Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vividh Gachhiy Pattavali Sangrah Part-i

2012/08

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खि घी जैन ग्रन्थ माला ***ttenternatr kattent.[ग्रन्यांक ५३ ]kartertaintentit- अनेकविद्वत्संग्रथित -प्राकृत, संस्कृत, देशभाषा - निबद्ध भिन्न भिन्न गच्छीय ऐतिहासिकवृत्तविषयक विविध गच्छीय पट्टा वली संग्रह -[प्रथम भाग]- SRI DALCHAND JI SINGH श्री सदजी सिंधी 卐 SINGHI JAIN SERIES .............[ NUMBER 53 Jettituti.. VIVIDHA-GACCHIYA-PATTĀVALI. SAMGRAHA A Collection of historical records comprising the account of successions of the JainAcharyas belonging to various traditional monastic lineages and their diffcrent branches ~ ७ SINGHI JAIN SERIES अद्यावधि मुद्रितग्रन्थ नामावलि . मेरुनुझाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि २५ उदयप्रभरिकृत धर्मायुधपमहाकाव्य. मूल संरक्ल प्रय २६ जयसिंहरिकृत धर्मोपदेशमाला (प्रा. २ पुरातनपन्धसमह बहुविध ऐतिमतप्यपरिपूण २७ कोऊहलविरचित लीलायई कदा (प्रा.) अनेक प्राचीन निवथ सचय २८ जिनदत्ताण्यानद्वय (प्रा.) ३ राजशेखरसरिरचित प्रबधकोश २९३० ३१ स्वयंभूविरचित पठमधरिट ४ जिनप्रभसूरिकृत विविधतीर्थकल्प. भाग १२३ (अप. ५ मेघविजयोपाध्यायकृत देवानन्दमहाकाव्य ३२ सिद्धिचन्दत वाग्यप्रकारापण्टन ६ यशोविजयोपाध्यायपृत जैनतकमापा २३ दामोदरपण्डित कृत उचिव्यक्तिप्रकरण हेमचंद्राचार्यकृत प्रमाणमीमासा २४ मिन्न भिन्न विद्वत्कृत कुमारपार चरित्रमग्रह ८ भट्टाकलदेवकृत अकरमन्यत्रयी ९ प्रबन्धचितामणि-हिन्दी भाषांतर ३५ जिनपालोपाध्यायरचित खरतरगच्छ दगुर्वावलि "प्रभाचन्द्रसूरिरचित प्रभावकचरित २६ उपयोतनरिकन कुवलयमाला कहा (प्रा.) .सिद्धिचन्द्रोपाध्यायरचित भानुचन्द्रमणिचरित ३० गुणपालमुनिरचित जवुचरिय (प्रा.) १२ यशोविजयोपाध्यायविरचित ज्ञानविन्दुप्रकरण २८ पूर्वाचार्यविरचिन जयपाय:-निमित्तशास्त्र (प्रा.) १३ हरिषेणाचार्यकृत बृहत्कथाकोश ३९ भोजनृपतिरचित हारमशरी (संस्कृत कथा) जैनपुस्तफमशतिसमह, प्रथम माग १. धनसारगणीकृत-मर्तृहरिशतकनपटीका १५ हरिभद्रसरिविरचित धूर्ताडयान (प्राकृत) ४. कौटल्यकृत अर्थशास्त्र सटीक (कतिपयश) १६ दुर्गदवकृत विष्टसमुख्य (प्राकृत) ४२ विशतिरेखसम विज्ञप्तिमहालेख-विज्ञप्तित्रिवेणी 10 मेधविजयोपाध्यायकृत दिग्विजयमहाकाव्य आदि अनेक विज्ञप्तिलेख समुचय १८ कवि भब्दुल रहमानत सन्देशरासक (अपभ्रश)| ४३ महेन्दरिकृत नर्मदासुन्दरीकथा (प्रा.) १९ भदेहरिकृत शासकमयादि सुभाषितसाद ४४ हेमचन्द्राचार्यकृत-उदोऽनुशासन २० शान्त्याचार्यकृत न्यायावतारवातिक वृत्ति ४५ वस्नुपालगुणवर्णनात्मक काम्यद्वय २। कवि धाहिलरचित पदमसिरीचरित (अप) कीर्तिकौमुदी तथा सुतस्कीन २२ महेश्वरसूरिकत नाणपघमीकहा (प्रा.) ४३ मुस्तकीर्तिकोटिनीआदि वस्नुपालप्रशस्तिसंग्रह २३ श्रीमतदाहुभाचार्यकृत भद्रबाहु सहिता ० विविधगम्लीय पहायलिसप्रद २७ जिनेवरसूहिकृत कथाकोपप्रकरण (प्रा.) ४८ जयसोमविरचित मग्रीकर्मचन्द्रवाशप्रबन्ध 1 2 Shri Bahadur Singh Singhi Memoirs Dr. G. H. Buhler's Life of Hemachandrāchārya. Translated from German by Dr Maoilal Patel, PhD स्व बाबू श्रीबहादुरसिंहजी सिंघी स्मृतिमय [भारतीयविद्या भाग ३] सन १९४५ Late Baba Shn Bahadur Suaghji Singh Memonal Volume BHARATIYA VIDYA [Volume v]AD 1945, 3 Literary Circle of Mahamitya Vastupala and its Contrbution to Sanskrit Literature By Dr Bhogilal J Sandesara, M.A, Ph D (SJS3) 4-5 Studies in Indian Literary History. Two Volumes By Prof. P. K. Gode, MA (S J.S No 37-38 ) संप्रति मुद्यमाणग्रन्थनामावलि जैनपुस्तम्मशस्तिसमद, भाग २ ५ तरुगप्रभाचार्यस्त पडावश्यकवालावोधवृत्ति २ गुणप्रभाचार्यन्त विनयसूत्र (बौमात्र) प्रद्युम्नसूरिक्त मूलशुद्धिप्रकरण-सटीक. ३ रामचन्द्रकविरचित-मल्लिकामकरन्दादेिनाटकसमह कुवलयमाला कथा, भाग २ ४ जयपायद तथा चूडामणि शाख ८ सिंहतिलकसरिरचित मन्त्रराजरहस्य

विविधगच्छीय पट्टावलीसंग्रह ।
चंदगच्छिअसिरिअजियसिंहसूरिविरइया
गण हर सत्तरी।
or
३
सिरिवद्धमाण माणवदाणवअमरिंदवंदिय जिणिंद ।
तुह संताणं ताणं जंतूणं दूसमसमाए ॥
तित्थाहिवो सुहम्मो लहुकम्मो गरिमगयणसंकासो ।
वीरेण मज्झिमाए संठविओ अग्गिवेसाणो ।
तेण वि जंबुमुणिंदो कासवगोत्तो विमुकमाणिको ।
ठविओ केवलनाणी अपच्छिमो वीरतित्थम्मि ॥
कच्चायणो य पभवो पहे तस्सासि पसरियपयायो ।
जभवो य वच्छो जसभद्दो तुंगियसमुत्तो ॥
न य सीसो पढमो पायन्नो भद्दवाहुनामेणं ।
* अंतेवासी संभृओ माढरसगोत्तो ॥
अग्गिदत्ते य जन्नदत्ते य कासवे ।
य इमे सीसा सिरिमभद्दवाहुणौ ॥
तओ साहा कोडीवरिसा अहावरा ।
यो नाम चउत्थी पुंडवद्धिणी ॥
भूया चउरो साहा इमा तया।
'ए सीसा वारस तं जहा ।
.
६

कलकत्ता निवासी
साघुचरित-प्रेष्ठिवर्य श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी पुण्यस्मृतिनिमित्त
प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित
सिंघी जैन ग्रन्थ मा ला
[जैन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहाग्निक, वैज्ञानिक, कथात्मक-इत्यादि विविधविषयगुम्फित
प्राकृत, सस्कृत, अपभ्रश, प्राचीनगूर्नर, राजस्थानी भादि नाना मापानियद्ध सार्वजनीन पुरातन
दाध्यय तथा नूतन सशोधनात्मक साहित्य प्रकाशिनी सर्वश्रेष्ठ जैन ग्रन्यारहि]
प्रतिष्ठाता
श्रीमद्-डालचन्दजी-सिंधीसत्पुत्र
स्व. दानशील - साहित्यरसिक-संस्कृतिप्रिय
श्रीमद् वहादुर सिंहजी सिंघी
BALADISEAUGGI
प्रधान सम्पादक तथा संचालक
आचार्य जिन विजय मुनि
अधिष्ठाता, सिंधी जैन शास्त्र शिक्षापीठ
निवृत्त ऑनररि डायरेक्टर
भारतीय विद्या भवन, बम्बई
ऑनररी फाउडर-डायरेक्टर
राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान)
भॉनररी मेंबर-जर्मन ओरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना
(दक्षिण), गुजरात साहित्यममा, अहमदाबाद (गुजरात), विश्वेश्वरानद वैदिक
शोध प्रतिष्टान, होमियारपुर (पभाव) इत्यादि ।
संरक्षक
व्यवस्थापक
श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंधी
अधिष्ठाता, सिंधी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन, घम्बई
प्रकाशक-ज ह दवे, ऑनररी डायरेक्टर, भारतीय विद्या भवन, बम्बई, न ७
मुद्रष- छोटालाल मगनलाल शाद्दा, मनोरथ प्रिंटरी, रक्साल, अहमदाबाद

अनेकविद्वत्संग्रथित - प्राकृत, संस्कृत, देशभापा - निबद्ध
भिन्न भिन्न गच्छीय ऐतिहासिकवृत्तविषयक
विविध गच्छी य पहावली संग्रह
[प्रथम भाग]-
(अनेक प्राचीन लिखित पुस्तकानुसार संकलित एवं संपादित)
संपादन कर्ता
पुरातत्वाचार्य, पद्मश्री, जिन विजय मुनि
अधिष्ठाता-सिंघी जैन शास्त्र शिक्षापीठ, भारतीय विद्या भवन, चंबई ।
तथा
सम्मान्य अध्यक्ष-राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राजस्थान)
प्रधान संपादक- राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
अध्यक्ष- राजस्थान इतिहास संपादक मंडल, जयपुर
प्रकाशनकर्ता
अधिष्ठाता, सिं घी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्याभवन, बम्बई
विक्रमाद २०१७]
प्रथमावृत्ति
[निनाद १९६१
~~
ग्रन्यांक ५३]
सर्वाधिकार सुरक्षित
[मूल्य रु०१३/३०

SINGHI JAIN SERIES अद्यावधि मुद्रितग्रन्थ नामावलि . मेनुझाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि २५ उदयप्रभरिश्त धर्माभ्युदयमहामाग्य, मूल सस्कृत मन्थ. २६ जयसिंहमूरिकृत धमापदेशमाला. (प्रा.) २ पुरातनमयन्धसंग्रह बहुविध ऐतियतथ्यपरिपूर्ण २७ कोऊद्दलविरचित लीलावई कदा. (प्रा. अनेक प्राचीन निवन्ध सचय. २८ जिनदत्ताप्यानद्वय. (प्रा.) ३ राजशेखरक्रिरचित प्रबन्धकौश. २९.३०.३१ स्वयंभूविरचित पडमपरिउ, जिनप्रभसूरिकृत विविधतीर्थकरूप. भाग १. २. ३ (अप. .) ५ मेघविजयोपाध्यायकृत देवानन्दमहाकाच्य. ३२ सिद्विचन्द्रन काव्यप्रकाशखण्डन. ६ यशोविजयोपाध्यायकृत जैनवकंभापा. ७ हेमचन्द्राचार्यकृत प्रमाणमीमांसा. ३३ दामोदरपण्डित वृन्न उत्तिय्यक्तिकरण. ३४ मिन भिन्न विद्वत्कृत कुमारपालचरित्रसंग्रह. ८ भट्टाकलदेवकृत अकरमन्यत्रयी. ९ प्रबन्धचिन्तामणि-हिन्दी भाषांतर. ३५ जिनपालोपाध्यायरचिन सरवरगग्छ वृहद् गुर्वावलि .. प्रभाचन्द्रसूरिरचित प्रभावकचरित. ३१ उपयोतनरिकृत कुवलयमाला कहा. (प्रा.) 11 सिद्धिचन्द्रोपाध्यायरचित मानुचन्द्राणिचरित, ३७ गुणपालमुनिरचित अंबुचरिये. (प्रा.) १२ यशोविजयोपाध्यायविरचित ज्ञानबिन्दुप्रकरण, ३८ पूर्वाचार्यविरचित जयपायर-निमित्तशास्त्र.(प्रा.). १३ हरिपेणाचार्यकृत बृहत्कथाकोश. ३९ भोजनृपतिरचित राहारमारी.(संस्कृत कथा) १५ जैनपुस्तफाशस्तिसंग्रह, प्रयम भाग. ४० घनसारगणीकृत-मतदरिदातकनपटीका. १५ हरिमारिविरचित धूर्तापान(प्राकृत) ११ कोटल्यकृत मर्यशास्त्र-सटीक. (पतिपयअंश) १६ दुर्गदेवकृत रिष्टसमुच्चय. (प्राकृत) ४२ विलिलेखसंग्रह विज्ञप्तिमहालेख- विज्ञप्तित्रिवेणी १७ मेघविजयोपाध्यायकृत दिग्विजयमहाकाव्य, आदि अनेक विज्ञप्तिलेय समुच्चय. १८ कवि अन्दुल रहमानकृन्त सन्देशरासक. (अपभ्रंश)| १३ महेन्द्ररिकृत नर्मदामुन्दरीकथा. (प्रा.) १९ भर्तृहरिकृत शतकत्रयाद सुभाषितसंग्रह. १५ हेमचन्द्राचार्यकृत-छन्दोऽनुशासन. २. शान्त्याचार्यकृत न्यायावतारवाक्षिक-वृत्ति. ७५ वस्तुपालगुणवर्णनात्मक काध्यद्वय २. कवि धाहिलरचित पउमसिरीचरिड. (अप०) कीर्तिकौमुदी तथा मुफ्तसंकीर्तन २२ महेश्वरसूरिकृत नागपंचमीकहा. (प्रा.) तसंप्रह. २३ श्रीमद्रबाहुआचार्यकृत भद्रबाहुसंहिता. २४ जिनेश्वरमरिकृत कथाकोपप्रकरण.(प्रा.) गर-C-N. 1 2 Shri Bahadur Singh Singhi Memoirs Dr.G. H. Buhler's Life of Hemachandracharya. Translated from German by Dc Manilal Patel, Ph. D. स्व. यावू श्रीवहादुरसिंहजी सिंघी स्मृतिप्रन्ध [मारतीयविद्या भाग ३ ] सन १९४५. Late Babu Shri Bahadur Singhji Singhi Memorial Volume BHARATIYA VIDYA (Volume V] A. D. 1945. 3 Literary Cirele of Mahāmātya Vastupala and its Contribution to Sanskrit Literature. By Dr. Bhogilal J. Sandesara, M, A., PA, D, (S,J.S.33.) 4-5 Studies in Indian Literary History. Two Volumes. By Prof. P.K. Gode, M. A. (S.J.S.No. 37-38.) 90- संप्रति मुन्धमाणग्रन्थनामावलि जैनपुस्तकप्रशस्तिसंग्रह, भाग २. ५ तगप्रभाचार्यकृत पदावश्यकचालावबोधवृत्ति-- २ गुणप्रभाचार्यकृत बिनयस्त्र. (बौद्धशाख) ६ प्रद्युम्नहरिकृत मूलशुद्धिप्रकरण-सटीक. रामचन्द्रकविरचित मलिकामकरन्दादिनाटकसंग्रह. .कुवलयमाला कथा, भाग २ ४ जयपाषट तथा सामणि शास्त्र. ८ सिंहतिलकमरिरचित मन्त्रराजरहस्य.

विविधगच्छीय पट्टावलीसंग्रह ।
चंदगच्छिअसिरिअजियसिंहसूरिविरइया
गण हर सत्तरी।
१
३
सिरिवद्धमाण माणवदाणवअमरिंदवंदिय जिणिंद ।
तुह संताणं ताणं जंतूणं दूसमसमाए ।
तित्थाहिवो सुहम्मो लहुकम्मो गरिमगयणसंकासो ।
वीरेण मज्झिमाए संठविओ अग्गिवेसाणो॥
तेण वि जंबुमुर्णिदो कासवगोत्तो विमुकमाणिको।
ठविओ केवलनाणी अपच्छिमो वीरतिस्थम्मि ॥
कच्चायणो य पभवो पट्टे तस्सासि पसरियपयावो।
सेजभवो य वच्छो जसभद्दो तुंगियसगुत्तो ।
तस्स य सीसो पढमो पायन्नो भद्दवाहुनामेणं ।
वीओ अंतेवासी संभृओ माढरसगोत्तो ॥
गोदासे अग्गिदत्ते य जन्नदत्ते य कासवे ।
कासवा य इमे सीसा सिरिमंभद्दवाहुणो॥
तामलित्ती तओ साहा कोडीवरिसा अहावरा।
साहा
खवडियो नाम चउत्थी पुंडवद्धिणी ॥
गोदासगच्छसंभूया चउरो साहा इमा तया ।
संभूयविजयस्सेए सीसा घारस तं जहा ॥
६

विविधगच्छीय पत्रावलीसंग्रह
१२
नंदणभद्दे य भद्दे य तह चेव य तीसभद्द-जसभद्दे ।
थेरे य सुमणभद्दे मणिभद्दे पुन्नभद्दे य ॥
थेरे य थूलभद्दे उजमई अजजंबुनामे य ।
थेरे य दीहभद्दे थेरे तह पंडुभद्दे य ॥
अजमहागिरिगरुओ अनसुइत्थी य हस्थिसोंडीरो ।
सिरिथूलभद्दगुरुणो दो सीसा पयंडमाइप्पा ॥
उत्तर-थेरबलिस्सह थेरधणढे तहा सिरिडे य ।
कोडिन्न-नागमित्ते नागे तह छलगनामे य ।
गिरिगरुयमहागिरिणो गुणिणो सीसा इमे तया अट्ट।
उत्तरवलिस्सहगच्छे साहा चउरो इमा नेया ॥
सोत्तिमई' य कोसंबी साहा तो चंदनागरी ।
कोडिधाणी चउत्थी य साहा देविंदपूइया ।
पढमेत्थ अज्जरोहण भद्दजसे महगणी य कामही ।
सुट्ठिय-सुप्पडिबुद्धे रक्खिय तह रोय(ह)युत्ते य ॥
इसिगुत्ते सिरिगुत्ते गणी य वंभे गणी य महसोमे ।
दस दो य गणहरा खल्लु एए सीसा सुहथिस्स ॥
कासववंसससुबभवरोहणागुरुपो गामिल उद्देहे ।
चउसाह कुला छच्च उ पग्निज्जती इमे पयर्ड ।
उडवरक्खिया साहा सोमपुरिसा तहावरा ।
महुरजी तओ होइ साहा सोवन्नवत्तिया ॥
पढमेत्थ नायभूयं चीयं पुण सोमभूईयं होइ ।
अवणेलयं च तइयं चउत्थयं हस्थिलिज तु ॥
पंचमयं नंदिन छटुं पुण वारिदम्मियं होई ।
उद्देहगणस्स एए उच्च कुला हुँति नायव्वा ॥
२०

गण ह र सत्तरी ३ २१ २२ ૨૨ २४ २५ २६ साएयगुत्त-सिरिगुत्तसूरिणो चारणगणम्मि उप्पन्ने । ससुरासुरभुवर्णसरा नायजिणिदस्त तित्थम्मि । हारिय-मालागारिय संकासिय पुणो तया(हा) । गवेहुया तहा साहा चउत्थी वजनागरी ॥ पढमं च वच्छलिजं बीयं पुण पीइधम्मियं होइ । तइयं पुण हालिज्ज चउत्थयं पूसमित्तिज्जं ॥: पंचमयं मालिज छटुं पुण अज्जचेडगं होइ। सत्तमयं कन्नसहं सत्त कुला चारणगणस्स ।। तह उद्धवाडियगणो भारद्दसमाणगुत्तभद्दजसा । चउरो साहा तम्मि य तिन्नि कुलाई च वोच्छामि।। तत्थ चंपजिया साहा बीया भद्दिजिया तथा । कागिदिया तओ वुत्ता चउत्थी महिलज्जिया ॥ कुले भद्दजसे नाम भद्दगुत्ते य आहिए । तइए य जसोभद्दे गोयमेण पसंसिए ॥ माणवगणम्मि रम्मे इसिगुत्ताणं सुसीसजुत्ताणं । चउरो साहा बुत्ता तिन्नि कुलाई च विउलाई। साहा य कसविज्ज त्ति विन्नेया गुत्तमिज्जिया। वासट्टिया तओ होइ सोवीरी य पुणो तथा ॥ इसिगुत्तियं थ पढमं वीर्य सिरिगुत्तियं मुणेयव्वं । तइयं च अभिजयंतं तिन्नि कुला माणवगणस्सना सुट्ठिय-सुष्पडिबुद्धा कोडियकागंदगोत्तमसगोत्ता । कोडियगण त्ति गच्छे विणिग्गया तेसिमा साहा।। उच्चानागर विज्जाहरी च वयरी य मज्झिमाल्ला य। कोडियगणस्स एया हवंति चत्तारि साहाओ कुलमित्थ बंभणिज्ज बीयं नामेण वच्छलिज्जं तु। तइयं पुण वाणिज्जं चउत्थयं पन्नवाहणयं ॥ २७ २८ J २९ ३० ३१ ३२ ३४ ३७ ३८ विविधगच्छीय पहावलीसग्रह अज्जदिन्ने य थेरे य पियगंथे तहेव य । विज्जाहरे य गोवाली इसिदत्ते मुणीसरे ॥ सुट्ठिय-सुपडिबुद्धयमुर्णिदसीसा इमे य पन्नत्ता । पियगंथमुणिंदाओ मज्झिमसाहा य विन्नेया ॥ विजाहरगोवालियगुरूण विज्जाहरी तओ साहा । सुरविहियपाडिहेरा तिहुयणविक्खायमाहप्पा ॥ अज्जदिन्नसुसीसस्स चंददिन्नस्त सूरिणो । संतिसेणे तया(हा) सीसे थेरे सीहगिरी वि य ।। संतिसेणमुणिंदाओ साहया उच्चनागरी। संतिसेणस्स सारस्स विणेया चउरो इमे ॥ सेणीए ताक्से चेव कुवेरे इसिपालिए । एएर्सि च जहासंखं साहा पढम सेणिया ।। तावसी य कुवेरी य चउत्थी इसिपालिया। गुरुसीहगिरीणेए चउरो थेरा य विस्तुया ॥ धणगिरी पायडे तत्थ अज्जवयरे महारिसी । माउले समिए तस्स अरिहदिन्ने य सूरिणो ॥ अज्जसमियाउ तो साहा जाया वंभगदीवगा। गोयमगोताओ वयराओ वयरसाहा विणिग्गया ॥ वयरे तिन्नि-सीसा उ पढमे वेरसेणए । अजपउमे तओ सूरी अजरिहे तहेव य । वयरसेणाउ जा साहा सा बुत्ता अज्जनाइला । अजपउमा पुणो साहा अज्जपउमाउ निग्गया । अजअरिहजा साहा जयंती जगपायडा । अज्जआरहस्स सीसो उ सूरी पूसगिरी तओ ॥ ३९ ४१ ૨૨ ४३ -- ४५ गण ह र सत्तरी ४७ ४८ ४९ सिरिपूसगिरी सीसे थेरे जे फग्गमित्तए । गोयमे सेयगुत्तणं वंदणिजे सुराण वि ।। वंदामि लोयपयर्ड नामेणं धणगिरिं च वासिहूँ। सिवभूइगोच्छगोतं कोसिय दोजन्तकन्ने य ॥ तं वंदीऊण सिरसा वत्सं वदामि कासवसगोत्तं । निक्खं कासवगोतं रिक्खंपि च यासवं वंदे। वंदामि अज्जनागं च गोयमं जिटिलं च वासिढें। विण्९ माढरगोतं कालयमवि गोयमं वंदे ।। गोयमगोत्तकुमारं सबलगं चेव भद्दयं वंदे । थेरं च अज्जबुद्धं गोयमगोत्तं नमंसामि ॥ तं वंदीऊण सिरसा थिरसत्तचरित्तनाणसंपन्नं । थेरं च संघपालिय गोयमगोतं नमसामि ॥ मिउमद्दवसंपन्नं उवउत्तं नाणदंसणचरित्ते । गणथेरं दिन्नं पि य कासबगोतं पणिवयामि ॥ तत्तो य थिरचरितं उत्तमसंमत्तसत्तसंजुत्तं । दूसगणिखमासमणं माढरगोत्तं नमसामि ॥ तत्तो अणुओगधरं वंदे मइसागरं महासत्तं । सिरिगोत्तखमासमणं वच्छसगोत्तं पणिवयामि ॥ तत्तो कासवगोत्तं सुट्टियनामं मुणिंदमुहतिलयं । थेरं कुमारधम्म देवहिं गणहरं वंदे ।। एसा गणहरसेणी दसासुयखंधगंधओ भणिया । संपइ नदिऽणसारा सुहास्थिवंसाउ पयडेमि ।। गणहरसुहस्थिसीसो बहुलस्स सरिव्वओ उ कोसियो । साई नामेण गुरू हारियगोत्तो तओ जाओ || तग्गुत्ते सामज्जो कोसियगुत्तम्मि तयणु संडिल्लो । अज्जसमुद्दमुणिंदो मंगू तह अज्जधम्मो य ।। ५२ ५३

निरिधगच्छीय पावलीसग्रह
५९
६२
भद्दयुत्तो गणाहीसो वयरसामी य रक्खिओ।
अणुयोगधरा एए पायडा जिणसासणे ॥
अज्जो नंदिलसूरी सूरी सिरिअज्जनागहत्थी य।
इंदीवरदलकंती रेवयनामो गणहरिंदो ।
वंभगदीवगगुरुणो अयलपुराओ पुरीउ निक्खंता।
खंदिलसूरिमहप्पा हिमगिरिगुरुओ य हिमवंतो ॥
नागुज्जणमुणिनाहो गोविंदरिसी य भूयदिन्नरिसी।
लोहिञ्चो समयधरो दूसगणी दूसमविहूणो॥
नियगुरुउवएसाओ साहाणं उच्चनागराईणं |
पुव्वुत्ताण सरूवं किं पि अहं वन्नइस्लामि।।
उच्चानागरयाणं साहूणं कोडिओ गणो नेओ।
उच्चानागर साहा एएसिं बंभसेज्ज कुलं ।
विज्जाहराण तग्गण त्रिजजाहर साह वच्छलिज्ज कुलं ।
नाइलचंदुदेहियनिव्वुइबंधूण सोपारे ।
तस्संताणम्मि तहा कोडिय गण वयरसाह अह साहा।
तेसिं वाणिज्ज कुलं जहत्थनामं तया जायं ।।
चंदकुलं वाणिज्जं एगट्ठा हुँति दो वि सद्दाए।
जम्हा चंदस्त कुलं तदन्नबंधूण य तमेव ॥
सिरिवयरसामिगणहरसमुन्भवं वइरसाहमाहु गुरू।
केई पुण वइराओ खुड्डाओ धइरसाह चि ।।
मज्झिमसाहसमुभवसाहूण कोडियम्मि वरगच्छे।
मझिमसाहा साहा तेसि कुलं पन्नवाहणयं ।
इय ससिगच्छविहूसणजयसिंघमुर्णिदसीसमुहतिलया ।
सिरित्रिमलसूरिंगणहरसीसा जे समयजलनिहिणो ॥
६४
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उप के श ग च्छ गु वा व ली सिरिअजियसिंहसूरी गण हरस यरी इमेहिं किल लिहिया। संताणजाणणस्थं सिरिमंतसुहम्मसामिस्स ।। ॥ गणहरसत्तरी जुगपहाणसत्तरी संताणसत्तरी वा समत्ता॥ 卐 卐 म संवत् १२३७ माघ चदि ९ सोमे पं० महादेवेन प्रकरणपुस्तिका लिखितेति। उपके शगच्छ गुर्वावली or २ m श्रीपाच नौमि सद्भक्त्या वे गच्छपरम्पराम् । पट्टानुकमशाखां च वक्ष्येऽहं सद्गुणाधिकाम् ।। पासजिणेसरतित्थे केसी नामेण गणहरो पुटिव । तस्स सुसीसो सूरी सयंपहो आसि सिरमाले ॥ सिरिरयणप्पहसूरी तस्स विणेओ अ खेअरो तइया। उवएसगच्छकंदो उवएसपुरम्मि विक्खाओ॥ उवएसे कोरंटे सत्तरिवरिसम्मि वीरमुक्खाओ। इक्के लग्गम्मि जेण पइट्ठियं बिजुअलमिणं॥ सप्तत्या वत्सराणां चरमजिनपतेर्मुक्तिजा(या)तस्य माघे. पञ्चम्यां शुक्लपक्षे सुरगुरुदिवसे ब्रह्मणः सन्मुहर्ते। रत्नाचार्यरिहार्यः प्रतिभगुणयुतैः सर्वसहानुयातः, श्रीमद्वीरस्य विम्वे भयसितुमथने निर्मिताऽत्र प्रतिष्ठा । सच्चिका च सुरी श्रेष्ठा कृता स्वदर्शने दृढा । गच्छाधिष्ठायिका जाता देवी श्रीजिनशासने ।। ६ श्रीमाले चापि कोरण्टे तथा च वल्लभीपुरे। स्तम्भतीर्थे च संजाताः शाखाश्चत्वारि ता इमाः॥७ श्रीमदुपफेशगच्छे ककुदाचार्गीपमवरसन्ताने । श्रीकमसूरिसुगुरुश्चक्रेश्वर्याज्ञया जातः॥ ८ श्रीकपासूरिसुपट्टे गच्छभारधुरन्धर । श्रीसिद्धसूरिः संजातो भुवननयपावनः ।। पधालङ्कारगणभृत्सूरिश्रीदेवगुप्तस्य । गच्छाधिष्ठायिकादेव्या दत्तं नामवयं तदा ।। साधुभिः पञ्चशताभिः सच्चारित्रविभूपितः । सत्पाठफसप्तयुतैर्वाचनाचार्य भिमित्रैः॥ ११ द्वादशसापासहितैर्गुरुपदभरं सदा गणेशयुगम् । त्रितयं या युग्मद्विक, मरत्तरायाश्च युग्मवरम् ॥

विविधगधीय पावटीसंग्रह १८ आर्यापा, सप्तशतं, मयतिन्या द्वादशा सदा गच्छे । श्राद्धानां गोग्राणि, प्रिंशन्मानाणि गच्छेऽस्मिन् ॥ अष्टादश गोत्राणि, सच्चियादेविपूजनपराणि । द्वादश गोत्राणिसधा, चक्रेश्चर्याच भत्तानि ॥ शेपा हि ये च श्राद्वा अम्पोत्सप्ताहलाहरीभक्ताः । जीउल्यानागपुरी येषां फुले गोत्रदेव्यभूत् ॥ तारशेऽस्मिन् गणे सूरीश्वरकोऽपि सफलगणनाथः । देव्याया वरवचनात सद्धाज्ञयैव घेदृशं सुकृतम् ।। पदानुक्रमतो नामनितय स्थापने जनः । फासूरेश्चाभिधानं गणपपिराजितम् ।। १७ रस-रस-दिनकर १२६६ वर्षे, मासे मधुमाधचे च सम्झायाम् । जाता द्विवन्दनीका, श्रीमत्श्रीसिद्धसूरिवराः ।। आगमगच्छाद् गृहीतः सामाचारीति रिमन्त्रवरः । परमेष्ठिपदोच्चारणगृहीतनियतं प्रतिक्रमपो । द्विधन्दनीकास्तु ते जाता द्वादशावर्तयन्दनासमये। वैराग्यरगसागरसत्सूत्रे सावधानास्ते ॥ २० नमस्कारे च होईति मगलं च द्विवन्दनम् । नीपधानं न मालापि गच्छेऽस्मिन्नीशी क्रिया॥ २१ यभूवान गणे पूर्वमुपाध्यायशिरोमणिः । शालिभद्रस्ततो माणिभद्रो देवप्रमुस्ततः॥ २२ सायदेवस्ततोऽप्पासीत् श्रीमद्देवयशास्ततः । ततो भुवनचन्द्रारुपः श्रीरलतिलकस्ततः।। सिद्धसूरी ततो जाते श्रीचन्द्रो पाथफोऽभवत् । शुभकीतिस्ततोऽप्यासीत् जयादितिलकोपि च ।। ૨૪ सर्वसिद्धान्तपारीण सोमप्रभमुनीश्वरः। कलाकलापसम्पूर्णो धर्मनामाऽभवत्ततः ।। त्रिभृङ्गमारन्ये सदृग्रामे, महीपालस्थिते प्रभो । खरतपाविरुदं जातं वस्वभ्रारन्येक १३०८ वर्षे च ॥ २६ ततोऽपि द्वितीयसंजाता शान्वा सन्मुनिसंयुत्ता। स्वा साधिकारसम्पूर्णा कथ्यतेन प्रसङ्गतः ॥ हुँ नन्देन्द्रियरुद्रकालजनितः ११५९ पक्षोस्ति पूर्णाभिधः, वेदाम्रारुण १२०४ काल उष्ट्रिकभवो, विश्वार्क १२१४ कालेऽश्चलः । पदव्यपु १२३६ च साधुपूर्णिम इति व्योमेन्द्रियाः १२५. पुना, वर्षे खिस्तुतिकोऽक्षमगलरवौ १२८५ गाढग्रहास्तापसाः ॥ २८ २३ -- -1 ૨૫ .

... आ ग मि क ग च्छी य प हा वली शाखाकुरा गणभृतोऽस्य वभूविरे ते, नागेन्द्र इत्यमलकीर्तिनदीनगेन्द्रः । चन्द्रस्ततश्च भगवान्नध निवृतिश्च, विद्याधरश्च भुवि विश्रुतनामधेयाः ॥ २९ एतेषु चन्द्र इति सूरिपुरन्दरो यस्तस्य प्रफुल्लगुणगच्छचनस्य गच्छे । भूयांस एव भुवनत्रयचंन्दनीयाः संजज्ञिरे गणधरा गणिनो धरायाम् ॥ ३० गौतमाग्रहमात्रेण श्वेताम्बरं गृहीतवान् । केसीकुमारगुरुणा व्रतं पश्चमं जगृहे ॥ शाखा च द्विविधा ज्ञेया पार्श्व-चीरसमुद्भवा । परम्परा कृता चैका ज्ञातव्या सर्वदा बुधैः।। ३२ तः काले हीयमाने शाखा जाता द्विधा पुनः । वसुनन्दवेदेन्द्रंके १४९८ वर्षे शाखा पृथक्कृता॥ ३३ श्रीदेवगुप्तसूरीणां शिष्योऽपि मतिसागरः । तेनाभिमानमात्रेण, खदिरी शाखा कृता तदा ॥ ३४ सूरिश्रीदेवगुप्तस्य पट्टे श्रीसिद्धसूरयः । तत्पट्टे ककसूरीशो भुवनत्रयदीपकः॥ ३५ एतान्यप्यभिधानानि त्रीणि त्रीणि भवन्तीह ! सत्सदाचारकुशला जयन्तु गुरवः सदा ॥ ३६. इत्येषां पूर्वसूरीणां नाममात्रप्रभावतः । कल्मपं विलयं याति कल्याणं चोपतिष्ठति ॥ ३७ तेपी पादमसादेन स्वल्पबुद्धया मयाऽधुना। व्याख्या प्रारभ्यते किञ्चित्, श्राद्धानां साधुसंसदि॥ ३८ नमोऽस्तु गुरुचन्द्राय यत्करः स्पृष्टमूर्द्धनि । आविर्भवति भवेऽस्मिन्नपि वाक्यसुधारसः॥ स्तुतिरेव सद्गुरूणां पठन्ति शृण्वन्ति ये च भावेन ! लभते.(१) शिवपदसौख्यं भव्यास्ते नास्ति सन्देहः ॥ इति उपकेशगच्छगुर्वावली समाप्ता ।। आगमिकंगच्छीयपट्टावलीः। १ २ पुण्याऽऽस्पदं गणभृतोऽन्तिमतीर्थभर्तुरेकादशस्त्रिदशवन्यपदा बभूवुः । तुर्योत्तरोऽभवदमीपु पुनः सुधर्मा यस्यान्वयोऽयमवनीमभितः पुनीते ।। कुन्देन्दुसुन्दरमहांसि यशांसि यस्य, विश्वत्रयीं धवलयन्ति किमत्र चित्रम् ।। मिथ्यारशा मलिनयन्ति नयप्रशस्तिमेतत्पुनर्मनसि कस्य न कौतुकाय ।। कम्बूज्ज्वलेन यशसा कलितश्च जम्बूस्वामी तदीयगणनायकनामबाप । रैकोटयो नवतिराप्तनवाऽमुनाष्टी बघूः प्रववजियुणा गणितास्तृणाय । मन्यामहे प्रापभदत्तमुचो भुवीह सौभाग्यमप्यधिकमेव मुनीश्वरस्य । 'यस्मादमुं समधिगम्य गतेऽपि तस्मिन्नद्यापि नान्पमधिगच्छति केवलश्रीः ॥ तस्य प्रशस्यविभवः प्रभवो भवोपभेत्ता पदे प्रभव इत्यभवत् प्रसिद्धः । यो जैनशासनवनीनवनीरदश्री रेजे यशोभिरभितो विशकण्टकामा। शय्यम्भयो भवपयोनिधिकुम्भजन्मा सन्मानपात्रमजनिष्ट पद तदीये। या शासनाधिविसपिमहाभुताब्यकालिकं किल दशादिपदं चकार । ३ ४ ५ ६:

.१० ७ . १० विविधगच्चीय पट्टावलीसंग्रह नाम्ना पुरस्कृतयशाः क्रिययापि भद्रश्रीमानमेयमहिमाऽस्य पदे बभूव । भद्रङ्करीव ननु यः किल पंचवाणपञ्चानने व्यघटयचरणमचारैः ।। संभूतिपूर्वविजयो विजितान्तरारिर्वार्ता निरर्गलपशस्ततिरस्य पढ़ें। श्रीमजिनागमपयोनिधिपूर्णचन्द्रो गोमिस्लतान कुमुदं शिशिरोज्ज्वलाभिः।। श्रीभद्रयाहुरिति मन्मथयाशक्तिमाथोन्मदस्तदपरं प्रधितो यभूव । यो दुम्पमावलिचतुर्दशपूर्वधारी धीमानभूदभयदुर्गमिव श्रुतस्य ।। श्रीस्थूलिभद्र इति मूलगुणानुकूलः शीलवते शमवतामधिभूरतोऽभूत्। सीमाऽभवद् भुवि चतुर्दशविणां यः स्वामीव केवलजुपामृपभमसूतिः । वेणीदण्डं विधृत्योन्नतकुचकलशाने व तत्पाणिमूलं, कोश्या वेश्या विदेशाततपतिपुरतो दर्शयन्ती विभाति । तच्चित्तोहापनोदव्यतिकरकरणव्याकुला कालकल्पं, हस्तेनेयं सतीत्वाद् घटभुजगमियाकर्षयन्ती प्रतीत्यै ॥ गतः काल मोऽयं प्रणयिनि मयि प्रेमकुटिला, कटाक्षा कालिन्दीलघुलहरि यत्र प्रसरति। इदानीमस्माकं जरठकमटीएप्ठिकठिना, मनोवृत्तिस्तत् किं व्यसनिनि मुधैव क्षिपयसि ।।१२ आर्यो महागिरिरभूद् दशपूर्वधारी शिप्यः सुहस्त्यपि च तस्य नमस्यधाग्नः। पभाषितेन भरतार्द्धमिदं ततान धर्मेकतानमिह संमतिभूमिपालः || १३ सप्तरभवंस्तदनु सुस्थित-सुपबुद्धमुख्याः क्रमेण दशपूर्वभृतो मुनीद्रा।। यैपां यशोभिरमलर्धवलीकृतेषु विश्वेपु पर्यटति कृष्णदिक्षया श्रीः ।। श्रीमानभिन्नदशपूर्यघरस्ततोऽभूदु बजो विनिर्जितपुरन्दररूपलक्षमीः । अङ्गान्युपश्रुतियशाच्छिशुरप्यपाठीदेकादशापि जिनशासनमण्टनं यः॥ यास्पेन मातृवचनैरतिदीनदीनैः स्निग्धाइनानिगिरा न हि यौवनेऽपि । श्रीसञ्चयैरपि चचाल मनो न यस्य तस्मै नमोऽस्तु दशपूचंभृतेऽन्तिमाय ।। श्रीपरसेन इति निर्मित भाववैरिसनस्तदंद्विारजनपदशोऽभूत! . शाखा य एप जिनशासनकाल्पवृक्षः स्कन्धा दिगन्तरगताः सुपुर्व चतस्रः ।। शाखा फुरा गणभृतोऽस्य धभूवुरेते नागेन्द्र इत्यमलकीर्तिनदीनगेन्द्रः। चन्द्रस्ततच भगवामय निर्वृतिश्च विद्याधरथ भुवि विस्तृतनामधेयाः॥ तस्प प्रभोः समभवन् भुवनप्रशस्याः शुद्धाः श्रुताक्षकमलोदरणप्रवीणाः। पत्यार जिसरजोचिदुपां नु सेव्या देव्याः करा इय पुराणकविमसूतेः ।। ११ एतेषु चन्द्र इति सरिपुरन्दरो यस्तस्य प्रफुल्लगुणगच्छवनस्य गच्छे । भूपांस एव भुवनत्रयवन्दनीयाः संजज्ञिरे गणधरा गुणिनो धरायाम् ।। जने वीरजिनात सुधर्मगणभृत् तस्माच जम्यूस्ततः, संख्यातेपु गतेषु सुरिपु मुधि श्रीपञशाखाऽभवत् । २५. १६ ... . आ ग मि क ग च्छी य पट्टा व ली ११ तस्यां चन्द्रकुलं मुनीन्द्रविपुलं तस्मिन् बृहगच्छता, तत्राभूत स्वयशम्भसाधितककुव् श्रीसर्वदेवः प्रभुः ॥ २१ सुरिः श्रीसर्वदेवाख्यः सारदो धर्मवान्धवः । बृहद्गच्छो यतो जातो ववृधे चाधिक भुवि ॥ २२ अथाभवन् श्रीजयसिंहसूरयः श्रियस्तपःफेलिविलासमन्दिरम् । अधास्य शिष्या अभवन्नवस्फुरत्सुधीधनाढ्या निधयश्चला इव ।। २३ सिद्धान्तरत्नाकरपारवोधैर्बुधेश्वरैस्तैरभितोऽभितोपि । आह्लादिनी लोचनरवाणां सा पूर्णमासी ददृशे सुधेव ।। साम्प्रतं विषमदुःपमावशात् पर्वयुग्मकरणासुतो(?) जनः । नत्तपोऽजनि चतुर्दशीदिने पाक्षिकं च तदिदं भृशायते ॥ २५ अष्टमीयुतचतुर्दशीकुहूपूर्णिमातिथिषु धीरधीरधीः । आयुपो हि विदधाति बन्धनं शोभनासु किल जन्तुजातिपु॥ चातुर्दशीये दिवसेऽपि सायं कुहमुहूर्त यदि पूर्णिमा वा । कार्यस्तदा पाक्षिकपक्षपात आज्ञापयन्तीति यतिक्षितीशाः॥ २७ बन्धः पुण्येषु नैवोपधिपु सुविधिपु स्थापनं नो जिनेपु, श्राद्धस्वान्तेपु नित्यस्थितिरुचितपुरग्रामगोछेपु नैव । तृष्णा ज्ञानामृतेषु प्रणतजनपुरस्कारसौख्येपु नैव, सर्वज्ञोक्तवपेक्षा न च धनिपु मुनिस्वामिना येन चक्रे ।। कैलासं दशकण्ठवद् गिरिवरं गोवर्द्धनं विष्णुपत्, क्षोणीमादिवराहवद्रूधुरं धौरेयवृद्धोक्षवत् । योन्यैर्दुर्द्धरमुद्दधार विधिवत् पक्षं विधे/रधीः, श्रीचन्द्रप्रभसूरिरद्य भवतां भद्राय भूयात् प्रभुः॥ २९ सिरिचंद्रप्पहसूरिजइ न पयासंत पुन्निमापक्वं । उदयंमि अजयपाले चउद्दशी जंतु पायालं ॥३० एकस्यां विधुनाऽतिघोरयता दुष्कर्मदग्धां दशां, पूर्णा वारिधयो दिशः कुसुमिता सिक्ता सुधाभिर्मही। यदन्या अपि पूर्णिमासमतिधी: धाताकरिष्यत्तदा, को जानाति कक्षया रचनयाऽधास्यत् समस्तं जगत (1)॥ ३१ आजैश्वर्यमकृत्रिमं कुसुमयनशेपसोऽपि यः, पूजां श्रीजयसिंहदेवनृपतौ कुर्वत्यपि प्रत्यहम् । गर्वस्य त्रसरेणुनाऽपि न परा सृष्टी विशिष्टाऽऽशयः, सोऽयं मगलमादधातु भवतां श्रीधर्मघोपप्रभुः ।। रूस कुमरनरिंदो अहवा रूसंतु लिंगिणो सव्वे । पुन्निमसुद्धपयहा नहु पत्ता समत्तसूरीहिं ।। ३३ ।। , १२ १२ विविधगधीय पावलीसमह अद्यापि नत्ति यदीयकीतिथिद्वन्मनोरङ्गवसुन्धरायाम् । नवीनसत्काव्यवराद्गहारैः समन्तभद्राय नमोऽस्तु तस्मै ॥३श्या भुवणरुदसमवरसि जम्मु हुओ गुणभूरिहिं, तह चउधीसद हय दिख चंदप्पहसूरिहिं । छत्तीसह संठविय सूरि सिरिजयसिंहसूरिहिं, संपा वसही यादु जितु चउरासी सूरिहिं । एगुणवंचासई तिहिं वरसि संघ सक्खि पण पवारि । छासहइ सियु परिगमणु फिर बावन्न सन्चायु परि ॥१॥ जिम इक्षिण दिणयरण निशिहि तमपसर विहाडिय । जिम इकण शशिहरण गयणमंडल परि पयडिय। जिम इकण केसरिण करड कोडि किय खंडण । तिम पई इकण चन्द्रसूरि किय अथिहिविहंडण । पायाल जंतु दूसमवसिण सत्तहीण नर परिहरिय । इकल्हण हरिहिं धरित्त जिम पई विहिपक्ष समुद्धरिय ॥१॥ पुन्नि नहु परिहरिय मग्गु सिद्धांत न चालिओ, उद्यासणि न पयट्ट पाउ सिंहासणि चालिओ। विवह कियन पतिट्ठ मासकप्पह नहु चुकाउ। दममि दलि मेलीड जेण अप्पाणु न मुकाउ ।। निघडिय जु गुरु कसवट्टिहिं चिरु चउद्दसि न मणुरओ। नरिंदस तुडि करवि समतसूरि कुंकणि गयउ ॥२॥ येन ध्वस्तमदेन सप्त... .....निर्मायिकानां कुलं, धर्मेऽयोधि पडायथाऽन्वयमुखं गोत्रं च जैने स्थिरम् । हिनं मद्यपभावसारककुलं भूपस्तथा कोङ्कणे, पापात् श्रीसमन्तभद्रसुगुरुनः पासि योधममु ॥३॥ श्रीपूर्णिमापक्षसरोजवोधगभस्तयोऽभ्यस्तसमस्तशास्त्राः । श्रीचन्द्रगच्छाम्बुधिचन्द्रतुल्पाश्चन्द्रप्रभाख्या गुरवो जयन्ति ॥१॥ आयो नैष्ठिकमौलिमण्डनमणि श्रीधर्मघोपप्रभुः, श्रीभद्रेश्वरसुरिरित्यभिधया ख्यातो गुणग्रामणी। सूरिः शीलगुणाभिधस्तदपरः श्रीपादेवालय- श्चत्वारोऽपि समुद्रघोपकलिताः पश्च प्रधाना अमी ॥२॥ ॥ इति गुरुगुणवर्णनम् ॥

बृहत्पोसालिकपट्टावली।
॥श्रीः। श्रीवृहत्तपागच्छाधिराजश्रीपूज्यश्री ५ श्रीधनरत्नसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमः ॥
इहादौ गुरुपरिपाटीकथनाय मङ्गलाचरणमाह-
सत्थिसिरिसिद्धिसयणं णमिजणं वद्धमाणजिणनाहं ।
गुरुपरिवाडीहेउं तहेव सिरिइंदभुइगुरुं ॥१॥
'सत्य' त्ति-अहं वर्धमानजिननाथं नत्वा, पर्द्धमानश्चासौ जिननाथश्च तं चरमतीर्थकरं नत्वेत्यर्थः । कथंभूतं
वर्द्धमानजिननाथम् ?-'स्वस्तिश्रीसिद्धिसदनं' तम् । स्वस्ति अविनाशम् । श्रीश्चतुस्विंशदतिशयलक्ष्मीः । सिद्धिरष्टोमहा-
सिद्धयः । अथवा सिद्धिरमृतं मोक्ष इति यावत् । तेषां सदनं गृहम् । पुनः कथं 'गुरुपरिपाटीहेतु-गुरव आचार्यास्तेषां
परिपाटी अनुक्रमः । 'परिपाटी अनुक्रमः' इत्यमरः । तस्य गुर्वनुक्रमस्य हेतुमाचं कारणम् । जिननाथा हि आचार्यपरि-
पाठ्या उत्पत्तिहेतयो भवन्ति । न पुनस्तदन्तर्गताः। तेषां स्वयमेव तीर्थप्रवर्तकत्वेन कस्यापि पट्टधरस्वाभावात् । 'तहे-
चत्ति-तथैव श्रीइन्द्रभूतिगुरुम् । श्रीमहावीरस्य प्रथमगणधरं नत्वेति गाथार्थः ॥१॥
श्रीवर्द्धमानजिननाथं श्रीइन्द्रभूतिं च नत्या किं पुर्व इत्याह--
गुरुपरिवाडी वुच्छं तत्थेव जिणंदवीरदेवस्स ।
पहोदयपढमगुरुसुहम्मनामेण गणसामी ॥२॥
'गुरुति-गुरुपरिपाटीं गुर्वनुक्रमं वक्ष्ये । 'तस्थेव'ति-तत्राचार्यपरिपाट्यां जिनेन्द्र श्रीवीरदेवस्य । 'पट्टोदय'त्ति-
पट्टे उदये च प्रथमगुरुरादिसरिः। 'सुहम्मत्ति-सुधर्मा इति नामा श्रीमहावीरस्य पञ्चमगणधरः। स च कीदृशः ? गण-
स्वामी । यत एकादशानामपि शिष्याणां गणधरपदस्थापनावसरे श्रीमहावीरेण श्रीसुधर्मस्वामिनें पुरस्कृत्य गणोऽनु-
ज्ञाता, दुःसहं यावत् श्रीसुधर्मस्वाम्यपत्यानामेव प्रवर्तनात् । इह पट्टोदयेत्यत्र उदयपदं प्रथमोदयस्यापि प्रथमाचार्य-
श्रीसुधर्मस्वामीति सूचकम् । स च पञ्चाशद्वाणि ५० गृहस्थपर्याये, त्रिंशद्वर्षाणि ३० श्रीवीरसेवायां, द्वादशवर्षाणि १२
छामस्थ्ये, अष्टौ वर्षाणि ८ केवलपर्याये चेति । सर्वायुर्वर्षशतमेकं १०० परिपाल्य श्रीचीरात् विंशत्या वः २० सिद्धि
गतः। श्रीवीरज्ञानोत्पत्तेश्चतुर्दशवर्षे १४ जमालिनामा प्रथमो निहवः, पोडशवर्षे १६ तिष्यगुप्तनामा द्वितीयो
निहव इति ॥२॥

cc विविधगच्छीय पट्टावलीसंग्रह , बीओ गणवइजंवू पभवो तइओ गणाहिवो जयइ । सिरिसिज्जंभवसामी जसभद्दो दिसउ भद्दाणि ॥३॥ 'बीओ'त्ति-द्वितीयः श्रीसुधर्मखामिपट्टे श्रीजम्यूस्वामी गणपतिः। स च नवनवतिकाञ्चनकोटिसंयुक्ता अष्टौ कन्यकाः परित्यज्य श्रीसुधर्मस्वाम्यन्तिके प्रबजितः। स च पोडशवर्षाणि गृहस्थपर्याये, विंशतिवाणि प्रतपर्याये, चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि युगप्रधानपर्याये चेति । सर्वापुरशीति वर्षाणि ८० परिपाल्प, श्रीवीरात् चतुःपष्टि ६४ वर्षे सिद्धः । अत्र कविः-- मत्कृते जंबूना त्यक्ता नवोढाष्टौ सुकन्यका तन्मन्ये मुक्तिवध्याऽन्यो न वृतोऽन्यरतो नरः॥ अन्यच्च- स्युर्ब्रह्मणो नृसुरमोक्षसुखानि किं तु जम्मुनेः सुभगताऽभिनवैय काचित् । भेजुतं सममनेन मुदा प्रियास्ता अन्या रता सह जगाम च केवलश्रीः ।। मण १ परमोहि २ पुलाए ३ आहारग ४ वयग ५ उपसमे ६ कप्पे ७ । संयमतिग ८ केवल ९ सिज्झणा य १० जम्बूम्मि विच्छिन्ना ।। 'प्रभवनि-प्रभवस्तृतीयो गणाधिपो, जयति उत्कण वर्तते । सोऽपि त्रिंशद्वर्षाणि ३० गृहस्थपर्याये, चतुश्च- त्वारिंशद्वाणि ३३ व्रतपर्याय, एकादश वर्षाणि ११ युगप्रधानपर्याये, पञ्चाशीति वर्षाणि ८५ सर्वायुः परिपाल्प श्रीवीरान पंचसप्तति ७५ वर्षातिकमे स्वर्गभागिति । ननु यदा श्रीजम्बूस्वामिसाई श्रीप्रभवस्वामिना यतं ग्रहीतमिति रूदिः सत्या, तदा श्रीजम्यूस्वामिपट्टे श्रीप्रभव- स्वामिन एकादश वर्षाणि युगप्रधानपर्यायो न घटते । यतो जम्बूस्वामिनो गृहस्थपर्याये १६ वर्षाणि, प्रभवस्यामिन- त्रिंशद्वर्षाणि, ततो ज्ञायते, यदाऽनेन चौर्थिमागतं तदायं दशवर्षीयः संभाव्यते, सतो गृहं गत्वा' कतिचिद्वर्षाणि स्थित्वा पश्चाजम्बूस्वामिसविधं समागत्य चारित्रमग्रहीत् । एतयोक्तं परिशिष्टपर्वणि श्रीहेमसूरिभिः । तद्यथा- प्रभवोऽप्यभ्यधाद् मित्रपितृनापुच्छच सत्वरम् । परिव्रज्यासहायस्ते भविष्यामि न संशयः ॥ -नृतीयसर्गे २७९ श्लोकः। 'सिरिसिजभवति-श्रीप्रभवस्वामिपट्टे श्रीशय्यंभवस्वामी । स च श्रीप्रभवस्वामिप्रहितसाधुमुखाद्-'अहो कष्ट- महोकप्ट, तचं न ज्ञायते परम्'-इत्यादिवचसा यज्ञस्वम्भादधः धीशान्तिनाथप्रतिमादर्शनादवाप्तधर्मा प्रवज्य क्रमेण मनकनानः स्वसुतस्य निमित्तं दशवकालिकमत्रं कृतवान् । यतः- कृतं विकालवेलायां दशाध्ययनभितम् । दशवैकालिकमिति नाम्ना शास्त्रं बभूव तत् ।। अतः परं भविष्यन्ति प्राणिनो ह्यल्पमेधसः । कृतार्थास्ते मनकवत् भवन्तु त्वत्मसादतः॥ श्रुताम्भोजस्य किञ्जल्कं दशकालिके ह्यदः । आचम्याचम्य मोदन्तामनगारमधुव्रताः॥ इति संघोपरोघेन श्रीशयंभवसूरिभिः। दशकालिकनन्धो न संवने महात्मभिः । स चाष्टाविंशतिवर्षाणि २८ गृहस्थपर्याये, एकादश ११ आतपर्याये, त्रयोविंशतिः २३ युगप्रधानपर्याये; 'सर्वा- युषिष्टिवर्षाणि ६२ परिपाल्य श्रीवीरात् अष्टनवति ९८ वर्षातिक्रमे स्वर्गभाक् ।।

" वृह त्यो सालिक पट्टा व ली १५ 'जसभद्दो'त्ति-श्रीशय्यभवस्वामिपदे श्रीयशोभद्रस्वामी। स च द्वाविंशतिवर्षाणि २२ गृहे, चतुर्दशवर्षाणि १४ व्रते, पञ्चाशद्वर्षाणि ५० युगप्रधानपर्याये, सर्वायुः पडशीतिवर्षाणि ८६ परिपाल्य श्रीवीरात् अष्टचत्वारिंशद- धिकशते १४८ वर्षे अत्तीते स्वर्गभाक् ॥ श्रीयशोभद्रसरिभद्राणि दिशतु ॥ संभूइविजयसूरी सुभद्दवाहू य थूलभद्दो अ। अज्जमहागिरिसूरी अज्जसुहत्थी दुवे पट्टे ॥४॥ संभूतिविजयो द्विचत्वारिंशद्ववर्षाणि ४२ गृहे, चत्वारिंशद्वर्षाणि ४० व्रते, अष्टौ ८ वर्षाणि युगप्रधानपर्याये च "सर्वायुर्नवति ९० वर्षाणि परिपाल्य स्वंगभाक् ॥ श्रीभद्रबाहुस्वाम्यपि श्रीआवश्यकनियुक्तिविधाता, व्यन्तरीभूतवराहमिहरकृतसंघोपद्रववारकोपसर्गहरस्तवनेन 'प्रवचनस्य महोपकारं कृत्वा पञ्चचत्वारिंशत् ४५ वर्षाणि गृहे, सप्तदश १७ यते, चतुर्दश १४ युगप्रधानपर्याये चेति सर्वायुः पट्सप्तति ७६ वर्षाणि परिपाल्य श्रीवीरात् सप्तत्यधिकैकशतवर्षे १७० स्वर्गभाक् ।। 'थूलभद्दो अति-च पुनः श्रीसंभूतिविजय-भद्रबाहुस्वामिनोः पट्टे श्रीस्थूलभद्रस्वामी, कोशाप्रतिबोधजनित- यशोधरलीकृतासिलजगद सर्वजनप्रसिद्ध चतुर्दशपूर्वरिदामपश्चिमः । कचिव चत्वार्यन्त्यानि पूर्वाणि सूत्रतोऽधीता- नीत्यपि । स च त्रिंशद्वर्षाणि ३० गृहे, चतुर्विशति २४ व्रते, पश्चचत्वारिंशत् ४५ युगप्रधानपर्याये, सर्वायुर्नव- नवति ९९ वर्षाणि परिपाल्य श्रीवीरात् पञ्चदशाधिकशतद्वयवर्षे २१५ स्वर्गभाक् । श्रीवीरनिर्वाणाचतुर्दशाधिकवर्षशतद्वये २१४ आपाढाचार्यादव्यक्तनामा तृतीयो निहवः संजातः । श्रीस्थूलभद्रस्वामिपट्टे 'अञ्ज महागिरि' ति-श्रीआर्यमहागिरिमरिस-आर्यसुहस्तिमरिश्च इमौ द्वावपि गुरुभ्रातरौ पट्टधरौ । तत्र श्रीआर्यमहागिरिजिनकल्पतुलनामारुढो जिनकल्पिकतुल्यः, त्रिंशद्वर्षाणि ३० गृहे, चत्वारिंगत् ४० वते, त्रिंशत् ३० युगप्रधानत्ये सर्यायुर्वर्पशतमेकं १०० परिपाल्य वग्भाक् । द्वितीय आर्यसुहस्तिस्वामी येन पूर्व- भवे नमकीभूतोऽपि संप्रतिजीवः प्रव्राज्य त्रिखण्डाधिपतित्वं प्रापितः । तेन संपतिराज्ञा त्रिखण्डमिताऽपि मही जिन- प्रासादमण्डिता विहिता। साधुवेषधारिनिजवंठपुरुपपणेन अनार्यदेशेऽपि साधुविहारः कारितः। स चार्यसुहस्ती त्रिंशद्वाणि ३० गृहे, चतुर्विंशति २४ व्रते, पट्चत्वारिंशत् ४६ युगप्रधानत्वे, सर्वायुः शतमेकं १०० परिपाल्य श्री वीराद् एकनवत्यधिकशतद्वये २९१ स्वगभाक् । यद्यपि स्थूलभद्रस्य पञ्चदशाधिकशतद्वय २१५ वर्षे स्वर्गो गुर्वा- वल्यनुसारेणोक्तः । श्रीमहागिरि-सुहस्तिनौ तु त्रिंशत् ३० वर्षगृहस्थपर्यायौ शतवर्ष १०० जीविनी दुःपमा- संघस्तोत्रयन्त्रकानुसारेणोक्तौ । तथा च सति, आर्यमहागिरि-सुहस्ती श्रीस्थूलभद्रदीक्षितौ न संपद्यते । तथापि गृहस्थपर्याये वर्षाणि न्यूनानि, व्रतपर्याय चाधिकानि संभाव्यन्त इति । तथा श्रीसुहस्तिदीक्षितावन्तिसुकुमालमृति- स्थाने तत्सुतेन देवकुलकारितस्य महाकाल इति नाम संजातम् । श्रीवीरनिर्वाणाद् विंशत्यधिकवर्षशतद्वये २२० अश्वमित्रात् सामुच्छेदकनामा चतुर्थों निवः । तथाऽष्टविंशत्यधिकशतद्वये २२८ गगनामा द्विक्रियः पञ्चमो निहवः ॥ सुट्टियसुप्पडिबुद्धा कोडिअकाकंदिगा गणाभिक्खा । सिरिइंददिन्न-दिन्ना सीहगिरी वयरसामी अ॥५॥ 'सुट्टिय'त्ति-सुइस्तिनः पट्टे सुस्थित-सुप्रतिबद्धौ गुरुभ्रातरौ, कथंभूतौ कौटिक-कार्कदिको, कोटिशः सूरिमन्त्र- " ,

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विविधगच्छीय पावन्नीसंग्रह
जापान कौटिको, काकंद्यां नगर्यां संभवत्यात् कार्कदिको । कोटिको च तो काफैदिको च तो। 'गणामिक्स चि-
गंणस्य गच्छस्य अभिल्या नाम याम्यां तौ । श्रीसुधर्मवामिनोऽष्टौ सूरीन् यार निर्ग्रन्थाः साधयोऽनगारा इत्य-
र्थाभिधायिन्याख्या आसीत् । नबमे च पट्टे कौटिका इति विशेपार्थावयोधकं द्वितीयं नाम प्रादुर्भूतमिति
श्रीआयमहागिरिसुशिष्यो बहुल चलिरसहो यमलनातरी । सत्र नलिस्महाशप्पः स्वातिः, तत्त्वार्थादयो प्रन्या-
स्तत्कृता एव संभाव्यन्ते । नच्छिप्यः श्यामाचार्यः प्रशापनाकृत् । श्रीपीरात पट्सप्तत्यधिकशतत्रये ३७६ स्वर्गभाम् ।
तच्छिष्यः सांडिल्यो जीतमर्यादाकत् । एते दिसूत्रस्थाविसवल्यामुक्ताः सन्ति । परं सा पट्टपरम्पराज्येति बोध्यम् ।
'सिरिइंददिन'त्ति- श्रीसुस्थित-मुप्रतिबद्धयोः पट्टे इन्द्रदिनमरिः । अत्रान्तरे-श्रीवीरनिर्वाणात त्रिपश्चाशदधिक-
चतुःशतवर्षे ४५३ भृगुफच्छै आर्यखपुटाचार्य इति पट्टावल्याम् । प्रभावकचरिने तु-श्रीवीरान चतुरशीत्यधिकच-
तुम्त४८४व आर्यखपुटाचार्यः। तचं तु बहुश्रुतगम्यम् । तथा सप्तपष्टयधिकचतुःशत४६७वर्षे आर्य मंगुः, युद्धबादी,
पादलिप्तश्च । तथा गन्धहस्त्याचार्यसिद्धसेनोऽपि । येन भगवतोजपिन्या महाकालपासादे रुद्रलिङ्गस्फाटनं विधाय
कल्याणमन्दिरस्तवेन श्रीपार्श्वनाथविम्बं प्रकटीकृतम् , श्रीविक्रमादित्यच प्रतियोधितः । तदाज्यं तु श्रीवीरान सप्तत्य-
धिकवर्पतशंतचतुष्टये संजातम् ४७० १ तानि वर्षाणि चैवम्-
जं रयणि कालगओ अरहा तित्थंकरो महावीरो।
तं रथणि अवनियई अहिसित्तो पालओ राया ॥
सही पालयरनं ६० पणवनसयं तु १५५ होइ नंदा।
असयं मोरीआणं १०८ तीसच्चिय ३० पूसमित्तरस ॥
चलमित्तभाणमित्ता सही चरिसाणि चत्तनवाणे ।
तह गद्दभिल्लरनं तेरस १३ चरिसा सगस्स चउ ।।
'दिति-श्रीइन्द्रदिन्नमरिपट्टे श्रीदिनदरिः । 'सीहगिरिति-श्रीदिन्नमरिपट्टे श्रीसीहगिरिः ।
'वयरसामी अति-श्रीसीहगिरिपट्टे श्रीवनस्वामी । यो बाल्यादपि जातिस्मृतिभारु, नभोगमनविद्यया संघरक्षा-
कृत् , दक्षिणस्यां दिशि चौद्धराज्ये जिनेन्द्रपूजानिमित्तपुष्पाद्यानयनेन प्रवचनप्रभाषनाकृन्, देवामिवन्दितो दशपूर्ववि-
दामपश्चिमो वजशाखोत्पचिमूलम् । तथा स भगवान् षण्णवत्यधिकचतुःशतवन्तेि ४९६ जातः सन् , अष्टौ वर्षाणि
८ गृहे, चतुश्चखारिंशत् ४४ वर्षाणि प्रते, पत्रिंशत् ३६ वर्षाणि युगप्रधानपर्याय; सर्यायुरष्टाशीतिवर्षाणि परिपाल्य
श्रीधीरात् चतुरशीत्यधिकपञ्चशत ५८४ वर्षे वर्गभाक् । श्रीवज्रस्वामितो दशमपूर्व-चतुर्थसंहनन-संस्थानानां ध्युच्छेदः।
चतुःकुलसमुत्पत्तिपितामहमहं विभुम् । दशपूर्वनिधि चन्दे वनस्वामिमुनीश्वरम् ॥
अत्र श्रीमदायसुहस्ति-श्रीववस्वामिनोरन्तराले श्रीगुणसुन्दरमरिः १, श्रीकालिकाचार्यः २, श्रीस्फन्दिलाचार्यः३,
श्रीरेवतीमित्रमरिः ४, श्रीधर्मसूरिः ५, श्रीभद्रगुप्ताचार्यः ६, श्रीगुप्ताचार्यश्रेति ७, युगप्रधानसप्तकं बभूव ।
तत्र श्रीवीराद नयत्रिंशदधिकपञ्चशत ५३३ वर्षे श्रीआर्यरक्षितपरिणा श्रीभद्रगुप्ताचार्यों निमितः स्वर्ग-
मागिति पट्टावल्यां दृश्यते, परं दुःपमासंघस्तवयन्त्रकानुसारेण चतुश्चतारिंशदधिकपञ्चशत ५४४ वर्षातिकमे श्रीआर्य-
रक्षितमरीणां दीक्षा विज्ञापते ३ तथा सति उतपासरे निर्णन संभवतीत्येत बहुश्रुतगम्यमिति ।
तथाऽश्चत्वारिंशदधिकपञ्चशत ५४८ वर्षान्त त्रैराशिकजित् श्रीभद्रगुप्ताचार्यः स्वर्गभाक् ।
तथा श्रीवीरान्. सपादपञ्चशतवएँ ५२५ श्रीशत्रुक्षपोच्छेदः, सप्तत्यधिकपञ्चशत ५७० वर्षे जावडयुद्धार इति
माशार्थः॥५॥

वृह त्यो सा लि क पावली १७ सिरिवज्जसेणसूरी कुलहेऊ चंदसूरितप्पट्टे । सामंतभद्दसुगुरू वणवासरुई विरागेण ॥६॥ 'सिरिवजसेणत्ति-व्याख्या-श्रीवज्रस्वामिपट्टे श्रीवज्रसेनरिः । स च बहुदुर्भिक्षे श्रीवजखामिवचसा सोपार- कपत्तने गला जिनदत्तव्यवहारिगृहे ईश्वरीनाम्न्या तद्भार्यया लक्षपाकभोज्ये विपनिक्षेपविधानचिन्तनश्रावणे सति प्रातः सुकालो भावीत्युक्त्या विपनिक्षेपं निवार्य, नागेन्द्र १ चन्द्र २ निवृति ३ विद्याधराह्वान् ४ चतुरः सकुटुंबान् इभ्यपुत्रान् प्रवाजितवान् । तेभ्यः स्वस्वनामांकितानि चखारि कुलानि संजातानि । तेन श्रीवज्रसेनसूरिः कुलहेतुः, ऐपां चतुर्णा कुलानां मूलकारणमित्यर्थः । स च श्रीवनसेनमरिर्नव ९ वर्षाणि गृहे, पोडशाधिकशतं ११६ व्रते, त्रीणि ३ वर्षाणि युगप्रधानपर्याये । सर्वायुः साष्टाविंशतिशतं १२८ परिपाल्य श्रीवीरात् विंशत्यधिकपद्शत ६२० वर्षान्त स्वर्गभाग् । अत्र श्रीवजस्वामि-बजसेनयोरन्तराले श्रीमदायरक्षितरिः, श्रीदुर्वलिकापुष्यसूरिश्चेति युगप्रधानद्वयं संजातम् । तत्र श्रीमदार्यरक्षितसूरिः सप्तनवत्यधिकपञ्चशत ५९७ वर्षान्ते स्वर्गभागिति पट्टावल्यां दृश्यते । परमावश्यकवृत्यादौ श्रीमदार्यरक्षितम्ररीणां स्वर्गगमनानन्तरं चतुरशीत्यधिकपञ्चशत ५८४ वन्तेि सप्तमनिहवोत्पत्तिरुक्ताऽस्ति तेनैतद्भहु- श्रुतगम्यमिति । तथा नवाधिकपट्शत ६०९ वर्षान्ते श्रीवीरात् दिगम्बरोत्पत्तिः। 'चंदररितप्पट्टे'त्ति-तत् श्रीवत्रसेनसरिपट्टे श्रीचन्द्रसरिः । तस्माचन्द्रगच्छ इति तृतीयं नाम.प्रादुर्भूतम् । तस्माच क्रमेणानेकगणहेतवो भूयांसः सूरयो बभूवांसः। 'सामंत'त्ति-श्रीचन्द्रमरिपट्टे श्रीसामन्तभद्रसूरिः। स कथंभूतः शोभनो गुरुः, पुनः कथंभूतो वनवासरुचिः । वनवासे रुचिर्यस्य सः । केन वैराग्येण । स भगवान् पूर्वगतश्रुतविशारदो वैराग्यनिधिनिर्ममतया देवकुलवनादिवृक्ष- प्ववस्थानात् लोकैर्वनवासीत्युक्तः । तस्माचतुर्थ नाम वनवासीति प्रादुर्भूतमिति षष्ठगाथार्थः ।। सिरिवुद्धदेवसूरी पज्जोयण-माणदेव-मुणिदेवा । सिरिमाणतुंगपुज्जो वीरगुरू जयउ जयदेवा ॥७॥ 'सिरिबुड्ढ'त्ति-श्रीसामन्तभद्रसरिपट्टे श्रीवृद्धदेवमूरिः। स च वृद्धो देवसरिरिति ख्यातः । श्रीवीरात् पञ्चनवत्य- धिकपट्शत ६९५ वर्षातिक्रमे कोरंटके नाहडमन्त्रिप्रासादे प्रतिष्ठाकृत् । श्रीजजगमरिणा च सप्तत्यधिकपट्शत ६७० वर्षे सत्यपुरे नाहडनिर्मापितप्रासादे श्रीमहावीरः प्रतिष्ठितः। 'पोयण'त्ति-श्रीवृद्धदेवसरिपट्टे श्रीप्रद्योतनरिः। श्रीप्रद्योतनमरिपट्टे श्रीमानदेवसरिः । इमौ द्वौ पट्टधरौ कथं- भूतो, 'मुणि'त्ति-मुनिदेवौ रूपविशेपेण मुनीनां मध्ये देवाविव देयौ । तत्र श्रीमानदेवसूरेश्च मूरिपदस्थापनावसरे तस्य स्कन्धोपरि गुरुणा साक्षात् सरस्वती-लक्ष्म्यो दृष्टे । तदवसरे गुरुभिश्चिन्तितमस्य चारित्रभंशो भावीति विचार्य गुरखो विषण्णचेतसो बभूवांसः । तद्विज्ञाय श्रीमानदेवमरिभिः भक्तकुलभिक्षा सर्वाश्च विकृतयस्त्यक्ताः। तत्तपसा नड्डूलपुरे पद्मा १ जया २ विजया ३ अपराजिता ४ भिधाभिर्देवीभिः पर्युपास्यमानं दृष्ट्वा कथं नारीभिः परिवृतोऽयं सूरिरिति शंकापरायणः कश्चिन्मुग्धस्ताभिरेव शिक्षित इति । 'सिरिमाणतुंग'त्ति-श्रीमानदेवरिपट्टे श्रीमानतुंगमरिः । 'पुझो'त्ति-पूज्यः सर्वजनानामिति शेषः । येन 'भक्ता- मरस्तवनं कृत्वा वाण-मयूरपंडितविद्याचमत्कृतोऽपि वृद्धभोजक्षितिपतिः प्रतियोधितः । 'मयहरस्तव' करणेन धरणेन्द्रो- ऽपि वशीकृतः । 'भत्तिन्भरे' त्यादि स्तवनानि च कृतानि । प्रभावकचरित्रे तु प्रथमं श्रीमानतुंगचरित्रमुक्त्वा पश्चाच ३ विविधगठीय पावलीसंग्रह श्रीदेवसरिशिप्पथीप्रयोतनसुरिशिष्यश्रीमानदेवहरिप्रबन्ध उक्तः, परं तत्र नाशंका विधेपा। येन तत्र अन्मेऽपि प्रबन्धा व्यस्ततयोक्ता दृश्यन्त इति । 'चीरगुरु'त्ति-श्रीमानतुंगसरिपट्टे श्रीवीरगुरु:-श्रीचीरसरिर्जयतु । स च श्रीचीरात् सप्ततिसतशत ७७० वर्षे विक्रमतः त्रिशती ३०० नागपूरे श्रीनमिप्रतिष्ठाकत् । यदुक्तम्- नागपुरे नमिभुवने प्रतिष्ठाया महितपाणिसौभाग्यः। अभवद पीराचार्यत्रिभिः पतिः साधिके राज्ञः।। 'जयदेवो'ति-श्रीवीरसरिपट्टे श्रीजयदेवसरिः । देवाणंदो विकम-नरसिंह-समुद्द-माणदेववरा । विबुहप्पहाभिहाणो युगप्पहाणो जयाणंदो ॥८॥ 'देवाणंदोति-श्रीजयदेवमरिपट्टे श्रीदेवानन्दसरिः । अनान्तरे श्रीवीरान पञ्चचसारिंशदधिकाष्टशत ८४५ वर्षातिक्रमे बलमीभंगः । शीत्यधिकाष्टशत ८८२ वर्गविक्रमे चैत्यस्थितिः । पडशीत्यधिकशत ८८६ वर्षातिक्रमे ब्रह्मदीपिकाः। 'विक्रम चि-श्रीदेवानन्दसारिपट्टे श्रीविक्रमसरि । 'नरसिंह'त्ति-श्रीविक्रमसरिपट्टे श्रीनरसिंहयरिः । यतः-- नरसिंहसूरिरासीदतोखिलप्रन्धपारगो पेन । यक्षो नरसिंहपुरे मांसरति त्याजितः स्वगिरा। 'समुद्दति-श्रीनरसिंहसरिपट्टे श्रीसमुद्रसरिः । स च किंलक्षण:- खोमाणराजकुटजोऽपि समुद्रसूरिंग शशासं किल यः प्रवणप्रमाणी। जित्वा तदा क्षपणकान् स्ववश वितेने नागदे भुजगनाथनमत्यतीर्थम् ।। 'माणदेव'-त्ति । श्रीसमुद्रसरिपट्टे पुनः श्रीमानदेवसरिः । एते पूर्वोक्ता गुरवो बराः प्रधाना इत्यर्थः । स श्रीमान- देवः कथंभूतः? विद्यासमुद्रहरिभद्रमुनीन्द्रमिन्नं सूरिभूच पुनरेव हि मानदेवः । मान्द्यात् प्रयातमपि योऽनघसूरिमन्त्रं लेभेऽम्बिकामुग्वगिरा तपसोज यन्ते ।। श्रीवीरात् वर्षमहले १००० गते सत्यमित्राचार्य पूर्वव्यवच्छेदः । अत्र च श्रीनाग्रहस्ती १ रेवतीमित्रो २ ब्रह्मा- ३ नागार्जुनो ४ भूतदिन्नः ५ श्रीकालिकमूरिश्चेति ६ पद युगप्रधाना यथाक्रम श्रीवज्रसेन-सत्यमित्रयोरन्तरालकालव- तिनो बोध्याः । एषु च युगप्रधानः शक्राभिनन्दित्तपादपाः प्रथमानुयोगसूत्राणां सूत्रधारकल्पः श्रीकालिकाचार्यगु- स्वरः । तः श्रीकालिकाचार्यैः श्रीवीरात् त्रिनयत्यधिकनवशत ९९३ वर्षाविक्रमे "अंतगवि य से कम्पह, नो से कप्पड़ तरयणि उवाइणा विस्तए"ति श्रीवीरवचनात् पंचमीतचतुर्पा पर्युपणापर्यानीतमिति । श्रीबीरात पंचपंचाशदधिक- सहस २०५५ वर्षातिकमे, विक्रमात पंचाशीत्यधिकपंचात ५८५ वर्षातिक्रम, पाकिनीमनुः श्रीहरिभद्रवरिः स्वर्ग- भाक् । तथा श्रीवीरात् पंचदशाधिककादशशत १११५ वर्षे श्रीजिनभद्रगुणियुगप्रधानः । जिनमद्रीयध्यानयतकादेई. रिभद्रसूरिभितिकरणाद्भिन्न इति पट्टायल्यां दृश्यते, परं श्रीजिनभद्रगणिचतुरुत्तरशत १०४ वर्षायुष्कस्तेन हरि- मद्रमूरिकालेऽपि संभवात् , नाशंकावकाश इति । 'वियुद्दति-श्रीमानदेवरिपट्टे श्रीवियुधप्रभयारिः । 'जुगप्पदाणो'चि-पुगप्रधान इव युगप्रधानः । 'जयाणद' ति-श्रीविबुधप्रभारिपट्टे श्रीजयानन्दसरिः। . - वृह त्यो सालिक पहा व ली सिरिरविपहसूरिंदो जसदेवो देवयाहिं दीवंतो। पज्जुन्नसूरि पुण माणदेव-सिरिविमलचंदगुरू ॥९॥ 'सिरिरवि' त्ति-श्रीजयानन्दरिपट्टे श्रीरविप्रभसरिः । स च श्रीवीरात् सप्तत्यधिककादशशतव ११७०, विक्र- मात् सप्तशतववर्षे ७०० नड्ड्लपुरे श्रीनेमिनाथप्रासादप्रतिष्ठाकत् । तथा च श्रीवीरात् नवत्यधिकैकादशशत ११९० वर्षे श्रीउमास्वातिवाचको युगप्रधानः । 'जसदेवो' त्ति-श्रीरविप्रभसारिपट्टे श्रीयशोदेवसरिः । कथंभूतः ? 'देवयाहिं'ति-देवताभिः मन्त्राधिष्ठात्रीमिः दीप्यन् दीप्यमान इत्यर्थः। अत्र च श्रीविरात् द्विसप्तत्यधिकद्वादशशतवर्षे १२७२, विक्रमात् दूधुचराष्टशतवर्षे ८०२ अणहिल्लपुरपचन- -स्थापना वनराजेन कृता । तथा च सप्तत्यधिकद्वादशशत १२७० वर्षे श्रीवीरात , विक्रमकालाच अष्टशत ८०० वर्षे भाद्रपदशुक्लपतीयायां वप्पभट्टिसरेर्जन्म। येन आमराजा प्रतियोधितः। स च श्रीवीरात् पंचपष्टयधिकत्रयोदशशव १३६५ वर्षे, विक्रमात् पंचनवत्यधिकाष्टशत ८९५ वर्षे भाद्रपदशुक्लपष्ठयां वंगभाक् । 'पज्जुन्न'त्ति-श्रीयशोदेवसरिपट्टे श्रीप्रद्युमसूरिः। 'पुण माणदेवत्ति-श्रीप्रद्युम्नमरिपट्टे पुनरपि तृतीयः श्रीमानदेव- सूरिस । 'उपधानवाच्य ग्रन्थविधाता। 'सिरिविमल'त्ति-श्रीमानदेवमरिपट्टे श्रीविमलचन्द्रगुरुतत्त्वोपदेष्टा मरिरित्यर्थः । उज्जोयणो य सूरी वडगच्छो सबदेवसूरिपहू । सिरिदेवमूरि तत्तो पुणो वि सिरिसव्वदेवमुणी ॥१०॥ 'उजोपणो यत्ति-उद्योतनश परिः । श्रीविमलचन्द्रररिपट्टे उद्योतनमूरिः । कथंभूतः १ 'वडगच्छो'ति-वटाद्ग- च्छो यस्यासौ वडगच्छ!, बृहद्गच्छो वा । स श्रीउद्योतनसरिरन्यदार्चुदाचलयात्रार्थ पूर्वावनीतः समागतः। आगच्छन् ढे(ट)लीग्रामस्य सीग्नि पृथोर्वटस्य छायायामुपविष्टो निजपट्टोदयहेतु शुभमुहूतं विज्ञाय श्रीवीरान चतुःषष्ट्यधिक- चतुर्दशशत १४६४ वर्षे, विक्रमात् चतुर्नवत्यधिकनवशत ९९४ वर्षे निजपट्टे श्रीसर्वदेवसरिप्रभृतीनष्टौ सूरीन् स्थापि- तवान् । केचित्तु सर्वदेवसरिमेकमेव वदन्ति । वटस्याधः मरिपदकरणात् वडगच्छ इति पञ्चमं नाम लोकप्रसिद्ध- मिति । तथा प्रधानशिष्यसन्तत्या ज्ञानादिगुणैः प्रधानचरितैश्च बृहत्वाद् बृहद्गच्छ इति वा । 'सव्वदेव'त्ति-श्रीउद्योतनसुरिपट्टे श्रीसर्वदेवसरिप्रभुः । स च गौतमवत् मुशिष्यलब्धिमान् । विक्रमाद् दशाधि- कदशशतवर्षे १०१० रामसैन्यपुरे श्रीऋषभचैत्ये श्रीचन्द्रप्रभप्रतिष्ठाकृत् । चन्द्रावत्या निर्मितोत्तुङ्गप्रासाद कुंकुणमत्रिणं स्वगिरा प्रतिवोध्य प्रावाजयत् । यदुक्तम्- चारित्रशुद्धिं विधिवजिनागमाद विधीय भव्यानभितः प्रयोधयन् । चकार जैनेश्वरशासनोन्नति यः शिष्यलब्ध्याभिनवोनु गौतमः ॥ भूपाशाग्रे शरदां सहस्रे १०१० यो रामसैन्यापुरे चकार । नामेयचैत्येऽष्टमतीर्थराजविम्वप्रतिष्ठा विधिवत् सदर्ग्यः ।। चंद्रावतीभूपतिनेत्रकल्पं श्रीकुंकुणं मन्त्रिणमुचऋद्विम् । निर्मापितोत्तुङ्गविशालचैत्यं योऽदीक्षयच्छुद्धगिरा प्रयोध्य ॥ तथा विक्रमाद् एकोनत्रिंशदधिकदशशतवर्षे १०२९ धनपालपण्डितेन देशीनाममाला कृता । विक्रमात् पण्ण- वत्यधिकसहस्र १०९६ वर्षे श्रीमदुत्तराध्ययनबृहट्टीकाकर थिरापद्रीयवादिवेतालश्रीशान्तिसरिः स्वर्गभार ।

विविधगच्छीय पधावलीसंग्रह 'सिरिदेवसरि तत्तोति-ततः श्रीसर्वदेवसरिपट्टे श्रीदेवसरिः । स च श्रीदेयसरी रूपश्रीतर्जितरतिपतिर्भूपप्रदत्त- पिरुदधारी। 'पुणो वि सिरिसबदेवमुणीति-श्रीदेवरिपट्टे पुनरपि श्रीसर्वदेवमुनिः सूरिरित्यर्थः । जेण य अट्ठायरिया समयसुत्तत्वदायगा ठविआ। तत्थ धणेसरसूरी पभावगो वीरतित्थस्त ॥११॥ 'जेणयनि-येन श्रीसर्वदेवसरिणा, 'अट्ठायरिय'ति--अष्टौ आचार्याः । कथंभूताः ? 'समयसुत्तत्यति-नमयः सिद्धान्तः, तस्य सूत्रार्थी तौ ददन्तीति समयसूत्रार्थदायकाः । 'ठरिय-त्ति स्थापिताः । 'तत्यति-तत्र तेपु आचार्यपु, 'घणेसर'ति-धनेश्वरसरिः, 'वीर'ति-श्रीवीरतीर्थस्य प्रभावकः । श्रीपीरतीर्थस्य प्रभारकलं दर्शयति- खवणाणं सत्तसया एए च्चिअ दिक्खिआ सहत्थेणं । चित्तपुरे जिणवीरो पइडिओ चित्तगच्छो य ॥१२॥ 'सवणाणं ति-क्षपणका दिग्नाससो निन्हनाः, तेपां सप्तशतानि; 'एगुत्ति-एकनार स्वहस्तेन दीक्षितानि । ते च नम्नाटाः स्वमतपक्षपातयुग्रहाः चैत्रपुरे राजसभाया श्रीधनेश्वरसरिभिः सार्धं पणीकृत्य निरदितुमागताः । ते सर्वे श्रीगुरुभिः सयुक्त्या जिताः, समयामृतोपदेशेन बोधिताच । तदा ते सर्वे शिप्यीभावं प्रतिपद्य श्रीगुरूणामन्तिके स्थिताः। श्रीगुरुभिस्तेषां श्वेताम्बरीदीक्षाप्रदानेन यहूपारितम् । एतत्सर्व चरपुरे जातम् । तस्मिथ चत्रपुरे श्रीमहावीर- प्रतिष्ठा कृता । तर चर इति नामा गच्छोऽपि प्रतिष्ठितः ॥ तत्थ सिरिचित्तगच्छे तओ गुरू भुवणचंदतप्पट्टे । जावजीवं अंबिलतवकरणाभिग्गहा उग्गा ॥१३॥ 'तत्थै' ति-तत्र तसिन् श्रीधनेश्वरमरिस्थापिते श्रीचरनानि गच्छे, ततः श्रीधनेश्वरसूरिपट्टालंकरणश्री- भुवनचन्द्रसरिः । तथेह श्रीधनेश्वरसरि-भुवनचन्द्रसूर्यन्तरालकाले विक्रमात् पंचत्रिंगदाधिकादशशत ११३५, केचिदेकोनचत्वारिंशदधिरंगादाशते ११३९ नागवृत्तिकृत श्रीअमयदेवमरिः स्वर्गभार । तथा कृयपुरगच्छीय- चैत्यवासी जिनेश्वरमरिशिप्यो जिनवल्लभगणिधिरकटे पठं कल्याण प्ररूपितरान् । आ च एकोनपष्ट्यधिककादश- शनवर्षे ११५९ पौर्णिमीयरमतोत्पत्ति'। तत्प्रतियोधाय च श्रीमुनिचन्द्रसरिभिः 'पाक्षिकमप्ततिका' कृतेति । श्रीमुनिचन्द्रसूरिशिष्यश्रीवादिदेवशरिभिः श्रीअणहिलपुरपत्तने जयसिंहदेवराजस्पानेकविहअनलितायां सभायां चतुरशीतिवादलन्धजययास नमाटचन पचिनं बादलिप्तुं दुमुदचन्द्राचार्य वाद निर्जित्य श्रीपत्तने दिगम्बरप्रवेशो -निवारितोऽद्यापि प्रतीतः । तथा विक्रमात् चतुरधिकद्वादशशतवर्षे १२०४ फलद्धिग्रामे चैत्य विम्बयोः प्रतिष्ठा कृता । तत्तीर्थ तु संप्रत्यपि प्रसिद्धम् । तथा आरामणे च श्री नेमिनायप्रतिष्ठा कृता । तथा चतुरशीतिसहस ८४००० प्रमाणः 'स्याद्वादरत्नाकर' नामा प्रमाणग्रन्धः कृतः । येभ्यश्च यन्नाम्ना ख्यातिमचतुर्विशतिपरिशापा यभूत । एषां च श्री- वादिदेवसुरीणां पित्रमात् चतुनिशदपिकादशशत ११३४ वर्षे जन्म, द्विपंचाशदधिकादशशत ११५२ वर्षे दीक्षा, चतुःसप्तयधिक ११७४ सरिपदस् । पदरिंशत्यधिकदादाशन १२२६ वर्षे धारणादिसप्तमीगुरौ सर्गभार । तत्समये पूर्णतालगन्तीयश्रीदेवचन्द्ररारिशिष्परिकोटिग्रन्थका 'कलिकालसर्वश' ख्यातिमान् श्रीहेमचन्द्ररासि । तस्य विक्रमात् पंचचत्वारिंशदधिर कादशशन ११४५ वर्षे फार्नियशुदिपणिमायां जन्म, पंचाशदधिकैकादशशते ' १ बृहत्पो सा लि क पट्टा व ली ११५० व्रतम् , पट्पष्टेयकादशशते ११६६ सूरिपदम् , एकोनत्रिंशदधिकद्वादशशते १२२९ वर्षे स्वर्गः। तत्समये विक्रमात् चतुरधिकद्वादशशत १२०४ वर्षे खरतरोत्पत्तिः । तथा विक्रमात् त्रयोदशाधिकद्वादशशत १२१३ वर्षे अंचलिकमतोत्पत्तिः । विक्रमात् पत्रिंशदधिकद्वाददाशत १२३६वर्षे सार्द्धपौर्णमीयकोत्पत्तिः। विक्रमा- पंचाशदधिकद्वादशशत १२५०वर्षे आगमिकमतोत्पत्तिः । यदुक्तं 'गुरुतचपदीपे- हुँ नन्देन्द्रियरुद्र(११५९)कालजनितः पक्षोऽस्ति राकांकितो वेदाभ्रारुण(१२०४)काल उष्ट्रिक भवो, विश्वार्ककाले(१२१३)ऽश्चलः । पठ्यपु च (१२३६) सार्द्धपौर्णिम इति, व्योमेन्द्रियार्के (१२५०) पुन: त्रिस्तुतिकोऽक्षमंगलरचौ(१२८५)गाढक्रियास्तापसाः ॥ तथा च जीर्णपत्रे गाथाचतुष्कम्- एगारसए पुण्णे एगुणसहिमि विकमाओ गए। वडगच्छाओ पुषिणम जाया चंदप्पहकसाया। वारसवाससएसु विकमकालाओ जलहिअहिएसु। जिणवल्लहकोहाओ कुचरयगणाउ खरयरया ॥ बारसचउदुत्तरए जाया उ पुण्णिमाओ अंचलया। धारसपंचासंमि अंचलिआओ अ आगमिआ!! यारह छत्तीसंमि पुण्णमीआओ अ साहपुण्णमीआ। । बारसपंचासिमि तवागणो देवभद्दाओ। तथा च श्रीवीरात् द्विनवत्यधिक पोडशशतवर्षे श्रीशत्रुजये पाहडोद्धारः । 'जावजी'ति-श्रीभुवनचन्द्रसरिपट्टे वैराग्यरसिकसमुद्राः श्रीदेवभद्रगणिगुरवः। कथंभूताः ? चारित्रकालाद् आजीवितं यावत्, 'अंबिल'ति-पष्टतपःपारणके आघामाम्लतपःकरणाभिग्रहो येपां ते । तथा पुनः कथंभूताः 'उग्गा'-उग्रविहारिणः। 'आबालति-बालाश्च गोपाश्च वालगोपाः, वालगोपान् आमर्यादिकृत्य आबालगोपं प्रसिद्धा सर्वत्र विख्याता शुद्धा निर्मला संप्राप्ता 'तपागण' इत्यभिख्या नाम यः ते आवालगोपसुप्रसिद्धसंप्राप्ततपोगणाभिख्याः। ते च के इत्याह- 'सिरित्ति-श्रीदेवभद्रगुरवः, देवानां पूज्यानां मध्ये भद्रजातीभद्रा इव भद्रा देवभद्राः, श्रीमन्तश्च ते देवभद्राः, अथवा श्रीमन्तश्च ते देवाश्च पूज्याश्च श्रीदेवाः । पूर्वर्पयो गौतमादयस्तद्वद्भद्राः । श्रीदेवभद्राश्च ते गुरवश्व श्रीदेवभद्रगुरवः । बहुवचनं पूज्यत्वात् । ते च भगवन्तः श्रीभुवनचन्द्रसूरीणां शिष्याः,श्रीजैनसमयामृतवारापारपारीणाः, स्वगणे किंचित् क्रियाशैथिल्यमवलोक्य श्रीगुर्माज्ञया संवेगरंगचेतसाः सत्कियोद्धारं चक्रिरे । क्रियोद्धारदिनमारभ्य यापजीयं पष्ठतपः- पारणके आचामाम्लतपःकरणाभिग्रहधारिणो गणित्वमापन्नाः । प्रवचने सांगेधीतीगणिस्तद्भावो गणित्वम् । अथवा गणो ऽस्यास्तीति गणी तद्भावो गणित्वमिति । इतश्च वडगच्छीयश्रीमणिरत्नसूरिशिष्याः श्रीजगचन्द्राचार्याः क्रियाशिथिलं स्वगणं विहाय श्रीदेवभद्रगुरुं सर्वोत्कृष्टक्रियाधरगण्यर्थगरिष्ठं संवेगसागरं ज्ञात्वा तेषां सविधमुपागत्य श्रीदेवभद्रगणि गुरुत्वेन प्रतिपद्य तेभ्यश्चारित्रोपदां गृहीत्वा, तत्समीप एव स्थिताः । श्रीदेवभद्रगुरुभिरपि स्वपदे स्थापिताः । उभ- योरपि गाढक्रियां तपोपाहुल्यं दृष्ट्वा सहर्लोकरेते तपा इति विरुदं प्रसिद्ध प्रदत्तम् । एतच्च विक्रमात् पंचाशीत्यधिक द्वादशशतवर्षे श्रीविद्यापुरनगरे भूपसभासमक्षं तपाविरुदं लेभिरे । , १ . २२ विविधगल्छीय पडावलीसंग्रह 'जगचंदोति-श्रीजगचन्द्रसरिरपि 'हीरलाजगचन्द्रयार' इति ख्यातिभागभूत् । तथा च निग्रंथ १, कौटिक २, चन्द्र ३, बनवासि ४, वडगच्छापरनामबृहद्गच्छ ५, तपा ६ इति पण्णां नाम्नां प्रतिहेतको गुरवः क्रमेण-श्रीसुधर्म- स्वामी १, श्रीसुस्थित २, श्रीचन्द्र ३, श्रीसामन्तभद्र ४, श्रीउद्योतन ५, श्रीदेवभद्र-जगचन्द्र ६ नामाना स्युरिति । देविंद-विजयचंदा गुरुबंधू खेमकित्तिकिचिधरो । गुरुहेमकलसपुज्जो रयणायरसूरिणो सच्चा ॥१५॥ 'देविंदत्ति-श्रीदेवेन्द्रसरि-श्रीविजयचन्द्रसूरी उभावपि श्रीजगचन्द्रसरीणां गुरुनातरौ, श्रीदेवभद्रगुरोः शिष्य- खात् । एतचोक्तं श्रीवृहत्कल्पवृत्तिप्रशस्तौ- श्रीजनशासनन भस्तलतिग्मरहिमः श्रीसद्मचन्द्रकुलपविकाशकारी। सज्ज्योतिरावृतदिगंबरडंयरोऽभूत् श्रीमान् धनेश्वरगुरुः प्रथितः पृथिव्याम् ।। श्रीमचैनपुरैकमण्डनमहावीरप्रतिष्ठाकृतस्तस्माचैत्रपुरनयोधतरणे श्रीचैत्रगच्छोऽजनि । तत्र श्रीभुवनेन्दुसूरिसुगुरुभूभूपणं भास्कर: ज्योति सद्गुणरत्नरोहणगिरि कालक्रमेणाभवत् ॥२ तत्पादाम्बुजमण्डनं समभवत् पक्षद्वयांच्छुद्धिमान नीरक्षीरसहक्षदूपणगुणत्यागग्रहैकवतः । कालुष्यं च जडोद्भवं परिहरन दूरेण सन्मानसस्थायी राजमरालयद्गणिवरः श्रीदेवभद्रप्रभुः ॥ ३ शस्याः शिष्यानपस्तत्पदसरसिरुहोत्संगशृङ्गारभृङ्गाः विश्वस्तानसंगाः सुविहितविहितोत्तुगरगा बभूवुः । तत्राय: सपरित्रानुमतिकृतमतिः श्रीजगचन्द्रसूरिः श्रीमान देवेन्द्रसूरि सरलतरलसचित्तवृत्तिद्वितीयः ।। तृतीयशिप्याः श्रुतवारिचाया परीपहाक्षोभ्यमनासमाधयः । जपन्ति पूज्या विजयेन्दुसूरयः परोपकारादिगुणोघभूरयः ॥ प्रौढं मन्मथपार्थिवं त्रिजगतीनं विजित्येयुपां, येषां जैनपुरे परेण महसा प्रक्रान्तकान्तोत्सवे । स्थैर्य मेरुरगाधतां च जलधिः सर्वसहत्वं मही, सोमः सौम्यमहर्षतिः किलमहत्तेजः कृतं प्राभृतम् ।। चापं वापं प्रवचनवचोचीजराजी विनेय- क्षेचबाते सुपरिमिलिते शब्दशास्त्रादिसारैः। यैः क्षेत्रहः शुचिगुरुजनानायवाक्सारणीभिः सित्या तेने सुजनहृदपानन्दिसम्झानसस्पन् । यैरप्रमत्तः शुभमन्त्रजापैतालमाधाय कलि स्ववश्यम् । अतुल्यकल्याणमयोत्तमा सत्पुरुषः सत्वधनैरसोधि ।। ज्योत्स्नामन्जुलया यया धवलितं विश्वम्भरामण्डलं, या निशेिपविशेषविज्ञजनताचेतश्चमत्कारिणी। ८ वृह त्यो सालिक पावली २३ तस्याः श्रीविजयेन्दुसूरिसुगुरोनिकृत्रिमाया गुण- श्रेणेः स्याद्यदि वास्तवस्तवकृतौ विज्ञः स वाचांपतिः॥ २ ३ श्रीदेवेन्द्रसरिभिरपि धर्मरत्नप्रकरणवृत्तिप्रशस्तौ- विष्णोरिव यस्य विभोः पदत्रयी व्यानशे जगमिविलम् । सद्धर्मरत्नजलधिः स श्रीवीरो जिनो जयतात् । कुंदोज्ज्वलकीत्तिभरैः सुरभीकृतसकलविष्टपाभोगः॥ शतमखशतविनतपदा श्रीगौतमगणधरः पातुः ।। तदनु सुधर्मस्वामी जंबू प्रभवादयो मुनिवरिष्ठाः । श्रुतजलनिधिपारीणा भूयांसः श्रेयसै सन्तु ॥ क्रमशश्चित्रावालकगच्छे कविराजरांजिनभसीव । श्रीभुवनचन्द्रसूरिगुरुगदियाय प्रवरतेजाः ॥ तस्य चिनेयः प्रशमैकमन्दिरं देवभद्रगणिपूज्यः। शुचिसमयकनकनिकपो यभूव भूविदितभूरिगुणः।। तत्पादपद्मभृङ्गा निस्संगाश्वङ्गसंवेगाः । संजनितशुद्धयोधा जगति जगचन्द्रसूरिचराः ।। तेपामुभौ विनेयो श्रीमान् देवेन्द्रसूरिरित्यायः । श्रीविजयचन्द्रसूरिद्वितीयकोऽद्वतकीर्तिभरः ।। स्वान्ययोरुपकाराय श्रीमद्देवेन्द्रसूरिणा। धर्मरत्नस्य टीकेयं सुखबोधा विनिर्ममे ] श्रीहेमकलशवाचकपण्डितवरधर्मकीतिमुख्यबुधैः । स्वपरसमयैककुशलैस्तदैव संशोधिता चेयम् ॥ ५ पुनः श्रीदेवेन्द्रमरिविरचितश्राद्धदिनकृत्यवृत्तिप्रशस्तौ- जीयाट्रीवर्धमानस्य तीर्थ सुरसरित्सखम् । पवित्रं विबुधैः सेव्यं पङ्कतृष्णापहं च यत् ॥ १ गौतमादनु तत्राभूत श्रुतगङ्गाहिमाचलः । आद्यो युगप्रधानानां सुधर्मा गणभृद्वरः॥ २ ततश्च केवली जंबू प्रभवः श्रुतकेवली । शय्यंभवो यशोभद्रः संभूतिविजयोऽपि च ॥ ३ ततोऽभूद्वज्रसेनर्विज्रशाखा ततोऽप्यभूत । गणस्य कौटिकाभिख्या कुलं चन्द्रकुलं तथा ॥ ४ तत्र क्रमेण चित्रावालकगच्छो बभूव भूविदितः। श्रीभुवनचन्द्रसूरिस्तनाभूद्भव्यपद्मरविः ॥५ 'तच्छिप्यरत्नमभवद् भुवनप्रसिद्धाश्चारित्रपात्रमग्विलश्रुतपारगाप्ताः। गाम्भीर्यमुख्यगुणरत्नमहासमुद्राः श्रीदेवभद्रगणिमिश्रसुनामघेयाः ॥ तत्पादाम्बुजरोलम्यावपुष्यपि.........। अभूवन भूरिभाग्याढ्याः श्रीजगचन्द्रसूरयः।। देवेन्द्रसूरिसंज्ञस्तेपामायो चभूव शिप्पलवः श्रीविजयचन्द्रसूरिस्तथा द्वितीयो गुणैस्त्याद्यः ॥९ ५ ७ ८ 'विविधगधीय पावलीसंग्रह 7 २ चक्रे भव्यावयोधाय संप्रदायात्तथागमात् । सन्मांद्धदिनकृत्यस्य वृत्तिदेवेन्द्रसूरिभिः॥ . १० 'श्रीविजयचन्द्रसूरिप्रमुग्वैविद्वद्गणैर्गुणगरिष्टैः । स्वपरोपकारनिरतैस्तदैव संशोधिता चेयम् ।। ११ प्रथमांप्रतिमप्रतिमप्रतिहस्तितत्रिदशसूरिः।श्रीहेमकलशनामा सदुपाध्यायो लिलेखास्याः॥१२ श्रीगुणरत्नमरिकृतक्रियारत्नसमुचयप्रशस्तावप्येवम्- विधोचैत्रगणाम्भोधौ तपोज्ञानक्रियानिधेः वाचकानामलंकारात् देवभद्गणीश्वरात ।। २७. चारित्रमुपसंपद्य यावज्जीवमभिग्रहात् । आचामाम्लतपस्तेनुस्तपागच्छस्ततोऽभवत् ॥ २८ तत्पद्योदयभूधरे शशिरवी वागीश्वरी मन्दरे सेनान्यौ वृपभूपतेः शमरमाकर्णावंतसावुभौ । श्रीदेवेन्द्रमुनीश्वरोऽमयमना आद्यो द्वितीयः पुनः सूरीशो विजयेन्दुरुत्तरगुणः सेव्यावभूतां सताम् ।। २९ इति बृहत्कल्पचिप्रशस्त्यनुसारेण श्रीविजयचन्द्रसरिप्रभृतयत्रयोऽपि सतीर्थ्याः, श्रीदेवभंद्रगुरूणां शिष्यत्वा- दिति । ग्रन्यत्रयप्रशस्त्यनुसारेण तु देवेन्द्र-विजयचन्द्रौ गुरुभ्रातरावित्यर्थः। अथ श्रीदेवभद्र-श्रीजगचन्द्रौ द्वावपि गुरू स्वर्गभाजावभूताम् । इतव तत्समये श्रीदेवेन्द्रसूरयो. मालपके विच- रन्ति स्म, श्रीविजयचन्द्रस्वरयस्तु स्तंभतीर्थे सन्ति स्म । तदा श्रीदेवेन्द्रसरीणामाकारणं प्रेपितम् । ते तु किमपि कारण- वशामायाताः । ततः श्रीस्तंभतीर्थे साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकाभिश्चतुर्विधसघन श्रीविजयचन्द्रगुरुं गुणगणगरिष्ठं पधरयोग्य विज्ञाय गणधरपदे स्थापयाँचके। तच्छ्रुत्वा श्रीदेवेन्द्ररयोऽपि स्तंमतीधे समागताः । पृथस्थाने , स्थिताः । तत्र श्रीहेमकलशादयो गीतार्थाः श्रीविजयचन्द्रमरिसमुदायस्य 'वृद्धशालिका' इत्युक्तम् देवेन्द्रहरिनिथितस्य शालिका' इति ख्यातिः। श्रीविजयचन्द्रसरिव्यतिकरस्त्वम्-पूर्व माणसानाम्नि नगरे निवासी अनेकमद्धिवृद्धिविलासी श्रीओसवंशश्रृंगार- दु:स्थितजनाधार-मंत्रिश्रीगजराजकुलांबरभास्करः श्रीबीरधवलनुपतिराजव्यापारी पंचशतनामाधिकारी श्रीजिनधर्मवा- सितान्तःकरणो दीनजनसमुद्धरणः श्रीसम्यक्त्वमूलस्थूलद्वादशव्रतधारी सर्वजनोपकारी निरवद्यविद्यापिशालो मन्त्रीश्वर- श्रीविजयपालः, एकस्मिन्नवसरे श्रीदेवभद्रगुरुं विद्यापुरे विचरन्तं श्रुत्या पंचविंशतिनगमपरिवृतोऽनेकपरिकरयुतः श्रीविद्यापुरे श्रीगुरुसमीपं चतुर्दशीपौषधोपचासग्रहणार्थमाजगाम । तत्र श्रीगुरुसविध सनैगमः पौपधवतं जग्राह । तदिने श्रीगुरूणां देशनां श्रुत्वा वैराग्यरसपूर्णचेताः परमसंवेगमापन्नः । प्रभाते श्रीगुरवो विज्ञप्ताः-पूज्या मम संसारसागरं निस्तारयध्वम् । गुरुमिरुक्तम्-यथासुखम् । मत्रीश्वरोऽपि पौषधं पारयित्वा स्वगृह समागत्य, मत्रिवस्तुपालस्य सर्वा- धिकारलेखकं दचा महता महेन निद्रव्ययपुरस्सरं मनिश्रीवस्तुपालविहितसंयमोत्सव पंचविंशति नैगमः सह सपुत्र- कलत्रः श्रीदेवभद्रगुरुहस्तेन संयम ग्रहीतवान् । श्रीगुरुसमीपे सुखेनानेकशास्त्राभ्यासेन गीतार्थत्वमासदत् । तद् दृष्ट्वा श्रीवस्तुपालमहामात्योऽत्यर्थं जहर्ष । श्रीमत्रिभिः श्रीदेवभद्र-जगचन्द्रगुरुवरौ विज्ञप्ती श्रीविजयचन्द्रपेरहमाचार्य- पंदोत्सवं चक्रे (करोमि)। श्रीगुरुभिरपि शिष्यद्वयं सरिपदयोग्यं विज्ञाय श्रीदेवेन्द्र-जियचन्द्राचायौं स्थापितौ । बहु- 'लघुद्रव्यव्ययपुरस्सरं महोत्सवं तु मत्रिवस्तुपालः कृतवानिति वृद्धाः । स्तंभतीर्थे चतुःपथस्थितकुमारपालविहारे धर्म- देशनायामष्टादशशत १८०० मुखपत्रिकाभिः मत्रिवस्तुपालादयः श्रीगुरूणां वंदनकप्रदानेन गाढक्रियाबहुमान वहन्ति- स्म । अथ च येन न्यूनाधिकं वदन्ति तेषां वार्ता त एव जानन्ति । वयं तु उभयेषां गुणरागिणः स्म, वृद्धाम्नाया- दायातव्यतिकरलेखकाः । तत्त्ववेदिनस्तु केवलिन इति ।

बृहस्पो सा लि क पट्टा व ली 'खेमकित्ति'ति-श्रीविजयचन्द्रवरीणां पदे श्रीखेमकीर्तिमरिः । कथंभूतः कीर्तिधरः, सर्वत्र विख्यातकीर्तिः। द्विचत्वारिंशत्सहस्रप्रमाणां श्रीबृहत्कल्पजिनागमस्य टीकामकार्षीत् । तेन चतुर्दिक्षु व्याप्तयशाः। तदुक्तम्- तच्छिष्यः सुरवृक्षोऽभूद् विनेयार्थप्रदानतः । राद्धान्तवारापारस्य पारगः पूज्यपूजितः॥ १ क्षेमकीर्तिगुरुर्मत्या विनेयीकृतवाक्पतिः । बृहत्कल्पसदाप्तोक्तश्चक्रे टीकां सुविस्तराम् ॥ तथा श्रीक्षेमकीतिसूरिभिरेकविंशतिकृत्वो भूपसभासमक्षं परवादिनो जिताः । उक्तं च- अनवद्यवादविद्यावैशारद्याद् भृतं वचो यस्य । श्रुत्वाऽप्यखर्वगर्व त्यजन्ति वादीन्द्रवृन्दानि ॥१ तथा श्रीविजयचन्द्रसरीणां शिष्यद्विकमाचार्यपदधरम् , गणधरस्तु क्षेमकीर्तिमरिः । चोक्तं बृहत्कल्प- वृत्तिप्रशस्तौ- तत्पाणिपंकजरजापरिपूतशीः शिष्यास्त्रयो दधति संप्रति गच्छभारम् । श्रीवज्रसेन इति सद्गुरुरादिमोऽत्र श्रीपलचन्द्रसुगुरुस्तु ततो द्वितीयः ।। १६ ., सायीकस्तेषां विनेयपरमाणुरनणुशानेऽस्मिन् । श्रीखेमकीर्तिसूरिविनिर्ममे विवृतिमल्पमतिः ।। १७ श्रीविक्रमतः कामति नयनाग्निगुणेन्दु (१३३२) परिमिते व । ज्येष्ठश्वेतदशम्यों समर्थिता चप हस्ताक्र्के । प्रथमादर्श लिखिता नयमभमभृतिभिर्यतिभिरेपा । गुरुतरगुरुभक्तिभरोद्वहनादिव ननितशिरोभिः।। इह च- सूत्रादर्शपु यतो भूयस्यो घाचना विलोक्यन्ते । विपमाश्च भाष्यगाथा: प्रायः स्वल्पाश्च चूर्णिगिरः ।। २० तत्सूत्रे भाप्ये वा यन्मतिमोहान्मयाऽन्यथा किमपि । लिखित हा चिकृत वा नतिम पादुकुर्न भूयात् ।। २१ श्रीक्षेमकित्तिमरिशिष्य पं० श्रीनयप्रभगणिर्गुरुतचप्रदीपापरनामोत्सेवकंदकुद्दालगन्धकद । 'गुरुति-श्रीक्षेमकीतिमरिपट्टे श्रीहेमकलशसरिः । कथंभूतः ? पूज्यः, सर्वेषां वन्दनीयः । उक्तं च- तत्पदाम्बरमार्तण्डचण्डः कर्मारिभेदने । हेमकुम्भगुमः ख्यातो हेमकुम्भ इयोज्ज्वलः॥ तथा च-कर्णावत्यां नगर्या महाराजाधिराज श्रीसारंगदेवभूपसभायामनेकपण्डितजनपरिकलितायां येषां श्रीहे- मकलशसरीणां पचोऽमृतनिमग्रचेतीभिः सारंगदेवनृपमुख्यरामभातासंध्यापर्यन्तं दिवसगमनं नावयुद्ध केवलं देश- नारस एव पीतः। ततथ सारंगदेवनृपप्रभृतयो यहवो जनाः सम्यक्त्ववामितान्तःकरणा जाता इति प्रतीतिः। तथा श्रीहेमकलशमरिसंस्थापिताचार्याः श्रीयशोभद्रसूरयः । तेऽपि च प्रभावका: श्रीयशोभद्रसरिरिव रि- रुयातयशसः। 'रयणाय'त्ति-श्रीहेमकलशमरिपट्टधारिणः श्रीरत्नाकरमूरयः । कथंभूताः ? सत्याः, सत्यसनाधराः, साक्षातर- लाकरा इस रत्नाकराः । यन्नामाऽद्यापि श्रीयुद्धतपागणो 'रत्नाकरगच्छो'ऽयमिति ख्याति प्राप्तः । उक्तं च-श्रीतमा चीनियासिव्यवहारिकोटिकोटीर साधुश्रीशाणराजनिमापितश्रीविमलनाथप्रासादप्रशस्तौ गिरिनारगिरी-, + ४ १२६ विविधगल्ठीय पावलीसंग्रह ७० श्रीमद्वीरविनेयपंचमगणाधीशः सुधमाऽभवत तत्पक्रमतो पभूप गणभृच्छीयनसेनमभुः। तत्प फिलचन्द्रनितिमुनी नागेन्द्र-विद्याधरी चत्वारश्यतुरम्बुधिप्रसमरोत्कर्षों धनुःसूरयः॥. ६८ घान्द्रे तेषु फुलेऽतिदुस्तपतपोनिष्णातताविश्रुताः सूरीशा विजयेन्दवः समभवन् वृद्धास्तपाः रुयातितः । तेपामन्ययशालिनस्त्वभिनयश्रीगौतमश्रीधराः श्रीरत्नाकरसूरयस्त्रिजगतीविख्यातसत्कीर्तयः।। यतो धर्म लब्ध्वा द्विनवतिचिहारानरचयत् सुधीः श्राद्धः पृथ्वीधर उरुवरालंकृतिधरान् । तथा सिद्धान्द्रो श्रीवृपभभुवनं हेमघटिक- कविंशत्या मेरोः शिवरमिच गांगेयकलितम् ।। किं वय॑ते झंझणदेवनाम्नः सूनोस्तदीयस्य यशाप्रशस्तिम् शजयादागिरिनारशूनं योऽदाद् ध्वजं हेममयं फिलेकम् ।। वर्षे विक्रमतः कुसप्तदहनकस्मिन् (१३७१) युगादिप्रभुः श्रीशधुंजयमूलनायकमतिप्रौदप्रतिष्टोत्सवम् । साधुश्रीसमराभिधस्निमुबनीमान्यो वदान्यः क्षिती श्रीरत्नाकरसूरिभिर्गणधरैः स्थापयामासिवान् ।। उक्तं च पुनरपि- ततो रत्नाकरः सूरिज्ञानरत्नमहोदधिः । यतो रत्नाकराभिख्यां लेभे वृद्धतपागणः ।। ते च श्रीगुस्खोऽन्यदा श्रीगिरिनारतीथे श्रीनेमियात्रार्थ चलिताः। तत्पर्वते परीक्षार्थमम्बिकया चिन्तामणिर्द- शितः। श्रीगुरुभिः सपरिकरैदृष्टः । तदा शिष्यैः पृष्टा गुरवः-पूज्याः! कोऽयं मणिः । गुरुमिरुक्तम्-चिन्तारत्नम् । कथं ज्ञायते परीक्षा विना १ । गुरुभिरुक्तम्-हे मणे । सम्भतीर्थचित्कोशतः सत्तिकं भगवत्यङ्गमानय। तदा तेन तत्क्षणमेवानीतम् । परीक्षया ज्ञातचिन्तामणिः । श्रीगुरुभिनिर्लोमतया तत्रैव मुक्तो मणिः, अहएचाभूत् । कैबिदुक्तम्- पूज्याः कथं कस्मैचित् श्रद्धालये न ददध्वम् । गुरुव आहुः-नायं निस्पृहाणामाचारः। तद् दृष्ट्वा श्रुत्वा च सर्वत्र चमत्कृतो जनः । इति पंचदशगाथार्थः ॥ रयणप्पह-मुणिसेहरगुरुणो सिरिधम्मदेवनाणससी । अभयाओ सिंहवरा जयतिलया रयणसिंहगुरू ॥१६॥ 'रयणप्पहत्ति-श्रीरत्नाकरसरिपट्टे श्रीरत्नप्रभसरिः केचिद्वदन्ति । अयमाचार्यः प्रशस्तौ च पट्टभृत् । तत्पट्टनमोमणिः श्रीरत्नप्रभसरिराट् बभूव । 'मुणिसेहरति-तत्पट्टे श्रीमुनिशेखरसरिः। मुनिशेखरमरिराजभीडे तत्पट्टाम्युजभृङ्गरगदङ्गः (१) ॥७२।। ૧૭૨ १ १ यह पो सा लि क पट्टा व ली भवपयोनिधितीरवनद्रुमश्रितमधीश्वरपक्षिकुलाकुलम् । कुसुमित यशसा हि सदा फलं नमत तं गणभृन्मुनिशेखरम् ।। 'गुरुणो सिरिधम्मदेव'त्ति-श्रीमनिशेखरसुरिपट्टप्रभावको गुरुश्रीधर्मदेवसरिः । आरासनतीर्थप्रतिष्ठाकत् । तत्र प्रशस्तौ- तस्मात् श्रीदेवधर्मसूरिः क्लूप्तारासनतीर्थसत्प्रतिष्ठः। 'नाणससी'ति-श्रीधर्मदेवमरिपट्टे श्रीज्ञानचन्द्रसरिरिति प्रशस्तौ; कचिद् ज्ञानचन्द्राचार्य इति । तथा च श्रीधर्म- देवसरिसंस्थापिताचार्याः श्रीसिंहदत्तसूरयः । ते च चिरं मेदपाट-खडग-बागडदेशेषु विहरिताः । तब तेषां प्रतिष्ठित- प्रासादप्रतिमाषाहुल्यमद्यापि दृश्यत इति । इह प्रशस्त्यनुसारेण श्रीज्ञानचन्द्रसरिपट्टे श्रीअभयसिंहारिः । पट्टायल्य- नुसारेण तु श्रीधर्मदेवरिपट्टे श्रीअभयसिंहमूरिः । स च महावीरतपोविहितनियमः । तदुक्तम्- अभूचरमतीर्थकृत्कृतसमस्तभास्वत्तपाः, ततस्तपमहोदयस्वभयसिंहमूरिगुमः । यैः श्रीगुरुभिराचार्यपदवीं प्राप्य पड्विकृतयः परिहताः । पुनश्च पंचपंचाशतां चाचाम्लतपो निरन्तरं वारत्रिक कृतवान् । दुःसाधमङ्गविद्यापुस्तकं सार्थकं परिवाचितवान् । अन्यच- आबू तारणगढ गिरिहिं छट्ट किया इगवीस । विमलाचलि सित्तरि किया रेवइगिरि अहवीस ॥ सिवकुमारना छह किया दोसय एगुणतीस । दसम दुवालस विविधतप सोसिअ तणु निसिदीस ॥ २ तवसिंगारअलंकियदेहं, निम्मलचरणकरणवरगेहं । अभयसिंहसूरीसरि हरिसिय, करिअ सुतप छम्मासीवरसियं ।। पट्पद वरसीतप सिरि मुगट बेउ छम्मासी कुंडल, चउमासी दोमासी हार अघहार सुनिम्मल । भद्र महाभद्र बेड वाहिरवा वखाएं, प्रतिमा सर्वतोभद्र हृदय सिरिवत्सु जाएं। अंबिल निरंतर पंचसइ महारयणमय हार खप । सिरिअभयसिंहसूरींदगुरु किद्ध देहसिणगार तप । तथा च-श्रीअभयसिंहरिप्रस्थापिताचार्याः श्रीहेमचन्द्रगुरवः, कुमारपालनृपतिप्रतियोधक श्रीहेमचन्द्रसरि- संस्मारकाः । उक्तं च- ततो नृपतियोधिदो मुनिपहेमचन्द्रप्रभुः । कुमारनृपयोधकः किमिह हेमचन्द्रो घसौ॥ ७५ अभयसिंहसरिपट्टे श्रीजपतिलकसूरिः। स च कीदृशः- ततस्तत्पद्दे श्रीहरिरतिशयोद्दामभुचनं क्षमाभृत्सेव्यः श्रीजयतिलकसूरिः समजनि । कपर्दीयक्षो यं प्रकटमहिमागारमतुलं विधत्ते स्म प्रीत्या जिनमतभृतो विश्वविदितम् ॥ ७६ अनेकविद्यातिशयसंपूर्णकामम्मः श्रीजिनशासनमण्डपस्तम्भा, मिथ्यात्वमत्तमगजमृगेन्द्रः, समरविजित- मन्मथनरेन्द्रः, अनेकाचार्योपाध्यायपंडांश (प्रज्ञांश) मुनीश्वर महचरा प्रभृति द्विशताधिक द्विसहरु साधु-सावी परिकरयुक् । तथाऽनेकानेकपरिवारपरिश्तकविशतिशः शत्रुमपादितीर्थयात्राकारकः, पंचविंशत्यधिकशतवाद- ७७ ७८ २८ विविपगाछीय पावलीसंमह संघपतितिलकदापक एतादृक् श्रीजयतिलकारीघरगच्छनापकः । तसंस्थापिताः श्रीधर्मशेखरपरि-श्रीमाणिक्य- परि-श्रीरत्नसागरसरिरिति प्रयोऽप्याचार्या चभूयुः । तथा चतुर्थांचाः श्रीसिंपतिलकसरयः प्रभावकशिरोमणयोऽभू- पन् । ये च निर्विकल्पधीमरिमप्रकल्पमकार्षुरिति । 'रयणसिंहगुरुचि-श्रीजयविलकसरिपट्टाम्परभास्करगुरुश्रीरत्नसिंहयरिः। स भगवान् कीदृशः! भास्ते तत्पट्टमेगस्थिरतरशिपरापद्धमूलमसर्पत्, पारिनस्कन्धवन्धोद्धतमुनिपमुनिप्राज्यशाग्वोपशाखः । उत्फुल्लज्ज्ञानपुप्पः मकटतममनोऽभीप्सितार्थप्रदाता, सूरिश्रीरत्नसिंहः सुरतरुरिय सच्छायया व्याप्तविश्वः ।। जित्या मोहमहीपति त्रिजगतीनं जयश्रीजुपो, यस्योपैतिसार्वभोमपदवीप्राप्त्युत्सवे माभृतम् । गाम्भीर्य जलधिः सुवर्णशिबरी स्थैर्य मरस्तापना, चातुर्य धिपणो पुरंधरगुणं धात्री विधत्ते स्म यम् ॥ प्रासाद विमलाईदादिसकलदीतीर्धकृन्मण्डलीम् , प्रत्यठादतिशापिलब्धिनिलयः श्रीरत्नसिंहमभुः। भन्दाकाशतिथिप्रमेय (१५०९) समये श्रीविक्रमाद् घासरे पंचम्याः सितमाघमासिवसुधाधीशाचितांद्विद्धयः ।। तत्पाणिपङ्कजरजासुरभीकृताङ्गाः शिप्यास्त्रयः श्रुतधराः प्रथमस्तु तेषु । श्रीहेमसुन्दरगुरुगरिमाम्बुराशिरासीविनप्रवचनस्फुटसौधदीपः ।। उदितभाग्यविधुतमस्तोत्तमद्यतिजितान्तरवैरितमरततिः। उदयवल्लभसूरिरथापरः परमसंघमवान जपते क्षिती॥ ८१ केनोपमीयत इहाथ तृतीयसरिः श्रीज्ञानसागर उदारगुणकराशिः। वार्द्धः सरः श्रयतु जातु किलोपमानं धादिः कथं तु सरसस्ततयापि लक्ष्म्या।। इह प्रस्तापात् गिरिनारगिरौ साधुश्रीशाणराजनिर्मापितविमलार्हतः प्रसादोत्पत्तिप्रशस्तिलिख्यते । तथा हि- अस्ति स्वस्ति निधिः श्रियो निरवधिप्रेमास्पदं संनिधि श्रीधर्माधिपतेरामणयिनीमौलिस्फुरन्मण्डनम् । धापीकृपतडागकाननजिनप्रासादर्शवालय- प्राकारादिगुणरनन्यसहशः श्रीस्तम्भतीर्थ पुरम् ॥ तस्मिन् पुरे चतुरशीतिसनान्वयैकस्थाने मुनेरपि गुणैरभिवर्णनीये। श्रीस्तम्भनाभिधजगत्मभुपार्श्वनाथ कल्पद्रुमः प्रथितसर्वसमीहितार्थः॥ लक्ष्मीलीलोत्तमगृहमसदोपरेणुर्मभीरो राजमाशोदपविभवभूरच्युतस्थित्यपारः। , पुरत्नानां निधिरमलसत्कीर्तिडिण्डीरपिण्डः श्रीश्रीमालीत्यभिध उदधिः किनु वंशो विभाति ॥८ वंशे तस्मिन् विविधसुकृतोल्हासि भास्वत्प्रशंसे श्रीपूनाख्यः क्षितिपतिसदापद्मनिच्छमहंसः। आसीहासीकृतसुरतरुः प्राधितार्थप्रदानात् सचैतन्यादनुपमभवत् सन्ततेभूभवत्वात् ।। ७ ९ ८० wor वृह पोसा लि क प ध वली २९ तन्नन्दनोऽय जगदे जगदेकवीरः सद्भिः सतां धुरि गुणैर्जगदेभिधानः । तत्सूनुरूर्जिततमोगरिमानिधानः श्रीवाधणः पृथुगुणः प्रथितः पृथिव्याम् ॥ तत्पुत्रः सचरित्रत्रिभुवनविदितो विक्रमादित्यनामा, यो निर्माति स्म हर्षादिह तिमिरपुरे पर्वतोतुङ्गशृङ्गम् । प्रासाद पार्श्वनाथं परिकरसहितं स्थापयामास तत्र प्रेखत्प्रौढप्रतिष्ठार्जितशुचियशसा द्योतयन मर्त्यलोकम् ।। श्रीमालदेवस्तनयस्तदीयः संप्राप्य संघेशपदं त्रिकृत्वाः । शचुंजये रैवतके च यात्रामसूत्रय धर्मधुराधुरीणः ।। १२ अभवदय तदीयः सूनुरन्यूनधामा जगति वयरसिंहः शत्रुमातङ्गसिंहः। · गुणजलनिधिमत्स्यो वासलक्ष्मीविभुःसार विशदसुकृतराशि मिताशेपविश्वः। तस्याङ्गिविभूपयद् धवलदे नाम्नीति शुद्धाशया शीलालंकृतिधारिणी किल हरेर्लक्ष्मीरिव मेमभूः। पुत्राः पंच तयोः पवित्रचरिता मर्यादया मेरवः कल्याणैकनिकेतनोन्नतिपदं सन्नन्दनानन्ददाः ॥ व्यवहरपतिराद्यः सत्सु सर्वात्मनाऽऽद्यस्तदनुजवयजाख्यः कर्मसिंहस्तृतीयः । अभवदय च रामः स्फारलीलाभिरामः कृतकलिपलिकम्पश्चम्पकः पंचमस्तु । पंचते कल्पवृक्षा इव भुवनतले रेजिरे पुत्रपौत्र- श्रीशाखाढथप्रशाखासुमनसउदितोदर्कदानकदक्षाः। फचैतेपां महान्ति क्षम इह गदितुं धर्मकर्माणि साक्षा- द्वाहाम्रीच नावेहं जिनमतमाधिसत्कल्पसत्यमेव हैमादे नामलदे प्रेयस्यौ हरपतेः प्रियस्नेहे । चन्द्रोज्ज्वलशीलकले पंचेपोरिव रति-धीती॥ १७ तत्तनया स्फीतनया ऋतव इवासन सदोदयाः पडध । सन्ननसिंहष्ठक्कुरसिंहाख्यः पाप करिसिंहः ॥ इंगरसिंहस्तुर्यो धन्यः पाशाभिधस्तुपंचमकः । पष्ठो नारदनामा बभूव सम्यत्तवगुणधामा ।। १९ : संततिसंततिमेपामाख्यातुं कस्तु पुण्यपुण्यकृताम् । इह सह उदित्वरश्रीप्रसृत्वरस्फूर्तिनिलयानाम् ।। वर्षे विक्रमतो द्विवेदमनुभृत् (१४४२) संख्येतिदुःखाकुलान् दुभिक्षेण जगबनानुपमैर्वस्त्रानदानादिकः। श्रीणन् यः स्तनपितुतोऽप्यतितरां लेमे जगद्विश्रुतां ख्याति दानकलामलैकवसतिः श्रीवसिंहात्मजः ।। यः पिप्पलठ्ठपुरवासिनमाशुनष्टसंपत्पदं.........जनमनेकवर्णम् । पन्दीकृतं दुरधिपेन विमोचयन् साक् सप्टेच तस्य जगदेऽभिनयः प्रजाभिः ।। ૨૨ विविधगच्छीय पट्टावलीसमह श्रीगूजराधिपमदाफरपातशाहिः प्रखत्मतापपटलीजितहव्यवाहः । श्रीकारमाख्यदतिधामधुरिमतीतं यस्यायनीशशतसंख्यसमक्षमत्र । २३ प्रयोधं प्राप्य श्रीजयतिलकसरिममुगुरोः व्यधात मासादस्योदधृतिमतिकला रेवतगिरी (१४४९)। विभोर्नेमे सर्वागतविरचितोत्तुङ्गशिखरां स्ववासायैवेन्द्रभुवनमिह यो विश्वविदितम् ।। २४ प्राप्तश्रीपातशाहिस्फुरदुरुगरिमस्फूर्तिकीत्तिमतानः संमील्याशेपसंघ नयविनयमतिः सप्तदेवालयैर्युग्। सिद्धाद्री रेवते च प्रथमजिनपति नेमिनाथं पचन्दे सर्वर्या जैनमेकं कुमरनृप इव द्योतयन् शासनं यः॥ २५ चक्षुणिमनु (१४५२) प्रमेयसमये श्रीस्तंभतीर्थ पुरे येन श्रीजयपुण्डूसरिगुरुणा विश्वप्रसिद्धोत्सवम् । श्रीमत्सूरिपदं गणोदपपदं श्रीरत्नसिंहम भी- रद्यापि प्रसरत्प्रतापयशसः संविन्निधेः कारितम् ॥ लक्ष्मीकल्पलतानिदानविकसहानप्ररोहत्फलैः संमीणन् जगतीगताखिलजनानन्दप्रदीप्यन्मना। तत्रैवोहसदाहदोक्तिचतुरां श्रीरलचूलाभिधां साध्वीं साधुगुणां महत्तरपदे यः स्थापयामासिवान् ।। २७. तस्माद् विस्मयकृद्गुणाद' हरपतेरुयैर्यशःशालिनी हेमादेशतकुक्षिसत्कमलिनीहंसावतंसो नृणाम् । आसीत् सज्जनसिंहकः शकपतियं प्रेमतः पुत्रवन् मेने मानमहोदयं जनमनोऽम्भोजनजाहर्मणिम् ॥ ૨૮ कतिगदे-कर्माद दयिते अस्य प्रशस्यरूपनिधी। धर्मस्य मिथास्नेहासक्ते इव गी: श्रियावास्ताम् ।। अथ सज्जनसिंहरोहणाद्रेः श्रीशाणाभिधमुत्तमं चरत्नम् । कउतिगदेकुक्षिभूरपूर्वास्फुरदुरुभानुना समानम् ।। ३० अनुपमदेहातिविराजनित्रासः शुभवृत्ततागुणाटमः । स जयति भूभामिनीशिरःश्रीमुकुटमणिस्फुटमत्र शाणराजः ।। मामेयस्याद्भुतपरिकरं श्रीमहीशानपुर्या कमदिन्या रचितमतुलं वीक्ष्य दक्षिविशंके । कि पीयूपधुतिकरभरः किं सुधाशुद्धसारैः स्रष्टा किंवा विमलयशसा सौयसख़्जन (1)॥३२. वेधा दुष्टकृतातिदुःश्वमखिलं विश्वं विलोक्य धुवं छन्नं स्थगिपतेः प्रतार्य मरुतश्चिन्तामणि नीतवान् ।

३३ ३४ वृह पो सा लि क पा व ली ३१ घुवेषेण जगत्सुकरसिकं शाणाभिधं निर्ममे तन्मन्ये निमिपास्तदीक्षणपरा नाद्यापि तं लेभिरे ।। मोढेरापुरवासिनीं द्विजवणिग्जाति महाकष्टकृत् यन्दित्वात् ] किल मोचयन निजधनैः शाणाभिधानः सुधी। मोक्षादित्यगतांस्तथैव चतुरो वर्णान सुधांशुज्ज्वलं श्रीजीमूतनरेश्वरस्य चिरुदं जातं लसत्कीर्तितः ।। दुर्वारोद्धतासमोरगविपव्यासंगतो मूच्छितान् नानाजातिजनानपत्यदयितात्यागैकचित्तान् क्षुधा। पैनाम्नायपवित्रितः सुहृदयः शाल्यौपधीभिर्मुहुः शाणो गारुडिका प्रसिद्धमहिमा संजीवयामासिवान् ।। तीर्थभ्रंशसुसाधुपीडनपरोद्दण्डप्रचण्डासुरा- धीशैर्विश्वमिदं पराभवपदं जातं निरीक्ष्य क्षणात् । सर्वांगीणगुणः स्फुरत्तरमहा स्वां निर्मिति रक्षितुं धात्रा सत्सु दयालुनात्मवदयं शाणाभिधो निर्ममे ।। श्रीमद्गुर्जरमण्डलाधिपतयः श्रीपातशाहा अमी चत्वारो यदहम्मदप्रभृतयः संसत्समक्षं सदा। लायन्ते स्म यदीयभाग्य-यशसे सर्वोत्तमा यं स्फुट कस्पासो न नमस्य आस्यजितसचन्द्रोऽस्तु शाणाभिधः ।। ૨૭. इति किं बहुक्त्या । श्रीरत्नसिंहसरीश्वरसद्गुरूपदेशमासाद्यायं साधुश्रीशाणराट् सप्तक्षेच्यां यद् यद् धनव्ययम- कार्षीत् तत् सर्व निगदितु का क्षमस्तेनालमिति प्रसंगेनेति । • तथा यो भगवान् गिरिपुरनगरे श्रीपीआविहारनानि श्रीपभदेवप्रासादे पंचविंशत्यधिकशतमणप्रमितपित्त- लमयसपरिकरश्रीऋषभदेवविम्ब-चैत्यप्रतिष्ठाकृत् । तत्र चैत्येऽद्यापि सेर......मितरूप्यमयमारात्रिक मंगलप्रदीएं चामरद्वयं च तत्सामयिक दृश्यते । तथा कोटनगरे पित्तलमयश्रीसंभवजिनविम्यस्य प्रासादस्य च प्रतिष्ठामकार्षीत् । एवं मालव-भेदपाट-खडग-घागड-गुर्जर-सौराष्ट्र-कुंकण-दक्षिणापथप्रभृतिदेशेषु स्थाने स्थाने श्रीरतसिंहयरिप्र- तिष्ठितानि चैत्य विम्यानि दृश्यन्ते । उक्तं च- तत्पट्टे सूरयः शश्वद् रत्नसिंहा दिदीपिरे । सद्भ्यः स्वेष्टप्रदानेन चैलब्ध्या गौतमायितम् ।। जातोऽनाऽहम्मदावादाधिपः शाहिरहिम्मदः। तं प्रवोध्य महीपीठे चक्रिरे शासमोन्नतिम्।। २ तथा हि-श्रीरनसिंहसरयः पोडशवर्षीयाः, भव्यपानि वियोधयन्तः पृथिव्यां रविरिय विचरन्ति स । तत्समवे अहिम्मदसुरत्राणोऽहिम्मदनगरं वासयामास । तत्र पापाणदुर्गो विहितः । वस्मिन् दुर्गे चतुःपष्टिकोष्ठका जाताः । तत्र चतुःषष्टियोगिन्यों निवेशिताः । रात्रौ ताः सुरत्राणं पल्यंकाभूमौ पातपन्ति स्म । इतश्च मुल्लाणिकवचसा सुरत्राणेन जैन दर्शनिनः सर्वेऽपि स्वप्रदेशानिष्कासिताः । ते च साधवः सर्वे हिन्दुस्थाने स्थिताः सन्ति स्म । देतच राजनगरथी- अहिम्मदाबादनिवासिनगरयेष्ठि-श्रीश्रीमालीवंशविभूपण-व्यवहारिचर्य्यरत्ना-फतानामानौ श्रीरन सिंहसुरीश्वरचरणा- रविन्दनमरौस्तः । तत्समये सुरत्राणेन सर्वे पदनिनः समाकार्य पृष्टा:-"मवत्सु योगिन्युपद्रयवारका कोऽप्यस्ति ।' १ विविधगच्छीय पट्टावलीसंग्रह २४ -- २५ श्रीगूजराधिपमदाफरपातशाहि खत्मतापपटलीजितहव्यवाहा । श्रीकारमाख्यदतिधामधुरिमतीतं यस्यायनीशशतसंख्यसमक्षमत्र ।। प्रबोधं प्राप्य श्रीजयतिलकसूरिप्रमुगुरोः व्यधात् प्रासादस्योधृतिमतिकलां रैवतगिरी (१४४९) । विभोर्नेमे सर्वाद्भुतविरचितोत्तुङ्गशिखरां स्ववासायवेन्द्रभुवनमिह यो विश्वविदितम् ।। माप्तश्रीपातशाहिस्फुरदुरुगरिमस्फूर्तिकीत्तिपतानः संमील्याशेपसंघं नयविनयमतिः सप्तदेवालयैर्युम् । सिद्धाद्री रैवते च प्रथमजिनपति नेमिनाथं यवन्दे सर्वां जैनमेकं कुमरनप इच धोतयन शासनं यः ।। चक्षुर्वाणमनु (१४५२) प्रमेयसमय श्रीस्तंभतीर्थे पुरे येन श्रीजयपुण्ड्रसूरिगुरुणा विश्वप्रसिद्धोत्सवम् । श्रीमत्सुरिपदं गणोदयपदं श्रीरत्नसिंहह्मभो- रद्यापि प्रसरत्मतापयशसः संविन्निधेः कारितम् ।। २६ लक्ष्मीकल्पलतानिदानविकसदानप्ररोहत्फले. संप्रीणन् जगतीगताखिलजनानन्दादीप्यन्मनाः। तत्रैवोहसदाहंदोक्तिचतुरां श्रीरत्नचूलाभिधां साध्वीं साधुगुणां महत्तरपदे या स्थापयामासिवान् ॥ तस्माद् विस्मयकृदुगुणाद हरपतेरुचर्यशःशालिनो हेमादेऽमृतकुक्षिसत्कमलिनीहंसाचतंसो नृणाम् । आसीत् सज्जनसिंहकः शकपतिय प्रेमतः पुत्रवन् मेने मानमहोदयं जनमनोऽम्भोजमजाहर्मणिम् ।। कउतिगदे-कर्मादे दयिते अस्प मशस्यरूपनिधी! धर्मस्य मिथास्नेहासक्त इव गी: श्रियावास्ताम् ॥ अथ सज्जनसिंहरोहणाद्रेः श्रीशाणाभिधमुत्तमं चरत्नम् । कउतिगदेकुक्षिभूरपूर्यास्फुरदुरुभानुना समानम् ॥ अनुपमदेहातिविराजन्निस्नासः शुभवृत्ततागुणाढाः । स जयति भूभामिनीशिराश्रीमुकुटमणिस्फुटमत्र शाणराजा ।। ३१ नामेयस्याभुतपरिकर श्रीमहीशानपुर्या कर्मादेव्या रचितमतुलं वीक्ष्य दक्षिर्विशंके। कि पीयूपद्युतिकरभरैः किं सुधाशुद्धसारैः स्रष्टा किंवा विमलयशसा सौवसज्जन (1)||३.. वेधा दुष्कृतातिदुःखमखिलं विश्वं विलोक्य धुवं छन्नं स्वर्गिपतेः प्रतार्य मरुतश्चिन्तामणि नीतवान् । २९ ३० ३३ वृह पो सालिक पहा व ली पुंवेषेण जगत्सुखैकरसिकं शाणाभिधं निर्ममे तन्मन्ये निमिपास्तदीक्षणपरा नाद्यापि तं लेमिरे ।। मोढेरापुरवासिनीं द्विजवणिग्जाति महाकष्टकृत् चन्दित्वात् ] किल मोचयन् निजधनैः शाणाभिधानः सुधी। मोक्षादित्यगतांस्तथैव चतुरो वर्णान् सुधांशुज्ज्वलं . श्रीजीमूतनरेश्वरस्य विरुदं जातं लसत्कीर्तितः॥ ३० दुरोद्धतदुःसमोरगविषव्यासंगतो मूच्छितान् नानाजातिजनानपत्यदयितात्यागैकचित्तान् क्षुधा। पैत्राम्नायपवित्रितः सुहृदयः शाल्यौषधीभिर्मुहुः शाणो गाडिका प्रसिद्धमहिमा संजीवयामासिवान् ।। ३५ तीर्थभ्रंशसुसाधुपीडनपरोद्दण्डप्रचण्डासुरा- धीशैर्विश्वमिदं पराभवपदं जातं निरीक्ष्य क्षणात्। सर्वांगीणगुणः स्फुरत्तरमहा स्वां निर्मिति रक्षितुं धात्रा सत्सु दयालुनात्मवदयं शाणाभिधो निर्ममे ।। श्रीमद्गूर्जरमण्डलाधिपतयः श्रीपातशाहा अमी चत्वारो यदहम्मदप्रभृतयः संसत्समक्षं सदा। श्लाघन्ते स्म यदीयभाग्य-यशसे सर्वोत्तमा यं स्फुटं कस्यासौ न नमस्य आस्यजितसचन्द्रोऽस्तु शाणाभिधः।। इति किं पहुक्त्या । श्रीरत्नसिंहमरीश्वरसद्गुरूपदेशमासाद्यायं साधुश्रीशाणराद् सप्तक्षेत्र्यां यद् यद् धनव्ययम- कार्षीत् तत् सर्व निगदितु का क्षमस्तेनालमिति प्रसंगेनेति । । तथा यो भगवान् गिरिपुरनगरे श्रीपीआविहारनानि श्रीपभदेवप्रासादे पंचविंशत्यधिकशतमणप्रमितपित्त- लमयसपरिकरश्रीऋपभदेवविम्म चैत्यप्रतिष्ठाकृत । तत्र चैत्येऽद्यापि सेर......मितरूप्यमयमारात्रिक मंगलप्रदीप चामरद्वयं च तत्सामयिकं दृश्यते । तथा कोटनगरे पिचलमयश्रीसंभवजिननिम्बस्य प्रासादस्य च प्रतिष्ठामकार्षीत् । एवं मालव-मेदपाट-खडग-बागड-गूर्जर-सौराष्ट्र-कुंकण-दक्षिणापथप्रभृतिदेशेषु स्याने स्थाने श्रीरत्नसिंहसरिन- तिष्ठितानि चैत्य-बिम्बानि दृश्यन्ते । उक्तं च- तत्पट्टे सूरयः शश्वद् रत्नसिंहा दिदीपिरे । सभ्यः स्वेष्टमदानेन यैर्लन्ध्या गौतमायितम् ।। जातोऽत्राऽहम्मदावादाधिपः शाहिरहिम्मदः । तं प्रयोध्य महीपीठे चक्रिरे शासन्नोन्नतिम् ॥ २ तथा हि-श्रीरतसिंहसूरयः पोडशवीयाः, भव्यपद्मानि विवोधयन्तः पृथिव्यां रविरिष विचरन्ति स । तत्समवे अहिम्मदसुरत्राणोऽहिम्मदनगरं वासयामास । तत्र पापाणदुर्गो विहितः । तस्मिन् दुर्गे चतुःपष्टिकोष्ठका जाताः । तत्र चतुःषष्टियोगिन्यो निवेशिताः । रात्रौ ताः सुरत्राणं पल्यंकाभूमौ पातयन्ति स्म । इतश्च मुल्लाणिकवचसा सुरत्राणेन नैन- दर्शनिनः सर्वेऽपि स्वप्रदेशानिष्कासिताः । ते च साधवः सर्वे हिन्दुस्थाने स्थिताः सन्ति स्म । इतश्च राजनगरश्री- अहिम्मदाबादनिवासिनगरयेष्ठि-श्रीश्रीमालीवंशविभूषण-व्यवहारिवर्य्यरत्ना-फतानामानौ श्रीरत्नसिंहसरीश्वरचरणा- रपिन्दनमरौस्तः । तत्समये सुरत्राणेन सर्वेऽन्यदर्शनिनः समाकार्य पृष्टा:-'मवत्सु योगिन्युपद्रववारकः कोऽप्यस्ति !', १ " र .३२ " विविधगच्छीय पावलीसंग्रह तैरपि सुरत्राणसमक्षमनेकोपाया विहिताः, पर तदुपद्रवो न शशाम । इतव, सुरत्राणपुरः केनचित् प्रोक्तम्-'राजनग- .,राधिकारिरला-फताख्यव्यवहारिगुरवः श्रीरत्नसिंहाभिधानाः सर्वत्राधीतिनः शृंयन्ते । यदि साधुः फवाख्यः तेषा- माकारणार्थ याति, तदा ते आयान्ति । यदि ते प्रसन्ना भविष्यन्ति तदा सर्वोपद्रवं वारयिष्यन्ति इति थुला, राज- नगरात् साधुफताख्यमाकार्य श्रीशाहिः स्वसचिवैः सह श्रीगुर्याकारणार्थ साधुफताख्यमप्रेपीत् । तत्र गत्वा सविनय- -मत्यर्थमभ्यर्थिता गुरवः शाहिसविध समागताः। अथ गुरूणामाकृति दृष्ट्या सुरत्राणोऽपि विस्मयचेताः स्थगित इब पभूव । पृष्टाः श्रीगुरवः-रत्नसिंहाभिधाना भवन्तः। श्रीगुरुभिरुक्तम्-'जना एवं वदन्ति । पुनः पृष्टा:-'कथं भवन्तः प्रथमवयसि त्यागिनो बभूवुः । श्रीगुरुराह-संसारासारतां दृष्ट्वा' 1 श्रीशाहिः पुनर्वभापे-'केषु केषु शाखेष्वधीविनः।' शिपैरुक्तम्-'सर्वेषु । तहिं किंचिज्ञानीयाः, कथं न ज्ञायते । एवं च तर्हि वक्तव्यम् वः किमहं का श्रीगुरुणो- कम्-'पत्रं लिखित्वा दास्यामः उत्तरेधुर्वाचनीयम् । श्रीशाहिनोक्तमेवमस्तु । श्रीगुरुभिरपि तत्र स्थित्वा वकृत्य - निखिल लिखित्वा शाहेः प्रदत्तम् । श्रीशाहिना कस्यचिद् करे दचा उत्रेधुर्वाचितम् । नदेव सर्व संजातम् । सुरत्राणस्तु अत्यन्तं चमत्कृतः । श्रीगुरूणां पादयोः पतितः । उक्तं च-पधेप्सितं मार्गयध्वम् । गुरुभिरुक्तम्-'वयं निग्रन्धा!, अस्माकं किमपि द्रव्यादिकं ग्रहीतु नो कल्पते । परं भवदाज्ञया अस्मद्दर्शनिनः श्रीमद्देशेषु विचरन्तु । श्रीशाहिनोक्त- मेवमस्तु । श्रीशाहिना तत्कालं नामांकित फरमानं कृत्वा श्रीगुरुभ्यः प्रदचम् । कतिचिद्दिनानि जीवदयायाः फरमानं च। ततश्च साधवः सर्वे स्वं खं स्थान समागताः । इतश्च श्रीशाहिना-प्रोक्तम्-'स्वामिन् ! रात्रौ योगिन्यो मामुपद्रव न्ति, भवत्प्रसादातदुपद्रवनाशो भवतु । श्रीगुरुभिरपि चतुःपष्टियोगिन्युपद्रवोपरि सर्वतोभद्रं पंचषष्टियत्रमुत्पाय' "आदौ नेमिजिन नौमी"ति स्तोत्ररत्नमकारि। तद्यन्त्र शाहिना शिरसि रक्षितम्, स्तोत्रं च पठितम् । गत उपद्रवः श्रीशाहिकुले शान्तिचाभूत् । तत्समये श्रीगुरोः श्रीजनशासनस्यापि महती सुपमा समजनि । तथा श्रीरत्नसिंह- सूरीणां पण्डितप्रकाण्डपण्डितश्रीशिवसुन्दरगणिप्रभृतयः शिष्या अपि समभावका यभूवुः । येषां पण्डितशिवसुन्दर- गणिपादान करस्पर्शादेव दाक्षिणात्यमुरत्राणशरीरे महारोगोपशान्तिनर्माता । तथा महोपाध्यायश्रीमदुदयधर्मगणयो 'वाक्यप्रकाश अन्य विहितपन्तः। तथाऽन्येऽपि श्रीचारित्रसुन्दरमरिप्रमुखाः शिष्याः। ये च 'महीपाल- कुमारपाला दिसंस्कृतचरितानि वेनिरे । इति पोडशगाथार्थः ॥१६॥ सिरिउदयवहा पुण सच्चस्था नाणसायरा गुरुणो । सिरिउदयसायरा विय लद्धिवरा लद्धिसायरया ॥१७॥ • मिरिउदयनि-धीरत्नसिंहधरीणां शिष्यालयोऽप्यांचाः । तत्र समस्यासकार' विरुदधर ज्ञानविज्ञान- रत्नाकर-श्रीहेमसुन्दरसरिप्रवरः । स चाचार्यः पुनः श्रीरत्नसिंहसरीथरपट्टधरस्तु श्रीउदयवल्लभारिः । सोऽप्या- पाल्पादष्टावधानविधानविरुदमृत् । पुनरष्टादलिपिलिसन-चाचनत्वैन कपिप्रतिष्ठिनः अष्टादशवर्षे सरिपदं प्राममान् । 'सच्चत्यति-श्रीउदयपालभरारी घरपट्टे श्रीज्ञानसागरमूरिगुरवः । भूता:-सत्यार्थाः । श्रीविमलनाथ- चरित्र' प्रमुखानेकनन्यग्रन्थलहरिप्रकटना सान्ययावाः । येषां श्रीमानसागरंधरीणां मुसाद मंडपदुर्गनिवासि- घ्यवहारिवर्य-पातशाहि श्रीसिलची महिम्मदग्यासदीन मुरत्राणप्रदत्त 'नगदलमलिक' विरुदधर साधुश्रीसंग्राम- : सौवर्णिक नामा मत्तिक श्रीपंचमाझं श्रुत्वा "गोयमे"ति प्रतिपदं सौवर्णटंगममोचीत् । पद्मिसत्सहस्रममाणाः सुवर्गटककाः संजाताः । यंदुपदेशात् तद्गविणव्ययेन मालवके मंडपदुर्गप्रभृतिप्रतिनगरं गूर्जरधरायामणहिल- पुरपत्तन-राजनगर-स्तंमतीर्थ-भृगुरुप्रमुख प्रतिपुरं चित्कोशमकान् ि। पुनर्यदुपदेशात् सम्यक्त्वस्वदारसन्तो- भवतासिवान्तः करणेन पन्ध्यामतः सफली चक्रे । तथा हि-एकस्मिन् समये सुरत्राणो वनक्रीडार्थमुपान अगाम । 6 वृह पो सा लि क पट्टा व ली ३३ तत्रको महानतर्दृष्टः। श्रीशाहिस्तत्र गन्तुमारब्धः । तदा केनचित् प्रोक्तम्-'महाराज ! नात्र गन्तव्यम्। अयं पन्ध्य- वृक्षः। तदा शाहिना प्रोक्तम्-एवं चेत्तर्हि भूलादुच्छेदयध्वम् । तदा संग्रामसौवर्णिकेनोक्तम्-'स्वामिन् ! अयं वृक्षो विज्ञपयति, यद्ययमागामिकवर्षे न फलिष्यति, तदा स्वामिने यद्रोचते तत् कर्तव्यमिति' । पुनः शाहिना प्रोक्तम्- 'अप्राधिकार का प्रतिभूः । संग्रामसौवणिकेनोक्तम्-'अहमेव । शाहिनोक्तम्-'त्वं प्रतिभूः,परं यद्ययं न फलिष्यति तदा ता कि कर्तव्यम् । साधुनोक्तम्-'यदस्य वृक्षस्य क्रियते तन्मम'; इति श्रुखा श्रीशाहिना आत्मीयास्तत्र पंच नराः स्थापिताः । तेपामुक्तम्-'नित्यं विलोक्यम् , अयमानस्य किं करोति । अथ संग्रामसौवणिकस्तत्र नित्यमागत्य खपरिधानवस्त्राश्चलपक्षालनजलेन-तमानं सिचति स्म । वक्ति च-'अहो आम्रतरो! यद्यहं स्वदारसन्तोपत्रते दृढचित्तो- ऽस्मि, तदा त्वयाऽन्यानेभ्यः प्रथमं फलितव्यम् , नान्यथेति । एवं पण्मासं यावत् सिचितः । इतश्च वसन्तर्तुरायातः । तदा पूर्वमयमानः पुष्पितः फलितश्च । तत्फलानि सौवर्णिकसंग्रामेन श्रीशाहेः पुरो ढौकितानि । श्रीसाहिनोक्तम्- 'कानीमानि फलानि ? श्रीसाधुनोक्तम्-'तद्वन्ध्यानस्य' । इति श्रुत्वा श्रीशाहिना भृशं नराः पृष्टाः, तैर्यथावृत्तं सर्व निग- दितम् । तच्छत्वा परमचमत्कारप्राप्तेन श्रीशाहिना अनेकनररत्नभूपिताया सभायां सर्वजनसमक्षं भृशं संग्रामसौवर्णिकः प्रशंसितः, सत्कृतः परिधापितश्च । अत्युत्सवपुरःसर गृहे प्रेपितः । ततः सर्वत्र संग्रामसौवणिकस्य यशः प्रशसार । असौ संग्रामसौवणिक पड्दर्शनकल्पतरुषभून । तद्यथा-गूर्जरघरानिवासी कश्चिदाजन्मदरिद्रो विप्रः संग्राम- सौवणिकं दानशौण्डं श्रुत्वा मंडपदुर्गमाजगाम । तत्र व्यवहारिसभाया स्थितस्य संग्रामसौरणिकस्य सनिधमियाय । दचाशीर्वादस्तर स्थितः । सौवणिकेनोक्तम्-'द्विजराज ! कुतः समागता " 1 तेनोक्तम्-'क्षीरनीरधेम॒त्योऽस्मि, तेन भवन्नामाकितं लेसं दया प्रेपितोऽस्मि । व्यवहारिभिरुक्तम्-'दहि लेसं, वाचयस्व' । तेनोक्तम्-तद्यथा- स्वस्ति प्राचीदिगंतात् प्रचुरमणिगणैर्भूपितः क्षारसिन्धुः क्षोण्यां संग्रामरामं सुखयति सततं वाग्भिराशीयुताभिः। लक्ष्मीरस्मत्तनूजा प्रवरगुणयुता रूपनारायणस्त्वं कीर्तरासक्तभावात तृणमिव भवता मन्यसे किं वदामः ॥ इति श्रुखा संग्रामसौवष्णिकः सर्गागाभरणयुतं लक्षदानं ददौ । ततो विप्र इतस्ततो विलोकितुं लग्नः । तदा व्यव- हारिभिरुक्तम्-'किं विलोक्यसे तेनोक्तम्-'आजन्ममिनं दरिद्रं पिलोयामि, हा मित्र! क गतोऽसीति' कृत्वा पूचकार । पुनरुक्तम्-'हुं ज्ञातं, सम्याः श्रूयताम्'- यो गंगामतरत् तथैच यमुनां यो नर्मदां शर्मदा का घार्ता सरिदम्युलंघनविधेर्यवाण्णवं तीर्णवान् सोऽस्माकं चिरसंचितोऽपि सहसा श्रीरूपनारायण! त्वदानाम्बुनिधिप्रवाहलहरीमग्नोन संभाव्यते ।। इति श्रुखाऽपि श्रीसौषणिकः पुनर्लक्ष दापितवान् इति । एवं श्रीज्ञानसागरसूरीणामुपदेशाद् बहवः श्रद्धालमो ऽनेकपुण्यकृत्यानि रितेनिरे । श्रीज्ञानसागरसूरीणा पदे, अपि च, श्रीउदयसागरसरिः। तेनापि भगवता पंचाचार्याः स्थापिताः। तेच श्रीलब्धि- सागरमरिः, श्रीशीलसागरमरिः, श्रीचारित्रसागरसरिः श्रीघनसागरसरिः, श्रीधनरतमरिश्च । एपां श्रीउदयसागर- सूरीणा पट्टधरः श्रीलन्धिसागरयरिः । सोऽपिभगवान पुरपसरस्वतीति निरुदं जनमुसालेभे । स च प्राकृतचतुर्विंश- विजिनस्तव-रतकोश-पृथ्वीचन्द्रचरित-यशोधरचरिनादिनन्पग्रन्धविधाता । इति सप्तदशगाथार्थः ॥१७॥ or L २०. विविधगल्छीय पावलीसंग्रह सिरिधणरयणगणाहिवअमराओ रयणतेअओ रयणा। गुरुभायरा गुणन्नू सूरिवरो देवरयणो य ॥१८॥ 'सिरिति-श्रीलब्धिसागरसरीणां पट्टधरः श्रीधरतबसि । कथंभूतः गणाधिपः, गच्छेश इत्यर्थः । श्रीश्रीमालि- ज्ञातिमण्डन-कर्णारतीयोभाकर साधुसमधरपुनमंतिवापा मार्याअधक्षिप्राचीरनिः। सोऽपि भगान् रूपश्रीनिजि- तमन्मथः 'एकसंथा' इति विरुदं प्राप्तवान् । तथा च लघुशालीयगन्छाधिराजश्रीपूज्यश्रीहेमरिमलमूरीधरपादारविन्द- मधुकरपदर्शनप्रसिद्धशता विरुदधरः, पातशाहिश्रीमहादूरशाहिप्रदत्तसहस्वार्थीविरुदभृत् , सकलपंडितोचमपंडित- श्रीहर्पकुलगणिः श्रीधनरससूरीश्वरं दृष्ट्वा होरकर्षभरो नव्यपंचदशमिरवृत्तः श्रीगुरोः स्तुति चक्रे । तथा हि- गांभीर्य जलधेर्जयश्रियमपि श्रीचक्रिणः संपदः सर्वा सेवधितः प्रसत्तिमधिको पूर्णेन्दुतः श्रीविधिम् । लब्धि गौतमत: नियं धनदतो वास्वादुतां सौधतो लात्वा श्रीधनरत्नसूरिसुगुरनिर्मापहनिर्ममे ।। सौभाग्यं कृतपुण्यतः शुभमति श्रीदेवसूरेस्तथा रूपं मन्मथतश्च कीतिमतुलां श्रीरामभूमीश्वरात् । चाणिक्याचतुरत्वमाश्रितजने दानं च कल्पनुमात् लात्वा श्रीधनरत्नसूरिसुगुरुः श्रीधेधसा निर्ममे॥ ये सर्वकायस्थितजन्तुतंतयाः, प्रणम्रशिष्यवजशास्त्रदंदया। स्वसेवकादीनवमं तु मंमयाः, स्वविद्यया भूपतिसौधशंशवाः ।। ३ अनुपमयकत्प्रतापः पापतमाप्रकरसंहरणकरणे । संवितरति वित्तरतिवरः (१)तरति रतिप्रियपयोधिमपि ॥ शिष्यः कुशिष्ययाट्यान् येषां दुर्वादिनः पराजयति । राजयति स्पीयगणं जयति यतिवातमौलिमणिः ।। येषां मुखः सुरावा वपुषः सुपमा च सुभगता का वा। जयति निभुवनगा या श्लोकभरः शशधरनावा ।। ६ सभाजनप्रीतिकरं स्वरूपं तल्लोचनाशेचनकं च रूपम् । वक्त्रं च सत्पुण्यकृतं प्ररूपं येपांच सौजन्यमिहासरूपम् ॥ ताचनरस्यैप कपायवह्निः सर्वकपः सन् प्रणिपापचीति । यावन्न येषां पदपद्मलेवारेवाप्रवाहं प्रणिवाभजीति ॥ उत्सर्गतः सक्रियतामुपासते संप्राप्य डिद्धातुरिवात्मनेपदम् । सक्तिको यत्परिवारका स्वयं साधुप्रयोग प्रवदन्ति तं बुधाः येपामशेपांगमपंडितानामपि.........पोधकानाम् । शरीरकान्त्या विजितं सुवर्ण संकोचितं सपर्णमितियतेर्यत् ।। - . १ . ७ -- or - .

१५ वृह त्यो सा लि क पट्टा व ली स्फुटं गुणवति (१) प्रतिपादितानां श्रीहेमचन्द्रगुरुणा निजलक्षणान्तः । येपामहो गुणवतामपि दृश्यते सा चित्रं तथापि नहि याति सलक्षणत्वम् ।। द्वात्रिंशदक्षरोऽपि श्लोकः शास्त्रैकदेशसंस्थाता। यच्छलोकश्चित्रमहो नहि माति द्वयक्षरोपि भुवनेऽस्मिन् ॥. १२ सतां दर्शनमात्रेण धनरत्नप्रदोऽसि यत् ।', इतीव विश्वविख्यातं धनरत्नेति नाम ते ॥ १३ पादान्जातिमन्मणिप्रभनखश्रेणीमिपात्माभृतं सदाम्भीर्यजितोऽर्णवो वितनुते.शंकेऽनं येपां सदा.। स श्रीधनरत्नसूरिरतुलप्रौढप्रतापोदयो गांगेयद्युतिमांश्चिरं विजयताद् भूम्यङ्गनामण्डनः ॥ एवं विनु.........भत्तया हर्पकुलेनामलेन.। सत्काव्यः श्रीशशिगणनाथा धनरत्नसूरीशाः।। इति श्रीपूज्यश्रीधनरत्नखरीश्वरस्तुतिः पंडितप्रवरश्रीहर्पकुलगणिकृतेति । तथा श्रीधनरत्नरिसंस्थापिताचार्याः सौभाग्यकनिधिश्रीसौभाग्यसागरसूरयः । तेषां शिष्यः पं० श्रीउदयसौभाग्यगणिः श्री हेमप्राकृतढुंढिका चक्रे। • 'अमराउत्ति-श्रीधनरत्नसूरीणां पट्टधरः, अमराद-अमरशब्दाव , रत्न इति-श्रीअमररत्नसूरिः । पत्तननगरनिवासि विंशतिप्राग्वाटज्ञातीयसाधुअचलांगनाचन्द्रावल्युदरमरालावतारः। सोऽपि श्रीगुरुः सपादलक्षश्रीहैमशन्दानुशासन- निर्णयदावकः । ते च श्रीअमररतसूरयोऽप्याचार्यचतुष्कं स्थापितवन्तः । ते चाचार्या:-श्रीतेजरत्नमरिः, श्रीदेवरसमरिः, श्रीकल्याणरत्नमरिः, श्रीसौभाग्यरतसूरिश्च । एभ्यः शाखात्रिकं जातम् । तत्र 'तेअओरयणा' इति-तेजसन्दाद् रताः, तेज- रत्नाः । यद्यपि तेजस् शब्दः सकारान्तस्ततः तेजोरता इति युक्तम् । तथापि ग्राम-नाम्नोन संस्कारः, तेनाविरुद्धमिति। 'गुरुभायरा गुणन्नू' इति-अमररत्नमरिः श्रीतेजरत्नमरिश्च उभावपि गुरुभ्रातरौ कथंभूतो ? गुणज्ञौ । गुरुभ्रात्रा च श्रीधनरलपरिणा] पदप्रदानेन बहूपकारितम् । श्रीतेजरत्नमरिभिरपि तदुपकारमामन्य, तसिन्नेव गुरुसं प्रतिपद्या- ऽऽत्मनस्तत्पट्ट एव प्रख्यापितमिति तेन गुणज्ञाविति । थीतेजरतरिव्यतिकरस्लेम्-स्तम्भतीर्थपुरनिवासि साधुवीपक भार्या हाइ कुक्षिमानसमरालावताराः श्रीशा- रदाकण्ठपीठोरुहाराः । यदुपदेशाद् वागडदेशाचत्यवतसगिरिपुरनगरनिवासि व्यवहारिवर्यधुर्य्य हुंबडज्ञातिश्रेष्ठ- साधुनाकरः सागवाटकपुरे विमानप्रतिमानं शिखरबद्ध श्रीपार्श्वनाथचत्यमकारयत् । तत्र श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथप्रभृति- जिनविम्बकदम्बकं प्रौढप्रतिष्ठोत्सवं श्रीतेजरतसरिभिः प्रस्थापयामासिवांश्च । पुनर्यदुपदेशादन्येऽपि श्रद्धालवः प्रतिष्ठा- संघपतितिलकाद्यनेकधर्मकृत्यानि कारयां चक्रिरे। एकेयं शाखा । 'परिवरो देवरयणो' चि-सूरीणां वरः प्रधानः सरिवरः, स च श्रीदेवरसमरिः। असावपि अमररतमरीणां शिष्यः तेन वपट्ट एव प्रख्यापयन्ति । अत इयं द्वितीया शाखा । व्यतिकरस्त्वयम्-सीरोहीनगा साधु गोपक प्रियाचंगादे कुक्षिप्राचीप्रमाकरः । यदुपदेशाद् अहमदाबाद-राज- नंगरनिवासि साधु देवचंद श्रादी प्रीमलदे नाली च प्रौढप्रतिष्टोत्सवं चक्राते । इति श्रीपट्टावली समाप्ता ।। , . " विविधगच्छीय पावलीसंग्रह ॥ परिशिष्टारमका गाथाः ॥ सिरिदेवसुंदराहा विहरता विजयसुंदरा गुरुणो। चिरजीविणो हवंतु जिणसासणभूसणा परमा ॥१९॥ धणरयणसूरिसीसा विबुहवरा भाणुमेरुगणिपवरा । माणिकरयणवायगसीसा लहुभायरा नयसुंदराभिहाणा उवझाया सुगुरुचरणकमलाई। पणमंति भत्तिजुत्ता गुरुपरिवाडि पयासंता ॥२१॥ तेसिं ॥२०॥ ॥ इति श्रीवृहत्तपोगणगुविलीस्वाध्यायः समाप्तः ।।

लघुपोसालिक पट्टावली। १ श्रीवर्द्धमानस्वामी। ७ संभूतिविजय-भद्रवाह-१७० वर्षेः। वीराद - २ श्रीसुधर्मस्वामी-श्रीवीरनिर्वाणात् २० वः ६० वः नवनंदराज्यं, ११८ वर्षे यावत् । श्रीवीरान पंचमो गणधर श्रीसुधास्वामी यस्याधुना साधुसंततिः। १५५ वः चंद्रगुप्तः । ३ जंबूस्वामी-निवृतो वीरान ६४ वः । ८ संभूतिशिष्यश्रीस्थूलभद्रः-श्रीवीरा२१५ मण १ परमोहि २ पुलाए ३, चः स्वर्ग गतः। ४ पूर्व, २ संयम, २ संस्थानादिव्य- आहारग ४ खवग ५ उपसमे कप्पे ७॥ बच्छेदः । सूक्ष्मध्यानं येन पूर्वपरावर्तनशक्तिर्भवति, संयमतिय ८ केवलि ९, महाप्राणध्यानं येन १४ पूर्वाणि परिका २ मध्ये गण- सिज्झयणा १० जंबुंमि चुच्छिन्ना ॥१॥ यति तावपि व्युच्छिनौ । पाचात्य ४ पूर्वव्याख्या मत्कृते जंबुना त्यक्ता नवोढा नव कन्यकाः । व्युच्छिन्ना। तन्मन्ये मुक्तिवध्याऽन्यो न वृतो भारतो नरः ॥२॥ श्रीनेमितोऽपि सगडालसुतं विचार्य, चित्तं न नीतं पनिताविकार मन्यामहे वयममुं भटमेवमेकम् । वित्तं न नीतं चतुरैथं चौर। देवोद्रिदुर्गमधिरुह्य जिगाय मोह यद्देहगेहे द्वितयं निशीथे. यन्मोहमालयमयं तु वशी प्रविश्य ॥ जंयूकुमाराय नमोस्तु तस्मै ||३|| वीरान २२०यौद्धाः। वीरात् १७८ मोरियरजं च । श्रीवीराद ७० वर्षे ऊकेशे श्रीवीरप्रतिष्ठा । सत्यपुरे ९ तच्छिप्यो महागिरि-सुहस्ती-श्रीवीरा श्रीरत्नप्रभसूरिभिः श्रीवीरप्रतिष्ठा कृता । गृहवास १६, २९१ वः स्वर्गः । स्थिवरावल्यां महागिरि-मुहस्ति. मत २०, केवलि ४४, सर्वायुः ८० शिष्यो बहुलसदृग्वयाः । वद शिष्यः स्वातिः, वत्कृता- ४ श्रीमभयस्वामी-श्रीवीरराव ७५ वभूव। स्वचादियः संभवंति । तच्छिष्यः श्यामाचार्यः प्रज्ञापना- गृहे ३०, प्रते ४४, युगप्रधानत्वे ११,सर्वायुः ८५ वर्ष। छन् । श्रीआर्यमहागिरिमा गतोऽपि जिनकल्प आचीर्णः । ५ श्रीशय्यंभवसूरि:-श्रीवीराद ९८ यः। गृहे श्रीआर्यसहस्तिना संप्रतिः प्रतियोषितः । वेन ३६ सह- २८, मते ११, युगप्रधाने २२, सर्वायुः ६२ वर्ष। समिताः प्रासादाः कारिताः । सपादलक्षार्षियानि कारि- ६ श्रीयशोभद्रसूरि:-चीराव १४८ वर्षः पट्ट. वानि । ३६ सहसजीर्णोद्वाराः कारिताः। प्रातःवन्म्यिो- श्रीवीरा ३७६ वर्षे कालिकतरिनामा । - पविधगडीय पट्टावलीसंग्रह १० सुहस्तिशिप्यो सुस्थित-सुप्रतिबद्धौ १९ श्रीप्रद्योतनसूरि- कोटिक-कादको । ज्ञानचतुष्टया सरिमंत्रः प्रकटी कृतः । सर्वदेवमरिणोपाध्यायः सन् चैत्यं त्याजितः। ११ थीइन्द्रदिन्नसूरि-कोटिवार सरिमंत्र आरा २० श्रीमानदेवसूरि:-पभा १ जया २ विजया धितः, तस्मात् कोटिकगच्छः। ३ अपराजिता ४ [सेवितः]| तक्षशिलायामशिवोपशा- १२ श्रीदिनदरिः-श्रीपीरात् ४५३ वर्षे गई भि- न्त्यै शान्तिस्तवनं नडूलपुरात् प्रपीत् । प्रभावकचरित्रे स्लोच्छेदी कालिकसरिः। पूर्व मानतुंगचरित्रं उक्तम् । पचात् देवसूरिशिष्यप्रद्योत- १३ श्रीसिंहगिरिसूरिः-वीरात् ५५३ भृगुफच्छे नशिप्यमानदेवस्य प्रबन्धोऽस्तीति । खपटाचार्यः, वृद्धवादी,पादलिप्तश्च प्रभावकचरित्र त्विदम् २१ श्रीमानतुंगसूरि:-मानतुंगमरिर्मक्तामर- ४८४ आर्यखपटः। बी० ४६९ आर्यमंगुः । वी० ४७० भपहर-भचिम्भर-अमरस्तादिकृत । विक्रमादित्यराज्यम् । श्रीसिद्धसेनदिवाकरः, येन उज्जयि- भक्तामरं च भयहरं च विधापनेन न्यां महाकालपासादे महाकाललिंगस्फोटं कृत्वा स्तुत्या नम्रीकृतः क्षितिपतिर्भुजगाधिपश्च । श्रीपार्श्वनाथनिय प्रकटीकृतमिति । मालवके तदा वृद्धभोजराजसभायां मानं प्राप्त १४ बज्रस्वामी-चीरात् ४९६ श्रावस्त्यां वज भक्तामरतः। स्वामिजन्म । वी० ५८४ स्वर्ग । वी० ५३३ भद्रगुप्तः २२ श्रीवीराचार्य:- आर्यरक्षितसरिणा नियमितः । वी० ५८४ श्रीगुप्तचरा नागपुरे नमिभवनप्रतिष्ठया महितपाणिसौभाग्यः। सिकः समभवत् । ची० ५२५ श®जयोच्छेदः । पी० ५७० अभवत् वीराचार्य स्त्रिभिः शतैः साधिक राज्ञः। जावड्युद्धारः । वी० ५९७ आर्यरक्षितरिः । वि० ३०० चः । अतीय भाग्यसाराः । १५ वयसेनसूरिः-ची. ६२० वर्षः स्वर्गः। २३ श्रीजयदेवसूरि:-पी०८२६ प्रशदीपिकाः। चतुपुलसमुत्पत्तिपितामहमहं विभुं । वि० ३५० चतुर्दशी वदंति । परं चतुर्मासकं तति । दशपूर्वनिधि वंदे वजस्वामि मुनीश्वरम् । २४ श्रीदेवानन्दसूरि:-ची० ८४५-वि० ३७५ ६०५ शाफराज्यम् । ६०९ दिगंबराः। वी० ६१६ बलभीभंगः । कचिद्देचं वि० ९०४ गंधर्ववादिवेतालशां. दुईलिकाचार्यः । विक्रमात...गिरिनारतीर्थे जावडोद्धारः। तिना बलभीभंगे श्रीसंघरक्षा । १६ श्रीचन्द्रसरिः-श्रीचीरात् ६७० सस्पपुरे जा. २५ श्रीविक्रमसूरिः-ची० ८८२=वि० ४१२ (ना?)हडनिर्मापितप्रासादे श्रीजजगारिणा श्रीवीरप्रतिमा चैत्यस्थितिः। पी० ९९३-वि०५२३ कालिकेन'४ पर्यु- स्थापिता। पणा, ९९४ तस्य स्वर्गः। १७ तच्छिप्यश्रीसामन्तभद्रसूरि:- २६ श्रीनरसिंहसरिस- पूर्वश्रुताम्नाया। अत्र तृतीयाभिधारण्यका इति । नरसिंहरिरासीदतोऽपिलग्रंथपारगो येन ।.. सामन्तभद्रसरिः, लोकैर्वनवासी तसात् चतुर्थ यक्षो नरसिंहपुरे मांसरतिस्त्याजितः स्वगिरा।। नाम च वनवासी। २७ श्रीसमुद्रसरिः- १८ श्रीदेवसरिः-वृद्धो देवसूरिरिति ख्यातः। सोमाणराजकुलजोऽथ समुद्रशारि- पी०६९५ वर्षे कोरंटके नाहडमंत्रिचैत्ये शंकुप्रतिष्ठाकन् । गच्छं शाशास किल यः प्रवर प्रमाणी। श्री वि० २२५ वः । श्रीसिद्धसेनदिवाकरमरिविक्रमप्र जित्वा तदा क्षपणकान् स्ववशं वितेने तिबोधदाता (0. नागहदे भुजगनाथनमस्यतीर्थे ।। . • . -- ११५० व्रतम्, लघु पो सा लि क प धावली ३९ ची०१०१५-वि०५४५ सत्यमित्रात् पूर्वव्यवच्छेदः । अर्बुदे श्रीविमलेन श्रीऋपभदेवप्रासादप्रतिष्ठा कृता । श्री २८ श्रीमानदेवसूरि- वि० १०९६ श्रा० २०९ दिने वादिवेतालेन उत्तरा- विद्यासमुद्र-हरिभद्रमुनीन्द्रमित्रं ध्ययनवृत्तिः कृता। थिरापद्रगच्छे श्रीशांतिसूरेः स्वर्गः। मूरिर्पभूव पुनरेव हि मानदेवः। प्रभावकचरित्रे येन तिलकमंजरी शोधिता सुवाच्या कृता। मान्यात् प्रयातमपि योऽनघररिमंत्र ३८ श्रीसोमप्रभसूरिः-शतार्थी ()बी० १५५१ लेंभेऽम्बिकामुखगिरा तपसोजयते ॥ सत्यपुरे चीरो न चलितः। ची० १०५५=वि०५८५ याकिनीसूनुहरिभद्रस्वर्गः । ३९ श्रीमुनिचन्द्रसूरि:-येपां शिप्यो वादिदेव- २९ श्रीविवुधप्रभसूरि:-धी० १११५ जिनम- सरिः । वि० ११३४ जन्म, ११५२ दीक्षा, ११७४ द्रगणियुगप्रधानः । जिनभद्रीयध्यानशतकादेहरिभद्रसू- सूरिपदम् , १२२६ श्रा० १०....गुरौ खर्गः। एकोनप- रिभित्तिकरणादयमन्यः। प्ठ्यधिकैकादशशत ११५९ वर्षे पौर्णमीयकमतोत्पचिः। ३० श्रीजयानंदसूरिः। तत्प्रतियोधाय च मुनिचन्द्रसूरिभिः .............. ३१ श्रीरविप्रभसूरिः-नडूलपुरे नेमिप्रासाद श्रीदेवचन्द्रमुरिशिष्याः श्रीहेमचन्द्रसूरयः-सं० कृत् । वी० ११७० वि० ७००। ११४४ का शु० १५ निशि जन्म, ३२ श्रीयशोदेवसूरि:-बी०११९० उमास्वाति- ११६६ सरिपदम् , १२२९ स्वर्गः। वाचकः युगप्रधानः । जिनभंद्रीयध्यानशतक-श्रावकप्रज्ञ सं० १२१३ वर्षे मंत्रिवाहडेन श्रीशत्रुजयोद्धारः स्यादेहरिभद्रवृत्तिकरणादयमन्य उमास्वातिः। तथा कारापितः श्रीहेमाचार्यवारके । मल्लवादी[य] सम्मतिवृत्ती-'अयं उमास्वातिवाचकाभि ४. श्रीअजितसिंहसूरि-भृगुकच्छे देवसरि- प्राय इत्युक्तम्' पत्र २१, तेन चायमन्यः । वी०१२७० पार्चे कान्हडउयोगी विवादार्थ १८४ सर्पकरंडकान्यादा- वि० ८०० भाद्रवाशु०३ जन्म बप्पभट्टिगुरोः । वि० यागतः । आसन उपविष्टः प्रभुभिः तन्मुक्तस रेपा उल्लं- ८९५ भा० शु० ८ स्वर्गः, इति प्रभावकचरित्रे। पिता न केनापि पष्ठी (१) तदा कोपाचन पलिकाम- वि० ८९४ वटे सूरिपदकृते वृद्धगच्छस्य वडगच्छ ध्यस्थः सर्परूढसिंदूरे त्याज्यो (प्र. 'जो) मुक्तः। स इति संज्ञा प्रभुपादासन्ने चटन्नन्तरे शकुनिकारूपेण कुरुकुल्लया गृ- ३३ श्रीविमलचन्द्रसूरिः। हीतः, स च प्रतियुद्धः । इति श्रीदेवमरिप्रबंधः । ३४ श्रीउद्योतनसूरिः। ४१ श्रीविजयसेनसूरिः-वि० १२०१ चामु- ३५ श्रीसर्वदेवसूरिः-वि० १०१० रामशयने डिकः । वि० १२०४ खरतरगच्छमत्तोत्पत्तिः। वी. ऋपभप्रासादे श्रीचन्द्रप्रभप्रतिष्ठा कृता । चन्द्रावतीशविमल- १६७४=वि० १२१४, पाठांतरे १२१३ आंचलिकमतो- मंत्रिस्त्रीश्रीमतीनां(?) दीक्षा मंत्रिदीक्षाप्रदः (प्रत्यं 'पद) त्पत्तिः। वि० १२३६ साधुपूनिमीआ । वी० १६७२ वि० १००८ पौपधशालास्थितिः । ची० १४९१ तक्ष- जाव(पाह)डोद्वारः । वि०१२५० आगमिकमतोत्पत्तिः । शिलाया गाजणकेति नाम जातम् । ४२ श्रीमपिरत्नसूरिः। ३६ श्रीअजितदेवसूरिः-वी० १४९९-वि० ४३ श्रीजगचन्द्रसूरि:-ची. १७५५-वि० १०२९ धनपालेन देशीनाममाला कृता । १२८५तपाश्रीजगचन्द्रसूरीणां जावजीवमाचाम्लाभिग्रह- ३७ श्रीविजयसिंहसूरि:-वि० १०८८ वर्षे स्तेन गच्छस्य तपानामेति प्रसिद्धम् । आघाटे शारदापरेण विविधगच्छीय पहावलीसंग्रह . - तामा ३२ क्षपणकजयेन भूपालदत्तहीरलाजगचन्द्रविरुदः । यद्ध- ' तेन कोगा लिसापिताः । २१ वटीस्वर्णेन ८४ प्रासादा: गच्छाधीपाश्रीजगधन्द्रमूरि प्रति चित्रावालगच्छीयउपा- पारिताः । साधर्मिकवेपागमने......३२वयों ब्रह्मचारी यो ध्यापदेषभद्रेण प्रोक्तं-श्रीमतां साहाय्यदापी भविष्यामि, अभूत् । तवसुतेन झांझणेन तीर्थद्वये एका रक्तवस्त्रचना क्रियोद्धारः क्रियते । कृत उद्धारः । देवमद्रउपाध्यायशिप्प- दत्ता। राजासारंगदेव(१) कर्पूरकृते येन हस्तयोजना विजचन्द्रः । उपाध्यायेन विज्ञप्तिः कृता-शिष्यविजयच- (योजित ?)मकारयन् । न्द्राय अनुचानपदवी दीयते । न दत्ता । पट्टे श्रीदेवेन्द्रपुरयः श्रीधर्मयोपसरीणां देवकपत्तनेब्धिनारत्नं दर्शितम् । स्थापिताः । भद्रकभाविदेवेन्द्ररारिणा विजयचन्द्राय स्वमात्र प्रयाणकमेकं बलिखा सोमनाथः कायोत्सर्गाद् आचार्यपदं दत्तम् । पश्चात् पृथग जातः । गोमुखयक्षप्रभामिपालमुत्सर्पयन्निपेधितः जंधरालायां- ४४ श्रीदेवेन्द्रसूरिः-श्रीदेवेन्द्रसरिकृतग्रन्थावेते विद्यापुरै वटकानि पापाणाः, कंठे केशगुल्मकरणात दिनकृत्यमन्त्र वृत्ती, नव्यकर्मग्रंथपंचक-वृत्ती, धर्मरत्न दुष्टा ज्ञात्वा प्राधिकापाः भुतहधे पट्टको लगः । श्राद्धः वृत्तिः, सुदर्शनाचरित्रं, भाप्याणि त्रीणि, सिरिउसहस्त- प्रष्टं तत्स्वरूपं सा मोचिता | उजयिन्यां योगिभयात् वादयश्च । चतुर्देववंदणां (प्रत्यं० चतुद्देवन्दृणां !) देवेन्द्र, साध्वऽस्थितौ श्रीगुरव आगताः । योगिना साधका सूरीणां श्रीस्तंभतीर्थचतुष्पथस्थितकुमारविहारदेशनाया मोक्ता:-अनागतैः स्थिरैः स्थेयम् । साधुभिः मोचे स्थि- १८ शतमुखवत्रिकाः। नौवित्त-ब्राह्मणादयः सम्या । किं करिष्यसि । तेन साधूनां दन्ता दर्शिताः । मंत्रिवस्तुपालादयश्च क्रियाबहुमानं गाढं वहति । १३०२ साधुभिस्तस्य कफोणिर्दर्शिता.। साधुभिर्गुरूणां विज्ञप्तम् । वर्षे श्रीविद्यानन्दयरीणां सरिपदम् । तदा तन्मंडपात कुंकु- तेन निशि शालायात्रुन्दरबन्दं विकृवितम्। साधयो भीताः। मवृष्टिः । तदा पाल्हणविहारे नित्य ५०० चीसलपुरी- श्रीगुरुभिर्घटमुसं वरणाच्छाद्य तथा जप्तं यथा आरार्टि भोगः । ३७ (प्रत्यं० ३२) वर्षे श्रीदेवेन्द्रसूरयो मालवे- कुर्वन योगी आगत्य पादयोलमा । कचन पुरे अभिमंत्रि- स्थिताः । कार्मणविस्मृतसूरिमंत्रविद्यापुरस्थविद्यानन्द- तद्वारदानं निशि एकदा अनभिमंत्रितद्वारदाने शाकि- सूरयः । पूर्व विजयचन्द्रमरिणा श्रीदेवेन्द्रररिपु मारवकं नीभिः पट्टिरुत्पाटिता, स्तंभिता, पादपदने मुक्ताः । सर्प- गतेपु गच्छावर्जननिमित्तं समस्तगीतार्थपृथग् २ वस्त्र, दंशे काष्ठभारिकमारामध्ये विपापहारिणी वल्ली ग्राहिता। पुलिकाप्रदान, नित्यं विकृतिअनुज्ञा २, चीवरक्षालनं तथा:-संघाचारनव्यभाष्यवृत्ति, जयपम २८स्तुतयः। ३, फलशाकग्रहणं ४, साधुसाध्वीनां निर्विकृतिकप्रत्या- एकेन मंत्रिणा अष्टयमकं काव्यमेकं दर्शयिता प्रोचे- ख्याने निर्विकृतिकग्रहणं ५, सर्वेषां मत्यहं द्विविधप्रत्या- ईदृक् केनाप्यधुना कर्तुं न शक्यते । गुरुमिा प्रोचे नास्ति ख्यानं ६, आर्यकाभोगसाधूनां ७, गृहस्थार्जननिमित्वं इति नास्ति । मंत्रिणोक्तं तर्हि तत् काव्यं दर्शय | गुरु प्रतिक्रमणकरणअनुज्ञा ८, संविभागदिने गीतार्थेन सद् मिरुक्तं ज्ञास्पते । ततो 'जयधृपभ' स्तुतयः २८ अष्ट गृहे गमनं ९, लेपसंनिध्यभावः १०, तत्कालेनोप्योद- यमका निशेषा निष्पाद्य मित्तौ लिसिताः । स चम- काहणं ११-इति वृद्धशालासामाचारी। स्कृतः। तैः १३५७ दिवं गताः। ४५ श्रीधर्मघोपसूरिः-चातुर्दशिकआचार्य ४६ श्रीसोमप्रभसूरिः-१३१० सोमप्रभमरीणां पार्थात् श्रीमरिमंत्री गृहीतः । १८ वर्षे श्रीविद्यानन्द-ध- जन्म, २१ सरिपदम् । श्रीगुरुदत्ता मंत्रपुस्तिका ।धारित्रं मकीति-अपरनाम-श्रीधर्मयोपरीणामुपायापाना सरि- मे प्रयच्छतु, मंत्रपुस्तिका चेत्युक्ता न गृहीता । अप-, पदम् । नातिशयाद् योग्यतामवधार्य सा० पेथडः रस्य योग्यताभावात् गुरुभिर्जले बोलिता सा। श्रीसोमन- परिग्रहपरिमाण संक्षिपन् नियमभंगसंभवतया नानुनावः। भसरीणामेकादशांगीसूत्रार्थी कंठस्यौ। भीमपल्लयां चतु- .

ल धु पो सालिक पावली ६१ , . मासीमवस्थिताः । एकादशेष्वपराचार्यपु चारयत्स्वपि येपा १३९६ जन्म, १४०४ दीक्षा, महेश्वरे कार्तिकद्वये प्रथमे कार्तिकपक्षे प्रतिक्रम्य विहताः। १४२० सूरिपदं, गुंगुडीसरसि कणयरीपा शिष्येण पश्चात् ग्रामभंगोऽभूत् । तैः पश्चात् पलिखा कोडीनारे उदयीप्पा योगिना सभक्तिना नमस्कृतः। सं० नरीया. समागत्यांबायाः कायोत्सर्गः कृतः । ग्रंथास्तु-यतिजीत- दिपृष्टः स जगौ कणयरीपा दुर्गादेशाद् युगोत्तमत्त्वे नता। कल्पविस्तः,. यत्राखिलेत्यादि ५० स्तुतयः, जनेन येन' इति नित्यनिरपायपैराग्यकराः श्रीदेवसुन्दरसूरयः। २७ स्तुतयः । १३५७ धर्मघोमपुरेरनन्तरं श्रीसोमप्रभ- ५. श्रीज्ञानसागरसरि:-येपां सं० १४०४ सूरिभिः श्रीश्रीविमलप्रभसूरीणां पदं ददे । ते च स्तोकं जन्म, १४१७ दीक्षा, १४४१ सरिपदं, ६० दिवंगताः। जीविताः । ततः स्वायुर्ज्ञाला ७३ वर्षे श्रीपरमानन्दमूरि- दैव कपूरोद्गारुकसरतरसंघे सं० गोवालेन वयं तुर्ये श्रीसोमतिलकसरीणां द्वयेषां मरिपदं दचा'मासत्रयेण कल्पे म इति खमोऽप्युपलेभे। 'थीमदावश्यकोपनियु- श्रीसोमसूरयो दिवं गताः । अन्यत्र कापि पुरे तदिने क्यायनेकग्रन्थावचूर्णयः, श्रीमुनिसुव्रतखामिस्तव-घोषा- पत्रावतीणे देवतावचः-तपाचार्यः प्रथमे सौधर्मे उत्पन्न नवखंडस्तव-तत्कृताः ग्रन्थाः। इति प्रवादी अधुना मेरौ मया देवमुखात् श्रुतः। परमान ५१ श्रीकुलमण्डनसूरि:-येपा १४०९ जन्म, न्दसरयों वर्पचतुष्कं जीविताः। .१७ दीक्षा, ४२ मरिपदं, १४५५ दिवंगताः । सिद्धान्त- ४७ श्रीसोमतिलकसूरि-१३५५ चर्पे माघे आलापकोद्धारः, विश्वश्रीधरेत्यष्टादशारचक्रवन्धस्तव इ- श्रीसोमतिलकसरीणां जन्म, ६९ दीक्षा, ७३ सरिपदं, त्यादि कृतानि । १४२४. दिवं गताः । महाभाग्यवराः। सर्वायुः ६९ । १५२ श्रीसोमसुन्दरसूरि:-१४३० माघ २०..शुक्र तद्ग्रन्थाः-वृहत्नव्यक्षेत्रसमाससूत्रं, सत्तरिसयठाणं, जन्म, ३७ दीक्षा, ९९ स्वर्गः। श्रीसोमसुन्दरसरिवचनात् यत्राखिल २८ वकृतचतुरर्थराजस्तुतिः; शस्ताशम': साहश्रीधरणेन राणपुरे चतुर्मुसधरणविहारः प्रतिष्ठितः । वृत्तयः, तत्चादयः स्तुतयः, शुभभावनशिवशिरांसि, ९९ लासपीरोजी बइठा । सवालास मिथ्यालीकुलानि श्रीनाभिसंभव-श्रीशैबेयादिबहुस्तवानि । श्रीसोमतिलः - प्रतियोधितानि । सवालासं प्रतिमा प्रतिष्ठिता। संवत् कसरिभिः क्रमेण श्रीपद्मतिलकसरि-चन्द्रशेखरसारि-जयाः १४०५ वर्षे धरणविहारस्य प्रतिष्ठा कृता । चत्वारि मुहू- णन्दसूरीणां पदं दत्तम् । तेषु श्रीपद्मतिलकसूरयः श्रीसोमा तानि-दानशाला, गृह, प्रासाद, सत्रुकार कारापितानि । तिलकसरिभ्यः पर्यायज्येष्ठाः । एक वर्ष जीविताः । येषां योगशास्त्र-उपदेशमाला-पष्टिशतक-नवतचसूत्राणां था- वचनायनातिगाः (१) । श्रीचन्द्रशेखरसूरीणां १३७३ लावयोधाः, भाष्यावचूरि-कल्याणकस्तुतिस्तोत्रप्रमुसा जन्म, ८५ दीक्षा, ९२ सरिपदं, १४२३ स्वर्गः । उपित- ग्रन्थाः। १५०९ शिष्या। तेषु शान्तिचन्द्रगणिप्रमुखाः भोजनकथा-श्रीस्तभनकहारचन्धस्तयादीनि उत्कृतानि । मासादिकारिणः । धूलिझेपे स्मृतौ च व्याघ्रगेहरिकटलनम् । ५३ श्रीमुनिसुन्दरसूरिः-१४२६ जन्म, ४३ ४८ श्रीजयानन्दसूरि:-श्रीजयानन्दसूरीणां १३८० दीक्षा, ६५ वाचकपदं, ७० सरिपदं, ३ अर्पयुगप्रधानप- जन्म, ९२ दीक्षा, साजणाख्यभ्राताऽमाने यत् देवतया देवी, १५०३ वर्षे का शु० १ स्वर्गः । बाल्येऽपि १०००.. निशि चपेटया दीक्षाग्रहणमनुमेने, १४२० वर्षे । वैशास अवधानानि, १०८ वर्तुलिकानादोपलक्षिताः। ११८ शु०...अणहिल्लपुरे १४४१ दिवंगताः। तत्कृतग्रंथा:- हस्तश्रीपर्वलेसविधायकाः । ३२ सहस्रटंकव्ययेन युद्ध- श्रीस्थष्लिभद्रचरित्रं, जीपकथास्तवानि । नगरीय सं० देवराजेन सरिपदं कारितम् । संतिकरस्तर- ... ४९ श्रीदेवसुन्दरसूरि:- करणेन मार्यपद्रवो टालितः। २४ वारं विधिना परिम- ६ ४२ विविधगप्टीय पहावलीसंग्रह माराधनम् । तेषु १४ यारं चंपक राजा देपा(1) धाराधि ५७ श्रीसुमतिसाधुसूरि:-पत्तने सं० शिवाका- राजभियंदुपदेशतो निज २ देशेषु अमारि: कारिता। रितवियुधपदः । कोठारी श्रीश्रीपाल-सहिजपालकारितः श्रीसहस्रमाठराशो वचनात् सीरोहीपरिसरे मारिविकारो श्रीसरिपदः । मंडपागताकारणेन सं० जाऊजीव्ययित निराकृतः शांतिफरस्तयकरणात् । टीडमयोऽपि एकलक्षचतुष्कटिकद्रव्यप्नवेशमहः । ८४ चुरासी जोटक निवारितः । नफेर्यादिबढुवाघावरपुरस्सरं । तदवसरे संघस्य मडि- '. ५४ श्रीजयचन्द्रसूरि-कालीसरस्वती विल्दा, प्रदानम् । तदनु तेनैव ११ सेर स्वर्ण-२२ सेर रुप्यमय- सर्वग्रंथविशारदः।। पतिमाप्रतिष्ठा कृता । तदवसरे ११ लक्षानुमितरुप्यटकक- ५५ श्रीरत्नशेग्वरसूरिः-१४५७ जन्म, ६३ व्ययश्च तेनैव चक्रे । पंचपन्यांचाम्लानि जायजीवम् । वट- दीक्षा, ८३ पंडितपदं, १५१७ वर्षे पोप व०६ दिने पटीनगरे मासत्रयेण विधिना श्रीमरिमंत्राराधनमेकश्वेता- स्वर्गः । स्तंभतीर्थे यांचीनाम्ना भट्टेन बाल्ये 'पालसरस्व. भैराचाम्लम् । तदधिष्ठातुः प्रत्यक्षीभवनं च । सीणउरफ- तीति नाम दत्त । तद्ग्रंथा:-श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रवृत्ति, - सारंगपुरादौ सौवर्णटंककमभावनापूर्वकमुभगप्रवेशमहो- श्राद्धविधिवृत्ति-आचारप्रदीपादयः । ११ वर्ष युगमधा- सवाश्चेति कियत् स्मार्यते । श्रीसुमतिसाधुसरिमिः वट्ट- नपदी। पल्या विशेषविधिना श्रीमरिमंत्रसमाराधिता मंत्राधि- ५६ श्रीलक्ष्मीसागरसूरि:-पेयापुरे पदस्थापना। प्ठायकाः प्रत्यक्षी बभूवुः। ते प्रोक्तं श्रीपूज्यायुः साई- विद्यापुर-लाटापछी० पदांनि । साह नगराजेन पदमहो द्वयवर्पमितं वर्तते, तेनास्माभिः प्रत्यक्षीभृतेः किम् । तदा सयो विहितः । संवत् १५१८ वर्षे युगप्रधानपदवी। गुरुभिः प्रोक्तं-केषां शिष्याणां दीयते हरिपदम् । पर्याद चंदनलिमपट्टिकायां वर्णा देवैर्देशिताः । तपागच्छाधिराज- लाटापट्टीयसंघवी माहादेवेनोपाध्यायपदद्वयं, एकादशा- चार्यपदमहोत्सवों विहितः । गिरिपुरे साहश्रीसाल्हाकेन श्रीहेमविमलसूरया स्थाप्याः। श्रीगुरुमिर्हदये स्वाप्प समये ते स्थापिताः । श्रीगुरुभिः पूर्व द्विकआचार्याः स्थापिता:- ५५ अंगुलरीरीमयप्रतिमानयं काराप्य प्रतिष्ठित श्रीगु. रुभिः। मंद्रपे सं० चांदाकेन,७२ देवालय २६ पूजा-- श्रीइंद्रनंदिगरिः, श्रीकमलकलसहरिः । परं श्रीपूज्यश्री- पकाराम,२४ मप्रतिष्ठाः कृताः। श्रीसुमतिसाधुसरिपदं गणमारी न दातव्यः । कस्मात् ? गणभेदः करिष्यति । सुंमतिसाधुसरीणां सरिमंत्राधिष्ठायकैन प्रोक्तम्-एतेषां मंडपीय सं० सूरा-धीराभ्यां । उंबरहट्टे २४ पट्टप्रतिष्ठा । श्रीशुभरत्नहरिपदं पत्तने । देवगिरीय संघवी नगराज- तस्मात् कारणात् युगप्रधानपदवी न दत्ता। पदशतसाधूनां धनराजाम्यां थीम रिपद-वाचकपदं । अहमदावादिय दीक्षा दत्ता । अष्टादशशतसाधुमानम् । श्रीसंघमुख्य संघची गदाकेन अर्बुदे सपरिकरा ४० [सं० १५०७ वर्षे लेपकलंकात् लुकामतप्रवृत्तिः। अंगुलरीरीमयार्चा निर्मापिता । श्रीशरिपदानि। सीरोमां सं० १५३३ वर्षे प्रथमचेषधारी रुपिभाणाख्यो अभूत् ।] सं० 'सीमान मरिपदं ! पेथापुरे वाचकपदचतुष्टयं । ५८ श्रीहेमविमलसूरि:-श्रीतप्पागच्छाधीश श्री पां शिष्याः पंडितश्रीचरणप्रमोदगणि. शिष्यप्रमुस हेमविमलसरीश्वराणां सं० १५२० वर्षे कात्तिक शु० १५ २४ पंडितपदानि । येन श्रीचरणप्रमोदगणिना अष्टादश दिने जन्म, सं० १५२८ वर्षे श्रीलक्ष्मीसागरवरीणां हस्ते शत साधुपरिवाराणां द्विक् २ फल्पप्रदानं प्रत्येकं । पद- दीक्षा, सं० १५४८ वर्षे पंचलासाग्रामे श्रीसुमतिसाधु- त्रिंशत् शत कल्पमदानपूर्व गणपरिधापनिका विहिता। सरिभिः श्रीमरिपदं दत्तम् । साह पाताकेन महोत्सवः विबुधपदमहचराप्रवर्तिन्यादिपदानि । कृतः । सदनु इलप्राकारे कोठारी सायर श्रीपालेन गच्छ- पंचशतसाधूनां दीक्षादचा ! महाभाग्यसारा मभूषुः । नायकपदमहोत्सवो विहितः । तसिन् समये श्रीइन्द्रनन्दि- 1 .

. - लघु पो सालिक पहा वली सरि-श्रीकमलकलसमरिम्यां गणद्वयः कृतः । कुतवपुरा, गीतार्थाश्चत्वारश्चंपकदुर्गे प्रहितास्तैस्तत्र गत्वा सुस्त्राणस्य कमलकलसा । मूलशाखा तु पाल्हणपुरा एतत् त्रिशाखा, स्वकाव्यरंजनकला दर्शयित्वा द्रव्यं वालयित्वा च श्रीगुरुं हेमशाखादीप्तिर्जाता । सं० १५५० वर्षे श्रीदेवदत्तवमात् ववंदुः। सं० १५७८ वर्षे श्रीपूज्या पत्तने चतुर्मासी स्वभतीर्थीयश्रीसंघसाई श्रीशत्रुजयतीर्थयात्रा महामहो- स्थिताः। प्रवेशमहोत्सवसमये ऊकेशज्ञातीय दो० नाकर त्सवपूर्वकं कृता। सं० १५५२ वर्षे सोनी जीवा जागाकृत पंचाननेन तुर्यव्रतोचारसंयुक्तअष्टादशशत मडिः प्रदत्ता प्रतिष्ठामहे श्रीदानधीरसुरीणां सरिपदं दत्तम् । परं स्तोका- श्रीसंघस्य । श्रीस्तंभतीर्थे सा० लाखाकेन ६५ मणमित- युष्काः। ते च पण्मासमध्ये दिवंगताः। तदनु गुरवो रीरीमयांः पट्टाः कारापिताः, तेऽपि प्रतिष्ठिताः श्रीहेमविः लालपुरे क्षेत्रे चतुर्मासी स्थिताः। तत्र सं० थिरासानि- मलमूरिभिः । पुनः पत्तने दो० गोपाकेन .६१ एकपष्टि ध्यात श्रीमरिमंत्रः साधितः । सरिमंत्राधिष्ठायकैर्वरो दचः। मणमित रीरीमयीजिनपट्टिकाः कारापितास्ता अपि श्री सं० १५७० वर्षे डाभिलाग्रामे संभतीर्थीय सोनी जीवा पूज्यैः प्रतिष्ठिताः। विजानगरे कोठारी सायर श्रीपाल जागैरागत्य महामहोत्सवेन श्रीआणंदविमलसूरीणां सरि • कारित-प्रासाद-प्रतिमाप्रतिष्ठा महामहेन श्रीपूज्यैर्विहिता। पदम् , तथा श्रीदानशेखरगणि-श्रीमाणिक्यशेखरगणि- एवं कियवदाताः लिख्यते । पंचशतसाधवः दीक्षिताः। पाचकपदद्वयम् । तथा महत्तरापदं दत्तम् । सं० १५७२ , महाभाग्यसारा बभूवुः । तद्वर्प पूज्यादेशेन श्रीआणंद- चर्प श्रीस्तंभतीर्थे समागमनाय इलप्राकाराचलिताः । कर्पट- विमल (प्रत्यंतरे-आणंदसोम)मरया कुमरगिरी चतुर्मासी चाणिज्ये श्रीपूज्यपादावधारणसमये दो० आणंदेन नगरे स्थिताः । श्रीपूज्यानामाज्ञां विना मावी (प्र० माहवी) सर्वत्र सुरंनाणागमनसमयवत् तलीआ-तोरण-ध्वजारोप- साध्वी दीक्षिता, वयेन लघीयसी । श्रीपूज्यैरेवं प्रोक्तम्- णादिकोत्संवयुतः प्रवेशमहोत्सवः कृतः । तज्ज्ञात्वा पिशु- ममाज्ञां बिना त्वया कथं दीक्षिता ?, यदि दीक्षिता तदा नेन पातशाह मुदाफरखाग्रे प्रोक्तम्-एवंविधः प्रवेशो- सर्वथैव मोचनीया एवं कथिते सति न मोचिता । प- त्सवः कृतः । ततः कर्पटवाणिज्ये बंदाः प्रेषिताः । गुरवा श्वाद सिद्धपुरे सीरोह्यां चतुर्मासकचतुष्टयं कला श्रीआणं- पूर्वमेव चलिताः । चूणेलग्रामे प्रामाः । रजन्यां श्रीपूज्यैः । दविमलसरयः गूर्जरधरित्र्यां समागत्य, श्रीहेमविमलसरि- श्राद्धाने प्रोक्तम्-विममस्ति, वयं चलिष्यामः। निशायां पादानामनाच्छय सं० १५८२ वर्षे पैशास ०३ दिने चलिताः । सोझीत्राग्रामे प्राप्ताः । प्रभाते चूणेलयामे पृथगुपाश्रये स्थिताः। तत्र तैलधुंसकयोगेन मलिनांशु- प्राप्ता चंदा:-क गुरवः ? ग्रामाधीशेन प्रोक्तम्-न, कानि कृतानि । ऋपिमतीनामेवंविधा प्रवृत्तिर्जाता। जानीमा, अत्रता क चलितास्ते । पश्चात् पलिताः । अथ श्रीपूज्य सं० १५८३ वर्षे विश्वलनगरे ज्येष्ठ- संभतीर्थे पादावधारिताः । श्रीसंघेनोत्सवः कृतः। स्थिती स्थिते सति.अश्विनमासे श्रीपूज्यशरीरे असमा- पिशुनवाटिका कृता । पोजकीभिः श्रीगुरवा बंदीस्थानके धिर्जाता। चटपल्लीतः चतुर्मासकमध्ये श्रीआणंदविमला- रक्षिताः । टंकाः सहस्रद्वादशमिता जीर्णनाणका संघ- चार्याः समाकारिताः । तेषां गुरुभिः प्रोक्तम्-सं गण- पार्थे गृहीताः। श्रीगुरुभिर्मनसि चितितमेवं सर्वत्रापि भारं गृहाण । तैरुक्तम्-गणभारे मम क्षमा नास्ति । भविष्यति तदा अतीव दुसकरं जायते । इति विचार्य पश्चात् गीतार्थसंधैः संभूय श्रीआणंदविमलाचार्यसमक्षं आचाम्लतपः कृता श्रीमरिमंत्रं आराधिते सति अधिष्ठा. श्रीहेमविमलसरिभिः स्वहस्तेन श्रीसौभाग्यहर्षसूरयो निज- यकवचनं बभूव । आक्षेपं कुरुध्वं, द्रच्यो पलिप्यति। पट्टे स्थापिताः । सं० १५८३ वर्षे अश्विन शु० १३ दिने पथात् शतार्थी पं० हर्पकुलगणि-पं० संघहर्पगणि-पं० दिवं प्रासाः सौभाग्यनिधानाः । सं० १५८३ वर्षे ऋषि- इसलसंपमगणि-शीघ्रकवि पं० शुभशीलगणिप्रभृति मतोत्पचिर्जाता । रुपिमतात् विवंदनीकगच्छागतराज- P 1 विविधगच्छीय पद्मावलीसंग्रह विजयहरिणा लघुउपाश्रयमतं कर्पितम् । ७०० दर्शन ,परिधापनिकापूर्व वित्र पंचशत शैलमयानि : [१५७० वर्षे सुपकमता निर्गत्य वीजाख्यवेपधारी रीरीमयान्यलब्धसंख्यानि प्रतिष्ठितानि श्रीसौभाग्यहर्ष- यीजामती नाम्ना मतं निर्गतं तेपां द्विकभंगा। सूरिभिः। सं० १५७६ वर्षे नागपुरीयगणात् उपाध्याय पवा अथ पुनः श्रूयतां-सं० १५९६ वर्षे अहम्मदावादे शिष्य पासचंद्रउपाध्यायेन स्वनाम्ना मतं प्रकटीकृतं । पादाबधारिताः श्रीसौभाग्यहर्पसरयः श्रीसंधैः प्रवेश-नंदि- । पाचचंद्रमतात् बार्पिणा ब्रह्मामत कर्षितं । मंडन-मालारोपणाधनेकोत्सवा विहिताः । तत्र चातुर्मासी कुतवपुरागच्छात् हर्पविनयचरिणा निगममतं कर्पित स्थापिताः श्रीसंपेन । सं० १५९७ वर्षे आश्विन शुक्ल ५ अपरनाम भूकटीयामतं । पश्चात् हर्पविनयरिणा मुक्तो दिने वाचकश्रीसोमविमलगणिपादानां च तथा सकल- निगमपक्षो ब्राह्मण रक्षितः। हर्षमुनीनां च मूरिपदं दत्तम् । तत्समये सा. गंगदास- संवत् १५६२ वर्षे घिरापद्रनगरे कटुवणिजा पुत्र सा० देवचंदेन पंचलक्ष द्रव्यव्ययेन रिपदमहो- कटुकमतं कर्पित गुरुणा सह द्वेषः।] स्सको विहितः । वाचकपदद्वयं च उ० विजयकुल-पिन- ५९ तत्पद्दे श्रीसौभाग्यहर्ष सरिः-संवत् यकुलमणीनां च विहितम्। महामहिमाकरा बभूवुः । १५५५ वर्षे श्रीसौभाग्यहर्पसरीश्वराणां जन्म, सं०१५६३ सं० १५९७ वर्षे काकिशुक्ल १२ दिने दिवंगताः । चर्षे पं. हर्षदानगणिभिईद्धनगरे विहृताः, श्रीहेमविमल- कियद्गुणाः मार्यते। सूरैर्दीक्षिताः। सं० १५८३ वर्षे अश्विन शु० १० दिने श्रीसौभाग्यहर्पसूरय ओसवंशज्ञातीयाः । साधु ३०० श्रीहेमनिमलसरैनिंजपट्टे स्थापिताः। तत्समये व्यवहारि दीक्षिताः ।। • भीमसी-रूपा-देवदत्त-कवा-जयपंतप्रमुसः जीर्णलक्ष ६० तत्पट्टे श्रीसोमविमलसूरिः-तेषां कियद- टंककमितव्ययेन पदमहोत्सयो विहितः। सं० १५८६ वदावारनुभूताः लिख्यते । स्तंभतीर्थनगरपाधै कंसारीपुरे र्षे वृद्धनगरीय अलवरवास्तव्यागत टंकमालीय-सा० वृद्धसजनीय-प्राग्याटान्वये मंत्रीश्रीसमधरान्वये मंत्रि डाहाप्रमुस-भइरसदास-भवानीदास तत्रत्य गूजर धरि-. रूपा भार्या अमरादे कुक्षीभगाः। सं० १५७० वर्षे ... त्रीय 'श्रीसंघयुक्ततपागच्छेशं श्रीसौभाग्यहर्पसरिभिः १५ दिनोदये जन्म । सं० १५७४ (१) वर्षे वै० शु०३ साई पत्तनादारभ्य शगुंजय-गिरिनारं यावत् प्रतिनगरं दिने श्रीहेमविमलसूरीश्वरैर्दीक्षिता अहम्मदाबाद। तत्स- वर्णटंककलमनपूर्वकं थीस्तंभतीर्थयात्रा कृता । स्तंभतीर्थ- मये सं० भूभच जमूकेन दीक्षामहोत्सवो विहितः। स्तम- नगरे सं० १५८९ वर्षे ज्ये० शु० नवम्यां तिथौ रविवारे तीर्थे प्राग्याटज्ञातीय सा० कीकाकेन सं० १५९० वर्षे जगसीहरा सा० सोमसी-रजसी-लरामसी-पीमसी कृत का० ३०५ दिने बहुद्रव्यव्ययेन गणिपदं दापितम् । नमस्कारबद्ध वर्णटंक-संडलंभन साहम्मीवच्छल-दर्शना. सं० १५९४ वर्षे सीरोह्या श्रीसौभाग्यहपरयः पादावधा- सुभगश्रीगच्छनायरुपदमहोत्सवो विहितः। विद्या. रिताः । तत्र गांधी राणा जोधाकृत महोत्सवपुरस्सर पुरे सं० १५९५ वर्षे, पोप शु० ५ गुरुपुष्पयोगे दोसी फागुण च० ५ दिने धीसोमविमलगणिना पंडितपदं तेजा मांगा स्थालिकायुत मोदकलंभनपुरस्सरं अहम्मदा- दत्तम् । अझाहाँ शारदा पंडितैस्समाराधिता । वरो दत्त:- बादादिश्रीसंघमीलनपूर्वकं पं० सोमविमलगणीनां चाच- वं सद्भाग्यो भरिप्यति । ततः श्रीगुरुभिः सार्धं विद्या- कपदं दचम् । तम्मिन् वर्षे इलप्राकारे मुहडासीआ साहश्री पुरे समागताः । सं० १५९५ वर्षे तत्र दो० तेजा मांगा- आमराज पोपट विहित नवलक्ष टंकन्ययेन बहुग्रामागत केन वाचकपदं दापितं महोत्सवेन । सं० १५९७ वर्षे धीसंघ, दर्शनी ७००, दीगंवर ५००, अन्यगच्छीय यती अहम्मदाबादे श्रीसौभाग्यहर्पमरैः सरिपदं दत्तम् । तदव- . .

१५ - - . लघु पो सा लि क प हा वली दाताः पूर्वतो ज्ञेयाः। तद्व चैत्रमासे विद्यापुरीय दो० यथाऽभिग्रहः पूर्णः ॥५॥ तेजाकेन पहुग्रामीयसंघमीलनपूर्वकं त्रिशतसाधुयुतश्री ततश्चलिताः श्रीशत्रुजययात्रां कुखा धवलके समेताः। सोमविमलसरिभिः सार्द्ध श्रीविमलाचलयात्रा चतुर्लक्ष- तत्राहम्मदाबादीयसंघो चंदनाथ समेतः । तैस्तत्र घृतलं- द्रव्यन्ययेन कृता । तस्मिन् समये संघमध्ये मरकोपद्रवो भनप्रभावनाद्युत्सवो विहितः । शालाद्वारं कोऽपि दास्यति जातः । श्रीगुरुभिानं कृता शान्ति प्रापितः । तदा पारयिष्यामि । पश्चात् प्रहरं यावत् श्रीसंघः स्थितः । सं० १५९८ वर्षे पत्तने चातुर्मासी प्राप्त प्रतिक- कपाटोद्घाटैयमिक शालाद्वारं दापित, अभिग्रहः मणानन्तरं कायोत्सर्ग कृते,शालासन्न सं० गोगी चंदित्वा पूर्णः॥६॥ यदा गृहे याति तदा पारयिष्यामः । स तत्रैव स्थितः। ततः श्रीस्तंभतीर्थे पादावधारिताः। तत्रैकदिने कायो। प्रभाते घटिकाचतुष्क जाते वंदित्वा गतः । पूर्णाभिग्रहे त्सों विहितः । सो० खीमसी-ओसवंशज्ञातीय लघु पारितः॥१॥ शास्त्रीय, श्रीमाली राजव्यापारी सारखीमु-एतवयं सह पर्युपणानन्तरमष्टमीदिनेऽभिग्रहो जगृहे-विसा पास समागत्य बंदिष्यति,उत्सर्ग पारयध्वं, तदा पारयियामः। पत्नी सखमादे कुल्हरिदुग्धमाकारयित्वा दाखति तदा उत्सर्गकृतानन्तरं सार्द्धपंचप्रहरैरभिग्रहः पूर्णः ॥७॥ इति पारणकम् । पंचोपचासैरभिग्रहः पूर्णः ॥२॥ सप्ताभिग्रहाः। कार्तिकचतुर्मासकानंतरं अभिग्रहो जगृहे गुरुभिः ततः कान्हमदेशे वणच्छराग्रामे प्राप्ताः। तत्र श्रीसं- दो० पंचायण भ्राता दो० गोधाख्यो जिनालये जिनार्चा घाग्रहेन शाहश्रीवर्द्धमानकृतमहोत्सवेन एकलक्षटंकमाद्य कृत्वा धौतिकैऽपहते सति श्रीगुरूणामाकार्य खडा दुग्धं जीर्णनाणकव्ययेन पंडित श्रीआणंदप्रमोदगणीनां वाच- घृतं च सह दास्यति तदाऽऽचाम्लपारणकम् । सप्तविंशति कपदं दत्तम् । तदा उपाध्याय श्रीआणंदप्रमोदगणिना दिनरभिग्रहः पूर्णः ॥३॥ गणपरिधापनिका विहिता । ततः क्रमेणाम्रपद्रनगरे । अहम्मदावादीय सं० सहजपालो वंदना समेतः। प्राप्ताः। तत्र सं० मांडणकृतमहामहेन पं० विद्यारत- तस्मिन्नेव दिने प्रतिक्रमणानन्तरमुत्सगों विहितः । यदाऽयं • गणीनां पं० विद्याजयगणीनां च विबुधपदं दत्तम् । अथा- करेण पादौ वंदित्वा कथयिष्यति-यमुत्सर्ग पारयध्वं । एमीदिने उपोपिते सति पाश्चात्यग्रहरे ग्रामादहिः पति- स दूतो वंदित्वा गतः। सकाले जिनवंदनार्थ वाटिकापुरे तप्रपायां पद्मासनेन कायोत्सगों विहितः। कपरवाडा गतः। सपादप्रहरे समेतः, वंदित्वा प्रोक्तम् , अभिग्रहः ग्रामतः चतुर्विधश्रीसंघसा, पं० आणंदनेमिगणिभि- पूर्णः॥४॥ रागत्य वंदयिष्यति तदा पारयिष्यामः । साईपश्नहरैर- संवत् १६०० वर्षे चतुर्मासकं कृता कार्तिक शु० भिग्रहः पूर्णः ॥८॥ प्रतिपदादिने पत्तनीयसंघसार्द्ध श्रीशचुंजय-रवतकाचल पश्चाद् पलिते सति अहम्मदाबादं प्रति चलिताः। यात्रार्थ चलिताः। तत्र यात्रां कसा संयं चंदाप्य दीवयं- आसन्ने प्राप्तेऽभिग्रहो गृहीतः। मौनम्, न शयनम् , दिरे प्राप्ताः । तत्र चैत्र शु० १४ दिनेऽभिग्रहो गृहीत:- नाहारः कर्तव्यः। चंपक दुर्गीय पारपि काला सुत पारपि संभतीर्थीय सा० सहजपाल घरणी सहजलदे नाम्नी स- जीवराजो गृहे आकार्य चत्वारि साधकानि चतुर्थ किंचि- शृंगारा अक्षानकं समानीय गुंहलिका दचा बंदिप्यति, न्यूनं यदा दास्यति तदा पारणकं करिष्ये, नो चेत् पर्चने मवत्पादः मम गृहे विहरणाय समागंतव्यं, नत्र गते सति गत्वा पारणकं करिष्यामि । तदभिग्रहः चतुर्थदिने सा स्त्री सर्जूरघृतयुतपौलिको दास्यति तदा पारणकं पूर्णः॥९॥ फरिप्यामि, नो चेत् नहि । सप्तोपनासा जाताः, अष्टमदिने क्रमेण सं० १६०२ वर्षे अहम्मदागद चतुर्मासी -- विविधगष्टीय पहावलीसंग्रह स्थिताः । भाद्रपद शु० अष्टम्यां अभिग्रहो गृहीतः। सा० शुमचतुर्दशीदिने अशुभसूचकं वा संघस्याने प्रोक्तं हीराख्यो द्विप्रहरानन्तरं पर्पटपर्पटिका गुढपर्पटिका श्रीगुरुभिः-दुर्गभंगो भविष्यति । उत्तु सप्तम्पामजनि । पोलिका पूपरयुता स्वकरेण दास्यति तदा पारणकं करिष्ये। गुरवो हाथिलग्रामे प्राप्ताः । तसिन् समये इंडपद्रग्रामे नयमदिने अभिग्रहः पूर्णः ॥१०॥ मरकोत्पत्तिर्जाता। यहबो मनुजाः पशवश्व मृताः । तस्मिन् आश्विनमासे शुक्ल प्रतिपदादिनेऽभिग्रहो जगृहे- समये हाथिलग्रामे श्रीपूज्यानामागमनं श्रुतम् । तत्रागत्य पत्तनीय सं० अमरा मंत्रि गोरा समागत्य गृहे आकार्य श्रीसंधविशतिः कृता-तत्र पूज्यैः पादावधार्य मरक- करवो दास्यति तदा पारणकं करिष्ये । नवमदिनेऽभिग्रहः निवारण क्रियताम् । पश्चात्तत्र पादावधार्य मारिनि- पूर्णः॥१२॥ यारिता ॥१५॥ तस्मिन् वर्षे वागढदेशे गोलनगरमध्ये चत्रशुक्ल सं० १६१९ वर्षे श्रीस्तंमतीर्थ चतुर्मासी स्थिताः चतुर्दशीदिनेऽभिग्रहः कृतः। पाचात्यनहरे ग्रामाधिकारी चतुर्मासकमध्ये आश्विन शुलप्रतिपदादिने सा धनराज- मंत्री कमलाख्यो दिसा बदिप्यति उत्सर्ग पारयच्छ । पा० बाधाभ्यां हस्ते कृत्वा असंडधिगोरसं दासति तृतीयोपवासे पदभिः प्रहरैरभिमहा पूर्णः॥१२॥ तदा पारणक, नोचेचदा पंचदशोपचासः करिष्ये । पंच- ततश्चलमाने सति इलादुर्गे प्राप्तः। वैशाखसुदि मोपवासेऽभिग्रहः पूर्णः ।।१६।। पूर्णिमादिने,पठनपाकृते सति पाश्चात्यपहरे सूर्यगुफा चतुर्मासकानन्तरं नंदुरबारे प्राप्ताः, संघाग्रहाचतुर्मासी यामुत्सगों विहितः । दो० तेजा सा० सालिग सहा- स्थिताः । सं० १६२० वर्षे भाद्रपदवदिचतुर्दशीदिने- गत्य द्वितीय प्रहरसमये वंदितोऽभिग्रहः पूर्णः॥१३॥ मिग्रहो जगृहे-वैष्णवभक्तीयदेशाधिकारी मंत्री थीभाई सं०१६०५ च स्तंमतीथे चतुर्मासी स्थिताः। तत्र समागत्य गृहे आकार्य संडायुतं दुग्धं ददाति तदा पार- पारपि वाघा मेघा कृतमहोत्सवपुरस्सरं गच्छत्रयपरिधा- णकम् । पंचमदिनेऽभिग्रहः पूर्णः ॥१७॥ पनिकापूर्व · दर्शनपरिधान-बहुसंघमीलन बहुद्रव्यच्य. सं० १६२३ वर्षे अहम्मदाबादे पोपमासेभिग्रहा मकरण-सुभग गच्छाधीशपदस्थापना सं० १६०५ वर्षे · प्रपन्नः पविकृतित्यागरूपः। यदा कोऽपि श्राद्धः माघ शुक्ल ५ दिने विहिता। कास्मीरपुरी आगत्य घृत-गुडं ददाति तदा पारणकं, सं० १६०८ वर्षे राजपुरे चतुर्मासी स्थिताः । चतु अन्यथा पण्मासं यावत्सर्वविकृतित्यागः । त्रयस्त्रिंशद्दिने मसिकानन्तरं हविदपुरे मासकल्पो विहितः। तत्राभि सा० भवानेनाभिग्रहः पूरितः । अन्येऽपि बहवः प्रभावा- अहो गृहितः । मौनं शयनाहारवर्जनं च । संघवी रूपचं- संवि ॥१९॥ द गृहे समाकार्य प्रथमसेवतिकामोदकैकमन्ये चत्वारि अशावधानपूर्वकाम, इच्छारिपियाचकाः, श्रीवर्द्धमान- मोदका विभिन्नजातीया दास्यति तदा पारणकम् । पाठे विद्यापरिमंत्रसाधकाः, अभिधानस्मरणप्रभावान् चौर्यादि- दिने पूर्णोऽजनि ॥१४॥ भयनिवारकाः, संदेशकथनात् चंदनाच एकाहिक- -सं० १६१० वर्षे पुनः पत्तने चातुर्मासकानन्तरं व्यहिक व्यहिकज्वरादिरोगापहारकाः, पादजलानुभा- वैशास शुक्ल ३ दिने प्रतिष्ठा कृता । चीठीआ श्रीश्रीअ- वात् सुराप्रसव तथा कुष्ठादिदुष्टरोगापहारकाः, अधः- मीपालेन स्फाटिकमयीप्रतिमाद्विकपीरीमधी-ौलमयी शीर्पकादि पादचंदनात प्रयाति । एवमनेकमहिमाकराः। २५ प्रतिमाः प्रतिष्ठिताः श्रीसोमविमलमरिभिः। टंकाध श्रीकल्पसूनटमार्थादियहुसुगमग्रन्थकारकाः । शतार्थी- पंचलक्ष द्रव्यन्यया कृतः सा० श्रीअमीपालेन । सं० विरुदधारकाः । सं० १५९६ वर्षे कार्तिकसु० १५ दिने १६१७ वर्षे अक्षयदुर्ग चतुर्मासी स्थिताः । अश्विनमासे जन्म । सं० १६०१ वर्षे कात्तिक सु०१५दिने दीक्षिता, - लघु पोसा लि क पावली पा० सांडाकृतमहामहेन। सं० १६११ वर्षे का० बदि वर्तते । तेषां कियद् अवदाताः लिख्यते । सं० १६२३ ५दिने पा० सांडाकृतमहामहोत्सवपूर्वकपंडितपदं दापि- वर्षे धांणधारदेशमध्ये जन्म। तत्र निवासी प्रामाटज्ञातीय तम् । सं० १६२५ वर्षे वैशाख शुक्ल पंचम्यां पत्तने वृद्धसजनीय सा० जोधराज-तत्पनी रूडीनानी, तयोः सं० पंचायण-भार्या वरयाई-पुत्ररत सं० देवजीकृत पुत्रः सुखमसूचितः। सं० १६२३ वर्षे जन्म क्रमेणाप्ट- महामहेन श्रीसोमविमलसरिणा आणंदसोमसरीणां आचा- वयोऽजनि । तस्मिन् समये भुवि विचरन् सन् श्रीसो. यंपदं दत्तम् । तत्समये गणपरिधापनिका विहिता। मविमलसरिस वडगामे प्रासः । सर्वश्रीसंघयुत साह जोध- सं० १६३० वर्षे अहम्मदाबादे माघ शु० पंचम्यां श्री. राजकुमार हर्पराज वंदनाथं गतः । धर्मदेशना श्रुता । आणंदसोमाचार्याणां वंदनदापनमहोत्सवः कृतः । तस्मिन् प्रबुद्धः श्रीहर्षकुमाः। श्रीपूज्यपाधै दीक्षा जग्राह । समये उ० हंससोमगणि-30 देवसोमगणिवराणां क्रमेण सर्वशास्त्रपारीणोऽजनि । सं० १६३० वर्षे दीक्षा वाचकपदद्वयं दत्तम् । तस्मिन् अवसरे संघाधिपविरुद- गृहीता । उपस्थापनानंदिमहोत्सवो विहितः, सं० पुण्य- धारी-वृद्धनगरीय-सं० लखमण पुत्र-नानजी-संघजी- पाल-चर्द्धमानेन । मु० श्रीहेमसोम अभिधानं स्थापि- मेघजी-सूरजीकेन समस्तविवुधपरिधापनिका-निशा- तम् । सं० १६३५ वर्षे सं० लखमणकृतमहोत्सवपूर्वक जागर-साधर्मिकवात्सल्यादिहुद्रव्यव्ययेन उत्सवः कृतः यदि द्वितीयादिने पद्धनगरीय सं० लसमण चतुरशीति पंडितपदं कारितं श्रीपूज्यैः । सं० १६३६ वर्षे वैशाख- श्रीपूज्यविद्यमाने सति । सं० १६३६ वर्षे भाद्रपद चदि ५ दिने दिवं प्राप्ताः । पश्चात् श्रीहेमसोमसूरीणां गणसाधुमीलनबहुग्रामागतसंघसमुदायमिलनसर्वेषां मडि- सारिपदं दत्तम् । सं० १६३७ वर्षे मार्गशिर्षदिनोदये श्री प्रदानपूर्व शर्करापुट प्रदानपूर्व, नमस्कारो यः पठति सोमविमलसूरयः वर्जग्मुः। द्विशती साधूनां दीक्षिता। सरिपदं दत्तम् । खगच्छ-चतुरशीतिगच्छपरिधापनिका तेषां भोजनप्रदानपूर्व श्रीसोमविमलसरिमिः सहस्तेन • ६१ तत्प? श्रीहेमसोमसूरिस-विजयमाना कृता । जाता गच्छाधीशाः । श्रीहेमसोमसरयो विजयमानाः संति इति ।। 卐 ॥ इति श्रीपट्टावली क्षेया। शुभं भवतु ।। 卐 [अन्यान्यहस्ताक्षरैरसितानि निम्नलिसितमूरिनामानि कैश्चित् पाश्चात्यैः पूरितानि समुपलभ्यन्ते एकस्मिन् आदर्शपुस्तके] ६२ तत्पट्टे श्रीविमलसोमसरि ६७ तत्पट्टे श्रीसोमसरि ६३ तत्पट्टे संप्रति विजयमान श्रीविशालसोमसरि ६८ तत्पट्टे श्रीआणंदसोमसरि ६४ तत्पट्टे श्रीउदयविमलसरि ६९ तत्पट्टे श्रीदेवेन्द्रविमलसोमसरि ६५ तत्पट्टे श्रीगजसोमसरि ७० तत्पट्टे श्रीवत्वनिमलसोमसरि ६६ तत्पट्टे श्रीमुनींद्रसोममरि ७१ तत्पट्टे श्रीपुन्यविमलसोमरि विजयराज्यंते नागपुरीयतपोगच्छपट्टावली। १ श्रीधीर-चईमानस्वामी। ४ प्रभवस्वामीराजपुत्र कात्यायनगोत्रीय गृह- २ सुधर्मस्वामी-अग्नियेसापन गोत्रीय कोडाफ- स्थरास वर्ष ३०, गत वर्ष ४४, पुगप्रधान वर्ष ११, सर्वा- संनिवेसवासी धम्मिलनाह्मण महिला ब्राह्मणीना पुन, युः वर्प ६५। चौर ५०० सहितदीक्षा ।१४ पूर्वधर श्रीपी- गृहस्थवास वर्ष ५०, दीक्षा वर्ष ३०, युगप्रधान वर्ष २०, रात् ७० बरसे उपकेमग्रामे श्रीप्रतिष्ठा वीरस कृता । श्री. एह माहि वरस ८ केवलपर्याय पाली राजगृहनगरे मास चीरात ७५ वर्षे श्रीप्रभवस्वामि सिद्धारा प्रमाने पाट- १ नो अणसणारी सर्व आयु वर्ष १०० नौ पूरी करी ५ श्रीसिजभवसरि-श्रीवीरान् ९८ च स्वर्गः। श्रीवीरात् २० वर्षे मोक्षः । जंबप्रतियोधकः पंचमो गण- गृहस्थ वर्ष २८, प्रताप ११, युगप्रधान वर्ष २३, सर्वायु धरः । श्रीसुधर्मसामिन पार्ट- वर्ष ६२ । पज्ञयूपा [धःस्थित] जिनप्रतिमादर्शनात् प्रति- ३ श्रीजंबूस्वामी-राजगृहनगवामी काश्यपगो- युद्धः। मनकपिता दशकालिक ७००'की। श्रीसिज- त्रीय ऋपभदत्तश्रेष्ठिनी भार्या धारणीनौ पुत्र पांचमै भवसरिनै पाटै- देवलोकहुँती चवीन ऊपनी जंयूक्षनी वर्णनानी अधि ६ यशोभद्रसूरि-थीवीरा १०० वर्षे स्वर्ग । कार सुधर्मस्वामियै विद्याधरप्रत कह्यो, विद्याधरह माता- गृहस्थै वर्ष २२, व्रत वर्ष १४, युगप्रधान वर्ष ५०, पिता प्रति कह्यौ तिबार पुत्रप्राप्तिनी आझ्या पई तिवारे सर्यायु वर्ष ९६ । वीरनिर्वाणान् १५५ वर्षे चन्द्रगुप्तो अनुक्रमे पुत्र हुयौ नाम जंबू दीघौ ! अनुक्रमि १६ वर्ष नृपः । परिशिष्टपर्वणि । श्रीयशोभद्रयरिनै पार्ट- गृहवास बसी वैराग्य- वस ब्रह्मचर्य लेइ पछै पिताने ७ श्रीसंभूतिविजय-श्रीगीरात् १४८ वर्षे आग्रह आठ कन्यानो पाणिग्रहण करी रानिनै समै प्रति-. सिद्धः । गृहस्थै वर्ष ४२, दीक्षा ४८, युगप्रधान वर्ष ८, गोधी प्रभातन समै निवाणु ९९ कोडि कंचण छोडी सर्वायु वर्ष ९० । श्रीसंभृतिविजयने पाटई- दीक्षा लीधी । आठ कन्या अन तेहना मातापितादिक ८ श्रीभद्रयाहुस्वामी-श्रीवीरा १७० वर्षे प्रभवादिक ५०१ चौरनै प्रतियोधी छयस्थपणे वर्ष २०, स्वर्गः। गृहस्थै वर्ष ४२, व्रतवर्ष १७, युगप्रधाने वर्ष केवल पर्याय वर्ष ४५, सर्व आयुः वर्ष ६० पाली, श्रीवी- १४, सर्वायु वर्ष ७३ । अपश्चिम पूर्वधर, श्रीउपसर्गहर रात् ६४ वर्षे सिद्धः । अपश्चिम केवली, १० वाना पिच्छेद जयविजय दशनियुक्ति कर्ता, श्रीसंघरक्षाकारी । श्री- गया-मनपर्यव १ परमाणधिर....३ आहार ४ सग ५ भद्रबाहुनै पाटिइं- उसमे ६ कप्पे ७ संयम तिम ३-कहतां सूक्ष्मसंपराय ९ श्रीस्थूलभद्र-श्रीसंभृतिविजयना शिष्य, श्री १ यथाख्यात २ परिहारविशुद्धि ३ केवल सिझगमणा य चीरात् २१५ वर्षे स्वर्ग । शकडालमंत्री पिता माता लाछ- जंम्मि विच्छिन्ना ॥ श्रीवीरा ६० वर्षे पालकराज्यं । त. लदे वत्सुतः, गृहस्थ वर्ष ४५, व्रतवर्ष २४, युगप्रधान दन १०८ वर्षाणि यापन्नवनंद राज्यं ।श्रीजंबूस्वामीनै पाटै- वर्ष ४५, सर्यापु वर्ष पूर्व ४, संयम १, प्रथमसंस्थान २, . नाग युरी य त यो ग च्छ पहा व ली प्रथमसंघयणादिविच्छेदः। भगीनी ७- १२ श्रीआर्यसुस्थितसूरि-गृहस्थे वर्ष ३०, जक्खा य जक्खदिन्ना भूया तह चैव भूयदिना य। व्रतवर्ष २४, युगप्रधानवर्ष ४६, सर्वायु वर्ष १००। को- सेणा वेणा रेणा भयणीओ थूलभद्दस्स ॥१॥ टिक गणस्थापना। पाठतः १४ पूर्वधरः, अर्थतः १० । श्रुतकेवली । १३ इंद्रदिन्नसूरि-गृहस्थे वर्ष ३०, व्रतवर्ष ३२, सूक्ष्मध्यानं येन १४ पूर्वाणि परावर्त्तनशक्तिः स्यात्, युगप्रधानवर्ष ४६। श्रीवीरात् ४५३ वर्षे भृगुकच्छे महा- महाप्राणध्यानं येन १४ चतुर्दशान्यपि पूर्वाणि घटिका- नगरे श्रीखपुटाचार्य वृद्धवादी पादलिप्तश्च । श्रीप्रभाव- द्वयन गणयति; ते अपि द्वे व्यवच्छिन्ने । श्रीधूलिभद्रे कचरित्रे त्वेवम् । श्रीवीरात् ४६९ वर्षे श्रीआर्यमंगुनामा- पूर्वे व्याख्यानं च (१) चतुरशीतिचतुर्विंशतिका यावद्यस्य चार्य । श्रीवीरात् ४७०वर्षे 'श्रीविक्रमादित्यराजाराज्यम् । नाम ज्ञायते जगत्त्रयमध्ये । श्रीवीरात् २२० वर्षे श्रीवृद्धवादी आचार्यः। तत्पट्टे श्रीसिद्धसेनदिवाकरः, येन बौद्धाः । श्रीवीरात् २७८ वर्षे मोरिअराज । १०८ उजयिन्यां श्मशाने महाकालप्रासादे महादेवलिंगस्फो- वर्षाणि स्थूल.. टनं कृत्वा स्तुत्वा श्रीपार्श्वनाथविवं प्रगटीकृतं । श्रीवी- १० श्रीमहागिरिसूरि-श्रीवीरात् २९१ वर्षे स्वर्ग। रात् ४८४ आचार्यपद सिद्धसेन । विक्रमादित्यराज्या- गृहस्थे वर्ष ३०, व्रतवर्ष ४०, युगप्रधानवर्ष ३०, सर्वा- नंतरे त्रयोदशवर्षे संवत्सरोत्पचिः । श्रीइंद्रदिन्ननै पाटि- युवर्ष १०० थविरावल्या श्रीमहागिरिसरि-श्रीसुहस्तिसरी १४ श्रीदिन्नसूरि। द्वौ शिष्यो बहुलसदृशवयो । शिष्याः श्रीउमाखातिपादा- १५ श्रीसीहगिरिसूरि। स्तत्कृतास्तवार्थादयः संति । तच्छिष्यः श्रीवीरात् ३२० वर्षे कालिकाचायों द्वितीय नाम श्यामाचार्यः,श्रीप्रज्ञापना १६ श्रीवहरस्वामी-श्रीवीरात् ४९६ वर्षे जन्म, उद्घारिता यैः । श्रीआर्यमहागिरिणा गतोऽपि श्रीजिनकल्पः सावस्तीनगर्यां धनगिरि पिता, सुनंदा माता, श्रीयजस्खा- समाचीर्णः। एतलइ जिनकल्पाभ्यासी । श्रीमहागिरिसरिनै मिनो जन्म । नभोगमनविद्याकृतसंघरक्षा वनशाखो- पार्ट इग्यारमै पाटि- त्पत्तिमूलं चालो जातिस्मृतिधरः । ११ श्रीआर्यसुहस्तिसुरि-श्रीवीरात ३३५ वर्षे मोहेन मातुः किल वीरनाथो वर्ग:। गृहस्थे वर्ष ३०,व्रतवर्ष ३२, युगप्रधानवर्ष ३८, ऽप्यस्थादृहस्थाश्रम एव तावत् । सर्वायु वर्ष १००। संप्रतिराजाप्रतिबोधकः । अत्र संप्रति- वालोऽप्यहो यजकुमार एप राजासंबंध:-श्रीवीराव.....वर्षे उजयिन्यां संप्रतिराजा । मोहं जगद्रोहकर पिजिग्ये ॥२॥ सवाकोडि जिनप्रतिमा कारिता, सवालाप जैनप्रासादाः वइराचार्यः दशपूर्वधरः । श्रीचीरात् ५८४ वर्षे श्रीव- कारिताः १९५ पित्तलमयप्रतिमाः कारिताः । सिंधुदेशमध्ये यरखामिस्वर्गः। अर्द्धकीलिकासंहननव्यवच्छेदः । श्री- सोरठग्रामेऽद्यापि संति। ७०० दानशाला । येन धर्मप्रवृ- वीरात् ५३३ वर्षे श्रीभद्रगुप्ताचार्यः श्रीआर्यरक्षितमरिणा श्ययं स्वकीय....पा साधुसमाचारि शिष्य(क्ष)पिन्वा निर्यामितः । श्रीवीरात् ५७० वर्षे जावडकृतोद्धारः । साधुवेषेण प्रथम प्रेपिताः पश्चात् साधयः प्रेपिताः । ३६ श्रीवीरात् ५९५ मंत्रिनाइडचैत्ये शंकृप्रतिष्ठा कता कोरंट- हजारजीर्णोद्धाराः। यहुविस्तरेण तीर्थरथयात्राश्च इति संप्र- कनगरे । श्रीवीरात् ५९५ वर्षे समंत्री (१) श्रीआर्यरक्षित विराजाव्ययस्वरूपम् । श्रीवीराव ३०० वर्षे साचौरे स्वर्गः। गृहस्थे वर्ष ८, प्रतवर्ष ४०, युगप्रधानवर्ष १३, जिनभुवनं जातं । श्रीवीराद ३१श्चर्षे तुरकेन न चालिवम्। सर्वायु वर्ष ६१ श्रीवीरान ६०५वर्षे शामराज्यम् । श्रीची- भीआर्यसुहस्तिमरिने पाट- रात् ६०९ दिगंबर हुआ | श्रीवीरान् ६१६ वर्षे दुर्वलि- . - . विविधष्ठीय पहायलीसंग्रह कापुष्यमित्राचार्य । श्रीवीरात् ५८५ वर्षे हरिभद्रधरि मित्रे १० पूर्वाणि सर्वथा व्यवच्छेद । श्रीवीराव १००८ याकिनीमाता ! श्रीवइरस्वामिन पार्टिई- वर्षे पोसाली मंडाणी। १७ श्रीवज्रसेनरि-श्रीवीरात् ६२० वर्षे सर्गः । २८ श्रीनरसिंहमूरि-श्रीवीरान १०५५ वर्षे । गृहस्थै वर्ष ९, व्रतवर्प २८, युगप्रधाने वर्ष १९, सर्वा- २९ श्रीसमुद्ररि-विक्रमात् ३९४ वर्षे अर्बुद- युवर्ष ५६ । सोपारके ईश्वरी श्रेष्ठीनी, पुत्र ४, चंद्र १, ना- गिरिकारितप्रौटचैत्यः । गेंद्र २, निवृति ३, विद्याधर ४ । चतुःकुलसमुत्पतिः । ३० श्रीमानदेवसूरि-श्रीवीरात् १११५ वर्षे- विक्रमात् ६५ वर्षे जिनभद्रगणियुगप्रधान। १८ श्रीचंद्रसूरि-इतो चंद्रकुलं वरीशासा । १९ श्रीसामंतसरि-श्रीवीरात ६७० वर्षे सर्गः। ३१ श्रीविवुधप्रभसूरि-धीचीरा ११९० वर्षे ' २० श्रीवृद्धदेवसरि-श्रीवीरा ६९५ च ८४ श्रीउमास्वाति युगप्रधान | आवकमज्ञस्यादेहरिभद्रमुरिणा शिप्यनै वटतलै आचार्यपद दीघो, तिहांथी वडगलाने वृत्तिकरणा[दायमन्य उमास्वातिः । तथा श्रीमल्लवादिसू- चैसणा थयां, पछे जे जिहां रखा ते तेहां गामने नामे क- रिणा सम्मतिवृत्तौ... । श्रीचीरात् १२७० वर्षे-निक्रमात हिवराणा । तिहाथी ८४ गच्छ थया । ८०० वर्षे भाद्रपदसुदि३ दिने वप्पभट्टिगुरोजन्म, विक्रा- २१ श्रीप्रद्योतनसूरि। भात् ८९५ वर्षे भाद्रवा शुदि ५ खर्गः। श्रीवीरान १२७२ २२ श्रीमानदेवसूरि-नड्डलपुरस्थ शाकिनीभय वर्षे पत्तनस्थापना वनराज बाडुडेन, विक्रमात् ८०२ वर्षे श्राद्धाभ्यर्थनया शांतिस्तर....मारि हतवान् । प्रभावकच- पत्तनमासो जातः। रिने पूर्व मानतुङ्गचरित्रमुक्तं पश्चाद्देवसरिशिष्यश्रीप्रद्योतन ३२ श्रीजपानंदसूरि । सरितच्छिप्यश्रीमानदेवरिप्रबन्धोऽस्ति श्रीवीरात् ८६४ ३३ श्रीरविप्रभसूरि-नाडुले नेमिचैत्यप्रविष्ठा । व श्रीमल्लयादिमुरिणा यौद्धाः पराजिताः। श्रीमानदेवसू- ३४ श्रीपशोदेवसूरि-बीरात् १४९१ वर्षे तक्ष- रिने पाटिई- शिलाया गाजणेति नाम जातम् । विक्रमात् १००८ वर्षे २३ श्रीमानतुंगसूरि-भक्तामरकर्ता, भतिमर- पौपधशालास्थिति। अमरेति स्तवादि कर्ता, वृद्धभोजराज्यावसरे। ३५ श्रीमयुम्नमूरि। २४ श्रीवीराचार्य-श्रीवीरात् ८०२ वर्षे स्वर्गः । ३६ श्रीमानदेवसूरि-उपधानविध्युद्धारकः । गृहस्थे वर्ष....नागपुरे नेमिमवनप्रतिष्ठा० । ३७ श्रीविमलचंद्रसूरि-श्रीवीरान १५६६ वर्षे २५ श्रीजयदेवसूरि-विक्रमात् ३५० वर्षे-धीरान् उत्तराष्पपनवृत्तिकृता... पीरा १६८० -विक्रमात ८२० चतुर्दशी चतुर्मासीति तत्त्वम् । ११३ (१ ११३०) वर्षे नागेंद्रगच्छे श्रीदेवेंद्रसरिरभवत् । २६ श्रीदेवाणंदसूरि-श्रीबीरात ८४५ वर्षे विक्र- येनैकरात्रिमध्ये व्यतरः कृत्वा सेरीसके श्रीपाचचैत्य मात् ३७५ वर्षे अत्र बल्लभीनगरभंग । कचिदेयं चीरात् कारितम् । अत्र मुनिचंद्रशरिरभूत् । वीरात् १६२९ पूनमी- ९०४ गंधर्वादिवेतालोपद्रवे श्रीशांतिपरिणा वल्लभीभंगे या, १६७४ खरतरगन्छस्थापना । श्रीसंघरक्षा कृता । श्रीवीरा ८८२ वर्षे विक्रमात् ४१२ ३८ श्रीउद्योतनसूरि-धीरान १६०८ वर्षे-विक्र- वर्षे चैत्यस्थिति। मात् १२११११३८) २७ श्रीविक्रमसूरि-श्रीवीरान ९६२ वर्षे बीजो ३९ श्री सर्वदेवसूरि-वीराद १४८० वर्षे राय- हरिभद्रसरि हुऔ । वीरात् ९९३ वर्षे कालिकाचार्य हुओ सेण प्रतिष्ठा । तीजी।चतुर्थीद पर्युषणा कर्ता । श्रीवीरान १००० सत्य .१० श्री रूपदेवसरि-अबुदाधिपप्रतियोपका।

नाग पुरी य त पो ग च्छ पट्टा व ली। हुआ। गृह प्रतियोध्या। ४१ श्री सर्वदेवसूरि। वर्षे ४२ श्री यशोभद्रसूरि। ५७ श्री पुण्यरतन पंण्या[स]-सर्वविद्याविशा. ४३ श्री नेमिचंद्रसूरि। रद सं०१४९९ वर्षे। ४४ श्री मुनिचंद्रसरि-उपाध्यायशिष्यः, अवि ५८ श्री साधुरतन पंण्यांस। कृताहारी नागोरीतपा। ५९ तशिष्य श्री पार्वचंद्रसूरि-भट्टारक पद ४५ श्री वादिदेवसूरि-वीरात् १६४४ वर्षे-विक्र- प्राप्त हुआ। सलपणपुरमध्ये विजैदेवसरि सूरिमंत्र ल्याया 'मात् ११७४ वर्षे, ८४ चाद जेता, ३५००० श्रापक दक्षिणथी। अचूदाचलपार्चे हमीरपुरनगरे प्राग्वंशे सा० वेलाभार्या विमलादे तत्सुत पासाभिधान, संवत् १५३७ ४६ श्री पद्मप्रभसूरि-भुवनदीपक ग्रंथ कर्ता । जन्म, १५४७ दीक्षा साधुरत्न गुरुपायें, श्रीसेनुंजययात्रा ४७ श्री प्रसन्नचंद्रसूरि-विक्रमात् ११७४ वर्पे, गया हुता संवत् १५५४ उपाध्याय पद, संवत् १५६५ इतो नागपुरीयतपाशाखा जाता। ते किम इहांथी नागपुरी- क्रियाउद्धार,सिद्धांतोक्त क्रिया, पांचम संवत्सरी,चतुर्मासी तपाविरुद, तिवार पछी तिहां १२ वरसी दुकाल पड्यौ, १५, देवदेवीना काउसग मिथ्यात्वक्रिया उत्थापक,विधि- तेणें सघलौ आचार प्रवयों, सिद्धांत सर्व ओरडा मांहि वादादि ११ बोल प्रगटकरण, आचारांग १ सूयडांग २ घालीन राज्या, कोइ वांचै नहिं । संवत् १५० (१)वरस प्रश्नव्याकरण ३ ठाणांग ४ तंदुलवेयालीपइन्नादि ५ एहना लगै कोई आचार्य हुओ नहीं; पछै ते सघलौ आचार बालावबोध कीधा, श्रीभगवतीमत्रना टयाग्रंथ ५०००० देखी श्रीजयसेपरसरि गुरुने पूछी ओरडा उघाड्या, हजार कठिनना कीधा, श्री पेत्रसमासना टवा कीधा, संघ. सिद्धांत यांच्या, पछै क्रिया करवा उपरि मन थयौ, यणीना टवा, नक्तचना वालावरोध,चोसरणमालावरोध, पछै नागोर आवी तप किरिया कीधी, तिहां थकि लोक- आवश्यकना टवा, आराधना बडी गाथा ७०० प्रमाण मांहि नागोरी तपा बिरुद। कीधी, जंबूदीपपन्नत्ती वृत्ति १६ हजार शुद्ध कर्ता । योध- ४८ गुणसमुद्रसूरि। पुरे राठोडवंशे रायमालदे प्रतिबोधक, शुद्धप्ररूपक, कटुक- ४९ जयशेखर-१३०१ वर्षे थया। १२ गोत्र मती प्रतिरोधक, वचनसिद्धि । संवत् १६१२ मागशिर प्रतियोध्या। सुदि दिने अणसणसहितेन निर्वाण प्राप्त श्रीयोधपुरमध्ये। ५० श्री वनसेनसूरि-१३४२ वर्षे आचार्य पद । तच्छिप्य श्री विजयदेवसूरि-तस्य शापा........ लोढा गोत्रीय, गूजरदेसे १००० हजार पर प्रतिबोध्या। रुणनगरे उसबसे सा० चाहड भार्या चांपलदे तत्सुत वर- -५१ श्री हेमतिलकसूरि-१३९९ वर्षे पेरोजसा- दराज, नवमवर्षे दीक्षा, दक्षिणदेशाद सपालाप चिंतामणि हेन परिघापितः ढिल्ल्यां । लोढां.......। त्रिभिः पठित्वा विद्यापुरे राजसभायां वाद जीता, दिन ५२ श्री रत्नशेखरसूरि-पेरोजसाह पाविसाह १५ यावत् । तत्र आचार्यपद प्राप्त । श्री विजयदेवसरि प्रतिरोधक । नामस्थापना कृता! पासचंद्रमरि छतां देवंगत हुआ। ५३ श्री हेमचंद्राचार्य। ६. श्री समरचंद्रसूरि-अणहिष्टपत्तने श्रीश्री- - ५४ श्री पूर्णचंद्रसूरि-हींगडगोत्रीय १४२४ व मालीज्ञावीय दोसी भीमा वाल्हादे तासुत । संवत् १५८२ ५५ श्री हेमहंससूरि-१४५३ वर्षे पंखेलवाल जन्म, संवत् १५९५दीक्षा, आचालनमचारी, महासिद्धा- ज्ञातीयः। ती, पहुरागांगी(१) संवत् १५९९ उपाध्याय पद, सं० ५६ श्रीलक्ष्मीनिवास पंण्यांस-संपद १४५३ १६०५ आचार्यपद, सं० १६२६ वर्षे वैशास यदि १ दिने विविधगच्छीय पटाक्लीसंग्रह ܫܫܕ निर्वाण प्राप्त ११ वीरमगाम मध्ये स्वर्ग पधार्या। श्री पनचंद्रसरिनं ६१ श्री रामचंद्रसूरि-श्रीजांग्रामे श्रीश्रीमाली- पाट- शातीय दोसी जापड भार्या कमलादे तरसुत राजकुमार । ६५ श्री मुनिचंद्रसूरि-ओसवंसे सोनी गोत्रे सं०१६२६ दीक्षा। रोहीठना पासी साधना मार्या धारलदेनाम मनोहर । ६२ श्री विमलचंद्रसूरि-५वर्ष पर्यंत आचार्यपद। संवत् १७२२ आचार्यपद स्वभतीर्थमध्ये, सं० १७४४ ६३ श्री जयचंद्रसूरि-श्रीवीकानेर वास्तव्य ओ भट्टारक पद श्री विक्रमपुरे, सं० १७५० आसोज पदि सवालज्ञातौ रोकागोत्रे.....। १. दिने दिवंगत थया वीरमगाममां। ६४ श्री पद्मचंद्रसूरि-राजनगर वास्तव्य, श्री ६६ तत्पट्टे श्री नेमिचंद्रसरि थया-ओसबसे ना- श्रीमालीज्ञातीय संघवी शिवजीसुत, सं०१६८८ वर्षे श्री हरगोत्रे सा भारमल्ल भार्या भगतादे पुत्र नाम नेतसी। जयचंद्रसरि पार्चे दीक्षा, संवत् १७४४ वर्षे आसोज बदी सं० १७५० मट्टारक पद थयो पीरमगाम मध्ये। ॥ इति शम्।। वृहद्गच्छ गुर्वावली। [ इयं गुर्वावली अर्धसंस्कृत-अर्धदेश्यभापामिश्रितकल्पान्तर्वाच्यग्रन्धस्यान्ते अस्तव्यस्तस्वरूपा अपभ्रष्टभापामयी याशी लिखिता लब्धा तादृशी अन प्रकटी क्रियते -सम्पादक श्रीमहावीरे निर्धते, ततः कैवलिघु, श्रुतकेवलिपु, दश वत उ(प्र)द्योतनयरिस तैः परिवार पंचशत शाकंभरी पूर्वधरेषु, युगप्रधानेपु एकादशांगवेदिषु समतिक्रान्तेपु सत्क संघकृते नडूलस्थैः शान्तिस्तवः कृतः। पद्मावती १ दुर्भिक्षात् सुविहितपक्षे समुच्छिन्ने,वाराणसीपरतो गंगातट- जयार विजया३ अपराजिताख्या४ देव्यो नित्यं वन्दन्ति । चास्तव्या अरण्यकाः श्रीसमंतभद्रसूरयो वृद्धाः सिद्धिक्षेत्रे तेषां सत्का प्रतिष्ठा रामसयने श्रीमपभदेवचत्य महावी- कालकरणाय चलिताः। तैर्मार्गे कोरण्टाग्रामे चेइहर-चैत्य. रस्य सं० २२२॥ 'निवासिपंडितदेवचन्द्रो अतीय विद्वान् संविग्न उत्स- ततो देवेन्द्रसुरि। गिको निजीपसंपदानुग्राह्य स्वे पदे स्थापितः । स वृद्धदे- ततो मालवेश्वर चौलुक्य वयरसिंह देवामात्यो मान- यसरिः। तत्र नाहडामात्येन देवकुलं कारितम् । श्रीमप- तुंगमरि । भक्तामर-भयहर स्तोत्रकर्ता। भदेवपिम्यं प्रतिष्ठितं तैः, सं० १२५ विक्रमार्कात् । तथा मैदपाटदेशे आघाटनगरे नाहडराजानं प्रतिभातिशयेन यो वैधर्मिकलोकभूपतिपुरस्तुत्रोट जैनस्तवान् , प्रतियोध्य तत्र नाहडपसही देवकुलं प्रतिष्ठित सं०१५०। सर्व शृंखललोपन्धनमयं संघप्रभावोद्यतः। १ नवसय चउणउएहिं ९५४ वहगच्छ महियले विक्खाओ। यस्यादेशविधायिनी समभवत् देयंविका सर्चदा, भादू सिहरे ठविओ सामतमहि ॥१॥ पायाद् वः स सदा सुनिर्मलगुणः श्रीमानतुंगप्रभुः ।।

f܀ वृह र छ गुर्थी व ली। ततो वीरसरि-नागपुरे नेमिनाथः प्रतिष्ठितः संवत् सर्वदेवसरि प्रथम प्राग्वाटा, वडगच्छ इतिख्यातोऽभवदव- ३४०॥ नौ,यस्मात् श्रीबृहद्च्छ एप तस्मादात्मद्वितीया चढावल्यां ततो जयदेवसूरि। समायाता । तत्र कुंकुणाभिधानामात्येन स्वज्ञातिपक्षपातेन ततो देवाणंदररि । अद्भुतपत्रिंशत्सरिगुणरञ्जितेन सम्यक्त्वं गृहीतं देवकुलं ततो विक्रमसूरि । च कारितं कुंकुणावसही। कुंकुण भागेयो नेऊया गच्छे ततो नरसिंहमूरि-यैः मेदपाटे नरसिंहपुरे मिथ्यादृष्टि आमदेवसरिस्तस्यायत्तं कृतं आमदेवायरिय इति प्रसिद्धः । नारसिंहयक्षो बलात्कारेण मांसमद्यादिविषये उपशमितः। तस्मिन् देवकुले एकस्मिन् लग्ने कृताः शिष्या ८४। कुंकुणेन ततः समुद्रसरि-यै गदहे श्रीपार्श्वनाथतीर्थ दिग- प्रवृज्या ग्रहिता। अतो वृहद्गच्छ इति प्रसिद्धः। तेभ्यः म्बरानुच्छिद्य श्वेताम्बरायत्तं कृतम् । पुनरपि गगन क्रमेण ८४ शाखा जाता। साचोरा १ झेरंडिया२ आ- कीर्तिना दिगम्बरेण पद्मावतीप्रसादात् अद्धोप॒कृतं सं० नापुरा ३ गूंदाउआ ४ ओढविआ ५ डेकाउआ ६ घोप- ५८२ वर्षे। चाडा ७ सापडउला ८ महुडासिया ९ भयरुच्छा १० ततो श्रीमानदेवसरि-विद्यागुरुभ्राताश्रीहरिभद्रसरि- दासरुया ११ जीरावला १२ मगउडिया १३ ब्रह्माणिया सहितः सूरिमंत्रो विस्मृतः । ततः पोडशतमे उपवासे १४ मडाहडा १५ पिप्पलिया १६ तपा १७ भीनमाला रैवतके अम्बादेव्या श्रीसीमंधरस्वामिपार्थात् मंत्र आ १८ जालउरा १९ रामसेणा २० वोकडिया २१ चित्त- 'नीतः। तैर्देवपत्तने अंबरशिवनामा जटिलो वैशेपिकः उडा २२ गंगेसरा २३ कूचडिया २४ सिद्धान्ती २५ चादेन निर्जितः। इत्यादि शाखा बृहद्गच्छे ख्याताः । तैः सर्वदेवमूरिभिः ततो विबुधप्रभसूरि। रामसैन्ये प्रतिष्ठितश्चन्द्रप्रभस्वामी सं० १०१० वर्षे । तैरेव ततो जयानंदसूरि । नड्डूले स्थापिताः सूरयः ४ प्रथम देवमरि १,धर्मसरि २, ततो रविप्रभसरि-पैनडूले नेमिनाथस्य प्रतिष्ठा पद्मसरि ३, उद्योतनसरि ४ । कृता । सं० ७१०। श्रीउद्योतनमरिणा अर्बुदगिरिसमीपे अष्ट सूरयः स्या- ततो यशोदेवसरि । पिताः। ततो विमलचन्द्रसूरि-यैः स्वर्णसिद्धिलब्धिधरैः श्रीरूपदेवमूरि। अनेकश्रावकाणां उपकारं कृत्वा देवकुलानि कारितानि । पुनः श्रीसर्वदेवसूरि । चित्रकूटे देवगृहं २४ प्रतिष्ठा । ८२० गोपगिरौ राज्ञा यशोभद्रसरि। व्याख्यानरंजितेन एकलवटें विरुदं दत्तम् । वादनिर्जि श्रीमुनिचन्द्रसरि । स च नेमिचन्द्रसरिगुरुवान्ध- तेन दिगम्बरेण दन्तैटिका त्रोटयित्वा व्यापादितः । वश्रीविनयचन्द्रोपाध्यायशिष्यः। ततो उद्योतनसूरि-परिवारवती ३००, नांदिया गुरुवन्धुविनयचन्दाध्यापरुशिष्यं स नेमिचन्द्रगुरुः। ग्रामात् मार्ग चलितास्तत्रांतराले लकडिया वटाधो जां यं गणनाधमकार्षीत् स जयतु मुनिचन्द्रसरिगुरुः॥ गलचाहमानजल्लगणिस्तदुपरोधात् सर्वशास्त्र सिद्धान्तपार आरनालपरिवर्जितनीरं गं सर्वोगुणोपेतं पं० सर्वदेवनामान परिवार नीतैः (१)सं० सर्वथापि सकला विकृतींच। ९९४ ज्येष्ट सुदि ८ रवौ वासरे आचार्यपदस्थापना कता। यो ऽत्यजत् स मुनिचन्द्रमुनीन्द्रः नवसय चउणउएहिं ९९४ टेलियगाममि सम्बुओ हेतु । कस्य कस्य न युधस्य नमस्यः॥२॥ लउकडवरे य जाओ वडगाछो संयुओ पुचि ॥१॥ द्वादशानन्तरं यावजीवं आचाम्लतपः कर्ता।

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विविधगच्छीय पावलीसंग्रह
ततो वादि श्रीदेवरि-सं० ११७४ वर्षे स्थापितः,
वस्त्रप्रतिष्ठाचार्याय नमः श्रीदेवसरये ।
वदन्धु श्रीविमलचन्द्रोपाध्याय, २४ बरि माणिक्या- यत्प्रसादमियख्याति मुसप्रश्नेषु दर्शनम् ||२||
दया शिष्याः। यैर्वादिदेवरिभिः ८४ वादा जिताः।
तदा प्रभृति भगिनीकृतसंयमपालनादिधर्मकृत्याय-
अन्यदा कुमुदचन्द्रो दिगम्बर ईदृश्या दया सह अणहि-
हारान् श्रीदेवसरिभिर्वृहद्गच्छे महासत्यो निषिद्धार
ल्लपुरपत्तने समायातः।
तत्प? विमलचन्द्रोपाध्यायः-ततः प्रभृति उपाध्या-
कुमुदचन्द्र दक्षिणि पयंड छ दरसण संतावइ ।
यपदवी च निपिद्धा।
अणहिल्लपुर संपत्त पडह मुल्लहं यजामह ।
तस्पट्टे मानदेवरि।
बंभण भट्ट बहुत सब सक्सहं सह पल्लइ ।
तदनु हरिभद्रसूरि ।
कोइ न तासु समत्थ जासु सम्मुहउ जु बुल्लइ ।
तत्पट्टे पूर्णप्रभसूरि ।
निवडंत सयल गुजर धरणि देवसरि जं वसि पडथउ ।
तत्पड़े नेमिचन्द्रमरि।
बुल्लायउ घुल्ल न उच्चरइ जिम मक्ड डालइ चड़यां ।।
तत्पद्दे नयचन्द्रमरि।
चारि जोड नीसाण यह सय पच पच्यासी,
तत्पट्टे मुनिरलसरि।
इग्गारह सय सुहड सीस सय दुनि छियासी ।
'तपट्टे श्रीमुनिशेसरसरि।
बलदह सह तिचियारि कम्भकर पंच छिहत्तरि,
येणं युगप्रधानानां अद्यापि कायोल्मों विधीयते ।
अत्य लेख पणवीस दम्म दुइ लक्स बहुत्तरि ।
यैः पूज्यभट्टीद्रयस्थैर्व्याख्यानावसरे मुदा।
तह छत्त चमर टोडर विरुद सुक्सासण वाहण लियउ ।
श्रीशत्रुञ्जयगिरेरमिहस्ताम्यामुपशामितः ॥शा
वडगच्छतिलय पहु देवसरि नग्गउ बलि नग्गउ कियउ ।।
एवंविधं तं वीक्ष्य वादिदेनबरेभगिनी महासती वा-
तत्पट्टे श्रीतिलकसरि ।
हडदे मंत्रीश्वर जाहडसाहादिभिर्गुरवः विज्ञप्ता:-स्वामिन्
तत्पट्टे श्रीभद्रेश्वरमरि दुगड गोत्री । अाचार्य पद-
अयं दिगम्बरः भवत्सु सत्सु जैनमुनीनामपि एवं कद
स्थापना पूर्व मट्टारका एव आमन् ।
थनां करोति । गुरुमिस्तु कथंचिद्वादार्थमाहूतो दिगम्बरस। तत्पद्दे मुनीश्वरसरि-लोढावंशशृङ्गारः, येषां मस्तक-
वाहड जाहडाम्यां कुमुदचन्द्रस्याने इत्युक्तं यदि असद्
मणिरद्यापि देहुरासर अवसरे पूज्यते नरैः। पेरोज-
गुरुहारयति तदा चारि जोडनिसाणादिकं तर वस्तु विद्यते साह सुलतानेन वादिगजांकुशो विरुदो दत्तः।
तावद्विगुण वस्तु आना दवः, यदिख हारयसि तदा तब
१ चमन वेदु धरहिं उद छद न उहिहिं,
वस्तु आवां गृहीमस्वं चास्मद्गुरूणां शिष्यो भवेति प्रतिज्ञा
दरशन महिन साह भट्ठ कवि न सघहि ।
कृत्वा राजसभासमक्षं द्वौ विवादं कुरुतः । पण्मासा गताः। अचल अगमि तपिय सहय दिगपर डंबर
थाइ ते विहरत लोयसुन्दर सेयम्बर।।
तदा सरिभिः सरस्वती साधिता,तयोक्तम्-कुमुदचन्द्रपार्श्वे
इम निरवि सयत गुज्जरधरह सिन्धु सवालख आइसउ।
मद्दत्ता गुटिका वर्तते, यावत् सा मुखे तस्यास्ति तावद्दे-
वादीन्दगाच्छ मुनिस्सरह सूरिहिं धन भरावियउ ॥१॥
वैरप्यजेयस्तथाकुरु.यथा मुसप्रक्षालनक्षणे स शिष्य अग्गइ वादि देवमूर पुतिहि परसिद्धउ,
पार्धाद गुटिका मुखात् .. ग्राहोति कथयित्वा देवी स्थान कुमुदचद निजिवि सुयमु महिमालि लिउ ।
प्राप्ता | प्रभाते तथैव कृते स जितः।
तिम भोजपुरह मडारि राय नायदे विदितउ ।
अद्धति वादि ज्ञानसागर जिण हेला जितड ।
यदि नाम कुमुदचन्द्रं न जिग्ये देवशरिरहिमरुचिः ।
जिणि कृष्णभद हारावियर खिमपह जपद उजकर ।
कटिपरिधानमधास्यत् कतमः श्वेताम्बरो जगति ॥१॥ वडगच्छ मुनीश्वरसूरि गुरु कोडिजुग जयवन्त चिरु ॥२॥

वृहद् च्छ गुर्वा व ली। तत्पड़े रत्नप्रभसूरि। मानगणधारकाः संप्रति वर्तमानाश्चिरं जयन्तु । येषां तस्पट्टे महेन्द्रसरि। पदस्थापना १६०४ वर्षे । तदनु मुनिनिधानसरि-यैर्वाणारस्यां सर्वे पण्डिता [कल्पान्तर्वाच्यप्रशस्तिः।] बादार्थ समायाता दण्डकफेरणेन मुखस्थंभनं कृत्वा जिता) श्रीदेवसरिसन्ताने सर्वशास्त्रविशारदाः। तत्पढ़ें मेरुप्रभसरि। श्रीपुण्यप्रभसूरीन्द्रा यशोमण्डितभूतलाः ॥१॥ तत्पट्टे राजरतसरि। तत्पादपद्ममधुपाः विज्ञाः श्रीमानदेवसूरीशाः । तत्पट्टे मुनिदेवमूरि। श्रीकालिकाचरितं पुनः कृतं यः सगीपूत्यै ॥२॥ तत्पट्टे रत्नशेसरसरि । तत् शिष्यो हि युगैकपदकहिमगौवर्षेषु शास्त्रान्तराद् तत्पट्टे पुण्यप्रभसूरयः। विज्ञायाथ गुरूपदेशवचनैः किंश्चिच किंचित् सतः। तत्पट्टे संयमरत्नमरि-येपां १५६९वर्षे पदस्थापना । अन्तर्वाच्यरहस्यमेतल्लिख..........मल्लदेवो मुनिः गीतार्थैः सुविचार्य सारममलं ग्रन्थो विशोद्ध्यो ह्ययम् ।। तत्पट्टे पिराइचा गोत्रे लक्ष्मणांगजा लक्ष्मीकुक्षिभवाः, कलिकाल वर्तमान शास्त्राधार बृहद्गच्छान्धिकुमुदवा- कार्तिक सुदि ८ दिने रविदिने श्रवणनक्षत्रे सिद्धिनाम- ग्रन्थाग्रं०७६५० । संवत् १६२० वर्षे, शाके १४८५ घवतुल्याः, यशःपूताष्टककुभः श्रीभावदेवसरिसूरीन्द्राः। योगे श्रीसरस्वतीपत्तने पावसाह अकबर विजयराज्ये तेपां गुणवर्णना एकजिह्वया कथं कत्तुं शक्यते। विद्य- श्रीबृहद्गच्छे भट्टारकश्री ६ पुण्यप्रभसरि तत्पट्टेम० श्री येषां मुनीश्वरसूरीणा १३८८ माघ सुदि दशम्या पल्हवणगोने ७ भावदेवसरि तत्शिष्य पं० पुण्यरत्न लिखितम् । सा० गुणधर भावदे वघेलइ नदिकारिते पदस्थापना । २ येषा रत्नप्रभुसूरीणा १४५५ वर्षे चैन सुदि त्रयोदश्या सर- (बीकानेरराजकीयग्रन्थसंग्रहस्थितकल्पान्तर्गच्यग्रन्थाद् स्वती पत्तने पदस्थापना। इयं गुर्वावली समुतास्ति) " म बृहद्गच्छीय शाखान्तरसत्का अन्या गुर्वावली । गुर्वावली वर्णवियइ- प्रभरि नीपना। पूर्विहिं आरण्यक गच्छु, किसी परइ श्रीपद्मप्रभसरि तणइ पाटि श्रीप्रसनचन्द्रसरिवर यः पूर्व पूर्वदेशेऽभवदुदितगुणग्रामकोरण्यवासी नीपना। सूरिः सामन्तभद्रान्वयजलधिशशी सर्वदेवो मुनीन्द्रः। श्री प्रसन्नचन्द्रसरितणइ पाटि श्री गुणसमुद्रयरि ज्ञानाचेनावृंदाद्रौ पटविटपितले स्थापितो वृद्धगच्छो. नीपना। वादीन्द्रदेवसरिप्रभृतिगुरुशते पितो यः पुनातु ॥१॥. श्रीगुणसमुद्रसरि तणइ पाटि हेमप्रमसरि युगप्रधान, श्रीसामन्तभद्रसूरिश्वर युगप्रधानु, समस्त सूरिवर अतिही कलानिधानु हुबउ । मोहि प्रधानु, अनइ धर्म तगउ निधानु । पांचसइ तपो- एतला सर्वे मरिश्वर दूगडकुल उद्योतकारक हुआ। धन तणइ परिवारि परिकलितु पूर्वदेशि आरण्यकवासी. श्रीहेमप्रभमरि तणइ पाटि नक्षत्रकुल मंडनु श्रीपूर्ण- हुवउ । तिहनइ ऋमि श्रीसर्वदेवसरि । बिहुसइ तपोधन भद्रमरि, पांच लक्ष आगम सिद्धान्त तणउ जाणणहारु' तणइ परिवार परिकलितु अर्बुदाचल यात्रानइ विपइ महासिद्धान्ती नीपना । गमनु काइ । तिणि श्रीसर्वदेवसरिह टेलीतणी पाजइ तेहनइ पाटि खड्ग गोत्र मंडनु श्रीदेवसेनसरि वि- वट वृक्षु सविस्तार दीठउ । तिहतणी छाया घइसीयनइ ख्यतकीर्ति नीपना । इसउ मनमाहिं विचार। किमइ मुहूलि इहनउ वीजु तेहनइ पाटि श्रीपद्मप्रभसरि सरियर नीपना । भूमिमाहि पडयउ, तेह हूंतउ वटवृक्षु सत सहस्र शासा श्रीपद्मप्रभमरि तणइ पाटि श्रीअमरप्रभरि नीपना। वध्यउ । ते मुहुर्तुं ज्योतिप पली करियनइ तेउ समउ श्रीअमरमभमरि तणइ पाटि श्रीमागरचन्द्रमरि विज- तत्क्षणि जाणियनइ, नवसय चाणूय संवत्सरि वटवृक्ष यवन्त प्रवर्तइ । तेहनइ प्रसादि श्रीसंघ आगिलइ मई हेठिलई गमह आठ आचार्य कीधा । तेह हुंतउ वडगच्छ कल्पाध्ययन वाच्यउ। एहु कल्प तणइ प्रसादि अनेक नामु जगतीतलि विख्यात नीपनउ । शुभमाला नीपजउ । अनइ जिनशासन प्रमावक शुभ तेहनइ अनुक्रमि श्रीमुनिचन्द्रसरि नीपनउ, जिणि भावना प्रोल्लासक इसा सुश्रावक तेहि कल्पतणी प्रभा- पुनिवति छहइ विगय परिहरि, अनइ पाणीनउ कीधउ वना नीपजावियइ । पहिली प्रभावना पुण्यवन्तिहि निप- परिहारु । कांजिक तणउ आहारु नीपजायइ । इसउ एकु जावियइ । इसीपरि सुश्रावकह तणा नाम लीजह । एह श्रीमुनिचन्द्रसूरि नीपनउ । कल्पवाचना निर्विन नीपनी । एह कल्प तणा प्रसाद, तेह तणइ पाटि पादी श्रीदेवसरि नीपना । हुँतउ, भगवंत श्रीमहावीर तणा प्रसाद ढुंतउ, श्रीसंघ तेह तणउ पट्टालंकारु श्रीवीरभदु सरि नीपनउ । रहइ उत्तरोचर ऋद्धि पृद्धि अभ्युदय नीपजउ । एउ श्रीवीरभद्रसरि नइ पाटि, दूगडकुल मंडनु श्रीपद्म- अर्थ होउ । छ।।। श्री। श्री। छः ।। - राजगच्छ पट्टावलि । . सर्वो जनः सुखार्थी सुखं च तद् धर्मतः स च ज्ञानात् । ज्ञानं शास्त्राधिगमात् शास्त्राधिगमश्च सद्गुरोर्भयति ॥ इह हि संसारे सर्वो जनः देव-नारकिक-तिर्यङ्-मनुष्यरूपो लोकः मुखार्थी मुखाभिलापी प्रवर्तते । परं तत् सुखं धर्मतः, तत् सौख्यं धर्मतः श्रीजिनोक्तजीवदयामूलपुण्याद् भवति । यत उक्तम्- धर्मसिद्धौ धुवा सिद्धिम्नि प्रद्युम्नयोरपि । दुग्धोपलम्भे सुलभा सम्पत्तिर्दधि-सप्पिंपोः॥ २ स च ज्ञानाव, स च धर्मः ज्ञानात् जीवाजीच-पुण्य-पापासव-संवर-निर्जरा-बन्ध-मोक्षलक्षणानां श्रीवीतरागोक्तानां नवतचानामवबोधाद् भवति । ज्ञानं शास्त्राधिगमात् । तत् ज्ञान नवतत्त्वावबोधः शास्त्राणामधिगमाद् भणन-गुणन-अर्थ- चिन्तन-व्याख्यान-श्रवणाद्यभ्यासात् संजायते । यत उक्तं दशवकालिके- सुच्चा जाणइ कल्लाणं सुच्चा जाणइ पावगं । उभयं पि जाणइ सुच्चा जं सेयं तं समायरे ।। ३ तच्छास्त्रं चतुःप्रकारं यथा- कामार्थ-धर्म-मोक्षाणां भेदात् शास्त्रं चतुर्विधम् । कामार्थाविह लोकाय धर्म-मोक्षौ दयाय च ॥ ४ तत्र कामशास्त्राणि कोक-वात्स्यायन-शुकसप्ततिकाप्रमुखाणि सांसारिकविषयसुखहेतुनि ज्ञातव्यानि अर्थशास्त्राणि व्याकरण-छन्दोऽलङ्कार-नाटक-साहित्य-प्रमाणग्रन्थ-कला-उपकला-धुद्धिशास्त्रमुख्यानि अर्थोपार्जनादिहेतूनि ज्ञेयानि । तथा धर्मशास्त्राणि श्रीयुगादीश्वरादि-चतुर्विंशतिजिनचरित्राणि । श्रीगौतमस्वाम्यादिगणधराणां प्रबन्धाः, तथा धर्मों- पदेशगुम्फित-उपदेमाला-पुप्पमाला-शीलोपदेशमाला-भवभावना-सम्यक्त्वसप्ततिका-कर्मग्रन्थप्रभृतिविचारग्रन्थमुख्यानि प्रकरणानि धर्मोपार्जनहेतूनि बोधव्यानि । मोक्षशास्राणि तु चतुर्दशपूर्वाणि; तथा प्रवर्तमानानि आचारान- मूत्रकृताङ्ग-स्थाना-समवायाङ्ग-भगवतीपञ्चमाङ्ग-ज्ञाताधर्मकथाङ्ग-उपासकदशाङ्ग-अन्तकृद्दशाग-प्रज्ञा(?)व्याकरणाग-विपाक- श्रुताग-दृष्टिनादार इत्येकादशाहानि ॥ तथा औपपातिकउपाग-रानमसेनोपाङ्गप्रमुखानि द्वादशोपागानि । श्रीआवश्यक- जीतकल्प-दशवकालिक-उत्तराध्ययन-निशीथ-महानिशीथ-ओपनियुक्ति-जम्बूद्वीपमज्ञप्ति-मूर्यमज्ञप्ति-निरयावलिकाश्रुत- स्कन्ध-दशाश्रुतस्कन्धमुख्यानि श्रीगौतमादिगणधरविरचितानि । मासगिकफलस्वर्गादिदायकानि । तत्वतो मुख्यफल- मोक्षसाधनहेतूनि मन्तव्यानि । परं च- शास्त्राधिगमथ सद्गुरोर्भवति । तत्र इहलोक-परलोकमुखहेतूनां तत्त्वतो मोक्षमार्गसाधकानां धर्मशाख- मोक्षशास्त्राणामधिगमो भगन-गुणन-व्याख्यान-श्रवणाभ्यासः सद्गुरोः संजायते । ते च गुरवोऽटकल्पव्यवहारक्रम कृत्वा जीवयतनाथै वर्षाचतुर्मासके एकत्र तिष्ठन्ति । यत उक्तम् - ग्रैप्म-हैमन्तिकान मासानष्टौ भिक्षुस्तु संचरेत् । दयाथै सर्वभूतानां वर्षास्वेकत्र संयसेत् ॥ ।

विविधगडीय पट्टावली प्रह ६ ८ यथा दशकालिकेऽप्युक्तमस्ति- आया वयंनि गिम्हेमु हेमंतेस्सु अवाघडा । वासास पडिसंलीणा संजया सुसमाहिया॥ नया जीवदयापालनं परसमयेऽप्युक्तम् - पश्यन् परिहरन् जन्तन मार्जन्या मृदुमक्ष्मया । एकादं विचरेद यस्तु चान्द्रायणफलं लभेत् ॥ ७ ना च यतीवरा ईदो वांकाले विशेषतो जीवयतनां कुर्वन्ति । कोदशी वर्षाकाल: ?- मति घणा नचंति सिहिगणा लघइ विचला गयणं । फुलं फसायकलसं वरिमति चारिधरा।। यद्वा-दिशां हाराकाराः शमितमदभारा अपि मुने- रमसंचाराः कृतमदनिकारातशिपिनाम् । गता वन्यापारास्नुहिनकणभारा विररिणी मनाकीर्णागाराः फिरति जलयारां जल परः।। अपना परिकारसद विपमे वर्षाकाडे ये भन्याः साधु-साभी पारस-श्राविर ध्यानं पुर्वन्ति त एर धन्याः। राहगो पांगालः पलिगलव तद् यथा- मर्वनोद्गनगन्दला वसुमती वृद्धिर्जनानां परा जातं निःकमलं जगत् मुमलिनलन्या धनग्ननिः । मर्पन्ति प्रतिमन्दिरं हिरममाः मंत्यामार्गो जनो योगांप कला मंप्रति जयत्यकेच गव्यस्थितिः॥ एभून दणमागद पांगट च ममागने धीनिनादितधर्म सम्पर तदा विधायने यदा मुधारकः मुक्षेत्र गुरवो यहुमानान म्या पन्ने । मुक्षेत्रगुणास्नु प्रपोदन मिदान्नोक्ताः । यथा- निरिगट-पाण भंडिल यमा-गोरम-जणाउले विग्ने । ओमर बिगगारियई पामंडा भिम महा। गोपन क्षेचे गुग्नरायण गुरुन मैग्याप शमणोपागी: पुन्तरमारम्भमहोत्सरपुरम्सरे निरन्तर सद्गुरुणां समीपे आगम्गादिममादान मुरता शुदमायेन घ्याग्यान भूवने । उस्तं च- आलम्सनाह निहा विगारणं परमाय च । पधिप मुत्ता धम्म निमुणे एगमणो ॥१२ तपा उपमाः श्रीवारः धारकाः सरिना गन्न: अपगदाधरगणान् मुबत्य घ्या गावगैरोगंणान एच मन्ति। यन:- पर्पम्निकादिपरिबासनमायधाना ये रहते गुणगणं गुम्दोषजालान् । श्रीरं गयर मलिता मिल गजामाः मन्याम्न गय फतिपिच्च श्रुतेन लभ्याः ॥ भएन भन धर्ममार्ग वारयितुं मारम्मयिष्यामः, परं नम्य पूर्वकापिमणीनम्य गासम्य सम्मान मन्दयुदिना पप सम्पर प्पाग्या पिपीयने ? । पन:- राजगच्छ पावलि ५९ + . परिमलो वाताद मेरुमगुलिभिर्मातु चुलुकैः पातुमम्बुधिम् । पदभ्यां गन्तु नभः शक्तं सिद्धान्ते स विचारयेत् ।।१४ परं तथापि यः कश्चिन्महाशास्रज्ञगुरुतराचार्यव्याख्यानसदृशा सम्यक्शास्त्रव्यारयाः कर्तुं न शक्नोति सोऽस्मा- दृशः स्वमुद्धयनुसारेण फिश्चिद् व्याख्यानलबलेशं किं न रोतु । यतः-- जइ जलनिहि जलभरिओ गुहिरं गज्जेइ लहरिसम्पुन्नो। ता किं गामतलाओ जलभरिओ लहरि मा लेओ ।। जड भमइ पंखिराओ गरुडो पक्खेहि छन्नगयणयलो। ताकिं इयरचिडेहिं नगमण नेय कायव्य ।। जड दुद्ध० जइ भरह । किं च तथा च एवंविधा अपि मम मालापाः पञ्चभिजनैर्मानिताः शोभा लभन्ते । यदुक्तम्- वहीं प्रतिष्ठामाप्नोति पञ्चभिः स्वीकृतो नरः । उत्तमाड्गं शिरः प्राहुः पञ्चेन्द्रियनिपेवितम् ॥ १७ यद्वा-शकुनानामत्मनोल्लापी रेखामात्रा सरस्वती । पूर्ण चाभीष्टसंसिधै तथापि मानितः ॥१८ अथवा-भाग्याली व्यवसायतः सुपयमो वीजाकुरः सूर्यतो नेवालोकनशक्तिरध्ययनतः प्रज्ञा परात्मालयात् । चन्द्राच्चन्द्रहपत्सुधा विपञ्चीवगाः कोणाद याति यथास्थितो मम गुणः सघप्रसादात् तथा ॥ जडोऽपि सधमानेन यहा शक्नोमि जल्पितुम् । अनरलड्यते व्योम यदर्केण पुरष्कृ(स्कृतः॥ २१ अथ च शासारम्भे विघ्नोपशान्तये मगलाय च देवेभ्यो नमसारः क्रियते । यतः- दधि चन्दन-दुर्वादि क्रियते द्रव्यमङ्गलम् । शास्त्रारम्भे पुनर्भावमङ्गलं देवतास्तुतिः ।। ऋषभ-अजितादीना चतुर्विंशतिनिनाना नामोच्चारेण नमस्कारः, तदनु महता गणधरादीनामाचार्याणा नामो- चारो मङ्गलाय कर्तव्य । यतः-- सर्वत्र महतां नामोच्चाराद् भवति मङ्गलम् । लभते भव्यभोज्यानि शुको राम इति ब्रुवन् ॥ पूर्वमादिमतीर्थङ्करस्य प्रथमगणधरथीपुण्डरीकं नोमि । यथा- धाग्देवताफरविभूपणपुण्डरीक दुष्याटफर्मगजमदनपुण्डरीकम् । विमोपतापतपनातपपुण्डरीक वन्दामहे गणधरोत्तमपुण्डरीकम् ॥ २४ अपश्चिमतीर्थकृत एकादशगणधराः । इन्द्रभूनिरग्निभूति वायुभूनिश्च गीतमाः ।। व्यक्त-सुधर्मा मण्डित-मौर्यपुत्रायकम्पितः । अचलभ्राता मेतार्यः प्रभासश्च पृथक्कुलाः॥ तत्र इन्द्रभूतिः श्रीगोतमस्वामी श्रीवीरस्य मुग्यगणधरः। 'श्रीगौतमो मङ्गलमातनोतु श्रीवीरनाथस्य गणाधिपो यः । यस्याभिधान प्रथमाक्षरेऽपि गर्दिश्यते कामदुधा जनेन ॥ २८ 79 विविधगधीय पावली से ग्रह पश्चमगणधरः श्रीवर्द्धमानेन स्वपदे स्थापितः श्रीमुधर्मास्वामी। यथा- इहत्ययस्यन्वयजनुजौघमालेपशेलं सुरशैलपादे । शिवाधिवासं गणपञ्चमं च सुधर्मनामानमहं नमामि ।। तच्छिप्पश्रीजम्बूस्वामी कन्याष्टकादिभोगपरिहारकः । यथा- कृत्वा चेतसि मा सुवर्णनिचय कन्याष्टकं तुष्टिद सौभाग्योदयकिङ्करीकृनसुरम्नैणं मुमोच प्रभुः। इत्यास्तिक्यपरेव मुक्तिवनिता से प्राप्य नैच्छत् परं जम्बूस्वामिनमानतोऽस्मि चरमं तं फेवलज्ञानिनम् ।। वदन्वये श्रीप्रभवस्वामिमुख्याः पट् गणराः श्रुतकेवलिनी बभूः। ते चामी श्रीमधर्मस्वामिनः शिप्याः- केवली चरमो जम्बूस्वाम्यथ प्रभवप्रभुः । शय्यंभवो यशोभद्रः सम्भूतिविजयस्तथा ॥ भद्रयाहुः स्थूलभद्रः श्रुतकेचलिनो हि पट् । तत्र प्रभवनामा नरेन्द्रमृतः पश्चशतचौरयुतः सहनचौरी भुक्त्वा दीक्षां गृहीत्वाऽप्टकर्मग्रन्थिच्छेदचौरी चकार । यथा- यो ग्रन्धिमेदं मुनिवेयबुद्धया चकार संसारचतुप्पधान्तः । तथापि लोके प्रभवाभिधानो युगप्रधानो विदितः स साधुः॥ तच्छिष्यः शयंभवो द्विनन्मा सरिजर्जातः, मनकाभिधः पुत्रनिमित्तं 'दशवकालिक थुतकर्ता, यथा- श्रीजैनमतिमामुदीक्ष्य विदलन्मोहोदयस्तत्........(2) प्रवज्याभिहित(ता) चतुर्दशमहापूर्वाणि योऽधीतवान् । यश्चक दशकालिकं फिल पतीनुद्दिश्य दुर्मेधसः सोऽर्हत्शासन.... ..शशी शय्यंभवः पातु वः॥ तया श्रीभद्रबाहुस्वामी 'श्रीआवश्पका दिदसिद्धान्तानां रहस्यभूत नियुक्ति कर्ता । 'उपसर्गहरस्तोत्र' कर्ता संबभूव । यथा- सिद्धान्तसौधमधिरोपयितुं मुनीन्द्रान् सोपानपद्धतिरियं सुकृतकलभ्या । नियुक्तयो यहुविधाः बल्लु येन क्लृप्तः श्रीभद्रयाहुमुनिरेप मुदे सुनृणाम् ॥ तद्विनेयो ब्रामणाः नाडालमन्त्रिमुतः श्रीस्थूलभद्रः पञ्चयागीयविकारसंसर्गेऽपि मदनदर्पदलनो बभूव । यथा- कोशा प्रेमवती सदा तदनुगा पड्भी रसैर्भोजनं शुनं वेश्म सुविभ्रमं वपुरहो नव्यो वयःसङ्गमः । कालोऽयं जलदाविलस्तदपि यः कामं जिमायादरात् तं धन्दे युवतियोधनिपुगीस्थूलभद्रं मुनिम् ।। सच्छिष्यों द्वौ प्रथमं श्रीआर्यमहागिरिप्पमाकालेऽपि विच्छिन्नं जिनकल्पमुद्धृतवान, परमपि रागद्वेपरहितश्व यथा- ..

राजगच्छ पहावलि अन्नमहागिरि गुणगहणि किं न पयट्टइ वाणि । छड्डीता भत्तह भणी जेणि पसारिज पाणि ॥ द्वितीयशिष्यश्रीआर्यमुहस्तिः संपतिराजमतियोधकः । यथा- कोसंवीए जेणं दमगो पब्वाविओ तओ जाओ । उल्लेणीए संपईराओ सो नंदउ सुहत्थी॥ तस्योपदेशेन सम्पतिनरेन्द्रेण पोडशसहस्राणि जिनभवनानि कारितानि । अनेका जिनमतिमास्तत्मतिष्ठादि- महोच्छ(त्सवाच विहिताः । एवं जिनमण्डितां मेदिनी चक्रे । तथा आर्यमहागिरि-आर्यसुहस्तिहरिप्रमुखा दशगणधरा दशपूर्वधारिणोऽभूयन् । तन्नामान्यमूनि- श्रीमानार्यमहागिरिर्भववनीहस्ती सुहस्ती विभुः स्वाति-श्याममुनी चिनीतवपुपो शाण्डिल्यरत्नाकरौ। मगुर्धर्म-सुभद्रगुप्तयतयः स्वामी च वज्रप्रभुः जीयासुर्दशपूर्विणो दशदिशि ख्याता हमी तेदश॥ तत्र दशमस्य दशपूर्वधारिण आवाल्याद् भावचारित्रिणः श्रीवनस्वामिनः कियन्तो गुणा व्यावयन्ते । यत:- स्मृत्वा जातिव्यतीतामविरतरुदितैर्गाढमुदेजिताया मातुर्लधाम्य(?)नुज्ञा शिशुरपि जगृहे भावतो यश्चरित्रम् । कन्यारत्नापि(नं हि) मात्रोपनतमपि नो यस्तृणायापि मेने वज्रस्वामी स जीयाजगति यहुविधाश्चर्यविश्रामभूमिः॥ ३८ किं रूपं [च किमगसूत्रपठनं शिप्येषु किं वाचना किं प्रज्ञा किमु निःस्पृहत्वमधिकं सौभाग्यविद्यादिकम् । किंचा संघसमुन्नतिः सुरनतिः तस्यैव किं वय॑ते यवस्वामिविभोः प्रभावजलधेरेकैकमत्यद्भुतम् ॥ एतेपामन्तराले श्रीपुष्यमित्र-नागहस्ति-रेवतीसरि-स्कन्ध(न्दिोलाचार्य-भूतदिन्न-नागार्जुनमूहि-देवगणि-जिनभद्र- गणि-उमास्वातिवाचकभमुखाः सूरयो बभूवुः । गोविन्दाचार्याः 'व्याकरण-गणमहोदधि प्रमुखग्रन्यकारकाः सूर्याचार्या- दयश्च संजाताः । तच्छिप्यो वनसेनसरिः। तेन द्वादशवर्षदुर्भिक्षमान्ते अल्पेषु यतिषु क्यापि क्यापि उद्धरितेषु सोपारकपत्तने श्रेष्ठिचतुष्टयविपभक्षण-कुमरणनिवारणसम्बन्धेन प्रतियोध्य नागेन्द्र-चन्द्र-निर्दृति-विद्याधरगच्छचतुष्क- स्थापना कृता । तत्र नागेन्द्रगन्छे वायडग्रामे श्रीजीवदेवसरिणा द्विजैविद्वेषात् श्रीमहावीरमासादे मदिना गौनिक्षिप्ता। मृता सती संजीवीकृता, द्विजाः प्रतिबोधिताय । तथा श्रीदेवेन्द्रररिणा कुमारपालदेवराज्ये सेरीसकग्राम विभूमिका श्रीनिनभासादश्चेटकशक्त्या एकरात्री कारितः ।।२।। श्रीमल्लवादियाद्धि(दोजेता, मल्लिषेणसरिश्च । तया श्रीशीलगुणसूरित्रणरायपतियोधकः।गाली ) बर्द्धमानयरिन 'पाण्डवचरित्र'कर्वा ॥३॥ तथा श्रीउदयमभसरिः श्रीविजयसेनसरिन । ययोरुपदेगेन श्रीवस्तुपालमन्त्रीवरेण 'मीयर्योदरण-मासाद- फारापण-संघवात्सल्य-दानसत्राः कारापिताः। श्रीजिनशासनमभावना कृता ।।४।। एवं नागेन्द्रगच्छे पंचासरीयपदासनानि पत्र । लोलाउत्रा पदासनान्यधिपत्र ।

विविध गच्छीय पहायली संग्रह ។ ." नितिगच्छे पासडमरिः, संच गाडी प्युनिउनि जगौ ।।। तथा विद्याधरगन्छे श्रीवीसन १३१२ वर्षे श्रीयणमगिरगः सरस्पतीपरलन्धा गोपगिरी आमेराज मतिरोध्य श्रीवीरमासादकारकाः। पैराचार्यगिरिनारितीर्थयात्रायां चलितेन आमरामा श्रीनेमियन्दनाय अईमार्गेऽप्यशनाभिग्रई गृहीते ----यनगरे राज्ञि व्याकुले जाते धीउन्नयन्ततीर्थे अम्बिकासांनिध्यन रानी यात्रा कारिता । श्रीसंप. लोरस्य प्रत्ययार्थ अपापामठस्था नेमिप्रतिमा तवानीता। रामोऽभिग्रहः पूरितः। तदनु तन तीर्थे गस्तराचार्यः पूर्वदिगम्यौलाद गृहीतं श्रीगिरनारतीर्थे अम्बिकामुखेन 'इको विनमुकारो पति गाथया आत्मायनं कृतम् । श्रीपादलिप्ताचार्याः यैनागार्जुनयोगिनस्तधापानं स्वनिरोपदेपाग्नियोगकारापणेन स्वर्णसिद्धिर्शिवा । तेन तचरणक्षालनादाफाशमामिलेपणाँपधानि १०७ शानानि नन्दुलोदकोपदेशः इत्यादि-स्तम्भनरससिद्धिः। ये पञ्चमहा- तीर्थेषु आकाशमामिनीविद्यया शिष्यपु गोचरचयों गतेपु यानां मत्यई कुर्वन्ति । यथा-- : 'अट्ठावय-सम्मेए पाचा-चंपाइ-उलायतमि । निचं देवे धंदड पाइविलेवेण पालित्तो ।। ये च बालक्रीडारसिका विमान दृष्ट्वा फूटाचरणान्यन संपेक्ष्य आसनमुप्ताः, देशान्तरायातैः कुर्युटमानारादि- शब्दकरणच्छलितविमः । समस्या पृष्टा, यथा-'पालित्तयक०' । 'प्रत्युत्तर:-'अइसाभिओगतदनु विप्राः स्तुति विधाय गताः। अन्यच, व्याग्याविद्यागुणात् चमत्कृतसकलनागरिकास्ते 'तरगलोलास्था कारः । यथा- श्रीपादलिप्तकगरोस्तुहिनाचलस्य यस्याप्यहो सुमहिमा न हि माति लोके । भागीरथीव भुवनं परिपाययन्ती यस्मादजायत तरङ्गवती कथाऽपि । ४१ तथा वृद्धवाधाचार्या, तेषां वांदकरणे एपा प्रतिज्ञा- मुदगो शटगं शमयप्टिममाण शीतो घहिमाकतो निष्पकम्पः। यदा यस्मै रोचते तन्न किनिद वृद्धो वादी भापते तत् तथैव ।। तैराचार्य महारादी सिद्धसेनब्राह्मणो गोपसमोचितदगडकादिवादेन निर्जितः । स च शिष्यः कृतः स्वपदे स्थापितः। चीरात १३१२ सिद्धसेनः । तेन सिद्धसेन दिवाकरेण संस्कृतभापया सिद्धान्तकरणागतपाराचीपाप- क्षपणार्थ गुरुदत्तालोचनाहरणाय द्वार्निशतिरा, तदनु 'कल्याणमन्दिरस्त,' विधाय शिवलिड्गं भेदयित्वा श्रीयार्थ- प्रतिमा प्रकटीकृता । तथा तस्य राज्ञोऽग्रतो भाविनमभावका श्रीकुमारपालराजा कथितः । यथा- पुन्ने वाससहस्से सयंमि परिसंमि नवनवइ अहिए (१९९९) । होही कुमरनरिंदो तुह विकामरायसारिच्छो। एवं विद्याधरगन्छेऽन्येऽपि मभाषाचार्यप्रमुसा बभूवुः ॥३॥ अथ चन्द्रगच्छे प्रभावसाचार्या: श्रीहरिभद्रसूरय । वीरात् १०५५ वर्षेऽस्तं [गता] इरिभद्रहरिः। यौंद- शाखावगादनार्य दक्षिणस्या गतयोनिनभागिनेयहंस-परमदंसशिष्ययोगोंदकनोपदरं श्रुत्या संजातकोपैः आकृष्टि- विद्यया बौद्धहोमांदागतस्य पापस्य फाटनाय गुरुदत्तालोचनया १४४४ प्रारणानि पिहितानि । तदनु तेषां मरीणां कोषागाररूपो रोगो गतः। यथा- यस्यामयो गतमयो व्यगलन् क्षणेन दोपोज्झितोऽधिगतसुक्षुतयोगयोगात् सर्वज्ञता कलियुगे कलयन् नितान्तमेनःस संहरतु वो,हरिभद्रसरिः॥ ४२ -- ४४ राजगच्छ पट्टावाल : - है। पूर्व हि आरण्यकाः श्रीसोमन्तभद्रमयः आसन्, तत्सन्ताने श्रीमानदेवरिणा नड्डूलनगरात् श्रीसंघोपरोधेन शाकम्भर्या गत्या मरकोपद्रवोपशान्त्यर्थ 'शान्तिस्तव'श्चके । तत्पधारी श्रीमानतुझसरिः । येन वाणारस्या बाण-मयूर- पण्डिताभ्यां स्वोपेशसूर्य-चण्डीस्तुतितः कुष्ठरोगस्फेटयद्भ्यां चैत्यद्वारपरावर्तनेन च लब्धयशःप्रसराभ्यां कृताया जैना- वहेलनाया निराफरणार्थ श्रीपेपराज्ञः पुरतो 'भक्तामर० इति युगादिदेवम्तवश्चक्रे । यथा- यो वैधर्मिकलोकभूपतिपुरस्तुनोट जैनस्तवात् कुर्वे शृङ्खललोहबन्धनमय संघामावोबसः। ।। यस्यादेशविधायिनी समभवदः देव्यघिका सर्वदा पायाद वः स सदा सुनिर्मलगुणः श्रीमानतुङ्गः प्रभुः। तदन्वये-श्रीउद्योतनसरिणा टेलीग्रामे लउकडीयावटस्याधः संवत् ९९४ वत्सरे सुमुहूर्तसाधनाय श्रीसर्वदेव- सूरिप्रमुखा आचार्याः स्थापिताः। ततः क्रमेण बृहद्गच्छसंज्ञकाः शाखाः ९४ संजाताः। नेपां सन्ताने वादी श्रीदेवमरिः। येन भृगुकच्छे सैंधवादेवोभवने कानडायोगीन्द्रेण गारुडिना 'त्वं वादविरुदं मुञ्च, नोचेन्मया सह सर्पवादं कुरु' इत्युक्ते देवमरिणा बादो गृहीतः । तेन 'नमिऊण ' मन्त्राम्नायेन भूरेखाकरणतः सप्तवारं अधिका- धिकदर्पधराः सा निवारिताः स्वदशनायागच्छन्तः। ततो योगिना सिन्दुरिकासप्पो वितस्तमानो गुरुं प्रकोपाय मुक्तः । स आकाशे भूत्वा मस्तके डफदायी । ततः सरिणा 'प्रणवहृदि यदीयं स्तोत्रं कृत्वा कुरुकुल्ला शकुनिझारूपा प्रकटीकृत्य सोहिः गृहीतः। खिन्नो योगी चरणलग्नो 'मम निहिसर्प देही 'ति विज्ञपयति । ततो देवगृहजगती- मुक्तोऽहिर्दनः । तस्य जीवहिंसानिषेधं दत्त्वा, सोऽहीनां दुग्धादिपानेन निहियति । श्रीजिनं नमति योगीति नियमः। प्रथमो येन जयसिंघदेवराज्ये दिगम्बरेण कुमुदचन्द्रेण सह पण्मासान् दिनानि १९ यावद् वादं विधाय जयपत्रं जगृहे । यतः-- यदि नाम कुमुदचन्द्रं नाजेव्यद् देवमूरिरहिमरुचिः । कटिपरिधानमधास्यत् कतमः श्वेताम्बरो जगति॥ तथा पूर्णतिलय(तल्ल)गच्छे प्रभावकाः राजगुरुषः प्रभुश्रीहेमसूरयः । यैः कुमारपालदेवं राजानं प्रतियोध्य चतुर्दशशतानि श्रीजिनेन्द्रप्रासादाः कारिताः। अपादशवर्षाणि यावत् चतुर्दशदेशेषु जल-स्थलचराणामभयदानं दापितम् । यदुक्तम्- सप्तर्पयोऽपि सततं गगने चरन्तो रहूं क्षमा न हि मृगी मृगयोः सकाशात् । जीयाच्चिरं कलियुगे प्रभुहेमसूरिस्केन येन भुवि जीववधो निपिद्धः॥ इत्याद्यनेकप्रकारैजैनधर्मप्रभावकाः 'हैमव्याकरणा दिनानाशास्त्रकारकाः कालिकालसर्वज्ञविरुदास्ते वभूयुः । तथा आरण्यकाः श्रीउद्योतनसूरयस्तदन्वये श्रीमभवदेवसूरयः, यै स्वीयकुष्ठरोगस्फेटनाय 'जय तिहुअपा.' स्तवेन श्रीस्तम्भनपार्श्वनाथं स्तुत्वा धरणेन्द्रः प्रकटीकृतः । रोगो निर्गमितः । तथा नवानामगसूत्राणां वृत्तयः -कृताः । यथा- स्तुवेऽमेवाभयदेवसूरि विनिर्मिता येन नवाङ्गत्तिः । .. श्रुतश्रियं गोदहतो महभी नवाजा चरवेदिकेच ॥ ४७ .: ४८ विविधगच्छीय पधवली संग्रह तंच्छिप्याः 'पिण्डविशुद्धयादि 'प्रकरणकारकाः श्रीजिनवल्लभसूरयः । तेषां शिप्यो द्वौ। आयो जिनशेखर- सूरिः रुद्रपल्लीस्थाने मिथ्यात्विप्रतियोधकर्ता। तदन्वयस्य रुद्रपल्लीयखरतरगच्छसंज्ञा । द्वितीयो जिनदत्तरिः श्रीचामुण्डामतियोधकः । तदन्वयस्य खरतरगच्छसंशा । तत्र गच्छे श्रीजिनप्रभसरयः पयावतीसांनिध्ययुक्ताः परम- सिद्धान्तविदुराः दिल्यां यवनाधिपमहम्मदसाहिरअकाः नानाविधचमत्कारदर्शनेन च जिनशासनोन्नतिकारका बभूवुः। तथा सं. चैत्यवासिनः पूर्व रत्नप्तभसूरयः । यैरुपकेशिनगरे कोरण्टनगरे च एकमुहूर्ते देवसांनिध्याद् द्विरूप- धारिभिः श्रीवीरमतिष्ठा कृता । यथा- सप्तत्या वत्सराणां चरमजिनपतेर्मुक्तियातस्य माघे पञ्चम्यां शुक्लपक्षे सुरगुरुदिवसे ब्रह्मणः सन्मुहत्तै । रत्नाचायरिहार्यः प्रतिभगुणयुतैः सर्पसंघानुयातः श्रीमदीरस्य बिम्ब भवशतमथने निर्मिता सत्प्रतिष्ठा ।। तत्पट्टे यक्षदेवसूरिणा यक्षः प्रतियोधितो जिनभक्तः कृतः । ततः कक्कमरिसंताने ओसिवालगच्छसंज्ञा । नन्नपर्यन्वये कोरण्टवालगच्छसंज्ञा । थारापद्रगच्छे वादिवेतालः श्रीशान्तिमरिः। नाणावालगच्छे मौनी श्रीशान्तिसरिः। यैः श्रावकपृष्टसिद्धान्तविचारोचरदानाऽशक्तैः सत्रपैः श्रुतदेवताराधनार्थ द्वादशवर्षाणि मौनं धृतम् । तदनु नाणाग्रामे सरस्वती सन्तुष्टा विद्यां ददौ । शास्त्रज्ञा वभुवुस्ते । तवो विगैस्तत्परीक्षार्थ वेदार्थे पृष्टे, तैश्चत्वारोऽपि वेदा व्याख्याताः। १८००० ब्राह्मणाः प्रयुद्धाः, आचार्यभक्त्या मरुस्थलीतस्तैः संघाचा चक्रुः । तैरतिबहुलैखेजिनभवने पाटामण्डपो निप्पन्नो लोकमसिद्धः । तथा पण्डेरकीयगच्छे श्रीयशोभद्रभूरयः। संघस्प तृपोपशमनायाऽकाले मेघदृष्टिकारकाः, अनेकप्रभावना- प्रसिद्धाः। यथा- येपामायाल्यकालाद् विकृतिपरिहृतिर्मान्यता मूलराजे संघे मेघाम्वृष्टिः सकललिपिवचो वाचने वा निपेच्यः। पण्डेरे पल्लिकायां नयनमधनतो याति मिथ्यादिकानां श्रुत्वा नानाऽदभुतानि त्रिभुवनगतिनो धुनयन्ते शिरांसि ॥ योउ यमरिसि० । बोडाको दुस्थितः श्राद्धो भगिनीयनेन घृनकूपिकाव्यवसायं करोति । चौरेलष्टितः 'कुतो भग्नीधनं दास्ये' इति वैराग्यान्महावती यभूव तपस्वी । अन्यदा अरण्यावग्रहमनुज्ञाप्य द्धनीतिं कुर्वतो देवतया स्वर्णनिधानं भकटीकृतम् । मुनिना निरीहेण जीवरक्षार्थ तत्रैव मलोत्सर्गः कृतः । तद् गोष्टम् । भोजनृपस्योक्तम् । नृपपुम्भिस्तं दृष्ट्वाऽचिन्ति निरीहोऽयं तपस्वी बन्धः' प्रसिद्धिस्तत्र ! अन्यदा गजानां रोगोत्पत्तौ नृपेण ऋषि- चरणनीरमानायितम् । स न दत्ते । सन्मुक्तपादरेणुकाक्षालनाजलसे का गनमारिरोगनाशः||इत्यादि वोहाऋपि प्रवन्धः।। तद्गछे पूर्व बलिभद्रमुनि तः। तेन देवशवत्या बौद्धैहोतं श्रीगिरनारतीय बालितम् ॥ प्रश्नवाइनकुले हर्षपुरीयगच्छे मलघारीविरुदाः श्रीहेमचन्दसूरयो । भयभावना-पुष्पमाला 'दिपकरणकर्तारः । वदनु नरचन्द्रसरिः, श्रीचन्द्रमूरिभमुखा विविधग्रन्यकारकाः, तथा चादिगजगन्धिहस्तिनो रानशेखरसरयः । . .

राजगच्छ पावलि कृष्णार्पिगच्छे महाभिग्रहनिवद्धोग्रतपरकारकाः कप्पा पिसरयः कालीकम्बलधराःतद्वंशे वादीन्द्रश्रीजयसिंघबरयः। पल्लीवालगच्छे प्राकृतविविधछन्दोऽभिरामश्रीशान्तिमरिः। श्रीकालिकाचार्यसंताने संडिल्लगणे भावडारगच्छे श्रीवीरमरिणा कल्याणकटकनगराधिपपरमार्डि राजानं रञ्जयित्वा पञ्चगजघटा आनीता। तद्रव्यं प्रासादे व्ययिता । तेषां वाक्यम्- आकाश प्रसर प्रसर्पत दिशः [त्वं ?] पृथ्वि पृथ्वी भव प्रत्यक्षीकृतमादिराजयशसो युष्माभिरजृम्भितम् । प्रेक्षध्वं परमर्द्विपार्थिवयशोराशेर्विकासोदयाद् बीजोद्भासितपक्चदाडिमतुलं ब्रह्माण्डमारोहते ॥ तेपामनुक्रमे शास्त्रसिद्धान्तवेत्तारो भावदेवमूरयः । कासहृद्गच्छे उज्जोयणमूरिः। हुंचडशाखायां आर्यसपुटाचार्या विद्यासिद्धा वडकरयक्षमवोधकाः । एवं गच्छे गच्छे अने के प्रभावका बभूवुः । ते च वक्तुं तदा पार्यन्ते यदि मुखे जितासहस्राणि भवन्ति । तथा श्रीवीरनिर्वाणात ९९३ वर्षेषु गतेषु श्रीकालकाचार्यश्चतुर्दश्यां पाक्षिकप्रतिक्रमणं संघादेशात् स्थापितम् । यथा- सालाहणेण रन्ना संघाएसेण कारिओ भय । पज्जूसवणचउत्थी तह चउमासं चउद्दसीए॥ तथा श्रीवीरनिर्वाणात् प्रयोदशशतवर्षेषु यातेषु मुख्यगच्छेभ्यो मतान्तराणि जातानि । यतः कालचक्रे उक्तम्- तेरससएहि वीराओ होहिंति अणेगमयविभेया । बंधति तेणि जीवा बहुहा कंखाइ मोहणियं ॥ ५३ पक्षान्तराणि यथा- हुँ नन्देन्द्रियरुद्रकालजनितः (११५९) पक्षोऽस्ति राकाङ्कितो वेदाभ्रारुणकाल (१२०४) औष्ट्रिकभवो विश्वार्ककालेऽश्चलः (१२१४)। पट्भ्यर्केषु (१२३६) च सार्धपूर्णिम इति व्योमेन्द्रियाक्पु (१२५०) च ..व त्रिस्तुतिकोऽक्षमङ्गलरची (१२८५) गाढग्रहस्तापसः ।। विक्रम ११५९ वर्षे बृहद्गच्छाचार्याः (० र्यात् ) शाखा ४ (१) पूर्णिमापक्षः । तत्र श्रीमुमतिसरिः, श्रीतिलकाचार्यः 'सुगमसिद्धान्तवृत्त्या 'दिकर्ता। वेदाभ्रारुण[काले] १२०४ औष्ट्रिकपक्षः । विश्वार्ककाले अञ्चलपक्षः । पूर्णिमापक्षात् उपाध्यायात् १२१४ वर्षे नाढश्रावकोपरोधाद् अञ्चलपक्षः। तत्र मेरुतुगलरिर्व्याख्यानगुणोपेतः । पट्यर्वेषु च १२३६ वर्षे पूर्णिमापक्षीयाचार्यात् .. आगमपक्षः त्रिस्तुतिकः । अक्षमङ्गलरचौ १२८५ मन्त्रिवस्तुपालाधिकारिमन्त्रिमजसवीरेण घृहद्गच्छपण्डितापराधभीतेन बृहद्गच्छपण्डित- पार्श्व दीक्षा गृहीता। -१२८५ वर्षे चैत्रगच्छीयदेवउ(भद्रामुनिस्तेषां मिलितः। तेन वस्तुपाल्तजितेन महत्तए आरब्धमिति तपासंज्ञा । तत्र चैत्रगच्छे मतान्तरे विजयचन्द्र-रत्नाकरमरी । बृहद्गच्छे मतान्तरे सोमतिलकसरिः। तेषु मतान्तरेष्वपि प्रतिमतान्तरण्यनेकांनीति दुःपमकालविलसितम् ।. . . . . १ J विविधयकीय पावली से प्रह एवं श्रीपुण्डरीकगणधर-श्रीगीतमादिगणधराणां प्रभावकसरीणां च नामग्रहणं मलाप कृतम् ।। अथ स्वगच्छममालकाणां श्रीगुरूणां नामानि सपन्ते । अतः स्वगुवारली लिख्यते । तद् यथा- पूर्व हि तलवाडदेशस्वामी मापालो भन्नरानः आक्षेटके पापादितसगर्महरिणीयालके तडफडन्तं वीक्ष्य स्वयं वैराग्यमापन्नः राज्य विहापारण्पकसरिसाधुसमीपे दीक्षां जग्राह । स च राजपिराचार्यपदस्थः श्रीनन्नमरि- प्रसिद्धः समजनि । तदन्वये अजितपनोवादिसरिप्रमुसाः सम आचार्या चादिजेनारो लक्षण-प्रमाणग्रन्यारो अभूवन् । अतो राजगउसना मसिद्धा । वदनु पद्भिशक्षकन्यकृन्नदेशाधिपतेः फईमरामस्प पुनो धनेशरकुमारः अन्यदा आक्षेटके एकाकी अष्टपादसरमं दृष्ट्वा वृक्षारूढोधास्यम्भायमाणं सरम मलेन मुखे जवान । नतोऽतीवरुष्ट- दुष्टसरमेण निजनिरोधमिश्रमत्तिकाशुण्डादण्टेनोल्हालिता। यत्र यन क्रुमरदेदे लाना तन तर स्फोटका उत्पन्नाः । पश्चादायातैरनुचरगुहं नीतः कुमारः। विविधोपचारैरशान्तं तदार्य मन्त्र्यानीतेन राजर्षिश्रीमभयदेवमरिचरणनीरेण उपशान्तं वीक्ष्य वस्योपकारिणो गुरोः समीपे पित्रा निपिद्धोऽपि प्रतं प्रविपन्नः । स च श्रीधनेश्वरपरिर्वभूव । वेन चैाभिधमहास्थाने सर्पदष्टद्विजकुमारस्य करपानीयेन जीवदानं दत्वा अप्टादशसहस्राणि ब्राह्मणकुटुम्बानि प्रतियोध्य थीचीरमासादः कारितः। अष्टादशसूरयः स्थापिताः । द्वादशवर्षयोऽनन्तरं यात्रजीवं पविकृतित्यागिनो नामस्मरणेऽपि नि शिवक्षुद्रोपद्रवा अक्षीणलब्धिकारका श्रीशीलभद्रसरयः । तेषां शिष्याः ११५६ वर्षे सरिमन्नमाप्ता अम्बिकासांनिध्यतो भूपनयोधका वारद्वयं गुणचन्द्रादिजेतारः श्रीधर्मयोपरयोऽभूवन् । यथा- आसीत् भीराजगच्छे सदसि नरपतेरहलणारूपस्य सांख्य- अन्यव्याख्याविधाताऽनलम्रपतिपुरो चादिगापहर्ता। जैनावज्ञाप्रसक्तं जिनमतसुदं विद्महेशं विधाय श्रीमन्जैनेन्द्रधर्मोनतिकरणपटुर्धर्ममूरिर्मुनीन्द्रः ।। तथा यदुपदेशात् शाकम्मरीद्रेशाधिपेन राजा वीसलदेवेन अजयमेरुदुर्गे रानविहारः कारितः। मूलनायक- श्रीशान्तिदेवस्य प्रतिष्ठामहोत्सवोऽकारि । तस्य भूपतेर्माना सहबदेच्या सहवपुरे श्रीपार्श्वप्रासादः कारितः। एवं यैराचार्यः श्रीफलवद्धिपुरमण्डनश्रीपार्श्वदेवमभृतिजिनानां पश्चोत्तरशतं १०५ मासादेषु प्रविष्ठा विहिता । तथा च ब्राह्मण-क्षत्रिय-माहेश्वरीयपैश्यान् प्रतिबोध्य ओसिवालानां पञ्चोत्तरशत १०५ गोत्राणि श्रीमालानां च पञ्चत्रिंशद- गोत्राणि धावकवतधारीणि विहितानि ।। तेभ्यः श्रीधर्मपोपसरिभ्यो राजगरछस्प धर्मयोपगगसंज्ञा प्रसिद्धा । तेषामन्वयेऽमृतोपमनिजदेवानामविवोधि- तानेकमिथ्यास्विनः प्रभावकाः श्रीसागरचन्द्रवरयो वभूवुः । यथा- वन्दामि तं सुगुरुसागरचन्द्रसूरि यस्यामृतोपमवासि निशम्य सघः । के के न केल्हणनूपप्रमुखा पनघुजनेन्द्रधर्मरुचयो बिजराजपुत्राः ।। तस्पधारिणोऽनेकविद्याकलाचमत्कारैर्विश्रुताः श्रीमलयचन्द्रसूरयः । तया श्रीचित्रचालशाखायां श्रीमद्रेश्वरसरिमिः श्रीगिरनारतीर्थे मुख्यमासादस्य प्रतिष्ठा चके । यतः- श्रीमन्नेमेरुजयन्ताद्रिशृङ्गे मासादं यो वीक्ष्य जीर्ण विशीर्णम् । दण्डाधीश सज्जनं योधयित्वा नव्यं दिन्यं कारयामासुराशु ॥

O .राजगच्छ पावलि तथा श्रीचैत्रगच्छ एव श्रीवीरगणयः कम्बोइयाशाखायां संजाताः । यैस्तपःमीणितवालींनाहक्षेत्रपालसांनिध्येन श्रीअष्टापदतीर्थ यात्रा विहिता । तस्या शाखाया अष्टापदशाखेयमिति प्रसिद्धिः। अथ अमुकगोत्रीयाऽमुकान्वयमण्डनामुकथावकाभ्यर्थनयाऽमुकधर्मशास्त्रवाचनां करिष्यामः । अथास्मादृशो मूखों यत्किश्चिदस्य गम्भीरार्थस्य शास्त्रस्य व्याख्या वाचनां चा करिष्यति स अमुकमरेगुरोः प्रभावः । यतः- यद्रेणुर्विकलीकरोति तरणि तन्मारुतस्फूजितं भेकश्चम्यति य जनवदनं तन्मन्त्रितं मन्त्रिणः । चैत्रे कूजति कोकिला कलरवं तत्सारसालत्रुमः स्फूर्त्या जल्पति माहशा किमपि यन्माहात्म्यमेतद् गुरोः॥ ५८ तत्र येन अमुकगुरुणा मम हृदयलोचनं विकासितं तस्य नमोऽस्तु । यथा- अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया। नेत्रमुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अथ अमुकधर्मशास्त्रस्य पञ्चमङ्गलमहाश्रुतस्कन्धनमस्कारमन्त्रभणनपूर्वक]प्रथमः श्लोको वाच्यते । व्याख्येय- ग्रन्थस्य गाथाः, श्लोका वा १, ३, ४, ५, ६, ७ व्याख्येयाः। यथा- हट्ट पोपधशालिकां नवनवं पण्यं च दानादयः शास्त्रार्थी ऋजुधीरहं पुनरहो वर्तेऽत्र विक्रायके । यूयं भो व्यवहारिणः प्रतिदिनं गृह्णीध्वमभ्येत्य त- न्नैवोद्ग्राहणिका न च त्रुटिभयं न ग्रन्थिवित्तव्ययः॥ अथवा- वेलाकूलमिदं [महा]जलनिधेजैनेश्वरं शासनं पोतःशास्त्रमिदं मणिप्रभृतिसत्पण्यानि तत्त्वाह्वयः। दातारो गुरवश्च सम्प्रति मम श्रेयस्य लाभार्थिनो यूयं श्रावकसत्तमास्तत इतो गृणीत च स्वेच्छया ॥ धर्मशास्त्रन्याख्यारूपा भोज्यवारेयं मण्डिताऽस्ति । यथा- श्रद्धावृद्धिकरः श्रियां कुलगृहं सोऽयं सभामण्डपः सोऽयं तत्त्वविचारणैकतरणिः संतर्पणीयो जनः । सेऽयं जैनकथाप्रथारसवती सौहित्यहेतु सतां माहक्षः परिवेषणे पुनरसौ जातोऽधिकारो जनुः ॥ ६२ अथवा-धर्मशास्त्रमारम्भेषु श्रावका साथमिकेभ्यस्ताम्बूलं ददति । इत्यतोऽस्माभिरपि धर्मताम्बूलमिदं दीयते। यथा- एला यत्र दया क्षमा बलवली सत्यं लवड्गं पर दाक्षिण्यं कमुकीफलानि विदितशूर्णस्तु तत्त्वोद्यमः।

१४ विविधगध्ठीय पत्रावली संग्रह कपूर मुनिराग उत्समगुणं शीलं तु पत्रोचयो गृणीध्वं गुणकृजनयदपि तत् ताम्बूलकं पीटकम् ॥ अथवा- पत्राणि व्रतसम्पदः शुचिगुणाः पूगीफलानि स्फुट शीलं चूर्णमनुत्तर शुचि मनः फरिपूरस्स्वयम् । श्रीमद्देवगुरुप्रसादविशद करोलके स्थापित राग-क्षेपकफादिदोपग्नसनं ताम्बूलकं गृह्यताम् ।। अथवा-धर्मशास्त्रव्याख्यानरूपेऽस्मिन् मङ्गलकार्य श्रीसंघायाऽक्षतमानने समानीय तेऽस्माभिरिति । नक्षत्राक्षतपूरितं मरकतस्थालं विशालं नमः पीयूपकृतिनालिकेरकलितं चन्द्रप्रभाचन्दनम् । यावन्मेरुकरे गभस्तिकटके धत्ते धरित्रीवधू- स्तावन्नन्दतु पुत्र-पौत्रसहितं श्रीसंघभधारकः ॥ आशीर्वादपुस्तकमारम्भणम्- श्रीजनशासनविकाशनपार्वणेन्दुः श्रीनन्नमरिरभवद भवतापहा । ये पूज्यसम्पदमपास्य च हेलयैय लीला ललौ करणचारिरमाविलासात् ॥ ततशिष्योऽप्यजितयशोऽजितयशोचादिसरिरमतिमः । श्रीसर्वदेवसूरिगुरवस्तदंदिराजीवराजहंसः॥ तत्पहार्णवकौस्तुभः समुदितः प्रद्युम्ननामा हि यः ६७ ६८ तशिप्योऽभयदेबसरिस्समो मिथ्यात्वयादिवज- मादोन्माधकरः प्रसिद्धमहिमः स्पावादमुद्राङ्कितः ॥ श्रीचैत्रगच्छे प्रकटप्रभावी धनेश्वरशरिरभूच तस्मात् । आसीद् विनेयोऽजितसिंहरिः सिंहोपमो यादिमतगजेषु ।। श्रीवर्द्धमान इति जैनमतारबिन्दप्रद्योतनस्तदनु शाश्वतकीर्तिपूरः। दुःप्रापशीलमणिरोहणपुण्यभूमिः श्रीशीलभद्रगुरुराश्रिततत्त्वश्रेणिः ॥ यादिचन्द्र-गुणचन्द्रविजेता भूपतित्रयवियोधविधाता। धर्मसूरिरिति नाम पुरासीद विश्वविश्वविदितो मुनिराजः ॥ तायत् कविनयकवित्वविधानदक्षो चादीश्वरो वदति तावदशेपवादान् । वक्ताऽपि तावदमृतोपमशक्तिरासीद] ज्ञानेन्दुरति कुशकोटिमतिर्न यावत् ॥ ७० ७२ ७५ ७६ ७८ ७१ राज गच्छ पट्टा व लि श्रीराजगच्छतटिनीपतिशीतभानुं भव्याम्बुजप्रतिवियोधननव्यभानुम् । लोकप्रकाशसततोरुगुणप्रधानं श्रीज्ञानचन्द्रसुगुरुं प्रणमामि मानम् ।। कल्पद्रुपल्लवपवित्रपवित्रहस्तं पादप्रसादविधिगम्पसुसिद्धिभावम् । भावारिचूरणचरत्तरभावभावं श्रीज्ञानचन्द्रसुगुरुं कवयामि भक्त्या ॥ ७४ मोहप्रगल्भवललुण्टनलम्पटाय सिद्धधङ्गनानयनपट्पदपङ्कजाय । लालित्यदिव्यभविकप्रतियोधकाय श्रीज्ञानचन्द्रगुरवेऽस्तु नमो नमाय ।। नित्योपवत्कलुपपडिल्लदेहिदेहगेहप्रसन्नसजलाम्बुधरमभाय । गीर्वाणचक्रमुकुटप्रकटाञ्चिताय श्रीज्ञानचन्द्रसुगुरुं भवभेदनाय ॥ उन्मत्तकोकिलविपश्चिपटेष्टवाचं वाचंयमप्रचयसेवितपादपद्मम् । कन्दर्पदर्पदलनोल्वणशीलखड्ग श्रीज्ञानचन्द्रसुगुरुं शरणं भजेऽहम् ।। कुन्देन्दुहारहरहासयशःप्रकाशमाकाशवद्धिमलवुद्धिचयप्रतीक्ष्यम् । ईक्षामहे महिमनीरजधीरइंसं श्रीज्ञानचन्द्रसुगुरुं भवभेदनाय ।। कल्याणकल्पलतिकामृतमेघकल्पं कल्पान्तकालसममत्सरमेरुशल्यम् । संकल्पकल्पनविकल्पनगुल्मचक्रं श्रीज्ञानचन्द्रगुरुचन्द्रमहं नमामि । मार्तण्डमण्डलमिलत्कलकान्तिचक्र चक्रभ्रम भ्रमदिदं दव (तु विभाति देहे । साम्राज्यमोहकदनस्फुटवारिवाहं जाज्वल्यमानमिव चक्रमहो चकास्ति ॥ चारित्रवाहननिकामनियामका दीमारिवारमददुर्द्धरभासुराभम् । खजूरपिण्डएटुलच्छविदेहगेहं श्रीज्ञानचन्द्रमतिशं हृदयं वसामि ॥ ८१ श्रीज्ञानचन्द्रगुरुपादपङ्कजं संवसामि हृदये मनोहरे । अष्टसिद्धिवरकामिनीवशीकरं कार्मणमिव सुशर्मणाम् ॥ ८२ कीतिगेहमिह सद्गुणावलीवल्लिसन्जलजलाश्रयश्रियम् । सौव्यनष्टपटहृध्वनिध्वनि ज्ञानचन्द्रसुगुरूं गुरुत्तमम् ।। सुलभविविधलब्धिर्भाग्यसौभाग्यभूमिभवशतकृतपुण्यप्राप्यपादप्रसादः। जिनपतिमतचित्रोत्सप्पणाकेलिकारो जयति कलियुगेऽस्मिन् गौतमो धर्मसूरिः ॥ ८४ प्रणाशयन्तो जडतान्धकारं विकासयन्तो भविकैरवाणि । श्रीज्ञानचन्द्रोत्तमसूरिराजपादाः प्रकाम जयिनो भवन्तु । प्रयलबादिमतङ्गाजमर्दने हरिरियोन्नतवाक्यनखाइकुरे । य इह जैनमताभिधकानने सुशिवदः सुगुरुर्मुनिशेखरः ॥ चन्दामि तं सुगुरुसागरचन्द्रसूरि यस्यामृतोपमवचासि निशम्य सद्यः। के के न केल्हणनृपप्रमुखा बभूवुः जैनेन्द्रधर्मरुचयो दिजराजपुत्राः॥' ८३ ८५ . ८८ ९० ९२ विविधगच्छीय पापली संग्रह श्रीजैनशासनयनीनयवारियाहाः सद्देशनारसनिरस्तसुधाप्रवाहाः । विद्याकलागुणसुलब्धिमहानिधानाः श्रीसागरेन्दुगुरवो गुरवो जयन्तु ।। भूपालमालापणतो निरीहः समग्रविद्यागुणलब्धिपात्रम् । सर्वत्र सत्कीर्तितपद्महस्तो मुदेऽस्तु नित्यं मलयेन्दुसरिः॥ श्रीराजगच्छाधिपूर्णचन्द्रः समस्तविद्यापदमस्ततन्द्रः। प्रज्ञापराभूतसुरेन्द्रसरिजर्जीयाचिरं श्रीमलयेन्दुसरिः ।। विश्वोद्योतियशामतापचिलसचन्द्रार्कसंशोभितो गुनिन्दनसौमनस्यकलितः सदभवशालावनिः। भूयान्मेरुरिव क्षमाभरघरो विख्यातनामा सता पूज्यः श्रीप्रभुपमशेखरगुका कल्याणदः शर्मणे | अभिधानानि गुरूणां निधानानि शिवश्रियः । च्याख्यामि पुस्तकव्याख्यां प्रारम्भोऽयमापच्छिदे ॥ इत्येषां पूर्वसूरीणां नाममन्त्रप्रभावतः। कल्मपं विलयं याति कल्याणं चोपतिष्ठति ॥ तेषां पादप्रसादेन स्वल्पघुद्धया मयाऽधुना । व्यारया प्रारभ्यते किञ्चित् श्राद्धानां साधुसंसदि । नमोऽस्तु गुरुचन्द्राय यत्करस्पृष्टमूर्द्धनि । 'आविर्भवति मय्यइमन्यपि वाक्यसुधारसः॥ शीलं शालिः सुदालिः प्रशमपरिणतिः स्वच्छमाज्यं विवेका संतोपः शालनीषा समिनिसमुदयः पञ्चपक्यानपाकः । लप्नश्रीविश्री: दधि परमदया मिडका सत्तपांसि द्राक्षापानं गुरूणां वचनमनुपमं दुर्लभ त्यिष्टभोज्यम् ॥ व्याख्यो सत्रशाला जिनवचनकणाः पुस्तका कोष्ठकल्पो भोक्तव्य व्यञ्जनाढय नवरसकलितं स्वादतापापहारि। धास्तव्यागन्तुकै प्रतिदिवसमिदं भोज्यमागत्य लोक संघेनाहं परोधात् प्रमुदितमनसा तत्र कार्ये नियुक्तः।। अन्थे यत् किल दुर्गमार्थमहिते गाम्भीर्यदुःसंचरे दुरपसरनिरन्तरतमश्छिन्नप्रकाशात्मनः। यज्जातं स्खलितं मम प्रतिदिनं किश्चिद्विचाराध्यनि क्षन्तव्यं तदशेपमेपपुरतः संघस्य पद्धाञ्जलि। किन्नु गरपहि पुरओ धरिया इयरावि जुग्गयं जंति । पंगु वि भमइ भवणं अरुणो रविणा को पुरओ। ९५ . ९८ श्रीरत्नसिंघसरि श्रीदेवेन्द्रसरि २॥ श्रीरत्नप्रभसरि ३। श्रीआनन्दसूरि । श्रीअमरमभसरि ५। श्रीमहावीर १॥ श्रीगौतमस्वामी २ श्रीसुधर्मस्वामी ३ । श्रीजम्यूस्वामी । श्रीप्रभवस्वामी ५ श्रीशय्यंभवस्वामी ६॥ श्रीयशोभद्रस्वामी ७॥ श्रीसंभूतिविजय ८॥ श्रीभद्रबाहुस्वामी ९। श्रीस्थूलिभद्र १०। श्रीआर्यमुहस्ति ११॥ श्रीवयरस्वामी १२॥ श्रीवयरसेन १३ ॥ श्रीनागेन्द्र-चन्द्र- निति-उद्देहो (१) १४॥ राज गच्छ पट्टा वलि श्रीराजगच्छे ।। श्रीनन्नसरि १। श्रीअजितयशोवादी २। श्रीसर्वदेवसरि ३। श्रीपशुनसरि ४। श्रीअमयदेवमरि ५ श्रीधनेश्वरसूरि ६। श्रीअजितसिंहसरि ७। श्रीवर्द्धमानसूरि ८॥ श्रीशीलभद्रसरि ९। श्रीधर्मसूरि १॥ श्रीसागरचन्द्रसरि २। श्रीमलयचन्द्रसरि ३ । श्रीज्ञानचन्द्रसरि ४॥ श्रीमुनिशेखरसरि ५। श्रीपद्मशेखरसूरि ६। श्रीपद्मानन्दसूरि ७॥ श्रीनन्दिवर्द्धनहरि ८॥ जयवन्ता श्रीनयचन्द्रसरि ९।

पाडिवालगच्छ पट्टावलि। पाडिवालगच्छपट्टावली लिख्यते- तेणं कालेणं तेणं समएणं इमीसे ओसप्पिणीए दुसममुसमाए समाए एगसागरोवमकोडाकोडीए तिवासअनवमासऊणाए वइने समणे मगर्य महावीरे कासवगीते कालगए । तयणतरं च समणस्स भगवश्री महावीरस्स अंतेवासी मुहम्मनामगणहरे अग्गिवेसायणगोत्ते सतुस्सेहे सो पट्टहरो जाओ । अन्ने गणहरा णिरवया सिद्धा, अश्रो परं मुहम्मस्स गन्छस्स मेरा जाव दुप्पसहसरी बहिस्सइ । अइ मुहम्मगणहरो विहरमाणो रायगिद्दे समोसरियो । तत्थ रिसइपुत्तो धारणिभत्तो जघृणामा, सो देसमा मुणिऊण पडिबुद्धो, सावगधम्म पडिवन्नो । मायाम्गहेण अट्ठकन्ना परिणीआ, रयणीए पडियोहिया, जणगाइ सह दिक्सिी। वीराओ वारसे वरिसे मुहम्मो केवली । वीरपरछा बीसइमे वरिसे मुवार । जयू केवलित्तणेण मुहम्मपट्टे ठिो, तस्स सोलस वरिसा गिरासे गया। वीसवरिसा छउमत्ये। सेसा केवलित्तणे । सम्बाउ असिइ बरिसस्स सिद्धो। तओ परं-मण-परमोहिपुलाए आहारगग्ववगउवसमे कप्पे । संजमतियकेवलसिज्झणाय जंबुम्मि घुच्छिन्ना ॥ तस्स पट्टे पभवसामी कच्चायणगुत्तिो। सो वि उवओगेण गणहरपयजोगो पिक्सइ । रायगिहे सेजभवमट्ट नाऊण जिणपडिमा दरिसिआ, पडियुद्धो, सगम्मिणिभजा चिचा संजमे पविभो । तं पट्टे ठवित्ता वीराओ पणइत्तरिमे वरिसे देवलोयं गओ। सो वि मणगढे 'दसवियालिय'मुत्तं रइऊण, वीराओ नवाणुवरिसे देवलोयं पत्तो । तप्पट्टे जसोभद्दो ठिओ चउदसपुची । तेण दो सीसा कया-संभूइविजओ माढरगुत्तो, वीओ भद्दवाहू पाइण- सगुत्तो। तेम भदवाहू वराहमिहिरस्स वितरस्स उवसग्गरस वजणढे उवसग्गहरो विहिओ। ताहे संचे पढमाणो सच्चाणि उवसग्गाणि हरइ । अन्नाणि वि णिज्जुतिमुत्ताणि च रहयाणि । तम्मि वारसवरिसिमो दुक्कालो पडिओ। णिग्गंया अप्पठिभा, पुच्चपढिओ गस्थि । तत्य गदरायमंतिपुनो धूलिभहो तायमरणसोगेण बइरमाभावणाभाविअप्पो संभूइविजयस्स सीसो जाओ, सो बुद्धिवलिओ भरवाहुसमीवे दसपुच्चाणि सत्येण गहियाणि 1 पुढालंयणतणेण विजा पयडीकया । भदवाहुणा अनुम्ग ति काऊण णिच्छूढो । संघेण विष्णविओ, चउपुन्चाणि पाठेण गहियाणि । अओ परं दसपुच्चाणि । भद्दवाहू वीराओ सत्तरिसयवरिसे देवलोयं गया। तत्पट्टे धूलिभदौ ठिो सो वीराभो दोसयपणरसाहियवरिसे सगं गो । इत्य पिण्डवाइपउरवक्खाणं वुड्ढपदावलीए अस्थि । तओ णेयं, इत्य संखे । तस्स पट्टे महागिरी, सुहत्थी दो आयरिया । तेसु महागिरी उग्गविहारी । एगया उज्जेणीए संपइरण्णो मुइत्थिपसंगेण लद्धसम्मत्तो सारगगिहे रायदश्वेण असणाई पडिलाभेइ । मुठ्ठ असणं दट्टण गाओ, सुहत्यिस्स 1.

पाडिवाल गच्छ पदावलि " कहिलं रायपिंडो त्ति । सो भणइ - सव्वत्यवि अत्थि त्ति एवं णिस्यवयणं सुच्चा निभत्यिो कहिओ, अओ परं गत्यि संभोओ । अण्णत्थ विहरिओ, मुहत्थी वीराओ २९१ वरिसे देवलोयं पत्तो। अज्जमहागिरिणा वीराओ २९३ वरिसे सग्गं साहिरं । तस्स सीसो बहुलसरिओ दसपुची विहरमाणो साईणामा वेयपारं विप्पं पडिवोहित्ता दिक्खिओ । वीराओ ३२५ वरिसे देवलोयं गओ। तस्स पट्टे साईसरी रायसभाए उमापक्सं गहिऊण विप्पाणं वायं हणि । तेण लोए उमासाई पसिद्धो । 'दसज्झाओ' तत्तत्थ-भासो कओ । अण्णे वि गंथा रइया । वीराओ ३६१ चरिसे सम्गं गओ। तप्पट्टे सामा आयरिओ । तेण 'पण्णवणा उचंगो अंगाओ उद्धरिओ। धीररायपुत्तो संडिल्लयुद्धो दिक्खिओ। तेण वहवे खत्ति पडिबोहिआ। वीराओ ३७६ वरिसे साईसरि (सामारियो ?) दिवं पत्तो । तओ संडिल्लसरी गणहरो जाओ। तेण मुभोजरायपुत्तो गुत्तो पडिवोहित्ता दिक्सिओ। सो पंडिओ परं सरलो त्ति । तेण अजगुत्तो ति पसिद्धो । संडिल्लो वि अज्जगुत्तं पट्टे ठवित्ता, वीराओ ३९९ वरिसे देवलोयं गया। अजगुत्तेण वुड्ढसिटि दिक्सिओ । सो वायरणं सिक्खइ । तओ लोया चिट्ठ भणंति-'एसो वुड्ढवाई सोऊण लज्जो ओधारेइ - जाव मम विजा णागमिस्सति ताव आयंविलं होज्जा । एवं ददाभिग्गहो णवयारं गुणइ । तप्पभावेण अक्खलियवायसत्ती समुप्पन्ना । परं अप्पसीसो भरुअच्छे ठिओ। तम्मी(म्मि) काले उज्जयणीए सिद्धसेणदिवायरभट्टो गन्धपच्चए चढिओ । वायत्थं भरुअच्छमग्गे मिलिओ। बुड्ढ- वाइणा जिओ, सीसो कओ । तेण विक्कमादित्तरणो पडियोहिओ, कल्लाणमंदिरथवेण महाकालचेइए ठिया ईसर- लिंगी फोडिया, पामपडिमा पयडीकया। अणेगरायपुत्ताण वोहो दत्तो । तस्स पुत्तो नागदिग्णो अइचवलो। सो एगया उज्जाणे आगओ सरिणं अवमन्नइ भणइ-किमद्वे कटु ? मूरिणा पडियोहिओ, दिक्खिओ । पंचपुची जाओ । सूरीपयटिओ । सो सूरी वीराओ ५०७ वरिसे सग्गं गयो । तो णागदिण्णमूरी सोरटे विहरमाणो बारवईए धरावइरायसुओ कण्णसेणो, तं पडिवोहिऊण दिक्खिओ । तेण वहवे रायपुत्ता पडियोहिआ। तस्स माउलो गरदेवो, सि(सो)वि सीसचणं पत्तो पंचपुच्ची । तेण गढजिण(णोराय पडिवोहिओ । नागदिन्नसरी विकमसंवच्छराओ ८७ वरिसे देवलोयं । तप्पट्टे परदेवसूरी विहरमाणो हत्थिणाउरे गओ । तस्थ सिट्टी तस्स चउपुत्ता । जिही पुत्तो सुरसेणो। संसारं अणिच्छंतो मूरिणा दिक्खिओ । तत्थ रहे मिच्छा पडिवोहिया । णरदेवसूरी वि उग्गविहारेण मेयणीपुरे पाओवग- मणसरिसो संथारो कओ। तत्थ घिजातीयेण तजिमो ण चलिओ। विक्कमओ १२५ बरिसे देवलोयं पत्तो । नियडवत्तीहिं देवेहि महिमा कया। तप्पट्टे सूरसेणसरी विहरमाणो चिनकूडे ठियो । तत्य चंडि[या] पडियोहिया, हिंसा वजिआ तो मंदसौर- वासी कण्णसेट्टी, तस्स तणुओ धम्मकित्ती, सो सूरीणं पिक्सिऊण सम्म पडिवन्नो । तेण विन्नविओ चउमास ठिओ । सरसेणमरिणा चित्तकूडे अणसणं कयं । विकमओ १६७ वरिसे मुरलोधे । तओ धम्मकित्ती मरी पए ठिओ, विहरमाणो उज्जयणीए गओ । तत्य सुरप्पियचिप्पो चउदहविजापारंगओ पसिद्धो, सूरीणं भणइ-'केणाणुहाणेणं मुक्सं साहिज्जइ ? कि धम्मस्स मूलं?" सरिणा कहियं-'निरवज्जज्झवसाणाणुहाणेणं जीवो सिर्व साहिज्जइ । अहिंसा धम्मस्स मूलं । सव्वे धम्मा तम्मि पइहिआ। केवलिणा एवं वुत्तं । " १० -- विविधाच्छीस महामसी ग्रह सो भणइ-'को जाणह रिसो केवली।।' सरी भणइ- अहुणा केवली इंह खित्ते पत्थि, सहवि तण्णस्थिन(?) परिविखमाइ । मष्णस्य कत्व विसवालोण गो(१) । सवण्णुक्यणे णधि सम्पदा एवं मुत्तालागा कहिा, पडिबुद्धी दिवियो। ती धम्मफित्तिसूरी विक्रमी २१० वरिसे देवदीयं पत्तो। परप्पिय सरिपए ठिओ।। तप्पट्टे धम्मयोससूरी । धम्मघोसस्स. पट्टे निव्वुइखरी । तस्स पट्टे उदितसरी । तप्पटे चंदसेहरसरी । चउरो वि दियखावण्णवो वुढ़पट्टापलीए गस्थि । चंदसेहरसरिस पट्टे सुधोसहरी । तेण अजयगढे परसेहरातियो महिहो पहियोहिमओ, दिक्खियो । रहेण रण्णा देसमिनिसो कयो । मुघोसबरी विकमओ ३९७ वरिसे देवलोयं पत्तो । सओ महिहरबरी चिहरमाणो अजयगढ़े कणयसिंहरायं पडियोहिता, मरुभूमि पत्तो । तत्य बद्दनो सावगा कया। तो वडणयरवासी कोल्लगसिटिपुचो दागपिओ पडिबुद्धो दिक्खियो। किंची जण पुल्वधरो भवद्विते पट्टे णिवेसिऊण, महिहरसूरी विक्रमी १२५ वरिसे परलोप पत्तो। दाणपियररिपट्टे मुपिचंदसरी । तस्स पट्टे दयानंदहरिणा रायगिहे पयरे देवदत्चपिराचिपुतं पणमिनं दिक्खियं । दयाणंदमुरिणा विक्मओ ४७० बरिसे देवलोयं साहि। तो धणमिचम्री महुराए पत्तो । तत्थ परचम्मपुरोहिअस्स पुत्तो सोमदेवो दिक्सिओ । दसमागाव से सपुची घणमित्तसूरी । विकमी ५१२ परिसे देवत्तं पत्ती । तओ सोमदेवारी विहरमाणो महुराए गओ । तत्व अमोवि पंचसयसरिसंघो मिलिभो । तम्मि देवदिगणी किंचि अण पुनपरी समभाविभप्पा भगइ-'अप्पविजा अहुणा वि पच्छा किं भविस्सइ ? तम्हा तुम्हाणं अणुष्णा होजा, तो पुत्थे लिहामो।' सव्वे वि तं पणि(डि)वन्नं । मुत्ताणि पुत्ये लिहियाणि । अभी परं पुत्थे ठिा विजा होहु ति काऊण भंडायारे ठाविया । तो सोमदेवसूरी विकमभो ५२५ देवलोयं गओ । पुच्चा चुच्छिन्ना । तुप्पटे गुणधरसूरी | तप्प महाणंदमरी । तेगा दिगंवररिजाणदो जियो वारण । सो दक्सिणे गो। तेणा 'तकमंजरीगंयो' को। विकमओ ६०५ परिसे दिवं गो। तुप्पट्टे समइसरी । तम्मि समए आयरियाणं मइभेमो अणेगविहो उन्भवो । सामायारो वि विसमा । अणेग- गंधा गिम्मिा। अजमुहत्यिपरंपराए सागुणो सिथिलायारं चेयवासिणो पउरवलं, सुहम्मपरंपरापाला अप्पयरा। समइसरी विहरमाणो भिन्नमालायरे गो । तत्प सोमदेवयलिपुतो इंददेवो पडिबुद्धी संजमिओ विजापारगी । समइसरी विकमओ ६७० बरिसे देवलीयं पत्तो । तप्पट्टे इंददेवखरी । तप्पटे भट्टसामी । तप्पट्टे जिनपहो आयरिभो। तेण कोर(र)टगामे महावीरचेइए पट्टा कया, तो देवापुरे चेइए । विक्रमओ ७५० वरिसे परलोयं । तप्पटे मानदेवायरिभो उम्गविहारेण विहरमाणो नड्डुलपचने []ो णिव्युहमग्गं विसेसेण परुवेइ । सम्हा लोए पीडि पाल गच्छे पावलि जिबुडायरियो ।सो जत्य, विहरइ तत्थ रोगाई ण पभइ । तेण लोया भणंति-जिगप्पहाणी एसो। सिरिमालविप्पाण] जिनघम्म भणइ सदा जाया । एगो पल्लिवालविप्पो सरवणणामो वेयपडिगो आयरियमहिम नाऊण पवज्जा पडिचन्नो । तेण समइ[ए] तक्कसत्यो णिम्मिओ। णिचुइआयरिओ विक्कमओ ७८० वरिसे देवलोय पत्तो]। सरवणायरिंओ णियुइसिस्सत्तणेण पसिद्धो । णिचुइकुलो अप्पसाहुबग्गेण विहरई। एगया रयणीए सूलरोगेण कालगओ। अवसेसा सीसा आयरियमिच्छंति को पट्टजोग्गिो] विसण्णा अच्छन्ति। तत्य कोडिगणो जसा(या णंदररी सो तत्यागो । तेण तेसिं सासणं कयं-'तुम्हाणं मज्झे सरो जुग्गो।' ते भणंति-'तुम्हे ठावेह ।' तेण ठविओ सरायरिओ । तओ साहुणा मन्निओ गच्छवुड्ढी जाया । दोषि आयरिया संगया विहरति परमपीइमणा । एगया दुक्कालो पडिओ । तेण दोवि मालवदेसे भिन्नसंघाडिया विहरति । सूरायरिओ महिंदणयरे चउमासठिओ । जयाणंदमुरी उज्जयणीए कालगओ सोचा, सरायरिओ सोपा(गा)उलो जाओ । तस्स सीसो देल्ल- महत्तरो भणइ-'ण जुत्तं ।' एवं आयरिएणावि देल्लमहत्तरं पट्टे ठविऊण अट्ठम-अट्ठमपारणले आयंविलमाढत्तो सबमणिच्चं झायमाणो उज्जयणीए अणसणं किच्चा देवलोयं गओ। तो देल्लमहत्तरायरिओ विहरमाणो भिन्नमालपुरे आगो । तत्थ सुप्पभो गाम विप्पो वेयपारगो । तस्स पुत्तो दुग्गो, सो लोयायतिओं परलोयं ण पमाणेइ । आयरिएण वोहिओ दिक्सिओ, निम्मलचरित्तो विहरइ । पुणो साणपुरे एगो सुहवइखत्तिओ । तस्स पुत्तो गहिलो । तेण आयरियाणं भणिभं-'पुत्तस्स गहिलत्तं फेडेइ तस्स सासणं देमि ।' आयरिएण भणिअं-पुत्तं दिक्खेमि । तेण पडिवन्न । तओ विजापभोगेण सुद्धो बुद्धो दिक्खिओ, सत्थपारगओ । देल्लमहत्तरेण दोवि आयरियपए ठविआ । पच्छा कालगो । दुग्गसामी गग्गायरिओ य एकया सिरिमालपुरे गया । तत्थ धनी नाम सिट्ठी जिणसावओ । तस्स गिहे सिद्धो णाम रायपुत्तो । सो गग्गरिसिआयरिएण दिक्खिओं अईववक्कबुद्धीऔ । अण्णया भणइ-'अओ परं तकं अस्थि ण वा ?' दुग्गायरिएण कहियं-'युद्धमए अस्थि ।' गंतुमाढत्तो । गग्गरिसिणा कहिअं-'मा गच्छ, सद्धाभंगो भावी । तेण कहिअं-'इत्य आगमिस्सामि ।' गो, समत्तहीणो आगो। दुग्गायरिएण बोहियो । पुणो गो। एवं पुणो पुणो गमणागमणं । तदा गग्गायरिएण वि जयाणंदमूरिपरंपरासीसो हरिभदायरिओ महत्तरो बोहमयजाणगो बुद्धिमंतो विग्णविओ-'सिद्धो ण ठाति ।' हरिभद्देण कहियं--'को वि उवाओ करिस्सामि?' सो आगओ, चोहिओ, ण ठाति । ताधे हरिभद्देण वोधणटुं 'ललिअवित्थरावित्ति' रइया तक्मंथरा । हरिभद्दो णियकालं पञ्चा गग्गायरियस्स समप्पिया । अणसणेण देवलोयं पत्तो ! तओ कालंतरेण आगओ, गग्गेण दिण्णा । सो वि लट्ठो 'अहो ! अइपंडिओ हरिभदगुरू ।' सम्मत्तं पडिवन्नो । जिणवयणे भावियप्पा उग्गतवं चरमाणो विहरड । अह दुग्गसामी विवमओ ९०२ वरिसे देवलोयं गतो । तस्स सीसो सिरिसेणो आयरियपए दिओ। गग्गायरिया वि विकमओ ९१२ वरिसे कालं गया। तप्पट्टे सिद्धायरिओ । एवं दो आयरिया विहरति । सिरिसेणो मालवं पत्तो । तत्य नोलाई धम्मदाससिद्वि- मुओ दिक्खिओ। णयरसंघकारियचेइयपइसा कया । सिद्धरिसी आयरिओ विकमओ ९६८ वरिसे देवलोयं पत्तो। तप्पट्टे धम्ममई आयरिओ । तप्पट्टे नेमसरी । तप्पटे मुबइबरी । तम्मि समए बहवो गणभेया । आयरियाणं विवाओ , विविधगष्ट्रीय पावलीसंग्रह समुडिओ, णियणियसावयसाचियाचि संगहिआ। मुबइसीसा [महि]यलविहारिणी, तम्मि एगो. दिणसेहरो सो अईवपंडिओ । मुबइमरी विषमओ ११०१ परिसे देवलोयं गयो । तप्पटे दिसरसरी उम्गविहारी महमा विहर- माणो पट्टणे गयो । तत्य महेसरजातीया पणिया पडिवोहिया । तप्पट्टे महेसरसूरी नड्डुलाइ गयो । तत्य पल्लिचालविप्पा सड्ढा पत्ता, सावंगा कया। लोएण 'पल्लिबालगच्छ'. तिणाम कयो । महेसरसूरी विक्रमओ ११५० बरिसे देवलोयं गया। तप्पट्टे देवारी तेण मुघण्णगडे पासणाहचेइयं तं पइढ़ियं । पुणो महावि(वी)रे मुवण्णकलसं ठविर्भ । सम्मि अवसरे पुग्णमियाइ गच्छा पपडिया । देवसूरी विकामओ १२२५ वरिसे देवलोयं गया। तप्पट्टे जिणदेवसूरी जोइससत्या गिम्मिा । तेण सोणगरा पडियोहिआ । जालंधरवडाकसमीदे चेइयं पइटियं । विकमओ १२७२ वरिसे कालगो। तप्पट्टे कण्णसरी । तप्पट्टे विष्णुवरी । तुप्पट्टे आमदेवमूरिणा 'कहाकोसा'दि गंया रइया । तप्पट्टे सोमतिलकसूरी । तप्पट्टे भीमदेवमरी, कोर(टगामे चेहए पइसा कया विफमओ १४०२ वरिसे । तप्पट्टे पिमलबरी मेदपाठदेसे उदयसायरपालिचेयजिणषिवं ठविमं । तप्पटे नरोलमसरी विकमो १४९१ देवलोय । तप्पट्टे साइगरी । तप्पटे हेमसरी चिंतामणिपासणाहसमरणकरणेण 'चिंतामणिय' इति णामए पसिद्धे १५१५ विकमओ ! तप्पटे हरससूरी पोसाले ठिआ। तप्पट्टे भट्टारककमलचंदो। तप्पट्टे गुणमालि(गि ?)कः। तपट्टे भ० मुन्दरचंदो वि० १६७५॥ तप्पट्टे भ० प्रभुचंदो विद्यमानो वर्तते। ॥ इति गुरुपावली चिन्तामणीया पाडिवालगच्छीयस्य । श्रीरस्तु ।। जाडानगरे ।

रघुनाथर्षि रचित नागपुरीयलुङ्कागच्छपट्टावलीप्रबन्ध । - ॥ॐ नमः ॥ श्रीसर्चकलाय(य) नमः] । अहंदनन्ताचार्योपाध्यायमुनीन्द्ररूपशिष्टाय। इष्टाय पञ्चपरमेष्ठिनेऽस्तु नित्यं नमस्तस्मै ॥१॥ प्रणिपत्य सत्यमनसा जिनपं वीरं गिरं गुरुंचापि । पट्टावलीप्रवन्धो विलिख्यते निजगणज्ञप्त्यै ॥२॥ १. इह किलावसर्पिण्या श्रीऋषभाजित-संभवाभिनन्दन-मुमति पामभ-पार्श्व-चन्द्रप्रम-सुविषि-शीतल-श्रेयांस-चामु- 'पूज्य-विमलानन्त-धर्म शान्ति कुन्थु-अर-मल्लि-मुनिसुव्रत-नमि-नेमि-पार्श्वेषु सार्वेषु त्रिलोकीदीपकेषु परिनितेषु नन्दननृपजीवो दशमदेवलोकतश्चुतो द्विजवरऋषभदत्तगृहिणी-देवानन्दोदरेऽवतीर्णः पुत्रत्वेन । तदैव देवराजेन शक्रेणावधिविज्ञातभगवदवतारेण विधिवग्रिहितहितकृत्मभुस्तयेन विमृष्टम्-'अहो ! कर्मणां विपाको यचरमतनुरपि चतुर्विंशतितमस्तीर्थकृन्महावीरनामा द्विजातिकुलेऽवातारीद्' इत्यादि सकलं यस्य चरित्रं परमपवित्रं सुवाचितमेव । तस्योत्पन्न केवलस्य भगवतः श्रीइन्द्रभूति १-अग्निभूति २-चायुभूति ३-व्यक्त ४-सुधर्म ५-मण्डित ६-मौर्यपुत्र ७-अक- म्पित ८अचलभ्रात ९ मेतार्य १०-प्रभास ११ नामान एकादश गणधरा जाताः । तेषु पथमः श्रीन्द्रभूतिगोतमगोत्रीयः गुब्बरग्रामनिवासिद्विजवरवमुभूतिसुतः समग्रोत्तमार्थपृथ्वीमातृकुक्षिशुक्तिमुक्तिसमः सप्तकरोन्नततनुः पदमगर्भगौर- वर्णः समतिसकलहृद्याविद्यागन्तिमाजिनवचनामृतपानान्तरमवे समुपात्तदक्षिचतुर्दशपूर्रचनाकरणमायतवान वित्त ?- विभवः सकलसकलसाधुमण्डलामणी[:] पञ्चाशदब्दान् गाईस्थ्यस्थितिमार त्रिंशत्समा(मां)शछद्मस्याऽवस्था भृत् । तदनु समुत्पन्नकेवलज्ञानः प्रतियोधितानेकभव्यजननिकरः श्रीवीरनिर्वाणाद् द्वादशवर्षे सिद्धः । एवं पूर्णद्वानवतिसमायुः मथमपट्टोदयाचलभानुः ॥१॥ २. तत्पट्टे पञ्चमगणभृत् सुधर्मस्वामी, श्रीवीरात् सिद्धो विंशतितमेऽन्दे ॥२॥ ३. तत्पट्टे श्रीजम्बूस्वामी श्रीवीरात् चतु-पष्टिमितेऽन्दे मुक्तः । श्रीवीरे बुद्ध चतुःपष्टिसमा यावत् केवलज्ञान- मदीपि । अथ श्रीजम्बूस्वामिनि मोक्षं गते मनःपर्यवज्ञानम् १, परमावधि २-पुलाकलब्धि ३-आहारकतनु ४-उपशम- श्रेणि ५-क्षपकश्रेणि ६-जिनकल्पित्वम् ७, परिहारविशुदि ८-सूक्ष्मसंपराय ९-यथाख्यातनामकं चेति चारित्रत्रितयम् १०- एतेाः न्युच्छिन्नाः ॥३॥ ४. तत्प? श्रीमभवप्रभुः श्रीवीरात् ७४तमेऽन्दे स्वर्गतः ॥४॥ ५. तत्पट्टे,श्रीशय्यम्भवयारिः श्रीवीराद् ९८तमेन्दे देवत्वं भाप ॥५॥ ६. तत्प? श्रीयशोभद्रसरिः श्रीचीरात शत १०० तमे वर्षे देवत्वं गतः॥६॥ ०- ७८ विविधगच्छीय पावलीसग्रह ७. तत्प? श्री सम्भूतिविजयस्वामी श्रीपीरात् १४८ तमेऽन्दे स्वरियाय ||७|| ८. तत्पढे श्रीभद्रबाहुस्वामी नियुक्तिकृत् श्रीचीरात् १७० तमे वर्षे स्वर्ग गतः । श्रीगीरात् २१४ वर्षेऽव्यक्तवादी तृतीयनियोऽभवत् ।।८।। ९. तत्पट्टे श्रीस्थूलभद्रस्वामी २१५ वर्षे स्वर्जगाम ।।९।। १०. तत्पड़े श्रीमहागिरिजिनाल्पाभ्यासरत् ॥१०॥ श्रीवीरात् २२० वर्षे शून्यवादी तुर्यो निचोऽभूत् । श्रीवीरा २२८ वर्षे रियावादी पचमो निवोऽजनि। एकस्मिन् समये क्रियाद्वयं ये मन्यन्ते ते क्रियानादिनः ॥ ११. अथ श्रीमहागिरिपट्टे श्रीमुहस्तिसरिः । येन सपतिनामा नृपः प्रतियोधित] ||१|| १२. तत्प? श्रीमुस्थितमरिः योटिकगणस्थापयिता ॥१२॥ १३. तत्प? थीइन्द्रदिन्नसरिः ॥१३॥ १४. तत्पट्टे श्रीभार्यदिन्नमरिः ॥१४॥ १५. तत्पट्टे श्रीसिंहगिरि ॥१५॥ १६. तत्पढे दशपूर्वधरः श्रीवयरस्वामी । यतो वयरीशासा प्रवृत्ता ॥१६|| १७. तत्पष्टे श्रीवत्रसेनाचार्य[:] श्रीघोरात् ४७० वर्षे स्वर्ग गतः । अस्मिन्नेव समये विक्रमादित्यो नृपोऽभूत् । कीदृशः ? श्रीजिनधर्मपारम', पुनः परदु सापनोदका, पुनः वर्णादिव्यक्ति सम्यग् विधाय पृथक् पृथक् स्वस्वकुल- मर्यादाकारको जात ॥१७॥ १८. वत्प? श्रीआर्यरोदस्वामी ॥१॥ १९. तत्पट्टे श्रीपुप्पगिरिस्वामी ॥१९॥ २०. तत्पट्टे श्रीफल्गुमित्रस्वामी ॥२०॥ २१. तत्प४ श्रीधरणगिरिस्वामी ॥२१॥ २२. तत्प? श्रीशिवभूतिस्वामी ॥२२॥ २३. तत्पट्टे आर्यभटस्वामी ॥२३॥ २४. तत्प? आर्यनक्षत्रस्वामी ॥२४॥ २५. तत्प? श्रीभार्यरक्षितस्वामी ॥२५॥ २६. तत्पष्टे श्रीनागेन्द्रसरिः ॥२६॥ २७. तपट्टे श्रीदेवगिणिक्षमाश्रमणाहाः सरिपादा यभू. 1 ते च कीदृशाः १ तदाह गाथया- सुत्तत्थरयणभरिए खम दम मद्दवगुणेहिँ सपन्ने । देवढिखमासमणे कासवगुत्ते पणिवयामि ॥ एच सप्तविंशतिपट्टा जाताः । श्रीवीरात् ९८० वर्षेषु गतेपु आगमाः पुस्तके लिसितास्तत्कारण कययन् गायामाह- ७९ नागपुरीम लाग छ पहावलि प्रबन्ध वल्लहिपुरम्मि नयरे देवढिपमुहेपा समणसंघेणा । पुत्थे आगम लिहिया नवसयअसीयाउ वीराओ। एकदा प्रस्तावे देवद्धितमाश्रमणे[न] कफोपशमाय गृहस्थगृहादेका शुण्ठीग्रन्थिरानीतो याचनया। स चाहार- समये विस्मृतिदोषान्न जग्यः। अथ प्रतिक्रमणावसरे प्रतिलेखनायां क्रियमाणायां धरातले स शुण्ठीग्रन्थिः कर्णात् पतितस्तच्छब्दं श्रुत्वा ज्ञातमहो ! शुण्ठीग्रन्थिविस्मृतः । समयानुभावो ह्ययम् , यन्मतिहीना जाताः । अधुना आगमाः कथं मुखे स्थास्यन्तीति विमृश्य वल्लभीपुरे सकलाचार्यसमुदाय मेलयित्वाऽऽगमाः पुस्तकारूढाः कृताः। पूर्व मुख- पाठः श्रुत आसीत् । पुनः आचारागीयं महापरिवानामकं सप्तममययनं साधूनां पठयमानमासीत् । तस्य पोडशाप्युद्देशा किञ्चित् कारणं विज्ञाय देवगिणिक्षमाश्रमणैर्न लेसिता अतस्ते विच्छिन्नाः ॥२७॥ २८. तत्प? श्रीचन्द्रसरित, येन संग्रहणीपकरणं रचितम् । स मलधारगच्छेऽभूत् । अतोऽग्रे चतस्रः शाखा अभूवन् । चन्द्रशाखा १, नागेन्द्रशासा २, नितिशापा ३, विद्याधरशाखा ४ चेति ॥२८॥ २९. तत्पट्टे विद्याधरशाखायां श्रीसमन्तभद्रसूरिनिर्ग्रन्थचूडामणिरिति यस्य विरुदोऽभूत् ॥२९॥ ३०. तत्पट्टे श्रीधर्मघोपसरिः पञ्चशतयतिपरिवृतो नानादेशेषु बिहरन क्रमादुज्जयिनीपार्थवचिधारायां पुरि (पर)मारवंशसुमणिश्रीजगद्देवमहाराजपुत्ररत्नं श्रीवरदेवेश्वरं नानापत्ययदर्शनपूर्वकं प्रतियोध्य श्रीजैनधर्मे स्थिरी- चकार । पुनः सप्तकुव्यसनपरिहारं कारितवान् । तत एव श्रीधर्मयोपगच्छ[:] सर्वत्र विश्रुतो जातः । तदेव च श्रीसूरदेवलघुभ्राता सांपलनामा, सोऽपि प्रतियुद्धः। त्रिंशनमोऽय पट्टः श्रीवीरशासनेऽजनि ॥३०॥ ३१. तत्पट्टे श्रीजयदेवसरिः]॥३१॥ ३२, तत्पढे श्रीविक्रमसरिः] दुष्टकुष्टादिरोगदूरीकरणेनानेकोपकारकृत् ॥३२॥ ३३. तत्पट्टे श्रीदेवानन्दमुरिः । एतस्मिन् गणाधीशे श्रीवरदेवापत्यतः सूरवंशः प्रतीतो जगति जातः, तथैव -सांपलावंशोऽपि । राज्यं तु म्लेच्छैरपहृतम् । ततो धनदसमसंपत्त्या शत्रुञ्जयादितीर्थयागाविधानेन संघपतिपदं मोतुइयवनाधीशसाहिशिरोमणिभिः प्रदचम्, सकलजैनसड्नेनापि ॥३३॥ ३४. तत्प? श्रीविद्यामभवरिः ॥३॥ ३५. तत्पट्टे श्रीनरसिंहमूरिः ॥३५॥ ३६. तत्प? श्रीसमुद्रहरिः ॥३६॥ ३७. तत्पट्टे श्रीविबुधप्रभसरिः । सर्वेऽप्येते सरयो जाग्रत्तरमत्यया वभूवुः ॥३७॥ ३८. तत्पट्टे संवत् ११२३ श्रीपरमानन्दरियतिः। तस्मिन् गुरौ जाग्रति ११३२ वर्षे सूरवंशः कुतश्चित् कर्मदोपाद तुच्छता प्राप्तः परिकरण । ततो गुरुणाऽज्ञा(ज्ञोप्तम्-'भो! यूयं नागोरनगरे वसत । तन स्थितानां भवतां महानुदयो भावी 'ति श्रुत्वा सरवंशजो वामदेवसंघपतिः सकलन एव नागोरनगरे उपितः, संवत् १२१० वर्षे मुखेन । तत्र प्रतिवर्ष महती कुलवृद्धिाः जावा । १२२१ वर्षे सुरवंशीयसंघपतिसतीदासगृहे ससाणीनाम्नी माता जाता। १२२९ वर्षे नागोरपुरादुत्थिता मोरयाणानामग्रामेऽन्तर्हिता, १२३२ वर्षे ससाणीमावा प्रकटिता । मोलासुरवंशीयस्य स्वप्ने दर्शनं दत्त्वा पुत्तलिका प्रकटीभूता । मौलाकेन देवालय[:] कारिताः ॥३वा .

विविधगच्छीय :पावली संग्रह . ३९. तत्प? श्रीजयानन्दसरि[:] ॥३९॥ ४०. तत्प? श्रीरविममयति॥४|| ४१. तत्प? सं० १९८१ श्रीउचितमरिः । ततः श्रीधर्मघोपीयगण उचितवालसंझो जातः। तत्पतियोधिता इदानी ओस्तवालसंज्ञकाः कथ्यन्ते श्रावकजनाः ॥ ४१ ।। ४२. तत्पट्टे सं० १२३५ श्रीपीटरिन 'उपसग्गहरस्तोत्र पाठेनैव श्रद्धालुटहे प्रवृचा मारी निवर्तिता । तत एक धर्मपोप(पी)या पूढवालशासा जाता । पुनस्तमतियोषिताः प्राग्वाटकाः कथ्यन्ते ॥४२॥ ४३. अयोत्तरोत्तरसंपदायां परिवर्दमानायां सूरवंशीयाः सुराणा इति कयापिता लोके । एतस्मिन् लोके पट्टालङ्करिष्णुः श्रीविमलचन्द्रमरिरभवत् ॥ ३ ॥ .४४. तत्प? थीनागदत्तयरिरभूत् । ततो धर्मयोपीया नागोरीगच्छसंज्ञाघरा जाता । तस्मसगश्वायम्-'श्रीविमलचन्द्र- सरेर्नागदत्त १- माण्डलचन्द्र २- नेमचन्द्राहा स्त्रियोऽन्तेवासिनो बभूवुस्तेषु नागदत्त: पाटणवासी श्रीश्रीमाल- ज्ञातीयोऽभूत् । स च सं० १२७८ केनापि कार्येण लवपुरीमगात् । पुनस्ततो निवर्तमानो नागोरपुरे समेतः । तत्र श्रीविमलचन्द्रसरेर्मुखाद् धम्मोपदेशमाकार्य संजातवैराग्यः सन् दीक्षां ललौ ॥१॥ अथ माण्डलचन्द्र उज्जयिनी- निवासी तातेडगोत्रीया, सोऽपि कार्यवशेन नागोरपुरे समागतः । नागदनं दीक्षितं श्रुत्वा स्वयं प्रवनाज ॥२॥ एवं द्वापपि उग्रतपसाटमपारणायामाचाम्लं कुर्वन्ती श्रुतपारगौ बहुनिमित्तझी जातौ । कियत्कालं श्रीविमलचन्द्रमुरिणा सार्द चिहत्य उज्जयिनीमागतौ । तत्र स्थितेन नागदत्तैन स्वीयगुरुन् शिथिलाचारान् दृष्ट्वा ४५ साधुभिः सह पृथग् विन) । क्रमेण प्रतिग्राम विहरताऽनेकश्रावक-श्राविका प्रतिबोधयता पुनर्नागोरपुरे समेत्य चतुर्मासी चक्रे, बहुथा धर्म- ध्यानप्रभृतिकं सत्कर्म च । ततोऽन्यगच्छीया श्रावकाः स्वीययतीन् श्रीपूज्यांश्च शिथिलान् वीक्ष्य नागदत्तान्तिके समेत्य धर्मध्यानं व्याख्यानश्रवणं च कुर्वन्ति । एवं नागोरपुरे तिष्ठति । पश्चान्माण्डलचन्द्रोऽपि एकादशयविपरितस्ततो निःसृत्य लवपुरीदेशे गतस्तन बहवो नवीनाः श्रावकाः प्रतियोधिताः । तदा धर्मघोषीया मण्डेचवालशाखा जाता। सा तु सांगतं न दृश्यते। इतथोजयिन्यां श्रीविमलचन्द्रसूरयो दिवं गताः । अन्तसमये नेमचन्द्राय निजपदवी प्रदत्ता। अय च कियत्म दिनेषु गतेपु एता प्रवृत्तिमार्ण्य थावकाः संभूय नागदत्तान्तिके समेताः। आगत्य चोक्तम्-'स्वामिन् । श्रीविमलचन्द्रवरयो दिवं गताः। नेमचन्द्राय पट्टः प्रदत्तः, परन्तु स्वामिन् ! पदयोग्यास्तु भवन्त एव सन्ति, वोधुनाऽस्माभिरनभवन्तः पट्टे स्थापयिष्यन्ते, श्रीश्रीपूज्याः करिष्यन्ते' इति मिथः समालोच्य सर्वोचममुहूर्त दृष्ट्वा श्रीश्रीमाल-मुराणा-सातेड-गान्धी-चोरवैटिकामुरासर्वश्रापकै गोरमध्ये सं० १२८५ अक्षयतृतीयादिने श्रीनाग- दत्तभ्यः पदवी दत्ता। श्रीश्रीपूज्याः कृताः। ततो नागपुरीयगणो निःसृतः। ततः प्रसिद्धि पाप । तदनु श्रीनागदत्तजितः तपस्यामभावाऽऽकृष्टचेता भवनवासी रत्नचूडामियो देवः सांनिध्यकृजातः । एकदा तद्देवमभावान्निजगुरूणां सूरिमन्त्रपटं नेमचन्द्रशरिपार्थादाकृष्ट स्वपार्थे । ततः सरिमन्त्रयुता अथ श्रीनागदत्तमुरयो यत्र गतास्तत्र नागोरीयगच्छीयाः कथापिता अनेके श्रावकाः प्रतिबोध्य स्वगच्छीयाः कृताः। तदनु बहवो यतयोऽपि नेमिचन्द्रसरि(री)न् शिथिलान् वीक्ष्य श्रीनागदत्तसरिसादान् सिपेविरे । नागोरीगच्छीयसाधवः कथापिताः। ईदृशा महामतापिनो जागरूकमागधेयाः 'सेढिस्त(तोटस्तम्भनकमविष्ठं' इति स्तोत्रकार श्रीनागदत्तसरयो जज्ञिरे ॥४४॥ जाताः।

नागपुरीयलुवागच्छ पट्टायलि प्रबन्ध n४५. तत्पट्टे श्रीधर्मसूरिः॥४५॥ । ४६. तत्प? श्रीरत्नसिंहसरिः॥४६॥ ४७. तत्पट्टे श्रीदेवेन्द्रसरिः॥४७॥ ४८. तत्पट्टे श्रीरत्नप्रभसरिः॥४८॥ ४९. तत्पटटे श्रीअमरमभसरिः॥४९॥ ५०. तत्पट्टे श्रीज्ञानचन्द्रमरिः ॥५०॥ ५१. तत्पट्टे श्रीमुनिशेखरसरिः ॥५१॥ ५२. तत्पट्टे श्रीसागरचन्द्रसरिः 'त्रैवेद्यगोष्ठी 'ग्रन्थकर्ता यवनराजसभासु लब्धजयः ॥५२॥ ५३. तत्पट्टे श्रीमलयचन्द्रसरिः ॥५३॥ ५४. तत्पट्टे श्रीविजयचन्द्रमरिः 'उपसर्गहरस्तोत्र-व्याख्या 'कृत् ॥५४॥ ५५. तत्प? यशवन्तमरिः ॥५५॥ ५६. तत्पट्टे श्रीकल्याणमरिः ॥५६|| ५७. तत्पट्टे श्रीशिवचन्द्रसरिः सं० १५२९ जातः । स च शिथिलाचारी एकमालयमाश्रित्य स्थितः, साधुव्यव- हाररहितः सूत्रसिद्धान्तवाचनामकुर्वन् रास-भासादिकं वाचयितुं लग्नः। स चैकदाऽकस्माच्छूलरोगेण मृत्युमाप ॥ ५७ ।। ५८. तस्य देवचन्द्र-माणकचन्द्रनामानौ द्वौ शिष्यावभूताम् । तयोर्मध्ये देवचन्द्रस्तु व्यसनी विजयाहिफेना- दिकर्मात्तशिथिलतरो महात्मतुल्यो जातः । अथ माणकचन्द्रो यतिव्यवहाररक्षकः श्रद्धालूनां पुरतो व्याख्यान-प्रत्याख्यानादिकं धर्मकर्म साधयति श्रावयति च भक्तामरादिस्तवान् । उभयकालं प्रतिक्रमणं करोति । अस्मिन्नवसरे माणकचन्द्रपार्श्व मुराणाडेडोजी-देवदत्तजी- वीरमजी-रयणुजी-सांडोजी-सोहिलजी-नरदासजीप्रमुखा गान्धी सदारगजी-सींचोजी-गेहोजीममुखाः पुनस्तातेडसदोजी- कमोनी-नन्दोजीप्रमुखाः पुनश्चौरवेटिका नाथोजी-चीजोजी-रूपोजी-खेमोनीपमुसाः, पुनः श्रीश्रीमालसहसकरणजी- शिवदत्तजी-श्रीकरणजीप्रमुखा आगच्छन्ति, सामायिक-पतिक्रमणादिकं च कुर्वन्ति । तस्मिन्नवसरे धर्मघोपसरीणां गच्छीयैः पौषधशालिकैः मुराणाडेडोजी-देवदत्तजीममुखान्(खा.) प्रतिभणित(ताः), भवन्तोऽस्मान् शिथिलान् दृष्ट्वा नागोरीगच्छगा जाताः। तदिदानीं तु एतेऽपि श्लथाचारा एव जाताः । अतो भवन्तोऽधुनाऽस्मत्पौपध- शालायामागच्छन्तु । तदा सुराणाममुखश्रावकैरुक्तम्-'अक्रियावतो युप्मान् वीक्ष्यास्मट्टद्धा नागोरीगच्छीया जाता। अथ को गुणो भवत्सु, यमाश्रित्य युप्मासु तिष्ठेमः ?' तदा पुनः पौपधशालिका अझथयन्-'अस्माभिर्भववृद्धाः मतिबोध्य ऊकेशाः कृताः। जगदेवपुरतोऽखिला प्रवृत्तिः श्राविता । पुनरवोच-'वयं युप्मदीयाः कुल- गुरवोऽतोऽस्मभ्यमपि अशनादिकं दीयताम् । तदा सुराणकैरवाचि-'अग्रतोऽस्माकमपि स्थाननामादि लिख्यताम् । अस्मत्तोऽशनादिकमपि गृह्यताम् ।' नतः पौपधशालिफैविवाहपट्टिकास लिसना(न)मकारि । जातस्य परिणीतस्य च लागभागमुपाददते स्म । त एवंप्रकारेण धर्मघोपीयनागोरीगच्छस्य श्रीमहावीरदेवात् ५८ पहा अभूवन् । - + ८२ विविधगष्ठीय पधवली संग्रह ५९. अयकोनषष्टितमे पट्टे श्रीश्रीमालगोत्रीयाः श्रीहीरागरवरयोऽभवन् । पिनाम मालाजी, माणिक्यदेनी जननी, नौलाईनामे जन्म। ६०. पष्टितमे पटूटे मुराणगोत्रीयाः श्रीरूपचन्द्राचार्या जाताः। पिता रयणुनी, माता शिवादे, नागोरनगरे जन्म । अथ श्रीहीरागर-रूपचन्द्रयोः कया लिख्यते- ऋद्धिस्तिमितसमृद्धं नागोरनाम नगरम् । तत्र साहिशिरोमणिमुगलान्वयः पीरोजखाननामा राज्यं करोति । तन नगरे वइयः साघुरहुकारा जना धनिनो बसन्ति । तेषु शिरोमणिः घराणादेवदत्तजीकोऽस्ति । तदीयद्धभ्राता डेडोजीकोऽस्ति । देवदत्तजीकस्य देल्हणजी १, कमादेनी २ चेति भार्याद्वयम् । आयायालयः पुगः-रयपुंजी १, -सांडोजी २-सोहिलजी ३ नामानो जाताः । एते त्रयोऽपि सुधर्माणः । शनुञ्जयस्य संघः पृथक् पृथक् निभिनिफासितस्तेन ते प्रयोऽपि भ्रातरः संघपतयः कयापिताः। द्वितीयस्या भार्यायाः सहस्समल्ला- ऽऽरुपः पुनोऽभूत् । अथ स्पर्धूनीकरप भाण्डरान १-हरचन्द्र २-रूपचन्द्र ३-कम्मो ४-पंचायण ५ नामकं पुत्रपञ्चकमननि । पन्चाप्येते सदोदरा महान्तो यहुमदा नगरेऽग्रेप्सरा अभूवन । साण्डैजीकस्य नाथू १-नापो २ -नन्दो ३-नन्हो ४ नामानयत्वारः सुता बभूवुः । सोहिलकस्य पुत्राभावेन स्य[मीपवाद् रूपचन्द्रोऽड्के गृहीतः । पश्चात् किपदिनेषु गतेषु रूपचन्द्रस्य पुष्पातिशयात् सोहिलजीपस्य पेतसीनामानोऽजनि । सहस्समल्लस्याइके पञ्चायणको दत्तः। डेढ़ोजीकस्य साह वीरम १-श्रीकरणाऽऽख्यौ २ द्वौ मृतावभूताम् । साइ चीरमस्य पुनो नरदासोऽभूत् । तस्य नागोजीनामा गुतोऽजनि । अथ सं० १५४५ रावत्रीमानीकेन योधपुरान्निर्गत्य पिठव्यमान्चलजीकृतसाहाय्येन बीकानेरपुरं स्थापितम् । सं० १५५९ माघ शुक्ल पञ्चम्यां रगणुंजीसाहो बीकानेरपुरे समेत्य रामः पार्थं गृहाणां भूमि गृहीतवान् । तत्राप्य- वासः स्थापितः । अथ सं० १५६२ श्रीचतुष्पयीय मन्दिरं वत्सापत्यैः पञ्चजनैः सह संभूय कारितम् । प्रतिष्ठादिवसे सं० १३८० वर्षे नवलपारासलपुनरानपालात्मनसाहनेमचन्द्र-वीरम दुसाउ-देवचन्द्र कान्दडादिमिः ‘प्रतिष्ठापिता मूलनायकमतिमा मण्डोवराद् वत्सापत्यैरानीता सती सम्पर स्थापिता सर्वेरेकन मिलितैरापाढशुक्लनवम्यां रावयोवीकाजीराज्ये। पश्चात् तदेवमन्दिरं सर्वपञ्चजनानाभड्के धृतम् । सं० १५७१ चतुप्पथीयमन्दिरस्यपरितो दुर्गन्धं कारितं वत्सापत्यैः मकदा कात्तिक्या पूनाया विधीपमानाया स्य[साहेनाभाणि-'अधषपमादौ पूजां विधास्यामः । तदा वत्सापत्यरुक्तम्-'मो. साहजिदस्मस्कारित मन्दिरमस्ति पुनर्मण्डोबरादस्मदानीता मुलपतिमाऽस्ति । ततोऽद्य महतीमचा वयं करिष्यामः, यूयं स्वाकर्ता स्थ'इति भणितेऽन्योऽन्यं विवादो जातः । तदा वत्सापत्यः साइकार चची मापितम्-"मी साहजित ! इयवलं तु नीनं मन्दिरं विधाप्य कर्तुमुचितम् । ततो रय[साहो मन्दिरान्निासत्य निनभवने मनस्युद्विग्नः सन् विमृशति । नव्यमन्दिरकारापणं विना महत्त्वं न तिष्ठति । द्रव्यस्य तु गणना नास्ति मम, परन्तु तत्कारिवमन्दिरोपरि स्वीयस्वं न घार्यम्, इति विमृश्य चतुप्पथीयमन्दिरे गमनं त्यक्तम् । पश्चादनेके मेलका आगताः परन्तु रयणुनीसाहो न गतः। वियदिनानन्तरं नागोरपुरे गत्वा भाव-भाहनः सद स्वीयवाकियनपूर्वकं नव्यमन्दिरकरणपतिशा स्थापिता । मुखेन तत्र तिष्ठतो स्य[साहस्य रावश्रीलूणकरणानां मसादपत्राणि समेत्तानि, तानि याचं याचं रय[साहो भाग्डैनी-कमैनीकाभ्यां विमर्श कृतवान् । सकलत्रवर्गों वीकानेरपुरे समागतो नगोजीकोऽपि, रूपचन्द्रस्तु खियं विनवाऽऽगतः । तत्र रानान्त्रिके रुक्मपञ्चशती माभृतीकृता, राजा महान् सम्मानः कृतः। कथितं च यूय महीयांसो वरीयांसः साधुकारा: स्य । अतः मुखेन वाणिज्यादिक - नागपुरीयल का गच्छपशवलि प्रबन्ध कुरुथ । यचात्मकार्य राजोचितं वाच्यं वाच्यमेव । एवं श्रीमहाराजेन सहर्षमुदिते सद्वस्त्रादिभिः सत्कृताः सर्वेऽपि । एवं तिष्ठतां तेपां आपाढचतुर्मासीपर्व समागतम् । तदानी रूपचन्द्रादिभिः सदलङ्कारभूपितैर्देवसदनं गन्तुकामै रय|साहः पृष्टः सन् इति व्याहृतवान्- 'भोः श्रूयतामस्माकं तु वत्सापत्यैः साई विवादो जातोऽस्ति । नवीनमन्दिरं कारयित्वैव जिनमन्दिरे गमनं युक्तमन्यथा न हि' इत्याकर्ण्य रूपचन्द्र-कमोजीकाभ्यामुक्तम्-'कृतं प्रसाधनम्, नोचारयामोऽधुना ।' एतेनैव प्रतिकर्मणा राज्यद्वारतो मन्दिरभूमि गृहणीमस्तदा वरम्, इत्यामृश्य प्रधानमेकं शिरोभूपणं रजतैकसहस्रं च लात्वा राज्यद्वारे गत्या राज्ञः प्राभृतीकृतम् । तदा राज्ञा श्रीलूणकरणेनाऽऽज्ञप्तम्-' भोः ! कथ्यताम्' इत्युक्ते रय[साइन विज्ञप्तम्-'महाराज ! वयं नवीनं श्रीजैनमन्दिरं कारयिष्यामस्ततो मन्दिरोचिता भूमिः पदीयताम्।' तदा राज्ञाऽभाणि-' नगरे सती भूमिभवदीया, यथेच्छं गृह्यतामस्मच्छासनमस्ति ।' ततो रय[साहेन मनोऽभिमता भूरुपाता । संवत् १५७८ विजयदशम्या दिवसे श्रीवीरवर्द्धमानस्वामिनो मन्दिरस्य पादो धृतः । ततः परं शैव्याद् रूपचन्द्र-कमोजी नगोजीका मन्दिरकार्य कारयन्ति । रजताना पञ्चविंशति सहस्राणि रय[साहेन पृथगेव रक्षितानि सन्ति । अस्मिन्नवसरे सोहिलात्मजस्य रूपचन्द्रभ्रानुः खेतसीकस्योद्वाहो नागोरपुरे मण्डितोऽस्ति । तदुपरि रयगुंजी-रूपचन्द्रजी-कमोजीका अहिपुरं गताः। भाण्डोजी-नगोजीको बीका- नगरे स्थितौ । रयगुंजीकेन नागोरपुरं गच्छता रूपचन्द्रजीकस्य कथनेन मन्दिरकार्यस्य अर्पणा नागोजीकस्य कृता । रजताना पश्चदशसहस्राणि दत्तानि । कथितं च मन्दिरकार्य शीघ्रतया कार्यम् । अथ नगोजीकः श्रीमन्दिरकृत्यं कारयति । तस्मिन् समये कोडमदेसरनिवासी सोनो नाम वैद्यो निःस्वोऽस्ति । तेनाऽऽगत्य नगोजीकं प्रति लपितम्-' एतत् कार्य मम समर्प्यताम् ' इत्युक्ते स्थानीयोऽयमिति मत्वा मन्दिरकृत्यं तद्धस्तेन कारितम् । तावता रजताना पञ्चदश सहस्राणि व्ययीभूतानि । तदा सोनाकेनोक्तम्-'पुना रजतानि प्रदीयताम् । तदा नगोजीकेनाऽभाणि-'सांप्रतं कार्यशैथिल्यं विधीयताम् , समयान्तरेण पुनः करिष्यते।' अस्मिन्नवसरे यद् वृत्तं तल्पिीक्रियते । नगरलोकेषु प्रशस्यः श्रावकशिरोरत्नं धनी सुकृती गांधीगोत्रीयः सदारगजी सींचोजीकश्च वर्तते । तयोर्मध्ये सींचोजीको महान् धर्ममर्मज्ञः शास्त्रार्थज्ञोऽस्ति । सींचोजीपाः रूपचन्द्रस्य महती स्थितिः। ऊमौ धर्मगोष्ठी कुरुतः परं सिद्धान्तपुस्तकानामलाभात् साधु-श्रावकधर्मभेदं न जानीतः। सिद्धान्तश्रवणोत्कं मनो विशेपादेतयोः सदैवास्ते । इतश्च कैश्चित् पौपधशालिकैः सिद्धान्तपुस्तकानि भूमिगृहमध्यस्थानि ज्ञात्वा जालोरनिगमनिवासिलुकाइ- लेखकमाहूय रहः संस्थाप्य पुस्तकलिखनं कारितम् । अथ पुस्तकलिखनं कुर्वता लुकासाहेन साधोराचार दृष्ट्वाय विचारं मनसि कृत्वा सहर्षभरं विमृष्टम् , धन्यं श्रीजैनशासनम् , धन्याः साधवो ये ईदृग्गुणैर्विराजमाना भवन्ति । तचरणरजसैव पापानि विलयं यान्ति, इत्यामृश्यान्यपत्राणि कृत्वा यतिभ्यः प्रच्छन्नं स्वस्मै सिद्धान्ता- ल्लिसति लेसकः सः। एवं कुर्वता सर्वग्रन्था लिखित्वा गुरुभ्यो विसृष्टाः । स्वस्यापि पार्थे रक्षिताथ । अय गुरुतो गृहगमनाऽऽज्ञा मार्थिता । तस्मिन्नवसरे रूपचन्द्रनीकेन भत्तिरियं प्राप्ता । लुकासाई प्रत्युक्तम्-'दर्यतां नः सिद्धान्तान्, लिसित्वाऽपि च दीयताम् ।' तदा लुपैसाईनावादि-'अत्र तु लिखने, यतयो विटहणन्ति, गृहे विविध गच्चीय पहावली संसह । re+ गस्वाऽखिलरादान्ताल्लिसित्या व प्रेषयामि' इत्युक्त रूपचन्द्रनीकेनः व्याहृतम्-'वचो दीयताम् ।' तदा लुकासाहोऽवदत्-'यूयमपि चची दत्य ।' तदा रूपचन्द्रेणामाणि-'वयं कीदृग् वचो दाः ततो लंका- साहोऽवदत्-'अई जाने भवद्वेश्मनि ईदृशी संपदस्ति । एतद्वो वयः सुन्दरं विद्यते । पुनर्भवतां धर्मेण परिणामा- तिरेक वीक्ष्य जानामि, भवन्तः सत्कियोद्धारं करिष्यन्ति, तन्ममापि नाम चेद् रक्ष्यं भवेत् तदाऽहं सिद्धाना लि. सित्वा प्रदद्याम् ।' इस्युदीरिते रूपचन्द्रनीकोऽयोचत्-'मम बचोऽस्ति अस्माभिवेत् नियोद्धारः कृतस्तदा वर्य नागोरगच्छीयाः स्म एव । भवतामस्माकं चेत्युभयेषां नाम रक्षिष्यामः ।' अथ लुरेसाहेन जालोरपुरान् सर्वागमकदम्बा रूपचन्द्रेभ्यः प्रहितम् । अन्यदेशेष्वपि योग्यहिणो वीक्ष्य दत्तम् । अथ रूपचन्द्रनीकः सींचोजीपार्श्वे सिद्धान्तान् शृणोत्पधीते च । एक्दा सींचोनीकेन रूपचन्द्रजीक पति कथितम्-'भवन्तश्चेत् क्रियोद्धारं कुर्युस्तदा जगति महन्नाम स्यात् । पुनः धर्मस्य महिमा महान् भवति । भवदीयां गिरमाकर्ण्य यहवी जीवाः प्रतिबुध्यन्ते, चतुर्विधश्रीसंघस्थापना च जायते । तदा रूपचन्दनीकेनोदितम्- 'खियं मतियोध्य पिनोराज्ञां च लात्वा दीक्षा कक्षीकरिष्येऽहम् । पुनर्यापद दीक्षाज्ञानं प्राप्नुयां तावच्छुदश्रावकधर्म पालयिष्यामि' इत्युदीर्य गृहं गताः सर्वे । अथ तत्क्षणकृतसरसभोजन-नागवल्लीदलचर्वण-सरसाऽऽमोदलेपन-गुलावनलेन स्नान-कस्मीरजन्मादितिलक- करणादीनि सर्वाणि त्यक्तानि रूपचन्द्रजीकेन विरक्तात्मना । एवं मति हीरागरजीकेनेयं वार्ता श्रुता, विमृष्टं च धन्यः मुराणगोत्रीयः । श्रीरूपचन्द्रोऽस्यामवस्थाया परामीडशों ऋद्धिं त्यक्त्वा दीक्षामङ्गीकरिष्यति । ततो वयमपि लास्यामो व्रतम् । एवं ज्ञात्वा रूपचन्द्रान्तिके समेतो हीरागरः श्रीश्रीमालान्वयः । अथ रूपचन्दजीफस्प द्वितीये सहाये मिलिते दीक्षाभिलापो महानेव जातः। अयैकदा रुपचन्द्रजीको गृहे पिनादिपरिवारमध्ये स्थितः सरससिद्धान्वव्याख्यानं कुर्वन्नाह लोकम्- यो दीक्षाऽनुमति दत्ते संसारे नास्ति तत्समः । निषेधयति दीक्षां यो धीहीनोऽपि न तत्समः ॥ एवमुक्ते रयणुजीका माह-दीक्षानिवारण न कार्यमिति में नियमः। भ्राता वा पुत्रो वा नारी वा य: कश्चिद् भाग्यवान् गृहारम्भसमारम्भादिकं त्यक्त्वा भाज्यामादत्ते स सुकृती ।' तस्मिन्नवसरे सोहिलसाहे स्वर्गते रूपचन्द्रेण विमृष्टमधुना गृहे स्थातव्यं न हि । पितृस्वमः समीपे गत्या कृताञ्जलिना दीक्षानुमतिथिवा । अथ पितृष्वसाऽऽह-'हे रूपचन्द्र ! भवान् भोगिभ्रमरः, श्रृणु मद्वचः । तब मुन्दरमोदकपक्वान्नसहितोदन रोचते, साधुत्वे तु शीतपिरसाद्यन्नमाप्तिः । अब अतलसादिभव्यनव्यनेपथ्यानि, तत्र तु मलिनांचधारणं शिरोलोच- फरणं भविष्यति । अत्र ताम्बूलं पुष्पसक, तत्र दन्तधावनमपि न, देहस्य शुश्रूपाऽपि न कार्या । अत्र रम्यशयनीये शयनम् । तन भूमावेच शयनोपवेशनादि । अब भव्यजलैः स्नानम्, तत्र गाने मलसंचयः। अत्र गोदुग्धादिपेयममेयम् , तत्र नित्यमुष्णजलं पास्यसि । अत्र त्वं राजेवाऽऽक्षा करोपि, तत्र तु गद्दे रहे भिक्षार्थमटनम् , कण्टकादिसहनम्' इत्यादीनि पितृष्वना बहूनि बचांसि व्याहतानि । तदा रूपचन्द्रेणोक्तम्-'पितृष्वसः! साधुभावात् कातरी विमेति, न शूरपुरुषः । एवं पितृप्वसारं प्रतियोध्याऽज्ञा गृहीता।

८५ १ नागपुरीयछ कागच्छ पावलि प्रबन्ध अर्थकदा रूपचन्द्रो नवीनमन्दिरोपरि रमणीय केलिगृहं कारयित्वा स्त्रिया युतः पर्यवोपरि निपण्णः -सन् धर्मवातों करोति; अनेन जीवेन गढ-हादिसुन्दरस्त्रियो राज्यलीलाथानेकशोऽधिगताः, परन्तु संपमं विना जीवस्य न किञ्चित् कार्य सरति । इत्थं वायतोः खिया हास्पेन भणितम्-'संयम गृहतः को वारयति ? कस्यापि चित्ते दीक्षाभिलापोऽस्ति चेत् तदा गृह्यतां संयमश्रीः' इति कथिते सत्पेव रूपचन्द्रः प्राह-'अथ गाईस्थ्ये वसनस्य में नियमोऽस्ति' इत्याकर्ण्य स्त्री विलक्षा जाता सती वभाण-' हे कान्त ! मया तु हास्यं वचो व्याहृतम् ।' तदा रूपचन्द्रेणाऽभाणि-'भामिनि ! हस्तिनां ये रदा निर्गतास्ते पश्चान्न प्रविशन्ति, तथैव ममापि नियमो नापवर्चते । पुनरस्मिन् संसारे देवलोकादिष्वनन्तशः खी-भर्तृसंबन्धः पाप्तः, तस्मात् प्रसद्य, हे सुभगे ! दीक्षानुमतिं देहि ।' इत्युक्ते तयाऽऽज्ञा प्रदत्ता । अथ रूपचन्द्रः प्रसन्नः सन् मातःकालीनं प्रतिक्रमणं कृत्वा समुदिते दिनकरे माता-पित्रोरुवाच-'भो पितरौ ! अन्यैस्तु सबैराज्ञा दचाऽस्त्येव, परं भवदाझा विशेषतः श्रेयसी गृहीतुं युज्यते । अतः सा पदीयताम् । तदा पितृभ्यामत्याग्रहं ज्ञात्वा आज्ञा प्रदत्ता । अथ रूपचन्द्रः प्रहष्टः फलितमनोरथः सन् दीक्षां लातुमुद्यतो जातः । तस्मिन्नवसरे पञ्चायणनामा स्वसहोदरः सहसमल्लाङ्कपुनो द्वितीयां स्त्रियं परिणेतुमना विवाहमकरोत् । तोरणानि बद्धानि, सधवस्त्रीभिर्मगलगीतानि गातुमारब्धानि सन्ति । तत्समये पञ्चायणजीकेन रूपचन्द्रस्य दीक्षावात श्रुता विचारितं च-'असारोऽयं संसार, धन्यो रूपचन्द्रः यो विद्यमानां संपदं रम्यां रमणीं च त्यजति । धिगस्तु मां योऽहं द्वितीयां खियं परिणेतुमना अस्मि' इत्यामृश्य विवाहस्य महं दीक्षायाः कृत्वा रूपचन्द्रान्तिके गतः । पञ्चायणजीका माह-'भो महाभाग रूपचन्द्र ! प्रवज्यासमादानमसितयोर्भवतोरहं तृतीयो भवामि, अहमपि दीक्षामादास्ये' इति पञ्चायणजीकस्य चचौ निशम्य हीरागर-रूपचन्द्राभ्यां विमृष्टम्-अहो ! शुभः सार्थों मिलितः । तनु-मनो-नयनानि विकसितानि । अस्मिन्नवसरे सिद्धान्तवचसा वर्षसहस्रद्वयस्थितिको भस्मग्रहोऽपि समुत्तीर्णः । उदितो जिनधर्मसहसकरः । श्लोकः- भस्मगृहे समुत्तीर्णः प्रयाणां जगतामिव । जिनधर्मारुणेनैषां प्रध्वस्तं ह्यान्तरं तमः ॥ अथैतस्मिन् समायोगे सं०१५८० मिते वर्षे ज्येष्ठशुक्लमविपदो दिनं दीक्षामुहूर्त शुभमागतम् । हीरागरस्य भाज्यामहोत्सवः सहसमल्ल-श्रीकरण-सहसवीर-शिवदत्तैर्मण्डितः । रूपचन्द्र-पञ्चायणकयोमहामहः साह रयगुंजीकेन मारब्धः अर्थिभ्यो दीयमानेषु वही वेला लग्ना, तावता भानुरस्तं गतः । अथ प्रातरुत्थाय खजनसंपन्धिवर्गे मिलिते प्रथमरसशोभासमुदये जाग्रति गीयमानेषु सजलजलधरगम्भीरगर्नेषु नान्दीतूर्येषु वाद्यमानेषु दीक्षां समादातुं निर्गच्छन्ति त्रयोऽपि शूरतरपुरुषाः । तस्मिन्नवसरे नगरे वार्ता विस्तृता । बहवो राजकीयाः पुरुषाः पञ्चजनाः साधुकारावागताः । साहिशिरोमणिनाऽपि स्वीयकृष्णमन्त्रीश्वर उत्सवकरणाय मेपितः। अथ योऽपि ते तिस्रः शिविका आरुह्य जयजयशब्देषु प्रवर्तमानेषु बहुषु क्षत्रियमहाजनद्विजातिममुसनागरिकेपु पादयोन्मत्म, मस्तके मुकुटं बदुवा गलेपु हारेषु नियमाणेषु श्रीसिद्धार्थमहाराजपुत्रवदतिशयेन दीयमानेषु नानादानेषु सायरसाहस्याहोद्याने समेताः। प्रथमतः शिविका हीरागरस्य, ततो रूपचन्द्रस्य, तत्पृष्ठतः पञ्चायणकस्य चलिता । क्रमेण सायरसाह- स्पानोपाने प्रयोऽपि शिविकाभ्यः समुचीर्य प्रथमालापं मुखाचार्य, आभरणादिकं सर्व समुत्तार्य च पूर्व दिगभिमुरा त्रयोऽप्युपविष्टाः। ततः स्वहस्तेन लोचं कृत्वा अहव-सिद्ध-साधून नमस्कृत्य च पञ्चमहामवरूपं सामायिकचारित्र- . ७ ८६ विविधगच्चीय पयलीस प्रह मादृतं त्रिभिः । बहुषु लोकेषु 'धन्या एते' इति शब्दं कुर्वाणेषु श्रीचन्द्रमभस्वामिनो मन्दिर समेत्य स्थिताः । अथ सिकदारश्रेष्ठिसाघुकाः सर्वैरागत्य श्रीहीरागर-रूपचन्द्रयोराचार्यपदं दरे, लङ्कासाइस्य वचः पालितम् । नागपुरीयलकाः कयापिता लोके । अर्थ सफलपर्पदि समेतायाम्- आरम्मे नस्थि दया महिलासंगेण नासए बभं । संकाए संमत०" इत्यादिजीवदयापूर्वकं उपदेशो दत्तः । काव्यद्वयम्- 'श्रुत्वोपदेशं पहुभिस्तु भव्यैरारम्भकृत्यं सततं निपिद्धम् । समाहृतं शीलमहर्घ्यरत्नं सम्यक्त्वमात्तं च निशाशनानाम् ॥ आचार्यहीरागर-रूपचन्द्रः समारते श्रीमुनिसिधर्मे । सुखं प्रवृत्तं भयभीः प्रणष्टा जातो हि सर्वत्र गुणप्रकाशः ।। अथ श्रीरूपचन्द्रसियाऽपि श्रापक्वतान्याहतानि । कियत्नु दिनेषु गतेषु श्रीहीरागरजी रूपचन्द्रजी- पंचायणजीर्वनवासः समाहतः, तृतीययामे नगरे गोचर्य आगच्छन्ति, शुद्धाहारं गृणन्ति, षट्कायजीवरक्षा कुर्वन्ति । पुनः पश्चाचारपालनं कुर्वन्ति, वने कायोत्सर्ग विदधति, गीष्मे आतापनां समादत्ते, शीतकाले शीतपरीपहं सदन्ते, उपशमरसे रक्ताः भन्यजीवान् प्रतिबोधयन्ति । समकाञ्चन प्रस्तराः पूजाऽपमानयोः समाः महोज्ज्वलतरै- गुणविराजमाना अरकेऽस्मिन् परमपुरुषवद दुष्करकियां कुर्वन्तः मुखेन संयममाराधयन्ति । अथ ते प्रयोऽपि देश-नगरादिषु विहरन्ति श्रीजिनधर्ममुद्दीपयन्तः । यते बनन्ति तत्र श्रेष्ठिप्रमुखाः सम्यक्त्वमाद्रियन्ते, केचन श्रावालम् । एवं मालबदेश-बागड-मरुघरोत्तरदेश मेदपाटदेशादिषु विचरन्तः श्रीजिनधर्ममभावनाभि केभ्यश्चित् संयम ददानाः यहून श्रावकी कुर्वन्तः नागपुरीयलकागच्छत्याचार्या इति बिरदं दधानाः सन्ति । अथैकदा पश्चायणजीको मुनिराज्ञा लात्वा कतिचिनुसाधुपरिश्तो मालपदेयो नगरकोटे समेतः । सर्वोऽपि नगरलोको हरः । भस्तोकलोकोपरि धर्मोपदेशदानादिना उपकारः कृतः। तन तिष्ठतस्तस्य श्रीपश्चायणजीसाधो शरीरे असाध्यो रोग उत्पन्नः । तदा अनशनं कृत्वा स्वर्ग मातः । अध स. १५८५ रयगुंजीकेनाऽऽत्महितं ज्ञात्वा श्रीहीरागरसरिपाचे दीक्षा कक्षीकृताऽहिपुरे । बहून् दिवसान पञ्चाचारदं संयम प्रतिपाल्पान्तसमपे अनशनं कृतम् । तस्मिन् समये श्रीरूपचन्द्रारिभिः रिणस्तम्भपुर- कोहस्थित रपणुंजीकेनानशन गृहीतं श्रुत्वा नागोरपुरे समेत्य स्वपिनुराराधनारतानि पूर्णानि कृतानि। पञ्चाशदिनानि संस्तारकमाराध्य शुभायानेन कालं कृत्वा चैमानिको देवो जातः । अय श्रीहीरागर-रूपचन्द्रसूरयोऽनेक्साधुसहिता नागोरपुराद् विहत्य सं० १५८६ वीकानेरे समायावास्तदा तन चौरवेटिकः श्रीचन्द्रनामा लाक्षाधीशोऽस्ति । तेन बहुसाधुजनानां सुखेन संपमयानानिहाय स्वकीया कोष्ठिका चतुर्मासीस्थित्यै दत्ता । अथ व्याख्यानं श्रोतुं पोपध-अतिक्रमणादिकं यतुं च परवंशीयाचौरयेटिका अन्ये वह समागच्छन्ति, तस्मिन्नवसरे कमलगच्छीययतयः शिथिलाचारा अभूवन् । ततस्तेभ्यो विरक्ताः सन्त एव गुणरञ्जिताय चौरवेटिवाः सर्वे नागोरीलङ्कामच्छीया जाताः । कोष्टिकोपाश्रयनिमित्तं दत्ता । अथ चतुर्मास्यनन्तरं विहत्य क्रमेणोजयिनी पुरीं गताः। .

नागपुरीयल का गच्छ पट्टा व लि प्रबन्ध - - तत्रान्त्यसमयं मत्वा श्रीहीरागरसरिभिरेकविंशतिदिनमनशनं साधयित्वा मृत्वा वैमानिकसूरत्वं प्रपेदे । पदवी १९-समा भुक्ता ॥ ५९॥ अथ श्रीरूपचन्द्रसूरय उंजयिनीतो विहत्य क्रमान्महिमनगरे पादा अवधारिताः । तत्र चातुर्मासिकस्थिति- करणाय कोटिधनाधीशगोवर्द्धननामकथेष्ठिपार्श्वतः स्थानं मार्गितम् । ततः परीक्षां क तथाहास्यपूर्वकं श्रेष्ठी माह-'भो महाभागाः! स्वातुं योग्या वसतिस्तु ,काचिन्नास्ति परन्तस्मदीयकोष्ठिकाऽभिमुखचतुर्दारकेऽस्मद्रथ- चुक्राणि पतितानि सन्ति तेषामुपरि स्थीयतां सुखेन । तदाऽऽचार्यश्रीरूपचन्दैन्ये तु साधयोऽन्यत्र चतुर्मासे(स्यर्थ) पेपिताः । स्वयं देपागरमुनिनाऽन्वितैः रथचक्रोपर्युपविश्य मासोपवासं प्रत्याख्याय धर्मध्यानपरायणैः स्थितम् । श्रेष्ठिना रहो लोका रक्षिताः, परं ते तु महान्त उत्तमपुरुषाः, मेरुखद् धर्मध्यानेञ्चला स्थितदृष्टयः । श्रेष्ठिपार्श्व तैलोकः सोऽपि धर्मध्यानादिको व्यतिकरस्तेषां निरूपितः । t- अथ श्रेष्ठी तदीयगुणश्रवणेन जागरुकभव्यपरिणामः सन् प्रातरुत्थायाऽऽगत्य प्रदक्षिणात्रयदानपूर्वकं नत्वा पादयोनिपत्य कृताञ्जलिः सन्नित्युवाच-' हे स्वामिन् ! असारेऽस्मिन् संसारे भवन्तो धन्याः शुक्रियोद्धारकाः, अघापचारकास्तारकाच सन्ति । न दृश्यतेऽस्मिन् समये भवादृशः कश्चित् तपोधनेषु मुख्यः । अहं पापीयानस्मि, - येन भवतां कष्टं दत्तम् । महानविनयो वः कृतः। तदिदानी स्वामिन् ! भवन्तः कृपां कृत्वाऽन्यस्मिन् स्थाने समीचीने तष्ठन्तु तदा श्रीश्रीरूपचन्द्राचार्यरुक्तम्-'हे महानुभाव ! एको मासक्षमणस्त्वत्रैव करिष्यते । पश्चात् स्पर्शनानुरूपं विधास्यते ।' एवं कुर्वतां मासक्षमणः पूर्णों जातः । पारणार्थ द्वये चलिताः । पारणाय एकैकमुत्कलं गृहं रक्षितमासीत् । तदा श्रीरूपचन्द्राचार्यस्तु गृहस्थैकगृहमकपाटं वीक्ष्य प्रवेशः कृतस्तत्र गृहस्थेनाऽभाणि- * महाभाग ! अधुना तृतीययामे अन्य आहारस्तु न सांप्रतम् । प्रासुका मासाः पतिताः सन्ति । ते यदीच्छाऽस्ति तदा गृह्यताम् ।' अथ तैरपि शुद्धाहारनिरीक्षणपूर्व गृहीताः। अथ देपागरसाधुरेकस्य मिथ्यात्विनो गृहस्थस्य गृहमकपाटं विलोक्य प्रविष्टः । तदा तत्रैका स्त्री प्राह-'अधुनाऽशनस्य का वेला ? रक्षान्विता रब्यास्थाली कस्मैचित् कार्याय भृत्वा धृताऽस्ति । यदीच्छाऽस्ति तदेयं गृह्यताम् ।' तदा शुद्धां मत्वा सा गृहीता । अथ द्वयेऽपि स्थाने पारणां विधायाष्टमं गृहीतम् । तस्यैव श्रेष्ठिन आज्ञां लात्वा तस्यामेव कोष्ठिकायां मइत्यस्मॅिश्रतुःद्वारके स्थिताः । अथ श्रेष्ठी वभाण- हे स्वामिन् ! अद्यमभृति मनो-चाक-कायैयं मे गुरवोऽहं भवदीयः श्रावकोऽस्मि ।' अथ देशान्तरेषु श्रेष्ठिना निजवणिकपुत्रानन्यानपि स्त्रीयसंवन्धिप्रमुखान् पर्णानि दायं दायं निवेदिताः समाचाराः- 'यदेवे मुनयः सत्याः सक्रियापालका पन्यतराच, कियद्गुणवर्णना लिख्यते ?। ये केचन तेषां चरणारविन्द- युगलं नमस्यन्ति तेषां जन्म फलेग्रहि । वयं त्वेतेषां श्रावका जाताः स्मः' इतीदृशान् समाचारान् वाचं वाचं बहवो लोकाः श्रावका भातास्तत्रत्या अपि यहवः। तथैव जालोरे कोचरान्वया वेलापत्याः, कालूनिवासिनो भाण्डागारिणः, जेसलमेरौ वोहराभिजनाः, कृष्णगढे व्याघ्रचाराः चौधरी-चोपडाः, भहनयरे नाहरगोत्रीया महीपाला- पत्याः साहपदधारिणः वैद्याः। वापणा ललवाणी-~णापत्याः, वरढीया-नाहटाप्रमुखा अनेकज्ञातीया ऊकेशवंशीया अगोत्रकाच नागोरीलङ्कागणीया जाताः। एवमेकलक्षमशीतिसहस्राधिकं गृहाणां प्रतियोधितम् । पूर्णभद्रदेवोऽपि सांनिध्यकृज्जातः॥ अथ श्रीरूपचन्द्राचार्याः स्वान्त्यसमयं ज्ञावा पञ्चविंशतिदिनानि यावदनशनं विधाय महिमपुरे एवाकालं कृत्वा वैमानिकपुरत्वं प्रपेदिरे । सं० १५८० तः २१ वर्षान् यावद् पदं मुक्तम् ।। ६० ।। " ८८ . विविध गष्ठीय पदिय वली संग्रह ॥ ६१. तत्प? श्रीदेपागरसूरयो बभूवुस्ते परीक्षफवंशीयाः कोटडानिगमे पेतसीनामा जनकः, धनवती जननी, नागोरपुरे चारित्रं, पदमपि तवातम् । संवत् १६१६ चित्रकूटमहादुर्गे कावडियान्वयो भारमल्लो धनी तपा- गणीयोऽभूत् । तेन श्रीदेपागरवरीणामभिधानं शुद्भक्रियाधारकत्वं च श्रुतम् । तदादित एव तद्गुणरजितचेतस्कोऽवदत् लोका- धन्यो देसागरस्वामी प्रदीपो जैनशासने । एप एवं गुरुमेंऽस्ति धन्योऽहं तन्निदेशकृत् ।। इति भावनया शुद्धात्माऽभूद् भारमलः । तस्मिन्नवसरे वत्रत्यो भामानामा नाइटोऽस्ति । तद्गृहे पुण्ययोगाद् दक्षिणावर्तः शङ्खः मादुरभूत् । वत्सांनिध्याद् गृहेऽप्टादश कोटयो धनस्य प्रकटीमवन्ति । अय षण्मासी- भान्ते शङ्खदेवेन भामाकस्य स्वप्ने दर्शनं दत्तं निवेदितं च-'भो भामासाह ! त्वं शृणु, तब भाया उदरे पुनीत्वेन फचिनीयः समेतोऽस्ति । कावडियाभारमल्लमार्योदरे मुकृती कश्चन जीवः मुतोऽवतीर्णोऽस्ति । ततस्तत्पुण्य- प्रेरितो भारमल्लकावडियागारे गमिष्यामि' इत्यामे मामाकोऽवदत्-एवं मा याहि, यथाऽहं करोमि तथा गच्छ' इत्युक्ते तेन 'आम' इति भणितम् । अथाइर्मुखे जाते सर्वः स्वजनसहितः शहरानजागरुकीकृतानेफलोकः स्वर्णस्थाले दक्षिणावर्तशहर निधायातिमहर्यबस्त्रेणाच्छाध मामाको भारमल्लभवनाभिमुसमागतः । तमायान्त- मालोक्य सानन्दं सादरं भारमल्लोऽभिमुखं मिलितः, पृष्टं च-'क्मिागमनमयोजन, मोच्यताम्' इत्युदिते भामाकोऽवर 'वर्येभ्य! सभ्यसंवन्धिन् ! मम पुत्री तब च पुनो भविष्यति, तयोः संबन्धं कर्नु श्रीफलस्याने इममद्भुतमाहात्म्यं शड्यं ददामि' इति निशम्य समुत्पन्नपरमामोदो बहुदानमानपूर्वकमग्रहीत् । भारमल: गृहकोष्ठकान्तः समभ्यर्च्य सम्यक् चन्दनचतुफिकोपरि संस्थाप्य संस्मृती देवस्तेनाप्टादशकोटिधनं तन प्रकटितम् । अत्र महती कीर्तिविस्तृता। एकदा तर बनान्तरुच्चैमण्डपाधो धर्मध्यानं विदधत् साधुगुणग्रामाभिरामः श्रीदेपागरस्वामी शुद्धतपोधनो भारमल्लेन दृप्टो विधिवद् वन्दितश्च । शुद्धधर्मोपदेशामृतं पीतं श्रवणाभ्याम् । अतिप्रसन्नेन भारमल्लेन विमृष्टमहो ! महान माग्योदयो मे प्रकटिती यदीगगुणगौरवो दृष्टः । सर्वेऽर्था मे सेत्स्यन्ति । तदा भारमल्लोऽन्ये च बहवः श्रावका जाता नागोरीलुकागणीयाः। अथ भारमलस्य भामानामकमुतोऽजनि । महान् महः कृतः। सान दानादिनाऽभिजनमनोरयाः पूरिताः । अन्येऽपि ताराचन्द्रादयः पुना अभूवन् । तर भामासाह-वाराचन्दी विश्रुतौ जाती । स्वगच्छागेण वहनो जनाः सगणे समानीताः । पुनः श्रीराणानीतोऽमात्यपदं लात्वा बलिनी जातो । ताराचन्द्रेण सादडीनाम नगरं स्थापितम् । सर्वन पौषधशालादिकानि स्थानानि कारितानि । स्थाने स्थाने, पुरे पुरे, ग्रामे ग्रामे बहुननेभ्यो धनं दायं दायं स्वमणीयाः कृताः । श्रीनागोरीलड्कागणोऽतिख्यातिमाप । पुन मासाहेन दिगम्बरमतगा नरसिंघपौराः स्वगणे समानीताः । बहु स्वं दचा १७०० गृहाणि तेपामात्मीयानि कृतानि । भिण्डरकादिपुरेषु तदा च जातं श्रावरगृहाणां चतुरशीतिसहस्राधिकं लक्षमेकम् । पुनः देपागरसूरेविनय- राज्ये लुदिहानानिगमनिवासी श्रीचन्द्रनामा बम्भवतुरशीतिकोटिवित्तेश्वरोऽभूत् । तस्य सौदरः मुरीभूतः प्रत्यई वणिकपुनाणां लेखानितस्ततो दत्ते, येन पहुधनोत्पत्तिर्भवति । स चैकदा नायातस्तदा श्रीचन्द्रेण पृष्टम्, 'भ्रावर! ह्या कथं नागतः ?' तदा सुरेणोक्तम्-'भ्रातर् ! यो महाविदेहे माचि श्रीसीमन्धरनिनं नन्तुमिन्द्रोऽगाव- , नागपुरीयल वाग छ पहावलि प्रबन्ध तेन सहाहमपि, गतोऽभुवम् । व्याख्यानान्ते शक्रेणोक्तम्-'प्रभो ! भरतक्षेत्रेऽपि कचित् सत्यः साधुर्वर्तते नवा' इति पृष्टे प्रभुणाऽभाणि- हरे ! अस्मिन् समये देपरगरनामा मुनिपोऽस्ति, स चतुर्थारकमुनिसमसंयमभृत् ।' इमां प्रवृत्तिमाकर्ण्य श्रीचन्देनोक्तम्, 'स क्ब सांप्रतमस्ति ? ' देवः पाह-सन्मानकपुरे तपस्यति' इत्याकर्ण्य हप्टचेतसा श्रीचन्देन स्वमानुपः प्रेपितस्तत्रत्यश्राद्धानामिति कथापितं च भवद्भिर्देपागरस्वामिनं नत्वा मदीया- नागमनप्रार्थना कार्या । ततस्तैः पुराद् बहिर्देवमण्डपे स्थिता दृष्टाः प्रणताश्च मक्त्या विज्ञप्ताः। तदा श्रीसरिभिरुक्तम्-'ज्ञास्यते साधुधर्मोऽस्ति । ततो द्वि-विष्वन्देषु गतेषु श्रीश्रीपूज्या लुदिहानाबाह्योद्याने निरवद्यमदेशे तपस्यन्तः स्थिताः। तदा प्राग्ज्ञापितेनाऽऽरामिकेण पनिका श्रीचन्द्राय दत्ता । सोऽपि सत्वरं नग्नपद एवागत्य ववन्दे, तुष्टाव च-'धन्योऽसि स्वामिन् ! भवादृशः संयमी कोऽपि सांगतं नास्ति । तत्र श्रीसरिभिरुपदेशा- मृतपानेन तच्छ्वसी तोपिते । तस्मिन्नेवावसरे श्रीचन्दमुतया धर्मकुमरीत्याख्यया त्यक्तश्वभूरादिसंवन्धया ज्ञाततत्त्वया गृहे स्थितयैव श्रावकाचारपालनपश्या सर्वांगमश्रवणावगतपरमार्थया तत्राऽऽगत्य विधिवद् गुरवोऽभिवन्दिताः। गुरुवचनसुधारसमुहितया दीक्षाकरणाय चेतो विशोध्य स्वयमेव तत्साक्षिकं चरणमातम् । तिमभिः धर्मसखीभिः सार्दै लोके महान् धर्मप्रकाशोऽजनि यशश्च । अस्मिन् गणे सैव प्रवर्तिनी प्रथमाऽभूत् । तयापि द्वादशक्रोशी- परिमण्डलविहारः कृतो नाधिकः । एवं श्रीदेपागरस्वामिना धर्मोद्योतं विधायाऽऽचार्य पदं नक्षमित २७ समाः परिभुज्य मेडतानगरेऽनशनं कृत्वा २१ दिनान्ते स्वर्गतिः प्राप्ताः ॥ ६१ ॥ ६२. तत्प? श्रीवैरागरस्वामी दिदीपे श्रीमालीज्ञातिः, भल्लराजः पिता, रत्नवत्ती जननी, नागोरपुरे जन्म, चारित्रं पदं च तत्रैव, एकोनविंशति १९ समा: पदवीभोगः । मेडतानगरे ११ दिनान्यनशनं कृत्वा देवत्वं माय ॥६२॥ ६३. तत्पर्ट श्रीवस्तुपालोऽलञ्चके । कडवाणीयागोत्रे महाराजः पिता, हानाम्नी माता, नागोरपुरे जन्म, चरणं पदं च नागोरपुरे, वर्षसप्तकं पदवी भुक्ता । सप्तविंशति २७ दिनान्यनशनं कृत्वा मेडतानगरे " स्वर्जगाम ॥ ३॥ ६४. तदीयपट्टपरिष्कर्ता श्रीकल्याणसरिर्जातः । शिवदासः पिता सराणागोत्रीयः, कुशलानाम प्रसः, राजलदे- सरनिगमे जन्म, बीकानेरे चारित्रं पदं च नागोरपुरे जातम् । चतुर्विंशतिसमाः भुक्तम्, लवपुर्या दिनाष्टकम- नशनं देवलोकालङ्कारतामियायाय सुरिर्महाप्रतापः, शतं शिष्याणां हस्तदीक्षितानामजनि जागरूकमत्ययो गच्छवृद्धिकत् ॥ ६४ ॥ ६५. तत्पट्टे भैरवाचार्यो दिदीपे सूरवंशजः । तेजसीजी पिता तस्य लक्ष्मीनाम्नी प्रसूरभूत् ।। जन्मचारित्रपहश्रीकृत्यं नागोरपूर्वरे । दादशादी तु सूरित्वे दिग्दिनानशनं कृतम् ।। सोजतायपुरे प्राप देवत्वं शुद्धसंयमः। पञ्चषष्टितमः मूरिः क्रियाद् वृद्धि गणे पराम् ।। १२ विविधमकीय पावलीसै प्रह यस्य धर्मराज्येऽनेके व्यतिकराः शुमा जाता । नागोरपुरे गहिलडागोत्रीया हीरानन्दप्रमृतयो निःस्त्री मेडतापुरे श्रीगुरुवन्दनाय गताः । निशीथे भैरवारिहितसानियतः श्रीश्रीपूज्यैरेतेपामृद्धि दिवची दत्तम् । तेऽपि तस्य गुरोः कृपया पूर्वाशानगरेषु महेभ्या भूताः। तदनु तदपस्पैः दिल्लीधरानगन्छेष्ठिपदं महाराजपदं न प्राप्तम् । फसेरतो वितीर्गकोटिधनैरिद तु प्रसिद्धतरमाख्यानम्, नती न विस्तुत्य लिखितम् ॥ ६५ ॥ ६६. तत्पट्टे श्रीनेमिदासमरिरभवद् विजयी घरपश्यः, रायचन्द्रः पिता, रामना जननी, जन्म-चारित्रे बीकानेरपुरे, पदमहिपुरे गृहीतम् । तत् १७ समा मुक्तम् । दिनसप्तकानशनेन उदयपुरे सरिताः ॥ ६६ ॥ ६७. तत्पर्ट शोभयामास श्रीभासफरणाचार्यः । सरवंशीयः लयमल्लः पिता, वारांनीति मावनाम, मेडतापुरे जन्म, चारितं पदं च नागोरपुरे । एकदा श्रीश्रीपूज्या नागोरनगरे स्थिताः सन्ति । तस्मिन्नरसरे भागचन्दनामा सूरवंश्यः स्वपिठ-पिव्य-भ्रातृ-भ्रातृज-पुत्रादिपरिष्टतो व्यार पानं शृण्वन्नुपाश्रये स्वस्थाने उपविष्टोऽस्ति । तदानीं यशोदाकुक्षिजास्तस्य पञ्चापि पुस्तन स्थिताः सन्ति । चत्वारस्तु मुता अग्रजाः स्वोचितस्थाने निपल्याः । पञ्चमोऽङ्गनः सदारनामा निजपितृव्याङ्के उपविष्टः। महस्यां श्रीसहपर्पदि व्याख्याने जायमाने बालस्वभावत्वात् सदारतः पितच्याकात्यायोपपट्ट ' युद्धमूनिसमुपयेशनभू इयमिति मणिते-'अई यतिरेव भूत्वा निपेत्स्यामि अत्र' इत्युक्तं सदाग्गेण सर्वेषु मौनमाधाय स्थितेषु । श्रीश्रीपूज्यास्ततो विहत्य मेडतापुरे गतास्तदनु तेन सदारङ्गेण गृहे मानादीना पुरतो निनसंघमग्रहणाशयः भोक्तः, अत्याग्रहेण तदानामादाय श्रीमीनाकार्य च कृतमुमतिसद्गेन सदारगेणामिवयन त्यक्त्वा महामहपूर्वकं दीक्षाशीचक्रे । नवमवर्षे तत्समृत्येवाऽध्येतुं लग्नः, वर्षपञ्चक एवानुचानो जातः । ततः पन्चदशाब्दिकेन पप्ठतपोभिग्रदो गृहीतः, महान् तपस्त्री विकृति- त्यागी शृद्धाशयो विज्ञश्चेति मत्वाऽऽचार्यरन्त्यसमये श्रीवर्द्धमाननाम्नोऽन्तेयासिनो गणभृत्पदानावसरे प्रोक्तम्- 'मवताऽऽत्मीयपढें सदारगाय देयम्' इति । १८ समाः पदं भुक्तम् । दिननवकानशनकरणेन श्रीश्रीपूज्यैयाँमाप्ता सं० १७२४ फाल्गुने ॥ ६७ ॥ ६८. तदीयपट्टे बर्द्धमानाचार्या । वैद्यचंदपः सूरमपिता, जननी लाइमदेजीति, जापासरे जन्म, चारित- महिपुरे, पदमपि तत्रैव संवत् १७२५ माघशुयल्पन्धम्याम् । तदनन्तरं संच १७३० वर्षे वैशाखशुक्लदशम्या श्रीवीकानेरे पादा अवधारिताः श्रीश्रीपूज्यैः। तत्र महान् महः संजातः, श्रीफलैः प्रभावना कृता । श्रीदेव- गुर्वाज्ञाचिन्तामणिविभूषितमस्तकैः श्रावकैः महती प्रतिष्ठा व्यधायि । ततोऽनेमक्षेत्रेषु विहृत्य पुनीकानेरे समेत्य स्वान्त्यसमयवेदिभिर्दिनसप्तकानशनमाश्रित्य निदियोऽलन्चक्रे वर्षाप्टक्पदभोगिभिः श्रीश्रीपूज्यैः ॥ ६८ ॥ ६९. श्रीवर्द्धमानाचार्यसुरुदेवश्चास्मरद्भिः श्रीसदारनसूयो निनपट्टे स्यापिताः । तब मइति महे विधीयमाने श्रावकैरनेफया मिलिते स्व-परगणीये श्रीसंथे महान् प्रमोदः सर्वेषां भवन्नस्ति । तस्मिन्नवसरे सचियायदेवीयात्रा- गतेनिजसंपदभरावगणितनिनिवहैः हिंसारकोटनियासिभि ब्रह्मचागोत्रीयैः कुहाडापरपयायः शालिभद्रोत्तम- चन्द्रादिभिः सभ्यपरिकरान्वितैः प्रमानागोरनगरे समेतैर्विज्ञातपदवीमहे मुनावगुरुतरगुरुभक्त्या साधर्मिकवास- त्यादिसकृतकृत्यकृतये रजतानां चतुःसहस्री व्ययिता । तर तेपो यशो-नामकर्मपकतेन्दयो महानानि । तत्रत्यैः सूरवश्यैरपि तैः सह स्वसंबन्धः कुतोऽजागेतनविस्तरस्तु नहटः । ततः सदारगरयः किन्चिन् कालं तत्र 4 नागपुरीय लुड्का गच्छ पट्टावलि प्रबन्ध स्थित्वाऽन्यदेशेषु विहरन्तः श्रीमत्पातसाहिना मार्गे मिलितेनाऽभिवन्दिताः स्तुताश्च । सत्मत्ययदर्शनेन' तत्र वीकानेरस्वामिना श्रीअनोपसिंहमहाराजेनापि निजहृद्गतसुतचिन्तानिवर्तनपूर्णविस्मितचेतसाऽभ्यर्चिताः सत्कृताः। कथितं च श्रीश्रीपूज्यपादा:-' भवन्त उत्तमपुरुषाः सर्वविद्याविशारदाः श्रेयांसो वरीयांसोऽखिलजगतः "पूज्या अस्माकं विशेषतो गुरवः प्रतीक्ष्याश्च' इत्यादिशिष्टाचारपूर्वकम् । ततोऽनोपसिंहात्मजमहाराजसुजाणसिंहेनाऽपि तथैव मानिताः। . श्रीश्रीपूज्या लवपुरी गताः । तत्रापि, वइयो लोका रजिनाः । संवत् १७६० धर्मक्षेत्रे चतुर्मासी कृता । तत्र पातसाहिमान्याऽभात्यमुद्दता शीतलदासेन शिविराद् द्वितीयचतुर्मासीकरणविज्ञप्तिलेखः प्रहितः, परं न तत्र स्थिताः । ततो विहत्य पानीयमस्थद्रङ्गेऽग्रेतनैः श्रावहुविज्ञप्तिकरणपूर्वकं स्थापिताः। तत्रामात्यशीतलदासेन खानमहाशयद्वाविंशत्या युतेन दर्शनमकारि । जन्तुत्राणोपदेशः सर्वैराकर्णितः, उररीकृतश्च दयाधर्मों 'बहुलाभः समुपार्जितः । ततो योगिनीपुरे श्राद्धा रञ्जिताः विशदतरसिद्धान्तसदर्थसार्थप्रकाशनेन । ततोऽर्गलापुरे पातिसाहिश्यालकस्य सत्मत्ययदर्शनपूर्वकं जीवदयोपदेशेन मानसं रजितम् । यावस्थितिकालं जीवदया महाखानेन प्रवर्तिता सर्वत्र नगरे । ततो विहृत्य संवत् १७६६ पुनर्वीकानेरपुरे पूर्वगोपुरे पादा अवधारिताः। तत्र कतिचिद् दिनानि शुक्रास्तादिमलिनदिवसत्वात् श्रावकैः पटमण्डपे रम्यतरे स्थापिताः । तत्र नगरप्रवेशोत्सववार्तायां जायमानायां श्रावकाः संभूय विचारयन्ति स्म, ईदृशः प्रवेशः कार्यते यादृक् केनापि न कृतः कारितो वा पूर्वम् । इतश्च साहचिमलदासेन गत्वा राज्यद्वारे भणितम्-'महाराज! भवदीयपूर्वजैर्ये मानिता अर्चिता वन्दितास्तेऽत्र श्रीश्रीपूज्यचरणाः समेताः सन्ति । ततो राजशार्दूलैः सनातनः पन्था ज्ञायते एवास्माकम् । श्रीमद्भदन्तपुङ्गवाः पूर्वगोपुरादेव बादित्रवादनादिकया महत्या विच्छित्या प्रविशन्ति। सांपतं केचन यतिपाशाः किश्चित् काचपिच्च्यं चिदधति । ततः का चश्वेतसो वृत्तिस्तदाद्रियताम्' इति भापिते श्रीमहाराजैरचादि-एते तु श्रीश्रीपूज्या अस्मदीया एव, :ततस्तान् को रुणद्धि ? श्रीश्रीपूज्यानां यादृशः प्रवेशमहामहो भवति, तादृश एव विधीयताम् , किमत्रान्यत्, सर्वाऽपि राज्यद्धिरादीयताम्। सति राजशासने को निवारयिता?।' ततो हस्ति-तुरगादि-वाद्य-ध्वज-पटहाऽऽतोधादि समादाय राजकीयसचिवः समेतः कथयितुं लग्नः-'श्रीमहाराजेनाऽऽज्ञप्तमस्ति, अन्याऽपि या काचिद् भवतां मर्यादा भवेत् तदनु- रूपमपि क्रियताम् ।' ततः प्रतोलीप्रयं कारितम् । तत्र चैका सूरवंश्यानाम्, परा चौरवेटिकानाम्, तृतीया समेपां श्रद्धालूनाम् । एवं प्रतोलीत्रयपदमण्डनपटोलिकाप्रभृतिसर्वमहकृत्यं कृतम् । स्वावदातोयोतितपूर्ववरयो युगमधानश्रीसदारङ्गसरयः सम्मुखाऽऽगतास्तोकलोकसमुत्कीर्त्यमानविशदतरकुन्दकुमुदवान्धवमयूखसमानानेकमवेक- शम-दम-संयमप्रकारा निजचरणगतिमृदुतापहसितराजहंस-सुरगज-मत्तटपमा मुनिटपभाः शनैः शनैः स्थानीये स्थानीये यावताऽनेकयतियुताः प्रविशन्ति तावता खरतर-कमलगणयः संघटन्ते । राटीमन्त्रः मारब्धः, पूर्व परसरं, पश्चात् पुरलोकाग्रतो भणन्ति- अस्मदीया एवातोयनिवहा अत्र ध्वनन्ति, नेतरेपां' इति । पाहुः- 'एतद् वाद्यादिकं राजकीयं मुतरां यतयः वादयन्तु, परं शङ्ख झल्लरिकां च श्रीचिन्तामणि-श्रीमहावीरयोरेव सप्तविंशति २७ महल्लेषु वादयिष्यन्ति, अन्यस्य न।' नागोरीलङ्कागीयान् प्रति परानपि तपागौरादीन माहुः-'मवतां शङ्ख न कुत्रापि वादयितुं दाः' तदा श्रीभदन्तपादैरुक्तम्-'अस्मदग्रेऽस्मदीय एवं .

-- विविधगलीय' पहावली संग्रह शङ्सो ध्वनिष्यति । अन्यं वयमपि नेच्छामः।' तदा पुनपादेशः' समेत:- शीघ्रतया मवेशी विधीयताम् यया तपो न पराभवति पौरान् । तदाऽमात्पेन शवन्यतिकरो निवेदितो नृपाये-'शङ्खस्स्थवश्यमेव युज्यतेऽत्र ।' तस्मिन् समये श्रीलक्ष्मीनारायणमसादमादाय नयनाख्यः शङ्मा समेतः। तं वीक्ष्य लालाणीज्यासउदयचन्द्र- मुंधडाचतुर्भुजाभ्यामुक्तम्-' एप शङ्लविवादो पतिभिः क्रियते, ततः कथं निवर्तेत। एते बदन्ति १३ महल्लेषु श्रीचिन्तामणिभगवतः शहखी वाद्यतेऽन्येषु १५ महावीरदेवस्य, एतयोस्तु शङ्खादिकं श्रीश्रीपूज्या अपि नोरीकुर्वन्ति, अतो श्रीलक्ष्मीनारायणजीकस्य शहाँ ध्वन्यते, एवं विवादो याति ।' अन्यथा नेत्यामृश्योपप- मागत्य विज्ञसम्-'श्रीमहाराज ! अधुना तु प्रवेशोत्सवे श्रीलक्ष्मीनारायणजीकस्य शसः प्रदीयते तदा वरम् , अग्रे श्रीमहाराजानामिच्छा । तदा श्रीमहाराजेन नयनाहः शङ्खध्मा दृष्टः, कथितं च-'भो नयन ! त्वं श्रीठाकुरजीकानां सेवकोऽसि, वयं निर्दिशामः श्रीश्रीपूज्यसदारङ्गनीकानां प्रवेशमहे श्रीठाकुरजीकानां शक्टो ध्वन्यताम्।' ततस्तमादाय स तत्र गतः, महताडम्बरेण प्रवेशमहः कारितः। नालिकेराणां प्रभावना कुवा । श्रीफलानां नवशती लग्ना। तदनु येनाडम्बरेण प्रवेशोत्सवो जातस्तेनैवाडम्वरेण सुराणामुन्दरदासवेश्मनि मासक्षमणानशनं गृहीतम् । तत आपाउनुर्मास्यागमेन्ययतिविदितशविवाद मला पूज्यश्रीस्वामिदासजी-रामसिंहजी- भेमराजनी-कुशलचन्दजीनामः प्रवस्यतिमिः श्रीराजसमीपे गत्या भणितम्-'भो महाराजाधिराजाः । श्रीश्री- पूज्यैर्वः शुभाशीर्वचांसि दत्तानि सन्ति, पुनः शशविवाद निवर्त्तनोदन्तश्च कथापितः, सोऽधुना विमृश्य क्रियताम् । किञ्च खरतरकमलगणीयश्रावसैः पूर्व या स्थितिः कृता मोक्ता सा पृच्छयताम् । के नेयं स्थितिः कृताऽ. भूत, तत् कलादिकं चेत् स्यात् तदा दर्यताम् ।' पुनः पूज्यस्त्रामिदासरवादि-'महाराजाधिराज ! सं० १६४० यावत् तु कोऽपि विवादो नासीत्, कोऽपि कस्यापि न वर्ननमकरोत् । ततो विश्वविश्वम्भराभारसमुद्धरणादि- बराहकल्पश्रीरायसिंहजीराज्ये कर्मचन्द्रवत्सापत्येन सीमा स्वीययतीनां कृताऽन्येषां शहो झल्लरिका च न बाद्यते । ततः श्रीसुरसिंहजीराज्ये ठाकुरसीनामवैधेन स्वगणीयशङ्कादिस्थितिः स्थापिताऽधुनाऽऽनय । एप विमृश्य विधेयः।' सतः श्रीमहासजेन द्वायपि समाकार्य पृष्टौ-" भवदीया स्थितिः केन बद्धा कथं चान्येपां शड्सवादनं निरस्तम् ।' तैर्भणितम्-'महाराज ! अस्माकं राज्यद्वारतोऽयमारोपः कृतः, यव १३ महल्लेषु खरतरगणीयानां श्रीचिन्तामणि- राड्सः १४ महल्लेषु श्रीमहावीरदेवस्य शङ्को इलरिका च प्रवर्तते । एवमुक्ते श्रीमहाराजेन भणितम्-'य आरोपः कृतोऽस्ति भवतोयोस्तत् कर्गलादिकं दर्शनीयम् ।' तदा तैरुदितम्-'कर्गलादिकं तु तावन्नास्ति किं दर्शयामः?' श्रीमहाराजेनाऽभाणि-' भवतां राज्यद्वारकर्गलं बिना द्वयेषां आरोपः कया रीत्या जातः ।' पुनः श्रीमहाराजेन पृष्टम्-'अन्येषां वनितो यः शड्सः तस्य श्रीमहाराजकृतं लिखन-पठनादिकं भवेत, तदपि दर्यताम्, अन्यथा केन हेतुनाऽभूनन्यगणीयान् वर्जयन्ति यतयः ?' तदा तैाहृतम्-' हे श्रीमहारान! वैद्यवत्सापत्यराबधीचीकाजीकस्य सार्थे समेता अभूवन् , तेन हेतुना तैर्निजनिनसीमाऽकारि । अग्रे देवपादानां मनसि यद् भवेत् तथा विधेयम् ।' तदा श्रीमहाराणितम्--'वयं श्रीमभुणा यथावन्नीतिमवर्जनार्थ राजानः कृताः स्मः' तदरीतेरेच मचिर्भविष्यति । एवमुक्ता मनसि विमृष्टम् । एतेपामपि रीतिः प्रस्थापितैव पूर्वनादे- शाधिकारिविहितत्वात् । अयेतेषां श्रीश्रीपूज्यानां समधिका कर्तुमुचितेति परामश्योक्तम्-'यूयं सप्तविंशतिमहल्लेषु सार्वदिकी स्थितिः क्रियताम्, एतेषां तु अद्यप्रभृत्येव श्रीलक्ष्मीनारायणजीकानां शड्सः सर्वत्र पुरे वादयिष्यति, पतदीयश्राद्धानामपि इपंचांपने श्रीठाकुरजीकानामेव शद्सी वादयिष्यति । श्रीचिन्तामणि-महावीरयो , - नागपुरी यलु काम छपशवलि प्रबन्ध ९५ शवस्यानवकाशः । एनं शङ्ख निराकुर्वन् जनः श्रीठाकुरजीकेभ्यो विमुखो भविष्यति पुनः श्रीराज्यद्वारस्या- पराधी ।' एवं भणित्वा शङ्मा विसृष्ट इति । अथ श्रीश्रीपूज्यरष्टत्रिंशदूवर्षपर्यन्तं धर्मराज्यं कृतम्, तत्र चतुर्विशतिशिष्याः जाताः। तन्नामानि यथा- श्रीगोपालनीका अटकमहादुर्गे महान्तस्तपस्विनोऽटकजले जनं क्षुभ्यन्तं पदस्पर्शादपस्तं नदीजलेनापि, यच्छासनं मानितम् १। श्रीआनन्दरामजीका वडनगरे स्थिता अभूवन् २। भागुजीका तोलीयासरे , प्रसिद्धाः३। महेशजीका मालवदेशे प्रसिद्धाः ४। वपतमल्लजीका महान्तो मला अजितसिंहनृपमल्लमानमर्दकाः ५। चत्वारो रामसिंहनीका आसन् । एकेतु केशवश्याः कोचरगोत्रीया उदयसिंहजीकैः समं मिलिताः ६। द्वितीयावहुराणाभिजना मालपदेशे। तृतीयाः खतिज्ञातीया मालवे ८१ तुर्या रामसिंहजीका भीमनी- अमीचन्द्रनीकानां गुरवः ९ । श्रीमुखानन्दजीका बीदासरस्थ लेपु कृतानशना दिवं ययुः, ये ते तपस्विनः १०॥ श्रीउदयसिंहनीका यैर्गणभेदः कृतः ११। श्रीजगजीवनदासजीका मूलपदाधिपाः १२। द्वौ शिष्यावादिमौ धर्मचन्द्र-गुणपालाख्यो सिद्धान्तं पठन्तौ देवोपसर्गननितमहाकष्टौ सम्यगाराधनामाधाय दिवं गतौ १३-१४ । मेमरानजी-रायसिंहजीको भैरवमन्त्राराधको भ्रमन्तौ निशि चलितो, विड्लिप्तपदी सूको जातौ १६ । विधिचन्द्रजीका दीक्षातोऽशीतिदिनेज्वेव स्वर्गताः शूलरोगेण १७ । वस्तपालजी-हीराजी-धनाजीकास्तपसा मसिद्धा:१८-१९। सेरजलकृतनियमाग्रीष्मे उपसर्गसहनं कृत्वा सं० १७६५ वर्षे पञ्चत्वमापुः२० वैद्यवंश्या ज्ञानजीका आगमज्ञा महान्तो मालवदेशे दुष्टडाकिन्या गृहीताः । कृतानेकोपचारा अपि न पटवो जाताः २१ । मालपदेशे भारजीकाः प्रसिद्धाः २२ । लक्षमीका आनन्दरामजीसार्थ एव विहृतवन्तः २३ । दुर्गदासातास्तु मालवे सार्थाद् भ्रष्टादरिनिपाते न केनापि लक्षिताः २४ । एतेषां मध्यान्नवदेशेषु विद्यमानेषु श्रीश्रीपूज्य उदयसिंहस्य तपस्विनः शिष्यस्य प्रोक्तम्-'भोः! पदं गृहाण ' इत्युक्ते उदयसिंहजीकैरभाणि-मम पदेन कोऽर्थः ? सर्वगुणसंपन्नाः प्रज्ञाला जीवनदासनीकाः सन्ति, तेभ्यः प्रदीयताम् , अहं तन्निदेशकद् भविष्यामि' इत्युक्त पुनरप्याग्रहेणोक्तम्-'पदं गृहाण, पधान्न किञ्चित् कर्तुमुचितम् । तैः पदादानं नोरीकृतम् । सदा श्रीमरिशार्दूलैरवसरं विज्ञाय श्रीसंघप्ताक्षिपमन्यगणीयानां च पुरतः श्रीमद्भदन्तपदं श्रीजगज्जीवनदासजीकेभ्यो लिखित्वा प्रदत्तम् । स्वयमाराधनां दिनदशकं यावत् साधयित्वा 'त्रिदिवं मण्डयामासुः सं० १७७२ एवं पट्टानि ६९ जातानि ॥६९॥ ७०. तस्मिन्नन्दे शिक्षापत्राणि नागपुरीयसुराणासहस्समल्लादिभिलेख लेखं यतिभ्यः प्रदत्तानि । श्रीउदयसिंह- जीका यतित्रयान्विता चीकानेरे स्थिता भाचिमूरयस्तु बहुमुनिपरिताः श्रीनागोरपुरे स्थिताः । तत्र पट्टमुहूर्त वर्षद्वयं यावच्छुद्धं नागतम् । ततः समीचीने मुहूर्ते श्रीश्रीपूज्याचार्याः जगजीवनदासकाः पहुं भूपयामासुः । चोरवेटिकगोत्रीयः वीरपालजी पितॄनाम, जनन्या नाम रतनादेवीति, पहिहारानिगमे जनुचारित्रं मेडतापुरे, पदमहिपुरे। अथ नागोरनगरे घोडापत्यैः कथञ्चित् किञ्चिन्यूनरागैचौरवेटिकादियुतर्भाण्डापत्यमराणागोत्रीयाणां लेखं दत्त्वा कयापितम्, मदत्सदयसिंहेषु स्थितेषु अप्रत्यैः। श्राद्धैरेतेऽभिषिक्तास्तन्नामास्माकं धं जातम् ।

९५ 1 " विविध गच्छीय पहावली संग्रह अय बीकानेरे, स्थिता अपि उदयसिंहजीकाः पठे स्थाप्या इति मुहुर्मुहुः समाचारे प्रवर्त्तमाने श्रीश्रीपूज्य कयापितम्-'अद्यापि किमपि गतं नास्ति । अनाऽऽगत्य पदमादीयताम्, यूयं, महान्तः । तदोदयसिंहजी- कैरभाणि-मम पदादानेच्छा न हि!' ततस्तवत्यैर्माण्डापत्यादिभिरत्याग्रहेण मसद्य पदे स्थापिताः । बीकानेरे एव । एवं गणस्फोटे जातेऽपि श्रीमूलपटेश्वरसांनिध्याद बहुपतिततिपरिताः श्रीनगजीवनदासनी- नामवेया वरभागधेयाः सर्वत्र देशे देशे क्षेत्रे क्षेत्रे श्राद्धैरन्याणीयाः संपेनाऽपि सम्मानिताः पूजिताच, नागोरपुराद् विहृत्य भनेरकोट्टे पादा अवधारिताः । तत्र लघीयानपि वाघासाहः मभावनां मही कृतवान् । ग्रन्थगौरवमयान्नान विस्वरतो लिख्यते सर्वसंवन्धः । ततः सरस्वतीपत्तने हिंसारकोटे बुढलाडानिगमे टोहणा-सुनाम-सन्मानक-रोपड वनवाडा-राहो-जालन्धर- गुजरात-रावलपिण्डीमभृतिषु क्षेत्रेषु विहृत्य सम्यम् लवपुर्या प्रवेशोत्सवे जायमाने मुगलयवनः कश्चिद् युवा तत्रत्यस्थायुकमुतोऽकस्मात् समूच्छितो लोकमत इति संभावितः । सशोकेपु लोकेषु जातेपु नमस्कृति- जलेन सर्वलन्धिवितानसंस्मारिते पूर्वगणधरैः श्रीश्रीपूज्यपादैः सिक्ता, प्रत्यागवचेतनः सन् परमभक्तो महामहिमानमकरोत् १॥ ततो अनेकेषु क्षेत्रेषु विहरभिः श्रीश्रीपूज्यचरणैर्ये प्रत्याया दर्शितास्तान् को लिखितुं शक्नोति ? न वा चामलम् । पुनस्टकधुनी पतिता । समर्थनामसाइकस्य बहुपण्यभृता नौस्तारिवा। तत्रत्यैर्हिन्दूयवनैः प्रभावनाऽधिका चक्रे २ ॥ ततो नित्य समागच्छद्भिः सरिपादै रोपडनगरे वृद्धश्रावि- काया गलत्कुष्ठमपहृतम् ३॥ पुनः सरस्वतीपचने विपमदुःकालभीतैर्यवनैर्महम्मदहुसेनस्योक्तम्-' वणिग्- जनरेते यत्यो रौरवानिवन्धनं दृष्टयभावार्थ रक्षिता अत्र' इत्याफर्ण्य दुर्मतिना तेन लोकानां पुरतः प्रोक्तम्- 'एतेनातथेद् गमिप्यन्ति तदाई करनाइमेनान् निष्कासपिप्यामि' इति वार्ता कस्यापि मुखाच्छुत्वा निःमतिमपुग्यपण्यशालिभिर्लोकोत्तरातिशयधरैः श्रीश्रीपूज्यैर्भणितम्-'भो यतयः! अतः शीघ्रतया विहर्तव्यम् , अतः स्थानाद् द्वि-प्वहस्सु यदा भावि तत् स एव दुर्धीः इक्षिप्यति' इत्युक्त्वा विहां लग्नाः । तदा श्राद्धैरुक्तम्-'स्वामिन् ! वयमपि भवत्पदयुगमाश्रिताश्चलामः । एवं कथनेन श्रीसरयस्तत्रैव स्थापिताः । अथ तृतीये दिवसे झोरडयवनैः मातरेवागत्य यहिनिर्गतो महम्मदहुसेनः शिरसश्मश्रुकचग्राहं मुवि निपात्य मृशं कुहितः, श्वसन्मुक्तः । ततो ज्ञातवृतान्तेन तस्पिना हसनपांमहाशयेनातीवनिर्भत्सितः-'रेपुत्रपाश ! वाहशोऽधमो मत्कुले कथं जात:१ अस्मत्पूज्यपूज्यानामविनयो वाचाऽपि कृतो दुःखात्र, केवलमस्मरमाणास्तुदन्ति ४ ॥. तत एव किमधिकलपितेन । तत्र हसनपानवायेन बहुभक्तिपूर्वकमाराधिताः । तदुक्तम्- दर्शितप्रत्ययं को हि नाराधयति सत्तमम् । ध्वस्तध्वान्तं प्रगे दीप्तं रवि को न निपेवते? ।। इति ५॥ ततो भटनेरमार्गेऽतितृषाकुलाः करमवाइकाः सद्गुरुचरणस्मरणपरायणास्तस्क्षणमदृष्टचरममृतोपमं पानीयमपिवन ६॥ ततः संवत् १७८४ वर्षे श्रीवीकानेरनगरे पादा अवधारिताः। तत्र प्रत्यर्थिद्विपपञ्चा- ननेन श्रीमनाणसिंहमहाराजेन विशेषतः सन्मानिताः, दृष्टमत्ययैः तत्रत्यैः सर्वैरपि राजकीयपुरुषः समेत्य स्व-पर पक्षामिमतजनमनोहारी महान् मवेशोत्सवोऽकारि। एका प्रतोली चोरवेटिकैः कृता, अपरा सूरवंशीयानामिति . नागपुरीयल का गच्छ पावलि प्रबन्ध ९५ अतोलीद्वयमण्डनं चित्रकदेव जातम् । श्रीफलैः प्रभावना व्यधायि हवेगात् परवशैरिव श्राद्धः। सुराणा- भुकनदासजीकानां गृहे क्षमाश्रमणैः विहरण कृतम् । द्वितीयदिवसे आचार्यमाणनाथजीकैरागत्य श्रीमहाराज- कृतदण्डबन्नमस्कृतिनिवेदनमकारि तदा श्रीश्रीपूज्यचरणैरपि यानि कानिचिद् वचनानि विहितानि तानि श्रीमन्महाराजकुञ्जरैः मतीतानि सांदृष्टिकतया वृत्तानि ७ ।। तत्र पुरे श्रीश्रीपूज्यपादैश्चतुर्मासद्वितपी कृता । ततो मालबादिजनपदेषु विहृत्य सिंहादु धेनुमोचनं, निर्धन- श्राद्धस्य सुतस्य धनवरमदानं, देवलीयानगरे कीटिकामकोटकभूयस्त्वनिराकरणं, भटेवराशिशुकस्य नगरमुख्यतामति- पादनप्रभृतयोऽनेकेश्वदातनिकरा जाताः । पुनर्मन्दसोरनगरेऽतीवनिःस्वताविदितसततसद्भक्तिभावितवेतस्कखजभृत आदलवेगकस्य शुद्धवचोऽमृतपानानन्तरमुक्तम्-'वं याहीतः, सकलमालयानामाधिपत्यभृद् भविष्यसि इत्याकम्ययोज- यिन्यभिमुखं चलतस्तस्याने के महाराष्ट्रिकाश्वारोहा मिलिताः। तं प्रति गदितम्-' त्वमस्मत्पुरोगमो भूत्वा ग्राम-पुरादीनि दर्शय, यथाऽस्मन्नवीनराज्यसंस्था समीचीना जायेत ।' तदा तेन 'आम' इति भणित्वा तदुक्तं कृतम् । पश्चान्नान्दासाडिवकस्य दाक्षिणात्यानामधिपस्य मिलितः, तेनोजयिनी-मन्दसोरेन्दोरनाम्नां बृहत्पुराणामा- धिपत्यं प्रददे। ततः सोऽतिवलवान् प्रतापी यवनोऽपि हिन्दुकवत् परमभक्तो जातः। विकृतित्यागरूपया तपःश्रिया शरीरमपि 'सखेदं जातम् । वर्षद्वयं सत्र स्थित्वा, ततो यथाकथञ्चिद् बीकानेरपुरे समेताः । तनुशक्तेरभावेन प्रवेशनमहोऽपि न कृतः । चतुर्मासचनुष्कमकारि । ततो विहितानशनैः संवत् १८१६ आश्विनकृष्णसप्तम्याः मातर्दिनपञ्चकानन्तरं स्वर्गों मण्डितः ४४ समाः पदभोगः ॥७॥ ७१. तत्प? श्रीभोजराजसूरयो वोहित्यान्वयाः, जीवराजः पिता, कुशलांजी जननी, रहासरे जन्म, फतेपुरे चारित्रम् , पदं तु श्रीनागोरपुरे संवत् १८१६ फाल्गुनमासे । मालवानीरति पश्चाशयतिपरिटताश्चिरं विहृत्य पेडतापुरे दिनत्रिकानशनमाप्तस्वर्गा अभूवन् । वर्षपट्कं पदभुक्तिः । एपा सप्तगुरुभ्रातरोऽभवन् । श्रीलालजी १- जयसिंहजी २- जयराजजी ३- श्रीभोजराजजी ४- श्रीलद्धराजजी ५- श्रीदूदाजी ६- श्रीरामचन्द्रजी ७- क्षेमचन्द्रजीदानामधेया अप्टौ शिष्याः श्रीमजगज्जीवनदासमरीणां दिग्गना इव [आसन] ।। ७१ ॥ ७२. तत्पटोदयकारिणः श्रीहर्पचन्द्रप्रयः। नवलपागोत्रे पिता भोपतनजीनामा, माता भक्तादेवीति, करणुयामे जनुः, सोझतपुरे चारित्रम्, श्रीनागोरपुरे पदमापुः संवत् १८२३ वैशाखशुक्ल ६ दिने । पदे वर्ष १९ भुक्तम् , श्रीहर्पचन्द्रसरेविजयति धर्मराज्ये महान्तोऽमी यतयः संघाटकवरी: तथाहि, अभयराजनी-अमीचन्द्रजी-लद्धराजजी- उदयचन्द्रनी-गुलावचन्द्रजी-मेघराजनी-हीरानन्दजी-आनन्दरामजीमभृतयो मरुधरदेशसमीपवासिनो मालवदेशे मनसा- रामजी-नैणसीजीपमुखा ३७। उदीच्या सेटूनी-जयराजज़ी-दरजीजी-मंगूजी-हरसंहायजी-दरचन्दजीममुखाः ११ ॥ एपां वैदुष्यं यादृशं जातं तादृशमत्र युगे न कस्यापि भूतम् । 'विस्तरस्तु मत्कृतपद्यवन्धपट्टावलीतो ज्ञेयः । सपाद- जयपुरे विहितानशना दिनत्रयं दिवं भूपयामासुः ॥ ७२ ॥ ७३. तत्पट्टे श्रीश्रीपूज्याचार्याः श्रीश्रीलक्ष्मीचन्दनीनामानः । कोठारीगोत्रे जीवरानजीनामा पिता, जयरदेवी जननी, नवहरनिगमे जन्म, चारित्रमहिपुरे, स्वहस्तेन पदमपि तदैव । सं० १८४२ अपादकृष्ण २ दिने त चतुर्मासद्वयी कृता। व्याख्यान-प्रत्याख्यानादि सम्यग् धर्मकर्म प्रवर्तितम् । श्रीसंघमनोरयाः सफलोता तो नावटनिगमे श्रीसंवेन महोत्सवेन चतुर्मासी कारिता । ततो जोनावरनगरे पञ्चविंशतियतिसमन्विता वर्षद्वयं . '- विविधगच्छी य पधवलीसंग्रह। स्थिताः । ततोऽन्यानेकक्षेत्राणि निनचरणन्यासेन पूतानि विदितानि । ततो : बीकानेरनगरादिषु अभूतशुद्धमाव- भावितान्तःकरणश्रद्धालूनां मनांसि प्रमोदमेदुराणि विधाय श्रीमुनाम-पटयाला-ऽम्बाला-धर्मक्षेत्र रोपड-हुसयारपुरा- जेजी-जगदुरूप्य-कृष्णापुरा-पंडेलश्रावकमण्डितयविममुखानेकच्छेकजनमनस्म अमन्दानन्दमुत्पादयन्तोऽमृतसरोलवपुरी- शालिकोबदभ्रक्षेत्रेषु विदरन्तः श्रीश्रीपूज्याः पुनः सर्वदिचारुचूरुनिगमादिपु चतुर्मास्यनेकशी विधाय हितकृद्धर्मपरूपणा दिल्ली-लक्ष्मणपुरी काशी-पाटलीपुत्र-मम्दावादादिस्थानेषु संस्थित्य च पुनदिल्लीनगरे चतुर्मासीद्वयमकार्पः। ततो भूरिपरिकरान्विताः मुश्रावकमाभृतीकृतशिविकोतमारूदा भरतपुरगोदनिगमादिषु विहत्य कोटानगरादिषु विहस्य च दाक्षिणात्यमहिता मालवादि-जनपदेषु च बहुशो शेपश्रीसंघमनोविनोदाय संस्थितास्ततः श्रीनागोर- नगरमविष्टाय (2) जालोर-जेसलमेरु-श्रीसंधेन यहुविज्ञप्तिपत्राणि संपेप्याऽऽहूताः श्रीमद्भदन्तपुङ्गवाः मुखेन शुद्धमुकृतोपदेशकादम्बिन्याऽस्तोकलोफहृद्गतरौरवतामपनीतवन्तः । तवो विहृत्य फलवदिपुरीमभूतिक्षेत्रेषु चिरं चतुरचेचश्चमत्कारकारिविहारकरणेन झझूरिनामे समेताः । राजाधिराजमहाराजश्रीरत्नसिंहदेवैः प्रज्ञालभबई- मुनिवंशामरण-श्रीगुरुचरणवनजभजनाऽवाप्तपरमानन्दमहपिरचनाविशयमीणितचित्तै रजतयष्टिशृद्धलेखन-प्रेपणपूर्वक बहु विज्ञप्य श्रीबीकानेरपुरे पुरातनपृथ्वीराजकारितप्रवेशोत्सवानुसारिणा महामहेन प्रवेशिताः, विशेषतो भक्तियुक्तिः कृता कारिता च, एकविंशतिपतिमधुपातिचरणाः मुखेनान्दत्रयमस्थुः। इतचोदीच्ययावत्क्षेत्र श्रीसंघेन सुनामस्थपतिरघुपति पति कथापितम्-' वगुवत्सरबन्दमतीतं श्रीश्रीपूज्यपाददर्शनामृतसप्णमस्मदीय- मानसं संवर्वति, तेनाशु विज्ञप्तिपनाणि संमेप्य श्रीसूरयः समाकार्याः। तदा तेनापि संदेशहराश्च । अस्मिन्नवसरे स्थैयौदार्य गाम्भीर्यादिगुणावलीसमुपार्जितहीराट्टहासराकासनाशकरनिकरसोदरयशास्तोमैः श्रीधीपूज्यचरणैः सद्यः प्रसव समागमदलद्वारा ज्ञापितमागमनम् । ततो चीकानेरान्महतो महेन विद्वत्य नवहरनिगम पुनानै राजपुरारोढीबुढलाडादिषु समागत्य मुनामनगरे चतुर्मासी कृता । तर लद्वराजजीकानां मपौरशिप्यो रघु- नाथपिः शिष्यचतुष्टययुतः, अपरेऽपि विंशतिसाधवस्तैः परिवृताः श्रीमद्भदन्तपुङ्गवाः सदागमावली सम्यग् व्याख्यान- वन्तः। ततो विहत्य सन्माना-धर्मक्षेत्र-सटौराम्बलायन्डभोपड-नालागढ-लुदिहाणाममुखक्षेत्राणि स्पर्शनापूतानि विधाय च संवत् १८९० वर्षे श्रीमत्पटयालानामनि पूटभेदने श्रावकैचतुर्मासी कारिताऽस्ति । तत्र मुखेन धर्मकर्म भवर्तयन्तः विराजन्ते ते, सर्वजनपदेषु पूर्ववद् विजयमानाश्चिरं जीयानुः कोटिदीपालिकाः । एतदाशया श्रीसंघः प्रवर्चताम् । पट्टावल्या प्रबन्धोऽयं रघुनाथर्षिणा द्रुतम् । लिखितः सुगमः शोध्यो विशेष पुनर्मुदा ॥ इति श्रीमद्विभुपचनशकश्रीमुनिराजसिंहचरणाजपचरीकरघुनार्षिणा पट्टावलीमबन्धो रचितः॥ सं० १९८९ असाढ मुदि २ श्री॥ वहुशच्छदा विसृष्टाः अञ्चलगच्छ-अपरनाम विधिपक्षगच्छ-पट्टावली। (विस्तृतवर्णनरूपा) १. श्रीमहावीरपाटें श्रीगौतमस्वामी थया । तेह. पुंठई कोई शिष्य नहीं, तिवारें गुरुभाई श्रीमुधर्मास्वामिने पाट आपीउ । वर्ष १०० आयु भोगव्यो, ते प्रथम पाट जाणवो । २. बीजे पार्ट जंबुस्वामी जाणवा । ते मोक्ष गया तिवारें केवलज्ञान आदे दश वोल विच्छेद गया, ते कहे छे-मनःपर्यवज्ञान १, परमावधिज्ञान २, पुलाकनामालब्धि ३, आहारकलब्धि ४, क्षायिक समकित ५, उपशान्तमोह-इग्यारमु गुणठाणु ६, जिनकल्पिविहार ७, परिहारविशुद्धिचारित्र-मूक्ष्मसंपरायचारित्र- यथाख्यातचारित्र ८, केवलज्ञान ९, मोक्षमार्ग १० । ए बीजो पाट । ३. श्रीजे पाटे प्रभवस्वामी थया । ४. चउथे पाटे सिज्जभवसरि थया । ५. पांचमे पाटे यशोभद्रसरि थया । ६. छठे पाटें संभूतिविजय थया। ७. सातमे पाटे श्रीभद्रबाहु थया। ८. आठमे पाटे श्रीथुलभद्रस्वामी थया । ९. नवमे पाटे श्रीमहागिरिसरि थया । १०. दशमें पाटे श्रीमुहस्थितसरि यया । ११. इग्यारमें पाटे श्रीइन्द्रदिन्नसरि थया । कोटिगण । वली वीजुं चोख्द । कोटिवार सरिमन्त्रनो जाप कीधो तेणे 'कोटिकगण' कहेवाणो। ए इग्यारमो पाट जाणवो। १२. बारमे पाटे श्रीदिनसरि थया । १३. तेरमे पाटे श्रीसिंहगिरि यया । १४. चउदमे पाटे श्रीवासरि यया; 'वपरीशाखा' थइ । १५. पंदरमे पाटे श्रीवयरसेण यया। १६. सोलमे पाटे श्रीचन्द्ररि यया, चंद्र समान तेहथी 'चन्द्रकुल' ।

९ ८ विविध मच्छी य पद्या वली संग्रह १७. सत्तरमे पाटे श्रीसामंतभद्रसरि थया । १८. अहारमे पाटे श्रीद्धसरि थया। १९. ओगणीसमे पाटे श्रीप्रद्योतनमरि थया । २०. वीसमे पाटे श्रीमानदेवसरि थया । २१. एकवीसमे पाटे श्रीमानतुंगमरि यया । 'नमिऊण' जोडी शासननी उन्नति पयारी। २२. बागीसमे पाटे वीरसरि थया । २३. वीसमे पाटे श्रीजयदेवसरि थया । २४. चउवीसमे पाटे श्रीदेवाणयरि थया । २५. पचवीसमे पाटे श्रीविक्रमसूरि यया । २६. छवीसमे पाटे श्रीनरसिंहमूरि यया । २७. सत्याचीसमे पाटे श्रीसमुद्रसरि थया । २८. अठावीसमे पाटे श्रीमानदेवमरि थया । २९. ओगणत्रीसमें पाटे श्रीहरिभद्रसरि थया । ३०. त्रीसमे पाटे श्रीविबुधमभसरि थया। ३१. एकत्रीसमे पाटे श्रीजयानदसरि यया । ३२. बत्रीसमे पाटे श्रीवीरभद्रसरि थया । ३३. तेत्रीसमे पाटे श्रीयशोदेवसरि थया । ३४. चोत्रीसमे पाटे श्रीविमलचन्द्रमरि थया । ३५. पात्रीसमे पाटे श्रीउद्योतनसरि थया । ३६. छत्रीसमे पाटे श्रीसर्वदेवरि थया। तणे वडतले सौरपद आपोउ । वडगच्छ धोजु नाम । ३७. साडनीस पाटे पादेवसरि थया । ३८. आडत्रीसमे पाटे श्रीउदयममसरि थया । ३९. ओगणचालिसमे पाटे श्रीप्रमाणदमूरि यया, जेहने संघे प्रतिष्टाइ नाणां घणा खरच्या, नाणावालगच्छ। । पाचमुं नाम थयु। ४०. चालिसमे पाटे श्रीधर्मचन्द्रसरि थया। ४१. एकतालिसमे पाटे श्रीमुमणचन्द्रमरि यया। ४२. चैतालिसमें पाटे श्रीगुणचन्द्रसरि थया। ४३. नेतालिसमे पाटे श्रीविजयममसरि थया ।'

अञ्चल गच्छ-सपर नाम विधिवक्षगच्छ-पट्टावलि - , ४४. चिम्मालिसमे पाटे श्रीनरसिंहसरि थया। ४५. पसतालिसमे पाटे श्रीवीरचन्द्रसूरि यया। ४६. छइंतालीसमे पाटे श्रीमुनितिलकसरि थया । ४७. सडतालिसमे पाटे श्रीजयसिंहसूरि थया । ४८. अडतालिसमें पाटे श्रीआर्यरक्षितम्ररि थया । इवई अंचलगच्छनी उत्पत्ति कहींई छ जिसि कलिंकालें तेणें योगि करी जैनदर्शनमांहिं पायो बाहुल्यई क्रिया टली, आपणी स्वेच्छाई नवनवी वात आदरी तिर्सि अवसर श्रीजयसिंहसरि दंताणिग्रामें आव्या, तिहां द्रोण व्यवहारीओ रहै छई तेहने गोदओ एहवें नामें पुत्र छ । इग्यारछत्रीसें (सं० ११३६) जन्म, संवत् ११४२ इग्यारवेताले दीक्षा लोधी । ते सकल शास्त्र भगतां थकां 'दसवैकालिक' सिद्धान्त भणवा लागा, तेहमांहे एक गाथा दीठी, यतः 'सिउदगं न सेविज्जा सिलावुट्टो हिमाणिय ।' ते शिष्य गाथाना अर्थ विचारवा जोवा लागो, सीतोदक सचित्त पाणी न सेवीई शिलाष्टि ते हेमनां पाणी बंधनसें । उप्नोदक तातो पाणी, माहात्मा जे साधु तेणे लेवू । गुरुकनें आवो प्रश्न पूर्छिओ- 'भगवन् ! 'अन्नहावाई अन्नहाकिरिया' कहीई अनेरु कहींई ।' गुरु आगलि गाथा भणी, तिवारें गुरुइं वात कही-'वच्छ ! ए क्रिया हवणां न चाले ।' तिवारें तेगें शिष्ये कहीउं-'जे चलावे प्रतिलाभ अथवा नहीं है।' गुरुई कहिउ-ते भाग्यवंत ।' तदनंतर तेणें शिष्ये समग्र सिद्धान्त यांची क्रिया समग्र ओलखी साची, गुरुई तेहनई उपाध्यायपद दीy, विजयचन्द्र नाम दीधुं, तेणे च्यार यति सहित विहार कीयो । लोकनें साचो धर्मनो उपदेश दीधां, पणि ते कोई अंगीकार करे नहि, ते क्रिया न चाले। पर्छ पावें पर्वतई आवी भगवंतने वांदी त्रीस उपवासनु पचक्साण कयु । हवै तेणें समये श्रीमहाविदेह क्षेत्रने विषे श्रीसीमंधरस्वामि पासें वखाणे वसाण साभलवा श्रीचक्रेश्वरी गयां हता, तिहां श्री[सी]मंधरस्वामिइं श्रीविजयचन्द्र उपाध्यायनी क्रिया गुणनी प्रसंसा कीधी, पूर्वक वंदना करी, आगल हाथ जोडी उभी रही, ने गुरुनै कहै-'वालागी प्रभु तुम्हे 'विधिपक्ष' नामा गच्छ थापो । लोकमति सुधर्म तणो मार्ग प्रगट करी आपो ।' एहयु वचन देवीतणु हीई धरी, पावापर्वतइंथी हेठा उतरी देवीई कयु हतुं जे मालजनगरे जाजो, तिहां शुद्धमान आहार मिलसै । तिहां पारणुं करजो, ते वचनें भालजनगरे आव्यां, तिहां शुद्धमान आहार हरि पारj करीउ तिहां यशोधन भणसालीने प्रतिवोध्यो। पछै तेहनें नवीन मासादें भरतेश्वर चक्रवर्तितणी युक्ति प्रतिष्ठा थात थकि आकासि देववाणी एहवी यई-'अहो लोको विधिपक्षगच्छ आसरो, जिम संसार तरो।' एहवं देशीवचन सांभलि श्रावक लक्षो गमें आदर्यु । राजा विक्रमादित्य थकी इगारसै ओगणौतेरई (सं० ११६९) वरसई श्रीविधिपक्ष गच्छनो महिमा विस्तयौं । इ विहार करतां श्रीविजयचन्द्र उपाध्याय बइणपनगरें पढोता । तिहां योडि व्यवहारीयो छै, ते सिद्धरामओ जेसंगनी मंडारी छे, तेहने प्रतिवोध्यो । यतः- तस्स सुआ समयसिरि एककोदिटंका मूलअलगारा। परिहरीय गहिय दिक्या पणवीससहि य परिवरिया ।। १ विविधगठीय पधवली संग्रह अण्णेवि तत्व जणया गुरुवयणरसेण लीण पडियुद्धा। के सच्च[देसीविरई वैरागवसेण य पडिवण्णा ॥ अर्थ-ते कोडि व्यवहारीयानी पुत्री समयश्री छे, तेणें कोढिसोनाना मुल्य पैसइ तेटलानुं ग्रहणुं पहिरइ छ ते सर्व तनीने पचवीस सखी साये परवरी थकी गुरु पासे दीक्षा लीथी । १ । बली पीना पणि घगा मनुष्य गुरुना चचनरस तेणे लयलीन थका केटलाइक सर्वपिरति साध थया, केटलाइफ देशविरति भावक थया । वयराग चसै पडिवजु । ते कोडि व्यवहारीभो पडिकमण छेडे करी बांदणा देवा मांडया। तिवारे कुमारपालराजाना पुछयाथी हेमाचार्य प्रभाविकपुरु कहिउँ-ए अविचलक ।' तिवारें पूर्वे तो 'विधिपक्ष' एहवू नाम इतुं, वली बीजु नाम 'अंचलगच्छ' स्थापना थई । हमें श्रीविजयचन्द्र उपाध्याय धीराने पहोता तेवा समयनै विर्ष सोपारापूर पाटणई कोटि द्रव्यतणो धणी बाहड, भेंडी कलन, तेहनो पुत्र जेसिंगकुमार जंबुस्वामिनुं चरित्र सांभलि मावित्रनी आज्ञा मागी थिरादनगरे पुहतो । गुरु श्रीविजयचन्द्र उपाध्याय चैत्यपरिवाडे गया छै। पछवाडे ठवणी उपरि पुस्तक देखी एक वांच्यु । सातसे गाथा 'दशवकालिक ' आवडिङ । पछै जेसींगमरने दीक्षा दीधी । बिहु चरसै त्रिण कौडि ग्रंथ भण्या। हवे विजयचंद्र उपा-यायनें घगां साधु साध्वीना परीवार परवर्या । पृथवी पीठने विषे विहार करता मंदाउर नगरि पोहता, तिहां आचार्यपद स्थापना थई । विनयचन्द्र उपाध्यायनु नाम श्रीआयरक्षित एइ, नामस्थापना थई । हवें श्रीआयरक्षितरि भूपीठनै वि घगा साधु साधवीने परिवारें विहार करता एकवीससई साधुनें दीक्षा दीधी । इग्यारसई त्रीस साधवीने दीक्षा दीधी। शासाचार्य १२, उपाध्याय २०, वाचक ७०, पंडित १०३, समयसिरी प्रमुख महत्तरा पुहतणीस ८२। एवं से . . . अठ्यासीपद स्थापना कीधी । वैणपनगरे संवत् १२३६ धार छत्रीसे श्रीमार्यरक्षितपरिने निर्वाण । एवंकारई सर्वायु वर्ष १०० ए अडतालिसमो पाट जाणवो ।। ४९. इंचे ओगणपचासमें पाटें श्रीजयसिंघसरी थया । यतः- महयाडंबरयुतं सूरी पयंतस्स विओणवे जायं । जयसिंहसूरिनामेण जाओ भूमीसिंगारो ।। अर्थ:-मोटे आडंबरई करी सहित तेह जयसिंहमूरिन बईपापनगरने विषई मरिपद आचार्यपद ययु, एहवा जयसिंहसरि पृथवीने विषे श्रृंगारसरसा थया । हवे तेइ समयनें विर्षे सिद्धराओ जेसंगने पार्ट राना कुमारपाल थयो । जेणे हेमाचार्यनें बचनें अहारदेशनें विपई जीवदया पलावी । जयसिंहपरि कुमारपाल राना आगल पाखी पूनिम अमावास्थानी प्ररूपणा साची छ, एड्युं कहेबराव्यु । बली दुर्मत जयसिंहसरीने मारवा आव्या, ते यंभाणा । वली पेटपीड थइ, पटरी गुरुने वीनती कीधी । चीटक बारो कर्यो । पेटपीड मटी । एदया श्रीजयसिंहयरि विहार करता महावपुरि पदोता। संवत् इग्यारभोगणोवेरिई जन्म, संवत् इग्यारसताइ दीक्षा लीधी, संवत वार छन्नीसें आचार्यपद, संवत् पार भट्ठावनई नीर्वाण ॥ ५०, पंचासमें पारें श्रीधर्मघापारिनी कथा-मादारपुरने विपे महावपुरिई नगरि श्रीचन्द्र व्यवहारीओ, रानलदे कलत्र, तेहनो पुत्र धनदचकुमर । संवत् पार अटोचरे जन्म, संवत् धार सोलोतरे मायामि 44720 अश्चल गच्छ-अपर नाम विधि पक्ष गच्छ-पट्टावलि -दीक्षा लीधी, जेणें समेभरदेसनो धणी नीद्र गहिलडओ महा अहेडानो व्यसनी ते राजान प्रतिबोधी श्रीपार्श्वनाथनी प्रतिमा पूजतो कीघो। संवन् बार चओनीसे भट्टोइरिग्रामि सरिपद थयु। संवत् धार अडसहि नीर्वाण । एवं सर्वायु वर्ष ओगणसाठ॥ ५१. हवे एकावनमे पाटे महिंद्रसींह सूरि थया। सरस नामें नगर । देवप्रसाद एहवे नामें श्रेष्ठि वसें, थिरादेवी कलत्रं । संवत् वार एकोत्तरें गच्छनायकपद । जेणे वेगलावी श्रावक वांदता आव्यां, तेहना मनना चोरासी संदेह घडी एकमाहि भागा। संवत् तेर नवोतरें तईरवाडि । निर्वाणी तिमिरपुरै । एवंकारे वर्ष ॥ ५२. तेहने पाट श्रीसिंहमभुमरि । वीजापूरनगरी अरसिंह श्रेष्ठी, प्रीतमती भार्या, तेहनो पुत्र । सं० १२८३ जन्म, सं० १२९१ दीक्षा, जेणे चेले हुने गुरस्युं वाद कराव्या, बुद्धि करी वादि हराव्या । सं० १३०९ आचार्यपद, गच्छनायकपद । सं० १३१३ तिमिरपुरै निर्वाण । एवंकारे ३० वर्ष आयु सर्व आयु भोगवीउं॥ ५३. इंपनमें पाटें अजितसिंहसरि । डोडग्रामि निणदेव श्रेष्ठि, जिनमति कलत्र, तेहनो पुत्र । संवत् चार त्र्यासीई जन्म, संवत् बार एकाणुई दीक्षा, संवत् तेर चउदोत्तरे अणहलपुरिपाटणी आचार्यपद, जेणे मुवर्णगिरितणो स्वामि राओल नरसिंघ प्रतियोध्यो । देशमाहि वध वातो वार्यों । लोकन कुमारपालतणा वारा संभार्या । पंदर पद वैसणां तणां महोच्छवइके लग्नमांहि नीपजाव्यां । संवत् तेर सोलोतरे जालोरनगरे गच्छनायकपद । तेर ओगणचाले निर्वाण । एवंकारे छपन वर्ष सर्वायु ॥ ५४. चोपनमै पाटै देविंद्रसिंघसरि पालहणपुरनगरि श्रीमालवंसई सातु श्रेष्ठि, संतोपथी कलत्र, तेहतणो पुत्र । संवत् वार नवाणुइ जन्म, सवत् तेर छेडोत्तरइ थिराने दीक्षा, संवत् तेर बीस तिमिरपुरे आचार्यपद, संवत् तेर ओगणच्याले गच्छनायकपद, तेहनी वाणी साभलवा निमित्त अनेक गच्छना उपाध्याय, पंडित आवें । संवत् र एकोत्तरे अणहल्लपुरपाटणिं निर्वाण । एरंकार वर्ष बिहुत्तरे सर्वायु ॥ ५५. हवे पंचावनमें पाटें धर्मप्रभम्ररी । भीनमालनगरि श्रेष्टिं लीग, वीकमदे कलत्र, तेहनो पुत्र । संवत् तेर एकत्रीसें जन्म, संवत् तेर एकतालई दीक्षा जालोरि, संवत तेर ओगगसठि आचार्यपद, संवत् तेर एकोत्तरई गच्छनायकपद अणहल्लपुरपाटणे थयुं । तेहने वारे भवनतुंगमरि शासाचार्य यया । तेह जूनागढ गया । तिहां रामोल खंगारतणी समर्शि तकितनाग प्रतक्ष आण्यो, सोल गारुडाना नाद नीग्रही जावजीव सर्प सेंलावा नियम लेवराया। पावसाह वदिती पांचसे भाठी भजागी सवालाख जाल वलावी । एवडी मोटी शक्तिना धणी | वली चोरासी झाति चोरासि गच्छना संघ देसवां श्रीआदिनायनी प्रतिमा पोलारी। *श्रीअंचलग साचो छ' एहवी सासि पुरावी । एक टंक भावपाणी करघु, रात्र-दीवस मध्ये सुनहीं। सबद तेर त्राणुंई आसोटिग्रामि निर्वाण । एवं प्रइसठ वर्ष सर्वापु ।। ५६. छपनमें पाटें सिंहतिलकसरी । दर्शन जाई दुख दूरि । मरुमंडंलि आइवपुरनगरे आसपर श्रेष्टि, विविधगच्छीय पहावली संग्रह . चापलदे कला । संवत तेर पसताले . जन्म, संवत् तेर यावनई दीक्षा, संवत् तेर पंचा]ई स्थंमतीर्थे निर्वाण । एवं.पंचास वर्ष सर्वायु ॥ ५७. सत्तावनमें पाटे महिन्द्रप्रभसरि। घडग्रामि श्रेष्ठिं आसा, भार्या जीवणि, तेहनो पुत्र । संवत् तेर सठि जन्म, तेर पंचोतरें वीजापुरे दीक्षा, संवद् तेर त्राणुई अणडल्लपुरपाटणि आचार्यपद थयु, तेर अठाणुई स्थंभतीर्थे गच्छनायफपद थयुं, मरुमंडलिई नाणीग्रामि चोमास रहा, चौमासामध्ये चमालीसमें दिवसे मध्यरात्रीनी बैलां कालंदर सर्प आवी गुरुने डंसो, पणि मंत्र जंत्र तंत्र जांगुलीना औषधीवणा भ्रम छांटी एकांति श्रीपार्थनाय ध्यान घयु । दशमि पुहरी लहिर बाजी पणि ध्यान तणि वले लहिर तणुं पल भाजीउ । समग्र विपद्या टल्यो जयजयारव ओछल्यो । समग्न लोक आणंद्यां । संवत् १४४४ निर्वाण । एवं ८० वर्ष सर्वायु ।। . ५८, अठाचनमें पाटें इंणि कलिंकाले अद्भुत भाग्य सौभाग्य विद्यानिधान गुणे करी प्रधान मिथ्यात्वकंदकुंदाल श्रीमेरुतुंगसरि यया। नाणीग्रामि चुइरो वयरसाह, नांलु कलत्र, तेह तणो पुत्र वस्तपाल । चउद बीडोत्तरे जन्म, चउद डाहोत्तरे दीक्षा, चउद वत्रीसें आचार्यपद, चउद पीस्तालीस १४४५ गच्छनायफपद, जेहने वारे शासाचार्य श्रीजयसेसर थयां । चार सहस्र 'उपदेशचिंतामणी' ग्रंथतणा करणहार श्रीमरुतुंगसरि पास रात्रे चक्रेश्वरी आवतां से सने कोईफ श्रावके दीठा। तेज रात्रे कोईक बाईडीओ उपाश्रयमां आवे छई ते श्रावक रीसाणो उपाश्रय आवे नहि, ते सर्व गुरुई जाणुं। पछै गुरु तेहनें मनावी तेडी लाव्या, वली वीजै दिवसै वखाणे आव्यो छ, तिवारे पाटला ओधा मुकान्या छै, हवे चक्रेश्वरी नित्य वसाणे आवे छै । ते आव्या एटले पाटला ऊंचा हता, ते समा थया । श्रावक जोइ रह्या, गुरुइं फदिओ राने एहु आपै छै । पछै श्रावकना मननो संदेह भाग्यो, पछे गुरुहं कहिउं चक्रेश्वरीने-' हवे आवस्यो म ।' ते दिवसथी आवता ते रद्यां । मेरुतुंगमरी १४७१ निर्वाण । एवं वर्ष अइसठ सर्वायु ॥ ५९. औगणसाठमि पाटे श्रीजयकीर्तिसरि। तिमिरपुरनगरि भुपाल सेठ, भरमादे मार्या, पुत्र वीना । चउद त्रैवीसें जन्म, संवत् चउद त्रेताले दीक्षा, संवत् भोगणोतेरें आचार्यपद स्तंभतीर्थे, चउद त्रीहोतेरे गच्छनायकपद पाटणनगरि, १५०० निर्वाण । एवं सर्वायु वर्ष ६०॥ ६०. साठिमें पाटें श्रीजयकेसरसरि। पंचालदेशे स्थान महानगर प्रेष्ठि देवसी, भार्या लासणदे, पुत्र धनराज । चउद ओगणोतेरे जन्म, चउद पंचोतर दीक्षा, चौद चोरा}ई आचार्यपद, पनरसैं एके चांपानेर नगरे गच्छनायकपद, पनरसें एकताले स्वर्ग पहोता । एवं सर्वायु वर्ष बिहुत्तर ।। ६१. एकसठमें पाटे श्रीसिद्धान्तसागरसूरी, तेणई चरेश्वरीनु आराधन कहुं । तिवारें चक्रेश्वरीई कहिउँ- 'अह्म भापीई पणि तुम्हे ओलसस्यो नहीं ।' विवारे गुरुई कहिउँ-'माताजी तुमेने औलसीई नहीं फिम ? ' पछै श्रीसिद्धान्तसागरमरि वुहरवा उठया छै, सर्वे परे पगलां करें हैं, तेहवा समयने चक्रेश्वरीई नवु घर रचना करी गरदी पाईडीनुं रूप करी मार्गे आडी उभी रहिने गुरुने कई- स्वामि माहरें परें पगलां करो।' गुरु विहां अश्चल गच्छ-अपर नाम विधि पक्ष गच्छ-पट्टावलि गयाँ पर्छ ते डोसीई सोनईयानी थाल भरी बुहराया माड्या, ते गुरुइं सोनईया घुइर्या नहीं, पछी चोखानी थाली भरी ते मध्ये छुटक एक वि सोनईया घालि वुहरावा मांडया। पछै गुरुई तेहनो भाव जाणि चोखा अचित्त जाणी वुहरा। पर्छ गुरु उपाश्रय आल्या। पर्छ चोखामांहिथी सोनईया नीकल्या ते गुरु चेला साथै ते डोसीने मोकल्यां पणि ते ठेकाणे घर तथा डोसी मिले नहि । पछै गुरुई फिर चक्रेश्वरीनुं आराधन कर्या । चक्रेश्वरी आव्यां । चक्रेश्वरीई कहिउँ-'अमें आवीई पणि तुमें ओलखो नहीं।' तिवारें गुरुई कहिउं-'माजी किवारे आव्यां, अमे ओलख्या नहीं।' तिवारे चक्रेश्वरी कहै-'मैं सोनानो थाल भरि वुहरावया मांडयो, तिवारे तुमे मुझने ओलख्या नही, इम न जाण्यु जे सोनईया ते कुण चुहरावतु इसे ? ते वुहरा होत तो भलु अने पछे चोखानी थाली बुहरी ते मध्ये छटक एक वि सोनईया हता। ते वती तुम्हारे गामो गाम एक वि सोनइया सरिखा गृहस्थ होस्यें।' इम कही चक्रेश्वरी गया, ते हवें प्रगटपणई तो आवता नथी मुहणे स्वप्नांतरि आवे छ। ते श्रीसिद्धान्तगरसूरि अण- हलपुरपाटण नगरइं सोनी जावड, भार्या पुरलदे पुत्र सोनपाल । १५०६ पनर छीडोत्तरे जन्म, पनर वारोत्तरे दीक्षा, एकताले गच्छनायकपद, पनर साठे स्वर्गगमन ॥ ६२. वासठिमें पाटें श्रीभावसागरमरि। नगर तरसिणि सा सांगा, भार्या श्रृंगारदे, पुत्र भावउ । पनर सोलोतेरे जन्म, पनर वीसइं दीक्षा स्थंभतीर्थे श्रीजयकेसरसूरिहस्ते, संवत् पंनर साठिं माडल गच्छनायकपद, संवत पनर चउरा- सीई निर्वाण । सर्वायु वर्ष ६८ अडसठ ॥ ६३. इंसठमैं पाटे श्रीगुणनिधानसूरी । श्रीअणहिलपुरपाटणी श्रीमाली ज्ञाति शेठ नगराज, भार्या लीलादे, पुत्र सोनपाल । पनर अडताले जन्म, संवत् पनर वावनमइंश्रीसिद्धान्तसागरसूरिहस्ते दीक्षा, संवत् पनर पासठिं स्थंभतीर्थे आचार्यपद, संवत् पनर चउरासोइ गच्छनायरुपद, संवद सौल बीडोत्तरे निर्वाण । सर्वायु वर्ष ५३ इंपन ॥ ६४. चउसठिमई पाटे श्रीधर्ममूर्तिहरि । श्रीस्थंभतीर्थे सा हांसा, भार्या हांसलदे, पुत्र धर्मदास । संवत पनर संच्यासीइं जन्म, संवत् पनर नवाणुइं दीक्षा, संवत् सोल विडोत्तरे अहमदाबाद]नगरि गच्छनायकपद, संवत् सोल ओगणोतरे श्रीपाटणि निर्वाण । एवं सर्वायु वर्ष पंच्यासी । ६५. पांसठमे पाटे श्रीकल्याणसागरमरि । लोलपाटकनगरि कोठारी नानिग, भार्या नामलदे, पुत्र कोडण । संवत् सोल तेत्रीसें जन्म, सोल घेताले दीक्षा, सोल ओगणपचासें आचार्यपद, सोल ओगणोंतेरे गच्छनायकपद, संवत् सत्तरे अहारोत्तरें निर्वाण । सर्वायु वर्ष पंच्यासी ॥ ६६. छासठमें पाटें श्रीअमरसागरवरी । मेवाडे देशे श्रीउदयपुरनगरि श्रीमालि ज्ञाति चउधरी जोधा, सोनवाई 'भार्या, पुत्र अमरसिंघ । संवत् सोल छनुई जन्म, संवत् सत्तरें पंचोत्तरे दीक्षा, संवत् पनरोत्तरे आचार्यपद, सतर महारो- नरें भटारकपद, सत्तर वासठि निर्वाण । सर्वायु वर्ष ७० सितेर ॥ ६७. सडसठमें पाटे श्रीविद्यासागरसरि । श्रीकच्छदेशे सीरसरा विंदर, ओशयंस झावि साह कर्मसी, भार्या कमलादे, पुत्र विद्याधर । संवत १७४७ सतर सडताले जन्म, संवत १७५८ अठावनें दीक्षा, सतर घास १७६२ आचार्यपद, चयराटनगरिं ॥ - 00 श्रीअंचलगच्छ (विधिपक्षगच्छ) पावलीयंत्र । श्रीकल्याणसागरसरिपर्यन्त सं० १६७० । श्रीगच्छनायक जन्मदेश जन्मनगर वंशनाम | पितानाम मातानाम जन्मवर्ष दीक्षा सरिपद गच्छ- निर्वाण सर्वायु वर्ष वर्ष पदववर्षे नाम ८० विविधगडीय पायली संग्रह १ श्रीआयरक्षितसरि भागोदि दताणीग्राम मागरंश व्यवहारिद्रोण देदी संवत् ११३६/११४२११६९११६९१२३६, १०० २ श्रीजयसिंहसरि कुंरुणदेश सोपारुनगर ओशवंश श्रष्ठि दाहड नेदी सं० ११७९/११९७/१२०२१२३६/१२५८ ३श्रीधर्मपोपहरि मगदेश माहवपुर श्रीमाली साथीचंद राजलदे सं० १२०८/१२१६१२३४६१२५८/१२६८ ६१ श्रीमहेन्द्रसिंहसरि मरुदेश सरनगर श्रीमाली सा देवप्रसाद थिरदेवी सं० १२२८१२३७/१२६३.१२७१/१३०९ ८२ ५श्रीसिंहमभरि रहुनरि बीजापुर श्रीमाली मंसी मीतिमती स. १२८३/१२९११३०९१३०९/१३१३/ ३० ६श्रीअजितसिंहसरि मरुदेश डोडाम श्रीमाली मंजिनदेव जिनमती सं० १२८३/१२९११३१४१३१६१३३९/ ५६ ७/श्रीदेवेन्द्रसिंहसरि मरुदेश पाल्हणपुर श्रीमाली व्यमांतू संतोपश्री सं० १२९९१३०६१३२३१३३९१३७१) ७२ ८|श्रीधर्मप्रभरि मरुदेश भीनमाल श्रीमाली श्रष्टिलीवा वीजलदे सं० १३३१/१३४११३५९/१३७११३९३/ ६२ ९ श्रीसिंहतिलकधारि मरुदेश भाइचवाई श्रीमाली सा आसधर चांपलदे सं० १३४५/१३५२/१३७११३९३/१३९५/ ५० १०/श्रीमहेन्द्रमभरि नीरीउ- वडग्राम ओशवंश शाह आभा लींवणि १३६३/१३७५/१३९३/१३९५/१४४४ लिया ११ श्रीमेरुतुंगसरि मरुदेश नाणीग्राम मायांश व्यवयरसी नाल्हणदे सं० १४०३१४१०/१४२६/१४४४१४७११ ६८ १२ श्रीजयकीविसरि मरुदेश तिमरपुर श्रीमाली व्यभूपाल भरमादे सं० १४३१/१४४४१४६७/१४७१/१५०० ६९ १३ श्रीजयकेसरबरि पंचालदेश थाननयर श्रीमाली श्रे० देवसी लाखणदे सं० १४७१११४७५/१४९४१५००/१५४२ ७१ श्रीसिदान्तसागर-गुज्जरदेश अणहलपुर भोशवंश सोनी जावड पूरलदे सं० १५०६१५१२/१५४११५४२१५६० ५४ सरि १५श्रीभावसागरमरि मरदेश नरसानगर श्रीमाली वुहरा सांगा भंगारदे सं० १५१६१५२०/१५६०/१५६०१५८४ ७४ १६श्रीगुणनिधानपरि गुजरदेश श्रीपाने श्रीमाली सा नागराम लीला सं० १५४८१५५२/१५६५/१५८४१६०२ ५४ १७श्रीधर्ममूर्तिहरि गुज्जरदेश स्तंमती श्रीमाली सा० हंसराज हांसलदे सं० १५८५/१५९९/१६०२१६०२१६७० .१८श्रीकल्याणसागर- विढीयार लोलपाटके श्रीमाली को नानिग नामलदे सं० १६३३१६४२१६४९१६७० सूरि देश

श्रीवीरवंशपट्टावली-अपरनाम विधिपक्षगच्छपट्टावली।
१
५
॥ श्रीवीतरागाय नमः ॥
पणमियसयलसुरा-सुर-नरवरमहियं जिणाण पयकमलं ।
भवियणवंछियपूरणसुरतमसममनणुगुणनिलयं ॥
समरिय नियगुरुवयणं उभडसोहम्गसन्निहाणमिणं ।
श्रीवीररायवंसं सुयाणुसारेण चुच्छामि ॥
अत्थऽत्थि भरहवासे ओसप्पिणीए चउत्थए अरए ।
तेवीसं तित्थयरा समइकता तओ पच्छा ॥
खत्तियकुंडग्गामे सिद्धत्यनिवस्स नारितिसलाए।
सिरिवीरो जिणराओ चउचीसइमो समुप्पण्णो॥
तीसयवरिसे चरणं नवविहलोगंतिगेहि विष्णविओ।
पणयालीससएहिं पनरसदिबसेहि जिणकम्मो ।
चइसाहसुद्धदसमी हत्युत्तरजोगि वद्धमाणस्स ।
रिजुवालानइतीरे उप्पन्नं केवलं नाणं ।।
भवणवइ-वाणमंतर-जोइसवासी विमाणवासी य ।
सव्वड्डीए सपरिसा कासी नाणुप्पयामहिमं ॥
मुणिणो चउदससहसा छत्तीसं अज्जियासहस्साई ।
इकारस गणहारा एवं सा संपया तस्स ।।
भवियजणे पडियोहिय यावत्तरि पालिकण परिसाई ।
सोहम्मगणहरस्स य पट्ट दाउं सिर्व पत्तो !!
पढमो सुहम्मसामी गणहारो केवली सिवं पत्तो।
तत्तो जंबूसामी केवलजुत्तो गओ मुक्खं ।।
मण परमोहि पुलाए आहारग खयग उवसमे कप्पे ।
संजमतिय केवल सिझणा य जंबूम्मि चोच्छिन्ना।
भन्यो गणहरतिलओ सूरी सिजंभयो य गणहारो।
सूरिजसोभद्दगुरू पट्टे संभूयविजओ य ।।
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१०१ विविधगच्छीय पहावली संग्रह १५ सिरिभद्दयाहुगुरुणा घउदसपुब्बाइ माणिजण लहुं । सिरिथूलभद्दसूरी संभूइपए य संठविओ॥ पुव्वाणं अणुओगो संघयणं पढमयं च संठाणं ! सुहुममहापाणाणि य घोच्छिन्ना धूलिमम्मि ।। तस्स य दुन्नि य सीसा ते वि य साहाण नायगा दो वि । पढमो अन्नमहागिरि सूरी तस्स उ इमे कमसो।। सूरिवलिस्सहनामा साई सुगुरू तओ य सामन्यो । जेण निगोयचियारो सोहम्मघढस्स परिकहिओ । संडिल्लो जीयधरी अजसमुद्दो सुमृरिमा प। नंदिल्ल नागहत्यि य रेवइ-सिरिसिंह ग्वदिल्ला ॥ हिमवंसिरि नागज्जुणसरी सिरिभूदिन्न-लोहिचा। दूसगणिसूरिराओ देवहिवखमासमणनाहो ॥ दुस्सहदसमवसओ साह-पसाहाहि फुलगणाईहिं । विज्जा किरिया भट्ठा सासणमिह सुत्तरहियं च ॥ उवयारं समरिय मेलीए चउसंघे यलयपुरमज्झे । देवढिखमासमणेण पुत्थए रोधियं सुते॥ वीरस्स सत्तवीसे पट्टेसुं तत्थ रयणसिंगारं। देवढिन्वमासमणं पणमामि य बुड्ढसाहाए । अह धूलिभद्दसीसो अज्जहत्यी य विइयगणहारी। संपइनरिंदराओ पडिबोहिय जेण धवणेण ।। तप्पय सुवियसूरी सुप्पडियद्ध य इंददिण्णे य । सिरिअजदिष्णसुरी सीहगिरी सासणाहारो॥ तस्स य सोग्गनिही अइसयगहिरिमगुणाण भंडारो। दसपुचघरो सामी सिरिचयरमहामुणी जयउ ।। दसपुव्वा चुच्छिन्ना संपुन्ना सुरभवम्मि संपत्ते । वयरम्मि महाभागे संघयणं अद्धनारायं ॥ तस्संति अजरक्खिय भपिऊपां जाव सड्ढनवपुब्बी। जाओ जुगप्पहाणो अणुओगो रविवओ जेण ।। आरेण अजरक्खिय कालाणुन्ना उ नत्थि अन्नाणं । पन्यजाविहिमुट्ठावणं च पच्छित्तदाणं च ॥ २१ २२ २५ २६ २८ ३० ३३ श्रीवीर वंश पावली-अपर नाम विधिपक्षगध्छ-पावली सिरिवयरसामिसीसो सुवयरसेणो य तस्स चत्तारि। सिरिचंदसूरि-नागिंद-निघुइ-विजाहरा सीसर । पढमो चंदो सूरी तत्तो सामंतभद्दओ कमसो। सिरिदेवसूरि पजोयणो य सिरिमाणदेवमुणी ॥ सिरिमाणतुंगसूरी भत्तामर करणविस्सविक्खाओ। सिरिवीरो जयचंदो देवाणंदो य विकमओ। नरसिंहो य समुदो हरिभहो सरिरायगणतिलओ। पहुगंधकरणकुसलो तस सीसो माणदिन्नो य ।। चिवुहपहो जयनंदो रविपहसूरीसरो जसोदेवो । सिरिविमलचंदसूरी तत्तो उन्जोयणो सुगुरू॥ जेण य टेलग्गामासन्ने चडरुक्खहिडिमे भाए। गोगोरचुण्णजोएण सुद्धसुमुहुत्तवेलाए । नियसव्चदेवसीसोत्तमस्स सूरीससंपयं दिण्णं । घडगच्छनाम जायं तत्थाइमसव्वदेवगुरू॥ तह पउभदेवसूरी उदयप्पहरिवइ पहाणंदो। सूरीसधम्मचंदो सुविणयचंदो गुणसमुद्दो। सिरिविजयप्पहसूरी नरचंदो वीरचंदमुणितिलओ। तत्तो सिरिजयसिंहो बड़गणपट्टे य सूरिधरो॥ अब्बूगिरिवरपासे दंताणीनामगाममज्झम्मि । पागयवंसाभरणो निवसइ दोणाभिहो मंती ॥ देढी तस्स य भज्जा दोन्नि य पुत्ताय तत्थ संजाया। वयजा सोल्हा नामा घाला ते सुगुणगणगेहा ॥ जयसिंहमूरिपासे विजएण रसेण संजममगिण्हं । नामेण विजयचंदो भणइ सुयं तिक्खयुद्धीए । दुस्सहकालवसेण य अणेसणिज्जेण असणपाणेण । सावजकुणताणं साहणं कुबरा किरिया ॥ तं टुं सो पभणइ समहिनंतो वि सुत्तमायारं । भय । किं विवरीयं दीसह उम्मग्गकरणाओ। तत्तो सूरी भण्णइ कि किजह जइ पमायबहुलतमो। कालो वा एवं तत्तो सो भणइ सवसुयं ।। ३४ ३८ ४० ४१ ४२ १०८ विविधगच्छीय पावलीसंग्रह . - ४६ ४८ सूरिं च अणिच्छतो ठवियमुवज्झायसंपयं गुरुणा । अप्पवउच्छो चलिओ उद्धरि सुद्धकिरियमिणं ॥ पंचसमिएहि समिओ निगुत्तिगुत्तो य अप्पमत्तो य । चरणकरणेहिं जुत्तो संपत्तो लाडदेसम्मि । मज्झण्हे गोयरिए सुद्धाहारस्थ साहुणो चलिआ। पावंति नेसणिलं पच्छा वलिआ तओ ते चि।। पावागिरिवरसिहरे सुवीरभवणम्मि धंदणे पत्ता । संलेहमिच्छंता कुणति मामोपवासतवं ॥ इयो विदेहवासे पुक्खलविजए विसालजयविजए । सीमंधरजिणचंदो विहरइ गामाणुगामं च ॥ सीमाए नयरीए देवेहि कओच्छयो समोसरिओ। तत्थ सुरा-ऽसुर-नरवरचउविहसंघस्स मज्झम्मि । किरियाइगुणपसंसं भणइ जिणो साहुविजयचंदस्स । अहुणा भारहवासे उद्धरिया जेण मुणिकिरिया ।। तं सोऊणं देवी घरफेसरिहरिसपूरिया ण्या! वंदद्य सुगुरूं बच्चइ भययं ! मा साहसं कुणसु ।। भालिज्जइ नयराओ जसोहणो संघसहिय एयरस । पाभाइयम्मि समए जत्तत्थं वीरनाहस्स ॥ तुम्हाण सुद्धधम्मोवएमसुरसेण सो य युज्झिसइ । सुद्धेसणऽन्नदाणेण पारणं भे भविस्सइ य ॥ इइ कहिय गया देवी दिणयरउदयम्मि आगो तत्थ । संघवइओ जसोहण पडिबुद्धो सुगुरुवयणेण } तत्थेसणासणेण य साहणं मासपारणं जायं । पुणरवि सुगुरुसमीवे जसोहणो आगो तत्य ॥ भययं ! सुसुद्धसिद्धतमग्गपरमत्थसंपयासेग। भवजलहिपडताणं जीवाणं तारगो होउ ।। तत्तो भण्णइ सुगुरू सावयधम्मो जिणेहि पन्नत्तो। सम्मत्तमूलयारसवयगणविही समाउत्तो। पढम पभायसमए उद्दिष्ट्य सइढो चिसुद्धभावेण । सगसहिअक्रवरेहिं समरइ जहसत्ति परमेट्ठी ।। ५७ श्री वीर शपशवली-अपरनाम-विधि पक्ष गच्छपवा वली २०९ ५८ २९ x अह उत्तरसंगेण य छविहमावस्सयं कुपतो सो। सामाइयणुढाणं साचवई सुत्तमुवउत्तं ॥ इय उरगयम्मि सूरे विसुद्धमण-देह-यच्छमाईहिं। विहिपुब्च सतरमेएहिं सड्ढो पूएह जिणपडिमा । पढमालोए पणओ पडिमाओ तत्थ लोमहत्थेण । मोणी कयमुहकोसो एसो निउणं पमज्जेह ।। तो पहविय सुरहिसलिलेण गंधकासाइंयाइ लूहेइ । चंदणरसेण लिंपइ दुसयजुयलं नियंसेइ ।। अग्घेइ पवरगंधेहिं अह कुणई मुक्कालाण कुसुमाण । मुल्लाण चुण्णवण्णगवत्थाभरणाण आरहणं ।। मुंचह पलंयमाला करयलमुकाई किरइ कुसुमाई । सियतंदुलेहिं अमंगले आलिहइ पुरओ। धूवं च देइ तत्तो अट्टसरण थुणेइ वित्ताण । सत्तहपए ओसरिय वाममुच्चेइ सो जाएं ! दाहिणमिलाइ लाइय नामेइ सिरं महीइ तिक्खुत्तो। ईसि नमित्तु सीसे कयंजली भणइ सकथयं ।। तो गीयवज्जनद्वं मणरंगेणं पुणो पयासेइ । चेइयहरस्स चिंतं कुणइ य आसायणारहिओ ।। तत्तो पंचाभिगमणविहिणा मकसन्निहिम्मि सो पत्तो। अणुजाण इइ एग चारं पणमेइ साहणं ॥ अह उत्तरसंगणं दुवालसावत्तवंदणं सड्ढो। पियवंदणे गुरू पयलग्गे एव सो कुणई ।। स गहिय पच्चक्खाणं करेइ गुरुसक्खियं च सत्तीए । सुणिऊणं उवएसं सुत्तवियारं च पुच्छेद ।। चाउद्दस-ट्ठमुदिपुण्णिमासीसु चउसु पब्वेसु । जहसत्ति पोसहरओ चाबिहाहारवज्जेण ॥ वंदे बंदे अभिवढियम्मि वंदेऽभियड्ढिए चेव । आसादिपुण्णमाओ यंदे पन्नाससिरिपञ्च ॥ अभिवड्ढियम्मि चीसे दिणम्मि सो कुणइ पज्जुसणपव्वं । भवसुद्धे पंचमि तह सावणसुद्धपंचमिए । ६८ ६९ ७१ ७२ विविधगच्छी य पहावली संग्रह ७२ ७४ ७५ ७७ ७८ किंच- ७१ एव तवो जहसत्ति पणहुत्तरि पन्धसुत्तकहियम्मि । पोसहिओ तह पावारंभाईयं विचज्जेइ ॥ अन्ने तवस्स भेया चवीसा सेणि-पयरमाईया । एएसु चेव निरओ तवकरणे उन्जमाउत्तो॥ जिणभववियपहचउविसंघस्स सत्तिभत्तिरओ। सिद्धंतपुत्थलेहण सुतिस्थजत्ता उ नचखित्ते ॥ जिणवियपइटाणं करावेऊण यंभधारेहिं । सिद्धतचयणमग्गेण पढमं पूपइ तिक्कालं ।। फल-पत्त-भत्तवजण तह तंदुलअट्ठमंगलभरेणं । आसायणाइरहिओ सक्कथएणं नमसेइ॥ बहुलारंभविवजणकिरियं ववहारसुद्धिसहियं च । घणअनणं कुणंतो माया-मय कोहरहिओ य ।। पासंडिदेवतच्चणधणेण खरकम्म-नीयकम्मेहिं । जूएण धाउधारण वा वि अत्यं न अत्थेइ ।। संझासमए पुणरवि छब्धिहमावस्सयं कुणंतस्स । दिवस-निसा सड्ढस्स हु सयला सहला भवइ एवं ॥ एवं गुरुवयणरसं आसाएऊण जायरोमंचो। पडियनइ दृढचिसो जसोहपा सुद्धधम्मं तं ।। तत्तो जत्तं काउ गहिऊण गुरू जसोहणो चलिओ। भालिजपुरे एओ काराधिय रम्मजिणभवणं । विहिपुच्वं सुपइट्टा भव्वयसावएहि कारविया । ठवियं च रिसहविवं महामहा सहरिसा जाया ॥ पासंडिदरिसणेहि कओवसग्गा सुनिष्फला जाया । चक्केसरिवयणेण वि जाओ विहिपक्वगणतिलओ। सिरिविजयचंदसुगुरू सुसुद्धकिरियं समाचरंतो य। विहरंतो भूमितले पिऊणपनयरम्मि सो पत्तो। तत्वहारसवेलाकूलसुविक्खायफडिववहारी। गुरुवयणेणं युद्धो सकुटुंयो सायओ जाओ। तस्स सुया समयसिरी इगकोडीटंकमुल्ललंकारं । परिहरिय गहियदिक्खा पणवीससहहिं परियरिया ॥ ८१ ८४ ८५ श्रीवीरवंशपावली-अपर नाम विधि पक्ष गच्छ-पट्टा वली ८८ ८९ ९४ अन्ने वि तत्थ जणया गुरुवयणरसेण लीणपडिवुद्धा । के सव्व-देसविरई धेरग्गवसेण पडिवन्ना ॥ गाम-पुर-नयर-पट्टण-सदेस-परदेसभूयले विहरइ । साहू साहुणि सावय सुसाविया बहुयरा जाया ॥ नवकप्पे विहरंतो थिरपद्दपुरं गया समजुत्ता । चासावासं तत्थ य संठविया भवियलोएहिं॥ अह वरकुंकणदेसे सोपारभिहाणपट्टणपुरम्मि । दाहडसिट्टी नामा नेटीभन्नऽथि सीलजुया ॥ अन्नय निसीहसमये सुमिणे दिवो ससी तथा पुण्णो । नवमासे पडिपुण्णे जाओ जासिगभिहाणवरो॥ वड्ढइ कमेण बालो सुरुव-लावण्णसुगुणमणिहारो। बहुसत्थकलाकुसलो मयणसह जुब्धणं पत्तो।। अन्नय जंबूचरियं सुणिऊणं गुरुमुहाउ उभडयं । वेरग्गरंगभरिओ वयगहणे उज्जओ जाओ। पिय माय अणुन्नाविय चलिओ सुहदत्तमित्तसहिओ य । अणहिल्लपट्टणम्मि य जयसिंहनरिंदवयणाओ। थिरपद्दम्मि समेओ गुरुरहियउवस्सए पविट्ठो य । सिंहासणम्मि दसकालियस्स पुत्थी पवापइ ॥ इगवारेण य वायणपुब्वं इगसंथि()लद्धिबुध्धीए । आवडियसयलसुत्तं नाणावरणक्खओवसमे ।। चेइयचंदण काउं समागओ तत्थ सुगुरु वंदे । गणिऊणं वयभारं गुरुभत्तिरओ भणइ सुत्तं ॥ वागरण-तक्क-साहिच्च-छंद-लंकार-आगमाईणं । सुयसागराण पारो जाओ सो पंचरसेहिं ॥ महयाडंबरजुत्तं सूरिपयं तस्स विउणपे जायं। जयसिंहसूरिनामो जाओ भूमीय सिंगारो॥ सूरिपए संठविया नियगुरुसिरिअजरक्खियभिहाणा । तप्पहि उदयगिरिरविसिरिजयसिंहो जयउ सूरी॥ बहुभवियण पडियोहिंय वरेग्गरसेण चरण दाऊणं । यहुपरिवारेण जुओ सो वि य भूमंडले विहरह ॥ १०२ ११२ विविध गच्छीय पशवली संग्रह १०३ १०४ १०५ १०८ इगवीससया चीसा साहणं संपया भवे तस्स। एगारससयतीसा सा संपइ संजईणमिणा ॥ अह बारस आयरिया वीस उचज्झाय वायणायरिया। सत्तरि तह सयमेगं तियभहियं पंडियाणं च ॥ कवडिसुया समयसिरी महत्ता परतणी सयासीया। एवं संपय दो सय अहासीआ उ संठविया । इय अणहिल्लपुरम्मि य जयसिंहनरिंदपलंकारो। सिरिकुमरपालराओ जाओ भूपालमउडमणी ।। सिरिहेमसरिगुरुणा पडियोहिय क्यणसुरसदाणेणं । जिणभत्तित्तिरत्तो जामो सुस्साचओ परमो ।। अट्ठारदेसमझे अमारिउग्योसणं पवहेड । सो जीवदयातप्पर परिपालइ देसविरई च ॥ अह अन्नया नरेसो भुहपत्तीए करेइ किडकम्मं । विहिपविखफचडिसाचय उत्तरसंगेण तं वियरह ।। एवं किमिइ निवेण य पुट्टो सिरिहेमसूरी वच्चेइ । जिणवणेसा मुद्दा परंपरा एस तुम्हाणं ॥ तत्तो भण्णइ राया परंपरामग्गो य एगल्थ । कीरइ सूरी बच्चइ महिमा सिरिविजयचंदस्स ॥ सीमंधरवयणाओ चक्केसरिकहणसुद्धकिरियाए। सिधंतसुत्तरत्तो चिहिमग्मं सो पगासैइ ।। पच्छा निवेण तस्स वि अंचलगणनाम सिरिपहेण कयं । तिमिरपुरे गंतृपं बंदइ सुगुणं सुभत्तीय ॥ एगारसछत्तीसे जम्मण घायाल चरणसिरि वरिया। अउणुत्तरिए चरिसे विहिपक्वगणो य संठविभो ।। पारसछत्तीसम्मि य सपरिस पालिऊण परिपुषणं । सिरि अवरक्खियगुरू गओ दिवं निमिरनयरम्मि ॥ तप्पटपउमहंसो गणाहियो सरिरायजयसिंहो । कत्थ वि गामदुगंतर गच्छइ सो परिकरेण जुओ। केहि पि गुरुं घार्ड संपेसिय भइसई करे सत्था । जाव समेया तत्थ वि चंभियभूया तया सव्या ॥ ११२ ११४ ११५ ११७.

श्री वीरवंशपावली-अपर नाम वि घिपक्ष गच्छ पट्टाकली ११८ ११९ १२० १२१ १२२ १२३ १२४ पिय-माय-पंधवेहिं गुरुपासे आगएहि भत्तीए । तइयदिणे पगधोवणछंटणओ मुघाला जाया । अन्नय पासत्थेण वि गुरुहणणत्थं च पेसिया सुहडा । विउणपि वसइदुधारे परुप्परं जुज्झिया पलिया । तस्स य उयरे वेयण संजाया अइवहपगारेहिं । न समइ तत्तो तप्पयधोयणपाणाउ उपसमिया ॥ एवं जस जसमहिमा पवट्टए भूयलम्मि अणुकमसो । माहवपुरम्मि पत्ता तत्थ य सिरिवंसमउडमणी ।। सिरिचंद वसइ सिट्टी राजलदेवी इ भारिया तस्स । धन्नभिहाण कुमारो गुरूवएसेण गहिअवओ। थोवदिणे यहुपन्नावसेण बहुसत्यपारओ जाओ। जाणिय जुग्गं गुरुणा सरिपए सोचि संठविओ। सिरिधम्मघोसनामा सूरी गुरुसन्निहम्मि सो विहरइ । सयपइयाइयगंथा रइय महाकविविख्दवहो । विक्कमकालइगारसइगऊणासीइवच्छरे जम्मो । सगणउए चरणसिरि वारससइगुत्तरे सूरी ॥ तत्थेव गच्छनाहो जयसिंहमुर्णिद विहरिउँ भरहे । इगसीइवरिस आउं अडवन्ने परभवं पत्तो॥ तप्पयकमलाहारो सूरीसरधम्मघोसगणहारो। भदोहरिनयरम्मि य पयउच्छव कउ य संघेण ॥ विहरंतो संपत्तो संभरिदेसम्मि पढमभूपालो । योहिय जेण जिणालय कारावियमनणुब्वेण ॥ गुज्जर-सिंधु-सवालख-मालव-मरहट्ट मरुय-सोरट्टे । विहरतो सिरिनयरे भवियणपडियोहणे पत्तो॥ सिट्ठी देवपसाओ सिरिवंसे तत्थ वसइ ववहारी । थिरदेवीरमणीए जाओ मालाभिहो कुमरो॥ गुरुवयणे संलीणो वेरग्गभरेण संजमं गिण्हाद । गुरुपासे बहुसत्यं अवगाहइ बुद्धिपन्भारो॥ सूरिपए संठविओ महिंदसिंहो य सूरिरायमी वादिगयघडासिंहो न चुक्कए तफयाए वि॥ १२५ १२६ १३२ . १३८ विविधगच्छीय पहावली संग्रह चारसअछुत्तरए जम्मण सोलुत्तरे य पध्धज्जा। चउतीसे सूरिपयं अडयन्ने गच्छभारजुयं ॥ सिरिधम्मघोससूरी सट्टियपरिसं च पालिई आउं । अडसइ तिमिरपुरे सुरभवणं अणसणे पत्तो ।। तप्पय महिंदसिंहो विहरंतो सोलसाहुपरिवरिओ। चित्तउडगिरि पत्तो संघकयाडंबरो यहुसो॥ तत्थ य देवगनामा कणयगिरीबहुलदव्ययवहारी । मुणिऊणं गुरुवयणं पडिबुद्धो सावो जाओ। तस्स य भइणी मिच्छत्तवासिणी धम्मरहिय दुट्टमणा नीबीरा कलहपिया साहणं मच्छरं वहइ ।। अन्नय उच्छवसमए निमंतिया भोयणे लोया विसमिस्सं साहुकए अणेसणिज्नं तया रद्धं ।। साहुनिमंतणकहणे देवगहरसेण आगया मुणिणो । दिन्नं तया तमन्नं विहिरिय बलिया य गुत्तीर ।। झाणगया गुरुराया झाणं मुत्तूण उडिया जाय । तियवारं खोभविमा दिट्ट चिसमिस्सियं भत्त ।। तत्तो देद्गकणं भइपीए विलसियं च लेणावि । सव्वं यहि परिठवियं उम्मणदुमणो य खामेइ ॥ पुणरवि गुरु झाणगया पयडिय चक्केसरीइ देवीए । दूरहिया वि सा हं सब्ध विग्घे निवारेमि ।। इय कहिय गया देवी पयडपयायो गुरूण सुपसरिओ। बेवणम्मि नयरे पत्ता सेंघायरेणेव ।। चउमासे संठविया अट्ठोत्तरिगाहिया कया तत्थ । तित्ययमालभिहाणा सामाझ्यमज्झि सड्ढाणं ॥ सिरिपासभवणमझे भीमनरिंदेण कहिय पासथुई । इगइगकन्वेण कया सोलससाहहिं भत्तीग ॥ चउविहसंघेण जुओ तओ चलतो य बहुलपरिवारो। तह भीमसेणखमणो सयछत्तो सम्मुहो मिलिओ। कस्सवहारे चलिया पुढे चंगेण तेण दप्पेण । गुरुणो कहंति एवं नाई अम्हाण नागविआ॥. १४२ १४५ १४६ ११५ १४८ १५२ १५३ १५४ श्रीवीर वंशपावली-अपरनाम-विधि पक्ष गच्छप टावली 'छ(कोलिओह मित्ति सीसो जाओ सपरिच्छओ य सुगुरूण । विहरतो कण्णवईनयरम्मि समुच्छवो एओ। सिरि बकपालमंती चलुसीभद्देहिं संजुओ तत्थ । बंदणरसेण आवइ निसुणइ सुगुरूण उवएसं ॥ सव्वेसि भहाणं वयणं निसुणिय संसया भग्गा। गुरुभत्तिरसे लीणा चमकिया नमिय ते चि गया ।। बीजापुरम्मि पत्ता सिरिवंसे सिहिनाह अरसीहो । पीइमई तस भजा सीहसुओ कुंयरसीहनिहो । चारितं गहिऊणं गुरुपासे सच्छसत्थअत्यं च । सिंहप्पहनामेण य बुद्धीए भट्या चिजिया ।। तो डोडगामनयरं पत्ता गुरुणो य तत्य सिरिवंसे। जिणदेवो वसइ वरो जिणमइ भज्जा सुओ अचलो ।। गहिऊणं वयभार नाम अजियसिंह खुड्डओ सुमुणी । सिरिगुरुणो वि विहरिया थंभणनयरम्मि संपत्ता । बारसअट्ठावीसे जम्मण सातीसए य चारित्तं । लेसइ आयरियो उगुणत्तरि गच्छपदभारो॥ तेरनवोत्तरवरिसे सिंहपहे सूरि गच्छपइभारं । ठाचिय महिंदसूरी सुहझाणे सो दिवं पत्तो। अह सिंहप्पहसूरी गणनाहो हणियमोह-मय-माणो । बारसतिसिए जम्मण एगाणूए य चरणसिरी॥ तेरनवोत्तरवरिसे सूरीपय-गच्छभारसंजुत्तो। तेरोत्तरि तिमिरपुरे सुरभवणालंकिओ सो वि।। तप्पहि अजियसिंहो सूरीसररायहंसअवयारो। संघेण उच्छवेण य संठविओ गच्छपइभारो॥ बारसतिसिए जम्मण एगुणणउए य गिहए चरणं । तेरसचउदसवरसे सच्छे सिरिरिगणभारो॥ ओगणयालावासे अणहिलपुरपणे समोसरिओ। सगवण्णवरिसआउं पालिभ सुहझाणि परलोओ॥ तप्पयकमलाहारो सूरी देविंदसिंहगणहारो। पाल्हणपुरि सिरिवंसे सांत(? तू)संतोससिरिनाहो ॥ १५६. १५८ १५९ १६० विविधगच्छीय पावलीसंग्रह ६४ १६८ तस उयरे संपत्तो पारसनवनवइवच्छरे पुत्तो। तेरछडुत्तरिचरिसे पवनारयणगणं च ॥ तेवीसे तिमिरपुरे पहुच्छचे सुगुणग्वाणि मूरिपयं । ओगुणयाले गणपड इगहुत्तरि परभवं पसो ॥ तस पयकमलविलासो अहिणदहसो वि सुद्धसिरिचसो । सूरीस धम्मघोसो सुभिन्नमाले कयाचासो॥ लीबाचींझलउयरे तेरसगुतीमवरिस धनराओ। जाओ तह इगुयाले गिट्ट चरणं सुगुरुचरणे ॥ एऊणसहि सूरी इगुहत्तरि गणबई च पावे । तेसहि बरस आउं तिनवइवरिसे दिवं पत्तो॥ तप्पइ सिरिसिरिवंसे सूरीमणि सिंहतिलयगणराओ। आइचपुरे सिट्टी आस(सा)धर चापलाउयरे ॥ तेरसपणयालीसे जम्मण बावन्नए य चरणसिरी। इगहुत्तरि सरिपयं तिनवइयरिसे घ गच्छेसो॥ पणनवए परलोए पत्तो मिच्छत्ततिमिरहरदिवसो। सूरीस महिंदप्पहगणाहियो जयइ जगदीयो ।। जीराउल्लिसमीवे बडगामे ओसवंससिणगारो। आमा निबिणिज्यरे तेरसतेसट्टए जाओ। पणहुत्तरि वयभारो धम्मपहरिरायकरकमले । तिनवइवरिसे सूरी गणभारो अनवइम्मि ॥ अह कालविसमईसमयसेण तुझं पमाघदोसेण । तवनियम-किरिय-विजारहियं दट्टण नियगच्छं ।। चिंतइ सुगुरू कमुवायमित्ति देविषयणमिति उच्छलियं । इगचित्त मंतराओ एगंते शायगो होड ॥ अविलतयविहिपुब्वं छम्मासं जाय नरिमंतस्म । जावो लक्खपमाणो साहणजोएण तेण कओ। पयडीभूया देवी नमिऊण गुरुं पभासए चयणं । सयले समीहियं चिप भविस्सई गच्छदित्तिकरं ।। तत्तो दिवसे दिवसे वह सोहम्गउम्गकिरियाए । रविपरि धम्मपयायो अह विहरइ महियले कमसो।। १७० १७४ १७५ १७६ श्री वीरवंशपधच ली-अपर नाम विधिपक्ष गच्छ पट्टा वली ११७ १७८ १८० १८१ १८२ १८४ बहुसीसलद्विवसओ पडियोहिय देइ भविय चारित्तं । पंचसई परिवारो गणमज्झे भासए चि गुरू ।। अह नाणी(ण)नयरमज्झे धणकंचणरयगरिद्धिय समिद्धो। सिरिवयरसिंहनामो निवसइ सो पोरवाडकुले । नालूयरसरहंसो चउदसतियअहियवच्छरे जम्मो । दहउत्तरि चारित्तं सुमेरुतुंगो मुणी नाम ।। गुरुपयपंकयलीणो भूओ बसच्छसत्यपरिकलिओ। छच्चीसे सरिपयं सावयजणविहियउच्छाहं ॥ सिरिगुरु माहिंदसिंहो विहरिय भुयणम्मि पट्टणे पत्तो। संवच्छरपणयाले सुहझाणो सो दिवं पत्तो। मिच्छत्ततिमिरनासण अहिणवगुरुमेरुतुंगदिणराओ। जाओ गणवइभारो पणयाले हरिसकल्लोले । गुज्जर-सिंधु-सवालख-मरहट्ट-कच्छपे वा वि । मरुमंडल-मेवाडे मेवाए संभरीदेसे ॥ सव्वत्थ अप्पमत्तो तह विहरइ भविययोहणट्ठाए । सियमिलियदुद्धरससमदेसणक्यणेण महुरेण ।। मिच्छतं उच्छिदिय सम्मत्तारोवणम्मि संठविया। सयसहसा सुयविहिणा गुरुणा सुस्सावगा विहिया ॥ सुहझाणइद्धचित्तो निसीहसमये सया वि उस्सग्गे। साहेइ मंतरायं तहिडिया किंकस देवा । जंज गणस्स कर्ज उप्पजइ तंतहा वि तक्कालं । साहंति ते चि गुरुभत्तिलीणचित्ता य महिमाए सिरिसित्तुंजयचेय मज्झे दीवान चंदुओ लग्गो। जाणिय देसणमज्झे चोलिअ मुहपत्ति उल्हविओ॥ दूरट्टियाचि चंदा गुरुभहणीवंदणस्थभिगहिया। सुरकयपहाववसगा एवं बंदिय घरं पत्ता। जीराउलिपासम्मि य पेसिय गीयंसयीयगम्भ?) च । तयहिडियदेवेहिं सगगुडिया पेसिया गुरुणो। वाहडमेरे नयरे परचकागमणओ जणा भीया। गुरुझाणवसदेवेहिं उपसमिया वेरिणो सन्ये ।। १८५ १८० १८७ १८८ १८९ १९२ विविध गच्छीय पट्टा वलीसंग्रह १९५ १९८ १९९ तिमिरपुरे रयणीए लग्गा अग्गी निरग्गला यहुला । झाणयले उल्हचिया सब्यो लोओ सुही जाओ। लोलाडगामि गुरुणा काउस्सग्गट्टियस्स रयणीए। कालभुयंगम इसिओ झाणे जाओ निस्वसग्गो।। एवं पपडियअइसयसयसहसो भूयलम्मि विहरतो। पन्नासाहियपणसपभविआण देह चारितं ॥ पणदह सिरिपयठविया सूरि-उवझाय-महतराईया । अन्ने वि वायणारियपमुहा य गुरूहिं पणयाला ।। एवं विहिपहवंसियजिणमयदीचो य मेग्तुंगगुरू । चउदससत्तरिवरिसे खंभपुरे परभवं पत्तो ।। तप्पयधरगुरुराओ जयकित्ति मुणिंदचंदगणतिलओ। तिमिरपुरे सिरिवंसे भूपालो घसइ ववहारी ॥ भरमादेवी भन्ना उयरे जाओ य तत्थ वरकुमरो। चउदसतेतीसइमे, पवढए बीयचंदसमो॥ इगलेणेब(? गवणे) चरित्तं गहियं जपकित्तिनाम संठवियं । गुरुपयपंकयलीणो अवगाहइ सत्थसत्थं च ॥ छासढे सूरिपयं इगुहत्तरि गच्छनाहपयमतुलं । सिरिपोपसंघवइणा कउच्छवो हरिससंपुण्णो॥ पनरस सि(सु)रिपयसंपय काऊणं भूयलम्मि विहरतो। पणदहसए य वरिसे पट्टणनयरम्मि सग्गि गओ॥ तप्पयउदयाचलचरनवदिणराओ गणाहियो जयउ । सिरिजयकेसरिसूरी नामेण य पाविया पुहिवी ॥ धाणपुरे सिरिवंसे देवोपम देवसिंह पवहारी। सुररमणीरूवसमा लाखणदेवी य तस भना॥ अन्नय निसीहसमए सवणे सिंह निरक्खए सा वि। को वुत्तमजीव सुओ चउदसइगुहुत्तरे जाओ (2) ॥ नामेण य धनराओ दिणे दिणे सो वियड्ढए यालो । पन्नायपुद्धिजुओ किर पुब्वन्भासवसग व्व ॥ पणहुत्तरि चयभारो जयकेसरि नाम उपिय मुणिरायं । धोवदिणे सुयसायरमवगाहिय पारओ जाओ। चउदसचउराणूए राउलसिरिगंगदासवयणेण । सिरिजयकित्तिगुरूहि दिण्णो सूरीसपयभारो ।। २०१ २०२ २०३ २०५ २०६ २०७ २०८ २०९ २१० २११ २१२ २१३ २१४ श्री वीरवंशपावली -अपरनाम विधि पक्ष गच्छ-पट्टावली एगाहियपन्नरसे बरसे गणभारधारणसमत्यो। सिरिवीरनाहमवणे पाचागिरि-चंएयपुरम्मि। सालावइ संघवई कालागर कुणइ उच्छयो तत्थ । सिरिवीरवंसपट्टे ओयणसट्टम्मि सो ठविओ। सो नवदीयो दीवइ मिच्छत्तमहंधयारहरणपरो। सिरिजिणसासणहारो जयकेसरिरिंगणहारो॥ ज किंचि सत्यलेसं चउविहसंघस्स मज्झि बच्चे हैं। ता नियगुरुपयलग्गयरयस्स फासप्पभावाओ। जीहा कोडिसहस्सं जइ वि भवह पुब्धकोडिसमआउं । सुरगुरुसमकविराओ तय न धुणइ सुगुरुगुणकिति॥ कविकुलकोकिलकेलीकरणाहारेगसारसहिगारो। परवाइविपडवारणअहिणववरकेसरिसमाणो। पहुबुद्धिरिद्विसिद्धी विणेयलद्धीसमिद्ध गुणबुद्धी। जस जसपडहो बज्ज गज्जइ कियभूयलो मेहो । जे तक्कवियक्ककला कक्कसमइणो वि के वि कव्वकरा। जे सव्वसत्यकुसला ते गुरुपयपंकजे लीणा ॥ एवं विहरंता वि हु अणहिलवरपट्टणम्मि संपत्ता। तत्थथि ओससे सोवपिणय जावडभिहाणो । पूरलदे वर भाजा सीलदयाहारधारणे सजा तिस उयरे उपन्नो चारसछच्युत्तरे जाओ ॥ सोनाभिहाणकुमरो पणतियजणमित्तमजिश रमलिकरो। बारुत्तरि वयभारो गुरुकरकमले य संगहिओ ।। सिद्धतरुई साह मणहरमुणिमंडलीमउलिमउडो। पभणइ सुगुरुसमीवे थोवदिणे सधसत्थाई ॥ गच्छवइभारजुग्गं मुणिय उवज्झायसंपयं पुव्वं । दत्तं तत्थ य पिउणा चमक्किओ उच्छवो विहिओ। सूरिदुग सत्त पाठग महत्तरा दसह सिरिपए दाउं। सिरिजयकेसरिसूरी थंभपुरेलकिओ लत्तो।। पोससुद्धट्टमीए पालिय बावत्तरि च परिसाउं । आराहणाइपुव्वं इगयाले सो दिवं पत्तो। अह चाविहसंघेण वि मिलिय महानंदपूरिएण सम। अहमदपुरवरमज्छे फरगुणसुद्धस्स पंचमिए । २१६ २१७ २१८ २२२ २२४ , २२६ २२७ विविध गच्छी य पहावलीसंग्रह सरिपयगच्छभारो विओ सिद्धतसापरगुरूण । सिरिवंसाभरणेण य हंसेण कओच्छचो तत्थ ॥ सिद्धतसागरगुरू समग्गसोहग्गरंगलीलाए । विलसइ सासणमज्झे सजणमणरंजणवियड्डो॥ विहरइ वसुहापीठे पुर-पट्टण-नयर-देस-परदेसे । धम्मोवएसरविणा बोहइ सो संघपउमाई ।। नियपयडपयावेण य किरियज्झाणेण महुरवयणेण । एकग्गभत्तिजुत्ता सेंबंति चउब्धिहा संघा॥ अणहिल्लपट्टणम्मि य सही परिसे गुरू विमलझाणे । प? णपण्णवरिसआई पालिय सुरमंदिरं पत्तो । अन्ज चि तत्तैय कलापहाववसएण अंचलगणिदो। दिप्पइ दिवसे दिवसे सविसेसपहापाकिरियाए । जाव सिरिवीरतित्थं जावय गयणंगणम्मि रविचंदा । ताव जिणसासणम्मि य विहिपक्खगणी चिरं जयउ॥ इतिश्रीभावसागरसूरिचिरचिता वीरवंशपट्टानुगा गुर्वाचली समाप्ता ।। २२८ २२९ २३० २३१ [भावसागरसरिपरिचयगाथाः] सिरिभिन्नमालनयर सिरिवंसे सांगराजओ साह । सिंगारदेवि भन्ना तस्स सुओ भावडो आसि ॥१ विक्कमपन्नरसोलोसरम्मि जम्मण महामहोच्छाओ । पीसइमे जयकेसरिरिकरे संजमो गहिओ॥२ सो भाषसायरमुणी पढेड गुणई य बहुलगंथगणे । थोयदिवसेहिं पत्तो पारं सो आगमोहहणो ॥३ तो ते भारंगेण चविहसंघेण ठाविआ गुरुणो। मंडलिनयरे सहियसंवच्छरे मासि वयसाहे ॥४ पोदयगिरिरविणो गणवइसिद्धंतसागरगुरूणं । विहरति भावसायरगुरुणो सुरमरिसमसोहा ॥५ अइसइरासि तेसिं कहमवि सक्को न चण्णिउं सक्को । गूडीपासो जम्हा पए पए कुणइ साहनं ॥ ६ पच्चुप्पण्णमणागयं च समयानीयं च जाणति जे, जेहिं झाणवलेण कट्टपडिया बुज्झाविया साविया । जेसि कित्तिभरो य निज्झरयरो भूमीयले विहरइ, ते वंदे गुरुभावसायरवरे सूरीसरे सव्वया ॥८ जेसिं झाणवलेण पुत्तपडलं पामति चंझा अवि, जेसिं पाणियले वसंति सयला लदी य सिद्धी सया। जेसिं पायरयप्पसायवसओ लच्छीविलासो हवइ, ते वंदे वरभावसायरमुणी सूरीण चूडामणी ॥ ८ ।। शुभं भवतु ॥

जे-कहिछइ जूऊ, अनइ मार्ग जूओ दीसइ छ।। कडुआमतीगच्छपट्टावली। परमगुणनिधये एकोनपश्चाशत्तमयुगप्रधानपदधारिणे श्रीजिनचन्द्रसूरये नमः ॥ [श्रीकटुआचरित्र] कडूआमतीना गच्छनी वार्चा पेढीबद्ध यथाश्रुत लिखीइ छइ- नंडोलाईग्रामे नागरजातीय वृद्धशापायां महं श्री ५ कान्हजी, भार्या बाई कनकादे संवत १४९५ वर्षे पुत्र प्रस्तः । नामतः महं कडूआ, वाल्यतः प्रज्ञावान् । स्तोकदिने माईप्रमुख सूत्रांतणी चतुरपणइ आठमा वर्पथी हरि- इरना पदबंध करइ। केतलइकि दिनांतरि पल्लविक श्राद्ध मिल्यो । तिणि कहिउं जे-'तुझे हरिहरना पदवंध करउ छउ तिम काई जैनना मार्गर्नु जोडु तो वारू छइ ।' पछइ जैन एहयो शब्द सांभली जीव आनंद पाम्यो । कहि जे- 'मुझनई जैनमार्ग सांभलबउ छइ ।' ते आंचलीआन श्रावक पोतानई उपाश्रयि तेडी गयो । तिहां तिणि वेषधरि केतलीइक वादर वा रूप देशना दीधी। ते सांभली चित्तनई विपद धारी, पछइ ते वा रूपनी एक सज्झाय माइ यापनी कीजइ भगति, विनय करंतां रुडा युगति । जीवदया साची पालीइ, सील धरी कुल अजूआलीइ ॥ इत्यादि सज्झाय सर्वत्र सांगतं प्रसिद्धाऽस्ति । तिहार पछी तेहनइ उपाश्रयि जातां सांभलतां वार्ता हृदयनई विषइ आवी, जे संसार असार छइ, अनादि काल थयु जीव निगोदि निवसिउ। एक श्वासोश्वासि सतर वार मरी अहारमी वार ऊपनु । एक वि घडीना महुर्त्तनई विषइ ६५५३६ वार मरह, ऊपजई। इम अनंता पुद्गल थयां रलतां तोडं जैनमार्ग टाली पार न पाम्यो । तउ हवइ हुं दीक्षा अंगीकरुं । एहचुं विचारी माता पिता पति कहि जे- 'मई दीक्षा लेवी । ते मिथ्यात्वी वार्ता सांभलि अशाता पाम्यां । महं कडूअइ घणो आग्रह कीधु तोहि पणि आशा नापइ । तिवारइ कहि जे-मई विण आज्ञाई दीक्षा लेगी।' महं कान्हजी ते गाम मध्ये देशाई, शत एक अश्वना धणी, सर्व तेथी वीहइ । मोटाना पुत्र, विण आशाई को दीक्षा दिइ नही। मई कहा अतीव वैराग्यवान्, संसार अपरि चित्त आवइ नही । वापि अनेक धन धान्य अश्व प्रमुख अनेक मकारि लोम देपाडयु पणि ते भीरान पित्त सर्व असार अशाश्वत अध्रुव इम जाणइ । उदासीनपणइ रहइ । माता पिता उभगां थयां, कुमरनी रक्षा करवाया मनुस्य मुंक्यां । केतलइक दिनांतरि तेहुनई डोत्री आर्द्रकुमरनी परि नंडोलाईयो अहम्मदाबादि संवत १५१४ भाव्या । जन्मतः वर्ष १९ ना छइ, पणि तेणि कालि चैत्यवासी मठपती घणी। महं का चिचमा विचारह कीधी। सा इमा- १ १२२ विविध गच्छीय पहावली संग्रह इम करतां अहमदावादनुं परं रूपपुर एहवइ नामि छ । तर आगमीआनु पुन्यास हरिकीति एहवइ नामि । यणा वेपघर जोतां, संवेगपक्षी शुद्धपरूपक पोताना गच्छनी निष्ठा मुंगी एकाकीपणइ क्रियाकलाप करइ । आहा- रनी गवेक्षा(पणा) करइ । घांदवा आनई से पाद दाइ पणि मद्दी । यतीना गुण चित्त धारई । तेटनी लापमी पांतीमई थकी नथी, तउ किम चंदावू ?। ते पुन्यास हरिकीर्ति रूपपुरमध्ये शून्यशालाइ रह्या छड् । तेहयइ महं कडूआ तत्र आव्या । तेहना आचरण देपी शाता पाम्या । बांदया लागा त्यारई वांदवा दीया नही । यतः श्रीउपदेशमालायाम्-- 'बंदइ य चंदावह किइकम्मं कुणइ कारवइ ने। अत्तहा न वि दिक्खो देइ सुसाहण बोहेडं ॥' विहां रहितां विचायु जे ए वारू, पछइ पुन्यासनई कहि जे-'मुझनई दीक्षा दिउ।' त्यारह पन्यास कहि-'तुझे कुण छउ?" पछइ पोतानी वार्ता थडावद्ध सर्व मांडी कही । पछइ पन्यासि विचारि जे को चोपो जीव दीसह छइ । हल्लुकी प्रत्येक संसारी दीसइ छइ । जे दूमम आरामां एवडी रिद्धि अंडी दीक्षानु परिणाम आव्यो छइ । तो जो हुए धणीनइं दीक्षा नही देउ तउ कउ कपटी पासत्यादिक पांच मध्येनउ छेत्री संसार मध्ये बोलसिइ । ते मार्टि ए जीवनी जिम गरज सरइ तिम करूं।' त्यारह मई कडूमा प्रति कही जे-'दीक्षानु भार मतु लइन आगलथी दशकालिना च्यार अध्ययन भणउ ।' त्यारइ कहइ-बारू मुअनड ते भणावो ।' पछइ पन्यासि धम्मो मंगल- मुकिट्ट' इत्यादि छ जीवणिया पर्यति च्यार अध्ययन भगाच्या । अग्रेतन ६ अध्ययननउ अर्थ संभलाबु । पछड़ मई कहइ पन्यास प्रति वधु-'पुन्यास ! आ मार्ग सिद्धांतोक्त आयो दोसइ छइ । सांपत आम कां ?' पछइ त्यार पन्यासई कथु-'हनी तुमो भणउ सांभलउ । पछइ वार्ता करीसिइ ।' पद महं कभइ पन्यास पासई सवी शास्त्र अभ्यशा । सारस्वत, काव्यशास्त्र, छंदशास्त्र, चिंतामणि प्रमुख बादशास्त्र आचारा[गा]दि ११ अंगना अर्थ धार्या । उचाई प्रमुख १२ उपांग, छ छेद, दि]स पदन्ना, च्यार मूलसूत्र, अनुयोग, नंदीमत्र-एवं ४५ सूचना अर्थ धारी भवीण थया। निजुत्ती, भाप्य, चूर्णि-पंचांगी पीछचा । गीतार्थ श्रावक थया । श्रावस्नई गीतार्थ कहीइ ते अधिकार राजप्रश्नोत्तौ चिनाधिकारे। पछइ पन्यास कहा-'वच्छ ! यतीनु भारग आचारांगादिक सूत्रनई विपई का, ते हमणा आ देशनई विषइ नयी दीसतो । ए. सर्व पतीत ढोणां पूजणां यतीनी प्रतिष्ठा, कल्पित दान तप प्रमुख घणां वानां, पोथी पूजणां चैत्यना रपवाल थाइ] रह्या छइ । ते सांगत दस अछेलं जाणवू ।' यतः श्रीठाणांगे- 'अर्णतेणं कालेणं दस अरगं भविसु, ते जहा-उवसग १, गन्महरणं इत्यादि । असंजयाण पूया असंयता।" 'असंघमवन्त आरम्भपरिग्रहमसक्ता अवमपारिणस्तेपु पूजा-सत्कारो असंयतपूजा। सर्वदा हि फिल संयताः पूजार्हाः । अस्यां त्यवसपिण्यां विपरीतं जातमित्याश्चर्यम् ।' यया संघपटके- मैषा हुंडावसपिण्यनुसमयहसद्भन्यभाषांचा)नुभावात निशच्चोनो ग्रहोऽयं खनव-नग्वमिति वर्पस्थिति(नौ) भस्मराशिः। । - . Tr - पकृत्वस्त्रिविधं विदेत्यनुदिनं मोच्यापि भञ्जन्ति ये कडु आमतीगच्छ पावली अन्त्यं चाश्चर्यमेतद् जिनमतहतये यत्समा दुःपमा वे- त्येवं पृष्टेषु दुष्टेष्वनुकूलमधुना दुर्लभो जैनमार्गः ॥' पुनः पष्टिशतमकरणे- 'संपय दसमच्छेरयनामायरिएहि जणिय जणमोहं । सुहधम्माओ निउणा विचलंति बहुजणपवाहाओ ॥ वृत्तौ संपति दशमाश्चर्य सोममुंदरकृतायाम् । तथा महानिशीथि पणि एह ज १० अच्छेरां वखाण्यां छइ । अनंती चउवीसी उपरि एह हतुं के हवडां छइ, अनई भगवतीसूत्र मध्ये तो भगवंति का छइ-'माहरु धर्म एकवीस सहस वरस लगईं निरंतर चालसिइ अविच्छिन्न परंपराई।' यतः भगवतीसूत्रे श०२०, उ०८- 'जंबुदीवे णं भंते दीवे भारहे वासे इमे(मी)से ओसप्पिणीइ देवाणुप्पियाणं केवति काले तित्थे अणुसज्जसति?। गो०-जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए ममं एकवीस सहस्साइंतित्थे अणुसज्जस्सति। ते मार्टि युगप्रधाननउ विहार उत्तर दिशि विषइ ज्याणवु । अत्र तउ श्रीवज्रसेन एकवीसमा युगप्रधाननी एक चंद्रशाखा जाणवी । ते केतलइ कालि रसगारख्या पतित यया । यत:-श्रीमहानिशीय सिद्धांति वीरि गोतम प्रति कहिउँ छइं-'जे मुझ थिकी साढां वारसई वरसि १२५० गई पासत्था थासिइ ।' सूत्रम्- 'सेभयवं! केवइएक कालेणं पहे कुगुरु भविहिति? गोयमा! इओ य अद्धतेरसहं वाससयाणं साइरेगाणं समइपंताणं पुरओभवेसुं। से भयवं! केणं अटेणं? गोयम ! तक्कलं इढिरस-सातारसगारवसंगए समीकारग्गीए अंतो संपलित योंदी अहमहंति कयमाणसे अमुणी(णिय)समयत-(स)भावे गणीभविंसु एएणं अटेणं।' 'इत्यादि द्रव्यलिंगी मिथ्यात्वी जाणवा । ते मार्टि दीक्षा लीधानु लाग दीसतु नथी । मई लीधी पणि तेहयो संघाडो नयी जे हुँ पालुं । भगवंति का छइ-'ये व्रतभंगी पाहि पाटिकी वारू । यतः-'चरं स गउ' इत्यादि । व्रत मंगीनां तप संयम क्रियाकलाप फोक जाणवा । यत:- 'सारम्भपरिग्रहस्य गृहिणोऽप्येकासनं ह्येकदा प्रत्याख्याय न रक्षनो यदि भवेत् तीव्रोऽनुतापस्तदा । . तेषां तु क्च तपः क्च सत्यवचनं क्य मानिता क्व व्रतम् ।।'

- ७ १२४ विविधगठीय पहायलीसंग्रह तथा पीरि महानिशीथनई विपई कहिंउ छइ जे, आवति कालि सरिमंधारी एना जइसि जे येहनई नाम लीधई प्रायश्चित्त लागइ । यतः पर ३९ मइ- भूए अणागए काले केई होहिंति गोयमा सूरी। नामग्गहणेण वि जेसि हुज्ज नियमेण पाछित्तं ।' इत्यादि शास्त्रि घणा पदार्थ छ । तुह्मो सन जाग छउ । ते बती तुझे दीक्षानु भाव करो छो ते साचु, पण तेहबउ हवडा लाग नयी दीसतो। पासत्याना प्रबल मध्ये दीक्षा रिम पलइ, अनई श्रीयुगमधान खउ शाखि पंचम आरानई पिपई वि सहस्र अनई च्यार २००४ अधिक वसाण्या छइ । यतः श्रीपाचनसारोद्धारसूत्रे- 'जा दुप्पसहो मरी होइंति जुगप्पहाण आयरिया । अन्नसुहम्मप्पभिई चउरहिया दुन्नि महस्सा ।' वृत्ति-इहावसप्पिण्या दुष्पमावसानसमये द्विहस्तोरिकृतवपुर्विशतिवर्षायुष्कपुष्कलः तपाक्षीणकर्मतया समासन्न- सिद्धिसौधः शुदान्तरात्मा दशवकालिकमात्रधरोपि चतुर्दशपूर्वधर इव तु शक्रापूज्यो दुम्मसदनामा सर्वान्तिमसरि- भविष्यति ततः तं दुःप्रसहं यावत् तं व्याप्यैवेत्यर्थः। आर्यसुधर्मप्रभृतयः आराव सर्वहेयधर्मेभ्यो र जाताः । आर्य- सत्त्वोऽसौ मुधर्मस्तत्मभृतयः। प्रभृतिग्रहणाच जम्यूस्वामि-प्रभव-शग्यम्भवाद्या गणधरपरम्परा गृह्यते । प्रधानास्तत्काल प्रवृत्या परमेश्वरमवचनोपनिषद्वेदित्वेन विशिष्टतरमूलगुणोत्तरगुणसंपन्नत्वेन च तत्कालापेक्षया भरतक्षेत्रमध्ये प्रधाना आर्याः सूरयश्चतुरधिरसहस्रद्वयप्रमाणा भविष्यन्ति । अन्ये च त्वररहितसहस्रद्वयप्रमाणा इत्याहुस्तत्वं सर्व- पिदो विदन्ति ।' यच्च महानिशीथग्रन्ये ग्रन्थाः- 'इत्थं चायरियाणं पणपन्ना हुंति कोडिलरखाओ। कोडिसहसा कोडीसए य तहा इत्तए चेव ॥' इति तत्सामान्यमुनिप्रत्यपेक्षया दृष्टव्यम् । तथा दुप्पमकालसंघस्तवेऽपि ये सहस अनई च्यार युगमधानना २३ उदय छइ । प्रथम उदये युगप्रधान, यथा- वीसे २० ते यी अंडनवई उसपरी पर्चसयरि गुणनवई । संय सँगसी पंणनउई सँगसी छैस्तपरि अँडसयरि ।। चउणवह अद्ध()"सिअ संग चैत पनरुत्तरसयं "नित्री(त्ती)ससयं । सय पणनउई नवनवह चत्त तेवीसुदयसूरी। इत्यादि घणा ग्रंथनई विषइ छइ ते पणि आ देशनई विषइ नथी, उत्तरदिग्नई विपद संभवीइ छइ, ये मार्टि दक्षण भरताई मध्ये अयोध्या छइ, ते पासइ अप्टापद छइ । ते पणि साप[न] दोसतो नथी । अनई गौतम तु तत्र जै आव्या । श्रीआवश्यफ चूर्णि-उत्तराध्ययननियुक्तो कहिउ छइ । अनइ आपण तो जगतीनई पासि छीइ । ते माटि अयोध्या वेगली जाणवी । जगतीथी अयोध्या ११९ योजन देवा छइ । मनुष्य योज़न ४७६०० एतलां थाइ । एतली भूमि ते कुण जै आव्यो। ये यती आतलामां छइ अनई तिहा नथी । अत्र तो युगप्रधाननी वार्ता पणि नयी, मतांतर दीसइ छ। । यत:- ८ ८ १० कडुमतीगच्छ पावली १२५ 1; हुँ नन्देन्द्रियरुद्र(१९५२)कालजनितः पक्षोऽस्ति राकालितो वेदाभ्रारुणकाल(१२०४) औष्ट्रिकभवो विश्वार्क(१२१३)कालेऽन्चलः। पत्र्यपु(१२३६) च सार्द्धपूर्णिणम इति व्योमेन्द्रियार्के(११५०) पुनः जातस्त्रिस्तुतिकोऽक्षमगलरवौ(१२८२) जाता कलौ चाग्रहात् ॥ संवत ११५९. निमीआ ऊपना । प्रथम पूनिमनी पाखी अनादि छइ, चउसिनी आचरणा छइ । तथा संवत १२०४ खरतर । संवत १२१३ आंचली। संवत १२३६ साईपुनमिआ । संवत १२५० आगमीआ, संवत १२८५ तपा ऊपना । संवत १५०८ लुंका। आपापणा आग्रहथी मत चाल्या । तउ युगप्रधान कीहा मतमा लेखवीइ। चतुःपींनी पणि आम्नाय दीसती नथी ते तो श्रीयुगप्रधान हसिइ । तिहां एक हसिइ ते मार्टि तुह्मो युगमधान- नई ध्यांनि श्रावकनई वेपि संचरी, पणइ भावसाधुपणइ वत्तों । तुझोरा जीवनी गरज सरह ।' सा श्रीकडुआ भण्या गुण्या डाहा, श्रीसिद्धांतोक्तवार्ता सर्व सत्य जाणी संवरीपणइ प्रवर्त्या । भान साधु- पणइ माशुक जल सच्चित्त त्याग अ(प)ण कराविउं । भोजन श्रावकनइ घरि शुद्ध आहार करइ । अतीव वैराग्यवान, चालब्रह्मचारी, वार व्रतधारी, अकिंचनी, ममता रहित आपणउ पारको नही । प्रथ्वीनई विपद विचरवा लागा । मथमतः श्रीपाटण मध्ये मह लींग प्रतियोध्या। सोल महर उपरांत दधिनई विपद जीव देपाडया। यत: अणदिलवाडइ पाटणि मई लीवा कगंभीआ जालहि(ह) राक्षातीय महामिथ्याती सुरत्राणमान्यगृहे अथ [मुख अनेक रिद्धि, ओगणच्यालीस महिपी, शत एक अश्व केडि चढता इत्यादि घणी संपदाना घणी । संवत १५२४ वर्षे साश्रीकडूआनु योग मिलिउ । विरागी जाणी घरि तेडी पधार्या । घणी आगति सागति कीधी। भोजननई अवसरि पक्वान्न मीसवा लागा त्यारइ काल पूछिउ, उपरांत जाणी न लीयां । पोली वांसी न कलपइ, राति करी न कलपर, ओदन []त्रि वासी न कलपइ, साल' अत्थाणुं न कलपइ-इम घणां वानां न कलपई । त्यारह महं लीवा कहइ-'जे पूज्ये ! दधि साकर वावरउ ।' त्यारह सा श्रीकडूआ कहि जे-'पूज्य! केतलु काल थयु ।' तउ कहइ-'अह्मारइ घरि ओग- गच्यालीस भईसि छइ, तेहनी सी नरति जणाइ । पछइ सा श्री कहइ-'अलारइ पोडश महर उपरांत न कलपइ ।' पछइ मई लीवा कहि जे-'पूज्य ! सर्वमध्ये जीव कहउ [3] ध मध्ये पूरा काडो छो । उपाणी साचउ करउ छड, नउ दघि मध्ये जीव देपाड तु हुँ जैनधर्म करं ।' त्यारइ सा श्रीकहइ तत्र दांत रंगवानी पोथीनई योगि आतपि दधि मुंको जीव देपाड्या । मह लीव जैनधर्म साचो जाणी सा श्री पासइ मर्म पीछी समकित ऊचरिउं । रात्रिभोज- न पचयाण कीधु । घर मध्ये २७ घडा दहीना इता ते वोशराव्या । बीसँई घर साथि श्रावक थया । पोतानी पीटणीई चोमा राप्या । घुहरा धनराज परी कीकाना पितामह प्रतियोध्या । घणां घर साथि आव्या । घणां घर पाटणि थयां। - संवत १५२५ वीरमगामि घणा प्रतियोध्या । चतुर्मासक घर शत ३०० मतियोध्या । प्रत(तत्र) चैत्यवासीई सा श्री ऊपरि घायक मुक्या । सा श्री आसोईनी राति पोसह कीधु छ । पेलु पणि पासि रह्यो छ । सा श्री संथारा पोरसि भणावी १२ भावना भावी, संधारइ शयन कीर्छ । पैलो पायक ताकी रहिउ छइ पण सा श्रीनी पुन्याईनई मेलाई तेहनउ हाथ ऊपडइ नही, विचारवा लागो एतलइ जालानुं अआलं सा श्रीना शरीर उपरि आन्यु । सा श्री पाइं पालटचा वेला चरवला वडा पुंजी पासउं पालटिउँ । धापकि दीटुं, धन्य ए जे सतां जीव पालह । पापी १२६ विविधगच्छीय पावली संग्रह काम करूं छउं। आवी सा श्रीनई पगे लागउ । सा श्रीई पूछि-'तु कोण?' सबली पार्ता पोतानी कही। साश्रीना बचनयी प्रतिबोध पाम्यु, त्रस इणवानुं पचरसाण कीर्छ । " संवत १५२६ सलपणपुरि चतुर्मासक, तन पणां मनुष्य प्रतियोध्यां । पछइ सलपणपुर मध्ये चुहरा पहिरान ते बोहोरा अटोल घेताना वडेरा प्रतिबोध्या । तथा सा लाडण पोपाना बढेरा उसवाल प्रतियोध्या । इत्यादिक १५० घर आदि घर १५० थयां । तत्रतः संवत १५२७ सूर्यपुर चतुर्मासम् । तर २०० घर प्रवियोध्यां। तत्रत सेपद कालि घगइ गामि प्रतियोध्यां । कडी प्रमुस सघलइ गामि सा श्रीकडूआनु समवाय प्रवत्यो । संवत १५२८ वर्षे श्रीश्रदम्मदाबादि चतुर्मासक । तत्र दोसी देवरना बढेरा मतियोध्या। तेणीनी पीटीई देहरासर स्थापन, वितरदोष निवर्यो, तत्र-" रिसह जिनवर मूरति तुह्म तणी" स्तवनं कृतं । दोसी सोनाना वडेरा प्रतिवोध्या। परीप रीड़ा सा श्री पासि वारू भणी, पारी बना पितामह सा चउथाना वडेरा प्रतियोध्या। सा मुलानो पिता मतियोध्यु । महं आणंदना बढेरा इत्यादि घर शत ७०० शासाई मतियोध्यां । संवत् १५२९ स्तंभतीथि चतु- मांसफ । तत्र सोनी लाडणनु पिता प्रतिवोध्या । ते धणीई सा श्रीनइ पोतानई घरि राप्या । सा श्रीनी वाणी सांभूलवा घणा मनुस्य आवइ, नगरमध्ये घणो प्रभाव चाल, ते नगरमध्ये सोनी हका रामा, सा रामा प्रकृति संताऐं दिन प्रति पोतानी मातानई गालि प्रदान ताडण पणि करता । पछइ बाई आवी सा श्रीनई वीनती कीधी जे- पूज्यनी चाणीयी घणा मानव प्रतिबोध पामइ छइ पण रामानई प्रतियोघो तो वारू, जे मावानी भक्ति करइ ।' पछइ बीजइ दि[व]सि सा श्रीनई व्याख्यानि सा रामा आवी बइठा । सा श्रीई व्याख्यानमां मातानी भक्ति करवानी वार्ता परूपी । श्रीठाणांगना आलावा परूया, अणिना गुण ओसीकल न थाइ । ते वार्ता सा श्रीना मुखयी सांभली पचखाण कीधु, जे मातानई गाल न देउं । घरि आवी मातानी भगति कीधी । सा श्री पासि घणा मनुस्य साथि समकित ऊचिरिउं । पोवानी पीटणीइं सा श्रीनई राप्या । त्रीजइ मालि देहरासर स्थापन। सा श्रीई विचमवेश कीयो। घणो उच्छव, सांमति ते जागि, सख त्रीजइ मालि छह । सा मूलानु पिता संघवी श्रीदत्त पिता, संघवी संग्रामस्य पितामह, सोनी शिवा पितामह, तथा सोनी लाडण पितामह, सो० रौंडा पितामह, सो० विमलसी पितामह, संघवी लडू पितामह, जयवंत पितामह इत्यादि घणी शाखाई घर शत ५०० मतियोध्यां । पार्धवर्ती कंसारीग्रामे दोसी छांछा, दोसी पोमरही, पासी सहिसा प्रमुस घर शत प्रतिबोधितवान् । संवत १५३० मांडव चतुर्मासक । तत्र चैत्यवासी साट्टै घणी चरचा, घर शत ५०० प्रतिवोध्यां । एवं सर्वत्र प्रतिबोधता संवत १५३१ सूरति चतुर्मासक । तत्र घणो वाद, सा श्री पुन्य घडूं, सबलइ जयपताका, घणा प्रतियोध्या । संवत १५३२ भरुअछि चतुर्मासक । तत्र चैत्यासीई घणां था(वा)नां कीयां । एक चैत्यवासीई चेलं मोकलं । सा श्रीनई पासि आवी काई कुविद्या जपवा लागु । तत्र थंभा, सा श्रीना बचनथी मुंका- [णु घाणा नई प्रतिवोध्या । संवत १५३३ चापानउर चतुर्मासक । तत्र चुहरा कान्हा परि राज तथा साह इसा गड्या लड्या चोथाना बडेरा प्रतियोध्या, सांप्रति जेहना परिवार राजनगरे छे, तथा महं रतनाना वडेरा यस्य संतानी महं वीरजी राघजी इत्यादि वारहीइर शत ३०० मतियोधितः । तथा थरादि सर्व लपक हतुं, ते सर्व सा श्रीना कागलथी बल्यु इति रद्धवाद स्थिरपन(द) घर शत ९०० थयां । .

-- - . माव संवरनु पप करइ ते एतला बोल पालइ- फडुआ मतीगच्छ पधावली। संवत १५३६ राधनपुर तत्र घणानेई प्रतियोध्या । संवत १५३७ मोरवाडि सोहीगाम प्रमुख संघलई प्रति- बोधित । संवत १५३८ सघलइ विचर्या । संवत.१५३९ नंडोलाई मध्ये रूपि भाणा ढुंगा साथि वाद कीधु । सिद्धांत नई अक्षरि प्रतिमा यापी । यतः श्रीभगवतीमूने शत०२०, उ०९- 'कतिविहा णं भंते! चारणा पत्नत्ता? गोयमा ! दुविहा चारणा पत्नत्ता, तं जहा-विजाचारणा य जंघाचारणा य ।" इत्यादि-आलावा छइ । वयती हुता नंदीसर रुचिक]नां चैत्य बांदइ । तिहाथी आवी अहीनां चैत्य वांदइ । फट भगट अक्षर छइ-'इह चेइआई बंदड़।' तु महानुभाव जे तुझे कहु छ कुगि श्रावकि चैत्य कराव्यां ते देषाडु, पण अहीनां अशाश्वतां चैत्य पांद्या, ते कईना कराव्यां ते कहु तपा कुणि श्रायकिं प्रतिमा पूजी, देपाडउ ते पण मूल सूत्रना अक्षर सांभलं ज्ञातामध्ये- 'तते णं सा दोबई रायरव(वर)कन्ना । जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइत्ता, मजणघरं अणुपविस विण्हाया, कयलिकम्मा कयकोउयमंगल्लपायच्छित्ता। सुद्धप्पविसाई मंगलाई वत्थाई परिहियाई मजणघराओ पडिनिक्खमइ, पडिनि- क्खमित्ता जेणेव जिणघरे तेणेव उवागच्छइजिणपडिमाणं अ(आ)लोएइ, पणाम करे। पणामं करेता लोमहत्त्वं परामुसह, एवं जहा सूरीआमो जिणपडिमाणं अच्चेइ ति तहा भाणियब्वं जाव धृवं दहाइ, वामं जाणुं अंचेह, दाहिणं जाणु धरणितलंसि निवेसेइ। निवेसइत्ता जाव पच्चुन्नमई करयलजाव एचं वयासि नमोत्यु णं जाव ठाणं संपत्ताणं, बंदइ नमसइ जिणघराओ पडिनिक्खमह ।' इत्यादि तो ए प्रासादप्रतिमा जैननी भरावी, कह मिथ्यातीनी भरावी ? उडे विचारयो । अब लुपफ साथि पणी वार्ता छइ, तथा राजपनीय सूर्याभे सतरभेद पूजाई भगवंत पूज्या, ते विस्तर छइ, तथा वृत्ती भावकनई चंदनाना अधिकार, आणंद श्रावक आदि देई १० श्रावक, तया अंबडनइ आलायइ चैत्यशब्दि जिनमति]माना अधि- कार इत्यादि घणी युक्ति ऋपि.भाणानई जरजरू कीधा । लुकानां घर १५० वाल्यां । संवत १५४० श्रीपत्तने चतुर्मासे(स)क तन परी पुंनइ घणा घर साथि सा श्रीनां वचन सद्दयां । भणसाली सोना, भणसाली जीवरान, भणसाली देवाना वढेरा प्रतिबोध पाम्या । एवं पत्तने घर शत ९०० सा श्रीकडूआना सम- वायनां थयां । मह लीवानी पीटीई ५०० शत पोसा, तथा ता इति दृद्धवाद । तन सा पीमाभमुस ४ श्रापक, संबरी सा श्री पासि थया, तेहाना] नाम सा पीमा १, सा तेना २, सा कर्मसी ३, सा नाफर ४, द्वादश १२ नतधारक सा श्री कृत १०१ योल्ना पालक, ते बोल लपीइ छ । संयमार्थी संघरी गृहस्थनई वेसि रहितउ दीक्षानु . १ प्रथम दीसि नीची दृष्टि हीडइ । २ रानि अणपुंजि न हीडइ, पंडिल वर्जी बीजइ कामि पोटा कारण टाली न नाइ । ३ हीडतो वार्ता न करइ, को वार्टि प्रश्न पूछइ तैइनह एक बोल कहइ, वणी वार्ता स्थानकि यररी। ४ सञ्चित्त आहार न जिमइ, औषधवीं । ५ पाछिली पादिली यि यही पठी चउविहार करता r १२८ विविधगण्डीय पट्या वसी संग्रह ६ जिमतां पडसाड न पाडइ, अतिमात्र न निमई, छांडइ पण नही, अणमावतुं न जिमइ । ७ जिमतां वार्ता न कीजह । ८ विदल अन्न तथा काठ विदल टालवा । ९ छूटुं हाथथी फाई नापीइ नहीं । १० घसती किसी वस्तु पाटि पाटला प्रमुख कोई न ताणीह । ११ थंडिलनी घणी जयणा कीजइ, भूमि शुद्धप्रमुप । १२ मात्रु पुंनी नगरां प्रमुख नुं इइ तिहां परठवीइ । १३ मात्राना कुंड टाली निरोधन कीनइ, मोटा कारण टाला । १४ पाणी प्रमुस सर्व पुंजी परठवीह । १५ वचन परनई पीडा उपनइ ते, तया हास्यादिक न बोलइ । १६ काया अणपुंजी न सण, । १७ पांच थावरनु आरंभ न कीजइ । १८ तया निवाणयी पोतइ पाणी न लीजइ, लावइ ते गली वावरीइ । १९ अणगल पाणीई लूगडा न धोईइ । २० आ(आगनिनु आरंम आप कोजि(काजि) जाति न कीजइ । २१ वीजणइ वाय न पीजी । २२ वनस्पती आप काजि न छेदीइ । २३ अस जीव दूवाणइ किसी इक आसडी कीनइ । २४ नसर्नु हणवानुं पञ्चसाण कीजइ । २५ सर्वथा मृपावाद न वोलीइ । २६ चोरी तथा पीआरी अणआपी वस्तु न लीजा । २७ मानुषी तथा चतुःपदी वीनु संघट टालघु, संघट थयइ घृतनी जयणा । २८ पोतइ आपणु करी गुस्थ न रापीइ । २९ पाछिली च्यार घडी राति पछी शयन न कीजइ । ३० ऊघाडइ मुपि न बोलन, तिवारइ मुपि हाथ तया वस्त्र देई वोलइ । ३१ पहिली राति पुहरमध्ये न सू[ई] । ३२ दीइन सड, रोगातंकि मोकलुं । ३३ दिन प्रति एकाशन त्रिविहार कीजइ । ३४ गांठसही पचखाण कीजइ, शक्ति । ३५ त्रिकाल देववंदन वेलांइ उभय कालावश्यक पडिलेहणा प्रमुख कीजइ । ३६ दिन प्रति चैत्यवंदन ७ तथा ५ कीजइ । ३७ भण्या गुण्यानु अभ्यास कीजद, योडु तोहइ गाथा १ भणीइ, गाथा सई ५०० गणीइ । ३८ पासत्यादि ५ कुदर्शनीनु संसर्ग न कीजइ । ३९ सामायफ दिन प्रति घणी कीना । ४० एक विगइ दिन प्रति उपरांति नहीं। ४१ घृत सेर पा उपरांत दिन प्रति नहीं । ४२ पनर दिनमा जघन्य तो उपवास २ कीजइ । ४३ लोगस १०, तथा १५ नु काउसग पणि कीजह । ४४ एक वरस उपरांति एक ठामि पण न रहीइ । ४५ आत्माथि घर तथा हाट न करावीइ । ४६ वस्त्र न नीपरावीई, पांच उपरांत पोतइ न राखीई, गांठडी वांधी न मुंकीइ । ४७ गोदडां औसीमां तलाई न वावरीइ । ४८ पल्यंक मांची प्रमुख न सूईइ, वइसीइ । ४९ चोक जइ न वइसीइ । ५० कलसीउ १, वाडिकी १, उपरांति नहीं। ५१ रोगि लंघनं ३, उपरांति ओपध । ५२ स्वीरों एकांति गोष्ठि न कीनइ । ५३ ब्रह्मवतनी नववाडि पालवा यतन कीजह । ५४ मास दी[व]सि १ घोणी। , १२९ T कडु आ म ती गच्छ पावली :५५ एकांत संघट टालवू । ५६ च्यार कपाय न कीजइ । ५७ करखा(पा)य ऊपनइ विगयत्याग । ५८ अभ्याख्यान न दीजइ । ५९ पुंठि पाछलि दोप न बोलीइ, चाडी पणि न कीजइ । ६० न सुगंध तेल भोगार्थि चोपडीइ । ६१ द्रव्य १२ उपरांति दिन'मति न लीजइ । ६२ सोपारी पान एलची प्रमुख भोगार्थि नही । ६३ वस्त्र उत्क(?)ट निषेध । ६४ रेसमी पणि नही। ६५ पल तेल एकठां मेली न्हाण न कीजइ । ६६ हाथि न पचीइ, सचित्त न पचावीइ । ६७ नीलवणि स्वाद अर्थि न य(ज)मीइ । ६८ चौमासइ टोपरां पारेक प्रमुख न वावरीइ । ६९ स्त्री सांभलतइ राग न गाईई, राग नालापीइ । ७० आभरण न पहिरोइ । ७१ विइ पुरुष एकठा न मईइ । ७२ स्त्री सुइ तिहां निरर्गल न सइइ । ७३ लुंकानु धांन पाणी न यमीइ । ७४ देवकु द्रव्य होइनई नापी सकइ तिहां न यमीइ । ७५ लूकामतीनान्न न यमीइ। ७६ एकली स्त्रीनइ न भणात्रीइ । ७७ दहेरानी भूमिशयन न कीजइ । ७८ सगानइ काजि काई मागीइ नही । ७९ पीआरु गरथ खेइ तेहना स्वजननी विण आज्ञाई धर्मस्थानकि न परचीइ । ८० लागट दिन २ एक घरि न यमीइ । ८१ मिथ्यात श्राद्ध संवत्सरी थाइ तिहां दिन ३ न यमीइ । ८२ घेवर प्रमुख उत्कट आहार नही । ८३ सीघोडां नीला सूकां न खाईइ । ८४ डगला पहिर्यानी जयणा । ८५ परवाल देपी न लडावीइ । ८६ मुजण उपरांति जिमइ, तिहां न ज्यमीइ । ८७ कंदोईना पक्वाननी जयणा। ८८ रातिनां नीपनां अन्न निषेध । ८९ गृहस्थनई घरि बइठां गोठि न कीजइ । ९० पादत्राण निषेध । ९१ वहिल प्रमुख यानि न घइसीइ । ९२ अश्व प्रमुखि न चढीइ । ९३ मासमा एकवार नख ऊतरावीइ। . ९४ कूलिर पकवान पोतइ करावी, वासी न राखीइ । ९५ वाटिं स्त्रीशुं ऊभा रही वा हीडतां गोठि वार्ता न कीजइ । ९६ वाटि हीडी न सकइ तिवारइ यानि वइसइ । ९७ 'पंचवयण न पहिरोइ ९८ एकली स्त्रीना दमाहिं भोजन अथवा वीजइ कामि न जाएँ। ९९ सराग गीत न गावां, न सांभलवां, राग आलपवा नहीं । १०० विमर्नु संग न करखु । १०१ पारका परि जावां पुंकारी जावू । इत्यादि वीजाइ बोल जेणी वाति संवरीनई अपभ्रानना थाइ ते वस्तु न करवी, तया सा श्री कहानी कीपी पचवणों बख वाद, १३० विविधगच्छीय पावली संग्रह १०४ वोल सील पालयाना छइ, ते धरवा । अन्य पत्री मीछयो । स्त्रीनइं पणि सील पालवाना ११३ पोल छइ, ते अन्य पनि । ते वपिई सा श्रीकआ पाटणमध्ये अमर(नड)बाडद दरवाजइ बाहिरि जातां-दिन दिन एक योगी सा श्रीनई देसी घणु पुसी थयु । तेणड योगीई सा श्रीनई पराणि धणी आम्ना आपी, मंत्रनी जावरूपा सिद्धि पणि आपी इति वृद्धवाद पणि सा श्री निगर्वी एका विद्या न चलावइ । वैराग्यवंत जावजीव सा श्रीनइ एक घृत विगय मोकली दिन प्रति द्रव्य १० मोकला। पांच विगयनी अगड, जावजीव एकाशन, मास एक मध्ये आंविल १० करइ । इत्यादि घणी वातनां पञ्चसाण । एकांति श्रीयुगमधाननुं ध्यान धरइ, दीक्षानु भाव घरइ । तदनंतरि संवत १५४१ वडोदरइ चतुर्मासक सा कुंरपालगृहे स्थित । तत्र भट देपाल साथि जैन बोल ऊपरि आव्यो, तत्र घणां घर मिथ्याती टली जैन थयां, तत्र-"जय जगगुरु देवाधिदेव स्तवनं कृतवन्तः । तदनंतरि संवत १५४२ गंधारि चतुर्मासक सा देवकरणगृहे । तत्र चैत्यवासी साथि घणी चरचा, पछइ सा श्रीकडूम ऊपरि चैत्यवासीई पेत्रपाल मुंक्यो । सा श्रीना सम्यक्त्वना प्रभावी प्रभवी न सक्यो । तत्र सा श्रीई वीरस्तवनं कृतं-"सखि सार नयर गंधार गाम" इत्यादि । तदनंतरि संवत १५४३ चूडा, राणपुरि सा शंघराजगृहे स्थितवंतः । तत्र सा श्री पासि सा राणा, सा कर्मण, सा शवशी, सा पुंना, सा धीगा श्रावक ५ संवरी थया । चूडा रागपुरमध्ये घर शत २०० । सा श्रीकडूआनी सदहिणनां सांपति तिहांना सामी सोझीत्रइ पणि छइ, तिहांनी प्रतिमा अहमदावादि हवतपुरइ देहरइ वइसई छ।। विमलनाथनी । दो० राजपाल पणि भण्या गुण्या येन-“वंदी वीर जिणंद" इत्यादि गुरुना मार्गनी सज्झाइ कृता। तदनंतरि सा श्री संवत १५४४ जूनगढि चतुर्मासक । तत्र ठाकर राजपालगृहे स्थितिः। तत्र लुंपकनां १५० घर वाल्यां। लुपकी साथि घणी चरचा हुडीपत्रयी पीछयो। जूनागढना सामी संघवी बना, पीमा प्रमुख सांगतं यस्य संतानी संघवी रूपसी दीवेऽस्ति । तदनंतरि संवत १५४५ सोरठमध्ये विचरी अमरेलीई चोमासु ठाकर फासीगृहे । तत्र रात वीदो नामि चहुआण सा श्री पासि आव्यो, धरथी वैरागी, सा श्रीनी संगति धर्म यj प्रगम्यो, संवरीपणुं पडवजिउं, घणुं वैराग्य- वंत । एकदा सा श्रीनुं वैावच करतां वाचर्चा गिरनारिनी प्रवर्ती । आचारांगनी निजुत्तीमध्ये तीर्थकरनी न्यान- निर्वाण भूमि चंदनीक छइ, जेहनुं भाग्य हुइ, ते भूमिका वांदइ । तेदनई विपइ अनशन लिड एहवी वार्ता सा वीदइ पूछिउं, जे केतलइ उपवासि सीझइ ? सा श्री कहइ-'जे चुत्रीहार करइ तो थोडा कालमां सीझइ, त्रिविहारि काल विशेष थाइ ।' एहवी वार्ता करी सा श्री वेयावच करी, संथारइ आवी, सीमंधरनई नमोत्थुणं करी, जावजीवाइ चोवीई पि आहार अनशन कीर्छ । रात्रि गिरनारि सन्मुख नीकल्या । व्याघणामां सा श्री वीदानई न देपइ, जाणिउं थंडिल गया हसि, व्याख्यानांते श्राव िपूछिउं-'साहनी बीदो सा किंहां ।' सा श्री कहइ-'हुँ पणि वाट जोडं छ।' श्रावाक जोया, लाधा नहीं । सा श्री कइइ-'जे रात्रि आहवी वारता मवरती रपे गिरिनारि गया हुइ ।'सा श्रीई सरोदइ जाणुं जे तिहां गया छइ । को(के)डिंथी सा श्री प्रमुख संघ नौकलिउ । एक मजलनई आंतरइ पुहुता, जूह तो शला उपरि सता छइ । वार्ता पूछी, कहइ-'अनशन कीधैं । तेणी रात्रि विहरमान सापि ऊचरिउं।' सा श्री प्रमुख संघि जूनागढनइ श्रावकि घणा उच्छच कीधा, सा पिमा प्रमुख संघरोई अनेक साधुना संबंध संभला- बतइ संथारापपन्ना भणतई, नीझमतइ, १७ उपवासि सतर वरसना दिवं गतः। - कडुआमतीगच्छ पट्टावली सा श्री शत्रुजयनी संघ साथि यात्रा पधार्या पण म्लेच्छना भयवती तलहटी फरसी, "विमलगिरिमासाद पोढउ" गीत करी पाछा वल्या । तदनंतरि सा श्री संवत १५४६ अहम्मदाबाद पासि पुरु अहम्मदपुरि चतुर्मासक । तत्र परीप चांपसीइ आबू, राणपोर, चीत्रोडनु संघ कीधु, ते साथि सा श्रीकडूआ प्रमुख नव संवरीयाई चाल्या, ते जिणि गामि देव पूज्या ते गाम नाम सर्वचैत्य परवाडिनु तवन छइ पोतानु की , यथा-"जिणबरवचन अमृत- सम जाणी" इत्यादि । सा श्रीकडूइ सीरोहीमध्ये चैत्यवासी साथि वाद । चैत्ययासी निराकरण कीधा । तेगि घणां वाना साथि कीधा, पण पुण्यवंत प्राणीनई कुणइ प्रभवी न सका । पछई संघ साथि पालडीई पधारिया। पाछालिथी वेपथरि संच करी एक वेपधर साथि चीठी मोकली कहि जे- 'तुम्हे अझनई पूछिउं तेहनु उत्तर सांभलु' वावुरचु) चीठी आपी वेपधर पच्छन् थयु, सा श्रीई विचारिउं जे वीरनी आज्ञा छइ, व्रतभंगीनु विश्वास न करवु, अगीतार्थनु संग त्याज्य, यतः-"वर(२) वाही वर() मचू(च्च)" इत्यादि संबोधसप्ततिकायाम् । त्यारइ संघ समक्ष सा श्रीई सा राणा पाई चीठी वांचतपेव ग्रथल थया, कहइ-'जे हुं कडूओ, मइ मत मांडयु ।' इत्यादि अनेक ग्रथलाई करवा लागा, संघ समस्त विस्मय पामिओ । सा श्री कहइ-'जूओ ए कडूओ किराणो असंयती एहवा छइ, एहनु विश्वास न करवु । एहना अवगुणनो पार को न पामइ । यतः- प्रोद्भतेऽनन्तकालात् कलिमलनिचये नामनेपथ्यतोऽहं- न्मार्गभ्रान्तिं दधानेऽथ च तदभिमरे तत्त्वतोऽस्मिन् दुरध्वे । कारुण्याद् यति ?] कुयोधं नूपु निरसिसिपुर्दोपसंख्यां विवक्षे दम्भाम्भोधेः प्रमित्सतसकलगगनोल्लङ्घनं वा धित्सेत(?) ॥ ११ पछइ सा श्रीकडूइ फासू पाणी पाई तरत साजो कीयो । सा श्री कहइं-'जे मइ एहनई साजो करनार को न हुतउं अगई श्रीजिनधर्मनी हेलणा थात ।' समस्त संघनई दृढ आस्ता थई, सघलड़ यात्रा करी नडोलाईमध्ये घणा लोकनई प्रतिबोध देई, सा वीरानड संवरी, केटलाइफ पोताना स्वजन साथि आव्यां, कुशलि श्री अहमदावादि आन्यां, सा श्री सजन रूपपुरमध्ये रह्या वासि । तदनंतरि सा श्री संवत १५४७ स्थंभतीथि चतुर्मासक । तत्र लघुशाली तपा साथि घणो वाद, गुरुतत्त्व चर्चा, सा श्रीवंतकृत हुंडीथी सर्व प्रीछयो । तत्र तपानु उपाध्याय रामविमल, तेणइ विचारिउं यतीमार्ग पलतु नथी, दिन प्रति ६ वार ऊचरी भंग कीजइ छइ, ते बती गृहस्थ मारगि चाली जीवनी गरज सारडं । ते पापडी बांधी, मुडेवाल थई, सा श्रीनइ पगे लागइ । तत्र सा श्रीनई पासि रहिया । सा श्री सोनी इक्का रामानी पीटणाई रह्या । तेहनई सर्व सदहिणा सा श्रीनी आवी । सा श्री अन्यत्र विचर्या, सा रामा कर्णवेधी स्यंमतीधि रहया, ते पणी पडकमइ त्यारइ प्यार धुइ करइ, ते भीआनई पासि पडकम्या। तेणि पणि च्यार थुइ कीथी। तमाम पणि स्थंभि, एह ज रीति छइ, केतलीइक ते आचारणा जाणवी?। संवत १५४७ सा श्रीकहअइ सा रीडानई सूर्यपुर पत्रप्रेक्षण, लंपकचर्चा आश्री पूजा संवर करी वर्णवी छइ, ते पत्र सा श्रीतेजपाल अष्टम पट्टालंकार पाऽस्ति । तदनंतरि सा श्री संवत १५४८ पत्तने चतुर्मासक । नत्र परी थायर तथा डोसी समरयना बडेरा मतियोपित।

१३२ विविधगच्छीय पावली संग्रह । श्रीपत्तने चु० धनराज परी कीकाना पितामहनु विवप्रवेश कीधु । तत्र गीत-"माहरइ मंदिरि पासजी" इत्यादि। तिणि देहरासरि सा श्री देव जुहारखा पधार्या छइ। तेहबइ समः सा दिपो धर्मनु रागी, दीक्षानु भाव, पण चैत्यवासी पधरनां फरणी देपी थावकनइ वेपि वैराग्यवंत वद । तिगि कालि सा श्रीकहानी वा(च्या)ख्या सांभली सा श्रीनई मिलबा, प्रेम जीवनई विषइ घणो ऊपनु । ते धणी जोता जोता श्रीपाटणमध्ये आव्या । सा श्रीमठूआनई चु० धनराजनई देहरासरि आणी तिहां आव्या । सा श्रीनइ देहरासरनइ विपद पापडी ऊतारी देपी। सा दिपइ पणि पापडी ऊतारी देहरासरनई विपइ आवी जिनपतिमा अवलोकी प्रणाम कीधउ । प्रथम तिहां रहि छंद कीधु-"जिनभुवन जाए विमान पहिलं मुफीइ " इत्यादि संपूरण छंद प्रसिद्ध छ । चैत्यवंदन करी वाहिरि आव्या, सा श्रीनई पगे लागा। सा श्रीनई भेटि आगलि यारव्रतनी चूप मुंकी, सा श्री यांची रलीआति थया । सांमत सा चतुःपदी प्रसिद्ध-"वीरजिणेसर प्रणमुं पाय" इत्यादि । पछइ सा श्रीनई प्रश्न पूछिउं-'जे पाघडी उतारी देव जुहारवा ते वारू दीसद छइ मान मुंग्यु, पणि शास्त्रि अक्षर किदां छई ? ' सा श्रीई अक्षर कह्या प्राचनसारोद्धारसूत्रे, लघुवृत्तौ, बृहत्ती, उपदेशचिन्तामणित्ती, चैत्यबन्दनभाष्यवृत्ती, पडाआविशि- (डावश्य)कविवरणे, घणइ ग्रंथि शिरोवेष्टन त्याज्य करवा वह्यां छः । मूलसूत्रे-मौलि शिरोसेहरं कीजइ ते आशातना ८४ आशातनामां जाणगी ।' मौलिं शिरोवेप्टनं शिरसि वासोवेष्टनं तत्य(द)नं त(त्य)जति' इत्यादि घणा ग्रंयनी सापि पीछन्या। ते विस्तर अप्टमापदपट्टालंकार सा श्रीतेजपालकृत 'दशपदी' मां जोयो। सा देपा सा श्री. पासि संवरीपणुं पडवज्या, साथि विचरवा लागा । परी पुंना सा श्री पासि घणु भण्या, डाहा थया । तदनंतरि विचरता संवत १५४९ नंडोलाई चतुर्मास: । वुहरा टीलाहे स्थितः । वु० टीला पण मोटउ गृहस्थ वैराग्यवंत ! सा श्री पासि पचखाण कीधुं, जे जावजीव छठनई पारणु करूं । पार[ करई त्यारइ द्रव्य ७५ लागता वाणोतर पासि गणता । सा श्रीनई पासि श्रावक ३ संवरी यया । सा थरपाल, सा धीरू, सा लींवा । एवं श(स)वरी १४ सा श्रीनई पासि विधमान वर्तई । तदनंतर मख्याडदेसमध्ये विचरी, संवत १५५० सादडीइं चोमासु पधार्या । दो. शंघराजगृहे स्थितवान्, तत्र परतर सायि चरचा। चीरनां पांच कल्याणक, कल्पसूत्रमध्ये, यात्रापंचागके, जंबूदीवप्राप्ती इत्यादि ग्रंथनी सापि, छहउं कल्याणक ते जिनवल्लभि थापिउँ छइ । तथा स्त्रीनई पूजानिषेध खरतरमते, सा श्रीई ज्ञातानई अक्षर थापी । तत्र श्रावक २ संवरी थया । सा सीधर, सा कुंपा । घणइ मनीशि व्रत पचखाण कीधा । तदनंतर सा श्री १५५१ सीरोहीइ चतुर्मासक। तिहां एक संवरी थयु । सा शवगण तत्र तपा साथि वाद, सामायकि प्रथम सामायक उच्चार, पछइ ईर्यापथिकी आवश्यकचूणों, पंचासके, दिनकृते(त्ये), धर्मरत्नत्ती इत्यादि ग्रंथि । तदनंतरं सा श्री संवत १५५२ श्रीस्थिरपत्रे(द) चतुर्मासक । तिहां हरिकीर्ति पणि रहइ छइ । सा श्रीकडूआना व्याख्यान] सांभली घणु स्लीआति थया । सा श्री थरादमध्ये धणानइ प्रतियोध्या । रत्नागर पैत्र, तत्र श्रावक ४ सा श्री पासि संवरीपणुं पडवज्या । सा लूणा, सा मांगनी, सा जसवंत, सा डाहा । थरादनई विपइ सा श्रीना धरमनी सद्दहण, समस्त नगरनई स्थिरपत्र(द्रवासी श्रावक सा रामा, ते सा श्री पासिं घणुं भग्या, केतला दिन सा श्री पासि पणि रह्या । तत्र वासी डूदा सी पन्यास पासि वारू भण्या। धरादपेत्रनुं वरणन केतलं लपीई ? सांप्रत पणि तिमन छह । तदनंतरि सा श्री संवत १५५३, संवत १५५४, संवत १५५५ जालोर [ममुख संघलइ विचर्या । - माप्पादो'१९मागरोपण उपधान निपेष ते टाली घणा तर्या लोहपरादि । १० स्थापना परिमाण अनेक सिद्धांति। कडुआ मतीगच्छपावली १३३ यात्रा पण घणा ठामनी कीधी, तिहां यतीनी प्रतिष्ठानी चरचा, साधुना कृत्यनु विचार, तथा पर्व टाली पौपधना विचार आश्री आंचलीआ, खरतर साथि वाद थयो । ठाणागे ज्ञातायां नंद मणिकार, विपाकर त्रि मुवाहु प्रमुपि नण्य पौषध कीघा, पर्व तु २ सामटा आवइ, विचा पणि ३ न आवइ, विचारयो । श्रीवसुदेवहिंडी श्रीविजय सात दिन पौषध इत्यादि घगइ ग्रंथि छइ । तिहाथी सा श्री संवत १५५६ आगरा भणी पधार्या । नागोर, मेरतइ जाव आग- रइ सबलइ देव जुहारी घणानई प्रतियोध्या । घगा द्विज | घणा चैत्यवासीसिउं चर्या करी । संवत १५५८ पाटणि पधार्या । तिहां परीप पूनई सा श्रीनइं पासि वृद्धशाखायां ओसवालज्ञातीय मातृ-पितृ रहित वर्ष ११नु कुमार आण्यो, नामि श्रीवंत । सा श्रीनई कहि जे-आ कुमरनई भणायो ।' सा श्रीई कुमारनु हाथ जोई मस्तक धूणिउं, कहिये । सा श्री कइइ-'आयु थोडू छइ पण भणनार एहनी बरोबरी को नही आवइ ।' पछइ परीप पूनइ पोतानइं परि राख्या, केतला दिहाड़ा सा श्री पासि भण्या। पछई सा श्री संवत १५५९ नवानगर भणी पधार्या, तिहां चोमा करी, घगांनई समझावी धर्मनु मारम | संवत १५६० राजनगर तत्र चतुर्मासक । सत्र पटिल शंया, पटिल हांसा संवरीपणु पडवज्या। तदनंतर संवत १५६१ सूर्यपुरि चतुर्मासक । तत्र सा वेला, सा जीवा संवरीपणउ पडवज्या । तदनंतरि संवत १५६२ वीरमग्रामि दो० तेजपालगृहे चतुर्मासक । तत्र शरीरे वाया जाता । केतलइ दियसि सुखं जातं । तदनंतरि संवत १५६३ महिसाणइ दो० वासणगृहे स्थितवान् । तदनंतरि संवत १५६४ श्रीपाटणि पधार्या । सा श्री पासि संवरी छइ, तेह नाम लिखीइ छइ-सा पीमा १, सा, तेजा २, सा कर्मसी ३, सा नाकर ४, सा राणा ५, सा कर्म ६, सा शवशी ७, सा पुंना ८, साधीगा ९, सा देपा १०, सा लींवा ११, सा सीधर १२, सा कया १३, सा शवगण १४, सा लूणा १५, सा मांगजी १६, सा जसवंत १७, साहा डाहा १८, सा वेला १९, सा जीवा २०, पटेल हांसा २१, पटेल शंघा २२ धर्मर्थी पासि छइ । सा वीरा १, सा थिरपाल २, सा धीरू ३-जण ३ नडोलाईइ । सा रामा कर्णवेधी संभाति छई। संवत १५६३ थरामध्ये पुन्यास हरिकीर्ति दिवं गतः । तत्र सा रामा श्रावक वसाण यांचइ, इदासा पण सांझई वाचइ । केतलाइक दिन पछी पापी दिनि वार्ता चाली, जे आठमि शा बारी छइ ? त्यारह सा रामा कहि जे-'मकडइ वारि। दासा कहि जे-'इम नही । पन्यास तो आम कहिता ।' सा रामा कहइ-'ना, पन्यास आम कहिता ।' त्यारइ बादयात प्रवती । पछद परठ कीधु, जे सा श्रीकट्टा पाटणि छइ, ए धणी जे कहसिइ ते सत्य, पूछीसिइ जे कहिसिइ ते करीसि । पछह परठ करी पूछया आवइ त्यार पहिलण सा श्रीनई शरीरि पुन बाधा जाता, मातं आयु स्तोक छइ । श्रीसंघनई तेडी समक्ष्य, सा पीमानई तेडी सर्व भलाव्युं, जे संघना मार्ग रूडइ पालयो, सा श्री कहा पतला बोल शास्त्रनी सापि मरूप्या, तद्यथा- १ चैत्यनई विपइ पापडी ऊतारी देव जुहारवा । २ श्रावकनी मतिडा शास्त्रिं छई पण यतीनी नही। ३ पासी पुंनिमनी सिद्धांति छइ पण चउदसिनी आचरणा । ४ पजसण चुथिन कालिकापापि युगमधानि आर्या वती करीइ छ । ५ मुहपती चरवलो श्रापति लेयो आवश्यक समइ ‘अनुयोगद्वारचूणो' इत्यादि । ६ सामायक पुनः करयां आवश्यक। ७ पर्व टाली पौषध लेवो 'शावादी'। ८ विदल टालघु काठयी अन्नयो कल्प , -- . " १३४ . विविध गच्छी य पट्टा वलीसंग्रह ११ थुइ ३ करवी 'आवश्यके'। १२ वासी कठोल निषेध 'योगशास्त्रादौ । १३ पौपध त्रिविहार 'आवश्यक- चूणीं'।१४ पंचागी मान्य सिद्धांता? नुयाइ । १५ मथम सामायक पछइ इरीदावरी(रियावही) 'आवश्यक- चूर्णारयां)दौ । १६ वीरना ५ कल्याणक 'कल्पादौ'।१७ चीजें वांदणु बइठां देवू 'समवायांगवृत्तौ । १८ साधुना कृत्यनु विचार 'आचारांग-दशवी (वैकालिकादौ । १९ श्रावणहिके कार्तिकद्विके द्वितीय पजूसण चतुर्मास 'कल्प]चूर्म्यादी' । २० सीनइ पीपध 'उपासकदशांगे', पूजा 'ज्ञातायां' । २१ सांपत दशमाश्चर्य अनेक ग्रंथ 'संघपट्टादौ। पडिकमणाविधि प्रमुख पणा पदार्थ कही, सा पीमानइ पदस्थापन । सा पीमा नेत्रधी आंसू पाडतइ कहिवा लांगा-'पूज्य! एवडो भार फिम उपडइ ।' सा श्री कहइ-'जे धर्म करयो जिम जीव मुखी थाइ ।' संघि वैध तेड्या । सा श्रीनी धातु देपाडी । वैद्य कहइ जे-'अमकुं औषध करो ।' संघ कहि-बारू ।' सा श्री कहे जेहे- 'माहरइ औपधनु 'पप नथी' 'अरिहंत नाम औपर्हि सारइ०' इत्यादि गीत । सा श्री कहि जे-'माहरइ सीमंधर सापि जावजीवाए तिविहं पि [आ]दारं अनशन ऊचरिउं ।' वीजइ सतर संवरई अनशन कीधा सा श्री पासि-सा तेजा, सा कर्मसी, सा नाकर, सा राणा, सा कर्मण, सा डाहा, सा पुंना ७ । वीजा १० संवरी सेजइ गया-सा शबरी, सा धीगा, सा लींवा, सा सीघर, सा शवगण, सा लूणा, सा मांगजी, सा जसवंत, पडिल हांसा १०॥ सां श्री अरिहंत सिद्ध जपतां २१मइ दिनि दिवंगत हवा । वाफी संवरी को मसवाडइ, कोपांत्रीसमइ दिहाडइ गरदा हता, सा श्रीनई मांडवीनई मंडाणि देइसंस्कार सूकडि ममुसि कोधु । सर्व स्थानकि आविठ । सा श्रीपीमाना मुखथो श्लोक सांभली स्थानकि पुहुतु । एवं सा श्रीकआ १९ वर्ष गृहस्थपर्याय, वर्ष १० सामान्य संवरीपर्याय, वर्ष ४० पट्टोधरत्वं, सर्वायु वर्ष ६९ एकोनसप्तति परिपााल्य दिवं जगाम । सा श्री कडूआ समस्त संघनइ जय- कर्चाहु भस्मग्रइ ऊतरि धर्म दीपाच्यु । संवत १५३० भस्मग्रह ऊतर्या । सा श्री कहानां कीधा गीत, स्तवन, साधुवंदना प्रमुख ग्रंथान सहस्र ६००० माझनई पाटणमा छड् ते पीछयो । पछइ थारादयी सा रामा, दूदासा ममुख पूछवा सा श्रीनइ आवइ, एतलइ वाटि सांभल्युं ये सा श्री दिवंगत इवा । वार्ता तेतलइ रही पूछी सका" नहीं । पछइ माहौमाहि वार्ता तणाई । पछई सा रामा आठमि पासी जाणी करवा लागा। दासा पण जाणी करवा लागा। दासानी सा पीमानी वार्ता एक मिली ते बती सांप्रत स्थिरपत्रे(द्र) २ वि उपाश्रय छइ । सा रामा कहइ-सा कड़आ इम न कहिता । ' ए सर्व पांचमा आरानुं विलसित जाणवू ते बती क्यारइ आठमि पाखी जूआं आवइ छइ, बाकी सर्व एक छद, वेहु सा फडआना समवाई ।। अथ सा खीमाचरित्रम् । पत्तनमध्ये राति(ज)कावाडई प्राग्वाटज्ञातीय द्धशासायां सा कर्मचंद, मार्या वाई कर्मादे, पुत्र सा पीमा, वर्ष १६ मइ सा श्रीमडूमा पासि संवरी, वर्ष २४ सामान्य संवरीपर्याय, परी घुनानई घरि सा श्रीवंत छइ, ते घणी घणि विद्या भण्या । परी पुंनई दिन प्रति कोरी १ आपी विभ पाई न्यायशास्त्री भणाव्या । थोडर दिनि घणी विद्या भण्या । सा का दिवंगत पछी सा श्रीपीमानई शरीरि इरसविकार प्रगट्यु। तेणइ विचरी पणि न साइ, संवरी पापइ श्रावक शथल थवा लागा, एहवइ थरादमध्ये पोसाल यई ते वार्ता ययावत लिखीइ छह- कडुआमतीगच्छ पावली - संवत १५८६ सा रामा यरादमध्ये व्याख्यान वांचइ छ । एहबइ तिहां एक श्रावक आव्यो । ते श्रावकनी प्रथम वारता चरचाणी छड़, ये अमकडइ सेठि वेषधर आव्यो । ते पांहि फालावाणी कराविउं । घर तेडयु हतु विहिराव्यु, ते मार्टि ए भीओ आव्या । सा रामानइ कहइ-' साजी पोथी वाल । ए धणी अहीथी ऊठइ मायश्चित्त लिइ तो वखाण बंचाइ ।' ते श्रावक कहि- पूज्य ! माहरु एवडउ सिउ अपराध ? ' त्यारइ कह[३]-'तुझे वेपधरनु संग कीधु ते माटिं।' कहि जे-'मइ ए वार्ता नथी कीधी।' स्यारइ पासइना कहइ-'जे सा श्रीई सांभल्यु ते कइइ छइ, तुझे साइमी चरचा सी मांडी छइ, ते बती तुझे अहीथी ऊठो तो व्याख्यान चालइ ।' पछइ ते धणी अधिकारी पणि सा श्रीनुं वचन किम लोपइ, ते मार्टि ऊठी गया। पछइ व्याख्यान वाचु पण नगरमा वार्ता घणुं चरचावा लागी । ते धणी कहइ-'जे हुँ मायश्चित्त सा वातनुं लेउं ? कइ पोटानु कहो तो धीज करुं ।' पछइ कहइ-चारू धीज करुं ।' त्यारई लीवडीआ कूआ आगलि तेलनी कहावी, तेल आकरुं ऊकाल्युं, लोक सर्व मिल्या, ते धणी पणि नगरनई विपइ मसिद्ध छइ, ते धणीनां सजन सर्व मिल्या, पछइ सर्वनी सापि तेलमध्ये वीटी नांपी, तेलमांची नुकार गणी-'जो मई वेपधरचं संग कीधु होइ तो हुँ दाझयो नहीतरि नहीं।' पछइ तेलमध्येथी बींटी काढी पण लगार दाधा नही । सर्व चमत्कार पामिउं पण केतलाइक दोपी इम कहिवा लागा-'जे धीज तेणि वेपधरि पिल्यु ।' पा तेणी कहइ-जो इम कहो छउ तउ माइत्मानी पोसाल अही ई करावीसिई।' पछइ सा रामाई घणुइ वार्या पण भावी पदार्थ टलइ नही, विहां ए पोसाल करी(रा)ची। केतलीइफ पोसालि जाइ, पण सामाचारी सर्व सा श्रीमानी मोटी पोसालि जाइ । वाइ सर्व उपाश्रय आवइ । सांपत पण इम ज छइ । सा रामा, तत्पट्टे सा रायन, तथा वीजइ उपाश्रयि डूदासा, सा ब्रह्मा इत्यादि । थराद रत्नागरपेत्र । अथ सा श्री पीमा १६ वर्ष गृहस्थ- पर्याय, २४ वर्ष सामान्य संवरीपर्याय, वर्प ७ पट्टोधरत्वं, सर्वायु सप्तचत्वारिंशत् ४७ वर्षाणि परिपाल्य सा श्रीवीरानइ पदस्थापन करी, संवत १५७१ पत्तने दिवं गतः । . अथ सा श्रीवीराचरित्रम् । नडोलाईग्रामे श्रीश्रीमालीज्ञातीय वृद्धशाखायां दो० कुंरपाल, भार्या पाई कोडमदे, पुत्र सा पीरा । सा श्रीकआ पासि संवरी थया। सा श्री पीमइ सा श्रीवंत भण्या, गुण्या, डाहा जाणी, भंडारनी पोधी भलावी, लीया महितानई परि छइ ते वांचयो । सा वार्या त्यारइ सीरोहीई हता, ज्यारइ सा श्रीपीमइ काल कयों त्यारह । अय पचनमध्ये प० पुंना व्याख्यान यांचह । एकदा व्याख्यान वांचता एक श्रावरु घणइ दिनि ठयकु आकरो दीधु, पद चांचा लागा। ते श्रावकि मरकलो कीधो, जे घणुं डाहा पग पोथी मंडार न भलान्यु, ते यात हृदयमा लागी जे साचु । पोथी लीया कबीआनी पीटणीयी परि मागी, चार्चा नणाई। सा श्रीवंतनई फदि जे-भायु पर समगाईमध्ये जाई ।' सा श्रीवंत कहइ-सा श्रीकडूआनां तथा सा श्रीपीमाना वचन सिद्धांतोक्त मांभली हीनाचारीनई पगे लागी तो आटलु भण्या शा कामनु, हीनाचारी दृष्टि जोपरा न फल्पा, यतः-- " पंचासु महापाये गोयमा ! न निरक्यई।" इत्यादि । तिहां घणी परचा या, सा पीरनि टीनागरी ज्याप्पा, परी पुनह दीनाचारी याया। रूप ग्रंप की । मे मांगन बतपुरमध्ये , भरारानां भंडारि विहां सा श्रीनि 'गुरुतत्वनिरगपहुंडी - --- - विविध गच्छीय पदावली संग्रह ग्रंथ छइ, पत्र ४४ प्रमाण । तेथी सर्व साधुनउ मार्ग जोबो, पणि हीनापारीनई पगे न लागg । परी पुंना पछइ सा श्रीवंतनइ कहइ-'मई तुझनई भगाव्यो गगाव्यो, माहरु कहिण करिजे, परसमचाईमध्ये आवि ।' साश्रीवंत कहि जे- पूज्य ! कहउ ते करुं पण धर्म तो आपणु जाण्यु थासिइ, वीतरागनई मार्गी वरस शव सूली उपरि रहीइ पण धर्मबुद्धि अगीतार्थनु संग न करीइ । ' इत्यादि घणी वार्ता । पछइ परी पुंना कहइ-'जे आपण पंभाति सा रामा कर्णवेधी छह वेदनई कागल लपीइ, चरचा आश्रयी । ते कहि ते प्रमाण कीजइ । ' पछी सा श्रीवंति चात कबूली, सा रामानइ कागल लप्या, पण परी पुनइ ए वार्ता सद्दही नहीं । ते कागल पण संमत हवतपुरई भंडारि छइ, पत्र १० प्रमाण । सा रामा पण घणु पंडित हवा । परी पुंनानई रीस चढी, सा श्रीवंत पासि जे पौतानी परतु हती ते ऊदाली लीधी, घणा मनुस्यनी पक्ष फरी घर शत ७०० लेई पोसालि गयो, पण भंडार लेई न सक्यो । विहां गया पछी वर्ष एकि मूत्रगच्छ(कृच्छू)नई रोगि मरणं माप्तः । सा श्रीवंत तिहांथी नीकल्या श्रीअहम्मदाबादि पधार्या । तेइवइ दोसी देवरनी पीटणीई श्रावक सर्व मल्या छइ, सा पीमानु दिवंगतनु प्रस्ताव परी घुनानइ पोसालि गमन । ' सा श्रीचंति शुं कीg हसिइ ' एहवी विचारणा सर्व करइ छइ, तेहवइ सा श्रीवंत तिहां पधार्या, फाटां वस्त्र को ओलपइ पण नहीं, प्रथम दर्शन पूछयु-'जे किहांथी आन्या ? ' कहि जे- पाटणथी आव्या ।' तो वलता समाचार पूछया-'परी पुंना गमन संभलाइ छि ते साचु ?' कहि जे-'हा परुं।' 'काई सा श्रीवंतनी परि जाणु ? ' कहइ हा, जाणीइ ।' 'कहु सी परि छइ ?' कहि जे-जेहनइ तुमे पूछउ छु ते पूज्यने पासइ छइ, पछइ सरत्र फेरवी मिल्या घणु रलिआति थया, वस्त्र वीजा परि नवा आप्यां । सामी सर्वे कहइ-जो तुझे छउ तउ सर्व छइ ।' सा श्रीवंत विहां रह्या सुस समाधि, सा श्रीवंति मुखशातानिमित्त 'श्रीरुपभदेवनु वीवाहलु' ढाल ४४ प्रमाण कीयो । संघलइ गच्छि प्रसीध छइ । संवत १५७२ पासचंदना गुरु(?) तपामांहिथी मत नीकल्यो । लोकनइ विमतारवा मइला वेस करी क्रिया मांडी, वीजइ गामि धर्मार्थीनु योग नही, तेणि जागि जागिथी मनुस्य ओतलं वीरम प्रमुख सघलइ पासचंदि लीघा । आंचलीइ खरतरि पणि क्रिया उद्धरी, जेहनई संवरीनु योग नहीं ते जाइ ज । सांभत पण केतलइ गामि संवरी टाली रापी रह्या छइ सा श्रीकहानी सामाचारी । अथ सा श्रीवंत घणी विद्याना जाण । एकदा सा देधरनी पीटणीइं रह्या छइ । तत्र घणइ द्विनि विद्यानी ख्याति सांगली, सा श्रीवंत पासि आन्या । सा श्रीवंत साथि प्रमाणवाद, पीनी गोठि कीधी, छंदशास्त्रनी वार्ता । पछइ विम कहा-'तुह्मारी जोडि देपाड्ड ।' पोतानां कयां कान्य देपाड्यां। पछइ वाडव कहइ-' वणिकनई एवडी शक्ति नु हुई, साचुं तो मानीइ जो हवडां आ पीटणीइं ढोलीउ छइ तेइनुं वर्णन करो।' पछइ सा श्रीवंति दोलीआवें वर्णन धर्मरूप कीधुं । तद्यथा- पादाश्चत्वार (?) यस्मिन्निह चरित-तपो-दर्शन-ज्ञानसिद्धा निर्लाभत्वं मृदुत्वं तदनु सरलता क्षान्तिरत्राश्चतस्रः । धर्माच्छी दिपञ्चव्रतनिवडपटीपच्छदः कर्ममुक्ति- स्तल्पे निद्राति चेतो भवभयविरतं वासरो मे स धन्यः ।। तरत काव्य कीर्छ । सूत्र कैठ रलीआति यया कहि जे-' अह्मो द्विज हुता तरत न जोडाइ ।' , संवत १५८१ सा रामा इन स्पिरपत्र(घ) दिवंगतः। - भान्या । सा गोरइ राजय संघ कीधु । मुरत्राणनी आना मागी । मा श्रीयंत पणि मेनुनय पयायो । नयनी वदनंतरि सा श्रीवीरा गुजराति पथा। नियां संररीनु योग नही विहां केतला दिन पावफि पगि पाएँ। कडुमा मतीगच्छ पट्टावली अथ सा श्रीवंतसघलइ विचरत पण सा मोरा, सा सरपति पातशाहना वजीर सा श्रीकडूआना समवाई सा श्रीवंतनइं पातशाहनइ मलव्या । तत्र लहुआ व्यास साथि दिन २ चरचा । एकदा लहुइ व्यास पातशादनई वार्ता कहि जे-'श्रीवंत आदाना खंडमध्य अनंता जीव कहइ छ।।' मुरत्राणि सा श्रीचंतनई तेडान्या। नफर तेडाव्या आव्या । नफरनई पूछयु, कहि-'जे हवडां हुँ आव्यो, पुनः शुं काम छइ ? ' सेवक कहइ-'नधी जागतो पण लहुओ व्यास आद्रपंड ल्यान्या छइ, अनई तेडइ छइ ।' सा श्रीवंति विचायु जे वार्ता भरावा दीसइ छह । सा श्रीवंत मुरत्राण भणी जातां सुरत्राण निजरि आवइ । तिहां गाइ एक दीठी, सा श्रीवंत सुरभिन पुच्छ जोवा लागा। सुरत्राणि पूछिउं-'जे श्रीवंत धेनुनु पुच्छ शुं जोयु ? ' सा श्रीवंत कहइ- लहूओ व्यास गोनई पुच्छि तेत्रीस कोडि देवता कहे छइ ते जोतो हतो।' सुरत्राण कहइ- किम लहुआ? ' कहइ-' हा जी, अमारइ शास्त्रि छइ । मुरत्राण कहइ-लहुओ इम कहइ, जे कहइ छइ जे श्रीवंत आदाना खंडमां अनंता जीव कहइ छइ ।' सा श्रीवंत कइइ-' हा जी, अमारइ शाखि छइ, ई जीव देपाई जो ए देव देपाडइ।' लहु व्यास कहइ-'देव दीसइ नही, उक्त प्रमाण ।' पछइ सा श्रीवंति आतुं वावी देपाङ, पंड जीव प्रगट थया, जैन प्रभावना घणी थई । सा श्रीवंत चांपानेउरी पण सुरत्राण पासि रहिता । एडबइ संवत १५७९ पभाति पासि कंसारि, तिहां कडूआमतीनई देहरइ देव जुहारवा पर समवाई आवइ ते पाघडी ऊतारी देव जुहारइ, तेहनई देव जुहारवा दि, नहींतरि नही । पंभातिमध्ये सा धनुआ मनुआ राजमान्य, ते कंसारीई मनुभा देव जुहारवा आव्या। श्रावकि साभल्यु जे सा मनु देव जुहारवा आव्या छइ, अनई आपणइ देहरइ पाघडी नही ऊतारई तो वंध भाजसिह, त्यारह भावक मिली देहरइ आव्या । सा मनुआनई कहि जे-'पापडी ऊतारो।' त्यारइ कहइ-जे अह्मे पर समवाई, स्यावती ऊतारीइ ? ' ना ना कहितां पाघडी ऊतारी, सा मनुआनि विरोधी वोल्या नही, ते धणीना भाईनई आगलीथी मनुस्पई कहिउं-'जे कंसारीनइ फडूमतीइं तुम्हारा माईनी पाघडी ऊतारी । तेणी चडी आल्यो । भाइ सन्मुख मिल्यु, पूछिउं-'सिउं हतुं जे पापडी ऊवारी ?' कहि-'ना, हुं उतारतो इतो ।' तिणि हाथ धरिओ तेणिहानु तरत कोप शम्यो, पछइ सधी नरति जागी मनन मेली बंध जे कंसारीना कहआमतीनई कोकनी वस्तु चुहरावइ नही ते वार्ता कंसारीना साभलो चांपानेउरि सा गौरानई पासि आव्या । सामी जाणी मिल्या, समाचार पूछया- कोहइ गामियी पधार्या ?' कहि जे-'माति पासि कंसारीयो आव्या।' पूछिउ-'जे कंसारीई दो छांछा, दोसी पासा, सहिसा समस्तनई कुशल छइ ? ' त्यारह कहि जे-' ते सर्व पूज्यनई पासइ छइ त्यारइ बीजी वार मल्या, देवपूजा कीधी, भोजनौचर पूछ-' आतली भूमि किम पयार्या ? सर्व पानी मांडी, कही सांभली । मुरत्राण कहुई-'जई स्थंमतीथि मोतीनी फरमासि मोगली वेनि जोयुंजे की अपनी । जाप्यु ये केसारीना चंपानेउरि गया छइ, तिहां एना सामी लीभा घर, सर्व महाजन चांपानेउरि मिली आव्यु । सा गोरानइ मिल्युं । कंसारीना महाजन साथि मेल करी कुमलि पार पारा करी पाठा तलहटीई आव्या। पेटमध्ये दूपता आन्युं सा श्रीवंतनई । सा श्रीयंत अरिहंत सिदना दिवं गतः । सर्वायु वर्षप्रयसिंग व] ३३ ।

विविधगच्छीय पट्टावली संग्रह तत्प? सा रापत्र संवत १५८५ वर्षे रिपिमती उत्पत्ति । आणंदत्रिमलसरि क्रिया उद्धरी, मावी आविका विकानई विण आज्ञाई दीक्षा दीधा वती गुरि ठवकु दीधु जे-'ए चाईनी वार्ता लोकमा तुह्म साथि विपरीत संभ- लाइ छइ ते सर्व विस्तर अन्य परथी पीछयो हायपोथीमां छइ।' ते क्रिया उद्धरी सबलइ फिर[वा] लागा | धर्मा- थींना योग विण कडूआमती सबलइथी ताणी लीधा । माडवना घर सर्व लीधा । इम जागि जागिनां लीधा, वीजह पेन जिहा श्रावक भगनार हता तिहा योभ्या । संवत १५८६ सा श्रीगीरइ स्यंमतीर्थ पासि कंसारी मध्ये दोसी यासा सहिसानी श्रीशांतिनाथनी प्रतिष्ठा कीघी, ते प्रतिमा सांपत अपुन दो० माहवानइं घरि छइ । संवत १५८८ संघपी श्रीदत्ति आबू, गोडी, चीनुड, कुंमलमेर प्रमुसनो संघ कीधु घगाइ उन्उवि । यस्य संताना संघटी महिपाल, अमीपाल, सा वीरा संवत १५९० श्रीअहमदाबाद] चतुर्मासक रह्या । तन सा जीवराजनइ संपरी कीधा । दो० मंगल प्रतियोध्या । पुनमीआधी कद्दामती कीधा । संवत १५९१ पाटग चोमासुं। सा रामइ पणि स्यंमतीय प्रमुषि मनुस्य ठामि राप्यां। संवत १५९२ सा रामा कर्णवेधीद श्रीवीरवाह वीरल(बीबाइल ?), लुपमहुंडी वृद्धपन ३२९ छइ। अनई अधिकार ५७४ छइ, सांप्रत राजनगरनई भंडारि ते प्रति छइ । संवत १५९२, "संवत्ता१५९३ राधनपुर, स्थिरपत्र(द) ममुस सपलइ विचर्या । संवत १५९४ सा रामा कर्णवेधी दिवं गतः । संवत १८९४ सीरोहीई चतुर्मासक । संवत १५९५ सादडीइ । इम सघलइ विचरी पद नंदोलाईइ पधार्या । वृद्धावस्था छई, व्याहार पण करी न सइ । संवत १६०१ नंडोलाईड शरीरि वाधा थई, वर्ष कठिण द्विधा, अन्नतः रोगतः । वीजा संवरी सा जीवराजप्रमुख सर्व पासि हवा । सा श्रीवीरानई उपधनई अर्थ वसी वस्तु जोईती इती त्यारइ ते वस्तु श्राकानई परि छती हती पणि ना कही । पछइ औषध कीधुं जोई सा श्रीवीरा पासि छापरी ४ हती, ते मध्ये धीथी छापरी २ श्रावकना हाथमां आपी। कहि जे-'सा भाणानई घरि अमकडी वस्तु छइ ते ल्याचु । नाणुं लेई तस्त काही आपी, ते वस्तु सा श्रीनई आपी । सा श्रीई औषध की) । पछा सा श्री नीराजनई कहिलं-'जे दीठउं, संसारमा सर्व स्वर्थमय छइ, ते मार्टि इवइ तुझो आजयी सख्या मात्र मतवमता(ममता) रहित द्रव्य रापयो, आमंत्रण वा आमंत्रण टाली भोजन करवा गयो, हाथनइ विपइ मुद्रिका पहिरयो, वख २, तथा ४ वधता रापयो, काल कठिण छइ, आपण तो वारनतधारी श्रावक छीइ, संपेपीइ तेतलु वारू।' पीजी पण घी सीपामण दोधी । सा श्रीगीरा संवत १६०१ दिन ४ अनशन पाली दिव गतः । सा वीरा १४ वर्प गृहस्थपर्याय, २५ वर्ष सामान्य संवरीपर्याय, ३० वर्ष पटोधरत्वं, सर्वायुरेकोनसप्तति ६९ वर्षाणि परिपाल्य सा जीवरानस्य पदस्थापनं कृत्वा स्वर्गे गवः ३। तत्प? सा श्रीजीवरान सर्वत्र विख्यात यशस्वी, स च अहमदावादे परी जगपाल, भार्या बाई सोभी, तत्पुत्र सा जी[व] राज संवत १५७८ प्रसव, संवत १५९० सा वीरा पासि संबरीत्वं जातं, १२ वर्ष गृहस्थ, ११ वर्ष सामान्य संबरी, पचापट्टे (घ)धरत्वं समायातं । अतीर यशवान(स्त्री) आगाल गोपालमतीत सा श्रीनीवराज स्यंमतीर्थे, राननगरे, पत्तने, राधनपुरे, मोरवडि, थराद प्रमुस सबलइ देहरा उपाश्रये कराव्या । ठामि ठामि श्रावक ठामि राष्या, घणा अवदात्त छ । संवत १६०३ सा राघव दिवं गतः थरादमध्ये। तत्प? सा जेसा । संवत १६०४ सा नरपतिनइ सबरी कीधा । सा साजननइ संबरी कीधी(पा)। - भ कडु आमतीगच्छ पदावली । संवत १६०२ ब्रह्ममतीनी उत्पति. लिखीइ छद-सा श्रीजीवराज राधनपुरिस्थितेन राजनगरे पासचंदि विजयदेवनई पद दी, ते वती रिषि ब्रह्मउ मनशुं पेद पाम्यु । एहवइ पासचंद हबतपुरमध्ये उपाय करनार हता, जागइ कडूआमतीनई ताणं पण महं आणदि विचार्यु जो इयतपुरमध्ये उपाश्रय थासिइ तो साहमी शथल यासि, पासत्यानुं संग वारू नही। ते वती रिपि ब्रह्मा साथि मं० आणंद मिल्या जे-'तुह्मो चिंतामणि पर्यत पंडित तृधनई पद नहीं ते शुं कहिजे ? रजपूतवती इसिइ तुमे पणि एहवा छो जे नवो गच्छ मांडो, तुह्मनई पणि निमनी पाखीनी सद्दहण छद, रिपि ब्रह्मउ जे साचं निमनी पाखी सिद्धांतनइ अक्षरि थापुं, समवसरण त्रपणे प्राकार आदि सर्व यापुं, पण माहरि पासि श्रावको नथी ।' पछइ म० आणदि कयु-'जे तुझारुं हुं श्रावक थाउं । 'म आणदि सरभरण, पोखण कयूल्युं । गच्छ नवो मांडयो ऋ० ब्रह्मइ, मं० आणंदना प्रेमथी कड्आमतीमाथी आयु जाणी प्रतीत अयि नागिल-मुमतिनी चोपई जोडी आपी पूंनिमनी पापी थापी । पासचंद उपाश्रय करता रहा । सा श्रीजीवराजि राधनपुरि सांभल्युं ये मई आणंद ब्रह्मामती धया। सा श्रीई महं आणंदनई कागल लप्यु-'जे आढची वार्ता सांभली ते शुं छइ ? ' पछइ मं० आणदि ऋपि ब्रह्मा कन्हई आवी मिच्छामि दुकडं देई कहि जे-'तुमारी संगति कार्यविशेषि कीधी ते सीधी, तुह्मारी पण गरज सरी ।' इम कही पोतानइ उपाश्रय आव्या । सा श्रीजीय- राजनई कागल लप्यो, रलीआति थया इत्यादि घणा'अवदो(दात) छइ । सा श्रीजीवराज महाप्रभावी के संवत १६०९ पत्तने चतुर्मास: । तत्रथी आयु प्रमुखनी यात्रा । संवत १६१६ स्थिरपत्रे(द्र) सा श्री चतुर्मासक, घणा उच्छव थया, माससमण प्रमुख तप, तत्र सा डुंगरनइ संविारी चतुकीधा । संवत १६१७ राधनपुरि सा श्रीजीवराज चतुर्मासक रया । एहवइ पंभातिमध्ये धर्मसागर साथि सो० पउमसी, ठाकर मेरइ मास लगइ चर्चा चाली, दिन २ प्रति सो० पउमसी, सो० वस्तुपाल, सो रौंडा, सो० लाला प्रमुख समवाय ठाकुर मेरु साथि जई, यतीनी प्रतिष्ठा आश्री चर्चा करइ, पण यतीनी प्रतिष्ठा शाखि नथी, श्रावकनी प्रतिष्ठा छड़, तद्यथा श्रीआवश्यकवृत्ती-भरतः स्वयं प्रतिष्ठितवान् । पप्ठपन्चाशके तृतीयगाथा-'जिभवण-यिंबठायण' इत्यादि दिव्यस्तवमध्ये प्रतिष्ठा कही, अनई महानिशीथिये तया यती द्रव्यस्तव करइ, ते देवनु पूजारु तथा कुशीलीओ इत्यादि अध्ययन पांचमइ छइ, तथा कल्पसामान्यचूणौं वा विशेपचूणौ च श्रावक प्रतिष्ठा करइ । तत्र यती परवादीनां विघ्न निवारया आयइ इम छइ, पण प्रतिष्ठा करवा आवइ इम नधी, यतीनई तु दशवी (वै)कालिके स्नान निषेध्यु-"सिणाणं सोहपमजणं” इतिश्चनात् । सोनह रूपइ नाभडइ, महानिशीथे-"जत्थ य ह(हि)रन्नसुवन्नं" इत्यादि । तो साधु प्रतिष्ठा करन किम ? प्रतिष्ठानई करनारि स्नान कर, कंकण पहिचु, तो प्रतिष्ठा याइ इत्यादि धणी युक्ति निरुत्तरी कोपी । पछइ कहा- 'साधुनी प्रतिष्ठाना अक्षर छइ ते देपाडीसि ।' पछइ योजड दिनि कागल लप्यु ये फट्टामती सो० पउमसीह ठाकर मेर भमुस प्रतियोघ पाम्या छइ । हवा केतलाइक यानी पीना छर ? तेहनई तेडी आपणा गन्ठमांहि आवसिइ। ते कागल राधनपुरि सा श्रीजीवरानि सामन्यु । मा श्रीचनमाथि दिलगीर थया जे-एडया डाहा पासल्याने पगे लागिसिह तो पीनानुं शं गर्नु ? पछइ सा श्रीरं सो० पोममीनई कागल लप्यो, वार्ना नगावी, जे आहयो वाचा सांभलीइ छह जे-सो० पउमसी सा(सो०) यम्नुपाल, मो० लाला, मो० रीडा प्रमुग्ने तेडीन ठार मर आपणा गच्छमध्ये आसिड, एहयु धनसागरि नष्प्युं शह' ते मा श्रीनु कागल ममायं वांगी रिचारया मागा, देषु मृपापादीनां फरणीय अच्छती वा गामि गामि लिपा छा । पर मानई तडी मेर टार धर्मगार भाज्या-तानी प्रतिष्ठाना अक्षर आपो । तुम प्नं गे भार . उछ ।' पर फरि-मिहानि नो वीरगरिवना कपिल केचनी मनिष्ठा कीपी पारा भार छ ।' पा सो पोममी कार- प्रथमानी पुनः अग्रे १४० विविधगच्छोय पावली संग्रह कीधु ?' त्यारह कहइ-'हेमाचार्यनु फीधु ।' तिवारह कहइ-मतिमा केवलीई मतिष्ठी फीहा ग्रंथम येयी आणी।' संबंध सपलं उदायन राजानु प्रतिमानो 'श्रीमावश्यकपूर्णि'मध्ये छर, ते मध्ये तु फपिल केवलीनी प्रतिष्ठान नाम ज नधी, भनई निशीथचूर्णि, आवश्यरुचूणि, जीयंतस्वामिनी प्रतिमा विद्यमाली देवताई मतिष्ठी दीसह छद-- 'पढमपूआ पइट्टा' इत्यादि तुझे कहउ छड जे वीरचरित्रि इमाचापि कपिल केवलीनी प्रतिष्ठा आणी ते जाणीइ छह, जे असंबद्ध अर्थ दीसइ छइ, जे माटि वीरचरित्रमा आप्यु छइ, वीरविहारि मुनिचंद्र अणगार देवलोकि गया कहा छइ, अनई श्रीभावश्यकचूणि तु मुगतिगमन छइ, वीजा पणि अधिकार फारफेर छइ । मुमंगल अणगारनई लोचना तथा पोतइ आण्यु छइ, जे वीरनइ अभयकुमार प्रश्नं- पृच्छति स्माभयोऽप्येवं कपिलपिंप्रतिष्ठिता। प्रकाशमेष्यति कदा प्रतिमा परमेश्वर ! ॥ ६ ॥ १३ स्वाम्याख्याति स्म सौराष्ट्र-लाट-गुर्जर-सीमनि । फ्रमेण नगरं भावि नाम्नाऽणहिलपाटकम् ।। ३७ ।। अस्मन्निर्वाणतो वर्षशतान्यभय ! पोडश। नवपष्टिश्च यास्यन्ति यदा तत्र पुरे तदा ॥ ४५ ॥ १५ कुमारपालभूपालश्चौलक्यकुलचन्द्रमाः । भविष्यति महायाहुप्रचण्डाखण्डशासनः ।। ४६ ॥ १६ जे आगलि हेमाचार्य हसिइ त्यारइ कुमारपाल राजा हुसिइ त्यारइ प्रतिमा प्रगट यासिइ, इत्यादि धणी संबंध छइ पणि ए अधिकार कृण सिद्धांतमाथी कुण पंचागीयी आग्यो छइ । ते मार्टि जे एहवा अर्थ अणमीच्या ते कपिल केवलीनी प्रतिष्ठा आणइ ज ए वातन सिउं पूछ ! ते अधिकारनां पत्र माशुरु जलयोग्य दीसइ छ ! पछइ धर्मसागरि मौनालंय कीधा । ठाकर मेर कहइ-'जे आतला दिन अह्मो आशीर्वाद देता ते भाटनु आचार, अनई नमस्कार पोयीनई करतु पणि तुह्मानई परगामि पोटा कागल लपया मावइ, एतला दिन वीरनी आज्ञा रहीतनी संगति कीधी हुइ ते मिच्छामि दुकडं ।' सर्वनई तेडी जयपताका पामी, सरव उपाश्रय आव्या। सा श्रीजीवराजनई राधनपुरि कागल लप्यु । संवत १६१८ ठाकुर मेरनइ सुचा कांगा साथि गंधारमध्ये पाघडी उतारवा चरचा, पेलइ धगो लोभ देपाडधुं पण अचल इत्यादि विस्तर । संवत १६१८ सा श्रीजीवराज पत्तमे चतुर्मासक । तन उपाश्रय देहरा ममुस घणां धर्मकार्य । संवत १६१९ राजनगरि चतुर्मासक । संवत १६२० स्यंमतीथि चतुर्मासक । तत्र चु० जिणदासनी प्रतिष्ठा कीधी । थावर दोसी घृतपटीमध्ये चैत्यं कारापितं । तत्रयी घणा मनुस्य साथि पंभा. तिथी आबू प्रमुखनी यात्रा घगी नागि पधार्या । संवत १६२१ धिरपुर घणो प्रभाव, सा श्री आदि एक भावकि जावजीच त्रणि द्रव्य उपरांत पचसाण कीधुं । संवत १६२२ मोरवाडि प्रमुस सयलइ विचयाँ । संवत १६२३ पचने चतुर्मासक । तन सा तेजपालनई संवरी कीधा । स्थिरपुरि सा नरपति, सा चांपसीनई संवरी कीधा । संरत १६२४ व संघत्री संग्रामि आममुसवें संघ कोई । संवत १६२५ स्थभती सा रत्नपालनइ संवरी कीधा । संवत १६२६ राजनगरि सा श्रीवंत तथा सा घजूडनई संकरी कीधा । सा श्री काशीपमुसनई प्रतियोध्या शाहपुरा । संवत १६२८ सा नरपति सा चांपसीना भाई सा निणदासनई संवरी कोधा । संवत १६३० सा श्रीजीवराज राधनपुरि चतु- मासका सा सानम(न) राजनगरि चतुर्मासक, एहबह पानभानमि विराध की । तिणि मनुस्य मरीई टगाइ ते देषी।

पटोपरत्वं, सर्वायुः पट्पटिरपाणि परिपाल्प स्वर्गमगमन् । मामी पगां मंटाग होमगार माल नगरि दिन कडु आमतीगच्छप धावली सासा साजन वैरागी चित्तमा चीतवई जे देपो जीव धर्म पापड आतली वेदना परवशि पमड छइ पण पोतानई वसि पमतो नथी तो घणो काल संसारमा भमीसिई तो मनुस्यनु जंवार फोक न हारु । चउदसि ऊत्तरवार| करी पापीनई दिनि पोसह कीधो । कालना देव वांदी, श्रीचंद्रप्रभ सापि जावजीवाइ तिवि पि आहारं अनशन कीर्छ । बीजइ दिनि पारणा वेलाई पारणं न करइ त्यारइ जाण्यु जे पीजउ उपवास कीधु हुसिइ, पद वलती वार्ता कीधी जे-'मुझनई संघ महत्त्व आपइ, मइ अनशन कीधुं छइ ।' प० रत्ना, दो० मंगल, दो० सोना, सा० धना प्रमुख संचि वीनती कीधी-सा जी ! ए कार्य दुष्कर छइ सानइ शरीरि ते मार्टि उपवास ८ तथा १५ अथ मास करउ।' पछइ सा साजन कहि जे-'मइं जावजीवन उचरित्रं ।' पछइ संघि राधनपुरि सा श्रीजीवराजनई कागल लप्यु जे- 'सा साजनि अनशन कीधुं छइ ते मार्टि पूज्य अन बहिला पधारयो ।' पछइ सा श्री सतरमइ उपवासि पधार्या । उच्छव विशेष थया, दिन ६१ अनशन पाली दिवं गतः । संघि माडवी प्रमुस उच्छवि दहन संस्कार करी सहू घरि आव्यु । सा साजन साजन जपवा लागुं । पछइ श्रीसंघि धर्मसी पटेलनी वाडी मध्ये असारूइ थूम कोर्छ । सांपतं वाटिकामध्येऽस्ति । पछइ सा जीवरानि घणी जागि प्रतिष्ठापइ, सारी यात्रा कीधी, तथा पत्तन- देहरु मलाणीइं पाडयुं ते दो० गलिफाठ सर्वराजमाथी पाछु आप्यु । देहरु कराव्यु, तथा मं० जयराज, जयचंदनई कपिलपानि राप्या हता। मं० लीवाना संतानी तेहनइ अहमदावादथी दो० मंगल, प० रत्ना, दो० सोना, सा० धना पाटण नै तरत मुंकव्या । साइमीना एहवा राग हुइ, घणां कार्य कीधा । धर्मबांधव जाणवा, यतः- अन्नन्नदेशजाया अन्नन्नाहारचुढिय[सरीरा] । एगस्स धम्मे पत्ता सव्वे ते बंधवा भणिया॥ तदनंतरं परी कीका नई सा नरपति भणाव्या । सा नरपति वारू पंडित घणी विद्यासंग्रह कीधा । संवत १६३५ सा चांपसी दिवं गतः। संवत १६३६ सा तेजपालि स्थिरपत्रे(है) सा राइमलने संबरी कीधा । संवत १६३१(७) सा नरपति दिवंगतः। संवत १६३८ सा गोवाल, सा देवनी ममुप पेलाडी जालुहरा मतियोधितवान् । संवत १६४२ पत्तनथी परिकीका आनी यात्रा साथि सा जीरानममुस संबरी, स्थिरपत्र(द्र)को संगी सोहर आउनु संघ कीधु । वेहु संघ एक ठाम मिल्या, स्थिरपनदायी सा जेसादिक घणा संबरी, मा श्रीजीपराननई मिल्या। सा माडणि आर ऊपरि अनशन कीधुं । घणा उच्छा कीधा ते 'सा माडणना रास' भी पीछया । सा मांडण दिन ५९ मई दिवं गतः । संवत १६४३ दोसी अमनीइ प्रतिष्ठा कीथी। सा श्रीनीवरानि प्रतिमा प्रतिष्टी । तदनंतरि खरतरा सा सोमनी शवा तेगि संघ कीधु । ते धणीइ सा श्रीनइ घगइ आग्रहि सायि तेया। सा श्री पोताना यणा संघ साथि पंभातिना सोनी परा प्रमुख राजनगरना पण यगा मनुस्य साथि संबरी सनिड तेडी मिडायलनी या पार्या । तर श्रीरिमलायलि घणा उन्छा पूजा-स्नात्र ययां । सा रत्नपालि ना आनीमा नु ना राम की । तत्र गानं, बुशलि यानाकरी पधार्या रामनगरि। संवत १६४४ सा श्रीनई गरीरि बाधा पई, ममम्न सघ मन्यु, मा श्री पोता- आयु स्तोक नागी सा तेजपालनां पदस्थापन, संरीनई घगी गीपामग दोगी, दिन ३ अनगन पारी, अरिहंत सिद्ध जपता, दिवंगतवान् । सा श्रीजीरान १२ पर्प ग्राम्यपर्याय, ११ उरम मामान्य मंत्ररी, परम दिन अमारिपटही घोपः ४॥ १७ १४२ विविधगच्छीय पावली संग्रह तत्प? सा श्रीतेजपालस्य चरित्रम् । पत्तनवास्तव्य श्रीश्रीमाली दोसी रायचंद, भार्या याई पनाई, पुन सा तेजपाल, सा जीवराजनई वचनि संबरीत्वं वर्ष १३ गृहस्थपर्याय, वर्ष २१ सामान्य संवरीपर्याय, वर्ष २ पटीपरत्वं । अतीवविद्यापान 'महावीरनम- स्करणकल्याणकारणो धर्मः' इत्यादिस्तोत्राणि कृतवान् , सावभू(चू)रि-समाससहित कीधी छह । सा राइमलनई सा चोथाइनई भणाव्या । सा चोथानई थरादनो आदेश आप्यो । वीजा संरीनइ घणी विद्यानु अभ्यास घणो । संवत १६४५ सा श्रीवंति पण घणां स्तुति कीधा छइ । सा श्रीवंत दिवं गतः। संवत १६४६ सा श्रीतेजपाल पचने चतुर्मासक, तत्र शरीरि विशेष बाधा। सा रत्नपालनई पदस्थापन शुभपरिणामे दिवं जमाम । सर्वायुः पशिदिति ३६॥ तत्प? सा श्रीरत्नपाल । स च स्यंमतीर्थ पासि सारीग्रामे दो० वस्ता श्रीश्रीमालीटद्धशासायां भार्या वाई रीडी, पुर सा रत्नपाल । सा श्रीजीवराजना वचनथी संवरीत्वं, मूक्ष्मविचारनई विषई घणुं प्रवीण, रागांगी घj हवा, घणां स्तवन-स्तुति कीयां छह, २४ तीर्थकरनी, २० विहरमाननी, १३ काठीनी भास कीधी छड् । संवत १६४७ स्थंमतीर्थे चतुर्मासक । तत्र वाई सहिजलदे घणु वैराग्यवान । श्रावफ्नई घरि पिण आमंणि भोजन करवा जातां पोताना जीवनी घणी गरज सारई, संसार असार जाणइ, सा श्रीनी वाणी सांमली जापनीवाइ तिविई पि [आ]हारं अनशन कीg, तेहवह हरमजिथी सोनी सोमसी आव्या, ते धणीई घणा उच्छव कीधा । अनशननी घणी शोभा थइ । सामी सामिणीनी घणी भक्ति, चुवीस पासी, वात्सल(ल्य), नित्य रानिजागरण प्रमुसा घणां ब्रत- पचखाण धयां । सा श्रीरत्नपालना उपदेशयी बाईनई दिनई दिन प्रति नीझामतइ दिन ५९ अनशन पाली दिवं गता । श्रावकि घणइ उच्छवि मांडीपी प्रमुख आडंबरि देहसंस्कार दिन दिन उच्छर बघतइ संवत १६४७ सा जेसा थराद दिवं गतः। तत्पट्टे सा पेतसी संवत १६४८ राजनगरि चतुर्मासक । तदनंतरि संवत १६४९ सा जिणदासनइ धर्मसागर साथि चरचा । तत्र धर्मसागरिं सा जिणदासनई प्रश्न जे, 'तुझे धर्मार्थी ? ' तु कहि-'हा।''तुझे धर्मी तिम धर्मार्थी..जिणि जल नथी पामिउ ते जलायी कहिवाइ, विम तुह्म धर्म नथी पाम्युं नई धर्मार्थी कहावु छउ ।' पछइ सा निणदासि धर्मसागरनई क्युं जे-'महानुभाव ! शास्त्रसन्मुख दृष्टि यो तो वारू छइ, जे ठाणागे- 'दुविहे धम्मे पन्नत्ते तं जहा-अगारधम्मे अणगारधम्मे ।' ते वती तलो श्राश्मनु धर्म पाम्या छीइ, यतीनु धर्म नथी पाम्या, ते बती धर्मार्थी कहावीइ छइ, एकांति श्रीयुगमधाननइ ध्यानि वीइ छइ पण मतांतरी गच्छांतरी देषी आस्था नथी आवती । मौनावलंयनं भेजे । संवत १६४९ सा श्रीस्थंभतीर्थ चतुर्मासम् । तत्र संघवी अमीपाल, सो० महीपाल, सो० पनीमा, सो० लपमसीई, सा श्रीना वचन सांभली विमलाचलनु सघ कीधु । घणा मंडाण शुं सा श्री प्रमुस संवरी साथि श्रीस्थंभतीर्थनो वीजा गामनो संघ कुशलि यात्रा करी सर्व धरि आव्यु । संवत १६५० राजनगरि चतुर्मासक । तन बाई सोनपाईई अनशन की , घणा उच्छव थया, भावना भावतइ उपवास ६१ मइ दिवंगता । संवत १६५३ सा श्री पत्तने चतुर्मासक । तन मं० लालजी लीया मुंभीआना या ते घणी संपेसरानु संघ कृतवान् । संवत १६५४ सा श्री रत्नपालई स्थभतीर्थे सा माहावजीनइ संवरी कीपा । संवत पछइ धर्मसागर 44 सजताग-यिणयसय-सत्तिमो अइपनपणा मुविहिपाणं ॥ . कडु आम तीगच्छ पट्टावली " संवत १६५५ सा जिणदासि सा तेजपालनई संवरी कीधा । संवत १६५६ सा श्री रत्नपाल राजनगरि चतुर्मासक। तत्र भणसाली सोनाना संतानीया, भगसाली जीवराज, भगसाली देवइ ऊभी सोरठनु संघ कीधु । गिरनारि, सेजइ, देवकइपाटणि, दीवि प्रमुख सघलइ पधार्या । साथि सा श्री आदि सर्व संवरी घणी प्रभावना, घणा उच्छत्र सहित कुसलि यात्रा करी सर्व घरनई विषई आव्यु । दिनि दिनि उच्छव अधिक । संवत १६५८ सा राइमल दिवं गतः । संवत १६५९ सा वस्तुपालनो विवमवेश कृतः सा श्री रत्नपालेन । संवत १६६० सा श्री रत्नपाल राजनगरे चतुर्मासक । तत्र भण. जीवराजि, भण. देवइ आधु, गोडी, राणपुर प्रमुखनो संघ कीधुं । पंभातिना सामी, पाटणना सामि, राधनपुर थरादना सर्व संघ साथि, सा श्री रत्नपाल आदि संवरी सा श्री रत्नपाल, सा निणदास, सा पुंजा, सा घेतसी, सा चुथा, सा महावजी, सा तेजपाल, सा रिपभदास, सा पुजीआ, सा गोवाल, सा हीरजी ११-इत्यादि घणा संवरी साथि हता। सघलइ देवपूजा विधिपूर्वक नाटक-उच्छवसहित श्रीसंघ सीरोहीई पधार्यो । तत्र चैत्यवासी साथि चर्चा । सा श्री रत्नपालनई आदेसि पुनः संघनई आदेशि सा रत्न निणदासि चर्चा कीधी, तद्यथा चैत्यवासीई कयु-'सांभलो, अह्म पधर वेप प्रमाण ।' यतः-उपदेशमालायां- धम्म रक्खइ वेसो सकइ वेसेण दिक्खिओमि अहं। उम्मंग्गेण पडतं रक्खइ राया जणवा व्व ॥ ते वती वेप प्रमाण, ते मार्टि अह्मो मान्यता जाणवा । पछइ सा जिणदास कहइ-'तुझो श्रीउपदेशमाला --- १८ . मध्ये जूभो, कयु छइ ये- वेसोवि अप्पमाणो असंजमपए [प]वढमाणस्स । किं परिअहिय वेसं विसं न मारेइ खज्जतं । ते माटि ए गाथामध्ये असंयमि वर्ततो वेप अप्रमाण जाणयो ।' पछइ कहि जे-'हिवडां यकुस चारित्र छइ, कसा सरिपुं ।' पछइ सा कहि जे-'हवडां छई कइ सदाइ छइ ? यतः- 'यकुसकुसीलेहि चहए तित्या' इति वचनात् सदा जाणवू, पण सिद्धांतना भाव अगमीछि कडो छउ, प्रथमता बकुसयरित्र का ते तां निग्रंथ जाणियु, ते निग्रंथनो अर्थ बाह्य अभ्यंतर परिग्रहरहित ते निग्रंथ जाणषु । अनई यकुस ते कूकसा माय, केवलीना चारित्र जोतां स्नातक निग्रंथ जोता जाणवो । अनई सार भास परिग्रहा छइ ते तउ जाणु छउ ।' पुनः कहि जे-'महानुभाव छह, पांचमु आरउ छह । पुनः साह माह-उपदेशमालाया- 'संघयणकालयलदूसमारआलंयणाई चित्तूर्ण । सब्य च्चिय नियमधुरं निम्बमाओ पमुञ्चति ॥ - कालस्स य परिहाणी संजमजोग्गाई नत्यि खेत्ताई। जयणाए यष्टियव्यं न हु जयणा मंजए अंगं ।। समिई-कसाय-गारयदंदिय-भय-यंमयेर गुतीमु। २० विविधगच्छीय पापली संग्रह - श्रीउपदेशमालानी २९३ मी आदि देई सर्व गाथा छइ, एणइ मेलि काल पडतइ पण जयणानुं अंग न माजबू, ते पांच सुम(समिति पालवी १, चार कपाय टालवा २, प्रप्णि गारव मुंगवा ३, पांच इंद्री दमवां ४, आठ मद छांडवा ५, नत्र वाडि सील पालj ६, विनय करघु ७, सज्झाय करवी ८, तप करयु ९-इत्यादि जयणांनां अंग छइ, गाथा सघली छइ, ४२ दोप मांडिल्यु दोप लगाडइ ते पासत्यु इत्यादि-उपदेशमालामध्ये ३५० मी गाया जाणवी । र आदि घणी छ। । ते मार्टि महानुभाव ! सर्व विचारउ, साधुनई उठीगण न कल्पइ-ओपनियुक्ती । चोमासा टाली पाटि पाटला न कल्पइ-ज्ञाता-आवश्यके च । नित्य विगय ले ते पापी श्रमण-उत्तराध्ययने । मृत्ति कानुं पण पात्र मुनि रापइ-श्रीठाणांगे । श्रावस्नई कल्प सभलावइ छइ ते आचरणा पण-निसीयम्ने निषेध । बार्टि हौंडतां वार्ता करइ ते पासत्यो आवक टाली वजह । कुलि पणि आहार लेवु, वर्द्धकि नापित-आचारांगादौ । साधु पीटणीई न रहइ-आचारांगे ! हाथ पग न धूद-दशवकालिके । इत्यादि घणा घोल पिंडनियुक्ति, तथा पिंडविशुद्धि नइ विषद पणि छइ ते पीछयो। पछइ चैत्यवासी निराकरण थया । सा श्रीफहआनई मसादि आणंद यम् । विहांथी संघ चिरादि आव्यो । विहां समस्त संघ वत्सल १७ थयां । ६० मण खांडनी य(ज)ठेवी पपती । तिहां दिन ३० श्रीसंघ रा । पछड़ राधनपुरि । तत्र पण संघवत्सल । तत्रथी पाटणि संघवत्सल । इम सघलइ यात्रा करी कुशलि संघपति सा श्री प्रमुस सर्व घरि आव्यु । तदनंतरि सा श्री संवत १६६७ स्थंभतीर्थ चतुर्मासक पघायर्या । तत्र शरीरे वाधा जाता। सा श्रीजिणदासनई पदस्थापन । सा श्रीअनशन[पूर्वक] शुभध्यानेन दिवंगतः। तर साहमीइ घणा उच्छव सूकडि प्रमुख देहसंस्कार कीधु, दिने दिने सा श्रीमानो समवाय दीपतो वर्चइ । सा श्रीरत्नपाल दश १० वर्ष गृहस्थ, २१ वर्ष सामान्य संवरी, ५ वर्ष पट्टोपरत्वं, सर्वायुः पट्चत्वारिंशदिति ४६ । वत्प? सा श्रीनिणदास स्थिरपत्रे(द्रे) श्रीश्रीमाली वुहरा जेसंग, भार्या वाई जिमणादे पुत्र जिणदास । सा नरपतिनई वचनि संवरी । संवत १६६२ सा श्रीनिणदास राजनगरि चतुर्मासक । तत्र भणसाली देवा मुरत्राणमान्य ते धणीइ प्रतिष्ठानई महूर्ति फागुण बदि १ दिने ते ऊपरि जागि जागि श्रीसंघनई कुनोत्री लिपी मोकली। संघ सघला गामथी आव्या, घणा उच्छच । श्रीरिपभदेवनी प्रतिमा १ पंचासी आंगुली, एहवी मोटी प्रतिमा हवडां कहीं नथी, ए टाली एक भणसाली देवइ भरावी । प्रतिमा आगुल ५७ भणसाली जीवराजि भरावी । प्रतिमा ? आंगुल ५७ नी भणसाली कीकइ भरावी । एवं प्रतिमा ३ मोटी । पुनः प्रतिमा १ आंगुल ३७ नी श्रीशांतिनायनी भणसाली देवइ भरावी । बीजी प्रतिमा घणी पुत्र प्रमुख स्वभनि भरावी । संघनी समस्त प्रतिमा १५० सा निण- दासेन तदादेशेन च संवरी श्रावकेण प्रतिष्ठिता । अत्र श्रावक प्रतिष्ठानी घणा दिन चर्चा जाता। सांप्रत ते प्रतिमा राजनगरि घांचीनी पोलिमध्ये भणसाली देवेन चैत्यं कारापितं, देवविमान सदृशं तन मुईहरामध्ये प्रतिमा ३ मोटी वइसइ छइ । प्रतिमा १ श्रीशांतिनाथनी ऊपरि मूलनायक बइसइ छइ । पासि सर्व संघनी वइसइ छइ । मति- प्ठामा उच्छय वेदी वर्णन प्रमुख सर्व वाच्यं सर्वेषां दृष्टमतीतं संघेन आगतसंघस्य वात्सल्यं विहितं । भणसाली जीव- राजेन भणसाली देवेन वस्त्रप्रभावना कृता । संवत १६६३ सा श्रीपत्तने चतुर्मासा, तन परीप लटकणेन विवप्रवेश करितः । मई लालजीई विषप्रवेशो विहितः, तत्र घणा उत्सव । संवत १६६३ सा माहावजीई नर्मदासुंदरीनु रास' कीधु । तदनंतरि संवत १६६४ सा श्री रायधनपुरे चतुर्मासक, पणा उच्छव। संवत १६६४ राजनगरि भणसाली .

, विशति २३॥ कोषां । यरादमध्ये मोदी सगनी मावा र कडुआ मतीगच्छ पट्टावली ११५ पंचाइणि संपेसरानु संघ कीधु । एहवइ पंभाति सा श्रीरत्नपाल शिष्य सा महावनी चतुर्मासक । तत्र सोनी वस्तुपालनी भार्या वाई वैजलदे तिणि प्रतिष्ठा करवानुं मन करिउं । सा श्रीनई आदेशि प्रतिष्ठा कृता । घणा उत्सव सामीवत्सल वस्तु प्रभावना। तत्र दोसी हां, भार्या वाई सहजलदे, मुत सा कल्याण, सा महावजीने वचने संवर १ थया। संवत १६६४ संवरी । संवत १६६५ सा श्रीपंभाति चतुर्मासक । तत्र वाई बइजलदे वारव्रत ग्रहण, वस्तु प्रभावना । सा महारजी राजनगरे चतुर्मासक । तत्र भ० देवइ श्रीशांतिनाथस्विमवेशनिमित्तं तत्र सा श्रीनई आकारण । शुभेऽति विवप्रवेशः कृतः मार्गशीर्षे मासे, घणा उच्छवः । संवत १६६[६] सा श्री राजनगरि सा जीवानई संवरी कीधा । सा महावजी स्थंभतीय चतुर्मासकः। तत्र सा महावजी दिवं गतः । सर्वायुः वर्षत्रयो- सा कल्याण स्थंभतीर्थे स्थितः । तत्र वाई हेमाई धर्मनाथ विवमवेशनिमित्त सा श्रीनई आकारण । शुभदिने माग[स]र शुदि ६ दिने विवप्रवेशः कृतः । तत्र संघेन सा कल्याणनइ सा श्रीनइ भणावा सोप्या । एहवइ पत्तने परी लटकणेन श्रीशत्रुजयनुं मन कीधु । संघ करीनई स्यंमतीर्थे सा श्रीनइ तेडवा द्वो(दो०) सीरंग मोफल्या, संघनई पणि कहिवा । सा श्री पासि पंभाति आव्या । सा श्रीनई तेडी पाटणि पधार्या । तत्रथी मोटइ मंडाणि संघ करी राज- नगरि पधार्या । थराद सर्व अहमदावादि आयु । साथि भणसाली देवा प्रमुख सर्व याबाई आव्या। सा श्रीजिण- दास आदि संबरी, सा श्रीजिणदास, सा तेजपाल, सा पेतसी, सा चोथ, सा ऋषभदास, सा कल्याण, सा जीव, सा पुंजीया, सा रूडा प्रमुख घणा संवरी श्रीशजयनी यात्रा करी कुशलि राजनगरि आन्या । तत्र भणसाली देवेन संयवात्सल्यं कृतं । भण समरशंवेन संघवात्सल्यं कृतं । बीजा सात संघवात्सल्य थरादनई संघे कीधा । परी लटकणेनापि संघवात्सल्यं कृतं । एवं प्रकारेण उत्सवेन कुशलेन पत्तनं प्राप्तं । तत्र सा श्री चतुर्मासक । सा तेजपाल फ्ल्याणने राधनपुरि चतुर्मासका सा श्री पाटणथी राधनपुरि पधार्या, चु० सोमसीनई आग्रहि स्थिरपुरि पधार्या । सा तेजपाल, सा कल्याण, सा जीवा साथि तत्र दिन ४५ रद्या । तत्र ‘वरणाग-णन्नुभआनी सज्झाय ' सा तेजपालेन कृता । तत्रधी चाचि सोहिगामि. मोरवाडि, महिमदावादि विचिरी राजनगरि पधार्या । श्रीसंत १६६७ पंभाति चतुर्मासक । संवत १६६७ सा तेजपाल राजनगरि चतुर्मासक । तत्र सा तेजापालेन दशपदी कृता, पाघटिकापंचदशी इत्यादि १० बोलना विचार । सा श्री संवत १६६८ राजनगरि, सा तेमपाल पंभाति । संवत १६६९ सा श्रीमरीरि पाया ठवी पंभाति । सा तेजपाल रामनगरि । संवत १६७० सा श्री रामनगरि चतुर्मासक । मा श्रीनई आदेसि सा तेजपाल कल्याणनई थरादना संघनइ आग्रहि थराद चतुर्मासक । सा श्रीई सा विजयचंदनई संवरी कोया । संरत १६७० वर्षे सा श्रीनई देटि रक्तपित्त पीडा व्याप्ता । सा श्रीई समस्तसंघ तेडाची उत्सवसहित नगरमध्ये मगसाली देवानई चैत्य आवी, देव शारी, उपाश्रय पधार्या । सा श्रीतेनपालनई पदस्थापना(न) कथितं । सा श्री शुभन्यानि अनशनपूर्वक दिवं गतः । सा श्रीनिणदास वर्ष १७ गृहस्थपर्याय, वर्ष ३३ सामान्य संपरीपर्याय, बर्ष ९ पटोपरत्वं, सर्वायुरेकोनपष्टि ५९ वर्षाणि । तत्प? सा श्रीतेजपाल स्थंभीर्थे । सो० यी(ब)स्नुपाल, भार्या याई फीकी, सुत सा तेजपाल सा निणदागने चचने सारी, भा, अतीव विधायान, येन म पुप्फरमिष्ट(श्र)पार्धे मंपादरेण चिंतामणिशागमपी पनि सदादानेनेति । सा श्रोतेजपाले स्थिरपत्रे(टे! पिनानि अतीर उस्मरः पणे मीसिनुप्प) मत पगार पाई नीगं, एकदा पुत्र सापि मेम-फलाद अपना पपवन फररा गां।

विविधगच्छी य पहावली संग्रह तन कूपपतन करतां शब्द थयु, येमां वार ३ वाईई पूछिउं- ये कुण छइ ? ' त्यारइ काहइ-'ये हुँ ताहरु क्खाक भावो नाम, दिन १३ नुं अनशन करी देवलोक गति पाम्यो छउँ । ते वती यापडी पपतनि संसारद्धि थासिइ ।' तु कहे-' हुँशुं करूं? ' वलतुं कहइ-' अन[शन लिइ, चउविहार अनशन करये, दिन २२ मइ सीझीसि ।' ए वात याईनई मुपि सांभली ते लपी छइ । , पछइ दिनि वीजइ सा श्री वा(व्याख्यान बांचता वाई आवी कहइ-' माहरइ हवड आ भवनइं विषय आहार निषेध ।' सर्व संघ सामली विस्मय पामिउ कहि जे-'कहि छर शुं ?।' पुत्र आव्यो, घणा घानां मोदी हंसराजि कीघा, पण बाई कहइ-'जे माहरा मनमा रा[ग द्वैप लगार तुझ ऊपरि, वीजा परि नथी, मन वचन कायाई अनई मुझनई धर्मविघ्न म फरीसि ।' पछइ सा श्री तेजपालि, सा पेतसीई. दो० रत्ना प्रमुख संघि बाई जयवांनइ घणा वाना कयां, पण लगार चित्त आभेद । बाई कहि-जो अनशन ऊचरावो तो पाणी पीठ, नहीतरि चुवीहार करीसि।" पछइ संधि वेटानई आदेशि उच्छव सहित देहरइ आपी दिन ७ मई अनशन लेबराव्यु, पण सघग उपवास चुवीहार कीधा, संथारापयन्ना प्रमुख संमलावतद एकवीसमइ उपवासि पजूसणनी अठाईधरनई दिनि बाई चंपाणां लगारेक, संघ सर्वनई पौषध, वाई पासि सा श्री आवी नींझामवा लागा । वाई कहइ-'कसी बापा नथी, कालि रिपुरि सीधानी ।' बार्चा संघ सर्व विस्मय पाम्यु । पद चीजइ दिनि सर्व पार| करी उपाश्रय आव्यु, भणतां गुणता मध्याह्न समय 'नमोत्यु णं' करतां दिवगता । सर्वदृष्टप्रत्यय दिन २२ अनशन पाल्युं, घगइ मंडाणि मांडवी प्रमुस अनेक गूडाना शत, थरादपेन धर्मना राग प्रबल, वाईनई दहनभूमि ल्यावी संस्कार कीधु । संघसमस्त उपाश्रय आवी सा श्रीना मुपथी श्लोक सांभली सर्व स्थानकि पुटुत । तर थरादमध्ये जमालपानि सा श्रीनई रानहारि तेडाव्या । तन [त]पाना पुन्यास पणि तेडाव्या, तत्र यती आश्री चर्चा । सा श्रीनु बोल ऊपरि आन्यो । थरादमध्ये घणा उच्छा थया । एक दिन थरादमध्ये लुको महं रतनसी, तेणि प्रश्न-'जो तुझे प्रतिमानु एपडो प्रभाव कहु छउ पण चमरेंद्रनई अधिकारि त्रणि शरणमां वीरनु शरण असंख्य द्वीप उल्लंघीनई अत्र आची कीर्छ । अनई भुवनपतिनई विपद पणी प्रतिमा छइ, असंख्य द्वीप उल्लंघी आव्यो, तिहां पणि प्रतिमा छइ, ते मुंकी, अत्र तो आव्यो, प्रतिमानु परमार्थ नहीं ।' पछइ सा श्री कहइ-'जे तुझे क्युं ते अल्पबुद्धिना धणीनइ संदेह आपइ, पण विचार्यानुं काम छह ।' मं० रतनसी कहइ-मई घणा गच्छनावासीनई प्रश्न पूछिउँ पणि कोणि नयी कह्यु छइ ।' सा श्री कहइ-' चमरेंद्रना मनमा इम ज आविउं नई करिडं, ते मार्टि जिनप्रतिमानु प्रभाव उच्छु न थयु, जो कहिशो तो विद्यमान तीर्थररनु मभाव उछउ करशो । कहि-ते किम ?' पउइ सा श्री कहई-'सांभलो, जे चमद आव्यो ते वचि पुष्करद्वीप आव्युं, तत्र आठ तीर्थकर केवलीपणइ, आठ धातकीमध्ये, ते उलंघी अत्र आव्यो, ते तो ढूफडा हता ते वती तेहनु महिमा नही, ते वती कुयुक्ति मुंकी, साचइ मारगि चालि ।' साहमुं मं० रतनसी पुसी थया । एहवा अधिकार सा श्रीनई घणा थया छह । तदनंतरि सा श्री राजनगरि पयार्या । तत्र भगसाली दो(दे)या प्रमुख सन्मुसागमनं । संघ सहित उपायय- गमनं च श्लोकायनं । तदनंतरि सा श्री संवत १६७१ पत्तने परी लटकणाग्रहेण चतुर्मासक । तत्र सा श्रीतेजपाल 'दीपोत्सवकल्प' संस्कृत कृतवान् सावचूरो(रि), मुखशोधनगच्छे यः सामतं वाच्यते, चतुर्विंशविजिनस्तोत्रं चकार- . - धंतकाल अनशन करयो।' वाई कहइ-'मिई अरिहंतसापि आत्मासापि जावजीयर्नु अगसण कीछु ।' पछद संधि गई अहम्मदावादनी दसकोसी लगइ पडह बजडावीसि ।' पछइ पडद वजडाव्यो, घणा जीव ऊगार्या, महालाम ते उत्तवा केतला लपाई? सर्वेषां दृष्टमत्यय, नित्यव्याख्यान, संथारा, मकीणक प्रमुस । भगसाली कीकड़ मांडवीनु मान सर्व कीधु, घणइ यतपचखाण कीधा, यणइ एकांतर कीधा, तेहनइ पारणक पाईनी परिचर्या सर्व बाई रूपा पोगं ठामि ठामिना मनुस्य वाईनई वांदवा आव्यां, तेहनई वात्सल्य, वसमभावना मनसाली देवर, भगसाली मपि कोधी घणा ज उच्छा थया । बाईनं चित्त ठामि, यतः सा श्रीवचनं- '. कडुआ मतीगच्छ पट्टावली 'सर्वसुरामुरैर्वन्ध ' इत्यादि, छंद-स्तुतिः योपण कीधु छइ । सा कल्याण स्थंभतीर्थे चतुर्मासक । राजनगरि भणसाली देवइ शचुंजय छयरी पालता जेइ, एहवी वासना कीथी । सा श्रीनई चतुर्मासा पछी तेडाव्या। शुभ महूर्ति कार्तिक बदि ५ दिने यात्रा पधार्या, साथि घणा परसमबाई, घणा सामी पाटणना परी लटकण प्रमुख, खंभातिना संघवी अमीपाल, सोहरजी प्रमुप घणुं संघ परगछी अनेक वार्टि छयरी पालतइ गान थाते सर्व गामना संघ वारणइ एकठा थई सी(सिदाचल भणी सांचर्या । धार्टि एकाशन १, भूमिशवन २, उभयटंक प्रतिक्रमण ३, त्रिकाल देवपूजन ४, सञ्चित्तत्यजन ५, ब्रह्मवत पालन ६, पादचलन ७, सम्यक्त्व ध(धा)रण ८ इत्यादि घणी पडइ आठमि पापी एक स्थानकि रदिनइ दिन २२ मइ श्रीशचंजय पोहता । एक बाईइ राजनगरथी उपवास ते श्रीशचुंजय लगइ उपवास पाली आची, अनेक उच्छच दृष्टप्रत्ययः । सा श्री आदि संवरी भण. देवा आदि समस्त संघि श्रीऋषभदेव भेट्या । मानुषो जन्म सफल कीधु । सा रामजी, सा हांसूनई सा श्रीइं संवरी कीधा। दिन ८ तत्र रही सतरभेदादि पूजा करी, समस्तसंघ साथि धोलकइ पधार्या। तत्र जामीअ कठनी प्रभावना, भणसाली देवेन संघसमस्त नइ वस्त्रमभावना कृता । कुशलि सर्व यात्रा करी घरि आव्यु । तदनंतरि सा श्री संवत १६७२ पंभाति चतुर्मासक । सा कल्याणनइ राजनगरि चतुर्मासक । तत्र संवेन वासरे पटक आसन स्थापन संघवात्सल्यं परी वीरदास, सा हीरजीकेन कृतं । तत्र भणसाली देवइ श्रीशांतिनाथनु परिकर प्रतिष्ठाव था। चोमासा अंतरि सा श्रीनइ तेडाच्या, परिकरमतिष्ठा कृता । शुभेऽद्धि स्थापितः । भणसाली देवानइ शाह शलीमि हस्ती अर्पण । भणसाली देवाना पुत्र भणसाली रूपजीनई अजमेरमध्ये सुरत्राणेन दस्तीअर्पण । दिनि दिनि कडूआ सानो संघ दीपतो वर्तइ । संवत १६७३ वैशाप मास वदि ७ दिने सोनारि बाई कान्हवाई वीरूनी संगति धर्म पानी इती ते सा श्रीना उपयी थरादनी वाई जयवादी वा सांभली वैराग्य पामी कहि ये-'माहरइ आ भवनई विषद आहारनिषेध ।' पड़ा थीसंघि चाईनई कहिउँ जे-बाइ कार्य कठिण छइ, तुझो बाल छो, वर्ष २०नां छो, इबडां तप करो, पछड़ सा थीई दिन १५ लगई जोयु, पण या ठिाम भणसाली देवड पोताना परमी उच्छय सस्ति पाईनाई पारसीई वइसारी इयतपुरि उपाश्रय तेडी आया । समस्त संघनी सापिं देहरानई विपद सा श्रीई अनशन ऊचराव्यं । पना उच्छ्य यया । मुकुरवपान राजनगरे साहित, बाईनं मुख जोया आव्यो। वाईनइ कहइ-' मुझ प्रति फाई मागि ।' याई कहइ-"माणु ये जान पडावडायो । पछइ मकरंवपान याई मति कहा-'वारूई एक माम " ११८ विविधगच्छीय पावली संग्रह वज्रचित्तांतां) गुणखनी कृष्णां दुष्करकारिकाम् । दीपिका कटुवंशस्थ चन्दे तां जगदुत्तमाम् ॥ + सा श्री प्रमुख संवरी नींझामतइ चित्त ठामि रापतइ श्रावण वदि १२ दिने दिन ६५ नुं अनशन पाली शुभध्यानेन दिवं गता । श्रीसंघि घणइ उच्छवि मांडवीनई मंडाणि देहसंस्कार कीधु कान्हवाईनई । संसारनुं सर्व घरनई विषइ आव्यु । सा श्री संवत १६७३ सा श्री राजनगरि चतुर्मासक । तत्र भणसाली देवड़ द्वादश व्रतग्रहण साथि १५ मनुस्यई वारव्रतग्रहण । वेहनां नाम-परी वीरदास, मं० संतोपी, सा शवजी, सा हीरजी, सा देवजी, पर० देवजी, सा पनीआ, दु० गणपति प्रमुख तेहनई सुवर्णवेढनी प्रभावना । अन्यैः मुद्रिका प्रभावना कृता। सा कल्याणनई संवत १६७३ पंभाति चतुर्मासक । तत्र पाई हेमाद प्रतिष्ठा करवानी इच्छा कीधी । ते यती सा.श्रीनई तेडाव्या । तत्र सा श्रीई फाल्गुन मास शुदि ११ महूर्त लीधु । जलयात्रा प्रमुख उत्सव, संघवात्सल्य, सा श्री तेन- पालेन प्रतिष्ठा कृता विमलनाथनी । वाई हेमाईइ संघस्य वखप्रभावना । संवत १६७४ सा श्री पुनः भ० देवानई आग्रहि राजनगरि चतुर्मासकः । सा कल्याणनई पत्तने चतुर्मासक मुंबया । संवत १६७५ चैत्र सुदि पुनः(नम) भण- साली देवर श्रीआयू, इंडर, नारंगार्नु संघ कीधु । सबला कंकोतरी मोकली। पंभातिथी सं० अमीपाल, सो० हरजी, सा० सोनपाल, सं० भीमजी, सो नाफर, सासोमचंद प्रमुख संच आव्यो। सोझोत्राथी बु० बाछा प्रमुख आन्या। परगछी पणि घणा आल्या । अहमदावादी पण सामी सर्व भ० मूलीया, सा देवनी, सा लटकण, सा वस्तुपाल, प० वीरदास, सा हीरजी प्रमुख यात्रा आव्या । भणसाली देवा मोटइ मंडाणि सांचर्या, दृष्टमत्यय । साधि इस्ती, अश्व घणा सहित पालखी प्रमुख धणी सामग्री साथि पोताना स्वजन भणसाली देवा, भार्या देवलदे, तत्पुत्र भ० रूपनी, भ० पीमजी, तत्पुत्र भ० लालनी, भ० देवानी, भगिनी वाई रूपाई, बेटी राजबाई, सोनाई, भ्राता भण कीका, भ्रावन भ० विजयराज, तथा भणसाली जीवराजना पुत्र भ० सूरजी, भार्या वाई सजाणदे, तेहना पुत्र भ० समरशंघ, भ० अमरशंघ, भाई वेहू साथि प्रेम, भ्राता भ० पंचायण प्रमुख घणइ परिवारि यात्रा पधार्या । अश्व, रथ प्रमुख घणो समुदाय बी[जा परगच्छी घणा ! प्रथम श्री संपेसरनी यात्रा। तिहाथी पाटणि पधार्या । पाटण- संघ सन्मुखागमनं । तत्र तत्र सबलइ देव जुहार्या । परी० लटकणेन समस्तसंघवात्सल्यं कृतं । परगच्छी सो. रामजीई पण संघवात्सल्यं कृतं । तत्र सिद्धपुरना देव जुहार्या । तत्रथी मजलि मजलि देव जुहारतो श्रीआई पधार्या, अचलगढना देव जुहारी देलवाडि गया । तत्र सतरभेदपूजा घणी थई, घणा उत्सर, घणा दिन तत्र रही अचलगढि पुनः सप्तदशभेदपूजा । तत्रथी श्रीआरासणनी यात्राई पधार्या । तत्रधी ईडर प्रमुखनी यात्रा । तारंगह पयार्या । तत्रधी सर्व वडनगर आव्यु, देव जुहार्या, भण० देवइ संघवात्सल्यं कृतं, नागरज्ञातीय विष जीवा. केन संघवात्सल्यं कृतं वस्त्रार्पण । भण. कीकर, भण० समरशंघि मुद्रिका २ प्रभावना समस्तसंवनई कृता । राधनपुरी महं वीरजी, शंघनी, पंभाती घाई हेमाईइ पण प्रभावना कृता, घणा हर्प पुहुता । एवं प्रभारि यात्रा करी पटणी राधनपुरी संघनई सीप देई, कुशलि रामनगरि पधार्या । सा श्री आदि संवरी । तत्र भणसाली देवानई आग्रहि संवत १६७५ सा श्री तत्र चतुर्मासक । सा कल्याणनई पंभाति चतुर्मासफ मेहल्या। एहवा थरादि दो० धीगानी भार्या दोसी देवसी ढुंगरसीनी माता वाई वाल्हाई अनशन । घणा उच्छव । सा पेत्रसी, सा चोथा, सा रिपभदास प्रमुख संवरी ई निझामतइ, चित्त ठामि रापतह, उपवास ५७ मइ दिवं गता । अथ सा श्रीतेजपालेन सन्झ(शत)प्रश्नी प्रमुख घणां वानां कीयां। -

'सव्येहि पक्मिपहिं गन्मंनो ग्गरयरो सहावेण ।
क दु आमतीगच्छ पावली
अय राजनगरमध्ये भणसाली पंचायण शत्रुजयन संघ उपरी पालतइ कान्यो, चैत्रादि संवत १६७५ वर्षे
कानिंग बदि १३ दिने यात्राई पधार्या । घणा उच्छव सहित भणसाली प्रमुख साथि [या बाई पधार्या । भ०कीका,
म०मूलीआ, भ०समरशंघ, भ०रूपजी, भ०अमरसंघ, म०पीमजी प्रमुख छयरी पालतइ पधार्या । साथि हस्ती, अब,
रथ, पालखी प्रमुख घणी रिद्धि सहित पाटणथी राधनपुरथी केतलं संघ आव्यो। पंभातिथी सो सहिजपाल, प्रमुख
सर्व वारणि आव्या। परगच्छी वीजा पण घणा आव्या। भग०पंचायण छयरी पालति, वाटिं अनेक उच्छर थातइ,
आठमि पासी एक स्थानकि रहइतद, सञ्चित्तत्याग करतइ, उभयकाल आवश्यक करतइ, त्रिकाल देवपूजा समाचर-
वाइ, सर्व विधि भणसाली देवानी छयरीनी परि जागवी । भगसमरशंघ, भ०अमरशंग, माता चाई सजाणदे, अनेक
प्रकारि लाहो लेतइ, सा श्रीतेजपाल प्रमुख संवरी व्याख्यान करतइ, श्रीशनंजय पधार्या । तत्र आदीवरप्रमुस
संघलइ देव जुहार्या । सतरभेदपूजा, स्नात्र, उच्छव पण घणा कीधा । पालीताणई भणसाली देवाकेन संघवात्सल्य
कृवं । पंचाइणि संघवात्सल्यं कृतं । भ०समरशंधि मुद्रिकालइ(हा)ग कीधुं । तत्र दिन ८ रही संघ गोयइ पधार्यो ।
तत्र सबलइ देव जुहार्या । तत्रयी मजलिं मजल श्रीसंघ पंभाति पार्यो। तत्र साहमी सर्व सन्मुपागमनं । घगइ
उच्छवे चैत्यवंदन कीधा । घणी प्रभावना जाता । तत्र कडूआमती थरादनां पंभातिवासि महं धनापुत्र, मं० नानजीई
समस्तसंघवात्सल्यं कृतं । स्थंभतीर्थीय संघि स्वकीय संघनई वस्त्रमभावना । तत्रथी संघ कुशलिं सबलइ यात्रा करी
राजनगरि आव्यो । तत्र भणसाली देवानई शरीरि वाधा जाता, सा श्री पार्श्वे तुर्यव्रत ग्रहण कीy, शरीरे मुखं
जातं । भदेवइ अहमदाबाद मध्ये नुकारबद्ध सर्व गछि जामी १, मोदक १, लह(हा)ण कोधी । पोताना गच्छमध्ये
साहमी सर्वनइं गदीआणा एकनां सुवर्णनां वेलीआ आप्यां । बीजइ सबलइ गामि सामीनई जामी १, मोदक १,
अनई व्रतधारीनई सुवर्णनां वेलीआ आप्यां । घणु मोटी प्रभावना की धी] भ० देयइ यणी धर्मपद्धति वालती कीधी।
तदनंतरि भ०कीका दिवं गत । संवत १६७६ वर्षे भ० देवा अनशनपूर्वक सा श्री नीझामतड दिवं गतः ।
संवत १६७६ सा श्री पंभाति चतुर्मासक । सा कल्याणनई राजनगरि चतुर्मासः । तत्र दीपोत्सवादि संवत
१६७७ वर्षे फागुण शुदि ११ दिने बतपुरमध्ये अभिनंदनचैत्यं । तत्र १७ प्रतिमा, १७ भ०पंचाइगि वर्ष १ प्रति
रूपैया २५ आपी पूजाती कीधी । तत्र वियप्रवेश उच्छच चुडाहा थरादना केन कृतः । तत्र सा कल्याणेन अभि-
नंदनस्तवनं कृतं-"मभु मण, २०" इत्यादि । स्यंमतीथि सा तेजपालेन वीरनां पांच स्तवन- भगवती साधुवंदना'
वा। थरादमध्ये वुहरा माना राइंशघि गुडीनु संघ कीधु। घगा उन्य थया। पुनः सा श्रीनराननगरि संधि तेडाव्या,
यणां धर्मकाज । संवत १६७७ सा तेजपाल कल्याण एकठा चतुर्मासक। तर एक दिन सा श्री माथि थंडल पपायां,
सा कल्याणयुक्त । तत्र लुपकना ये वेपधर मल्या, ते साथि वार्ता करता, परतरना ये वेपधर आव्या । तेगि सा
श्री मति कहिउँ-जे धर्मसागरि कयुं ते मल्युं, जे देव-गुरु अरि ।' त्यारइ मा श्री कहा-' आमारा तो पांच सात
हसिइ, पण तुमारी भक्ति घणी कोधी छह ।' त्यारई कहा-'ते कही।' बलतुं सा श्री महा-'सद या ना
मासो ।' त्यारह सा श्री कह-सांभल, प्रवचनपरीक्षायां-
.
जिम्भादोसदुगेणं भामण-भासण-मरूयेणं ॥७॥

विविधगच्छीय पापली संग्रह 'टीकायां पत्र १५५ (अत्यु) उत्सूत्रभापी, यतः स्थापना अक्षत नहीं, च्यार आंगुल प्रमाण सकडि पंड वोल्यो छइ। उमास्वातिकृत 'विचारवल्लभायां' तथा 'सूत्रकृदङ्ग-वृत्ती, 'पौर्णमासीषु च तिसृष्वपि चतुर्मासकतिथिग्वित्यर्थः । एवंविधे पाठे विद्यमानेऽपि तरुणप्रभाचार्येण 'पडावश्यकवालावोधे' तिसप्वपि चतुर्मासकपर्युषणातिथीप्रित्यर्थः । तया 'साहूण गोआरभो ।' इत्यादि गाथाव्याख्यानुपलंभे श्रावक्रधर्म प्रतिमारूपो पुच्छिन्न इति । आदि अनेक असंबद्ध समिति । 'पश्चाशत्तौ' तु- 'संप्रति काले प्रतिमावनेन तुलनां विधाय प्रनजतीति । तथा अग्रे पत्र १८१ मई- 'जिणदत्तो जिणपूआरहिआ रमणीउ जति निब्वाणं । सिद्धाणरिहा वि रमणी पूएउइ जिणं भणइ खमणा ॥ ४९ ॥ एवं दुन्हवि दक्खो खमणो निअमेण जेण जिणपूआ। तेण पमणा उ दुगणं पावं जिणदत्तवयणेण ।। ५१ ॥ पुष्यं विराहिओ सोऽणतोदिअपावरासिनारी हिं। पाचावणपणकाले गणलग्गहो जेण निम्मविओ॥५२॥' इत्यादि । पछइ खरतरा कहि-'रापु, अझो जाण्युं तुह्यो नही जाणताहु ।' पछइ वल्या । पछइ लुं० कहइ-चारू फीधु ' इति । तत्र मार्गशीर्षे भणसाली पंचाइणि श्रीसंपेसरानुं संघ कीधु । वारू उच्छवि यात्रा पधार्या । भणसाली रूपजी साथि श्रीपार्श्वनाथनी पूजा कीधी । सा श्री संप्रेसराथी पाटण पधार्या । पाटणनां मनुश(प्य) तेडवा आव्यां तां । संवत १६७८, तथा संवत १६७९ सा श्री पाटणि थोभ्या । तत्र घणां स्तवन, सज्झाइ, तथा शतमश्नी प्रमुख घणां वानां कीयां । सा कल्याण संवत १६७८, संवत १६७९ पंभाति चतुर्मासा सा श्रीई मुंक्या । तत्र टुंपक साथि चर्चा, यथा-एक दिन व्याख्यानमां कहि जे- कल्पसूत्रे वीरनई इंद्रि नमौत्यु णं कीधु, गर्भमां वीर छतइ त्यारइ द्रव्य तीर्थकर छइ पण भाव तीर्थकर नथी, अत्र लंकानई अडइ छ ।' ते वार्ता बीजइ दिनि सो नाकर जेसलमेरो संघवी कचरो लुको भण्यो गुण्यो ते आगलि कही । त्यारइ ते कहइ जे-'इंद्र वांदइ पण गणधर न बांदर, टीकामां कहिउँ छइ ।' बलतुं सोनी नाकर, संघवी कचरानइ, रतन गोधानई तेडी उपाश्रयि आव्या । कहिजे- 'टीका काढो ।' पछइ सा कल्याण कहि-तुह्मो टीका मानु नही तो शो विशेष ? ' त्यारइ कहि-'जे तुह्मो तो मानु ते वती काढो, अमे पण मलतुं मानीइ । पछइ ब्राह्मी टीका काढी ते मध्ये कांई नही, सोलमी वांची ते मध्ये काई नही।' पछइ सा कल्याण कहि जे- छइ शं, जे तुह्मारइ गरि लिप्यु होइ ते देपाडु।' पछइ कागल फान्यो-- मध्ये लप्यु छइ चोसरणनी पनरमी गाथानी टीका जोयो, ये द्रव्य अरिहंतनई इंद्र वांदइ, गणधर न वांदइ ।' पछइ वली आगलि पंचाव्युं ते मध्ये तु इम आव्यु- ये आगलि अनंता तीर्थंकर थासिइ तेहनु शरण करूं छु, यतः- 'चउसरण'नी २१ मी गाथा- 'अच्चम्भुअगुणयंते निअजसससहरपचासि(साधि)अ दियंते। निअयमणाइ अणंते पडियन्नो सरणमरिहते ॥ २१ ॥' २८ . 7 , . कडुआ मतीगच्छ पावली १५१ वृत्ति-अतीताऽनागताहच्छरणमाह-अच० अत्यद्भुतगुणाः बुद्धयतिशय-प्रातिहार्यगुणा विद्यन्ते येषां ते तथावदभुतगुणवन्तः, निजयश एव शशधरो निजयशःशशधर तेन प्रासाधितो मण्डितो धवलीकृतो दिगन्तो यैस्ते तान् निजयशःशशधरप्रसाधित- दिगन्तान नियतं शाश्वतं वा यथाभवत्येवं न चान्ता येषां ते अनाद्यन्तास्तान् अर्हतोऽर्ह- त्शरणं प्रतिपन्नास्तानाश्रित इत्यर्थः । एतेन कालत्रयभाविनोऽपि जिना ग्रहीताः २१॥ एहवा फट प्रगट अप्यर नींकल्या । जे सूत्र-वृत्त(त्ति)नी तुह्मो संमति लान्या तुह्मारइ गरिं पण ते शास्त्रनी . सम्मिति लपी छइ शुं करवु । सा कल्याण कहइ जे-'संघवी कचरा रासभो हाकतां बाघ पदठो।' संघवी कहइ-' अह्मे ए न मार्नु । मात्र तीर्थकर मान, भावनई बांद्याना अक्षर छह । यथा-आ[व]श(श्य)के, नयां च-' चंदे उसमें अजिअं ।' इत्यादि सष्ट छइ, अनई इसिइ तेहनइ समवायांगे होक्खई छइ पण वंदनथी, ते मार्टि भाव वंद्य(दन) पण द्रव्य नहीं । सा कल्याण कहि जे-'समवायांगमध्ये कहावती अडकइ नही ।' यतः भगवतीमध्ये-'ऋषमादि चउवीस तीर्थकर- नई ‘होत्या' शब्द छइ पण बंदना नथी।' पछइ [क]हि-तेदनई बंदना शब्द नु हुइ। किम नु हि तो रोसडा सहित पर जाइ ।' सा कल्याण कहइ-' एहj सांभरइ छइ कदाचिन्मध्ये वंदना शब्द न हि तो तुमे शु करो।' तो कहि- आवति चोवीशीना द्रव्य तीर्थकरनई हुं वांदउं, तुझो शुं करस्यो ? ' सा कल्याण कहइ-' इणइ मेलि हुँ पण द्रव्य तीर्थकरनई नही वाद्, वार्ता तणाई, लप्यां कीयां, यतः संघवी कचरानां लप्या, सा कल्याण कहि छह-जे मगवतीस्त्रमध्ये चुवीस तीर्थकरना नाम छह ते रिपभादिकनां छड़ तिहां 'चंदना' शब्द नथी, ते जो चउवीस तीर्थकरनां नाम जो चंदना पापा नीकला तो संघवी कचरो आगली चोवीसी थासिइ तेहनई बंदना करइ, करवी परूपइ, अनई सा कल्याण न देपाडइ तो आगलि चोवीसी थासिइ ते तीर्थकरनई बंदना करइ नही, करवी पण परूपई नही । अत्र मंत्र (मत) संघी कचरामता(त), सा कल्याणमतं । अन्न सापि नाकर, सोमचंद सापि, रतन गोपा सापि, इति एहयं लिप्यु फरीसा, कल्परइ सा कल्याणनई आप्यु, सा कल्याणन एट्युं लपावी पोतइ राप्', दिन ३ नु वाइदो परख्यो । पछइ दिन वीजद सा कचरो स्तन गोधानई तेडी आव्या, फहि ये-'देपाडो।' सा कल्याण १६इ-' आपणइ वायदो दिन ३ नो छइ तो सांपत किम देपाडी ? प्रथम जे आने कालि 'आवश्यक' तथा 'नंदि' पाठ भग्यो जे 'वंदे उसमें अजिसं ' इत्यादि । एहयुग पाठ कीधु । पछइ कहइ-'गगरि चिरं जीवतु भागल सोयादिवंदना शन्द यथा- 'यंदामि अत्य धम्म वंदे तत्तो अ महगुत्तं च । तत्तोय अजययरं तव-नियम-गुणेहि ययरममं ॥ ३१॥ इत्यादि देवहिदगगि लगाई गणपरि भविष्य वांपा का ना बांया ।' तो फरि-'ए गाया फिगि पानी दीगर घर, ते न मानो तो 'माता मे वंध्या' न्याय मंगाना 'पोइ फार-'ए गान रापो, मगरती देपारो।' पद सा कल्याणि भगरतीयत्रमध्ये भत २० मइ उगो ८ मो, पा:- विविधगच्छीय पायली संग्रह - 'जंजूदीवेणं भंते दीवे भारहे वासे इमीसे ओसप्पिणीए कइ तिथ[य]रा पन्नत्ता? गोयमा! चउघीसं तित्यारा पं० २०-उसम-अजित-संभव-अभिनंदण-सुमति- सु-(पउम)प्पभ-सुपास-ससि-पुष्पदंत-सीतल-सेकंस-वासुपुत्र-विमल-अनंत-धम्म-संति-कुंथु- अर-मल्लि-मुणिसुब्बय-णमि-णेमि-पास-पद्धमाण २४ हवइ । जूओ अही बंदना शब्द किहां ? पुनः समवायांगे-- 'जंबुद्दीवेणं दीवे भारहे वासे उस्सप्पिणीए चउबीसं तित्थयरा होत्या तं उसम-अजित- -जाव बद्रमाण इत्यादि। 'अन पण वंदना किहां? महापद्म-अधिकारे-होक्सई नेहसि तेहनई अनई हवा तेहना होत्या ते वती काई बाधा नहीं।' ते पाठ देपी अणवोल्या रह्या, शुं करइ ?, प्रगट पाठ देपइ, सा कल्याण कहइ-मनुस्यना एक योल ते वती आगलि चउवीसी ना चांदउ, पण मत कदाग्रही आकरा ।' पछइ कहि ये-'अह्मारइ गुरि लिपी हतो, सम्मति ते काई हसिइ ।' बलतुं सा कल्याण कहइ-'सांमलो, प्रथम तुमारा गुरनइ ए समत्ति(म्मति) लपवी नावइ जे ग्रंथ मानीइ तेहनी लपवी, अनई लपी ते पण गाथा फेर लपी, पनरमी गाथानी रत्ति जोयो । इम लप्यु तो किम लाभइ पण चउदमी गाथा चउसरणनी तिहां तुमनइ ऊपजइ छइ, पण अह्मनई ते अर्थ अंगीकरतां काई नयी अडतुं, अह्मे पण इम ज सहीइ छइ तेहनो पाठ सांभलो, यतः- 'रायसिरिमवकमित्ता तव चरण-दुचरणचरित्ता । केवलसिरिमरिहंता अरिहंता इंतु मे सरणं ॥ १४ ॥ वृनौ बीजु अर्थ कीधु छइ ते मध्ये- 'यद्यपि शक्रादीनां सर्चास्वप्यवस्थासु जिना नमस्काराहस्तिथापि गृहवासस्थाः साधूना न नमस्कारार्हाः, अविरतत्वादिति दर्शितं, यच्च अनागतजिनास्साधुभिनमः क्रियन्ते तेऽपि चात्रावस्थालु एवेति भावः। तुह्मारह संतुष्ट थाइ ते तो ए पण ए मध्ये तो जिम अह्म कहीइ छइ ते जीव छइ, जे इंदि गर्भमांथिकु नमोत्थु णं कीरेउं ते पण इम ज कडं जे 'नमोत्यु णं समणस्स भगवओ महावीररस' तो जुओ इंदि गर्भमा छता केही अवस्था लेई वांद्या?। द्रव्य अरिहंत, छता भाव लेइ बांधा। भरति पण भाव लेइ वांद्या, अह्मे पण इम ज बांदीइ छइ। ते ती तुह्मानई कहीइ छइ ए गाथाना अर्थ मध्ये तु विशेष इंद्रनई वांदवाना शब्द आव्या जे राजिमां बइठा हुइ विहां इंद्र आवइ तु पण वांदइ । अनइं साधु परतक्ष न वांदइ पण भाव अवस्था लेइ आवती चउवीसीनई द्रव्य जिन- नइ चांदइ ते पती पदाग्रह मुकी श्रीकल्पसूत्र प्रमाण करी द्रव्य तीर्थकरन्इं भाव अवस्था लेई चांदता पण नहीं । पछइ संघवी कचरु झापा थया, मरड करवा लागा, मरड करइ न जे श्रीसिद्धांति उती प्रतमा उथापइ तेहनइ ए वातनु सिउं पूछवं ! मनमां बीही की जो द्रव्य जिन आराध्य कहीसिइ, तो थापनाजिन मानवा पडसिह । पछइ ते लप्यां पाछा लेवानइ घणां वानां कीधा, पण लेइ सक्या नही । ते वार्चा पणी छइ ते धणीनां लप्यां हाथ पोथीमा छइ, अष्टम पट्टालंकार सा श्रीतेजपालनई मसादि, बोल ऊपरि आन्यो इति । + हम्मदाबादि आव्यु । तिहां आनमपाननई मिली मोटी मरान, मोदी बधा, राधनपुरी नपाना नेटया गया, १५३ घरादरी मध्ये मोरवाडि, सोहीगामि, वावि प्रमुख सघरद गामि पड्आमवीना तपान अगडा चाला, पण पहा. कडुआम तीगच्छ पदावली -, संवत १६७९ थरादमध्ये तपानां घर १७ छ भनइ कडवामतीनां ७०० छइ, तत्र कहआमतीनई देहरइ तपा देव पूजवा आवइ, त्यारइ घरथी धोतीआं करी देव पूजइ, पछइ गीत-गान सांभल्यांनां मन हुइ तो पायडी जवारी रंगमंडपि वइसी सांभलइ, पाघडि बांध्यान मन हुइ तो हेठा बइसइ, ए रीति सदा छइ । एहवइ गांधी हरजीना भत्रीज गांधी लालजी पापडी बांधी रंगमंडपि बइठा, पछइ कहआमती साथि वार्या, जे तुझे सदाइनी रीति म लोपु, पण वार्या न रह्या । पछइ नान्दइ साथि बोलाचालं कीधु । ते वार्ता ऊपरि गांधी हरजीई तपाना सायनइ राधनपुरि लप्यु जे-'अत्र कड़आमती घणा छह अह्मारी सार करयो, नहीतरि अझे पणि तपा फीटी कडूमामती थईसिउं ।' ते कागल संवत १६७९ ना भादवा मुदि २ लाधरनइ दिहाडइ आव्यु । कागल वाच्यु पछइ पुन्यास कहि-'धर्मनइ कांजि चक्रवत्तिनु दल चूरीइ तो पुण पाप नही, सी विमासण करो छो ?' पछइ तपानु साय, राधनपुरना कडूआमतीनु साथ, तपानु उपाश्रय पाडया आव्यौ । मांहि केतला पोसायत छइ, तिणि यार्चा जाणी पणि चित्त ठामि रापी वइसी रह्या, पेलड आदी छापरुं पाडयं, छापलं पाडतां मध्ये एक पडधु ध्रुजवा लागो, पोसात कहि-बीहि मां अह्मयी तुझनई भय नथी, अमारा सा श्रीनु उपदेश नथी जेकु इनई पण तुमारा गुरनो ए उपदेश छइ ।' पछइ मां रत्नना पुत्र महं वीरजी प्रपुत्र में शंघजीई वीजां मनुष्य लावी तपाना साथनई वार्या, छापरुं पाडी स्थानकि गया। पछइ राधनपुरइ साथि थरादि लप्यु-'जे अत्र आ पदार्थ थयु छइ ।' कागल यांची पेद पाम्या, केतलो कहआमतीनु साथ तपान उपाश्रय पाडवा, जावा लागु, ते सा श्री पितसीई वारी राज्या। दो० रत्नई सेठ नाथा प्रमुख वार्या जे-आकला म थाउ, धर्मनु वोल ऊपरि आवशिइ । ' पछइ थरादनु संघ अनमेरि सरत्राण शाह शलीम भणी चाल्यो । राधनपुरी तण्या सेठ पालो पण पातशाह भणी चाल्यो । एहवीड राजनगरियी भणसाली देवाना पुत्र भ० पीमजी अनइ तपानु शांतिदास पण पातशाह कनई जाइ छइ। सर्व अजमेरि एकछु मिल्युं। थरादनु संघ भणसाली पीमनीनई मलया गयु । भण० पीमजी कहइ-'जे द्रव्यनुं काम होइ ते मुझनइ कहियो, पण जिम सा श्रीकडूआना समवायनो बोल उपरि आवइ तिम करियो ।' पछइ संघ कहि- ये पूज्य संघ वइरागर छइ, तिहां पणो मामलं थयु, मोदी हंसरानि वाई जइवानइ पुत्रि सेठ वालानइ हइडिमां घलाव्यु । पछइ वली संघ पात्रत)शा कन्हइ जातां संघवी चंदा तपइ मी(वी)नति करी परि तेडी आवी, संघनई य(ज)माडी, तपाना साय पाई अपाशरो करात्री आपयो कालावी, अनड रूपैआ १० केसरना, देहरइ डंड आपवा एवा लप्यां करी, सर्व पार्छ बाजु । सबलइ गामि कहआमतीन यश थयु । सर्व कुशलि थरादि आप्यु । पछड़ राधनपुरी तपा राधनपुरि आवी पतली(ल्टी) गया, जे आपण ठामो ठाम छिइ । यहआमतीनु भो आशरो आपण एहनु उपाश्रय नही करावी आपीड । घणा दिवस केलिस रयो । पछ: राधिनपुरी तपड बंध कीघु जे कामतीनई को य(ज)माडइ नही । पछइ राधनपुरी वीजा सघला गच्छयासी रहमतीनी मोरि थया। दादी पणा झगडा चालइ । तपा घणा तु हि कहआमती माथि न चालइ । पछड़ अहमदावादि बंध करा आव्या, पण मणसाली रूपनी, भण० समरशंग्गी(नी) लानि कुणि बंध न कीधु । भूटा पडी पाछा वही गया। पर . - मतीनु सबला यश ज संवत १६८० पउइ यरादनु संघ दो० रत्ना सेठि नाया प्रमुष राधनपुरी म० वीरजी, परीप मूला ममुप सर्व विविधगच्छीय पहावली से ग्रह तेणि सांभल्युं ते पुण नीकल्या जाण्यु, झाली जासिइ, ते मार्टि साइमा नीकल्या वीरमगाममध्ये मल्या. तत्र मोदी इंसराजि घणां कोड पुहुचाड्या, पछई दी ते सर्वनई तेडी राजनगरि आन्यां तेतलइ आजमपान (मृत्यु पाम्या। पइ श्रीसंधि विचार्य जे हवइ मुं कर? । पछइ परठ की सुरनाग कन्हई जागनु । ते वात वपइ शांतिदासि जाणी विचायु जे थरादना तत्र जाइ मुझनई पुणि तेडाबर, ते मार्टि आगलथी चेतं, रानपुरी तपा कनइ आची कहि जे- * कद्दमामती सुरत्राण पासि जासिइ, ते माटिं तुमार वोल ऊपरि तो करूं जो सागर मध्ये मत करो।' ते वाजि आव्या मतुं कीg । पछइ मतुं करारी भ० रूपजी पासि आन्यु कहि जे-'कांड वस्तु मांगु छु।' भण. कहि- १, बलतुं कहि जे-'यरादना नई [राधनपुरीनई मेल करी आपो । ' भणसाली को जे- अह्मारइ मेल ज छइ' अमार उपाश्रय करावी आपि डंड परठ्यो प(छोइ आपि । ' भणसालीनई पछइ तेडाई दलपुरि जई थरादना संघनई तेडी सर्व वार्ता शांतिदासि कबूली । सेठनई बस, वाकीनई श्रीफल आपी मेल कीधु । सा श्रीकडूआना संघनो बोल ऊपरि आन्यो, धर्मनय । पछइ थरादनई संघि राधनपुरिइ संघि सात दिन लगइ घर उपरी जिमणवार राजनगरनई साह्मी(हम्मी वात्सल्यं कृतं । अहमदाबादी संधि राधनपुरि अनइ थ ]रादना संघनई यणां साइमी वत्सली कीधा। भ० रूपनी, भ० समरशंधि, साहमीनई वस्वमभावना कृता। इम अनेक उच्छर थया। सर्व कुशलि स्थानकि आव्युं । शांविदासनई माणसि आवी उपाश्रय कडूआमतीनु कराव्युं, डंड आप्यो, आणंद वर्निउ । पण राधनपुरी तपा तपा मध्ये नामां घांत्या सागरस्मा(मां) मतां कीयां, ते वती कलेस थयु, उपाश्रयमध्ये भीति प्रमुख प्रसिद्ध छइ इति। सा श्रीतेजपाल संवत १६८० स्थंमतीथि चतुर्मासक । सा कल्याणनइ पत्तनि मुंक्या। स्यंमतीर्थे सा नीइ स्नानविधि नवीना कृता श्रीशांतिनाथनी । तत्र पंभातिमध्ये सो० सहिजपालनी पुत्री बाई जीवाईई सा श्रीनई पासि भतिष्ठा कीधीनां फल जाणी भाव कीधु । फागुण मासे महूर्त । सघलइ गामि कंकोतरी । संवरी आकारण यणा उच्छच फागुण सुदि ११ दिने जलयाना प्रमुख घणी सामग्री हर्ष पुहुता । तदनंतरि संवत १६८१ सा श्री संघनइ आग्रहि पुनः पभाति चतुर्मासक । संवत १६८१ चैत्रमासे थरादमध्ये चु० जसा बुजीवाए धणीई गुडीनु संघ की।। घणा उच्छव थया । कुशलि याना करी घरि पधार्या । सा कल्याण राजनगरि चतुर्मासक । तन सा श्रीनइ आदेसि सा लटकणना पुन सा देवकरणनो विध प्रवेश कीधु । पुनः सा रूपनीनु विवप्रवेश मार्गशीर्षे कृतः । उत्सवो जातः। संवत १६८२ सा श्री राजनगरे चतुर्मासकः । सा पल्याण पत्तने मुंक्या । सा विजयचंदनई पंभाति मुंक्या । अप राजनगरे सा श्री चतुर्मासकस्थिते भणसाली पंचायण प्रमुस मनुस्य पंचासि अठाई कीधी, घणी प्रभावना, घणा उच्छय थया । तन सा श्रीई श्रीसंमघरस्वामीनो 'शोभातरंगस्तिवन] ' कीधु, अतीव सुंदर, दाल ४, त्रिचत्वारिंशत् प्रमाण । श्रीअजितनाथस्तुतिस्तस्तस्यावचूरिः कृता । भणसाली समरसंघि श्रीसंपे[स] रानु संघ कोधु । भण० रूपजी, भमुस सर्व साधि श्रीपार्श्वनाथनी यात्रा करी, संघवात्सल्प करी, कुशलि पधार्या । संवत १६८३ चैत्रादि रामनगर- मध्ये भणसाली अपानी पुत्री, सोनी पानीआनी पत्नी, भणसाली देवानी भगिनी बाई रूपाईई प्रतिष्ठानई अधि सा श्री मति बीनती कीधी, जे पूज्य प्रति प्रतिष्ठानु भाव छइ । सा श्रीई संवत १६८३ जेठ शुदि ३ दिने महत्तं दत्तं । सर्वनगरे कसोतरी प्रेक्ष(प)ण, संवरी आकारण, घणइ उच्छवि हरतीप्रमुरा जलयात्रागमन, घणी प्रतिमा, रत्नमय संभवनाथनी प्रतिमा । बाईना आंगुल ७ नी रत्नमय, पीजी प्रतिमा रत्नमय भणसाली समरसंपनी, भ० पंचायण, भ० [क]त्याग, म० धननीनी वीजी पीतलमय, पापाणमय, पणी प्रतिमा-एवं प्रतिमा ७५ प्रतिष्ठाणी । तत्र प्रतिमा १ पीवलमय भंगुल पांचनी सा श्रीई भरारी ! श्रीपार्धनायनी, रो वतपुरमध्ये मंद्रमभुचैस्य धर्मना पासि कडुआ म तीगच्छ पट्टावली बइसइ छइ, तथा प्रतिमा १, पापाणमय अंगुल १७ नी श्रीविमलनाथनी सा कल्याणि भरावी, ते श्री अभिनंदन- चैत्य झारतां डावा हाथनइ गभारइ मूलनायक समोसरण मांडइ त्यारइ पण मूलनायक इत्यादि प्रतिष्ठाना घणा उच्छया वस्त्रमभावना । संवत १६८३ सा श्री पाटणि चतुर्मासक । सा कल्याणनई स्थंभतीयि, सा विजयचंद्रनइ राजनगरि । तत्र फेर वीपी अभिनंदनचैत्य जातं संघेन कारापितं । तत्र सा श्रीई विप्रवेश वैशापमासे कृतः। बुहरा पदाकेन कारापितः । अथ संवत १६८४ सा श्री पंभाति चतुर्मास, सा कल्याणनई राजनगरि चतुर्मासक, सा विजयनइ राधनपुरि । राजनगरमध्ये ,सा श्रीनई आदेसि सा कल्याणेन भ० पंचायणनो रत्नमय श्रीपार्श्वनायनी प्रतिमानु विवप्रवेश कृतः । घणा उच्छच थया । अथ भणसाली देवाना पुत्र भ० रूपजीई अहमदावादि सामी सामिणिने मांटीने थेपाडु, पछेडी, चरवलो दांतनो, प(2) नुकरवाली, पोसानु वेप आप्यो, वाईनई साडल, दांतनु चरवलो, नोकरवाली आपी, नवरं चरवला सीपना, वीनइ मामि । ते वर्पनी संवच्छरी भण० रूपजीई जिमाडी। सघलई गामि लपियां ये अह्मारी वती जिमाड्यौ । अनया रीत्या सा श्रीकडूआनो समवाय दीपतो छइ, सदा एहवो दीपयो । भणसाली पीमजी आगरइ सुरत्राण पार्श्वेऽस्ति, सा श्रीई 'वीरतरंग' संस्कृत कीधु ।.' निनि]तरंग' पणि कीयो । मझमई ग्रंथ हजार १० कीधु । भ० रूपजीई श्रीसंपेसरानु संघ कीधु, घणा उच्छच । अथ सा कल्या- गेन 'घन्यविलास' कीधु, ढाल ४३ प्रमाण, तथा 'युगमधानपट्टावलीटीका' कृता, संस्कृतमयी, तथा 'युगमधान- चंदना' प्रमुख घणा ठाम कीधा, एवं विधि सा श्रीकहआनो समवाय दीपतो वर्तइ छइ । -- . ।। इति कडूआमतीना गच्छनी पट्टावली ॥ अष्टमपट्टे विराजमान साश्रीतेजपालप्रसादात् कल्याणेन संवत १६८५ पोस शुदि १५ पुप्फ(प्योनक्षने कृता ॥

सा. कल्याणरचिता कडु आ म ती गच्छ ल घुपट्टा व ली। , १) प्रथमत. सा कडुआ नाडोलाइग्रामे मह काहानजी भार्या वाइ कनकादे । सवत् १४९५ मत पुत्र नामतः महं कडुआ वैराग्यवान्, आचलीयाका श्रावक नियागी वेशधरका उपदेशसें पैराग्य हुवा । माता पिताकी आश न मीलनेसे वहासे चलकर अमदावाद स० १५१४ में आव्या । रूपपुरमें आगमि गच्छका पन्यास इरिकीति पासे शाख पदे, और चैत्यवासीका आचरण जाण्या। दशमा अच्छेरा 'सपयदसमच्छरए' इत्यादि पष्टिशतकग्रन्थे, तथा 'सेसा हुडा०' इत्यादि सघपट्टकग्रन्ये, श्रीमहानिशीथसूत्रमें श्रीवीरे भाष्या है कि मेरेसे १२०० वर्ष पीछे कुगुरुओं पेदा होगा । तब पन्यासे कयु-'तुम सबरी श्रावक हो।' तबसे सबरी वैरागी, बालब्रह्मचारी, अकिंचनी, अममत्व हो करके ग्रामोगाम विचरने लगे बहोत प्राणीको प्रमोधे, और इस मुजब प्ररूपणा प्रवृत्ति व्यवहार चलाया- १. मदिरमें पापडी उतारके देव वादवा । २. श्रावकको प्रतिष्ठा । ३. पुनमकी पाखी। ४. पर्युपणा चोथकी। ५. मुहपत्ति, चरवलो धरणा। ६. बहुधा सामायिक करना। ७ पर्व शिवाय पोसह लेना । ८ द्विदल टालना। ९ मालारोपण नहि। १० स्थापना प्रमाण । ११. तीन थुई कहेवी। १२. वासी कठोल तजवा । १३. पोषध त्रिविहार चोविहार । १४. पचागी सूत्रानुसार मान्य । १५. सामायिक लेके इरियावही करना । १६. वीर पवाल्याणक मान्य । १७. वीजु वादण वेठेहि देना । १८. साधुकृत्यविचार। १९. अधिक श्रावणे दुजे श्रावणे पनोसण तथा द्वितीय कार्तिके चोमासी। २० स्त्रीया प्रभु पूजा करे। २१. सप्रति दशमा अच्छेरा चलते है। इत्यादि बहोत बोल मरूपया । शास्त्राक्षर मुजच सामायिक पडिक्मण करणा, और सबरी गृहस्थका १०१ बोल प्ररूप्या, ते इत्य- १. सयमार्थी सबरी गृहस्थके वेशमें रहकर दीक्षा परिणाम रक्खे और इस मुनव वर्ते-नीची दृष्टिसे चले। २. राने बिना पूज्या न चले । ३. स्थडिल सिवाय राते वहार न जाय । ४. मार्गे चालता बोलना नहि । ५ सचित्त भोजन गर्ने । ६. दो घडि दिन थके चोविहार । ७. अनीठु जुठु न छाडे, अतिमात्राए न निमे, निमता न योले । ९. हाथसे क्सिी चीजको फेकना नही। १०. किसी चीजको सूचना नहीं। ११ स्थडिल शुद्धि करना। ८. द्विदल टाले।

कटु आमती गच्छ लघु पावली १२. लघुशंका शुद्धि करना । १३. मूत्र भानन भरके न रखना। १४. पुंजी प्रमाजी परठना। १५. कठोर भाषा न वोले। १६. पूंज्या विना सूजली न सणे । १७. पांच स्थावरकी जयगा। १८. निवाणसे स्वयं जल नहि लेना। १९, अणछाग्या जले वस्त्र प्रक्षालना नहि । २०. स्वयं आरंभ न करे। २१. वीजणे पचन न ढोले । २२. स्वयं हरिकाय न छेदे । २३. सजीवको न दभे। २४. स जीवको न हणे। २५. सर्वथा मृपा न वोले । २६. अदत्त न लेवे। २७. मानुपी और पशुस्त्रीका संघट्ट टाले। २८. स्वयं परिग्रह न राखे। २९. पोछली राते चार घडी पछी न सूवे। ३०. उघाडे मुखे न वोले। ३१. राते प्रथम प्रहरे न सूवे। ३२. कारण विना दिवसे न सूवे । ३३. नित्य एकासणनत । ३४. नित्य गंठसहि पञ्चसाण करे । ३५. देववंदन उभयफालावश्यक पडिलेहणा करे । ३६. नित्य चैत्यवंदन ५-७ करे । ३७. नित्य १ गाथा अवश्य पड(होना । ३८. नित्य प्रते ५०० गाथा भणना । ३९. कुदर्शनीश संग न करणा। ४०. नित्य सामायिक बहोत करणा। ४१. नित्य प्रतें एफहि विगय लेना। ४२. नित्य पावसेर घृतसे ज्यादे न लेना। ४३. पनर दिनमा अपवास दो करणा। ४४. लोगस्स १० तथा १५ नो काउसग्ग करणो । ४५. एकवर्ष से ज्यादे एक ठामे न रहे । ४६, अपने लिये घर ओर हाट न करणा। ४७. ख धोना नहि, पांच पोतसे ज्यादा न रसना । ४८. गदेला तलाइ ओशीका न रखणा। ४९. पल्यंग मांचडा साटले मुना वेठना नहि । ५०. चाफ्ला गद्दी पर नहि बेठना। ५१. कलशीयो १, कटोरी १ से ज्यादे न रसणा। ५२. दर्द हुवे पीछे वर्ग दिन पीछेसे दवा करणा। ५३. स्त्री के साथ एकात न करणा। ५५. मास पर्यंत एक दिशा रखना। ५६. खोका एकांत संघर्ट टाले । ५७. फलेश पाय न करे। ५८. पाय उत्पन्न हुवे तव विगय त्याग करे । ५९. अभ्याप्यान न देगा। ६०. परनिंदा न फरे। ६१. तेलादि मुगंध विलेपन न करे । ६२. नित्य १३ द्रव्यसे ज्यादे न साना । ६३. पान सोपारी मुगगम न गाना । ६५. रेशमी यय न लेये। ६४. बहुमूला बस न ठेवे। ६७. स्वयं रमरती न पकाना। ६६. तैगदि मसलके स्नान न करे। ६९. गोमामेमें गजर आदिन ऐना। ६८. हरिमाय नसांना। ७१. जेर नहि पाना। ३०. ग्रीयां सुनते हुवे रागताल न परणा। ७३. गी गुरे हा न गना। ७२. दो पुरपे एक सिनामें न राना। ७५. देठप्प रो उसके पनि निर्म। ४१. टुंफामतीमा धान पाणी न पाना । ७३. मंदिरी मिन गना। ७६. एकेली मीलोन पाना। ५४. नववाडे सील पालना। .

१६४ विविधगच्छीय पहावलीस मह 5 ७८, संबंधीके लीए याचना नही करणी। ७९. पारका द्रव्य उसकी मंजुरी सिवाय धर्ममें लगाना नही । ८०, दो दिनसे ज्यादे एक घरे न खाना । ८१. मिथ्यात्वी जो संवरी होवे तो उसके घरे तीन दिनसे ज्यादे न जिमे । ८२. घेवर प्रमुस उत्कट आहार न करे । ८३. सीघोडा सा नीला न साना । ८४. डगला कुडता पहेरवेकी जयणा । ८५. परका लडका न लडाना ।' ८६. स्वजन सिवाय जिमे वहां न जिमना । ८७. हलवाइकी मिठाइकी जयणा।। ८८. रात्रिकारांध्या हुवा भोजन न साना । ८९. गृहस्थ के घरे घेठके वातां नहि करणा। ९०. जूता नहि पहनना। ९१. वाहन पर नहि बेठना। ९२. मासमें एक दफे नख उतारावना । ९३. कुलेर पकवानादि वासी न रासना । ९४. मार्गमें स्त्री साथ वाता नहि करना । ९५, पंचरंगी वस्त्र न पहेरना। ९६. 'स्त्रीयोका झुड में जाना नहि । ९७. गानतान गाना मुनाना नहि । ९८. लोकविरुद्ध न करना । ९९. पारका घरे जाता झुकारी करके जाना । इत्यादि वीजा वोल बहोत जानना । तथा सील पालया संबंधी १०४ चोल सो अन्यत्रसे जानना । स्वीयोंको शील पालवा विशे,११३ वोल छे ते अन्यनसे जानना । कडुआ साहे वहोतको संवरी बनाया, जैसा के-सा खीमा, सा तेजा, सा कर्मसी, सा राणा, सा कर्मण, सा शवसी, सापुंना, साधीगा, सा वीरा, सा देपा, सा थिरपाल, साधीरु, सालींवा, सा सीधर, सा कया, सा सवगण, सा लुणा, सा मागजी, सा जसवंत, सा डाया, सा वेला, सा जीवा, पटेल हांसा पशाया, सा रामा, कर्णवेधी इत्यादि बहोत साये पाटण, राजनगर, संभात, राधनपुर, थराद, जुनागढ प्रमुखे घणा संवरी थया, ते विस्तार वडी पट्टा- बलीयी जाणजो । स० १५२४ थी ते सं० १५६४ लगे विचरी चरम चौमासो पाटण पधार्या । तत्र सा खीमाने पदस्थापन कीया ओर अणसण २१ दिन पाली दिवं जगाम । दुसरा संबरीए अनशन कीधा । भस्म(ग्रोइ उतरते सा कडुए धर्म दीपाव्यो । श्रीवीरसे ४७० वर्षे विक्रम अने विक्रमसे १५२४ क्डुआ हुवा, एवं सा कहुआ १९ वर्ष गृहस्थपर्याय, १० सामान्य संवरी, ४० वर्ष पटोधर, सर्वायु ६९ । संवत १५६४ दिवंगतः। २) तत्पदे सा पीमा-सो पाटणमे प्रागवाड(पोरचाड)वृद्धशाखायो सा फर्मचंदभार्या कर्मादे पुत्र खीमा, १६ वर्ष गृहस्थपर्याय, १४ वर्ष सामान्यसंबरी, ७ वर्ष पटोधरपर्याय, सर्वायु वर्ष ४७ परिपाल्य, श्रीवीराने पदस्थापन कर सं० १५७१ पाटणमे दिवंगतः । ३) तत्पदे सा वीरा-सो नाडोलइनामे रद्धशापायां श्रीश्रीमाली दोशी कुरपाल भार्या कोडमदे, पुत्र सा वीरा, सा कडुआना वचनथी संवरी यया । १४ वर्ष गृहस्थपर्याय, २५ सामान्य संवरी, ३० वर्ष पटोघर, सर्वायु ६९ परिपाल्य, जीवराजने पदस्थापन करी दिन ७ अणसण पाली, नंडोलाइग्रामे सं० १६०१ दिवंगतः । ४) तत्पट्टे सा० जीवराज-सो राजनगरे श्रीश्रीमाली परीख जगपाल, भार्या सोभीपुत्र सा जीवराज । श्रीबीराना बचनयी संबरी, १२ वर्ष गृहस्थपर्याप, ११ वर्ष सामान्य संबरी, ४३ वर्ष पटोघर, सर्वायु ६६ वर्ष ।

कडु मनीगच्छ लघु पावली १५९ श्रीमाली दोसी रायचंद, भार्या कनकाइ, पुत्र तेजपाल श्रीजीवराजना बचनथी संवरी थया, ते तेजपालने पाटे थापी राजनगरमां दिन ३ अणसण करी, दिवंगतः। ५) सं० १६४४ में सा तेजपाल-१३ वर्ष गृहस्थपर्याय, २१ वर्ष सामान्य संबरी, पटोधर २ वर्ष, सर्वायु ३६ वर्ष । श्रीरत्नपालने पट्ट स्थापी, पाटणमें संव० १६४६ दिवंगतः। ६) सा रत्नपाल स्थंभतीर्थे समीप कंसारीग्रामे दोसी बस्ता भार्या वाई रीडी पुत्र रत्नपाल । सा जीवराजना वचनयी संवरी यया । १० वर्ष गृहस्थपर्याय, २१ वर्ष सामान्य संवरी, १५ वर्ष पटोधर, सर्वायु ४६ । श्रीजिणदासने पाटे यापी संभातमें सं०१६६१ दिवंगतः। ७) सा जिणदास स्थिरपद्रे श्रीश्रीमाली बहुरा जेसंग भार्या जमणादे पुत्र जिनदास । सा नरपति सामान्य- संबरीना वचनथी संवरी थया । १७ वर्ष गृहस्थ, ३३ वर्ष सामान्य संवरी, ९ वर्ष पटोधर, सर्वायु ५९। अमदावादमे तेजपालने पाटे थापी सं० १६७० दिवंगतः। ८) सा तेजपाल यंभीर्ये श्रीश्रीमाली सोनी वमुपाल भार्या कीकीपुत्र तेजपाल । श्रीजिणदासना वचनधी सं० १६५५ में । १४ वर्ष गृहस्थ, १५ वर्ष सामान्य संवरी, सं० १६७१ पटोधरत्वं आगतम् । सांपत सं० १६८४ लगे विराजमान अष्टमपदे उद्योतकारक सा कल्याणादिशिष्ययुतेन मुखेन पृथ्व्यां विहरति । ९) सा कल्याण, सो स्थंमतीर्थ दोसी हर्षा भार्या सहिजलदे सं० १६५२ जन्म, सा मावजीना वचनवी सं० १६६४ मां संवरी यया, सं० १६८३ लगे श्रीतेजपालकी साथे सुखे समाधे विचरते है। आठ पाटनां चतुर्मासा श्रावक प्रभाविक संघमतिष्ठा-प्रवेशादि-अनशनप्रमुस बहोत धर्मक्रियाका विचार हमेरी की हुइ 'वृद्धगुरुपदीपिका' से जानना । इति कडुआमति लघुपट्टावली सा० कल्याणेन कृता । सं० वेद-वसु-कला १६८४ संवत्सरे । यावचन्द्र-सूयौं तावत्काल कडुआमतिनु संघ दीपो । इति कडुआमतिना गच्छकी लघुपावली ॥ श्रीगौतमाय नमः ॥१ प्रथम साहा कडुआ, २ तत्पट्टे सा श्रीसीमा, ३ तत्प? सा श्रीवीरा, ४ तत्पदे सा श्रीजीवराज, ५ तत्पदे सा श्रोतेजपाल, ६ तत्पदे सा श्रीरत्नपाल, ७ तत्पदे सा श्रीजिनदास, ८ तत्पदे सा श्रीतेजपाल-सांमत अष्टमपदे विराजमान सा कल्याणादिशिप्ययुत्तेन, श्रीसंघस्य शृभं भवतु ॥ संबरी हुवा, वीरवंशावली अपरनाम तपागच्छ वृद्ध पट्टा व ली। T Th - ॥ॐ॥ अथ वृद्धपट्टावलि लप्यते- श्रीआदिदेवादिजिनांश्च सर्वान सीमन्धरादीनिह वर्तमानान् । श्रीजैनदेवीं सुगुरुन् प्रणम्य श्रीवीरवंशावलिकां लिखामि ।। १ अथ शिवललनालीलाविकासदातु(त)श्रीपर्वमाहात्म्यकथनानन्तरं श्रीवीर शिष्यपरंपरां कथयति । वादी वर्तमान- तीर्थाधिराजनमस्कारमाह- प्रकटितजगदानन्द ! सुरतरमणिसुरभिमहिमरमणीय!। प्रणते हितप्रणेता शासननेता जयति जिनवीर ! ॥ , घुनः स वीर कि(पी)दृशः ?- श्रीशासनाधीश्वरवर्धमानो गुणैरनन्तरतिवर्धमानः । यदीयतीर्थखखाइनेन्नैर्वाणि यावद विजयि प्रसिद्धम् ॥ इति मुख्यस्वामी । सहासमुष्टिट यमुत्तमाइगे प्रक्षिप्य सिद्धर्पिजनोऽत्र यस्य । संस्थापयामास पदे स्वकीये स्वामी सुधर्मा जयताचिरं सः । सद्धर्मवन्तं पितरं स्वकीय स्वकीयएनीमय मातरं निजाम् । संबोध्य रात्रौ प्रभवादिचौरान दीक्षा ललौ प्राप पदं च जम्बूः ।। श्रीमान प्रभवस्वामी गणनाथो गुणमणिसलिलनाथः । शय्यंभवोऽपि सूरिमणकपिता समजनिष्ट ततः॥ निजगतिनिर्जितभद्रकृतभद्रः श्रीगणियशोभद्रः । तत्प.. अथ नव गणधर वीर विद्यमान थकां वैभारगिरिपर्वतोपरि मासभक्त संलेषणा करी मोक्ष गता ।। श्रीवीर मोक्षं गया पछी पारे घरसे गोतम मुक्त । गोन गोतम । मगधदेसे गोवरनगरे बहभूतिविभगृहे पृथिवीत्री सुत । इंद्रभूति नाम । पंचास वर्ष गृहयास । बीस वर्ष वीरसेवा । चार वर्ष केवलपर्याय पाली, सर्व आयु पाणु वर्ष भोगवी श्रीवीरथी वारे वर्षे मोक्ष गया । ५ ६ ७ वीरवंशावली .१. सुधर्मास्वामी---- पछी श्रीवीरपाटे पांचमा गणधर श्रीसुधर्मा स्वामी पहेंलें पाटें थया । तथाहि- कोलाग सन्निवेशे धमिल्ल नामा विम, तेहनी स्त्री महिला नामें । ते हरिद्रायण गोत्रथी उपनी । तेहनो पुत्र । उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रे जन्म हुओ । सुधा नाम दीधु । अनुक्रमें योवनावस्थायें वक्षसगोत्रथकी उपनी एक कन्या परणावी । तेहस्यु संसारिक सुप भोगवतां एक पुत्री हुइ । ते सुधर्मा चार वेद सांगोपांगनो पाठी छ । तेहूनें पासे पांचसयें विद्यार्थि वाडवसुत विद्याभ्यास करे छ । पिण ते सुधर्मना चित, विपें एक महासंदेह छ । ते किस्यो ? जे जेदवो ते तेहयो । ते संदेह श्रीवीरवचनें निःसंदेह हुओ । तिवारें पांचसय छात्र युक्त वर्ष पंचास गृहस्थपणु मोगवी, संसयछेदक श्रीवीरहस्त दीक्षा लीधी। वर्ष यहितालीस शिष्यपणे श्रीवीरनो विनय कियो। एतलो वर्ष वाणु छद्मस्थापद भोगवी, पुनः वर्ष आठ केवलीपद भोगवी-एवं सर्व आयु वर्ष सोनी संपूर्ण । मास एक चउविहार अणसण । पांचों आरें। पश्चिमदिशि। श्रीवीरने मुक्ति हुआ पछी वीसे वर्षे श्रीगिरनारपर्वतोपरि श्रीमुधर्मा नामें श्रीवीरनों पहेला पटोधरने मुक्ति हुई। श्रीवीरज्ञानोत्पत्तेः चउद वर्षे जमाली प्रथम निहब । सोले वर्षे तिष्यगुप्त द्वितीय निहव । प्रथम नाम निग्रंथी। श्रीवीरने मथमपाटें सुधर्मा स्वामी जाणवा ॥१॥ -- २. तत्पट्टे श्रीजंबूस्वामी- - हवे ते जंबू कुमारनी उत्पत्ति कहें छे-पूर्वदिशि मगधदेशे वछभूमियें राजगृह नगरें काश्यपगोत्री श्रेष्ठ रुषभदत्त । तेहनी खी पारणि नामें । तेहनी कूपें पांचमा ब्रह्मदेवलोकयी आयु संपूर्ण थिय] देवतानो जीव चवी आवी घेटापणे उपनो । तिवारें धारणीइं मध्यरात्रे सूतां थकां सुहणें सफलंत जंयूनो झाड दीठो । तेहने अहिनाणे जंयुकुमार नाम दीधू । अनुक्रमे वर्ष सोलनो हुओ । एइये अबसरें श्रीसुधर्मा केवली विचरता आव्या । तेहने मुपे उपदेस सांभली लघुकर्मी जीव जंयूकुमारे चोधु वर्त आदरयुं । सुधर्मा केवलीप बिहार कीधौ । भोग समर्थ जाणी चार वार मातापिता संसारनी वार्ता कहें । तोहि पिण जंबु पाणिग्रहण न बांछे । मातापितायें हर्षपूरण माटे पणा आग्रहथी उत्तम व्यवहारियानि वेटी आठस्यूं परणाव्यो । पिण तेहस्यूं स्नेह दृष्टि जोडें नहीं । संसारीफनां मृदुवचन बोलें नही । यतः- हायो मुखविकारः स्याद भायो चित्तसमुनयः । विलासो नेत्रजो ज्ञेयो विभ्रमो भ्रूसमुनयः ॥ एहवी एहवी फामचेष्टा करी अंग देपाडे । पण जंयु ते खी सादमी दृष्टी जोटें नही, एहवे घणा मनुष्यमें मुखि जचुनें परें नवाणु कोडी सुवर्ण द्रव्य आयो सांभली प्रभवो नामें चोर पालयी च्यारसे नवाणु चोर मनुष्य छे राति अबू धेर द्रव्य लेवा पाठो । घरमें छूटक चौकमाहिं द्रव्यनो दीग कीयो देसी अवस्थापनी विधाने में सफल परना मनुष्य मतें निंद्रा दोधी । पछी वालोद्घाटनी विधाई तालां उयाडी गृहाधीसनी परें भी यका द्रव्यनी गांठडी बांधी माय मुको । यारसे नवाणु चौर सर्पित चित्तयका सयरे जावा उपमि हुआ। एतटे गुना ८ विविधगच्चीय पहावली से प्रह सीलधर्म महिमायकी शासनदेव्याई धांमानि परे निश्चल चन्या । अने जंबु तद्भच मोक्षगांमि छे ते माटे आवस्वापनि नीद्रा न आवी । एतले प्रभवो मेढी चढ्यो । दे तो रंगसालायें जंबू नबोढा स्त्रियोने उपदेशरूप प्रतिबोध कही दृष्टांते समजावि छ । ते जंयूवचन सांभली स्त्री पण पाछो पडुत्तररूप दृष्टांत करे छ। पिण संसार विरक्त.थका, द्रव्यना ढिग चोर लिये छे ते सांइस जोवा नधी । ए मोटा अचरिज देपी लघुकरमी जीव मभवो जंबू कथक दृष्टांत सांभली मन विचारें , जे धन्य ए जंबू कुमारने । नवांणु कोडि कनक अ तूरत परणी नवोढा नव कन्या धकी वेगलो छ । धिग मुनने जे हूं रानपूत्र कहवाउ छु । भीलसंग रही घणा जीवने ढबंधनें तथा वृद्ध प्रहार करी वासि महादुप आपू छु । तो मुझनें कुण गति हुस्यें । इस्युं विचारी प्रतिबोध पांमी च्यारसे नवाणु परिकरसहित प्रभवो आवी जयने नम्यो । एतले शासनदेच्याई ते सकलने व्रत लेबानो आसय जापी बंधन थकी मुश्या । जंबुये पण नव स्त्रीओने प्रतिबोधी प्रभाते स्वमातापिता अने ८ मियानां मातापिता-एवं पांचश सत्यावीस मनुष्य युक्त । पुनः नवाणु कोडी सूवर्ण उपरि मृर्ग बनी नीलोभितायें.......पाणिग्रहणने अबसरे तिल दीधा कोडी सत्यावीस घरनो मूलगो द्रव्य-एवं नवाणु कोडि संख्या जाणवो । ते तजी वर्प सोल गृहस्थपणे रही । श्रीसुधर्मा इस्तें दीप्य लीधी । वर्ष वीस श्रीमुधर्मानो बिनय शिष्यपणे कीघो। वर्ष चउमालीस युगपघानपदें केवलीपद भोगती । छहला केवली विरुद धरायी । श्रीवीर स्वमुखें श्रेणिकनें कहयुं जे-'पेइला देवलोक यकी आयी इणि सूर्या- भदेव नाटिक की ते देवनो जीव छेद्दलो जयूनामें केवली होसें ।' ए वचनने अनुसार जाणज्यो । सघलो आउपो वर्ष ऐसीनो भोगी संपूर्ण । प्रभवाने स्वपार्टि थापि श्रीपीरमुक्ति हुभा पछी वर्ष चोस श्रीजंबू मोक्ष हुआ। तत्र- बार वरसहि गोयमो सिद्धो वीराओ चीसहि सुहम्मो । चउसट्टीए जंबू चुच्छिन्ना तत्थ दस ठाणा !! ते जंयू मोक्ष हुया ते साये उचम घोल दस विच्छेद हया ने कहे छे । मण परमोहि पुलाए आहारग खवग उवसमे कप्पे । संघमतिय केवल सिझणा यजंम्मि धुच्छिन्ना। एतले मुक्तिनां कपाट देता गया । अत्र जंबू उपमा- लोकोत्तरं हि सौभाग्य जम्बूस्वामिमहामुनेः । अद्यापि यं पति प्राप्य शिवश्री न्यमिच्छति ॥ श्लोकः- चित्तं न नीतं वनिताविका वित्तं न नीतं चतुरैश्च चौर।। यद्देहगेहाद् द्वितीयं निशीथे जम्बूकुमाराय नमोऽस्तु तस्मै ।। इति जंयूसंबंध । द्वितीय पाट ॥२॥ ३. तत्प? श्रीमभवस्वामी- तेहनो काइक स्वरूप कहे ,-वंध्याचल पर्वतने विर्षे तलहटीई जयपूर नगरें काल्यायणगोत्रि जयसेन 'राना । तेहने मभव नांमै १, विणयधर नामे २-विहू पुत्र छ । ते मांहिं पिता गुणे जेष्ट जाणी कनिष्ट जे लघु पूत्रने , वीर वंशावली १६३ राज दी । एतले प्रभवो क्रोधे घरथकी नीकली भीलनी पाले पल्लिपति पासि जइ रह्यो। तिणे राजपूत्र जाणी आदर देइ पांचसे चोरनो स्वामी कीयो । चारसों नवाणु चोर लेई दृष्टाल्मा अति क्रूरपणाथी घणा मनुष्य प्रति उपद्रव उपनावे पण कोइ वारवा समरथ नहीं । एहवें जंबूने घरें द्रव्यना समुह आव्या जनमुखथी जाणी, प्रभवा पोताना समुदायनें लेइ रात्रि जंबूनें घरे द्रव्य हरवाने पेंठो। वीजा चोर सघला द्रव्ये विलगा छ । एतले प्रभवो मालीये चढ्यो, देपें तो रंगमोहले जब हस्ते नव परणोत कंकण बांध्यो छे । संसाने विषे सर्व अनित्यपणु स्त्रीओनें कहे छे । ते उपदेस सांभली जंबू साथै प्रभवे वर्ष त्रीस संसारीकपणो भोगवी, श्रीसुधर्मा केवली हस्ते दीक्षा लीधी। वर्ष चौमालिस श्रीजंवूनी सेवा, शिष्यपणे कीधी अने वर्ष इग्यार जुगप्रधानपद भोगव्यु । एकदा श्रीप्रभवे पोताने पाटें थापवाने अर्थे श्रुतवले करी स्वसंघने विषे उपीयोग देइने जोयुं । पिण पाटयोग्य कोइ न दीठो । तिवारे पर सासनें उपयोग देवे थके पूर्व दिसें मगध देसें राजगृही नगरें वक्षगोत्रि यजुर्वेदीय यज्ञारंभ करतो शिव्यंभव वाडच वेदकुंभ दीठो । विहां स्वशिष्य मोकली यज्ञकुंडनी खेटी हे श्रीश्य(शां)तिर्विव दर्शने करी प्रतिवोध पामी, श्रीमभत्र पासें दीक्षा लीधी । हवे प्रभवस्वामी सर्वायु धर्म पंचासीन संपूर्ण पाली श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी वर्ष पंचोचरें श्रीमभवस्वामी स्वर्ग हुओ। इति त्रिजो पाट ॥३॥ हवें श्रीपार्श्वनाथना प्रथम गणधर श्रीसुभेय नामें । तस्य शिप्याचार्य श्रीहरिदत्त । तस्य शिष्याचार्य श्रीसमुद्रस्वामी । तस्य शिष्याचार्य श्रीकेसी । श्रीवीरवारे केसीस्वामी । तस्य शिप्याचाय्य श्रीस्वयंमभरि । तस्य शिष्याचार्य श्रीरत्नप्रभसरि प्रगट हुआ। तेहनें श्रीवीरमुक्ति पछी वर्ष वावन आचार्यपद हुओ। श्रीवीर मुक्ति गया पछी वर्ष पच्योत्तरे ओईसा नगरि चामुंडा प्रतिबोधी घणा जीयने अभयदान देई साचिल्ल नाम दीधुं । पुनः तेही ज नगरनो स्वामी परमार श्रीउपलदेव पति धर्मोपदेस देई एक लापनें नवाणु हाजार गोत्रीस्यू पति- वोध्या । तिणे श्रीपार्श्वनाथमासाद थाप्यो । एहि न सूरिय मतिष्ठयो। तिहाथी उपकेशज्ञाति कहीवांणी । श्रीरत्नप्रभसरीने 'उपकेसगच्छ' लोके कह्यो । तिहां पोहकरणा भोजग हुआ । इति चोथो पाट ॥४॥ ४. तत्पढे श्रीशय्यंभवस्वामी- तेइनो वक्षस गोत्र । तिणे सगर्मा, यज्ञारंभने वि, स्त्रीने घरे मुकी श्रीप्रभवस्वामी पासें दीक्षा लीधी । यज्ञ करतां शिय्यंभवनें प्रभवास्वामीई संवाद करी, यज्ञस्थंभयी श्रीशान्तिनाथजीनी प्रतिमा देपाडीने पतिबोधी दीक्षा दीधी । तेबारे कडे ते तीन मनक नामें पूत्र हो। ते बेटे पण लघुपणे पीता श्रीशय्यंभव पासे दीक्षा लोधी । पूत्रना स्नेह थकी साधुनो आचार शिपचा उपमारने हेते श्रीदशवीकालक एहवे नामें सूत्र दस अध्य[योन निपजान्या । ते वाल साधुनी छमासनी आयुस्थिति थाकतें सूत्र नीपजाव्यो, छमासे ए सिद्धांत भण्यो । अनुक्रमें ते पालक साधु मरण पाम्यो । तिवार अन्य साधुयें पोतानो पुत्र जाण्यो । गुरुये नेत्रे आंसूपात थाता नाणी साधोये वैराग्य वचन कही समझाया। निर्मोहदशामां चेतना आणी समताभावे हुआ। हविं श्रीशव्यंभवस्वामी वर्ष अठावीस गृहस्थपद भोगव्युं, अने वर्ष इग्यार श्रीमभवनी सेवा शिप्यपणे कीधी । पुनः वर्ष प्रेषिसताइ युगप्रधानपद भोगवी सर्व आयु [व] यासठ संपूर्ण पाली श्रीवीर मुक्ति गया पडी वर्ष अठाणुयें श्रीशियंभवसरि स्वर्ग हो ॥ ५॥ यतः- - १६ ३ १५. ! विविधगच्छी य पहावली संग्रह कृतं विकालपैलायां दशाध्ययनगमितम् । दशवकालिकमिति नाम्ना शास्त्रं यभूव तत् ।। अतः परं भविष्यन्ति प्राणिनो ह्यल्पमेधसः । कृतार्थास्ते मनकवद् भवन्तु त्वत्प्रसादतः॥ श्रुताम्भोजस्य किजल्कमिदं संयोपरोधतः । महाफलसमायुक्तं न संवत्रे महात्मभिः॥ ५. तत्प? श्रीयशोभद्रस्वामी- तेहनो तूंगीकायन गोत्र । तिणें वर्ष वाचीसताह संसारीपणु भोगी श्रीसय्यंभव गुरुहस्ते दीक्षा लिधि, अने वर्ष चउद श्रीसिय्यंभवस्वामीनी सेवा शिष्यपणे कीधी । पुनः वर्ष पचास युगप्रधानपद भोगची सर्व आयु वर्ष- छासी संपूर्ण पाली, श्रीवीर मुक्ति हुआ पठी, वर्ष एकसो बहेतालीस विनें (वीत्ये) श्रुतकेवली श्रीयशोभद्रस्वामी स्वर्ग हुआ। इति पंचम पाट ॥ ५॥ ६. तत्प? श्रीसंभूतिविजयसूरी, श्रीभद्रयाहुस्वामी- ए चेहू गुरू भाइ जाणवा । ते मांहि श्रीसंभूतिविजयसूरी ते पटधर जाणवा अनें भद्रवाहस्वामी ते गच्छनी सार संभालीना करनहार जाणवा । ते माविहूनो नाम जोडे लप्यो छे । तिहा प्रथम बडा गुरूमाई श्रीसंभूतिविजयस्वामी । तेहनो माडर गोन छे। अनें वीजा लघु गुरुभाइ श्रीभद्रवाहुस्वामी । तेहनो प्राचीन गोत्र छ । हिवे श्रीसंभूतिविजयस्वामीये वर्प यहेतालीस गृहस्थाश्रम भोगवी श्रीगुरू यशोभद्र पासि दीक्षा लीधी । अने वर्ष चयालीस श्रीयशोभद्रस्वामीनी सेवा शिष्यपणे कीधी । पुनः वर्ष आठ युगमधानपद भोगवी सर्वायु वर्ष ९० संपूर्ण । श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी वर्ष १५६ बीतें श्रीसंभूतीविजयस्वामी स्वर्गे पूहूता ॥१॥ हवें बीजो लघु गुरूभाइ भद्रयाहुस्वामि तेहन्तुं काइक स्वरूप कहें छ- दक्षिणदिशि प्रतिष्ठानपूर नगरं माचिनगोत्रिया वराहमीर । १। अने लघु वधव भद्रबाहु । २ । नामे चाडव रहे छ । तिणें श्रीयशोभद्र गुरुनी वाणी सांभली गुरूहस्ते दीक्षा लीधी। ते चेहूं बंधव घणे दिने विद्या- भ्यास करतां पट् दर्शनना मतना शास्त्र तेहना जाण हुआ । एकदा गुरु यशोभद्र चित्तनें वि चिंतवें जे ए बडो भाइ योग्य छे, पिण अहंकारी छे । तेथी पद योग्य नही । अनि नाहनो भाइ भद्रबाहु तेहनि समतायुक्त श्रुतसमुद्र जांनी गुरुयें सरी कीधौ । एतले ते याराहमिहर वडो भाइ गुरु तथा भद्रवाह-ए विहूं उपर घणे दूध यतीवेप लोपी पूनरपि संसारी हुइनें आजीवीका हेति पोताना नामनी वाराहीसहिता' नामें जियोतिषनो साख नीपजावी मनुष्यनि निमित्तशास्त्रे प्रश्न कहें । एकदा राजसभायें आवी वाराहमीहर भूई कुडालु करी करें-'जे आज थकी पांचमे दिने पूर्व दिसि थकी बीजा पहरने अंतें इणि कुंडावर्चमध्ये अभ्रमार्ग थी देवयोगें बावन पलनो मछ पडसें ।' ते सांभली राजा श्रीभद्रयाहूनें कहे-'ए किम?' तिबारें भद्रबाहु कहें- जे मेह पूर्व दिसी यकी कह्यो ते मेह इशान कुणे यकी आबसें । थाकतो दिन घडी छ पाछलो रहेस्ये गोतमगोत्री शकडाल नामें मंत्री छे। तेहने लक्ष्मी नामें स्त्री छे । तेहने थूलीभद्र १ अने सिरीओ २ वह पूत्र छे]. विलसतां बार कोटि स्वर्ण पाधा। एहवें वार बरसनें अंते रानाने दरवारे कोइक वररुचि नाम ब्राह्मण पंडत आन्यो। राजानी कीर्ति कीधी । द्रव्य देवराव्यों । तेहनें सफडाले द्रव्य न दीघो। पछे तिणे पंडते प्रपंच करी राजाने पोकार्यों । तेहथी, अकस्मात् लघूभाई सिरीओं तेहने हाथ पीतानुं मरण जाणी, प्रत्यक्षपणे संसारनु स्वरूप असार देषी, वर्ष त्रीस ग्रहस्थपणें रही, वैराग्यवासीत चीतयकी श्रीसंमृतिविजयस्वामीहस्ते दीक्षा लीधी। राजा कहें-- "ए किस्यूं कीy?' तिवारई श्रीस्धूलिभद्र राजा मर्ति कहे, यतः-- वीरवंशावली तिवारें। पण छटो दिन पांचममां भलवानी मुख्य घडीयें, ते मश्य कूडाला चाहिर किनारे पडस्यें। साडा एकाचन पलनो तोलमान होसी। तो तिमही हूओ । राजा भद्रवाह प्रसंसा अनें वाराहमिहरनें निभ्रंछीओ।.... राजा कहे-'ए मूढ ते किम ?' जे तिहाथी आवतां पवनने जोरें मत्स शोपाणो तेहनी मालीम रही नहीं । एतली बुदि न्यून एइनी जाणवी। पुनः केतलेक दिने राजसदने राणीइ पूत्र जनम्यो। तेतले वराहमेहर कहें-'एहनो शत वर्ष आयु छ।' एटले राजायें भद्रवाहूनें पुछयो । तिवारें भद्रवाह कहें- एहनें आज धकी सातमें दिने बिलाडीमुपथी नीश्चय मरण छ ।' ते सांभली राजायें नगर थकी सर्व मंजारी कहावी । सातमि दिन दासी ते बालकने उच्छंगे लेइ निरपे छ । एहवें भाविने बसें अकस्मात मांजारीने आकारें भोगल खेटीई धकी पडी मस्तकयात हुओ। मरण पाम्पो । श्रीभद्रबाहुनो? वचन साचो जांणी घणी आदर कीर्ति हुइ । राजाई वराहमीहरतुं वचन असत्य जाणी देश वहार कीघो। ते पिण! अणादर थकी को मरण लही व्यंतर हुओ। पहेला भवनो वैर संभारी गुरूना संघनें मारिनो उपद्रव्य(व) करे। तिवारें गुरुये श्रूतनो उपीयोग दीपो । बराह जीव जाणी उपसर्गहरस्तोत्र' नीपजाव्यो । जिणि जल मंत्री छाटणी थकी ते व्यंतर नाठो । श्रीसंघ समापी हुई। श्रीभद्रवाहस्सामीई नवमा-पूर्व हंती 'कल्पसूत्र' उधरीने रंचना कीधी। ते भदबाहुस्वामीयें वर्ष पस्तालीस संसारीपद भोगवी पर्छ श्रीयशोभद्रसूरी हस्ते दीक्षा लीधी अनें वर्ष सत्तर ताइ श्रीयशोभद्रस्वामीनी सेवा शिष्यपणे कीथी । पुनः वर्ष चउद युगप्रधानपद भोगवी श्रीस्थूलीभद्रने अतियोग्य विद्याधिक जाणि पोताने पाटें थापी; सर्वायु वर्ष छहोचर संपूर्ण । श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी- व० एकसो सित्तरें 'श्रीभद्रबाहुसंहिता 'कारक, पुनः 'आवश्यकनियुक्ती । १। पचपाणनियुक्ति । २ । ओघनियुक्ति । ३ । पिंड- नियुक्ति । । उत्तराध्ययन नियुक्ति ॥५॥ आचारांगनियुक्ति । ६। मुगडांगनियुक्ति । ७ । दशविकालक- नियुक्ति । ८ । विवहारनियुक्ति । ९ । दशाकल्पनियुक्ति । १० -ए दश नियुक्तिकारक; अनें 'उपसर्गहरस्तोत्र करी महामारी निवारक पंचम श्रुतकेवलीविरुदधारक श्रीभद्रवाहू स्वर्ग हुओ। इति भद्रयाहू संबंध। पाट ॥६॥ - ७. तत्पट्टे श्रीस्थूलिभद्रस्वामी- N तेहनुं स्वरूप कांइक कहिए छीए--पूर्वादिशि पाडलीपूर नगरे नवमो नंद राज्य करे छे । तेहने नागरशाति जखा १, जखदिन्ना २, भूया ३, भूयदिन्ना ४, सेणा ५, वेणा ६, रेणा ७-ए सात धूलिभद्रनी वहेनो जाणवी । इवे स्थूलिभद्रनि नीशाल भणी वेश्याघरे संसारीकना सूप विषयासन्न शिखयानि नायका यरें क्यो । पूर्व कर्मा सुयोग तेहस्यूं संग हो । भोगी भ्रमर थको तिहां ज रह्यो । पिता सुपप्रष्ण कहावें । विलसवा द्रव्य मोकले । म न विविधगच्छीय पट्टा वली संग्रह -'हस्ते मुद्रा मुखे मुद्रा मुद्रा स्यात् पादयोः दयो। तत्पश्चात् गृहे मुद्रा व्यापार पञ्चमुद्रिकम् ।। पुनः श्रीस्थूलीभद्रस्वामी चउद पूर्व सूत्रे भण्या, अने दश पूर्व अर्थि भण्या । वर्ष चोवीस श्रीसंभूतिविजय- स्वामीनी सेवा विनइपणे कीधी । अने वर्ष पस्तालीस युगप्रधानपद भोगवी, सर्व आयु वर्ष नवाणुर्नु संपूर्ण । श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी बसें पनरे वर्षे, कोसा नामें नायकाप्रतियोधक, गुरु श्रीसंभूतिविजय दुष्कर दुष्कर कथक वं धन्नं वं धन्न', इदं बड बतरसा, विरुदधारक, श्रीस्थुलिभद्रस्वामी स्वर्ग पुद्दता । ते संघाते पहिल वचम्पभनाराच संघयण १, अने पहिलं समचउरंस नामे संस्थान २, पुनः पूर्वानुयोग ३- ए विहूं वस्तु विच्छेद हुइ ! एहवें श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी बसें चउद वर्ष गइ थमें अव्यक्त नामा त्रिनो निव प्रगट हूओ। यत उक्तम्- केवली चरमो जम्बूस्वाम्यथ प्रभवः प्रभुः । शय्यंभयो यशोभद्रः संभूतिविजयस्तथा ॥ भद्रबाहुः स्थूलिभद्रः श्रुतकेवलिनो हि षट् । एछ श्रुतकेवली जाणवा । अत्र महारुपि श्रीस्थलिभद्र वर्णनकाय- वेश्या रागवती सदा तदनुगा पड्भी रसौजनं शुभं धाम मनोहरं वपुरहो नव्यो वयःसंगमः । कालोऽयं जलदाविलस्तदपि यः कामं जिगायादरात् तं वन्दे युवतीमवोधकुशलं श्रीस्थूलिभद्रं मुनिम्॥ १८ श्रीशान्तिनाथादपरो न दानी दशार्णभद्रादपरो न मानी। श्रीशालिभद्रादपरो न भोगी श्रीस्थूलभद्रादपरो न योगी । ए श्रीस्थूलीभद्रनो संबंध अन्य चरित्र विस्तार छे । ते माटे अत्र विस्तार कन्यो नथी । पुनः श्रीवीर मोक्ष हुआ पछी बसें अने वीस वर्ष गई हूंति 'योधमत' मफट हुओ। इति थुलिभद्र संबंध । पाट ॥ ७ ॥ ८. तत्प? श्रीभार्यमहागिरि, श्रीआर्यसुरस्तिरि- ए बेहूं गुरुभाइ जाणवा । ते माहि प्रथम बडा गुरूभाइ श्रीमहागीरी, तेहनौ गोत्र एलापत्य नामें छे । भनें वीजा लघु गुरुभाइ श्रीआर्यम्हस्तिसुरी, तेहनो गोत्र वासिष्ठ छ। ते मांहि प्रथम श्रीआर्यमागिरिसरि ते पटोघर जाणवा अनें श्रीआर्यमुहस्तिसरि ते गछनी सार संभालिना करणहार जाणवां । ते माटे विहूंनो नाम जोडे लख्यो छे। विहां प्रथम वडा गुरुभाइ श्रीआर्यमहागिरिमरि वर्ष त्रीस संसारीकपद भोगवी श्रीस्थूलीभद्रस्वामी पासें दीक्षा लीधी। अने वर्ष च्यालोसताई गुरु श्रीस्थूलीभद्रस्वामीनी सेवा शिष्यपणे कोधी । वर्ष त्रीस युगप्रधानपद भोगची सर्वायु एक शत वर्ष संपूर्ण । लघु श्रीआर्यसुहस्तियरीने गछ भलावी श्रीार्यमहागिरीधरीइं जिनकल्पीनी तुलना करी । श्रीवीर निर्वाणि हुआ पछी बसे पसतालीस वर्ष चीते श्रीआर्यमहागीरीघरी स्वर्ग हुआ ।। १ ।।

मुहस्तीवरी विहार करतां कोसंबी नगरीइं चनें वाटिकाइं रखा । शिप्य गुरू-आज्ञा लही नगरमांही आहारने उधमें गया छे । तिहां दुर्भिक्ष योगें अन्नने अमात्र भिक्षुक घणा हुआ छ। पण साधुन पण घणे आदर सरस आहार थापता देपी एक रंक भिक्षुक ते साधु साये हुओ। आहार लेइ साधु वाटीकाइ आन्या। गुरू आगले आहार आलोई छ एटले रंक पण द्वारि आवी उभो । साधुनें कहें छे-'मुजन ए आहार आपो।' गुरु कहे-'साधुनो आहार साधुने कल्पें, वीजा गृहस्थने न फल्पे।' सांभली कहे-'मुजने शिप्य करो। पिण आहार आपो । हूं घणो सुधाति छु।' वीरवंशावली १६७ एहवें श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी बसें अठावीस वर्ष गंग नांमा पांचमो निहव प्रगट हूओ। इवें श्रीआर्यमुहस्तिसरि भव्य जीवनें परमोपकारी यका विचरता मालब देसें उजेणी नगरे भद्रा नामें सार्थ- चाही पासे वाहनशाला याची चौमासु रखा छे । तिहां निसि सज्झाय ध्यान करें छे, एतले सात भूमिइं भद्रापूत्र अंबंतिसुकमाल नामें बत्तीस स्त्रीओ साथै सुप विलास करतां, गुरु कथक अध्ययन मधुर स्वर एकचितथकी सांभली, जातिस्मरण पांमी, पूर्व भव नलनीगुल्मविमाननो देवसुप दीठो । स्त्रीओनो सुपविलास मूकी उतावलो मेढी थकी उतरी गुरुने नमी कहे-'साधुजी! ए तुमे कही एहवी जे नलनीगुल्मविमानमुप-देवसाहिचीनी वात ते तुम अत्र रह्या किम जाणो छो ? 'श्रीआचार्य कहि-श्रीजिनवचनानुसारि।' श्रेष्टिपूत्र कहे-'पूज्य ! एतलो ए सुप भोगवी अत्र उपनो अमें पुनरपि ते देवमुप हूं किम पांमु ? 'श्रीगुरु कहें-'व्रत लिओ तो ते सुप लहो। तिवारें विणे भदा मातानी आज्ञा लही, वत्रीस कन्या, कोटी द्रव्य तजी; श्रीगुरुहस्ति दीक्षा लीधी । गुरुने फ. ए कठीण दीक्षा मे घणा दिन ताई न सचवाय ते मारें अणसण की सांभली कहे-'तमारा जीवनि जिम मुपनो हेतु हुइ तिम करो।' गुरुवचन 'वह त्ति' कही जिहां समसानि कंथरी बननें विशे काउसगो रही अणसण कीधु । मारगिं जाता कोमलपणा- यकी विहु पर्गे कंथेरना कांटा खंचवे करी लोहीना टवकां पड्यो छ । तेहनी गंधे रात्रिने विशे प्रसूता सीयालणी पोताना परिवारस्युं जिहां अतिसकुमाल साधु देहनी मी तजी काउसगी रया छ तिहां आवी । विहु पगयी मांडी सघलो सरीर भक्षणरूप उपसर्ग कीधो । पिण तें मुनि दृढचितथकी ध्यान न चल्यो । आयू संपूर्णे उदारीक देह तनी सौधर्मराजध्यानी ई नलनीगुल्मविमाने देवनी साहीवीये उपनो एतले मातायें पूत्र आयु पूर्णि, पिण भंगुर देह जाणी एक सगी बहुने घरें मुकी, एकत्रीस बहुयुक्त भद्रा दीक्षा आराधी देवलोके गयां। घरें सगर्माने पूत्र जनम्यो, तिणें पीता दधस्थान प्राप्ताद नीपजावी श्रीअवंति नामें श्रीपार्श्वनाथनो विव यापी ते " सद्गतिनो भजनार हुओ। हवें सीयालणीनो संबंध कहें छे-अयंतिम कुमाल पाहिला त्रीजे भवे माछिनो अवतार हुओ। विहां बि सी. इति । ते माछिये साधुनो उपदेश सांभली श्रीधर्म आराधी मरण पांमी नलनीगुल्मविमाने देवपणे उपनो । विहांधी चबी कोटीध्वज विवहारीयाने घरें अवंतियकुमाल नामें पूत्रपणे उपनो । अनें बडी स्त्री विभव वणीकपूची हुर । पुनः नाहनी स्त्रीं मरीने अपमांनी हती, ते वाडवी हुइ । तिहां थकी मरण पांमी सीयालणी हुइ । ते वैरे मक्षणरूप महा उपसर्ग साचल्यो । ते पार्श्वविध आज दिनताई समभाव उन्जेणी नगरीइ छ । इति अति- सुकुमाल संबंध छे ॥१॥ दश पूर्वधारक श्रीआर्यमुहस्तीसरी पुनः जेहनी नव दीक्षित भिक्षुक जीव तेहने उपगारीपणें हुआ । श्रीवीर मोक्षं गया पली बसें पंचासी वर्ष संमति इसइ नामे राजा हुओ। तेहनो संबंध कहें छे-एकदा श्रीआर्य- H .१६८ विविधगच्छीयापहावलीसंग्रह तिवारें गुरु दशपूर्वनाण छै । तिणें श्रूत उपोयोग दीधो । शासन दियोतकारक जांणी दिक्षा आपीने आहार पण दीघो। घणा दीन यकी तिने सरस जांणीने आहार विशेष लीयो । निर्बल सरीरथकी तेह रंकाने विसचिका हुइ। घणी असाता उपनी । उदरपीडाथको चेर्दै । पहेला जे गृहस्थ भिक्षुरपणे, जे आहार न देता घणा तिरस्कार करता ते गृहस्थ नगरसेठ जेद्दवा आधी, नर दीक्षितने साधुवेप उदय आव्यो जाणी बहूमूल्य भोपधादिके विशेष भक्ति वेयाश्च साचवें । ते देपी रंक साधु मन चिंतवे जे ए धन्य ए चारित्रने, धन्य ए वेपनें, जेना महिमा थकी एक कोटीध्वज लखेसरी व्यवहारीया बहुमाने करी मुझ भक्ति साचवे छ । एहना शुभ चास्तिनी अनुमोढनाई काल पांमी उजेणी नगरीई श्रेणिकने आठमे पाटे कुणाल राजा, ते ओस्मान माताना कपट थकी वर्प तेरनो चहीण थयो छे, तेहने यरे वेटापणि उपनो । कलेक दिने तेहनो जन्म थयो एतले अस्मात पेटशूल रोगपीडाधकी पीतानो नास हुओ । तुरत ते बालकने लात्री पाट तपते ३सारयो । ते माटे एहन नाम संपति। केतलेंक दिने श्रीआर्यमुहस्तिमरी उज्जेणीई चौमामु आव्या । तिहा दीवालीई जूदार भटारें दिन श्रीगोतमकेवलोछन महिमाई श्रीवीरचैत्ये स्थजानाई समस्त संघयुक्त महामहे राजपथे जातां गवाक्षे चातायनि बेठा थका संपविई श्रीगुरुने देषी, जातिस्मरणे पूर्वभव दीठो । मनस्यू चितवे, ए गरि पहिला रंफने मवें मुजने महाउपकार, दीक्षा देने, कीधो छ । एहयो वीचारी गौरायकी उतरी गुरुने चादी कहे-मुजने तुंमे भोलपो छो?।' गुरु कहे-'मालवाधीश प्रवल पून्यनें जगत ओलखें ।' ते सामली संमति कहे-'इणही ज नगरनो हु क्षत्री रंक नवदीक्षित चेलो तुमारो, ते माटें तूंमि कृपा करी मुजने धर्मउपदेश कहो।' तिवारे संमतिर्ने गुरु कहे-अथ श्लोक- दिने दिने मङ्गलमजुलाली सुसंपदा सौख्यपरंपरा च । इष्टार्थसिद्धिः बटुला च बुद्धिः सर्वत्र सिद्धिं सृजतां सुधर्मः॥ अतः कारणात सर्वत्र- चन्द्रपल तारायल-ग्रहबल-दग्यल(दिशोयलम्)। घाहुपलादिभ्यो(बाहुभ्यो) बलवत्तर धर्मपलं विलोक्यते ॥ २१ बीजेनैव भवेद् धीजं प्रीपेन प्रदीपकम् । द्रव्येणैव भवेद् द्रव्यं भवेनैव भवान्तरम् ॥ २२ एहवो उपदेश श्रीगुरु भुपनो साभली, संमति कहे-'हे कृपानिधि ! उत्तम गविना जाणहार रूडा जीव तेहना कुण आचार हुइ ?' गुरु कहे-'हे संपति ! हे महामतिना स्वामी ! सांभल, उत्तम माणीना एह आवार हूं।' श्लोक- अध: क्षिपन्ति कृपणा वित्त तन्न यियासवः । सन्तस्तु गुरुचत्पादौ तदुच्चैःपदकाक्षिणः ।। २३ एहयो वचन उपगारी गुरुना मुफ्थी साभली समकित लही मुकृत करतो हुओ, संमति नृप, जिनप्रसाद मंडित प्रथची शोभावतो हुओ। तेहनी संख्या-सवा लाप नोतन प्र(मा)साद निपजायतो हो। तेहनें वारण ३ हजार -- and पछिमें देवपतनें पूनः इहरगहें श्रीशान्तिनाथनो प्रासादवि निपजान्यो । पूनः पूनः संपति स्व माक्रमे त्रिखंडा- धीश मंगलश्रेणी निमित्ते सदैव सूर्योदये अष्टोतरी, एकवीसभेदी, सत्तरभदा, अष्टभदा, नवपदादी, मन पवीत्र श्रीजिनभक्ति साचवें । पूनः श्रीसिद्धगीरी। १। रेवंतगीरी ।२। श्रीशंपेस्वर । ३। नंदीय । ४। ब्राह्मण वाटक । ५। रथजात्रादि प्रमुख महातीर्य जाणी वर्प मांईि बार च्यार संघपति हूई। जात्रानो लाभ कमायें। वाजे । एहवी रीते संप्रति न्यायमि राज्य करें छे। एहवें एक साधु मासपमणनो चोबीहारी तप संपूर्ण काउसग्ग पारी गिरिगुफामाहियी नीकली, उजेणी नगरें पारणाने दि आहार अर्थ आव्या। तिहां दुर्भिक्षने योगे भिखारी घणा हूआ । कोइ तेदन अन्न न आएँ । एहवे ते १६९. वीरवंशावली धर्मशाला निपजावी । संवाकोटी श्रीजीनविच कीथा। ते मांहि पंचाj हजार धातूना विय । शेप विब उपलना राता, पीला, सांम, स्वेत जाणवा । इग्यार हजार वापिका तथा कुंड नीपजाव्या । कोइ तेरा हजार पण कहें । छत्रीस हजार जिर्णोद्धार निपजाव्या । ते किम, दिन प्रतें एक प्रासाद जीर्णोद्धार नीपजानी वधामणी आवे, ते द्वारपालक वीजे दिनें कहें। एटलें संपत्तिनु आयु वर्ष सोनुं जाणवू । अनें सो वर्षना दिवस छत्रीस हजार हूया। र प्रमाणे जीर्णोद्धार जाणवा । ते मांहि मुख्य जीर्णोद्धार श्रीसमलीकाचीहारनो नीपजाग्यो । हवे ते श्रीशकुनिकाविहारनी उत्पत्ति कहे -श्रीनर्मदा उपकंठे भृगुक्षेत्रि कोरंटकवने आम्लीयले एक समली पोताना वालक सहित रहेछ । ते निरंतर पोताना पालकने पोखें । एटले पाटकी वीचारें जेए समली चांचस्यू सवलो मंस विगा. छ । एटले समली आची चांच पूढे मांसखंड लेइ एक बडवृक्ष साखायें वेठी। तेतले खाटकीए वांणे करी विधी । मारग विचमा भूमीई पडी । एहचे कोइक जैन गृइस्थे नमस्कार संभलावीओ। ते समलीई सांभल्यो । एतले पोताना वालक उपरें मोह न आंग्यो । नवकार सदह्यो । तेहना महिमा थकी मरण पांमी सोहलद्वीपना राजा श्रीचंद्र घेरे बेटो उपनी । ते वृधर्वती हुइ । एकदा पिताने साथे ते कार्याथै भृगुकछे आवी । ए बजारे दाटें ऋषभदत्त व्यवहारियाना मुपथको नोकार सांभली जातीस्मरण पांमी पाछिलो समलीभव दीठो । ते पासे यकी नौकार शिख्यो। जैनधमि श्रद्धावंत हुई। जे ठेकाणे वाणे विधाणी भूमीइं पडी हंति तिणहि न ठेकाणे विद्यमांग शासन श्रीवीसमा तिर्थकरनो जांणी यावन्न देवकुलिका सहित प्रासाद नीपजावी श्रीमुनिसुव्रतस्वामीनो विव थाप्यो। ते प्रासाद मांहिं वडों समलीनु स्वरूप कीधु । ते वालीका सीलधर्म आराधी तीव्र तप तपी इशान वीजें देवलोके देवतापणे उपनी । यतः हरिवंशभूपणमणि गुकच्छे नर्मदासरस्तीरे । श्रीशकुनिकाविहारे मुनिसुव्रतजिनपतिर्जयति ॥ इति शकुनीकाचीहार उत्पत्ति ॥ पुनः संप्रतिये उत्तर दिस मरूधरि घंघाणि नगरि श्रीपद्मप्रभस्वामीनो मासाद चिंच नीपजाव्यो । वीजागीरी पासनो मासाद निपजाव्यो । ब्रह्माणी नगरी श्रीहमीरगढी श्रीपासमासादवि नीपजाव्यो । इलोरगिरि सिपरे श्रीनेमाविव थाप्यो ते दक्षण दिसें जाणयो । पूर्व दिसि रोहिसगीरें श्रीसपासनो प्रासादयिंग नीपनायो। मरण २४ मचूर चित्ते सप्तपत्रे वित्त वावतो हुओ, मार सब्द मुसे न कहें, काने पण मार सब्द सामने नही । न्याया २२ १७० विविधगच्छीय पावली संग्रह , ૨૧ साधुनें तपस्वी जाणीने गृहस्थे कमाड उघाडी घरमांहि लीधा । साधुयें पारणो करी पूनः अठाइ पचखी, आवी गुफाई निश्चल काउसग धांने रह्यो । एतले सघले भिष्यारीई मली चिंतब्यु जे ए यती तरत आहार छेइ गयो छे, विहां भिखारीए आवी तेह तपसीनो उदर विदारी अन्न पायो । नगरमा वात प्रसिद्ध थई । संपतिइं यतीचात जाण्यो । श्रीकेवली तीर्थकर वचनानुसारें भस्मपहनें योगें दिन २ हांणीनो समय जांणी संपतिई समग्र देशे श्रीर्यमुहस्ती प्रमुख साधु समुदायने घणे आनहें महामहोत्सवें स्वकृत धर्मशालाई पधराव्या । कपाट हुआ छे नहीं। पूनः संप्रति राजाई पोताना दास तथा घरनी दासी तेहने साधु साधयीनो वेप देह अनारज देस विहार कराव्यो । घणा गाहा मिथ्यात्वीने समकीत पमाडी आर्य जैन कीया । इत्यादि उत्तम सूकतें करी इह परभत्र आत्मा कल्याणनु हेतु जाणी नीपजाबी, कौरवकुल मोरियवंस सोभावी संपति नृप सो वर्प आउ संपूर्ण, सदगतिनो भननार हूओ । गाथा- कोसंवीए जेणं दमगो पन्याविओ तओ जाओ। उजेणीए संपइ राया सो नंदउ सुहथी । इति संमति नृपसंबंध ॥ ए श्रीआर्यमुहस्तिसरि लघु गुरुमाइ ते गछना पटोधर हुआ, अने बडा गुरुभाइ आर्यमहागिरिसरि तेहणे जिनकल्पनी तुलना कीधी । दाक्षिणपणे राज्यपिंड लीयो । ते मात्रै विहूं गुरुभाइने मांडली आहार पांणीनों व्यवहार जूदो हुओ। श्रीमहागीरीसरीइं सम्मितशिपरनी यात्राने हेते पूर्वदेशे बिहार कीघो । तेहनी च्यार पेढीने आंतरें श्रीदेवढी क्षमाश्रमण हुआ! श्रीआर्यमुहस्तीसरीई वर्ष त्रीस संसारीपद भोगी श्रीस्थूलीभद्रस्वामीने हस्ते दीक्षा लीधी, अने वर्ष चोवीस शिष्यपणे गुरुनी सेवा कीधी । पुनः वर्ष छद्देतालीस युगप्रधान पद भोगवी सर्वायु वर्ष सोनुं संपूर्ण श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी यसे में एकांणु वर्ष श्रीआर्यसुइस्तीमुरी स्वर्ग हुआ ॥ पाट ८॥ २. तत्पद्दे श्रीसुस्थितस्वामी १, लघु गुरुभाइ श्रीसुप्रतिपदस्वामी २- ए विहू गुरुमाइनो व्याघापत्य गोत्र छ । ते माहिं श्रीमुस्थितस्त्रांमी ते पटधर जाणवा अनें लघु भाइ श्रीमुप्रतिवद्धस्वामी ते गछनी चिंताना करणहार हुआ! ते मारें ए बिह गुरुभाई नाम जोडें लख्यां छ। पूनः ए बेहू गुरुभाइई आलीयसंडे काकेंदी नगरीई, महर्षि गौतम कथक जे सूरीमंत्र तेहनों कोटिवार स्मरण कीयो । तिवारें नवमा पाट थकी 'कोटिकगछ' एहवो बीजो नाम प्रगट हुओ । ते पहिलां श्रीसुधर्मास्वामीथकी मांडी आठ पाट सुधी 'निग्रंथगछ' एहवी नाम कहेवातो । तेहनें सर्व आयु संपूर्ण. .श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी वर्ष त्रिणसे अने वहोतर वित थ श्रीसुस्थितस्त्रांमी स्वर्ग हुओ । पूनः श्रीवीर निर्वाण हुआ पछी त्रिणसें अन उगणासी वर्ष वीत, श्रीभृगुकच्छ नगरें श्रीआर्यखपूटाचार्य प्रगट हुआ ॥ पाट ९ मो ।। १०. तत्प? श्रीइन्द्रदिन्नसूरि- अने लघु गुरुभाइ वीजा श्रीमीयग्रंथसूरी । तिहां रद्ध गुरुभाई थीइन्द्रदिनारी तेइनो कौसिक गोत्र, लघु गुरुभाइ भीयग्रंथसरी तेइनो कासप गौन छ । श्री इन्द्रदीनमरी विहरता मुटेरीई पुहूता। एहवें श्रीवीर मुक्ति - देवता छ । ए अज माहरु वाहन छ। तें माटें तुम ए धर्म यांछो छो ते सर्व मिथ्या छ। साचा धर्मनी परीक्षा ते छागना एहवा वचन सांभली सकल मनुप्यना टंद छागर्ने पुछे छ-'जे तूं कुंण छ ?'छाग कहे-'हुँ याचक ए गाथाइ कही। ते सांभली सर्व वाडव प्रतियोघ पांमी दयाधर्म प्रत्ये आराधता हुआ। श्रीगुरुरं वोकडाने अभयदाननो देणहार जांणी कीर्ति हूइ । एतले ए मीयग्रंय थिवीरने श्रीवीरसासनें प्रभावक यदा । थकी जांणयो। २६ वीरवंशावली हुआ पछी च्यारसे सीतर वर्ष गया हुँते मालब देशे उजेणी नगरें परमारवंसें राजा श्रीविक्रमादित्य प्रगट हुओ। तेह वर्षनु मान कहें छ । श्रीवीर चिरं (१) पालकराज्य वर्ष साठ। नंदराज्य वर्ष १५५ । मोरियराज्य वर्ष १०८ । पुप्फमित्रराज्य वर्ष त्रीस । चलमित्र १ भानुमित्र २ श्रीकालिकाचार्यना भाणेज तेहनो राज्य वर्प साठ । नस्वाहनराज्य वर्ष च्यालीस । गर्दभिलराज्य वर्ष तेर । साकीराज्य वर्ष च्यार। श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी च्यारसे छनु वर्ष गयें दक्षिण दिसें श्रीगोदावरी नदीने कांठे पइटाणे भूजंगाधीप सानीपथकी श्रीशालिवाहननो साको प्रगट हो । एवं वर्ष च्यारसे ने सीतरनो मेल हुओ । श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी त्रणसें में बीस वर्ष गया पछी मोरीय राजाने राजे श्रीआर्यसुहस्तीसुरीने संघाडे पहिला श्रीकालिकाचार्य प्रगट हुआ। तिणे सौधर्मेंद्र आपले निगोदनो विचारस्प वियरो कह्यो । पुनः ‘श्रीपन्न- वणा उपांगसूत्र'ना कारक ए चोथा युगप्रधान जाणवा । पुनः वीजा कालिकाचार्य श्रीवीर मुक्ति गया पछी च्यारसे ने बेहपन वर्ष बीतें वलमित्र-भानुमित्र राजाने राज्ये दक्षण दिसें गोदावरी नदीने कांठे पठाणे राजा श्रीशालिवाहनना आग्रहथकी एकतालीस जैनाचार्यनी शाक्षिई, श्रीपर्व आयें हूते यक्षोत्सवें श्रीपर्वनो अंतराय जांणी भाद्रवा मुद पांचमी चोथ दीने पर्युपणपर्व कीघो। एहनो विस्तार श्रीकालिकाचार्यनि कथा- श्रीवीर मुक्ति गया पछी च्यारसे में एकवीस वर्ष गयें हृते श्रीदन्द्रदिनखरी स्वर्ग हुआ । हवे लघु गुरुभाइ श्रीमीयग्रंथसूरी श्रीवीरसासनें प्रभावक हुआ। तेइनो संबंध कहे छे । अजयामेर गढीनी तलहटीई हर्पपूर नगर बसें छ । एकदा तिहां विहार करता श्रीमीयग्रंथसरी आव्या। एहवे छार्ने होमवानें सफल मंत्रना नाण जग्न करता उद्यमी हुआ छ । एटलें जैन गृहस्थे गुरुने जागनी वार्ता कही । तिवारें श्रीगुरुयें खरीमंत्र वास मंत्री श्रावकने देइ कहा जे-ए वास बोकडाने माथें ठवज्यो । जिम एहनें अभयदांन हूसे अनें शासन पण उन्नत होसें।' श्रावके गुरुई कयु तिमज कीधु । एटले बोकडो देव अधीष्टत थको आकाशे जाइ उभो रह्यो । यागकृत वाडव पति मनुष्य भापायें, अरे विभो ! तुम्हे सांभलो, जेतला पसनी देहीयें रोम होय तेतला हजार वरस सूधी पसना घातनो करणहारनो जीव नरके रह्यो वेदना वेदे । यतः- महतामपि दानानां कालेन क्षीयते फलम् । भीताभयप्रदानस्य क्षय एव न विद्यते ॥ -- करो, तो श्रीमीयग्रंथसरीने पूछो । तिणे वाडवें गुरुने धर्म पूछयो, तिबारे खरीई, यत गाया- धम्मो मंगलमुफिट्ट अहिंसा संजमो तयो। देवा वि तं नमसंति जस्स धम्मे सया मणो॥ इति प्रियग्रंथसूरीसंबंध।

१७२ विविधगच्छीय पथावली संग्रह एडवें अवसरें मथम विथंकर श्रीरुपमपूत्र नमि १, दिनमि २ तेहनी शापायें विद्याधरवंशी श्रीद्धवादी- सूरी, तेदना शिष्य श्रीसिद्धसेनभरी 'श्रीकल्याणमंदिरस्तोत्र 'ना करपाहार प्रगट हुआ। तिहां प्रथम वृद्धवादी- सूरीनो संबंध कहें - एकदा विद्याधरशापाई आ० श्रीस्कंदपुरी विहार करता गोडदेश कोसलपूर नगरें आव्या। विहां मुरंद नामे बाडचे वृद्धपणे गुरुषांणी सांभली यूज्यो । चितम्युं चित, जे शासने वि पंडितें कहां ऐ-- यथा चतुर्भिः कनक परीक्ष्यते निधर्पण-च्छेदन-ताप-ताडनैः। तथाहि धर्मो विदुपा परीक्ष्यते श्रुतेन शीलेन तपो-दयोगुणैः ।। २८ शिवशासनने वि ए च्यार आत्मशुद्धिना भेदमाहिं एके शुद्ध नथी, एक जैन विना । तया अभिनिवेश मिथ्याविना शास्त्र १, शील २, तप ३, दयापरिणाम ४-ए च्यार वाना शुद्ध न कहिए । इम जैनदर्शननी साची वस्तु जाणी श्रीस्कंदलाचार्य पासि मुरूदे दीक्षा लीधी। वृद्धावस्थाई पिण रात्रं गादि स्वरें विद्यानो उद्यम करें। तिवारें गुरु कहे-'भो महानुभाव ! रात्रि मोटे शन्दे न भणीयें। अनार्य मनुष्य जागे। खांडण पीसण आरंभे प्रचते।' तेहवे एक वृद्धा स्त्री ते साधु रात्रे भणतां घोप पाठ करता ते डोसी कहें-'रे साधु ! तु घरदपणे भणीने स्यूं मूसल फूलावीस ? अमने नीठा करवा देतो नथी । ते हेतुथी गाढे शब्दे अहेतु थाई ।' यथा यतः- जागरिया धम्मीणं आहम्मीणं तु सुत्तया सेया । वच्छाहियभगिणीए अहिंसु जिणो जयंतीए ।। इति भगवत्यंगे । एह, गुरुनु बचन सांभली रात्रि भणषु मूफी दिवसें घोप पाठ करें। तिवारे गृहस्थ तथा लघु शिष्यादिक ते पिण हास्यि करी हसई । ते किम जे-'तुम्हे गरढपणे गादि शब्दे भणीने फिस्युं ते फूल्हावस्यो ? ते हार सांभली कास्मीरदेशि हूंतो, सारदामंदिरे उपवास करी बैठौ । निश्चले सरस्वति प्रसन्न थइ । कहि- 'वृद्ध ! वर मांगी । हूं तूझने तूठी।' कहे- 'गरटपणे बुद्धि बांछु।' ते सांभली वाग्देवी कहइ-'जातूं विद्यापात्र हो।' ते श्रुतदेव्या दत्त वर लई भावी गुरु वांदी बाजारने विषई यणा मनुष्य समक्षि, ते डोसी समक्षि, सारदादत्त बरना महिमा थकी मुशल संकू हतूं ते नवपल्लव कूपले करी शोभाव्यु फुलाव्युं । काव्य माह- मद्गोः शृङ्ग शमयष्टिप्रमाणं (१) शीतो यदिः (२) मारुतो निष्पकम्पः (३)। यो पद छूते सर्वथा तन्न किंचिद (४) वृद्धो चादी क किंमहीम्न घादी ॥ ॥ गुरे विद्यापात्र योग जांगी आचार्यपद देइ श्रीद्धवादीवरी नाम दीधु । इति वृद्धवादीसरीसंबंध ।। पुनः इचई 'श्रीकल्याणमंदिरस्तोत्र 'नी उत्पत्ती कहई छई-श्रीदवादीसरी विहार करता भृगुकछि 'प्रभावकचरित' अने 'प्रबन्धकोश' मा आ पश्ना पन्ने चरणो आ प्रकारे मळे ई- 'यद्वा यस्मै रोचते तन्न किञ्चिद् वृद्धो चादी भाषते कः किमाह ॥' २९ - १ १७३ . . " वीरवंशावली आव्या । एहवइ मालय मंडलें उज्जेणी नगरी कौशिक गोत्रे देवरुपी नामई वाडव रहि छई । तेहनी देवशिका नामें स्त्री । तेइनो पूत्र कुमुदचंद्र नामी महा पटू अंगनो जाण छई। तिणें अन्य पंडितना मुपथकी चाग्देवी प्रसन्न थई श्रीद्धवादीनो घणो महिमा सांभली अत्यंत गर्व धरी 'जे मुंजने विधावादे जीतस्य तेहनो हूं शिष्य थाइस ।' एहवी प्रतिज्ञा धारी जिहां भरुयचि श्रीद्धयादी छई तिहां आन्यो । एहबई वृद्धवादी देहचिंताई नगर वाहिर आव्या छै। तिहां बिलु एकठां मिल्या । वनई विपई गौवलीया तथा पिंडारा गौ चारई छई । कुमुदचंद्रि विद्यावादनो आसय जणान्यो । तेह पिंडारानी शापीया करी विद्यावाद मारंभ्यो । तिहां प्रथम कुमुदचंद्रे संस्कृत वाणी कही। पिंडारा न समजई । ते कहे-'ए विद्या काई नहीं । ब्रह्म तूं फोकट आरडे छ । मूर्ख छई।' तिवारें वृद्धवादिसरी अवसरना जाण हुई । कल्पक रजोहरण कटि बांधी डंड उंचो हार्थि रापी प्रदक्षणारूपी घेरणीइं नाचता हुआ मुषि इम भणिजे । अथ चालि- नवी मारीई नवी चोरीइं, परदारागमण न कीजीइं। थोडास्युं थोडं दीजई, तर टगिमगि सग्गि जाइई। गाय भिस जीम नील चरई, तिम तिम दूध दूणो भरइं। तिम तिम गोवाला मनि ठरई, छाछि देयंतां तेहू तरई ॥ गुलस्यु चावई तिलतांदुली, वेड वजावई वांशली। पहिरणि ओढणि हुंइं धावली, गोवाला मन पूगी रली ॥ मोटा जोटा मिल्या पिंडार, माहोमाहि करय विचार । महीपी दूझणी सरजी भली, दीइं दायोटा पूगी रली ॥ वनमाहि गोवाला राज, इंद्रतणि घरि ते नहिं आज । भमर भिस दुझि वली सोल, सुखि समाधि हुई रंगरोल ॥ वाटउ भरी दहीनें घोल, जीमणो कर लेइ सि बोल । इणि परई मुह मेलावउ करई, स्वर्गतणी वात ज वीसरई ॥ हडहडाट नवी कीजें घणु, मर्म न बोलीजे केह तणुं । कूडी शिप म देज्यो आल, ए तुम्ह धर्म कहुं गोवाल ॥ गर इस विच्छु नवी मारई, मारतओ पिण उगारिई। कूड कपटथी मन वारीई, इंणि पिरइ आप कारिज सारीई॥ गोवालीया उठ्या गहगही, हर्पित थका ताली देता सही। भलो एही ज डोकरउ, नहीं भणीओ एही ज छोकरउ । भट जे बोल्यो भूतप्रलाप, फोडया कान विगोइओ आप। जात्यो ए हरयो तुं हल्ला, पाए लागी करई ए गुर भल्ला, ३१ ३२ ३३ ३४ ३५ . ३७ ३८ ४० विविधगच्छीय पट्टावली संग्रह . ते गोवालीयाना वचन सांभली कुमुदचंद्र श्रीवादीनें कहे-'हूं प्रतिज्ञा संपूणि । विद्यावाद हारयो । ते मार्टि मुझने शिष्य करो।''किसा थकी?' 'तुम्हे समयना जाण अनि ई समयनो जाण नहि । एतली माहरी बुद्धि काची।' गुरे दीक्षा देइ 'कुमुदचंद्र' साधु नाम दीधुं। केतलेक दिने गुरुसंग धकी श्रुतधर हूया। अतिगर्वित थकी, एकदा श्रीगुरुनें कहें-'गणधरगुंथीत जे माकृत सिद्धांत छई ते सघला संस्कृत करूं।' इम कही महा उद्दाम विद्यापणई 'नमो अरिहंताणं' ए सकल पंच पद प्राकृत छई, देहनि संस्कृत निपजावी गुरुने संभलाग्यो-"नमोऽर्हत्सिद्धा- चार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः" ते सांभली गुरु कहे-'सकलगुणसद्म श्रीदेवाधिदेव सर्वाक्षरसंनिपातलन्धिना धणी गणधरादि हुआ । अनि श्रुतकेचली पिण आगि हुया । पिण जें श्रीचीरमुखि गणधरें त्रिपदी पामीनई मुग्ध पाणीनई उपगारनई हेतूई प्राकृत भापाई रचना कीधी, तेहनु वचन अन्यथा करई ते अनंत संसारी हुई । ते मार्टि 'नमोऽईत्सिद्धा०' ए वचने तुम्हनई मोटी आलोयणा आधी । ते वृद्धवादी गूरुनो वचन सांभली कुमुदचंद्र चेलो गूरु पासें वृद्धनु वचन अन्यथा] करयानी आलोयण मागई । तिवारई गूरु कहेई-'गाढा मिथ्यात्वीने प्रतियोधी समकित पमाडी जैनपणु आदरावी गत तीर्थ पाछौ वालई तओ श्रीसंघि गच्छमांडलई आवई ।' एइयु गूरु १ संघ २ नु वचन प्रमाण करी एकाकी बीहार करता अवधुत चेंशि वारमई वर्पि, मालवदेसि, उज्जेणी नगरई, परमार श्रीवीक्रमार्कराज्ये शिमार्टि श्रीमहाकालेश्वरनि मासादि शिवलिंग उपरि मस्तक देइ सुतो। वीजई दिनि प्रात समई अर्चक सिवपूजक आव्यो । एतलें पोट शरीर, लंब भुजा, विशाल अवयव, निःस्पृह, अबीर, देपी अर्चक कहई-'तूं उठि उठि । ए शिव भोलो भस्मयोगी तेहनें दूहबी किस्यूं मरण मागई छे? ।' इम गाढई स्वरि अर्चक बार वार कहई तेतलई मनुष्य एकठा हूंआ, कहि-'उठि उठि।' पिग किम हि न उठिं । तिवारे भरडई विक्रम पोकारयो । विक्रम कहींई-ताणी घसरडी मासाद बाहिर काही नाख्यो।' ते भरड राजाना अनुचर लई मनुष्यना समुदाय मीली उठाडवा लागा । पिण ते वज्रतुल्य । शिवनी आशातना जाणी पुनः अर्चक विक्रमई पोकारें । विक्रमें शिवमर्यादा लोपी जांणी त्रानणा दीधा । ते त्राजणा राणीने माहार हुँइ । राणी आकंद करें। ते सांभली वीक्रम चिचे चितवई, जे ए कोइक महा सिद्धपुरुष छे । एहस्यु पाक्रम नहीं । विक्रम आवी हाय जोडी नमी कहै- 'हे कृपानिधी ! मुज अपराध खमी, तुम्हे प्रसन्नि प्रत्यक्ष थाओ।' ते सांभली कुमुदचंद्र तत्काल उठी कहे-रे अहो ! विक्रम, आ नगरई तुज राज्यि किसी अन्याय वार्ता छई।' विक्रम कहेइं-'ते अन्याय वार्ता कहो।' तिवारई श्रीकुमुदचंद्रई धुरथको विक्रमनई अतिमुकमालनो संबंध संभलायो। विक्रमनई मनि संदेह हुओ, कहे-'ते परमेश्वर श्रीअतिपासनी तुम्हे कीर्ति कहो।' तिवारें कुमुदचंद्र श्रीपार्श्वनाथ क्षेत्रीसमा तीर्थकर तेहनी स्तुतिरूपे 'श्रीकल्याणमंदिरस्तोत्र' कहई छई । ते कहितां जेतलिं एकादशम काव्ये श्रीपार्थ परमेश्वरि पहिलाथी कामराग जीतो छई ते स्तबई-"यस्मिन् हरम० ११।” ए काव्य कहितां शिवलिंग थकी धूम्रज्वाला मगट हुई । पुनः कुमुदचंद्रि पारमा काव्यमा अद्भुत रसिं करी श्रीपार्श्वदेवनो महिमा वर्णवई ,-"स्वामिन्नल्पग० १२।" ए वारमु काव्य कहितां शिवलिंगनो तेज हीण हो । पूनः श्रीकुमुदचंद्र तेरमा काव्यमा वीररसें करी श्रीपार्श्वनो धर्म वीरपणु वर्णवई छई-"फ्रोधस्त्वया० १३." ए तेरमूं काव्य कडितां शिवलिंग स्फोट हुई। पिंडीई विरह हो। ते माही थकी तत्काल श्रीधरणेन्द्र श्रीपद्मावतई सेवीत, पुनः पार्चयक्ष १ वैरोटया देवीई २ युक्त श्रीविपासनो विध प्रगट हुओ। ते देखी विक्रम विस्मय पाम्यो । सकल मनुष्य युक्त श्रीपास मणमी बइठो । कुमुदचंद्र कहै-'रे विक्रम ! किहां ए हरलिंग अनि किहां राग-द्वेषवर्जित ए परमेश्वर । यतः- संघाडे लब्धिसंपन्न श्रीवलीकापुष्फमित्रमूरी मगट हुमा । वेहने मणाचानई घोप पाठ उद्यमई फरी सूर्योदये ४१ ४२ वीरवंशावली १७५ पापदावाग्निजलदः सुरेन्द्रगणसेवितः। समस्तदोपरहितो निःसङ्गः कलुपापहः ॥ अस्य पूजानमस्कारप्रभावैर्भविनां विभो !। भवन्ति संपदो वश्या मुक्तिश्चापि गृहाङ्गणे ॥ सततमुच्चरितं येन 'जिन' इत्यक्षरद्वयम् । बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति।। एहवी कुमुदचंद्रकथक स्तुती सांभली मिथ्यात्वशल्य टाली समकितर्मि निश्चल हुओ। महामहोत्सवै श्रीअयंतिपास थाप्या । गुरुवचनें संयपति श्रीसिद्धाचलनो हुओ। पुनः महोग्रानई करी स्वसंवत्सर प्रवर्तावतो हुओ। निकंट एकछत्र राज्य भोगवी, पात्र अपात्रनी परीक्षा करी, एक शत अनि वाविस नूतन्न प्रासाद नीपजावी, समशत निर्णोद्धार करी, परदुःख टालवा अग्रेश्वरी हुई, महापरमोपगास्थिको परमारवंशशिरोमणि श्रीविक्रमादित्य मुकृतनो संचय करी सद्गतिनो भाजन हुओ। श्रीकुमुदचंद्रे इणि परे गयु तीर्थ पाछो वाल्यो । गाढा मिथ्यात्वीने गाढो समकिती कोधी । आवा वारें वर्षे श्रीद्धवादी गुरुने चांदी आणाधर्म लोप्यानी आलोयणा लेई, मिथ्या दुष्कृत देई, संघशाखि स्वछमांडले लीया। श्रीद्धवादी मुरई पोतानि पार्टि थापि श्रीसिद्धसेनगरि नाम दीर्छ । 'सम्मति' ग्रंथकरता, अनुक्रमें विहार करतां, दक्षिण देशे प्रतिष्ठान पुरई दिन ईग्यार अणशणि, श्रीवीर- मुक्ति हुआ पछी, च्यासह अनई सितातरि वर्षि पुनः विक्रम १८ वर्षि श्रीसिद्धसेनसरी स्वर्ग हुओ । यतः- सव्वे पभावगा ते य जिणसासणसंसकारिणो जे अ। भावंतरेण विजओ एए भणिया जिणमयम्मि ॥ इति सिद्धसेनसूरिसंबंध ॥ तेहनो गौतम गोत्र । ए सुरीइं कर्णाटकदेशि विहार कीधों। एक भक्ति विगय रहित जाणवां । ए सरि हुई। ते पहेला साधुनी देह जिनावरने उपगारि काम आवि, एहवउ जांणी जल-थलने विपई साधु एकठा यई पड़द उपगरणना धरणहार हुआ। अत्र उपगरणनो विवरो। एहवें अवसरि चंदेरी नगरि साधु शयनं दग्धस्थिति पाठवता । ते वार्ता वृद्ध परंपराइं गुरुमुपथी जाणज्यो ।। तेदन कौशिक गौत्र । एइवई-श्रीशांतिपरि १, श्रीमुधर्मवरी २, श्रीआर्यनंदीसूरी ३, श्रीशांडिल्यसूरी ४, श्रीहीमवंतसूरि ५, श्रीलोहीतबरी ६, श्रीरत्नाकरसरी ७- ए सात युगप्रधान प्रगट हुआ। पुनः श्रीआर्यमहागिरिना शिप्य स्थिविर श्रीआयरक्षितसरी । तेहनें ११. तत्पद्दे श्रीदिन्नसूरि- १२. तत्पढे श्रीसिंहगिरिसूरि- ४४ . विविध गच्छी य पहावली संग्रह सेर दस घृत जठराग्नि जरतुं । पुनः नागार्जुनसरी १, श्रीरकंदिलमी २, श्रीपादहितसरी ३ औपधीई पादप करी आकाशमार्गि उद्धी श्रीसिद्धाचल १, गिरीनार २, सम्मितशिपर ३, नंदीय ४, ब्राह्माणवाटक ५- एवं पंचतीर्थनी यात्रा करी पाक्षिक तपनु पारणुं करता हूया । श्रीवीर मुक्ति हूया पछी पांचसओ अनि पचवीस वर्षे श्रीशचुंजय उच्छेद हो । श्रीवीर निर्वाण हुआ पठी पांचसो अनई चुमालीस वर्षे गई थकि छठो निहव रोहगुप्त नामि प्रगट हो । श्रीवीर निर्वाण हूया पछी पांचसो अनि सडतालीस वर्षे, पुनः विक्रम २६४ वर्षे, श्रीसिंदगिरिसरी स्वर्ग ह्या । १३. तत्प श्रीवास्वामी- हवि श्रीवास्वामीनो संबंध कहे छई-जंतुद्वीपे दक्षिणार्धभरतें अचंति दिशि लूंचबन ग्रामि गौतम गोत्रई श्रीधनगिरि रहई छई । तिणे सगर्भा मुनंदा खिने घरें मुकी आर्य समित साला सहित वैराग्य श्रीसिंहगिरिसरीनो उपदेश सांभली दिक्षा लेई गुरु साथि विहार कीयो । केतलेक दिने घरे मुनंदाने बेटो हो। मुनंदानी सहीयर स्त्री ते बालकने रमाडतां कहई-'ताहरई पिताइ दीक्षा लीधी न हुत तो जन्मोत्सव करत ।' एहवा वचन स्त्रीनां ते बालके काने सांभली जातिस्मरणई पूर्वभव दीठो। चित्ति चित जे हुँ पिण चारित्र ठेउं । एहयउ विचारी एकमनी थई घणु रुदन करी । तेह थकी सुनंदा घणी आकुली हुई। मने चितवी जे एहनो पिता आवे उ तेहने आपुं । इम करतां पट् मासनउ हो । एहवि आसरई श्रीसिंहगिरिसरी शालाई रह्या । तिहा धनगिरि १, अनि आचार्य समित २-ए विहं साधु गुरुनि आज्ञा लही तुंबवन ग्राममाहि आहारनी गविषणाई जाइ छ । एतलें ज्ञान उपयोगी शकुन विचारी गुरु कहै-'हे शिष्य ! तुम्हनें आज गोचरीइं जातां सचित अचित जें मिले ते लेज्यो।' गुरुवचन अंगी करी ते बेहु मुनि संसारिक बंदाववा मुनंदा घरे पुडुंता । नगर मनुष्यई घर स्त्रीई ओलसी, रुदन करवो वालक तेणी पीडाती एहवी जे स्त्री कहई-'आ मुत तुम्हारो तुम्हे लिभो।' इम कही चेटो धनगिरिनई दीधो । एतले तुरत रोतो रह्यो । ते पालक झोलीई लेई गुरुवचन संभारी धर्मलाभ देइ धनगिरि गुरु पासिं आव्या । घणे भारई वाह नमती देपी वनसमांन मार जांणी गुरुई 'वनकुमार' नाम दीर्छ । साधवीने उपाश्रये शिव्यातरि भाद्धि मुश्रूपा साचवी । पालणई पउदाडई । रात्रिने विपई साधवी इग्यार अंगनी सझाय करें । ते पालणे मुतां सांभलतां थका बालकने अंग इम्यार मुखि आवड्यां । इम करतां ते वज्र यालक त्रिण परसनो हो । एतले तेजवंत पूत्र सुनंदा गुरु पासि मागई-'मुनई माहरो वेटो साधुनी आपो ।' गुरु कहें-'धरमलाभई विहराव्यो बालक अम्हें पाछौं न दीउं ।' इम करतां राजा समक्ष विवाद हो । राजा कहें-'योलाव्यो जेहनई पासिं जाई तेहनो ए चालक ।' एहवो राजानो वचन सांभली सुनंदाई भांति भांतिनी मुखडी मूकी; गुरिं रजोहरण मुक्यो । एतलई वनकुमार राजसभा समक्ष रनोहरण मस्तके लेई नाच्यो; मुपडि अनि माता साहमुं न जोयुं । तिवारे ते देसी मुनंदा विचारई, जे भाईई १. स्वामिई २ अनई येटई ३ पिण दीक्षा लीधी । इवि संसारई रह्यो मुझनई कुण आधार ?। एहवउ जाणीनई श्रीसिहगिरि पासि सुनंदाई दीक्षा लीधी । वनकुमारई आठ वर्षनई दीक्षा लेई दश पूर्व भण्या । एकदा श्रीसिंहगिरि बहिर्भुमी गये हुतई अन्य साधु नगरमाही आहारने अर्थिं गया छई । एहवई शालाई यंत्रकपाटि बाललीलाई साधुनी उपधि एकठी करी । विद्यार्थी ना भगई। एहवई इग्यार अंगनी यांचना दीइ छई । एतलई गुरु शालाने द्वारें विवर थकी गुप्तपगई रहा ते सघलां व्यतिकर देपी, जोग्य जांणी, श्रीसिंहगिरिनरीई दश पूर्वधर वनने पोताने पाटिं याप्या। 3 चारवंशावली श्रीसिंहगिरिमरिनी आज्ञा लही पांच शत मुनि साथि पूर्वदिशि थकी विहरता उत्तर दिर्शि आव्या । श्रीवनस्त्रांमी तिहां दुर्मिक्षियोगि संघ सिदातो जांणी पूर्वभव मित्र जूंभिकदेवार्पित आकाशगांमिनि विद्याई श्रीसंघनें वार योजन कल्पफनो विस्तार, अडसठि कोठई निपजावी, मुभिक्षई महानसीपुरई मुक्या । पुनः श्रीवनमरी उत्तर दीशि थकी विदरता दक्षणपंथि तंगियानगरई चोमासई रह्या । तिहां रस विकारना जोगयी श्लेष्म हुओ । शिष्य प्रति श्रीवासुरी कहइ-'जि वारई भान तुम्हें आहारने अथि गृहस्थनें घरे जाओ ति बारें शूठिनो खंड याचि लाबजो।' तिणे शिष्ये तिम ज सुठि लावि गुरुहस्ते दीधी । मुरि कर्णे ते शुंठि थापि चिंते में आहार करी ए खंड वावरिसुं । आहारने करवई ते मुंठिसंड वावरवी वीसरी, स्यांजेनी पडिलेहण करतां मुप- बखिका पडिलेहतां, कर्णयकी मुंठोसंड प्रथवीई पडची । ते देखी पोतानो प्रमाद तथा विसरणपणु जांणी विचारई, जे हं दशपूर्वनो धारक तेइनि ए किंम वीसरी ? उपयोग दीघई यकी पोताचं आयु थोडं जांणी पोताना शिष्य श्रीवत्रसेन, तेहनि पोताने पाटई थापी, कहें-'तुम्हे सोपारकपत्चनई विचरो । तिहां बार वर्षनई अंतरई, दुर्भिक्षनई योगि, लक्ष द्रव्ये, एक हांडी खीरनी विपमिश्रित थर्फि मरणे, श्रे० जिनदत्त, भा० ईश्वरी, पूत्र च्यार, उत्तम पात्र छई, तेहनई अभयदान दीओ । इम कहीजो, जे वार हजार जिहांज जुगंधरीना भरया वाहण आवस्यें । समुद्रथी पर द्विपथी आवसी। ए उपकार तिहां जाई करो।' एहवी श्रीगुरुनी आज्ञा लही श्रीवन्नसेनमुरीई विहार करता हूवा । एहवी श्रीवजसेननई युगमधान पदवी हुई । ते समयई बीजो उदय हुओ। वीर मुक्ति हयां पछी छसई सोले वर्पः। हवि श्रीवीर निर्वाण हुआ पछी श्रीवनमरीनो च्यार सय अनि पंचाशुं वर्ष जन्म हुओ। वर्ष आठ गृहस्थ- पणई रह्या । अनि वर्ष चुमालीस शिष्यपणी श्रीसिंहगिरि गुरुनि सेवा कीधी। वर्ष छत्रीस युगमधान पद भोगव्युं । सपलं आयु पर्प अठ्यासि संपुर्णि । श्रीवीर नीर्वाण हुआ पछी पांचसि अनि चौरासि वर्ष गये हतई, दक्षिण दिशि, मांगिया नामि पतिनई विपई शिला उपरि अणशणि श्रीवजस्वामी स्वर्ग हुआ। श्रीवास्वामी नामि 'वजिशापा' कहिवाणी। पुन इणहि ज वर्षि गोष्टामाहिल्ल नामि सातमो निन्हव प्रगट हुओ। जिम श्रीजंबू साथि दश वोलनो विच्छेद हुओ तिम श्रीवन साथई, चौथु अर्धनाराच नामा संघयण १ अनि दश पूर्व २-६ विहु उत्तम बोलनो विच्छेद हो । महागिरिः १ सुहस्ती २ च सरिः श्रीगुणसुन्दरः ३ । श्यामाचार्यः ४ स्कन्दिलाचार्यः ५ रेवतीमित्रसरिराट् ६ ॥ ४५ श्रीधर्मः ७ भद्रगुप्तश्च ८ श्रीगुप्तो ९ वज्रसरिराट् १० । युगप्रधानप्रवरा दशैते दशपूर्विणः । २ ॥ चन्द्रकुलसमुत्पत्ति(न)पितामई महाविभुम् । दशपूर्वनिधिं वन्दे वज्रस्वामिमुनीश्वरम् ॥ अत्र श्रीवज्रवर्णन । उक्तं च- + ४७ - १७८ विविध गच्छीय पदावली संग्रह कि रूपं किमुपानमन्त्रपठनं शिप्येषु किं वाचना कि प्रज्ञा किमु निस्पृहत्वमध किं सौभाग्यभड्ग्यादिकम् । किं वा संघसुमन्ननिः सुरनतिः किं तस्य किं वर्णनं बजस्वामिविभोः प्रभावजलधेरैकैकमप्यदभुतम् ।। ४८ ए बज्रस्वामी संबंध अन्य चरित्रे विस्तार छे, माटे लवलेश कयो । १४. तत्पट्टे श्रीवज्रसेनसरि- तेहनु भारद्वाज गोत्र । गुरु श्रीवनस्वामीने बचनें विहार करता समुद्रतटे सोपारकपुरपचने वालाई रया। मध्याने सल्लइडगौत्री थे जिनदत्त, तेहनी स्त्री ईश्वरी, तेहनें बेटा च्यार नागिंद्र १ चंद्र २ निर्देत्ति ३ विद्याधर ४- ए नामि छई। तेहने घरें श्रीवत्रगुरुना पचनानुसारे भिक्षार्थ पुहुता । एतलई स्त्री भरतार विपमिश्रित आहार देखी सांहमी दृष्टि संज्ञाई कहई-'श्रीगुरु ! तुम्ह योग्य निर्दोष आहार नहिं छई।' ते सांभली श्रीवत्रसेन कहें-'ए आहार भूमिकाई शरण करो।' गृहस्य फही-'विषम समई मर्यादावंत गृहस्थनी मर्यादा किम रहई। वज्रसेनजी कहई- 'प्रभाविनई समयई खाडीई जिहाज युगंधरी पानि भर्या श्रावस्यई ।' ते गुरुवचन सामली विष हांडी भूशरण करी। व्यवहारिओ जिनदत्त, स्त्री इश्वरी, पुत्र च्यार युक्त हाथ जोडी श्रीवज्रसेननें कहई-'तुम्हे महामूनि निस्पृह छौ । जओ तुम्हारं वचन सत्य हुस्ये तभी अम्हे तुम पासें व्रत लेइस्युं ।' ए प्रतिज्ञा लेइ महाश्रद्धावंत थया। श्रीसरि शालाई आवी स्मरण करतां चार पहूर संपूरण हुआ । समुद्री जिहान युगंधरीइं भरया आल्या । घणो सुभिक्ष हुभो देपी श्रीअभयदांनना दाता जाणी जिनदत्त, स्त्री इश्वरी, नागिंद्र १ चंद्र २ निर्दृत्ति ३ विद्याधर ४-ए च्यार बेटा युक्त श्रीवनसेनसूरी पासे दीक्षा लीधी । अनुक्रमि ते च्यारे जणा केतलंक उणां दश पूर्वधर हुआ। वे चिहनें आचार्यपदि कीधा । नागिंद्र १ चंद्र २ निर्वृति ३ विद्याधर ४ च्यारथी ए च्यार शापा प्रगट हुई । अनि विणे चिहए पिण एकविस आचार्य कीधा ! तेह थकी तेहने नामि चुरासी गच्छ कहिवाणा । एतलई श्रीवीर निर्वाण हुमा पछी पांचसे व्यासी वर्ष गयई हूते ए च्यार शाखा प्रगट हुई । ए च्यार शापा जाणवी । तीहां यकी श्रीवासेनसरी केतलेक दीने विचरता श्रीसोरठ देसि मधुमतिई कादि नामी वणकर वसे छे, तेहनी घरी आडी १ अनी कुहाडी २ नामी ये स्त्री छई, पिण ते कपरदी तेहनी अमक्ष १ अपेय २-ए बिहूनो अगाचार जांणि प्रहाररूपें शिक्षा दीई छई । एहवे श्रीवत्रसेनवरीये ते वणकरनि दुपीयो देपी यहिभूमि जातां थकां श्रीगूरुई कोमल वचने बोलायो । कही- रे कपर्दी ! तु अम्ह पासिं आवी।' ते कपर्दी पिण आवो हाथ जोडी उभो रह्यो । एहबई श्रीगुरुई आगिम ज्ञान करी दृष्टि दोधी, सुल्लम बोधी जांण्यो । वली तेहर्नु आयु घडी २ नुं जाणी गूरु श्रीवासेन कहियों-'अहो कोफिल ! तुने महारष्ट देखि छई । तूं धर्म करी पञ्चसायनु परमाण कर, जिम फष्ट मिटें।' ते गूरुनु वचन सांभली विनयवंत कपर्दी कहें-'श्रीगुरु ! ते पचखांणनी मुझने कृपा करो।' ति वारे गुरु श्रीवत्र सेन कहें-'नमो अरिहंताणं ' इत्यादि नमस्कार मुप थकी उचारी, पछी कटी दोरानी गांठी छोडि एक ठिकाणे पेठां भोजन १ अनि जल लेवू २ । पछी तीमही ज कटी दोरानी गांठि बांधी । ते गुरुवचन कपी अंगि करी, ते व्रत उपयु । एहबई तिणहि ज दिने सर्प गरल व्याप्त अमिस संड तेहनो भोजन हुओ, तेहथी ते कपर्दी मरण पान्यो । पञ्चखाग अंगी कर्यायी ते महिमाई अणपन्नी पणपन्नी मध्ये उपनो । अवधिज्ञांनई जाग्यो, । - दक्षा श्रीयक्षराजः स भवतु भवतां विघ्नमर्दी कपर्दी॥ हरई श्रीवसेनसुरीई वर्ष नव गृहस्थपणु भोगबुं । वर्ष एक सौ अनि सोल श्रीवनस्वामी गुरुनी सेवा शिप्य. पर्ण कीधी । अनि वर्ष त्रिण युगप्रधान पद भोगवू । सर्व आयु वर्षे एकसओ अनि अठ्ठावीस संपूर्णी, श्रीवीर मुक्ति हया पछी छसय अनि वीस वर्षे, पुनः श्रीविक्रमादित्य थकी एक्सो अनें आठि वर्षे श्रीवज्रसेनसूरी स्वर्ग हुआ। श्रीवीर मुक्ति हूआ पछी श्रीवत्रसेनसरी चिरं राज्य चर्प छ सय अनि नव गये हूते, पुनः वीक्रमयी १३९ " वोरंवशावली १७९ पोतानी पाछिलो भव । नमस्कार सहित पचखाण महिमा मोटो दीसे छे । हवी गुरुई पचखांण शिपव्यो, पहि भोजनें तूरत मरण पांम्यो जांणी विहू स्त्री मिलि राजाने पुकारिओ जे-'इणि महात्माई काइक शीपवी मारीओं।' राजाई श्रीवज्रसेन गुरुने राव लेवा बेसार्या । कहे-'तुम्हे साधु थई किम ए स्त्रीनो स्वामी मार्यों ?' एहवे कपर्दी पोताने ज्ञाने करी जुई। एटले उपकारी गुरुने कष्ट जांणी गांम प्रमाणे देवशक्तिं पथर शिला निपजावी, आकाशे रह्यो, सकल लोकनें कहें-'ए मूझ गुरु प्रत्ये खमावीं प्रणमो ! नहि तो आ शिला गांम उपरई पाडं छु । ए गूरु मूझ पति महा उपगारी छई।' तिणे राजाई मरणना भय थकी श्रीवत्रसेनने प्रणमी शालाई पधराव्या । एतलि कपर्दीई शिला संहरी प्रसन थई राजादि लोक समक्ष ए गाथा कहें- मांसासी मज्जरओ इक्केण चेव गंठिसहिएण । सोहं तंतुवाओ सुसाहुवाओ सुरो जाओ। श्रीगुरुनें वांदी कहई-मई श्रीभगवान ! किस्या कर्म कीया।' इम कही-'ते तुमहे कृपावंत करुणासमुद्र हित करी कहो।' ते सांभली गुरु कहई-'तें पूर्व भवि मोठा पाप कीधा । पिण तेहनो पवीत्रतानी हेतुई सकल कर्म झालणई श्रीसिद्धक्षेत्र गिरिई श्रीसंघने साहग्यना कारक थाओ । श्रीरुपम परमेश्वरनी भक्तीमां रहो।। श्रीवजगुरुना वचन सांभली कपर्दी यक्ष हो, कहे-'मुझ जन्म कृतार्थ हुओ। जे ए महातीर्थनि भक्ति मुजने उदय आवी ।' ए तीर्थ किस्यो छे- यत्र यहुकोटिसंख्या सिद्धिमगुः पुण्डरीकमुख्यजिनाः । तीर्थानामादिपदं स जयति शत्रुञ्जयगिरीशः ॥ एहवी बहुमानई स्तुति करतो थो ते व्यंतर श्रीसिद्धाचली कपर्दी नामा यक्ष श्रीसंघने कूशलकारक हुओ । एतलि विरति मास एकताई कीजई । तओ ओगणत्रीस उपवास कीधानो लाभ हूई । काव्यं- यः पूर्व तन्तुवायः कृतसुकृतलचैर्दुरितः पूरितो यत् प्रत्याख्यानमभावादमरमृगशामातिथ्यं यः प्रपेदे ()। सेवाहेवाकशालिप्रथमजिनपदाम्भोजयोस्तीर्थरक्षा- इति कपर्दीसंबंध ॥ एहवें श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी पांचसें अनि सीनर वर्षे श्रीसिद्धिक्षेनि सा. जावडे तेरमो उद्धार फीयो ।

विविधगच्छीय पट्टायली संग्रह वर्पि दक्षिण दिशि कर्णाटक देशी दिगंबर नामि सर्व विसंवादी सातमें बोलनी परूपणा यापि, आठमो ए निन्दव हो। पुनः श्रीवीरनीर्वाण पछी छ सत में वीसें चर्षे श्रीगिरिनारें सा जावडे उद्धार कीघो। १५. तत्पश्रीचंद्रसरि- तेहनो सल्लहडगोत्रः, श्रीवज्रसेने चंद्रशापानो उदय जांगी च्यार गुरुभ्राता मध्ये श्रीचंद्रसरीनिं पाट- थापना कीधी । अन्य त्रण गुरुभाई शालाइ रह्या घणा गौत्र प्रतिवोध्या। 'श्रीचंद्रगछ' एq त्रीजु नाम कहिवाणुं। पुनः विक्र० संव० ३७७ वर्षे नितिकुलिराज चै अगच्छीय आ. श्रीधनेवरसरी । सवा लाख ग्रंय श्रीसिद्धाचल महातीर्थनो महिमा हूतो । ति वारे वल्लभीनगरें श्रीशिलादित्य राजाई अल्पायु अनि विकल्प घणा जांणि ते पूर्वग्रंथ सवालक्ष इंतो ते माहि थकी सार सार संबंध दश हजारनई संख्याई उद्धरीने 'श्रीसिद्धाचल- महात्म' कीघो। इविं ब्रह्मद्वीपीका शापानी उत्पति कहई छई-आहिर देशी अचलपुर नगरें परिसरें कृष्णा अनि चेन्ना एहवे नामई विहुं नदीनी वीचली ब्रह्म नामी द्वीप छे । तिहां च्यारसे अने निवाणुं तापसनि परिवारि देवशर्मा नामि कुलपति रहे छे । ते मुख्य देवशर्मा आपणो महिमा वधारवा सर्व तापसनें बिहुँ पगने विपि उपधी लेप करी संक्रांतिना पर्वना पारणानि दिने वेना नदीना जल उपरी हिंडी अचलपुरे आवें । ते चमत्कार देपी मीथ्याली गृहस्थ भोजन देइ प्रसंसा करे । तपस्वीनी] महातपसक्ति चमत्कारि है। जननी नींदा करी श्राद्धने कहें-'तुम्हारा जैनांहि कोइ एहवा प्रभावक नधि ।' एहवे तिहां विहार करता श्रीवास्वामीना मामा श्रीआर्यसमितिसरी आव्या । तिवारें जैन गृहस्थे तापसनो सर्व संबंध बह्यो । ते गृहस्थवचन सांभली गुरु विचारी जे कोइफ ओपधीना जोगयी कपट छई पिण तपशक्ति नहि । गुरे श्रावकने तेडी यां-'ए तापसनें रुडि परि वि पग घोइ जीमाडज्यो।' गृहस्थे तिम ज की । 'अमारो हर्ष छइ' इम कही बलात्कारिं देवशमा तापसें ना ना कहितां वि पग घणि माक्रमि करी धोया। भोजन देइ वोलवया लोकटंद साथई हया। पादलेप औषधी धोया थकी नदीमां अर्द्ध विचालई यूडवा लागो । ति वारे लोके कपट कही निभ्रंच्छीभो । मुप झापी हुओ। तेहबई तेहनी प्रतिबोधवाने श्रीआर्य- समितिमुरी तिहां नदीतटिं आत्री सकल लोकचंद देपतां, चिपटी देई गुरु कहें-'है वैन्ने ! अम्हे पेलई पार जात्रा बांछं छु।' तेतले नदीमा विहूं कुल एकठा मिल्या । सफल लोकमनि विस्मय हुओ। ति वारि श्रीआर्यसमिति- सूरी मनुष्यछंद सहित वापस स्थानि कनई जाइनई धर्मोपदेश देइने ते पांचसि तापस प्रतियोधी दीक्षा दीधी । ते सपला श्रीआर्यसमितिसूरीना शिष्य हुआ। तेइनी संघाते तेडी श्रीगुरु संघ सहित शालाई आन्या। श्रीजिनशासनोन्नति हुई । तिहां थकी 'ब्रह्माणगछ' हुओ । श्रीवीर नीर्वाण हुआ पछी छसई अनि ईग्यार वर्ष गयई हृति ते तापस साधु यकी श्रीब्रह्मदीपीका शापा' केहेवाणी । एवं पाट पन्ना सुधी श्रीथिरावली मुत्रि करी थविर कह्या; हवे तेहना शिष्य ते आचार्य कहे छई। १६. तत्प श्रीसमंतभदमूरि- श्रीवैराग्यनिधी यहां किवारई वाडीने विपई रद्दई, किवारई यक्षनई देहेरें चासो रहें। किवारई बनने विषई ।

बिहुँ वाडव महाविद्यापात्र रहई छई । एकदा ते विडं विद्याविवाद करता राजसमाई माहोमाहि अहंकार धरें-'हु संबंध 'प्रभावकचरित्र'मई धुरेंतें जोइ वांचज्यो। श्रीनागराज वशि कीधो। पुनः श्रीमरीई श्रीचक्रेवरीना साहाज्य थकी वृद्धभोज राजानी सभाने वि 'श्रीभक्तामर' एडवई नामइं स्तोत्र भगट कीधो । ते भक्तामर स्तोत्रनी उत्पत्ति कद्दई छई । यथा- सिंघदेशी विहार हो। २०. तत्प? श्रीमानतुंगसूरी- वीरवंगावली १८१ रहें । इम जावजीव अह्मी निःस्पृहपणइं सकल सूरी छत्रीस गुणें संपूर्ण देषी लोकें बनवासी एह विरुद दीधु । तिहां यकी चोथु नाम 'वनवासीगच्छ' कहिवाणुं । श्रीवीर मुक्ति हूया पछी आठसई नई बीयासी वर्षे चैत्यवासी हुआ। विक्र० सं० ४२८ वर्षे श्रीअनंगसेन तूंआ यकी दीली नगरीनी थापना हुइ । १७. तत्पढे श्रीवृद्धदेवसूरी- श्रीविक्र० सं० ५९२ वर्षे श्रीसाचोरपुर नगरें ओईसा नगर थकी आवी चहाण श्रीनाहडई श्रीवीरविव अढार मार समर्णमय समासाद थाप्यो । श्रीपद्धदेवसूरीई प्रतिष्ठयो । १८. तत्प? श्रीप्रद्योतनसूरी- एहवै विक्र० सं० ५९५ वर्षे अजयामेरुनगरें श्रीरुभविवप्रतिष्ठा नीपजावी । पुनः सुवर्णगीरीई दो० धनपतिई द्विलक्ष द्रव्य मुक्रिति करी यशवसती नाम श्रीवीरविंचप्रासाद सहित प्रतिष्ठा हुइ। एही ज सूरीई प्रतिष्ठा कीधी। १९. तत्पट्टे श्रीमानदेवसूरी- सुरीपदना महिमा थकी ट्विगय त्यागी तेहने भक्तिवंत गृहस्थ भक्ति करी आहार आपे तो आहार न लेवो । ते तपना महिमा थकी पद्मा १ जया २ विजया ३ अपराजिता ४-ए च्यार देवी श्रीगुरुनी भक्ति साचवे । अमारि पलावई । श्रीमरिहं नाडोलनगरें 'लपुशान्ति' निपजावी तेहनई संभलावयाई तथा तेहनें जल मंत्री छांट- चतुर्विध संघ यकी महामारि कादि संघ उपद्रव रहित हुओं। श्रीसरी संयने कुशलकारी हुया । श्रीगुरुनो रूप उच गाजिपान देराउल प्रमुख नगरि घणा सोढा रानकुमार प्रतिबोधी उपकेश कीधा । एहनो विस्तार श्रीनरीई अभयगर्मित भयहर कहिता 'नमीऊण' इस्ये नामई स्तोत्र श्रीपार्थनाथनी स्तवनारूपई श्रीपद्मावतीनी कृपा थकी नीपजावी ते माहि 'विलसंतभोगभीसण ०' र गाथा आठमीनई कहिवें करी जेणई मालवदेशी उजेणी नगरई राजा भोज द्ध छे । ते राज्य करै छै । तिहां मयुर १ अने याण २ एहवें नामई यणो मण्यो, तह थकी हुँ अधिक पात्र छु।' इम पेहुं मत्सर घरता देपी वृद्धभोज कहें-'रे दक्षो ! तुम्हे येई फास्मिर देशी जाओ। तिहासारदा जेहनई विधावंत कहई ते मोटो पंडित ।" ते बिह रागानो वचन सांमली फास्मिर भणी १४२ विविधगच्छीय पट्टा वली संग्रह चाल्या । अनुत्रमा घणो मारग उल्लंघी सारदामंदिर प्रति पाम्यां। भोजन फरी संध्याई बिहु मुता छई, एतलई सरस्वतीई परिक्षार्थि मयूरने अर्घ जागते ए समस्या पद पूछयूं जे-"शतचन्द्र नभस्तलं।" ते सांभली मयूरे कयु- दामोदरकराघातविदलीभूतचेतसा। दृष्टं चाणूरमल्लेन शतचन्द्रं नमस्तलम् ।। एहवी समस्या मयूरे संपूर्ण कही। ते सांभली पुनः वाणर्ने परीक्षा हेति सारदाई समस्यानु पद पूछीओ जे-"शवचन्द्र नभस्तलं" ते सांभली बाणे अर्थ जागतई कहा- यस्यामुत्तुङ्गसौधाग्रं विलोलवदनाम्बुजे । विरराज विभावर्या शतचन्द्रं नभस्तलम् ।। एहवी समस्या वांगें करी । ते बीहुनी बांणी सांभली कुमारीका कडे तुम्हे-'पिहुं महामज्ञ छौ।' एडवू विरुद लही केतलेक दिवसें घरे आव्या । बिहुने पंडित जांणिया । तो पिण मयूरनई वृद्ध जाणी भोज घणो आदर दीई। एतले वाण द्वेष धरी स्वहस्ते चउरंगो हुई चंडीकानें मासादे बैठो। चंडीकाना काव्य ६१ करी स्तवना कीधी, एतलें चंडी प्रत्यक्ष हुई कहई-'वर मांगी, हु तुठी!' ते वाण कहें-'लोके आश्चर्यपणा थकी हस्त-पाद नवपल्लव आपओ।' देवी कहें-'हुआ ।' एतले हस्तपाद नवपल्लव लही नगर मध्य थई दरवारें राजानी कचेरीई वाण आन्यो । महा आम्नायवंत जांणी राजाई आदर आप्यो । एडवो चमत्कार देपी राजा श्रीद्धमोज सभा समक्ष सफल पंडित चमत्तार देपो राजा शिवि(वोदर्शन बिना एहवा चमत्कार आमनाय अन्य दर्शनि न हुई।' एहबू सांमली रानानो कामदार जैन छे, ते कहें-'इणही ज नगरें जैनाचार्य श्रीमानतुंगवरी महा आम्नायना धारक महा विद्यापान निगवी छई।' ते सांभली वृद्धभोनै श्रीमानतुंगसूरीने कचेरीई तेड्या। चांदी कहे-'हे दर्शनी ! महापुरुष छो तुम्हे सासननो महिमा करो।' तिवारे श्रीमानतुंग वृद्ध भोजनें कहें-'पग थकी कंठ लगे आठील्ल अडतालीस ताला सहीत गाढी मुझ देही करो।' राजाई सहु कचेरीना मनुष्य देपतां तिम ज कीधु । पछी तिहां थकी उपाडी ओरडा माहि पाली वारण ताला देइ रक्षक मुक्या । वधु-सज्जपणे रहीज्यौ।' श्रीगुरु ओरहे थेठा। श्रीरुपमस्तुति तद्रूप 'श्रीभक्तामरस्तोर' कहितां श्रीपभदेवनी कींकरी चक्रेश्वरी शक्ति आवी । एक एक काव्यई एक निगड एक तालओ उपा. इम कहितां थकां "आपादकण्ठमुरुगृग्वलवेष्टितागा० ४२" ए काव्य वहितालीसमु कहितां थकां सर्व आठील भागी ओरडाना कपाट पुल्या । श्रीहरी रक्षकने पासें आची उभा । सेवके जोई वृद्धभोजनें चीनव्या। श्रीगुरु कचेरी आन्या देपी रामा नम्यो । आश्चर्य पांमी कहई-'धन्य ए धर्म ! धन्य ए दर्शन जैन ! निहां एहवा प्रभाविक महाम्नायना नाण, श्रीमानतुंग जेहवा रत्नत्रयीना आराधक छई।' महानिस्पृह, निर्लोभी जांणी, परमार वृद्ध भोज श्रीसरीनई कहई-'तूम्हे कीस्यो स्मरण कीधो। ति घारे श्रीगुरु कहे-'भक्तामरस्तोत्र' रूपीइंश्रीरुपमदेवनी स्तुतीनो स्मरण कीयो । दृद्धभोज कहें-'ते कहो जे स्तोत्रि आठील्ल घुटा एहवा मंगाम्नाय छै ।' ति वारे श्रीमुरीइं स्वर पद अक्षर मंत्रयुक्त सभा समक्ष प्रगटपगै 'श्रीभक्तामरस्तोत्र' कह्यो । ते सांभली वृद्धभोज श्रीसरीने महामहोछवे शालाई पधराव्या। ते दिन थकी श्रीभक्तामर स्तोवनो महिमा भूमंडलई लोकने विषे विस्तरयो । श्रीजिनशासननी कीर्ति हुइ। इति भक्तामरनी उत्पत्ति जाणवी। मंडलीने कहइ- .

एहचे वि० सं० ५२५ वी श्रीजिनभद्रगणि क्षमाश्रमण 'ध्यानशतक'ना करणहार मगट हुआ। पुनः एद ܫܝܙ भूतदिन्नमरी ५, भावडहार श्रीकालिकमरी ६। एवं पट् युगमधान जांणीवा । इणी कालिकाचार्य श्रीवीर निर्माण हुआ पछी ९९३ वप, केटला एक वीर वंशावली २१. तत्पट्टे श्रीवीरसूरी- श्रीमुरीये दक्षिण देशी नागपुरनगरें श्रीनेमीनाथर्विय प्रतिष्ठयो। एहवई समई श्रीवीर नीर्वाण हुआ पछी आठसय अनि पिस्तालीस वर्षे पुनः वि० सं० ४२१ वर्षे पछीम दिशि वल्लभीनगरनो भंग हुओ। २. तत्पट्टे श्रीजयदेवसूरी- इणी मुरीयें रणतंभोरनई गिरिशृंगई विक्र० ५७२ वर्षे पद्मप्रभविंच प्रतिष्ठयो। पूनः श्रीपद्मावती मूर्ति स्थापि । श्रीगुरुदं थलेची मरुधरई विहार कर्यो । तिहां भाटी क्षत्रीयना प्रतिबोधक हया । २३. तत्प? श्रीदेवानंदसूरी। श्रीमुरीइ पश्चिम दिशि देवकई पत्तन्दं विक्र० ५८५ वर्षे श्रीश्रीपार्श्वनाथर्विव थाप्यो । पुनः वि० ५७१ बर्षि कच्छदेशी सुथरी ग्रामई शिव अनि जैननई वाद हुओ । २४. तत्पट्टे श्रीविक्रमसूरी- श्रीगुरुने सारदा प्रसन हुई । गुर्जर देशी सरस्वती नदीई तट्टे खरसडी ग्रामने विष बिमासी चउबीहार तप कीघो । ते तपना महिमा थकी सारदाई श्रीगुरु नमी पीपलीनो वृक्ष सुकओ तो ते नवपल्लव कीघो। श्रीगुरु कीर्ति हुई । पुनः श्रीगुरुई धान्यधार देशि गोलानगरई घणा परमार क्षत्री प्रतिबोधी उपकेश कीया। २५. तत्पट्टे श्रीनरसिंहसूरी- श्रीसरीइं उमरगढि पुहकरना तलावनें कंठे भादा प्रमुप नगरे नवरात्रीय अष्टीमीनि दिनई महिप वधनो व्यंतर राक्षस भोग लेता तेहने धर्मोपदेश देइ महिपना वध मुकाव्या । २६. तत्प? श्रीसमुद्रसूरी- मेवाड देशी कुंभलमेरई जाति सोमण क्षनी । संसार असार जांणी गुरु श्रीनरसिंह पासिं दिक्षा लीधी । श्रीगुरुई योग्य जांणी गच्छनायक पद दीर्छ । श्रीमुरीई पाहडमेर कोटडां प्रमुख नगरि चामुंडामतिबोधक या । पुनः अणहिल्लपत्तने (2) दिगंबर वाद जीती वैराटनगरें जय करयो । यत उक्तं- खोमाणराजकुलजोऽपि समुद्रसूरिर्गच्छे शशाकल्पः (१) प्रवणः प्रमाणी । जित्वा तदा क्षपणकान् स्ववशं वितेने नागहूदे भुजगनाधनमस्थतीर्थे । छ युगमधान प्रगट हूया तेहना नाम कहे छ-नागहस्तिम्ररी १, रेवतीमित्रमुरी २, ब्रह्मद्विपसरी ३, नागार्जुनरो ४, आचार्य कहें-नवसै अनि ऐसी वर्ष या पठी, पुनः विक्र० ५०० अनि वीस वर्ष गये हूंते चौराणु कालमो विरो को विविधगच्छीय पट्टा वली संग्रह .. - ए पिण वीजा कालकमरीश प्रभावक जांगवा । श्रीवीर निर्वाण थया पछी एक हजार वर्षमांहि एकवीस वर्षे ओछई, पुनः विक्र० ५४५ वर्षे याकिनीमद्दत्तरा- मुत श्रीहरिभद्रसूरी प्रगट हुया । तहनी उत्पत्ति कहै छै- मगध देसी कुमारीया ग्रामि हारिदायण गोवैः हारिभद्र नामई ब्राह्मण व्याफर्ग(करण)प्रमुख खट्शाखनो वेत्ता रहै छै । घणुं ब्रह्म क्रीयाई करी कुशल के पिय प्रतिज्ञावंत छै। जे कोई मुन्हे प्रश्न पूछई इनो अर्थ न उपजै तओ ९ तेहनों शिष्य थाउं । इम चितवी तीर्थयात्राई निकल्यौ, भृगुक्षेत्रनें पांम्यो । तिहां एकदा संध्याई नगरमां बाजारे जातां धर्मशालाई साधवी प्रतिक्रमण संपूर्ण आवश्यकसूत्रनी गाथा गुणे छई । चकिदुग हरिपणगं पणगं चकीण केसयो चका । केसव चक्की केसव दुचक्की केसी य चक्का य ॥ ए गाथा उभे रही हरीभद्रे सांभली, शालाई आवी कहइं-'भो साथवीजी! तुम्हे कोस्यो आ चिंगाचिगायमान शब्द रह्यो ?।' ते सांभली साघवो कहै-'नवू शास्त्र लपीइं ति वारे चिग चिग शब्द हूई।' एहयुं साधयो कयफ बचन सांभली जे हरीभद्र चितवै जे महारी विद्यानो प्रयास निफल हो । ए गाया साधवी कथक तेहनो अर्थ मुझ थकी न उपनो । साधवीने कई—'ए गायानो अर्थ कहो।' साधवी कदै-'नगर बाहिरे वाडी अम्हारा गुरु रहै छै, ते अर्थ कहेस्यें । ति वारे हरिभद्र वाडीमांहि जाई गुरु वांदि, गाया पूछी, अर्थ सांभली, प्रतिज्ञा संपूर्णि शिष्य हो । योग्य गीतार्थ जांणी श्रीगुरें आचार्य पद देइ 'श्रीहरिभद्र' नाम दीर्छ । श्रीमरीई विहां यकी विहार फीधो । श्रीहरिभद्र भृगुक्षेत्र मासकल्पि रया । तिहां रडिता श्रीहरिभद्रसूरीन इंस १, अनि परमहंस २ नामि बिहू शिष्य शिरोमणी शाखना पाठी छै, तिणे गुरू बीनवा-'अम्है बौधमतनी विद्यानौ उद्यम करवा चौद्ध देसि जाग्नं ।' गुरु कहे 'ए नही। तो ही पीण कपटथकी ते बिहू बौद्धमतनी विद्याना रहस्य टेवा योद्ध देशी जाई चौदाचार्य पासे विहूं सिष्य विद्या भणता हूया । एकदा पुस्तीकाई शास्त्रना अक्षरने वि बौद्धाचार्यई खटीका दीधी दीठी। चित्ते विचारि जे कोइक जैन छै । ते पेहूनी परीक्षा करवाने निश्रेणीनई पावडीई निनप्रतिमानो स्वरूप सडीने पंड थकी आलेखी, गुरु छात्रने भणाववानई मेढीई बैठा एतले बौद्धना विद्यार्थि स्वरूप उपरे पग मुकीने भणवा आव्या । तेहने पाछीले हंस १, परमहंस २ आव्या । जिनविच देपी सडीना खंडयकी प्रतिमा उपरई जनोइनो आकार करी, ते उपर पग थापी, आधी आचार्य पासि भणवा बेठा । आचार्ये जाण्यु जे ए जैन छै । अनि विहुं शिष्ये जाण्यु जे आचार्य आपणनें जैन जाण्यां । मरणना भय थकी पुस्तीका लेई नभमार्गे विद्यापली पोताना देशि निकळया। आचार्ये जाण्यु। बौद्ध रानाने कइयु-'ए जैन मालिम हुआ, आपणां मतनी विद्याना रहस्यनी पुस्तिका लेइ जाई छ ।' सांभली राजाई सैन चहान्युं । विद्यायुद्ध करतां प्रथम इंसने हण्यो। वीजा परमहंस साथि विद्यावाद करतां परमहंस लडथडीओ आवतो आवतो श्रीभृगुकछई शकुनिकाविहारि तिणें वौद्धनी पुस्तिका नांपी। पछी ते बीजा परमहंसने पिण इण्यो । ते चौद्ध सेन मातकाल हुओ जाणी पोताने देसि वल्यो । हवि प्रभाते गृहस्थ श्रीमुनिसुव्रतने दर्शनि आव्या। देव मदिक्षणाई गृहस्थनें रजोहरण १ अनि चुपडी २ लाधा। ते श्रीहरीभद्रने दीपा । गुरे रजोहरण ओलख्यो । बौद्धपुस्तीकानि चुपडी ते मांही घंटाकर्णनो मंत्र वाच्यो । श्रीहरीभद्रे चितव्यु जे मुझ शिष्य बिहू बौद्ध देशी विद्या भणवा गया तेहने बौद्धे केड करी इण्या दीसें छै । विधाना रहस्य छेइ जातां जांणी इण्या । गुरुने छ । एडचे अवसरई श्रीभारद्वाजवंशि मष्णवाइनकुले हर्पपुरीयगछि आचार्य वप्पभट्टरी विहार करवा आव्या। - जुमाइड देशि गोपाचलनी तल्हट्टीई गोपनगर वसे छे। विहां चहुंआंण श्रीआम राजा राज करइं लगग तुम्हारि सुदृष्टि हुसि तिहां लगण रहिस्युं।' इम कही श्रीगुरु चोमासे रहा। आम प्रमुख संघ श्रीगुरुनी बहु विविध भक्ति साचबई । निरंतर गूरु वांदी गुरुमुपे धर्मव्याख्या सांभले । गुरुवाणी रंजितयको परम जैन राना हो । एकदा पून्य तीथीनई दिने आमराजानी सी नीला वस सिणगार पेहरी गुरुमुप आगली गृहलीइ स्वस्तिक करई छै । विहां पगले पगले वार वार मुखि मरकलडा करई । तिवारई आमराजाई गुरु श्रीवप्पमहर्ने पुछघु- वीरवंशावली १८५ क्रोध हुओ। शालाने यंत्र कपाट करी, तेलपूरीत कढाइ लोहनी अग्नी चढावी, गुरुदत्त पूर्व आम्नाय करी, जेतले कढाई कांकरी नापई ति वारे वौद्ध तपस्वी चउदशत अनि चुमालीस मंत्राकर्पित शकुनीकारूपि कडाहनि प्रदिक्षणा दीये छै । तेहवें जाकिनी नामि साधवी, जेहना मुखधकी गाथा सांभली चाडीमा जाई गुरुमुपथकी गाथार्थ सांभली संपूर्ण प्रतिज्ञाई हरिभद्रे व्रत लीधु छै; एतले इहां याकिनी नामी साधवी ते श्रीहरीभद्रसरीने उपकारीणी हुई। ते माटी 'याकिनीमनु श्रीहरीभद्रसरी' एहवओ विरुद कहिचाणूं । ते श्रीहरीभद्रनी गुरुवहिन याकिनी साधवीई उँचु जोयु, एतलई शकुनीकारूपे वौद्धाचार्य आवता दीठा । साधवीई जाण्यु जे क्रोधना फल कडवा छई। घणा जीवनें असंतोप उपनो जांणी आचार्यनि क्रोधनी शांतिनई हेति शिज्जातरी श्राविका साथई लेई शाला द्वारि उभी रही गुरु मति कहै-'एक पचिंद्री जीवनो घात अनाणधकी हुओ तेहनी आलोयण फहो।' तिवारइं शालाई रह्या गुरु कहे-'पंच कल्याणक तप अनि उपवास दश चउविहार कह्या छै । एतले बिहू उपवासें एक कल्याणक तप जांणयो । पंच कल्याणक तपनी आलोयण तुम्हने आवी।' ते सांभली साधवी कहें-'अजाणपणेनी एवडी आलोयण कहाँ छौ, विवारई जाणपणाथकी घणा पंचेंद्रीय जीवना वयनी आलोयण कीसी हुई ?' ते सांभली गुरु कहै-'ते कहयुं स्यु।' गुरुने क्रोधनी शांति हुई वोधे सघला आकर्ष्या ते जीवता मुक्या । ए असार संसारे कुण गुरु कुंण शिष्य इम चितवी स्वचितथकी कृत पाप शुद्धिनई देती आकर्पित वोधनी संख्याइं चउदशत अनि चउमालीस प्रकरण 'पूजापंचा- शक प्रमुप, एक एक पंचाशकै गाथा पंचास पंचास हुई एहवा ५० पंचाशक, त्रीस अष्टक, सोल पोडस, पुनः आवश्यक वृद्धवति 'कारक विक्र० सं० ५६५ वर्षे श्रीहरिभद्र स्वर्ग हुओ । इणि परि श्रीहरिभद्रसरी हवा । पूनः श्रीहरिभद्रसूरीना भाणेज श्रीसिद्धर्षि 'उपमितिभवमपंचा १, श्रीचंद्रफेवलीचरित्र २, श्रीविजयचंद्र- केवलीचरित्र ३' ना करणहार स्वर्ग हुओ। इति हरिभवसंबंध ॥ २७. तत्पटे श्रीविवुधप्रभसूरी- एहवई श्रीवीर मुक्ति हुआ पछी एक हजार अने चउद वर्ष गयई हूतई पुनः वीक्र० सं० ६०१ वर्षे गये हुँतई मालवदेशी धारनगर श्रीसम्मति' ग्रंथना करणहार श्रीमल्लवादीमुरी प्रगट हूया । पुनः एहवें अवसरि आचार्य श्रीवप्पभट्टसरि प्रगट हूया वेह वप्पभट्टारीसंबंध कहै है- . - श्रीगुरु उपगारीपणे धम्मकथा कहै। तिवारई श्रीआम संघ सहित गुरु प्रति वीनती करे-'जो तुम्हे महासाधु छौ । भव्य जीवने पवित्रनई हात जंगम तीर्थ छौ । ते माटे इंहा गोपनगरे चुमासे तुम्हें अवश्य रष्टियु।' गूरु कहई-'निहा विविध गठीय पधवलीसंग्रह - 'वाला चमकंती पए पए कीस कुणह मुहभंग ।' तदा गुरु कहई- 'नूनं रमणपएसे मेहलया छिवइ नहपंती ॥' ए वचन सांमली राजा म्लान मुख हूओ । एतले श्रीमुक्ताफलिं वधावतां नील वस्त्र देपी अवस्थाई चचना तेजहीणने अंगे नीलाबख उपरि श्रीमरिनी विहां दृष्टि रही । तिहां आमनि पिण दृष्टि हुई। चितस्युं संदेह हूओ। जे साधुनी दृष्टि नीले सिणगार उपरि रही । व्याख्यान सांभली घरे आवी राजाई गुरुनी परिक्षा जोवाने अर्थि पोताना घरनी वडी दासीनई नीला सिंणागर पहिरावि, रात्रि प्रहर सवा गया पछी, शालाई गुरु पासे मोकली। जिहां रात्रि वप्पभहि संथारापोरसी कही संथारेई संथार्या छ, तिहां आची आचार्यना चरण स्पश्यां । कोमल हाय जांणी गुरु कहई-'एकुण स्त्री?' तिवारई ते कहइं-'हूं राजानी रांणी तेहनी मुख्य दासी । राजानी आज्ञा थकी इहां तुम्हारी भक्तिमा आदी छडं।' गुरु नीरादरई निभ्रंछी काढी । ते दासी म्लानमुसी थई आम पासिं भावी सर्व सरूप कहथु । इवें श्रीगुरुई उपयोग देतां थकां धर्मकथाई नीला बखनो उपयोग हुभो। आममनें संदेह जाणी मुदृष्टिनी प्रतिज्ञा पूर्ण हुइ । प्रभावना पडीकमणानी क्रिया साचवी गंतुक्मनी हूया। विहार करता थकां खडीनां पंड थकी शालगने पारणे ए गाया लीपी- दो तुपडाई हत्थे वयणे धम्म अखरा य चत्तारि । विउलं च भरवासं को अम पहत्तणं हरइ ॥ आम अनि अन्य रानाने माहोमांहे विरोध छई, तेहनई नगरई आन्या । तिणे आम गुरु आव्या जांणी घणो आदर देई, बिहू हाथ जोडी कहई-'हे पूज्य! निवारी आम अत्र तेडवा आवै विचारई आमनगरई जा, नही तु नहीं।' एहवी प्रतिज्ञा करी तिहां रह्या । हवई ग्यालेर नगरें गृहस्थ प्रातकालि देव दर्शन करी शालाई आव्या, गुरु नही । नगरई वार्ता हुई एतलेई आम राना पिण आव्या । शाला जोता वारणीए लसीत गाथा देषी । आम राजाई वांची, दासी मोकल्यानी वार्ता सांभली । मनस्यु पश्चाताप करतो हुओ-'मुझ थकी अवज्ञा हुई।' केतलेक दिने गुरु प्रति वीनती कहाची । तिवारई गुरु धर्मस्नेह जांणी कहिराज्यु-'जे तुम्हे वेप परिवर्तई आवज्यो।' तिवारे कौतुकरूपई आम राजा कापडोना वेपे धूसर मलीन हुई, मस्तकें आम्ल पत्रनो छोगो धरी, बिहूं कान ऊपरी तुंअरी पत्र थापी, पुनः विहूं हस्तकमांहि वीजोरानां फल ग्रही, शत्रुनगरी जिहां गुरु विरोधी राना सहित संघ समक्ष, व्याख्यान कहई छई, तिहां उतावलो आवी उभो रह्यो । आचार्ये आम ओलख्यो । साहमु जोइ आदर देइ कहई-'आम ! आवओ आम! आवभो।' ते सांभली साल सभा महाधुंसररूप देपी, आमनो शत्रु राना ते श्रीगुरुने पूछे-'ए पुरुषनई मस्तके फिस्युं ?।' ते वारई गुरु कहै-'ए आम्ल ।' ते सांभली विरोधी राजा पुनः पुछै-'ए पुरुपर्ने कानई किस्युं?' ति वारई गुरु कहई-तुं अरि!' ते सांभली विरोधी राजा गुरु...आमनई कहई... विहरति। एसमस्या गुरु कथा सांगली शाला पाहिरई आम नीकली वारणइं खडीना संडयकी ए श्लोक लिप्यो- 'गिरी गोपपुरे रम्ये प्रभो! तत्र पधार्यताम् । सभामध्ये समागत्य प्रतिज्ञा पूरिता मया ।' - पोतानी देही असमाधीपणई चितथकी श्रीसरीमंत्र वीसरी गयो । केतलेक दिने श्रीमरिनइं समाधी हुई। विद्यासमुद्रहरिभद्रमुनीन्द्रमित्रं सूरियभूय पुनरेव हि मानदेवः । मान्यात् प्रयातमपि योऽनघमूरिमन्त्रं लेभेऽम्बिकामुखगिरा तपसोज्यन्ते ।। -- वीरवंशय ली १८७ सकल लोक देखतां ए श्लोक लिपि आम पोतानइं घरे आव्या । बीजई दीने संघ तथा राजा पासें गुरै आज्ञा मांगी-'अम्हे गोपनगरइं जास्यु।' तिवारई आमनो शत्रू राजा कहई-'जियारई तूमनई तेडवा आम आनई, ते तुमारो वचन छई।' ते सांभली गुरु कहई-'ते तो काले वाप्यानमांहि आविनइं गया।' तिवारइं विरोधी राजा कहें-'तुम्हे मुझने को नहीं ।' गुरु कहें-'संघ समक्षई मई कहायुं जे आम ! आवो आम ! आयो । पुन तुम्हे पुछयु जे ए पुरुष मस्तके किस्युं ?।' ते वारे अम्हे कहा -'ए आम्ल।' पुनः तुम्हे पूछयु जे-'एकाने स्युं ?।' अमे कयूं जे-'तुअरी'। पुनः तुम्हे कहां जे-'एहना हाथमांहि स्युं ।' जि वारे अम्हे कह्यो जे-'ए चीजोरा । एतले आम्रने नामि आम राजा जाणिवा। पुनः तुभरि कहिता ताहरो ए शत्रु । पुनः चीजोरा कहिंतां तुम्हे राजा ए पिण राजा। ए श्लोक पिण पूर्ण प्रतिज्ञानो वारणई सकल लोक देवतां लिख्यो छै ।' ते सांभली आम शत्रु विचारी, जे सांकडे आव्यो हुतो पिण तेहना पुन्य थकी कुशले गयो । प्रतिज्ञा संपूर्ण, संघाज्ञा लेई गुरु ग्यालेरनगरें आव्या । आम राजाइ शालाई महोच्छवे पधराव्या । महाहर्प पांमी श्रीवप्पभट्टसूरीने मुप वारव्रत उचर्या । एकदा गुरुनइ आम कहई-'तुम्हे श्रीगुरु ! मुझ उपरि कृपा करी काइक ए जीव प्रत्ये सुकृत कहो।' तिवारई गुरु कहई-'आ असार संसार तेहनें विपई दोप रहित श्रीजिनवर, तेहनी भक्ती, तेहिं ज सार, जेह थकी माणिने सद्गति हुई । यतः- कारयन्ति जिनानां ये तृणावासमपि स्फुटम् । अखण्डितविमानानि ते लभन्ते त्रिविष्टपम् ॥ ते गुरुनो उपदेश सांभली ग्यालेर नगरई एक शत अनि आठ गज ऊंचओ प्रासाद नीपजावी ते माहि श्रीवीरविव विक्रम सं०७५६ वर्षि भूमिगृह थाप्यो। श्रीवप्पभटि प्रतिष्ठयौ । पुनः श्रीसिद्धगीरीइं त्रणि लक्ष मनुष्य संघपति थई यात्रा कीधी । साडावार कोटि सुवर्ण सुकृति करि श्रीजैनधर्म आराधी आम चहूआण वि० सं० ७६० चर्पि स्वर्गी हुओ । पुनः श्रीसरीने बाल्यावस्थाई सातसें गाथा सूर्योदये मुपपाठिं चढती । तेहना घोपना शोप थकी सात सेर घृत जरतु । श्रीवीर निर्वाण हुआ पछी तेरसई अनि पांत्रीस वर्ष बीतई पुनः वीक्रम सं० ७६१ वर्षि श्रीभाम मतियोधक आ० श्रीवप्पभसरी स्वर्ग हो । उक्तं च- यस्तिष्ठति धरवेश्मनि सार्धद्वादशसुवर्णकोट्याः। निर्मापितो आमराज्ञा गोपगिरौ जयति जिनवीरः ॥ इति बप्पभसूरीसंबंध ॥ २८. तत्प? श्रीमानदेवसूरी- तिवारई श्रीहरि गिरीनार पर्वति आवी वि मासी चउबीहार तप कीधी। अंबीका आवी कहई-'ए किम तिवार मुरी कहै-'मुस देही असमाधी ।' ते शरीवचन सांभली देव्याई श्रीमुरिमंत्र संभारी विजयादेवीने पूछी श्रीमरीन मंत्र कह्यो- ૨૮૮ विविधग छीय पट्टावली संग्रह २९. तत्पट्टे श्रीजयानन्दसूरी- श्रीमरीना उपदेशवकी वि० सं० ८२१ वर्षि श्रीहमीरगति, विन्जानगरें, ब्राह्मणवाटक, महुरि नगरें, श्रीपास इत्यादिक श्रीसंपतिकारक नवशतमासाद जीर्णोद्धार मा० म० सामंतई कीयो । पुनः विक्र० सं० ८४१ वर्ष यकी मांडी पिस्तालीताई पंच दुकाली हइ । ते अवसरई घणा साधु मर्याद यकी सिथिल हुया ! विचारे उ० श्रीगोविंद, उ० श्रीसंभूति, श्रीदप्यगणि क्षमाश्रमण, उग्रतपस्वी श्रीक्षेमरीपी, मलधारी गच्छीय श्रीहर्षतिलक, श्रीधूलिभद्रवंशे श्रीदर्पपुरीयगच्छे श्रीकृष्णार्षि प्रमुप गीतार्थो मिलि, श्रीमुरीना वचन थकी समय विपम जांणी महानगरई शुभ थानिकई सिद्धान्तना भंडार हया-ज्ञान यत्न कीयो । पुनः वि० सं० ८६१ वर्षि श्रीकरहेडा नगरई श्रीपार्थनाथनो मासाद हूओ। उपकेशभूत गो को खीम- सिंघे कराव्यो । एहया अनेक सुकृत श्रीसूरीना उपदेशधकी हूया । ३०. तत्प? श्रीवीरप्रभसूरी- एहवई वि० सं० ९२९ वर्षि दीलीइं चहाण हुआ। तुअरने दोल्ली थकी चहूयांणे काढ्या । पुन वि० सं० ९५२ वर्षे श्रीनाडोलनगरे श्रीनेमिचि सूरीई प्रतिष्टयो । एइबई अवसरे दडनायक श्रीविमल प्रगट हुओ। विमलनी संबंध कडई छई- श्रीगुर्जरदेशी बहीबार पंडि पंचासरा ग्रामथकी आवीनई चावडी पनराज वि० सं ७९५ यपि चोदनगर वसावी रह्यौ । पिण चिहुँ दिशि भयंकर बन देषी उदासी रहै । तिवारई थीवीर निर्माण हुआ पछी पारसई अनई विहोतरी वपि पुनः विक्रम सं० ८०२ वर्षि अणहिल्लवाडओ पाटण वसान्युं । विवारई विमलना शृद्ध पितानि ग्राम गांभू यमी तेडी लावी श्रीवनराजि पाटण मध्ये बसाव्या । तेहना वंशमा मा० दो० वीरो तेहनी भार्या वीरी कुर्ति वि० सं० ९४५ वर्षे विमलनो जन्म हुभो । अनि वर्ष ८ थकी मांडी वर्ष ११ नाई हाटि च्यापार कीधु । यर्प १३ मे श्रीधर्मघोषसूरीनो उपदेश सांभली श्रीपचनाघीस श्रीभीम राजाई वाणभाक्रम जांणी मधान पद दीधो । वर्षे ४ देश साध्यो। द्वादस म्लेछनोदालिक सकलभूपचूडामणि विरुदधारक चंद्राउलि १, आरासणि २ नगरथापक । पुनः वि० सं० ९८८ वर्षि श्रीधर्मयोपसरी नागिंद्र १, चंद्र २, नित्ति ३, विद्याधर ४ अनुप सकल आचार्ये मिलि श्रीअदोपरि नवीन प्रासादकारक । तन्मध्ये श्रीवालीनाह क्षेत्रपालदत्त श्रीरुपभर्विवस्थापक । पुनः आरासणी श्रीनेमिवियस्थापक, अन्य एकादश शव महामासादकारक, अढी इजार जीर्णोद्धारकारक, एडवें वि० सं० ९६१ वर्षि गीरीनारासन्नी श्रीजीर्णदुर्गाधिपति श्रीराय सिंगारनो जन्म हो। वि० सं० ९८९ वर्षि पोरु घणिक मति द्रव्य देई विमलई द्वादश गौत्र प्रति भागवाट कीधा। वि० सं० ९९१ वर्षि सोमपुरा बाडने विमले द्रव्य देई शिलावट कीपा। वि० सं० ९९३ वर्षे दंडनायक विरुदधारक श्रीविमल स्वर्ग (ओ। यतः- नागेन्द्र-चन्द्र-निर्वृति-विद्याधरममुखसंघेन । अर्बुदकृतप्रतिष्ठो युगादिजिनपुड्गयो जयति ।। ।

तिहाँ श्रीसूरीना उपदेशथी घोसीर गोत्र दो० धनराजई विक्र० सं० ९६९ वपि मासाद नीपजावी श्रीश्रीयांसर्विव याप्यो । पुन इणही ज वर्षि मडाहडई नगरइं श्रीसूरीना उपदेसथकी किन्हडीओ प्रासाद हूओ। विहां साहमी. माक्रमि करी पाल्लीथकी घृत अणावी साइमीवछला, श्रीगुरुनी कीर्ति हूइ । पछी दिन त्रीणि सांडेरथकी दो धनराज घीनो द्रव्य लेई पाल्ली नगरई आवी कहई-'घीनो द्रव्य लीओ।' ते कहई-'घी कुण काम आव्यो ।' दो० धनराज कहै-'प्रासादनई ओछवई साहमिवछली काम आव्यो।' ते गृहस्थ हाटमां जाई घीना ठाम जूइं। घीना ठाम श्रीसूरोइं आइड, खमणूर, करहेटक, कविलाण, भेवर प्रमुप नगरें घणा मिथ्यात्वि प्रतियोधि श्रीनाडलाई नगरें घउमासि आल्या । एतलई तिहां पूर्व कलहकारी प्रविज्ञाधारी पहिलानओ बालमित्र दुकालई अन्नना अभावयी कानफटो योगीनो शिष्य हूओ। मलीन विद्या सीख्यो। केतलेक दिहाडे पाछो घरे पलासी गांमइ भान्यो। वणिक वोर वंशावली तिणहि ज विलाई ए सकलाचार्य मिलि पाखि चउदसि दिने थापी। इति विमलोत्पत्ति। ३१. तत्पढे श्रीयशोदेवसूरी- ते गुर्जरदेसी वालिमनगरई, नागर वाडव कौशिक गोत्रि, विक्र० सं० ९९५ वर्षे जन्म हो। एहवई विक्र० सं० ९४१ वर्पि श्रीयशोभद्रसरी प्रगट हृया । तेहनो संबंध कहै छै- श्रीसांडेरगच्छे श्रीईश्वरसरीई पोतानई पाटिं पद देवाने बदरी देवी आराधी । ते आवी कहें-'अदपासनि रोहाईपंडे पलासी गामी प्रा. नारायण गोत्रि सापुनी भार्या गुणी तत्पुत्र सुधर्म वर्ष पाचनो छई। ते हचणा पोसा- लई भणि छई । तिहां पूर्व कर्मना योगी कोइक वाडवपुत्र खडीओ पाटी एकांति स्थानिके मुकी घरे जिमवा गयो । एतलई सुधमई तेहनो पडीओ लीधो । पाछो मुकता अफलाणो, भागो खंड खंड हुओ। एतलई ते वाडव- पुत्र आव्यो। वालके कह्यु-'ताहरो पडीयो सुधम्मि पंड पंड कीधा।' ति चारई वाडयपुत्र कहई-'तेहि जपडियो लेउ।' मनुष्ये घणु ज वार्यों पिणन रदी। 'सुज.मस्तकनी ढूंबडी ते मध्ये शालिमा तंदूलनउं करंबउ खाउ तओ हूं वाडव।' मुधर्म कहई-'हं मओ तूजने मातओ हूं घणिका' विहूं एहवी प्रतिज्ञा कोधी छ। 'ते सुधर्म ताहरा गछपाटनी उदयकारी छ ।' एहवा कहीं वरी देवी अलोप हुई। देवीवांणी सांभली श्रीईश्वरसरी रोहाइखंडई पालासी ग्रामें आन्या। तिहां देवीनी मेरणाई सुधर्म गुरुवाणी सांभली दीक्षा लीधी । तिहा थकी श्रीसुरी मडाहडई नगर आव्या । 'पुनः बदरी देवी आराधी । देवी कहै-' इहां सुधर्मनई पदवी दीओ, हु तेने सहायकारी छु।' गुरु देवी- वचनथकी मडाहडई नगरई तिणही ज घडी ए पद देई आ० श्रीयशोभद्रवरी नाम दीर्छ । तिणहि ज घडीई निल्ये आठ आठ कवल आहारना अभिग्रहधारक श्रीआ० हुआ। श्रीवदरी देवी भक्ति साचवें । तिहां यकी विहार करता गुरु श्रीईश्वरसरी १, श्रीयशोभद्रसरी २-वीह पाल्ली नगरे चाउमासे रह्या । तिहां निरंतर आ० उत्तर दिशदेड- चिंताई जाई । महातपस्वी जांगी श्रीदीवाकर आचार्यनई प्रसन्न हूओ ! ० नई कहई-'काइ वर मांगी।' तिवार आ० यशोभद्र कहई-'सकल वांछित दें।' सूर्यदेव कहि-“हस्यैई।' गुरु शिष्य तिहां निर्विघ्न रहई छई। एडवई गुरु श्रीईश्वरीमुरि स्वर्ग हुओ । चउमासई संपूर्णि विहार करता श्रीयशोभद्र गुरुभाइ सहित सांडेरा नगर आव्या । वात्स्यले सांडेरा नगरई घीई हूंइ रह्यो । दो० धनराज गुरुनई वीनती करई-जे घृत नही।' श्रीमरीई वीरविद्यानई ठाली दीठा। एतलाई व्यवहारी कहें-'ए द्रव्य तुम्हे मुकृत करो!' इणि धनराजै पाल्लीमध्ये मुकृत की । तिहाथको विविधगच्छीय पक्षाच स्त्री संग्रह पूत्रनी सोध करतो जिहां नाडलाई नगरई शालाई गुरु व्याख्यान कहई छई विदा आवी मस्तकनी जटा उतारी सर्प कीयो । बाप्यांनना लोक बीहता हूया। तेतलई गुरे मुसाकारी पूर्वलो मित्र विरोधी उलख्यो । एतले श्रीसुरीई बदरी देवी समरी, मुहपट्टी फाडी तेहना खंड खंडई नकुल प्रगट कीधा । तेहथकी पन्नग नाठा । योगी म्लान बदनई नाठो । पुनः प्रासादनो बाद हुओ । गुरु कांतिनगरीथकी तथा वल्लीपूरथकी पावन वीरनइं प्राक्रमी श्रीरुपभप्रासाद आग्यो । योगीई शंभूप्रासाद आण्यो । चेइ मासाद भ्या। जहिलें क्रोधनइ बसि मंत्रयोगि करि प्रतिमाना मुप बांका कीधा । संचे गुरुने बीनती करी-'देवदर्शनि कोई मनुष्य न आवइ ।' तिवारि गुरुई अष्टोतर जलकुंभ मंत्री विंचनई पपाल कीयो । विंच मूलरूपी हुया । पुनः प्रासादना यांभा तथा पाट डगामग डगमगता जांणी गुरुदत्त आम्नायथकी पथ्यरनई पाटि मंत्र लिपी सकल प्रासाद थिर कीयो । गुरु शंभुमासादनुं इंई मंत्र- चलई पाडयं । श्रीजिनशासननो जय जयकार हुओ । श्रीगुरुनी कीति हुई । इम जटिलने अनेक वादि नित्या । जटिल देश नगरीमा फिरई ।....... 'नस्तकमां मणि छइ । ते तुम्हे मरण हुआ पछी मस्तक फोडी उरही लेज्यो । ते पछी मुन देहनई अग्निसंस्कार करज्यो। तिण शिष्ये तथा संघे तिमहि ज की । केतले क दिने विणे योगीई गुरुमरण जांगी पूर्व संकेतई आवी दुधपात्र भरी वेगलो गुप्तई रह्यौ । गूरु कथके कल्पकनो चहि उपरि चंदुओ कीधौ । बदरी देवी चहि पछवाडइं प्रदिक्षणा दी छई, एतलि तिणे योगी वर्षा वायुनी उत्पत्ति किधी, जाणई जे मस्तकनी पोपरी लेऊ । एतलि बदरीदेवीई वायु- नई जोगि पोतानी शक्ति थकी योगिनि उपाडी चहिमांहि गुरु एकठो नाप्यो। ते मरण पांमी श्रीसांढेरगछनो रखवालओ यक्ष हुओ। देवी गुरुचिताने नमी स्वस्यानिके मडाइडई नगरई आवी। श्रीगुरुनी प्रतीज्ञा बदरी देवीनी साहाज्यथकी संपूर्ण हुई । इणि परें वि० सं० ९७१ वर्षि श्रीयशोभद्रसूरी हूंता हुआ। यतः- यहआ १ किन्नरुपी २ खीमरूपी ३ चउथा यशोभद्रसूर ४ । ए बिहु कालि प्रणमतां दूरिय प्रणासई दूरि । इति सांडेरगळे आश्रीयशोभद्सूरीसंबंध । ३२. तत्पढे श्रीप्रद्युम्नसूरी- श्रीसूरीना उपदेशयको पूर्व दिसि सतर प्रासाद हूया। ११ ज्ञानना भंडार लिखान्या। सात यात्रा श्रीसमित- गिरिनी श्रीमूरोई कीधी। ३३. तत्पढे श्रीमानदेवसूरी- श्रीमुरीई श्रावक भाविकानई हेतुई उपधान वहिवानि विद्या प्रगट कीधी। ए विटुंनी अल्प आयु जाणिवओ। ३४. तत्पश्रीचिमलचंद्रसरी- तेहने श्रीपद्मावतीना साहाज्यपकी चित्रकूट पर्वतई स्वर्णसिद्धिनी प्राप्ति हुई । ३५. तत्पढे श्रीउद्योतनसूरी- पूर्व दिशि श्रीसमेतगिरिनो यात्रा पांच करी। ए तीर्थ कहेवभो छई । यतः- जहिले क्रोधि करी वंशनलिकायकी काढी सिन्दुरीओ सर्प महाविपाकुल गुरु साहमो मुक्यो। ते रेपा त्रिण सुधी श्रीसूरीने हल्लारदेशस्त्रांमी राजश्री कर्णसिंही रुपश्री विरुद दीधुं । पुनः जेहना थकी ओ० कुर्कट गोत्रि सं० गोपि नव प्रसाद कीधा । पुनः चउदशत एक श्रीजिनवि धातुपट्टिकाई भराव्या। दक्षिणे नासिक नगरे " वीरवंशावली विंशत्यास्तीर्थकरैरजितादिभियंत्र शिवपदं प्राप्तम् । देवकृतस्तृपगणः स जयति समेतगिरिराजः ॥ ६४ पुनः एतलइ सांभल्यु, जे अदाचल उपरि विमल दंडनायकें श्रीरुपभर्थिव थाप्यो, तीर्थ प्रगट कीयो जाणीनई श्रीसरी मनिस्यु चितवई जे- अष्टपष्टिपु तीर्थेषु यत् पुण्यं किल यात्रया। आदिनाथस्य देवस्य दर्शनेनापि तद् भवेत् ।। ते माटि आयु, नंदिय, भणवाड, दहिआणक प्रमुष इणि नेत्रि न निहाल्या; एहया हर्ष सहित श्रीगुरु तिहां- थकी विहार करता थका आधुनी तलहटिइं टेली नामइं गाम, तेहनी सीमई, मोटी घणी सापायुक्त वडवृक्षनो विस्तार देपी, उष्ण कालई, शीतल छायाई श्रीमुरी विहां विश्राम्या । एतलई श्रीसर्वानुभूति यक्ष प्रगट हुया । प्रसन्नपणि श्रीसरीने कहई-'आ शुभ घटिका छई, ते माटि तुम्हें तुह्मारा शिष्यनें आचार्यपद दीओ। तो आवड वृक्षनी परि अपंड शापाई करी विस्तार उदय हुई।' तिवारें श्रीसूरीई देवकथकथकी श्रीवीर निर्वाण हूया पछी चउदसई अनि चउसठि वर्षि, पुनः वि० सं० ९९४ वर्षे श्रीसर्वदेवसुरी, प्रमुप आठ आचार्य स्वपाटि थाप्या। ति चारई तिहायकी वडने अहिनांणि पांचमो वडगछ' एडवो नाम प्रसीद्ध हूओ। पिण ते सघला गुरुभाई शालाई रह्मा । तिहाथकी महिमावंत तीर्थनी यात्रा करी अझारी नगरे आव्या । तिहां संपति निर्मापित श्रीवीरमासादि डोकरा शिष्यने योग्य जाणी मुरीपद देई श्रीवर्द्धमान तीर्थकरना प्रासादनि अहिनांणि श्रीवर्द्धमानसूरी नाम दीर्छ । गुरुकृपा जाणी श्रीसारदाई वालिका– गुहलीयें स्वस्तिक कीधो । श्रीगुरे तेहनी गूर्जरी विहार कीधानी आज्ञा दीयी । श्रीसरी नीत्ये एक भूक्ति जाणवा । श्रीउद्योतनसूरीनो मेदपाटी धांवल नगरि स्वर्ग हुओ ॥ ३६. तत्प? श्रीसर्वदेवसूरी- श्रीसूरी विचरता भरुभचि नगरि आव्या । तिहां कान्हडीओ योगी श्रीगुरुनें गृहस्थनो बहुमान देपी क्रोधि करी ८४ सापनी करंड लावी शालाई वाद करवा आवी बैठो। ति वारे श्रीमरीये ते देपतां जिमणा हाथनी कान- छांगुलीई करी पोवानि चिहं पासई भूमंडले वलयाकारें त्रिण रेपा कोधी । एतले तिणे ८४ सर्प करंडीई की फाढी गुरु साहमा मुक्या । ते रेपा त्रिणताई आवई पिण आगिले न आवई । पाछा करंडीई आधी बईठा । पछी जाई पाछो आव्यो । एहये चउसठि योगिगि मादिली कुरुकुल्लानामि देवि ते धर्मशाला वाहिरई पिपली छ । तिणे गुरुने उन तपस्वी जांणी तिहां आवी सिंदूर सापनी दादा बंध करी । योगी गुरुने नमी पोतानि स्थानि- कई गयो। श्रीगुरुनी कीर्ति हुई। पुनः श्रीगुरुना उपदेशथकी वि० सं० १००२ यपि सत्तावीस मासाद हुआ, मतिप्ठ्या। ३७. तत्पहे श्रीदेवसूरी- १९२ विविधगछीय पधवलीसंग्रह श्रीचंद्रमभमासादें जीर्णोद्धार हुभो । पुनः वि० सं० १००४ वर्षे श्रीरामसैन्य नगरई श्रीरुपभप्रासाद हो। पुनः श्रीसूरीय मालवदेसि घणा पोरु गृहस्तनें पतियोधिने जैन प्रावाट कीया । वि० सं० १०.७ वर्षिगालानि स्थिति हुई। ३८. तत्पद्दे श्रीअजितसिंहसूरी- श्रीसूरीना उपदेशथकी मेवाड देशी मा० दौ० सानाची सप्त प्रासाद नीपजाच्या । पुनः वि० सं० १०१० वर्षि श्रीरामसैन्य नगरें श्रीरुपमचैत्ये श्रीचंद्रप्रभस्वामी विध प्रतिष्ठा हूँई । यदुक्तं- चारित्रशुद्धिं विधिवजिनागमादाधाय भव्यानमितः प्रयोधयन् । चकार जैनेश्वरशासनोन्नतिर्यः शिप्यलब्ध्याऽभिनयोऽस्ति गौतमः॥ मुपादशाग्ने (१०१०) शरदां सहस्र यो रामसैन्याहपुरे चकार । नामेयचैत्येऽप्टमतीर्थराजविम्वप्रतिष्ठा विधिवत् स्वद्रव्यैः ॥ चन्द्रावतीभूपनिनेप्रकल्पं श्रीकुकृणं मन्त्रिणमुच्चाद्विम् । निर्मापिनोत्तुङ्गविशालचैत्यं योऽदीक्षयत् शुद्धगिरा प्रयोध्य ।। ६८ एहवे वि० सं० १०२८ वपि आचारांग सूत्र १, मुगडांग सूत्र २ टीकाना करणहार श्रीशीलाचार्य प्रगट हुआ । पुनः तिणही ज वर्षि नोवृत्तिगळे अनेक ग्रंथकारक श्रीद्रोणाचार्य प्रगट हुया । पुनः मालय देप्ति उज्जेगि श्रीलघु भोजराजनो राज्य हो । तेहनई बेटई वीरनारायणि वि० सं० १०७७ वर्पि सिबांगो गह वसाव्यो । पुन: एहवें वि० सं० १०९४ वर्षि, श्रीवडगछदं श्रीलघुभोजदत्त यादीविताल विरुदधारक थिराद्रीइं चहुआग क्षत्री प्रति. वोधक श्रीशांतिमुरी प्रगट हुआ। श्रीमरीयें चक्रेश्वरी १ पद्मावती २ ना साहाज्यथकी छवठण (1) पणि वि० सं० १०९१ वर्षि सातसें श्रीमाली गोत्रने धुलिकोट पडतो क्यो । एतलि श्रीसंघरक्षक, उत्तराध्ययननी वृद्ध टीका भादार हजारना कारक, पुनः जीवविचार मारणमा कारक, कांनोहडी नगरई विक्रम सं० ११११ वर्षि श्रीशांति- सूरीनो स्वर्ग हो। एहवई वि० सं० १११७ वर्षे वडगछई श्रीचक्रेश्वरई च्यारसया अनई पनर राजकुमर प्रतियोध्या। पुनः धनपाल पंडिते श्रीरुपम पंचाशिका १, देशीनाममाला २ कीधी। ३९. तत्प? श्रीयशोभद्रसूरी, लघु गुरुभाई श्रीनेमिचंद्रसूरी- एहबई डोकरा आ० गुरु श्रीउद्योतनसूरी आज्ञा लही श्रीअझाहरी नगरयकी विहार करता श्रीगुर्जर अणदल्लपाटणि आवी श्रीवर्द्धमानमूरी स्वर्ग हूया। तेहना शिष्य श्रीजिनेश्वरमरी । पाटणि राजा श्रीदुल्लभनी सभाई कूर्चपूरगच्छीय चैत्यवासी साथी कांस्यपाननी चरचा कीधी । तिहां श्रीदशविकालिकनि चरचा गाथा कहीने चैत्य वासीने जीत्या । तिवारई राजाश्री दुलभ कहे-'ए आ० शास्त्रानुसारे सरुं योल्या।' तेह थकी विक्र० सं० १०८० वर्षे श्रीजीनेश्वरमुरिई 'खरतर' विरुद लादो । तेहना सिप्य श्रीजीनचंद्र १ लघु गुरुभाई श्रीअभयदेवसरी २ । तत्पट्टे श्रीजिनवल्लभमुरी हुया । तिणि चित्रकूट पर्वति आयी श्रीमहावीरनओ छठो कल्याणक परूप्यो । पुनः दोहसो, छयासीया ग्रंथ नीपजान्यो । एक शत अनि चौत्रीस बोलई करी खरतरगछनी समाचारी थापी । जेहना शिष्य श्रीजिनदत्तसूरी हूया। तेहनो संबंध कहई छई- सनई कहइं-'ए दृपद् पिहुला करओ।' तिणे पारसें गुरुआज्ञाथकी ते दृपद् वेगला भिन्न भिन्न कीधा । तेतलई श्रीपार्श्वविव दीठो । पासने अधिष्ठायकि प्रगट मनुष्यने शब्दि कहई जे-'प्रासाद करावी पूजा करनें।' तिवार पारस कहई-'द्रव्य नही। अधिष्ठायफ कहई-'श्रीपासना मुपाग्री समु ममाति स्वर्णना अक्षतनो ढिगलो निरंतर व्यय भमार्ग हुस्यई । ते द्रव्ये मासाद नीपजावीजे । पिण ए वार्ता कोई आगलई न कहेवी।' ते पारस श्रेष्टी अंगीकार करी घरे आवी श्रीगुरुने विच प्रगट हूआनी वार्ता कही । तिवारई ते अधिष्ठायक आराध्यो । विगारइं ते देव १९३ वीरवंशावली विक्रम० सं० ११३२ वर्षि जन्म । एहवि श्रीजयसिंघदे राजा जन्म हुओ। वि० सं० ११४१ वर्पि दीक्षा । विक्र० सं० ११७० वर्षे सुरीपद । श्रीसूरीनई तपस्थी जाणी चउसठी योगिणी, चावन वीर, पूनः पंचपीर ए सदैव श्रीगुरुनि भक्ति साचवई । एकदा श्रीगुरु विहार करता श्रीगुर्जरदेशी वडनगरई आव्या । तिहां संघ पणि भक्ति साचबई । श्रीसंप्रति निर्मापित श्रीमहावीरमासादि घणा स्नात्रि, अg भकारी पुजा, अष्टोतरीइं पच शब्दा सदैव हया । तिवारई मिथ्यात्वी वाडवई जैन महिमा जाणि कोइक त्रिवाडी चाडबने घरे डोकरी गो करेरडी जणीने मृत्यु पामी । द्वेपथकी ते वाडवे गौशव रात्रि एक द्वे मिली उपाडी लेई मुप्तपणई जिनघरे मृकी। सुप्रभाति सिष्य जिनदत्त दर्शनिं आव्या । प्रदिक्षणा करता गौशव दीठो । तुरत आवी गुरुने कयौ । गुरे उपयोग देइ जोयु। मिथ्यात्वि व्यंतर पिण नही। मिथ्यात्वि वाडच जाण्या । श्रीगुरुई देवघरनी मोटी आसातना जांणी वावन वीर माहिलो पूर्णभद्र वीर तेब्यो। ते हाय जोडी कहे-'कार्य कहो।' गुरु कहई-शासनोन्नति करौ । आ मासादथकी छ मासनी अवधई ए शव सजीवन करी प्रगटपणे काढो ।' किसई जेह जीव...ने अभयदान हुई । ते गुरुनई बचने देव गौकलेबरई पइठो। एतलें देवघरथकी प्रगटपगि सकल बाडब तथा अन्य मनुष्य देपतां ते गो सिंग धुणा- चती जिहां त्रिवाडी वाडचनई घरई शिघई देवशक्ति वत्सीनई हेते करी मिलि । स्तनि दूधपान ते वत्सीई कीघो। ते देपी सफल वडनगर वाडव हर्पित हुआ। माहोमाहि कहई-'अनामुका त्रीवाडी ! आ फिस्युं ?' तै त्रीवाडी कहई- 'ए कोईक महादेवशक्ति ।' नगरई वार्ता हुई । जैनाचार्य महाम्नायधारक । पुनः अन्न गौ १ अनई वत्सी २-ए विहूं जीवनें अभयदानना दातार कृपावंत दयावंत जाणी सकल मिथ्यात्वि श्रीगुरुने नम्या । श्रीजिनशासननी उन्नति हूई। एतलई नाम तो श्रीजिनदत्तमरी पिण गौ १ वत्सीने २ अभयदान देवे थकी उपगारी हुया, तेह थकी सकल मनुष्ये वडनगरे मिली श्रीजिनदत्तनें 'उपगारी वरी' ए बीजो नाम कह्यो । पुनः अणहिल्लपत्तनपार्थे श्रीवायडनगरे श्रीगुरुई वायडज्ञातीया यणा गृहस्त प्रतियोधी जिनधर्म वासित कीधा । पुनः श्रीसरीई वृद्ध सिंधु देशी उंचा नगर पंचनदीई मध्य भागई सैयद मलेछनई वादई जीत्या । तिहां घणा जाडेचा क्षत्रीय प्रतियोधी अद्वार गौत्र उपकेसज्ञाती कीया। ते परम जैनधर्मवासीत हुआ। श्रीजिनशासनई शोमनीक ए सूरी कहीवाणा । श्रीगुरुना नाम स्मरणि दुखार्ति विलय जाय । अनुक्रमि श्रीकुमारपालराज्ये विक्र० सं० १२११ वर्षे श्रीसूरीनई स्वर्ग हुओं। इति जिनदत्तसूरीसंबंधः। पुनः एडवई श्रीमरुदेशी श्रीफलदर्चिपुरी तीर्थनी उत्पत्ति, ते कदै छै-पुनः नांणावालगछे श्रीमानदेव- सूरी विहार करता फलवदिपुरी चुमा रह्या । तिहां ओ० गुरुड गोत्रि श्रे० पारस नामें गृहस्थ रहै छै । ने भद्रक परिणामि करी निरंतर श्रीसरी वांदई । एकदा ते पारस श्रेष्ठी गांम वाहिर कार्यार्थि, लघु वोरडीनी जालिस मध्ये कांइक नीला अनि काइक सूका म्लान फूलई करी पूनीत एहवओ पापाणनो ढीगलो देपी, गुरु श्रीमानदेवनई भारी पुछयु जे- पद सदैव पूनि देखं छु। ते माटे अत्र स्थानिके काई आश्चर्य दिसें छई। तिवारी श्री पार विविध गछौय पावलीसंप्रह भावी गुरुने कहई-'पहिला इणि पुरि इणि ठिकाणे संमतिनृपकारक पार्श्वनाथनो मासाद हूंती । ते कालना योगी जज्जर हूई क्षय हुओ । ते विच ए श्रीपासनो प्रगट हुई। श्रे० पारसनई दर्शन दीधो। बीजेई दिने देवकथक प्रमाणे स्वर्ण अक्षतनो ढिगलो प्रत्यक्ष साचो देपी श्रे० पारसई प्रासाद नवी प्रारंभ कीघो। मूलमंडप १, रंगमंडप २, नृत्यमंडप ३ सर्व निपजाव्यु । द्वार कोट निपजाव्यो । तेहवे एक दिने स्वपुत्री पुछयु-'ए द्रव्य तुम्हे किहायको लावओ छओ?' इम बार ३ पुछै । पारस श्रेप्ठिई पुत्रीनई भद्रकपणई यथास्थित कयु । तिवारई अधिष्ठायकई द्रव्यनी वार्ता प्रगट करी जांणी स्वर्णाक्षत द्रव्य बंध कीधो । तिवारई प्रासाद एतलो रह्यौ । तिवारई श्रीमानदेव- सूरीई श्रे० पारसना आग्रहथकी वि० सं० १११८ वर्षे श्रीफलवद्धि नगरें महामहोछबई श्रीपासविच धाप्यो । यदुक्तं- श्रीमत्पार्श्वजिनाधीशः फलवद्धिपुरस्थितः। प्रणम्य परया भक्त्या सर्वाभीष्टार्थसाधकः ।। इणि परें समहिम्न श्रीफलवद्धि तीर्थ प्रगट हो । ४०.तस्पट्टे श्रीमुनिचंद्रसूरी- ६९ श्रीसूरीना उपदेशयकी वि० सं० १११५ वर्पि श्रीदधिपद्रई वायटज्ञातीय दो. अंबरानई श्रीशांतिनायनो विव थाप्यो। पुनः श्रीसूरीना उपदेशथकी श्रीसीरोही नगरे वि० सं० १११७ वर्षि विजापान सगोत्रि(?)चहुआण श्रीपृथ्वीराज हुओ। श्रीसूरीई पासी सूत्रग्रंथ नीपनाच्यो । एहबई वि० सं० १११८ वर्षि श्रीअभयदेवसुरी प्रगट हुआ। श्रीअभयदेवसूरीनी उत्पत्ति कहई छई- मेदपाट देशी वउसल्ल ग्रामई तूंअर सगो नामि राजपुन रहै छ। तिहां कौटिकगछे खरतर विरुदधारक श्रीजिनेश्वरसूरी विहार करता आन्या । श्रीमरीनई देपी सीघो(सगो?) नम्यो। श्रीगुरुई भव्यात्मा -जाणि उपदेश यद्यो । सांभली पूज्यौ । तत्काल दीक्षा लोधी । योग्य जांणी आ० पद देई श्रीमभयदेवबरी नाम दीधु । अत्युन पट् विगयना त्यागथकी पूर्वकर्मानुसारें देही कूष्ठ हो । श्रीसरी पूर्वोपार्जित कर्मे अहियासता थका गुजरात देसि भाणपुर गामि आन्या । वडक्ष हेठलि रात्रि सुतां सुप्नमा तपलब्धियकी अर्थनीसाई सासनदेवी फहई-'ऋषीश्वर ! जाग्रत छो?' ते देवीवांणी सांमली सरी कहै-'रोगग्रस्तनई निद्रा किहांथकी ?।' एहवी आल्नी यांणी सांभली शासनदेवीई वालीकास्वरूप धरी आवीनई आचार्यनई करई जिमणे हाथै सूत्रना कोकडा नव दे। मुझ देही समाधी हूई उवेलीस्युं । ते सांभली श्रीसरस्वती कहई-'सेदी नदीनई कंठी पलास वृक्ष हेठई चीकणी भूमिका छई । ते अहिनाणई पहिला श्रीनागार्जुन योगोई विद्यासीधीई भूभंडारित विच श्रीर्थभणपासनो समहिम्न छ । तिहां तुम्हे जाज्यो । श्रीयंभणपासनी स्तुती करज्यो। कीर्तना करतां ते बिंव सघ प्रगट हुसई । तेहना स्नाननई जलि सकल रोग ए देइयकी जास्यें । पिण कोकडा नब तुम्हे उबेलज्यो ।' इम कही देव्या श्रीशारदा स्वस्थानि- फई गयां । तेहना वचनने अनुसारई गौदुध चीकणी भूमीनई अहिनाणी खासर वृक्ष हेठली जाई श्रीमभयदेवाचार्य उभा रही श्रीयंभणपासनी कीर्ति, तदपि 'जयतिहुयण' पत्रिसीइ ‘फणिफणफारफुरंत रयणकर ' १७ ए काव्य सतरमु फहिता श्रीपासवित्र भूमिकायकी प्रगट तत्काल हुओ। श्रीसंधि स्नात्रोछवई श्रीपासना अभिषेकनओ जल मुचिपात्रई भरी गृहस्थि श्रीभाचार्यनी देहीमई छांदवि करी गुरुभंगथकी सकल रोग उपद्रव सम्या। दे 1 - श्रीहेमचंद्रसूरी प्रगट हुआ। इवई श्रीहेमचंद्राचार्यनी उत्पत्ति कहै छै- नामि वणिकपुत्रे गुरुसंयोगें परम श्रावक हुओ। वि० सं० ११४५ वर्षे तेहनो जन्म । पांचमे वर्षे वि० सं० ११५० गिरिसूरी मिल्या। तिहां थकी कुमारिया गामें जातां थका तटाके धोवी वस्त्र धोतो दीठो । पानी चीर देपी पूछीओ । तिवारी ते वस्त्रख्यालक गुरुने कहइं-'आ गामनी श्रेष्ठी तेहनी पहिरवानो छ।' तिहां चउमासि रखा। फेंतलेक दीने ते श्रीमाली गृहस्थनें पद्मनीना मुप आगिलई विद्यासाधन- रहस्य क्यो। श्रीजिनगासननी भक्तिनें २० सोमदेव ३-ए निहू साधु दिगंबर हूइ काउस्सगें रहा । सन्मुसि नग्न पद्मनी स्त्री उभी रही । तेहनो स्वामी १९५ पौर वंशावली तप्तमवर्णोपम हूइ । महोछय मंगल जय शब्द हूओ । तिणही न ठिकाणई सेढी नदीनई तटि थंभणपुरनामें गाम पाप्यो । मासाद नीपजावी वि० सं० १११९ वर्षि श्रीअभयदेवसूरीई यंभणपुर प्रासादि श्रीपासजी थाप्या । तिहां यकी विहार करता श्रीअणहिल्लपाटणि श्रीपंचासर पासने जूहारी चोमासे रया । रहितां थकां एकदा गुरुने शासनदेव्या दत्त नव सूत्रना कोफडानो उपयोग आव्यो । तिवारई श्रीसरीई वि० सं० ११२० वर्षि भगवती प्रमुष नव अंगमत्रना जे सिद्धान्त तेहनी टीका नीपजावी । एहयै श्रीथंभणपास प्रगटकार वि० सं० ११४५ वर्षि श्रीगोपनगरे आ० श्रीअभयदेवसूरी स्वर्ग हुओ। तेह पछी केतलेक वर्षे मुर्जर देसी यवनराज हो । तिवारई श्रीसकल संधि मिली समभाव विव जांणी वि० सं० १३६२ वर्षे श्रीखंभायत नगरे मुठिकाणे घणै यत्नि श्रीथंभणापास थाप्या। नीलप्पल समान नीलवर्ण देहधारक सकल क्षुद्रोपद्रववारक ते विंव आज लगणि सप्रभाव छई । उक्तं च- जयत्यसौ स्तंभनपार्श्वनाथः प्रभावपूरैः पूरितः स नाथः । व्यधत्त धन्वन्तरिणैव येन कुष्टापतापोऽभयदेवमूरिः॥ स्फुटीचकाराभयदेवसूरियर्यो भूमिमध्यस्थितमूर्तिसिद्धम् ।। • इणि परि आ० अभयदेवसूरी हुता-हुआ । इति आ० अभयदेवसूरीसंबंध । पुनः एहबई वि० सं० ११५२ वर्षे श्रीजयसिंहदेवि श्रीसिद्धपुर नगर वसाव्यु । इग्यार मालई करी श्रीरुद्रालय थाप्यो। पुनः श्रीमुविधिनाथ नवमा तीर्थकरनओ प्रासाद नीपजाव्यो । स्वदर्शन १, अपर दर्शन २ पोपी घणुं सुकृतई द्रव्य कीघो । वि० सं० ११५४ वर्षे वृध तटाफ १७ कराव्यां । ४१ जलनी दीर्घ वापीका नीप- जावी । ६१ कुंड बंधाव्या । ६७ लघु तटाक; दर्भावती, सहेली, झींझुवाडा प्रमुप नगरें गढ बंधाव्या। लघु वापिका १०२१, विश्राम थानीक १०६८, देव देव्या यक्षमासाद एक लक्ष निपजाव्या । एहवई गुर्जरे अणहिल्लपत्तना- धीश सोलंकी श्रीजयसिंहदेवराज्ये श्रीकोटिकगछे, चंद्रकुले, वजीशापाई आ० श्रीदेवचंद्रनरी तेहना शिष्य आ गुर्जर देशि धंधुफि नगरई मोदज्ञाती गोत्री साचो रहै छैई। तेहनी स्त्री चंगी नामि । तेहनशी पुत्र चंगदेव नामि । तिहाविहार करता आ० देवचंद्रखरी आव्या । श्रीमरीनो धर्मोपदेस सांभली तिणइं चंगदेव वर्षे दीक्षा लीधी। सोमदेव रुपी नाम दी) । श्रीगुरुनी कृपाथी अनुक्रमि गुरु श्रीदेवचंद्रसुरी १, अनि शिष्य रुपी सोमदेव - विहूं कलिंजर नामि पर्वतई कौइक ओपधीनई सोधिवा जाई छई । तिहां मारगमां श्रीमलय- ते विण प्रामालिफार कीयो । शुभ दिनई श्रीपभदेवमासादें भूमीगृहें श्रीदेवचंद्रसरी १, श्रीमलपगिरीयस, --- विविध गछौय पावली से प्रह ग्राम ० ते नग्न खड्ग हाथई शाली छेई श्रीगुरुने पासई आत्री साइस धैर्य परी उमो रह्यो । गुरुई गृहस्थनई फर्दा-'ध्यानधी चुमै तेहना मस्तकई तत्काल खड्ग दीजें विलंब नही।' इस विधि विद्या साधतां साहसीक धैर्यपणो देपी ते देव ईग्यारमई दिने आवी कहइं-टूठो, वर मांगि।' तिवारई गुरु श्रीदेवचंद्रशरीई धीर ५२ बसिनो वर माग्यो । श्रीमलयगिरीसरीई सिद्धांतनी टीका करवानो बर माग्यो। अनि रु० सोमदेवि राना प्रतिवोधवानी शक्ति मागी । विह साधुने त देव वर देई भलोप हो । गृहस्थ कोटी द्रव्यनी प्राप्ति हुई । तिहां थकी देवदत्त वर लेई श्रीमलयगिरीमरीई मालबदेशे बिहार कीधौ अनि गुरु श्रीदेवचंद्रवरी १, अनि शिष्य २० सोमदेव २-ए बिहू गुरु शिष्य श्रीगिरिमारि नेमीश्वरनी यागाई दर्शन करवा गया। तिहां मारगे कोइक गामि एक वणिक दरीद्री रहई छ । पहिला तेहनई माता पिता महाश्रीमंत हृता । तेहनी भ्रांति 'तिणे वणिके घरनी पुन ....... थकी राणीने तिहा यकी द्रव्य प्रगट कीयो । व्यंतराधिष्टिते सेवंतरा प्रगट इया । तेह थी परने मध्य भागई दिगली कीधो छ । प्रत्यति लीहालानी समुह छ। तिणे समयई वि पोहरई मध्यानई श्रीगुरु अनि शिष्य तेहनई घरे आहारनई अथि गया। तिणे सूक्ष्मरव (दान दीधुं । आहार देखी सोमदेव शिष्य चार वार गुरु साहमी दृष्टि करी संज्ञाई समझाबई पिण गुरु संज्ञाई न समझ्या । तेतलि वणिक समझ्यो जे ए पी महाभाग्यनो स्वामी जाणी उतावलो आधी तत्काल सोमदेव रुपी मति विहाथि उपाडी सेवंताना ढगला उपरि यइंसाड्यौ । एतले ते गृहस्थना पुन्यनई योगई ते सेवंत्राना समुहना द्विगलाथकी रु० सोमदेवनी दृष्टिना प्रभावथकी ते व्यंतर नाठी । एतले वणिक साक्षात् प्रगटपणे सुवर्ण ढगल दीठौ । तिवारे ते गृहस्थे पणा आग्रहे गुणनिष्पनि श्रीगुरुनई वीनती करी। वि० सं० ११६६ वर्षि रु० सोमदेवनई श्रीगुरु आचार्य पद देई 'श्रीहेमचंद्रसरी' नाम दीधुं । वि० सं० ११६७ वर्षि गुरु श्रीदेवचंद्रसरी स्वर्ग हो । एहबई अनेक ग्रंय- कारक श्रीमलयगिरीमरी स्वर्ग हो । श्रीमुनिचंद्रसरी जारजीव लगई छ विगयना नियमधारक श्रीसूरीई सोरठ देसि मासादवि प्रतिष्ठथा। मुमतादि चारिपई समर्थ यता- संविग्नमालिविकृतीश्च सर्वास्तत्याज देहेऽप्यममः सदा यः। विद्वद्धिनेयाभिवृतः प्रभावप्रभागुणैः यः किल गौतमोऽयम् || अष्टहयेश(११७८मितेऽन्दे विक्रमकालादू दिवंगतो भगवान् । श्रीमुनिचन्द्रमुनीन्द्रो ददातु भद्राणि संघाय ॥ ४१. तत्प श्रीअजितदेवसूरी- लघु गुरुभाइ सफल वादीमुगट विरुदधारक श्रीवादिदेवभूरि २। ए पिहूं गुरुभाई। ते मध्ये बडा गुरुभाई ते पट्टधर भनि लघुभाई ते गछनी मर्यादाना सार संभालिना करणहार । वि० सं० ११६८ धोनिवृत्ति- कुलिं श्रीमहेन्द्रसूरीना उपदेशथको घोषा विंदरे श्रीमालिज्ञाति नाणवट्टी सा० हीरुई श्रीनवपंडा पार्श्वनाथनो वित्र भरान्यो । वि० सं० ११७७ वर्षी 'श्रीनागरी शापा' कहिवाणी। श्रीअनिवदेवगुरु मति गुरुवाणि रंजित- थको अणहिलपत्तनाधीशः सो० नीजयसिंहदेव निरंतर त्रिण मदिक्षणा देइ वांदेई । -श्रीमरी पत्रिम दीसी देवकै ७२ ते शिष्यना वचनें वीर कहें-'अझारु माक्रम प्रभाति कुर्कट शब्द न हुई तिहां लगण, शब्द पछी नही। शिष्यआज्ञा तिवारे आकासि कोलाहल, वावन वीरनो 'आंण्यो मासाद श्रीपासनो देखी चित्ते चिंतवई ए फिस्युं ? पुस्तिकानो जे कीधो । एतलई प्रभात हुई जांणी वीर स्वस्थानकि पोहता। एतलई मासाद तिहां ज रह्यो । तेह थकी वि० १९७ विणि स्नात्र वीरवंशावली पत्नई श्रीजिनशासनई शोभाकारक हया । अनि लघु गुरुभाई श्रीवादिदेवसूरी तेहना शिष्य श्रीरामचंद्रमुरी, विधि प्रगट कीधी। तेहवई श्रीमरुदेशी जीराउली तीर्थनी उत्पत्ती हुई-आबूनी पासि जीराउली गामई घोसिरगोत्रि श्रे श्रीघांधल रहै छई, तेहनी गौ सेहली नदीनई कांठई बोरडीनी जालमांही सीमाढे चरवा जाई छ। तिहां ध शरई । संध्यासमयई ते गौ वणिकघरै द्ध न दीई । तिवारई ते धांधल गृहस्थ जाणई जे कोई सीममई दोहीने दूध लीड छ । तेहनी भ्रांती तेणे संघाते पुत्रनें मोकल्यो । जिहां गौ चरई तिहां पृथ्वीनई ठिकाणि द्ध करी गई। ते देषी पुत्र घरे आवी द्ध झरण वात पिता पति कही । तिणई धांधलई आश्चर्य जांणी ते दूधझरण भूमीका पणी । एतलई घणा कालनी श्रीपास मूर्ति प्रगट हुई। एतलई अधिष्ठायकै स्वप्न दीघो, ते–'मुझनें जीराउल्ली नगरई याप्यो।' तिवारई धांधलई मासाद नीपजावी महोत्सवें वि० सं० ११९१ वर्षि श्रीपार्थने प्रासादे थाप्या । श्रीअजितदेवसरीई प्रतिष्ठया । घणा दिनताई श्रीपार्श्वनाथनी भक्ति साचयतो श्रे० धांधल सद्गतीनो भजनार हुओ। ते श्रीपरमेश्वर जे जीरापल्ली नगरई रह्या । सफल भक्ति लोकनी वांछापूरक मारिउपद्रवनिवारक समभाव तीर्थ हुओ। यतः- प्रयलेऽपि कलिकाले स्मृतमपि यन्नाम हरति दुरितानि । कामितफलानि कुरुते स जयति जीराउलीपार्श्वः ।। इणि परि श्रीजीराउल्ली पार्श्व उत्पत्तिः । पुनः वि० सं० ११९१ वर्पि दील्ली नगरें विल्हाती पठांण आल्या । चहुआणनइ काढ्या, म्लेछाण हो। . इबई श्रीदेव लोडणपास तिर्थनी उत्पत्ति कहै छै-गुजर देसि सेरिसा नगरें नागिंद्रगछई श्रीदेवेंद्रसरि शिष्य सहित विहार करता आया। पिण गुरु शिष्यथकी वीराकर्षण विद्यानी पुस्तिका गुप्तपणि राखई । एकदा गुरु रात्रि निद्राई आन्या। एतलई एक शिष्ये ते पुस्तिका चंद्रमानई उद्योति वांची। बावन वीर आया। कहि-' किस्युं काम छै?' ते शिष्य कहई-' इणि पुरे जिनमासाद नहीं छई ते मार्टि पछिम दिशि जैन कांतिनगरीयकी श्रीजिनदर्शननो आ घणा पुन्य जाणी तुमारी शक्ति । इहां एक प्रासाद लाव्यो।' तिवारें लही वाचनार जैन कांतिनगरीयकी रात्रि मासाद लेई सेरीसई नगरई आव्या। एहवें उंघथकी गुरु जाग्या। उपयोग आव्यो। एतलि तिहां पुस्तिका नही । श्रीगुरुई शिष्यनां काम जाणी श्रीचक्रेश्वरी मरीनई कहई- शिष्यने मालिम नही । रात्रि घणी छई ते माटि तुमो कारिमा कुर्कट बोलायो ।' गुरुआज्ञायकी ते देवीई तिम .. वर्षे सेरिसा नगरई श्रीलोडणपासनी थापना हुइ । आ० श्रीदेवेंद्रसरी तिहां यकी विहार करी अणहील. 'पत्तनइं पंचासरो मणम्या। इति सेरिसा तीर्थ उत्पत्तिः।

१९८ विविधगल्छीय पहायचीसंप्रह ४२. तत्प श्रीबिजयसिंहसूरी- चारित्रचूडामणि विरुद धरता विचरी। एहबई सोलंकी श्रीकुमारपाल प्रगट हुओ। तेहनी उत्पत्ति कहई छई- गुर्जर देसि अणहिलवाडा पाटण पासे देइथली नगरई सो० श्रीत्रिभुवनपालभार्या वाघेली कास्मीरी । पुत्र पांच, ते मांही कनिष्ठ कुमारपाल नामो | तेहनो वि० सं० ११७७ वर्ष जन्म हुओ। विक्रम सं० ११९७ वर्षि श्रीपभायते श्रीमुरीमुपे धम्मोपदेश लह्यो । विक्रम सं० ११९९ वर्षे कुमारपाल टीको हो । एतलई गुरुने घणई ओच्छवइ शालाई पधराव्या । स देव व्याप्यान सार कांइक मुकृत कहो । तिबारें मरी कहीइं- दीर्घायुः परं रूपमारोग्यं श्लाघनीयता। अहिंसायाः फलं सर्व किमन्यत् कामदं भवेत् ॥ एहवा वचन श्रीगुरुनां सांभली चउमासई जीवाकूलभूमिका जांणी गुरुमुषे कुमारपालि नियम लीयो जे- 'चउमासे सैन्य चहाइ युध न करवभो ।' ते चार्चा केवलेक दिने दिल्ली नगरई म्लेछई सांभळी । तिहां यकी सैन्य आवी अणहीलवाडें उतयौं । सहिर पापति गढ कोट नही, तिरारि कुमारपालि गुरु चिनव्या-'सैन्य १ अनइं युद्ध २ नो तुम मुपई माहरई नीयम छई। सूरी कढई-'धर्मयकी कुशल हुसई ।' श्रीसुरीई कंटेश्वरी पादर देवी स्मरीने फ-'जिनशासनई ए राजा नियमधारक छे तेह थकी परचक्रनो उपद्रव निवारो।' ते गुरुआज्ञा लही देव्यांई रात्रि निद्राई सुतो म्लेछनई उपाडी कुमारपालना महेलमा लावी मुक्यौ । प्रभाते जागी उठयो । स्वसैन्य अनुचर नहीं । एतलई चढति दिनई रामर्पिनइं अनुचरें दंतधावननिमितें पावन जलसंपूर्ण पात्र, अंचलो लावी दीधो । ते देपी मुगल कहा- कुण स्थान ? तूं कुण ?।' ते अनुचर कहई-'ए राजा श्रीकुमारपालनमो मंदिर। हु तेहनो सेवक ।' ते मुगले सेवकना बचन सांभली मनस्युं विचारई हुं एहनो राज्य लेचा आव्यो छु, पिण सांकडे हूं आग्यो इणई, अनई एव महाभाग्यनो स्वामी मुझस्यु मैत्री वांछई छई। एहना पीर पिण साचा छई । तओ ए राजानो हुँ मित्र । तिवारई मुगल १, अनि कुमारपाल २-बिहू मित्र हुई माहोमाहि भेट आपि पीराणपत्तन नगरनो नाम देइ, कुमारपालनई स्वमि दृढतापणुं १ अनि उपगारीपणु २ देपी प्रसंसा फरतो दीली नगरई मुगल पुहतो। श्रीजिन सासनई महिमा हुओ । गुरुकीर्ति हइ। एतलई विक० सं० १२०७ वर्षि सो० श्रीकुमारपाले अढार देशि अमारि पलादि । हवे ते अहार देशना नाम यथा- कर्णाटे १ गुर्जरे २ लाटे ३ सौराष्ट्रे ४ कच्छ ५ संघवे उच्चायां ७ चैव भंभेया ८ मारवे ९मालवे १० तथा ॥ कोंकणे ११ च तथा राष्ट्रे १२ कीरे १३ जालंधरे १४ पुनः । पंचाले १५ लक्षमेवाडे १६ दीपे १७ काशीतटे १८ पुनः॥ । 'मारि' शब्द एइवओ मुपि कहिवई करी चउविहार उपवास एक करई । सफल प्राणि छाग्यो पागी पीई । पुनः वि० सं० १२०९ वर्षि हेमीव्याकरण' श्रीहेमाचार्य प्रगट कीधो । विक्र० सं० १२११ वर्षि सप्त लक्ष मनुष्ये श्रीसिदावली संघपति हो। वि० सं० १२११ वर्षे लेउआ गायापविनई दयापात्र जांणी सांडेरिया विरुद दीयो।

वीरवंशावली वि० सं० १२१३ वर्षे श्रीमाली मं० वाहडदेई श्रीसिद्धाचलई चउदमो उद्धार नीपजाव्यौ । वि० सं० १२१६ वर्षे बंबेरागढयकी श्रीशांतिपूजाने नूतन वखाथि शालबिना सात हजार घर पाटणी लावी वसाव्या । वि० सं० १२१८ वर्षे श्रीहेमाचार्य अमावस्यानी पूर्णिमा देपाडी। वि० सं० १२२१ वर्षे तारणगीरीई श्रीअजितजिनबिंब याप्यो। तिणही ज वर्षे सातसे लेखकने द्रव्य आपी एकवीस ज्ञानकोश लिपाव्या। न्यायघंटा सदैव वाजई। श्रीगुरु- उपदेशि चउदशत अनि चुमालीस, ८४ मंडप सहित भासाद नीपजाव्या। पुनः एकवीस शत जीर्णोद्धार नीपजाच्या। एकदा मं० बाइडदे श्रीगुरुने वीनती कहे जे-'नवीन मासाद नीपजावई पुण्य किंवा जीणोंदारनो लाभ ?।' एहवू मंत्री वचन सांभली श्रीसूरी कहई । यतः- नूतने श्रीजिनागारविधाने यत् फलं भवेत् । तस्मादष्टगुणं पुण्यं जीर्णोद्धारे विवेकिनः॥ एइवओ गुरुवचन सांभली मंत्रीइं पन्नरशत जीर्णोद्धार निपजाव्या । तेमाहि प्रथम जीर्णोद्धार वि० सं० १२२० वर्षे श्रीभृगुक, श्रीशकुनिकाविहारनो कीधो, श्रीगुरुना साहज्यथकी । पुनः इणही ज वपि आगिम- गछ' हुओ। पुनः एकदा कुमारपालनें रात्रि मुतां थकां पूर्वि वालावस्थाई अभक्ष भक्षण खाधओ छई तो गुरु पासई चारवत उच्चर्या, ते मांसनो स्वाद दाढामा उपनो जाणी चिंतवई अभक्ष भक्षनई संभरवई खंडित हो । प्रभाते गुरु वांदि पूछिओ । तिवारई गुरु कहई-'एहनी आलोयणा तुम्हे वत्रीस लक्षणा पुरुष छओ तेह थकी वत्रीस घरो पासाद, वावन देवकृलिका सहित निपजावो । ए वतभंग हुआनी तुम्हने ए आलोयण दीधी । ' ते गुरुयांणी अंगीकार करी स्वपिता तिहुयणपालने नामि तिहूयणवीहार, बहुत्तरी देवकुलिका सहित निपजाव्यौ। तेमाहि २४ विव रत्नमय, विच २४ स्वर्ण-पित्तलमय, विच २४ रूपमय, पुनः मुख्य प्रासादे एक सभी अनि पंचवीस अंगुल प्रमाणी अरिष्टरत्नमय मूलनायक श्रीरुषभदेववि स्थापित, सकल देवकुलिका सुवर्णकलसें युक्त जाणवी । निरंतर सत्तरभेदि, पुनः पट् पर्वि अष्टोत्तरी, जिनभक्ति हुई । विहं टंक प्रतिक्रमण, त्रि टंक देववंदनक, साचबई। सूर्योदये स्वगृहइं श्रीशांतिनाथनई अर्चि, वीतराग एकशत भावा नाम समरी, पछी अढारसय कोटीध्वज गृहस्थ युक्ति, तिहूयणपालविहारई, श्रीरुपमदेव दर्शन करी, गुरु वांदि, उपदेश सांभली, घरेआवी, सदैव सातर्सि साधर्मिक जीमाडी, पछी एकभक्त करई। मासें मासें लक्ष साधम्भिक पोपि । प्रति वर्ष यात्रा सात सवा सवा लक्ष मनुष्यई करवि । अथ द्रव्यसंख्या-कोठार चार अघटित स्वर्ण भर्या । कोठार चार अघटित रूपि भर्या । कोठार १ मुक्ता- फलि भयौँ । कोठार १ नानाविधि रत्ने भयो । पार्श्व पापांणना खंड च्यार । कोठार १ विद्रुमनो पंडे भयो । १५ सक्ष कोठार पवीत्र धानई करी भर्या । अथ सैन्य द्विपद संप्या-७२ सामंत ! चारशत मधान । सातसै कोटयाला १८ लक्ष पायक । एक लक्ष दूत । ११ हजार गज (?) । १२ हजार अंगमईक । १७ हजार स्यार । १५ दास अनि दासि । वि स्त्री । अथ चउपद संप्या-११ लक्ष इय। ११ हजार पालपी । ५० हजार स्य । २४ हजार करभ । १७ हजार वेसर । २२ हजार महिपा । दोदलाप टपम । एक लक्ष शकट । १५ सो कौतुक चडोल। इणि परि पूर्वभवान्ये भोगवें । पूर्वलइ भवई कोइक व्यवहारीयाने घरे कुमारपालनउ जीव चाकर हतो । तिहां निर्मल श्रद्धायकी नव कपर्दीकानां अद्वार फूल आव्यां । ते लेइ सिद्धगीरीई श्रीपरमेश्वरनई चदाव्यां । तिणे पून्य कर १८ देवनी साहिबी भोगवतो, श्रीगुरुवचनें मुकृत करतो, जिनसासन सोभावतो यको दिन नीगमई । एचई - , - ०० विविधगच्छीय पशवली संग्रह - ७८ ७०. ८० वि० सं० १२२९ वर्षि सार्थ नि कोटि ग्रंथकरता, फलिकालसर्पज्ञ विख्दधारफ, अष्टादशदेशाधिपतिबोधक, श्रीतारणगिरी तीर्थयापफ आ० श्रीहेमचंद्रखरी स्वर्ग हो । उक्तं च- सो जयइ बुड्ढचाई १ सिद्धसेनो जयड ग्चलु हरिभद्दो । सिरी यप्रभसूरी ४ पालित्तो५ अभयदेवो यः॥ सिरीमलयगिरिसरी ७ सरी सिरीयसमद्दो य ८। सिरीहेमसूरी अ९ इमे पवरथेरा जयंतु जुगपवरा ॥ पुनः विक्र० सं० १२३० वर्षि कलिकालराजर्षि विरुदधारक श्रीजीनसासनोन्नतिकारक सो० श्रीकुमारपाल स्वर्ग हूओ । यत उक्तम्- दया धर्म सुवेलडी रोपी रुपम जिणंद । श्रावककुलमंडप चडी सिंची कुमर नरिंद ।। [इति श्रीकुमारपालसंबंध ॥ इवईश्रीअंचलगछनी उत्पत्ती कईई-वडगछ विरुदधारप श्रीउद्घोतनसूरी। तेहनें पाटी श्रीसर्वदेवसरी। तेइना लघु गुरुभाइ आ० श्रीपद्मदेवसूरी ११ तेइना शिष्य श्रीउदयमभनी २,धर्मचंदयरी ३, विनपचंद्रसरी ४, गुणसागरसरी ५, विजयप्रभसूरी ६, तेइना नरचंद्रसूरी ७, तेहना श्रीवीरचंद्रपरी ८, वेदना शिष्य आ० श्रीजयसिंहसूरी । ते आयूनी तलहटीई दत्ताणि नगरें शालाई रह्या छ । एहरई तिहां ओ० दृद्ध द्रौण नामि सेठ रहि छई । नाटी नामी स्त्री छई, तेहनई गोदो नामई बैटो छे । तेहनो वि० सं० ११३६ वर्षि जन्म हुओ । पुनः तिणे पुन्यने योगे वि० सं० ११४२ वपि श्रीजयसिंहसूरी हस्ति दीक्षा लीधी । निहा प्रथम साधुनी आचार ओल्पवानई हेति 'श्रीदशकालिकसूत्र' गुरु तेइने भणाविता हूया । भणता थका अध्ययन सातमानी गाथा छठी भणा मांडी। ते सीउदगन सेवेना शिलावुद्धि हिमाणिय । उसिणोद्गं तस्थ फासुर्य पडिमाहिच संजइ ॥ ४१ ए गायानी अर्थ गुरुई भणान्यो । ते अर्थ गोदें चित्तमांहि विचारयो । पोशालमांहि ताडा सचित पाणीना भांडा भरया देपी गुरुनई पूछे-'श्रीगुरुजी! अन्नहा वाहाई अन्नहा किरिया कहोई ।' ए वचन सांमली गुरु कहें-- 'मुशिष्य ! एह किरिया आ समयईन चालि ।' विवारि तिणे शिष्य का-ए क्रिया करई तेहनई लाम किंवा त्रोटो?' मुरु कहे- लाभ, पिण तेहने नोटो नही।' एइनी गुरे योग्य क्रियापात्र तपस्वी जांणी उपाध्याय पद देइ श्रीविज- चंद्र नाम दिधु । तिणई तिहा यकी गुरु चांदी आशा लही च्यार साधुस्युं विहार फीधो। केतलेक दिवसें पावर पर्वति आव्या । तिहां संपति नृपफारफमासादे श्रीसंमवदेवनई नमस्कार करी चउविहार माससमणे उपाध्याय काउस्सगि रह्या । मास संपूर्णि जितेंद्रिय तपस्वीपणइ जांणी महाकाली देव्या वांदी कहीई- तुम्ह उपरी प्रसन्न छु । तुलो संयनई फ्ल्याणकारी छु । मुझने संभारई उपद्रव वेगलो करीस । पिण आज कृष्णाष्टमी छई ते मादि समनई अष्टमोई दीनई उपयासी तुम्हें संभारग्यौ ।' ते देवी दचारयकी उपाध्याय श्रीविजयचंद्र पारागिरि पीठ- । गाथा- , एहबई वि० सं०.१२३६ वर्षि 'साढपूर्णिमा'मगट हूओ। मुतो छई । एहवई आकाशथकी एक तारानो पतन हुओ। एतलई शिष्ये कह्यौ-'श्रीगुरु एह किस्युं १' तिवारइं गुरु व्यापारई घी द्रव्यनो वधारो करीनई, घणा जीवने रक्षकपणइं, जिनमासाद नीपजावी, श्रीसिद्धाचलें यात्रा करा श्रीजिनशासनि आचंद्रार्क विप्यात हूंसि । ते गुरुवचन सांभली तिण जगडूइं गुरु चांदि तिम ज कीधुं । समुद्रनो व्यापार ते जेम-तुरीनी बुहरत-द्रव्य वधारी देशि देशि द्रव्य मोकली, अन्न उदक घृत-गुड-खंड-साकर-तैल-अमुपनो अमयदाननो देणहार हूओ। श्रीसिद्धाचल १, गिरीनारि २, श्रीवेलाकूलि ३, श्रीनर्मदातटे ४, श्रीअनयामेरु ५ इत्यादि महादानशाला कीधी। २०१ वीर वंशावली, यकी उतरी भालिजनगरई आवी माप्तखमणने पारणए यशोधन भणशालीनई घरे आहार लीघो। एतलई देवीनइ वरथको मुख्य गृहस्थ यशोधन धनशाली हुओ । एतले पांचमा आरानई योगी केवलीने अभाडे करी आप आपणी सईछायकी नवनवी क्रिया, नवनवी सामाचारी आदरी, एतलि पोताना गुरुनी मूल सामाचारी लोपीनई, वि० सं० ११६९ वर्षि, श्रीजयसिंहदेवराज्ये एकसओ अनि सिचर बोलनी परूपणाई 'श्रीविधिपक्षगछ' नाम कीर्छ । तिहां यकी केतलेक दीने श्रीविजयचंद्र उपाध्याय विहार करता वइणप नगरि आव्या। तिहां श्रीश्रीमाली कोडि नामें न्यवहारीओ प्रतिबोधी स्वगछि कीधो । तिहां यकी विहार करता घणा गृहस्थने प्रतिवोधी दीक्षा देता पुनः श्राधि प्रमुपर्ने दीक्षा देता थका पश्चिम देशे मंदाउर नगरई आया। तिहां वि० सं० १२०२ वर्षि उ० श्रीविजयचंद्रने सूरीपद हुओ। श्रीआयरक्षितसरी नाम दी● । केतलाक चौमासा पश्चिम दिशि कीधा । तिहां थकी विहार करता श्रीविधिपक्षगछ विरुदधारक श्रीआर्यरक्षितसरी गुजराति अणहिल्लपत्तनि पंचासरनई नमवा आव्या । तिहां शालवी गृहस्थनई तंतुआ जीवनी उत्पत्ती देखाडी स्वगछई लीधा। तिहां चउमासे रखा। एहबई बणप नगरथकी कोटी व्यवहारीओ कोइक कार्यार्थ पाटगई आव्यो । तिहां देवदर्शन करी जिहां शालाई राजा कुमारपाल आ० श्रीहेमचंद्रना मुपथकी उपदेश सांभलीई छ, तिहां आवी सभा समक्षई श्रीहेमचंद्रने बवांचलई वांदई । ते देखी राजा कुमारपाल कहई-ए-कुण गृहस्थ जे वीगर वांदणई इम वांदई ?' ते सांभली श्रीहेमचंद्र कर विधिपक्षीक ।' तिवारि कुमारपाल कहई-ए वस्त्रांचलि गुरुनइ वांदई छई तेह थकी एहनो नाम 'अंचलिक' कहो । एतलई वि० सं० १२२१ वर्षि वीजं नाम 'अंचलगछ' कहिवाणो। तिहां थकी श्रीआर्यरक्षितमुरि विहार करता श्रीवइणप नगरी आव्या। एहबई सओ वर्ष आठ संपुर्णी वि० सं० १२३६ वर्षे श्रीआर्यरक्षितसरी स्वर्ग हो । + इत्यंचलगच्छ उत्पत्तिः। तेहवई गुजराति सोलंकी कुमारपाल राज्य छतई, एहवई सोरठ देशि, हल्लारखंडा, भद्रेश्वर नगरें, श्रीमालि सा० सोल्हा भार्या खेति पुत्र सा० जगहु, तेह दरीद्रीपणई नगरमांही मनुष्यना कार्य करतो माता सहित कठिण उदर पूर्ण करे छ। एकदा तिहां विद्याधरशापाई आ० श्रीधर्ममहेंद्रसरी आवी चउमासी रह्या । एकदा एकादशीनई दिवसि सकल गृहस्थ प्रतिक्रमणई करी स्व स्वनई घरे गया, पिण सा जगडूओ शालाई खुणै एक ठिकाणे अंधकारी कधु-'पांच वर्ष लागटई दुर्भिक्ष हुसई।' तिहा घणा जीवनो संहारनो मालिम हुओ। ते सांभली शिष्य कहई-'तिले समयई कोइ. अभयदाननो देणहार हुसि किंवा नहि ?' तिवारि गुरु कहई-'इसि नगरई सा० जगह श्रीमाली रहि छई। हिवणां ते दारिद्रि छई । पिण तेहना दृद्ध पिता श्रीवंत हता। ते पोताना पितानी घरभूमि पणई द्रव्य काही संग्रह कराव्यो। ते वि० सं० १२११ वर्षयकी वि० सं० १२१५ ताई एवं वर्ष पांच सा० जगहू पणा जीवन २०२ -- । विविध गाछीय पदावलीसं मह दुहो-नाकारवाली मणि अहा। पुनः कवीत-अहसहस्स मुंड० । एडवो जगहओ दाने उदार, उपकारी गुण जांणी दुर्भिक्ष वृद्ध वाडवरूपि जगडनी परीक्षा करी वाचा दीधी जो तुज मुझ मिलयो हुओ, मित्राइ हूइ । तिहां धकी पन्नरोतसे वर्ष जे हुसे तें दुर्भिक्ष नही थाइ । इम कही दुर्भिक्ष : पोतानई थानकै गयो । श्रीमाली सा० जगडुओ पिण देव-गुरुनी भक्ती साचवी घणा सुकृत करी सद्गतिनौ : मननार हुओ । यतः- दानामृतं यस्प करारविन्दे वाक्यामृतं यस्य मुखारविन्दे । कृपामृतं यस्य मनोरविन्दे स वल्लभः कस्य नरस्य न स्यात् ॥ देयं देयं सदा देयं अन्नदानं विचक्षणः । अन्नदातुर्यशो निन्यं जगडूकस्य यथादद्भुतम् ॥ इति श्रीमालि सा जगडु उत्पत्ति । ४३. तत्पद्दे श्रीसोमप्रभसूरी, लघु गुरुभाई श्रीमणिरत्नसूरी- ए वेह गुरुभाई जाणवा । श्रीमरी उत्तम माणिनें धर्मोपदेशनई कहिवई यकी उपगार करता विचरई । एतलइ मा० मंत्री वस्तुपाल १, लघुभाइ मं० तेजपाल २ मगट हया । तेहनो संघ कहइ छई । वस्तुपाल-तेजपाल- गुर्जरात देसि धुलझा नगरई माग्वाटजाति ऊंबरड गौत्रि सा. आसराज रहै छै । पाटणि चखन्यापारे आव्यो । तिहां हाटमांडी रह्यो । मालमुद गांमि व्यापार करी । एकदा पंचासरा पासनी यात्रा करी धर्मशालाई चित्रावालगछि आ० श्रीभुवनचंद्रसरी पति चांदि बइठो। एहवि तिहां श्रीमालीज्ञाती वणहर गौत्र सा० आंबो, तेहनी स्त्री लक्ष्मी, तस्य पुत्री बालविधवा कुंवर नामी । ते श्रीगुरुनि वांदि छई । एतलि गुरु वांदतां यका श्रीसरीई वामकुक्षी तिलवर्ण देपी मस्तक धूणीओ । विचारई पासे येसी शिष्ये कयु- श्रीगुरु ए कीम?' गुरु कहे- 'एहनि कुक्षि युग्मपुत्र वस्तुपाल १, तेजपाल २ नामि पुत्र घणा पुन्यना करणिना कारक हसि । तेहनो आचंद्रार्कि नाम रहस्यई।' ते गुरुकथक वचन सा० आसराजी सांभल्यु । केतलेक दिवसें पूर्व कर्मना संचयना योगे थको ते विहूनो संग हो । एतलि तिहां थकी ते विह पलायन हूई मांडलि नगरई जाइ रह्या । अनुकमि वि० सं० १२६० वपि वस्तुपालनो जन्म हुऔ १। पुनः एफसो ने पंचास पलनई अंतरे तेजपाल जन्म हुओ २। तिणें आसरानि पहिला गुरि नाम कह्या हूंता तेही ज नाम दीयां । एइवि माला देसि नलवर नगरइं शालिकुमार प्रगट हूओ। तेइनई मनुष्य दोलो नाम कहे छै । राजा श्रीवीरधवलनई राज्यई पुनः वि० सं० १२४१ वर्षि लापो फुलाणी प्रगट हो । एतलि वस्तुपाल १, तेजपाल २ मांडलि नगरई वर्ष पांचना हूगा। तिवारि तिहां मनुष्यि झात पूछि। एतलिं तिहां थकी आसराज पछिम दिशि जाई देवकई पत्तनई रह्यो । तिहां मनुप्यि वालक मोटा तेजवंत देपी गांम ठिकाणुं पूछई । तिहां थकी एटले घोडिआल गामि पोताने देशि आवी रह्यो । तिहां वर्ष आठना वि बालक हया । तिवारई घृतकूपिकानो व्यापार करई । एइचे तिहां श्रीभुवनचंद्रसरी विहार करता आन्या । सा० आस- रानई कुंवर स्त्रीई ओलख्या । गुरुई बि वालरने पुनवत जाणी तिवारई श्रीगुरई वि० सं० १२६९ वर्षि वस्तुपाल- नई जिनशासन कीर्तिकारक उत्तम योग्य जाणी अविका १, अनि कवड यक्षनओ २ वर दीयो | गुरुई विहार करतां तारणगिरि श्रीअजितनाथनी यात्राई गया। केटलेक दिने सा० आसरान विहां यकी स्त्री कुभरयुक्त त्रि एकादसि, चतुर्दशिइं, अष्टोतरी पुजाई, स्वजाति साधर्मिक पोपई। नित्ये सतरभेदि स्वनिर्मापित श्रीवासुपूज्य- मासाद हुई । एकदा श्रीभुवनचंद्रखरी मं० प्रति उपदेश कहै- जीयं जलबिंदुसम्मं संपत्तिओ तरंगलोलाओ। सुमिणं च समं पिम्मं जं जाणिज्न करिजसु॥ एहयो उपदेश गुरुमुपयकी सांभली मंत्री वस्तुपालि वि० सं० १२८० वर्षि श्रीदोपरि मासादयंम "धीर वंशावली २०३ बंधव लिइ धवलकई नगरे आवी रखा । इही थकी गुरुदत्त वरनई महिमाई दिने दिने व्यापारथंकी उदयवंत हूंया । एडवई विक्र० सं० १२७४ वर्षे वस्तुपालने ललतादेस्युं पाणीग्रहण हूओ १ । पुनः भ्रात तेजपालने अनोपदेस्युं पाणि- ग्रहण हो २१ एहवें माता फुअरदेनो स्वर्ग हो। दिवस इग्यारनई आंतरई पिता सा. आसराजनो स्वर्ग हो। एवं वर्ष १८ व्यापारे हया। विणहि ज यपि अंबिका-कवड यक्षनी कृपाथकी राजा श्रीवीरधवली यस्तुपालने यणा आग्रहि मंत्रिपद दीधो। तेजपालनें भंडारीपद दीधो । अणहिलपाटणे आगार निपजावी तिहां रह्या । तेतले तिहां भंडारीपद तथा मंत्रीपदनई तिलक अवसरि मंत्री वस्तुपाले ज्ञाति त्रीस पाटण माइलि पोपतो हो । एह पाटण नगरप्ठिनें घरें भवीतव्यना योगथकी अजाणपणे नुइतरो चीसरयौ। ते सेठनो पुत्र वर्ष १३ नो ते सामान्यपणाथकी घी, तेल, इलद्र हीग्वा वेची चिहुं पुहरें घरे आयो एतले माताने रुदन करती दीठी। ते देपी पुत्र कहें-'ए किम्?' तिवारे माता कहें-'आपणई घरे मुंहुतरु नहीं । अनि ए राजमंत्री भाग्यवंत हुओ पिण ए छिद्र सहित छई।' यतः- वयोवृद्धास्तपोवृद्धा ये च वृद्धा बहुमताः । सर्वेऽपि धनवृद्धानां द्वारे तिष्ठन्ति किङ्कराः ॥ इम विचारी तीण वृद्धाई बेटा आगलि कहें-'आसराज भागवाट सा०, कुयर बालविधवा श्रीमाली, मंत्री तेहना पुत्र, मोटो छीद्र ए छई।' ए वात पुत्रनें सघली कही । ते सांभली बेटानें हर्ष हो । एतलें जिहां समग्र साजनी भोजन करइ छ मुख्य गृहस्थ हर्पमई बेठा वार्ता करई छ, तिहां तिणे आवी चोरासी साजनानी आज्ञा करी, वि हाथ जोडी, माताई कही जे विपरीत वात, तेहनी चीनती सकल साजनानई कीधी। तिवारई तेहनो साजनो कहई-'रे मुग्ध ! तुं कुण घर ? आ पत्तने मुख्य हुई ? ते ए कीसी बात कही ? लाजतुं नथी। एतलें ते कहे मंत्रीनी उत्पत्ती संघली ते वृद्ध गृहस्थ आगलि मझासी। सांभली सकल लजावंत हुआ । चितई संदेह पड्यो । सकल साजनई तेहनी माता वृद्धा पूछी। तिणे कधु-'मुझ घरइ नुहतर नही, अनि तेहनें घरे तुम्हे द्रव्ये गया। पिण तुम्हे सकल साजनो जाइ वरुडी गांमी जे एहनी उत्पत्तीना कारक श्रीभुवनचंद्रगुरु सत्य गौत्रीयाने पूछौ । तिणे साजने वृद्धगुरु पुछया । तिवारे श्रीगुरुई यथार्थ कयौ । एतलि ते पाटणि आव्या। मंत्रीनी वात माहो- माही कहीवई नगरमा तथा अन्य गामि विस्तरि । एतले तिहां थकी वि० सं० १२७५ वर्ष -मंत्री वस्तुपाल १, तेजपाल २ थकी मायाट लघुशापा' प्रगट हुई । एतले स्वज्ञातीया परज्ञातीया दुर्बल गृहस्थनें भोजन तेडी बल कचल स्वर्ण मुहर देश स्वज्ञात वधारी नाम राप्यु । सकल ज्ञाती जीम्या । ते लघुशापा हुइ । एतलिं श्रीभुवनचंद्र- सुरी विहार करता पाटणि आव्या । महामोहोत्सवि शालाई पधराव्या । चौमासई रह्या । मं० वस्तुपाल गुरुवचनई पंचासर पासमासादि वर्षमाहि च्यार मौढ साधर्मिक संतोपई ! पुनः कुमारपाल विनिर्मित श्रीतीहणपालावर २०४ विविषयीय पावली संग्रह । थाप्यो । पुनः वि० सं० १२८२ वर्षि मासादि कलस दंड ध्वज चढान्यौ । श्रीनेमीश्वर याप्यौ। तिहा श्रीभुवन चंद्रसरीइं स्वशीप्य उ० श्रीजगचंद्रने -तथा पं० देवेंद्रने सूरीपदई कीधा । विणहि ज प्रासादि बिहुँ भ्रावानी स्त्रीयई नव नव लक्षई द्रव्य बाबरीने स्वस्वनामि बिहुँ आलीया नीपजावी नाम राख्युं । तिणदि ज वर्षि श्रीगिरनारी मं० वस्तुपाले उद्धार कीधी । एतलई श्रीमायु, सिद्धाचल, गीरनार-ए तिहु वीर्थे अद्वार लक्ष मनुष्यई उ. श्रीदेवभद्र, आ. श्रीजगचंद्र, आ. श्रीदेवेंद्र प्रमुप स्वेतांवर इग्यार आचार्य, पुनः दिगंबर भ० एकवीस आचार्य युक्ति यात्रा करी। सकल संघ सहित मं० वस्तुपाल पाटणि आव्या। केटलिफ दिने गुरु श्रीभुवनचंद्र- सूरि स्वर्ग हुआ। तिवारें - मंत्रीई घणे आग्रही उ० श्री देवभद्र, आ० श्रीदेवेंद्रनई चीनती करी पाटणे चौमासु राख्या। उतरीई चउमांसई मंनी आज्ञा लही बिहु विहार कीयो। भीलडी नगरई श्रीपास दर्शनि आव्या । एहवे तिहां हिंदूआणि देशथकी श्रीसोमप्रभमूरी पिण विहार करता भीलडी नगरे सह हर्षि पास दर्शनि आन्या । तिवारइं उ० श्रीदेवभद्र, आ० जगचंद्र, आ. देवेंद्र-ए बिहुए श्रीसोममभारीने चांदणई करी बंद्या । तिवारी श्रीसोमप्रभवरीई परतर, स्तवपक्ष, मागिम, राकापक्ष, विवदणिक, उपकेश, जीरावल्ली, नांगावाला, निवजिया इत्यादि आचार्यनी शाक्षि वि० सं० १२८३ चर्पि श्रीसोममभसरि १, मणिरत्नमरिहं जावजीव आंवल तपना धारक २, पुनः समता आदि गुण आगला जाणी स्वगछइ लेई आ० श्रीजगचंद्रसूरीनई पोतानी पाटि थाप्या । श्रीबीजापूर नगरी उ०श्रीदेवभद्र, आ. श्रीजगचंद्रशरी, आ० श्रीदेवेंद्र-र बिहु चौमासि रहा, अनि श्रीसोमप्रभमूरी १, श्रीमणिरत्नवरी २ वडाली नगरी चउमासई रह्या । एतलि पुनः मं० वस्तुपाल चीनी वार संघपति हो। श्रीसोमममसूरी, श्रीमणिरत्नमरी, आ० श्रीजगचंद्रसूरी, आश्रीदेवेंद्रसरी, उश्रीदेवभद्र सहित श्रीसिद्धाचल यात्रा जातां मार्गि श्रीवढवाणि नगरें संघ उतयौं । विहां श्रीमालि शा० ऋ० सा० रत्ने दक्षिणावर्त शंखनें महिमाई सप्त दिन ताई भानाविधि मुखाशिकानई भोजनि तया सरख आभूपणि पहिरामणी सकल संघनई कीधी। विहां थकी मंत्री मोरवी प्रमुप नगरें स्त्रज्ञाति सापम्मिक प्रति नगरें नगरें गामि गामि पकवान आभूपण वसई संतोपतो हूओ । श्रीसिद्धाचल, श्रीगिरिनारनी यात्रा करी देवकि पाटणी संघ आयो । तिहां मंत्रीई नूतन मासाद निपनावि श्रीचंद्रमभस्वामिनो विव थाप्यौ । श्रीसोममभवरी १, श्रीनगचंद्रसूरी २ प्रतिष्ठयाँ । विहां मंत्रीई स्वज्ञात घणुं संतोपी सम्मिनि संतोप्या । अणहिलपाटणि संघयुक्त श्रीमरी अनि मंत्री आव्या । उ० श्रीदेवभद्र, श्रीजगचंद्र, श्रीदेवेंद्र श्रीसोमप्रभमरीनी आज्ञा लही पाल्हणपुरई चौमासाई रह्या । श्रीसोममभसरी अंकेचालीई चोमासी रह्या । श्रीमणिरत्नमरीई हिंदुआणि देशि विहार कयों। श्रीसत्यपुरि चोमासी रह्या । श्रीवंत मंत्रीई संघयात्राना मनुष्य मनुष्य पति पाटणि सुवर्ण मुहर दीधी। चउमासई उतरई पाल्दणपुरयकी उ०श्रीदेवभद्र, आश्रीदेवेंद्रसरी विहार करता आयु, दहियाणाक, नंदिय, ब्राह्मणवाटक इतीयादि तीर्थ फरसी अनारी नगरई श्रीवीरमासादे श्रीमुरीई अठमर्पि श्रीशारदानो स्मरण कीधो । ब्रह्माणी प्रसन्न हुई कहि-'तुझ किति हुसि।' ए सारदा दत्तवर लेई श्रीमुरीई मेवांड देसि विडार कीधो । एहवि श्रीसोमप्रभमरो एक शब्दना शत अर्थना कर्ता, पुनः 'श्रीसिंदुरमकरण' ग्रन्थना कारक श्रीश्रीपालि नगरि स्वर्ग हो । १ । अनि लघु गुरुभाइ श्रीमणिरत्नवरी 'नवत्वप्रकरण' कर्ता ते वि मासि अंतरि श्रीथिराद्र नगरई स्वर्ग हुया । २ । हवि मंत्रि वस्तुपालनई अणहिल्लपटनि १, आसापल्लीई २, खंभायाति ३ प्रमुप नगरि छप्पन्न कोटि द्रव्य भूमध्ये जूइ जूइ शांति ते उपरि देवसनिधिओ शब्द हुई ते समय द्रव्य मुकृति कीघो ते कहइ छई-अद्वार " , , पुनः श्रीदेवभद्रनो साहज्य पामी उग्र क्रीयानो आरंभ श्रीआइड नगरई कीधो । विहां श्रीसरी वर्षा- कालि चउमासि रह्या । एतले जावजीव आंबील तप करतां वर्ष वार हृया। तिवारइं चित्रोडपति राउल श्रीजयसिंह घणा मनुष्य मुपि छ विगयना त्यागकारी, सचित्त परिहारी, आंबिल तपना कारक सांमली शालाई आवी देही कुशल कहें । ए श्रीमुरीनो बडु अनि जिहां लगिणि चिरंजीवी हुई तिहां लगण आंबिल तप देही कुशल देसी वीरवंशावली कोटि द्रव्य तीर्थयात्रामें उनमणि व्यय कीधा । आधु, पाटण, बडनगर, खंबायत, देवकि पाटणि, भृगुकच्छ, गुजा, थुडिआला, सांडेरा, प्रमुप नगरई पांच हजार प्रासाद नीपजाव्या। सवा लाप जिनविंव निपजाव्या। ते मांहि एकतालिस हजार सुवर्ण-पीतल धातुमयि जाणवा। श्रीतारणगिरी, श्रीभीलडी नगरि, श्रीईडरगदि, श्रीविजा- नगरि, श्रीशंखेश्वरि, श्रीविजापुरी चिंतामणि पासमासादि, पुरहातिज पद्मप्रभमासादि इत्यादि-विश शत जिर्णोद्धार निपजाव्या । नव शत अनि चउरासी धर्मशाला निपजावी । पांच शत समोसरण निपज़ान्या। पुनः देवकि पाटणि ज्ञानकोश ईग्यार लिपावी सोधाव्या । पत्रीस हजार येत चंदननी ठवणी, उगाणीस हजार रहिल्ल नीपजावी । वहितालीस हजार सांपुडी, कवली नीपजापी 1 पुनः स्मरणी श्वेत चंदन, मोती, प्रवाला, सूत्र प्रमुपनो नीपजावी, नगरी गामि गामि देशदेशांतरे पुण्यार्थे दीधी । पुनः द्रव्य संख्या कहई छई-आठकोडी अनि त्राणुं लाख टका यात्रा, स्नात्र, पासाद, विवथापनई, श्रीपुंडारिकगीरीइं, आत्महेतूना कारण माटि सुकृतिई वावर्या १ । पुनः अहार कोटी अनि आसी लक्ष टका धीरेवतांचलि सुकृतिई कीयो २। पुनः वारकोटि अनि वहिपन्न लक्ष अधिक श्रीअर्बुदाचले सुकृति कीधा ३। एतले ए ओगणीस सयकोटी, भनि आसी कोटि, भइसी लक्ष, वीस हजार नवसय अनि ताणुं टका ते नव चउकडीइ उणा एतलो द्रव्य मंत्री श्रीवस्तुपालई त्रिहूं तीर्थे सुकृति कीयो । पुनः कवित- पांच अरब नई खरव कीधां जेणे जीमण बारह । सात अरव में खरब दीध दूबल परिवारह । द्रव्य पंच्यासीय कोडी दीघ भोजक बड भह । सत्ताणु सय कोडी फूल तंबोली हह । चंदन पीर कपूर मपि कोडी यहत्तरी कप्पडे । पोरवाडवंश अवणे सुण्यो श्रीवस्तुपाल महिमंडले ॥ इत्यादि अनेक मुकृतिकारक श्रीभुवनचंद्रवरी उपदेशात् श्रीविका कवडयक्ष सानिधकारक, मागवाट लघुशापा विरुदधारक एवं वर्ष १८ मुकृत कीधु । सर्व आयु वर्ष ३६ संपूर्णी तेहनो वि० सं० १२९८ वर्षि चालीया गामि सं० श्रीवस्तुपाल स्वर्ग हुओ १ । पुनः वि० सं० १३०२ वर्षि लघुभाई मं० तेजपाल चंद्राणा इति मं० वस्तुपाल-तेजपालसंबंध । ४४. तत्पट्टे श्रीजगचंद्रसूरी- श्रीगुरु जावजीव आंवील तप अभिग्रहना धारक थका मेवाड भूमंडली विहरता श्रीआहाड नगरि आव्या। एहवई गछना साधुसमुदाय प्रतई क्रिया आचारि शियलपणि जागी पहिला दीयां में श्रीआ० सारदाई वर तेहनी गामि स्वर्ग हुओ २॥ कृपाथकी एहवा वचन उ० चाँदी कहे-' गुरांजी तुम्हारी कुण गछ अनि कुण तप?' तिवारि उ० श्रीदेवकुशल कहे.

- २६ 'विविध गच्चीय पट्टीवली संग्रह श्रीदेवभद्र सांभली श्रीजयतसिंह भूप कहे-'ए तप करता केटला वर्ष हुया।' तिवारि श्रीदेविंद्र कहें-'ए मरीने तप करतां वर्ष वार हुया।' तिवारि श्रीजपतसिंह मनस्यु चितवई-महायोगिंद्र महायतीनी तपस्या चार वर्ष कही है, अधिक नहीं । तेह थकी ए अधिक तप जाणी आश्चर्य पांमी राउल श्रीजयतसिंह सफल मनुष्यवृंद समक्षई कहि- भो भो लोको ! तुम्हे ए सूरीनई आज थकी 'तपा' कहीज्यो ।' एतलई श्रीवीर मीर्वाण हया पछी सत्तर सय अनि पंचावन वर्ष गयई हूते, पुनः वि० स० १२८५ वर्षे वैशाप सित वीजने दीनी राऊल श्रीजयतसिंह दत्त 'तपागछ' बिरुद श्रीजगच्चद्रारीने हो । एतराई प्रथम पट्टधर श्रीसुधस्मिीथकी 'निग्रंथगछ' एडयु नाम प्रथम कहिवाणु, ते आठ पाट लगई ए विरद पहिचांणो १ । तिवार पछी नवमई पार्टि श्रीसुस्थितस्वामी अनि सपतिबुदस्वामी ए विहूं गुरुभाइई कारंदी नगरीइं 'कोटी वार खरीमननो स्मरण कोधो, तेह थकी चीजें नाम 'कोटिक्गर' एह, कहिवाणूं, ते गछ छ पाट लगण 'बिरुद जाणवो २॥ तिवार पनरमे पाटि श्रीवजसेनयरीनो शिष्य श्रीचंद्रपुरी या तेइ थकी 'चंद्रगछ' ए पीजो ३। पुनः सोलमे पाटि सामंतभद्रसरी ते निस्पृहपणा थकी चनने विषे रहि । सरिथकी 'वनवासीगछ' ए चोथु नांम । ते सोल पाट सूधी ४ । तिवार पछी तेतीसमै पाटें सर्वदेवसरीने उद्योतनगुरुई आयु तलहटीनई वनें वडक्ष हेठि आठ शिष्पर्ने सरीपदे कोधा, तेहथी 'वडगछ' एहयुं पाचमुं नाम ए इग्यार पाट लगई ५। तिवार पछी चउमालिसिमें पाटि श्रीजगचंद्रमरी हृया। तेणई आयु पर्यंत ऑविल तप करतां वर्ष २२ हूया, तिवारी श्रीजगचंद्रसरीने 'तपा' विरुद हूओ। तेह थकी हवणा छठो 'तपागछ' नाम कहिवाणो ६। ते पहिला वडगछ कहिवातो । एतलें कह्या ए पाच आचार्य तेहने एक एक बिरुद कहिवागो अने श्रीनगचंद्रसरी पांच विरुद कहिवाणो ते कहे , कौटिकवंश १, चंद्रकुल २, पजीशापा ३, वडगछ ४, अनि पाचमो तपागछ विरुद ५- ए पाच विरुद आ० श्रीजगचंद्रसरीने वह्या । ते किम जे श्रीजगचंद्रसरी पठी एहवा विरुदधारक कोई आचार्य हया नही । ते माटे श्रीजगचंद्रसरीने पाच विरुदनी उपमा कही। श्रीजगचद्रे क्रीयाउद्धार कीधौ । तिबारे एकासी गौत्र उ० श्रीदेवभद्रना शिष्यनें दीया । ते शिष्य सीता नगरें शालाधारक हुई रह्या । श्रीसरी आहड नगरथको विहार करता श्रीनडलाइ नगरि देवदर्शन करी श्रीसीरोही नगरई चौमासि रह्या । तिहां उ० श्रीदेवबुशल्नो स्वर्ग हो। तिहा थफी श्रीजगचंद्रशरी १, श्रीदेविंद्रनरी २-ए विहूं गुरुभाई विहार करता गुजराति धवलकि नगरि चउमासि रहा । एहवि तिहा माणसा गाम वास्तव्य ओ० तृ० आंव गौत्रि सा० विजयचंद्र राजा श्रीवीरधवलने गामनी उत्पत्ती खपती लपतो कोईक मोटि अपराधि राजाई कारागारि दीघो। ते किमही काई नही । तिबारे विजपचंद्रइ श्रीदेविंद्रमरिने कयौ जे- मुझनें कारागारथकी कढावभो तो ह तुम्हारो सिप्य थाउं ।' तिवारि श्रीदेविंद्रसूरीइ मनी वस्तुपालने कही सा० विजयचंद्रने बंदीपांणाथी कढायो । तिणे श्रीजगनचंद्रमरी हस्ते दिक्षा लीथी । रुविजयचंद्र नाम दीधैं । पिण लिगारेक अभिमान धरई। घउमासी संपूर्णि धवलकई यकी श्रीजगतचंद्रइ विहार कीयो । मैचार्डि धावल नगरि आन्या ! सिहा रु० विभयचंद्रनें उत्तम पात्र जाणी श्रीजगचंद्रि वि० स० १२८८ वर्षि आपद देइ श्रीविजयचंद्रधरी नाम दीपो। श्रीजगत्चंद्रखरी १, श्रीविजयचंद्रसरी रखा छ, तिणे श्रीदेवेंद्रसरीनी आज्ञा विना कियाई शिथिल साधु मति पं० उ० दिक्षादिक दिई स आलाई यत्ने फिधा अनि गृहस्थने आवर्जन निमिचे प्रतिक्रमणादि क्रिया करता हुवा । पुनः मालबई थकी पिण न साचल्यो । एहवओ गछना साधुमुपथकी सांभलो । श्रीदेविंद्रसूरी कर्पटवाणीज्य नगरथकी सभापति आती मोटी पोशाल ते श्रावस्ने उपाश्रयनई एकवासि रहा। किहाई विहार न कीधो, नगरमा मासरप श्रीयंभणयात्राई आच्या। विवारी श्रीविजयचंद्रसरी तथा तेहनी पक्षना साधु मत्सरि धरी । श्रीदेवेंद्र आवी साधवीन उपाने नांहनी शालाई आवी रखा। तिवारी गृहस्थ माहोमाही पूछई जे-'तुम्हे गुरु वांदवानइं कुण मागाइ जास्यो?' ते सांभली अन्य श्रीद्ध कहइं-'बिहुँ ए सूरी एक गुरूना शिष्य छई, तेह थकी आप आपणुं चित्त ममन्न हुइ तिहां जाइ वंदना करो।' एवलई श्रीविजयचंद्रखरी तो पहेला थकी ज द्धशालाई रह्या, एतलई विजय- चंद्रसूरीना साधुसमुदायनई मनुष्ये 'वृद्धशालि' कह्या, अनि श्रीदेवेंद्रसरीना साधुसमुदायनई, नांनी शालाई रक्षा तेह यकी श्रावके 'लघुशालिक' कह्या । एतले श्रीविजयचंद्रथकी वि० सं० १३०१ वर्षि 'श्रीवृद्धशाला' नामि गछ जुदो हो । इवी लघुशालिक श्रीदेवेंद्ररी पाल्हणपुर श्रीपाल्दविहारी श्रीपासनें नमवा आन्या। विहां तिणही ज मासादी दिन प्रतिदीन अक्षत एक मुडो अनि सो मण सोपारी आवे छे। एतले जैन गृहस्थ घणो छई। श्रीमरी उमासि रहा। तिहां विपपिने श्रीगुरुई मरिपदे श्रीविद्यानंदसरी नाम दीयो। अनी वीजा भीमपिने पाठऊपदे श्रीधर्मकीर्ति नाम दीपो। श्रीगुरुइ श्रीविद्यानंदसरीने इडरगदि श्रीशांतिदर्शननई विहारनी आशा फही। २०७ - वीर वंशाच ला देवरी २, आ. श्रीविजयचंद्रनरी ३ विहार करता कउआणा नगरें चौमासि रह्या । तिहां यकी मोसिल ने आव्या । तिहां सात दिगंबराचार्यस्युं जैन वाद हुओ। श्रीश्रुतदेवीनी कृपाथकी तेहनें जीत्या। एतले भासने वादि हार्या नहि, तिवारी हीरानी परे निर्मल अभेद्य देपी लोके 'हीरला श्रीजगचंद्रदरी' एहवी कीर्ति ।। तिहां नागावाल, कोरंटक, पिपलीक, वडगछ, राजगछ, चंद्रगछ इत्यादि केतलाक शापाधारीई श्रीसरी हस्ते या उदरी तेहनें स्वगछे लीधा । तिहां श्रीसूरीइं बंदणक, विवंदणक, मतिक्रमणादि प्रमुप स्वगछनी सामाचारी गी। ते पहिला छ आवश्यक लगणि क्रिया करता, श्रीसरी आंबिलतपनो आराधन करता, निर्मल तपाचार ता, योग्य जीव प्रतें सुउपदेशे करी संसारयकी उथरता, मेवाड देशि विचरता, अनुक्रमि वीरशालि गामें आयु त आंबिल ग्रतकारक, तपागछ सामाचारीधारक, पुनः श्रीतपागछ विरुदधारक, श्रीजगत्चंद्रमरीनो वि० सं० २९७ वर्षि स्वर्ग हो। पुनः कीदृश श्रीगुरु ?- श्रीगुरुः पदर्शनकारः मुक्तिदानदूरीकृतदूपणगुणनिधानः। युगपदधारका जयतीशः भविमानवकुवलयभामिनीशः ॥ ४४. तत्पद्दे श्रीदेवेंद्रसूरी, लघु गुरुभाई श्रीविजयचंद्रसूरी २। ए बेहूं मेवाड देशथका विहार करता मालवई उज्जेणी नगरई श्रीअर्वती पासनी यात्रा कीधी । तिहां श्रीदेवींद्र- शरीई श्रीविजयचंद्रसुरीनी गुजरात विहार करवानी आज्ञा कीधी। तिवारी श्रीविजयचंद्रखरी गुज्जराति गया । श्रीसंभायति आयी रह्या । अनी श्रीदेवेंद्रसरी मासफल्पि उज्जेणी रह्या । तिहां खंडेरवालज्ञाति सा० जिनचंद्र तेहना इन वीरधवल १, अनि भीमसिंह २-२ विहं बंधव प्रति पाणिग्रहणनई ओत्सयि श्रीगुरुई धम्मोपदेश देइ वि० सं० १२९८ वर्षि वि भाइने दीक्षा दे वीपपि १, अनि भीमर्षि २ ए नाम दीधा । तिहां थकी हरीयाणी नगरी उमासे रही श्रीपावकाचलि संभवदेव पदी श्रीदेविंद्रसरी कर्पटवाणिज नगरी आव्या। हवि श्रीखंभायत नगरे ८७ ।

२०८ विविषगाय पावली संग्रह श्रीदेवेंद्रसूरी संभापति आवो चौमासी रह्या । श्रीगुरु सदैव उपगारीपणि धर्मकथा कई छ। एकदा गुरुवाण रंजित थको श्रीगुरु प्रति श्रीमालि सा० सोनी भीमजी वीनती कहइं-'श्रीगुरु मुझने कृपा करी काइक हित शिक्षा कहो ।' तिवारी गुरु कईई-सत्य वचन मुपथकी बोली मनुष्य जन्म सफल करो।' ते सांमली भीमजी मनस्युं विचारई जे सोनारनभी व्यापार तो मिथ्या वचननो ज छई, पिण मुझस्युं गुरुनु बचन क्रिम लोपाई एवू मनि धारी गुरुमुसि सो० भीमजीई एयु नियम लीधुं जे मई सदाकालि सत्य बोलविण असत्य नहीं । ते घणे यले सत्यनीयम जालयीने रापई। एम्दा सोनी भीमजीनई महितरि चोरे ग्रयो। भीमजीनई मील पूछई-'तुझ घरी केतलो द्रव्य छई ?' तिगारें सोनी भीमजी मनस्युं विचारीनें कहें छईजे-'चार हजार रुक्मनो घर वापरो छई। भील्ल तेंवलो ज द्रव्य मांगई, तिवारई सो भीमनीनई पुत्रह सोटा नकलची इन्ये नोपजाबी डंड भरवानी चोरनी आप्या कही, परपी लीओ। भील्ल कहि-' इहां पुण पारखू। एहि ज सोनार छई।' कारागारथकी काही कहई-'आ द्रव्यनी परिक्षा करी।' विवार भीमजी चित्तस्यु विचारई जे-‘कृतकर्म उदय च्या छई, अनि बली उदय आवई, तो हुँ मिथ्या न कहुँ।' एहवं जांणी, कही-'ए द्राम सकल सोटा छे।' ते भीमनीनु वचन चोर सांभली मनस्युं चिंताई जे एकतो आपणा पुनने झूठो कीधौ, अनि आपि पण यदीसाने रयो । इणि सोनी भीमजीइ रिस्यु कीधैं ? तिवारई भीमजी कढई-' मिथ्या कहानो माहरई नीयम छ।' चोरे पिण तिम ज अन्य मनुष्य मुसि सांभल्यु । सत्यवादी जांगी पल्लीपतिई पाच वस्त्र पहिराची गांमनो कामदार थापी घणे आदरें घरे मुक्यो । श्रीगुरुकीर्ति हुई। इति सूरी उपदेशात् सत्ये सो० भीमजी संबंध । श्रीदेविंद्रसरीई श्रीसंभायत नयरि छ 'कर्मग्रंथसूत्र' अनि तेइनी टीका, 'सिद्धपंचासीफासून ' अने तेइनी टीका, 'श्राद्धदिनकृत्यान' अनि तेहनी टीका, पुनः 'भाष्य' ३ तेहनी टीका; इत्यादि ग्रंथकारक श्रीदेवेंद्रसरी सत्यपुर नगरे वि० सं० १३३४ वर्षि स्वर्ग हो। एहवे देवना योगयी श्रीगुजरावई वीनापुर नगरई श्रीविद्यानंद- सूरी पिण दिन तेरनई गछ निराधार हुओ। पठी वडगडीक वृद्धशालिक श्रीक्षेमकीविसरी ममुप गोनीक आचार्य मीली श्रीपाल्हणपुर नगरि उ०श्रीधर्मकीर्तिनई सूरीपद देई श्रीधर्मघोपहरी नामई पाटथापना कीधी । तिणही न अवसरि ते प्रासादमंडपि गोमुस यति कुंकुमष्टि कीधी। एहवई वृद्धशाला विरुदधारक श्रीविजयचंद्रसरी तत्पट्टे श्रीक्षेमकीर्तिमरीई 'श्रीबृहत्कल्प' नी टीका वि० सं० १३३४ वर्षि वहितालीस हज्जार नीपजावी । ४६. तत्प? श्रीधर्मघोपसूरी- विजयवंत विहार करता तारणगिरें श्रीअजितनाथ बांदी श्रीवीजापुरे चौमासि रह्या ! तिहां सकल गृहस्थ सदेव श्रीगुरुमुसि धर्मव्याख्या सांभलि एतलि श्रीमाली दृद्धशाखा सा० पेयड उपदेश सांभली शुभाशय थकी पूज्यौ। श्रीगुरुनई कहई-'मुझ पूर्व तूछ पुण्यनई योगे करी महारई घरे सामानपणाई अल्प द्रव्य छई तेह यकी मुझनें पांचमी परिग्रह परिमांण व्रत उचरावभो । आत्मार्थे माहरई रुक्म पंचशत रापवा ते उपरांत नीयम । तिवारि श्रीमरी कहै-'है गृहस्थ ! तुम्हारा पूर्वकृत पुण्य करी तुम्हारे भाग्यनो उदय हुणहार छई, तेह थी तुम्ह निमि- तई पांच हजार रुक्मनी जयणा रापो। अधिक हूई ते सुकृति करज्यो । इम कही परिग्रहभमांण व्रत श्रीगुरुई उचराव्यो । तिबार पछी सा० पेथड लाटावल्ली गामि वस्त्र, गुड, घी, साफर, सांड, लवण, तेल, हींग, हळद प्रमुष व्यापार की केतले दिने पुन्योदये राजा श्रीसारंगदेवनो कामदार हो। माहारुद्धि पाम्यो । तिवारई पोताना -- २०९ - लटकई। वाच दीधी-'तुम्हारइं गछई उपद्रव नहीं करूं।' प्रभात कालि संघाग्राहि मूकी। तिहां थकी दरी विहार फरता मालव देशि मांडवगढि आन्या। तिहां श्रीसरीना उपदेशयको माग्वाटज्ञाति वृद्धशापाई सं० पृथवीपर यहिता. लीस हेम घडी वेची मासाद एकवीस स्वदेसि अनि धार नगरई ममुपई निपजान्या । ते माहि मूलनायक सफल सप्तधातुना थाप्या । श्रीधर्मघोपसरीइं प्रतिष्ठया । श्रीगुरु ब्रह्मडल नगरे आव्या, विहां रात्रि अहिडंस हुओ, वीरवंशावली पुत्र झांझणने वडाउली गामि परणान्यो । सा• झांझण पोतानो स्वामी जाणी राजा श्रीसारंगदेवनइं जुहार करवा गयो । तिवारे सारंगदेवई सा० झांझणनी याल स्त्रीने ओत्सवई बईसारी पोताने देशि, नगर, गाममति प्रतिमनुष्यई मुवर्ण गदीयाणो एक कंचूकीने ठिकाणे दीधो । तिवारि सा. पेथडनई घरें थोडई दिनई घणो सुवर्ण हुओ। मनस्यु विचारई जे माहरई तो श्रीगुरु वचनानुसारी पांच हजार रुझानो खप छइ । पिण द्रव्य अधिक सुकृतई देवो । एहवई श्रीपर्व आव्यई हुँते परिग्रह परमाण व्रतना दायक उपगारि गुरु श्रीधर्मघोपसरीने चैत्यपरवाडि श्रीचिंता- भणी पासना दर्शनना अवसरे ७२ हजार टका संघने पहिरांमणी कीधी। संघवात्सल कीघो। श्रीगुरु उपदेश- थकी बावन देवकुलिकायुक्त कोडाकोडी नामि मासाद प्रमुप ८४ प्रासाद् निपजाच्या । शत जीणोद्धार निपजाव्या। पुनः च्यार ज्ञानकोश अणहिल्लपत्न- लिपाव्या। त्रिण शत पासादने शिपरई स्वर्ण कलस नीपजाव्या। श्रीगुरुने वचने श्रीसिद्धाचलि १, तारणगिरे २, श्रीविजानगरे ३, श्रीपोसीना गामि ४, इडरगढि ५-ए पंच तीर्थनो संघपति हो । छप्पन्न धडी सुवर्णव्ययई श्रीसिद्धाचलई श्रीवर्तमान चौवीसीई प्रथम जिनना मुखागलई सा० पेथडे इंद्रमालक पिहरी । वर्ष घत्रीसं समई श्रीगुरुमुपि ब्रह्मवत लीघो। पुनः एकवीस धडी सुवर्णनी खोल, आंगुल त्रणनी प्रमाण जाडी उपजावी ते खोली मूल गंभारानो मंडप कीघो। इणि परि सा० पेथड पूत्र सा. शांझणे अढार भार कांचन वावरी स्वन्यायोपार्जित लक्षमी सफली कीधी। एकदा एकादशी दिने वृद्ध सप्त (?) श्रादी व्याख्यान अवसरई श्रीगुरुनें वांदी कहें-'चेलाभो ! तुम्हे ते पाट महेलवा किम विसरी गया।' तिवारई गुरु कहि-'इम हीज पईसओ।' तिवारे ते श्राद्ध व्यंतरी कही-'अमारी नीति हुइ ते किम मिटइं ।' एतलि सप्त श्रादीरूप व्यंतरीने चेले पाटला आधा लीधा, ते बेठे एतले श्रीगुरुई पाटलाई यंभी । धर्मकथा विसर्जनइ ते घरे जायवा उठी, तिवारे पाटला आसनी विलगा आव्या । लोके हास्य हुओ। ते व्यंतरी रांकपणुं मुखई उचरई-आज पछी एहवी साधुनो अविनय नही करुं ।' श्रीगुरे दया आणी, पाटलाना बंधनथकी मुंकी । ते गुरु वांदी घरे पुहती, पिण चित्ते गुरु उपरि रोप वहई । एकदा ते सीए कार्मण ५ वटका साधुनें वहिराव्या । ते वटक गोचरी आलोतां श्रीमरीई दीठा । तिवारई ते व्यंतरी गुरुदृष्टि नाठि, ते चटक श्रीसरीई साधने आहारे निषेद्या । एकांति भूमि {काव्या। विजे दिनई प्रभाति जोया ते पापांणना वटक दीठा । पुनः केतले दिने ते व्यंतरीई श्रीगुरुनो मुस्वर जाणी, स्वरभंग करवाने गुरुनी गलनालकंठि केशनो गुच्छ कापी एतले श्रीमरिई ते व्यंतरी कर्तव्य जांणी गलनालकंठि रजहरण फेरव्यो । श्रीमूरिनई समाध हुई। उष्ण कालि श्रीबीजापुरथको विहार करता गोधिरा नगरई अव्या । तिहां डाकिणिनां उपद्रवयकी सांजनी वेलाई साधु घंटा- कर्णन मना मंत्राने कपाट देता, अने जे दीवसई श्रीसरी आव्या तेहि न दिने उतावली रात्रिई कोइक अनाण साधुई घंटाकर्णनी मंत्र भण्या विगेर शालाना कपाटनी जयणा कीधी । गुरु पिण पोरसी कही पाटि संधार्या छई, निद्राई आव्या । एतली व्यंतरी च्यारे मीली आवी संथार्यानी पाटि च्यारे पाइया उपाडी आकासे लेई चाली । एतलाई श्रीगुरु जान्या, डाकिणी जांणी, चिंई दिसि रजहरण फेरव्यो । तेतले डाकिणी आकासें मस्तकं पाट सहित अपर विव २७ विविधगच्छीय पट्टावली संग्रह संघने व्यग्र चित्त जाणी श्रीमुरी संघ पति कहई-'प्रभाति नगरनी पोल उघडसि, तिवारई प्रथम मुका काष्ठनी भारी आवस्यई, ते माहि काववणि सकल महाविपापहारण नामि ओपधीनो मूल सर्पाकारी हुसई, तेहनी आदा खंठम् घसी अहिडंके देज्यो । एवलि मुझनी समाधि धास्य ।। श्रीसंघि तिमजकीयो । श्रीगुरु समाधि पणि हुआ । ते दिनथकी श्रीसरीई जावजीव लगी छ विगयनो नीम लोधी, अनि सदाकाल युगंधरीनो आहार करयो, ए बिहु नीम लीई, श्रीमरी अवंती पासना दर्शनई उत्कंठीतयको उज्जेणी नगरई आव्या। तिहां पासंडोना उपद्रवयकी यती कोई चोमासु न रहई । ते सकल वार्ता श्रीगुरुई संघनी पूछी निर्णय कीधो। एतले मध्याने यति गौचरी जाता यागारी देषी पासंडी जटीले यतीने बोलावी कहे-'तुझे अन चौमासई थिर हुई रहिज्यो । तिवारई ते यत्ति कहें-'रहिवानई आव्यो , ते रहियुंज।' ते सांगली तिणे पापंडीए यतीने कर दांत देयाश्या । तिवारई यतीई हनी कूदणी देपाडी । ते सरुल वार्ता साधुई आगरी श्रीसूरीने कडी । गुरु कहई-भलु ।' एतले संध्यानई समयई प्रतिक्रमण कीधा पछी तिणें जटिलें शालाई कोइक मंननई योगई करी मूषक मेल्या । साधुई गुरुनि कयौ, एतलि श्रीमरीई नूतन घटनई भूपई कल्पक आछादी गुरुदत्त आम्नाय स्मरण कीधौ । विवारई ते नहील चुंबांट करतो आवी गुरुनई नमी कहई-'आज पछी जुह्म गछि उपद्रव नहीं करूं। मई तुम्हने जाग्या नहीं।' इम कही स्त्रयानिके गयो । श्रीगुरु कीर्ति हुइ। तिहां थकी विहार करता नोलाई नगरें चौमासि रहा । एहबई संघाचार १, कालसत्तरि २, कायस्थिति ३, प्रमुष ग्रंथकारक विक्र० सं० १३४७ वर्षि श्रीधर्मयोपमरी स्वर्ग हो। एहवइं गुज्जराति वीसलनगरा वाडव मंत्री मायब भाइ केशवयकी राजा श्रीकर्ण लडीनई तूरकाणी राज्य हो। पुनः वि० सं० १३६३ वर्षि सिद्धपुरनगरि सिधरायकृत रुद्रालयनो हेद हो । ४७. तत्पढे श्रीसोमप्रभसूरी- तेहनो वि० सं० १३१० वर्षे जन्म ! वि० सं० १३२१ वर्षि व्रत ! वि० सं० १३३२ वर्षि वरीपद । श्रीसरीने ईग्यार अंग सूत्रार्थ तभय जिहाग्रि नित्य स्वाध्याय करता । भूमंडलि शोल, तप, संजम आराधता मालब देशि विवरई । पहवि स्वगौत्रिया वृद्धशालिक श्रीरत्नाकरहरी प्रगट हूया, तेइनो संबंध कहई छई, श्रीरत्नाकरसूरी- गुर्जर देशि रायसंढी बडली नगरी वृद्धशालाई श्रीरत्नाकरवरी सप्त कलसि मुक्ताफलना परिग्रहधारक रहेई छ । एहये धवलका नगरनो वासी पाबाट वृद्ध शा० सा० रुनो व्यवसापार्षि तिहां आव्यो । श्रीवितामणि पासने नमी शालाई श्रीरलाकरबरी बंधा, सपरिग्रहि दीठा । तथापि श्रीसरीने महा उत्तम जांणी सा० रुनी यहई-'स्वामी तुम्हे मुझने पट्मासनो नियमनो प्रासाद करो । तिवारी श्रीरत्नाकरहरी कहें-'किस्पो नियम ?' सा रुनो कहई-'तुम्ह वांदि अन्न लेचो । जे दिने न वांदु तो अन्न न लीऊ ।' हनी श्रीगुरु तिमन नियम दियो । एतले ते श्रावक छ मासनो अभिग्रही हो । निरंतर सूर्योदय श्रीपासनई नमी एसी रत्नाकरसूरीने निण्य प्रदिक्षणाई वांदी मुखाग्रि उभो रहि विहु हाथ जोडी सुपी महर्षि उपसमनी गाथा कही विरुदावई छई । ते गाया- गोयम सोहम जेबू पभवो सिबंभवा य आयरिया अन्नेवि जुगप्पहाणा ते दीठहं सुगुम ते दीठा ॥ अज कयत्यो जम्मो अज्ज कयत्यो जीवियं मुन्न । जेण तुह वदणामयरसेण सिदाई नैणाई ॥ ८८ ! आदिनाथस्य देवस्य दर्शनेनापि तद, भवेत् ॥ येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुपो भवेत् ।। वि० सं० १३७१ वर्षे श्रीशजय गिरे श्रीरुपवि थापि पंदरमो उद्धार निपजाध्यो। श्रीगुरुनो उपदेश एहवो सा० समरो पामी श्रीसिद्धशैलि श्रीसोमममसूरी युक्त विलक्ष मनुष्यइं संबपति हुई पौर वंशावली ववरीया सुरघेणु संजाया मह गिहे कणयहि । दारिदं अज मयं दिठे तुह सुगुरु मुहकमले । पुन:- पंचिंदिय संवरणो० ॥ पंचमहब्वयजुत्तो० ॥ एडवा वृद्ध आचार्यनी उपमा आपी हेठो बेसई धिर्यपणइं श्रीसूरी प्रति ललित वाक्यि करी ए गाथानो अर्थ पूछई। ने गाथा- दोसस्स मूलजालं पुवरिपि विवज्जियं जइ वत्थं । अयं वहसि अनघं किं च अन्नत्थ तवं चरसि ॥ इणि परि ते गाथानो अरथ पूछतां संपूर्ण छमास हुआ। श्रीसरी पिण तेहनी निरंतर बुद्धिने माक्रमइ थकी ते गायानो नवो नवो अर्थ कही समुज्झावई । अनुक्रमि छमासने अंतें सा० रुनो गुरुनें चांदी कहई-'भवतारक निग्रंथ सांमी ! मूझ अजाणनई जेहवो अर्थ हुई तेहवो ज कहओ।' तिवारई श्रीसरी मनस्युं विचारि जे ए गृहस्थ घणे उद्यमि मुजनई हितू पणाई हूई छई । गुरु कहे छई-' हे गृहस्थ ! तुम्हे प्रभाति अवस्य आवीवो । किस्या माटि जे हिवणां सत्य अर्थ क्यानो समय छई नहीं।' इम कही विसर्जव्यौ । विवारि संध्याइं श्रीगुरु कलसी सात मुक्ताफलनो परिग्रह असार जाणी घरटीई पीसी छारी दोधो, एतले स्वशिष्य आ० श्रीरत्नप्रभसूरी कहे-'श्रीगुरु आ किस्य ?' तिवारि गुरु कहि-'मुझ प्रतिवोधक गृहस्थनें ए गाथानो सत्यार्थ कहियो छई तेह थकी कहिणी अनि करणीमां फेर हुई। बीजई दीने प्रभाते ते सा० रुनभो आवी पहिलानी परि वांदि मुपथकी कहई-'तुम्हे कृपानिधि मुझने प्रसन्न हुई। सत्यार्थ कहो ।' ते गृहस्थ वचन सांभली श्रीगरि रजहरण मुपपट्टी प्रमुख साधु धर्मना उपगरण संभाली नीरवध यकी 'दोसस्स मुलजालं० ।' ए गायानो यथार्थ अर्थ कह्यौ । एतलि ते श्रावकि सात कलसा मुक्ताफलनो चूर्ण छारी दीधो देपी कहई-'आज मई तुह्म मुखि सत्यार्थ घणे दिहाडई सांभली तुम्हारी कृपाथकी हुँ भी निसारयौ । आज तुह्मारा दर्शनथकी मुझ जन्म कृतार्थ हुओ। तुझे श्रीवीरना पट्टधर हुई शासन शोभावो। इम विरुदावि सा नो अनुक्रमि स्वघरे धवलफई नगर पुंहतो। एतलि श्रीगुरु स्वशिष्य श्रीरत्नमभवरीने गछ मलावी श्रीसंघनी आज्ञा लही निस्पृह हुई विहार कीधो। केतलेंक दिने श्रीमरी चित्तोड गढी आया। तिहां ओ० छर्कट चुपडा गोत्रि सा० समरा प्रति धर्मापदेश कहै छई । यत:- सव्यं १-सुकुले जन्म २-सिद्धिक्षेत्र ३-समाधयः । संघश्चतुर्विधो लोके ५ सकाराः पंच दुर्लभाः ९२ अष्टषष्टिषु तीर्थेषु यत् पुण्यं किल यात्रया। ९३ जिनं नत्वा मुनि भक्त्या कृत्या साधर्मिवात्सल्यम् । .

-- म २१२ विविधगच्छीय पहावली प्रह विहां संघ साक्षि श्रीरुपमना मुप आगलि श्रीरत्नाकरारीई स्व चारित्रपंडण आलोयगिलपि 'श्रेयः श्रियां मंगल०' रूप स्तवने पंचवीसी निपजावी । तेहमाहि पोताना आत्मानी शिक्षारूपई वैराग्यना काव्य कहे छै-- वैराग्यरङ्गः परवचनाय० ॥ परोपवादेन मुख सदोपं० ।। एहवा ८ काव्यरूप आलोयण लेई लघुम्मि हूई घणा जीवनें उपगारीका वि० सं० १३८४ वर्षि सा समर उपदेशक श्रीरत्नाकरसरीनो स्वर्ग हो । यदोक्तं- महयाडंवरजुत्तो सूरीपर्य वडापल्लीए जाय । रयणायरसूरी नामेण जाओ सासर्पमि सिणगारो॥ इणि परि श्रीरत्नाकरसूरिसंबंध ।। पुनः वि० सं० १३७५ वर्षि श्रीसोममभसूरी स्वर्ग हुओ। ४८. तत्पढे श्रीसोमतिलकसूरी- तेहनो वि० सं० १३५५ वर्षि जन्म । वि० सं० १३६९ वर्षि दीक्षा । वि० सं० १३७३ वर्षि सूरीपद । श्रीखरी विहार करता श्रीसिरोही नगरई चोमासि रहा। तिहां श्रीचंद्रशेखरसरी १, श्रीजयानंदसरी २, श्रीदेव- सुंदरसूरी ३-ए त्रिहुं शिष्योनें श्रीमरीइ मरीपदि कीधा। एहवई 'देवा प्रभोऽयं० । स्तवनकारक श्रीजयानंदसरि श्रीगुरु चिरंजीवीथका स्वर्ग हुया । ' नव्यक्षेत्रसमास, सत्तरीसपठाणा, श्रीतीर्थरानस्तुती' प्रमुप ग्रंथकारक श्रीसोम- विलासरी वि० सं० १४२४ वर्षि स्वर्ग हुआ। ४९. तत्पर श्रीदेवसुंदरसूरी, लघु गुरुभाइ श्रीचंद्रशेखरसूरी- श्रीदेवसुंदरसूरीनो वि० सं० १३९६ वर्षि जन्म ! वि० सं० १४०४ वर्षि लघु मरदेसि महेश्वर गामि ब्रत । वि० सं १४२० वर्षि अगाष्पित्ती भरीपद । पहबई वि० सं० १४४८ वर्षि श्रीभहीमदावाद नयरपणुं । वि० सं० १४५५ वर्षि ओ० वृ० सा० आंबामाई सा० गणिआ श्रीसिद्धाचलि संघपति हुया। पुनः वि० सं० १४५६ वर्षि सा० आंबाई त लीघो। श्रीदेवसुंदरसरीनो शिष्य हुओ। वि० सं० १४६२ वर्षि पावसाई गजनीपान आन्यई इंतई श्रीसिद्धाचलि सा समरा थापक मूलनायफर्षिय श्रीचक्रेश्वरीई असुरनो उपद्रव नाणी अलोप पीयो । पछी सवा त्रीण पहोरे पाछो मूक्यौ । पुनः रापसंडि बडालीवास्तव्य ओ० १० सा० गोविंदई असुरनो उपद्रव देपी तारणगिरई श्रीकुमारपाल थापित मालानो श्रीअनितनाथनो विध भूमीगृहे भंडारी प्रासादमध्ये नवीन विध याप्यो । श्रीदेवसुंदरसूरीई मतिष्ठयो । विहां श्रीवरीई स्वपंच शिप्य तेहने सरीपदें कीघा ! ते पावना नाम कहे छई-पहिला श्रीज्ञानसागरवरी ते 'आवश्पकभाचूरी १, ओपनियुक्तिनी अवचूरी २ ' प्रमुप ग्रंथकारक ॥१॥ बीजा श्रीकुलमंडनमरी ते ' श्रीकुमारपालचरित्र 'ना कारक ॥२॥ श्रीजा श्रीगुणरत्नसूरी जेहनी अवष्टंम १, रोप २ अनि त्रिकथा ३-ए त्रिहुनी ते नीम छई । 'क्रियारल- समुन्वय १, पट्दर्शनसमुच्चय २' पप ग्रंथकारक ॥३ - २१३ वीर वंशावली चोया श्रीसाधुरत्नखरी ते 'यतिजीतकल्प ' नी टीकाना कारक ४-ए च्यार शिष्य श्रीगुरु चिरंजीव थकई अल्प आयुइं स्वर्ग हुआ । अनि पांचमा शिष्य श्रीसोमसुंदरवरी विद्यमान विहरंत जाणी श्रीमरीई श्रीसोमसुंदरसरीने कछदेशि विहारनी आज्ञा दीधी। एतलई श्रीसोमसुंदरसूरी केतलेंक दिने देवकई पत्तने गया। नवखंडई, श्रीसिद्ध- क्षेत्र, श्रीरैवताचल फरसी देवके पचने गया। गुरु देवमुंदर गोपगिरई श्रीवीरदर्शन करी केतलेंक दिने,दील्ली नगरई पुहता तिहां श्रीमाली दृ० सा० जगसिंह १, भाइ सा० महणसिहि २ श्रीतपागछइं समस्त संघने संघवाछल नीपजाची श्रीजिनदर्शननई समयई चुरासि हजार टका मुकृति करी सदस्य आभूपणि तिलकें ए रीते हुओ । एहवई ओडछा नगरई वि० सं० १४६२ वर्षि श्रीदेवसुंदरमरी स्वर्ग हुओ। ५०. तत्पट्टे श्रीसोमसुंदरसूरी- तेहनो वि० सं० १४३० वर्षे जन्म । विक्र० सं० १४३७ वर्षि व्रत । वि० सं० १४५० वर्षि वाचकपद । वि० सं० १४५७ वर्षि सूरीपद हुओ। श्रीगुरु भुजपत्तनई, अंबारई, मांडवी प्रमुष नगरे विचरता चउबारी नगरीई महाक्रियावंत महिमामंदिर गुरू प्रतिदेषी तिहां कोइक रुठई द्रव्यलींगीई द्रव्य देई शस्त्रधारक पुरुपनई गुरुयातार्थि सज्ज कीधो । ते दुवुदि वसतीई गुरु घातार्थ गुप्तपणई रह्यो । जेतलई अनुचित काम करवा उद्यम करई एतलई चंद्रमाने अजूआलई श्रीगुरु रजहरणि निद्रामांहि पुंजी पासु पालटयूं । वधकारक पुरुपई चितव्यूं जे निद्रामांहि पिण जेहनई जीव उपरई हवी कृपा छई, एहवा महापुरुपनो वध करी मुझनी कुण गति जावं । एइयो विचारी परलोक- थकी वीहतो श्रीसरीनई नमी स्वघरे पोहतो । विहां थकी गुरु विहार करता केतलंक दीने मालब देशि आमझरे नगरई आव्या । एहचई सो० संग्राम प्रगट थयो, तेहनो संबंध कहे छे, सो० संग्रामसिंह- गुजरात देशि वढीयारखंडे लोलाडा ग्रामि प्राग्वाट ४० पूसगोत्री सोनी अवटंकई संग्राम नामे रहि छई। ते कोइ समयानुयोगि मालव देशि मांडवगदि चिकथा श्रीग्यासदिनने राज्ये, माता नाम देवां, स्त्री नाम वेजा, पूत्री नाम हाँसी-ए परिवार सहित जेतलई मांडयगढि नगरनी पोलि पइंसई तेइवई डावी दिशि महामणीधरें पूण कीधो छई अनि तेह फूणि उपरि दुर्गा पईठि सहर्षित शब्द करई छई। ते अचरिज देपी सपरिवारि संग्राम उमो रह्यो । एहवई तिहां एक आहेडी उभो छई। ते संग्रामने देशांतरी जाणी कहई-' ए शकुनी जे नगरमा पइसई तेहने ते महारुदिना देणहार छै ।' तेह चिकथा श्रीग्यासदीन हज्जूर रहई । ते शब्द अनि शकुन सांमली चित्ते घरी सहर्ष ओछाइ सो० संग्रामई नगरपोलि प्रवेश कीयो । राजदरवार पासई आवी रह्यो । अल्प द्रव्ययी थोड थोड्ड तेल, नाना प्रकारनो घी, गुड, हिंग, मिरची, साकर, श्चेत, रक्त वख, पुनः सौगंधिक प्रमुपनो व्यापार करई । पून्य प्रमाणि मुपि तिहां काल नीगमी ! एकदा उष्णकालि चि० श्रीग्यासदीने असवारी कीधी । एतलई यणा वापयोगि चिकया स्वदरवारनी दृक्षवाटीकाई, सुंदराकार शापाई, मतिशापाई, हरिकुंपल पत्रई, मनोहर सुपटाई, शीतल मुछाया दीपी उभा रही वीसामी लेइ स्वस्त हुई । ते सहकारने देखी आरामिकनई चिकया कहई-'सब आंवकु फल हई पिण इस आंवकू फल क्युं नहीं ? ' तिवारें आरामिक कहई-पा० सिलामित इस आंरके दसतमे सब गुण अ, पिण एक अएव पुरी हई, जे फल नहीं । वांजोए आंव इंई ।' एहवो वचन पुष्पपालकनो सामली श्रीग्यासदीन कहई-' इस पांझीए आंघकी सूरत देपी कूण कामका । इसे वाडीसे काट डालौ । एहवई पुन्योदय -यको सो संग्राम पिण ते पाटिकानई जुई छई । तिणि चिकया कहिण सांमली मनस्युं विचारि जे ए उचम नव- - २१० विविधगयीय पावलीस मह पल्ला यक्ष ते तुरत कादसिई, एहनई हु अभयदान देउ ! धर्म प्रभावि महा मंगलिक हुसई । विणहि ज वेलाई- हद चिनई संग्रामि सरल जन देयतां चिश्था श्रीग्यासदीनने सिलाम करी अरजी फरई छई-जे ए आंव जन्म- वंध्य हई पिण मुजे एक मुहमांग्या दीओ । महा पसाय करो। आपतई जेप्ठ मासे इन आपके फल श्रीपातसाहक, मेट करूं।' ते अचिरज गात सांमली चिस्था संग्रामनई कहई-'आरतई जेप्टी इणि दिने ईस आंरके फल न लाया तो इस आंका जैसे हमाल्ल तैसे तेरा वाल्ल ।' ते बात संग्रामि अंगिकार कीधी । चिकयो १, अनि संग्राम २ स्वपरि आन्या । पूर्वोदयना योगयकी सो० संग्रामनो अत्र थी भाग्योदय हुओ। ते वात सबली मावानई स्त्रीनई कही । इनई संग्रामई ते सहकारनई पवाडइंस्निायत तथा चंदआ यंधारी स्नानादिर मुचि हूइ पवित्र वस्त्र धरी निर्मल चित्रं धूप, दीप, चंदन, अक्षत, पुप्प ते आगंनई अर्चई, एतले शीलगुणई साहसीक नाणीनई पूर्वमवी वणिक सा० आंग नामि द्रव्यधारक इणि स्थानिक रहितो, ते वांझियो मरण पांमी इणही ज स्वद्रव्य स्यानिके वीर्ने मवई आंबो वृक्ष हुओ। ते आंबानो जीव आवी संग्रामनई यहई-'तें मुझनि अभयदान दीयो छई वेह यरी हुँ तुज प्रति तूठौ । ए आंबाना मूल हेठि द्रव्य छई ते तूं भूमि पनि काटि सेजे । ए तूझ भाग्यनी छई।' ते वचर्ने संग्रामि तिम ज लघु लाघवो कलाना योगथकी माता स्त्री पूनी प्रमुपी ते द्रव्य स्वटहे याप्यो । आंगानी मूलि पाणी लूण माटीई करी सिंच्यो । अनुक्रमि उप्णकालि ते सदमारी मुगंध मुहर आवी तिमन फल हया। ते फल यत्ने जालवी सध्यासि आादि गीत बाजींनई चि० श्रीग्यासदीनने चरणे भेटी कीया। संग्राम हाय नोडी कहई- 'पा सिलामिव ! ए फल सुगंधी बागीए आंवके ।' ते सांभली ग्यासदीन नूठो, पांच यख देई घरि कामदार कीयो । संपदावंत हो। एहवई तिहां विदरता श्रीसोमझदरम्री आच्या । सो० संग्राम संघ समस्तना आग्रइई विहां मांडवगदि श्रीसरि चउमासई रह्या । सदैव मर्यादयी 'श्रीभगवतीअंग'नी व्याख्या कहई। सो. संग्राम १, माता २, स्त्री ३ सहित निश्चल निर्मलई चित्ते सदहणाई सांभली। जिहां छतीस हजार बार 'गोयमा ! गोयमा!' एइ, नाम आवई तिहां सो० संग्राम नामि नामि एक एक सौनइओ मुगई। एतलई श्रीभगवतीमत्र अंग संपूर्णि छत्रीस हजार सोनइआ सो० संग्रामइनी नेश्राई हूया । तेह यकी अर्थ सोनइओ मातानी नेश्रानो । तेह यकी अर्थ सोनइओ भार्यानी नेश्राई हो । एवं संख्याई बहिसठि हज्जार सोनइया हुया । सो० संग्राम श्रीगुरुनई कहई-'आ ज्ञानद्रव्य लीओ।' गुरु कहई-'साधु हुइ ते ए द्रव्य पाप दोपर्नु मूल जांणी एह यकी वेगलो रहि, जेह थकी पंचमहावत जाई । तिण थकी ए ज्ञान द्रव्यई ज्ञाननो यत्न करो।' लिखापयन्ति जिनशासनपुस्तिकानि व्याख्यानयन्ति च पठन्ति च पाठयन्ति । शृण्वन्ति रक्षणविधौ च समाद्रियन्ते ते मर्त्य -देव शिवशर्म नरा लभन्ते ।। भक्ष्याभक्ष्यं तथापेयं पेयं वा कृत्याकृस्ययोः। गम्यागम्यं तथा ज्ञेयं हेयोपादेयकादिकम् ।। जेह यकी श्रीवीरवाणी ओलखी प्राणी प्रत्यक्ष मुसने वरई । एy वचन श्रीगुरुचं सांमली सोनी संग्रामे पहिलांना बहिसठि हजार सोनईया, पुनः अन्य द्रव्य स्वघरथकी लीधो तेइनी संख्या एक लाप अनि पिस्तालिस इनार सोनइया एकठा मेली वि० स० १४५१ वर्षि श्रीरल्पाध्ययन सूत्र १, अनि आ० श्रीकालासरीक्या २-एवं सचित्रीत स्वर्णाक्षरे तथा रूपाक्षरि लिसाची सकल साधु प्रति ज्ञानपुण्यार्थे ते प्रति यांचवा भणवा दीधी। केलिक पति शानकोशिशॉनलाभार्यि थापि । पुनः गुरुवाक्ये मालवमंडले श्रीमांडवगढि श्रीमुपासनी मासाद, मगसिपुरई १६ ९७ श्रीनेमि प्रमुप सकल प्रासादना देव नमी विहां वर्षाकालि रह्या । तलेक वर्षे श्रीमूरि राणपूर नगरइं चौमासि रहा। पातमाह श्रीपीरोजना हुकमयी मा० ० सं० धरणि श्रीगुरुनी उपदेश लही वि० सं० १४६९ वर्षे श्रीराणपुर मतिष्ठा कीधी। प्रथम सं० १४९५ वर्षि सा० घरणो श्रीसिद्धाचलि संघवि हूओ । स्त्री वर्षे १८ मई सा० धरणो वर्ष २१ मई श्रीसिद्धाचली मुख्य तीर्थकरने आगली श्रीपाउसाह मंत्री ते सं० संघावे इंद्रमालनई अवसरई सजोडे चोयु व्रत उच्चरी, गुरुमुखी विहां पोते, सं० धरणि इंद्रमाल पिहिरि। पुनः सं० धरणो मुख्य जिनना मुखागिले बिहु हाय जोडी शुभ निर्मलाशययी विनती फरी किमु मांगइ छई ? गाया- सुलहो विमाणवासं एगच्छत्ता वि मेइणि य सुलहा । २१५ - वीरवंशावली श्रीमुगसिपासनो विमासाद वि० सं० १४७२ वर्षि थाप्यो। भेइ, मंदसोर, ब्रह्मडल, सामलीया, धार, नगर, खेडी, चंडाउलई प्रमुप नगरई सो० संग्रामि सत्तर प्रासाद निपजाव्या । इणिहि ज मरीई प्रतिष्ठ्या । एकावन जीगोंद्धार निपनाच्या । इत्यादिक मुकृत श्रीगुरुवचनि सो० संग्रामई कीयो इति । श्रीमी चरित्र, तप, शीलनई आराघता; द्रव्य १, क्षेत्र २, काल ३, भाव ४ अनुमाने विहार करता, पुनः गरि चटपद्र नगरई, संखेहडा नगरई, डभोइ नगरें जंयूसर न०, आमोद न०, संभायत न०, अहिंमदाबाद न०, बासापल्लीई, कोठर्च (?) पुरई, फरमान वाटिकाई, शिकंदरपूरी, विसलनगरि, श्रीटद्धनगरई आन्या । तिहां प्राग्वाट ४० सं० देवराने श्रीअभिनंदनस्वामीनो विच सप्त धातुमयि निपनान्यो। ते श्रीमुरीई प्रतिष्ठ्यौ । तिणदि ज अइसरि सं० देवराजिनई हर्षि स्वच्यार शिष्यनई सरीपद कीधा । तेहना नाम प्रथम मोहननंदन नाम श्रीमुनीसुंदर- सरी नाम दीयो १ । बीजा शिष्य जयउदय नाम श्रीनिनकिर्तिरि दीयो २ । त्रीजा शिष्य श्रीभुवनधर्मनो नाम श्रोमुत्रनमुंदरसरी दीयो ३ । चोया जयवंतही तेइनो नाम श्रीनिणसुंदरवरी दीपो ४ । वि० सं० १४७८ वर्ष छत्रीस हजार टंका व्ययई मरीपदोत्सव कोधा। ए च्यार शिष्य युक्त श्रीमुरी नगरी गामइं स्नात्रोपदेशना दायक तिहां यकी तारणगिरि श्रीअजित दर्शन करी इणाद्र, पोसीणा नगरई आव्या । श्रीगुरुना उपदेशें मा० १० सा धुलई श्रीरुपम १, श्रीशान्ति २, श्रीनेमि ३ श्रीपास ४, श्रीवीर ५-एवं पंचतीर्योना प्रासाद पांच जुदा जुदा निपनान्या । विहां यकी श्रीअदाचलनी यात्रा करी श्री भार्या नगरई आन्या। तिहां समस्त संघई श्रीगुरुने उपदेशी भार्या नगर मासाद कीयो । एवं भट्टां प्रमुप नगरई अदासनि श्रीवरीना उपदेशयकी सप्त प्रासाद नीपनाव्या। एकवीस जीर्णोद्धार हया । श्रीमरी नीतोहडा नगरें आव्या । विहां संपति नृपकारक प्रासादि वि० सं० १४८१ वर्षि देव- कापत्तनयको तेडावीने बाबायानी मूर्ति नीतोडे प्रासादमा पापि । तिहां यकी श्रीसरी जीवितस्वामी नंदीपुरे, पुनः वीरवाट श्रीबंगणवाहिनी यात्रा करी सरस्वतीने नमी अनुक्रमि मेवाडदेशी गोडवाडखंडे नाडलाइ नगरि ३ मासादारंभ कीयो । पुनः वि० सं० १४९८ वर्षि चतुर्मुपमासाद संपूर्ण हुओ। तिहां श्रीसीई कृष्णसरस्वती विरुदधारक श्रीमुनिसुंदरवरी १, 'महाविद्याविडंबन 'टीकाना कारक श्रीजिनकीर्तिमरी २, कंठगत एकादशांग स्त्रार्ययारक श्रीभुवन दरवरी ३, ' दीपालीकादि-माहात्म्य 'कारक श्रीजिनमुंदरखरी ४-५ च्यार शिष्य युक्ति सुमसकल, वसादि नव पाठक युक्त; पंडित, गणि, रुपी युक्त इत्यादि पांच शन साधुनई परिवारि करी सहीत वि० सं० १४९९ वर्षे सा० धरण निर्मापित त्रैलक्यदीपिका नामि चतुर्मुपमासादें श्रीरुपमादि अनेक विनी दुल्लहा पुण जीवाणं जिणंदवरसासणे योहा ॥ इणि परि मुशील प्रत आराधतो, निरंतर श्रीनिनमक्ति साचवतो अन्य घगा साधम्मिक पोपंतो संसारनि विविधगध्छीय पधावली संग्रह विपई रहि छई। श्रीगुरुई स्वशिष्य श्रीभुवनसुंदरसूरीनई श्रीशीरोही नगरई चौमासानी आज्ञा दीधी । पुनः श्रीजिनमुंदरवरीने . श्रीश्रीमाल नगरी चौमासानी आज्ञा कही । तिणे तिहां गुरुआज्ञा लही विहार कीयो । श्रीगुरु राणकपुरथकी विहूं शिष्य युक्ति नाडोल नगरो चौमासी आव्या । बर्षाकाल संपूर्ण स्वपट्टधर श्रीमुनिमुंदरसुरीनई गछ भलावी श्रीगुरु आम नृपतिनिर्मापित श्रीवीर दर्शनई उत्कंठित गोपनगरें चउमासी रहा । एवई 'भाप्य निणनी चूणि १, कल्याणक- स्तव २, रत्नकोश ३, पुनः योगशास्त्रनो ४, उपदेशमालानो ५, पडावश्यकनो ६, नव वचनो ७, आराधना पताकानो ८' इत्यादि ग्रंयनो वालाववोधना कारक श्रीसोमसुंदरखरी वि० सं० १५०१ वर्षे स्वर्ग हुया । ५१. तत्पट्टे श्रीमुनिसुंदरसूरी- तेइनो वि० सं० १४३६ वर्षि जन्म । सं० १४४३ वर्षे व्रत । सं० १४६६ पाठकपद । सं० १४७८ वर्षि सूरीपद । वाटलीना नादना एकशत अनि आठ शब्द तेहना ओलखणहार, श्रीकृष्णसरस्वती विरुदधारक, 'श्रीउपदेश- रत्नाकर' ग्रंथकारक, 'श्रीशांतिकर स्तवन निर्मापितेन तन्मंत्रितजलेन योगिनीकृत मारि उपवनिवारक, मुलभयोधी पाणिनें उपदेशदायक, श्रीमुनिसुदरमरि सं० १५०३ वर्षि श्री कोरटानगरें स्वर्ग लयौ । ५२. तत्प? श्रीरत्नशेखरसूरी, श्रीजयचंद्रसूरी- श्रीरत्नशेपरवरीनो सं० १४५७ वर्षि जन्म । सं० १४६३ वर्ष व्रत । सं० १४८३ वर्षे पं०पद । सं० १४९३. वर्षे वाचकपद । सं० १५०२ वर्षे सुरीपद । श्रीसूरीइं अजमेर नगर पार्चे वीठारपुरे श्रीनेमिविय प्रविष्ठ्यो । 'श्राद्ध- विधि सून-वृत्ति १, श्राद्धमतिक्रमणसूत्र-वृत्ति २, आचारमदीप ३' प्रमुप ग्रंथकारक । श्रीसरीनई यांणदेव्या दत्तवर यकी हस्तसिद्धि जाणवी । सं० १५११ वर्षे स्वर्ग हो ॥१॥ लघु गुरुमाई श्रीजयचंद्रखरी प्रतिक्रमणगर्भहेतु १, बीसस्थानिकनो विचारामृतसंग्रह २' इत्यादि ग्रंथकारक कुमुठीई गांमि स्वर्ग हुया ॥२॥ ५३. तत्पद्दे (१) श्रीलक्ष्मीसागरसूरी, (२) श्रीसोमदेवसूरी, (३) श्रीसोमजयसूरी- श्रीलक्ष्मीसागरसूरी तेहनो वि० सं० १४६४ वर्षे जन्म हुओ। सं० १४७० वर्षे व्रत । सं० १४७९ वर्षे पं० पद । वि० सं० १५०१ वर्षि पाठकपद । सं० १५०८ वर्षे आ० पद । सं० १५१५ वर्षे गछनायकपद । श्रीमरीना उपदेश- यकी बागडदेशि गिरिपुर नगरे सो० साल्हे श्रीगंभीरापासनो प्रासाद निपजाव्यो। पुनः मालव देशि घारनगरें श्रीगुरुना उपदेशि मा० १० सं० ह«सिंहई सप्त घडी सुवर्णमुकृति भासाद ईग्यार निपजान्यो। एहवि गुजराति अणहिल्लपचनई जिनर्विवोत्थापक सा० लूको प्रगट हुओ । सा॰ लुफानी उत्पत्ती कहि छई- यथा गुजरे अणहिल्लाख्य पत्तने नूतनपाटकि मा० ० धवेचा गोत्रं सा० लुको एक सामान्य पणि रहि छई। ते पुनिमगछ गुरु संयोगई जैनलिपि शिख्यौ । तिणे वि० सं० १५२८ वर्षे ज्ञानकोशि जैन सिद्धान्त बार ७ लिख्या। ते साल ज्ञानद्रव्य लेवां थकां साडासत्तर दोकडा रवा लिखवाना। सा० लुको गृहस्थनें कहें-'साडासत्तर दोकडा.... ज्ञान पिण घणो लिख्यो छै । सानद्रव्य मांहि यकी काढी आप्यौ । तिवारे गृहस्थ फहै-'सा० लुका तुम्हे जैन अम्मि छो, एतलो तुम्हने ज्ञानलाम हुभो ।' शालाई जाई साधुनई कहै-'तुम्हे श्रावकनई कहो, तुमारई उपदेशि कायना जीवनी विराधना हुई। तेह थकी जिनविंव आराधक नही। ए प्रासादवि सर्व मिथ्या छई।' ते सांभली श्रीगीतार्थि समझान्यौ पिण ते लुको कदाग्रह न मुकई । जिनर्विवनी निंदा करतो जांणी ज्ञातीपंक्ति वाह्य कीयो । सिद्धपुर नगरें आव्यो । तिहां माग्वाटि तपा लुकाई ज्ञातिभेद हुओ। विहां यकी केवलेक दीने श्रीसीरोही देशि अरटवाडि गांमई आव्यों, तिहां उपकेश वृद्धशापाइं सा० भाणो रहि छई, तिणि समणोपासक सा० लुकानो उपदेश एतले वि० सं० १५३५ वर्षे श्रीसत्यपुर सा लुकानो आयु पूर्ण हुओ। तिहां थकी रु० भाणो शिप्य रु० भीदा गुजराति अहिमदावाद नगरमाहि शाहापुरी उष्णकालि आवी रह्या । तिहां रु० भीदानो उपदेश सांमली श्रीमाली लघुशापाई सा० नानचंदि रु० भीदा हस्ते दिक्षा लीधी। नानांरुपि नाम दीधुं । तेहनो शिप्य रूपरुपि हुओ। इत्यादि कुमती छ तेहनो संग तजयो । मुमति भजवी । उत्तम जीवे स्वआत्महित कारणि चितई शुद्ध सदहणा घरी श्रीजिनभक्ति तेहि ज मुक्तिपंथ गमनरूप जांणी आदरवी । यथोक्तम्- वीर वंशावली, २१७ ए लिपावई छई। ': साधु कहे- अह्म पासि द्रव्य नहि अनि. पुस्तक पिण ज्ञानकोशथकी गृहस्थ पासई वांची पाछा ते गृहस्थनई दीजई छई। ज्ञानद्रव्य पिण गृहस्थ जांणई।' सांभली सा० लुको क्रोधी घरे । एइवई संध्याने अवसरे उत्सवई जिनभक्ति जिनमंदिरि बाजारि थयो। तिहां घांमभागि कपालि देव- रनो यांभ भागो। प्रभाति कुणगिरि बाजारि कोइक हाटि बैठौ । एतलि तिहां गुजराति सैयद लेखक मित्र यो। ते पिण म्लेछनी पारसीना हिरफई घरख लिखई। ते पिण कधू-' सा० लंका लेखक ! ए तुम्हारई लि क्या लगा हुई ?।' लुको कहि- देवमंदिरका थंमा लगा।' ते सांभली म्लेछ कहई-' तुह्मारे जे फकीर या छोडिके हुये सी साहिचकी बंदगी करइ कै, साहिबके हजूर मुक्तिमई बैठो, हे अल्ला अनंत ते जय अखंड असत्या नापाकीसे दुर हई।' ते म्लेछवचन सांभली सा० लुकाने चितई म्लेछबुद्धि प्रगट हुई। सा० लुका- म्छेछधर्म प्यारो जांणी तिणे सैयदई पीर हाजीनो आम्नाय दीयो । अनि साडासत्तर दोकडा पिण गृहस्थें न या । तेहना क्रोधथकी म्लेछनी बुद्धि चिचे धरी । सा० लुको गृहस्थनई। कहई-ए गुरु सावध उपदेश कहई ई । जेइ वचनयकी हिंसानो पोप हुई । निरवध वचननो उपदेश कहीं नहि छई।' अनि साधु भति इम कहई- साधुनी जेम में पिण आगिमना पुस्तक वार सात लिख्या छई तिहां श्रावकनी क्रीयाई जिनपडिमानो पाठ किहाई ई न दीठो । अनि छई पिण नही, ते माटि पंचेंद्री जीव ते एकेंद्री जीवनई नमई अनि ए एकेंद्रीयना दलथकी छ साधु कहई-'सा० लुका ! तुम्ह मत्यक्षपणि किम अनंत संसारी थाओ छओ। श्रीसिद्धांत द्रव्ययकी लिखावी साधु पोतानई भणचा सिद्धांतनी यत्न करई । तियारि ते द्रव्यनेश्राई कहिवाणो । तेह थकी ठवण नीक्षेपइ छई अनी नंदी प्रमुप सिद्धान्ते पूर्वि चोरासी अगिम कह्या छई ते वीरनीर्वाण हुया पछी त्रिणवार वार दुःकाल पड्यो तिहां ८४ आगिमनो विछेद थयो । तिवारे सकल मुविहित गीतार्थ मिली साधुमुपथकी जिम सांभल्यु तिम उदर्य छई। पछी तो ते केवलीनई गम्य, मनुष्य कुण मात्र । हा पिण नहि ना पिण नही ।' इम घणई नयई उपनयई तेह यकी घणै क्रोधी संसारपणु जी वि० सं० १५३० वर्षे समणोपासक वेप आदरी अणहीलवाडा पाटी सांभली स्वास्ति सा० भाणे दिक्षा लीधी । वि० सं० १५३२ वर्षि मथम वेषधर रु० भाणो हुओ। पुनः वि० सं० १५४० वर्षि श्रीसीरोही नगरवास्तव्य ओ० स०४० सायरीया गौत्रई सा० भीदें रु० भाणा हस्ति दीक्षा लीधी। घरगंध १-धूप २-चोखगहि ३ कुसुमेहि ४ पपरदीवहिं ५। नैवेद्य ६-फल ७-जलेहि ६ जिणपूआ अट्टहा होई ।। २८ २२० । विविधगीय पी वली संग्रह ओरडई जीगैयंत्रनी मुद्रा दीपी देपी रु० पासचंद्रगुरु श्रीसाधुरत्ननई-'इणि ओरडई किस्यु छई। कदहि उघाडता नयी ।' तिवारई गुरू कहा-'आगि महावारावर्षि दुर्भिक्ष हुभो, ते समयई साधु शियलचारि जांगि तेहना पुस्तक ज्ञान आसातना देखि, तिहां दृद्धगितार्थे मिली ए ओरडामा ज्ञानना डावा भरी यंत्र कीधो छई। ते थकी आपणे कीस्ये कामि उघाडवू नही । वृद्धवचन कुण लोपीइं?।' एइवो वाक्य गुरु श्रीसाधुरत्ननुं सांमली शिष्य रु० पासचंद्र मौन हुइ रह्यो । एक दिन गुरु नगरमा कोइक कार्याथि गया । एतले पासचंद्र गुरुभाज्ञा विगर ते ओरडो उघाडी जोयो पुस्तक जिम तिम मुक्यां दीठा । एहवें गुरु आव्या एतलि उतावलिमा आगले पडचा ते अही पत्र लेइ रजोहरणि घालि यत्ने राख्या । पछी गुरुने किमाड उपाख्यो । गुरु कहई-'एवडी देर क्यु हुई ।' शिष्य कहई- 'इमहि ज।' पछी ते अढी पत्र वांची क्षेत्रपालनो आम्नाय जांणी एकांति ठिकाणे सापनविधि कीयो । एतलई कालो अनि गोरओ विहुँ क्षेत्रपाल आवी पर दीघो। अनुक्रमि वि० सं० १५७४ वर्षे रु० पासचंद्रे वीरदत्त वर साहज्यथकी 'पासचंद्र' नामि मति उत्पन्नः । ते मांहि यकी श्रीपासचंद्र शिष्य रु० ब्रह्म नामई, तेह थकी अणहिल्लपटनि वि० सं० १५७८ वी 'ब्रह्मामति- गछ' प्रगट हुओ । एतलई जे जिहां यकी फांटो हुओ, तिणई तिहां यकी पोताना मूल गुरुनी सामाचारी लोपिने सूत्रविरुद्ध सामाचारी भवर्तावी, अने सूत्रोक्त जे पर्व ते पुनः अन्यथा कीधा । पोवानि मति भेदी करी नवा नवा गछना नाम थाप्या। विवारि ए मति कहींई। इति पासचंद्र मतोत्पत्ति। इबई श्रीहेमविमलनो वि० सं० १५२२ वर्षे जन्म । सं० १५३८ वर्षि दीक्षा, हेमधर्म नाम दी । सं० १५५५ चर्षि गुजराति पतियारखंडि पंचासरा नगरई श्रीमाली वृ० सं० पातई सूरीपदोत्सव कीघो। सं० १५५६ वर्षे क्रिया उद्धरी । सं० १५६८ वर्षे स्वर्ग हुओ। ५६. तत्प: (१) अ.आणंदविमलसूरी, (२) मीसौभाग्यहर्पसूरी- श्रीआणंदविमलसरीनो वि० सं० १५४७ वर्षे जन्म । सं० १५५२ वर्षे व्रत, अमृतमेरु नाम दीयो । सं०.१५७० वर्षे कर्पटवाणिज्य नगरई आ० पद हुभो । सं० १५८२ वर्षे देवरी नगरई गछनायक पद हुओ। एकदा गुरु श्रीसौभाग्य- हर्पसरीनई कहई-'आपणे विहुं क्रिया उद्धरीई ।' तिवारी श्रीसौभाग्यहपसरी कहें-'आपणि शालाधारक विरुद गुरुनो छई।' तिवारई श्रीआगंदविमलसरी कहें 'बावन्न साधुस्युं क्रिया उद्धरि सपरिग्रही जाणता ते साधुने गछ बाहिर काडता, भव्य जीवनई धर्मोपदेश देइ वारता, पुनः जेसलमेरु देसि जल दूर्लभ माणि श्रीसोम- भभसरीई विहार निषेध्यो छई । पिण लुकामत च्यापितुं जांणी उ० श्रीविद्यासागरनई विहारनी आज्ञा देता हुया । तथा जेसलमेर खरतर, मेवाति विजामति, मोरबीइ लुका, वीरमगामि पासचंद्र, इत्यादि नगरि श्रीसूरीइं छठ तपनई पारणि रसा तक्रनई करवई, पद्विगयत्यागी, महातपस्वी जांणी घणा जीव श्रीजीनपूनानी सदहणा आणी । पुनः श्रीसूरीना उपदेशथकी ओ० ४० याफणा गोत्रे दो० कमि चितोडगढवास्तव्य सं० १५८७ वर्षे श्रीसिदाचलि सोलमो उद्धार करायो । श्रीवरीई अनयामेरु, सांगानयर, जेसलमेरे, मंडोवरे, नागौरि, नाडलाई, सादडीई, सीरोही नगरे, पाटणि, महिसाणे प्रमुख अनेक नगरें यगा जिनविच प्रतिष्ठ्या । कलियुगि श्रीहरि युग- प्रधानोपमः सम जाणिवा । यत उक्तं- " बारवंशावली २२१ वदन्ति तस्मै च जनो निरीक्ष्य निरीहितज्ञानतपःक्रियाख्यः । अवातरत् सर्वगुणः किमेप श्रीमज्जगश्चन्द्रगुरुदितीयः॥ श्रीसूरी छठ, अठम, चउथ, विंशतिस्थानक तपना कारक, पटुकायजीव यत्नावंत, समतासमुद्र, जन्म पर्यंत अतिचार आलोइ । पांच दिवस अणसणई अहिम्मदाबाद नगरई निशापाटकि वि० सं० १५९६ वर्षे श्रीआणंदविमल- बरी स्वर्ग हुओ। अनि श्रीसौभाग्यहर्षवरीयकी गुर्जराति विजापुर नगरई वि० सं० १५८२ वर्षे 'लघुशाली' नामें गछ भिन्न हुओ। एहवें समइ श्रीसिद्धाचलि असुरनो उपद्रव हुओ ते कहइ छई- गुर्जर देशि अणहिल्लपचन्न पासि कुणगिरि नगरी श्रीमाली लघुशापा अडालना गोत्रि सो० भाणसी रहेछ। तेइनी स्त्री कोडाइ नामि अत्यंत रूप सुंदराकारे देपो चिकथो श्रीशेरशाह आसक हूओ। ते स्त्रीनई दरवारे राखी, तेइनी मोहनीई क्षण बेगलो न रहि । एकदा कोडाइ पवित्रपणि स्मरणि स्मरई छई, एतलई शेरशाह काम बिडलि आव्यो। कोडा कहई-' तसवी पढति हूं।' शेरशाह कहई-'किणके नामकी ?।' कोडाइ कहई-'मेरे पीरके नामकी ।' ते सांभली शेरशाह कहई-' उनकी जमी अस्थल किहां छै ? ।' कोडाइ कहई- सोरठ देशि है, शत्रु- जय पाहाडई रहई छई। तिवारै स्त्रीनो मेयों शेरशाह सैन्य लेइ देश द्रव्य उघरावा नीकल्यौ । अनुक्रमि पालिताणि नगरी आन्यो । सैन्य सर्व तिहां उतयौं । तिणहि ज रात्रि शेरशाह १, कोडाइ २ अनि चमरनो विजनार विलाति फकीर आंगारशाह नामि ३-ए त्रिहुं लस्कर थकी छांना पाहाडे चढ्या । श्रीरुपभदर्शन कोडाइने हुओ। कोडाइ कहई-'ए बेठे सो मेरे पीर ।' एतलई चिकथई सुवर्ण मुहरनो ढिग जिनने आगि कीयो । ते देखी महाम्लेछ अंगारस्याह द्वेपी हुओ, मनि विचारई जे, ओरतके लीई चिकथेने काफिराणा कीया। पूतलेकु पाउं लगा। एतलई चिकयो अनि कोडाई ए बिहुं दर्शन करी उतावलि पाछा निकल्या। अंगारशाह कपटथको पछवाडें अंतरई रह्यौ । मूर्वि श्रीमूलनायक उपरि गुर्ज शख नांखी आसातना कीधी । तिवारि तीर्थरक्षक देव कोप्या। म्लेछ नाठो। हिंदु जक्ष जांणी वासतां चिहु दिशि भयंकर देखि सुहाली पुगथारिई थकी पसी देवल बाहिरई अयडाई हेठो भूमी पड्यौ, तत्काल निधन हुओ। प्रत्यक्ष पीर हुई, हिन्दु यक्षनई कहई-' असरनो उपद्रव जिवारि किवारई श्रीक्षेत्रि हुँई, तिवारई मुझ ठिकाणि धूप, दीप, अबीर, अक्षत, यव, तथा युगंधरी, पुष्प मरूओ, सवा वहित रातो वस्त्र, गुलीरंगनो नीलो वख, वांधण चंदुओ, त्या ध्वजा सवा बहितनी, सवासेर गुड बांटि देवो, तिहां ई महा अमुरांणइ साहज्यकारी छ । ए तीर्थनो उपद्रव टालया समर्थ छु । तुम्ह सकल देवनो भक्त छु ।' तिणि तीर्थरक्षक देवि अमुराण जांणी स्थानीक किधुं। केतलेंक दीने चिकथो अनि कोडाइ पाटगि आव्या। एतलिं वि० सं० १५९५ वर्षे श्रीसिद्धाचलि अमुरनो उपद्रव हुओ, तिवारई सकल संघ श्वेतांबराचार्य एकठा मिली ए तीर्थे दुग्धधाराई जैनमतना आम्नायना प्रयोग करवइं थकी श्रीगिरीयकी अमुरछाया निवारण कीधी। ५७. तत्पट्टे श्रीविजयदानसूरी- तेह गुर्जरखंडि राओदेशि जामला नगरई ओ० ऋ० करमयागोत्रि सा० जगमाल, खी मुर्याई पूत्र । तेहनो वि० सं० १५५३ वर्षे जन्म । वि० सं० १५६२ वर्षे प्रत, उदयधर्म नाम दीर्छ । वि० सं० १५८७ श्रीसीरोही जगाई गछनायकपद हो । श्रीमरी अममचपणि भव्य जीवनई धम्मोपदेश देता भूमंडलि विहार करता समात २२३ " पीरयंशावली एहबई श्रीवडगछि चतुर्दशिकपक्षे पिप्पलिशापाई श्रीमालदेवई श्रीहारीज नगरें वि० सं० १६३५ वर्षे श्रीहीरन विजयसूरीने बंद्या । श्रीसुरोई पिण पोताना गोत्री जांणि आदर देइ पासई राष्या। अनुक्रमई श्रीमरीई माल देव सहित दील्ली नगरई पोहता । श्रीसूरीनई पातिशाह कहें-'वेठो।' तब हीर कहे-'जीवत दिया विछात उद्धाइ देपइतो पाय मेवा धर्या हे तिणेंमें कीडी आइ ()।' प्रथम दिन एता जीव हुओ। विजे दीन पातसाहीनो बहुमान देषी विछात नीचे पाड कर बकरी एक सगर्भा मांहि पाली दरीमाना कीयो । पातसाइ कहई-'विजेहीर ! बेठो।' तदा हीर कहे- 'इस जमीमें जीव है।' सा० कइई-केता जीव?' तदि गुरु कहें- तीन जीव हैं।' पातसाह खोलकर देषी तो १ चकरी, २ वच्चा हुआ। सो देप पातसाह कहें-'ए दूसरा पूदा हई, सच्चे पीर हो, तुम्ह अम्हारे गुरु होइसो?। पातसाहनो सन्मान देपी म्लेछ मुल्लाणीया द्वेप धरी कहई-'अयसे सच्चे फकीर हई तो अल्लाकी वंदगीसें हजुर कछु करामत देपावई ।' ते सांभली एक पातसाह मुल्लागीया सहित श्रीरीने सभाई आदर देइं कहई-'आप अपणी करामत देसाओ।' तिवारि पिपीलिका १, अजाभूमीगृहे २, विछात ठिकाणे कछै वली रजहरण १, टोपी २, बली अनेक वीद्या करामत देखी पाठो थको कहि-'तुम्द वडे दर्शनी हो।' इम कही सकलात्मीय देशि पर्व आवीई आठ दिन जलचर, तीर्यच जीव प्रमपनी आमारी पलावी, मवावी । पुनः श्रीसिद्धाचले पावसाह मनुष्य मुंडकादि द्रव्य लेता तेहनी माफी पीपी हि सं० १६३६ वर्षे श्रीचिंतामणी पास मतिष्ठया । पुनः श्रीरावणपास जुहारी दिल्ली नगर चौमासु रही सं० १६३७ वर्षे अकवर मूगल्ल वंदावी आगरें मेरुते आवी जालंधरादिक नगरई चौमासो कीयो । श्रीमरीना कीर्ति सांभली याचक प्रमूप श्रीमरीने ओपम रुप(?) बीरुदावइ । हो- हीर वइरागर नीपजई खीमसरारी खांण । पातसाह प्रतियोधिओ अकवर मानी आंण ॥ श्रीसरी अफवरदत्त जगद्गुरु विरुद धारता, भिनमाल हुई रायधनपुर नगरई आव्या। तिहां पाटि श्रीविजय- सेनवरी नाम प्रतिष्टयौ । आपदलही गुरुभाण लही श्रीविजयसेनसरी पाटणि, सीरोहीई विहार कीधी। बरीई पिण तेहनी शिष्य थापि कुशल, वर्द्धन, आनंद, सौभाग्य-ए च्यार शापाई नाम दीपा । श्रीगुरु अहार श्रीगुरु अहिमदावादि वजीरपूर नगरई आव्या । विहां लुकागछि रु० मेवनी सतावीश शिष्यई श्रीसूरी प्रतिवंद्या । शासाई विस्तारे कही विचरता जंगम कल्पक्ष समान सोभई । अथ अष्टादश शापा नाम-श्रीमद विजय १, विमल २, सागर ३, चंद्र ४, हर्ष ५, सौभाग्य ६, सुंदर ७, रल ८, सुधर्म ९, हंस १०, आनंद ११, बर्द्धन १२, सोम १३, रुचि १४, सार १५, राज १६, कुशल १७, उदय १८-निरमल नाम । श्रीमुरी खंबायति हुई गंधार विदिरई आव्या। तिहां गुरु उपदेशथकी सा० रामजीई वि० सं० १६४९ वर्षे श्रीवीर चउमुख मासाद निपजाव्यो। चौमासि उतये पत्तनई आव्या । एतलई श्रीसरीइंतिहा बार वोल प्रगट कीधा । तिहां थकी श्रीसरी श्रीसिद्धाचलि आव्या । एवलई तिहां मेवाड, वागड, मरुधर, इंदाड, दक्षिण, गुजरात, मालव, सोरठ, देवफापत्तन, ममुप सकल द्विलक्ष मनुष्यः छंद सहित वि० सं० १६५० वर्षे महामहोत्सवि श्रीमरीइं श्रीमथम तीर्थकरनो दर्शन कीधो । विहां घणा याचकने दान हुया । स्नान, अप्टभेदी, सत्तरभेदी, अष्टोत्तरी, साधर्मिक वात्सल बहुला जाणीवां । किंबहुना ? श्रीसरी उ० विमलदर्प, उ० कल्याणविजय पांचसै विधुधयुक्त पुनः श्रीसफल संघयुक्त श्री रैवताचलि श्रीनेमी दर्शन कीघो। तन्निवासि संघाग्रही जीर्णगढि चउमासि रहा। अनुक्रमि श्रीसूरी उन्नानगरि आन्या। विहां द्विप- वास्तव्य ओ०.३० पासाहस्से (2) स्फाटिक विव श्रीशान्तिनाथनो प्रतिष्ठायो। विहां संघाग्रही चउमासी रहा। सोमविजय, उ० १०३ वीर वंशावली २२५ मनुष्य संघाति व्रत लीयो । तेह देशना नाम-मुष्य पिता सा० श्रीवंत वृद्ध, तेहनु नाम रु० श्रीवंत दीघो। हवी च्यार पुत्रना नाम वृद्ध पुत्र ते धारो तेहनुं नाव धर्मविजय, २ बीजो पुत्र अजो तेहर्नु नाम अमृतविजय, ३ त्रीजा पुत्र मेघानुं नाम मेरुविजय ४, लघुपुत्र वर्ष ९ नो कल्लो नाम तेहचं नाम कमलविजय ५-ए पांच पिता सहित ते । पुनः सा० श्रीवंतनो वनेवी सं० साल वृद्ध छै, माटि रु० सादूल नाम दीधो ६, तस्य पुत्र स० भक्ति तेहनो नाम भक्तिविजय १, सा० श्रीवंतनी वहिन रंगादे तेहनो नाम रंगश्री दीधो ८, सा० श्रीवंतनी पत्नी सिण- गारदे तेहनो नाम लाभश्री दीधो ९, सा. श्रीवंतनी पूत्री सहिजां तेहनो नाम सहीजश्री दीधो १०-एवं दश संबंधी साथी च्यारसें अनि सचावन मण घृति ज्ञाति, गोत्रि, मित्र, साधर्मिक प्रमुख सप्तक्षेत्र पंच जीर्णोद्धार इत्यादि मुकृति करीने श्रीहीरें स्वनेश्राई श्रीसिरोही नगरई श्रीरुपभचैत्ये सं० १६५१ वर्ष व्रतई, पहिला कद्या ए नाम दीधा। ते मांहि लघु कमलविजयनें श्रीगुरुए समतादिक गुणि योग्य जांणी उ० श्रीसोमविजय ग० ने वाचनाई भलाव्या। अनुक्रमि पुन्योदयि षट्शास्त्रना ज्ञाता हुया। तिवारें श्रीविजयसेनसूरीई अणहिल्लपत्तनई श्रीपंचासर पासमासादे कमलविजयने पं० पदि कीधा । वि० सं० १६७५ वर्षे श्रीसिरोही नगरई गछनायकपद हुओ। प्रा० १० पोलिख्या गौत्रि सं० वीरपाल मृत सं० आंबा, भाइ सं० मेहाजलि पदमहोत्सव कीयो । सकल सहिर पुनः साधर्मिक संतोषी मनुप्यि मनुष्यि पीरोजी एक एक दीधी । श्रीसूरीने उपदेशि रंजितको श्रीसिद्धाचल १, गिरीनार २, तारण- गोरी ३, अदगीरी ४, घोघा नवखंडपास ५, शंखेश्वरपास ७, वंभणवाड ८-एवं सप्त तीर्थनो संघाधिपति हुओ। ते संघनो वर्णन । कवित- सत्तर सहस्र गुजरात सुभट मिल सोरठ सारी। हांटा बद्ध हजार वडकै वडकै व्यापारी । खंभायत निजखेत सहिर घोघा सारीखा। हील्ला झाल्ला हलख पांति कीधा पारिखा। पूरव उत्तर दक्षिण पश्चिम कृपाण कोइ न सकि कलि । ताहरिं संघ वीरपाल तणा मेहाजल दुनीआं मली। १०५ श्रीसीरोहीई, नाडलाई, भमराणी, चचरडी, आयु ममुखि एकसठि मासादि जीणोद्धार कीघो। वि० ० १६८२ वर्षे श्रीशांतीलपुर नगरे श्रीसंघाग्रही विजयदेवसूरीने श्रीविजयानंदसीने मछमेल हुओ । पुनः सं० १६८५ वर्षे अणहिल्लपटनि श्रीविजानंदसरीथकी कपट करीने श्रीविजयदेवसरी गछभेद करी सागरने गछमाहि लेइने देव सूरी जुदा हुया । २ गछ हुया अणहिल्लपत्ननि । श्रीविजयानंदसरीये संखेंडई नगरई श्रीआसापुरीमासाद दत्तवर थकि सं० १६९१ वर्षे पंचांगुलीनो उपद्रव देवसरीई कीयो । ते श्रीसूरीई आसपुरी देव्याई उपद्रव टाल्यो। जय हुओ। श्रीगुरुगछि मंगलश्रेणि हुइ । केतलेक दिने मुगसी पासनी यात्रा कीधी । श्रीगुरुने अंतरीक पानी यात्रानो हर्ष हुओ। केतलेक वर्षे दक्षिणे पुहरानिपुर नगरे चोमासई रया। खानदेशी कुंकणे विचरतां घरति चोमासी रह्या । अनुक्रमि कान्हमि विचरता खंभायति तत्शापा श्रीअकबरपुर नगरें श्रीमरी संघाग्रही चउमासि रया । तिहा श्रीमालि १० शापाई परिप वजीयाना आग्रहथकी श्रीविजयराजबरीने भट्टारकपद दीधो । पा० यनीयायें पदोत्सव कीधी। श्रीगुरुनी आशा लही श्रीविजयराजसरीई दोसी मनीयाने आग्रही अहमिदावाद नगरें विहार कायो। एकदा श्रीगुरुमुखि पा० वजीओ सभा समक्ष धर्मोपदेच समाधिपणिं सांभलि छई। एवं वाणोतर आयो लों कागच्छ पट्टा व ली। पाटणरा वासी रूपनी साह कोडीधन हुवा । साधारी संगतसं धर्मदेशना मुण पतिपोध पायो सं० १८२० । अवारै गुमासतां संगात रूपजी साह आपण पैह लकै लेदेरै प्रतिगोधमुं दीक्षा लीनी । इण भांत लंकी ठेही हुतौ । तिको पुस्तक लिखतौ । सो एक दिन शास्त्र लिपतां प्रतिमारी आगवी छूट गयी, तरां वादस्थल हुवी । प्रविमारी आलावा उथापनें साधां संगते विवाद कर, नइ दयाधर्म मूल थापीयी। हिंसा निहां धर्म नहीं इसी प्ररूपणा करने रूपसी साह पाटणरा वासी क्रोडीधज, विणोंने प्रतिवोध देने माहे कोनी । तिवारा रूपसी साह कह्या दीक्षा ल्यौ ने दया मू० मवर्तायौ। तरां लंफैजी यद्यो-'हुँ रांक म्हारी उपदेस कुण माने ? था सरीपा दीप्या लेनै धर्म चलावै तौ धर्म चले। जद रूपसी साइ १८ मोटा सेठा गुमासतां साथै दीक्षा लीनी। आपण पैई जनै धर्मप्ररूपणा गुजरातमां कीनी लाफामत' थापीयौ । महाप्रभावीक श्रीलाकागच्छरा थापणवाला श्रीरूपनपनी हुवा। १. श्रीरूप मपनी। २. तत्पट्टे श्रीजीव मपनी। ३.१० श्रीकुंवरजी ऋपि । ४. त० श्रीमल्लजी। ५. त० श्रीरत्नसीजी । तिका वीवाहमहोच्छच वरनो लीपावतां दिलमां हिंसा देपने संसार विरक्त हुवा । अस्त्री छोडनै श्रीमल्ली उण स्त्रीसहित भेला दीक्षा लीनी । इसा प्रभावीक हुवा । ६. त० श्रीकेसवनी। ७. त० श्रीसिवनी ऋपि हुवा । ८.१० श्रीसिंघमल्लजी। ९.त. सुषमल्लजी। १०. त० श्रीभागचंदजी। ११. त० श्रीवालचंदजी। १२. त० मोणकचंदजी। १३. त० पूवचंदनी। १४. त० श्रीजगचंदजी कच्छरा वासी चुतरचंदजी पासै चारित्र लीनौ । तिवार पछी जोग्य जांण आचार्य श्रीपूबचंदजी आपरी आऊपी अल्प जाण सं० १८७६ वैशाप मुदि ८ गुरौ श्रीजेसलमेररौ श्रीगुजराती लाफगच्छरै श्रीसपकृत महामहोच्छवपूर्वक आचार्य श्रीपूवचंदनी आपरै पाटै आचार्यपद दीनी इत्यादि । श्रीआचार्य श्रीजगचंदजीरी आशामै श्रीसंघ प्रवः ॥ शुभं भवतु ।।

पार्श्व चन्द्र गुरु पट्टा वली । श्रीसाधुरत्न-पन्यास तत् सि(शिष्यगरिमा हि लब्ध्यम्युधि परमभट्टारक श्रीपाश्चचन्द्रवरी १ । तत्सम्बन्धो यथा- अर्बुदाचलपार्चे हमीरपुरनगरे माग्वंसे साहा वेला, भार्या विमलादे, तत्सुत पासाभिधान संवत् १५४० नक, संवत् १५४९ पण्डितश्रीसाधुरत्नपार्चे दीक्षा । संवत् १५५४ नइ उपाध्यायपद, संवत् १५५८ क्रिया-उदार, सद्वान्तोक्तक्रिया पांचमि संबच्छरी, चतुर्मासु पूर्णिमाइ । देव-देवीना काउसग्गादि मिथ्यात्वऊथापक, विधिवादा- लिगिद्ध), देवतादि आकर्षण(क), विद्यासावपारग, बहुश्राद्धप्रतिबोधक, संवत् १६१२ वर्षे मागसिर शुदि ३ दिने विहांवी श्रीपूजनीकइ पधार्या । पछि श्रीपूजि आचार्यपदस्थापना विहांनी रापी । पुण कर्मयोग्यइ श्रीपूज्य छतां राजसमायां वादजी(जे)ता दिन १५ यावत् । तत्र आचार्यपद प्राप्तः, श्रीविजइदेवसूरी नाम स्थापना कृता । श्रीपासचंदररिनइ पाटिइ श्रीसमरचंद्रसरि । अणदिल्लपत्तने श्रीश्रीमालीज्ञातीय दोसी भीमा, भार्या बल्दादे, तन्त संवत् १५८२ जन्म, संवत् १५९५ दिप्या, आबालब्रह्मचारी, महासिद्धांती, बहुरागांगी संवत् १५९९ उपा- पायपद, संवत् १६.५ आचार्यपद, संवत् १६२६ वर्षे वैशाप वदि १ दिने निर्वाण प्राप्तः। श्रीसमरचंद्रसूरिनि पाटि श्रीरायचंद्रसरि जंग्रामे श्रीश्रीमालीज्ञातीय दोसी यावड, भार्या कमलादेवी, वत्सत पगमारे संवत् १६२६ दीक्षा | श्रीविमलचंद्रहरि । वसिप्य श्रीजइचंदररि । तद् सप्य (शिष्य) श्रीपचन्द्रपरि विराजमान । श्रीराजनगरे वास्तव्य श्रीश्रीमालीज्ञात(ती)य संयत्री शिवजी मुत संवत् १६९८ वर्षे वैराग मने श्रीजय- चटपरिपाचे दीक्षा ग्रहिता, जोग्य ज्ञात्वा स्वपदे स्थापिता, महान् महोच्छवेन शुभजोगे शुभदिने सा सांकर जुपरी देक ११ वोल प्रगटकरण । नंदीवपन्नची वृत्ति १६०० शुद्धकर्ता । अगसगसहितेन निर्वाण प्राप्तः ज्योधपुरमध्ये देसंगत हुआ, पाट न चाल्यउ। आचारांग १, सूयगडांग २, प्रश्नव्याकरण ३, ठाणांग ४, तन्दुलवेयालीय पइन्नादि ५-एहना वालावि(व)- बोध कीथा । श्रीपेत्रसमासना टवा कीधा । संघयणीना टवा, नवतत्वना बालावि(ब)बोध, चउसरणवालावियोध, आवश्यकना टया कीधा । आराधना वडी १८ ढालनी ग्रंथ ७०० प्रमाण कीधी । एपणासतक ग्रंय कीधउ । , जोधपुरे राठउडवंशे रायमलदेप्रतिबोधक, शुद्धपरूपक, शुद्रक्रिया जिनोक्तकरण, कटुमतिपतिबोधक, वचन- इति श्रीपार्श्वचंद्रसरिसम्बन्धः। तच सिष्य श्रीविजइदेवरि तश्या(स्य) सापा। श्रीरुणनगरे सवालाप चिंता[म]णि त्रिभिर्वर्षे पठित्वा विधापुरे यह महोच्छव कृतः॥ इति श्रीगुरुपापली संपूर्णा । लिपिताऽस्ति स्ववाचनार्य श्रीइहमंदपुरे नगरे ।

लों का गच्छ पट्टा व ली । पाटणरा बासी रूपजी साह कोडीधज हुवा । साधारी संगतमु धर्मदेशना मुण पतिबोध पायो सं० १८२० । अहारै गुमासवां संगातै रूपजी साह आपण पैह लंकै लेदेरे पतियोधमुं दीक्षा लीनी । इण भांत लंका लेही हुतौ । तिको पुस्तक लिसतौ । सो एक दिन शास्त्र लिपतां प्रतिमारी आलावी छूट गयौ, तरां वादस्थल हुवौ । प्रतिमा आलाची उथापनें साधां संगते विवाद कर, नइ दयाधर्म मूल थापीयी। हिंसा निहां धर्म नहीं इसी प्ररूपणा करने रूपसी साह पाटणरा वासी क्रोडीधज, तिणोंने प्रतिबोध देने महेिं दूद्ध कीनी। तिवारां रूपसी साह कहाँ दीक्षा ल्यौ ने दया मू० प्रवाचौ । तरां लकैजी कह्यो-'हुँ रांक म्हारी उपदेस कुण मनि ? थां सरीपा दीष्या लेनै धर्म चलावै तौ धर्म चलै । जद रूपसी साह १८ मोटा सेठां गुमासता साथै दीक्षा लीनी । आपण पैई जनै धर्मप्ररूपणा गुजरातमां कीनी 'लांकामत' थापीयो । महापभावीक श्रीलांकागच्छरा थापणवाला श्रीरूपनपनी हुवा । १. श्रीरूप रूपजी। २. तत्प४ श्रीजीव नपजी। ३. त० श्रीकुंवरजी ऋपि। ४. त० श्रीमल्लजी। ५. त० थीरत्नसीजी । तिकां वीवाहमहोच्छन चरनो लीपावतां दिलमां हिंसा देषनें संसारमं विरक्त हुवा । अस्त्री छोडनै श्रीमल्ली उण स्त्रीसहित भेला दीक्षा लीनी । इसा प्रभावीक हुवा। ६. त० श्रीकेसरजी। ७. त० श्रीसिवनी ऋपि हुवा । ८. १० श्रीसिंघमल्लजी। ९. त० सुपमल्लजी। १०. त० श्रीभागचंदनी । ११. त० श्रीबालचंदजी। १२. त० मोणकचंदजी। १३. त० पूबचंदजी। १४. त० श्रीजगचंदजी कच्छरा वासी चुतरचंदजी पासै चारित्र लीनी । तिवार पछी जोग्य जांण आचार्य श्रीपूवचंदजी आपरी आऊपौ अल्प जांण सं० १८७६ वैशाप मुदि ८ गुरौ श्रीजेसलमेररी श्रीगुजराती लांकगच्छरै श्रीसंघकृत महामहोच्छवपूर्वक आचार्य श्रीपूबचंदजी आपरै पाटै आचार्यपद दीनी इत्यादि । श्रीआचार्य श्रीजगचंदजीरी आझामै धीसंघ भवा ।। शुभं भवतु ।।

Vividh Gachhiy Pattavali Sangrah Part-i

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Vividh Gachhiy Pattavali Sangrah Part-i
File name
Vividh Gachhiy Pattavali Sangrah Part-i
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,bhartiya Vidhya Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
232
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311071
Barcode
99999990319995.00
Scanning centre
Banasthali University
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