Sanmati Library
Jasaharacariu Of Puspadanta
Front matter
THE
Ambādās Ohaware
Digambara Jain Granthamālā
OR
KARANJA JAIN SERIES
EDITED
With the Co-operation of Various Scholars
BY
HIRALAL JAIN, M. A, IL D
King Edwaid College, Amiaoti
Volume I
PUBLISHED BY
Karanja Jain Pablication Society
Karanja, Berar, India
JASAHARACARIU
OF
PUSPADANTA
an Apabhramsa work of the 10th Century
CRITICALLY EDITED
With an Introduction, Glossary and Notes
BY
Parašurāma Laksmana Vaidya
M. A. (Cal ), D LITT (Paris)
Professor of Sanskrit and allied languages
Fergusson College, Poona
1931
A copy of this volume, postage paid, may be obtained directly
by sending a Postal Order of Rupees Sıx and annas Eight or
Ten Shillings and six pence from the Secretary, Karanja Jain
Publication Society, Kazanja, Berar, India.
We have great pleasure in announcing that the following
Apubhramsa works are under preparation and we hope to issue
them soon in the forthcoming Volumes of this Series Orders for
Copes may be register ed now wrth the Secrelary
N
Kıtrakanducartu of Kanahūnar a
%. Sudamsanaca? Zu of Nayanandı
3 Mahāpurāna of Puspadanta.
4 Apabhramsa-kathū-samgraha.
&
Printed from type at the
Shri Ganesh Printing Works, 495-498, Shanwar Peth, Poona
and Published by
Seth Gopal Ambadas Chaware, Karanja, Berar.
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7
4h--
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प
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श्री १०८ भट्टारक वीरसेनजी स्वामी,
सेनगण, कारंजा (वरार)
समर्पण-पत्रिका प्रात स्मरणीय, अध्यात्मविद्याविशारद, सद्गुरु, श्री १०८ भट्टारक श्री वीरसेनजी स्वामी- आपकी श्रेष्ठ अध्यात्मविद्यापर मुग्ध होकर तथा आपके उपदेशा- मृत का आकंठ पान करके में जिस प्रकार आपका अतिशय प्रणा व धन्य हुआ है उसी प्रकार अनेक विद्वान् पंडित व मुमुक्षु लोकों के अंतःकरण में भी आपने चिरस्थायी स्थान प्राप्त किया है। हमारे अहो- भाग्य से हमें आप जैसी अद्वितीय विभूति प्राप्त हुई है। अपने धर्मोपदेश से आपने जो मेरी आत्मा का कल्याण किया है उसके लिये में आपका चिर ऋणी हो चुका हूं। उसी अनन्त ऋणराशि के बरपांग परिशोधनार्थ आपके ही सदुपदेश के फल-स्वरूप मेरे पूज्य पिताजी की स्मृति में स्थापित ग्रंथमाला का यह प्रथम पुष्प 'यशोधर चरित' आपके अर्पण करता हूं। आपका विनम्र शिष्य गोपाल अम्बादास चवरे
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प्राथमिक वक्तव्य जैन धर्म भारतवर्षके सबसे प्राचीन धर्मोमें से है । इस धर्म ने देशकी सभ्यता व आचार, कलाकागल्य और विज्ञान पर चिरस्थायी छाप लगा दी है। इस वर्म का प्राचीन साहित्य बहुत विस्तीर्ण तथा सत्रीगपरिपुष्ट है । किन्तु खेद है कि यह साहित्य अभीतक पूर्णरूप से प्रकाशित नहीं हुआ। बम्बई की माणिकचन्द्र दिगम्बर जैन प्रथमाला इस ओर प्रशसनीय कार्य कर रही है, किन्तु सम्पूर्ण प्राचीन साहित्य को शीघ्र प्रकाश में लाने के लिये एक नही अनेक प्रथमालाओं की आवश्यक्ता है। हमें यह प्रकट करते हुए अत्यन्त हर्ष होता है कि कारजा के उदार तया धर्मिष्ठ श्रीमान् सेट गोपाल साहुजी चवरे ने अपने पूज्य पिता अम्बादास साहुजी चवरे की पुण्यस्मृति में उनके नाम से एक 'जैन धनिति फड' खोला है, जिसमें उन्होंने वीस हजार रुप्या प्रदान किया है । धर्म की उन्नति के लिये प्राचीन जैन ग्रयोंका सुचारु रूप से प्रकाशन व प्रसार आवश्यक जान सेठजीने इस द्रव्य के व्याज से 'अम्बादास चवरे दिगम्बर जैन ग्रंथमाला' प्रकाशित करने का निश्चय किया है व इस हेतु एक समिति भी बना दी है । इस ग्रंथमाला में मूल प्राचीन संस्कृत व प्राकृत अथ उच्च कोटि के विद्वानों द्वारा वैज्ञानिक शैली से सम्पादित कराकर प्रकाशित किये जायगे जिससे उन ग्रंथो का देश व विदेश में आदर हो सके, वे विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षाओं में पाठ्य पुस्तकें नियुक्त की जा सकें तथा उनके द्वारा विद्वान लोग पुरातत्त्व की खोज कर सके । कारजा तथा अन्यस्थानों के शालभंडारों में जो बहुसख्यक ग्रंथरत्न छिपे हुए है उनकी जगमगाती हुई ज्योति को इस ग्रंथमाला द्वारा संसार के सन्मुख प्रस्तुत करनेका उक्त समिति प्रयत्न करेगी। इस ग्रंथमाला का प्रथम पुष्प 'यशोधर चरित' प्रस्तुत है । इसके कर्ता विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दि के महाकवि पुष्पदन्ताचार्य है। प्रथ की कथा वही यशोधर महाराज का पवित्र चरित्र है जिसका वर्णन सोमदेवादि अनेक आचार्यों ने सस्कृत में किया है। भाषा की दृष्टि से यह ग्रंथ बडा महत्वपूर्ण है । उसकी भापा वह अपभ्रश प्राकृत है जो आज की प्रचलित हिन्दी, गुजराथी, मराठी आदि भाषाओं की जननी है तथा जिसके प्रथों के लिये विद्वत्समाज लालायित हो रहा है। इस प्रथ का सम्पादन फर्ग्युसन विद्यामदिर के संस्कृत व अर्धमागधी आदि प्राकृत भाषाओं के अध्यापक तथा अनेक प्राकृत संस्कृत जैन ग्रंथो के सम्पादक डॉ. परशुराम लक्ष्मण वैध, एम्. ए. डी. लिट. द्वारा हुआ है । आपने अनेक हस्तलिखित प्रतियों परसे संशोधन करके प्रथ को प्रचुर पांडित्यपूर्ण तथा विद्वानों द्वारा सग्राह्य बनाया है। .
जसहरचरित जिनकी अनुमतिसे गोपाल साहुजीने उक्त उदार कार्य किया है तथा जिनके सदुपदेशके फल- स्वरूप आज कारंजा में श्री महावीर ब्रह्मचर्याश्रम, चवरे दि जैन बोर्डिंग, जे. डी. चवरे, ए व्ही. स्कूल, तथा जे. जी चवरे, हायस्कूल नामक धार्मिक तथा सामाजिक सस्थायें दृष्टि पडती हैं उन्ही अध्यात्मप्रेमी श्री १०८ वीरसेन स्वामी भट्टारकको यह प्रथ समर्पित किया गया है। उक्त कार्योंके लिये जैन समाज स्वामीजीका चिर ऋणी रहेगा। हमे यह प्रकट करते हुए असह्य दुःख होता है कि गोपाल साहुजीके बन्धु, बरार दि. जैन समाजके आधार ओर आभूषण तथा हमारी समितिके एक मान्य सदस्य व इस ग्रंथमालाको जन्म देने में भारी प्रयत्न करनेवाले श्रीयुक्त जयकुमार देवीदासजी चवरे वझीलका प्रथमालाका यह प्रथम पुष्प प्रस्फुटित होनेके पूर्वही हमसे वियोग हो गया। आपके वियोगसे हमारी समिति तथा जैन समाजको जो क्षति पहुंची है उसकी पूर्ति होना कठिन है ! विद्वत्समाज से प्रार्थना है कि आगे संस्कृत, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाके चुने हुए ग्रंथोंको सर्वांगसुदर और पूर्ण बनाकर प्रकाशित करने में हमे सहयोग प्रदान करें। हीरालाल जैन
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स्वर्गवासी श्रीमान् अंबादास गंगासावजी चवरे
कारंजा (अकोला)
श्रीमान् गोपाल अंबादासजी चवरे
कारंजा (अकोला)
.
स्वर्गवास
२३-८-१८५६
२४-९-१९२३
२४-२-१८८९
A NOTE BY THE GENERAL EDITOR JAINISH ja onc of the most ancient religions of India It has played a great part in the cultural derclopment of the Indian people "Animsā paramo dharmah" or' Non- iolence duts par excellence' is the sine-qua-non of this faith which has alunga stood for unitorral peace and brotherhood It bas sought to accommodate the dificrent sew.points in the domain of thought as well as of action by its pbilosopby of Ancinta It has attempted to afford equal oppostunities of material and spiritual advancement to all irrespective of tho incident of birth and it has tried to avoid clashes of worldly intercets by placing spiritual well-being above material gain It may appear from this that a faith so pre-eminently spiritual would be un- Fuited for the dei clopment of art and science But the contributions of Jainiem to these departments are also bs no menns small Building temples and setting up images for norrlup forms an important atein of the faith amongst the Jain laity and this brought about the introduction of fome special features in the architecture and sculpturo both in Northern and Southern India where their numerous temples and statues still excite thr derotion and admiration of the worshippers and the scholars alike Boola hayo also been produced on there as well as on the other fine arts such as paint. ing and music With still greater attention and success have the Jains cultivated the highest of the fine arts-poetry, which is fully represented in their literature in all alf branchen Hund in hand with poetry they have produced numerous important works on kuch technical subjects os grammar, lexicography, poetics, law and polity as well as on sciences such as astronomy, mathematics and medicine, and treatises are not wanting in their literature even on subjects like war-carriages, bows and arrows elephants and horfes, erotics, astrology and magic Thus important as the Jain literature is for the study of Indian philosophy and religion, ort and science, it is of a still greater importance for the study of the development of Indian longuages It may even be said that the importance of Jein literature is, in this respect, unique, The sacred languuge of the Brahmins was Sanskrit and they did not, at first, take any important part in the development of the languages of the people-the Prakrits Lord Buddha gave his preachings in the language of the people but the Buddhist literature confined itself to one language only-Pali, and at & later date it adopted Sanskrit But Lord Mabāyjra gave a permanent impetus to the development of the popular languages and his followers adopted these both for preaching and writing in their religious propagande They gave literary shape to many languages even for the first time and took a prominent part in the early development of A NOTE even the Dravidian vernaculars of South India The ancient Prakrits, Magadbi, Ardha- Māgadhl, Sauraseni and Māhārastri are extensively preserved in the Jain books whose study is very essential for their adequate knowledge Of a very special interest are the Jain works written in what is called the Western Apabhramsa This language is the immediate forrunner of at least three important vernaculars, Hindi, Gujarati and Marathi All the works in this language that have so far come to light are the productions of the Jains Till very recently, not a single complete work of this language was brollable in print, on account of which the study of history and philology of the modern vernaculars could not make any appreciable progress It was only in the year 1918 that the first complete and systematically edited work of this language appeared Tois was the Join work Bha- Visayatta-kahā of Dhanapale edited by Professor Hermann Jacobi of the University of Bonn This same work was again published in the Gaekwad Oriental Series in 1923 This was all and nothing definite or much was know, about the other works of this language till I had the occasion in 1924 of examining the Jain manuscript stores at Kāranjā in the Akolā district of Berar, being deputed to that task by my learned patron and benefactor Rai Babadur Hiralal, B A., MRA 8, Deputy Commissioner who, in his retirtinent, was entrusted by the Government with the pork of compiling a Catalogue of Sanskrit MSS in the Ceneral Provinces and Berat Here I discovered & dozen works in Apabhrams, including three Purângs of more than one hundred chapters each, the other works being of a more modest size Information about these works will be found embodied in the Catalogue mentioned above which was published in 1926 It is a great pity that a very large part of the Jain literature of which I have spoken so far, remains yet unpublished A few Granthamālās have recently been started with the chief object of making these works svailable to the scholarly world in the original, and the Manikchand Digambara Jain Granthamālā of Bombay deserves special mention in this connection. It has so far issued thirty volumes oonteining about fifty ancient Sanskrit and Prakrit works The work is however, too vast to be adequately handled in a single series and hence the need of fresh efforts to speed up the work of publication Iwo years ago, Seth Gopal Ambadas Chaware of Karaná sought my advice in the matter of utilising certbin funds which he had set apart for some religious or choritable purpose in the memory of his late father. I suggested to him that the best and most lasting memorial that he could raise to his father and at the same time do a great service to the cause of Jainism was the institution of a book-series for the publication of Jain works that remain yet unpublished, particularly those from MSS deposited at his own place, Käranjā This suggestion of mine was disoussed at a meeting of the leading Jains of Berar and was ultimately adopted in preference to other suggestions put forward for the utilisation of the funds. A committee was formed for starting the work of the series to be known at the Ambādās Chaware Digambar& Jairt Granthamālā or the KARANJA JAIN SERIES of which I was elected Ganeral Editor -10- BY THE GENERAL EDITOR We had decided to open the Series with one of the Apabbremsa work recovered 'from the Karanjā MSS when Dr P L Vaidya, M A.,D Litt, sought my help in obtaining facilities for consulting some of those MSS I learnt from him that he had already secured some MSS of the Jasabaracariu of Puspadanta and was engaged in preparing the text for the Press I told him about our Series and offered to open the Series with that work if he would edit it for us To this Dr Vaidya readily agreed and he has spared no pains in presenting the text as ecourately and critically as was possible with the apparatus that he had before him We are very thankful to Dr Vaidya for his valuable contribution to the Series as well as for the help he gave in making arrangements for the printing of the book, all this work being undertaken by bin merely as & labour of love It is our great sorrow that one of the members of our committee who was also & cousin of Seth Gopal Ambādās Chaware and a leading Jain citizen of Berar, Mr J.D. Chaware, B A, LL B, to whose efforts the inaguration of this Series owes & good deal, did not live to see even the publication of its first volume By his death our committee has suffered an irreparable loes I can hardly adequately thank Seth Gopal Ambadasji to whose munificence this Series owes its inception I pay my humble respects to Svāmi Virasenji Bhattāraka who is the custodian of the manuscript-store of the Sena Gans temple at Kâranjā end who encouraged Seth Gopal Ambadasji in his laudable munificence I also thank the members of my committee for their co-operation in the work I take this opportunity to invite the co-operation of all scholars interested in the study of Jain literature in making the future volumes of this Serios es suitable for study and research as possible With their co-operation we hope to publish Boon the remaining Apabhramśa works at Kāranjä. King Edward College Amraoti 20th March 1931 HIRALAL JAIN TABLE OF CONTENTS 1. Portrait of Swami Virasena Bhattaraka Facing page he na 2 समर्पण पत्रिका 5 Hehe Souto Nebes M 7-8 NO Mete 3. 9721794 a Thou 4. Photos of Shet Ambadasji and Gopaldasji facing page NON con 9 5. A Note by the General Editor 9-11 6. Table of Contents 12 NOM M 7. Introduction MON 13-32 wome 8. TEXT OF JASAHARACARIU 8-800 Pariccheda I १-२३ Pariccheda I hours MWM २४-४६ Pariccheda III we MO ४७-७४ Pariccheda IV MO ७५-१०० Wor 9 Jogailu: Morena Meetin 10. Notes 175-186 11. Addenda et Corrigenda torna sowie fonts 187-188 INTRODUOTION 1. GENESIS OF THE UNDERTAKING WHILC working as Springer Research scholar of the Bombay University during 1926-28 I occupied myself with the surveying work of the Prokrit literature in general and of the anabhramsa works in particular in the course of my labours in that direction I commenced examining the Bhandarkar Institute MS of Puspadanta's Tisa- 1th malūpuriengunalarnhūra, of which the late Dr P D Gune included a short notice in his introduction to the Bhavayatta kahā, published in the Gaekwar Oriental Series at Baroda It came to my knowledge that the Bhandarkar Institute Library of MSS contained a few more MSS of this work and also a MS of another work, JASAHARA- CARIU, by the same author Just at this juncture Rai Babadur Hiralal published his Catalogue of Sanshrit and Prakrit Manuscripts in the Central Provinces and Berar ond, on going through it, I discovered, to my delight, that the Kāranjā Jain Bhandars contained several MSS of the two works mentioned above, and in addition, one more work, Nigakumaracariu, by the same author Whilo I was eludying the Tosatthimahāpurisegunālamkāra and the Jasaharacariu at the Bhandarhar Institute, which works were composed at Mãnyakheta, the modern Malhhed in the Nigam's territois, another des struck me, how far would these works of Puspadonto, written in the Apabhromsa language and composed in the province of Maharastra proper, throw light on the origin and growth of the Marathi language For, at is a well knoon fact that a very large number of works in the old Marathi were composed or revised within a radius of about a hundred miles from Māngakbeta, the capital of later Rüstrakūtas The discovery of Puspadonta's works at Käranjā in Berar, there fore, porticularly delighted me, as I thought, I would find therein pre-Marathi Apabhramso records composed, and also preserved, in Mahārāstra which would be of great valuo to the bistory of the Marathi language. Consequently I made up my mind to Visit the Kiranjū Jain Bhandars for this purpose during the Christmas holidays of 1927 It was on that occasion that I made acquaintance of Prof Hiralal Jain, MA, LL B, of the King Edward Collego, Amroads, who, within a few days of my visit, made & proposal to me that I should edit tho Jasabaraçarju of Puspadanta before undertaking the bigger work, Tisatthimahapurifogunālamkara, and that I should allow it to be included in the Karanji Jain Series as its first volume, which proposal I readily accepted INTRODUCTION 2 THE CRITICAL APPARATUS The critical apparatus on which tbis edition of the Jasabaracariu is based consists of four manuscripts collated in full and three more MSS partiall collated in cases of doubt I also used pretty frequently the printed edition of the Hindi translation, which here and thera gires the ghatta lines in the original Apabbramsa The detoile of this apparatus ara giren belot - S This is a paper manuscript deposited in the Sena Gana Bhāndārs of Kárani in Berar The MS Es written in good band, consists of 78 leaves with 11 lines to 8 page and s'out 37 leiters to a line, las columinous notes in the margin in mixed Hindi and Ssnskrit It is dared Tednesday the auspicious 13th of the dark half of Āsrina of 1656 of the Sala ere, or 1790 of the Tikrams e13, i e, 1734 A D, as can be seen from the following colophon - शके १६५६ मिति आनो वदि मंगलात्रयोदश्यां बुधवार श्रीमूल्संधे नूरस्यगणे पुत्तरछे काभण- गणधरान्वये पारपर्यागते मशरकश्री १०८ तोमसेन तल भट्टारधीजिनतेन तत्प? महारपसमतम तत्पहे भधारकश्री १०८ छत्रसेन तपट्टोदयाद्विवर्तमान Ho maanraala जतोघरचरित्रं संपूर्ण रूपठनाय वा अन्येषा ज्ञानावर्णीकर्मक्षयाथै श्रीसूरतवंदरे श्रीआदिनायचैत्यालये २० १५९०. It will be seen from the colophon that the cops was made at Surat and then it travelled to the Karanjā temple of the Sens Gans There is another MS of this work in the same temple, but it was so old and its condition so delapidated that it could not be safely used I however consulted it occasionslls and found that it generally agrees with the above as regards omission of certain passages for which sce belon As the MS is prepared at Surst, there is to consistency as regards the use of initial u T This is another WS of the Sena Gang group now deposited in the Terapanthi Jain Mandr of Bombay It was secured for my use by the kindness of Pandit Nātbūräm Premi of Bo ab35 It seems to be the oldest Ms of the work nos extant, as it is dated 1390 of the Tikrams ere, e , 1333 A D It - a paper MS consisting of 98 leares with S lines to a page and about 30 letters to a line The colophon runs as follows मंगलमस्तु । संवत् १३९० वर्षे आपादशुद्धत्रयोदशी भानौ अोह श्रीमहाराजाधिराजश्रीरत्राण- महंमदराज्ये दुर्गामंडपपडिगनामागे (१) पगडीनामनि प्राग्वाटवंशीयसाभावडसंतान मल्लौ पुत्र रामा...... This MS seeras to have been copied from another older MS The copyist seemed to be unable to read some lines and letters of his original and put dots and dashes were he was not able to decipher them is T is not nearly 600 years old, its latter part bas become considerably worn out and indistinct to read It is hokerer striking that the readings of T agree with those of Softener than with those in A and P. I have used T throughout my woră P This MS belongs to the Deccan College Library, now deposited in the Bhan. darkar Oriental Research Inshtute, Poons, and bears No 1192 of 1891-93. It consists JASAHARACARIU of 84 leaves with 11 lines to a page and about 29 letters to a line It has the following colophon:- संवत् १६१५ वर्षे मादव सुदि ५ वीसप्तवारे पुष्यनक्षत्रे तोडागढमहादुर्गों महाराजाधिराजराउश्री- कल्याणराज्यप्रवर्तमाने श्रीमूलसधे नद्यालये बलत्करगणे सरस्वतीगच्छे श्रीकुकुंदाचार्यन्वये महारकश्रीपद्मनदि- देवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीश्रुतचद्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीजिनचंद्रदेवास्तत्पट्टे भट्टारकश्रीप्र... It will be seen that this MS s dated Thursday, the 5th of the bright half of Bhadrapade of 1615 of the Vikrama era, i e, 1558 A D It is a carefully prepared paper MS belonging to the Balātkāra Gana group, and what is striking is the consistency with which it uses the initial n except in one or two places only See also under H below A, This is another MS of the Balatkāra Gana group It was secured for me, when the printing of the text had already considerably advanced, by my friend, Professor Hiralal Jain of King Edward College, Amraotı, from Pandit Jugal Kishore Muktbar of Sarasawa and now of Samantabhadıāsrama, Delhi It consists of 73 leaves of which the first loaf in missing, with 11 lines to a page and about 38 letters to a line It is also 8 carefully written paper MS but is slightly inferior to P Its colophon runs as follows:- अथ संवत्सरेस्मिन् श्रीनृपतिविक्रमादित्यराज्ये सवत् १६२१ वर्षे श्रावणवदि २ सोमवासरे श्रीमूलसघे बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे कुदकुंदाचार्यान्वये भट्टारकश्रीपद्मनदिदेवा तत्पट्टे भट्टारकरीशुमचद्रदेवा तत्पट्टे भट्टारकश्रीजिनचंद्रदेवा तत्पट्टे भहारकश्रीसिंहकीर्तिदेवा तत्पट्टे मट्टारकश्रीधर्मकीर्तिदेवा तत्पट्टे भट्टारकरीशील- भूषणदेवा तदाम्नाये आर्याश्रीचारित्रश्रीतसिष्यवितगुणसुदरी एकादशप्रतिपालिका तपगुणराजीमती शीलतोय- प्रक्षालितपापपटलाः। बाई हीरा तथा चंदा पठनार्थ इदं यशोधरचरित्र लिखापितं कर्मक्षयनिमित्तं ॥ ७॥ लिखितं पडितवीणासुतगरीवा अलवरवासिनः ॥ ७॥ शुभ वो भूयात् ॥ It will be seen that this MS. is dated Monday, the 2nd of the dark half of Śrāvana of 1621 of the Vikrama era, 10, 1564 A,D, 19, about six years after P Asp was prepared in 'Todā gadh or Todā fort and A in Alwer, and as the genealogies of teachers mentioned therein agree so far as they are available, it can well be presumed that they belong to the same group The text and the readings in them agree closely except in one detail, viz., P omits the portion IV 29 9-IV.30 13 which is given only in B and A. A is also almost consistent in the use of initial n - In addition to these four fully collated MSS described above, I have used the following meterial at times (a) B This is a MS deposited in the Balātkāra Gana Jain Bhāndāra at Kāranjā I personally examined this MS on the spot, but had no time at my disposal to fully collate it A copy of this MS was recently prepared for the Ailak Pannalal Jain Bbander of Bombay. Through the kindness of Professor H D Velankar of the Wilson College, Bombay, I was able to collate a portion of it, 10, to the end of the first paricchede, when I thought that the text there agreed with P, & bet er and more reliable - - INTRODUCTION MS, in sll essential points, and that it was no use further to collato a secondary MS like this on the discovery, however, of the additional pageage in A, viz, IV 29 - IV 30 13, I wanted to ascertain whether the original MS B also contained the same Professor Hiralal Jain got it examined for me again and sent me collation of which I made full use (6) # This is a printed Hindi translation of our text which I purchased in a Bombay bookseller's shop This printei translation usually gives in the original Apabhrams& the ghattā portion with its Sanskrit rendering, and translates the rest in Hindi calling the translation as Tikärtha I was not able to discover the name of the translator nor the year of its publication On the last page I find the following लाला गिरिनारीलाल ने जैनी भाईयों के हितार्थ लाला जैनीलाल के "जैनीलाल प्रिंटिंगप्रेस" देवबन्द जिला सहारनपुरमें छपाकर प्रकाशित किया। I consulted this translation throughout for what it was worth and have come to the conclusion that the translator used & MS of the text identical with the one in P and not with the same in A or B, as the absence of translation of IV 29 9-1V 30 13 clearly shows The relationship of all the material described above will be clear from the following diagram - Archetype ( 975 A D ) - *X (Sena Gana) MY (Bolāthāra Gana, 1308 A D ) *+ T(1333 AD) mm B P A (1558 A,D) (1564 A D) Original of the Hindi translation S(1734 A D) * The asterc indicates conjectural MSS JASAHARACARIU It will be clearly seen from above that there are two recensions of the text of Jasshøracariu, of wbich the older one belongs exclusively to the Sena Gana and is represented in my material by Sand T This group of MSS, in my opinion, presents almost the original text es composed by the author himself. The original of my T, 1 e,t of the diagram, is irrecoverable, being already worn out in 1333 A D, and so it may have been two or three centuries older, which is approximately the age of Puspadanta Copies of this recension, howerer, were being made from time to time in the Sena Gana tradition, and I SAW S, a copy of wbich, S, I have fully collated This Sena Gana reconsion omits the following passages from the printed text- (a) Verses in Sanskrit in praise of the poet's patron, Nanna, at the beginning of the 2nd, 3rd and 4th pariccheda; and, (6) (1) A Passage from I 5 3 to I 8 17 (Bhairava's visit), (11) A Passage from I 24 9 to I 27 23 (Jasahara's marriage, and (11) A Passage from IV 22 17b to IV 30 15 (The various subsequent births of several persous in the story) Of these additions to the Seng Gana recension, I think, those mentioned under (a) may have been made by the author himself during his life-time in some of the copies of his work Tor, in the poet's other work, eg, in his Tisatthimahāpurisagudā- Ismkāra, there are similar verses in Sanskrit in parise of Bharata, Nanna's father, which verses also are found only in some of the MSS of that work As regards additions under (6) all of wbich (except IV 29 9 IV 30 13 which passage is found in A and B only), appear in the second recension of the Balātkāra Gana, there is only one conclusion to be drawn, viz, that these additions were made by Gandhorra (Sk Gandharva), son of Kanbada (or Krsna), in the Somvat year 1365, on Sunday, the 2nd tithi of the bright half of Vaisūkha, i e, in 1308 A D, at the request of Visalasübu, the son or pupil of Khelāsābu and grandson or grand pupil of Changesõhu of Pattana Now, as tho passage IV 29 13-IV 30 15 tells us, this Visala once asked the poet Gandharva to fill up the deficiency in Puspadanta's work by adding passages relating to (1) the visit of Bhairava to the royal household, (11) the marriage of Jasohora, and (ni) the wanderings of the various persons through coveral subsequent birthe Accordingly the poet Gandborva composed these passages, inserted them at appro- 1 . When my work on the text and on the introduction was completed I had the good luck of securing another MS from Kolhapur through my pupil and friend Prof A N Upadhye of the Rajaram College This MS belongs to Mr Tatyasalieb Patil of Nondni near Kolbapur It is of the Balātkāra Gana group and presents the text as in P and (H) I am glad to see that my classification of MSS De given above and my remarks on the additions to the original text by Gandharva are fully borne out and confirmed by the discovery of this additional MS, which consists of 100 leaves of which the second and third are missing The MS was completed in Todā (Todāgad?)on the 11th day of the bright half of Asvina of the Samyat year 1699 and Saka year 1564, 1, 2 , 1642 4. D.
INTRODUCTION priate places and read them on the above mentioned date to Visala, who was then staying at Yoginipura or Delhi The poet says that he borrowed the material of the above mentioned passages from an older poet on the subject, Vatsarāja ly name, and the material for the description of Jasahere's morriage from Vasavasena's work for which gee below It is a noteworthy thing here that Gandbarva makes mention of his own name at the end of all the three passages Thus we have (१) गंधव्वु भणइ मइ कियउ एउ णिवजोईसहो सजोयभेउ। धत्ता-अग्गइ कइराउ पुष्फयतु सरसइणिलउ । देवियहि सरूउ वण्णइ कइयणकुलतिलउ । I 8 13-17 (२) ज वासबसेणिं पुन्वि रइउ त पेक्सिवि गंधव्वेण कइउ । I 2723 (३) गंधव्वे कण्हडणदणेण आयह भयाइ किय थिरमणेण । महु दोसु ण दिजइ पुन्धि काउ कइवच्छराइ त सुत्त लइउ। 1V 30 14-15 Now it muy be asked How is it that the passage IV 29, 9-1V 30-13 came to be omitted in Pand in the original of (H) ? My explanation is that the clerer and learned copyists of P and the original Apabhramsa of Il did not like that the passage in gliestion, giving the history of these additions to Puspadanta's work, should continue to remain, as they thought the deficiency would do little credit to the poct, and hence they suppressed it The retention of IV, 30 14-15 in all the recensions of the Balāt. kăra Gana has, however, misled several scholars lile Pandit Nathūrām Premi in the Jin sahulya Samsodhaka, Vol II 1 page 6%, and Pandit Jugalkısboro Mukhtor in the Jain Jagat of October of 1926 They interpreted that must gota ujut meant Puspidanta, as Kanhada, they said, was only another name of Kesgra, the real name of Puspadanta's father (See iv 31 2) It will be seen from the above discussion that the text in the present edition represents the secondary and amplified version of MSS A, B and P If the origin of the additions had been discovered in earlier stages of my labours on the printing of this edition, it would not have been difficult for me to give the smaller, and, should I say, the original, version of the text I must confess that the externals of P impressed mo so much that I thought I had discovered the best version, though the roughness of language, expressions and versification of the additional passages made me frequently pause It is, however, quite easy from the critical apparatus of the present text, to 8scertain what the original version of Sand T must have been There 18 only one more point to which I should like to draw the attention of the reader The date of these additions is 1308 A D, while the date of my oldest MS TIS 1333 A D The additions, thus, did not influence the copies that were made in the H JASAHARACARIU quarter of the century that followed their composition Besides, my MS T is, as pointed out obore, a faithful copy of a still older and worn out MS prepared at least two centuries before s bich in the diagram I have called / 3 THE POET AND HIS DATE The author of this small work in Arabhramsa is Pupphayamta, Sk, Puspa danta. Besides Tasohatacariu he u Tote tho other sorks, both in Apabhramsa, viz, (1) Tisatthiinahápuris guilamlira, better known by its shorter title Mabūpurāna, divided into tuoports, Adipurim in 37 Chapter- and Utłorapurāna in 65 chapters, (11) Nāgakumāra- Cotiu in 9 chapters, both of which ore contemplated to be jucluded in the Kārenjā Series In all these works the poet gives some account of himself I give below a tentative sketch based upon tho sailable material in the crude form, reserving a fuller and more nccurate information to a future volume of the Series when I hope to have the material cirtically cdited Puspadinta saso Brahmın bg ca-te and belonged to Kasyapa golra His father's name was Kendrabhatta and mother's name was Mugdhadevi. He was at first follower of Saiviem but later was conserted to Digambara Jainism He seems to have secured Ee: eral titice und hirudrın for lus poetic genius, such as Ahinīnameru,Kavyarayanāyara Kartapıcallo, Korsara! I-1951, Kolkulatılaa, Sarasaırılnge, Väesarighara and others. He had a lean bods and durk complexion, but a smiling face, and seems to have no wile nor children We do not know what his native land was, where he studied and who patronined him before he migrated to Mänyukhets It is however clear that he had some bitter esplienco in life, was probably insulted at the court of his patron, whose name, according to Prabhūcandri's notes to the Mahápurina, seems to be Virarája lisipati or hüncipati (?) alias Südroka After this bumiliation at the court of his patron ho left him notre land, comme to a garden in the outskirts of Mängakbeta, where two persons persuaded him to see their patron Bharata, the minister of king Subbatungarüya, 'Tudiga or Krsnaraja III of Minyakheta, and assured liim that he would be well received ly the Minister Puspadanta thercupon saw him and was at once offered patronage After a len duy's stay Bharata requested the poet to write on the theme of the Mohāpuräna, a theme already made popular in Sanskrit by the work of the same name of Jinasenn and Gunabhadra a century before-,as a prāyescitta for the sin that the poct cominjited in writing poems in praise of his formor patron Virorāja पदं मणिउ वणिउ वीरराउ पच्चित्तु तासु जद्द कहि अनु उप्पण्णड जो मिच्छत्तभाउ। ता घडा तुझ परलोयकज्जु । The poet wag at firet reluctant to take up the proposal as he was pory much depresscd at that timo ond thought that tlic age of poetry was gone, but after a good deal of persuasion he agreed to commence the work Lvon in the middle of his undertaking -19.- INTRODUCTION the poet was once more in depressed mood when the goddess in a dream asked him to wake up and finish his labours In the introduction to his Tosatthimahāpurisagudālamkāra Puspadanta mentions & long list of well-known literary figures which were his predecessors I give below the passage in full - अकलक-कविल-कणयर-मयाई दिय-सुगय-पुरंदर णयसयाई। दतिलविसाहिलुद्धारियाई णउ णायई भरहवियारियाई। णउ पीयई पायंजलजलाई इइहासपुराणइ णिम्मलाई। भावाहिउ भारहभासि वासु कोहलु कोमलगिर कालिदासु । चउमुहु सयभु सिरिहरिसु दोणु णालोइउ कइ ईसाणु वाणु । णउ धाउ ण लिंगु ण गण समासु णउ कम्मु करणु किरियाविससु । णउ सधि ण कारउ पयसमत्ति णउ जाणिय मइ एक वि विहत्ति । णउ बुझिउ आयमु सद्दधामु सिद्धतु धवल जयधवल णामु । पडु रद्दडु जडणिण्णासयार परियच्छिउ णालंकारसार। पिंगलपत्यारु समुद्दि पडिउ ण कयाइ महारइ चित्ति चडिउ । जसइधु सिंधु कल्लोलसितु ण कलाकोसल हियवइ णिहित्तु । In addition to thoso mentioned in the passage above he mentions a few more per- Bons prominent amongst them being Prayerasena, the author of Setubandha It appears that Puspadanta completed his Mahapurāna during the life-time of Bharata After Bharata's death the poet continued to enjoy the favour of Nanna, Bharata's son, under whose patronoge he composed his two other works known to us. It Bppears that besides these three he composed a few more works prior to his arrival at Mānyakheta, at any rate one such work in praise of Virarăja seems to have been alluded to in the lines already quoted above, but is probably lost As regards the date of Puspadanta we have the following evidence in his works, (1) The mention of his predecessors, particularly of Rudrata whose date is fized by Mr PV Kane of Bombay and Dr S K De of Dacos to lie between 800 and 850 A D., (ii) the reference to the death of the Cola king in the war waged by Subhatungs or Tudiga or Krsnarāja III, which event, in my opinion, took place at about 940 AD, (111) the mention of the name of the year Siddhartha ( of the Saka era ) in which he commenced his Mehāpurāns, and of Krodhana of the same era in which he completed it, which, in my opinion, are 959 A D and 965 A D, for I think Puspa dants commenced his work in the same Siddhartha year in which Somadeva completed his Yasastilaka which year is 881 of the Saka era, 1 e 959 A D, (17) mention by the poet in 8 verse of the plunder of Māngakheta by Harsadeya of Dhārā which event took place about the year 1029 of the Vikrama era, 18,972 A D in the reign of Khottigadeve, the successor of Krsnarāja III The tes minus a quo therefore would be the date of Rudrata, say 850 A, D, and the termenus ad quem, the plunder of Manyakhets in the " JASAHARACARIU Fear 972 A D Non eithin these limits the Siddhartha Samvatsara of the sake erë would occur in 99 A D and 939 A D, but of these two years we cannot accept the first os the defeat of the Cola king by a Rüstrakūta king could not have been effected before 940 AD, the probable year of the accession of Krsnarāja III In fact the crent took place, according to V Smith, in the yeor 949 A. D. We therefore have to accept 959 A D as the year in which Puspadanta commenced his Mahápurāna Puspadanta', patron Bborats lived to see the completion of this work, but may have perhaps lost his life in defence of the city in the year 972 AD Paspodanto mentions or refers to, I think, this ovent in the last line of following veree at the opening of the 50th chopter of lus Uttarapurīna MS of Karonjā – मदीनानायधनं सदाबहुजन प्रोत्फुटवल्लीवनं मान्यारेटपुर पुग्दरपुरीलीलाहर सुन्दरम् । धारानाथनरेन्द्रकोपशिसिना टग्ध विदग्धप्रियं फेदानी वसति करिष्यति पुनः श्रीपुष्पदन्तः कविः ।। As I have already remarked above, the Sanskrit veraes in praise of the poet's patron are found only in fome of the MSS of his works, which shows that they were inserted by the poct at his leisure efter some of the copies of bis work had already gone out It is not nececours to argue theroforo that the plunder of Mangakbeta must have taken place before the Mahipurans was completed in 966 A D Shortly after this event, in 972 A, D, Puspidants once more secured the patronage of Bharata's son Nanna, and resumed his poetic activity which gave to the world two more works, the Jasabaracariu and the Nipolumaracariu In order to moke clear the above arguments as to the date of Puspadanta, I quote below & long extract from Rai Bahadur Hirolal's Introduction to bis Catalogue, page zliv fi As for the date of the author, no hayo the following verses towards the end of the Uttarapurana पुग्फयतकदणा धुयप जइ अहिमाणमेरुणाम। कयउ मनु भत्तिद परमत्य जिणपयपंफयमउलियहत्यें। कोहणसवज आसाढह दहमह दियहे चंदसहरूढइ । Thesc serses convey thut Puspadanta completed the Purana on the 10th of the bright fortnight of Asūdha in Krodhana samvatsara. Apparently there is no mention of the year in the verses, and hence wo have to look for other data in the work to determine the year. Puspadanta tells us that bo was the protege of Bbarata, the minister of king Subbatungariya of Münyakbota. The samo king at other places in the work has been Tho Kolhapur MS of the Uttarapurūna does not give this verse at all Tho Kolhapur MS of the Uttarapuräna confirms this reading in the text as against anothor reading given below from the Poona MS -21- INTRODUCTION teferred to as Vallabharaya On both these names we have in the manuscripts a marginal explanatory note “Kisnarāja," which proves that the note-maker thought Subhatungarāya and Vallabharāys to be only different names of " Krsnarāja". History tells us that there have been three kings bearing the name of Krsnarājs in the Rastrakūta dynasty of the South In the time of Krsnorāja I, the Rästrakūta capital was not at Manyakheta but near Nasik Amoglavarsa I whose reign began in 815 , D, established Mānyahheta as a ospital town and Krsnatája II and III sat on the throne there Krsna II reigned from about 722 to 788 and for Krsno III we have epigraphical and literary records of years ranging from Sako 861 to 881 (A D 939 to 959 ) In order to deoide as to which of these two kings bas been referred to by Puspadanta, wo should examine some other data deducible from his Epic Quite at the beginning of the great work we have a line in which we are told that the king of Mānyakheta who is here called "Tudiga" killed the king of the Colas उवबद्धजूड भूभगमीसु तोडेप्पिणु चोटहो तणउ सीसु । We read in Dr Smith's Early history of India ( pp 424-430 ) that "The war with the Colas in the reign of Krsnu LII, the Rästrakūta king, was remarkable for the death of Rājāditya, the Cola king, on the field of battle in 949 A D" Again in the Imperial Gazeteer, Vol II, page 332, we read, The Rástrakūta Krspa III (940-971) had great success in the Cola country and inscriptions in that tract shon that he crercised Sovereign rights over parts of it An inscriphon at atkūr, also in Mysore, of the year 949--50 relates that at a time when the Rāstrakūts king Krsna III was warring against the Cola king Räjāditya, son of Pärantaka I, the former's ally Būtuga IT of the Western Ganges of Talkād ( who had married Krsna's sister), murdered the the Cole sovereign at a place called Tatkola, not far west of modern Madras. Somadeva also in the colophon to bis Yasastilaka refers to the conquests of Cola by Krsna III Thus it is probable that the line quoted from Puspidants refers to this Very event Continuing our search we find at the beginning of the 50th chapter of Uttarapurāna & verse of some importance for our inquiry This Terse is ata1a7497 341765a alchemiaa मान्याखेटपुरं पुरदरपुरीलीलाहर सुन्दरम् । धारानाथनरेद्रकोपशिखिना दग्ध विदग्धप्रिय केदानी वसति करिष्यति पुनः श्रीपुष्पदन्तः कविः ।। In this verse Puspadanta refers to the raid of Mángakheta by some king of Dhară that took place in his time Dhanapāls in his Pâiyalacobinamamālā (verse 276) says that he composed the work' when one thousand years of the Vikrams era and twenty nine besides had passed, when Manyakheta had been plundered in consequence of an attack made by the lord of Malaya" A reference to this plunder occurs in the Udaipur Prasasti as well ( Ep Ind, Vol I. p 226 ), the 12th verse of which runs as follows JASAHARACARIU तस्मात् [वैरिसिंहात् ] अभूदरिनरेश्वरसंघसेवा- गर्जगजेन्द्ररवसुन्दरतूर्यनादः । श्रीहर्षदेव इति खोट्टिगदेवलक्ष्मी जग्राह यो युधि नगादसमप्रतापः ॥१२॥ Khottigedeva was the successor of Krsna III, and we have & stone inscription of his date in the Saka year 893 , while Harsadeva was a Paramāra King of Dhārā contemporaneous with Krsna III and KhottigadeyIt is quite possible that Puspadanta in the above quoted verse refers to this plunder of Mãnyakheta by Harssdeve The identifications irresistibly lead us to the conclusion that Puspadanta wrote in the time of Krsna III. It has been said above that Puspadanta refers to the king contemoreneons with him by the names of Vallabharāya and Subhatunga As for the first of these terms, it is known to have been the general title of the Rāstrakūta princes Dr V. Smith tells us " All these writers (Arab) agree in stating that they regarded the Balhars as the greatest sovereign in India. They called the Rastrakūtx kings Balhara, because those princes were in the habit of assuming the title of Vallabha (Beloved, Bien aime') which in combination with the word R21 ( prince) was easily corrupted into the form Balbara" Jinasena in his Horivamsa-Purana-Prasasti calls the Rāstrakūta king Indra ( son of Krsna I, ) as Sri Vallabha.-- पातीन्द्रायुधनाम्नि कृष्णनृपतौ श्रीवल्लमे दक्षिणाम् । As for the second name Subbatunga it is well known that it was an alternative name of Krsna I, but probably that was also a general title of the Rästrakūta kings Tunga was certainly their common name of Deoli plates) These proofs are, I think strong enough to justify the conclusion that Puspadanta wrote in the time of Krsna IIT. But we have still to determine the year in which Puspadanta completed his Mahāpurāns We have quoted above six lines from the work, expressing the date without any mention of the year Mr. Nātbūrām Premi, on the strength of many manuscripts of this work seen by him reads the third and fourth lines of these as follow कयउ कब्बु भत्तिइ परमत्य छसय छडुत्तर कयसामत्यें। This gives the year 606 for the completion of the work. Referred however to the Vikrama, Śaka, Kalacũri or Gupta era, the year does not agree with the facts disclosed above, nor does it prove to be a Krodbana Samvatsara as required Therefore this reading must be held to be erroneous, unless and until it is shown to have reference to an ere other than the four mentioned above At the beginning of the work Puspadanta tell us that he began writing it in Siddhārtha Samvatsare - तं कहमि पुराणु पसिद्धणामु सिद्धत्यवरिसे भुवणाहिरामु ।
INTRODUCITON Somadeva, in the colophon to bu8 Yašastılaka, tells us that he completed the work in the Saks year 881 (Siddhārtha Samvatsara) when Krsca III was reigning (of Peterson's III Report, 156) Astronomical calculations also confirm the statement that the Saka year 881 was Siddhārtha. Krodhana follows Siddhārtha after six years and thus the Sake year 887 was Krodhana Hence the Mahāpurāna may be taken to have been begun in the Śaka year 881 and completed on the 10th of the bright fortnight of Āsādha of Saka year 887 This according to Swami Kannu Pillai's Indian Ephemerig is equivalent to Sunday the lith June, 965 AD This date, however, raises & question of some historical importance If we accept that this Mahāpurāns was completed in A D 965=V 8. 1022, and also that the raid of Mānyakheta mentioned in it refers to the plunder of the city by Harss of Dhārā, at prima facie follows that the latter event took place at least not Later than y 8 1022 But as we have seen, the author of Pāiyalacchināmamāla refers to the same event in & way as to make us understand that it occurred in V8 1029 This would make a difference of seven years I take it that the event in fact took place about the year 1022 V8 The mention i Dhanapāla may be explained by the probability that King Harsadova returned to his capital Ujjain seven years after the plunder of Mānyakheta, spending the interval in conquering other parts of the country. In V 8 1029 the memorable plunder of Mānyakbeta must have been still fresh and hence Dhanapāla referred to it in that manner Though it is difficult to say how long after the completion of Mahāpurāna, the Yesodhara-carita and Nāgakumāra carita written written, this much is certain that they were written after the Mahāpurāna, because during the composition of the latter, Bharata was the minister of the King, but when the other two works were composed, his son Nanna 18 said to have occupied that office. The king has been referred to by the name of Vallabharāya in these two works also, and on their manuscripts we find the marginal note" Krsnarāja" This 18 & mistake As we have seen Khottigadeva had already succeeded Krsnarāja even before the completion of Mahāpurāna.' 4 POPULARITY OF JASAHARA WITH THE JAIN WRITERS Jasahara or Yasodhara, the hero of the present work, seems to be highly popular with both the seots of the Jains Well-known literary figures like Haribhadra handled the theme, and works bearing the title Yaſodharacarita are found in Sanskrit, Prakrits Apabhramsa, old Gujarati, old Hindi, old Tamil and old Kannada I have been so far able to collect over twentyfive authors on the theme, and I do not feel confident that my list is exhaustive 1. Somadeve composed his Yašasbilakacampü, & huge work in Sanskrit prose and verse He completed the work in 881 of the Saka era, i e, in 959 A. D. It 18 printed and published by the Nirnayasagara Press, Bombey, together with the commentary of Srutasāgara 2 Väsavasena composed in Sanskrit a Yasodhatacarita in eight cantos It 28 in Verse and the predominent metre is anustubh. It is this poet who is mentionod in the -24 JASAHARAOARIU passages added to Puspadanta's work and therefore must be earlier than 1308 A, D. There are two MSS of this work, No 550 of 1884-86 and No 307 of 1883-84 at the Bhandarkar Institute At the opening of his work Vāsayasena mentions Prabhaſjang and Harisena as bus predecessors in writing on Yasodaracarita. सर्वशास्त्रविदा मान्यैः सर्वशास्त्रार्थपारगैः । प्रभजनादिभिः पूर्व हरिषेणसमन्वितैः ।। ३ ।। यदुक्तं तत्कयं शक्यं मया बालेन भापितुम् । तथापि तत्क्रमाम्भोजप्रणामार्जितपुण्यतः ॥ ४ ॥ प्रोच्यमान समासेन संसारासारसातनम् । पठता शृण्वता यत्तत्सन्तस्तच्छृणुतादरात् ॥ ५ ॥ The description of the marriage of Yasodbara which Gandharva added to Puspadanta's work and whicb, he says, is based upon Vasavasena's work is found in the second oanto of the work 3 Sakalakirti composed a Yasodharacarita in Sanskrit, probably after the model of Vasarasena's work It is also written in anustubh metre and in eight cantos There are two MSS of this work, No 1469 of 1886-92 and No 1051 of 1887-91 at the Bhandarkar Institute One of these MSS 18 dated Samvat 1806 but is itself copied from an other old MSS dated Samvat 1776, 1 e 1719 A D Sakalakírtı, however, must have lived about 1450 A D, as his grand-pupil Jñānabhūsane wrote bis Tattva Jñana. tarangini in Samvat 1560, 1 Q, in 1503 A D See Rai Bahadur Hiralal's Catalogue, Introduction, page xxxVII. 4 Vädırāja, otherwiso known as Kanakasena Vädırāja composed & Yasodharacarita in Sanskrit in four contos There is published an edition of this work in Tangoro in 1912 According to that editor, the poet Vadiraja lived in the second half of the 10th century AD This work therefore must be regarded as almost contemporaneous with our work Vadıräjcalls himself to be the author of the Ekibhāvastrotre and Pārsvanāthacarita which are published, and of Kūkutsthacarita ,- श्रीपार्श्वनाथकाकुत्स्थचरित येन कीर्तितम् । तेन श्रीवादिराजेनारब्धा यागोधरी कथा ॥ ६ ॥ 5 Somabirti composed a Yosodharacarita in Sanskrit The work is divided into cight centos as in Sakalakirti's. There are two MSS of this work, No 549 of 1884- 86 and No 167 of 1872-13 at the Bhandarkar Institute The author gives the date of the composition as samyat (?) 1536, 1 e, 1479 A, D in the colophon wbich runs as follows: नन्दीतटाख्यगच्छे वंशे श्रीरामदेवसेनस्य । जातो गुणार्णवोकः (काः) श्रीमाश्च श्रीभीमसेनेति ॥ ९३ ॥ निर्मितं तस्य शिष्येण श्रीयशोधरसंज्ञिकम् । श्रीसोमकीर्तिमुनिना विशोध्याधीयता बुधाः ॥ ९४ ॥ - -25- INTRODUCTION वर्षे षट्त्रिंशसंख्ये तिथिपरिगाणना युक्तसंवत्सरे वै पञ्चम्या पौषकृष्णे दिनकरदिवसे चोत्तराभे हि चन्द्रे । गौढिल्या मेदपाटे जिनवरभवने शीतलेन्द्रस्य रम्ये सोमादीकीर्तिनेदं नृपवरचरितं निमितं शुद्धभत्त्या ॥ ९५ ॥ 6 Mäpikyasuri or Mānikyadevasūri composed a Yasodharacarita in Sanskrit It is divided into fourteen centos and the Granthasamkhya is 1350 There are two MSS of this work, No. 1308 of 1884-87 and No 1332 of 1887-91 at the Bhandarkar Institute There is no mention of the date of the work or of MSS Mánikyasūri, bop. eyer, mentions Haribhadra as his predecessor on the theme 7. Padmanābhs composed a Yaśodh8racarita in Sanskrit in nine contos There is one MS. of this work, No 1161 of 1891-95 at the Bhandarkar Institute which does not give any indication as to the date of the composition or of the MS Is he the same as Padmanatha, author of MS No 7805 in Rai Bahadur Hiralal's Catalogue ? He must however be older than Pandit Lakhmidāsa who composed his Yasodharacarita in old Hindi In Samvat 1781,1e, in 1724 A D, after the model of Padmanabha 8 Parnadeva composed a small work in 311 Sanskrit stanzas on Yasodhara, of which there is a MS No 548 of 1884-86 at the Bhandarkar Institute I could not get any clue to fix the date of the author 9 Ksamākalyãng composed a Yaíodharacarita in Sanskrit prose and in eight chapters. There is one copy of the MS, No 394 of 1880-81, of this work at the Bhandarkar Institute In the introduction to his work, Ksamākalyada mentions Hari bhadra ssawriter of a Prakrit Yasodharacarita:- श्रीहरिभद्रमुनीन्द्रविहितं प्राकृतमयं तथान्यकृतम् । सस्कृतपद्यमयं तत्समस्ति यद्यपि चरित्रमिह ॥ ८॥ तदपि तयोविपमत्वादर्थावगमो हि तादृशो न भवेत् । तदहं गद्यमयं तत्कुर्वे सर्वावबोधकृते ॥ ९ ॥ Ksemākalyāna wrote his work in Samvat 1839, 1. e, in 1782 A D, as is clear from the following colophon to his work वर्षे नन्दकृशानुसिद्धिवसुधासंख्ये नभस्ये सिते पक्षे पावनपञ्चमीसुदिवसे श्रीजेसलाद्रौ पुरे। 10 There is, at the Bhandarkar Institute one more MS of the Yośdhar carita' No 804 of 1892-95 A few pages at the beginning are missing and the colophon also does not mention the name of the author The work, however, is divided into four cantos, and the MS is dated Samvat 1581, 1 e, 1524 A D Besides these writers in Sanskrit on Yasodharacarita whose works I could examine at the Bhandarkar Institute, the following are mentioned in Rai Bahadur Hiralal's Catalogue - -26- JASAHARACARIU 11. Mallıbhūsana, No 7788. 12. Brahmanemidalta, No 7800 13. Srutosāgara, No 7804. Is be the same as the commentator on Somadeva's Yašastilaka? 14 Padmanātha, No 7805, probably the same as Padmanābba above The Jain Granthāralı adds one moro name to the list 15 Hemakunjara, wbose work consists of 370 ślokas only. The following writers, presumably in Sanskrit, on the theme are referred to in Worke already examined: 16 Prabhañana, mentioned by Vásavasena 17 Harisena, mentioned by Vásavasena 18. Vatsarāja, referred to by Gandharva in passages added to Puspadanta's work The following writers wrote on the theme in Prakrit and Apabhramsa respec“ tirely 19 Haribhadra, on the authority of Ksamākalyāna and Manikyasūri 20. Puspadonta, the author of the present work. Besides thcso I have discovered the names of the following writers in vernaculors on the theme 21 Janna composed his Yasodboracarita in Kannada in 1209 A. D, in the reign of Vira Ballal (1173-1220 A D). His work is in prose and verse and is divided into four avatāras In the introductory portion of bis work he says that the story was already narrated in Sanskrit, Prakrit and kannada by former poets (See karnātaka-kavi-carite, Vol I, UFR B R Narasimhücārya) 22 Lakhmidäss or Pandit LakumIdāsa wrote a Yasodharacarita in Hindi, of which there is a copy at the Bhandarkar Instituto and bedrs No 681 of 1895-98. The Pandit says that he wrote the work after the model of Padmanabha in the year 1781 of tho Vakrama era, 1 c, in 1924 A D 23 Jinacandrasűri of Kunratara Gacoba wrote a Yaśodharacarita in old Gujarati, MS of which, No 1489 of 1887-91, is deposited at the Bhandarkar Institute I think ho belongs to 16th century. 24. Dovondra composed in old Gujarati a Yasodbararása, a MS. of which, No. 1468 of 1886-92, is deposited at the Bhandarkar Institute. Both Jinacandra and Devendra have not been mentioned by Mr M. D Desai in bis Jain Gurjara Kavio vol | He hollover mentions four more poets of old Gujarati on the theme - 25. Lāvanyaratna composed a Yasodharacarita in Gujarati which 18 dated Samvat 1573,1 6., 1516 A, D 26. Manoboradāsa composed a similar work in Gujarati dated Samyat 1676 ie, 1619 A, D INTRODUCTION 29. Brahmajinadāse composed a Yasodbararāsa in Samyat 1520,1 6, 1463 A.D 28 Jñānadāsa composed & Yasodhararāsa in Samvat 1670,1 e 1613 A.D 29. An unknown author, perhaps Vadırāja composed in Tamil & Yasodharacarita in the 10th century (See Introduction to Vadirajā's Sanskrit work, page 6) It will be clear from the above list of writers to what extent Jasahara was popular with the Jains from the time of Haribhadra down practically to the close of the 18th century of this vast literature on the hero, only two works, Somadeva's Yasastilaka and Vädırāja's Yaíodharacarita are made known to the world and the present work is the third. Its special interest is not thus the narrative, but the language, the Apa bhramga larguage of Mahārāstra of the 10th century I am reserving for my introduotion to Puspadanta's Tosatthimahāpurisagunālamkāra, a detailed examination of all his works from the linguistic point of view, their vocabulary and metre, as the present work 18 only one-twentieth of his extensive literary activity I have bowever added to the present text an Apabhramsa-Sanskrit Glossary and a few notes to help the reader. 5 THE STORY OF JASAHARA There was on this earth & prosperous and beautiful country named Yaudheya, the capital of which was Rājapura King Māridatta ruled over this country and spent most of his time in the full enjoyment of princely pleasures One day there came on a visit to the capital, a Kāpātikācārya, named Bhairavānanda He used to wander in the city for begging alms and also for the purpose of initiating people in the faith of the Kāpālıke school He himself proclaimed that he possessed supernatural powers of visualising things of all times, that he had the power of remaining young for ever and that he could even check the movements of heavenly bodies like the sun and the moon The news of the visit of Bhairavānanda reached the king's ears, and be sent one of his elderly minister for bım On bis arrival at the court the king respectfully bowed down to him and begged of him the favour of the power of moving into the air Upon this Bhairavānanda said that he would certainly secure for him that power of goddess Candemārl is worshipped with the offering of pairs of all living beings inoluding a human pair The king immediately ordered his officers to secure such pairs The officers accordingly brough these pairs except & human pair The king again ordered one of the officers to secure one and he began to search various places for at At this junctures there came on a visit to the town & Jain monk called Sudatta, accompanied by his two pupils in the stage of ksullaka, named Abhayaruci (boy) and Abhayamati (gul) He at first halted at & garden adjoining the town, but finding that place unsuitable, he went to the cemetery The two ksullakas under training with bim asked their teacher's permission to go for begging into the town, when they were moving into the town, the king's officers caught them and brought them to the temple of goddess Candamári. The pair of ksullakas blessed the king in grave tone which attracted his attention. The king was greatly impressed by their figure and -28 JASAHARAJARIU asked them whether they came from & royal family and how it was that thoy took the vow of ascetic life in so tender an age The boy ksullaka thereupon said to the king that a pious narrative like his own would be wasted on an assembly of impious men but the king stopped all the noise of drums and other musiqal instruments and pressed him to give the narrative Thereupon the ksullaka said - There is a country in this Bharata Varsa called Avantı with Ujjayini as its capital There rulod at this place a king, Yasobandhura by name His son Yasorba succeeded him to the throne He married princess Candramati, daughter of king Azitāngs. I was the son of this couple and was named Yasodhar& I was trained in all the princely arts and crafts of the age, and, when in youth, was married to the princess of Krathkaisika and to a few more princesses. In due course of time king Yasorha saw his bair turning groy and immediately decided to place his son Yasodbara on the throne and lead the life of an ascetic The young king Yasodhara firmly established his rule on the earth in a short time II King Yasodhara was so much addicted to pleasures of youth that he felt even the responsibility of his kingship an obstacle to the full enjoyment of life. Now one day in full moon-light, the king Yasodhara went to the palace of his queen Amrtamatı At about midnight, when the king was in bed and apparently asleep, the queen gently got herself froe from the king's arms and quietly went out to meet her paramour who was an ugly figure of a hump-back The king was astonished at this conduct of the queen and followed ber sword in hand The queen, on approaching the hump-baok, pressed his feet to win him, but he got angry as she was late, and even kioked her. The queen however declared hur helplessness and said that she would indeed be glad and worship the goddess if her husband was dead. The king on watching this bebaviour of the queen was at one moment about to strike them both with his sword but he thought that he could not with propriety kill a woman and a mean fellow like her paramour So be returned home in disguet The queen also returned to her bed before dawn Disgusted with what he saw the previous night the king at first thought of leava ing the worldly life and becoming an ascetic Accordingly be declared in the court the next morning to his mother that he saw a bad dream the previous night to the effect that he must at once be a monk or he would die The mother however proposed that she would rather offer an animal victim to the goddess to counteract the effects of the epil dream. The king proposed that, instead of an animal, & cook made of flour be offered which was done accordingly The flour was eaten by all as flesh of a cook But the king, returning home, placed ble son on the throne and made preparations to go to the forest On hearing this the queen came to him and told him that she had arranged a feast after which she also would accompany him to the forest. The king was tempted to wait and partake of the feast, at which the queen poisoned both the king and bis mother The king fell on the ground under the effect, of the poison when the queen, apparently wailing, threw her body on him and strangled him in the neck to death -29 INTRODUCTION His mother also died as a result of the poison His son Jasavai came to the scene and in grief performed all the funeral rites with due pomp so that his father and grand mother might have good life in the future But on account of the offering as a victim of the artificial cook, king Yasodhara was born & peacock and Candramati a dog in & forest The peacock was brought to Ujjayini and presented to king Jasavai by a forester Yasodhara in his birth as pescook saw his queen still leading & vicious life with her paramour and in anger attacked them both The queen struok the pescock with her girdle and thus broke one of its legs Her maids persued the peacock, when the dog, queen mother Candramatı of the previous life, came there and killed it. King Jasaval came there and with the stroke of a sped killed the dog In their next birth Yasodbars and Candramati respectively became a mangoose and a snake Both these met their death in the forest, the snake being devoured by the mangoose and the mangoose by & boar III Resuming the narrative, Abhayaruci said Jasahata was born a fish in his next birth in the river Siprā, and his mother's soul a crocodile. While this crocodile attempted to catch the fish, one of the maids of the palace fell on them in the course of their water-sport, and the crocodile caught her The fish thus escaped from the clutches of the crocodile who was caught by the royal order and so also the fish The crocodile died on being placed on the ground, while the fish was taken to the royal kitchen, was out and fried and served to Brahmins by Jasavai in the name of his father Jasahara In their next life Candramati was born a she-gost and Jasahara a he-goat to her While in youth the he-goat the son was enjoying sexual pleasures with the she-goat, the he-goat was killed. Jasabara's soul passed into the womb of the she-goat again One day king Jass781 caught the she-goal and cut ber when he saw the child in the womb still alive The young one was brought up in the palace, but one day Amrtamatı ordered it to be killed Next Candramati and Jasahara passed through successive births of buffalo, cook and hen While in this last birth they were placed in a cage under the charge of an officer of Jasaval This officer met a monk who delivered to him a long discourse on Jainism, The officer was, as 8 result of the conversation, converted to Jainism and the occks recollected their previous births But at this very juncture the cocks in the cage were killed by an arrow of king Jasaval who wanted to show his skill in archery to his queen, Kusumāvall, and the souls of Jesabara and Candramati then passed into the womb of the queen as twins, the boy Abhayaruci and the girl Abhayamat! In course of time the twins attained youth King Jasavai went to the forest to hunt with five hundred dogs He met there a Jain monk named Sudatta, and thinking his presence to be a bad omen, he discharged all his dogs against the monk But by the prowess of the monk they all stood before him with bent heads, The king thereupon thought of killing the monk with bis sword, when the merchantfriend of the king intervened and asked him to prostrate before the monk who, as the merchant said, renounced his kingdom of the Kalinga country because he punished an innocent person by mistake King Jasave was moved by this narrative, bowed down to the monk, and thought in his mind to cut off his head in order to expiate his -30% JASAHARACARIU sins. The monk knew the king's thoughts and asked bim not to do such a rash act. The king was agoin surprised to see that the monk possessed the power of knowing the thoughts of olhers and asked him further to tell him where his father, mother and grandmother were born The monk thereupon narrated to him their various birthe, saying in conclusion that his father and grand-mother were born to bim as his son Abbayaruci and daughter Abhayamatı, while his mother was born in the fifth hell IV On bearing this narrative king Jasavai kas moved, and decided, despite the gentle persuasions of his harem, to live the life of a monk Abbayaruci and Abhayamatı also recollected their previous births and fainted When they were brought round they at first thought of becoming monks, but being too young and being advised on the principles of Jainism by Sudatta, postponed the project for some time, and became ksullakas, novices Abhayaruci concluded his narrative by saying to king Mārıdatta that they were, while wandering as ksullakas, caught by bis men and brought to the temple of Candamārſ On hearing this account both the goddess Candamarı and king Mârıdatta repented and requested the ksullaka to initiate them into the fold of Jainisin The ksullaka however replied that he could not do that, but his teacher alone could admit them into Jainism At this juncture Sudatta come there, narrated the past lives of king Maridatts and others Bhairavānanda also became disgusted with his mode of life and all the three were converted to Jain faith. At this stage Abhayarucı became a monk and Abhayamati a nun, and after having lived & pious life, were born as gods in the Isans heaven 6. ACKNOWLEDGMENT OF OBLIGATIONS . It now remains for me to perform the pleasant duty of thanking all those who, one way or the other, assisted me in the production of the present work I must thank in the first place Rai Bahadur Hiralal, who, through the kindness of my friend Mr. V K Deshpande B A, LL B, Additional District and Sessions Judge in the C P and Berar, put me in coinmunication with the late Mr. Jaykumar Devidas Chaware, Pleader of Akola. It was late Mr Chawre who made all the necessary arrangements for my inspection of the two Bhandars at Kāranjā The lovers of Indian scholarship owe a special debt of gratitude to the generosity and munificence of Shet Gopal Ambadas Chaware, Banker and Merchant of Kāranjā in Berar, who has set apart a large sum of money for the purpose of starting the Series Ambadas Chaware Digambar Jain Granthamālā, to perpetuate the momory of his late father It is through this Series that the valuable treasures of the Kāranjā Jain Bhandars will be made known to the world of Echolars I am particularly indebted to him for the courtesy he showed me during my stay at Kāranjā and for the honour he did me in entrusting the edition of the present work. -31- INTRODUCTION To Professor Hiralal Jain, M A, LL B, of King Edward College, Amraoti, and the General Editor of the Series, I owe a special debt of gratitude It was Professor Jain who did me the honour of entrusting the editorship of this first volume, and bore through patiently with me in my protracted labours of editing and printing It was he, as Rai Bahadur Hiralal had already said in his introduction to the Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts in C P and Berar, who first inspected the Kāranjā Jain Bhandars and made their precious treasures known to the world Professor Jain helped me in other ways also He procured for my use a valuable MS from Pandit Jugal Kishore Mukhtar of Samantabhandrāsrama, Delbi, and sent me from time to time any piece of information that he might have come across His articles on the Apabhramss literature in the Allahabad University Journal, Vol I and on Paspadanta in the Jam Sahitya Samsodhak, Vol II 111 and others, have been of great use to me To Pandit Nātbūrām Premi and to Professor HD Velankar of the Wilson College, Bombay, I convey my thanks for respectively procuring for my use the MSS from the Bhandars at the Terapanthi Jain Mandir and the Ailak Pannalal Sarasvati Bhuvan in Bombay Nor should I forget to mention the deep obligations on me of my friend Mr G K. Gokhale, Secretary, Shri Ganesh Printing works, Poona, who, as Printer, did his best to produce the work with utmost core and promptitude, and never minded the troubles and inconveniences of the rather exacting editor. His staff, I am glad to note, cheerfully co-operated with him and with me in looking even to the minute details of printer's technicalities. Fergusson College, Poona January 1981 PL VAIDYA जसहरचरिउ
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er तिहुर्वणसिरिकंतहो अइसयवंतहो अरहंतहो हयवम्महहो । पणविवि परमेटिहि पविमलदिहिहि चरणंजुयल णयसयमहहो ॥ ध्रुवकं ॥ कॉडिल्लंगोत्तणहदिणयरासु वल्लहरिंदधरमहयरासु। णपणहो मंदिरि णिवसंतु संतु अहिमाणमेरु कइ पुष्फयंतु। चिंतह ये हो घणणारीकहाए पजत्तर कयदुक्कियपहाए। कह धम्मणिवद्धी का वि कहमि कहियाइ जाइ सिर्व सोक्खु लहामि । पंचसु पंचसु पंचसु महीसु उप्पजइ धम्मु दयासहीसु। धुर्ड पंचसु दससु विणासु जाइ कप्पंधिवखइ पुण पुण वि होइ। कालावेक्वड पढमिल्लु देव इह धम्मवाइ सियवसहकेट । पुरुएँउ सामि रायाहिराउ आणदिउ चउसुरवरणिकाउ। घत्ता-वत्ताणहाणे जणु घणदाणे पई पोसिउ तुहूं खत्तधरु ॥ तवचरणविहाणे केवलणाणे तुई परमप्पउ परमपरु ॥ १॥ IO 2 5 5 जय रिसह रिसीसरणवियपाय जय अजिय जियंगयरोसराय। जय संभव संभवकयविमोय जय अहिणंदण दियपओय । जय सुमहसुमइसम्मयपयास जय पउमप्पह पउमाणिवास। जय जयहि सुपास सुपासगत्त जय चंदप्पह चंदाहवत्त । जय पुप्फयंत दंतंतरंग जय सीयल सीयलियवयणमंग। जय सेय सेयकिरणोहसुन जय वासुपुज्ज पुजाणुपुज। जय विमल विमलगुणसेढिठाण जय जयहि अणंताणतणाण । जय धम्म घम्मतित्थयर संत जय संति संतिविहियायवत्त । जय कुंथु कुंथपहुअंगि सदय जय अर अरमाहर विहियसमय। जय मल्लि माल्लियादामगंध जय मणिमुन्वय सुब्धयणिबंध । IO 1. ! STB road तिहुयण. २. SB चलण ३. अइसयमहहो ४.3 कोढिण्ण ५ BIB चितइ हो ६. 8 लहु मोक्खु. ७. धुचु ८. STB पुरुदेवसामि. ९. चउविहसुरणिकाउ. 2. 1. STB णमिय. २. 81B सीयल. 3. अणंत अणतणाण. ४ सुदयः पुष्पदंतविरइयउ [I 2.11- जय णमि णमियामरणियरलामि जय णमि धम्मरहचकणेमि । जय पास पासछिंदणकिवाण जय वहमाण जसवडमाण। घत्ता-इय जाणियणामहि दुरियविरामहि परिहिवि णवियसुरावलिहिं ॥ अणिहणहि अणाइहि समियकुवाइहि पणविवि अरहतावलिहिं ॥२॥ 3 5 - i.. पुणु पभणमि जसहरणिवचरितु वइयरविचित्तु जं जेम वित्तु । बहुदीवमहण्णवमंडलिल्लि इह तिरियलोइ मयसंकडिल्लि । वित्थिण्णए जवुदीवि भरहे खरकिरणकरावलिभूरिभरहे। जोहेयउ णामि अस्थि देसु णं धरणिए धरियड दिव्ववेसु । जहिं चलई जलाई सविन्भमाई णं कामिणिकुलई सविभमाई। भंगाई कुकइत्तणाई जहिं णीलणेत्तणिद्धई तणाई। कुसुमियफलियई जहिं उववणाई णं महिकामिणिणवजोव्वणाई। गोवालमुहालुंखियफलाई जहिं माहुरई णं सुफयहो फलाई। मंथररोमंथणचलियगंड जहिं सुहि णिसण्ण गोमहिसिसंद। जहिं उच्छवणई रसदसिराई णं पवणवसेण पणचिराई। जहिं कणभरपर्णविय पिर्क सालि जहिं दीसइ सयदलु सदलु सालि। जहिं कणिसु कीररिंछोलि चुणइ गहवइसुयाहि पडिवयणु भणइ। छोकरणरावरंजियमणेण पहि पउण दिण्णु पंथियजणेण । जहिं दिण्णु कण्णु वणि मयउलेण गोवालगेयरंजियमणेण । जहिं जणधणकणपरिपुण्ण गाम पुरणयर सुसीमाराम साम । 15 घत्ता-रायउरु मणोहरु रयणंचियधरु तहिं पुरवरु पवणुद्धयहि ॥ चलचिंधहि मिलियहिं णहयलि घुलियहिं छिवइ व सग्गु संयंभुहि ॥३॥ -- 10 ५ 8 जयवडूढमाण ६ B परहवि. 3. 1.ST इय २ 8T जबुदीवभरहे ३ P भगालय ४ Tणितणाइ ५ 'सुक्कय ६ SB सुहु- णिसण्ण, " सुहणिसण्ण ७SB पणमिय, विणमिय. ८.P पक्क. ९ कणधणभर १० SB सणीलाराम. ११. PB पवणुध्दुएहि १२ P सयभुएहिं.
15.5.] जसहरचरित 4 5 जं छण्णां सरसहि उववणेहि णं विद्धउं वम्महमग्गणेहि। कयसहहिं कण्णसुहावरहि कणइ व सुरहरपारावहिं। गयवरदाणोल्लिय वाहियालि जाहिं सोइह चिर पवसियपियालि। सरहंसई जहिं णेउररवेण मउ चि कैमति जुवईपहेण । जं शिवभुयासिवरणिम्मलेण अण्णु वि दुग्गउ परिहाजलेण । पडिबलियबइरितोमरझसेण पंडुरपायारिणं जसेण। णं वेदिउ वहुसोहग्गभारु गं पुंजीकय संसारसारु। जहिं विलुलिय मरगयतोरणाई चउदारई ण पउरांगणाई। जाहिं धवल मंगलुच्छवसराई दुतिपंचसत्तभोई घराई। णवकुकुमरसण्डयारुणाई विक्खित्तदित्चमोतियकणाई। गुरुदेवपायपंकयवसाई जहिं सम्बई दिव्वई माणुसाई। सिरिमंतई संतई सुत्थियाई जहिं कहिमि ण दीसहि दुत्थियाई । जहिं णिच विजयदुंदुहिणिणाउ तर्हि मारिदत्तु णामेण राउ । घना-कोवग्गि जलियहिं परमंडलियहिं जो खंडइ अहिमाणसिह ॥ जस णिहिघडधारिणि आणाकारिणि वियरइ सिरि घरदासि जिह ॥ ४॥15 9 5 चारण कण्णु विहवेण इंदु दंडे जमु दिण्णपयंडघाउ सुरकरिकरथोरपयंडवाहु भसलउलणीलधम्मिल्लसोह गोउरकवाडाइविउलवच्छु रूवेण कामु कंतीए चंदु। परदुमदलण वलेण वाउ। पञ्चंतणिवइमणि दिण्णदाहु । सुसमत्थभडह गोहाण गोहु। सत्तित्तयपालणु दीहरच्छु। 5 5 4. सुहावणेहि. २ ST M. 3.8 चिकमंति, " विक्कवंतिः ४. ST पवराणणाई.५ S भउमई "भूमी ६. 8 दिट्टई ७ णिचु ८, ७ घरि दासि. 5 १. STB परवलदलणवलेण वाउ. २. Porthon beginning with this line and ending with कडवक 8, is, curnoualy enough, omitted in S as well as in T. ५ [I.56- 10 पुप्फदंतविरइयउ लक्षणलक्खंकिउ गुणसमुहुँ सुपसण्णमुत्ति घणगहिरसई । विण्णाणणाणतेपण तरणि परणिवइ ण वुज्झइ धम्मसरणि । तहो वुडहूवजससेस सब संठिय जे तरुणसरतगन्ध । हिंडइ समवयसभडेहि जुत्तु परिपकवुद्धि एकु वि ण पत्तु । जोवणमउ सिरिमउ जेत्थु फार वटृति तेत्थु वहलंघयार। कहिं दीसह तहिं सुहमग्गु सारु बुहरवियरहिं विण विहिय चारु । कइया वि तुरइ आरुहिवि भमइ घर खुदिवि खरखुरखण्णु कमई। कझ्या वि इत्थि चडिर मइरंगि अंकुसेण भमाडइ विविहभंगि । वणि भमइ कीलउच्छल्लचित्तु रमणीहि पउहर णियह चित्तु । वल्लीमंडवि कामिणिसमाणु रइसुढ भुंजइ रइबद्धठाणु। 15 पुणु कक्खि जाइ सुणहहिं समग्गु अवलोयह मयसूयरह मग्गु । कइया वि पुरउ गिजं व गीउ अप्पुण गायइ रहसिं अभीउ । णञ्चावइ घरिणि धरेवि तालु वजउ वजावद पुणु णिवालु। छंदें विरजइउ करइ कम्म विण वुढ्यणेहिं कहिं लहइ धम्मु । पत्ता--तहो रज करतहो जणु पालंतहो मंतिमहल्लिहिं परियरिउ ॥ एतहिं रायउरहो घणकणपउरहो संपत्तउ कउलायरिउ ॥५॥ 20 6 ताह जगह भयाउलु अलियरासि तहि भमह भिक्खअरु देह सिक्ख बहुसिक्ख हिंसहियउ डंभधारि सिरि टोप्पी दिण्णरवण्णवण्ण अंगुलदुतीसपरिमाणु दंड गलि जोगवट्टु सजिउ विचित्तु तडतडतडतडताडयसिंगु भइरउ अहिहाणि सधगासि । अणुगयहं जणहं कुलमग्गदिक्त। घरि घरि हिंडइ हुंकारकारि। सा झंपवि संठिय दोषिण कण्ण । हत्थे उप्फॉलिवि गहइ चंड। पाउंडियजम्मु पइ दिण्णु दित्तु । सिंगग्गु छेवि किउ तेण चंगु । un AM ma- 6 ३. B समूहु ४. B सोहु ५ B करइ ६. B रइसुह. ७ B अप्पणु ८ B घरणिहिं. ९ B परिवरिउ. १ PA जगडइ राउलु २ PA अहिणामि ३ Bहुकारिकारि ४ B सिरटोप्पी. ५ B अप्फालिवि. ६ B पावड़िय AB add before this hne बहुवियपासियउवएसदुडु चलघुम्ममाणु परलोयभट्ठ अपि अप्पहो माहप्पु दप्पु IO 15 1.7.2] जसहरचरित अणउंछिउ जंपई थुणइ अप्पु। महु पुरउ पसंप्पिय जुयचयारि हउँ जरई ण धिप्पमि कप्पधारि । णल णहुस वेणु मंधाय जेवि महि अँजिवि अवरई गयई तेवि। मई दिट्ठ रामरावण भिडंत संगामरंगि णिसियर पडत । मई दिलु जुहिडिल बंधुसहिउ दुजोहणु ण करइ विण्डकहिउ । हउँ चिरंजीविउ मा करहु मंति इउं सयलह लोयहं करमि संति । हउँ थंभामि विहि विमाणु जंतु चंदस्स जोण्ह छायमि तुरंतु । सबउ विजउ मह विप्फुरंति बहु तंत मंत अग्गइ सरंति। इय जपंतहो तहो जाय वत्त सा मारिदत्तकणंतु पत्त । जायउ कोऊहलु रहसजुत्तु दीसइ झडति परिसउ पत्तु । पेसियउ महल्लउ गुणवरिष्टु गउ तेण भइरवाणंदु दिहु। आपसु करेविणु भणइ मंति तुह दंसणि रायहो होइ संति । सिग्घउ गड जहिं ठिउ परवरिंदु सहमज्झि परिहिउ णं उबिंदु । दिट्ठल जोईसरु णरवरेण सीहासणु मेल्लित रहसिरेण । संमुहु जाएविणु धरणि पडिउ दंड व्व दंडपणिवाइ णडिट । आसीसिउ गरवह भइरवेण हउँ भइरउ तुहउ णियमणेण । उच्चासणि वइसाविवि तुरंतु सलहणहं लग्गु तहो पैई पटतु । तुहुं देव सिटिसंहारकारि तुहूं जोईसरु कुलमग्गचारि। तुई चिरंजीविउ जं हुवर किंपि पयहि जे होसइ कन्जु तं पि । तुहूं महु उप्परि साणंदभाउ वियरहि हो सामि महापसाउ । धत्ता-जोईसरु मणि तुहउ चितइ दुट्ठउ इंदियसुहु महु पुजइ ॥ जं जं उद्देसमि तं भुजेसमि आएसहु संपजइ ॥ ६॥ 20 25 7 ता चवह जोई महु सयल रिद्धि विप्फुरइ खणंतरि विजसिद्धि । हर हरणकरणकारणसमत्थ हउँ पयदु धरायलि गुणपसत्थु । ८. Bजं सइ. ९ B समाप्पियः १०. चिरु.११ B सवह. १२ B रविह. १३. B. कण्णति.१४. B पयः १५ PB चिरु १६. B विरयहि. 7. १.PA राय.
[1.7 3- पुष्पदंतविरइयउ जंजं तुहं मग्गहि किं पि वत्यु तं तं हां देमि महापयत्थु । पप्फुल्लवयणु ता चवह राउ महु खेयरत्तु करि विहियछाउ । तुह खेयरत्तु हउं करमि बप्प परमोवएसु जह णिवियप। भो भो णिवकुलकुवलयमयंक दुव्वारवइरिवारण असंक। माणिसुणहि णियपरिवारवयणु णिस्संकि लब्भइ गयणगमणु । जह देवि पुज आगमिण उत्त जइ जुयलजुयल जीवेहि जुत्त। णहयर थलयर जलयर अणेय पसुपक्खिमिहुण बढुवण्णभेय । जइ णरमिहुणुल्लउ अवयँपुण्णु देवीमंडउ तुहं करहि पुण्णु। तुह एम करतहो बलिविहाणु हउं तूस मित्तु हैं चंडियसमाणु । ता तुज्झ होइ खेयरियसत्ति विजाहर सेवहिं अतुलसत्ति । तुह खग्गि वसइ जयसिरि सछाय अमरत्तु होइ तह अजर काय । घत्ता-इउँ सयलु सुणेवि कउलायरिएं जं भणिउं ॥ खगविजालाहु अवसि होसइ मई मुणिउं ॥ ७॥ IO co co तां रायहो चित्ति चमकु जाउ णिच्छउ अणेण जं कहिउमझ आढतु तलारहं किंकराह पसुपक्विमिहुण आणेहु सज अहियारियाहं कहियउ विसेसु सुपयच्छहु भत्तिभरेण णवडु जं कि पि चवइ तं करहु आसु रहसिल्लु राउ हिंसाहिणंदु आइकूरदुरग्गहगहिउ जेण जो होइ मिच्छमयगहिउ सहित दिनु होपपिणु कजाणुराउ। तं करमि जइ वि करणहं असज्झु । वलियहं जमैदूअभयंकराई। देवीमंडउ पुरेहु अज। एयहो जोईसहो घणु असेसु। उप्परि आयहोसियछत्तु तडहु । जिह होइ मज्झु पुण्णाहिलासु। उवएसि कउलहो हुवउ णंदु। कजु व अकज्जु वावरह तेण । ण वि मण्णइ सो बुहयणहि कहिउ। 10 २ B मगहि ३. B omits मा. १. B हिस्संकें. ५ B जुवलजुयल ६ B बहुवण्णि ७. B अवइपुण्णु. 4.Bहं ९, B इय. १० B अवसें. 8 १. AB तो. २. B होएविणु ३ B. जम इव ४ B. कवलहो. ५, B. जाणइ.
I.9.14] जसहरचरित जह अंधु ण णियइ कुमग्गम] जह जलु घोरणिकिउ तहिं विलग्गु । जह करिहि सुंर्ड चउदिसिहि वलइ तह गरवइमणु पेरियउ चलइ । इम मारिदत्तु परिहरिवि सन् जोईसहो वयणि विलग्गु भन्नु । हिंसाजीवह संसारसरणि जीवहं अहिंस सुहकम्मघरणि । गंध भणइ महं कियउ एउ णिवजोईसहो संजोयमे। 15 घत्ता-अग्गइ कइराउ पुष्फयंतु सरसइणिलउ ॥ देवियहि सरुट वण्णइ कइयणकुलतिलउ ॥ ८॥ 9 en धेयालकालमगियमिसाहि तहो रायहो केरी वरिमारि उरयलि विलुलिय गरेरुंडमाल फणिवद्धदीहलंविरथणाल ललललियजीह रुहिरोलचोल घोणसकडिसुत्तयलिहियपाय जिम्मंस भीम चम्मटिसेस पेयंतावलिभूसियभुसंग णिरसिय दूसिय जइ णिंदमन्ग गुंजारुणदारुणचवलणयण कंकालकवालतिसूलधारि अण्णांण कुलिंगदेषभन्तु तंर्णयरदाहिल्लियदिसाहि। फुलदेवय णामि चंडमारि। सिसुससिसममुहदाढाकराल। तइयच्छिविणिग्गयजलणजाल । वसकद्दम चिक्कियकवोल। पिउवणधूलीधूसरियकाय । सिहिसिहसंणिहर्फरुसुद्धकेस। तासियपासियवहुजीववग्ग। णग्गी दुच्चार वियारभग्ग। पलकवलगिलणपायडियवयण । किवण्णमि जा पञ्चक्नमारि। मारणसीलउ सो मारिदत्तु। 10 घचा-पिच्छिवि कंचाइणि रुहिरंचाइणि चक्कसूलअहिखग्गधरि ॥ जयकारियभावि विमलसहावि मह परमेसरि दुरिउ हरि ॥९॥ wroom ६. B. कुमग्गु मग्गु. ७. B जिह जलि. 4. B तहिमि लग्गु. ९. P. सुंदु 9. १. Tत नयरह २. T ढाहिणिलिय.३ वेरिमारि ४ AB उरयल. ५.ST मुंड ६ लललुलिय १० T अण्णाण ७. A चयकिय. ८. फुरिसुटकेस, 8 फलरुद्धकेस. ९ A भुवग्ग, PT भुयग ११. कुदेवकुलिंगि. जस...२ ९ पुष्पदंतविरइयउ [ 1. 10.7- 10 छेलमिहुणसूयरा रोझहरिणकुंजरा। वालवसहरासहा मेसमाहिसरोसहा। घोडकरहभल्लुया सीहसरहगंडया। वग्यससयचित्तया एवं बहु चउप्पया। कंककुररमोरया हंसवलयचउरया। घूयसरढकाउँला कोडिपूसकोइला। कुम्ममयरगो या गाहझसयरोहया। जीव सयल जाणिया तीए पुरउ आणिया। घत्ता-णियजीविउ वंछह संति समिच्छइ परु मारेप्पिणु मूढमइ ॥ णाणाविहमिहुणई रोहई हरिणई मारइ तहि अग्गा णिवह ॥१०॥ 10 11 ar विसभोयणेण किं णर जियंति गोसिंगई किं दुद्धहं सर्वति। घण्णाई सिलायलि कि हवंति णीरसभोजि कहिं कायकंति । उवसमविहीणि कहिं होइ खंति परु मारंतहं कहि होइ सति । करकमलुग्गिण्णकिवाणपण अवियाणएण ते राणएण। मेल्लाविय बहु मिहुणुल्लयाई अवलोइवि चिण्णतणुल्लयाई। रत्तत्तणेत्तजुलि पउत्तु भो चंडयम्म तलवर तुरंतु। आणहि णरमिहुणुल्लउ पसत्यु तं मई मारेव्वउ पढमु एत्यु। आएसु लेहिवि मउलियकरण पेसिय णियकिंकर किंकरण । जोयंति णयरि वहावयासि ते तं सरितरुवेल्लीणिवासि। धत्ता-तहिं तेहइ अवसरि हिंसावासरि पत्तु सुदत्तु ससंघु मुणि ॥ पत्थिवणंदणवणि दुमसाहाघणि कोरमोरकुररउलझुणि ॥११॥ IO Rana 10 1 ABS एव बहु २ B सरह 3 PTS कोइला ४ AB पुंसकोइला, PS पूसकाउला. ५. ST गोह. ६.S ढसय ७ ST णाणामय, B णाणाविहु.. 8 सव्वइं सउणई. 11 १ B सिलाइलि २ T भोयणिं ३ | रायएण. ४ 8 मेसाइयाई मिहुणुल्लयाई, T मेसाइय बहु- ५. A लइवि.६ PBT सुसंघ I. 13.5] जसहरचारित 12 en जत्थ चूयफुसुममंजरिया सुयचंचूचंबणजजरिया। हा सा मुहरत्तेण व खद्धा कहिमि विढेण व वेसा लुद्धा । छप्पयछित्ता कोमलललिया वियेसह मालइ मउलियकलिया। दसणफंसह रसयारी मउँउ को अण वहमणहारी। वायंदोयणलीलासारो तरुसाहाए हल्ला मोरो। सोहह घोलिरपिंछसहासो ण वणलच्छीचमरविलासो। जत्थ सरे पोसियकारंट सरसं णवमिसकिसलयखंडं। दिणं हसणं हंसीए चंचू चंचू चुंयंतीए। फुल्लामोयवसेणं भग्गो केयइकामिणियाए लग्गो। खरकंटयणईणिभिणंगो ण चला जत्थ खणं पि भुयंगो । जत्थासण्णवयम्मि णिसण्णो णारीवीणारवहियकणो। ण चरइ हरिणो दूवाँखंड ण गणइ पारद्धियकरकंदं। जत्थ गंधविसरणं स्ववियो जक्खीतणुपरिमलवेहवियो। हत्थी परिचइ णगोह फंसह हत्थेणं पारोह। संकेयत्थो जत्थ सुहहं सौऊणं मंजीरयसह। महमं तीए तीए सामी एवं भणि णञ्चइ कामी। धत्ता-तं वणु जोयंतिं मयणकयंति भणिउं पत्तैफल्लु भिजइ ।। समदमजमवंतहं संतहं दंतहं पत्थु णिवासु ण जुजइ ॥१२॥ ro 15 13 उग्गदित्ततवतावभासुरो तंच केरिसं कालगोयरं करयरंतकायउलसंकुलं रफ्नसीमुहामुक्कणीसणं पफ्लिपक्वलक्नेहि छाइयं ता गओ मसाणं मुणीसरो। सिवसियालदारियमओयरं। ढंखरुक्खसुक्खेहि णिप्फलं। सूलभिण्णचोरउलभीसणं। किलिकिलंतणिसियरणिणाइयं । 12. १. जत्थ य. २. छप्पइ ३. ST विहसइ ४. AS मउलियमालइ ५ ST मउयउ कोण ६.T णिबिण्णंगो. ७. ST दूवाकंद. ८. 'T' एत्थ. ९. ST सोऊण य १०. AB एउं. ११. SBT पत्तु फलु. 13 2.8 मसाणे. २. P तत्य. ३. सुक्रुक्सेहि ४. ST पक्खिलक्खपक्खेहि • ११ पुष्फदंतविरइयउ [I. 13.6- भीयरं चियाचिञ्चिजालयं चित्तवालपूलोलिणीलयं । धूमगंधधावंतसाणयं सम्वदेहिदेहावसाणयं। पवणपेलणुल्ललियभप्परं भग्गभाणविक्खित्तखप्परं। इंदचंदगाइंदसंथुओ चउविहेण संघेण संजुओ। फासुए विसाले घरायले उज्जले पवित्ते सिलायले। सुद्धमुक्कलेसो अदुम्मई तम्मि संणिसण्णो महाजई। घचा-पालियजिणदिक्खहिं गच्छहु मिक्वहि भणिवि णवेवि णियच्छियउ॥ तहिं गुरु परमेसर हयवस्मीसरु खुल्लयजुलिं पुच्छियउ ॥१३॥ 10 गाणालक्खणचच्चियगतं पहसियवत्तं कयकरपत्तं । पंकैयणे पालियवित्त जिणपयभत्तं विलयविरतं। कलिमलचत्तं सुयणविर दयसंजुत्तं उत्तमपत्वं । धम्मासत्तं गुरुणामुक्कं सगुणगुरुकं जियमयचकं। अहिमाणिक रुइरहियकं पुरवहिदुकं कम्मविमुकं । 5 वालयजुयलं दहुं विमलं धुणियं कमलं लवियंसमलं। णरणियरेणं खग्गकरणं पावपरणं कडुयसरेणं। एयं मिहुणं परमं गहणं सुहसंगहणं दुहणिम्महणं। चारुकरगं केवसमग्गं विहिवसमग्गं मारणजोग। मयउलविलए चियविलए महियलतिलए देवीणिलए। धत्ता-इय तेहि भणेप्पिणु मिउडि करेप्पिणु सयण किरणमालाफुरिउ ॥ तं सिसुजुयलुल्लड तिहुवणि भल्लउ रूसिवि करपल्लवि धरिउ ॥१४॥ 10 ५T महामई ६. ता 14 1 This line and the two following ones are arranged in Mss in various ways, the wording being the same २.Tभावसमग्गं. ३. T णिच्छियणिलए I. 16.2] जसहरचरित 15 IO तंजणभयजणणं सिरणिल्लणणं णाऊणं । कयजीवविमई मारणसई सोऊणं ॥ अभयरुइकुमारो णिजियमारो थिरु चवद । सुकियहलवेल्ली णियवहिणल्ली संठवइ । मा वीहसु कण्णे अच्नु पचपणे मरणदिणे । हिययं अविवंकं गयस्वयसंकं ठवसु जिणे ॥ छिदड तणुचम्मं भिंदउ वम्मं रसवसउ । भक्खर जंगलयं चंपउ गलयं रक्खसउ॥ घुट्टउ कीलालं लंडउ सीलं जइण मुणी । ता होइ पसिद्धो देवो सिद्धो अद्वगुणी ।। किं कुणइ रउद्दो राओ खुदो असुहरणं । अम्हाण अछम्मो जिणवरधम्मो सहि सरणं ॥ ता भणियं तीए चंदमुहीए कयपुलयं । पई उत्तं जुत्तं जं जिणसुत्रं णिम्मलयं । अवरोप्पर खंतई संतई दंतई दमियाई । दुद्दमि भवकदमि जं चिरुणिरसमि भमियाई ॥ मई हियएँ धरियं ण हुवीसरियं तं खणु घि। एवहिं अवगण्णमि जीविउ मण्णमि ण उतणु वि ॥ घत्ता-इय वे वि चवंतई जिणु सुमरंतई कउलकुडंवाणंदिरहो। पकलपाइकहिं जमलल्लकाहिं णियइं तिलिणिमंदिरहो॥१५॥ 15 20 16 जाहिं रसियसिंगाई उद्धरियकंडाई लवंतमाऊरपिछोहणिवसणई भुमदंडदक्ववियकोअंडदंडाई। मसिधातुमंडियई पित्तलविहसणई। 15. १. AB सिरु, २. . सुफय. ३ STB अज्ज. ४. A8 चप्पउ ५. 'T तइ. ६. ST दइवें होतई. ७. AB णिस्समि, 8 णिसमे. 6. B हियह परियं ९. ST तिसूलणि 16. 1. ST कोअंडचंढाइं. २. T मालर.
पुप्फदंतविरइयउ [I. 163- कडिवद्धचलचीरियाचिंधजालाई करघरियविप्फुरियकत्तियकवालाई। पायडियणियगुरुकमाखढलिगाई कुलधोसमयचम्मपच्छाइयंगाई। मुद्दाविसेसेण दूरं णमंताई पयघग्घरोलीहिं घवघवघवंताई। 5 कहकहकहताई सवियारवेसाई मुक्कट्टहासाई झंपडियकेसाई। जहि विविहमेयाई कउलाई मिलियाई कोलंति ढहरई अटुंगवलियाई। जाहिं फरडपडहाई वजंति बजाई इट्ठाई मिट्ठाई पिजंति मजाई। छिजंति सीसाई णिवडंति भीसाई रसवसविमीसाई सजति मासाई। गिर्जति गेयाइं चामुंडचंडाई गहिऊण तुंडेण रंडस्स खंडाई। दुप्पेच्छरत्तच्छविच्छोहदाइणिउ णचंति जोइणिड साइणिउ डाइणिउ। पसुरुहिरजलसित्तपंगणपएसम्मि पसुदीहजीहादलञ्चणविसेसम्मि । पसुअढिकयपिरंगावलिल्लम्मि पसुतेल्लपजलियदीवय इल्लम्मि। पसुकत्तिउल्लोवेचियणहंतम्मि मारीए देवीए देवालए तम्मि। घवा-सीहु व कारतासणु दाढाभीसणु मेहु व विजुविराइयउ॥ 15 इंति व दंतगि उगयनगि लहुं णरणाहु पलोइयउ ॥१६॥ 17 10 5 ता भासियं तेहिं भावि प्फुरतेहि भो सुद्धवरवंस सिरिपोमिमणीहंस भो रायराएस संगहियजससेस । गुणसेढिठाणेण जोइ व्व णाणेण गेहु व्व दाणेण पाणि व्व पाणेण । गिरि विव सिलोहेण तरु विव फलोहेण ससि विव कलोहेण जलहि व जलोहेण । हयकूरकम्मेण तं वह धम्मेण इय महुरघोसेण पसमंतरोसेण। 5 दहण डिभाइ भयमयाणसुंभाई संचिंतियं तेण पहुमारिदत्तेण। लच्छोपियल्लेहि सरलंगुलिल्लेहि पापहि रत्तेहि णक्खेहि दित्तेहि । गूढेहिं गुंफेहि ण मैतगुंफेहि सोहामहग्याहि मसिणाहिं जंघाहि। ३ Tomats सवियार मिलियाई : B दडूढ ५ गतुंडाइ ६ AP पठि ७ 8 विसेसम्मि - ST कित्ति. ९.ST उल्लोयमंचिय १०. S1 उक्खय 17 2 S भाविच्छुरतेहि २. ASTB पोमिणी ३ ST गुप्पेहि 1. 18.15] जसहरचरित णिविदेहि जाहिं करिकरसमोसहि सुविउँलकडिल्लेहिं तुच्छोरिल्लेहि । गंभीरणाहीहि वट्टियसमाहीहि दयवेल्लिरीहाहिं ललियाहिं वाहाहिं। 10 अविलासर्वकेहि रेहातियकेहि गलकंदलुल्लेहिं तिल्लोकमोल्लेहि। छर्णयंदवयणेहिं आयंवणयणेहि संगयपलंवहिं कण्णेहि दिव्वेहि । विवाहलाहेहि महरहि तंवेहि उज्जवहिं णासाहिं कुडिलाहिं भउहाहि । उवइपभालेहि पत्तलकवोलेहि णिवपट्टमालेहि अलिणीलवालहिं । धत्ता-कहि आयहिं वालई णिरु सोमालई हा खल विहि हयसुयणसुह ॥ 15 एए सामुहि समउ समुझे फ्यहि किं ण भुत्त वसुह ॥ १७ ॥ 18 अणिदो गिदो दिणिदो फणिदो सिसूरूवघारी मुरारी पुरारी इमो को वि देवो सुअवत्तभावो मही बुद्धि सिद्धी सुहाणं व लद्धी सुहाणं व जोणी तवाणं व खोणी पसण्णा कुमारी इमा चंडमारी णिएउं गदीरं महं भत्तिभारं जिणं दिक्तपत्तं भवाणंतपतं मणे मंतिऊणं इमं चितिऊणं सवित्तोपउत्तं पसहि वत्तं सरजाय भट्टो पुराओ पणठो तुमं रायउत्तो ण किं को वि धुत्तो इमी कस्स धूया कुलाणंदभूया घरामो पउत्थं किमत्थं वउत्थं सिसूर्ण पि दिक्खा गुणेसुं परिक्खा सुरिंदो उविदो महारुंदवंदो। अणंगो असंगो अभंगो अलिंगो। दिही कंति कित्ती सिरी संति सत्ती । जसाणं च सेणी गुणाणं व खाणी । दुहाणं व हाणी कवीण व वाणी । 5 समाया समाया घरादिण्णपाया। किम भायणेयं महं कहिमि पयं । पमोत्तूण चोजं पपुच्छामि कजं। तिणाणं परत्तं महो हो णिरुत्तं । मुसावायचत्तं अयं इत्थ पत्तं। रिऊणं भयाओ पमोत्तुं पयाओ। पुरं मज्झ पत्तो सढो गूढगत्तो। अमाणं णवाणं जुवं माणवाणं। सिसूणं पि सिक्खा सिसूणं पि भिक्खा। महामभुयं भो महाभुयं भो। 15 10 ४. AB जपति; ST जण्हहि. ५ AS समूहिः ६ ST सुपिहल. ७ AB दयवेलिसाहि. ८ AP भवलास ९. STB छणइंदु. १०. ST omit उदुवइ पट्टभालेहि. ११ ASTB एयहि भुत्त कि ण वसुहः 18 2. S पहारंद, T महारुद्द २. AP सुआवत्तभावो ३. 8 सुयाण. ४. T omits thas and the following line ५ ST जिणे. ६. पवाहेह. ७, ST omit अय इत्थ पत्तं. - १५ - पुष्पदंतविरइयउ [I 1816- धत्ता-अम्हारउ पुरवरु छुहपंकियघरु कि आयउ कुमरीए सहुँ । भणु दुरियखयंकर सवणसुईकर सकहतरु भो कुमर महुं ॥१८॥ 19 in तापरवइणो हरिसं जणियं उत्तमसावयचइणा भणियं। अंधे णट्ट बाहिर गीयं ऊसरछेत्ते ववियं वीय। संलग्गं तक्षणिकडक्वं लवणविहीणं विविहं भक्खं । अण्णाणे तिब्वं तवचरणं वलसामत्थविहीणे सरणं। असमाहिल्ले सल्लेहणयं णिद्धणमणुए णवजोवणयं। णिभोइल्ले संचियदविणं णिणेहे वरमाणिणिरमणं। अवि य अपत्ते दिण्णं दाणं मोहरयंधे धम्मक्खाणं। पिसुणे मसणे गुणपडिवणं रणे रुग्णं वियलई सुणं। घचा-जो जिणपडिकूलहो मत्था सूलहो गुरु परमागमु भासह ॥ सो वयणई सुद्धई णं धयदुद्धई सप्पहो ढोइँवि णासह ॥ १९ ॥ 20 10 7 5 मुच्छं गइ दिजइ सलिल पवणु कि सुक्के रक्खें सिविएण कह राय महारी धम्मचिज वंणिसुणिवि मणि उवसंतु राउ चामुंडचंड डिडिमु रसंतु णिमुकु भीमु हिंसाविणोड ण चलई ण वलइ णं लेपि विहित ता पमणइ अभयरुह सुवाय दिउ णिसुणड अणुहूउ जपि एत्थरिथ अवंती णाम विसर उवसंतहो किजइ धम्मसवणु। अविणीयं कि संबोहिएण। उत्तमपुरिसहं सवणिज पुजा वारिक भभामेरीणिणा। वारिउ किलिकिलिकलयलु महंतु थिए णिञ्चलु णिहुयउ सयलु लोउ। ण भित्तिहिं वित्तयरेण लिहिउ ! देवाणं पिय भो णिसुणि राय । मायण्णहि गरवइ कहमि तं पि। महिबहु मुंजाविय जेण विसउ । IO ८ AB कुमरीहि 19 १. महिवइणो २ BT चइयं. ३ 8 अवत्ते, B अविते ४ । वियलियसुन्नं. ५ ढोयधि. 20. 2. ABST सब्बु २. चवइ. ३. Pण लेवविहिउ ४.8 कि पि.
1.22.1] जसहरचरित घचा-गंदतहिं गामहिं विउलारामहि सरबरकमलहि लच्छिलाह। गलकलकेकाहिं हंसहि मोरहिं मंडिय जेत्थु सुहाइ महि ॥ २० ॥ 21 जहिं चुमुचुमति केयारकीर वरकलमसालिसुरहियसमीर। जहिं गोउलाई पङ विकिरंति पुंडुच्छुदंडखंडई चरंति । जहि वसहमुक्क देकार धीर जीहाविलिहियणदिणिसरीर। जहि मंथरगमणई माहिसाई दहरमणुड्डावियसारसाई। काहलियवंसरवरत्तियार बहुअउ घरकम्मि गुत्तियाउ। संकेयकुदुंगणपत्तियाउ जहि झीणउ विरहि तत्तियाउ । जहि हालिणिरूवाणिवद्धचक्नु सीमावहु ण मुबह को वि जिम्मइ जहिं एवहि पवासिपहि दहि कुरु स्त्रीरु घिउ देसिपहि। पवपालियाइ.जहि वालियाइ पाणिउ भिंगारपणालियाइ। दितिए मोहिउ णिरु पहियविंदु चंगउ दक्वालिवि वयणचंदु। जहिं चउपयाई तोलियमणाई घण्णई चरति ण हु पुणु तिणाई । उन्जेणि णाम तहिं णयरि अस्थि जहिं पाणि पसारइ मत्त हत्थि । घत्ता-मरगयकरकलियहि माहियलि घुलियहि फुरियहिं हरियहिं मूढमह ॥ विडिउ वासई रसविण्णासई णीणिउ मिमिंदगइ ॥ २१ ॥ en जक्खु। IO 22 जहिं चंदकंति माणिक्कदित्ति जाहिं पोमरायराएण लित जहिं इंदणीलपरि कसणकंति सुपहायकालि जोयंतियाहिं अमलियमंडणु मुहु दिटु जेत्यु अप्पाणउं जूरिउ तिहिं जेत्थु जहिं छडयधित्तकुसुमावलीउ उल्ललइ गयणि णं धवलकित्ति । णउ लायइ कुंकुम हरिणणेत्त। वहु णजइ सियदंतहि हसति । मणिभिचिहि चिरु पवसियपियाहि । हा पिय विणु मंडणु हुँउ णिरत्थु । डिभपडिविवहो देइ हत्थु। मोत्तियरइयउ रंगावलीउ। 5 New 21 2.8 कमिण. २ SP पिट.३ T टुक्कार ४ T कुडंगण, AS कुडगुण ५. T विभावियाइ ६.१ टक्खा- लिट. ७. ST दुब्बामएं. 22. 9. T W T 2 ST TE. 3 AS OVE.S omits this line जस...३ . १७ - [I. 22, 8- IO पुप्फदंतविरइयत जहिं णदइ जणु जणजणियसोक्खु णिचोरमारि णिलुत्तदुक्खु । जहिं गयमयसित्ता रायमग्गु हयलालाजलपंकेण दुग्गु। मुहचुअतंबोलरसेण रत्तु णिवडियभूसणमणियरविचित्तु । कप्पूरधूलिधूसरियचमरु मयणाहिपरिमलुम्भमियभमरु । घत्ता-जहिं णरवइ णाएं मंति उवाएं ववहारु वि सञ्च वहइ ॥ कुल कुलवहुसत्थे पुरिसु वि अत्थे अत्थु वि जहिं दाणि सहइ ॥ २२ ॥ 5 23 ताई उजेणिहिं महिवइ पसिद्ध जसवंधुर णामि जससमिद्ध। तहु कुलमंडणु गंदणु जसोह णं खत्तधम्मु थिउ होवि गोहु । णं गुणमेलउ णं तवपहार णं पुण्णपुंजु णं कलकलाउ। णं कुलभूसणु णं जसणिहाणु णं णायमग्गु णं भुवणमाणु । पविग्गहगहविजामणि व दीणाणाहह चिंतामणि व्व। रिउसेल्लसिहरसोदामणि च मंडलियमउलचूडामणि व्य। णं कामजुत्ति णं कामदित्ति ण कामकित्ति णं कामसत्ति । णं कामहो फेरी वाणपंति णं कामहत्थिवीणाय तंति । अजियंगजाय णवणलिणणयण चंदमइदेवितह चंदवयण। हउं जणियउं ताइ महासईए तणुरुहु कन्वत्यु व कइमईए । घता-बहु वैण्णिउ सयणहिं भूसिड रयणहिं हउं जायउ जणणीइ किह ॥ णवमयणरसिल्लिं जायउ फुल्लिं जोवणदुमफलंगुंछ जिह ॥२३॥ 24 सिसुलीलई कीलई सुंहु रमंतु गुणि परिउ वारिउ दोसि /तु । उज्झाएं ताएं पढमि खविउ सुवसिल्लइ भल्लइ विणइ ठविउ । मई लिहियई गहियइं अक्खराई गेयई सरिगमपधणीसराई। IO ५ हरचलिय ६ B भसलु. 23 1 AB भूवइ, 'T' णरवइ. २ ST omib पसिद्ध गंदणु ३ 'T reads णं पावग्गहविजामणि ब्व. ४.S omits दीणाणाहह सोढामणि ब्व ५ ABT सिहरि ६ 8 मण्णिउ ७ मंढिउ ८ AB गोच्छु, 'गुच्छु। 24 3 ST घरि भमंतु २ । दोसदित्तु ३ A पढण 5 10 I. 25.15] जसहरचरिउ फलफुल्लपत्तछिजंतराई सिललेपकट्टकम्मतराई। वायरणई णट्टई णवरसाई छंदालंकारई जोइसाई। मायंगतुरंगारोहणाई मुणियई गुणियई पहरणाई। दिव्वदं कव्वई उवलक्खियाई सम्बई विण्णाणई सिक्खियाई। तारुण्णउं लायण्णउणिवद्ध णउ जाणउं विहिणा किह णिवद्ध । पोढत्तणि पुहिपलष्टियंगु अंगें सहुं हउं णावइ अणंगु। घत्ता -संयलकलासंपुण्णउ विणिहयदुण्णउ जसहरु कुमरु विसालई ॥ समर्वयसहिं जुत्तउ णिम्मलचित्तर कोलइ णयरि सुसालई ॥ २४ ॥ 25 ता एत्थउ कथकोसाउ णित्तु देसाउ मंति चाहिवि स पत्तु। कईवयदिणेहिं गड रयणधाम तोरणमंडिय उज्जेणि णाम । पडिहारहो सच्छिकरेवि चारु सहमंडवि पत्तउ विहियचारु । जयकारिउ राउ जसोहु तेण विणएण विणयभूसियमणेण । तंवोलजुत्त संमाणु विहिर कुसलतु कुसलु ता तेण कहिउ । पुच्छिउ राएं भो मंति एत्यु पयडेहि कन्जु तुहं आउ जेत्यु। ता भणड मंति महियलि पसिद्ध वइराडणयरु जणधणसमिछु । तहिं गरवइ णियकुलकमलभाणु णामेण विमलवाहणु पहाणु । तहो भन्जा देवी णाम साम लक्षणलक्खंकिय मौखाम । सुम अभयमहाएवी सउण्ण णं अच्छर णावह णायकण्ण । सा जोव्वणसढ णिपवि ताउ धूहि परिणावमि हुवउ भाउ। मेलाविय सुयण विसिट्ठ इट्ट जे वुह वियक्त्रण सुइ वरिट्ट। भो पुतिहि कारणि वरु णिपहु को वि रायउत्तु गुणमहियदेहु । मंतेप्पिणु कहियउ सजणेहि उजेणि णयरि हिम्मलमणेहि । जसहरु तहि रायजसोहपुत्तु कण्णाकारणे वरु एहु जुत्तु । 5 10 15 wam-name-Maruti- ----- rommandan- ५. Sr omit this line ५ P omits this line ६ A तुरगम ७. T सच्चइ ८. B पलिद्धियंगु ९ ST अभोरटु १० Porthon boginning with this line and ending with कडवक 27, Iime 23, 18 omitted an S and T ११. A. विसालमइ १२. A वइसहि. 25 १ Bकयवय. २ AB मार ३. B मज्मि साम 20 पुष्पदंतविरहयउ [I 25 16- राएण मज्झु आएसु दिण्णु चालेवि पत्तु हउं इह पवण्णु। पडिहार लेवि तुह लह पर जणसंकुलु रायद्वाणु दिहु। सीहाँसणत्यु पेक्वेवि राय सीसेण णमंसिय तुज्झ पाय । संभासणु करि पुच्छियउ क मई तुम्हहं कहियउ सामि सज्ज । संमालिवि किजाइ कज्जु एहु परसप्पर वट्टइ जेमणेहु। राएं संतुहि कहिउ सन् जंकहिउ पइंमि तं भन्छु भन्नु । कोणेच्छह घय पयमज्झि सारु सकरपऐसु वपणेण चारु। रायहोज पिउ णिसुणेइ जाम हरिसं गउ मंती हुवउ ताम। सुपयच्छियकण्णावरहो सजु इह आणिवि कण्ण विवाह कजु । किजइ सुहदिणि सुहजोई लग्गि आएसहं एत्थु वहेवि मन्गि। 25 ताराएं मणिमुद्दी अणग्ध कण्णाकारणे तहो दिण्ण सिग्ध । घचा-जणवयकयसति ता सो मंति हरिहि चडेविणु णिग्गउ ॥ राएं सम्माणिउ सजणु जाणिउ पइराडइ संपत्तउ ॥२५॥ 26 तहिं दिछु विमलवाहणु णरिंदु सहमज्झि परिदिउ णाइ इंदु । पयकमलु णविउ मंतीवरेण इल लाइवि सिरु भत्तीभरण । अमयमइ कण्ण जसहरहो देव दिणी जसोहतणयहो सुसेव। लिजा किजइ कण्णहे विवाहु । किउ मंतु सयलसजणहं जुत्तु उन्जेणिहि जाइजइ णिरुत्तु। बंधव सुगणियपरिवार लोउ अंतेउरु भुजियदिव्वभोउ। चल्लिय हय गय रह सुहड जेत्थ जगि पयड णयरि उजेणि तेत्यु । तहिं गंदणवणि णिवसेइ जाम वणवालि रायहो कहिउ ताम । उच्छाहु जाउ णयरीहि मज्झि वणि उच्छउ हुँउ वइरियदुसज्झि । मंडउ विचित्तु विरइउ तुरंतु वरपंचवण्णधयवडफुरंतु। बहुथंहिं बहुतोरणहिं घटित बहुकलसहि मंडिउ रयणजडिउ । बहुणरणारिहि सेविउ विचित्तु वणि मंडउ दीसइ हरियचित्तु । उजेणिहि जाइवि पुण्णलाहु 5 IO ४ AB सिहासणत्थु ५ AB पवेसु ६ B जोगि 26,9 B नहमज्झि २ B कण्णाविवाहु ३ A परिवारलोउ ४B किउ 15 20 I. 27. 10.] जसहरचरित तहिं वजहिं मंदल पडह ताल णचंति विलासिणि लडह वाल । सुललियउ गीउ गायंति के वि मंगलु पढंति थुइवयणु के वि। कलघोसु पवष्टिउ तहिं वणम्मि णयरीजणु तुट्ठउ णियमणस्मि । णयरिहिं वजहिं वर संख पडह वहुभेय विलासिणिणडहिं लडह । मंगल गाइजइ रायगेहि उच्छवरसु पट्टिड देहि देहि। दोहिमि कुलेहि उच्छाहु जाउ दोहिमि कुलेहिं आणंदभाउ। दोहिमि कुलेहि वरपत्तदाणु धणु धण्णु सुवण्णउं अप्पमाणु । आयउ विवाहदिणु उच्छवेण हरिसिउ जसोहु णिउणियमणेण । चंदमइमायहि तोसु जाट रहसिं पूरिउ थीयणहं काउ। कंचणमयपट्टि णिवेसियंगु कलसेहिं पहाविउ उत्तमंगु। आहरणहिं भूसिउ कुमरु तत्थ परिहाविय सियणिम्मलसुवत्थ । चंदणि चञ्चंकिउ सुद्धभाउ सिरि सेहरु किउ जणदिण्णराउ । कप्पूररेणुमयणाहिगंधु फुल्लाहहिं हुउ भमरोहु अंधु । घत्ता-ता कंकणहत्यु रहसपसत्थु अस्सरयणि आरूढउ ॥ भरभेरीसद्दहि तूरणिणद्दहि जणु जायउ मणमूढउ ॥ २६ ॥ 27 समवयस कुमर सहुँ चलिउ जाम पारंभिय थुइ अंग्गुडिहिं ताम। णचंति विलासिणि गीउ रम्मु गायण गायंतिहिं सुकियकम्मु । गय गंदणवणि मंडवदुवार वरतोरणमंदिउ रयणफारु । तहिं किड जं जोग्गु पुरोहिएण आयारु कुमग्गणिरोहिएण। सुपर मंडवमज्झि जाम वरु दिहुउ सजणजाणिहि ताम। चउरिइ णिविहुँ कंदप्पमुत्ति पासेहि णिवसिय ता सुपत्ति । अग्गइ पयक्खु किउ धूमकेत किउ होमु हुणेप्पिणु तिव्वतेउ । अमयमइ पाणि कुमरेण गहिउ सीयारु पमल्लिउ ताइ अहिउ । तहो दिण्ण कण्ण विरइउ विवाहु सहि उच्चरिय साहु साहु । णवयारि विमायरि कण्णसहित णिग्गउ वर पहु विवाहु कहिउ । 15 5 5 IO - -- ५ Bण्डवियउ तहु. ६. B कुवरु ७. B फुल्लेहि हिंडइ. म १ Bणागुढिहि. २ B omits this line 1. A. णिबद्ध. ४. P अमयमइकुमरि पाणेण गहिउ 5 20 पुप्फदंतविरइयउ [I. 27. II- अण्णहिं वासरि संतुहुराउ विणयहो पणयहो भरणवियकाउ । तंबोलवत्थाहारदाणु सम्वहं विरइड संमाणदाणु। जं जासु जोग्गु तं तासु दिण्णु सियजसिण दिसामुहु जाइ भिण्णु । परसप्पर णेहु करेवि दोण्णि दितहं धणु धण्णु सुवण्णु दोषिण । ण खलेह वित्तु दोणि वि गरिंद णं गिल्लगंड दोण्णि वि गइंद। 15 वरु गयउ ताम वइरियदुगेजिह उजेणिणामणयरीहि मज्झि । णयरीतवंगि थिउ हरिसजुत्तु णारीयणु पेक्खइ एयचित्तु । सलहइ किं रइ किं मयणु एड जसहरु संपत्ता मायगेहु । लीलण णविय पुत्रेण माय अमयमइ देवि तह णवइ पाय । सुण्हा पेक्खेप्पिणु रूवजुत्त चंदमह तुह इहँ चंदवत्त । जसहरु परिणेविणु दिव्वभोर भुंजइ भजइ सहुँ जणियमोउ। चिंतइ जसोहु हउं रायकण्ण परिणावेसमि सयपंच अण्ण। जं वासबसेणि पुचि रइड तं पेक्खिवि गंधवण कई। परिणाविउ सुललियतणु आउ रापण पंच पत्थिवसुमाउ। गयकाले पइहरि तहि णिवेण दप्पणयलि मुंहु जोतिएण। 25 घचा-ससहरकिरणुजलु पिक्खिवि कुंतलु चिंतिउ रइसवत्तिमहणु ॥ दोहग्गहं रासिए महु जरदासिए हा किं किउ केसग्गहणु ॥२७॥ 28 तारुणि रणि दहि खलेण उगि लगि कालाणलेण। सियकसभारु णं छारु घुलइ थेरहो बल सत्ति व लाल गलइ । थेरहो पाविणं पुण्णसिह वयणाउ पयह रयणविहि। जिह कामिणिगइ तिह मंद दिडि थेरहो लट्ठी विण होइ लही। हत्थहो होती परिगलिविजाइ कि अण्णविलासिणि पासि ठाइ । थेरहो पयाई ण हु चि कमंति जिह कुकरहिं तिह विहडेवि जंति। थेरहो करपसरु ण दिहु केम कुत्थियपहु विणिहयगामु जेम। थेरहो जरसरिहि तरंगएहिं घोइड तणुलोणु अहंगपहि। er mam ५ PB रायगेहु. ६ AB तहो. ७ AB मणि ८ A कहिउ ९ PBT अणुहुंजियसिवेण 28 1ST अण्णणियविणि. २२ I. 29 14] जसहरचरित पत्ता-सत्त वि रजंगई तणुअटुंगई कासु वि भुवणि ण सासयई ॥ तउ करिवि असंगई दह धम्मंगई पालमि पंचमहब्वयई ॥२८॥ IO 29 5 इय भणिवि मझु किउ पट्टबंधु णं बंधुसहासे णेहबंधु। णं दीणहं चामीयरणिबंध णं परणरणाहहं बाहुबंधु । कंदप्पसप्पदप्पावहारि हुउ जणणु परमजिणमग्गचारि। मई मुणिउं करणविजल्लियाई अप्पउ विजाइ पहिल्लियाई। चउवण्ण चारु तइयाइ सिङ दडि दंडिउ उइंड दुहु। मई वत्त वित्तई संचियाई सत्त वि वसण आउंचियाई। मई कोहु लोहुँ मई माणु बत्तु कामु वि सेवियउ विणोयमित्तु । हरिसंगई णिक दूरुझियाई मंति परकजई बुझियाई। विग्गहु संधाणु सजाण ठाणु संसउ मणदोहीयरणणाणु। सव्वदं पञ्चाखरं महु फुरति भिचउलई भइयई थरहरति । जे महु णमंति ते सुहि जियंति जेणठ्ठा ते काणणि वसंति। खल णडिय भिडिय जे महिच्छियाई ते सरल तरल तडिसंणिहाई। पत्ता-आहवि दुबारए असिवरधारए परमंडलवद तजिय ॥ तेपण फुरति दिसि पसरति पुप्फयंत मई णिजिय ॥ २९ ॥ ० इय जमारमहागयचरिण महामालणपणकपणाहरणे महाकइपुप्फयतविरइए महाकव्वे जगाररायपट्टचंधो णाम पढमो सधी परिच्छेउ समत्तो ॥१॥ Mircher- MPAN- -~- - Man २.चरमि,A चरिवि 29. SI बिजलिया. 2.8 मोहु. 3. BT वेण्ण ४ ASB omat सधी २३ - II नित्यं यो हि पदारविन्दयुगलं भक्त्या नमत्यर्हता- मयं चिन्तयति त्रिवर्गकुशलो जैनश्रुतानां भृशम् । साधुभ्यश्च चतुर्विधं चतुरधीनि ददाति निधा स श्रीमानिह भूतले सह सुतैर्नज्ञाभिधो नन्दतात् ॥ ६॥ South 5 कामालसु रइलालसु पेस्मपरवसु मत्तउ ॥ हाँ परिणिहि वणकरिणिहि वणकरिंदु जिहं रत्तउ ॥ ध्रुवकम् ॥ अमयमईए लच्छमईए हंसगईए सुद्धसईए। पियपत्चीए मल्झं तीए। सिढिलविलासो गत्वपवासो णयणणिमेसो विरहकिलेसो। करउं सयजं महिवइपुजं उज्झउ रजं णिवडउ वजी अवि य हिरीए रायसिरीप परए पुत्तं गुणगणजुत्ते। जयजलधामं जसवइणाम णिवसासणए सीहालणए। जय भणिऊणं इहे ठविऊणं भूमी दाउं इलु काउं। संपिज्जामोतं गच्छामो वड्डियणेहं कतागेहं। सह णिवसामो सह विलसामो सह भुंजामो सह कीलामो। उजलियाए पत्तलियाए सामलियाए कोमलियाए। सुहललियाए पियमहिलाए। सह वणवासो वणयरभीलो मह संतोसो लच्छिविलासो। तीए रहिमोण मए महिमो। जणभारणं वावारण दुक्खजुएणं सुक्सचुएणं। हो पजच रमणास अमलियंवत्तं तरुणीवत्तं। जत्थ ण दिलुणियणगिढ़। 10 15 This verse is omitted in S and T 158 घरघरणिहि २ जिम ३ ST सिदिलासेसो ४ Tणयणणिवासो. ५ इय ६ ST भूमि ७ 7 विहसासो वियलामो ८ ST मुह ९ ST समलिण -२४- 11. 3.8] जसहरचरित पत्ता-ता दिणयह पसरियकर अस्थहो उप्परि रचउ । थिउ दीसह किं सीसइ अत्यु केण परिचत्तउ ॥१॥ 2 5 अत्यासिउ रत्तउ मित्तु जहिं दिसिणारि वि रजवप तहि । रणवीरु वि सूरु वि किं तवइ बहुपहरिहि णिहणु जि संभवह रवि उग्गु अहोगइणं गम णं रत्तउ कंदउ णिक्खियउ। तहि संझावेल्लि वणीसरिय जगमंडवि साणिरु वित्थरिय। तारावलिकुसुमिहि परियरिय संपुण्णचंदफलभरणविय। णं रत्तगोवि छाइय हरिणा सा सद्धी बहलतिमिरकरिणा । f चक्कु तमोहविहंडणउ णं सुरकरिसियमुहमंडणउं। णं कित्तिए दाविउ णिययमुह णं अमयभवणु जणदिण्णसुह। णं जसु पुंजिउ परमेसरहो णं पंदुर छत्तु सुरेसरहो। गं रयणीयमुहि णिलाँडतिलउ उग्गाउ ससिणं सइरिणिविलउ । 10 पत्ता-णहयलसले उहकणवले बारह रासिउ पेच्छइ ॥ ससिलग्गउ अच्छद मउ तेणे ण अत्थें गच्छह ॥२॥ 3 ससिघडगलिएं जोण्हासीर दीसद धवलं रुप्पयरइयं ताम विसजियपरिवारणं कणयलयाजुइपिंगकरेणं विण्णवियर सुरहरसंकासं णरकरदीवयविणिहयतिमिरो कलरवगायणगाइजतो जंतो जंतो पत्तो रम्म भुवणं हाय पिव गंभीर। गं तुसारहारावलिछइयं । कंठविलंवियमणिहारेणं। अहयं णवियउ पडिहारेणं । गच्छतु महएवीए णिवासं। ता है चलिओ णिवडियचमरो। कईवयसेवयसेविजंतो। मणिमयसिहरं रमणीहम्मं । er AM 2.१ ST रणधीर २. T भहोगयण ३. ST णमिय ४. ST बहुल ५ A मुहसिय ६ ST जणु ७ ST णिसाल,A जिलादि ८ A चले.९ गतेणत्यवाणु ण गच्छद. 3. १.ST विवनिय २ T जुय. ३. AST वचसु. ४ ST कयवय. जस...४ २५ 10 पुष्पदंतविरइयंत t it. 3.9- भित्तिचित्तरेहारमणिजं वजमाणणाणाविवर्ज। पंगणवावीसारससारे कामिणिवीणारवझंकारे। लंबियमोतियमालासोहे कुसुमदामरंजियभमरोहे। धत्ता-वहिं पेच्छमि किर गच्छमि सुद्धफलिहाविद्धी ।। पन्मुज्जल रयणुज्जल महि णं गयणविसुद्धी ॥३॥ 4 in बीयभूमि भोत्तियहिं सुखंचिय पं मालइकुसुमोहिं अंचिय। बारि रायसोवाणविसेसिय पउमरायमणि तझ्य चिहसिय । मरगयचारयणससिद्धी भूमि चउत्थी तेयाविद्धी। णीलरयणजालेहि पलाहिय पंचम महि बहुसोहालोहिय। विदुमजालसिलायलि घट्टी विसयम्मै कय महि छट्ठी। जंवूणयकयकीरविसेसि जहिं ठिय हंस मोर सविससि। पउमरायमणिणियरि वैद्धी सत्तम महि कय कम्मविसुद्धी। चंदकंतिसिलरयणिहिं धाम अट्ठम महि गहवका णार्म। घत्ता-वहिं मंदिरे अइसुंदरे सत्त वि भूमिउ दिउ । मड्ड कंपइ मइ एवहिं मई ण णरएसु पइट्टा ॥४॥ 10 5 संपत्ता असु धरणियलु हउँ पावयम्मु मणि णडिउ सव्वंगु मज्यु रोमंचियउ सव्वंगु वप्प वेवइ वलइ पेच्छिवि तहि पियघरपंगणउं अद्धद्धदुवारविणिग्गयए चामायरदंडयधारियए गं फेणि पिहियउ णवैकमल महु तो वि ण णउ कम्ममलु। सध्वंगु घरिणिहिं घडिड। सध्वंगु सेयसंसिंचियउ। पं सैविससप्पदउं चला। णं लद्धउ मई आलिंगण। भासाकुसलइ सविणयणयए। जयकारिउ ह पडिहारियए। लियचीरि ढंकित पाणियलु। on - ५ AST करवीणा 4 2 1 दुविध २ ST संसुद्धी. ३ 8 वसुसोहे : ST विद्धी ५ AP धामा. ६. AP णामा ७. एवाहु जपइ तणु कपड़ ण णरएस पडहउ. 52P सविसु सप्पु. २ Tणवकमलदल २६ 10 II.6.18] जसहरचरित हउँ तहिं अवलंवमाणु गयउ गड जाणमि यदइवि हर्यउ। मुहसासवासवासिउ सुरहि आलाउ घाणु सुहसुक्खणिहि। अच्छिउदहिं पीयउ स्वरस मुहरसु लद्धड जीहइ सरसु। तर्गुफैसि देहहो जाय दिहि पिययम पंचिंदियसुक्खणिहि । दिठी सुंदरि सवर्डमुहिय छणवासररयणीयरमुहिय। धत्ता-आलोयणु संभासणु दाणु संगु वीसासु चि ॥ पियमेलणु रइकोलणु जं महु तं णड कासु वि ॥ ५॥ 15 IO तं मम्मणु संणि सणिडं भणि तं गहिरु महरु मणहरु मणि। तं हावभावविश्भमफुरि तं हसिउं रमिउं रइरसभरिउं । सो मयुखीण ते तुंग थण ते दीह णयण हयमणुयमण । सो सामवण्णु तं मुद्धमुह सुमरंतहो णावइ णिह महुँ। मउलियणयणुल्लउ विभियंट जामच्छमि कामग्गहि लियउ। 5 ता महु भुयपंजरणिग्गमणु किउ पारद्धउ कत्था गमणु। भाइ म भरि सकुंतलिय एयह वेलह कहि संचलिय। एवि चितिवि करवाकर संजायउ तहि अणुमग्गयरु। सुपसत्थि णरस्थि अणुजयहो गय दुइ पासि सा खुजयहो। जं पेच्छिवि णिदइ सव्यु जणु दवनद्वथाणुसंकासतणु। जो दोहदंतदंतुरवयणु कदमबुबुअसंणिहणयणु। अइअडवियइविसमु णिरु फुट्टपाय कयणयविरम्। कुप्परसमाणणिमंसकडि जो कह पियामणघरणहडि। उरु संकड कढिणट्ठियहियेउ पल्हत्थियपी९ व जस्लु हियउ। जो विरलकविलकेसुभदउ जो परउचिट्ठयलंपट। 15 जो परदिण्णउ घाउ वि सहा जो परपयउँचोलिउ वहह । पत्ता-सो देविए सियसेविए चलण मलिवि उहावियउ॥ धवलच्छिपण लच्छिए वेयालैंड गउरवियउ ॥६॥ ३. कि. A सलिड ५, T तणुफाग ६ ST अवलोयणु. 6 १ Tमणिय मणिय २. A महुरु गहिर 3 5 मज्यु सामु ४ AP णिद ५ ST विभइउ. ६ ST इय: A इउ ७ AST उं. ८T सुपसत्यु णरत्यु ९ AST पामिदुह. १० % उरि ११. S पयद १२ ST पिदर १३ ST उच्चोलिय. १४. T वेयालड जिह गउरविड २७ पुष्पदंतविरइयउ [ II. 7. I- 7 5 सो कसिवि भासह दिण्णदुहु भूभंगुरमीसणु करिवि मुहूं। तुहु हलि हलि खलि समावचुए किं णागय तुहुं लटु दासिसुए। इय गरहिवि सालंकारवह पिसुणेण व ताडिय सुकइकह । अच्छोडिय चिहुरमारे धरिवि हय पायपहारे हुंकरिवि। ताभण देवि पणवेवि पय हउँ घरवासेण जि स्त्रयहो गय। तुझु देउ भडारउ कुसुमसरु तुहुँ सामि महारउ हिययहरु । पई विणु महु छत्तई चामरई हे णाह सत्तभोमई घरई। हरि करि रहवर विविहासणई देवंगई भूसणणिवसणई। एयई अवरइमि णिवण सहुं पई विणु सम्बई पंजलंति माहुं । जं विहिणा दुई तुह ण कय कुलउत्ती त हउँ कि ण मुंय । जं जिजइ पई विणु दइय दिणु तं दिजा संचियटुरियरिण। पत्ता-जइ जसहरु जमपुरघरु पावइ तो हणञ्चमि ॥ वरुगासिं महुमासि सई कंचाइणि अच्चमि ॥ ७ ॥ 10 8 इय जारहो माणु विहंडिया पुणु पियवयणेहि संमाणिय ता मई सेवि णं विजुलिय अरिकरिसिरमोत्तियदंतुरिय पहरांत णियमणि चितियउ खग्गेण तेण पुणु परिगणमि इय चिंतिवि खमसलिाल दमिर्ड गउ चावचित्तकुट्टोअरए सुमरमितं पणइणिवावरित णउ कुलु णउ सिरिणउ हरंण सुउ पुणु' गादु गादु अवडियउ। अण्णोण्णु तेहिं पुणु माणियउं। रणरुहिरपवाहिं विच्छुलिय। करि असिवरलहि समुद्धारय । महं आसि जेण परबलु खविउ । 5 तिय मई काउरिसु विकिह हणमि । णियरोसईयासण उपसमि। अप्पउ घल्लिउ सयणोमरए। हा एफु वि णउ हियवह धरित। हा देविहि किह मइभंसु हुउ। 10 7 1ST रूसवि २. A खयहुगय, T खवह णय ३ T भराडउ ST सत्तभउमई ५ 8T भडढ. ६ T पिय जलंति, 8 वि जलंति ७S मय ८ ST णिजइ ९. A वरु १० ST तो ११. AST अचमि. 8 १T अइगाढ २ A हुवासणु ३. T वागरिय -२८- II. 10.2] जसहरचरित घत्ता-साहारहो तरुसाहारहो उपरि चडेविण लंवह ॥ कंटयतरु अवरु विखरु वेल्लिणिहीणु चि चुंबइ ॥ ८॥ 9 चंदु वि चंडालु वि मणहरिहे दीसह पडिविविउ सुरसरिहे। जिह वालु मरालु सलीलगइ तिहं दुमसाहहो कंकु वि रमइ । जिह पउमिणि पापं हय रविण तिह सालूरेण वि णिच्छविण। संझाइ व मेल्लइ रंगु लहुँ घणुलहि व कुडिल गुणेण सहुँ । चिससत्ति व मारणसीलणिय सिहिधूमोलि व घरमइलणिय। 5 जिह णइ तिह तियमइ णीयरय णारीरुवह किर के ण हय। तथा चोकम् । गोवइयइ पडिवहुसिरु लुणिवि पित्तउ पइपत्ति वाहि भणिवि । णासंतु सो वि छरियइ हणिवि दारिउ मारिउ वम्मई लुणिवि । वीरवइप गाढालिंगण दिण्णउं चोरहो मुहे चुंवणउं। 10 णिव्बूढपोढसिंगारयहो सूलासढहो अंगारयहो। महरुल्लउ खंडिउ ति मरिवि गय गेहि मुहुल्लउ संवरिवि । घरु आइवि फूआरउ करिवि खंदिउ वियाहरु वजारपि । मारावद फिर वरइत्तु सई णामेण दत्तु वरवीरवह। ता केण वि पहिएं रक्लियर णिसिचारु जेण उवलक्खियउ। 15 राणउ पुरयणु संबोहियउ पुण्णालिहि साहसु साहियर्ड। णीसेसु वि साक्षिणाणु कियेउ णियमित्तहो सगुणु पयासियउ। घत्ता-रुहिरावलिछिण्णंगुलि तरुतलि असिपहरुलउ ॥ तक्करमुहिं णं जममुहि दिहु असइअहरुल्लउ ॥ ९॥ 10 णइसंगमि दुइ वइरिणिए उज्झाहिउ देवरइ त्ति मूड उक्यारविमुक्का सइरिणिए । पंगुलणिमित्तु रत्ताइ छूद्ध। ४ AST फलमाहारहो 9 १. T साहारण - T कय ३. AST omit तथा चोक्तम् ४ AT मुहुचुवणउ ५ ST णामि सुदत्तु ६.ST add after this lino जं दिठं सयलु वि तहिचरिउ. ७ ST कहिउ ८ ST omit this line, २९ 5 पुष्पदंतविरइयउ [II. 10 3- हा तियमा साहसुजं करा कइवइ विण वण्णहुं तं तरह। आवेप्पिणु सुपुसियसेयवह णं मुक्खि माणिय विउससह । परपुरिसु रमेप्पिणु पाणपिय महु भुयपंजरि पइसरिवि ठिय । ला दुइ सविसणं णाइणिय महु मडयहु साणं साइणिय। जह कंडूकंडू अणेण सुहु तिह रइरमणि पुणु जणइ दुहु तणुसंघट्टण समु सब्बु जाहिं सोक्खहो अवसरु किर कवणु तहिं । आहरणभारु देहहो दमणु णचणु आहारहो जीरवणु। लावण्ण सरीरहो असुइरसु बहुदुक्खहं कारणु णेहवसु। गेयहो छलेण विरहिउ रडइ पियसंभासणु वम्म खुडह। पेच्छंतहं वड्डइ कामजरु अवरुदणु पिंडहं पीडकरु। अणुवंधि तिव्वु पेम्मु तवह पेमिम ईसासिहि संभवइ । ति कामुउ डझाइ कलयलइ उन्भुन्भउ णं जालहि जलह । तिय मारह पुणु अप्पुणु मरइ घोरई संसारई संसरह । 15 धत्ता-जीवहु पर दुझियघरु विच्छिण्णउ वाहायरु । इंदियसुहु गल्यउ दुहु किह सवइ पंडियणरु ॥ १० ॥ 10 माणुससरीरु दुहपोट्टलउ घोयउ धोयउ अइविट्टलउ। वासिउ वासिउणउ सुरहि मलु पोसिउ पोसिउ उ घरह वलु। तोसिउ तोसिउ णउ अप्पण मोसिउ मोसिउ घरभायणउ । भूसिउ भूलिउ ण सुहावणउ मंडिउ मंडिउ भीसावण। वोल्लिड वोल्लिउ दुक्खावणउं चॅञ्चिउ चञ्चिउ चिलिसावणउं । मंतिउ मंतिउमरणहो तसह दिक्खिउ दिक्खिउ साहुहुं भसह । सिक्खिउ सिक्खिउ वि ण गुणि रमइ दुक्खिउ दुक्खिउ वि ण उवसमइ । वारिउ वारिउ वि पाउ करह पेरिउ पेरिउ वि ण घम्मि चरइ। अब्भगिउ अब्भंगिउ फरिसु रुक्खिउ रुक्खिउ आमईसरिसु। मलियउंसलियउं वाएं घुलइ सिविउ सिंचित पित्ति जलइ । TO 1028 गेयच्छलेण २ मम्मइ ३ हवइ, T वहइ ४ कलमलइ ५ गवाहाकरु 11 १ ST रुय २.णिरु ३ ST omit this line ४ ST omit this line ५. आमयसरसु ३० 12.201 जैसहरचारित सोसिउ सोसिउ सिभि गलइ पच्छिउ पच्छिउ कुठंह मिलइ । चम्मै बद्ध वि कालिं सडा रक्खिउ रक्खिउ जममुहि पडइ । घत्ता-इय माणुसु कयतामसु जाइ मरिवि तंवारहो ॥ तरुणीवसु अम्हारिसु जडु लग्गउ घरदारहो ॥ ११ ॥ 12 5 IO पुरं परियणु मिल्लिवि रायसिरि पय पाडिय णरफणिसुरवरई इय महु चिंतंतहो अरुणयरु उग्गमिउ दुमणि जणु रंजियउ अरुणायवत्तु णं णहसिरिहि लोहियलुद्ध जगु फाडियउ कुंकुमपिंड व दिलिकामिणिहि ता जयमंगलतुरहं रवेहि कयकायसुद्धि मई तक्खणेण तहि अवसरि मई चिंतिउमणेण जो अंगराउ सो मयणमूल अहवा जइमई आहरण चत्त कि अंतेउरु अमणोज जाउ जे मह सण्णा विउस के वि एउ मणिवि मई किउ अंगराउ जह कह व देवि इह वत्त सुणइ जाणियह सुहासुहु सयलु राय लाहालाहु विजं मुहिगहिउ जाणंति जोइ जे विउलवुद्धि इय पत्तिउ णाणि मुणति जे वि कल्लई आसंघमि गहण गिरि । तउ करमि घरमि मुणिवरवयई। णवपल्लव णं कंकेल्लितरु। सिंदूरपुंजु णं पुंजियउ। णं चूडारयणु उदयगिरिहि। णं कालि चक्कु भमाडियउ। रतुप्पलु संझापोमिणिहिं। पडिवुद्धउ फंफावयसरेहि। ढोइयउ पसाहणु परियणेण। कि रजें कि महु भूसणेण। तहो फलु मई रणिहिं दिहु सयलु। ताजणहं मज्यि वित्थरइ वत्त । अइदुम्मणु दीसह जेण राउ। परचितुवलक्वहिं सयलु ते वि। णं अंगि विलग्गउ दुहणिहाउ। सई मरइ मई वि तक्वणि हणइ । जीविय मरणु वि अरिदिण्णधाय । णहउ पवसिउ विसुहिउ दुहिउ । जहुं हत्थगिज्झ ठिय सयल सिद्धि । तियचित्तई णउ जाणंति ते वि। 15 I 20 wom ६ 8 कोहहो. ७. S घरवारहो. 12. ९. 8 पुरपरियणु २ | उग्गउ उडमणि. ३. A संझापोमणिहि. - ३१ पुष्पदंतचिरइयर [II. 12 21- धचा-करि वज्झइ हरि रुज्झइ संगरि परवलु जिप्पइ ॥ कुकलत्तहि अण्णासत्तहि चित्तु ण केण विधिप्पड ॥ १२ ॥ 13 5 JO अत्थाणभूमिगत मणि विलण्णु कणयमयरयणविद्वरि णिसण्णु । दोवासई चमरई महु पति वहुदुक्खसहासइंणं घडति। सहमंडवि खुजयवावणाई णञ्चतई णिरु कोडावणाई। वीणावंसई गेयई झुणंति वेयालिय फंफावय थुणंति । एयाई जइ वि णि सुहयराई महु पुणु सुविरत्तहो दुहयराई। पोत्ययवायणु आदत्तु सरख मणसवणहं जंजणि जणइ हरिसु। तहि अवसरि पडिहारि वरेण कणयमयदंडमंडियकरण। पइसारिय भड सामंत मंति अणवरय भमइ जगि जाहं कित्ति। पयजुयलु णविउ महुँ णरवरेहि मउडग्गकोडिवियधरेहि। अवलोइय गरवइ मई णवंत पडियावयाई णावइ कुमित्त । गोविहिणिविट्ठ परिंद सव्व णिविडत्यवंत णं सुइकब्ध। तांजणणि महारी दुक तह सीहासणि हउँ आसीणु जहिं । तवचरणउवाउ चित्ति धरिज मई मिच्छासिविणउ वजरिउ । सीसेण चिहुरणीलिं णविय मई माईं महारी विण्णविय । हउं अज्जु माइ णिसि पीणभुउ सिविणई साह्यलहो झत्ति चुत। 15 ता दिहु जोहु दाढाकरालु दंडयकरु णं पञ्चक्खकालु। दुद्दरिसणु भीसणु दुण्णिरिक्षु रत्तुप्पलदलसारिच्छचक्खु । सो भणइ अम्मि लहु लेहि दिक्न जिणणाहहो केरी परमसिक्त । णं तो सपरिग्गहु खामि अजु कहो तणिय पुहवि कहो तणउं रजु । मई तुंड वि मुंड वि मुंडियउ दूसहु इंदियरल दंडियउ। घत्ता-सुउ जसमा णिञ्चलमइ ठविवि रजि तं किजह ॥ णिलि दिहड णिक्किएर लडेणु भाइ मण्णिजह ॥ १३ ॥ 20 13. ST सहि २ ST पप्फावय ३ ST णिवसुहगराई 5 मणिकणय ५ ' बहु ६ सुणइ कच्छ सुक्यव.७ Sता भन्माएवी पटुक्क ताह - A माय ९ T सिविणु १० ST माणिजइ.
M II. 161 जसहरचरित 5 10 तं णिसुणिवि भासिउ जणणियए अण्णाणइ मुणिगुणहणणियए। कुलदेविहि आसाऊरियहे चितवियमणोरहगारियहे। बहुभेय जीव दिति वलि पसमिजइ दुक्ख किलेस कलि। तुह संति होउ महु णंदणहो सजणमणणयणाणंदणहो। हियउल्लउ करुणि कंपियउ तं णिसुणिवि मई पडिजंपियउं । पाणिवहु भडारिए अप्पवहु किं किजइ सो दुक्कियणिवहु । फर्हि चुका माणउ पसु हणिवि पावेण पाउ खजइ खणिवि। जचिंतिजइ विप्पिउ परहो तं पह खणद्धि णियघरहो। मारउ पर मारिउ पुणु मरह कहिं विग्धमहाणइ उत्तरइ । घत्ता-इहलोयहो परलोयहो जीवहिस भयगारी॥ दुणिरिक्स्नए आउनए कि किर करइ भडारी ॥१४॥ 15 किणस्थि चरुउ कि मेसउल किं णस्थि देउ कि देवउलु। किं णत्थि मन्नु भक्खु वि सरसु किं जणु ण जाउ सिवसस्थवसु । किं चिरणर सयल वि स्त्रयहो गय कि तेहिं ण जोइणिपुज्ज कय । कि होइ हिंस जगि संतियरि सिलणावह मूढ तरंति सरि। जं मुणिगणणाहहिं पिसुणियउ तं कहामि माइ पई ण सुणियउ । परमत्थु अहिंसाधम्मु जए मारिजइ जीउ ण जीवकए। तं णिसुणिवि अम्मइ बोल्लियउ जिणवयणु णिसुभिवि घल्लियउ। जगि घेउ मूल धम्मंघिवहो वेएण मगु भासिउ णिवहो। तं किजह वे महिउ पसुमारणु परमधम्मु कहिउ। घत्ता-पसु हम्मा पलु जिम्मइ सग्गहो मोक्खहो गम्मइ ॥ जिह दियगुरु तिह कुलगुरु चवह एम पंविउलमइ ॥१५॥ 16 इय मुणिवि पसु हणिवि करि संति तुह कति। तुह तुहि तुह पुछि जयलच्छि धवलच्छि। 5 IO wear-mwwwww 14. 9. AST जपिठ. २ ST णिण्णाणइ. ३. ST परियहे ४ T किं. ५. T' मारह, A मारिधि 15.१ T सरिसु २ ST णाइहि. ३ | णिसुणियउ ४ A वेय ५ ST परमपुण्णु ६. T पविमलमइ. - जस...५ पुष्पदंतविरइयंट (II. 16.3- an उरि वसउ रिउ तसउ कम णमउ जसुभम । महिवलइ पविउलइ। तं सुणिवि सिरु घुणिवि मणि मुणिउं भई भणिडं। अहो जणणि धरिसमणि पई उत्तर ण वि जुत्त। हिंसाहिवत्तार कत्तार णेयार मायार सोयार सूणार ते घोर। मलहेड जो वेउ सो नग्गु णिलियन्गु जे घिट्ट णिकि दप्पिट्ट पाविट्ठ । वंधति रुंधति हिंसंति धंसंति भयउलई मयउलई भक्खंति चक्वंति। जंगलई महुजल धुम्मति णचंति वायंति गायंति सरयस्मि णरयाम्मि ते होति दीसंति । घचा-रयणप्पहि सकरपहि वालुयपहि पंकप्पहि ॥ धूमप्पहि पुण तमपहि होति पुणु वि तमतमपहि ॥ १६ ॥ 10 17 5 वाहिल्ल ते भिल्ल ते सूबते लल्ल ते पंगु ते कुंट चहिरंघ ते मंट। ते काण काणीण धणहीण ते दीण दुहरीण वलखीण। णिसास णिद्धाम णिच्छाम णिपणाम णित्नेय णिप्पाण चंडाल ते पाण! ते डोव कल्लाल मच्छंधिणीवाल दाढाल ते कोल ते सीहसहल । ते सिंगि वियराल ते णहरपहराल ते पवित्र पिंछाल। ते सप्प रत्तच्छ संसासिणो मच्छ छिंदणई रुंधणई वंधणई वंचणई । लुचणई खंचणई कुंचणई लुट्टणई कुट्टण घट्टणई वट्टणई। पउलणई पीलणई हूलणई चालणई तलणाई दणलाई मलणाई गिलणाई। तिरिए णरएसु मणुएसु रुक्नेसु दुक्खाई भुजंति सम्ग कहं जति । घता-पसुणासह जहिं हितइ परमधम्मु उप्पजह ॥ ता बहुगुणि मेल्लिवि मुणि पारद्धिउ पणविजह ॥ १७॥ IO 16 1 PST omit this line 17,1 ST arrange the wording of this line and the following in a different way ST 713 II. 19.12] जसहरचरित 18 5 मंति हुणउं सग्गि लुणउं दिसियलि कुणउं हुअवाहि हुणउं । पियरदं ठयउं देवदं घिवर्ड फासायपटु लइ घरउ जहु । रत्तउ अंबरुचीवर पवरु पक्वालियउ उद्धलियउ। दप्पुम्भडउ चप्पंउ जड अप्पउ दाउ णग्गउ भमउ। मुंडउ ससिह मामिसगसिस लोहियगसिरु गुरुयणभसिरु । सेवउ घणडं मायावणई चंदायणई सुद्धोयणई फैलभोयणई अत्तावणई । उदरउ बउ चिरु चरउ तउ यमरणभय जो जीवदय । ण करद कुमणु सो देउ घणु मणि आहरणु गोउल भवणु। दुम्माय ममह तनु णस्थि गह। धत्ता-पय संति भयवंति परति णउ इरिउ ॥ ण करति मर्यवंति जेण जीउ संघारिउ ॥१८॥ 10 19 अम्मि जर en सो जम्मि जम्मि चारोयदर सो जम्मि जम्मि भूभारु णरु । सो जम्मि जम्मि अणुहबइ दुइ सो जम्मि जम्मि कहिं लहइ सुहु । महु जीवियच्चु धुर मारिजइ जीउणे जीव तह। ता म असि फद्वियि णिययसिरि लाइउ वरकुंडलमउडधरि। मटु जणणिए हाहाकार फिर पासस्थिहिं णरवरेहि धरित। ता घेरिए पयवडियह लबिउ मई पुत्त असघउ सचविउ । जा जीउ ण देहिं सचेयणउ ता दिजउ अवरु अचेयणउ । जो पारिउ ण मुणह येयण तो हर ठिउ मउलियलोयणउ । अम्मापपिए गॅग्गिरगिरए जं भासिउ दिट्ठपरंपरए। तं जा यि अधम्मु तो वि कामि पडिसिविणमिसिं पुणे वउ घरमि । घत्ता-अम्हारउ लिप्पारउ विहसिवि अम्मर माणित ॥ तिं फुकुहु घण्णुमड पिढ़ि णिम्मिवि आणिउ ॥ १९ ॥ IO A-NAMANAGAR -~ --- 18 1. ST 577 2 T1qz.: ST omit this lino | TEHR 19 1 1 जीररुपण अण्णु तए २ Sहारउ ३. 8 सो ४ ST पयगयसिरए ५ A बउ उद्धरिमि. ३५ - पुष्पदंतचिरइयत [ II 20. I- 20 5 सो सरह व फुरह व उड्डइव सो वलइ व चलइ वडइव। सो सजीउ व इवि घडिउ मह तणियहिं दिद्विहिं आवडिउ । सो पडहहिं संखहि मद्दलिहिं वजंतिहिं टिविलिहि काहलिहिं । णाणातरुकुसुमसमच्चियउ दहिवंदणचंदणचैच्चिय। सो परिवारइ विणिवेयर कुलदेविहि अगइ घाइयउ। मायइ कुंकुमजलु घत्तिय तं रत्तु गलंतु विचितियउ। पिड वि जंगलु मण्णिवि गसिउ संपुण्णु अपुण्णु समभसिउ। जिह वमणघउ महु बजरिवि दिहिसु गिलंति पल संभरिवि। पवियप्पिड किंण होइ सहल तिह अहह जायउ पावमलु । घत्ता-पुणु जोइणि भयदाइणि मई पणविय सम्मावि ॥ पई दिवई संतुहई जणु मुच्चइ संतावि ॥ २० ॥ 10 21 ar जंघावलु दढयरु बाहुबल महु देहि देवि जीविउ अचलु। दुत्तरि कंतारि विहुरि घरहि परिरक्ख सुरेलरि महु करहि। इय देविहि हउँ पढुसरणु उ जाणमि आसण्णउं मरण । घैरु जाइवि सिरिकलसेहिं हविउ णियणंदणु रजि परिद्वविउ । अप्पुणु किर वणवासहु चलिउ तउ करहुँ णवर दइवे खलिउ। पियतणयहो रज्जु लमप्पियउ कंतह णियकन्जु वियाप्पियउ । जं मई जारि सहुँ कीलिया तं रणिहि एण णिहालियउ। इयरह कह कंवइ तवयरणु सामंतमंतिमहिपरिहरणु। णिच्छउ मई एउ परिक्तियउ तणुलिगि मणु उवलक्षियउ। घत्ता-सुदलिल्लिं जिह फुल्लिं फलु होही जाणिजइ ॥ अविहांग तणुलिंगि तिह परहियउँ मुणिजइ ॥ २१॥ to 20 १ गतिविलहि २ 8 अञ्चियउ ३ S reads दोहि वि भावें परिवारियड ४T पिच्छियउ ५ वभ. णाधिन, विभणघिय, A भणघउ 21 १ T दियवलु २ त सवलु ३ Sणवि ४ T घरि ५ Tहउँ कलसिहि ६ 8 चरहुं, 'T करिमि. ७ कम्मु.८ AST परि हियड II. 23.13] जसहरचरित 22 1 5 जइ पुण रिसित्तु ण परिगहह तो वसुहाहिउ मई णिग्गहइ। इय चितिवि इउ पिम्मितविउ पयवडियइ देविए विण्णविउ । मां तु सुमंगलु चिंतियउ अंतेउरु पुरु आमंतियउ। भो अजु भोजु देवायरिउ भुजिवि जोइणिभुत्तुव्वरित। सुविहाणई धम्म लइयाई होसहि पिणि वि पव्वइयाई । पई विणु इ जीविउ उ घरमि परमेसर पई सहुँ तउ चरमि। जिम कामहो रह सुरवरहो सह जिद्द परममुर्णिदहो सुद्धमइ। सिरि हरिहि सीय रहुपरहि जिह ह अणुगामिणि पिय तुज्झु तिह । पत्ता-तवचरणु वि जमकरण वि पई सहुं मरण वि भावह । पिय पर विशु मटु जोन्यणु जणु अंगुलियइ दावह ॥ २२ ॥ JO 23 en परपुरिसु रमिवि रविभलए जं रयणिहि दुकिउ किउ खलए। तं मई सिविणयसमाणु गणि मोहंधि तं कलत्तु भणिउं। उहहु देवि भईरुदरहित किं पणयमंगु मई तुह विहिउ । ता उठ्ठिय सुंदरि चंदमुहि कित्तिमु हसंति रंजंति सुहि। सोयारवयणचिदि गंदियट ता हउं बंदियणहिं बंदियउ। णियकयकम्मेण व पेल्लियउ जणणिड समउं तहि चल्लियउ। जहिं पंचवण्ण मरुयधयउ महपविणिकेयह तहिं गयउ। उपविठ्ठउ पढपिदियासणह मणिकिरणजालभाभूसणइ। परियलु विस्थारिउ कणयमउ में उग्गमिउ णवदिणयरउ। फचोल थाल सोईति किह गयणयलवडिय णखत्त जिह। जेवणवेल महमद सह बदुरसरसोइ णं सुकइकह। पत्ता-अइफोमलु सरलामलु धवल कूरु किह लीसह ।। तं भोयणु गुणमायणु पिसुणसमाणउंदीसह ॥२३॥ to --------- 22 1. T पडवाहिया: A पयवदिह २ 5 किम. ३ ST पई सहु परमेसर ४. 8 प्रिय 23.18 परपुरिसरउपरह, '' परपुरिसरायरइ २ ST अइरइरहिट ३ सूयार ४, S गउ ५ T जैमण, ३७ - [II. 241- पुष्फदंताविरइयत 24 5 दोफीलियाइ हउं फालियउ णं वट्टमि जमपुरचालियउ। दालिइ णवकंचणवणियह ताडिउणं विरइयकणियह । उहँउ चोप्पडु पुणु मई उहह णं दुट्ठधरिणिसंगमु वहइ । पुणु मंडय ढोइय मंडलिय मारंति वै मई परमंडलिय । पुणु दिण्णइं तिक्खई तिम्मणई णावइ मुक्कई रिउपहरणई। पुणु लड्डय सविस विइण्ण किह महु णिहणणसील भिच्च जिह । पडिसवणु ण कासु वि दितियए वोल्लिउ देविद विहसंतियए । मोयय महु मायइ पट्टविय मई तुम्हहं णिरु विणएं ठविय । णउ कंतहि वयणु अइक्कमिडं सम्हई मायासुपहिं समिउं। तं सविसु भोजु दोहिं मि जिमिडं अंगउं विसएं परिभमिउं। णिवडतहिं विजु विज्जु चविउ भजए हा णाह णाह लविउ । पत्ता-धरपडियए उरि चडियए केसभारु विस्थारिउ ॥ हउँ कोसले गलकंदले दंतिहिं पीलिवि मारिउ ॥२४॥ IO 25 जो सइरिणिवयणहि पत्तियइ सुय झत्ति वत्त महु पंणिण णिवडिउ महिमंडलि थरहरंतु उम्मुच्छिउ पाहावंतु राउ सोयणहं लग्गु हा ताय ताय पइं विणु सुण्णउं घरवीदु जाउ विणु ताएं रजहो पडउ वज वलि किउ महु रज्जु दुहोहस्त्राणि सोमाणउ मई जिह किह लिया। सजणमणणयणाणंदणिण । णं वजणिहाएं गिरि महंतु । हा पई विणु जंगु अंधारु जाउ । पई विणु महुँ भग्गी छत्तछाय । एवहिं को सामि अवंतिराउ । विणु ताएं महु ण सुहाइ रज्ज। जं हात्ति परत्तहो करइ हाणि । 5 24 R ST read this line after the next २ AS दड्डउ ३. T वन्मई ४ AS सविस य दिग्ण ५ AST पणए ६. वरि, T परि ७ 8 उप्परिचढियए, T उप्परिपढियए ८ पीढिवि, T चपिवि 25 3 ST जगि २ | विलवणह ३ A भग्गी महुं ४ T वप्प चाय. ५ ST धरवट्ट, A धरपीटु - ३८ 11. 26. 121 जसहरचरित IO मंतिहिं पडियोहिउ धरणिणाहु मेलंतु सदुक्खउ अंसुवाहु। संसारि असारइ जेत्तियाई वोलीणइं अक्वमि केत्तियाई। णल णहुस वेणु मंधाय होत ते वि महियले कालवसि समत्त । इह णरवइ होतउ जगि पसिद्ध अइलु वि महावलु कालि सद्ध । आलेहिवि जो मारंतु वेणु कालाणलि दहउ जेम वेणु। हरि हलहर कुलयर चकणाह ते कालिं कवलिय वलसणाह । इय जाणिवि किजइ सोउ केव संसारहो पहावस्थ देव। तं णिसुणिवि उच्छाइयई चे वि पहपढहसंखकाहलई देवि। उभियचंदो वा केलिदंड विच्छाय जाय बंधवह तुंढ। घत्ता-विवर्णम्मणु पहु दुम्मणु वारवार मुंच्छिजइ ॥ मणि तप्पड पुणु जंपइ ताएं विणु किह जिजह ॥ २५ ॥ 15 26 5 उटुंतपढ़तई णिगयाई रायहो पच्छइ गच्छंति केम रवरधारिणि जुवइ काइ वहुयाउ मुयउ सहुँ राणपण काहि मि लइयउ तवचरणु घोर अमयमइ ण णिग्गय कलुसमाष कयउद्धहत्थणारीणरेहि अण्णत्तहि घेलपडिच्छिपहि केण वि णवखंडई कियउ देहु वि विचि विलग्गउ गुणमहंतु कि वि कुंतहि हिंदोलंति वीर महयालहो दाहिण मुत्ति वि अंतेउराई दुहवसगया। छणयंददो ताराणियरु जेम। पं सूरहो पच्छइ संझ जाइ। पयपालणधम्मवियाणएण। परिससिवि कंकणु हारु डोरु । खुजय आसत्ती दुट्ठ पाव। धाहाविउ बहुदुक्खाउरेहिं । छिण्णई सीसई कयणिच्छपहि। सुमरेप्पिणु सौमिहि तणउं गहु । असिघेणुयाइ उयरई हणंतु। कि वि अप्पड हुयवहि हुणहिं धीर । संकारावियई सुपण वे वि। IO ६ ST सयर.७ A. जेवि महि भुजिवि अवरई गयई तेवि..ST पयापालु ९, 8 विमणम्मणु.१० ST मोहिजड़ ११ ST कि किजइ 26 , ST चीयंदही, A छपाइंट २ SP read this line before रायही जेम. ३ 'सामियतण ४. ST चिधि (note. चितायां) ५ ० उरयलु.६ A कुणइ धार ३९ - [it. 26 13- 15 पुष्पदंतविरहयउ कयसंसयारसेसाई लेवि खित्तई सुरसरि अहियई णवि । महु णामि दिण्णइं गोहणाई महुँ तणएं अइणि हसोहणाई। दिण्णई अंगहारई कंचणाई वरवेलई लण्हई बघणाई। दिग्णइं धयछत्तई भूसणाई दियवरहं लिहाइवि सासणाइ । रोरतणु रोरहं हरहिं जाई महु णामि दिग्ण सुपण ताई। जचंधहं अंघहं भुक्खियाई घणघण्णई दिण्णई दुक्खियाई । गोसुयह विवाहई कयइं तेण णरवह मह णामि महु सुएण। तो वि लद्भुण उत्तमु मणुयजन्तु वलवंत जीवहं राय कम्मु । घत्ता-संसारए अघोरए हिंडहिं विसयासत्तई ॥ जीवई णउ पावहिं जाम ण भावहिं दसणणाणचरित्तई ॥ २६ ॥ । 20 27 सीयल्लवेल्लितरुवरगहणि हिमवंतहो दाहिणगिरिगहणि । जहिं वग्यसीहगयगंडयाई मयदुग्गहकरिभल्लूसयाई। संवरवेउल्लई रोहियाई एणई जहिं पुल्लिहिं छोहियाई। जहिं संचरंति बहुमुग्गसाई गत्ताई जाह णिरु घुग्घुसाई। जहिं परहा कोकता भमंति झिलिरि खच्चेल्लई गुमुगुमंति। जहिं भिल्लपुलिंदई णाहलाई वीणतई तरुवेल्लीहलाई। जहिं कुकरति साहामयाई झुलंत तरुसाहागयाई। उडुणसीला तंबोललग्ग जहिं हरि खजंता कहिं मि भग्ग। जहिं घुरुहुरंत दाढाकराल सूलच्छहि सहुं जुज्झति कोल। कंदुल्लगहर गइन्भु जेत्थु हरिहुल्लिहिं जहिं दूँसियउ पंथु । 5 10 ७ ST वित्तई . हे परवड ९ 8 अंगहारइ T अंगहारई १० P adds before this line in second hand सीयलवल्लीतरुवरघणाई दिण्णइ विउलई गंदणवणाई ११ % छत्तई हरिभूसणाई.२ S क्णधणाई. 27 ST read this line as हिमवतहो दाहिणि गिरिगहणे ('दाहिणगिरिसिहरे गहणे) अवइण्णु मऊ- रिहि गम्भि खणे.२ 8 omats मयदुग्गह रोहियाइ ३, 5 छप्पाई, छित्ताई ५ 5 मुग्गससरढा परिभमंति, ''महिसा सरदा ५ T फुक्करति ६ S adds before this line जहि आरई घोरई बुमरति घोरप्पड दीवड सचरति । उड्डणमयदुंगई णित भल्लयसयाइ संवरवेउलुई रोहियाई ७ 8 कुंटुल्लगहिरु, A कंदुलगुहिर. ८.वासियत II. 39.3] जसहरचरित पंचासहिं थूणई दारियाई जहि मिल्लिं हरिणई मारियाई। जहिं गहिरई धारई परिभमंति णिक वायडउल चुमुचुमति । जहि वेल्लिहिं वेढिय तरुवराई णं कीलहिं अवरुंढणपराई। धत्ता-तहि काणणि तरुवरघणि असुहकम्मपरियमि ॥ बरिहणकुलि दुहसंकुलि आणिवि घित्तु कुकमि ॥२७॥ 15 28 5 आइदारुणभासणवेणगहणि अवइण्णु मऊरिहि गभि खणि। उयरगि दहउ बप किह खलवयणिहिं सजणु पुरिसु जिह । तहिं दुक्वहिं पत्तउ कहमि केम तत्तइ कडाहिणारइउ जेम। छुडु उयरहो हुंतवणीसरिउ छुहु पक्खिणिपक्सवा परित। कंटयतरखरसकरखरहे छुड पाउण देमि देमि घरहे। काणणि विसदसह ह डरमि छुहु मायह परिरक्खिड चरमि। छुड किमिउलु चंचुइ चूरियउ पोद्दुल्लउ छुडु मई पूरियउ। कोलंती विणिय वणममिणि ता वाहि मारिय महु जणणि । सा लइय णिवंधिवि चेलिहि हउँ पुणु घल्लियउ उच्चोलियहि । लहरडा मोरु पारद्धियहो किं पूसह मासालुद्धियहो। घत्तातहि गिम्हइ देहुण्हह ह संताविउ जैहउ ॥ वाएसरि परमेसरि वण्णहुं तरह ण तेहँउ ॥ २८ ॥ 10 29 आणिय गामहो छुडु णिहविय विणिवारियमंदिरमंजरए हियउल्लउ दुक सल्लियड मायरि तलवरहो परिहविय। हउं आणिवि घिउ पंजरए । वा वणयरघरिणिए वोल्लियउ। wamwww ९. A बरहिणकुलि. 28.18 इय. २. S वणगहणि, ३. T omits this line. ४ जढरहं. ५A ककर.६ पेलउ, पेटुल्ला A शुटर ७. ST विणिहया A वरहिणि. . ' वेल्लियए. ९ ST उच्चैलियहे. १० ST देहुम्हइ. ११. 9 केहर. १२. जेहत. 29. 1.8 अवविय: T पविय, अस...६ [It. 29.4- an पुण्फदंतविरइयंट महुँ छुहइ कलेवरु थरहरह सिसुमोरि कवलु वि णउ भरर । डिभाई काई खाहिति तणु तुहूं किं खाएसहि भिल्ल भणु। पई गरुय मोरि दिण्णी परहो हो जाहि समेर मावहि घरहो। णिसुणिवि णियकंतहि क्यणगइ सहसत्ति चिलायहो जाय मह। णिउ हडं वग्गुरियइ विक्किणि सत्तु व पत्थे तेण जि किणिउं । आरक्तिएण गउ भक्खियउ घोरहं मजारहं रक्खियउ। घत्ता--तलवरघरि हंसु व सरि हउँ सुच्छायउ जायउ॥ कणु भुजमि जणु रंजामि सुमहुरमुक्कणिणायउ ॥ २९ ॥ 10 30 5 जीवाहार परिवडियउ पावै सहुँ देहु वि वडियउ। मह जायउ पिछफलाउ किह वरपंचवण्ण मणिमाल जिह । अपलोइवि मेरी स्वसिरि तलवरु पभणइ उजेणिपुरि। जायवि बहु ढोयमि जसवाहि जसहरतणयहो कोलारइहि । ता पत्तहिं महु पियपत्तियो महुमहपथपंकयभत्तियहे। दियनद्धसेसमासासाणिहे मुक्कग्गहारदियसासणहे। अणवस्यई पुजियदेवयहे बलिदिण्णछिण्णमिढयसयहे। गंगासरिललिलपवित्तियहि सीसैंण णवियगहसोत्तियहि । अयहरिणवियपियरुलियहि णिदियमुणिवरवरणुलियहि। धत्ता-उजेणिहिं सुहजोणिहिं विसरसमुच्छियकायहि ॥ मंदमइहे बंदमइहे गयउ जीउ महु मायहि ॥ ३० ॥ 10 31 बलवंतहि पवणजउद्धरिदि चलंकुब्लिकुलिसककसणहरु सा केण वि कम्मै कुक्कुरिहि । हरिणयणुग्गामियकरपसंक। o । २ ST सवर ३T आरण्णिएण ४ हंसच्छायड (हं सच्छायउ.) 3 हउं सच्छायउ 30 1 ST इह २ AST कीलणरइहि ३ A एत्तहु. ४ S omits मुक्कग्गहार • देवयहे. ५ A ठेल ६ ST समुहे ७ Tomats सीसेण णविय पियरल्लियहे 31ST पहरु ४२ 5 II. 32.1] जसहरचरित सिर वलइ य चलवालहि चवलु दीहररोमावलिजडिलगलु। उरि गयउ पच्छइ विस्थरिउ णं विहिणा मैजिस मुहि धरिउ । पिंगलविलोलभासुरणयणु बहुसूअरकुलधंधलवयणु। जमपुरकरवत्तदंतडसणु हूई करहाडणयरि भलणु। राणी वि पवण्णी सुणहं भउ परु कि पिण मण्णइ लच्छिल। सो आणिउ पादुडु जसवइहे जिहे तिह ह मि पावमइहे। विणि वि एकहि दिणि दरिसियई महु सुयह सुअंगई हरिसियई। हत्थे परमत्थे जोइयई पुणु दो वि तेण पोमाइयई। घत्ता-णिउणउ विहि एहउ सिहि किह विरहउ मणरावउ ॥ कमलच्छिहि वणलच्छिहिणावह केसकलावउ ॥ ३१॥ 10 32 5 भल्लु वि भैल्लउ महु आवढइ कंचाइणिसीहहु अभिडह। पडु वांउवेउ हरिणु वि छिवह वर्ष धावेष्पिणु मुहूं घिवह । एयहो हरिकिडि वि ण उव्वरह कि अण्णु को वि अग्गह सरह । हउँ घरमंडणु पवियप्पियर सोणयहो सो वि समप्पियउ। ति सो अकंदमबुं गलए बद्धउ चामीयरसंखलए। हउं पुणु हिंडेमि घरपंगणइ खेल्लमि उडुमि गयणंगणह। ता एकहि दिणि उडं गएण सउँहयलसिंगि रंगंतपण। दिउ जलहरु गजंतु किह गिंभारिहि महउ मुह जिह। दिउ सुरचाउ पाउँ हरित णं णहमंदिरि तोरणु धरित। घत्ता-विजुलियए कंचुलियए भूसियदेहए सुरघणु ॥ घणमालए णं वालए किउ विचित्तु उप्परियणु ॥ ३२ ॥ 10 २. 8 मुहिमझिा T मज्छ मुहिधरित ३. ST जिह तिह णिव हउँ वि, A जिह सौ तिह ह मि. UST परिमहइ. 32.१.ST महु मल्लट २ ST चाउदेव. ३ घरसिहरइ पंगणइ ४ 8 सियसरहसिंगि, सियसत. हयलसिरि: A सहयलसिहरि. ५ T पीयहरित ६. 8 भरिउ. - ४३ पुष्पदंतविरइयउ [ II. 33. 1- 33 en पाउसु णिएवि रोमंचियउ हउँ परमाणदि णञ्चियउ। पुणु रुण्णउं मई थोरंसुयहि णं जम्मासुहम्मरणचुहि। पुणु दिउ खुजउ खोणियहि आसत्तउ पिययमराणियहि । ईसावसेण विलमिटिड रूसिवि दोहि मि उप्परि पडिउ । वलपक्षणक्खवंचूहयई पहुँणयझडप्पणमहिगयई। णीसारइ जारइ हासरई विण्णि वि णिहयई उड्डियकरई । रुहिरुलउ धारहि परियलिड मिहुणुल्लउ विहलंघलु घुलिउ। मणिरसणादामि ताडियउ कताइ चरणु महु मोडियउ। घत्ता-जइयतुं पहु तहयतुं सहु असमाणउ णउ घायमि ॥ एवहि ढहु मोरउ लहु तेण तीइ करु लायमि ॥ ३३॥ 34 IO उहंतु पडतु पधाइयउ पच्छह परिवार पराइयउ। तहिं एका कोवाऊरियए पाउंय महुं मुक्की दारियए। अण्णेकइ चामरदंडएण आहउ कप्पूरकरंडएण। अण्णेका तडेउ एंतियए चटुंयफलेण पहरंतियए। अण्णेका हउ हारावलिए अण्णेकपककुसुमंजलिए। अवरह वीणादंडेण हउ हउं कह कह व रंगंतु गउ । घे घे पभणंतिउ खुजियउ पच्छइ लग्गउ घरलंजियउ। घत्ता-सुरउद्दहो तहु सहहो औएं जणणीसाणि ॥ गलि धरियउ थरहरियउ ह णिम्मुक्कउ पाणि ॥ ३४ ॥ 5 35 जसवइराएं पीडिय गलउ मावद्धदीहदढसंखलउ। मेल्लविउ ण मेल्लइ णिहुरउ पासयफलहे हउ कुकुरउ। 33. १ ST पियरायाणियहि २ ST रोसे ३. AT मेहुणय 34 १. A पाडव.२ ST हउ ३ S चड्डयफणेण ४ धाविवि. 35 १ A दिन 5 II. 36 n] जसहरचरिउ सिरु दोहाविउ गउ सो वि मुउ विहिकम्माविया विचित्तु कउ। मई सोइ पडु चिरजम्मसुउ हा सिहि घरसिरि भूसणउं चुउ । हा मोर मझु घरपुत्तलिय पहं चढियह होइ सकुंतलिय । तुहूं जाम सिहरि थिउ पायटउ घरि तामण लोहइ धयवडउ। हा पई विणु को हियवउ हरइ घरवावीहंसि सहुं चरइ। पर विणु एवाह रंगावलिय छजह विचित्तकुसुमावलिय। कामिणिपयणेउरसरु सुणिवि पई विणु को णच्चइ तणे धुणिवि । हा जसहरु राणउ अज्जमुउ हा दइच काई मई सुणहु हर । हा सूअर अज्जु कसेरदल भक्खंतु पिअंतु सुसच्छ जलु। करवंदजालवणि वसियमए सुहु अणुहवंतु सरकद्दमए । धत्ता कयदुग्गइं सारंगई रणि भवंतु सहच्छंई ॥ को सारउ मिगमारउ एयहो कविलहो पच्छह ॥ ३५ ॥ 10 36 en इय सोइवि दिण्णउ तेण सिहि जिह पिउपिउजणणिए चिरु णिहिउ जणु पियरहं जलु भोयणु उवइ णिक्खजयनपत्थरपउरे णिजले मल्हयगयधूलिरए काणिहिं पसविहिं दहवें वणिउ मिगि भुक्लिय दुफ्तिय सुक्खथणि दुद्धिं विणु जढराणलु जलिउ हिसाउ अणेयणायसयई सद्ध विवरहो कहेवि किह सो सुणहु मरिवि तहिं हुउ उरउ किउ विहिमि मरणसंकारविहि । तिह पाणि पिंडदाणु विहिउ । पियकलउँ कि पि ण अणुहवइ । उग्गयसामरि बंधुलखयरे। काणणि सुवेलगिरिपच्छिमए । ह कुंटिं पसविएण जणिउ। थणु जीहइ लिहमि ण लहामि धणि। मई एक सप्पु कत्थइ गिलिउ। णं धम्महो मूलई उक्खयई। अइभुक्खिएण गरुडेण जिह। दुद्धरसर हुँदरभक्तिरउ। IO Animanawww २. A विवाउ.३ 8 सोइय: A सोवह.. ST सिरु. ५ ST चरतु 36. 1. ST पुणु किउ. २ AST वबुल. ३. 81 साउ लहिवि. ४. 8 दुंदुरा | हिंदुर ४५ [II. 37.12- पुष्पदंतविरइयउ घचावणि विलसइ बिलि पविसह जाम ताम मई लडउ ॥ मुहलग्गए पुच्छग्गए धरिवि खाहुं पारद्धउ ॥ ३६ ॥ 37 पल्लष्टेवि मुह विससिहि मुयह दढवियडफडेप्फड फुप्फुवा। लो हउँ भक्खमि सो मइंडसइ महु पलु तरच्छ पच्छइ गसह। तोडइ तडत्ति तणुवंधण मोडइ कहात्ति हहुई घणई। फाडह चडत्ति चम्मई चलई घुट्टइ घडत्ति सोणियजलई। एम तरच्छि खयहो णित मई मायाविसहरु कवलु किउ । को लंघह महियालि कम्मवसु अण्णोण्णाहार मरंति पसु । बहु थावर जंगम जीवउलु जर तिरिय गिलंति णिचु सयलु । वियलिंदिय बहु पंचिंदिय वि अवरोप्पा खंति ण भंति क वि। हउँ फूरतरच्छे मारिया मई कालसप्पु संघारियउ। भो मारिदत्त णिव दिहु सई दूसह अणुहवियउ दुक्खु मई । घता-- इय पिसुणिउ पई णिसुणित जइ तो हिंस विवजहि ॥ हयदप्पउ परमप्पउ पुष्फयंतु पडिवजहि ॥ ३७॥ 10 इय जसहरमहारायचरिए महामहल्लणण्णकण्णाहरणे महाकइपुप्फयतविरइए महाकग्वे जसहरचंदमइभवंतरवण्णणो णाम वीभी संधी परिच्छेओ समत्तो ॥२॥ 87. 2 फणफ्फड. २ ST पच्छइ तरच्छु III *नक्षत्राधीशरोचि प्रचयशुचितरोतामकीया निकेतो निर्णीताशेपशास्त्रनिदशपतिनुताशेपवित्पादभक्त । भ्राता भन्यप्रजानां सततमिह भवाम्भोधिसंसारभीर- नोतिनो निर्जिताक्ष प्रणयविनयवानन्दतां नजनामा ॥१॥ en पुणु रायहो भासह अभयकह णियभवभवणकिलेसकह ॥ उजेणिहि सिप्पा णाम णई अस्थि सच्छ गंभीरदह ॥ ध्रुवकम् ॥ दुई-तडतरुपक्षियकुसुमपुंजुजल पवणवसा चलंतिया। दीसह पंचवण्ण णं साडी महिमहिलहि घुलंतिया ॥ जलकीलंततरुणिघणथणजुयवियलिय(सिपिंजरा। वायाहयषिसालकल्लोलगलच्छियमत्तकुंजरा ॥ कच्छवमच्छपुच्छसंघट्टविहष्ट्रियसिप्पिसंपुस। फूलपडतघवलमुत्ताहलजललवसित्तफणिफटा । पहंतणारंदणारितणुभूसणकिरणारुणियपाणिया । सारसचीसमासकारंडविहंडिरहंसमाणिया । परिघोलिरतरंगरंगंतरमंततरंतणरवरा । पविमलकमलपरिमलासायणरंजिर्यभमिरमायरा ॥ मंदुवयंठपसतवसंठियतावसवासमणहरा। सीयलजलसमीरणासासियणियरकुरंगवणयरा ॥ जुझिरमयरकरिकरुप्फालणतसियतडत्थवाणरा । पंडियफुलिंगवारिपुण्णाणणचाययणियरदिहियरा ॥ नयचिपिलल्लस्रोल्लखणिस्रोलिरलोलिरकोलसंकुला। असइसत्थाणिवसंसेवियवहलतमालमहुयला ॥ IO 15 Aream wwwwwwwwwwwwwww * This verse 18 omittod in S and T 1, १. T तदितर २ 'T कुसुम ३ पवणाहय. ५. विसट्टिय ५ 8 भासचास ६. T गुजिय. ७. सीय- लवायवीयणासासियणियढकुठंगवणयरा. ८, T तटियपुटिंगा पटियपुडिंग ९ ST खेलिर. १० A लोलिय, २१ AT महुयरा 3 मदुलया. ४७ fuit. 1. 19- पुष्पदंतविरदय धत्ता-हउँ तासु तरच्छहु णिहुरहो दाढाधायहि णिट्टियउ॥ आवेप्पिणु तो तरंगिणिहि मीणिहि गम्भि परिडियउ ॥१॥ 20 १७ 5 दुबई हउं संजाउ पोढपाढीणसरीरवियारणक्खमो । गयणुल्ललणवलणपरियणलंघियवारिविन्ममो ॥१॥ उज्जलम्मि कोमलम्मि तत्थ सच्छविच्छुलम्मि संचरंतु हं तरंतु मीणमंडलं गिलंतु। ताउँ माउपण्णएण दंतपंतिभिण्णएण पुव्वयालि मे हएण तम्मि रणए मपण। बद्धघोरकस्मएण लवारिजम्मरण सुस्वारहयएण सुसुवारियासुएण। दंतपहिं पीलिऊण णक्लएहि फालिऊण जाँव हणियच्छिओ मि खाइउंसमिच्छिमो मि। ताणईसमागयाई सोमजुअंगयाई घग्घरावलीरधाई णीरकीलगुच्छवाई। चारुचीरसोहियाई संपयाविलोहियाई दिवगंधवासियाई हारदोरभूसियाई । साविणोयभूसियाई खुजयाई वावणाई तोर्यमज्झए तरंति णिचुदेवि उच्छति । जारमति एहति थति पंति जति संभवंति एकमेक सिंचयंति पंजलीहिं कं घिवंति। घत्ता-ता तेत्थु तरंतु तरंतु जले एक एक णिसुंभियउ । गुजुल्लिय अम्ह उवरि पडिय दिवउ दयवियंभियउ॥२॥ 10 3 दुवई-सा धरिया गेलेण जलवेइणा हउँ मुक्का पणदुर ॥ जममुहरकुहरणित भयवेविरु सरिविवरं पइट्ठउ ॥ २॥ गोमिणीसामिणीमाणिणीमाणउ धाविया किंकरा बोल्लिओ राणउ । मजमाणा समाणा तए पुजिया देवकीलाविलासुजिया खुजिया । वित्त गाहेण गाहेण णिवटिया आमिसालुद्धपणं मुहावट्टिया। ता रुसा कंपियं राइणा जंपियं एरिसं विप्पियं कस्स होही पियं। 5 १२. ST ताहि 2. 3 S1 ताव २ A सुसुमारओ हुएण, ST संसुआरहूयएण ३. सिसुमारिया ६. A जाम हं णिय च्छिण समिच्छिकण ५ ST माइणाई ६PST omit तोय उच्छलति. ७ PST omit एकमेक सिंचयंति खुजल्लिय 3 RAST' घलेण. २. जलवालिणा with note जले बलं यस्य. ४ Tणियंतु. 1. AT विलासुजया, III. 4. 10] जसहरचरिट सूमरा संवरा मुक्कदोसा वणे मेसया मारिया भूर्य भीसावेण । रुद्धसिप्पासरो खद्धणारीणरो एस दोसायरोणेमि वारीयरो। दंडिणी मंदिर लोयणासुंदरं अग्गिजोलाघरं भासुरं भीयरं। वृत्तुमेयं सकोहो सजोहो सरि झत्ति पत्तो णियो वाहिऊण हरि। 10 तेण केवविदं समाणत्तय तस्स सहेण फुट्ट व लोयत्तयं । तं दहंत महंत पि संखोहियं वाहुदंडेहिं चंडेहि कंडोहियं। देहसंदोहसंमहणुप्पेल्लियं तेण जंतेण सहत्यलं रेल्लियं । उहिए रुढपच्छंधिकोलाहले भंगुरेणं गलेणं विभिण्णो गले। उच्छलतो वलंतो चलंतो गले कविमो सुसुवारो णिहित्तो थले। 15 राहणो दाविओ चिचिणा ताविमो चंडदंडेण सो णिग्गह पावियो। पत्ता-हउँ विवरही होतउ णीसरिउ जावच्छमि माणंतु सरु ॥ ता कयमारणकलंयलचवलु आयउ पुरधीवरणियरु ॥ ३ ॥ 4 er दुवई-जालं तत्थ तेहिं मझोवरि घित्तु महाघणसुत्तसंकडं ॥ इत्थपहत्थपहिं धरिऊण णिमओ महाणईतडं ॥६॥ ण रणि सुहहु रइयरिउहि पं कोसियकिमि तंतुसमूहि। णं घरस्थ दुग्घरवावारि पुत्तकलत्तमोहवित्थारि। जेम जीउ मोहेण विसाल तेम राय हवेदिउँ जालिं। पायपहारहि हउँ अवियद्यहि जा समरथोडकेवहिं। ता कंचुर मच्छंधिउ घोसह मह गृहं मुए दुग्गंधु पहोस।। पुंजियवहुलिप्पिउडकर्वांडई कच्छवझसकुलीरहेडालई। ता ह तेहिं धम्म णिद्धाइ णेवाविउ मच्छंधियवाडइ । जलयर होइवि थलयर दुक्खा संपत्तउ विणिवारियसोक्नई। 10 anwaan - ५ A भूरि. ६ ६ सढणारीणरो रन्डसिप्पामरो ७ 5 अग्गिजालाहरं, A अग्गिजालाउलं ८ सुहः ९. ST कलयलु चवलु 4 .ST तेहि नत्थ २. 8 घित्तमहो ३ SI णिउम्मि, A णिऊवि. ४ ST वेढिय. ५ 8 णहोमुत, 'T णहोयल: A णहमुए ६ ST कबालइ ७ST णेवि ठविउ. जस...७ - ४९ - - पुष्पदंतविरइयउ [III. 4. 11- गय महुँ तहिं कह कह व विहावरि उग्गउ सूरु तिमिरकरिकेसरि। दाविउ मीणधरोहिं गरिंदहु चिरभवतणयह कुवलयचंदहु । ता भट्टै महु लखणु उत्तउ जं विप्पागमि कहिउ णिरुचत । धत्ता--पहु मच्छउ पंदुरु रोहियउ गइवाहहो समुह तरह ॥ बहुहन्चकन्वजोग्गउ भणिवि वेउ भडारउ वजरइ ॥४॥ 15 दुवई-कहिय सायराउ मुररिउणा रोहियमच्छरूविणा ॥ बत्तारि वि सडंगवरवेय जगुय्भवभावभाविणा ॥ ६ ॥ तो हउं तेहिं पवित्त विहाविउ अमयमईहि भवणि णेवाविउ । सा विष्णविय कयंजलिहत्थे माह माइ णिसुणहि परमत्थे। रोहियमच्छु एहु जाणिजह एएं पियरवग्गु पीणिजह। बप्पहो णामि विष्पहं दिजा एयहो पुंछु लुणेवि पइजइ। ता कंतह मह पुंछ लुणाविउ सिहिणा संभारेण पयाविउ। भट्टभडारएहिं तं बद्ध मई तहिं देहदुक्खु आलद्ध। अण्णु खाइ अण्णुहु किं पावह वेयमूद जणु किं पिण भावद। पुणु हडं जलणजालसंतत्वह उकालियहि वलियहिं परियत्तइ । तेल्लकडाहि कढंति णिहित तियडयतोयझळकि सित्त। णियघेरु पुरु परियणु परियाणिउ माणसदुक्खु भीम मई माणिउ । देहदुल्खु पुणु केहउ सीसह जो वण्णहुं सकद ण सरासह। 10 घत्ता-सिजनहो महु घउ सिमिसिमइ चालुय चट्ठय चूरियउ ॥ बहुजीरमरियलवणहो जलिण णिव्वाइउ मुहं पूरियउ ॥ ५॥ 15 दुबई-तं गिलिऊण झत्ति गैलणालिवहेण डेहेइ अंगयं ॥ तमतमणारयस्ल सारिच्छमहो मह दुह पसंगयं ॥१॥ ८. णरचदहो ९ ' भराड 5 9 5 जुय २ % रोहिउ एहु मच्छु ३ S rends एयहो पुंछ लुणेवि पहजइ बप्पहो णामें तिणहे दिजइ, I reads बप्पहो कारणि विप्पह विजइ ४ ST णियपुरु घरु ५ जाणिलं ६T सरस्सइ ७ST लवणजलेण, A लवणसहित 6 १ A गलिऊण २ A गलणालिवहेइ. T गलणालीवहेण ३.8 इहेयः ४ Tदुक्ख संगयं. -५० III.7 13] जसहरचरिउ उच्छल्लिवि उच्छल्लिवि तलियड एम वप्प दुक्खें णिहलियउ। लुणिवि लुणिवि तणुकंटय वीणिवि भक्विउ मणेहिं पुत्तेण वि। भक्विउ पणइणीइ जारेण वि भक्खिउ सर्याल परिवारेण वि। 5 महु णामेण ह जि संपासित एम लोउ अण्णाणि दूसिउ । हिंसाकम्मु धम्मु पडिवजह णिग्घिणु सोचियवाएं मिजह। जा चंदमइ सुणहं फणिभवचुभ सुसुयारु होइवि पुणरवि मुम। माय महारी विहवविहई छाली पासँगामि सी हूई। मरिवि मीणु संजायउ छलउ ताहि गम्भि लंविरकण्णालउ । 10 योक्कडएण जूहपरिपालि हउँ जुवाणु ह्वउ गयकालि। पत्ता-णियजणणिहि मेहुणसण्णसुहं अणुहवंतु सिंगि हयउ॥ जूहेसि ताएं अईयएण वम्मुल्लरिउ हउं मुअउ ॥ ६॥ ~ दुवई-सत्तमघाउ जीउ विणि वि सह थाकई माउपोट्टए । अप्प अप्पपण मइंजणियउं दुविहभवे पयट्टए ॥१॥ जउ तहि लजण णिवसणेचली पसुयह जणणि वि होह महेली। तइयहं हां काई मि ण बुज्झमि एवहिं अंतो अंतो उज्झामि । गमि णिसण्णां हां संपुण्णउ अच्छमि जाम कुजम्मि पवण्णउ। 5 आसि जेण जायउ जा मायरि जा मई रमिय अपण मणोहरि। जाहि वि पुणु हउं गम्भि णिलीणउ अच्छमि णिग्गमकंखिकरण । कामाउरु मायापियरुल्लड तं कीलंतउ अयमिहुणुल्लउ। पारद्धिउँ जाइवि मलु संचिति काणणु णिरवसेसु परियचिति । मिगु ण लहति पडिमावति तं जोइवि कुलुमावलिकति। तिक्खखुरुप्पि सणि दोहाविउ छावउ जीवमाणु अवलोइउ। पत्ता-दोण्णिवि दोखंडी हयाई ताई मयाई रुवंताई ॥ गम्भासह महुँ अवलोइयह अटुंगई कंपंताई ॥ ७ ॥ o amarria- ५ AST विहयविहूई. ६ | छालिय. ७. A पासिगामि. ८. 1 संभूई ९. A अयवहणा. 7. 1. A मायपोट्टए २ A पारदिहिं. ३ 8 म; T मृगु. ४. AST पुणु णियडीहूएं. - ५१ पुष्पदंतविरइयउ [ III. 8. 1- 8 5 दुवई-उअरं फालिऊण विभइएं हउं राएण कहिउ ॥ अप्पिड अयवइस्स सुणु ससिमुह कालेण वहिउ ॥ १ ॥ तहि सेवामि अण्णाणपवित्तिउ मायासससुआ3 णियणत्तिउ। पड झडवि हडाविय जूदाहिउ हउं जावच्छमि ता वसुहाहिउ । देविहि अग्गइ भणइ भडारिए महिसासुरवरदेहवियारिए। करि पारद्धिलाहु महु भयवह तुह पलि महिस देमि हरिवरगइ। ता तहु वणि संपण्णउ मयवहु धरि आयउ पुणु पुण्णमणोणु। तहि थिर थोर महिस मारेप्पिणु पुजिय मासरसोइ करेप्पिणु। ता हउ आणाविउ सूारि भासखंड जं सुहिं घोरिं। उचिड जंतं मई सुंघिउ सुज्झइ णासापवर्णि लंघिउ । अच्छमि बद्ध दोहे डोरें णं भवभयकयकम् घोरें। बंभण मुंजाविय महिणाहिं मासरसयधयस्वीरपवाहि। घत्ता-परमेसरि सूलकवालपरि माहसामिसवसरुहिरपिय ॥ कंचाइणि पीणिजउ भणिवि राएं परिवाएवि दिय ॥८॥ 10 9 दुवई-अण्णेकहिं हयारिपलकवलपथिदिपरतुप्पधारयं । दाउं भोज मज सुअ बहुरस विणियछुहवियारयं ॥१॥ कंकणाई णाणापरिहाण दिण्णई गोदाणई भूदाणइं। पुणु भासिड रापण पसत्थडु पावउ महु षष्पहो सग्गत्थहु। दढरजुभपरिवेढियगति भुक्खातहासिहिपरितत्ति। मई संचिति णिरलंकार विहवत्तणवजियसिंगारि। अंतेउरणारियणे सन् दिण्णु पिंडु पुत्तेण विगवें। पासस्थहुजं कि पि वि णावह सगत्थहु तं किरे कहिं पावइ । 5 8! A jāagi, T Forage ? Tgy, s grūt Tomits this line, P gives this line and the following in second hand & S भवभवकयकम्में ५T परिवारें वदिय 9. 18 सतत २ कहिं किर III. 10.14] जसहरचरित सष्टुं माउच्छियाहि तहिं भुंजह पुत्तु महारउ सयणइं रंजह। हउं अंतेउरु सयल णियच्छमि अमयमई पियघरिणि ण पेच्छमि। 10 णियणासउडि करग्गु णिउत्तर ता एकह लंजियइ पउत्तउ। अज जि मारिय महिसयजंगलु वाइ दुगंधउ सुख अमंगलु । भणइ अवर यसभोजिउ अंगुवाइ देविहि णिकिटउ। अण्णेशा जि भासणउ पहउ ह आहासमि दिउ जेहउ । मायइ सहुँ गरलुल्लउ चारित खुजयकारणि णियपह मारिउ । 15 पाच तेण संडियणासोह पूइवाइ राणी हय कुट्टई। घत्ता-हउँ जाणामि मामिस पुंजियउ भोयणवेलइ ढोइयउ । आयण्णिधि कामिणिपियउ देविहि वैयणु पलोइयउ ॥९॥ 10 en 5 दुई-सव्यावयवरुवफुडवत्तिविजियअइअलक्पणं ॥ सुहरु पि पिच्छमाणु णउ लफ्खमि तिमहमहु पडिक्त्रणं ॥१॥ विहि परयारहो अवसि सह कोढिं लुणियउ णक ण दीसह । जो जारहो दिहिर आवडियट बिवाहरु सो सडियउ पक्षियउ । जाई जारयच्छयलि पईट्टई णक्नई ताई पवई गट्ठई। तारई तरलई जारासत्तई वणसंकासई जायई णेत्तई। जे थण जारकरग्गे भूलिय गंडसरिस ते पूएं दूसिय। जो जारिकरण अच्छोडिड केसभारु सो विहिणा तोडिउ । पाणि िजेहिं जारु परिमट्ट ठाउ चि ताई ण केण वि दिट्ठल । जारणिवेध्याई संघाय संयलंगुलियउ सडियउ पायहं । इय तणुणिग्गह दुग्णयगारी पाधि पाविय भज महारी। मई सफलत्तु दुचित्तु विपिउ तहि अवसरिता तेण जि जीपउ । घत्ता-लइ अच्छउ देवई वंभणदं परिवाइउ धेरि पुंजियउ ॥ ण सुदाइ मज्छ चिलिसावणउं महिसयमासु णिजियउ ॥१०॥ 3 T महिमालिया, A मई माउहि ४ S अण्ण का वि ५ A सरिय ६ A कामिणिवयणगइ JO 4AM - -- 0.5 रूयु 10.1 पटियत्ति, S फुडवित्ति. २. A. अहमहमलक्सणं, ST विलक्खणं ३, ST पघि ४. Tणिवेसि- याई ५.ST अंगुलि एप पि दिह ण पायाहं. ६. S वियफिट ७ 8 परिपुजियउ ८ T मंसुः - ५३ - पुप्फदंतविरइयर [III. II. I- 11 5 दुवई हरिणं सूयरं पि सूयारय सज्जो मारिअल्लयं ।। आणहि गपि कहिं मि अवलोइपिजीहिंदियरसिल्लयं ॥१॥ तं णिसुणिवि जसवइणरणाहि भणि होउ हरिणेण वराहिं। मिङ पवितु वि भट्टहिं गिजह योकहु अस्मि वियारिवि खजा। अच्छइ वद्धड मेम्मायंतर महिसयमासु समुग्घायंत। एयद्दो पच्छिमु पाउ लुणेविणु अम्महि ताम देहि पउ लेप्पिणु । ता तं णिसुणिवि तेण दहचि आणालंघणभीएं मिचि। लहु महुं पैच्छिउ सथि छिग्णउ करिवि भडित्तउ कंतहि दिण्णउ । कोदिणितणु वणपूएं लित्ती तो विण मासहो उवरि विरत्ती। वेयधरमवेहावियमाण तमतमपहमहि जाइ सतामसु । तिव्वद वेयणाइ ह कंपमि जाणंतु वि पसु काई पयंपमि। तिहिं पायहिं उन्भुन्भउ अच्छमि मेरंतु दस दिसउणियच्छमि। को आसंघमि किह किर गच्छमि सरणु ण को वि वप्प तहि पेच्छमि । पत्यंतरि अण्णेक्क कहाणउं आयउ णिसुणहुं दुक्खणिहाणउं । IO घता-जा छाली होइवि तत्थ मुय भुंजिवि मायरि पावफलु ॥ सा सिंधुविसह सहिसिहि उपरि हूई महिसउ भीमण्लु ॥ ११ ॥ 15 12 दुवहे-सो वणि मंडमारु पवहंतु पुरं पुणरवि समागउ ॥ सिप्पासरिसरम्मि जा मजइ दीहरपहसमाहेउ ॥ १ ॥ अलिघररायपुरिसपरिक्षित सीयलु सलिलु पियंतु णिरिक्षित। खुरिहिं हणंतु वारि परिमोसि जाइसहावसमुन्भवरोसिं। जडिवि सिंगग्गेण वियारित रायतुरंगु तेण तर्हि मारिउ। ar 11 R S हिरणं २ AP अबि ३ 8 मेमावंतउ : A पच्छिमु ५ ST वेयधम्मवेहाविउ माणुसु ६ ST वेनरत ७. ST पुणु वि मुय 6.ST महिसउ हूयउ 12 T समागउ २. ST read असिधर रनिखड after सीयलु णिरिक्खिड - ५४ IC 111.13 12] जसहरचरित सो किंकरहिं घरिवि णिउ तेत्ताह अच्छद गरवइ जसवह जेचहि । सविसाणेहिं देव णिहारित एण तुहारउ हरि संघारित। एहु सदोसउ पडु मारिजह राएं भाणि सणिउंमारिजह। जेम ण जाइ जीउ लहु एय? तुरयाणहणयारिहि कुविवेयहु । तेम जियतु जियतु अमित्त पयसु पयसु सूवारु पउचउ । तं णिसुणेवि सूवारि घोरि णासारधि विणिगायदोरिं। पुरंदुतउ बद्धउ मुहूं कह्विवि पच्छाहोतउ पुंछु समोडिवि। संखलाहिं चउपासहि तालिउ पेट्टहु हेहि हुआसणु जालिउ। चलसिद्दिजालावलिहि जलंतहु णीणियजीहहु चिरसु रसंतहु। सार तिक्खरं कायउं आणिउं अग्गा ठविर्यउ तियङयपाणिउँ। 15 धत्ता-तं पीयर्ड तण्हासोसिएण विरसतह वम्मई हयई ॥ तेणतई बहुमल पूरियई पच्छिमहारि णिग्गयई ॥ १२ ॥ 13 दुवई-जहिं जहि सिजमाणु सोसिजइ तहि तहि वप्प छिज्जए । णामेणजियाहि सपउत्ते वरसोतियहं दिजए ॥ १॥ फंदंतु वेयणइ णिम्मुमताणाइ दासेण गहिऊण भूमीसराणाइ । अहमवि णिहित्तो वि पाणे हरंतमि इंगालपुंजम्मि धगधगधगंतम्मि । देभंकहत्येण चित्तूण चित्तूण तिक्त्रेण सत्येण छित्तूण छित्तूण । 5 भत्तेण पुत्तेण सिहिणा विसपणो मि भो मज्झ णामेण हं चेव दिण्णो मि। अम्हे हया पीणिया वंभणा जाम धुत्तेहि लोपहि जड वंचिया ताम । अण्णम्मि जिमियम्मि अपणो कई घाइ अण्णस्स णामेण विप्पो पलं खाइ। अण्णम्मि नलियम्मि अण्णस्ल णखाई भजति किं भह दिणंगदुक्खाई। माहिंदतिरियस्य मज्झम्मि अइयस्स लग्गग्गिजालाकलावेण लइयस्स। 10 दोहं पि सह चेव जीयो गओ ताम उजेणिमायंगणरवारओ जाम । गोमुंडवाहइविच्छिइवंतम्मि पसुपेयपरियलियकिमिसिमिसिमंतम्मि । --- ३ जसवइ णरवइ. ४. ST महारिड ५ AST मणु कि किजइ.६ A तुरयारिहि एयहि. ७ प विणि गयटोरि . A उसुटुंतठ ९. ST मुमट्टिवि १० ST ढोइट ११. ST विरसंतहो. 13. १. A दम्भंगहत्येण २ ST दिण्णुग्गदुक्साई ३. परिगलिय, Tपरिघलिय ५५ [II. 13. 13- पुष्फदंतविरइयउ सिप्पंतपवईतलोहियरसिल्लस्मि विच्छिण्णघणचम्मछाइयकुडिल्लस्मि । मयमहिससिंगावलीसंकडिल्लम्मि फासुद्धकेसम्मि धूसरेकडिल्लम्मि। कियवाउपयपहयधूलीरयालम्मि विक्वित्तकंकालमालाकचालम्मि। 15 सिहिसिण्हमंडलरसासायकायम्मि आमिसवसामीसउलुनधूमम्मि । धत्ता-कुकुडियहि जायई गम्भि तहिं अम्हई विणि वि पिल्लाई ॥ छुड छुहु तत्तियहि विणिग्गयई उकुरुंडम्मि णवल्लाई ॥ १३ ॥ दुवई-ता गहिया गलम्मि मजारि जणणी कंपमाणिया ॥ खद्धा कलमसत्ति मुडियहिरवेण जमाणणं णिया ॥१॥ ता चंडालिइ रइयउ भल्लउ चित्तउ घरकयारपिडउल्ल। णाणाहडखडततुडियर्ड णं दुक्किउ अम्हहं सिरि पडियउ। दोहि मि कुक्कत्तिए आरडियउ ताहि मि तहिं हियउल्लउ घुलियउ। 5 में छुहु अहिएहि संवलियड तंवचूलसिसुजुयलउ घल्लि । गणियसत्तिसमूहि पेल्लित समउं कयार इह मई घल्लिडं। अम्हहं सहु ताइ अवहारिउ पुणु कयाह चरणि ओसारित। लग्गई पायग्गई महु अंगई हत्थे लेवि णियाई विहंगई। कुहियकलेवरि ठविय णियपरि विलसियकम्मविवायसुदुद्धरि । हजो णिवं णिववंदिउ होवउ सो चंडालिह पायएं छित्तउ। धत्ता-सीउण्हे वाएं पीडियई छुहंतण्हासंतत्ताई ॥ चंडालणिलइ णिवसंताई दुक्खपरंपर पत्ताई ॥ १४ ॥ 15 IO दुधई-दूसहविहुरवडणसुढियंगई धरणियले पलोट्टई ॥ तहिं पाणहरि खद्धपरपाणई पाणिवहे पयट्टई ॥१॥ ४ 'कुडिलम्मि ५ AT कुक्कुढियहि ६ ST उकरडम्मि 14 १. S घल्लिड R S adds after this पुष्वजम्मि ('T जम्म) किउं णावइ घडिय ३ S omits ण णियसत्तिसमूहि पेल्लिट ४ S मध्यंगइ ५ S जिउ णिववंदिउ, T जो णिवपइवदिउ ६ P छुहतहासिहि संतत्ताई. - ५६ - III. 16. 13] जसहरचरिउ चित्तपिच्छचित्तलाई चंचुचारुचंचलाई भूरिपावभारयाई उक्नयावणारयाई । जीवरासिखंडिराई पत्थ तत्थ हिंदिराई चोरमारए रएण राइणो तलारपण । दूरमुकसंमेपण दो वि चंडयम्मएण दिट्ठयाई आणियाई हत्थफंसमाणियाई। 5 ढोइयाई पत्थिवस्स पुष्वजम्मणंदणस्त स्वरिद्धिमायणेहिं णेहणिलोयणेहिं । वारवार जोइयाई तेण तं णिसवियाई उत्तिमाई लक्खिया मेमणे परिक्तियाई । तंवचूलडिंभयाई पीययंगणंभयाई ताम तुज्झ मंदिरम्मि संवसंतु सुंदरस्मि । एयहिं जायपहि दिण्णणक्खधायपहिं रोसिरेहिं पत्तिपहिं पुत्तपहिं पत्तिपहिं । चाहियधियारपहिं मूंघुलंतगत्तरहिं उद्धकंटकेसरेहि रत्तणेत्तभासुरेहिं । उहिरेहि रंगिरहिं विभमं पयासिरेहिं जुझिरेहि कीलिहीमि जुझयाई पिच्छिहीमि। वत्ता-ता णिसुणिवि णरवहणियमविहि मिर्चइ ठवियई णियभवणे ॥ गय रयणि तित्थु पंजरि ठियई सुप्पहाइ जहिं राउ चणे ॥ १५ ॥ IO 16 5 दुवई-तत्थ णियाई दो वि दाहिणमंदाणिलचलियनुमदलं ॥ दिलं वणमणेयखयरापलिकलरवजणियकलयलं ॥१॥ परंतसच्छविच्छुलंभणिज्झर भरतरुंदकुंडकूवकंदरं। ललंतवेल्लिपल्लवोहकोमलं मिलतपक्लिपक्षलक्खचित्तलं । सिणिद्धामपुप्फरेपिंजरं फलोवतधुकरंतघालवाणरं। दिसाचरंतजस्त्रफिकिणीसरं लयाहरस्थकीलमाणकिणरं। व(पलिचगेयमोहिएणयं णहोयरंतदेवयाविमाणयं। सिलायलासणथसिद्धसेयर गहीरपंकलोलमाणसूमरं। परिददंतिदंतमिण्णचंदणं पुरंघिधित्तहारदित्तवंदणं । पढंतकीररिच्छसहपेसलं मरालियाणुगामिवालपाडलं । तुसारफारफेणरासिसयो वणमिम तम्मि राइणो णिकयो । पत्ता-तहो पंगाण मंडउ पडरइउ पंचवण्णु किकिणिमुहलु ॥ तहि अम्हां पंजरएण सहुँ ठवियई णं जमर्मुहकवलु ॥१६॥ 15. { । मण्णएण २ मम्मणे. ३ AT पीहएं गएं भयाई ४. AP एययाण. ५ AST add णित्त ( णेत्त) रत्तधारएहिं ( A adds after it णिटुरापहारपहि) चंचुघायधुम्मिरेहि सेयतोयतिम्मिरेहि, but P erased this by means of हरिताल.६ णिच. 16. १. ST घोहि वि. २ ST लक्सपक्स. ३. ST जममुहि कवलु 10 मस...८ - ५७ - [ift. 1. 1- पुष्पदंतविरड्या 17 an दुवई-तष्णियडम्मि रत्तपत्तंचिउ हयपरतावदुक्खउ ॥ सीयल सोमु रम्मु णं णरवइ सहइ असोयहक्खउ ॥१॥ दारियघोरचोरपरयारि हिंसायारि तेण तलारि। तहो तलि पविमलसिलहिं णिविउ झाणारूढ मुणिवा दिट्ठउ । दोआसावंधणपरिचुकर रायदोस दोदोसहि मुक्क। धरियतिमुंड तिदंडविहंडणु छिण्णतिसल्ल तिलोयहु मंडणु। हयगारवतिउ तिरयणभूसणु वउकसायसिप्पीरहुआसणु। चउसण्णाविसेसणिण्णासणु पंचसमिदिसम्भावपयासणु। पंचासवदारह कयसंवर पंचमहव्ययभारधुरंधरु। पंचमीसु पंचमगइसामिउ पंचाचारमहापहगामि। थिरु छन्जीवणिकायदयावरु सत्तमेयभयतिमिरदिवाया। अदुहमयणिवणायह अहमपुहविवासजाणाया। असिद्धगुणसंजोइयमणु णवविहवंभचेरै जो भणु। दहविहु धम्मलाहु जि लद्धर दहपाणक्खउ जेण णिसिद्ध। घचा-एयारहपंडिमउ सावयहं जेण वियारिवि उत्तियउ॥ उद्धरिय जेण बारह वि तव तेरह चरिय वित्तियउ ॥ १७ ॥ Io 15 दुधई-जो मयमोहलोहकोहाइरिऊण रणम्मि दुम्महो॥ जो तवचरणकरणजालावलिवधगत्तिवम्महो ॥१॥ तं पिच्छिवि सो तलवर पर चिंतइ दुडु घिटु पौविठ्ठड। विठ्ठलु णग्गड दुक्खें छित्तर थत्ति महारी दूसिवि थक्कर। दीसह ताम जाम अवसउणउं णिववणाइ णिद्धाडमि सवैणउं । कित्तिउ णियमणि दूमिउ अच्छमि कडि किं पि अपुच्छिउ पुच्छमि । जं जिह भासइ तं तिह दूसमि रिवि णिवत्ता पच्छइ रूसमि । 5 17 S वारिय २ ST णिञ्चल ३ ST परिचुका ४ ST चुक्कल. ५ P कय ६ A समिइ जायण पर ८ वमचरि ९ T पडिमा 18 १T दप्पिड २ AP अवसवणड ३ A खवणत ST करमि IO III. 1914] जसहरचरिउ कि पि अर्जुत्तु दुरुत्तु पवोल्लमि अवसवणउणीसारिवि घल्लामि । इय सुमति मायावति वंदिउ साहु णिरिककयंति। तहि अवसरि तहु जोउ समत्तउ जाणतेण वि पिसुणु अभत्तउ । आसीवाउ दिण्णु भयवंति धम्मवुद्धि तुह होउ भणति। णियगुणु मोक्खु पयड्ड संपन्जा सुहु संभवउ भंति तुह मजउ। पत्ता-णउणिदह मच्छरु विच्छरइ ण पलंसह वहा हरिसु॥ समतणकंचणहं महारिसिहि सत्तु वि मित्तु वि समसरिसु ॥ १८ ॥ 19 दुवई-भणियं तलवरेण घणु धम्मु भणिजइ जोहसासणे ॥ गुणु तहो कोडिलग्ग मोक्खु वि रणे वाणहो रिउविणासणे ॥१॥ अण्णु धम्मु गुणु मोक्खु ण याणमि ह पंचिंदियसोक्ख माणमि। तुहुं पुणु काई मि दीसहि दुव्वल णस्थि चीर पंगुरुणु ण कंवलु। अट्ठ वि अंगई रीणइं झीणई णयणई गंपि कवोलि णिलीणई। 5 गत्तु मलावलित्तु कि ण घोगहि रत्तिदिवसु णिमिसु वि कि ण सोवहि। मउलियणेत्तवत्तु किं झायहि अम्हारिसह भंति उप्पायहि । ता मुणि भणइ सझाणु णिउंजिवि जीउ वि कम्नु वि दो वि विहंजिवि । जाहु समीहमि सासयठाणहो अजरामरहो परमणिव्वाणहो। पुरिसु महेली संदु वि एवउ सोमुचंड पुणु णं जमदूअउ । राउ पुणु वि पाइकु सुदीणउ रूववंतु पुणु स्वविहीण। मइलगोत्तु पुणु गोत्तसमुज्जलु वलविहीणु पुणु अतुलमहावलु। घचा-हुउ अन्जु मेच्छु णरभवभवणे दालिदिउ पुणु दविणवह ॥ सोत्तिउ होइवि चंडालु हुउ विसमी भवसंसारगइ ॥ १९ ॥ 10 4 ST दुरुत्तु अजुत्तु ६ ST अवसणु Artemu 0. ST omit this line and P gives it in second hand. 19.1. S कवालि.२ ST समाहपि. ३. A भड ५९ पुष्पदंतविरइयर (III. 20. 1- 20 5 दुवई-मासाहारु कूरु मिर्गु काणणि पुणु तणयह वि जायउ ॥ पुणु रयणप्पहाइ णरएसु वि विसहियगड्यघायउ॥१॥ णार पणु हुउ जलयर थलयरु णहयरु पुणु तिरिक्खु बहुअहयरु। पुणु कुच्छिय सुरजम्मावत्ता णिवडिउ परिवत्ता रयणत्तइ। अण्णण्णई अंगाइं धरंतहो अण्णण्णाई ताई मेल्लतहो। एम वप्प जावतमरतहो गयउ कालु दुक्खाई सहतहो। दुक्खु पावफल हई मणि मण्णाम तेणिदियसुहाई अवगण्णमि। भिक्ख चरमि अप्पउ आयासमि थोवउ भुजमि णिजणि णिवसमि। धम्मु पयंपमि मोणि अच्छमि मोहु ण इच्छमि णिदं ण गच्छमि। कोहु ण संचमि कवडु विलुंचमि माण विखंचमि लोहु विवंचमि । जायइ देहदुक्ति उन्नेवउ कहिं मि करमि णउ मयणुम्मायउ। ण भयाउरु गउ सोएं मिजमि हिसारंभु डंभु णावजमि। घता-हउँ अंघउ णारिणिहालणए बहिरउ गेयायण्णणइ ॥ पंगुलउ कुतित्थपंथगमाणि सूअउ विकहावण्णणइ ॥ २० ॥ 21 IC con दुवई-जो आहार देहु सो अण्णु जि मइं गहिओ अचेयणो ॥ सो सच्चेयणु व्व परिघावइ धवलणियहिओ अणो ॥१॥ विणु घवलेण सयड किं हल्ला विणु जीवेण देहु किं चल्लइ । अण्णु जीउ महु अण्णु कलेवर तेण भइ हउँ हुवउ दियंवरु। परु ण दुगुंछमि मोक्खु समिच्छमि झाणालीणु णिरुत्तरु अच्छमि । अट्ट रउद झाण णउ इच्छमि धम्मसुक्कझाणिं पह पेच्छमि। आहाकम्मुईसहि चत्तउ पिंडु लेमि जिह केवलिवुत्तउ। पंचासबदारई परिवजमि एम वप्प इंदियवलु णिजमि। भणह सुहडु गोसिंगु ण दुभइ विशु छत्तेणं छाहि किं लभइ। 20 १ ST मृगु २ ST णि ण गच्छमि ३ ST read this line कोहु ण संचमि माणु विवंचमि कवडु विलुंधमि ('' विलंघमि) लोहु बि खाम : ST ण हसमि ण रममि णउ उब्वेयउ ५ A विकहाकण्णणइ 21. T हल्लइ २. ST आणाख्दु ३ 8 पावासवदारइ ४ चवइ.
to III 22. 14] जसहरचरित विणु जीवेण मोक्खु को पावइ तुम्हारिसु किं अप्पउ तावइ । छंडहि त उ करि मेरउं वुत्ता जीउ वि देहु वि एकुणिरुत्तउ । जिह तरुकुसुमहो गंधुण भिण्णउ तिह जीउ वि देहाउण छिप गउ । फुल्लविणासिं गंधु जिह णासह तिह तणुणासि जीउ वि णासह । तं णिसुणेवि मुणिवरु आघोलह परमप्पयहो क्यणु परिपोसइ। चंपयवासु वि लग्गउ तेल्लहो एम गंधु जिह छिपणउ फुल्लहो। तिह देहहो जीवहो भिण्णत्तण दिवउ किंकर चवहि जडतणु । भणइ वीरु दिण्णई पचुत्तरि इंतु ण दीसइ जीउ पहंतरि। घत्ता-पर दीसइ सोणियसुकधर गम्भभंतरि बुद्धिगउ ॥ तं णिसुणिवि संजमणियमणिहि कहइ भडारउ समियमउ ।। २१ ॥ 15 22 दुवई-दूरा पंतु सहु णउ दीसह परकण्णम्मि लग्गओ ॥ गजइ जेमतेम जगि जीउ वि बहुजोणीकुलं गओ ॥१॥ णकिं को विण रूवई पेक्वह कर्षिण को विण भक्खई चक्खइ। अण्णगेज्यु अण्णे ण लइजइ रूवे स्ववत्थु जाणिजइ। तं पि सविसयवगपतिवद्धउ अण्णु होइ अण्णुमाणि सिद्ध । सुहमु ण थूलि णाणि छिप्पा करिकरण किराई धिप्पइ। सुहमु जीउ सुहमेण जि णाणि दीसइ जगि केवलअहिणाणि। ता सुंडीर भणइ कि णिजइ जोणिहि केण जीउ आणिजह । तं आयण्णिवि णवजलहरझुणि संसयहरु आहासइ तहो मुणि। अयसिरु छिदिवि एक्कु महब्वइ जायउ अवरु वि तवभहउ जह। संभु वि वंभु वि कम्मायत्त कम्मविवाउ लोइ बलवंतउ । लोहु व कडएण कहिजइ जीउ सकमि चउगड णिजइ। घत्ता-वित्थान वि संघौरु वि करइ अनुकम्मपयडिहिं गहिउ ॥ जगि कुंथु हवेप्पिणु करि हवा जीउ सरीरमाणु कहिउ ॥ २२ ॥ to ५. 'T' फुल्लविणासे गंधु ण पावइ ६. T परिघोसइ ७.ST भिण्णड A णियमविहि 22. 9. ST थूलणाणेण ण.२ ST संहारु. - पुष्पदंतविरइयउ [III 23 1- 23 5 दुवई-जइ धुउ लोयमाणु णिरु णिञ्चलु किरियागुणविवजिओ। तो तहो कम्मबंधु कह होसइ भीसणभवसमनिमो ॥१॥ वधि विणु कहिं गुरुसीसत्तणु घडह वप्प अवरु वि तवसित्तणु । सुद्धहो रइ तमु अंगि ण लग्गह सन्गु मोक्खु किं कारणु मग्गइ। विणु जीवेण फासु किं सयणई परियाणइ उकोइयमयणई। विणु जीवेण जीह किं लक्खह रसविलेस णाणाविह चक्खइ । विणु जीवि पेच्छंति ण णेत्तई अग्गा थकई वइरई मित्त। त्रिणु जीवि घुलिणाई ण माणित घाणि कत्थ वि गंधु ण याणिउं। विणु जीवण कण्णु णायण्णा सहु सुहासुहु कि पि ण मण्णइ । विणु जीवेण सुड णिचिटई पच ताई कुलगुरुणा सिहुई। अयहरिहरईसरसिवणामह फासाइयई गुणगहधामई। पत्ता-णउ फासु ण रसु णड रूउ तहो गंधु ण सहु वि वजियउं ॥ पर फरणहिं पंचहि पंचगुण जाणइ मई आयण्णियउं ॥२३॥ 10 24 5 दुवई-सुरगुरु लोयणेहिं जं पिच्छइ इच्छह तं समक्वयं ॥ जो ण णियइ घरस्मि चिरपुरिसणिहाणघडं पिणिक्वयं ॥१॥ वायाकुंछ वंठु दप्पुब्भड विसयकसायरायरसलंपड। सो किं जाणइ व्वई फुरियइं वायरसुहुमई दूरंतरियई। गोयह वायह णबह खेल्लइ कामिणिघणथण हतिय पेल्लइ । अरिवल हूलइ सूलइ फालइ खेत्तई गामई णयरई जालइ । पावकम्मु किं सम्बड पेक्वइ किं कारुणि कासु वि अक्वा । जह सिद्धंतु अदेहिं कहियउ इ तो मई एउ जि सदहियउ। कुम्मरोमकंवलपंगुत्ति णहकुसुमंचित वझहि पुर्ति। घत्ता-णिकलुणइ जायइ णउ मरहण करइ ण घरइ उ हरइ ॥ णिकलु अरूउ परमेहि पहु भवसंसारि ण संसरइ ॥ २४ ॥ 23 3 ST सिद्धहो २. A भक्खइ ३ ST गुणगगधालाई. 24. FT णिक्सिय २ S वायइ गायइ ३. T लायइ T सूलइ ५ 'पावधम्मु ६ 7 वंशापुत्ति • ६२ . IO III. 26.51 जसहरचरित 25 5 दुवई-इंदपडिदचंदविसहरणरस्नेयरविरइयच्चणो ॥ अहोत्तरसहासलक्खणधरु केवलणाणलोयणो ॥१॥ अट्ठपाडिहरामललंछणु ण उदयायलि थिउ मयलंछणु । धम्मचक्किकयमणमलणिग्गमु वीयराउ मुणि मुणिवरपुंगमु। एहउ होइ सयल परमप्पउ ति मासिउ हां जाणमि अप्पउ। सो ण णिचु पजाएं वुचइ दव्यत्य पुणु णिच्चु जि सुव्वा । णिचु भणंतहं ण मरइ ण हवा णिचु भणंतहं ण रमइ ण चवइ । णिच्चु भणंतहं गयणसमाणउ ठाइ जीड गयकिरियाठाणउ । णाणाभेय जीव जिणु भासह एक्कु जि जीउ भट्ट किं विरसइ। एक हसइ अणेकु वि रोइ एक्कु चे अणेक्कु वि सोभइ। एक जाइ अणेक्कु वि थका भिडइ एक्कु अणेकु वि संका। एफ सीसु अणेकु वि गुरु णरु एक्कु राउ अणेक्कु जि किंकरु। मणिजासवणहेउ कि दिना रूवि कि अरूवि परु विजह। असिवरेण गयणयलु ण छिजह पण णाई मह हासउ दिजह । णिम्मलु कि रम्मइ परराएं भयवं भयवहो होउ विवाएं। धत्ता-जगि णत्यि अणुइ तवचरणु पत्तवडियपलरसरसिउ ॥ विण्णाणखंभु पुरिसु वि भणइ बुद्ध भडारउ साहसिउ ॥ २५ ॥ 26 10 15 दुवई -जइ तिल्लोकखंभु विण्णाणु वि ता सुगयंवरंगए ॥ भतिए भंति केम जाणिजइ साहिजइ जणग्गए ॥१॥ यणि खणि अण्ण होइ जइ चेयण ता को मुणई छमासीवेयण। वासणा जाणाणु पयासह तो वासण खणि किणउ णासइ । किं सा पंचह संघहं भिण्णी जीवसिद्धि एमइ पडिवण्णी । in 25. १. T फणिढ २. STण धरइ ण करइ, A णरवइ ण चवइ. ३ A णाणाजीवभेय ४ST भिजाइ ५.ST रप्पइ. 26 १. S तयलोक्कु मंतु; T तेल्लोकभति २. ' मुयइ ३ 81 लइ मई. ६३ 10 पुष्पदंतविरइयउ [III. 266- तो सिरसिहरि चडावियहत्थे मुणि वंदिउ भडेण परमत्थे । विसरिसकुसुमवाणविणिवारा भणु किं पेसण करमि भडारा। भणइ भडारउ धम्मु लइजह धम्मि सग्गु मोक्खु पाविजइ । धर्मिम होति मणुय हरि हलहर चारणचकवाट्टि विजाहर। पायपोमपरिघुलिय पुरंदर पहाणसलिलपक्खालियमंदर । धम्मि होति जिणिंद रिद वि धम्म होति सुरिंद फणिंद वि। ससहरवयणउ कुवलयणयणउ माणियमयण उज्जलरयणउ । सुहमुहपवणउ भूसियभवणउ लीलागमणउ मुणिमणदमणउ । मम्मणभणियउ कोड्डावणियउ घणघणथणियउ णं सुरगणियउ । धम्मे महिलउ होति घरत्थह परिहियविविहविहसणवत्थई । 15 घत्ता-धम्मि रयणंसुजालंधरई जालगवक्त्रमणोहरई ॥ सुविचित्तचित्तभाभासुरई सत्तपंचभोमई घरई ॥ २६ ॥ 27 दुवई-धर्मिम होति जाणजंपाणई घयधवलायवत्तयं ॥ चामर रह तुरंग मायंग महाभड वलाई भत्तयं ॥१॥ पावेण महिलाउ जायंति मइलाउ जाराणुकूलाउ धणहरणलोलाउ। पिंगुद्धवालाउ लंबिरकवोलाउ 8ोहरुद्वाउ दूहवउ दुट्ठाउ। कुलमग्गभट्ठाउ कट्ठाउ घिद्वाउ सुहणिट्ठणहाउ गोलग्गकंठाउ। 5 णिम्मुक्कणेहाउ दुग्गंधदेहाउ खयकाललीलाउ कलहेक्कसीलाउ । सोहाविहीणाउ दारिहरीणाउ खरफरसभासिणिउ गेहम्मि गेहिणिउ । णिवसंति दुरिएण चिरजम्मचरिएण तिलपिंडखंडेसु तुसविरसपिंदेसु । डिभाइ लग्गंति रोमेति मग्गति सीएण कंपति उण्हेण तप्पंति । वारण भिजति भुक्खाइ छिजंति फट्टाई णिवसणई फुटाई भायणइ। 10 ४ A रइजइ ५ T पायपोम्म ६ ST पढिद ७ ST सत्तपंचभउमई 7 १ T दुहो? २ P omits सुहणिढणढाउ गोलग्गकंठाउ, ST read पावेकणिहाउ for सुहणिटुणटाउ. ३ ST तुसरइय , AST adds afrer this दुग्गय ( A दोहग्ग) कुहुवियइ णियकयविडबियइं (A मयमह. facias), but A adds this in second hand III. 29.7] जसहरचरित पीरसई भोयणइं णिव्यंधुपरियणई बहुछिद्दजजरई कुहियाई कुडिहरई । संजणियतावेण जीवस्ल पावेण दुक्खाई पसरंति सुक्खाई ण हवंति । घसा-इय जाणिवि तुहुं करि धम्मु तिह जिह जीववणु ण वि संभव॥ तं णिसुणिवि मुणिवरिंदवयणु विदसिवि तलँवरु पडिलवइ ॥ २७ ॥ 28 5 दुई-जिम्मइ मासखंड पसु हम्मइ गम्मइ सग्गवासहो ॥ एम भणंति देवगुरुवंभण णाणु ण जिणवरेसहो ॥१॥ तं णिसुणिवि मुणिणाहिं युत्तउं इंदियवजिउ णाण णिरुत्त। जीवसहाउ ण अण्णायत्तउ साहणकमपडिखलाण चत्तउ। दियवुद्धिए काई मि पिक्चर काई मि पुणु जम्मि वि णो लक्खह । सुत्तहो मत्तहो मुच्छावण्णहो सुणहुल्लउ मुहि सवइ विसपणहो । ति तिवणु तियालु संगायउ भणु भणु वप्प केण विण्णायउ। पासि भारहु सयलु वि दिउ अणहोतु जिकिह लोयहं सिट्ठउ । ठविय केम महि संख पयासहि परमाणुअउं गणिउं परिहासाहि । गहगहणुल्लउ केम पमाणित गहण केम गयणंगणि जाणिउ । घत्ता-सव्वण्हु मणिदिउ णाणमउ जो मयमूद ण पत्तियइ ॥ सोणिदित पंचिंवियणिरउ वइतरणिहि पाणि पियइ ॥२८॥ IC 29 दुवई-कि केण वि जयमिण कयाउ रियाउ भणंति णिहया ॥ ण हि सयमेव थति पंतिए णहे मिलिऊण सहया ॥१॥ अणुसंघट्टणि सहु विहावइ उद्विउ खणि णहयलि परिघावइ । पसुई विणिजीवहं वि मणक्खरु सो संभवइ महुरु अवरु वि खरु । परमुहवणठाणसंकेयहो बुद्धिए णिजइ भासाभेयहो। वेउ सयंभु भणंतु ण लज्जा दियवरवरकइकित्तणि पुजह । विग्गहवंतु देउ णउ अक्षा पंडव सुरसुअ मुहियइ झंखइ । 5 ५ ST add after this पावेण दंडियई धम्मेण छंढियइ ६. A. लहति ७. AP परवर 28 1.7 रिसिणाह. २. A वि. ३, ST महमूद्ध 29. 1. AST कियाउ, २.ST कित्तिण; A कित्तणु जस...९ ६५ - 10 पुष्पदंतविरइयाउ [III.29.8- अंसुण लम्मा चिणिरसहो वासुएउ किह फिउ रिउ कसहो। हिंसइ लग्गु मोक्खु सुयसंगमु अण्णु पुराणु अण्णु वेयागमु। अण्णु देउ अण्णु जि पुजिजा कि वोलिजइ हो हो पुजई। वयणु कुमारिलभट्टहो फेरउ अइअसुद्धधम्महो विवरेर। घचा-गेयई यई मई जाणियई हरिणहो मरण पयासिया ॥ एकि णिरु णिकिउ समरउलु अवर दियउलु पोसियउ॥ २९ ॥ 30 दुधई-मीण गिलंतु ण्हंतु जइ सुज्झइ ता कंको महामुणी ॥ वदिजह वरंतु णइतीरिं किं किजइ परो मुणी ॥१॥ मिढी हरिणी वि गाइ वि तणयरि पावि हूई सूअरि वणयरि। जिणवरदिहिहिं सब समाणी देवि भणिवि सुरवसाहिसमाणी। वंदेह गाइ पुणु वि जो मारह अप्पउ भवसंसारहो तारइ । 5 गोसुम जणि घम्मि रइ माणइ सोयामाणहिं मन्जु वक्त्राणइ। हो तहो विष्पहो तत्ति ण किजइ रिसहि दिहउ धम्मु लइजइ । दुद्धरु होइ धम्मु अणगारउ लह परिपालहि तुहं सागारउ। अणालयगिर जीवह दय किजइ परघणु परफलतु वंचिजह। आणिसामोयणु पमियपरिग्गड मणि ण णिहिप्पड लोहमहागहु । महुमइरामि पंचुबरिफल जउ चक्खिजइ कयक्कियमलु। किजा दसदिसपचक्खाण वि भोउवभोयमुत्तिसंखाण वि। मरिक्त्रणु अवरु वि सुदसवणु वि पाउँसकालि गमणवेरमणु वि। जीवाहारु जीउण धरिजा णियपहरणु ण विकास वि दिजह । घत्ता-अहमिदिणि अवरु चउदसिहि छिह पुरंघि ण थण दुहडि ॥ 15 उववासु एक्कठाणु वि करहि एकभत्तु जिम णिविवयडि ॥ ३० ॥ 31 दुवई-जिम पुण कजिएण भुजेजसु झाइयधम्मझाण ॥ णिषसिजासु कहिं पि जिणमंदिरि जणियमलावसाणमो ॥१॥ ३ गेएं वेए ४ दियवलु 30 ST बदइ पुणु वि गाय जो मारइ २. AST गोसव ३ ST' लोहमहमहु ५. A मयरक्खणु 10 " ST पाउसि कि पि ६ ST मच्छिव पुरंधिहिं थणदुहडि. - , 5 III. 32. 10] जसहरचरित पवि पनि तुहूं एम करिजसु सयल वि कम्मु सहिंसु चएजन। अहमु पत्तु सणि जाणेजस जीवदयावरण होएजसु। मज्झिमु घरवइ उत्तम संजमि संठिउ समदमवयणियमुजमि। अभयाहारोसहसुपदाणई तिविहपत्तीचरइयसंमाणई। दिग्णई गठ्यपुण्णसंताणई पुरिसहं दिति पंचकल्लाणई। दसणु णाणु चरिउ चितिजह किरियापुन्धि जिणु पंदिजई। रोसु तोसु हासु वि वंचिजह समभावण भावि भाविजह। इय समिाइउ भाणिउ तियालइ घरपढिमग्गइ अहव जिणालइ । अह पुणु उत्तरदिसि सवडंमुहु ठाइवि होवि सुरवइदिसिमुहु । मणिण णियच्छिउ जिणवरसिरिमुहूं फुगुरुकुदेवहं होवि परंमुहु । अंतकालि सल्लेहणमरणि अवसु मरेव्वळ णिजियकरणिं। घचा-तं णिसुणिवि पभणइ पवरभदु अम्हहं कुलि मारणु पढमु ।। तं वजिवि सयलु परिग्गहिउ धम्महो फेरउ कहिउ कमु ॥ ३१ ॥ ro 15 32 5 दुवई-हउँ पुरवरतलारु परु मारमि दारमि भारमंडणे ॥ महु वउ णत्थि देवमुणिपुंगवदुद्धरचोरमारणे ॥१॥ पियरपियामहकमसंचार महु कुलधम्मु वढु णरमारि। तं णउ मुअमि इयर वउ लइथउ तं णिसुणिवि रिसिणा पुणु केहियउ । एउ णियच्छहि अच्छह णियडउ जिह भवि भमियउ कुक्कुडजुयलउ । तिह भमिहीसि तुहु मि संसारइ लग्गड कउलघम्मवित्थारइ । भासइ परवर कहहि चिराण संवचूलजयलस्ल कहाणउं। कहइ मुणीसह मायापुत्तई इह होताई लच्छिसंजुत्तई। धत्ता-अञ्चतकुसंगि जायएण जायउ भाउ सकक्खडउ ॥ मारिवि कुलदेविहि दिण्ण वलि एयहि कित्तिमु कुक्कुडउ ॥ ३२ ॥ IO Anmmm 31. 2 8 omits this line; 'T reads सयलु वि धम्मु अहिंस वरेजसु २ ST omit this line, ३ A चरणु. ४ A8 अंतग्रालि 32. 1.ST संदणे २ ST लवियठ ३. " तुहुँ जि. - पुप्फदंतविरइयउ [III. 33. 1- 5 33 दुवई--णियतणु घणु विणासिवि भयतुंगई मरिवि छुहावसं गई। संजायाई बे वि सिहिसाणई पुणु पसव भुयगई ॥१॥ पुणु झससुंसुमारभवयत्तणु पुणु अय आयय अयमहिसत्तणु। संपइ जायउ पुणु वि णवल्लड पेच्छसि रत्तसिहरमिहुणलउ। ता गरेण कुलधम्मु मुएप्पिणु लइयउ सावयवउ पणवप्पिण। अम्हई विण्णि वि णिसुणियजम्मई मणि संगहियजीवदयधम्मई । अइअउव्वलाहि संतुट्टई लवियई सुमहरु कयउकंठई। णवरम्हारउ सद्दु सुति धणगुण मग्गणि झत्ति कुणंति। भणिय देवि जसवइणरणाहिं मेहुणसण्णाहणुच्छाहिं। पेच्छि देवि घणुवेउ अभग्गउ सहवेहु दक्खालमि लग्गउ । घत्ता-इय भासिवि राएं मुक्कु सरु वम्मई तेण विलुक्काई ॥ अम्हई विण्णि वि पंजरि ठियई दहविहपाणि मुक्काई ॥ ३३ ॥ 34 दुवई-वे वि मुयाई कंडणिभिण्णइं सोणियकिमिणिहेलणे || सुयपणइणिहि गभि संकमियई कुसुमावलिहिं तक्वणे ॥१॥ पावपरंपराइ णिरु वणियउ हउं सुण्हहे णियपुचिं जणियउ । जा चिरु होती माय महारी परमेसरि चंदमइ भडारी। सा णियकम्मि भववलि दिण्णी णत्तिहे णत्तिएण उप्पण्णी। 5 गम्भट्ठिउ जुयलुल्लउ जइयहु मासाहारु ण रुञ्च तइयहु। पवमासहि सुव कुमरहं जुवलउं संजणियउं सुहजोई विमलडं। जणणिए हउं जणणेण वियाकित अभयरुइ ति कुमारु पकोकिल। अभयमइ ति सत्ति णं कामहो सस परिवहइ कति व सोमहो । विणि वि सयलकलाणिउणियरइं जावई णययाणंदियपियरई । महु जुयरायपटु बज्झेसह लोउ समोउ भवणि भुजेसइ । कजई तेण मयामिससिद्धिहि जसवइपहु पत्थित पारद्धिहि । 33 १ Tकयउक्टिहि 34 ? ST अइ २ STomat this line, AP add this an second hand. ३ STधम्महो, A वम्महो 10 III. 36.2] जसहरचरित अग्गा काइलसदहो मिलियाई पंचसया सोणइयहुं चलियम्। उववणि तस्यरतलि आसीणड उग्गतत्ततवता स्त्रीण। ता दिट्ठउ कुसुमसरवियारउ झाणासटु सुदत्तु भडारउ। घत्ता-पा चिंतह सिद्धिविणासयह अवसवणउ कहिं आइयउ॥ घलु अवणउ तइयह याहिरउ कहि महु जाइ अघाइयउ॥ ३४ ॥ 15 35 दुर्वा-य संचितिऊण मणि पिसुणि णियसुणहउ विमुकमो ॥ गं चलु विजुजु मणपवणजवालउणं पिसको ॥१॥ अणुमांगे तहो पषिणहरंकुर सोणइएहि मुफ णियकुक्कुर। भसणहं ताई सुतिक्या उसणई ण रायहो मयमारणवसणई। का उजुयत्तु णा पत्ता पुंछई णं पाविठ्ठहो चित्तई। जीहरणं हिंसातरुपल्लव पक्सई ण तहो अंकुर णव णव । सुणहा पावपुंजरं व दिट्टा पारद्धिय ताई वि णिकिट्ठा। मयेउलु दंवि रसिउ वणि दिउ स्रद्धउ जेहिं नुणहं उचिठ्ठ। ते जि सुणहं दारियसारंगई अण्णु किं सुणहहं मत्यह सिंगई। ते गुणवंत हसति भसंति व आकोसंति संति मारंति व । मुणियरतवसामस्थि णिरत्था संयल वि थिये ओणावियमत्था । सुण णियवि लेवि सई असिवरु राउ पधायउ मारहुं मुणिवरु । तातहिं केण धणिदि घोल्लित वणि कल्लाणमित्तु अंतरि ठिउ। -विरएपिणु अंजलि वणिवरेण योल्लिउ राउ जणतिहरु । जह मारहि जइवर वयसहिय तोकिं करइ विझि समर ॥ ३५॥ 10 15 36 दुई-पणवसु परणवरुणवइसवणथुयं विसए विरतयं ॥ ता परिचवइ णिवह कोवारुणु पइं कि हो पउत्तयं ॥१॥ - 35. ! T हरिणमसु दंतावलिदिट्ठठ. २ ST सयल वि संठिय पणवियमत्या ३. A ठिय ४. ST ता तहिं अवसरिगं हाइवे णित 5 10 पुष्पदंतविरइयउ [III. 363- गग्गु अमंगलुरुजविणासणु जो मई पावव्बउ जमसासणु।। तहो पयजुइ पडंतु किं वुच्चमि वेयवंत दियवरहण रुचमि । ता पभणइ वणि गंजोलियमणु णग्गउ रुहु धूलिधूसरतणु। जग्गउ खेतवालु कत्तियकर रणझणंतपयगयणेउरसरु। लोहवलयकयकमखरवाहणि णगी जोइणि मुंडपसाहणि। भीमई भक्खियमाणुसमासह एयई सम्बई पिउवणवासई। हत्यगहियकंकालकवालई मंगलाइं किह भणु हिंसालई । सेतु जीवदयवंतु सुणिम्मलु साहु भडारउ केम अमंगलु। णगगउ परमहंसु परु झायह जग्गड णगएहि जणु जायइ । तिरयणभूसणु णग्गउ भावई तो वि मुर्णिदह दोसु जणु लावह । अण्णु वि पई अण्हाणु किं दूसिउ जिंदावयणु मुर्णिदहो भासिउ। जणि अण्डाणु पउत्तु कुणंतह कि पुणु रिसिहिं महातववंतह। संयमलसलिलि सुज्झह कप्पड देहुँ कि सुज्झइ दुक्कियलंपहु। 15 माणुसु पुणु थिप्पड बसचोप्पड लोहमोहमायामयसुक्कडु। धुप्पड धुप्पड पुणु वि अयोक्खड णयरोघसरपसरसारिक्खउ। फुल्लमालचंदणघायंवरु ताम सुद्ध जा दूरि कलेवरु। धत्ता-सम्बंगु पवित्तु महारिसिहि पत्थिव दुद्धरतवघरहं ॥ लालारसु लग्गड तणुमलु वि हरइ रोउ रोयाउरहं ॥३६॥ 20 37 दुवई-जाणउं पायधूलिलेवेण वि णासइ पावपंकओ ॥ ताणमिसीणमीस पणविजसु छडुइ मच्छरोको ॥ १॥ आमोसहि पविउँलखेलोसहि जल्लोसहि विप्पोसहि णंसहि । अहयमहाणसद्धि सम्योसहि एयहोणउ डसंति अंगई अहि । एयहो हरि करि पुणु वि ण लगाहिं मिल्लपुलिंदई पहलवलग्गहि । 5 36 1 ST कानपणासणु २ णग्गठ ३ ST सब ४ ST तिणयणु णियतणु णग्गड भावइ. ५ ST दोसई लावइ ६ AP अयमयसलिलि ७ ST omit this line C ST omit this line. ९ ST ता सुधुय 37 } ST जाणं; Aणम २ सांसु ३ AST पविमल : ST omit this line. -७० IO III. 38, 12] जसहरचरित जइ ससइ तो पाडइ सक्कु वि मेरुमहीहरु सउ तिल्लोक्कु वि। तेयरिद्धिपजलियसिद्विहि को किर थकद एयहो दिहिहि । पर किं चलि वि खलाह ण रूसइ पणवंतहं सजणहं ण तूसइ। • अहमजत्थु महत्थु महाजसु जीवियमरणिं मुणिंदु समंजसु। एयहो परिणरसहि चित्तई लइ ताई जि हवंति सयवत्तई। इय एवड्डहो कित्तिणिहाणदो करु पसरिजह केम किवाणहो। सीहहं सङ्कलह वि अणुग्गहु जेण कियउ जिणधम्मपरिग्गहु । अहवा हकिर चोल्लमि सावउ पेक्खु पेक्खु मुणिवरहं पहावउ । परमारणसीलई लल्लकई सुणहई पंचसयई पई मुक्कई । मुणिवरपायमूलि लोलंत चललंगूलदंडचोलतई। पेक्खु पेक्खु मा मुज्झहि मोहि वंदहि साहु म उज्झहि कोहि । घत्ता-णामेण सुदत्तु गुणोहणिहि होतउ राउ कलिंगवइ ॥ कुसुमालधरहु बंधहुं वहहु णिविण्णउ इहु हुवउ जइ ॥ ३७॥ 38 15 5 दुवई-णियणायाहियारिथियदियवरणियरेण विणिउत्तमो॥ तक्करपाणिपायसिरखंडणदंडणविहिविरत्तो ॥१॥ जीवधणासपास छंडेविणु जुण्णउ तणु व सरजु मुपविणु। थिउ गिरिगहणे महरिसि होइवि भो भो जसवइ रोसु पमाइवि । पणवहि चरणजुयलु एयहो तुहुं कर मउलेवि अवलोहि रिसिमुहूं। इय कल्लाणमित्तवयणुल्लङ लग्गउ कण्णि परिंदहो भल्लडं। वंदिउ गुरु गुरुआरए भत्तिए तेण वि सधजीवकयमित्तिए। धम्मलाहु होउ त्ति पोलिउ वच्छल्ले महुरक्खरु भासि। चिंतह णियहियवद णिवसुंदर अचलतेण धीरु गिरि मंदरु । गंभीरत्तणेण रयणायरु तेएं सई पुणु चंदु दिवाया। णं पुंजेप्पिणु उवियउ संजमु मुणिवेसिं णं संठिउ उवसमु। णं माहप्पसारु तवसत्तिहि आवासउणं जिणवरभत्तिहि । IO . *५ ST चंदफु वि सक्कु वि तेलुकु वि ६. ST लग्गइ ताइ. ७ ST पञ्चक्खु. ८ ST लोलतई ९. ST वणवहेण. 38 A पउत्तउ २.ST छिदेप्पिणु. -७१ - en [ III. 38. 13- पुष्पदंतविरइवट णं दयवलिहि कीलागिरिवरु खंतिपयरपोमिणियहि सरवक। मई पाधि मारण आढत्त। एहउ साहु साहु सुइ संत घसा-पच्छित्तु करमि दुन्जिलसियहो सीसु लुणेप्पिणु अप्पणउ ॥ णिवचितिउ मुणिवि मुणीसरिण जंपिउ सवणसुहावणउ ॥ ३८॥ 39 दुवई हो हो हो गरिंद किं चिंतिउ अलिउलणीलकेसयं ॥ जिंदणगाहणाइ तसु णासइ मा खंडहि ससीसयं ॥१॥ ता पहु ववह गुज्झु किह लक्खिउ मणु वि महारउ मुणिणा अखिउ । हियउ मुणेघडं किं फिर साहनु भणड सेट्टि परमेट्टि समंजसु । लोयालोयड जंजि समिच्छहि तं जि कहर जावर परिपुच्छहि। पुणरवि जगरवि रिसिहि णवेप्पिणु भणइ राउ महु ताउ मरेप्पिणु । जसहरु सहुंजणणिए कहिं जायउ कहिं जसोहु जसपसरियछायउ। कहा सूरि सियपलिउ णियच्छिवि तुह जणणहो कुललच्छि पर्यच्छिवि । दुद्धर तउ रेवि भयमयवहु गउ सुरहरहो जसोहु पियामहु । परियणसैयणाणंदजणेरह पट्टयषि णरणाह तुहारइ। कुलदेवयाहि पुरउ परिवायवि पिढ़ि विरइउ कुक्कुडु घाइवि। पत्थु जि णिहयई मायापुत्तई गरलवलेण पत्त पंचत्तई। जरंवह संजायई सिहिसाणई एम जीउ पावहं फलु माणइ। सुणहिं मारिउ जो मोहल्लाउ सो परियाणसु तुहुं जणणुल्लउ । पई फल हउ फोडियमच्छउ सारमेउ जो महिपलहत्थ। सो अजियहि जीउ जाणेजस एवहिं जीवहं जीविउ दिजसु। घत्ता-पुणु विसहरारि तुह पिउ हुवउ तहो मायरि भीयरु उरउ ॥ सो खद्ध तेण भयंकरिण सई पुणु मरिवि तरच्छहउ ॥ ३९ ॥ 10 15 ३ दयदेविहि .ST परम ५ ST सत्तर 39 1ST जइ तुहुँ २. A समप्पिवि. ३ A तवैवि.४ गयणाणद.५ % मारिवि ६. S7 एत्थुज्जेणिहिँ मायापुत्तइ. ७ ST' भवसायरि जायइ. ८ 8T भीसणु 111.41.5] सहरचरित 40 5 दुई-मुउ सिप्पाणईहि उप्पण्णउ सुजयणारिमारओ ॥ पर मारियउ जणणजणणी चिरु दुद्धरु सुसुमारओ ॥१॥ घेएं मासिउ भट्टमरद रोहियमच्छु दिण्णु जो भट्टह। तेरउ बप्पु पई जि संतावित सो कयपहरई विहुरई पाविउ । तहिंजणणीयहि अइयहि अइयउ हवउ पावपडलसंछइयउ। जूहिदें सिंगगे भिण्णउ मायारूढउ तहि जि विवण्णउ । जीविउ यायपिंदुसंमाइउ अप्पर अप्पएण मई जाइट। थिउ पुणु गम्भंतरि णियमायहि भंगुरअंगो णामियकाहिं। मयमारणि पारद्धिण सिद्धी सा छाली पत्थिव पहं विद्धी। पियमायरिहि पोटु दोहाविउ छावउ जीवमाणु अवलोइट। अपिउ घणियहि तेण जि रबिखत घरु आणि ता आमिसु भक्खिउ । पाउ लुणेवि दिण्णु णियमायहि पुचजम्मि तहु तणियहि जायहि । अयस्यमय णिव तुह वाणरिंग कय पुणरवि सयत्त कयमगि । ईसिंधुमहिसु नयस्वर जाणसि किण तुरयजमदूअउ । उअरहो हेहि अग्गिजालाविउ जो पई विरसमाणु पउलाविउ । सो सेरिटु अजी य तुहारी अवसु ण चुकाइ वाय महारी। धत्ता-सो छेलउ महिसु वि संभरहि अवरपक्खि जहिं जश्यहु ॥ पई दिवि पंडिवि वंभणह घाउ दिण्णु तर्हि तइयतुं ॥ ४० ॥ 10 15 41 दुई-वे वि मुयोई ताई पुण फुकुडपक्खिभवे पवण्णई ॥ तित्थु सुणेवि सहु णंदणवणि पई वाणेण भिण्णई ॥ १ ॥ तहमरेवि णिस्यमलायण्णई कुसुमावलिहिं गम्भि उप्पण्णई। एम बप्प विसहियसंसारई अभयमईअभयरुइकुमारई। एवहि पुण्णधपारंभई घरि अच्छंति तुज्झ पियडिभई 5 -- Pawan 40 १ ST जूहेस. 41 2. AST मयाई. २. ST चढपुण्णपारभई. स..... - ७३ पुष्पदंतविरइयंत [iii. 41.6 अमयमइ ति देवि तुह मायरि मंसासिणिणं भीमणिसायरि। गुणगणवंत महारिसि णिदिवि कुगुरुकुदेवहं चरणई वंदिवि। मीण जियंत जियंत तलेप्पिणु भोयणवेलइ विष्पहं देप्पिणु। सई भक्खेप्पिणु मजु पिएप्पिणु जारहो कारणि पहमारेप्पिणु । णिट्टियष्टि कुटुंण कुपिणु अइरउहाणेण मरेप्पिणु। पंचमणरयहो गय सा पाविणि जसहररायहो केरी भामिणि । IC धत्ता-दुकम्मि णिवाइ गरयविले सुहिउ कहिउ अवगपणा ॥ लिरिपुष्फयंतजिणवरवयणु मूदु लोउ णायग्णइ ॥ ४१ ॥ इय जसहरमहारायचरिए महामहल्लणण्णकण्णाहरणे महाकइपुष्फयंतविरइए महाकव्वे जसहरमणुयजम्मलाहो णाम तहउ परिच्छेउ समत्तो ॥३॥ ३. ST सासासिणि ४ST भाविणि ७४ IV *अमान्तदानपरितोपितयन्दिवृन्दो दारिद्ररीदकरिकुंभविभेददक्षा। श्रीपुष्पदन्तकविकाव्यरसाभितृप्तः श्रीमान्सदा जगति नन्दतु नन्ननामा॥१॥ 5 5 णिसुणिवि दुहभरियां महु भवचरियई जसवइणिवाहियउं चलिउ ॥ सोयरसु पधाइउ अंगि ण माइउ णयणंसुय धारहि गलिउ ॥ ध्रुवकम् ॥ दु-मुणिकमकमलजुयले लोलंतु पोसइ एम पत्थिओ । हा हा मज्झु जणणु जि मारिउ सो भुवणयलि णिक्किमो ॥१॥ अज्जु जि संघारमि पाववेरि लहण करमि केण वि समउ खेरि। पिट्ठमपं कुक्कुडपं हएण मणि मण्णिएण दुरिएं करण। गुख्यणु पत्तउ एवह दुक्खु उज्झउ माणुसु जं चम्मचक्छु। बपु पि णो लक्खिउ जम्मि जम्मि मइं माराविउ णिद्धम्मि घनिन । जहिं रिसि गुरु जिणवरु णस्थि देउ तहिं कुलि कहिं जीवह दयविवेउ । पाहिजा जहिं घणयरहं सत्यु तहिं बंधु वि हम्मइ परभवत्थु । जीवउलई मई णिहयाई जाई को लक्विवि सका ताई ताई। जाचरणकमलसंणिहियचित्त भो भो वणिवर कल्लाणमित्त । पत्ता-सीहासणछत्तई वरवायत्त विविहां विंधई चामरई ॥ रहवर मायंगई पर्वरतुरंगई भडसेण्णई पंजलियरई ॥१॥ 10 2 दुई-लइ पत्थिवसुदाई अणुइंजउ अभय कुमारो॥ महु दिक्खहे पसाउ पडिवजउ भणु भणु तुहुं भडारओ ॥१॥ Mana- *This verse 18 omitted in Sand T 1 १.ST णिवहियवउं, A णिवहु हियउं. २ ST एव. ३. A चम्मरुक्खु. ४ ST एथु ताइ. ५. चवल. ६.8 सिंहासण. ७५ 5 10 पुष्पदंतविरहयउ [IV. 2.3- कयलीकंदलसोमालगत अभयमइ कुमरि सिमुहरिणणेत । दिजउ कुमरहो रिउमहणासु अहिछत्ताहिवणिवणंदणासु। तहि अवसरि पुरवरि वैत पत्त लइ चारुसिद्धपारद्धिजत। संजायज रायहो धम्मलाहु तववरणहो उवरि णिवद्ध गाहु । तातहि चवंति रायाणियाउ घणरस्मस्मसवियाणियाउ। कवि भणइ हुवउ पियतिलयछेउ हो हो कि किजह पत्तछेउ । बहु का वि भणइ किं लिहहि चित्तु पहु वट्टइ कामविरत्तचित्तु । कवि पभणह किं मुहमंडणेण राणउ रंजिउ तवमंडणेण। वहु क विपमेला पडहु पवन विहिवार्यइ लग्गउ कि पि अवरु । कवि कुरुल करंति करंति थक्क लह केसुप्पाडणविहिपढुक्क। पिय का वि लिहंति कवोलवत्तु हाँ दइव काई विवरीउ पत्तु । उहिय क वि मुत्तियगुणि ण दिति मुणिगुणणिञ्चलु णियमणु ठवंति। कवि पभणइ म करहि तिक्ख णक्ख वरदत्तु लएसइ परमदिक्व । 15 कवि णिसुणिवि पियवत्ताई खीण देहइ कंचुलिय ण थाइ लीण । इय' णाणाविह जंपतियाउ पियविरहभएं कंपतियाउ। पासेयबिंदुथिप्पंतियार कंचीकलाव गुप्पंतियाउ। गयणंजणंसुमलमइलियाउ मणिरसणाकिकिणिमुहलियाउ । णेउरझंकारमणोहराउ उण्णयघणपीणपयोहराउ। 20 सियल वि अतेउरराणियाउ जहिं राउ तर्हि जि संपत्तियाउ । घचा-णहपहजियसुमणिहि चलहारमाणिहिं पत्थिउ रमाणिहि पत्थियउ ॥ विणडिउ तवचरणि सिरिसुहहरणिं तुई दइवेण गलच्छियउ॥२॥ 3 दुवई-अम्हहं अच्छराउ तुई सुरवइ सउहलयं विमाणयं ॥ पियसंजोन्गु सन्गु किं लग्गसिरे कुडिलं विसाणयं ॥ ६ ॥ 2 . ST पत्त वत्त २ ST पभणइ हुड ३ ST महुं मंडणेण ४ A विहिवायणलग्गउ ५ 3T हा दइ यउ कि पि विवरीउ पत्तु ६ ST झीण ७ ST णयणजण मुहं मइलितियाउ ८ Ssnd T omit this line and A and P give it in second hand 3 १. सउहयलं -७६ .
5 IV.4: 4] . जसहरचरित रइकरणालिंगणधुत्तियाउ पणयंगणाउ कुलउत्तियाउ। इय पलवंतियउ ण इच्छियाउ सपलउ राएं णिमच्छियाउ। ढकारवचल्लियगयवरेहि हिलिद्विलिसरेहि सियहयवरेहि। णगुग्गनग्गकरकिकरहि मणचडुलतुरयणियरहवरेहि। परिवाइयाई सहयरणरेहि विजिजंतई चलचामरेहि। सिग्गिरिशंदणवणसदलाई छत्तावलिछाइयणहयलाई। मरवलियघुलियणाणाधयाई सिवियाजाणि विणि वि गयाई। पत्ता-परिसेसियपरियरु सधैउ सचामरु चरियरयणउडियसयरु ॥ खोणियलि णिविट्ठउ दोहि मि विट्ठउ गरवइ णं सामण्णु ण ॥३॥ 10 4 5 दुवईता मुणिवयणकमलणिग्गंतझुणीकहियं कहतरं ॥ अम्हई तमि विहि मि तं चिय पुर्ण संभरियं भवंतरं ॥ १ ॥ भउ सुमरिवि विण्णि वि मुच्छियाई लंजियाह करेण पडिच्छियाई। अहिसिंचियाई सीयलजलेण आसासियाइं चमराणिलेण। परियाणियचिरभववेयणाई कह कह व समागयचेयणाई। मलिणाणणाई पुणु उट्ठियाई मुणिचरणजुयलि णिवडिवि ठियाई । अम्हई मुच्छई मुच्छिय मयच्छि कुसुमावलि णिवकुलकमललच्छि । कोमलकरयलताडियउरेण सोइय सलि अंतउरेण। वहु का वि भणह सोहग्गथत्ति उटुडु माइ मणहरणसति। के वि भणइ ण तुंड वि महु णिएइ पई मणिउ णाहु तंबोलु ले। उद्दुहु देवि करि साहिलासु देवाविउ पई महु पहाणवासु। दूहवियहि पई महु किउ विलास भूसिवि पेसिय णियपदणिवासु। बहु का वि भणइ तुहूं ण वि सवत्ति महु माय वहिणि अविहिण्णामिति । उटुट्दु महि कारुण्णु करहि वउ लितु जंतु णियकंतु धरहि । IC Aama m Aanana www- २. T पणियंगणार ३. ST चलियसुगरवरेहि: ४ ST अम्हइ विलुलियणाणाधयाई, ५ ST अणउध अचामरू 4. १. ST पुणो भरियं, २. ST कुछ देवि लहु बोलु देइ. ३ ST हउ पियह पासु ७७.
[IV. 4. 15- पुष्पदंतविरहयउ घत्ता-ता मुच्छ पमाइवि अम्हई जोइवि पयलियवाहजलोल्लियई। महएविहि णेत्तई ओसालित्तणं लयवत्तई टोलियई॥४॥ 15 10 ar दुचई-वितइ रायपरिणि मुणिवरवाणीरवदिण्णकण्णई ।। एयइंडिंभयाई कि विणि चि मुच्छावसणिसण्णई ॥१॥ इय चितिवि करसंजोइयाई आलिंगिवि अंकई ढोइयाई। मुणिणा णाणेण णियच्छियाई तुम्हई कि जाणह पुच्छियाई। अम्हहं संभरहं पउत्तु सम्बु किं रिसि भारति असचु कन्छ । अम्हई चंदमइजसोहराई अम्हइं सिहिसाणई थलयराई। अम्हइं पण्णयरिउउरयराई अम्हई सिप्पाणइजलयराई। अम्हई अयनयमहिलय हुआई अम्हहं खगाई पुणु तुह सुआई। जाणहि णियणदणणेहतहि इहजम्ममाइ चिरजम्मसुण्डि । ता मुणिपयपोमई पुंजियाई अम्हई रापण विसजियाई। णियणयरि गपि मंदिरि ठियाई कल्लाणमित्तु जंपइ पियाई। तुह पिउ पार्वजह वलिउ अज तुई परिपालहि सत्तंगु रजु तं णिसुणिवि मई पहसंतरण बोल्लिड भवभयसमसंतरण। घत्ता सो महु पियर्णदणु णयणाणंदणु इह मई रजि परिठविउ ॥ एवहिं तहो तणुव्ह ह ससहरमुहु इविं चंगउ सिक्वविध ॥ १५ ॥ o 6 दुबई एवहिं दिण्णलइयपरिवाडि वि लंघिवि जामि गिरिगुहं ॥ फेडमि मोहजालघणमुहबहु पेच्छमि तवसिरीमुहं ॥६॥ ता भणह सेहि गुणगणविसालु तवचरणहो अज वि कवणु कालु। पहिलारीपहुणा अजाणिज जाणेब्बी सयल वियारविज। जिणधम्माहम्मविही तइ ति वचवि मत्थाणस्थहं पवित्ति। 5 5. १ S पसंगयं २ भंके पढोइयाइ ३ ST अम्हहि पउत्त संभरहु सब्बु १ S अम्हई अयमहिसय भवि हुयाई ५. AST पवजहे ६ 5 भवभवसमसंतएण 6 १ जाणेवि.२ AST जण ७८ - IV.7.15] जसहरचरित जहिं भुवणि णयाणय ववहरंति सा दंडणीह णिच्छउ कहति । एयहि वह जगि जोडे खेमु संपजा सुहे धम्मत्थकामु। अणवरयभुत्तसंपुण्णभोउ पयासु परिटिउ जियई लोड। राणउ परिरफ्नइ दंडधारि विजउ चत्तारि वि दोसहारि। विणुराएं जगि को करइ दंड विणु दर्डि जणवउ कम्मचंह। परधणपररमणीहरणकामु लइ ण सहइ धम्महो तणउं णामु । घत्ता-खमदमसमसधिं विउलसञ्चि जीवदयाइ पवाणियउ॥ सामण्णवण्णहं लिंगिहि वण्णहं एहु धम्मु मई मण्णियउ॥६॥ 10 7 5 5 दुई-इंदफणिदचंदविजाहरणरवरणियरपुजिओ ॥ णासह एदु धम्म जिणभासिउणिवसासणविवजिओ ॥१॥ ता मई मायाभावेण रजु इच्छिउ पिउणा दिण्णउ अवज्जु । अहिंसेयकलसजलखलहलंतु णाणारयणावलिपजलंतु। देवंगवस्थपल्लवललंतु कामिणिकरचामरचलवलंतु । पारद्धय उप्परि परिघुलंतु उत्तुंग मत्त गेय गुलगुलंतु। मर्णगमण तुरंगम हिलिहिलंतु मयणाहिगंध महमहमहंतु। प्पूरफार महुयर मिलंतु भूवालविंदसेविड महंतु। महु रजु देवि जसवरणरिंदु गउ मई पुच्छिवि वंदिवि मुर्णिदु । लइयउ तैउ सहुं अंतउरेण उत्तारियकंकणणेउरेण। णं किण्हणाललेसाविसेस उप्पाडिवि घल्लिय कुब्लिकेस । णिवसणु वसणु वि परिहरिउ तुरित रिसिवैउ संख्नेवि तेण धरिउ । आदत्तु घोर तवचरणु तेण जम्माहिउ वाहिउ जति जेण। मिल्लेवणु विणि वि रायदोस माणावमाण हयकम्मपास। णिवसइ णिज्जणि काणणि मसाणि आहार लेइ मासावसाणि । IO 15 3. ST णयाणयवह वहति.४. ST जोयखेमु. ५. A सहुं धम्मत्यु कामु ST सुहं धम्मत्थु केमु ६ 8 जियउ. ७. AP पसण्णहं..माणियउ. 7. 1. ST सलहलंतु. २ ST चलचलतुं. ३ ST पालद्धियः ५. ST अंबर. ५ ST करि. ६. ST ललियंग. ७. ST णिरु 4. AP omit कप्परफारमहुयरमिलंतु. ९. ST वंदिउ १०. A वउ. १९. ST 0 परिहरिउ. १२. ST पटिवण्णउ तेण रिसिंदचरित. १३. ST जम्माइउ. १४, AT रोस. ७९ पुप्फदंतविरइयत [IV.7.16- घत्ता-घरमोहु णिसुभिवि णियमणु रंभिवि तिपिण वि सल्लई खंडियई ॥ गुणमणिचिंचइयई पिउपावइयई पंच वि करणई दंडियई ॥७॥ 8 उवषणु गयाई 5 दुवई- -ताम मए सवत्तितणयस्ल णयस्त तणु व छडियं ।। दिणं सहरस्स मणिभवणधणं कुललच्छिमंडियं ॥१॥ उर्वसमहरि णं परलोयकुहिणि हउं एह अवर महु लहुयवहिणि । बिणि वित चिय णवियाई साहुणाहहो पया। संसारमहाभरमग्गएहि दोहिं मि गुरुचरणालग्गएहिं। भासिउ मुणि दिक्खइ करि पसाउ ता भणइ भडारउ चीयराउ। तुम्हई बालई अइपत्तलाई मज वि कुवलयदलकोमलाई । तवचरणकरण परिणइदुसज्झ पुत्तय डिमहं णउ होइ गिज्झ । होएप्पिणु उत्तमसावयाई गुरुसेवए सिक्खहं सुर्यपयाई। परसमयारुढसढत्तणाई लोइयवेक्ष्यमूढत्तणाई। आसंक कंत्र वि दिगिंछ हणहं मा कहि मि कुलिंगिचरितु थुणहं । मा कुणहं दिहीहर दप्पसंगु रक्खहं सुविसुद्ध अंतरंगु। लासणहं पहावण करिवि णवह पहभट्ट वि पुणु जिणमगि ठवहं। आउंचहं उद्दिउ हरिसु रोसु मा गिण्हहं सम्माइदिदोसु। चउमेयहु संघहो करहु पणउ वच्छल्लु सुविजावधु विणउ। 15 सुविसुद्धउ दलणु एम होइ इयरहो पुणु सहसा खयहु जाइ । धत्ता-परणयविद्धसणु सम्मइंसणु पहिलारउ थिरु मणि धरहं ॥ पुणु बज्झन्भतरु भसयमलहरु पच्छइ दुद्धरु तउ धरहं ॥८॥ 10 दुवई-सेगिण विणु णिवेण मुरहुभियधयवडपंडुरारुणं ॥ विणु सहसणेण किं कीरइ तवचरणं पि दारुणं ॥१॥ 8 R. AP जसहणस्स २ उवसमसुहरिणि ३ ST उववणु पुणु गयाई ४ 8 अइवालई पत्तलाई.५६ सुयवयाइ. ६ ST लप्पसगु ७ AT सुवेयावबु ८ ST णियमणि ९, भवकलिमल. ८० IV. 10.12.] 5 10 जसहरचरित मा जंपद कासु वि कण्णसूल वउ धरह अहिंसा सचमूल। सामाइउ पाल जीवमित्ति गुरुदेवभत्ति उज्झायभत्ति। सिद्धहं साहुहु वंदणविइत्ति पोसटु समेरमत्तहो णिवित्ति। सचित्तु म धंसह आउ पाउ महि जलणु वि अवरु वि हरियकाउ । पजह णिसिभोयणु जर वि मिट्टु मा जोयह थी पुरिसु वि सुइछु। दिदु धरह विमुदउ यंभचेर औरंभु चयह कयलोयवेरु। मम्भसा पयत्ति अंगचाउ मिच्छह अणु मणु मण्णेवि पाउ । णिहिटु मुपधि भिक्याइ अडए पयारहमह गुणठाणि चडह। पंधणु तारणु मारण वि गणि पहरणधारणु वि रउहु भणिउं। तणुकटाणिहदं जायपण उप्पजइ इट्टविमोयणेण। यदु मुपविणु दुरियाण णिचं चिय झायह धम्मझाण । घत्ता-ध्ययम्महतावउ फयसमभावउ दुग्गहगमणणिवारणिउ ।। चिंतह अणुयेपर जगगुरुसिक्पउ धम्मरुक्खजलसारणिउ ॥ ९॥ 15 10 दुवई-तणुलायण्णु चण्ण णवजोधणु रूपविलाससंपया ॥ मुरघणुमेहजालजलवुन्बुयसारिसा फस्स सासया ॥१॥ सिमुतणु णासर णवजोधण जोधणु णासइ बुहत्तणेण। बुद्धत्तण पाणि चलियपण पाणु वि संघोहिं गलियएण। संध घि सगुणोहि परिणमंति बहुविह पजायह परिणवति । परिगलराउ घारायण णीरोयत्तण रोयत्तणेण। जीविउ पावर पाणाचसाण सिरिवंतु होइ दालिहठाणु। गच्छंतु भाणु जीवंतु जीउ कालि अथवणही को ण णीउ । जा यज्मद रायो थाउगठि ताकि किउ सोहण जणियतुहि । परिसह परिसह परिसोण ठाइ भयवद्धउ आउपमाणु जाइ। लिया फुटिलत्तणउजयाई अइदीदई तिट्टई रजयाई। णारी घुटा पसु पुरिसु बद्ध कालिं सहले इत्ति स्वद्ध । 5 10 -MA५ 9. 1. S उशाययति 2.3 मारंभु ३. मंगचाउ. 10. P.ST महमयु .ST यघिय. ST परिभमंति. Y ST भइपलियए कुटिलाणुजयांइ. ५. ST णारीमाणुए. जह...११ ८१ - tiv. I0. 13- पुष्पदंतविरइयेउ धत्ता-रु सुक्खु लमीहइ मरणहु बीहह देवहं सरणु पईसरह ॥ विजहो धरु गच्छइ मंतु पपुच्छइ खयकालहो णउ उन्बरह ॥१०॥ 11 दुबई-परिवारेण लच्छि मुंजिजा रक्खिजह महारणे ॥ धावइ सव्वु को विप्रेरणाहहो तंदुलपसहकारणे ॥१॥ परियणु भुंजइ माहीविहउ रस्म एक जि परवइ अणुहवइ कम्मु । उदससु भूरगामंतरेसु जिउ णिवसइ सयलकलेवरेसु। णियपुण्णपावसंवैलई लेवि पुणु अण्णभवहो पाहुणउ जाइ। 5 पक्क जि जैगि जीउ सुदुण्णिरिक्खु हिंडइ चउरासीजोणिलक्छ। णयण अण्णण्णई घाणु अण्णु जीवहो संफासणु को विभिण्णु । अण्णण कण्णा अवि भवि हवंति अण्णण्णउ जोहउ मुहि ललंति । अण्णण्णई कम्मई संगिलंति अण्णण्णइं विविहंगई मिलंति । जीवहं सयरायरू सन्तु अण्ण जह मोहमहादहि किं णिविष्णु । णारयतिरिक्तसुरणरभवसु परिभमह भावतमविभमेसु । सयलामलकेवलणाणसयाणि वित्थिणि अणंताणतगयणि । धता-जगु ठियउ पहिल्लउ णावइ मल्लउ पल्हत्यिवि केण वि ठविउ ॥ मज्झिमु पविमझुव उवरिलउ णिव मुणसु मुंयंगु व मुणि चविउ ॥११॥ 12 IO दुवई-ण किउ ण धरिउ बंभरुहाइहिं ण य कालिं विलीण ॥ ण हि ठिउ 'एक्वंभु तिलोक वि चउदहरजमाणउ ॥ १॥ ' जतियणु भालइ वडमाणु तं चउदहरज्जपरिप्पमाणु। तं फालतु तं वण्णवंतु तं गंधर्षतु तं रूवतु। तं सहवंतु भासह अणंतु तं रसविसेससम्मावतु। 5 11 १. A. गरणाहु वि २ चोहहसु ३ SI हिंडइ. ४ A संवलउ ५ जणि. ३. 3 अण्णु. ७.ST महहि.48 मइगु 12. 1ST एकखंधु -८२ - IV. 13. 12.] जसहरचरित सो बंधु माणिजह गिरवसेसु तस्सद्धउ जिण पभणति देसु। अवस्स वि अद्धउ पुणु पपसु परमाणू अविहायउ असेसु । तं पुरंगलु पेपिसावि परिणयंतु सच्चेयणभावे सञ्चवतु। अवयासु लहंतु अलठाणु तं पिच्छिवि णहथलि गच्छमाणु । भणु कारणु तं मई दिटु कनु तं भणइ महामुणि महु मणोजु । णिगुणहि सुअवणलक्षणाल परिणामहो कारणु होइ कालु। चेयण जीवई कारणु कहंति अवयासहो आयामु जि भणंति । ठाणदो अहम्मु गमणहो वि धम्मु गुरु भणइ मज्झु परिगलियछम्म । भार्य सम्बई संघाउ लोउ पपहि विवजिउ धुड अलोउ। घत्ता-जगि छाइहि कारणु उण्हणिवारण आयवत्तु अहिणाणियउं॥ इय पदउ सीसइ ज णउ दीसह ति कजि परियाणियउं ॥१२॥ IO 15 13 दुबई-पुग्गलु सापयासु परिणामिउं अवरु वि चेयणालउ । आलीयंतु जाइ कहि ठाइघि दीसह फजमेल ॥१॥ इद्द कारणेण विण कजु णत्यि करिमिहुणि विण कहिं हवइ हस्थि । विणु पुग्गलेण कहिं गुणरसाई विणु जीवि कहिं चेयण विहाद। आयासि विणु अवयासु लहात फर्हि पुग्गल जीव मुर्णिद कहहिं। पिणु काले कहिं परिणयह वत्यु विणु धम्माहम्मै कहिं पयत्थु । गइठाणु वि लहइ माणुभाव एप लोयह किर छह सहाव। परिणयर गंधु कालाउ भिण्ण सजीउ होइ जीवाउ छिण्णु। ला धम्मादम्मु ण होह जा घि गच्छद अच्छह सौ चष्प तइ वि। अण्णु चि णहि घाउ लहेतु कमई तिजगभंतरि भुवणयलि भमई। तहिं ठाइ ण जाड अलोयत्ति जातिल्लोकहो आधारसत्ति। चलयिरलपरणलक्षियविमुत्ति सा जाणसु धम्माहम्मत्ति। 10 - ST forurgers; P notes forencia la ar yr and this reading is given in & &. ST घयण जीट. १. AP भावई छभाय. 13. 1.6 अण्णु वि २. Sण: Pण ३. ST वि आइ. ४. S and T omit this line; P gives it in Fecond hand ५.8 णरछद. ६. 8 घयासु.७. तयलोषाहो.
[ IV. 13.13- पुष्पदंतविरइयउ परमेटि पियामहु लञ्चसंधु पणवह जिणवरु भन्वयणबंधु। भावह छह ब्व सम्बायरेण मा खजह मोहणिसायरेण। धत्ता-हड्डावलिविहियउ चम्मि पिहियउ पूयगंधभीसावणउं ।। माणुसहो कलेवरु चंडालहु घरु जिह तिह णिरु चिलिसावणउं ॥१३॥ in 14 5 दुवई-चोक्कयरत्तपित्तमस्थिकतावलिसुक्कसगमं ॥ रयईणीरखीरसंमहसमुभवकहमोवमं ॥१॥ इय सत्तघाउविलु णरंगु कामि दुद्दति अंतरंग। मणि वसइ कामु मजायसुक्कु कोहु वि परवंधणहणणढुकु । दप्पुमहु माण अतुहि लोहु महरा इव मोहणसील मोहु । परवंचणयरु मायाकसाउ सोउ वि कयहाहारवणिणाउ । कुलवललच्छीमयफुट्टणेत्तु ण वि पेक्खइ विण मजेण मन्तु। णेहेण णिबद्ध सलजमाउ णेहु वि अणस्थपत्थराणिहाउ) जहुँ णि ण याणा सहियोउ तण्हइ मग्गह पाणिउ अपेडा णिहिवि लेइ णीसेस देह छुह पइसारइ चंडालगेडु । रमणीरूवेसु रमंति बक्खु जीहा वि समीहइ मिट्टु भक्खु। घाणु वि सुहगंधहो जाइ झत्ति फासु घिमिउसयणहो करह थेत्ति। लहु धावइ गेयहो कण्णजुयलु मणु पुण वणमकड जेम चवलु। अणुदिण मुहि पइसइ अलियवाणि हिंसाकम्महो उवगरण पाणि । पयजुयलु वि पावपहाणुकूल काइ करइ कइत्तणु रायमूल। पंडित्तु कुतकपलावभासि सुहडत्तणु जाणह दुरियरासि । पत्ता-अण्णाणु सिमुत्तणु णवजेवणु पुणु हिंडइ पियविरहिं सुसिउ ।। चुहृत्तु करालहो णियडउ कालहो मरणवसणसमूससिउ ॥ १४ ॥ to 15 ८. A छत्र. 14-9 A विरइय २. A वंचण ३. ST जढ णिइ ४ ST तत्ति.
IV. 16.5] जसहरचरिउ 15 5 दुई-कंचुह कामभोयमणिभूसणणिवसणमइविहश्या । रोयफयंतभिन्न मउलियमुह मुच्छामरणदूइया ॥१॥ मिच्छत्तकसायासंजमेण आसवइ कम्मु करणुभवेण। सम्मति जीवदयागमेण इंदियरइसंगविणिग्गमेण । किना संवरु मुणिपुंगवेहि दढवयभावणविरइयसमेहि। णिजर पुण बारहविहतवेण जाएं णिव्वेएं णवणवेण। मासमवहेण दुसहेण आमहवेण अइअजवेण। पासवरण सुसउच्चपण परिचत्तपरिग्गहसंगहेण। संभवइ धम्म घंभवएण अजेन्चउ भावे भवएण। मग्गिजह इयजरमरणवाहि जिणगुणसंपत्ति समाहि वोहि । मा गिदह लाई मुणिदिक्ख ताम अंगाई समत्थई होति जाम। ता अम्हहिं लइयउ खुल्लयत्त चत्त परिहणु आहरण वित्तु । पंगुत्तउ पंदुरवीरचंदु मण मुंडिवि पुणु मुंडियउ मुंड। कोयीशु कमंडलु भिक्पपत्त लइयउ वउ भवजलजाणवतु। पत्ता-जायउ संजइयउ णिजियमइयउ राणियाउ जसवइपियउ॥ फयसुरणरसेवि गुरुणा देषि पुरफतियहे समप्पियउ ॥ १५ ॥ 10 15 16 दुवई-जिणतववरणकरणपरिणयमणविणिहयमारमारिहिं । तणुधुलियाहिरायजीहादलविलिहियघम्मवारिहि ॥१॥ परिदुस्सदणिहाणिट्टिएहि कडयडियसंघियंघट्टिएहि। उरपुटियंसहभडेहि सुविसमपासुलियापायडेहि। कयघोरवीरतवतत्तपहि जगजीवभयंकररूवरहि। an 44 15. 1. ST मय 2. ST संचएण ३. ST लहु. ४. A पुरु कंतियहे. 16. 1. ST उपरहि: A ठरपिटि.
10 पुष्फदंतविरइयउ [IV. 16.6. हेमंतणिसाहयणेहपहि हिमपडलपंडावियदेहए। विसहियपाउसजलझल्लिरेहि गिभम्मि सहियरवियरझलहि। अट्टविहफाससमभाविरहिं सग्गापवग्गपहदाविरोहि। हयसलिहिं णिजियवरमहहिं तासियविद्धसियमयगहेहि। माणावमाणसमभावहि झाणासिएहि तणुतावपहि। धणुदंडमडयसिजासिएहिं कंदरमसाणगुहवासियहि । गोसुईयगोदुहनासहि दिणपक्रमासकयपारणेहि। दीहररोमावलिभासुरेहि सुतिमुंडघरेहि जडाधरहि । जल्लमलविलित्तसरीरएहिं मेइणिमंदरगिरिधीरहि । रुद्ददृक्षाणणिग्गयमईहि सहं महि भमंतु हिम्मलजईहिं। इत्थाइउ जइव अप्पमत्त अम्हारउ गुरु णामि सुदत्तु। अवहत्थियपस्थिवसंपयाई ति सत्यि अम्हि समागया। वंदोप्पिणु गुरुपयपंकयाई भिक्खाणिमित्तु छुटु णिगया। पत्ता-ता पंथि चरंतई जिणु सुमरंतई किंकरहिं संदाणियई ॥ विणि वि लुहचरियह करयलि परियई एउ देविघर आणियई ॥१६॥ 25 15 दुवई-माणिवि दलियाई तुह महिवइ पई वइयरु पपुच्छिउ । मई तुह कहिउ एवं भवकदमि हउँ हिंडंतु अच्छिउ ॥ १ ॥ इस समायणि वंडमारी पह मारिदचो वि जीवावहारी। विलण्णाई वित्त विरत्ताई पावे विलगाई धम्म पराइण्णतावे। पबुद्धाई दूरं वरं दोवि णाणं विचित्तं तिलोए पवित्तं पहाणं । सिसूर्ण जुयं णिम्मलं पुजणिज ससीलच्छचूडामणीवंदणिझं। इमं चिंतिऊणं वसातुप्पगिलं रसोल्लं दिसाजंतकीलालरेलं। 5 २ हेमंतणिसासु अणेहएहिं ३ ST पछाइय A.ST पाउसजलझल झलेहि. A पाउसझलशलेहिं. ५ 8 गहिय ६ ST गयसुडा, A गयमुंड. ST णिम्ममजईहि. 17 १.Aणरवइ. २. A एड ३ वकीलालरनं IV. 18.5] 10 15 जसहरचरित सहइं समुंड सतुंई सखंद णिहित्तण भूमीयले मजलंडं। घरं णिम्मियं णीलमाणिकपद्धं पखितं व मुत्ताहलोलीसणिद्धं । वणं विल्लिकंकेल्लिफुल्लुच्छलंत दलारत्तसाहारसाहाललंत। जहालग्गहितालतालीतमालं इलाजंतलीलामरालीमरालं। लयोमरवोद्दण्णविदर्भ सिलासीणसीमंतिणीगीयसद। सरुप्फुल्लकंदोरेटतामगं मरुद्भूयतिगिच्छविच्छिडुर्पिगं। गष्टुभत'कोइलारावरम्म छुहापंहुरुभूयदीसंतहम्म। ससत्तीइ भत्तीइ णाणागुणाए सउजाणमो सवेउवणाए। उयेऊण णाऊण णेउ महंत मदासणे खुल्लयाणं जुयं त । पणदुग्गयेसं जणाणभूमे पुणो चक्युगम्मं पघेत्तूण रुवं । महावच्छवण्णं पसणं रवपणं सुवण्णग्यवंतं सपुष्फमपुण्णं । घरा णिग्गया देवया सोममावा सपायंतघोलंतकंचीकलावा। असामपणलायण्णसोहग्गसारा विलंवतहारावलीतेयतारा । सयारूदणिन्यूढसिंगारभारा तुलाकोडिझकारणचतमोरा। घणापीणतुंगत्यणी मज्झमीणा जिणुत्तस्ल गंथस्स पंथरिम लीणा। दयालोइयासेसबंदीमयाए समेऊण सामीवयं देवयाए। घचा-खुद्यगुरुपायह णहसुच्छायह णियसीसत्तु समिच्छियउ ॥ जलकमलकरंघिउ महुअरचुंबिउ अग्यवत्तु पलहत्यियउ ॥ १७ ॥ 20 25 18 दुवई-कारिमकुकुरेण णिहएण वि तुडं भामिओ सि दुभवे ॥ कउल जीवरासि मक्खंति वि हंति वि लोहियण्णवे ॥१॥ अणुकंपद भासह सुरपुरंघि अयमेसमाहिसहयकंठसंधि। ६ पाचयम्म पावेण जाम ण वि खजमि तुहं परिताहि ताम। दे देहि देव तउ तिव्यु चरमि हिंसादुक्किउ णीसेसु हरमि। Lo Y ST मुसालली. ५. STलयामंटवाइण्ण ६ APएंट, ७ AP णहुम्भंतयं कोइलारावरम्म. G.ST ममतीद सप्ताह ९. ST घणुत्तुंगपीणत्थणी; A घणातुगपीणत्यणी. ८७ - पुष्पदंतविरइयत [IV. 18. 6- ता भणइ अभयरुइ पिडलरमाणि पाडलपेल्लय गयमंदगमणि। सुरकामिणि सुणु उववायएसु कमवड्डियकम्मविवायएसु णिस्मंसचस्मरोमट्टिएसु णिप्पायघाउतणुरुइरएसु। सहजायमउडकुंडलघरेसु मंदारकुसुमरयपरिमलेसु। वउफासरूवरवकयरपसु मणपडियारप्पडियारएसु। बहुधणकरिकणरमाणपसु उवरुवरिपहियमारएसु। दससहसवरिसपल्लाउपसु सायरसमेसु चिरंजीविएस्। तुह एकहि णउ तउ णत्थि पसु वासद्विविहेसु वि सुरवरेसु। घत्ता-इलजलसिहिवायहं तणतरुकायहं संसारइ आहिंडियई ।। संठियचउपाणहं णिरु णिण्णाणहं णत्थि दिक्ख एइंदियह ॥ १८॥ 15 10 19 5 दुबई-खुभयसंखगोहेभमराइसु विमलेसु वि महावले ॥ णत्थि तओ असण्णिासपणीण तिरिक्वेसु वि सुकुंतले ॥ १ ॥ णरजम्मइ परवणपरेसु तुलकूडमाणकूडायरेसु। ववहारकूडसक्लीयरेसु पसुमारणेसु मायामएसु। जाएसु अम्मि बहुविहमएसु परियवियरयणप्पहथलेसु । उरचूरएसु माणियविलेसु महिमजयरविसममहोरपसु । सरदुंदुरसेहाणउलएसु एकखुरवेक्खुरकुंजरेसु। मंडलचरणेसु चउप्पएस ओलंधियणइजलणिहिजलेलु। कच्छवमच्छाइसु चंचलेलु तउ णत्थि संखदीवाइए। शाणापिहचंचूजीविपतु थीवालवुडरिसिमारएसु। परललणालालसजारएल महुमजर्मसरसलंपडेसु। अणवरयकोवविहडप्फडेसु माणवभावि णिदियजिणवरेसु। 10 18. P AST पुण्ण, २.8 णाणएसु, A माणएसु ३. SI थिर. 19 १ A गोमि २ AST असण्णिपचक्खतिरिक्खेसु ३ ST उरभुययरेसु ४. ST अजयरविसविसम ५ 8 मणमहियलतणुअसुरासुहेसु IV. 20.17] जसहरचरित माणियधम्माश्वसुंधरेसु मणतणयसुहासुहआयरेसु । अण्णुण्णघायसयजजरेसु भयधणुतिरयणे छंगुलमिएसु । पुणु दूणदणदेहुण्णए। 15 घत्ता-संगहियाहारह धरणिविहारइ पसरहो होतु अणंतु दुहु ॥ परमाणुयमेलणु णयणणिमीलणु कालु विजेत्यु ण अस्थि सुहु ॥ १९ ॥ 20 5 5 दुई-तं चंडिऊण घिपि हु लग्गइ पहरवेवियं ॥ असिलिण्णेसु सूलभिण्णेसु वि णिवसह जासु जीवियं ॥१॥ सत्ताहोभूमिकयायरेसु चउरासीलक्खविलोयरेसु। परजम्मवारयलवुझिरेसु अंगाहमहाउहजुझिरेसु। णिचक्कमेकसंधारपसु तउत्थि सत्तविहणारपसु। चिरभवकयसंजयभोयणेसु ससहरमुहि मुहमालोयणेसु। जाणियसुरतरुफलसाईएम दुतिपल्लएकद्धाउसेसु । तउ णत्यि भदि कीलाविसेसु वरतीसभोयभूमाणुसेसु । उच्छलियपुण्णदेवीकपसु उव्वरियपुण्णदेवीरएसु। अण्णेसु वि मुणि मिच्छामएस पत्तेसु आसि तावसतवेसु। विरइयकुपत्तदाणुभवेसु विवरीयकण्णमुहपल्लवेसु। छण्णवकुमोयघराणरेसु वसुसमसयपण्णासुत्तरेसु। तउणस्थि मेच्छखंडतरेसु। जंवूदीवह पुणु घाईदीवि पुक्खरवरद्धिदीवतजीवि। सत्तर सयगणियह मुणि कहति इय अजमहिहि खंडाई होति । पत्ता-जो तेसु हवेप्पिणु गुरु पणवेप्पिणु लेइ धम्मु कवडेण विणु॥ तर करइ अगावि अकुडिलभावि पंचिदियसुहु गणिवि तिणु ॥२०॥ IC 15 M- ५.8 मणमष्ट्रियलतणुअसुरासुहेसु 20. R. ST बहरि. २. 8 साउएसु.३ 8 कीलालएसु ४. भत्तेसु. ५. A धाइखंडि ६ A दीवतमंडि. जह...१२ पुष्फदवविरइयउ [IV.21.1- 21 वुवई-दसणणाणचरियरयणतयपरमाराहणाफलं । सो दियहहिं लहह मणिपुंगउ केवलणाण पविमलं ॥१॥ 5 सम्मत्तु होइ सुरणारएर अणुवयह कहि मि तिरियह हवंति तं णिसुणिनि णिहयणियावयाइ पुणु पुच्छिउ गुरु महुरह गिराइ चउगह पायालगई उहि णिवतहि पहं महु दिण्णु इत्यु तुहुं मझु सामि हडं तुझु दासि ता मेहविजयदुंदुहिसरेण णिज्वणि मच्छियउण भिणिहिणंति ता देविड जंपिउ साहु साहु संभासिवि माहिवइ पसुहं घाउ वणि उववणि चच्चरि एत्थु गेहि सहजाई बहुँय किचिमकियाई महु उद्देसिवि जो देह को वि इय भणिधि मणोहर तियसपत्ति तववरणु ण जम्मि वि ठाइ तेसु। पर पंचमहब्धयमा वहति । सम्मत्तु लइउ षणदेवयाइ। चरणारविंदपणवियासिराहा दुत्तारघोरभवजलसमुहि। तुहुँ देउ को वि पवयणसमत्यु। भणु किं दिजह गुणरयणरासि । पडिवोल्लिउ देसजईसरेण। हिम्मोहदिण्णदाणण लिंति। पुणु पुणु पणविवि भावेण साहु । मा दिजसु होजसु सोमभाउ । बहु छिदिय मिदिय पाणि देहि। परिहिमि पाण पाणप्पियाई। सकुटुंबउ हउं स्वउणेमि सो वि। असणाई गय सथति। IC 15 धत्ता-ता मउलियलोयणु णिदियणियगुणु हियह सुद्धयुद्धिहि वडिउ । दिग्गयवरगामिहि खुड्डयसामिहि मारिदत्तु पायहिं पटिउ ॥ २१ ॥ 22 दुवई-भणइ महीमहंत परमेसर कित्तिमचूलिमारणं । फाउं तं भवेसु भमिऊण दुई पत्तो सिदारुणं ॥ १ ॥ 21. 9. ST केवलणाणमविचलं. २. ST पुणु पणवेवि सन्मावेण साहु. ३ ST अहव कित्तिमहं जाई. / ST णिसणहूई. - - ९० 3 5 IV. 23.31 जसहरचरित मई पुणु जीवउलई जाई जाई णियई को लक्खइ वाई ताई। हणिवडीसमि रउरवतमालि णारयगणहणणरववमालि। दे देहि देव पावहो णिवित्ति अवलंवमि मणि णिग्गंथवित्ति। भववासपासवेढणचुएण ता भासिउ कुसुमावलिमुपण। आवेहु जाह जिणणाहसिक्न गुरु देइ महारहु तुझु दिक्त। वयणेण तेण पिभियउ राउ आणंदु मणोहरु तासु जाउ। हउँ जणि महग्ध णरवंदणिज सामंतमंतिमंडलियपुज्जु । मझु वि सुपुज कुलदेवि आसि सौ संजाया खुल्लहहो दासि। खुल्लयहो वि जइ गुरु अस्थि अवरु तववंतहं जगि माहप्पु पवरू। जाणिवि संबोहिउ मारियन्तु पत्थंतरि आयउ गुरु सुदत्तु । अवहीलर सुरणरवंदणिज्जु णिजियमयारि तिल्लोकपुजु । हयमोहु महामइ गुणसमिद्ध सत्तहिं मि पवररिद्धीहि रिद्ध। जजरिउ जेण बहुभेयकम्मु तवि संठिउ दसविहु णाइ धम्मु । इल लाइवि जाणुयसिरभुएण गुरु वंदिउ कुसुमावलिसुएण। राएण वितहो पयपंकयाई गवियई उम्मूलियभवसयाई। धत्ता-ता जगपरमेसह संघाइउ गुरु धम्मावद्धि सुपयच्छिय ॥ संतुट्ठमणेणं तेण णिवणं णियसीसत्त समिच्छियः ॥ २२ ॥ 10 15 23 पुच्छइ मारियत्तु हरिसं गउ गोवहणसिहीहि भवंतर जोईसह भइरवह चिराण कहहि देव णियभवणमियं गउ । महु भवाई जं जेम णिरंतर। चंडमारिदेविहि सुपहाणउं। 22. १.ST को लक्खिवि साह तित्तियाइ २. ST णिवाठिहीमि ३ ST' ताहि वि खुड्डउ गुणरयणरासि ४ s and I have after this line बटियई सुरासुरपुजियाई। तहु पायमूलि पणमियसिरेण पावज लक्ष्य राएण तेण. ५. Portion beginning with this line and ending with कडवक 30 line 15 1s omitted in S and T. ६. A तहिं अवसरि गुरुणा गुणगणगुरुणा धम्मविद्धि सुपयच्छिय 23. 9. Both A and P omit the gas from this threat onwards, but P gives'in second hand the following as दुवई:-आसियवाउ पढिच्च्यि राएं तह मणि आणंदकित्ति ण (१)। गुरुएवउ मुणिवि को दीसह मुहु मणसंसउहेढणं ।
en 10 पुष्पदंतविरइयां iv.23.4- णिवइजसोहहो जसैपरिपुण्णहो चंदसिरीहि चंदाइ अण्णहो। जसहररायहो अवगुणभरियहि अभयमहाएविहि महचरियहि । जसवइणामहो लैच्छिसहायहो कुसुमावलिहि सुमंडियकायहो। माहिदहो तुरयहो पुण खुजहो एयह कह पयडेहि अणुजहो। अवहीसर जंप सुपसिद्ध अस्थि देसुगंधब्बु सुरिद्धउ । सालिछेत्तकणभरपूरियघर पक्ककलमझंकारमहरसरु। गंधजुत्तु गंधगिरि भणिजह अइउत्तुंगु सिहरु तहो छजह। गंधव्वायदहिं परिसोहिउ गंधहरिणमसलेहि णिरोहिउ । तहो सयालि घरसिरिअवरुंडिउ पुरु गंध धम्मघणमंदिउ। णिवसह तहिणिवमग्गसयाणिउ णि वाघच्नु णाम असमाणउ । बायभोयभोयांकियविग्गहु परदलवलेचट्टणु कयविग्गहु । तहो विझसिरि भज कलकोइल पइवय सञ्चसील णावह इल। आयए जणिउ थणद्धउ केहउ रूवे जो मयरद्धय जेहउ । मयरद्धयहो रूउ कि किजा पयड ण दीसइ उप्पम दिजह । इहु गंधवसेणु जाणिजद सयलहि लोयहिं थुत्ति थुणिजन । रायहो घरि कोमलतणुअंगी पुत्ति रूवलपवणरुहचंगी। ताहि णामु गंधव्वसिरी सिय अइलडहंग अंग विहिणा कय। धत्ता-णियपुत्तलमाणु पचिहियमाणु सजणकमलदिणेसरु ॥ दुजणगयसीह दीहरजीह मुंजइ रज्जु गरेसरु ॥ २३ ॥ 15 20 24 तहो रायहो मंतणइ महल्लउ चंदलेहमजाइ अलंकित पुत्तुप्पण्ण स्वगुणभायण हुयउ कणिटउ भीमु सहोयरु गरवाणा किड पुत्तिहि कारणि मंति रामु मंतेण अभुलउ। दोसुल्झिउ गयदप्पु असंकिउ । जिणियसत्तु जियसत्तु परायणु। भीसावणु भीम व्व अहोयरु। वद्धर्मवदिप्पंतह तोरणि । 5 २ A गुणपरिपुण्णहो. ३ A लच्छिहसणाहो ४ A आयहं. ५ A अरिवलदलवण, P अरिदलदलवणु- ६ A गुणचगी ७ A पियपुत्त ९२ - 10 IV. 24:30.] जसहरचरित जाउ सयंवरमंडवि मेला रायउत्त साहरण सचेल। तहिं गंधव्वलच्छि पइसारिय पुष्फमाल करि कयसंचारिय। ताह माल जियसत्तुहि उत्परि घल्लिय पुवासिणेहिं चप्परि। उच्छउ संखतूरभेरीसर कर्यउ विवाहु तुटणारीगर। मंतिणिहेलणि कंत सइत्तिय थिय गंधव्वलच्छि जुइजुत्तिय । एत्थंतरि पारद्धि महीवह गउ वणि दिवउ तेथे मिगीवई। किउ संघाणु गहेवि सरासणु मुक्नु पाणु परपाणविणासणु। अंतरि हुइय हरिणि मिगु णट्ठउ भजिवि गयउ दूरि भयतहउ। विद्ध कुरंगी तेण गुरुकि पैडिय धरणि लुम पाणपिसकिं । पारद्धियहि बधि उच्चाइय पलिवि ताम हरिणेण पलोइय। 15 आरडंतु मिगु संमुहु धायड भुल्लर कंदइ कलुणु वरायउ। दिसि दिसि भमइ सकंत णिहालइ मोहिं बद्धउ भजण भालइ। मोहंधु विण कि पिचिंतइ माणि चिंतइ सा पिय खणि खणि पुणु मणि । एम रदंतु दिट्ट वइधवे करुणारसपूरेण अगवे। हुयउ विसायघत्यु हउ लुद्ध हउं इंदियरसलंपड मुद्ध। एत्तिउ कालु ण कि पि वियाणि कयउ अहम्मु विसयसुहं माणिउं । संवेयाउरु णियमणि झूरइ दिक्ख लेमि कि रजि पूरइ। संसारासारत्तु मुणेविणु लइय दिक्ख बहराउ करेप्पिणु। राय दोस विण्णि वि संदाणिय तिव्वतवेण काय अवमाणिय। सो वध दियंवर जायउ एतहिं तासु पुत्त गुणराइट। 25 रजि बइठ्ठ महारिउमहणु हुउ गंधव्वसेणु घणसंदणु। रायरिद्धि पिउपट्टि णिसण्णउ हयगयरहवरपयपरिपुण्णउ। विझसिरी हुय मासोवासिणि भयवंतायमभावपयासिणि। 20 धत्ता-इक्कईया तेण गंधब्वेण णियबंधारहिं जुत्तउ ॥ कयजचपवित्तणिम्मलचित्तपिउरिसिपासि पहुत्तउ ॥ २४ ॥ 30 24 1. A हुयड. २. A तेण. ३. P omits this tine ४. A इकड्या सो वि गंधवो वि. ९३ en पुष्फर्दताविरहवउ [IV. 25. I- 25 संणासि परिहिउ दिटु साहु पुत्तहो बंधारु णिएवि साहु । रिसिवयहो पहावि होइ सिद्धि ता होउ मज्यु परिसिय रिद्धि । तुसकंडखंड संगहिउ तेण रयणोहु पमेल्लिउ णिग्गुणेण। मरिऊण तेत्यु उजणि पत्तु जसबंधुररायहो हुयउ पुत्तु । णानि जसोहु जसपूरियासु णिवपटु णिवद्धउ भालि तासु। जा विझसिरी भयवंतपाय आराहिवि सोसिवि णिययकाय । कयण्हाण मरोविणु तत्थ आय अजियंगरायघरि पुत्ति जाय । चंद्मइ णाम अइमंदमेह परिणिय जसोहराएं सुह। तहो पुत्तुप्पण्णउ जसहरक्खु परिवारहो पोसणु कप्पविक्खु । जसहरहो रज्जु देषिणु जसोहु किउ तउ वारसविहु चइवि मोहु। 10 संणासु किया सुसमाहिजुत्तु वंभोत्तरसग्गि जसोहु पत्तु । जाणिवसुय थिय मंतीहि सुण्ह सा देवररत्तिय सुरयतण्ह। रहाविमल चप्परि रयह जाम णियदइएं दिद्रिय दु ताम। पिक्खेवि विरत णारिसंगि गउ णिज्जणवाणि जइवरह संगि। जिणदिक्न लेवि जायउ णिसंगु तवचरणु चरह जियसत्तु चंगु। 15 चारित्तु चरिवि चिरु छडि काउ चंदमाहि गमि जियारि जाउ। हुउ जसहरु राउ जसोहतणड जणणिए जंपिउ जि कियउ अण। णिवसुयविलसिउ सुणि रामु मंति वउ वंभचेरु किउ णिसुणि कंति । किं किउँ कुकम्मु सुहाइ केम ता चंदलेह वउ गहइ तेम। घंभवएण दिढ मरिवि ते वि विजाहरगिरिउप्पण्ण वे वि। गंधव्वलच्छि कुविसिट्टकम्म आयण्णिवि णिदिवि तियहं जम्मु । गंधव्वसेणु गिण्हेवि दिक्ख जिणमग्गहो केरी परमासिक्ख । अणसणु णिवाहिवि किउ णियाण तुहं मारिदत्त सो अप्पु जाणु। पत्ता-णिसुणहि हो राय अण्णु कहतर जणभरिय ॥ मिहिलाउरि रस्म घणकणकणयसमावरिय ॥ २५॥ 20 25 MAN 25. १. A किं कियट कम्मु.२ A गुणभरिय. ९४ - IV. 27.31 जसहरचरित - 26 5 IO तहि सेटि अस्थि जिणपायमतु सम्मत्तरयणवयसीलजुत्तु। दयंदाणकजि सावउ सुदच्छु जिणयत्तु णाम वणि दीहरच्छु। जलु गाहंतउ सो अस्सरयणु महिसेण हयउ संपत्तु मरणु। तहो सेटिहि सुरहीगभि जाउ हुउ वच्छउ दिदु संपुण्णकाउ। अण्णहि दिणि मरणावस्थपत्तु वणिणा तहो कणि जवेइ मंतु । अरुहपतराई भावेण तेण गिण्हिय भवभयसमसंतपण । तत्थाउ राय तुव कंत उभरि समवियड रुप्पिणिगभि पवरि। होसइ घरबलइ पयावधारि रिउमहणु कुलसंतोसयारि। जो भीम मंतिसुउ दुन्विणीउ सो खुजेउ हुउ पाविड कोउ। गंधव्वसिरी अइकुडिलचित्त किसु कियउ काउ संस्त्रीणगत्त। होपविणु णेहु धरेवि सज अमयमणाम साखल अलज। राएण विमलवाहणिण दिण्ण जसहरु परिणाविउ पाकण्ण । जसु वहया णिसुणिउ मारिदत्त अभयरुइमुहाहितो सुबत्त। खयरायलि जो गड रामु मंति ससिलेहासमउ दिणिकंति। अणुवय परिपालिवि वंभचेह केण वि सुहधम्मोदएण वीक। सो जसवइ णियकुलकमलभाणु जसहरहो पुतु जससेयभाणु। जा चंदलेह चिरु खयरकुले ला हुय कुसुमावलि विजविउले। सहयरि उपपणी तुझु राय णउ चुकइ बुज्यहि मझु वाय । पत्ता-सुहहिं परिरक्सिउ जाम णिरिक्खिउ रायतुरउ खरखुरचवलु ॥ रोसाइदेणं माहिदेणं मारिउ सो पीयंतु जलु ॥ २६ ॥ 27 किं कारणु जंपहि गुणसायर महु मणसंसउ हरहि दयावर। कियउ कुपत्तदाणु अण्णहि भवि खीणु करेवि काउ तावसतवि। मरिवि जसोहहो पति गुणग्गल हूई चंदलच्छि चंदुजल। 15 20 meanA 26. १. A गुणगणविसालु सम्मत्तरयणपालणु गुणालु.२. A. वयदाण ३. A वणिवइ ४. A धरवलय. ५.A सुज्जण. ६. A पावकिण्ण. ७ A अभयमहमुहहो जा सुय सवत्त. 27. 1. A. महु मणसंसउहरणदिवायर. - 5 10 पुप्फदंतविरइयउ [IV. 27.4- चंदाईहि सवत्तिविरोहउ धरिवि चित्ति घाइउ सो णिव ह। पुत्ववहरवसु जीवहं धावह रोसाणलु हुइ तं जा पायद। वच्छउ हुयउ सेहिधरि हरिवह कणि जाउ लद्धउ कियमुहमद । संपह तुह भजहि उरि अच्छइ रज्नु करेसइ घर तुह पच्छ।। चिर रायउरि राउ पयपाल भयवह पयजलेण पक्वालिट। वित्तंगउ णामेण महावलु छडि रजु तुह दिण्णु महीयलु। अप्पुणु भगव दिक्ख पडिगाहिय सरिसरवरतित्थई अवगादिय । धराणि भमंतु भमंतु परायउ णियपुरवरि देविहि मदि आयउ । तहि ठिउ तवह सचित्तह छह होउ मज्झु इच्छेवयसंपद। वंछित लक्षु मरेवि गुरुकर चंडमारि देवय हुइ थकाउ। पुल्लिंगाउ फिरिवि तियलिंग वप्पु तुम्ह हुउ असुहवसंगउ । जणणी तुज्झ सरूव सुलक्षण चित्तसेण णामेण चियपत्रण। 15 उवसमगुणु परिपालिवि सुहरउ पाण चरवि जाउ सो भइर। दंडपणामु जासु पई विहियड अच्छइ हिं जो माहमाहियउ। करुणारस पूरिवि णियविग्गहु कप्पणिवासी देउ होसह बहु । उज्जेणिहि णयरिहि जसवंधुरु राउ पसिद्धउ उण्णयकंधरु। छइंसणभत्तउ मढ देउल अड दीहिय पोखरि पविउलेजल। महियालहो आयदणु मणोहरु रयणजडिउ दिप्पंतउ सेहरु। सरसाहारहिं पाणिवि तावस भयवजईसरयहुणिटावस। जिणचेईहर धयमंडियसिर उण्णइवंत सवित्थर अइथिर। कारावेप्पिणु दाणु पयच्छिवि मिच्छभाउ भावेण समिच्छिवि। वणकीलाबहुमोउ करोप्पिणु दीहु कालु णियपंउ भुंजेप्पिणु। 25 सुहमावणजुत्तीइ मरेप्पिणु इदेउ णियहियइ घरेप्पिण। मयगयपउरु कलिंगाहिउ णित भयदत्तहो रायहो हउँ सुउ। गाम सुदत्तु रायसिरिमंडिड करमि रजु रिउवलहिं अखदिउ । इकझ्या कुसुमालु गहप्पिणु तलवरेहि दिद दिउ बंधेप्पिणु। महु जाणाविउ किं णिव किजा कारागार तरसा णिजह। 30 20 २. A घाइड णिव हड ३. A तुव. ४. A राय ५, A जलपविठल. ६ A णिवपट. ७ Aणियमणि झाएप्पिणु... A णामु. ९६ IV. 28.15] जसहरचरित तहिं दियवर जे दंड पजहिं ते व लेवि महु पुरउ पयंपहि। आयहो कण्णणासकरछेयणु चलणच्छेउ किजह सिरछेयणु। पहु सदोसउ पहु मारिजह कस्स पाउ मई वृत्तु ण फिजह । पाउ तुज्य जह इहु मारिजा छहिजइ णिवयहु तुव जुजइ। एम सुणेविण चित्तु विरच जुण्णतणु प रज्जु परिचत्तउ। जिणसिफ्ना सीयरिवि भमंतउ पंचवार तुव पुरि संपत्ता। पत्ता-एवहिं हउं एत्यु चउविहसंघसमावरिउ ॥ तउ तिव्यु तवंतु तणकंचणु सम मित्तु रिउ ॥ २७ ॥ 35 28 5 उज्जेणिहि रायजसोहमति णियपह ठवेवि सुउणागदत्त अप्पुण घरि संठिउ दंदचतु सुहपरिणामि तहिं चदवि काउ णामि गोवद्धशु गुणविसाल फरुणायर परमपरोययारि अपलोयहि णिवह णिसण्णु पहु णिसुणिवि भवाई सपल गरिंदु ण तरमि हवं विणउ करेवि साहु सुपसण्णु होवि महु देहि दिक्त्र ता गुरुणा दिण्णु दियंवरतु ता णरवद यणिजियकसाय भूसिउ दिपचाइ पलोइ राउ भइरउ पमणइ भो सामिसाल मुणि जंपइ दिप ण तुज्नु अस्थि गुणसिंधु जणविहियसंति। घरभारवहणु पिउपायभत्तु । समभावणविरइयभावजुतु। सिरिवइवणिवइघरि पुत्तु जाउ । सम्मत्तवंतु दिप्पंतभालु। जसवहरायहो संयोहयारि। महु संघाड तवलच्छिगेहु । आणंदसोयपूरियउ णंदु। संयोहिउ पहु किउ धम्मलाहु। तवचरणु चरमि पालेमि सिक्खा थिउ मारिदत्त णिवरिधिचत्तु । पणतीसणिवह णिग्गंथ जाय। जोईसरासु वडराउ जाउ। दिक्खापसाउ करि गुणविसाल। छंगुलउ जेण तुहुं अस्थि हथि। 10 15 Ran 28. 1. Aणिय २. P adds after thrs in second hand in the damagad margin: दहलखण- धम्मु वित्तजि ....तचार ....यभाव .... य. 'Tho Hindi translation of this line, however, 1s not found. Seo pugo 300, lines 12-14 of the translation - ९७- पुप्फदंतविरइयंउ [IV. 28. 16-- कई करमि देव तो भणइ साहु अणसण परिपालहि करिवि गाहु। थोआउसु दीसह तुन्झु देहि सिग्घउ उवाउ भल्लउ करेहि। तातेण किर्येउ संणासु भन्नु वावीस दिवस पालेवि सव्यु । चउविहआहारहि चत्तु काउ सो भइरउ तायइ सग्गि जाउ । अभएण पमेलिउ खुल्लयतु तहिं तक्वणि पडिवण्णउ रिसित्तु । 20 मयरद्धयझाणपहायरुद्ध णिवकण्णहि पुणु थणवट बदु । अभयमई जाय विरत्तभाव कुसुमावलि अजिय सुद्धभाव । तहि पायमूलि खुल्लियहि वित्तु छडेवि धित्तु अजियचरितु। णिग्गथमग्गु णिम्मलु सरेवि अभयरुह जैइहि गुणगणु सरेवि । गय दोण्णि वि तहिं देवीवणम्मि चउविहाराहण घरि मणस्मि । 25 आराहिवि दंसणु णाणु चरित तउ वारहविहु अवहरियदुरिउ । पंचदसदिणई संणासु करिव सुसमाहिए दोषिण वि पाण वरवि । ईसाणसग्गि ते दोणि देव उप्पण्ण झत्ति सुरसहि सेव । सम्मत्तबलि तियलिंगु छिपिण कीलहिं विमाणि सुर तेत्यु दोणि । घंदहि, जिणभवण अकिट्टिमाई पडिमामंडियई जगुत्तमाई। 30 सम्मत्ति लन्भइ सग्गु मोक्नु सम्मति लमह अर्चलु सोफ्षु । पत्ता-तत्थाउ मुणिंदु चउविहसंधि परियरिउ ॥ सिद्धहरिहि णाम संपत्तउ जइवह तुरिउ ॥२८॥ 29 तहिं ठिउँ चिंतह भावण आणिञ्च आराहिवि आराहण सुसच्च संणासु कियउ सुसमाहित सो जसवइ सो कल्लाणमित्तु वणिकुलपंकयबोहणदिणसु संसारहो गइ ण होह णिध । अवहिए परियाणिवि सचतम् । सत्तमइ सम्गि पत्तउ सुदत्त । सो मारिदत्तु जइवरु पवितु । सो गोवहण गुणगणविसेसु। wamme B. APA TIES 4. This line and the following are given in S and T as part of कडवक 22, after राएण वि तहो पयपकयाई ६ Aणिग्गथु मग्गु ७ A जाइहि . A अचलसोक्खु. 29 1 A घिट २. ST give णिव जसवइ सो कल्लाणमित्तु सो अभयणाउ सो मारिदत्तु as part of कडवक 22, after कवडक 28, line 21 of the present edition ३, ST omit वणिकुल .... विसेसु - ९८.
IV. 30.17] जसहरचरित सो कुसुमावलि पालयतिगुचि मजियगुणु जाणिय घम्मवित्ति। सर्व दुग्णयणिण्णासणेण तउ चरिवि चार संणासण। कालि जति संणासजुत्त जिणधरमे ते सगगगग पत। घचा-कि उपरोह जस्स कयह पउँ भवंतर ॥ तहो भबहु णामु पायरमि पयडउ धर ॥ २९ ॥ :० 30 S चिक पट्टणेच्छंगे (1) साहुसाहु तहो सुइ खेलागुणवंतु साहु। तहो तणुरुहु वीसलु णाम साहु वीरो साहुणियह सुलहु णाहु । सोयार सुणाणगुणगणसणाहु एकरया चितह चित्ति लाहु। हो पंडियठकुर कण्डपुच उपयारिय वल्लहपरममित्त। कह पुप्फयंति जसहरत्ररित्तु किउ सुटु सहलक्षणविचित्तु । पेसहि तहिं राउलु कउलु भजु जसहरविवाहु तह जणियचोड। सयलहं भवभमणभवंतराई महु वंछिउ करहि णिरंतराई। ता साहुसमाहिउ कियउ सब्बु राउलु विवाहु भवभमणु भन्नु । चपवाणिउ पुरउ हवेड जाम संतुट्ठउ वीसलु साहु ताम। जोइणिपुरवरि णिवसंतु सिह साहुद्दि घरे सुत्थियणहु धुहु। पणसट्ठिसहियतेरहसयाई जिवविकमसंवच्छर गया। घासाहपहिला पवित्र वीय रविवारि समित्थिउ मिस्सतीय । चिरु वत्थुवंधि करकियउ जंजि पद्धडियबंधि मई रहउ तं जि। गंध कण्हडणंदणेण आयहं भवाई किय थिरमणेण । मा दोसुण दिजह पुद्धि काउ काबच्छराई त सुत्त लाउ। 15 घता-जो जीवदयावरु णिप्पहरणकर वंभयारि इयजरमरणु ॥ सो माणणिसुमणु धम्मु णिरंजणु पुष्फयंतु जिणु महु सरणु ॥ ३० ॥ 10 -- ४. ST सा कुसुमावलि पालियतिगुत्ति सा अभयमइति णरिंदपुचि.५ ST भन्वई | ST कालिं जति सम्बई मयाई जिणधम्म सग्गरगहो गयाई. ७. Porhion beginning with this line and ending with कवरक 30, line 13 is omitted in PST and also not rendered in Hindi. B. एय. 30.1. B.स. २. B. अहिय. - ९९- पुप्फदंतविरइयड [V.31. 31 पावणिसुंभणि मुद्धाभाणि- ज्यरुप्पणे सामलवणं। कासवगति केसवपुर्ति जिणपयभातं धम्मासति। वयसंजुतिं उत्तमसति विलियसंकि महिमाणका पइसियहिं कहणा खंडे रजियचुहसह कयजसहरकह । जो आयण्णइ चंगउ मण्णा लिहइ लिहावह पढइ पढावह। 5 जो मणि भावइ सो णरु पावा विहुणियधणरय सासयसंपय । जणवयणीरसि दुरियमलामास कहणिदायरि दुसहे दुहयरि । पडियकवालह णरकंकालह बहुरंकालइ अइदुक्कालइ । पवरागारि सरसाहार सहि चलि वरतंवोलि। महु उवयारिउ पुर्णिण पेरित गुणमचिल्लउ णण्णु महल्लउ । होउ चिराउसु परिसउ पाउसु तिप्पट मेइणि घणकणदाइणि । विलसउ गोमिणि णञ्चउ कामिणि घुम्मउ मंदलु पसरउ मंगलु। संति वियंभउ दुक्खु णिसूंभउ धम्मुच्छाहि सहुँ णरणाहि। सुहु णंदउ पय जय परमप्पय जय जय जिणवर जय भयमयहर। विमलु सु केवलु णाणु समुज्जलु महु उपजउ एत्तिउ दिन। मई अमुणति कन्चु करति जं हीणाहिउ काई मि साहिउ । घचा-तं माय महासइ देवि सरासह णिहयलयलसंदेहदुह ।। महु खमउ भडारी तिहुवणसारी पुष्फयंताजणवयणकई ॥ ३१ ॥ la इय जसहरमहारायचरिए महामहल्लणण्णकण्णाहरणे महाकइपुप्फयंतविरइए महाकन्वे चंडमारिदेवय- मारिदत्तरायधम्मलाहो णाम चउत्थो परिच्छेऊ समतो ॥४॥ 31. ST पविमल केवलु णाणु सुणिम्मलु.२ STण मुणंति. ३. AT माइ. ४. सरस्सइ. ५. AP सय लसंदोह. ६. AP रूह.७ % जसवइकल्लाणमित्तमारियचमभयमइसग्गगमणो णाम.
शब्दकोशः (In the folloning glossary of words occurring in the Jasabaracariu, pronouns and tboir derivatives oro ignored oltoghther, while in the case of verbs only roots, primitive and causal, are included, dropping the different forms of finite verbs, infinitives ond absolutires) अअ-अन अर-अति असइ-अतिविकट ( अट्ट विकटार्थ देशी) अर-अतिर अकोमल-अतिकोमल अइयामिअ-भतिकान्त अषण-अतिपन अउनीह-अतिदीई अब्दुन्मण-अतिदुर्मनस् अध्यक-मन (फ-) अविश्ल-अतिविपुल अहमययन्त-अतिशयवन् (शनादिमूलातिशय. चनुकसंगना नतुशिदतिमयोपेतः। नि:- स्वेदत्वा पतिशयोपेत इति टिप्पणम् ) असुंदर-मतिसुन्दर अउच्च-अपूर्व अग्घवत्त-अर्घ्यपात्र अचल-अचल अचलत्तण-अन्चलत्व अचेयण-अचेतन अञ्चण-अर्चन (पूजा) अचंत-अत्यन्त अचोक्खअ-अमृष्ट, अमार्जित (अनुचि) अच्छ-आस् (धातुः) अच्छरा-अप्सरस् अच्छिअ-आसीन अच्छि-अक्षि अच्छिउड-अक्षिपुट अच्छोडिय-आस्फोटित अछम्म-अच्छम (कपटरहित) अज-अज अजयर-अजगर अजर-अजर अजरामर-अजरामर अजिय-अजित (द्वितीयतीर्थकरनाम) अजियंग-अजिताङ्ग ( राशो नामविशेषः) अजुत्त-अयुक्त अज्ज-अद्य अजमहि-आर्यमही अन्नव-आर्जव (ऋजुता) अजणिज-अर्जनीय अजिय-अर्जित अफज-अकार्य अकिहिम-अनिम अक्चर-अक्षर (वर्णावलि) अस्पा-आल्या (धातुः) अपटिअ-अराण्डित अगच्च-अग अगाय-अगर्व सग-अम अग्गि-अमि अग्गिजाला-अमिग्याला जस....१३ - १०१ अजु जसहरचरिउ अतुद्धि अजु-अद्य अट्ट-आर्त अट्टहास-अट्टहास (विकटहास) अट्ठ-अष्टन् अहगुणी-अष्टगुण (अष्टमहापातिहार्ययुक्त इत्यर्थः) अट्ठम-अष्टम अट्ठमि अष्टमी अहविह-अष्टविध अट्टसिद्धगुण-अष्टसिद्धगुण अटुंग-अष्टाङ्ग (अष्ट शरीरावयवा इत्यर्थः) अहि-अस्थि अट्ठोत्तरसहास-अष्टोत्तरसहस्र अड-अट् (धातुः) अड-अवट (कूप इत्यर्थ.) अण-अनस् (शकट) अणअ-अनय अणउंछिअ-अवाञ्छित अणक्खर-अनक्षर अणगार-अनगार अणिद-अनिन्द्य अणिदिअ-अनिन्दित अणु-अणु (परमाणुरित्यर्थः) अणुकंप-अणु+कम्प् (धातुः) अणुकूल-अनुकूल अणुगय-अनुगत अणुगामिणि-अनुगामिनी अणुज्ज-अनवद्य (निर्दोष इत्यर्थः) अणुजय-अनुद्यत अणुष्ठा-अनु+स्था (धातुः) अणुहाण-अनुष्ठान अणुदिणु-अनुदिनम् अणुबंध-अनुबन्ध (क्रमः संततिर्वा) अणुमग्ग-अनु+मार्ग अणुमग्गयर-अनुमार्गचर (अनुचर इत्यर्थः) अणुमाण-अनुमान अणुवय-अणुव्रत अणुवेक्ख-अनु+प्रेक्ष् (धातुः) अणुसंघट्टण-अनुसंघटन अणुहव-अनु+भू (धातुः) अणुहूंज-अनु+भुज् (धातुः) अणेय-अनेक अण्ण-अन्य अण्णण्ण-अन्य+अन्य अण्णत्त-अन्यत्व अण्णभव-अन्यमव अण्णव-अर्णव अण्णाण-अशानिन् अण्णाण-अशन अण्णायत्त-अन्यायत्त अण्णासत्त-अन्यासक्त अण्णुण्ण-अन्योन्य अण्णेक-अनेक अण्णोण्ण-अन्योन्य अण्हाण-अस्तान अतुद्धि-अतुष्टि अणत्थ-अनर्थ अणलिय-अन्+अलीक (सत्य) अणवरय-अनवरत अणसण अनशन अणंग-अनन अणंत-अनन्त (चतुर्दशतीर्थकरनाम) अणंत-अनन्त अणंताणंत-अनन्त+अनन्त (अतिशयेन अनन्तमित्यर्थः अणाइ-अनादि अणाह-अनाथ अणिञ्च-अनित्य अणि?-अनिष्ट अणिट्ठिअ-अनिष्ठित (असमाप्त) अणिसामायण-अनिशाभोजन अणिण-अनिधन (अनन्त इत्यर्थः) १०२ - शब्दकोशः अलिंग अतुल-अतुल अनुलनागि-अतुरमात अनारण-भातासन अन्ध-गर्म अत्य-अन्त (भरतपर्वत इत्यर्थः) अत्यरण-अत्तमन अत्याग-आस्पान (सभामनिमियर्थः) अन्गामिभ-अल+भागीन अदुन्मा-ममति अदमगाअ-मनीभून अमरत्त-अमरत्व अमल-अमल अमलिय-अमलिन अमंगल-अमलाल अमाण-अमान (मानहित इत्यर्थः ) अमित्त-अमित्र अमुणंत-अजानत आमोसहि-आम+ोषधि अम्म-अभ्य (सबोधने) अन्माणवि-अम्पादेवी (मातेत्यर्थ.) अम्मि-अप (संबोधने) अय-अज अयवह-अजराति अयसिर-अजगिग्स् (अजो ब्रहोति टिप्पणम्) अर-अर (अष्टादगतीर्थकरनाम ) अरमाहर-अरमा (अलमी) + हर ( दारिद्य- नागफ इत्यर्थः) अरविद अरविन्द (कमलमित्यर्थः) अरहंत-अर्हत् अरहनावलि-मईदावलि (जिननामावलिरि- शान- अपन-मार (मिर्ग.) अपार-अपार अपे-परेन (गम इव) त्यर्थः) अपमन-गमन अगरमा-आरमरम अपिरति अपु-भागमा (नपनियां.) जभगिम-अपना भन्भनर- उस्मान-नियम भयपने (गु.) अभिगमनेगी (मान अन्भग-1 जमग-ममा (मलिनिरिणाम) जमरामापी-नमपमहादेवी ( गगीनाम निर) अमगग-अभानि (नाग) अभंग-अमः पनी- अमा-अमानत इत्पर्य जी अगणत-अमनोम अमय-गगन अमयग:-अगमति (जीनामनिमेष:) अमरणियर-अमर्गनकर (देवसद) अग्ण-अरण अरणयर-अनणकर (सूर्य इत्यर्थ.) अम्णायवत्त-अरणातपत्र अमणिय-अगणित अमहवर-अर्दत् (पति)+अक्षर अरुअ-अरूप अवि-जरुपिन् (अरूप इत्यर्थः) अलपत्रण-अलक्षण अलज-अलन अलंकिअ-अलकृत अलाउ-अलायु अलि-अलि (भ्रमर इत्यर्थः) अलिउल-अलि कुल अलिय-अलीक अलिंग-अलग - १०३ - अहिणाणिय जसहरचरित अलोय अलोय-अलोक अविहंग-स्वभावतः इत्यर्थे देशी अवगण-अव+गण् (धातुः) अविहाअ-अविभाग अवगण्ण-अव+गण् (धातुः) अविहिण्ण-अविहीन अवगाहिय-अवगाहित अस-अस् (धातुः ) अस्थि, अस्ति इत्यादि अवगुण-अवगुण असइ-असकृत् अवज्ज-अवद्य असइ-असती अवत्थ-अवस्था असच्च-असत्य अवमाणिय-अवमानित असल्झ-असाध्य अवयपुण्ण-अवयवपूर्ण असण्णि-अ सशिन् (अचेतन इत्यर्थः) अवयास-अवकाश असमाण-असमान अवर-अपर असमाहिल्ल-अ+समाधि इल्ल (मत्वर्थीयः) अवरअ-अपर(क) असामण्ण-असामान्य अवरपक्ख-अपरपक्ष असारत्त-असारत्व अवरुंडण-आलिङ्गने देशी असि-असि (खा) अवरंडिय-आलिशिते देशी असिघेणुय-असि+धेनुका (क्षुरिकेत्यर्थः) अवरोप्पर-परस्पर असुइरस-अशुचिरस अवलंबमाण-अवलम्बमान असुहरण-असु+हरण अवलित-अवलित असेस-अशेष अवलोय-अव+लोकय् (धातु:) असोय-अशोक (वृक्षविशेषः) असंक-अशङ्क अवसर-अवसर अवसवण-अपस्वप्न, अपशकुन असंकिअ-अशक्षित अवसाण-अवसान (अन्तः, समाप्तिः) असंग-असङ्ग अवसिं-अवश्यम् असुंदर-असुन्दर अवसु-अवश्यम् अस्स-अश्व अवहत्थिय-अपहस्तित अहचरिय-अधश्चरित (नीचवृत्त इत्यर्थः) अवहरिय-अपहृत अहम-अधम अवहीसर-अवधीश्वर (अवधिज्ञानवानित्यर्थः) अहम-अहमित्यर्थे अवंतिराअ-अवन्तिराज अहम्म-अधर्म अवंती-अवन्ति (जनपदनाम) अहयर-अघश्वर अविगीय-अविनीत अहर-अधर अवियड्ड-अविदग्ध अहरुल्ल-अधर+उल्ल (स्वार्थे ) अवियाणअ-अविजानत् अहि-अहि (सर्प इत्यर्थः) अविलासर्वक-अ+विलास+चक्र अहिछत्त-अहिच्छत्र (नगरनामविशेषः) (स्वभावसुन्दर इत्यर्थः) अहिणंदन-अभिनन्दन (चतुर्थतीर्थकरनाम) अविवंक-अ+वि+वक्र (अतिसरल इत्यर्थः) अहिणाण-अभिज्ञान अहिणाणिय-अभिज्ञानिक (अभिज्ञान) " পশা शब्दकोशः आमई अंध-अन्ध अंघयार-अन्धकार अंधार-अन्धकार अंबर-अम्बर (वन) अंभ-अम्भस् अंग-अंश अग्मिाण-अभिमान अहिमाणमेर-नाभिमानमेक (पुष्पदन्तकोषिक- देशयतमा) अमिाणक-अभिमानाह (पुष्पपन्नोस्टिम) अधिमाणिप-गानिमान एक (अभिमानर ल) अस्चिाग्यि-भाषितारिफ जाहिराय-मगिन अहिय-मादित मिनिय-मिनिक गरसेग-अमिक সানি हिम-अहिंगा সোনাম-সন্নিা अंमु-अनु अंसुवाइ-अनु+वाह (अनुप्रवाह इत्यर्थः) भाग:- आगन-मोगगन (!) आमि-भपोभूमि जदिन-प्रति अंगुम या अंग-अन अंगर-नगर अंगनाज-गरम (गायोलग.) अगग-मदन अंगराज-शासग पंगहार-भाभार अंगारण-मारक (नोगा) जंगल-मानि अंगुलि नति अंगुलियस मानि (ग) अनियमित धन-अप धनग्ग-भन्न नायलि-मन भायलि आह-आदि आइअ-आगत आउद्ध-जाविद्ध आउ-अप्. आउपय-आयुःक्षय आउगंठि-आयुर्यन्यि आउपमाण-आयु प्रमाण आउस-आयुए आउंच-आ+कुछ (धातुः) आरंचिय-आकुनित आण्म-आदेश (आशेत्यर्थः) आकोस-आ+शुम् (धातुः) आगम-आगम (शास्त्रमित्यर्थः) आघोन-आ+सुप् (धातुः) आढत्त-आरत, आशप्त आणण-आनन (मुस अथवा द्वार) आणंद-आनन्द आणंदिअ-आनन्दित आणंदिय-आनन्दित आणदिर-आनन्द+इर (शीलाथे प्रत्ययः) आणा-आगा आणाकारिणी-आशाकारिणी आणाविअ-आगापित आणिय-आनीत आणी-आननी (धातुः) आपीण-आपीन आमहसरिस-आमयसदृश नटा-अन्तःपुर अंदायण-आन्दोलन - १०५ आमंतिय जसहरचरिउ इत्तिय आमंतियअ-आमन्त्रित(क) आमिस-आमिष आमिसगसिर-आमिष प्रसनशील आमोय-आमोद आयअ-आगत आयण्ण-आ+कर्णय् (धातुः) आयण्णण-आकर्णन आयदण-आयतन आयम-आगम आयर-आचार आयर-आदर आयवत्त-आतपत्र (छत्रमित्यर्य.) आयंव-आताम्र आयार-आचार आयावण-आतापन (व्रतविशेष ) आयास-आ+यस् (धातु.) आयास-आकाश आरडत-आरटत् आरडिय-आरटित आरत्त-आरक्त आरंभ-आरम्म आराम-आराम (उपवनमित्यर्थः) आराहण-आराधन आरुह-आव्ह (धातु ) आरुण-आरोहण आरुढ-आरुढ आलमग-आलग्न आलिद्ध-आश्लिष्ट आलिंगण-आलिङ्गन आलुखिय-आरक्षित (आवादित इत्यर्थः) आलोइय-आलोचित आलोयण-आलोचन आलोयंत-आलोकयत् आव-आ+ह आगमने (धातु.) आवडिय-आपतित आवज-आ+पद् (धातुः) आवडिअ-आपतित आवत्त-आवर्त (अम्भसा भ्रम.) आवया-आपद् आवलि-आवलि (पत्तिरित्यर्थः) आविद्ध-आविद (आबद्ध, खचित) आस-आस् (धातुः) आसण-आसन आसण्णवय-आसन्नपद आसत्त-आसक्त आसत्ती-आसक्ति आसव-आ+तु (धातुः) आसंका-आशा आसंघ-आ+धि इत्यर्थे देशी आसाऊरिय-आगापूरित आसाय-आस्वाद आसायण-आस्वादन आसासिय-आश्वासित आसिअ-आश्रित आसीण-आसीन आसीवाअ-आगीर्वाद आसीसिय-आशीपित ! (आशीर्दत्ता इत्यर्थ.) आहय-आहत आहरण-भामरण आहव-आइव (युद्ध) आहाकम्म-आधाकर्मन् (हिंता) आहार-आधार आहार-आहार आहास-आ+भास् (धातुः) आहिड-आ+हिण्ड् (धातुः) इक्कइया-एकदा इच्छिय-इच्छित इच्छेवय-एष्टव्य इत्तिय-इत्वर (चपल इत्ययः) इत्तिय-एतावत् - १०६ इत्यं शब्दकोशः उडिय प्रत्य-अप प्य-ति (वासादाय) गर-दर प्रयगा-स्तरया (अन्यमा) इल-दना (पी) मला- (ती) समि-जर उगाहय-उच्चीकृत उधासण-उच्चासन उभिट्ट-उच्छिष्ट उभिठ्य-उच्छिष्टक उयोलिय-उपानद उच्छअ-उत्सव उच्छल-उद्+क्षिपधात्वर्थे उच्छलंत-उच्छरत् मालग-पालो गाट-मार न- (भाताला) -पती S:- माल-नाम (माणिyि) इंदिन-दिर मार-मार गिमा-पिगुग २-२ (नन्द्र) ifre-in (Ain) मर-भर मान-शान (ग्यांनाग) नामिटि-i-fin (r) उच्छल्ल-उत्क्षुब्ध (देशी) उच्छव-उत्सव उच्छाय-उत्पादित उनकाह-उत्साह उग्रवण-इवन उनल-उम्मल उजालिय-उज्ज्वलित उजाण-उद्यान उजय-जु(क) उनुयत्त-मजुसत्य उजुया-प्रनुका उजेणि-उजयिनी उज्या-अयोध्या उज्झाअ-उपाध्याय उज्याय-उपाध्याय पज्झाहिअ-अयोध्या अधिप उह-उत्तिष्ठ अलिय-धारा (उरटायर्थः) आठ-आन्द अगु-मानी (मराठी- रिका) पाय-उमदिन पण देशी उपयय-न उसम-तुप उदंत-उत्तिष्ठत् उटुंतपढत-उत्तिष्ठत् तत् उहा-उद+स्था (धातु) उहावियअ-उत्यापित (क) उहिय-उस्थित उडु-उद (नक्षत्र) उढुवढ-उनुपति (नक्षत्रराट्, चन्द्र इत्यर्थः) उद-उद+टी (धातुः) उणसील-उनशील उझाविय-उचित उहिय-उचित (ऊर्वीकृत इत्यर्थे ) गमित्र- गय- नग्गिण-उतीर्ण ne -- - १०७ उडिर जसहरचरित उवा उभिय-जीकृत उन्मुभ-अर्ध्व+अर्व उड्डिर-उड्डनशील उण्णइवत-उन्नतिमत् उण्णय-उन्नत उण्णयकंधर-उन्नतकंधर उण्ह-उष्ण उत्त-उक्त उत्तम-उत्तम उत्तर-उद्+तु (धातुः) उत्तार-उद्-तारय् (धातुः) उत्तिय-उक्त उत्तिम-उत्तम उत्तुंग-उत्तुङ्ग उदयायल-उदयाचल उद्देस-उद देशय् (धातुः) उद्देस-उद्देश उद्ध-उर्ध्व उद्धर-उद्धृ (धातुः) उद्धरिय-उद्धृत उद्धहत्य-उर्ध्वहस्त उद्धूलिय-उलित उप्पंज-उद्-पद् (धातुः) उप्पण्ण-उत्पन्न उप्पम-उपमा उप्परि-उपरि उप्पाड-उद्-पाटय् (धातुः) उप्पाडण-उत्पाटन उपाय-उत्सात उप्पेल्लिय-उत्प्रेरित उप्फाल-आ+स्फालय , अथवा, उद्+पाटय् (धातुः) उपफुल-उत्फुल्ल उन्भूय-उद्भूत उम्मुच्छिअ-उन्मूर्छित उम्मूलिय-उन्मूलित उयर-उदर उर-उरस् उरअ-उरग उरचूर-उरश्वर (उरगजातिः) उरयर-उरश्चर उरयल-उरस्तल उल-कुल (उत्तरपदे एव) उल्लल-उद्+लल् (शोभाया धातुः) उल्ललण-उल्ललन उल्ललिय-उललित (विकीर्ण इत्यर्थः) उल्लिय-आति (आर्द्र इत्यर्थः) उल्लोवय-उलोच(क) (वितानमित्यर्थः ) उवएस-उपदेश उवगरण-उपकरण उवमा-उपमा उवयंठएस-उपकण्ठदेश (समीपप्रदेशः) उवयार-उपकार उवयार-उपचार उवयारिअ-उपकारिन् उवरि-उपरि उवरिल्ल-उपरितन उवरुवरि-उपर्युपरि उवरोह-उपरोध उवलक्खिय-उपलक्षित उववण-उपवन उववाय-उपपाद उपवास-उपवास उवसम-उप+शम् (धातुः) उवसम-उपशम उमड-उद्भूत उन्ममिय-उद्भमित (उद्भ्रान्त) उभव-उद्भव उन्भंत-उद्भ्रान्त उन्भि-उद्-भृ (धातुः) उवसंत-उपशान्त उवाअ-उपाय - १०८ . -- - उविंद शब्दकोशः कडिळ उविंद-उपेन्द्र (विष्णुः) उज्वर-उर्वर् इत्यधिकार्थे (धातुः ) उव्वरिय-उर्वरित उव्वेविर-उद्-वेपनशील उंजिय-अर्जित उंजु-ऋजु उंदुर-उन्दुर (मूपक इत्यर्थः) ओली-आवलि ओलंघिय-उलंपित ओसह-औपध ओसारिअ-अपसारित ओसासित्त-अवश्याय+सिक्त ओह-ओष ऊसर-ऊपर एइंदिय-एकेन्द्रिय एक-एक एकच्या एकदा एक्कखंभ-एकस्तम्भ एकखुर-एकस्तुर एक्कठाण-एकस्थान एक्कभत्त-एकमत एकमेक-एकैक एत्तहिं-एतावति (काले) एत्थंतरि-अत्रान्तरे एत्थु-अत्र एत्तिअ-एतावत् एम-एवम् एयारह-एकादशन् एयारहमअ-एकादशमय एयारिस-एतादृश एरिस-ईदृश एवड-एतावत् एवहि-एवम् एवं-एवम् एहावस्थ-एषा+अवस्था क-क (उदक) क-क (मस्तक) १-१४-६ कइ-कवि कइत्तण कवित्व कइमइ-क्रविमति कइयइ-कविपति कइयण-कविजन कइया-कदा कइराअ-कविराज कइवइ-कविपति कइवय-कतिपय कउल-कौल (कापालिकः कुलाचार्य इत्यर्थः) कउलउल-कौलकुल (कापालिकादिदुष्टधार्मिक- समूह इत्यर्थः) ककस-कर्कश कक्खड-कक्ष (लतावृक्षादिगुल्मः ) कक्ख-कर्कग कच्चोल पात्रविशेष देशी (मराठी-कचोळे) कच्छव-कच्छप कन्न कार्य कजाणुराअ-कार्यानुराग कट्ठ-कष्ट, कष्टम् कट्ठ-काष्ठ कट्ठकम्म-काष्ठकर्मन् कडमत्र-कटाक्ष कडयडिय-कडकडित (विद्युच्छब्दानुकारः) कडाह-कटाह कडि-कटि कडिल्ल-कटी+इल (मत्वर्थीयः) ओइण्ण-अवतीर्ण ओट-ओष्ठ ओणाविय-अवनामित ओल-आर्द्र जस....१४ कर्डिसुत्त कडिसुत्तय-कटिसूत्रक (मेखला) कडुयसर-कटुक स्वर कड-कृष्धात्वर्थे देशी कड्डिय-कृष्ट ( आकृष्ट) कड्डिय-कृष्ट कढ-कथ् (धातुः) कढिण-कठिन कण-कण् (धातुः) कण-कण कणभर-कणभर (धान्यभार) कणय-कनक कणयमय-कनकमय कणिस-कणिश कण्ण-कर्ण (श्रोत्रेन्द्रिय) कण्ण-कर्ण (कुन्तीसुत) कण्णसूल-कर्णशूल कण्णत-कर्णान्त कण्णा-कन्या कण्हडणंदण-कृष्ण नन्दन कण्हपुत्त-कृष्णपुत्र कत्तार-कर्तृ कत्ति-कृत्ति (व्याघ्रादिचर्मेत्यर्थ.) कत्तिच कर्तित (भिन्न) - जसहरचरित करंति कम्म-कर्मन् कम्मचंड-कर्मचण्ड कम्मपास-कर्मपाश कम्मबंध-कर्मबन्ध कम्ममल-कर्ममल कम्मविवाय-कर्मविपाक कम्मायत्त-कर्मायत्त कय-कृत कयाणच्छय-कृतनिश्चय कयपारण-कृतपारण कयपुलय-कृतपुलक (कृतरोमाञ्चकचकं यथा त्यात्तथेति टिप्पणम् ) कयरअ-कतर (क) कयली-कदली कयसंचारिय-कृतसंचारिका कयसंवर-कृतसवर कयंजलि-कृताञ्जलि कयंत-कृतान्त कयायर-कृतादर कर-क (धातुः) कर-कर (किरण) कर-कर (हस्त) करग्ग-कराग्र करग्ग-कर ग्र (अङ्गुलि) करड-कठिन इत्यर्थे देशी करण-करण करयरंत-करकरत् (शद्वानुकरणे देशी) करयल-करतल करवत्त-करपत्र (शस्त्रविशेषः) करवंद-करमर्द (फलविशेषः) करसंजोइअ-कर+संयोजित करह-करम करहाड-करहाकट(कन्हाड) करंड-करण्ड (क) करत-कुर्वत् करति-कुर्वती कथकेस-क्रयवैशिक (जनपदनाम) कदम-कर्दम कप्प-कल (युग) कप्पड-कपट (वन) कप्पधारि-कल्पघारिन् कप्पविक्व-कल्यवृक्ष कप्पंधिव-कल्पाविर (कल्पवृक्ष ) कपूर-कर्पूर कप्पूरफार कर्पूरस्कार कम-क्रम् (धातु.) कम-क्रम (चरणमित्यर्थ ) कमंडलु-कमण्डलु - ११० - करवि शब्दकोशः कोजे करविअ-करम्बित कराल-कडार (कपिल, चित्रवर्ण) कराल-कराल (भीषण इत्यर्थे ) करावलि-करावलि (किरणजाल) करि-करिन् करिकर-करिकर (शुण्डा) करिकरसमोरु-करिकरसम+ऊर कारणि-करिणी (हस्तिनी) करितासण-ऋरिन्+त्रासन करिमिहुण-करिमिथुन करिंद-करीन्द्र करुण-करुणा कलकलाअ-कलाकलाप (कलासमूह) कलकोइल-कलकोकिल कलत्त-कलन कलम-कलभ कलयल-कलकल कलयल-कलकलंक (धातुः) कलरव-कल+रव कलस-कलश कलहेक्कसील-कल कशील कलाव-कलाप कलि-कलि (युगविशेषः) कलिया-कलिका कलिंगवइ-कलिङ्गरति कलिंगाहिअ-कलिङ्गाधिप कलुण-करुण कलुसमाव-कल्प+माव कलेवर-कलेवर कलोह-कला+ओघ (कलासमूह) कल्लाण-कल्याण कल्लाल-मद्यविक्रयिन् इत्यर्थे देशी कल्लोल-कल्लोल कवण-कोऽपि (कः पुनः) कवल-कवल (पास) कवलिय-कवलित कवाड-कपाट कवाल-कपाल (मृभाजनखण्ड:) कवि-कवि कविल-कुक्कुर इति टिप्पणम् कविल-कपिल कवोल-कपोल कवोलवत्त-कपोलपत्र कव्व-काव्य कव्वत्थ-काव्यार्थ कसण-कृष्ण (गणे) कसमसत्ति-कृश+गक्ति (दुर्बल इत्यर्थः) कसाय-पाय कह-कथय् (धातुः) कह-कथा कहकहंत-शब्दानुकरणे देशी कहा-कथा कहाणअ-कथानक कहिअ-कथित कहिय-कायत कह-कथम् कहतर-कथान्तर कंक-कङ्क (पक्षिविशेषः) कंकण-कण कंकाल-कवाल (शरीरास्थि) कंकल्लि-ककेलि (अशोकवृक्षः) कंख-काश् (धातुः) कंख-काक्षा कखिर-काक्षा-इर (शीलायः) कंचण-काश्चन कंचाइणि-कात्यायनी (चण्डमारिदेवता) कंची-काञ्ची कंचीकलाव-काश्चाकलाप कंचुइ-कञ्चुक (स्त्रीणामुत्तरीयम्) कंचुइ-कञ्चुकिन् (अन्तःपुरवृद्ध इति टिप्पणम्) कंचुलिय-कञ्चुकविशेष (मराठी-काचोळी) कंजिअ-कालिक - १११ जसहरचरित किलिकिलि कंटय-कण्टक कंटयतर-कण्टकतरु कंड-काण्ड (बाण इत्यर्थः) कंड-काण्ड (धनुर्दण्ड इत्यर्थः) कडू-कण्डू कंडोहिय-मयित इत्यर्थे देशी (मराठी-काड- कंत-कान्त (पतिः) कंता-कान्ता कतार-कान्तार कंति-कान्ति कंती-क्रान्ति कंद-क्रन्द् (धातुः) कंदअ-कन्द (क) कंदर-कन्दर कंदल-कन्द ल (स्वा) कंदुल्ल-कन्द+उल (मत्वर्थीयः) कंदोट्ट-नीलोत्पल इत्यर्थे देशी कंप-कम्प् (धातु) कंपंत-कम्पमान कंपति-कम्पमाना कंपिय-कम्पित कंवल-कम्बल कंस-कस (नामविशेषः) काउरिस-किम्- पुरुष (निन्द्य इत्यर्थः) काउल-काक काण-काण (अक्षिविकलः) काणण-कानन काणि-काणी (अक्षिविकला) काणीण-कानीन (कन्यकाजातः) काम-काम (मदन) कामग्गह-शाम+ग्रह कामजर-कामज्वर कामाउर-कामातुर कामालस-काम+अलस कामिणि-कामिनी कामिणिया-कामिनि(का) कामी-कामिन् कामुअ-कामुक काय-काय कायउल-काककुल कारण-कारण कारंड-कारण्ड (चक्रवाक) कारागार-कारा+अगार कारावय-कारय् (धातुः) कारिम-कृत्रिम कारुण्ण-कारुण्य काल-काल कालगोयर-कालगोचर (यमगोचर इत्यर्थः) कालाणल-कालानल कालावेक्खा-कालापेक्षा (कालावेक्खइ समये समये इत्यर्थः) कासवगोत्त-काश्यपगोत्र कासायपड-काषायपट काहल-काहल (वाद्यविशेषः) काहलियवंस-काहिलो गोपः तेन वाद्यमानः वशः इति टिप्पणम् किअ-कृत किज-कृधातोः कर्मणि किण्ह-कृष्ण कित्तण-कीर्तन कित्ति-कीर्ति कित्तिम-कृत्रिम किम-किम्+इम-किमिदम् । किमि-क्रिमि किमिउल-क्रिमिकुल किय-कृत किर-किल किरण-किरण किरणोह-किरणोध (किरणसमूह) किरिया-क्रिया किलिकिलि-किलि इति शब्दानुकरणम् ११२ - किलेस शब्दकोशः कुसुमावलि कुणंत-कुर्वत् कुतक-कुतर्क कुत्थिय-कुस्थित (दुष्ट) कुदेव-कुदेव कुपत्त-कुपात्र कुप्पर-उपर कुमग्ग-कुमार्ग कुमरी-कुमारी कुमार-कुमार कुमारिलभट्ट-कुमारिलभट्ट (नामविशेषः) कुम्म-कूर्म कुरंग-कुरड्न कुरंगी-कुरङ्गी किलेस-केश किवाण-कृपाण (खड्ग) किस-कृश किसलय-किसलय किह-कुत्र किकर-केंकर किंकिणि-किक्षिणी किंणर-किन्नर कीर-कीर (शुक) कीर-कृधातोः कर्मणि कील-क्रीड् (धातु) कील-क्रीडा कीलण-कीडन (फ्रीडा) कीलंत-क्रीडत् कीला-क्रीडा कीलाल-कीलाल (रक्त) कुकइत्तण-कुकवित्व कुकम्म-कुकर्मन् कुकलत्त-कुकलत्र कुक-कुफ इति शब्दानुकरणे (धातुः कुकुर- इति शब्दं कृ (धातु.) कुकुड-कुकुर कुकुडअ-कुकुट(क) कुकुडिया-कुछुटि(का) कुकुरी-कुकुरी (शुनी) कुगुरु-कुमुरु कुच्छि-कुक्षि कृजम्म-कुजन्मन् कुट्टण-कहन कुछ-कुष्ठ कुडिल-कुटिल कुडिलत्तण-कुटिलत्व कुडिहर-कुटीगृह कुडुंगण-लतागृहमित्यर्थे देशी कुटुंब-कुटुम्ब कुण-कृ (धातुः) कुरर-कुरर (पक्षिविशेषः) कुरुल-अलक (रचनाविगेपः) कुल-कुल कुलउत्ती-कुलपुत्री कुलउत्तिया-कुलपुत्रिका कुलगुरु-कुलगुरु कुलदेवय-कुलदेवता कुलदेवी-कुलदेवी कुलमग्ग-कुलमार्ग कुलमग्गचारि-कुलमार्गचारिन् कुलयर-कुलकर कुलिंग-कुलिङ्ग ( दुष्टतापसादिः) कुलीर-कुलीर (जन्तुविशेषः ) कुवलय-कुवलय कुवाइ-कुवादिन् (अन्यान्यदर्शनप्रवर्तक इत्यर्थः) कुविवेय-कुविवेक कुसल-कुशल कुसलत्त-कुशलत्व (कुशलवृत्त) कुसंग-कुसङ्ग कुसुम-कुसुम कुसुमसर-कुसुमशर (मदन) कुसुमावलि-कुसुमावलि (राजीनामविशेपः) कुसुमिय जसहरचरिउ खंगद्ध कुसुमिय-कुसुमित कुसुमोह-कुसुम+ओघ ( समूह) कुह-क्रुध् (धातुः कुहर-कुहर कुहिणी-मार्ग इत्यर्थे देशी कुहिय-क्रुद्ध कुहिय-क्षुभित ( व्याधिदूषित इत्यर्थः) कुंकुम-कुङ्कुम कुंकुमपिंड-कुङ्कुमपिण्ड कुंचण-कुश्चन ( आकुञ्चन ) कुंजर-कुञ्जर कुट-कुब्ज कुठ-कुण्ठ कुड-कुण्ड कुंडल-कुण्डल कुत-कुन्त (भल्ल) कुंतल-कुन्तल (केश) कुथु-कुन्थु ( सप्तदशतीर्थकरनाम ) कुंथु-कुन्थु (अतिसूक्ष्मशरीरः प्राणिविशेषः ) कुंथुपहुआंगि-कुन्थुप्रभृत्यशै(कुन्थुप्रभृतिप्राणेषु) कूआरव- इति रख कूडायर-कूट+आदर केवलणाण-केवलज्ञान केस-केश केसरि-केसरिन् (सिंह इत्यर्थः) केसव-केशव केसुब्भड-केश+उद्भट (भयकर इत्यर्थः) कोअंड-कोदण्ड (धनुः) कोहल-कौतूहल कोकंत-को इतिशब्द कुर्वत् कोडि-कोटि कोडि-कुक्कट (मराठी-कोंबडी) कोडु-कौतुक इत्यर्थे देशी कोडावण-कौतुककरण इत्यर्थे देशी कोड्डावणिय-कौतुककारक इत्यर्थे देशी कोटि-कोटि कोढिणि-कुष्ठवती (कुष्ठरोगदूषिता) कोमल-कोमला कोल-कोल (वराह) कोलाहल-कोलाहल कोव-कोप कोवग्गि-कोपामि कोवारुण-कोपारुण कोवीण-कौपीन कोसियकिमि-कोशित (कोशस्थित) + क्रिमि कोह-क्रोध कोडिल्ल-कौण्डिण्य (गोत्रविशेषः) खअ-क्षय खगविजा-खगविद्या (आकाशसंचारसामर्थ्य- मित्यर्थः) कूर-ओदनार्थे देशी कूल-कूल (तीर) कूव-कूप केउ-केतु (चिह्न बजो वा) केक्कार-फ्रेङ्कार (पक्षिणा शद्वविशेषः) केयइ-केतकी केयार-केदार केर-तस्येदमित्यर्थे षष्ठयन्तात्प्रत्ययः केरअ-तस्येदमित्यर्थे षष्ठयन्तात्प्रत्ययः केरी-तस्येदमित्यर्थे षष्ठयन्तात्प्रत्ययः केलिदण्ड-केलिदण्ड केवट्ट-कैवर्त केवल-केवल (ज्ञानविशेषः) खगिंद-खगेद्र (गरुड) खग्ग-खग खच्चेल-प्राणिविशेष [1] खज-खाद्धातोः कर्मणि खण-खन् (धातुः) खण-क्षण (कालविशेषः) खणद्ध-क्षणार्ध खणंतर शब्दकोशः खोल खणंतर-क्षणान्तर खंधार-स्कन्धावार खंघोह-स्कन्ध+ओष खंभ-स्तम्भ खण्णु-खननशील [१] खत्तधम्म-क्षत्रधर्म खत्तधर-क्षत्रधर (दोषेभ्यो निवर्तको राजा धर्म- धरो वा क्षतजातिरिति टिप्पणम् ) खद्ध-खादित खा-खाद् (धातुः) खाअ-खाद् (धातुः) खार-क्षार खाणी-खनि खित्त-क्षिप्त खीण-क्षीण खीर-क्षीर खुड्य-क्षुल्लक खुज-कुन्ज खुन्जय-कुन्ज(क) खुजिया-कुब्जिका (दासीत्यर्थः) खुजुल्लिय-कुन्जा+उल्ल+क (स्वार्थे ) खप्पर-कर्पर (कपालखण्ड) खम-क्षम् (धातुः) खम-क्षमा खमबह-क्षमावह, क्षमापथ खय-खग खय-क्षय खयकाल-क्षयकाल खयर-खचर खयरकुल-खचरकुल खयरूव-श्यरूप खयंकर-क्षयंकर स्वर-खर (तीक्ष्ण) खर-क्षर खरकिरण-खरकिरण (सूर्य) खल-खल खलहल-खलखल इति जलप्रवाहशब्दानुकरणे (धातुः) खलि-खले ( संबोधनेऽव्ययम्) खलिअ-स्खलित खवण-क्षपण खविअ-क्षपित खविय-क्षपित (पीडित इत्यर्थः) खंचण-खंचन (खचित) खंड-खण्ड् (धातः) खंड-खण्ड (पुष्पदन्तकवेनीमान्तरम् ) खंडिअ-खण्डित खंडिर-खण्डनशील खंत-क्षान्त खंति-क्षान्ति खंघ-स्कन्ध खुभ-क्षुब्ध खुर-खुर खुरुप्प-शस्त्रविशेष (मराठी-खुर) खुल्ल-क्षुल खुल्लय-क्षुल्लक (मुनिजातिविशेषः) खुट-स्तम्भ इत्यर्थे देशी ख़ुद-क्षुद् (धातुः) खेत्त-क्षेत्र खेत्तवाल-क्षेत्रपाल खेम-क्षेम (लब्धस्य रक्षणम् ) खेयरत्त-खेचरस्व (आकाशगमनसामर्थ्य- मित्यर्थः) खेयरियसत्ति-खेचरिक शक्ति खेरि-वैरिन् इत्यर्थः [१] खेला-खेला (पुरुषनामविशेषः) खेलिर-क्रीडनशील खेलोसहि-खेल (क्ष्वेड) ओषधि खोणियल-क्षोणीतल खोणी-क्षोणी (भूमिरित्यर्थः) खोल-गम्भीर इत्यर्थे देशी (मराठी-खोल) । ११५ - जसहरचरित गाह ग गलिअ-गलित गलियअ-गलित(क) गव्व-गई गअ-गत गइ-गति गइठाण-गतिस्थान गउरविय-गौरवित गग्गिरगिर-गद्गद+गिर गच्छ-गम् (गच्छ ) (धातुः) गच्छमाण-च्छत् गच्छंत-च्छत् गण-गणय् (धातुः) गण-गण (समूह) गत्त-गात्र गहभ-गर्दम गम्भ-गर्भ गव्भासअ-गर्भाशय गमण-गमन गमिअ-गमित, गत गय-गत गय-गज गयकाल-गतकाल गयण-गगन गयणयल-गगनतल गयणयलवडिअ-गनतलपतित गह-ग्रह (धातुः) गह-ग्रह ( ग्रहण, निरोध) गहचक्का-ग्रहचका (प्रासादभूमिनामविशेषः) गहवइ-गृहपति गहण-गहन गहण-ग्रहण गहणुल्लअ-ग्रहण+उल्लअ ( स्वायें ) गहिअ-गृहीत गहिर-गभीर गहीर-गभीर गंजोल्लिय-क्षुब्ध इत्यर्थे देशी (मराठी-गाजलेले) गंड-गण्ड ( कपोलदेशः) गंडय-गण्ड (जलमहिप, मराठी-गेंडा) गंथ-ग्रन्थ गंध-गन्ध गंधजुत्त-गन्धयुक्त गंधवंत-गन्धवत् गंधव्व-गन्धर्व ( कविनाम) गंधव्वलच्छी-गन्धर्वलक्ष्मी गंधव्वसेन-गन्धर्वसेन ( नामविशेषः) गंधविसय-गन्धविषय (त्वगिन्द्रिय) (गन्धो विषयो यस्येन्द्रियस्येति टिप्पणम् ) गंधहरिण-गन्धहरिण (कस्तूरिकामृग) गंभीर-गम्भीर गाइन्नत-गीयमान गाढ-गाढ गाम-ग्राम गामंतर-ग्रामान्तर गाय-गै (धातुः) गायणगायन गयणंगण-गगनाङ्गण गयदप्प-गतदर्प गयमंदगमण-गजमन्दगमन गयवराजवर गरल-नगरल गरलुल्ल-गरल+उल्ल (स्वार्थे ) गरह-गई (धातुः ) गरुय-गुरु (क) गरुयपवास-गुरुप्रवास ( दीर्घप्रवास ) गरहण-गर्हण गारव-गौरव गलकंदल-गलकन्दल गलच्छिय-पीडित इत्यर्थे देशी; (कदर्थित !) गलय-पाल(क) (कण्ठ) गास-पास गाह-गाह् (धातुः ) गहि शब्दकोशः घग्घरोली गुरुकमारूढ-गुरुकमारूढ (गुरुपरंपराप्राप्त इत्यर्थः) गुरुक्क गुरु(क), (महदित्यर्थे ) गुरुयण-गुरुजन गुलगुलानशब्दानुकरणे (धातुः ) गुह-गुहा गुछ-गुच्छ गुजा-गुजा (फल) गुफ-गुल्फ गाह-वाह गाह-वाह (स्नेहाथै ) गाहंत-गाहमान गिण्ह-अह् (धातुः) गिज-ौघातोः कर्मणि गिल-गेय गिन्झ-बाह्य गिरा-गिर् गिरि-गिरि गिल-गिल् (धातुः) गिलण-गिलन (प्रसन) गिलंत-गिलन गिल्लगंड-गिल (शिवकार्थे देशी)+ गण्ड (शिविकावाहक इत्यर्थः) गिंभ-ग्रीष्म गिंमारि-प्रीम + अरि (वर्तुरित्यर्थः) गीअ-गीत गीय-गीत गीयसद-गीतशब्द गुल्म-गृह गुण-गुण गुणग्गल-गुणार्गला तुणठाण-गुणस्थान गुणमेलअ-गुणमेलन (गुणसमूह) गुणमोयण-गुणमोचन गुणवंत-गुणवत् गुणसायर-गुणसागर गुणसिंधु-गुणसिन्धु गुणसेढि-गुणश्रोणि (अण० मिच्छ मीस इत्या- दीनि आपकोण्युक्तानि गुणस्थानानीत्यर्थः) गुणहणणि-गुणहननी (गुणघातिकेत्यर्थः) गुणिय-गुणित (अभ्यस्त) गुत्तिय-सक्त इत्यर्थे देशी (मराठी-गुंतलेली) गुप्प-गुप् (धातुः) गुरु-गुरु गेय-गेय (गीत) गेह-गेह गो-गो गोउर-गोपुर गोउल-गोकुल गोत्त-गोत्र गोदाण-गोदान गोदुह-गोदोह गोमिणि-गोमिनी गोवइय-गोपति (क) गोवडण-गोवर्धन (श्रेष्ठिनाम) गोवाल-गोपाल गोवि-गोपी गोविहिणिविट्ठ-गोविष्टिनिविष्ट (गोष्ठीनि- विष्ट) गोसिंग-गोराङ्ग गोसुय-गोसुत गोखंड-गो+शुण्डा गोह-पुरुष इत्यर्थे देशी गोह-गोघा (प्राणिविशेषः) गोहय-गोधा गोहण-गोधन घग्घरा-किङ्किणीशब्दार्थ देशी(मराठी-धागन्या) घग्घरोली-घग्घर+ओली (किङ्किणीपतिः) जस....१५ • ११७ - जसहरचरित चचिव घट्टण । घूय-धूक घोड-घोट (अश्व इत्यर्थः । मराठी-घोडा) घोणस-गौनस (सरीरूपविशेषः) घोर-घोर घोलत-घोलत् (भ्रमन्नित्यर्थः) घोलिर-घोलनशील (लुण्टनशील इत्यर्थः) घोस-गुच्छार्थे देशी (मराठी-घोस) घोस-घोष (शब्द) चउ-चतुर चउकसाय-चतुष्कषाय चउगइ-चतुर्गति चउत्थी-चतुर्थी चउदस-चतुर्दशन् चउदार-चतुर घट्टण-पट्टन (ससर्ग) घट्ट-घृष्ट घट-घटय् (धातुः) घड-घट घडिअ-घटित घण-धन (निविड) घण-धन-(मेष) धम्मवारि-धर्मवारि (स्वेदजलमित्यर्थः) घय-घृत घर-गृह घरत्य-गृहत्प घरदार-गृह+दार (कलत्र) घरदासि-गृहदासी घरभार-गृहमार घरलंजिया-गृहदासीत्यय देशी घरवइ-गृहपति घरिणी-गृहिणी घल्ल-प्रक्षिप् इत्यर्थे देशी (धातुः ) घल्लिअ-क्षिप्त इत्यर्थे देशी घवघव-न्धप्रसरणे देशी (धातुः घंघल-कलहाथै देशी घाअ-घात घाइअ-धातित घाण-घ्राण घारजातीयः पतिविशेषः चित्त-क्षिप्त, गृहीत इत्यर्थे देशी घितअ-क्षिप्त (क) घिप्प-ग्रहयात्वर्थे देशी घिव-क्षिप् इत्यर्थे देशी (धातु:) घुग्घुस-धू धू इति शब्दकरणशील घुट-घुट् इति पानशब्दानुकरणे (धातुः) घुट-घुष्ट घुम्म-धूनने देशी (धातुः) (मराठी घुमणे) घुरुदुरंत-घुरघुरुशब्दं कुर्वत् घुलिय-धुलित (चञ्चल इत्यर्थः) घुसिण-घुराण चउप्पअ-चतुष्पद चउप्पय-चतुष्पद चउपास-चतुष्पाश चउभेय-चतुर्भेद चउरय-चक्रप (चक्रवाक !) चउरासी-चतुरशीति चरि-लग्नमण्डप इत्यर्थे देशी (गुजरायी- चोरी) चउविह-चतुर्विध चउसण्णा-चतु संज्ञा चक्क-चक्र चक्कणाह-चक्रनाथ चकवट्टि-चक्रवर्तिन चक्ख-आस्वादने देशी (धातुः) चक्खु-चक्षु चक्खुगम्म-चक्षुर्गम्य चचकिय-चर्चित चच्चर-चत्वर (चतुष्पथ) चच्चिअ-चर्चित चचिकिय-चर्चित (लिप्त इत्यर्थः) चश्चिय-चर्चित चत्तारि-चतुर चंचु-चञ्चू चंड-चण्ड चट्टण शब्दकोशः चामुंडचंड चट्टण-नाशक (मक्षक) इत्यर्थे देशी चलवल-धूनने (धातुः) चट्टय-उत्पूत इत्यर्थे देशी (१) चलिअ-चलित चट्ठय-यष्टी इत्यर्थे देशी चलिय-चलित चट्ठयफल-यष्टयप्रनिहितलोहमयाङ्कुश इत्यर्थः चलियअ-चलित (क) चड-आ+रुड् इत्यर्थे देशी (धातुः) चल्ल-चल् (धातुः) चडाविय-आरोहित इत्यर्थे देशी चल्लिय-चलित चडिर-आरोहणशील चव-वच्चात्वर्थे देशी चवल-चपल चत्त-त्यक्त चत्तअ-त्यक्त (क चविअ-उक्त, जल्पित चंग-सुन्दरार्थे देशी चंचल-चञ्चल चप्प-पीडने देशी (धातुः) चप्पड-तैलाभ्यङ्गे देशी (धातुः) चप्परि-सत्वरम् चंचूजीविअ-चञ्चूजीविक (पक्षीत्यर्थः) चमक-चमत्कार चंडमारी-चण्डमारी (कात्यायनी) चमर-चमर (पुच्छ) चंडयम्म-चण्डकर्मन् (राजपुरुषनामविशेषः) चमर-चामर चंडाल-चाण्डाल चमराणल-चामरानिल चंडियसमाण-चण्डीसमान (देवीतुल्य) चम्म-चर्मन् चंद-चन्द्र चम्मचक्खु-चर्मचक्षुष् चंदण-चन्दन चम्मट्टिसेस-चर्मास्थिशेष चंदप्पह-चन्द्रप्रभ (अष्टमतीर्थकरनाम) चय-त्यज् (धातुः) चंदमइ-चन्द्रवती, अथवा, चन्द्रमति चयारि-चत्वारि (यशोधरजननीनाम) चर-चर् (धातुः) चंदमुही-चन्द्रमुखी चरण-चरण (पद) चंदसिरि-चन्द्रश्री चरण-चरण (व्रताउनुष्ठानम्) चंदायण-चान्द्रायण (तपोविशेषः) चरणजुयल-चरणयुगल चंदावहत्त-चन्द्राभवक्त्र (पूर्णिमाचन्द्रसदृश- वदनयुक्तः । अथवा, चन्द्रः अधोवृत्तो यस्य; चरित्त-चरित, चारित्र अष्टमतीर्थकरस्य चन्द्रचिह्नत्वात् ) चरिय-चारित्र, चरित चंदुजल-चन्द्रोज्ज्वल चंप-पीडने देशी (धातुः) चरुअ-चर(क) (नैवेद्य इत्यर्थः) चल-चल् (धातुः) चाअ-त्याग (औदार्य) चामर-चामर चलचामर-चलचामर चामीयर-चामीकर चलण-चरण (पद) चामुंडचंड-चामुण्डचण्ड (भयंकर इत्यर्थः) चरंत-चरत चंपय-चम्पक • ११९ जसहरचरित छज्जीवणिकाय चाय चाय-त्याग चायय-चातक (पक्षिविशेषः) चारण-चारण चारित्त-चारित्र चारु-चार चालुय-चालन्या शोधित इत्यर्थे देशी (मराठी- चाळलेले) चालण-चालन चास-चाष (पक्षिविशेषः) चि-चित् (अवधारणे एवार्थेऽव्ययम् ) चिक्कम-चंक्रम् (धातुः) चिक्खिल्ल-कर्दमार्थे देशी चिचि-अग्निशब्दार्थे देशी चिण्ण-चीर्ण चित्त-चित्र (आश्चर्येऽव्ययम्) चित्त-चित्त चित्तय-व्याघ्रजातिविशेषः (मराठी-चित्ता) चित्तल-चित्रल (चित्रित इत्यर्थः) चित्तसेण-चित्रसेन चित्तंगअ-चित्रंगत चित्तुवलक्ख-चित्त+उपलक्ष चिया-चिता चिर-चिरम् चिरजीविन्-चिरजीविन् चिरजीविअ-चिरजीवित चिरणर-चिरनर (पुराणपुरुष इत्यर्थः) चिराउस-चिरायुष् चिराण-चिरतन चिरु-चिरम् चिलाय-किरात चिलिसावण-जुगुप्साकर इत्यर्थे देशी ( मराठी-चिळसवाणे) चिहुर-चिकुर (केश) चिहुरभार-चिकुरमार चिंचइय-चर्चित (भूषित इत्यर्थः) चिंत-चिन्तय् (धातुः). चिंध-चिह्न (केतुः ध्वजादिकं वा) चिंध-वस्त्रखण्डमित्यर्थे देशी (मराठी-चिंधी) चीर-चीर (वस्त्र) चीरखंड-चीरखण्ड चीरिया-चीरिका (मराठी-चिरडी) चीवर-चीवर चुअ-च्युत चुक्क-भ्रश् इत्यर्थे देशी (धातुः) चुण-भक्षणे देशी (धातुः ) (पक्षिणा भक्षणे एव युज्यते) चुमुचुम-कीरशद्वानुकरणे (धातुः) चुंव-चुम्ब् (धातुः) चुंबण-चुम्बन चुंबत-चुम्बत् चुंबिअ-चुम्बित चूडामणि-चूडामणि चूडारयण-चूडारन चूय-चूत चूरिय-चूर्ण चूलि-कुक्कटी चे-म इत्यर्थे देशी (धातुः) (चेइवि-मृत्वा) चेईहर-चैत्यगृह चेयण-चेतन चेयणाल-चेतना+आल (मत्वर्थीयः) चेल-चेल (वस्त्र) चेलिय-चेटी चेली-चीरी ( वस्त्र) चोज-कौतूहलायें देशी चोप्पड-म्रक्षणे देशी (धातुः) चोर-चोर चोरउल-चोरकुल छ-षट् छड्य-छादित, शोभित छज्ज-शोभाया देशी (धातुः) छन्नीवणिकाय-षड्जीवनिकाय (पृथिव्याते- छट्ट शब्दकोशः जङ जोवायुत्रसवनस्पतिकायाः) छडय-उपलेप इत्यर्थे देशी (गोमयादिभिः प्राङ्गणादिकस्योपलेपः । मराठी-सडा) छडया-छटा छड्-त्यज्धात्वर्थे देगी छण-क्षण छणयंद-क्षण चन्द्र (पूर्णिमाचन्द्र इत्यर्थः) छण्ण-छन (आच्छादित) छिव-स्पृश्धात्वर्थे देशी छिंद-छिद् (धातुः) छिंदण-छेदन छुड-क्षिप्रमित्यर्थेऽव्ययम् (देशी) छुरिय-चुरित छह-क्षुध् छह-सुधा (चूर्ण) हा-सुधा (चूर्ण) छुहावस-क्षुद्वश - छुढ-क्षित छत्तछाय-छत+छाया छहंसण-पड्दर्शन (साख्ययोगन्यायवैशेषिक- पूर्वोत्तरमीमासारूपाणि) छप्पय-षट्पद ( मधुकरो धूर्तश्चेति टिप्पणम् ) छम्म-छम छल-छल (मिष) छंगुलिमिअ-पडडुलिमित छंड-त्यधात्वर्थे देशी छंद-छन्द (अभिप्रायविशेषः) छंद-छन्दः (शास्त्र) छेअ-छेद छेत्त-क्षेत्र छेयण-छेदन छेल-छाग (अज) छेवि-छित्त्वा छोकरण-छूत्कार (उड्डापनगद इति टिप्पणम्) छोहिय-शोभित छाइअ-छादित छाइय-छादित छाय-छादय् (धातुः) छार-क्षार (भस्मेत्यर्थः) छाली-छागी (अजा) छाव-शाव (वत्स) छाहा-छाया छाही-छाया छिन्ज-छिद्धातोः कर्मणि छिन्जंतर-छेद्यान्तर (कलाखन्यतमा) छिण्ण-छिन छिण्णंगुलि-छिन्नादगुलि छित्त-क्षेत्र छित्त-स्पृष्ट (छिब्धातोनिष्टान्तम् !) छिद्द-छिद्र छिप-स्पृश्धात्वर्थे देशी जइ-यदि जइ-यति जइयहु-यदा जइवह-यतिपति जइवर-यतिवर जक्ख-यक्ष जक्खिद-यक्षेन्द्र जक्ली-यक्षी (यक्षिणी) जग जगत् जगजीव-जगजीव जगपरमेसर-जगत्परमेश्वर जगमंडव-जगन्मण्डप जगुत्तम-जगदुत्तम जगरवि-जगदवि जञ्चंध-जात्यन्ध जन्जर-जर्जर जजरिय-जर्जरित जड-जटा जसहरचरित जाअ जलयर-जलचर जलवइ-जलपति (मकर इत्यर्थः) जलहर-जलघर जलहि-जलधि जालय-ज्वलित जलोह-जल+ओघ (जलसमूह) जल्ल-मल इत्यर्थे देशी जल्लोसहि-जल्ल (एव) ओपधि जव-जप् (धातुः) जवालअ-जव+आलम ( मत्वर्थीयः) जस-यशस् जसपूरियास-यशःपूरिताश ( दिगन्तव्यापि- यशाः इत्यर्थः) जसबंधुर-यशोबन्धुर (राजो नामविशेषः) जसमइ-यशोमति (यशोधरपुत्रस्य नाम ) जसवइ-यशोमति (यशोधरपुत्रस्य नामान्तरम् ) जससेस-यशःशेष (सकलमपि भुवनस्थं यश इत्यर्थः) जड-जड जडत्तण-जडत्व जडा-जटा जडिय-जडित (युक्त इत्यर्थः) जढराणल-जठर+अनल जण-जन जणण-जनन जणणी-जननी जणगुल्ल-जनन उल्ल ( स्वायें) जणात्तिहर-जनार्तिहर जणवअ-जनपद जणवय-जनपद जणु-स्वार्थेऽव्ययम् जण्ण-यज्ञ जत्त-यात्रा जत्ता-यात्रा जत्थ-यत्र जम-यम (नियम) जम-यम (मृत्युदेव) जमदूअ-यमदूत जमसासण-यमशासन जम्म-जन्मन् जय-जगत् जय-जयकारशद जय-जि (धातुः ) जयकारिअ-जयकारित जयलच्छि-जयलक्ष्मी जयसिरी-जयश्री जर-जरा जरदासी-जरा (एव) दासी जरमरण-जरामरण जरसरि-जरा (एव) सरित् जल-जल जल-ज्वल् (धातुः) जलण-ज्वलन जलणिहि-जलनिधि जसहर-यशोधर जसहरक्ख-यशोधराख्य जसोह-यशोई, यशोघ, यगओघ इति वा ( यशोधरपितुर्नाम) जह-यथा जहि-यत्र जंगल-जागल (मास) जंगलय-जागल (क) जंघा-जड्या जंघाबल-जवाबल जंत-यात् जंप-जल्स् (धातुः) जंपति-जल्पन्ती जंपाण-यानविशेषे देशी जंबुदीव-जम्बूद्वीप जंबूणय-जाम्बूनद ( सुवर्ण) जा-या (धातुः) जाअ-जात १२२ जाई शद्धकोशः मुंबई जाइ-जाति जाण-ज्ञा (धातुः) जाण-यान जाणवत्त-यानपान जाणिय-शात ( प्रसिद्ध इत्यर्थः) जाणु-जानु जाणुय-जानु(क) जाम-यावत् जायअन्याचक जार-जार ( उपपति) जारासत्त-जारासत जाल-जाल जाल-जाल (समूहाथै समासान्ते एव) जाल-ज्वालय् (धातुः) जाल-ज्वाला जालगवक्व-जालगवाक्ष जालंधर-जालंधर ( धीवर इत्यर्थः ) जाव-यावत् जि-चित् ( अवधारणे एवार्थेऽव्ययम्) जिअ-जीव जिज-याधातोः कर्मणि (यायते, याप्यते जिमिय-जेमित (भुक्त) जिम्म-मुन्धात्वर्थे देशी जिय-जित जिय-जीव् (धातुः) जियसत्तु-जितशत्रु जियारि-जितारि जिह-यत्र जीअ-जीव जीर-जीरक (मराठी-जिरें) जीरवण-जीरण (पाचन इत्यर्थे ) जीव-जीव जीवउल-जीवकुल जीवकए-जीवकृते जीवदया-जीवदया जीवंत-जीवत् जीवमित्ती-जीवमैत्री जीवरासि-जीवराशि जीवसहाअ-जीवस्वभाव जीवहिंस-जीवहिंसा जीवावहारी-जीवापहारिन् जीवाहार-जीवाहार जीविअ-जीवित जीह-जिह्वा जीहादल-जिह्वादल जुअ-युत जुइन्जुत्तिय-द्युतियुक्त जुज-युज्धातोः कर्मणि जुझिर-योधनशील जुत्त-युक्त जुत्ति-युक्ति जुण्ण-जीर्ण जुय-युग जुयल-युगल जुयल्ल-युगल+उल्ल (स्वार्थे) जुव-युग जुवई-युवति इत्यर्थे ) जिण-जिन जिणदिक्खा-जिनदीक्षा जिणधम्म-जिनधर्म जिणमग्ग-जिनमार्ग जिणमंदिर-जिनमन्दिर जिणयत्व-जिनदत्त जिणवयण-जिनवचन जिणवर-जिनवर जिणसुत्त-जिनसूक्त, जिनसून (जिनभाषित- मित्यर्थः) जिणियसत्तु-जितशत्रु जिणुत्त-जिनोक्त जिप्प-जिधातोः कर्मणि जिमिअ-जेमित (भुक्त) १२३ ।
जुवैरायपट्ट जसहरचरित डसण जुवरायपट्ट-युवराजपट्ट जुवाण-युवन् जुहिडिल-युधिष्ठिर जूरिअ-खेदित इत्यर्थे देशी जूह-यूथ जूहाहिअ-यूथाधिप जूाहिद-यूयेन्द्र जूहेस-यूथेश जेत्तहि-यत्र, यावति जेत्थ-यत्र जेत्यु-यत्र झल-उष्मा इत्यर्थे देशी (मराठी-झळ) झल्लिर-धारायुक्त इत्यर्थे देशी झस-शष ( मत्स्य) झस-झष (आयुधविशेष) झळक-कथ्धात्वर्थे देशी झंकार-शङ्कार झंख-आच्छादने देशी (धातुः) झंप-आच्छादने देशी (धातुः) झंपडिय-मुक्तविरल इत्यर्थे देशी (मुक्तविरल इति टिप्पणम्) झा-ध्यै (धातुः) झाइय-ध्यात झाण-ध्यान झाणारूढ-ध्यानारूढ झाय-व्यै (धातुः) झिलिरि-झिल्लिरी (प्राणिविशेष) झीण-क्षीण झुण-ध्वन् (धातु) झुणि-ध्वनि झुलंत-वेपमान इत्यर्थे देशी (मराठी-झुलणे) झूर-खेदे देशी (धातुः ) ( मराठी-झुरणे) जेम-यथा जेवणवेल-जेमन ( भोजन )+वेला जोअ-योग (अलब्धस्य लाभ इत्यर्थः) जोइ-योगिन् जोइणि-योगिनी जोइणिपुज-योगिनीपूजा जोइणिपुर-योगिनीपुर (नगरनाम) जोइस-ज्यौतिष (शास्त्र) जोईस-योगीश जोईसर-योगीश्वर जोगवट्ट-योगपट्ट जोग्ग-योग्य जोणी-योनि (प्रभव) जोण्ड-ज्योत्स्ना जोहा-ज्योत्स्ना जोय-अवलोकने देशी (धातुः) जोव्वण-यौवन जोह-योध जोहेयअ-यौधेय(क) (जनपदनामविशेषः ) टिविल-वाद्यविशेष टोप्पी-शिरआच्छादने देशी ( मराठी-टोपी) ठकुर-ठकुर ( वंशनाम) ठव-स्थापय् (धातुः) ठा-स्या (धातुः) ठाण-स्थान ठिअ-स्थित ठिय-स्थित झडत्ति-झटिति झडप्पण-आक्रमणार्ये देशी (मराठी-झडप) झड-विद्रावणे देशी (धातुः) झत्ति-झटिति झरंत-क्षरत डज्झ-दह् (धातुः) डर-भये देशी (धातुः) डस्-दश् (धातुः) डसण-दशन - १२४ शब्दकोशः परत्य भाट ! इति टिप्पणम्) १-२७-१, । णग्गोह-न्यग्रोध णच्च-नृत् (धातुः) णचण-नर्तन णचंत-नृत्यत् डह-दह (धातुः) डह-दहर ( बाल इत्यर्थः) ढंभ-दम्म डंभधारि-दम्भधारिन् डंस-दा( धातुः) डाइणि-आकिनी (प्रेतपिशाचादिनीविशेष.) डिडिम-दिण्डिग (वाद्यविशेष.) डिभ-हिम्भ (शिशु, बालक) डिभय-लिम्भ (क) इट-धूनने देगी (धातुः) डोर-सूत्र इत्यर्थे देशी (मराठी-दोर) डोट-धूनने देगी डोन-चाण्डालजातिविशेष णचावय-नर्तय् (धातुः) णच्चिय-नर्तित णज-शा (धातुः) पट्ट-नाट्य ण?-नह पट-नट णडिअ-वञ्चित इत्यय देशी णण्ण-नन्न (नन्द !) (भरतमहामन्त्रिणः पुत्रः) ढका-दपा ( वाद्यविशेष) ढहर-राक्षसप्रेतपियाचादय इति टिप्पणम् ढुंय-शुक इत्यर्थे देशी (पत्रपुष्पपलादि- रहित इत्य) डिड्डिस-पिष्ट (धान्यादीना पिष्टमिति टिप्पणम्) ढुफ-दीफित (प्रसृत इत्यर्थे देशी) ढकार-पभगद्वानुकारमहः ( मराठी-ढेकर ) ढोअ-ढोकय (धानः) ढोठ्य-दौकित ण-न (निषेधेऽव्ययम् ) अ-नय णण्ण-न+अन्य णत्ति-नानी गस्थि-न+अस्ति णमि-नमि (एकविंशतीर्थकरनाम) णमिय-नमित णय-नत णय-नय (नीतिशास्त्र) णय-नय (राजपुत्रनामविशेषः) णयण-नयन णयणजण-नयनाजन णयणंसु-नयन + अक्षु णयणि?-नयन + इष्ट णयणल्ल-नयन + उल्ल (स्वार्थे) णयर-नगर णयरी-नगरी णयरोह-नय + रोध (दुर्नय इत्यर्थः) णयाणय-नय+अनय णरन्नर णरअन्नरक णरजम्म-नरजन्मन् णरणाह-नरनाथ णरत्थ-नर+अर्थ णह-नदी णइतीर-नदीतीर णहवाह-नदीप्रवाह णउल-नकुल णमा नासागद्वार्थे देशी (मराठी-नाक) क्स-नस णग्ग-नम णगी-नम णग्गुडि-चारणादिवन्दिवर्ग इत्यर्थे देशी (भट्ट- , जस....१६ -१२५ णरय जैसहरचरित णिकलण णरय-नरक गरयविल-नरकविल (छिद्र) णरवह-नरपति णरवर-नरवर परवरिद-नरवरेन्द्र णरिंद-नरेन्द्र णल-नल गरंग-नराज णव-नम् (धातुः) णव-नव णवकमल-नव+कमल णवखंड-नव + खण्ड णवपल्लव-नवपल्लव णवयारिवि-नमस्कृत्य, १-२७-१०. णवल्ल-नव + ल्ल (स्वार्थे ) णवविह-नवविध णविअ-नत णविय-नत णह-नख णहत्नमस् णयर-नमश्चर णहंत-नभस् + अन्त णहयल-नमस्तल णहर-नखर (नख) णहसिरि-नभाश्री गहुस-नहुष णहोयरंत-नमस् + अवतरत् णं-ननु गंद-नन्द् (धातुः) गंद-नन्द (आनन्द) णाअ-न्याय णाइ-ननु इत्यर्थे (उत्प्रेक्षायाम् अव्ययम् ) णाइणि-नागिनी णाइंद-नागेन्द्र णागदत्त-नागदत्त (नामविशेषः) णागय-न+आगत णाडिवह-नाडीपथ णाण-ज्ञान णाणमअ-ज्ञानमय णाणा-नाना णाणागुण-नानागुण णाणाविह-नानाविध णाम-नासन् णारय-नारक (नरकोव इत्यर्थः) णारिसंग-नारीसंग णारी-नारी णारीरूव-नारीरूप णावइ-उपमार्थे उत्प्रेक्षार्थे वाव्ययम् णावइ-न+आगच्छति णाव-न+आप् (धातुः) णास-नश् (धातुः) णास-नाश णास-नाशय् (धातुः) णासा-नासा णासउडि-नासापुटी णाह-नाथ णाल-अरण्यचाण्डाल इत्यर्थे देशी णाहि-नाभि णिउत्त-नियुक्त णिउणयर-निपुणतर णिजिय-नियुक्त णिए-अवलोकने देशी (धातुः) णिकाय-निकाय (समूह) णिकेय-निकेत (गृह) णिकल-निष्कल (निशरीर इति टिप्पणम्) णिक्कलुण-निष्करण गंदण-नन्दन गंदणवण-नन्दनवन णदंत-नन्दत् णदिणि नन्दिनी (धेनुः) गंदिय-नन्दिन णा-शा (धातुः) णिकाम शब्दकोशः जिम्मलय णिकाम-निष्काम णिह-निर्दड् (धातुः) णिफिअ-निष्कृप णिणह-निनाद णिबिह-निकृष्ट (नीच) णिणाअ-निनाद णिफिटुअ-निकृष्ट(क) णिणाइय-निनादित णिक्खिय-निसात णिण्णाण-निर्शन ( अज्ञान) णिक्खिय-निक्षिप्त णिण्णाम-निर्नाम (अज्ञातनामा) णिग्गम-निर्गम णिण्णासण-निर्नाशन णिग्गमण-निर्गमन णिण्णेह-निःलेह णिग्गयमइ-निर्गतमति णित्त-गीत, (प्राप्त ) (नीघातोनिष्ठान्तम् ) णिग्गह-निग्रह णित्तेय-निस्तेजस् णिग्गह-नि + अद् (धातुः ) णित्थाम-निःस्थामन् णिग्गंत-निर्गच्छत् णिह-निद्रा णिग्गंधवित्ति-निर्गन्यवृत्ति णिय-निर्दय णिग्गुण-निर्गुण णिद्दलिय-निर्दलित णिग्विण-निर्पण णिहिट-निर्दिष्ट णिध-नित्य णिद्ध-स्निग्ध णि-नित्यम् (अव्ययम् ) णिद्धण-निर्धन निशट-निश्चल णिद्धम्म-निर्धर्म णिशलमइ-निश्चलमति णिद्वाड-प्रेरणे देशी (धातुः) णिचिट्ट-निश्चेष्ट णिद्धाम-निर्धामन् णिञ्चयण-निश्चेतन णिप्पहरण-निष्प्रहरण णिशोरमारि-निस्+चोर+मारी (जनपदोद्ध्वं. णिप्पाण-निष्प्राण सनो रोगादिः) णिप्पेय-निष्पेय णिच्छअ-निश्चय णिप्फल-निष्फल णिच्छवि-निभ्छवि (निस्तेजस्) णिवद्ध-निबद्ध णिज-नीघातोः कर्मणि णिबद्धी-निबद्धा (विरचितेत्यर्थः) णिनण-निर्जन णिबंध-निबन्ध (निबन्धन) णिन्नर-निर्जर णिबंधु-निवन्धु णिजिय-निर्जित णिबुड-निस्+मस्यात्वर्थे देशी णिजियमइय-निर्जितमति(क) णिभच्छिय-निर्भसित णिलीव-निर्जीव णिभिण्ण-निर्मिन्न णिज्झर-निर्धार णिन्भोइल्ल-निर+भोग+इल्ल (मत्वीयः) णिहा-निष्टा णिमीलण-निमीलन णिहावस-निष्ठावश णिमेस-निमेष णिट्टिय-निष्ठित (समाप्त, मृत) णिम्मल-निर्मल णिहर-निष्ठर णिम्मलय-निर्मल (क) १२७ 'शिम्मंस जसहरचरित णिसिद्ध णिलअ-निलय (गृह) णिलाड-ललाट णिलीण-निलीन णिल्लुणण-निर्लवन (छेद इत्यर्थः) णिल्लुत्त-निर्लप्त णिम्मंस-निर्मास णिम्महण-निमथन णिम्मा-निर मा (धातुः) णिम्मुक्क-निर्मुक्त जिम्मुक्ताण-निर्मुक्तत्राण णिम्मोह-निर्मोह णिय-अवलोकने देशी (धातुः) णिय-निज 'णिय-नीत णियघर-निजगृह णियच्छ-दृश्धात्वर्थे देशी णियच्छिय-निरीक्षित णियडअ-निकट(क) णियड्डिय-निकर्षित णियम-नियम णियमण-निजमनस् णियय-निज(क) णिययसिरि-निजक+श्री णियर-निकर णियाण-निदान जिरअ-निरत जिरलंकार-निरलकार गिरवसेस-निरवशेष णिरस-नीरस णिरसिय-निरसित (परित्यक्त) णिरत्य-निरर्थ (व्यर्थ ) णिरत्य-निरस्त णिरंजण-निरञ्जन णिरंतर-निरन्तर णिरस-निरश (अखण्ड इत्यर्थः) णिरिक्खिअ-निरीक्षित णिरु-नितराम् णिरुत्त-निरुक्त णिरुवम-निरुपम णिरूविय-निरूपित णिरोहिअ-निरुद्ध णिव-नृप णिवइ-नृपति णिवड-नि-पत् (धातुः) णिवडिय-निपतित णिवस-नि+वस् (धातुः) णिवसण-निवसन णिवसुया-नृपसुता णिवह-निवह णिवारण-निवारण णिवारणिअ-निवारणीय णिवास-निवास णिविठ्ठ-निविष्ट णिविड-निविड णिविडत्थवंत-निविड+अर्थवत् णिवित्ति-निवृत्ति णिव्वट्टिअ-निवर्तित णिव्वण-निर्वन णिव्वाइअ-प्रसारित इति टिप्पणम् णिव्वाण-निर्वाण णिब्वियड-निर्विकट णिव्वियप्प-निर्विकल्प णिव्वूढ-निव्यूढ णिव्वेअ-निर्वेद णिस-निशा णिसण्ण-निषण्ण णिसंग-निःसंग णिसा-निशा णिसायर-निशाचर णिसायरि-निशाचरी णिसिचार-निशिचार (निशि वृत्तमित्यर्थे ) णिसिद्ध-निषिद्ध - १२८ णिसि शब्दकोशः तणु णेत्त-नेत्र जमि-नेमि (द्वाविंशतीर्थकरनाम) जमि-नेमि (रथचक्रधारेति टिप्पणम् ) णेयार-नेतृ णेवाविअ-नायित (नीधातोर्णिजन्तानिष्ठा- न्तम् ) णेह-स्नेह एहविअ-नापित पहा-ला (धातुः) पहाअ-सात पहाण-स्नान तइ-तदा तइ-त्रयी णिसिभोयण-निशाभोजन णिसियग्ग-निशितान णिसियर-निशिचर (भूतप्रेतपिशाचादि) णिसुण-नि+शु (धातुः) णिसुभ-नि+म्भ (धातुः) णिसुभ-निश्रय (निस्तब्ध उत्यर्थः) णिस्संक-निश णिहअ-निभ(क) (सदृशार्थ ) णिहण-निधन णिहय-निहत णिहाण-निधान णिहाल-नि+भालय् दर्गने (धातुः ) णिहालण-निमालन (प्रेक्षण) णिहालिय-निभालित (दृष्ट) णिहि-निधि णिहित्त-निहित णिहिप्प-नि+धा (धातुः) णिहुय-निभृत (गान्त इत्यर्थः) णिहेलण-निहेलन (गृहमित्यर्थे ) जिंद-निन्द् (धातुः ) जिंद-निन्दा जिंदण-निन्दन णिंदमग्ग-निन्य+मार्ग णी-नी (धातुः) णीअ-जीन णीगिय-निति णीयरय-नीच+ग्न णीर-नीर णीरम-नीरस गांगेयत्तण-नीरोगत्व णील-नील णीलय-नीलक णीसण-निस्सन णीसरिअ-निःसृत णीसेस-निःशेष उर-नूपुर तइय-तदा तइय-तृतीय तइयाच्छि-तृतीय+अक्षि तझ्यहु-तदा तउ-तपस् तकर-तस्कर तक्खण-तत्क्षण तजिय-तर्जित तट्ट-त्रस्त तहअ-धृष्टशद्वार्थे देशी (मराठी-ताठ) तड-तट तड-तड् (आरुह इत्यर्थे देशी, धातुः ) तडतड-शद्वानुकरणे तण-तृण तणअ-तस्येदमित्यर्थे देशी प्रत्ययः तणअ-तनय तणय-तनय तणयर-तृणचर तणयरी-तृणचरी तण्णियड-तद्+निकट तणु-तनु (शरीर) तणुअंगि-तन्वनी - १२९ जसहरचरिउ तणुताव तणुतावअ-तनुतापक तणुफंस-तनुस्पर्श तणुरुह-तनुरुह तणुल्लय-तनुलता तण्हा-तृष्णा तत्त-तप्त तत्तिय-तृप्त तत्थ-तत्र तप्प-तपधातोः कर्मणि तम-तमस् तमतमपह-तमस्तमःप्रभ (सप्तमनरकनाम) तमपह-तमःप्रभ (षष्टनरकनाम) तमाल-तमाल तमोह-तमस्+ओघ तर-शधात्वर्थे देशी तर-तु (धातुः) तरच्छ-तरक्षु (प्राणिविशेषः) (मराठी- तरस) तरणि-तरणि (सूर्य) तरसा-तरसा (वेगेनेत्यर्थः) तव-तपस् तवपहाअ-तपःप्रभाव तवमंडण-तपोमण्डन तवयरण-तपश्चरण तवलच्छी-तपोलक्ष्मी तववंत-तपस्+वत् (मत्वर्थीयः) तवसत्ति-तपाशक्ति तवसित्तण-तपस्वित्व तवंग-उपरितनो भागः (उच्चप्रदेश इति टिप्प णम् । मराठी-तवंग') तवंत-तप्यमान तविअ-तप्त तस-त्रस् (धातुः) तहिं-तत्र तहु-तदा, तत्र, तस्य तंणयर-तद्+नगर तंत-तन्त्र तंति-तन्त्री तंतु-तन्तु तंदुल-तण्डुल तंब-तान तंबचूल-ताम्रचूड (कुक्कुट) तंबोल-ताम्बूल तंबोललग्ग-ताम्बूल+लम तंवार-तवार (नरकनाम) ता-तावत् ताडण-ताडन ताडिय-ताडित ताम-तदा तामस-तामस (पापमित्यर्थः) तार-तार (शुभ्र) ताराणियर-तारानिकर तारावलि-तारा+आवलि ताल-ताल तालिअ-ताडित ताव-ताप तरंग-तरङ्ग तरंगिणि-तरङ्गिणी तरु-तरु तरुकाय-तरुकाय (वनस्पतिकाय इत्यर्थः) तरुण-तरुण तरुणी-तरुणी (युवति) तरुणीवस-तरुणी+वश तरुवेल्लीहल-तरु+वल्ली+फल तरुसाहागय-तरु+शाखा गत तरुसाहार-तरु+सहकार तल-तैलादिमर्जने (धातुः) तलण-तलन तलवर-ग्रामरक्षको राजपुरुष इत्यथें देशी तलारअ-तलवर (क) तलिय-तलित तव-तम् (धातुः) . १३० तावस शब्दकोशः तेम तावस-तापस नामिय-पासित ति-नि तिक्स-तीण विक्रय-तिक. सिंगिच्छ-पारज इत्पर्ध देशी तिगति-रिगुति (फायवात्मनोगुप्तिः) निजगभंतर-निजगदम्यन्तर निहा-तृणा तिण-तृण तित्य-तीर्थ तित्ययर-नीधार (मान्त्रमनतंक इत्यर्थः) नित्धु-तत्र निर-सिमपर तिष्प-ए (भानु.) निम्मण-दोमन (गर्दन) तिमिर-तिमिर तिगुंट-मुट निय-पी तियचिन-नीचित्त नियट्य-शिक (प्टी मरिच विपरीति प्रमाणां वर्णन) नियमर-नीमति नियमपनि-त्रिदक्षपत्नी (देवीत्यर्थः) नियाल-काल तिग्यण-मिल्ल (शानदाननारिमाणि) तिरिय-तिन् तिरिकग्य-नियंन् तिरिवलोअ-नियंग्लोक ( मनुष्यलोफ पति टिप्पणम्) तिल-तिलक तिलपिंट-तिल+पिण्ड (पिण्याक) (मराठी- पैट) तिलबछेअ-तिल(क)+छेद (सोमाभाव इति टिप्पणम्) तिलिंग-स्त्रीलिन तिल्लोअ-त्रैलोक्य तिल्लोक-प्रैलोक्य तिल्लोय-त्रैलोक्य तिव्य-तीन तिविह-त्रिविध तिसल्ल-त्रिशल्य तिसूल-त्रिशूल तिसृलिणि-त्रिशूलिनी (कात्यायनी) तिह-तन तिहुयण-त्रिभुवन तिदुवण-त्रिभुवन तीय-तृतीया तीस-त्रिंशत् तुच्छोअरिह-तुच्छ+उदर+इल (मत्वर्थीयः) तुह-तुष्ट तुहि-तुष्टि तुडिय-त्रुटित तुप्प-घृतशद्वार्थ देशी तुम्दारिस-युप्मादृश तुरअ-तुरंग तुरयणिणयारि-तुरगनिधनकारिन्। तुरंग-तुरङ्ग तुरंत-त्वरमाण तुरिउ-त्वरितम् (अव्ययम् ) तुलफूड-तुलाकूट (वञ्चनार्थ प्रयुक्तानि न्यूनातिरिक्तानि मानोन्मानानीत्यर्थः) तुलाकोडि-तुलाकोटि (पादागुदम्) तुस-तुप् (धातुः) तुस-तुप (धान्यादीना तुषम् ) तुसार-तुपार तुहार-त्वदीय तुंग-तुङ्ग (उच) तुंगत्थणि-तुङ्गस्तनी तुंड-मुराशद्वार्थे देशी तूर-तूर्य (वाद्यविशेषः) तेज-तेजस् १३१ - तेत्तहि जसहरचरित दलंण तेत्तहि-तत्र तेत्थ-तत्र तेत्थु-तत्र तेय-तेजस् तेयाविद्धी-तेजस्+आविद्धा तेरह-त्रयोदश तेरहसय-त्रयोदशशत थुत्ति-स्तुति थुय-स्तुत थूण-अश्वशद्वार्थे देशी थूल-स्थूल थेरि-स्थविरा थोअ-स्तोक थो-छिन्नहस्त इत्यर्थे देशी (मराठी-थोटा) तेल्ल-तैल थोर-स्थूल थोरंसुय-स्थूल+अश्रु (क) थोव-स्तोक तोडिअ-त्रुटित तोमर-तोमर (आयुधविशेषः) तोरण-तोरण तोस-तोष तोसिअ-तोषित दइन्च-दैत्य दइय-दयित दइव-देव थक्क-स्था (धातुः) थक-स्तब्ध, स्थित इत्यर्थे देशी थत्ति-स्थान इत्यर्थे देशी थण-स्तन थणवट्ट-स्तनपट्ट, स्तनवर्त (वर्तुल) थणाल-स्तन+आल (मत्वर्थीयः) थरहर-कम्पने देशी (धातुः) थल-स्थल थलयर-स्थलचर थंभ-स्तम्भय् (धातुः) था-स्था (धातुः) थाणु-स्थाणु थाल-स्थाली थिअ-स्थित थिप्प-गलने देशी (धातुः) थिय-स्थित थिर-स्थिर थिरमण-स्थिरमनस् थी-स्त्री थीयण-स्त्रीजन थुइवयण-स्तुतिवचन थुण-स्तु (धातुः) दक्खविय-दर्शित दक्खालय-दर्शय् (धातुः) दट्ठ-दष्ठ दृड्ड-दग्ध दढयर-हृढतर दुप्प-दर्प दप्पसंग-दर्पसग दपिट्ठ-दर्पिष्ठ दप्पुन्भड-दर्पोद्भट दम-दर्भ दम-दम् (धातुः) दम-दम दमण-दमन दमिय-दमित दय-दया दयविवेअ-दयाविवेक (दयायाः विवेकः भावः, दयाबुद्धिरित्यर्थः) दयवेल्लि-दयावल्ली दया-दया दयावर-दयापर दल-दल (पत्रमित्यर्थः) दलण-दलन - १३२ दव शब्दकोशः दिय , दब-दर (देवानल प्रत्यर्थ) दविण-द्रविण दविणयइ-विणीत (उमेर) दार-दार (स्त्री) दारद्वार दारिअ-दारित दारिद-दारिद्य दारिय-दारित दारुण-दारुण दालि-टालि (गिम्बीधान्यादिदलमित्यर्थ दममहम-सममहर बह-रगन् देशी) दहन-प्रदान्त (इटमा स्यर्थ ) इंट- देवणीद-नीति ददधारि- दंदपणाम-दाम(1) प्रणाम ददय-र () - 3 इंदी-अमिन (यम इत्य) न-मन दंन-मान देवग-दातार नपनि- दकि दनि-दन्निन् गंतुर-दन्तर दालिहठाण-दारिद्यस्थान दालिदिअ-दरिद्रित दाविअ-दर्शित दाविर-दर्शनशील दासिमुअ-टासीसुत दामी-दामी दाह-दाद दाहिण-दक्षिण दाहिणुहिय-दनिण+उलिय (खा) दिक्ख-दीक्षा विस्वा-दीक्षा दिक्सिअ-दीक्षित टिक्सपत्त-दीक्षापात (दीक्षित) दिगिंछा-जुगुप्सा दमण-न मंमिय-मित दमिर-I+(नीला प्रत्यय ) (दगनशील इत्यर्थः) दादा (धातुः) याइणी-दागिनी (उनपदे एर) दादा-दष्टापदार्थ देगी दानाकगल-कागल माढाल-दंष्ट्रा+भाल (मत्वर्थीयः) याण-दान बाणाष्टिय-दान+आई (मदजला इत्यर्थः) दाम-दामन् दिग्गय-दिग्गज दिज-दाधातोः कर्मणि दिट्ठ-दृष्ट दिट्टपरपर-दृष्ट+परपरा दिट्टि-दृष्टि दिढ-दृढ दिण-दिन दिणयर-दिनकर (सूर्य) दिणिंद-दिनेन्द्र (सूर्य) दिणेसर-दिनेश्वर (सूर्य) दिण्ण-दत्त वित्त-दीप्त दिप्पत-दीप्यमान दिय-दत्त जस....१७ १३३ दुग्घर-दुर्गह दुजण-दुर्जन दुण्णय-दुर्नय दियउल जसहरचरित दुविह दियउल-द्विजकुल दुग्गंध-दुर्गन्ध दियगुरु-द्विजगुरु दियवर-द्विजवर दुचित्त-दुश्चित्त (दुष्टाभिप्राय इत्यर्थः) दियह-दिवस दुचार-दुश्वार (दुराचार) दियंवर-दिगम्बर दिवस-दिवस दुजोहण-दुर्योधन दिवायर-दिवाकर दृट्ठ-दुष्ट दिव्य-दिव्य दिसा-दिश दुग्णयगारी-दुर्नयकारिन् दिसि-दिश् दुण्णिरिक्ख-दुनिरीक्ष्य दिसिणारि-दिश+नारी दुतीस-द्वात्रिंशत् दिहि-धृति दुत्तर-दुस्तर दिहियर-वृतिकर दुत्तार-दुस्तार दिहीहर-धृतिहर दुत्थिय-दुःस्थित दीव-द्वीप दुदम-दुर्दम दीवय-द्वीप(क) दुद्दस्सिण-दुर्दर्शिन् दीवयजुइल्ल-दीपकद्युति + इल्ल ( मत्वर्थीयः) दुईत-दुर्दान्त दीवंत-दीप्यमान दुद्ध-दुग्ध दीस-दृश्धातोः कर्मणि दुद्धर-दुर्धर दीह-दीर्घ दुप्पेच्छ-दुष्प्रेक्ष्य दीहर-दीर्घ दीहरच्छ-दीहर (दीर्घ)+ अक्षि (दीर्घाक्ष दुब्भ-द्रुह् (धातुः) दुव्भव-दुर्भव (कुजन्म) दीहिय-दीपिका दुम-द्रुम दु-द्वि दुमणि-घुमणि (सूर्य) दुकाल- दुष्काल दुक्किय-दुष्कृत दुमसाहा-द्रुमशाखा दुक्कियणिवह-दुष्कृतनिवह दुम्मण-दुर्मनस् दुम्मह-दुर्मथ (अभङ्ग इति टिप्पणम्) दुक्ख-दुःख दुक्खावण-दुःख + आपण (प्रापण) दुरग्गह-दुराग्रह दुरिअ-दुरित (पाप) (दुःखदायीत्यर्थः) दुक्खिय-दुक्खित दुरिय-दुरित (पाप) दुगुंछ-गुप् (जुगुप्सार्थे धातुः) दुरियठाण-दुरितस्थान दुग्ग-दुर्ग (दुर्गम) दुरियरासि-दुरितराशि दुग्गअ-दुर्गत (दुर्माह्य इत्यर्थे ) दुरुत्त-दुरुक्त दुग्गह-दुर्गति दुवार-दार दुविह-द्विविध दुव्बल-दुर्बल इत्यर्थः) १३१ 1 दुल्यार शब्दकोशः धम्मझाण दुबार-दुर दुव्बामा-+आगा दुयिणीअ-मूर्षिनीत दुन्चिलमिय-दुर्विसित दुनाइ-7.गद दुमन्म-माप दुरमा-गह दु:-गुग दुहमिद पटी (लामात्रा) दुणिमाअ-T.पन निगात (समूह) दुहपोट्टलअ-सोल द्वायरलपर टार्गण-गरी ( विदेशी) दुहित्र- दयगि-.गोपन पनि दुभि-दुन्दभ (नामनिरोप.) सुद्धहि-मुनि इल्या-तिसा देवंगअ-देव+भा (क) देवायरिअ-देव आचार्य देवालअ-देवालय देवाचिअ-दापित देवि-देवी देविघर-देवीगृह देविया-देवी देवी-देवी (विमलवाहनराजीनाम) देम-देश देसिअ-देशिक (वैदेशिक) देह-देव देहि-देदिन् देहुण्णअ-देह+ऊन(क) दोआमा-द्वि+पार्श्व, अथवा, द्वि+आगा दोयंडीभूय-द्विसण्डीभूत टोफालिय-द्वि+पाटित दोर-तन्तुशदाथै देशी (मराठी-दोर) दोवास-द्विपार्व दोसहारी-दोपहारिन् दोमायर-दोप+आकर दोसुमिअ-दोपोशित (उज्झितदोप इत्यर्थ.) दोहाविअ-द्विघाकृत टोहीयरण-द्वैधीकरण (सशय इत्यर्थ.) - दमित्र- रं-पुरम (अपपम् ) रंवरिय-गजलि व्यासंद-नांग (दानमिल्ल ) मिज-पित दमिय-पित दमियन-दपिन(क) दायम-भग(क) कुछविय-पित देअ-देव देउन-देशात देव-देव देवउल-देवकुट देवया-देवता देवर-देवर देवरा-देवरति (नामविशेषः) धगत्ति-अग्निवलनगद्वानुकरणे धगधग-अग्निवलनगद्वानुकरणे (धातुः) धण-धन धणधण्ण-धन धान्य धणहीण-धनहीन धाणिय-धनिक धणु-धनु धणुवेअ-धनुर्वद धम्म-धर्म धम्म-धर्म (पञ्चदशीथकरनाम) धम्मचकि-धर्मचक्रिन् धम्मझाण-धर्मध्यान (ध्यानप्रकार: -ro धूमगंध-धूमगन्ध धम्मत्थकाम जसहरचरिउ पउत्त धम्मत्थकाम-धर्मार्थकाम धावंत-धावत् (सधातोः शत्रन्तम् ) धाविय-धावित धम्मलाह-धर्मलाभ धम्मवाइ-धर्मवादिन धाहावंत-धा, हा इति शोकशब्दं कुर्वन् धम्मविज-धर्मविद्या धाहाविअ-शोकयुक्त इत्यर्थे धम्मंघिव-धर्माधिप (धर्मवृक्ष इत्यर्थः) धिट्ठ-धृष्ट धम्मक्खाण-धर्माख्यान धीवर-धीवर धम्मासत्त-धासक्त धुअ-धुत (कम्पित) धम्माहम्म-धर्माधर्म धुउ-ध्रुवम् (अव्ययम् ) धम्मिल्ल-धम्मिल्ल (केशपाशः) धुत्त-धूर्त धम्मुच्छाह-धर्मोत्साह धुत्तिय-धूर्तित घय-ध्वज धुप-धूप (धातुः) धर-धृ (धातुः) धुरंधर-धुरंधर धर-धरा (पृथ्वी) धुव-ध्रुव धरणि-धरणि धूमकेउ-धूमकेतु धरणिणाह-धरणीनाथ घरणियल-धरणीतल धूमप्पह-धूमप्रभ (पञ्चमनरकनाम ) धरपडिय-धरापतित ध्या-दुहित धरवीढ-घरापीठ धूली-धूली धरायल-घरातल धूलिर-धूलियुक्त धरिअ-धृत धूसर-धूसर धरिय-धृत धूसरिय-धूसरित धरिसमाणि-धरासमाना धोय-धौत धवल-धवल धोयअ-धौत(क) धवल-धवल (शुक्लवर्ण, सुधावर्ण) धोरणिकिअ-धोराणिकृत धवलच्छि-धवलाक्षी धंस-वस् (धातुः) पअ-पद धा-तृप्तौ (धातुः) पइज-पच्धातोः कर्मणि धाइदीव-धातकीद्वीप धाउ-धातु पइपत्त-पति+पात्र धाउ-धातु (गैरिकादि) पइवय-पतिव्रता धाम-धामन् पइसर-प्रति+स (धातुः) धायअ-धावित पइहर-प्रतिगृह (अन्तर्गहमित्यर्थे ) धार-धारा धारिणी-धारिणी (उत्तरपदे एव) पईसर-प्रति+स. (धातुः) धारिय-धारित पउ-पयस् पउत्त-प्रवृत्त, धाव-धाव् (धातुः) प्रोक्त पउत्त-पौत्र पइट्ट-प्रविष्ट पउत्थ शब्दकोशः पडिसवण पउत्थ-प्र-उपित पउमा-पद्मा (लक्ष्मी) पउमप्पह-पद्मप्रभ (पष्ठतीर्थकरनाम ) पउमराय-पद्मराग (मणिविशेपः) पउमिणी-पद्मिनी पउर-पौर (पौरजन, पुरसबन्धि) पउर-प्रचुर पउलण-प्रेरण पउलाविय-पाचित पउंज-प्र+युज् (धातुः) पएस-प्रदेश पओय-प्रजाघ (१) (प्रजासमूह इति हिन्दी भाषानुवादः) पओहर-पयोधर (स्तन) पकोकिअ-आहूत इत्यर्थे देशी पक-पक पक्कल-समर्थ इत्यर्थे देशी (समर्थ इति टिप्प- णम्) पक्ख-पक्ष पक्खालिय-प्रक्षालित पक्सवाअ-पक्षपात पक्खि-पक्षिन् पखित्त-प्रक्षिप्त पधे-प्र+ग्रह (धातुः) पघोस-प्र+घुप् (धातुः) पञ्चक्ख-प्रत्यक्ष पञ्चत-प्रत्यन्त (सीमा) पचुत्तर-प्रत्युत्तर पच्छड-पश्चात् पच्छाहोंत-पश्चाद्भवत् (पश्चास्थित इत्यर्थः) पन्नलिय-प्रज्वलित पज्जाअ-पर्याय पट्ट-पट्ट (चिह्न) पट्टण-पत्तन पट्टबंध-पट्टबन्ध पट्ठविय-प्रस्थापित पड-पत् (धातुः) पडपिहियासण-पट+पिहित आसन पडरइअ-पटरचित पडल-पटल पडह-पटइ ( वाद्यविशेषः) पडाविय-पटित, पटयुक्त (आच्छादित) पडिअ-पतित पडिआवंत-प्रत्यावर्तमान पडिकूल-प्रतिकूल पडिक्खणं-प्रतिश्चणम् पडिखलण-परि+स्खलन पडिखलिय-परिस्खलित पडिगह-प्रति+अड् (धातुः) पडिच्छ-प्रति+इप् (धातुः) पडिजंपिय-प्रतिजल्पित पडिविच-प्रतिविम्ब पडिविविअ-प्रतिविम्बित पडिबुद्ध-प्रतिबुद्ध पडिवोल्लिअ-प्रत्युक्त पडिम-प्रतिमा पडिय-पतित पडियार-प्रतिकार पडियावय-प्रतियापक (१) प्रत्याख्यात पडिलव-प्रति+लप् (धातुः) पडिवन-प्रति--पद् (धातुः) पडिवण्ण-प्रतिपन्न (प्रतिपादन कथनमित्यर्थः) पडिवण्णी-प्रतिपन्ना पडिवयण-प्रतिवचन पडिवहु-प्रतिवधू (सपत्नीत्यर्थः) पडिसवण-प्रति स्वप्न पच्छिअ-पथ्ययुक्त पच्छित्त-प्रायश्चित्त पच्छिम-पश्चिम पजल-प्रविल् (धातुः) पज्जत्त-पर्याप्त (पजत्तउ इत्यलमर्यऽव्ययम् ) पजल-प्र+ज्वल् (धातुः) १३७ पडिसिविण जसहरचरित प्रयंप पडिसिविण-प्रतिस्वप्न पडिहार-प्रतिहार पडिहारिय--प्रतिहारी पडिंद-प्रति+इन्द्र पडु-पटु पढ-पठ् (धातुः) पढम-प्रथम पढमिल्ल-प्रथम+हल (स्वार्थे ) पढमुज्जल-प्रथम+उज्ज्वल पढंत-पठत् पढाव-पाठय् (धातुः) पढुक्क-प्रवृत्त इत्यर्थे देशी पणइणी-प्रणयिनी पणचिर-प्र+नृत्+हर (शीलार्थे पणविज-प्र+नम् धातो. कर्मणि पण?-प्रनष्ट पणयमंग-प्रणयभङ्ग पणयंगणा-पण्याङ्गना (वेश्येत्यर्थः) पणव-प्र+नम् (धातुः) पणविय-प्रणत पणसहि-पञ्चषष्टि पणालिया-प्रणालिका पण्णयरिउ-पन्नगरिपु पणिवाअ-प्रणिपात पत्त-पत्र (अश्वादिवाहनम्) पत्त-पात्र पत्त-पान पत्तछेअ-पत्रच्छेद (अगुरुकुङ्कुमादिभिर्विरचितः शरीरे शोभाविशेषः) पत्तल-कृश इत्यर्थ देशी पत्तल-यवीयस् इत्यर्थे देशी पत्तलिया-कृगा इत्यर्थे देशी पत्तवडिय-पात्रपतित पत्थर-प्रस्तर पत्थिअ-प्रार्थित पत्थियअ-प्रार्थित(क) पत्थिव-पार्थिव पथिप्पिर-प्र+गलत् इत्यर्थे देशी पद्धडिय-पदाटिका, पज्झटिका (वृत्तनाम) पधाइअ-प्रधावित (प्रसृत इत्यर्थः) पपुच्छ-प्र+प्रच्छ (धातुः) पफुल्लवयण-प्रफुल्लवदन पद्ध-प्रबुद्ध पबोल्ल-प्रविद् धात्वर्थे देशी पभट्ठ-प्रभ्रष्ट पभण-प्र+भण् (धातुः) पभाल-प्रभा+आल ( मत्यर्थीयः) पमाण-प्रमाण पमाणिअ-प्रमाणित (प्रमाणीकृत) पमियपडिग्गह-प्रमितपरिग्रह पमुच्-प्र+मुच् (धातुः) पमेल्ल-म+मुच् इत्यर्थे देशी (धातुः) पय-पद पय-पद (पदातिरित्यर्थः) पयच्छ-प्र+दा (धातुः) पयक्स-प्रत्यक्ष पयजुअ-पदयुग पयजुयल-पदयूगल पयट्ट-प्र+वृत् (धातुः) पयड-प्रकटय् (धातुः पयड-प्रकट पयत्त-प्रयत्न पयत्थ-पदार्थ पयपंकय-पदपकज पयपालण-प्रजापालन पयलिय-प्रचलित पयवडिय-पदपतित पयंड-प्रचण्ड पयंप-प्र+जल्स् (धातुः) पत्तिय-प्रति+इ (धातुः) पत्ति-पत्नी पत्थ-प्रस्थ (धान्यादिपरिमाणविशेषः) १३८ - पया शब्दकोशः परियरिक्ष पया-प्रजा पयाव-प्रताप पयाविअ-पाचित पयास-प्रकाशय (धातुः) पयास-प्रकाश पयासिअ-प्रकाशित पयासिर-प्रकाश् + इर (शीलार्थे ) पयोहर-पयोधर पर-पर (अतीतानागत) परड-वनकुकुट परत्त-परत्र परभवत्थ-परभवस्य परमत्थ-परमार्थ परमधम्म-परमधर्म परमपर-परमपर (परमा गणधरदेवादयस्ते- भ्योऽपि पर उत्कृष्ट इति टिप्पणम्) परमप्प-परमात्मन् परमप्पअ-परमपद परममित्त-परममित्र परमहंस-परमहंस परमागम-परम + आगम (जिनशासन- मित्यर्थः) परमाणु-परमाणु परमेट्टि-परमेष्ठिन् परमेसर-परमेश्वर परमेसरि-परमेश्वरी परमोवएस-परमोपदेश परमंडलिय-पर + माण्डलिक परयार-परकार परलोय-परलोक परवंचणयर-परवञ्चनकर परव्वस-परवश परसापर-परस्परम् परहिय-परहित परंपर-परपरा परंमुह-पराङ्मुख पराइण्ण-परा + दा (निष्ठान्दम्) परायण-परायण परिअंच-परि + अञ्च (भ्रमणे धातुः) परिकरिय-परिकरित परिक्खा-परीक्षा परिक्तिअ-परीक्षित परिगण-परि + गण् (धातुः) परिगल-परि + गल् (धातुः) परिग्गहिअ-रि + गृहीत परिघुल-परि + घुल् (धातुः) परिघोलिर-परिषोलनशील परिचत्त-परित्यक्त परिचुक्किम-परिभ्रष्ट इत्यर्थे देशी परिविअ-प्रतिष्ठापित परिहा-प्रति + स्था (धातुः) परिडिअ-प्रतिष्ठित परिणइ-परिणति परिणम-परि + नम् (धातुः) परिणय-परिणत परिणाव-परि + नायम् (नीधातोणिजन्तम्) परिणिय-परिणीत, परिणायित परितन्त-परितस परिता-परि +त्रै (धातुः) परिपक-परिपक परिपुण्ण-परिपूर्ण परिपोस-परि + पुप् (धातुः) परिभम-परि + भ्रम् (धातुः) परिभामिअ-परिभ्रान्त परिमट्ठ-परिमृष्ठ परिमल-परिमल परिमाण-परिमाण परियत्त-परित्यक्त परियतण-परिवर्तन परियण-परिजन परियर-परिचर परियरिअ-परिचरित - १३९ - परियल जसहरचरित पसंगय पल्हत्थ-पर्यस्त पल्हत्थिअ-पर्यस्तित (आवर्जित इत्यर्थः) पवण-पवन पवणचस-पवनवश पवणुद्धय-पवनोद्धत (पवनप्रकम्पित इत्यर्थः) पवडिय-प्रवर्धित परियल-परितल (भाजनमित्यर्थे ) परियलिअ-परिगलित परियंच-परि + अञ्च् (धातुः) परियचिअ-पर्यञ्चित परियाण-परि + शा (धातुः) पणियाणिय-परिशात परियाणियअ-परिज्ञात(क) परिरक्ख-परि + रक्षा परिरक्खिअ-परिरक्षित परिवारअ-परि + उक्त (१) परिवाइय-प्रतिपादित परिवाडी-परिपाटी परिवार-परिवार परिवारे-परि + वारय् (धातुः) परिवेढिय-परिवेष्टित परिसेस-परि+शिष् (धातुः) परिसेसिय-परिशेषित (त्यक्त इत्यर्थः) परिसोहिय-परिशोधित परिहण-परिधान परिहर-परि+ह (धातुः) परिहा-परिखा परिहाण-परिधान परिहास-प्रति+भाप् (धातुः) परोवयारि-परोपकारिन् पल-पल (मास) पलट्ठिय-प्र+श्लक्ष्णित पलवंति-प्र+लपन्ती पवण्ण-प्रपन्न (प्राप्त इत्यर्थः) पवणिय-प्रवर्णित पवपालिया-प्रपापालिका पवयण-प्रवचन पवर-प्रवर पवसिय-प्रोपित पवसियपिय-प्रोपितप्रिय (प्रोषितभर्तृकेत्यर्थः) पवसियपियाली-प्रोपितप्रियालि (प्रोपितमर्तृ- कापङ्क्तिरित्यर्थः । पवास-प्रवास पवासिअ-प्रवासिन् पवाह-प्रवाह पवि-पवि (वजमित्यर्थ.) पविउल-प्रविपुल पवित्त-पवित्र पवित्ति-प्रवृत्ति पविमल-प्रविमल पविहिय-प्रविहित पव्व-पर्वन् ( अमावास्यादि) पञ्चइअ-प्रवाजित पसइ-प्रसूति पसण्ण-प्रसन्न पसत्थ-प्रशस्त पसप्पिय-प्रसृत, प्रसारित पसम-प्र+शम् (धातुः) पलंच-प्रलम्ब पलाव-प्रलाप पलिअ-पलित पलित्त-प्रलाप (इति टिप्पणम्) पलोइय-प्रलोकित पलोदृ-प्रलोटित (प्रक्षिप्त) पल-पल्य (सख्याशब्दः आयुःप्रमाणवाची) पल्लव-पल्लव (वस्त्रादीनामञ्चल इत्यर्थे ) पल्लवोह-पल्लव+ओष (पल्लवसमूह इत्यर्थः) पसमंत-प्र+शाम्यत् पसर-प्र+स. (धातुः) पसर-प्रसर पसरिय-प्रस्त पसंगय-प्रसक्त(क) पसविध शब्दकोशः पेडिया पहिसियतुंड-प्रहसिततुण्ड पहु-प्रभू (धातुः) पहु-प्रभु पहुत्त-प्राप्त पंक-पक पंकय-पङ्कज पंकप्पह-पड्कप्रभ (चतुर्थनरकनाम) पंकिय-पङ्कित (पङ्कयुक्त इत्यर्थः) पंगण-प्राङ्गण पंगु-पगु पसविअ-नकुल इत्यर्थ देशी पसवी-नकुलस्त्री पसगय-प्रसक्त पसंस-प्रशस् (धातुः) पसाअ-प्रसाद पसार-प्र+सारय् (धातुः) पसाह-प्र+श्रावय (कथनार्थे धातुः) पसाहिय-प्रमाधित, प्रकथित पसिद्ध-प्रसिद्ध पसु-पशु पसुय--पशु(क) पसुमारण-पशुमारण पह-पथिन् पहट्ट-प्रभ्रष्ट पहत्थ-ग्रहस्त पहभट्ठ-पयिन्।भ्रष्ट (भ्रष्टपथ इत्यर्थः) पहर-प्र+ह (धातुः) पहर-प्रहार पहरण-प्रहरण पहरवेविय-प्रहारवेपित पहराल-प्रहारशील पंगुत्त-प्रावृत इत्यर्थे देशी पंगुरुण-प्रावरण इत्यर्थे देशी (मराठी-पाघरूण) पंगुल-पद्गु+ल (स्वार्थे ) पंगुलणिमित्त-पडु+निमित्त पंच-पश्चन् पहरिअ-प्रहृत पहस-प्र+हस् (धातुः) पहसिय-प्रहसित पहंतर-पथान्तर पहा-प्रभा पहाग-प्रधान पहाय-प्रभाव पहार-प्रहार पहाव-प्रभाव पहावण-प्रभावना पहिअ-पथिक पहियविंद-पथिकवृन्द पहिलार-प्रथम+आर (स्वार्थ) पहिल्ल-प्रथम पहिल्लिय-प्रथा +इय (स्वार्थे ) पंचकल्लाण-पञ्चकल्याण पंचत्त-पञ्चत्व पंचदश-पञ्चदशन् पंचम-पञ्चम पंचमगइ-पञ्चमगति (मोक्ष इत्यर्थः) पंचमहव्वय-पञ्चमहावत पंचवण्ण-पञ्चवर्ण पंचवार-पञ्चवारम् पंचसमिति-पञ्चसमिति (ई- भाषा-एषणी- दान-उत्सर्गाः) पंचाचार-पञ्चाचार पंचास-पञ्चास्य ( सिंह इत्यर्थ.) पंचासव-पञ्चासव पंचिंदिय-पञ्चेन्द्रिय पंचुंबरि-पच उदुम्बर पंजर-पञ्जर पंजालियर-प्राञ्जलि कर पंजली-प्राञ्जलि पंडच-पाण्डय पडिअ-पण्डित जस....१८ - १४१ .
पि जसहरचरित पंडिय पंडिय-पण्डित पंडुर-पाण्डुर पंथ-पथिन् पंथिय-पान्थ, पथिक पाअ-पाद (किरण इत्यर्थे ) पाअ-पाद (चरण इत्यर्थे ) पाअ-पाप पाइक-पादिक, पादचारिन् (सेवक इत्यर्थे ) पाउडियजुम्म-(पादयोरलकारयुग्मामत्यर्थे । हिन्दी-पावडी) पाउय-खनित्रविशेषे देशी (मराठी पावडे) पाउस-प्रावृप पाउसकाल-प्रावृट्काल पाडीण-पाठीन (मत्स्यविशेषः) पाडल-पाडल पाण-प्राण (स च दशप्रकार इति टिप्पणे) पाणक्खअ-प्राणक्षय पाणचंडाल-अरण्यचाण्डाल इति टिप्पणम् पाणप्पिय-प्राणप्रिय पाणविणासण-प्राणविनाशन पाणावसाण-प्राण+अवसान (अन्त) पाणि-प्राणिन् पाणियल-पाणितल पाणिवह-प्राणिवध पाय-पाद पायगा-पादान पायड-प्रकट पायडिय-प्रकटित पायपोम-पादपद्म पायंत-पादान्त पायार-प्राकार पायाल-पाताल पारद्ध-प्रारब्ध पारद्धिय-व्याध इत्यर्थे देशी (मराठी-पारधी) पारंभ-प्रारम्भ पारावअ-पारावत पारोह-प्ररोह पाल-पाधातोणिजन्तम् पालण-पालन (पालक-उत्तरपदे एव) पालिय-पालित पाव-प्र+आप् (धातुः) पाव-पाद पाव-पाप पावइय-प्रापित, प्रव्रज्या पावग्गह-पापग्रह पावज्ज-प्रव्रज्या पावपर-पापपर पावफल-पापफल पावमल-पापमल पावयम्म-पापकर्मन् पाववेरि-पापवैरिन् पाविअ-प्रापित पाविट्ठ-पापिष्ठ पास-पाश (पाश इव पाशः, कर्मबन्ध इति टिप्पणम् ) पास-पार्श्व (त्रयोविंशतीर्थकरनाम ) पासगाम-पार्श्वग्राम पासत्थ-पार्श्वस्थ (समीपस्थ इत्यर्थः) पासय-प्रास (क) (कुन्तविशेषः) पासिय-पाशित (पाशबद्ध) पासुलिय-पाशुल पासेय-प्रस्वेद पाहुड-मामृत ( उपायन) पाहुणअ-प्राघूर्णक पिआ-पितृ पिउपट्ट-पितृपट्ट ( पितृसिंहासन) पिउवण-पितृवन (मशान ) पिक-पक पिक्ख-प्र+ईक्ष् (धातुः) पिच्छ-प्र+ईक्ष् (धातुः) पिज-पाधातोः कर्मणि पिट्ठ-पिष्ट (चूर्ण) १४२ पिटम पिट्ठमअ-पिष्टमय पित्त-पित्त पिम्म-प्रेमन् पिय-प्रिय पिय-प्रिया पियपत्ती-प्रिय-पत्नी पिययम-प्रियतम पियर-पितृ पियरवग्ग-पितृवर्ग पियविरह-प्रियाविरह पियसंजोग्ग-प्रियासयोग पिया-प्रिया पियामह-पितामह पिल्ल-डिम्भ इत्यर्थे देशी ( मराठी पिल्लू) पिसक-पिशाच इत्यर्थे देशी पिसक-पृपत्क (बाण इत्यर्थ.) पिसुण-पिशुन पिसुणिय-पिशुनित ( सूचित) पिहिय-पिहित पिहुल-पृथुल पिंग-पिङ्ग पिंगल-पिङ्गल पिंछ-पिच्छ पिछाल-पिच्छ+आल ( मत्वर्थीयः) पिंछोह-पिच्छ+ओघ (समूह) पिंजर-पिञ्जर पिंड-पिण्ड पिडदाण-पिण्डदान पीडकर-पीडाकर पीढ-पीठ पीण-प्री (धातुः) पीण-पीन पीणभुअ-पीनभुज पीणिय-प्रीत पित्तल-पित्तल (धातुविशेषः, मराठी-पितळ) पीय-पीत शब्दकोशः पुरवर पीयंत-पिबत् पीययंगणंभय-पीत+अङ्गण+अम्मस् पील-पीड् (धातुः) पीलण-पीडन पुक्खर-पुष्कर पुग्गल-पुद्गल पुच्छ-प्रच्छ् (धातुः) पुच्छ-पुच्छ पुच्छिय-पृष्ट पुन-पूज्य पुज-पृधातोः कर्मणि पुज्जणिन्न-पूजनीय पुजागुपुज-पूज्याना पूज्यः (पूज्याना गणधर- देवादीनामपि पूज्यः आराध्य इति टिपणम्) पुजिअ-पूजित पुट्ठि-पुष्टि पुष्टि-पृष्ठ पुटिपलट्ठियंग-पुष्टि + पल + अस्थि + अग (पुष्टथा उपचितं पलं मास अस्थीनि अङ्गानि च यस्य) पुट्ठिवंस-पृष्ठवंश पुणु-पुनर् पुणो-पुनर् पुण्ण-पुण्य पुण्ण-पूर्ण पुण्णपुंज-पुण्यपुज पुण्णालि-पुश्चलीत्यर्थे देशी पुण्णाहिलास-पूर्णाभिन्दाष पुत्त-पुन्न पुत्ति-पुत्री पुप्फ पुष्प पुप्फमाल-पुष्पमाला पुप्फयंत-पुष्पदन्त (चन्द्रसूर्यो, कवेर्नाम ) पुप्फयत-पुष्पदन्त (नवमतीर्थकरनाम ) पुर-पुर पुरवर-पुरवर फफावयसर जसहरचरिउ पुरउ पुरउ-पुरतः पुरवहि-पुरावधि (पुरमुद्दिश्येत्यर्थः) पुरंदर-पुरदर पुरारि-पुरारि (शिवः) पुरिस-पुरुष पुरुएअ-पुरुदेव (इन्द्रादयो देवा इति टिप्पणम् पुरुहुंत-पुरोमवत् पुलिंद-पुलिन्द पुल्लि-शबरजातिविशेषे देशी पुलिंग-पुलिङ्ग पुव्वयाल-पूर्वकाल पुन्वसिणेह-पूर्वस्नेह पुहवि-पृथ्वी पुंकोइल-पुस्कोकिल पुंछ-पुच्छ पुंज-पुज्ज पुंजिअ-पुञ्जित पुंजिय-पूजित पुंजीकय-पुजीकृत पुंड-पुण्ड् (इक्षुजातिविशेषः) पूइवाअ-पूर्तिवात पेल्लिय-प्रेरित पेस-प्रेपय् (धातु.) पेसण-प्रेपण पेसल-पेशल पेसिय-प्रेषित पेहुणय-पिच्छगद्वार्थ देशी पोक्खर-पुष्कर पोट्ट-उदर इत्यये देशी (मराठी-पोट) पहिलअ-प्रन्धिगद्वायें देगी (मराठी-पोटळी) पोटुल-पोट+7 (स्वार्थ ) पोढ-प्रौढ पोढत्तण-प्रौढत्व पोत्थयवायण-पुस्तकवाचन पोम-पद्र पोमराय-पद्मगग पोमाइय-अवलोकित इत्यथ पोमिणि-पद्मिनी पोमिणिय-पद्मिनी पोसण-पोषण पोसह-उपवासदिन इत्यर्थे पोसिअ-पोपित पोसिय-पोषित फट्ट-विदीर्ण इत्यर्थे देशी (मराठी-माटणे) फडा-फटा फणि-फणिन् (सर्प) फणिद-फणीन्द्र (शेषः) फरुस-परुप फरुसमासिणि-परुपभाषिणी पूरय-पूरय (धातुः) पूरिय-पूरित पूस-प्रच्छधास्वथें देशी पूसकोइल-पुस्कोकिल पेच्छ-प्र+ईश् (धातुः) पेट्ट-उदर इत्यर्थे देशी (हिन्दी-पेट) पेम्म-प्रेमन् पेय-प्रेत पेयंतावलि-प्रेत+अन्न आलि पेरिअ-प्रेरित पेरिय-प्रेरित पेल्लण-प्रेरण पेल्लय-पेलव फलभोयण-फलभोजन फलिय-फलित फलिह-स्फटिक फलोह-फल+ओघ (समूह) फंफावय-बन्दिचारणादय इत्यर्थे देशी फंफावयसर-बन्दिन् स्वर • १११ फंस शब्दकोशः बंभव फंस-स्पर्श फस-स्पृश (धातुः) फंसण-स्पर्शन फाडिअ-पाटित फार-प्रचुर इत्यर्थ देगी (मराठी-पार) फार-फार, सीत (अतिगयार्थे फाल-पाटय् (धातुः) फालिय-पाटित बद्ध-बहू बद्धाउस-बद्धायु वप्प-पितृशद्वार्थे देगी वप्प-चातक परिहण-बहिन (मयूर) बल-त्रल वलखीण-वलक्षीण बलवंत-बलवत् फान-स्पर्श फासवंत-स्पर्शवत् फासाइय-स्पादिक (विषयः) फासुअ-प्राशुरु (प्रशस्त इत्यर्थ) फिर-परावर्तने देशी (धातुः) (मराठी-फिरणे) फुट्ट-स्फुटित फुट-भिन्न इत्यर्थे देशी (मराठी-फुटणे) फुटपाय-स्फुटित+पाद् फुडवत्ति-स्फुट+वृत्ति फुफुव-फुत्व (धातुः) फुर-स्फुर् (धातुः ) फुरिअ-स्कुरित ( टीस) फुरिय-स्फुरित फुलिंग-स्फुलिङ्ग फुल्ल-पुष्प (मराठी-फल) वलसणाह-बलसनाथ बलि-बलि वलिय-बलिन् वलिविहाण-घरि विधान (पूजाविधिः) वहल-बहल वहिणी-भगिनी वहिणुल्ली-भगिनिका (यवीयसी भगिनी यर्थः) वहिर-बधिर बहिरअ-बधिर (क) वहिरंध-बविर+अन्ध बहु-बहु बहुदुक्खाउर-बहुदुखातुर वहुभेय-बहुभेद बहुरोयहर-बहुरोगहर बहुवण्णभेय-बहुवर्णभेद बहुविह-बहुविध वदियण-बन्दीजन वदी-बन्दी वंध-बन्ध बंधण-बन्धन बंधु-बन्धु वंबुल-बब्बुल (वृक्षनाम । मराठी-बाभूळ) बंभ-ब्रह्मन् (ब्रह्मदेव) वंभण-ब्राह्मण बंभणव्वअ-ब्राह्मणव्रत वंभणी-ब्राह्मणी वंभयारि-ब्रह्मचारिन् वंभवअ-ब्रह्मावत (ब्रह्मचर्यमित्यर्थः) फुल्लोह-पुष्प+ओघ (समूह) फेड-मुच्धात्वर्थे देशी फेण-फेन फेणरासि-फेनराशि फोडिय-स्फोटित वहट्ट-उपविष्ट इत्यर्थे देशी वइसावय-उपवेशय् इत्यये देशी (धातुः) चज्झ-बन्ध्धातोः कर्मणि वन्झावयास-बाह्य + अवकाग (बाह्यप्रदेश इत्यर्थः) वज्झ-बाछ ---१४५ बंभोत्तर जसहरचरिउ भमिर भअ-भव भइरअ-भैरव भइरव-भैरव भइरवाणंद-भैरवानन्द (कापालिकनामविशेष) भउहा-चकुटि भक्ख-भश् (धातु) भक्ख-भक्ष्य भग्ग-भन्न (वशीकृत इति टिप्पणम् ) भज-भ (धातुः) भन्न-भार्या बंभोत्तर-ब्रह्मोत्तर (स्वर्गनाम) वायर-बादर (बदरप्रमाण इत्यर्थः) वार-द्वार बारह-द्वादश बारहविह-द्वादशविध बाल-बाल वालय बालक वावीस-द्वाविंशति बाहा-बाहु बाहु-बाडु बि-द्वि बिण्णि-दौ, द्वे विल-बिल बिंदु-बिन्दु बिबाहर-गिम्भाधर वित्रीहलाह-बिम्मीफलाम बीय-द्वितीय चीय-बीज वीयंद-द्वितीयाचन्द्र बीह-भी (धातु:) बुज्झ-बुध् (धातुः) वुज्झिर-चौधनशील बुद्ध-बुद्ध बुद्ध-बुद्ध( तथागत) बुद्धि-बुद्धि बुब्बुज-बुद्बुद बुब्बुय-बुद्बुद बुह-बुध वुहयण-बुधजन बे-द्वि वेक्खुर-द्विखुर बोकड-अज इत्यर्थे देशी (मराठी-चोकड) बोल्लिअ-कथित इत्यर्थे देशी बोहि-बोधि भन्न-भज्धातोः कर्मणि भट्ट-भट्ट भट्ट-भ्रष्ट भड-भट भडारअ-भट्टारक, भगवत् भडारिआ-भट्टारिका, भगवती भडारी-मारिका भडिय-पक्क इति टिप्पणम् (मराठी-भारत) भण-भण् (धातुः) भाणिअ-भणित भणिज-भण्धातोः कर्मणि भत्ति-भाक्ति भत्तिभर-भक्तिभर भत्तिल्ल-भक्तियुक्त भद्द-भद्र भद्दी-भद्रा भप्पर-भस्म इत्यर्थे देशी भम-भ्रम् (धातुः) भमर-भ्रमर भमरोह-भ्रमर+ओघ (समूह) भमंत-भ्रमत् भमाड-भ्रम् (धातु भमाडिअ-भ्रामित भमिअ-भ्रमित भमिय-भ्रमित भामिर-भ्रमणशील भअ-भय १४६ भय আৰ্কীয় मिण्णी भय-भय भयउल-भयाकुल भयगारी-भयकारिन् भयदाइणि-भयदायिनी भयधातु-सप्तधनुर्भित इति टिप्पणम् भयवइ-भगवती भयवंत-भगवत् भयंकर-भयकर भयाउर-भयातुर भयाउल-भयाकुल (भयावह इत्यर्थे ।) भर-भर (भार) भरह-भरत (वर्षनाम भरह-मृत (आच्छादित इति टिप्पणम् ) भरिअ-मृत, भारत भरिय-भरित भल्ल-भद्र भल्ल-शुनक इति टिप्पणम् भल्ल्य-मल्क (प्राणिविशेषः) भालू-भल्लूक भव-भव (संसारगति) भडण-भण्डन (कलह इत्यर्थ.) भति-भ्रान्ति भतिअ-भ्रान्त भंभा-मम्मा (वाद्यविशेषः) भाण-भाजन भाणिअ-माणित (कथित) भाणु-भानु भायण-भाजन भार-मार भारह-भारत (महाभारत इति टिप्पणम्) भाल-भाल्य् अवलोकने (धातु) भाल-भाल (ललाट) भाव-माव भाव-भावय् (धातुः) भावण-भावना भाविप्फुरत-भा+विस्फुरत् भाविर-भाव+इर (मत्वर्थीयः) भास-माप् (धातुः) भास-भास (पक्षिविशेषः) भासा-भाषा भासिय-भाषित भासुर-भासुर भिउडि-भ्रुकुटि भिक्ख-मिशा भिक्खयर-भिक्षाचर भिक्खपत्त-भिक्षापात्र भिक्खा-भिक्षा भिक्खाणिमित्त-भिक्षानिमित्त भिच्च-भृत्य भिचउल-मृत्यकुल मिन्न-भिदधातोः कर्मणि मिड-अभिगमने देशी (धातुः) भिण्ण-भिन्न भिणिहिण-भ्रमरादिशब्दानुकरणे धातुः (मराठी-मिणमिण) भिण्णी-मिन्ना भवकद्दम-भवकर्दम भवचरिय-भवचरित भवण-भवन भवबद्ध-भवद्ध भवंतर-भवान्तर भव्व-भव्य भन्वयण-भव्यजन भस-भस् (धातुः) भसण-भपक (मनसा दुष्ट इति टिप्पणम् ) भसण-भपक (शुनक इत्यर्थः) भसल-भृङ्गशद्वायें देशी भसलउल-भ्रमरकुल भंगाल-भृग+आल (मत्वीयः) (सभृङ्ग इत्यर्थः) भगुर-भइगुर भंड-भाण्ड - ११७ -- भित्ति जसहरचरित मग भेय-भेट भेरी-भेरी (वायधिशेष.) भो-भो (सगोयनेऽव्ययम्) भोअ-भोग भोउवभोय-भोग+उपभोग भोज-भोज्य भोम-भौम (भूमिसबन्धि) भोयण-भोजन भोयणवेल-भोजनवेला भित्ति-मित्ति भिल्ल-मिल्ल (शबरजातिविशेपे देशी) भिस-बिस भिंग-मृङ्ग भिंगार-भृङ्गार (पात्रविशेषः) भिंद-भिद् (धातुः) भीअ-भीत भीम-भीम भीयर-भीकर (भीजनकमित्यर्थः) भीस-भीष्म (भीषण) भीसण-भीषण भीसावण-भेषण भुअ-मुज भुक्खा-बुभुक्षा भुक्खिया-बुभुक्षिता भुत्त-भुक्त भुत्तुव्वरिअ-मुक्त उर्वरित( भुक्तशेष इत्ययः) भुय-मुज भयग-भुजान भुयंग-मुजङ्ग (सर्पो विटश्चेति टिप्पणम् ) भुल्लअ-भ्रान्त इत्यर्थे देशी भुवण-भुवन भवणयल-भुवनतल भुज-भुज् (धातुः) भुंजाविय-भौजित म-मा (निपेधेऽव्ययम्) मअ-मद मअ-मृग मअ-मृत मइ-मति मइभंस-मतिभ्रश मइरक्खण-मतिरक्षण मइरंग-मदिर+अङ्ग (मदजललिप्तगरीर इत्यर्थः) मइरा-मदिरा मइल-मलिन मइलणिय-मलिनित मइलिय-मलिनित भूदाण-भू+दान भूमी-भूमि भूमीयल भूमितल भूमीस-भूमीश (प इत्यर्थः) भूय-भूत भूरि-भूरि भूवाल-भूपाल भूसण-भूषण भूस-भूप् (धातुः) भूसिय-भूषित मइंदासण-मृगेन्द्र+आसन (सिंहासन) मई-मति मउ-मृदु मउअ-मृदुक (प्रियवदः कोमलश्चेति टिप्पणम) मउड-मुकुट मउडग्गकोडि-मुकुट+अन+कोटि मउल-मुकुल मउल-मौल (मौलि: गिरस्) १ २३.६ मउलिय-मुकुलित मऊरी-मयूरी मओयर-मृतोदर मग्ग-मार्गय (याच्) (धातुः) मग्ग-मार्ग - १४८ सांगण আন্ধীয়ঃ मर? मग्गण-मार्गण (बाण) मग्गिज-मार्गय्धातोः कर्मणि मच्छ-मत्स्य मच्छर-मत्स्य मच्छर-मत्सर मच्छंधि-मत्स्यधर मच्छंधिणीवाल-मत्स्यधरवाल मच्छियअ-मत्स्य(क) मज्झ-मध्य मज्झत्थ-मध्यस्थ मज्झखाणा-मध्येक्षीणा मझिम-मध्यम मन्ज-मद्य मज-मस् (धातुः) मन्न-मजा (गरीरधातुविशेषः) मजखंड-मजाखण्ड मन्जमाण-मजत् मणिमुद्दी-मणिमुद्रिका मणुअ-मनुज मणुय-मनुज मणुस-मनुष्य मणोज-मनोज्ञ मणोरह-मनोरथ मणोहर-मनोहर मण्णिअ-मानित मत्त-मत्त मत्थअ-मस्तक मत्यिक-मस्तिप्फ मद्द-मृद् (धातुः) मद्दण-मर्दन महल-मर्दल (वाद्यविशेषः) मदव-मार्दव मजाय-मर्यादा मडय-मृत (क) मढ-मठ मण-मन् (धातुः) मण-मनस् मणगमण-मनोगमन (मनोजव इत्यर्थः) मणचडुल-मनश्चटुल (मनोवच्चटुल) मणतणय-मानसिक मणरावअ-मनोरजक मम्मण-मम्मण (कामोद्रेककारिवचनम् ) मय-मद मय-मृग मय-मृत मयउल-मृगकुल मयगह-मदग्रह मयचक्क-मदचक्र (अष्टविधमदसमूह इत्यर्थः) मयच्छि-मृगाक्षी मयण-मदन मयणाहि-मृगनाभि मयणुम्मायअ-मदनोन्मादक मयर-मकर मयरद्धय-मकरध्वज मयलंछण-मुगलान्छन मयवह-मृगवध मयवंत-मदवत् मणहर-मनोहर मणहरण-मनोहरण मयंक-मृगाङ्क मण्ण-मन् (धातुः) मणिअ-मणित (रतिकूजितमित्यर्थः) मणिजासवणहेउ-मणि+जपा+हेतु (मणि- जपादृष्टान्तः । स्फटिकमणियथा जपापुष्प- सानिध्यादतिरक्तो दृश्यते तथा शुद्धोऽप्यात्मा संसारिणा योगे ताहशो भवति, अरूपित्वात् इति टिप्पणम् ) माणमय-मणिमय मयारि-मद+अरि मर-म (धातुः) मरगय-मरकत मरदृ-गर्व इत्यर्थे देशी जस....१९ १४९ मरण जसहरचरिउ महमह मरण-मरण महापयत्थ-महापदार्थ मराल-हस महापसाअ-महाप्रसाद मरालिया-मरालिका (हंसवधूः) महापह-महापथ मरिय-मरिच (मराठी-मिरे) महाबल-महाबल मरु-मरुत् महामइ-महामति मरुद्धय-मरदुद्धत् महामुणि-महामुनि मरुहय-मरुद्+हत महारह-महारथ महारुंढ-पूर्ण इत्यर्थे देगी, अथवा, महम् मल-मल (तेजः ) + रुद (विस्तीर्ण) १.१८ १ मलण-मलन मलहेउ-मलहेतु (तेजसा विस्तीर्ण इत्यर्थ.) मल्ल-मल्ल महावच्छ-महावन मलिण-मलिन महासइ-महासती मलीमस-मलीमस महि-मही (पृथ्वी) मल्लि-मल्ली (एकोनविंशतीर्थकरनाम) महिअ-महित (पूजित) मल्लिया-मालिका (कुमुमविशेषः) महिच्छिया-मही+इच्छा (मही+सा इति मसाण-श्मशान टिप्पणम) मसि-मपी महिणाह-महीनाथ मसिण-मसूण महिमयि-मही+महित महएवी-महादेवी महिमहिल-मही+महिला (ती) महएविणिकेय-महादेवी+निकेत महियाल-महीपाल महग्य-महार्घ, अथवा, महाई महिल-महिला (मी) महिला-महिला ( (ती) महिवइ-महीपति महमह-गन्धोद्वाने देशी (धातुः) माहिवल-मही+ल महयर-महत्तर महिवलअ-मही + वलय (भूमण्डल- महयाल-महाकाल (उजयिनीस्थशिवनाम) मित्यर्थ.) महरिसि-महर्षि महिवहु-मही+वधू महल्ल-महत् (वृद्ध इत्यर्थ.) महिस-महिप महव्वय-महाव्रत महिसासुर-महिषासुर महंत-महत् महिसी-महिपी (महिपती) महाउह-महायुध मही-मही महाएवी-महादेवी महीमहंत-मही+महत् (पूज्य) महागह-महाग्रह महीयल-महीतल महाजइ-महायति महीहर-महीधर महाजस-महायशस् मह-मधु महाणुभाव-महानुभाव महुमह-मधुमथ(न), (विष्णुरित्यर्थः) महण्णव-महार्णव महत्थ-महार्य - १५० - महुयर शब्दकोशः मारय मंथर-मन्थर (मन्द) महुयर-मधुकर महुयल---मधुकर महुयला-मधुलता महुर-मधुर महुरक्खर-मधुराक्षर महेली-महिला महोरअ-महोरग मंगल-मङ्गल मंच-मञ्च मंजर-मार्जार मंजरिया-मञ्जरी मंजीरय-मजीर (पादभूपणविशेषः मंठ-मन्द (मराठी-मह) मंठ-मृष्ट मंळुवयंठ-मृष्ट+उपकण्ठ (समीप- स्थप्रदेशः) मंडअ-मण्डप मंडण-मण्डन मंडय-मण्डक (खाद्यविशेषः। मराठी-माडा) मंडलचरण-मण्डलचरण (सरीसृप- विशेपः) मंडलिय-मण्डलित (वर्तुल) मंडलिय-माण्डलिक (मण्डलवर्तिनृपसमूहः) मंडलिल्ल-मण्डल+इल (मत्वर्थीयः) मंडव-मण्डप मंडिअ-मण्डित मंडिय-मण्डित मंत-मन्त्र मंतगुंफ-मन्त्र+गुम्फ, अथवा, मन्त्र गुप्त मंद-मन्द मंदरगिरि-मन्दरगिरि मंदल-मर्दल (वाद्यविशेषः) मंदार-मन्दार (वृक्षविशेपः) मंदिर-मन्दिर मंधाय-माघात (नृपविशेषः) मंस-मास मंसासिण-मासाशिन् मा-मा (प्रतिपेघेऽव्ययम् ) माइ-मातृ माइअ-मात (माघातोर्निष्ठान्तम् ) माउच्छिआ-मातृप्वम् माउपण्णअ-मातृ+पन्नग माजर-मायूर (मयूरसबन्धि) माण-मान माणअ-मानव माणवभव-मानवमव माणावमाण-मानापमान माणिक-माणिक्य माणिणि-मानिनी माणुस-मनुष्य माय-मात मायरि-मातृ मायंग-मातङ्ग (हस्ती मायंगणर-मातङ्गनर (चाण्डाल) मायाकसाअ-मायाकषाय मायापियरुल्लअ-मातापितृ उल्लअ (स्वार्थे) मायाभाव-मातृभाव मायामअ-मायामय मायार-माया आचार मायासुअ-मातृ+सुत मार-मार (मदन) मारण-मारण मारणसील-मारणशील मारय-मारय् (धातुः) (गुसमन्त्र इत्यर्थः) मंतण-मन्त्रण मंति-मन्त्रिन् मंतिअ-मन्त्रित मंतिमहल्ल-मन्त्रि+महत् मंतिसुअ-मन्त्रिसुत - १५१ माराव जसहरचरिउ मुय मिंढय-मेपशद्वार्थे देशी (मराठी-मेंढा) मिंढी-मेपस्त्री इत्यर्थे देशी (मराठी-मेंढी) मीणधर-मीनघर (धीवर) मीणी-मीनी (मत्स्यस्त्री) मुअ-मुच् (धातुः ) मुअ-मृत मुक्क-मुक्त माराव-मारय् (धातु) माराविअ-मारित मारि-मारी (हननशीलदेवताविशेषः) मारिअ-मारित मारिदत्त-मारिदत्त (राज्ञो नामविशेषः) मारियत्त-मारिदत्त (राज्ञोनामविशेषः) मारी-मारी (कात्यायनी) माल-माला मालइ-मालती (लताविशेषः) माला-माला मास-मास मासावसाण-मास+अवसान मासाहार-मासाहार माहप्प-माहात्म्य माहिंद-माहेन्द्र मि-अपि (अनुस्वारानुनासिकयोः परे एव) मुक्ख-मूर्ख मुग्गस-नकुल इत्यर्थे देशी (मराठी-मुगुस) मुच्छ-मूर्छ (धातुः) मुच्छ-मुर्छा मिउ-मृदु मिग-मृग मिगीवइ-मृगीपति मिच्छत्त-मिथ्यात्व मिच्छभाअ-मिथ्याभाव मिच्छमअ-मिथ्यामद, मिध्यामत मिच्छ-मा+इच्छ मिच्छामअ- मिथ्यामद मिट्ठ-मिष्ट मुच्छा-मूर्छा (यमदूतीति टिप्पणम् ) मुच्छावण्ण-मूर्छा + आपन्न मुच्छावस-मूविश मुच्छिन्न-मूर्छधातोः कर्मणि मुच्छिय-मूर्छित मुझ-मुह (धातुः) मुट्टिगहिअ-मुष्टिगृहीत मुडियठि-मोटित (भम)+अस्थि मुण-मन् चिन्तायाम् (धातुः) मुण-ज्ञा इत्यर्थे (धातुः) मुणि-मुनि मुणिज्ज- जाधातोः कर्मणि मुणिदिक्ख-मुनिदीक्षा मुणिपुंगव-मुनिपुगव मुणिंद-मुनीन्द्र मुणी-मुनि मुणीसर-मुनीश्वर मुत्ताहल-मुक्ताफल मुत्ति-मुक्ति मुत्ति-मूर्ति (शरीर) मुत्तिय-मौक्तिक मुद्दा-मुद्रा (अङ्गविक्षेपप्रकारः) मुद्ध-मुग्ध मुद्ध-मुग्धा मुय-मृत मिट्ट-मृष्ट मिट्ठ-मेण्ठ (हस्तिपाल) मित्त-मित्र (सुहृद्) मित्त-मित्र (सूर्य) मिल-मिल् (धातुः) मिलिय-मिलित मिस-आमिष मिहिलाउर-मिथिलापुर मिहुण-मिथुन मिहुणल्ल-मिथुन+अल्ल (खायें ) मिहुणुल्ल-मिथुन उल्ल (खार्थे ) -- १ मुयंग शब्दकोशः रक्ख मेसउल-मेपकुल मेसय-मेप (क) मेह-मेघ मेहजाल-मेघजाल मेहा-मेघा मेहुण-मैथुन मोक्ख-मोक्ष मोडिय-मोटित (भग्न) मोण-मौन मोत्तिय-मौक्तिक मोयय-मोदक मोर-मयूर मोरुल्ल-मयूर+उल्ल (स्वार्थे) मोरय-मयूर मोल्ल-मूम्य मुयंग-मृताश मुररिउ-मुररिपु (विष्णुः) मुरारि-मुरारि (विष्णुः) मुसावाय-मृपावाद मुह-मुद् (धातुः) मुह-मुस मुहर-मुखर मुहरत्त-मुसरक्त (शुको विटश्च ) मुहल-मुसर मुहलिय-मुखरित मुहबड-मुखपट मुहामुक-मुखामुक्त मुहावट्टिय-मुखावर्तित मुंड-मुण्ड् (धातुः) मुंड-मुण्ड (मूर्धन् ) मुंडपसाहणि-मुण्ड + प्रसाधना ( मुण्डालकृतेत्यर्थः) मंडिय-मुण्डित मृअ-मूक मूढ-मूढ मूढत्तण-मूढत्य मूढमइ-मूढमति मूल-मूल मेहणी-मेदिनी (भूमिः) मेकरंत-मे इति मेपचन्द कुर्वत् मेच्छ-म्लेच्छ मेमण-मेहतिशब्दविशेषः मेम्मायंत-मेमे इतिशद कुर्वत् मेर-मर्यादा इत्यर्थ देशी मेक-मेरु (पर्वतनाम) मेलअ-मेलन मेलण-मीलन मेल्ल-मुच् इत्यर्थे देशी (धातुः) मल्लाविअ-(मेलित) मेलिअ-मुक्त इत्यर्थे देशी मेस-मेष मोसिअ-मोषित, मुषित मोह-मोह मोहणसील-मोहनशील मोहरबंध-मोहरजस्+अन्ध मोहंध-मोहान्ध मोहिअ-मोहित य-च (स्वरात्परे एव) या-शा (धातुः) याण-ज्ञा (धातुः) युत्त-युक्त रइ-रति रइअ-रचित रइय-रचित रइरमण-रतिरमण (मदन) रइलासस-रतिलालस रइविंभल-रतिविह्वल रउद्द-रौद्र रउरव-रौरव रक्ख-रक्ष (धातुः) - १५३ जसहरचरित रक्खस-राक्षस रक्खसी-राक्षसी रक्सिअ-रक्षित रज-राज्य रज्ज-रब्धातोः कर्माण रत्नंग-राज्याङ्ग रज्जु-रजू (प्रमाणविशेषः) रनुया-रज्जुका रड-रट् (धातुः) (रोदनेऽपि दृश्यते) रडत-रटत् , रुदत् रण-रण रणझणत-रणझणशद्व कुर्वत् रण्ण-अरण्य रत्त-रक्त (रक्तवर्ण) रत्त-रक्त (आसक) रत्तच्छ-रक्ताक्ष रत्तत्त-रक्त+अक्त (रक्तरञ्जित इत्यर्थः) रत्तपत्तचिअ-रक्तपत्राञ्चित रत्तसिहर-रक्तशिखर (कुछुट) रतिदिवसु-रात्रिंदिवसम् रत्तुप्पल-रकोसल रम-रम् (धातुः) रमण-रमण (वल्लम) रमण-रमण ( रतिः, क्रीडा) रमणिज-रमणीय रमणी-रमणी रमंत-रममाण रस्म-रम्य रमिअ-रत रय-रजस् रयई-जकी रयण-रल रयणत्त-रत्नत्व रयणत्तय-रत्नत्रय (ज्ञानदर्शनचारित्राणि) रयणप्पह-रत्नप्रभ (प्रथमनरकनाम) रयणायर-रत्नाकर रयणि-रजनि रयणी-रजनी रयणीयर-रजनीकर (चन्द्र) रयणुज्जल- -रत्नोज्ज्वल रयणोह-रत्नौघ रव-रख रखण्ण-रमणीय इत्यर्थे देशी रवि-रवि रवियर-रविकर (रविकिरण) रविवार-रविवासर रस-रस रस-रस (रक्तादिधातवः) १.१६.९. रसणा-रशना रसय-रस (क रसयारी-रसकारिन् ( सुखजनक इति टिप्पणम्) रसवस-रसवा रसविण्णास-रस + विजिज्ञासा रसत-रसत् रसिय-रसित (गद इत्यर्थः) रसोई-रस + इल (मत्वर्थीयः) (पाकइत्यर्थः) रसिल्ल-रसवती (ओदनादिपाक इत्यर्थः ) रसोल्ल-रस + उल्ल (मत्वर्थीयः) रह-रथ रहवर-रथवर रहस-रमस रहसजुत्त-रभव्युक्त रहसिर-रमस + इर (शीलार्थे प्रत्ययः) रहसिल्ल-रभस + इल्ल (मत्वर्थीयः) राहअ-रहित रहुवइ-रघुपति रंग-रग रंगंत-रङ्गत् ( मराठी-रागणे) रंगावलि-रङ्गावाल (प्राङ्गणादिपु विविधवर्ण चूर्णः क्रियमाणो विच्छित्तिविशेषः । मराठी- रागोळी) १५४ रंगित शब्दकोशः रुंट रिच्छ-ऋच रिण-अण रिद्ध-जद्ध रंगर-रग + इर (रनयुक्त) रजिअ-रजित जिय-रजित रंध-रन्ध्र राअ-राग राअ-राजन् राई-शजि (धान्यविशेषः । मराठी-मोहरी) राउ-राजन् राउल-गजकुल राणअ-गजन् राणासण-राजासन राणिया-रानी राम-राम (रामचन्द्र) राम-गम (मन्त्रिनाम) राय-राग राय-राजन् रायउत्त-राजपुत्र रायउर-राजपुर रायपरिणि-राजगृहिणी रायगेह-राजगेह रायट्ठाण-राजस्थान (गजसभेत्यर्यः) रायतुरअ-राजनुरग रायपुरिस-गजपुरुष रायमग्ग-राजमार्ग रायराएस-राजराजेश रायमिरी-राजश्री रायसोवाण-राजसोपान रायाणिया-गजी रायाहिराय-गजाधिराज राव-पय (गन्द) रावण-रावण रासह-गसम रासि-राशि राहा-गोमा इति टिप्पणम् रिउ-रिपु रिउपहरण-रिपुप्रहरण रिद्वि-ऋद्धि रिया-ऋच् (वेदपटूक्तयः) रिसह-ऋषभ (प्रथमतीर्थकरनाम) रिसि-ऋषि रिसित्त-ऋपित्व रिसिवअ-ऋषिव्रत रिसीसर-ऋषीश्वर रिछोलि-श्रेणिशब्दार्थ देगी रीण-दीन, श्रान्त इत्यर्थे देगी रुइ-रुचि रुइरहियक-रूचिरहितार्क (रुच्या दीप्त्या प्रच्छादितादित्य इति टिप्पणम् ) रुक्ख-वृक्ष रुक्खिअ-रूक्षित रुज्झ-रुध्धातोः कर्मणि रुट्ट-रुष्ट रुण्ण-रुदित रुद्द-रौद्र रुद्ध-रुद्ध रुप्प-रोप्य रुपिणी-रुक्मिणी रुवत-रुदत् रुसा-रोपेण रुह-रुह् (धातुः) रुहिर-रुधिर रूहत्थल-लह स्थल रुहिरंचाइणि-रुविर अर्चिता रुहिरावलि-रुधिरावलि रुहिरोलवोल-रुधिर+ओल + वॉल (रुधिरेण आर्द्रा इत्यर्थः) रुजिय-जित रंट-गुइत्यर्थे देशी (धातुः) - १५५ - जसहरचरित लंजिया रुंड-इण्ड (कबन्ध) रुंद-विस्तीर्ण इत्यर्थे देशी रुंधण-रोधन रंभ-रुध् (धातुः) रूव-रूप रूववत-रूपवत् रूस-रुष् (धातुः) रेणु-रेणु रेल्ल-शुभ धात्वर्थे देशी रोलिय-भाष धात्वर्थे देशी रेहा-रेखा रेहातियंक-रेखा+त्रिक+अङ्क रोअ-रुद् (धातुः) रोझ-रोझ (प्राणिविशेषः) रोमंचिय-रोमाञ्चित रोमंथण-रोमन्य रोमावलि-रोमावलि रोयत्तण-ऐगित्व रोयाउर-रोगातुर रोर-दरिद्र इत्यर्थे देशी रोरत्तण-दारिद्य रोस-रोष (क्रोध) रोसह- रोषेणान्योन्य घ्नन्तीति टिप्पणम् । सोसर-रोषशील रोहय-रोहित (मत्स्यविशेषः) रोहिय-रोहित (मत्स्यविशेषः) लग्ग-लग् (धातुः) लग्ग-लग्न लग्ग-लग (योगविशेषः) लच्छि-लक्ष्मी लच्छिसहि-लक्ष्मी+सखी लच्छीपियल-लक्ष्मीप्रिय+ल (स्वार्थे ) लन्ज-लजा लना-लजा लडह-सुन्दर इत्यर्थे देशी लट्ठि-यष्टि लड्डुय-लड्डुक ( मोदकादि) लण्ह-लदंग लद्ध-लब्ध लद्धी-लब्धि (प्राप्ति लम-लभ्धातोः कर्मणि लयामंडव-लतामण्डप लयाहर-लतागृह लल-लल् (धातुः) ललणा-ललना ललललिय-चञ्चल इत्यथें देशी ललंत-ललत् लल्ल-अस्पष्टभापीत्यर्थे देशी लल्लक-रौद्र इत्यर्थे देशी ललिय-ललिता ललिया-ललिता लवण-लवण लविय-लपित (उक्त) लह-लभ् (धातुः) लहंत-लभमान लहुय-लघुक लइ-अतिशयार्थेऽव्ययम् (दशी), लोकोक्ताविति तु हेमचन्द्रः । लइ-शीघ्रम् लइअ-गृहीत लइय-गृहीत (व्याप्त इत्यर्थः) लक्ख-लक्षय् (धातुः) लक्ख-लक्ष (सख्या) लक्खण-लक्षण लक्खणाल-लक्षण+आलु (मत्वर्थीयः) लंगूल-लागूल लंघ-लड्घ् { धातुः) लंघिय-लड्डित लंछण-लाञ्छन लंजिया-दासीशद्वाथै देशी - १५६ लंपड शब्दकोशः व न लंपट-लम्पट लंब-लम्ब् (धातुः) लोइय-लोचित लोण-लावण्य लंबत-लम्बत् लोय-लोक लोयण-लोचन लोयत्तय-लोकत्रय लोयालोय-लोकालोक लोल-लोल लोलंत-लोलत् लोलिर-लोलनशील लोहवलय-लोहवलय लोहिय-लोहित लोहियलुद्ध-लोहितलुब्ध वइतरणि-वैतरणी (नरकनदीनाम) लंबिय-लम्बित लंविर-लम्बनशील लाइअ-लात (गृहीत इत्यर्थः) लायण्ण-लावण्य लाल-लाला लालस-लालस लालारस-लाला+रस लावण्ण-लावण्य लाह-लाभ लाहालाह-लाभालाम लित्त-लिप्त लियअ-लात (गृहीत) लिह-लिस् (धातुः) लिहाव-लेसम् (धातुः) लिहिय-लीट, लिसित लिंग-लिन (चिह) लिंगि-लिङ्गिन् (ब्रह्माचारीत्यर्थः) लिंत-लात् (लाधातोः शत्रन्तम् ) लीण-लीन लीला-लीला लअ-सून लुट्टण-लुट्टन लुण-लू (धातुः) वइधव्व-वैधव्य वइयर-व्यतिकर वइर-पैर वइराअ-वैराग्य वइराड-वैराट वइरि-वैरिन् वइरिमारि-वैरिमारिणी वइसवण-वैश्रवण (कुबेर) वइसाह-वैशाख लुद्धअ-लुब्धक (व्याध इत्यर्थः) लुल्लका-यमदूत इत्यर्थे (1) लंचण-लुचन ले-ला (धातुः) लेप-लेप (कलास्वन्यतमा) लेप्प-लेप (वर्णादिः) लेव-लेप लेसा-लेल्या लोअ-लोक वउ-व्रत वउत्थ-व्रतस्थ वक्खाण-व्याख्यान वग्ग-वर्ग ( (समूह) वग्गुरिया-वागुरा (मृगबन्धनी रज्जु) वग्ध-व्याघ्र वच्छ-वत्स वच्छ-वक्षस् वच्छराअ-वत्सराज (पूर्वकवेर्नाम) वच्छल-वत्सल वच्छल्ल-वात्सल्य वज्ज-वज्र वज-वर्जय् (धातुः) जस....२० - १५७ जसहरचरिउ ववहर वज्ज वत्त-वृत्त वत्त-वक्त्र वत्त-वार्ता वज-वाद्य वजअ-वाद्य(क) वन्नणिहाअ-वजनिघात वजमाण-वाद्यमान वजर-कथ् इत्यर्थे देशी (धातुः) वन्जावय-वादय् (धातुः) वट्ट-वृत् (धातुः) बट्टण-वर्तन वझावयास-बाह्य अवकाश (नगरवाह्यप्रदेश इति टिप्पणम्) वट्टिय-वर्तित (आवर्तित, अभ्यस्त इत्यर्थः) वड-वृध् (धातुः) वड्डमाण-वर्धमान ( चतुर्विंशतीर्थकरनाम) बमाण-वर्धमान वडिअ-वर्धित वडिय-वर्धित वण-वन वण-व्रण वणदेवया-वनदेवता वणमकड-वनमर्कट वणयर-वनचर वणयरि-वनचरी वणलच्छी-वनलक्ष्मी वणवाल-वनपाल वणि-वणिक् वणिअ-कदर्थित इति टिप्पणम् वणिय-णित (जर्जरित इत्यर्थः) वाणिवइ-वणिक्पति वणिवर-वाणिग्वर वण्ण-वर्णय् (धातुः) वण्ण-वर्ण वण्णण-वर्णन वण्णवंत-वर्णवत् वण्णुकड-वर्णोत्कट वत्त-वार्ता (कृषिवाणिज्यपशुपालन वार्ता इति टिप्पणम्) वत्थ-वस्त्र वत्थ-वस्तु वत्थुबंध-वस्तुबन्ध वम्स म-वर्मन्, मर्मन् चम्मह-मन्मथ वम्मीसर-मदन इत्यथें देशी वम्मुरिय-वोल्ट्ररित (मर्मणि विद्ध इत्यर्थः) वयण-वचन वयण-वदन वयणभंग-वचनभद्ग (सादस्ति स्यानास्ती- त्यादिसप्तभनीप्रतिपादकवचनप्रकार इति टिप्पणम् ) वयणुल्ल-वदन + उल्ल (स्वार्थे ) वर-वर (श्रेष्ठ) वरइत्त-वरीता (पतिरित्यर्थः) वरचेल-वर + चेल (वस्त्र) वराई-वराकी वराय-पराक वरिट्ट-वरिष्ठ वरिस-वर्ष (धातुः) वरिस-वर्ष (संवत्सर इत्यर्थे ) वरिसोण-वर्ष + ऊन वल-वल् चलने (धातुः) वल-युक्त इत्यर्थे २-२-११. वलय-पलाका वल्लह-वल्लभ वल्लह-वल्लम (राष्ट्रकूटनरेन्द्राणा विरुदेवन्यत- मम् । कृष्णमहाराजस्य नामान्तरमिति टिप्पणम्) वल्ली-वल्ली ववहर-वि + अव + ह (धातुः) - १५८ यवहारकूट शब्दकोशः बाह ववहारकूड-व्यवहारकूड (कटव्यवहार इत्यर्थः) वविय-उप्त वस-वा वस-वम् (धातुः) वस-वसा ( रसादिशरीरधातूनामन्यतमा १-१६-९.) वसकदम-वमा+कर्दम वसचोप्पड-घसावलिप्त इत्यर्थे देशी वसण-पसन वसह-वृषभ वसहि-वसति चना-बना वसातुप्पगिल्ल-बमाघृतभक्षक वमुह-वसुधा वमुहाहिअ-वसुधा + अधिप वसुधर-वनुधरा (पृथ्वी) वह-वध् (धातु') वह-वह् (धातुः) बहु-वयू वाउ-वायु वाएसरि-वागीश्वरी वाड-वाट (वसतिस्थानम् । मराठी-वाडा) वाणर-वानर वाणी-वाणी वाय-वात वायडउल-गुककुल इत्यर्थे देगी वायरण-व्याकरण वाय-वाचम् (धातुः) वाया-वाच् वारण-वारण वारवार-वारवारम् वारिअ-वारित वारीयर-वारिचर (जलचर) वाल-वाल (केश) वाल-व्याल वालपूलोलि-बालपूलाः केशपुञ्जास्तेपामोलिः पतिरिति टिप्पणम् वालुयपह-वालकाप्रभ (तृतीयनरकनाम) वावग वामन वावर-वि+आ+Y (धातुः) वावरिअ-व्यापार वाचार-व्यापार वावी-वापी वास-व्यास वास-पास (वसतिः) वासअ-चर्पति॒सबन्धि (दूर्वाटिकम्) वासट्टिविह-द्विपष्टिविध वासणा-वासना वासर-वासर (दिनम् ) वासवसेण -वासवसेन (कविनामविशेषः) वासिअ-वासित वासुएअ-वासुदेव वासुपुज्न-वासुपूज्य (द्वादशतीर्थकरनाम) वाह-बाप वाह-वाहय् (धातुः बंक-वक वंच-पन्न् (धातु.) बंत्रण-यजन चंचणपर-वतनपर बंछ-वान् (धातुः) बंछिअ-वान्छित वंझ-बन्ध्या चंठ-गुफवृक्ष इत्यर्थ देशी (मराठी वटलेला) चंदण-चन्दन वंदणिल-वन्दनीय बंदिय-वन्दित वंभचेर-ब्रह्मचर्य बम-बम (कुल) वा-या (धातुः) वा-टनार्थव्ययम् वाअ-बात बाउत्त-वादित - १५९ वाह जसहरचरिउ वित्यिण्ण विजावञ्च-वैयापृत्य (व्यापारः सेवादिक वे. त्यर्थः) वाह-व्याध वाहण-वाहन वाहायर-बाधाकर वाहि-व्याधि वाहिज-वध्धातोर्णिजन्तात् कर्मणि वाहिय-वाहित वाहियालि-वाह्यालि (वाह्यमार्गः, वाहनाना मश्वगजादीना शिक्षार्थे परिकल्पितः प्रदेश विशेषः । बाप्पधारेत्यर्थान्तरम् ) वाहिल्ल-व्याधि+इल (मत्वर्थीयः) वि-अपि (स्वरात्परे एव) विइण्ण-वितीर्ण विउल-विपुल विउस-विद्वस् विउससह-विद्वत्समा विओय-वियोग विओयण-वियोजन (वियोग) विक्रमसंवच्छर-विक्रमसवत्सर विक्किर-वि+कृ (क्षरणे धातुः) विक्खित्त-विक्षिप्त (विहित) विगव्व-विगर्व विग्गह-विग्रह विग्गहवंत-विग्रहवत् विग्धमहाणइ-विन महानदी विचित्त-विचित्र विश्व-वमनित्यर्थे देशी विच्छडु-विच्छद विच्छाय-विच्छाय (निस्तेजा इत्यर्थः ) विच्छिण्ण-वि+छिन्न विच्छुल-विच्छुर विच्छलिय-विच्छुरित विच्छोह-विक्षोभ विजय-विजय विज-विद्या विज-वैद्य विनाहर-विद्याधर विजिज्जत-वीप्यमान विजु-विद्युत् विजुपुंज-विगुत्पुञ्ज विजुलिय-विद्युत् विज्जविराइय-विद्युद्विराजित विट्ठल-अपवित्रार्थे, अस्पृश्यसंसर्ग वा देशी विट्ठलअ-अपवित्रार्थे देशी विट्ठर-विष्टर (आसन) विड-विट विणअ-विनत विणअ-विनय विणडिअ-वञ्चित इत्यर्थे देशी विणविय-विजप्त विणास-विनाश विणासयर-विनाशकर विणिउत्त-विनियुक्त विणिग्गम-वि+निर्गम विणिग्गय-विनिर्गत विणिवारिय-विनिवारित विणिवेइय-विनिवेदिन विणिय-विनिहत विणु-विना विण्णाण-विज्ञान विण्हु-विष्णु विणोअ-विनोद विणोय-विनोद वित्त-वित्त वित्त-वृत्त वित्थर-वि+स्तृ (धातुः) वित्थरिअ-विस्तृत वित्थार-विस्तार वित्थरिअ-विस्तारित वित्थिण्ण-विस्तीर्ण विजविउल-विद्याविपुल - १६० विदुम शब्दकोशः विलोहिय विहुम-विद्रुम विद्ध-विद्ध विद्धंसण-विध्वसन विद्धंसिय-विध्वस्त विद्धि-वृद्धि विद्धी-विद्या विप्प-विम विप्पागम-विप्र+आगम (वेद इत्यर्थः) विप्पिअ-वि+प्रिय (हिंसादिकर्म) विप्पिय-विप्रिय विप्पोसहि-विौषधि (1) योगिना प्रभाव- विशेषेण मूत्रविष्ठादिभ्यो निष्पाद्यमाना- न्यौपधानि) विप्फुर-वि+स्फुर् (धातु.) विम्भम-विभ्रम विभयंत-विभावयत् विभिण्ण-विभिन्न विमह-विमर्द विमल-विमल (प्रयोदगतीर्थकग्नाम) विमल-विमल विमलवाहण-विमलवाहन (राजो नामविशेषः) विमाण-विमान (स्थाटिकम) विमाणय-विमानक (गृह प्रासादो या) विमीस-वि+मिश्र विमुका-विमुक्त वियकिअ-वितर्कित वियक्खण-विचक्षण वियइ-विकट वियर-वि+चर (धातुः) वियर-वि+तु दाने (धातुः) वियराल-विकराल वियल-वि+गल् (धातुः) विलिय-विगलित वियलियसंक-विगलिशतक वियस-वि+कस् विक्रमने (धातुः) वियंभ-वि+जृम्म् (धातुः) वियार-विकार वियारणक्खम-विटारणक्षम वियारभग्ग-विकारमग्न (व्याधित इत्यर्थः) वियारविज-विचारविद्या (आन्वीक्षिका) वियारिअ-विचारित वियारिअ-विदारित विरव्य-विरचित विरइयकाणिय-विरचित + कर्णिका (कुन्ता- दीनामग्रभागः) विरत्त-विरक्त विरत्त-विशेपेण रक्त १.१४.३ विरजइअ-विरजित विरम-विराम विरहिअ-विरहित विरल-विरल विरस-वि+रस् शब्दे (धातुः) विरस-चिरस विरह-विरह विराम-विराम (नाग) विलअ-विलय (विनाश) विलआ-वनिता इत्यर्थे देशी १-१४-१० विलग्ग-विलग्न विलस-वि+लस् (धातुः) विलसिअ-विलासित विलंवंत-विलम्बमान विलास-विलास विलित्त-विलित विलिहिय-विलिखित विलिहिय-विलीढ विल्लि-बल्ली विलीण-विलीन विलुका-विलुप्त (1) विलुलिय-विलुलित विलंच-वि+लुम् (धातुः) विलोल-विलोल (चञ्चल) विलोहिय-विलोभित १६१ विव जसहरचरित विंद विव-इवार्थेऽव्ययम् विहडाफड-विस्फुरित इत्यर्थे देशी विवजिअ-विवर्जित विहत्ति-विमक्ति विवणम्मण-विमनस्क (1) विहत्तिय-विभक्ति (क) विवण्ण-विपन्न विहलंघल-विवल इत्यर्थे देशी (अचेतन विवरीअ-विपरीत इति तु टिप्पणम्) विवरीय-विपरीत विहव-विभव विवरेर-विपरीत विहवत्तण-विभव विवरेर-विवरणकार विहंग-विहङ्ग विवंच-वि+मुच् धात्वर्थे विहज-वि + मञ् (धातुः) विवाय-विपाक विहंडण-विखण्डन विवाह-विवाह विहंडिर-विभण्ड+हर (शीलायें) (कलहगील विविह-विविध इत्यर्थः) विविहासण-विविध + आसन विहा-वि + भा (धातुः) विस-विष विहाण-विधान विसअ-विषय (देशः भोगादिवा) विहार-विहार विसज्जिय-विसर्जित विहाव-वि + भावय् (धातुः) विसण्ण-विषण्ण विहावरि-विभावरी विसदस-विषदश ( सर्प इत्यर्थः) विहाविअ-विभावित (कथित इति टिप्पणम्) विसमी-विपमा विहि-विधि विसय-विषय विहिअ-विहित विसयम्म-विश्वकर्मन् विहिय-विहित विसयासत्त-विषयासक्त विहियछाय-विहितच्छाय (विहितप्रसाद विसरिस-विसा इत्यर्थः) विसवेअ-विषवेग विहिवसभग्ग-विधिवाभम (कर्मवशात्प्रेरित- विससत्ति-विषशक्ति मिति टिप्पणम्) विसहर-विषधर ( सर्प) विहीण-विहीन विसहरारि-विपधरारि (नकुल इत्यर्थः ) विहुणिय-विधूत, विधूनित विसहिय-विषय, विसोढ विहुर-विधुर (विकल इत्यर्थे ) विसाणय-विषाण (क) विहुर-विधुर (दुःख इत्यर्थे ) विसायघत्थ-विश्वासघातिन् विहुरवडण-विधुरपतन (दुखपतन) विसाल-विशाल विहूई-विभूति विसुद्धि-विशुद्धि विहूसण-विभूषण विसेस-विशेष विहूसिय-विभूषित विसेसिय-विशेपित विझ-विन्ध्य विहअ-विभव विझसिरि-विन्ध्यश्री विहट्टिय-विघट्टित विंद-वृन्द १६२ विंभल शब्दकोशः सग्गत्य विमल-विह्वल विभिय-विस्मित वीणंत-वीणयत् (वादयन् इत्यर्थे ) वीणा-वीणा वीणारव-वीणारव वीयराअ-वीतराग वीर-वीर वीरवइ-वीरवती (स्त्रीनामविशेषः) वीसरिय-विस्मृत वीसल-चीसल (पुरुपनामविशेषः) वीसास-विश्वास वुक्करंत-भू भू इति श्वशब्दं कुर्वत् वेल्लि-वल्ली वेल्ली-वल्ली वेव-वेप् (धातुः) वेविर-वेपनगील वेस-वेप वेहविअ-विवलित (रोपितोऽनुरजितो वेति टिप्पणम्) वेहाविय-वि + भावित वोकय-वृक्क (शरीरभागः) वोल-आर्द्र इत्यर्थे देशी वोलीण-व्यतिक्रान्त इत्यर्थे देशी वोल्लिअ-आर्द्राकृत ( अभ्यक्त) व्व-इवार्थेऽव्ययम् (स्वारस्वरादुत्तरमेव प्रयुज्यते) बुद्ध-वृद्ध बुद्धत्तण-वृद्धत्व वृड्डहूव-वृद्ध + भूप वृत्त-उक्त सइ-सती सई-स्वयम् सइरिणि-स्वैरिणी सउच्च-गौच सउण-कुन सउण्ण-सपुण्य, १-२५-१० सउहयल-सौधतल सउहलय-सौघतल वूह-व्यूह वेअ-वेद वेइय-वेदित (निवेदित) वेउव्वणा-विकुर्वणा (विकार) वेढण-वेष्टन वेढिअ-वेष्टित वेण-वेन (नृपविशेपः) वेणु-वेणु (वंश) वेयण-वेदना वेयमूढ-वेदमूढ वेयवंत-वेदवत् वेयागम-वेद + आगम वेयालअ-वेताल (क) वेयालकाल-विकाल + काल (संव्यासमयः । वेतालादिभ्रमणकाल इति तु टिप्पणम् ) वेयालिय-वैतालिक वेर-वैर वेरमण-विरमण (विराम) वेल-वेला वेलपडिच्छिअ-वेला+प्रतीष्ट सकलत्त-स्व+कलत्र सकहंतर-स्व + कथान्तर सकंत-स्व+कान्ता सक्क-गक् (धातुः) सक्क-गक सकर-शर्करा सक्करपह-शर्कराप्रभ (द्वितीयनरकनाम) सकुंतलिय-स + कुन्तल (सुकेगीत्यर्थः) सकोह-सक्रोध सखंड-स + खण्ड सक्खीयर-साक्षिचर सग्ग-स्वर्ग समगत्य-स्वर्गस्थ १६३ सगसिर जसहरचरित सम सत्ततच्च-सत्य तथ्य सत्तभेय-सप्तभेद सत्तभोम-सप्तभौम (सप्तभूमिवह ) सत्तम-ससम सत्तमअ-सप्तम (क) सत्तर-सप्तति सग्गसिर-स्वर्गशिरस् सम्गापवग्ग-स्वर्गापवर्ग सगुण-स+ गुण सगुण-ख+गुण सगुणोह-सद्गुणोध सञ्च-सत्य सञ्चमूल-सत्यमूल सञ्चवंत-सत्यवत् सञ्चविअ-साक्षात्कृत, दृष्ट सञ्चसंध-सत्यसघ सञ्चित्त-सचित्त (सचेतन इत्यर्थः) सचेयण-सचेतन सचेलअ-सचेल(क) सच्चेयण-सचेतन सच्छ-स्वच्छ सच्छाय-सच्छाय सच्छिकर-साक्षीक दर्शने (धातुः) सज्ज-सज (सद्यः) सजण-सजन सजिअ-सजित सब्जीअ-सजीव सजोह-सयोध सझाण-स्व ध्यान सड-शातय् (धातुः) सत्तविह-सप्तविध सबसील-सत्यगील सत्तंग सप्ताग(स्वाम्यमात्यादिराज्यानानीत्यर्थः) सत्थ-शास्त्र सत्थ-साथ सतामस-सतामस (अनान इति टियणम्) सत्ति-शक्ति सत्तितय-शक्तित्रय (प्रभावोत्साहमन्त्ररूपा राशस्तितः शक्तयः) सतुंड-सतुण्ड सत्तु-शत्रु सथति-स्व+स्थान सदय सदय सदल-उदल (सपत्र) सद-शद्व सदय-शद्ध (क) सद्दल-सदल (नीलपत्रयुक्त इति टिप्पणम) सद्दवंत-शद्ववत् सहवेह-शद्ववेध सद्दहिय-शद्वित सद्दसण-सद्दर्शन सडूल-शार्दूल सधअ-सध्वज सपरिग्गह-सपरिग्रह सप्प-सर्प सम्भाव-सद्भाव सम्भावपयासण-सद्भावप्रकाशन सम-शम सम-सम समअ-सममित्यर्थेऽव्ययम् सडंग-षडङ्ग सडिय-शातित सढ-शठ सढत्तण-शठत्व सणाह-सनाथ सणि-शनैः सणिद्ध-स्निग्ध सण्ण-सज्ञा सण्णा-सशा सण्णि-सशिन् (सचेतन इत्यर्थः) सह-लक्ष्ण सत्त-सप्तन् - १६४ समक्खयं शब्दकोशः सर समक्खयं-समश्च (क) समग्ग-समग्र (सपूर्ण) समच्चिय-पम् + अर्चित समन्जिय-सम् + अर्जित समतणकंचण-समतृणकाञ्चन समत्त-समात समत्थ-समर्थ समाप्पिय-समर्पित समभसिअ-सम् + अभ्यस्त समभावण-समभावना समय-समय ( व्यवस्थेत्यर्थः) समर-शवर २२९६. समरउल-शवरकुल समरट्ट-स+मरट्ट (मगर्व इत्यर्थे देशी) समल-स+मल (पापयुक्त) समवयस-समय स् समसरिस-सम + सहा समंजस-समञ्जभ समीह-सम्+ईड् (धातुः ) समीहिअ-समीहित समुग्घायंत-सम्+उद्+जिघ्रत् समुज्जल-सम्+उज्ज्वल समुद्द-समुद्र समुद-स+मुद्रा (लक्षगवर इत्यर्थः) समुद्धरिअ-सम्+उद्+वृत समुभव-समुन्द्रव समुड-समुण्ड समूससिअ--समुच्छ्रमित सह-सम्' समोड-सम् + मोटय् (धातु ) सम्मत्त-सम्यक्त्व सम्मइंसण-मायग्दर्शन सम्मय-साम्य, सम्यवत्र सय-शत सयगुणिय-गतगुणित सयज-ख+ कार्य सयड-ठाकट सयण-गयन (गृहमिति टिप्पणम् ) सयण-स्वजन सयणु-सतनु सयणोअर-गायन + उदर (मायाम य इत्यर्थ ) सयदल-गनदल (पद्म इत्यर्थ.) सयमह-गतमन (इन्द्र सयर-स्कर सयरायर-सचराचर सयल-सकर सयवत्त-ठातपत्न सयासि-सकागे सयंभु-स्वयभू सयंभुअ-स्व + भुन सयंवरमंडव-स्वयंवरमण्डप सया-सदा सर-सु (धातुः) समाइठ्ठ-समादिष्ट समागय-समागत समागयचेयण-समागतचेतन (लब्धचेतन इत्यर्थः) समाण-समान (सममित्यर्थ ) समाणत्त-सम्+आजप्त समाया-सम्+आगता समाया-स+माया (मायायुक्ता) समावरिय-समावृत समाहि-समाधि समिउ-सम समियमअ-शमितमद समिच्छ-सम्+हप् (धातुः ) समिच्छिय-सम्+इम् समिद्ध-समृद्ध समिय-गामित समीर-समीर समीरण-समीरण जस....२१ - १६५ सरवर-सरोवर त्यर्थः) सर जसहरचरित सह सवण-श्रवण (कर्ण) सर-स्वर सवत्ति-सपत्नी सर-शर सर-सरस् सवत्तिविरोह-सपत्नीविरोध सरज-ख+राज्य सविणय-सविनय सरढ-सरठ (सरीसृरविशेष. (मगठी सरहा) सवित्तोपउत्त-स्व+वृत्त+उपयुक्त (स्ववृत्तान्त सरण-गरण सहितमित्यर्थः) सरण-गरण (रक्षितृ इत्यर्थे) सवित्थर-सविस्तर सरणि-सरणि (मार्ग) सविन्भम-सविभ्रम (सावनि, अथवा, सरय-सरजस् सह वीना पक्षिणा भ्रमः भ्रमणैः वर्त- सरल-सरल मानानि इति टिप्पणम्) सरलामल-सरल+ अमल सविन्भम-सविभ्रम (कामोद्रेकवनितभ्रयुगा- दिभ्रमणमिति टिप्पणम) सरस-सरस (रमयुक्त) सवियाणिया-स+विजानती (विज्ञानवती. सरस-सरस (स्निग्ध इति टिप्पणम् ) सरसइणिलय-सरस्वतीनिलय (पुग्पदन्त सवियार-सविकार (विकृत इत्यर्थः) कवेविरुदेष्वन्यतमम्) सविस-सविप सरह-शरम (अष्टापद. प्राणिविशेषः) सविसाण-स्वविषाण सरहंस-सरोहस सविसेस-सविशेष सरंतगव्व-सरद्गर्व (१) (गर्वयुक्त इत्यर्थ.) सरास-कथ् इत्यर्थे देशी सव्वगासि-सर्वग्रागिन् सवण्ण-सर्वन सरासण-शरासन (धनुः) सव्वंग-सर्वाङ्ग सरि-सरित् सव्वोसहि-सोपवि सरिगमपधणी-गीतस्यस्वरश्रेणि सस-स्वस् सरिविवर-सरिद्विवर ससय-शशक सरीर-शारीर ससहर-गगधर (चन्द्र) सरूअ-स्वरूप ससहरमुही-गगधरमुखी (चन्द्रमुखी) सलह-लाथ् (धातु) ससंघ-ससंघ (संघसहित) सलहण-श्लाघन, श्लाघा ससि-शाशेन् सलिल-सलिल ससिमुह-गशिमुख सलीलगइ-सलीलगति ससिर-स्वशिरस् सल्ल-शल्य ससिलग्ग-गशिलम सल्लेहण-सलेखन (तपोविशेषः) ससी-शशिन् सल्लेइणय-समेखन(क) (तपोविशेष) सह-शोभाया देशी (धानु ) सव- (धातु) सवडंमुह-समुख इत्यर्थे देशी सह-सद् (धातु.) सह-सभा सव्व-सर्व सरासइ-सरस्वती सह शब्दकोशः संढ संग-संग सगम-संगम सह-सह ( अव्ययम् ) सहउयरी-सहोदरी सहज-सहज सहड्ड-स+अस्थि सहमज्झ-समामध्य सहमंडव-सभामण्डप सहयर-सहचर सहंत-महमान सहाय-सहाय सहाव-स्वभाव सहास-सहस्त्र सहास-सहास, स + भास् (सगोभ इत्यर्थः) सहिअ-महित सहिय-सह्य सहिय-सहित सही-सखी सहु-सह (अव्ययम् संक-शङ्क (धातुः) संकड-संकट सकडिल्ल-सकट + इल ( स्वार्थे ) (व्यात इत्यर्थे ) संकमिय-संक्रान्त सका-शङ्का संकाराविय-संस्कारित संकास-सकाश संकुल-सकुल संकेयत्थ-सकेतस्थ संख-शख सखदीव-शंखद्वीप सखल-शृखला सखला-शृखला संखाण-सख्यान संखीणगत्त-सक्षीण गात्र सखेव-सक्षेप सखोहिय-सक्षोभित संगर-सगर (युद्ध) संगह-सम् + ग्रह (धातुः) संगहण-संग्रहण संगहिय-सम् + गृहीत संगामरंग-सग्रामरक्ष संगिल-सम् + गृ (धातुः ) संघ-संघ (जैनधर्मानुयायिना वर्गः) संघट्ट-सबट्ट संघट्टण-संघटन संघाअ-संघात संघाय-सघात (गात्रमित्यर्थः) संघार-सम् + हयातोर्णिजन्नम् संघारअ-सहारक सघारिअ-सहारित (मारित इत्यर्थः ) संचलिअ-सचलित संचार-सचार सचि-सम् + चि (धातुः) संचिय-सचित संचितिय-सचिन्तित संछइअ-सछन्न संजइअ-सयतिक संजम-सयम संजाय-संजात संजायअ-सजात (क संजुअ-सयुत सजुत्त-उयुक्त सजोइय-संयोजित सजोयमेअ-सयोगभेद सझ-सध्या संझा-सच्या संठव-सम् + स्थापय् (धातुः) सठिय-मस्थित संड षण्ड (वृन्द संढ-पण्ड । १६७ जसहरचरित सामल सणास 1 .. सणास-सन्यास सणिसण्ण-सनिपण सणिह-सनिभ सणिहिय-सनिहित सत-शान्त सत-सत् ( असधातो. शत्रन्तम् ) सतअ-सतत संतत्त-सतप्त सताण-सतान सताव-सताप संताविअ-सतापित संति-शन्ति (पोटशनीकरनाम ) संति-शान्ति संवियरि-शान्तिकरी सतुट्ठमण-सतुष्ट मनस संतोस-सतोप सथुअ-सस्तुत सदाणिअ-सदानित (बद्ध इत्यर्थ.) सदाणिय-सदानित सदेह-सदेह संधाण-सधान सधि-सधि सपइ-सपद् सपइ-सप्रति सपज-मम् + पद् (धातु) सपत्त-समाप्त संपत्तिअ-मप्राप्त सपया-सपद् सपासिअ-सप्राशित संपिच्छ-सम् + प्र + ईस् (धातु.) सपुण्ण-सपूर्ण सपुण्णकाअ-सपूर्णकाय संफास-सस्पन संबोहयारी-सबोधकारी संबोहिअ-सबोधित संभव-सभत्र (तृतीयतीर्थक्रनाम ) सभव-समव (ससार इति टिपणम् ) संभव-मम्+भू ( धातु.) संभाल-सम् + भालय निरीक्षणे ( यातु ). संभविअ-सभूत सभासण-सभापण सभु-शभु संम-श्रम संमह-समर्द संमद्दण-समर्दन समुह-समुख संवर-सवर सवर-वर (पशुविशेष.) संवरवेउल्ल-संवरवेगवत् संवेयायर-सवेगकर संसअ-शय ससयार-सस्तार ससर-सम् + स. (धातु.) संसार-ससार संसारसरणि-ससार + सरणि (मार्ग.) ससिद्धी-ससिद्धि संसिंचिय-ससिञ्चित ससेविय-ससेवित सा-सा (लक्ष्मी) साअ-स्वाद ३३६.९ साइअ-स्वादित साइणि-शाकिनी (प्रेतपिशाचादिस्त्रीविशेप.) सागार-स+ अगार साडी-शाटी ( मराठी साडी) साण-श्वन् साणंदभाअ-सानन्दमाज (सानन्द इत्यर्थ.) साम-श्याम (वर्ण) सामण्ण-सामान्य सम-थ-सामर्थ सामरि-शाल्मली (वृक्षनाम) सामल-श्यामल संभरिय-सस्मृत १६८ - सामलिया शब्दकोशः सिप्पिसंपुड सामलिया-श्यामला सामन्त-सापन्त सामाइय-सामयिक (आचारविशेषः) सामि-स्वामिन् सामिणी-स्वामिनी सामी-स्वामिन् सामीवय-सामीप्य सामुद्द-सामुद्रिक (लक्षणशास्त्र) सायर-मागर सायरसम-सागरोपम(आयु प्रमाणम्) सार-सार (स्थिराग) सार- सार (श्रेष्ठ) सारणि-(मरणि) (प्रवाह इत्यय) सारमेअ-सारमेय सारस-सास (जलचारिपभिविशेष:) सारंग-सारङ्ग सारिच्छ-सदृश्न सारिच्छचक्खु-सदृक्षचक्षुप् सारिस-सहा साल-श्याल सालंकारवह-स+अलकार-पथिन् (सालकारे- त्यर्थः) सालि-स+अलि (सभृङ्गमित्यर्थः) सालि-गालि (धान्यविशेषः) सालिछेत्त-शालिक्षेत्र सालूर-झालर (भेक) सावअ-श्रावक सावय-श्रावक सावयवअ-श्रावकवत सावयवइ-श्रावकपति ( साधुरित्यर्थः) सावयास-सावकाग सास-श्वास सासण-गासन सासय-शाश्वत साह-श्रावय (कथ्धात्वर्थे देगी धातुः) साहण-साधन साहस-साहस साहरण-स+आभरण साहसिअ-साहसिक साहा-शाखा साहामय-शाखामृग (वानर इत्यर्थः) साहार-स+आधार साहार-सहकार (आम्रवृक्ष) साहिअ-श्रावित (कथित) साहिणाण-स+अमिजान साहिलास-साभिलाप साहु-साधु सिक्ख-शिक्ष् (धातुः) सिक्ख-शिक्षा ( उपदेशः) सिक्खा-शिक्षा (दीक्षा) सिक्खिअ-शिक्षित सिगिरि-नीलवर्ण इत्यर्थे देशी (1) सिग्घ-शीघ्र सिजमाण-पच्यमान इत्यर्थे देशी (मराठी- शिजणारा) सिनंत-पच्यमान सिटु-शिष्ट सिट्ठि-श्रेष्ठिन् सिट्ठि-सृष्टि सिट्ठिसंहारकारि-सृष्टिमहारकारिन् सिढिल-शिथिल सिणिद्ध-स्निग्ध सिह-पक्क सित्त-सिक्त सिद्ध-सिद्ध सिद्धइरि-सिद्धगिरि (क्षेत्रनाम) सिद्धंत-सिद्धान्त सिद्वि-सिद्धि सिपा-शिमा (नदीनाम) सिप्पिउड-शुक्तिपुट सिप्पिसंपुड-शुक्तिसपुट सिप्पीर जसहरचरित सिग-वृन सिंगग्ग-वृङ्गार (नग्कालदेग.) सिप्पीर-धान्यादीना तुमित्यर्थे देनी (पलाल इति टिप्पणम् ) सिमिसिम-वयनशनानुरणे देशी (गत ) सिय-सित (शुवर्ण) लियछत्त-सितच्छन सियमेरिआ-श्रीमविता(मत्रीका सुन्दरेत्यर्थ) सिगार-शृङ्गार सिगि-ऋगिन् सिचाल-गाल सिर-शिरम् सिरि-श्री सिरिजलस-श्रीकलन सिरिपोमिणी-श्रीपगिनी (शोभायु कमल- सर इत्यर्थ ) सिरिमंत-श्रीमन् सिरिवइ श्रीपति (वणिजो नामविशेष) सिरिवंत-श्रीमत् सिल-शिला सिलणाव-शिलानी सिला-शिल सिलायल-शिलातल सिलोह-शिला भोव (ममुह) सिव-शिव सिव-शिवा (गाल्नी) सिवसत्यवस-निवशास्त्रवश सिविणअ-स्वप्न (२) सिविणयसमान-वप्नसमान सिविचा-शिविका (गनविशेष ) सिसु-निशु सिसुत्तण-शिगत सिसुससि-गिनुशाशिन् (प्रनिपञ्चन्द्र.) सिह-शिला सिहर-शिखर सिहि-निखिन् (अग्नि ) सिहि-गिजिन् (मयूर ) सिहिथूमालि-शितिधूमावलि सिहिसाण-शिजिन्वन् सिहिसिह-शिखिगिजा (अग्निज्वाला) सिंचिअ-सित सिंदूर-सिन्दूर सिंधु-सिन्धु (देशनाम) सिंधुविसय-सिन्धुविण्य (देग) सिंम-लेपन् सीमंतिणी-तीमन्तिनी सीमावड-सीमावर सीय-रीता सीयर-सीक (धान) सीयल-शीतल सीयल-गीतल (दशमतीर्थकरनाम) सीयल-शीतल सोयलिय-जीतलित (संसाग्दु स्वसोनकर इति टिप्पणम्) सीचार-सीतार सील-शील सीस-गास्थातो. कर्मगि सीस-शिष्य सीसत्त-दिव्य व नाह-सिंह सीसहल-सिंह+गाल सीहासण-सिंहासन सु-शु (धातु ) सु-तु (तुष्ट इत्यर्थे ) सुअ-श्रुत सुअ-तुत सुअ-सूप सुअवट्टण-श्रुतवतन सुअन्वत्त- सुअव्यक्त (गूढ इत्यर्थ ) . सुइ-शुचि सुइ-श्रुति - १७० सुइ8 शब्दकोशः सुरपुरवि सुइट्ठ-सु+इट सुइरु-सु+चिरम् सुकइकह-सुकवि + कथा सुकय-सुकत सुकुंतल-सु+कुन्तल (केश) सुकियहल-सुकृताल सुक्क-शुक्र सुक्क-शुक्ल सुक्कड-शुष्क इत्यर्थे देशी सुक्कलेस-शुक्ललेव्यायुक्त सुक्ख-शुक सुक्ख-सौख्य सुक्खणिहि-सौख्यनिधि सुखंचिय-सु+खलित सुगय-सुगत सुच्छाय-सुच्छाय सुज-सूर्य सुज्झ-शुध् (धातुः) सुदलिल्ल-सुदल+इल्ल (मत्वर्थीयः सुदीण-सु+दीन सुटुण्णिरिक्ख-सुदुनिरीक्ष्य सुद्ध-शुद्ध सुद्धोयण-शुद्वौदन सुद्धमाअ-शुद्धभाव सुद्धमइ-शुद्धगति मुद्धसई-शुदसती सुपसण्ण-सुप्रसन्न सुपसत्य-सुप्रशस्त सुपसिद्ध-सुप्रसिद्ध सुपहाण-सुप्रधान सुपहाय-सुप्रभात सुपास-सुपा ( सप्तमतीर्थकरनाम ) सुपासगत्त-सुपार्श्वगात्र (गोभने पार्श्व गत्र च यस्येति टिपणम्) सुपुन-सुपज्य सुपुसिय-सु+पुसिय (मार्जित इत्यर्थे देशी। मराठी-पुमणे) सुप्पहाअ-सुप्रभात सुमइ-सुमति (पञ्चमतीर्थकरनाम ) सुमइ-सुमति सुमण-सुमनस् सुमर-रम् (धातुः) सुमरण-स्मरण सुय-शुक सुय-श्रुत सुय-सुत सुयण-सुजन सुयपय-श्रुतपद सुया-सुता सुर-सुर सुरकामिणी-सुरकामिनी सुरगणिया-सुर+गणिका (अप्सरेत्यर्थः) सुरधणु-सुरधनु सुरपुरंघि-सुरपुरन्ध्री सुढिय-दुःखित इत्यर्थे देशी सुण-श्रु (धातुः) सुण-श्वन् सुणह-शुनक सुणहुल्लअ-शुनक+उल्लअ ( स्वार्थे ) सुणिय-श्रुत सुणेह-सुस्नेह सुण्ण-शून्य सुण्ड-स्नुपा सुण्हा-स्नुपा सुत्त-सुप्त सुत्त-सूत्र सुत्थिय-सुस्थित सुद-श्रुत सुदच्छ-सुदक्ष सुदत्त-सुदत्त (मुनिनाम) - १७१ रय सुहि-सुहृद् जसहरचरिट মুন सुरय-सुरत सुहकम्म-शुभकर्मन् सुरवइ-सुरपति मुहचरिय-शुभचरित सुरवइदिसि-सुरपतिदिग् ( प्राचीत्यय ) सुहजोअ-शुभयोग (कार विशेष ) सुरसरि-सुरमरित् (गङ्गा) सुहजोड-शुभज्योतिम् सुरसुअ-सुरसुत सुहड-भट सुरहर-सु-गृह (देवालय) सुहह-सुभद्र सुरहि-पुरभि सुहधम्मोटअ-शुभवोदय सुरहिय-सुरभित सुहम-सूक्ष्म सुरही-सुरभि (धेनुरित्यर्थ.) सुहयत्तण-मुभगत्व सुरहुभिय-सुरय+ऊर्वीकृत सुयर-सुग्वकर सुरावलि-सुरावलि (देवसम्ह) सुहरअ-शुभरत सुरिंद-सुरेन्द्र सुहकर-सुवर सुरेसर-सुश्वर सुहाड-तु+भाति १ २० १२ सुरेसरि-सुरेश्वरी (देवी) सुहावअ-सुखावह सुलक्खण-सुलक्षण सुहावण-सुख+आपण (प्रापण) सुललिय-सुललित सुहासह-शुभ अशुभ सुवण्ण-सुवर्ण सुवत्त-सुवृत्त सुहिअ-सुखित सुवाय-सुवाच् सुघिअ-आघात इत्यर्थ देवी सुविउल-सुविपुल सुंड-शुण्डा सुविरत्त-सुविरक्त सुडीर-शौण्डीर सुविसम-सुविषम सुंदर-सुन्दर सुविसुद्व-सुविशुद्ध सुविहाण-सु+वि+भान (सुप्रभात इत्यर्थ ) सुसुयार-शिशुमार ( मार इत्यर्थ ) सुंसुवार-शिशुमार (मकर इत्यर्थ ) सुवेल-सुवेल (पर्वतविशेष.) मुसुवारिआ-शिशुमारिका सुव्वय-सुव्रत (विंगतीर्थकरनाम) सूअर-सूकर सुव्वय-सुव्रत सूअरि-सूकरी सुसउच्च-सु+शौच सूआर-सूपकार सुसच-सुसत्य सूणार-सूना (वव्यस्थान वधो वा)+कर्तृ सुसमत्थ-सुसमर्थ सूयर-सूकर सुसाल-सु+शाला सुसिअ-गोपित सूयारय-सूपकार (क) सुसेव-सुसेव्य सुसीम-सुसीमन् (बृतियुक्तमित्यर्थ ) सूल-शूल सुह-सुख सूलच्छ-शूलाक्ष सूलभिण्ण-शूलभिन्न सुह-श्वन् सूलारूढ-शूलारूढ १७२ सूर-सूर्य सूवार शब्दकोश हरि सोयारवयण-सूपकार+वचन सोवहि-स+उधि सोसिय-शोषित सोह-शुभ् (धातुः) सोह-शभा सोहग-सौभाग्य सोहग्गथत्ति-सौभाग्यस्थान सोहण-शोभन सोहा-शोभा सोहिय-गोभित सूवार-सूपकार सटि-श्रेष्ठिन् सेट्ठी-श्रेष्ठिन् सेढि-श्रेणि सेणी-श्रेणि सेण्ण-सैन्य सेय-श्रेयम् ( एकादशतीर्थकरनाम) सेय-श्वेत सेय-स्वेद सेयभाणु-श्वेतभानु (चन्द्रः) सेयवह-स्वेद+पथिन् सेरिह-सरिभ (महिप) सेल्ल-शैल सेव-सेव् (धातुः) सेवय-सेवक सेविअ-सेवित सेविजंत-सेव्यमान सेस-शेप सेहा-सेधा (प्राणिविशेषः) सोअ-शुच् (धातु:) सोअ-शोक सोइय-सोचित सोक्ख-सौक्ख सोणइय-श्वपालक, सौनिक सोणिय-गोणित सोत्तिय-श्रोत्रिय सोत्तियवाअ-श्रोत्रियवाद सोदामणि-सौदामिनी सोम-सौम्य सोमभाअ--सौम्यभाव सोमभावा-सौम्यभावा ह-अहम् (ह इत्यस्य स्थाने हअ-हत हडाविय-दूरोत्सारित इत्यर्थे देशी (मराठी- हटविलेलें) हडि-अभ्यरत इत्यर्थे देगी हड-अस्थिशद्वार्थ देशी हडाल-अस्थियुक्त इत्यर्थे देगी हड्डावलि-इड+आवलि हण-हन् (धातुः ) हणण-हनन हणहण-हणहण इतिशब्दः हत्थ-हस्त हत्थगिज्झ-इस्तग्राह्य हत्थि-हस्तिन् हम्म-हर्म्य सोमाल-सुकुमार हम्म-हन्धातोः कर्मणि हय-हत हय-हय (अश्व) हयदइव-इत+दैव हयमोह-हतमोह हयसल्ल-हतशल्य हयारि-ह्य+अरि (महिप इति टिप्पणम् ) हर-ह (धातुः) हरण-हरण हरि-हरि (सिंह) सोयण-शौचन सोयरस-शोकरस सोयामणि-सौत्रामणि (यज्ञविशेषः) सोयार-श्रोत . " जस....२२ १७३ हरि जसहरचरिउ होती हिययहर-हृदयहर हियव-हृदय हिरी-ही हिलिहिलि-अश्वशब्दानुकरणे (धातुः) हिलिहिलिसर-हिलिहिलि इत्यश्वशब्दानकारी स्वर: हरि-हरि हरि-हरि (विष्णोनामविशेषः) हरिकिडि-इरि+किटि (वराह) हरिण-हरिण हरिणणेत्त-हरिणनेत्रा (स्त्री) हरियकाअ-हरितकाय हरिवइ-इरिपति हरिस-हर्ष हरिहल्लि-हरि+हुल्लि (बालकाणे देशी, सिंह- बालक इत्यर्थ.) हलहर-हलधर (बलदेव) हलि-हले (संबोधने) हल्ल-नृत् इत्यर्थ देशी (धातुः) हलिणि-हालिनी (कर्षकस्त्री) हव्यकव्व-हव्य+कव्य हस्-हस् (धातु.) हसिअ-हसित हंस-हंस हंसगइ-हसगति हंसी-हंसी हा-हा (खदेऽव्ययम्) हाणि-हानि हाणी-हानि हार-हार हारावलि-हारावलि हावभाव-हावभाव हास-हास हासअ-हास्य हाहाकार-हाहाकार हाहारव-हादारव हिमपडल-हिमपटल हिंड-हिण्ड् (धातुः) हिंडोल-हिन्दोल् (धातुः) हिंस-हिंस् (धातुः) हिंस-हिंसा हिंसहियय-हिंसाहृदय हिंसा-हिंसा हिंसाकम्म-हिंसाकर्मन् हिंसाजीव-हिंसा+आजीव हिंसायार-हिंसाचार हिंमारंभ-हिंसारम्भ हिंसावासर-हिंसावासर हिसाहिणंद-हिंसाभिनन्द हिंसाहिवत्तार-हिंसा अभिवक्तृ हीणाहिअ-हीनाधिक हू-भू (धातु.) हु-हु होमे (घातुः) हुआसण-हुताशन हुण-हु (धातुः) हुयवह-हुतवह हुयासण-हुताशन हुंकारकारि-हुकारकारिन् हू-भू (धातुः) हूलण-शूलाधारोपणे देशी हेउ-हेतु (दृष्टान्त) हेहि-अधस् हिय-हित (निहित, दत्त) हिंयअ-हृदय हियउल्ल-हृदय+उल्ल (स्वार्थे) हियय-हृदय हेमंत-हेमन्त हो-भू (धातुः) हो-हो (सबोधनेऽव्ययम् ) होती-भवन्ती १७४ NOTES - [X B-The Noles supplement lhe glossary Knowledge of technical terms of Jain piilosophy is presumed in the Reader, The first figure indicates the kaqalaka and the sccond the line, I 1 The poet, after saluting the Jins, Fay: that he was staying in the house of his patron Nanna, the favourite of the Vallabha king, Krsnarāja III, and thought of ariting upon a pious theme rather than a theme relating to wealth and women 17-8 It is only in the fifteen bhūmus, five Bharatas, flve Alrävates and five Vidarbhas that Dharma is born or proclauned, and out of these fifteen bhūmis, it is constant or perpetual in five Vidarbhas only, while it has a fluotuating existence in the remaining ten bhūmis This Dharma was first proclaimed by Rsabhs in this Jambudi Ipa, while the remaining Tirthamkaras repeated the same when occasion arcse 3. Descuiption of the Yaudbeya country 3 17 The poet fancies that the flags and banners on the loft, palaces of the city of Rajapura were scratching the sky asif by their arms 4. Description of the city of Rajapura 4 6 The city was surrounded by a wall on which the weapons such as tomaro, Jlsa etc of the enemies were baffled, padıkhalıya 5 Description of king Máridotta 5 10 The poet says wherever there is pride of youth and pride of wealth, there is naturally all darkness How can in such a place be found the right path (suhamagga), so long as there are no rays of light from wise men? 5 19 The king performed his duties according to bis own whim (chanda), and could not find the right path in the absence of w180 men 6 Description of Bhairavānanda 6 8 Bhairavānanda himself proclaimed bis onn greatness and even though nobcdy asked him (anaumchiu) he praised his own self 6 23 sis u scoms to be used in the sense of " was blessed ", "was given blessings". 8 1 The word camahku is used in the sense of oamatkāra, āsoarys 8 14 The poct says that those who live on liimsã fall into the samsāra, while abstinence from at forms the solid base of sublia karman 8 15. For this line see Introduction Decoruption of Candamārl, goddess Kāli of the town 91 Tamnoyarı stands for tat + nagara, and means' of that town' 9 9 Viyūrabhagga are the decrepits by difcages, vikära 10. List of pairs of different animals 10 9--10 The poet says that it ik only a fool who desires to live by killing the lives of others 11 6-9 When Märıdatta found that his servants did not procure a human pair, he got angry and asked Capdakarmon, one of his officers, to procure a good human pair 9 -177 JASAHARACARIU which he would kill first His servants accordingly searched the region in the neighbeurhood of the city (nayarabanı hüvayāsa) 12 A fine description of the pleasure garden of the king 12.16 The Kolhapur MS reads "aham entie" which is superior to the one in the text as ahamam in the senso of ahan does not seem to be a recognised form of asmad 13 Description of the burning ground 13,1%-13 The pupils of Sudatta asked permission of their teacher in the usual terms if they could go out for begging alms, and then the teacher allowed them to do so. 14 4 Gurunā muhhu means permitted by their teacher, Sudatta 14 5. Puruvahe dhukka, proceeded towards the city 14 6 Larryam samalam, they talked a wicked talk that this pair of Ksullakas is a good one to be offered as victims 14 11 Sayanuku anamālāphuriu, bright in the cluster of rays of their own body 15 9 Jal na muni etc The meaning of the passage seems to be that though the ksuallakos may not reach a bigher stage of asceticism in thus life if they are killed, they will at least be born as gods possessing eight gunas 15 20 Jamalullahlv, frightening like the god of death 16 Description of the temple of goddess Candamāri 17, 16 The pair had on their persons auspicious signs, samudda, Sk Samudra as mentioned in the Samudrikaśāstra, a bich indicated that they were fit to enjoy the kingdom of the whole earth 19 9 Matthar sizlaho, to one who bears on his forebead the mark of trident indicating his faith in the Kāpālıka tenets 20 7 Lepp vrhu, as if made of plaster 20 12 Suuhür, su + bhāti 21 Desoription of the Avanti country 21 12-14 The idea is that the elephant mistook the dark green rays of the emerald-pavements for green dūrvā grass and therefore nas reluctant to leave it The conductor of the elepbant drove it away with great difficulty The reading duvrūsae Sk. dûrvāsaya, of ST is to be preferred to the one in the text 22 3 The young wuman of dark completion was detected by her sparkling smiles in the Indranila houses of the city 23 % Prince Jasoba is here described as hsatradharma in a human garb 24, 8 Abhayaruci says that in his former life as prince Jasabara be bad bis body in south well-developed in flesh, bones, and limbs by good nourishment, putthepalatthyanga 25 This kadavaka describes how the princess of Krathakaisika was offered to Jasahara in marriage Aminister of Krathakaisika came to the court of Jasa hara's father and said that his master proposed to offer his daughter Amayamabäderi, i e, Amrtamati to prince Jasabar& The king agreed and the marriage was celebrated as described in the following Kadavakas Note roughness of language of the passage, -178— NOTES 28 Description of the cffects of old age on the body 28 10 The ten constituent parts of the Juin dharms aro ksiniī mārdava do 29 llon muu elc I controlled myself by the first lora (ünviksiki) which is capable of conquerring the wensch milliy of Sr' is a better reading 29 5 Cautannu, the four casion 29 6 lhe seven dangers of kingship are gambling etc 29 7 The king ongored pleasures of conscs, not out of attachin.ent, but only use direreton, vincdanatra II 1 King Jasnhora describes his attachment to Amulematı 1 18 Thero 15 a pun on the word alla sluch means the setting incuntuin as well as money 2 Description of the evening 2. 3 Thouam, under the Home of the sky, 1 c, set 2 11-12 Theshs i compared to threshing ground of the field with twelve heap of corn There is ndara spot on the moon which is kept thrro as a sign that pruents b'id omens pouing the horsest 3 The king proceeds lo the place of quern i l'apalı on a moon-light night 4 Description of the cight qundrongles of the queen's pulnco 61-j Theling enjors plea-ures of the con pany of the queen 6 9 The queen went to a hump-back who never a'tempted, ujilja, any good deeds of the human life, i e, he was low G 17 Siyaserre, the qucen who was adorned by beauty, siye, Sk, SI 7 12-13 Amrtamata engu to her paramour: "If Jn-ahara dies (goes to the liouse of Yonn, I shall doncc (nath delight), and shall myuelf worship the goddess Kalyayanl in the inonth of Chitra sith an oficring of cooked rice (ca'uqura, Sk carūgrása)" An offering in the month of Coitra to the goddess is considered as specially auspicious 8 9.10 The hug 14 pasinad loved that hur qucen in dollying win the bumpback did not pay any regard to her fan ily, her elatus or even her royal husband 8 11-12 A creeper (tyili) climbs up and then stands suspended froin a mango treo which is a (filtıng) supporting tree for it, but the same creeper (sometimes) kisses & wretched (mhina) and harsh thorny platil. 9 5 Suhadhiimel 14 hicap of root from the burning fire which gives a dark tinge to the whitewash of the houso. 9 6 Tho king compares the crooked mind of & woman (Myamat) to the course of thio risor which zy nisny s nícarata ( attached to a low-born person with thic rner,-flowing on the slope) 8–19 Thus passage tells us two stories of wicked women , of the othe first was named Copavati, whoso bushand being disgusted with her wont of clinstity, marricd another lady Now one day Gopavati cut off the hond of lor rival and kept it at ne mo socrct place The husband returned homo after having altended to the funeral of the leadless trunk of his jourg wife, and while hic fut for meals, Goravali placed on his plate the head of her rival 1931113 'cat itº llorifiod at lloirified at this conduct of his wife, the husband began to run away when Gopavali stubbed him to death The second story tells us tho wicked conduct of Viravali who was the wife of - -179- JASAHARACARIU Sudatte or Datta, but was in criminal intimaoy with thief olled Angārska Now this Angārake was one day found to ba guilty by the king of the place and was ordered to be impuled in the burning ground On learning this nens Viravati left her husband's bed at night and went to meet angāraks who, before dging, kissed her and while kissing, cut off her lower lip Now Viravati returned bome covering ber face, and reised a cry that her husband cut off her lip The king thereupon ordered him to be killed, but & traveller who had watobed the canduct of Viravati the previous night, saved him by revealing to the king and the people the wicked conduct of the woman, and convincing the people by showing to them the piece of the lower lip of the lady inside the the mouth of the impaled thief 9 17 Sūlunūna, Sk Sabarjñāns 9 18 19 It appears that the thief cut off with his sword the fingers of the lady which were lying under the tree, while the lower lip remained in bis mouth 10 1-2 These two lines refer to the story of queen Raktá who, for the sake of her lome lover, threw her husband Devaratı, king of Ayodhyā, into the stream of the river This queen Raktā, as the story goes, was attached to a lame gardener Tinding the king & nuisance, she got a garland woven by means of a fine iron thread, put this garland on the neck of Devarati, strangled him and threw him into the river 1Q 317 Abhayarucı lectures on the worthlessness of the pleasures of senses. 10 13 The Isūsıhı is the fire of jealousy 11 A lecture on the nature of human body which is here said to be a bundle of misery and impurities and diseases 11 11 Pacchuu Sk pathiya means "bolesome food and drink The line means that human body is subj:ct to the attack of leprosy even if man takes wholesome food and drink 12 Jasahara was disgusted with the conduct of his queeen and also with the worldly life, and thinks he should bzcome an ascetic, but in the morning he felt ho should not do so immediately as his resolve to become an ascetic would be regarded by people as due to some disagreeable things in the harem, so he took to normal life for the time being, 13 The king declared bis intention in the court to his mother to placa luis son Jasamai or Jaskvai on the throne in order to respect, as he said, a bad dream which be saw the previous night 14 Jasahara's mother proposes to him that the effects of an evil dream can be nullified by offering living beings as victims to the goddess, but he shows his disapproval of killing & living being 11 10-11 The king says to his mother -"If by killing animals as victims merit is obtained, then one should salute & hunter or a butcher in preference to a monk" 19 4 The king dragged his sword in order to cut off his own head, as the thought he was not able to persuade his mother, bul the mother, immediately came round and suggested that an inanimate victim should be offered to the goddess to which Jasahars gave his consent by silenoe The mother thereupon asked the statue. maker to bring a cock made of four -180 NOTES 22 9-10 Queen Amrtamatı says lo Jasabata that in case she does not accompang him to the forest, people will ridicule ber by pointing their fingers to her youth and therefore she would like even death in his company 24 The king describes several articles of food prepared by the queen as sug. gesting an approaching death 25 and 26 These kada vakas describe the wailings of Jasabara's son and wives In the latter part of 26, it is mentioned that several obsequious rites were performed by his son in order that Jasahara might get good life ofter death But, as the fate would have it, Jasahara was born as a pencock in the forest 28 4 Pahhhın-pahlcharŪu is on uncertain expression, the line may mean that the young peacock could not at first walk and therefore sought the support of the wings of its mother (The marginal note in one of the MSS is 'pādavāritvāt paksapäte dbrtoh) 28 10 Note the word lat which means 'much' and is still preserved in the Marathi language of the lower class people of Mahārästra in this sense, while Hemacandra explains it as 'lar ile lolohlar' 29 The hunter brought the young peacock and its mother home, but offered the hen to the police officer and kept only the young one for bimself At this the hunter's wife got angry The hunter thereupon sold the young peacock to the police officer who brought it up in a cage. 30 The police officer offers the peacock, when grown up, to Jasavai. Candramati, Jasahara's mother, who was also poisoned by Amrtamati, was born in Ujjayini as a bitch and was presented to Jasaval 32 10-11 A fine fancy that the row of clouds is likened to & young maid, linghtnırg as her kañcuki and the rainbow as her cloak, uppariyana, Sk uparitana, upper garment 33 The peacock saw here Amrtamati dallying with the bump-back and out of jealousy of the peryious life attacked them both Amrtamatı struck it with her girdle and thus broke its leg 33 9-10 The peacock remarks --When I was king, I did not strike the hump-baok and the woman who were not my equal, but now as a young and low peacock, I caught the hand of the woman as tbis time it was not objectionable 34 Maids of Amrtamati coon arrived on the scene and attacked the peacock with whatever weapon they could catch hold of On hearing this din and cry of the maids, the bitch, the peacock's mother in the previous life, oame there, and caught it in the neck. 35 Jasayai held the bitch fast with the chain, but when it could not let go the peacock, he struck the bitch with the iron end of the sped, so that both the peacock and the bitch died Jasaval beweiled the loss of both 36 In his next birth Jasahara was born as a mangoose, and as its mother could not sfficiently feed it on her milk, the young mangoose began its career by devouring snakes Candramatı also was born in her next life as a snuke in the same forest One जस....२३ -1814 JASAHARACARIU 36 9. day while the snake w89 entering into its hole, the mp3goose caught its tail Lih säu Sk, spådam labdbvá, forquing taste (for the blood of the snake) 37 When the mangoose was eating the snake, it was itself caught from behind by a wild animal taracchu, Sk teraksu 37 11-12 Abhayaruci winds up the second pariccheda by appealing to Māridatta that ifbe understood the significance of the narra tive, be should give up doing injury to creatures and should resort to the doctrine of Puspadante, the ninth Tirthamkara (or the words of the poot Puspadanto) JII 1 The first six kaevakes of this pariocheda describe the next birth of Candrematı who was born as 8 crocodile and of Jasalara who was born as a big fish in the river Siprā near Ujjayini The first kadavaka gives a fine description of the river in Duval metre rounded off by the usual Gbattá In fact the kaclavakas in this pariccheda open with a Duval and close with a Ghatta 1 13 manthurayantia is a clean bank adjoining the river which was resorted to by ascetics 2 12 Darya vyambhuyau Sk dovavimbhuita, the wonderful working of destiny 3 3 Gomini etc, are the names of maids 4 The great fish was caught and was shown to king Jasayai who got at exa. mined by Brahmins They said the fish belonged to that species from which the Matsyāyatárs of Visnu came, 4 6 Thotta is either sthūla or samartha according to marginal notás, 4-9. dhammaniddhādar, from which dharma has disappeared 5 JAStook the fish to his mother Amrtamatı who cooked, fried and seasoned at 6 7-12 In the next birth Candramaatı was born a she-goat Jasabata became her child, while in youth be began to enguy sexual pleasures with the mother-she-goat when he was killed by his father-goat 1. Jasahara was again born into the womb of his mother slie-goat King Jasavai caught the pregnant she-goat one day as he did not get any other chase, and when he out the she-gost into two, he found the child alive and handed it over to the shepherd 2 10 Kusumavali, the naine of Jasaydi's queen 8 One day Jaskyi made a promise to the goddess that he would offer as victim & buffalo if he would find good chose in the forest 8 14 Paritev: after baying offered the flesh of the buffalo to the goddess in a particular way This act of porivārang is usually expressed by uttārans and consists of raising the offering from the ground, showing it to the deity and then again placing it on the ground 9 One day Jasaval performed the annual sraddha of his father For this Various articles of food were prepared, and ware offered to Brahmins, friends and relatives Amrtamalı did not figure amongst these as sbe was suffering from leprosy and maids were openly talking of this 9 13 Angu võit, the body of Amrtemati is giving out this bad smell 182- NOTES 10. Condition of the body of Amrtamati is described here 10 12-14 Amrta mati did not like the flesh of buffalo and asked for some other kind of meal 11. Amrtamatı asked the cook to hsve the meat of a deer or of a pork, but king Josa voi said that the mest of the goat would do well He therefore asked the cook to cut the binder leg of the goat for the queen-mother 11 10 Veyadhamnavehāviyamūnasu, one whose mind is deluded (velüvya) by the law proclaimed in the Veda, The soul of Candromatı in the mean while was born as a buffalo in Sind, 12 This buffalo was used to carry goods for a merchant, and once came to Ujjayını There the buffalo met, while enjoying the bath in the river Siprā, the royal horse attended by its keepers The buffalo attacked the horse and killed it Immediately the keepers caught hold of the buffalo and brought it before the king The king ordered it to be killed with all possible cruelty The goat also was killed on the same doy 13. 11 Candramoti and Josahara in their next birth were born as young ones of & hen and from this line onwards right upto the end of kadavaka 33, we get the happenings in their life as young ones of hen. 15 These young ones of hen were in due course presented to the king who wanted to see & cock-fight and asked the keeper to bring them up well 16-17 The next morning they were taken to a specially erected tent and were placed under the Asoka tree The king's officer saw a Jain monk seated under the tree in a meditating posture 18-33, Then follows a long conversation between the monk and the officer on the religious views of Jains and Cārvākas, and when the monk mentioned that the young ones of hen by his side were formerly king Jasehors and his inother Candramati, the officer accepted the vows of & Srāvaka The young ones of the hen also recollected their previous births, in mind decided to observe the vows, and in delight cried aloud. But Jasavai, who was in the company of his queen Kusumavali, wanted to show his skill in archery by sound to his queen, discharged an arrow at them, and both the young ones were killed They were born as twins into the womb of the queen 34 17 The king on seeing monk Sudatta thought it to be a bad omen and says.-"How can this monk (hhavangu ) if he is other than the three gods, Brahmā Visnu and Mahesa (taya, Sk trika ) go away from here) without being killed by me? 35. 15 Jarvaia layasallıya, great monk observing the (five great) vows 36 The king gets angry when asked by the merchant to fall at the feet of the monk, and says that he would not do so as the monk was very dirty 36 17 Naya- Toghasarapasara, like tha stream of the dirty guttar-water of the town 37 % The merchant says Even the dirt of these monks is capable of curing diseases and therefore, O king (iša), bow down to such monks Why this hatred ? 37 4 Ahayamahūnasuddhi is & doubtful expression The marginal note gives its equivalent as aksinamahānasa, in the light of this we can say that the monks possess the power of making the kitchen inexhaustible and prosperous. To me it appears that the correct reading might be ahayamūnasaddir, Sk ahatamānasardhi, inexhaustible or --183- JASAHARACARIU full possession of mental powers 37 17-18 The merchant tells Joggyal that the monk is no other than the king of the Kalinga Country and that he took to the life of an ascetio because, by having wrongly punished a person charged with theft, he got disgusted with his kingship 40 17 Avarapakhha is the second and dark half of Bhadrapada during which a mahālaya şrāddba is offered to the manes 40. 18 Khūu, Sk khäditum IV 15 Kheri is a deši word meaning vaira or pairin, bere it is used in the former sense 2 The king says to Sudatta that he would place his son Abhayaruci on the throne and like to be a monk 3 Ladies of the king's harem try to persuade bım by saying that he would not get anything better in heaven by practising penance For, they say, they are as good as nymphs, the king Indra and the palaces heavenly abodes, thus the possession of (union with) what is good constitutes Svarge Is there on the head of Svarga (conceited as a being) a crooked horn ? Kem saggise kudilam visūnayam has a corresponding phrase in the current Marathi language 38 Sigger is a nord of uncertain meaning, does it mean nilavarna 4 Both Abhayaruci and Abbagamati recollected their previous birtbs on hearing this narrative from Sudatta and fainted Kusumāralı also fainted on seeing her children in that condition Other ladies of the larem come to her help and she and the children Boon recovered 4 16. Mahaevi of course is queen Kusumavalı 5 14-15 Abhayaruci, on recollecting that he was in one of his former life the father of Jasayai, skys - He was formely my dear son, so delightful to niy eyes, and I myself placed bim on the throne, but now I am (born) as his son with a moonlike face, destiny has taught me a fine (cangan) lesson!" 6 I Dinnalatya, ar rūdı, one, who by turn bas given and taken the same posttron, one who was the father of JASAyal and placed him on the throne bas become the son of the same JebBy8, who now thinks of placing him on the throne 6 2 Muhazadu. mukhapatah, cover for the face 1 17 Gunamanıcıncarya, decked (Cincauya) by the gems of guna, the rows of Jain ascetics, Pāvarya 15 PTByTajyā, taking to the life of an ascetic 8.1 Abbayarucı handed over the kingdoni to bis step-brother, Nasa 8 % Kuha the path 9 1 Surahubbhaja, erected on a good cbario The sense of the passage is that mere penance without right faith is like a banner on the top of the chariot, without soldiers 9 10 Angacūu, Sk apgatyāga, 1 e, kāgotsarga posture 9 15 Anurekhhaut, the twelve anupretsās, impermanence (adbrura) etc 15 1% Khullayattu, the stage of ksullaka consists of complete renunciation of worldly things, wearing only one wbite garment and a lon-cloth, the gourd, the beg- NOTES ging boul and tonsuring the head 15 16 Purakuntıyū is the nun Kusumāyalı who alongwith Jasavai, became a Ganını 17 15 Salcilvvanie, by the supernatural power of creation (urkurvang). 18 Candamárı requests the ksullaka to initiate her and teach her the rules of penance The ksullnha thereupon says that there is no penance for gods of sixty-two types 19-20 These two hadavokas give the list of persons who cannot prachise penance 23 King Märıdatta asts Sudatta to tell him the various previous births of the Govardhana Merchant, Goddess Candamarl, Bhairavānanda and of himself. Ithas been oxplained in the Introduction that the portion beginning with this kadavaka down to kadaraka 30, line 15 is added by Gandhorva 28 3 Danvicalla, free from pairs (of ploosant and unpleasant things) 28 33 Siddhair Sk Siddhagiri, name of a holy place. 29 9-10 For the interpretation of these lines and the following kadavaka see Introduction 31. # Kama Klandem, Puspadanta wasalso known by this name Kbanda as could be seen from some of the rerses at the opening of somdhis in the Mabāpurāna MSS मुग्धे श्रीमटनिन्द्यखण्डसुकवबन्धुर्गुणैरुन्नतः स्वप्ने प्येष पगलना न भरतः शौचाम्बुधिर्वाञ्छति ।। -185–
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ADDENDA ET CORRIGENDA Page, Kadavaka Line For Read ૨ पुरुएउ सामि १० १३ २ १२ ५ ५ ६ ६ ६ ६ ५ पुरुदेवसामि परिहि वि चिकमति कहिं मि तरुण सरत पओहर तहि पाउडियजुम्मु ५ परिहवि चि कमंति कहिमि तरुणसरत पउहर तीह पाउडियजम्मु जुयचयारि पुरे १४ ६ १ ६ ६ ६ जुय चयारि ८ ४ ८ १० १० गो या or १२ १२ णयरि वहावयासि काहिमि अहमं तीए लवियंसमल पूरे गोहया णयरिबज्झावयासि कहिं मि अहमितीए लविय समलं सयणुकिरण जिल्लणण २ १६ ६ ११ •- ११ १२ १२ १३ सय किरण १५ १ গান্ধায় or ३ जहण कहिं मि १५ १५ १५ १७ जइण कहिमि तिणाण सरजाय महो तिणाण ९ ११ सरज्जा पमहो विणडिउ वासइ १५ १८ १८ १८ २१ २१ २३ २५ २६ २७ विडिउ दुव्वासए कणिस note ९ २१ चंदमइ देवि तह - १८ २० २१ २१ कसिण चंदमइदेवितह पइमि दोहिमि ता सुपत्ति पइं मि दोहिं मि ६ तासु पत्ति -187- JASAHARACARIU २१ २७ १० ६ २८ २ २४ २५ २८ २९ ३० अवरह मि वैलि णिही ८ १० १२ ३४ ३४ ८ १० १७ १ ४४ ३ ७ ४९ ४९ ५१ ३ १० १२ वयारि वि पश्यारिवि चिकमंति चिमनि पुत्त युत संझालि वणीसरिय संभावेलिवणीसरिय अवरइमि वेल्लिणिही सवह सेवह विसहिउ चि मुदित णिच्छाम णित्याम दणलाई दलणाः हिसद हिंसर पटिंउ पदिउ भीसावण भीसाचणे धम्म णिवाद धम्मणिदार णिवसणेचली णिवसण चेली लदति लदंति बाद वाद अंगुवाइ अंगु वाह वणि भंडमार वणिभंडमान पच्छिमहारि पच्छिमदारि अण्णुमाणि अणुमाणि मच्छरोको मच्छगे को णायण णायण्ण विभिण्णु दुमडेहिं घशुभडेष्टि सयगणियई सरगुणियह पणे उग खेलागुणवतु णिसूभउ ਉਸਤੇ सयल संबल ९ ५३ ९ १२ १२ २२ ३७ ८२ ८५ विभिण्णु ८९ २० १५ १ पट्टणेच्छगे (1) ० १ १ १०० खेला गुणवतु १६ --188-
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