Adarsh Library, Jaipur
Ragh Viragh
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राग-विराग
संगीत के अनुराग में भीगी उस युवती की
कहानी, जिसे बार-बार टूटन मिली, विखराव
मिला और मिला सच्चाई से सीधा साक्षात्कार
मालती जोशी
राग-विराग
सरस्वती विहार
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अपने गुरुजनों को,
जिन्होंने समय-समय पर
मेरे मानस को
साहित्य और संगीत से
संस्कारित किया
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राग-विराग तानपूरा नीचे रखते हुए पता नही कैसे दृष्टि द्वार पर चली गयी । देगा, दोशोलन्सी गहरी आंखें अपलक मुझ पर टिकी हुई हैं। सकपका• कर मैंने नजरें झुका ली और अपना मामान समेटना प्रारण किया। पंडित जी जब तक लौटे नहीं थे। खोल चढ़ाकर मैंने तानपूरा यथास्थान रखा और रसोई के दरवाजे पर खड़े होकर कहा, "जिया, मैं जा रही हूं। दर- वाजा देख लेना।" लेकिन पूरी बात शायद मैं कह भी न पायी क्योंकि मुझे पूरनेवाली ये आखें सशरीर जिया की रसोई में विराजमान थी। "ए कनु, आओ, चाय पीव जाओ," जिया ने फरमान छोड़ा। नमे नकारने की ताव मुझमे न थी। घुपचाप जाकर पटरे पर बैठ गयो, परमार्थे अब भी उस अपरिचित की ओर उठ-उठ जाती थी। "ये मनोज हैं, हमारे वहनात है," जिया ने जैसे मेरे असमंजम को पड लिया, "गाव से परीक्षा देने आये हैं।" मैंने "अच्छा" कहकर प्रसंग समाप्त कर दिया। जिया के रिपतेदारों में अब हम लोगो को कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी है, क्योकि एक तरह से सारी दुनिया ही उनके भाई-भतीजों से भरी पड़ी है, कोई रासुराल पक्ष मे, कोई पीहर पक्ष से, तो कोई केवल गाव ये नाते से उनका सगा-मबंधी हो जाता था। एक बार तो कोई अब्दुल गनी साहब पंडित जी से मिलने आये हुए थे। मने जिया को छेड़ा, "ये भी तुम्हारे कुछ लगते होंगे !" राग-विराग
"सो ? का लगत नइयां ? हमाई जिठानी के राखी वंद भैया हैं।"
उनके गंवई रिश्तेदारों की फौज का एक और नमूना आज देख लिया
था। उसे नजरअंदाज करते हुए मैं एक ही धूंट में कप खाली कर गयी।
उसे धोकर रखा और कहा, "अच्छा जिया, चलूंगी।"
दूसरे दिन स्फूल से बाहर निकली ही थी कि दरवाजे में ही मुठभेड़ हो
गयी।
"नमस्ते !" उन्होंने ही पहल की। नहीं तो मैं शायद पहचान भी न
पाती।
"आप यहां कैसे.?" दोनों ने एक साथ प्रश्न किया।
"मैं यहां पढ़ाती हूं।" मैंने कहा।
"क्या पढ़ाती हैं ?"
मैंने 'संगीत कला निकेतन' के बोर्ड की ओर संकेत किया।
"मतलब शाम को मौसा जी से सीखने आती हैं और वही सुबह यहां
पढ़ा देती हैं, ठीक है न ?"
"इस बचकाने प्रश्न का मैंने जवाब नहीं दिया, बल्कि पूछ ही लिया,
"आप यहां किसलिए तशरीफ लाये हैं ?"
"परीक्षा देने," उन्होंने बगल में रखे टाइपराइटर की ओर संकेत किया ।
"अच्छा, इस विल्डिंग में टाइपिंग की परीक्षाएं भी होती हैं ! मुझे तो
पता ही नहीं था। अच्छा जी, मैं चलूं, अव देर हो रही है।"
"बेस्ट लक नहीं दीजिएगा?"
"बेस्ट लक ! मैं ?"
"और क्या? एक तो हाल के दरवाजे पर ही मिल गयी हैं और
"मतलव पेपर खराव हो जाये तो मुझे ही दोप देंगे?"
"सो तो है ही। मेरे भविष्य का न सही, इस टाइपराइटर का तो
लिहाज कीजिए । किराये पर लाया हूं।"
।
परी दोपहर मन में धुकुर-पुकुर होती रही। पता नहीं, परीक्षा कैसी रही
होगी? पता नहीं महाशय खुद कितनी तैयारी से आये हैं। पर अगर
= | राग-विराग
यहां कुछ नहीं बन पड़ा, तो मुझे हो कोलगे। उनके पीसने की को धाम परवाह भी नहीं थी। पर पता नही क्यो, मन यहीं अटका रहा। चार बजे मैंने अपनी कापी और पेन उठाकर दलको तयारीको सो मां आश्चर्य से देपने लगो, "आज तो युधवार हैन?" मां जानती हैं, पडित जी मुझे केवल मंगल और शुक्र को मिपाते हैं। हफ्ते पे ध्यो दिन उनके शिष्यों में घटे हुए हैं । सोमवार को ही रहती है, क्योकि उस दिन उनका ग्रत रहता है । दिन-भर निराहार रहकर काम को नीलकंठेश्वर मा दर्शन करने के बाद ही वे याना पाते थे । यही दिन या जो जिया को बाहर के कमरे की सफाई के लिए मिलता था। कमर को मापना, याद्ययात्रा के गिलाफ धांना, दरियां झटकारबार फिर से विद्याशा-ये मारे फाम जिया अकेले निपटाती थी। इसमें किसी का दास उन्हें पमद न था। मां को मारे कार्यक्रम की जानकारी थी। इसीलिए उन्होंने पूछा, "याज तो बुधवार है न?" "कल पंडित जी को सेट जी ने किसी काम से युलवा लिया था। प्रेक्टिस हो ही नहीं पायी," मैंने किसी तरह मा का समाधान रिया और पंडित जी के घर की राहती। "क्यों वे?" वे पद भी मुझे देखकर विस्मित थे। "जी, वो गल मापने म्याम ल्याण की पीज बतायो पी, बहुत कोशिश की मैंने पर वह अतरा उठाते ही नहीं बन रहा।" "कोई बात नहीं, अभी देख लेते हैं। तानपूरा मिलानो उय तक, उन्होंने यात्सल्यपूर्ण आश्वासन दिया। उनके पास बैठे दोनी गिम्य मुझे गद्गद भाव से निहारने लगे। उन लोगोषी पढ़ाई उस दिन वहीं एका गयी। सबके सब मेरे लिए व्या हो उठे। एक ने हारमोनियम मंभाल लिया, दूसरा तयला सुर मे विटाने लगा। आलाप गुरू ही किया पाकि थीमान जी भीतर दापित हुए। "कहो वेटे, पेपर कैसा रहा?" "अच्छा ही रहा मौसा जो। गुवह आप लोगो के आनीद मेजर पला या। फिर राने में अच्छे लोगों मे मुलाकात होती गयी।" ।
- - मैंने कनखियों से देखा-~-वे मेरी ओर देखकर शरारत से मुस्करा रहे थे। पता नहीं पंडित जी ने इसे लक्ष्य किया या नहीं, पर तुरंत ही उस प्रसंग को बदलकर मुझसे बोले, "हां वेटे, शुरू करो तो।" दोबारा शुरू किया तो लगा, पूरा शरीर ही तानपूरा बन गया है जैसे । रोम-रोम से स्वरावलियां फूट रही थीं। पंडित जी मुझ पर अकसर बिगड़ा करते थे, "क्या रटू तोते की तरह गाती चली जाती हो ! बोल के मर्म को तो समझो बेटे, शास्त्र ही सब कुछ नहीं है, गायन में मिठास भी होनी चाहिए। और यह मिठास केवल स्वर को साधने से नहीं आती। उसके लिए शब्दों की तह तक जाना पड़ता है। गायक जव गीत में अपने प्राण उड़ेलता है, तब जाकर बात पैदा होती है।" यह प्राण उड़ेलना क्या होता है, यह मैंने आज जाना। सावन को सांझ मोको सुखद भई । सच, इतनी खुशनुमा सांझ तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी। बेगम अख्तर की एक गजल मुझे बहुत अच्छी लगती है : यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुजर जाती थी आज क्या बात है जो शाम पे रोना आया इन पंक्तियों को गाते हुए उनके स्वर में ऐसी तड़प होती है जैसे सच- मुच शाम उनके लिए दर्द का पैगाम लेकर आयी हो। इसके विपरीत मुझे लग रहा था कि आज की शाम मेरे लिए खुशियों का काफिला लेकर उतरी - गाना समाप्त करते हुए अनायास ही आंखें रसोई की ओर उठ गयों। दो झील-सी गहरी आंखें अपलक मुझे निहार रही थीं। कल उन आंखों में कौतूहल था, आज परिचय की आंच थी। उस आंच से मैं कानों तक लाल हो आयी। घर के लिए चली तो वे भी साथ चले आये। "कहां रहती हैं आप? कहें तो घर तक छोड़ दं?" "अरे नहीं बावा !" "क्यों ? डरती हैं ?" १० । राग-विराग "हा, लोगो से।" "अच्छा ! • कल तो हमे चले हो जाना है। आपसे एक बात पहनी पी। भाप गाती हैं न तो आपका पेहरा एक उमास से भर जाता है।" मैं कुछ पल उनके सुदर्शन व्यक्तित्व को निहारती रही। फिर धीरे से कहा, "मैं मुन्दर नहीं हूं। यह बात में अच्छी तरह जानती हूं।" "मैंने आपके रूप को लेकर तो कुछ नहीं कहा, मैं तो कह रहा था कि गाते समय आपका चेहरा एक अनोखे उजास से भर जाता है । ऐसा मयो ?" ऐसा क्यों? इस प्रश्न का भला कोई क्या उत्तर दे! कोई दो महीने बाद पंडित जी के घर से वही आकृति फिर दिखाई दी। देखते ही भान हुआ कि पिछले दिनो मेरे अंतरंग सपनों में यह घेहरा पार-वार उभरता रहा है । सोचकर गर्म मे, संकोच से भर उठी में। फिर भी उनके 'नमस्ते' का जवाव तो देना ही था। "कब आना हुआ?" स्वर को संयत कर मैंने पूछा। "परसो रात को-और इस बार जाने के लिए नहीं आया हू । आपके शहर मे पूटा गाड दिया है।" "मतलब?" "उसकी नौकरी लग गयी है," पंडित जी ने बताया। उनके स्वर से स्पष्ट था कि रियाज के बीच इस तरह का व्यवधान उन्हे पसद नहीं है। मैंने तुरन्त मारा ध्यान समेटकर गाने में लगाया। पर बार-बार यही लगता रहा-कम-मे-कम 'काग्रेच्युलेशस' तो कह ही सकती थी। सच, क्या सोचा होगा उन्होने ? पर बधाई लेने को वह मुझसे ज्यादा मातुर लगे। दरवाजे के बाहर ही उन्होंने मुझे घेर लिया और साथ हो लिये। "माफ कीजिए. आपको बधाई देना भूल ही गयी।" "मैं तो सोच रहा था, आप छूटते ही मिठाई मागेगी।" "मिठाई!"
. मैंने कनखियों से देखा-वे मेरी ओर देखकर शरारत से मुस्करा रहे थे। पता नहीं पंडित जी ने इसे लक्ष्य किया या नहीं, पर तुरंत ही उस प्रसंग को बदलकर मुझसे वोले, "हां वेटे, शुरू करो तो।" दोबारा शुरू किया तो लगा, पूरा शरीर ही तानपूरा बन गया है जैसे । रोम-रोम से स्वरावलियां फूट रही थीं। पंडित जी मुझ पर अकसर विगड़ा करते थे, "क्या रटू तोते की तरह गाती चली जाती हो ! बोल के मर्म को तो समझो बेटे, शास्त्र ही सब कुछ नहीं है, गायन में मिठास भी होनी चाहिए। और यह मिठास केवल स्वर को साधने से नहीं आती। उसके लिए शब्दों की तह तक जाना पड़ता है। गायक जब गीत में अपने प्राण उड़ेलता है, तब जाकर वात पैदा होती है।" यह प्राण उड़ेलना क्या होता है, यह मैंने आज जाना। सावन की सांझ मोको सुखद भई । सच, इतनी खुशनुमा सांझ तो पहले कभी नहीं देखी गयी थी। वेगम अख्तर की एक गजल मुझे बहुत अच्छी लगती है : यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुजर जाती थी आज क्या बात है जो शाम पे रोना आया इन पंक्तियों को गाते हुए उनके स्वर में ऐसी तड़प होती है जैसे सच- मुच शाम उनके लिए दर्द का पैगाम लेकर आयी हो । इसके विपरीत मुझे लग रहा था कि आज की शाम मेरे लिए खुशियों का काफिला लेकर उतरी, . गाना समाप्त करते हुए अनायास ही आंखें रसोई की ओर उठ गयीं। दो झील-सी गहरी आंखें अपलक मुझे निहार रही थीं। कल उन आंखों में कौतूहल था, आज परिचय की आंच थी। उस आंच से मैं कानों तक लाल हो आयी। घर के लिए चली तो वे भी साथ चले आये। "कहां रहती हैं आप? कहें तो घर तक छोड़ दूं ?" "अरे नहीं वावा! "क्यों ? डरती हैं ?" १० / राग-विराग "हां, लोगों मे।" "अच्छा!.. कल तो हमें चले ही जाना है। आपसे एक गत कहनी पी। पाप गाती हैं न तो आपका चेहरा एक उजास से भर जाता है।" मैं कुछ पल उनके मुदगंन व्यक्तित्व को निहारती रही। फिर धीरे से मुन्दर नहीं हूं। यह बात मैं अच्छी तरह जानती हूं।" "मैंने मापके रूप को लेकर तो कुछ नहीं कहा, मैं तो कह रहा था कि गाते समय आपका चेहरा एक अनोख उजास से भर जाता है । ऐसा क्यो?" ऐसा क्यों? इस प्रश्न का भला कोई या उत्तर दे! कहा, पूछा। कोई दो महीने बाद पंडित जी के घर में वही आकृति फिर दिखाई दी। देखते ही भान हुआ कि पिछले दिनो मेरे अंतरंग सपनों में यह घेहरा बार-बार उमरता रहा है । सोचकर शर्म मे, संकोच से भर उठी में। फिर भी उनके 'नमस्ते' का जवाब तो देना ही था। "कर आना हुआ?" स्वर को रायत फर मैंने "परसो रात को और इस बार जाने के लिए नहीं आया हूँ। आपके शहर मे गूटा गाड़ दिया है।" "मतलब?" "उसकी नौकरी लग गयी है,"पडित जी ने बताया। उनके स्वर से स्पष्ट था कि रिपाज के बीच इस तरह का व्यवधान उन्हें पसंद नहीं है। मैंने तुरन्त मारा ध्यान समेटकर गाने में सगाया। पर बार-बार यही लगता रहा-कम-मे-कम 'काग्रेच्युलेशम' तो कह ही सकती थी। सच, क्या सोचा होगा उन्होने ? पर बधाई लेने को वह मुझसे ज्यादा आतुर लगे । दरवाजे के बाहर ही उन्होंने मुझे घेर लिया और साय हो लिये। "माफ कीजिए. आपको बधाई देना भूल ही गयी।" "मैं तो सोच रहा था, आप छूटते ही मिटाई मागेगी।" "मिठाई!" ।
"हां, आपका तो हक बनता है। आपकी दुआओं ने ही तो असर दिखाया है। नहीं तो हम इस बार भी वैरंग ही लौटते । बोलिए, कहां चलेंगी ?" "आपकी पहली तनख्वाह मिलने दीजिए, तव मिठाई लेंगे।" "मिठाई न सही। एक-एक कप चाय तो हो जाये। कुछ तो सेलिब्रेट करने दीजिए। आइए।" हम लोग मानसरोवर के सामने खड़े थे। वहां खड़े होकर ना-नुकर करने का मतलब था लोगों का ध्यान आकृष्ट करना। चुपचाप उनके पीछे हो ली। इत्मीनान से वैठकर जब लंबा-चौड़ा आर्डर दिया जा चुका तो मैंने पूछा, "वहुत खुश हो रहे हैं ?" "खुश होने की तो वात ही है। दो साल से प्राइवेट मिडिल स्कूल में लड़के हांक रहा हूं। साले तीन सौ पर साइन करवाकर दौ सौ टिकाते थे। ऊपर से क्लर्क का भी काम करवाते थे।" "यहां क्या मिलेगा?" "साढ़े चार सौ का तो ग्रेड ही है। ऊपर से महंगाई भत्ता है, अंतरिम राहत है। फिर सरकारी नौकरी है, काम की कोई पाबंदी नहीं, किया तो किया, नहीं किया तो नहीं किया। कोई पूछनेवाला नहीं, ढेर सारी छुट्टियां, सी०एल०,ई०एल०, मेडिकल 'वस, आराम से जिंदगी कट जायेगी। फिर बुढ़ापे की पेंशन तो कोई रोक ही नहीं सकता-ऐसे क्या देख रही हैं ?" "सोच रही थी..." "क्या?" "लोग कैसी-कैसी महत्त्वाकांक्षाएं पाल लेते हैं !" "कल्याणी जी", वे एकदम गंभीर हो उठे, "हम आपकी तरह कला- कार नहीं हैं। आकांक्षाओं का आकाश बस इतना-सा है।" "अरे, आप तो बुरा मान गये । आई एम वेरी सारी।" "नहीं, इसमें सारी कहने जैसी तो कोई बात ही नहीं है। आपने सच कहा है। और अब अगर आप बुरा न मानें तो मैं भी कुछ सच बोलना चाहता हूं। इस नौकरी से मैं खुश हूं, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि . - १२ राग-विराग यहाँ रह मकंगा। आपसे रोज भेंट हो सकेगी।" मैंने तड़पकर उनकी ओर देया। इच्छा हुई कि घीपर कि इतना गुगनुमा मूठ मत बोलिए । उसे सच मान लेने की इच्छा होती है। पर प्रस्ट रूप गे इतना ही कहा, "रोज नहीं। मैं वेवल मंगस और गुम को ही पडित जी के पास थाती हूं।" "केवल वही एक जगह तो नहीं है।" "नही-पंडित जी यह सब पसद नहीं करेंगे।" "मपाल उनकी पसंद का नहीं है। आप पसंद करेंगी कि नहीं, यह बताइए?" पानी के तेज बहाय मे जैसे संतुलन यो जाता है, वैसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। पर लौटी तव भी मेरे पर जमीन पर नहीं थे। परामदे में ही भैया टकरा गये। गोद में ट्रांजिस्टर रस 'स्वरमुधा मुन रहे थे। मतलव पौने सात बज चुके थे। डर लगा कि देर से लौटने के लिए जवाब तलय होगा। पर ये तन्मयता से कार्यक्रम सुन रहे थे । मुमे देखते ही बोले, "फनु, सुन ! टैगोर हाल में पिछली बार परवीन ने यही चीज मुनापी धीन?" अब मेरे कान सजग हुए, हंस ध्वनि का तराना था। इसे भी मान ही बजना पा। मेरा रोम-रोम उस लय पर थिरक उठा। हर तान के साप मन अंगड़ाई ले रहा था। "जी,"मैं जैसे सोते से जागी। "बहुत गुश नजर आ रही है आज !" "नही तो," मैंने कहा और तब ध्यान आया कि गाना तो बव का समाप्त हो चुका, रोल समाचार शुरू हो गये थे और में सभी उसी धुन पर पिरक रही थी। अपने उसी स्वाग को बरकरार रखते हुए मैं ताकि घूम तिनक तकि घूम' गुनगुनाती हुई कमरे में चली आयो । मन तो हुआ था, भैया से कहूं- 1 . हां भैया, आज मैं बहुत खुश हूं। आज पहली बार किसी ने मेरी देह से परे जाकर मेरे अंतस के सौंदर्य को पहचाना है। पहली बार किसी ने मेरी भावनाओं को अपना मखमली स्पर्श दिया है। पहली बार किसी ने सपनों से मांग भरी है। पहली बार मेज पर रखे लवे लिफाफे ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। खोलकर देखा, एप्वाइंटमेंट लेटर था। इसी सोमवार को मानिक चोकवाली ब्रांच में ज्वाइन करना था। एक तरह से भैया ने अपना वादा निभाया था। "एक बार तू इंटरव्यू में निकल जा। फिर पोस्टिग का जिम्मा मेरा रहा। तेरी संगीत साधना में कोई व्यवधान नहीं आयेगा," उन्होंने कहा था। खुश होना चाहिए था मुझे, बैंक की नौकरी आजकल मिलती किसे है? पर इस सफलता से जुड़ा सारा प्रसंग याद करके मन कड़वा हो आया। भैया तीसरी वार मेरे लिए फार्म लाये थे । उसे मां के सामने पटककर मैंने कहा था, "आखिर आप लोग हाथ धोकर मेरे पीछे क्यों पड़ गये हैं ? जानते तो हैं कि इन चीजों में मेरा मन नहीं लगता।" "मन तो लगाने से लगता है," मां ने शांत स्वर में कहा । "कोई जबरदस्ती है ?" मैं भुनभुनायी। "कनु, कभी वात को समझा भी तो कर। हर वार अपनी ही हांकती रहेगी या किसी की सुनेगी भी !" "सुनाइए, क्या सुनाना है ?" "देख विटिया, जमाने का चलन अव बदल गया है। आजकल लड़की का रूप-रंग कोई नहीं देखता। सब नौकरी पर मरते हैं। नौकरी अगर बैंक की हो तो फिर पूछना ही क्या ! लड़केवाले हाथोंहाथ ले जाते हैं।" यह रूप-रंगवाली बात भीतर तक चुभनेवाली थी। उसे दिलेरी से झेलते मैंने कहा, "मां, अव्वल तो मुझे शादी ही नहीं करनी। और जो लोग सिर्फ मेरी नौकरी देखकर रीझेंगे, वहां तो विलकुल भी नहीं।" "शादी नहीं करनी तो फिर क्या करने का इरादा है ?" "वही जो कर रही हूं।" "गाने से किसी की जिंदगी वनी है ?" "मेरी वनेगी । तुम देखना, एक दिन मैं कहां पहुंचूंगी । तव तुम्हीं मेरी - १४ / राग-विराग तारीफ करते नहीं अपाओगी।" "आसमान को कंधाई कोई एक दिन में नहीं घूमोगी तुम। उसमें समय लगता है । तब तक के लिए पया सोपा है ?" "मतलब?" "कनु येटे." मां ने उसास भरकर पहा, "तुम्हारे पापू जी नही रहे। मैं भी अप कितने दिन जीऊंगी। यही गाल-दो साप"पाप गास। भाई भी मान लो तुम्हारे अपने हैं पर भाभियो सो पराये पर से यापी है। शादी नही करोगी तो क्या जिंदगी भर उनके भरोसे बैठी रहोगी? हाप में पुण्हतर तो होना पाहिए। हर महीने तनप्वाह साकर उनके हाप पर रोगी तो भाभियों की भी मारमा शात रहेगी। गही तो यही सोपेंगी कि दुनिया-जहान को लड़किया नौकरी करती है लेकिन ये दोनों मां-बेटी मुफ्त की रोटियां तोड़ मां को फिर और कुछ नहीं कहना पड़ा था। हारकर फार्म भर दिया था मैंने। फिर एक कोचिंगवलास भी ज्वाइन कर सी भी । तीन महीने जम. कर पढ़ाई की थी और आज यह नौकरी का नियुमितपत मेरे हापमपा। मन हुआ, उस कागज के टुकड़े-टुकड़े करके मो के सामने उधारा दू और पहूं--अब इस नौकरी की जरूरत नहीं है मां। इसके बिना भी मुगे चाहनेवाले लोग दुनिया में है... अगली बार मेंट हुई तो मैंने ही आमंत्रण दिया, "मार पाप हमारी और में पोजिएगा।" "मिस युगी मे?" "हमे नौकरी मिल गयी है।" "लेकिन याप तो नौकरी करती पीन?" "वह कोई नौकरी पी! पामेटमनी तक नहीं जुटती थी। मैंने सो गोषा या कि उम बहाने थोड़ा रियाज ही जाया करेगा। पर यम्मी माय पिल्लाते हुए मेरा गला भी फट वाग कागा हो गया है।" "यय नहीं मिली है?"
"बैंक में, यूनियन बैंक।" "वाह !.." तब तो सिर्फ चाय से काम नहीं चलेगा।" "जो आप कहें।" बोले, रेस्तरां से निकलकर हम लोग पार्क की तरफ निकल गये । वही जानी- पहचानी जगह, वही परिचित माहौल था। पर साथ बदल जाने से एकदम खुशनुमा हो उठा था। वहां नरम घास पर पैर फैलाकर बैठते "कल्याणी जी, एक काम कर सकेंगी? आप सुबह पढ़ाने जाती हैं न? वहां कुछ परिचय तो हो गया होगा। एक-दो ट्यूशंस दिलवा सकेंगी?" "क्यों ? पढ़ाने से मन नहीं भरा क्या?" "सिर्फ मन भरने से क्या होता है !" वे बुदबुदाये; फिर मुझसे बोले, "बहुत सारा खाली समय रहता है मेरे पास । उसका उपयोग हो जायेगा। फिर थोड़ा सहारा तो होगा ही।" "सहारे का तो मैं नहीं जानती, पर हां, खाली समय के उपयोग के बारे में सुझाव दे सकती हूं।" "क्या?" "भाग्य से आपकी पोस्टिग इतने बड़े शहर में हुई है । अब कुछ क्वालि- फिकेशंस बढ़ाने के बारे में सोचिए न ! क्या जिंदगी-भर क्लर्क ही बने रहने का इरादा है ? एम० ए० की क्लासेज सुबह लगती हैं। आप आसानी से किसी भी विषय में एम० ए० कर सकते हैं । या चाहें तो शाम को मैनेजमेंट या लॉ ज्वाइन कर सकते हैं। और आप तो वी०एस-सी० हैं न, पालिटेक- निक में दाखिला क्यों नहीं ले लेते ? मजे से तीन साल में डिप्लोमा ले, लेंगे।" वे एकदम उदास हो आये, "कल्याणी जी, उस दिन आप मेरी महत्त्वा- कांक्षाओं को सुनकर हंसी थीं, आज..." "ओह तो आप उस बात को भूले नहीं हैं ?" "नहीं भूल सका। और मैं चाहता हूं कि आप भी मेरी यह बात याद रखें कि महत्त्वाकांक्षाएं पालने के लिए भी सुविधा चाहिए। याद होगा, आपको उस दिन मैंने कहा था, मेरी आकांक्षाओं का आकाश बस इतना-सा १६ / राग-विराग ही है। जानती हैं क्यों ? सपने देखने की उम्र में ही गृहस्थी का भार कंधों पर आ पड़ा है। सिर उठाकर चलने की आदत ही छूट गयी है। "मेरे पिता बहुत बड़े आदमी नहीं थे, पर उनके होने में एक महारा था, निश्चितता थी। चार साल पहले उनका देहात हो गया। एक बहन की शादी करके गये हैं। पर फर्ज की किस्तें अभी बाकी हैं। दूसरी बहन भी अभी व्याहने को है। मां भी हैं। इतनी सारी जिम्मेदारियां लेकर आदमी ऊंची उड़ान कैसे भर सकता है ? उसे जमीन पर ही घिसटना पड़ेगा।" मैं करणा से आप्लावित होकर उनकी गापा मुन रही थी। कभी सोचा भी न पा कि यह हंसमुख व्यक्ति अपने भीतर इतने नूफान समेटे होगा। "आपने अभी इतने सारे नाम गिनाये। अगर चाहूं भी तो क्या मैं वह वर्ष उठा सकता हूं? कालेज की फीस, परीक्षा की फीस, किता, कापियां, यस का किराया-इन सबके बारे में सोचकर देयिए। महां मे आपेगा इतना रुपया, कौन देगा?" "मैं दूंगी।" ये तो क्या वस्र में भी चौक पड़ी। यह अनजाने में ही बया रह गयी में ? अनजाने में भले ही हो, पर अननाह नहीं कहा था, इसीलिए पछतावा भी नहीं हुआ।
२
।
।
सोमवार की सुबह आफिस जाने से पहले मैं पंडित जी के यहां गयी।
पिछवाड़े आंगन में जाड़े की धूप सेंकते हुए दोनों शिव-पार्वती की
तरह पास-पास बैठे थे। पंडित जी अखबार पढ़ रहे थे। और जिया मटर
छोल रही थी। मैंने मिठाई का डिव्वा सामने रखकर दोनों के पैर छू लिये।
"काहे की मिठाई है ?"
"जिया, मेरी नौकरी लग गयी है।"
"नौकरी? हम तो समझे कि तुम्हारी सगाई हो गयी है।"
"अजीव अहमक हो, सगाई की मिठाई देने क्या वह खुद आती ?"
पंडित जी ने एकदम झिड़क दिया तो जिया कटकर रह गयीं। उन्हें उबारने
के लिए मैंने कहा, "आज ही ज्वाइन कर रही हूं। आप लोगों का आशीर्वाद
लेने आयी हूं।"
"बैठी मुंह क्या ताक रही हो? जाओ, ठाकुर जी को भोग लगाकर ले
आओ। लड़की प्रसाद लेकर जायेगी," पंडित जी फिर झुंझलाये। मिठाई
का डिब्बा उठाकर जिया वैचारी भीतर चली गयीं।
"अव आपको मेरे लिए रविवार को समय निकालना पड़ेगा," मैंने
कहा, “या कहें तो शनिवार की शाम को भी आ सकती हूं, क्योंकि बैंक में
शनिवार की भाधी छुट्टी रहती है।"
"अरे भई, क्या करने लग गयीं ?" पंडित जी ने जिया को आवाज दी,
"जल्दी ले आओ। उसे दफ्तर जाना है।"
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-
१५ / राग-विराग
चनरे उस बादश में मेरे लिए म्पपता मले हो रही हो, पर स्वर में केवल पिरान कामा भाव था। तम पहली बार मैंने लक्ष्य पियामि अब से पापी हू, वे मुमसे एक गम्द भी नहीं बोले हैं। "पंडित जी" उन्होंने केवल मेरी तरफ देखा। "आप"आप"नाराज है?" "नही नो, हम क्यों किसी से नारार होने सगे।" "किसी से हों, न हो, मुमसे तो हो ही साते हैं। आप मेरे बड़े हैं. मेरे गुरु हैं । अगर अनजाने में कोई भूल हो गयी हो तो कान पकड़कर बताने काहरू आपको है।" "नहीं विटिया, अब यह बात नहीं रही।" "क्यों ? क्यो नही रही?" "अगर हम तुम्हारे कुछ होते तो तुम एक बार कम-मे-यम पूलही भेती। एकदम मिठाई साकर सामने न रखती।" म एकदम से आसमान से गिरी। शर्म से मैंने सिर झुका लिया। सप-यह मुझे क्या हो गया था ! जिस नौकरी के लिए पहले इतनी उदा- सीनता थी, उसी के लिए इतनी म्यग्र हो उठी कि इतनी साधारण-सी बात भी याद न रही। मा ने याद न दिलाया होता वो मापद मिठाई मेकर भी नहीं पाती। ऐसा पहले कभी नही हुआ था। उनकी अनुमति लिये बिना मन पर तो कभी गयी ही नहीं, कालेज की पिकनिक या किसी रिश्तेदार की शादी में भी जाना होता तो पहले उनसे माता सेसी। मेरी इस गुरुभक्ति का पर मैं अकसर मजाक उड़ता। मंध्या भाभी नयी-नयी शादी होकर मामी तो ये धाएं मुनफर बड़ी रसुक हो उठी । एकदिन जिद करके मेरे साप हो मीमा ने इस तरह नयी-नवेली बहू का औचफ पता जाना मन्सा नहीं लगता। पर मैंने मना नहीं किया। में उनके अपेक्षा-मंग का मजा मेना पाहती थी सिप पारी सनी निराश हुई। मल्टी-यासी मासिप का मना हाय से निरम गया।
"कनुः.. "ऐसी क्या मजबूरी आ गयी थी वेटे ? हमसे कहा होता.!" "दरअसल~-भैया की बहुत इच्छा थी। परीक्षा देने गयी थी, तव आपसे कहा भी था।" "हां, शायद बताया था तुमने।" "उनका मन रखने के लिए परीक्षा दे दी थी। अब सेलेक्शन हो गया है तो वे कहते हैं कि चांस छोड़ना वेवकूफी है। आप तो जानते हैं--बाबू जी के बाद अव भैया ही घर के बड़े हैं। उनकी वात रखनी पड़ती है।" इसके बाद पंडित जी कुछ नहीं बोले। पर मेरा मन ग्लानि से भरं उठा। सारे रास्ते मैं अपने को धिक्कारती रही। छिः, अपने पितृतुल्य बड़े भाई पर यह कैसा आरोप जड़ दिया मैंने ! अपने ऋपितुल्य गुरु से कैसे वोल गयी मैं ! बड़े भैया ने तो कभी किसी बात के लिए जोर नहीं दिया। वे तो बेचारे डरे-डरे-से ही रहते हैं कि मुझे और अम्मां को कोई वात चुभ न' जाये । हम दोनों को वे ही तो झेल रहे हैं। बाकी दोनों ने तो बड़ी आसानी से पीछा छुड़ा लिया है। कपिल भैया के पास वइया छोटे मकान का शाश्वत बहाना है । सुनील भैया दिल्ली की महंगाई का रोना रोते रहते हैं। नीता भाभी तो साफ कहती हैं कि जब बड़े भैया पैतृक मकान का आनंद उठा रहे हैं, तो जिम्मेदारियां भी भुगतें। से कैसे झूठ मेरे लिए रविवार की दोपहर में दो से चार तक का समय निश्चित हो गया। पहले दिन से ही लगा कि पंडित जी कुछ खिचे-खिचे-से हैं। सात-आठ. साल साथ रहने के बाद गुरु-शिष्य के बीच जो सामंजस्य पनपता है, वह कहीं से टूटता नजर आया। फिर कुछ मैं भी उखड़ी-उखड़ी-सी रहती। मनोज उन दिनों एक अलग कमरा लेकर तिलक नगर में रहने लगे थे। रविवार की शाम मैंने उनके नाम कर दी थी। तानपूरे पर उंगलियां फेरते हुए मैं अकसर प्रतीक्षा की .२०/राग-विराग । पड़ियां गिनती रहती। शरीर यहा होता, पर मन हवाओं में बात करता हमा प्रियतम के पास पहुंच जाता था। इसीलिए पंडित जी एक-एर चोर कई बार ममताने, फिर भी मेरी पकड़ में न थाती। तब वे अरसर मसला उटने। उमदिन मालकोंस का रियाज हो रहा था। अमीर यो माहा की बड़ी प्यारी-मी बंदिश जिनके मन राम विराने में कही मे लिगकर में वापी पी और मे गले में बैठाने का प्रयास कर रही थी। पोडत जी यही तन्मयता में मुझे उस जैसी को वारीवियां, मृवियों समता रहे थे। पर मेरा दिमाग उम समय नौमिधियों से भी गया-गुजरा हो रहा था। बार-बार स्वर फिमलकर गुट निषाद पर ही आ टिकता था। दो-तीन बार पहिन जी ने टोरा भी, "बेटे, यह पंद्रकास नहीं है," पर जैसे मैं पहली बार सा-रे-गा-मा सीप रही थी। जब तीन-चार बार इसी पी पुनरावृति होती रही तो उनकी भी सहन- पीसता जवाब दे गयी। "रस करो," घीसे, "तानपूरा रप दो और दरा हो जाओ। जब दिमाग टिकाने रहा करे तभी यहा माया करो। परना मेरा समय पराब करने की जरूरत नहीं है।" अपमान में मेरे मामू निकल आये । पस्तिनी की संट पहली बार नही पायी थी। पर मिठ घावो के सामने वे हमेशा वरिष्ठ नियों की गरिमा बनाये रयते थे। माज उन्हें इसका भी भान न रहा। मेरे पीछे अपनी बारी की प्रतीक्षा करती हुई गिरिजा और गोभा बैठी थी। उनकी सरफ देखने का मुझे साहस नहीं हुआ। वैसे ही सिर झुकाकर पली आयी। अपने उम अपमान की बात मैंने पिसी को नहीं बतायी। मनोजो भी नही। उस माम में खुशी-बुमीमी रही तो वे मुतमे पुरंदर पूछते रहे। पर मैंने कुछ नहीं बताया । यताती भी तो वे शायद समाते नहीं। अपने रविवार को जब ढाई बजे तक लेटी हु. में उपन्यास पढ़ती रही तो मां ने टोका, "आज जाना नहीं है ?" । "क्यों?" मां के इमप्रल पर इतने दिनो का बंधा अवसाद "देख कनु, मां चुपचाप सुनती रहीं। फिर मेरे चुप होते ही बोली, "इसका मतलब है कि अव तुम बहुत बड़ी हो गयी हो। तुम्हें डांटने का भी अब किसी को अधिकार नहीं रहा ।" मैं हैरत से उनका मुंह ताकती रह गयी। मैं अनपढ़ सही, पर इतना जानती हूं कि विद्या गुरु के चरणों में बैठकर ही पायी जाती है। तू अगर उनसे ही अभिमान करने लगेगी तो इतने दिन का सीखा हुआ भी मिट्टी हो जायेगा।" उस दिन मां ने ठेल-ठालकर मुझे भेजा। मैं मुंह फुलाये ही घर से निकली थी और उसी मुद्रा में जाकर बैठ गयी। लेकिन पंडित जी हमेशा की तरह अपने वत्सल स्वरूप में थे। मुझे देखते ही वोले, "तबीयत तो ठीक है न, विटिया? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है ?" "कुछ नहीं-चलकर आयी हूं न, इसलिए।" उन्होंने जिया को आवाज देकर मेरे लिए शरवत बनाने को कहा। फिर मेरे संकोच को अनदेखा करते हुए बोले, "मैं पहले ही जानता था कि ऐसा होगा।" "हफ्ते-भर दफ्तर में मगजमारी करने के बाद गाना सीखने लायक दम- खम तुममें नहीं है। कोई लड़का होता तो शायद निभा ले जाता। पर यह तुम्हारे बस की बात नहीं है।" "लेकिन पहले भी तो हफ्ते में दो ही दिन सीखती थी।" "पर वाकी दिनों में तुम स्वतंत्र तो थीं । तुम्हारा मन कहीं भटकता तो नहीं था। तुम्हारी शक्ति कहीं और तो खर्च नहीं होती थी। यह तो साधना की डगर है वेटा, शक्ति भी चाहिए और लगन भी। इस तरह दो नावों पर पैर रखकर चलोगी तो बड़ी मुश्किल होगी, तुम्हारे लिए भी और मेरे लिए भी।" "वहुत आशाएं लगायी थीं तुमसे," वे उसांस भरकर वोले, "तुम्हारे पिता जी से मांग लिया था मैंने। उन्हें वचन दिया था कि विटिया को एक दिन संगीत-शिरोमणि बनाकर रहूंगा। पर अब लगता नहीं है कि मेरा वह कोल कभी पूरा होगा।" २२ / राग-विराग उनके स्वर में पोर हटानायी।मे ८-१० सान की तपस्या पर रिसी ने पानी फेर दिया हो। आदम साल पहमेवानी यह बात याद हो आयो । बाबू जी रिटायर हो गये थे और हम सब अपना सामान समेटकर भगा के पास या गरे पे। शहर के सूल का एक हौवा-सा मन में था। पर बहुत जल्दी ही मैंने अपना सिक्का जमा लिया। सड़कियां मेरे कपड़ी का मजाक बनाती, मेरी मापा की नकल उतारती पर एक तुप घाल मेरे पास भी पी- आवाज । महीने दो महीने में ही मैंने कई फैन जुटा लिये थे। स्कूल के वार्षिकोत्सव में पहली बार मंच पर जाने का अवसर मिला। मुगम संगीत की प्रतियोगिता थी। मुझे तो नया कोई गीत याद भी नहीं पा। वहीं पुराना-सा-'पूपट के पट मोत ही गा दिया और बाजी मार मी। प्रथम पुरस्कार के लिए जब मेरे नाम की घोषणा हुई तो कितनों के पेहरे देखने मायक हो गये थे। निर्गायकों में एक युजुर्ग से पक्ति भी थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर उन्होंने पाम धुमाकर गावामी दी, नाम पूछा, फिर बोले, "गाना सीयोगी?" "गाना?" -अगर सीपना पाहो तो अपने पिता जी से कहना, मुममे मिस उनका मताया पता रटते हुए ही में घर पहुंची। रात-भर पगी के मारे नीद नहीं पायो । दूसरे दिन मुबह-सवेरे में बाबू बी को घसीटकर सेठ रामदास जी की बगीची में ले गयो। वहां धीचोबीच श्री रघुनाथ जीना मुन्दर मदिर पा। छोटा-सा,किंतु सुन्दर-सा। सफेद पत्थर पर रंगीन नलागी थी। फर्ग पर काले-सद संगमरमरी चौकोर टुकड़े जठे हुए थे। युगल जोडी की मूर्तियां तो इनको मुन्दर थी कि आप टिकी रह जाती थी। हम मोग पहुंचे, उस समय भारती हो रही थी। बाहर इसका-दुक्का नापी यो पे। भीतर कसवारे सजन रेगमी धोती पहने मारती उतार रहे थे। बाबू जी तो उन्हें देखकर ही गद्गद हो गये। प्रसाद लेकर जैसे ही बाकी भक्तगण विदा हुए, बाबू जी ने आगे बढ़कर उन्हें दंडवत् किया' और बोले, "महाराज, मैं काशीनाथ दूवे हूं। कल बिटिया के हाथ आपने संदेश भेजा था।" मुझे देखकर पंडित जी को सव याद हो आया। प्रसन्न होकर बोले, "अच्छा, तो आप हैं ! वाह भाई साहब, मैं तो आपको बधाई देना चाहता आपके घर में साक्षात् सरस्वती ने जन्म लिया है। मैं इतने दिनों से बच्चों को सिखा रहा हूं, सुन रहा हूं। पर यह बात कभी-कभी ही देखने में आती है.। मैं तो चाहूंगा कि आप इसे मुझे सौंप दें।" "यह तो कन्या का अहोभाग्य होगा, महाराज," वाबू जी हाथ जोड़- कर बोले, "लेकिन मैं रिटायर्ड आदमी हूं। खुद बच्चों के भरोसे हूं।" "मैंने आपसे कुछ और तो नहीं मांगा, भाई साहब । बस, बिटिया को मांग रहा हूं। पैसे देने वाले विद्यार्थी तो बहुत मिल जाते हैं, पर संतोप देने- वाला एकाध मिलता है। और फिर मैं पैसे के लिए सिखाता भी नहीं । हम कुल दो प्राणी हैं । पेंशन में मजे से गुजारा हो जाता है। सेठ जी के कुल- देवता की सेवा का भार ले लिया है। उनकी कृपा से सिर पर छत बनी हुई है। अब तो बस यही इच्छा है कि जो कुछ अपने गुरु से पाया है, वह शक्ति- भर औरों को देकर जाऊं।" बाबू जी ने बटुआ खोलकर ग्यारह रुपये निकाले और कहा, "बेटे, गुरु जी के चरण छुओ।" "यहां नहीं, घर चलिए," कहते हुए वे हमें पिछवाड़े ले गये। साफ- सुथरे, लिपे-पुते दो कमरे थे। बाहरवाले कमरे में तवलों की चार-पांच जोड़ियां, चार-पांच तानपूरे और दो हारमोनियम रखे हुए थे। बीचवाली दीवाल के पास एक बड़ी-सी चौकी थी। उस पर किसी साधु-महात्मा की तसवीर रखी हुई थी। उस पर चढ़ाया फूलों का हार ताजा ही था । वाता- वरण में अगरबत्ती की सुगंध व्याप्त थी। भीतर की ओर मुंह करके उन्होंने दो कप चाय लाने का आदेश दिया और फिर मुझसे बोले, "पहले इन्हें प्रणाम करो विटिया; ये गुरु महाराज हैं।" २४ / राग-विराग गुरु महाराज को प्रणाम करने के बाद मैंने उन्हें प्रणाम दिया। कुछ श्लोक-सा गुनगुनाकर उन्होंने आशीर्वाद दिया, जो मेरी समान में नहीं वापासव तक भीतर से चाप मा गयो। "ये तुम्हारी गुरुमाता है यिटिपा," पडित जी ने बताया। बाबू जी का इशारा पाकर मैंने उनके भी परछू लिये।" "का नाम है बिन्नू तुम्हारो?" म आगे तक सिर दफे हुए ही उग महिला ने पूछा । उस कच्ची उम्र में भी यह बात चुभे बिना नहीं रही कि ऐसे मुरीले व्यक्ति को यह कैसी वेमुरी पत्नी है ! . घर लौटते ही मां ने तूफान खड़ा कर दिया। "कुछ समानते हैं न सोचते हैं. वस जो मन मे आयेगा, कर गुजरत हैं। यह भी होश नही रहा कि सड़की अय बड़ी हो रही है। उमे किसी उस्ताद के पास मैं नही भेजने की-साफ यह देती हूं। ये सारे मंगीत मास्टर एक नंबर के लफंगे होते हैं !" और लगे हापों मा ने दर्जनो किस्ते मुना डाले जो उन्होंने भी कही से सुन रखे थे। मां ने तो एक तरह से वह प्रसंग समाप्त ही कर दिया था पर मैं ही जिद पर अड़ी रही। मां को हार माननी ही पड़ी। पहले दिन वे स्वय मेरे साप गयौं । पंडित जी की सौम्य, शात, सात्त्विक मुद्रा देखकर वे आश्वस्त ही नहीं, अभिभूत हो गयी। पर जिया को देखकर तो एक्दम हो रीम गयी। किसी भी प्रसाधन की अपेक्षा न रखनेवाला उनका दमकता रंग, वयस को झुटलानेवाली काति, तीखे नाक-नकश-ऐसा अनिद्य रूप-रग मैंने भी जीवन में पहली बार देया पा। वहां से लौटते हुए मा बार-बार उमांस भर रही थी, "माग्य का बुल है सय । ऐसा रूप सो रजवाड़ो के यहां भी मुश्किल से दिखाई देता है । और वैचारी इस पहे-पुजारी दावा के यहां माहू-बुहारी कर रही है।" मां की सहमति मिल जाने के बाद फिर कोई रवावट नहीं रही और मेरी विधिवत् शिक्षा प्रारम हो गयी। साल भर तो वे केवल भजन सिखाने रहे । कोई ८-१० भजन इस बीच मैंने याद कर लिये। पंडित जी कहते, - "कई लोग साल-दो साल सीखकर छोड़ देते हैं। उस समय उनके पास गुरु की नामलेवा कुछ तो पूंजी होनी चाहिए।" एक वार गला अच्छी तरह से मांज लेने के बाद ही उन्होंने रागदारी में प्रवेश किया। उस समय उनके पास कोई २०-२५ शिष्य थे। पांच से ले- कर ४५ वर्ष तक के ये स्त्री-पुरुष बंधे-बंधाये समय में उनके पास आते थे । पंडित जी सव पर एक-सी मेहनत करते थे । पर शीघ्र ही सब जान गये कि मुझ पर उनकी विशेष कृपादृष्टि है। एक-एक स्वर को मेरे गले में बिठाने के लिए वे जान लगा देते। एक-एक तान जब तक ठीक से न उतरती, वे चैन से न बैठते । एक-एक हरकत के लिए वे खुद ही हलकान होते, मुझे भी थका डालते । पर दोनों तरफ जोश वरावरी का था, इसलिए थकन नहीं होती थी। समय और दिन तो मेरे लिए भी नियत था । पर मैं जव जी चाहे, चली जाती थी। दूसरों को सुनना मुझे अच्छा लगता था। और मेरा यह उत्साह पंडित जी को अच्छा लगता था। कई वार किसी कठिन जगह को वरिष्ठ छात्र बार-बार प्रयत्न करने पर भी पकड़ नहीं पाते। बाद में मैं बड़ी आसानी से उसे छुआती। पंडित जी निहाल हो जाते। अपनी परख पर उन्हें गर्व हो आता। वे बड़े इत्मीनान से मुझे सिखा रहे थे । वे किसी शिल्पकार की तन्मयता से मुझे गढ़ रहे थे। मैं अभी से उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति होने का दंभ भरने लगी थी। पर उन्होंने मुझे भटकने नहीं दिया। शुरू के वर्षों में उन्होंने मुझे गाने की अनुमति नहीं दी। बोले, "इनाम तो तुम ले भामोगी पर प्रशंसा का नशा अगर तुम्हें चढ़ गया तो फिर कुछ न सीख पाओगी।" उन्होंने मुझे रेडियो पर जाने नहीं दिया, "दुनिया भर के औंगे-पोंगे वहां परीक्षक बनकर आते हैं। अगर आडीशन में फेल हो गयीं, तो मेरी बदनामी होगी। अगर पास हो गयी तो बंधी-बंधाई लीक पर गाना शुरू कर दोगी। वही तीस मिनट का खेल, छोटा खयाल, बड़ा खयाल, आलाप, तान-गाओगी और सोचोगी, दुनिया बस, यहीं समाप्त हो जाती है।" तीन साल बाद पहली बार उन्होंने मुझे भातखंडे जयंती पर गाने की अनुमति दी । उस दिन जिन-जिन लोगों ने मुझे सुना, स्तब्ध रह गये। पंडित । २६ ! राग:विराग जी के पास बधाइयों का तांता लग गया। रात को मां ने मुघर में राई. नोन उतारा पा। वह मेरी पहली विजय पी, मेरी जयन्यावा रापहमा पडावपा। दूसरे दिन समाचारपत्रों में मेरा नाम फोटो के साप पापा। उन दिनो बी० ए० में पढ़ रही थी। हलसते हुए ही कालेन पहुंची । मब तक किसी ने मेरा नोटिस नहीं लिया था। यव सब जान जायेंगे कि भी कुछ . महपाठियो ने मेरा स्वागत विचित्र ठग से किया। सानियों ने मुझे देयने ही नजरें झका ली। पर कई लड़कों के चेहरे शरारत से मुस्करा । अपनी सीट पर वटते हुए मैंने देखा, लकयो पर मैरी अपवारवाली फोटो पिपली है। उसके नीचे पाक से लिखा हुआ है: 'कोयत काली होती है इतनी दारण अपमानना नोयन में पहली बार सही पी। सारा दिन में सिर ऊपर न उठा सकी। शाम को पंडित जी के यहां पहुंची तो वे उस समय भी गद्गद थे। जिया मे वैसे ये संगीत-पर्धा कम ही करते थे, पर मगन भाव से गेहूं फट- पती हुई जिया से उन्होंने कहा, "कल तुम्हारीय विटिया ने क्या पसंत गाया पायाह ! सबके चेहरे फक हो गये !" “पडित जी," मैंने गमीर होकर कहा, "आपने मुन्नसे वर्मत ही गों गवाया? मैं कोयल की तरह करती हैं, इसलिए म!" "मह गया कह रही हो कनु ?"वे हैरान थे। मैंने सुवासे हुए उन्हें सारी बात बता दी। मेरी बात सुनकर वे बोले, "उन्होंने तुम्हें कोयल कहा हैम! धुम्हारे स्वर के मोदयं को तो ये लोग अनदेया नही कर सके। बस, इसीका सोहा सदमै मनवाना है और ये एक दिन मानेंगे।" सर मैंने सोचा कि शायद यादूजी ने यही कुछ मोपकर मुझे उनके पाणो मे रान दिया था। 1 ३ बहुत दिनों बाद एक फुरसतवाला रविवार मिला था। मनोज चार-पांच दिन के लिए घर गये हुए थे। नौकरी के बाद वे पहली बार अपने परिवार से मिलने गये थे। वह भी इसलिए के पालिटेकनिक में उनका दाखिला हो गया था। उन्हें मालूम था कि सेशन शुरू होने के बाद फिर वे इतना समय न निकाल पायेंगे। मुझे लौटने की कोई जल्दी नहीं थी । इसीलिए पंडित जी के पास से उठने पर मैं जिया के पास आ बैठी थी। पहले दिन जिया मुझे बहुत बेसुरी लगी थीं। पर जैसे-जैसे परिचय बढ़ता गया, मैं उनके स्वभावगत माधुर्य से परिचित होती गयी। उनकी बोली में मुझे अपने ननिहालं की सोंधी गंध आती। इतने सालों तक महानगर में रहने के बावजूद न तो उनकी भाषा बदली थी, न स्वभाव । उनके निश्चल वात्सल्य की छांह में दो घड़ी बैठ लेना बहुत अच्छा लगता था। बहुत दिनों बाद सुयोग बना था इसलिए वातें थीं कि खत्म ही नहीं हो रही थीं। तभी पंडित जी ने आवाज दी, "इधर देखो, कौन आया है ?" और इससे पहले कि हम उठकर देखते, एक गोरी-चिट्टी महिला भीतर प्रविष्ट हुई। उन्हें देखते ही जिया वांहें पसारकर उठ खड़ी हुई और उन्हें अंक में भर लिया। गले मिलते ही दोनों ने जो विसूरना शुरू किया कि वाहर का सुरीला शोर अपने-आप थम गया। जिया के साथ मैं भी उठकर खड़ी हो गयी थी और अव असमंजस में २८ / राग-विराग
यौ कि क्या फर्स।वह स्लाई खुशी की यो या दुख की, यह मोसमझ म नहीं
पा रहा था। इसीलिए चुपचाप विरुक लेना भी अच्छा नहीं लग रहा
पा। जब कुछ भी समझ नहीं पड़ा तो मैंने वह दाल समेटनी शुरू कर दी
जो मैं जिया के माप दिनवा रही थी। बिनी हुई दाल डिब्बे में भरकर
यथास्थान रण आयो। अनादिनी दाल पतौली में रखकर उस पर पानी
र दी। बोरी उठाकर पिछवाड़े आंगन मे फटकारकर रख दो।
इस बीच वह युगल रदन थम गया था और दोनों बैठ गयो भो। हार
धोकर मैंने दो गिलासों में पानी डाला और उनके सामने रहर
"जिया, चाप बनेगी?"
जिया को जैसे अब मैरी उपस्थिति का भान हुआ। हुलहा.
"कानू, जे हमाई होरी है, मनोज की अम्मां।"
आश्चर्य है, मुझे पहले ही यह खपाल क्यों न आया? देने
कितना तो साम्प है! बस, जिया के भाल पर दिप-दिनकर
विदी-मर नहीं थी।
"कन्न," वे जैसे चौंकली हुई, “मतलब, कल्याणी"
"हो-जेई नाम है । हमपे तो लेतई न बनत।"
"तो यही हैं वो हुस्नपरी, जिन पे मुन्ना राजा मरे राम
हम दोनों अवाक।
"वाह जिया ! खूब देख-भाल की भाजे की। हम तो वहादुर
बैठे रहे । तुमने हमारे घर में आग लगा दी।"
"ऐसो का हो गयो?"
"अव होने को वाकी ही क्या रह गया है ! हम तो मन
गाना-भर सिखाते हैं। पर हमे क्या पता था कि वे प्रेमबार किन
घोल बैठे हैं। ये गर्वपे-बजवैये सब एक से होते हैं। दीदी
अम्मा ने हमें कभी तुम्हारे पास नहीं भेजा।"
"और अब किसकी भेजी हुई आयो हो?" पडित जी दाहारेरी
होकर एकदम दहाई तो मैं कांप-सी गयौ । पर मागंतुक परमो मन
हा, उतनी ही कड़कदार आवाज मे जवाब देते हुए दोदो,
भेजा है। यह गघा इस पद्मिनी से व्याह रचाना चाहता है। प्रमोद
- चार महीने भी पूरे नहीं हुए और उसके पंख निकल आये हैं। यह भी होश न रहा कि घर में जवान वहन कुआंरी वैठी है।" "यह तुम्हारा अपना मामला है, घर में निपटो। यहां गालियां वकने क्यों आयी हो?" "गाली किसने दी? खरी बात कह रही हूं, तभी तो लग रही है। आपकी शह मिलती रही है तभी तो उसकी यह हिम्मत हुई है, नहीं तो आज तक उसने कभी किसी की ओर आंख उठाकर नहीं देखा। और अव आंख पड़ी भी तो किस पर, हुंह !" शब्दों में जितनी घृणा उड़ेल सकती थीं, उतनी उड़ेलकर उन्होंने मुंह विचका दिया। पंडित जी दरवाजे में खड़े थे इसीलिए इतनी देर लिहाज किये रही। पर जव सव असह्य हो उठा तो उन्हें परे धकियाकर मैं बाहर निकल आयो। 'मनोज पर इतना गुस्सा आ रहा था। इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले मुझसे पूछा तो होता । क्या यह सोचा था कि मैं तो एक पांव पर तैयार खड़ी हूं, उनके कहने भर की देर है ? वैसे उन्होंने गलत नहीं सोचा था। पिछले कुछ दिनों से यही सपना मैं वार-बार देख रही थी। पर हर लड़की की तरह मैंने भी चाहा था कि यह वात कोई मेरे कानों मे मधुवंती की मदिर स्वरावलि में गुनगुनाकर कहे । यह क्षण मेरे जीवन में वासंती हवी का झोंका बनकर आये। यह पल मेरे मन के आकाश में शरद पूनों की चांदनी वनकर उतरे। प्राण-पांवड़े बिछा- कर मैं उस मदिर क्षण की प्रतीक्षा करती रह गयी और कोई जैसे मुंह पर थूककर चला गया। और अब यह मुंह लेकर पंडित जी का सामना कैसे करूंगी? क्या सोचा होगा उन्होंने ? उनके अकृत्रिम स्नेह का मैंने यही प्रतिदान दिया है ? उस अजातशत्रु को मेरे कारण आज क्या-क्या न सुनना पड़ा! रविवार की शाम अपने पूरे यौवन पर थी। सड़क पर वाहनों का रेला- सा बह रहा था । मन तो हुआ कि कूद पडूं किसी गाड़ी के आगे। सारा किस्सा ही खत्म हो जाये । पर एक और बेवकूफी करके मैं अपने ऋषितुल्य गुरु को ३० । राग-विराग और संताप देना नहीं चाहती थी। फिर इस अभागे देश में मवारी तड़की का मरना भी तो निरापद नहीं है । सो विवाद उठ खड़े होंगे। मा-मया कही मुंह दिखाने लायक न रहेंगे। और फिर इस तरह चुपचाप मरने से फायदा। एक बार मनोज से जवाब तलब तो करना ही है। मेरा इस तरह अपमान करने का उन्हें क्या बैंक से लौटकर चाय पी रही थी कि नीता ने आकर बताया, "वुआ, पंडित जी आये है।" हिम्मत जुटाकर उनके सामने पहुंची। उस समय वे ड्राइंग रूम में भैया के साथ बैठकर चाय पी रहे थे। मुझे देखते ही सहज भाव से बोले, "इधर से निकला तो एकदम याद मा गया। कल तुम मदिर जाने को कह रही थी न!". मना करने का कोई सवाल ही नहीं था। पूरे रास्ते कोई एक शब्द भी नहीं बोला। मंदिर पहुंचकर मैंने बेमन से प्रणाम किया और बाहर चबूतरे पर आकर बैठ गयी। पंडित जी निलिप्त भाव से भारांधना करते रहे। गर्भगृह में बड़े होकर उन्होंने अपने गुरु- गंभीर स्वर में शिव-महिमा का पाठ किया, अपनी नियमित परिक्रमाए पूरी की। फिर सबकी 'जै राम जी को' लेते हुए मेरे पास आकर बैठ गये। जिसके लिए आतकित थी, वह क्षण सामने आ गया था। "कनु," उन्होंने पूछा, "कल पाली बात क्या सही है ?" उत्तर मे मैंने सिर झुका लिया। जवाब देती भी तो क्या? कैसे कहती कि मेरी मनोज से इस संबंध में कभी कोई बात नहीं हुई। अगर कह भी देती तो क्या वे विश्वास कर लेते ? क्या कभी मैंने भी यह सोचा था कि इतनी बड़ी बात मेरी सहमति के बिना ही कह दी जायेगी? "एक रात और पूछूगा बेटे-तुम मनोज के रूप-रंग पर रीमी हो? या और कोई बात है।" मैंने इस बार भी उत्तर नही दिया। कैसे कह देती कि मैं तो इसलिए रीझी हूं कि कोई पहली बार मुझ पर रीझा है। पहली बार किसी पुरुष ने मुझे नारी रूप में देखा है। पहली बार किसी ने मेरे व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया है। पहली बार मेरा अस्तित्व गानेवाली गुड़िया से कुछ ऊपर उठा है। "उस घर में तुम्हारा स्वागत कैसे होगा, इसकी झलक तो तुम्हें मिल ही गयी होगी।" "जी," मैंने अस्फुट स्वर में कहा। "अच्छा हुआ जो कल तुमने अपनी होनेवाली सास का स्वाभाविक रूप देख लिया। यह भ्रम कभी मत पालना किं वह तुम्हारी जिया की सगी वहन है। दोनों के स्वभाव में कोई साम्य नहीं है। वह तो साक्षात् चंडिका है। सारा घर उसके आतंक के साये में पलता है। पति भी जब तक जीवित रहा, डरा-डरा रहा। उसके परिवार से उसे ऐसा काट दिया था कि जिंदगी-भर वेचारा अकेलेपन की व्यथा में घुलता रहा। बड़ी बेटी के सुसरालवालों से ऐसी ही ठनी हुई है। वेचारी के लिए पीहर का रास्ता ही बंद हो गया।".. "लेकिन आप यह सब मुझे क्यों सुना रहें हैं ?" मन अपने-आप प्रश्न करने लगा था। "तुम शायद सोच रही हो कि मैं यह सब क्यों सुना रहा हूं," उन्होंने जैसे मेरा मन पढ़कर कहा, "मैं तो तुम्हें केवल आगाह करना चाहता हूं कि लड़का मां के रोव में है, उसकी मर्जी के विना वह कुछ भी नहीं करेगा। तुम दोनों की भावनाओं में कितनी गहराई है, यह भी मैं नहीं जानता। पर यह जरूर कहूंगा कि मनोज कस्बे के कालेज का पढ़ा हुआ गंवई युवक है। ऐसे लड़कों के लिए लड़कियां एक अजूवा होती हैं। उनसे हंसना- बोलना तो वे आंख उठाकर देख भी नहीं पाते। उसके घर के वाता- वरण के संबंध में बता ही चुका हूं। "पहली गार उसने यहां आकर खुली हवा से सांस ली है। संयोग समझ लो कि इसी समय तुमसे परिचय हो गया। मैं अपनी कोई राय तुम पर थोपना नहीं चाहता। लेकिन कोई भी निर्णायक कदम उठाने से पहले तुम्हें आगाह जरूर करना चाहता हूं। यह मेरा कर्तव्य है।" . ३२ / राग-विराग मनोज छुट्टी से लौटे तो इतने उदास और बुझे-युझे से थे कि सारा गुस्सा पानी हो गया। पंडित जी की बात याद हो आयो। सचमुच वैचारे यातंक के साये में जीत रहे हैं। तभी तो मा की बमवारी को सिर झुकाकर खेल गये होंगे। मुझे तो माश्चर्य है, अपने मन की बात कहने का साहस कहा से जुटाया होगा इन्होंने ? शायद यह मेरी संगत का प्रभाव हो। इसके बाद हिम्मत जवाब दे गयो होगी । तभी तो ऐसे लुट-पिटे-से लौटे हैं । अपने ही बच्चों के व्यक्तित्व को इतना कुंद बना देने में उस औरत को न जाने क्या सुख मिला होगा! पडित जी ने ठीक कहा था, 'यहां आकर पहली वार उमने खुली हवा में सांस ली है। पहली बार परिचय हुआ था, वव में एक तरह ने चौंकी ही थी। पहली भेंट में कोई इतना कैसे खुल जाता है ? पर अब समझ में आ रहा है कि जिन्हें घर में मुंह खोलने का अवसर नहीं मिलता, वे बाहर ऐसे ही चहलते रहते हैं। उनके घर के माहौल से मुझे यो कुछ लेना-देना नहीं था। पर इस समय तो मेरी अपनी खुशी, अपनी जिंदगी दाद पर लगी हुई थी। मैंने समक्ष लिया था कि यह व्यक्ति इतना दम्बू है कि अपने मुख-दुख की बात भी स्वतंत्र होकर सोच नहीं सकता। यदि मेरा सुख-दुख भी इनके साथ नत्थी है तो इसके लिए भी मुझे ही सोचना पडेगा। और मैंने एकबारगी सोच लिया। मेरे इस आकस्मिक निर्णय से माई लोग चौक पड़े। अपनी इकलौती वहन के लिए उन्होंने इससे बेहतर घर-दर की कामना की थी। पर विरोध किसी ने नहीं किया। मा तो दामाद का रूप देखकर सारी हताशा भूल गयी। मनोज के परिवार में एक अम्मा जी भर थो, जिनको स्वीकृति की आशा थी ही नहीं। और रिश्तेदारों से तो पहले से ही ठनी हुई थी। एक बार अपना निश्चय मनोज के गले उतारने के बाद सारा काम आसान हो गया। पंडित जी बहुत प्रसन्न नहीं लगे। पर उन्हान अपनी अप्रसन्नता भी जाहिर नहीं की बलि वरात उन्हीं के घर से चदी। सनुराल की देहरी पर मेरा परघ्न जिया ने ही किया। इस बात को लेकर दोनो बहनो में सदा के लिए गांठ पड़ गयी। किसी की इच्छा-अनिच्छा, वैर-प्रेम की यहां परवाह ही किसे थी। आनन्द-पथ के दो यानी सारी दुनिया को अंगूठा दिखाकर अपनी यात्रा पर चल पड़े थे। - सब कुछ सपना-सा लग रहा था। अपने विवाह को लेकर कल्पना का ताना-बाना मैंने बुना ही नहीं था। इतना अवकाश ही नहीं मिला। मन सदा और-और बातों में उलझा रहा। यह प्रसंग जीवन में आंधी की तरह अकस्मात् उठा और मुझे अपने साथ वहाकर ले गया। पलक झपकते ही मैं मनोज को वरमाला पहना चुकी थी। भैया ने वेमन से.ही सही, जो सामान दिया था, उसे लेकर अपनी गृहस्थी का श्रीगणेश किया। विवाह वहुत प्रसन्न वातावरण में नहीं हुआ था। पर उससे हमारे उत्साह में कोई अंतर नहीं आया। समय पंख लगा- कर उड़ चला था। नौकरी मेरी भी थी। उनकी भी। शाम को वे क्लास भी जाते थे। बस उतनी ही देर को हम अलग होते थे। दिन तो दफ्तर में चला जाता था। पर शाम को घर पर अकेले रह जाना बहुत अखरता था, अपनी महती आकांक्षाएं तव मुझे ही जहर लगतीं। वह शाम का समय ही मेरे लिए फुरसत का समय होता था। कई बार मन होता -तानपूरा लेकर बैठ जाऊं, कुछ गा लूं, गुनगुना लूं । पर तभी रसोई की टेर सुनाई दे जाती। मां के यहां तो कभी चाय भी मैंने अपने मन से नहीं बनायी। पर इन दिनों पति को नित्य नये व्यंजन खिलाने का एक जुनून-सा सवार हो गया था। सुवह विस्तर से बाहर निकलते-निकलते नौ बज जाते थे। हावड़-तावड़ में चाय-नाश्ता भी ढंग का नहीं बन पाता था। पर शाम के खाने में मैं पूरी शक्ति लगा देती। रेडियो से, सहेलियों से, पत्रिकाओं से नयी-नयी विधियां सीखकर उनका प्रयोग करती रहती। बेचारे मनोज, मेरे इस अत्याचार को हंस-हंसकर झेलते। पति की प्रशंसा पाने का सुख उन दिनों मेरा सबसे बड़ा प्राप्य था। ३४ / राग-विराग रनोई से बचा समय इनके होमवर्क पर खर्च होने लगा, पता ही नहीं चला। स्वरलिपि लिखनेवाले मेरे हाय बड़े मजे से कॉपिया मरने लगे। और मजे की बात तो यह कि मुझे उस शुष्क काम में भी अलौकिक काम्य नजर आने लगा। जीवन का रंग ही बदल गया। रविवार की दोपहर पंडित जी के यहां जाना एक भार लगने लगा। बड़ी नासानी से में दो-दो रविवार गोल कर जाती। वे भी मुझसे उदासीन से हो गये थे। जाती तो निलिप्त भाव से कुछ बता देते । न पहले को तरह डांटते-फटकारते, न मनु- पस्थिति की कैफियत तलब करते। गाना विलकुल ही छूट गया हो, ऐसी बात भी नहीं। बल्कि इतने दिनों तक मैं स्वरों के जंगल में भटक रही यो। सही सुर तो अब जाकर मिला भा। इतने सालो से जो सीख रही थी, वे तो कोरे शब्द थे। उनका मर्म तो अब समझ में आया था। यब तक तो केवल गाती थी. अब मैं गीती को जी रही थी। सोलह शृगार करके रोज अटरिया पर बैठकर पिय की बाट जोहा करती। उनके विरह में एक-एक पल युग-सा बोतता । वै जरा भी देर लगा- कर आते तो रूठ जाती। कहती "जायो, जहां इतनी रात बिताकर आये हो, वही लौट जाओ। अब यहां क्या लेने आए हो?"वै मनुहार करने लगते तो लडियाकर कहती, "अच्छा; जरा मेरी उलझी हुई लट तो मुलझा दो।" मेज चढते हुए कभी बरन पायल को कोसती, कभी कंगन को-जो झन-सना- कर मेरा रहस्य सब पर सोल देते हैं। ऐसे में अड़ोस-पड़ोस को जिज्ञासु औरतें मुझे बैरन सास और दुष्टा ननद से कम नहीं लगती। सुबह होती तो मेरी अलम नायिका कहती, "अब तो जरा-र सो लेने दो, रात-भर तो तुमने आंख नहीं लगने दो.." मैं तो हैरान थो--उन रसिक मनोपियों ने कैसे-कैसे मरस प्रसंगों को शब्दों में बाघ दिया था। पहली राखी पर मैया मुझे लिवाने याये तो मैंने इन्हें भी ठेल-ठालकर घर भेज दिया। इनके मना करने के बावजूद रजनी के लिए एक अच्छी-सी साड़ी साथ रख दी। पर मेरा यह मद्भावना-मिशन फेल हो गया। दो दिन बाद ये लौटे तो वेहद उखड़े हुए थे। अपनी सारी धीज मुझ पर उतारते हुए थोले, "खुद वो अपनी मां के महा येठकर आराम फरमाती रही और मुझे । वहां भट्ठी में झोंक दिया। मैं तो जानता था, वहां जाकर क्या स्वागत होना है ! बस चलता तो कभी वहां का रुख न करता। पर रानी जी की जिद थीन !" पांच महीनों में पहली बार वे मुझसे इतने तिक्त स्वर में बोले थे। मैं समझ गयी कि इस व्यक्ति का प्यार जितना आक्रामक है, गुस्सा भी उतना ही भयानक है । फिर मैंने दीवाली पर कुछ नहीं कहा। चार-पांच दिन की और छुट्टी लेकर हम लोग वंवई चले गये। शादी के बाद पहली वार बाहर निकले थे। रोज की आपाधापी से उवरकर मन तरोताजा हो गया। जेव की हालत जरा और अच्छी होती तो इस सुख का स्वाद और बढ़ जाता। फिर भी हमने इस नयी आजादी का भरपूर आनंद । लिया। - पर घूमने का सारा मजा घर लौटते ही किरकिरा हो गया। अम्मां जी की एक बममार्का चिट्ठी हमारी प्रतीक्षा कर रही थी। पिछले अनुभव से ये इतने विफर गये थे कि इस बार त्योहार पर न खुद गये, न रुपये भेजे। अम्मा जी का झल्लाना स्वाभाविक था। पर दुख इस बात का हुआ कि वेटें की लापरवाही का दोष वहू के सिर मढ़ दिया गया था। "चलो, हम जाकर उन्हें मना लायें," मैंने कहा। "नहीं, तुम वहां नहीं जाभोगी," वे गुर्राये। "तो तुम अकेले ही हो आओ।" "नहीं, मैं भी नहीं जाऊंगा।" "क्यों?" "जहां तुम्हारा स्वागत नहीं हो सकता, उस घर में मैं पांव भी नहीं दूंगा।" पति का यह ऐकांतिक प्रेम देखकर मैं गद्गद हो आयी। पर मेरे कारण वे अपने घर-परिवार से कट जायें, यह मुझे अच्छा नहीं लगा । उन्हें शांत करते हुए मैंने कहा, "कभी उनकी ओर से भी तो सोचकर देखो। हर मां अपने वेटे के लिए एक सुंदर-सी बहू की कामना करती है। अम्मा जी ने भी की होगी। इसलिए उनका निराश होना स्वाभाविक है। हमें उनकी भावनाओं को समझने का यत्न करना चाहिए।" .३६ / राग-विराग "तो क्या करने को कहती हो?" वे नोखे। "हम लोग जाकर उन्हें लिवा ले आयें। मैं अपनी सेवा से उन्हें प्रसन्न कर लूंगी। वैसे भी अब उन दोनो के वहा रहने में कोई तुक नहीं है । रजनी की पढाई यहा भी हो सकती है बल्कि और अच्छी तरह हो सकती है।" "तुम सोचती हो, तुम्हारे बुलाने से ही वे आ जायेंगी?" "क्यो नही आयेंगी?" "शादी तक में तो आपी नही । मिन्नतें कर-कर के हार गया मैं।" "तो क्या हम वही गाठ मन मे लेकर बैठे रहें ? देखो मनोज, कुछ हमे भी भूलना होगा। उनका मान यदि तोड़ना है तो पहले हमें कुछ झुकना होगा। फिर देखना । कैसे चुटकी में सब काम होते हैं। क्योकि मैं जानती हूं, अपना बेटा-बहू कोई हमेशा के लिए नहीं छोड़ देता।" "तुम्हारा भ्रम है, ये बहुत नाकवाली हैं, नहीं आयेंगी।" और वह प्रसंग वही समाप्त-सा हो गया। सचमुच वे बड़ी नाकवाली निकली। दस वार जाकर इन्होंने नाक रगडी, तव कहीं उन्होंने आने की अनुकंपा की-इतने दिनों तक कहती रही तव नहीं माने; जव गरज पडी तव बुलाने गये । इसीलिए आते ही उन्होंने सबको नाकों चने चबवा दिये। आते ही उन्होने अड़ोस-पड़ोस मे एलान कर दिया, "मेम साहब को तो दफ्तर जाना होता है । हमारे मुन्ना राजा तो बेचारे अभी तक स्कूल-कालेज के चक्कर में पड़े हुए हैं। फिर घर को कोन संभाले ? राजकुमारी को देख- भाल कौन करे ? इसीलिए दो-दो दाइयां बुलवायी गयी हैं । रूखा-सूखा खाकर कोने मे पड़ी रहेगी।" दरअसल राजकुमारी जरा जल्दी ही आ गयी थी। अभी हमारे पास बच्चे का कोई प्रावधान नहीं था। पर जब डाक्टर ने यह खुशखबरी सुनायी तो उस ईश्वरी सौगात को लौटाने का मन भी नहीं हुआ। प्रसूति के लिए मैं मां के यहा चलो गयी थी। तीन महीने की पूजा को लेकर ही घर लौटी। इसी बीच रोटी-पानी की समस्या को लेकर यह ।
। - अम्मा जी को ले आये थे। बोले, "रोटी-पानी का तो बहाना है। खाना तो मैं होटल में भी खा सकता हूं। सर सोचा कि कल को तुम बैंक जाने लगोगी, तब भी तो घर में कोई चाहिए । सिर्फ नौकरों के भरोसे तो बच्ची को दिन- भर नहीं छोड़ा जा सकता।" जब तक मां के यहां रहीं, ये रोज शाम को मुझे देख जाते। पर अम्मां जी एक वार भी नही आयो । मां अकसर कहती, "कैसी कठ-करेजिन है तेरी सास? क्या एक बार भी उसका पोती देखने को मन नहीं होता?" मां तो मेरे ससुराल जाने की कल्पना मात्र से व्याकुल हो जाती। अगर मनोज यह नयी व्यवस्था न करते तो मैं पूजा को मां के हाथों ही सौंपती । तीन महीने बाद ज्वाइन करके मैंने फिर छुट्टी बढ़ा ली। वह एक दिन भी मुझ पर भारी पड़ गया था। दिन-भर मन घर में ही लगा रहा। उधर पूजा ने भी रो-रोकर सारा मोहल्ला जुटा लिया था। सारा हाल देख-सुनकर मनोज मुझे छुट्टी समाप्त होने से पहले ही घर ले आये ताकि बच्ची नये लोगों से परिचित हो सके । नये वातावरण की अभ्यस्त हो सके। वहुत जोरदार स्वागत की तो मैंने भी आशा नहीं की थी। पर अपने ही घर में चोरों की तरह घुसना पड़ेगा, यह भी नहीं सोचा था। रजनी पड़ोस में सहेली के पास बैठी थी। उसने देखकर भी अनदेखा कर दिया। अम्मां जी रसोई में व्यस्त थीं। कुंडी खोलकर दोबारा वहीं लौट गयीं। उनके पांव छूकर मैंने पूजा को उनके चरणों में डाल दिया। पर आशीर्वाद देना तो दूर रहा, उन्होंने आंख उठाकर देखा भी नहीं । अपमान का चूंट पीकर रह गयी मैं । अनायास ही जिया की याद हो आयी। रिक्शा रुकते ही कैसे हुलसकर दौड़ी आयी थीं। फिर मुझे दरवाजे पर खड़ा करके वैसे ही भागी-भागी भीतर गयी थीं। राई-नोन उतारने के वाद ही मुझे भीतर प्रवेश मिल सका था। पूजा को उन्होंने लपककर गोद में उठा लिया था और उसके कुनमुनाने की परवाह न करते हुए देर तक दुलराती रही थीं। पोती के उछाह में उस दिन पंडित जी ने सारे शिष्यों को छुट्टी दे दी थी। जिया ने खीर-पूड़ी बनायी थी, मोहल्ले में बताशे वांटे थे । चलते समय 'रघुनाथ जी का प्रसाद' कहकर ढेर सारा सामान साथ दे - दिया था। ३८ / राग-विराग मुझ पर तो अम्मांजी की अवकृपा सदासे थी, पर सोचा था कि बच्ची को देखकर उनका मन पिघल जायेगा। मेरी यह आशा एकदम व्यर्थ भी नहीं हुई । मुझसे दे वैसे ही कटो-कटी-सी रही पर पूजा को अधिक समय तक अनदेखा न कर सकी। गोरी-चिट्टी गुलगोयनी पूजा विलकुल उनके बेटे की प्रतिमूर्ति थी। मैं जान-बूझकर उसे लिटाकर इधर-उधर काम मे लग जाती। वे चुपके से आकर उसे उठा लेती, लाड करतो । मेरो जरा-भर आहट पाते ही पटककर चली जाती। पंद्रह दिनों में ही वे इतनी मोहाविष्ट हो गयी कि उन्हें फिर मेरा संकोच भी न रहा, वे दिन-भर उसे चिपटाये रहती और मुझे सुनाकर रजनी से कहती, "गनीमत है कि मा पर नहीं गयी, नहीं तो हाय लगाने का भी मन नहीं होता।" कई बार मन होता कि तड़ से कह दूं, "लाख काली सही, कोख तो मेरी उजली है। आप ही की तरह गोरा-चिट्टा बच्चा मैंने जन्मा है।" पर फूस के ढेर में चिनगारो डालने की हिम्मत नहीं पड़ती।
४ - । अपने में शक्ति और साहस जुटाने के लिए जो छुट्टी मैंने वढ़ायी थी, वह भी एक दिन समाप्त हो गयी। शायद उसी दिन से मेरा यातना-पर्व प्रारंभ हुआ था। अपनी लाडली को उन सहानुभूति-शून्य हाथों में सौंपकर बाहर निकलते हुए मन बहुत रोया था। पता नहीं किस कुघड़ी में मैंने उसे छोड़ा था-वह मुझसे दूर होती चली गयी। मेरा उसे लाड़ से दिया पूजा नाम भी अस्वीकृत कर दिया गया। अब वह श्वेता थी। मैदे की लोई-सी, कच्चे दूध की-सी उसकी चिकनी शुभ्र कांति ही उसे यह नाम दे गयी थी। विवशता ही कुछ ऐसी थी कि मुझे मन मारकर काम पर जाना पड़ता था। नहीं तो मैं कब से नौकरी छोड़-छाड़कर घर बैठ जाती, बार सामान्य औरतों की तरह बच्चे पालती। पर नौकरी तो अब मेरी नियति बन गयी थी। घर में एक नये प्राणी के आते ही खर्च बढ़ गया था। मैं उसे अच्छे-से- अच्छा पहनाना-ओढ़ाना चाहती थी। उसके रख-रखाव में, खाने-पीने में किसी तरह की कंजूसी मुझे स्वीकार नहीं थी। अम्मा जी और रजनी के आ जाने से घर भी छोटा पड़ रहा था। उन्हीं दिनों हमारे भाग्य से ऊपरवाला हालनुमा कमरा खाली हुआ। उसमें अटैच्ड टायलेट की भी सुविधा थी। किराये की परवाह न करते हुए हमने तत्काल उसे ले लिया। दिन-भर की आपाधापी के बाद इस निगूढ़ एकांत से बहुत शांति मिलती थी। दिन-भर आफिस में काम करते हुए मन अपनी लाडली के आसपास । ४० / राग-विराग ही घूमा फरता। उसके किसी प्रकार के अहित की आशंका मुझे नही थी फिर भी वह पांच-छह घटों का विछोह मेरे लिए पहाड़ बन जाता। घर लोटने तक ममता का भार असह्य हो उठता। लगता कि उड़कर पहुंच जाऊं और उसे छाती से लगा लूं। पर घर पहुंचते ही पता लगता कि अम्मां या रजनी उसे लेकर पड़ोस में निकल गयी हैं । मन मसोसकर रह जाती। ये मुझसे पाच-दस मिनट आगे-पीछे ही घर लौटते। उन्हें दूर से आता देखकर ही अम्मा जी घर पहुंच जाती। मैं लपककर श्वेता को गोद में लेती और कमरे में गुम हो जाती। यही तो समय मिलता था उसे जी भर- कर दुलराने का, प्यार करने का। इनका चाय-नाश्ता अम्मा जी तयार करती, पास बैठकर, इसरार करके खिलाती। इन्हे तुरंत शाम की क्लास के लिए जाना होता था। किसी तरह जल्दबाजी में ये खा-पीकर चले जाते। अम्मा जी वाद मे अड़ोस-पड़ोस को सुनाकर कहती, "अच्छी लव मैरेज की है। थके-हारे मर्द को एक कप चाय का भी आसरा नहीं है। मैं कहती हूं, सूरत-शक्ल तो भगवान की देन है पर आदमी गुन-ढंग तो सीख सकता है।" मैं सुबह-शाम खाना बनाने का भरसक यल करती। पर अम्मा जी ने रसोई मे ऐसा दखल जमा लिया था कि हटने का नाम ही नहीं लेती थी। मेरे हिस्से में लगाना, कपड़े धोना या चटनी पीसना-ऐसे ही काम आते थे। कभी आग्रहपूर्वक कुछ बना भी लेती, तो वे ऐसे धूरती रहती कि घबराहट में कमी नमक भूल जाता या मिचं दोबारा डल जाती। खाते समय वो नुक्ताचीनी होती कि वस । गुस्मा तो तव आता जब ये भी आलोचकों की टोली में शामिल हो जाते । कल तक यही मनोज बनानेवाले की उंगलिया चूमने की बात करते थे। झाड उस दिन भी हम मा-बेटी तृप्त भाव से कमरे में लेटी हुई थी कि नीचे से रजनी ने आवाज दी। पता चला, इनके एक मिन सप्तनीक आये हुए हैं । जैसे ही बाहर के कमरे में पाव दिया, मैं चौंक पड़ी। मित्र-पली सिर से तक सौंदर्य प्रसाधनों का विज्ञापन बनी हुई थी। उनके सामने अपनी रड़ी साड़ी और वासी चेहरा लेकर मैं एक हीनबोध से भर उठी। मनोज : लाखों में भी मैंने पहली बार एक वितृष्णा का भाव देखा और सहम थी। रात अपनी सफाई देते हुए मैंने कहा, "बैंक से लौटकर इतनी थक जाती हूं कि कुछ करने का मन ही नहीं होता। फिर दिन-भर उसे छोड़े हुए हो जाता है।" वे जैसे फट पड़ने को आतुर ही बैठे थे, "बार-बार यह नौकरी का हवाला क्यों देती हो? इस शहर में पचास प्रतिशत औरतें नौकरी करती हैं। अनिल की बीवी भी करती है। सभी अपने बच्चों को छोड़कर काम पर जाती हैं। तुम्हारी तरह सभी भाग्यवान भी नहीं होती। उन्हें सुबह- शाम खाना बनाना पड़ता है, वच्चे को नहला-धुलाकर आया के घर छोड़ने जाना होता है, बाजार से सौदा-सुलुफ भी वे ही लाती हैं, तुम तो इन सारे झंझटों से बची हुई हो। सलीके से रह तो सकती हो।" श्वेता के जन्म के बाद सब कुछ छूट-सा गया था। अब फिर से शाम को सजना-संवरना शुरू कर दिया । पर किसके लिए? तैयार होकर नीचे उतरती, तव तक ये या तो क्लास के लिए निकल चुके होते या जाने की जल्दी में होते। सारा आयोजन व्यर्थ हो जाता। मुझे देखकर, अम्मा जी और रजनी कनखियों से एक-दूसरे को निहारती और हंस देतीं। वह हंसी मिला देनेवाली होती थी। कभी-कभी उनका उपहास मुखर भी हो ता। वे विधाता को धन्यवाद देतीं, जिन्होंने उन्हें 'पौडर' के खर्च से बचाये रखा, कभी कहती, "गृहस्थी क्या करेंगी खाक ! रानी जी के सिंगार-पटार से ही फुरसत नहीं मिलती।" रूप-रंग के वाद, घर-गृहस्थी के कामों में मेरा अनाड़ीपन अम्मा जी हाथ का दूसरा वड़ा पत्ता था। इससे वाजी हमेशा उनके हाथ में रहती थ बचपन से ही मन सुरों की दुनिया में ऐसा खो गया था कि कई चीजें सी को रह गयी थीं। उन्हें लेकर कभी-कभी बड़ी शर्म झेलनी पड़ती थी। "हाय भाभी, कित्ती प्यारी फाक है ? आपने बनाई है ?" पड़ोस मुंहबोली ननद पूछती। .
"नहीं, रजनी ने बनायी है।" "अरे वाह ! मेनोग तो बड़ा खूबसूरत है। यार इतनी अन्टी एंद्राय- हरी कर लेती है, हमें तो पता ही नहीं था।" "नहीं-यह तो रश्मि के हाथों का कमाल है। गादी में पहले कादा था।" "दुलहिनको लाल मिर्च का अचार तो बड़ा स्वादिष्ट लगा। कमे बनाया पा, जरा वताना मई।" "अम्मा जी मे पूछ लीजिए । उन्होंने ही वाला है।" मतलब कि घर में कई चीजें प्रगंमा बटोरती रहतीं पर किमी पर भी मेरी मोहर नहीं होती थी। ऐसे में मां बहुत याद याती। वे यकसर कहती थी, "कनु, पौड़ा इधर भो देख लिया करो। कल को ससुराल जाओगी तो यही काम आयेगा। यह हिंदुस्तान है, अमरीका नहीं है।" वायू जी सुनते तो मा को बुरी तरह निड़क देते । पडित जी की बात दोहराकर कहते, "तुम्हारी बिटिया चूल्हा-चकी करने के लिए दनी नहीं है। वह तो साक्षात् सरस्वती है।" यव बाबू जी आकर देखें अपनी सरस्वती को! कई चीजें तो अब मैंने सीख भी ली थी पर उनके लिए समय नहीं मिलता था। मुबह-शाम घर का और दिन में आफिम का काम करके इतना पक जाती कि बस । फिर थोड़ी देर गुडिया को दुलराने का भी मन होता। कभी लंच यावर में दो-चार सन्नाइया निकाल लेती, बस । एक-एक स्वेटर महीनों ले लेता । इस बीच रजनी अपने और आसपासवालों के चार-पाच स्वेटर वुन चुकी होती। मेरी मजबूरी कोई नहीं समझता, मनोज भी नहीं। वे तो मजाक बनाने में अग्रणी रहने और मेरी मुस्त चान को 'दिलंवित लय' का नाम देहालते। श्वता के जन्मदिन की पार्टी एक हादसे की तरह टीस जाती है। उसके जन्म पर तो किसी ने पांच लड्डू भी नहीं वाटे । पर जन्म- दिन बड़ी धूमधाम में मनाया गया। क्योंकि इस दीच वह दादी और दुआ राग-विराग /४३ की आंख का तारा बन चुकी थी। पूरे मोहल्ले के लिए ही वह एक खिलौना थी। सवको बुलाया गया। इनके मेरे आफिस के सब लोग भी थे। कुछ रजनी की सहेलियां भी थीं। पंडित जी के यहां मैं खुद गयी थी पर उन्होंने मना कर दिया । श्वेता के लिए आशीर्वादस्वरूप ग्यारह रुपये जबरदस्ती मेरे हाथ में रखते हुए बोले, "तुम्हारी सास का कुछ ठीक नहीं है । हमें देख- कर भड़क उठी तो वेकार रंग में भंग हो जायेगा।"भैया-भाभी का भी यही मत रहा । उन्हें जो भेजना था, उन्होंने निखिल-नीता के हाथ भेज दिया। खुद नहीं आये। उस दिन मैंने छुट्टी ले ली थी। सुबह का पूरा समय घर की झाड-पोंछ में निकल गया। उसके बाद मोहल्ले-भर से प्लेटें, चम्मच-गिलास इकट्ठा कर लायी। उन्हें धो-पोंछ कर करीने से रखा। बाहरवाले कमरे को झंडियों और गुब्बारों से सजाने में इनका हाथ बंटाया। इसके अतिरिक्त ५ किलो गाजरों को कद्दूकस किया। दही-बड़े के लिए दाल पीसी। छोलों का मसाला बनाया। बड़ों के लिए दही तैयार किया। दूसरे छोटे-मोटे काम इस बीच निकलते ही रहे। सांस लेने का भी मेरे पास समय नहीं रहा था। अतिथियों का पहला जत्था आ पहुंचा, तब कहीं जाकर मैंने कपड़े बदले । श्वेता को रज्जो ने तैयार कर दिया था। सफेद झालरदार फ्रॉक में वह परी-सी लग रही थी। केक काटने के बाद सबके इसरार पर मैंने 'मेरे घर आयो एक नन्ही परी' गाया तो मेरे आंसू निकल आये। वहुत दिनों बाद इस तरह खुलकर गाया था। बड़ा अच्छा लगा। सुननेवालों को भी शायद पसंद आया होगा क्योंकि 'वंस मोर' की आवाज से कमरा गूंज गया। एक-दो हलके-फुलके गीत और सुनाने पड़े। (अच्छा ही हुआ जो पंडित जी नहीं आये।) गाने के बाद खाने का दौर शुरू हुआ। प्रशंसा की फिर झड़ी-सी लग गयी। पर इस बार सुर दूसरा था। "दही-बड़े कितने साफ्ट बने हैं न !" "गाजर का हलवा तो मथुरावाले को मात कर रहा है।" "छोले घर पर ही बनाये हैं या सरदार दी हट्टी के हैं।" "रमा," इनके मित्र पत्नी से बोले, "भाभी से जरा ट्रेड सीक्रेट पूछ लो। ४४ / राग-विराग 1 तुम्हारे बड़े अंदर से कड़े क्यों रह जाते हैं ?" जैसा कि स्वाभाविक था, रमा का चेहरा लाल हो पाया था। मैंने उसकी इंप मिटाते हुए कहा, "भई, हम भी आप ही की जाति के हैं। आप अम्मा जी से पूछिए । उन्होंने ही बनाये हैं।" "सब कुछ अम्मां ने ही बनाया है," रजनी ने सूचित किया। मुझे लगा, पास बैटी अम्मा जी कह कि अरे, मेरे अकेले के बस की बात थी? ये वैचारी भी सुबह से लगी हुई है। पर वे एकदम बोल उठी, "अरे, अपनी भाभी से तुम बस गाना गवा लो। उनसे और कुछ नहीं होता।" मुझे जैसे आग लग गयो । अभी-अभी जो मेरे गाने की प्रशंसा हुई थी उसी के लिए यह उपालंभ था। ये लोग जैसे मेरी इतनी-सी अच्छाई भी वरदाश्त नहीं कर सकते । किसी तरह मुझे दूसरों की नजरों में उठता नही देख सकते । मुझे भी ताव आ गया । जहर वुझे स्वर में मैंने कहा, "आप ये हरदम गाने का उलाहना क्यो देती रहती हैं ? इस घर मे आकर तो मैं गुन- गुनाना तक भूल गयी है।" "अरे तो मना किसने किया है ? अटारी पर बैठकर सुबह-शाम बलापा करो। रोटी-पानी के लिए हम हैं तो।" इस जुगलबंदी से सव सन्न रह गये। अच्छा-पासा तमाशा हो गया। पर असली भाशा तो रात में हुआ। मेहमानों के चले जाने के बाद इन्होंने यो बमबा की कि बस । दोनो मा-बेटी सिर झुकाये सुनती रही- जैसे मुह में जवार न हो । पर मैं उनकी हर इंट का जवाब पत्थर से देतो रही। पता नहीं ने दिनों के संचित रोप को शब्द मिल गये थे। जिरह करके जवथक गो उपसंहार-सा करते हुए बोले, "एक मिनट घर में शांति नहीं रहने दोगी वात का जवाब देना जरूरी है।" तव समझ ता, यद्यपि वही देर से आया कि दोनों-को-दोनों बुत क्यों बन गयी थी हिस्वामी को जैसे जता देना चाहती थी कि दोनो बहुत सौम्य, शारीनिशील हैं । झगडे की जड में है तो बस यह तुम्हारी बहू। ।
। । की आंख का तारा वन चुकी थी। पूरे मोहल्ले के लिए ही वह एक खिलौना थी। सवको वुलाया गया। इनके-मेरे आफिस के सव लोग भी थे। कुछ रजनी की सहेलियां भी थीं। पंडित जी के यहां मैं खुद गयी थी पर उन्होंने मना कर दिया। श्वेता के लिए आशीर्वादस्वरूप ग्यारह रुपये जवरदस्ती मेरे हाथ में रखते हुए बोले, "तुम्हारी सास का कुछ ठीक नहीं है। हमें देख- कर भड़क उठी तो वेकार रंग में भंग हो जायेगा।" भैया-भाभी का भी यही मत रहा । उन्हें जो भेजना था, उन्होंने निखिल-नीता के हाथ भेज दिया। खुद नहीं आये। उस दिन मैंने छुट्टी ले ली थी। सुबह का पूरा समय घर की झाड़ -पोंछ में निकल गया। उसके बाद मोहल्ले-भर से प्लेटें, चम्मच-गिलास इकट्ठा कर लायी। उन्हें धो-पोंछ कर करीने से रखा। बाहरवाले कमरे को झंडियों और गुब्बारों से सजाने में इनका हाथ बंटाया। इसके अतिरिक्त ५ किलो गाजरों को कद्दूकस किया। दही-बड़े के लिए दाल पीसी। छोलों का मसाला बनाया। बड़ों के लिए दही तैयार किया। दूसरे छोटे-मोटे काम इस बीच निकलते ही रहे। सांस लेने का भी मेरे पास समय नहीं रहा था। अतिथियों का पहला जत्था आ पहुंचा, तब कहीं जाकर मैंने कपड़े बदले। श्वेता को रज्जो ने तैयार कर दिया था। सफेद झालरदार मॉक में वह परी-सी लग रही थी । केक काटने के बाद सबके इसरार पर मैंने 'मेरे घर आयी एक नन्ही परी' गाया तो मेरे आंसू निकल आये । बहुत दिनों बाद इस तरह खुलकर गाया था। बड़ा अच्छा लगा। सुननेवालों को भी शायद पसंद आया होगा क्योंकि 'वंस मोर' की आवाज से कमरा गूंज गया । एक-दो हलके-फुलके गीत और सुनाने पड़े। (अच्छा ही हुमा जो पंडित जी नहीं आये।) गाने के बाद खाने का दौर शुरू हुआ। प्रशंसा की फिर झड़ी-सी लग गयी। पर इस बार सुर दूसरा था। "दही-बड़े कितने साफ्ट वने हैं न !" "गाजर का हलवा तो मथुरावाले को मात कर रहा है।" "छोले घर पर ही बनाये हैं या सरदार दी हट्टी के हैं।" "रमा," इनके मित्र पत्नी से वोले, "भाभी से जरा ट्रेड सीक्रेट पूछ लो ४४ / राग-विराग - तुम्हारे बड़े अंदर से कड़े क्यों रह जाते हैं ?" जैसा कि स्वाभाविक था, रमा का चेहरा लाल हो आया था। मैंने उसकी झेंप मिटाते हुए कहा, "भई, हम भी आप ही की जाति के हैं । आप अम्मा जी से पूछिए । उन्होने ही बनाये हैं।" "सब कुछ अम्मां ने ही बनाया है," रजनी ने सूचित किया। मुझे लगा, पास बैठी अम्मा जी कहे कि अरे, मेरे अकेले के बस की बात थी? ये वेचारी भी सुबह से लगी हुई है। पर वे एकदम बोल उठी, "अरे, अपनी भाभी से तुम बस गाना गवा लो। उनसे और कुछ नहीं होता।" मुझे जैसे आग लग गयी। अभी-अभी जो मेरे गाने की प्रशंसा हुई थी उसी के लिए यह उपालंभ था। ये लोग जैसे मेरी इतनी-सी अच्छाई भी बरदाश्त नहीं कर सकते । किसी तरह मुझे दूसरों की नजरो में उठता नहीं देख सकते । मुझे भी ताब आ गया। जहर बुझे स्वर में मैंने कहा, "आप ये हरदम गाने का उलाहना क्यों देती रहती हैं ? इस घर में आकर तो में गुन- गुनाना तक भूल गयी हूं।" "अरे तो मना किसने किया है ? अटारी पर बैठकर सुबह-शाम अलापा करो। रोटी-पानी के लिए हम हैं तो।" इस जुगलबंदी से सव सन्न रह गये। बच्छा-खासा तमाशा हो गया। पर असली तमाशा तो रात मे हुआ। मेहमानों के चले जाने के बाद इन्होने वो बमबारी की कि बस । दोनों मां-बेटी सिर झुकाये सुनती रहीं- जैसे मुंह में जवान ही न हो। पर मैं उनकी हर इंट का जवाव पत्यर से देवी रही। पता नहीं कितने दिनों के संचित रोप को शन्द मिल गये थे। जिरह करके जब थक गये तो उपमहार-सा करते हुए बोले, "एक मिनट घर में शांति नही रहने दोगी? हर बात का जवाब देना जरूरी है।" तब समझ में आया, यद्यपि बड़ी देर से आया कि दोनों-की-दोनों युत क्यो बन गयी थी। वे गृहस्वामी को जैसे जता देना चाहती थी कि दोनों बहुत सौम्य, शांत, सहनशील हैं । झगड़े को जड़ में है नो वम यह तुम्हारी वहू।
वे तीन साल कैसे बीते, मेरा ईश्वर जानता है। घर मेरे लिए एक होटल- सा हो गया था। अपने हिस्से का काम निवटाकर कमरे में पड़ी रहती थी। ये सुवह खाना खाकर निकल जाते तो रात गये ही लौटते। शिकायत करना भी चाहती तो इनका श्रांत-क्लांत चेहरा देखकर चुप लगा जाती। इनके इस तरह सारा-सारा दिन वाहर रहने से मैं कितनी अकेली पड़ गयी, इसका इन्हें कोई होश नहीं था। सास और ननद तो हमेशा से विरोधी खेमे में थीं। पर इस बीच अपनी बच्ची भी अपनी नहीं रह गयी थी। दादी का स्नेहबंध दिन-पर-दिन प्रगाढ़ होता जा रहा था। कई बार तो वे उसे रात में भी अपने पास सुला लेती। वैसे भी श्वेता जितनी देर मेरे पास होती, डांट खाती रहती। दादी और बुआ के सीमातीत लाड़-प्यार ने उसे बहुत जिद्दी बना दिया था। उन दोनों की देखा-देखी वह भी मेरी उपेक्षा करने लगी थी। अपनी हर गलत- सलत बात मनवाने की उसे आदत पड़ गयी थी। मैं जरा भी विरोध करती तो वह जमीन पर लोट जाती या दीवार पर सिर दे मारती। उसकी चीख- पुकार सुनते ही अम्मा जी दौड़ी आती और अपनी लाडली की फरमाइश पूरी कर देतीं। उसे पुचकारकर चुप करा देती और गोद में उठाते हुए बुदबुदाती, "मां है कि डायन, बच्चे का इतना मन नहीं रख सकती।" 'डायन' शब्द को तो मैं किसी तरह पी जाती, पर जब श्वेता दादी की गोद में चढ़कर 'ममी गंदी है' के नारों से घर भर देती तो कलेजा छलनी हो जाता। उस निपट एकाकीपन के बीच कभी-कभी अपना तानपूरा याद आ जाता। कमरे की खिड़कियां-दरवाजे बंद कर मैं उसे लेकर बैठ जाती । पर जैसे ही तारों पर उंगलियां फेरती, लगता कि कई जोड़ी अदृश्य आंखें मुझ पर पहरा दे रही हैं और आवाज गले में फंसकर रह जाती। पता नहीं कौन-सी दुनिया में आ गयी थी मैं कि संगीत से नाता छूट- सा गया था। गाना तो दूर, मेरी तो सुनने की आदत भी छूट-सी गयीं थी। कभी कोई बहुत बड़ा' कलाकार शहर में आता तो मैं अपना मोह न रोक पातो। उस दिन में बैंक से सीधे मैया के यही चली जाती ताकि रात लाने-ले जाने की समस्या न रहे। अम्मा जी के आ जाने में यह मुत्र भी जाता रहा।" थव भी कई बार भया का आफिस में फोन माता है, "कन, रान को टैगोर हाल में जसराज जी हैं या मानक भवन ने मदुल हलीन आ रहे है।" उस समय सिवाय तरसकर रह जाने के मैं कुछ नहीं कर पाती। पहले बैंक में लोग पूछ लिया करते थे, "अरे, कल जितेंद्र अभिषेकी के कार्यक्रम में आप नहीं दिखीं ?" अब कोई नहीं पूछता । जैसे सब जान गये हैं कि मेरे जीवन का यह अध्याय अव समाप्त हो गया है। दिन-रात को इस ऊब को पीते-पीते एक दिन मेरा भी धैर्य जवाव दे गया। खोजकर मैंने कहा, "बाहर जाने पर शायद तुम्हें यह भी याद नहीं रहता कि तुम्हारी एक बीवी है, बच्ची है।" "तुम क्या मोचती हो, में बाहर मटरगश्ती करता हूं?" "मैं क्या जानू कि क्या करते हो?" "माह झोंकता हूँ।" थे चिढ़कर बोले। पर दूसरे ही क्षण अत्यंत गंभीर हो गये, "कनु, में नौकरी छोड़ रहा हूं। अनिल के जीजा जी एक फैक्ट्री डाल रहे हैं । उन्हें एक भरोसेमंद यादमी की जरूरत थी। अनिल ने मेरा नाम सुना दिया। उसी की जुगाड़ में तो लगा रहा इतने दिन । मरे, ऐसे क्या देख रही हो ? अनिल भी छोड़ रहा है । उसको तो बारह साल पुरानी सर्विस है । पर उसकी बीवी ने कुछ नहीं कहा। वलटे हौसला..' "तुम्हारी पढ़ाई?" उनकी दात काटकर मैंने पूछा। "बाखिरी सेमिस्टर ही तो है । कर लूगा । उसी के बल-बूते पर तो यह सुपरवाइजर का चांम मिला है , मेरा अपना देविन होगा, टाइपिस्ट होगी, प्यून होगा। सरकारी नौकरी में यह सब जुहता? जरा सोचो। सब-इजी- नियर बनकर जिंदगी-मर देहाती की खाक छानता फिगा, सो अलग। तुम लोग यहां अकेले परेशान होते रहोगे । इसमे तो यह व्यवस्था या बुरी है ? डिप्लोमा हो जाये तो दो साल में एम० वी० ए० भी कर लगा। फिर ।
तो असिस्टेंट मैनेजर की कुर्सी पक्की है।" "लेकिन नौकरी तो प्राइवेट ही हुई न ! अनिल के पिता जी; सारी, जीजा जी जिंदगी-भर ऐसे ही कृपालु बने रहेंगे, इसकी क्या गारंटी है ?" "बिलकुल है, मेरा पच्चीस हजार फैक्टरी में लगा हुआ है । जिस दिन नौकरी छोडूंगा, पाई-पाई लेकर ही हटूंगा।" "पच्चीस हजार !" आश्चर्य से मेरी आंखें फैल गयीं, "इतना रुपया तुम्हारे पास कहां से आया ?" वे एकदम झेंप गये । खिसियाकर वोले, "सारी कनु, तुम्हें बताना भूल गया। गांव की जमीन मैंने वेच दी है। जमीन का वह उतना-सा टुकड़ा किसी मतलब का नहीं था। न वहां का माहौल ही अव अच्छा रहा है। वैसे भी अब हमसे खेती-किसानी तो होने से रही।" "मनोज, तुमने नौकरी छोड़ दी। गांव की जमीन बेच दी। क्या एक बार तुम्हें ऐसा नहीं लगा कि इतने अहम फैसले लेने से पहले मुझसे एक वार पूछ ही लेना चाहिए ?" "कनु"दरअसल मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था।" "क्या मेरा कोई हक नहीं बनता मनोज ?" "सच कहूं कनु, मुझे तुम्हारे हक का. खयाल कभी आया ही नहीं...मैं ""मैं सिर्फ तुम्हारी खुशी के बारे में सोचता रहा। जरा सोचो''ये सारी उठा-पटक क्या मैं अपने लिए कर रहा हूं ? कनु, तुम्हीं ने मुझे सपने देखना सिखाया है । तुम्हीं ने मेरी आकांक्षाओं को नया आकाश दिया है। तुम्हीं इस तरह हिम्मत हार जाओगी तो मैं कैसे आगे बढुंगा ? तुम्हीं मुंह फेर लोगी तो ये सारी भागमभाग मैं किसके लिए करूंगा। उनके मिश्रीधुले स्वर ने सारे गिले-शिकवे भुला दिये। अपना सिर उनके सीने में छुपाते हुए मैंने पूछा, "जमीनवाली बात अम्मा जी को मालूम "न-और तुम बताना भी नहीं। नहीं तो अभी रजनी की शादी के लिए हाय-हाय करने लगेंगी। जानता हूं, अम्मां सुनेंगी तो आसमान सिर पर उठा लेंगी। पर फिलहाल मैंने उस विषय में सोचना ही छोड़ दिया है। रज्जो का व्याहं दो साल बाद भी हो सकता है और मैं खूब धूम-धाम से ४८ / राग-विराग । करूंगा। पर इतना स्पया रोज-रोज तो हाथ आयेगा नहीं। इस समय इसे ठिकाने से नहीं लगाया तो जिंदगी-भर क्ती ही करनी पड़ेगी।" वह रात सुनहले सपने देखते वोत गयी। भाग्यलक्ष्मी ने अप्रत्याशित रूप से दरवाजे पर दस्तक दी थी। जमीन को लेकर भाई-बदों में पता नहीं कब से टनी हुई थी। किसी जमाने में वादियों की सूची में मनोज के पिता का नाम भी था। उनकी मृत्यु के बाद ये लोग तटस्थ हो गये थे क्योंकि कोर्ट- कचहरी लायक न तो पास में पैसा था, न हौसला। पर दिल्ली के भाग से छोका टूटा और जमोन का वह टुकड़ा अनायास हमारे हाथ लगा। हाईकोर्ट के निर्णय की शुभ सूचना देते हुए रिश्ते की एक बुआ ने लिखा था, "वहू वड़ी भागवान आयी है । आते ही तुम्हारे सारे काम सुलझा दिये।" मेरी यह तारीफ अम्मा जी को जरा नहीं भायी थी। मुह बिचकाकर उन्होने उस पोस्टकार्ड को ही सुना दिया था, "अरे यह तो देर-सबेर होना ही था। इसमे उमने क्या कर लिया?" उनकी उस बात का कसैलापन मन में अब तक ताजा था। पर अब सारा मलाल अपने-आप धुल गया।
५
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की पी, Thirtीगार जोशीजी।
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faitanामगा11
गो१५-१५. सागा। राम गामाता मनसा
राजा - Eritiny | रोमामा मार गमनागा सो
१९११ मा, पार"
रा, सालापा, "रिम जल्दी
जाग जाती तो। (गा in Tetr wrinारसा? मीनालों
on 19 १५0 Mati श सा-गुणा ससमे गिलो मी
शारी iii yet Aprint or unar गाना
सीय लियापार पर गैर भागाती, सी गहरे एका माल हो गया
भारत-नीरा ।
Hity Air It गेसुरता सीपी frimansity
नामर ।
"भाजपही ती भानग?"
पर पूरी पानी ) for गरेमा शारों में fine
"गा गया है ?'' [AI HRA सपने को मात ए गगे गा।
५० / राग-गिराम
"साड़ी है।"
"वो तो देख रही हूं। कितने पैसे फूंक माये !"
"घटिया वात मत करो यार ! मेरी भावनाओं की कद्र करो।"
"पहले वताओ, कितने को है ?"
"पहली तनख्वाह पूरी-की-पूरी तुम्हारी नजर कर दी। बस "बरे,
ऐसे आखें फाडकर क्या देख रही हो? बनारसी साडो है-पच्चीस स्पये
में तो आती नहीं।"
"जरूरीया?"
"विलकुल । तुम्हें ऐसे ही बाली हाथ व्याह लाया था। मेरे लिए कुछ
करने के दिन तो अव आये हैं और अब भापणवाजी बन्द, यस""फटाफट
तैयार हो जाओ। पिक्चर चलेंगे।"
"अम्मा जी से..."
"मैं पूछता हूं। तुम स तैयार होकर नीचे आ जाओ।"
इंद्रधनुषी कल्पनाओ पर तैरते हुए ही मैं नीचे उतरी । अम्मा जी कुर्सी
पर मुह फुलाये बैठी थी। शायद हम दोनो के सिनेमा जाने के प्रस्ताव मे
उनका मूड आफ हो गया था। मैंने धड़कते दिल से उनके पाव छुए।
"आज यह सुमति कैसे उपज आयो?"
"जी""यह नमी साडी..."
"अच्छा तो हमे दिखाने आयी है ?"
"अम्मा," बोले, "मेरी पहली तनख्वाह की साड़ी है । परनकर तुम्हे
प्रणाम करने आयी है। आशीर्वाद दो।"
"अच्छा! तो पहली तनखा की बहुरिया के लिए साडी आयो है । ठीक
तो है। घर में और कोई पहनने वाला है ही नही। अरे निपूते, अम्मा तो बुढ़ा
गयी हैं, मान लिया, पर जवान-जहान वहन तो थी घर मे । रानी जी के
लिए बनारसी लाया है, उसके लिए सूती ही ला देता।"
"हर बात को उलटा क्यों लेती हो अम्मा? रज्जो के लिए क्या कभी
कृछ लाता नहीं हूं? कोई भी राखी या दूज मैंने मूनी जाने दी है ? आज का
दिन कल्याणी का था । आज मुझे नयी नौकरी की पहली तनख्वाह मिली
है । और तुम्हें मालूम है कि आज जो मैं इसके लायक हुआ हूं, उसके पीछे
।
इसकी तपस्या है।" "हां, जरूर है । हमने तो वचवा, कुछ तुम्हारे लिए किया ही नहीं! तुम तो सीधे आसमान से टपके हो और धरती छूते ही इतने बड़े हो गये हो।" वे हतबुद्धि होकर उन्हें देखते ही रह गये । मैंने कहा, "सच तो है। अम्मा जी बेचारी कैसे जानेंगी कि मैंने क्या तपस्या की है ? तुमने कितने पापड़ बेले हैं ? वे तो अब तक यही समझती रहीं कि काली-कलूटी बहू के कारण लड़का घर से भागा-भागा फिरता है।" "क्या वक रही हो?" "झूठ थोड़े ही है। विश्वास न हो तो अपनी मां से पूछ लो। अड़ोस- पड़ोस में ये यही सब तो कहती फिरती हैं।" अब वे मां पर बरसना शुरू हुए। मैं चुपचाप ऊपर चली आयी। नौकरी की, नयी साड़ी की सारी खुशी हवा हो गयी थी। अम्मा जी को शायद यही अभिप्रेत था। फैक्टरी शहर से दूर इंडस्ट्रियल एस्टेट में थी। आते-जाते पंद्रह किलोमीटर का चक्कर पड़ जाता था । बस के टाइमिंग्स नहीं मिलते थे। फिर वस से उतरकर काफी दूर तक पैदल चलना पड़ता था। फिर जहां हर कोई छोटा-बड़ा स्कूटर या मोटर साइकिल दनदनाता हुआ आता हो, वहां अपनी खड़खडिया साइकिल पर जाना बहुत खराव लगता था। हम लोगों ने जी कड़ा किया और एक सेकंड-हैंड लैबेटा खरीद ही लिया। उसके लिए एकमुश्त रकम हमारे पास नहीं थी। फिर कुछ इन्होंने दोस्तों से उधार लिया, कुछ मैंने बैंक से लोन लिया-कुछ बड़े भैया ने दिया। उन्हीं के दोस्त का स्कूटर था। हमारे भाग्य से उसका नया वेस्पा आ गया था। उसी ने समय निकालकर इन्हें अच्छी तरह चलाना भी सिखा दिया था। एक दिन इनका आफिस में फोन आया, "कनु डियर, पांच बजे तैयार ५२ / राग-विराग रहना । स्कूटर लेकर आ रहा हूं। साथ घर चलेंगे।" सुनते ही मन उछल पड़ा। परंतु किसी तरह अपने को संयत कर मैंने कहा, "देखो, प्लीज बुरा मत मानना । लेकिन सबसे पहले आप अपनी पूज- नीय माता जी को घुमा लाइए। नहीं तो वे गाड़ी देखते ही चीखना शुरू कर देंगी कि घर में जवान बहन व्याहने को बैठी है और इन्हें ऐयागी सूझ रही है।" अपना गुवार निकालते समय याद ही न रहा कि फोन मेहता साहब को कैबिन मे है और वे मुझे घूर रहे हैं। घर लौटी तो देखा, दरवाजे पर अच्छा-खासा मजमा इकट्ठा है। स्कूटर के गले में माना है, माथे पर अक्षत-रोली का टीका है और रजनी उसकी बाकायदा आरती उतार रही है। इसके बाद अम्मा जी ने सबका मुह मीठा करवाया । वे अपनी सबसे अच्छी साडी पहने हुए थी। वेटा सबसे पहले उन्हे घुमाने ले जा रहा है, इस गर्व से उनका चेहरा दमक रहा था। सब लोगो के इसरार करने पर शरमाने का नाटक-सा करती हुई वे पिछली सीट पर जा बैठी। पहली बार वैठी थी, धवराहट होनी स्वाभाविक ही थी। पर वे उसे छिपाने की प्राणपण से चेप्टा किये थी। इन्होंने गाडी स्टार्टकी ही थी कि किसी को याद आया, "अरे, गुडिया कहां है ! उसे दादी की गोदी मे दो।" गुड़िया डरकर रोने लगी। रजनी ने उसे दो बार बिठाना चाहा, दोनों बार वह मचलकर उतर पडी, मैंने खोजकर कहा, "भरी वैठन, डरती क्यों है ? तेरा भी तो हक है। तेरी मा का भी पैसा लगा है इसमें ।" जैसा कि मुझं विश्वास या, अम्मा जो खट से उतर पड़ी। "क्या हुआ?" इंजिन की घरघराहट बदकर इन्होंने पूछा। "हमे नही बैठना। गिर-गिरा गये तो और फजीहत होगी।" उन्होने बहुत समझाया, वहुत मनापा, पर वे नहीं मानी। आखिरकार वे रजनी को लेकर ही चले गये। इतने सारे लोग धेरे खड़े थे, उनके सामने कुछ तो करना ही था। ।
लौटते ही इन्होंने मुझसे पूछा, "तुमने अम्मां से एसा क्या कह दिया था?" "क्या कह दिया?" "रज्जो बता रही थीं।" "तो उसी से पूछ लिया होता।" "उससे क्या पूलूंगा खाक, मैं तो तुमसे पूछता हूं। क्या हर बार इस तरह नाटक करना जरूरी है ?" "हर बार तो नहीं, पर हां, कभी-कभी जरूरी हो जाता है । मैं तुम्हारी मां को दिखाना चाहती थी कि हाथ आयी खुशी जव अचानक छिन जाती है, तब कैसा लगता है । जो कसक मैंने हजार वार झेली है, उन्हें एक बार तो सहन करने दो।" "अरे, उनसे इस तरह निठुर होकर वदला लेते हुए तुमने यह कभी नहीं सोचा कि मुझ पर क्या बीती होगी। जव भी बड़ी उमंग से कुछ करने को सोचता हूं, तुम पानी फेर देती हो।" "मैं पानी फेरती हैं?" "नहीं, तुम नहीं करती कुछ, हर वार अम्मां ही झमेला खड़ा कर देती हैं, बस । अम्मां "जिनका उल्लेख तुम हर बार 'तुम्हारी मां' के रूप में करती हो-वे मेरी मां हैं, सिर्फ यही सोचकर तुम चुप रह जाया करो तो क्या है ! पर नहीं, हर वार तुम्हारा अहं आड़े आ जाता है।" मेरा अहं ! अपने होने का अहसास भी मुझमें चुकता जा रहा है और यह सामने बैठा शख्स कह रहा है कि मेरे अहंकार ने उसके जीवन को नरक बना दिया है। अपने आसपास को उसने बड़ी आसानी से अनदेखा कर दिया है और अपनी सारी हताशा मुझ पर उड़ेलकर वह हलका होना चाहता, है । उसके स्वर में जो कड़वाहट है, वह एकदम ही नहीं उपजी है। पता नहीं, यह जहर कब से उसके मन में बूंद-बूंद कर घुलता जा रहा है। किसने घोला है यह जहर? किसने? किसने? । . ५४ / राग-विराग । चैव की एक मुदह मुझे लगा कि मैं फिर मा बननेवाली हूं। भागो-भागी मैं अपने डाक्टर के पास गयी। यहा जद मेरे अनुमान की पुष्टि हो गयी तो मैं युगी से थिरकती हुई ही घर लौटी। इन दिनों में वेहद अकेली पड गयी थी। मन एक अंतरग साथी के लिए तरम गया था। नवागत ने जैसे मेरी पुकार सुन ली थी और दोडा चला आया। मैंने उसी क्षण निर्णय ले लिया कि यह बच्चा मैं खुद पालूगी । भले ही इसके लिए साल-दो साल की छुट्टी ही क्यो न लेनी पडे । मैं उसे अपना नाम दूंगी, अपना स्वभाव, अपने सस्कार दूगी। अपना स्वर, अपनी साधना दूगी। मैंने ईश्वर में प्रार्थना की कि आनवाला मेरा ही रग-रूप लेकर बारे। ताकि मेरे श्याममुदर पर किसी और की नजर न पडे । पर घर मे इस नये प्राणी के आगमन की सूचना का उननी गर्मजोशी से स्वागत नहीं हुआ। विविध भारती पर जब भी परिवार नियोजन के विज्ञापनो को सुनती तो लगता-छि ऐसा भी कोई कहता होगा। पर अपने ही घर में उन संवादो की पुनरावृत्ति होते देख मैंने माया पीट लिया। ये तो एकदम बौखला मे गये, “अरे, अभी से इम मुसीवत की क्या जरूरत थी? अभी तो घर की हालत जरा सुधरी है। इस नये वर्ष के साथ फिर वैसी-की-वैसी हो जायेगी। दो-तीन महीनो मे मैं एक मशीन डालने की सोच रहा हूं। इस नयी जिम्मेदारी को अभी गुमाइश ही कहाँ है ? वैसे इतनी जल्दी भी क्या है, जिंदगी पड़ी है। मन बहलाने को एक खिलौना घर मे है तो।" पतिदेव का भाषण सुन लेने के बाद सास की प्रतिक्रिया जानने का उत्साह हो जाता रहा। जानती थी, वे तो अपना वही राग अलापेंगी, "घर मैं जवान-जहान वहन व्याहने को दैठी है और इन्हें चोचले मृझ रहे हैं।" अम्मा जी हमेशा की तरह भुनभुनायी, पर इस बार स्वर दूसरा था! बोली, "अच्छा तो है, रज्जो के ससुराल जाने से पहले जितने होने हैं, हो जायें। मेरे अकेली के वस का थोडे ही है। भगवान करे, इस बार बेटा हो जाये तो मझट खतम हो। रज्जो के भरोसे पर ही तो लोग-बाग निश्चित हैं। नहीं तो अद तक कही वात न चलाते ? पर तव इनके लाड़ली के पोतड़े कोन घोता?"
. - दोनों चावल बीनने जैसा नितांत सांसारिक कार्य करते हुए अध्यात्म-चर्चा करती रहीं। तभी इनके स्कूटर की आवाज सुनाई दी। आज थोड़ा जल्दी ही आ गये थे। अम्मा जी एकदम उठ खड़ी हुईं, "मुन्ना आ गया है शायद । चलूं थोड़ी चाय वना दूं । रज्जो पढ़ रही होगी।" मां ने उन्हें हाथ पकड़कर विठा लिया, "जिज्जी, आप तो आराम कीजिए अब । बहू किसलिए है ?" निरुपाय होकर अम्मां जी वैठ गयीं। मुझे उठना ही पड़ा । मन में कुढ़ते हुए ही मैं नीचे उतरी। इतने दिनों बाद थोड़ा अकेले में मिलने का मौका मिला था, मां ने वह भी गंवा दिया। और रज्जो ऐसी कौन-सी पढ़ाई कर रही है ! दो विषयों में सप्लीमेंटरी आयी है। तव भी फेल होने का दोप मेरी बीमारी के सिर गया था, अब भी जायेगा। कौन-सी नयी बात है। एक अरसे बाद मैंने रसोई में पांव दिया था। इस बीच गैस की जगह बदल गयी थी, चाय के लिए नये मग्स आ गये थे, दूध की अलमारी पर फिर से रंग हो गया था। "अरे, तुम ?" इन्होंने चौंककर पूछा। "चाय पियोगे न !” मैंने कहा और माचिस ढूंढने लगी। इन्होंने लाइटर से गैस जला दी तो मैंने चाय चढ़ा दी। चाय-शक्कर के डिब्बे खोलकर देखे । शक्कर कुछ कम थी। हमेशा वाले डिब्बे में देखा-उसमें वेसन था। "रजनी, शक्कर का बड़ा डिब्बा कहां है ?' रजनी ने बाहर से ही आवाज देकर अता-पता बता दिया। शक्कर निकालकर लायी तब तक चाय उफनने लगी। घबराहट में गैस बंद करने की याद न रही । पतीली ही उतार ली, वह भी हाथ से । स्टील की पतीली अंगारा हो रही थी। हाथ लगते ही मेरी चीख निकल गयी । पतीली हाथ से छूट गयी। पूरे घर में दूध-ही-दूध हो गया। चीख सुनते ही सब लोग दौड़े आये। अच्छा-खासा नाटक हो गया। अम्मा जी दोबारा वेटे के लिए चाय बनाने में व्यस्त हो गयीं। रजनी ने पूरी रसोई में पोंछा लगाया। साथ में वरनोल की ट्यूब लेकर मैं फिर ऊपर आ गयी। मां भी साथ थीं। । ५८ / राग-विराग
अपनी आठों उंगलियां उनके सामने करके मैंने कहा, "देखो तो मां,
इतनी सी देर में कैसे फफोले-से पड़ गये हैं।"
पर मेरे जले हुए हाथों को सहलाना तो दूर, मां ने उलटा उन्हे झटक
दिया । आग्नेय दृष्टि से मुझे घूरते हुए बोली, "घर आये मदं को एक कप
चाय भी नहीं पिया सकतीतू?"
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मैं चुप।
"रोज पाना कौन बनाता है ?"
"अम्मा जी ही बनाती हैं । या फिर रजनी।"
"या फिर पडोस की अर्चना"
"अर्चना !" मैं मा का मुह देखती रह गयी ।
"ऐसे मुह फाडकर क्या देख रही है ? जितनी बार आयी हूं, रजनी की
यह सहेली रसोई में घुसी हुई मिली है। तुझे दीन-दुनिया का जरा भी होश
है ? वस, जब देखो, अपनी तबीयत का रोना लेकर बैठ जायेगी। अपनी
गृहस्थी का जरा तो खयाल कर। पति हाय से निकल जायेगा, तभी क्या तू
चेतेगी? तब सिवाय हाय मलने के कुछ हाथ नहीं आयेगा, बताये देती है।"
- ६ मां जैसे आग बरसाकर चली गयी थीं। पर मैंने उनकी बातों का बुरा नहीं माना । यह वे नहीं, उनकी ममता वोल रही थी। पर मैं उन्हें कैसे बताती कि मैं इन दिनों मनोज से दो घड़ी बात करने के लिए तरस गयी हूं। वे सुबह-शाम आकर हाल पूछ जाते हैं, हर हफ्ते डाक्टर के यहां ले जाते हैं, इंजेक्शंस, दवाइयां समय पर ला देते हैं। पर इन सव कामों में कितनी आस्था है और कितनी औपचारिकता, पता नहीं । चलता। कितना मन होता है कि उनकी गोद में सिर छुपाकर एक बार जी भर कर रो लूं । कितनी इच्छा होती है कि वे मेरे वालों में उंगलियां फेरते हुए मुझे आश्वस्त करें कि जो कुछ घट गया, वही अंतिम सत्य नहीं है। कितना चाहती हूं कि वे अपने स्नेहिल स्पर्श से, मिश्रीघुलेस्वर से मुझे पीड़ा के, अपराध के, अकेलेपन के इस अहसास से मुक्ति दिलायें। पर अब उतना एकांत मिलता ही नहीं है । वे तो बस, पांच-सात मिनट के लिए कमरे में आते हैं । किसी जान-पहचानवाले की तरह हाल-चाल पूछकर चले जाते हैं। रात को मेरे पास रजनी सोती है। रजनी, जिसके साथ ननद-भाभी का वह मधुर रिश्ता कभी कायम न हो सका जो मुझमें और भाभी के बीच था। अव तक तो मैंने मन को समझा लिया था कि वे इन दिनों मुझसे जान- बूझ कर दूरी बनाये हुए हैं पर मां की वात मन को कुरेद गयी। उस दिन मेरा टानिक लेकर आये तो मैंने हाथ पकड़कर पास विठा ६० / राग-विराग लिया, "हरदम क्या भागमभाग मचाये रहते हो, घड़ी-भर तो पास बैठा करो।" पर इससे पहले कि में कोई बात शुरू करूं नीचे से यावाज आयी, "भैया, चाय ठंडी हो रही है।" आवाज सुनते ही वे एकदम उटकर खड़े हो गये । "यही मगा लेते न!" "अरे नही। वह बेकार परेशान होगी। मैं ही ले आता हूं।" वे जो गये तो वही के होकर रह गये। फिर शायद कोई मिलने भी आ गया। देर तक उनके कहकहे सुनाई देते रहे । मैं जली-भुनी छत पर बैठी - रात को जब रजनी खाना लेकर आयी तो मैंने खुद ही अपना मान तोड दिया। रजनी के जाने ही अपनी थाली उठाकर उसके पीछे-पीछे मैं नीचे उतर आयी। तीनो एक साथ खाने पर बैठे थे। अम्मा जी बड़े मनोयोग से दोनों बच्चों को परोस रही थी । भाई-बहन मे परस्पर चुहलवाजी चल रही थी। मुझे एकदम अपने घर की याद आ गयी। मुझे देखते ही तीनों ऐसे चोंके जैसे भूत देख लिया हो। उनका हास- परिहास एकदम थम गया। "अरे, तुम नीचे क्यो आ गयी , कुछ चाहिए था तो आवाज क्यो नहीं दे लो" "अब जिदंगी-भर क्या ऊपर ही बैठी रहूगी? आठ-दस दिन बाद ड्यूटी भी तो ज्वाइन करनी है । अमी से आदत तो डालनी पड़ेगी।" फिर किसी ने कुछ नहीं कहा। मेरे लिए जगह बना दी गयी । सब लोग चुपचाप कौर तोड़ने लगे। मैंने स्पष्ट अनुभव किया कि मेरे मा जाने से उन्हे अमुविधा हो रही है। उनके आनंद में खलल पड़ गया है। अब समझ में आया कि क्यों मेरी चाय, मेरा खाना निर्विघ्न रूप से ऊपर पहुचता रहा है, नहीं तो, जमा अम्मा जी का स्वभाव है, उन्होंने इस बात को लेकर अब तक तूफान मचा दिया होता। चुपचापचार निवाले गटककर उठ आयी। पिता की गोद में सोयी श्वेता को मैंने विस्तर पर लिटाना चाहा-पर उसने नीद मे भी मेरे हाय "क्या हुआ झटक दिये । इस तरह सबसे उपेक्षित होकर, हारी-सी, मैं अपने दड़वे में लौट आयी। अगले दिन सुबह श्वेता अखवार देने आयी तो मैंने पूछा, "पापा क्या कर रहे हैं ?" "नहा रहे हैं।" "नहा लें तो उनसे कहना, मम्मी ने फौरन बुलाया है।" वे तौलिया लपेटे, अंगोछे से सिर पोंछते हुए भागे-भागे ही ऊपर आये, ?" मुझे इत्मीनान से बैठा हुआ देखकर थोड़े-से रुष्ट स्वर में बोले, "यह कोई तरीका है ! तुमने तो एकदम डरा दिया था। मैंने सोचा पता नहीं क्या बात है।" "कोई बात होगी, तभी तुम मेरे पास आओगे। मतलव अब तुम्हें मेरे पास आने के लिए भी कुछ वहाना चाहिए ?" "समझने की कोशिश करो कनु । आई एम सो विजी दीज डेज ।" "विजी तो तुम हमेशा से हो। लेकिन फिर भी सबके लिए समय निकाल लेते हो-सिवा मेरे।" उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। "क्या मेरा कोई हक नहीं है ?" वे चुप। "मैं अपनी बात कहूं तो कव कहूं, किससे कहूं ?" वे खिड़की के पार देखते रहे। "मैं क्या कह रही हूं, सुन भी रहे हो ? एक बार इधर देखो तो।" "क्या देखू ?" उन्होंने खीजकर कहा और पलटकर मुझे इस तरह घूरकर देखा कि मैं सहम गयी। मैंने अपनी दृष्टि हटा ली। वहां से हटते ही मेरी आंखें ड्रेसिंग टेबुल के बड़े से आईने पर टिक गयीं। दर्पण में हम दोनों एक साथ प्रतिविवित हो रहे थे। उनका सद्यः सात सुडौल, सुदर्शन शरीर और उसके बगल में खड़ी मैं-~~~मृत्यु के मुख से लौटी एक जर्जर काया, विखरे वाल, बासी चेहरा । चेहरा जो सुंदर तो कभी भी नहीं था, पर इस समय तो असुंदरता की सीमा छू रहा था। . EPIf
नही, दर्पण मे हम दोनों की दृष्टि टकरायी। जो मैंने देखा, उसे दे भी
अनदेखा नही कर सके। दोनों परछाइयों का वैपम्य उनकी आवों में भी
प्रतिबिंबित हो रहा था । एक ऊब, एक बेजारी, एक वितृष्णा के साथ मेरे
प्रतिबिंब की पूर रहे थे वे।
"न-ही, "मैं जोर से चीखी और मैंने एक मुक्का आईनं पर दे मारा ।
दूसरे ही क्षण मुझे अधेरे के अजगर ने लील तिया।
होग
आया तो मिर बहुत भारी लग रहा था। हाथ से छूकर देखा, वहीं
भारी-सा बडेंग बधा था । इतना भारी कि उसके बोझ से सिर फटा
जा रहा था। मन हुआ कि दोनो हाथों से उसे उतारकर फेंक दू । पर दूसरा
हाथ उठा ही नहीं। दाहिने हाथ की हथेली पर भी पट्टी बंधी हुई थी।
चेहरा खिंचा-खिंचा-सा लग रहा था। उगलियो से छूकर देवा, वायी आख
के ठीक नीचे भी एफ पट्टी विपकी हुई थी।
"मां !" मनै क्षीण स्वर मे पुकारा। उस नीम बेहोशी की हालत में भी
समझ गयी थी कि मेरे शरीर पर इतने प्यार से हाथ फेरनेवाला कौन है ।
।
"क्या है वेटे ? कसा जी है सर?"
"सिर फटा जा रहा है मा।"
"टाके वासक रहे होंगे । विटिया, थोडी देर में आराम आ जायेगा।"
"टांके ? मुझे टाके लगे हैं ?"
"हां चार टाके आये हैं । वे तो कहो कि आय वच गयी।"
"मा, मेरे हाय में क्या हो गया है ?"
मां ने इस बार जपाय नहीं दिया। चुपचाप मुझे घपयपाती रहीं।
"मा?"
-अब पोड़ा सोने की कोशिश करो। नीद मे हीलिंग जल्दी होती
है।" यह बड़े भैया की आवाज थी।
"भैया, मेरी गुड़िया-मेरी श्वेता कहां है?"
"वह पार्क में गयी है।"
- वड़ी देर बाद मनोज उसे लेकर आये। "देखो वेटे, मम्मी बुला रही हैं।" पर उसने मेरी ओर देखा ही नहीं। पापा के कंधे से चिपकी रही। "आ जा मेरी गुड़िया, मेरे पास आ । इसे मेरे पास विठा दीजिए न प्लीज!" वे उसे लेकर झुके पर उसने उन्हें कसकर पकड़ लिया। भैया ने उसे जवरदस्ती मेरे पास विठा दिया। जैसे ही मैंने उसे अंक में भरना चाहा वह चीख उठी, "डर लगता है पापा । हमें डर लगता है।" और उसने अपनी दोनों हथेलियों से मुंह ढांप लिया। पापा ने जैसे ही उसे उठाया, वह किसी भयभीत व्यक्ति की तरह उनसे चिपक गयी। वे चुपचाप उसे लेकर बाहर चले गये। मैं आंख फाड़े उन्हें देखती रह गयी। फिर मेरी आंखें पथरा गयीं । हाथ-पांव ऐंठ गये । कानों में एक ही बात हथौड़े की तरह बार-बार चोट करती रही, 'डर लगता है !' श्वेता को मम्मी से डर लगता है। अपनी मम्मी से। . - इस बार आंख खुली तो मैं अस्पताल में थी। पीहर का पूरा कुनवा मुझे घेरे हुए था। यहां तक कि सुनील भैया, अनिल भैया भी थे। मेरी तबी- यत देखने इतनी दूर से दौड़े चले आये थे। सव-के-सव मेरे लिए व्याकुल थे। मेरी हर इच्छा पूरी करने को आतुर, मेरा हर शब्द झेलने के लिए तत्पर। उस भीड़ में जिन्हें खोज रही थी, वे नजर नहीं आये। दो दिन तक मेरी आंखें दरवाजे पर ही लगी रहीं। जब भी आहट होती, मुझे लगता वे ही आये हैं। पर वह कोई तीसरा ही होता। हताशा से मैं मुंह फेर लेती। उस आगंतुक के औपचारिक प्रश्नों का उत्तर भी न देती। तीसरे दिन मुझसे नहीं रहा गया। भाभी से पूछ ही लिया, "भाभी, वे दिखाई नहीं दिये।" "वे इलाहाबाद गये हैं, अपने मामा के यहां ।" . FX for "अम्मा जी को छोड़ने।" "और श्वेता?" "दह भी साय गयी है। दरअसल उसी के लिए गये हैं। उन दिन यह पोड़ा डर गयी थी।"भाभी ने कहा और एपदम जबान काट ली, "शायद रजनी के लिए कोई लड़का देखने गये हैं । दो-चार रोज में लौट आयेंगे।" भाभी ने शायद गलत मुना था। इलाहबाद में इनके कोई मामा जी नहीं थे। फिर तो रजनी के लिए लड़का देखने की बात ही ठीक थी। पर यया इसी समय जाना जरूरी था? या फिर जैसा कि भाभी गलती से कह गयी थी, श्वेता को कहीं घुमा लाने के लिए निरस गये हैं । क्या सचमुच यह इतना डर गयी थी? क्या सचमुच में इतनी डरावनी लग रही हूं? पर नाईने में अपनी शक्ल देखने की हिम्मत ही न पडी। भाभी से मैंने किसी तरह की जिरह नही की । चुपचाप बिस्तर पर पड़ी-पड़ी घर जाने के दिन गिनने लगी। अस्पताल से जिम दिन छुट्टी मिली, मैं बहुत प्रसन्न थी। पिछली सारी कडवाहट भुला कर मैंने एक नयी जिंदगी शुरू करन का निश्चय कर लिया था। पर टैक्मी जब अपने पुगने घर पर की तो मैं चौंक पड़ी, "आप लोग मुझे महा क्यो ले आये हैं।" "पहले भीतर तो चलो।" भैया ने डाट लगायी । गुस्से में पैर पटकते हुए मैं भीतर आयी और सोफे पर धम्म से बैठ गयी । कहा तो मैं यहा आने के लिए तरस रही थी और अब यहा आते ही दिमाग गरम हो गया। "आप लोग मुझे यहां क्यों ले आये हैं ?" "तो क्या करते?" "वे अभी लौट नहीं है क्या?" "लौट भी आये हो तो हम तुम्हें वहा नहीं भेजेंगे।" "क्यो?" "क्योंकि तुम्हें पागलखाने भेजने की वहा पूरी तैयारी हो चुकी है।" "वया?" "तुम्हारी पूजनीय सास सब जगह प्रचार करती फिर रही है कि तुम्हें ऐसे दौर हमेशा से पड़ते हैं। तुम्हारी वजह से उन लोगो का जीना हराम - हो गया है। कभी भी, कुछ भी, कर बैठती हो। किसी दिन उलटा-सीधा हो गया तो उन लोगों को जेल जाना पड़ेगा। तुम्हारे इन्हीं लक्षणों से बच्ची तुम्हारे पास तक नहीं फटकती।" "क्या?" मेरे हाथ-पांव फिर ऐंठने लगे, जवान तालू से चिपक गयी, पुतलियां चढ़ गयीं। भैया ने एकदम आगे बढ़कर मुझे कसकर पकड़ लिया और कड़ककर कहा, "ये क्या पागलपन है कनु ! इस तरह तो तुम उनकी बात की पुष्टि कर रही हो। परिस्थिति से लड़ने का यह तरीका नहीं होता। इस तरह तो तुम जीत चुकी ! हौसला रखो-तुम अकेली नहीं हो। तुम्हारे तीन-तीन भाई तुम्हारे साथ हैं।" वेहोशी का वह दौरा आते-आते रह गया। पर मुझे भीतर तक हिला गया। - भाग्य मुझे जीवन के किस मोड़ पर ले आया था? दूसरे दिन से घर में लोगों का तांता लग गया। ये सव मेरे अपने थे, मेरे गली-मोहल्ले के और परिवार के लोग थे, जिनके वीच पलकर मैं बड़ी हुई थी। ये लोग मेरे ससुराल की देहरी पर जाना नहीं चाहते थे। इसीलिए इतने दिनों तक कोई मुझे देखने तक नहीं आया। पर अव घर पर भीड़ लगी हुई थी। उनकी सहानुभूति, उनकी ममता बड़ा सुकून दे रही थी। इतने सारे लोग मेरे दुख से व्याकुल हैं, यह अहसास ही बड़ी तृप्ति देनेवाला था। खबर मिलते ही पंडित जी भी आये । आते ही बोले, "यह क्या है विटिया ? वहां तो सबके चेहरे पर लक्ष्मी का तेज चढ़ रहा है। और घर की लक्ष्मी का क्या हाल है ?" "कौन-सी लक्ष्मी ! क्या मेरी शकल आपको लक्ष्मी की-सी लगती है ? मैं तो चुडैल हूं। मेरी अपनी बच्ची भी मुझसे डरने लगी है।" और कहते- कहते मेरी रुलाई फूट पड़ी। दो दिन में पचीसों लोग आये थे, सबने इसी तरह दुख और आश्चर्य व्यक्त किया था, पर सबके सामने मैं धीरगंभीर बनी रही थी। पता नहीं क्यों, पंडित जी के सामने अपने को रोक न सकी। वे मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सांत्वना के कुछ शब्द बुदबुदाते रहे। पर उनसे शांत होने की अपेक्षा मैं और विखर गयी, "कोई मेरे पास नहीं - ६६ / राग-विराग आता अय । किसी को मेरे लिए फुरसत नहीं है, आपने भी तो अब जाकर सुध ली है। इतने दिनो तक विस्तर पकड़े रही, मौत के साये मे जलती रही-पर आपने कोई अवर न ली। और अब आकर पूछते हैं कि ये क्पा हाल हो गया है ?" उनके जाते ही भाभी ने डाट लगायो, "जो भी मुह मे आया, कहती चली जाती हो। बडे-छोटै का तो ययाल किया करो। पता है, पडित जी यरावर तुम्हारे लिए पूछते रहे हैं। तुम्हारी ज्वालामुखी सास के कारण तुम्हारे घर नही गये तो मया हुआ, यहा आकर बरावर पोज सवर लेते रहते थे। उन्ही लोगो के कारण वे अस्पताल भी नहीं गये। उन्हें क्या मालूम कि वहा एक दिन कोई झाकने भी नहीं आया।" भाभी को क्या मालूम कि मेरा सारा रोप भी तो उन्ही लोगों के लिए या। पडित जी का तो मिर्फ बहाना भर या। सच तो यह है कि पडित जी को इतने दिनों कभी याद भी न आयी। "भाभी, ये लोग इलाहाबाद से लौटे कि नहीं -~-जरा पता लगाना।" "सघ बात बताऊ, कनु, कोई नाटक तो नहीं करोगी? नहीं तो तुम्हारे भाई मुझे खा जायेंगे।" "बताओ।" "मनोज तो अस्पताल आये थे। दो दिन रहे भी थे। पर मुनील भैया ने आते ही उन्हें दो चार खरी-पोटी सुनी दी। अच्छी-खासी हप हो गयी दोनों में। तुम्हारे बडे भंया भी पीछे नहीं रहे। तब से उन्होंने आना बंद कर दिया। लोगों की पूछताछ से बचने के लिए शायद कही बाहर निकल गये हैं।" अपनी बात का उपसंहार करते हुए भाभी ने कहा, "वात सही भी थी, तब भी इतना तूल देना ठीक नहीं हुआ। वे तो लड़-झगडकर चले गये, पर यह नहीं सोचा कि वहन का क्या होगा।" सच तो है, मेरा क्या होगा ! इस अपमान के बाद क्या यहां वे आयेंगे? और उनके बुलाये बिना फोन-सा मुह लेकर मैं वापस जाऊंगी। ।
भाई लोग जिस ठसक के साथ ले आये हैं, क्या उत्तने ही सम्मान से मुझे रख सकेंगे ? मैं भी कितने दिन तक गलग्रह वनकर यहां पड़ी रहूंगी? भाभी ने ठीक ही किया जो पहले से आगाह कर दिया। यह सब सुन लेने के बाद मेरा फिर से बेहोश हो जाना विलकुल स्वाभाविक था। मेरे हाथ-पैर ऐंठने भी लगे थे। बड़ी मुश्किल से मैंने अपने पर नियंत्रण किया। मैं भाभी को किसी मुसीवत में डालना नहीं चाहती थी। जीने का, ठीक होने का उत्साह ही जैसे जाता रहा। रूठा हुआ पति, खौफ खाती विटिया, पागलपन का प्रचार करती सास, किसके लिए जिंदा रहना है मुझे । औरों से तो मुझे कुछ लेना-देना नहीं था। एक ये ही अगर अपने होते ! अपने होते तो क्या मां के भ्रामक प्रचार का प्रतिवाद न करते, विटिया के मन में पैठ गये मिथ्या भय को हटाने का प्रयास न करते? पर वे तो जीवन-मृत्यु के बीच झूलती पत्नी के सिरहाने वैठकर लड़ते रहे, आत्म-सम्मान की बातें सोचते रहे। उनके व्यवहार से लग रहा है कि मेरी वीमारी उनके लिए इष्टापत्ति वनकर आयी है । ऐसे व्यक्ति को कोई मनाये भी तो कैसे! आज मां, भैया-भाभी जान छिड़क रहे हैं। उनके अकृत्रिम स्नेह की कव तक परीक्षा लेती रहूंगी? उसे नकार कर चली भी जाऊं तो किस बल- बूते पर ? उठकर एक गिलास पानी पीना भी तो मेरे लिए कठिन हो गया है। दिन-रात मैं इसी सोच में घुलने लगी। मेरा बिस्तर मां के कमरे में ही लगा दिया था । उस पर पड़ी-पड़ी दिन-रात मां के ठाकुर जी को निहारा करती। चांदी और पीतल की मूर्तियों से वह पीतल का सिंहासन खचाखच भरा हुआ था। अगल-बगल देवी-देवताओं की ढेरों तसवीरें थी। इन सवसे ऊपर साईबाबा की एक फोटो थी जो अपने आकार-प्रकार के कारण अलग ही चमकती थी। मैं टकटकी लगाये उन्हीं को देखा करती, अपनी रिहाई की भीख मांगा करती। एक रात इसी तरह लेटे-लेटे करुणा की याचना कर रही थी कि कुछ ६८ / राग-विराग ।
पंक्तियां अनायास फूट पड़ी : शरण में अपनी बुला ले मोसाई दुविधा मन की मिटा दे ओ साई तन के सौ दुख झेल गपी में मन के हाथों हार गयी हूं अपने से ही छली गयो में अपनों पर ही भार हुई हूँ दीप जला आशा का या फिर मुझको जग से उठा ले ओ साई मैं तो हैरान रह गयी। क्या यह सचमुच मैरी पक्तिया है या कहीं का पढा-सुना याद आ रहा है। पर नहीं, वह मेरी ही अंतरात्मा की पुकार थी, मेरी ही पीडा गीत बनकर फूटी थी। और मजे की बात यह कि गीत के शब्द भी सुरों का माज पहनकर आये थे । कलावती की कर्णमधुर स्वरा- वलियों में पिरोये हुए उन योलो को जोर से गाने का मन हो आया । पर माधी रात का वह सन्नाटा तोड़ने का साहस नहीं हुआ, सब लोग गहरी निद्रा मे निमग्न थे। सबको सुबह होते ही काम में जुट जानाया। मेरी तरह दिन भर खाट तोड का मुख किसी को नसीब नहीं था। वही मुश्किल में अपने को जन किया। रात भर मन-ही-मन उन स्वरो को दोहाती रही। सुबह होते ही सबसे पहले मैंने नहाने की इच्छा प्रकट की। भाभी को आश्चर्य तो हुआ पर उन्होंने जिरह नहीं की। नल के सुर में सुर मिलाकर गाने की मेरी पुरानी आदत यो । माज तो और भी मजा आया। धुन भी मेरी, योल भी मेरे उधार का कोई अझट ही नहीं था। भाभी दरवाजान थपथपाती तो पता नहीं कब तक बैठी रहती। बाहर सब लोग डर गये थे । स्वाभाविक ही था, इतनी देर में सचमुच मुझे पकान हो आयो थो। बाहर निकलते ही पस्त होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। भैया एकदम दौड कर मेरी नब्ज टटोलने लगे। उनसे कहा, "प्लीज, दफ्तर जाने से पहले हारमोनियम निकालार रख जायेंगे?"
मेरी शादी के वाद हारमोनियम संदूकों के कुतुबमीनार की निचली मंजिल पर आ गया था। मां ने तो तानपूरे के साथ इसे भी ले जाने के लिए कहा था पर मैने ही मनाकर दिया था। भैया मौज में आकर कभी- कभार कुछ गुनगुना लेते थे। उनका यह सुख छीनने का मन न हुआ। दिन भर मैं हारमोनियम पर उंगलियां फेरती रही। उसे बजाते हुए मेरी सांस भी धौंकनी की तरह बज उठती। फिर मैं थोड़ी देर को लेट जाती । जरा-सा आराम आते ही फिर उठ बैठती। अपनी ही बनायी धुन पर मैं मुग्ध हुई जा रही थी। मां मुझे देख-देखकर खुश हो रही थी। कोई जिद्दी बच्चा घड़ी भर को खिलौनों में रम जाये तो मां को जैसी खुशी होती है-~-वस, वैसी ही खुशी मां की थी। मोहल्ले के शुक्ला जी के यहां से संकट सोमवार के प्रसाद का निमंत्रण आया तो मुझे याद आया कि आज सोमवार है, मतलव पंडित जी आज अवश्य आयेंगे। नीलकंठेश्वर जाते हुए वे अवश्य घड़ी भर को रुककर हाल- चाल पूछ जाते हैं, शाम को तैयार हो कर मैं घड़ी की ओर दृष्टि लगाये - बैठी रही। वे आते ही बोले, "आज तो बहुत प्रसन्न लग रही हो विटिया, क्या - बात है ?" "एक भजन बनाया है, सुनेगे?" "जरूर," वे कुर्सी खींचकर बैठ गये, "बल्कि मैं तो तुमसे कहने वाला था कि रोज सुवह एक-दो भजन गाने का नियम बना लो। देखो, पंद्रह दिन में तुम्हारी सेहत वन जायेगी।" मैं हारमोनियम लेकर बैठ गयी। सारा घर मेरे आसपास इकट्ठा हो गया । सबके चेहरे पर एक अपूर्व उल्लास था। मैं बड़ी देर तक उंगलियां फेरती रही। वाजे के स्वर साई को पुकारते रहे, पर मेरे गले से आवाज ही न निकली। "कमजोर हो अभी। दोनों काम एक साथ न कर सकोगी । लाओ, मुझे दो।" वे वही मेरे पास दरी पर बैठ गये। मेरी धुन को उन्होंने बड़ी सहजता से उठा लिया और उनकी उंगलियों से रस के सोते फूट पड़े। ७० / राग-विराग "गाओ विटिया।" पर चिटिया गाती क्या खाक ! बावाज तो निकले। मुबह वापरूम में कितना मुन्दर समां बंध गया था। उस समय सचमुच मैंने गाया था या नल की धार में अपनी आवाज को आरोपित कर दिया था। "पोड़ी नीचे से उठा लें?" और बडी आसानी से वै दो सुर नीचे उतर आये । जीवन में पहली बार काली तीन से गाने का अवसर था। लगा जैसे अपनी आवाज को किसी गड्ढे में खीचकर निकाल रही है। वहां से तो निकाल लिया, पर उसले दाद ठप्प । सोच-तानकर धवत तक ले गयो । पर वहा तक जाते-जाते ही दम फूल गया। आवाज फट गयी, विषर गयी। कापती हवेलियों में चेहरा छिपाकर मैं मुवक पड़ी। कानो में पडित जी की आवाज आ रही थी, "कोई बात नहीं बेटे। बहुत दिनो याद गाया है न, इसीलिए ८-१० दिनो के अभ्यास से सब ठीक सो जायेगा।" उसके बाद मुझे कुछ सुनाई ही नहीं दिया। मैं उसी तरह हथेली में मुह छिपाये ही लुढक गयी।
६ पांच महीने की लंबी छुट्टी के बाद एक अच्छा-सा दिन देखकर मैंने काम पर जाना शुरू कर दिया। कमजोरी अव भी बहुत थी पर कभी-न- कभी पहल तो करनी ही थी। वैसे स्टाफ के लोग बहुत सहृदयता से पेश आये। . वैसे भी,शरीर तो अब स्वस्थ हो चला था । मानसिक तनाव भर बाकी था पर उससे उबरने का एक ही उपाय था। उस दिशा में भी पहल करनी ही थी। एक दिन मैंने पूछ ही लिया, "भैया, मुझे घर कव भेजेंगे? "तुम्हें यहां कोई तकलीफ है ?" "क्या तकलीफ होगी, तभी अपने घर जाऊंगी?" मैंने सूखी हंसी हंस- कर कहा। "वहां किसी को तुम्हारी जरूरत भी है ?" मुझे तो है----मैंने कहना चाहा पर सख्ती से होंठ भींच लिये। मुझे चुप देखकर भैया बोले, "तुम्हारा घर है, जब चाहे जा सकती हो। मैं टोदूंगा नहीं। पर वहां जो कुछ देखकर आया हूं. "आप गये थे?" मैं उत्सुक हो उठी। "हां, दो बार गया था। तुम्हारे कपड़े, तुम्हारी दवाइयां लेने के बहाने से गया था।" "फिर?" ७२ / राग-विराग "रिमा, तुम्हारी सात बरसती रहीं, बतो-टो मुनाती रही।" "मेरेरप-रंग का उलाहना दिया होगा।" "तुम सद बानती तो हो," भैया दोने, अब तुम्हारी बीमारी भीड बाबर जुड़ गया है। कह रही यों कि भोने-माने लड़के को जानकर हम लोगों ने पांच लिया। बोह ! मैं कुछ क्षन चुप रहो । फिर पूछा, "और मोला-माना नहा वथा दोला?" "एक दार तो योमान जी मिले होनहीं। दूसरी बार नरनाकर गया था। तब मी एक शब्द नहीं बोला। टुकुर-टुदुर देयता मानका मापण मुनता रहा।" "मेरे बारे में पूछा भी नही ?" "नहीं। मैंने कुछ सर्टिफिकेट्न मंगवाये थे।कहा या कि परदे काना वह भलामानुस दफ्तर में आगर दे गया । वद वहां इक तीनों ने पया कहता, बना मुनता?" एक और प्रश्न मन में कुलबुला रहा था, श्वेता की हैपर में लौटा दिया । डर था कि पूछते हुए मैं रो ही पड़ती। "यहा सब लोग वड़ें मजे मे है कनु," भैया ने बने मेरे मन की बात जानकर कहा, "देखकर लगता ही नहीं कि किसी के भारत में जन्हें कोई चिंता पाये जा रही है। गृहिणी वे न होने में परमे कोई जनुका हो रही है।" अगले पंद्रह दिन में फिर बैंक नहीं जा सकी। "कल्याणी दीदी !" अपनी धुन मे मड़क पर चली जा रही पी। नाम सुनार चौकी। देखा, अठारह-उन्नीस साल का एक किशोर साइकिल से जारसर मेरे रास्ते में सहा हो गया है। "नमस्ते !" मुझने दृष्टि मिलते ही उसने शरीफ कम्पो को सराय जोड़कर नमस्कार किया, जबकि उसको आपों से शरारत टपक रही थी।
-- . । "भाप-आप मुझे कैसे जानते हैं ?" "वाह, जानूंगा क्यों नहीं? आप मेरी गुरु वहन जो हैं।" "मतलव -आप. "जी हां, गुरु जी का नया रंगरूट हूं। पर इतना नया भी नहीं कि आपको न पहचान।' "पर मैं तो आपको..." "नहीं जानती, यही न ! जानेंगी। जरूर जानेंगी। चार-पांच साल जरा सन्न कर लीजिए। फिर आप तो क्या, हर संगीतप्रेमी मेरा नाम जान जायेगा।" "इस समय आप ही बता दें तो कृपा होगी..." "क्यों नहीं, क्यों नहीं। मेरा नाम है श्रीरंग । पर प्यार से लोग मुझे श्री भी कहते है।" उसने फिल्मी तर्ज में जवाद दिया। मेरी गंभीरता ने हथियार डाल दिये । हंसते हुए मैंने पूछा, "हां तो श्री श्रीरंग जी, बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं?" "बहुत कुछ। मतलब कल दोपहर को बगीची में भोजन के लिए पधार कर मेरा श्रम सार्थक कर सकती हैं।" "कल ! कल क्या है ?" "गुरुपूर्णिमा है, गुरु जी का जन्म दिन है।" ओह ! कितनी पुरानी बात याद दिला गया वह लड़का। किसी दूसरे जन्म की वात लगती है। अव तो पांच साल में आदमी इतना बदल जाता गुरु-घर के ये दो ही तीन उत्सव तो थे। एक बड़ी गुरुपूर्णिमा थी जो आपाढ़ में पड़ती थी। इसका आयोजन हम सब शिष्य मिलकर ही करते थे। महीने भर पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी। सुवह गुरु पूजा, होम-हवन शाम को महफिल । पता नहीं कितनी बार इस महफिल में गाकर मैंने प्रशंसा लूटी है। एक होती थी गुरुअष्टमी । माघ महीने में पड़ती थी । इसका आयोजन पंडित जी स्वयं करते क्योंकि यह उनके गुरुमहाराज की पुण्यतिथि होती थी। इस दिन संगीत प्रतियोगिताएं होती थीं। पंडित जी विजेताओं को अपनी ७४ | शनि बरि स पुरस्कार बाटते थे। इस विशिष्ट कार्यक्रम में सरस्वती वंदना गाने का सम्मान मुझे वर्षों मिलता रहा। एक और गुरुपूर्णिमा होती थी-कातिक पूनो। यह पंडित जी का जन्मदिन था । एक तरह से यह जिया का ही उत्सव या। वे क्या करवाती और नये-पुराने शिष्यों को निमनित करती। पटिन जी अपने शिष्यों ने वधी-वधाई फीस नहीं लेते थे। जिसे जो देना होता, इन्ही पर्वो पर दे देता। किमने क्या दिया, कितना दिया- इसकी कभी चर्चा नही होती थी। मा को पडित जी से ज्यादा शिया पर आस्था थी। इमीलिए वे हर माल एक अच्छी सी साडी सौगात में भेजती । विवाह के बाद एकाध माल तो मैं इन आयोजनों में गयी। वहां गाया भी। फिर धीरे-धीरे सब कुछ छूटता-सा गया। इस निमनण की अवहेलना अमभव थी। पर जाती भी तो किस मुह से? उम दिन के लज्जास्पद प्रसग के बाद क्या पडित जी का सामना कर सकूगी? वे तो जीवन भर अपनी आत्मा का मगीत निरपेक्ष भाव से सुटात रहे हैं। पर उनके इस दिव्य दान का मैने कसा जाक बना डाला? क्या इसके बाद भी मुझे शिप्य कहलाने का अधिकार रह जाता है ? - . छुट्टी थो, फिर भी मैं बगीची नहीं गयी। मैंने मा को हवा भी नहीं लगने ७ दी। उनके लिए गुरु ईश्वर से भी बढ़कर होता है। चाहे वह अध्यात्म का हो या संगीत का। भनक भर पा जाती तो भेजकर ही दम लेती। गुनगुनी धूप में बैठकर वाल मुखा रही थी कि वह आकर खड़ा हो गया । यमदूत की तरह कमर पर दोनो हाथ रखकर बोला, "चलिए।" "देखो धीरंग, ऐसा है। मैं वहाना टटोलने लगी। मेरी वात काटकर वह बोला, "कल मैंने अपना पूरा परिचय नहीं दिया था। गुरु जी का चेला तो हू ही। पर उससे पहले मा का लंगूर हूं । आपको लाने की आज्ञा हुई है, लेकर हो जाऊगा।" "अगर न जाना चाहू तो।" "उठाकर ले जाऊगा।" ..." राग-विराग। ७५ "देखो श्रीरंग, तुम जानते हो, मेरी तबीयत ठीक नहीं है । अभी खाना- पीना..." "वहां क्या कोई खाने के लिए जाता है ?" "तुम्हें मालूम है, मैं इतने दिनों से घर पर बैठी हुई हूं। खाली हाथ वहां जाते अच्छा नहीं लगता।" "वहां क्या सिर्फ देने के लिए ही जाते हैं ?" "तो फिर?" 'आप मुझसे पूछ रही हैं ?" वह एकाएक उत्तेजित हो उठा, "वहां कोई आपके लिए पथ्य का खाना बनाकर बैठी है तो किसलिए? आपकी तबीयत का हाल जानने के लिए मुझे भेजा है तो किसलिए? जानती हैं, मुझे अपनी खड़खड़िया साइकिल भी न लाने दी। बोली, वीमार है-~-रिक्शे में लेकर आना।' और यह सब वे किसलिए कर रही हैं ? क्या इसलिए कि आप जाते हुए सौ-पचास रुपये या एकाध जोड़ी धोती लेकर जायेंगी? वाह दीदी, ममता की क्या कद्र की है आपने ! मैं तो आप- को बहुत समझदार मानता था। उसकी तमतमायी आवाज भीतर तक भी पहुंची होगी। मां और भैया घवराकर बाहर निकल आये, "क्या हुआ?" "कुछ नही," वह एकदम अवोध शिशु-सा सौम्य हो आया, "गुरु महाराज का जन्मदिन है आज । जिया ने दीदी को भोजन पर बुलाया है।" "अच्छा तभी," भैया बोले, "कल दफ्तर से लौटते हुए देखा था। तमाम झंडी-पताकाएं लगी हुई हैं। मैंने सोचा कि मंदिर में कोई उत्सव "उत्सव तो है ही। गुरु महाराज का पचहत्तरवां जन्मदिन है। हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं।" "अरे वेटा," मां वोली, "तुम्हारी दीदी इन सब कामों में अगुआ हुआ करती थी। वेचारी बीमारी के कारण पस्त हो गयी है।" फिर मुझसे बोली, "जा बेटे तैयार हो जा।" भव मना करने का कोई सवाल ही नहीं था! चुपचाप जाकर कपड़े बदल लिये। चलने लगी तो भयाने हाथ में एक लिफाफा पकड़ा दिया। ७६ / राग-विराग उसमें ग्यारह थे, इक्कीस थे या एक सौ एक–मने जांचने की कोशिश नहीं की। पहले यह दायित्व वाबू जी निभाते थे। उनके बाद बड़ी सहजता से यह काम भैया ने अपने ऊपर से लिया था। मड़क पर आते ही उसने कहा, "वह जो आप साथ लेकर यापी है, मेहरबानी करके पमं में ही रखिएगा 1 नहीं तो हंगामा हो जायेगा। "क्यों?" "इसलिए कि मैं नहीं चाहता कि को रिसी किस्म का घाटा हो। पहले आप इत्मीनान से दाजार भाव नालप कर लीजिए। तर तप करेंगे किजी कीमत थाप अदा कर रही हैं वह "श्री..." मैंने तड़पकर उसकी बाजू थाम ली। पता नहीं यह मेरा स्पर्श था या मेरी आवाज पर वह पिघल गया। हुए स्वर में बोला, "आपको मैं क्या समझाऊंगा? आप तो मुझने हर प्रकार ते ज्येष्ठ हैं, प्रेष्ठ हैं। दीदी ! एक यात बताईये, यहां आकर हम जो पाते हैं । क्या सचमुच उसका मोल कभी दे पाते हैं ? मैं टिककर खड़ी हो गयी। इच्छा हुई कि बीच रास्ते में उस वित्ते भर के लड़के के पैर छू सू । नाशीर्वाद माग लू । भीगे मसे तो पता भी न था कि गोबर-मिट्टी मे लिपेपुते उन दो कमरों में मेरी ७ चेतना का एक अंश छूट गया है, वहां पहचते ही जो मुझमे लिपट गया और बिलखकर कैफियत मागने लगा कि इतने दिनों तक मैं यहां रह गयी थी। जिया की परिचित रसोई में पहुंचते ही मैं भूल गयो कि अब मैं भी मां बन गयी हूं। वे जय मनुहार करके मेरे लिए विशेष रूप से बनाया गया दाल-भात, फुलके आदि परोमने लगी तो मैं एकदम वच्ची बन गयी और कचौड़ी के लिए, अचार के लिए जिद करने लगी । उन्होंने जब कसकर एक डांट लगायी तो मेरा वचपन जैसे लोट याया। सारे रास्ते यही सोच बना हुआ था कि पडित जी के सामने क्या मह लेकर जाऊंगी। पर यहां बाते ही सारा संकोच दिला गया। वे बाहरवाले कमरे में अपने नये-पुराने शिष्यों से घिरे बैठे थे। उनके सुसज्जित आसन के पास भेंट-सामग्री का अंबार लगा हुआ था। मैंने उन सवको अनदेखा कर के निस्संकोच उनके चरणों में मत्था टेक दिया। अपना वरदहस्त मेरे सिर पर फेरते हुए जब उन्होंने आशीर्वाद दिया, तव लगा ही नहीं कि मैं एक अकिंचन, अनिकेत, असहाय स्त्री हूं-दूसरों की करुणा पर पलनेवाली एक अवला नारी हैं। चलते समय उन्होंने कहा था, "विटिया, जब भी मन उदास हुआ करे, यहां चली आया करो।" उनके इन शब्दों को उनका दुलार मान कर मैं गद्गद् हो आयी थी। पर तव यह नहीं सोचा था कि उनकी अंतदृष्टि ने मेरा भविष्य देख लिया है और इसीलिए मुझे अभय दे रहे हैं। किसे पता था उनके स्नेह-निमंत्रण को इतनी जल्दी साकार करना पड़ेगा? दशहरा आकर चला गया था, दीवाली भी यों ही बीत गयी थी। शरीर से, मन से इतना टूट गयी थी कि कमरे में मुंह छिपाये पड़ी रही। मेरी वजह से भैया-भाभी का त्योहार भी फीका रहा। निखिल, नीता न जी भरकर पटाखे चला सके, न हुड़दंग मचा सके। पर कैलेंडर में जनवरी की आठ तारीख देखते ही मेरा मन मचल गया। यह श्वेता का जन्मदिन था। एक ही शहर में रहते हुए मेरी बच्ची अनाथों की तरह उपेक्षित रहे, जन्मदिन पर मां का आशीर्वाद भी न पा सके, यह मुझसे सहन नहीं हुआ। घर पर मैंने केवल यही बताया कि शाम को लौटने में देर हो जायेगी। पूरी बात बता देती तो शायद भैया मुझे जाने न देते। या स्वयं साथ आने का आग्रह करते। दोनों ही बातें मुझे स्वीकार्य नहीं थी। ऑफिस से मैं सीधे बाजार गयी। नेट की एक गुलाबी फ्रॉक खरीदी। टॉफी का एक बड़ा-सा डिब्बा लिया। जिस पर नर्सरी राइम्स लिखी हुई थीं-और अंत में शरबत पीती हुए एक गुड़िया भी खरीदी। ये सारी खरीदारी करते समय मन आनंद और उल्लास की तरंगों पर झूलता रहा। उन्हीं तरंगों पर चढ़कर मैंने रिक्शेवाले को अपने घर का पता दिया। मैं स्वयं तो वहां पता नहीं कब से पहुंच गयी थी। ७८ / राग-विराग रिक्शा जैसे ही आवरी मोड़ पर मुड़ा, लाउडस्पीकर वा कर्मकट मंगीत कानों से टकराया। हैरत तो यह थी कि यह डिस्को गान मेरे ही छग्ने से नि:सृत हो रहा था। घर के बाहर छोटा-सा चंदोबा दना या जिसमें करीने से कुसियां लगी हुई थी। नीचे गमले और ऊपर गुब्बारे लगा कर वातावरण को सुशोभित करने का प्रयास किया गया था। मेरी नीली चंदेरी माड़ी पहने रजनी गेट के सामने अल्पना मौड़ रही थी। अपना पर समझकर बैंक से सीधे चली आयी पी। अव इस मजेसवरे माहौल को अपनी उपस्थिति से बदरग करने का मन नहीं हुआ। स्वागत की आशा वैसे भी नही थी। वेवल मेरा मा का मन मुझे यहा पीच ले गया था। पर जिसके लिए अपना मान-सम्मान नाक पर रखकर चली आयी थी, क्या वह भी मेरी ममता को ममझ मकेगी या पहले की भांति मिडक देगी? औरो को अवहेलना तो मैंने झेल ली है पर करा उसका तिरस्कार सह पाऊंगी? m रजनी जब तक मुडकर पीछे देखती मैंने रिक्शा लोटा लिया था। पर लौटने का भी मन नहीं हुआ। सीघे बगीची मे आ गयी। मान्य आरती का समय था। इक्का-दुक्का भक्तगण जुट आये थे। रेशमी धोती पहने पंडित जी श्री रघुनाथ जी की आरती उतार रहे थे। मेरा मन दस-पंद्रह साल पीछे लौट गया। ऐसी ही एक साध्य वेला में धावू जी गुरु चरणो मे डास गये थे। कितनी उमग से मैंने दीक्षा ली थी। कितनी आशा से उन्होंने अनुग्रह किया था। उसके बाद? चरणामृत देते समय पहित जी ने मुझे देखा, "अरे विटिया, तुम मैं फीकी-सी हंसी हम दी। "चलो, कमरे में चलकर बैठो। हम आते हैं।" जिया को पुकारते हुए ही में घर में दाखिल हुई पर उनका कही पता नथा। उनकी रसोई में श्री महाराज सटर-पटर करते नजर आये। "क्या हो रहा है ?" वह बुरी तरह चौंक गया। पर मुझे देखते ही उमका चेहरा एक सरल हंसी से उद्भासित हो उठा। मुझे लगा जैसे ताजी हवा का तोंका मुझे कर निकल गया है । मन तरोताजा हो गया।
"ये क्या उठापटक कर रहे हो? जिया देखेंगी तो जमकर पिटाई कर । - " - "जिया है कहां? वे तो भतीजे की शादी में गयी हैं । यह भानुमती का पिटारा मुझे सौंप गयी हैं । अव वहां खड़े-खड़े क्या कर रही हैं। जरा आ कर हाथ वटाइए।" "फरमाइए।" "खिचड़ी बनाने का हुक्म हुआ है। मुझे उड़द की और मूंग की दालों में फर्क ही पता नहीं चल रहा मैंने उसकी मुश्किल आसान कर दी। सारे डिब्बे यथास्थान रखते हुए पूछा, "खाना कौन बनाता है ?" "देख तो रही हैं।" "हे भगवान ! मुझे तो पंडित जी की चिंता होने लगी है।" "तो आप आकर बना दिया कीजिए न ! आप तो लाट साहब की तरह रिक्शे पर आयेंगी, रिक्शे पर जायेंगी। अभी जो रिक्शा सका था, वह आप ही का था न ! अपन तो भई, गुरुसेवा में विश्वास करते हैं। उलटी-सीधी जैसी भी बन पड़ती है, कर देते हैं। विद्या इतनी आसानी से थोड़े ही मिलती हैं।" "हम तो तुम्हारी तरह सेवा नहीं कर पाये। तभी न विद्या हमसे रूठ गयी है।" "अरे नहीं-आपकी तो यहां सब लोग कितनी तारीफ करते हैं। कितना मन होता है आपको सुनने का, अच्छा, उस दिन शाम के कार्यक्रम में आप क्यों नहीं आयी ?" "तुम्हारे डर से-कहीं मुझे उठाकर मंच पर विठा देते तो फजीहत होती कि नहीं।" "चलिए, इस बार माफ कर दिया। पर गुरुअष्टमी के दिन नहीं छोडूंगा, कहे देता हूं। अव तो मैंने घर भी देख लिया है। वहीं से उठाकर ले आऊंगा।" "क्यों रे, विटिया को क्यों परेशान कर रहा है !" पंडित जी एकदम सामने आकर खड़े हो गये तो वह सकपका गया। उसकी घबराहट का मजा - , ८० / राग-विराग लेते हुए मैंने कहा, "मुझे धमकी दे रहा है कि अष्टमी के उत्सव में नहीं आयी तो घर से उठा ले आऊगा।" "तब तो तुम तयारी से रहना विटिया, यह दुष्ट ग्रह एक बार पीछे पड़ गया तो खैर नहीं है।" उसने भागने का मौका दूढ़ा, "गुरु जी, दही ले आऊं?" "ले आओ। पर जरा जल्दी आना। फिर फनु को छोड़ने भी जाना "रिक्शा लेता आक?" उसने मासूमियत से पूछा और मेरी ओर देख कर शरारत से मुस्कुरा दिया। "बहुत शरारती है।" उसके जाते ही मैंने कहा। "अरे वहुत--तुम्हारी जिया यहा होती है, नय देखना । बोनी की युगलबंदी सुन-सुनकर कभी मेर कान पक जाते हैं।" "नया ही आया है न ! किसका लड़का है ?" अपनी चौकी पर बैठते हुए पडित जी बोले, "में अनाय है बिटिया' जयलपुर के पास किसी गाव का रहनेवाला है। यहा उसकी बडी बहन व्याही है । एक साल छुट्टियों में बहन के पास आया हुआ ना। उधर गाव में एक दिन ऐमी आग लगी कि उसका घर, माता-पिता और छोटी-बहन- सब अग्नि को भेंट चढ़ गये। तब से यही पर रह गया है।" "ओफ, कितनी दर्दनाक घटना है। वहीं तो यता रहा हूँ। चोद-पद्रह मात का दुधमुहा बच्चा, इतना बड़ा आघात सहन न कर मका। एकदम पगला-मा गया। न हसता, न बोलता। वस, दिन भर एक कोने में गुमसुम चना बैठा रहना। दहन अपने दुरा वहाल। उसे समझाये तो कौन बहनोई परेशान हो गये। तव डाक्टरो ने ही कहा था इसमें गाने-बजान का कोई मोरपंदा करो। समय भी कट जायेगा और दिल भी लगा रहेगा। तब इसके बहनोई मेरे पास लेकर आये । मुझे भी फरणा हो थायी। एक-दो दिन परखकर मैंने उसे तबला थमा दिया। एक वही साज था जिसने इमो मन का हाहाकार डूब सकता था।" मैंने मनायास ही उनके पैर छू लिये। चरण-रज मारे लगाने हुए - - कहा, "भाग्य ही उसे आपके दरवाजे ले आया होगा। नहीं तो लड़का सच- मुच पागल हो गया होता। ऐसी कायापलट तो यहीं संभव थी।" "कायापलट सिर्फ तबले से नहीं हुआ है, गंडा वांधते समय मैंने एक मंत्र भी दिया था।" "कौन-सा ?" "जो अपने पास नहीं है, कभी हो नहीं सकता, उसके लिए विसूरते मत रहो। जो है, उसे प्रभु का प्रसाद मानकर ग्रहण करो, जतन करो... और कनु वेटे, आज यही बात तुमस भी कहने को जी चाहता है।" मैं चुप हो रही। "एक बात कहूंगा तो बुरा तो न मानोगी ?" "कहिए. "यह तो तुम जानती हो कि अभिमान करने योग्य रूप तुम्हारे पास कभी नहीं था।" में एकदम सुलग उठी, "पर मैं इतनी असुंदर भी नहीं थी कि बरावर कोई मुझे कोंचता रहे । इतनी कुरूप नहीं थी कि मेरा अपना खून भी मुझसे नफरत करने लगे।" "यही तो मैं समझाने का यत्न कर रहा हूं। तुम्हारे पास विद्या थी, स्वर थाबस, रूप नही था। तुम्हारे दुश्मनों के पास केवल रूप था। वे अच्छी तरह जानते थे कि यही एक क्षेत्र है जहां तुम मात खा जाओगी। इसलिए उसी एक हथियार से वे तुम्हें बार-बार पछाड़ते रहे। तुम पागलों की तरह अपने पर कुढ़ती रहीं। अपनी शक्ति का तुम्हें विस्मरण हो गया- तुम यह भी भूल गयीं कि तुमने मनोज को सबसे पहले अपने स्वर से ही सम्मोहित किया था।" "तब वे फुरसत में थे पंडित जी।" "और अव उसके पास समय नहीं है, यही न! तो इसलिए क्या तुम गाना छोड़ दोगी? आज सारी दुनिया अपनी भागमभाग में व्यस्त है तो क्या कोयल चुप हो जाये। यह तो ईश्वर के वरदान का अपमान करना हुआ।" "तो मैं क्या करूं बताइए।" ८२ / राग-विरा "किसी दिन तुम्हें बहुत ऊंचाई पर पहुंचाने का सपना देखा था। पता नहीं कहां से यह मनोज टपक पड़ा और सब छिन्नभिन्न हो गया। मैं तुम्हें दोप नहीं देता । अपने रूप-रंग को लेकर कोई हीनवौध या तुम्हारे मन में। मनोज जैसे सुदर्शन पुरुष का प्यार पाते ही तुम्हारा अहं पुलकित हो उठा। तुम्हें अगला-पिछला सव कुछ भूल गया। तुम्हे उस आवेग में निर्वाध वहते हुए चुपचाप देखता रहा । उस समय कुछ भी कहना-मुनना व्यर्थ था । आज तुम अपनी सारी साधना मिट्टी करके मेरे पास आयो हो-पूछती हो कि मैं क्या करू । अव तो मेरे पास उतना समय भी नहीं है बिटिया। लेकिन जब तक मैं हूं, तुम यहा आया करो। तुम्हारा खोया हुआ आत्मविश्वास भी फिर से दिला सका तो समझंगा, मेरा थम सार्थक हो गया।"
८ - जिनकी छांह तले बैठकर श्रीरंग अपना इतना दारुण दु:ख भूल गया था, वहां मुझे शांति न मिलती, यह असंभव था। मेरा तो वह जाना- पहचाना ठौर था । वैसे भी भैया-भाभी के शांत जीवन में लहरें उठाने से तो दो घड़ी यहां बैठना वेहतर था। वेचारे खुलकर हंसने बोलने को तरस गये थे। मेरा अहसास एक बोझ की तरह हरदम मन पर लदा रहता । सुनील भैया तो लड़-झगड़कर अपने सुरक्षित दड़बे में जाकर दुवक गये थे। तबसे खबर भी नहीं ली कि कनु मरती है या जीती है। मुसीवत भैया-भाभी उठा रहे थे, बड़े होने का दंड भुगत रहे थे। इन वार मैंने अपनी जगह बदल ली थी। मैं जिया की रसोई में दरवाजे के पास बैठी रहती। जिया की जगर-मगर गृहस्थी को देखती हुई मटर की पलियां छील देती या मेथी का साग वारीक काट देती। बाहरवाले कमरे में पंडित जी विभिन्न आयु वर्ग के शिष्यों को संगीत के पाठ देते रहते। कोई तबला सीखता, कोई गायन-कोई सितार सीखनेवाला रागज्ञान के लिए आ जाता। इनमें से बहुत कम थे जो भविष्य में भी संगीत-साधना करते। लड़के रोजगार की तलाश में निकलते ही गाना-वजाना भूल जानेवाले थे, गृहस्थी के झंझट में लड़कियों का भी यही हश्र होने वाला था। कुछ तो बस, इस- लिए सीख रही थीं कि लड़केवालों को बताया जा सके कि गाना भी आता , ८४ / राग-विराग 1 यह कोई नयी बात नहीं थी। यह इतिहास बार-बार दोहराया जा चुका या। पडित जी इस कटु सत्य को जानते थे। फिर भी वे उसी तन्मयता से अपना ज्ञान दोनों हाथों मे उलीचते रहते। कभी-कभी हारमोनियम पर सुर लगाने के लिए मुझे भी बाहर बुला लेते । नामिविये मे कोई तान नही उठती तो मुझमे दोहराने के लिए कहते। शुरू-शुरू में तो थोडी घबराहट हुई । फिर लगा कि यह तो अपने वांये हाथ का खेल है। कभी आकाशवाणी का कोई ताजा-ताजा गायक भजनों को कापी लेकर आ पहुंचता। कभी किसी स्कूल को दोदी कोरम गीतों का गटकर लिये आ धमकती। सेह-सम्मेलनों का मौसम चल रहा था । गजल गायको की वाड-सी आयी हुई थी। वे लोग भी कभी-कभी रास्ता भूलकर इघर आ निकलते। इन लोगो के लिए पंडित जी ज्यादा सिर नही खपाते । नोटेशन लिख- कर मुझे दे जाते या उन्हे पूरी तरह मेरी दया पर छोट देते। उनके कच्चे गलों में अपनी सुरावट विठाते हुए सजना का सुख प्राप्त होता । बरसो बाद फिर से मिली सुरो की मगत ने ऐसा मोह लिया था कि में घर पर भी रहती तो गुनगुनाया करती। सब लोग इसे मेरी खुशी का प्रतीक मानते और खुश हो जाते। उनकी खुशफहमी को मैंने भी तोड़ने की चेप्टा नहीं की। वैक में काम करते हुए भी कोई-न-कोई स्वरलहरी मन की घाटियो में चक्कर लगाया करती। तब फिर अनायास याद आ जाता, अरे, यह तो यही वंदिश है जो फल पडित जी संध्या को सिखा रहे थे । संध्या देसाई इन दिनों उनकी प्रिय शिष्या थी। उसे देखकर अपना बचपन याद आ जाता था। पता नहीं कहा-कहा की दुर्लभ और मुश्किल वदिशे पंडित जी उमे सिगाते जा रहे थे। कई चीजें तो उसकी मौकात से परे घो। जरा-सी तो थो वैचारी। कई बार लगता कि यह तो सरासर अन्याय हो रहा है। मेरै समय तो इतनी कंजूगी वरती गयी कि तीन-तीन महीने तक एक ही राग का घोटा लगता रहा और अब उसके सामने खजाना खोलकर रख दिया गया है। उम वेवकूफ को समेटने का भी शऊर नहीं था। कई बार कोई नाजुक-सी 1 • जगह उसकी पकड़ाई में नहीं आती तो पंडित जी हताश हो उठते। उसांस भर कहते, "जल्दी-जल्दी सोख लो बच्चों। अव ज्यादा समय नहीं रहा।" जिया के साथ गेहूं फटकती हुई मैं उस वंदिश को जस-का-तस यादकर लेती, पर मान किये बैठी रहती। गुरुअष्टमी की तैयारी जोरों पर थी। ने कहा, पंडित जी के शिष्यों में तो उत्साह होना स्वाभाविक ही था। पर उत्सव की शहर में भी बड़ी उत्सुक प्रतीक्षा रहती थी। इस अवसर पर होने वाली प्रतियोगिताओं का बड़ा आकर्षण था और रसिक लोग उन्हें सुनने के लिए अवश्य आते थे। उस दिन लड़के लोग वैठकर निर्णायकों के नामों पर विचार कर रहे थे। वादन प्रतियोगिता के नाम तय हो चुके थे। गायन के लिए भी नूतन कालेज की मिसेज कुमार और श्रीराम हाईस्कूल के श्रीखंडे सर की स्वीकृति मिल गयी थी। तीसरे निर्णायक की खोज हो रही थी। एकाएक पंडित जी "अपनी कनु को रख लो ना!" "मुझे ?" मैं चौक पड़ी। "क्यों ? क्या हर्ज है। बच्चे कैसा गा रहे हैं यही तो देखना है। मेरे खयाल से इतनी समझ तो तुम्हें है।" मैंने उस प्रस्ताव को आदेश मानकर स्वीकार कर लिया। और झूठ क्यों बोलूं, मन भीतर-ही-भीतर पुलकित हो उठा। जिस प्रतियोगिता में साल-दर-साल गाकर इनाम जीते हैं। उसमें जज बनकर बैठने का अपना ही आनंद है। पर मेरा यह आनंद अधिक देर तक न टिक सका। क्योंकि लड़कों के जाते ही पंडित जी बोले, "कनु, अच्छे से तैयारी कर लेना।" "क्यों ?" "आजकल निर्णायकों को गाना भी पड़ता है।" "क्यों ?" "बच्चे भी तो जानें कि उन्हें परखनेवाले कितने गहरे में हैं।" ८६ / राग-विराग
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. आकाशवाणी के कार्यक्रम में तो पंडित जी की याद नहीं आयी। बड़े-बड़े नाम गिना दिये पर सबसे पहले जिसने स्वर-ज्ञान कराया, उसका कहीं उल्लेख भी नहीं और यहां बड़ा नाटक हो रहा था। पर लाख कोसने के बावजूद मैं उसके गाने में मीन-मेख नहीं निकाल सकी। मारू विहाग गा रही थी वह–'जागूं मैं सारी रैन बलमा...' लगा जैसे प्रभा अन्ने को गले में उतार लिया हो। मेरे हाथ-पांव और फूल गये । मेरा नाम आया तो किसी तरह घिसट कर मैं नाइक के पास जा वैठी। आंख उठाकर किसी की तरफ देखा भी नहीं। प्रणव दासगुप्ता मेरा परिचय देते हुए बता रहा था-अभी-अभी कल्याणी दीदी एक भयंकर बीमारी से जूझ कर उठी हैं। हम सवका भाग्य ही है कि हमने उन्हें पा लिया। एक अरसे बाद वे फिर हमारे लिए अमृत वर्षा करने जा रही हैं। कहां का अमृत और कहां की वर्षा ? तानपूरा उठाते हुए भी हाथ कांप रहे थे। पड़ज लगाकर ज्यों ही आलाप भरना शुरू किया तो आवाज ऐसे थरथराने लगी जैसे किसी ने मुझे पूस की रात में वेतवा की धार में खड़ा कर दिया हो। जिस जाड़े के लिए सुबह से सिर पटककर रह गयी थी, वह अब मेरी फजीहत करने पर तुला हुआ था। अपनी उस असहाय अवस्था में पंडित जी पर इतनी कोफ्त हो आयी। अच्छा फंसा दिया था मुझे । मन-ही-मन उनसे कहा, "महाराज, आप ही की कृपा से यहां बैठी हूं। आप ही लाज रखिएगा। बदनामी होगी । नेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। विलकुल ही नहीं वन पड़ेगा तो वानंत्री को भैरवी बनाकर यहीं लुढ़क जाऊंगी। फिर आप निपटते रहिएगा।" और इसके बाद अपनी सारी शक्ति समेटकर मैंने गुहार लगायी : विनती सुनो मोरि अवधपुर के गुतैया मोरा तुम दिन कोऊ न और दुख को हरैया और आश्चर्य-मैं स्वयं अपने स्वर-लालित्य पर मुग्ध हो गयी। क्यों डर रही थी मैं ? मेरा कुछ भी तो नहीं बदला था। मेरी वही सबी हुई ८८ / राग-विराग । ।
आवाज थी, जो तार-मप्तक. को नीर की तरह बंधती चली गयी थी। वहीं कोई अवरोध नहीं, कोई फिसलन नहीं। अतरे में जर मन 'जानकीपति राम' को टेरा था तो कितनी सहजता से मध्यम को छू आयी थी। कार्यक्रम के बाद इतनी तालियां बजी कि लगा, तब तोन्ही अव म पुगी से जरूर बेहोश हो जाऊगी। श्री खडे सर ने हमेशा की तरह अपने भीमनी अंदाज में 'मी भजे हरि को गदा' गा दिया उन्हे याद ही न रहा कि आज पंडित जी भी गापेंगे। बेचारे हाथ जोटकर क्षमा मागने लगे। पडित जी हंसकर बोले, 'बैंग भैरवी के बाद गाने का विधान तो नहीं है । पर आज मैं गाऊगा। फिर कभी यह मौका मिस, न मिले।" पचहत्तर साल का वह यूढा तपस्वी तनी हुई चाल से स्टेज पर आया। श्रीखडे सर हारमोनियम लेकर विनीन मुद्रा में बैठ गये। मगीत विद्यालय के प्राचार्य तवला पकडने दौर गये। तानपूर के लिए तो जोर-मी मच गयी। स्टेज पर रखी हुई गुग प्रतिमा को शीश नवार पडिन जी मादक पर आये। श्रोताओ का अभिवादन करके उन्होंने गुरवंदना का एक प्रतीक मस्वर पढ़ा । जोगकोस को गुरायट थी यह । और फिर उसी राग ने मुर था भजन छोड़ दिया: मोसम फोन कुटिल पल कामी जैहि तन दियो ताहि विशारापो, ऐसो नमक हरामी। उसी दिन जान पायो कि अगर गायक समयं हो तो भैरवी के बाद भी समा बाध सकता है । मैंने मन-ही-मन उन्हे गत वार प्रणाम किया। अपने को बार-बार धिक्कारा कि नदी किनारे बैठकर भी मैं प्यामी रह गयी तो यह मेरा दुर्भाग्य ही तो है। नदी तो दोउकर मेरे पास आयेगी नहीं। अपना सारा अहंकार त्यागकर मुझे ही अजुरी फैलाकर उनके पास जाना पड़ेगा। - मैं फिर से गा सकती हू, यह अहसाम इतना सुभावना था, यह युगी इतनी अलौकिक थी कि उने दार-बार भोगने का काम होने लगा। इमीगा - में मैंने शिवरात्रि के रतजगे में एक घंटे का भजन का कार्यक्रम दे डाला। होली की दूज पर हर साल की तरह श्रीखंडे सर के घर महफिल जमी तो मैंने उसमें भी भाग लिया। मुहल्ले के राममंदिर में नवरात्रि के नौ दिन अखंड भजन-कीर्तन होता था। शादी से पहले दो-दो घंटे मैं अकेला पारकर लेती। इस बार भी मैंने सुबह पांच से सात का समय मांग लिया। मां एक दिन वोली, "कनु, तू यहां-वहां गाती फिर रही है। उन लोगों को पता चल जायेगा तो एक बहाना हो जायेगा।" "बहाने उनके पास और भी बहुत-से हैं मां। एक और सही। पांच साल मैं परदे में बैठकर रही, तब उन्होंने मुझे कौन-सा खिताब दे डाला? . मुद्दत के बाद खुशी के दो-चार क्षण मेरे हाथ लगे हैं । कृपा कर के उन्हें मत छीनो।" "कनु ठीक कह रही है," बड़े भैया बोले, "हम लोग कव तक उनकी परवाह करते रहेंगे ? और किसलिए? हमें तो वस, अब कनु की सेहत का ध्यान रखना है। जरा अपनी बेटी की तरफ गौर से देखो तो। जो काम बड़े-बड़े डॉक्टर न कर सके, वह गायन ने कर दिखाया है। मैं तो इस काम के लिए पंडित जी का आजन्म ऋणी रहूंगा।" भैया गलत नहीं कह रहे थे । इन दिनों सचमुच मेरे चेहरे की रंगत बदल गयी थी। आंखों में पुरानी चमक लौट आयी थी। आंखों के निचले गड्ढे भर गये थे । रंग सांवला ही सही पर उसमें अब पहले की सी स्निग्धता आ गयी थी। पिछले दिनों मुझे दर्पण से दहशत होने लगी थी। अब फिर उसके सामने देर तक बैठने का मन होने लगा। आत्म- विश्वास से भरपूर अपनी छवि पर मैं ही मुग्ध हो चली थी। चेहरे पर जो नयो रौनक, नयी ताजगी आ गयी थी, उसे बार-बार देखने का जी करता। दीन-दुनिया से मन हटाकर मैंने फिर से सीखना प्रारभ कर दिया था। संध्या से रश्क करने की अब कोई जरूरत नहीं रह गयी थीं। एक-से-एक दुर्लभ बंदिशें अब मुझे भी मिल रही थीं। मैं, सध्या, श्रीरंग, प्रणव चौवे जी, अरुणा, सियाराम-हम चार-पांच लोग ही तो थे, जिन्हे पडित जी बड़े विश्वास से अपनी धरोहर सौंप रहे थे। उनकी मुद्रा घर के किसी बड़े बुजुर्ग ६० / राग-विराग - यी-सी हो गयी थी जो अपने रहते ही जायदाद का बंटवारावर देना चाहता है। किसी अतष्टा की तरह ये इन दिनो बार-बार अपने अतिम समयका हवाला देते, जिसमें कभी तो सीज होनी थी और कभी मन पाप आता था) एक अरसे बाद जीवन में कुछ ठहराय आया था और में गंतुष्ट थी। स्मृति के कपाटों को बंद करना मैंने मीठ लिया था और व्ही मर गुग-गंगोप या रम्य था। पर मेरे अपने मेरी तरह निश्चित नहीं हो पाये थे। म दिन पाम गे लौटी तो घर में पाव देते ही भाभी ने कहा, "कनु. चाय पी लो तो जग मेरे वमरे में आ जाना।" "क्यों?" पर भाभी ने शायद मेरा प्रश्न मुना ही नहीं। मेरा फोनहन ही मुझे उनके कमरे तक ले गया। देगाव दोनोन चमारमी माध्यिा गोद में रंगे विचारमग्न बैठी हैं । मुझे देखते ही बोली, "कौन-मी पर्नेगी, बता दो तो जरा हलकी-मी प्रेम मार देगी।" मैं तो हैरान रह गयो, 'इतनी भारी माडी पहनाकर मुमे कहा मैत्र रही हो।" "शादी में" "किसी" "ये तो तुम्हारे भैया ही दना मरने हैं।" "भंया ?" में दनदनाती हुई दादर यानी पर एन महम पनी। हाइंगरूम मेंभया बोले नही थे, परिन नीटदरे पाम बाब म्बर को तार-मप्नक से स्थापित नीचे टवाने हा ना, "बार मुझे किनकी शादी में ले जा रहे हैं ना?" "रज्जी की मादी में-और करिन नहीं, हम ने रा रहे है।" पह यावासहित बीवीपी। मेरा रोम-रोम में मुखग दा! किरन मामा दिनप्री- हुए कहा, 'मैं नहीं जाऊंगी। मेरे पास निमन्त्रण नहीं हैं।" "अपने घर जाने के लिए भी तुम्हें निमंत्रण चाहिए ?" इस प्रश्न का एक तीखा-सा उत्तर मेरे होठों तक आया था पर पूछने- वाले का लिहाज कर के चुप रह गयी। पर अपना रोप से तमतमाया चेहरा लेकर वहां खड़े रहना भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं भीतर जाने को मुड़ी तो भैया ने पुकारा, "कनु सुनो।" उन लोगों की ओर पीठ दिये मैं वहीं खड़ी रह गयी। "पंडित जी शायद तुम्हें बताना नहीं चाहते । पर मैं सोचता हूं, तुम अव बच्ची नहीं हो । सच को झेल सकती हो।" "कह भी डालिए, जो कहना है।" "वे लोग मनोज की दीवारा शादी रचाने का प्लान बना रहे हैं। इसी- लिए उन्होंने सब जगह यह प्रचार कर रखा है कि तुम पागलपन की कगार पर हो । हम सब~यानी मैं, पंडित जी, मां, तुम्हारी भाभी-सव यही चाहते हैं कि शादी में आये सारे आमंत्रित नाते-रिश्तेदार तुम्हें देख लें ताकि उन्हें असलियत का पता चल जाये।" "और उसको वाद ?" मैंने एकदम पलटकर पूछ लिया तो भैया बगलें झांकने लगे। "उसके बाद तुम्हारा मन जो कहे, वही करना," पंडित जी ने कहा तो मैं एकदम फुफकार उठी, "और मेरा आत्मसम्मान ! क्या आपके निकट उसका कोई मूल्य नहीं है ?" "देखो बेटे,हर वात सीमा में अच्छी लगती है। मान अभिमान की दीवार अगर हद से ऊंची बैठ जाती है तो मिलने के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं । गृहस्थी कोई अखाड़ा नहीं है कि हर बार हार-जीत का ही विचार करती रहो । कभी-कभार हार भी मान लेनी चाहिए। अगर इससे तुम दोनों के वीच की खाई पट सकती है तो उससे तुम्हारा मान-भंग नहीं होगा। और फिर क्या सदा अपने लिए ही सोचती रहेगी? तुम्हारे सामने एक बच्ची भी तो है ? क्या मां के रहते वह अनाथ हो जाये ?" बच्ची के उल्लेख मात्र से मन कैसा-कैसा हो गया। अपने आंसू छिपाने के लिए मैंने चेहरा घुमा लिया तो भैया बोले, "इतना अभिमान अच्छा नहीं ६२ / राग-विराग है कनु । जरा सोचो तो, तुम्हारी भलाई के लिए पडित जी अपमान करवाने पर तुले हैं । निमंत्रण तो उनके पास भी नहीं है पर वे तुम्हारे साथ जा रहे . "मेरे अपमान की चिता रहने दो कपिल । तुम लोगों का जन्म भी नहीं हुआ था, तब से इस शहर में हूं। भरे मंडप मे किमी ने मेरी और मांग भी उठायी तो मेरे पचासो शिष्य पड़े हो जायेंगे। एक अध्यापक की यही तो पूंजी होती है । और एक इसी अधिकार से इनु को लिवाने माया हू । आदेश या अनुरोध-जो भी वह समझे, उसे मानना ही होगा। क्योंकि दोबारा यह सच वहन के लिए मैं नहीं आ पाऊंगा।" थोड़ी देर बाद पडित जी की बगल मे जब मैं तागे में जाकर बैठ गयी तो द यह सोचकर संतुष्ट हो गये कि उनरा थादेश मने मान लिया है। उतरा यह भ्रम मैंने नोडा भी नहीं। अगर जिया साथ होती तो समझ जाती किजिनका आदेश मने सिर-माये लिया है, वे पहित जी नहीं हैं, बल्कि मेरे भीतर की नारी है । अतीत की सारी पहवाहट निगलकर, अपना स्वा. भिमान ताक पर रखकर थातुर मन से जो चल पदी है-वह पडित जी को शिष्या नहीं है, श्वेता की मा है, मनोज की पत्नी है। यही एक छोटा-सा घर है जिसे उसने सपनो मे मजाया था। उसे दोबारा देखने को ललक ही उसे खीचकर लिये जा रही हैं। जिस उत्साह से गयी थी, लौटते समय मन उतना ही रोता था। यह वात नहीं कि वहा किमी ने मेरा कोई यपमान किया हो । उलट ऐसा अभूतपूर्व स्वागत तो ममुराल पी देहरी पर पहली बार हुआ। पहली वार मनुराल पक्ष के इतने सारे रिश्तेदारो से मेरा सामना हुआ था और उन लोगों ने मुझे हायोहाय लिया था। पडित जी के आदेश पर जाने रिस- किम के पैर छूकर मैंने ढेर सारे आशीर्वाद बटोर लिये थे। औरतें सिर्फ आगीयांद देकर ही सतुष्ट नहीं हुई, उन्होंने चिबुक उठाकर भर आप मुझे निहारा भी था। उन आखो में एक कौतूहल था जो धीरे-धीरे आश्चर्य और प्रशसा में बदल जाता था।
। भाभी की घंटे भर की मेहनत अकारथ नहीं गयी थी। वहन की शादी में रश्मि भी सपरिवार आयी थी। उससे मेरी यह पहली ही भेंट थी। वह मुझ से कटी-कटी ही रही पर उसकी सास ने पास विठाकर मुझ पर ढेर सारा प्यार उड़ेल दिया। वार-बार कहती रहीं, "हाय, कैसा सलोना रूप है ! एक रंग जरा दवा हुआ है तो क्या हुआ ?" यही नहीं, उन्होंने खास तौर से बेटे को बुलवाकर मुझसे परिचय भी करवाया। वह भला आदमी तो अपना विस्मय भी छुपा न सका । छूटते ही बोला, "भाभी जी ! आपने तो हमें चौंका ही दिया । हमने तो पता नहीं क्या-क्या सुन रखा था।" पंडित जी ने जाते ही एलान कर दिया था कि बहू केवल कन्यादान का पुण्य लूटने आयी है । सुनकर महिला मंडल गद्गद् हो गया था। केवल अम्मा जी ने मुंह विचका दिया था। वुददुदायी भी थीं कि "विना बुलाये तो हम भगवान के घर भी न जैहैं।" पर इससे ज्यादा प्रकट रूप से वे कुछ नहीं कह सकीं। रजनी से मेरा ननद भौजाईवाला मधुर रिश्ता कभी जुड़ा ही नहीं। अपनी वधाई के उत्तर में मैंने एक सलज्ज मुस्कान की अपेक्षा भर की थी। पर उससे इतना भी न हुआ। उलटे वह और सिमट-सिकुड़कर बैठ गयी। बड़ी देर बाद मुझे ध्यान आया कि वह साड़ी में अपने कंगन छुपाने का यत्न कर रही है । मैं तो उन कंगनों की वात एकदम भूल ही गयी थी। ये जड़ाऊं गन मुझे मां ने श्वेता के जन्म पर दिये थे। इस बीच मेरा इतना कुछ छिन या था कि उसके आगे इन कंगनों की विसात ही क्या थी? मुझे निराश किया तो उन दोनों ने, जिनके लिए मैं भागी-भागी वहां पी थी। बुआ की शादी के लिए सजी-धजी श्वेता की झलक बस एक बार ली थी। तब उसे गोद में खींचकर प्यार करने का मन हुआ था। पर वह स्फारित नेत्रों से मुझे देखती भर रही। उन आंखों में मैं परिचय की क्षीण IT भी पा जाती तो उसके सहारे अपनी बेटी तक पहुंच जाती। पर उसका मल अंतस ठोंक-पीटकर किसी अलग सांचे में ढाल दिया गया हो जैसे। उसके बाद पता नहीं उसे किस तहखाने में छुपा दिया गया। मैं दोबारा की छाया भी नहीं देख पायी। | राग-विराग दन्होंने मुझे ठीक कन्यादान के समय ही देखा और बुरी तरह चौक पड़े। उन आंखों में केवल विस्मय ही होता तो कोई बात नहीं थी, पर वहां ग्रीज थी, रोप था वेजारी थी। और कन्यादान करते समय उन हाथो का वह भावेगहीन ठंडा, बेजान स्पर्श ! उसके याद तो जैसे कुछ सोचने के लिए वाकी ही नहीं रहा। पति के मन की तह तक जाने के लिए नारी को शब्दों की सीडी की जरूरत नहीं पड़ती । स्पर्श की भापा वह खूब समझती है। लौटते समय पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला। तागे से उतरते हुए मैंने पंडित जी मे पैर छूकर कहा, "आपको आना थी इसीलिए मैंने अपना सारा मान त्यागकर संधि का हाथ बढ़ाया था। अव दीवारा तभी जाऊंगी जव वहा से बुलावा आयेगा। मेरा इतना अधिकार तो आप मानेंगे ना।" उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। उनके चेहरे पर टका विपाद ही बता रहा था कि उनके सारे उत्तर शेप हो चुके हैं।
६ . उस दिन सोचा भी न था कि पंडित जी को मैं आखिरी वार देख रही हूं। मृत्यु की पूर्वसूचना उन्हें मिल चुकी थी। कई बार उन्होंने इस ओर संकेत भी किया था। पर हम लोग नहीं चेते। इसीलिए यह दारुण समाचार सुनते ही दिल दहल गया । जैसे बैठी थी, वैसे ही काळ होकर रह गयी। उनके अंतिम दर्शनों का सौभाग्य भी मुझे नहीं मिल सका। क्योंकि जब तक मैं होश में आयी, सब कुछ निपट गया था। बाद में भी मुझे वहां किसी ने जाने नहीं दिया। मां, भैया दो-चार वार हो आये थे। उनसे बार-बार पूछने का मन करता पर वह विपय ही जैसे घर में वजित कर दिया था। अपने विस्तर पर लेटी मैं पुरानी यादों को दोहराती रहती । रज्जो की शादी के बाद मैं एक तरह से मुंह फुला- कर बैठ गयी थी। अपनी अवमानना का सारा दोप मैंने उनके सिर मढ़ दिया था। अब उस विषय में सोचती तो अपने को धन्यवाद ही देती कि मैंने उनके अतिम आदेश की अवहेलना नहीं की। नहीं तो शायद जीवन भर अपने को क्षमा नहीं कर पाती। मेरी तवीयत जरा संभलते ही मां मुझे लेकर सुनील भैया के पास बंबई चलो आयीं। इस बार उन्होंने निमंत्रण की राह नहीं देखी। उन लोगों ने भी इस बार वहुत सौजन्य वरता । भैया ने तो यहां तक कहा कि कनु यदि तुम्हें मशीनी जिंदगी रास आती हो तो यहीं रह जाओ। मैं तुम्हारे स्थानां- तरण की व्यवस्था कर दूंगा। ६६ / राग-विराग - पर सुनील भया की सदागपता का लाभ नहीं उठाया 1 पर लौटकर फिर अपनी स्टीन जिदगी शुरू कर दी थी। पर यव उसमें एक बहुत बड़ा गूच भर गया था और उगने उपरने का कोई उपाय नहीं मूझ रहा था। भैया-भाभी अलग परेशान थे। पर में फिर पहले का-मा निरानंद वातावरण छा गया या। उन दिन जिद करके मैया-भाभी मुझे पिक्चर ले गये।हम लोग ऑटो से उतरे ही थे कि सामने श्रीरंग दिखाई दिया। "श्री!" मैंने आवाज दी। वह चीज, आवाज का अनुसरण कर उसने मुझे देखा और एक औप- चारिफ मी नमस्ते करके मुह फेर लिया। "श्री" मैं भीड को चीरती उसके पास पट्टच गनी-"चतो, आओ, पिक्चर देखेंगे।" "सुत्रिया", उसने रखाई से कहा, "पर इस समय फुरसत नहीं है।" "क्यों ? अब इतनी रात गये कौन-मा काम पर रहे हो?" "जिया के पास सोने जा रहा है।" "जिया ! जिया क्या यही है अभी?" "कहा जायेंगी?" "नहीं-मेरा मतलब है ? मैंने सोचा था।" "आप एक दार आकर देख तो सकती थी।" "श्री, दरअसल उस दिन मुझे इतना शाक लगा था -इसीलिए शायद घर पर सबने मुझसे झूठ-मूठ ही कह दिया होगा कि जिया यहा नही यह मुंह फेरकर एकदम चल पड़ा। "श्री, सुनो तो..." "क्या है ?" उन दो शब्दों में उसने अपना मारा रोप उडेल दिया था। मुझमे जवाब देते नहीं बना। "दीदी, एक बात बताइए। क्या आपका दुए जिया के दुर बड़ा था? फिर उसका इतना होवा यो बनाया जा रहा है ?"
उसकी यह बात हथौड़े की तरह सारी रात मेरे मस्तिष्क पर चोट करती रही। - दसरे दिन मैंने घर पर बताया भी नहीं। बैंक के बहाने घर से निकली और सीधे वहीं पहुंच गयी। दरवाजा हमेशा की तरह खुला था पर अब वहां संगीत की अनुगूंज नहीं थी । सारा माहौल भांय-भांय कर रहा था। ठंडी जमीन पर चटाई विछाकर जिया लेटी थीं। उन्हें वेवक्त इस तरह लेटे देखकर ही जाने कैसा लगा। "जिया !" मैंने हौले से पुकारा । मैंने जैसे भरे घड़े को छू दिया। मेरी ओर देखे विना ही वह झरझर वह चलों । उनका वह करुण विलाप सुनकर दिल दहल गया । लगा कि मैं अव गिरी कि अव गिरी। पर कहीं अवचेतन में खड़े होकर श्री जैसे आंखें दिखा रहा था, 'क्या आपका दुख जिया के दुख से भी बड़ा है !' उसी के डर से मन को मजबूती से थामे रही, विखरने नहीं दिया। रुलाई का आवेश जव कुछ थमा तो जिया ने उलाहना दिया, "भाग में बाल-बच्चा ना हते। ऊको हमने एक बार मलाल न कियो। तुम्हाए पंडज्जी कहत हते कि औरन के तो दो-चार होते हैं। तुम्हाए लानें तो मैं पूरी फौज छोड़ जाऊंगा । वैठे-बैठे खूव सेवा करवाइयो । पर उनकी माया उनई के साथ चली गयी । अब तो कोऊ मडैया में झंपत नैया। एक सिरी आउत है के एक नौवे जी आत हैं "तुम्हें भी तो अव फुरसत भई है।" "जिया मैंने सोचा था कि आप घर चली गयी होंगी।" "घर अब हमारे लाने उते ठौर कहां है लली। गठरी भर माया होती पास में तो हर कोऊ लिवा जातो। चूंछी को को राखंगो ?" "क्या उमेश भैया ने भी कुछ नहीं कहा ? वे तो आपको कितना मानते थे? आप लोगों ने भी उनके लिए कितना कुछ किया है।" "उमेश तो बोले थे कि काकी, इत अकेली ना रही। हमारे संग चली चलो। पर वहू बोलीं कि घर हमाओ छोटो है । ई कवाड़ ऊ में न समैहे। १८ ! राग-विराग उनकी मसा हवी कि हम सब वेंच-बांच ~और विना, ये चदै पी हमाइ हिम्मत ना पड़ी।" मैंने उस 'कवाई को देखा। पाच वानरे, दो हारमोनियम, एक भजनवाली तंदूरी एक दोनक, तवजे की ३-४ जोड़ियां, एक मितार भी पा जो कभी कोई शोक मे वग नेता था। उनंग की नजरो में मह सब कदाई या योंकि वे नहीं जानते थे कि पंडित जी ने कितने कष्टों से, जीवट से ये सान जुटाये थे। कई वार किमी अच्छे नग के लिए जिया ने अपना बेवर तक उतारकर दिया है। तव जाकर यह सरंवाम जुटा है। रमेश की बहू क्या जाने कि इनमें पंडित जी के प्राग बसते थे। मंदिर में रघुनाप जो को मेवा तो उनकी आजीविका यी। पर उनके पटास्यान तो यही माजपे। रोज सवेरे स्नान-संध्या के बाद वे गुरु महाराज को प्रणाम करते थे, उसी तरह इन्हें भी मत्था टेकते थे। जिया इन माजी को कैसे बेच दें। बच्चों की तरह इनकी साज-सभाल क्या इमीलिए करती रही हैं कि किमी दिन इन्हें कबाड़ी के हाप बेच दें। पहित जी इन्हें पूजते थे, बरतते थे पर रख-रखाव तो जिया के ही जिम्मे "नहीं जियाये चीजें नहीं विकगो फिर कभी कोई ऐमी बात कहे तो उमे हमारे पास भेज देना । हम निपट लेंगे। वहां से आने के बाद भी जिया मेरे मन मस्तिष्क पर छापी रहीं। बातें तो मैं बहुत लंबी-चौड़ीकर के आ गयी थी। पर उनमे किमी का घर पोहे ही चलता है। जिया के भविष्य का बुछ तो फैमला करना ही या । मबसे पहले मैं सेठ जी से जाकर मिली। वे वेचारे वडे सम्जन निकले। बोले, "वे मेरे पिता को गुस्माता है । मेरे लिए भी मां के समान हैं। वे बाजीवन यहा माराम मे रह सकती हैं। हम से जो मेवा बन पडेगी, हम करेंगे । वैसे तीज-त्योहारो पर सीधा-सामयी पहले की ही तरह पहुंचती रहेगी। फिर मैंने भैया को महायता से उनके लिए पेंशन फार्म भरा दौड- धूप पीसारी जिम्मेदारी भी भया पर डाल दी। इसके बाद मार गिप्पा , समुदाय ने आपस में मिल-बैठकर समय वांध लिया। हर अपनी-अपनी सुविधानुसार जिया के पास घड़ी-दो घड़ी बैठने लगा। मैं जव भी जाती, कुछ फल-फूल लेकर जाती। कभी भूख का बहाना- कर वही कुछ बना लेती, जिया को भी जबरदस्ती खिला देती। वे अकसर खीज उठतीं, 'हमें रोज-रोज पाप में काहे ढकेलती हो विना! विटिया की कमाई अव हम न खैहें।" मैं तुम्हारी बहू हूं जिया, इसी नाते सेवा कर रही हूं। तुम्हें सोच करने की जरूरत नहीं है।" 'बहू' शब्द सुनते ही उनकी त्योरी चढ़ जाती। वे वहन को, उसके बेटे को बुरी तरह कोसने लगतीं। पहले उस घर में जाते हुए मन में एक उमंग-सी होती थी। पर अब तो जैसे एक कर्तव्य-सा निभा रहे थे हम लोग। धीरे-धीरे एक ऊव-सी हम लोगों पर छाने लगी। अपनी-अपनी आपा- धापी में व्यस्त लोगों को एक एकाकी, दुखिया नारी के पास घंटे-दो-घंटे वैठना भार-सा लगने लगा। इस एकरसता को तोड़ने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। उस दिन भी अपने को किसी तरह ठेल-ठालकर मैं वहां तक ले गयी थी। उढ़के हुए दरवाजे में धीरे से मुंह डालकर भीतर का जायजा लेना चाहा तो जो दृश्य देखा, उससे स्तब्ध रह गयी। एक हारमोनियम पर औंधी पड़कर जिया बिलख-विलखकर रो रही थीं। मैं एकदम घवरा गयी। कहीं ये उमेश महाशय फिर से तो नहीं आ गये। "जिया ! क्या हुआ है तुम्हें ? क्यों रो रही हो?" अपना अश्रुसिक्त चेहरा ऊपर उठाकर उन्होंने मुझे देखा और भीगे स्वर में बोली, "गावे वारे तो चले गये लली, अब तो रोयवेवाले ही बचे हैं।" और वे फिर बिलख उठीं। बड़ी मुश्किल से उन्हें शांत किया जा सका। फिर धीरे-धीरे उन्होंने अपनी व्यथा-कथा सुनायी। १०० / राग-विराग घर में भागे हुए सड़के को पाचा, ताऊ बड़ी मुश्किल मे पकड़कर लाये थे। गाने-बजाने मे उमा ध्यान हटाने के लिए तुरत-फुरत उमकी मादी भी कर दी थी। पर नयी-नवेली किशोरी दुलहन को पहली ही भेट में उम अक्ड़ गये ने धमकी दे दी, "मेरे साथ रहना हो तो मेरे शौक से निवाह करना पड़ेगा। नहीं तो तुम अपने बाप के घर व चुनी जा सकती हो। मैं कभी लिवाने नही आऊंगा।" क्या करती बेचारी, हारकर समझौता करना ही पड़ा। पति के इस शोक को सिंदूर की तरह मांग में धारण करना ही पडा। मां-बाप, माम- समुर मव नाराज कि अगर पति यो रास्ते पर नहीं ला सको तो फिर यह रूपगुण कित काम का? पर गौरा मंगा की तरह वह सबकी बुरी बन गयी पर अपने भोले बाबा का साप नहीं छोड़ा। जहा ले गये, गयीं; जिस हाल में रखा, रही, अपनी कहानी शेप करते हुए बोली. "हम कैसेऊ रहे मार्ग बिन्ना पर हमाई मडया कयह मूनी ना रही। पर अब तो ये मुन्नकार करके चले गये।" जिया फिर सिसकने लगी। मैं हैरान होकर उन्हें देखती रह गयी। यह अनपढ महिला जिसे अकसर में वेमुरी कहा करती थी अतरतम तक स्वर. गंगा में नहायी हुई है। यह सगीत पार्श्वसंगीत की तरह उसकी गृहस्यो में पंठ गया था। उनी की लय पर पे अमानुपी कौशल मे घटों का काम मिनटो मे निपटाती रही हैं। पति क्या गये, इसका तो जीवन-मगीत ही यम गया। "जिया तुमने गाना श्यों नही सोया?" "और पाना को बनाती?" "अगर गाना सीखी होती तो आज तुम्हारा ये सूनापन भर जाता।" "जो सीखे हैं, वे कौन सो कमाल कर रहे हैं। दो महीना हो गये कोऊ धूर तातो घटकारी नैया।" मैंने फिर उन्हें बोलने न दिया। फटाफट सारे गिलाफ उतार डाले। मैं उन्हें लेकर पिछवाड़े नल पर चली गयी तो जिया पीछे ने सावुन लेकर आ पहुंचा। दोनों ने मिलकर मल की परतें वहा दी और उन्हें पागन में रम्मी पर डाल दिया। फिर मैं झाडू लेकर भीतर आयी-दरी, फणं, सबको मटकारकर फिर से विधाया, उन पर घुली चादर बिछायो। फिर बेतरतीय . ।
- पड़े साजों को करीन से रखा। काली और पीली नक्काशीवाला मेरा तानपूरा छूते ही मुझसे लिपट गया। उसे गोद में लिटाकर मैंने साड़ी का छोर उंगली में लपेटकर उसकी गर्द पोंछ डाली। यहां-वहां जरा भी हाथ छू जाता तो उसके तार वेसुरी आवाज में शिकायत कर बैठते । अपने प्रिय साज का वह वेसुरापन मुझसे सहा नहीं गया। तारों को ठीक से कसकर दो-चार वार उंगली फेरी तो कमरा एक गूंज से भर उठा । मेरा मन आह्लाद में नहा गया। उसके बाद अपने पर वश ही न रहा। क्षितिज पर सिंदूरी सांझ उतर रही थी। मैंने पूरिया में आलाप भरना प्रारंभ किया । अपनी आवाज पर जैसे मैं स्वयं ही मुग्ध हो गयी। कितनी देर तक गाती रही, पता ही नहीं चला। अंतस में जमा हुना बहुत कुछ जैसे पिघलता जा रहा था। गाना समाप्त कर तानपूरा रखते हुए घड़ी देखी तो उसमें आठ बज रहे थे। जिया को टेरने भीतर गयी तो पीतल के डिब्बों की चमचमाती कतार से आंखें चौंधिया गयीं। जिया की जगर-मगर गृहस्थी के ये डिब्बे एक अहम हिस्सा हुआ करते थे। इस समय जिया उन्हें पोंछकर करीने से लगा रही थीं। उनमें रखा सामान थालियों में उलटा हुआ था। कई चीजों में तो जाले पड़ गये थे। "देख तो लली, सब नास हो गओ।" "जिया, तुम्हारा लंगूर नहीं आया आज! मुझे जरा घर तक छोड़ देता । बहुत देर हो गयी आज !" "आपने बुलाया और हम चले आये," वह आंधी की तरह प्रविष्ट होता हुआ वोला, "देखिए, नाम लेते ही हाजिर हो गया हूं।" "नाम लेते ही जो हाजिर हो जाता है, उसे क्या कहते हैं, जानते हो?" "जानता हूं। मैं भी किस..." और वह एकाएक ठिठककर चुप हो गया, "दीदी, घर आज कितना भरा-भरा लग रहा है।" "आज जरा झाड़-पोंछकर चमका दिया है न ! इसी से।" "नहीं-वह वात नहीं है। सच बात कहूं ! मुझे यहां सुरों की महक आ रही है।" - - १०२ / राग-विराग "अरे, वाह कविराज, तबला बजाते-बजाते ये शायरी कब से शुरू कर "मजाक नहीं कर रहा दीदी। सच, रोज यह घर जैसे फाट खाने को दौडता था। बाज लग रहा है जैसे गुरु जी..." "धत, अभी मैं थोड़ा-सा गा रही थी। वस।" "अच्छा !" उसने आश्चर्य में भरकर मुझे देखा, "तब तो आज आपको नहीं छोडूंगा। बहुत दिनो से हाथ साफ करने का मौका नहीं मिला है। घलिए।" । मैं मना करती रह गयी पर वह जिद पर अड़ गया। मेरे पास तानपूरा रखकर तबले की जोड़ी और हपौड़ी उठा लाया। उसका वह वालमुलम उस्माह देखकर मना भी करते नहीं बना । उसके मन में भी मेरी तरह एक वर्फ की सिल जम गयी होगी। अभी-अभी गा चुकी थी। दोबारा गाने की जरा भी इच्छा नही थी। उनका मन रखने के लिए यो ही बिहाग को एक चीज गुनगुना दी। पर यह तो पूरे मूड में था। उसने पहले यालाप से ही अपना जौहर दिखाना गुरू कर दिया। मैं थोड़ा अन्यमनस्क पी। एकाध बार गोता भी खा गयी। पर फिर एकदम समलकर बैठना पड़ा। श्री की नीयत साफ नहीं थी। यह पारारत पर उतर आया था। मैंने भी फिर पैतरा बदला । वह पीज समाप्त करके फहा, "लो, अब एक टप्पा मुनो।" और उसे संभलने का मौका दिये बगैर ही शुरू हो गयी। टप्पा गायन वैसे मुझे कभी प्रभावित नहीं कर सका। हमेशा लगता कि स्वरी की कलावाजी हो रही है । पर पंडित जी के सामने यह सब कहने का साहम नहीं था, अतः सीखना ही पड़ा। खमाज की यह मुश्किल बंदिश सिखाते हुए पडित जी ने खास तौर पर कहा था-"अगर तवलची ज्यादा पो-चपढ़ करने लगे तो यह उसके मुह पर दे मारना। भागता नजर पायेगा।" ठीक वही हुआ। पांच मिनट तक तो वह सम के लिए ही हाथ-पांव मारता रहा। चीज का मुखडा ही उसकी पकडाई में नही आ रहा था। फिर जरा उसमें गति आयी तो मैंने टप्पा समाप्त कर चद्रकौंस में एक तराना प्रारंभ कर दिया---एकदम सुपरफास्ट स्पीड से। बेचारा पसीने-पसीने हो गया। कोई चालीस मिनट बाद मैंने तानपूरा नीचे रखा तो पसीना पोंछते हुए बोला, "वाह दीदी, मजा आ गया।" बच्चू हमें छकाने चले थे। जानते नहीं कि जिस गुरु का गंडा वांधे हो, उन्हीं से हम भी सीखे हैं । और तुमसे बहुत पहले से सीख रहे हैं । कानों पर हाथ रखकर वह मेरे पैरों में लोट गया। "ये क्या कह रही हैं दीदी, मैं आपकी परीक्षा लूंगा? राम-राम !" "फिर शैतानी क्यों कर रहे थे?" "वह तो बस, जरा जायका बदल रहा था।" "मतलव ?" "कल एक गजलों की महफिल में बजाने चला गया था । आप तो जानती हैं, आजकल गजल का चलन है। जहां-तहां गजल गायकों की बाढ़ आयी हुई है । ठीक से कल की देवी जी~-वाह क्या चीज थीं! न तलफ्फुज ठीक था, न आवाज ! और मुर ऐसा पक्का कि हारमोनियमवाला रो-रो. दिया। और हाजमा इतना दुरुस्त कि हर अंतरे के बाद एक माना डकार जाती थीं।" "लोगों ने हूट नहीं किया ?" "कोई हूट कैसे करता । उन्हीं के घर में बैठकर उन्हीं के चाय-समोसों पर सव हाथ साफ कर रहे थे। वे और वहां सुरताल की समझ थी ही किसे ?" "और ऐसी बेसरी महफिल में तुम क्यों चले गये थे?" मैंने किंचित रोपने "थे पापी पेट है न दीदी, हर कहीं ले जाता है।" "ये पेट बीच में कहां से टपक पड़ा ?" "एक्जेक्टली पेट नहीं दीदी, क्योंकि उसमें दाना-पानी तो वहन डाल ही देती है । पर और भी तो खर्चे हैं। मसलन "और उन खों के लिए तुम मिरासियों की तरह कहीं भी पहुंच जाओगे?" मुझे एकदम ताव आ गया था, "अपनी इज्जत का तो तुम्हें । पूजा , १०४ / राग-विराग ययाल है ही नहीं। पर उस महात्मा का अपमान क्यों करते हो जिसने तुम्हे अपनी कठोर साधना से अजित विद्या दी है ? तुम्हारे ये करतब देखकर उनकी आत्मा बड़ा सुख पा रही होगी न? दूमरे खर्चे हैं तो क्या हमसे कहते शर्म आती है ? आगे से खवरदार जो ऐसी-वैसी जगह गये। कान पकड़कर यही से पीच लाऊगी-समझे ?" मेरी वमयारी से थी पहले तो चकित और फिर रासा हो आया। गर्जन-तर्जन सुनकर जिया भी हाथ का काम छोड़कर उठ आयी थी। उन्हें तो आश्चर्य हो ही रहा था, मैं खुद हैरान थी। ये किस अधिकार से इतना सय कह गरी में कौन कहलवा गया? और श्री ने भी सिर झुकाकर सब कुछ सुन क्यो लिया ? पलटकर जवाव क्यों नहीं दिया? उसके भले-बुरे की जिम्मेदारी अचानक मैंने अपने ऊपर क्यों ओढ ली? किसका आदेश या वह? .
१० । । सवेरे-सवेरे संध्या को अपने घर देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। "क्यों री, शादी का कार्ड देने आयी है क्या ?" "नहीं दीदी," उसने मेरे पैर छूकर कहा, "आज शाम युववाणी में गा रही हूं। रेडियो पर पहला प्रोग्राम है न, इसलिए किसी का आशीर्वाद लेने का मन हो आया। जिया के पास जाने की तो हिम्मत नहीं पड़ी; आपके पास दौड़ी चली आयी। फिर दोपहर में तो आप काम पर चली जायेंगी।" मैं किसी को आशीर्वाद देने लायक कब से हो गयी? पर अनायास मिला यह बड़प्पन बड़ा अच्छा लगा। मैंने समय अच्छे से नोट कर लिया। बैंक में पहुंचते ही माथुर से कह दिया कि शाम को लौटते समय तुम्हारे यहां रुकुंगी। मुझे एक जरूरी प्रसारण सुनना है । घर पहुंचते वहुत देर हो जायेगी। हम लोग एकदम समय पर ही पहुंच पाये थे। जैसे ही माथुर ने रेडियो आन किया बचकानी आवाज में उद्घोषणा सुनाई दी-उभरते कलाकारों - पर नहीं, वह मे हिंडोने पर मननै हुए गा रही पी। पीर की धुनी सो 'ना गोतोशाम' । चीज का मुमा ही तीन-तीन मायनों से शुरू होता पा। और इससे तोग से 'सा' भी नहीं लग रहा था। वह तो नर्वस हो ही रही पो, मेरे हापसाव फम गरे। टीर से गा महको ! पहला ही कायंत्रम पोपट हो गया तो दोबारा कोई बुमावैगा भी? वाहर मह उड़ेगी सो अलग। मैंने अपनी सारी शक्ति बटोरकर उसके लिए प्राधना शुरू कर दी। कार्यक्रम समाप्त होने तक मैं इतना एक गमी, मे कहीं घंटा-दो-यंटा गाकर उटी हूं। "अच्छा गामा न?" मापुर की पत्नी ने पाप का कप पकड़ाते हुए पूछा। "दरअमल धाय तो वो देर की पन गयी थी," मापुर घोसा, "पर आप इतना तन्मय हो गयी थी कि डिस्ट करने का मन नहीं हमा। उन दोनों को धन्यवाद देकर मैं सोधे मध्या के पर पहुंची। उसे कस कर डांट लगाने की इन्ठा हो रही थी। वह दरवाजे पर ही मिल गयी। अभी-अभी सौटी पी। मुझे देखते ही उरमुक होकर पूछा, दीदी?" उसका यह आकुत स्वर सुनकर मारा रोप पिपस गया। पार से उसकी पीठ पपपपाते हुए मैंने कहा, "तना नवंस क्यों हो रही पी? पहली बार गा रही थी ?" "रेडियो पर तो पहली बार ही था न दीदी! इतना र मग रहा था। गुरू के दो-तीन मिनट तो आवाज काप ही रही थी। फिर एकदम हिम्मत मा गयी । लगा, जैसे कोई हाय पकडकर मुमे अंतरे तक ले जा रहा है... बाद में तो अच्छा रहा पान।" मेरी आखों में आंसू आ गये। उस महफिस की याद आ गपी, जब मैंने बीमारी के बाद पहली बार गाया था। उस दिन भी तानपूरा उठाते हुए मैं और मेरी आवाज इमी तरह काप रही थी। उग रामम परित जी को कितना कोसा था मैंने ! पर याद मे सब ठीक हो गया था। उस दिन क्या पंडित जी ने ही आकर मेरा साहस बढ़ामा था? सहारा देकर मुमे गतप्प तक पहचाया था? क्या मेरीणातिर वे भी यंत्रमा के, प्रार्थना के उस "कैसा रहा से गुजरे थे? मेरे आंसुओं का संध्या ने कुछ और ही अर्थ निकाला । बोली, “महीनों से रियाज नहीं है दीदी । घर पर कर लेती हूं वस, उतना ही । कोई बताने- वाला भी तो नहीं है।" " .. संध्या की बात से विचारों को एक नयी दिशा मिली। दूसरे ही दिन मैं श्रीखंडे सर से मिली, "सर, क्या. शाम को दो घंटे का समय दे सकेंगे? रोज न सही, हफ्ते में एक बार, दो बार।" "किसलिए?" "हम लोगों को गाइड करनेवाला अब कोई नहीं है सर। आपसे थोड़ा 'दिशा-निर्देश मिल जाता। वे एकदम कानों पर हाथ रखते हुए बोले, "क्या वात . कर रही हो कल्याणी ! उस आसन पर बैठने की पात्रता मुझमें नहीं है ।" "गुरु की हैसियत से न सही, बड़े भाई की हैसियत से ही आप हमारा मार्गदर्शन करते रहिएगा।" "साल भर ठहर जाओ। अगले साल रिटायर हो रहा हूं। उसके बाद कुछ-न-कुछ तो करना ही है । तब हम गुरु जी के नाम पर एक स्कूल खोल लेंगे । उनके इतने सारे शिष्य विखरे पड़े हैं । फंड्स मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी।" "लेकिन जो लोग अव तक सीखते रहे हैं, उनका क्या होगा? साल भर में तो वे रियाज करना भी भूल जायेंगे।" "उन लोगों के लिए तो तुम हो ही! अपनी योग्यता को इतना कम क्यों आंकती हो ? साल भर तक इस काम को खींच ले जाने की माद्दा तुम- में जरूर है।" मैंने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उनका आभार मानकर उठने लगी तो बोले, "एक मिनट रुको कल्याणी। एक जरूरी बात कहनी . . मैं वापस बैठ गयी। १०८ / राग-विराग "ये जो धीरंग है न, बड़ा टलटेड सहमा है।" "जी हां, वह तो है।" "लेकिन उसका टैलेंट सिर्फ पूजा-पाठ में एचं हो, यह अच्छा नहीं लगता।" "पूजा-पाठ में? मतलव ?" "मतलय आजकल रघुनाय जी की पूजा-आरती यही कर रहा है।" "क्या कह रहे हैं ?" "सच कह रहा हू । उस दिन जिया से मिलने चला गया था। तब देश पा। एकदम गुरु जी की तरह रेशमी धोती पहनकर आरती करता है । मैंने टोता तो बोला-ब्राह्मण का लडका है। पूजा-पाठ तो मेरा धर्म है।" "लेकिन सर, हर काम की एक उन्न होती है।" "ठीक यही तो मैंने भी कहा था। बल्कि मैं तो उमे पैरागढ़ अपने एक मित के पास भेजना चाहता हूं। इस हीरे को यही चमका सकता है। पर उसने साफ मना कर दिया। बोला-एक तो मैं इतना पचं नहीं उठा सकता। दूसरे मैं जिया को अकेले नही छोड सकता।" कुछ देर तक मैं सुन्न होकर बैठी रही। फिर उठते हुए मैंने कहा, "सर, आप अपने खेरागढवाले मिन्न से अवश्य बात कीजिए। श्री अवश्य जाएगा। उसका खर्च में दूगी।" "तुम?" सर आश्चर्य से मेरा मुह ताक रहे थे। - जिया ने सुना तो बच्चो की तरह मचल गयी, "हम यहे देत हैं, सिरी कतहुं न हें । ऊके आसरे तो हम इते बने हैं। नहीं तो अपने पर न चले जाते !" जिया का अपना घर यदि कही था तो इन्ही दो कमरों में, यह में अच्छी तरह जानती थी। फिर भी मैंने उन्हें समझाते हुए कहा, "निया, तुम अच्छी तरह जानती हो कि तुम मना कर दोगी तो श्री नहीं जाएगा पर क्या तुम चाहती हो कि इतना अच्छा मौका हाप से निकल जाये और जिदगी भर मंदिर में घण्टी बजाता रहे।"
"तो भेज दो, हमें काय पूंछन लगीं? पराये लरिका पे हमाओ का जोर है ? अपनो जायो होतो तो का अकेली छोड़ के चलो जातो?" वे तमक कर बोलीं। मुझे भी ताव आ गया, "अपना जाया होता तो तुम रोकती भी नहीं। उलटे खुश होती कि उसकी तरक्की का रास्ता खुल गया है।" वे एकदम आंखों में पल्ला लगाकर सुबकने लगीं, "हमाई खुशी तो लली उनई के साथ चली गयी। न वे हमें इकली कर जाते न हम तुम और- न के निहोरे करते।" "किसने कहा जिया कि तुम अकेली हो! उसका भी इन्तजाम कर दिया है। शाम को नया किरायेदार आ रहा है । बगलवाली कोठरी खाली करके रख देना, किराये की शर्त भी तय कर लेना।" "अरे, हम न लैंहे किराया-उराया । उलटे उनको रोटी-पानी बना देहैं। बस, आदमी परख कर रखियो। लुच्चे-लफंगे को हम झंपन न देहें।" "तुम अपनी आंखों से देखकर परख लेना । वस !" बैंक से लौटकर मैंने अपना सामान अटैची में लूंसा और भैया-भाभी के चरण छूकर कहा, "आशीर्वाद दीजिए, अपने घर जा रही हूं वे दोनों अचकचा गये, "ये एकदम क्या सूझा तुम्हें ?" "कभी-न-कभी तो जाना ही था।" "बुलावा आया है क्या ?" "उसके इंतजार में तो बूढ़ी हो जाऊंगी।" "कम-से-कम मां को तो आ जाने दिया होता।" "इसीलिए तो अभी जा रही हूं। मां होती तो शायद मोह इतनी आसानी से भैया एकदम कपड़े पहनकर तैयार हो गये। "जव जा रही हो तो रोदूंगा नहीं। पर अकेले नहीं जाने दूंगा। मुझे उन राक्षसों का भरोसा नहीं है।" "वे लोग मुझे खा थोड़े ही जायेंगे और अगर अपमान होना ही है तो छूटता नहीं।" ११० / राग-विराग
मेरा होने दीजिए। आपको मैं बीच में एमोटना नहीं चाहती।"
चिरपरिचित रास्तों से गुजरता हुआ रिवना मजिल की ओर या रहा
या और मैं शात भाव से बैठी हुई थी। मन में जरा भी समान या मुगयुगा-
हट नहीं थी। रिक्शा रुकते ही मैं सहज भाव से उतर परी। मृटम वरी
पड़ा रहने दिया।
घटी दजाने के कोई पाप मिनट बाद दरवाजा पुसा। मामने अपना
यही थी । मुझे देखकर उसका चेहरा सफेद पट गया।
"श्ता के पापा है ?" मैंने पूछा।
उसने कोई उत्तर नहीं दिया। करीब-करीव मुझे ठेलकर वह बाहर
निकल गयी। उस सजे-धजे डाइंगरूम में कुछ समय तक मैं अकेली ही रह
गपी।
"कौन है अर्चु?" कहते हुए मनोज भीतर से बरामद हए और मुझे
देखकर ऐसे चौके जैसे भूत देख लिया हो। उनके हाय की प्याली गिरते-
गिरते बची।
मुझसे आंच चुराने के लिए वे बाहर देखने सगे और उनकी नजर सामने
यड़े आटोरिसमा पर अटक गयी, "ये रिवशा"
"मेरे साप आयी है। मेरा सामान है उसमें । तुम कहोगे तो अंदर से
आऊंगी। वरना उलटे परों लौट जाऊगी।"
उनके चेहरे पर हवाइया उहने लगी। वे पत्थर केन्मे होकर रह गये ।
"चाय पी लो। ठही हो रही है।"
एकदम चौके और एक साल में कप पाली कर गये। पदये फिर में
विस्फारित नेत्री से कुछ देख रहे थे।
"और लोग कहा है ?"
"अम्मा श्वेता को लेकर पार्क में गयी है।"
"समानदार हैं । भरसक प्राइवेमी दे देती है। है ना?"
वे फिर जड हो गये थे।
"सुनो, इतना मनहूम चेहरा बनाने की जरूरत नहीं है। यहा रहने
के लिए नहीं आयी हूं।"
उनके चेहरे का कसाव एकदम ढीला पड़ गया।
.."
"मेरी कुछ चीजें यहां छूट गयी हैं । ला दोगे तो मेहरवानी होगी। वैसे भी वें तुम्हारे किसी काम की नहीं हैं।" "कौन-सी?" मैंने लिस्ट पकड़ा दी और सोफे पर निढाल होकर लेट गयी। मन तो. हुआ था कि उनके पीछे-पीछे चली जाऊं और अपने सपनों के संसार को आखिरी बार नजर भरकर देख लूं । पर हिम्मत न पड़ी। इस मोहपाश को छुड़ाने में इतने दिन लग गये। फिर एक बार देख लूंगी तो पता नहीं कितनी रातों की नींद गायब हो जायेगी। बड़ी देर बाद मनोज सामान लेकर लौटें । सामान क्या था, एक तान- पूरा, कुछ गाने की कापियां और कुछ इनाम के कप और मेडल्स । उन्हें समेटने हुए मैंने कहा, "एक और चीज यहां छोड़कर जा रही हूं।" "कौन-सी?" "श्वेता । उसका ध्यान रखना। अब से मां-बाप दोनों की भूमिका तुम्हें ही निभानी है।" "उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।" "है। तभी तो कह रही हूं । मनोज जिन बच्चों की मां नहीं होती, पिता की परिकल्पना वे आदर्श पुरुष के रूप में करते हैं । इसीलिए कह रही हूं कि तुम ऐसा कोई काम नहीं करोगे जिससे श्वेता के मन में बसी तुम्हारी प्रतिमा खंडित हो।" "तुम कहना क्या चाहती हो?" वे गुर्राये। "यही कि तुम अर्चना से व्याह कर लो।" उनका चेहरा फक हो गया। "मत्र कह रही हूं मनोज, तुम उसे विधिवत पत्नी बनाकर घर ले आओ। नेरी ओर से कोई कावट नहीं होगी-एक वात और। जब भी लगे कि श्वेता तुम्हारी नयीं गृहस्थी में बाधा बन रही है, उसे निस्संकोच मेरे पास छोड़ जाना । उसकी मां हूं मैं । उसकी अवहेलना नहीं करूंगी। तब तक वस, यही करना कि मेरे लिए जो जहर उसके मन में वोया है, उसे और पनपने नत देना।" उसके बाद मैंने किसी उत्तर की प्रतीक्षा नहीं की और अपना ताम-झाम समेट कर वाहर चली आयी।
मेरा रिक्शा और भया का स्कूटर साथ-साथ ही बगीची "भैया, थाप?" "मेरा मन नहीं माना कनु । तुम्हारे पीछे-पीछ ही चला गया पी पहो। और तुम्हारे साथ ही यहाँ में वापस हो लिया था।" "तब तो आप सब देख-सुनकर पा रहे हैं।" भैया ने मिर झुका दिया। "मैं आपकी ममता को समझती हूं भया। पर इस समय मुस पर एक उपकार कीजिए । मुझे पर चलने के लिए मत कहिए। मैं कुछ दिन पही रहना चाहती है। जिन लोगो को सचमुच मैरी जरूरत है. ममें मुछ दिन उन मोगों के लिए जीने दीजिए।" और फिर मैं दनदनाती हुई जिया के सामने जाकर घड़ी हो गयी, "नया किरायेदार आ गया है जिया। कमरा पाली हुआ कि नहीं?" जिया कुछ देर मुझे और मेरे मामान यो देखती रही। फिर अपने दोनों हाथ पसार कर बोली "नाइने तुम्हारे साने टौर नया । नुप माने पर जाह मिली!" - नायो "और अपने घर में कोई घुमने न दे तो?" "तो देहरी पकर के बैठ जइयो। पावन पे लो: जइयो। माफी माग तो पसीजेंगे।" "और तब तक क्या सडक पर पडी रहूं या माई के पर की रोटिया होडती रहू ?" जिया से कोई उत्तर नहीं देते बना। "तुम्हारे घर में जगह न हो तो मना कर दो जिपा पर अपने अननिये सराधों के लिए बार-बार माफी मागने के लिए मत कहो। और सपनो यह है जिया कि सामने हिमालय की सी ऊंचाई हो तो मुकने में भी मानन्द आता है। पर बोनी के सामने घुग्न टेषना तो अपने को और छोटा बनाना जिया पता नही मेरी बात समझी भी कि नहीं। पर परवाने में पा हा मेरा तानपूरा उठावर उन्होंने एहतियात के साथ दीयार से टिर
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