावन-दिग्वजय, कथा अगस्त्य ललाम । पञ्चमास कर गर्भ सिय, पनि सोइ त्यागेउ राम ॥६॥ जेखाने वाल्मीकि मुनि भावन बसिया * सेखाने नारद मुनि उत्तरिल गिया नारद देखिया मुनि सम्भ्रमे उठिल * दण्डवत् करि वसिते आसन दिल सेइ श्लोक शुनाइल मुनि नारदेरे * नारद करिया अर्थ बुझाइल तारे एइ श्लोक छन्दे तुमि कर रामायण * उपदेश कहि जानि तुमि से भाजन सूर्यवंशे दशरथ हो नरपति * रावण बाधिते जन्मिलेन लक्ष्मीपति श्रीराम भरत पार शत्रुघ्न लक्ष्मण * तिन गर्ने जन्मिवेन एई चारि जन सीता देवी जन्मिवेन जनकेर घरे * धनुर्भङ्ग पणे तॉर विवाह तत्परे पितार आज्ञाय राम जाइवेन बन * सङ्गते जावेन तार जानकी-लक्ष्मण सीतारे हरिया लवे लङ्कार रावण * सुग्रीव सहित राम करिवे मिलन बालि के मारिया तारे दिवे राज्य भार * सुग्रीव करिया दिवे सीतार उद्धार दशमुण्ड विश हात मारिया रावण * अयोध्याय राजा हइवेन नारायण करिवेन अगस्त्य रावण दिग्विजय * पुनरपि सीता के वजिवे महाशय १ नारद ।

३२ कृत्तिवास रामायण गोपवाम सियकर, ..तप-उपवन * लव कुश जनम जानकीनन्दन रामायण वेदादि पुराना * सिखबहु तिनहिं अस्त्र विधि नाना ग्यारह सहस वर्ष छिति पालन * सुतहिं राज, प्रभु स्वर्ग सिधारन गाबहु चरित जो मुनि गुन-सीला * कारेहैं जनमि राम नर-लीला देवलोक नारद पगु धारा * चन्द्रवश पुनि इमि विस्तारा चन्द्रवश का वृत्तान्त सागर-मथन 'चन्द्र' आलोका * 'बुध' शशिसुवन' विदित त्रयलोका बुध 'पुरुरुवा' नाम कर ताता * तेहि सुत 'सतावत' विख्याता सतावत के 'स्वर्ग' कहाये * 'श्वेत' नाम सुत-स्वर्ग 'सुहाये श्वेत-पुत्र निमि नाम कहावा * जिन गाथा मुनि देवन गावा मथ्यो सबन निमि केर शरीरा * तेहि प्रगट्यो 'मिथि' सुत अतिवीरा जिन यश मिथिला बसी उजागर * 'सीरध्वज' 'कुशध्वज' तिन कोडर' जग-कल्यान हेतु कछु साधन * सोचन कछु साधन * सोचन लगे तो चतुरानन जनक-गेह लक्ष्मी अवतारा* 'सीता' रूप प्रगट संसारा पञ्चमास गर्भवती सीतारे गोपने * लक्ष्मण राखिवे लये तब तपोवने कुश लव नामे हवे सीतार नन्दन * उभये शिखावे तुमि वेद रामायण एगार सहस्र वर्ष पालिवेन क्षिति * पुत्रे राज्य दिया स्वर्गे करिवेन गति जन्म हैते कहिलाम स्वर्ग आरोहण * करिवेन जन्मि इहा प्रभु नारायण एत बलि नारद गेलेन स्वर्गवास * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवास चन्द्रवशेर उपाख्यान ९ मागर मन्यने चन्द्र हइल उत्पन्न * हइल चन्द्रेर पुत्र बुध अति धन्य गृल्या नारो हदल तोहार नन्दन * तोहार पुत्र शतावर्त जानेस प्रजन मनाये ताहार हइल एक सुत * हइल ताँहार पुत्र श्वेतनाम युत नारा हल निमि तॉहार नन्दन * निमिके प्रशंसा करे जत देवगण माते मिलिया तॉर मथिल शरीर * जन्मिल वाहाते पुत्र मिथि नामे वीर नः माल एइ मिथिला नगर * वीरध्वज कुशध्वज वॉहार कोंडर मटरक्षा हेतु धाता चिन्तिल अन्तरं * करिल लक्ष्मीर जन्म जनकेर घरे , वरनेउ प्रकासा . आदि काण्ड ३३ चन्द्रवंश कृतिवामा * सूर्यवंश कर बहुरि सूर्यवश का वृत्तान्त और मान्धाता का जन्म आदिपुरुष जो अलख 'निरञ्जन' * 'शिव' 'विधि' 'विष्णु प्रगट ताहीसन सुवन तीन, पुनि एक नन्दिनी * सवन धरेउ मिलि नाम 'कन्दिनी' जरत्कारु अवतंस-मुनि, तिन सन रचेउ विवाह । नारद, भगिनी कन्दिनी, सहित समोद उछाह ॥१०॥ तिन कर सुंता 'भानु' जिहि नामा * ऋषि जमदग्नि' केरि सो वामा जिन घर एक अंश अवतारा * जनमे विष्णु विष्णु विदित संसारा वीजपात तहँ किय चतुरानन * प्रगटे मुनि 'मरीच' सोइ कारन सुत-मरीच 'कश्यप' विख्याता * कश्यप-सुवन 'सूर्य' सुखदाता सूर्य-तनय 'मनु' नाम कहाये * तिन अतिरूप 'सुपेन' सुहाये अंश-सुपेन 'प्रसन्न' भुआला * तेहि 'युवनाश्व' अवध महिपाला सुता 'कालनिधि' 'कंदक' नृपवर * वरेउ ताहि युवनाश्व तपागर कृत्तिवास पण्डितेर कवित्व सुन्दर * चन्द्रवंश रचना करिला कविवर सूर्यवशेर उपाख्यान ओ मान्धातार जन्म आदि पुरुपेर नाम हैला निरञ्जन * ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुत्र तिन जन तिन पुत्र हइला तनया एक जानि * सकले तॉहार नाम राखिल कन्दिनी जगत्कारु मुनिपुत्रे से नारद आनि * तॉहारे विवाह दिल कन्दिनी भगिनी सवे गाय वाजाय नारद मुनि वेणु * ताहाते जन्मिल कन्या नाम हैल भानु तॉहारे विवाह दिल जामदग्न्य वरे * एक अंशे विष्णु जन्मिवेन तार घरे ब्रह्मार काछेते तॉर पडिलेक वीज * ताहाते जन्मिल पुत्र नामेते मारीच मारीचेर नन्दन कश्यप नाम धरे * तॉर पुत्र सूर्य इहा विदित संसारे ।। सूर्येर हइल पुत्र मनु नाम तॉर * सुपेण तोहार पुत्र रूपे चमत्कार ! प्रसन्न तोहार पुत्र अति से सुठाम * हइल तोहार पुत्र युवनाश्व नाम युवनाश्व हइल राजा अयोध्या नगरे * विवाह करिते गेल कन्दकेर घरे कालनिमि नामे कन्या कन्दक राजार * विवाह करिल युवनाश्व गुणाधार ......

LA ३३ कृत्तिवास रामायण किन्तु तालु सन, करिय न संगा * तजि सँकोच पितु कहेउ प्रसंगा क्रुद्ध निरखि तनया-संतापा * जामातहिं दीन्हेउ अभिशापा तप सों लौटि इतै गृह आई * विनय द्विजन युवनाश्व सुनाई संतति-घर पाव? द्विजदाया * सुनि हॅसि कहेउ विप्र समुदाया दरस तें न पत्नी कर कीना * सुत-कामना कौन विधि लीना तदपि यज्ञ-पुंसपन' गृहीता * पियै रानि सोइ · वारि पुनीता इमि सतेज सुत इक उत्पन्ना * सविधि याग नृप किय संपन्ना 1 जल पुंसवन यतन धरि लीना * नृप युवनाश्व शयन तन कीना अर्ध निसा गत लागि पिपामा * अाकुल नृपति सहत नहिं त्रासा खसुर शाप, भावी प्रबल, जो जल-यज्ञ महान । घरेउ यतनयुत रानि हित, कर लीन्हेउ सो पान ॥११॥ निसा विगत, रवि-वैभव जागा * विप्रन नीर-पुंसवन मांगा तर राजन निमि-क्रया बुझाई * सुनि सखेद कह द्विज-समुदाई विवाह करिल मात्र सम्भोग ना करे * लज्जा घुचाइया कन्या वलिल वापेरे विशेष जानिया से कन्दक महीपति * अभिशाप करिलेक जामातार प्रति तपस्या करिया जवे ग्राइल भूपति * प्रणति करिया द्विजे मागिल सन्तति आशीर्बाद कर मम हउक नन्दन * शुनिया ईपत् हासि कहे द्विजगण पत्नीसह तोमार नाहिक दरशन * केमने बलिव तव हउक नन्दन एक युति कर राजा यदि लय मन * यज्ञ कर ताहे तब 'हइवे नन्दन यानल कराइये राणी के भक्षण * हइवे तोमार पुत्र अति विचक्षण करि जल राजा रासे निज घरे * शयन करिल राजा खाटेर उपरे जसन हल रात्रि द्वितीय प्रहर - जल आन नलि राजा हइल कातर त गाय पीडित राजा श्राकुल हइ * पुंसवन जल छिल मुखेते टालिल प्रो प्रकाग हैल मूर्येर किरण * जल अान वलि डाके यतेक वालण राजा यन्ते विजनल करि निवेदन : रात्रिकाले जल आमि करंछि भक्षण प. या गुनिया नने जत महामति : रात्रिकाले जल सेले हवे गर्भवती पुरोष्टि पर। .

तनय भय आदि काण्ड ३५ यज्ञ-सलिल कर अमिट प्रभाऊ * धारौ गर्भ, न संसय पूरन गर्भ विगत दस मासा * उदर फारि इक कुँवर प्रकासा अति वेदना, तजे नृप प्राना * मुनि विरचि आदिक जे नाना नामकरन कीन्हेउ 'मान्धाता' * सोइ सुत अवधभूप विख्याता दानशील अस पुन्य गुणागर * सप्त द्वीप लो नाम उजागर सूर्यवंश निवेश और अयोध्या में हारीत का अभिषेक तासु 'सुचकुन्द' सुहाये * होपेत होत युद्ध के पाये भूतल भेदि चक्र जिन स्यन्दन * सप्तसिंधु किय, सोइ 'पृथुनन्दन पुनि 'इक्ष्वाकु' समर सुविशारद * जिन सारथि वशिष्ठ अरु नारद 'सतावत' ताकर ताता* 'आर्यावर्त तासु प्रख्याता । तिनके 'भरत' अमित बलधारन * 'भारत' नाम ख्याति जेहि कारन । 'भूधर' भरत केर अधिकारी * 'खाण्ड' प्रकट तेहि सुत धनुधारी ! 'दण्ड' सुवन तेहि पापाचारी * जेहि व्यभिचार दुखित पुरनारी पुरजन नृपहिं निवेदन करहीं * तव सुत हेत श्वशुरेर अभिशाप ताहारे लागिल * युवनाश्व महाराज गर्भ जे धरिल || 5] दशमास गर्भ पूर्ण हइल राजार * वाहिर हइल पेट चिरिया कुमार नृपति त्यजिल प्राण पेये घड व्यथा * ब्रह्मा आदि पुत्र नाम राखिल मान्धाता अयोध्या नगरे राजा हइल मान्धाता * सप्तद्वीप अधिपति पुण्यशील दाता कृत्तिवास पण्डितेर कवित्व सुटाम * आदिकाण्ड गान मान्धतार उपाख्यान सूर्यवंश निर्वश एव अयोध्याय हारीतर अभिषेक मान्धातार तनय हइल सुचुकुन्द * समर पाइले जार हृदये श्रानन्द तोहार तनय नामे पृथु नृपवर * जॉर रथचक्रे सप्त हइल सागर तॉर पुत्र हइल इक्ष्वाकु नरपति * वशिष्ठ नारदे बैल रथेर सारथि ।। शतावर्त नामे तॉर हइल कुमार * आर्यावर्त्त नामे पुत्र हइल तोहार भरत ताहार पुत्र अति बलवान * जाहा हैते उपजित भारत पुराण जन्मिल ताहार पुत्र नामेते भूधर * खाण्ड नामे तॉर पुत्र अति धनुधर खाण्डेर हइल पुत्र दण्ड नाम धरे * प्रजार कामिनी कन्या बलात्कार करे कहिल जतेक प्रजा, राजार गोचर * तव पुत्र हेतु छाडि अयोध्या नगर ।

कृत्तिवास रामायण किन्तु तालु सन, करिय न संगा * तजि सँकोच पितु कहेउ प्रसंगा क्रुद्ध निरखि तनया-संतापा * जामातहिं दीन्हेउ अभिशापा तप सों लौटि इते गृह आई * विनय द्विजन युवनाश्व सुनाई संतति-वर पाचहुँ द्विजदाया * सुनि हॅसि कहेउ विप्र समुदाया दरस ते न पत्नी कर कीना * सुत-कामना कौन कौन विधि लीना तदपि यज्ञ-पुंसपन' गृहीता * पिय रानि सोइ बारि पुनीता 5 इमि सतेज सुत इक उत्पन्ना * सविधि याग तृप किय संपन्ना जल पुंसवन यतन धरि लीना * नृप युवनारव रायन तब कीना | अर्थ निसा गत लागि पिपामा * आकुल नृपति सहत नहिं त्रासा स्वखुर शाप, भावी प्रबल, जो जल-यज्ञ महान । धरेउ यतनयुत रानि हित, कर लीन्हेउ सो पान ॥११॥ निसा विगत, रवि-वैभव जागा * विप्रन नीर-पुंसवन मांगा । तब राजन निमि-कथा बुझाई * सुनि सखेद कह द्विज-ससुदाई विवाह करिल मात्र सम्भोग ना करे * लज्जा घुचाइया कन्या वलिल वापेरे विशेष जानिया से कन्दक महीपति * अभिशाप करिलेक जामातार प्रति तपस्या करिया जवे आइल भूपति * प्रणति करिया द्विजे मॉगिल सन्तति आशीर्बाद कर मम हउक नन्दन * शुनिया ईपन् हासि कहे द्विजगण पत्नीसह तोमार नाहिक दरशन * केमने बलिव तव हउक नन्दन एक युक्ति कर राजा यदि लय मन * यज्ञ कर ताहे तब हवे नन्दन यज्ञजल कराइवे राणी के भक्षण * हइवे तोमार पुत्र अति विचक्षण यज्ञ करि जल राजा राखे निज घरे * शयन करिल राजा खाटेर उपरे जखन हइल रात्रि द्वितीय प्रहर * जल आन बलि राजा हइल कातर तृष्णाय पीड़ित राजा अाकुल हइ 1 * पुंसवन जल छिल सुखेते टालिल प्रभाते प्रकाश हैल सूर्खेर किरण * जल आन बलि डाके यतेक वालण राजा चले द्विजगण करि निवेदन * रात्रिकाले जल आमि करेछि भक्षण एक था शुनिया वले जत महामति * रात्रिकाले जल खेले हवे गर्भवती १ पुत्रेष्टि यज्ञ । सा म पन्न AAAA " भय आदि काण्ड ३५ यज्ञ-सलिल कर अमिट प्रभाऊ * धारौ गर्भ. न संसय राऊ पूरन गर्भ विगत दस मासा * उदर फारि इक कुँवर प्रकासा अति वेदना, तजे नृप माना * मुनि विरचि आदिक जे नाना नामकरन कीन्हेउ 'मान्धाता' * सोइ सुत अवधभूप विख्याता दानशील अस पुन्य गुणागर * सप्त द्वीए लौ नाम उजागर सूर्यवंश निवेश और अयोध्या में हारीत का अभिषेक । तनय तासु तासु 'मुचकुन्द' 'मुचकुन्द' सुहाये * हपित होत युद्ध के पाये भूतल भेदि चक्र जिन स्यन्दन * सप्तसिंधु किय, सोइ 'पृथुनन्दन पुनि 'इक्ष्वाकु' समर सुविशारद * जिन सारथि वशिष्ठ अरु नारद 'सतावत' ताकर ताता* 'आर्यावर्त तासु प्रख्याता तिनके 'भरत' अमित बलधारन * 'भारत' नाम ख्याति जेहि कारन । 'भूधर' भरत केर अधिकारी * 'खाण्ड' प्रकट तेहि सुत धनुधारी ! 'दण्ड' सुचन तेहि पापाचारी * जेहि व्यभिचार दुखित पुरनारी ! पुरजन नृपहिं निवेदन करही * तव सुत हेत अयोध्या तनहीं श्वशुरेर अभिशाप ताहारै लागिल * युवनाश्व महाराज गर्भ जे धरिल ।। | दशमास गर्भ पूर्ण हइल राजार * वाहिर हइल पेट चिरिया कुमार नृपति त्यजिल प्राण पेये बड़ व्यथा * ब्रह्मा आदि पुत्र नाम राखिल मान्धाता अयोध्या नगरे राजा हइल मान्धाता * सप्तद्वीप अधिपति पुण्यशील दाता कृत्तिवास पण्डितेर कवित्व सुटाम * आदिकाएड गान मान्धतार उपाख्यान सूर्यवंश निर्वश एव अयोध्याय हारीतवेर अभिषेक मान्धातार तनय हइल मुचुकुन्द * समर पाइले जार हृदये आनन्द । तोहार तनय नामे पृथु नृपवर * जॉर रथचक्रे सप्त हइल सागर तॉर पुत्र हइल इच्चाकु नरपति * वशिष्ठ नारदे कैल रथेर सारथि । । शतावर्त्त नामे तॉर हइल कुमार * आर्यावर्त नामे पुत्र हइल तोहार भरत ताहार पुत्र अति चलवान * जाहा हैते उपजित भारत पुराण जन्मिल ताहार पुत्र नामेते भूधर * खाण्ड नामे तॉर पुत्र अति धनुधर खाण्डेर हइल पुत्र दण्ड नाम धरे * प्रजार कामिनी कन्या बलात्कार करे कहिल जतेक प्रजा, राजार गोचर * तव पुत्र हेतु छाड़ि अयोध्या नगर ।

३६ कृत्तिवास रामायण मन अति छोह खाण्ड नरनाहा * सुवन दण्ड कर रचेउ विवाहा नगर तजन वन गमन कर, आयसु नृप पुनि कीन्ह । करि प्रवेश कानन सघन, दण्ड नगर तजि दीन्ह ॥१२॥ नगर एक तह दण्ड बसावा * 'दण्डारण्य' नाम सोइ पावा तह मुनिप्रवर 'शुक्र' कर वासा * नृप नित पठन जाय तिन पासा एक दिवस तपहित मुनि गयऊ * गुरगृह दण्ड उपस्थित भयऊ तोरत सुमन सुतामुनि 'अना' * लखि नृप दण्ड, काम मन उपजा कामातुरहिं कहेउ मुनिवाला * उचित न, तैं पितु-शिष्य भुवाला तदपि वरन मोहिं जो मन चहहू * प्रकट पिता सन प्रायसु लहहू रुचै न मोहिं तव सीख-प्रसंगा * यहि छन केलि करहु मम संगा करि वाटिका विवस मुनि-ललना * कुमति तृप्त निज कीन वासना क्षत-विक्षत अरु नख प्राधाता* अब्जा कर कौमार्य निपाता तप निवृत्त, मुनि आश्रम आये * आसन सलिल सुता सों पाये दिवस क्लांत मुनि, सुता-सरूपा * निरखि क्षुब्ध, पूछेउ करि कोपा एकथा शुनिया खाण्ड विपादित मन * पुत्रेर विवाह राजा दिल सेई क्षण परे पाठाइल राजा दण्डेरे कानने * प्रवेश करिल दण्ड सेइ महावने कानन मध्येते गिया दण्ड नृपवर * वसाइल दण्डारण्य नामेते नगर । ताहाते वसति करे शुक्र मुनिवर * पडिबारे दण्ड नित्य जाय तॉर घर शुक्र गेल एकदिन तपस्या करिते * दण्ड राजा हेन काले गेलेन पड़िते शुक्रकन्या अब्जा जाय पुष्प आहरणे * दण्ड तारे वले मोरे तोप आलिङ्गने अब्जा बले शुन राजा कहि तब ठॉई * पित शिष्य तुमित सम्बन्वे हो भाई करिते विवाह यदि लय तब मन * पित विद्यमाने तवे कर निवेदन । राजा बले ए कथाय स्थिर नहे मन * विभा हवे पाछे आगे देह आलिङ्गन गुरुकन्या बलि राजा ना करे विचार * पुष्पवाटिकाते तारे करे बलात्कार प्रथम युवक राजा युवती मिलन * नखाघाते रक्तपात हैल सेइ क्षण तपस्या करिया मुनि शुक्र एल घरे * आसन सलिल अब्जा दिल मुनिवरे दिनान्ते अभुक्त मुनि पुड़े कलेवर * कन्यारे देखिया मुनि कुपित अन्तर कस जप तप नेस अवध आदि काण्ड ३७ शरीर शृंगार सहीता * सकुचि निवेदन किय भयभीता। 'दण्ड' शिष्य तव सूने आवा * कियो विवस, मम धर्म नसावा कुपित शुक्र नृप तुरत बुलावा * पोथिन सहित पढ़न मनु आवा विद्यादान जो मोसन लीना * गुरु-दक्षिणा भली विधि दीना दण्ड भस्म सों' राजु पुनीता * होय, शाप दिय क्रोध अतीता भयो अवधपुर नृपति विन, भानुवंश निर्वस । मुनि-शापित असमय तजेउ, जीवन, दण्ड नृशंस ॥१३॥ । मुनि वशिष्ठ-माथे सन सासन * करें प्रजा कर सुतसम पालन ब्राह्मण धर्मा * छटे सकल राज्य के कर्मा अति चिन्तित सोचत मुनि ज्ञानी * जोहे छिन दण्ड वुद्धि बौरानी ऋतुवंती अजा तेहि काला * निश्चय घरेउ गर्भ मुनिवाला शुक्र वुलाय सुगिरा उचारी * तव दौहित्र राज्य अधिकारी कुपित शुक्र तहुँ साज सजावा * अब्जा सहर्षि पठावा मुनि बले अजाकन्या देखि ए कैमन * तोमार सर्लाङ्ग देखि शृङ्गार लक्षण लज्जापुचाइया कन्या कहे तॉर पाश * तव शिष्य दण्डराजा कैल जाति नाश शुनिया ए हेन कथा क्रोधे मुनिवर * दण्डक बलिया तवे डाकिल सत्वर पुधि कॉखेकरि दण्ड आसे पड़िबारे * देखिया कुपित मुनि कहिल तॉहारे । पड़ाइया तोमारे यदि दियाछ चेतन * ताहार दक्षिणा भाल दिले हे एखन कोपदृष्टे चाहिल तखन महा ऋपि * राज्य शुद्ध हइल से दण्ड भस्मराशि अयोध्यान दण्डर जा त्यजिल जीवन * निर्वंश हइल सूर्यवंशेर राजन अयोध्याते हैल राजा वशिष्ठ ब्राह्मण * पुत्रेर समान करि पाले प्रजागण मुनि बले जप तप सब नष्ट हैल * मिछा राज्य करि मम जन्म गोडाइल ध्यान करि जानिल से वशिष्ठ ब्राह्मण * अब्जार हइवेक एक उत्तम नन्दन जेइकाले अजाकन्या ऋतुमती छिल * दण्ड राजा बलात्कार तखन करिल ध्याने जानि वशिष्ठ कहेन शुक्र प्रति * शीघ्र पाठाइया देह राजा हवे नाति शुनि शुक्र मुनि तवे हैल हष्ट मन * कन्या पाठाइवार सज्जा करिल तखन १ कुमार्गी दण्ड के नष्ट होने से राज्य पवित्र हो, ऐसा शाप । २ राजकाज के कारण।

1 वर्ष एक गत, ३८ कृत्तिवास रामायण मुनितनया किय अवध निवासा * प्रमवि कियो मुत मजु प्रकामा नाम तासु 'हारीत' बखाना * बढत नित्य शशिकला समाना अन्नप्रासन किय पटमासा * गुरु असीस मन अमित हुलासा मुनी प्रवीना * सिंहासन सुत किय ग्रामीना वयस अल्प, वैधव्य सरूपा * निरखि मातु आफुल सुतभूषा नृप हरीत पूँछत इमि वानी * कहेउ जननि निज करुन कहानी तव पितु सन नहिं सविधि विवाहू * बल प्रयोग घरबस नरनाहू मुनि-सूने मम चरित विनासा * मम-पितु-शाप तापु तन नामा आख्यान-दण्डक यहि रूपा * कृत्तिवास किय वरनि वरनि अनूपा राजा हरिश्चन्द्र का उपाख्यान भल हारीत प्रजा प्रतिपालत * तासु तनय 'हरिवीज' बखानत परनारी-हारी सदा, पुरजन विकल अनन्य । ताके सुत 'हरिचन्द' नृप, ख्याति चराचर धन्य ॥१४॥ नृप तन कियो जाह्नवी अर्पन * 'हरिश्चन्द्र' कह राज्य समर्पन अब्जा के पाठाय शुक्र अयोध्या नगर * अब्जार हइल एक अपूर्व कोडर हरणे हइल तॉर नाम जे हारीत * मुनि तारे श्राशीप करिल जथोचित दिने दिने वाडिल जेमन शशधर * छय मास मध्ये अन्न दिल मुनिवर एक वर्ष हैल जेइ राजार कोङर * वसाइल निया सिंहासनेर उपर हारीत बलेन माता करि निवेदन * अल्पकाले विधवा हइले कि कारण एइ कथा शुनि राणी कहिल निश्चय * तोमार वापेर सङ्ग विवाह ना हय तव पिता आमारे करिल वलात्कार * मम पिता कैल तव पितार संहार कृत्तिवास पण्डितेर रामायण गान * आदिकाण्डे गाइल दण्डक उपाख्यान राजा हरिश्चन्द्रर उपाख्यान हारीतेर पुत्र हरिवीज नाम धरे * राजा हैल हरिचीज अयोध्या नगरे परवधू हरि हरिबीज राज्य करे * तॉर पुत्र हरिश्चन्द्र ख्यात चराचरे हरिश्चन्द्र समर्पण करि सर्व देश * स्वरूपे गङ्गाते राजा करिल प्रवेश १ उन । २ मुनि की अनुपस्थिति मे ।

بدنه अनुपम तेहि अवध आदि काण्ड ३६ सत्य-रूप हरिचन्द भुत्राला * पितु सम प्रजा सतत प्रतिपाला सोमदत्त नृप तनया 'शैव्या' * कियो विवाह सुन्दरी विवाह सुन्दरी भव्या रुहदास कुमारा * सब विधि मोद भूप परिवारा सत्य-सुयश तिन पुन्य विलोका * इन्द्रादिक अचरज सुरलोका सुरपति इक दिन सभा विराजा * पचकन्यान नृत्य तह छाजा सुग्ध नर्तकी नृत्य तरंगा * नाचति भयो ताल कहुँ भंगा कोह,' चूकि लखि, सुरपति व्यापा * दीन पंचकल्यन अभिशापा 1 यौवनसत्त बन्दिगृह जाही * विश्वामित्र तपोवन माही रूपसि कहैं विकल भरि लोचन * नाथ होय किमि शाप विमोचन पुन्यनरेम हरिचन्दा * तिन कर छुये कटें तब फन्दा चुनै सुमन नित तोरे डारी * तरु उपवन शापित सुकुमारी निरखि तपोवन डारि निपाता * कह शिष्यन सह कौशिक वाता विटप-अंग जड़मति जेहिं भंगा * जड़वत बॅधै लता के संगा पितृ मृत्यु परे हरिश्चन्द्र हैल राजा * पुत्रेर समान पाले अयोध्यार प्रजा सोमदत्त राजकन्या तॉर नाम शैव्या * विवाह करिल हरिश्चन्द्र अति भव्या पाइया सुन्दरी जाया अन्तरे उल्लास * हइल ताहार पुत्र नाम रुहिदास सुखे राज्य करे हरिश्चन्द्र महीपति * इन्द्र रे लइया किछु शुनह सम्प्रति एक दिन सभाते बसिल सुरपति * पञ्चकन्या नृत्य करे प्रथम युवती नाचित नाचिते अति बाडिल तरङ्ग * एक बार करिलेक तारा ताल भङ्ग देखिया करिल कोप देव पुरन्दर * अभिशाप दिल पञ्चकन्यार उपर यौवन गर्विता तोरा ह'येछिस मने * बद्ध हये थाक विश्वामित्र तपोवने चरणे धारेया तारा करेन क्रन्दन * कतकाले वल हवे शाप विमोचन इन्द्र बले बन्दीरूपे थाक तपोवने * हवे मुझ राजा हरिश्चन्द्र परशने नित्य से रूपसी पुप्प करे आहरण * डाल भाङ्ग फूल तोले के करे वारण शिप्यमह विश्वामित्र गेल तपोवने * डाल भाजा गाछ सब देखिल नयने । एमन क.रेया डाल भाङ्ग जेइ जन * आइले लागिवे कालि लतार बन्धन स १ कोष ४० अवध कृत्तिवास रामायण भोर होत पुनि सोइ अतिरूपा * किसिलय' तोरन चलीं अनूपा छुवतै चपकि लता सन लागी * मुनि के शाप न बची अभागी अपराधिनि तरुषद्ध लखि, करि भर्त्सन' अति रीस । किय पयान निज आश्रम, विश्वामित्र मुनीस ॥१५॥ मृगया हेत फिरत तहँ भूपा ॐ कानन हरिश्चन्द्र यशरूपा भेंट कुरंग न, सिथिल - सरीरा * डोलत मग-मारग प्रनधीरा सोइ, तरु तरे लियो विश्रामा * कियो गोहार निरखि खुरवामा क्रन्दन" सुनत छुयो तरु जैसे * कन्या पंच मुक्त भइँ तसे लख्यो भूप सोइ अचरज नयना * कीन ससेन राज्य निज गमना भोर गाधिसुत उपवन आये * लखि न नवेलिन मन अकुलाये जेहि अपराध छुटे तिन बंधन * होय नष्ट कह गाधिय नन्दनं हरिश्चन्द्र-कर" तिन कर बाना * धरत ध्यान कैतुक मुनि जाना । तुरत चले कौशिक तन ज्वाला * सत्यसंघ जह भुआला एत बलि शाप तारे दिल मुनिवरे * आइल प्रभाते कन्या पुष्प तुलिवारे जेइ काले कन्या आसि डाले भर दिल * लतार बन्धन हाते अमनि लागिल प्रभाते आसिया विश्वामित्र तपोधने * कन्या देखि भाविते लागिल रुट मने । अनेक प्रकारे तारे करिया भर्सन * यथास्थाने मुनिवर करिल गमन हेन काले तथा हरिश्चन्द्र यशोधन * मृगया करिते करिलेन आगमन मृग ना पाइया अति व्याकुलित मन * क्लान्त हन नाना स्थाने करिया भ्रमण मनस्ताप पाइया बसिल तरु तले * कन्या डाके उच्चै.स्वरे हरिश्चन्द्र बले क्रन्दन शुनिया राजा गेल तपोवने * स्पर्श मात्र मुक्त हये गेल पञ्चजने आश्चर्य देखिया हरिश्चन्द्र यशोधन * सैन्यसह निज राज्ये करिल गमन प्रातःकाले आइलेन गाधीर नन्दन * कन्यागणे ना देखे दु.खित हैल मन आमि जे वान्धिनु मुक्त कैल कोन्जन * सर्वनाश हैल तार संशय जीवन ध्यान करि जानिलेन गाधीर नन्दन * हरिश्चन्द्र छाड़ाइया दिल कन्यागण क्रोध करि मुनि तवे चलिल सत्वर * उत्तरिला गिया मुनि राजार गोचर १ पुष्प । २ फटकार । ३ हिरन । ४ देव पचकन्याएं । ५ रोना । ६ सुन्दरियां । ७ हाथ ।

सकल आदि काण्ड ४१ आदर-विनय सहित दै अासन * कह नृप, धाम कियो मुनि पावन जीवन सफल नाथ मम आजू * धन्य ! धन्य ! कौशिक ऋपिराजू सुनु नप, अग्निपुञ्ज मुनि कहेऊ * मम बन्दिनी मुक्त किमि करेऊ कह नृप, असत न कहो तपोधन * करुन टेर' सुनि काटेउँ बंधन दान-पुन्य नित द्विज-परितोपू * कम मोहिं नाय ! अकारन रोपू रे नृप ! अहंकार तोहिं छावा * दान-पुन्य . यश यश मोहिं सुनावा | बहु अभिलाप, करौं कछु याचन * कस समरथ, देखों तें राजन सफल धर्म, गृह आजु मम, पुलकित कह अवनीस । स्वयं दान मोसन गहें, विश्वामित्र मुनीस ॥१६॥ तन मन धन जो कछु अवसेसा * अर्पन नाथ-आदेसा मुनि तव मान बचन प्रतिपाला * राखौं अटल कहेउ महिपाला व्याध फन्द मृग फमहिं अबूझा* * मुनि-प्रपञ्च तिमि नृपहिं न सूझा प्रन-पालन हरिचन्द स्वभाऊ * साखी देव, कहत मुनिराऊ मुनिरे देखिय राजा कैल अभ्यर्थन * एस एस बलि दिल वसिते आसन सफल भवन मोर सफल जीवन * मोर गृहे बाइलेन गाधीर नन्दन ज्वलन्त अनल जेन चले तपोधन * वॉधिनु ये कन्यागणे छाड़ कि कारण राजा बले कन्या मोरे केल आमन्त्रण * मिथ्या ना बलिव प्रभु करेछि मोचन दान पुण्य करि प्रभु तुपि ये ब्राह्मण * आमा प्रति क्रोध केन कर अकारण ए कथा शुनिया कहे गाधीर कुमार * दान पुण्य कर बले कर अहङ्कार करिवे कि दान तुमि देखि तब मन * आमारे किञ्चित् दान देहत राजन राजा बले गृहधर्म सफल जीवन * मोर दान लवे प्रभु गाधीर नन्दन याहा चाह ताहा दिव ना करिव आन * नाना दाने गोसाई राखिव तव मान मुनि वले दान देह यद्यपि राजन * करह अग्रेते तुमि सत्य निवन्धन राजा बले सत्य सत्य ना करिव आन * ए सत्य लडिले नाहि पाव परित्राण भूपति करिल सत्य ना बुझिया छन्द * मृग बन्दी हैल येन ना देखिया फान्द मुनि बले देखह सकल देवगण * राजा करिवेन निज सत्येर पालन १ पुकार । २ घोसे में । ३ गवाह ।

कस
४२
कृत्तिवास रामायण
जो कछु देन, नृपति ! मन थानौ * तौ दै अवनि सकल, सुख मानौ
हरपि भूप लै किञ्चित माटी * कृत संकल्प
दान-परिपाटी
श्रद्धायुत भूदान अनूपा * स्वस्ति ! स्वस्ति ! कहि लिय तपरूपा
कह मुनि सुनु कुल-भानु-विभूपन * विन दच्छिना दान नहिं पूरन
कोप-अधिप कह कृपा-निकेता * कोटि सप्त
सुबरन मुनि हेता
स्वर कठोर कह कौशिक बानी * दानवीर मति बौरानी
धरनि दिये अब तें न नरेसा * धन सेवक न राजु अवसेसा
। सुनत मर्म, नप मन सुधि आई * निज करनी निज सर्व नसाई
प्रन किमि सधै महीप विचारा * उत मुनि किय पुनि वाक् प्रहारा ।
दान-धर्म कर दर्प घनेरा * तजि महि अन्त लखौ कहुँ डेरा
सुहृदन कह, मुनि विनय विचारहु * कछुक धरनि हरिचन्दहिं छाडहु
जहॅ निज तन नृप करें निवासू * धरा छोड़ि कित मानव वासू
सूची अग्र न महि तजौ, कह सकोपि मुनि वैन ।
महि-तटस्थ वाराणसी, सो अकेल
नृप
मुनि बले दिवे यदि करेछ अन्तरे * राजन पृथिवी दान करह अामारे
दानेर करिल राजा अति परिपाटी * आनिलेक हाते करि तिन तोला माटी
भू-दान करिल हरिश्चन्द्र श्रद्धायुत र स्वस्ति स्वस्ति बलिया लइल गाधीसुत ।
मुनि बले दान दिला पाइनु एखन * दानेर दक्षिणा राजा देहत काञ्चन
राजा वले दक्षिणाते ना करिह घृणा * दानेर दक्षिणा दिव सात कोटि सोना
मुनि बले विलम्वे नाहिक प्रयोजन * सात कोटि काञ्चन करह समर्पण
सूपति करेन आज्ञा भाण्डारीर प्रति * आमारे आनिया देह स्वर्ण शीघ्रगति
दृढ़ करि वले मुनि गाधीर कुमार * भाण्डारी उपरे तव किवा अधिकार
। सकल पृथिवी दान करिले आमारे * भाण्डारी काहार धन दिवेक तोमारे
शुनिया भावित राजाछाडिलनिश्वास * करिलाम आपना आपनि सर्वनाश
मुनि बले भूपति मजिले अहङ्कारे * पृथिवी छाडिया तुमि याह स्थानान्तरे
पात्र मित्र सवे वले करि जोड पाणि * हरिश्चन्द्र भूपे दिते पल्ली एक खानि
सूच्यग्र खनने यत उठे वसुमती * उहाके ना देय विश्वामित्र महामति
अन ॥१७॥

कान आदि काण्ड ४३ काशीवास सहित परिवारा * तजै राज तिय सहित कुमारा 1 शैव्या, रोहितास अरु राजन * तज्यो अवध, धरि मुनि अनुसासन तब लौं मुनि पुनि गर्जन कोन्हा * मप्तकोटि सुबरन नहिं दीन्हा विवस भूप सविनय कह बानी * सात दिवस ठहरौ मुनिज्ञानी यहि विच सुवरन-भार उतारन * कहि काशी-पथ किय पग धारन बोते दिवम, सोन कहें मोरा ? * गाधि-मुवन' कह वचन कठोरा नृप ससोच किमि उचरहिं भारा * सहगामिनि सह करत विचारा हाट चि मोहि आनहु काञ्चन * यहि विधि करौ नाथ ! प्रन पालन नृप पुकारि कह सुनु पुररासी * लेहु जु लेन चहौ कोउ दासी। भद्र विन इक फिरत वजारा * परी हरिचन्द-पुकारा हे नर रतन ! उचित तुम कहहू * कतक' मोल दासी कर चहहू कह नप, नहिं प्रवञ्च द्विजराई * चारि कोटि सेविका विकाई पात्र मित्र बले शुन गाधीर तनय * कोथाय वासेचे हरिश्चन्द्र निराश्रय एत शुनि क्रोध करि वले महाऋपि * पृथिवीर बहिर्भाग अाचे वाराणसी शैव्या नारी आर निज पुत्र रुहिदास * तिन जन याउक करिते काशीवास विश्वामित्र कथा शुनि सूर्यवंशधन * दारा पुत्र सह काशी करिल गमन मुनि बले शुन राजा आमार वचन * दिया जाह सात कोटि आमारे काञ्चन राजा बलेन गोसाई ना करिवेन घृणा * सात दिन परे दिव सात कोटि सोना सात दिन पथे राजा हॉटिया चलिल * पथ आगुलिया मुनि कहिते लागिल मम कथा शुन हरिश्चन्द्र यशोधन * आगे देह सात कोटि आमारे काञ्चन शैव्यार सहित राजा करिल मन्त्रणा * कि दिया शोधिच आमि ब्राह्मणेरसोना शैव्या बले शुन प्रभु निवेदि तोमारे # करह विक्रय मोरे हाटेर माझारे स्त्री लड़या चले राजा हाटेर भितरे * दासी के किनिने बलि डाके उचे.स्वरे एक विन छिल से पण्डित साधुजन * छिल तार एकटि दासीर प्रयोजन ब्राह्मण बलेन ओहे पुरुपरतन * लइवे दासीर मूल्य कतेक काञ्चन राजावले नाहिजानि मिथ्या प्रवञ्चना * ए दासीर मूल्य चाइ चारि कोटि सोना १ विश्वामित्र । २ कितना। ३ गई, मोलतोल ।

- कस ४२ कृत्तिवास रामायण जो कछु देन, नृपति ! मन थानौ * तौ दै अवनि सकल, सुख मानौ हरषि भूप लै किञ्चित माटी * कृत संकल्प दान-परिपाटी श्रद्धायुत भूदान अनूपा * स्वस्ति ! स्वस्ति ! कहि लिय तपरूपा कह मुनि सुनु कुल-भानु-विभूपन * विन दच्छिना दान नहिं पूरन कोप-अधिप कह कृपा-निकेता * कोटि सप्त सुबरन मुनि हेता स्वर कठोर कह कौशिक बानी * दानवीर मति औरानी धरनि दिये अत्र तें न नरेसा * धन सेवक न राजु अवसेसा सुनत मर्म, नृप मन सुधि आई * निज करनी निज सर्व नसाई प्रन किमि सधै महीप विचारा * उत मुनि किय पुनि वाक् प्रहारा ।। दान-धर्म कर दर्प घनेरा * तजि महि अन्त लखौ कहुँ डेरा सुहृदन कह, मुनि विनय विचारहु * कछुक धरनि हरिचन्दहिं छाड़हु जहँ निज तन नृप करें निवासू * धरा छोड़ि कित मानव वासू सूची अन न महि तजौं, कह सकोपि मुनि चैन । महि-तटस्थ वाराणसी, सो अकेल नृप मुनि चले दिवे यदि करेछ अन्तरे * राजन पृथिवी दान करह आमारे दानेर करिल राजा अति परिपाटी * आनिलेक हाते करि तिन तोला माटी भू-दान करिल हरिश्चन्द्र श्रद्धायुत " स्वस्ति स्वस्ति बलिया लइल गाधीसुत मुनि वले दान दिला पाइनु एखन * दानेर दक्षिणा राजा देहत काञ्चन राजा वले दक्षिणाते ना करिह घृणा * दानेर दक्षिणा दिव सात कोटि सोना मुनि बले विलम्वे नाहिक प्रयोजन * सात कोटि काञ्चन करह समर्पण सूपति करेन आज्ञा भाण्डारीर प्रति * आमारे आनिया देह स्वर्ण शीघ्रगति । दृढ़ करि बले मुनि गाधीर कुमार * भाण्डारी उपरे तव किवा अधिकार सकल पृथिवी दान करिले आमारे * भाण्डारी काहार धन दिवेक तोमारे शुनिया भावित राजाछाडिलनिश्वास * करिलाम अापना आपनि सर्वनाश मुनि बले भूपति मजिले अहङ्कारे * पृथिवी छाड़िया तुमि याह स्थानान्तरे पात्र मित्र सवे वले करि जोड पाणि * हरिश्चन्द्र भूपे दिते पल्ली एक खानि सूच्यग्र खनने यत उठे बसुमती * उहाके ना देय विश्वामित्र महामति अन ॥१७॥ -- F- कान २ आदि काण्ड ४३ काशीवास सहित परिवारा * तजै राज तिय सहित कुमारा शैव्या, रोहितास अरु राजन * तज्यो अवध, घरि मुनि अनुसासन । तब लौं मुनि पुनि गर्जन कीन्हा * सप्तकोटि सुवरन नहिं दीन्हा । विवस भूप सविनय कह बानी * सात दिवस ठहरौ मुनिज्ञानी यहि विच सुवरन-भार उतारन * कहि काशी-पथ किय पग धारन बोते दिवम, सोन कहें मोरा ? * गाधि-लुवन' कह वचन कठोरा विचारा नृप ससोच किमि उवरहिं भारा * सहगामिनि सह करत , हाट वेंचि मोहि आनहु काञ्चन * यहि विधि करौ नाथ ! प्रन पालन । नृप पुकारि कह सुनु पुरवासी * लेहु जु लेन चहौ कोउ दासी । भद्र विन इक फिरत बजारा * परी हरिचन्द-पुकारा हे नर रतन ! उचित तुम कहहू * कतक मोल दासी कर चहहू कह नृप, नहिं प्रवञ्च द्विजराई * चारि कोटि सेविका विकाई पात्र मित्र बले शुन गाधीर तनय * कोथाय वसिये हरिश्चन्द्र निराश्रय एत शुनि क्रोध करि बले महाऋपि * पृथिवीर बहिर्भाग आचे वाराणसी शैव्या नारी पार निज पुत्र रुहिदास * तिन जन याउक करिते काशीवास विश्वामित्र कथा शुनि सूर्यवंशधन * दारा पुत्र सह काशी करिल गमन 1 मुनि बले शुन राजा आमार वचन * दिया जाह सात कोटि आमार काञ्चन राजा बलेन गोसाई ना करिवेन घृणा * सात दिन पर दिन सात कोटि सोना सात दिन पथे राजा हॉटिया चलिल * पथ आगुलिया मुनि कहिते लागिल मम कथा शुन हरिश्चन्द्र यशोधन * आगे देह सात कोटि आमारे काञ्चन शैय्यार सहित राजा करिल मन्त्रणा * कि दिया शोषिव आमि ब्राह्मणेरसोना शैल्या बले शुन प्रभु निवेदि तोमारे * करह विक्रय मोरे हाटेर मामारे स्त्री लइया चले राजा हाटेर भितरे * नमी के किनिने बलि डाके उचैःस्वर एक विग्र छिल से पण्डित साधुजन * छिल तार एकाटि दासीर प्रयोजन बामण वलेन ओहे पुरुपरतन * लइवे दामीर मूल्य कक काञ्चन राजावले नाहिजानि मिथ्या प्रवञ्चना * ए नासीर मूल्य चाइ चारि कोटि सोना १ विश्वामित्र ।२ कितना बाई, मोलतोल।

४४ १ । । कृत्तिवास रामायण हर्षि विप्र सोइ दीन्हेउ सुवरन * लै शैव्या पुनि चलेउ निकेतन अञ्चल धरि हिदास कुमारा * मातहिं तजत न, रुदन अपारा छोड़-छोड़ कहि लकुटि दिखावै * द्विज हियहीन सुवन विलगावै' बटु ! दामन विन सुत ले लीजै * रानी कहत अनुग्रह कीजै दुइ जीवन भोजन-सन, नहिं बाउरि' बस केरि । विप्र-वचन ढारस कछुक, वहुरि रानि किय टेरि ॥१८॥ प्रभु निज भाग इतर नहिं चाहो * सुवन सहित, सोइ विच निर्वाही प्रति दिन सेर अन्न अधिकाई * सुलभ न, कहि गमने द्विजराई। चारि कोटि सुवरन जो लहेऊ * मुनि ढिग नृपति उपस्थित भयऊ कस मम करत अवज्ञा राजन * चारि कोटि दिखरावत काञ्चन रती सात होय नहिं अल्पा * सप्त कोटि पूरन संकल्पा आकुल हृदय माथ धरि हाथा * हाटहिं चले अयोध्यानाया कासी पुरवासी सुनि लीजै * सेवक चहौ तो मोहिं लै लीजे शुनिया ए कथा विप्र स्वीकार करिल * चारिकोटि स्वर्णदिया शैव्यारेकिनिल दासी निया द्विज जाय आपनार वास * मायेर कापड़ धरि कान्दे सहिदास अञ्चले धरिया पुत्र जाय गड़ागडि * छाड़ छाड वलि विप्र देखाइल वाडि ! । शैव्या बले गोसाईं गो करि निवेदन * विना पणे किन एवे अामार नन्दन शुनिया कहिल विप्र हइला वातुल * दुजनार तरे क्रोथा पाइन तण्डुल शैव्या बले मुनि अन्न दिवाये आमाके * ताहाइ भक्षण कराइब ए बालके ब्राह्मण बलेन क्रोये हइया बातुल * दिन प्रति सेर पाइवे तण्डुल दामी किनि विप्र जाय आपनार स्थाने * अर्थ लये गेल राजा मुनि विद्यमाने 1 अत्यल्प देखिया स्वर्ण कहे तपोधन * अल्पज्ञान कर हरिश्चन्द्र हे राजन 1 सातकोटे लब नहे कम सात रति * विश्वामित्रे अवज्ञा ना कर महामति ए कथा शुनिया महा प्रमाद भाविल * शिरे हात दिया राजा हाटे चलि गेल हाट खानि से वाराणसीर गोचरे * तृण वॉन्धि सान्धाइल हाटेर भितरे नफर किनिवे बलि डाके उचै.स्वरे * कालू नामे हाडि एक छिल से नगरे १ अलग करे । २ ब्रह्मन् । ३ पगली । ४ अलावा । ॥

४५ मम . आदि काण्ड कालू नाम श्वपच' तह अावा * दास लेन कै रुचि दिखरावा राखौ सुअर-यूथ मन भावै * तौ मोहिं जन ! निज मोल वतावै 1 जो जो आदेस, करौ चितलाई * बूझो मोल तो नहिं चतुराई । तीन कोटि सुवरन मोहिं दीजै * कह नृप मोहिं चाकर करि लीजै नहिं विलंब सोइ दाम चुकाये * यहि विधि सात कोटि मुनि पाये गाधितनय उत अवध विरामा * डोम इतै पूछत नृप नामा जननी-जनक नाम जो दीन्हा * 'हरिश्चन्द्र' कहि जग मोहिं चीन्हा हरिचन्दा, हरि, हरे, पुकार * जेहि जस प्रीति सो नाम उचारे 'हरिश्चन्द्र' सों करि 'हरिदासा' * कालू गमन चहेउ निज वासा प्रभु उछिप्ट भोजन कवौ, देव न यह अरदास । विनय सुनत बोलेउ श्वपच, धरौ ध्यान हरिदास ॥१६॥ शकरगन पालहु नीके * आचैं मृतक, घाट सुरसरि के मरघट-कर तिन सों नित लेहू * विन, शव-दाह करन जनि देहू से वले आमार कर्म आछेत नफरे * चाहि एक नफर से राखिवे शूकरे ए कथा शुनिया राजा बलिछे वचन * आमि या वलिव ताहा करिवे पालन कालू वले शुन ओहे पुरुपरतन * आपनार मूल्य लवे कतेक काञ्चन राजा वले नाहिजानि मिथ्याव्यवहार * स्वर्ण लब तिन कोटि मूल्य आपनार एकथा शुनिया कालू विलम्ब ना कैल * तिन कोटि स्वर्ण दिया नफर किनिल सात कोटि सोना नियादिया मुनिवरे * धन पेये गेल मुनि अयोध्या नगरे कालू बले शुन अोहे पुरुपरतन * कि नाम तोमार कह काहार नन्दन करिया प्रवन्ध राजा कहिते लागिल * हरिश्चन्द्र नाम बाप मायेते राखिल कत वा डाकिये हरिश्चन्द्र नाम धरे * बलियो कखन हरि कखन वा हरे लझ्या नफर कालू जाय निज वास * हरिश्चन्द्र घुचाइल हैल हरिदास में हरिदास बले प्रभु करि निवेदन * खाइते उच्छिष्ट मोरे ना दिवे कखन कालू बले हरिदास शुनह वचन * वाराणसी पुरे राख शूकरेर गण वाराणसी तीरे जत मड़ा दाह हय * पञ्चाश काहन लह प्रत्येक मडाय १ चाण्डाल । २ जूठा, अपवित्र । ३ विन्ती।

४८ भावन मन कृत्तिवास रामायण बन विहरत सुत, भीति न अंगा* तोरत किंशुक रंग बिरंगा गेंदा गुलदाउदी सुहावन * गुलमेहेंदी गुलाव मन वेला बकुल कुलुम चहुँ फूला * हरसिंगार कुअर झूला शेफालिका सुकेपर प्यारी * चन्या जवा विरजित क्यारी पारिजात किंशुक कहुँ तारै * कहुँ वल्लरी सुमन झझकोरै कहुँ मल्लिका जुही मद भीनी * कलिका कछुक कुअर चुनि लीनी डाली विविध प्रसून सजावा * पुनि श्रीफल ढिग रोहित आवा छुअत डार मुनि-शाप बस, डस्यो मर्प विकराल । अवुध धरनि सव' रक्त मुख, तन विप बाढी ज्वाल ॥२१॥ दिन गत अर्ध, न सुत तव अावा * देवार्चन किमि सुमन अभावा ! सपन-ससंक रानि हिय लर्जत * द्विज समुझाय चली सुत खोजत चहुँ दिसि दीठि पुकारत उपवन * तरुतर लखि अचेत निज नन्दन खाय पछार अवनि गिरि माता * जिमि समूल कदली भुइँ पाता निरखत छवि मुख बिलखत धरनी * सुत कित गमन कियो तजि जननी रुहिदास प्रवेशिल कुसुम कानने * नाना जाति पुष्प तुले याहालय मने जाती यूथी मल्लिका से तुलिल रङ्गन * शेफालिका पारिजात शिउलि काञ्चन अशोक किंशुक जवा आतसी केशर * प्राकन्द गोलाप तोले वकुल टगर अवशेपे श्रीफले आकड़ि लागाइल * प्राछिल डालेते शाप बुकेते दंशिल सर्लाङ्ग ते शिशुर वेडिल विषज्वाला * भूमिते पडिल शिशु मुखे भाङ्ग लाला हइल आकाशे बेला द्वितीय प्रहर * तवु से राजार पुत्र ना आइल घर विलम्ब देखिया तारे कहिछे ब्राह्मण * एखन ना एले कवे हवे देवार्चन शैव्या बले प्रभु एइ करि निवेदन * श्रापनि देखिया अासि कोथा से नन्दन । तनये देखिते शैव्या करिल गमन * विश्वामित्र तपोवने दिल दरशन वालकेरे चाहिया वेडान तपोवने * देखे वृक्ष आड़े पड़े आपन नन्दने पुत्र के देखिया शैव्या पडिल भूतले * येमन कलार गाछ भाङ्ग डाले मूले पुत्र कोले करि शैव्या करिछे क्रन्दन * कोथा गेल मम पुत्र रुहित नन्दन १ वेहोश । २ बहने लगा। ३ केला ।

धर्म आदि काण्ड ४६ करत दारुन दुख डारा * हे प्रभु ! अनल करो तन छारा लिये अंक सुत, भरत उसासा' * विलपत रानि गई द्विज पासा केहि विधि प्रान बचें मम नन्दन * दासी तोर अकारथ क्रन्दन सर्पदंश घातक तेहि प्राना * मृतक पुरुष किमि जीवन दाना धेर्य, सती ! करु धीरज धारन * भावी अमिट, न सको उबारन काशीघाट दाह मृत देहू * बहु प्रबोधि, द्विज रहेउ स्वगेहू मरघट चली रानि शव अंका * डोलत जहॅ हरिदास निशंका लिये बॉस अरु श्वपच सरूपा * मृतक देखि पहुँचे ढिग भूपा जो लौ कर नहि घाट चुकायौ * नारी जनि तुम चिता लगावौ विधि मोहिं विवस अधम गति दीना * मरघट नियम विनय तोहि कीना मम अधिकार प्रथम र्दै दीजै * नतरु दाह कहुँ अन्तै कीजै घाट-अधिप अनुमति मिले, अर्ध वस्त्र तन फारि । चुकवौ कर तब, रानि कह, कातर गिरा उचारि ॥२२॥ धर्म करिबारे दुःख दिल नारायण * अग्नते पुड़िया आजि त्यजिव जीवन पुत्र कोलेकरि शेव्याछाडिल निश्वास * कॉदेिते कॉदिते गेल ब्रामणेर पाश निवेदन करि शुन सकल ब्राह्मणे * कह ए अधीन पुत्र वॉचिवे केमने शुनिया प्रबोध वाक्य कहे हिजगण * सर्पर दंशने प्राण छाडिल नन्दन । मरिले मानुप कभु बाँचे कि कखन * सम्बर सम्बर सती सम्बर क्रन्दन वाराणसी पुरे तुमि मड़ा लये याह * काष्ठ चिता करि एइ मृत देह दाह मड़ा लेया गेल शैव्या कातर अन्तरे * एकाकी रहिल द्विज अापनार घरे महालैया गेल शेव्या वाराणसी वास * हातेते मुद्गर करि आसे हरिदास हरिदास बले आमि मड़ा दाह करि * मड़ा प्रति लइ पञ्चाश काहन कड़ि सत्यकथा एड् तोमाय कहिनु निश्चय * तोमारे बलिनु याहा मिथ्या नाहि हय अन्यर वाटेते लेया पोड़ाओ कुमार * विधाता करिल मोरे हाड़िर आचार शैव्या बले गोसाई वलिते भय वासि* विधाता करिल मोरे ब्राह्मणेर दासी आज्ञा कर यदि मोरे घाटेर पाटनी * दिवामिचिरिया ये वस्त्र पर्द्धखानि १ दुज भरी माने लेना।

५० कृत्तिवास रामायण कर जागा विप्रगेह दासी कामा * कटें दिवस, सवविधि विधि' वामा तापर' अहह दुसह दुख आई * उतरेउ मम सिर गाय बजाई पुनि-पुनि 'हरिश्चन्द्र' कर नामा * करत उच्च लै रोदन भामा अहौ कितै तुम अवधनरेतू * तव सुत गमन आजु आजु यम-देसू धर्मय कै आहुति पूरन * प्रानहीन लखि मुअन विसूरन' सुनत नाम निज, रानि विलापा * पूर्ववृत्त' हरिचन्द धरि धीरज शैव्या-ढिग आई * परिचय दै, बहु विधि समुझाई सुनि सकोपि बोलत अकुलानी * कल लों अवधभूप-महरानी मरघट-डोम करें परिहासा * हाय विरञ्चि पलट कस पासा पुनि नृप कहत सुनौ प्रिय रानी * व्यथा-विषम सब कथा भुलानी सोमदत्त-तनया जो शैव्या * अवध-भूप मैं बरेउँ सुभव्या रोहित जनम लियेउ युवराजू * कौशिक हरन कियो पुनि राजू नृप-ललाट इक चिन्ह विशेखी * संशय मिटेड रानि सोइ देखी एतेक शुनिया तवे शेव्यार वचन * हातेते सुद्गर लैया अाइसे राजन पडिलेन पुत्र लैया शैव्या स्थानान्तरे * हरिश्चन्द्रवलिया सेकान्दे उच्चै.स्वरे प्रभु हरिश्चन्द्र राजा गेल कोथाकारे * आसिया देखह मृत आपन कुमारे धर्म तरे देख नाथ कि दशा हयेथे * पराण पुतलि पुत्र छाडिया गियाछ । हरिश्चन्द्र बलि शैव्या कान्दे विद्यमान * तखन राजार हैल सेइ पूर्वज्ञान हरिश्चन्द्र बले राणी ना कर क्रन्दन * प्रामि सेइ हरिश्चन्द्र देखह लक्षण शैगा चले हरि हरि कपाले ए छिल * आमार रूपेर मोहे पाटनी पडिल अयोध्याय छिलाम ये राजार रमणी * एवे परिहास करे घाटेर पाटनी हरिदास चले प्रिये बलि तब टॉइ * पासरिले सकलि किछुइ मने नाइ सोमदत्त राजकन्या शैव्या तब नाम * त.मारे विवाह प्रिये आमि करिलाम ।। साहेदास नाले तर हइल नन्दन * मम राज्य निल विश्वामित्र तपोधन । ए कथा गुनिया राणो देखिो लागिल * कपाले निशान छिल तखन चिनिल १ भाग्य । २ विमरना दुखो को याद करके कलपना । ३ पहले का हाल ।

है मिटवों कारन तन परसा आदि काण्ड ५१ उपजा मोह, नृपति तजि धीरा * रोहित-तन लखि शिथिल शरीरा सुत ! हे कुमार ! हे ताता ! * कितै गमन किय तजि पितु-माता सत मारग, दिय दुख नारायन * अनल भेटि तन, सुवन सहित चन्दन-चिता, सजि बैठे पितु-मात । अनल देत प्रगटे तवे, धर्मराज साक्षात् ॥२३॥ अगिनि नृपति जनि करौ प्रवेसा * पद्मपाणि रोहित खोले दृग, विष दूर कुमारा * पुनि रविकुल वाटिका वहारा कालू आय कहत सुनु राजन * मुक्त वध तब, सोन न याचन सोड चन विन विनय किय आई * दीन सोन, मो में भरपाई मम कल्यान न, द्विज धन लीने * शेव्या-कर कंकण तेहि दीने विश्वामित्र मुनीय विचारा * विनसेट जप-तप-जोग-अचारा वृथा प्रपञ्च राज कर राज कर लीना * भेटि नृपति, मुनि प्रायसु दीना साधु-साधु नृप गमनौ आजू * करौ सनाथ अवधपुर राजू पुत्र कोले करि राजा करिछे क्रन्दन * कोथा फेन्ले गेले बापू सहित नन्दन धर्म करिते दुःख दिल नारायण * अग्निते पुड़िया ग्राजि त्वजिवजीवन तखनि चन्दन काष्ठे साजाइल चिता * मध्येते राखिल पुत्र पाशे माता-पिता ये काले जलन्त अग्नि दिवेन चिताने * हेन काले धर्मराज कहेन साक्षाते | अग्निते पुडिया केन त्यजिबे जीवन * आमि बाँचाइया दिव तोमार नन्दन पद्महस्त परशेन बालकेर गाय * विपज्वाला दूरेगेल चक्षु मेलि चाय हेन काले कालू यासि राजारे सम्भावे * तोमाय अामार स्वर्ण दाय नाहियासे वालण प्रासिया बले राजार सदने * तोमाते प्रामाते दाय शुचिल काञ्चने राजा बले गोसाई गो करि निवेन ब्रह्मस्व लइत्र बल किसेर कारण राणीर हातेते स्वर्ण मडूण ये छिल * ताहा दिया राजा तार दाय घुचादल मुनि भावे तप जप सब नष्ट केनु * मिथ्या राज्य करिया हे जन्म काटाइनु ये साने पाछेन हरिश्चन्द्र यशोधन * सेइ खाने मुनि प्राति दिलो दरशन मुनि बले शुन हरिश्चन्द्र महीपति * आपनार राज्ये तुमि याह शीघ्र गति ए १ मूल्य में दिया नुवरन भर पाया ।

राजसूय विधिवत ५२ कृत्तिवास रामायण सपरिवार महिपति पग धारा * गाधितनय मन मोद अपारा । छैटे विपति-धन उघरेउ चन्दा * सुखी भानुकुल भानुकुल पुरजन वृन्दा करि पूरन * राजतिलक दै रोहित नन्दन श्वान विडाल प्रजागन केते * भूपति-सह पयान जिन चेते सतन' स्वर्ग तिन लै पगु धारा * सत्य-धर्म कर वजेउ नगारा नारायण चैकुण्ठ विराजा * हरिश्चन्द्र कर निरखि समाजा नृप के तप आधार, कुवर्गा' * जुरै न कहुँ मेट छवि स्वर्गा कहेउ सकोप गदाधर नारद * नृप-संकल्प करौ मुनि गारद प्रभु आयसु, सोई दिसि चले, वीणापाणि मुनीस । गति अबाध रथ लखेउ नभ, बढ़त कोशलाधीस ॥२४॥ करि प्रणाम वरनेउ निज अर्था * कह मुनि, नृप किमि भयेउ समर्था जोरि समाज सतन गोलोका * के सुकर्म अस पुण्यश्लोका ? उपजी कुमति सुधुद्धि नसावा * सत पर विजय रजोगुन पावा वापी कूप तडाग सुकरनी * निज मुख नृप नारद सन वरनी ܨܝܚܕܚܫ ४ राजा बले गोसाई शुनह निवेदन * केमन करिला राज्य कह तपोधन स्त्री-पुत्र लइया राजा करिल गमन * प्रसन्न मानस मुनि प्रफुल्ल वदन अयोध्याय राजा आसि दिल दरशन * राजसूय यज्ञ राजा करिल तखन राज्यभार पुत्रेरे करिया समर्पण * हरिश्चन्द्र परलोके करिला गमन पुरीर सहित चले वैकुण्ठ भुवने * कुक्कुर विडाल आदि ये छिल ये खाने देव गदावर ताहे कुपिल अन्तरे * कहिलेन डाकिया नारद मुनिवरे स्वर्ग नष्ट करे हरिश्चन्द्र तृपवर * ए कथा शुनिया लुनि चलिला सत्वर ।। वीणा वाजाइया याय महातपोधन * देखे रथे स्वर्गे राजा करिछे गमन । मुनि प्रण मया राजा स्वर्ग याइ बले * मुनि कन याप्रो राजा कोन पुण्य फले सुबुद्धि राजा के तवे कुबुद्धि घटिल * आपनार पुण्य सत्र कहिते लागिल १ चाहना की। २ सदेह । ३ राजा के तप के बल पर अनधिकारी लोग भी । ४ मटिया- मेट | ५ विना रोक टोक । -पत.

, . आदि काण्ड ५३ हाट बाट फल विटप लगाये * यज्ञ दान प्रन-सत्य निभाये कौशिक राज सकल करि अर्पन * काया वेंचि चुकाये सुवरन जस-जस सुयश भूप निज गावा * तस स्यन्दन' लचि नीचे आया स्थ कर पतन, पतन नृप केरा * लखी चूक, हिय छोभ घनेरा होत ज्ञान, रथ पुनि टिकि गयऊ * सरग-धरनि विच स्थिर भयऊ कटक सहित नृप भोजन-बसना * देवन मिलि कीन्ही अस रचना जोरत अन्न मोद मन लेही * खरचत ताहि प्रान तांज देहीं 5 खेत धान्य भरि धरै कोठारा * खाई भूप-कटक सोइ सारा लोभी वसन संजूतहिं जेता * आवै सकल कटक के हेता अन्न-वस्त्र साधन * यहि विधि सकल जुटाये देवन हरिश्चन्द्र के पुन्य कहानी * कृत्तिवास यहि भॉति बसानी जेते सुख सगर-वश का उपाख्यान इत इ सहिदास सम्हारेउ सासन * पितु सम करत प्रजा प्रतिपालन । पुण्यकथा येइ राजा कहिते लागिल * कहिते कहिते रथ नामिया पडिल 1 नामिल राजार रथ दुःखित अन्तर * भाल मन्द नाहि वले हइल कातर स्वर्गे थाकि युक्ति करे यत देवगण * राजार कटक किवा करित्रे भक्षण ये शस्य मञ्चय करे ना करिया व्यय * हरिश्चन्द्र राजार कटक ताहा लय क्षेत्र हइते से शम्य अानिया फेलाय * हरिश्चन्द्र राजार कटके ताहा खाय भृतन नसन राखे करिया यतन * राजार कटके परे सेइ से वसन ए नियम करिल सफल देवगण * अर्द्ध पथे हरिश्चन्द्र रहिल तखन स्वर्गे नाहि गेल राजा सर्त ना पाइल * हरिश्चन्द्र राजा मध्य पथे ते रहिल । कृत्तिवास पण्डित कवित्व विचक्षण * आदि काण्डे गान हरिश्चन्द्र विवरण मगरवंशेर उपाख्यान अतः पर हइलेन सहिदास राजा * पुत्र तुल्य पालन करेन सब प्रजा । २हत्य मेवा।

५४ लै कृत्तिवाम रामायण रोहित-नन्दन 'सगर' नृप चहुँ दिसि जागु बखान । तासु रुचिर गाथा सुने, बिनसैं पाप महान ॥२५॥ संततिहीन सगर अति शोका * वंशहीन-मुख लखहिं न लोका मन अति छोभ, गमन किय कानन * बहु दिन कियो शंभु-आराधन आसुतोप सब विधि परितोपू * कहु नरपति, तोहिं कौन कलेशू नाथ ! तनय विन निसिदिन त्रासा * 'सुत अनेक' लहि मिट पिपासा भोलानाथ विहसि वर दीना * सुत सठ सहस एक पितु कीना वर, सगर गमन किय धामा * केशिनि-सुमति युगुल तेहिं भामा गर्भवती भ: शिव-वर पाई * गत दस मास प्रसव नियराई असमञ्ज केशिनी-नन्दन * अतुलित छवि मनोज-मन-रञ्जन सुमति उठी वेदना कराला * चर्म-उल्न' प्रसवित तेहि काला सगर उल्न लखि, क्रोध प्रकासा * 'भङ्गड' कहि, किय शिव-उपहासा ताहार नन्दन से सगर नाम धरे * सगर हइल राजा अयोध्या नगरे मन दिया शुन सगरेर विवरण * ये कथा शुनिले हय पाप विमोचन अपुत्रक राजा राज्य करे मनो दु.ख * प्राते नाहि देखे लोक अपुत्रेर मुख दुःखेते सगर राजा करिल गमन * बहु काल करिल शिवेर आराधन सन्तुष्ट हइया शिव बलेन सगरे * वर मॉगि लह राजा या चाह अन्तरे सगर बलेन पुत्र विना वड़ दु.ख * वर देह देखि आमि बहु पुत्र मुख 1 हासिया दिलेन वर भोला महेश्वर * पुत्र पाटि हाजार हइवे तव घर वर पेये आसिलेन सगर तृपति * शिव वरे दुइ नारी हैल गर्भवती केशिनी-मुमती तार दुह स्त्रीर नाम * दिने दिने गर्भ दोहा बाड़े अनुपम दश मास गर्भ हैल प्रसव समय * कोशनी प्रसन कैल सुन्दर तनय दो तनये देखिल येन अभिनव राम * असमञ्ज बलिया थुइल तार नाम 5) सुमतीर गर्भ-व्यथा हइल यखन * चस्मर अलाबू एक प्रसवे तखन । देखिया अलाबू राजा कुपित अन्तरे * भाङ्गड़ बलिया गालि दिलेन शिवेरे १ चमडे की झिल्ली थैली के समान जिसमे गर्भ रहता है ।

दुग्धपुष्ट ते आदि काण्ड तोरत उल्न युद्धि चकरानी * तिल मम साठि सहम लखि प्रानी मोहक रूप, सगर सुख पावा * क्षीर कलस सठ सहस मँगावा । नर-तन पावत * माठि सहम तृपसुत हुकारत सुत-समूह, दिय दिय शाप विसाई' * विनमह अवस्था पाई नहत बहत बीते पट मामा * डगरत सुत लखि सगर हुलाना चुटकी जन-जन भूप बजा* * चहुँ दिसि धसिलि अंक चदि आत्रै द्वादश वयम किशोर गन, सबन विवाहेउ भूप 'अंशुमान' असमञ्ज-लुत, प्रगटे धर्म स्वरूप ॥२६॥ एकाधिक-सठ-सहन कुमारा * नाति एक, नृप मोद अपारा विगत जन्म जिन जोग नसावा * सोइ असमञ्ज जनम पुनि पावा असत जगत, मत ब्रह्म सनातन * छटै राजपाश किमि ? चिंतन उपयो सुवन विविध त्रामा * तो पितु तजै, मिटे जगपामा कोपे लाउ भाडिया करिल खानखान * पाटि हाजार पुत्र हैल तिल प्रमाण उसिगिमि करे मत्र देखिने रूपम * पाटि हाजार याने राजा दुवर कलम खाइते साइते दुग्ध नव रूप धरे * पाटि हाजार पुत्रेर मगर हॉकारे पाट हाजार पुत्रे शाप दिलेन विमाई * अचिरे मरिवि तोरा नहि विचिराई दिने दिने बाड़े सेड़ नगर नन्दन * छ्य माम वयम्क हल पुत्र गण जबे मगर मा हाते सारे तुड़ि * पाटिहाजारकोलेनासे दियाहामागुडि यलन हइल तारा द्वादश बछर * समलेर परिणय दिलेन मगर पाइट हातारेर पाइ हानार नारी * उसे राज्य कर राजा अयोध्या नगरी ज्येष्ठ पुत्र प्रसमज धर्मपरायण * अशुमान नासे तॉर हइल नन्दन पाइट हानार तनय एक मात्र नाति * देखिया मगर राजा ग्रानन्दित अति अनमञ्ज मढाई भाग्न मनेमन संमार अन्त्य गन्य देव नारायण अमार संसारे केन बद्ध हये मरि * निभने बमिया आमि भजिय श्रीहरि माविल संसारे आमि ना थाकिव पार * अनुचित कर्म सब को दुराचार १ इन्द्र-पृची के पनी जानी ने नदेव नगपिन न्द्र ने नापी प्रनप-वृष्टि रेख साप दिया। २ा, पोटित कर दे।

असमंज वनवासा ५६ कृत्तिवास रामायण पुर वालक मारग जे खेलत * पकरत तिन्हैं बॉधि जल वोरत । भरें नीर नारी सर तीरा * तोरत घट, पुरजन अति पीरा ।। नित प्रति घरन लगावै आगी ॐ नृप सन कहेउ प्रजा दुख पागी सुवन-चरित सुनि मन अति त्रासा * सुत दोन हर्पित गमन कियो सोइ कानन * जग बंधन, भल मिटे अपावन अंशुमान सुत तासु' धर्मधर * इतर मुवन सह सुखिा भूप वर । कछुक सगर-सुत सरग विराजहिं * कछुक कियो तैनाथ पतालहिं । डोलति धरा धरनिधर कॉपैं * सगर-सुवन यहि विधि चहुँ व्यापैं । राजा सगर का अश्वमेध-यन आरभ और वश-नाश अश्वमेध शुचि यज्ञ उछाहा * उपजेउ एक दिवस नरनाहा सो सुभ घड़ी कियो प्रारंभन * कहेउ बुलाय सकल नृपनन्दन सजै अवधपुर यज्ञ तुरंगा * साठि सहस्र सहोदर संगा यतेक बालक खेला खेलाय नगरे * हाते गले वान्धि सकलेरे फेले नीरे यत नारीगण जल भरिबारे आसि * आछाड़िया भाङ्ग सब जलेर कलसी अग्नि दिया पोड़ाय सकल प्रजाघर * कहिल सकल प्रजा राजार गोचर पुत्रेर चरित्र शुनि लागिल तरास * असमज पुत्र राजा दिल वनवास वने गिया असमज हरषित मन * ससारेर वन्धन छेदिल नारायण असमञ्ज पाठाइया बनेर भितरे * अपर सन्तान लये सुखे राज्य करे कृत्तिवास पण्डितेर मुखे सरस्वती * अमृत समान कैल आदिकाण्ड पूथि सगरेर अश्वमेध यज्ञारम्भ ओ वशनाशेर विवरण एक दिन सगर भाविया मने मने * अश्वमेध यज्ञ करे अयोध्या भवने कत पुत्र राखे राजा स्वर्गेर उपर * कतेक राखिल लये पाताल भितर पृथिवीर राजा यत मम नामे कॉपे * मम वंशजात यत तिन लोके व्यापे एतेक भाविया यज्ञ कैल प्रारम्भन * तुरङ्ग राखिते दिल यतेक नन्दन वापेर आगेते तारा करिल उत्तर * घोड़ा सह याव पाटि हाजार सोदर १ केशिनी से उत्पन्न कुमार असमञ्ज के पुत्र अशुमान । २ उत्साह, उमग ।

लौट तुरग याग बल-सागर श्रादि काण्ड जीति दिग्देमा * पूरन तबहिं अवधेसा मम विवाद सुरपति सदा, परें कतक भय व्याध । मेटि तिनहिं रविकुल सुभट, हय' आनहु विध ॥२७॥ सागर कटक तरंग अनन्ता * उमड़त लखि सुरपति मन चिन्ता जुगुति विरश्चि ! रचौ केहि भाँती * सगर-तुरग' हरि जुडची छाती मध्य दिवस तम निसि सम छावा * तकि अवसर हय इन्द्र चुरावा बॉघेउ ताहि पताल शचीसा * योगलीन जहँ कपिल मुनीसा मिटेउ अंध पुनि भानु अलोका * कटक न सुतगन बाजि* विलोका । हेरत हेरत फिरे सकल भूमण्डल * मिलेउ न हय पुनि चले रसातल लै कुदार सठसहस कुमारा * कोम-कोस महि करत प्रहारा हुमकि हनै भल चोट कुदारी * लागै धर्म-पृष्ठ धर्म-पृष्ठ, महि फारी चारि दण्ड लखि चारिउ सागर * पहुँचे पुनि पताल पुत्र व क्य शुनिया सगर बले ताय * आनिते पारिले घोडा यज्ञ वे साय इन्द्रर सहित मोर हइल विवाद * एड् यज्ञे बत शत हइवे प्रमाद यज्ञाश्व राखिते याय सगर-नन्दन * शुनिया हइल इन्द्र बड मीत मन वासव बलेन ब्रह्मा कोन् युक्ति करि * विरिञ्चि बलेन तुमि घोडा कर चु.र दिने दुइ प्रहरे हइल निशानाय * चोड़ा चुरि करि इन्द्र पाताले पलाय तपस्या करेन मुनि कपिल ये खाने * घोडा लये राखिल ताहार विद्यमाने योगेते आछेन मुनि केह नाहि काछे * इन्द्र घोडा वान्धिया गेलेन तार पाछे अन्धकार वृष्टि सत्र घुचिल यखन * घोब हाराइल बले सगर-नन्दन चाहिया ना पाइलेक पृथिवी मण्डले * पृथिवी सुजिया तारा चलिल पाताले भाइ पाटि हाजार कोदालि हाते धरे * एक क्रोश एकेक कोनालि पारसरे क्रोध करि येइ धरे कोदालिर मुप्टे * एक चोटे भेजाय पाताले वर्मपृष्ठे चारि दण्डे खंडिलेक चारि ये सागर * सागर इंडिया गेल पानाल भितर १ घोडा।२ रोक टोक । ३ सगर का पक्ष के निये छोटा सा ४ पचिपति इन्द्र । ५ घोला । ६ कुदाल, सोदने का एक औजार । ९ भूमि को पाप पन्नेवारे पाप को पीठ पर। - ५८ कुदार-बेट अश्व-चोर पथ चले कृत्तिवास रामायण दिसि पावक' बाँधा बट-छाही * उपवन-कपिल तुरग लखि ताहीं करत कुलाहल कहि कटु वचना * घोर-चोर किमि ध्यान निमग्ना हनेउ मुनि अंगा * लागत भयो ध्यान मुनि भंगा अनल-नयन ऋषि झरै अँगारा * पल विच साठि सहस भे छारा कपिल ऋषि द्वार। सगर-वश के उद्धार का उपाय कथन फिरे न अश्व सहित नृपनन्दन * बीतेउ वरस, यज्ञ नहिं पूरन अशुमान असमज-कुमारा * सगर-मुतन खोजन पग धारा नृप आयसु सो रथ आरूढा * अवनि सकल मग-मारग ढूंढा खनित लखेउ चहुँ धरातल, प्रविशे भेदि पताल । प्राची दिसि कर महोदधि", दर्शन कियो विशाल ॥२८॥ नीलम वरन नील गज सुन्दर * दसनन धरा धरे तहँ भूधर वन्दन करि पूछेउ युवराजू * कियेउ सॅकेत पन्थ गजराजू सों रहेउ सचेतू * सोइ भानु-कुल-केतू पूर्व प्रो दक्षिण दिक तार मध्यखाने * घोड़ा बान्धा देखिल कपिल विद्यमाने डाकाडाकि करिया कहिल सब तॉई * घोड़ा चोरे देखिते पाइनु एक भाई मुनिर गायेते मारे कांदालिर पाशि * ध्यान भङ्ग हइया चाहेन महाऋषि क्रोधेते नयने अग्नि झरे राशिराशि * पुड़े पाटि हाजार हैल भस्म राशि एककाले क्षय हैल सगरनन्दन * आदि काण्डे गान कृत्तिवास विचक्षण कपिल ऋषि कर्त्त क सगर-वश उद्बारेर उपाय क्थन एक वर्षे न हैल यज्ञ अवशेष * तुरङ्ग लइया पुत्र ना श्राइल देश श्री असमञ्जर पुत्र नाम अंशुमान * पुत्रेर करिते तत्व ताहारे पाठान राज-आज्ञा पाइया चडिया निज रथं * एके एके पृथिवीते खुजे नाना पथे । ये पथे प्रवेश करे देखे खानखान * सेइ पथ दिया तवे पाताले सॉथन आगेत देखिल पूर्व दिलेर सागर * देखे नील वर्ण हस्ती परम सुन्दर पारेछ पृथिवी येन दशन उपरे * प्रणाम करिया तारे बलिछे सत्वरे हस्ती बले एड् पथे याह अशुमान * छोड़ाचोर निकटे हइवे सावधान १ आग्नेय कोण । २ घोडा हरण करनेवाला । ३ खुदी हुई । ४ पूर्व । ५ महासागर । ६ यह व्यग्य कपिल मुनि को ओर सकेत है । - ग्रादि काण्ड सागर पुनि उत्तर दिशि सोहा * विगज श्वेत निरखि मन मोहा धवल रूप हे अवनि-अधारा' * लखे जान कहुँ मगरकुमारा रविकुल-तुरग मिले याही पथ * बढ़ेउ कुअर उपजेउ पुरुपारथ पच्छिम दिसा पयोधि तरंगा * दन्तो' जहॅ सेन्दर मम अंगा बरन अरु अरु दन्त कराला * टिकी जहाँ मेदिनी विशाला लचत माथ जिन, डोलत धरनी * अनुपम कथा दिग्गजन बरनी कोन हय-बंधन * किये समीप कपिल मुनि दशन हे मुनीस ! पूछा करि बन्दन * देखें कती सगर के नन्दन कपिल-अनल सुनि बंग-विनासा * अशुमान मृदु वचन सुत सगर-अयतमा * कियो छार प्रभु, ते मम चंमा तिन सद्गति कछु कहाँ उपाऊ * महिमा अमित छमौ मुनिराऊ ब्रह्म कोप थिर नहिं अति काला * हरपि कहेउ मुनि सुनो भुवाला पूरुव-दखिन प्रकामा असमज, पूर्व हते चलिलेन उत्तर मागर * श्वेत वर्ण एक हस्ती देखिलो सुन्दर अंशुमान तोहारे लागिल शुधाइते * ए पथे सगर-पुत्रे देखेछ, याइते शुनिया ताहार कथा लागिल कहिते * पाइवेन घोडा याह एड् एड् पथे तथा यदि ना पाइले घोडार दर्शन * पश्चिम मागरे गिया दिल दरशन रक्तवर्ण एक हस्ती देखिल सुन्दर * मोदिनी से घरियाछे दशन उपर से मब हस्तीर शुन अपूर्व कथन * मम्तक नाडिले हय मेदिनी कम्पन । पूर्व प्रो दक्षिण दिक तार मध्य खाने * घोडा बान्धा देखिल कपिल विद्यमाने दण्डवत् हड या ताँरै लगिल कहिते * ए पथे सगरपुत्रे देखेछ याइने महाऋपि कपिल ये बलिल तखन * मम कोपानले भस्म हल सर्वजन शुनियाइ अंशुमान युडिल स्तवन * सेड वंशे तपोधन पामार जनम अंसमज पुत्र प्रामि सगरेर नाति * तोमार महिमा बले काहार शकति अंशुमान बलिलेन शुन महामति * केमने हवे मोर वंशेर मन्गनि ब्राह्मणेर कोपे नाहि थाके एक तिल * प्रसन्न हझ्या तारे कहेन कपिल १ दिग्गज । २ दिनज, हावी। पृथ्वी ।

६० कृत्तिवास रामायण जो शुचि गंग वहै भुवि लोका * लहैं पितर-तव सद्गति-लोका' कहँ उद्गम, कहँ वसत सो, मिलै दरस किमि गंग ? विनय मानि वरनेउ कपिल, सुरसरि-जनम प्रसंग ॥२६॥ गगा का जन्म और मर्त्यलोक में मगर का गंगा के लाने का उपाय-कथन तथा भगीरथ का जन्म परमधाम त्रिभुवनपति रूपा * सुर मुनि सहित विराज अनूपा श्रमियमूरि श्री आनंदकन्दा * निरखत शिव-हिय उदित अनन्दा ताण्डव नर्त ताल विधि नाना * आनन पॉच, सकल हरिगाना डमरू डिमि-डिमि जीव जगावै * सिंगी पुनि हरि-नेह लगावै अनुपम भाव-तल्लीना * मुदित सकल मुनि-देवन कीना लक्ष्मी सहित द्रवितर नारायण * सरसित द्रा लखि भक्तिपरायण ।। सरसि प्रेम-द्रव सोइ प्रभु अंगा * प्रगटीं पतितपावनी गंगा नीर कमण्डल भरि सोइ पावन * आदर सहित धरेउ चतुरानन गहा मर्त्यलोके यदि वहे प्रवाह गङ्गार * तवे से तोमार वंश हइवे उद्धार विनयेते अंशुमान कहे तॉर प्रति * कोथाय जन्मिल गङ्गा कोथाय वसति कोथा गेले पाइन से गङ्गा दरशन * कह मुनि शुनि सेइ गङ्गार जनम गङ्गार जन्मेर कथा करेन प्रकाश * आदिकाण्ड रचिल पण्डित कृत्तिवास गङ्गार जन्म विवरण ओ मर्त्यलोके सगरेर आनयनेर उपाय-कथन एव भगीरथेर जन्म एक दिन गोलोके वसिया नारायण * चतुर्दिके आर यत देव-ऋषिगण सभा माझे त्रिलोचन गान पञ्चमुखे * देवऋपि स्वर्गवासी पुलकित देखे शिङ्गा बले श्रीराम डम्बुरे बले हरि * पञ्चमुखे स्तुतिगान देव त्रिपुरारि लक्ष्मी सह वसिया आछेन महाशय * शुनिया से गान हइलेन द्रवमय द्रवमय हइलेन निजे नारायण * पतितपावनी गङ्गा ताहाते जनम सेइ जल कमण्डले भरिया श्रादरे * राखिलेन तुलिया विधाता निजघरे १ मोक्षप्राप्त लोगो का लोक । २ प्रेम मे पिघलना।

अवध आदि काण्ड ६१ सलिल पुनीत धरनि सोइ अावै * सगरवंश सद्गति तब पावै सुत तव-पितर बनावन करनी * मम-वर', सुरसरि प्रगटें धरनी ।। अंशुमान ले तुरग सिधाये * दुखित अवध भूपति ढिग आये । साठि सहस सुनि सहज विनासा * धरत न धीर सगर अति त्रासा जन्मत विपुल वंस, भय पाई * दीन विनास-शाप सुरराई सोइ चरितार्थ, यज्ञ भइ भंगा * अब किमि अवनि अवतरन गंगा । सुरसरि विन न त सुत-लोका * करै विलाप भूप अति शोका 1 अंशुमान करि राज समर्पन * चले सगर मन्दाकिनि आनन सकल जतन-जप-तप विफल, दरस न सुरसरि दीन । शोकाकुल नित गलत तन, स्वर्ग गमन नृप कीन ॥३०॥ अशुमान इत नरेसू * सुत 'दिलीप' करि अर्पन देसू सद्गति पितर लह सोइ कारन * सुरसरि हेत कीन तप धारन सहस वर्ष दम, चिन आहारा * सफल न तप, नृप स्वर्ग सिधारा सेइ गङ्गा यदि पार आनिते भूपति * तवे से सगर-वंश पाडवे सद्गति अंशुमान तोमारे दिलाम एड् वर * तब वंश हेतु गङ्गा हवेन गोचर घोड़ा लैया अंशुमान अयोध्यातेयाय * विवरण बले पासि सगरेर पाय कपिलेर स्थाने पाइलाम अश्वधने * तॉर कोपाग्निते भस्म हैल सर्वजने शुनिया सगर राजा शोकाकुल मन * पुत्रशोके निरवधि करेन क्रन्दन पाटि हाजार पुत्रे शाप दिलेन विशाइ * अल्पकाले मरिल ना हइल चिराइ । अशुचि हइल यज्ञ ना हइल साय * कि मते पावेन मुक्ति भावेन उपाय स्वर्गते पाछेन गङ्गा करि कि प्रकार * ताहा विना किसे हवे शेर उद्धार अंशुमाने राज्य राजा करि समर्पण * गङ्गारे आनिते राजा करिल गमन गङ्गा ना पाइया राजा नित्य बाड़े शोक* मरिया मगर राजा गेल ब्रह्मलोक अंशुमान राज्य करे अयोध्यानगरे * तॉर पुत्र हहल दिलीप नाम धरे । पुत्रे राज्य दिया गेल गङ्गा आनिवारे * तप करे दश हाजार वर्प अनाहारे १ मेरे वरदान से।

वस-श्रधारा पठात्रा २ ६२ कृत्तिवास रामायण युगुल रानि तजि, सतति हीना * नृप दिलीप पुनि पितुपथ' लीना जलाहार कहुँ निर्जल घोरा * तप विरञ्चि कर कीन कठोरा अयुत वर्ष सुरसरि नहिं आना * ब्रह्मलोक नृप कीन कीन पयाना निरखि भानुकुल वंस-विहीना * इन्द्रादिक मिलि चिन्तन कीना सुनी अवध प्रभु कर अवतारा * सो किमि इतै न देवन सोचि जतन मन लावा * गौरीपति कहें अवध विधवा युगुल वसति जहॅ रानी * वृपभ-अरूढ शंभु वरदानी 'पुत्रवती भव कोउ एक नारो' * अलख जगाय कहत त्रिपुरारी जीवन विधुर चकित दोउ भामा * किमि अमीप, सुत होय ललामा ? रति-रत होहिं परस्पर रानी * जन्मै सुत न असत मम वानी गमन शंभु इत नारि-दिलीपा * प्रायसु धरि नित रहहिं समीपा युगुल रहैं दम्पति सम तरुणी * लहेउ काल ऋतु तिन एक रमणी गङ्गा ना पाइया गेल स्वर्गेर उपर * ताहारे देखिया तुष्ट देव पुरन्दर अपुत्रक राजा दु.ख भावेन अन्तरे * दुइ नारि थुये गेल अयोध्यानगरे चलिल दिलीप राजा गङ्गा आनिवारे * कठोर तपस्या करे थाकि अनाहारे कमु जलाहार करे का अनाहार * अयुत वत्सर सेवा करिल ब्रह्मार तथापि ना पाय गङ्गा ना हय अशोक * मरिल दिलीप राजा गेल ब्रह्मलोक अराजक हैल राज्य अयोध्यानगर * स्वर्गेते चिन्तित ब्रह्मा श्रार पुरन्दर शुनियाछि जन्मिवेन विष्णु सूर्यकुले * केराने वाडिचे वंश निर्मूल हइले भाविया सकल देव युक्ति करि मने * अयोध्याय पाठाइल प्रभु त्रिलोचने दिलीपेर दुइ जाया आछिलेन वासे * वृप प्रारोहणे शिव गेलेन सकाशे । कहिलेन दोहाकार प्रति त्रिपुरारि * मम वरे पुत्रवती हवे एक नारी दुइ नारी कहे शुनि शिवेर वचन * आमरा विधवा किसे हइवे नन्दन शङ्कर वलेन दुइजने कर रति * मम वरे एकेर हइवे सुसन्तति एइ वर दिया गेल देव त्रिपुरारि * स्नान करि गेल दुइ दिलीपेर नारी सम्प्रीतिते आछिलेन से दुइ युवती * कत दिने एकजन हैल ऋतुमती २ पिता-पितामह के अनुसार ही गगा हेत तप को गये । १ नन्दी पर सवार । 4 सुत परई आदि काण्ड ६३ शंभु प्रसाद गर्भ धरि रानी * गत दस मास प्रसव नियरानी मांसपिण्ड कौतुक जनम, अस्थिहीन असमर्थ । लोक हॅमी, रानी दुखित, शिव दिय सतति व्यर्थ ॥३१॥ चली अंक-शिशु सरयू तीरा * तजहिं पंगु विन-अस्थि सरीरा सोइ छन मुनि बशिष्ठ धरि ध्याना * कौतुक सकल तपोधन जाना आयलु पय सोवाय सुत देह * पथिक-दया तजि तजि गमनहु गेहू अष्टावक्र, हेतु स्नाना * व्यथित-अग तेहि पंथ पयाना पंगु अचश्वल खुवन-सरोरा * लखि अस मन सोचत मुनि धीरा । मम तन विपम, नकल यदि करई * विनस, ब्रह्मकोप जो वस्तुतः लुञ्ज, मम दाया * मदनमुग्ध छवि पावै काया दोहाते जानिल यदि दोहार सन्दर्भ * दोहे केलि करिते एकेर हैल गर्म । । दश माम हैल गर्भ प्रसव समय * मांसपिण्ड मात्र पुत्र हइल उदय पुत्र कोले करिया कॉदेन दुइजन * हेन पुत्र बर केन दिल त्रिलोचन अस्थि नाइ मांसपिण्ड चलिो ना पारे * देखिया हासिवे लोक सकल संसारे कोले करि निल ताहा चूपडि भितरे * सरयर तोरे गेल फेलिवार तरे हेन काले देखिलेन वशिष्ठ तपोधन * ध्यानेते जानिल तार सकल लक्षन । मुनि बले थुये जानो पथे शोयाइया * करुणा करिवे केह अातुर देखिया पुत्रे पथे शोयाइया दोहे गेल वासे * स्नान करिबारे अष्टावक्र मुनि श्रासे आट ठॉइ वाका मुनि गमने कातर * बालक तेमन करे पथेर उपर एक दृष्टे अष्टावक्र तार पाने चाय * मनेभावे आमारे ए देखियाडचाय आमारे देखिया यदि करे उपहास * मम ब्रह्मशाये हवे शरीर विनाश यदि तव देह हय स्वभावे एमन * मम बरे हो तुमि मदनमोहन १ शभुप्रनाद मे रानी के गभ ने अम्विहीन लुण्ड-मुण्ड मामपिण्ड का प्रार दा नाग हर्प लुप्त हो गया और निरागा तथा गोरु परिहान को जागका में दुम्पिन हो उठी। २ मार्ग में छोड दिये गये मानपिन को दूर ले जाने हुए अप्टापा गुी ने सकर कल्पना को पि. यदि वह को प्राणी मेरे विकृत बागेर की नान या हमी उसासा है तो नष्ट हो जाय जी पदि सचमुच अनमयं है तो कामदेव ये ममान रविमयी काया पो प्राप्त हो।

अष्टावक्र सुनत टेरि ६४ कृत्तिवास रामायण विष्णु सम समरथ * जिन वर-शाप न होय अकारथ चमत्कार-मुनि, रविकुलनन्दन * चपल सतेज लगेउ मग धावन रानी दोउ आई * तनय-सरूप निरखि हरपाई आशिष देयं देव, मुनि, समरथ * सुचन-दिलीप नाम भागीरथ भगीरथ द्वारा मत्यलोक में गगा का लाना पचयें वर्ष भगीरथ नन्दन * गुरु वशिठ गृह विद्यारंभन कुअर संग बालकन विवादा * 'जारज'' कहि इक शिशु प्रतिवादा दुखित भगीरथ, उतर न आवा * मन गलानि लोचन जल छावा तजि चटमार' कोपगृह शयना * मौन कुमार न निकपत बयना । प्रहर द्वितीय दिवस चढ़ि आवा * आकुल जननि न सुत गृह आवा || सिंह वन्य पशु घात कहुँ, विलपैं मुनि सन मात । मुनि प्रबोध, किय गमन दोउ, लखेउ कोपगृह तात ॥३२॥ अष्टावक्र मुनि सेइ विष्णुर समान * यारे वर शाप देन कभु नहे आन अष्टावक्र मुनिर महिमा चमत्कार * दॉडाइ या उठिल से राजार कुमार ध्याने जानिलेन अष्टावक्र तपोधन * धन्य महापुरुष ए दिलीप नन्दन उभय राणी के डाकि आने मुनिवर * पुत्र लये हरपित दोहे गेल घर आसिया सकल मुनि करिल कल्याण * भगे-भगे जन्म हेतु भगीरथ नाम महाकवि कृत्तिवास पण्डित परम * आदिकाण्ड गान भगीरथेर जनम भगीरथ कत्त कमायें गगा-आनयन पॉच वत्सरेर हैल हाते खड़ि दिल * वशिष्ठेर बाड़ि पडिबारे पाठाइल बालके-बालके द्वन्द्व यखन वाडिल * जारज बलिया गालि एक शिशु दिल मने भगीरथ दुःखी ना दिल उत्तर * विषादे आइल शिशु अापनार घर सर्वदा अस्थिर हय सजल नयन * शयन मन्दिरे शिशु करिल शयन आकाशे हइल वेला द्वितीय प्रहर * माता बले पुत्र केन ना आइल घर शावक हाराये येन फुकारे बाघिनी * मुनि काछे कान्दि कय दिलीप कामिनी वशिष्ठ बलेन माता ना कर क्रन्दन * रोपेर मन्दिरे पुत्रे पावे दरशन १ उपपति से उत्पन्न बालक । २ पाठशाला। -- के दीना अति पुलक आदि काण्ड चूमि माथ अञ्चल मुख पोछत * भरि मुग्रंक ममता सों बोलत कहु केहि धनपति करौ भिखारी * बन्दिमुक्ति, रोग दुखारी तौ शत वैद्य करें उपचारा * गरभरि कह मृदु वचन कुमारा कछु अभिलाप न रोग सरोरा * लाञ्छन लगत, मातु मोहिं पीरा आश्रम कछु बालकन विवादा * कहि 'जारज' मोहिं शिशु प्रतिवादा केहि कुल जनम, नाम पितु कहहु * वरनि, जननि मम संसय हरह सुनि सुत-विथा रानि अति कातर * कथा सत्य सुनु वंस उजागर साठि सहस सुत सगर अधीसा * नसे कोप परि कपिल मुनीसा तजि मुरपुर, छिति गंग पधारहिं * तौ तब पितर सगरमुत तारहिं प्रवर' तोनि तब किय आराधन * सके न करि मुरसरि अावाहन तब पितु गमन स्वर्ग सुतहीना * नृप-वनितन महेश वर युगुल रानि कृत दंपति जीवन * यहि विधि जनम भगीरथ नन्दन सुत भानुवंश उजियारा * सुनि दिलीप-कुमारा आसि राणी भगीरथे कोले करि निल * निजेर प्रॉचले तार मुस मुछाइल वलिते लागिल भगीरथेर जननी * कोन दुःखे दुःखो तुमि कह यादुमणि कारे वाडाइब कारे करिव काङ्गाल * वन्दी मुक्ति करि यदि थाके बन्दीशाल कोन रोगेरोगी तुमि अमित नाजानि * एइक्षणे करि सुस्थ शत वैद्य श्रानि । भगीरथ बले माता कर अवधान * रोग दुःख नहे आजि पाइ अपमान विरोध बाधिल एक बालकेर सने * जारज वलिया गालि दिल से ब्राह्मणे कोन वंशजात आमि काहार नन्दन * इहार वृत्तान्त कथा कह विवरण पुत्रेर हइले दुःख माये लागे व्यथा * पुत्रे सम्बोधिया मातः कह सत्य कथा सगरेर छिल पाटि हाजार तनय * कपिल मुनिर शापे हल भस्ममय । गङ्गा स्वर्ग हैते यदि आइलेनक्षिति * तवे से सगरवंश पाइवे निप्कृति क्रमे तिन पुरुष करिल अाराधना * तत्रु गङ्गा ग्रानिते नारिल कोन जना दिलीप तोमार पिता गेल स्वर्गपुरे * पाइलाम तोमा पुत्र महेशेर बरे भगे-भगे जन्म हेतु भगीरथ नाम * सूर्यवंशे जन्म तव अयोध्याय धाम १ पूर्वज ।

. ६ कृत्तिवास रामायण . पितर सहस सुर-सलिला किमि सहज प्रयत्ना * सुलभ न विना भगीरथ-यत्ना' जप-तप-जोग पितरगन हेता * लौटौं महि, जाह्नवी समेता सुनि हठ-तनय विकल दोउ माता * हटकहिं, यहि छन जाहु न ताता सुनेउ न, मातन बंदि सुत, गमनेउ मुदित उमंग । गुरु वशिष्ठ लै दीच्छा, फरके दच्छिन अंग ॥३३॥ अनाहार पुनि हेतु-पुरंदर * सहस सात जपि वर्ष निरंतर सदा मंत्रवस सुरगन रीती'* प्रगटि इन्द्र कह वचन सप्रीती को पितु धन्य, कौन कुलकेतू ? * मांगु मांगु वाञ्छित हिय हेतू तनय-दिलीप भानु-कुल-नन्दन * वन्दहुँ सुरगनपति जगवन्दन सठ सगर-कुमारा * कपिल-शाप विनसे जरि छारा मंदाकिनि जो प्रभु सों पावौं * तिन सद्गति सुरपुरहिं पठायौं शुनिया मायेर कथा भगीरथ हासे * हासिया कहिल कथा जननीर पाशे सूर्यवंशे भूपतिरा निर्बोधेर प्राय * अल्प श्रमे गङ्गा देवी के कोथाय पाय यदि आमि धरि भगीरथ अभिधान * गङ्गा आनि करिव सगर वंश त्राण कॉदिया कहिछे भगीरथेर जननी * तपस्याय एक्षणे ना याह वंशमणि मायेर वचने भगीरथ ना रहिल * वशिष्ठेर स्थाने मन्त्रदीक्षा से करिल । यात्राकाले करे राजा मायेर स्मरण * दक्षिण लोचन तार करिछे स्पन्दन मायेर चरणे आसि करिल प्रणति * प्रथमे सेविते गेल देव सुरपति इन्द्रमन्त्र अनाहारे जपे निरन्तर * इन्द्रसेवा करे सात हाजार वत्सर मन्त्रवश देवता रहिते नारे घर * वासव एलेन तया दिते तारे वर कोन वंशे जन्म तव काहार तनय * वर मागि लह या अभीष्ट तव हय करिया प्रणाम इन्द्र बलिल वचन * सूर्यवशे जात आमि दिलीप-नन्दन सगरेर छिल पाटि सहस्र पाटि सहस्र तनय * कपिल मुनिर शापे हैल भस्ममय आछेन स्वर्गेते गङ्गा देव सुरपति * ताहे मम वंशेर ये हइवे सद्गति इन्द्र बले वलि शुन दिलीपकुमार * आमा हैते दरशन ना पावे गङ्गार १ अकथ और अथक परिश्रम । २ इन्द्र के लिये । नव- पूजहु लोचन भाव आदि काण्ड ६७ गुनहु सुवन, कह सहमविलोचन * गंग हेतु जो कछु विघन परै तत्र काजा * मिटिहैं मम सहॉय युवराजा ! इन्द्र प्रनम्य, चलेट कैलासा * तप अनन्य किय शंभु-निवामा आफ' धतूर विल्वदल' चन्दन * अनाहार कहुँ अजल शिवार्चन अडिग सहम दम वर्ष कठोरा * कह पशुपति ते सफल किशोरा अनन्य गदाधर रूपा * परम तत्व सेवहु सुतभूपा मम घर सफल साधना तोरी * सुरमरि मिले अमिय मय मूरी चलेउ बन्दि शिव, जहें श्रीकन्ता * जपत निरंतर तहें भगवन्ता शिशिर शरीर सलिल' विच थाप * ग्रीपम रुद्र पञ्चगिन तापै।। यहि विधि विगत वर्ष चालीसा * भक्त-विवम प्रगटे जगदीसा निष्ठा, भक्ति, अनन्य तप, जतन-भगीरथ, तात । सफल, मॉगु बरु वाञ्छित, बोले करुनानाथ ॥३४॥ सहस साठि जे सगर-कुमारा * ते मम पितर कपिल किय छारा आनिवेक गङ्गा यदि आमि देइ नर * एक भावे पूज गिया देव महेश्वर गङ्गार आनिते पथे विघ्न यदि घटे * ग्रामि ता करिव मुक्त कहि अकपटे इन्द्रर चरणे राजा करिल प्रणति * कैलासे सेविते गेल देव पशुपति । ओकड़ा धुतूरा ये प्राकन्द विल्लपात * इहातेइ तुष्ट हन त्रिदेवेर नाथ कमु अनाहारे कमु निराहार करे* हद तप करे दश हाजार बन्मरे महेश बलेन शुन राजार नन्दन * अनाहारे ए तपस्या कर फि कारण गङ्गारे आनिवे तुमि ग्रामि दिव वर * एक भावे सेव गिया देव गदाधर शिवर चरणे पुनः करिया प्रणति * गोलोके चलिया गेल यथा लक्ष्मीपति भगीरथ प्रतिदिन कोटी मन्त्र जपे * तप करे ग्रीप्मकाले रौद्रर उत्तापे शीत चारि मास थाके जलेर भितर * ए मते करिल तप चल्लिश वत्सर मन्त्रवश देवता रहित नारं घर * आसिया कहेन हरि तारे निते वर तपस्या तोमार मोर लागे चमत्कार* माग इष्ट वर दिव राजार कुमार भगीरथ बले प्रभु करि निवेदन * सगरेर छिल पाटि हाजार नन्दन १ मदार । २बेलपन। घोरटे में। ४ जना ६८ कृत्तिवास रामायण हे प्रभु ! मुक्तिदान तिन दीजै * सुलभ गगनवाहिनि' मोहिं कीजै प्रभु हँसि कहेउ जो गंग •पुनीता * ज्ञान न-मोहिं, सो अगम अतीता होहुँ विफल जो कृपानिधाना * पदपंकज तव ' त्यागहुँ प्राना कह हरि, सुरसरि हित तजि सोकू * चलौ संग मम सुत विधिलोकू 5) सदन-विरश्चि वारि रह जेता * हरन कियेउ सो कृपानिकेता प्रभुहि दरसि विधि सविनय अासन * दै पुनि चहेउ नीर पद परसन लखि निकेत-वासन जलहीना * सञ्चित गंग-कमण्डल लीना हरिपद परसेउ करि आवाहन * कह 'अंहिजा' गंग सोइ कारन कहेउ विष्णु विष्णु गमनौ लै संगा * सुत सोइ पतितपावनी गंगा गो-द्विज-घात अधम जे पापा * कुस विनसत संतापा अकथ पुन्य सुरसरि स्नाना * पितर मुक्ति-हित मुक्ति-हित करौ पयाना गमनौ छिति, हे धवल-तरंगा ! * तारौ वेगि सगर नृप-अंगा परसत ܚܚܚ कपिलेर शापेते हइल भस्ममय * पाइले गङ्गारे तारा मुक्त तवे हय ।। कहिलेन सहास्य वदने चक्रपाणि * गङ्गार महिमा वापू आमि किवा जानि भगीरथ चले गङ्गा नाहि दिवे दान * तव पादपद्मते त्यजिब श्रामि प्राण शुनिया ताहारे हरि करेन आश्वास * ब्रह्मलोके आछे गङ्गा चल तॉर पाश छिल ब्रह्मलोकेते सामान्य यत जल * माया करि हरिलेक हरि से सकल ब्रह्मार सदने प्रभु दिल दरशन * सम्भ्रमे उठिया ब्रह्मा दिलेन आसन पाद्य दिते यान ब्रह्मा घरे नाहि जल * जलहीन पात्र मात्र आछे अविकल कमण्डलु मध्ये गङ्गा पडे तॉर मने * आस्तेपास्ते गिया ब्रह्माानेन यतने गङ्गाजले विष्णुपद करेन स्खालन * अंहिजा बलिया नाम एइ से कारण भगीरथ राजारे वलेन चिन्तामणि * लये जाह एइ गङ्गा पतितपावनी ब्रह्महत्या गोहत्या प्रभृति पाप करे * कुशाग्रे यदि परशे सब पाप तरे कतेक स्नानेते पुण्य वलिते ना पारि * वंशेर उद्धार कर लैया गङ्गावारि । श्रीहरि बलेन गङ्गा करह प्रस्थान * अविलस्वे मुक्त कर सगर-सन्तान १ गगा । २ ब्रह्मलोक । ३ घर के बरतन । ४ वश, पुत्र ।

पापी अधम आदि काण्ड ६० मंदाकिनि प्रायसु धरि सीसा * कछु मम विनय सुनौ जगदीसा वसत बहु धरनी * अपै मोहिं मलिन निज करनी लहै मुक्ति सुरपुर मम संगति * कही उपाय नाथ ! मम सद्गति सुकृत-रूप वैष्णव अखिल, जिन विच रमौ अनन्य । दरस-परस-स्नान तिन, करै देवि तोहिँ धन्य ॥३॥ 2 गंग बोध दै वोध दै केकी-पंखा' * दीन भगीरथ अनुपम शंखा जेहि पथ शंखनाद सुत करई * सोइ मारग सलिला अनुसरई कह विरश्चि हे पुण्य कुमारा * तब त्रैलोक्य उबारा मम रथ बैंठि समर्थ भगीरथ * मारग चलहु वीरथ शंखनाद, स्यन्दन जस बढ़ई * तब अनुगमन गंग तस करई 1 मंदाकिनि सुरलोक प्रवाहू * अमरपुरी जन अमित उछाहू करि स्नान भानु-कुल-अंसहि' * अछत दुर्वा-दल ले पूजहिँ स्वर्गलोक सब मुरसरि नामा * मंदाकिनि कहि करहिं प्रनामा प्रयास बनावत कहिलेन एत यदि प्रभु जगन्नाथ * काँदिया वलेन गङ्गा प्रभुर साक्षात् पृथिवीते कत शत पाछे पापीगण * आसिया प्रामाते पाप करिवे अर्पण ताहारा हइया मुक्त याइवे स्वर्गेते * मुक्त हव ग्रामि प्रभु काहार स्पर्शेते श्रीहरि बलेन यत वैष्णव अखिले * ताहारा करिवे स्नान तोमार मलिले । करि ग्रामि वैष्णवेर संगति वासाना * वैष्णवेर संगे तुमि हवे पूतमना कहिया गंगाके एड वाक्य जगतपति * शह दिया बलिलेन भगीरथ प्रति याह तुमि आगे आगे शह वाजाडया * यावेन पश्चाते गंगा तोमारे देखिया विरिञ्चि बलेन राजा तुमि पुण्यवान * तोमा हैते तिनलोक पावे परित्राण ग्रामार ए रथ तुमि लह भगीरथ * चड़िया बागेते तुमि याह एइ रथ रव चड़ि यान आगे शह बाजाइया * चलिलेन गंगा तार पाछु गोसाइया स्वर्गवामी श्रामि करे गंगाजले स्नान * भगीरथेर माथाय देय दाधान श्रादिकाण्ड कृत्तिवास करिल वाखान * स्वर्गत गंगार दल मन्दाकिनी नाम १ मपूर पपपारी भगवान । २ गगा । ३ भानुकुल में उत्पन्न नगोत्य । ४ व्धन ।

७० मूल गिरि शृंगा तात कृत्तिवास रामायण ऐरावत का अहकार चूर्ण और चार धाराओ मे गगा का मृत्युलोक में आगमन तजि विधिलोक भगीरथ संगा * पहुँची सैल-मेरु ढिग गंगा योजन साठि सहस्र उतंगा * सहस वतीस सुमन धतूर सरिस तेहि रूपा * ता विच गह्वर गहन अनूपा द्वादश वर्ष भूमण तह कीन्हा * गह्वर-पथ सुरसरि नहिं चीन्हा स्तुति करत जोरि जुग पानी * विलमति कितै गंग महरानी तव विन बंस न मोर उधारा * अनुनय करत दिलीप-कुमारा सुमेरु पंथ अवरोधा * सफल करौं किमि तव अनुरोधा ऐरावत मतंग जो आवै * दन्त चीरि गिरि पंथ वनावै को सोइ निकास मम होय प्रवाहा * चले भगीरथ सुरनाहा ब्रह्मलोक सों अवतरी, करि पुनीत सुरधाम । जिमि सुमेरु गह्वर रुकी, धारा गंग ललाम ॥३६॥ गाथा सकल इन्द्र सन बरनी * केहि विधि प्रगति करै जगतरनी ऐरावत पठवौ संगा * पर्वत फोरि देय गंगा एरावतेर अहङ्कार चूर्ण ओ चारि धाराय गङ्गार मत्र्ये आगमन ब्रह्मलोके ह'ते गंगा आने भगीरथ * ानिया मिलेन गंगा सुमेरु पर्वत सुमेरुर चूड़ा पाटि सहस्र योजन * बत्रिश सहस्र तार गोड़ाय पत्तन एइ आदि कहिलाम एइ तार मूल * सुमेरु पर्वत येन धूतुरार फूल तार मध्ये आछे एक दारुण गह्वर * भ्रमेन ताहाते गंगा द्वादश वत्सर गंगार ना पाय देखा नाहि कोन पथ * जोडहाते स्तुति करे राजा भगीरथ सुमेरुते हइल तोमार अवतार * ना करिले गङ्गा मम वंशेर उद्धार गङ्गा बलिलेन शुन वाछा भगीरथ * याव आमि कोन दिके नाहि पाई पथ ऐरावत हस्ती यदि आनिबारे पार * तवे से पर्वत हैते पाइ ये निस्तार ऐरावत पर्वत चिरिया देय दॉते * तवे त वाहिर हइ आमि सेइ पथे गंगार चरणे राजा करिया प्रणति * आरवार गेल यथा देव सुरपति प्रणाम करिया बन्दे जोड़ करि हात * कहिते लागिल कथा इन्द्रर साक्षात् ब्रह्मलोक हइते आसिया कोन मते * पडिया आछेन गङ्गा सुमेरु पर्वते ऐरावत पर्वत चिरिया देय दॉते * तवे त बाहिर हन गङ्गा सेइ पथे मम पथ आदि काण्ड ७१ इन्द्रायमु चलि चलि अधिपमतंगा' * पहुंचेउ जहाँ हेमगिरि श्रृंगा अहंकार कुजर मन आवा* मलिन भाव तर मुतहिं जनाचा 1 मम ढिग गंग एक निमि वासा * तौ गिरि भजि मिटावौं त्रामा विकल भगीरथ सुनि गजवानी * द्रवित नैन काया कुम्हिलानी मुख न चैन; कित उदधि मतंगा' * करुनमई पूछत इमि गंगा सुरपति दया न संसय माता * तदपि गजेन्द्र मलिन जिमि वाता कही, सो घरनौं किमि, अति हीना * सुरसरि ब्झि मर्म सब लीना सुरपुर मुख उन्माद' विशेसा * दन्तीपति सन कहेउ कहेउ सँदेसा साधि लेय मम वेग तरगा * सात रैन निवसौ तेहि संगा। मोद ऐरावत लीना * दन्तप्रहार चारि ढिग कीना कनकसेल५ फुटी नाम उतर पग धारा - सुनत मोद चौधारा * भद्रा शुनिया चलिल इन्द्र चापि ऐरावते * आसिया मिलिल सेइ सुमेरु पर्वते ऐरावतेर अन्तरं हहल अहङ्कार * कहगे गङ्गा के गिया संवाद अामार गङ्गा यदि एक रात्रि वश्च मम सने * अव्याहति दिव तवे बन्धन खण्डने यखन कहिल एड् कथा ऐरावत * म्लान मुखे माथा हेट करे भगीरथ मुखे नाहि वाक्य सरे चक्षे बहे जल * दुरु दुरु हिया करे अन्तर विकल दशा देखि दयामयी जिज्ञासेन ताय * कि हेतु एमन दशा घटिल तोमाय पारिले कि ऐरावत आनिते हेथाय * कोन दुःखे कॉद बापू कहत अामाय भगीरथ कहे माता करि निवेदन * सुरमणि मनवाञ्छा करिल पूरण ऐरावत ये कहिल आमार गोचरे * पुत्र हये जननीरे बलिय कि कर गङ्गा बलिलेन तार त्रुभिलाम तत्त्व * राजभोगे ऐरावत हइयाछे मत्त यद्यपि प्राडाइ ढेउ से महिने पार * तार घरे मात रात्रि रब बल तारे भगीरथ एड् कथा कहे हस्तीवर शुनिया गङ्गार कथा आपना पासरे चारिखान करिया पर्चन चिर दॉत * चारि धारा हैल गङ्गा सुमेरु कायाने बग्नु भद्राश्वेत पार अलकानन्दाबार * पडिलेन पर्वत हुने चारि धार जति ऐरावत । २ चागे दिमागे नागरी के दिग्गजा मिगेमणि । रात्रि। ४ म्यान । ५ नुवर्णपवंत ।

७२ कृत्तिवास रामायण वसु प्रवही प्राची दिसि सागर * पच्छिम जलधि श्वेत लिय डागर वही अवनि शुचि अलकानन्दा * सुत-दिलीप' हिय अमित अनन्दा इत गज विकल प्रवाह प्रचण्डा * जल चहुँ भरेउ श्रवण मुख शुण्डा' मातु मातु कहि, धरनि गिरि, प्रान याचना कीन । दलित दर्प इमि दन्तपति, सुरपुर मारग लीन ॥३७॥ महादेव के द्वारा गंगा का वेग धारण सहित कुँअर सुरसरि तजि मेरू * चलि कैलास वास शिव केरू गिरि उतंग सों पात-प्रहारा* * डगमग धरनि सहत नहिं भारा विवस बहेउ जलवेग पताला * लखि दिलीप-सुत -सुत हाल वेहाला करहु रसातल मातु प्रवेसा * विन गति पितर सहहिं मम क्लेसा को मम वेग सकै छिति धारी * सेवहु सुत समरथ त्रिपुरारी रोपहि" शम्भु जो मम जलभारा * तव हित अवनि लेहुँ अवतारा वसु नामे गङ्गा हर पूर्बेर सागरे * भद्रा नामे सुरधुनी चलिला उत्तरे श्वेत नामे चलिलेन पश्चिम सागरे * गेलेन अलकानन्दा पृथिवी उपरे मारिलेन एक ढेउ ऐरावतोपरे * गेल जल नाक मुखे हॉसफॉस करे मारिलेन पार ढेउ प्राय गत प्राण * हस्ती बले गङ्गामाता कर परित्राण मा बलिया हस्ती यदि दॉते खड़ करे * राखिलेन आर ढेउ पर्वत उपरे ऐरावत पलाइल पाइया तरास * आदिकाण्ड रचिल पण्डित कृत्तिवास । मह देव कर्त्तक गगार वेग धारण भगीरथ सुमेरु हइते गङ्गा निया * कैलास पर्वते परे मिलिल आसिया कैलास हइते पड़े पृथिवी उपरे * वसुमती तॉर भारे टलमल करे वेगवती हये गङ्गा चले रसातले * दॉड़ाइया भगीरथ जोड़ हाते बले पातालेते हइल तोमार आगुसार * केमने हइबे मम वंशेर उद्धार । गंगा बलिलेन वापू शुनह वचन * धरित्री आमार वेग ना सबे कखन शिव यदि आसिया बहेन जलधार * तबे पारि क्षितिते हइते अवतार १ भगीरथ । २ सूंड । ३ ऊँचे । ४ घार के प्रपात की चोट । ५ रोकें । ६ पृथ्वी।

RAL . ...... आदि काण्ड ७३ कियो भगीरथ गंग प्रनामा वर्ष अराधन किय शिव धामा शिव प्रसन्न पूछत तप-हेना * वरनी विथा भानु-कुल-केता सुरमरि-धार सहति नहिं धरनी * नाथ शीशं रोपहु शीशं रोपहु जगतरनी ! मुनि शिव नाचतः पुलकित अंगा * उमा' गुनह जग प्रर्गटति गंगा, जटाजूट शिरपञ्च कराला * तह प्रवही शुचि धार मराला द्वादश वर्ष न मारग पाया केम-महेम विपुल भ्रम তাঘা कौतुक लखेड भानुकुलनन्दनं * किये यहोरि गौरीपति वन्दन शंकर जटा चीरि पथ दीन्हा * सोई' यल 'हरद्वार जग चीन्हा जह स्नान दान जन करहीं * पुन्य अमित विधि बरनि न सकहीं विलग धार एक बही पताला'* भोगवंती तेहि नाम विशाला संग भगीरथ पुनि चली, वही त्रिवेनी तीर । गंगा-यमुना-सरस्वति, मंगम 'जहँ शुचि नीर ॥३८॥ गंगार चरणे पुनः करिया प्रणति * आचार गेल यथा देव पशुपति एक वर्ष करिल शिवेर अाराधन * बलेन महेश पुनः एले कि कारण भगीरथ बले गंगा दिल नारायण * पृथिवी धरिते वेग ना पारे कखन तुमि यदि पासि शिरे धर जलधार * पृथिवीते हय तवे गंगा अवतार गौरीर सहित तवे नाचे त्रिलोचन * तोमा हैते पात्र आजि गंगा दरशन ! पातिलेन पञ्चानन पञ्चशिर मुखे * पतित पावनी गंगा पड़ेन कौतुके । शिवेर माथाय जटा बड भयङ्कर * बेड़ान जटार मध्ये द्वादश वत्सर भगीरथ बलेन मा ए कि व्यवहार * प्रामार केमने हवे वंशर उद्धार गगा बलिलेन बापू शुन भगीरथ * जटा हैते बाहिर हइते नाहि पय भोलानाथ बलिया डाऊन जोड़ हाते * ध्यान भङ्ग हया चाहेन विश्वनाथ महेश चिरिया जटा दिलेन गङ्गार * सेड़ साने तीर्थ ये हइल हरिद्वार येइ नर स्नान दान करे हरिद्वारे * तार पुण्य नीमा ब्रह्मा कहिने ना पार एक धारा गेल गङ्गा पाताल मण्डले * मोगवती वले नाम हल रसानले पश्चाते चलेन गङ्गा भगीरथ आगे पासि गङ्गा मिलिलन निवगीर भागे बहिल यमुना गंगा पार सरस्वती * नामेने त्रिवेणी तिन धारा युगगति ।

७४ कृत्तिवास रामायण प्रयाग तीरथराज सुहावन * मकर-नहान स्वर्ग-पथ पाचन शंख घोष रविकुल-सुत आगे * वारानसी भाग पुनि जागे काशी-थल जहॅ शुचि सुरधारा * महिमा चित दै सुनहु अपारा एक दिवस द्विज वधेउ त्रिलोचन * पातक तासु लखात न मोचन गौरि गनेश पडानन चिंता * किमि अघ-मुक्त होय भगवन्ता ब्रह्मघात किमि उतरइ माथा * उमा कही शिव सन, हे नाथा ! विहसि कहेउ शिव, लखु मन्दाकिनि * वसति अवनि जो पाप-विनाशिनि उमापति वृष असवारी * सुरसरि टिग सॅवारी कुस परसत सो विनसेउ पापा * कहत शंभु लखु गंग प्रतापा पञ्चकोस सीमित करि धामा * वारानसी छेत्र सरनामा ज] तन तजे लहै शिवलोका * मिटै सकल भव दारुन सोका दिवस एक तहँ विलमि विरामा * सुरसरि सहित कुंअर तजि धामा शखयोप; पुनि पय गहि लोना * सोइ सुरधनी, अनुगमन कीना उमा, यात्रा प्रयागे मकरे येइ नर स्नान करे * मुक्त ह'ये सर्चपापे याय स्वर्गपुरे भगीरथ आगे याय शङ्ख बाजाइया * वाराणसी पुरे गंगा उत्तरिल गिया मन दिया शुन वाराणसीर आख्यान * वाराणसी तीर्थ याहे हइल निर्माण काटिलेन एक काले हर द्विज माथा * ब्रह्महत्या पाप तार ना हय अन्यथा चापिलेक ब्रह्महत्या गिरिशेर काँधे * कार्तिक गणेश आर कात्यायनी कॉदे गौरी कन केन वा काटिले विप्रमाथा * ब्रह्मवध हइले के करिबे अन्यथा गौरीर शुनिया कथा शिवहासि भावे * पृथिवीत गेल गंगा कत पाप नाशे वृषमे चापिया तवे शङ्करो शङ्कर * दॉड़ाइल सुरधनी तीरेते सत्वर । कुशाग्रे करिया हर कैल परशन * ब्रह्महत्या पाप तॉर हैल विमोचन वलेन धूर्जटी देख परीक्षा गंगार * पञ्च क्रोश युडि हर देन गण्डी तार सेइ पञ्चक्रोश तीर्थ नाम वाराणसी * ताहाते छाडिले तनु शिवलोके वसि एक रात्रि गंगा तथा करिअवस्थान * करिलेन भगीरथ सहित प्रस्थान भगीरथ आगे यान शङ्ख बाजाझ्या * जह्न र निकटे गिया मिलिल प्रासिया ७५ आदि काण्ड पनकुटी विच-पंथ मुहाई * जहँ तप करत जह्न मुनिराई भइ जलमगन कुटी, मुनि ध्याना * भयेउ भंग किय सुरमरि पाना तब लो दीठि भगीरथ डारी * लुप्त गंग, जनि को निहारी वट तर जलु मुनीस लखि. पूछी अवध नरेम । कम कौतुक ? मंसय अतिव, मेटह मोर कलेम ॥३६॥ उचित न केह विधि गंग-अचार * नागेउ मम आश्रम निज धारा सुरसरि पान कीन मोइ कारन * लावहु टेरि विधातहिं राजन् !' सुनत महीप व्याप अति वासा * दोउ कर विनय करत मुनि पासा काण्डार मुन का कुण्ठ गमन तुम विधि, विष्णु, तुमहिं त्रैलोचन * तब महिमा-गुन जानत को जन सगर-तनय जे साठि हजारा * कपिल-अनल विनसे जरि छारा उदरमुक्त मुनि सुरमरि करहीं * पितर मोर तो सद्गति लहहीं पाता लता कृत जब मुनिर कुटीर * गंगास्रोते भेसे याय प्लावि दुइ तीर चक्षुमेलिलेक मुनि भागिलेक ध्यान * गण्डुप करिया मब जल कर पान कत दूरे गिया भगीरथ फिरे चाय * कोथा गेल गङ्गादेवी देखिने ना पाय अकस्मात् गङ्गादेवी गेल कोन खाने * देखे मुनि नटतले चलियाई ध्याने जलुरे जिज्ञासे भगीरथ जोड़ हात * गङ्गा मोर केवा निल पथे अकस्माद । वलिलेन मुनि शुन राजा भगीरथ * यानिते गङ्गार तर नाहि छिल पथ मम घर भाग गङ्गा केमन आचार * गिया कह भगीरथ निकटे ब्रह्मार आनगिया देसि ब्रह्मा मम किवाकर * गण्डुप करिया गगा रेखेछि उदरे मुनिर वचन शुनि लागिल तरास * ग्रादिकाएड गाइल पण्डित कृत्तिवास काण्डार मुनिर पुण्ठे गमन जोड़ हाते भगीरथ करेन स्तवन * तुमि ब्रह्मा तुमि विष्णु तुमि त्रिलोचन तोमार महिमा गुण जाने कोनजन * मनुष्य शरीरे तब कि जानि स्तवन मगर राजार पाटि हाजार तनय * कपिलेर शापेते हल भम्ममय तोमार उदरेते गङ्गार अवतार * पामार वंशेर किने हइवे उद्धार १किसी भी जगट । २ आय व्यहा। पाचन।

लै, यमदूत 1 ७६ कृत्तिवास रामायण ब्रह्मकोप नहिं थिर अतिकाला. * मुदित जह, कह- सुनु महिपाला पुनि मुख निसरि गंगजल आवै * तो उच्छिष्ट !. निरादर-- पावै दच्छिन जानु चीरि मुनि ज्ञानी * प्रगट कीन इमि सुरसरि रानी नाम जाह्नवी, . भगवति, लोका * लहत. हरहिं भव-तन-मन सोका मुनि काण्डार शापयश जाना * नहिं, त्रिभुवन त्रिभुवन पातकी समाना बसत पापरत गनिका धामा * मोह-काम कर फन्द ललामा कानन काठ लेन सो गयऊ * तह मुनि-प्रान व्याघ्र हरि लयऊ चले यमलोका * मांसपिण्ड केहरि अवलोकार अस्थि अरण्य शेष जहॅ डारी * तहाँ उतर दिसि गंग पधारी पुन्य सलिल वन कियो प्रकासा * उड़ेउ अस्थि लै काक अकासा ।। निरखि चील्ह एक लोभवस, अभिरी वायस संग । अस्थि हेत सुरसरि उपर, जूझत दुहू विहंग ॥४०॥ तजी अस्थि वायस भय पाई * दैव-योग सुरधनी" समाई ब्राह्मणेर कोप नाहि थाकये कखन * कृपाते चलेन तारे जह्न तपोधन मुख हइते वाहिर करिले गङ्गाजल * उच्छिष्ट बलिया तवे घुषिवे सकल चिरिल दक्षिण जानु सेइ क्षणे मुनि * जानु दिया वाहिर हइल सुरधनी छि लेन किञ्चित् काल जल र उदरे * जाह्नवी बलिया ख्यात हइल ससारे ॥ गंगामाता शुनि शापभ्रष्ट सेइ खाने * उत्तर वाहिनी हैया यान सेइ खाने काण्डार नामेते मुनि छिल एक जन * तार तुल्य पापी नाइ ए तिन भुवन जन्मावधि सेइ मुनि वेश्या सेना करे * तार वशीभूता हैया थाके तार घरे काष्ठ काटिबारे गियाछिल से कानन * धरिया व्याघ्रते तार वधिल जीवन यमदूत आसि तारे करिया वन्धन * लइया चलिल तारे यमेर भवन व्याघ्रते सकल मास गेल त खाइया * वनेर मध्येते अस्थि रहिल पड़िया काके लइया याय गङ्गा मध्य दिया * हेन काले सञ्चान से काकेरे देखिया याय पक्षी महावेगे काके खेदाइया * गंगा दिया याय काक भये पलाइया दुइजने तारा तथा जहांजडि करे * दैवयोगे अस्थि सेइ गंगा नीरे पड़े १ सिंह । २ देखा। ३ वन । ४ कोआ । ५ गगा ।

ܝܚܚܚܚܲܕ ७७ यमराज कान्डार आदि काण्ड परसत जल काण्डार अपावन * चौभुजरूप भयेउ सो पावन गयेउ लोकं जहें हरि अभिरामा * यमकिंकर भाजे यमघामा रोय कथा चुभाई * मुनि पातकी चन्दि जिमि लाई तामु पापमय जीवन वरना * लहेड अन्त सो किमि हरि चरना दुसह लाज नहिं काज हमारा * मुनि यम चकित स्वर्ग पग धारा गहि पद पंकन विष्णु पुनीता * यम वरनी जिमि भई अनीता' पातकी अपावन * अधम विदित सो जग मनभावन पापिन पर यम चिर-अधिकारू * प्रभु छीनेउ सो किमि अविचारू पाप-पुन्य कर एकहि भोगू * तौ यम-शासन कर किन योग हॅसि हरि कही सुनहु यमराया * रहत गंग किमि पातक-छाया महिमा अकय अमित शुचि धारा * जतक' दूर ताकर विस्तारा दण्डपाणि कह, वम नहिं जाई * अधम परमि जन शुभ गति पाई कर. शवदाह अस्थि जल-शयना * चौमुन जीव लहै मम श्रयना' करिल यसन अस्थि गंगा परशन * चतुर्भुज हइया से चलिल ब्राह्मण हेन काले नारायण वैकुण्ठे थाकिया * काड़िया निलेन यमदतेरे मारिया कॉदिते कॉदिने मत्र यमेर किदर * जिज्ञामा करिते गेल यमेर गोचर विषय छाडिनु प्रभु पार नाहि काज * याजि वड़ यमराज पाडलाम लाज काएडार नायेते पापी त्रिभुवने जाने * वैकुण्टे ताहारे हरि निलेन कि जाने यमराज रोरे शुनि दूत थाहा भारे * जिज्ञासा करिने गेल श्रीहरि पाशे कॉदिते लागिल यम धरि प्रभु पाय * विषय छाडिनु नाहि विषयेर दाय । पापीर उपर मोर चिर अधिकार प्राजि केन ताहार हइल अविचार । काण्डार ब्राह्मण पापी विदित संमारे * पानिलेन कोन गुणे वैकुण्ठे ताहार शुनिया यमेर कया हरि हामि कय * गंगा यथा तथा कभु पाप नाहि ग्य गंगार महिमा कत कि बलिते जानि * मन दिया शुन तो कहि दण्डपारिग यत दरे याइवेक गंगार वाताम: मामार दोहाई चटि यायो नार पाश पुड़े मरे यस्वि लया फैन्ने गगोदके, चतुर्भुज हैया मेन' यानि गोलोक १ नीति विलिनी । : धान ।

७८ समाना कृत्तिवास रामायण वसै तीर गंगोदक पाना * प्रानी सो मम रूप वरजी दूत, न तहँ पग डाएँ * ते मम जन, मम आन' विचारै यम-प्रबोध इमि, उत सुखद, महिमा जासु अपार । गौड़ देश पावन करत, वही गंग शुचि धार ॥४१॥ सगर-वश उद्धार 3 पूरुव दिशा पद्म मुनि धामा * लीक लीन जाह्नवी ललामा मम अकाज पूरुष दिसि जाये * विनय भगीरथ मातु सुनाये चली फेरि शुचि प्रवल तरंगा * भागीरथी भगीरथ संगा। वही धार इक तजि जग तरनी * पद्मावती' पद्म अनुसरनी | गंग दीन पद्महिं पुनि शापा * तासु नीर जनि मेटइ पापा प्रथम कछुक पुनि भैरव वाहिनि * पुनि भई मातु उदधि-अनुगामिनि मंदाकिनि कर दरस पुनीता * करें शंखध्वनि देव सप्रीता शंखघोप, मज्जन जे करहीं * अयुत वर्ष सुरपुर नर लहहीं गंगातीरे थाकि गंगाजल करे पान * से शरीर जान तुमि आमार समान निषेध करह यत दूतरे तोमार * यदि यात्रो सेइ स्थाने दोहाइ आमार शुनिया प्रभुर कथा शमनेर त्रास * आदिकाण्ड रचिल पण्डित कृत्तिवास सगर-वश उद्धार 1 काण्डारेर प्रति गंगा मुक्तिपद दिया * गौड़ेर निकटे गंगा मिलिल आसिया । पद्म नामे एक मुनि पूर्वमुखे याय * भगीरथ भावि गंगा पश्चात् गोडाय जोड़हात करिया बलेन भगीरथ * पूर्व दिक याइते आमार नाहि पथ पद्ममुनि लये गेल नाम पद्मावती * भगीरथ सङ्गते चलिल भागीरथी शापवाणी सुरधनी दिलेन पद्मारे * मुक्ति केह तव नीरे पावे ना संसारे एक बार गेल गङ्गा भैरव वाहिनी * आरबार फिरिलेन सागरगामिनी | । अजय गंगार जल हइल दर्शन * शङ्खध्वनि करेन यतेक यतेक देवगण ।। शङ्खध्वनि घटे येवा नर स्नान करे * अयुत वत्सर सेइ थाके स्वर्गघरे । १ मर्यादा, लीक । २ बगाल मे प्रसिद्ध नदी । ३ पद्म मुनि । ४ पवित्र स्थान ।

घाट . आदि काण्ड ७६ कीन्ह समोद इन्द्र अस्नाना : इन्द्रेश्वर० प्रसिद्ध अस्थाना इन्द्रेश्वर जो सुपावन * स्वर्गदेन सब पाप नसावत । द्रुतगति' चली मरित' जगमाया * 'मेदा' चढ़ि भेटे द्विज राया मेड़ातला० नाम सोई कारन *थल प्रसिद्ध पातकी उबारन मुदित महीप चले कछु आगे* भाग तव 'नदिया के जागे मप्तद्वीप० विच श्रेष्ठ सुठामा * नवद्वीप सुरसरि विश्रामा रैन निवसि पुनि सप्तग्रामा० * पहुँचो शुचि प्रयाग सम धामा दछिन महेश. गंग पतु धारा* परमत अगनित घाट-विहारा तव संगति कत वर्ष गत, कतक* दूर तब देश । कहहु भगीरथ भस्म कहें, सन्तति सगर नरेस ? |॥४२॥ दछिन-पुरुष विच देश सुहावन * जहाँ कपिल मुनि श्राश्रम पावन भस्म-पितर मम तह अनुमाना * जननी कथन सुने अस काना निमिपते आइलेन नाम इन्द्रेश्वर * गगा लये भगीरथ चलिल सत्वर गंगाजले यथा इन्द्र करिलेन स्नान * इन्द्र श्वर बलि नाम हइल से स्थान इन्द्रेश्वर पाटे येवा नर स्नान करे * सर्व पापे मुक्त हो जाय स्वर्गपुरे " चलिलेन गंगा माता करि बड़ न्वरा * मेडातला नाम स्थाने यान सरिद्वारा मेड़ाय चड़िया वृद्ध आइल ब्राह्मण * मेडातला बलि नाम एड से कारण गंगारे लड्या यान आनन्दित हैया * ग्रामिया मिलिला गंगा नीर्थ ये नदीया सप्तद्वीप मध्ये मार नवद्वीप ग्राम * एक रात्रि गंगा तथा करिल विश्राम रथे चड़ि भगीरथ यान आगुयान * ामिया मिलिल गंगा मप्नग्राम स्थान सप्तग्राम तीर्थ जान प्रयाग समान * सेखान हहने गंगा करेन प्रयाण आकना महेश गगा दक्षिण करिया - विहारोटेर घाटे गंगा उत्तरिल गिया गंगा बलिलेन बापू शुन भगीरथ * कत दूरे तोमार देगेर आछे पथ भ्रमितेछि कत वर्प तोमार संहति : कोथा पाछे भम्ममय मगर-मन्तनि भगीरथ बले पड़े मने ये प्रामार * पूर्व प्रो दक्षिण दिक मध्यन्याने नार यहखाने प्राछिल कपिल महामुनि मह खाने मम वंश मात्र मुखे शुनि । तीज गनिमे।मनिनन । नतीर । ४ !ि तिनी। गन्य चिहिन बगान के भागीयी नट न पित पुगेन पानी से नाम ।।

८० जग - कृत्तिवास रामायण सुनत शतमुखी होइ सुरधारा * वही, क्षार जहॅ. सगर-कुमारा परसि गंग चौभुज तनु पाये * सगर-तनय सुरपुरहिं सिधाये ।। बसेउ सुवन इक जल-अधिकारी * शेप धाम हरि मंगलकारी। वंस-मुक्ति धनि सफल मनोरथ * प्रनवति पुनि पुनि गंग भगीरथ जाहु देस सुत वंस-उजागर * मैं अब मिलौ भेटि उर सागर 'गंगासागर तीर्थ महाना * संगम करहिं दान अस्नाना अमित पुन्य, पातक सब छीना * लहहिं स्वर्ग हरिपद आधीना सुरसरि अवनि भगीरथ लाई * मुक्ति-दैनि पाप नसाई गगा-प्रार्थना आई सुचि सलिल मातु सन्तन' सुखकारी । सुरधनी गंगा नाम, प्रगटी सो धरा धाम, तीनि भुवन जासु नाम, मंगल जयकारी ॥ आई०॥ सुरनर मुनि तारिनि जो, पाप ताप हारिनि' जो, संकट निवारिनि जो, • कलियुग अवतारी ॥ आई०॥ एइ कथा येखाने गंगारे राजा वले * हइलेन शतमुखी गंगा सेइ स्थले 1 आर्छिल सगर-वंश भस्मराशि हैया * वैकुण्ठे चलिल सवे गंगाजल पाइया हस्त तुलि गंगा भगीरथेरे देखान * श्रोई तव वंश देख स्वर्गवासे यान एक जन रहिल जलेर अधिकारी * आर सब गेल स्वर्गे चतुर्भुजधारी वंश मुक्ति हइल देखिया भगीरथ * गंगा के प्रणाम करि पूर्ण मनोरथ गंगा बले देशे यात्रो राजार नन्दन * सागरेर संगे आमि करिगे मिलन महातीर्थ हइल से सागर संगम * ताहाते यतेक पुण्य नाहि व्यतिक्रम || गंगासागरे ये नर करे स्नान दान * सर्वपापे मुक्त ह'ये स्वर्गे पाय स्थान गंगा आनि लोक मुक्त कैल भगीरथ * कृत्तिवास पण्डितेर कवित्व महत् गङ्गार महिमा सुरधनी गंगा नामे, अाइलेन धरा धामे, ए तिन भुवने प्रतिकार । सुर नर निस्तारिणी, पाप ताप निवारिणी, कलियुगे हन अवतार॥ - - - आदि काण्ड ८१ धन्य धन्य बनुन्धरी, सुरमरि नित जहाँ सरी, धनि धनि हे सकरी, भव-तम उजियारी आई०॥ योजन सत पून धार. मंगे गंगे पुकार, दरमि पनि पुन्यवारि, रम्पुर अधिकारी ॥याई॥ भजन तह पच्छिन्द, वरना किमि लो अनन्द, दिलमत फल-फूल-मंत. पियन सुधा बारी आई०॥ सृपन के जे भुयाल, वा कुजर विमाल, नेऊ लमि है बिहान सगन मोद भारी |आई०॥ सेतुबंध, नीलाचल, द्वारिका, बदरिका थल, कामी, मथुरादि विमल नगरी सुचि मारी ॥आई०॥ तीरंथ मनभावन जे, विष्णु सरिम पावन जे, अति महान ताहू ते सुरसरि महतारी पाई। धन्य धन्य ‘वानुमती, याहाते गङ्गार गति , धन्य धन्य कलियुग सार । शतेक योजन थाके. गङ्गा गजा बलि डाके, शुने यमे लागे चमत्कार । पक्षिगग थाके यत, गगातीरे कर कत, गङ्गाजल पान । दूरं राज चक्रवती, यार पारे कोटी हनी, सेह नहे पक्षीर पक्षीर ममान ॥ काशी गया नीलाचल, द्वारका मधुरा स्थल, रामेश्वर बढोकाश्रम। ए नव योक तीर्थ, विष्णुर सम महत्त्व, नत्र तीर्थ गगा मारे सदा - -- - मर्वोत्तम ।।

-~- ८२ कृत्तिवास रामायण सौदास राजा का उपाख्यान बीते वर्ष सहस्र सठ, सुरसरि लाये भूप । पहुँचि अवध पुनि प्रत्रागन, पालत गुत अनुरूप ॥४३।। लिहि 'सौदास' जनम युवराजू * सुदित नृपति सह अवध समाजू सासन सौंपि सुवन तृप धीरा * बसे भगीरथ सुरसरि तीरा वीते दिवस, काटे भवफंदा * लहेउ सरित-तट मुकुति अनन्दा करि सौदास श्राद्व पितु तर्पन * बहु विधि दान द्विजन करि अर्पन पावन चरित तासु सुनि ध्याना * तन सुचि होइ, मिटहि अघ नाना दिवस एक मृगया' कर साजा * हेरत चहुँ वन-बन मृग राजा 1 दनुज एक तहँ भामिनि साथा * उतरेउ जहाँ भानुकुल नाथा ! तजि निसिचर तन व्याघ्र सरूपा * करत केलि तहँ माया रूपा लखि सार्दूल' हनेउ नृप बाना * मुग्धकाल पसु त्यागेउ प्राना हनेउ केलिरत पति केहि दोपा * विकल कहेउ निमिचरी सरोषा - सौदास सि राजार उपाख्यान गङ्गाहेतु गेल पाटि हाजार वत्सर * पुनार गेल राजा अयोध्या नगर राजा हैया करिलेन प्रजार पालन * हइल सौदास नामे ताहार नन्दन । अयोध्याते करिलेन राजत्व सौदास * भगीरथ करिलेन गङ्गातीरे वास किछु काल भगीरथ भागीरथी तटे * थाकिलेन मुक्त ह'ये संसार सङ्कटे करिलेन राजार श्राद्धतर्पण सौदास * ब्राह्मणेरे दिल दान यत यार श्राश मन दिया शुन राजा सौदाम चरित्र * शुनिले ये पापक्षय शरीर पवित्र एक दिन गेल राजा मृगया कारण * मृग लागि फिरे राजा चुरे सारा वन आइल राक्षस एक सङ्ग जाया निया * सौदासेर काछे उत्तरिल से आसिया । छाड़िया राक्षसरूप व्याघ्ररूप धरे * दुइ जने प्रभासेर तीरे केलि करे । हेन काले सौदास से शल देखिया * शृङ्गारेर काले तीरे मारिल बिन्धिया सेइ काले राक्षसी राजार प्रति कय * विना दोषे स्वामी मार शृङ्गार समय १ शिकार । २ सिंह।

ग्रादि काण्ड 13 दारुन कोप ब्रह्म कर शापा * परहु फन्द भुगतहु नृप पापा || करि कुभाप निशिचरी सिधारी * चले नगर तन भूप दुखारी ।। गुरु प्रिय परिजन सुहृद बुलाई * मुनि वशिष्ठ सन कथा सुनाई अश्वमेध नर पातक मोचन * शास्त्र वचन इमि कहत तपोधन सोइ सौदास याग संपन्ना * सुरभि दान चसन दिक अन्ना द्विज गृह गमन, तोप भूपाला * इत चिन्तित निसिचरी कराला वचन अकारथ मोर कस, तजेउ दानवी रूप पुनि वशिष्ठ सम रूप धरि, प्रगटी सम्मुख भूप ॥४४॥ सामिप' नृपति करावह भोजन * मुनि श्रदेश मुनि कहेउ यशोधन अर्जित अश्वमांस मन लावहु * करि स्नान-ध्यान गुरु श्रावह तौली तालु रुचिर परिपाका * होइ, कहत रवि-बंश-पताका तजि निशिचरी छा गुरु-वेपा * पुनि गृहपाक विन धरि वपा भूपति अयुध दनुज छल कान्हा * रधि मांस मानव धरि दीन्हा ।। परिणाम जानिये हड्वे यत्त पाप , महापाप भुजिवे हड्वे ब्रह्मशाप एतेक बलिया ये राक्षसी गेल वन * मनोहखे घरे राजा करिल गमन पात्रमित्रगणे राजा करिल अाहबान * बशिष्ठ मुनिरे आगे करिल सम्मान मुनिरे कहिल राजा मर विवरण : एड पाप कमने हइवे विमोचन पुरोहित वशिष्ट अनुज्ञा प्रमाणे अश्वमेध करिलेन शास्त्रंर विधाने यत पूर्ण दिल राजा दक्षिणा यसन * विदाय हइया तब गेल मर्वजन हेन काले से राक्षमी भावे मने मन * मम वाक्य व्यर्थ हवे जानिल कारण श्रापन राक्षसरूप दूरे तेयागिया * वशिष्ट मुनिर रूप धरिया ग्रामिया सौदास राजार काछ कहिल वचन * मोर मांग भोजन करायो यशोधन राजा बले अश्व मांस करि बाहरण * खाडबारे सेइ मांन गेल तव मन स्नान मंध्या करिया श्राइस महामुनि * एइ मांग कराइब रन्धन एखनि वशिष्ठेर रूप से दृरे ते तेयागिया प्राचीन विग्रेर वेश धरिया श्रामिया मनुप्येर् मांस लेया कारेल रन्धन * वशिष्ठक डाके राजा करिते भोजन ' मानपुन । गर्दा, अना। प्रान रिया हुआ (सरप) । ४ पार ।

- - TI योनि धरत anaa कहत सतवती । मोचत मन क्रोध शमन, कृत्तिवास रामायण इत, नृप गुरु सन्मानि बुलावा * छल न ज्ञात, दोउ परे मुलाया परसि मांस मानुप विप बोई * भायाविनी लोप भड योई कुपित वशिष्ठ निरखि अपमाना * दीन्ह शाप, रे शठ ! यजमाना ब्रह्मराक्षस कर पाई * चकित भूप मुनि गति दुखदाई 1 मैं निर्दोष शाप किमि दीन्हा * लै जल निहिं भर्म चह कीन्हां ध्यान : मुनि , कौतुक जाना * जिमि निसिचरी रचेउ छल नाना सौदास-रानि दसयती * 'भावी प्रबल' उदय, दनुज वध फल शुमकेतू * तनहु न शाप-नीर गुरु हेतू राऊ * अभिमंत्रित जल अमिट प्रभाऊ छिति पताल सुर-लोक निवामी सलिल-परस तिन सकल तिन सकल बिनासी । युगुले पाँव निज जल तजि जारे * जग कल्मापपाद विस्तारे पूछत विकल नरेम, बहुरि धाय गरुचरन धरि । ब्रह्मराक्षम वेम, ताजे का लौ पाव मुकुति ||४|| यजमान वाक्य मुनि लजिते ला पारे * हालेन उपस्थित रन्धन -आगारे बसिलेन मुनि तवे करिते भोजन * राक्षसी मनुष्य मांस दिल ततक्षण थाल कोने शुटया राक्षसी गेल घरे * देखिया मुनिर क्रोध बाटिल अन्तरे मनुष्येर मांस दिया कर उपहाय * तुमि ब्रह्मराक्षन ये हो हे सौदास एत यदि श्री वशिष्ठ मुनि शाप दिल * मुनिरे जापिते रात्रा हाते जल निल । नहामि दोपी शाप दिला आकारणे * ऐइ अले भस्म करि शेड़ाव एक्षणे । राक्षमी राजार शाप शुनिया लखनि * घर हैते पलाल चलिल आपनि ध्यान करि जानिल वशिष्ठ तपोधन * राक्षसी आसिया मांस नाागेल मो- मुनिक दिवारे शाप राजा जल निल * तारे दमयन्ती। नारी जिध, करिल क्रोध मन्त्ररिया राजा भावे मने मन * कोन स्थाने एड जल श्रुडव एखन स्वर्गे यदि शुद्ध तवे मरे देवगण * यदि फेलि नागपुरे। नागेर मरत पृथिवी ते फेलिले शस्य सब जाय * सेइ जल फेले राजा अापनार पाय राजार पुडिये गेल दुखानि चरण * राजार कल्मापपद नाम से कारण वशिष्ठ बलेन शाप दिनु नृपवर * राक्षस हडया थाक एगारे वत्सर लोटाय धरिया राजा वशिष्ठ चरण * कनं दिने हवे मम शाप विमोचन میبریری राकम-दत्य वरन प्रांदिकाण्ड कह वशिष्ट तृपवर धरु श्रीरा ग्यारह वर्ष विगत गत पीरा दरस गग पावतु । नहि काला : मिटहि शार नजि योनि-कगला मराम भयेउ नरेसा : हिजन मच्छि मरमन दिग्दमा शाप-अवधि बीती बीती लेहि काला : विन प्रहार दिन नीनि सुभाना मिथिल, बिलमि' ज: मुघल प्रभामा · विटए लूल बिय कलुक निवामा क्षुधित' भूप लसि रहेउ मुगामा : तेहि ना बेग दैन्य कर वापा पूछत दैत्य कवन ते पानी कम मा बिटप चान अनानी न्धा ज्वाल अति उदर काला " भच्छ नोहिं इमि कहेउ मुसाला युगुल भटभेग' : मल्लयुद्ध पट मार धनरा कोउ न न्यून, नई मानत हारी । पुनि में जुन्द दोउ तजि गरी निज सुख-दुख दोरकर प्रकासा शाप चलिए गोदामा मखा सुनह, कह दैत्य मनीना : गन बग्दन नाम सीता गुरुग्रह देद पड़े पर काला : ताल दनिछना बचन न मनि चले पात्रे यो गंगा दान : ननद कीनार पाए हहने मोचन मौदास भूपति, जसरानन हा देगे ने कि नानो खाइया एगार वत्सर पूर्ण बदल यायन : तिन दिन मातार ना मिलिल तरुन उत्तरिल गिया राजा प्रभायेर कुले : अमर हदया बमिल वृक्षामले क्षयाय अतान राजा वृक्ष ये ना, नत्य चाहे गेड नाडा नगदैत्य व ने बोहे तुमि न हेया भार ग्यान नमिनिने 'प्रामियाय को गुनिया नाहार कथा सौदान मालिन देन देन गटागटन गहन बलदैत्य राक्षले विवाद बजने : छय माग लियत करिछ रमन दुइजन युद्ध चम न्यून हे केह । गिवना करिया परापर करनेट सध दुःख दान जान जान नमित शान्ति नो वन नीलाम नात्य बले मित्र शंन विवरण : नन्दमा नारे प्रामशिलाम नाम यहकाल वेद पन्निाम गुम्बाये । चाहिन्ना बजेगा गुरु रामानकारी :- तव बन्धन ८६ कृत्तिवाम रामायण लखि उपहास, शाप गुरु दीन्हा * योनि अधम निशिचरि-गति कीन्हा । पुनि गुरु द्रवित' कहेउ, द्विजनन्दन * परमि गंग कटिहैं भयेउ चेत, भल कह मौदासा * चलहिं सखा दोउ गंग निवासा मंदाकिनि स्नान करि, गंग कलश धरि सीस । तेहिं मारग आवत लखे, भार्गव महा मुनीस ॥४६॥ 5) मुनिवर ! दै कछु सुरसरि वारी * दया करहु दोउ शाप निवारी । विन जल-अर्घ प्रथम शिवशीसा * इतर हेतु किमि, कहत मुनीमा आदि न शेष तालु सम रूपा * गग सलिल सब भॉति अनूपा अनुचित मुनि, न सोह यह वानी * भार्गव सुनत कथा सब जानी चीन्हेउ नृपाते भगीरथ नन्दन * कुश सन कीन्ह गंग जल सरसन विगत पाप तजि अधम सरीरा * निज-निज पंथ चले तजि पीरा लहेड स्वर्ग पुनि गंग प्रभावा * कृत्तिवास यस करिलाम उपहास गुरुर वचने * गुरु बले ब्रह्मदेत्य हो एइ क्षणे यखन गङ्गार जल पावे दरशन * तखन पाइले मुक्ति ब्राह्मण नन्दन सौदाम बलेन मित्र चिताडले मोरे * तेंइ से गङ्गार तत्व दुइजने करे । गङ्गा स्नान करि यान भार्गर महर्षि * माथाय करिया गङ्गाजलेर कलसी ।। हेन काले दोहे व ले आगुलिया ताय * गङ्गाजल विन्दुमात्र दायो दुजनाय लागिलेन कहिते भार्गव तपोधन * अग्रभाग शिवेर ता दिव ना कखन दोहे कहे मुनि तत्र नाहि विद्यालेश * गङ्गाजले नाहि हय अग्र अवशेष जानिलेन तनन भार्गव तपोधन * महाजन बटे भगरिथेर नन्दन कुशाग्र करिया गङ्गाजल दिल ताय * ब्रह्महत्या आदि पाप एडिया पलाय लिलेन सौदास ब्रह्मराक्षस हइया * वैकुण्ठे चलिया गेल गङ्गाजल पाइया ब्रह्मदैत्य भार ब्रह्मराक्षस सत्वरे * दुइ नने मुक्ति हैया गेल निजघरे गङ्गार म हेमा कथा अनन्ता ये शुनि * आदिकाण्ड रचे कृत्तिवास महागुणि विमल सुनावा १ दय। मे पिघलकर ।

बाम सुदूर, ममीपा आदि काण्ड दिलीप का अश्वमेव या नृप सौदाम सुरधामा * तनय 'सुदाम' नामु कर नामा विपुल वर्ष मासन सुखदाई * सुत 'दिलीप' सासन पुनि पाई प्रबल प्रताप दिलीप प्रकामा * सुत मम पालि प्रजा दुखनामा तनय एक 'रघु' नाम खाना * जनक सरिस विक्रम बलवाना रखु-बल अतुल निरखि नरनाहा * अश्वमेध कर उटेड उछाहा छाडेर तुरंग महीपा जहँ-तहँ जात, तुरंग जाति लोटड दिग्देगा * सफल याग तब, कहत नमा शु युवराज दिलीय प्रनामी * सुभटन सहित वाजि अनुगामी सफल याग, सुरपुर अधिकारी होय दिलीप, इन्द्र भय भारी हे विरचि ! कस करिय ? विधि कहेड, अश्व हारे लेह । विफल दिलीप उछाह करि, सुरपति अनॅद लेहु ॥४७॥ दिली अग्यमेध यक्ष गोदाम गेलेन अायु शेष स्वर्गस्थले * हहलेन सुदास भूपति भूमण्डले नुदास करेन राज्य अनेक वत्सर * दिलीप हड्ल राजा राज्येर उपर दिलीपेर नन्दन हइल रखुराजा - पुत्रेर ममान पाले पृथिवीर प्रजा एतेक दिलीप राजा महाबलवान * नद्र प हल पुत्र पितार ममान पुनेर विक्रम देखि भावे मने मन- अश्वमेघ यज्ञ करिलेन प्रारम्भन घोडा राखिवारे नियोजिलन रतुरे येसाने सेखाने यावे निम्टे कि दूरे घोड़ा दिया दिलीप काहिल तार टॉइ: यत पूर्ण काले येन एड घोडा पाह घोडा राखिवारे रघु करिल पयान : म चलिल तुल्य योद्धा बलवान महेन्द्र वलेन ब्रह्मा कोन बुद्धि करि : अश्वमेध करि राजा लये बगपुरी किसे निवारण हय बल कृपा करि* विरिचिवलेन तार बाबा लयो हरि अश्व विना राजा यज्ञ करिने ना पारं* चलिलेन इन्द्र बोहा चुरि करिवार १ भूपंवार भी एक ही परसा में मान्य के पिता और उन्दी मगर प्रपौन, दोनो नाम 'दिलीप' पृत्तवानी रामायण में अग्निपित है, जो गहन-जनक है । मानुम नहीं रिली पुरान में ऐसा ही वर्णन है, अपना सन उत्तवाम ये दाद वह उत्तवाम गे याद यह निम्न-उपने को भूल २पिता। उल्लाह । ४ घोडा।

नृप वैपरहीं का नाथा AAAA कृत्तिवास रामायण राजा रघु की दान-कीर्ति पुन्य दिलीप विश्व चहुँ छाजा * रहिं राजु दे रवर्ग विराजा करि पितु श्राद्ध द्विजन हित अर्पन * अखिल कोप किय शेप' यशोधन असन-वसन' हित द्रव्य न लहहीं * माटी वासन सुनहु कथा, कश्यप मुनि गेहा * बसत शिष्य वरदत्त सनेहा दिवस अनेक अध्ययन कीना * चौसठ कला कला भयेउ सुप्रवीना विदा काल प्रणवत माथा * गुरु-दक्षिणा देहुँ अधिक न कोटि चतुर्दम सुवरन * दै मोहिं उरिन होहु द्विजनन्दन चकित अमित सुनि सुबरन भारा * लही सु किमि ? मन सोच कुमारा पुन्यवान रघु अवध प्रतापा * तिन पह मॉगि भेटु संतापा सुनत सीख गुरु सन, अवधि सात दिवम पुनि लीन्ह । किय पयान, हिय थिर न, द्विज दरस अवधपुर कीन्ह ॥४६॥ विग्न निसेध न रघुपुर कतहूँ * अन्तःपुर प्रविसेउ, नृप जहहूँ रघु राजार दान-कीर्ति दिलीप राजत्व करे अयुत वत्सर * पुत्र राज्य दिया गेल अमर नगर पितृ श्राद्ध करिलेन रवु यशोधन * ब्राह्मणेरे दिल रा॥ यत छिल धन अद्य भक्ष्य रखुराजा नाहि धन घरे * मृत्तिकार पात्रे राजा जलपान करे वरदत्त नामे एक मुनिर नन्दन * कश्यप मुनिर टॉइ करे अध्ययन गुरुगृहे बसति करिल बहु दिन * चतु.पष्टि विद्याते से हइल प्रमीण गुरुरे दक्षिणा दिते कहिल तोहारे * कि दक्षिणा दिव गुरु आदेश आमारे गुरु वले अल्प मागि कर विवेचना * चौपट्टी विद्यार देह चौद्द कोटि सोना द्विज कहिलेन एइ असम्भव कथा * मने मावे एतेक सुवर्ण पान कोथा सवे बले रघुराजा बह पुण्यवान * तॉर ठॉइ अानि गिया मागि स्वर्णदान सात दिवसेर तरे समय चाहिल * गुरु के कहिया शिष्य विदाय हइल सात पॉच माविया से निज प्राकिञ्चन * अयोध्यानगरे आमि दिल दरशन बामणे निषेध नाहि दुयारे रबुर * उत्तरिल गिया रोइ राज अंत.पुर १ समाप्न । २ भोजन-वस्त्र । ३ बरतन । ४ सुवर्ण मुद्रा । ५ मोहलत । ६ रोकटोक । -

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امومه 4 CU कृत्तिवास रामायण दे द्विज वास, टेरि पुनि राजन * अवध प्रजा जे रहेउ महाजन सुबरन चौदह कोटि जुटावहु * दसगुन तारा तागु प्रात पुनि पाबहु । एक कोटि लौ कनक प्रभु, नगर न तव असेस । विवस प्रजा वानी-विनय, गुनि अनमने' नरेस ।।५०॥ तेहे अवसर नारद मुनि पाये * आसन अर्थ वन्दना पाये हे नृपमणि ! कस बदन मलीना * रघु द्विज-कथा निवेदन कीना | चहत आजु द्विज, सो किमि लहहीं * मुदित देवरिपि र सन कहहीं ॥ पठइ सन्देस कुबेर भुत्राला * लहहु वैठि गृह धन यहि काला नारद इतै रघुराजा * सजे अवधपुर बाजे सुभट अमात्य' स्वसैन बुलावा * सजेउ कटक, दुदुभी सुनेउ कुवेर घोष कैलासा * तासु दूत नित अवध निवासा पूछत चहुँ, कित कटक सम्हारा ? * मद-कुबेर धारा गमन, दाजा बजावा । भजन एत बलि ब्राह्मणे राखिल निज घरे * प्रापनि जिज्ञासा करे साधु सदागरे । चौहकोटि सोना धार येवा दिते पारे * चौह दश कोटि कालि शुधिव ताहारे । जोड हात करिया कहिछे प्रजागण * तोमार नगरे नाइ एक कोटि धन हेंट माथा करि राजा माविल विपद * हेन काले तथा मुनि आइल नारद पाच अर्घ्य दिल रोजा बसिते अासन * मुनि बले केन राजा विरस बदन राजा वले महाशय शुन वलि कथा * ब्राह्मण चाहिल धन आजि पात्र कोथा लागिलेन हासिते नारद महामुनि * इहार उपाय कहि शुनह अापनि वल कालि कुबेरे करिव सम्भापण * घरे ते बसिया पावे यत चाह धन तार परे गेलेन नारद तपोधन * अयोध्या नगरे राजा वाजाय बाजन आज्ञा करिलेन राजा पात्र मित्रगणे * सवे साज जाइब कुबेर सम्भाषणे कटक साजिल बाजे दुन्दुभि वाजन * कैलासे कुबेर ताहा करेन श्रवण कुवेरेर दूत छिल अयोध्या-भुवने * जिज्ञासा करिल सब पात्र मित्रगणे पात्र मत्र वले कि वे हाम्रो शुवाड्या * प्रमाद पड़िवे कालि कुबेरे लक्ष्या १ चिन्तित । २ मत्रिगण । ३ राजदून, एम्प्रेनेडर---प्रेता के प्राचीन काल मे एग्न डर की व्यवस्था की झलक कृत्तिवासी रामायण म अनूठी है ।

६ वैदरहीं। आदि काण्ड १३ सुनत दूत कैलाश सिधायेउ * तहँ नारद कुवेर ढिंग' पायेउ चढ़ेउ साजि दल रघु नरनाहा * अस अचेत धनपति' न निवाहा चौदह कोटि हेम' संकल्पा * परवस नृप न कनक पुर रवल्पा सुमति दूत, सिख मानि मुनीसा * सुवरन अमित दीन धनईसा ।। कनक सहित चर अवध सिधावा * रवु प्रताप-जस चहुँ दिसि छावा 1 भेंट कुवेर लीन सन्मानी * द्विज हित सकल देन मनमानी कान हाथ धरि, मुख 'हरि' भाषा * रत्ती अधिक न मम अभिलापा 'चौदह कोटि लीन गिनि कञ्चन * सो लदबाइ चलेउ हिजनन्दन कनक-राशि-युत शिष्य लखि, गुरु अति अचरज लीन । पुण्य रूप रघु दान-यश, विरद शिष्य बहु कीन ॥५१॥ गहन अरण्य वास मुनि संका * हरें प्रान-धन दस्यु निसंका इन्द्र समीप अमानत धरहीं * यज्ञकाल सोइ लै गुरु प्रायलु' द्विज द्रव्य असेसा * सहित चलेउ जहँ वसत सुरेसा शुनिया चलिल दूत धाइया अमनि * कैलासे गरद गिया कहेन तखनि कि कर कुबेर तुमि निश्चिन्त वसिया * तोसार उपरे रघु श्रासिछे साजिया सुवर्ण नाहिक रवु राजार भाण्डारे * चौद्दकोटि स्वर्ण विप्र चेयेछे ताहारे एत यदि बलिल नारद महामुनि * कुवेर वलेन आमि पाहात्र एखुनि, स्वहस्ते कुवेर धन दिले र गणिया * दूत गिया भाण्डारेते दिल फेलाइया! विनयं कहेन रघु ब्राह्मण कुमारे * भाण्डार सहित स्वर्ण दिलाम तोमारे श्रीविष्णु बलिया मुनि स्पर्श दुइ कान * चौदकोटि मात्र लव ना लइव ान चौदकोटि स्वर्ण तारे दिलेन गणिया * शत शत जने बोझा दिलेन बान्धिया शिष्येरे आनिते देखि चौद्दकोटि सोना * गुरु बले एत धन दिल कोन जना शिष्य वले रघु राजा बड़ पुण्यवान * करिलेन तिनि चौद्द कोटि स्वर्ण दान सुनि चले थाकि प्रामि गहन कानने * धन हरि दस्युगण बधिवे जीवने एइ धन राख ल'ये इन्द्रर भाण्डारे * यज्ञकाले धन प्रानि देय ये आमारे काञ्चन लड्या गेल इन्द्रेर सदने सम्भ्रमे उठिल इन्द्र देखिया ब्राह्मणे १ समीप । २ धन के स्वामी, कुवेर । ३ स्वर्ण । ४ दूत, धावन । ५ प्रशसा । ६ गहरा जगल । ७ डाकू । ८ धरोहर । ९ आज्ञा ।

विप्र-सुवन - ६४ कृत्तिवाम रामायण बटु' सन्मानि भेटि सुरनाथा * सुनी सकल पुनि पुनि सुवरन-गाथा दच्छिना पुरावा * पुष्कल हेम' अवध जिमि आवा सरिस कल्पतरु रघु दिय दाना * दस्यु-त्रास सोइ तब ढिग अाना श्रवन हाथ धरि कहि पुनि 'रामा' * सम्मुख मम न लेहु रघु नामा रैन न नींद, तामु भय पाई * खेतन अवध रखावहुँ जाई इतर धरौ कहुँ धन हे ब्रह्मन ! * नतरु निपातै रघु मम जीवन सुनि वरदत्त वचन सुरनाहा * गुरु-आश्रम-पथ पुनि अवगाहा" मुनि आयसु बहोरि सोइ कञ्चन * राखेउ ढिग कुबेर द्विजनन्दन । विहसि कही धनपति कैलासा * जासु द्रव्य, आयो सोइ पासा सुयश भूप रघु त्रिभुवन छावा * कृत्तिवास शुचि गाइ सुनावा राजा अज का विवाह और दशरथ का जन्म वर्ष सहस दस रघु किय राजू # मनमोहन 'अज' पुनि युवराजू द्विज बले गुरु पाठाइलेन आमारे * रघुराजा स्वर्णदान दिल भारे भारे राखह भाएडारे महामुनिर से धन * एत बलि धन तथा राखेन ब्राह्मण वासव वलेन बापू सत्य कह कथा * उञ्छवृत्ति करि सोना पाइलेन कोथा द्विज वले दक्षिणा चाहिल स्वर्ण गुरु * आमारे दिलेन रघुराजा कल्पतरु राम राम वलि इन्द्र काने दिल हात * रघुनाम ना करिश्री अामार साक्षात् निशाते ना याइ निद्रा रघुर भयेते * अयोध्या नगरे सदा भ्रमि क्षेते क्षेते स्थानान्तरे निया प्रभु राख एइ धन * धनेर कारण रघु बधिवे जीवन धन लैया वरदत्त गेल गुरुपाशे * गुरु बले राख निया पर्वत कैलासे निजधन देखिया कुवेर मने हासे * गियाछे जाहार धन एल तार पाशे रघु भूपतिर यश त्रिभुवन घोपे * रचिलेन आदिकाण्ड कवि कृत्तिवासे अज राजार विवाह ओ दशरथेर जन्म रघुराज्य करे दश हाजार वत्सर * अज नामे ताँहार तनय मनोहर १ ब्राह्मण । २ ढेर का ढेर । ३ सुवर्ण । ४ दिलीप के अश्वमेघ यज्ञ के अवसर पर इन्द्र को बांधकर रघु ने अयोध्या के राज्य मे वृष्टि और खेती की सुरक्षा की व्यवस्था का वचन ले लिया था। यह कथा पहले आ चुकी है । ५ ग्रहण किया।

प्रजा पौत्र-दिलीप, सुवन-रघु सभा, आदि काण्ड यौवन पग छवि सुत अवलोका * सौपि राजु रघु गे सुरलोका अज समान नहि इतर भुत्राला * पितु सम करै प्रतिपाला रति लजाय, रूपसि परम, इन्दुमती जेहि नाम । माथुर-नृप तनया सुभग, अति लावण्य ललाम ॥५२॥ इच्छावर विवाह मन लीना * सकुच न नेक, प्रकट पितु कीना सुता-स्वयंवर भूप उछाहा * नेउते चहुँ नरपति नरनाहा पाय निमंत्रण माथुर देसा * चले सुभट बहु अवनि नरेसा तजेउ न अवसर, तजि तजि धामा * जुरे सकल बल-रूप-ललामा अवधभूप अज सभा विराजा * मनो वृन्द-पशु छवि मृगराजा नाहर * एक छत्र छिति तपत गुनागर सजी स्वयंवर सभा विमाला * विनय कीन लखि नपन भुबाला मम गृह सुता दान हित एका * आनहुँ सुनौ सविवेका जाखु कराठ त वरमाला * सोइ मम अतिथि गहै कर चाला देखिया पुत्रेर राजा प्रथम यौवन * पुत्रे राज्य दिया गेल वैकुण्ठ-भुवन अजेर समान राजा नाहिक संसारे * पुत्रेर समान राजा पालेन सवारे माथुर राजार कन्या इन्दुमती नाम * परमा सुन्दरी सेइ लावण्येर धाम ॥ इच्छावरी हइते कन्यार गेल मन * कहिल पितार अग्रे ना करि गोपन 1 स्वयम्बरा हइते अामार आछे मन * सकल राजारे आन करि निमंत्रण यत यत महाराज एड धरा बासे * साथरेर निमंत्रणे सबे येन आसे प्रथम यौवन सवे देखिते सुन्दर * सकले अाइसे केह ना रहिल घर अयोध्या हइते हैल अजेर गमन * सभामध्ये अज गिया बसिल तखन पशुर मध्येते येन पशिल केशरी * बसिल सकल राजा अज मध्य करि रघुर तनय अज दिलीपेर पौत्र * पृथिवीमण्डले जॉर एकदण्ड छत्र वसिल करिया सभा यत राजगण * तखन माथर राजा कर निवेदन एक कन्या दानयोग्या आछे मम परे * आज्ञा कर सेइ कन्या आनि स्वयम्बरे परिणामे द्वन्द्ध येन ना हय घटन * तवे शीघ्र श्रानि कन्या एइ निवेदन मम कन्या वरमाल्य दिवेन जाँहारे * सबारे विदाय दिया राखिव ताँहारे AAAAA कृत्तिवास रामायण नृप ललना विदा शेष नृप लै घर जाहीं * रारि-द्वन्द अक्सर कछु नाहीं राजन उजुर' न, आतुर बचना * सभा वेगि अानौ 1 सजी इन्दुमति वेनि' सॅवारी * श्रुत कुण्डल कज्जल दृग डारी । ससि सम विमल, सुकुंकुम भाला' * पैज सिंगार विविध गर माला जगमग छवि अति सुघर सुहावन * पुतरी कनक रची चतुरानन सह सहचरिन चली गजगामिनि * मद मतंग सकुचत लखि भामिनि चितवति इन्दुमती जेहि भूपा * सुधि न रहत लखि बदन अनूपा पाय चेत, निकमत वचन, जालु गरे वरमाल । देय सुमुखि, सोइ सफल तन, सोइ धनि-धन्य भुआल ॥५३॥ कोउ कह मोहिं निरखत मृग अयनी * कोउ कह चहति मोहिं पिक-बयनी । जेहि नृप तजै बढे पग वाला * रोवत धरनी लोटि देहाला कस कुत्सित मम रूप निहारी * सुमुखि तजेसि मोहिं सोक मॅझारी पैज-पैज तजि नृपन विलोकत * सुता बढ़ी जहँ रघुसुत सोहत 12 माल भाल बलिल सकल राजगण * शीघ्र इन्दुमती आन करिया साजन केश ऑचड़िया तार बान्धिल कुन्तल * विविध पुष्पेर माला करे झलमल कपाले सिन्दूर दिल नयने कज्जल * चन्द्रेर समान रूप अतीव विमल सुचित्र विचित्र परे पायेते पाशुलि * विधाता गड़ेछे येन कनक पुतुलि सहचरीगण सङ्ग चलिल घेरिया * मत्त गजपति रामा चलिल साजिया जेइ जन करे इन्दुमती निरीक्षण * रूपेर मोहेते हरे ताहार चेतन । चेतन पाइया उठि चले नृपगण * ए कन्या ये पाइवे तार सार्थक जीवन || केह बले कन्या मोरे करे निरीक्षण * केह कहे कन्यार आमाते आछे मन यारे पाछु करि कन्या करिल गमन * भूमेते पड़िया सेइ जुडिल रोदन कन्या कि कुत्सित रूप देखिल आमारे * आमारे छाड़िया सेइ भजिवे काहारे एके एके देखिया यतेक राजगण * अजेर निकटे आसि दिल दरशन १ उज, आपत्ति। २ वेणी, चोटी । ३ मस्तक । ४ होश । ५ खराब हालत मे । ६पग-पग पर।

आदि काण्ड ६७ दारिद जिमि बहुअन सुख पात्रा * हुलमि मालवर अज पहिरावा इन्दुमती पुलकित गृह गृह जाई * चला व्यथित नृपयूथ लजाई कानन बटुरि' मंत्रना करहों * केहि विधि प्रान भूए अज हरहीं इत-उत वन लुकान' मव तहही * अजहि निपाति इन्दुमति लहहीं सुतादान माथुर इत कीना * हय, गज, रथ, संपति बहु दीना दिवम तीन प्रातिधि सन्माना * अज-दंपति पुनि अवध पयाना चला वेगि रथ, लै दोउ संगा * कटक साथ अगनित चतुरंगा अज सोवत, रथ कन-पथ अावा * नृपगन घेरि पंथ किय धावा मारु मारु बोलत चहुँ ओरा * इन्दुमती संकट लखि घोरा बचै कंत' किमि संसय लागी * रुदन र नत अज निद्रा त्यागो अरिगर्जन न भीत' रनवंका * निरखत तिर-मुख मलिन निसंका अहह नाथ ! शत-शत भट योधा * चहुँ दिसि पंथ घेरि अवरोधा धन पेले हष्ट यन दरिद्रेर मति * गले माल्य दिया बले तुमि मम पति वरमाल्य दिया यदि कन्या गेल घर * यत राजा पलाइल लज्जायं कातर वनेते वसिया मवे ह'ये एकमति * वधिो अजेर प्राण करिल युकति एक्षण मवाइ थाकि वने लुकाइया * अजे मारि इन्दुमती लइव काड़िया लुका:या बने तारा रहे स्थाने स्थान * हेथाय माथर राजा कर कन्यादान कन्यादान करे राजा करिया कौतुक * नानारत्न हन्ती अश्व दिलेन यौतुक तिन दिन छिल राजा माथरेर घरे * तारपर यान राजा अयोध्या नगरे इन्दुमती सह रथे करे आरोहण * कत सेना संगे रंगे चले अगणन निद्राय कातर राजा चलितेछे रथ * सेइकाले राजगण आगुलिल पथ मार मार वलि सवे श्रागुलिल तथा * इन्दुमती देखिया करिल हेट माथा । कैमने वाँचाव स्वामी कान्दे इन्दुमती * से क्रन्दने जागिलेन अज महारथी राजगण डाके ताहे भीत नहे मन * मलिन देखिल इन्दुमतीर वदन इन्दुमती बले नाथ कि भाव एखन * देखना तोमारे रिलेक नपगण १ इकट्टा होकर । २ छिप गये । ३ पति । ४ भयभीत ।

ܝܝܝܕܝ १८ -- सघाना 3 राम कृत्तिवास रामायण हरन मोर, वध स्वामि तव, अधमन मिलि मत कीन । महारथी रघु-तनय सुनि, भामिनि धीरज दीन ॥५४॥ सुमुखि ! सोच तजि होहु अनन्दा * मायक एक हनौ अरि-वृन्दा गहों इतर सर सत्रु-संहारन * तौ रघु अान, अस्त्र धिक् धारन चढ़ेउ चाप, स्यन्दन अज सोहा * खल नृपगन मन उपजेउ छोहा' छत्रप विपुल ! सो तृण करि जाना * अज गंधर्ववान व्यापे तीन कोटि गधर्वा * अभिरे नृपति परस्पर सर्वा सर अमोघ जनि आनि उपाऊ * सकल मरे कटि जे नरराऊ सहित प्रिया पुनि चलि नरनाहा * आये अवध अतीव उछाहा अज-तन प्रान इन्दुमति ताकर * धारेउ गर्भ विगत कछु वासर गत दम मास प्रसव शिशु कीना * शशि जिमि जनमि अवनि छवि दीना काम सरिस गुन रूप निहारी * दशरथ नाम तनय कर धारी। दशरथ विरद वरनि नहिं जाई * जाके सुवन रघुराई दशरथ जनम कथा सुखकरनी * कृत्तिवास मञ्जुल इमि बरनी शत शत राजा आछे पथ आगुलिया * आमारे काड़िया लवे तोमारे मारिया अज बले प्रसन्न करह प्रिये मुख * एकवाणे सबे मारि देखह कौतुक एक बाण विना यदि दुइ बाण मारि * रघुर दोहाई तवे वृथा अस्त्र धरि एत बलि धनु लैया रथे दाण्डाइल * अजे देखि राजगण भाविते लागिल शत शत भूपतिरे करि तृण ज्ञान * एहिलेन अज से गन्धर्व नामे वाण एक बाणे हइल गन्धर्व तिन कोटि * आपना पनि मरे करि काटाकाटि गन्धर्च बाणेते रण नाहिं जाय ऑटा * एक वाणे राजगण सवे गेल काटा 1 सेड सब राजगणे युद्धते मारिया * अयोध्याते गेल अज इन्दुमती निया । अज राजा तनु तार प्राण इन्दुमती * हइलेन किछु काल परे गर्भवती दश मास गर्भ हैल प्रसव समय * हइल तनय येन चन्द्रर उदय रूपे गुणे देखि येन अभिनव काम * दशरथ बलिया राखिल तार नाम आमि दशरथेर कि कैव गुण ग्राम * यार पुत्र हइलेन अापनि श्रीराम कृत्तिवास पण्डित कवित्वे विचक्षण * गान दशरथेर उत्पत्ति विवरण १ क्षोभ । २ अचूक । : उमग । ४ अज और इन्दुमती दोनो परस्पर जीवन-प्राण थे ।

आदि काण्ड 28 २ दशरथ का राज्याभिषेक किंशुकवन, जहँ द्वादम मामा * सुत सोवाय दोउ मगन विलासा इत रत-केलि हास-परिहासा * उत नारद कहुँ गमन अकासा पारिजात माला खसि बीना * गिरत रानि-तन परसन कीना छुवत माल सो तजेउ सरीग * विलखत अज, दृग नीर, अधीरा रुदन अकथ, विलपत अतिव, मिटत न हिय संताप । पारिजात पुनि परसि तहँ, तजेउ प्रान नृप आप ॥५५॥ नर्त-नर्तकी सुरपुर वासी * भये साप बस धरनि-निवासी । चले युगुल पुनि सुरपुर वामा * तजि दसरथ सुत द्वादस मासा जनक-जननि विरहित शिशु देखी * मुनि वशिष्ठ हिय सोच विशेषी पञ्च वर्ष सिखयेउ गृह राखी * सविधि शास्त्र सुतहित अभिलापी पितु पद गहि, गुरु प्रायसु माना * परशुराम किय आयुध दाना दशरथे राज्याभिषेक एक वर्ष वयस्क यखन दशरथ * पुत्रे शोयाइया दोहे साधे मनोरथ पुष्पवने क्रीड़ा करे हास्य परिहास * नारद चलिया यान उपर आकाश पारिजात माला छिल तोहार वीणाय * वातासे उड़िया पड़े इन्दुमती गाय पारिजात यखन हइल परशन * इन्दुमती छाडिलेन तखनि जीवन प्राण छाडि इन्दुमती गेल स्वर्गधाम * कॉदे अज नयनेते वारि अविराम कत वा कहिब सेइ राजार विलाप * ना पारे सहित इन्दुमतीर सन्ताप सेइ पारिजात मारे अाफ्नार गाय * दुइजने मुक्त हये स्वर्गपुरे जाय नर्तक नर्तकी छिल दोहे स्वर्गपुरे * शाप भ्रष्टे जन्मिया छिलेन भूमि परे दुइ जन यखन गेलेन सर्ग पथ * एक वर्ष वयस्क तखन दशरथ । पिता माता अल्प काले मरिल दुजन * देखिया चिन्तित ये वशिष्ठ तपोधन लैया गेल सेइ पुत्र प्रापनार घरे * पड़ाइल नाना शास्त्र शास्त्र अनुमारे । पञ्चवर्प हइलेन वयस्क यखन * लइलेन आपनि पैतृक सिंहासन भृगुराम मुनि तारे अस्त्र दिल दान * शिखाइल यत्न करि शब्दभेदी बाण १ खिसककर । २ स्पर्श । ३ पिता का स्थान, राजमिहासन । ४ अस्त्र । 5-न्य १०० कृत्तिवास रामायण माजा शब्दवेध किय अस्त्र-प्रवीना * वयम पञ्चदश नृप पग टीना लोकपाल पितु सरिस धनुर्धर * तपत राजु जिमि प्रबल पुरदर दशरय के साथ कौशल्या का विवाह सूर्यवंश दशरथ महराजा * सकल प्रशंम सर्वगुन अधिप महीपन के, नरनाहा * वर्स तीस नहिं रचेउ विवाहा सो सुभ घड़ी अवधि सजि आई * कोशलपुर नृप कोशलराई । सुता तासु कौशल्या नामा * सोच 'वयस' लखि बढत ललामा प्रोहित द्विज बटोरि पुनि राजन * कौशल्या-बर जोगु विचारन गवनहिं विप्र अवध तत्काला * विनवहिं मम संवाद भुवाला तुम समान वर धरनि न दूना * हरपि जासु कर देहुँ तनूना लै संवाद चले द्विजराई * सत्वर अवधपुरी नियराई लखि सोड, दसरथ कीन प्रनामा * दै असीम प्रगटत द्विज नामा राज्य करे दशरथ येन पुरन्दर * पुत्र तुल्य पाले प्रजा महा धनुर्द्ध र राजार वयस हैल पनर वत्सर * आदि कोण्डे रचे कृत्तिवास कविवर दशरथेर सहित कौशल्यार विवाह ॥ दशरथ महाराज जन्म सूर्यवंशे * सर्व गुणेश्वर राजा सकने प्रशंसे राज चक्रवर्ती राजा सवार उपर * विवाह ना हय क्य. त्रिंशत् वत्सर देवेर घटने हैल राजार निबन्ध * हेन काले घटे तॉर विवाह सम्बन्ध कौशलेर राना कौशल दण्डधर * कौशल्या नामेते कन्या आछे तॉर घर कौशल्यार रूप राजा देखिया मूर्च्छत * कारे कन्या दिव बलि राजा सुचिन्तित पुरोहित ब्राह्मणेरे काहेल सत्वर * दशरथे श्रानिवारे याह द्विजवर आमार संवाद कह रातार गोचरे * कौशल्या नामेते कन्या दिव तॉर करे तॉहा विना कौशल्यार वर नाहि आन * सुखी हब दशरये करे कन्यादान संवाद लइया विप्र चलिल सत्वर * शीघ्रगति गेल द्विज अयोध्या नगर ब्राह्मणे देखिया राजा करेन प्रणाम * आशीष करिया कहे आपनार नाम १ उन । २ कन्या । ३ शीघ्र ही ।

पचास + आदि काण्ड १०१ मैं द्विज-कोसलनाथ, सुता तामु अति रूपसी । देन चहत तब हाथ, सो पठयेउ संवाद नृप ॥५६॥ नहिं तव रूप आन' दिग्देसा * तुमहिं वरन नृप चाउर विसेसा करौ अनुग्रह कोमलदेसू * सुनत वचन द्विज, अवध-नरेसू बोलि सचिव सुहृदन मत कीना * निज-सूने सासन तिन दीना स्यन्दन साजि सारथी अाना * सैन-सहित किय नृपति पयाना नाचति विद्याधरी समाजा * तुरही, भेरि, झॉझ, बहु बाजा सहम मृदंग बजावा * तीनि कोटि सिंगी-रव छावा शंख कोटि अरु घण्टा जाला * अगनित बजत भरंग रसाला डफ, महनाइ, सुढोल दमामा * तबल घोप जयटोल ललामा घन सम गर्जत नाद कराला * महाप्रलय, छिति-व्योम" विहाला तुमुल -विराट बनत चहुँ बाजा * आयो कोशल, अवध-समाजा कोशल देशेते घर राज पुरोहित * तोमारे लइते राजा करे नियोजित परमा सुन्दरी कन्या आछे तॉर घरे * कौशल्या नामेते कन्या दिवेन तोमारे । तब तुल्य रूप ार नाहि कोन देशे * तोमारे दिवेन तिनि मनेर अावेशे राजार संवाद एइ जानानु तोमारे * विवाह करते चल कोशल आगारे एतेक शुनिया राना सवाद वचन * पात्र वर्ग लैया राजा करेन मन्त्रण यावत् विवाह करि नाहि आमि घरे * तावत् पालह राज्य अयोध्या-नगरे रथ लैया योगाइल रथेर सारथि * सेनागण संगे राजा चले शीघ्रगति नाना वाद्य बाजे नाचे विद्याधरीगण * तुरी भेरी झॉझरी ता ना जाय गणन पाखोयाज पञ्चाश सहस्र परिमाण * तिन कोटि शिङ्गा बाजे अति खरशान वाजे तिन कोटि शङ्कार घण्टाजाल * भोरङ्ग सहस्रकोटि शुनिते रसाल सहस सानाई बाजे इम्फ कोटि कोटि * तिन सहस्र दामामा घन पड़े काटि तवल विशाल वाद्य वाजे जय ढोल * महा प्रलयेर काले येन गण्डगोल वाद्यभाण्ड महाभाण्ड करिल प्रचुर * रथ वेगे गेल राजा कोशलेर पुर १ दूनरा । २ चाहना । ३ अपनी अनुपस्थिति में । ४ गोर । ५ पृथ्वी-आकाश सर्वत्र । ६ हलचल पूर्ण । ७ घोर कोलाहल । ।

१०४ कृत्तिवास रामायण नृप किय केई माना दसरथ गर डोलत वरमाला * लचे लाजवम सीम भुवाला वरै आनि किमि सुता सयानी * निज-निज गेह चले कहि वानी कैकय किय कन्यादाना * बहु मनि रतन द्रव्य सन्माना दासी निपुन मंथरा साया * लै अयोध्यानाथा चले वेगि पुनि सानि तुरंगा * सैन सहित नृप प्रमुदित अंगा राजा दशरथ के साथ सुमित्रा का विवाह और राजा के मदा स्त्री स ालप्त रहने के कारण राज्य पर शनिदृष्टि तथा उसके निवारणार्थ इन्द्र पर चढाई कौशल्या-कैका युग भामा * क्रीहा-रत महीप अविरामा नृप सुमित्र सिंहल-अधिकारी * सुता सुमित्रा छवि उजियारी कह वर लही सुजोग कुमारी * मन सुमित्र नित करै विचारी सारभौम दशरथ जग जाना * दनुज-गंधर्व जासु भय द्विज बुलाय दिय नृप आदेसा * आनहु दसरथ अवध-नरेसा धन पाइले तुष्ट येन दरिद्रेर मति * गले माल्य दिया बले तुमि हो पति दशरथ भूपतिर गले माल्य दोले * लजाय नृपतिगण माथा नाहि तोले राजगण बले कन्या बड़ विचक्षण * दशरथ थाकिने परिवे कोन जन राजगण परस्पर करिया सम्मान * विदाय हइया गेल निज निज स्थान कन्यादान करे राजा परम कौतुके * मन्यरा नामो चेरी दिलेन यौतुके माणिक मुकुता राजा पाइया विस्तर * अश्ववेगे निज देशे चलिल सत्वर कैकेयी लइया राजा आसे निज देशे * आदिकाण्ड रचिल पण्डित कृत्तिवासे , राजा दशरथेर सहित सुमित्रार विवाह ओ राजार सर्वदा स्त्री ससर्गे थाकाते राज्ये शनिर दृष्टि ओ अनावृष्टि निवारण जन्य इन्द्र र निकट रणयात्रा कौशल्या कैकेयी एइ सपत्नी उभय * उभये लइया क्रीड़ा करे महाशय सिंहल राज्येते से सुमित्र महीपति * सुमित्रा तनया तॉर अति रूपवती कन्यारे देखिया राजा भावे मने मन * कन्या योग्य वर कोथा पाइब एखन राज चक्रवर्ती दशरथ लोके जाने * राक्षस गन्धर्व कॉपे यॉर नाम शुने ब्राह्मण डाकिया राजा कहिल सत्वर * दशरथे आन गिया अयोध्यानगर १ दो।

422 42 . आदि काण्ड हरपि विप्र नप आयम माना * कीन अवध दिसि वेगि पयाना अज मुत निरखि विन सन्माना * दे अमीस, सो करत वखाना मिहलप.ते-प्रोहित, सोड' काजा * आयेउँ लेन हेत महराजा सुता सुमित्रा परमा रूपा * सिंहल करत अलोक' अनूपा मञ्जुल छवि अतुलित दिग्देसा * हरपि देन तोहिं चहत नरेसा अकथ रूप सुनि प्रमुदिन दसरथ * वरौ सुमुखि अविलंब मनोरथ सजे भूप आखेट-मिस', वनिता-युगुल अजान । बाजन बाजे, सदल बल, महल कियो पयान ।।१६।। नृप-आगम सिंहलपति जानी * पाद अर्ध्य बहु विधि सन्मानी दसरय रूप सराहत लोगू * राजसुता विधि" वर दिय योगू नंदीमख आदिक सुभ कर्मा * हरपि दोऊ पालत कुलधर्मा दम्पति दीठि' परस्पर डारी * दोउ छवि बसुन्धरा उजियारी मय्या सुमन सॉझि किय सयना * अलसभरे नृप झपके नयना राजार आज्ञाय द्विज चलिल हरिपे * शीघ्रगति गेल द्विज अयोध्यार देशे ब्राह्मणे देखिया राजा करेन प्रणाम * आशीप करिया द्विज कहे निज नाम सिंहल देशेर श्रामि राज पुरोहित * तोमारे लइते राजा आमि उपस्थित रानकन्या सुमित्रा से परमा सुन्दरी * तॉर रूपे आलो कर सिंहल नगरी समरूप राजकन्या नाहि कोन देशे * तोमारे दिवेन राजा परम हरिपे शुनिया कन्यार कथा हृष्ट दशरथ * हइते मुमित्रा पति हैल मनोरथ कौशल्या कैकयी पाछे जाने दुइजन * मृगयार छले राजा करिल गमन नाना वाद्ये दशरथ चले कुतूहले * उत्तरिल गिया राजा नगर मिहले वार्ता शुनि हरपित सिंहलेर राजा * पाद्य अर्घ्य दिया तॉर करिलेन पूजा देखि दशरथेर लावण्य मनोहर * लोक बले विधि दिल कन्यायोग्य वर नान्दीमुख करि दोहे विशेष हरिपे * दुइजने वृद्धि श्राद्ध करे अवशपे गोधूलिते दुइजने शुभदृष्टि करे * दोहाकार रूपे आलो वसुमती करे कुलुमशग्याय राजा शयन करिल * निद्रार अलसे प्राय अचंतन हैल । १ उन्ही के । २ आलोक, प्रकाश । ३ शिकार के बहाने । ४ दोनो गनी (कौगल्या ककेई)। ५ विधाता । ६ दृष्टि । .

। १०६ कृत्तिवास रामायण भोर भूप उठि शय्या त्यागी * दिये नेग परजन अनुरागी यौतुक' लहेउ भूप मनमाना * प्रमुदित दीन विविध बहु दाना दोउ नरेस नरेस किय बागबिदाई * सतिय चढ़े रथ कोमलराई छवि नववधू निरखि नहिं धीरा * काम-अनल नप अबुध सरीरा स्यन्दन-उपर रमन युग करहीं * कालरात्रि अनुचित अनुसरहीं । कालनिसा परसत जो नारी * परति नारि दुर्भाग विचारी आनि सुमित्रा अवध, नरेसा * अन्तःपुर किय पुलकि प्रवेसा कौशल्या-कैकयि दोउ भामा * सोचें लखि छवि रूप ललामा संकर पूजि गौरि मन गावैं * मंगल नित सौमित्रि मना8 रानि तीन बिलसत महिपाला * सुख सासन महियाला * सुख सासन वीतेउ अतिकाला। सुत कर मुख न लखेउ नरनाहू * किय सत सप्त पचास विवाहू बहु बनितान निकेत नृप, जिनहिँ प्रमुख पद दीन । कौशल्या, कैकय सुता, अरु सुमित्रजा तीन ॥६०॥ शय्या छाडि उठे दशरथ नृपवर * शय्यार उत्थान कौड़ि दिलेन विस्तर बासिबिया सेइ स्थाने कैल दशरथ * यौतुक पाइल बहुधन मनोमत बिदाय हइल राजा राजार साक्षाते * सुमित्रा सहित राजा चड़े निज रथे सुमित्रार रूपे राजा मदने मोहित * अधैर्य हइया राजा हइल मूछत विलम्ब ना सहे आर करे इच्छाचार * रथेर उपरे राजा करेन शृङ्गार बामि बिया परदिन हय कालराति * स्त्री पुरुष एक ठाइ ना थाके संहति कालरात्रे ये नारी के करे परशन * से स्त्री दुर्भागा हय ना हय खण्डन सुमित्रा लइया राना आनि निन देशे * अन्त पुरे प्रवेशिल परम हरि कौशल्या कैकेयी तारा राणी दुइजन * सुमित्रार रूप देखि भावे मने मन निरवधि सेरे तारा पार्वती शङ्कर * सुमित्रा दुर्भागा हक एइ मागे वर तिन रानी लैया राजा आछे कुतूहले * सुखे राज्य करे बहुकाल भूमण्डले पुत्रहीन महाराज मने दु.ख दाह * करिलेन मात शत पञ्चाश विवाह सात शत पश्चाशेर मुख्य तिन गणि * कौशल्या कैकेयी आर मात्रा सतिनी १ दहेज । २ लाकर ।

उत ते आदि काण्ड १०७ तिन, छवि अतुल मुमित्रा न्यारी * जगमग करत अयोध्या सारी कालनिमा अपराध, विचारी' * तबk, भई मन-भूप उतारी' प्राणाधिक कैकई सनेहा * बसाते भूप निसिदिन सोइ गेहा तीनिहुँ भाग सराह न जाई * सबन गर्भ जन्मे हरि आई मगन भूप इत सुख-संभोगू* अनावृष्टि अवध कुयोगू वृप,-रोहिणी दीठि शनि डारी * पावस हरन अमंगल कारी । भोग विलास नारि बिलात नारि संभाष * रर;" पुर विपति न अवगत राजन सोइ अवसर नारद मुनि आये * श्रासन भूप पूजि बैठाये सुनौ मुकुटमणि आगम-हेतू * कहाँ कपा, सुनि होहु सचेतू इन्द्र वृष्टि पोपत संसारा * तब पुर जल बिन सोक मँझारा कामिनि मन रत निमिवासर * भोगत नरक प्रजा दुखसागर तार मध्ये सुमित्रा ये परमा सुन्दरी * तॉर रूपे आलो करे अयोध्या नगरी हेन स्त्री दुर्भागा हैल राजार विषाद * कालरात्रि दोप हैल एतेक प्रमाद प्राणेर अधिक राजा कैकयीरे देखे * दिवारात्रि दशरथ तारे लैया थाके ए तिनेर भाग्य कत वर्णव सम्प्रति * या सवार गर्भे जन्म लवेन श्रीपति सतत था फेन राजा सुखेर सागरे * देवे अनावृष्टि हैल अयोध्या-नगरे | रोहिणी वृरते हेल शनिर गमन * ते कारणे वृष्टि नाहि हय वरिपण | कौतुके थाकेन राजा भाा सम्भापणे * राज्येते प्रमाद हैल इहा नाहि जाने सकल अयोध्या राज्ये हाल आपद * हेन काले आइलेन तथाय नारद पाद्य अर्घ्य देन राजा वसिते अामन * मुनिर करिया पूजा बसिल राजन नारद बलेन नृप करि निवेदन * पाइलाम तोमारे करिते विज्ञापन इन्द्रर वृष्टिते वॉचे सकल संसार * तब राज्ये अनावृष्टि दुःख सवाकार कामिनी लझ्या राजा करितेछ सुख * नरके पडिला प्रजागण पाय दुःख १ वेचारी, दीन । २ उपेक्षित, मन उतरी । ३ गमादिक चार वन्धुओ मे प्रगट होनेवाले नारायण । ४ वर्पा । ५ लीन । ६ भिन, जानकार । वृष राशि स्थित रोहिणी नक्षत्र पर मनिश्चर की दृष्टि पडने पर अकाल योग होता है, यह प्रयकार का कथन है।

1 १०८ . शुक-सारिका वास कृत्तिवास रामायण किय न अकाज काहु मुनि ज्ञानी * निन्दति प्रजा बुद्धि बौरानी | पुरजन भोगत दुख निज कर्मा * लेपति किमि मम अंग अधर्मा वर्षा छीन हेतु सुनु ताता * वृप-रोहिणी दृष्टि शनि पाता सोइ कारन तव प्रजा दुखारी * चले नृपहिं कहि बीनाधारी आवा चेत, साजि रथ राजा * चले लेन सुधि प्रजा-समाजा लखे उतर', आकुल सकल, जलचर, खग, पसु वन्य । नदी, ताल, नद, बड़े सर, जलविन शुष्क अरन्य' ॥६१।। सॉझ भई तरु-तर नृप वामा * शाखा, निवासा कछु निसि बीति नींद भइ भगा * कह विहंग इमि इमि सोक-प्रसंगा कह सारिका, बहुकाला * गत नित करत उपास कराला रविकुल-राजु न दुख कहुँ लेसा" * सो कस पाप ? दुसह दुखदेसा चौदह वर्ष असन -जल हीना * पावम रहित, न फल तरु दीना सर सरिता, नद वारि विहीना * नृप पुरजन-हित चित तजि दीना राजा बले कारे आमि नाहि करि दंड * कि कारणे मन्द मोरे बल राज्यखण्ड । दुःख पाय प्रजागण निज कर्मफले * कोन दोषे प्रजागण मोरे मन्द बले नारद बलेन शुन नप चूडामणि * रोहिणी नक्षत्रे दृष्टि दिया गेल शनि । एइ हेतु अनावृष्टि हइल राज्येते * प्रजागण दु.ख पाय एड् कारणेते एत बलि करिलेन नारद गमन * रथे चडि राज्य देखि बेडान राजन गेलेन उत्तर दिके गहन कानन * जलजन्तु देखे राजा पशु पक्षिगण नद नदी देखे राजा ताहे नाहि जल * दीघि मरोवर देखे शुष्क से सकल 1 बेला अवसाने राजा बसे वृक्षतले * शारी शुक पाखी आछे सेइ वृक्षडाले १ शेष रात्रि हइल पक्षीर निद्रा भाङ्ग * पक्षिणी कहिल कथा पतिराज सङ्ग बहुकाल हडल मोरा एइ वनवामी * आर कत पार कष्ट नित्य उपवासी । सूर्यवंश राज्ये कभु दु ख नाहि जानि * चौद्द वर्ष अनाहार नाहि पाइ पानि अनावृष्टि कारणे वृक्षते नाहि फल * नदनदी सरोवर ताहे नाहि जल १ उत्तर दिशा । २ जगली । ३ जगल । ४ लघन, फाका । ५ लवलेश, ज़रा भी। 11 ६ भोज । .

वीती ।। प्रान आदि काण्ड १०६ नारि-लिप्त निसि दिवस नरेसा * आधा असह, शुक चलौ बिदेसा प्रिया ! सुनौ, कह शुक मृदु वानी * सीख न तब मैं रुचिकर जानी 5। सतयुग सों वन वसत मप्रीती * पीढ़ी मम पचास इत 1 हमहि' न दुख, दुख सर जग छाया * निरखि विपाद स्वयं नृप पावा जेहि थल जनम, मरन सोइ देसा * तब सिख उचित न त्याग स्वदेसा कह सारिका सुनौ शुक वाता * पापराज बसि निपाता श्वास रुद्ध जलविन गत पाना * चलि तट सिंधु करें जलपाना युगुल पच्छि जिमि व्यथा खाना * सुनि दसरथ तरुतर निज काना असत न कहेउ तपोधन वानी * खग निन्दति प्रतच्छ दर्सानी इन्द्र लवार, वचन थिर नाहीं * कहनि-करनि प्रतिकूल दिखाहीं वॉधि इन्द्र राखे अवध, रखु पितुजनक स्वधाम । कटे फन्द दीने वचन, पावस सतत ललाम ॥६२॥ परि इन्द्र पुनि, धरि अनि लायौ * तौ दसरथ-अजसुत न कहावौं भूपति पालिते राज्य चेष्टा नाहि करे * रात्रि दिन स्त्री लइया थाके अन्तःपुरे कप्ट पाइ आर कत थाकि अनाहारे * अतएव चल प्रभु जाइ स्थानान्तरे पक्षीराज वले प्रिये शुन मोर वाणी * तोमार वचने कि छाडिव अरण्यानी सत्ययुग हैते मोर एड् वने वाम * गोंयाइनु एड् बने पुरुप पञ्चाश समोर दुःख नहे दुःख हयेछे संसारे * एड् दु.खे आछे राजा दुःखित अन्तरे । एइ खाने जन्म मोर एखाने मरण * तोर चोले छाहिते नारिव एड् वन पक्षिणी वलये पक्षी शुन विवरण * पातकीर राज्ये थाकि हारावे जीवन जल विना श्वासगत व्याकुलित प्राण * समुद्रेर तीरे गिया करि जलपान एइ कथावार्ता तारा कहे दुइजने * वृक्ष तले थाकि ताहा दशरथ शुने राजा बले नारदेर वचन प्रत्यक्ष * पक्षी मोरे निन्दा करे पेये उपलक्ष । बुझिलाम इन्द्रराज वडइ चतुर * मुखे एक कहे से अन्तरे करे दूर मम पितामह सेइ रघुनाम धरे * इन्द्र प्रानि खाटाइल अयोध्यानगरे तवे आजि हय मम दशरथ नाम * इन्द्ररेवान्धिया आनि यदि निज धाम १ केवल हम पर हो । २ मिथ्या । ३ झूठा, वकवादी । ४ कहने और करने मे ।

२ कित सुरराजा - ११० कृत्तिवाम रामायण रजनी विगत, प्रभात अलोका * दुखित भूप, दोउ विहॅग विलोका कह शुक सुनु सारिका अपावन * अधम पच्छि किमि निन्दति राजन सुनेउ सकल दसरथ निज काना * सब्दवेध सर हरहि पराना । प्रान-मोह खग मन अति त्रासा * लिये डिम्ब' उड़ि चले अकासा भुज उटाय नृप विहग बुलावा * पुनि प्रबोधि मृदु वचन सुनावा अन्त न जाहु तजौ भय-संका * सुख मन मानि बसौ तरु-अका दोस न लेस तोर खगरानी * लहउँ चेत सुनि तव मतवानी कटहल-प्रामादिक जे, कानन * खगन-अधीन कीन ते राजन चले हेलि स्यन्दन सुरलोका * सभा अमरगन" भृप विलोका हुकार गर्जि महराजा * कहौ अमरगन । पुनि-पुनि समर हेत ललकारा * पूछेउ देव क्रोध कस धारा तुम सन रारि न सुरपति भावा * अनावृष्टि, नृप, जोगु सुनावा चौदह वर्ष अवध जल नाहीं * उपज न अन्न जीव विलखाहीं रजनी प्रभात करे राजा मनोदु.खे * प्रभात हइले राजा दुई पक्षी देखे , पक्षी बले पापिनी पक्षिणी शुन वाणी * राजारे निन्दिला केन हइया पक्षिणी से सकल दशरथ शुनियाछे काने * शब्दभेदी बाणे राजा मारिवे पराणे पक्षीर पराण फाटे एतेक बलिया * डिम्ब लये ठोंटेते आकाशे उठे गिया पक्षी पलाइया जाय पाइया तरास * ऊर्द्धबाहु करि राजा करेन आश्वास दशरथ वले पक्षी ना पालाप्रो डरे * फिरिया आसिया बैस वासार उपरे स्त्री वाक्ये अपराध नाहिक तोमार * तोमार वचने ज्ञान हइल आमार ॥ एइ वने यत आम्र कॉठालेर भार * आजि हैते दिलाम तोमारे अधिकार पक्षी सम्बोधिया राजा राखि वासा घरे * आपनि गेलेन परे इन्द्रर नगरे स्वर्गेते पाइया राजा देवेर समाजे * कोथा इन्द्र बलिया डाकेन देवराजे तर्जन करेन दशरथ महाराज * रणं देहि रणं देहि कोथा सुरराज देवेरा चलेन राजा क्रोध कि कारण * तव सङ्ग वासव ना करिवेक रण भूपति बलेन मम राज्ये नाहि वृष्टि * अनावृष्टि हेतु मोर नष्ट हैल सृष्टि १ अण्डे-बच्चे । २ वृक्ष की गोद मे । ३ ज़रा भी । ४ होश । ५ देवताओ की । मा ६झगडा । ७ पसद ।

. आदि काण्ड विनसत सृष्टि विकल जलहीना * नर, पसु, पच्छि, विटप, जलमीना पावस विन, नित सहत कलेमा * सकल करत अपमान नरेसा कै सुवृष्टि वरसैं जलद, अवध चराचर लोक । हरपैं, नतरु', न दोप मोहिं, लहौं जीति सरलोक ॥६३।। चले अमरगन जहँ मुरनाथा * सविधि वरन किय दसरथ-गाथा कौन ? सुरपुरी प्रवेमा * मनुज न भय ! किमि ? कहेउ सुरेमा अहंकार तजि तजि सुनौ पुरंदर' * नहिं निस्तार' भूप सन सगर" शब्दवेध संधान प्रवीना * इत रन मनहुँ प्रान उत दीना मिटै न जब लौ नृप मन-तापा * तिन सन करौ मधुर संलापा सुरन-सीख सुरपति हिय आनी * पाद अर्घ्य दसरथ सन्मानी । भूपति कहेउ, सुनहु सहसानन * मम पुर अनावृष्टि केहि कारन वृप रोहिणी दीठि शनि डारी * कारन अजल' कहेउ असुरारी करौ निवारन तालु नरेसू * महावृष्टि सरमै देस कान तव मम राज्ये वृष्टि नाहिं हय कोन काजे * अनावृष्टि हेतु यत प्रजागण मजे चौद्द वर्ष अनावृष्टि नाहि हय धान * प्रजागण दुःखे मोरे करे अपमान सुवृष्टि करिया सृष्टि राखुन सम्प्रति * नतुवा निनिया लब ए अमरावती एतेक शुनिया यान यत देवगण * इन्द्र के कहेन तर सब विवरण वासव बलेन राजा एलो कि कारणे * मनुष्य हइया निन्दे शका नाहि मने देवेरा बलेन इन्द्र त्यज अहङ्कार * राजार युद्ध ते कार' नाहिक निस्तार शब्दभेदी बाण राजा शब्द मात्रे हाने * तार सने युद्ध करि मरिव आपने यावत् मनेते राजा नाहि पाय ताप * राजार सहित कर मधुर अालाप देवतार वाक्य इन्द्र नाहि करे धान * पाद्य अर्घ्य दिया नॉर करेन सम्मान करिलेन दशरथ करि सम्बोधन * मम राज्ये अनावृष्टि हय कि कारण वासव बलेन राजा शुन एक चिते * पडिल शनिर दृष्टि रोहिणी नक्षत्रे छाड़ाइते पार यदि रोहिणीते दृष्टि * हइवे तोमार देशे तवे महावृष्टि १ या तो । २ नही तो । ३ इन्द्र । ४ पार पाना । ५ समर, युद्ध । ६ वर्षा का अभाव ।

पाय प्रथम घू मे पछारी ताप अनन्ता .... ११४ कृत्तिवास रामायण कुदीठ निस्तारा * सकेउ जो नृप आगम यहि वारा सारभौम रविकुल-मणि राजन * जन्मैं तब निकेत नारायन धर्मरूप ! सोइ हेन नृप, मम मक दी ठे निवार' । नतरु' दीठ-शनि परत छन, मकल होत जरि छार ॥६५॥ तासों मोरि कुदीठ निवारी * आवौ भृति सुनौ कथा, धरि ध्यान, पुरातन * जिमि गनेस पायउ गज-यानन सुनेउ जनम-मुत गौरि-निकेता * जुरे सकल रर दरमन हेता देव-समाज न शनि अवलोका * कहत, न रवि-गुत, देवि ! विलोका उमा दूत पठयेउ मम वामा * आयसु पाय चलेउ केलासा परत दीठि मम सुचन-गिरीसा' * लखेउ सवन उत शिशु विन सीसा ।। देव अवाक् शंभु मन चिन्ता * पारवती उर जस के तस, न सभा कोउ त्यागो * मम सुत मीस हरन को भागी कहत अमरगन हे जग-जननी * असुभ दीठि शनि के यह करनी शनि बले दशरथ आइले अावार * तुमि से अामार दृष्टे पाइले निस्तार दशरथ तुमि सूर्यवंशेर भूपण * लबेन तोमार घरे जन्म नारायण राज-चक्रवर्ती तुमि धर्म अवतार * ते कारणे मोर दृष्टे पाइले निस्तार मुदिया नयन शनि दशरथे बले * सम्मुख छाडिया तुमि एम पृष्ठमूले कोपदृष्टे सुदृष्टे याहार पाने चाइ * शरीरेर काज थाक हैया जाय छाइ पूर्व कथा कहि राजा ताहे देह मन * येमते शिवेर पुत्र हैल गजानन जन्मिलेन गणपति गौरीर नन्दन * देखिते गेन्तेन तथा यत देवगण देवगण चले देवी तोमार आदेशे * आइल सकल देव शनि ना आइसे । दूत पाठाइया दिल आमार गोचर * देखिते गेलाम पुत्र केलाय शिखर शुभ दृष्टे गिया येइ मुखपाने चाइ * सवे चले गणेशेर मुण्ड देखि नाइ ता देखिया देवगण हडल विस्मित * पार्वतीर मनोदु.खे महेश चिन्तित पार्वती चलेन हेथा आछे देवगण * आमार पुत्रेर मुण्ड निल कोन जन देवगण बलेन शुनह विश्वमाता * शनिर दृष्टिते भस्म गणेशेर माथा १ बच निकलना । २ नही तो। ३ शिव के पुत्र गणेश । ४ जिम्मेदार ।

हुकरी सोइ वर, आदि काण्ड १५ सुनि सकोपि रानि-वध मन हानी * लें त्रिशूल भवानी चहुँ, शनि फिरत, न आश्रय पावा * सुरन वीच लुकि, प्रान बचावा चण्डि-कोप, कर शूल कराला * निरखि देवगन हाल-किहाला विन, अगम, अकथ तब दाया * आदिशहि, जगगति, जगमाया शनि कुदीठ भव सीस विहीना * कौतुक वर माता तव दीना वरदा.यनि विपरीता' * शनिवध उचित न मातु प्रतीता स्वयं सिजे पुनि ताहि निपाती * तारा त्रान जगती केहि माती विनय गौरि सन कीन विधि', शनिवध कतहुँ न हेत । धरौ धीर, गनपति वदन', सिरजौ, करौं सचेत ॥६६॥ चलेउ पवन विधि आयसु पाई * लखेउ अबुध सोबत गजराई" उतर-सीस' जल गंग अघाना * निरखि मरुतः अवसर मनमाना काटि भाल-गज आनि बहोरी * नर-तन, मुख-कुञ्जर इमि जोरी । देवतार वात्य शुनि रुपिया भवानी * आमारे बधिते यान लये शूलपाणि पलाइया याइ आमि स्थान नाहि पाइ * देवतार आडालेते तखनइ लुकाइ शूल हस्ते आइलेन देवी महाकोपे * पार्वतीर कोप देखि देवगण कॉपे सकल देवतागण करिछे स्तवन * आपनि सृजिया शनि मार कि कारण तुमि आद्याशक्ति माता जगतेर गने * तोमार महिमा बले काहार शकति अापनि दियाछ वर परम कौतुके * शनि यारे देखे तार माया नाहि थाके पाझ्या तोमार वर तोमाने परीक्षा * तुमि यदि मार तारे के करिवे रक्षा शनिके मारह केन विधाता वलेन * स्थिर हो जीयाइव तोमार नन्दन आज्ञा करिलेन ब्रह्मा तवे पवनेरे * मुण्ड काटि प्रान येवा उत्तर शियर गङ्गा नीर खाइया इंद्रेर ऐरावत * उत्तर शियरे शुछिल निद्रागत काटिया ताहार मुण्ड आनिल पवन * रक्तमांसे डीगइल हैल गजानन शरीर नरेर मत वदन करीर * देखिया हाल बड इ.ख पार्वतीर १ गनि को स्वर भगवती से यह वरदान प्राप्त या कि उन्पी दृष्टि में आने ही वस्तु नष्ट हो जाय । अव उसका प्रयोग उन्ही के पुत्र पर हो जाने से, उन्हें अपने ही दिये व विपरीत, शनि पर कोप न करना चाहिये । इन प्रकार विनम्र देवनाओ ने निवेदन किया । २ ब्रह्मा । ३ मुख । ४ प्राणयुक्त। ५ ऐरावत । ६ उत्तर दिशा की ओर मिर रनकर । - AAA A ७तृप्त । ८ पवन, घायु।

नमा । ११६ कृत्तिवास रामायण रूप विहंगम तनय विलोका * कस गजवदन ? गौरि मन सोका आनि-देव-सुत-छवि मन मोहा * निज नन्दन निरखत मन छोहा विधि विधान दै, पुनि समझावा * तव सुत आदि - पून-पद पावा तजि गजवदन, इतर लुत धावै * धर्म, लोक - परलोक ऐरावत इत सीस विहीना * निरखि अपार इन्द्र दुख कीना उच्चैःश्रवा - दन्तिपति हीना * किमि सुरपति सुर-साज बिहीना अनिल' बहोरि विरञ्चि पठावा * श्वेत मतग' पछिम सिर पाना जोरेउ ताहि गजेन्द्र सरीरा * गजपति जियत, इन्द्र गत पीरा । बन्दि गौरि, पुनि सहित मतंगा * सुरपति चले सुरन ले संगा । गनपति जनम कथा शनि वरनी * दसरथ सुनौ दृगन मम करनी तैं मानव पुनि-पुनि पग धारा * किमि संभव कुदृष्टि निस्तारा मैं रविसुत, ते रविकुल जाया * मोइ कारन निवरेउ' नृपराया सकल देवेर पुत्र देखिते सुन्दर * गजमुख बसिवेक ताहार भितर विरिञ्चि बलेन करि गणेशेरे राजा * आगे गणेशेर पूजा पिछे अन्य पूजा गणेश थाकिते येवा अन्य देवे पूजे * पूर्व धर्म नष्ट तार हय सब काजे । ऐरावत मुखे जीयाइल लम्बोदर * हस्तीर शोके कान्दि कहे पुरन्दर उच्चैःश्रवा घोडा आर ऐरावत हाती * ए सत्र सम्पदे मम नाम सुरपति आज्ञा करिलेन चतुर्मुख पवनेरे * मुण्ड काटि प्रान येवा पश्चिम शियरे पश्चिम शियरे शुये श्वेत हस्ती यथा * पवन काटिया आनि दिल तार माथा प्राण प्ये ऐरावत गेल निज घरे * हेलाय आलस्य नाइ पश्चिम शियरे देवीरे प्रणाम करि गेल देवगणे * गणेशेर जन्म शनि कहिल राजने शुभदृष्टे कोपदृष्टे यार पाने चाइ * प्रामार दृष्टिते केह रक्षा पावे नाइ मनुष्य हइया तुमि एस बार वार * सूर्यवंशे जन्म हेतु पाइले निस्तार सूर्यवंश जात श्रामि सूर्येर कुमार * एक वशे जन्म तेइ पाइले निस्तार १ पवन । २ हाथी । ३ बच सके हो। & श्वेत हस्ती के पश्चिम दिशा की ओर शिर रखकर सोने पर शिरच्छेद होने के कारण पश्चिम की ओर शिर करके सोना वजित है ।

- तोप' भुवाला पानस पाय आदि काण्ड ११७ जो जाना जाना तव आगम हेतू * पूरन करौ भानु - कुल - केतू तव लोचन रोहिनि ग्रसित, विकल धरा, जल-हीन । भूए-मनोरथ जानि शनि, मुक्त रोहिणी कीन ॥६७॥ तजि विपाद गृह जाहु नरेसू * पावस अतुल भरइ तव देसू तव यश भूप त्रिलोक प्रकासी * जब जहँ रोहिनि गृह वृप रासी तहाँ न शनि आगम सोइ काला * लहि रविसुत -बर, दमरथ चले जहाँ सुरराजा * तहँ विराज विच देव समाजा गाथा, शनि - प्रसाद जिमि पावा * सकल सुरपतिहिं भूप सुनावा नोले वचन देव मन हर्पा * सात दिवस अविरल जल वर्मा धन बरसैं तब धाम नरेमा * यथाकाल तर देमा मनोरथ इमि नपराई * चले अवध मन मुद अधिकाई दशरथ के द्वारा अवमुनि के पुत्र का वध पुनि, 'पावत', 'दोण' अरु 'पुकर' * धन 'संवत' चारि जे जलधरले कि कारणे आसेयाछ तुमि मोर पाश * वर चाह तोमार पूराव अभिलाप तखन बलेन दशरथ यशोधन * रोहिणीते तत्र दृष्टि नहे परिपण शनि वले आजि हैते छाडेिव रोहिणी * अविलम्चे देशे चलि जायो नृपमणि ।। प्राजि हैते तब राज्ये हवे वरिपण * घोपिये तोमार यश ए तिन भुवन रोहिणी वृषभ राशि हत्रे येइ जन * सेइ राज्ये हवे ना आमार अागमन हड्या सन्तुः नुपे शनि दिल वर * चलिलेन राजा इन्द्र निकटे सत्वर सभाते बसिया इन्द्र सह देवगणे * दशरथ बसिलेन तॉर एकासने ! कहिलेन से सब वृत्तान्त पुरन्दरे * शनिके प्रसन्न करिलेन ये प्रकारे । शुनिया राजार कथा देवगण भापे - एक्षणे हइवे वृष्टि यात्रो तुमि देशे । सात दिन वृष्टि मात्र झड न करिव * तोसार राज्यते जल यथाकाले दिव विदाय हइया राजा गेलेन स्वदेशे * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवासे दशरथ कत्त क अन्धमुनिर पुत्र-वध अनुज्ञा करिल इन्द्र चारि जलधरे * सात दिन वृष्टि करे अयोध्या-नगरे निश्चर । ३ तृप्ति । ४ लगातार । इननगे वाले चार दादलो को त्योध्या में जल वरनाने की बाना इन्द्र ने दी। १ वर्षा।

. aai ॥ पुत्र - शोक १२२. कृत्तिवास रामायण दिवस उपासन किय जलपाना * असन' नीर दें राखहु प्राना दोउन गोहार, भूप मन त्रासा * संसय - वम न जात तिन पासा राना दशस्थ को अन्धक मुनि का शाप आगे बढ़त, हटत पिछलाही * सुत लखि मौन, अंध घबराही जनक - जननि सन कस उपहासा * जोतिहीन - हिय जोति प्रकासा । धरत ध्यान कौतुक मुनि देखा * धुनेउ सीस कर, रुदन बिसेषा दसरथ ! तव - सायक सुत घाला * शव समीप आनौ नरपाला "सुवन - विछोह प्रान तव जाहीं * इतर शाप मुख निकसत नाहीं दारुन अनुतापा * भोगौ नृप, इमि अंध विलापा तजब प्रान दोउ"; सुनि नरराई * शाप सरिस - वरदान' सुहाई सत द्विज - वचन फलवती मंसा" * मरौं भले, निरखौं अवतंसा विष्णु - तुल्य मुनि मोहिं प्रतीता * अमिट वचन तव, हर्ष अतीता कालिकार उपवासी करिव पारण * फल जल दिया चापू राखह जीवन दुइ जने डाक छाड़े - राजार तरास * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवास दशरथेर प्रति अन्धकेर अभिशाप 1 देखि दुइ अन्धे राजा सन्देह अन्तरे * याइते नारेन अग्रे पाछु यान धीरे कहिल अन्धक मुनि करिया विश्वास * किवा माता-पिता सने कर उपहास देखिते ना पाय मुनि वसिलेक ध्याने * सकल वृत्तान्त मुनि क्षणेकेते जाने चक्ष भासे नीरे करे कराघात शिरे * वजे राजा मारियाले पुत्रे एक तीरे मुनि बले एस दशरथ नरपते * मृत पुत्र प्रानिले आमाके देखाइते आर किवा दशरथ शापिव तोमाके * एइ मत तोर प्राण जावे पुत्रशोके पुत्रशोके मरिव आमरा दुइ प्राणी * पुत्रशोक' ये यन्त्रणा जानिये आपनि मुनि शाप दिल यदि राजार उपरे * दशरथ कहिछेन प्रफुल्ल अन्तरे शुभमस्तु मुनिवाक्य ना हइवे पान * देखिया पुत्रेर मुख जाय जावे प्राण तोमा मुनि देखि येन विष्णुर समान * तोमार वचन सत्य होक नहे आन तव शापे मुनि मम हरिष अन्तर * शाप नहे आमार हइल पुत्र-वर १ लघन, उपवास । २ भोजन । ३ पुकार । ४ आश्चर्य । ५ वियोग । ६ वरदान के समान । ७ मनोकामना । ܝܚܚܚ - -- आदि काण्ड १२३ सुत-वियोग किमि वर-सरिस ? लखेउ अंध धरि ध्यान । नृप-निकेत' जन्मैं स्वयं, कृपासिंधु भगवान ॥७॥ मम वर' सत्य, गेह' तव भूपा * चारि अंस हरि जनम अनूपा पुनि सोइ वचन शाप होइ लागी * पुत्र - विछोह मरौ तन त्यागी ग्यारह वर्ष विलसि सुत चारी * सुत-सूने तन तजौ दुखारी द्विज कर शाप अकारथ नाहीं * लोचन तजेउँ कोप - मुनि माहीं पूरुष शाप - कथा मम राई * सुनौ, नैन जिमि जोति गंवाई श्लीपद - पग त्रिजटा मुनि श्राये * पितु निकेत मम अलख जगाये पाद अध्यं पितु श्रासन दीना * कस द्विजनाथ श्रागमन कीना ? । भिक्षा हेतु, दिवस उपवासी * मुनिवर, मोहिं भोजन अभिलासी रिधिवत असन' अतिथि पितु दीना. सविनय विदा तपोधन कीना कहेउ तात', हे सुत अनुमरहू * मुनि-पद वंदि दण्डवत करहू पग स्थूल, घृणा, लखि जागी * लेउँ तासु - रज किमि अनुरागी अन्ध बले दशरथ कञ्चत सन्ताने * पुत्रशोके शाप दिनु वर करि माने, ध्यान करि जानिल अन्धक तपोधन * इहार घरेते जन्मिवेन नारायण याह राजा तोमारे दिलाम आमि वर * चारि पुत्र तोमार हवेन गदाधर मम शापे पुत्रशोके तोमार मरण * पुत्र हैल एकादश वत्सर जीवन व्यर्थ नाहि हय कमु मुनिर वचन * मुनिर शापेते अन्ध श्रामार लोचन पूर्व कथा कहि राजा ताहे देह मन * ये शापे हइल मम अन्ध ए लोचन त्रिजटा मुनिर दुइ चरण डागर * मागिते अाइल भिक्षा मम पितृघर 1 मुनिरे देखियो पिता उठिल तखन * पाद्यअर्घ्य देन तारे वसते आसन- जिज्ञासा करेन तार केन आगमन * मुनि बले आइलाम भिक्षार कारण- गतकल्य हते आमि प्राछि उपवासी * भोजन कराह मोरे तुम महाऋपि अतिथि बलिया पिता करान भोजन * विदाय हइया मुनि यान तपोवन पिता आसि श्रामारे कहेन सेइ काले * दण्डवत् करह मुनिर पद तले- गोदा पा देखिया तॉर घृणा हैल मने * एमन पायेर धूला लइव केमने १ घर । २ वरदान । ३ गृह । ४ न होने पर । ५ पूर्व जन्म की । ६ परमात्मा के नाम पर पाचना करना । ७ भोजन । ८ पिता । । F दृग " १२४ 'कृत्तिवास रामायण नयन मूदि रज मीस चढ़ावा * 'एवमस्तु' मुनि वचन सुनावा कथन महा अमिट फल दीना * भये अंध जोति-विहीना सोइ अपराध, दीठि-तिय 'लोना # गमन तपोधन कानन कीना ।। असिस' समान, शाप अनुकूला' * नप तव गेह जनम जगमला सुफल सत्य पालन नराई * रचौ यज्ञ ऋपि 'शृंग' बुलाई श्रीफल पायेउँ बर्न फिरत, तव अर्पन नरनाथ । चरु दीन्हे फल दिव्य सों, 'प्रग दीनानाथ ||७२।। करुन बैन पुनि अन्वक भांपा * लाबहु सुत शव, कित नृप राखा ? दसरथ धरी आनि मृत काया * लोटत छिति बिलखत मुनिराया , नैन विहीन, न निरखत देहीं * परसत कर, सुअंक भरि लेही बहु तप किये, लहेउँ तोहिं ताता * जनक - जननि घालक तव घाता पुरवत फल-जल छुधा-पिपामा * अंधक-नयन, अंधि कर आसा गुरुनिन्दा कुतर्क अधमूला" * दधि-तन्दुल न असन प्रतिकूला' लइलाम नयन मुदिया पद -धूलि * आशीर्वाद दिल मुनि एवमस्तु बलि व्यर्थ ना हइल सेइ मुनिर 'वचन * इहाते हइल अन्ध आमार लोचन सेइमत करिलेक आमार गृहिणी * दोहारे करिया अन्ध घरे गेल मुनि आमार शापेते राजा 'पाइले प्रमाण * शापे वर हइल हइवे पुत्रवान एइ सत्य दशरथ करिवे पालन * ऋष्यशृङ्गानि कर यज्ञ आरम्भन श्रीफल पेयेछि प्रामि भ्रमिते कानन * एइ फल करिलाम तोमारे अर्पण एइ फले जन्मिवेन देव चक्रपाणि * चरुर भितरे एइ फल दिनो तुमि पुनश्च कहेन मुनि तारे मृदु स्वरे * कोथा पाछे सिन्धुपुत्र आनि देह मोरे मृतपुत्र दशरथ दिलेन आनिया * पुत्र कोले करि मुनि कान्दे लोटाइया नयन विहीन मुनि देखिते ना पाय * कोलेते करिया हस्त शरीरे बुलाय जन्मिला ये पुत्र तुमि तपेर सञ्चारे * तोमार मरणे मृत्यु घटिल आमारे अन्धेर नयन तुमि हये छिला जानि * फल दिते क्षुधाय तृष्णाय दिते पाणि गुरुनिन्दा नाहि करि नहे सन्ध्यावाद * दधिर संयोगे रात्रे नाहि खाइ भात १ ऐसा ही हो। २ आशीर्वाद । ३ 'माफिक । ४ यज्ञ के हवन के लिये तैयार किया १ अन्न या खीर । " पाप को जह । ६ दही-भात जसे उलटे भोजन । - ३ 1 आश्रम, त्राना आदि काण्ड १२५ कवौं न मन दिय पाप-अचारा * निधन' अकाल सुवन कस डारा कैधौं विगरि.. पुरातन करनी * सुत-विछोह भोगत पितु जननी 'नारायण' कहि,, सन्तति-सोका * तजि तन, मुनि गमनेउ हरिलोका जीवन दुमह, सती . पतिहीना * अन्धकि अन्ध-अनुगमन कीना दसरथ लै पुनि .. मृतक सरीरा * चन्दन अगरु चिता के तीरा आस-पास पितु जननि सोचाये * चीच 'सिंधु'-शव भूपति लाये उत्तर शीम-शव अनल लगाई * परमि नीर सर, अस्थि बहाई लिये कंध मुनि-घातक पापा * गये अवध नृप, हिय संतापा चले बहोरि वशिष्ठ निकेता * भेंट न, गुरु गुरु गमने तप-हेता वामदेव गुरुनन्दन' * सकल कथा भूपति किय वरनन मुनिकुमार-वध पाप सन, उबरौं कौन उपाय ? गुरुनन्दन ! अायसु करौ, जासों पाप नसाय ॥ ७३ ॥ वध अकाल, नृप पाप महाना * यज्ञ-दान कीने नहिं शास्त्र, पुरान मनीपि विचारी.* वालमीकि जिन मंत्र उबारी" पूर्वजन्मे कार कि करेछि विघटन * गुरुनिन्दा करेछि हरेछि स्थाप्यधन एतेक वलिया मुनि नारायण डाके * नारायण मन्त्र जपि भरे पुत्रशोके पतिव्रता नाहि जीये पतिर मरणे * अन्धकी छाडिल प्राण अन्धकेर सने तिन मन लये राजा गेल सरो रे * अगुर चन्दन काष्ठ आनिल सादरे करिलेन चिता राजा उत्तर शियरे * तिनजने शोयाइल ताहार उपरे 1 दुइजन दुइदिके पुत्र मध्यखाने * शोयाइल तिन जने वेष्टित प्रागुने चिता प्रक्षालिया सेइ सरोवर तीरे * कान्दिया फेरेन राजा अयोध्यानगरे मुनि हत्या करि राजा अजेर नन्दन * अमनि कान्दिया गेल वशिष्ठेर वन गियाछेन वशिष्ठ तपस्या करिवारे * वामदेव पुत्र तार पाछेन श्रागारे सकल वृत्तान्त राजा कहिलेन तारे * मुनिहत्या करियाछि वनेर भितरे प्रायश्चित्त इहार कराओ महाशय * कि रूपे हइव मुक्त किसे पाप क्षय मुनि वले अकोलेते नाहि यज्ञदान * एइ पापे कैमने पाइवे परित्राण विचार करय मुनि अगिम पुराण * वाल्मीकि ये मंत्र जपि पाडलंन बाण १ मृत्यु । २ या, फिर । ३ वशिष्ठ के पुत्र । ४ आयुष्काल विना पूरा हुए । ५ उद्धार किया। H - ܝܚܘܿܪܚܵܫܚܚܫܳܕ݂ܝܫܺܝܬ݁ܫܺ - १२६ कृत्तिवास रामायण नाम : 'त्रय वार कहावा * सकल पाप सोइ नाम नसावा पाप-छीन, गृह भूप सिधाये * साँझ वशिष्ठ तपोवन आये फलाहार, सुस्थिर, मन मोदा * सुत-पितु रत दोउ वाग्-विनोदा वामदेव पुनि अवसर पाई * कथा भूप-आगमन सुनाई सुवन अंधमुनि सिन्धु बखाना * सब्दवेध दसरथ संधाना अबुझ घात द्विज, नृप अतिदीना * नसै पाप किमि, याचन कीना याग, दान, तप, यतन न भावा * तीनि चार नप 'राम' कहावा तपत तैल उफनत लहि बारी' * अनल-कोप मुनि गिरा उचारी 1 रसना' 'राम' एक पद लाई ॐ कोटि घात-द्विज पाप नसाई । सो त्रय वार भूप मुख आनी * कस मम तनय ? निपट अज्ञानी ।। तजि वन, अधम खपच गति जाई * पितु-पग मुनिज' धरे अकुलाई कहौ तात ! किमि शाप विमोचन ? * थिर न रोष बहु, कहेउ तपोधन दसरथ अनघ' मंत्र' 'दिय नामा * जनमैं अवध धाम सोइ रामा तिन बार बलाइल सेइ . राम-नाम * पाइलेन भूपति से पापेर विराम राजा मुक्त हइया गेलेन निज घर * आइलेन संध्याय - वशिष्ठ मुनिवर फलमूल भक्षणे, मुनिर, सुस्थ मन * पिता पुत्रे कथा वार्ता कन दुइजन पितारे कहेन वामदेव नीतिक्रमे * दशरथ आसिया छिलेन ए आश्रमे अंधक मुनिर पुत्र सिन्धु बले यारे * मारिलेन राजा शब्दभेदि शरे तारे दीनभावे कहिलेन राजा ए वचन * मुनिहत्या पाप मोर कर विमोचन योगयाग स्नान दान नाहि करालाम * तिन वार राजा के बलानु रामनाम जल फेलाइया येन दिल तप्त तैले * कुपिया वशिष्ठ मुनि पुत्र प्रति बले । एक रामनामे कोटी ब्रह्महत्या हरे * तिन बार रामनाम - वलालि राजारे मोर पुत्र हैया तोर- अज्ञान विशाल * दूर हरे वामदेव हबिरे चण्डाल लोटाइया धरिल से पितार चरण * केमने हइब मुक्त कहः विवरण ना थाके मुनिर मने कोप बहुक्षण * बलिलेन ताहारे वशिष्ठ तपोधन येडू रामनाम तुमि बलाले राजारे * तिनि जन्मिवेन दशरथेर आगारे ११ उबलते तेल में जल पड़ने पर उफान आने के समान । २ जीभ । ३ मुनिपुत्र । ४ निष्पाप ।

उतै सुर साजा आदि कण्ड १२७ सुरसरि मग रघुनाथ विलोकी * परसहु पद-पंकज पथ रोकी वामदेव, पितु सीख सुनि, श्वपच-योनि निस्तार । लियेउ जनम गुह-गेह, नित जोहत' अवधदुलार ॥७॥ सम्बर असुर का वध तपत इन्द्र सम दसरथ वीरा * संबर-असुर पीरा वैजयन्ति अमरावति जीती * वसत न तहँ सुरवृन्द सभीती यतन सोधि कछु कहौ विधाता * कह सुरेस, किमि दनुज निपाता जो पानहु दसरय रनका * सोइ कर संवर-मरन न संका। स्वयं इन्द्र किय अवध पयाना * आसन-अर्घ्य भूप सन्माना सुनौ अथवरति ! सुरगन त्रासा * सुरपुर संवर संबर दैत्य प्रकासा जीति स्वर्ग, संकट मोहि डारी * तुम मम सुहृद सकौ सो टारी तव सहाय, वध निसिचरनाथा * तत्र प्रसाद सुर होय सनाथा सुरपति विदा, बजे रनवाजा * संवर-हित. दसरथ दल गङ्गास्नाने रघुनाय यावेन यखन * आगुंलिश्रो पथ तुमि रामेर तखन तहार चरणपद्म करिह स्पर्शन * तखनि हइवे मुक्त चण्डाल जनम बनिलेन एइ रूप वशिष्ठ महामुनि * गुहक चण्डाल हैया रहिलेन तिनि कृत्तिवास पण्डितेर कवित्व विचक्षण * आदिकाएडे गाहिलेन अंधकोपाख्यान सम्बर असुर वध राज्य करे दशरथ येन पुरन्दर * हइल असुर स्वर्गे नामेते सम्बर हद्दल सम्बर सर्व देवतार अरि * जिनिल अमरावती वैजयंतीपुरी तार भये स्वर्गे देव रहिते ना पारे * महेन्द्र बलेन ब्रह्मा बॉचि कि प्रकारे ब्रह्मा वलिलेन प्रान राजा दशरथे * असुर सम्बर मरिवेक तॉर हाते श्रापनि आइल इन्द्र अयोध्या नगरे * पाद्य अर्घ्य दशरथ पूजे पुरन्दरे इन्द्र बले दशरथ तुमि मोर मित * ठेकेछि सटे रक्षा कर एड हित असुर सम्बर नामे तारे श्रामि हारि * खेदाड़िया देवगणे निल स्वर्गपुरी आमार सहाय हैया यदिः कर. रण* तोमार प्रसादे तवे चाँचे देवगण एतेक बलिया इन्द्र गेलेन स्वर्गेते * सम्बर मारिते तो साजे दशरथे १ मोक्ष पाने लिये । २ राम्ता देखना । ३ क्योध्या के लादले राम । ४उन्ही के हायो। 11 ܚܝܚܪܪܚ . १२८ कृत्तिवास रामायण साजु-साजु-चहुँ दिसि रणरंगा * मत्त-मतंग समीर-तुरंगा । मुद्गर मूषल कसत कमाना * स्यन्दन शूर सजत' धनुबाना ओर-छोर नहिं कटक अनन्ता * कटक धूरि नभ छुवत दिगन्ता शिरस्त्राण' कञ्चुकि हरि-मण्डा' * नृप साजे कर सर-कोदण्डा दिव्य तुरग सारथि रथ साजा * चलेउ पवनगति भूप-समाजा चढ़े अवधपति संबर कारन * डगमग त्रिभुवन धीर न धारन कैतुक चली अनी चतुरंगा * गज पैदर रथ-रथी तुरंगा अमरावति उतरेउ कटक, दसरथ अवधमहीप । निरखि सैन कोपेउ अतुल, संबर दनुज-अधीप ॥ ७५ ॥ विन्धि सरीर, बान झर लाये * असुर, सैन सों नप बिलगाये ।। नृप असैन, सर कोपि चलावा * दानव-दल हनि विपुल नसावा आयुध विविध बुन्द झरि लाई * गगन पाटि सर, पथ न लखाई साज साज बलिया पड़िया गेल साड़ा * राहुत माहुत साजाइल हाथी घोड़ा मुद्गर मूषल केह बान्धिल कामान * धानुकि साजिल रथे लये धनुर्बान साजिछे कटक सब नाहि दिशपाश * कटकेर पदधूलि लागिल आकाश गायेते परिल सोना माथाय टोपर * धनुर्बाण हाते राजा चलिल सत्वर दिव्य अश्व योगाइल रथेर सारथि * रथे चड़ि दशरथ चले शीघ्र गति सम्बरे जिनिते राजा करिल गमन * दशरथे देखिया कॉपिल त्रिभुवन चतुर्दोले चड़ि राजा चले कुतुहले * रथ रथी पदाति तुरंग हाती चले उत्तरिल गिया राजा इन्द्रेर नगरी * देखिया राजार साजे क्रोधे देवअरि दशरथे गाणे विंधे करिया जर्जर * भंग दिल सेना राजा रहे एकेश्वर कोपे काँपे दशरथ पूरिल सन्धान * अस्त्राघाते दैत्यसेना त्यजिल पराण नाना अस्त्र चर्षण करेन दशरथ * छाइल अमरावती पवनेर रथ सम्बरेर सेनागण समरे समरे प्रखर * भूपतिर सेना बिन्धे करिल जर्जर लनलक्ष बाण पूरे सम्बरेर , सेना * पडिलेक स्वर्गपुरी छाइया झञ्झना ܚܚ १ फौजी टोप । २ कवच । ३ सुवर्ण से मढ़ा हुमा । ४ धनुष-बाण । ५ दशरथ को उनकी सेना से अलग कर दिया।

सर-गंधर्व राकम आदि काण्ड १२६ समर चटक दानव दल चीरा * अवध-भटन किय विद्ध सरीरा लख-लख अस्त्र, अनुर बरसाये * सुरपुर नभ रञ्जित, चहुँ छाये भूप संधाना * श्रद्धल अस्त्र त्रिभुवन नहिं जाना सर उपजे त्रिकोटि गंधर्वा * मरहिं परस्पर कटि रिपु सर्वा निसिचर सर निसिचर तकि मारी' * सकल दनुज एक वान सँहारी रुधिर-नदी उतराही * त्राहि-त्राहि संवर-दल माही दसरथ रन विछांय रिपु दीना * बचेउ दनुजपति दनुजपति सैनविहीना तकि तकि बानवृष्टि दोउ करहीं * सरन पाटि सुरपुर दोउ लरहीं सरमण्डित नभ, तम चहुँ ओरा * अलख२ दैत्य गर्जन-रव घोरा शब्दवेध परवीन विशेखा * तिमिर-अलोप दनुज नहिं देखा भावी प्रबल काल तेहिं घेरा * कछुक दरि किय सोर घनेरा बँचउ चापा * सायक चलेउ अगिनि सम तापा गिरेउ धरनि कटि संवर-माथा * कौतुक असुरघात नर-हाथा! शब्द ताकि नृप N , पडिल गन्धर्व अस्त्र भूपतिर मने * एमत अस्त्रेर शिक्षा नाहि त्रिभुवने एकवाणे प्रसवे गन्धर्च तिन कोटी * आपना पनि रिपु करे काटाकाटि आपना श्रापनि करे त्राण परिपण * एक बाणे पहिलो सकल सेनागण सम्बरेर सेना देय रक्तते सॉतार * त्राहि त्राहि डाक छाड़ि कर हाहाकार पडिल सकल सेना दैत्य एकेश्वर * दशरथ वाणे सेना पडिल विस्तर दुइजने वाणवृष्टि करे झॉके-झाँके * उभयेर बाणेते अमरावती ढाके हइल अमरावती वाणे अन्धकार * दैत्येर रणेते राजा ना देखि निस्तार शब्दभेदी दशरथ शब्द शुने हाने * देखिते ना पाय देत्य थाके कोनखाने कालप्राप्ति दानवेर निकट मरण * रे थाकि दशरथे करिछे तर्जन सम्बरेर पेये शब्द राजा पूरे वाण * छुटिल राजार चाण अग्निर समान एहिलेक वाण राजा तार शुने कथा * काटि पाड़े दशरथ सम्बरेर माथा 1 नर हैया मारिलेक असुर सम्बर * देव सह सुखे राज्य पाले पुरन्दर १ गवं-बाग के प्रभाव में रामल स्वय एक दूसरे को भरने लगे २ प्य पाप अन्धक-कथा प्रथम १३० कृत्तिवास रामायण सुरन सहित सुरपति सरग, बोलत हिय होय । माँगहु वर मनवाञ्छित, नृप ! तुम भयेउ सहाय ॥ ७६ ॥ प्रानि न वर चाहौं सहसानन * मेटौ अन्धसुत-मारन कहेउ इन्द्र हँसि, गवनहु देसा'* सो अघ' तोहिं न लेस अवसेसा कुतूहल बरनी * जनक तासु द्विज, सूदिन जननी* संवर के साथ युद्ध करने में हुए घावो को अच्छा कर देने पर राजा का कैकेयी को घर देने की प्रतिज्ञा मिटेउ छोम सुनि, नृप गृह आये * सुहृद तात परिजनन सुहाये सर्वप्रिय कैकयि-धामा * अनलुत सुखद लीन विश्रामा अस्त्र-सजीवनि कला प्रवीना * कैकाय छत-सरीर चित दीना जल अभिमंत्रि भूप तन डारी * सुखद सकत सोइ व्यथा निवारी ॥ सिथिल-गात पुनि जीवन अावा * कैफयि-जतन प्रान तब समान प्रिय मोहिं न आनू * मनवाञ्छित मॉगहु वरदानू इन्द्र बने दशरय रक्षा कैले मोरे * वर माग दिव याहा प्रार्थना अन्तरे 5 दशरथ बले इन्द्र देह एइ वर * येन मुनिहत्या नाहि थाके ममोपर शुनिया राजार कथा इन्द्रदेव हासे * से पाप तोमाते आर नाहि जानो देशे अन्धक मुनिर कथा अपूर्व काहिनी * ब्राह्मण ताँहार पिता शूद्राणी जननी एतेक शुनिया दशरथ आसे देशे * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवासे सम्बर-सह युद्धे क्षत हओयाय कैकेयीर आरोग्य करिते राजार वर दिवार अङ्गीकार पात्र मित्रगणे राजा दिलेन मेलानि * अन्तःपुरे दशरथ चलिल अमनि सवार अधिक भालवासे कैकेयीरे * सेइ हेतु आगे गेल कैकेयीर घरे अस्त्र सञ्जीवनी विद्या जानेन कैकेयी * देखिल राजार तनु अस्त्र-क्षतमयी 1 मन्त्र पड़ि जल दिल भूपतिर गाय * ज्वाला व्यथा गेल दूरे शरीर जुड़ाय मृतदेहे येन पुन: आइल जीवन * सुस्थ ह'ये दशरथ बलेन तखन हे कैकेयी प्राणरक्षा करिले अामार * तोमार समान प्रिये केह नाहि प्रार १ पाप । २ घायल शरीर । ३ अन्य । 8 'ब्राह्मण पर श्रद्धा' का यह अतिरेक है । शूद्रा से जन्मे अन्धमुनि का भी श्राप 11 दशरथ को भोगना पडा–व्यर्थ नहीं हुआ । ( हिन्दीकार ) अदेय, प्रान लौं आदि काण्ड १३१ नहिं पूरन भएडारू * धन सम्पदा अमित आगारू नाम मंथरा, कैकयि कैरी * कूबर भार पृष्ठ, सोइ चेरी कूवर कुटिल बुद्धि के रासी * कहेउ बोलाय, रानि, सोइ दासी मुदित भुशाल वचन वर दीना * मम हित सुमति कही परवीना वचन-बद्ध भृपति करि लेह * अवसर परे मॉगि वर लेहू दासि-वचन वैक्सी प्रमाना * पुलकि भूप-ढिग कीन पयाना । नाथ आज वर मोहि न हेता * देहु वचन इमि कृपानिकेता करौं विनय अत्रमर परे, मन-उपजी अभिलाप । तब लौ वर मञ्चित रहैं, नरपति-वचन न माप ॥ ७७ ।। सुरखि ! चहौ तव अवसर लागी * पुरवो वचन त्यागी व्याध-फन्द मृग फसत अजाना * निरखि समाज-देव हरपाना सोइ पितु-वर पानन वन जाई * कह विधि रावन-वध रघुराई दसरय-राज अनन्द घनेरा * सुख प्रतिपाल वर मागि लह येवा अभीष्ट तोमार * कोन धन भाण्डारते नाहिक आमार एत यदि बलिलेन राजा दशरथ * कैकेयी कुँजीके कहे वाक्य अभिमत महाराज श्रामारे चाहेन दिने वर * किवा वर मागि लव तॉहार गोचर पृष्ठे भार कुँजेर नाड़िते नारे चेही * कुंज नहे ताहार से बुद्धिर चुपड़ि कुंजी बले एक्षणे नाहिक प्रयोजन * इच्छा हवे नवे वर बलिव तखन । कैकेयी कुंजीर वाक्य ना करिल अान * हासिया कहिल राणी राजा विद्यमान महाराज आजि वर नाहि प्रयोजन * यस्न घटिवे कार्य मागिव तसन आमार सत्यते बन्दी रहिले गोसाइ * प्रयोजन अनुसारे वर येन पाइ नृपति चलेन दिव याह चावे दान * श्राहक अन्येर काज दिव निज प्राण कैकयीर कपटे अमरगण हासे * नाजानिया मृग येन बन्दी हैल फासे ए सत्य पालिते राम याइवेन चन * विरिञ्चि लेन तवे मरिने रावण राज्य करे दशरथ हरिपत मन * करेन पुत्रेर मत मजार पालन यखन या हवे ताहा देवे सब करे हइल राजार व्रण नखेर भितरे कृत्तिवास कहे कथा अमृत समान राम-नाम विना तार मुखे नाहि प्रान प्रजागन केरा ܙܝܝܝ - सुवन-धन्वंतरि, man १३२ कृत्तिवास रामायण दशरथ का नखत्रण अच्छा करने पर कैकेयी को दुबारा वर देने की प्रतिज्ञा रिद्धि-सिद्धि भरपूर भुआला * नखबन' विथा उपज एक काला कातर अतिव । दुसह बनपीरा * कहेउ बोलाय सुहृदगन तीरा यहि कलेस मम: मरन समीपा * लखत भानुकुल रहित - महीपा तबाह नामा * 'पद्माकर' किय नृपहिं प्रनामा । मिटै व्यथा, नहिं संसय राऊ * वरनउँ ताफर युगुल उपाऊ घृनारहित शामुक रसपाना * करइ स्वयं साधन हित - प्राना नतरु आनि जन कोउ नृप हेता * नखान-रक्त पूय, रस, जेता । मुख सन चूसि हरै नपपीरा * कैकइ सुनेउ, वसत नित तीरा पति विषाद, सो सतत' निहारी * अहिनिमि से ये करत उपचारी तिय-गति कतौं न पति विन, नाथा * चूसौं मुखवन, होउँ सनाथा मम अधिकार, भूप मम - धामा * नखवन मुख धरि पुलकित वामा परसत पीरा * विगत व्यथा, नप स्वस्थ सरीरा दशरथेर व्रण आरोग्य करिते कैकेयी के पुनार वर दिते अङ्गीकार व्रणेर व्यथाय राजा हइल कातर * पात्र मित्र आनि राजा बलिल सत्वर ए व्यथाय बुझि मम निकट मरण * सूर्यवंशे राजा हय नाहि कोन जन धन्वन्तरि पुत्र एक पद्माकर नाम * श्रासिया राजार काछे करिल प्रणाम कहिलेन शुन राजा पाइवे निस्तार * दुइ मते आये इहार प्रतिकार शामुकेर झोल खायो ना करिया घृणा * नहे नखद्वारे चुम्घ दिक एकजना रक्त पूये झरितेछे नखेर दुयारे * ताहाते चुम्बन दिते कोनजन पारे कैकेयी राजार काछे दिवानिशि थाके * राजा यत दुःख पाय कैकेयी ता देखे रानार शुश्रूषा राणी करे रात्रिदिने * कहिल कैकेयी राणी राजा विद्यमाने स्वामी विना स्त्रीलोकेर अन्यनाहिगति * व्रणे मुखदिव यदि पात्रो अव्याहति यार घरे थाके राजा तार दाय लागे * कैकेयी चुपिल गिया दशरथ आगे पाकिया आछिल सेइ नखेर वरण * मुखेर अमृत लागि गलिल तखन सुस्थ हइलेन राजा व्यथा गेल दूरे * रक्त पूंय फेलि देह बले कैकेयीरे १ नाखून का घाव, विपहरो । २ घोवा । ३ सदैव । ४ दिनरात । रानि - सुधामुख " गान शाप-अंध वर सरिस श्रादि काण्ड १३३ रुधिर-पूय तजि, सुमुखि ! लिय पान कपूर सुवास । अन्य रानि तै, मॉगु वर, मनवाञ्छित अभिलास ।। ७८ ॥ दोउ वर धरहु अमानत' राई * याचहुँ सोइ पुनि अवसर पाई दसरथ विहंसि अनुमती दीना * कृत्तिवास प्रवीना राजा दशरथ को पुत्र के लिए शृंगी ऋपि को चुलाकर यज्ञ करने की चिंता तथा उक्त मुनि की उत्पत्ति-कथा बहु वत्सर राजन-अधिराजू * एक छत्र सुरपति सम साजू एक दिवस नृप सभा विराजा * परिजन सुहृद सगोत समाजा १ मुनि अमात्य चहुँ सचिव सुहाये * सर्वाधिय वशिष्ठ तह तहँ आये भूपति तहें हिय-छोभ प्रकामा * गत अतिकाल, न सन्तति श्रासा तर्पन, पिण्ड न गति-परलोका * बाद बंसरवि बंसरवि अस्त विलोका नवम सहस मम आयु वितीता * तबहुँ न दरस तनय कर कीता बताई * होय याग ऋपि शृंग वुलाई कपूर ताम्बूल प्रिये करह भक्षण * वर लह याहा चाह दिव एइक्षण कैकेयी वलेन शुनि राजान वचन * यखन मागिव वर दिनो हे तसन दुइ बारे दुइ वर थाक तब ठाँइ * पश्चाते मागिव वर एखन ना चाइ शुनिया राणीर कथा दशरथ हासे * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवासे दशरथ पुत्रेर जन्य ऋष्यशृङ्ग के आनिया यन्न करणेर चिन्ता ओ उक्त मुनिर उत्पत्तिते-कादिनी। राज्य करे दशरथ अनेक वत्सर * एकछत्र महाराज पात्र मित्र भाइबन्धु सबाकारे आनि * वशिष्ठादि अाइ लेन यत महामुनि सभा करि बसे राजा अमात्य सहिते * अति खेद करि राजा लागिल कहिते इहकाले ना हइल प्रामार सन्तति * परकाले कि रूपे पाइब अव्याहिति सन्तति थाकिले करे श्राद्धादि तर्पण * आमार मरणे बंशे नाहि एक जन नवम हाजार वर्ष वयस हइल * एतकाले तयू मम पुत्र ना जन्मिल वर दियाछेन श्रीअन्धक महामुनि * यन कर तुमि ऋप्यभृङ्ग मुनि आनि १ धरोहर । २ वन्युगण । ३ अथक मुनि का शाप । येन पुरन्दर पठावा - १३४ कृत्तिवास रामायण तिन अागम पूरन मम कामा * कहौ कितै शृंगीऋपि घामा गुरु वशिष्ठ कह, कोसलनाथा * सुनौ शृंगि ऋपि-उतपति गाथा । तपत विभाण्डक मुनि परतापा * तासु शाप-भय त्रिभुवन कॉपा मुनि तप अतुल, इन्द्र भय छावा * तप-विछेप' हित पत्रन । नीर-नर्मदा मुनि तपलीना * सोइ पथ गमन उर्वसी कीना लखेउ गगन उर्वसी, समीरा * करि उर जतन उघारेउ चीरा दैवयोग मुनि सोइ तन देखी * लगेउ पञ्चसर मोह विसेखी रेतपात, लिय वाम कर, तजेउ न सरिता-नीर । धरेउ कूल" ढिग रेत सोइ, आकुल सिथिल सरीर ॥ ७६ ।। शुचि आचमन विभाण्डक कीना * भये तपोधन पुनि तपलीना विधि रचना नहिं मिट मिटाई * तृषित मृगी तह जलहित आई पयत पानि, तट ब हरेरी * लागि चरन, मन लोभेउ हेरी तहँ मुनि-रेत घास लपिटानी * हरिनि-उदर सोइ चरत समानी मृगी ऋतुकाला * धरेउ गर्भ विधिगती विसाला ऋष्यशृङ्ग मुनिवर कोन देशे बसे * कार्य सिद्धि हय यदि सेइ मुनि आसे कहिते लागिल ये वशिष्ठ महामुनि * शुनह ऋष्यशृङ्गार उत्पत्ति काहिनी विभाएडक मुनि भये सर्व्वलोक कॉपे * त्रिभुवन भस्म हय यदि मुनि शापे ताँहार तपस्या देखि इन्द्र भावे मने * पाठाइया दिल इन्द्र देवता पवने तपस्या करेन मुनि नर्मदार जले * ऊर्वशी चलिया जाय गगनमण्डले अङ्गर वसन तार वातासेते उड़े * दैवयोगे तॉर दृष्टि तारे गिया पड़े ताहाके देखिया मुनि कामे अचेतन * मुनिर हइल रेत: पतन तखन आस्ते व्यस्ते मुनि ताहा धरे वाम हाते * जले ना फेलिया रेतः फेलाय कूलेते पुनर्बार महामुनि करि आचमन * तपस्या करेन विभाण्डक तपोधन विधिर लिखन कभु ना हय खण्डन * तृष्णाय हरिणी जल खाय सेइ क्षण जल खेये हरिणी कूलेते घास चाटे * घासेर सहित रेतः सान्धाइल पेटे दैवयोगे हरिणी आछिल ऋतुमती * मुनि वीर्य खाइया हइल गर्भवती १ विघ्न । २ वायु । ३ हटा दिया । ४ वीर्य पात ! ५ किनारे । रेत-अहार, अादि काण्ड १३५ बढत गर्भ, पशुवत पशुवत पटमासा * मृगी कियो मनु प्रसवि प्रकासा बन-बन फिर मनुज-भय पाई , सो रिपु-जनम गर्भ मम आई ।। गमनी वन, अनाथ, मिसु डारी * चूमत अँगुरि रुदन पथ भारी सोइ मग · गमन विभाएडक कोना * रोवत सुवन दीठि मुनि दीना निर्जन वन, शिशु गात निहारा * हरिनि-बदन' अरु मनुज अकारा धरत ध्यान सब लखेउ तपोधन * ान न हरिनि-गर्भ मम नन्दन मुनि लै अंक गमन बन कीना * सुत मधुपुहुप पोषि बल दीना नूतन-कुम-कोमल सुत सयना * दिन-दिन बढ़त महामुनि-अयना । शास्त्रनिपुन, छवि छवि अतुल कुमारा * शृंग गुल्म युग मस्तक धारा । श्रृंग समय गति उभरे भाला' * सोइ विभूति ऋषि भंग भुवाला जा शाप-वर अमिट प्रभाऊ * सोइ-वर पुत्रवान भर राऊ लोमपाद के राज्य में अनावृष्टि-निवारण के लिर ऋष्यशृग का लाया जाना कयन-वशिष्ठ सुमंत्र सुनि,वरनेउ अघिपति-अंग। लोमपाद सन्मानि गृह जिमि राखेउ ऋपि शृं. ! ८० ॥ दिने दिने गर्भ तार वाडिते लागिल * छयमासे पशुवत प्रमत्र हइल मनुज्येर डरि आमि भ्रमि बने बन * आमार गर्भेते हैल शत्रुर जनम पुत्र फेलाइया से हरिणी गेल बन * अङ्ग लि चुपिया शिशु युहिल क्रन्दन तपस्या करिया विभाण्डकेर गमन * कानने पडिया शिशु करिछे क्रन्दन बालके देखिया मुनि भावे मने मन * मनुष्य आकार देखि हरिणी बदन ध्याने जानिलेक विभाण्डक तपोधन * हरिणोर गर्भ हैल आमार नन्दन पुत्र कोले करि गेलेन निज घरे * पुष्पमधु दिया मुनि पोपेण ताहारे नवीन कुशेर मूले करान शयन * दिने दिने बाड़े विभाण्डकर नन्दन परम सुन्दर से विभाएडकेर वेटा * शास्त्रवेत्ता हय से कपाले शृङ्ग फोंटा किछु दिन परे शृङ्ग उठिल कपाले * ऋष्यशृङ्ग बले नाम थुडल सकले यारे वर शाप देन कभु नहे प्रान * तॉर याशीर्वादे राजा हवे पुत्रवान लोमपादेर राज्ये अनावृष्टि-निवारणार्थ ऋष्यशृंग के आनयन वशिष्ठेर वचन हइल अवसान * सुमंत्र वलेन राजा कर अवधान १ हरिणी के समान मुन्न । २ अन्य । : गिरना नानभाग । ४ अग-नरेग गजा नोमनाद ।

. 8 1 १३६ कृत्तिवास रामायण सचिव सुमन्त्र ! रहौ केहि हेता * गवन शृंगमुनि अंग-निकेता? कहेउ सुमंत्र अंग नृप-देसा * द्वादश वर्ष वृष्टि नहिं लेसा लोमपाद पण्डितन बुलावा * अनावृष्टि कर हेतु वुझावा । बुध विचारि बोलत, सुनु राजन ! * अनाचार किञ्चित् तव सासन ... विन विवाह विवाह ऋतुमती कुमारी * तव छिति, भूप ! न वरसत वारी आनहु सुवन-विभाण्डक शृंगा* पाप-छीन, जल बरसै अंगा भूप एलान', नगर-नरनारी * शृंगि आनि, जो काज सवारी अर्ध राजु अर्पन सोइ-हेता * बूढ़ि एक कह दर्प समेता शृंग न ज्ञान नारि-नर लेसा ! * मुनि भरमाइ' बुलावहुँ देसा । फल-तरु रोपि सजावहु तरनी * वयस चतुर्दस मुनिसुत हरनी सवरन नाव जरठि" हित साजा * जहाँ अतुल छवि ध्वजा विराजा लोमपाद राजा अंग देशेर ईश्वर * ऋष्यशृंग आनिया छिलेन निज घर दशरथ चले पात्र कह विवरण * लोमपाद आनालेन किसेर कारण सुमंत्र चलेन दशरथ नृपवर * सेइ देशे अनावृष्टि द्वादस लोमपाद ब्राह्मण पण्डिते जिज्ञासिल * मम राज्ये अनावृष्टि कि हेतु हइल कहिल पण्डितगण करिया विचार * किंचित् तोमार राज्ये आछे दुराचार तव राये कुमारी हइल ऋतुमती * एइ पापे वृष्टि नाहि हय नरपति विभाण्डक पुत्र यदि ऋष्यशृंग आसे * पाप दूर हय आर देवता वरपे नगरेते लोमपाद दिलेन घोषणा * ऋष्यशृंग मुनिके आनिवे कोन जना ताहारे आनिया मोरे येवा दिते पारे * अर्द्धराज्य दिव आमि अवश्य ताहारे । डाकिया कहिल कथा बुड़ि एकजन * आमि आनि दिव सेई मुनिर नन्दन स्त्री-पुरुष भेद सेइ मुनि नाहि जाने * भुलाइया पानिव से मुनिर नन्दने नौका एक साजाइया देहत श्रामारे * फलवान वृक्ष रोप ताहार उपरे चौद्द वत्सरेर सेइ मुनिर सन्तति * वुडिरे वलये राजा भाल तव युक्ति । सुवर्णेर नौका राजा करिया गठन * विचित्र पताका ताहे करिल साजन १ अग देश मे । २ घोषण । ३ भटका कर । ४ जमाकर । ५ वूढी ।

आदि काण्ड कनक-वितान भुवन दुइ सोहा ॐ परम् रम्य निरख्त मन मोहा बाछि-बाछि सुन्दरी अनूपा * किन्नरि धौ अप्सरा सरूपा तरुनि रुदन, मन मलिन विचारी * परि मुनि-साप जरहिं, भयकारी तिनि प्रबोधि वृद्ध इमि बोली * तजि भय चलहु संग मम, भोली ! सुनु, मम नवयौवन जेहि काला * शत-शत महामुनिन-मन घाला तरनि तरत जल-नर्मदा, लगी विभाण्डक देस। बॉधि तीर तरि, रूपसिन, उपवन कीन प्रवेस ।।८१|| मुनि-तप मांचि मुन्दरिन त्रासा * जासु कोप परि छिनहिं विनामा पितु-सूने उपवन एकाकी * रमनिन वहाँ शृंग सुत ताकी बंसी धुन कोड क्रोइति चीना * ताल देत सत्र चली नवीना वृद्धि-अदेय मृदुन्न पुनि गाई * बहु चोचला रूप दरमाई कामिनि - कुण्ठ कोकिला - गाना * सामगान ऋपि : सुवन भुलाना नौकार उपरे करे स्वर्णे दुइ घर * परम सुन्दर नौका अति मनोहर वाछिया बाछिया निल परमा सुन्दरी * चेना भार अप्सरी कि अमर किन्नरी कान्दिते लागिल मचे मुखे नाहि हासि * मुनि कोपानले आजि हब भस्मराशि वृद्धि चले केन भय करिछ युवती * तोमरा सकले चल आमार मंहति यखन प्रामार छिल नवीन यौवन * कत शत भुलानेछि महामुनिगण नर्मदा बहिया जाय परम हरिपे * उपस्थित हय ऋष्यशृङ्ग येड़ देगे येखाने तपस्या करे विभाण्डक मुनि * सेहु वने तरुणीरा राखिल तरणी विभाएड़के देखिया सकले भये काँपे * भस्मराशि करे पाछे शाप दिया कोपे तपोवने श्राछे यथा ऋष्यशृङ्ग मुनि * प्रासिया मिलिल तथा सकल रमणी तरी ते उचरिजा सकल नीना * केह वंशी पूरये वाजाय केह वीणा वृद्धि के वेड़िया गान करे नारीगण * मुनीर निकटे गिया दिल दरशन कामिनीर मुखे गीत कोकिलेर घनि* शुनि मुनि वेदध्वनि छादिल अमनि १ नाव । २ पिता को अनुपस्थिति में | ३ अपेला।

. कृत्तिवास रामायण सचिव सुमन्त्र ! रहौ केहि हेता * गवन शृंगमुनि -अंग-निकेता? कहेउ सुमंत्र अंग नृप-देसा * द्वादश वर्ष वृष्टि नहिं लेसा लोमपाद । पण्डितन बुलावा * अनावृष्टि कर हेतु बुझावा बुध विचारि बोलत, सुनु राजन ! * अनाचार किञ्चित् तव सासन बिन विवाह ऋतुमती कुमारी * तव छिति, भूप ! न बरसत वारी श्रीनहु सुवन-विभाण्डक शृंगा * पाप-छीन, जल वरसै अंगा भूप एलान', नगर-नरनारी * शृंगि प्रानि, जो काज सवॉरी अर्ध राजु अर्पन सोइ-हेता * बूढ़ि एक कह दर्प समेता शृंग न ज्ञान नारि-नर लेसा ! * मुनि भरमाइ बुलावहुँ देसा । फल-तरु रोपि सजावहु तरनी * वयस चतुर्दस मुनिसुत हरनी सवरन नाव जरठि हित साजा * जहाँ अतुल छवि ध्वजा विराजा 3 . लोमपाद राजा अंग देशेर ईश्वर * ऋष्यशृंग श्रानिया छिलेन निज घर दशरथ बले पात्र कह विवरण * लोमपाद आनालेन किसेर कारण सुमंत्र वलेन दशरथ नृपवर * सेइ देशे अनावृष्टि द्वादस वत्सर लोमपाद ब्राह्मण पण्डिते जिज्ञासिल * मम राज्ये अनावृष्टि कि हेतु हइल कहिल पण्डितगण · करिया विचार * किंचित् तोमार राज्ये पाछे दुराचार तव राये कुमारी हइल ऋतुमती * एइ पापे वृष्टि नाहि हय नरपति विभाण्डक पुत्र यदि ऋष्यशृंग आसे * पाप दूर हय आर देवता वरपे नगरेते लोमपाद दिलेन घोषणा * ऋष्यशृंग मुनिके आनिवे कोन जना ताहारे आनिया मोरे येवा दिते पारे * अर्द्धराज्य दिव आमि अवश्य ताहारे डाकिया कहिल कथा बुड़ि एकजन * आमि आनि दिव सेई मुनिर नन्दन स्त्री-पुरुष भेद सेइ मुनि नाहि जाने * भुलाइया आनिव से मुनिर नन्दने नौका एक साजाइया देहत आमारे * फलवान वृक्ष रोप ताहार उपरे चौद्द वत्सरेर सेइ मुनिर सन्तति * बुड़िरे वलये राजा भाल तव युक्ति सुवर्णेर नौका राजा करिया गठन * विचित्र पताका ताहे करिल साजन १ अग देश मे । २ घोषण । ३ भटका कर । ४ जमाकर । ५ बूढी ।

सुन्दरी आदि काण्ड १३७ कनक-वितान भुवन · दुइ सोहा ॐ परम् रम्य निरखत मन मोहा बाखि-वाछि अनूपा * किन्नरि धों अप्सरा सरूपा तरुन्नि रुदन, मन मलिन विचारी * परि मुनि-साप जरहिं, भयकारी तिनि, प्रबोधि वृद्धर इमि बोली * तजि भय चलहु संग सम, भोली ! सुनु, मम नवयौवन जेहि काला * शत-शत् महामुनिन-मन घाला तरीन तरत जल-नर्मदा, लगी विभाण्डक देस । बॉषि तौर तरिंग, रूपसिन, उपवन कीन प्रवेस ॥८१|| मुनि-तप मांचि सुन्दरिन त्रासा * जासु कोप परि छिनहिं विनासा पितु-सूने. उपवन एकाकी * रमनिन वहाँ शृंग सुत ताकी बंसी धुन कोड' क्रीड़ति बीना * ताल देत सत्र चली नवीना बूढ़ि-अदेस मृदुल पुनि गाई * बहु चोंचला रूप कामिनि = कण्ठ कोकिला - गाना * सामगान ऋषि : सुवन भुलाना दरसाई नौकार उपरे करे म्वर्णे दुडु घर * परम सुन्दर नौका अति मनोहर वाछिया बाछिया निल परमा सुन्दरी * चेना भार अप्सरी कि अमर किन्नरी कान्दिते लागिल सवे मुखे नाहि हासि * मुनि कोपानले आज़ि हब भस्मराशि वृद्धि बले केन भय करिछ युक्ती * तोमरा सक्रले चल आमार संहति यखन अामार छिल लवीन यौवन * कृत शत भुलायेछि महामुनिगण नर्मदा बहिया जाय परम हरिपे * उपस्थित हय ऋष्यशृङ्ग येडू देशे येखाने तपस्या करे विभाएडक मुनि * सेह वने तरुणीरा राखिल तरणी विमाएडके देखिया सकले भये काँसे * भस्मराशि करे पाछे शाप दिया कोपे तपोवने पाछे यथा ऋष्यशृङ्ग मुनि * प्रासिया मिलिल तथा सकल रमणी तरी हैते उचरिला सकल नवीना * केह वंशी पूरये वाजाय केह वीणा बुद्धि के वेड़िया गान करे नारीगण * मुनीर चिकटे गिया दिल दरशन कामिनीर मुखे गीत कोकिलेर ध्वनि * शुनि मुनि वेदध्वनि छादिल अमनि १ नाव । २ पिता को अनुपस्थिति मे | ३ अफेला ।

मात्र १३८ कृत्तिवास रामायण नर-तिय अवुझ, रूप मुनि भाये * जिमि सुर अवनि, स्वर्ग तजि पाये विह्वल शृंगि - द्वार चलि जाई * गहे बूढ़ि - पद अंग नवाई परति पाँय, कर धरति किशोरा * चूमि कञ्जमुख पुनि-पुनि भोरा' । 'श्राव-श्राव' कहि, सबन वुलाई * गदगद रोम, न मोद समाई उपवन एक कुस-आसन * बुदिहिं दीन सप्रीति विछावन कन्द - मूल - फल नीर समेता * धोउ शृंगि सो सुमुखिन हेता 'विष्णु-विष्णु' कहि, कर धरि काना * हरि-पूजन विन किमि जलपाना ? दिव्य कुसासन सोइ-हित साजी * उपरि जासु नायिका विराजी नासा परसि, उलटि दृग-तारा * मुनि प्रतच्छ' मनु विष्णु निहारा । कछुक काल बकध्यान' लगावा * पुनि प्रसाद - हित सुतहिं बुलावा अहह सफल - जीवन मम आजा * ले प्रसाद हरि• स्वयं विराजा फल कहि मोदक, नीर मिस, मायाविनि मधु दीन । अमित स्वाद अम्रित सरिस, मुनिसुत मोहित कीन ॥२॥ स्त्री-पुरुष भेद सेइ मुनि नहि जाने * स्वर्गेर अमरगण मुनि मने माने व्याकुल हइया मुनिद्वार हइते उले * प्रणिपात करिले बुडिर पदतले मुनिपुत्र पाये पड़े।'धरि करे कोले * बार-बार चुम्ब दिल 'बदन कमले एस-एस बले मुनि' ता सबाके 'बले * अानन्दे गद्गद से आसन दिते चले एकखानि कुशासनं छिलं मात्र घरे * बैस बलि आनिया दिल से बूडिरे फल-मूल जल घरे छिल ये सकल * बूटिर भक्षण हेतु दिलेन 'संकल श्रीविष्णु बलिया बुडि छुइल दुइ कान * विष्णुपूजा विना नाहि करि जलपान् दिव्य कुशासन पाति दिलेन बुड़ीरे * पूजा करिबारे 'वैसे ताहार उपरे चक्ष उलटिया बुडि नाके दिल हात # मुनि बले विष्णु आजि करिल साक्षात कतक्षणे नासिकार हात घुचाइल * ए प्रसाद लो बलि मुनिरे 'डाकिल मुनि बले आजि मोर सफल जीवन * विष्णुर प्रसाद देह करिव भक्षण फल बलि हाते दिल गङ्गाजल लाडू * जल बलि खाोयाइल मधु गागाडू १ भोला । २ सानात् । ३ बगुला के समान बनावटी ध्यान ।

खवावा * मोदक-मद आदि काण्ड १३६ १ उपजत फल कित पूछत श्रृंगा * चले मुग्ध पुनि युवतिन संगा मोदक मदनानन्द मुनिसुत तन छावा दै संदेस,' कहें अतिरूपा * सुखतर फल जहँ, चलिय अनूपा जो कहुँ सुलभ अधिक रसपागी * चलौं संग तव, उपवन त्यागी मदन-विभोर निरखि : मुनिनन्दन * सरकत वसन अंग छवि - बनितन कोउ मुनि-कक्ष गात अनुसरहीं * पंकज मुख कोउ चुम्बन करहीं पुनि गरेरि' बहु हास - विलामा * मुनिसुत उपज अमित उल्लासा परसि उरोज अबुझ कोउ नारी * इकटक दीठि रहइ कोउ डारी नेन - कटाछ रञ्ज मन कोऊ * करत प्रगाढ़ अलिंगन कोऊ जो मुनिहरन करहिं तत्काला * विनमैं सकल विभाएडक-ज्वाला उचित श्राजु, तजि चलहि वराई * कथा सकल सुत जनक" जनाई सुवन - नेह मुनि रहइँ निकेता * काल्हि न रह. निकेता * काल्हि न बन गमन तप-हेता मुनि वले एइ फल कोया गेले पाई * सङ्ग करि लये गेले तवे सङ्ग याई खामोयाइल कामेश्वर खाइते सुस्वाद * कामेश्वर खाइया से हाल उन्माद कन्यागण वलिल खाइले ये संदेश * इहार अधिक आछे पल सेइ देश मुनि वले इहार अधिक यदि पाइ * तोमरा चलह देशे आमि सङ्ग याइ मदने भुलिल 'यदि मुनिर नन्दन * अगर वसन खमाइल कन्यागण आसिया मुनिर पुत्रे केह करे कोले * केह केह चुम्ब देय वदन कमले मुनि लैया सवे करे हास्य परिहास * देखिया मुनिर पुत्र हइल उल्लास कोन नारी भुलाइल स्तन परशने * केह वा भुलाय ताके भक्ष्य द्रव्य दाने केह वा हरिल मन चाहिया नयने * केह वा करिल मत्त गाद आलिङ्गने बुड़ेि वले आणि यदि लये याइ हरे * पाछे विभाएडक मुनि कोपे भम्म करे प्राजि पिता पुत्रेते थाकुक एकस्याने * कहिवे ए कथा मुनि पिता विद्यमाने पुत्र प्रति यदि स्नेह केर तपोधन * तवे कालि तपस्याय ना यावे कखन १ एक बगाली मिठाई २ घेरकर । ३ प्रसन्न करती थी। ४ टल जायें। ५ पिता । पन्न ar ܝܐܬܝܝܽܐܝܺܝ १४० कृत्तिवास रामायण जो तजि तनय श्रेय तप देहीं * कहत बूढ़ि, तव सुत हरिप्लेही सोचि जुगुति' 'दिय मत मुनिनन्दन * 'बिलमहुर कछुक काल भल उपवन शिष्य एक 'तव-सरिस सुहावन * निकट भेटि लौटहुँ मनभावन मिनयेउ शृंगि, ‘नाथ तव दासा * सदा स्वामि - ढिग सेवक - वासा गमन अन्त कहुँ देस, करहु त्यागि मोहिं अमरगन ।। । पायक करौं - प्रवेस, ब्रह्मघांत सिव - सीस धरि ॥२॥ नर-नारी कर भेद न जानी * मुनि-कौतुक ! 'छलिनी मुसकानी । बोली, करहु बास यहि काला * सुत बोलथि तोहि लेउ सकाला' । मुनि तजि गेह, चलीं मृगनयनी * लागि नर्मदा-तट जहें 'तरंनी अस्ताचल जब सूर्य 'सिधाये * बिकल 'शृंगि'! सुरगन नहिं आये अञ्चल-निधी 'नसानी * मम विपरीत देव 'मैं जानी रुदन-थकित, तरुतर आसीना * तबहिं विभाण्डक उत 'पग दीना शोकाकुल सुत्त लखि मुनिराई * कसं मलीन ? पूछत क्रुसलाई करगत 'पुत्र एड़ि जाय यदि तपस्यार तरे * तबे काल लैया याव मुनिर कुमारे एइ युक्ति तबे बुड़ी भावे 'मने ‘मने * कहिते 'लागिल सेइ मुनिर नन्दने तपोवने बैस हे तोमारे भालंबासि * अन्य एक शिष्येर आश्रम देखे शासि बलिते लागिल तारे ऋष्यशृङ्ग ऋषि * तोमार सेवक हैया तव सङ्ग श्रासि | श्रामोरे एड़िया यदि यावे कोन देशे * ब्रह्महत्या हवे तने ‘मरिच हुताशे बुड़ी बले एइ क्षणे धरे थाक 'तुमि * संध्याकाले तोमारे लइयां यावं श्रामि एतेक बलिया तारे थुये निजघरे * सैंकल कामिनी चड़े नौकार ऊपरे दिवाकर 'अस्तगत हइल यखन * मुनि 'बले ना श्राइल कैन,ऋषिगण शिरोमणि हाराइल अञ्चलेर निधि * चुझिलाम आमारे वञ्चित हैलविधि कान्दिते-कान्दिते मुनि बैसें वृक्षतले * विभाण्डक तप करि एल हेन काले पुत्रेर देखिया मुनि विचलित मन * जिज्ञासिल केन बापू करिछ क्रन्दन १ युक्ति, तरकीब । २ ठहर जाओ। ३ सायकाल । ४ भाग्य । + आदि काण्ड कीजिय तात प्रथम जलपाना * हाल सकल पुमि करउँ नखाना फलाहार करि पितु सुख पावा दिवसम्कया सुत जलकि' सुनावा तपहित जब मितु बनहिं सिधाये * देव स्वर्ग तजि आश्रम आये ना चखे न अस 'फल स्वाद अनूपा ! * दीख त्रिलोक न तिन सम रूपा जठा 'सीस छविमण्डित 'भाला' * तहँ साजे कोउ किंशुक-माला कस मृतिका' ! ललाट छविसागर *नभमण्डल जिमि उदित 'प्रभाकर कौन पुहुप ! गर हार सुहावन * मीलम, पीत, 'घवल मनभावन वलकल बसन लसत कस अंगा * लाल, पियर, सित, हरियर रगा लता कौन सब करम सिजीली* कोउ कर मानिक जोति छचोली 'लोम न आनन, परम द्विज, मांस-पिण्ड उर दोय।। कोमल कर परसत 'मनहुँ, सुरपुर करगत होय ॥८४|| नर-नारी ऋषि श्रृंग नि ऋषि 'शृंग न ज्ञाना *बुझेउ सकल धरत मुनि ध्याना - . ऋष्यशृङ्गवले आगे खायो फल जल * श्राजिकार विवरण कहिब 'सकल फलजल खाइया हइल सुस्थ मन * पितापुत्रे कथावाचा क्रन दुइजन तुमि येइ गेले पिता तपस्यार तरे *-स्वर्ग हते देवगण आसे मम घरे सेइ मत फल नाहि खाइ ए जीवने * एत रूप देखि नाइए तिन मुवने कत बा छन्देते जटा घरे छे माथाय * कत कुसुमेर माला दियाछ ताहाय कि जाति मृत्तिका आछे कपाले शोभित * मगनमण्डलेयेन भास्कर उदित कि जाति वृक्षर माला सबार गलाय * श्वेत पीत नील कत शोभिछे ताहाय तेमन ना देखि पाता गाछेर बाकल-* श्वेत रक्त पीत नील वरण :उज्ज्वल कि जाति वृक्षर लता सबाकार हाते * कतेक माणिक गाँया नाण्ये ताहाते परम ब्राह्मण कारो लोम नाहि मुखे * तुलार समान दुटा :मांसपिण्ड चुके ताते यदि हस्त टि कराइ परशन * स्वर्गवास हाते माइ हेन लय मन।। मने भावे महामुनि पुत्रर क्चिने * स्त्री-पुरुप ऋष्यशृङ्ग कसु नाहि जाने १ प्रसन्न होकर ! २ मस्तक । ३ सकेशर चन्दनको भस्म समझा ।.३ हाथो मे । ४ दाढी-छ ।

ܕܝܪܝ १४० कृत्तिवास रामायण जो तजि तनय श्रेय तप देहीं * कहत बुढ़ि, तव सुत हरि प्लेही सोचि जुगुति' 'दिय 'मत मुनिनन्दन * चिलम २ कछुक काल भल उपवन शिष्य एक 'तव-सरिस सुहावन * निकट भेटि लौटहुँ मनभावन विनयेउ , गि, ‘नाथ तव दासा * सदा स्वामि - ढिग 'सेवक - वासा गमन अन्त कहुँ देम, करहु त्यागि मोहिं अमरगन । पावक करौं प्रवेस, ब्रह्मघांत तिव - सीस धरि ॥८॥ नर-नारी कर भेद न कर भेद न जानी * मुनि-कौतुक ! 'छलिनी मुसकानी बोली, करहु बास यहि काला * सुत बोलथि तोहिं लेउ' सकाला' मुनि तजि गेह, चलीं मृगनयनी * लागि नर्मदा-तट जहँ 'तरंनी अस्ताचल जब जब सूर्य सिधाये * बिकल 'शृंगि! सुरगन नहिं आये करगत अञ्चल-निधी नसानी * 'भम बिपरीत दैव 'मैं जानी रुदन-थकित, तरुतर 'आसीना * तबहिं विभाण्डक उत पग दीना शोकाकुल सुत्त लखि मुनिराई * कस मलीन ? पूछत कुसलाई 'पुत्र एड़ि जाय यदि तपस्यार तरे * तबे काल लैया याव- मुनिर कुमारे एइ युक्ति तबे बुड़ी भावे 'मने 'मने * कहिते 'लागिल सेइ मुनिर ‘नन्दने तपोवने वैस हे तोमारे भालबासि * अन्य एक शिष्यर आश्रम-देखें आसि बलिते लागिल तारे ऋष्यशृङ्ग ऋषि * तोमार सेवक हैया तंव सङ्ग बासि | आमारे एड़िया यदि यावे कोन देशे * ब्रह्महत्या हवे तने ‘मरिव हुताशे बुड़ी बले एइ क्षणे घरे थाक तुमि * संध्याकाले तोमारे लइया या प्रा.म एतेक बलिया 'तारे थुये निजघरे * संकल कामिनी चड़े नौकार ऊपरे दिवाकर अस्तगत हइल यखन * मुनि बले 'ना प्राइल केन,ऋषिगण शिरोमणि हाराइल अञ्चलेर निधि # बुझिलाम अामारे कञ्चित हैलविधि कान्दिते-कान्दिते मुनि बैसे वृक्षतले * विमाण्डक':तप करि एल हेन काले पुत्रेर देखिया मुनि विचलित मन * जिज्ञासिल केन बापू कस्छि क्रन्दन १ युक्ति, तरकीब । २ ठहर जाओ। ३ सायकाल । ४ भाग्य । न आदि काण्ड कीजिय तात प्रथम जलपाना * हाल सकल पुमि करउँ खाना फलाहार करि पितु सुख पावा * दिवस-कथा सुत ललकि' सुनावा । तपहित जब पितु बनहिं सिधाये * देव स्वर्ग तजि आश्रम आये | चखेन 'अस 'फल स्वाद अनूपा ! * दीख त्रिलोक न तिन सम रूपा जटा 'सीस छविमण्डित भाला * तहँ साजे कोउ किंशुक-माला कॅस मृतिको ! ललाट छविसागर *न्नममण्डल जिमि उदित प्रभाकर कौन पुहुप ! गर हार सुहावन * मीलम, पीत, 'घवल ग्मनभावन बलकल बसन प्लसत कस अंगा* लाल, पियर, सित, हरियर रगा लता कौन सब करन सजीली:* कोउ कर •मानिक जोति छबीली । 'लोम" न आनन, परम द्विज, मांस-पिण्ड उर दोय।। कोमल कर परसत मनहुँ, सुरपुर करगत होय ॥४॥ नर-नारी ऋषि ऋषि शृंग न ज्ञाना * बुझेउ सकल धरत मुनि ध्याना .. ऋष्यङ्गवले आगे खायो फल जल * आजिक्रार ‘विवरण क्रहिव सकल फलजल खाइया हइल सुस्थ मन * पितापुत्रे कथावार्ता कन दुइजन तुमि येइ गेले पिता तपस्यार तरे * स्वर्ग हते देवगण आसे मम घरे सेइ मत फल नाहि खाइए जीवने * एत रूप देखि नाइाए तिन भुवने कत वा छन्देते जटा धरे छे माथाय * कत कुसुमेर माला दियाछ ताहाय कि जाति मृत्तिका आछे कपाले शोभित -* मगनमण्डलेये न भास्कर उदित कि जाति वृक्षर माला सवार गलाय * श्वेत पीत नील कत शोभिले ताहाय तेमन ना देखि पाता गाछेर चाकल * श्वेत रक्त पीत नील वरण उज्ज्वल कि जाति वृक्षर लता साकार हाते में कतेक माणिक गाथा नाघ्ये ताहाते परम ब्राह्मण कारो लोम नाहि मुखे * तुलार समान दुटा न.मांसपिण्ड चुके ताते यदि 'हस्त टि कराइ परशन * स्वर्गवास होते माइ हेन लय मन'। ! मने भावे महामुनि पुत्रेर वचने * स्त्री-पुरुप ऋष्यशृङ्ग कभु नाहि जाने । १ प्रसन्न होकर ! २ मस्तक । ३ सकेशर चन्दनको भस्म समझा । ३ हाथो मे । ४ दाढी छ । - - १४२ कृत्तिवास रामायण कहत विभाण्डक, सुत ! ते नारी * कामुकि फिरहिं, दनुनि वनचारी आजु पुन्य-मम बच तव प्राना * पुनि तिन-फन्द न सुत कल्याना 1 पिता न इमि भाखहु तिन हेता * ते अस कतहुँ न दयानिकेता सबन काल्हि विधि देइ मिलाई * सूचित करहुँ तात ढिग आई निसि वितीत, मुनि बहु समुझावा * तदपि शृंग कछु बोध न आवा भोर होत रवि किरन प्रकासी * सुवन-विषय सोचत गुनरासी जो सुत साधि, श्राश्रमवासू * अतिव चूक, तप-धर्म निनासू सकल वृथा—को केहि मुत-नारी * जग अमार, सत् प्रभुहिं विचारी बहुरि प्रबोधि' भॉति बहु शृंगा * हटकेउ मुनि तिन वनितन-संगा ।। ताम्रपात्र, तुलसीदल लीना * तपहित गमन विभाण्डक कीना सो लखि, बूढि कहत हरपाई * चलौ सबै, मुनिसुत हरि लाई बीना, ताल, करताला * चलीं शृंग-ढिग चाल मराला . वसुरि, , विभाण्डक बले बापू तारा नारीगण * कामाचारी राक्षसी वेलाय. बने बन मम पुण्ये प्राण प्राजि रेखेछे तोमार * पुनः गेले धरे खावे ना पावे निस्तार ऋष्यशृङ्ग बले पिता ना बल एमन * एमन दयालु नाइ ताहारा येमन कालि यदि विधाता मिलाय ता संगारे * तखनि याइब आमि कहिनु तोमारे सारा रात्रि छिल मुनि पुत्र ल'ये घरे * बुझाइते श्रापनि ना पारिल पुत्रेरे प्रभात हइल रात्रि रविर किरण * पुत्रेर विषय मुनि भावे मने मन यदि आमि घरे थाकि पुत्रे करि साध * धर्म नष्ट हवे मम हवे अपराध कार पुत्र कार पत्नी सब अकारण * ससार असार सार सत्य नारायण पुत्ररे प्रबोध करिलेन महामुनि * कारो सङ्ग कथा नाहि कहिश्रो श्रापनि ताम्रघटी हाते निल तुलिल तुलसी * तपस्या करिते गेल विभाण्डक ऋषि 1 वुड़ी बले वुड़ा मुनि छाड़ि गेल घर * सवे चल पानि गिया मुनिर कोडर ताल करताल बीणा केह पुरे वॉशी * आइल मुनिर काछे सकल रूपसी १ ममझाकर । २ मना किया।

आदि काण्ड १४३ गई-द्रव्य मनु दारिद' पाई * पद-नायिका गहे लपिटाई गयेउ काल्हि कित मोहिं बराई * तव-हित रोवत निसा विताई सोइ मोदक रुचि सोइ जल पाना * देव संग तव करहुँ पयाना फंसे फन्द, तिय कोल' करि, लिये नाव हरि शृंग। तरि - खेवत द्रुत बहि चली, काटत सरित-तरंग ||८|| शृंगी ऋषि का लोमपाद के राज्य में जाना और अनावृष्टि का निवारण तरनी तरति, न एनि आभासा * भरमत बनितन सहित हुलासा मुनि-पद अंगदेस जोइ परसा * अनावृष्टि गत पारस बरसा लच्छन सुभ, अागम-मुनि जानी * अर्घ्यपाद चलि लोमपाद कन्याहीना * दसरथ सुता + दान पुनि दीना यहि विधि मुनि रघुवंस-जमाई * बोलि अंगनृप, लेहु बुलाई दसरथ पूछेउ सचित्र सप्रीती * कस सुत्त-सोक विभाण्डक बीती नृप सन्मानी नप । दरिद्र पाइल : येन हाराइया धन व्यस्त मनि करे धरि वुड़ीर चर्रण ओमारे एड़ियां कालि गेल पलाइया * सारारात्रि कान्दियाछि तोभार लागिया सेइ जल सेइ नाडू करिव . भक्षण * सङ्ग करि लैया चल करिव .. मर्म बुझ सवे कृत्तिवासेर सुवाणी * नारीर कथाय भुले ऋष्यशृङ्ग मुनि ऋष्यशृङ्गर लोमपाद राज्ये गमन ओ अनावृष्टि निवारण कोले करि बसाइल नौकार उपर * वाह वाह वलि बुड़ी डाकिछे सत्वर तरणी वाहिया जाय मुनि नाहि जाने * ऋष्यशृङ्ग, वले बैस व्याघ्र पाछे वने लोमपाद राज्य मुनि दिल दरशन * अनावृष्टि छिल वृष्टि हाल तखन लोमपाद जानिल मुनिर आगमन * पाद्य अर्घ्य दिया पूजे मुनिर नन्दन । कन्याहीन लोमपाद शान्ता अभिधान * दशरथ कन्या के मुनिरे दिल दान सम्पन्चे से मुनि हय तोमार जामाइ * ताहाके चाहिया आन लोमपाद ठाँइ दशरथ बलिलेन, कह हे नायक * पुत्रशोके. केमने वॉचिल विभाण्डक १ नर्धन । २ टालकर । ३ गोद । ४ रघुवंशी राजा दशरथ के जामाता । + राजा दशरथ की कन्या 'शान्ता' जिसका पालन राजा लोमपाद ने अपनी कन्या मान कर किया था। -------- है कृत्तिवास रामायण उपाख्यान ऋषि, शृंग. सुपावना * अनजल-हरन, नीर-सरसावन कृत्तिवास झमि काव्य प्रकासा * राम-नामा मुद-मंगल-बासा शृङ्गी ऋषि' को न देखकर विभाण्डक मुनि का खेद फुनि सुमन्त्र दसरथहि सुनावा * बूढ़ी जिमि नप नीति सिखाया लोमपाद थिर, सोचहु करनी * मुनिसुत-हरना फन्दः पुनि. बरनी कुर्पित विभाण्डक, साप कराला * सहित राजु विनमहु मुनि-ज्वाला। तासु ऋान-हित कहउँ उपाऊ * रचना रचहु पन्थ सोइ राऊ ठौर-ठौर गो-महिष तुरंता * गीत वाद चहुँ नृत्य अनन्ता उत्सव चहुँ लखि, मुनि-मन-रोपा * मिटै सहज, उपजै सन्तोषा बूढी बचन महीप प्रमाना जनपद कायम कीन महाना ठौर-ठौर तह धाम ललामा * सोइ ऋषि श्रृंग-ग्राम धरि नामा सकल धान्य-पूरित मही, दिव्य धाम, पुर, ग्राम । लोमपाद नृप शृंग ऋषि, इमि राखे निज धाम ॥८६॥ तप करि कुटी विभाण्डक पाये * सुत-श्रुतिगान न मुनि सुनि पाये येइ दशे हय ऋष्यशृङ्ग उपाख्यान * अनावृष्टि घुचे हय से देशे कल्याण कृत्तिवास पाण्डतेर काव्य अनुपम * सानन्दे वसिया सवे शुन राम नाम ऋष्यशृङ्गरे अदर्शने विभाण्टक मुनिर खेद सुमन्त्र बलेन शुन राजा दशरथ * चुड़ी लोमपादे नीति कहे वाक्य यत मन दिया स्थिरचित्ते शुनइ बचन * भुलाइया आनियाछि मुनिर नन्दन यदि शाप देन कोपे विभाएडक ऋषि * राज्यमह ापनि हइते भस्मराशि तार ठॉइ यदि तुमि चारो परित्राण * पथेते करिया राख विहित विधान स्थाने स्थाने महिष गो राखह सत्वर * गीतवाद्य नृत्योत्सव इउक विस्तर गीतवाद्य देखिया तखनि तपोधन * यत क्रोध जन्मे थाके हवै पासरण । बुडीर चचन राजा ना करिल श्रान * पथे पथे करे ग्राम बड़-बड़ स्थान श्री मष्यशृङ्गर ग्राम बलि तार नाम * सर्वशस्ययुता पुरी दिव्य-दिव्य ग्राम ऋष्यशृङ्ग रहिलेन लोमपाद परे * विभाए इक तप करि गेलेन कुटीरे १ रक्षा के लिये । न्यता हैनमधु ومما सरन भैटि . कवन सरन आदि काण्ड १४५ नित-विपरीत, सौन ! मन चिंता * द्वार धरेड पग सन्ता दिवम. ताप-तप, आश्रम श्राई * कासु विथा मिटाई तात! कहि- कुटी प्रवेसा * लखेउ न सुत, मनि दुसह कलेसा । छुट कमण्डल, मूर्छित गाता * तरु-तर धरनि. तपसि-तन पाता वीते छन, कछु चेतन अावा * कितै सुवन ! पुनि-पुनि गोहरावा पूछत सुत-बाता * सुवन-नेह जग अतुल विधाता हे क्षुप, विटप, लता जे उपवन ! * लखे जात कहुँ तुम मम नन्दन हे खग, मृग, पसु कतहुँ विलोका * तनय जात, इमि मोध - ससोका हेरत. चलत न मग विश्रामा * पहुँचे । जह इक ग्राम ललामा ग्राम को धाम-निवासी ? * पूछत दुखित, पुरवासी विनय - जोरि. कर प्रजासमाजू * नाथ शृंगपि कर यहु राजू लोमपाद तनया जिन अी * -हय-गज-सुरभि, सुभूमि समी सुनत प्रजा-मुख मंगल-बाली * शमन क्रोध, आतमा जुडानी पार दिन दूर हडते शुने वेदध्वनि * से दिन ना शुने शब्द व्यस्त हैल मुनि आकुल हइया मुनि-दाण्डाइल तथा * कॉदिया वलेन बाछा ऋष्यशृंग कोथा तपस्याते श्रान्त ह'ये आइलाम घरे * हेथा आसि कह कथा दुःख याक दूरे । बलिते बलिते गेल कुटीरेर द्वारे * पुत्र-पुत्र बलि डाके पुत्र नाहि घरे । कमण्डलु आछाडिया फेले भूमितले * अज्ञान हइया मुनि पड़े वृक्षतले क्षणेक रहिया ज्ञान पाइलेक मुनि * कोथा ऋष्यशृङ्ग वलि डाकये अमनि अपत्येर स्नेह ममा नाहिक संमारे * याहारे देखेन मुनि जिज्ञासेन तारे मुनि बले भाछ बने यत तरु लता * देखेछ तोमरा मम पुत्र गेल कोथा मृग पशु - पक्षीरे लागिल सुधाइते * तोमरा देखेछ ऋष्यशृङ्गरे याइते कांदियाकांदिया जाय विभाण्डक मुनि * कत दूर गिया पान ग्राम एकखानि । सकल लोकेरे- मुनि शोकेते लुधान * काहार ए ग्रामखानि कह विद्यमान जोड़हात करि प्रजागण कहे वाणो * ऋष्यशृङ्ग मुनिवर इथे राजा तिनि लोसपाद ताँके कन्या दियाछे कौतुके * ग्राम पशु अश्व गज दियाछे यौतुके एइ कथा कहिलेक यत प्रजागण * क्रोधमन गेल मुनि अति हटमन मंत्र-सुमंत्र भूप मन दसरथ कही १४६ कृत्तिवाम रामायण सकुसल सुवन बिलस संसारू * मिटेउ छोभ, मुनि करत विचारू संतति-हीन अवध प्रजनन्दन' * करहिं शृंग सुत-याग अरंभन सोइ अवमर भेटउँ सुवन, भूप-निमंत्रन पाय । अस विचारि, बन गमन किय, मुनिवर तप मन लाय ॥८७॥ राजा दशरथ का पुत्र ष्टि-यन और नारायण का चार अशों में जन्मग्रहण भावा * अंग हेत चतुरंग सजावा चले लेन हित शृंग मुनीसा * लोमपाद-ढिग अवध-महीसा दसरथ-खबरि अंग नृप पाई * पाद-अध्ये, मृदु असन' सजाई पूजि राज-उपचार समेता * पूछेउ अंग आगमन-हेता कही अंधमुनि अंधमुनि बानी * समय पाय सुतजोग बखानी अवध-पयान शृंग मुनि करहीं * सफल याग संतति हित रचहीं सुनि, नृप भूप शृंग ढिग ये * मुनिहिं जोरि कर माथ नवाये लोमपाद परिचय पुनि दीन्हा * रविकुलमणि दसरथ जग चीन्हा संसार करिते पुत्र करियाछे साध * पुत्रेर कुशल शुनि खण्डिल विषाद भावे अपुत्रक राजा अजेर नन्दन * ऋष्यशृङ्ग करिवेन यज्ञ प्रारम्भन निमन्त्रण हइवेक मम से यज्ञेते * सेइ काले हवे देखा पुत्रेर सहिते एतक भाविया मुनि गेल निज वास * आदिकाएड गाइल पण्डित कृत्तिवास दशरथ राजार पुत्र ष्टि यज्ञ आ नारायणेर चारि अशे अवतार 1 दशरथ राजारे सुमन्त्र इहा बले * मुनिके आनिते राजा दशरथ चले दशरथ लोमपाद नृपतिर घरे * चतुरङ्ग सङ्ग यान हरिष अन्तरे राजार पाइया वार्ता लोमपाद राजा * राज उपचारे यत्ने तारे करे पूजा मिष्टान्न प्रभृति दिया कराय भोजन * जिज्ञासिल कोन कार्ये तव आगमन दशरथ बलिलेन शुन मोर वाणी * अयोध्याय लये चल ऋष्यशृङ्ग मुनि अन्धकेर उक्ति आछे ये अतीत काले * पुत्रवान हव आमि ऋष्यशृङ्ग गेले एमत कहिले दशरथ नृपवर * लोमपाद लये गेल मुनिर गोचर प्रणाम करेन दशरथ जोड़ हाते * लोमपाद परिचय लगिल कहिते १ दसरथ । २ अगदेश । ३ जलपान । ४ प्रयोजन ।

मन अवध आदि काण्ड ११७ सुता शान्ता मुनिहिं विवाही * जनक तास दसरथ नृप अाही श्वसुर भूप, मुनि तासु जमाई * सुवन अभाव ताप दुखदाई । सो तव कृपा होयँ सुतवन्ता * अवध गमन कोजिय भगवन्ता मुदित ध्यान लखि मुनि, गृहभूपा ॐ चारि अंम प्रभु प्रगट अनूपा अंधक मुनि कर वचन प्रमाना * अवध-पयान शृंग माना चढ़ि रथ सहित सुता-जामाता * चले पुरजन सुखदाता लोमपाद संग सुहाये * दल-बल सहित नृपति-घर आये लखि वशिष्ठ-मुनिगन, कह शृंगा * करहु अरंभन याग-प्रसंगा सो० श्रादि विष्णु पाराधि, पुनि निमंत्रि मुनिगन मकल । भूपति मंगल साधि, अश्वमेध रचना करहु 10 भूप निमंत्रण दिय दिग्देसा * जुरे पाय, मुनिवृन्द असेमा पुलह, पुलस्त्य, पुलोम प्रकासा * गौतम, दुर्वासा वैशम्पायन, भरत, पराशर * पिप्पलाद, शरभंग, निशाकर नृप कौण्डिन्य कर दूर दशरथ रजा एइ शुनेछ आख्यान * तुमि कृपाकर यदि हन पुत्रवान शान्ताकन्याविवाहयेदियाछि तोमारे * सेइ कन्या जन्मेछिल इहार आगारे इहार जामाता तुमि तोमर श्वशुर * अपुत्रक तापित ये ताप ध्यानेते जानिल मुनि मनेते प्रशंसे * एइ घरे जन्मिवेन विष्णु चारि अशे अन्धक मुनिर कथा कभु नहे भान * एतेक जानिया मुनि करिल पयान तनया जामाता सङ्ग चड़ि निज रथे * अयोध्याय प्राइल राजा लोमपाट साथे वशिष्ठादि आइल सकल मुनिगण * ऋष्यशृङ्ग बले कर यज्ञ प्रारम्भन अश्वमेध यज्ञ कर विष्णु श्राराधन * यत मुनिगणे तुमि कर निमन्त्रण दशरथ निमन्त्रण करे देशे देशे * निमन्त्रण पाइया यतेक मुनि आसे अगस्त्य श्राइल पार पौलस्त्यपुलोम * आइलेन वैशम्पायन दुर्वासा गौतम जैमनी गोतम पिप्पलाद पराशर * पुलहकौण्डिन्य मुनि श्राइल निशाकर मार्कण्डेय मरीचि भरत भरद्वाज * अष्टावक्र मुनि भृगु कूर्म दक्षराज गर्गमुनि दधीचि आइल शरभंग * पूजे राग गुनिगणे बाडे मने रंग مہتمممم ميهمهم من مجموم समान प्रकामा अवध बहुल अवनीसा मल्ल १४८ कृत्तिवास रामायण अष्टावक्र, पतञ्जलि, गर्गा * गोतस, भरद्वाज तपवर्गा कूर्म मारकण्डेय तपोधन * सनक, सनन्दन, ऋपी सनातन ! भृगु, अगस्त्य, जैमिनि क्रिय वासा * कपिल-मगर जिन सुतन विनासा वेदवान, चक्रवान, मरीची ॐ दक्षराज, मावर्णि, दधीची मत्स्यकर्णि जिन नीर निवासा * सौरभि विष्णु वाल्मीकि तट-जमुन निवासू * सवन पूजि, नृप हृदय हुलाग्मू कश्यप-सुवन विभाएंडक आये * अगनित नाम बरनि जनि जाये तीनि कोटि द्विज श्रुति उच्चारन * सकल मुनिन-मुख प्रगट हुताशन कोउ छिति एक पाद आधारा * वर्ष सहस कोउ विन आहारा जटा सीस, तन बल्कल वसना * विष्णु-कथा तजि, पान न रसना तीन कोटि इमि मुनिन-समाजा * विपुल शिष्यदल सहित विराजा दिय निवास सन्मानि मुनीसा * आये मैथिल जनक राज-ऋपि आये * काशिराज नृप सुहाये लोमपाद अंगाधिपति, बंग महिप घनश्याम । भोज पुरन्दर आगमन, नृप मरीचपुर धाम ॥ ८६।। पातालेते प्राइल कपिल राजऋषि * सगर सन्ताने ये करिल भस्मराशि वेदवान चक्रवान आइल सावर्णि * जल माझे आछे से मुनि मत्स्यकी सनातन सनक से सनन्द-कुमार * सौरभि प्राइल मुनि विष्णु अवतार इल वाल्मीकि यमुनार कूले धाम * कश्यपेर पुत्र एल विभाएडक नाम कतेक आइल मुनि नाम नाहि जानि * राजार यज्ञेते एल तिन कोटि मुनि तिन कोटि मुनि करे वेद उच्चारण * सवाकार वदने निःसरे हुताशन पृथिवीते केह पाछे एक पदे भर * केह अनाहारे आछे सहस्र वत्सर माथाय कपिल जटा वाकल वसन * नारायण कथा विना मुखे नहे आन 1 एमत आइल तथा तिन कोटि मुनि * सङ्ग कत शिष्यतार संख्या नाहिजानि मुनिगण वासार्थ दिलेन वासाघर * पृथिवीर राजा आइल अयोध्या-नगर मिथिलार प्राइल जनक राजा-ऋपि * मल्ल महाराज एल' राज्य यार काशी अंगदेश अधिपति लोमपाद नाम * राजा चंगदेशेर अाइल घनश्याम २ मागध, आदि काण्ड १४४ अतुल तज तैलंग-नरेसा * चपेश्वर नृप अवध प्रवेसा कोटि अठासि पछाँह-सुवाला * निन पुर तजि लख-लख नरपाला कर्नाटक, गंधारा * जेतक नप तिन अवध अखारा' पाय निमंत्रन-दशरथराऊ * समिटे अखिल सुवन-नरराऊ राजन अकथ कहौ - किमि रंगा * अगनित सचिव-सखा .. दिन सगा कोटि अठासी लख नरराई * प्रथक नाम को सकिय गनाई सारभौम दसरय महराजा * वार्षिक कर भेटें सकल राज-भण्डारा * प्रथक चास प्रति कृपसॅवारा नृप सरयू तीरा * सोइ शुाचे भृमि चले तपर्धा' योजन. लंब एकासी अवनी * द्वादश इतर पक्ष लिय धरनी । वारि कोस मेखला बंधाई * शत . योजन छिति यज्ञ खहाई यज्ञभूमि मुनिगन लिय आसन * शुभ छन-लगन याग प्रान सन सो धन रची यज्ञ मरीचिपुरेर राजा भोज पुरन्दर * चम्पापुर - हइते आइल चपेश्वर आइल तैलङ्ग- राजा तेजेते असीम * श्राइल आटाशी कोटि ये छिल पश्चिम मगध मागध प्राइल गांधार कर्णाट * लक्षलक्ष राजा एल छाडि राजपाट उदयास्त गिरिते रतेक राजा बसे * दशरथ निमन्त्रणे सब राजा आसे । मेदिनी सुवने से यत राजगण * नाना रङ्ग आइलेन सड़ी अगणन प्रत्येक कहिते नाम नितान्त अशक्य * राजा यत आइल बाटाशी कोटि लक्ष यत राजा गेल दशरथेर गोचरे * राजचक्रवर्ती दशरथ सबापरे आसिया करिल दशरथ सह देखा * दिलोक वापिक कर मसूचित लेखा यत धन एने छिल राखिल भाण्डारे * प्रत्येक प्रत्येक बास दिल मयाकारे यज्ञ करिछेन राजा सरयर तीरे * मुनिगण गेलेन राजार यजघरे एकाशी योजन घर अति दीर्घतर * द्वादश योजन तार बाड़े पनियर चारिक्रोश बांधियाछे यज्ञेर मेखला * शतेक , योजन उमे सेइ यज्ञशाना मुनिगण वैसे गिया घरेर भित्तरे * शुभक्षणे सुभलग्ने -यज्ञारम्भ करे १ जमाव । २ तपस्थी लोग ।

१५० कृत्तिवास रामायण आदि स्वस्तयन मुनिगन गावा * पुनि दशरथ संकल्प नुहावा विनय जोरि कर मधुरम माने * सकल तुल्य, बह-छोट न जाने " कालु वरन ? मोहिं करहु अदेया * कहेउ शृंग ऋपि सुनहु नरेया 1 कुल गुरु प्रथम सुवन-जगमला' * वरन वशिष्ठ, शास्त्र अनुकूला सो० तासु वरन न विवाद, उचित कहेट ऋपिगन मकल । मुनि समान मर्याद', अमित द्रव्य नृप देय हरपि ।।६०॥ काहि वेदध्वनि संग तपोधन * भइ प्रकट मुनि-नदन हुतामन कार शुचि अनल, याग सोइ थापा * अग्निकुण्ड, मोइ पावक व्यापा आहुति यव-तिल-तण्डुल रासी * घृत-घट वनवासी निरखि याग इमि वर्ष निरंतर * सुग्गन मरग न थिर उर अन्तर विश्वस्वा-सुवन दसमीसा * सुरन सूल नित लक-अधीमा कहत इन्द्र, किमि हे चतुरानन * यहि अवसर जन्महिं नारायन । महम देय ब्रतार तनय स्व.म्न कादि अग्रेते करये मुनिगण * संकल्प करिल तवे अमेर नन्दन । द गडाडल दशरथ जोड करि हात * कहिते लगिल सब मुनिर साक्षात् छोट बड़ नाहि जानि तुल्य सर्वजन * आज्ञा कर कारे अग्रे करिव वरण ऋष्यमृग वलिलेन शुनह राजन * अग्रेते करह गुरु वशिष्ठ वरण पार कलपुरोहित * उहार वरण आगे शास्त्रेते विहित व. रिया घुचाओ अभिमान * बड छोट केह नहे सकलि समान । भाल-भाल बलिया सकल मुनिवले * वस्त्र अलङ्कार राजा दिलेन सकले मग्ने कारेल एककाले वेदध्वनि * मुनि मुखे नि.मरिल पावक तखनि येइ प्राग्न पावेत्र करिया मुनिगण * अग्निर कुण्डेले लये करिल स्थापन श्रा । ताल यव तिल राशिराशि * एके एके दिल घृत महस्र कलसी एक वर्ष ज्ञ करे राजा दशरथे * देवतार भय हेथा हडल स्वर्गेते श्वश्व र पुत्र हय राजा दशानन * हीन ज्ञाने लंकाते खाटाय देवगण महेन्द्र बलेन ब्रह्मा कोन बुद्धि करि * एइ कान्ने जन्म कि लवेन श्रीहिरि १ ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ । २ प्रतिष्ठा । ३ मुनिया क मुख से । ४ यज्ञार्थ पवित्र अग्नि । न आदि काण्ड १५१ सफल याग, दसरथ-गृह ताता * होय तबहिं दसकंध-निपाता मत मिलाय गमने सुरवृन्दा * छीर-उदधि ज] श्रानॅदकन्दा विनय विरंचि विविधि संलग्ना * प्रभु जगपति किमि नींद-निमग्ना रमा' परमि तह प्रभुपद बंदति * शयन अनन्त-सेज' त्रिभुवनपति गे ममोप सुर सकल समाजा * पन्नग-विछवनि विष्णु विराजा आमा-मेघ मलिल कम सोहा * अहिफन सहस छत्र मन मोहा तव निद्रा निद्रित जग जेता * सकल विश्व तव-चेतन चेता कृपा-कोरि सेवकन निहारी * विपति दर कीजिय वनवारी 1 चौमख-विनय सुनत रस पागी * श्रीहरि क्षीर-सयन उठि त्यागी जुरे सकल सुरगन चहुँ देखी * कहेउ शब्द एक नाथ विशेखी मो० प्रगट अनुष्टुप छन्द, मुख मलीन सुरवृन्द पूछत अानंदकन्द, कहहु शत्रु को प्रगट तव ॥११॥ लखि। पुत्रेर लागिया दशरथ यज्ञ करे * तॉर पुत्र हैले तवे दशानन मरे एडु युति कारेया यतेक देवगण * क्षीरोद समुद्रे गेल यथा नारायण चारिमुखे ब्रझा गया करेन स्तवन * कत निद्रा यान प्रभु देव नारायण पदतने लक्ष्मीदेवी करिछेन स्तुति * अनन्तशय्याय शुये पाछेन श्रीपति । सफल देवता गिया दाराडाइल कू से * देखिल येमन मेघ भासिछे सलिले शुइया आन हरि अनन्त उपरे * वासुकि सहस्र फना तदुपरि धरे से रकगणर प्रति प्रभु देह मन * तोमार निद्राय निद्रा चेतने चेतन विते करह दूर श्रीमधुसूदन * चारमुखे ब्रह्मा यदि करेन स्तवन क्षारोटे उठिया नमिलेन नारायण * चारि दिके देखिलेन यत देवगण बलिया श्रीहिरि कोरलेन एक शब्द * से शब्दे हइल श्लोक चारि पद बद्ध हार क रलेन चारािदेके निरीक्षण * म्लान देखिलेन सब देवेर वदन मलिन देखियाजेज्ञासेन नारायण * तोमा सवाकार शत्रु हैल कोन जन १ लक्ष्मी । २ शेप शटया । ३ जितना भी, समस्त ! ४ कृपाप्ट । ५ ब्रह्मा की प्रार्थना - ४ १५२ कृत्तिवास रामायण विधि सकोच कह सुनहु पुरन्दर * मम वर प्रपल दयानन निसिचर सो तुम जाय सकल दुख-गाया * बरनौ, द्रवित होय भवनाथा जोरि पाणि, सुरगुरु प्रभु आगे * यविनय करन दएडवत लागे मंगल रूप परम भगवाना * जनन विदित, गबह सुर माना नाथ-अनाथ, दीन कर बाना * लिगमानम तुम मकल पुराना विश्वस्त्रवा-तनय दुर्दण्डा * विधि अराधि, वर लहेउ प्रचण्डा तेज-लंकपति, सुर श्रीहीना * खुरपुर-नाम दुसह तिन कीना सविता-सोम न स्वर्ग प्रभामा * निसा-दिवस तम-निविड निवामा दण्डहीन, हत यम-प्रायकारा * वरुन न अधिपति जल-आगारा पावक प्रबल तेज निर्माना * कियो दरिद हरि धनद' खजाना गतिविहीन भयभीत ममीरा* * तजे अति पीरा सागर वेग न, मंद तरंगा * राग-रंग जनि कतहु' प्रमंगा मार्ग ग्रहगन, आराधन विधाता बलेन शुन देव पुरन्दर * तुमि गिया कह कथा प्रभुर गोचर प्रामि वर दियाछि दुर्दान्त रावणेरे * तुमि गिया कह दु.ख प्रमुर गोचरे देवगुरु बृहस्पति जोड़ करि हात * प्रभुर गोचरे करिलेन प्रणिपात । अवधान करह ठाकूर भगवान * प्रापनि जानह यत देवतार मान आगम निगम तुमि भारत पुराण * अनाथेर नाय तुमि कर पारेत्राण विश्वश्रवा मुनिपुत्र राजा दशानन * पाइल ब्रमार वर करि तार तेजे स्वर्गे देव रहिते ना पारे * देवेर देवत्व हरे दुष्ट बलात्कारे 1 घुचाइल यमेर यतेक अधिकार * सूर्येर उदय नाइ सदा अन्धकार । चन्द्रर कोक कत्र नाहि तारज्योति * बहुकाल प्रम 'स्वर्गे अन्धकार राति वरुणेर घुचिल अगाध यत जल * निर्वाण हइल अग्नि नाहिक प्रबल कुवेरेर हरे धन पाइल 'तरास * ग्रहगणेर अधिकार हइल विनाश सम्बरिल पवन पाइया महाभय * समुद्रेर वेग अति मन्द मन्द बय - ana १ ब्रह्मा । २ वहस्पति । ३ वेद-शास्त्र । ४ विश्वनवा का पुत्र रावण । ५ घोर अप- फार । ६ कुवेर । ७ पवन । "- वीना-नाद न आदि काण्ड १५३ नारद गीता * सुरपुर असुभ, सकल विपरीता पावसादि पऋतु कुसुमाकर * तजे समय भयवस दमकंधर 1 वर विरंचि दोनेउ भय मानो * किय दुर्जय रावण अभिमानी विधि-वर पाय, विधिहिं प्रतिकूला * सुरपुर हरन दुमह दुखसूला छिनी सुता. अपमान चहुँ, मलिन, न सुरपुर वास । ठौर न त्रिभुवन सुरन कहुँ, जहाँ जॉय तहँ त्रास ॥१२॥ अहह सरन पग प्रभु तव पावन * देव-देवि राखिय बधि रावन सुनत, नाथ-उर क्रोध कराला * जिमि घृत पाय प्रज्ज्वलित ज्वाला कर गहि चक्र सुदर्शन धारी * सुरन प्रबोधि गरुड असवारी अधिक न सुरगन त्रास प्रसंगा * करौं मान-मद-रावन भंगा अवहिं वधौं, कह गरुड़-असीना * विधि सोड समय निवेदन कीना वर अमर प्रथम दसकंधर * वध न तासु बिन मानव-वन्दर जो नर जनम लेय भगवाना * निमिचर मारि, करें सुर-बाना मम छाड़े वीणा नारद वीणाय छाड़े गीत * अमङ्गल स्वर्गेयत हैल विपरीत वसन्तादि अधिकार छाड़े छ्य ऋतु * नित्य भय पाइ सवे रावणेर हेतु ब्रह्मार वरेते सेइ हइल दुर्जय * तारे वर दिया ब्रह्मा निजे पान भय तॉर वर पेये लङ्घ ताँहार वचन * स्वर्ग हैते ग्वेदाडिया दिल देवगण काड़िया लइल से देवेर कन्या यत * देवेर शरीरे अपमान सहे कत त्रिभुवने रहिते कोथायो नाहि स्थान * यथा जाइ तथा से करे अपमान 1 निवेदन करि प्रभु तोमार चरणे * रावणे बधिया राख देव देवीगणे शुनिया प्रभुर क्रोध अन्तरे वाडिल * घृत पेये अग्नि येन प्रज्ज्वलित हेल विनता-नन्दने हरि करेन स्मरण * चक्र हाते करि पक्षे करि श्रारोहण कहिलेन देवगणे भय नाहि आर * रावणे एखनि ये करिव संहार गरुड़े चड़िया चलिलेन जगन्नाथ * हेनकाले कहे ब्रह्मा प्रभुर साक्षात् श्रामि वर दियाछि ये पूर्व रावणेरे * एखनि करिले रण गवण ना मरे नरेर उदरे यदि लो हे जनम * नर वानरेर हाते ताहार मरण प्रभुर साक्षाते ब्रह्मा कहेन ए कथा * जन्मेर नामेते प्रभु हेट करे माया F वसन ....... १५४ कृत्तिवास रामायण वर के वीर, विपति मोहिं टेरा * सहज सुभाव सदा विधि केरा भावी अमिट, चखौ निज करनी * मकल, स्वर्ग तजि गमनौ धरनी सुनि विरंचि, हरि, विनय सुनावा * दुर्जय दनुज दुसह दुख गावा प्रहरी-लक दण्डधर भानू' * निज कर रंधति' पाक कृमानू सुरपति सुमन सँजोवति हारा * पवन करत नित मन्द बयारा छपाकर* छिति महरानी * मार्जन, महरानी * मार्जन, वरुन पियावत पानी घोटक घास काटि उपहासा * दीन विलोकि दमा यम त्रासा शनि-कुदीठ त्रैलोक विनासा * धोवत लंकपति-बामा दनुज-सुतन चटसार गुजारा * सकल सृष्टि मैं सिरजनहारा रावन मन रजन करत, वीनापानि मुनीस । भुवन सिद्धि-सम्पति सकल, हित विलास-दससीस ।।६३॥ जो नर-जनम न भा– प्रभुमन * हरि-रचना लीजै हरि-चरनन रचउ विरचि इतर सुरनाथा * तव जग तुमहि समर्पित नाथा वरेर समय ब्रह्मा हन आगुयान * विपदे पडिले बले रक्ष भगवान कतवार दुःख पाव ललाटे लिखन * पृथिवीते याव स्वर्ग करिया त्यजन पुनश्च हरिरे ब्रह्मा कहेन वचन * दुष्ट रावणेर क्रीडा करह श्रवण हाते अस्त्र सूर्यदेव लंकार दुयारी * इन्द्र माला गॉथि देन चन्द्र छत्रधारी अापनि त अग्निदेव करेन रन्धन * मन्द मन्द वातास करेन समीरण वरुण बहिया जल देन निति निति * करेन मार्जना गृह निजे वसुमती शुनिले यमेर कथा हइवेक हास * काटिया धानेन तार घोटकेर घास शनि दृष्टे त्रिभुवन भस्म हैया उड़े * कापड धुइया देन शनि लड्कापुरे जगतेर कर्ता प्रामि ब्रह्मा महामुनि * पड़ाइ बालकगणे लाते श्रापनि रावणेर अग्रेते देव गायक नारद * रावण भुवन जिनि करेछे सम्पद 1 जन्म निते हरि यदि हइला कातर * आपनार सृष्टि सब लह चक्रधर आर इन्द्र आर ब्रह्मा करह सृजन * आपनार सृष्टि सब लह नारायण एतेक वलिया ब्रह्मा करुण वचन * भकतवत्सल प्रभु ताहे देन मन १सूर्यदेव । २रसोई बनाते हैं । ३अग्निदेव । ४पखा झलना । ५चन्द्रदेव । ६पाठशाला। नारद । - पारन वानर-योनि प्रनवत भगवन्ता आदि काण्ड १५५ सुनि विधि-विनय सुधा रसमानी * भक्तविवस कह मंगल वानी बरनउ युगुति' सकल चतुरानन * कासु उदर जनमउँ, केहि आँगन कवन देम-कुल मम अवतारा* को मम जग परिजन-परिवारा कह विधि, अवध भानुकुल-भूपा * कौशल्या पटरानि सुरूपा तासु गर्भ प्रभु जन्मा * सुनि बोले मृदु वैन अजन्मा' चिर परिचित ते मम दोउ प्रानी * भक्त पुरातन मम-वरदानी सो वर सफल जनमि तिन गेहा * धरहुँ सुरन हित मानव-देहा जनमि सुरवृन्दा * नर-वानर मिलि असुर निकन्दा' जानत विष्णु-गमन छितिलोका * कातर कमला' प्रभुहिं विलोका ।। धरा जनम, तव नाथ वियोगा * कतक काल पुनि दरस सँयोगा 1 दुसह व्यथा, मोहिं तजिय न कन्ता * रमा रोय बोले हरि, विधि कहहु विचारी * लोकजनानि किमि व्यथा निवारी विना जगमाता * होय न प्रभु दसकंध निपाता हे ब्रह्मन् इहार उपाय बल मारे * कोन वंशे जन्म लत्र बल कार घरे काहार उदरे आमि लइव जनम * आमारे वा अपत्य बलिवे कोन जन ब्रह्मा वले जन्म लवे दशरथ घरे * सूर्यवंश पुण्येते कौशल्यार उदरे विधातार वचने बलेन चक्रपाणि * दशरथ कौशल्या उभये आमि जानि पूर्वेते आमार सेवा करिछे विस्तर * जन्मिव तोमार घरे दियाछि ए वर नरेर गर्भते आम लइव जनम * वानरीर गर्ने जन्म लह देवगण आमि नर हइ हो तोमरा वानर * रावण मारिते येन हइनो दोसर ब्रह्मा वाक्ये स्त्रीकार करेन नारायण * पदतले पडि लक्ष्मी यूडिल क्रन्दन तब अवतार हवे पृथिवी मण्डले * तोमा दरशन प्रामि पाव कत काने श्रामारे छाडिया कोया याइवेश्रीहरि * विच्छेदयन्त्रणा आमि सहिते ना पारि लक्ष्मीर रोदनेते कान्दे कम्युग्रीव * ब्रह्मारे जिज्ञासे कोथा लघमीरे राखिव शुनिया से वाक्य ब्रह्मा निवेदन करे * उनि नाहिं गेले कि रावण राजा मरे । अयोनि सम्भवा उान जन्मिवेन चापे * जनकर घरे जन्म मिथिला प्रदेशे जगती जनम १ तरकीन । २ जन्म-मृत्यु-रहित । ३ विनाश । ४ लक्ष्मी । ५ जगर म्वा ।

१५६ कृत्तिवाम रामायण दिव्य जनम' छिति जहाँ विदेहा * सुता प्रकट मिथिलापति गेहा कथा हरिजनम विलमि' कछु. पुनि बरनेउ कृतिवाम । जगदम्बा जिमि जानकी, जनमी जनक-निवास ।।६४|| जनक ऋषि के हल जोतते समय लक्ष्मी का जन्म मिथिला-अधिप जनक ऋपिराजा * यज्ञभूम जोतत सुतकाजा लै हर जोतत खेत भुवाला * नम उर्वसी गमन सोइ काला लखि अप्सरा कामसर पाता * छिति ऋतुमती, रेत नप पाता अवनि-गर्भ सो डिम्ब-सरूपा * जोतत भूमि भूमि जहाँ नित भूपा हर परसत, नृप डिम्ब निहारी * किये टूक दुइ, कौतुक भारी सुता रतन छवि रमा सरूपा * चपला सरिस, स्दन सुनि भूपा चकित देव, उत शब्द अकासा * सीरभूमि जो सुता प्रकासा ! तव तनया, पालौ गृह जाई * लै नृप अंक चले हरपाई - . एतेक बलिल यदि ब्रह्मा तपोधन * आदिकाण्ड गान कृत्तिवास विचक्षण जनक ऋषिर चाषेलर्म र जन्म श्री हरिर जन्म-कथा थाकुक एखन * आगेते कहिब माता लक्ष्मीर जनम येखानेते वेदवती छाडिल जीवन * सेखाने हइल दिव्य मिथिला भुवन तार राजा हइल जनक नामे ऋषि * पुत्रेर कारणे राजा यज्ञभूमि चषि स्वहस्ते लाङ्गले राजा यज्ञभूमि चषे * उर्वशी चलिया जाय उपर आकाशे ताहाके देखिया कामे जनक मोहित * हठात् ऋषिर वीर्य दृइल स्खलित दैवयोगे पृथिवी श्राछिल ऋतुमती * ऋषिवीर्य पहिया हहल गर्भवती ! डिम्बरूपे भूमि मध्ये छिल बहुकाले * भासिया उठिल डिम्ब लाङ्गल मिराले डिम्ब भङ्गि जनक करिल दुइ खान * कन्यारत्न देखि ताहे लक्ष्मीर समान उडा-उडा करि कान्देयेन सौदामिनी * आचम्बिते आकाशेते हैल देववाणी चापभूमि हैते एइ कन्यार जनम * तव कन्या बटे एइ करिह पालन शुनिया जनक बड़ हरिष अन्तरे * कन्या कोले करिया तखनि एल घरे १ अलौकिक ( अयोनि ) जन्म । २ रुककर । ३ अर्ड के समान ।

श्रादि काण्ड १५७ केहि दुख दैन हरन किय वाला ? * कहत रानि, नहिं उचित भुवाला जोतत मीर लही यह सीता * पालहु रानि ममोद सप्रीता संततिहीन उमड़ म्नेहा * सुता बढ़त दिन-दिन नृप-गेहा । केशपाश धन चवर ममाना * अपर प्रोष्ठ फल विम्ब लुभाना करगत सुकर सहज कटि अंगा * अँगुरि पदुमपग हिंगुल रंगा तनछवि सुवरनलता प्रतीता' * सीता जनम नाम सो सीता अतुल इंदिरा मरूपा * जेहि छवि मुग्ध विष्णु नररूपा -जनम-कथा मुनि काना * लहै मुतिय, सुत, संपति नाना पुत्रेष्टि-गज की समाप्ति पर यज्ञ का चरु राजा दशरथ की तीन रानियों द्वारा खाना और तीनी के गर्भ से चार अशी में नागयण का जन्म जनकपुरी श्री-जनम उत, अवधपुरी श्रीकान्त । असुर-सूल मुरमुखद, किय. लीला लीलाकान्त ॥१५॥ यज्ञ, वर्ष लौं, वर्प लौं, दसरथ कीन्हा * यजभूमि प्रभु दरसन दीन्हा अथक देखि कन्या राजराणी जिज्ञासे तखन * दुःख दिया काहारे पानिले कन्याधन जनक बलेन क्षेत्र कन्यार जनम * मम कन्या बटे तुमि करह पालन अपत्य नाहिक स्नेह वाहिल अन्तरे * दिने-दिने बाड़े लक्ष्मी जनकेर घरे धन केशपाश तॉर यमन चामर * पाका विम्बफल तुल्य तॉर प्रोष्ठाधर मुष्टिते धरिते पारि तॉहार कॉकलि * हिङ्गले मण्डित पादपद्मर अंगुलि परमा सुन्दरी कन्या येन हेमलना * मिराले हइल जन्म नाम राखे सीता लक्ष्मीर रूपेर किवा कहित्र तुलन * यार रूपे मुलिवे आपनि नारायण -येइ जन शुने एइ लक्ष्मीर जनम * धन पुत्र लक्ष्मी तारे दन नारायण कृत्तिवासपरिडतेर कावेत्वविचक्षण * गाइल ए आदिकाण्ड लक्ष्मीर इनम दशरथे पुत्रोष्टि-या साग आ यझेर चरु तिन रानीके भक्षण एव तिनेर गर्भ नारायणर चारि अशे जन्म मिथिलाय हैलयदि लक्ष्मोर उत्पत्ति * अयोध्याय जन्म निते यान लक्ष्मीपति दशरथ यज्ञ करे एकइ बत्मर * यज्ञस्थले प्रामि देखा दिलेन श्रीधर १ मालूम पहनी थी । २ खेत जोतने के बाद भी रेवा को मीना कहते । रामचद्र।

शंख चक्र . १५८ कृत्तिवास रामायण कर पद्म गदाधर * वनमाला किरीट कुण्डलधर भृगहिं केवल दरम सरूपा * लखत न पान, चतुर्भुज रूपा कह मुनि, दसरथ-पुन्य महाना * जिन निकेत जन्मत भगवाना ।। कौतुक ! सुरन कीन नभवानी * रामजनम, रावनवध जानी ।। अंधक सों नृप श्रीफल पावा * यो श्रृंगी चरु सहित मिलावा। आहुति पूर्न शृंगि ऋषि दीना * विष्णु-रूप चरु प्रगटित कीना चरु सॅजूति पुनि सुबरन थारी * सुभ छन मुनि दसरथहिं मवॉरी महरानिन चरु दीजिय जाई * ते सुतवती होय सो पाई चरु नृप लीन, कीन मुनि बदन * शुचिपथ महल चले अजनन्दन कौशल्या, कैका पटरानी * यज्ञप्रसाद देन भाग दै भूप समाना * यज्ञभूमि दिमि कीन रानि सुमित्रा सकल विलोका * भरत उसाम, अतुल उर सोका कवन द्रव्य मोहिं वञ्चित कीन्हा * हत्भागिन मोहिं भूप न चीन्हा मन मानी । दोउन, पयाना शंख चक्र गदा पद्म चतुर्भुज कला * किरीट कुण्डल कणे हृदे वनमाला एइरूपे आमि देखा दिल नारायण * केवल देखिल ऋष्यशृङ्ग तपोधन मुनि चले दशरथ तुमि पुण्यवान * तव घरे जन्मिते आइल भगवान हेनकाले देववाणी हैल चमत्कार * विष्णु जन्मे रावणेर करित संहार ऋष्यशृङ्ग मुनि दिल यज्ञेते आहुति * यज्ञ हैते उठे चरु विष्णुर आकृति विष्णुमत्रे ऋष्यशृङ्ग ताते दिल काटि * ताते फेले दिल अन्धकेर फल गुटि तुलिलेक चरु मुनि सुवर्णेर थाले * दशरथ हाते दिया कहे शुभकाले प्रथमा नारी के लये करात्रो भक्षण * एइ चरु हैत हवे तोमार नन्दन मुनि चरु हा दिल राजा वन्दे माथे * अन्तःपुरे गेल राजा सुपवित्र पथे कौशल्या कैकेयी तॉरमुख्य दुइराणी * एकभाग छिल चरु कैल दुइ खानि अग्रभाग दिल राजा कौशल्या राणीरे * शेष भागखानि दिल कैकेयी देवीरे चरु दिया यज्ञशाले गेल दशरथे * हेन काले सुमित्रा से लागिल कान्दिते ऊर्द्ध श्वासेासिकहे छाड़ियानिश्वाम * कोनद्रव्य खेते राजा नाकैल आश्वास १ अन्य किसा का । २ यज्ञ की आति के लिये हवप्यान्न ।

ܚܚܚ ममज' दाम आदि काण्ड १५६ जीवन विफल, विलग मोहिं राखी * कतहुँ न सुख, अकेल जो चाखी' करुनामयी कौशिला रानी * कहेउ, सुमित्रा ! सुनु मम वानी महमामिनि तीनिउ भगिनि, अर्द्ध देहुँ तोहिं अंस । पै, मम सुत-महचर मदा, रहै तोर अवतंस ॥१६॥ तब-तनय जंठानी * दै वर मोहिं सनाथहु रानी एक भाग निज हित धरि शेपा * दियो सुमित्रहिं चरु अवशेषा कैकड+ कौतुक सकल निहारी * अति सयानि, इमि गिरा उचारी मम चरु-भाग रानि तव हेता # वचन देहु जो हर्प समेता । मम चरु-अंस प्रगट तव नन्दन * मम-सुत-सखा सतत मनरंजन दीदी दया लही बड़भागी * ममज, दाम तव सुत अनुरागी मुनि कैकई, अस निज दीन्हा * तीनिउ संग पान चरु कीन्हा हरि, इक अस, जनम तन चारी * शुभ छन तीन कोखि अवतारी दया लहौ आमित दुर्भागा नारी विफल जीवन * प्रामारे वञ्चिया खेये कत पावे धन । शुनिया कौशल्या राणी ह'ये दयावती * वलिते लागिल राणी सुमित्रार प्रति । । मने मानियाछि हेन तिनाटे भगिनी * आपन भागेर तोमा दिव अर्द्धसानि इहाते तोमार यदि जन्मये नन्दन * श्रामार पुत्रेर सङ्ग रवेक से जन सुमित्रा वलेन दिदि एइ देह वर * मम पुत्र हय तव पुत्रेर नफर अग्रभाग कौशल्या राखिया निज तरे * शेफ्भाग दिल तवे सुमित्रा भग्निरे ताहा देखि बसिया कैकेयी क्रूरमति * कपटे डाकिया कहे मुमित्रार प्रति चरुर अद्धक अंश तोमा दिव आमि * सुमित्रा भगिनी एड सत्य कर तुमि अामार चरुर अंशे हवे ये नन्दन * अमार पुत्रेर सङ्गी करो सेइ नन सुमित्रा वलेन दिदि करिलाम पण * तीमार पुत्रेर दास आमार नन्दन एत शुनि शेपमाग दिलेन तॉहारे * तिनजन खाइलेन चरु एकवारे एक अंशे नारायण चोरि अंश हैया * तिन गर्भ जन्मिलेन शुभक्षण पाझ्या १ सायगा । २ मुझमे उत्पन्न पुत्र । ३ सदैव । + कैकेई का भाव कृतित्रासानुसार यहां नहीं वर्णन किया है । वदा दिया गया है।

इत, रानिन तन १६० कृत्तिवास रामायण दिय नृप सविधि दच्छिना दाना * पूरन याग. द्विजन सन्माना 'नृप सुतवान' सबन वर दीना * तृप्त गमन निज-निज गृह कीना श्रीराम का जन्म चरुपान प्रभावा * कोटिन भानु तेज छावा अमित केस सित, वयम बुढानी * सो तजि, चरुरल तरुनि लखानी विधि-माया, तीनिउ इक काला * भई ऋतुवती, विदित भुवाला धारेउ गर्भ, भूप अनुमाना * बढ़त सतन शशिकला समाना शुभ लच्छन दुइ मास वितीता * चौथ माम, नृप भई प्रतीता पञ्चम पगुधारा * समाचार नुभ जग विस्तारा पुरुवारध', सुमुखिन बदन', जिमि प्रभात कर चंद । श्याम उरोज सलज्ज मन, अहिनिसि पुलक अनन्द ॥१७॥ कछु बीते रुचि मृतिका पाना * उन्नत उदर, नयन अलमाना फरकति कछु उठवनि लग भारी * अमरन' खसति, अंग पियरारी गर्भ, भूप मास गर्भ हेथा यज्ञ माङ्ग करि राजा दशरथ * ब्राह्मणेरे धन दान करे विधिमत ब्राह्मण तुपेल करि नाना धन दान * सवे आशीर्वाद करे हओ पुत्रवान विदाय हइया सबे निज देरो आय * श्रादिकाण्डे गाइल पुत्रेष्टि यज्ञ साय श्री रामेर जन्म हेथा तिन राणी चरु करिया भक्षण * कोटि सूर्य जिनि सेइ तिनेर वरण हइया छिलेन वृद्धा शिरे पाका केश * चरुर भक्षणे येन प्रथम वयेस विधाता सकल माया करेन घटन * एक काले ऋतुमती हैल तिनजन दशरथ जानिलेन ए सत्र सन्दर्भ * ऋतुर लक्षणे जाना गेल सेइ गर्भ एइमत तिन गर्भ बाड़े दिने दिने * दुइ मासे गर्भ जाना गेल सुलक्षणे चारिमास गते प्रतीत हैल मन * पञ्चमास ग.ते शुनिल त्रिभुवन प्रथम गर्भेते लजायुक्ता अहर्निशि * बदन हइल येन प्रभातेर शशि कुचाग्र हइले काल उदर डागर * मृत्तिकार भक्षणेते संदा समादर घन धन हाइ उठे अलस नयन * पाण्डुवर्ण हैल अङ्ग खसे आभरण १ गर्भकाल का पूर्वाद समय । २ मुख । ३ रातदिन । ४ गहने ।

गर्भ नव पावा श्रादि काण्ड १६१ अंसह वसन, तन-बल नित छीना * आमा श्याम उरोजन लीना बढ़त वीने मासा * लखि भूपति - हिय अमित हुलासा पञ्चामृत कराय शचि पाना * पावन गर्भ कीन सविधाना पुन्य पुरातन, तरु फल आवा * कौसिल्या हरि सपने शंख चक्र कर पद्म गदाधर * दरस चतुर्भुज दिय सारंगधर सुवन - भाव अंकहिं भरि रानी * प्रभु कह 'मांगु' सुमञ्जुल बानी प्रथम कीन मम बहु सेवकाई * सुफल, उदर तव प्रगटहुँ आई पालहु मोहिं दे स्तन पाना * श्रम कहि पुनि श्रदरस भगवाना भौंचक रानि निरखि सुख सपना * सकल समोद दसरथहिं 'मातु-मातु' मोहि नाथ पुकारी * अन्धक-वर नृप हरपि द्विजन बहु सुवरन दाना * गत दस मास नृपति अनुमाना प्रसव-काल नियराई * तस-तस भूप मोद अधिकाई वरना । सत्य विचारी जस-जस कृष्णवर्ण प्रकाश हइल स्तन बॉटे * शरीरे ना रहे वस्त्र नित्य बल टुटे एइमत हइल से गर्भेर वर्द्धनः नयमास गर्भवती हैल तिनजन देखि दशरथ राजा आनन्दित मन * पञ्चामृत दिया कैल गर्भर शोधन ये छिल प्राक्तन पुण्य ताहारि कारण * कौशल्यारे देन देखा प्रभु नारायण स्वप्ने शंख चक्र गदापद्म शाङ्गधारी * चतुर्भुज रूपे देखा दिलेन श्रीहरि पुनभावे हरिके करिल राणी कोले * कहिलेन कौशल्यारे डाकिया मा बले पूर्वेते आमार सेवा करेछ प्रादरे * सेइ पुण्ये जन्मिलाम तोमार उदरे आपनि तोमार गर्भ लयेछि जनम * पुत्र बलि स्तन दिया करह पालन एत बलि अदर्शन हैल नारायण * कौशल्या वलेन किवा देखिनु स्वपन कहिल सकल कथा दशरथ प्रति * मा वलिया अामारे ये डाकेन श्रीपति शुनि दशरथ राजा हरपित मन * भावे बुझि सत्य हवे अन्धक वचन दीन द्विजगणेरे दिलेन कत स्वर्ण * एड्रूपे दश मास हइल सम्पूर्ण प्रसव समय यत निकट हइल * दशरथ भूपतिर आनन्द वाडिल - मन १६२ कृत्तिवास रामायण अब-तब जनम, निकट, मन धरहीं * मंगलगान प्रजागन करहीं हरि अागमन-भूमि अनुमाना * बमति गगन आतुर मुर नाना । दस दिसि मंगल नखत चहुँ, शुभ ग्रह उदित अनन्द । प्रथम पीर सुनि, प्रसव-पुर, प्रविमीं नारीवृन्द ।।८।। शुक्ला नवमि चैत्र मधुमासा * शुभ छन जग जगनाथ- प्रकासा व्यथा न. सोनित', गर्भ पुनीता * श्री , हरि जनम - सहित. उपवीता दीपशिखा जिमि तिमिर विनासा * प्रभु-तन-दुति रवि कोटि प्रकासा श्याम गात मकराकित कुण्डल * निखरित मुख, सुधांसु, छवि झलमल लंब अजानुबाहु मन रजा * श्रवन खचित - दुग नीलमकंजा | नूतन, अकथ, सुकोमल अंगा * अधरः ओष्ठ कस विवित रंगा । जो छवि विश्व जुरै मिलि तीरा * अतुल, असम श्रीनाथ-सरीरा पुर-वनितन जय-कलरव कीन्हा * सम्हरि नार-छेदन दीन्हा शुभ संवाद कौशिला - दासी * खुसखबरी नृप , पाहि प्रकासी एखन तखन राणी हइल प्रसव * प्रजागण गान करे सदा शुभ रव येइ दिन भूमिष्ट हइबे नारायण * अाकाश युड़िया बसिलेन देवगण शुभ ग्रह सकल उदित स्थाने स्थाने * दशदिक मङ्गल सकल तारागणे प्रथमे, प्रथमा स्त्रीर गर्भेर वेदन * अन्त.पुरे प्रवेश करिल. नारीगण मधु चैत्रमास शुक्ला श्रीरामनवमी * शुभक्षणे भूमिष्ट ह' लेन जगत्स्वामी गर्भव्यथा नाहि पायनाहिक शोणित * शुभक्षणे श्रीहरि हइल उपनीत अन्धकार घुचे येन ज्वलिलेक बाति ॐ कोटि सूर्य जिनिया तोहार देहाति श्यामल शरीर प्रभु चॉचर कुन्तल * सुधांशु जिनिया मुख करे झलमल आजानुलम्बित दीर्घ भुज सुललित * नीलोत्पल जिनि चक्षु अाकर्ण पूरित । के वर्णिते हय शक्त रक्त ओष्ठाधर * नवनीत जिनिया, कोमल कलेवर संसारेर रूप यत एकत्र मिलन * किसे वा, तुलना दिन नाहिक तेमन जय जय हुलाहुलि दिल नारीगण * सावधाने करिलेन नाड़िका : छेदन कौशल्यार दासी सेइ शुभवार्ता नामे * शुभ समाचार दिल गिया राजधामे १ सौर, सूतिका गृह । २ प्रवेश किया। ३ रक्त । ४ यज्ञोवपीत । ५ चन्द्रमा । म - छावा आदि काण्ड १६३ अष्टामरन आदि सोइ पाया * दसरथ-उर उछाह अति वेसुध गात विभोर अनन्दा * अगनित धन पाये द्विजवृन्दा । , पुनि तरंग पुलकावलि छाई * शत-शत मुरभि दान मन भाई सुभ छन पछि, सुवन मुख हेता * अवलोकन नृप चले निकेता रोहिनि-गेह चन्द्र जिमि गमना * सुरपति चले मनो शचि-भवना चले भूप छवि-सुत अवलोकन * जहँ कौशिला-कोलि मनमोहन वहु सम्हारि शिशु उर लपिटाई * पुनि-पुनि चुम्ब चदमुख राई दरिद मोद निधि-कलस लहि, लोचन लोचनहीन । ताहू सों नृप अधिक सुख, तनय विधाता दीन ।।६।। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म प्रथम अंश प्रगटत घनश्यामा * कैकड़ छोम जनम सुनि रामा कौशिला-लुत बहभागी * विधि' न प्रथम मोहिं दीन, अभागी जनम शुनि दशरथ पूर्ण पुलक शरीरे * अष्ट आमरण अारो दिलेन दासीरे परम अानन्दे राजा पामरे अापना * कत धन दिल द्विजे के करे गणना आनन्द सागरे राजा भासे सेइ ठॉइ * पुनरपि दिल दान कत शत गाइ गणक आनिया करिलेन शुभकाल * पुत्रमुख देखिबारे यान महीपाल इन्द्र येन चलिलेन शचीर मन्दिरे * चन्द्र येन आसियाछे रोहिणीर घरे कौशल्या बपियाचे नारायण कोले * पुत्र देखिबारे राजा गेल हेनकाले धीरे धीरे दशरथ पुत्र निल बुके * एक लक्ष चुम्ब तार दिल चॉदमुखे दरिद्र पाइल येन निधिर कलम * ततो धक आनन्दित राजार मानस अन्धजन येमन नयन लाभे हय * ततोधिक दशरथ पाइया तनय एतदिने दशरथ मनेते उल्लास * रामजन्म रचिल पण्डित कृत्तिवास भरत, लक्ष्मण ओ शत्रुघ्नेर जन्म एक अशे चारि अंश हैल नारायण * शुनिया दुःखित बड़ कैकेयीर मन आजिहते कौशल्याय बाडिलसोहागे मोरे पुत्र केन विधि नाहि दिल आगे १ कौशल्या की गोद में। २ विधाता ।

नृप-सुत जेठ - मुदित भूप १६४ कृत्तिवास रामायण राज-अधिकारी * शास्त्र सकल अस नीति विचारी पूछत मंत्र मंथरा तीरा * तब लौं बढ़ी प्रसव । के पीरा मंगलघरी प्रगट पद्मासन * अंस द्वितीय · जन्म नारायण भरत. सरूप सलोन अनूपा * नखसिख सकल राम अनुरूपा गई मन्थरा जहँ अजनन्दन * कैकइ-उदर जनम तव नन्दन कैकई निकेता * चले सुवन मुख दरसन हेता अानन-सुत विलोकि महिपाला * बहु धन दान, द्विजन प्रतिपाला पीर सुमित्रा प्रसव बहोरी * जन्मति जुगुल तनय के जोरी गौरवर्ण दोउ हरि-अवतारा * अनुपम छबि सौमित्रि-कुमारा रूपसि-प्रसव जुगुल सुत देखी * बनितन जय-ध्वनि कीन विशेखी । दीन सगर्व खबरि पुनि चेरी * जोरी नाथ जनम सुत केरी सुनत अवधपति मोद अपारा * दीन लुटाय, द्विजन भएडारा निरखि सुतन मुख, भूप पयाना * करें गनित' जहॅ बुध-विद नाना ज्येष्ठ पुत्र राजा हय सर्वशास्त्रे बले * मम पुत्र विधि आगे केन नाहि दिले बलिते बलिते हैल गर्भेर वेदन * कैकेयी बलेन कुंजी गा करे केमन छिलेन मायेर गर्ने करि पद्मासन * शुभक्षणे जन्मिलेन प्रभु नारायण कौशल्या राणीर पुत्र येरूप लावण्य * सेइ मुख सेइ नाक किछु नहे भिन्न कुंजी गिया जानाइल भूपतिर घरे * हइल तोमार पुत्र कैकेयी उदरे शुनि दशरथ राजा आपना पासरे * पुत्र मुख देखे गिया कैकेयीर घरे पुत्र मुख देखि राजा अति हृष्टमति * धन वितरणेते देन अंनुमति सुमित्रार हंइलेक गर्भेर वेदन * यमज उभय पुत्र प्रसवे तखन | गौर वर्ण हैल दोहे विष्णु अवतार * सुमित्रा प्रसव कैल यमज कुमार यखन यमज पुत्र प्रसवे सुन्दरी * जय-जय हुलाहुलि दिल सब नारी दासी गिया दशरथे कहिल गौरवे * पार दुइ पुत्र राजा सुमित्रा प्रसवे शुनिया हइल तॉर आनन्द अपार * ब्राह्मा-णेरे लुटाइल सकल भाण्डार चलिलेन दशरथ 'परम कौतुक * तिन घरे देखिलेन चारि पुत्र मुख १ ज्योतिषी गणना।

आदि काण्ड १६५ रविकुल धनि, नृप सुयस बखाना * सुभ ग्रह घरी अकथ भगवाना सारपौम' मंगल सुवन, रामजनम मुनि गान । हरन । स-यम, लहन सुख, सुत, श्री, संपति खान ॥१०॥ श्री राम जन्म में सभी को आनन्द चले दान लहि गनित बुध उत पुर अनॅद-हिलोर । अवध, प्रजा-चारिउ बरन मगन, अवध सुख-सोर ।। रघुनाथ-जनम सुनि, नाचत ऋषि-मुनि, दण्ड कमण्डल हाथा । नाचत सुर सुरपुर, धरा नारि-नर, अवध नचत नरनाथा' ।। नाचत विरंचि रंग, देवयानि मंग, इन्द्र नर्त शचि-साथा । जड़-जगम जेते, नृत्य अचेते, बसुमति नर्ति सनाथा ।। दिवि अभरन-धारी रूपसि नारी, चलीं दरस भगवन्ता । विद्याधरि-नर्तन, सकल नगर ध्वनि, रतन प्रदीप ज्वलंता ।। - तिन दण्ड वेला हैल गण केर मेला * खड़िते गणिया देखे शुभ क्षण वेला सूर्यवंशे आछे बहु राजार सुकीत्ति * सवा हेते सेइ पुत्र राजचक्रवर्ती इहार कोष्ठिर किवा करिव गणन * एमन लक्ष्मण बुझि प्रभु नारायण येइ जने शुने प्रभु रामेर जनम * धन पुत्र लक्ष्मी हय भय पाय यम अयोध्याय हइल अानन्द कोलाहल * क्षत्रि वैश्य शूद्र सबे करिल मङ्गल गणके तुपिल राजा दिया नाना धन * आदिकाण्ड गान कृचिवास विचक्षण श्री रामेर जन्मे सफलर आनन्द रामेर जनम शुनि, नाचिल सकल मुनि, दण्ड कमण्डलु करि हाते । स्वर्गे नाचे देवगण, मलै नाचे मर्त्यजन, हरिपे नाचिछे दशरथ ॥ श्री देवयानिर सङ्ग, नाचिछेन ब्रह्मा रङ्ग, शची सङ्गै नाचे शचीपति । स्थावर जङ्गम भार, सवे नाचे चमत्कार, उल्ला सत नाचे वसुमती ॥ दिव्य-दिव्य आमरण, परियत नारीगण, चलिजाय अनेक सुन्दरी । चलि जाय राजपथे, श्रीरामेरे निरखिते, सम्मुखेते नाचे विद्याधरी ॥ - , - १ चक्रवर्ती । २ ज्योतिपी। दारय । ४ पृथ्वी ।

خیمه . 9 मन संका कृत्तिवास रामायण कौशिला सुवन जनि',गगन सुरन ध्वनि, रघुपति जय श्रीकन्ता । जन्मे नारायन, वधैं दसानन, सुरन कलेस-भनन्ता ॥ प्रभु-ध्यान लगाएँ, चरित जो गा₹, धनि ! भवमागर तरहीं। नर-पुन्य उदित, हरि देवलोक तजि ! धराधाम अवतरहीं । यम-त्रास नसावनि, कथा सुपावनि, सुनि, सुत-संपति लहहीं । पूरन अभिलासा, कवि कृतिवासा, वालमीकि अनुसरहीं। श्रीराम के जन्म से रावणको अमगल की आशका एव उसके निवारण का उपाय मोचना अवध जनम जो प्रभु, तौलका * हित अतंक, रावन अचरज दनुज, सिंहासन हाला * गिरे सुकुट छिति, हाल बेहाला ! : धरनि किरीट खमकि किमि आये * कौतुक कस ? अपसकुन दिखाये । कित घननाद ! भानु कोदण्डा * करौं वसुमती ४-बासुकि खण्डा कहेउ विभीषण धर्म सरूपा * तव वध, प्रभु प्रगटे हरि रूपा धरनि- सहसफन' कोप अकारन * श्रानि न केहु अपराध दमानन रत्नेर प्रदीप ज्वले, पुरी पूर्ण कोलाहले, कौशल्या हइल पुत्रवती। गगनमण्डले थाकि, देवगण बले डाकि, जय-जय-जय रघुपति ॥ जन्मिलेन नारायण, वधिवारे दशानन, देवेर करिते अव्याहति । इहा शुने येइ जन, किम्बा करे अध्ययन, भेवे मुक्त हय सेइ कृती ।। वैकुण्ठ करिया शून्य, प्रकाशिते नरपुण्य, अवतीर्ण प्रभु भगवान । रचिल ये कृत्तिवास, पूर्ण करि अभिलाष, वन्दिया से वाल्मीकि पुराण ।। श्री रामेर जन्मे रावणेर अमङ्गल आशका एव तन्निवारणेर उपाय चिन्तन अयोध्याले यदि जन्म निलेन श्रीपति * लङ्काय आतंक देखे सदा लंकापति आचम्बिते रावणेर सिंहासन दोले * माथार मुकुट खसि पड़े भूमितले दशमुखे हाय-हाय करे दशानन * आचम्बिते मुकुट खसिल कि कारण कोथागेल इन्द्रजित थान धनुर्बाण * पृथिवी वासुकि करि करि खाना-खान हेनकाले कहेन धामिक विभीषण * जन्मियाछे ये तोमार वधिवे जीवन पृथिवीर प्रति क्रोध कर कि कारण * तोमारे वधिते जन्म निल नारायण १ जन्म देकर । २ क्लेशहारी । ३ आतक,भय । ४ पृथ्वी । ५ शेषनाग । ६ शेषनाग । - पनपत - श्रादि काण्ड १६७ तबहिं सुरन नभवानी कीन्हा * दसरथ-सदन जनम प्रभु लीन्हा मो सुनि चिन्तित अतिव दयानन * कहेउ बेलाय दूत शुक-सारन लखहु अवनि पग-पग दोउ सोधी * कितै जनम रिपु मोर विरोधी अवहिं हनौं मोइ सैसव काला * नतरु प्रबल जंजाला चंदि लंकपति, आयसु धारी * लघि उदधि, चर .करें विचारी वैष्णव परम - दूत - शुक-मारन * त्रिभुवन प्रकट पुरंदर कारन कह शुक, सुनु सारन ! अम भाये * श्रीपति अवध जनम मन आवे धन्य भाग ! दोड अवमर पाई * लहैं दरस प्रभु लखेउ अवध छवि सुरपुर भामा * घर-घर रतन प्रदीप प्रकासा विछलत पग पथ चहुँ चिकनाई * सॉम प्रवेस महल दोउ पाई तह कौशल्या-अंक प्रभु, राजत बाल सरूप । जाकर जा विधि भावना, लहै दरम अनुरूप ॥ १०१ ॥ चरनन जाई श्रार कारो अपराध नाहि दशानन * वासुकी काटिते एवे कह कि कारण सेइकाले आकाशेते हैल देववाणी * दशरथ घरेते जन्मिल चक्रपाणि शुनया चिन्तित बड़ राजा दशानन * डाक दिया वले शुन शुक ओ शारण एके एके देखे एम पृथिती भुवने * आमार शत्रुर जन्म हैल कोनखाने एखनि मारिव तारे अति शिशुकाले * प्रबल हइवे बड़ घटिवै जनाले रावणेर अाज्ञा चर वन्दिलेक माथे * समुद्रेर पार हैया लागिल भाविते परम वैष्णव दूत शुक ओ शारण * बासदेर द्वारी तारा जाने त्रिभुवन शुक बले शुन मोर भाइरे शारण * अयोध्याय जन्मिलेन बुझि नारायण आजिशुभ दिन हैल अामा दोहाकार * भाग्यफले देखि गिया चरण तॉहार एत बलि अयोध्याय दिल दरशन * देखिल अयोध्या येन वैकुण्ठ भुवन रतन प्रदीप ज्वले प्रति घरे धरे * तेल हरिद्राय पथे चलिते ना पारे । अलक्षिते सान्धाइल कौशल्यार घरे * बसेछेने कौशल्या श्रीराम कोले करे है याहार मानसे चाके ये रूप वासना * सेई रूपे - प्रभुरे प्रभुरे देखये सेइ जना पम सनक, न सन सब कथा . १६८ कृत्तिवास रामायण युगुल बन्धु-चर भक्त महाना * दरस चतुर्भुज दिय भगवाना शंख चक्र कर गदाधर * बनमाला, कुण्डल, कुण्डल, किरीट धर १ शत कोटिन विधि' स्तुति करहीं * हरि-तन तीनि लोक चर लखहीं सनातनादि प्रहलादा * नारद निरखि, चरन' अहलादा' भक्ति भरे दोउ, लखि भवमोचन * लोटि मही प्रणवति भरि लोचन जोरि हाथ स्तुति सुख लहहीं * पुनि-पुनि सहम दण्डवत करहीं राकस जाति अधम अज्ञानी * तव महिमा अपार किमि जानी ब्रह्मादिक पद लहे ध्याना * चरन मो चरन* प्रतच्छ प्रमाना कृपासिन्धु प्रभु गहन, गुनागर * दीजिय वर, निमिचर अति पामर सदा रमन मन अंबुज-चरना * यहि विधि बंदि, लक किय गमना सुक-सारन मग मंत्र मिलावा * रावन दुरावा पलक निमेस अटे दोउ लका * कहेउ, दनुजपति रही निसंका तिल-तिल छानि, लखेॐ त्रैलोका * नाथ ! न तव-रिपु कतौं विलोका परम वैष्णव तारा भाइ दुइ जन * चतुर्भुज रूपे देखिलेन नारायण शंख चक्र गदा पद्म चतुर्भुज कला * किरीट कुण्डल शोमे हृदे वनमाला शत कोटि ब्रह्मा तारे करिछे स्तवन * प्रभुर शरीरे देखे ए तिन भुवन प्रमङ्गते देखिल ये मर्च पारिषद * सनक सनातन प्रादि प्रह्लाद नारद एइ रूपे दुह भाइ प्रभुरे देखिया * महस्र प्रणाम करे भूमे लोटाइया भक्तिभावे करये अनेक प्रणिपात * स्तवन करिछे तारा करि जोड़ हात राक्षसेर जाति मोरा बड़इ अधम * तोमार महिमा ज्ञाने श्रामरा अक्षम ये पद ब्रह्मादि देव नाहे पाय ध्याने * हेन पाद-पम देखि प्रत्यक्ष प्रमाणे एइ निवेदन करि शुन महाशय * तव पादपद्म येन मोर मन रय कृपार सागर तुमि प्रभु गुणधाम * एत बलि गेल तारा करिया प्रणाम पथे येते दुइ भाइ भाविलेक मने * एकथा कहिब नाइ पापी दशानने चक्षेर निमिपे तारा लङ्कापुरे गिया * रावणेरे कहे गिया आगे दॉड़ाइया एके एके देखिलाम ए तिन भुवने * तोमार ये शत्रु आछे नाहि लय मने १ ब्रह्मा । २ दूतों को। ३ हर्ष । ४ दूतो को। ५ चरण । , रंगा* कह आदि काण्ड १६६ खसे किरीट अमंगल जानी * जल स्नान तीरथन पानी दीन, द्विजन दें सुवरन दाना * टरै विपति, अपसकुन नसाना खिली केतकी भादौ ठठाय दसमुख इकसंगा। अधुझ विभीपन बन्धु ! करु, सुक-सारन विस्वास । धरनि सोधि आये, कतौं, जनि मम रिपु श्राभास ॥१०२।। अवहिं कहा परिनाम लखाई * अवसर परे परे विलोकेउ भाई! प्रायसु पुनि पयोधि' दिय रावन * सकल तीर्थन सुचि जल लावन तनिक न देर जोरि जुग-पानी * प्रस्तुत तीर्थन पानी सोई सुचि सलिल कीन स्नाना * दरिद दुखीजन मुवरन दाना शत-शत सुरमि, शिला संकल्पा * अमित दान सदर्पा दान-पुन्य करि सकल विधाना * भयेउँ अमर, दसकन्धर मकल लकेश जाना मुकुट खसिल राजा हवे अपमान * एकाल तीर्थेर जले कर तुमि स्नान खुवर्ण करह दान दीन द्विजवरे * अमङ्गल घुचिवे प्रापद यावे दूरे ।। दशमुख मेलिया रावण राजा हासे * केतकी कुसुम येन फुटे भाद्रमासे ना बुझिया कथा कह भाई विभीपण * आमार नाहिक शत्रु हेन लय मन रावणेर कथा शुनि वले विभीषण * परिणामे एइ कथा करित्रे स्मरण रावण ममुद्र बलि लागिल डाकिते * प्रामिया समुद्र दॉड्राइल जोड़ हाते राजा बले पृथिवीते यत तीर्थ पाछे* सकल तीर्थेर जल पान मोर काळे वाक्य मात्र पलिते विलम्ब ना हइल * सकल तीर्थेर जल सम्मुखे श्राइल तीर्थजल दशानन करिलेक स्नान * दरिद्र दुःखीरे राजा करे स्वर्ण दान यतेक काञ्चन दिल नाम कर कत * धेनु दान शिला दान करे शत-शत दान पुण्य करिया पसिल दशानन * भाविल अमर आमि नाहिक मरण कृत्तिवास पण्डितेर श्लोक विचक्षण * रामेर प्रीतिते हरि बल सर्वजन १ समुद्र । २ दोनो हाथ ।

A १७० कृत्तिवास रामायण वानरों का जन्म इत नररूप जनम जगदीसा * उत सुरगन प्रगटत तन कीमा निज-निज तेज देवगन दीन्हा * गर्भ वानरिन धारन कीन्हा 'सुरपति' अंस 'बालि' बलवाना * 'भानु' तेज 'सुग्रीव' महाना कन्द मूल फल खाय रसाला * किष्किंधा तिन शौर्य विशाला उद्गम धन वाढति, धनरासी * तेज, तेज तहँ अवमि प्रकासी बालि-तनय 'अंगद' बलवंता * 'पवन' अंस प्रगटति 'हनुमन्ता' सचिव 'जाम्ब' जन्मति 'चतुरानन' * सुत 'केसरी' जनम 'पञ्चानन'' बादति दिन-दिन जिमि तरुशाला * 'हेमकूट', सुत 'वरुण' विशाला 'यम' सुत पॉच तासु अनुहारा * प्रवल 'प्रमाथि' 'कुवेर' - कुमारा 1 'चन्द्र'-तेज 'दधिमुख' बलसोला * 'अग्नि' अंश सेनापति 'नीला' 'धन्वन्तरहिं 'सुपेन', * ज्ञान द्रव्य-गुन कपि 'सुपेन' कर देन, * सुत 'महेन्द्र' 'देवेन्द्र' दोउ ॥ सकल जिन । - वानरगणेर जन्म नर रूपे जन्मिलेन प्रभु नारायण * वानर रूपेते जन्म निल देवगण विधाता बलेन शुन यत देवगण * ये यथा वानरी पाओ कर आलिङ्गन एक वानरीते रति इन्द्र सूर्य करे * दुइ पुत्र जन्मिलेक ताहार उदरे हइल इन्द्रेर तेजे बालि कपिवर * सुग्रीव वीरेर जन्म दिलेन भास्कर किष्किन्ध्यार फल मूल खाइते रमाल * फलमूल खाय दोहे विक्रमे विशाल 1 तेज हैते तेज बाड़े सम्पदे सम्पद * हइल बालीर पुत्र कुमार अगद हइल ब्रह्मार तेजे मन्त्री जाम्बुवान * हइलेन पवनेर तेजे हनुमान हेमकूट नामे कपि वरुणनन्दन * पञ्च पुत्र यमेर ये यम दरशन जन्मिल शिवेर तेजे केशरी वानर * दिने दिने बाड़ेन ये शाल तरुवर अग्नि तेजे हइलेन नील सेनापति * कुवेरेर तेजे जन्मे वानर प्रमाथी सुषेणेर जन्म हय धन्वन्तरि तेजे * अहिविद्या विश्वशास्त्र दिल तार माझे । । महेन्द्र देवेन्द्र हइल सुपेण नन्दन * चन्द्रतेज दधिमुख हइल तखन १ वानर-शरीर । २ शकर । 0 राजा । अन्नप्रासा सब आई आदि काण्ड १७१ सुर जेते. निज तेज दै, जन्मे कपि बलवन्त । प्रथक-प्रथक, रसना अकथ, कोटिन कीस अनन्त ॥१०३।। दशरथ के चारो पुत्रों का अन्न-प्राशन और नामकरण अातुर नृप इत, गत दिन चारी * पचयें प्रथम अशौच निवारी छठी पूजि पुनि राति-जागरन * अठयें शिशुन कलाई-बन्धन पुनि निमंत्रि पुर-बाल समाजा * असन-बसन-अभरन दिय दिवस त्रयोदस असुचि निवारा * कतक दान नृप नाहिं सम्हारा चारिउ सुवन वयस पड्मासा * सबन सुभधरी अवनि-महीप, निमंत्रन पाई * दसरथ-सदन जुरे गुरु वशिष्ठ शुभ साइत देखी * परस अन्न मुख हरप विशेखी भूपति मुदित अंक लै चारी * मधु जल अन्न कञ्जमुख डारी सुमुख नन्दनन पुनि बैठारी * कौतुक रत्न द्रव्य दिय भारी सकल सतोप मुदित सब काहू * नामकरन सवन उछाह । प्रतेक कहिले हय पुस्तक विस्तर * एकैक देवेर तेजे एकैक वानर कृत्तिवास पण्डित ये सुखी सर्व दण्डे * वानरेर जन्म एवे गाय आदिकाण्डे दशग्घर चारिपुत्र र अन्नप्राशन ओ नामकरण एकैक गणने ये हइल चारि दिन * पाँच दिने पाँचुटी करिल सुप्रवीण छय दिने पष्ठीपूजा निशि जागरणे * दिल अष्ट कलाइ अष्टाहे शिशुगणे 1 डाकिया प्राने राजा बालक गणेरे * कापड़ पूरिया सोना दिल मवाकारे त्रयोदशे राजार हइल अशौचान्त * कतेक करिल दान नाहि तार अन्त छय मास वयस्क हइल चारि जन * कराइल साकार प्रोदन-प्राशन आमन्त्रण करिया सकल क्षत्रगणे * श्रानाइल दशरथ अापन भवने आसिया वशिष्ठ मुनि महानन्द मने * चारि पुत्र मुखे अन्न दिल शुभक्षणे दशरथ चारि पुत्र ल'ये निज कोले * मिष्ट अन्न दिल जल बदन कमले वसिलेन चारि भाइ सुचारु बदन * कौतुके यौतुक दिल सवे रत्न धन सकले यौतुक निले श्रासि राजधाम * विचार करेन सवे राखेन कि नाम १ पहला नहान पड़ा (सौर मे ) १ २ अन्नप्रागन, पमनी । - ग्रामा मातु करिहाई . १७२ कृत्तिवास रामायण निगमागम' जह स्त्रोत पुराना* * जासु जाप मों त्रिभुवन-बाना वालमीकि जोइ जप अविरामा * नाम कौशिला-सुत सोइ 'रामा' सहन भार मेदिनी समर्था * राखेउ 'भरत' नाम सोइ अर्था पुनि जे युगुल सुमित्रानन्दन * जेठ 'लखन' लघु सुत 'रिपुसूदन' दसरथ सुनत चारि सुत नामा * दीन भूसुरन अगनित रजतशिला, सुवरन अरु गाई * शतविधि शत-शत बरनि न जाई सुरभि दुधारू सहस दिय, विविध दान सन्मान । सहित वशिष्ठ, असीसि नृप, मुनिगन कीन पयान ।। १०४।। श्री राम-लक्ष्मण आदि की बालक्रीड़ा छठे मास हरि चलत चकाई * विहॅसत चढ़त । छिन पितु-अंक, मातु छिन गोदी * तोतरि वोल, दोउन हिय मोदी ससिमुख राम, सुधा सम बतियाँ * हँसी मंद, दुति उधरै दतियाँ वर्षगाँठ सुभघरी वहारा * कटि करधनि गर कञ्चन हारा विचारिया चारिवेद आगम पुराण * ये मन्त्र हइते लोक पावे परित्राण येइ मन्त्र वाल्मीकि जपेन अविश्राम * कौशल्या पुत्रेर नाम राखिल श्रीराम पृथिवीर भार सहिवेन अविरत * तेइ हेतु तॉर नाम हइल भरत सुमित्रार हइयाछे यमज नन्दन * शत्रुध्न कनिष्ठ तार ज्येष्ठ श्री लक्ष्मण राजा चारि नन्दनेर शुनिलेन नाम * ब्राह्मणेरे दिल दान कत शत ग्राम | रजत काञ्चन दिल नाम लव कत * धेनु दान शीला दान करे शत-शत 1 नाना दान दिया करे वशिष्ठेर मान * दुग्धवती गाभी दिल सहस्र प्रमाण आशीर्वाद करि घरे गेल मुनिगण * आदिकाण्डे श्रीरामेर नाम सङ्कलन श्रीराम लक्ष्मणादिर बालक्रीड़ा छयमास वयस्क राम देन हामागुड़ि * हासिया मायेर कोले यान गड़ागड़ि क्षणेक मायेर कोले क्षणे पितृकोले * वदने ना आसे कथा आध आध बोले श्रीरामेर चन्द्रानने अमृत वचन * प्रकाशित मन्द मन्द हासिते दशन एक वर्ष वयस्क हइले भाइ कटि * पीत धड़ा परिधान गले स्वर्णकॉठि १ वेद शास्त्र । २ पुराण । ३ पृथ्वी । ४ ब्राह्मण ।

माल मध्य समान आदि काण्ड १७३ सुवरन लटकनिया * पग झंकार रतन पैजनिया विविध- बालक्रीड़ा बहु करहीं * नेह परस्पर धरहीं राम चलत, लछमन पग डारा * पुनि रिपुदमन भरत अनुसारा लछमन-राम, भरत-रिपुसूदन * निज चरु अम लखे दोऊ जन पल न राम विन, नृप कोउ काला * तिल विछोह दुख दुसह कराला ध्यान न सुलभ चरन चतुरानन * पुनि-पुनि चुम्ब तासु मुख राजन नित्य बढ़त शशिकला प्रमाना * सबन लावण्य एक अस हरि चारि सरूपा * माया-राम विलोकत भूपा सदा निहाल पै चारै * मन, मुनि अंधक-शाप विचार मुनि-सराप मोहिं भा फलदाई * सुतन-दरम विन जीव नसाई । वर्ष सहस नव कौतुक राजू * पायेउँ 'राम' पुन्यफल आज नेह सबन, पुनि रम विशेखी * जीवन सफल सदा मुख देखी उठत मनोरथ विविध नित, लागेउ पञ्चम वर्ष। पाटी-पूजन धाम गुरु, पठयेउ भूप सहर्ष ॥१०॥ समाना राम ई कॉठिर मध्येते दिल सोनार किङ्किणी * रतन नूपुर पाय रुणुरुणु ध्वनि करेन श्रीराम खेला बालकेर मने * परस्पर सम्प्रीति हइल चारिजने श्रीराम चलिते पये चलेन लक्ष्मण * भरतेर चलवेते चलेन शत्रुघ्न यार ये चरुर अश जानिल ताहाते * श्रीराम लक्ष्मणे मिले शत्रुघ्न भरते यथा तथा यान राजा राम यान साथे * एक तिल अदर्शने प्रमाद ताहाते ब्रह्मा आदि याँर पद ना पाय मनने * पुनः पुन. चुम्ब देन तॉहार वदने चन्द्रकला येमन कति दिने दिने * सेइ रूप लावण्य बाडिल चारिजने एक विष्णु चारि भाइ मायार कारण * राम देखि दशरथ भावे मने मन सर्व क्षण दशरथ रामेरे नेहाले * अन्धक मुनिर शाप मने मने रले । में शाप दिल मुनि मोरे गौरव कारण ** एइ पुत्र ना देखिले प्रामार मरण ! नय हाजार वर्ष राज्य करिनु कुतूहले * राम हेन पुत्र पाइलाम पुण्य फले पुत्र मुख देखि सदा जीवन सफल * दशरथ गृहे राम प्रथम प्रबल एइ सब दशरथ करे अभिलाप * आदिकाण्ड गाडल पण्डित कृत्तिवास - १७४ कृत्तिवास रामायण श्री राम की शास्त्र और अस्त्र-विद्या की शिक्षा गुरुगृह पढ़न गये मर भाई * वरनाछरी वशिष्ठ सिखाई विविध वर्ण, आकृति तिन नाना * अष्टशब्द+ हरि कुशल निधाना काव्य, व्याकरण, श्रुति मन लाई * पारगत स्मृति रघराई । चौसठ कला अल्प दिन जाना * कवन शास्त्र प्रभु जासु न ज्ञाना शेप अध्ययन, गुरुहिं प्रनामा * अस्त्र-शस्त्र सीखत पुनि रामा भोर वन्धु सब जाइँ अखारा * कर जोर भिरि मल्ल जुझारा डण्डा-गुलि अरु लाठी हॉथा * डटत न कोउ विक्रम न कोउ विक्रम रघुनाथा 1 अचल मेरु सम प्रभु कर हाला * लरजत भट न देत कोउ ताला | भानुवंस धनुधारी * सुमन-चाप धरि काननचारी | सायक राम जाहि संधाना * तीनिहु लोक न ताकर नरेस दसरथ-प्रतिकूला * डरपत, राम-तेज तिन सूला एक दिवस धनु-पुहुप मवॉरी * लखन सहित कानन पग धारी जन्मत মানা जे श्री रामेर शास्त्र आ अस्त्र-विद्या शिक्षा पञ्च वर्ष गत हय हाते दिल खड़ि * पहिते पाठान राजा वशिष्ठेर बाडी क ख ग आठार रुला बानान प्रभति * अष्टशब्द पाठ करिलेन रघुपति व्याकरण काव्यशास्त्र पडिलेन स्मृति * अवशेष लिखिलेन राम चतु.श्रति कोन शास्त्र नाहि तॉर हय अगोचर * चौद्द दिने चतुःषष्टि विद्याते तत्पर विद्या पड़ि करिलेन गुरुरे प्रणाम * अस्त्र विद्या सेइ क्षण शिखिलेन राम । प्रातःकाले चारि भाइ यान मालघरे * मल्लविद्या शिखिलेक मकले समादरे गुलि दॉड़ा निया राम लाठरि खेलान * रामेर विक्रमे सत्र मालर पयान राम संगे कोन माल नाहि धरे ताल * सुमेरु पर्वते येन करिते साताल सूर्यवंशी बालक धनुक भाल जाने * फूलधनु हाते राम वेडान कानने धनु हाते करि राम यारे एड़े वाण * त्रिभुवने ताहार नाहिक परित्राण दशरथ राजार विपक्ष यत छिल * रामेर विक्रम देखि सवे पलाइल । यतने खेलेन राम फूलधनु हाते * एक दिन वने गेल लक्ष्मण सहिते + 'अष्ट शब्द' से तात्पर्य कदाचित् शब्दो के आठो कारकों के रूपों से है।

आदि काण्ड १७५ मृगया हेतु फिरत दोउ कानन * असुर मरीच मिलेर मनभावन कहें अदृश्य कहुँ प्रगट सरूपा * आयो राम ममुख मृगरूपा निरखत मृग, प्रभु कौतुक छावा * वान अचूक अचूक सुचाप चढात्रा उल्कापात सरिस जाई * असुर भीत, भजि चलेउ बराई सो पलाय मतिमंद, सॉस लीन लीन मिथिलापुरी। सुरगन अमित अनन्द, निरखि राम विक्रम प्रबल ॥१०६॥ सब विधि प्रभु ममरथ मनभावन * निमचय मरन निकट अत्र रावन अथये रवि, छिति सॉझ मवारी * थकित लखन-मुख मलिन निहारी | एक दिवस-श्रम दुमह, अधीरा * हनि रिपु ककस मिटइ द्विजपीरा र श्रामलकी निचोरि मुख डारी * झुधा-कृपा मेटन सुखकारी तौलौं सरवर' अनुपम लखहीं * नार विविध खग कलरव करहीं कहेउ विरञ्चि सुनहु सुरनाथा * दसरथ-गेह जगनाथा नर-तन धरि प्रभु निज नहिं चीन्हा * रावन-हनन जनम जग जनम जग लीन्हा जनम मृग चाहि दुइ जन वेडान कानन * तखन मारिच मङ्ग हइल मिलन कोन खाने गेल सेइ मारीच निशाचर * मृग रूप हैया गेल रामेर गोचर मृग देखि गमेर कौतुक हइल मन * धनु के अव्यर्थ वाण जुडिल तखन छुटिल रामेर वाण तारा येन खसे * महाभीत मारीच पलाय महा त्रासे श्रीरामेर बाण शब्दे छाडिल से वन * जनकेर देशे गेल मिथिला भुवन रामेर विक्रम देखि देवगण भारे * एत दिने रावण मरिचे अनायासे मूय्य अस्त गेल यथा बेलार विराम * रण श्रान्त लक्ष्मणेरे देखिलेन राम मालेन हइया गेल लक्ष्मणेर मुख * देखिया श्रीराम पान अन्तरेते दुःस एक दिन दुःखे भाइ हइले एमन * केमने मारिवा चैरी राखिने ब्राह्मण आमलकी फल पाडि देन तार मुखे * क्षुधा तृष्णा दूरे गेल खान मनोसुखे हेन काले देखिल निकटे सरोवर * नाना पक्षी जले अाछे करे कलरव एमन समये ब्रह्मा कन पुरन्दरे * जन्मे छ अापनि हरि दशरथ घरे नव रूपे आपनाके विस्मृत प्रापनि * रावण मारिते मात्र अवतीर्ण तिनि १ आवला २ तालाब।

१७६ कृत्तिवाय रामायण वन रने असुर! असन फल-मूला ! * वर्ष चतुर्दस किमि अनुकूला ? अमिय' मृनाल भरहु सुरराई * सुधापान श्रम-छुधा नसाई । सुरपति सुधा नाल सरसावा * सोइ छन श्रीपति लखन वुझावा लखन मृनाल तोरि प्रभु दीना * सुधा मृनाल पान दोउ कीना छुधा, तृपा, श्रम गत; दोउ भाई * शयन सेज पल्लव सुखदाई श्रम उपरांत, नींद अस आई * सोबत मातु-अंक मनु पाई निरखि न राम, इतै महतारी * अस्त-व्यस्त नृप निकट पधारी उत अतिकाल, न सुत अवलोका ॐ सभा विदा करि, भूप मसोका लखहिं सुवन, चलि मातु-निवासू * भई भेंट दोउ मग-रनिवासू कौशल्या पूछत विकल, कहहु नाथ कित राम ? भोजन विविध सेरात, मग जोहौं, तात न धाम ॥१०७।। सुध-बुध दसरथ सुनत विलानी * बूझत, सुत अलोप कम रानी ? चतुर्दश वर्ष तिनि थाकिवेन बने * फल मूलाहारे युद्ध करिबे केमने मृणाल भितर तुमि राख गिया सुधा * सुधापाने रामेर ना लागिवेक क्षुधा एइ आज्ञा पाइलेन देव पुरन्दरे * राखिया गेलेन सुधा मृणाल भितरे हेनकाले लक्ष्मणेरे बलेन श्रीराम * मृणाल तुलिया आन करि जलपान लक्ष्मण बानिया दिल श्रीरामेर हाते * दुइ भाइ सुधा खान मृणाल सहिते क्षुधा तृष्णा दूरे गेल सुस्थ हैल मन * वृक्षपत्र पातिया ये करिल शयन परिश्रमे सुनिद्रा हइल वृक्षतले * श्राछेन श्रीराम येन शुये मातृकोले ना देखिया श्रीरामेर हइया कातर * आस्ते व्यस्ते गेल राणी राजार गोचर हेथा राजा बहुक्षण रामे ना देखिया * मने सुख नाहि येन अज्ञान हइया सबारे विदाय दिया गेलेन आवासे * रामेरे देखिब बलि कौशल्यार पाशे दुइ जने पथेते हइल दरशन * चिन्तिता हइया राणी जिज्ञासे तखन प्रस्तुत प्राछये घरे खाद्य नाना विध * बहुक्षण रामे केन ना देखि सन्निध दशरथ वले राणी कि कहिला कथा * देखिते ना पाइ रामे तारा गेल कोथा १ नमृत । २ कमल का डण्ठल । ३ ठढा हो रहा है ।

१७७ साथा आदि काण्ड दोउ किय गमन कैकयी-धामा * पूछत-कतों लखे तुम रामा ? सुवन कञ्जमुख दिवस न देखा * थिर न प्रान, उर त्रास विसेखा । दरस न आजु राम गुनखानी * लहे न प्रभु, कह कैकयि रानी जहँ सौमित्र' तहाँ रघुनाथा * सदा भरत रिपुसूदन अवध नगर भरमत दोउ पानी * राम-सखा खेलत जहँ जानी पूछत ललकि- लखन-रघुबीरा ? * 'लखे न' मुनि उपजत पुनि पीरा शावक -हरन फुकरति वाघिनि * फिरें तीनि तिमि दसरथ-भामिनि । धुनत कपाल फिरत नरनाया * मिलिहैं शाप-अंधमुनि आजुइ इला * जीवन हत, वियोग-सुत मूला मुवन-सोच रचि मीचु३ विधाता * राम-लखन विन काय निपाता दिवस वीत, चहुँ निसि-तम छावा * तात-दरस, नृप बिलखति रानिन आस गँवाई * प्रविसे तबहिं नगर रघुराई करन गेल रघुनाथा । স্বাম नसावा बुझि राम रहियाछे कैकेयी आवासे * धेये गिया कैकयीरे उभये जिज्ञासे आजिआमिनाहिदेखि श्रीरामरमुख * प्राण नाहि रहे मोर विदरये बुक कैकेयी बलेन श्रामि किछुइना जानि * श्राजि हेथा नाहि देखि राम गुणमणि प्राजि बुझि भुलियारहिलकोनसाने * लक्ष्मण ये स्थाने वाले राम सेइ खाने भरत सहित हेथा मिलिल शत्रुघ्न * अयोध्या-नगरे भ्रमे भाइ दुइ जन येइ येइ बालक खेलाय तार मने * ताहारे जिज्ञासे राम पाछे कोन खाने शुनिया सकले कहे शुन राजराणी * कोथा राम कोथाय लक्ष्मण नाहि जानि कौशल्यासुमित्रापारकैकयीकामिनी * डम्वुर हाराये येन फुकारे बाधिनी हृदे दुःखे दशरय भाले मारे हात * कोथा गेले पात्र आमि राम रघुनाथ अन्धक मुनिर शाप घटिल एखन * रामे ना देसिया मम ना रहे जीवन पुत्रशोकमृत्यु प्राजिसृजिल विधाता * राम नाहि देखि यदि मरण सुधा दिवसे सकल देखि घोर अन्धकार * श्रीराम लक्ष्मण युझि ना देखिन श्रार एइमत कान्दे राणी वेला अवशेपे * हेन काले दुइ भाइ अयोध्या प्रदेशे। । १ तक्ष्मण । २ वच्चा । ३ मृत्यु । ४ गरीन ।

२ राम-मुख परेउ " १ सतई बरस - १७८ कृत्तिवास रामायण वन्य कुसुम छवि, सारंग' हाथा * टुमुकि धरत पग लछिमन साथा भरत-रिपुघ्न कौशिला तीरा * धाय कहत- आये रघुवीरा सुनत रानि मोइ छन उठि धाई * द्वार लखाई । धाय मात-पितु, लाय उर, लख-लख चुम्बत चंद । अंक लेत भरि, सिथिल तन, हिय न समात अनन्द ॥१०८।। दारिद-निधि तुम तुम लोचन-तारा * पलक वियोग प्रलय मनु धारा अंध-शाप हिय चोर नरेमा * कव विधि वाम, न मिटत कलेसा भरत-रिपुध्न वन्धु सिर नावा * राम मातु ढिग भोजन पावा राजा, रानि, सकल पुरवृन्दा * सुखी, अवध चहुँ दरस अनन्दा सीता के विवाह के प्रण के लिए शिवजी का धनुप-प्रदान राम पगु धारा * लक्ष्मी जनक-गेह अवतारा जोतत सीर, सुता नृप पाई * सीता सोइ रूपसी कहाई वनपुष्पे भूपित धनुक वाम हाते * नाचिते नाचिते आसे लक्ष्मणेर साथे भरत शत्रुघ्न गिया कहे कौशल्यारे * हेर माता आइलेन राम पुरद्वारे तार मुखे एइ वाक्य शुनिते शुनिते * वाहिर हइल राणी श्रीरामे देखिते । धेये राजा दशरथ रामे करे बुके * एक लक्ष चुम्ब दिल तॉर चॉदमुखे अन्धकेर शाप मुनि करे धुक धुक * कि जानि वा हन को विधाता विमुख कौशल्याधाइया गिया रामेकैलकोले * एक लक्ष चुम्ब दिल बदन कमले दरिद्रेर निधि तुमि नयनेर तारा * पलके प्रलय घटे हइ यदि हारा भरत शत्रुध्न तवे देखेन श्रीराम * दुइ भाइ आसि रामे करिल प्रणाम मायेर आलये राम करिल भोजन * राजाराणी हइलेन सुस्थिर तखन कृत्तिवास पण्डितेर मधुर भणित * श्रीरामेर अरण्य-विहार सुललित सीतार विवाह पणजन्य हरेर धनुक प्रदान सात वत्सरेर राम अयोध्या-नगरे * लक्ष्मी हेथा जन्मिलेक जनकेर घरे चापेर भूमिते कन्या पाय महाऋपि * मिथिला हइल पालो परम रूपसी १ धनुप । २ शत्रुघ्न । ३ हल । ४ जोत की रेखा अर्थात् सीता से जन्म होने के कारण - सीता नाम पडा।

रमा, गौरि धी गमनत लाजे आदि काण्ड १७६ सीता अतुल रूप गुन-खानी * मिथिला प्रगट मनौ श्री रानी सारद रूपा * जनक मुग्ध लखि गुता-सरूपा कजल छत्रि मृगलोचनि छाई * धवल-पुहुप' नामिका गुहाई सुधर बाहु दोउ सुललित सोहा * इन्दु-तुधा मरसति छवि मोहा करगत गुकर सहज कटि-अंगा' * अपुरी सिय-पग हिंगुल-रगा अरुन कंज पद न पुर बाजे * राजहंस गति अमिय वैन मधु झरत शुवासा * तारा रूप दम दिमा प्रकामा रोम-रोम लावण्य ललामा * वर मिय जोग लखिय कहि धामा 1 सोइ अनुहार न नर जग चीन्हा * प्रोहित सन विदेह मत कीन्हा 1 कवन देस, फित सिय वर जोगू ? * इत चितिन सुरपुर सुरलोगू कह विधि, सुरपति मुनहु मन, मात वप रघुनाथ । सीता छबि निति बढ़त उत, चिंतित मिाथेलानाथ ॥१०६।। राम इतर वर' तजें नरेसा * सोइ हित चलिय समीप महेमा अद्भुत सीटार रूप गुण मने मानि * ए सामान्य नहे कन्या कमला श्रापनि कन्यारूप जनक देखेन दिने दिने * उमा कि कमला वाणी भ्रम हय मने हरिणी नयने किया शोभित कजल * तिल फूल जिनि नार नामिका उज्ज्वल सुललित दुइ वाहु देखिते सुन्दर * सुधांशु जिनिया रूप अति मनोहर मुष्टिते धरिते पारि सीतार कॉकलि * हिंगुले मण्डित तॉर चरण अंगुली अरुण वरण तॉर चरण कमल * ताहाते नू पुर बाजे शुनिते कोमल राजहंसी भ्रम हय देखिले गमन * अमृत जिनिया नॉर मधुर वचन दशदिक पालो करे जानकीर रूपे * लावण्य निःसरे कन प्रति लोमकृपे जनक भावेन मने सीता दिव कारे * सीता योग्य वर नाहि देखि ए मंमारे पुरोहित आनि राजा कहेन विशेपे * जानकीर योग्य वर पाच कोन देशे जानकीरे विवाह करिबे कोन जन * ग्वगन करेन चिन्ता यत देवगण विधाता बलेन शुन देव पुरन्दर * रामेर बयम मात्र सप्तम वत्सर दिने दिने जानकीर रूप वृद्धिमान * पाछे अन्य बरं राजा सांता करे दान १ श्वेत पुष्प । २ फनर । ३ राम के अलावा अन्य वर ।

न राम वैदेही १८० कृत्तिवास रामायण धरि विधि-वचन सकल सुरवृन्दा * चले, शंभु जह परमानन्दा 1 कह बिरंचि-शिव अंतर्यामी ! * जनक-गेह अस कीजिय स्वामी 1 तव सेवक आयसु सिर लेही * देंय इतर करि विधि विनय, गमन उत कीन्हा * परशुराम, शिव प्रायसु दीन्हा मम धनु लै विदेहपुर धरहू * मम आदेस जनक पुनि कहहू जो समरथ जग शिवधनु-भंगा * सिया-विवाह रचिय सोइ संगा राम रमापति बिन त्रयलोका * भञ्जक चाप न कतहुँ विलोका आयसु शंभु चले भृगुवीरा * कर भृगुवीरा * कर कोदण्ड' प्रचण्ड सरीरा । पीठ निषंग जटा सिर धारा * धनु-प्रतञ्च' एक कुठारा सुत-जमदग्नि जनकपुर जनकपुर आये * नप बैठाये पाद अयं सों नृप सन्माना * भृगुपति निरखि, मुनिन भय माना कर प्रनम्य आसन r एइ युक्ति देवगण करिया मनन * कैलास पर्वते गेल यथा त्रिलोचन ब्रह्मा बलिलेन शुन शिव अन्तर्यामी * जनकेर घरे सीता रक्षा कर तुमि से तव सेवक श्राज्ञा लघिते ना पारे * येन राम विना अन्ये ना देय सीतारे एतेक बलिया ब्रह्मा करिल गमन * भृगुरामे डाकिया कहेन त्रिलोचन आमार धनुक निया करह पयान * जनकेरे धरे राख करि सावधान आमार धनुभंग करिते ये पारे * कह जनकेर येन सीता देय तारे ए तिन भुवने इहा तोले कोन जन * सबे मात्र तुलिवेन प्रभु नारायण पाइया शिवेर आज्ञा वीर भृगुपति * धनुक धरिया हाते करिलेन गति माथाय जटार भार पृष्ठे दुइ तूण * एक हाते कुठार अन्येते धनुर्गुण ब्रह्मारे येमन देवे करेन सम्भ्रम * जनक परशुरामे करेन से क्रम प्रणाम करिया तॉरे दिलेन आसन * पाद्य अर्घ्य दिया तॉरे करेन पूजन भृगुरामे देखि सब मुनिर तरास * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवास १ धनुष । २ तरकस । ३ धनुष की डोरी।

श्रादि काण्ड १८१ राजा जनक को धनुर्भम-प्रतित्रा सिया-विवाह प्रगंग चलावा * सुनि मुनि-वचन जनक सुख पाया विनय वचन निज माग सराहा * मुनि-मत इतर न रचउँ विवाहा पुनि भृगुराम चले तप कानन * गहि पद युगुल विनय किय राजन । मिय-मौभाग्य सुअवसर सुअवसर पाई *विन तब सीख न रचउँ सगाई तदपि तपोधन ! दरम कर, कव सौभाग्य बहोरि । तव-सूने' केहि संग मुनि, करी मिया गठजोरि ॥११०॥ आयतु श्रवन धरहु सिथिनेमा * निरखहु कौतुक चाप महेमा धरि प्रतञ्च, धनु भंजा बीरा * सुता जोग वर सोड़ रनधीरा सो कहि, गमन कीन भृगुरामा * शभु-धनुप तजि मिथिला धामा सत्तर योजन लव प्रमारा * योजन दमक इतर विस्तारा नृप प्रन- चाय चढ़ावे डोरी * करी तासु सन सिय-गठजोरी जनक राजार धनुर्भ ग पण जिज्ञासिते लागिलेन जनक राजन * कोन कार्ये महाशय हेयाय प्रागमन बलेन परशुराम तोमार दुहिता * सीता देह यदि राजा करि विवाहिता जनक बलेन शुन एकि चमत्कार * एत कि सौभाग्य प्राछे कपाले सीतार सीतार विवाह काल हइवे यखन * करा यात्रे युक्तिमत कहिवे येमन भुगु वले तपस्याय करिव गमन * देखो येन अन्य मत ना हय राजन एतेक बलिया यदि भृगुराम यान * भृगुर चरण धरि जनक सुधान तोमार साक्षात पार पात्र कत काले * कारे दिव कन्या आमि तुमि ना भाइले चलेन परशुराम अामार धनुक * राखि यात्र तव स्थाने देखिन कौतुक धनुक तुलिया येवा गुण दित पारे * रहिल आमार आज्ञा कन्या दियो तारे एत बलि भार्गव गेलेन स्थानान्तर * पडिया रहिल धनु जनकर घरे हरेर धनुक सेइ अपूर्व निर्माण * सत्तर योजन उमे धनुक प्रमाण योजन दशेक धनु आड़े परिसर * करिलेन प्रतिज्ञा जनक ऋषिवर ए धनुके गुण दिते ये जन पारिवे * सेइ जन जानकोरे विवाह करिवे १ आपकी अनुपस्थिति में । २ स्पाई से इतर अर्यात् चोलाई ।

१८२ कृत्तिवास रामायण मन्दिर जोजन दीर्घ एकासी * तँह धनु धरेउ शंभु अविनासी- ग्यारह जोजन गृह चौडाई * विरद'-चाप दिग्देसन छाई समस्त राजाओं एव रावण का धनुप उठाने में असमर्थ होकर पलायन 1 सिया-वरन मन सबन उछाहा * जुरे जनकपुर जग-नरनाहा जे जे नृप जुरि गाल बजावे * तिन धनु-मन्दिर जनक पठा प्रन-विदेह- जो चाप चढाव * यौतुक अमित महित सिय पावै जिन सूरन धनु ढिग डग डारी * दरस होत पग परे पिछारी बहुते हुमकि जायँ धनु पाहीं * परस न, दरस होत भजि जाहीं ॥ पट कसि, चाप चढ़ावत साजू * भरहि जोर नरपति-युवराज अभिरि प्रानपन, थकित वेिचारे * चढव दूर, धनु टरत धनु गुन' अडिग मेरु सम भारी * लाज विवस पुर तजि धतुधारी न टारे यतन करिया कैल धनुकेर घर * एकाशी योजन सेइ घर दीर्घतर एगार योजन तार आड़े परिसर * धनुक पड़िया आछे ताहार भितर सेइ धनुकेर कथा गेल देशे देशे * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवासे सकल राजा ओ रावणेर धनुक तुलिते अपारग हइया पलायन धनुकेर कथा यदि गेल देशे देशे * जानकी विवाह हेतु राजा सब श्रासे पृथिवीते आछे यत राजा महत्तर * एके एके आसे सब जनकेर घर आमिया सकल राजा अहंकार करे * सबारे पाठाये देन धनुकेर घरे जनक बलिल येबा तुलिबे धनुक * तॉरे सीता कन्या दिव परम यौतुक धनुक तुलिते यत राजपुत्र जाय * देखिया सकल लोक पश्चाते गोराय घरेर द्वारे गिया ऊँकि दिया चाय * तुलिबार शक्ति कोथा दाखया पलाय कत राजा राजपुत्र उद्यत हइया * धनुक तुलिते जाय वस्त्र काछटिका प्राण पणे तारा धनु टानाटानि करे * तुलिवार साध्य किया नाड़िते ना पारे सुमेरु पर्वत हेन धनुखान भारि * दिबे कि ताहाते गुण नाड़िते ना पारे १ प्रसिद्धि । २ दहेज । ३ धनुष की होरी। E-93 आदि काण्ड १८३ दै कामना न डगर सबन निज गेह सम्हारी * बालक-जूथ हसैं तारी तिनहिं मिले मग भूप बहु, आवत सिय अभिलास । शुनत चाप-कौतुक, तहैं, तजी दरस धनु अास ॥१११॥ उलटे पॉव फिरे निज देसा * दरस-परस सेसा अगनित, अकथ अतिथि विस्तारा * तीन कोटि नप पुर पग धारा कोउ न ममर्थ, अडिग धनु संकर * सजेउ लंकपति पुनि दसकदर गले मारीच, प्रहस्त, अकम्पन * सहित महोदर सजि निज स्यंदन रावन मिथिला कीन पयाना * समार मिथिलापति पात्र मित्रगन सबन बुलाई * चढ़ेउ दनुजपति खररि जनाई जो न हर्षि सिय ताहि विवाहू * हरड् जोर, किमि कहौ निवाहू मग भेटे विदेह अगवानी * हँमा ठठाय सुभट अभिमानी कह प्रहस्त, सुनु लंक-जुझारा * प्रस्तुत नृप शिष्टाचारा रथ तजि, असुर जनक भरिलीन्हा * वाहु प्रसारि अलिङ्गन अलिङ्गन कीन्हा जाना तव लज्जा पाइया सब राजापलाइया जाय * हात ताल दिया सब बालक दौड़ाय पलाइया जाय सब आपनार देशे * विवाह करिते अन्य राजागण आसे पथ मध्ये देखा हय से सवार सने * धनुकेर पराक्रम तारा सब शुने । देखिवार काज नाइ शुनिया डराय * शुनिया शुनिया पथे अमनि पलाय । एतेक कहिले हय पुस्तक विस्तर * तिन कोटि राजा गेल मिथिला नगर धनुक तुलिते ना पारिल कोनजन * लकाय थाक्रिया शुने लंकार रावण अकम्पन प्रहस्त मारीच सहोदर * चारि पात्र ल'ये रथे चड़े लकेश्वर प्राइल सकले तारा मिथिला भुवन * जनक शुनिल रावणेर आगमन जनक बलेन शुन पात्र मित्रगण * रावण आइल प्राजि हइवे केमन । स्वेच्छाय विवाह यदि नादिव रावणे * काडिया लइवे सीता राखे कोन जने चलिल जनक राजा रावणे आनिते * देखिया रावण राजा लागिल हासिते प्रहस्त डाकिया बले रावण राजारे * जनक प्राइल देख लइते तोमारे देखिया रावण तारे भूमितले उलि * दुइ बाहु प्रसारिया करे कोलाकुलि १८४ कृत्तिवास रामायण रत्न सिंहासन अतिथि सुहावा * उभय मधुर संलाप चलावा जीवन सफल दरस तव पाई * कारन कवन दया दरसाई कह दससीस, सुता तव सीता * करहु दान, सोइ चहउँ ग्रहीता धन्य भाग मम, निसिचर-नाहा ! * तव समान कित जोग विवाहा तदपि बचन-बन्धन कछु मोरा * भृगुपति आनेउ धनुप कठोरा । भजइ चाप वीर धनुधारी * सोइ, लंकेस ! सिया अधिकारी अवनि' न अब लौं सफल कोउ, सुभट, सुनहु दसभाल। धनु चढाइ, अन पूर करि, लेहु सुता जयमाल ॥११२।। अानन दसौ हँसा सुनि रावन * धनुबल भल वरनेउ मोहि राजन गिरि मंदर कैलास उठावा * चाप-भार लघु चलावा भञ्जउँ सोइ, जब करउँ पयाना * तब लौ सुता करौ मोहिं दाना। मैं प्रन-विवस, करहु धनुभंगा * लखें सबै तव भुजबल रंगा पुनि प्रहस्त दिय मंत्र विसेखा * प्रन-विदेह कछु अहित न देखा चढ़त चाप नृप अर्पहि सीता * नतरु करव ग्रहीता बात जोर-वल वसाइल रावणेरे रत्न सिंहासने * मिष्टालाप करिलेन बसि दुह जने जनक बलेन आजि सफल जीवन * कोन कार्ये महाशय तव आगमन दशानन बले राजा तव कन्या सीता * आमारे करह दान आमि ये ग्रहीता जनक वलेन इहा सौभाग्य लक्षण * तोमा विना पात्र आर आछे कोनजन आनिलेन भृगुराम धनु एक खान * हेन वीर नाहि ये ताहाते देय टान तुलिया धनुकखान भांग गिया तुमि * धनुकेर घरे सीता समर्पिच आमि शुनिया से दशमुखे हासिल रावण * आमार साक्षाते चल धनुक विक्रम कैलास तुलेछि आमि पर्वत मन्दर * ताहारे जिनिया कि धनुक हवे भार आगे सीता बानिया आमारे करदान * यात्रा काले भॉगिया याइव धनुखान 1 जनक बलेन कर प्रतिज्ञा पूरन * देखुक सकल लोक धनुक भगन प्रहस्त बलेन शुन राजा दशानन * यार ये प्रतिज्ञा भंग ना कर कखन । धनुक भांगिले राजा जानकीरे दिवे * इच्छाधीने नाहि देय चले काड़ि लबे पृथ्वी पर।

टूटै धनुप, धाई प्रजा, तासु प्रकासी आदि काण्ड १८५ न संशय यही * मातुल' ! वरौं अवै बैदेही अभिमानी गमनेउ धनुगेहा * संग लकपति, चले विदेहा कूतूहल छावा * जानकि-बर विधि आजु पठावा युवा, वृद्ध, अरु बाल-समाजा * धनुमंदिर पुर सकल विराजा कौतुक योजन दीर्घ एकासी * ग्यारह परिसर' गृह विशाल जहें चाप-महेसा * तासु द्वार लकेस प्रदेसा दुर्जय धनु निरखत रनवंका * लकापति उपजी संका बल सुमिरत छिन, पुनि भयभीता * असफल-सफल न हिय परतीता विहँसत वदन, न अन्तस धीरा * धनु ढिग गयेउ दसानन वीरा कसि कटि फेंट, सुभट बलधारी * चहेउ चाप भुजबीम उपारी तमकि, हुमकि, उठि, वैठि बल, विविध करत दमसीस । सिथिल गात. हिय लाज अति, टरत न धनुप-गिरीस ॥११३।। मन - दशमुख बले मामा राखि तव कथा * धनुक भागिले येन ना हय अन्यथा अहंकार करिया चलिल लकेश्वर * देखाइते चलिल जनक नृपवर शुनिया धाइल सब मिथिला नगर * सवे वले जानकार प्राजि एल वर ।। युवा वृद्ध शिशु एक नाहि रहे घरे * कौतुक देग्विते गल राजार मन्दिरे एकाशी योजन घर अति दीर्घतर * एकादश योजन ताहार परिसर धनुरु या प्राछि ताहार भितरे * प्रासिया रावण राजा दाण्डाइल द्वारे द्वारेते दाण्डायवीर डाँकिदियाचाय * देखिया दुर्जय धनु अन्तर डराय मने भावे श्रामार घुचिल भारिभरि * ये देखि धनुकखान पारि कि ना पारि अन्तरे आतङ्क अतिमुखे आम्फालन * धनुक तुलिते जाय वीर दशानन ऑटेया कापड परेवाछिल कॉकाले * कुडि हाते धरिल से धनु महावले । प्रॉकडि करिया तवे धनुखान टाने * तुलिते ना पारे आर चाय चारि पाने नाके हातदिया बले कि करि उपाय * कि हहवे मामा धनु तोला नाहि जाय प्रहस्त बलेन शुन राजा लङ्क श्वर * लोक हामाइला श्रामि मिथिला नगर चिन्ता ना करिह तुमि ना करिह डर * गात्रे बल करि श्रार एक बार घर १ मामा (प्रहस्त) । २ प्रमार-फैलाव । ३ मुख । ४ उठाना ।

भरि १८६ कृत्तिवास रामायण मातुल ! थकित भुजा मम बीसा * सिखवति, सुनि, प्रहस्त दससीसा पुर उपहास असह, यहि कारन * तन, जोर करौ बल धारन भय तजि, धनु भजिय केहु भाँती * साहस जोरि असायसि छाती। , शिवगिरि मन्दर सहज उपारा * सोइ भुजबल, तिल धनुष न टारा प्रन-पुरवनि प्रानन पर छाई * मातुल ! जुगुति एक मन भाई सब मिलि जोर करहिं एकसंगा * कह प्रहस्त, सियवर केहि संगा ? प्रान जाय पै राखिय माना * करि बल, हित साधिय बलवाना मातुल ! जतन करौं सिख मानी * तदपि द्वार रथ हॅसि प्रहस्त, रथ द्वार बुलावा * रावन पुनि बल अमित लगावा तजी श्रास, चितवत नभ ओरा * सुरगन मनी हॅसत तेहि अोरा रथ चढ़ि भजेउ लक-अधिकारी * वालक हॅसत बजावत तारी मन गलानि उत गमनेउ रावन * इत सुरगन हिय ताप नसावन बिन हरि, चाप चढ़े केहि हाथा * श्री-बर कौन कौन विना श्रीनाथा राखहु प्रानी पुनश्च धनुकखान टानाटानि करे * तथापि धनुकखान नाडिते ना पारे दशग्रीव बले आर नाडिते ना पारि * प्राण जाय मामा तबू तुलिते ना पारि कैलास तुलिनु मामा पर्चत मन्दर * ताहारे जिनिया मामा धनुकेर भार एइयुक्ति मामा गो तोमार ठॉइ मागि * सवाइ मिलिया तुले धनुखान भाङ्गि प्रहस्त बलिल शुन वीर दशानन * तवे त सीतार वर हवे कोन जन पार वा ना पार पार एक बार टान * जाय प्राण राख मान एड वाक्य मान रावण बलिल मामा शुन मोरवाणी * तुलिते ना पारि शीघ्र रथ श्रान तुमि ईपत् हासिया चले प्रहस्त ताहारे * रथ लये एइ आमि रहिलाम द्वारे भारवार रावण धनुक खान टाने * तुलिते ना पारे चाय प्रहस्तेर पाने 5) कॉकालेते हात दिया आकाशेनिरखे * मने भावि पाछे आसि इन्द्र बेटा देखे , वुझिया प्रहस्त रथ दिल योगाइया * लाफ दिया रथे उठे धनुक एड़िया पलाइया चलिल लङ्कार अधिकारी * सकल चालक देय तारे टिटकारी लकाय शंकाय गेल लंकार रावण * आकाशे थाकिया देखे यत देवगण श्रीलक्ष्मीपतिर लचमी लवे कोनजन * तुलिवेक धनुक केवल नारायण Aninh श्रादि काण्ड १८७ दनुज-त्रास मिटि सीतल छाती * चिंता जनक मिटी यहि भाँती अमा-ग्रहण'-रवि दसरथ देखी * मन धरि सुत-कल्यान विसेखी हेमदान सुरसरि असनाना * नृप उमग, कृतिवास बखाना श्री राम का गगा-स्नान और गुह के साथ मित्रता तथा भरद्वाज मुनि के घर राम का धनुर्बाण प्राप्त करना सहित चारि सुत, भूप रथ, शत-शत हय, गज संग । गगन तुमुल रव' व्याप चहुँ, अमित कटक चतुरंग ।।११४॥ नृप-नृपसुत रथ दिव्य सुहाये * पन्य दरम नारद के पाये पूछत हेतु गमन ? नृप भाषा * मुनि ! म्नान-गंग अभिलापा भूप अजान ! राम मुख दरसन * पुनि कित हेतु जाह्नवी परसन भूतल पतितपावनी धारा * गग, जासु पद-पदुम प्रमारा गग-स्नान पुन्य सोइ दाना * सुवन रूप तव गृह भगवाना नारद बचन नरेस प्रतीता * चलहु राम गृह, कहेउ सप्रीता कृत्तिवास परिडतेरकि कहिव शिक्षा * आदिकाण्ड गाइल सीतार हैल रक्षा श्रीरामर गगास्नान ओ गुहकर सहित मितालि ओ भरद्वाज मुनिर गृहे रामेर धनुर्वाण प्राप्ति एक दिन दशरथ पुण्य तिथि पेये * गङ्गाम्नाने यान राजा चार पुत्र लये हइवेक अमावस्या तिथिते ग्रहण * रामेर कल्याण राजा दिवेन काञ्चन तुरंग मातंग चले संगे शते शते * चारिपुत्र सह राजा चापिलेन रथे चलिल कटक सब नाहि दिक पाश * कटकेर शब्दे पूर्ण हडल आकाश चले छेन दशरथ चारि दिव्य रथे * नारद मुनिर संगे देखा हय पथे मुनि चले कोथा राजा करिछ पयान * भूपति कहेन साध करि गंगास्नान मुनि कहे दशरथ तुमि त अज्ञान * राम मुख देखिले के करे गंगा स्नान । । पतितपावनी गंगा अवनीमण्डले * सेइ गंगा जन्मिलेन यॉर पदतले । सेइ दान सेइ पुण्य सेइ गंगास्नान * पुत्र भावे देख तुमि प्रभु भगवान एत यदि नृपतिरे कहिलेन मुनि * राजा बले चल घरे राम रघुमणि १ अमावस्या पर मूर्य-ग्रहण । २ स्वर्णदान । ३ गब्द । ४ अनीम ।

१८८ कृत्तिवास रामायण सुनि पितु बचन, कहत रघुराई * विपिन धर्म-पथ, रीति सदाई तिनहिं बराय, मातु-डग' धरहीं * सुरसरि-सुकृत सफल तन करहीं पितु मन दीन कथन-रघुनन्दन * सहित उछाह बढ़ेउ नृप-स्यंदन । तो लौं पथ घेरेउ गुहराज * कोटिक' तीन निषाद-समाज कहेउ, कटक इत कस अवधेसा ? * नित गहि पंथ बिगारत देसा जो सुरसरि-स्नान उछाहू * तजि मम भूमि, आन पथ जाहू सोइ मग गमन रुचिर यदि भूपा * प्रथम लखौं छबि राम अनूपा राम-राम गुहपति मुख भाखा * रथ लुकाय रामहि नृप राखा धनु चढ़ाय सोचत नरनाथा * बध गुह हीन ! कवन जस हाथा ? जीते हीन, न पौरुष लेसा * हारे त्रिभुवन अजस विसेसा छाड़ेहू पुनि पार नहि, अभिरत उत चण्डाल । नप विमूढ़-मन, करिय कस ? अरझेउ मग जंजाल ॥११५॥ वापेर बचन सुनि बलेन श्रीराम * अनेक पाषण्ड अाछे धर्मपथे बाम गगार महिमा आमिकि बलिते जानि * ना शुनिश्रो महाराज नारदेर वाणी एत यदि बलिलेन कौशल्याकुमार * चलिलेन दशरथ राजा पार बार चलिल राजारसैन्य आनन्दित है' या * गुहक चण्डाल आछे रथ आगुलिया तिन कोटि चण्डालेते गुहक वेष्टित * हुडाहुडि वाघे दशरथेर सहित गुहक चण्डाल बले शुन दशरथ * भॉगिया प्रामार देश करिले कि पथ वारे बारे याह तुमि एइ पथ दिया * सैन्येते आमार राज्य केलिल भांगिया गंगास्नान करिते तोमार थाके मन * पार पथ दिया तुमि करह गमन यदि इच्छा थाके हे याइते एइ पथे * देखा ओ तोमार आगे पुत्र रघुनाथे राम राम बलिया से गुहक डाकिल * रथमध्ये भूपति से रामे लुकाइल निल दशरथ राजा धनुर्बाण हाते * रथेर द्वारेते राजा लागिल भाविते चण्डालेरे मारि किवा हइवेक यश * नीच जने जिनिले कि हइवे पौरुष यदि पराजय हइ चण्डालेर वाणे * अपयश घुसिवेक ए तिन भुवने आमियदिछाडिनाहि छाड़िवेचण्डाल * कि करिव पथे एक घटिल जजाल १ गगा माता की राह । २ पुन्य । ३ करोड ।

-- श्रादि काण्ड सन . 3 मम नाम १८४ वरस वान, कोपि दोउ लरही * रिपु-पर निरखि, उभय मन डरहीं तजहिं परस्पर वान कराला * यहि विधि ठनेउ युद्ध बहु काला दसरथ पुनि पशुपति सधाना * गुहपति-हाथ बांधि रथ आना 1 सोचत- दरस न कृपानिकता * सफल न रन पथ रोकन हेता पग धनु कसि, पग सो धरि बाना * विन कर' कौतुक रन गुह ठाना रामहिं अचरज भरत जनावा * पग धनुर्युद्ध जस गावा राम कुतूहल ! कला नवीना ! * देखन चले निपाद प्रवीना गुहपति, निरखत छवि-रघुनाथा * नाय माथ, थिर भयेउ सनाथा पूछत राम, कवन रन-कारन ? * सुनह कथा प्रभु शाप-निवारन पाप पुरवुले, अधम शरीरा लहि, अब लौं भुगतो भव-पीरा पितु वशिष्ठ, सुत जनम पुनीता * वामदेव अतीता सुत विहीन दसरथ जेहि काला * अंध-सुवन-वध-पाप वेहाला तप-उपवन, पकरे मम चरना * लोटत चरना * लोटत धरनि विकल मम सरना दुइजने चाणवृष्टि करे महाकोपे * उभयेर बाणेते दोंहार प्राण कॉप एड मत वाणवृष्टि हइल विस्तर * उभयेर संग्राम हइल बहुतर दशरथ राजा एड़े पाशुपत शर * हाते गले गुह के वान्धिल नरेश्वर गुहकं वान्धिया राजा तुलिलेन रथे * बन्धने पडिया गुहक लगिल भावते याहार लागिया आमि आगुलिनु पथ * देखिते ना पाइलाम से राम कि मत एतेक भाविया गुह करे अनुमान * पायेते धनुक टाने पाये एड़े वाण । भरत कहिल गिया रामेर गोचरं * एमत अपूर्व शिक्षा नाहि चराचरे । पायते धनुक टाने पाय एड़े वाण * देखिते कौतुक राम गेलेन सेडस्थान येड़ मात्र गुहक देखिल रघुनाथे * दण्डवत् हइया रहिल जोड हाते श्रीराम बलेन धनु टानह केमन * गुह वले तोमारे कहिब से कारण पूर्व जन्म कथा मम शुन नारायण * ये पापे हइल मोर चण्डाल जनम अपुत्रक छिलेन यखन दशरथ * अन्धक मुनिर पुत्र करिलेन हत मुनि हत्या करिया आसिल तपोवने * लोटाइगा धरिलेन प्रामार चरणे १ विना हाय के । पूर्वजन्म के । ३ व्यतीत काल का । -- १६० कृत्तिवास रामायण राम नाम जय बार कहावा * सोइ प्रताप नृप-ताप नसावा नाम एक, वध कोटि उबारन * तीनि वार केहि हेतु उचारन ? सोइ कारन पितु शाप कराला * जन्मेउँ अधम योनि चण्डाला पितु-प्रकोप लखि, गहे पग, शाप मुक्ति कम नाथ ? कहेउ, निवारन अधम गति, दरस राम रघुनाथ ॥११६॥ सोइ अब राम अवध अवतारा * जासु चरन मम पाप निवारा भक्तन प्रिय तुम नाथ-अनाथा * दयासिंधु को अम रघुनाथा । श्वपच-शरीर घृना यदि करहू * नाम पतितपावन, हरि ! तजह विनय सनी श्राकुल गुहबानी * सुनत राम दृग सरसत पानी पितु सन विनय करत कर जोरी * गुहपति-मुक्ति याचना मोरी राम ! न कछु अदेय तव हेतू * अर्पित हर्ष समेतू पितु-अनुमति; आतुर रघुनन्दन * काटे निजकर गुहपति-बन्धन लखन सोई छन अनल जराई * साखी राम-निषाद मिताई गुह तक, वशिष्ठर पुत्र आमि वामदेव नाम * तिन बार राजारे बलाइ राम नाम शुनिया वशिष्ठ शाप दिलेन विशाल * याह वामदेव पुत्र होरे चण्डाल एक रामनामे कोटि ब्रह्महत्या हरे * तिन चार रामनाम बलालि राजारे लोटाय पडितु प्रामि पितार चरणे * चण्डाल हइत्र मुक्त काहार दर्शने पिता बलिल जवे पावे श्रीराम दर्शन * तवेत हइवे मुक्त चण्डाल जनम सेइ राम जन्मियाछे दशरथ घरे * चरण परश दिया मुक्त कर मोरे अनाथेर नाथ तुमि भकतवत्सल * करुणासागर हरि तुमि हे केवल चण्डाल बलिया यदि घृणा कर मने * पतितपावन नाम तवे कि कारणे एतेक बलिया गुह लागिल कान्दिते * गुहेर क्रन्दने राम कान्दिलेन रथे 1 करपुटे दाण्डाइल पितार साक्षात् * भिक्षा देह गुहक चलेन रघुनाथ राजा बले प्राण चाह प्राण पारि दिते * चण्डाले तोमाके दिव बाधा नाहि इथे पाइया बापेर आज्ञा कौशल्यानन्दन * खसालेन निज हस्ते गुहेर बन्धन श्रीरामवलेन अग्नि ज्वालह लक्ष्मण * गुहकेर सह करि मित्रता बन्धन स्नान आदि काण्ड १६१ हीन न तात ! सुनहु गुहभृपा * सब प्रकार तुम मम अनुरूपा अधम अहौं, तुम अधम-महाई * जग चहुँ पुजै राम-ठकुराई करि मित्रता, विदा गुह कीन्हा * सुरसरि-पथ दसरथ पुनि लीन्हा फल अनन्त रविग्रहन पुनीता * दान धर्म मप्रीता शत-शत सुरभि शिला किय दाना * कञ्चन, रजत, रतन विधि नाना दान-पुन्य करि नृप बहु भाती * सुतन सहित पुनि निरखि सँभाती' भरद्वाज-उपवन चलि जाई * वन्दि चरन-मुनि, विनय सुनाई सरन तपोधन तव, मुत चारी * अहह भाग तब चरन निहारी देहु अमीस; विलोकि तिन, सोचत मनहिं मुनीस । तजि गोलोक प्रतच्छ लख, जग प्रगटे जगदीस ॥११७॥ तव सुत राम, जनक' जग केरा * जीवन सफल अवधपति केरा परम दुर्वादल श्यामा * दरमत मुनिहिं अतुल छवि रामा . लक्ष्मणज्वालिलेनअग्निरामेरसाक्षात्* गुह सहित मित्रता करेन रघुनाथ येइ आमि सेइ तुमि बलेन श्रीराम * गुह चले घुचाइते नारि निज नाम श्रीरामेर जगते हइल ठाकुरालि * प्रथमे करेन राम चण्डाले मितालि विदाय करिया रामे गुह गेल घरे * पुत्र लैंया दशरथ गेल गङ्गातीरे अपूर्व अनन्त फल भास्कर ग्रहण * स्नान करि राजा दान करिल काञ्चन धेनुदान शिलादान कैल शत शत * रजत काञ्चन तार नाम लव कत । दान धर्म करिते हइल वेला क्षय * प्रदोषे यान राजा भरद्वाज आलय । बसिया आछेन मुनि आपनार घरे * चारि पुत्र यह राजा नमस्कार करे जोड़ हाते बले राजा मुनिर गोचर * श्रानियाछि चारि पुने देख मुनिवर आशीर्बाद कर चारि पुत्रे तपोधन * बहुभाग्ये देखिलाम तोमार चरण देखिया रामेरे भापे भरद्वाज मुनि * वैकुण्ठ हइते विष्णु पाइला श्रापनि मुनि बले राजा तव सफल जीविता * राम तव पुत्र किन्तु जगतेर पिता भरद्वाज एइकाले देखे चमत्कार * दुर्वादल श्याम तनु परम श्राकार १ सायकाल । २ मालूम पडता है । ३ पिता ।

जब आई अवध सत्रन 1 राजभोग १६२ कृत्तिवास रामायण अंकुश बज्र ध्वजा पद पंकज * शंख चक्र कर पद्म गदा सज शिव, विरञ्चि जेते सुरलोका * भुवन, सुरलोका * भुवन, राम-तन', सकल विलोका । मुनि-आश्रम प्रातिथि नप पाया * सहित सैन तहँ रैन बितावा शयनकक्ष मुनि राम लेवाई * सोवत, अर्धनिसा अक्षय कवच दिव्य धनु माथा * सिरहाने राखेउ सुरनाथा मुनिहिं सकल सो सपन दिखाई * भोर, चाप निरखेउ रघुराई आयुध दिव्य शचीपतिदीन्हा * सो निमि-कथा कथन मुनि कीन्हा मुनि प्रणम्य, हरि पित ढिग जाई * सम्मुख धरेउ चाप-सुरराई राक्षसो की दुष्टता से मुनियों के यज्ञ पूर्ण होने में विघ्न और उसके निवारण का उपाय दसरथ मुदित; सहित सुत चारी * आगम सुखकारी। ऐश्वर्य प्रपन्ना' * सब विधि सुख समृद्धि सपन्ना मिथिला मुनिन यज्ञ सोइ काला * करैं भग नित दनुज कराला ध्वज-वज्राङ्कुशे शोभित पदाम्बुज * शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज शङ्कर विरािञ्च आदि यत देवगण * रामेर शरीरे आरो देखेन भुवन समुचित आतिथ्य करेन भरद्वाज * सुखे रहिलेन सैन्यसह महाराज रामेरे लइया मुनि अन्त.पुरे गिया * शयन करेन दोंहे एकत्र हइया । । यखन हइल रात्रि द्वितीय प्रहर * शियरे राखेन देवराज धनु शर । स्वप्ने उपदेश एइ करेन मुनिरे * अक्षय धनुक तूण देह श्रीरामेरे एतेवलि करिलेन वामव पयान * प्राते राम शियरे देखेन धनुर्बाण कहिलेन श्री रामेरे मुनि भरद्वाज * तोमारे दिलेन धनुर्बाण देवराज मुनिर चरणे राम करे प्रणिपात * आनिलेन सेइ धनु पितार साक्षात् शुनि राजा दशरथ आनन्द हइया * आइलेन देशे चारि कुमार लाइया | कृत्तिवास करे आश पाइ परित्राण * आदिकाण्ड गाइल रामेर गङ्गास्नान राक्षसे दौरात्म्य मुनिदेर यज्ञपूर्णे व्याघात तन्निवारणेर उपाय एइ रूपे दशरथ चारि पुत्र लैया * करेन साम्राज्य भोग सावधान हैया हेथा मिथिलाय यज्ञ करे मुनिगण * यज्ञ पूर्ण नाहि हय राक्षस कारण १ राम के शरीर मे विरस्ट रूप के दर्शन । २ इन्द्र । ३ प्राप्त ।

रक्त वरसावा जाय भानहु रघुराई भयो जगत भयऊ आदि काण्ड १६३ जब-जब मुनिगन याग रचावा * तबहिं मरीच मिथिला चहुँ दिसि याग-विहीना * मुनिन बोलाय जनक मत कीना कौशिक-जुगुति सबन मन भाई * अवध अवतार प्रभु, निसिचर नासन हेत। जनम राम बलधाम सोइ, दसरथ अवध निकेत ॥११॥ कहेउ जनक, तुम बिन मुनिराई * याग-सिद्धि नहिं जतन लखाई सवन प्रबोधि, अवध मुनि गयऊ * राम-निवास उपस्थित प्रहरी-खार- भूप-मन चिन्तन * विधि न सीध, कस गाधियनन्दन'! रघुकुल कौशिक विपम प्रभावा * बीते कस ? दसरथ भय छावा सुविदित सत्यसंध हरिचन्दा * तिय-सुत वेचि कटे तिन फन्दा संसय मन ! मुनि-चरन पखारी * बन्दि, भूप मृदु गिरा उचारी कीन गाधि-सुत पुष्कल' धामा * अहो भाग्य ! श्रावउँ मुनि-कामा कौशिक कहेउ सुनहु अवघेसू * मिथिला मुनिन अनन्त कलेसू यज्ञ प्रारम्भन करे येइ मुनिवर * करे रक्त वर्पण मारीच निशाचर यज्ञहीन हइलेक मिथिला भुवन * करे जनक युक्ति ल'ये मुनिगण 1 तार मध्ये वलिलेन विश्वामित्र मुनि * अयोध्यायगिया रामचन्द्रेश्रामिानि राक्षम बधेर हेतु धरि राम वेश * दशरथ गृहे अवतीर्ण हपीकेश बलिलेन जनक शुनह महाशय * तुमि रक्षा करिले ए यज्ञ रक्षा हय विश्वामित्र सकलेरे करिया अाश्वास * चलिलेन यथा राम अयोध्या निवास उपस्थित हइलेन अयोध्यार द्वारे * द्वारी गिया जानाइल तखनि राजारे भूपति शुनिया मात्र विश्वामित्र नाम * चिन्तित कहेन बुझि प्राजि विधिवाम विश्वामित्र मुनि एइ बड़इ विषम * प्रमाद घटाय किम्बा करे कोन क्रम सूर्यवंशे छिल हरिश्चन्द्र महाराज * भार्या पुत्र वेचिया तारे दिल लाज श्रासि वन्दिलेन राजा मुनिर चरण * शिष्टाचार पूर्वक करेन निवेदन तव श्रागमने मम पवित्र आलय * आज्ञा कर कोन कार्य करि महाशय विश्वामित्र वलेन शुनह दशरथ * श्रीरामेर देह यदि हय अभिमत १ गाधि के पुत्र विश्वामित्र । २ पवित्र ।

विस्तारी। मन समाना १६४ कृत्तिवास रामायण सफल न याग, दनुज-उत्पाता * शोनित-सव, अति-काज निपाता जो मोहिं देव लखन-रघुराई * कटै विपति विपति तौ, अनुर नसाई आव: लौटि वितइ दिन चारी * रबुकुल-सुयस भुवन संसय सो आगे आवा * धुनत सीम दसरथ भय छावा । सुत-वियोग मम काल कपाला * अन्धक-शाप सतत हिय साला बिन मुखचन्द्र-राम, छिन एका * दूभर जियव, न मुनि अतिरेका" जीवन राम ध्यान मोइ ज्ञाना * पल विन-दरस अचेत मम तन-मन अर्पित तव काजू * राम अदेय छमहु मुनिराजू सोवहुँ निमि, हिय राम धरि, सदा सचेत मभीत । स्वप्न विलग जिय कण्ठगत, कतहुँ न काहु प्रतीत ।।११६।। श्रीराम को राक्षसों के साथ युद्ध के लिए भेजना दशरथ को अस्वीकार जिमि राम जनमे, धाम मम, मो कया-क्रस मुनि ! श्रवन धरि । सर तीर, कानन, सिन्धु - सुत-मुनिअंध, जल जिहि काल भरि ।। मुनिगण यज्ञ करे करिया प्रयाम * राक्षम आसिया सदा करे यज्ञनाश एइ भार महाराज दिलाम तोमारे * श्रीराम लक्ष्मणे देह यज्ञ राखिवारे येइ मात्र विश्वामित्र कहेन ए कथा * भूपति भावेन मने हेट करि माथा पुत्र शोके मृत्यु मम लिखन कपाले * ना जानि हइवे मृत्यु मम कोन काले अन्धकेर शाप मने करे धुक् धुक् * कवन मरिव नाहि देखे चॉदमुख प्राण चाह यदि मुनि प्राण दिने पारि * एक दण्ड रामचन्द्रे ना देखिले भरि अतएव रामचन्द्रे ना दिव तोमारे * एक दण्ड ना देखिले हृदय विदरे आदिकाण्ड गाय कृत्तिवाम विवक्षण * राम ध्यान राम ज्ञान राम से जीवन श्रीरामके राक्षससह युद्ध प्रणे दशरथेर अस्वीकार यखन शुइया थाकि, रामके हृदये राखि, भूमे राखि नाहिक प्रतीत । स्वप्ने ना देखिले ताय, प्राण श्रोष्ठागत प्राय, चमकिया चाहि चारि भित ।। येमते पेयेछि रामे, कहि से सकल क्रमे, मृगया करिते गिया बने सिन्धु नामे मुनिवरे, सरोवरे जल भरे, तारे मारि शब्दभेदी वाणे ॥ १ प्रारब्ध । २ सदैव । ३ खटकता रहा । ४ कठिन । ५ अत्योक्ति । ६ विश्वास ।

शब्द-जलवट. शाप दिय ..... श्रादि काण्ड १६५ आखेट घूमत. शब्दवेधी सर हने । सो तौ न पसु ! मुनि-गुचन हत ! धरि कन्ध अन्धक-बन गयेउँ । मन्तान विन, मन ग्लानि निमिदिन, ताप मुनि-गुत-बध हुदै । तह अन्ध-दम्पति, कुपित बिलखत, सुत-बधिक-मोहिं शाप दै 'मृत्युयोग वियोग-सुत'-- मुनि वरदान सम । यहि भॉति पाये चारि गुत. भयभीत हिय. मुनिनाथ ! मम ॥ स्वयं चलि, दलि दनुज, रच्छड़ें याग; सुनि मुनि कोप विन लखन-राय न काम. चाहत कुमल कोसलनाथ हिय ।। दोउ सुवन दै. मुनि कान करु, नतु शाप वंश विनामिहीं । कौशिक कुपित लखि, कहत नृप, मुनि कछुक अर्ज सुनाइहौं । राजा दशरथ का विश्वामित्र मुनि के साथ छल करके भरत और शमन को भेजना और विश्वामित्र का कोप, फिर गम को भेजना स्वीकार वारी लटुरियाँ सीमा * रन न ज्ञान! किमि लरहिं मुनीमा? तब हेता * हनै दनुजगन कटक समेता किय । बयम जेतक मैन चहहु - मृत मुनि कोले करि, गेलाम अन्धकपुरी, देखि मुनि अग्निर ममान । पुत्र-पुत्र बलि डाके, मरी पुत्र दिलाम ताँके, पुत्रशोके से छाडिल प्राण ।। छिलाम मन्तान हीन, मनोदासे रात्रिदिन, वधिलाम मिन्धुर जीवन । कुपिया मिन्धुर बाप, दिल मोरे अभिशाप, तेंइ पाइलाम एइ धन ॥ अतएव तपोधन, शुन मम निवेदन, आमि याव सहित तोमार । विना श्रीराम लक्ष्मण, अन्य कि प्रयोजन, याहा चाह दिव शतबार ।। राजार बचन शुनि, कुपिलेन महामुनि, झाट देह तोमार कुमार । आपन मङ्गल चाह, श्रीराम लक्ष्मणे देह, नहे वंश नाशिय तोमार ।। राजा दशरथ विश्वामित्र मुनिके प्रवारणा कारचा भरते आ शत्रुघ्न के प्रेरणा ओ विश्वामित्र र कोप, तत्परे रामेर गमन स्वीकार राजा बलिलेन मुनि करि निवेदन * धनुर्विद्या नाहि जाने कि करिवे रण अत्यल्प वयस मम पुत्र चारि गुटि * शिरे चूल नाहि घुचे पाछे पञ्चमुटि अन्य मैन्य यत चाह लह तपोधन * ताहारा करिवे निशावर निवारण -.

मम मग १६६ कृत्तिवास रामायण रसद' कटक हित कित तपकानन ? * एक राम समरथ खल नासन नृप तव सैन न कारज लेमा * रविकुल, जहँ हरिचन्द नरेसा दै छिति दान, बेचि सुत-दारा * सत्यसंध भार उतारा तह लघु चात मनिन-उपहासू ! * प्रगट भानुकुल अाजु विनासू निरखि कोप, नृप युगुति बनाई * भरत-रिपुघ्न समीप बुलाई करहु अनुगमन मुनि श्रादेसा * नृप-प्रवञ्चमुनि ज्ञान न लेसा लखन-राम तिन दोउ अनुमानी * कौशिक चले मोद मन मानी सरयू तीर पहुँचि मुनिराई * युगुल सुतन दुइ पथ दिखराई सुगम पंथ दिन तीन चलाई * पहर तीन दुर्गम पथ पाई दुर्गम ताडुका सुरारी' * लगति, खाति मुनिगन नित मारी । , मन भावे सोइ मग अनुसरहीं * 'कुपथ न हेतु'-भूप-सुत कहहीं । दनुजि एक ! डरपत रनवंका ! * राम-लखन कस ? मुनि मन संका शुनिया कहेन विश्वामित्र तपोधन * कटके खाइवे यत कोथा पार धन एका राम गेले हय कार्येर साधन * सहस्र कटके मम नाहि प्रयोजन तव वंशे छिल ये हरिश्चन्द्र राजा * पृथिवी प्रामाके दिया करिलेक पूजा तथापि ना पाइलेन मनेर सान्त्वना * मार्या पुत्र वेचिया से दिलेन दक्षिणा एका राम तुमि दिते कर उपहास * सूर्यवंश बुझि आज हइल विनाश । चिन्तित हइया राजा भावि मने मने * डाकिलेन भरत शत्रुघ्न दुइ जने दोहे दॉड़ाइल आसि मुनिर साक्षाते * राजा बलिलेन याह मुनिर सङ्ग ते भूपतिर वञ्चनाय भ्रान्त तपोधन * मने भाविलेन एइ श्रीराम लक्ष्मण आगे यान महामुनि पाछे दुइजन * सरयू नदीर तीरे दिल दरशन मुनि वलिलेन शुन भूपति कुमार * हेथा गमनेर पथ पाछे द्विप्रकार एइ पथे गेले याइ तिन दिने घर * एइ पथे गेले लागे तृतीय प्रहर तृतीय प्रहर पथे किन्तु श्राछे भय * सेइ पथे ताडका राक्षसी नामे रय । ताड़िया धरिया खाय यत मुनिगणे * कोन पथे याइते तोमार लागे मने बलिलेन भरत शुनह तपोधन * दुष्ट घॉटाइया पथे कोन प्रयोजन १ फोज के लिए अन्न । २ ठगई, छल । ३ राक्षसी।

आदि काण्ड १६७ चीते कस अगनित खल पाई ? * किमि कोटिक दल-दनुज नमाई ? धरत ध्यान मुनि नृप-छल जाना * दीन न राम, भरत पहिचाना फिरे गाधिसुत, कुपित अति, दसरथ किय उपहास ! पुरजन सकल, भूपति करौ विनास ॥१२०॥ मुनि-ग प्रगटी पावक-रासी' * जरत नगर आकुल पुरवासी हाट-बाट चहुँ जरै अटारी * राम समीप भजे नर-नारी तुम तजि, दीन भरत, नरनाहू * कौशिक-कोप अनल पुर दाहू नगर त्रास लखि अति दुख पागे * धाय राम मुनि चरनन लागे , जेहि सिर पाप दण्ड-अधिकारी! * निरपराध संकट डारी । दोप अकारन, मुनि ! मन आवै * सोइ छन पूरुष धर्म नसावे पितु सनेहवस मोहिं न दीना * करौ विदेह निसाचर-हीना रच्छहु प्रजा, शमन ! तपपुजा ! * राम-वचन मृदु मुनि-मन रजा कम एकथा शुनिया मुनि भाविलेन मने * इनि कि हवेन योग्य राक्षस निधने एक राक्षसेर नाम शुनि एत डर * मारिन किसे इनि कोटि निशाचर राजार शठता इनि भावेन अन्तरे * श्रीरामे ना दिया राजा दिल भरतेरे श्रामार महित राजा करे उपहाम * अयोध्या सहित प्राजि करिव विनाश क्रोधे फिरिलेन पुनः विश्वामित्र ऋपि * निर्गत हइल तॉर नेत्र अग्निराशि 1 सेइ अग्नि लागे गिया अयोध्या-नगरे * प्रजार तावत् घर द्वार दग्ध करे कान्दिया चलिल प्रजा रामेर गोचरे * विश्वामित्र मुनि श्रासि सर्वनाश करे तोमारे ना दिया राजा दिल भरतेरे * ते कारणे ए श्रापद अयोध्या-नगरे प्रबार क्रन्दन शुनि रामेर तरास * धाइया गेलेन राम विश्वामित्र पाश मुनिर चरण धरि वले रघुमणि * प्रजालोके रक्षा प्रभु करह श्रापनि अपराध येह करे दण्ड कर वार * निरपराधीर दण्ड करा अविचार मुनि हैया येह जन रागे देय मन * पूर्व धर्म नष्ट तार हय सेइक्षण पुत्रे पाठाइते पिता हलेन कातर * यज्ञ रक्षा करि गिया मिथिला नगर हामिलेन मुनिराज रामेर वचने * अयोध्यार पाने चान अमृत नयने १ अग्नि की सपर्ट।

तप १६८ कृत्तिवास रामायण प्रभाव, अम्रित मुनि-लोचन * मरसि अवध किय संकट मोचन ह्रास न त्रास विपति कहुँ लेसा * मुनि-तप . कौतुक राम विसेसा ! यज्ञरक्षा के लिए मिथिला में श्रीराम-लक्ष्मण का जाना और मन्त्र-दीक्षा पञ्चशिखा सिर हरि अवतारा * मुग्ध राम-छवि मुनी निहारा नभ शरदेन्दु' सरिस अभिरामा' ! * शोभाधाम चलहु मम ग्रामा लखि न उपाऊ * सौंपेउ राम-लखन मुनिराऊ रहु निचिन्त', दसरथ बडभागी * राम हेतु भय संका त्यागी तुमहिं न बोध, असुर-बध हेता * जनम कृपानिकेता नृप प्रबोधि, मुनि सुतन बुलावा * सोइ छन रघुबर विनय सुनावा जो अनुमति, आयसु-जननि, लै, पुनि करौ पयान । नतरु अनन्तर, अन्न-जल-पान ॥१२॥ बहोरि कौशिलाधामा * करि प्रनाम विनयेउ श्रीरामा सुनी कथा नप, ... राम-तन रुदन-रत, तनँ ॥ चले सकल करिते पारे तपेर कारण * येमन अयोध्यापुरी हइल तेमन मुनिर चरित्र देखि रामेर तरास * आदिकाण्ड गाइल पण्डित कृत्तिवास मिथिलाय यज्ञरक्षार्थे श्रीराम-लक्ष्मणेर गमन ओ मत्र दीक्षा शिरे पञ्च झुटि राम विष्णु अवतार * मुग्ध हइलेन मुनि रूपेते ताँहार पूर्णिमार चन्द्र येन उदय आकाशे * मुनि बलिलेन राम चल मोर देशे जानिलेन महाराज रामेर गमन * लक्ष्मण सहित रामे करेन अर्पण बलिलेन विश्वामित्र राजार गोचर * राम लागि चिन्ता ना करिह नरेश्वर तुमि नाहि जानह रामेर गुणलेश * राक्षस बधिते अवतीर्ण हृपिकेश श्रीराम लक्ष्मणे ल'ये आमि देशेयाइ * स्थिर हो महाराज कोन चिन्तानाइ राजारे कहिया एइ प्रबोध वचन * मुनि बलिलेन चल श्रीराम लक्ष्मण श्रीराम बलेन मुनि यदि वल तुमि * मातृस्थाने विदाय लइया आसि आमि माये ना कहिया यात्र मिथिला नगर * कान्दिवेन अन्नजल छाडि निरन्तर ! गेलेन श्रीरामचन्द्र मायेर गोचरे * प्रणाम करिया पदे बलेन मायेरे १ शरत्पूनो का चद्र । २ मनोहर । ३ वैफिक्र (निश्चित) ।

मन आदि काण्ड १६४ मिथिला अणुर विधिन' नित करहीं * नित तिन कोप विपुल मुनि मरहीं रच्छड़ें याग असुर संहारी * कोशिक चहत मोहिं महतारी मंगल मुद ग्रामिस-माई * लहि प्रमाद लौटः जय पाई अवसर प्रथम, समर शुभ मोरा * उचित न सोच जननि मम पोरा उपजी सुनत वेदना भारी * भीजे वमन, भरत ग वारी भरि सुअंक, कर फेरति सीमा * कातर हिय, बहु भॉति असीमा मातहिं बहु प्रबोधि रघुवीरा * टरकत, रुकत न लोचन नीरा चरन धरि पुनि सीस सँवारी * किय सुभगमन राम धनुधारी । राम-लखन गमने मुनि माथा * दृग जल, धनि गिरे नरनाथा ओझल राम न, तो लो दरमन * छिति पलोटि, नप कातर क्रन्दन समुझावत बहु सचित्र मनेही * भावी' अमिट, न मंशय यही निरखि राम मुनि मोट उछाहा * रचेउ विधि-अनुगत' अश्विनीकुमारा * तिमि दोउ, मुनि-पाछे पग धारा देव रघुनाथ-विवाहा आइलेन विश्वामित्र लडते आमारे * मिथिलाय जाइ ग्रामि यज्ञ राखिवारे शुद्ध भने आमारे आशीर्बाद कर * युद्धे जयी हइ येन प्रमादे तोमार प्रथम युद्धते यात्रा करितेछि आमि * प्रामार लागिया शोक ना करह तुमि कौशल्या शुनिया तवे करिछे रोदन * मिनिल नयन नीरे नेतेर वसन कातरा कौशल्या कोले करिया रामेरे * आशीर्वाद करिलेन कर दिया शिरे मायेरे कहेन राम प्रबोध वचन * नेत्र नीर नेत्रेते हइल निवारण मात् पदधूलि राम बन्दिलेन माथे * शुभ यात्रा करिलेन धनुर्बाण हाते श्रीराम लक्ष्मणे निया विश्वामित्र यान * महाराज नेत्रनीरे धरणी भासान कत दूर गिया राम हन अदर्शन * भूमिते पड़िया राजा करेन क्रन्दन राजा के प्रबोध करे यत पात्रगण * के करें अन्यथा याहा विधिर घटन रामे देखि मुनिवर आनन्दित मन * रामेर विवाह हवे देवर घटन आगे मुनिवर यान पाछे दुइजन * ब्रह्मार पश्चाते येन अश्विनीनन्दन १ विघ्न । २ होनी । ब्रह्मा दे पोहे मानो अम्विनीकुमार चल रहे है । - २०० कृत्तिवास रामायण विकल अवध-जन लौटति देसा * उत बन विश्वामित्र प्रवेसा कुअरन-बदन' मलिन रवितापा * अवलोकत मुनि संसय व्यापा सो. रामहिं बन सों काम, वर्ष चतुर्दम व्यथा नित । दुसह एक दिन घाम, अवधि पूरि किमि काटिहैं ॥१२२॥ सोइ विचारि मुनि मत थिर कीन्हा * रामहिं मंत्र-दीक्षा दीन्हा रघुकुल जे पूर्वज, रघुवीरा ! * तजे प्रान शुचि सरयू तीरा तीरथ पुन्य सलिल सोइ पावन * मार्जन' करि आवहु मनभावन लेह सुमंत्र दीक्षा आई * मकल शोक-भय-हेतु नसाई सहस वर्ष नहिं छुधा-पिपासा * सुनि, नहाय, गमने मुनि पासा । युगुल बंधु दिवि मंत्र मिखावा * सुरगन निरखि अतुल सुख पावा। सोइ बल अनाहर बनवामा * विक्रम लखन इन्द्रजित" नासा दिव्य मत्र-दीक्षित शिर नाई * मुनि-अनुगमन कीन रघुराई कान्दिते कान्दिते सर्व गेल निज वासे * राम निया विश्वामित्र वनेते प्रवेशे आगे मुनि यान पाछे श्रीराम लक्ष्मण * श्रातपे हइल म्लान दोंहार वदन ताहा देखि विश्वामित्र अन्तरे चिन्तित * एक दिने श्रीरामेर दुःख उपस्थित रविर तापेते यदि मुखे आसे घाम * बहुकाल किमते भ्रमिबे वने राम विश्वामित्र एइ मत भाविया अन्तरे * कराइल मन्त्रदीक्षा श्रीरामचन्द्ररे विश्वामित्र बलेन शुनह रघुवीर * स्नान करि एस गिया सरयू नदीर यत राजा पूर्व सूर्यवंशे हये छिल * एइ स्थाने प्राण छाड़ि स्वर्गवासे गेल एइ पुण्यतीर्थे राम स्नान कर तुमि * तोमारे सुमन्त्र दीक्षा कराइब आमि शोक दुःख कखन ना पाइवे अन्तरे * क्षुधा तृष्णा ना हइवे सहस्र वत्सरे करिलेन रामचन्द्र से मन्त्र ग्रहण * रामेरे कहिते ताहा शिखिल लक्ष्मण दृढ़ करि शिखिलेन भाई दुइजन * आनन्दित हइया देखिल देवगण बहुकाल अनाहारे थाकिवे लक्ष्मण * ताहाते हइवे इन्द्रजितेर मरण कृत्तिवास पण्डितेर कवित्वेर शिक्षा * आदिकाण्ड गाइल रामेर मन्त्र दीक्षा १ मुख । २ मियाद । ३ स्नान । ४ दिव्य, अलौकिक । ५ मेघनाद । ----- । दुगम पथ आदि काण्ड २०१ श्रीराम द्वारा ताड़का राक्षसी का बध और अहल्या-रद्वार वन - ताड़का जवहिं नियरावा * प्रथम प्रश्न मुनि पुनि दोहरावा फूटत युगुल पंथ इत लखहू * मन भावे सोइ मग अनुसरह एक सुगम दिन तोनि चलाई * पहर तीनि, दुर्गम पथ दुर्गम पथ पाई। ताड़का मुरारी * लगत, खात, मुनिगन नित मारी भयङ्करी दानवि जित लागा * मो पथ. सुत ! न उचित अनुरागा! मग विलंब, गुरु ! मोहिं न भावा * पहर तीनि द्रुत' पंथ मुहावा जो निसिचरी करइ भटभेरा' * तो न तामु वध पातक हेरा कुपथ विसूरि उपज मुनि तापा * किमि उछाह रामहिं अस व्यापा ? । सो० भाजहिं पग धरि सीस, भेंट ताडका कतहुँ जो । सुनत कथन, जगदीस, विहँमि धीर बोलत वचन ॥१२३।। राम न नाम, विफल धनुबाना * हनउँ एक सर राकसि प्राना सर द्वितीय लो शुरू - दोहाई * तीज गहे मम धर्म नसाई श्राराम कत्त क ताड़का राक्षसी-ध ओ अहल्या-उद्धार गुरुर चरणे राम झरिलेन नति * रामे लैंया विश्वामित्र करिलेन गति तारकार बने आसि कहे अभिमत * रामे चाहि बलिलन एइ दुटि पथ एइ पथे याइ घर तृतीय प्रहरे * एइ पथे तिन दिने याइ मम घरे तिन प्रहरेर पथे किन्तु भय करि * ताड़का राक्षसी आछे महा भयंकरी ताड़िया धारेया खाय यत जीवगण * कोन पथे याइ बल श्रीराम लक्ष्मण करिलन राम गुरु-वाक्येर उत्तर * तिन दिन फेरे केन यार मुनिवर यदि से राक्षमी पथे आइसे खाइते * विचारे नाहिक दोष ताहार मारिते रामेरे कहेन विश्वामित्र मुनिवर * श्रो पथेर नामे मोर गाये श्रासे ज्वर तोमार वासना आमि ना पारि बुझिते * मार निया याह बुझि रातयेरे दित यसन राक्षसी मोरे आमिवे ताडिया * आमारे एड़िया दोहे यावे पलाया गुरुर वचने हामिलेन प्रभु राम * विफल धनुक घरि व्यर्थ राम नाम एक वाण विना कि द्वितीय वाण धरि * तोमार दोहाइ यदि तिन वाण मारि १ जल्दी वाला। २ घरमुट, झमेला ।

ܝܝܝܝܝ रन एकाकी २०२ कृत्तिवास रामायण करि प्रन अटल, चले मुनि साथा * कानन अनुज सहित रघुनाथा । युगुल बंधु विच, मुनि छवि पावा * ठिठकि दूर गृह-असुरि दिखावा विक्रम घरनि, मनहुँ भय पाई+ * कुथरन तजि, मुनि चले बराई लखन जाहु संग, गुरु भयभीता * तजब अकेल न उचित प्रतीता लछिमन कहत विनय कर जोरी * अनुचर विलग न प्रभु, मति मोरी विक्रम विपुल विकट गति जाकी * तासन उचित न सुनहु लखन प्रिय ! मन भय त्यागी * कस समर्थ निसचरि हतभागी जो मिलि सकल जुरहिं रन अर्था * अँगुरि न मम, सठ लघ समर्था गुरु-अनुगमन लखन पुनि कीन्हा * असुर-अरण्य राम पग दीन्हा धनुर्दण्ड बिच धरि बिच धरि कर बामा * तानि तन्तु दक्षिण कर रामा फेंट-वसन कसि, सारङ्ग' हाथा * दूर्बादल श्यामल रघुनाथा एइमत रघुवीर प्रतिज्ञा करिते * चलिलेन मुनि सेइ ताड़का देखिते उभय भ्रातार मध्ये थाकि मुनिवर * दूर हैते देखाइल ताड़कार घर कर वाडाइया तार घर देखाइया * अति त्रासे मुनिवर यान पलाइया श्रीराम बलेन भाई मुनिर सहित * शीघ्र याह गुरु एका यान अनुचित लक्ष्मण बलेन रामे जोड़ करि हात * थाकुक सेवक सगे प्रभु रघुनाथ शुनिले ताहार कथा बड़इ विषम * एकला केमने राम करिबे विक्रम श्रीराम बलेन भाइ भय नाइ मने * कि करिते पारे भाइ राक्षसीर गणे सकल राक्षमी यदि हय एक मिलि * लड़िते ना पारे मम कनिष्ठ अङ्गु लि गेलेन मुनिर सङ्ग लक्ष्मण तखन * ताडकार प्रति राम करेन गमन बाम हॉटु दिया राम धनु मध्यखाने * दक्षिण हस्तेते गुण दिलेन से स्थाने 1 ऑटिया सुपीत वस्त्र बान्धिलेन राम * वाम हाते धनुर्बाण दादल श्याम प्रथमे दिलेन राम धनुके टङ्कार * स्वर्ग मर्त्त पाताले लागिल चमत्कार शुये छिल राक्षसी से सुवर्णेर खाटे * धनुक टङ्कार शुनि चमकिया उठे वसिया राक्षसी सेइ एक दृष्टे चाय * दादल श्याम रूप देखिल तथाय + सत कृत्तिवास ने विश्वामित्र का भयाकुल वर्णन उपहासास्पद किया है। हिन्दीकार के मत से मुनि ने किशोरों की परीक्षार्थ भय का रूप दिखाया है । १ प्रत्यञ्चा। २ धनुष ।

- कानन तव-त्रास आदि काण्ड २८३ घनुटकार प्रथम, जग हाला * स्वर्ग, मर्त्य, भौचकित' पताला सुवरन - खाट । ताड़का सोई * सुनि टङ्कार नींद तिन खोई नयन पसारि सुरारि' निहारी * हरित बदल सम छवि प्यारी आसन - हेत विरञ्चि दिय, कोमल मानव - चाम । अवहिं हरौं तव प्रान, कहि, उठि धाई जित राम ।।१२४॥ विप्रचर्म-पट -खल तन धरही * भूर, चलत सो चरमर करही कुण्डल मुनिन-कपाला * मनुज-भाल उर झूलत माला रक्त-मांस, मुनि जरठ, विहीना * अस्थि-चर्म तिनकर रसहीना ! कोमल सुरुचि मांस विधि दीना * दनुजि कथन रघुवर सुनि लीना विपुल लोम" - युत ताम्र सरीरा * विकट दन्त जिमि लौह जंजीरा भच्छन हित, मुख चली पसारे * लखि निमचरि प्रभु वचन उचारे केतिक मुनि मनु कानन मारे * तजत पंथ विचारे पठवउँ अाजु तोहि यमलोका * कुपित निमिचरी प्रभुहिं विलोका । गर्जति निडर, विकट तन धारी * चली राम तन, शाल उपारी उठिया चलिल सेइ राम विद्यमान * डाकिया बलिल आज लब तोर प्राण ब्राह्मणेर चर्म तार गायेर कापड * चलिते ताहार वस्त्र करे खड़मड़ । ब्राह्मणेर मुण्ड तार कर्णेर कुण्डल * मनुष्येर मुण्डमाला गलार उपर वसिते आसन नाइ भावे मने मन * इहार चम्मॆते हवे वसिते अासन रक्त मांस मुनिर शरीरे नाहि • पाड * अस्थि चर्म सार मात्र शुधृ हाड खाई अपूर्व इहार मांस दिलेन विधाता * कहिलेन राम शुनि ताडकार कथा ताम्रवर्ण देखि तोर गाये लोमावली * दन्त गोटा देखि येन लोहार शिकलि वदन व्यादन करि आइल खाइते * पाठाइव तोरे प्राजि यमेर घरते । मनुष्य खाइया चेड़ी दश कैलि बन * तोर डरे पथे नाहि चले साधुजन शुनिया रामेर वाक्य कुपिया अन्तरे * निकटे पासिया से विकट मूर्ति धरे रामेरे खाइते जाय डरे नाहि पारे * शालगाछ उपाडिल घोर हुहुकार शालगाछ उपाड़िया धन दिल पाक * दूर-दूर करिया ताड़का दिल डाक १ अचभित । २ राक्षसी । ३ सूरो हुए । ४ बूटे । ५ रोम ।

२०४ कृत्तिवास रामायण । बालक ! 'सम्हरु, करौं तव पाना * नभ रव , घोर, शाल संधाना । निरखि राम सर एक चलावा * खण्ड-खण्ड, छिति विटप गिरावा । 1 आयुध' विफल कोप अधिकाई * शिशुपाल तरु' लै पुनि धाई । तौलति कर, तकि प्रभु, रव घोरा * हरि-सर चलेउ दनुजि मुख अोरा तदपि ताडु का अति रन ठाना * उत प्रभु तजत बान पर बाना पावस घन जिमि दामिनि नादा * गर्न तर्ज सर समर विवादा सुर-वानी सुनि सुनि परी परी अकासा * विन सर वज्र न दनुजि-विनासा राम बज्रसर मारि हिय, राकसि कीन अचेत । योजन दूरि पचास लौं, गिरी जाय सो खेत ॥१२॥ आर्तनाद करि त्यागेसि प्राना * सुनत दूरि, कौशिक हतज्ञाना राम, पठयि राछसि यमगेहा * बन्देउ चलि मुनि चरन सनेहा सचेत, रघुवर उर लाई * दुर्जय दनुजि तात जय पाई विनयेउ राम, कहा बल मोरा ? * चिन गुरु-कृपा न कारज घोरा ताहा देखि रघुनाथ एडिलेन वाण * बाणाघाते करिलेन गाछ खान-खान गाछ काटा देखि कुपिया गेल वने * शिशपार गाछ देखि घन-घन टाने शिंशपार गाछ तोले रामे मारिबारे * तार मुख मेदिलेन राम एक शरे तथापि ताड़िया जाय रामे गिलिबारे * महावीर भय कभु नाहि करे तारे बाणेर उपरे वाण शब्द ठन्ठनि * वर्षाकाले विद्यु तेर येन झन्झनि श्रीरामेरे डाकिया वलेन देवगण * बज्रवाणे ताड़कार वह जीवन ! बज्रवाण एड़े राम युड़िया धनुके * निर्घात वाजिल बाण ताड़कार बुके । बुके वाण वाजिते हइल अचेतन * ताडका पडिल गिया पञ्चाश योजन विपरीत डाक छाडि छाडिलेक प्राण * शब्द शुनि विश्वामित्र हैल हतज्ञान पाठाइया ताड़कारे यमेर सदन * मुनिर चरण राम करिल वन्दन चेतन पाइया चले गाधिर नन्दन * ताडका मारिला बाछा कौशल्याजीवन श्रीराम बलेन गुरु कि शक्ति प्रामार * ताड़कारे बधिलाम प्रसादे तोमार १ अस्त्र । २ शीशम का वृक्ष । बन्न न्यन्वयन उपवन सहस रूपमी आदि काण्ड २०५ कौशल्या-सुत ! सुनहु अनूपा ॐ कस ताड़का ? लखिय चलि रूपा निमिचरि निकट चले धरि धीरा * यदपि मृतक, मुनि कम्प शरीरा मुनि-मन मोच ! भयावह रूपा * लखेउ न विकट . तासु अनुरूपा हनि ताहु का, राम हग कञा * चले भृमि जहँ जन्म-प्रभञ्जा' उद्गम इत उनचास प्रभजन * कुऔर लखहु ! कह गाधियनन्दन पवन-भृामे तजि, पुनि पग डारा * गौतम-तिय विस्तारा मुनि अदेम, सुनु राजिवलोचन ! * उपल' परसि पग करु अघमोचन' परसन सिला कहहु कस कारन ? * कौतूहल गुरु करिय निवारन कौशिक कही पुरातन बाता * सिर्जि रूपमी विधाता तिन छवि एक सवॉरि अहिल्या * अतुल रूप जग तानु न तुल्या रूपरामि मो गौतम-नारी ! * दिवस एक, मुनि तप पग धारी मुनि-प्रिय शिष्य- इन्द्र, मुनिवेसा * मुनि सूने, किय कुटी प्रदेसा कस अकाल प्रभु आगमन ? प्रश्न अहिल्या कीन । छम्य वेस सुरपति उतर, गौतम-तिय सों दीन ॥१२६॥ मुनि बलिलेन शुन कौशल्यानन्दन * ताड़कारे देखि गिया तारका केमन ताडकारे देखिते मुनि करेन प्रस्थान * मरेछे ताडका तबू मुनि कम्पमान ताडझारे देखिया भावेन मुनि मने * एमन विकट मूर्ति ना देखि नयने ताडकारे मारिया राम राजीवलोचन * पवनेर जन्मभूमि विश्वामित्र कहे देख श्रीरामलक्ष्मण * एड् खाने हैल उनपञ्चाश पवन पवनेर जन्मभूमि पश्चात् करिया * अहल्यार तपोवने गेलेन चलिया मुनि बलिलेन राम कमललोचन * पापाण उपरे पद करह अर्पण शुनिया बलेन राम मुनिर बचने * पापाणेते दिव पद किसेर कारणे मुनि बलिलेन शुन पुरातन कथा * महस्र मुन्दरी सृष्टि करिलेन धाता सृजिलेन ता सवार रूपेते अहल्या * त्रिभुवन छिल ना मौन्दर्ये तार तुल्या करिन अहल्याके विवाह गौतम गौतमेर शिप्य इन्द्र अति प्रियतम एक दिन गौतम गेलेन तपम्याय * गौतमेर वेशे इन्द्र प्रवेशे तथाय करेन गमन १ पवन की जन्मभूमि । २ उनचान वायु का उत्पत्ति-स्थान । ३ पत्थर । ४ पारमुक्त ।

गिरेउ टूटि - २०६ कृत्तिवास रामायण हिय, तव रूप प्रिये ! स्मरना * मदन-दग्ध ! किमि तप-प्राचरना गुरु-तिय-रति सुरपति मन डारा * सतवन्ती पति आयसु धारा छम्य वेस पति शचिपति संगा * विवस अहिल्या-व्रत इमि भंगा तप-निवृत्त गौतम गृह प्राये * अासन-मान नारि सों पाये अवसर विन, शृंगार-प्रसंगा * प्रिय कस लखत चिह्न तव अंगा ? सुनि ससंक, विनयेउ मुनिनारी * स्वयं नाथ करनी अधिकारी नभ गौतम-सीसा * सकल कथा सुनि विकल मुनीसा धरत ध्यान, कौतुक सब जाना * पापहेतु-सुरपति, पहिचाना । इन्द्र ! इन्द्र ! मुनि गर्जि पुकारा * दबकति' पॉव पुरन्दर डारा । अनाहार, धधकत हिय अागी * बोलत दुगुन कोप मुनि पागी नाना शास्त्र ज्ञान तैं लीन्हा * गुरु-दक्षिणा तासु भल दीन्हा गुरु-तिय धर्म, नीच ! तँ भंगा * सठ ! तव होय योनिमय अंगा अहल्या गौतम ज्ञाने करे सम्भाषण * आजके सकाले केन घरे आगमन इन्द्र वले तव रूप हइल स्मरण * केमने करिव प्रिये तपस्याचरण मदन दहने दग्ध हय मम हिया * निर्वाण करह प्रिये आलिङ्गन दिया पतिव्रता नाहि ल पतिर वचन * तखनि शयनगृहे करिल गमन गुरुपत्नी बलिया ना करिल विचार * धर्मलोप करिल वासव अहल्यार तपस्या करिया मुनि आइलेन घरे * अहल्या प्रासन दिल अति समादरे गौतम बलेन प्रिये जिज्ञासि तोमारे * शृङ्गार लक्षण केन तोमार शरीरे अहल्या वलेन प्रभु निवेदि तोमारे * श्रापनि करिया कर्म दोपह श्रामारे ए कथा शुनियामुनि हेट कैल तुण्डे * आकाशः भाङ्गिया पड़े गौतमेर मुण्डे जानिलेन ध्यानेते गौतम मुनिवर * जाति नाश करिल आसिया पुरन्दर 1 इन्द्र इन्द्र बलिया डाकेन मुनिवर * पुंथि काँखे करिया प्राइल पुरन्दर दिनान्ते अभुक्त मुनि कुपित अन्तरे * द्विगुण ज्वलिया कहिलेन पुरन्दरे तोके पड़ाइलाम ये आमि शास्त्र नाना* एतदिने भाल दिलि गुरुर दक्षिणा जाति नष्ट कैलि तुई अोरे पुरन्दर * योनिमय होक तोर सर्व कलेवर १ डरा हुषा ।

, ! दसरथ-गेह साथा , कर आदि काण्ड २०७ पुनि, दिय शाप सुतिय अतिरूपा * बसइ तपोवन शिला-स्वरूपा। विकल चरन धरि रुदन अपारा * केहि विधि, नाथ ! शाप निस्तारा ? फातर तिय प्रबोधि अनुरागी * अमिट शाप मम सुनु हतभागी । जनमि रघुनाथा * याग-म हित, कौशिक गमनकाल, मग, चरन-रज, तिन परसत तव सीम । लहै मनुज-तन, रुदन तजु, सुमिरु कृपा जगढीस ॥१२७॥ लक्ष्मण कहत विनय सुनि लीजै * ब्राह्मणि-सीस, चरन किमि दीजे कतहुँ न द्विजः प्रस्तर यहि काला * सुनत पदुमदृग राम कृपाला । परसेउ चरन, सिला तजि रूपा * शापमुक्त तिय भई अनूपा अमित मोद, गौतम तहँ आये * निरखि अहिल्यहिं सुख अति पाय विगत अतीत, मिली पुनि जोरी * प्रभु-स्तवन करें जोरी भक्तन हित तरुकल्प अनूपा ! * दयासिन्धु ! अगतिन-गति रूपा! किय निस्तार, युगुल प्रभु-सरना * नमन राम जय रतुपति-चरना एक भाव मन प्रभु तल्लीना * रचेउ चरित कृतिवास प्रवीना अहल्या के शापिलेन क्रोवे मुनिवर * काननेते तोर तनु हउक प्रस्तर अहल्या चरणे धरि कहिल तखन * कत काले हवे मोर शाप विमोचन अहल्यारे कातर देखिया तपोधन * कहिलन मम शाप ना हय खण्डन जन्मिवेन यवे राम दशरथ घरे * विश्वामित्र लये यावे यज्ञ राखिवारे तोमार माथाय पद दिवेन यखन * तखनि हइवे मुक्त ना कर क्रन्दन इहा शुनि लक्ष्मण बलेन शुन मुनि * कैमने दिवेन पद उनि ये बामणी विश्वामित्र कहिलेन शुन रघुवर * ब्राह्मणी नहेन उनि एखन प्रस्तर ए कथा शुनिया राम कमललोचन * तदुपरे करिलेन चरण अर्पण ताहाते हइल तॉर शाप विमोचन * श्राहादित शुनिया गौतम तपोधन । अहल्याके देखिया मानन्द महामुनि * पुनर्बार करिलेन पुष्पेर छाउनि दोहे मिलि स्तव करे जुड़ि दुइ कर * भन्नवाञ्छा कल्पतरु दयार सागर जय-जय रामचन्द्र अगतिर गति * निम्तार दुयेरे प्रभु पदे करि नति शुन सवे परे भाइ हैया एकमन * आदिकाण्ड गाइल अहल्या-विवरण + वासव' २ २०८ कृत्तिवास रामायण श्रीरामचन्द्र द्वारा तीन कोटि राक्षमों का सहार एव मुनियों के यज्ञ की ति तथा शिवजी का धनुप तोडने के लिए मिथिलागमन मुंनिहिं कहेउ पुनि राजिवलोचन * भयेउ इन्द्र किमि शाप-विमोचन विश्वामित्र कथा इमि वरनी * सहसयोनि-युत करनी सोचत सुरगन, सुरपति लाजा * किमि निवरै उपहास-समाजा अश्वमेध करि पावन यागा * अमित नेम-जप-तप अनुरागा कायाकल्प, चिह्न जे अंगा * लोचन सहस भये एकसगा टोली, रत इमि कथा-प्रसंगा * पहुँची कछुक काल तट-गंगा पाहन पलटि भई मुनिगृहनी * केवट सुनत लुकायेसि तरनी" कौशिक डपटि कहेउ, कैवर्त्ता'! * श्रायसु-लंघ, मिलावहुँ गर्ता उड़े प्रान, आयेउ निकट, कहेउ कोपि मुनिनाथ । सुरसरि पार उतारु मोहिं, युगुल किशोरन साथ ॥१२८॥ केवट करुन कथा निज बरनी * छिद्र अनेक, जीर्न मम तरनी उजुर न मुनि श्रायसु सिर धारौ * सवन कंध लै पार उतारौं श्रीरामचन्द्र कत्त क तिनकोटि राक्षस वध ओ मुनिगणेर यज्ञ समाधान एव हरधनु भाँगिवार जन्य मिथिलाय गमन श्रीराम वलेन प्रभु करि निवेदन * केमने हइल मुक्त सहस्रलोचन मुनि वलिलेन शुन दशरथ सुत * हइलेन वासव सहस्रयोनियुत लज्जायुक्त हइलेन देव पुरन्दर * कि हवे उपाय सव भावेन अमर अश्वमेध करिलेन तखन वासव * योनि छिल घुचिया हइल नेत्र सब एइ रूपे कथा वार्ता कहिते-कहिते * तिन जने चलिलेन गङ्गार कूलेते पापाण हइल मुक्त कैवर्त ता शुने * नौकाखानि लइया से पलाइल वने 1 कैवर्त्तके डाकिया कहेन तपोधन * ना आइले भस्म आमि करिव एखन एत शुनि कैवर्तेर उडिल जीवन * आसिया मुनिर काछे दिल दरशन मुनि बलिलेन बलि कैवर्त तोमारे * गङ्गाय करह पार ए तिन जनारे कातरे कैवर्त कहे करिया विनय * नौकाखानि जीर्ण मम शत छिद्रमय तवे यदि आज्ञा कर मोरे- तपोधन * स्कन्धे करि पार करि याह तिनजन १ इन्द्र । २ निवारण हो । ३ मण्डली । ४ पत्थर । ५ नाव । ६ केवट । ७ घूल ट । मे।

मच जो प्रभा आदि काण्ड २०६ कित आनेउ छबि अतुल कुमारा * जिन पग छुअत शिला निस्तारा सुनी कथा मोइ भय-उपनावन * इन रज-चरन तरत छुड पाहन पद-रज परसि तरुनि' भइ तरनी' * कित निवास ? गृह भुरमुट घरनी' नौका-हरन, हरन काहू * मनि कित मम परिवार निवाहू ? चरन-धृषि पखराई * तो तरि-परम" न भय अधियाई केवट-युक्ति विनय-रस पागी * अत्मनि दीन राम अनुरागी पग पखारि कुअरन मुनि माथा * सुरमरि. नरनि तरी रघुनाथा कहेउ राम यहि सम जग माहीं * हे प्रिय लखन ! अकिञ्चन नाही १ परत दीठि शुभ राम कृपाला * तरनी कनकमयी तत्काला सरिता उतरि लखन-श्रीरामा * पूछत कत, मुनि ! मिथिलाधामा ? चलिय वेगि, मुनि कहत सनेहा' * तीन कोस, सुत ! अवहिं विदेहा राम-लखन भागम तप-कानन * मुनि-तिय चकित चितै मनभावन द्वादस वयस पञ्च सिर चोटी * कौतुक ! हनहिं दनुज त्रयकोटी ! कोथा हैते आनिला ए पुरुप सुन्दर * पायेर परशे मुक्त करिल प्रस्तर ए कथा शुनिया श्रामि सभय अन्तर * चरण धूलिते मुक्त हइल पाथर नौका मुक्त हय यदि लागि पदधृलि * कि दिया पोपिरामि मम पौप्यगुलि करिवेक गृहिणी अामाके गालागालि * वलिवे मुनिर बोले नौका हाराइलि यदि वल श्रीरामेर चरण धोयाइ * नतुवा लागिवे धृला तरणी हाराइ तरणीते त्वराय करिते श्रारोहण * धोयाडल कैवर्त श्रीरामेर चरण श्रीराम लक्ष्मण विश्वामित्र एइ तिने * पाटनी करिया पार गेल भव जिने श्रीराम बलेन शुन प्राणेर लक्ष्मण * इहार समान नाहि देखि श्राकिञ्चन शुभदृष्टे श्रीराम चाहेन तार पाने * हइल सुवर्णमयी तरणी तत्क्षणे हइलेन गद्गापार श्रीराम लक्ष्मण * जिज्ञासेन कत दूरे मिथिला भुवन मुनि वलिलेन राम चलह सत्वर * एखन मिथिला पाछे तिन क्रोशान्तर पार ह'ये यान राम सहित लक्ष्मण * कहिते लागिल देसि मुनिपत्नीगण द्वादश वर राम शिरे पञ्चझुटि * मारिवेन रानम केमने तिन कोटि १ तरुण स्त्री । २ नाय । ३ गृहिणी (पत्नी) । ४ नाय । ५-पर। ६ नेह-गहित ।

२१० कृत्तिवास रामायण शत-शत पुन्य-पूर्व केहि जागी ? * जन्मेसि जननि कवन बडभागी ? नारी, अच्छत-दूव लै, पुनि-पुनि देय असीस । असुर-निकन्दन राम लखि, प्रमुदित सकल मुनीस ॥१२६॥ प्रथम दिवस तपवने विश्रामा * भोर निवेदन किय श्रीराम युगुल बन्धु आये जेहि काजा * अनुमति मोइ दीजिय मुनिराजा सुनहु तात हे रघुकुल-चन्दा * रचहिं याग अव द्विज-मुनि-वन्दा अब लौ जब-जब याग • रचावा * तारक-सुत शोनित' बरसावा विप्र-स्वभाव न समुचित क्रोधा * किये कोप, जप-तप अवरोधा' यज्ञ-काज अविलन अरंभा * मुनि-प्रसाद मेटहुँ मेटहुँ खल-दम्भा तपसी तत्काला * लै कुश चले यज्ञ शुचि शाला कुश-आसन कोउ-कोउ मृगचर्मा * पूरुब मुख असीन तपकर्मा करहि वेदध्वनि बटु अनुरागी * स्वत: मंत्र-बल प्रगति प्रागी गगन धूम्र साकल्य सुवामा * निरखि असुरगन किय उपहामा राम-घोप, कोन भाग्यवती पुत्र धरियाछे गर्भे * कत शत पुण्य से ये करियाछे पूर्वे मुनिगण आइलेन करिते कल्याण * आशीष करेन सवे हाते दूर्वाधान श्रीरामेरे निरखिया यत मुनिगण * आनन्दसागरे मग्न सह तपोधन । से दिन वञ्चिया सुखे श्रीरामलक्ष्मण * प्रातःकाले मुनिरे करेन निवेदन ये कार्य करिते आइलाम दुइ भाई * सेइ कार्ये अनुमति करह गोसाई । मुनिरा बलेन शुन श्रीराम लक्ष्मण * एखनि करिव यज्ञ सकल ब्राह्मण आमरा सकले करि यज्ञ प्रारम्भन * रक्तवष्टि करे दुष्ट ताड़कानन्दन ना पारि करिते क्रोध आमरा ब्राह्मण * यदि क्रोध करि 'हय धर्म उल्लङ्घन श्रीराम बलेन प्रभु करि निवेदन * अविलम्बे कर' यज्ञक्रिया प्रारम्भन शुनिया रामेर कथा तपस्वी सकले * खोला कुश लइया गेलेन यज्ञस्थले केह व्याघ्रचर्म वैसे केह कुशासने * बसिलेन 'पूर्ध्वमुख हइया' प्रासने वेदपाठ करिते लागिलेन सकले * मन्त्रेर प्रभावे से अग्नि पनि ज्वले यज्ञेर यतेक धूम उड़ये आकाशे * देखिया राक्षसगणं मने-मने हासे । १ रक्त, खन । २ रुकावटे।

विपुल सेन धनवाना * बँचि आदि काण्ड २११ निमिचर-हत, न यज्ञ-अचारा * तीनि कोटि दल पनि हंकारा मारीच मजावा * यज्ञस्थल समीप चदि धावा सेनन' मुनिगन राम चेतावा * होहु सचेत, दनुदल श्राश रघुवर-दीठि जहाँ जहाँ लो जाई * अगनित असुर अनी छाते छाई तत्पर लखन-राम श्रवन लो सर संधाना लिये विटप-पापान विशाला * दानव ममर, वदन विकराला तिनहिं ताकि, रघुवर हने, तीखे विशिख कराल । कोटि असुर आहत किये, धनि-धनि दसरथलाल ॥१३०|| जूझे कोटि दनुज रन हेना * जुरे कोटि धनुधर पुनि खेता अति सुतीक्ष्ण भर हीरा-जीरा * इन्द्रवान छोहति रघुवीरा पशुपति वान, क्षुरूप-सुरूपा * दलति असुर, ध्वनि मारु अनूपा गर झलमल मणि-माणिक-माला * हनेड असुर दुइ बोटि कृपाला देय असीस, मुदित मुनिराई * जीत गमर राम दोउ भाई जीयन्ते थाकिते मोरा मुनि यज्ञ करे * तिन कोटि निशाचर मानिया चलरे तिन कोटि लड्या मारीच निशाचर * साजिया प्राइल तारा यजेर भितर सङ्केते श्रीरामेरे जानान मुनिगण * आमियाचे राक्षमगण कर निरीक्षण १ देखिलेन रघुवीर निशाचर गण * व्यापियाचे वसुमति ना जाय गगन श्रीराम लक्ष्मण करे धरि धनुर्माण * पाकर्ण पूरिया वाण करेन मन्धान पादप पाथर ल'ये प्राइल विस्तर * भयङ्कर कलेवर करें निशाचर कटाक्षेते निक्षेप करन राम शर * ताहाते पडिल एक कोटि निशाचर एक कोटि पड़े यदि रणेर भितर * अन्य कोटि लइया प्राइल धनुःशर हीरा वाण जीरा वाण अति सर धार * मारये इन्द्रेर याण कौशल्या-कुमार नरूपा सुरूपा वाण पशुपत श्रार * राक्षम उपरे पड़े चलि मार-मार गलाते लम्बित मणिमाणिक्येर काठि * रामवाणे पडिल राक्षम् दुइ कोटि श्रीरामेरे श्राशीर्वाद करे मुनिगण * मबे बले जयी होक श्रीराम लक्ष्मण ब्राह्मणेर श्राशीपे ना हय हेन नाई * मार-मार करिया जुभेन दुइ भाई १हमारे ।

२१२ कृत्तिवास रामायण सर तीखे विप्र-वचन सत, कतहुँ न भगा * युगुल बन्धु खेलत रणरंगा वरुण, पवन, कालानल पासा * अटल राम सर विविध प्रकासा मायासर गंधर्व विशेखा * निज दल रिपुन राममय देखा । करहिं परस्पर मारामारी * सुग्गन निरखि मोद मन भारी डोलत धरा राम सर-घाता * तीन कोटि निसिचरन निपाता || तकि राम-सरीरा * मारहिं यातुधान' बलवीरा बरसत सतत' दानवी सायक * अनुज सहित विचलित रघुनायक जर्जर भयेउ गात-रघुवीरा * रुधिर-लालरी श्याम शरीरा 'दनुज-पराभव' 'जय रघुनन्दन' * भाषत सुर-भृसुर जगवन्दन स्वस्तिवचन-द्विज, बल अति प्रेरा * भिरे कुऔर रन जूझ घनेरा। खचित कान प्रभु बान चलावा * पावस घन जिमि झरी लगावा अर्द्धचन्द्र सायक कठिन, कौतुक बरनि न जाय । हनेउ प्रमुख दुइ सुभट रन, सोइ सर राम चलाय ॥१३१।। दोउ भट प्रमुख निरखि रनपाता * कुपित मरीच ताडका-ताता वरुणास्त्र पाश वायुवाण कालानल * एडिलेन बहु राम समरे अटल , मारिलेन श्रीराम गन्धर्व नामे शर * राममय देखिल सकल निशाचर आपना आपनि सब काटाकाटि करे * सकल देवता देखि हासये अन्तरे श्रीराम करेन युद्ध कॉपाइया माटि * राम वाणे पडिल राक्षस तिन कोटि तिनकोटि पड़े यदि रणेर भितर * रामेर उपरे मारे चोख-चोख शर निरन्तर वाण मारे निशाचर गण * धरिवेन सहिष्णुता कत दुइजन हइलेन जर्जर वाणेते रघुवीर * शोणिते भासिया गेल श्यामल शरीर आशीर्बाद करेन अमर द्विजचय * हउक रामेर जय राक्षसेर क्षय ब्राह्मणेर अशीर्वादे वाडिल ये बल * मार-मार करिया गेलेन रणस्थल आकर्ष पूरिया वाण मारेन राघव * वरिपये वर्षार येमन मेघ सव। अर्द्धचन्द्र विशिखेर कि कहिव कथा * ताहाते काटेन राम दुइ पात्र माथा दुइ पात्र पड़े यदि रणेर भितर * मारीच रुपिल तवे ताड़काकोडर १ राक्षस । २ लगातार । ३ दानवो का नोश हो, राम की गय हो- नारा !

३ - आदि काण्ड २१३ अलख' राम कित ? कह लघु भ्राता ? * तीन कोटि किन असुर निपाता? मम सर प्रान ताड़का त्यागे * मम कर निधन' असुर हतभागे । सुनि हरि-चन मरीच रिसाना * रव' घनघोर, विषम रन ठाना। जिमि वैसाख धूमरित धूरी * राम देह सठ वानन पूरी कातर राम न, वीर अपारा * बरसहि मर जिमि जलधर धारा मायामृग सिय हरन विचारी * देवन मीच-मरीच निवारी" विशिप बज मन सुमिर कृपाला * प्रस्तुत प्रगटि भयेउ तत्काला प्रभु मोड कुलिशवान संधाना * हिय-मरीच तकि लाग निसाना घायल चपकि वजसर मंगा * उड़त यथा परहीन विहंगा भरमत दिवम सात प्रतिकातर * धरनि लाग जहें लक, निसाचर लंकवाम बहु हिंसाचारा * तजेसि अन्त लखि जगत अमारा बालक-रन मम हात निपाता ** कुधन कुवृत्ति फसत किमि गाता जटा शीश वल्कल पारधाना* सयन-वपन रत रघुपति ध्याना कोया गेल राम कोथा गेल वा लक्ष्मण * तिन कोटि गत्तम मारिल कोनज्न श्रीराम बलेन ताड़कार हन्ता ये? * तिन कोटि राक्षम मारिल रणे सेह मारीच शुनिया ताहा कुपिल अन्तरे * घन-घन वाण मारे रामेर उपरे रामेर उपरे वाण पडितेचे नाना * वैशाग्य मासेते येन पडये भञ्झना ।। महावीर रामचन्द्र ना हय कातर * शरवृष्टि कोन येमन जलधर मारीचेरे रक्षा करे भावि देवगण * मारीच मरिले नहे मीतार हरण वजयाण बलि राम करिल स्मरण * आसिया से बजवाणु दिल दरशन श्रीरामेर बज्रयाण वज्र रे हुडके * निर्धात परिल गिया मारीचर चुके बुके बाण बाजिया नाटाई येन घुरे * डाना-भागा पाखी येन उड़े जाय धीरे । भ्रमिते-भ्रमिते जाय मारिच कातर * मात दिने उत्तरिल लदार भितर बहु जीव खाइया मारीच लकावासी * विवेक संसार त्यजि हइल सन्यामी कहे यदि मरिताम वालकर रणे * के करित दस्युचि कि करित धने शिरे जटा परिया वाकल परिधान * शयने स्वपने करे राममय ध्यान १ पिपे हुए । २ नास । ३ पन्द । ४ मृत्यु । ५ यना नी । ६ वस्त्र ।

२१४ कृत्तिवास रामायण - न अगनित भूप - प्रतीत टूटइ टूटइ शिवचापा घटतर' तप मरीच मन लावा # इतर रामरट प्रान न भावा मिटे विधिन, किय याग मुनीसा * अछत-दूब लै हरिहिं असीसा यज्ञ-शेष फल-मूल जे, सबन कीन जलपान । लखन सहित, निसि तपोवन, सोये कृपानिधान ॥१३२॥ जुरी सभा ऋषिगनन प्रभाता * चर्चहिं सकल राम सकल राम के बाता सहज न मनुज, राम अवतारा ! * दसरथ-पुन्य प्रगट तनु धारा । स्वत. यज्ञ-प्रभु याग सम्हारी * अब न हेतु भय असुर-सुरारी हरि जन्मे दानव-बध अर्था * सोइ प्रन-जनक निगाह समर्था । रामहिं कौशिक कहेउ मप्रीता * वत्स ! विदेह स्वयंवर-सीता सिय-पितु प्रन ! शिवधनु जे भंगा * सुता समर्पित सोइ भट संगा भूप निरंतर प्राई * सभय चाप लखि, गये बराई रघुवर तव बल विपुल प्रतापा * मन मुनि-आयसु-उलघ अपकर्मा ! * को समर्थ ? पालन मम धर्मा वटवृक्षतले तप कल प्रारम्भन * राम विना मारीचेर अन्य नाहि मन हेथा यज्ञ मुनिर करिल समाधान * आशीप करेन रामे दिया दुर्ध्वाधान । यज्ञ अवशेषे येइ फलमूल छिल * खाइते से सब फल श्रीरामेरे दिल से रात्रि बञ्चेन राम मुनिर आश्रमे * प्रभाते एकत्र हन मुनिगण क्रमे सभाते बसिया युक्ति करे सर्वजन * सामान्य मनुष्य नहे राम नारायण यिनि यज्ञेश्वर यज्ञ राखिलेन तिनि * दशरथ पुन्यफले अवतीर्ण इनि राक्षसेर भय कर कि कारण पार * राक्षस बधार्थे हरि स्वयं अवतार करिलेन येइ पण जनक भूपति * राम विना ताहाते ना हबे अन्ये कृति विश्वामित्र बलेन शुनह रघुवर * मिथिलाते हइवेक सीता स्वयम्बर करेछे प्रतिज्ञा एइ जान कीर पिता * हरधनु भाङ्गिवे येइ तारे दिवे सीता कत शत भूपति बाइसे श्रार जाय * देखिया हरेर धनु सभये पलाय 1 देखिलाम ये तोमारे वीर बलवान * मने बुझि धनुक करिवे दुइखान श्रीराम बलेन आज्ञा कर ये एखन * ताहा करि तब आज्ञा लक कोन जन १ बरगद के तले । २ यज्ञ के स्वामी । ३ ५चकर निकल गये । ४ विश्वास ।

ले राम सप्रीता मन्त-मुनि केरी प्रामन श्रादि काण्ड २१५ सुधा-मने मुनि वचन विनीता * चले विप्र, धनुधर राम-लखन, चहुँ घेरी * टोली चली अनुमति-राम गाधिमुत पाई * खबरि प्रथम चलि जनक जनाई जनक. ममा मुनि-पागम देखी * दिय सन्मानि विरोखी कौशिक कहेउ, जनक तव-धामा * आये लखन माहित श्रीरामा दुर्जय दनुजि नाडु का मारी * जिन गौतम-तिय शाप निवारी जामु दरम मद्गति गुह पाया * जिन पर असुर त्रिकोटि नमावा मो० द्वादस वर्ष ललाम, अनुन लखन, अनुपम युगुल । तव पाहुन मोइ राम, अतुल वीर विक्रम प्रबल ||१३३।। राज समाज कथन-मुनि भाषा * वर मिय जोग विरंचि पटाया पुरजन सकल ढरम हित धाये * धरि करबन्धु' अन्ध लौ छाये राम-लखन-दरसन अति नेहा * उमड़े नगर, काज तजि गेहा सीस पञ्चलट केस सॅवार * मणि-माणिक-माला उर धारे ए कथा कहेन यदि कौशल्या-नन्दन * रामेरे लहया यान सकल ब्राह्मण हाते धनु करि यान श्रीराम लक्ष्मण * पागे पाछे चलिलेन सरल ब्राह्मण विश्वामित्र बलिलेन शुन रघुवर * अग्रेते गमन करि जनकर घर ए कथा शुनिया राम बलेन तॉहारे * आगे गिया वार्ता देह जनक गजारे विश्वामित्र देखिया उठिल सर्वजन * प्राइम बलिया दिल अमित यायन मुनि बलिलेन शुन जनक राजन तव घरे पाइलेन श्रीराम-लक्ष्मण ताडकारे मारिलेन हेलाय ये जन * प्रहल्यार करिलेन शाप विमोचन कैवत्तके तारिलेन सुकृपा दर्शने * तिन कोटि राक्षम मरिल यार बागे सेइ राम द्वादश वत्मर वयःक्रम * लक्ष्मण तोहार भाई दुह अनुपम ए कया शुनिया मये राज मभाजन * पहिल मीतार वर आटल एसन आइल ममस्त लोक करिने दर्शन * बन्धु कर धरिया आउन अन्धन्न मचे वले देखिव लक्ष्मण आर राम * मिथिलार मत्र लोक छाडे गृहकाम उभ करि बान्धियाछे शिरे पञ्चझुटि * गलाने निर्मित मणि माणिक्येर काँटि १ अतिपि । सायीचा मगरा लेकर। Far - २१४ कृत्तिवास रामायण न भावा यज्ञ-शेष अगनित भूप 3 भूप निरंतर प्रतीत टूटइ टूटइ शिवचापा बटतर' तप मरीच मन लावा * इतर रामरट प्रान मिटे विधिन, किय याग मुनीसा * अछत-दूब लै हरिहिं असीसा फल-मूल जे, सबन कीन जलपान । लखन सहित, निसि तपोवन, सोये कृपानिधान ॥१३२॥ जुरी सभा ऋपिगनन प्रभाता * चर्चहिं मकल राम कै बाता सहज न मनुज, राम अवतारा ! * दसरथ-पुन्य प्रगट तनु धारा । स्वतः यज्ञ-प्रभु' याग सम्हारी * अब न हेतु भय असुर-सुरारी हरि जन्मे दानव-वध अर्था * सोइ प्रन-जनक निगाह समर्था रामहि कौशिक कहेउ मप्रीता * वत्स ! विदेह स्वयंवर-सीता सिय-पितु प्रन ! शिवधनु जे भगा * सुता समर्पित सोइ भट संगा निरंतर आई * सभय चाप लखि, गये बराई रघुवर तव बल विपुल प्रतापा * मन मुनि-प्रायसु-उलघ अपकर्मा ! * को समर्थ ? पालन मम धर्मा वटवृक्षतले तप कल श्रारम्भन * राम विना मारीचेर अन्य नाहि मन हेथा यज्ञ मुनिर करिल समाधान * आशीष करेन रामे दिया दुर्वाधान यज्ञ अवशेषे येइ फलमूल छिल * खाइते से सब से सब फल श्रीरामेरे दिल से रात्रि वञ्चेन राम मुनिर आश्रमे * प्रभाते एकत्र हन मुनिगण क्रमे । सभाते बसिया युक्ति करे सर्वजन * सामान्य मनुष्य नहे राम नारायण यिनि यज्ञेश्वर यज्ञ राखिलेन तिनि * दशरथ पुन्यफले अवतीर्ण इनि राक्षसेर भय कर कि कारण पार * राक्षस बधार्थे हरि स्वयं अवतार करिलेन येइ पण जनक भूपति * राम बिना ताहाते ना हवे अन्ये कृति विश्वामित्र बलेन शुनह रघुवर * मिथिलाते हइबेक सीता स्वयम्बर करेछे प्रतिज्ञा एइ जानकीर पिता * हरधनु भाङ्गिवे येइ तारे दिवे सीता कत शत भूपति आइसे श्रार जाय * देखिया हरेर धनु सभये पलाय देखिलाम ये तोमारे वीर बलवान * मने बुझि धनुक करिवे दुइखान श्रीराम वलेन आज्ञा कर ये एखन * ताहा करि तब आज्ञा लङ्घ कोन जन १ वरगद के तले । २ यज्ञ के स्वामी । ३ ५चकर निकल गये । ४ विश्वास ।

श्रादि काण्ड २१५ सुधा-मने मुनि वचन विनीता* चले विप्र, वित्र, लै राम मप्रीता धनुधर राम-लखन, चहुँ घेरी * टोली चली सन्त-मुनि करी अनुमति-राम गाधिसुत पाई * खबरि प्रथम चलि जनक जनाई जनक, सभा मुनि-पागम देखी * दिय प्रामन सन्मानि विरोखी ! कौशिक कहेउ, जनक तव-धामा * पाये लखन महित श्रीरामा दुर्जय दनुजि ताडु का मारी * जिन गौतम-तिय शाय निवारी जामु दरर सद्गति गुह पावा * जिन पर असुर त्रिकोटि नमाया मो० द्वादस वर्ष ललाम, अनुन लग्बन, अनुपम युगुल । तव पाहुन' सोइ राम, अतुल वीर विक्रम प्रबल ।।१३३।। । राज समाज कथन-मुनि भावा * वर मिय जोग विरंचि पटावा पुरजन मकल दग्स हित धाये * धरि करवन्धु' अन्ध लौं माय राम-लखन-दरगन अति नेहा * उमडेउ नगर, काज तजि गेहा सीस केस सँवार * मणि-माणिक-माला घारे पञ्चलट ए कथा कहेन यदि कौशल्या-नन्दन * गमेरे लइया यान सकल ब्राह्मण हाते धनु करि यान श्रीराम लक्ष्मण * आगे पाछे चलिलेन सफल ब्राह्मण विश्वामित्र बलिलेन शुन रघुवर * अग्रेते गमन करि जनकेर घर 1 ए कथा शुनिया राम बन्नेन तॉहारे * आगे गिया वार्ता देह जनक गजारे ! विश्वामित्र देखिया उठिल सर्वजन * प्राइम बलिया दिल बमिते प्रशासन मुनि बलिलेन शुन जनक राजन * तव घरे पाडलेन श्रीराम-लक्ष्मण ताडकारे मारिलेन हेलाय ये जन * अहल्यार करिलेन शाप विमोचन कैवत्तके तारिलेन सुकृपा दर्शने * तिन कोटि राक्षम मरिल यार बाणे । सेइ राम द्वादश वत्मर वयःक्रम * लक्ष्मण तोहार भाई दुइ अनुपम ए कथा शुनिया सवे राज मभाजन * कहिल मीतार पर प्राइल एपन श्राइल समस्त लोक करिते दर्शन * बन्धु कर धरिया प्राइल अन्धजन सवे वले देखिव लक्ष्मण आर राम * मिथिलार मच लोक छाड़े गृहकाम उभ करि बान्धियाछे शिरे पञ्चमुटि * गलाने निर्मित मणि माणिक्येर काँटि १ अतिथि । २ सापो का सारा रेकर !

२१४ कृत्तिवास रामायण न भावा अगनित भूप 3 भूप निरंतर टूटइ शिवचापा वटतर' तप मरीच मन लावा * इतर रामरट प्रान मिटे बिघिन, किय याग मुनीसा * अछत-दूब लै हरिहिं असीसा यज्ञ-शेष फल-मूल जे, सबन कीन जलपान । लखन सहित, निसि तपोवन, सोये कृपानिधान ॥१३२॥ जुरी सभा ऋषिगनन प्रभाता * चर्चहिं सकल राम कै बाता सहज न मनुज, राम अवतारा ! * दसरथ-पुन्य प्रगट तनु धारा स्वतः यज्ञ-प्रभु' याग सम्हारी * अब न हेतु भय असुर-सुरारी । हरि जन्मे दानव-वध अर्था * सोइ प्रन-जनक निवाह समर्था रामहिं कौशिक कहेउ मप्रीता * वत्स ! विदेह स्वयंवर-सीता सिय-पितु प्रन ! शिवधनु जे भगा * सुता समर्पित सोइ भट संगा आई * समय चाप लखि, गये बराई रघुवर तव वल विपुल प्रतापा * मन प्रतीत मुनि-आयसु-उलघ अपकर्मा ! * को समर्थ ? पालन मम धर्मा वटवृक्षतले तप कल प्रारम्भन * राम विना मारीचेर अन्य नाहि मन हेथा यज्ञ मुनिर करिल समाधान * आशीष करेन रामे दिया दुळधान यज्ञ अवशेषे येइ फलमूल छिल * खाइते से सब फल श्रीरामेरे दिल से रात्रि कञ्चन राम मुनिर आश्रमे * प्रभाते एकत्र हन मुनिगण क्रमे सभाते बसिया युक्ति करे सर्वजन * सामान्य मनुष्य नहे राम नारायण यिनि यज्ञेश्वर यज्ञ राखिलेन तिनि * दशरथ पुन्यफले अवतीर्ण इनि राक्षसेर भय कर कि कारण पार * राक्षस वधार्थे हरि स्वयं अवतार करिलेन येइ पण जनक भूपति * राम बिना ताहाते ना हवे अन्ये कृति विश्वामित्र बलेन शुनह रघुवर * मिथिलाते हइवेक सीता स्वयम्बर करेछे प्रतिज्ञा एइ जानकीर पिता * हरधनु भाङ्गिवे येइ तारे दिवे सीता कत शत भूपति बाइसे श्रार जाय * देखिया हरेर धनु सभये पलाय देखिलाम ये तोमारे वीर बलवान * मने बुझि धनुक करिबे दुइखान श्रीराम वलेन आज्ञा कर ये एखन * ताहा करि तव आज्ञा ल कोन जन १ वरगद के तले । २ यज्ञ के स्वामी । ३ ५चकर निकल गये । ४ विश्वास ।

राम मप्रीता प्रासन आदि काण्ड २१५ सुधा-सने गुनि वचन विनीता * चले विप्र, लै धनुधर राम-लखन, चहुँ घेरी * टोली चहुँ घेरी * टोली चली मन्त-मुनि केरी अनुमति-राम गाधिसुत गाधिसुत पाई * खबरि प्रथम चलि जनक जनाई जनक. सभा मुनि-आगम देखी * दिय सन्मानि विरोखी कौशिक कहेउ, जनक तव-धामा * आये लखन सहित श्रीरामा दुर्जय दनुजि नाडु का मारी * जिन नाडु का मारी * जिन गौतम-तिय शाप निवारी जामु दरस मद्गति गुह पावा * निन मर असुर त्रिकोटि नमावा मो० • द्वादस वर्ष ललाम, अनुन लखन, अनुपम युगुल । तव पाहुन सोइ राम, अतुल वीर विक्रम प्रबल ।।१३३॥ राज ममाज कथन-मुनि भावा * वर मिय जोग विरंचि पटावा पुरजन मकल दग्म हित धाये * धरि करबन्धु अन्ध लौ आये राम-लखन-दग्सन अति नेहा * उमड़ेउ नगर, काज तजि गेहा सास पञ्चलट केस सॅवारे * मणि-माणिक-माला उर धारे - ए कथा कहेन यदि कौशल्या-नन्दन * रामरे लडया यान सकल ब्राह्मण हाते धनु करि यान श्रीराम लक्ष्मण * आगे पाछे चलिन्लेन सम्ल ब्राह्मण , विश्वामित्र बलिलेन शुन रघुवर * अग्रेते गमन करि जनकेर घर ए कथा शुनिया राम बलेन नॉहारे * आगे गिया वार्ता दह जनक गजारे विश्वामित्र देखिया उठिल सर्वजन * प्राइम बलिया दिल बसिते गायन मुनि बलिलेन शुन जनक राजन * तब घरे आहतेन श्रीराम-लक्ष्मग ताडकारे मारिलेन हेलाय ये जन * यहल्यार करिलेन शाप विमोचन कैवतके तारिलेन सुकृपा दर्शने - तिन कोटि राक्षम मरिल यार वागे , सेड राम द्वादश वत्सर वयःक्रम * लक्ष्मण तोहार भाई दुइ अनुपम ए कथा शुनिया सवे राज मभाजन * कहिल मीतार वर अाहल एवन प्राइल ममम्त लोक करिते दर्शन * वन्धु कर धरिया पाटल अन्धजन सबै बले देखिव लक्ष्मण पार राम + मिथिलार सब लोक छाड़े गृहकाम उभ करि बान्धियाछे शिरे पञ्चझुटि * गलाते निर्मित मणि माणिक्येर कोटि १ अतिथि । २ सादी का मगराकर ।

-- २१६ कृत्तिवास रामायण । मुनि, अनुसरत राम नरनाहा * लखि विदेहपति अमित उछाहा सोचत मनहिं, सवन मन्मानी * मियवर विधि पठयेउ अब जानी मुनि-प्रादेम, लखन-रघुराई * रहे जनक ढिग सीस नवाई तिन मृदुवैन मोद अधिकाई * पुलकि भूप दोउ उर लपिटाई योगी जनक ! ध्यान सब भामा * जगन्नाथ छिति' स्वयं प्रकामा दुर्जय शिवधनु जित आसीना * गमन स्वयंवर-थल नृप कीना प्रन दोहराई * सभा-सदस्य! सुनह जो समर्थ शंकरधनु भगा * सिया शंकरधनु भगा * सिया समर्पन सोइ भट संगा कमलनयन, सुनि बचन-महीपा * गवने प्रभु समीपा सखिन सहित सिय चढ़ी अटारी * पूछत मोइ छन, कहु अँखियारी ! लखन, सजनि को? कहँ मखि रामा? * सियहिं सकेत वताव: भामा द्वदल छबि रघुनाथा * निरखि, सुरन सिय नावइ माथा घोष कुतूहल मन लाई शिव-चाप श्याम विश्वामित्र लइया यान जनकेर घरे * अनुबजि रामेरे लइल समादरे उल्लासित कहेन जनक नृपवर * प्राइल सीतार वर एत दिन पर कौशिक बलेन शुन श्रीराम-लक्ष्मण * जनकेरे प्रणाम करह दुइजन गुरुवाक्य अनुसारे श्रीराम-लक्ष्मण * करिलेन राजा के उभये सम्भाषण आलिङ्गन दिलेन जनक दोंहाकारे * भासिलेन तखन आनन्द पारावारे महायोगी जनक जानेन अभिप्राय * गोलोक छाडिया हरि देखि मिथिलाय धूर्जटि दुर्जय धनु आछे येइ खाने * सभा सह गेल सेई स्वयम्बर स्थाने हेनकाले जनक वलेन कुतूहले * सभाय बसिया कथा शुनेन सकले ये जन शिवेर धनु भागिबारे पारे * सीता नामे कन्या श्रामि समर्पिव तारे ए कथा शुनिया राम कमल-लोचन * धनुकेर निकटते करेन हेनकाले मीता देवी सह सखीगण * अट्टालिका परे उठि करे निरीक्षण जानकी बलेन सखी करि निवेदन * कोनजन राम वा लक्ष्मण कोनजन ! सीतार देखाय सखीगण तुलि हात * ह्यदलश्याम श्रोइ राम रघुनाथ गमन । १ पृथ्वी पर । २ सुलोपनी । ३ इशारे से ।

ते वर जननि-जग, शिवा । आदि काण्ड २१७ सो० नलिनिविलोचन राम, पुरवढे वाञ्छित देवगन । कतहुँ विरञ्चि न बाम, पुनि-पुनि सुमिरत जानकी ॥१३४।। देवताओ के निकट श्री सानाबा का वर-याचना छं० कर जोरि युग, मन विकल, अातुर, मुरन ध्यावति जानकी । करि दामि, पुरवप्रास, गुणनिधि राम रूपनिधान की ।। वरुन, सुरपति, काल, सत्र दिवपाल, गणपति, अग्नि जे । भूतनाथ सनाथ करि देहिं भगवति गौरिजे ॥ धरन-पालन, करनि-मंगल, माता, वध-चण्ड-मुण्ड विलोकि निर्भय भजत सुरगन निशि-दिवा !! मातु-पद प्रणिपात, रघुपति चिन न गति, जीवन वृथा पति मिलें रखुकुलचन्द, आनंददायिनी मेटउ व्यथा ॥ रामेरे देखिया मीता भाविलेन मने * पाछे से विरिञ्चि करे वञ्चित ए धने देवगणे प्रार्थना करेन सीता मने * स्वामी कार देह राम कमललोचने दवगगोर निकट मीता देवीर वर-प्रर्थना कृताञ्जलि सुचिन्तिता, प्रार्थना करेन सीता, शुनह सकल देवगण । यदि राम गुणनिधि, म्वामी करि देह विधि, नवे हय कामना पूरण ।। शुनह देव हुताशन, आर शुन गजानन. शुनह श्रामार परिहार । महेन्द्र, वरुण, काल, शुन मये दिकपाल. महादेव करह निस्तार ।। कात्यायनी भगवती, कर जोड करे स्तुति, पति देह राम गुणमणि । तुमि शिव, तुमि धाता, मकल देवैर माता, वेदमाता हरेर घरणी । चण्ड, मुण्ड श्रादि यत, बधिले से कत शत, देवगण कारला निम्तार । श्रीरामेरे पति देह, घुचालो मनेर मोह. राम विना गति नाहि पार ॥ कमठ-कठोर धनु, श्रीराम कमल तनु, केमने तुलिवे शरासन । कत शत वीरगणे, ना पारिल उत्तोलने, दारुण पितार एड पण ।। सीतार एमन मन, बुझिलेन देवगण, अाकाशे हैल देववागी। शुन गो जनकसुता, ना हइयो दुःसयुत्ता, स्वामी तब राम गुणामणि ।। फूलेर धनुक प्राय, हेलाय तुलिया ताय, भागिवन कौशल्यानन्दन । देवतागणेर कथा, कभू ना हइचे वृथा, एड् कृत्तिवासेर वचन ।।

२१८ कृत्तिवास रामायण कुलिश कठिन धनु टरत न टारे * बल-प्रयोग अगनित भट हारे कोमल कमल राम इत अंगा * पितु-प्रन दारुन, अहह प्रसगा ! | सिय-ससपंज' सुरन अनुमानी * सुखद प्रबोधि कीन नभवानी सुमन-सरिस सिवसारंग, सीता * सहज राम-कर भंग प्रतीता तजहु सोक-भय, जे जगवन्दन * सोइ तव पति रघुपति रघुनन्दन श्रीराम द्वारा शिवधनु भग और श्रीराम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघ्न का विवाह तथा परशुगम का दर्प चूर्ण धनुमंदिर धनु-धारन हेता * चले जबहिं प्रभु, नृपदल जेता । विम्मित, निरत विविध अनुमाना * किमि समर्थ शिशु धनु-संधाना ? | कह सौमित्र, नाथ ! धरि चापा * मेटहु, कुतूहल अनुज-विनय, मुनि-आयसु पाई * बिहॅसि, साधि रघुराई सभा विलोकि कहेउ, सुनु भाई ! * तोरत शिवधनु मन सकुचाई पुनि प्रतंच धरि, सविनय हेरी * चहेउ कुअर अनुमति मुनि केरी भजि चाप पुरवउ मनकामा * कौतुः देखावउ रामा ! सभा व्यापा सवन श्रीगम कर्तृक हरधनु-भग ओ श्रीराम-लक्ष्मण-भात शत्रुघनेर विवाह ओ परशुरामेर दर्प चूर्ण धनुकेर घरे राम गेलेन यखन * धनुक तोलह राम चले सर्वजन यत राजा आछे तारा भाविल अन्तरे * देखिल केमने शिशु धनुर्भङ्ग करे विस्मित हइया सवे करे निरीक्षण * धनुक तोलह राम दले सर्वजन लक्ष्मण बलेन शुन ज्येष्ठ महाशय * घुचाओ धनुक धरि सवार विस्मय श्रीराम बलेन शुन गाधिर नन्दन * आज्ञा कर करिव कि धनुक धारण एतेक बलिया राम सहास्य वदने * धनुक धारण करे देखे सर्वजने । धनुके तुलिया राम बलेन लक्ष्मणे * भाङ्गिव शिवेर धनु भय हय मने | धनुके अर्पिया गुण बलेन मुनिरे * ताहा करि याहा अाज्ञा करिवे आमारे मुनि वलिलेन राम देखाओ कौतुक * मनोरथ पूर्ण कर भाङ्गिया धनुक १ पशोपेश । २ लीन । ३ शिवधनुप ।

.... बाजन श्रानन्द बधाई आदि काण्ड २१६ । क्षण टंकार विपुल कोटण्डा : नर-नई निमिष, भयेट दुह रराडा सभा अचेत, कम्प त्रयलोका * इत विदेह निवरेट' मब मोका वजन, यजत सहनाई * चहुँ मिथिला सवन विदेह निमंत्रन दीन्हा * गर धरि वमन समादर कीन्हा द्विज-गुमंत्र-गृह राम इन, द्वितिय करत बखान । राममातु धनि ! जनक ढिग, उत मुनि कीन्ह पयान ।। मुनि-पद बन्दे पूछत पुनि तरनाह। लुभ साइत अनुमति चही. रसुवर-सिया विवाह ॥१३॥ नृप-प्रस्ताव मुनि धाये * लखन महित जहँ राम सुहाय सुनहु तात ! मम मंगल हेतू * करि विवाह पुनि जाहु निक्तू बहुत काल बीतेउ मुनि-चरनन * ाकुल अवसि मातु-पितु-परिजन जानकी, पाय आजा पेये श्रीराम दिलेन गुणे टान * मड मड शब्दे धनु हेल दुइखान मभार मकल लोक हाराइल ज्ञान * त्रिभुवन मथने हइल कम्पमान हइलेन जनक भृपति हरपित * वाद्य वाजे मिथिला नगरे अगणित गले चम्त्र दिया राजा अनि समादरे - निमन्त्रण एक एक मत्राकारे करे सुमन्त्र ब्राह्मण रामे लगे गेल घरे * सुमन्त्रेण ब्राह्मनी कौशल्या नाम धरे कौशल्यार तुल्य कह नाह भाग्यवती * मा मा बलिया यार डाकन श्रीपति सुमन्त्र मुनिर घर राखिया रामेरे * विश्वामित्र गैलन से जनकर पुरे । मीतादेवी बन्दिलेन मुनिर चरन * अानन्दित हट्लेन जनक यशोधन जनक बलेन प्रभु कार निवेदन * गीतार विवाह जन्य कर शुभ क्षण ए कथा शुनिया मुाने गाधिर नन्दन * अमनि प्राइल यथा श्रीराम लक्ष्मण मुनि बलिनेन राम एइ ग्रामि चाs * विवाह कार या घरे याह दृढ़ भाइ श्रीराम कहेन प्रभु निवेदि तोमारे अामा दहि लयं चल अयोध्या नगर बहुदिन आमियाछि तोमार सहित * विलम्ब हदले पिता त्वेन चिन्तित १ मिट गया । मिपिता का नाम: RTI : विश्वामित्र ।

मन और २२० कृत्तिवास रामायण तासों अवध चलिय मुनिराइ * बात एक समाई जन्मे सकल अनुज सँग, ताकी' * तिन तजि किमि विवाह एकाकी' सुता चारि जहॅ, तह मन माहीं * चारिउ बंधु च्याहि घर जाही वचन राम सुनि उपजेउ त्रासा * मुनि-कपार जिमि टूट अकासा सुनहु विदेह ! राम प्रतिकूला * बरनत दुसह तपोधन सूला तजे अवध चीतेउ बहु काला * अवसि तहाँ पितु हाल बेहाला अनुजन जनम लीन एक संगा * तिन तजि उचित न वरन-प्रसंगा । सुता चारि तहँ रचिय विवाहू * सुनि मुनि-वचन विकल नरनाहू शतानन्द प्रोहित सोइ काला * दिय प्रयोध, थिर होहु भुवाला । भ्रात कनिष्ठ कुशध्वज नामा * सुता युगुल गुण-रूप ललामा दुहिता दुइ रूपसि तव भूपा * सुता चारि इमि अर्पि: अनूपा करौ भूप ! जो रघुपति भावा * सुनि प्रमुदित मुनि हाल जनावा चारि भाइ जन्म लइयाछि एक दिने * से सवार छाडि करि विवाह केमने ए चारि भ्राताके येइ कन्या दिवे चारि * चारि भाइ विवाह करिव घरे तारि एइ वाक्य नि.सरिल श्रीरामेर तुण्डे * श्राकाश भाङ्गिया पड़े कौशिकेर मुण्डे दुःखित हइया मुनि गेलेन तखन * जनकेर निकटे दिलेन दरशन । जनक बलेन प्रभु करि निवेदन * सीतार विवाह दिन कर शुभक्षण विश्वामित्र बलिलेन शुन नरपते * रामेर मनस्थ नहे विवाह करिते कहिलेन बहुकाल छाडियाछि घर * विलम्ब हइले पिता हवेन कातर ये चारि भायेरे चारि कन्या समर्पिवे * तार घरे रामचन्द्र विवाह करिवे शुनिया भावेन राजा करि हेट माथा * सीता विना कन्या नाइ पार पाबकोथा एतेक भाविया राजा विषण्ण वदन * शतानन्द पुरोहित कहिछे तखन केन राजा हइयाछ विचलित मन * तवे घरे चारि कन्या हइवे घटन | | तोमार कनिष्ठ भाइ कुशध्वज नाम * तार दुइ कन्या आछे रूप गुणधाम तोमार दुहिता दुइ परमा सुन्दरी * चारि भाये समर्पण कर कन्या चारि श्रीरामेर ये वासना हवे सेइ मत * तॉहारे जानाओ गिया समाचार यत १ देखकर । २ अकेले । ३ स्थिर। ४ अर्पण करके ।

काज ? अजय आदि काण्ड २२१ तात! जनक-गृह कन्या चारी * रघुकुल चारि कुऔर अनुहारी' मनचाही दसरथ-सुवन, मनभाई मिथिलेस । सुता चारि अर्पत, कुडर ! अब न विधिन लवलेस ।।१३६।। मुनिवर ! अबहुँ एटक सुभकाजू * बन्धु न पितु, किमि मंगल-साज ? । ! जो विदेह, मत, मुनि ! मन भावे * अवध मनुज चलि पितु लै आवे विश्वामित्र जनक ढिग जाई * बरनेउ सफल कथन-रघुराई पठवौ अवध तुरन कोउ पायक' * शुचि-उन्नत विचार विचार रघुनायक रोम-रोम नृप पुलकित अगा* मन-बच लहरति सुखद तरंगा मुनिवर ! श्रान' न जोग लखाई * लाबहु नृपति अवधपुर जाई गाधितनय हिय अमित उछाहू * चले लेन जम' राम-विवाह सिद्धाश्रम जहँ मुनिन समाजू * पूछत भेटि कुतूहल चाप त्रिपुरारि कठोरा * मुनी अवधनुत छिन महँ तोरा सिय-कल्याण हेतु शिवसायक * स्वतः' टूट, बोले मुनिनायक हरपित हैया मुनि गाधिर कोडर * वार्ता गिया देन तवे रामेर गोचर शुन राम नाहि देखि इहार बाधक * चारि भाय चारि कन्या दिवन जनक राम वलिलेन प्रभु करि निवेदन * सब भाह हेथा नाइ करिव कमन इहाते बाधक आरो आछे मुनिवर * विवाह करिते नारि पितृ श्रगोचर आमार विवाह दिते यदि आछे मन * अयोध्याते मनुष्य पाटायो एकन्न एतेक शुनिया गेल गाधिर नन्दन * कहिलंन जनकरे सब विवरण शुनिया भावेन राजा भावे गद गद * वचन मनेर अगोचर ए सम्पद मुनि बलिलेन शुन जनक राजन , आनिबारे राजारे पाठायो एकजन राजा बलिलेन मुनि करि निवेदन * तोमा भिन्न के याडबे अयोध्या-भुवन ए कथा शुनिया मुनि भाविलेन मने * घटक हइया याई अयोध्या-भुवने एड यश प्रामार घुपिये त्रिभुवने * विवाह दिलाम ग्रामि श्रीराम लक्ष्मणे एतेक भाविया मुनि करिल गमन * सिद्धाश्रमे प्रथमतः दिल दम्शन सुधाय सकल मुनि कि शुनि कौतुक राम नाकि भाङ्गियाछे हरेर धनुर. मुनि कन करिवारे सीतार कल्याण * शिवधनु पापनि हाल दुइखान १अनुरूप । २रकावट । दून-प्यादा । ४ समग । ५। ६ आन मार ।

२२२ कृत्तिवास रामायण सिद्धाश्रम तजि मुनि पग धारा * कछुक काल भे सुरसरि पारा मुनि पहुँचे जहॅ गौतम नारी * शिला परमि पग रघुवर तारी १ वहरि चले जहें जन्म प्रभञ्जन * सो तजि पार चीन ताडकवन चलि आये पुनि सरयू तीरा परसेउ गाधि-तनय शुचि नीरा कहत सुदूर अवध-पुरवासी * दरसत सोइ सोइ तपसी बनवासी राम-लखन गमने जिन साथा * सो किमि आजु खबरि दीन कोउ दसरथहि, आवत मुनि चिन राम । आकुल, रुदन, कहाँ राम घनश्याम ॥१३७॥ कस अकेल ? कित मम सुत प्राना ? * आजु अन्धमुनि-बचन प्रमाना राम-लखन विन जल बिन मीना * दै निधि दीनहि, विधि हरि लीना रच्छन याग, असुर-उत्पाता * मेटन हेतु, लीन मम ते अलोप', टूटी मब आसा * हरेउ प्रान, मुनि सर्व विनासा बिना रघुनाथा वज्रपात, ताता विश्वामित्र सिद्धाश्रम पश्चात् करिया * गङ्गार कलेते मुनि उत्तरिल गिया गंगापार हइया चलिलेन सुनिवर * अहल्या येखाने छिल हइया पाथर अहल्यार तपोवन पश्चात् करिया * पवनेर जन्मभूमि उत्तरिल गिया पवनेर जन्मभूमि राखि कत दूर * ताडकार वने यान पाछे सरयूर करिलेन सरयूर नीर परशन * दूग्ते थाकिया देखे अयोध्यार जन आसिया ये मुनिराज रामे लये गेल * एका मुनि आसितेछे राम ना अाइल ए कथा कहिल गिया दशरथ प्रति * वज्रपात सम ज्ञान करेन भूपति कान्दिया वाहिरे आसि अजेर नन्दन * रामे ना देखिया कहे कातर वचन एका ये प्राइले मुनि राम मोर कोथा * हइल प्रत्यक्ष आजि अन्धकेर कथा कोथाराम कोथावालक्ष्मण गुणनिधि * दरिद्रर दिया निधि हरिलेन विधि । यज्ञ रक्षा हेतु ल'ये गेला निजवास * छलेते करिले मुनि मम सर्वनाश राक्षस बधेर हेतु लइया कुमार * के जाने वधिवे मुनि पराण प्रामार १ गायव ।

अपार आदि काण्ड २२३ शावक विन बाधिन विकराला * विकल रानि, तह गये भुवाला अन्तःपुर दुख आवा अवध, प्रमाद नकल दिसि छावा द्वादस वयस नवोढ' किशोरा * हतेउ कतहुँ बन निसिचर घोरा विखलत भूप, न गात सम्हारी * विश्वामित्र कुतूहल भारी सुहद, मचिव कित ? कहत भुवाला * गुरु वशिष्ट आगम मोइ काला कौशिक कहो कुअर केहि भाँती ? * राम-कुमल काह जुबउ छाती परेउ न भल-अनभल' कछु काना * कह मुनि. रुदन अतुल कम ठाना ? कस न, गाधिसुत ! अचरज कारन ? * अलख राम किमि धीरज धारन ! । ज्ञान, ध्यान, जीवन घनश्यामा * चहुँ तम' अवध-भुवन विन रामा । लेहिं चरन-मुनि, भूप अधीरा * पूछत. किते लखन रघुबीरा ? कहेउ गाधिसुत, सुनु नरनाथा ! * विक्रम-नुबन, निसचरि प्रबल ताडका मारी* शाप-राहत किय गौतम नारी विन्द-रघुनाथा वार्ता पेये आइल राजार या राणी * डम्मर हागये येन मारे घेनी कौशल्या सुमित्रा राणी हाहाकार करे * प्रमाद परिल प्राजि अयोध्या-नगरे द्वादश वर राम तर नाहि पुरे हेन गमे पाडल कि निशाचरे , आकुल हडल राजा अजेर कुमार * विश्वामित्र भावनेन ए कि चमत्कार राजारे बुझाये कत पात्र मित्रगण * हेनकाले मानेन बरि वाहागा वशिष्ठ बलेन कह गाधिर नन्दन * रामेर मंगल शुनि जडाक जीवन एइ कथा शुनिया कहेन तपोधन * भालमन्द ना शुनियान्द कि कारण वशिष्ठ बलेन मुनि कह कि ग्राश्चर्य * गमे ना देखिया कार'मन हय धन्य रामध्यान रामजान राम से जीवन * राम विना अन्धकार अयोध्या भुवन [लोटाये पड़ेन राजा मुनि पदतले * कोथाय लक्ष्मण काया राम एड बले विश्वामित्र बलेन शुनह यशोधन * पुत्रेर विक्रम कया करह ताड़कारे मारिलेन कौशल्याग्न्दन * महल्या के करिनेन शाप विमोचन श्रवण १ नव-उम्र। २ भना-न।३ २५फार ।

२२४ कृत्तिवास रामायण केवट कीन सनाथ, पुनि, दनुज कटक हनि राम । पुरये मुनिगन-याग सुचि, पहुँचे मिथिला धाम ॥१३८।। अहँ धनुभंग जनक प्रन ठाना * परसत' सोइ हारे नृप शिवधनु भंजि, राखि प्रन-भूपा * लहेउ दान सिय रमा-सरूपा सुता चारि तह, सुत तब चारी * भूपति ! चलिय बरात सॅचारी। दसरथ सुनि मुद-मंगल-गाथा * पुनि-पुनि मुद-मंगल-गाथा * पुनि-पुनि मुनिपद बंदहि माथा सजी वरात अवध सजि आवा * लख-लख हय-गज-रथ चहुँ छावा भरत-रिपुदमन आयसु पाई * सबन निमंत्रि, दीन पहुनाई प्रथम चलेउ रथ मुनिन-समाज * पुनि सुत युगुल सहित नरराजू । तौलौ कहति कौशिला रानी * जननि-स्वभाव सुधा सरसानी । राघव-तन किमि हारिद'-परमन * वर-सरूप सुत-छवि किमि दरसन ? लखन-मातु कह मंजुल बानी * अमित उछाह सुधारस-सानी दीदी ! लै रघुवर कर नामा * करहु सकल सुचि मगल कामा लख-लख हय-गज-रथ-पद यथा * चली अनी चतुरंग वरूथा कैवर्तके करिलेन कृतार्थ श्रीराम * राक्षस मारिया पूर्ण करिलेन काम जनक करियाछिल धनुर्भङ्ग पण * ताहाते हारिया गेल यत राजगण १ शंकरेर धनुक करिया दुइखान * लक्ष्मीरूपा कन्या राम पाइलेन दान । , चारि कन्या दिवेन जनक चारि भाये * चल महाराज शीघ्र दुइ पुत्र लये । ए कथा शुनिया राजा अानन्दे विह्वल * प्रणति करेन मुनिर चरण कमल अयोध्याते तखन पड़िया गेल साड़ा * लक्षलक्ष हस्ती साजे लक्षलक्ष घोड़ा नाना रूप रथ साजे अति सुशोभन * डाकिया आनिल राजा भरत शत्रुध्न त्वरा करि सबारे करिल निमन्त्रण * अयोध्यार लोक सब करिल साजन अग्रे रथे चडिलेन यतेक ब्राह्मण * चडिलेन रथे राजा सह पुत्रगण बलेन कौशल्या देवी सुमित्रा देवीरे * ना पाइ हरिद्रा दिते रामेर शरीरे सुमित्रा वलेन दिदि केन भाव आर * रामेर नामेते करि मङ्गल आचार ॥ लक्षलक्ष पदादिक चलिलेक सङ्ग * चक्रवर्ती चलिलेन सैन्य चतुरंगे १ छूते ही । २ हल्दी लगाना-एक मागलिक काय । ३ समूह ।

गावा*उत तन जागा विकट चदन श्रादि काण्ड २२५ विग्दभाट, बटु' वेदन विदेह रच रंग, मुहावा रिधि-मिधि रमा जनम सिय केरा * मिथिला सुस, धन, धाम घनेग मग, सुपेय घृत क्षीर तडागा * प्रातिथि-भाव धारि अतुल राशि पकवान मिठाई * चहुँ, बरात हित, भूप मजाई अवध-सैन मुखदैन मग, ठोर-टौर जनवास असन-वसन-श्रामोद वहु, सब विधि विविध सुपास' ॥१३॥ रघुकुल-कटक लिये अजनन्दन * सग्य-सलिल परसि किय चन्दन पुनि म्नान, अमित करि दाना * सुधा सरिस नृप किय जलपाना सरिता उतरि अरण्य मोहावा * गाधि-सुवन इमि वचन सुनावा जहाँ राम ताड का विनामी * सोइ बन विकट लखो, गुनरामी कम ताडु का दनुजि विकराला ! * लखिय, सोचि पग घरे भुत्राला परतच्छ निहारी * कौतुक ! किमि मृदु राम पहारी ! पवन जन्म जहँ, भूमि अनूपा * पुनि गौतम-तिय-उपवन; भूपा ! रायवार पड़े भाट वेद विप्रगण * मिथिलार एये किछु शुन विवरण मीतारूपे लक्ष्मी स्वयं तथाय जन्मिल * मिथिला नगर धने पूर्णित हइल घृत दुग्धे जनक करिल मरोवर * स्थान-स्थाने भाण्डार करिल मनोहर चालराशिराशि सुमिष्टान्नकॉडिकोडि* स्थाने स्थाने राखे गजा लक्षलक्ष हॉडि हेथा मैन्यगण लये अजेर नन्दन * सरयू नदीर तीरे दिल दरशन सरयू नदीते राजा करि स्नान-दान * मिष्टान्न भोजन करे मिट जन्नपान त्वरित सरयू नदी उत्तीर्ण हइया तारकार बनेते प्रवेश कर गिया कौशिक बलेन शुन अजेर नन्दन * एई बने ताल्का हइल निपानन शुनिया बलेन राजा अजेर नन्दन * ताडका दोसब प्रभु सेह वा केमन । ताहकार निकटे गेलेन दशरथ * देवेन पडिया या सागुलिया पध ताडका देखिया राजा भाविलेन भने * इहारे बालक राम मारिल कैमने । ताड़कार वन राजा पश्चात् करिया * पवनेर जन्मभूमि देखिन्लेन गिया परनेर जन्मभूमि पश्चान् करिया * अहल्यार श्राश्रमेते उपग्लि गिया १ पाहान । २ वागत नि नियाह । ३ सागम । माहा।

१. २२६ रघुनाथा * मेंटेउ कृत्तिवास रामायण पावन दरस श्रम-पीरा * पहुँचे शुचि सुरमरि के तीरा । जासु तरनि उतरे सोइ निषाद नरनाथा अवध-कटक तरि' साजि उतारा * सिद्धाश्रम सुभ दरस निहारा। बन-उपवन, मुनि ! लखे ललामा * कतक दूर अब मिथिला-धामा ? गाधिसुवन कह, सुनहु नरेसा * कोस तीनि मारग अवसेसा मुनि-तिय कहइ पूर मन-कामा * नृप ! निकेत तव जन्मे रामा चले बहोरि विदेह-समोपा * प्रजा-सैन युत, अटे महीपा बाजन विविध बजत मन मोहा * हास-हुलास सकल दिसि सोहा । कौतुक-अस्त्र, खेल, उल्लासा * दूत जनक संवाद धाम जनक, सन्मानि बहु, भेटि अवधपति लीन । समुचित शिष्टाचार पुनि, सविनय स्तुति कीन ॥१४०॥ सुत तव चारि, चारि मम वाला * लेहु दान, जो दया-भुपाला बिहॅसि अवधपति जनक प्रबोधा * बनी बात, कित लेम विरोधा ? प्रकासा अहल्यार तपोवन पश्चात् करिया * गगातीरे उपनीत हइलेन गिया ये कैवर्त श्रीरामेर पार करे छिल * से राजार नाम शुनि नौका साजाइल नौकाते हइल पार यत सैन्यगण * सिद्धाश्रम दर्शन करेन यशोधन भूपति बलेन मुनि निवेदन करि * कत दूर आछे पार मिथिला-नगरी विश्वामित्र बलेन शुनह नृपवर * आछे पार तिन क्रोश मिथिला-नगर मुनिपत्नी सवे वले राजा पूर्णकाम * याँहार औरसे जन्म लइलेन राम सिद्धाश्रम दशरथ पश्चात् करिया * मिथिलार सन्निकटे उत्तरिल गिया आह्लादित प्रजा सब आर सैन्यगण * नानाजाति अस्त्र खेले वाजाय चाजन दूत गिया वार्ता दिल जनक राजारे * अनुबजि लो राजा अजेर कुमारे रथ हैते नामिलेन अयोध्यार पति * करिलेन जनक श्रादरे बहु स्तुति जनक बलेन राजा यदि कर दया * तव चारि पुत्रे देइ चारिटि तनया दशरथ चलिलेन शुन हे जनक * सम्बन्ध हइल ठिक तवे कि बाधक १ नाव पर । २ दृश्य । ३ पहुंचकर रुके । ४ अश-जरा भी।

प्रादि काण्ड तात-चरनन जनक चंदि गवने निज धामा * दशरथ पठड, बाम जहँ राम्ग पितु-आगम लखि, प्रायसु पाई * गहे लपिटाई पितु प्रनाम किय लखन, बन्दना * भरत-रिपुदमन रघुपति चरना भरतहिं लखन, लखन रिपुसूदन * पद'-अनुमार करहि पद-पूजन मिलहिं सनेह परस्पर चारी * तन-मन भृप, मोद ला भारी कोमल-दल सुपाम वह भाती * मिथिला, मकल प्रफुल्ल बराती 1 व्यञ्जन बहु पक्वान मिटाई * परम, खाइँ, छटा छिति बाई वशिष्ठ, नृपगेहा * चलि भेटे जहँ सभा विदेहा उठि मन्मानि कीन मुनि-चन्दन * म्वागत, पाद्य. अर्ध्य यरु प्रामन मिय-विवाह सुभ लगन विचारी * कहर, तपोधन ! मगलकारी पुनर्वस कर्कट कन्या * अनुपम लगन, महीप ! अनन्या दंपति-सुख, जनि कतहुँ विछोहा' * मुनि मुनि-वचन सवन मन मोहा मोड अवसर नखत उभये हइल शिष्टाचार सम्भापण * विटाय हया राजा करेन गमन येइ घरे बमिया आछेन रघुवीर * सेड घरे चाललेन दशग्ध धीर पितार अादेश पाइया हइया बाहिर * बन्दिलंन पितृ पदद्वय ग्यवीर लक्ष्मण बन्दिल गिया पितार चरण * रामेर चरण बन्द भरत शत्रुघ्न लक्ष्मण बन्दिल गिया भरते तखन * शत्रुघ्न आमिया बन्दे बोयर लक्ष्मण चारि भ्राता परस्परे करे ग्रालिंगन * मुखे पुलकिन अग अमेर नन्दन घाटेते नामिल कह उतरे या माठे कह पाक करि माय मरोबर बाटे सामोखाओ लोलो एइमात्र शुनि * अन्न व्यञ्जनेते पूर्ण हडल मेदिनी गेलेन वशिष्ठ मुनि जनकर घर * ममा करि बनियाने जनक नपवर वशिष्टे देखिया राजा करे अभ्यर्थन * पाद्य अध्ये दिल पार बनिने यापन कहिने लागिल राजा जनक तसन * गीतार विवाह लग्न कर गुमन्तरा, वशिष्ठ मभार मध्ये ज्योतिष मेलिल * पुनव्वनु कटने कन्या लग्न केल ताहाते विवाह विधि हडले घटन - स्त्री पुरुषे विछंद ना हय कदाचन -- १ मदि-बोटा-बडादेजोः ।।

लगन विसेखी पग धारी प्रासन अर्घ्य पाय २२८ कृत्तिवास रामायण उतै सुरन सुरपुर मन छोहा' * जो न होय मिय राम-विछोहा तो बनगमन न बध दसमाथा * देवन मिलि सोचत शचिनाथा' लगन सुकर्कट टरइ जिमि, कीजिय जतन विचारि । निरखि मयंक, भरोस करि, बोले इमि असुरारि ॥१४१॥ नर्तकि" मेष जनकपुर जाई * रचहु रंग, शशि ! छवि निखगई सुध-बुध तजइँ नर्त सब देखी * बीतइ कर्कट इत वशिष्ठ सुभ-लगन विचारी * दमरथ-हृदय मोद अति भारी अभरन विविध भूप बहु साजी * अमित भार फल बहुल विराजी ! खॉड, दूध, दधि, घृत-मधु, भारा * सेवक चले लदे तिन थारा , द्विजन सहित, अधिवास' विचारी * जनक सभा वशिष्ठ सन्मानू * लगन चढ़न मुनि कीन विधानू दुर्वा-धान मंगलाचारा * लगे होन, दोउ कुल अनुसारा कर वेद-ध्वनि द्विज समुदायी * कनकासन सिय चौक सुहायी सेइ लग्न करिल ये यत बन्धुजन * स्वर्गे थाकि युक्ति करे यत देवगण । स्त्री पुरुषे विच्छेः ना हय कालान्तरे * केमने मारिवे तबे लकार ईश्वरे । करह मन्त्रणा एइ बलि सारोद्धार * लग्न भ्रष्ट कर गिया श्रीराम सीतार नर्तकी हइया तवे यायो शशधर * नत्य कर गिया तुमि जनकेर घर तव नृत्य देखिले भुलिवे सर्वजन * अतीत हइवे तवे कर्कट लगन शुभ लग्न करिया वशिष्ठ मुनिवर * वार्ता गिया दिलेन भूपतिर गोचर आनन्दित हइलेन अजेर नन्दन * श्रायोजन करिलेन सर्व आभरण भारे भारे दधि दुग्ध भारे भारे कला * भारे भारे क्षीर घृत शर्करा उज्ज्वला मन्देशेर भार लये गेल मारिगण # अधिवास करिबारे चलेन ब्राह्मण । मभा करि बसेछेन जनक भूपति * सेखाने गेलेन वशिष्ठ महामति द्रव्येर यतेक भार एडिलेक गिया * वसेर वशिष्ठ कुशासन पातिया घट संस्थापन करे येमन विधान * उपरेते अाम्रशाखा नीचे दूर्वाधान वेदवनि करिते लगिल ब्राह्मण * सीतारे आनिया दिल नाना प्राभरण १शोभ । २ इन्द्र । ३ चन्द्रमा । ४ इन्द्र । ५ नाचनेवाली । ६ हल्दी,तेल, उबटन मादि, प्रत्येक मांगलिक कार्य के पूर्व होनेवाले टेहले या रस्में ।

आदि काण्ड २२६ क्षौर, स्नान, जं ब्राह्मणी, स्नान भूपण, वसन, भाल छवि चन्दन * सुभ परिधान करावई परिजन दै जलधार सुता तहँ लाये * खरचि द्रव्य बहु, जनक सोहाये सिय-अधिवास, संपदा सारी * पाय विप्रगन चले सुखारी पुनि-अधिवास-राम आदेसू * पुलकि वशिष्ठ दीन अवधेस चारिउ कुऔर बिना उपवीता' * तिन अरंभ भए काज पुनीता स्नान, गंध, कोपीना * मेखल, दण्ड, मंत्र, मुनि दीना यहि विधि कुअर चारि उपवीती * अमित दान दिय भूप सप्रीती तिन अधिवास, समोद नृप, करहिं स्वकुल अनुरूप । वरन विविध अभरन सजे, मंगल मूरति रूप ॥१४२॥ श्राद्ध नान्दीमुख नृप नृप कीन्हा * अतुल दान पुनि विप्रन दीन्हा साथ जे दासी * निरखि राम अति हृदय हुलासी मायन' तैल हरिद्रा उबटन * मगल गीत सहित किय सखियन पुनि कलावा बन्धन * कुअरन करन' सोह सुभ कंकन बमिलेन सीता देवी सुवर्णेर पाटे * वेदमन्त्रे दिल गन्ध सीतार ललाटे चारिजने अधिवास करिल तखन * वस्त्र पराइल आर नाना श्राभरण जलधारा दिया कन्या लइलेक घरे * जनक भूपति सब द्रव्य व्यय करे । अधिवास द्रव्य लैया चलिल ब्राह्मणे * श्रीरामेर अधिवास करे सर्वजने वशिष्ठ वलेन दशरथे सम्बोधिया * चारि तनयेर कर अधिवास क्रिया राजा वले शुनह वशिष्ठ तपोधन * अयज्ञोपवीत एइ चारिटी नन्दन क्षौरकर्म करालेन चारिटि नन्दने * ार यज्ञोपवीत हइल चारि जने रामचन्द्र बसिलेन वापेर निकटे * चन्दन दिलेन चारि पुत्रेर ललाटे चारिजन अधिवास करिल राजन * वसन पराये दिल नाना श्राभरण नान्दिमुख करिलेन येमन विधान * नान्दीमुख उपलक्ष्ये करिलेन दान कौशल्या ब्राह्मणी प्रारयत दासी लैया * आनन्द करेन सबे रामेरे देखिया हरिद्रा माखान चारि वरे कुतूहले * अंगेते पिठालि दिल सखीरा सकले तोला जले स्नान कराइल चारि वरे * मंगलसूता बान्धिलेक ताँहादेर करे १ यज्ञोवपीत । २ हाथों में । चन २३० कृचिवास रामायण निरखि चारि वर छबि एकसंगा * मनहु विराजत चार अनंगा मुक्तावलि उर मंजुल सोहा * पाग ललाट अतुल मन मोहा बाबद मुद्रिका कंकन * कुण्डल कान अमित मनरञ्जन । वसन दिव्य आभरन आभरन सरीरा * भाइन सहित सोह रघुवीरा सुभ विवाह छत्रिय-कुल रीती * सजै दोल' कह भूप सप्रीती सजे चारि चंदोल सोहावन * आगे कनक-कलश अति पावन चौदिक सुवरन-मालरि परहीं * विच गजमुक्ता मलमल करही चवर, निसान सुमंगलकारी * ठौर-ठौर गंगाजल-झारी चन्दोल सजीले * दसरथ-ठाठ अकथ रोचीले ॥ अभिमत अभरन बहु परिधाना* * धारि, चढ़े रथ, कर धनुबाना ! मन हुलास, सजि चली बराता * चारन विरद कीन विख्याता । नाचहिं नर्तक बाजन रोरा * ढाक, ढोल, ढफ, नभ अति सोरा सो० बजे बयालिस साज, दोल अरोहन सुतन किय । चीना, सुरी माधुरी ॥१४३।। चारि वरन दगड़ दमामे बाज, मंगल करिया बसिलेन चारिजन * देखिया सकले भावे ए चारि मदन वान्धिल अपूर्व पाग मस्तक मण्डले * मनोहर मुक्ताहार शोभे वक्षःस्थले अगुले अंगुरी करे अंगद बलय * कर्णेते कुण्डल दिल शोभे अतिशय दिव्य वस्त्र परिधान भाइ चारिजन * अपर अंगेते दिल नाना आभरण क्षत्रिय विवाह करे चतु?ल परे * साजाइते चतुद्दौल कहे नृपवरे चतुर्दोल साजाइल अति से रुपस * उपरे तुलिया दिल सुवर्ण कलस चारि दिके दिल नाना सुवर्णेर धारा * मलमल करे गज मुकतार मारा गङ्गाजल चामर दिलेक ठॉइ ठॉइ * चतुर्दोल साजाइल हेन आर नाइ । आपनार सुसाज करेन दशरथ * परिधान परिच्छद यत मनोमत' रथोपरि चडिलेन हाते धनु.शर * शुभयात्रा करिलेन सानन्द अन्तर भाटे रायवार पड़े नाचे नट गण * बाजना बाजाय कत ना जाय गणन दामामा दगड़बाजे बियाल्लिश बाजना * चतुर्दोले आरोहण करे चारि जना १ श्रीवर के लिये एक प्रकार की सवारी, पालकी । : गगाजली । ३ मनचाहे । ४ वस्त्र ।

विजत जनक * दर्सक आदि काण्ड २३१ वाजने पारी-पारी * कछु न सुनात कोलाहल भारी कहुँ अमि'-ढाल सुभट चमका * तुरगमवार' कतक शत धावें कहुँ सूरमा लिये सर-चापा * मस्त ! वरात मोद चहुँ व्यापा नचत चन्द्र ! उत जुरी समाजा * जनक-सभा रसरंग विराजा सोइ अवसर कोसलपति प्राये * धाय सन्मानि लेवाये रेल-पेल दोउ दल अगवानी' भिरें, को कटुवानी सोम-नर्त: मन मुग्ध लोभाना * कब कस लगन ? सबन विसराना सोइ छन राम-लखन तहँ अाये * शतानन्द इमि बचन सुनाये 'साधिय लगन', न केहु दिय काना * मोहित, प्रबल विरचि-विधाना बीती लगन, होस" जनि काहू * आये पुनि जहँ विहित विवाहू कुअर चारि मण्डप तर आये * द्विज-समाज प्रति सीस नवाये चन्दन चौक राम वेठाई * वनितन कृत पैपुजी सोहाई दूर्वाधान शीश श्रीरामा * चरन परमि दधि हुलसहिं वामा ढाक ढोल बाजाइछे डम्प कोटि कोटि * चारि दिके उठिल वीणार झटपटि कन ठॉइ बाजाइछे जोडा जोड़ा मानि * कॉशि वॉशी यतबाजे नियम ना जानि ढालि पाइक जाय खॉडार चिकिमिकि * कत शत अश्वारोही कत वा धनुकी चन्द्रनृत्य करिछेन जनक सभाय * हेनकाले दशरथ गेलेन तथाय तॉरे अनुबजिया लइलेन जनक * द्वारे ठेलाठेलि करे उभय कटक प्रथमेते उभयेते हैल ठेलाठेलि * ठेलाठेलि हइते हइल गालागालि चन्द्रनृत्य देखिते भूलिल सर्वजन * ताहे मग्न कोथा लग्न के करे गणन आगे आइलेन राम पश्चात लक्ष्मण * शतानन्द बले कन्या कर समर्पण भाल मन्द केह कारो ना शुनं वचन * अतीत हइल लग्न सवे विस्मरण ल'ये गेल सवाकारे विवाहेर स्थले * चारि भाइ बैसे छाया मण्डपेर तले प्रणाम करेन सवे सकल ब्राह्मणे * वरण करिल रामे वसन चन्दने नारीगण करिलेक वरण विधान * पाये दधि दिल आर शिरे दूर्वाधान वरण करिया गेल यत सखीजन * दुइ पुरोहित करे कथोपकथन १ तलवार । २ घोडसवार । ३ पेशकारा । ४ चन्द्रमा का नाच । ५ होश-सुघवुध ।

२३२ कृत्तिवास रामायण श्रीवर वरन कीन अनुरागी * चलीं बहोरि गेह रसपागी 'शाखोच्चार घरी पुनि जानी * निज-निज उपरोहितन बखानी शतानन्द किय विनय हुलासा * रविकुल करहु वशिष्ठ प्रकासा रघुकुल-गुरु दीन्हेउ उतर, चन्द्रवंश विस्तारि । कहहु प्रथम; सुनि तपोधन, बोले सभा निहारि ॥१४४॥ चन्द्रवश-वर्णन चन्द्रवंश कर दिव्य प्रकासू * कहउँ, श्रवन मंगलमय जासू उदधि सुरासुर मंथन करनी * जासों प्रगट 'रमा' जगजननी सोइ मंथन जग जनम 'सुधाकर' * भूतल 'चन्द्र' नाम छवि-आगर 'बुध' मतिमान चन्द्रसुत जानी * तासु 'पुरुरुवा' सुवन बखानी पुनि 'पुरुकृष्ण' पुरुरुवानन्दन * 'शतावत' तिनकर जगबन्दन 'श्रार्यावर्त तनय पुनि तासू * 'सेपदि' जनम महाशय जासू 1 'चाण' बहोरि 'रेत' सुत जाही * जगत-विदित 'ध्रुव' प्रगटत ताही । । तिनके 'स्वर्ग', 'सर्व' सुत-स्वर्गा * कीन वर्गा सर्व-तनय 'हैहय' छबिरूपा * अंगज 'अर्जन' सुभट अनूपा शतानन्द बलेन वशिष्ठ महाशय * सूर्यवंश कि प्रकार देह परिचय वशिष्ठ बलेन मुनि हबे बोझाबुझि * कहो देखि तुमि चन्द्रवंशेर कुलजि ! प्रकास चराचर चन्द्रवश-कथन शतानन्द बले मुनि सभार भितर * शुन चन्द्रवंशेर विस्तार मुनिवर देवासुर मन्थन करिल सिन्धु नीर * ताहे लक्ष्मी जगन्माता हइल वाहिर सागर मन्थनेते जन्मिल शशधर * चन्द्र नाम हइल तोहार मनोहर हइल चन्द्रर पुत्र बुध मतिमान * पुरूरवा नाम हैल तोहार सन्तान पुरूकृष्ण नामे हैल तॉहार कुमार * शतावर्त नामे पुत्र विदित संसार आर्यावर्त नामे हैल तोहार तनय * सेपदि नामेते तॉर पुत्र महाशय वाण नामे पुत्र हैल जाने सर्वजन * रेतनामे तॉर पुत्र अति विचक्षण ध्र व नामे तार पुत्र विदित भूतले * स्वर्ग नामे ताँर पुत्र सर्वलोके बले पुत्र स्वर्ग राजार से सर्व नाम धर * हैहय नामेते ताँर पुत्र मनोहर . मादि काण्ड चिरजीवी तिन सुत 'निमि' धीरा * मथेउ सवन मिलि तासु सरीरा निमि-तन मथन, जनम 'मिथि' पावा * मिथिला जिन रमनीक वसावा (जनक) सीरध्वज', 'कुशध्वज'नन्दन * मिथि के प्रगट युगुल जगवंदन प्रमुदि वशिष्ठ कही, मुनि ज्ञानी ! * सुनी चन्द्रकुल धन्य कहानी सूर्यवंश-वर्णन भातुवंश बरनउँ मनरंजन * जासु आदि कुलपुरुष 'निरञ्जन' 'शिव"विधि' 'हरि सुविदिततिनरूपा ॐ सुता 'कंदिनी' एक अनूपा सो किय 'जरत्कारु' मुनि-अपेन * जरत्कारु कंदिनी समर्पन सो० तिन की सुता ललाम, 'भानु' नाम प्रगटी जगत । ऋषि जमदग्नि' सुधाम, मुनिबामा होइ, गई जहें ॥१४॥ मंगल अवतंसा # हरि स्वरूप प्रगटेड एक अंसा सोइ एक दिवस रेत-विधि पाई * जन्मेउ सुत 'मरीच' सुखदाई 'कश्यप' सुत-मरीच, जिन व्यापी * 'सूर्य' तासु अति प्रखर प्रतापी तासु गेह - हैहयेर नन्दन अर्जुन नाम धरे * निमि नामे तार पुत्र विदित अमरे निमिर कीर्तिते व्याप्त सकल संमार * निमि नामे तॉहार ये हइल कुमार सकले मिलिया तार मथिल शरीर * ताहाते जन्मिल पुत्र मिथि नामे वीर सेइ बसाइल एइ मिथिला-नगर * जनक कुशध्वज हैल तोहार कोडर वशिष्ठ वलेन शुनिलाम विवरण * आमि कथा कहि तबे ताहे देह मन सूर्यवंश-कथन आदि पुरुपेर नाम हैल निरञ्जन * ब्रह्मा विष्णु महेश्वर पुत्र तिन जन तिन पुत्र हइल तनया एक जानि * सकले ताहार नाम राखिल कन्दिनी जरत्कारु मुनि पुत्र नारद वीणापाणि * ताहाके विवाह दिल कन्दिनी भगिनी सवे गीत गाय नारद वाजाय वीणा * ताहाते जन्मिल भानु नामे तार कन्या ताहाके विवाह दिल जमदग्नि परे * एक अंशे नारायसा जन्मिल तॉर घरे ब्रह्मार काछेते तार पडिलेक वीज * ताहाते जन्मिल पुत्र नामेते मारीच मारीचेर पुत्र हैल नामेते कश्यप * तोहार तनय सूर्य प्रचण्ड प्रताप जन्म सुभ पाई २३४ कृत्तिवास रामायण सूर्यवंश 'मनु' जग-विख्याता * तामु 'सुपेन' सूनु', सूनु', सुखदाता पुनि 'प्रसेन' छिति कीरति पाये * नृप 'युवनाश्य' तनय तिन जाये 'मान्धाता' पुनि तालु बंगधर * तासु भूप 'मुचकुन्द' कीर्तिकर 'धुन्धुमार' ऑगन तिन सोहा * 'इला' जासु नन्दन मन मोहा 'शतावत' क्रम रविकुल आई * 'आर्यावर्त' 'भरत' धरा चहुँ यश पुनि छावा * भारत नाम हेतु सोइ पावा भरत-तनय 'इक्ष्वाकु' धनुर्धर * प्रोहित-पद वशिष्ठ लिय जाकर पुनि सुमंत्र सारथि जिन स्यन्दन * 'भूधर' सोइ महीप कर नन्दन ! भूधर-'खाएड', खाण्ड-सुत 'दण्डा' * पुरनारी-हारी घरबण्डा दण्ड-सुवन 'हारीत' बखाना * तिन 'हरिबीज' प्रवल जग जाना ननय तासु 'हरिचन्द' प्रतापी * सत्यसंध महिमा कौशिक सकल दान जिन अी * काया, हेत समपी - जग व्यापी काञ्चन सूर्येर हइल पुत्र मनुनाम तॉर * मनुर नामेते सर्व व्यापिल ममार मनुर हइल पुत्र सुषेण नामेते * प्रसेन तोहार पुत्र विदित जगते । प्रसेनेर पुत्र युवनाश्व नाम धरे * राजा युवनाश्व हय अयोध्या-नगरे । युवनाश्व राजार कहिब किवा कथा * तॉहार जन्मिल पुत्र नामेते मान्धाता मान्धातार पुत्र हैल मुचुकुन्द नाम * गुणवान धुन्धुमार तॉर पुत्र नाम तोहार हइल पुत्र इला नाम धरे * तॉर पुत्र शतावर्त्त अयोध्या-नगरे श्रायवर्त नामे तॉर हइल नन्दन * भरत तोहार पुत्र जाने सर्वजन भरत राजार आर कि कर आख्यान * यॉर नामे पृथिवीर भारत पुराण । तॉर पुत्र हइल इक्ष्वाकु नरपति * वशिष्ठ पुरोधा यॉर सुमन्त्र सारथि | तोहार भूधर नामे हइल नन्दन * खाण्ड नामे तॉर पुत्र अयोध्या-भपण ! हइल खाण्डेर बेटा दण्ड नाम धरे * से प्रजार कामिनी के बलात्कार करे तॉर पुत्र हइल हारीत नाम धरे * हरिवीज तॉर पुत्र विदित संसारे हरिवीज राज्य करे परम आनन्द * हइल तोहार पुत्र नाम हरिश्चन्द्र यॉर दान लइलेन गाधिर नन्दन * विकाइया आपनि ये शुधिला काञ्चन १ पुत्र । २ उद्दण्ड ।

आदि काण्ड २३५ चिरशासन पूरन अभिलासा * तासु बंसधर सुत 'रुहिदासा 'मृत्युञ्जय' पुनि आगमन, तिन 'त्रिशंकु' तपरूप । जिन जन्मे 'रुक्मांगद', सील-धर्म-यस-रूप ॥१४६॥ द्वादस वर्ष कीन उपवासा * धर्म सुवन तिन 'मस्त' प्रकासा 'अनारण्य' पुनि रविकुल-नाथा * तिन-बध कीन लक-दसमाथा .'बाहु अमारण्यक-तन जाता * तिन शिवभक्त 'सगर' विख्याता सगर-सूनु 'असमंज धर्मधर * 'अंशुमान' तिन धर्म-धुरंधर | जिनके प्रगट 'भगीरथ' सुरसरि वही अनूपा सुर, नर, असुर- सृष्टि जिन तारी * भागीरथी भुवन विस्तारी 'वितपत' प्रगट बंसधर तासू * अवधरतन 'विवरन' सुत जासू पुनि 'अमर्पि', जिन सुवन 'दिलीपा' * तिन-'रघु' प्रबल प्रचण्ड महीपा साका जिन रघुवंस चलावा * जासु नाम, रविकुल जस पावा सब विधि 'अज' पितु सम रघुनन्दन * तासु तनय ... भृपा * जिन-तप प्रस्तुत जगवंदन हरिश्चन्द्र राज्य करे पूर्ण अभिलाप * तोहार हइल पुत्र नाम रुहिदास से रुहिदासेर पुत्र नाम मृत्युञ्जय * त्रिशङ्क, तोहार पुत्र यिनि तपोमय । तॉर पुत्र रुक्माङ्गद अयोध्या-निवामी * द्वादश वत्सर काल करे एकादशी रुक्माङ्गद जन्माइल धार्मिक तनय * तॉर पुत्र हइल मरुत महाशय अनारण्य तॉर वेटा जाने सर्वजन *तोहीके मारिया गेल लकार रावण हइल तोहार पुत्र बाहु नृपवर शिवभक्त पुत्र तॉर हइल सगर असमञ्ज नामे तॉर हइल नन्दन * तॉर वेटा अशुमान धर्मपरायण अंशुमान राजा राज्य करिल कौतुके * मरिल ताहार वंश पार नाहि थाके भगीरथ तॉर वेटा अयोध्या-नगरे * गङ्गा आनि उद्धारिल देव दैत्य नरे वितपत नामे तॉर हइल नन्दन * विवर्ण तोहार पुत्र अयोध्या-भूपण ताँहार हइल बेटा अमर्षि राजन * दिलीप तोहार बेटा जाने सर्वजन दिलीपेर सुत रघु बड़ बलवान * रघुवंश बलि यार वंशेते आख्यान रघुर तनय अज पितार समान * तॉर पुत्र दशरथ देख विद्यमान नयन २३६ कृत्तिवास रामायण 'दसरथ' शौर्य-वीर्य गुणधामा * धार्मिक लखौ सुवन 'श्रीरामा' वंशावलि वशिष्ठ जस गाई * प्रोहित सहित सभा मन भाई गर' धरि बसन, दसरथहिं पेखी * विनती करई विदेह विदेह विसेखी कोशलपति तव सुत बलधारी * शरण, समर्पित तनया चारी बोले दसरथ, सुनउ विदेहा * सुवन चारि अर्पित तव-नेहा ॥ समधी उभय निरत -संभाषन * सोइ छन बटुरी सकल सखीगन विविधि भॉति लाई सकल, भूषन बसन ललाम । अस बानक सिय साजिये, मुग्ध होयँ लखि राम ॥१४७॥ श्रामलकी' मलि सिर म्नाना * पुनि तन मोह दिव्य परिधाना रुचि-रुचि प्रालिन केस मँवारी * लटन लसी वेणी मनहारी बिन्दी कुंकुम भाल सोहाई * जिमि नभ, प्रभा-बालरवि छाई मुक्ता सहित सोह नकवेसर * तन सुवास शुचि सलिल सकेसर चञ्चल सुकजल धारी * लोचन लचत मनोज निहारी झिलमिल हार कण्ठ अति शोभा * उर कञ्चुकी जरी" मन लोभा दशरथ राजा शौर्य्यवीर्य गुणधाम * तॉर ज्येष्ठ पुत्र एइ धार्मिक श्रीराम एतेक वशिष्ठ मुनि बलिल सबाके * शुनि शतानन्द मुनि हात दिल नाके गले वस्त्र दिया वले जनक राजन * तब पुत्रे कन्या दिया लइनु शरण दशरथ बालेलेन जनक राजारे * शरण लइनु दिया ए चारि कुमारे दुइ राजा उठि तवे कैल सम्भाषण * कन्या श्रान पान बले यत बन्धुगण हेन वेश भूषण पराय मखीगण * याहाते मोहित हय श्रीरामेर मन सखी देय सीतार मस्तके आमलकी * तोलाजले स्नान कराइल चन्द्रमुखी चिरुणीते केश आँचड़िया सखीगण * चूल बान्धि पराइल अङ्ग श्राभरण ! कपाले तिलक दिल निर्मल सिन्दूर * चालसूर्य सम तेज देखिते प्रचुर नाको वेसर दिला मुक्ता सहकारे * पाटेर श्राछड़ा दिल सकल शरीरे चञ्चल नयने किया कज्जलेर रेखा * कामेर कामना येन गुणे जाय देखा गलाय ताहार दिल हार झिलिमिलि * बुके पराइया दिल सोनार कॉचलि, १ गले मे पट लपेटकर-विनय सूचक । २ लीन, सन्मय । ३ सजधज । ४ आंवला । ५ जरी के काम वाली।

विराजी * तापर बजनारे * प्रचुर कञ्चन आदि काण्ड २३७ करनफूल कनकावलि न्यारी * भुज भुजवन्द छटा अति प्यारी दोउ कर चूरी शंख कंकन साजी पग-अँगुरिन नू पुर वसन-भूषन छवि धारे कनकचौक छवि जुडवति छाती * चहुँ दिक् दीप्ति जोति-अवहाती' दुहितन सविधि सहचरिन साजी * मण्डप-तर पुनि लाइ विराजी पुष्पाञ्जलि दै सिय-कर जोरी * राम जोरी * राम सहित सत भॉवरि फेरी अवसर, ओट भई जब सखियाँ * मिली राम-सिय सकुचति अखियाँ सलिल-धार दै, राम लेवाई * चलीं, कछुक पुनि सिय ले जाई राखिन जहँ पटनई अंधेरी * आली करें राम-तन हेरी 'पष्टी कर पूजन मन लाई * करहु कुर इत मंगलदायी बहुँ अँधेर, सिय-पग चहेउ, देन सखिन हरि-हाथ । सिया-सकुच, चुरियन खनक, सजग भये रघुनाथ ॥१४॥ सिय-कर मञ्ज राम गहि लीन्हा * सुमुखिन निरखि ठठोली कीन्हा लक - उपर हातेते दिल ताड स्वर्णमय * सुवर्णेर कर्णफुले शोमे कर्णद्रय दुइ वाहु शङ्ख ते शोभित विलक्षण * शङ्खर उपरे साजे सोनार कङ्कण वमन पराये तारे सुन्दर प्रचुर * दुइ पाये दिल तार बाजन नूपुर सुवर्ण श्रासने सिलेन रूपवती * चारिदिके ज्वालि दिल सोहागेर वाति । चारि भगिनीते वेश करि विलक्षण * तखन मण्डपे गिया दिल दरशन पुष्पाञ्जलि दिया तवे नमस्कार करे * प्रदक्षिण सातवार करिल रामेरे अन्तःपट घुचाइल यत बन्धुगण * सीता रामे परस्पर हैल दरशन जलधारा दिया तार कन्या दिल परे * शोयाइल जानकीरे अन्धकार घरे वरेरे आनिते आज्ञा करे सखीगण * आसिया करुन राम षष्ठीर पूजन हाते घरि पानाइल रामेरे तखन * सीतार हात धरि तोल बले सखीगण तखन भावेन मने सीता ठाकुरानी * पाये हात देन पाछे राम गुणमणि करिलेन सीता वाम हस्ते शङ्खध्वनि * हाते धरि सीतारे तोलेन रघुमणि १ सौभाग्यवती । २ नीची पटी हुई अधेरी कोठरी । ३ पष्ठी माता- कुलदेवी दुर्गा । - सविधि सुभग २३८ कृत्तिवास रामायण कोउ कह सियहिं लीन धरि हाथा * कोउ कह पग परसे रघुनाथा पष्ठी-पूजन, सिय-पग-परसन * सो मसखरी' विफल भइ बनितन वर-कन्या आगमन वहोरी * रोहिनि-चन्द्र गगन जिमि जोरी संपन्न विवाहा * कन्यादान दीन नरनाहा यौतुक अमित दास अरु दामी * विविध सुपास दीन सुखरासी दम्पति लिये, देत जलधारा * चलि रनिवास जनक पग धारा रानी रुचि-रुचि पाक बनावा * दोउन परसि जेवनार करावा सखियन सेज सुहाग सजाई * सिया सहित शोभित रघुराई भरत निवास माण्डवी संगा * लखन-उर्मिला रत श्रुतिकीरति-रिपुसूदन रमना * निज-निज वास प्रमोद निमग्ना । हास-हुलास सुमिथिला-धामा * बनिता करें चुहल तकि रामा । हॅसि-हॅसि करै रञ्जना' एही * तुम न राम, सरवरि" बैदेही रूपसि अतुल सिया, तुम कारे * विहँसि, राम बोलत ढिठियारे सहवास सुन्दरी पाई * धन्य हो छबि सों छबि पाई रसरंगा ॥ अन स्त्री लोकेरा परिहास करे छल पेये * केह बले हाते धरे केह बले पाये पूर्बापर वर कन्या आइले दुजने * रोहिणीर सह चन्द्र येमन गगने । कन्यादान करे राजा विविध प्रकारे * पञ्च हरीतकी दिया परिहास करे । बहु दास दासी राजा दिल कन्या वरे * जलधारा दिया कन्या, वर लेल घरे राजराणी गिया परे करिल रन्धन * वरकन्या दुइ जने करिल भोजन साजाय वासर घर यत सखीगण * राम सीता ताहाते वञ्चेन दुइनन । उर्मिला सहित सुखे वञ्चेन लक्ष्मण * माण्डवीर सहित भरत विचक्षण श्रुतकीर्ति सहित आछेन शत्रुघ्न * एइरूपे बासरेते वञ्चे चारिजन । सानन्द हइल सब मिथिला भुवन * रामके देखिते जाय यत नारीगण परिहास करे सवे रामेर सहित * तुमि ये जानकी पति ए नहे उचित एइ कथा राम हे तोमाके बलि भाल * सीता बड़ सुन्दरी तुमि हे बड़ काल हासिया चलेन राम सवार गोचर * सुन्दरीर सहवासे हइव सुन्दर १ मजाक । २ दहेज । ३ छेडखानी,मनोरजन । ४ वाते नाना । ५ समान । ६ ढीठ वचन ।

आदि काण्ड २३६ अति खिसियई', मकल हतज्ञाना * मुग्ध, राम-पद तजि मन-प्राना लखनलाल ढिग गई पुनि, ठगी चितइ तिन ओर । अनुज न कहुँ घट बन्धु सों, अनुपम रूप किशोर ॥१४६॥ कोशल-कुअर चारि छविखानी * लोचन करहिं सनाथ मयानी निज अनुरूप कामिनिन पाई * रंग रसाल रसाल रमत सब भाई परशुराम का दर्प-चूर्ण भोर उदित रविकिरन-समाजा * सभा सपरिजन जनक-घर अनॅद वधाई * किय वशिष्ठ याचना-विदाई कातर जनक, अतुल पितुमोहा * कहत, तुल पितुमोहा * कहत, दुसह तत्काल विछोहा । वर्ष एक आयसु पहुनाई * रहैं जनकपुर मिय-नाई विहॅमि प्रबोधि कहेउ अजनन्दन * प्रान छाडि तन तुमहि समर्पन करिय स्वीकारू * मम गृह सकल लहैं जेवनारू दशरथ पुलकि अनुमती दीनी * उतै विदेह व्यवस्था कीनी भूप विराजा चजत तौ अरदास परिहास करिबे कि हाराइल ज्ञान * श्रीरामेर चरणे मजाय मन प्राण येखाने बसिया श्राछे अनुज लक्ष्मण * सेखाने चलिया जाय यत सखीगण अग्रज येमन तॉर अनुज लक्ष्मण * भूलिल रामेरे तारा हेरिया लक्ष्मण एइ रूपे चारि स्थाने करि दरशन * मानिल कामिनीगण मफल नयन चारि भाइ तुल्य चारि लइया सुन्दरी * नाना सुखे कौतुके वञ्चेन विभावरी । रामेर दर्प-चूर्ण प्रभात हइल रात्रि उदित तपन * सभा करि पमिलेन यत अन्धुगण बाजिल अानन्द वाद्य जनक भवने * विदाय मागेन गिया बशिष्ठ ब्राह्मण जनक चलेन अति हइया कातर * राम सीता राखि यात्रो एकटि वत्मर हासिया चलेन तवे अजेर नन्दन * शरीर लड्या याव राखिया जीवन वलेन जनक राजा शुनहे वचन * सकले आमार घरे करिवे भोजन भाल भाल बलिया दिलेन अनुमति * आयोजन करिलेन जनक भूपति १ लज्जावश सकोच । २ वियोग । ३ निवेदन - १ पंगत-क्रम., २४० कृत्तिवास रामायण रानी कुशल रसोई-रंधन * एक द्रव्य सौं शत-शत व्यञ्जन करि स्नान जनात-बराती * परिजन-पुरजन, जाति-विजाती पारुस रुचिकारी # भोजन लहि सुतृप्त नर-नारी । रामलला जेवनार विराजे * षटरस, दूध, दही सब साजे । भोजन तदुपरि कीन श्राचमन * सादर पान सुगंधित अर्पन विगत-निसावत' पुनि श्रीरामा * मिथिलाधाम कीन विश्रामा भोर होत नृप लीन विदाई * सजा अवध-दल, प्रायसु पाई दान अपरिमित दुखिन दे, दीन अयाचक कीन । चारि दोल' चढ़ि, चले सब, कुर-वधू आसीन ॥१५०॥ माथे मौर, दिव्य परिधाना * तेज सरूप, सोह धनुबाना भाइन 'सहित बदल श्यामा * चंदोलन अरूढ़ श्रीरामा मुदित, अवध तन, नृप पग दीना * स्यंदन दिव्य वशिष्ठ असीना सोइ छन चहुँ अपसकुन निहारी * द्विजवर ! कस विपरीत बयारी कस होनी ? कस विपति-विरोधा ? * सुनि वशिष्ठ भूपतिहिं प्रबोधा हे कोशलपति ! तव सुत चारी * राजत कुशल समुख सुखकारी - राजा राणी घरे गिया करेन रन्धन * एक अन्न सह पार पञ्चाश व्यञ्जन स्नान करि आसिया सकल प्रजागण * आनन्दित हैया सवे करेन भोजन भोजन करेन राम परम हरिपे * दधि दुग्ध दिल राजा भोजन विशेपे सुतृप्त हइया सवे करे आचमन * कपूर ताम्बुले करे मुखेर शोधन से रात्रि थाकेन राम तथा पूर्ववत् * प्रात:काले विदाय मागेन दशरथ राम सीता चतुर्दोले करि आरोहण * दीन दु.खीरे धन करेन वितरण दिव्य वस्त्र परिधान माथाय टोपर * दुदिलश्याम राम हाते धनुःशर परे तिन भ्राता चापिलेन चतुर्दोले * परम आनन्द राजा अयोध्याय चले देवरथे चडिलेन वशिष्ठ ब्राह्मण * किन्तु चतुर्दिके राजा देखे अलक्षण राजा बलिलेन शुन वशिष्ठ ब्राह्मण * चारिदिके देखि केन एत अलक्षण कि जानि केमने हबे विपद घटन * वशिष्ठ बलेन शुन अजेर नन्दन १ ज्योनार मे बैठने की व्यवस्था । २ पिछली रात के समान ही । ३ वर-वधू योग्य सवारी, पालकी, (डोला शायद इसी का अपभ्रश है ) । ४ उलटी हवा । ५ साक्षात् ।

बाजन-रव कवन रस घोली आदि काण्ड २४१ का सक तव अपसकुन विचारे ? * सुनत, बजे पुनि कटक नगारे वाजत तुमुल घोप नभ छावा * परशुराम-हिय कंपन प्रावा मिथिलापुर एही * वरन कीन कोउ नप वैदेही भूप ? सोचत भृगुराई * जनक व्यस्त इत वागविदाई वर-कन्या-विछोह, गर भरहीं * लख-लख चुच भूप मुख करहीं कहत, सिया भरि अंक, भुबाला * लली! कीन अब लौ प्रतिपाला कवी-कवौं पितुपुरी विसूरी * सास-ससुर सेइय पदधूरी कोउ प्रति इर्ष्या, राग न द्वष * सुख-दुख सम अदृष्ट' सतोष सतत स्वामिफ्द सेइय सीता * करुन, सीख पितु दीन सप्रीता तब लौं आइ सखी, सहबोली * परिचारिका करुन सो० चली सवन तजि सीय, दरस चन्द्रमुख होय कब ? सकल-दसा दयनीय, सिसकि सिसकि रोदन करहि ॥१५॥ जनक, विदा सिय-रघुवर कीना * शत सहस्र दीना सोइ अवसर कर कठिन कुठारा * जामदग्न्य, रहु ! रहु ! लेलकारा चारि दिके चारि पुत्र देख विद्यमान * के करिते पारे तव अशुभ विधान वाजनार महाशब्द उठिल अाकाश * परशुरामेर चित्ते लागिल तरास मिथिलाते शुनि केन वाघरे बाजना * सीता के विवाह बुझि करे कोन जना मने मने युक्ति करे सेथा मुनिवर # हेथा राजा विदाय करेन कन्यावर लक्ष लक्ष चुम्ब दिया बदन कमले * जनक करिया कोले जानकीरे वले करिलाम बहुःदुखे तोमारे पालन * बारेक मिथिला बलि करिश्रो स्मरण श्वशुर श्वाशुड़ि प्रति राखह सुमति * राग द्वेष असूया ना कर कार प्रति सुख दुखना भाविप्रो याछे कपाले * स्वामीसेवा सीताना छाडियोकोनकाले झियारी बहुरी सब आसिया तखन * गलाय धरिया सव जुडिल क्रन्दन आमासवाछाड़िया किचलिलाजानकी * ार कि हइवे देखा सीता चन्द्रमुखी राम सीता विदाय करिलेन जनक * द्विजेर दिलेन धन सहस्र संख्यक हेन काले जामदग्न्य हातेते कुठार * रह रह बलिया डाकिछे बार बार १ वारात विदा होने पर, ग्राम की सीमा तक सम्बन्धी को विदा करने जाने की सम्म । धन विप्रन २ याद करना। ३ भाग्य पर । ४परशुराम ।

भयानक गात .. द्विजराई । २४२ कृत्तिवास रामायण खड्ग, चर्स तन, मर-कोदण्डा # महा वेष प्रचण्डा । भीमवेग धावत करि गर्जन * प्रस्तुत रुद्ररूप भृगुनन्दन विकंपित कोसलराई * राम-लखन मुनि चरनन लाई सविनय मौन; निरखि सोइ काला * परशुराम कह, सुनिय भुआला ! जनक-गेह शिवधनु केहि भंगा ? * को तुम ? बरनउ सकल प्रसंगा मम सुत राम, नाथ ! तव दासा * मोइ-कर छुवत प्रतञ्च विनासा अग्निपुन्ज कोपे भृगुरामा * मम समता' राखेसि सुत-नामा । परशुराम भूतल मोहिं जानी * आन' राम कस नाम बखानी 1 सो सुनि, रवुपति विनय सुनाई * छमह दोस तपमी रक्तनयन कह, सुनु अज्ञानी ! * निपट विप्र-तपसी अनुमानी बोला मन्द, अबुझ मम करनी * क्षत्रिय-हीन कीन यत" धरनी मम कुठार कृत इकइस वारा * वही मही चहुँ शोनित-धारा कश्यप सौपि धरा नित दीनी * 'तापस द्विज' कहि, ताकर हीनी मम गुरु-चाप, मूढ़ जोइ भंगा * मस्तक रहित करौं सोइ अगा खड्ग चर्म धनुःशर शरीरे ग्रथित * भीमवेगे भार्गव हइल उपस्थित महा-भयानक वेश देखिया मुनिर * दशरथ भूपतिर कम्पित शरीर | एक हाते रामे धरि अपरे लक्ष्मणे * मुनिर चरणे राजा दिल सेइ क्षणे । मुनि वले दशरथ बलि हे तोमारे * धनुक भागिल केवा जनकेर घरे दशरथ कहेन आमार पुत्र राम * गुण दिते धनुके हइल दुइखान महाकोपे ज्वलिया बलेन भृगुराम * मम सम करि राखियाछ पुत्र नाम आमि त परशुराम विदित भूतले * हेन जन आछे के ये राम नाम बले ए कथा शुनिया राजा वलेन वचन * दोष क्षमा कर प्रभु तपस्वी ब्राह्मण 1 चलेन परशुराम आरक्त नयन * तुच्छ ज्ञान कर देखि तपस्वी ब्राह्मण नि.क्षत्रिय भूमि करि तिन सप्तवार * रक्ते नदी बहाइल आमार कुठार समस्त पृथिवी करि कश्यपेर दान * तपस्वी ब्राह्मण बलि कर अपमान आमार गुरुर धनु भागिलेक येइ * ताहाके बधिया आजि प्रतिफल देइ १ मृगचर्म । २ पैरो पर झुकाकर । ३ समान । ४ अन्य व्यक्ति को । ५ जितनी भी, समस्त ।

- . आदि काण्ड २४३ सो० कहेउ भूप, भय मानि, महावीर विक्रम विपुल ! छमहु सुवालक जानि, तबहि लखन बोले वचन ॥१५२।। वीरन विरद-बखान न हेत * मो गावत निज मुख भृगुकेत क्षत्रि-विनास सराहेउ जो बल * सोइ जुग राम-लखन विन भृतल सुनि कटु गिरा-लखन विषसानी * भृगुपति कोपि कहेउ इमि बानी जीरन' चाप भजि नहि पारा * मम धनु-गुन' चढये निस्तारा अस कहि धनुप दीन रघुराई * सिय मन उपज सोच अधिकाई राम सुयोग' एक धनु तोरा * पितु-प्रन राखि वरन किय मोरा पुनि भृगु आनि धरेउ धनु शूला * सौतिन सरिस किधौ प्रतिकूला दीन सदर्प चाप भृगुरामा * तासु भार निनस श्रीरामा सो हँसि वाम-पानि रघुवीरा * सहज लीन, अति पुलक सरीरा कौतुक लखहु लखन ! धनुधारी * यहि धनुही गरिमा मुनि भारी हे मुनिवीर ! धनुष किय अर्पन * तो सर कीजिय नाथ समर्पन क्षम महावीर भूपति बलेन भये कम्पित शरीर * वालकेर अपराध रुपिया कहेन तवे सुमित्रा-कुमार * कथाय कि फल कर वीरेर आचार क्षत्रिय विनाश तुमि करेछ यखन * तखन ना जन्मेछिल श्रीराम लक्ष्मण एतेक बलिल यदि सुमित्रानन्दन * कुपित परशुराम कहेन वचन जीर्ण धनु भाङ्गिया ये देखाइल गुण * आमार धनुके राम देह देखि गुण एतेक कहिया धनु दिलेन तखन * जानकी भावेन नम्र करिया बदन एक बार धनुक भाङ्गिया अकस्मात् * करिलेन विवाह प्रामारे रघुनाथ आर बार धनुक अनिल भृगुमुनि * ना जानि हवे मोर कतेक सतिनी धनुखान भृगुराम दिल बड दापे * मरे त मरुक राम धनुकेर चा धनुक देखिया अति प्रसन्न अन्तरे * हासिया घरेन राम धनु वाम क श्रीराम बलेन हे लक्ष्मण धनुर्धर * ए धनुकेर गरिमा करेन मुनि श्रीराम बलेन शुन ओहे वीरवर * धनु यदि दिले तवे देह एक । जीर्ण, पुराना । २ धनुष की डोरी । ३ सयोग से । ४ वायां हाथ ।

- सुख लेही २४६ कृत्तिवास रामायण राम सरिस, सिय सब गुनखानी * धन्य पिता, धनि जननि बखानी आगे चलि सरयू करि पारा * नगर अयोध्या नृप पग घारा शोभा अकथ, अवध-छवि न्यारी * प्रमुदित बाल, वृद्ध, नर, नारी उदधि-अनन्द हिलोरें लेही * आगम-राम सकल सुता-कुलवधुन, निज-निज निज-निज द्वारे * घृत प्रदीप दीपहिं सॅझियारे । कनककलस, बंदन बंदन अमरारी' * नरियल रंभा सगुन सुपारी ग्राम प्रदच्छिन करि अजनन्दन * नगर समीप बजाये बाजन कौशल्यादिक तीनिउ रानी * परछन बधुन चलीं सुखसानी चली पुरवधू तिन संग धाई * घर-घर पुरी, बजत सहनाई जय-जय ! सुमन बृष्टि सुरवृन्दा * नाचें, उर उल्लास अनन्दा बहुअन बगल सोवरन कलसी * दै सुभ सबन, आत्मा हुलसी हरा-भरा तिन तिन सीस सीस धराई * केला खील तहॉ छिटकाई कुल अनुरूप सुमंगल रीती * सविधि सबै पुरवइँ अति प्रीती सुभ साइति, रानिन मुंह देखा * चन्द्रमुखिन लखि जूड़ विशेखा अभरन, वसन, रत्नमय भूषन * नाना यौतुक दीन सर्वजन इहार जननी धन्य धन्य एर पिता * येमनि गुणेर राम तेमनि ए सीता । तथा हैते चलिलेन परम हरिपे * उत्तरिला गिया सवे आपनार देशे अयोध्यार ये शोभा ता वर्णिते नापारि * अानन्द-सागरे मग्न बाल वृद्ध नारी कुलवधू पार यत प्रजार कुमारी * घृतेर प्रदीप ज्वाले द्वारे सारि सारि सुवर्णेर पूर्ण कुम्भे दिल आम्रसार * गुवाक कदली नारिकेल राखे आर ग्राम प्रदक्षिण करे अजर नन्दन * ग्रामेर निकटे गिया बाजाय बाजन कौशल्या कैकेयी आर सुमित्रा रमणी * चारिबधू आनिते चलिल तिन राणी सङ्गते चलिल रङ्ग पुरवासी नारी * सानन्द सकल पुरी बाजे तुरी मेरी । देवगण वरिषण करे पुष्पराशि * जय दिया नाचेसवे आनन्द उल्लासि । चारि वधू कक्षे दिल सुवर्ण कलसी * व्यवहार मत कर्म करे पुरवासी कक्षे दिल कलसी मस्तके दिल डाला * छड़ाइया फेले सेइ खाने खइ कला शुभक्षणे राणीरा देखिल वधूमुख * निरखिया चन्द्रमुख जुडाइल बुक १ आम के पत्तो की वन्दनवार । २ केला । . -- -- आदि काण्ड २४७ यौतुक रघुपति लहेउ जो, अतुलित विविध प्रकार । तामों परिपूरन भयेउ, भयेउ, अमित राम-भण्डार । लहेउ सिया यौतुक यतक, निरखि रमा सकुचाय । चारि कुऔर उत परसि पग, जननिन बन्देउ जाय । रानिन दोन असीस बहु, धन, सुत, आयु बखानि । सुतन लिये दशरथ अवध, मगन पाय सुखखानि ।। सुख संपति सासन सकल, सुरपुर-स्वर्ग समान । मलिल सरिम कृतिवाम इमि, ललित कीन हरिगान । आदिकाण्ड गाथा पावन इतै विराम । रचौ अयोध्याकाण्ड पुनि, बन्दि सियावर राम ॥१५॥ नाना विधि यौतुक दिलेन सर्वजन * मणिमय आभग्ण वमन भूपण यौतुकेते पान राम यत अलङ्कार * ताहाते हइल पूर्ण तोहार भाण्डार पाडलेन मीतादेवी यतेक यौतुक * निजे लक्ष्मी तिनि तॉर ए नहे कौतुक श्रीराम लक्ष्मण आर भरत शत्रध्न * बन्दिलेन गिया सवे मायेर चरण चारि पुत्रे आशीर्वाद करे राणीगण * चिरजीवि हो पात्रो बहु पुत्र धन चारि पुत्र ल'ये राजा सुखी बहुतर * सुखे राज्य करे येन स्वर्गे पुरन्दर कृत्तिवास रचे गीत अमृत-समान * एत दूरे आदिकाण्ड हैल समापन परम, a आदिकाण्ड समाप्त 8 आर्डर भेजियेः- कृत्तिवास रामायण (द्वितीय खण्ड) (अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा तथा सुन्दर काण्ड) मूल्य १०) श्री प्रभाकर साहित्यालोक २३, श्रीरामरोड, लखनऊ - अत्यन्त उपयोगी साहित्य बंकिम-साहित्य-आनन्दमठ २) विषवृक्ष २) चन्द्रशेखर २) कपालकुण्डला २) कृष्णकात का वसीयतनामा २) देवी चौधरानी २) बगशार्दूल सीताराम २) गधारानी ॥ दुर्गेशनन्दिनी २) मृणालिनी २) इन्दिरा २) राजसिंह २।।) रजनी २) युगलागुरीय । लोफरहस्य २) कमलाकान्त का पोथा २) राजमोहन की स्त्री २) रमणी-रत्नावली-गढमण्डल की रानी ।।2) गार्गी ।।5) राज्यश्री ।।) बाल-साहित्य-चण्टचौकडी 1) महाराज कपालफोड 1) मायावी सपेरा ।। डायन राजरानी । टामकाका की कुटिया १३) भारतीय कृषि-विज्ञान-( ४ खण्डों में सम्पूर्ण ) मू० ७॥ वैज्ञानिक पशुपालन व चिकित्सा ( सचित्र ) ३) हमारा भोजन-उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत १।।) कुटीर उद्योग-मिट्टी का शिल्प १|| कागज के हुनर १|| लोहारी शिक्षक १) घोस वेत पत्तो का काम १) संगीत-शास्त्र- --सा-रे-ग-म २॥ कत्थक नटवरी नृत्य ३॥ रामायण कृत्तिवास (श्रादि काण्ड) मूल्य ६) (अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा तथा सुन्दर काण्ड) मूल्य १०) - कुरान शरीफ हिंदी तर्जुमा 5) कुरान का पारा अम्म-मूल अरबी, हिन्दी लिपि मे 12) जीवनचरित्र-हजरत अबूवकर 15 हजरत उमर 1) हजरत उस्मान । हजरत अली कुरान पर एक दृस्टि 1) प्राप्तिस्थान- श्री प्रभाकर साहित्यालोक, २३, श्रीरामरोड, लखनऊ .

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Kratiwas Ramayan

Author
Awsti,pandit Nand Kumar
Title
Kratiwas Ramayan
File name
Kratiwas Ramayan
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2010/10
Publisher
Locknow,shri Prabhakar Sahitya Lok Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
248
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
DLI number
327042
Barcode
99999990002245.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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MKNw3Pzi1sL
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