Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Savivaranam Shrigyanarnavaprakaranam Shrigyanbinduprakaranacha
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Homwww ॥ सविवरण श्रीज्ञानार्णव तथा ज्ञानविन्दु अंगे प्रकाशकीच निवेदन । ज्ञानपीयूपपिपासु सहृदय सौजन्यशालि विद्वानोना करकमलमां प्राप्त थतो एक जैन ज्ञानकोपोना भूगर्भमां छुपाइ रहेल अणमोल रत्न तुल्य स्वोपज्ञ विवरण समेत श्री ज्ञानार्णव नामनो आ प्रकरणग्रंथ प्रतिभाप्रभावथी पूर्व श्रुत. केवली भगवंतोनी स्मृति करावनार अनेक लक्ष श्लोकोप्रमाण ग्रंथोना प्रणेता, भवविरहाकविभूपित चौदसो चुम्मालीश ग्रंथ- प्रासादौना सूत्रधार भगवान् श्रीहरिभद्रसूरिजीना लघु वांधव तरीके ख्याति पामेला, न्यायविशारद, न्यायाचार्य, कूर्चाल- सरस्वती विरुदधारक महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजे रचलो छे. ते निर्विवादनिीत सिद्ध वस्तु मा ग्रन्थने मंगलपद्य "ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमान्यायविशारदः । ज्ञानार्णवसुधास्नानपवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥" तथा प्रथम तरंगना अन्तिम प्रशस्तिपद्य 'प्रोटिं ये विबुधेपु जीतविजयप्राज्ञाः परामैयरु-स्वत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानाचे निर्मिते, पूर्णी भाष्यवचोमृतैरतितरामायस्तरङ्गोऽभवत् ।। २॥” तथा तेओश्रीना पोताना ज रचेला शास्त्रवासिमुच्चयवृत्ति, स्याद्वादकल्पलता, न्यायालोक, ज्ञानबिन्दु विगरे अनेक ग्रन्थोमां "अधिक मत्कृतज्ञानार्णवा- दवसेयं" इत्यादि वाक्यो पूर्ण साक्षि आपे छे. वळी प्रायः एकाद ग्रंथ अपवादरूप बाद करी तेमोश्रीना सर्व ग्रंथोनो ४ ८ " गायानुहमणिकाना पत्र पछीनु मनुसथान छे." मायादिपाद गाथा पत्र पंक्ति गादाविर गायक पत्र पक्ति चारिता गायक पक्ति अणुससमयमणतरिय ३६८ ७९ २ | गतुमसखेजाओ महणेण परापामो गहणावेरखाए तओ १६९ ७९ ३ | भिन्न हुमयाये ३८२ ८१ बधो वि वीससाए ३९४ ८१ १२ निसिरिजइ नागहिय ३७० ७९ नदणसमुग्धायगइए ३८३ ८१ १३ / पगदिसमाइसमये गहण मोक्खो भासासमय ३७१ ७९ १६ / पठमसमये चिय नओ ३८४ ८१ दहा अपोह वीममा ३९६ ८५ ६ गहण मोक्खो भासागहण ३७२ ७९ १६ / मयतरेहि तइये होइ अपोरोनाओ १९७ १ गहनिसम्पपयत्ता ३७३ ७९ २५ | दिसिट्टियम्म पदमो ३८६ ८१ २१ मइपलामिणिोहिय ३९८ ८५२ १ तिविम्मि सरीरम्मि ३७४ ८० ५ोइ अ-म्वेजों ३९. ८२ ३ मध यामिनिमोहिय १९९८५ ओरालियवेउब्विय ३७५ ८० ६ कत्यइ देसणहर्ण २८८८३ उमाणमोही ति य ५०. ८६ सचा हिया सतामिह ३७६ ८. १२/ घउसमयमझगणे ३८७ ८३ अवगमणमवाओति य१.१८६ अर्णाहगया ना तीसु वि३७७८० १३ चउसमयविगहे सनि ३८९ ८३ त पुण चउठिवह नैय ४०२८६ काहिं समयेहि लोगो ३७८ ८० १९ | आपूरियम्मि लोगे ३९१८ आएसोत्ति पगारो १०३ ८६ २७ चउहि समयेहिं लोगो ३७९ ८. भासासमसेदोओ सेत्त लोगालोग ४०४ ८६ २८ कोइ मदपपत्तो न समुग्ध यगइये मापसोति व सस ४ २ - ॥ सविवरण श्रीज्ञानार्णव तथा ज्ञानबिन्दु अंगे प्रकाशकीय निवेदन ॥ ज्ञानपीयूपपिपासु सहृदय सौजन्यशालि विद्वानोना करझमलमा प्राप्त थतो एक जैन ज्ञानकोषोना भूगर्भमां छुपाइ रहेल अणमोल रत्न तुल्य स्वोपज्ञ विवरण समेत श्री ज्ञानार्णव नामनो आ प्रकरणग्रंथ प्रतिभाप्रभावथी पूर्व श्रुत. केवली भगवंतोनी स्मृति करावनार अनेक लक्ष श्लोकोप्रमाण ग्रंथोना प्रणेता, भवविरहाकविभूषित चौदसो चुम्मालीश ग्रंथ- प्रासादोना सूत्रधार भगवान् श्रीहरिभद्रसूरिजीना लघु वांधव तरीके ख्याति पामेला, न्यायविशारद, न्यायाचार्य, कूर्चाल- सरस्वती विरुदधारक महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराजे रचलो छे. ते निर्विवादनिीत सिद्ध वस्तु आ ग्रन्थने मंगलपद्य "ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमान्यायविशारदः । ज्ञानार्णवसुधास्नानपवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥" तथा प्रथम तरंगना अन्तिम प्रशस्तिपद्य 'प्रौढिं ये विवुधेपु जीतक्जियप्राज्ञाः परामैयरु-स्तत्सातीर्थ्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः श्रयन्ति श्रियम् ॥ तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्णवे निर्मिते, पूर्णो माष्यवचोमृतैरतितरामाद्यस्तरङ्गोऽभवत् ॥ २॥” तथा तेओश्रीना पोताना ज रचेला शास्त्रवार्तासमुच्चयवृत्ति स्याद्वादकल्पलता, न्यायालोक, ज्ञानविन्दु विगेरे अनेक ग्रन्थोमां "अधिक मत्कृतज्ञानार्णवा- दवसेयं" इत्यादि वाक्यो पूर्ण साक्षि आपे छे. वळी प्रायः एकाद ग्रंथ अपवादरूप वाद करी तेओश्रीना सर्व ग्रंथोनो प्रारंभ ऐंकार पद(सरस्वती बीजक)धी थाय छे तेम आ ग्रंथमा देखातुं वायी आ ग्रन्य तेओधीनो ज छे ते नि:संदेह छे. अर्णव-समुद्र जेम घणा तरंगोथी विभूषित होप छ तेम आ ज्ञानार्णवा पण ग्रंथकार भगवंते अनेक वरंगोनी रचना फरी छे, जो के आज ज्ञानार्णव नामनो एक ग्रंथ दिगम्बरीय साहित्यमा शुभचंद्राचार्य रचेलो विद्यमान छ अने ते मुद्रित पण छे, परंतु तेमां कलिकालसर्वज्ञ भगवंत श्रीहेमचंद्रसूरिजीनिर्मित योगशास्त्रमा प्रकाशानी जैम शुरूपदपायोगस्वरूप विगैरे निरूपण होवाथी नेने योगार्णव-योगप्रदीप-ज्यानशास्त्र विगेरे नामोथी ओळसारामा आध्यो छे, ज्यारे आ थी शानार प्रकरण- ग्रन्थान्तर्गत अभिधेयने अनुमरतुं ज निःशंक यथार्थ नाम रारावामां आव्युं छे. प्रस्तुत ग्रन्थकारे एक शानरिन्दु नामर्नु प्रकरण पण रग्युं छे, जे आ साये संयुक्त छे तेमा सामान्यतः धार ज्ञानोनुं निरूपण करी मुख्यत्वे केवळज्ञान केवळदर्शनना विषयमा सम्मति गाथाओना अनुसार अभेदपधनुं समर्थन कर्या पाद नयभेदयी विचारो आपता शासनप्रमावक धुरंधर श्री सिद्धसेन दिवाकरजी, श्रीमल्लादिजी, श्रीजिनभद्रगणिधमाश्रमणजी ए प्रणेय प्रभावक आचार्यभगवंतोना विचारोनो समन्वय कों छे. आ ज्ञानार्णवमा पांचेय ज्ञानोनो यथार्थ तवरूप केवळ अमृत प्रवाहज मरेलो छ. आज्ञानार्णव अंपर्नु अगाध गांभीर्य माहात्म्य यथार्थ वर्णव ते विशाल अश्वीनी पगयी चाली पार लेवा इन्यता पांगळा माणसनी जेम अमो पामरनी बुद्धिने अगोचर छ, आग्रंथर्नु अगाध अर्थ गांभीर्य स्वरूप जाणी पोतेज स्वोपन विवरण रम्यं छे. पाम खेदनो विषय तो एटलोज के आ ग्रंप वचमा वचमा तेमज अंतमाग श्रुटितरूपे उपलब्ध पयोछे. सायं परमर्प स्थान एछ के-इजु पण मन्यजीवोना परमभाग्योदये शासनस्तंम समा पूर्वना महापुरुषोए रचला अगदुपकारक शासन.
KOTA प्रभावक अबाधित ग्रंथो विश्वमा विद्यमान छ जेना आलम्बनथी पुण्यात्माओ आत्मकल्याणना मार्गे प्रवर्ती रह्या छे. हालमां यावदुपलब्ध सविवरण आ ग्रकरण प्रकाशित कयुं छे. आ ज्ञानार्णवनो प्रथम तरंग जे पत्र २७ मे पूर्ण थयो छ ते तो श्री संघना प्रबळ पुण्योदये परिपूर्ण अखंड छे, बीजा तरंगना सविवरण १६ पद्यो सुधी पण अखंड छे. सत्तरमा पद्यना विवरणांशथी २४ मा पद्यना विवरणांश सुधी खंडित छे. सहृदय सुज्ञ वांचकोने अर्थानुसंधानमा क्षति न थाय ते खातर तेमना प्रणीत न्यायालोक ग्रंथ विगेरेथी ते भाग संयोजित करी यथामति संगत कयों छे, जे संयोजित पाठ ३५ मा पत्रना वीजा पृष्ठनी पंक्ति अग्यारथी ३७ मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी वीजी पंक्ति सुधी [ ] आवा काटखुण कौंसथी चिन्हित करी आ पुस्तकमा छपायेल छे तेवीज रीते ज्यां ज्यां संयोजित पाठो जोडवामां आव्या छे त्या त्या सर्वत्र ते ज प्रमाणे काटखूण काँसमां दाखल कर्या छे तेज वीजा तरंगना चालीसमा पद्यना चोथा चरणना 'यदृष्टं' ए पदथी प्रारंभी वीजो आखोय तरंग अने त्रीजा तरंगना चोथा पद्यना विवरणांश सुधीनो संडित भाग विशेषावश्यक महाभाष्यनी गाथाओ तथा तेना विवरणानुसारे योजित कयों छे ते भाग ४७ मा पत्रना प्रथम पृष्ठनी आठमी पंक्तिथी प्रारंभी ६० मा पत्रना प्रथम पृष्टनी वारमी पंक्ति सुधी जोडवामां आव्यो छे. वळी त्रीजा तरंगना २० मा पद्यना विवरणांशथी २९ मी गाथाना विवरणांश सुधी खंडित छे ते पण एकोवेरमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी वारमी पंक्तिथी प्रारंभी व्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठनी आठमी पंक्ति सुधी जोडयो छे. ते पछी तेत्रीशमा पद्यना विवरणांशथी आगळनो सर्व ग्रंथ खंडितज छे ते स्थाने दिशासूचन मात्र पंचाशीमा पत्रना बीजा पृष्ठनी नवमी पंक्तिथी प्रारंभी सत्याशीमा पत्रना प्रथम पृष्ठ संपूर्ण सुधी अर्थवचक पाठ जोड्यो छे. कुल ६० पृष्ठप्रमाण योजित पाठ छे आ मुद्रित ८७ पन एटले १५४ पृष्ठ प्रमाग ग्रंथ भागमा मनिशान प्ररूपणा पण अधूरी रही छे. शेप श्रुवज्ञानादि प्ररूप. णानो तो अव्यक्त गंध पप आवी शक्यो नथी जैथी तैना जिज्ञासुमोनी तपोधेच्छा पूर्ण करवाने पूजपचरण तेश्रोत्री- प्रणीत शानाय पीयूपना बिन्दुतुल्य (आपणा माटे तो ते पण अर्गसंशज छ) ज्ञानपिन्दु नाम प्रकरण जोडयामां आव्युं छे. आ पेउ ग्रंथमा आवतो विषय प्रतिपृष्ठ आपेल होवाधी जुदो प्रयास कर्यो नथी.मात्र एफज पनि उपरधी छपाएल आ ग्रन्थोना संशोधनमा पूज्य मुनिमहाराजश्री शियानन्दविजयजी विगेरेए यथाक्षयोपशम प्रयास कर्यो छे. शुद्धिपत्रक आप्युं छ. छतां पण उमस्थ जीयोने भूल थवी सुलभज छे, विगरे कारणोथी टाइपोना वर्णोना स्थानथी ससी जाना कारणथी, इस्य, दीर्प, कार, एकार, ऐकार, ओकार, औकार रेफ विगैरेनी उपरनी पांसडीमो ससी जवाथी म ज प+ध,-प+प-च--म+म-य-थ विगैरे प्रायः समान आकृतिवाठा वर्णोना फेरफार थई जवा विगेरे कारणोथी थएली अशुद्धिको विद्वान् पुरुषो सुधारी पाचशे अने ते पदल अमोने श्री संघ क्षमा आपशे, वेम थी थमण संप पागे नम्रनारे क्षमा प्रार्थनापूर्वक आ निोदन पूर्ण फरवामां आवे छे. लि. श्रीसपरणकमलोपासिका भी जैन ग्रंथप्रकाशक सभा-राजनगर (अमदावाद) - १ २२ ६ १३ ८७ ७ ज्ञानार्णववृत्तिगतानां योजितपाठगतानां च साक्ष्योद्धृतानां भाष्यगाथानामनुक्रमः । ( पंक्तिसंख्यांकः द्वयोः पृष्ठयोः सम्मील्य कृतः ॥) गायक पत्र पक्ति गायांक पत्र पंक्ति गायादिपाद गाथादिशाद गाथांह पत्र पंक्ति गाधादिपाद जमभिणिबुज्झइतमभिणि ९८ ६ नं सामिकाल कारण कज्जतया णउ कमसो ११० ९ २२ ९ १२ मइपुव्वं जेण सुयं सुयकारणं जयो सो ९९ २४ दव्यसुअं मइपुव्यं ९ कालविवजयसामि १ २२ नइ सुअजक्खणमेयं १०१ दव्वसुअं बुद्धीओ ११२ ९ २५ अंते केवलमुत्तम भावसुयं भासासाय भावसुअ मइपुव्यं १०२ ११२ १० २ ८ जीवो अक्खो अथव्वा (९ २ ३ सुअविनाणप्पभवं जह सुहमं भाविदिय १०३ ११३ १० सिं चि इंदियाई ९१ २ एवं सवपसंगो १०४ २८ अविसेसिया मइचिय ११४ १० २२ ९२ उवलद्धा तत्थाया १२ मइपुव्वं सुयमुत्तं ८ सदसदविसेसणाओ ११५ ११ ३ इंदियमणोणिमित्तं ९३ पूरिज्जइ पाविजइ < २२ भेयकयं च विसेसण ११६ १२ एगतेण परोक्ख नाणाणण्णाणाणिय १०७ इंदियविभागओ वा ११६ १२ सामिताइविसेसा ३ इह लद्धिमइसुयाई १०८ ९ सोइंदिओवलाही होइ ११७ १२ इंदियमणोनिमितं जं १०० ९ सोऊण जा मई इभे १०९ ( पूर्वगन गाथा) ८ SA-ORSARISSASS २ २ १४ २८ ४ ४ १५ ७ १ १ २५ सो भोवलडि नह सुथ ११८ १२ सोइविनोबलबी चेव १२२ १३ के ई वितरस सुय किंश नाणेहिगये १२० १३ भणओ सुणओ व सुअ १२१ १३ तु समुच्चयवयणाओ १२३ १३ २६ पत्ताइगय सुयका भावमुअमक्खराण जह सुअमक्खरलाभो १२५ १४ सो वि हु सुअवसराण १२६ १५ ६ दम्ममुअ भावसु ८ बुद्धिहिद्वे भत्ये (पूर्वगतगाथा) जे सुअबुद्धिहिट इयरत्यवि होम्म मुअ १२८ १६ इयरत्यवि भावसुये १३० १६ सह उपलदीए वा फेद बुद्धिहि सिदो महरुभय सहो ता वसु भासापरिणइकाले १३४ १७ इयरत्य वि मइनाणे ११६ १७ ११ अहव मइदम्वमुअ १३६ १७ इयरम्मि वि महनाणे १३७ १७ १९ कह मइसुओसद्धा १३८ १८ तीरति ण वोत्तु अत्तो एत्तियभेता ११.१८ पण्णवणिना भावा १५ में चोदसपुबघरा १४२ १८ अक्सरलभेण समा जे मावराणुसारेण १४१ १९ फेद अभासेजंता किह महसुअनाणविउ १४६ १९ सामन्ना वा दुद्धी १४७ १९ महसहिय भावसु जे भासद एय तअ १४९ २० एव धणिपरिमाण १५० २. इयरे ति म्हाण अभिलप्पाणभिलप्पा ११२ २. १२ १२ २५ ७ ।
NOR ७ २१ १७ २५ २ उग्गहइहवाओ य १७८ २८ अत्थाणं उग्गहण १७९ २८ सामण्णत्थावग्गहण १८० २८ सामन्नविसेसस्स वि १८१ २८ ईहा संसयमेतं १८२ २९ जमणेगत्थालंबण १८३ २९ तं चिय सयथहेऊ १८४ २९ फेइ तयन्नविसेसा १८५ २९ कासइ तयन्नवइरेग १८६ ३० सम्यो वि य सोवाओ १८७ ३० काणुवओगंमि घिई १८८ ३० नणु साऽवायभहिया १८९ ३१ तं इच्छंतस्स तुई १९०३१ जं भासइ तंपि जओ १५३ २० १७ अह सुयओ वि विवेगं १६५ २४ २० अन्ने मन्नंति मह १५४ २२ मइकाले वि नइ सुयं १६६ २४ २२ भावसुआभावाओ १५५ २२ जइ सुयनिस्सियमक्खर १६७ २४ कप्पेज व सो भाव १५६ २२ २३ भरनित्थरणसमत्था ९४३ २४ २८ असुयक्खरपरिणामा १५७ २२ २४ जइ ते सुयेण ण तओ १६८ २५ इह ई जेणाहिगओ १५८ २२ २६ पुवि सुयपरिकम्मिा १६९ २५ ण य दवभावमेत्तेवि १५८ २३ उभयं भावक्खरओ १७० २५ १६ मह वग्गा सुंवत्तण १५९ ३३ सपरपञ्चायणओ १७१ २६ ३ अह उवयारो कीरइ १६० २३ सुयकारणं ति सदो १७२ २६ भावसुयं तेण मइ १६१ २३ ९ न परप्पवोहयाई १७३ २६ ६ भन्ने अणक्खरक्खर १६२ २३ दव्वसुभयसाहारण १७४ २६ २७ जइ भइरणक्खरचिय १६३ २३ २७ सा वा सद्दत्थो थिय १७५ २६ २८ सुयनिस्सियषयणाओ १६४ २४ महसुभनाणविसेसो १७६ २७ २४ ६ ४ २७ २८ ९ SPERISTRA १२ तुम्श बहुभरभेया २३ पारति सद्दगधा ७ २ ९ २ यणमणो जिदिय २.४ ३३ ता मिनरखणा यि ११९२ ३१ जुम्बइ पत्तविसयया २०५ ३३ तत्थोग्गहो दुरूगो १९३ ३१ २०१३३ पजिजइ जेणत्यो २ गते पोग्गलगइया २०६ ३४ अन्नाण सो बहिरा १९५ ३२ ६ | धमोन्य सहरणो २०७ ३४ वकालमि वि नाण १९६ ३२ ९ गेहति पत्तमा २०८३४ जह बन्नाणमसखेज २०० ३२ लोयणमपचविसय २.९३५ भ सहा ण चीसु २.१ ३२ डझेल पाविउ रचि २१० ३५ समुदाये जइ पण २०२ ३२ २१ २११ ३५ २०३३२ २२ नद पत्त मेण्हेजर २१२ ३६ कहमवत्तनाण १९७ ३३ गतु नेण्ण मणो २१३ ३७ लरिखजइ त सिमिणा १९८ ३३ नाणुग्गहोवधाया २१४ ३७ जगातो दिन याइ १९९ ३३ दध्य भावमणो वा ८ ९ स.वगओत्तिय बुद्धी २१६ ३७ सम्पासव्वभाहण २१६ ३९ दामणो विनाया २१७ ४२ परणतणओ तणुम २८ ४२ नजद उवधाओ से २१९ ४२ मइ दप्यमणोतियगे २२० १२ नीउ सागरिसिउ वा २२२ ४२ सो पुगसयमुधारण २१३ ४२ इट्टापिट्ठाहार २२१ ४३ सिमिणो ण तहारको २२४ ४३ इह पामुत्तो पेच्छइ २२५ ४३ दीसन्ति फासइ फुड २२६ १५ न सिमिणविन्नाणामओ २२७ ४४ २२ २४ . गतु ण रूपदेम ततू पोरयारी ३ १ ९ 15RS सिमिणे वि सुरयसंगम २२८ ४४ तद्देसचिंतणे होज २४१ ४८ सो अशसाणको २२९ ४४११ समये समये गिण्हइ २४२ ४८ २१ सुरयपडियत्ति रइसुह २३० ४४ १२ होइ मणोवावारो २४३ ४८ नणु सिमिणगओ वि कोइ २३१४४ २० नेयाउ च्चिय जं सो २४४ ४९ १२ नं पुण विनाणं तत्फलं २३२ ४४ २२ जह नयणिंदियमपत्त २४५ ४९ देहप्फुरणं सहसोइयं च २३३ ४४ २५ विसयपरिमाणमनियय २४६ ४९ २६ सिमिणमिव मन्नमाणस्स २३४ ४५ अत्थगहणेसु मुज्झइ २४७ ५० ६ पोग्गलगोअगदन्ते २३५ ४७ कम्मोदयओ व सहा २४८ ५० जह देवत्थं चाखु २३५ ४७ सामत्थाभावामओ २४९ ६० १९ विप्तयमसंपत्तस्स वि २३७ ४७ १९ तोए ण मल्लग पिय २५० ६० २८ समयेमु मणोदव्योइं २३८ ४७ २० दव्वं भाणं पूरिय २५१ ५१ ५ देहादणिग्गयरस वि २३९ ४७ सामन्नमणिद्देसं २५२ ५१ गिज्सस्स जणाणं २४० ४८ सद्दे ति भणइ यत्ता २५३ ५१ २० जइ सद्बुद्धिमत्तय २५४ ५२ १ थोत्रमियं नावाओ २५५ ६२ इय सुवहुणादि काले २५६ १२ १८ किं सदो किमसद्दो २५७ ६२ २४ किंतं पुत्वं गहियं २५८ ५३ १ अत्थोग्गहओ पुन्वं २५९ ५३ ६ जइ सरेत्ति न गहियं २६० ५३ १५ सव्वत्थ देसयंतो २६१ ५३ २० अहवसुए चिय भणिय २६२ ५३ २४ अहव मइयुवं चिय २६३ ५४ अस्थि तयं अव्वत्तं २६१ ५४ अत्योत्ति विसयगहणं २६५ ५४ जेणयोग्गहकाले २६६ ५४ २० w १ ५ ३ ७ CS ३ सामण्णतयण्मविसे २६७ ५४ २१ अण्णे सामण्णगह २६८५५ तदवत्थमेव त पुज्य २६९ १५ भयोगहो न समय २७० ५९ एगो वाऽवाओ च्चिय २७१ ५५ सामग्ण च विसेतो २७१५५ केपिहालोयणपुष्य २७१ ५६ २ त वगणोगगहाओ अत्थोग्गहो विजव २७५ ५६ तच समालोयणम २७६ ५६ आलोषणत्ति नाम गहिय व होउ तहियं २७८ ५७ मत्यावम्गहसमये खिप्पेयराइभेओ २८.६७ १६ | थाणुपुरिसाइकुछ २९३ ६२ स किमोग्नहोत्ति भण्णइ २८१ ५७ एष चिय सिमिणाइसु २९४ ६३ सामण्णमेत्तगहण २९२ १८ ११ | उकमओऽइक्कमओ २९५ ६३ सो पुणरीहावाया २८३ १८ १२ / ईहिजा णाहिय तत्तोणतरमोहा २८४ ५८ १३ | एत्तो थिय ते सव्वे २९७ ६३ सम्वत्येहावाया २८५ ५८ २३ | अम्भस्थेवाओ चिय २९८ ६३ तरतमजोगाभावे २८६५९ उप्पलदलसयवेहेन २९९ ६४ सदोत्ति यसुयभणिय २८७ ५९ ५ सोइदियाइभेएण ३००६४ खिप्पेयराइभेओ २१८६९ ८ अठ्ठावीसइभेय एय ३०१ ६४ इय सामण्णम्गहणा २९९ १९ पेहत्तु वनणोग्गह ३.१ ६४ महुराइगुणत्तणओ २९० ६. १ | अस्सुयणिस्सियभेय ३०२ ६४ वषणतर तयत्था २९१६. ६ | चउवहरित्ताभावा सेसेसु वि इवाइस २९२ ६२ ११ । किह पडिकुकुडहीणो ३०४ ६४ ९ २० २० ૧૨ ७ ८. २ २ २४ " २ ७१ २५ इह बत्युमत्यवयणा ३१६ ६८ अहवाण सव्वधम्मा ३१७६८ १२ जइ एवं तेण तुर ३१८६८ एग जाणं सर्व जे संसयाइगम्मा ३२१ ६९ १२ पन्जायमासयन्तो ३२२ ६९ निण्णयकाले विजओ ३२३ ६९ १८ कट्ठयरं वनाणं ३२४ ६९ अहवा जहिंदनाणो ३२९ ७० तुल्लमिणं मिच्छस्स वि ३२६ ७० जनिण्णओवओगे वि ३२७ ७० अहवा जह सुयनाणा ३२८ ७. २८ एसा सम्माणुगया ३२९ ७१ ५ " जह उपहाइसामा अठ्ठावीसइभेयं सुय जं बहुबहुविहखिप्पा ३०७ ६५ नागासदसमूह खिप्पमचिरेण तं चिय ३०९ ६६ एत्तो चिय पडिववखं ३१० ६६ १८ निस्तिये विसेसो वा ३१० ६६ २० एवं बज्झन्भंतर इह संसयादणंत ३१२ ६७ नगु संदिदे संसय ३१३ ६७ इह सज्झमोगगहाइ ३१४ ६७ २३ तहविणाम अभुव ३१४ ६८ वत्युस्स देसगमग .३१५ ६८ १० विवरीयक्त्युगहणे ३३० ७१ जह सो वि तस्स धम्मो ३३१ ७१ जोगगाजोगविसेसं. काले सिक्खइ नाणं (त्ति) १७१ काले य भत्तपा एवं समायरन्तो सयलसुरासुरपणमिय सत्तद्वभवगाहण ५ ७१ तत्थ य जरमम्मणमरण, ६ ७१ उग्गहो एक सभयं ३३३ ७२ अयोग्गहो जहन्नो ३३४ ७२ सोत्ताइणं पत्ताइ ३३५ ७२ पुढे मुंणेइ सद ३३६.७२ २७ २८ ९ १५ PREMORE १२ २२ २३ १० २० १२ १५ पुट्ट रेणुं व तणुमि १३७ ७२ २४ एगवीस खलु लपखा ॥२७४ पहुसद्मभावुगाह ३३८७२ २५ इति नयणविसयमाणं फरिसायतरमत्त ३६९ ७२ २६ जयहिं एकीसाए १४५ ०४ जेणं जग मसा (टोबा)१ ५३ नयणिदियस्स तम्हा ३४६ ७४ परम णू तसरेणू ६ नह सुत्ते भणियं १(टी.) ७५ उम्मेहंगुरमे मुत्ताभिप्पाओऽयं २४७ ७५ भायंगुलेण वायूं ८ पारसहिंतो सोर्स २१८७५ अपतकारि नयण १४०७३ दाणमपरिणा ३४९ ७५ नणु भणियमुम्सयंगुल ३४१ ७३ संखेजहभागाओ २४२७३ २७ भासासमासेटोमो इरियमाणे वि तय सेटी पएसपंतो ३५२.६ तणुमा थिय तेणं ३४४ ७४ १२ भासासमसेठिओ सोयालोससहरसा (टोका)१७४ मणुसेटिगमणामो १४ गिण्हइ य काइएण २५९ ७६ गिव्हिस कारणं वाया न जीवमोगो ३५७ ७६ मह सो तणुसरंभो ३५८ ७६ किं पुण तणुमरंभेण ३५९ ७७ तणुनोगो चिय मणयह ३६० ७७ तुले तणुमोगत्ते कारकिरियाइरित ३६२७७ वातणुनोगाहिय ३६३ ७८ तह तणुवावाराहिय २६९ ७८ जह गामामो गामो ३६५ ८ फेद पगंतरिय आह मुये चियनिसिरह १६७ ७९ २४ जं तेण पञ्षणुसय . १. २ ૦૪ eeee- ૩-૦ - શ્રી જૈન ગ્રન્થ, પ્રકાશક સભા પ્રકાશિત ગ્રન્થો – ૧ હરિભકાકરિ ૩૩ સંવાદ-પાવુક્ત ૧૨ હૈમધાતુમાલા ૩૧ થી ૩૪ ભાષારહસ્ય પ્રકરણ સટીક, યોગવિ- વૃત્તિ ડે ઈ પેપર ૩-૦ ૧૩ જૈનતત્વ પરીક્ષા શિક વ્યાખ્યા, તત્ત્વવિરવિવાર સમેત- ઝિપેપર ૨-૮ ૧૪ સ્તોત્રભાનું ૦-૪ કુદ્રષ્ટાન્તવિશકરણ પ્રકરણ, નિશાબતે ૨૪-૨૫ મોગદષ્ટિ યોગબિન્દુયટી ૨ સંભાલ પ્રકરણે ૨-૮ ૩ હરિલાદ્રસૂરિપ્રન્યસંગ્રહ ૨૬ ૨૫–૧૧–૩૫૦ માયાન વિગેરે સ્તવને, ' સ્વરૂપો દૂષિતત્વવિચાર ૪ હારિભદાષ્ટક પ્રકરણમૂિલ] કમ્પગુથપર્યાયરાસ, સમ્યક યોગદષ્ટિ, ૩૫ જ્ઞાનાર્ણવ પ્રકરણ મૂલ ૩૬ થી ૪૬ શ્રી યશોવિજયવાચક ગ્રન્યસંગ્રહ, ૫ સ્યાદાદરહસ્ય પત્ર સટીક સંયમણિ સજઝાય, સ્તવન વિચારા'દ ૦-૧૨ ૬ ન્યાયાલોક સટીક સયંત્રશ્રેણિયંત્રાદિ વિવિધ સંગ્રહ ૭-૮ પાતંજલ યોગદર્શનવિવરણુ, નરહસ્પ, ૭ અસહસ્ત્રીતાત્પયવિવરણ સપ્તભંગીનયનપ્રદીપાદિ ૧૧ પ્રો ૨–૦ ૨૭ પારમષ સ્વાખાય સંગ્રહ [બુક] ૦-૬ ૮ સુધાતતત્વ ૪૭ સવિવરણ ધમ પરીક્ષા ટિપણુયુક્ત :- ૨૮ પારમ સ્થાપાય ગ્રન્ય સંગ્રહ. ૯ જન જાય મુકતાવલી સ્ટીક ૯ ગ્રન્થો પત્રકારે ૮ ૪૮ અનેકાન્તવ્યવસ્થા પ્રકરણ જૈન તર્ક ૪-૦ ૨૯ સમ્મતિત પ્રકરણ સટીક ૪૯ થી પર. ઉત્પાદડિસિદ્ધિવિવરણ ૧૦ નવ તત્વ વિરતારા પ્રથમ વિભાગ વાદમાવાદિ ૪ ગ્રન્ય સંગ્રહ ૧૧ દંડક વિસ્તરાર્થ ૩૦ ગદયાનિવગ્રપલકારાદિ ૦-૬ પ૩ જમવ મીમાંસા ૫૪ જિયાયુકત મદૂત -૪, ૫૫ પારમ વ્યાખ્યાનમાલા ભેટ,પ૬ વૃદ્ધિનેમિન સ્તરનાદિ સંપ્રહ ૦-૮, ૫૭-૫૮ જ્ઞાનાર્ણવ સટી – જ્ઞાનબિન્દુચ (ર) પ-૦, ૫૯-૬૦ માર્ગ પરિશુદ્ધિ-તિલક્ષણસમુ૫યઃ સંસ્કૃત છાયા સહિત ૦-૮ ૬૧ ધૂત ખ્યાન સંસ્કૃત ૦-૧૨ પ્રતિસ્થાનઃ-શેઠ ઇશ્વરદાસ મૂલચંદ કી કભદ્રની પાળ-અમદાવાદ, ૫-૦ સ, જેમા ૫-૦ ૦-૧૨ - - - ।। स्यादादकल्पलतान्तर्गतस्याद्वादमाहात्म्यतपयकुसुमाञ्जलिः॥ व्यालायेद् गरुडं प्रमर्पिगरलज्वाला जयेयुर्जवाद्, गृह्णीपूर्विरदाय यद्यतिहठात् कण्ठेन कण्ठोरवम् । सूर पेत् तिमिरोकरा स्थगयितु व्यापारपेयुर्यलं पन्नीपूर्वत दुर्नया: प्रसृमराः स्याद्वादविद्यां तदा ॥१॥ नयाः परेषां पृथगेरदेशा, लेशाय नवाईतशासनस्य । सप्ताचिपा कि प्रस्ताः स्फुलिङ्गा, भवन्ति तस्यैव परामवाय ॥२॥ एक छविया न गम्यत इह न्यायेषु बाह्यपु यो, देशप्रेक्षिपु यश्च कवन रसः स्याद्वादविद्याश्यः । य:पोन्मीलितमालतीपरिमलोद्वारः समुज्जृम्भदे, स स्वैर पिचुमन्दकन्दनिकरक्षोदाद् न मोहावहः ॥३॥ अम्पास एकः प्रसाद्विवेकः स्यादादतवस्य परिच्छिदाप्यः । कपोपलाद् नैव परः परस्य निवेदयत्यत्र सुवर्णशुद्विम् ॥४॥ मापस्थ्यमास्थाय परीक्ष्यमाणा: क्षण परे लक्षणमस्य किश्चित् । जानन्ति तानन्तिमदुर्नयोत्था कुवासना द्राक कुटिलीकरोति ॥५॥ भतो गुरूणां चरणार्चनेन कुवासनाविममपास्य शवत् । स्याद्वादचिन्तामणिलब्धिलुब्धा प्रानः प्रवर्तेत यथोपदेशम् ॥६॥ चार्वाकीयमतावकेशिपु फल नैवास्ति बौद्धोक्तयः, कन्धुपमितास्तु कण्टकशवैरत्यन्तदुःखप्रदाः । उन्मादं दधते रसैः पुनरमी वेदान्तवालद्रमाः, गीर्वाणगुम एव(५) तेन सुधिया जैनागमः सेव्यताम् ॥७॥ न काकैयाकि सुगततनयापि शशकैद्वितज्ञैरपि च महिमा यस्य विदितः। मराला सेरन्द तमिह समय जैनयतयः, सरोज स्वादादप्रकरमकरन्दं कृतधियः ॥८॥ कषिद् भेदच्छेदः कचिदपि हताश्मेदरचना कचिद् नात्मख्यातिः कचिदपि कारातिविरहा। कलशन शहा न परसमये कुत्र १ तदहो। पिता यत् स्याद्वादं मुकतपरिणामः स विपुलः Resex SURE RECOREA ॥ ॐ अहं नमः॥ ॥'अनन्तलब्धिनिधानाय सकलविघ्नविच्छिदे श्रीगौतमस्वामिने नमो नमः ॥ सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-शासनसम्राट् खरिचक्रचक्रवति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रभाषशालि-प्रभूततीर्थोद्वारक- भट्टारक-आचार्यमहाराजाधिराजश्रीमद् विजयनेमिसूरीश्वरसद्गुरुभ्यो नमो नमः ॥ प्रौढप्रतिमावदातसंस्मारितातीतपूर्वश्रुतकेवलिभगवद्-न्यायविशारद-न्यायाचार्य-कलिंसरस्वती- पूर्वधरनिकटकालवर्तिश्रीहरिभद्रसरिपुङ्गवलघुवान्धवप्रमृत्यनेकविशंदावरुदावलीविभूषित- महामहोपाध्याय-श्रीयशोविजयगणिसन्दृब्धं स्वोपजविवरणसमलङ्कृतम् ॥ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणम् ॥ ऐन्दवीं तां कलां स्मृत्वा, धीमाझ्यायविशारदः ॥ज्ञानार्णवसुधास्नान-पवित्राः कुरुते गिरः ॥१॥ स्पष्टम् ॥१॥ तत्र पूर्व ज्ञानानि निरूपयितुं तद्विभागमाह- ज्ञानं पञ्चविधं प्रोक्तं, मतिः श्रुतमथावधिः ॥ मनःपर्यवसंज्ञं च, केवलं चेति नामतः ॥२॥ अत्र स्वाम्यादिनिरूपणसाम्यात्, तद्भाव एव शेपज्ञानोत्पत्तेचादौ मतिश्रुतयोरुपन्यासः । यदाह भाष्यकार:-"जं सामिकालकारण-विसयपरोक्खचणेहिं तुल्लाई । तब्भावे सेसाणि य, तेणाईए मइसुआई॥८५॥वि" [ यत्स्वामिकालकारण- "Ck विषयपरोक्षत्वैस्तुल्यानि ॥ तद्मावे शेपाणि च, तेनादौ मतिश्रुते] । अत्र प्राच्यो हेतुरेकत्रोपन्यासेऽन्त्यस्त्वादावुपन्यासे इति ध्येयम्। स्वाम्यादिसाम्यं चैवम् । मतिश्रुतयोः स्वामी तावदेक एव । 'जत्व महनाणं तत्थ सुअनाणं ।' इति वचनात् कालोऽप्यनयो नाजीवापेक्षया नाद्यनन्तः, एकजीवापेक्षया च नैरन्तर्येण सातिरेकषट्षष्टिसागरोपमप्रमाणस्तुल्य एव ॥ कारण- मपीन्द्रियमनाक्षयोपशमादिरूपं द्वयोस्तुल्यम् । सर्वद्रव्यविषयत्व-परनिमित्त्वाम्यां विषय-परोक्षत्वयोरपि तुल्यतेति।तता कालेनोक्तरूपेण, विपर्ययेणाज्ञानापत्तिरूपेण, स्वामित्वेन स्वस्वामिनोरमेदाश्रयणादेकस्वामिकत्वेन, लाभेन च युगपत्रयाणा- मपि लामसम्मवेन सापादयधेः ॥ ततःउग्रस्थस्वामिकत्व-पुद्गलमात्रविषयकत्व-क्षायोपशमिकत्वादिसाधान्मना- पर्यवज्ञानस्य ॥ तत उचमयतिस्वामित्वसाम्पादवसान एव लाभाचान्ते केवलज्ञानस्योपन्यासः॥ आह च-"मइपुवं जेण सुयं, तेणाईए मई, विसिट्टो वा ॥ मइभेओ चेव सुयं, तो मइसमणवरं मणियं ॥८६॥ काल-विवजय-सामिन-लामसाहम्मओ वही वचो । मापसमिचो छउमत्थ-विसप-मावादिसामना ।। ८७॥ अंते केवलमुत्तम-जइसामिपावसाणलामाओ॥ एत्यं च महसुगाई, परोक्खमियरं च पचक्खं ॥ ८८॥" [ मतिपूर्व येन श्रुतं तेनादौ मतिः ॥ विशिष्टो वा मविभेद एव श्रुतं, वतो मतिसमनन्तरं मणितम् ॥ कालविपर्ययस्वामित्वलामसाधर्म्यतोऽवधिस्ततः ॥ मानसमित छपस्थविषयमावादिसामान्यात् ।। अन्ते केवलमुत्तमयतिस्वामित्वावसानलामात् ।। मत्र च मतिश्रुते परोक्षमिवरच प्रत्यक्षम् ।।] इदन पूर्वानुपूर्त्या निरूपणप्रयो- जकेच्छया विषयोपवर्णनं, अन्यथेच्छाविशेषण पश्चानुपादिनापि निरूपणसम्भवादन चान्पया निरूपणस्यासाम्प्रदायि- कत्वेनानिष्टसाधनत्वामान्यादृशेच्छया तदिति ध्येयम् ॥ २ ॥ अथ प्रत्यक्षत्वपरोषत्वाभ्यां तदिलक्षणन्यवस्थामाह-- New तत्मत्यक्षं परोक्षं च, प्रत्यक्षं त्वक्षमात्रजम् ॥ यत्त्विन्द्रियोपलब्धिस्त-त्तन्न, यत् स्पष्टतैव सा ॥३॥ तद् ज्ञानं द्वधा,प्रत्यक्ष परोक्षं चेति,तत्रानुते च्याप्नोति ज्ञानात्मना सर्वार्थान्, अनाति स्वःसमृद्धथादीन्, पालयति भुक्ते वेति 'उणादिनिपातनाद'अक्षो जीवस्तं प्रति साक्षाद्गतमिन्द्रियनिरपेक्षं वर्तते यत् तत्प्रत्यक्षम् । आह च-"जीवो अक्खो अत्थव्या वणमाअणगुणनिओ जेण ॥ तं पइ वट्टइ नाणं, जं पञ्चक्खं तयं तिविहं ॥८९ ॥ ति॥[जीवोऽक्षोऽर्थव्यापन-भोजनगुणान्वितो येन ॥ तं प्रति वर्तते ज्ञानं, यत्प्रत्यक्षं तत्रिविधर ] । इत्थं चेदं व्युत्पत्तिनिमित्तमेव । नैश्वयिक प्रवृत्तिनिमित्तं तदेव च लक्षणम्, 'उत्पत्ताविन्द्रियमनोनिरपेक्षत्वम्' पर्यवस्यति । तेनावध्यादेः क्षयोपशमभावापनकर्मपुद्गलजन्यत्वेऽपि तस्य न क्षतिर्वस्तुतस्त- द्धतोरितिन्यायात्स्वाभिमगुणजन्यत्वमेव तस्य । तेन न वक्ष्यमाणपरोक्षलक्षणातिव्याप्तिरिति ॥ एवं च 'आत्ममात्रजन्यत्वम्'इति यथाश्रुतमेव न्यायः। न च सांव्यवहारिकप्रत्यक्षेऽव्याप्तिस्तस्यालक्ष्यत्वात्तत्रोपचारेणैव प्रत्यक्षत्वव्यवहाराद्, न हि वाहीको गोव्य- वहाराद् गौरेवायत्त्विन्द्रियोपलब्धिःप्रत्यक्षमित्यक्षपादमतानुयायिनःप्रचक्षतेतन्न, इन्द्रियाणामचेतनत्वेनोपलब्ध्य- भावात्तद्विगमेऽपि तदुपलब्धार्थस्मरणनात्मन एव ज्ञातृत्वात् ॥ उक्तञ्च-"कोसंचि इंदिआई, अक्खाई तदुवलद्धि पच्चक्खं ।।तन्नो ताई जमचेअणाई, जाणंति ण घडो व्व" ॥९१॥ [केपाञ्चिदिन्द्रियाणि, अक्षाणि तदुपलब्धिः प्रत्यक्षम् ॥ तम तानि यदचेतनानि, जान- न्ति न घटइव]"उवलद्वा तत्थाया, तन्विगमे तदुवलद्धसरणाओगेहगवक्खोवरमेवि तदुवलद्धाणुसरियाव||९२॥ति'[उपलब्धा तत्रा- त्मा,तद्विगमे तदुपलब्धस्मरणात्।। गेहगवाक्षोपरमेऽपि तदुपलब्धानुस्मतेव] अथेन्द्रियजन्यज्ञानमेव प्रत्यक्षमिति तदपिन समीचीनम्। तस्य परजन्यत्वेनाऽतथात्वात्, न चेन्द्रियजन्यज्ञानत्वमेव प्रत्यक्षत्वं अवघ्यादौ तु तदौपचारिकमिति वाच्यम्, लिङ्गाधजन्य- त्वेन तस्य प्रत्यक्षत्वावश्यकत्वात्प्रत्यक्षपरोक्षातिरिकसानस्यालीकत्वाताअपि चेन्द्रियमनोनिमिष ज्ञानं परोक्षं संशयविपर्ययानध्यय- सायसम्मवाद्विनिश्यसम्मवादा मामासानुमानवत्सम्यगनुमानवञ्चति देवोस्तस्य परोक्षत्वसिद्धौ न प्रत्यक्षत्वम् ॥ आह - "इदिअमणोणिमिनं, परोक्खमिह संसयादिभाषाओ। तकारणं परोकसं, जहेह साभासमणुमाण॥९॥ ति"[इन्द्रियमनोनिमिचं,परो- ।, धमिह संपादिमागरा ॥तत्कारणं परोक्षं, यह सामासमनुमानम्]। एवं च संशयादिप्रतिबन्धकतावच्छेदकतया सिद्धं प्रत्यक्षत्वमव- ध्यादिपेव व्यवस्थितमिति भावः । ननु तद्वत्तानानं प्रति तद्विरुद्धनिश्चयत्वेनैव प्रविषन्धकताऽसिदविरुद्धानकान्तिकैवानुमितिरेष प्रतिवद्धयते नत्वनुमित्यनन्तरं सन्देह एवाधीयत इति चेत्,न, तथापि साक्षात्कवेऽर्थे सन्देहसामप्रया एवानवतारादित्याशय इत्याहुः।। वस्तुतहन्द्रियजन्यशानत्वं नात्यवत्वं तन्मतेज्ञानमात्रस्यमनोरूपन्द्रियजन्यत्वात नचेन्द्रियत्वेनेन्द्रियजन्यत्वं विवक्षितं इन्द्रियत्वस्य प्रत्यक्षपटिवत्वेन वेन रूपेणाहेतुत्वात्पृथिवीत्यादिना साकर्येण तस्याजातिवादीचरझानेऽज्याप्तधानापि ज्ञानाकरणकज्ञानत्वं जन्यप्रत्य- धस्याऽद्वाराऽस्मदादिवानस्पेश्वरज्ञानस्य वा जन्यत्वेनाव्याप्तिवारणायाशाद्वारकत्वाशिणदानस्याऽऽवश्यकत्वेऽपि निदिभ्यास- " नारा मननजन्ये तत्त्वज्ञानेऽव्याने,विजातीयादृष्टद्वारा मननस्य तद्धेतुत्वापेक्षयाविजातीयनिदिध्यासनद्वारैव तद्धतुत्वौचित्यात नापि जन्यधीजन्यमाप्रपूपिजातिशून्यज्ञानत्वं जन्यर्धामात्रस्यादृष्टद्वारा जन्यधीजन्यत्वात् साक्षातबन्यत्वाविवक्षणेचस्मृतावतिव्याप्तेरह- याद्वारकत्वविशेषणे जन्यपदयाद, अनुमित्यादरप्यदृष्टद्वारा इविविषयकव्यातिज्ञानादिजन्यत्वाञ्च,अदृष्टव्यापारानिरूपितजन्य- धीजन्यवादन्माषपतिजातिमय विवक्षणेऽपिजन्यधीमात्रस्य कालिकन जन्यधीजन्यत्वात् सामानाधिकरण्यप्रत्यासरया जन्यत्वविव- क्षावश्यरवेजन्यपदयात् । किश्चैतानि लक्षणानीतरभेदोपयोगीनि न तु व्यवहारोपयोगीनि अयोमयोपयोगिसाक्षात्कारित्वमेव तल्लक्षणमस्तु, तच्च साक्षात्करोमीतिप्रतीतिसिद्धो जातिविशेषो निर्विकल्पकेश्वरज्ञानयोश्च धर्मिग्राहकमानसिद्धं तदिति चेत्, नून स्पष्टतैव तत् साक्षात्करोमि स्पष्टमवैमीतिप्रतीत्योरेकाकारत्वात्केवलं कपर्धनभ्युपगमाद् ज्ञानावरणक्षयोपशमविशेषजन्यतावच्छेद- कत्वेन तत्क्षयजन्यतावच्छेदकत्वेन च स्पष्टताद्वयासद्धिः । स्पष्टतात्वेनानुगतीकृता च स्पष्टता तल्लक्षणमिति ॥ न च प्रत्यभिज्ञाया- मतिव्याप्तिः, तस्याः केवलेन्द्रियसंस्काराजन्यत्वेन स्मृतिव्यावृत्तपरोक्षधीरूपत्वादिति वाच्यम् , तस्या अस्पष्टत्वादिदन्तोल्लेखमाने स्पष्टताया अनियामकत्वात्, उक्तञ्च-" भवति च परोक्षस्यापि साक्षादिवाध्यवसाये प्रत्यक्षसर्वनाम्ना परामर्श इति । " स्पष्टत्वेन तत्प्रतीतिस्तु सन्निहितविषयत्वादिकमवगाहते, यचिन्द्रियजन्यत्वेन तस्याः प्रत्यक्षत्वमेव लाघवादिन्द्रियजन्यत्वस्यैव प्रत्यक्ष- त्वप्रयोजकत्वात्, न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्यापत्तिः, विशिष्टानुभवं प्रत्यव्यवहितविशेषणज्ञानस्य हेतुत्वेन प्रत्यभिज्ञायाः पूर्व नियमतस्तत्तास्मृतिकल्पनेन तस्याः संस्काराजन्यत्वादिति, तदसत, तत्र नानास्मृतिकल्पनापेक्षया विशेषणज्ञानजन्यतावच्छेदक- प्रत्यक्षत्वाभावस्यैव कल्पयितुमुचितत्वात् प्रत्यभिजानामीत्यनुगतप्रतीतिसाक्षिकजातिविशेषस्य च चाक्षुपत्व-त्वाचत्वादिना साङ्- कर्यभिया प्रत्यक्षव्यावृत्तत्वाच, अस्माकं तु तत्वांशे उपनय इतरांशे च सनिकी हेतुरिति प्रत्यभिज्ञायां न कारणान्तरकल्पनागौ रवम्, भवतां तु प्रत्यभिज्ञात्वावच्छेदेन कारणान्तरकल्पनागौरवम् तचासंस्कारस्यैव तत्तोपनायकत्वाच नोक्तनानास्मृतिकल्पनागौ- रखमपि, इन्द्रियनिरपेक्षसंस्कारजन्यत्वस्यैव स्मृतित्वप्रयोजकत्वात्, प्रयोजककल्पनायाः कारणविशेषकल्पनानुपजीव्यत्वेन तद्गौरवस्यादोपत्वादिति चेत्, न, स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोर्विषयतालक्षण्यस्य कारणवैलक्षण्याधीनत्वेन तत्र विलक्षणहेतुकल्पनाव- श्यकत्वात्, अत एवाऽसन्निकृष्टेऽपि विषये स एव वहिरनुमीयते स एवार्थः कथ्यत इत्यादि प्रत्यभिज्ञानम्, एवं चेन्द्रियार्थ- सनिकर्पोऽपि तत्र संस्कारोवाधकसदृशदर्शनादिहेतुतयोपदीयते, बदिदमभिमेत्योक्तं " अनुभूततया परोधमप्येकं साधादि- वाघ्यवस्पतः पश्यतथापरं प्रत्यभित्रैवेयमिति" । अन्यथा प्रत्यक्षवपराधत्वयोः साकर्यप्रसगाजातेरव्याप्यत्तित्वे सष्टताया विषयताविशेषरूपत्वे वा किश्चिदशे परोक्षत्वं किचिदशे च तस्याः प्रत्यक्षत्वम्, साक्षावियेत्यस्य साक्षात्कारसामग्रीसम्पत्ता- विवेत्यर्थः, अनुमानादेः सर्वथा परोक्षत्वं चासनिकृष्टांश एव, एवं च प्रत्यभिज्ञात्वमपि तदेवेति विषयताविशेष एप मियोऽन्तर्मा- वानन्तर्भावी च विवक्षाधीनावित्यपि यदन्ति । ननु तथापि संशयादीनां लक्ष्यत्वे संशयानध्यवसाययोरस्पष्टपोरव्याप्तिा, अलक्ष्यत्वे च स्पष्टे भ्रमेऽतिव्याप्तिरिति चेत्, न, प्रतिनिपत्तवर्णसंस्थानाधाकाराभिव्यङ्गयायाः स्पष्टवायास्तधामावाचन स्पष्टताप्रतीवर्धमत्वाव, न च भ्रान्तभ्रान्तिप्रसादकर्यम्, भ्रान्तिमानस्य तत् स्पष्टतांश प्रमत्वेऽपि विषयांशेजपावाद, न च सांव्यवहारिकापग्रहेऽव्याप्तिस्तत्र प्रतिनियतमनुध्यत्वाधाकारामिव्यङ्गयस्पष्टवाया निरपायत्वात् । नन्वेवे सांग्य- वहारिकत्वं यदि व्यवहारनयामिमतत्त्वं तदापतिप्रसङ्गोऽयच्यादावपि स्पष्टत्वेन तद्व्यवहारात्, अयापारमार्षिकत्वं तदपि तथा कात्स्येनास्पष्टत्वरूपस्य तस्य विकलप्रत्यक्षेऽभावात् क्षायोपशमिकत्वरूपस्यापितस्य तथात्वात् प्रजन्यत्वस्यापि तथात्वाद् । वस्तु- वोत्रपादेर्गुणजन्यत्त्वे च मतिश्रुत्योरपि लब्धीन्द्रियगुणजन्यत्वात्पारमाधिपगुणजन्यत्वाभावस्पोमपत्र तुल्यवाद । अथेन्द्रियव्य- वहितात्मजन्यत्वं तदिति चेत्, न, कुडयादेर्घटस्येवेन्द्रियस्यात्मनोऽव्यवधायकत्वादिति घेव, न, इन्द्रियजन्यस्य सांव्यवहारिकत्वे- नावधिमनापर्याययोस्तु विकलप्रत्यक्षत्वेन परिभाषणात्, कथमित्यमिति चेत्, न, स्वतन्त्रपरिमापाया अपर्यनुयोज्यत्वादाभो- गकरणे परानपेक्षवं वापारमार्थिकत्वविवक्षार्ग तन्त्रमिति दिग् ॥३॥ परोक्षलक्षणमाह-- परोक्षं च परापेक्ष-मनुमानादि सर्वथा ॥ येन संव्यहारेणा-ध्यक्षमैन्द्रियकं स्मृतम् (जगुः) ॥४॥ परापेक्ष परोक्षं, तत्त्वं चात्मातिरिक्तजन्यत्वं उत्पत्ताविन्द्रियाद्यपेक्षत्वं वाऽस्पष्टत्वं तदिति तु व्यावहारिकाः; तच्चोक्तस्प- कृत्वाभावो विषयताविशेषो वेत्यन्यदेतत्,नियतवाद्याकारेणाप्रतिभानमिति तु प्राश्नः,तत्रैकान्ततः परोक्षमनुमानादिकम् इन्द्रिय- जन्यज्ञानस्य सांव्यवहारिकप्रत्यक्षत्वेनातथात्वात, एवञ्चैकान्ततः प्रत्यक्षमप्यवध्यादिकमेवेति स्थितम् । आह च-"एगतेण परोक्खं लिंगिअ-मोहाइअंच पञ्चक्ख ॥ इंदिअमणोभवंज, तं संववहारपञ्चक्ख ॥ ९५ ॥ ति" [एकान्तेन परोक्षं लैङ्गिकं, अवध्यादिकं च प्रत्यक्ष । इन्द्रियमनोभवं यत्तत्संव्यवहारप्रत्यक्षम्]। नन्वस्मदादिसाक्षात्कारस्य कुतो नैकान्ततः प्रत्यक्षत्वं विवक्षामात्रस्य वस्तुस्वभा- वस्थाकर्तुमन्यथाकर्तुं वाऽशक्यत्वादिति चेत्, न, अत्र प्रत्यक्षपरोक्षपदयोस्तद्व्यवहारविषयपरत्वात्, न च निश्चयस्य न व्यवहारोप- योगित्वमिति वाच्यम्,शब्दाभिलापरूपव्यवहारेतस्याप्युपयोगित्वात् यत्तु व्यवहारनिश्चयाभ्यामेवास्य स्पष्टास्पष्टत्वं भेदाभेदवदिति, तदसत, सतोरेव भेदाभेदयोस्ताभ्यामवगाहनात्तयोरसत्करणाक्षमत्वात्, अन्यथा विकल्पव्यवहारेण शशशृङ्गमपि सिद्धयेत्, सिद्धथे देवेति चेत्, न, खण्डशः प्रसिद्धरेव तत्र तत्र सिद्धयर्थत्वात्, अन्यथा "असतो णत्थि णिसेहो” इत्यादि भाष्यविरोधप्रसङ्गादिति वय- मुत्पश्यामः ॥ यदि व्यवहारेण न स्पष्टतासिद्धिरपि तु संशयाद्यनवतारनियामकत्वेन तदाप्यस्यैकान्तपरोक्षत्वमुक्तरीतिं विना न निवा- रयितुं शक्यम्, एतेन 'वस्तुस्वभावो निश्चयाधीनो व्यवहारस्तु व्यवहाराधीन' इत्युक्तावपि न क्षतिः ॥ नन्वन्द्रियकज्ञानस्य परो- क्षत्वप्रतिपादनमुत्यत्रं, ने तस्य प्रत्यक्षत्वेनैव प्रतिपादनाद् । यदार्षम्-" पञ्चक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-इन्दियपञ्चासं गोइन्दियपच्चरखं चेति," तन्न, "परोक्खं दुविहं पण्णत्तम् । तं जहा-आमिणिवोहिअनाणपरोक्खं सुअनाणपरोक्सं चेति" ॥
[ प्रत्यक्षं द्विविधं प्रशतं । तपथा-इन्द्रियप्रत्यर्थ प नोइन्द्रियप्रत्ययंप ॥] [परोधं विविधं प्रवतं । उपया-आमिनियो- पिकवानपरोधं श्रुतशानपरोक्ष पैति ॥ ] प्रदेशान्तरे तस्य परोयत्वेनापि प्रतिपादनाव,न पामिनिरोधात्वस्स सामानाधिकरण्पेन परोक्षत्वप्रतिपादनान स्त्रविरोधः, ऐन्द्रियकस्य तस्य प्रत्यक्षत्वेऽपि लैगिकस्य तस्य परोयत्यान् । एवं हि 'दिपपपरसं- इत्या प्रत्यक्षपदे न लक्षणाऽधप्रतिगतत्वस्थ व्युत्पमिनिमित्त्वेऽपि स्पटवाया एव प्रत्यक्षपदप्रतिनिमित्तत्वात, अत एवाध- पदस्येन्द्रियार्थकत्येऽपि न शतिः, प्रतिपूर्वादक्षिशदारव्ययीमारापत्यैव न बादशं रूपं 'अर्थ आदेरगोमाविकत्वात् इत्याहुः । ज्ञानस्य ससंरिदितत्वेन प्रत्यक्षेऽपि प्रत्यक्षातस्तदपीटमित्यन्ये, रिपयताया दृश्यनियामत्यादिदमातमित्यपरे, नाशादपि प्रत्यक्षशन्दात् प्रत्ययान्तरमिच्छन्त्येके, न प लथणमाघालवणाऽऽवश्यमी, लक्षणासिद्धी लक्षणवाघम्तसिदी र मेत्यन्योन्या- श्रयादिति चेत्, न, ध्यपहारेण तथागोषसम्भवेऽपि व्युत्पनिनिमिचमेर प्रचिनिमि व्यवस्थापपता नियपेन क्यारोधा- सम्भवादुक्तव्यवस्थप गूयोपपतेः तदिदमभिप्रेत्योक्तं 'तथा च सति मतिश्रुतयोः परोक्षत्वे गस्यापि पारमाथि परोधत्वमोति' सामानाधिकरण्येन बापानातारा न सामाधिकरण्येन पोषकल्पनापीति प्रतिभाति। या नोइन्द्रिपप्रत्यक्षमित्या नोइन्द्रि- यपदस्य मनोर्थकत्वातग्निमिचकं शानं प्रत्यक्षमेवेति, तदनागमिळं, तत्र नोइन्द्रियपदस्पेन्द्रियाभार्थम्त्यादन्यपाभर्या- सावस्थायामपि मारिनोऽवधिज्ञानस्सामनस्कप्रत्यक्षस्य चासत्ग्रहासरगादिति ।। ४ ।। नन्वेवं कृता सप्रसगं विमागव्ययस्या, न यापपचिमती मवियतयोः साम्यादिमापर्यप्रतिपादनेन तदभेदशझाया एवोदयान, न च भेदगर्भसाधर्म्यवानाम वदुदय इति वाच्यम्, असाधारणधर्मशानेन तदुदयादिस्यत आह- भिन्ने स्वाम्यादिसाधा-न ययपि मतिश्रुते ॥ लक्षणादिकृतो भेद-स्तथापि स्फुटमेतयोः ।। ५ ।। साधये खल्वभेदो वैधयं च भेदः, न चानयोरसमावेशः, प्रमेयत्वादिना सर्वेषां साधर्थेऽपि मियो भेददर्शनात्, एतं च मति- श्रुतयोः स्वाम्यादिसाम्येऽपि लक्षणभेदादविरुद्धो भेदः। उक्त-"सामिचाइविसेसा-मावागो महमुणगया णाम । लसणभेआइ. कयं, णाणत्तं तयविसेसेवि ॥ ९६ ॥" [स्वामित्वादिविशेषाभावाद्मतिश्रुतैकता नाम ! लक्षणमेदादिकृतं नानात्वं तदविशेषेपि ] अथ भेदे लक्षणादिकृतत्वं तज्ज्ञानज्ञाप्यत्वं साध्यसाधनयोरभेदे न सम्भवतीति चेत्, न, श्रुतलक्षणेन श्रुते मतिधर्म्यरूपस्य तस्य मत्यवृत्तिधर्मत्वेन साध्यत्वे तदविशेषाच्छ्ते श्रुतत्वग्रहेऽपिमत्यनित्वेन वदग्रहेसिद्धसाधनानप्रकाशादिति।।५।।अपलक्षणादयथ लक्षण हेतु-फल-भाव-भेदे-न्द्रियविभाग चल्का-ऽक्षर-मुकेतराणि, तत्र 'यशोद्देशं निर्देश' इति न्यायात्प्रथम लागभेदमेवाह- श्रुतं श्रुतानुसारि स्या-न्मतिरन्यत्परोक्षजम् ।। श्रुतं शब्दात्मकं गौणं, व्युत्पत्त्यात्तु ( तु) लक्षणे ॥६॥ श्रुतानुसारि ज्ञानं श्रुतं, तदननुसारित्वे सतीन्द्रियमनोबन्यं च ज्ञानं मतिः। एवं च-"इन्दियमणोनिमित्तं, जं विनाणं सुआणुसोरणं ॥ .णिययत्युत्तिसमत्यं, तं भावसुझं मई सेसं ॥१००॥" [इन्द्रियमनोनिमित्तं, यद्विवानं श्रुनानुसारेण ।। निजकार्थोक्तिसमर्थ, तद्भावश्रुतं मतिः शेपम् ॥ ] इत्यत्र इन्द्रियमनोनिमित्तमिति विशेषगं शेपमित्या योज्यं, श्रुतानुसा- रित्वस्यैव श्रुतलक्षणत्वे निजकार्योक्तिसमर्थत्ववत्तस्य स्वरूपविशेषणलेनाऽज्यावर्तकत्वात् , श्रुताननुसारित्वस्यावध्यादाव- तिप्रसक्तत्वेन तद्वारणाय मविलक्षणे तु तदुपयुक्तमिति, अव किं तत् श्रुतानुसारित्वं न तावच्छन्दजन्यत्वं शब्दावग्रहादीनामपि तयात्वाद, नापि तद्वीजन्यत्वं तदनुव्यवसायेशतव्याप्तेः, नाऽपि पदजन्यपदार्योपस्थितिजन्पत्वं शान्दातिरिक्ततज्ञानाच्याप्तः, नापि पदधीजन्यत्वाव्यमिपारिजातिमचं, शान्दोपमित्यतिरिक्तान्याप्तः, युतनिश्रितमतिझानेऽतिव्याप्तेय । स्यादेतव, श्रुत- समातिः साक्षात्परम्परया वा पदधीजन्यत्वं न व्यमिचरति, अमिलापप्लाविताना पटत्वादीनामपि पपरागत्वादे- रिवोपदेशसहकृतेन्द्रियवेयत्वात्, अन्यथा कदाचिदप्पनाकलितपटपदसकेताना घटत्वादिग्रहप्रसगाव, अप पचरागत्वा- दिकमप्युपदेशासहकृतेन्द्रियवेद्यमेव 'कान्तिविशेपवान्मणिः पराग' इत्युपदेशस्त परागपदवाच्यत्वोपमिवायुपपुज्यत इति चेत्, न, एवं सत्यनाकलितोपदेशानां पथरागमहं वेचीत्यनुव्यवसायप्रसगात्परागपदामिलापप्रमध्याय, मतिशानं तु न तति न तत्रातिव्याप्तिः । न च तथापि पदधीजन्यत्वाव्यमिचारियुतनिश्रितत्वजाविमति मतिनानेऽतिव्याप्तिस्तस्य मझेतग्रहमान्द- बोधप्रसूतसंस्कारजन्यत्वनियमात्संस्काराद्वारकजन्यत्वविवयणे शन्दानुभूतस्मरणाय्याप्तरिति वाच्यम्, जातिपदस्य वानवमाधा- याप्यजातिपरत्वे दोपामावाद, श्रुतनिश्रितस्यापि संस्कारद्वारा श्रुताजन्यत्वाप, अन्यथा तस्य स्मृतिन्वापत्तेः, अब "पुन्धि सुअपरिकम्मित्र-मइस्स बं संपयं मुआई । तं सुअनिस्सि" इत्यागमेन व्यवहारकाले युवाननुमारित्वे मति थुताम्या- सपाटवप्रसूतत्वस्य निश्रार्थत्वे मतेर्दृढतरसंस्कारद्वारा श्रुतजन्यत्वं तस्य निषिमिति चेत्, न, वाग्म्यासपाटवपदस्य धयो- पशमपाटवार्यकत्वात्, अन्यथा संस्कारस्पानुभूतमात्रोपनायकवपा युतनिश्रित युताननुभूतानां नानाधर्माणाममानप्रसमाइ, एवं सूत्रेऽपि परिकर्मितपदं पटकृतपरं, मतिपदं मतिलन्धिपरमिति न कोऽपि दोषा, अन्यथा तत्र श्रुतातीतत्वस्यानुक्तिसहलात्काल- व्यवधानस्य विविच्य दुहत्त्वाद, मैवं, पदधीप्रयोजकविववाहपश्रुतज्ञानस्य पदधानाजन्यत्वेन भुक्त्वस्य पददीजन्यत्तव्यमि- चरित्वात्परागत्वादिग्रह इव घटत्वादिग्रहेऽप्युपदेशानपेक्षणाच, नापि सामिलापत्वं, तदि साकारत्वं वा शन्दविषयत्वं वामिलाए- योग्यत्वं वा, त्रितयस्य तस्य साकारत्वाच्छन्दविश्यत्वादमिलापयोग्यत्वादिदमवघ्यादावतिव्याप्तं . भाषावर्गणादिमतोऽभिला- प्यज्ञानस्यैवामिलाप्यप्रयोजकत्वाच, अथ शब्दोपरागेणार्थावगाहित्वं तत्, तदुपरागच संज्ञास्मृतिजन्यतावच्छेदको विषयताविशेषः स च नावध्यादौ तस्य स्मृत्यजन्यत्वाद्, अस्ति च श्रुतज्ञाने सर्वत्र सः पूर्व शब्दार्थयोः सङ्केतग्रहादर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारेण प्रति- सम्बन्धिशब्दस्मरणोत्तरमेव तदभ्युगमात्, अत एव घटमनुभवामीति शब्दोपरागेणैव तदनुव्यवसाय इति चेत्, न, ईहादि- रूपमतिज्ञानातिव्याप्तेः, संज्ञास्मरणाजन्यशाब्दबोधादावव्याप्तेरवग्रहोत्तरं संज्ञास्मरणाविलम्बेनवेहादिदर्शनाच, एतेन ‘शब्दा- नुपरागेणार्थावग्राह्यवृत्तिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तत्' इत्यपि निरस्तमिति चेत्, अत्रोच्यते, पदधीविषयकधीजन्य- त्वाव्यभिचारिजातिमत्त्वं तद्, विवक्षारूपश्रुतस्यापि पदेष्टसाधनताधीरूपपदविषयकधीजन्यत्वादुपदेशनिरपेक्षेन्द्रियजन्यज्ञानस्य च मतिज्ञानरूपत्वेनालक्ष्यत्वात् यद्वा व्यक्तश्रुतस्यैव लक्ष्यत्वेनाऽव्यक्तश्रुताव्याप्त्यभावात्, अथवा शब्दानुपरागेणार्थावग्राह्य- वृतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तद्, अस्ति हि सर्वत्र श्रुतेऽर्थदर्शनोबुद्धसंस्कारप्रसूतशब्दोपरागशालित्वम्, न तु मति- ज्ञानादौ, अवग्रहादिरूपे तत्र तदभावात्, न च संस्कारजन्यत्वेन स्मृतित्वापत्तिः, प्रत्यभिज्ञाया इव संस्कारजन्यस्यापि श्रुतवि- शेपस्यातथात्वसम्भवात्, न च संस्कारेणेहाद्युत्पत्तिकाले स्मृत्युत्पत्त्यापत्तिः स्मृतिसामग्रथपेक्षयाऽनुभवसामग्रथा बलवत्त्वाद् अथवा श्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमप्रयोज्य एव सर्वत्र श्रुते शब्दोपरागः, अत एवैकेन्द्रियाणां तादृशसंस्कारविरहेऽपि न क्षतिरिति । अर्थावभासिनि श्रुते समानसंवित्संवेद्यतयैव पदोपराग इत्यपरे, प्रत्यक्षे विद्यमानत्वमिव श्रुतज्ञाने पदवाच्यत्वं संसर्गतयैव भासते स एव शब्दोपराग इत्यन्ये, यत्तु शब्दाननुविद्धं ज्ञानमेव नास्ति । तदुक्तं-" न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके, या शम्दानुगमाइते । अनुविद्धमिव शानं, सर्व शब्देन गम्यते-॥१॥" इति पैगाझरणमतं तदसत्, फेवलार्थदर्शन दिना संस्कारोद्योधाभावेन शब्दानि सादर्थभासकसामप्रथैव शब्दापमासाम्युपगमे चाप्युत्पन्नानामपि उदयमासमरामातू, व्युत्पभाना विविच्य पदोपरागेणार्थप्रत्ययोऽव्युत्पमानां तु सामान्यत इति चेत्, अर्थविशेपे मारामाने शन्दरिशेपनि - सस्यैव प्रत्यसिद्धत्वादिति दिग्। ननु यघेते मतिश्रुतलक्षणे तदा, 'अभिणिबुप्तइचि आमिणियोहिरं, गणेइ ति सुति पत्रोक्त लक्षणे फर्थ रामगंसातामिति चेत्, अनासाधारणधर्मरूपलक्षणोक्तेस्ता प व्युत्पत्तिनिमितरूपतदुक्तेः, तथापि श्रूयत इति भूत- मिति कर्मव्युत्पत्या शब्द एक ध्रुवं स्यात, न पायमात्मभाव इति चेत्, परतमुरा निर्गतस्य तस्य श्रोतृश्रुतज्ञानकारणत्वेन पश्रुतोपयोगस्य प च्याख्यानादौ शब्दकारणत्वेनोपचारादेव तस्य श्रुतत्वाभिधानात्, परमार्थवस्तु श्रुणोतीति युवामिति फर्तृव्युत्पण्या जीवानन्यश्रुतोपयोगस्य श्रुतपदप्रधिनिमिताक्रान्तत्यात् ॥ आद प-"जमभिणियुज्सह तमभिणियोहो जं राणह त सुअं भणि ॥ सदं गुणइ जइ तो नाणं तो नाऽऽयभावो ने ॥९८ ॥ [ यदमिनिपुध्यते तदभिनिगोधो यत् शृणोति गद धुत भणित ॥ शब्द शृणोति यदि सको शानं ततो नात्ममावस्तत् ] सुअकारणं जओ सो मुझं च तपारणं ति तो सम्मि ।। कीरह सओवआरो, सुकं तु परमत्थो जीयो । ९९ ॥" [ श्रुतकारणं यतः स थुतं च तत्कारणमिति ततस्ास्मिन् ।। क्रियते श्रुतोपचारः श्रुतं तु परमार्थतो जीवति ॥ अग्रापि प्युत्पत्पर्थमुपजीव्य जातिगर्भलथणे न दोपः ॥ ६ ॥ यथाथुतं लक्षणमच्याप्तिप्रसङ्गपरिहाराभ्यां समर्थयति ॥ कथमेकेन्द्रियाणां तद, नूनं सुप्तपतरिय | भाषाओंग्राधमावेऽपि, क्षयोपशमसम्भवम् ॥७॥ 2nESH यद्यप्येकेन्द्रियाणामव्यक्तं श्रुतं नोक्तलक्षणाक्रान्तं तथापि सुप्तयतिश्रुतस्योक्तजातिगर्मलक्षणाकान्तत्वाद् व्यक्तभुतस्यैव लक्ष्यत्वाद्वा न दोषः ॥ न चान्यक्तश्रुते मानाभावः १, खापाद्यवस्थोत्तरमाप व्यक्तीभवद् भावश्रुतं दृष्ट्वा पयसि सर्पिप इव प्रागप्यव्यक्तश्रुतस्यानुमानान्, इति सम्प्रदायः।। ननु भाषश्रुतव्यक्तीभावस्य न तज्जातीयसत्यनुमापकत्वं पर्यायव्यक्तेन्य- रूपशक्तरेवव्याप्यत्वात् तावतैव सदसत्कार्यवादनिर्वाहात्,अन्यथाऽस्मदादीनामपि केवलज्ञानव्यक्तिजातीयतच्छकिप्रसगाव, इति चेव, न, मावश्रुतेन तदा स्वकारणक्षयोपशमानुमाने तेन तत्कार्याव्यक्तश्रुतानुमानमित्याशयाद्, वस्तुतः सुषुप्ताधवस्थायामाप श्वासप्रश्वासादिसन्तानोऽव्यक्तचैतन्यप्रयुक्त एवेति तेन तदनुमानम्, अत एव सुप्तमूच्छितादीनां जलसेकादिप्रतिकारेणा- व्यक्तचैतन्यमेवाभिव्यज्यत इति अनुभवः, सुषुप्तोत्थितस्य 'सुखमहमस्वाप्सं न किश्चिदेवेदिपम्' इत्यनुभवस्तु नकिञ्चित्पदो- परागेणाऽव्यक्तज्ञानमेवावगाहते । स्यादेतत्, इन्द्रियवृत्तिनिरोधेन सुपुप्तौ ज्ञानमनुपपन्न, न च तदैवाघाणोपनीतकुसुमगन्धादि- भानापत्तिः, जन्यज्ञानत्वावच्छिन्नं प्रति त्वङ्मनोयोगस्य विजातीयात्ममनोयोगस्य वा हेतुत्वेन तदानीं तदभावे जन्यज्ञानमात्र- स्यैवानुपपत्तेरिति, मैव, द्रव्येन्द्रियोपरोधेऽपि तदानीं भावेन्द्रियज्ञानसम्भवाइर्शनावरणकर्मप्रकृतिविशेषरूपायाः सुपुर्व्यक्तचक्षुर्द- शनादेरेवोपयातित्वात् अत एव 'भाषाश्रोत्रलब्धिविरहेण सुप्तयतेरिवैकेन्द्रियाणां भावश्रुतं न भवति इत्यपि परास्तं द्रव्येन्द्रियोपरोय:- पि भावेन्द्रियज्ञानवद् भाषाश्रोत्रलब्धिद्रव्यश्रुतादिवैकल्येऽपि तेषां भावश्रुतसम्भवाद्, वृद्धिगकोचनादिनिधानम्लनिधानकामिनी- स्पर्शजनितातिशयलिङ्गकाहारभयपरिग्रहमैपुनसतानां तेषु साक्षादुपलम्भाच॥आह च भाष्यकार:-"जइ सुअलवणमेयं, तो न तमेगिदिआण संभवइ । दबसुआमावम्मि वि, भावमु मुत्तजइणो न्च ।।१०१॥" [यदि श्रुतलक्षणमैतत्तो न तदेकेन्द्रियाणां सम्भवति ।। द्रव्यश्रुतामावेऽपि, भावश्रुतं सुप्तयतेरिव ] " भावसुअं भासासो-अलद्धिणो जुञ्जए ण इपरस्स ॥ भासाभिमुहस्स जयं, सोउण य ज हवेज्जाहि ॥१०॥" [ भावश्रुतं भाषाश्रोत्र-लब्धेर्युज्यते नेतरस्य ॥ भाषाभिमुखस्य यत्, श्रुत्वा च यद् भवेत् ] "जह मुहुमं भाविदिअ-नाणं दष्विदिवशेहे वि ॥ तह दन्बसुआभावे, भावसुझं पत्थिवाईणं ॥१०३ ॥" [ यथा सूक्ष्म मावेन्द्रियशानं द्रव्येन्द्रियावरोधेऽपि ॥ तथा द्रव्यश्रुताभावे, भावथुतं पृथिव्यादीनाम् ] ति । परममुनि. २ वचनप्रामाण्याचदमित्यमवगन्तव्यम् । यचर्यग्रहणशक्तिरूपस्य लन्धीन्द्रियस्यार्थग्रहणे व्यापाररूपेणोपयोगेन्द्रियेण - ग्यवधानादहेतुत्वम्, आकरे व्यवस्थापित सुपुतौ ज्ञानानुत्पचिनिळहायार्थग्रहणव्यापाररूपत्वमुपयोगस्य, तत्प्रमाण- निरूपणप्रस्तावाद् व्यक्तशानमाश्रित्यावसेयम्, अन्यथा सामग्रीसले उपयोगाभावोऽपि तदानीं कुत इत्यत्र किमभिधानीय स्याद् विना क्षयोपशमवृत्पलाम, तदभावे तु क्षयोपशमविशेपस्यैवोपयोगहेतुतया 'तद्धतोः' इति न्यायेनान्ततस्तद्वारार्थग्रहणहेतु- त्वकल्पनौचित्यात् ॥ स्वव एव केवलिनो विहाय शेपसंसारिणां तारतम्येन द्रव्येन्द्रियेष्वसत्स्वपि लम्धीन्द्रियपश्चकावरणक्षयो- पसमनिष्पमा मतिरस्त्येवेति परममुनियचनम् ॥७॥ नन्येवमेकेन्द्रियाणामव्यक्तमतिश्रुते इव विनिगमनाविरहादव्यक्तावस्यादिप्रसङ्ग इत्याशङ्कायामाह- न चापध्यादिकं तत् स्या-दागमानुपदेशतः ॥ तत्कारणगुणाभावा-दक्षजन्यतया तथा ॥ ८॥ न खल्वेकेन्द्रियाणामव्यक्तं ज्ञानमवध्यादिकं मवितुमर्हति, केवलज्ञानस्य तावत् क्षायिकत्वाद्, अवधिमनःपर्याययोध क्षयोपशमस्य तत्कार्यादर्शनेन तेष्वनुपदेशात्, उक्तश्च-"एवं सवपसंगो, न तदावरणाणमक्खओवसमा ॥ मइसुअनाणापरण- पखआवसमओ मइसुआई ॥१०४॥" [ एवं सर्वप्रसङ्गः न-तदावरणानामक्षयोपशमात् ॥ मतिश्रुतज्ञानावरण-क्षयोपशमतो मतिश्रुते ] ति ॥ अपि चावध्यादौ गुणस्य हेतुत्वात् , तद्विरहादेव नैकेन्द्रिये तदुत्पत्तिसम्भवः, व्यक्तावधित्वादेर्गुणजन्य- तावच्छेदकत्वकल्पने चातिगौरवात्, न च व्यक्तमत्यादिकल्पनेऽपि व्यक्तमत्यांदाविन्द्रियादिहेतुत्वकल्पने समानं गौरवमिति वाच्यम्, मतिलब्ध्यादावनुगतप्रत्यासत्तिविरहेण, इन्द्रियत्वादिनाऽहेतुत्वे विशिष्यतद्धेतुत्वावंश्यकत्वात्, अत्र चानुगतस्य गुणस्य हेतुत्वेन तदसाम्यात, स्यादेतद् , अवधिज्ञानस्य भवप्रत्ययकत्व-गुंणप्रत्ययकत्वाभ्यां द्वैविध्यात्, विजातीयावधिज्ञान एव गुणस्य हेतुत्वात्, तद्विजातीयमव्यक्तं तदेकेन्द्रियाणां भविष्यति, युक्तं चैतत्, मतिश्रुतयाईयोरव्यक्तत्वकल्पनापेक्षयैकस्यैवावधेस्तत्त्व- कल्पनौचित्यात्, मैवम् , भवप्रत्ययिकेऽपि तत्र गुणस्य हेतुत्वाचत्र भवनिमित्ततामात्रेणैव तत्प्रत्ययकत्वव्यवहाराद्, भवस्य हेतुत्वेऽपि देवभवादेविशिष्यैव हेतुत्वात् , प्रत्येकमादायोक्तगौरवस्याविशेषाच, किञ्चावध्यादेरात्ममात्रजन्यत्वं व्यवस्थितम्, न चैकेन्द्रियाणां ज्ञानोत्पत्तावात्ममात्राधिकार इति न तेपामवध्यादिकमित्याधुहर्नायम् ॥ ८॥ उक्तो लक्षणभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ हेतुफलभावात्तद्भेदमुपदर्शयति- श्रुतस्य मतिपूर्वत्वं, श्रुतमित्यनयोभिदा ॥ योगपद्यं तु तल्लब्ध्यो-रिष्टमेवोपयोगयोः ॥९॥ 'मइपुन्वर्ग सुतम्'इत्यागमेन हि श्रुतस्य मतिहेतुकत्वं प्रतिपाद्यते, पूर्वपदस्य हेतुत्वार्थकत्वात्, 'सम्यग्ज्ञानपूर्विका पुरुषार्थसिद्धिः' इत्यादौ तथादर्शनात, पृधात्वर्थस्य कारण एवान्वयात्, तथाहि कारणेनैव सताऽनुप्रेक्षादिकालीनोहापरपर्यायेण मतिज्ञानेन श्रुतज्ञानं पूर्यतें वृद्धि नीयत इति यावत्, एवञ्च दृढस्मृतिरूपश्रुतज्ञाने ऊहस्य हेतुत्वं पर्यवस्यति, तथाभूतमत्यैव चान्यतस्तत्प्राप्यते, गृपते परोपदेशश्रवणादिरूपमतेरेव तदाहितसंस्कारद्वारा श्रुतहेतुत्वान्, एवं च श्रुतमात्र एव द्रव्यश्रुतग्रहणस्य हेतुत्वं लभ्यते, तथाभूतयेव च तयाऽन्यस्मै तद् दीयते व्याख्यायते, एवं व्याल्यानुकूलश्रुतसङ्कल्पे तदिष्टसाधनतामते- हेतुत्वं पज्यते तथाभूतपैय च मत्या परापनचिन्तनद्वारा गृहीतं श्रुतं स्थिरीक्रियते, इत्यं चाविस्मृत्यनुकूलधारणाच्या पाररूपाया मतेरुत्तरकालिफपरिस्फूर्निरूपश्रुतहेतुत्वं व्यवस्थाप्यते, यद्यपि 'प्रपालनपूरणयोः' इतिपाठात्प्राप्त्यानतद्वात्वर्थत्वम्, तथापि प्राप्तिदानयोः पूरणविशेषत्वाद् न किश्चिदनुपपनम् , एवञ्च मतिश्रुते कार्यकारणभावादेव परस्परं भियते ॥ अभेदे सम्पेतरगोविषाणयोरिस कार्यकारणभावाभावात्, आह प-" मइपुग्वं मुअमुलं, " मई सुयपुधिआ विसेसोयं ॥ पुचि पालणपूरण-भाषाओ जे मई तस्स ॥ १०५॥” [ मतिपूर्व श्रुतमुक्तं, न मतिः श्रुतपूर्विका विशेपोऽयम् । पूर्व पालनपूरण- मागत् यन्मतिस्तस्य ] " पूरिजा पारिनइ, दिना या जं मईइ नाऽमइणा ॥ पालिज्जा अ मईए, गहियं इहरा पणसज्जा ॥१०६॥" [पूर्णते प्राप्यते दीयते वा यन्मत्या नाऽमत्या ॥ पाल्यते च मत्या गृहीतं, इतरथा प्रणश्येत् ॥] यद्यपि प्रागभावा- वच्छिमकालसम्बन्ध एप पूर्वपदार्थो नतु कारणत्वं गौरवात्, अकारणेऽपि पूर्वपदव्यवहाराय, तथाप्पन्वयव्यतिरेकाभ्यां मतेः श्रुतहेतुत्वावधारणादन पूर्वपदस्य कारणत्वे लक्षणा, न चाय पीजाभास्तात्पर्यान्यथानुपपत्तरेवेतद्वाजत्वात, वयातात्पर्य विन- तदभिधानस्य निष्प्रयोजनागत्, ननु मानाज्ञानरूपयोर्मतिश्रुतयोः पृथक् समकालमेर लामोपदेशात् कथं सूयोर्हेतुहेतुमद्भापा, अन्यथाप्रतिपदा तु मविज्ञानलामकाले थुतज्ञानालामाव, श्रुतासानानिविप्रसङ्गादन्यज्ञानस्यामानानिवकत्वादिति चेद, | लन्धिरूपमतिश्रुतयोलामस्यैव योगपयोक्ता, उपयोगयोस्तु क्यास्यामाव्यात्क्रमापत्तेखे व्यवस्थितत्यान, आह च-"नाणाण- ण्णाणाणि य, समकालाई जओ मइसुआई ॥ तो न सुअंमइपुगे, मइनाणे वा सुअन्नाण।।१०७॥ इह लद्धिमइसुआई, समकालाई, नतूबओगो सिं ।। मइपुवं सुमिह पुण, सुओवगो मइप्पभवो ॥ १०८॥ चि ॥ [ज्ञाने अज्ञाने च समकाले यतो मतिश्रुते । ततो न श्रुतं मतिपूर्व मतिज्ञाने वा श्रुताऽज्ञानम् ॥ इह लब्धिमतिश्रुते समकाले, नतूपयोगोऽनयोः । मतिपूर्व श्रुतमिह पुनः, श्रुतो- पयोगो मतिप्रभवः] ॥ ९॥ अथ श्रुतस्य मतिपूर्वत्वमिव मतेरपि श्रवणजन्यायाः श्रुतपूर्वत्वमस्तीत्यविशेपं निराकर्तुमाह- न भावभ्रतजन्यापि, द्रव्यश्रुतभवा मतिः ॥ न तस्यामस्ति वैजात्य-मुत्कर्षों वा पुरस्कृतः॥ १० ॥ परस्माच्छब्दं श्रुत्वा प्रादुर्भवन्ती मतिर्न भावश्रुतजन्या किं तु द्रव्यश्रुतप्रभवैव, श्रवणानुकूलक्षयोपशमाद्बोधकस्य शब्द- स्यैव तद्धेतुत्वाद्, अन्यादृशश्रुतपूर्वत्वं तु मतेन वारयामः श्रुतोपयोगाच्च्युतस्य मत्युपयोग एवावस्थानाद् ॥आह च-"सोऊण जा मई भे, सा सुअपुन्छ नि तेण ण विसेसो ॥ सा दव्वसुअप्पभवा, भावसुआओ मई णत्थि ॥१०॥" श्रुत्वा या मतिर्भवतां, सा श्रुतपूर्वेति तेन न विशेषः॥सा द्रव्यश्रुतप्रभवा, भावश्रुतान्मतिर्नास्ति ।।“कन्जतया ण उ कमसो, कमेण को वा मई णिवारेइ ? ।। जं तत्थावत्थाणं, चुअस्स सुत्तोवओगाओ ॥११०॥" [कार्यतया न तु क्रमशः, क्रमेण को वा मति निवारयति ॥ यत्तत्रावस्थानं, च्युतस्य श्रुतोपयोगात् ॥ ]ति ॥ यद्यप्यनयोरविशिष्टमपि पौर्वापर्य भेदकमेव, तथापि वस्तुगत्यनुरोधेनायं प्रयास इति ऋजवः, एकजातीयत्वेऽपि व्यक्तिपौर्वापर्यसम्भवाजात्यैव पौर्वापर्यस्य भेदकत्वात् तन्निर्वाहककार्यकारणभावव्यवस्थापन, तनिहाय च विशेपसमर्थनं सफलमिति यौक्तिकाः॥ कार्यकारणमावेन भेदनिरूपणौपयिकप्रासङ्गिकसूत्रसमर्थनायेदमिति साम्प्रदा- यिकाः॥ ननु मतिर्न श्रुतजन्येत्यसगतं श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य श्रुतजन्यत्वात्, इति चेत्,न, श्रुतप्रसूतक्षयोपशमविशेषस्यैव तद्धेतु- एवं त्वात्, ध्रुवजन्यतावच्छेदक्जातिकल्पने मानाभावान्, अस्तु वा तत्र तहेतुत्वम्, तथाप्यत्र सामान्यतो हेतुत्वलक्षण उत्कर्ष सामान्यतो भेदोपयोगितया ग्रायः, अन्यथा सामानाधिकरण्येन भेदग्रहेऽपि सामान्यतो भेदाग्रहेण न्यूनत्वप्रसङ्गाद्, अपि च पौर्वापर्येण निरूपणोपषिकोऽपि सामान्यत एवोपजीव्योपजीवकमाव इत्युक्तसूत्रौपयिकतयाप्युक्तोत्कर्ष एव ग्राह्य इति दिग् ॥१०॥ मविपूर्व श्रुतमित्यत्र व्याख्यान्तरं विदधता केपाश्चिन्मते दूषणमाइ- केपित व्यश्रुतं प्राहु-मतिपूर्व न घापरम् ॥ तेषां भावश्रुताभायो, निर्थीजा कल्पना पुनः ॥ ११ ॥ मतिपूर्व श्रुतमित्यत्र श्रुतपदं द्रव्यश्रुतपरं न विवक्षितं कोऽपि मापते,' यच विवक्षाज्ञानं तत्किल मतिरित्येतन्मति- जन्यवंद्रव्यश्रुतस्यैव व्यवतिष्ठत इति केपाश्चिदाशया,तेषां विवक्षाशाने प्राप्तमपि भावश्रुतर क्षणमुपेक्षमाणानामन्यत्रापि तदपेक्षाया अन्याय्यतया भारश्रुतामाव एव प्रसजेत्, इति निमग्नाऽनयोविशेषचिन्ताआह च-"दव्यमुझं मइपुच्वं भामइ जनाविचिन्तियं केह।। भावमुअरसामानो, पावइ तेभि प य विसेसो ॥११॥"[ द्रव्यश्रुतं मतिपूर्व, मापते यद् नाऽविचिन्तित केचित् ॥ मावश्रुत- स्थामावः प्राप्नोति तेषां न च विशेषः।।] न च मतिशब्दयोरेवान भेदचिन्ता मतामौचितीमश्नति तभेदस्यासन्दिग्धत्वेनाचिन्त- नीयत्वात्, न च मनिपूर्वतया द्रव्यश्रुतस्य ततो भेदोऽपि, मतेरपि शब्दपूर्वत्वेनाविशेषात् ।।आद च-"दव्यमुझं बुद्धीओ, सा वि तमोजमविसेसो तम्हति [द्रव्यश्रुतं घुदेःसापि ततो यदविशेषतस्तस्मात्।। वस्तुतोऽनयोः सामान्यतो हेतुहेतुमद्भावाभावेन सामा- न्यतो मेदासाधनायूनत्वमपि, तस्मात् मावश्रुतं मतिपूर्वमित्येव व्याख्यानं सम्यग्, अन्यथा श्रुतपदस्य शब्द लक्षणा निपीजा स्पान, क्याहि किमत्रान्वयानुपपल्या लक्षणाऽऽश्रीयते, वाानुपपल्या वा, नाद्यो मावश्रुते जन्यत्वान्वयस्यायाधात्, न द्वितीया, 'सुणेइ ति सु'इत्यत्र व्युत्पत्त्यर्थगृहीते शब्द मतिजन्यत्वतात्पर्यानुपपत्त्या तदाश्रयणस्य वक्तुमयुक्तत्वाद्, भेदचिन्ताया अप्रस्तु- तत्वेन तत्र तज्जन्यत्वतात्पर्यानाकलनात्, स्यादेतत्, मत्यादीयमानस्य श्रुतस्य शब्दद्वारैव मतिजन्यत्वात्तत्र तत्पूर्वत्वं प्रतिपाद्यमानं श्रुत एव पर्यवस्यतीति, मैवम्, एतादृशमतिपूर्वत्वस्य सर्वत्रासम्भवात, एतेन द्रव्यश्रुते मतिपूर्वत्वप्रतिपादनस्य भावश्रुतभेदचिन्तौ- पयिकतया नार्थान्तरत्वमित्युक्तावपि न क्षतिः, नन्वेवमत्र द्रव्यश्रुते व्युत्पत्त्यानुसरणमप्ययुक्तमनौपयिकत्वात्, इति चेत्, न, भाव- श्रुतलक्षणत्वेन तस्योपादेयत्वाद् ॥आह च-"भावसुअंमइपुव्वं, दव्वसुअंलक्खणं तस्स॥११२॥[भावश्रुतं मतिपूर्व, द्रव्यश्रुतं लक्षणं तस्य] अत्र लक्ष्यते गम्यतेऽनेनेति लक्षणं लिङ्गमित्यर्थ इत्याहुः, वस्तुतो लक्षणं लक्षणघटकमित्यर्थोऽपि प्रागुक्तरीत्याऽनुसरणीयः, एवञ्च कार्याभृतेन लक्षणघटकेन वा शब्देन स्वकारणीभूतस्य स्वघटितलक्षणलक्ष्यस्य वा विवक्षारूपस्य भावश्रुतस्यैव लक्षणात, तत्र मतित्वप्रतिपादनं परेषां विपरीतमिति ध्येयम् । आह च-"सुअविन्नाणप्पभवं, दव्वसुअमियं जओ विचिन्तेउं ॥ पुचि पच्छा भासइ, लक्खिज्जइ तेण भावसुअं॥११३॥" [श्रुतविज्ञानप्रभवं द्रव्यश्रुतमिदं यतो विचिन्त्य ।। पूर्व पश्चाद् भाषते, लक्ष्यते तेन भावश्रुतम् ।।]॥११॥ अथ नन्यध्ययने मतिश्रुतयोः कार्यकारणभावेन भेदप्रतिपादनानन्तरं स्वस्थाने सम्यक्त्वमिथ्यात्वपरि- ग्रहात्तयोर्भेदप्रतिपादनायेदं सत्रमस्ति, तद्यथा ॥ "अविसैसिआ मई मइनाणं मइअन्नाणं च, विसेसिआ मई सम्मदिद्विस्स मई मइ- नाणं, मिच्छादिद्विस्स मई मइअन्नाणं ॥ अविसेसिअं सुअं सुअनाणं सुअअन्नाणं च, विसेसिअं सुयं सम्मदिहिस्स सुअं सुअनाणं, मिच्छदिहिस्स सुअं सुअअन्नाणंति" [ अविशेपिता मतिर्मविज्ञानं च मत्यज्ञानं च ॥ विशेपिता मतिः सम्यग्दृष्टेमतिर्मतिज्ञानं, मिथ्यादृष्टेर्मतिर्मत्यज्ञानं ॥ एवं अविशेषितं श्रुतं श्रुतज्ञानं श्रुताज्ञानं च, विशेषितं श्रुतं सम्यग्दृष्टेः श्रुतं श्रुतज्ञानं, मिथ्यादृष्टेः म भुतं थुताशनम् ] अतोनाप्पेनमर्थ भाप्पसम्मदापमनुल्धानानुविचदिपुराह-~- मतियुते निशेिपे, झानासाने विशेषिते ॥ सम्पग्शां हि ते ज्ञाने, अज्ञाने कुशां पुनः ॥ १२ ॥ मम्पष्टिमिध्यारष्टिभावनाऽरिपिता मतिरेयोच्यते न तु मतिज्ञानं मत्यज्ञानं वा, सामान्यपदेन विशेपानभिधानात्, विशेषाऽभाने मामान्यस्याप्पमानापतिः, इति चेतन,तथापि सामान्यरूपेण विशेपमानेऽपि विशेषरूपेण तदमानान, एवं चाविशेषि- ता मतिरित्यस्य विशेपोधाममभिव्याहारविनिर्मुक्तमतिपदजन्ययोपविपयो मतिरित्या, न च मतिज्ञानमत्यज्ञानयोरपि वस्तु- नस्तानयोधविषयत्वात्, अविशीपतमतिव्यवहारापनिरित्याशयम ,मतिज्ञानमविशेपिता मतिरिति व्यवहारोमतितानत्यापच्छेदेना- तासोपरिपपत्रमागाहते तस्यासम्ममादिति तचम्, एवं सम्पग्दृष्टित्यविशेषिता मतिर्मतिज्ञानम्, मिथ्याष्टित्वविशेपिता च मत्ययानं, एवं श्रुतेऽपि शेयम्।। आह प-"अपिसेसिया मइपिय, सम्मदिहिस्स सा मइमाण। मइप्रमाणं मिच्छा-दिद्विस्स सुअंपि एमेर ।। ११४ ॥"[भरिमपिता मतिरेख सम्पादृष्टेः सा मतिज्ञानम् ॥ मत्यज्ञानं मिथ्या श्रुतमप्येवमेव ॥] अत्र भतिज्ञानम- स्पमानयोर्मवितिने मामान्यसंशा, मतियान मत्यज्ञानश्चेति विशेषसंज्ञा द्रष्टव्या ॥ १२ ॥ ननु यथैर मतिश्रुताम्यां सम्य- ग्राष्टिपटादिकं जानीने व्यपहरति प तया मिध्यादृष्टिरपीति कपमेकस्य ज्ञानमपरस्य चाशनमिति व्यवस्थेत्यवाद- अविशेषात्मदमतो-भयहेतुतपा तथा ॥ यादृच्छिकतयाऽज्ञानं, मिध्यादृष्टेः फलं यिना ॥ १३ ॥ मिप्यादृष्टिशानं हि मदसतोविशेष न प्रतिपयते,मया घट एदापमित्यपधारणे पटगतानामपि प्रमेयत्वादीनामतथात्वेनाध्य- पमापान, अन्यथा पटगतधर्मद्वारा पटरूपठाया अपि तत्र सम्मो मया पट एवं इत्यापारणानुपपत्ते, एवं मर्माप्रकारेपटोऽस्त्ये.
वेत्यवधारणे तत्राऽसतामपि पटत्वादीनामध्यवसाया, अन्यथा सर्वथापदत्यागप्रसङ्गाद्, एवं विपर्यस्तत्वादेव भवकारणों तत्, भवहेतुपु हिंसादिषु मोक्षहेतुत्वाध्यवसायात्, मोक्षहेतुषु वाऽहिंसादिपु भवहेतुत्वाध्यवसायाद्, यादृच्छिकोपलम्भरूपं च तद्, विरतिलक्षणं फलं विना फलशून्यं च, इत्येतैर्हेतुभिरज्ञानमेवेदम् ॥आह च-"सदसदविसेसणाओ, भवहेउजदिच्छिओवलभाओ। नाणफलाभावाओ, मिच्छद्दिहिस्स अन्नाणं ॥ ११५ ॥" [ सदसदविशेषणाद् भवहेतुत्वाद्यदृच्छोपलंभात् । ज्ञानफलाभावाद् मिथ्यादृष्टेरज्ञानम् ॥] त्ति ॥ १३ ॥ ननु घट एवायं घटोऽस्त्येवेत्येवमेवाध्यवसायः परेपामपि नतु सर्वथेत्याकारस्तत्र च विशेषणक्रियासङ्गतैवकाराभ्यामन्ययोगव्यवच्छेदात्यन्तायोगव्यवच्छेदयोरेव लाभात्क सदसदविशेप इति चेद् ?, उच्यते । सर्वयाऽनुपरागेण, घटधीर्ज्ञानमेव नः ॥ कयश्चित्परसत्ताया, आपत्तौ चेन्न तद्ग्रहः ॥ १४ ॥ यदि हि घटे कथञ्चिदन्ययोगव्यवच्छेदः कथञ्चिदेव चास्तित्वात्यन्तायोगव्यवच्छेदोऽध्यवसीयते तदा ज्ञानमेव तत्, अन्यथा त्वज्ञानमेव, नहि घटभिन्ने पटादौ प्रमेयत्वादिनापि योगो घटे व्यवच्छिद्यते, न वा पटास्तित्वादेरपि घटेऽत्यन्तायोगव्यवच्छेद इति । अथ घटे घटभिन्ननिष्ठभेदप्रतियोगितावच्छेदकधर्मवत्तमन्ययोगव्यवच्छेदः, अस्तित्वे च घटनिष्ठात्यन्ताभावाप्रतियोगि- त्वमत्यन्तायोगव्यवच्छेदः सर्वथास्त्येव, नहि तादृशप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्वं तदभावः, येन सर्वथात्वव्याघातः, किन्तु तादृशधर्मवत्त्वाभावः । न च तादृशधर्मवति तादृशधर्माभावो विरोधादप्रतीतेच, न च सर्वैः प्रकारैरिति सर्वथार्थः, किन्तु तदभावानधि- करणत्वे सतीति चेत्,न, प्रतियोगिमत्यपि पररूपेण तदभावात, विशेषग्रहे च कथञ्चितूपक्षप्रसङ्गाद्, आधकः स्याद्वादरहस्ये विस्तरः ॥१४॥ ननु तत्रापि कथमेतदज्ञानम्, कथञ्चित्पक्षग्रहाव,किश्चैवमप्यवधारणविनिर्मुक्तं निर्विकल्पकादिकं कथं मिथ्यादृशां न ज्ञानं, न च स्यात्पदविनिमोकात्तस्याज्ञानत्वं नाम, सम्यग्दृशामपि स्यात्पदविनिर्माण क्वचिदशानदर्शनासंसर्गतया स्यात्पदार्थविषय- तायास्त्वन्यत्राप्यनिवारणीयत्वात्,मम्यग्दर्शनस्यैव तादृशससर्गमानहेतुत्वम् ,इति चेत्,न, तथापि सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिनोऽसंसर्ग- कस्यावग्रहस्याज्ञानत्वप्रसगाव, किश्च संपादिप्रत्तिजनस्तावच्छेदकं तदति वत्प्रसारकत्वलक्षणं' प्रामाण्य मिध्याहमांशानेऽतिव्याप्त, अध्याप्तं च सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिसंशयादी, इति च, उच्यते- ज्ञानं तदपि संवादि-प्रवृत्तिजनक यतः ॥ अगानं यन्धहेतुत्वा-न्मोक्षाऽहेतुतयाऽथया ॥ १५ ॥ व्यवहारौपयिक हि ज्ञानत्वं मिथ्यादृशां ज्ञानेऽस्त्येव, तथापि निश्चयतो बन्धहेतुतावच्छेदकमज्ञानत्वमपि तत्राऽस्तीति झान- मपि तदनानमित्येव निश्रीयते, ननु ज्ञानेशानत्वकल्पने मानाभावो मिथ्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेनैव विशिष्टबन्धहेतुत्वसम्भवाद, इति चेत्, न, मिध्यादर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन ज्ञानविशिष्टीमध्यादर्शनत्वेन या हेतुतेत्पत्र विनिगमकामावाद, मिथ्यादयनज्ञानत्वयोरे, सम्बन्धमैदेन व्यासज्यवृत्यवच्छेदकताऽगम्भवातू, अन्यथा दण्डविशिष्टचक्रत्वादिनाऽपि हेतुत्वप्रसगात्, न च ज्ञानवान्नान- त्वयोरसमावेशो पृथग्धर्मयोस्तयोः समावेशाज्जातिसाङ्कर्यस्यापि कचिददोपत्वाद्ननु मिथ्यादर्शनाविरतिरूपाययोगानामेव तत्तब- घहेतुत्वोपदेशात्मामान्यतो रन्धविशेपे मिथ्यादर्शनत्वेन मिथ्यादर्शनजन्यतावच्छेदकजातिव्याप्यजात्याञ्छिनं प्रति चामिध्याद- शनीवशेषत्वेनर हेतुता प्रामाणिकी 'यत्सामान्ययोः' इति न्यायात, ज्ञानं तु तत्महभूततया ताज्यथासिद्धमेवेति' न तस्याज्ञानत्वेन ततुतेति चेत्, न, मिथ्यादर्शनद्वाराज्ञानस्प हेतुत्वे दूयोर्हेतुत्वसमर्थनात्, अथवा मिथ्यादृष्टिज्ञाने सम्यरुपयादिद्वारा मोक्षहेतु- तावच्छेदकज्ञानत्वाभाव एवाज्ञानसं, न चोक्तज्ञानत्वय्याप्यत्वमस्यास्त्विति वाच्यम् सम्यग्दृष्टिसंशयादौ व्यभिचारात,न कवि- शेपवति विशेषान्तराभावेन सामान्याभावाभ्युपगमेऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, एकसामान्यवति सामान्यान्तराभावस्यैव स्वीकाराद्, द्वयोः सामान्ययोरेकपदवाच्यतायामेव नयविभागायत्सामान्यवत्येतत्सामान्याभावस्तत्सामान्यमेव मिथ्यात्योदयजन्यतावच्छेदक, बन्धहेतुतावच्छेदकश्चाज्ञानत्वमेवेति प्राच्यपक्ष एव युक्त इति चेत्,न, अज्ञानत्वेन बन्धाहेतुतायामेतत्पक्षस्यैव युक्तत्वात्, इति दिग्।। इत्यमेव वन्धहेतुत्वादयो हेतवो ज्ञानत्वगमकाः सम्भवेयुरिति सर्वमवदातम् ॥ १५ ॥ उक्तो हेतुफलभावान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ भेदभेदात्तमभिधातुमाह- वक्ष्यमाणभिदाभाजो-रेतयोरथवा भिदा ॥ विशेपनिश्चये जाति-भेदानुमितिगोचरः॥ १६ ॥ मतिज्ञानस्यावग्रहादयोऽष्टाविंशतिर्भेदाः, श्रुतज्ञानस्य चागानङ्गप्रविष्टादयश्चतुर्दश वक्ष्यन्त इति भेदभेदादनयोर्भेदो घटितः, नन्ववान्तरभेदस्य न सामान्यभेदानुमापकत्वम्, अन्यथा पृथिव्याद्यन्यतमभेदस्य द्रव्यभेदानुमापकत्वप्रसङ्गात्, इतिचेत्, न, तत्र साध्याभाववति हेतुसन्देहादननुमितेः, अत्र तु साध्याभाववति हेत्वभावनिश्चयेनानुमित्यप्रतिरोधात् व्याप्तिग्राहकादा- गमादेव साध्यसिद्धावपि सिसाधयिषया तदग्रहदशायां वाऽनुमानावतारात्पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन ॥ आइ च-मेयकयं च विसेसण-मट्ठावीसइविहंगभेआई [भेदकृतं च विशेषणमष्टाविंशतिविधाङ्गभेदादि]त्ति वैधर्म्यमसिद्धमेव साध्यत इत्यप्पाहुः ॥१६॥ समर्थितो भेदभेदाद् भेदः, अथेन्द्रियभेदाद् भेदमभिधातुमाह- !' अथवेन्द्रियभेदेन, भेदः सिध्येत्तयोर्द्वयोः ॥ श्रुतं पूर्वगते यस्मात् , तद्भवप्रतिपादनम् ॥ १७ ॥ स्पष्टः॥ आह च-"इंदिअविभागओवा,मइसुअभेओ जओ भिहि॥११६॥" [इन्द्रियविभागतो वा मतिश्रुतभेदो यतोऽभि- हितम् ]ति पूर्वगताभिहितंचेदम्-"सोइंदिओवलद्धी, होइ सुअं सेसयं तु मइनाणं ।। मोतूणं दबसु, अश्सरलंमो अ सेसे ॥११॥ [ श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिर्भवति श्रुतं शेषकं तु मतिज्ञानम् ॥ मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं, अक्षरलंभव शेपेषु ॥ ] ति ॥ १७ ॥ इमामेव गायां यथाभाष्यं सप्रसद्गप्रबन्धेन [विवरीपुराह-] श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धीति-पदार्थ व्याप्तिसिद्धये ॥ द्रव्यभावश्रुते प्राधे, उचिताद्विग्रहद्वयात् ॥ १८॥ श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र श्रोत्रेन्द्रियेण श्रोत्रेन्द्रियस्य वा उपलब्धिा,इति तत्पुरुषेण भाव श्रुतम्, श्रोत्रेन्द्रियादुपलान्धर्यस्येति बहुव्रीसाथयणेन च द्रव्यश्रुवं सङ्गृह्यते,एवमुपयुक्तस्य वदत उभपश्रुतमपि उमयविग्रहाश्रयणाद् ग्राह्यम् ॥१८॥ श्रोत्रेन्द्रियोलब्धिः श्रुतमित्यस्य सावधारणत्वाद्विपरीतावधारणमवयुध्यमानः शङ्कते- श्रोग्रेन्द्रियोपलब्धिश्चेत्, श्रुतमेवावधार्यते ॥ तद्वारकं मतिज्ञान-मुच्छियेत तदा न किम् १ ॥ १९ ॥ यदि श्रुतमेव श्रोत्रोपलब्धिस्तदा तस्या मतिरूपत्वासम्भवात् श्रोत्रावग्रहायभावेन मतेरष्टाविंशतिभेदाः समुच्छिघेरन, यदि च सा मतिस्तदैतदुक्त्यसड्गतिः, उभयं चेत्सङ्करः । आह च-"सोओवलद्धि जइ सुअं,न णाम सोउग्गहादओ युद्धी ।। अह युद्धी तो ण मुझं, अहोमयं सकरो णाम् ॥११॥ श्रोत्रोपलब्धियदि श्रुवं न नाम श्रोत्रावग्रहादयो बुद्धिः। अथ बुद्धिस्ततो न श्रुतं, अथोभयं संकरो नाम ] ॥१९॥ अत्रोच्यते- श्रोनोपलब्धिरेवात्र, श्रुतं न श्रुतमेव सा॥ शब्दः सैवेत्यपव्याख्या, तभेदानधिकारतः ॥२०॥ अत्र हि गम्य एवकारो विशेषणेन सह योज्यते, तन्महिम्ना च 'चैत्रो धनुर्धर, इत्यत्रेवायोगव्यवच्छेद एव प्रतीयत इति, श्रावन्निया " दयारपि श्रुतातीतं , यद्विज्ञानं तबुद्धिः ] किञ्च शब्दविज्ञप्तिः शब्द एवेत्युक्ते कि केन सड़गतमिति श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतमिति पर्यवसानेऽपि तस्या मतिरूपाया अपि सम्भवान्नोक्तदोपः॥ आह च-"सोइन्दिओवलद्धी, चेव सुअं न उ तई सुअं चेव ।। सोइन्दिओक्लद्धी वि, काइ जम्हा मइन्नाण।।१२२॥" [श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव, श्रुतं न तु सा श्रुतमेव ॥श्रोत्रे- न्द्रियोपलब्धिरपि,काचिद्यस्मान्मतिज्ञानम्] केचित्तु 'श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरित्यत्र केवलबहुत्रीयाश्रयणेन श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिः श्रुतमेव शब्द एव,स च ब्रुवतः श्रूयत इति श्रुतं, शृण्वतस्तु श्रोतुरखग्रहादिना मन्यत इति मतिरित्युभयमुपपन्नम्,उपपन्नाचाऽष्टाविंशतिरपि मतेर्भदा' इत्याहुः, तत्र,धात्वर्थमात्रभेदेन शब्दस्य द्रव्यश्रुतमात्रत्वाप्रतिघाते द्वैविध्याभावात्, आह च-"केई विन्तस्स सुअं, सद्दो सुणउ मइत्ति तं ण हवे ।।जसब्योच्चिअ सदो, दव्बसुअंतस्स को भेओ ? ॥११९॥"[केचित्रुवतः श्रुतं शब्दः शृण्वतो मतिरिति तद् न भवेत् ॥ यत्सर्व एव शब्दो, द्रव्यश्रुतं तस्य को भेदः १] वस्तुतस्त्वेतदवधारणोक्तिर्न मतिश्रुतज्ञानयोर्भेदनिरूपणौपयिकी शब्दभेदनिरूपणं त्वनधिकृतमित्यर्थान्तरम्, यदि च श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदार्थः शब्दविज्ञानमेव कार्यतया चोपचाराच्छब्द एवेत्युच्यते तदापि वक्तृश्रोटगतत्वेन तस्यातिशयाभिधानं श्रुत्वा त्रुवतश्च सैव मतिः, तदेव च श्रुतमिति सार्यम् , पारम्पर्यश्रुतो- च्छेदश्च स्यात्,आह च-"किंवा नाणेहिगए, सदेणं जइ अ सदविन्नाणं ।। गहिअंतो को भेओ,मणओसुणओ च जो तस्सा॥१२०॥" [किं वा ज्ञानेधिकृत ? शब्देन यदि च शब्दविज्ञानं ॥ गृहीतं ततः को भेदो, भणतः शृण्वतश्च यस्तस्य] " भणओ सुणओ व सुअं, तं जमिह सुआणुसारि विण्णाणं ॥ दोण्हं पि सुआईअं, जं विण्णाणं तयं बुद्धी ॥१२१॥" [भणतः शृण्यतो वा श्रुतं, तद्यदिह श्रोत्रेन्द्रियोंपलब्धेः शेषाक्षरलाभस्य च शब्दविज्ञानत्वप्रतिपादनेनैव. फलतः श्रुतत्वप्रतिपादनमनाकाक्षितमेव श्रोत्रेन्द्रियोपल- धौ मतित्वविलक्षणयुतत्वसिद्धावेव शेषे मतिजिज्ञासाप्रवृत्तः, अपिच थोरवारिकाप्युपलग्धिर्न शन्द एक, एककारणपरिशेपापाता। सन्दाजन्यत्वस्प निरमिलापत्वस्य वाव्यात्तिरेव युतत्वय्यापिकावधारणफलमेवेति चेत् न, तथापि च्यापकर्म पुरस्कारेण तदर्म- वत्तानियस्याहत्य व्याप्यधर्मपुरस्कारेण तवत्ता संशयानिवर्तकस्वाद, अन्यथा इदं द्रध्यमेवेति निभये इयं पृथिवी न वेति संशयामावप्रसङ्गात्, एवं च शेपेन्द्रिपाक्षरलाभ मतित्वशङ्कापि न निवर्वेत तत्र तद्विलक्षणभुतत्वाप्रतिपादनापनियतशब्दजन्य- . त्वप्रतिपादने चोक्त एष दौपा, यतु श्रोग्रेन्द्रियोपलब्धिपदं सामिलापमानपाम्, इति सामिलापशानं श्रुतमेवेति तभिमं तु मतिरेवत्या तुशन्दस्यैवकारार्थक्त्वोपपत्तिा, तम्तयाण्यानस्येन्द्रिपविभागानुपयोगित्यात्, न प तद्विभागलभ्याभिधान- मेवेदम्, अर्थान्तरत्वाद, किचैवं शेन्द्रिपाक्षरलाभे मविवश इकानिवृत्त 'अपरारलम्भो असेसमु' इत्यभिधानोनित्येऽपि । शेषपदस्य यथावदर्यानुपपरित्यपव्याख्यानमेतत् ॥२०॥ तुशन्दधात्र समुश्यार्थक एवेति ध्याचष्टे- मतेरपि प्रोनधीत्वात्, तुशन्दोन समुपये॥ नाऽयधारणपन्ध्यत्य-मेकषावधारणात् ॥ २१ ॥ श्रोत्रावग्रहादिरूपाया मतेरपि धोबीपलब्धिरूपत्वात्, तुशन्दोऽय समुसयार्थकः, तथा च श्रौत्रावग्रहादिका श्रोत्रातिरिक्त- न्द्रियजन्यश्च ज्ञानं मतिः, इति पर्यवस्यति, न चाप्रावधारणं सम्भवति सप्रयोजनं वा, एकावधारणादेव विमागोपलम्भादेवादशतु- शन्दम्पाख्यानादपि स मविभेदभमानापति समर्थयति । आह -"तुसमुपयवयणाओवकाई सोइंदिओवलदीवि ।। मारवं सति सोउग्गाहादओ होन्ति मामेआ।। ||१२३॥" तिसमुभयवचनादा, कापियोवेन्द्रियोपलन्धिरपि। मतिरेवं सति श्रोत्रावग्रहादयो भवन्ति मतिभेदाः] ॥ २१ ॥ ननु शेष मतिज्ञानमित्युक्त पत्रादिगतं अक्षाविन्यासरूपं मतिशानं मा प्रसाधीदिति " मोपूर्ण दव्वसुअं" इत्युक्तं तत्र तस्य द्रव्यश्रुतत्वे कि मानं कथश्च शेपेन्द्रियाक्षरलाभो न मतिरित्याशङ्कायामाह- व्यञ्जनाक्षरवद् द्रव्य-श्रुतं लिप्यक्षरं मतम् ॥ भावश्रुतं वर्णलाभः, शेपं तु मतिरिष्यते।। २२ ।। लिप्यक्षरं द्रव्यश्रुतं व्यजनाक्षरवदित्यत्र भावश्रुतकारणत्वात्, इतिहेतुर्गग्यः ॥ यदाह-"पत्ताइगयं सुअकारणं ति, सदो ब तेण दव्वसुअं॥ भावसुयमक्खरण, लाभो सेसं मइन्नाणं ॥१२४॥ [पत्रादिगतं श्रुतकारणमिति शब्द इव तेन द्रव्यश्रुतम् ॥ मावश्रुत- मक्षराणां, लाभः शेपं मतिज्ञानम् ] ननु द्रव्यश्रुतत्वमत्र साध्यम्, तच भावश्रुतकारणश्रुतत्वमेवेति हेतुसाध्ययोरभेद इति चेत्, न, द्रव्यश्रुतव्यवहारीवषयत्वस्यैव साध्यत्वाद्, हेतौ कारणपदस्य नियतान्वयव्यतिरेकप्रतियोगित्वपरत्वाद्वा, ननु भावश्रुतप्रयोजक- त्वमात्र, व्यभिचारि व्यजनाक्षरसाधारणं, परम्परया च न लिप्यक्षरस्य शाब्दज्ञानानुकूलत्वं तादृशानुपूर्वीकलिप्यक्षरज्ञाना- जन्यतादृशानुपूर्वीकव्यजनाक्षरज्ञानोत्तरमेव पदार्थोपस्थित्या शाब्दवोधोदयाद्, न च व्यजनाक्षरेणेव लिप्यक्षरेणाऽपि सममर्थस्य सम्बन्धग्रहात्ततोऽप्याहत्य तदुपस्थितिरिति वाच्यम् , अर्थाव्युत्पन्नानां ततः शब्दस्यैवोपस्थित्याज्यत्रापि तदुप- स्थितिद्वारैव तस्यार्थोपस्थापकत्वात्, साधुत्वाद्यभावेन तस्य शान्दवोधाहे तुत्वाचेति चेत्, न, व्यजनाक्षरादिव लिप्यक्षरादपि पट्वाकलितसङ्केतानां झटित्येवार्थोपस्थितेः, साधुत्वस्य सर्वत्रातन्त्रत्वादर्थोपस्थितिकारणतत्कारणसाधारणप्रयोजकत्वस्यैव वा व्यवहारानुकूलत्वात्सम्प्रदायभङ्गस्य विपक्षवाधकतर्कत्वादित्याहनीयम्, लध्यक्षरं तु श्रुतानुसारित्वात् , भावश्रुतं न मति- रिति शेपं मतिज्ञानमिति सुव्यवस्थितम्॥ आह च-"भावसुअमक्स्वराणं लाभो सेसं मइनाणं ॥ [ भावश्रुतमक्षराणां लामः शेष मतिज्ञानम् ॥]ति ॥२२।। ननु यदि शेषाक्षरलाभोऽपि श्रुतं तर्हि श्रुतं श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेवेत्यवधारणं भग्नमित्यत आह- ~ श्रुतत्वं न जहात्येच, लब्धिरक्षरगर्भिणी ॥ श्रोत्रन्द्रियोपलब्धिः सा, यतो योग्यतया स्मृता ।। २३ ॥ शेपेन्द्रियद्वारकज्ञानेऽपि प्रतिमासमानमक्षरं थोधेन्द्रियोपलब्धियोग्पमिति श्रोत्रेन्द्रियोपलन्धिरेव तत् । आह च-"जाइ सुअमक्खरलाभो, न णाम सोओवलद्धिरेव सुअं । सोओवलद्धिवक्सराई सुइसम्मवाओ" ति ॥१२५॥ ॥ [यदि श्रुतमारलाभो न } नाम श्रोत्रोपलब्धिरेव श्रुतम् ॥ श्रोत्रोपलन्धिरेवाक्षराणि श्रुतिसंभवादिति]॥२३॥ नन्वेव द्रव्यश्रुतस्योपलब्धिविषयस्य तथात्व- । समर्थनेऽप्यक्षरोपलब्धेस्तथात्वमसमर्थितं न खलु सापि श्रोत्रग्रहणयोग्या, न चामिलापस्य तथात्वे तदाकारपरिणतज्ञानस्यापि तथा- त्वम्, परिणामपरिणामिनोः सर्वथैकत्याभावात्, एवं सति केवलबहुबीद्याथ्यणप्रसङ्गाघ, इति चेत्, उच्यते-दोषाधरलामोऽपि श्रुतानुसारितया सङ्केतग्रहमपेक्षमाणः साक्षात्परम्परया वा वदनुकूला श्रीनजन्या पदधियमुएजीवनीति श्रीमद्वारिकोपलाधरेव सा, न चन्द्रियान्तरमपिता द्वारमित्ययधारणानुपपत्तिः, योगाद्वारकत्वव्यापत्तरेव तत्फलत्वादस्मादेवावधारणादिन्द्रियविभागः सड्गच्छते, अन्यथा द्वयोरपि मतिश्रुतयोः सन्द्रियापेक्षाया अविशेपादित्याशयेनाह- अवधारणमाश्रित्ये-न्द्रियभदोऽपि युज्यते ॥ उपेक्ष्यमेव व्याख्यान-मतो निरवधारणम् ॥ २४ ॥ तथाविधविरुद्धधर्माच्यासलक्षणभेदौपयिकाऽवधारणेनैव हि मतिथुनपोरिन्द्रियभेदो युज्यते, विनाध्यधारणं तदलाभात, अथ थुतंत्रीपोपलब्धियेति सावधारणव्याख्याने शेपाक्षरलामासङ्ग्रहेणाऽनन्ययात् योप्रोपलब्धिपदस्य तयोग्यत्वार्थकवया 'अक्सरलं- भोसेसेसु' इत्यभिधानानुपपत्ते, न च तत्रोत्सर्गच्याप्तं मतित्वमपोदितुं तदभिधानं, प्रथमानुपपरे, न चाक्षरलामे श्रुताभेदान्यया- देव तदपपादो, वाक्यभेदप्रसङ्गात्, नच द्वितीयार्थ एपेयं प्रथमा, अक्षरलामपदस्य श्रुतानुसार्यक्षरलाभपरतया द्रव्यश्रुत इव तत्रापि मुक्त्वेत्यन्वयसम्भवेऽप्यप्रामाणिकार्यभाक्तिव्यत्ययकल्पनानाचित्याद, तस्मानिखधारणव्याख्यानमेव सम्यक कलतोऽवधारणला- भाचेन्द्रियविभागोपपत्तिरिति चेत्, न, एकाध्यधारणलामेभ्यभजनाराकया तदभिधानान्, अत एवोभयाव्यभिचारस्थलेऽपि निय- मद्वयाभिधानं तत्र तत्रोपवीक्ष्यते॥२४॥ ननु यदि शेपाक्षरलाभः सर्वोऽपि श्रुतं तर्हि अवग्रहरूपैय मनिः स्यात्, इत्यत आह- भावः श्रुताक्षराणां यः, स एच श्रुतमिष्यते । ईहादयो मतेर्भदा, नोच्छियेरन कुतोऽन्यया ॥ २५ ॥ यदि सर्वोऽप्यक्षरलाभः श्रुतं तरक्षरानुविधा ईहादयोऽपि श्रुतरूपा एव प्रसजेयुरित्यवग्रहैकमूर्तिरेय मानः पर्यवस्येत् तस्माच्छुना- नुसार्यक्षरलाभ एव श्रुतमिति ॥ आह च-" सोऽवि हु सुअक्सगणं, जो लाभो तं सुओं मई सेमा । जइ या अणक्वरगिय, सा सव्वा ण पवत्तेज्जा।। १२६॥" [सोऽपि खलु श्रुताक्षराणां यो लाभस्तच्छुतं मतिः शेपा ।। यदि वाऽनयरव, मा सर्वा न प्रवर्ने] इत्यं व्याख्याता 'सोझांदओवलध्धीति' पूर्वगतगाया ॥२५।। अथाग्रिमपूर्वगतगाथासम्पन्धाय "दन्दमुथ भावमु,उभयं या कि कई व होजत्ति। को वा भावसुअंसो, दव्याइसु परिणमेन्ज ॥१२७॥" [ द्रव्यश्रुतं भावयुनं, उभयं या किं कथं या भवेदिति।। को या भावश्रुतांशो द्रव्यादिश्रुतं परिणमेत ] चि॥ भाष्योक्तां सङ्गतिमनुवति । द्रव्यभावश्रुते युग्मं, किं कथं वा भवेदिति ॥ कियान भावश्रुतस्यांशो-द्रव्यादीत्यनुभापते ॥ २६ ॥ द्रव्यश्रुतं भावश्रुतमुभयश्रुतं वा किं कथं च तद्भवेत्कियान्या भावभुतस्य भागो द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं चैत्यनुमापितुमिमां गाथा. माह-पूर्वगतप्रणयनप्रवण:-"बुद्धिढेि अत्थे, जे भासइ तं मुझं मईसहि । इयरत्यापि होज सुश्र, उपलदिमम जह भणेज्जा ।।१२८॥[बुद्धिदृष्टेऽर्थे यान्भाषते तश्रुतं मतिसदिनम् ॥ इतरयापि भवेत् श्रुतं, उपलब्धिसमं यदि भणे] ॥२६॥ इमामेव व्यावष्टे- nonmented ।
युद्धया बुद्धिगतानन्, वदतो शुभपश्रुतम् ॥ द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, भावतो जानतः परम् ॥ २७ ।। बुद्धया दृष्टानर्यान् मतिसहितान् यान् भापते तद्व्यभावलक्षणमुभयश्रुतम्, र बुद्धिशब्दो मतिशब्दच श्रुततात्पर्यकः, निरूपणप्रयोजकविवक्षारूपज्ञानस्य प्रयोगसमकालीनोपयोगस्य च मतिरूपस्यासम्भवात्, उभयत्वं चात्र प्रयोगोपयोगाभ्यां रोध्यम्, न तु विवक्षया, नया सहकविशिष्टापरत्वरूपोभयत्वासम्भवात्, अनुपयुक्तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतम्, अथानुपयुक्तस्यैव प्रयोगो मवति नोपयुक्तस्य, प्रयोगशाल एव तदधीनार्थोपयोगस्यासम्भवात, तथा च कथमय विभाग इति चेत्, न, सोपयोगप्रयोगाभिधि- न्सया केवलप्रयोगाभिधित्मया च प्रयोगद्वैविध्यसम्मवाद्वर्णादिपुग्छिन्मज्यालादृष्टान्तेनैव चोपयोग इति व्यक्तमध्या- रममतपरीक्षायाम, तदिदमाभप्रेत्पाह-"जे सुअवुद्धिदिढे सुअमइसहिओ पभासई भावात उभयसुअंभष्णइ, दव्यसुझं जेउ अणुवउचो॥१२९॥"[पान् श्रुतधुद्धिष्टान,श्रुतमतिसहितः प्रमापते भावान्।तदुभयश्रुतं भव्यते, द्रव्यश्रुतं यास्त्वनुपयुक्तः] अत्रा- मापमाणस्यैव श्रुतयुद्धचा पर्यालोचयतस्तु भावथुतमेवेति सामर्थ्यगम्य, सामर्थ्य च न तत् भावश्रुतमेवेति साध्ये द्रव्योभयश्रुतभिन्न- त्वे सति श्रुतत्वम, एवकारेण साध्यार्थस्यापि ठाइशस्य पर्यवसाने हेतुसायाभेदप्रसगाव, किन्तु प्रयोगाकालीनश्रुतत्वमेति पोध्यम् ।। सूत्रे तु श्रुतपदस्योमयश्रुतपरतयाऽनुपयुक्तस्य वदतो द्रव्यश्रुतमेवेत्यपि सामर्थ्य गम्यमेव, एवश्च द्रव्यधुतं भावश्रुत- मुभययुतं वा कि कथश्च भवेदित्याांधाः पूरिताः ॥२७{अथ द्रव्यश्रुतमुभयश्रुतं वा मावश्रुतस्य कियानंश इत्याकांक्षापूरणोपयिक- मुधराधं व्याख्यायते तात्पर्यतः- केवलश्रुतकालेऽपि, तदाऽत्मन्युमयश्रुतम् । भवेद्यापलब्धार्थान् , सर्वान् वक्तुं क्षमेत सः ॥ २८ ॥ २ MESSEMESH इयरत्य वि होज्ज सुअं उवलद्धिसमं जइ भणिज्जा ॥१२८ ॥” इत्यस्यायमर्थः, इतरत्र भावश्रुते, भवेद्रव्यश्रुतमु- भयश्रुतं वा, ययुपलब्धिसमं भणेत् प्राकृतशैल्या सहस्य समभावनिपातनात्समशब्दस्य तुल्यार्थकत्वात्समकालार्थकत्वाद्वो- पलब्ध्या सहोपलब्धितुल्यमुपलब्धिसमकालं वा भणेद्, अत्राद्यन्तयोः सहभावयोगपद्ययोः सामान्येन ग्रहणादीप्सितार्थ- सिद्धिः, तदिदमाह-" इयरत्यत्रि भावसुए, होज्ज तयं तस्समं जइ भणिज्जा ॥ण य तरइ तत्तियं सो, जमणेगगुणं तयं तत्तो ॥१३०॥ इतरत्रापि भावश्रुते, भवेत्तत्तत्समं यदि भणेत् ॥ न च तरति, तावत्सःयदनेकगुणं तत्ततः ] " सह उपलब्धीए वा, उवलम्धिसमं तया व जंतुल्लं ॥ जं तस्समकालं वा, ण सव्वहा तरइ योत्तुं जे ॥१३१॥"[सहोपलव्ध्या वोपलब्धिसमं तदा वा यत्तुल्यम् ।। यत्तत्समकालं वा न सर्वथा तरति वक्तुम्] एवञ्च द्रव्यश्रुतादुभयश्रुताचानन्तगुणं भावभुतं प्राप्तमिति सम्प्रदायः ॥ व्यक्तीभविष्यति चेदमुपरिष्टात्, भावश्रुते द्रव्यश्रुतमप्रसक्तमिति सूत्रे श्रुतपदं प्रागुक्तश्रुतपदसमानार्थकमुभयश्रुतपरमेव, न चैत्र तच्छन्देन तस्य परामर्शो युज्येत, सूत्रकृतांगतेर्विचित्रत्वात्, न चैकविशेष विशेषान्तरमापादनाईमिति, इतरत्रेत्यस्य केवलभावश्रुतोत्पत्तिकाल इत्यर्थः । एवञ्च तदा भावश्रुतसामग्रीसत्त्वेऽपि द्रव्यश्रुतसामग्र्यभावादुभयश्रुताभावो, न युभयम- तिरिक्तमस्ति, प्रत्येकातिरिक्तसमुदायाभावौदित्येतत्तात्पर्यम् ॥२८॥ अथाऽष केपाश्चिन्मतिश्रुतभेदोपयिक पूर्वार्द्धव्याख्याकौं- शलमपहस्तयितुमुद्भावयति- मत्या सह तया दृष्टान्, ब्रुवतो ह्युभयश्रुतम् ॥ द्रव्यतोऽनुपयुक्तस्य, तदेकालोचनं मतिः ॥ २९ ॥ 'बुद्धिद्दि?' इत्यत्र बुद्धया मत्या दृष्टेष्वर्थेपु मध्ये अत्र 'वर्णेषु क्षत्रियः शूर' इत्यत्रेय मध्यार्थे सप्तमी, एकवचनं बहु- वचनार्थकं ज्ञात्यभिप्रायकं वा, बुद्ध्या मत्या दृष्टान् यानर्थान् मतिसहितान् भापत इति सम्मुखीनैव व्याख्या, वच्छुतमुपयोग- प्रयोगाम्यामुभयश्रुतं भवति। ननु मनिसाहित्य कथमर्थानां विशेषणमनन्ययादिति चेत्, अत्राहुः-मईसहियमित्या मत्युपयोगे वर्तमानस्य वक्तुर्ग्रहणाद, तस्य मत्युपयोगसाहित्येनार्थानामपि तदुपचर्यत इति । अत एवाह-"केई बुद्धिद्दिटे, मइसहिए भासओ सुअंति।"केचिद् बुद्विदृष्टान् मतिसहितान्मापमाणस्य श्रुतम् ॥ इदं च भाप्यानुरोधादुक्तम्, सत्रे तु मइसहियमित्यत्र मतिसाहित्यस्य क्रियाविशेषणत्वलामात्मत्युपयोगसहितम्, मतिष्टार्थभापणं श्रुतमिति सम्मुखोऽध एव युक्तो, नहि मतिमहिता भाष्यमाणा अर्धास्तव , अपि तु तादृशः शब्द इति । अत एवाह-तत्सहितं यथा भवत्येवं यान् भावान् भापते इति अनुप- तस्यैव वदतो द्रव्यश्रुतं, अभापमाणस्य पदार्थमात्रपालोचनं तु मतिः,इति मतिश्रुतयोंर्भद इति ॥२९॥ तदेतद्दषयति- केचिदाहरिद, तन्नो, युक्तं भाषश्रुतव्ययात् ॥ नाधिक्यं नान्यधात्वं वा, भाषाव्यापारतो मतेः ॥ ३० ।। तदिदं व्याख्यानमयुक्तं भावश्रुतोच्छेदप्रसङ्गात्, नहि प्रयुज्यमानः शब्दो मतिज्ञानं वा वद्, अत एव नोभयं प्रत्येकाभावे समुदायामावाद्, आहे च-"वत्थ ॥ किं सदो महरुमयं, भावसअं सबहाजु ११३२॥ तत्र किं शब्दो मविरुभय, भाव- श्रुतं सरंथाऽयुक्तम् ]" सदो ता दच्वसुधे, महरमिनि-घोहि न वा उभये । जुनं, उभयाभावे भावसुअं कत्थ तं किंवा ॥१३३॥ [शब्दस्तावद्र्व्यश्रुतं मतिरामिनियोधिकं नवा उमय।। युक्तं, उमयाभावे, भावश्रुतं कुछ ताकि यान च भाषापरिणति- काले मतेराधिक्यमुपक्षयो वा जायते, न वा मापारम्भ एवात्र विशेषस्तस्य तत्स्वरूपपरावृत्यसहत्वात्, अन्यथा धावनवलगनादि क्रियानन्त्यान्मतानन्त्यप्रसङ्गात्, अथ द्रव्यश्रुतसामग्र्या एव मावभुतसामग्रीत्वान्मतिदृष्टार्थप्रयोगसमानकालीन उपयोगः श्रुतमेव RSSSSSS तस्य च मतिजन्यतया मतित्वं श्रुतत्वं चेत्युभयमप्यविरुद्धमिति चेत्, न,एवं सति श्रुतोहाद्यमिलापस्थलेऽवध्यादिमूलकाभिलापस्थले च तत्प्रसङ्गात्, तदिदमभिप्रेत्याह-"भासापरिणइकाले, मईए किमहियमहवन्नहत्तं वा-भासासंकप्पविसेसमेत्तओ वा सुअमजुत्तं ॥१३४ ॥” [भाषापरिणतिकाले मतेः किमधिकमथवाऽन्यथात्वं वा ॥ भापासंकल्पविशेषमात्रतो वा श्रुतमयुक्तम् ॥] ॥३०॥ ननु मतेः श्रुतहेतुत्वात् नावध्यादिस्थले तत्प्रसङ्गः, श्रुतानुसाराभावाच नाश्रुताभिलापस्थलेऽपीत्यत आह- मत्या श्रुतानुसारस्या-अयणाजन्यते श्रुतम् ॥ इति चेच्छुतसङ्कल्पः, श्रुतमेवावधार्यताम् ।। ३१ ॥ श्रुतमनुसृत्य मतिज्ञानेन यदि श्रुतज्ञानं जन्यते तर्हि भाषासङ्कल्पोऽपि श्रुतानुसारितया श्रुतमेव स्यात्, न तु मतिरिति बुद्ध्या मतिज्ञानेनेति व्याख्यानमनुपपन्नम् ॥३१॥केपाश्चिदेवोत्तरार्द्धव्याख्यानमधरयति- इतरोत्पत्तिकाले च, श्रुतं स्यादिति दुर्वचम् ॥ भिन्नहेतुकतासिद्धेः, स्वस्वावरणभेदतः ॥ ३२ ॥ इतरत्र केवलमातिज्ञानोत्पत्तिकाले, तदा श्रुतं स्याद्यधुपलब्धिसमं भणेदित्याद्यापादनानह, तदा श्रुतज्ञानसामग्रीविरहनिश्चयेन तदनापत्तेः, भिन्नलक्षणावरणत्वेन द्वयोर्व्यवस्थितत्वात्, न च तदा श्रुतलब्धिसत्त्वात्तदापत्तिः, विशेषसामग्र्यभावेन तदभावात्सा च परोपदेशाहद्वचनाद्यनुसाररूपा, अत एवाह-"इयरत्यवि मइनाणे, होज्ज सुअंति किह तं सुअं होइ ॥ किह व सु होइ मई, सलक्खणावरणभेआओ ॥ १३५ ॥” [इतरत्रापि मतिज्ञाने भवेच्छुतमिति कथं तच्छ्रुतं भवति ॥ कथं वा श्रुतं भवति मतिः, स्वलक्षणावरणभेदात् ।।] परव्याख्या वाधकत्व(वाधितार्थ)गोचरा भ्रान्तैव निसर्गाव,इति न किञ्चिदेतत्॥३२॥ श्रुतोपलब्धानां तु बहु- त्वादेव कात्स्न्येन वक्तुमशक्यत्वं कौशलमादधानस्य मतिर्भावश्रुतं न स्यादेव द्रव्यश्रुतत्वं तु तत्र निगद्यमानं हृद्यमपीत्याशयेनाह- A. - साम्प्रतं शबदेतुत्या-न्मतिष्यश्रुतं भवेत् ॥ शुद्धा तु सा तदा तत्स्यात्, यदि ज्ञप्तिसम भणेत् ॥३३॥ मनिष्टानान्मत्युपयोगेन मापमाणस्य द्रव्यथुतरूपशब्दकारणतया मतिष्पधुतत्वमास्पन्देदेव, प्रयोगानुकुलाच मतिस्तु यात्यम नुवीत,यदि नाम मतिमानुपलम्धिसमं मणितुं शक्नुयात् आह प-"अहय मई दवमुअत्तमेउ,मावेण सा विरुझज्जा॥ जो अगुअगरलामी, तं मइसहिओ पभासेचा ॥१३६॥" [अथवा मतिप्पश्रुतत्वमेत, मावेन सा विरुध्येत ॥ योऽश्रुताक्षरलाभस्तं मतिसहितः प्रभात।।] "इपरग्मि वि महनाणे, होज्ज तयं तस्सम जइ भणेज्जा ! ण य तरह तत्तियं सो, जमणेगगुणं तयं तसो॥ ॥ १३७ ।।" [इतरस्मिमपि मतिशाने, मवेतत्समं यदि मणेत् ॥ न च तरति तावत्स यदनेकगुणं सततः ॥] ननु शुदापि मतिः शब्दकारणत्वात्कृतो न द्रव्यश्रुत, नहि कार्यमजनयतोऽपि कारणस्याकारण नाम, अरण्यस्थ- दण्डादेर्पटाहेतृत्वप्रसमात्, विश्वैतव्याख्यानस्याविरोधाभिधानसावधानत्वेन मतिद्रव्यश्रुतयोभेदनिरूपणोपयिफत्वेऽपि मति- भुतपोस्तनिरूपणानौपयिफत्वमिति चेत्, न, सहकारियोग्यताया एव द्रव्यघटकत्वात्, उक्तातिदेशन श्रुतेऽपि सद्भेदलाभेन प्रपोगभेदेन मवियुतयोरपि भेदलामाग [चानुना विप्रयोगेऽप्यात्मानमलभमानाः शन्दाः पार्वतिच्छाय]॥ [अाशुध्धमवभामते]। ननुपलम्धितुल्यं माणितुमशक्यमित्यत्र को इंतरित्यत आह- अपामार्गार पात्याच्च, न सर्वत्र गिरा गतिः ॥ अपि प्रज्ञापनीयाना-मनन्तोऽशोन्यपन्धि यत् ॥३४॥ मत्याएपलधार्यानामनभिलाप्यत्वस्वमायादेय वक्तुमशक्यत्रं, यद्यपि कतिपयास्तैरप्पमिलाप्या एव तथापि श्रुताविषय- त्वेन तेपामनमिलाप्यत्वं पोय, भाष्ये शेपोपलब्धिपदं वा थुतोपरन्ध्ययोग्यत्यपरम्, या पथिदाह न सन्त्येवानमिलाप्या पाया CHEMECORRIER अभिधेयत्वस्य केवलान्वयित्वात्, इति, तत्तुच्छं, सर्वमभिधेयं प्रमेयत्वादित्यत्राभिधाविषयत्वस्य साध्यत्वे सिद्धसाधनादनभि- लाप्यानामप्यनभिलाप्यपदाभिधेयत्वात, तत्तत्पदवोध्यत्वप्रकारित्वावच्छिन्नेच्छाविषयत्वस्य साध्यत्वे क्वचिदेकस्येव सर्वस्यापि सङ्केतग्रहासम्भवेन विपक्षबाधकतर्कविरहेणाप्रयोजकत्वात्, न च विपक्षस्याऽभिधानानमिधानाम्यां व्याघात एव तद्बाधकस्तर्कः, अनभिधानेऽपि वस्तुस्वरूपाप्रच्युतेः, अथ न सङ्केतमात्रमभिधा, आधुनिकसकेतितेष्वपि तत्प्रसगाव, सर्गादी वाऽस्मदादिसके- तानुत्थानाच, किन्त्रीश्वरेच्छैव सा, तस्याश्च नित्यतया न कारणविरहप्रयुक्तो विरह इति तद्विपयत्वमेव सार्वत्रिकमनुमेयमिति चेत, न, शाब्दबोधानुकूलसङ्केतमात्रस्यार्थोपस्थापकत्वात्सर्गादेरसिद्धरीअरस्याप्यसिद्धेस्तज्ज्ञानविपयत्वस्येव तदिच्छाविपयत्वस्प साध्यत्वेऽप्युद्देश्यासिद्धस्तदिच्छाविशेषविषयत्वस्य साध्यत्वेऽप्रयोजकत्वाद्, अर्थानां बाहुल्येन शब्दानां चाल्पत्वेन सर्वत्र तदप्रसरात्, न हि तत्तत्क्षणेष्वेवानन्तेषु विशेषपदप्रयोगः सम्भवी, किमा शेपेषु भावपु, न चोलब्धेष्वपि बहुत्वं हेतूभवितुमु- सहते, तथापि फलामाचे स्वरूपायोग्यत्वमेव हेतुरिति तत्रास्वामान्यमेव हेतुरुक्तः, उपायस्योपायान्तरादूपकत्वाद्वा, तदिद माह-"कह मइसओवलद्धा, तीरति न भासिउं बहुत्ताओ ॥ सव्वेण जीविएण वि, मासइ जमणंतभागं सो ॥१३८॥" [ कथं मतिश्रुतापलब्धास्तीर्यन्ते न भापितुं बहुत्वात् ॥ सर्वेण जीवितैनापि, मापते यदनन्तमागं सः॥] "तीरंति ण बोत्तुं जे, सुयोवलद्धा बहुत्तभावाओ । सेसोवलद्धमावा सामव्यवहुत्तओमिहिआ ॥१३९॥" [ीर्यन्ते न वक्तुं, श्रुनोपलब्धा बहुत्वभावात् ॥ शेपो. पलब्धभावाः स्वाभाव्यवहुत्वतोऽभिहिताः]ननु मतिश्रुतोपलब्धार्थानां कथमीदृशं बहुत्वं यदनन्तभाग एव कृत्स्नायुपा माध्यत इति चेत्, उंच्यते, तदनन्तमागनियन्धस्यैव सूत्रोक्तत्वात्, आह च-" कत्तो पत्तियमेत्ता, मानसुअमईण पज्जया जेसि ।।
मासइ अगतमाग, मण्णइ जम्हा सुए मणिय॥१४०॥"[कृत एतावन्मात्रा मायथुतमत्योः पर्याया येषाम् ॥ मापतेऽनन्तमार्ग मण्यते पम्मायतेऽभिहितम्] "पणपणिज्जामावा, अणंतमागोउ "अगमिलप्पाणं ।। पण्णवणिज्जाणं पुण, अणंतभागो सुअभिवतो" ॥१४१॥ [ प्रग्नापनीया भाषा अनन्तभागस्त्वनभिलाप्पानाम् ॥ प्रशाप याना, पुनरनन्तभागाश्रुतनिबद्धः ॥] एवं च मागकारेण गुणकारानुमानादनन्तगुणत्वं तेषां सिद्धमिति भावः ॥३४॥ उक्तमेवोपपादयितुमाह- अत पय प पूर्वज्ञा, नूनं पदस्थानगामिनः। समाक्षरा अप्यसमाः, श्रुताभ्यन्तरया धिया ॥३५॥ यतोऽभिलाप्यभागानामनन्तमाग एव स्त्रे निरद्धोज एव पूर्वज्ञान।"अणतभागहीणेवा,"असरािवभागहीणे वा,संसिज्ज- मागहीण या, संगेज्जगुणहीणे वा, असंपेजगुणहीणे वा, अणतगुणहीणे वा" इति सूत्रोक्तं हीनत्वघटितं, "अणंतमागन्महिए था, अमोलभागन्महिए या, संमेजभागमहिए या, संरोजगुणन्भहिए या, अससेजगुण महिए या, अणतगुणन्महिए चा" इति सूत्रोक्तं चाधिक्यपटित पदस्थानगामि सङ्गच्छते। सर्वश्रुतार्थनिरन्धे च सर्वेषां साम्यापत्तिः। ननु होनाधिकमावः कथं सर्वेषा पतुर्दशपूर्वविये । उच्यते, तापदक्षरलामाविशेषेऽपि तदभ्यन्तरमतिवैपम्यात, नन्येवमपि श्रुतापेक्षया न पदस्थागोपनिपातोऽपि तु मत्यपेक्षयेति चेत्, न, शृताभ्यन्तरमतेरपि श्रुनानुसारितया श्रुतस्वरूपत्वात् ।। तदिदमाह-"ज चौदसपुष्यधरा, छट्टाणगया परोप्पर होनि ।। तेण उ अगंतभागी, पन्नाणिज्जाण सुसं ॥ १४२ ॥" [यचतुर्दशपूर्वधराः पदस्थानगताः परस्परं भवन्ति । तेन त्पनन्तभागः, प्रज्ञापनीपानां यत्मत्रं ॥] " अपरलंमेण समा उगाहा हुँति मइविसेसेहिं ।। ते उण(विय)मईविसेसे, सुअनाण- मंतरे जाण ॥ १४३ ॥" [अक्षरलाभेन समा ऊनायिका मरन्ति मतिविशेषः ।। तानपि च मतिविशेपान्, श्रुतज्ञानाम्यन्तरे जानीहि ॥] " जे अक्खराणुसारेण, मईविसेसा तयं मुझं सव्वं ॥ जे उण मुआणिरवेक्खा, सुद्धं चिय तं मन्नाणं ॥१४॥" [येऽक्षरानुसारेण, मतिविशेषास्तच्छुतं सर्वम् ॥ ये पुनः श्रुतनिरपेक्षाः, शुद्धमेव तन्मविज्ञानम् ॥ ] अत्र 'सुअनाणं चेव जाणाहि ॥ [ श्रुतज्ञानमेव जानीहि ] इति पाठमुपेक्ष्य 'सुअनाणभंतरे जाण' [ अतज्ञानाभ्यन्तरे जानीहि ] इति पाठकरणं चैवयोयर्थ्याच्छन्दोभङ्गमयादगाभ्यन्तरादिपदवदभेदार्थकस्याम्यन्तरपदस्यातिसान्निध्यव्यञ्जकत्वाच्छूतपदस्य चतुर्दशपूर्वश्रुतार्थ- कत्वेऽभ्यन्तरपदस्य तजातीयत्वबोधकत्वाद्वैत्याहुः ॥ ३५ ॥ ननु पदजन्यं ज्ञानमेव श्रुतं, नदुपजीविज्ञानान्तरं तु मतिरेव, नहि तदुपजीवित्वेन तत्त्वं नाम, प्रत्यक्षोपजीवित्वेनानुमानस्याप प्रत्यक्षत्यप्रसङ्गात्, इति चेत्, उच्यते- श्रुतानुसारिणी बुद्धि-मतिरेव यदीष्यते । तदा पदस्थानता भज्येत्, स्वस्थगने वा मियस्तयोः ॥ ३६ ॥ यदि पदजन्यो बोध एव श्रुतं तदनुसारिविशेषमानं तु मनसोपनीयमानं मतिल, नईि श्रुतस्यापि मननलक्षणेन मतित्वा- तदुच्छेदप्रसङ्गे कथं मतिश्रुतयोः पदस्थाननिवेशव्यवस्था, अस्तु वा तत् श्रुतं तथापि तस्य प्रयोगाधीनत्वात्प्रयोगस्य सल्येय- वायुपां सङ्ख्येयविषयस्यैव सम्भवात् स्वस्थाने सरत्येयेनैव न्यूनाधि कभावव्यवस्था स्यान्मतिज्ञानस्य न सर्वदा प्रयुज्यमा- नानन्तगुणविषयत्वान्मतिश्रुतयोर्मियोऽनन्ततैव सा स्यादिति श्रुतस्य स्वस्थाने मतिश्रुतयो व मिथः पदस्थानोपनिपातोच्छेदः ॥ आह च-"केइ अभासेन्जंता, सुअमणुसरओ वि जे महविसेसा ॥ मग्गति ते मड़ विप, भावमुआमावओ तमो ॥१४५॥ किह मइसुअनाणविऊ, छट्ठाणगया परोप्परं होना । मासिज्ज मोतुं, जइ सव्वं सेमयं बुद्धी ।। १४६ ।।" [ केनिदभाप्यमाणाः श्रुतमनुसरतोपि ये मतिविशेषाः ॥ मन्यन्ते वान्मातेरेव भावशुनाभारतस्तन्नो । कयं मतिश्रुतशानाविदः पदस्थानगताः परस्परं rammmmm.ar मवेयुः ॥ भाष्यमाणं मुक्त्वा यदि सर्व शेपकं बुद्धिः ॥] एवं च थुतादवगवमिदमिति प्रत्ययाऽविशपाच्छादवोधस्पेव तदनुसारिणोऽपि श्रुतत्व निर्वाधं तस्य स्मृतित्वानुमितित्वादिना सहमावाविरोधात, न चैवमनुमानस्यापीन्द्रियापेक्षया ऐन्द्रियकत्वं स्याद् , इष्टत्वात, केवलं श्रुतानुसारिणि श्रुतस्येव वेन्द्रियाणां नातिश्यनापेक्षेति तस्वम् ११३६ ॥ तदेवं श्रुतस्वरूपा- मिधानप्रकारेण बुद्धिद्दिटे इत्यादिगाथा व्याख्याता, अथ भाष्यकारोक्तयादिशा मतिश्रुतभेदोषयनानुकूलतयेयमेव च्यारयायते- घुया सामान्यया दृष्टान, भापते सम्भवेन यान् ।। श्रुतोपयुक्तरते तस्प, श्रुतमन्या मतिः स्मृता ।। ३७ ।। 'बुद्धिद्दिटे' इत्यत्र बुद्धिशब्दो मतिथुतसामान्ययुद्धयर्थयो, 'मतिसहितमित्यत्र' भतिशब्दश्च युततापर्यकः, भापत इत्यत्र योग्यत्वमाख्यातार्थस्तव वद्धतुविकल्पाश्रयत्वं श्रुवपदश्च मावश्रुठार्थकमिति थुतोपयुक्तः सन् बुद्धिदृष्टयदर्थमापणानुकूलविक- ल्पवान् यस्तस्य तेऽर्था विषयविषयिणौरभेदोपचाराद् भाषश्रुतं भवन्तीति पर्यवसितोऽर्थः॥ इयं घनमिलाप्यविषयिणी श्रुतमन- नुसृत्यैवामिलापविपयिणी चेति सामान्ययुद्धि दृष्टत्वं चार्थानां श्रुतदृष्टानामपि मतिदृष्टत्वनियमात्सम्मपति । एवञ्च श्रुतोपयुक्तस्यैय विकल्पपतो मावश्रुतं, वदनुपयुक्तस्यैव तु मतिरिति तयोर्मेदाचथात्वम् ॥आह -"सामना वा बुद्धी, मइमुअनरणाई तीइ जे दिला ॥ मासइ सम्भवमेचं, गहि न उ भासणामित्तं ॥ १४७ ॥ मइसहि मावसुअं, तं निययममासओ वि महरना । मइसहियंति जमुन, सुओवउत्तस्स मावसु ॥ १४८॥" [सामान्या वा थुदिमतिश्रुतज्ञाने तया ये दृष्टाः ।। भापते सम्मव- मात्रं गृहीतं न तु मापणामात्रम् ॥ मतिसहितं भावश्रुतं तन्नियतमभापमाणस्यापि मतिरन्या ॥ मतिसहितमिति यदुक्तं श्रुतोपयुक्तस्य मावश्रुतम् ॥] 'सहितमित्यस्य' क्रियाविशेषणत्वे तु मापणयोग्यत्वस्य धात्वर्थत्वायद्विपयफटोपयोगम- ॐ हितभाषणयोग्यतावान् यस्तस्य ते मावश्रुतमित्यर्थः ॥३७॥ अवधारणविधिमुपदर्य फलितमुपदर्शयति- श्रुतमेव न ते किन्तु, श्रुतं भापत एव यान् ॥ परिणामो ध्वनेरेव, श्रुतं तद्भजना मतेः ॥ ३८॥ यान सम्भवतो भाषत एव तच्छुतमित्यवधारणं युक्तम्, न तु ते श्रुतमेवेति अभिलाप्यगोचरया मत्यापि तदवगाहनात्, न च श्रुतोपयोगेन भाष्यमाणाः श्रुतमेवेति कुतो न ववतुं युक्तं, तेषामेव कदाचिन्मत्यापि भाषणसम्भवात्, एवं च श्रुतं ध्वनि- परिणाम एवं श्रुतोपनीतशब्दगोचरस्यास्यांतल्पविकल्पत्वनियमान्मतिज्ञानं त्वमिलाप्यानभिलाप्यविषयकमिति तत्र तद्- भजनेत्यनेन वैधयेणानयोर्भेदः ॥ आह च-" जे मासइ चैव तयं, सुअं तु नउ भासओ सुअं चैव ॥ केइ मईए वि दिट्ठा, जं दव्वसुअत्तमुवयन्ति ॥ १४९ ॥ एवं घणिपरिणाम, सुअनाणं उभयहा मइन्नाणं ॥5 मिन्नसहावाइ, ताई तो भिष्णरुवाई ॥ १५० ॥" [ यान् भापत एव तत्, श्रुतं तु न तु भाषमाणस्य श्रुतमेव ॥ केचिन्मत्यापि दृष्टा यद्रव्यश्रुतत्वमुपयान्ति ॥ एवं ध्वनिपरिणाम, श्रुतज्ञानमुमयथा मतिज्ञानम् ॥ यद्भिन्नस्वमावे ते ततो भिन्नरूपे ॥] ॥ ३८ ॥ इयरत्यवीत्यादि व्याचष्टे- इतरत्रापि शब्दस्य, परिणामाद् भवेच्छ्रुतम् ॥ मत्या श्रुतोपलब्ध्या वा, यदि नाम समं भणेत् ॥ ३९॥ इतरत्र मतिज्ञाने शब्दपरिणामरूपश्रुतधर्मदर्शनाच्छुतत्वं तदा कल्प्येत यदि तत्र यावन्त उपलब्धिविपया अर्थास्तायन्तो भणन- योग्या भवेयुः, न च भणनयोग्यामणनयोग्योभयविषयत्वान्मतेमतिश्रुतोमयरूपत्वमस्त्विति वाच्यं, भणनयोग्यानामप्यर्थानां मतिज्ञानेन श्रुतोपलव्ध्येव श्रुतानुसारेणाभाषणात्, तदिदमाह-"इयरं ति मइनाणं, तओ वि जइ होइ सद्दपरिणामो ॥ तो तम्मि वि किं न सुअं, मासइ जं नोवलद्धि समं ॥१५१॥" [इतरदिति मतिज्ञानं ततोऽपि यदि भवति शब्दपरिणामः ॥ ततस्तस्मिन्नपि किं न श्रुतं AAP भापते यद् नोपलब्धिसम] "अभिलप्पाणभिलप्पा, उमलमा तस्समं च नो भणइ ॥ तो होउ उभयरूवं, उभयसहावंति काऊणं ॥ १५२ ॥" [ अभिलाप्यानभिलाप्या, उपलब्धास्वत्समं च नो भगति ।। ततो मक्तूमयरूपं, उभयस्वभावमिति कृत्वा ।।] "ज मासइ तं पिजओ, ण सुआदेसेण किं तु समईए ॥ सुप्रोलक्षितष्ठति, वाजओ णोक्लाद्विसमं ॥ १५३ ॥" [पद्मापते । वदपि यतो न श्रुतादेशेन किन्तु स्वमत्या ॥ न श्रुतोपलन्धितुल्यमिति वा यतो नोपलन्धिसमं ॥ ॥३९॥ मविज्ञाने न शब्दपरि- णामरूपश्रुतसाधम्र्येण श्रुताशकपेतरत्रेत्याद्यभिधानं श्रुतत्वाभावव्याप्य श्रुतोपयोगासाहित्यनिर्णये तदनुत्थानात, किन्तु शब्दपरि. पामरूपसाधारणधर्मदर्शनानदाशयेत्यतोऽपरथा व्याचष्टे- तदा श्रुतोपयोगः स्या-छुतविज्ञप्तिहेतुभिः ॥ प्रयोगः स्याद् यदा(द्य) यंतु, नाक्षराय(रस्या)नुसारतः॥ ४० ॥ सम्भयेन फलतो वा प्रयोगकाले मतिज्ञानस्य श्रुतोपयोगस्तदा स्याद् यदि श्रुतधीहेतुसमिधानं स्यात्, वदेव चाय नास्ति, अभिलाप्येऽनमिलाप्ये वा मतिविपयेऽक्षरानुसाररूपसहकारिविरहात्, नहि सह कारिसनिधानानुयुश्रुतलन्ध्या श्रुतोपयोगः स्या- दिति तद्विरहेणेय तत्र तदनापचिरिति मावा, एकत्र इयरत्यवीत्यादौ श्रुतपदं श्रुतोपयोगपरं, उपलब्धिसममिति च श्रुतोपल- ब्धिसमहेतुकमित्यर्थक क्रियाविशेषणं, भणेदित्या मतिज्ञानोपयुक्त इविशेषः॥४ानन्वत्रभाष्यकारव्याख्याने भुवोपयुक्तस्य भापासम्भवः श्रुतमित्येतावदेवास्तु विषयग्रहणं पुनरमाविषयोजनामिविचेत्,न, विषयभेदेन तद्भेदोपदर्शनार्थ सद्ग्रहणादित्याशयेनाह- भेदो विषयभेदेन, हेतुभेदोपजीवि वा ॥ नूनं मतिश्रुते भेत्तुं, दर्शितो व्याख्ययाऽनया ॥४१॥ स्पष्टः ॥ ४१ ।। अथ विषयतामेदात्तभेदप्रतिपादनार्थमियमपरया व्याख्यायवे-
श्रुतमेव श्रुतं ज्ञेयं, भाषासम्भवशालि वा ॥ इतरत्र तदापत्ति-भिन्नाऽनुभववगिरा ॥ ४२ ॥
श्रुतोपयुक्तः सन् श्रुतसहितं यथा स्यात्तथा श्रुतसहितान् वा बुद्धिदृष्टान् यानर्थान् सम्भवतो भापतेऽन्तर्जल्पविकल्पे ज्ञेयाका-
रतया परिणामयति तथापरिणामापन्नास्ते तस्य श्रुतमेव, नहि श्रुतविपयता न श्रुतमिति, नन्वेवमभिलाप्यविषयकं मतिज्ञानमपि
श्रुतज्ञानसमानाकारमिति तत्रापि कथं न श्रुतत्वं, उच्यते, मतिश्रुतयोः स्फुटमेव विषयतावैलक्षण्यानुभवेन समानाकारताया एवा-
सिद्धेः, न च विषयाभेदे कथं विषयताभेद इति वाच्यम्, ज्ञानस्वरूपाया विषयतायास्तदभेदेऽपि ज्ञानसामग्रीभेदेन भेदात्, अनु-
भवेन न तद्भेदोऽनुभूयत इति चेत्, न, कालविशेषाद्यवभासभेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात्, तथा चात्र बुद्धिपदं बुद्धिसामान्यार्थक,
श्रुतपदं च श्रुतोपयोगार्थक, भापत इति च भाषणयोग्यतावानित्यर्थकं, अध्याह्रियमाण एवकारश्च श्रुतमित्यनन्तरं योज्यः ।
तत्पदञ्च नार्थमात्रपरामर्शकं ते श्रुतमेवेत्यस्य वाधात्, किन्तु भापासङ्कल्पविषयत्वविशिष्टार्थपरामर्शकं, इतरत्रेति च मतिज्ञानकाल
इत्यर्थक, श्रुतपदं च भावश्रुतार्थकं, उपलब्धिसममिति च समानानुव्यवसायत्वार्थकं साम्यं च सावधिकमिति सन्निधिसिद्धतया
मतिज्ञानमेवावधित्वेनोपतिष्ठते, भगेदित्युत्तरं च श्रुतमित्यनुपज्यत इति मतिज्ञानकाले श्रुतज्ञानं भवेद्, यदि मतिज्ञानसमानानु-
व्यवसायकं श्रुतं कश्चिदपि भणेदित्युत्तरार्द्धार्थः, एवं च विषयतावैलक्षण्येन कारणभेदानुमानात्तत्र कारणाभावनिश्चयेन कार्यो-
त्पत्तिशंकोच्छेद इतिभावः, अथवा श्रुतमिति भावप्रधाननिर्देशाश्रयणादितरत्र मतिज्ञाने श्रुतत्वं तदा स्यादित्याद्यर्थों बोध्यः ॥४२॥
हेतुविषयभेदोन्नयनानुकूलेन प्रकारान्तरेण व्याचष्टे-
अथवा बुद्धिदृष्टेऽर्थे, श्रुतं मत्यै(सत्ये)व भासते ॥ इतरत्राप्ययं न्यायो, द्वयोः साम्ये परं भवेत् ॥४३॥
'पुद्धिहि अस्थे' इति सप्तम्येक्वचनान्तं विशेषणविशेष्यपदद्वयं, इति पादपुरणार्थों निपातः, भासद भासते, तत्पदं प्रमि- सार्थकं प्रक्रान्तार्थकं या, भुतपदं भावभुतार्थकं, 'मइसहिय' इत्यत्र मतिः सहिता कारणत्वेन यस्य तदिति विग्रहः, पौपिर्यमावे मत्या सहितमित्येव या, एवन बुद्धिष्टेऽर्थे सति तरतं मतिहेतुपमेव भासत इति समुदायार्थः॥ न चार पुदिदृष्टेथे सती. त्यभिधानमनतिप्रयोजनं, अस्प मतिसाहित्यापपादनायित्वाद् पुषिशन्दस्याय मत्यर्थकस्य ग्रहणात् श्रुतविषयोपदाको मतिं श्रत- मवश्यमपेक्षत इत्यनेन समर्थ्यते, अथवा सप्तमी 'तत्र निप्पुल(प्य)को हत' इत्यवान सप्तम्या निमितत्वादिशिष्टे निमित्तत्वस्य विशेष्ययाधे विशेषणमात्रपर्यवसायित्वाचन्छन्दसापेक्षत्वेन यदित्यध्याहारा पुष्टिार्थदर्शनानिमित्तं यदिति श्रुतस्यरूपमन्यता मतिसाहित्यनियमविधानमभिपानीयं, ये इति यदित्पर्यकमित्यपि कवित, अन्यत्रापि मतिझानेऽपि भवेत् श्रुतपूर्वकत्वनियम इत्यर्थाद् गम्यते यदि थुतशानं उपलब्धिसमं मतिज्ञानतुल्यं मणेत, तग न मणितं तयोः परस्परं पदस्थानोपनिपातोपदेशाद, एपश्चानाभलाप्यविषयकमतिझाने क्थमिदपि श्रुतापेक्षाया अमावाद् व्यभिचारेण न तस्य तदेतुफत्वमिति मायः ॥ ४३ ॥ उभयश्रुतमतिभेदपरतया व्याचटे- ज्ञात्वा वा श्रुतदृष्टार्थान, अयतो हभपश्रुतम् ॥ भवेन्मत्युपयुफ्तस्प, थुतं यदि समं भणेत् ॥ ४४ ॥ बुद्धया श्रुतयुद्धया, दृष्टान् यानान् मतिसहितं वृत्तोपयोगेन, भाषते तत् श्रुतं उभययुतमेव इतरत्र मत्युपयोग- काले, भवेत् श्रुतपदानुपङ्गाद उभयश्रतं, यापलन्धिसमं मतिसमानापारथुतं युतानुसार, भणेयोपि कथयेव, श्रुतं भणेदनुसरेदिति वा, एवं चोमयमैदे सिद्ध प्रत्येकभेदः सुसाधः, उमयमैदक्सामग्रीभेदस्यैव प्रत्येफमेदवत्याद, अथवा मति- श्रुतमिति भावः ॥ ४४ ॥ प्रकारान्तरेण व्याचष्टे- सहितमित्यस्य श्रुतानुसारेणेत्यर्थकत्वादने एवकारयोजनाच श्रुतानुसारेणैव भापमाणस्योभयश्रुतमित्यर्थः, इत्थं चाग्रे इतरत्र मतिज्ञाने भवेच्छुतानुसारो यदि स्वोत्प्रेक्षामात्रमतितुल्यं श्रुतं भणेचदभणनाच न तदनुसारः, तं विना च न त्वदेकजीवितमुभय- श्रुतं मत्युपलब्धार्थ, मतिसङ्गतमेव तत् ॥ तादृशं स्यात् तदान्यत्तु, श्रुतं यदि समं भणेत् ॥ ४५ ॥ बुद्धया मंतिलक्षणया, दृष्टा विवक्षिता, येास्तान् भापमाणस्य, मतिसहितमेव द्रवनुतं भवेत्, इतरत्र श्रुत- विवक्षितप्रयोगस्थले च मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्यात् यदि श्रुतं मतितुल्यं कथयेत्प्रेक्षावान्, तच न कथ्यते श्रुतानुसाराननु- साराभ्यां तद्विशेषप्रतिपादनात्, अथ चेतरत्र तत्तदा स्याद् यदि श्रुतं मतिसमकालं भणेत्कश्चित्तदेव च भणितुमशक्यं उपयोग- योगपद्यनिषेधात्, एवञ्च श्रुतोपयोगकाले मत्युपयोगाभावादेव न मतिसहितश्रुतमित्यर्थः, अथवेतरत्र मतिसङ्गतं श्रुतं तदा स्याद् यदि मत्या सह श्रुतं भणन्मत्युपयोगेन शब्दमुच्चरेदि त्यर्थः ॥ ४५ ॥ तदेवं सप्रसङ्गं पूर्वगतगाथाद्वयव्याख्यानेन समर्थित इन्द्रियभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ वल्कसुम्वोदाहरणात मभिधित्सुः प्रथमं परेषां तदुदाहरणोपन्यासविधि निराकुरुते- केचिदाहुवल्कसमां, मति, सुम्बसमं श्रुतं ॥ तद्युक्तं तथाऽभेदे, श्रुतोच्छेदादिदूपणात् ॥४६॥ केचिद् वदन्ति वल्कसदृशी मतिरेव सुम्बसदृशशब्दसन्दर्भकाले श्रुतत्वमास्कन्दति, तथा च श्रुतपदं कर्मव्युत्पत्त्या शब्दार्थ- कमिति, तदसत्, मत्युत्तरं शब्दमात्रस्य भावेऽपि भावश्रुतस्याभावाच्छब्दसन्निधिमात्रेण मतेः श्रुतत्वोपगमेऽतिप्रसङ्गात्साकर्य- प्रसङ्गानिर्विशेषभावे विशेषाभिधायकश्रुताप्रामाण्यप्रसङ्गाच । आह च-"अन्ने मन्नति मई, वाय(वग्ग)समा सुत्रसरिसयं सुत्तं ॥
दिद्वतीयं जुत्ति, जहोरणीओ ण संसहइ॥१५॥[अन्ये मन्यन्ते मतिर्वल्कसमा सुम्पसदृशं स्त्रम् ॥ दृष्टान्तवोऽयं युक्तिं यथो- पनीतो न संसहते]. "भावसुआमावाओ, संकरओ गिव्विसेसमागाओ ॥ पुवुत्तलक्सणाओ, सलक्षणावरणमेप्राओ ॥१५५॥" [ भावथुताभावात् संकरतो निर्विशेषभावात् ।। पूर्वोक्तलक्षणात्स्वलक्षणापरणभेदात् ] ॥ ४६॥ अनेनैव दृष्टान्तेन द्रव्यमापश्रुतयोर्मतिद्रव्यश्रुतयोच मेदनिरूपणाभिप्रायमघरयति- द्रव्यभावभुते भेत्तुं, युज्येत नैतया दिशा ।। मतिद्रव्यश्रुते वा यद, ज्ञानभेदेन मृग्यते ॥४७॥ मावश्रुतं वरकसमं कारणत्वात् कार्यत्वाघ तननितः शब्दः सुम्य इति नेत्यमनयोर्मेदोऽभिधेयः । मतिश्रुतभेदचिन्तारसरे तभेदस्यानधिकृतत्वात्, एवमश्रुतानुसारिणी मतिर्वल्कसमा तजनिता शन्दः सुम्पसमः श्रुतानुसारिणी मतिस्तु भुतमित्यपि बचो नोचार्यमाणं चारुतामश्चति, अनेनोदाहरणेनाधिकृतं मतिश्रुत्तयों दमुपेक्ष्य भेदान्तरसाधनेनार्यान्तरप्रसङ्गात् । आह - "कप्पेज्जेज व सो भाव-व्यसुनेसु तेमु विण जुत्तो ॥ महमुपभैआपसरे, जम्हा किं मुअविससेण ॥१५६॥" [कल्प्पेत वा समाव- द्रव्यश्रुतयोस्तयोरपि न युक्तः॥ मतिश्रुतभेदावसरे, यस्मारिकं श्रुतविशेषण ॥] "असुयक्सरपरिणामा, पजा मई चग्गकप्पणा तम्मि ।। दव्वसुयं सुम्मसमं, किं पुण तेसि विसे सेगं १ ॥१५७॥" [अयुताक्षरपरिणामा या या मविर्वकाल्पना तस्याम् ॥ द्रव्यश्रुतं मुम्बसम, किं पुनस्तयोविशेषेण ] "इह इंजेणाहिगो, नाणविसेसो पदव्यमावाणं ॥ नयदव्यभावमिनेपि, जुम्लए सोऽसमंजसो॥१५८॥" [इह येनाधिकृतो ज्ञानविशेपो न द्रव्यमावयोः ॥ न द्रव्यमावमापि युज्यते सोऽसमञ्जसतः] ॥४७॥ किञ्च भेदघटितकार्यकारणमावशालिनोरनयोर्न वल्कसुम्बादाहरणं परमार्थतः सम्भवतीत्युपदिश्य वास्तवप्याख्याप्रकारमाह- 5 नायं न्यायः पृथग्भावे, तयोर्गुणकथा वृथा ॥ मतिर्वल्कं ततो भाव-श्रुतं सुम्बमिति स्थितिः ॥४८॥ सुम्बवल्कदृष्टान्तो हि कार्यकारणयोरभेदमपेक्ष्य व्यवस्थितः कथं चेतनाचेतनधर्मयोनिशब्दयोर्वक्तुमवकाशं लभेत?, 'अथ आयुर्घतम्' इतिवद्भिन्योरपि तन्मयत्वव्यवहारो नानुपन्न इतिचेत्, न, तथापि सम्भवति मुख्याथै उपचारकल्पनाऽयोगात्तस्माद्- वल्कसमा मतिः सुम्बसमं तु भावश्रुतं तस्य तत्पूर्वकत्वस्या(मा)गमे व्यवस्थितत्वादिति तदुन्नयनं युक्तम् ॥आह च-"णय दव्य- भावमेत्ते वि, जुजए सोऽसमंजसओ॥१५८॥" [नच द्रव्यभावमात्रेऽपि युज्यते सोऽसमञ्जसतः॥] "जह वग्गा सुंवत्तण-मुवैति सुंवं च तं तओणन्नं ॥ण मई तहा धणितण-मुवेइ, जं जीवभावो सा ॥१५९॥" [यथा वल्काः सुम्बत्वमुपयान्ति सुम्यं च तत्त तोऽनन्यत् ॥ न मतिस्तथा ध्वनित्वमुपैति यजीवभावः सा ॥] "अह उवयारो कीरइ, पभवइ अत्यंतरं पि जत्तो॥ तं तम्मयं ति भण्णइ, तो मइपुव्वं जओ भणियं ॥ १६० ॥" [अथोपचारः क्रियते प्रभवत्यर्थान्तरमपि यद्यस्मात् ॥ तत्तन्मयमिति भण्यते ततो मतिपूर्वं यतो भणितम् ॥] "भावसुअं तेण मई, वग्गसमा मुंबसरिसयं तं च॥ जं चिंतिऊण तया, तो सुअपरिवाडि- मणुसरइ ॥१६१॥"[भावश्रुतं तेन मतिर्वल्कसमा, सुम्बसदृशं तच्च ॥ यच्चिन्तयित्वा तया ततः श्रुतपरिपाटिमनुसरति ॥]॥४८॥ नन्वेतदभिधानस्य हेतुफलभावेन भेदाभिधानात्को विशेष इत्यत्राह- दृष्टान्तेनाऽमुनाऽभेदा-श्लिष्टभेदप्रदर्शनम् ॥ विशेषोऽस्य ततो हेतु-फलभावप्रदर्शनात् ॥ ४९ ॥ हेतुफलभावेन हि भेदमानं साध्यते, 'अनेन तु भेदाभेद इत्यनयोविशेपा, तथाहि श्रुतं मत्यभिन्नत्वे सति तद्भिन्नं, एकद्रव्यत्वे सति तद्धेतुकत्वात्, यद् यदेकद्रव्यत्वे सति यद्धेतुकं तत्तदभिन्नत्वे सति ततो मिन्नं यथा वल्कैकद्रव्यं सम्बं वल्कwanne हेतुकमिति तदभिन्नत्वे सति ततो भिन्ममिति, न च भेदमात्रस्याकाक्षितत्वादधिकाभिधाने निग्रहः एक्द्रव्यत्वेनाऽभेदोपस्थिती कथमभेदे भेद इत्याशङ्कायामेतदभिधानाद् अथवाऽभेदे कार्यकारणभाव एव कथं मतिश्रुतयोः ?, इत्याशकोत्थानादेतदभिधानं, तदुच्छेदय वल्कसुम्बयोरिखाऽनुकृतान्वयव्यतिरेकयोस्तयोरभेदेऽपि कार्यकारणभावानुमानाद्, न चार्थान्तरं मेदग्राहकहेतुफ्लभाव- ग्रहोपयिकत्वादेवास्य ॥ ४९ ॥ वल्कसुम्बोदाहरणान्मतिश्रतयोमेंदमभिधायाक्षरानक्षरतस्तमभिधित्सुः परमतं दूपयति- अनक्षराक्षरभेदा-दुक्ताव(ट्रिन्दन्त्य)न्ये मतिश्रुते ॥ तदसत्, साभिलापा य-न्मतिरेयं विलीयते ॥५०॥ मीतज्ञानमूनक्षरमेव, श्रुतज्ञानं तु श्रुतरूपमक्षरखदुच्छ्सितादि चानक्षरमित्युभयात्मकमित्यनयोर्भेद इति केचिदाहुः, तत्रैवं सत्ययं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विकल्परूपाया ईहामतरूच्छेदप्रसगाव, न हि शब्दनिर्मासं विना विकल्पत्वं नाम, किञ्चैवमवग्र- हवदीहादीनामन्वयव्यतिरेकधर्मपरामर्शित्वरूपो विवेको न स्यात्, अथ सप्रकारकज्ञानत्वेनैव विवेचकत्वं, नतु साक्षरत्येनैति, ईहादेः सप्रकारकत्वेऽपि नाक्षरानुगतत्वमिति चेत्, तर्हि थुत्तस्यापि साक्षरवे प्रमाणमन्वेपर्णायं, किञ्च ज्ञानविपययोः स्वरूपविशेष प्रकारता, इतीहादौ शब्द एव विशेष प्रकारताख्यामाविभीति कथमस्यानक्षरत्वं, न चातिरिक्तैव प्रकारतेति युक्तं, 'धर्मिकल्पनातो धर्मकल्पना लघीयसी'इति न्यायेन ज्ञाने शन्दाकारपरिणामरूपाया एव तस्याः क्ल्पयितुं युक्तत्वात्, तदिदमाह-"अन्ने अण्- पखरबखर-विससओ मइसुआई भिंदति ॥ जे महनाणमणक्खर-मक्खरमियरंच सुयनाण ।।१६।।" [अन्येऽनक्षराक्षरविशेपतो मतिश्रुते भिन्दन्ति ॥ यन्मतिज्ञानमनक्षरमक्षरमितरच्च श्रुतज्ञानम् ॥] "जइ महरणक्सरच्चिय, हयेज्ज नेहादओ गिरभिलप्पे॥ थाणुपुरिसाइपजाय-विवेगो किह शु होनाहि ? ॥ १६३ ॥"यदि मतिरनक्षरैव भवेनेहादयो निरमिलाप्ये । स्थाणुपुरुषादि- एव - पर्यायविवेकः कथं नु भवेत् १ ॥ ५० ॥ अथैवं प्रान्तस्योत्तरं निराकुरुते- श्रुतनिश्रितभावेन, मतिरेषा यदि श्रुतम् ॥ तयवग्रहरूपैव, मतिरन्यच्छ्रुतं भवेत् ॥५१॥ श्रुते हि मतिद्विषोपदिष्टा श्रुतनिमित्तमवग्रहादिचतुष्टयमश्रुतनिश्रितमौत्पत्तिक्यादिचतुष्टयं चेति ॥ तत्र चाक्षररूपतया श्रुत- व्यापारात्मकं श्रुतनिश्रितमीहादिकं श्रुतमेव, मतिस्त्वन्यैवेत्यनक्षरमय्येव सेति पराशयोऽयुक्तः, अवग्रहरूपाया एव मतेः पर्यवसानप्रसङ्गादक्षररूपायाः श्रुतव्यापारात्मकत्वेन श्रुतत्वाद्, आह च-" सुअनिस्सिअवयणाओ, अह सो सुयो मओ ण बुद्धीओ ॥ जइ सो मुअवावारो, तओ किमन्नं मइनाणं १ ॥ १६४ ॥" [श्रुतनिश्रितवचनादथासौ श्रुततो मतो न बुद्धः ॥ यदि स श्रुतव्यापारः ततः किमन्यन्मतिज्ञानम् ॥] ॥५१॥ अभिप्रायान्तरं निराकुरुते- श्रुतोदितविवेकश्चे-न्मतिरेवं श्रुतोच्छिदा ॥ योगपद्यं द्वयोर्भावे, एकदा चोपयोगयोः ॥५२॥ यदि हि मत्यभावभिया श्रुतानुसारी ईहादिविशेषोऽप्यक्षरात्मकत्वान्मतिरैवेष्यते तानक्षरमेव श्रुतं मृगयमाणस्य कथं तदा- शापूर्तिस्तस्यैवाभावाच्छ्रुतजन्यस्याप्यक्षरात्मकत्वेन मतित्वाद् । अथ स्थाणुपुरुषविवेककाले तदा मतिः श्रुतं चेत्युभयं स्वीक्रियते केव- ला तु मतिरनक्षरैव भविष्यतीति चेत्, न, एवं सति उपयोगयोगपद्यप्रसङ्गाद्,एकतरोत्पत्तिस्वीकारे च 'सावकाशानवकाशयो- रनवकाशो विधिर्बलीयान्'इति न्यायेनान्यत्रानवकाशस्य मतिज्ञानस्यैव स्वीकर्तुं युक्तत्वादिति प्राञ्चः ॥ नन्वयं नात्रोपयुज्यते विधिविषयत्वात्तस्य, तथाहि निर-सहशब्दयोर्निर्धनः सधन इत्यत्रेवाल्पबहुत्ववाचकत्वाद् 'बहुविषयादल्पविषयो विधिबलीयान्' इत्यर्थः, एवं च वृक्षरित्यत्र परमपि'एबहुस्भोसि'इति(सिद्धहैम १-४-४)सूत्रं बहुविषयत्वाद् बाधित्वा पूर्वमप्यल्पविषयं 'भिस ऐम्' इति (२)सूममुपतिष्ठत इत्युपपादितं भवति तथा च परादीनां पलयाचव्याप्ती सावकाशमिन्नत्वं सङ्कोचकविशेषणं देयमिति प्पुत्पादितं भाति,एवं च निरवकाशस्थले सावकाशप्रवृत्तेरसाधुत्वज्ञापकतयाऽस्योपयोगो नतु वत्प्रवृतिप्रतिबन्धकतया,अज्ञेनभ्रान्तेन वा तस्य तादृशप्रयोगस्य साधुवप्रसङ्गात, तदसाधुत्वज्ञापकान्तरकल्पने गौरवाद, व्युत्पमस्प तथाप्रयोगकारणविघटकाया वदपयोग इत्यपि कथित् । किशाज्यग्रहस्थले सावकाशं मतिज्ञानमपि कथं कल्पनीयमिति चेत्, न, क्लप्तश्रुतकारणाभायात् पलूप्स मतिकारणमघाग, मतिशानमेव तदोत्पत्तुमर्हतीति तात्पर्यात्, अपि चाऽक्षरानुगता श्रुतनिश्रिता मतिः, अन्या त्वश्रुतानिधितेत्यम्यु, पगमे औपनिफ्यादेरपि वनिधितत्वप्रसङ्गगादपसिद्धान्तः ।। आह घ-"अह सयओ वि विवेग, कुणओ ण वयं मुझे सुअं णस्थि ।। जो जो मुअवावारो, अनो वि तो मई जम्हा ।। १६५ ॥ अथ श्रुततोऽपि विक, कुर्वतो न तच्छुतं श्रुतं नास्ति । यो यः श्रुतव्यापारोऽन्योऽपि सको मतिर्यस्मात् ] "मइकाले विजइ सुअं, तो जुगवं महसुयोपोगा ते ॥ अह नेयं एगयर, । परजो जुज्जए ण मुझं ॥१६६॥" [मतिकालेऽपि यदि श्रुतं ततो पुगपन्मतिश्रुतोपयोगी ते ॥ अथ नैपमेकतरं प्रपद्यमानस्य पुज्यने न श्रुतम् ] "जा सुअनिस्सिअमक्सर-मणुसरओ देण मइचउर्फ पि ॥ सुनिस्सिमाव, तह तैपि जमक्सरप्पमय ।। १६७॥" यिदि तनिधितमक्षरमनुसरतस्तेन मतिचतुष्फमपि ॥ श्रुतनिथितमापनं तव तदपि यदधरप्रभवम् ] ॥५२॥ ननु यपक्षरानुगतत्वं न श्रुतनिधितत्वं तर्हि किमन्पदिति जिप्रासापामाह- श्रुतापाससमुद्रपुर-क्षयोपशमसम्भवम् ।। श्रुतानुसारहीनं प-तदेय श्रुतनिश्रितम् ॥१३॥ श्रुतानुसारहीनं श्रुवनिश्रितमित्युक्त औत्पसियादापतिन्याप्तिस्तद्वारणाय श्रुताभ्यासेति विशेषण, यद्यपि "मरनित्थरण- ICC-STERONE समत्था, तिवग्गसुत्तत्थगहियपेयाला||उमओलोगफलवई विणयसमुत्था हवइ बुद्धी।।९४३॥"(आव० भाष्य[भरनिस्तरणसमर्थी त्रिवर्गसूत्रार्थगृहीतसारा (प्रमाणा)। उभयलोकफलवती विनयसमुत्था भवति बुद्धिः] इतिवचनाद् वैनयिक्यामश्रुतनिश्रितायामपि श्रुताभ्यासापेक्षास्ति, तथापि श्रुतानुबुद्धक्षयोपशमजन्यावृत्तिश्रुतानुसारहनिवृत्तिजातिमज्ज्ञानत्वं श्रुतोबुद्धक्षयोपशमजन्यत्वाव्य- भिचारि तादृशजातिमज्ज्ञानत्वं वा श्रुतनिश्रितत्वमित्यत्र तात्पर्यम् , अत एवाह "किन्तु सकृच्छ्रुतनिश्रितत्वे सत्यपि वाहुल्यमङ्गीक- त्याश्रुतनिश्रितं तदुच्यत इत्यदोष" इति, इदमेवाभिप्रेत्य चाह भाष्यकारः॥ "जइ तं सुरण ण तओ, जाणइ सुअनिस्सि कहं भणियं ॥ ज सुअकओवयारं पुविइण्हिं तयणवेक्खं ॥१६८॥” [यदि तत् श्रुतेन न स जानाति श्रुतनिश्रितं कथं भणितं ॥ यद श्रुतकृतोपचार, पूर्वमिदानी तदनपेक्षम् ] "पुचि सुअपरिकम्मिअ--मइस्स जं संपयं सुआईयं ॥ तं निस्सिअमियरं पुण, अणि- स्सिों मइचउकं तं ॥१६९॥"[पूर्व श्रुतपरिकर्मितमतेर्यत्सांप्रतं श्रुताततिम् ॥ तनिश्रितमितरत्पुनरनिश्रितं मतिचतुष्कं तत्।। यद्यपि विशेषणधीत्वेन श्रुतानुसारो विशिष्टेऽश्रुतनिश्रितेऽपि पदधीत्वेन च न श्रुतनिश्रितेऽपि, तथापि श्रुतादवगतमिदमिति प्रतीतिसा- क्षिको विषयताविशेष एव श्रुतानुसारोन ग्राह्यः ॥५३॥ नन्वेवं यदि श्रुतनिश्रिताऽश्रुतनिश्रिता वा मतिरवग्रहरूपा निरमिलापा, ईहादिरूपा च सामिलापा, श्रुतमपि च प्रागुक्तरीत्या द्विविधं तर्हि कोऽनयोर्भेद ? इति सुहृद्भावेन पृच्छाम इति चेत्, उच्यते- द्विविधापि मतिस्तस्माद, द्विरूपैवेति का भिदा ॥ तद् द्रव्याक्षरभेदेन, भावनीया भिदाऽनयोः ॥ ५४॥ यद्यपि भावाक्षरेणाऽवग्रहेहादिरूपमतेर्भावद्रव्याक्षराभ्यां च श्रुतस्य वैविध्यमापततोऽविशिष्टं, तथापि मतौ पुस्तकादिगतं ताल्वा- दिव्यापारजन्यं च द्रव्यश्रुतं नास्त्येव द्रव्यश्रुतस्य द्रव्यमतित्वेनारूढत्वादिति, द्रव्याक्षरेणाऽनक्षरैव मतिः, श्रुतं तु द्रव्यश्रुत- तेनापि रुढं तदपि शब्दरूपमक्षरमयम्, उच्छ्वसितादिरूपं चानक्षरं मावश्रुतमपि विकल्पात्मकत्वाभावाक्षरेण साक्षरं द्रव्याक्षरास्त्र- मावत्वाच्च तेनानक्षरमित्यनयों दः॥ तदिदमाह-" उभयं मावक्सरओ, अणक्खरं होज वंजणक्खरओ ॥ मइनाणं सुत्तं पुण, उभयं पि अणक्खरक्सरओ ॥ १७० ॥" [ उभयं भावाक्षरतोऽनक्षरं भवेद्व्यञ्जनाक्षरतः ॥ मतिज्ञानं श्रुतं पुनरुभयम- प्यनक्षराक्षरतः ] ॥ ५४॥ पर्यवसितार्थमाह- द्रव्यश्रुतव्यवहते-र्भावाभावे विभिन्दतः ॥ मतिश्रुते इतरथा, व्यवहारस्य सकरात् ॥ ५५ ॥ मतिज्ञानस्य द्रव्यश्रुतव्यवहाराविषयत्वादेव श्रुतज्ञानाद् भेदः, अन्यथा द्रव्यश्रुतमितिवद् द्रव्यमतिरिति व्यवहारः स्यादर्थाs- मैदान, अथ भेदेऽपि मतिकारणे शब्दे द्रव्यमतित्वेनाव्यवहारे इच्छैव चीजमित्यमेदेऽपि व्यवहओरिच्छैव नियामिकेति चेत्, न, भेदे ऽसाधारण्येनापेक्षाया व्यवजिहीपचीज़त्वाद्, अभेद तदसम्भवाद्, एवं च मतिज्ञानं श्रुतज्ञानाद् भिद्यते द्रव्यश्रृतव्यवहारा- विषयत्वाद्, अवधिज्ञानवत् , श्रुतज्ञानं वा मतिज्ञानाद् मियते द्रव्यश्रुतव्यवहारविषयत्वाद्, व्यतिरेकेऽवध्यार्दिष्टान्त इति प्रयोगः । न च द्रव्यश्रृतव्यवहारविषयत्वं शब्द एवेत्यपक्षधर्मत्वं हेतोस्तथात्वेऽपि हेतौ पक्षीयसाध्यान्यथानुपपत्तिप्रतिसन्धानेन पक्षीयसाध्यसिद्धे, अत एव जलचन्द्रेण नभश्चन्द्रानुमानमितिप्राचः । अस्तु वा द्रव्यश्रुतव्यवहारघटककारणतानिरूपितकार्य- ताशालित्वादिति हेत्वर्थः ॥५५।। उक्तोऽक्षरानक्षरभेदान्मतिश्रुतयोर्भेदः, अथ मुफेतरभेदाचमभिधित्सुस्तदर्थमुपन्यस्यापाततो दूषयति- स्वपरज्ञप्तिहेतुत्वा-त्तयोर्मूकान्यवद्भिदा ॥ चेप्टादिमतिहेतोर-प्यन्यार्थत्वान्न युज्यते ॥ ५६ ।। द्रव्याक्षररूपस्य श्रुतस्य परप्रतीतिजनकत्वान्मतेस्तु नदभावेनात्ममात्रप्रत्यायकत्वान्मूकाम्कयोरिव तयोर्भेदमन्येऽभिदधति, ॥ ] तचिन्त्यम्, यतः श्रुतज्ञानं हि न स्वतः परप्रत्यायकं किं तु श्रुतज्ञानकारणे शब्दे तदुपचारं कृत्वा तस्य परप्रत्यायकत्वमभिधीयत इति परत एव तत्तथा, एवं च करवक्त्रसंयोगादिका अपि चेष्टा अनक्षररूपत्वेन मतिहेतुतां भजन्त्यः परस्मिन् भुजिक्रियादिप्रती- ति जनयन्ति, इति मतेरपि परतः परप्रत्यायकत्वमविशिष्टम् । आह च-"सपरपञ्चायणओ, भेओ मूएतराण वाऽभिहिओ ॥ जं मूअं मइनाणं, सपरप्पञ्चायगं सत्त।।१७१॥" [स्वपरप्रत्यायनतो भेदो मूकेतरयोरिवाभिहितः॥ यद् मूकं मतिज्ञानं, स्वपरप्रत्यायकं श्रुतम् ] "सुअकारणति सदो, सुअमिह सो य परवोहणं कुणइ ॥ मइहेअवो वि हि परं, बोहिंति कराइचेट्टाओ ॥ १७२ ॥ [ श्रुतकारणमिति शब्दा, श्रुतमिह स च परवोधनं करोति ॥ मतिहेतवोऽपि हि परं बोधयन्ति करादिचेष्टाः ] "न परप्पबोहयाई, जं दोवि सरूवओ मइसुआई ॥ तक्कारणाई दोण्ह वि, वोहिति तओ ण भेओ सिं ॥ १७३ ॥"[ न परप्रबोधके यद् द्वे अपि स्वरूपतो मतिश्रुते ॥ तत्कारणानि द्वयोरपि बोधयन्ति ततो न भेदोऽनयोः ॥] ॥ ५६ ॥ वस्तुस्थितिमुपदर्शयति- परप्रत्यायने शब्दो, ह्यसाधारणकारणम् ॥ चेष्टापि शाब्दहेतुळ (त्वात्), तदियं युज्यते गतिः॥५७ ॥ यद्यपि द्रव्यश्रुतं श्रुतज्ञानं जनयितुमान्तरिकान्मतिविवर्त्तानवग्रहेहादीन् जनयति तथाप्यक्षररूपतया मुख्यत्वात् श्रुत- ज्ञानस्यैव तदसाधारणं कारणं, करादिचेष्टास्तु न मतिज्ञानस्यैवासाधारणं कारणं, 'भोक्तुमिच्छत्ययम्' इत्यादिश्रुतानुसा- रिविकल्पस्यापि जनकत्वात, अथवाऽऽचारादिपुस्तकाक्षरस्य गुरुजनोदीरितशब्दस्य वा श्रुतस्य यथा मोक्षं प्रत्यसाधारण- कारणानां क्षायिकज्ञानदर्शनचारित्राणां कारणत्वं न तथा परप्रत्यायिकानां चेष्टादीनामिति विशेषः ॥ वस्तुतः शब्द- स्यैव चेष्टादीनामप्यर्थविशेषेण सह सम्बन्धग्रहात्पदार्थोपस्थितिद्वारा शाब्दप्रतीतिजनकत्वमेव, न तु मतिज्ञानजनकत्वं, अत एव शब्दोदीरणासामर्थ्याभाव प्रतिपिपादपिपवस्तथा तथा चेष्टमाना दृश्यन्ते, न च चेष्टादिना व्याप्तिप्रतिसन्धानपुरस्सरमनुः मितिरेव जन्यत, न तु शाब्दबोध इति वाच्यम्, एवं सति शब्दादप्यर्थप्रतीतिरनुमाननैवेति गतं शब्दप्रमाणचर्चयैव ॥ अथ शाब्दबोधे पदोपस्थित एवार्थो भासते नतूपस्थितमात्रं, अन्यथा घटपदारसम्बन्धितयोपस्थितस्याकाशस्य शाब्दबोधप्रवेश- प्रसङ्गात्तथा च चेष्टोपस्थितोऽर्थः कथं शान्दधैि निविशतामिति चेत्, न, सड़केतग्रहाधीनोपस्थितिकस्यैव वत्प्रवेशनियमाद, अथ चेष्टादिना शब्दानुमानादेव शाब्दयोधस्तस्यैव तद्धेतुत्वेन क्लप्तत्याद्, अन्यथा लिप्यक्षरादेरपि तद्धेतृत्वकल्पने गौरवादिति, तदिदमभिप्रेत्योक्तं "प्रयत्नजन्या शरीरतदवययक्रिया चेष्टा सा च नाव्यशास्त्रादिसमयबलेन पुरुषाभिप्रायविशेपं अर्थविशेष च गमयन्ती नागमाद् मियते लिप्यक्षरादर्थप्रतिपत्तियदिति" इति चेत्, न, चेष्टायाः शरीरवृत्तित्वेन शब्दस्य चाकाशवृत्तित्वेन उत्र न्याप्तिग्रहासम्भवाद, चेष्टया तदभिप्रायस्थः शब्दः कल्प्यते, इत्यपि वार्तम् ॥ आकाशं घटमानयेतिशब्दवदित्यनुमित्याद्याक- लितशब्दस्येव तस्य स्वतन्त्रानुपस्थितत्वेन शाब्दपोधाहेतुत्याद, किश्वैतादृशव्याप्तिप्रतिसन्धान पिनापि चेष्टादेराहत्यार्थप्रतीति- दर्शनात्तस्याः स्वतन्यतयैव हेतुत्वं युक्तम्, अथ चेष्टाजन्यज्ञानस्य शाब्दत्वे शब्दात्प्रत्येमीति तत्र प्रतीतिः स्याम तु संज्ञया प्रत्येमीति चेत्, न, तस्य ज्ञानस्य शाब्दत्वेऽपि शब्दाजन्यत्वाव, ताशप्रतीतौ शब्दजन्यत्वस्य नियामकत्यात्, अत एव चेष्टायां लक्षणाभावेऽप व्यजनयैव बोधकत्वमित्यालश्कारिकाः। तदिदमखिलं चेतसि निघाय वभाषे भगवान् भाष्यकार:- दव्यसुअमसाहारण-कारणओ परवियोहयं हुजा ॥ रुद्रं वि घ दव्यपं, मुझं वि रूढा ण दव्यमई ॥ १७४ " [ द्रव्यथुन मसाधारणकारणतः परविबोधकं भवेत् ॥ रूढमिति वा द्रव्यश्रुतं श्रुतमिति रूढा न द्रव्यमविः ॥]" सा वा सद्दत्यो चिप, क्या "
वि जं तंमि पचओ होइ । कत्ता वि हु तदभावे, तदभिप्पायो कुणइ चिट्ठ ॥ १७५ ॥" [सा या शब्दार्थ एव तयापि
यत्तस्मिन्प्रत्ययो भवति ॥ कर्तापि खलु तदभावे तदभिप्रायः करोति चेष्टाम् ॥ ] अत्र शब्दार्थ इति शब्दो वक्तुः समुदीरितव-
चनरूपस्तस्यार्थः शब्दार्थः श्रोतृगतज्ञाने प्रतिभासमानस्तदभिधेयवस्तुस्वरूपः श्रुतवानमिति तात्पर्य, तथा च कारणे कार्योपचार
आश्रयणीय इति हृदयम् ॥ वस्तुतः शब्दस्यार्थः प्रयोजनमिति सम्मुख एवार्थः ॥ ननु मुकेतरभेदस्याऽजधारणगर्भोऽयमर्थः कुतो
न स्याद्यत् श्रुतज्ञानं मुखरमेव मतिज्ञाने तु न नियम इति चेत्, न, श्रुतज्ञानस्यापि सर्वस्यामुखरत्वादनन्तभागस्यैव नियन्यादि-
योग्यतया मुखरत्वोक्तौ चाभिलाप्यानभिलाप्यविषयविभागादनतिरेकप्रसङ्गादितिदिग् । ननु तथापि खपरप्रत्यायकत्वाऽप्रत्याय-
कत्वाभ्यां मतिश्रुतहेतूनामेव विशेष उक्तो न तु मतिश्रुतयोः । न च श्रुतमपि शब्दप्रयोगद्वारा परप्रत्यायकमितिवाच्यम् मतिज्ञानस्यापि
तद्वारा तथात्वादितिचेत्,न,स्वकारणद्वारा परस्मै स्वसमर्पकत्वस्य विशेषकत्वात् । असार्वत्रिकमिदमभेदकमिति चेत्, न, तजाती-
यत्वस्य सार्वत्रिकस्य भेदकत्वात् ॥५७॥ उक्तो मुकेवरभेदान्मातिश्रुतयोंर्भेदस्तत्प्रतिपादनेन च कृतं सर्वप्रकार दनिरूपणमित्याह-
मियो मतिश्रुतभिदा, तदेवं सर्वहेतुभिः ॥ दिशा प्रदर्शिताऽकम्प-सम्प्रदायपवित्रया ॥ ५८ ॥
स्पष्टः ॥ नवरं प्रदर्शितेति क्तप्रत्ययग्लेन मतिश्रुतभेदस्य सिद्धत्वज्ञानेन प्रतिवन्धकजिज्ञासानिवृत्त्या मतिस्वरूपनिरूपण-
प्रयोजकजिज्ञासा शिष्याणां कृता भवाते ॥ ५८ ॥ सविवरणे श्रीज्ञानार्णवप्रकरणे प्रथमस्तरमः सम्पूर्णः ।।
प्रौढिं ये विबुधेपु जीतविजयप्राज्ञाः परामैया-स्तत्सातीर्यभृतो नयादिविजयप्राज्ञाः अयन्ति श्रियम् ॥
तेषां न्यायविशारदेन शिशुना ज्ञानार्णचे निम्मिते, पूर्ण भाष्यवचोमृतैरतितरा:-माद्यस्तरल्गोऽभवत् ॥ १ ॥
- ग्रन्थान्तरं रत्नजिक्षयान्ये, जडास्तडागं परिशीलयन्ति । रत्नाकरं जैनवचोररस्य, वयं तु भाप्यं परिशीलयामः ॥२॥ नमोऽस्तु भाष्यकाराय, भगवन्मतभानवे ॥ पराहतेपु तपु, भाष्यजीवातुदायिने ॥ ३ ॥ ॥ इति श्रीज्ञानार्णवे न्यायविशारदविरचिते मतिथुतभेदचिन्ताधिकार प्रथमस्तरइग सम्पूर्ण ।। अथ द्वितीयस्तरदः ।। अथावसरसङ्गत्या मतिज्ञाननिरूपणं प्रतिजानीते । भेदपर्यायसुव्यक्त-मय तत्त्वनिरूपणात् ॥ निरूप्यते मतिज्ञान-मुझेशक्रमसङ्गतम् ॥१॥५९॥ अथ' यथोदेशं निर्देश' इति न्यायात् पूर्व मतिज्ञानमुदिष्टमिति तदेव पूर्व निर्दिश्यते, एवं चौदेप्टुरिच्छयोद्देशक्रमः, उद्देश- प्रमाण निर्देशकम इति लभ्यते उद्देश व निर्देशपीछव नियामिकासाम्प्रदायिकत्वेन बलवदनिष्टानुबन्धित्वज्ञानाच्च नोद्देशकमवि- परीतक्रमेण निर्देशेरछेति तु युक्तं, अवाज्येत्यनेन प्रतिबन्धकजिज्ञासापगमलक्षणाऽवसरसङ्गति?त्यते, तथा चासङ्गताभिधान- शंका निवतिता भवति, प्रतिज्ञया च शिप्यावधानं कृतं भवति । तथा च भाष्यकारोऽपि-"मइमुअनाणविसेसो, भणिओ ताल यसपाइभएणं ।। पुचि आभिणियोहिय-मुदिदं तं परूविस्स||१७६॥"मतिश्रुतज्ञानविशेपो भणितस्तलक्षणादिभेदेन । पूर्वमा भिनियोधिमुदिष्टं तत्प्ररूपयिप्ये] ॥१॥ तत्र निरूपणं तावत्तवभेदपर्यायैः कर्तव्यं वा तस्य भावस्तत्त्वमिति निरुज्या तच सामा- न्यलक्षणं वन पूर्व कृतमेवेति भेदनिरूपणमवसरप्राप्तं चिकीर्षुराहm श्रुतनिश्रितमन्यच, तद्विधाऽवग्रहादिभिः ॥ औत्पत्तिस्यादिकै दै-रेकै स्थागतुर्विधम् ॥ २ ॥३०॥ तन्मतिज्ञानं द्विविघं श्रुतनिश्रितमश्रुतनिश्रितं च, तत्स्वरूपं च प्रागुक्तं, तदपि प्रत्येकं ननुर्विष, श्रुतनिश्रितमयग्रहेलापाय- धारणालक्षणं,अश्रुतनिश्रितोत्पत्रिकी-वैनयिकी-कार्मिकी-परिणामिकीलक्षणं चेति, याप्यथुतनिधिनेऽप्यनग्रहादिकमनि नथापि 'असाधारणेन व्यपदेश' इति न्यायादित्यं विभागः प्रदर्शितः ॥ २ ॥ आदिपदेन मंभिप्योपगिनं प्रभेदं प्रपनायनि- भिदाश्च ताश्चतस्रोच-ग्रहहापायधारणाः ॥ औत्पत्तिकी बैनगिकी, कार्मिकी पारिणामिकी ॥३॥६॥ स्पष्टः।। नवरं पारिणामिकीत्यस्यान्ते नैनीतिगेपः, अत्र च श्रुतनिश्रिताधिकागदपग्रमादिभेदानामेवाधिकारः ॥ आर नियु- क्तिकार:-"उन्गह-ईह-वाओ य, धारणा एन होनि चत्तारि ।। आभिपित्रोहियनाणस्म, भेरा नमानेग।।१७८" TRE ईहाऽपायथ धारणव भवन्ति चत्वारि ।। आभिनियोधिकमानम्य भेदगम्तनि गमागेन]. अब नागेजनवादः 'पर्यायनिगनेन स्वातन्त्र्यप्रदर्शनार्थः, तत्प्रदर्शकत्वं चास्य भेदार्थलादलसेयं, अनुगास्यने न नामों भेद ' इनि, एका अपग्रीनमेरेगने ईहितमेव निश्चीयते, निश्रितमवावमार्यत इति क्रमयोननाथः ।। भेदा एवं वस्तुनि लिविकासन्तुबम्पागि भदाम्ननि, नेन भेदन पदार्थान्तरत्वनिरासः, समासेनेति विलरेणाधिकानामपि सम्भवादितिमारः ॥३॥ अपग्रहादीनां समाह- अपग्रहोऽवग्रहः स्या-दीडा भेदगवेषणम् ॥ इदमेवेन्यपानी पी-धारणा तदनिगुनिः ॥ ४ ॥ १२ ॥ अपकृष्टः मामान्यमानावमासी ग्रहोऽवग्रहो निष्प्रकारकं मानमित्यर्थः, भदगगणं नयापानयत्यनियमसम्मानमी, इदमित्यमेवेत्यवधारणमपायो,निधिनार्थाविन्युतिधारणा,अविन्युतिस्मृतियामनारूपाणां तिगृणामपि भाग्यानो न्यनिरिगेमिना .
भाव्याप्तिः) आह च नियुक्तिकारः॥"अन्याणं उग्गहण,आगई नह मिशाल हो। समापं न आये, परन पुण धारण विति
॥१७९॥" [अर्थानामवग्रहणमरग्रहं तथा विचारणमीहां।।व्ययमापं चापापं घरण पुनरिणां प] "अत्याणं उन्गहणम्मि उन्गहो" ।
इविपाठे विभक्तिव्यत्ययो द्रष्टव्य । भाप्पकारोऽप्पम्ययात्-"सामणत्यामहप-मोरगहो भेप्रमग्गणमहे ।। तस्मा-
वगमोऽयात्री, अपिघुई धारणा तस्म ।। १८०॥" [ मामान्यार्थापग्रहणमपग्रहो मैदमार्गगमहा ।। तस्यारगमोऽपापोटीच्यु-
तिर्धारणा तस्य] एतेषां लक्षणानां निमग्ने पक्ष्यामः ॥ ४ ॥
अत्र चापग्रहादारम्य परैः सह पदयो रिप्रतिपत्त्या मातीत्यपाइपिपान्त तानिराकरोति-
अवग्रहेऽपि सामान्य-विशेषं विपर्य परे । माहुस्तेपामपापण, प्रतिरतिदुर्घटा ॥ ५॥ ६३ ॥
सामान्यमाघारगाहिन्नानत्य नारग्रहत्वं अन्दादिमामान्यापशेपग्रहस्यापि तयात्यान, फिन्तु इदं तदिति येत्याफारविमर्श-
पूर्वभाविज्ञानत्यमे, प्रवर्तते च शब्दोऽयमिीत ज्ञानोत्तरं किमयं मांगः शार्गो पेस्पादिरिमय इति, मोऽप्यपद इति केचिदाहा।
तन्न, तादृशविमर्शानुपरमैनापायस्य कदाप्यप्रवृतिप्रगान, हाया अपीहान्तरपूर्वमारित्वेनाऽरग्रहत्यप्रसगाव, सामान्यगिरोप-
मानस्यापि सामान्यमानमानं मिनासम्ममाद्विशेषधर्ममानेविग्रहस्य हेतुत्लादित्यादि मातरं यस्यते, आह प-"साममविम-
संस्स वि, केइ उग्गहणमुग्गई चिंति ॥ महरिदं तमं विघ तन्नो पदोसमायानो ॥१८॥" [सामान्यविशेषस्यापि फेचिदपप्रा-
रामनग्रहं युयते ॥ यन्मतिरिदं वदिति च तमो पदोपभावा) ॥५॥हाविपरिणीं विप्रतिपहिं निरस्पति-
ईहां संशयमेवाहा, परे तत्प्रकृतासहम् ॥ हेतृपपषिव्यापारा, न हा संगपात्मिका ॥ ६ ॥ ॥ ३३ ॥
स्थाणुर्या पुरुषो वेत्यनिश्चयात्मकं संशयमेवहां केचिदुपयन्ति, ते भ्रान्ताः,ज्ञानाधिकारज्ञानरूपाया ईहाया उपन्यासायोगाद्, आह च-"ईहा संसयमेत्तं, केई न तयं तओ जमन्नाणं । मइनाणंसा चेहा, कहमन्नाणं तई जुत्तं ॥१८२॥ [ईहा संशयमानं केचिन तत्स यदज्ञानम् । मतिज्ञानांशचहा-कथमज्ञानं सा युक्तम्] संशयेहयो_लक्षण्यं न वीक्षामहे इति चेत्, सोऽयं पुरुपदोपो न तु वस्तु- दोपस्तयोर्भेदस्यानुभविकत्वात्, तथाहि 'एकत्र विधिनिषेधौभयज्ञानं संशयः,' 'हेतूपपत्तिव्यापारप्रवणं ज्ञानमीहा' इति लक्षणभेदा- दनयोर्भेदः,यदाह-"जमणेगत्थालवण-मपज्जुदासपरिकुंठियं चित्तं ॥सेय इव सव्वप्पयओ,तं संसयरूवमण्णाण।।१८३॥" [यदने कालिम्बनमपर्युदासपरिकुंठितं चित्तम्।। शेत इव सर्वात्मतस्तत्संशयरूपमज्ञानम्] "तं चिय सयत्थदेऊ-वत्तिवावारतप्परममोहं ।। भूआभूअविसेसा-याणच्चायाभिमुहमीहा।।१८४॥"[तदेव सदर्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परममोघम् ॥ भूताभूतविशेषादानत्यागाभि- मुखमीहा] अत्रानेकार्थालम्बनमित्यत्रालम्वनपर्दैनकालम्बनत्वविवक्षणाद्,अनेकार्थपदेन विरुद्धार्थत्वलाभाद्, “एकविशेष्यकं विरुद्ध- धर्मप्रकारकं ज्ञानं संशय " इति लक्षणं, अपर्युदासपरिकुंठितमिति च स्वरूपाभिधानानुपलक्षणादविधिपरिकुंठितत्वमपि द्रष्टव्यं, 'सय ' इत्यादि च, सं सर्वात्मना शेत इवेति संशय इति व्युत्पत्त्यर्थाभिधानं, अत्र विरुद्ध नानाधर्मप्रकारकत्वं परस्परग्रहप्रति- वन्धकग्रहविषयतावच्छेदकनानाधर्मप्रकारकत्वं विवक्षितं, तेन तदभावव्याप्तिपर्यवसायिनो विरोधस्य संशयेऽभानेऽपि न क्षतिः, न वा इदं रजतमेतद्रूपवचेति ज्ञानस्य संशयत्वापत्तिः, यत्तु 'एकधर्मिकतत्तदभावोभयप्रकारकज्ञानमेव संशय' इति, तन्न, अयं स्थाणुः पुरुषो वेति भावाभावानात्मकविरुद्धधर्मद्वयप्रकारकज्ञानस्यापि संशयत्वात् , तत्र चतुष्कोटिकसंशयस्यासिद्धत्वादिति दिग् ॥ यच ज्ञानं स्वार्थहेतूपपत्तिव्यापारतत्परं तदीहा, भूताभूतेत्यादिकं च स्वरूपकथनं, तत्र हेतुव्यापारः स्थाणुरयं यल्ल्युपसर्पणकाकादि- निलयादित्याकारः, उपपत्तिव्यापारश्च सम्भवपर्यालोचनं यथा सूर्यास्तसमये महति तमिले स्थाणुरयं सम्भाव्यते नतु पुरुषः, तस्यासम्भादिति, न चाशुन धरझाने कथमेतावत्पर्यालोचनमिति वाच्यं, ईहाया बहुसामयिकत्वाद्, अत एव बहुकालमभुमर्थमनुम- वामीति प्रतीतिः सर्गच्छते, एवञ्च हेतूपपत्त्योः परमार्थत एकरूपत्वात्तत्सशविरोधितद्व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमेव तदीहेत्यायाति, तत्संशयविरोधिता च तदभावानवगाहित्वेन विवक्षितेति न व्याप्यव्याप्यवत्तापरामर्शप्रसूतव्याप्यवनानुमितेरपायरूपाया ईहा- खापचिः, तत्संशयनिवर्तकापायानुकूलपरामर्शत्वं चेहालक्षणं, तेन न तोद्यतिच्याप्तिः,स्यादेतव,तदभावाप्रकारकत्वे सति तत्प्रकारक ज्ञानं निश्यः, स एव चापायः, ईहापि संशयमिमत्वाचादृश्येवेतहापाययोः को भेद ? इतिचेत्,न,इदमित्थमेवेत्यनुभवसाक्षिक- विषयताविशेषवतोऽपायादतादृश्या ईहाया मिन्नत्वात् । तादृशविषयताभावः संशयत्वेन व्याप्त इतिचेत्,न,अवग्रहेण व्यभिचाराव, स्पष्टशानत्वविशिष्टः स तथेतिचत् न, तादृशव्याप्ती मानाभावाद् अपि चामुमर्थ विचारयामि, अमुमर्थ च निथिनोमीति प्रतीतिम्या मीहात्वापायत्वयोः स्फुटमेव स्वतन्त्रतया मानमिति दिग् ॥ ६ ॥ अपायधारणागतविप्रतिपचिनिरासाय परमतमुपदर्शयति-- फेचिदन्यविशेषस्या-भायव्यवसितिं जगुः ॥ अपायमिदमेवेति, निश्वयं धारणां पुनः ॥ ७ ॥६५॥ 'ववसायंमि अवाओं' इत्पत्र विशेषेण एककोटिव्याप्यधर्माभावप्रकारेणावसायो ज्ञानमिति यथाश्रुतार्थम्रान्ताः पुस्पत्वव्याप्य- शिकण्ड्यनादिधर्मामाववानयमित्यादिज्ञानमपायं, 'धरणं पुण धारणं विति' चि यथाश्रुतार्थभ्रान्ताव तदुत्तरोत्पन्न स्थाणुरेवा:- यमित्यादिज्ञानं धारणा केचिदाहुः।। आह च-"वेइ तयभावसेसा-वणयणमिचं अपायमिच्छति । सम्भूयत्थविसेसा-वधारणं धारणं विति॥१८५॥" [केचिचदन्यविशेषापनयनमात्रमपायमिच्छन्ति । सद्भूतार्थविशेषावधारणं धारणा ब्रुवते ॥ ॥७॥ तद्दष्यति- अन्वयाद्व्यतिरेकाद-प्यन्वयव्यतिरेकतः॥ अपायस्योदयात्तन्नो, भिदाः पञ्च स्युरन्यया ॥ ८॥६६॥ अन्वयधर्मवत्ताज्ञानाद्व्यतिरेकेधर्मवत्ताज्ञानादुभयधर्मवत्ताज्ञानाच्चाविशेषणहीतापायस्यैव प्रवृत्तेरसद्भूतधर्मनिषेधाकलनर्माहा, तज्जन्यनिश्चयश्चापायः, परमित्युक्तेऽन्वयधर्मगवेपणजन्या धारणा न स्यात् । आह च-"कासइ तयन्नवहेरेग-मेत्तओवगमणं भवे भूए। सम्भूअसमन्नयओ,तदुभयओ कासइ ण दोसो॥१८६॥ सव्वो वि य सोवाओ, भए वा होति पंच वत्थूणि।। आहेवंचिय चउहा, मई तिहा अन्नहा होइ ॥ १८७ ॥"[कस्यचित्तदन्यव्यतिरेकमात्रतोऽवगमनं भवेद् भूते ॥ सद्भूतसमन्वयतस्तदुभयतः कस्यचिन्न दोपः॥ सर्वोऽपि च सोऽपायो भेदे वा भवन्ति पंच वस्तूनि ॥ आहेवमेव चतुर्धा मतिस्त्रिधाऽन्यथा भवति ॥ ननु स्थाणुत्व- व्याप्यवक्रकोटरादिमानयमित्यन्वयधर्मज्ञानात् स्थाणुरेवायमित्यपायोस्तु पुरुषत्वव्याप्यकरचरणाद्यभाववानयमितिव्यतिरेकधर्म- ज्ञानात्तु कथं सः, नहि तदभावोऽन्वयेन व्यतिरेकेण वा स्थाणुत्वव्याप्यो घटादौ व्यभिचारात्, न च पुरुषत्वव्यापककरायभाववत्ता- निश्चयादेव पुरुषत्वाभावज्ञानादभावप्रतिपत्तिः, व्यापकाभावज्ञाने व्याप्याभावज्ञानावश्यंभावनियमादिति वाच्यम् । एवं सत्ययं न पुरुष इत्यपायेऽपि अयं स्थाणुरेवेत्यपायाऽभावात्, न चोक्ताभावविशिष्टसाधारणधर्मवत्ताज्ञानमेव तदपायजनकमिति वाच्यम् संशय- हेतोः साधारणधर्मवत्ताज्ञानस्य तदानीमननुसरणादितिचेत्, न, एककोटिनियतधर्माभावज्ञानस्याप्यपरकोटिनिश्चायकत्वाद्, अथ- वोक्ताभावज्ञानानन्तरं पुरुषत्वाभावज्ञानात्तद्विशिष्टसाधारणधर्मवत्ताज्ञानादेवायं स्थाणुरेवेति निश्चयस्तत्र तावदालोचनरूपायाईहाया अनुभवसिद्धत्वादिति दिग्। ननु व्यतिरेकधर्मगवेषणमीहेत्यस्य व्याप्यधर्मवत्ताज्ञानमपायोऽसावित्यर्थः, तच्चान्वयेन व्यतिरेकेणा- न्वयव्यतिरेकेण वास्तु,तजन्ययथाभूतार्थज्ञानं तु धारणा इत्युक्तौ को दोपो येन स्वमतव्यावर्णनमेव भ्राजमानं भवेत्, उच्यते, व्याप्य- धर्मव्यवसिर्जायमानो निश्चयो यदि धारणाख्यामारिभृयाघदा स्मरणस्यादुरुपह्नवत्वेनावग्रह ईहाऽपायो धारणं स्मरणश्चेति मति- ज्ञानस्य पञ्च भेदाः प्रसजेयुः, एवश्चागमविरोधः, किश्चै धारणाजनकं व्याप्पधर्मपचाज्ञानमपाय एवैतीहासंशय एव स्थापधा- चोक्तदोषप्रमगः । अथ व्यतिरेकधर्मज्ञानाजायमानो निश्योऽपायोऽन्वयधर्मशानाजायमानस्तु धारणेति चेत्, न, उमयधर्म- ज्ञानाजायमानस्य निधयस्योभयरूपत्वप्रसङ्मादुक्तदोपप्रसङ्गाच्च, एतेन व्यतिरेकधर्मावगाही निश्योऽपायोऽञ्चयधर्मावगाही तु धारणेत्यपि निरस्तम् ॥ ८॥ ननु धारणा नामाऽविच्युतिस्मृतिवासनालक्षणं मतिभेदान्तरं नास्तीत्पपापविशेष एव म इति न मम भेदपश्चकप्रसद्गो व्यक्तिभेदमनात्य जातिमेदान्वेपणनिष्ठानां भवतामेव प्रत्युव मेदत्रयप्रमहा इत्यावश्फते-- अविच्युतिरपायो हि, संस्कारो ज्ञानमेव न । अन्योपायः स्मृतिस्तेन, चतुर्भेदा मतिः कथम्? ॥२॥६॥ इह तारद्घटादिके वस्तुनि अपग्रहहापायरूपतयान्तर्मुहर्चिक एवोपयोगी जायते तत्रापापोत्पश्युत्तरं उपयोगसातत्यलक्षणा चाविच्युतिर्भवद्भिः स्वीक्रियते सा ताबचावत्कालीनापायस्वरूपामातिरिच्यते नहि कालभेदेन वस्तुमेदो नाम क्षणमड्गप्रसगाद या चोपयोगोपरमे सति संख्येयमसंख्येय वा कालं वासनावतिष्ठत इत्यम्युपगम्यते सा कि वस्तुविकल्पो या स्मृतिशानावरण- कर्मक्षयोपशमो वा तज्ज्ञानजननशक्तिर्वा, नाय एतापन्तं कालं तद्वस्तुविकल्पापोगान्, नोचरी अशानरूपत्वेन तस्य मति- भेदत्वाऽसम्भवाद्, या चानुभूतस्य कालान्तरोपयोगलक्षणस्मृतिराविर्भवति साप्यन्वयधर्मेणापि निययोऽपाप एवेति स्वदम्यु- पगमादपायान्तरमेवेति अवग्रह ईहाध्यायश्चेति तिस एव मतेभिदाः सम्मवन्तीति कथं न विमागवास्याविरोधः । आह च- "काणुरोगम्मि धिई, पुणोवोगे असा ओवाओ | तो गत्य दिई । सि ॥९॥ कानुपयोगे धृतिः पुनरुपयोगे च सा यतोऽपायः ? ॥ ततो नास्ति धृतिः ॥ १८८ ॥]ति ॥ ९॥ अत्रोच्यते- अविच्युतिर्ज्ञानधारा, वासना ज्ञानकारणम् ।। स्मृतिश्चेदं तदेवेति, धीरतः किन्नु दूपणम् ॥ १० ॥ ६८॥ यत्तावदुक्तं उपयोगसातत्यलक्षणाऽविच्युतिरपायान्नातीन्यित इति, तदयुक्तम् , प्रथमापायोत्पत्त्युत्तरं क्वचिदुत्पद्यमानस्य स्थाणुरेवायं स्थाणुरेवायमित्याकारस्यान्तर्मुहूर्तमविच्युतस्य धारावाहिकापायसन्तानस्य प्रथमापायादम्याधिकलात्, न च गृहीत- ग्राहित्वादस्याप्रामाण्यं, अन्यान्यकालविशिष्टत्वेन स्पष्टस्पष्टतरस्पष्टतमभिनधर्मवासनाजनकत्वेन वा भिन्नस्यैव वस्तुनो ग्रहणा- दिति प्राचा, वस्तुतो गृहीतग्राहित्वं नाप्रमाले तन्वं, अपि तु तदभाववति तत्प्रकारकत्वम् इति न तस्याप्रामाण्यं इति दिग् ।। वासना च यद्यपि स्वतो न ज्ञानं तथाप्यपायकार्यत्वात्स्मृतिकारणत्यागोपचारतस्तस्य ज्ञानत्वं, 'इदं यस्तु तदेव, यत्मागुपलब्धं मया' इत्याकारिका स्मृतिरपि वस्तुनिश्चयमात्रफलादपायादतिरिच्यते, पूर्वापरदर्शनानुसन्धानरूपा हि सेति, तस्मादविच्युतिस्मृति- वासनालक्षणानां तिसृणामपि धारणानां व्यवस्थितत्वान्न विभागन्यायातः। आह च-"भण्गइ इदं तदेवेवि जायुद्धी ॥१८८ानणु साध्वायन्महिआ, जओ असा वासणाविसेसाओ॥जा यावायागन्तर-मपि ई मा धिई णाम ॥१८९॥"[भण्यते इदं तदेवेति या बुद्धिः॥ ननु साऽपायाम्यधिका यतथ सा वासनाविशेषात् ॥ या चापायानन्तरमविन्युतिः सा तिर्नाम] यदि चोक्तरीत्याऽपाय- विशेप एव धारणाभ्युपगम्यते स्मृतिरपिचाधिकाऽभ्युपेयते तदा भेदपकासो वनलेपायत एव । आनन-"तं इच्छंतस्स तुहं, पत्थणि य पंच, नेच्छमाणस्स ॥ किं होउ सा अभावो, मावो नाणं व तं कयरं ॥१९०॥"[ तामिच्छतस्ता वस्तूनि च पंग, नेच्छतः ॥ किं भवतु साऽभावो भावो झानं वा तत्कतरत् ] ननु भवतामपि धारणानां निरूपत्वाद्विमागानिक्रम इति ने, न, धारणात्वेन सर्वासामप्येकीकृत्य ग्रहणाद, यथा द्विरुपयारप्यवग्रहयोरवग्रहत्त्वेन ग्रहणम्, आह च-"तुम्भ (झ) बहुपरमेषा, भणइ मई होइ विश्वहुत्ताओ । माइ न जाइभेओ, इट्ठो मझ जहा तुझं ॥ १९१ ॥" [तक पहुवरभेदा भणति मतिर्मवति धृतिबहुत्वात् ॥ मण्यते न जातिमद इष्टो मम यथा तव ॥] "सा भिमलासणा विह, घिसामभेण धारणा होइ ।। जा उग्गहो दुरुबो, उग्गहसाममओ इक्को ॥ १९२॥" [सा मिमलधणापि खलु धृतिसामान्येन धारणा मवति ॥ ययाऽवग्रहो द्विरूपोऽवप्रहसामान्यत एक ] नन्वपायसन्ततिरुपाऽविच्युतिः कथं धारणेति चेत्, अपायजन्यत्वादारपामीत्पनुभवाच्च, स्मृतेरित प्रत्पमिक्षाया अपि धारणात्वात्तिमृणा धारणानां ग्रहणे न्यूनत्वमिति चेत्, न, स्मृतिपदेन तवाविषयकमानविशेषाणा- दिति दिग् ॥ १० ॥ तदेवं विप्रतिपत्तीनिराकृत्य विभागं व्यवस्थाप्य प्रागुदिष्टमवग्रहं निरूपयति- तत्र द्विधाऽवग्रहः स्याद्-व्यञ्जनार्यावलम्पनः । तत्रेन्द्रियार्यसम्पन्धो-व्यञ्जनावग्रहः स्मृतः॥११॥६९॥ तत्रावग्रहहापायादिपु मतिभेदेषु, अवग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहोवप्रहम, तत्र प्रथमोपदिष्टत्वाद् प्यजनावग्रह प्राग्निरूपणीय इत्यत आह तत्रेति, आर च-"वत्योरगहो दुस्वो, गहणं होज पंजण-रयाणं ॥वंजणओं यजमत्यो, तेणाईए तयं बुच्छं ॥१९३॥ तत्रावग्रहो द्विरूपो ग्रहणं यद् भवति व्यञ्जनायोव्यञ्जनतब यदर्थस्तेनादौ वकं वक्ष्ये ॥] इन्द्रियार्थ- सम्बन्ध इति तत्समयभावीवि तात्पर्याय:, योगार्यमाह-स्वयं व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनं, कदम्पसमगौल- कधान्यमसरकाहलापुरप्राकारमांसगोलकरूपाणामन्तर्निचीन्द्रियाणा अन्दादिविषयपरिच्छेदहेतशक्तिविशेषलक्षणमुपकरणेन्द्रिय शम्दादिपरिणतद्रष्यनिकरम्बम्, तदुमयसम्बन्धश्व, ततम व्यञ्जनेनेन्द्रियेण व्यञ्जनस्यार्थस्य तत्सम्बन्धस्य वाऽवग्रहो व्यम्जना- Newer वग्रह इति मध्यमपदलोपेन समास आश्रयणीया,अर्थभेदेऽपि पदसारूप्येणेकशैपाश्रयणाद्,एकशेषेण व्यञ्जनानामवग्रह इत्यपि स्पाद ॥ आह च “जिबइ जेणत्यो,घडोव्य दीवेण वंजणं तं चा| उवगरगिंदियसदाइ-परिणयहव्यसम्बन्धो ॥ १९४ ॥" [न्यज्यते येनार्थो घट इव दीपेन व्यञ्जनं वच|| उपकरणेन्द्रियशन्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्धः। नन्वयं व्यञ्जनावग्रहो न झानमित्यत आह- स तदन्ते ज्ञानभावा-दव्यक्तं ज्ञानमिष्यते(ताम्)||अन्यथा प्रागलाभं त-दन्तेऽपि न जनुर्लभेत् ॥१२॥७०॥ व्यञ्जनावग्रहसमयो ज्ञानवान्, ज्ञानोत्पत्तिघटकान्त्यसमयशालित्वात्, यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो शानवान्, यथा ईहायसमयः,इत्यनुमानाद् व्यञ्जनावग्रहस्य ज्ञानत्वसिद्धिः । आह च-"यनाणं सो बहिरा-एणं व तफालमणुवलंभाओ ॥ ण,तदंते तत्तोच्चिय, उवलंमाओ तओनाणं ॥१९५॥ [अज्ञानं स वषिरादीनां वा तत्कालमनुपलम्मात् ।। न, तदन्ते तत एवोपलम्मात्म ज्ञानम्] ननु यदि व्यञ्जनाऽवग्रहो ज्ञानं तर्हि घिरादीनामपि शब्दादिशानापत्तिस्तरकालेऽपि तदुपलम्मापनिवेतिचेवान,यधिरादीनांन्यजन- व्यञ्जनपूर्तिघटकशक्त्यभावादव्यक्तत्वेन तदनुपलम्मसम्मवाच, आह च-"कालम्मि वि नाणं, तत्यत्थितणुं तितो तमव्यत्तं ॥ पहिराईणं पुण सो, अन्नाणं न्दुभयामावा ॥ १९६ ॥" [ तत्कालेऽपि ज्ञानं तयास्ति तनु इत्यतस्तदन्यक्तम् ।। रधिरादीनां पुनः सोऽज्ञानं तदुमयाभावात् ॥] एतेन 'यदन्त्यसमये ज्ञानमुत्पद्यते स कालो ज्ञानवानिति न व्याप्तिः, अनग्रहप्राकाले व्यभि- चाराद्'इति निरस्तं, ज्ञानसामग्रीसम्पन्नत्वस्य हेतु विशेषणत्वाद् , अत एव सर्वेषु अन्दादिद्रव्यसग्यम्भसमयेपुझानमस्ति मानोपकारि- शब्दादिद्रव्यसम्बन्धसमयसमुदायैकदेशत्वादविग्रहसमयवदित्यपि प्रयोगः,यदि न कारणसाम्राज्पेऽपि प्रान्समयेषु ज्ञानोत्पत्तिर्न स्यात्तन्त्यिसमयेऽपि न स्यादविशेषाद्, आह च-" जइ वऽमाणमसंसब-समयसदाइदचसम्भावे ॥ किह गरिमसमयसबार- दवविणाणसामत्थं ॥ २००॥" [यदि वाज्ञानमसंख्येयसमयशम्दादिद्रव्यसमा । कथं चरमसमयशब्दादिद्रव्यविज्ञान- सामर्थ्यम्॥] “जसबहा ण वीसुं, सव्येसु पितं न रेणुतेल्लं च ।। पयमणिच्छतो, कहमिच्छसि समुदये नाणं ॥२०१॥"[पत्सर्वथा न विष्वक्सर्वेष्वपि तन्न रेणुतलामव । प्रत्येकमनिच्छन्कथमिच्छसि समुदये ज्ञानम् ।।] ननु समुदायनिप्पीडनमा न तैलजनकं येन सिकतासमुदायनिप्पीडनानैलानुभवदर्शनेन प्रत्येकशक्त्यमावः समुदायशक्त्यभावे प्रयोजकः स्यात्, किन्तु तिलसमुदाय- निप्पीडनमेर तन्जनकमिति विपमो दृष्टान्ता, अन्पथा दण्डचक्रादिसमुदाये घटोद्भवदर्शनादण्डादिप्रत्येकसत्वेऽपि सूक्ष्मपटोत्पत्ति- प्रसङ्गादिति चेत्,न,कारणसमुदाधीनसाकल्पशालिनि कार्ये देशस्य देशोपकारितायामेतदृष्टान्ताभिधानस्य न्याय्यत्वाद्।अत एवाह-" समुदाये जइ नाणं, देशणे समुदये कई णत्थिी । समुदाए वाऽभूयं, कह देसे होन त सयलं ॥२०२॥"[समुदाये पदि शान, देशोने समुदये कथं नास्ति ॥समुदाये वाऽभूतं, कथं देशे भवेत् तत्सकलम् १॥] "तू पडोश्यारी, ण समत्तपडोय- समुदिआ ते उ । सबे समत्ताडो तह नाणं सबसमएसु ॥२०॥"[ तन्तुः पटोपकारी, न समस्तपटश्च समुदितास्ते तु ॥ सर्वे समस्तपटकस्तथा ज्ञानं सर्वसमयेषु ।। ] ननु सहस्रतन्तुकपटादौ सहस्रतन्तूनां तत्संपोगानाच हेतुत्वाव, द्वितन्तुकपटादौ च तन्तुद्वपसंयोगादीनां हेतुत्वादस्तु तत्र खण्डपटोत्पचिक्रमेणाखण्डपटोत्पत्तिा, अत्र तु ज्ञानस्य निरवपयत्वात्कथं खण्डज्ञानो- पत्तिक्रमणासण्डज्ञानोत्पत्तिरिति चेत्, न, असङ्ख्यातसमयनिष्पाये सांशे महति शानेऽसख्यातानामंशाना हेतुत्वाद्, अत एवं महज्ज्ञानमेवाभिव्यज्यते महत्तेजोवम त महममेकतेजोजपवदिति व्यसनावग्रहस्य सूक्ष्मत्वं ज्ञानान्तराणां च महत्त्वमुपपद्यते, नन्वन्यक्तं शानं दृष्टविरुद्धमिवि चेद, न, सुप्तमत्तादिसूक्ष्मयोपस्याऽध्यक्तस्य दृष्टवाद, झानं विना सापावस्थायां पचनचेष्टा- FREE धनुपपत्तेः, अन्यथा काष्ठादीनामपि तत्प्रसङ्गाद, आह च-"कहमव्वत्तं नाणं, च सुत्तमत्ताइसुहुमबोहु व्य ॥ सुत्तादओ सयं चि य, विनाणं नावबुझंति ।। १९७ ॥" [ कथमव्यक्तं ज्ञानं च, सुप्तमत्तादिसूक्ष्मबोध इव ॥ सुप्तादयः स्वयमपि च, विज्ञानं नावयुद्धथन्ते ] "लक्खिन्नइ तं सिमिणा-यमाणवयणदाणाइचेट्ठाहिं ॥ ज नाऽमइपुवाओ, विज्जते वयणचेट्टाओ॥ १९८ ॥ [लक्ष्यते तत्स्वमायमानवचनदानादिचेष्टाभ्यः ॥ यद् नाऽमतिपूर्वा विद्यन्ते व वनचेष्टाः] ॥ ननु सुप्ते स्वीयं चेष्टितं कुतो न स्वस्य ज्ञानगोचर इति चेद् , ज्ञानावरणवैचित्र्यात्, नहि जाग्रतापि सर्वस्वीयं चेष्टितं ज्ञायते, मुहूर्तेनाप्यसंख्याताध्यवसायोल्लङ्घनाद् कस्यचिदेव कदाचिदेव वा तदभिव्यक्तः, आह च-"जग्गंतो वि न याणइ, छउमत्थो हिअयगोरं सव्यं ॥ जं तझवसाणाई, जमसंखेनाई. दिवसेग ॥ १९९॥ [जाग्रदपि न जानाति, छद्मस्थो हृदयगोचरं सर्वम् ॥ यत्तदध्यवसानानि यदसंख्ये यानि दिवसेन] एवञ्च यथाऽध्यवसायस्थानान्यसंख्येयानि सूक्ष्माण्यपि केवलिदृष्टतया श्रद्धेयानि तथा व्यञ्जनावग्रहज्ञानमपीति भावः ॥ १२ ॥ अथ व्यञ्जनावग्रहतत्वं निरूप्य तद्भेदानिरूपयति- स चतुर्धा भवेच्चक्षु-मनोवर्जेन्द्रियोद्भवः ॥ उपघातानुग्रहाभ्यां प्राप्यकारीणि तानि यत् ॥१३॥ ७१ ॥ स चव्यञ्जनावग्रहश्चतुर्विधोघाणरसनश्रोत्रत्वग्लक्षगन्द्रियभेदात्, नन्वेतेपामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहो नतु नयनमनसोरित्य- व किं प्रमाणमिति चेत्, तेषां कर्कशकम्बलादिस्पर्शने त्रिकटुकाद्यास्वादने अशुच्यादिपुद्गलाघ्राणे भेर्यादिशब्दश्रवणे चोपघातदर्शना- व चन्दनद्रवादिस्पर्श क्षीरशर्कराद्यास्वादने कर्पूरपुद्गलाद्याघ्राणे मृदुमन्त्रशब्दाद्याकर्णने चानुग्रहदर्शनात्प्राप्यकारिवासिद्धेः,नयनम- नसोस्तु जलज्वलनायवग्रहेणानुग्रहोपघातादर्शनादतथात्वाद्, आह च-"नयणमणोवजिदिअ-भेआओ वंजणोग्गहो चउहा।।उवधा- - man यायुग्गहओ, जंताई पत्तकारीणि॥२०४॥"[नयनमनोवर्जेन्द्रियमेदादयचनावग्रहश्चतुर्धा।उपधातानुग्रहतो यत्तानि प्राप्यकारीणि] नन्वनुग्रहोपघाती यदि सुसद सविशेषौ न नहिं नौ प्राप्यकारित्वलिङ्गे यदि तु विषयेन्द्रियसंयोगकार्यविशेषौ तदा ताभ्यां प्राणादी.. ना स्वतभूतं प्राप्तिमात्रं सिध्यतु न तु प्राप्यकारित्वं,तादि वस्तु प्राप्यैव ज्ञानजनकत्वमिति चेत्न, भोप्रादीनां प्राप्यकारित्वानु- माने नयनमनसोयाप्राप्यकरित्वानुमानेऽनुग्रहोपयातव्यावर्णनस्य विपक्षबाधकतर्वप्रदर्शनार्थत्वात, एवश्च श्रोत्रादीनि प्राप्पका- शणि नयनमनोभिनेन्द्रियत्वाद् व्यतिरेक नयनमनोपदित्यनुमानमायवदातमितिदिग।।१३॥श्रोत्रप्राणयोरप्राप्यकारित्वं निराकुरुते- दूरार्थग्रहणाच्छोत्र-प्राणे अप्राप्यकारिणी ॥ स्यातां न ते शब्दगन्धौ,यदि प्राप्नुवतः स्वयम् ॥१॥७२॥ थोत्रमाणे अप्राप्यकारिणी असम्बद्धार्थग्राहकरवान्, न चायमसिद्धो हेतुः, द्रस्थस्यापि भेर्यादिशब्दस्य श्रवणाद् दूरस्थस्पैव कुसुमादेः परिमलग्रहणाच्च, न चानान्यतरकर्मणोभयकर्मणा वेन्द्रियविषययोः संयोगोऽनुभूयत इति केचिदाहुः । आह च- "जुन्जइ पतविसयया, फरिसणरसणे ण सोत्तयाणे मु॥ गिण्डंति सविसयमिओ, जं ताई मिनदेसंपि॥२०५॥"[पुज्यते प्राप्तविषयता स्पर्शनरसनयोर्न श्रोत्रघाणयोः । गृहीतः स्वविपयमितो यत्ते मिनदेशमपि] तदिदं तदा पुज्येत यदि शन्दगन्धयोः स्वकर्मणेन्द्रिय- प्राप्तिन स्यात्, तथा च दूरस्थावपि तौ तत्रागत्यैव ज्ञानं जनयत इति न किश्चिदनुपपनम् ॥ उक्तं च-"पावंति सहगंधा, ताई गंतुं सयं न गिण्इंति" ॥२०६॥ [ प्राप्नुतः शन्दगन्धौ, ते गत्वा स्वयं न गृणीतः ति॥१॥ तयोः सक्रियत्वे प्रमाणमाह- सक्रियौ तौ संहरणाद, वायुना वहनादपि ॥ द्वारानुपाताच्छैलादि-प्रतिघातात्समूर्तिको ॥ १५ ॥७३॥ संहरणाद् गृ(गोहादिषु पिण्डीमावाद, वहनादपि वायुना नयनात, तौ(शब्दगन्धौ)सक्रियो समूर्तिको धूमवदि.
शेषेण, द्वारानुपाताद्वा जलवद् वेगवद्विरलद्रव्यस्य पवनाभिमुखमैव प्रसर्पणादनयोः प्रायो द्वारानुधावनमिति बोध्यं, पर्वतादिषु प्रतिस्खलनाद् वा तौ तथा पाषाणवद्, आह च-जं ते पोग्गलमइआ, सक्किरिया वाउवहणाओ ॥ २०६ ॥ धूमोव्व संहरणओ, दाराणुविहाणओ विसेसेणं ॥ तोयं व णितवाइसु, पडिघायाओ य वाउब्व ॥ २०७॥" [ यत्तौ पुद्गलमयौ सक्रियौ वायुवहनात् ॥ धूम इव संहरणतः द्वारानुविधानतो विशेषेण ॥ तोयमिव नितम्बादिषु, प्रतिघाताच्च वायुरिव ॥] ननु पवनोपनीतगन्धवद्व्याणां घ्राणेन सह संयोगोऽस्तु शब्दस्त्वाकाशगुण इति न श्रोत्रेण तस्य संयोगः प्रत्यासत्तिः किं तु श्रोत्रस्य कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नाकाशरूपत्वाच्छब्दस्य च तद्गुणत्वात्समवाय एव, गतिस्तु तत्र पवनगतैवारोप्यते न तु स्वाभाविकी, स्वाभाविकगतेरन्यगत्यनुविधानानुपपत्तरिति चेत्, न, प्रतिघातजनकत्वेन तस्य द्रव्यत्वसिद्धेः, न च तीव्रतरपवमानस्यैव प्रति- घातजनकत्वं न तु शब्दस्येति वाच्यम्, भेर्यादिशब्दजनकपवनसदृशपवनान्तरेणापि बाधिर्याधुदयप्रसङ्गात्, अपि च श्रोत्रमपि नाकाशं बाधिर्याद्यभावप्रसङ्गारिकन्तु मूर्तमेवन्द्रियमिति न तस्य शब्दो गुणः॥ किञ्च शब्दस्याकाशगुणत्वे सर्वस्य सर्वशब्दग्रह- णापत्तिः श्रोत्रसमवायाविशेषात, तत्पुरुषीयकर्णशष्कुल्यवच्छिन्नसमवायसम्बन्धावच्छिन्नाधारतायास्तत्पुरुषीयशन्दग्रहं प्रति हेतुत्व- कल्पने महागौरवात्, द्रव्यत्वे तु संयोगेनैव श्रोत्रेण ग्रहणोपपत्तौ न किञ्चिदनुपपन्नं, एवं च शब्दस्य द्रव्यत्वे समवायसमवेतसम- वायप्रत्यासत्यकल्पनया लाघवं द्रष्टव्यं, शब्दस्य मूर्त्तत्वे तत्साक्षात्कारो न स्याद्विषयतया मूर्तप्रत्यक्षत्वावच्छि प्रति समवाये- नोद्भूतरूपवत्वस्य हेतुत्वादिति चेत्, न, द्रव्यप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति योग्यताविशेषस्यैव हेतुत्वात्स चव्यावृत्तिविशेषः शक्तिविशेषो वेत्यन्यदेतव, श्रोत्रेन्द्रियव्यवस्थापकत्वेन शब्दस्याम्बरगुणत्वसिद्धिरिति तु मन्दं, इन्द्रियान्तराग्राह्यग्राहकत्वस्यैव भिमोन्द्रियत्वव्या. MAMA . प्यत्वात्, तत्र गुणप्रवेशस्य गौरवकरत्वात्, एतेन श्रोत्रेन्द्रियं द्रव्याग्राहक रूपस्पर्शाग्राहकाहिरिन्द्रियत्वाद् रसनपद्' इत्यपि निरस्त, अप्रयोजकत्वाद् द्रव्यग्रहप्रयोजकत्यासत्यभिधानेन तद्विरहरूपरिपक्षवाकतानुत्थानात् । इत्थं च शब्दो न पौद्ग- लिका स्पर्शशून्याश्रयत्वाद्, अतिनिश्डिप्रदेशप्रवेशनिर्गमयोरप्रतिपातात, पूर्व पश्चाद्दा(चा)अयमानुपलब्धः, सूक्ष्ममूर्तान्तराप्रेरक- त्वाद्, गैगनगुणत्वाचेति हेतो निरस्ता वेदितव्याः, भाषार्गणादेस्तदाश्रयस्य स्पर्शगन स्पर्शशुपाश्रयत्वस्पासिद्धे,भि- प्यादिकमुपमिद्य प्रसर्पिणा मृगमदादिद्रव्येण द्वितीयस्याऽनै कान्तिकस्यात्, तृतीय चतुर्थयोयोलकादिना धूमादिना च तथात्वात पश्चमासिद्धतापास्तु प्रदर्शितन्यात्, उन्खलनपापिकास्तु " निमित्तपवनस्यैव गुणः शब्दा, अत एव निमित्चपवनना शातमाशा, समवायिकारणनाशस्य समतिकार्यनाशं प्रति हेतुत्वाद, कर्णसंयुक्तनिमिचपरनसमरायाय तद्ग्रहा, न च वीगा: वेणुमृदङ्गादेरेव कुतो नापं गुण इति वाच्यं, वेपो अननुगतत्वात, निमितपयनस्यैवानुगतत्वेन समवायिकारणत्वौचित्याद, तेषां निमित्तकारणत्वे क्लुप्तेऽपि समवायिकारणत्वाकल्पनात्सम्बन्धभेदेन कारणताभेदाद्" इत्याहुा, तदसन् , पवनगुणत्वे शन्दस्य तत्स्पर्शस्पेन स्पार्शनप्रसगाव, तस्य स्पार्शनप्रतिवन्ध कत्वकल्पने च महागौरवात, शब्दगुणस्पार्शनजनकतावच्छेदकजात्यमावा भ दोप इति चेत्, न, तादृशजातेरसिद्ध, गुपचापजनमतारच्छेदिया सायर्यादिति दिग। अधिकं स्याद्वादरहस्पेऽनुसन्धेयम् ।। तस्माच्छो त्रयाण अपि प्राप्यकारिणी इति व्यवस्थितम्।। आह च-"गण्हति पचमत्थं, उपायाणुहोरलद्धी भो याहिजपणासा- रिसादो कहमसंवदे ॥२०॥" [गृगीतः प्राप्तम उपयातानुग्रहोपलब्धः । वाधिपतिनासार्शश्रादयः कथमसम्म ॥१५॥ तदेवं नयनमनोवर्जेन्द्रियाणां प्राप्यमारित्वं व्यवस्थापितम् । अपनपनमनमानाप्पकारित्यस्प व्यवस्थापनीपतपा मनो- दृष्टान्तेन तावचक्षुपोऽप्राप्यकारित्वं व्यवस्थापयति- अप्राप्यकार्यधिष्ठाना-सम्बद्धग्राहि लोचनम् ॥ अनुग्रहोपघाताभ्यां, विषयाद् भाव्यमन्यया ॥१६॥७४॥ चक्षुरप्राप्यकारि अधिष्ठानासम्बध्धार्थग्राहकेन्द्रियत्वाद्, मनोवद्, अधिष्ठानेत्यादिविशेषणेन स्पर्शनादाविन्द्रियपददानेन च प्रदीपप्रभायां व्यभिचारः परिहतः, न चाप्रयोजक सम्बद्धार्थग्राहकत्वे तस्य करवालजलावलोकनादिनोपघातानुग्रहप्रसङ्गात्, न चासिद्ध एव तस्योपघातानुग्रहाभावो भूयो भूयः सूरकरावलोकनेन जलावलोकनेन च दाहशैत्यलक्षणतदर्शनादिति वाच्यम्, अव- लोकनानन्तरं चक्षुर्देशं प्राप्तेन मूर्तेन रविकरादिनोपघातस्य सम्भवाजलावलोकनादौ चोपघाताभावेनानुग्रहाभिमानात् स्वतस्तद्देशं प्राप्तेन च चन्द्रमरीचिनीलादिनाऽनुग्रहोऽपि भवत्येव, यदि च चक्षुः स्वत एवानुग्राहकोपघातकवस्तुनी संसृज्यानुग्रहोपघातौ लभेत तर्हि सूरकरावलोकनादिव करवालावलोकनादप्यभिघातः स्यात्, तदिदमाह-"लोअणमपत्तविसयं, मणोव्व जमणुग्गहाइसुन्नंति॥ जलसूरालोआइसु, दीसन्ति अणुग्गहविघाया ॥२०९॥ उज्झेज पाविउ रवि-कराइणा फरिसणं व को दोसो ॥ मनेज अणुग्गहं पिवु-वघायाभावओ सोम्मं ॥२१०॥ गंतुं ण स्वदेस, पासइ पत्तं सयं व णियमोयं ॥ पत्तेग उ मुत्तिमया, उवधायाणुग्गहा होज्जा ॥२११॥" [लोचनमप्राप्तविपयं, मन इस यदनुग्रहादिशून्यमिति ॥ जलसूरालोकादिपु दृश्यते अनुग्रहविधातौ ॥ दह्येत प्राप्य रविकरादिना स्पर्शनमिव को दोपः ॥ मन्येतानुग्रहमियोपघाताभावतः सौम्य!॥ गत्वा न रूपदेशं, पश्यति प्राप्तं स्वयं वा नियमोयं ॥ प्राप्तेन तु मूर्तिमतोपघातानुग्रहौ भवेताम् ॥॥१६॥ननु नयनान्नायना रश्मयो निर्गत्य प्राप्य च वस्तु रविरश्मय इव प्रकाशमादधति सूक्ष्मत्वेन तैजसत्वेन च तेषां वन्यादिभिर्दाहादयो न भविष्यन्तीति चत्, न, चक्षुपस्तैजसत्वस्यैवासिद्धेः, तथाहि- अष्टकल्पनापत्ति-स्तैजसत्वे हि चक्षुषः। न च तत्साधकं किश्चिद्-बलवन्मानमीक्ष्यते ॥ १७ ॥७५ ॥ चक्षुपस्तैजसत्वकल्पनेऽनुभूतरूपानुभूतस्पर्शतेजोन्तरं कल्पनीयमित्यदृष्टकल्पनापत्तिः परमते, न च तत्तैजसत्यसाधकं मिचिदलवत्प्रमाणमीक्षामहे, मन चक्षुसैजसं स्पादिपु मध्ये रूपस्यैवाभिव्यञ्जकत्वात्प्रदीपवदित्यनुमानातत्सिद्धिः, स्वस्पर्शव्य- अकत्वेन प्रदीपदृष्टान्तस्य साधनवकल्याद्विषयेन्द्रियसंयोगनानकान्तिकत्वाद्, द्रव्यत्वे सतीति विशेषणेऽप्यअनविशेपणानेकान्ति- करवाय, एतेन "रूपसाक्षात्कारामाधारणकारणं जसं रसाच्यञ्जकत्वे सति स्फटिकावन्तरितप्रकाशकत्वात्प्रदीपवद्" इत्यपि निरस्तम् ।। अअनादिमिन्नत्वे मतीति विशेषणदाने चाप्रयोजकत्वाचनःप्रदीपयोरेकया जात्या व्यकत्वासिद्धेः। एतेन "स्वप्नादिकमिवाअनादिकं सहकृत्य मनसैर साक्षात्कृते निघ्यादौ चाक्षुपत्वभ्रम एवत्युक्तावपि न शतिः॥ किं चैवंतवाअनादेः पृथम्प्रमाणत्वापत्तिः, मनो पदसाधारण सहकार्यासाप रहिर्गोचर प्रमां जनयति तस्य प्रमाणान्तरत्वनियमात्, न च पटपटलाच्छन्नचक्षुपामअनादिजनितो निष्पादिमाधात्यारो न अमेत्युक्तियुक्तिमहा, यथार्थप्रवृत्तिजनकत्वेन तत्प्रमात्वस्य व्यवस्थितत्वात्, न च कारणपाधादप्रमात्वं, तस्यै- वामिदा नपस्वप्नादिवदअनादेनिध्यादिश्चकत्वमेवेति युक्तं व्याप्तिग्रहादिकं विनाऽनुमिविरूपतत्यूचनाऽसम्भवात्, स्वभादिस्यले तु प्यातिप्राइकस्वमभावापनुमरणनियमादिति दिग् । ननु चतुर्यदिन प्राप्यकारि तदाऽसग्निहितत्वाविशेषात्कुट्यादिव्यवहितस्यापि प्रहणप्रसरण इति चेत, न, अतिमविहितस्प गोलकादेवि मित्यादिव्यवहितस्यापि योग्यतामाादेवाग्रहात् । नन्यप्रावच्छेदे- नैव चक्षुःसंयोगस्य ग्राहकत्वाप मूलावच्छेदेन तत्संयुक्तगोलकादिग्रहप्रसङ्गः । युट्यादिव्यवहिताना स्वरूपयोग्यता च स्थैर्यपक्षे न परावत, पणिकलपधेऽप्यप्रत्यासनानां सहकारिणो नातिशयजनकत्वं, प्रत्यासत्तिश्च परेषां निरन्तरोत्पादा, अस्माकं तु संयो- गः,तदुभयमपि कृष्णसारस्यार्थेन न सम्भवतीति चेत्, न, शक्तिप्रत्यासत्त्यैवातिशयाधानाल्लोहाकर्षकायस्कान्तादावतिरिक्तप्रत्या- सत्त्यदर्शनात्सामीप्यविशेषस्य तत्र सम्बन्धत्वे चात्रापि तेनैवोपपत्तेः । युक्तं चैतत्, संयोगादिनानाप्रत्यासत्यकल्पनलाघवात्, न चवमप्राप्यकारित्वभङ्गः, चक्षुःसंयोगस्य चाक्षुपाजनकत्वेनैव तदुपपत्तेः। वस्तुतः सन्निहितविषयग्रहे व्यवधानाभावकूट एव विषयनिष्ठा योग्यता व्यवहितविपयग्रहे चाञ्जनादिनिष्ठैव शक्तिलक्षणा योग्यता हेतुः, विपयपुरुषादिभेदेन तद्वैचित्र्यात् । अत एवास्मदादीनामालोकापेक्षयैव विषयग्रहः पेचकादीनां तु न तथेत्युपपद्यते । इत्थं चाव्यवहितचाक्षुषसाक्षात्कारे चक्षुर्व्यवधाना- भावादीनां व्यवहितचाक्षुषे च चक्षुरजनादीनां विलक्षणशक्तिमत्त्वेन हेतुत्वान किञ्चिदनुपपन्नम्,भित्त्यादेश्चक्षुःसंयोगप्रतिबन्धकत्वेतु स्फटिकादीनामपि तथात्वप्रसङ्गात्तद्व्यवहितानामप्यनुपलब्धिप्रसङ्गः। प्रसादस्वभाववतां स्फटिकादीनां न नायनरश्मिगति- प्रतिवन्धकत्वमिति चेत्, तर्हि भित्त्यादीनां चक्षुःप्राप्तिप्रतिवन्धकत्वापेक्षया लाघवाचाक्षुपप्रतिबन्धकत्वमेव कल्प्यताम् । स्वप्राची- स्थपुरुषसाक्षात्कारे स्वप्रतीचीवृत्तित्वसम्बन्धन भित्त्यादीनां तत्त्वसम्भवात् । यदि च तत्तक्रियातत्तदुत्तरदेशादीनामेव संयोग- नियामकत्वेनानतिप्रसङ्गाद्भित्त्यादीनां न प्रतिवन्धकत्वमिति विभाव्यते तदा 'तद्धेतो.' (तद्धतोरेव तदस्तु किं तेन) इति न्यायेन लाघवात्तत्तन्नयनोन्मीलनस्यैव तत्तच्चाक्षुपहेतुत्वमस्तु किमनन्तसंयोगादिकल्पनया, इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वकल्पनात्फल- मुखं गौरवं न दोषायेति चेत्, न, इन्द्रियसम्बन्धत्वस्यैकस्याभावेन तथाहेतुताया एवासिद्धः । तथापि द्रव्यचाक्षुपत्वाद्यवच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयोगत्वादिना हेतुत्वमनुगतमेवातंदुक्तं-मणिकृता 'प्रत्यक्षविक्षेपे इन्द्रियार्थसन्निकर्षविशेपो देतुरनुगत एवेति' इति चेत्, न, परमाण्वाकाशादौ व्यभिचारान् । न च महत्त्वसमानाधिकरणोद्भूतरूपवत्त्वस्यापि सहकारित्वान्न दोष इति वाच्यम्: समा- कलितसकलनेत्रगोलकस्य दूरासन्नतिमिररोगावयविन उपलम्भप्रसङ्गान, आह च-"जइ पत्तं गेण्हेज उ, तग्गयमंजणरओमलाईयं ।। पेच्छज्ज जंन पासइ, अपत्तकारि तओचखं ॥२१२॥" [यादे प्राप्तं गृह्णीयाचद्गतमजनरजोमलादिकम् ।। प्रेक्षेत यन्न पश्पति, अप्राप्तकारि ततश्चक्षुः ।। ] अत्यन्तासत्यभावस्यापि सहकारित्वे चाधिष्ठानसंयुक्ताञ्जनशलाकाया अप्यप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, अग्रा- वच्छेदेन चक्षुःसंयोगस्य हेतुत्वेऽप्युदीची प्रति व्यापारिवनेत्रस्य काञ्चनाचलोपलम्भप्रसङ्गाद, दूरत्वेन नेत्रगतिप्रतिवन्धे च शशघरस्याप्यनवलोकनप्रसङ्गात् । तदभीषुभिरिव तिग्मकरामापुभिरपि तदभिवृद्धवाविशेषात्, तिग्मत्वेन तिग्मकररश्मीनां तत्प्रति- घातकत्वे च तदालोकपरिकलितपदार्थमात्राभानप्रसङ्गादिति रत्नप्रभाचार्यप्रभृतयः(रत्नाकरावतारिकाद्वितीयपरि० सूत्र ५) इन्द्रियसम्बन्धत्वेन प्रत्यक्षहेतुत्वेऽपि सामीप्यविशेषेण संयोगस्यान्यथासिद्धिरित्यपि युक्तमुत्पश्यामः ॥ प्राप्यकारित्वे च चक्षुषः शाखाचन्द्रमसोयुगपद्ग्रहानुपपत्तिः, युगपदुभयसंयोगाभावात् । न च शतपत्रशुचविधव्यतिकरण तत्र यौगपद्याभिमा- न एव क्रमेणैव वेगाविशयादुभयसंयोगेनोभयसाक्षात्कारजननादिति वाच्यम्,चन्द्रज्ञानानुव्यवसायसमये शाखाज्ञानस्य नष्टत्वेन शा- खाचन्द्रौ साक्षात्करोमीत्यनुव्यवसायानुपपत्तेः, न च क्रमिकतदुभयानुभवजानतसंस्काराभ्यां जनितायां समूहालम्बनस्मृताववानुभ- वृत्त्वारोपाव तथानुव्यवसाय इति साम्प्रतम्, तादृगारोपादिकल्पनायां महागौरवात् । न च विर्यग्भागावस्थितयोः शाखाचन्द्रमसो- युगपत्संयोग इति साम्प्रतम्, सनिहितव्यवहितयोयुगपत्संयोगेऽतिप्रसद्गात् । नयनान्निासरता नायनेन तेजसायसंसर्गसमकाल- मेव बाप्यालोकसहकारेणान्यचक्षुरारम्भाच्छाखाचन्द्रमसोर्युगपद्ग्रह इत्यपि तुच्छम् उद्धृतरूपवतेजासंसर्गेणानुद्भूतरूपवत्तेबस आरम्भानम्युपगमावायचक्षुषा पृष्ठावास्थितवस्तुग्रहप्रसङ्गाच्चेत्यधिकंमत्कृतस्याद्वादरहस्यादवसयम् (न्यायालोकादुघृतम्) द्धृतम्)। किञ्च मनोऽप्राप्यकार्यपि प्रतिनियतस्यैव ग्राहकम्,ननु मनसोऽपि सर्वग्राहकत्वप्रसङ्गतो नाप्राप्यकारित्वं किन्तु प्रतिनियतग्रा- हित्वेन] तत्प्राप्यकारि स्यादिति चक्षुपोऽप्राप्यकारित्वसाधने दृष्टान्तीकृतस्य मनसः साध्यसाधनोभयकैल्यमिति चेत्, न, ज्ञेयसम्पर्क कृतानुग्रहोपघातलक्षणलिङ्गाभावेन तस्य तत्सम्पर्कासिद्धेः,अन्यथा जलज्वलनादिचिन्तया तस्य क्लेददाहादिप्रसङ्गः, अमुकत्र गतं मे मन इति प्रयोगस्य च गत्यर्थानां धातूनां ज्ञानार्थत्वेनैतदर्थग्रहणाय व्याप्तं मे मन इत्यर्थः ॥ आह च-"गंतुं नेएण मणो, संव- ज्झइ जग्गओ व सिमिणे वा ॥ सिद्धमिदं लोअंमिवि, अमुगत्थगओमणो मित्ति ॥२१३॥"[गत्वा ज्ञेयेन मनः, सम्बध्यते जाग्रतो वा स्वमे वा ॥ सिद्धमिदं लोकेऽपि अमुकत्रगतं मनो मे इति॥] "नाणुग्गहोवधाया-भावाओ लोअणं व, सो इहरा ॥ तोयजलणाइचिंतण- काले जुजेज दोहिंपि।।२१४॥ नानुग्रहोपघाताभावालोचनमिव तदितरथा। तोयज्वलनादिचिन्तनकाले युज्येत द्वाभ्यामपि]॥१७॥ किञ्च भावमनो द्रव्यमनो वा बहिर्गत्वा ज्ञेयेन सम्बध्यत इति विकल्प्य दोपमाह- किञ्च भावमनो गच्छेद-बहिर्द्रव्यमनोऽथवा ॥ नाद्यः शरीरवृत्तित्वा-दात्मनोऽनिर्गमाद बहिना२५॥*८३|| उक्तविकल्पद्वये हि प्रथमविकल्पो न प्रथते भावमनसाश्चिन्ताज्ञानपरिणामरूपस्य जीवानन्यत्वाज्जीवस्य च शरीरमात्रवृत्तित्वेन तद्रूपादीनामिव बहिर्निर्गमासम्भवाद्,आहच-"दव्वं भावमणो वा, वएज्ज जीवो अ होइ भावमणो। देहब्यावित्तगओ, न देहबाहिं तो जुत्तो।।२१५॥"[द्रव्यं भावमनोवा बजेज्जीवश्च भवति भावमनः॥देहव्यापित्वान्न देहबहिस्ततो युक्तः ॥२५॥ नन्वात्मनः शरीरव्यापित्वमेवासिद्ध सर्वगतत्वादिति चेद्, उच्यते-[*प्रतावस्येह द्वे पत्रे सप्तगाथाश्च गता इति लिखित्गकपरावृत्तिश्च कृता] कर्तृत्वं व्योमवन्न स्यात्-सर्वगत्वे किलात्मनः ॥ .प्रकृतेरेव कर्तृत्वं, युज्यते न कथञ्चन ॥२६ ॥६॥ PES आत्मनः सर्वगतत्वे साकाशवम् कर्तृत्वभोक्तृत्वादिकं न स्यात्सर्वगतत्वस्याक्र्तृत्वादिव्याप्तत्वाद्, आच-सव्वगओ ति य बुद्धी, कत्ताभावाइदोसओ तम्रो ॥२१६ । सर्वगत इति च बुद्धिकर्षभावादिदोषतस्तन]। अत्र सांख्याः सनिरन्ते-कूटस्थ- नित्यत्त्वध्रुवरात्मा तावदकारणमकार्य च, कारणत्वेऽपि तस्यानित्यकार्यपरिणामित्वेनानित्यत्वप्रसङ्गाद्, अत एव जन्यधर्मानाश्रयत्वं कूटस्थपदार्थो गीयते । तदुक्तं-"न प्रकृतिर्न विवृतिः पुरुष"इति, आदिकारणं च प्रकृविरेवातिदुक्तं-"मूलप्रकृतिरविकृतिरिति" अचेतनत्वेन चेयं परिणामिनी ततो महदहकोन्द्रियतन्मात्रमहाभूतानां सर्गः, न च पुस्पार्थप्रयोजकत्वात्प्रकृतिपरिणामस्य वदनुगुणशब्दादिपरिणाम एवास्तु किमान्तशीलकमहदादितत्वेनेति वाच्यम्, तत्सर्गस्य विषयपन्धनार्थत्वात्, न च चितिरेव विपयसम्पन्धस्वभावा, स्वभावस्यानुस्छेद्यत्वेनानिर्मोक्षप्रसगात् , न च प्रवृतिरेव तदीयभोगोपकरणसम्पादनस्वभावा, नित्य- खेन तस्याः कदाचिदप्यात्मनो निरुपाधिकरवाभावेन तत एव, न च घटादिरेवाहत्य तदीयो, दृष्टादृष्टविभागानुपपत्ते, नापीन्द्रि- यप्रणालिकयैव चिद्विपयसम्बन्धः, व्यासद्गायोगाव, नापीन्द्रियमनोद्वारा, स्वप्नदशायां वराहव्याप्राभिमानिनो नरस्यापि नरत्वाभिमानानुदयात् , नायं आटेन्द्रियवृत्यभावकृतो जानदवस्थायामपि तस्य तानिरपेक्षत्वदर्शनात् । न च मनोविरहवृतः, तस्य स्वप्नैपिच्यापारात्,तस्माद् यद्विरहकृतः स्वप्नेभिमानानुदयस्तदतीन्द्रियं तत्कारणमहङ्कारतत्वमवश्यमभ्युपेयमिति, न चाइकार- पर्यन्वव्यापारेणैव चिद्विपयसम्बन्धस्वभावः सुषुप्त्यवस्थायां तव्यापारविरामेऽपि श्वासप्रश्वासप्रयत्नसन्तानावस्थानात, तद् यदेता. स्वपस्थास्यनुवर्तमानमेकं सव्यापारमवतिष्ठते यदाश्रया चानुभववासना तबुद्धितत्वाख्यमन्तःकरणमिन्द्रियमनोऽहङ्कारपरम्परयो- । पारदोऽर्थः पुरणस्य भोगाय भवति। तदुक्तं-"एत प्रदीपकल्पाः, परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः॥ पुरुषस्पार्थ स्वच्छं, प्रकाश्य बुद्धी प्रयच्छन्ति ॥३६॥"इति, तस्मिन्नचेतनेऽपि चेतनत्वाऽभिमानोऽकर्तरि च चेतने पुरुषत्वाभिमानो भेदाग्रहादेव शरीर आत्मत्वामि- मानवत् । तदुक्तं-"तस्मात्तत्संयोगा-दचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ गुणकर्तृत्वे च तथा, कर्तेव भवत्युदानिः ॥२०॥” इति, कर्मवासनापि च बुद्धितत्त्व एव, पुरुपस्त्वनुभवतद्वासनातत्फलैः कर्मतद्वासनातत्फलैश्च निर्लेप एव, आलोचनमिन्द्रियाणां व्यापारी विकल्पस्तु मनसः, अभिमानोऽहङ्कारस्य, 'ममेदं कर्तव्यम्' इति कृत्यध्यवसायश्च बुद्धेः, अत्र हि पुरुषोपरागो विषयोपरागो व्यापारा- वेशश्चेति त्रयोंशाः, तत्र ममेति पुरुषोपरागो दर्पणस्येव मुखोपरागो भेदाग्रहादताविको, यद्यपि ममेत्यभिमानो न बुद्धधर्मस्तथापीदमा प्रतिनिर्दिष्टस्य विषयस्य ममेत्यत्र पुरुपस्यैव ग्राहकत्वेनाभिमानः पुरुषोपराग एव, इन्द्रियप्रणालिकोपनीतपरिणतिभेद इदमिति विषयोपरागः, मुखनिश्वासोपहतस्य मुकुरस्य मलिनिमोपराग इव पारमार्थिकः, एतदुभयोपपत्तौ च कर्त्तव्यमिति व्यापारावेशोऽपि, अस्यायं बुद्धौ विषयोपरागो ज्ञानं, दर्पणप्रतिविम्वितमुखस्य तद्गतमलिम्नैव पुरुषोपरागस्य विषयोपरागेण सह सम्बन्ध उपल- ब्धिरिति, वुद्ध्युपलब्धिज्ञानानां नानान्तरत्वं, तदेवमष्टावपि धर्मा बुद्धेरेव सामानाधिकरण्येनाध्यवसीयमानत्वात्, न च बुद्धिरेव स्वभावतश्चेतना परिणामित्वाद्, उक्तञ्च-अध्यवसायो बुद्धि-धर्मो ज्ञान, विराग ऐश्वर्यम् ॥ सात्त्विकमेतद्रूपं,तामसमस्माद्विपर्यस्तम् | ॥२३॥ इति बुद्ध्यादयो नैयायिकाभिमता आत्मविशेषगुणा अप्यत्रैवान्तर्भवन्ति, अव्यक्तस्यैव ज्ञानस्य स्मृतिजनकत्वाभ्युपगमेन केवलं वासनाया एवानभ्युपगमात्,एवं आत्मान कर्तेत्यभिमतमेवास्माकमिति चेत्।। तदेतदखिलं पवनप्रेरिततूलवत्तरलतरमेव।। कृति- चैतन्ययोः सामानाधिकरण्यानुभवेन चेतनस्यैव कर्तृत्वात्, न चायं भ्रमो, बाधकाभावात् न चाऽऽत्मनः कर्तृत्वे परिणामित्वप्रसङ्गो | बाधकः, बुद्धेः कृतिसमवायेऽपि तस्य बाधकत्वात् परिणामिनो घटादेरकर्तृत्वस्य दृष्टत्वाद् दृष्टविरोधादयमदोप इति तु तुल्यं, कर्तु- रचेवनकार्यत्वादचेतनत्वापत्चिाधिकेति चेत्, न, 'वीतरागजन्मादर्शनाद्' इति न्यायेन तस्यानादित्वस्यैव सिदे, पुढेरनित्यत्वेन तत्र नानामवार्जितवासनावस्थानायोगात्प्रकृतेश्य पूर्वदिवासनानुवृत्त्यम्युपगमेऽपसिद्धान्तायुद्धिनिष्ठवासनाया अनियामकत्वाच,नच सम्बन्धविशेषामियमोपपचिः, स्थूलरागे सूक्ष्मवासनाया अप्रयोजकत्वात्, न च प्रकृतौ सूक्ष्मतदम्युपगमेऽपि प्रमाणमस्ति, अन्यथा सूक्ष्मरागादियोगाद् भावाष्टकसम्पन्नतया प्रकृतिरेव युद्धिर्मवेद, स्थूलतद्योग एवं बुद्धित्वनियत इति चेत्, तथाप्यप्रामाणिक- सूक्ष्मतदम्पुपगमे घटादापि तदापचिः, तस्य प्रकृतिकार्यत्वात्कारणधर्माणां च कार्ये सक्रमाभ्युपगमात् स्थूलबुद्धिविलयेऽपि सूक्ष्मतत्सचाम्युपगमामानुपपचिरिति चेत्, न, मुक्तावपि तत्सत्वप्रसङ्गात्, अधिकारामावानायमिति चेत्, नन्वयमधिकारोऽपि धर्माधर्मवासनायोगः, धर्माधर्मों च बुद्धिधर्माविति कथं तत्सचेतद्विलया, स्थूलतद्विलय एव निरधिकारित्वमिति चेत्,तहि स्थूल- बुद्धयनुत्पादसमये सूक्ष्मशुद्धिसचाम्युपगमेऽपि तस्या निरधिकारित्वेन कार्याजनकतया संसारोच्छेदप्रसङ्गः, अन्यथा तु मोक्षो- पछेदप्रसङ्गः । किश्चैवमधिकार एव संमारहेतुरस्तु किं प्रकृत्या,युद्धिस्तु चेतनैव न तत्वान्तरं, मानाभावात्, न च दर्पणे मुखस्पेव पुझौ पुरुषस्योपरागः सम्भवति,अतात्विकस्प सम्भवे शशशृहगस्यापि सम्भवप्रसगाव, असतो विज्ञानस्याप्यभावानज्ञानिका- कारस्यापि दुरुपपादत्यान,अन्यथा सर्वदेवासद्मावानापनेः विषयोपरागोऽपि नाता सम्भनी,अन्यथा मेर्वादिज्ञाने मे याकारोऽपि तत्र स्यात्, तस्माद् बुद्ध्युपलान्धज्ञानशब्दाना पर्यायत्वमेव युक्तं,अहवारोऽपि पिकल्परूपोमानस एवब्यापारोळ्यथा समे यथार्था- इकार इस विपरीताहकारोऽपि न स्याद्, इदं पुनरवशिष्यते यत्कस्यचिदहमिति सकल्पात्स्त्रगुणाभिषमपरगुगद्रापारगाम : समुज्जृम्भते कस्पचित्तु नेत्या किं नियाममिति,तत्र तु मानं मोइनीयकर्मण उदयानुदये एव सन्ो,एकस्यापि कपापमोहनीय- कर्मणः क्रोधादिव्यापारभेददर्शनेन भेदकल्पनात्, एवं च कृत्यादीनां चेतनासामानाधिकरण्ये सिद्ध बुद्वयादितत्वकल्पना युक्तिही- नैवेति सङ्क्षपः ॥स्यादेतद्, आत्मनोजन्यधर्माश्रयत्वे कौटस्थ्यविरोधो धर्मधर्मिणारभेदे कार्यानित्यत्वेन कारणस्याप्यनित्यत्वप्र- सगाव, न च तयोरभेद एव युक्तो विरुद्वधर्माध्यासलक्षणस्य भेदस्य घटपटयोखि प्रत्यक्षसिद्वत्वादिति वाच्यं, श्यामत्वर- तत्वाम्यां वैधयेऽपि घटस्येव गुणगुणिभावेन गुणगुणिनोरन्योन्याभावायोगादिति, मैवं, आत्मनो नित्यानित्यत्वस्यैव युक्तिसिद्धत्वाद् धर्मधर्मिणार्भेदाभेदस्य समपञ्चं स्याद्वादरहस्ये व्यवस्थापितत्वात्, कूटस्थत्वं तु तत्र समानजातीयद्रव्यपर्या- यद्वाराऽपरिणामित्वं अना(आ)त्मेतरमिन्नत्वं वेति सर्वमत्रदातम् ॥ २६ ॥ सांगतत्वे दूपणान्तरमप्याह- सर्वासर्वग्रहोऽप्येवं, नित्यस्यान्यानपेक्षणात् ॥ अपेक्षणेऽपि देहस्या-पेक्षायामतिगौरवात् ॥२७॥ ॥८५॥ आत्मनः सर्वगतत्वे त्रिभुवनभवनोदरसञ्चारिपदार्थसार्थप्राप्त्यवश्यम्भावात् मनसः प्राप्यकारित्ववादिनः सर्वोपलब्धिप्रसङ्गः, प्राप्त्यविशेषेऽपि कतिपयार्थानुपलम्भे चाविशेषात्सर्वानुपलम्भप्रसङ्गः, यदुक्तं-"सवासव्यग्गहण-प्पसंगदोसाइओ वावि ॥२१॥"[सर्वासर्वग्रहणप्रसङ्गदोपादितो वापि] अथ मनसो बहिरस्वातन्त्र्याद् वहिरर्थग्रहसामग्रीनियमादेव मनसो बहिरर्थग्रह- नियम इति चेत्, तथापि शरीरावच्छेदेनैव सुखादिकमुपलभ्यते न घटाघवच्छेदेनेत्यत्र किं नियामकं, आत्मनः स्वगुणजनने शरीरस्यापि सहकारित्वान्नान्यत्र तदुत्पत्तिरिति चेत्,न,नित्यस्य सहकार्यपेक्षायोगाद, तथाहि, सहकारिणा किं तत्र कश्चिदतिशयः क्रियते न वा, क्रियते चेत्, स किं अर्थान्तरभूतोऽनान्तरभूतो वा, आये न किञ्चित् कृतं स्यात्, अन्त्ये तु तदनन्तरभूताति- शयकरणे तस्यापि करणप्रसङ्गः । अकरणपक्षे तु न तस्य सहकारित्वम्, अन्यथा जगतोऽपि सहकारित्वप्रसङ्गादित्याहुः, ननु सह- कारित्वं नातिशयजनकत्वं कार्यजन्माजन्मनोः सहकारिसन्निधानासविधानाम्यामेवोपपत्तावतिशयस्याकल्पनात्, कि त्वेककार्य- कारित्वं, तच नित्यत्वेऽप्यात्मनः शरीरे निरावाधमिति चेत्, न, तथापि ज्ञानादावनन्तशरीरादिहेतुत्वकल्पने गौरयाद, आत्मनः शरीरव्यापित्वक्ल्पनस्यैव युक्तत्वात् ॥२७॥ न चाऽत्मनो विभुत्वसाधनसावधानं बलवत्प्रमाणमपि जरीजृम्मत इत्याह- विभुत्वसाधक किञ्चित्, प्रमाणमपि नेक्ष्यते ॥ स्वसम्यन्धविशेषेणा-दृष्टं यत्कार्यमर्जति ॥२८ ॥ ८६ ।। न घदृष्टस्य कार्यमा प्रति हेतुत्वानस्य च स्वाश्रयसयुक्तसंयोगेनैव हेतुत्वकल्पनादात्मनो विभुत्वसिद्धिः, प्रध्यसे व्यभि- घारात् कालिकादिसम्बन्धेनैव तस्य तत्र हेतुत्वौचित्याद्, वस्तुतस्तु कार्यत्वं कालिकसम्बन्धेन घटत्वपटत्वादित्ववमननुगतमिति न कार्यतावच्छेदकं, न च कार्यमानहेतुत्वे तस्य प्रमाणमस्तीति सुखदुःखयोरेव धर्माधर्मरूपस्यादृष्टस्य हेतुत्वमास्थेयम्, अथ पनेरुर्घज्वलनादावदृष्टमवे नियामकम् । तदुक्तम्। "न ज्वलत्यनलस्तिर्यम्, यदुवं वाति नाऽनिलः ॥ अचिन्त्यमहिमा तत्र, धर्म एव निवन्धनम् ॥१॥" न च शरीरप्यापित्वे प्राणिनोऽष्टस्य वयादिसम्बन्धः सम्भवतीति तस्य, विभुत्वमेव युक्तमिति घेत, न, स्वाश्रयसयुक्तसंयोगसम्बन्धनादृष्टस्य घटादावपि सत्त्वाद् , द्वित्वविशिष्टस्याश्रयसंयुत्त सयोगसम्बन्धेन तस्य हेतुत्वे तु स्वायसंयुक्त संयोगविशिष्टवद्वित्वसम्बन्धेन तयारवे विनिगमनाविरहात्सम्बन्धविशेषेणैव तद्वैतुत्वौचित्यात, एतेन (यदपि) शत्रुजियांसया कृतन श्येनयोगेन यज्वन्येवादृष्टविधानाचस्य च शत्रावसम्बन्धात्कथमात्मविभुत्वं विना तत्फलोपपत्तिः (तदपि न, शक्तिविशेषरूपस्य कारणत्वस्यासम्बन्धेऽप्यविरोधात्सम्बन्धघटितत्वे घा तस्य प्रकृते सम्बन्धविशेषकल्पनावश्यकत्वाद) इति" परास्तम् ॥ २८॥ विभुत्वसाधकान्तरं निराकरोति- " ACCESS अथ नित्यमहत्त्वेन, व्योमवद्विभुतास्य चेत् ॥ नैवं तत्परिमाणं हि, यदुत्कर्षापकर्षभाक् ॥ २९ ॥ ८७ ॥ अथ परे प्रतिपादयेयुरात्मनो महत्त्वं तावनिर्विवादं द्रव्यचाक्षुपंप्रति कल्पनीयहेतुभावस्य महत्त्वस्य लाघवेन जन्यद्रव्यसाक्षा- त्कारत्वावच्छिन्नं प्रत्येव हेतुत्वकल्पनात्, आत्मसाक्षात्कारनिर्वाहायात्मनि महत्त्वस्यावश्यकत्वात्, तच्च महत्त्वं न जन्यं, कार्य हि महत्त्व अवयववहुत्वजन्यं स्यात्तन्महत्त्वजन्यं वा प्रचयजन्यं वा, न च त्रितयमपि निरवयवस्यात्मनः सम्भवतीति ॥ एवं चायं प्रयोगः, आत्मा विभुर्नित्यमहत्त्वादाकाशवदिति चेत्, अनोच्यते-अत्र हि परमप्रकृष्टपरिमाणवत्त्वलक्षणं विभुत्वं साध्यते, न च नित्य- महत्त्वस्य परमप्रकर्षविपक्षवाधको जागर्ति तर्कः, अपकृष्टत्वे तस्य जन्यत्वापत्तिर्वाधिका, गगनमहत्त्वावधिकापकर्षस्य बहुत्वजन्य- तावच्छेदकत्वादिति चेत्, न, परमाणुपरिणामसाधारणतया तस्य कार्यतानवच्छेदकत्वात् परमाणुपरिमाणे व्यभिचारेण त्रुटिमहत्त्वा- वधिकोत्कर्षेण समं सात्तिादृशापकर्षस्य जातित्वासिद्धथा वहुत्वजन्यतानवच्छेदकत्वाच, वस्तुत आत्मपरिमाणमपि प्रचयविशेषा- दुत्कर्षापकौ भजज्जन्यमेवेति हतारेवासीद्धः ॥२९॥ नन्वेवमात्मनः सावयवत्वापत्तिरिति चेत्, किन्चातः। सावयवत्वे सति तस्य कार्यत्वं स्यादिति चेत्, किमिदं कार्यत्वं प्रागसतः सत्तालामः पूर्वाकारपरित्यागेनोत्तराकारोपादानं वा, नाद्यः, असत उपायसहस्र- णाप्युत्पादयितुमशक्यत्वात, अन्यथा शशविपाणस्याप्युत्पत्तिप्रसङ्गात्, अन्त्ये तु तादृशं कार्यत्वमात्मन इष्टमेवेत्यभिप्रेत्याह- एवं सावयवत्वं त-नित्यत्वं नैव बाधते ॥ कथञ्चित्परिणामित्वं, विना तन्न घटेत यत् ॥ ३० ॥८॥ न हि सावयवत्वेनात्मनः कथञ्चित्परिणामित्वलक्षणेऽनित्यत्वे द्रव्यैकरूप्यलक्षणनित्यत्वव्याघातः येन प्रतिसन्धानाद्यभा- वप्रसङ्गः,नच सावयवत्वे तस्य प्रात्रीसद्धसमानजातीयावयवारभ्यत्वप्रसक्तिः, अवयवजन्य एव कार्येऽवयवानां जनकत्वात्, अस्य - त्वतथात्वात्, न च तादृशकार्येऽपि घटादौ प्रावप्रसिद्धसमानजायिकपालसंयोगारम्पलं दृष्टं, कुम्भकारादिव्यापारान्वितान्मृत्पि- ण्डात्प्रथममेव एषुबुघ्नोदराधाकारस्योत्पत्तिप्रतीतेरित्यप्याहुः ॥३०॥ प्रमाणासेदेऽर्थेन किश्चिदन्यदाधकमित्पन्यत्रातिदिशति-- मूतत्वादिप्रसङ्गोऽपि, वारणीपोज्नया दिशा ॥ मानराजादरे दुष्टा, हन्तापत्तिर्न पत्तिवत् ॥३१॥८९॥ एवश्च मूर्वशरीरानुप्रवेशेनात्मनो मूतत्वापत्तिरपि परास्ता, यतः किमिदं पूर्व इयत्तापच्छिन्नपरिमाणपोगो रूपादिसत्रिोशो वा, आये इष्टापचिः, न हविभुद्रव्यस्प मूर्तत्वं न मन्यते कश्चिद्विपश्चित्, नान्त्यो मूर्वानुप्रवेशिनो रूपादिमत्वव्याप्तिविरहान्मनस्येव व्यभिचारात्,न चमूर्तमहत्येनापि तद्व्याप्तिरस्ति,अप्रयोजकत्वाद् एवमात्मनो मूर्तद्रव्यत्वेऽचेतनतापचिरपि परास्ता, सहचारदर्शन- मात्रेण व्याप्त्यग्रहाद्, अन्यथा विभुत्वेऽप्याकाशादिवत्तथात्वं स्यात् एव चवालयुवशरिपरिमाणभेदेनात्मनो भेदापत्तिः, परिमाणभेदे द्रव्यभेदावश्यम्भावात्, तथाचान्यदृष्टस्पान्यस्य स्मरणानुपपत्तिरित्यधरीकृतं, कथञ्चिद्भदेऽपि तस्यामेदाम्मुपगमात्सर्पस्पेव सफण- विफणावस्थयोः,अत्यन्वभेदे तु प्रत्यभिज्ञायनुपपचिरित्यन्यत्र विस्तरातथा शरीरखण्डने शरीरव्यापिनो जन्तोरपि सण्डनप्रसङ्ग इत्यप्यसमीक्षिताभिधानं, शरीरखण्डने कयश्चित् तत्खण्डनस्येष्टत्वाच्छररिसम्बद्धात्मप्रदेशभ्यो हि कतिपयात्मप्रदेशानां खण्डितशरीर- प्रदेशानुप्रवेशात्मनः खण्डनं, वचात्र विद्यत एव, अन्यथा सण्डिवशरीरप्रदेशस्य कम्पोपलन्धिन स्यात् नमात्मविभुत्सवादेपि शरीर तदषयवं विना वाऽन्यत्रात्मगुणोपलन्धिः,नच सण्डितशरीरप्रदेशोऽपिशरीरमेव,अथ पूर्वाश्यवसपोगाविषेऽपि संपोगान्तरेणाऽदृष्ट- पशात् खण्डशरीरद्वयोत्पत्तेर्न दोष इति चेत्, न, एकदा शरीरद्वयोत्पतेविरोधादविरोधे वैकदोभयत्र मनासंयोगविरदात् कथश्चैक- दैव तयोः कम्पोपलब्धिः, अदृष्टवशात् खण्डितभरीरे मनोन्तरप्रवेशाम्पुपगमान दोष इति चेत्, न, वयाप्यात्माविशेषगुणपोग- पद्यानभ्युपगमसिद्धान्तविरोधात, अवच्छेदकभेदेन विभुविशेषगुणानामपि युगपदुत्पचिरिष्टैव, शब्दस्थले दृष्टत्वादिति चेत, न,तथापि मुहूर्त्तानन्तरमपि छिन्नगोधाशरीरे कम्पोपलब्धिप्रसङ्गात्, तदानीं ततो मनोविगमः कल्प्यत इति चेत्, न, एतादृशकष्टकल्प- नापेक्षया तत्रात्मप्रदेशानुप्रवेशोऽदृष्टवशाच कालान्तरे तत्सङ्घट्टनमिति कल्पनाया एव युक्तत्वादिति दिग् ॥ एवमदृष्टवदात्मसं- योगं विना परमाणुष्वाधकर्मानुपपत्तावन्त्यसंयोगं विना तन्निमित्तशरीरानुत्पत्तौ शरीरव्यापित्ववादे सर्वेषामनायाससिद्धो मोक्षः स्यादित्यप्युन्मत्तभाषितप्राय, विभुत्ववादेऽपि सकलपरमाणुग्रहणाभावस्यादृष्टस्वभावाधीनत्वेन शरीरव्यापित्ववादेऽप्यसम्बद्धानाम- पि परमाणूनां स्वभावत एव नियतानां ग्रहणानियतशरीरोत्पत्तेरविरुद्धत्वात्, तदेवमसमुद्धतस्यात्मनः शरीर एव वृत्तिः, समुद्घातमहिम्ना तु बहिरपीति सुव्यवस्थितम्, ॥३१॥ विभुत्वनये तु महतीयमनुपपत्तिरित्याह- विभुत्वे पुनरात्मा स्या-देक एवान्तरिक्षवत् ॥ उपपत्तेर्व्यवस्थाया, विविधोपाधिभेदतः ॥ ३२॥१०॥ आत्मनो विभुत्ववादे खेकात्मपरिशेषापत्तिरेकत्रैव नानात्मकार्योपपत्तेः, एकत्र व्योम्न नानाघटसंयोगवदेकत्रैवात्मनि नानामन:- शरीरेन्द्रियसंयोगानामेकाकाशसमवेतनानाशब्दवच्चकात्मसमवेतनानासुख दुःखादीनां युगपदुत्पत्तिसम्भवाद, अथावच्छेदकतास- म्बन्धेन शब्दोत्पत्तौ संयोगादिरूपस्यासमवायिकारणस्य नियामकत्वादेकत्रापि व्योम्नि देशभेदेन नानाशब्दोत्पात्तयुज्यतामत्र तु कथमिति चेत्,न, अत्राप्यवच्छेदकतासम्बन्धेनात्मविशेषगुणत्वावच्छिन्नं प्रति प्राणशरीरसंयोगादेरसमवायिकारगस्य नियाम- कत्वात् सुषुप्तिकाले ज्ञानानुत्पत्तिनिर्वाहाय च त्वङ्मनोयोगस्य शरीरनिष्ठतया हेतुता वाच्या, त्वयाप्यात्मनिष्ठतया तद्धतुताकल्प- नाव एवं च परामर्शादीनामपि शरीरनिष्ठतयैवानुमित्यादिहेतुत्वान्न चैत्रशरीरावच्छेदेन परामर्शान्मैत्रशरीराबच्छेदेनानुमित्याद्या-
पतिः, वस्तुतश्चैत्रपरामर्शसमवायिनि मैत्रे न चैत्रशरीरावच्छिन्नानुमित्यापचिः, कार्यतानवच्छेदकरूपेणापत्यभावात, न च
तवैकैकात्मस्थलेऽनन्तशरीराणां तच्चतत्त्वेन तत्तदात्मगुणं प्रति हेतुता वाच्या, मम तु समवायेन तदात्मसमयेतगुणत्वावच्छिन्नं
प्रति तादात्म्यसम्बन्धेन तदात्मत्वनावच्छेदक्तया तं प्रति च तदात्मशरीरत्वेन हेतुताद्वयं युक्तमेव कल्पनीयं, अथ तदात्मीयत्वं न
उदात्मसंयोगोऽतिप्रसङ्गारिकन्तु तदात्मादृष्टोपगृहीतत्वं तचाननुगतमेवेति तवापि नानैव हेतुत्वमिति चेत्, न, स्वसमवेतादृष्टोप-
गृहीतत्वसम्बन्धेन तदात्मव्यक्तिवच्छरीरत्वनानुगतस्यैव हेतुत्वादिति वाच्यं, शब्दादौ तच्छरीरावच्छिन्नं प्रति तच्छरित्वेन हेतुतया
क्लायव निर्वाहोद्धतुत्वान्तरायल्पनया ममैव लाघवात, अथवाऽवच्छेदकतया कार्योत्पत्तावपि मागभाव एव नियामक इति न किञ्चि-
दनुपपन्नम्, अथादृष्टफलयोः प्रतिनियमदर्शनानानात्मानो व्यवस्थाप्यन्तेऽन्यशरीरजनितस्थादृष्टस्यान्यशरीरावच्छेदेन फलजनक-
त्वेऽतिप्रसङ्गानियामकान्तरस्य चादर्शनादिति चेत्, न, तच्छरजनिताऽदृष्टस्य तमन्यशरीरावच्छेदेन फलजनकत्वेऽतिप्रसङगामा-
चाद, एवं च जननमरणादिनियमोऽप्युपपादित इति दिग् ॥ नन्विदं भवतामपि समं दूपर्ण शरीरव्यापिनानात्मकल्पनापेक्षया
विभोरेकस्यैवात्मनायल्पनौचित्याद, सिद्धान्तविरोधस्त्वावयो:समान एव,एकात्मवादे मोक्षार्थितया कस्यापि प्रवृचिर्न स्यात्किश्चिच्छ-
रीरावच्छेदेन सकर दुःखध्वंसरक्षणस्य मोक्षस्य सिद्धत्वात्सिद्धे इच्छाविरहात्, तच्छरीरावच्छेदेन दुःसबसे तु नेच्छा, सर्व दुःसं
नश्यत्त्विति कामनयैव परिवज्यादौ प्रवृत्तेरिति समाधानमप्यावयोः समानमिति चेत्,न, सिद्धिपदप्राप्तीच्यैव तदुपायेषु प्रवृत्तेः,
प्रेत्यमावदिव्यवस्थया च नानात्मनां मेदस्याविभुत्वस्य च सिद्धयोमयनिरासे तात्पर्यात, नहि दुःसध्वंसार्था पुरपाणां प्रवृत्तिरपि
तु सुखाथैवेति सर्वमवदातम् । तदेवं मावमनो बहिर्गत्वा वस्तुप्रकाशयेदिति विकल्पो निरस्तः ॥३॥
अथ द्रव्यमनी वहिर्गत्वा प्रकाशयिष्यतीति द्वितीयविकल्पं निराकरोति- बहिर्द्रव्यमनो गच्छे-त्किं यद्धीहेतुरेव न ॥ निमित्तमपि नो तस्या-करणं वा बहिर्गतम् ॥३३॥११॥ काययोगसाचिव्येन जीवगृहीतचिन्ताप्रवर्तकमनोवर्गणान्तःपातिद्रव्यनिकुरुम्बलक्षणं द्रव्यमनःपुद्गलस्कन्धत्वादात्मधर्म- स्य ज्ञानस्य जनकमेव न भवति कथञ्चित्, अत एव हेतुहेतुमद्भावातिक तद्वहिर्निर्गमाचिन्तयाजागलस्तनायमानया । अथ तवापि चक्षुरादिनेव प्रेरितो जन्तुर्ज्ञानं जनयतीति प्रदीपवत्तत्करणं स्यादिति चेत्, तथापि स्थितेनैव तेन ज्ञानं जननीय स्पर्शनादि- वकरणत्वादेव च तन्न बहिरेति स्पर्शनादिवदिति सुव्यवतिष्ठते, एवं च शरीरस्थितस्यापि तस्य पद्मनालतन्तुन्यायेन वहिन्निासरणं भविष्यतीति शङ्का परास्ता । आह च- दव्वमणो विन्नाया, ण होइ गंतुं वि किं तओ कुणइ॥ अह करणभावओ तस्स, तेण जीवो विआणिजा ॥२१॥" [ द्रव्यमनो विज्ञान, न भवति गत्वा च किं ततः करोतु ।। अथ करणभावतस्तस्य, तेन जीवोऽपि विजानीयात् ॥ ] "करणतणओ तणुसंठिएण, जाणेज फरिसणेणं वं ॥ एत्तोचिय हेऊओ, न नीइ चाहिं फरिसणं व ॥ २१८ ॥" करणत्वतस्तनुसंस्थितेन, जानीयात्स्पर्शनेनेव ॥इत एव हेतोर्न निर्गच्छति बहिःस्पर्शनमिव ।।२१८॥ ॥३३॥ नन्वनुग्रहोपघाताभा. वान्मनोऽप्राप्यकारीति प्राप्रतिज्ञातं स एव चाऽसिद्धश्चिन्ताहर्षादिना तदुपघातानुग्रहानुमानादितिभ्रान्तस्याशङ्कां निराचिकीर्षुराह- चिन्ताहादिना जीवो-पघातानुग्रही यदि ॥ किं ताभ्यां ज्ञेयसंसर्गा-न होतो मनसो यतः ॥३४॥९२॥ परः खल्वेवमनुमन्यते यदौर्बल्योरःक्षतादिलिङ्गैर्मनसः शरीरापचयप्रयोजक आरौिद्राभिवृद्धिमहिम्ना च हृद्रोगादिप्रयोजक उपांतो रोमाञ्चोदयाद्यनुमेयो हर्षादिरूपश्चानुग्रहो भवतीति तस्य तदभावाभिधानमसङ्गवमिति । यदाह-"नब्बइ उवधाओ से, दोबल्लोरक्खयाइलिंगेहि।जिमणुग्गहो य हरिसा-इएहि वो सो उमपधम्मो, ॥२१९॥" [शायवे उपयातस्तस्य दौर्षल्पोरक्षनादि- लिहै यदनुग्रहश्य हर्पादि-मिस्तता स उभयधर्मा]तदसङ्गतं, यतो द्रव्यमनस्तावन्मनस्त्रपारणतानि पुद्गलसद्दपावरूप शोका- दिपीडया हृदयदेशाधितनिविडमरुद्ग्रन्धिवजीव पीडयेत् तदेव चमनस्त्वपरिणतेश्च पुद्गलसवातरूपं हापमिनियत्या भेपजव- जीवमनु गृह्णीयात्तावता शेयनिमित्तकमनोनुग्रहोपपातकताभिधानामिदम्।यदाह-"जइ दबमणोतिषली,पीलिजा हियपनिरुद्धवा- उच्च । तयणुग्गेहण हरिसा-दओव्व नेएण किं तत्थ॥२२०॥ [यदि द्रव्यमनोऽतिपलि,पीडयेद् हभिरुद्धवायुरिव ॥ तदनुग्रहेण हदिय व झेपस्प किं तत्र अन्ताकरणं हि न बहिर्गत्वा ज्ञेयमर्थ जानाति न वा तत्स्वसमीपमानीय प्रकाशयति न वा यकृतानुग्रहोप- पातमाग भवतीति भुजमुत्क्षिप्य वर्ष घदामो,न तु तञ्जीवस्यानुग्रहोपघातावपि जनयतीति वयं वदामः, पुद्गलेम्प एव तेन तल्लाभात्तथा चेदमस्मान् प्रत्यनिष्टोपदर्शनं वादिनोऽविचार्यवादितामेव व्यञ्जयति। यदाह "नीउ आगरिसिउ वा, ननेप्रमालंचर तिणियमोऽयं ॥ तयकया जेऽणु-गहोवघाया य ते नात्या॥२२॥निर्गत्याछप्प वा नक्षेपमालम्बत इति नियमोऽयम् तन्नेयकतो यायनुग्रहोपधावी च तौ न स्ता]"सो पुण सपमुक्पायण-मणुग्गहंचा करेज को दोसो जमणुग्गहोवघाया, जीवाणे पोग्गलेहितो ॥२२३॥"[वरघुनः स्वयमुपयातमनुग्रह वा कुर्यात्को नाम दोषः। यदनुग्रहोपघाती, जीवानां पुद्गलेम्पः ॥३४॥ ननु चिन्तनीयवस्तुसंसर्गादेव हर्षशोकरूपावनुग्रहोपघाती भविष्यतो न तु द्रन्यमनस इति चेत्न,एवं सत्योदनादिचिन्तया पुभुक्षाघपगमप्रसङ्गात् । ननु तर्हि द्रव्यमनसस्तदेतत्त्वे किं प्रमाणमित्यत आह- देहोपचयवार्यल्ये, मनापुद्गलहेतुके आहारपुद्गलादीना, तहेतुत्वेन निश्चयात् ॥ ३५॥१३ ।।
अन्यथा हृद्ग्रन्थेरपि दौर्बल्यजनकत्वं न स्यात् , ननु चिन्ताहर्षयोरेव साक्षात्सजनकत्वमस्तु किं नानामनापुद्गलकल्पनया , वदति च- " चिन्तया वत्स ! ते जातं , शरीरकमिदं कृशम् " इति चेत् , न , एकशक्तिमत्त्वेन पुद्गलत्वेन तदेतुत्वकल्पनात्प्रमाणविरोधेन प्याहाराद्रोगिणां पुष्टथदर्शनादनिष्टादपि च शरीरस्य पुष्टिहानी तावत्पुद्गलजन्ये इष्टानिष्टाहाराम्यवहारेण तदर्शनाद्,अथेष्टादप्या भेषजादेस्तदर्शनाद् व्यभिचार इति चेत्,न, धातुसाम्यवैषम्यद्वारा तयोस्तदेतत्वानु, तदिह चिन्ताहर्षसमये जायमाने शरीरयष्टहानी पुद्गलसम्बन्धमपेक्षमाणे उपस्थितत्वान्मनःपुद्गलसम्बन्धकल्पनायैव प्रभवतो,नचौदर्यामिपरिपाकजनितातिशयानामेवाहारपुद्रलाना तत्यागायोगात्तयोरपि मनोजन्यत्वेन मनस एवं तद्धेतृत्वकल्पनौचित्याच, आकाशवदमूर्तयोश्चिन्ताहर्षयोर्न तजनकत्वमिति En चिन्तयेत्यादिकच प्रयोग औपचारिक इति दिग् ॥ तदिदमभिप्रेत्याह-" इटाणिहाहार-भवहारा होन्ति पुहिहाणीओ जह तह मणसो ताओ, पोग्गलगुणोति को दोसो १॥२२१॥" [ इष्टानिष्टाहाराभ्यवहारे भवतः पुष्टिहानी । यथा तथा मानस पुद्गलगुणत इति को दोषः ॥ ] स्यादेतत्, शोकहर्षव्यापारनैरन्तर्येण नाडीविशेषप्रयत्नप्रेरितद्रव्यान्तरादेव तदुपपत्तीमा कल्पनयेति, मैव, शोकहर्षादिकार्यजनकानां मनोद्रव्याणामेव कल्पनात्तत्र संज्ञामात्र एव परेषां विवादात्, इष्टानिष्टमनोद्रव्योपादा- ननियम एव कुत इति चेत्, अदृष्टवशादेवेति सर्वमवदातम्, ॥ ३५॥ स्वमविज्ञानेन मनुसः प्राप्यकारित्वं सेत्स्पतीति निराकर्तुमाह- मनसः प्राप्यकारित्वं,स्वप्नेनापि न सिद्धयति ॥ यदसौ न तयारूपी,व्यभिचारादिदर्शनात् ॥ameen 'मम मनो मेरौ गते' इति स्वप्नविज्ञानदर्शनान्न मनसा प्राप्यकारित्वं सिद्धथति तस्याप्रमाणत्वात्प्रमोघे तद्विपरीतदर्शनाव, नचाशु गमनागमनशीलस्य मनसस्तदा ततः परावृत्त्वा तद्विपरीतदर्शनमुपपत्स्यत इति वाच्यं, स्वप्नस्य प्रामाण्यानिश्चयेन तया- कल्पनाऽयोगात्तन शरीरस्यापि तत्प्राप्तिग्रहात्, न च सापि सम्भवति, कुसुमपरिमलायजनितथमायनुग्रहोपघाताभावादिह स्थित सुप्तस्यात्रैव दर्शनाच,तदिदमाह-"सिमिणोणतहारूपो,वभिचाराओ अलायचक्कं वावमिचारोअसदसण-मुवघायाणुग्गहाभावा १२२४॥" [स्वप्नो न तथारूपो व्यभिचारादलातचक्रमिव ।व्यभिचारश्च स्वदर्शना-दुपघातानुग्रहामावात्] "इह पासुनो पेच्छइ, सदेहमनत्य णय तो तत्थााणय तग्गयोवघाया-गुग्गहस्वं विबुद्धस्स ।।२२५।। [इह प्रसुप्त प्रेक्षते स्वदेहमन्यत्र न च सकस्तत्र। न च तद्गतोपघातानुग्रहरूपं विशुद्धस्य]॥३६॥ ननु प्रयुद्धस्य हर्षविपादोन्मादमाध्यस्थ्यदर्शनात् स्वप्नेऽपि जिनस्नात्र-तदपाय- कामिनीकुचकलशसम्पर्कसंस्तारस्वरूपदर्शनायर्थक्रियानुमानाद न तस्य व्यभिचारित्वं भविष्यतीत्यत आहू- हादिकं ज्ञानफलं, स्वमे नैव क्रियाफलम् ॥ तत्सम्भवे युभुक्षाऽपि, क्षीयेतोदनदर्शनात् ॥३७॥९५ ॥ न खलु स्वमे जिनस्नानादिकरणादेव प्रयुद्धस्य हर्षादिप्रादुर्भावः केनापि स्वमे तक्रियाऽदर्शनारिक तु रागादिमहिम्ना तदभिमानादेव, दृश्यते हि जागतोऽपि दराजरतीमपि मदिरोन्मादविपूर्णमाननयनां गतिविलासविडम्बितकलहंसगमनां ससम्भ्रमं निजजोत्क्षेपविहितपीवरकुचकलशानमनोमादरेण तरुणीमिव पश्यतस्तरुणस्य होन्मादादिप्रादुर्भावस्तस्मादिष्टप्राप्त्यादेखि तद- भिमानस्यापि सुखादिहेतुत्वमास्थेयो अत एव रागसहळूतस्यैव तस्य तज्जनकत्वात्तद्विरहिणो मुनेः स्वमे कामिनीदर्शनादिनापि न हर्षायुदयोऽपि तु माध्यस्थ्यमेव, मोहहीनस्य स्वम एवं न' इति तु न वक्तुं युक्तम्, मोहविगमाधीननिर्मोहत्वस्य दर्शनावरणोदय- प्रसूतनिद्रायविरोधित्वाद, यदि तु स्वमेऽपि सुखादिकं बियाफलमिति क्रियैव स्यान्नान्यथा, तदा तदानीमोदनादिदर्शनाद् शुभु- ।
क्षाविलयप्रसङ्गे बुभुक्षाक्षामकुक्षेनिद्रायामेव प्रवृत्तिः स्यान्न तु पाकादाविति विपरीतमेतद्, आह च-"दीसन्ति कासइ फुडं, हरिस- विसायादओ विबुद्धस्सासिमिणाणुभूअसुह-दुक्ख-रागदासाइलिंगाई॥२२६॥"[दृश्यन्ते कस्यचित्स्फुटं हर्पविषादादयो विवुद्धस्य। स्वमानुभूतसुखदुःख-रागद्वेषादिलिङ्गानि] "न सिमिणविन्नाणाओ, हरिसविसायादओ विरुज्झति। किरियाफलं तु तित्ती-मदवह- बंधादओणत्थि ॥२२७॥" [न स्वमविज्ञानाद् हर्पविपादादयो विरुध्यन्ते ॥ क्रियाफलं तु वृप्तिमदवधबन्धादयो न सन्ति] ननु कान्ता- दर्शनजन्ये सुखे तदर्शनमात्रं हेतुरस्तु, मोदकभक्षणादिजन्यं तु सुखं कथं स्वमे मोदकज्ञानमात्रादितिचेत्,न, अनन्यगत्या स्वमज- नितेष्टप्राप्त्यभिमानस्यापि विलक्षणसुखहेतुत्वस्वीकारात् प्रबुद्धस्य तु स्वमशुभत्वज्ञानस्य तथात्वादिति दिग् ॥ ननु स्वप्नेऽपि कामिनीसुरतादिक्रियाफलं व्यञ्जनविसर्गादि प्रबोधावस्थायामपि साक्षात् दृश्यत एव तत्कथं स्वप्ने क्रियाफलं नास्तीत्युच्यत इति चेत्, न, जाग्रतोऽपि तीबमोहाध्यवसायेन व्यञ्जनविसर्गदर्शनात, स्वप्नेऽपि तस्य तद्धेतुकत्वेन क्रियाफलत्वासिद्धेः, अन्यथा स्वप्नविषयीकृतकामिनीनां गर्भाधानादिप्रसङ्गाद्,आहच-"सिमिणे वि सुरयसंगम-किरियासंजणिअवंजणविसग्गो।पडिबुद्धस्स वि कस्सइ, दीसइ सिमिणाणुभूअफलं ॥२२८॥"[स्वप्नोऽपि सुरतसङ्गम-क्रियासञ्जनितव्यञ्जनविसर्गः॥प्रतियुद्धस्यापि कस्यचित्, दृश्यते स्वप्नानुभूतफलं]"सो अज्झवसाणकओ, जागरओपि जह तिव्वमोहस्स ॥ तिव्वज्झवसाणाओ, होइ विसग्गो तहा सुमिणे ॥२२९॥"[सोऽध्यवसानकृतो जाग्रतोऽपि यथा तीव्रमोहस्य। तीब्राध्यवसानाद्, भवति विसर्गस्तथा स्वप्ने] "सुरयपडिवसिरइ- सुह-गम्भाहाणाइ इहरहा होज्जा। सुमिणसमागयजुवईए, णय जओ ताई तो विफला ॥२३०॥"सुरतप्रतिपत्तिरतिसुखगर्भाधाना- दीतरथा भवेत्॥ स्वप्नसमागतयुक्तेः, न च यतस्तान्यतो विफला ] ननु व्यञ्जनविसर्गस्य क्रियापूर्वकत्वदर्शनात्कथमध्यवसान- जन्यत्वमिति चेत्, न, तीव्रवेदाध्यवसायजनकबहुतरमनोद्रव्यप्रेरितजीवप्रयत्नादेव तदुपपत्तेदृष्टार्थस्य बाधितुमशक्यत्वात् ॥३७॥ ननु माविराज्यादिस्वप्नस्य सत्यत्वदर्शनान्मनसो मेस्त्राप्तिस्वप्नोऽपि कथं न तथेत्यत आह- स्वप्नोऽपि न मृषा कश्चि-न तु सर्व इतिस्थितिः ॥ तेन न प्राप्पकारित्वं, मनसः स समर्धयेत् ॥३८॥१६॥ नहि माविराज्यादिसूचकस्वप्नस्यार्थक्रियाकारित्वेन प्रामाण्यमिति मेरुगमनादिस्वप्नस्यापि तथात्वं स्यात् अर्थक्रियाकारि- स्वाभावेन तस्य स्फुटमेवा प्रामाण्यान झेकजातीयस्प कस्यचित्प्रामाण्ये सर्वस्य स्यात्वं नाम, घटादिचाक्षुषस्य प्रामाण्ये रङ्गे रजत बुद्धेरपि तथात्वप्रसाद् आह च-"नणु सिमिणओ वि कोइ, सबफलो फलइ जो जहादिहोनणु सिमिणम्मि णिसिद्ध, किरिया किरियाफलाई च ॥२३१॥ ननु स्वप्नोऽपि कश्विरसत्यफला, फलति यो यथादृष्टाननु स्वप्ने निपिदं, क्रिया क्रियाफलानि ] "जं पुण विन्नाणं, तप्फलं च सिमिणे विबुद्धमेत्तस्स ।। सिमिणयणिमिचमावं, फलं च तं को णिवारे ।।२३२॥"पत्पुनर्विज्ञानं, तत्फलं च स्वप्ने विवुद्धमात्रस्यास्वप्नानिमिचमावं, फलं च तत्को निवारयति] ननु स्वमः सर्वोऽप्यप्रमैच निद्रादोपजनितत्वाद, भाविराज्यस्वप्नादीनां तु देहस्फुरणसहसोदितवद् माव्यानुमापकत्वादेव प्रामाण्य वरच्छास्त्राचयाविधव्याप्तिग्रहात,तदुक्तम्- "देहप्फुरणं सहसोइअं च, सिमिणो अ काइआईणि ॥ सगयाई निमित्चाई, सुमासुमफलं णिवेइंति ॥२३३॥"वि० [ देहस्फरणं सहसोदितं च, स्वप्नश्च कायिकादीनि ॥ स्वगतानि निमिचानि, शुभाशुभफलं निवेदयन्ति] कथं कथिदेव स्वप्नः प्रमा नतु सर्व इत्यभिधीयत इति चेत्, न, 'आरोपे सति निमित्तानुसरणं नतु निमितमस्तीत्यारोप' इति न्यायेन क्वचिदेव फस्यचिदोपत्व- कल्पनात्, न च तदिति स्थले इदमिति मानात्तस्याप्रमात्वं, स्मृतिप्रामाण्यव्यवस्थापितत्वाद, सर्वत्र स्वप्ने त्यामानामावाद, दृष्टार्थस्य कथं स्वप्ने मानमिति चेद् ?, एतन्महिम्नेति संक्षेपः॥ ३८॥ ननुस्त्यानर्द्धिनिद्रोदये द्विरदरदनोत्पाटनादिप्रवृत्तैर्मनसः प्राप्यकारित्वव्यञ्जनावग्रही सेत्स्यत इत्यत आह-- स्त्यानौ श्रवणादीनां, व्यञ्जनावग्रहादयः ॥ भवेयुर्न तु चित्तस्य, स्वप्नोऽयमिति जानतः ॥३९॥१७॥ स्त्यानर्धिनिद्रोदये हि प्रेक्षणकरङ्गभूम्यादौ गीतादिकं शृण्वतः श्रोत्रन्द्रियादीनामेवावग्रहो भवति, न तु नयनमनसोः,तत्प्राप्य- कारिताया युक्तिरिक्तत्वात्, नन्वेवं बाह्यन्द्रियव्यापारे प्रबुद्धस्य स्वप्नोऽयमिति ज्ञानं कथमिति चेत्, गाढनिद्रोदयपारवश्येन तथा- भिमानाद, आह च-"सिमिणमिव मन्नमाणस्स, थीणगिद्धिस्स वंजणोग्गहया । होज व ण उ सा मणसो, साखलु सोइंदिआईणं ।। ॥ २३४ ॥" [खममिव मन्यमानस्य, स्त्यानगृर्व्यञ्जनावग्रहता । भवेद्वा न तु सा मनसः सा खलु श्रोत्रेन्द्रियादीनाम्] ननु निद्रोदये कथमीदृशी विशिष्टचेष्टेति चेत्, तदुदयसमयेऽर्द्धचक्रिवलार्द्धवलसम्पत्तेः ॥ श्रूयन्ते ह्यत्रोदाहरणानि-ग्रामे वचन कोऽप्यासी-त्कौटुम्बिकशिरोमणिः ॥ यस्य जिह्वा पलग्रास-रसव्यसनतत्परा॥१॥ मांसानि खानिर्दोपाणां, यत्र यत्र स पश्यति॥ और्वानल इवाम्भोधौ, चेतस्तत्रास्य धावति ॥२॥ एष धर्मेधसां दाहे, वन्यदावाग्निरन्यदा ॥ आनीयोपशमं वाग्मि-र्मेघधाराभि- रजसा ॥३॥ दुर्नीतिदलनान्वीक्षा, दीक्षां दत्त्वा महात्मभिःस्थविरैः स्थिरतां नीतो, जगद्गीतयशोभरैः ॥४॥ तेनान्यदा विहरता, ग्रामे वचन घातितः ॥ सौनिकैर्महिषो दृष्टो, महिपघजमन्दिरे ॥ ५॥ अभिलापस्तदा तस्य, तदीयामिपभक्षणे ॥ प्राव- त हहा कर्म-स्थितिर्हि दुरतिक्रमा ॥ ६॥न न्यवर्चत तस्यासौ, व्यासङ्गेऽपि क्रियान्तरे ॥ कान्तासङ्गं विना याति, न नाम विरहज्वरः ॥ ७॥ तेनैव चाभिलाषेण, स्वापमाप दुराशयः ॥ तस्य तत्सहकारेण, स्त्यानर्द्धिरुदियाय च ॥८॥ महिषध्वजवत् H
दूर-स्ततधोरथाय शक्तिमान्। महिपामिपपिण्डापी,पयौ महिपमण्डलम्।।९।तत्र व्यापाघ महिप,मांसलसिलम्पटामिांस भुरुत्वाऽ
न्यदानीय, चिक्षेपोपाश्रयोपरि ॥१०॥ पुनः मुम्वाप पापा स, प्रत्यये च प्रयुद्धवान् ॥ स्वप्नोऽपमिति विज्ञाप, तमगाद गुरोः
पुरः ॥ ११॥ उपाश्रयोपरि प्रैक्षि, साधुभिश्य तदा पलम् ।। पाटलं परिपाकेण, स्त्यानगृद्धिलताफलम् ॥१२॥ न्यवेदि तथ गुरवे-
वेन लिङ्गेन तैस्तदा ॥ धूमेनाग्निरिवाज्ञायि, तस्य स्त्यानद्धिसम्मयः ॥१३॥ सहन स द्रुतं लिङ्ग-मपहत्य विसर्जितः॥ भस्मच्छ-
न्नोऽपि नैयामिः, स्थाप्यते फेलिवेश्मनि ॥१४॥ इति स्त्यानयुदपे प्रथमं मांसोदाहरणम्।। अथ द्वितीयं मोदकोदा-
हरणमुच्यते-भिक्षार्थ पर्यटन प्रामे, कोऽपि सापुर्व्यलोकत ।। भाजने स्थापितान् दिल्यान, मोदकान् मन्दिरे क्वचित् ॥ १॥
सुरभिस्निग्धमधुरा-नुग्रीवं ताभिमालयन् ॥ स पाप नहि साधूना, याचापूर्वः प्रतिग्रहः ॥२॥ विच्छेदं न जगामास्याभिला-
पस्तु तदाश्रयः ॥ अविच्छेदेन सुप्तस्य, स्त्पानविरुदियाय च ॥ ३ ॥ रजन्यां तद्गृहं गत्ला, महाद्विप याज्य सः।। अमाधी-
तत्कपाटानि, वृक्षाणीव मदोद्धतः ॥४॥ गत्वान्तः फवलीकत्य, स्वैरं मोदकमण्डली ।। शेष पतद्ग्रहे क्षिप्त्यो-पाश्रयं तूर्णमायपौ
।। ५ ।। स्थाने निधाय सुष्वाप, तं पतद्ग्रहकं पुनः ॥ सन धात्वा पमापेज्य, प्रयुद्धस्स गुरोः पुरः ॥६॥ भाजनप्रत्युपेशापा,
समये तत्प्रतिलेसने॥ ददृशे मोदक्श्रेणी,स्त्यानाद्वरिष पिण्डिता।गुर्वादिमिस्ततो शात्या,तस्प स्त्यानदिदुष्टताम् ॥लिझं पाराश्चि-
के दया, तथैवायं विसर्जितः ।।८॥ उक्तं द्वितीयम्।। अय तृतीय दन्तोदाहरणमुच्यते॥एका साधुर्दिवा कषित, रोदितः
परिणारिणा, प्रचण्डकरदण्डेन, नारदेनेव गर्जता ॥॥ पलाय सतत कटा-न्मृगो दायानलादिव॥ ग्रोधोपुरमनास्तूर्ण-सुपाय-
पापाययौ ॥ २ ॥ ज्वलवैव स कोपेन, रात्री स्वापमवीमजत् ॥ तदा सहधरीवास्य, स्थानाद्विरुपाययौ ॥३॥
॥ केशवा बलेनाथ, मन्यमानस्तृर्ण जगत् ॥ भक्त्वा पुरकपाटानि, पर्पटानीव तत्क्षणात् ॥ ४॥ गत्वा च हस्तिनः स्थान, केसरीव स हस्तिनम् ॥ व्यापाद्य दन्तमुशल-द्वयं जग्राह शक्तिमान् ॥ ५॥ क्रोधाग्निमपनीयाऽय, द्विपवैरनिवारणात् ॥ आगत्योपाश्रयद्वारि, क्षिप्त्वा तत् स्वपिति स्म च ॥ ६ ॥ उज्ज्वलं रुधिरा त-इन्तिनो दशनद्वयम् ॥ सपल्लवकपायद्रु-शा- खाद्वयमिवावभौ ॥ ७ ॥ प्रबुद्धः स तथारूपं, स्वयं स्वप्नममन्यत॥ स्त्यानःम्मितं चास्य, साघवो विविदुः क्षणात् टान हि स्त्यानर्द्धिपाथोधि-तरङ्गप्रसरं विना।।डिण्डीरपिण्डसङ्काश-दन्तिदन्तग्रहो भवेत् ॥९॥स्त्यानघेरुदद्याद्ग्रस्त-गुणमेनमवेत्य च॥ विससर्ज द्रुतं सङ्घने, लिङ्गमादाय धर्मधीः ॥ १० ॥ उक्तं तृतीयम् ॥ अथ चतुर्थ कुम्भकारोदाहरणमुच्यते-कश्चिदेका कुम्भकारो, गच्छे स्वच्छतरे गुणैः॥ प्रव्रज्या खलु जग्राह, कृतश्चिदपि कारणात् ॥१॥अन्यदा च प्रसुप्तं तं, स्त्यानद्धिरुपतस्थुपी। पूर्वाभ्यासं ततोऽस्मार्षी-न्मृत्पिण्डबोटनश्रमम्॥२॥ ततस्तदेकव्यापार-चिन्तासन्तापतापितः ।। शिरांस्यभांक्षीत्साधूनां, मृपिण्डानिव दुष्टधीशातद्रक्तरक्तधाराभि-धौते(पापो)ऽप्येतस्य चेतसि।।अवर्द्धताहो नितरां,सर्वतः पल्सकरः ॥४॥ साधवोऽपसृताः कोचव, पाप्मनोऽस्मात्ततो भिया।निहि ज्वलति दावानौ, पने स्थातुं किलौचिती ॥५॥ उदेक्षन्त च ते प्रातः, पाप्मनोऽस्य विजृम्भितम् ।। सर्वतः पृथिवीं दृष्ट्वा, मुण्डमण्डलमण्डिताम् ॥६॥ स्मशानवेश्मार्चनतो, नराणां मुण्डमण्डलैः ॥ स्मशानवास एवास्य, श्रेयानिति विचिन्त्य तम् ॥७॥ सङ्घः सद्धर्मनिरत-अकर्पोपाश्रयाबहिः ॥ दूषणस्य फलं मुख्य-माश्रयभ्रंश एव हि।।८।। उक्तं चतुर्थम्॥ अथ वटशाखाभञ्जनोदाहरणं पञ्चममुच्यते-साघुर्नामान्तरात्कश्चि-द्भिशा लात्वा न्यवर्तत।। तापेनाभिहतक्षेप, क्षुत्तुभ्यां बाधितस्तराम् ॥ १॥ छायां तां. सेवितुं स्निग्धां, शीतला वटभूरुहः॥ कामोपतापहृतये, कामिनीमिव कामुकः ।।२।। आगच्छन् ENA शासया नीचे-रुपतापातिविपलः॥ अपराधो दियेवासी, खेदं मेदस्विनं दधौ॥३॥अविच्छिन्नेन कोपेन, ततो गत्वा प्रतिश्रयम्।। । मेगावश्यकी कृत्या, क्रिया सुप्वाप पापधीः ॥४॥ रजन्या महतीं शक्ति, स्त्यानषिदुःखकैः ।। अभासी घटशाखा तां, । सह धर्मद्रुशाराया ॥५॥ तामानीयाश्रयद्वारि, क्षिप्त्याऽशेत पुनर्धशम् ॥ पुनः स्वप्नाभिमानी घ, जगौ सर्व गुरोः पुरः ॥६॥ द्वारि ती महती शायां, स्त्यानदिमिव रूपिणीम् ।। अवेक्ष्य लिजमादाय, गुरणा स विसर्जितः ॥७॥ उक्तं पश्चमम्।। तदेव- • पतायुदाहरणान्यायत्र सक्षपत एवम्प्रदर्शितानि- [1] पर पौटुम्विको मामे, मोसमेवारपनेकपा ॥ भुरवा धर्म म पेषाधित्, समीपे प्रतमाहीत ॥ १॥ विपरथ कृषिशमे, मदिरा पिशितार्षिभिः। विमिपमानमनाक्षीततोऽभूत्ता सस्पृहः ॥२॥सोऽयुनिशनतदाकांक्षोभुती गातो पहि भुषम् । सबरप पौरुषी वारपा, पके सुप्तस्तथा निशि ॥॥ जातसयाधिरेपोऽध, गरवा महिपमालम् ॥ हस्यक भुक्तधान, शेष- मेरप शालो, माझ्यस्योपरि पाए ॥ Mere गे स्वप्न, स्यालोषितषान्गुरो ।। दिशो पिलोषने तब, मुनिमि- मौसमीक्षितम् ॥4॥ मोऽप रपाधिमान् गारवा, लिङ्गपाराविति प्रथमम् २] साधुभिशाप्रकोऽपि, मोवाधीषप कुत्रचित् ॥६॥ विरमैतिर पस्मानलावाऽशेत तम्मना || जातहरयानरियाय, गाया तपन निशि ॥ भिषा पपाटम तिराम, मोरपाङ्गतानप ॥ पारे रस्वाभये प्राप्ता, प्रात स्पन पदयात् ॥ ne पादोमपोपल्या, ते पात्रप्रतिलेखने ॥ लिङ्गपाराधिका सोऽपि, ततो गुरुमिरामधे ९॥ इति मितीयम् ॥[पक साधुतो मिक्षा वासिता करिणा ततः॥ पलायितः पपमपि, तस्मिन् रुश्य हमवान् । तरपाधिदरवाय गत्या व्यापाप गम् ।। आनीय हातमुले, विन्यस्योराभयोपरि ॥१९॥ पुनः सुप्त प्रगे स्थान याचोऽपतपोधनष्ठा दातास विक्षातो,निपातविषाकृत ॥१२॥ तितृतीयम् ग माति परिमधित्,मामानीलकुम्भकार सुभ हत्यानधिभाषायी, मुसियाम्पासतस्तन ||१३ समीपस्थितमाret, ऐe t शिव- मेतानि दर्शितानि स्त्यानयुदये पञ्चाऽपि समयप्रसिद्धान्याहरणानि ॥ आहच-"पोग्गलमोअगदन्ते, फरुसगवडसालभजणेचेव। थोणद्धिअस्स एए, आहरणा होन्ति णायव्वा ॥२३५॥" [पुद्गलमोदकदन्ताः कुलालवटशालभञ्जने चैव ॥ स्त्यान'रेतान्युदाहर- णानि भवन्ति ज्ञातव्यानिवदेवं जागरे स्वप्ने स्त्यानौं वा मनसा प्राप्यकारिता निपिदा,अमुकत्र मे गतं मन इति प्रयोगस्त्वन्यार्थ- कत्वेन समर्थितो,वस्तुतस्त्वयं प्रयोगो भ्रान्तिमूलक एव, चक्षुर्मे चन्द्रं गतमिति प्रयोगवत्, नहि सर्वे लौकिकप्रयोगाः सत्या एव, आह च-"जह देहत्थं चक्खू, जं पइ चंदं गयंति ण य सच।।रुढं मणसो वितहा,ण य रुढी सच्चिआ सव्वा॥२३६॥"[यथा देहस्थं चक्षुर्यत्प्रति चन्द्रं गतमिति न च सत्यम् ॥ रूढं मनसोऽपि तथा, न च रूढिः सत्या सर्वा ] ॥ तदेवं व्यवस्थापिते मनसोऽ प्राप्यकारित्वे पुनः परकृतामाशङ्का परिहरति ।[*प्रतावत्र सवृत्तिषट्पञ्चाशद्गायायुतानि दश पत्राणि गतानीति लिखितमितियोजितम्] सर्वासर्वग्रहापत्ति-न चित्तेप्राप्यकारिण।। दृष्टस्यानुपपत्ती, यददृष्टं [*परिकल्प्यते ॥ ४०॥९८॥ अप्राप्यकारिणि अप्राप्यकारितया सैद्धान्तिकाभ्युपगते चित्ते मनसि, प्रतिबन्दी गृहता परेणोद्भाविता सर्वासर्वग्रहा- पत्तिः यदि विषयमप्राप्यैव मनो गृह्णीयादप्राप्तत्वाविशेषात्सर्वस्य ग्रहण स्यात्, अप्राप्तत्वाविशेषेऽपि यदि कस्यचिदर्थस्याग्रहणं स्यधीः ॥ एकान्ते न्यक्षिपत्तानि शीर्षाणि च वऽपि च ॥१४॥ शेषा अपमृता भूयः, सुप्तः स्वप्नं प्रगेऽवदत् ।। मृतान्वीक्ष्याथ साधुन्स लिङ्गपाराश्चिकः कृतः॥१५॥ इतिचतुर्थम् ॥ [२] घटस्याऽधोऽध्यना कश्चि-शिक्षाचर्यागतो मुनिः ॥भृतपायो वलन्वेगात् , क्षुत्तृड- श्रीष्मातापितः ॥ १६ ॥ तच्छाखायामास्फलितो, एस्तस्यामसौ निशि ॥ स्त्यानयुदयतो गत्या, भक्त्या शाखां समागतः ॥१७॥ विन्यस्योपाश्रयाद्वारे सुप्तः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ प्रातः स्त्यानधिमान् ज्ञात्वा लिङ्गपाराश्चिकः कृतः ॥१८॥ इतिपञ्चमम् ॥ केऽप्याहुः प्राग् वनेभोऽभूत् सोऽथ स्त्यानधिमान्नरः ॥ सजातप्राग्भयाभ्यासाद्, घटशाखां ततोऽमनक् ॥ १९ ॥ इति ॥
" तदा तथैवापरस्पाप्पाहणमिति,सर्वाग्रहणं या स्यादित्ययरूपा,न,यद यस्मारकारणाव,इष्टस्यप्रतिनियतार्थग्रहणस्यानुपपत्ती सत्या सदुपपपये,अरष्ट तत्कारणतया क्षयोपशमविशेपास्यं,परिकल्प्पतेन चैवं प्राप्पफारित्वपक्षेऽप्येवमस्त्वितियाध्यम्, अनेकप्राप्ति- कल्पनेऽपि पोपशमविशेषस्य तत्कारणतयाथपं फल्पनीयत्वेनिष्फलस्यगौरखस्यतत्कल्पनापरिपन्थिना सदायाद् ,अप्राप्यकारित्वे तु प्राप्तकल्पनालापपस्यानुकूलत्वादिति पोल्यम्॥४०॥मनसो विषयप्राप्त्यमावेऽपि फदाग्रहावेशाव्यअनावग्रहं प्रतिपादयन्पर आह- विसयमसंपतरस पि, संपिलर पंजपोग्गहोमणसो॥जमसंखेनसमइओ, उपोगो पसव्येसु॥२३७॥ समासु मणोदल्याई, गिण्डा पंजणं च दव्याई ॥ मणिगं संपंधो या तेण तयं जुए मणसो ॥ २३८॥ प्यारुपा-मर्यादिविषयमप्राप्य गृझतोऽपि मनसो प्पञ्जनावग्रहो पुज्यते, यस्मात्'च्ययमानो न जानाति' इत्यादिषपना- स्मोऽपि छपस्योपयोगोऽसदरण्येयसमपो निर्दिष्ट समये, न त्वेकरयादिसमयका, यस्मागतेपूपयोगसम्बन्धिप्यसबख्येयसमयेषु सर्वेप्यपि प्रत्येकमनन्तानि मनोद्रपाणि मनोर्गणाम्पो गृहाति जीया, द्रष्याणि प उत्सम्पन्धो या प्रागय मन्विर्यअनमुक्त, वेन तत् द्रप्पं तत्सम्पन्धो या प्यजनावग्रहो मनसो युज्यते। श्रोत्रादेरप्पसङ्ख्येयसमयगृपमाणशम्दादिपरिणतच्याणि उत्सम्य- न्धो या प्यम्जनावग्रहा, स मनसोऽपि समान इति तथा कि नेष्यत इति पराभिप्रायः ॥ २३७-२३८ ।। पियापासारपि मनसो प्यअनावग्रहमवस्थाप्येदानी तत्प्राप्त्या तं समर्थयभाह- देहादणिगस्स यि, सकापदिपपाइयं विर्णितयो॥ नेयस्स पि संपंधे, पंजणमेयं पि से जुत्तं ॥ २३९ ।। प्यापा-देहादनिर्गतसापि सत एप मेर्यापर्यमगतस्यापि स्वफायहृदयादिकमतियाभिहिवत्यारसम्बदं चिन्तयतो मनमो ज्ञेयेन स्त्रकायस्थितहृदयादिना सम्बन्धेऽपि तस्य मनसो व्यञ्जनावग्रहो युक्त उक्तमकारेणेत्यर्थः ॥ २३९ ॥ उक्तप्रकाराम्या परेण मनसो व्यञ्जनावग्रहे समर्थिते तत्र प्रथमपक्षे प्रतिनिधानमाचार्य आह- गिज्झस्स बंजणाणं, जं गहणं पंजणोग्गहो स मओ ॥ गहणं मणो न गिज्झं, को भागो वंजणेतस्स ॥२४०॥ व्याख्या-स्वपक्षपरपक्षरागद्वेपग्रहाविष्टचित्तेन परेण 'विसयमसंपत्चस्स वि' इत्यादि यदुक्तं तदसम्बद्वमेव, यतः श्रोत्रादी- न्द्रियचतुष्टयग्राह्यस्य शब्दादेस्सम्बन्धिना व्यञ्जनानां तद्पपरिणतद्रव्याणां यदुपादानलक्षणं ग्रहणं स व्यअनावग्रहोऽस्माकं सम्मत इति परो जानात्येव, एवञ्च चिन्ताद्रव्यरूपं मनो यदि ग्रामं स्यात्स्यात्तदा तद्व्यन्जनं मनसो न लेवं, किन्तु अर्थपरिच्छेदकरण- स्वरूपं ग्रहणं मनो न प्रासं, अतः को भागः कोऽवसरस्तस्य करणभूतस्य मनोद्रव्यराशेळअनावग्रहेऽधिकते, न कोऽपीत्यर्थः ॥ २४० ॥ 'देहादणिग्गयस्स वि ' इत्यादिना मनसो व्यञ्जनावग्रहप्रसाधनायोक्तो द्वितीयपक्षोऽपि न समता, स्वस्य स्वदेशेन सम्बन्धसर्वस्यापि, स्वदेशेन सहासम्बन्धे वस्तुनोऽसलमापद्येत, न च तावन्मात्रेण मनः प्राप्यकार्युपगन्तुं शस्यम्, तथा सति ज्ञानमात्रस्य स्वदेशात्मसम्बदस्य प्राप्यकारिता प्रसज्येत, तस्मात्स्वदेश, परित्यज्य बागापेक्ष्यैव प्राप्यकारित्नानाप्यकारित्व- चिन्ता फलवती, नासार्थव मनसाप्राप्त एव गृह्यत इति तस्याप्राप्यकारित्वनियमे न व्यभिचारः, मनसः स्वकीयहृदयादि- चिन्तायां प्राप्यकारिताम्युपगमेऽपि वा न व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति दर्शयत्राह- तसचिन्तणे होन, वंजणं जड़ तेओ न समयम्मि । पढमे नेव तमत्थं, गेण्डेन न यंजणं तम्हा ॥ २४१ ।। व्या० स्वकीयहृदयादिदेशचिन्तने सति मवेन्मनसो व्यजनावग्रहः यदि प्रथमसमय एवं तं सकीयहृदयादिकमयं न FREERS . शीमात्, न चैवम्, यतो मनसःप्रथमसमय एवार्थावग्रहो जायते न तु भोत्रादीन्द्रियस्येव प्रथम व्यञ्जनावग्रहा, क्षयोपशमापाटवेन थोत्रादीन्द्रियस्य प्रथम नार्थोपलब्धिरिति युज्यते तस्य व्यअनावग्रहा, चक्षुरिन्द्रियस्येव पटुक्षयोपशमत्वान्मनसोऽनुपलब्ध- कालाभावेन प्रथममर्यावग्रह एव जायत इति न व्यञ्जनावग्रहस्यावसर, अब चानुमानप्रकार इत्यम्, इह यस्य ज्ञेयसम्बन्ध सत्यप्पनुपलब्धिकालो नास्ति न तस्य ध्यअनावग्रहा, यथा चक्षुभस्तथा मनसः, वस्मान तस्य व्यअनावग्रहः, न्यतिरेके तु भोशादिष्टान्तस्तस्य शेपसम्बनपलम्मकालसम्मवाद, तत्र व्यसनावग्रहाभ्युपगमा, एक्श परोक्तपक्षद्वयस्याप्यघटमान- स्वान्मनसो व्यञ्जनावग्रहासम्मवमुपसंहरति । 'न वंजणं तम्हनि, ' तस्मादुक्तप्रकारेण मनसो न व्यअनावग्रहः ॥ २४१ ॥ प्रथमसमय एष मनमोऽर्थग्रहणम्भवतीत्यत्रोपपचिवपदर्शपति- समए समए गिण्हइ, दवाई जेण मुणा य तमत्यं ।। पिंदिलोवओगे वि, वंजणाऽवगहेतीते ।।२४२॥ होइ मणोवावारो, पढमाओ चेव तेण समयाओ ॥ होइ तदत्यग्गहणं, तदण्णहा न पवत्तेजा ॥२४३॥ प्याख्या-पेन कारणेन कस्यचिदर्थस्य चिन्तावसरे प्रतिसमयं मनोद्रव्याणि गृहाति मनोद्रव्यग्रहणशक्तिसम्पमो जीवः चिन्तनीयश्च तथा जानाति, एतत्प्रथमगायापूर्वार्थिन सह द्वितीयगाथाद्वितीयवृत्तीयचरणाएँ सम्बन्धनीयौ । ततश्च तेन कारणेन प्रथमसमयादेव मवति चिन्तनीयार्थस्य ग्रहणमित्यर्थः।अर्थानुपलन्धिकालस्त्वेकोऽपि समयो नास्ति, कुन तस्य व्यञ्जनावप्रह- इति भावः । नन्विन्द्रियव्यापाररहितस्प जीवस्य मनोमात्रेणैवार्थान्पर्यालोचयतो मा भवतु मनसो व्यञ्जनावग्रहः ओवादी- न्द्रियेणार्थान् गृहतस्तु जीवस्य मनोऽपि तत्र च्यापिपीति तन प्रथममनुपलब्धिकालसम्मवाद व्यसनावग्रहा किम स्यादित्यत आह, RECESSAGESSERECICC 'जं चिंदिओवओगे वि' इत्यादि, यस्मात् श्रोत्रादेः शब्दाद्यर्थग्रहणलक्षणोपयोगकालेऽपि व्यञ्जनावग्रहेऽतीते सति मनसो व्यापारी भवति,यथा केवलेन मनसाऽर्थचिन्तनेविग्रहादारभ्यैव मनोव्यापारस्तथा श्रोत्रादीन्द्रियेण सहापि तस्य व्यापारोऽर्थावग्रहादारभ्यैव न तु व्यजनावग्रहसमय इति न मनसस्तत्रापि व्यञ्जनावग्रहः । तत्र मनसो व्यञ्जनावग्रहे व्यापाराभ्युपगमे स व्यञ्जनावग्रहो मनसेोऽपीति मतेरष्टाविंशतिभेदभिन्नता न स्यात्, तस्मात्प्रथमसमयादेव तस्यार्थग्रहणमभ्युपगन्तव्यम् । एवमनभ्युपगमे दण्डमाह- 'तदण्णहा न प्पवत्तेजत्ति,' यदि प्रथमसमयादेव मनसोऽर्थग्रहणं नेष्यते तदा तस्य मनस्त्वेन प्रवृत्तिरेव न स्यादनुत्पत्तिरेव स्यादि- त्यर्थः, यथा भाषाऽवध्यादीनां भापमाणावयुद्धथमानलक्षणान्वर्थमुपादायैव प्रवृत्तिस्तथा प्रथमसमयादारभ्य मननलक्षणान्वर्थ- मुपादायैव मनस्त्वेन मनसः प्रवृत्तिः, अन्यथा न स्यादेव मनोऽवध्यादिवत्, तस्मादर्थानुपलब्धिसमयाभावान्न तस्य व्यञ्जनावग्रहः, श्रोत्रादीन्द्रियव्यापारकाले व्यञ्जनेऽतीत एव मनसो व्यापार इत्यत्राऽऽगमस्यापि संवादः । तदुक्तं कल्पभाष्ये-"अत्थाणं- तरचारी, चित्तं निययं तिकालविसयंति । अत्थे उ पडुप्पन्ने, विणिओगं इंदियं लहइ ॥१॥" अर्थ-शब्दादौ श्रोत्रादीन्द्रियव्यञ्जना- वग्रहेण गृहीतेऽनन्तरमर्थावग्रहादारभ्य चरति प्रवर्तते इत्यर्थानन्तरचारि मनः, न तु व्यञ्जनावग्रहकाले तस्य प्रवृत्तिरिति भावा, "त्रिकालविषयं चितं,साम्प्रतकालविषयं त्विन्द्रियम्" ॥ २४२-२४३ ॥ मनसोऽर्थानुपलब्धिकालासम्भवं सयुक्तिकं भावयन्नाह- नेयाउ चिय जं सो, लहइ सरूवं पईवसद्दव्व ॥ तेणाजुत्तं तस्सा-संकप्पियव्वंजणग्गहणं ॥ २४४ ॥ व्याख्या-यस्माज्ज्ञेयादेव चिन्तनीयवस्तुन एव मनः स्वरूपं लभते नान्यतः, तस्माद्यदि प्रथमसमयमेव तज्ज्ञेयं नावगच्छेत् तर्हि ततो ज्ञेयादुत्पत्तिरप्यस्य न स्यात्, मनुते मन्यते वा मन इत्येवं सान्वर्थक्रियावाचकशब्दाभिधेयस्य मनसः, प्रदीपयतीति - प्रदापा, शन्दयति भाषत इति शम्दा, दहतीति दहनः, तपतीति तपनः इत्येवं सान्वर्थक्रियावाचकशन्दाभिधेयप्रदीपादेः प्रदी- पनादिलक्षणार्थक्रियां कुर्वत एवात्मलाभो नान्यथा, तद्वन्मननादिक्रियां कुर्वत एवात्मलाभः, यथा च प्रदीपस्याप्रदीपनं भाषा- पाशाशब्दनमयुक्तं तथा मनसोऽप्यमननमयुक्तं, तेन कारणेन असङ्कल्पितशब्दादिविषयभावपरिणतद्रव्यलक्षणव्यञ्जनग्रहणं मनसोऽयुक्तम्, किन्तु सङ्कल्पितानामेवार्थावग्रहद्वारेणावगतानामेव शब्दादिद्रव्याणां ग्रहणं युक्तम् अतोऽर्थानुपलब्धिकालासम्भ- वान मनसो व्यञ्जनावग्रहसम्भव इति ॥ २४४ ॥ उक्तरीत्या नयनमनसोरप्राप्यकारित्वे विस्तरेण प्रसाधितेऽपि नयनस्याप्राप्यकारित्वे दूपणम्पश्यन्पर आह- जइ नयणिन्दियमपत्त-कारि सव्वं न गिण्हए कम्हा? ॥गहणागहणं किं कय-मपत्तविसयत्तसामने ॥२४५।। व्याख्या-यदि नयनेन्द्रियमप्रासकारि, तर्हि सर्वमपि त्रिभुवनान्तर्वति वस्तुनिकुरम्मं कस्मान्न गृह्णाति, अप्राप्तत्वस्य सन्निहित इगन्यत्राप्यविशिष्टत्वात्, अप्राप्तविषयत्वसामान्ये सति कस्यचिद्वस्तुनो ग्रहणं कस्यचिद्वस्तुनोऽग्रहणमित्येवं ग्रहणा- ग्रहणं किं कृतं स्यात्, प्राप्यकारित्वे तु येन सह सम्बन्धस्तस्य ग्रहणं येन च तदभावस्तस्याग्रहणामित्युपपद्यत इति ॥२४५॥ तस्मादप्राप्यकारित्वपक्षे चक्षुषो विषयपरिमाणनिपमामाव आपद्यत इत्याह- [॥२४६॥ विसयपरिमाणमनियय-मपत्तविसयंति तस्स मणसोव्व। मणसोवि विसनियमो,न कमह जओ स सव्वत्थ व्याख्या-तस्य चक्षुषोऽपरिमितं विषयपरिमाणं प्राप्नोति, अस्यां प्रतिज्ञायां हेतुमाह,अप्राप्तविषयमिति कृत्वा, मनस इवेति दृष्टान्तः, अत्रानुमानप्रयोग इत्थम्, यदप्राप्तमपि विषयं परिच्छिनास, न तस्य तस्परिमाण युक्तम्, यथा मनसा, अप्रासश्च विषयमवमच्छति चक्षुः, तस्मान्न तस्य तत्परिमाणं युक्तमिति । अत्र प्रतिज्ञाहेत्वोरनुपदर्शनश्चावयवत्रयवादिनो मीमांसका- दयोऽप्यत्र चक्षुपः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छन्तो वादितां विभ्रतीत्यभिप्रायेण, यदि नैयायिकोऽत्र वादी भवेत्तदा चक्षुर्न नियत- विषयपरिमाणं स्यादिति प्रतिज्ञा, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वादिति हेतुथोपदर्शनीयौ, अप्राप्तविषयपरिच्छेदकत्वलक्षणहेतुमतोऽपि मनसो नियतविषयपरिमाणत्वेन तदभावलक्षणसाध्यवैकल्यादुक्तानुमाने मनसो दृष्टान्तता न सम्भवतीति सरिरुत्तरयति-मनसो दृष्टान्तीकृतस्याप्राप्तकारिणो विषयनियमोऽस्त्येव, यतस्तदपि मनः सर्वेष्वर्थेषु न क्रामति न प्रसरतीति ॥२४६॥ एतदेवोपदर्शयति- अत्थगहणेसु मुज्झइ, संतेसु वि केवलाइगम्मेसु॥तं किं कयमग्गहणं, अपत्तकारित्तसामने ॥ २४७॥ व्याख्या-अर्था एव मतेर्दुष्प्रवेश्यत्वाद् गहनानि अर्थगहनानि,तेष्वनन्तेषु,सत्स्वपि विद्यमानेष्वपि,केवलज्ञानावध्यागमादि- गम्येषु कस्यचिन्मन्दमतेर्मनो मुह्यति कुण्ठीभवति,तान्सतोऽप्यर्थान् न गृह्णातीति तात्पर्यम् , तदेतदर्थानां मनसोऽग्रहणं किं कृतम् , अप्राप्तकारित्वसामान्ये तुल्येऽपि,इति परम्प्रति सूरेः पृच्छा, तस्मात्साध्यविकलो दृष्टान्त इति ॥२४७॥ अप्राप्तत्वाविशेपेऽपि यत एव कारणाद्विपयपरिमाणनियमं मनसि परो यात्तत एव चक्षुष्यपि विषयपरिमाणनियमस्सूपपाद इत्याशयवान् सरिराह- कम्मोदयओ व सहा-वओ व नणु लोयणे वि तं तुल्लं ॥तुल्लो व उवालंभो, एसो संपत्तविसए वि ॥२४८॥ व्याख्या-यत्केपाश्चिदर्थानां मनसोऽग्रहणं तत् तदावरणकर्मोदयाद्वा, स्वभावाद्वा, इति परो ब्रूयात् , नन्वेतल्लोचनेऽपि तुल्यम्, यतस्तदप्यप्राप्यकारित्वे तुल्येऽपि कर्मोदयात् , तत्स्वाभाव्याद्वा कांश्चिदेवार्थान् गृह्णाति न सर्वानिति न परोक्तपणम् , अथवा “यत्रोभयोस्समो दोपः,परिहारोऽपि वा समः।। नैकापर्यनुयोज्यः स्यात, तादृश्यर्थविचारणे ॥१॥" इति वचनात् चक्षु- NEL मनसोः प्राप्यकारित्वमभ्युपगच्छतो मते चक्षुपाऽतिसम्प्राप्ताञ्जनादेः किमिति न ग्रहः मनमैकदैव सम्प्राप्तानां घटपटादीनां किमिति न ग्रहो मेर्वादेरतिव्यवहितस्यापि ग्राहकस्य मनसो न कुत्राप्यसम्प्राप्तिरिति दोपोद्धाराय कर्मोदयस्य स्वभावस्य वा प्रतिनियतपदणे नियामकत्वं परेण तदुभयप्राप्यकारित्ववादिना वाव्यं तन्नयनस्याप्राप्यकारित्ववादिनाऽपि वक्तुं शक्यमेवेवि दोपपरिहारयोस्समत्वेन नात्र वादिना यत्नो विधेय इति भावः ।। २४८ ॥ ततश्च यद्वयवस्थितं तदाह- सामत्याभावाओ,मणोव्व विसयपरओन गिण्हेइ । कम्मक्खओवसमओ, साणुग्गहओ य सामत्थम् ॥२४९॥ व्याख्या-चक्षुः सिद्धान्तनिर्दिष्टनियतविषयपरिमाणात्परतो न गृह्णातीति प्रतिज्ञा, सामर्थ्यामावादिति हेतुः, मनोवदिति दृष्टान्ता,तदावरणकर्मक्षयोपशमात्स्वानुग्रहतश्य सामर्थ्य येवप्राप्तेष्वर्थेषु चक्षुपस्समस्ति तेपामप्राप्तानामपि चक्षुपा ग्रहणम्, येषु चाप्राप्तेपूक्तसामर्थ्य नास्ति तेषां चक्षुषा न ग्रहणमित्यर्थापत्या लम्यते, अनुग्रहय चक्षुपो रूपालोकमनस्कारादिसामग्रीतो भवति, तस्माद्व्यवस्थितमप्राप्यकारित्वं नयनमनसोः, स्पर्शनादीनां चतुर्णामेवेन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रह इति तस्य चतुर्विधत्वम् ॥ २४९ ॥ व्यञ्जनावग्रहस्य स्वरूपं नन्यध्ययनागमसूत्रे प्रवियोधकमल्लकोदाहरणाम्यां "वंजणोग्गहस्स परूवर्ण करिस्सामि पडियोह- गदिढतेण मल्लगदिहतेण य" इत्यारम्य "जाहे तं वंजणं परियं होइ, ताहे हुँ ति करेइ, नो चेव ण जाणाइ के वेस सदाइ इत्यन्तग्रन्थेन प्रतिपादितं तदेवमस्य व्यञ्जनावग्रहस्वरूपप्रतिपादकस्य नन्दिसूत्रस्य शेष प्रायः सुगममिति मन्यमानो भाष्यकार: 'जाहे तं वंजणं परिय होइ" इत्येतद्व्याचिख्यासुराह- तोरण मल्लग पिव, वंजणमापूरिय तिजं भणियं ॥ तं दत्वमिंदियं वा, तस्संजोगो व न विरुद्धम् ॥२५०॥ " व्याख्या-'जं भणियं' यदुक्तं नन्दिसूत्रकारेण, किं तत्, इत्याह, व्यञ्जनमापूरितमिति, केन किंवत् , इत्याह-तोयेन जलेन मल्ल शरावं तद्वदिति, तस्मिन् सूत्रकारभणिते व्यञ्जनं द्रव्यं गृह्यते, इन्द्रियं वा, तयोर्वा द्रव्येन्द्रिययोः संयोगः सम्बन्धा, इति सर्वथाऽप्यविरोधः, त्रिष्वपि व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनमित्यस्या व्युत्पत्तेर्घटनात् ॥२५०॥ व्यञ्जनशब्दवाच्येपु त्रिष्वपि द्रव्यादिषु प्रत्येकमापूरितत्वे विशेषमुपदर्शयति- दव्वं माणं पूरिय-मिंदियमापूरियं तहा दोण्हं ।। अवरोप्परसंसग्गो, जया तया गिण्हइ तमत्थं ॥२५१॥ व्याख्या-दव्यंति,द्रव्यव्यञ्जनेऽधिकृते 'जाहे तं वंजणं पूरियं होइ' इत्यस्यार्थः शब्दादिद्रव्यस्य प्रमाणं प्रतिसमयप्रवेशेन प्रभूती- कृतत्वात् स्वप्रमाणमानीतं प्रकर्षमुपनीतं स्वग्राहकज्ञानोत्पादे समर्थीकृतमिति यावत्,अथेन्द्रियमितीन्द्रियव्यञ्जनेऽधिकृते तु तदर्थः तदा पूरितं व्याप्तं भृतं वासितमित्यर्थः, द्वयोः द्रव्येन्द्रिययोः सम्बन्धलक्षणव्यञ्जनेऽधिकृते पुनः, तयोः परस्परं सम्यक्सम्बन्ध इति तदर्थः, द्रव्येन्द्रियसम्बन्धलक्षणव्यञ्जनपक्षे द्रव्येन्द्रिययोः परस्परमतीवसंयुक्तता वा अङ्गाङ्गीभावेन परिणाम एव सम्बन्धलक्षणव्यञ्जन- स्यापूरणम्, यदोक्तप्रकारत्रयेण त्रिविधमपि व्यञ्जनमापूरितं भवति, तदा तं नामजात्यादिकल्पनारहितं विवक्षितं शब्दाद्यथं गृह्णाति, एतच 'ताहे हुँ ति करेइ' इत्यस्य व्याख्यानं, अयमेवार्थावग्रह एकसामयिका, व्यञ्जनावग्रहस्तु द्रव्यप्रवेशादिरूपत्वादान्तौहूर्तिकः इति ॥ २५१ ॥ अर्थावग्रहो यादृशमथं गृह्णाति तमुपदर्शयति- सामन्नमणिदेसं, सख्वनामाइकप्पणारहियं ॥ जइ एवं जं तेणं, गहिये सद्देत्ति तं किह णु ? ॥ २५२ ॥ व्याख्या सामान्यविशेषात्मकस्य वस्तुनो रूपादेः स्वरूपनामजातिगुणक्रियाद्रव्यकल्पनारहितत्वेन शब्दानमिलाप्यं सामा- न्यरूपमेवैकसामयिकत्वेन विशेषग्रहणाऽसमर्थोविग्रहो गृह्णाति, एवमुक्ते पर आह-ययेवं व्याख्यायते भवद्भिः तर्हि यन्नन्ध. ध्ययनसूत्रे प्रोक्तं " तेणं गहिये सदेत्ति" उपलक्षणत्वादित्थं सम्पूर्ण द्रष्टव्यम्-"से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सई सुणेजा तेणं सदेति उग्गहिए, न उण जाणइ के वेस सदाइति" ' किह णु त्ति' तदेतत्कथमविरोधेन नीयते, उपदर्शितनन्दिसूत्रे तन प्रतिपत्रार्थावग्रहेण शन्दोऽवगृहीत इति प्रतिपाद्यते भवद्भिस्तु शब्दायुल्लेखरहितं सामान्यमवगृह्णातीत्युच्यत इति विरोधः स्पष्ट एवेति भावः ।। २५२ ।। अत्रोत्तरमाह- सद्दे ति भणइ वत्ता, तम्मत्तं पा न सहबुद्धीए ॥ जइ होइ सहयुद्धी, तोऽवाओ चेव सो होजा ॥ २५३ ॥ व्याख्या-शब्दस्तेनावगृहीत इति यदुक्तं तत्र शब्द इति वक्ता प्रज्ञापकः सूत्रकारो वा भणति प्रतिपादयति अथवा तन्मात्र शब्दमात्रं रूपरसादिविशेपव्याच्याऽनवधारितत्वाच्छन्दठयाऽनिश्चितं गृहातीति, एतावतांशेन शब्दस्तेनावगृहीत इत्युच्यते, न पुनः शन्दबुदया, शब्दोऽयमित्यज्यवसायेन वच्छन्दवस्तु तेनावगृहीत, शब्दोलखस्यान्तर्मुर्तिकत्वात्, अर्थावग्रहस्य त्वेकसा- मयिकत्वादसम्भव इति भावः, यदि भवति शन्दबुद्धिरावग्रहे शब्दनिश्चयस्स्यात्, तदा, अपाय एवासौ भवेत् , न त्वर्थावग्रहः, निशपस्यापापरूपत्वाद, एवं सत्याग्रहेहयोरभाव एव स्यात्, न चैवं दृष्टमभ्युपगम्यते वा ॥ २५३ ॥ ननु प्रथमसमय एव शब्दोऽयमिति शानमर्थावग्रहः, तता माधुर्यादयः शशब्दधर्मा इह घटन्ते न तु खरकर्कशत्वादयः साधर्मा इति विमर्शयुद्धिरीहा, तम्माच्छा एवापं शन्द इत्यपाय इत्येवमभ्युपगमेनावग्रहेहयोरभावप्रसङ्गः 'वेणं सदेसि उम्गाहिए' इति यथाश्रुतार्थक एवोपपद्यते 'नो चेत्र णं जाणइ' इत्यादिरप्पविरोधः, इत्येतत्परोक्तमन्य परिषयवि- - जइ सहधुद्धिमत्तय-मवग्गहो तव्विसेसणमवाओ॥ नणु सहो नासदो, न य रूवाई विसेसोऽयम् ॥ २५४ ॥ व्याख्या यदि शब्दोऽयमिति निश्चयज्ञानमप्यवग्रहः शाल एवायं शब्द इत्यादिविशेपज्ञानमवायो भवताऽङ्गीक्रियते, तर्हि मतिज्ञानस्य प्रथमभेदोऽवग्रहो न स्यादेव, विशेषज्ञानस्यापायरूपतया भवताऽपि स्वीकृतत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्य शब्द- वलक्षणविशेषग्राहकत्वेनापायत्वस्यैव भावात् , यथा च शब्दत्वस्यावान्तरसामान्यरूपतया शावत्वादिकं विशेष इति तज्ज्ञानस्या- पायता, यतः शासत्वेनाशाङ्घच्यवच्छेद इति कृत्वा शाङ्खत्वं विशेष इति, तथैव महासामान्यस्यावान्तरसामान्यतया शब्दत्वादिक- मपि विशेषस्तेनापि नाशब्दो न रूपादिरयमित्येवमन्यविशेषव्यावृत्तिः क्रियत इति तज्ज्ञानस्यापायतैवेत्याह-'नणु' इत्यादि, नन्वित्यक्षमायां, परामन्त्रणे वा, शब्दत्वस्य रूपत्वादिना विरोधातानिश्चयेन रूपादिरिति निश्चयस्यावश्यम्भावादित्याह-न च रूपादिरिति रूपादिव्यावृत्तिनिश्चयवलादेव रूपोऽयमिति निश्चयस्ततो नारूपोऽयमिति निश्चयस्ततोऽपायत्वेऽस्य निर्णीतेऽवग्रहा- भावप्रसङ्गः, अवग्रहत्वेन कक्षीकृतस्यापायत्वस्यैव भावादिति भावः ॥ २५४ ॥ स्तोकविशेषग्राहकत्वेन शब्दोऽयमिति निश्चयस्यावग्रहत्वं ततोऽधिकविशेषग्राहकत्वेन शाङ्ख एवायमितिनिश्चयस्यापायत्वमित्ये- वमवग्रहापाययोपियविभागमवलम्ब्यावग्रहसमर्थनं यदि परः कुर्यात्तदा शाहोऽयमितिनिर्णयस्यापि तदुत्तरोत्तरमन्द्रमधुरत्वादि- तरुण-मध्यम-वृद्ध-स्त्री-पुरुषसमुत्थत्वावगाहिनिर्णयापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वमेव स्यादित्यपायाभावप्रसङ्ग इत्याह- थोवमियं नाऽवाओ, संखाइविसेसणमवाओ त्ति ॥ तन्भेयावेक्खाए, नणु थोवमेवे त्ति नावाओ ॥२५५ ॥ अवतरणावेदितार्थेयं गाथेति ॥ २५५ ॥ उत्तरज्ञानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहिणो निर्णयस्यावग्रहत्वाभ्युपगमे उत्तरोत्तरज्ञान- स्थापि तदुत्तरोत्तरशानापेक्षया स्तोगविशेषग्राहकत्वेनावग्रहत्वप्राप्तो विशेषाणामनन्तत्वेन यदपेक्षयोपरविशेपो न भवत्यवेत्यस्या. गम्भानोतरोत्तरविशेषनिर्णयेऽपि तदुत्तरोनरपिशेषाकाडायास्सद्भावतोऽन्तिमविशेषावगमोऽयमेरेति निर्णयस्य कर्तुमशक्यत्वेन शाहाध्यमित्यादिनानानामपि स्वोत्तरविशेषग्राहिमानापेक्षया स्तोकविशेषग्राहकत्वेनायग्रहत्वेऽपायामायप्रसङ्गस्सुस्पष्ट एवेत्याह- एष सुयाहुणायि काले-ण सव्यभंगावहारणमसझं । जम्मि हयेन अचाओ, सन्चो थिए उग्गही नाम ॥२५६|| व्यापा-इति शन्द उपदर्शनार्थः, यथा शादोऽयं शब्द इति युद्धी शब्दगतविशेपारधारणमिदानीमसाप्यं मन्द्रत्याधु- परोनरसहविशेपसद्भावात् , तेन स्तोगविशेषग्राहिलेने नापापा किन्त्यवग्रहस्तथा सुपहुनापि कालेन सर्वेणापि पुरुषायुपा शब्दमत- मन्द्रत्याधुपरोपराविशेषावधारणं तद्रेदानासनन्तत्वेनासाध्यं, यस्मिन्यिशेपारधारणेन्यविशेषाकाहानिया पायत्वम्मदेव, तस्मा- रगर्योऽपि विशेषायगम उपरोनरापेक्षया स्तोगत्वाद्भवदभिप्रायेणार्थावग्रह एवं स्पाछब्दोऽयमिति निश्यवनापाय इति ॥२५६॥ अथ शम्द एवायमितिज्ञानमविग्रहतया परसम्मतमपि तदीहापूर्वकमेव ततो नास्यार्थावग्रहत्त्वसम्भव इत्याह- किं सहो क्रिमसदो-तणीहिए मह एप किह जुत्तं ॥ अह पुल्यमीहिणं, सदोति मपं सई पुन्य ६ २५७ ११ प्पागपा-किं शब्दोऽयम्, आहोसिन् अशन्दो रूपादिः,इत्येवं पूर्वमनीहिनेऽकस्मादेव शम्द एवेति निश्पज्ञानं कथं युक्तम् , विमर्थपूर्वकस्य तस्य नमन्तरेण न सम्भया, अन्यव्यायत्तिग्रहणे सत्येव विशेषरूपेण नियया, अन्यष्यात्तिग्रहणश्च न विमर्श विना शिमयदेति, अथ निषयकालारपूर्वमीहित्वा सन्द एवायमिति निषयज्ञानं भवतोऽप्यभिमतं तर्हि निधयशानारपूर्वमीहा मान- नवोऽपि सिदा ॥ २५७ ॥ ततः किमित्यपेक्षायामाह- MARA किं तं पुब्वं गहियं, जमीहओ सद्द एव विण्णाणं ॥ अह पुत्वं सामण्णं, जमीहमाणस्स सहोत्ति ॥ २५८ ॥ व्याख्या-शब्द एवायमिति निश्चयस्येहापूर्वकत्वे त्वयाऽभ्युपगते तत्र वक्तव्यं किमीहायाः पूर्व तद्वस्तु प्रमात्रा गृहीतं यस्मिन्नीहिते शब्द एवायमिति निश्चयप्रवृत्तिः ज्ञात एव वस्तुनि भवतीहा नाज्ञात इत्याशयः, उत्तरदानेऽसमर्थे परे स्वयमेवो- स्प्रेक्ष्य तन्मतमाशङ्कते, अथ-घूयात्परः सामान्यं नामजात्यादिकल्पनारहितं वस्तुमात्रमीहायाः पूर्व गृहीतं, यदीहमानस्य शब्द इति निश्चयज्ञानमुत्पद्यत इत्यर्थः ।। २५८ ।। अत्र सूरिः स्वसमीहितसिद्धिमुपदर्शयन्नाह- अत्थोग्गहओ पुव्वं, होयव्वं तस्स गणकालेणं ।। पुव्वं च तस्स वंजण-कालो सो अत्थपरिसुण्णो ॥२५९॥ व्याख्या-ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणन्तदस्मन्मतेविग्रह एकसामायिकः तस्य कालो य एकसमयस्तेनैव ग्रहणकालेन भवताऽपि सामान्यग्रहणकालस्य व्यवहृतावस्मन्मतसिद्धार्थावग्रह एव भवतोऽप्यभिमत इति न शब्दोऽयमिति ज्ञानस्यार्थावग्रह- त्वं स्यादतस्तदनुरोधेनास्मदभिमतार्थावग्रहात्पूर्वमेव भवदभिमतेन ईहायाः पूर्व गृह्यमाणस्य सामान्यस्य ग्रहणकालेन भवितव्यं, अस्मदभिमतार्थावग्रहस्य पूर्व व्यञ्जनकालः व्यञ्जनानां शब्दादिद्रव्याणामिन्द्रियमात्रेणादानकाला, सोऽर्थपरिशून्यः न हि तत्र सामान्यरूपो विशेषरूपो वाऽर्थः प्रतिभाति, तदा मनोरहितेन्द्रियमावव्यापारात्, अत ईहायाः पूर्व यत्सामान्यग्रहणमर्थावग्रहत्वे- नास्माभिरुपेयते तत्तथैव भवताऽप्युपेयमिति, तस्यार्थावग्रहत्वे सिद्धं शब्द एवायमिति निर्णयस्यान्वयव्यतिरेकधर्मपर्यालोचनरूपेहो- तरकालभाविनोऽपायत्वमिति ॥ २५९ ॥ "न उण जाणइ के वेस सदोति" इति नन्दिसूत्रानुरोधाच्छन्दोऽयमिति ज्ञानं प्रथ- मतोऽभ्युपगमनीयमेव अन्यथा तथा सूत्रनिर्दिष्टस्यायुक्तत्वं स्यादित्याशयेन पर आह- FRI AMAnnar जाममोतिन गहिये, न उजाणइ जंक एस महोत्ति॥ तमजुत्तं सामपणे, गहिए मग्गिजा विसेसो ॥२६०॥ व्याख्या यदि प्रथममेव शन्दोऽयमित्येवं तद्वस्तु न गृहीतं, तर्हि 'न उण जाणइ के येस सदोचि'इति यत् नन्दिसूत्रे निर्दिष्टं तदयुक्तं, यता शब्दमामान्ये रूपादिव्यावृते गृहीते सति पश्वान्मृग्यतेऽन्विष्यते विशेषः, 'किमयं शब्दः शाखः उत शाई इति, 'न उण' इत्यादिना सूत्रे विशेषस्यैवापरिज्ञानमुक्तं, शब्दसामान्यमात्रग्रहणं त्वनुज्ञातमेव, सामान्याग्रहणे विशेषमार्गणासम्भवात्, विशेपजिज्ञासायो सामान्यज्ञानस्य कारणत्वात् ।। २६० ॥ अत्रोचरमाह- सव्यत्य देसयंती, सदो सदोत्ति भासओ भणइ ।। इहरा न समयमेत्ते, सदोत्ति विसेसणं जुत्तम् ॥२६१॥ व्याख्या सर्वत्र पूर्वस्मिन् अत्र च मयावयवे, अयग्रहस्वरूपं प्ररूपयन भापक प्रज्ञापक एवं शब्दः शब्द इति वदति, न त्ववाहे शब्दप्रतिभासोऽस्ति, अन्यथा समयमात्रेऽवग्रहकाले शन्द इति विशेषणं न युक्तम्, शब्दनिश्रयस्यान्तर्मुर्तिकत्वात्, सांध्याहारिकार्यावाहमाश्रित्य वा मूत्रमिदं व्याख्यास्यते ।। २६१ ॥ मूत्रावलम्बिनम्प्रति सौषमेव परिहारमाह- अहघ सुए पिय भणिपं, जह कोइ सुणेज सहमवत्तं । अब्वत्तमणिसं, सामण्णं कप्पणारहियं ॥२२॥ व्यापा-अथवा स्त्र एव भणितं प्रथमपव्यक्तस्यैव शब्दोदेसरहितस्य शन्दमात्रस्य ग्रहणम्, तत्प्रतिपादकत्रावयवमुछि- गति-जह कोई मुणेन सदमव 'ति अस्य नन्यध्यपन इत्यमुपन्यासः “से जहा नामए के पुरिसे अव्वत्तं सदं मुणे- ज्जति " तश्राव्यक्तमित्यनिर्देश्य, तदपि सामान्यं, तध नामजात्यादिकल्पनारहितम्, शाश्यशामेदापेक्षया शब्दोष्टयस्याप्य- प्पक्तत्वमिति नाशकनीयं, स्वप्रहस्पानाकारोपयोगरूपतयैव भगनान्, अनाकारोपपोगो हि सामान्यमात्रविषयक एव, - इति भावः ॥ २६३ ।। अत्रोचरमाह- - किश्च शब्दोऽयमित्यस्य प्रथममेव स्वीकारे तस्यापायरूपत्वेन तत्पूनियनयोलग्रहेहपोरमानप्रमङ्ग इत्यस्य पूरमुपदायतलाग न प्रथमं तस्य भावः ॥ २६२ ॥ अथ सरिरुत्प्रेक्ष्य पराभिप्रायमाशकते- अहवमई, पुवंचिय, सो गदिओ वंजणोग्गहे नेणं | जणोन्गदम्मिवि, भणियं निषणाणमयत्तं ॥२६॥ व्याख्या-अथवा परस्यैपा मतिः यदुत सोऽव्यक्नोऽनिर्देश्यादितरूपः शब्दोविग्रहात्मा ज्यअनावग्र नेन श्रोत्रा गृहीतः, यस्माद्व्यअनावग्रहेऽपि भवनिरव्यक्तं विशानमुलम्, शानस्पान्यरतना चापकाविषयग्रहण एवोपपान अयि तयं अव्वतं, न उतं गिण्हइ सयपि मो भाणियं ॥नउ अन्गहिगम्मि जइ,मनोनि निमेमणंयुद्धी २६४ व्याख्या-अस्ति श्रोतुय॑जनानग्रहे, तद् अव्यक्त पानं न पुनरसी आतापविमोषम्यान गन् रपमपि गृहानि मोदयते, एतन प्रागपि भणितम् “ सुन-मनाइमुगुमनोहोल " इनि बननाद, तपा, "मुताओं मयं नियमिानं नागपुनमंति" इति वचनाम, तस्माद्यञ्जनमात्रस्यैत नत्र ग्रहणं, न शन्दस्य, अनाहतान्यमानुपामेरा, न नमामागायो माई ऽगृहीतेऽकस्मादेव शब्दः इति विशेषणवृदियुज्यते, अनुस्वारस्यालाक्षपिकवं,जस्याः प्रथमती मोपका पागनन्गः।२६४ व्यञ्जनावग्रहेऽव्यक्तशब्दरूपार्थमाने दोपमुपदर्भगनि- अत्यो त्ति विसयगहणं,जड़ तम्मिपि मो न बंजणं नाम ।। अन्योन्गही नियनओ,अमिमोसंरगेगानि२६॥ व्याख्या-अर्यानप्रडे अर्थ इत्यनेन विषयस्य रूपाहियेनानिरिकमायाकन दामिनम् , यदि अपि ग्यअनारयाऽभावव्यक्तभन्दा प्रतिभामत इत्पभ्युपगम्यते, तदा न व्यञ्जनं नाम व्यअनावग्रहो न स्यादित्या, एयश्च पानारदकोच्छिघेत, व्यञ्जनमात्र सम्बन्धस्यैव तत्रोक्तत्वात् , भवता तु तत्राच्यक्तशब्दरूपार्थग्रहणस्याभिधीयमानत्वात् , अध्यक्त गन्दग्रहणेत्यमापर्यावग्रह एव, एवमपि स्रोक्तत्वाद् व्यअनावग्रहत्वे द्वयोरपि व्यअनार्यावग्रहयोरविशेषः स्याद, मेचक- पाणिप्रभागात्सरी पा स्यादिनि ।। २६५ ।। एतापता व्यअनायग्रहे व्यअनसम्पन्धमात्रम्, अर्थावग्रहे पव्यक्तशब्दापर्थस्यैव ग्रहण न तु व्यक्तमन्दायर्धग्रहणमिति प्रतिपादितम् , इदानीमर्थावग्रहे युक्त्यन्तरेण व्यत्तशम्दापर्थसंवेदनं निराकरोति- जेणत्याग्गहकाल, गहणेहावायसंभयो नत्थि ॥ तो नधि सयुद्धी, अहत्थि नायग्गहो नाम ॥२६६ ।। व्याख्या-येनार्धापग्रहकाले क्रमोरिपत्गुस्वभावानामर्थग्रहणेहापायानां मतिज्ञानभेदानां सम्भवो नास्ति, ततोऽर्थावग्रह नास्ति पद इति विशेषद्धिा, तस्या अपायरूपाया अर्थग्रहणेहार्यकत्वात् , अथास्त्यसो तत्र, तर्हि नायमर्थावग्रहः किन्त्यपाय एव स्यात्, वयाप्युपगमे त्मविग्रहेहयोरभाव एव स्यात् ।। २६६ ॥ अविग्रह शन्द इति विशेषयुदधुपगमे दोपान्तरमाह-. मामण्णतपण्णयिम-महा-पत्रण-परिग्गहणओ से ।। अयोग्गहेगसमओ-घओगपालमावणं ॥ २६७॥ व्याया- अर्थावग्रहकममये मत्तोपगम्यमाना निश्वयरूपा शब्द इति विशेषपुद्धिरकस्मादनुपजायमानाऽव्यक्रशन्दसामान्य- प्रहणसम्दमामान्पाविशेषसम्दान्यरूपादिविशेषधर्मालोचनलक्षणेहास्मादिविशेषधर्मपरिवर्जनशम्दविशेषधर्मपरिग्रहणतः श्रोतुरुपजा- पत इत्यर्धारग्रहकममये उपयोगमा ल्यमापनम्, न चैनयुक्तम्, उपयोगयोगपधाभाषप्रतिपादकागमविरोधादिति नार्थापग्रहकाले मन्द हवि शिषधि किन भन्द इनि प्रयापको भगतीति मिदम् ।।२६७॥अथास्मिधेगावग्रहे परवायमिप्रायं निराचिकीराह- अण्णे सामण्णग्गह-णमाहु बालस्स जायमेत्तस्स॥समयम्मि चेव परिचय-विसयस्स विसेसविन्नाणं ॥२६८॥ अन्ये वादिन एवमाहुः-जातमात्रस्य तत्क्षणजातमात्रस्य बालस्य सङ्केतादिविकलत्वेनापरिचितविषयस्य सामान्यमात्रस्या- शेषविशेषविमुखस्याव्यक्तस्य सामान्यस्य ग्रहणमालोचनम्, परिचितविषयस्य तु, समय एवाद्यशब्दश्रवणसमय एव, विशेषविज्ञानं जायते, ततस्तमाश्रित्य "तेणं सदे त्ति उग्गहिये" इत्यादि यथाश्रुतमेव व्याख्यायते न कश्चिदोष इत्याशयः॥२६८॥अनोत्तरमाह- तदवत्थमेव तं पुव-दोसओ तम्मि चेव वा समये ॥ संखमहुराइसुबहुय-विसेसगहणं पसज्जा ॥ २६९ ॥ 'जेणत्थोग्गहकाले 'इत्यादि 'सामण्णतयण्णविसेसेहा' इत्यादिग्रन्थोक्तपूर्वदोपतस्तदेतत्परोक्तं, तदवस्थमेव दूषितावस्थमेव, नान्यदूषणाभिधानप्रयासोऽत्राभिधेय इत्याशयः, वा अथवा, तस्मिन्नेव समये शब्दोऽयमित्येकोपयोगसमय एव शङ्खमधुरादि- सुबहुविशेषग्रहणं प्रसज्येत, 'न पुण जाणइ के वेस सद्दे' इतिसूत्रावयवस्य सर्वप्रमातृन्प्रत्यविशेषेण प्रवृत्तस्य विरोधेन कस्यचित्प्रथम- समये एव सर्वविशेषविषयकं ग्रहणम्भवत्येवेत्यम्युपगन्तुमशक्यमेव,शब्दरूपधर्मिग्रहणमन्तरेण प्रकृष्टमतेरप्युत्तरोत्तरबहुधर्मग्रहणत्वा- सम्भवादिति ॥ २६९ ॥ एकसमये शब्दोऽयमितिविज्ञानमभ्युपगच्छन्तम्प्रति समयविरोधादिदोपान्तरमुपढौकयति- अत्योरगहो न समय,अहवा समओवओगवाहुल्लं॥सव्वविसेसग्गहणं, सव्वा विमइरवग्गहो गिज्झो ॥२७०॥ एगो वाऽवाओ चिय, अहवा सोऽगहियणीहिए पत्तो । उक्कम-वइक्कमा वा पत्ता धुवमोग्गहाईणं ॥२७१॥ सामण्णं च विसेसो, सो वा सामण्णमुभयमुभयं वा ।। न य जुत्तं सव्वमियं, सामण्णालंवणं मोत्तुं ॥२७२॥ विशेषविज्ञानस्यासङ्ख्येयसामयिकत्वेनार्थावग्रहे विशेषविज्ञानाभ्युपगमे " उग्गहो एक्कं समयं” इति सिद्धान्तनिर्दिष्टः सामयिकोऽसौ न स्यात्, अथवा " सामण्ण-तयण्णविसेसेहा ॥२६७॥" इत्यादिपूर्वग्रन्योक्तं समयोपयोगबाहुल्यं साव, अथवा परिचितविपयस्य विशेषविज्ञानेऽभ्युपगम्यमाने परिचिततरविषयस्य तस्मिन्नेव सर्वविशेषग्रहणमनन्तरोतं प्रसज्येत, अथवा सर्वाऽपि मतिरवग्रहो ग्राह्यः प्राप्तः स्यात, विशेषविषयकत्वेन वा सर्वाऽपि मतिरपाय एव स्यात्, एवं सत्यपायस्यैक- सामयिकत्वप्राप्तौ "ईहावाया मुहुत्तमन्तं तु" इति विरुध्यते । अथवा तथाऽभ्युपगमेऽनवगृहीतेऽनीहितेऽपायः प्राप्तः। एवश्वावगृहीते ईहिते चाऽपाय इत्युपपादकस्य सिद्धान्तस्य विरोधा, अथवा पाटक्वैचियेणावग्रहहाऽपायधारणानां ध्रुवमुत्क्रमव्यतिक्रमौ स्याताम् , 'पयानुपूर्वीभवनमुक्रमः, 'अनानुपूर्वीभावस्तु व्यतिक्रमा, एवमुपगमे "उग्गहो ईहा अवायो य, धारणाएव दोन्ति चत्तारि" इति परममुनिनिर्दिष्टस्य तेषां क्रमस्य विरोधः स्यात्, तथा यत्प्रथमसमये गृह्यते स विशेष इतिनियमाऽभ्युपगमे सामान्य विशेषरस्यात् प्रथमसमये सामान्यस्यैव ग्रहणात् , अथवा प्रथमसमये सामान्यमेव गृह्यत इति वस्तुस्थितिमाश्रित्य भवन्मते प्रथमसमये गृह्यमाणो विशेषः सामान्यं स्यात्, अथवा सामान्यं विशेपश्चेत्युभय, उभयं वा स्यात्, सामान्य सामान्यविशेषोभयरूप, विशेषश्च सामान्यविशेषोमयरूपः स्यात्, तथाहि, 'अव ईपत् सामान्यं गृहातीत्यवग्रह' इतिव्युत्पत्या वस्तुस्थितिसमायातं यत्सामान्यं तत्स्वरूपेण तावत्सामान्यं भवदम्युपगमेन तु विशेष इत्येकस्यापि सामान्यस्योभयरूपता, तथा योपि भवदम्यु- पगतो विशेषः सोऽपि त्वदभिप्रायेण विशेषः, वस्तुस्थित्या तु सामान्यम्, इति विशेषस्याप्येकस्योमयरूपता, अर्थावग्रहस्य सामा- न्यमालम्बनं मुक्त्वा न च युक्तं सर्वमिदम्, अघटमानकत्वात्, पूर्वोक्तस्यापि दपणस्यात्र प्रसङ्गापातत्वेन नपौनरुक्त्यावहस्वमिति ॥ २७०-२७१-२७२ ॥ प्रथमं सामान्यमात्रग्राहि आलोचनाज्ञानं तदनन्तरं रूपादिविशेषव्यावृत्तशब्दत्वग्राही अर्थावग्रह ~ RECORIES इति केपाश्चिन्मतं निराकर्तुमुपन्यस्यति- केइदिहालोयणपु-व्वमोग्गहं बेति तत्थ सामण्णं ।। गहियमहत्थावग्गह-काले सद्देत्ति निच्छिण्णं ॥२७३ ॥ केचिद्वादिन इहास्मिन् प्रक्रमे आलोचनपूर्वमालोचनं पूर्व यत्र स तथा तं आलोचनपूर्वकमित्यर्थः । तथाभूतमवग्रहं ब्रुवते प्रथममालोचनाज्ञानं ततोऽर्थावग्रह इत्येवं व्याचक्षते, तथा च तैरुक्तम्-"अस्ति द्यालोचनाज्ञानं, प्रथमं निर्विकल्पकम् ॥ बालमूकादिविज्ञान-सदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥१॥” इति तत्र आलोचनाज्ञाने सामान्यमव्यक्तं वस्तु गृहीतं, प्रतिपत्रेति गम्यते, अथानन्तरम्, अर्थावग्रहकाले निच्छिन्नं पृथक्कृतं रूपादिभ्यो व्यावृत्तं शब्दविशेषणविशिष्टं तदेव, गृहीतमित्यनुवर्तते, एवमुपगमे "से जहानामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सई सुणेजा" इत्येतदालोचनाज्ञानापेक्षया नीयते 'तेणं सदे ति उग्गहिए' एतत्त्व- विग्रहापेक्षयेति सर्व सुस्थम् ।। २७३ ॥ तदेवं वादिनमीषद्ध्मातमज्ञं विज्ञाय परं मार्गावतारणाय विकल्पयन्नाह सरिः- तं वंजणोग्गहाओ, पुव्वं पच्छा स एव वा होज्जा । पुव्वं तदत्थवंजण-संबन्धाभावओ णत्थि ॥२७४॥ तद्भवदुत्प्रेक्षितमालोचनं व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व पश्चात्स एव वा भवेत् , स्थानान्तराभावात्, अर्थव्यञ्जनसम्वन्धाभावात्पूर्व तावत्तन्नास्ति, अर्थः शब्दादिविषयभावेन परिणतद्रव्यसमूहा, व्यञ्जनं श्रोत्रादीन्द्रियं, तयोस्सम्बन्धस्य सामान्यविषयग्राह्यालोच- नस्य सर्वत्र सर्वदोत्पत्तिप्रसङ्गपरिहाराय तत्कारणतयाऽवश्यमभ्युपेयत्वेन तदभावे तदसम्भवात्, यद्युक्तालोचनोत्पत्तयेऽर्थव्यञ्जन- सम्बन्धाभाव उपेयते तदा तत्स्वरूपस्य व्यञ्जनावग्रहस्यैवोक्तालोचनात्पूर्व सत्वं न त्वालोचनस्य व्यञ्जनावग्रहात्पूर्व सत्त्वमिति प्रथमविकल्पो नात्मानमासादयेदित्याशयः ॥ २७४ ॥ व्यञ्जनावग्रहात्पश्चादुक्तालोचनं भवतीति द्वितीयविकल्पमाधिकृत्याह- अयोग्गहो चिज पं-जणोग्गहस्सेव घरमसमयम्मि॥ पच्छावि तो न जुत्तं, परिसेसं पंजणं होजा ॥२७५।। अर्थावग्रहोऽपि यस्माद्वधअनावग्रहस्यैव घरमसमये भवतीति निणीतं प्राग, तस्मात्पश्चादपि व्यञ्जनावग्रहादालोधनज्ञान न पुक्लं, म्यञ्जनार्थावग्रहान्तरालकालस्यैवाभावेन तदानीं तदुत्पर्वक्तुमशक्यत्वाचदेवं पूर्वपश्चात्कालयोस्वत्सत्वनिषेधे पारिशेष्या- मध्यकालवी कृतीयविकल्पोपन्यस्तो व्यअनं व्यञ्जनावग्रह एव मवताऽऽलोचनाशानत्वेनाभ्युपगतो भवेत्, एवं च न कविदोषः, नाममात्र एव विवादाद ।।२७५। किञ्च तव्यअनकालेऽभ्युपगम्यमानमालोचनं किमर्थस्य व्यअनानां वा, प्रथमपक्षे व्यअनाव- प्रहत्वाभावान ध्यानावग्रहस्य नामान्तरमप्यालोचनमिति, द्वितीयपक्षेऽर्थविषयकत्वाभायादवदालोचनसंज्ञाभाषप्रसङ्ग इत्याह- संप समालोपणम-त्यदरिसणं जान बंजणं तोतं ।अह वंजणस्स तो कह-मालोयणमत्थसुण्णस्स ||२७६।। तत्ममालोचनं यदि सामान्यरूपस्यार्थस्य दर्शनमिप्यते, ततस्तहिं न व्यञ्जनं व्यअनावग्रहात्मकं भवति प्यअनावग्रहस्य प्यअनमम्पन्धमात्ररूपत्वेनार्यशून्यत्वात्, अथ व्यञ्जनस्य शम्दादिविषयपरिणतद्रव्यसम्पन्धमात्रस्य वत्समालोचनमिष्यते, तर्हि कथमालोचनं कथमालोचकत्वं तस्य घटते, तत्र हेतुः अर्थशून्यस्येति, व्यञ्जनसम्बन्धमात्रान्वितत्वेन सामान्यार्थालोचकत्यानुपप- सरित्यर्थः ॥२७६।। नन्वेतदालोचनाशानं शास्त्रान्तरे प्रसिद्धमस्ति तक स्वरूपमुररीकत्येत्या प्रतिनिधानं वक्तव्यमित्यत्राह- आलोयणति नामं, इन तं पंजणोग्गहस्सेव ॥ होल कहं सामण्ण-गहणं तत्पत्यसुण्णम्मि ॥ २७७ !! तस्मादालोचनमिति पनाम तदन्यत्र निर्गतिकं सत् पारिशेपार घ्यअनावग्रहस्यैव द्वितीयं नाम भवेत्, एवं सति भवतो यदमिमा सामान्ममात्रग्रहणमालोचनन्तत्र तत् , यतः प्रागुक्त क्तिमिी अर्थशन्ये तत्र कथं सामान्यग्रहणं भवेत् तस्मादविग्रह - एव सामान्यार्थग्राहकः, “ अस्ति झालोचनाज्ञानम्" इत्याद्यपि तमाश्रित्यैव घटत इति ॥ २७७ ॥ 'तुष्यतु दुर्जन' इति न्यायेन व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतमित्युपगम्याप्याह-- गहियं व होउ तहियं, सामण्णं कहमणीहिए तम्मि॥ अत्थावग्गहकाले, विसेसणं एस सदो त्ति ॥ २७८॥ अथवा भवतु तस्मिन्व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतम् , तथापि कथमनीहितेऽविमर्शिते तस्मिन्नकस्मादेवार्थावग्रहकाले शब्द एपः इति विशेषणं विशेषज्ञान युक्तम्, न हि निश्चयो झगित्येवेहामन्तरेण युज्यते, तस्मानार्थावग्रहे शब्द इत्यादिविशेषबुद्धि- युज्यते ॥ २७८ ।। अर्थावग्रहसमय एवेहापायौ भविष्यत इति मन्यमानम्परम्प्रत्याहः अत्थावग्गहसमए, वीसुमसंखेनसमइया दो वि ॥तक्का-वगमसहावा, ईहा-ऽवाया कहं जुत्ता ? ॥२७९॥ अर्थावग्रहसम्बन्धिन्येकस्मिन् समये कथमीहापायौ युक्तौ ? इति सम्बन्धः, यतः तर्कावगमस्वभावौ, तर्को विमर्शस्तत्स्व- भावेहा, अवगमो निश्चयस्तत्स्वभावोऽपायः, द्वावपि चैतौ पृथगसङ्कथयसमयौ, तथा च यदिदमर्थावग्रहसमये विशेषज्ञानं त्वये- प्यते सोऽपायः स चावगमस्वभावो निश्चयस्वरूपः, या च तत्समकालमीहाऽभ्युपगम्यते सा तर्कस्वभावाऽनिश्चयात्मिका, तथा च विरुद्धनिश्चयानिश्चयस्वभावयोरनयो कस्मिन्नवग्रहसमये भावो युक्तः परस्परपरिहारव्यवस्थितत्वात्, इत्येकानुपपत्तिः। तथा, अवग्रहस्यैकस्समयः, अनयोश्च पृथक् पृथक् असंख्येयाः समयाः, एवञ्च पृथगसंख्येयसमययोरीहापाययोरेकस्मिन् समये भावोऽपि समयविरोधान्न सम्भवति, इति द्वितीयानुपपत्तिः ॥ अतोऽत्यन्तासम्बद्धत्वादुपेक्षणीयमेतत् ।। २७९ ॥ सामान्यमात्रग्राहित्वेऽवग्रहस्स ग्रन्थान्तरोक्तक्षिप्रेतरादिभेदासम्भवाद्विशेषग्राहित्व एव तस्य घटनाद्विशेषग्राह्यवग्रह इति नि:- संख्यप्रेरकान्तर्गतप्रेरकाविशेषस्यावशिष्टामाशङ्कामपहस्तयितुं सरिरुपन्यस्यति-- सिप्पेयराइभेओ, जमोग्गहो तो विसेसविण्णाणं " जुबइ विगप्पवसओ, सहोत्ति सुपम्मि जं केइ ॥२८॥ विप्रेतरादिभेदो यस्मादवग्रहा, ततः शन्द इति विशेषविज्ञान युज्यते, अर्थावग्रहे इति प्रस्तावाल्लम्यवे, तेणं सद्दे ति उग्गहिए । इत्यादिवचनात् यत्सूत्रे निर्दिष्टमिति शेषः, विशेषविज्ञानत्वे हेतुः विकल्पवशतः इहान्यत्रोक्तनानात्ववशता, अवग्रहस्य द्वादशभेदोपदर्शनार्थमिह शास्त्रान्तरे तत्त्वार्थादौ चैवमुक्ति:-क्षिप्रमवगृह्णाति १, चिरेणावगृह्णाति २, बह्ववगृनाति ३, अबबवगृह्णाति ४, बहुविधमवगृह्णाति ५, अबहुविधमवगृह्णाति छ, एवमनिश्रितं ७, निश्रितं ८, असन्दिग्धं ९, सन्दिग्धं १०, ध्रुवम् ११, अधुपमवगृह्णाति १२ इति ॥ ततः क्षिप्रं चिरेण वाञ्चचातीति विशेषणान्पथानुपपल्या ज्ञायते नैकसमयमात्रमान एवार्थावग्रहः, किन्तु चिरकालिकोऽपि, तथा बहूनां श्रोतृणामविशेषेण प्राप्तिविषयस्थे शङ्खमर्यादिबहुतूर्यनिर्घोपे श्योपशम- वैचित्र्यात कोऽप्यवहु सामान्यमवगृहाति,अन्यो बहपगृहाति मिमांस्तांस्तान् शब्दान्गृह्णाति,अपरः स्त्रीपुरुषवाद्यत्वादिबहुविधवि- शेषधर्मविशिष्यत्वेन बहुविधमवगृहाति, तदन्यस्त्वबहुविधविशिष्टरवादबहुविधमवगृह्णाति, अत एतस्माद् बहुबहुविधायनेकविकल्प नानात्ववादवग्रहस्य क्वचित्सामान्यग्रहणं चित्तु विशेषग्रहणमित्युमयमप्यविरुद्धं, ततो यत् सूत्रे ' तेणं सद्दे ति उग्गहिए। इतिवचनात् शब्दः इति विशेषविज्ञानमुपदिष्टम् , तदप्यर्यावग्रहे युज्यत एव, इति केचित् ॥ २८० ॥ अनोत्तरमाह-- सकिमोग्गही त्ति भण्णा, गहणेहावापलक्खणत्ते वि।। अह उवयारो कीरह, तोसुण जह जुज्जएसोवि॥२८॥ बहुशः समाहितमप्यर्थ पुनः पुनः प्रेरयन्वं प्रेरकं साक्षेपं कारवा रिः पृच्छति, किंशन्दा थेपे, स पूर्वोक्तो विशेषावगमा, अवग्रहोऽर्थावग्रहो भण्यते ग्रहणेहापायलक्षणत्वेऽपि, क्षेपार्थककिंशब्दसमभिव्याहारात्कथं ग्रहणेहापायलक्षणत्वे सत्यपि बहुबहु- विधादिविशेषग्राहकत्वेन निश्चयरूपतयाऽपायः सन्नर्थावग्रह इति भण्यते ?, ग्रहणेहयोःपूर्वभावित्वेन अपायस्य स्वस्वभावत्वे- नापायलक्षणत्वं योध्यम्, स्वस्वरूपस्यापि च लक्षणत्वं भवत्येवायदाह ॥ "विषामृते स्वरूपेण, लक्ष्येते कलशादिवत्।।एवं चस्वस्वभावाभ्यां, व्यज्येते खलसज्जनौ ॥१॥"इति।। बहुवहुविधादिग्रहणस्योक्तलक्षणत्ववलादपायत्वे कथं शास्त्रान्तरेऽ- वग्रहादीनां बहादिग्रहणमुक्तम् ?, सत्यमुक्तम्, किन्तूपचारतः वह्वादिग्राहकस्यापायस्य कारणेष्ववग्रहादिपु योग्यतया कार्यस्वरूपम- स्तीति कृत्वोपचारतस्तेऽपि वह्वादिग्राहकाः प्रोच्यन्ते, अथ यदि उक्तन्यायेन त्वयाऽप्युपचारं कृत्वा विशेषग्राहकोऽर्थावग्रह इत्युच्यते, स वाङ्मात्रेण तव न युज्यते, " यत्र मुख्यार्थो न घटते तत्र प्रयोजने सति उपचारः प्रवर्तते, " त्वया त्ववग्रहस्य विशेषविपयकत्वोपपादनाय यद्यदुक्तं तदन्यथैव समर्थितमिति प्रयोजनाभावानोपचारो युक्तः, यदि मां शिष्यो भूत्वा पृच्छसि त्वं 'कथमुफ्चारः क्रियमाणो घटत इति ?,' ततः शृणु समाकर्णय, सोऽपि यथा युज्यते तथा कथयामि ॥ २८१ ।। यथाप्रतिज्ञातमेव सम्पादयन्नाह- सामण्णमेत्तगहणं, नेच्छइओ समयमोग्गहो पढमो ॥तत्तोऽणंतरमीहिय-वत्थुविसेसस्स जोऽवाओ ॥२८२॥ सो पुणरीहाऽवाया-ऽवेक्खाओ वग्गहोत्ति उवयरिओ । एस्सविसेसावेक्खं, सामण्णं गेहए जेणं ॥२८३ ॥ तत्तोऽणतरमीहा, तत्तोऽवाओ य तव्विसेसस्स ॥ इय सामण्णविसेसा-वेक्खा जावंतिमो भेओ ॥ २८४ ॥ इहैकसमयमात्रमानो नैश्चयिको निरुपचरितः सामान्यवस्तुमात्रग्राहकोऽर्थावग्रहः प्रथमः, निश्चयवेदिपरमयोग्यवगम- विषयत्वावपिकोऽयमुच्यते, ततो नैवपिफार्थावग्रहादनन्तरमीहितस्य वस्तुविशेषस्य योऽपाय. स पुन विनीमीहामपायं चापे- त्यापपरितोऽवग्रहोऽर्धारग्रह. म ध्यस्थय्यवहारिभिर्व्यवट्रियमाणत्वाद्यावहारिकोर्थावग्रहा, उपचारे निमित्तान्तरमाह-एस्से- स्पादि, एप्पो मावी योज्या विशेषस्तदपेक्षया येन कारणेनापमपायोऽपि सन सामान्य गति, सामान्यग्राहित्वात्प्रथमनैश्च- विकारिग्रहनदयमारग्रहः, ततस्मामान्येन शन्दनिधयरूपात्प्रथमापायादनन्तरं किमयं शाहः शब्दः शाओं वेत्यादिरूपेहा मरति, ततस्तदिनपस्य चाहत्यादेरीहितस्य मास एवापमित्यादिरूपेणापायव निश्यरूपो भवति, अयमपि च मावितद्विशेषहा- मपापश्चापेक्ष्य सामान्यालम्पनत्यादुपचारितोऽर्थावग्रहः, इयं च सामान्यविशेषापेक्षाऽसम्भवरस्वविशेपान्तरान्त्यविशेष यावद्रपति, अथवा यतो विपारपरतः प्रमातर्विशेपजिनामा निवर्तते तपन्त्यपिशपं यायत् व्यावहारिकार्थावग्रहहापायार्थ सामान्यविशेषापेक्षा कपा एरमिहोपचारपटना युज्यते ।।२८२-२८३-२८४ । उक्तगाथाप्रयपर्ययसितमर्थमुपदर्शयति-- मप्रत्येहावाया, निच्छपओ मोतुमाइसामण्णं । संयवहारत्थं पुण, सव्वत्थाऽवग्गहोऽधाओ ॥ २८५ ।। आदिमायान्यमप्यक्तं सामान्यमावाटम्बनमकमामपिकं शानं मुक्त्या सर्वत्र विषयपरिच्छेदे कर्तव्ये निश्रयता परमार्थत हापायो मवत , ईहा, पुनरपायः, पुनरीहा, पुनरप्पपाय, इत्येवंक्रमेण यावदन्त्यो विशेषः, न त्वविग्रहः, अर्थावग्रहस्त सामा- न्यमानालम्पनमेमामपि प्रथमपानमेव,न तदीहा पायो वा संध्यवहारार्थ पुनः सर्वत्र यो योऽपापा स स उत्तरेहापायापेक्षयैप्प विपापपया चोपचारतोविप्राः || २८५ ॥ यारधारतम्पनोतरोतविशेषाका प्रपतवे तावदयाहा, परवमयोगामाचे त्वपाप एव भाति न तस्यापप्रात्यमिति दयवि- तरतमजोगाभावे-वाओ चिय धारणा तदंतम्मि॥सव्वत्य वासणा पुण, भणिया कालंतरे सई य॥२८॥ तरतमयोगाभावे ज्ञातुरग्रेतनविशेपाकासानिवृत्तावपाय एव भवति, तस्यावग्रहत्वाभावात्तनिमित्तानामीहादीनाममा तदन्ते धारणा तदर्थोपयोगाप्रच्युतिरूपा भवति, वासना वक्ष्यमाणरूपा कालान्तरे स्मृतिथेति धारणाभेदद्वयं पुनः सर्वत्र भवति ॥२८॥ सांव्यवहारिकार्थावग्रहापेक्षयेदानी " तेणं सद्दे ति उग्गहिए' इत्यादिसत्रं विशेषविज्ञानपरतयाप्युपपादयितुं शक्यत इत्याह- सहो त्ति व सुयभणियं, विगप्पओ जड़ विसेसविण्णाणं॥घेप्पेज तं पि जुजइ, संववहारोग्गहे सव्वं ॥२८७॥ वा अथवा, शब्द इति सूत्रभणितं शब्दस्तेनावगृहीत इति सूत्रे प्रतिपादितं यदि विकल्पतो विवक्षावशतो विशेषविज्ञानं गृोत, संन्यवहारोपग्रहे गृह्यमाणे सति सर्व तदपि युज्यते ॥ २८७ ॥ व्यावहारिकार्थावग्रहाम्युपगमे सविशेष गुणमुपदर्शयन्नाह- खिप्पेयराइभेओ, पुन्योइयदोसजालपरिहारो| जुज्जइ संताणेण य, सामण्णविसेसववहारो ॥२८८ ।। क्षिप्रेतरादिभेदं यत्पूर्वोदितदोपजालमेकसामयिकसामान्यमात्रग्राहकनैश्वयिकार्यावग्रहल्याख्यातारम्प्रत्येकसामयिकत्येऽस्य कथं क्षिप्रचिरग्रहणविशेषणं ? सामान्यमात्रग्राहकत्वे च कथं बहुबहुविधादिविशेषणोक्तं विशेषग्रहण, तथाऽस्यैव विशेषग्राहकले समयोपयोगयाहुल्यमित्यादिस्वरूपम्, तस्य परिहारो व्यावहारिकार्यावग्रहे सति युज्यते,नैश्चयिकार्यावग्रहवादिभिरपि उपनाराया- वहारिकार्थावग्रहस्यासंख्येयसमयनिष्पन्नविशेषग्राहकलानरूपस्य स्वीकृतत्वेन तत्र क्षिप्रेतरादिभेदस्य बहु-बहुविधादिविशेषणोक्त- विशेषग्राहकत्वस्य सम्भवात्,तस्य चाऽसंख्येयसामयिकत्वेनैकसमयोपयोगबाहुल्यस्यावकाश एव नास्ति, एवं च क्षिप्रेतरादिवि- सांव्यवहारिकार्थावग्रह एव घटने कारणे कार्यधर्मोपचारतस्तु नैयायिकावग्रहेऽपीत्युक्तं प्राग,सन्तानेन च शेषणकलापो मुख्यतया सामान्यविशेषव्यवहारो लोकरूढोऽपि व्यावहारिकार्थाऽवग्रहे युज्यते, लोके विशेषोऽप्यपेक्षया सामान्यं, यत्सामान्यं तदप्यपेक्षया विशेषः, इत्येवमन्त्यविशेष यावत्,एतचौपचारिकावग्रहे सत्येव घटते, नान्यथा, ' यदनन्तरमीहादि प्रवृत्तिः सोऽवग्रह' इत्येवमव- प्रहलवणस्प नैवपिकावग्रह इव विशेषप्राहिझानेऽपायरूपे औपचारिकार्यावग्रहतया स्वीक्रियमाणेऽपि भावात् ॥ २८८ ।। इति सविवरण श्रीज्ञानार्णवे मतिज्ञानाऽऽद्यमेदलक्षणद्विविधावग्रहतत्त्वप्ररूपणात्मको द्वितीयस्तरङ्गासम्पूर्ण। अय तृतीयस्तरङ्गः ॥ अथ मतिज्ञानद्विनौयभेदलक्षणामीहां व्याचिख्यासुरांह- इय सामण्णग्गहणा-णंतरमीहा सदत्यवीमंसा ॥ किमिदं सहोसहो, को होज्ज व संख-संगाणं १॥ २८९ ।। इत्येव प्रामुक्तेन प्रकारेणामिहिवाऽव्यक्तवस्तुमात्रग्रहणलक्षणनैश्चयिकाविग्रहशब्दादिसामान्यग्रहणलक्षणव्यावहारिकार्था- चप्रहात्मकसामान्यग्रहणानन्तरमीहा प्रवर्तते, सा सदमीमांसा, सतस्तत्र विधमानस्य गृहीतार्थस्य विशेषविमर्शद्वारेण मीमांसा विचारणा, किमिदं वस्तु मपा गृहीतं शब्दोऽशम्दो वेत्येवंस्वरूपा, इयं विचारणा निधयार्थावग्रहानन्तरभाविनी, वा अथ माशाहूयोर्मध्ये कोऽयं भवेत् शम्दा शाखा बागों वा, इयं विचारणा व्यवहारावग्रहानन्तरमाविनी, यद्यपीत्य विचारणा संशयात्मिका नेहा, वयाप्यनयाऽनन्तरमावी व्यतिरेकधर्मनिराकरणपर: अन्वपधर्मघटनप्रवृत्तचापायाभिमुख एव चोध उपलधित ईहा ।। तद्यथा- "अरण्यमेतत् सवितास्तमागतो, नचाधुना सम्भवतीह माना ॥ प्रापस्तदेतेन सगादिमाजा, मान्य म्मरारातिममाननाम्ना ।। १ ।।" इति ॥ एतेन स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशयानन्तरं पुरुषधर्मव्यतिरेकतः स्थाणुधर्मसमन्वपतन प्रायः स्थाणुरेवायमिति बोध ईहेत्युपदर्शिवम्भवतीति ।। २८९ ॥ अथ मतिज्ञानतृतीय भेदस्यापापस्प स्वरूपमाहt महुराहगुणत्तणओ, संखस्सेव त्ति जं न संगस्स ॥ विण्णाणं सोऽवाओ, अणुगमवरेगभावाओ ॥ २९० ॥ व्याख्या-मधुरस्निग्धादिगुणत्वात् शङ्कस्यैवायं शब्दो न शृङ्गस्य इत्यादि यद्विशेषविज्ञानं सोऽपायो निश्चयज्ञानरूपः, तत्र हेतुः, अनुगमव्यतिरेकभावतः इति, पुरोवर्त्यर्थधर्माणामनुगमभावात् तत्राविद्यमानार्थधर्माणां व्यतिरेकभावात्, अनुगमव्यतिरेको अस्तित्वनास्तित्वनिश्चयो । अयं च व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभावी अपाय उक्तः। निश्चयावग्रहानन्तरभावी तु श्रोत्रग्राह्यत्वादि- गुणतः शन्द एवायं न रूपादिरिति ॥ २९० ।। अथ मतिज्ञानतुरीयभेदलक्षणां धारणां सभेदामाह- तयणंतरं तयत्या-विचवणं जो य वासणाजोगो ॥ कालंतरे य जं पुण-रणुसरणं धारणा सा उ ॥२९१॥ व्याख्या-तस्मादपायादनन्तरं यत्तदर्थादविच्यवनम्, उपयोगमाश्रित्याभ्रंशः, यश्च वासनाया जीवेन सह योगः सम्बन्धः, यम तस्यार्थस्य कालान्तरे पुनरिन्द्रियैरुपलब्धस्यानुपलब्धस्य वा एवमेव मनसाऽनुस्मरणं स्मृतिर्भवति, सेयं पुनस्त्रिविधाऽप्यर्थ- स्यावधारणरूपा धारणा विज्ञेया, वासना च तदावरणक्षयोपशमरूपा ज्ञेया॥ २९१ ॥ इदमत्रैदम्पर्य-धारणाया अविच्युतिलक्षणभेदस्य दोिपयोगमाश्रित्याभ्युपगमादेव पराभ्युपगतनिरन्तरसमानविषयकज्ञान- सन्तानलक्षणधारावाहिकज्ञानफलस्य स्थिरार्थग्रहणस्योपपत्तौ निष्प्रयोजनमेव धारावाहिकज्ञानकल्पनं, पूर्वज्ञानमुत्पाद्य व्युपरतव्या- पारस्य कारणस्य पुनर्व्यापारान्तराभावेन कारणाभावाच न निरन्तरज्ञानसन्तानलक्षणधा(*सप्तचत्वारिंशपत्रादिह यावद्योजित पाठः)- *रावाहिकज्ञानाभ्युपगमो युज्यते न चैकापायोत्पत्तावपि सामग्रीसत्त्वात्पुनस्तदुत्पत्तेरवारणीयत्वात्तत्सन्तानोत्पत्ति सङ्गनेति वाच्यम्, अपायस्यापायोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वात्प्रागभावस्य तदेतत्वाद्वा पुनस्तदुत्पत्त्यापचेरभावात्, अन्यथैकवारं घटोत्पादेऽपि सा-- मग्रीमहिम्ना कपाले पुनस्तदुत्पत्त्यापतिप्रसङ्गादिति चेत्, उच्यते, घटोऽयं घटोऽपमित्यनुभवधारादर्शनेन तदपलापो दुष्करोऽपाय- सम्वेऽपायान्तरोत्पत्तिप्रविन्धस्याप्रामाणिकत्वात् स्पष्टस्पष्टवरस्पष्टतमवासनाजनकत्वेनापायजन्यापायपरम्पराया अवश्याम्पे- यत्वादीहावग्रहादिमेद इवापापनानात्वेऽप्युपयोगमेदानापचेरेकसन्ततिककविषयकज्ञानस्यैवोपयोगत्वात् , तस्य च नानात्वेऽप्ये- कत्वाविरोधात् ततथापायसमानाकारस्मृतिजननी स्मृतिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमरूपा वासना विजृम्भते, कालान्तरे च तद्विषयिणी , स्मृतिः प्रवर्तते इति, पपपीयं मिनोपयोगरूपत्वाभावानाधिकीमवितुमत्सहते, तथापि क्षयोपशममहिम्नाऽव्यक्ततया स्थित पूर्वज्ञान- मेवोद्गोधकवचात् स्मृत्युपयोगरूपतामारकन्दकपश्चिदभेदोपरिदं सन्तानगामित्वलक्षणं भेदमास्कन्दतीति द्रष्टव्यं, ननु स्मृतिर्न प्रमानीतश्यामत्वे वर्तमानावगाहिन्याः पाकरक्ते व्यामोऽयमिति प्रतीतेरियातीततत्वांशे वर्तमानत्वावगाहिन्यास्तस्पा अयथार्थत्वा- सत्तानिमिष्टस्यानागतार्तमानस्य वर्चमानत्वानुमवचलादननुभूतस्य वा तत्र वर्चमानत्वस्य ज्ञानसामग्रीमहिम्नैव मानाव, अन्यथा रिपयस्य वर्धमानत्याशाने तत्र प्रपनुपातिप्रसङ्गादत एवं यदा धूमस्तदा वहिरिति घ्याप्त्यप्रतिसन्धानेऽपि शानसामग्रीमहिम्नेव पान्यनुमितौ वर्नेर्वर्तमानत्यपानाचत्र निम्न प्रवृत्तिरिति चेत्, न,पाकरफ्ते श्यामोऽयमिति प्रतीतेरयथार्थत्वासिद्धेरिदानीमयं श्याम इत्यामारामान तय श्यामार वर्षमानवानवगाहनान्, अथ प्रकारतया तर विद्यमानत्वाभावेऽपि विशेष्यावच्छेदककालाप- छिपविशेषणसम्बन्धस्य संसर्गत्वासंसर्गतया तन्मानासा प्रतीतिरयथार्थेति चेत्, तथापि पूर्व श्याम इत्यत्रातीतश्यामतापाभिव स पट इत्यत्राऽप्यतीतधर्मवैशिष्ट्यरूपायो तत्तायां विद्यमानत्वप्रतिसन्धानायोगेन स्मृतियाथार्यस्य बाधितमशक्यत्वात्कादाचित्क- सम्बन्धपुरस्कारेणातीतधर्मशानस्याप्पप्रामाण्पे च कादापिकसम्बन्धेन सत्प्रातिपक्षितत्वज्ञाने देतरपि हेस्वामासता भोव, अपि- चानुमवस्मरणयोर्विषयकृतविशेषाभावेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्येदम्पदप्रयोगहेतुत्वात्संस्कारजन्यज्ञानस्य तच्छन्दप्रयोगहेतुत्वात्तदुभया- भिलापवलक्षण्यात्स्मृतेरप्रामाण्येऽनुभवस्याप्यप्रामाण्यापतिः, स्मृतेर्याथार्येऽप्यनुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यादप्रमात्वमितिचेत्,न,अनुमि- तेरपि व्याप्तिज्ञानादिप्रमात्वपारतन्त्र्येणायथार्थत्वप्रसङ्गाद्, अनुमितरुत्पत्तौ परापेक्षा विषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यमेवेति चेत्, न, स्मृतेरप्युत्पत्तावेवानुभवसव्यपेक्षत्वात्स्वविषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यात्,अनुभवविपयीकृतभावावभासिन्याः स्मृतेविषयपरिच्छेदेऽपि न स्वातन्त्र्यमिति चेत्, तर्हि व्याप्तिज्ञानादिविषयीकृतानन् परिच्छिन्दन्त्या अनुमितेरपि प्रामाण्यं दूर एव, नैयत्येनाभात एवार्थोऽनुमित्या विषयीक्रियत इति चेत्, तर्हि तत्तयाऽभात एवार्थः स्मृत्या विषयीक्रियत इति तुल्यमिति न किञ्चिदेतत् ।। वस्तुतः स्मृतित्वप्रमात्वे जन्यत्वप्रयोज्यत्वरूपं नानुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यं यदृच्छोपकल्पितं त्वप्रयोजकं, यदि वाऽ- नुभूतधर्माश्रयत्वरूपा तत्ता स्मृतौ भासते इदन्तांशे उद्बुद्धसंस्कारस्यैव तत्तांशे स्मारकत्वात्फलनलेन तथात्वकल्पनाद्धर्मविशेष- मादाय सहप्रयोगस्य समर्थनाद् ,अनुभवस्मरणयोर्षियकृतविशेषाभावेऽपि संस्कारजज्ञानत्वेन स्मृतेस्तच्छन्दप्रयोगहेतुत्वे तु प्रमुष्टतत्ताकस्मरणादपि तच्छब्दोल्लेखप्रसङ्गात्,अनुभवे यद्धर्मवैशिष्टयमानं तस्यातीतत्वं तत्ता स्मृतौ भासत इत्यभ्युपगमे चानाग- तविषयकस्मरणादौ तत्तांशेऽप्ययथार्थत्वप्रसङ्गादिति विभाव्यते, तदाप्यनुभूतधर्मे विद्यमानत्वस्यावाधान तस्या अयथार्थत्वम् ।। सम्प्रदायानुसारिणस्त्वनुभूयमानत्वलक्षणेदन्तानुभवे भासतेऽनुभूतत्वरूपा च तत्ता स्मृतौ भासतेऽत एव स घट इति स्मृ- त्यभिलापस्य यः प्रागनुभूत इति विवरणं सङ्गच्छते, इदन्ताविषयकानुभवादेव च तत्ताविषयकं स्मरणमुन्मीलति तं विना तु प्रमुष्ट- तत्ताकं तत्, न चानुभूतत्वमेव यदि तत्ता तदा तदवगाह्यनुमितावपि तत्तोल्लेखप्रसङ्ग इति वाच्यम् , उल्लेखो यदि विषयता तदा तदम्युपगमेऽविवादाद, यदि पुनरमिलापस्तदा संस्थारजज्ञानत्वेन तद्धेतुत्येन तदापत्यभागद, तथाप्यनुभूतो घटोऽनुभूय- मानो पट इत्यनुमपप्रमवस्मरणे तचोटिरामसङ्ग इति चेत्, न, पूनुिपस्थितानुभूतत्वानुभूयमानस्वयोरेव तत्तेदन्तापदा. । त्वान, प्रागनुभूतस्यापि कस्यचिन् ससर्गत्वस्येव प्रकारत्वस्यापि सम्भवादित्याहुः, इदन्तानुल्लेख्यनुभवप्रभवस्मरणेऽपि { तवामानात्स्त्रसामग्रीमहिम्नेर तत्र तत्ता मरसत इत्यन्ये, यत्तु तवेदन्ते स्मृत्यनुभवमासिनी अखण्डे एव वस्तुनी, एवं घदन्तासंस्कारेणेदन्तैव तथया स्मर्यते प्रमुष्टवघाकं तु स्मरण नास्त्येव ॥ हरिहराधनुचिन्तनं(ना) च कविकाव्यमूलशा- नान्मनःप्रभवेति मर्या स्मृतियथार्थव, न स क्वचित्प्रमितस्यैवान्यप्रारोपात्कथमन्यत्राप्रमितायास्तत्तायाः स्मृतायारोप इति वाच्यम्, इदन्ताया प्रयामानेन विषयकत्येन प्रत्यभिज्ञायो तचायाः अमितत्वात् स्मृताविदन्तायां तत्तारोपसम्मवात, न च स्मृते- प्रमत्वे नियामकनानादपिकल्पने गौरवमिति पाम्यम्, इदन्तशि उपद्धसंस्कारस्य दोपत्वात्, इदन्तानुष्लेख्यनुभवत्रभर- स्मरणेऽपि या धर्मान्तरस्पैवावगाइनाप तस्या पायामिति, तत्तुच्छ, तत्तास्मृतेः पूर्वमिदन्तोपस्थिति विना नदारोपास- । मयादिदन्तोष्टखानन्तरमेव तदारोप इत्या मानाभावाद, मावे वा इदन्तात्वेन तदुष्टले विशेषदर्शनादारोपस्यैवाऽसम्भवात, अपि घदन्ताविषयकसंस्कारस्य स्वरूपत एव तथाविषयकामविस्वाइन्छेदेनैव हेतुस्वाद स्मृतौ तत्तयेदन्तामानासम्भवः, तसावच्छिम- प्रकारताकस्मृतित्वावच्छेदेन तद्वतुत्वकल्पने तु तत्र तत्तया जगद्विषपात्यप्रसगाव तत्तावच्छिन्नामकारकत्वस्य च स्वरूपतस्तत्ता प्रकारकत्वापेक्षया गौरवान्, अपि च तत्ताया असण्डते स्वरूपततरप्रकारकतापछि प्रत्येव प्रत्यभिज्ञानसाधारण्येनेदन्ताश उससंस्कारस्पतित्वमुचितम्, न च प्रकारवयाऽनुभवत्वावच्छिभ प्रति विषयवपाशानन्देनेश हेतुत्वात् अन्यथा दण्डामनिषि तत्संस्कारादण्डीतिबुद्धिप्रसगाव, तत्ताज्ञानं विना कथं तदनुभव इति वाच्यम्, प्रकारतयाः संस्काराजन्यज्ञानत्वावच्छिन्नं प्रत्येव विषयतया ज्ञानत्वेन हेतुत्वात्, इत्थं च तच्छब्दप्रयोगहेतुतापि तत्ताप्रकारकज्ञानत्वेनैवेति स्मृतिप्रत्यभिज्ञयोस्तत्तोल्लेख इति न किञ्चिदेतत्, किं बहुना ? स घटः सोऽयं घट इति स्मृतिप्रत्यभिज्ञानयोस्तत्तांशे समानाकारत्वात्प्रत्यभिज्ञायाः प्रामाण्ये स्मृतेरपि- प्रामाण्यं स्मृतेरप्रामाण्ये च तथा प्रत्यभिज्ञाया अपि तथात्वं प्रसजेदिति दुरुद्धरा प्रतिमन्दी,न चेदन्तासंस्कारस्यातीततत्तद्धर्मवैशिष्टय- स्मृतावेव हेतुत्वमिति युक्तं,एकाकारत्वभङ्गप्रसङ्गाद् गौरवाच्च, यत्तु'स्मृतेर्याथार्थेऽपि न प्रमात्वं यथार्थानुभवत्वस्यैव तत्त्वाव, अन्यथा स्मृतेः प्रमात्वे तदसाधारणकारणस्य संस्कारस्य पृथक्प्रमाणत्वप्रसङ्गे मुनिप्रणीतप्रमाणविभागव्याघातप्रसङ्गादिति', तत्तु स्वगृह एव प्रोच्यमानं श्राजमानतां भनेन्न तु कथायां, अस्माकं तु प्रत्यक्षत्वपरोक्षत्वाभ्यां द्विधैव प्रमाणविभागाभिधानाद, स्मृतेः परोक्षकुशावेव निक्षिप्तत्वान्न किञ्चिदनुपपनं ॥ तस्मात्सत्यप्रवृत्तिजनकत्वादनुभवस्येव स्मृतेरपि प्रामाण्यस्य निरावाघत्वाद साधूक्तमवग्रहेहापायधारणाभेदाच्चतुर्विधं मतिज्ञानमिति, अत्र चावग्रहादीन् शब्दोदाहरणेन सूत्रकारः प्रतिपाद्य " एवं एएणं अभिलावणं अव्वत्तं रूवं रसं गंधं फासं" इत्याद्यतिदेशस्त्रमाह,ईहादीनामुभयवस्त्ववलम्बन प्रति नियमकारणं पूरयंस्तदेवानुवदतिस्म भाष्यकार:-"सेसेसु वि रूवाइसु, विसएसु हुन्ति रूवलक्खाई ॥ पायं पचासन्न-तणेणमीहाइवत्यूणि ।।२९२॥ [ शेपेष्वपि रूपादिषु, विषयेषु भवन्ति रूपलक्षाणि ॥ प्रायः प्रत्यासमत्वेनेहादिवस्तूनि ॥ ] प्रायः 'प्रत्यासत्तिर्हि बहुभिर्द्धः सादृश्यं तत्प्रतियोग्यनुयोगिनावेव धर्मिणावालम्ब्येहादीनां प्रवृत्तिस्वभाव इति, किमयं स्थाणुरुत पुरुष इतिवकिमयं स्थाणुरुतोष्ट्र इति ने- होदयः, उष्ट्रे स्थाणुप्रत्यासत्त्यभावादत एव श्रोत्रेन्द्रियप्रत्यासन्नवस्तूपदर्शनं बहुशः प्रदर्शितमिति शेपेन्द्रियप्रत्यासन्नवस्तूनि ECHESIRECTOR
माझिक्षुराह-" थाणुपूरिसाद-पलाइमंमिपकरिष्लमंसाइ ॥ सप्पुप्पलणालाइ क, समाणरूबाई विमयाई ।। २९३ ।।
{ स्थाणुपुरुषादिकुष्ठोत्पलादिसम्भूतकरीलमामादि ॥ सर्योत्पलनालादिरसमानरूपादिविषयाणि ॥ ] संभिपकरिलत्ति
संभूतानि संस्कृतानि, परीलानि वंशजालफलानि, स्पष्टमन्यत् ।।४॥ ननु प्रत्यासत्तिर्यदि स्वरूपसतीहानिबन्धमं तक धर्मिणि दृष्टे
सफलतत्प्रत्यासन्नवस्त्ववलम्बीहोदयप्रसङ्गोऽविशेषाद, न च प्रत्यासतिग्रहस्य तदेतत्यान दोप इति वाच्यम्, सद्गर्भायाः
साश्यरूपप्रत्यासनेप्रेहे संशयाभावात्तत्पूर्वकेहाया अप्रवृरित्यत आह-
पशानमीहादी, कोटिस्मारकता मजत् ॥ निपन्तुं प्रभवत्युवे-कमयस्यावलम्पनम् ॥५॥
स्थाणपुरुपयोः मादृश्पज्ञाने सति हि स्थाणुदर्शनोसरमुत्युसंस्कारेण स्थाणुत्वपुरुपयोभयकोटिस्मरणेन तदुभपसहचारित-
धर्मवचाज्ञानेन दोपमहिम्नासंमर्गाग्रहाच संशयोत्यवादीहादिप्रादुर्भागासोमपावगाहित्वं नानिपतं, एतेन ' भ्रमसंशयोत्तर-
प्रत्यक्षं प्रत्येव विशेपदर्शनस्य हेतुत्वात्सर्वत्र प्रत्यक्षनिर्णये ईहाया हेसुस्तमप्रमाणिकमिति' निरस्त, संशयोपरमेव निर्णया-
म्युपगमावू, वस्तुतः संशयोचरप्रत्यक्षत्वं न विशेषदर्शनकार्यतापच्छेदक, संशयोपरत्वस्प चत्वात, संशयोत्तरं विशेष
दर्शनं विनाऽपि संशयानुत्तरप्रत्यक्षप्रसङ्गाथ, संशयानुत्तरप्रत्यक्षे संशयाभावस्प हेतुत्वकल्पनेतिगौरवात् प्रत्ययनिश्यत्वाव-
विटनं प्रतीहाया हेतुत्वस्यैव पृक्तत्वात्, ॥५॥ अथ “से जहा णामए के पुरिसे अव सुमिणं पासिमा" इत्यादि सूत्रमनुम-
त्येन्द्रियाणामिय मनसोऽप्यपग्रहादयः सनादौ सम्मवन्तीत्याह-
स्वप्नादावपि शन्दादि-विषपाश्वग्रहापयः ॥ मनसोऽपि लसन्येव, इषीकष्याति विना ॥६॥
मनसोऽपि स्वमादाविन्द्रियव्यापार विनाऽवग्रहादयः प्रादुर्भवन्ति, तथाहि, स्वप्ने गीतादिश्रवणे प्रथममव्यक्तशब्दज्ञानं भवति, ततः किमयं शब्दोऽशब्दो वेतीहा प्रवर्तते, ततः शब्द एवायमित्यपायः, ततश्च धारणेति ॥ एवं जाग्रतोऽपि मनसैव वहलतमे तमसि घटादिपदार्थपर्यालोचनदशायां मानसा अवग्रहादयो द्रष्टव्या । आह च-"एवं चिय सिमिणाइसु, मणसो सद्दाइएसु विसएसु ॥ होन्तिदियवावारा-भावे वि अवग्गहादीया ॥ २९४ ॥" [ एवमेव स्वप्नादिपु, मनसः शब्दादिषु विपयेषु ।। भवन्तीन्द्रियव्यापारा-भावेऽप्यवग्रहादयः ॥ ॥ ६ ॥ अथावग्रहादीनां स्त्रोक्तक्रमनियमे हेतुमाह- व्यतिक्रमोत्क्रमौ नैतै- तेषां तत्त्वनिर्णयः ॥ नेहम् ज्ञेयस्वभावोऽपि, तदेते नियतक्रमाः ॥७॥ अनानुपूर्वीभवनं व्यतिक्रमः, पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः, अन्यतरवैकल्यं शून्यत्वमेतैर्वस्तुनस्तत्वनिर्णयो न स्यात् , तदेते एव वस्तुनिर्णयाय सर्वेऽपि क्रमनियमेनान्वेषणीयाः, न बनवगृहीतमीह्यते, धर्मिणोप्रसिद्धौ निरालम्बनविचाराप्रवृत्तेः, न चानी- हित निश्चीयते, तस्य विचारपूर्वकत्वात् , न च विचारं विनाऽपि कारणमहिम्ना तदुत्पादो युक्तो विचारस्यापि तत्कारणत्वेन तद्विरहे कारणमहिम्न एवासिद्धेः, न चानिश्चितं धार्यते, अन्यथा सन्देहादपि तत्प्रसङ्गादिति, वस्तुनोरुपि च सामान्यविशेषरूपः खभावस्तथा ज्ञानयोग्यतयैव व्यवस्थित इति तस्य तथाभावो युक्तः ॥ यदाह-" उक्कमओइकमओ, एगाभावे वि वा ण वत्थुस्स ॥ जं सब्भावाहिगमो, तो सव्वे णियमियकमा य ॥२९५॥" [उत्क्रमतोऽतिक्रमत, एकाभावेऽपि वा न वस्तुनः॥ यत्स्वभावाधिगमः, ततः सर्वे नियमितक्रमाश्च ॥] " ईहिबइ णाजगहियं, णज्जइ नाणीहियं न याणायं ॥ धारिज्जइ जं वत्यु, तेण कमोवग्गहाईओ.॥२९६॥” [ईझते नाऽगृहीतं, ज्ञायते नानीहितं न चाज्ञातम् ॥ धार्यते यद्वस्तु तेन, क्रमोऽवग्रहादिकः ] में एलो गिय ते सप्षे, भवन्ति भिन्ना य य समफालं ॥ न पहशमी र तेसिंग अन्नहा नेपसम्भायो । २९७१ [इच एका से सर्वे भवन्ति भिन्नान नैव समकालं ॥ न व्यतिक्रमश तेपो, नान्यथा शेयसभाषा ] 11७11 नन्यम्पस्ते पुरुषऽयं पुरुष इति प्रथममेव निर्णया समुन्मीलति, अनुभवे व संस्कारोयोपात्प्रथममेव स पुरुष इति स्मृतिरुमसत्यनुभ्यते प प्रदित्येवायं पुरुषोत निरणापि, झटित्येव पैनमस्भामिति घ, तथा च फयमन्यतरामाये न यस्तुभावशानम् ? | आहा-" अम्मत्येयाओ चिय, कल्यइ लरिसज्ज इमो पुरियो । अण्णाय धारण धिप, पुरोपलद्धे इम त ति ॥ २९८॥" [अम्पस्वैपाय एष श्यपिलक्ष्यते शौ पुरुषः ॥ अन्यत्र पारणव पुरोपलधे एवं पदिति । अत्रोच्यते- अभ्पस्ते निर्णपस्मृत्यो-वक्ष्या मोषण न क्रम | पमपत्रशतकोवे, यया याज्यत्र धुद्रिपु 11८॥ उक्तापायस्मृत्योरयग्रहेहादिप्वीहादेः फालसौम्पादलक्षणेऽप्युक्तममस्य प्रमाणसिद्धपान वा वदपलाए: फतुं शक्या, न दि पभपशाच्छेदे सत्यपि फालभेदे सदलक्षणेन तदमायो नाम, न यादीशुष्कशालीमक्षणे तद्रूपदर्शनसज्जनितशरदमपणवद्गन्धा. प्राणतद्रसास्वादनतस्पोंपलब्धाना पोषपयामिमानेऽपि कारणक्रमनियसस्वरकमी प्रमाणसिद्धोऽपि नास्तीति पात शक्पो, एकदैकोपयोगस्वमाययान्मनसः सन्द्रियेषु सदसम्पन्धादाशुसन्चारित्वेनैव तेनाशुफार्पजगनात, तथाप पारमर्ष-"जो मणे देवायरमणुगाणं, तसि तसि समयसिति ॥"मनु मवता मनसा शरीरप्यापिरोन सर्पदा सपेन्द्रियसपागायुगपदनेकज्ञानोत्पगिर्यारा बदत्यायुपगम एपेन्द्रियेषु तरसंयोगफमेण शासक्रमसम्भवादिति घेत, न, अत्याधुपगमेऽपि तस्य रसनेन्द्रियसंपोगकाले. स्वहसंयोगस्य दुर्भिधारस्वाद् युगपदुभएखानोस्पोरनियाप स्वात्, अध्यधिन्यमहिम्नव सधारणेच पित्तोपयोगकमादेव मानकम इति युक्तमभ्युगन्तुमिति दिग् ॥ तदिदमभिप्रेत्याह-"उप्पलदलसयवेहेः व्व, दुन्विभावत्तणेण पडिहाई. ॥ समयं व सुक्कसक्कु- लिदसणे, विसयाणमुवलद्धी ॥ २९९ ॥" [ उत्पलदलशतवेध इव दुर्विभावत्वेन प्रतिभाति ॥ समयं वा शुष्कशष्कुलीदशने विषयाणामुपलब्धिः॥] अभ्यासस्थलेऽप्ययं पुरुष इति निर्णयेऽयं पुरुष इति प्रयोगे कुत इति कस्यचिदाकाङ्क्षायां करचरणा- दिमत्त्वादिति प्रयोगात्तदनुगुणेहादेरनुमानात्तत्र तत्सत्त्वं सिद्धयतीत्यप्याहुः ॥ ८॥ अथ 'भेयवत्थू समासेणं' ति नियुक्तिगाथाs- वयवेनावग्रहादयो मतिज्ञानस्य सामान्यभेदा इत्युक्तमिति विशेषभेदाः किमधिका अपि सम्भवन्तीति शिष्याकाङ्क्षायामाह- श्रोत्रादिभेदात् षोढा स्यु-र्यदर्थावग्रहादयः॥ चतुर्की व्यञ्जनं तेन, स्युरष्टाविंशतिर्भिदाः ॥९॥ श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकं नोइन्द्रियश्च मन आश्रित्यार्थावग्रहादयश्चत्वारो भेदाः पड्भिः संगुणिताचतुर्विशतिर्भवन्ति तत्र च नयनमनोवर्जेन्द्रियभेदाचतुर्विधव्यञ्जनावग्रहप्रक्षेपे पूर्वोक्तभेदचतुष्टयापेक्षया विस्तरेण वक्ष्यमाणभेदापेक्षया च सक्षेपेणाप्टा- विंशतिः श्रुतनिश्रितमतिज्ञानस्य भेदाः सम्पद्यन्ते । आह च-" सोइंदिआइभेएण, छव्विहावग्गहादओऽभिहिया ॥ ते हुन्ति चउव्वीसं, चउन्विहं वंजणोग्गहणं ॥३००। अठावीसइभेयं एयं सुअणिस्सिसमासेणं ति ॥ [ श्रोत्रेन्द्रियादिभेदेन पड्विधा अव ग्रहादयोऽभिहिताः ॥ ते भवन्ति चतुर्विंशतिश्चतुर्विध, व्यञ्जनावग्रहणम् ॥ अष्टाविंशतिभेदमेतच्छुतनिश्चितं समासेन ॥] ॥९॥ अथ केचित्तु चतुर्विधव्यञ्जनावग्रहस्थले औत्पत्तिक्यादिभेदेन चतुर्विधमश्रुतनिश्रितं प्रक्षिप्य सामान्यतो मतिज्ञानस्याष्टाविंश- तिभेदानुपपादयन्ति तन्मतं पूर्वमनूय दूपयति- व्यञ्जनावग्रहस्थाने, चतुर्दा श्रुतनिश्रितम् ॥ केचित् क्षिपन्ति तदस-त्तदन्तर्भूतिसम्भवात् ॥१०॥ FORE - नगलुप्पअनायग्रहार्थायग्रहायपग्रहत्येन रूपेणैफोकस्यौत्पत्तिकपादिभेदचतुष्टयप्रक्षेपेण अतनिभितापुतनिधितसाधारण्येनाटा- विंशतिभेदपरिगणनं युक्तं, औरपत्तियादीनां पतुष्णा भेदानामयग्रहादिप्पेषान्त यात्, तथा दिद्वितीयाईटमन्तरेण मदीया छटो योदप्प ' इति राशादिष्टे परीक्षापात्रस्प भरतस्यौरपतिकी प्रादुर्मभूय, तर दामासस्वादप खप्रतिषिम्म रष्ट्या गुप्यतेत्य- षमते, तत्प्रतिविम्यं किं तडागपयापूरादिगवं तदनुगुणीभपति दर्पणादिगरी पेति तदनन्तरमीयते, ततः फल्लोलादिमिा प्रतिक्षणम पनीयमानत्पादस्पष्टत्या जलादिगतं पिम्म न तथा, स्थिरत्वेन स्पष्टरपेन घरणपातायधीक्षणयोग्यस्येन पदर्पणगसमेय तपथेवि । निधीयते इति । आह -"फेरत पंजगोग्गह-जे छोदणमेयरिम ॥३०१॥ अस्राणिस्सिअमेयं, असायीसइविहन्ति मारा- न्ति ।। जमनग्गहो दुमो-पागहसाममनो गहियो । ३०२ ॥"[पितु पअनापग्रहपर्ने शिफ्यैतस्मिन् । अनुतनिलिव- मेयमष्टाविंशतिविधमिति भाषन्ते ।। पदपग्रहो विमोऽग्रहसामान्यतो गृहीतil] "पउपारितामापा, जम्हा ण गमोग्गहारो मि।। तेणोगहाइसाम-प्रो असंतगयं गेप ॥३०॥" [पतुयतिरिक्ताभायात्,यस्माम पदग्रहादयः । भिम सेनापग्रहादिसा: मान्यतयततद्गतमेय । किर पतिक नहीणो, जुन्टे पिंपण परमहा ईहए। किं मुसिलिङ्कमाओ, दप्पणसंकेतपिम्पं वि॥३०४॥" [कर्ष प्रतिकटहीनो पुध्येत पिम्पेनाजाह हा मुश्लिष्टमपापो दर्पणसंक्रान्तप्रतिषिम्यामिति । ] नन्यवाहादिम्प औत्पति- फ्यादीनामपि कपश्चिमेदोऽस्त्येव मया भेदरस्पयनहोचविशेपागामपि नास्स्पेयायाहरसेन समोरमेदादिति चेत्, न, अधुरा- निधितपिमानफोपाधीनामवग्रहादिविमाजकोषाध्पष्पाप्पपेनोत्तरभेदामम्मवात्, पौरपनिक्पादिभेदेन मतिज्ञानस्य साक्षादिमागे तु न्यूनत्वापातात, अवप्रहापन्तर्मान दिमागे त्याधिकपात् प्याप्पष्पाप्योपाधिना साक्षादिमागाऽपोगान्ध, अब एप भुव- .
निश्रितत्वाश्रुतनिश्रितत्वाभ्यां मतिज्ञानत्वसाक्षाद्व्याप्योपाधिभ्यां द्विघा तद्विभागः सूत्रोक्तो न विशीर्येत, मतिज्ञानत्वेन तयोरभेदेऽपि प्रातिस्विकरूपाभ्यां भेदसम्भवाद्, अवग्रहत्त्वेनाभिनानामिव श्रोत्राद्यवग्रहाणाम् ॥ तदुक्तम्-" जह उग्गहाइ- सामण्णए वि, सोइंदिआइणा भयो ॥ तह ओग्गहाइसामण्णए वि, तमणिस्सिया भिणं ॥ ३०५ ॥" [ यथावग्रहादि- सामान्येऽपि, श्रोत्रेन्द्रियादिना भेदः ॥ तथाऽवग्रहादिसामान्येऽपि, तदनिश्रितत्वाद् भिन्नम् ॥] एवं च-श्रुतनिश्रितविभाजको- पाधिभिरौत्पत्तिकीत्वादिभिस्तस्यापि चतुर्दा विभागः सङ्गच्छते । तस्मान्मतिज्ञानस्य श्रुतनिश्रितत्वाश्रुतनिश्रितत्वाभ्यां सामान्यतो द्विधाविभागः, श्रुतनिश्रितस्य चाष्टाविंशतिभेदैरश्रुतनिश्रितस्य च चतुर्भिर्भेदैविशेषविभाग इति विवेकः, अत एव सम्पूर्ण श्रुतनिश्रितं प्ररूप्य ' से किं तं अस्सुअणिस्सिअं' इत्यादिना ग्रन्थेन सूत्रेऽश्रुतनिश्रितप्ररूपणं प्रत्यज्ञायि, अन्यथा तु प्रागेव तदनिरूपणे न्यूनत्वप्रसङ्गः॥ आह च-'अट्ठावीसइभे, सुअणिस्सिअमेव केवलं तम्हा ॥ जम्हा तम्मि समत्ते, पुणरस्सु- आणिस्सि भणि॥३०६॥[अष्टाविंशतिभेदं श्रुतनिश्रितमेव केवलं तस्मात् ॥यस्मात्तस्मिन्समाप्ते, पुनरश्रुतनिश्रितं भणितम् ॥] ननु मतिज्ञानस्यावग्रहादयश्चत्वार एव भेदा अवग्रहादिभेदास्तु प्रभेदा इति कथमुच्यतेऽष्टाविंशतिमतेर्भेदा इति, सत्यम्, प्रमे- दानामपि भेदत्वेन विवक्षणादाधिक्येऽपि तावतां भेदानां तावदन्यतरत्वेन मतिज्ञानत्वव्यापक(प्य)त्वाद्विभागवचनस्याव्याघाताच सम्प्रदायानुरोधादिकं विनैव हि क्वचिदेतादृशविभागस्याप्रामाणिकत्वमिति, अथवा 'समासेन भेदवस्तूनि इत्यत्र भदवस्तुत्वे समासे- नेत्यनुकूलं विशेषणं प्रभेदास्तु बहवोऽपि भवन्तीत्यर्थः ॥१०॥ अथैवमष्टाविंशतिविधत्वं मतिज्ञानस्योपदर्य प्रकारान्तरेण प्रभेदबाहुल्यघटितं बहुभेदत्वमुपदर्शयति- नाना-नानाविध-क्षिप्रा-निश्रिता निश्चित-ध्रुवैः ॥ पद्मिशच्छतभेदाः स्युः, सेतरापग्रहादिभिः ॥११॥ अवग्रहाद्या प्रागुक्तदिशाष्टाविंशतिभेदभाजो बहुबहुविध(धादिमिः)नानानानाविधक्षिप्राऽनिधितानिश्चितध्रुयैः सप्रतिपक्षः द्वादशीम दैर्गुणिताः पत्रिंशदधिकानि त्रीणि शशानि भेदा भवन्ति । अत्र रहुबहुविधेतिस्थाने नानानाविधेति बन्धानुलोम्यादुक्तम् । तवाह-"जं पहुबहुविहखिप्पा-ऽपिस्सिअणिच्छियधुवेयरविभिन्ना । पुणरुग्गहादओ तो, तं छत्तीसतिसयभे ॥३०७॥" [यद् बहुबहुविवक्षिप्राऽनिधितनिश्रितधुवेतरविभिन्नाः । पुनरवग्रहादयस्ततस्तत्पत्रिंशत्रिशतभेदम् ॥॥११॥ अथ यहवादीनां स्वरूपमाह नानानां पहुत्वं हि, पृथगजात्यवासिता ।। नानात्याग्नैवत्वेन न) तज्ज्ञप्ति-रपाहुत्वं प्रचक्षते ॥१२॥ प्रत्येकं बहुधर्माणां, ज्ञान यहुविधं मतम् । प्रत्येकं स्वल्पधर्माणां, विज्ञानं तद्विपर्ययः ॥ १३ ॥ क्षिप्रं त्वरितमुत्पन-मक्षिमं तु चिलम्पितम् ॥ अनिश्रितमलिङ्गोत्यं, निश्रितं लिइगसम्भवम् ॥ १४ ॥ निधितं संशयातीतं, तेन ग्रस्तमनिश्चितम् ॥ सर्वदा यत्तथानाडि, ध्रुवं तथान्यदाऽध्रुवम् ॥ १५॥ बहूना विषयाणां प्रातिस्विकधर्मप्रकारकग्रहो बहुज्ञान, यथा तत्त्वं बहुत्वं च 'सकलस्वविषयनिष्ठयावदसाधारणधर्मप्रकारकत्वं,' साफल्यवानेकाशेपत्वं, न त्वशेषत्वमात्र, यावत्वं च व्यापकरवं, तेन घटोऽयमित्यापथ्यावहारिकावग्रहेऽशेषस्वविषयनिष्ठाशेप- धर्मग्राहिण्यपि महत्वव्यवहाराभावे न क्षतिर्ने वा नानातर्यजनितेषु शब्देषु कतिपयविशेषावभासेऽपि यदुत्वव्यवहारः, कतिपय विशेषावमासेऽपि ततः स्वल्पविशेपापेक्षया बहुत्वव्यवहाराद्, पावत्त्वमनेकत्वमेव का विवक्षित, नश्वपिकार्थावग्रहापेक्षयाऽऽध व्यावहारिकार्थावग्रहेऽपि बहुत्वव्यवहारे तु साकल्यमप्यशेषत्वमेव, अबहुत्वं च तद्भिमज्ञानत्वं, तवं चासाधारणधर्मानुपरागेण नज बहुविषयग्राहित्वं 'नानाशब्दा एते' इत्यादिसामान्यज्ञानं हि तदिति, एवम् अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यवहुतर- धर्मावगाहिज्ञान बहुविधं, न चैवं बहुविधस्यापि बहुत्वापत्तिस्तल्लक्षणसत्त्वादिति वाच्यम्, उपधेयसङ्करेऽप्युपाध्योरसङ्करा- द्विवक्षाद्वैविध्येन तत्र द्विधाव्यवहाराच, अबहुविधत्वं च न बहुविधभिन्नज्ञानत्वं, बहुज्ञानेतिव्याप्तेः, किन्त्ववहुविधमित्यत्र पर्युदासाश्रयणाद् अशेषस्वविषयनिष्ठानेकासाधारणधर्मव्याप्यस्वल्पतरधर्मावगाहित्वं' तदिति, बहुज्ञानेन पृथभिन्नजातीय- तया गृहीतेषु नानाशङ्खपणवादिशब्देषु एकैकं शङ्खभेर्यादिशब्दमाश्रित्य स्निग्धत्वमधुरत्वतरुणमध्यमवृद्धपुरुषवाद्यत्वा- दिबहुविधधर्मवौशिष्टयं गृण्हदेव हि बहुविधज्ञानमुदाहियते, तत्र स्निग्धमधुरत्वादिस्वल्पधर्मवैशिष्टथज्ञानञ्चाबहुविधमिति । क्षिप्रत्वं च नाविलम्बितोत्पत्तिकत्वम्, अक्षिप्रत्वञ्च न विलम्बितोत्पत्तिकत्वं, सामग्रीसन्निधानासन्निधानाभ्यां सर्वस्यापि विलम्बिताविलम्बितोत्पत्तिकत्वाव,नापि विमर्शानपेक्षोत्पत्तिकत्वं क्षिप्रत्वम्, अपायस्य, सतो. विमर्शसव्यपेक्षत्वनियमात्, किन्तु 'झटित्युपनतसामग्रीकत्वं क्षिप्रत्वं, अतादृशत्वं त्वक्षिप्रत्वमिति ॥ 'झटिति सामग्रथुपनिपातनियामकादृष्टजन्यतावच्छेदकजाति- विशेषवत्त्वं क्षिप्रत्वमित्यपि, कश्चित्, 'प्रवलतरसंस्काराधीनझटित्युपस्थितिकविमर्शजन्यत्वं' तत्त्वमित्यन्ये । अनिश्रितं लिङ्गानपेक्षोत्पत्तिकं पताकादिनिश्रया देवकुलादिदर्शनवद्, यन्न लिगनिश्रामपेक्षते यद्यप्यन्वयव्यतिरेकधर्मान्वेषणरूपामी- हामपेक्षमाणः सर्व,एवाऽपायो लिङ्गमपेक्षत एव तथाप्यनुमितिसामग्रीसम्पत्तिरूपा लिङ्गनिश्रा यत्र नास्ति तदनिश्रितं, अन्यत्तु निश्रितमिति ध्येयम् ॥ निश्चितत्वमसन्दिग्धविषयकवं: 'प्रामाण्यसंशयादिरूपविषयसंशयसामग्रथनास्कन्दितत्वम्', तद्विपरीतत्वमनिश्चितत्वं,. ध्रुवत्वं च 'सर्वकालमेकजातीयसामग्रीसमुत्पाद्यत्वम्', अतादृशत्वं वध्रुवत्वमिति । आह च- नाणाससमूह, पहुं पिहं मुणइ मिन्नजातीयं ॥ बहुविहमणेगभेयं, एककं णिमहराइ ॥ ३०८॥ [नानाशब्दसमूह, वह पृथग्जानाति भिन्नजातीपम् ॥ बहुविधमनेकमेदमे-कैकं स्निग्धमघुरादिम् ॥] "सिप्पमचिरेण । चिय, सरूवओजं अणि. स्सिअमलिंग ।। निच्छियमसंसयं ज, धुवमपंत न य (उ) कयाइ ॥३०९॥" क्षिप्रमचिरेण तमेव स्वरूपवो यमनिषितमलिङ्गम् । निषितमसंशयं ध्रुवमत्पन्तं नतु कदाचित् ।। ] " एसो पिय पडिवक्र्स साहिजा [एतस्मादेव प्रतिपर्व कपये ] ॥३१॥ निश्रितानिश्रितयोवायमपि विशेषः, यत् 'अतस्मिस्तद्धर्मग्रहो निश्रित' यथा गव्यश्वत्वग्रह इति, इतरवानिधितामिति ॥ आहप- "निस्सिए विसेसो वा ।। परधम्मेहि विमिस्स, निस्सिअमविणिस्सिप इपरं ॥३१०॥" [निधिते विशेपो वा, परधर्मविमिभं निधितमविनिश्रितमितरत् ] स्यादेतत्, बवादयो भेदाः स्पष्टार्थग्राहकेवपायादिषु सम्भवन्त, अस्पष्टाग्राहिण्पावनहे तु कर्य तत्सम्मवान व नैश्चयिका(वग्रहे तदसम्मवेऽपि व्यावहारिकार्थावग्रहे तरसम्मवान्न दोष इत्युक्तमिति वाच्यम्, तथापि व्या- नावग्नहे सर्वथा नदसम्भवेनोक्तसङ्ख्याव्याघातादिति, मैचं, पञ्जनापग्रहादीनामप्पपायादिकारणत्वेन तद्गतबहुत्वादिविशेषस्य योग्यतया पानावग्रहादिष्वपि सच्चाद्, 'नसविशिष्टात् कारणादिशिष्टं कार्यमुत्पतुमईति' कोद्रवीजादेरपि शालिफलादिप्रसव प्रसादिति सम्प्रदायः। ननु कार्यगतयावद्धर्माणां कारणगतत्वाभ्युपगम एव वक्ष्मतारूपयोग्यतया तत्र तत्सबमम्युपगमाई स्यात्, तञ्च सापप्रक्रिपादपण एष पितं 'अविशिष्टात् कारणादिशिष्ट कार्यानुत्पत्तिस्तु' तादृशातिशयष्यतिरेकाता तथाविषसह- कारिष्यतिरेकाद्वैत्यन्यदेव, तथा च कथमेतदुक्तमिति चेत्, न, एकसन्तानगामित्वरूपपोग्पता पुरस्कृत्य पवादिविशेषस्य व्यङ्ग- नावग्रहादिषु सम्भवाभिन्नापेण तदभिधानाम् । नन्वेवंविधं वैचित्र्यं मतिज्ञानस्य विवक्षामेदादनपस्थितमित्यनवस्थितो विमागा
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रस्यथा व्यवहारोच्छेदप्रसगात्, न खलु धूमबलाकादेः सकाशात्सम्यगदहनजलादौ निधिवेऽपि मुखेन तनिधयं ध्रुवतामपि सर्वपां प्रमातॄणा पतास शक्कामात्रविनिवर्तनेन च ते सर्वेऽपि निश्चितं वस्तु न प्राप्नुवन्तीति ।। वस्तुतः सन्दिग्धस्थले सन्देहाननुपिद्ध- स्वरूपो निश्चय एव वस्तुप्रापको ज्ञानप्रामाण्यसंशयाद्विपयसंशयस्तु भिभोऽप्यन्तर्गत एवेति, न तत्र निष्कम्पप्रवृत्तिजनकताव- च्छेदकनिश्यत्वामावोऽपि सुपचः, ईहायाच संशयत्वं प्रागेव निराहतं, निधयादन्यज्ञानमात्रस्यैव संशयत्वेनाज्ञानतायुपगमे निश्चयोपादानलक्षणस्यापि सर्वथाऽज्ञानत्वप्रसङ्गे निधयस्याप्यज्ञानतापत्तिा, 'न विशिष्टात् कारणात्कार्योत्पत्तिः इति परधर्ममिथ च निश्रितं यत्र संगृह्यते तदा तत्र तटस्थतौर परधर्ममिश्रितत्वं विपक्षणीयं, यथा गौरवायं केवलमय इव प्रतिभातीति न त्वत्यन्तो. परागणेति, न, तदप्यज्ञानं परधर्माणामाशंकामात्रमेव विमिश्रणम् , अनिश्रिते तु वस्त्वमावस्यैयाशंका न तु परधर्माणामित्यस्या- प्ययमेवार्थः, उक्तोदाहरणे इवार्थसादृश्यस्यैव भानात् , अवग्रहश्च नाऽनध्यवसाय एकोपयोगान्तर्भूतत्वलक्षणयोग्यतया तत्राज्यव सायसम्बन्धात, अतिमत्तमूष्ठितानामेव ज्ञानस्य योग्यतयाऽप्यध्यवसायमस्पृशतोऽनध्यवसायत्वाम्युपगमाद, आह घ-इह सज्झमोग्गहाई-णं संसयाइसणं ॥३१४॥" [इह साध्यमवग्रहादीनां संशयादित्वम् ] यद्यपीयं यस्तुस्थितिस्तथाप्यभ्युपगम्योन्यते- न निश्रितादयोऽज्ञान, ज्ञानं यत्संशयादयः॥ पस्त्वदेशग्राहित्य, समानं निधयेऽपि नः ॥ १६ ॥ संशयादयोऽपि हि ज्ञानमेव वस्त्वेकदेशगमकत्वाद् , इह हि घटादिकं वस्तु मृन्मपत्वापर्थपर्यायैर्घटकुम्भकलशादिवचन पर्यायैः परव्यावृत्तिपर्यायवानन्तधर्माशकं न तु निरंश, तस्य चैकैकदेशपरिच्छेदं संशयादयोऽपि कुर्वन्त्येवेति तेऽपि ज्ञानमेर, अथ समस्तवस्तुपाक्षेव ज्ञानं न तु तदेकदेशग्राहकमिति चेत्, तहि निर्णयोऽपि ज्ञानं न स्याद, गौरपमित्याघाकारस्प तस्य FORESCREES गोत्यादिवस्त्वेकदेशग्राहित्वात्, देशग्रहणद्वारा तदभिन्नवस्तुग्रहणं च संशयेऽपि तुल्यं, अथ निर्णयेन तथाभूत एवार्थो गृह्यत इति तज्ज्ञानं, संशयानां त्वतथाभूतार्थग्राहित्वान्न ज्ञानत्वमिति चेत्, न, अर्थग्राहित्वेनैव तेषां ज्ञानत्वाद्, विशेषाभावस्य सामान्याभावनियतत्वात्सम्यग्दृष्टिसम्बन्धासादितनैश्चयिकज्ञानत्वरूपस्य मतिज्ञानसामान्यस्यैवात्र निरूपयितुमुपक्रान्तत्वात् ॥ न चैवमवग्रहेहापायधारणाः संशयविपर्ययानध्यवसायाश्चेति मतिज्ञानस्य सप्तभेदप्रसङ्ग इति वाच्यम् । अनध्यवसायस्याऽवग्रहे, संशयस्यहायां, विपर्यासस्य चापाये व्यक्तमन्तर्भावात्, इत्थं चैतदवश्यमङ्गीकर्तव्यम्, अन्यथा संशयादिकाले सम्यग्दृशामज्ञा- नित्वप्रसङ्गा, एवञ्च-"सम्मदिट्ठी णं भंते ! किं नाणी अन्नाणी ?, गोयमा ! नाणी नो अन्नाणी" इत्याद्यागमविरोधः, न चानेन सूत्रेण सम्यग्दर्शनसामानाधिकरण्येनैव ज्ञानित्वप्रतिपादनान्न दोप इति वाच्यम् ॥ च्युतसम्यक्त्वस्य मिथ्यात्वं प्राप्तस्य तत्सामानाधिकरण्येन ज्ञानसत्त्वाद् ज्ञानित्वप्रसङ्गः। "मिच्छदिट्ठीणं भंते ! नाणी अन्नाणी १,गोयमा ! नो नाणी नियमा अन्नाणी" इत्याद्यागमविरोधस्य दुरुद्धरत्वाद् , ज्ञानस्य कालतः सम्यक्त्वनियतत्वप्रतिपादनात्संशयादीनामपि ज्ञानत्वमेव प्रामाणिकं, तदि- दमभिप्रेत्याह-"तहवि णाम ॥ अब्भुवगन्तुं भण्णइ,नाणं चिअ संसयाईआ॥३१४॥ वत्थुस्स देसगमगत्त-भावओ परमयप्पमाणं व ॥किह वत्थुदेसविण्णाण-हेयवो सुणसु तं वौच्छम् ॥३१५इह वत्थुमत्थवयणाइ-पजवाणंतसत्तिसम्पन्न ।। तस्संगदेसविच्छेय- कारिणो संसयाईआ ॥३१६॥ अहवा ण सव्वधम्मा-वभासया तो न नाणमिट्ठन्ते ॥ नणु निण्णओ वि, तदेस-मेत्तगाहित्ति अन्नाणं ॥३१७॥ [तथापि नाम ॥ अभ्युपगम्य भण्यते,ज्ञानमेव संशयादयः॥ वस्तुनो देशगमकत्वमावतः परमतप्रमाणमिव ॥ कथं वस्तु- देशविज्ञानहेतवः, श्रृणु तद् वक्ष्ये ॥ इह वस्त्वर्थवचनादिपर्यायानन्तशक्तिसम्पन्नम् ॥ तस्यैकदेशविच्छेदकारिणः संशयादयः ॥ RRORE अथवा न सर्वधर्मावभासकास्ततो न शानमिष्टं से ।। ननु निर्णयोऽपि तदेशमात्रप्राहीत्यज्ञानम् ॥ ] ॥१६॥ ननु सम्यग्दर्शनकाल इव मिथ्यादर्शनकालेऽपि ज्ञानसामान्यसत्चात्कथमयं विभाग इत्यवाह- ज्ञानं मिध्यादृशां सर्व-मज्ञानमुपयार्णितम् ।। एकग्रहेऽपि सर्यस्य, ज्ञानं सम्यग्दशा ग्रहात् ॥ १७ ॥ मिथ्याशा हि संशयादिरूपमतधाभूतं वा सर्वमेयाज्ञानमिति "सदसदविसेसणाओ" इत्यत्र सप्रपश्यं व्यवस्थापितमिति, अत्र पुनस्तदुपदर्शनं पिटमेर पिनष्टि,अत एव "जइ एवं तेण तुई, अनाणी कोवि नस्थि संसारे(री) | मिच्छदिट्ठीणं ते, अनाणं नाणमि- यरेसिं॥३१८॥"[यद्येवं तेन तपाशानी कोऽपि नास्ति संसारे(री)। मिथ्यादृष्टीनां तेऽज्ञानं ज्ञानमितरेपाम् ] इति प्रतिशाय भाष्य कारोऽपि सदसदविसेसणाओ' इति गाथामेगाडितमान् ,सम्यग्दृशस्त्वेकं वस्तु गृह्णतः सर्वग्रहात् शानमेव सर्वोऽपि पोधा,तथाहि, इह तावदेक वस्तु समस्तत्रिभुवनमयं अनन्ताऽनन्तानां स्वपर्यायाणामियान्यव्यात्तिरूपाणां परपर्यायाणामपि तत्र पत्ता,तथापि परे पदार्थाः कथं तत्र पतिष्यन्त इति चेत्,अभापतिद्वारा प्रतियोगिनामपि तत्तित्वाद्, अमावस्य तत्र विशेषणत्वलक्षणः साक्षात्सम्य- न्धः, प्रतियोगिनां तु स्वाभावत्तित्वलक्षणः परम्परासम्बन्धः, इत्येव हि विशेषा, एयश्च याथारम्पेनैकरस्तुज्ञाने सर्ववस्तुज्ञानमिति नियमः,सर्ववस्तुशान एव चैकवस्तुशानमिति नियम इति ॥"जे एग जाणइ से सपंजाणइ, जे सर्व जाणइ से एग जाणइ ।। इत्यागमोध्यपस्थिता,तथा चैकं वस्तु गृहणतः सर्ववस्तुग्रहो निरापाधएव,अाविधं परिज्ञानं फेरलिन एव सम्मवति, नतु सूक्ष्मव्य- वहितार्थाग्राहिण उपस्थस्येविचेत् न,साक्षाचस्प तथापरिक्षानाभावेऽपि "जो एगंजामई"इस्याचागमप्रामाण्याम्युगमद्वारा तस्यापि तथा परिज्ञानात् तस्माआग्रता स्वपतस्तिष्ठतवलतो या परमगुरुपणीतपयोक्तवस्तुस्थरूपाभ्युपगमस्य चेतसि सर्वदेवाविचलनात् सम्यग्दृष्टिः सर्वदा ज्ञान्येव, आह च-"एगं जाणं सव्वं, जाणइ, सव्यं च नाणमेगंति ॥ इय सव्वमयं सव्यं सम्मदि- द्विस्स जं वत्थु ।।३२०॥ [एकं जानन्सर्वं जानाति सर्व च जाननेकमिति ॥ इति सर्वमयं सर्व सम्यग्दृष्टेः यद्वस्तु] ॥१७॥ तस्मा- तत्त्वाभ्युपगमविशिष्टस्य ग्रहणमात्रस्यैव ज्ञानत्वात्स्थाणौ व्यावृत्तिरूपाणामपि पुरुषत्वादिपर्यायाणां पररूपतया ग्रहेऽपि अनन्त- पर्यायस्यापि वस्तुनः प्रयोजनवशादेकपर्यायग्रहेऽपि याथात्म्याभ्युपगमस्य निरुपप्लवत्वात्सम्यग्दृशो न ज्ञानं प्रच्यवत इत्याह- तत्त्वोपगममाहात्म्याद, ज्ञानमेवास्य संशये ॥ प्रयोजनवशादेक-पर्यायग्रहणेऽपि च ॥१८॥ न खलु व्यवहारमात्रेणाज्ञानरूपा अपि सम्यग्दृशः संशयादयो निश्चयतो न ज्ञानं, तत्वोपगमविशेपितवस्तुधर्मग्रहणस्य तत्रान- पायात्सिद्धान्तनियन्त्रितेन समभिरूढनयेनैवम्भूतार्थावाधेन तादृशस्यैव ज्ञानस्याभ्युपगमाद्,नचैकपर्यायमात्रग्रहे वस्तुनोऽन्यथान- हात्तस्याज्ञानित्वप्रसङ्गः, यतः प्रयोजनक्शादनन्तधर्मात्मकेपि वस्तुनि यद्यप्यसावेकं पर्यायमासादयति यथा सौवर्णघटे दृष्टे घटार्थी घटत्वमध्यवस्यति सुवर्णार्थी तु सुवर्णत्वं जलानयनार्थी तु जलभाजनत्व मिति व्यवस्यति, उपलक्षणं चेदं, अभ्यासपाट- वप्रत्यासत्यादिभिरपि पर्यायविशेपग्रहाद् यथा ब्राह्मणे द्वारि दृष्टे कोऽप्यभ्यासवशाद् भिक्षुकोऽयमिति जानाति, अन्यस्तु पाटववशाद् ब्राह्मणोऽयमिति, अपरस्तु यस्तदभ्यर्णे भणति स प्रत्यासत्तिवशान्मदुपाध्यायोऽयमिति, तथापि तदानीं तस्य भावतोऽ- नन्तपर्यायात्मकतया वस्तुग्रहणपरिणामो न क्षीयत इति, तदाह-" जे संसयाइगम्मा, धम्मा वत्थुस्स ते वि पज्जाया ॥ तदहि- गमत्तणओ ते, नाणं चिय संसयाईआ॥ ३२१ ॥ पज्जायमासयन्तो, एक पि तओ पओअणवसाओ ॥ तत्तियपज्जायं चिय, तं गिण्डइ भावओ वत्थु ॥ ३२२ ॥" [ये संशयादिगम्या धर्मा वस्तुनस्तेऽपि पर्यायाः ॥ तदधिगमत्यतस्ते ज्ञानमेव संशयादयः॥
पर्यायमाश्रयन्नेकमपि तक प्रयोजनक्शात् ॥ तावत्पर्यायमेव तद् गृह्णाति भावतो वस्तु ॥] ननु भावतस्तथा ग्रहणं न सार्वत्रिक घटाघुपयोगकाले तदुपयोगानियमादत एव तथाविधागमप्रामाण्याऽभ्युपगमोऽपि न तथेति तद्विशेपित ग्रहणं ज्ञानमिति पर्यवसि- वार्थानुपपचिः, नचाऽभ्युपगमपदेमात्र उद्योग्यतैव विवक्षणीया, साच सम्यग्दर्शनरूपैवेति सम्यग्दर्शनविशेषितमेव ज्ञानं नैश्वयिक झानं, अत एव "नित्रयकाले विजओ, ण तहास्वं विदन्ति ते वत्थु॥ मिच्छदिट्ठी तम्हा, सव्वं चिय तेसिमन्नाणं ॥ ३२३ ॥" [निर्णयकालेऽपि यतो न तथारूपं विदन्ति ते वस्तु ॥ मिथ्या दृष्टयस्तस्मात्सर्वमेव तेपामज्ञानम्] इति गाथया मिध्याशा निर्णयकाले- ऽपि ज्ञानत्वनियामक तत्याभ्युपगमयोग्यताभावमणनाद् ज्ञानाभावलक्षणमझानमुक्तं,यदुक्तं "कट्ठयरं वन्नाणं,विवजओचेव मिच्छ- दिट्ठीणं ॥ मिच्छाभिणिवेसाओ, सम्वत्य घडेव्व पडबुद्धी ॥३२४॥" [कप्टतरं धाऽज्ञानं, विपर्ययत एव मिथ्यादृष्टीनां ॥ मिथ्या- भिनिवेशात्सर्वत्र, घट इव पटबुद्धिः] इति गाथया चाऽभिनिवेशव्यपदेश्यमिथ्यादर्शनरूपायास्तदयोग्यताया एव कष्टवरस्वात्तज्ज्ञान- जनकसम्यग्दर्शनविरोधि मिथ्यादर्शनजन्यं स्वतन्त्रमेवाज्ञानमुक्तं कष्टतरपदेनातिदुस्सहमहादुःखहेतुत्वाभिधानात्तचाभ्युपगमा- भावनियामकत्वोक्तावपि तस्य स्वतः संसाराहेतृत्वात् , विपर्ययनियामकमिथ्याभिनिवेशोक्त्या फलतस्तद्धेतुभूतमिध्यादर्शन- समामिधानाज्ञाननियामकत्ये मिथ्याभिनिवेशयोग्यताविशिष्ट स्वरूपज्ञानस्य तत एवातिप्रसद्गादिति वाच्यम, सम्यग्दृष्टी सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रसिद्धत्वेन तमुद्दिश्य सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य प्रश्नप्रतिवचनाऽभावप्रसङ्गाद्विशिष्याज्ञातस्यै- वार्थस्य प्रश्नारोहात् , न चापर्याप्ताद्यवस्थायां सम्यक्त्वकालेऽपि ज्ञानाभावशङ्कया प्रश्नावतारो मनोव्यापाररूपस्य व्यक्तज्ञानस्य वदानीमभावेऽपि ज्ञानसामान्यस्याप्रत्यूहत्वाच निर्वचनं फलवदिति वाच्यम् , तथापि विशेपमन्तव्य निर्वचनस्याऽनतिप्रयोजन- । wwww त्वात् , न च निर्वचनेनैव विशेषान्तर्भाव इति शङ्कनीयं, मिथ्यादृष्टिसूत्रानुरोधेन तत्र विशेषान्तर्भावावश्यकत्वात् , न च मोक्ष- हेतोः सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्य सम्यग्दृष्टौ विशेष्यशङ्काप्रयुक्तशङ्कया प्रश्नस्तन्निर्वचनञ्च सङ्गच्छेते इति वाच्यम्, सम्यग्- दर्शनविशिष्टज्ञानत्वेन मोक्षाहेतुत्वाद्विशिष्टज्ञानत्वेनैव तथात्वात्सामान्यपदेन विशेषप्रश्नानौचित्याच, अपि च सम्यग्दृष्टिसूत्रस्थप्र- भवाक्यद्वये ज्ञानपदस्यैकरूपस्यैव निवेशात्कथं निर्वचनस्त्रयोविशेषगर्भत्वं प्रश्नसमानाकारस्यैवोत्तरस्य युक्तत्वात् , नहि भूतले घटोऽस्ति नवेति प्रश्ने भूतले नीलघटोऽस्तीत्युत्तरमुञ्चन्ति विपश्चितः, एवञ्च स्वस्थितशडकाविरहेऽपि शिष्यजिज्ञापयिपोत्थापित- शङ्कया प्रश्न इत्युक्तिरपि न युक्तेति चेत्, न,सम्यग्दर्शनविशिष्टज्ञानस्यैव मोक्षौपयिकतया नैश्चयिकज्ञानत्वात्प्रश्ननिर्वचनवाक्ययोस्तु सामान्यपदगर्भयोरपि विशेषाभिप्रायप्रयुक्ततया विशेपे पर्यवसानात्, तथाहि, निश्चयाभिप्रायेण सम्यग्दृष्टिानी नवेति प्रयुक्तस्य प्रश्नवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिर्मोक्षौपयिकज्ञानवान्न वेत्यर्थात् ततः सम्यग्दृष्टिान्येवेति निर्वचनवाक्यस्य सम्यग्दृष्टिर्मोक्षौपयिकज्ञान- वानेवेत्यर्थात् यदभिप्रायेण प्रश्नस्तदभिप्रायेणैवोत्तरप्रदानात्, एवं मिथ्यादृष्टिसूत्रेऽपि भावनीयं, न च विशेषाभिप्रायेणापि प्रयुक्तात् सामान्यपदान्न विशेषोपस्थितिरिति शङ्कनीयं, भोजनाभिप्रायेण सैन्धवप्रश्ने तदुत्तरवाक्यस्थसैन्धवपदाल्लवणानुपस्थितिप्रसङ्गा- दिति दिग् ॥१८॥ अथ प्रकारान्तरेण संशयादिकालेऽपि सम्यग्दृशो ज्ञानं मिथ्यादृशश्च निर्णयकालेऽप्यज्ञानं समर्थयति- सम्यग्दृशः संशयो वा, ज्ञानं ज्ञानोपयोगतः ॥ मिथ्यादृशां किलाज्ञानं, सर्वो योधस्तमन्तरा ॥ १९ ॥ सम्यग्दृशः संशयः, उपलक्षणाद्विपर्यासानध्यवसायौ च ज्ञानमेव ज्ञानोपयोगात्, 'यो यदुपयुक्तः स तन्मयो' यथेन्द्रज्ञानो- पयुक्तो दरिद्रोऽपीन्द्र एव, वर्तते च सभ्यग्दर्शनलाभकाल एव मत्यादिज्ञानलाभात्सम्यग्दृशः सर्वदैव ज्ञानपरिणामरूपज्ञानोपयोग- मात्र, तस्मात्तस्य संशयादिकालेऽपि मौलज्ञानोपयोगयोगादप्रत्यूहमेव ज्ञानमिति । तदाह-"अहवा जहिंदनाणो-वओगओ तम्म- यत्तर्ण होइ ।। तह संसयाइभावे, नाणं नागोयओगाओ ॥३२५॥" [अथवा यथेन्द्रज्ञानोपयोगतस्तन्मपत्यं भवति तथा संशयादि. भावे ज्ञानं ज्ञानोपयोगात् ] मिध्यादृशस्तु निर्णयकालेऽपि सम्यग्दर्शनाविनाभाविज्ञानोपयोगयोर(स्पा)मावादशानमेव, उपयोग- ग्राहिणा नयेन तत्कार्यान्तरमनपेक्ष्य तदुपयोगेनैव तन्मयत्वव्यवस्थापनादिन्द्रपदार्थ परमेश्चर्यमनपेक्ष्यैवेन्द्रोपयोगवत इन्द्रत्वाम्यु- पगमात् ।। तदाह-"तुलमिणं मिच्छरसपि, को सम्मवाहमारसुमोति॥ उपओगमि वि तो तस्स, णिचममाणपरिणामो ॥३२६।। जं निमओपओगे पि, तस्स विवरीयवत्युपडियनी ॥ तो संसयाइकाले, कत्तो नाणोवोगो से॥३२७॥" [तुल्यमिदं मिथ्यादृष्टेरपि स सम्यक्त्वादिभावशून्य इति ।। उपयोगेऽपि ततस्तस्य नित्यमज्ञानपरिणामः ॥ यनिर्णयोपयोगेऽपि तस्य विपरतिवस्तुप्रातिपत्तिः । ततः संशयादिकाले कुतो ज्ञानोपयोगस्तस्य ।। ।। १९ ।। तदेवं साधितमभ्युपगम्यानिश्रितादीनां संशयादिरूपत्वेऽपि सम्यग्दृशा सानत्यम्, अध सामान्यतो शानाज्ञानरूपाया एप मतेनिरूपणीयत्वान्न किञ्चिदप्यतीत्याह- सामान्यतो निरूप्यत्या-मतेः कापि न च क्षतिः ।। ज्ञानाज्ञानविभागस्तु, शेपो फलविभागतः ॥२०॥ इह हि 'आमिणिरोहियनाणं, सुअनाणं च' इत्यादिगाथायां ध्रुतमान ताप योगार्थमात्रपुरस्कारेण ज्ञानज्ञानोभयसाधारणमेव निर्दिष्टमिति, यथा-'अक्सरसनीसम्म' इत्यादिनाऽभिधास्पमानेषु चतुर्दशसु तरेदेषु मिथ्यायुतस्यैपी ग्रहप्रसगात्, एवं चमति. शानमपि सङ्ग्रहलापवाद ज्ञानाज्ञानोभयसाधारणमेयोक्तमिति सम्यग्दृष्टिसम्बन्धिना संशयादीनामझानत्वेऽपिन क्षतिरिति तदाह- "अहया जह मुयनाणा-यसरे सामनदेसणं भणियं ।। तह महनाणायमरे, सबमइनिरूपणं कुणा ॥३२८" [अथवा यथा श्रुतज्ञा- नावसरे सामान्यदेशनं भणितम्।।तथा मतिज्ञानावसरे, सर्वमतिनिरूपणं करोति] ज्ञानाज्ञानविभागचिन्तायां तु सम्यक्त्वानुगता मतिर्मतिज्ञानं, मिथ्यात्वविशेपिता तु सा मत्यज्ञानमिति द्रष्टव्यं, 'अविसेसिया मई'इत्यादिसूत्रेण प्राक्तथाविवेचितत्वाद्।।आह च- एसा सम्माणुगया, सव्वा नाणं विवज्जए इयरं।।अविससिया मइ च्चिय, जम्हा णिदिट्टमाईए॥३२९॥[एपा सम्यक्त्वाऽनुगता, सर्वा ज्ञानं विपर्यये इतरत् ।। अविशेपिता मतिरेव यस्मानिर्दिष्टमादौ ॥] नन्वेतत्सूत्रव्यावर्णन एव मतिज्ञानपदं सम्यग्दृष्टित्वविशेषि- तायामेव मतौ प्रवर्तत इत्युक्तम्, तत्कथमाभिनियोधिकज्ञानपदेन ज्ञानाज्ञानोभयरूपाया मतेः सङ्ग्रह इति चेत्, सत्यम्-रूढिपुर- स्कारेणैव सम्यग्दृष्टित्वविशेषितं मतिज्ञानं ज्ञानमित्युक्तेर्योगार्थमादायोभयसनहाविरोधात्,योगार्थस्य साधारणत्वेऽपि मोक्षसंसार- लक्षणफलभेदेनैव सम्यग्मिथ्यादृष्टिसम्बन्धिनोनियोरनाद्यलौकिकसङ्केतलक्षणज्ञानाज्ञानपदरूढिप्रवृत्तेनिश्चयेन फलवत एव वस्तुनोऽभ्युपगमात्, अत एवाह-"विवरीयवत्थुगहणे, जं सो साहणा विवज्जयं कुणई ।। तो तस्स अन्नाणफलं, सम्महिस्स नाण- फलं॥३३०॥" [विपरीतवस्तुग्रहणे, यत्स साधनविपर्ययं करोति ॥ ततस्तस्याऽज्ञानफलं सम्यग्दृष्टेनिफलम् ॥] विपरीतवस्तु- ग्रहणशीलो हि मिथ्यादृष्टियोगीयहिंसादिकं संसारसाधनमपि मोक्षसाधनत्वेनाध्यवस्यतीति विपरीतफलकत्वेन तदज्ञानमिति परिभाष्यते, सम्यग्दृष्टिस्तु यथावद्ज्ञात्वा यथास्थानं साधनं विनियुक्त इति फलवत्त्वात्तदीयो बोधो ज्ञान xxx (योजितः पाठः)[मेवाननु सर्वमयं सर्वमेव वस्त्विति भवसिद्धान्ततो मोक्षसाधनस्य सम्यग्ज्ञानादित्रिकस्य सम्यग्ज्ञानादि. चन्मिथ्याज्ञानादिरपि धर्म इति सम्यग्दृष्टिना मोक्षसंसिद्धये ।यस्य साधनस्य धर्मोऽङ्गीकृतः मिथ्यादृष्टिनापि तस्यैव धर्मस्तत्सिद्धये स्वीकृतः, धर्मग्रहणद्वारेण च तस्य धर्मिणोऽपि कथञ्चिद्ग्रहणं समस्त्येवेति न मिथ्यादृष्टेविपरीतत्वमिति चेत्. न, यताऽनन्तधर्माऽभ्यासितस्यापि वस्तुनो न सर्वेऽपि धर्मा ऐकमर्थ साधयन्ति, किन्तु यो धर्मो यत्रार्थे योग्यस्स एव तमेवार्थ साधयति यथा कलशमल्लकादीनां मृद्धमत्वे समानेऽपि कलश एव मङ्गलादिकार्येषु व्याप्रियते, एवं यद्यपि मोक्षादिसाधनस्य मिथ्याज्ञानादिकोऽपि व्यावृत्तिरूपतया धर्मः, तथापि नासौ मोक्षस्य साधकः, किन्तु तद्विपक्षभूतस्य संसारादिकस्यैव, मोक्षा- देस्तु तत्साधनयोग्यः सम्यग्ज्ञानादिको धर्म एव साधक इति यस्तुस्थिती मोक्षेऽयोग्यं मिथ्याज्ञानादिकमयोग्यतयाऽपश्यंस्तत्र व्यापारयति मि यादृष्टिरतस्साधनविपर्ययं कुर्वतोऽस्याज्ञानमेव, तदाह भाष्यकार:-"जइ सो वि तस्स धम्मो, कि विवरीयत्तणं तितं न भवे ॥ धम्मो वि जओ सव्वो, न साहणं किंतु जो जोग्गो॥३३१॥जोग्गाजोग्गविसेसं, अमुणंतो सो विवज्जयं कुणइ ॥ सम्मट्ठिी उण कुणई, तस्स सट्ठाणविणिओगं॥३३२॥" [यदि सोऽपि तस्य धर्मः किं विपरीतत्वमिति वन्न भवेत् ।। धर्मोऽपि यतः सर्वो न साधनं किन्तु यो योग्यः॥ योग्यायोग्यविशेषमजानन् स(मिथ्याष्टिः) विपर्ययं करोति । सम्यग्दृष्टिः पुनः करोति, तस्य स्वस्थानविनियोगम्] इति । योग्यमयोग्यञ्च धर्म जानन् स्थाने व्यापारयश्च सम्यग्दृष्टिः सम्यगाराधको भूत्वा समीहितफलमा- ग्भवति ॥ उक्तं च-काले सिक्सइ नाणं, जिणमणिशं परमभत्तिराएण। ईसणपभावगाणि अ,सिक्खइ सत्थाई कालम्मि ॥१॥ काले य भत्तपाणं, गवेसए सयलदोसपरिसुद्धं ॥ आयरियाईणट्ठा, पवयणमायासु उवउत्तो ॥ २ ॥ एवं समायरंतो, काले कालं विसुद्धपरिणामो ॥ असवन्तजोगकारी, सलाहणिजो य भुवणम्मि ॥ ३ ॥ सयलसुरासुरपणमिय-जिण-गणहरभाणयकिरिय- विहिकुसलो ।। आराहिऊण सम्म-त्त-नाण-चरणाई परमाई ॥ ४ ॥ सत्तट्ठभवग्गहण-भतरकालम्मि केवलमाणं । उप्पाडिऊण गच्छर, विहुयमलो सासयं मोक्खं ॥५॥ तत्थ य जर-जम्मण-मरण-रोग-तण्हा-छुहा-भय-विमुक्को ॥ साइ अपअवसाणं, GANESCREE कालमणंतं सुहं लहइ ॥६॥” इति ॥ काले शिक्षते ज्ञानं, जिनभणितं परमभक्तिरागेण । दर्शनप्रभावकाणि च शिक्षते शास्त्राणि काले । काले च भक्तपानं, गवेधयेत्सकलदोपपरिशुद्धम्।।आचार्यादीनामयि, प्रवचनमातृष्पयुक्तः ॥ एवं समाचरन्काले काले विशुद्धपरिणामः ॥ अस्रवद्योगकारी श्लाघनीयश्च भुवने । सकलसुरासुरप्रणतजिन-गणधरभापितक्रियाविधिकुशलः ॥ आराध्य सम्यक्त्वज्ञानचरणानि परमाणि ॥ सप्ताष्टभवग्रहणाभ्यन्तरकाले केवलज्ञानम् ॥ उत्पाद्य गच्छति विधुतमलः शाश्वतं मोक्षम् ॥ तत्र च. जराजन्ममरणरोगतृष्णाक्षुधाभयविमुक्तः ॥ साद्यपर्यवसानं कालमनन्तं सुखं लभते ॥ ] तेषु मतिज्ञानभेदेषु चतुर्यु अर्थावग्रहादिषु एकसमयोऽर्थावग्रहः, समयः सर्वजघन्यः कालविशेषः, ईहापायावन्तमुहूर्तम्, व्यञ्जनावग्रहव्यावहारिकार्थावग्रहावपि तथैव, अविच्युतिस्मृतिवासनाभेदात् त्रिविधा धारणा, तत्राऽविच्युतिः स्मृतिश्च प्रत्येकमन्तर्मुहूर्त भवति, स्मृतिबीजभूता तदर्थज्ञानाव- रणक्षयोपशमरूपा वासना तु संख्येयवर्षायुषां सत्त्वानां संख्येयं कालम्, असंख्येयवर्षायुषां तु पल्योपमादिजीविनाम संख्येयं कालम्भवति, तदुक्तं नियुक्तिकृता ॥ “ उग्गहो एक्कं समयं, ईहा-वाया मुहुत्तमंतं तु ॥ कालमसंखं संखं च, धारणा होइ नायव्या ॥ ३३३ ॥” इति [ अवग्रह एक समयं, ईहापायौ मुहूर्तान्तस्तु ॥ कालमसंख्यं संख्यं च धारणा भवति ज्ञातव्या ] नैश्चयिकार्थावग्रह एकसमयः, वासनारूपधारणाम्मुक्त्वाऽन्ये व्यञ्जनावग्रह-व्यावहारिकार्थावग्रहापायाविच्यु- तिस्मृतिरूपा मतिभेदाः पृथगेकमेवान्तर्मुहूर्त भवन्ति । यदाह भाष्यकारः॥ "अत्थोग्गहो जहन्नो, समयं सेसोग्गहादओ वीसु ॥ अंतोमुहृत्तमेगं तु, वासनाधारणं मोत्तुं ॥३३४॥" [अर्थावग्रहो जघन्यः समयं शेषाऽवग्रहादयो विश्वक् अन्तर्मुहूर्तमेकं तु वासना- धारणां मुक्त्वा ] इति स्थितिविचारः ॥ नयनमनोभिन्नानां श्रोत्रादीनां चतुर्णामिन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वव्यवस्थापनतस्तेषां SARASAREEK ध्यअनावग्रहचतुर्धा नयनमनसोरप्राप्यारित्वष्यवस्थापनतस्तयोर्न व्यञ्जनावग्रहा, इत्येवं पूर्वमेव निर्णयः कत , इदानी तेपुत्र विशेष उपदर्यते-श्रोत्रं स्पृष्टमात्राण्यागन्दगपाण्पुश्लम, तानि नाणेन्द्रियादिविषयीभूनद्रव्येभ्यः सूक्ष्माणि, पहनि, भावुका- नि च, विषयपरिच्छेदे प्राणेन्द्रियादिगणापटुतरं च प्रोटेन्द्रियम्, माणरसनस्पर्शनेन्द्रियाणि स्वस्वाविषयं बद्धस्पृष्टं गुमान्ति, प्राणरस विषयो गन्धः, रसनाया विषयो रसा, स्पर्शनस्य विपयः स्पर्शः । स्पृष्टमित्यालिङ्गितं, पद्धं तु गाढतरमाश्लिष्टमात्म- प्रदेशः, प्राणेन्द्रियादिविषपभूतानि गन्धादिद्रव्याणि शब्दद्रव्यापेक्षया स्तोकानि,पादराणि,अभावुकानि च विपरपरिच्छेदे भोगा- पेक्षया पनि च प्राणादीनि,अत एव पदस्पृष्टमेव स्वस्वविपयं गृहन्ति न स्पृटमात्रम्, चक्षुरिन्द्रियन्तु अप्राप्तमेव विषयं गृह्णाति, अप्राप्तवारिशेपे कथं न सर्वस्य ग्रहणमिति नाशय, यतोऽप्राप्तमपि योग्पदेशस्यमेव पश्यति, नायोपदेशस्थमिति, उक्ताओं- पोबालिका 'पुढ मुणेइ सई' इत्यादिनियुक्तिगायां सम्पन्धयन्नाऽऽह भाष्यकारः ।। "मोत्ताईण पत्ताइ-विसपया पुब्बम: त्यो भणियाइह फंठा सट्टाणे, भण्णइ विसयप्पमाणं च ॥३३५॥ पुढे सुणेइ सई, रूवं पुण पासइ अपुढे तु ॥ गन्ध रसं च फास घ, पदपुढे वियागरे॥३३६॥” इति, 'पृह मुणेइ सई' इति नियुक्तिगायाव्यानरूपाश्वेमा भाष्यगाथाः, वद्यथा-पुढं रेणुं व तणुम्मि, पद्धमप्पीकप पएसेहि ॥ छिकाई चिय गिण्डर, सहदव्याज ताई ३३७॥बहुमुहुममायुगाई, ज पटुपरं च सोक्ष- विष्णाण ॥ गंधाईदयाई, विपरीयाई ओ वाई॥३३८॥ फरिमाणतरमत-पयसमीसीकयाई पति ।। पपरविण्णाणाई जंपन पाणाइकरणाई॥३३९॥ श्रोत्रादीनां प्रासादि-विपरता पूर्वमर्थतो भणिताह कठास्वस्थाने,भण्यते विषयप्रमाणं चाएं शृणो- ति शन्दरूपं पुनः पश्यत्यस्पृष्टं तु॥ गन्धरसं चस्पर्श च पद्धस्पष्ट ध्यागृणीयात् ।। स्पष्ट रेणरिप तनो पदमारमीकृतं प्रदेशेगारष्टा- HAR REERRESS - न्येव गृह्णाति,शब्दद्व्याणि यत्तानि।।आत्माङ्गुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥ वहुमुक्ष्मभावुकानि यत्पटुतरं च श्रोत्रविज्ञानम् ॥ गन्धादिद्रव्याणि विपरीतानि यतस्तानि ॥ स्पर्शानन्तरमात्मप्रदेशैमिश्रीकृतानि गृह्यन्ते ॥ पटुतरविज्ञानानि यञ्च न घ्राणा- दिकरणानि ॥ ] इति ॥ स्पष्टाश्चेमा गाथाः । नयनं मनचाप्राप्तस्यैव वस्तुनः परिच्छेदकारि, तेन नयनं रूपमस्ट- प्टमेव पश्यति, नयनस्य चात्माङ्गुलेन सातिरेक योजनलक्षमुत्कृष्टतोऽपि विषयपरिमाणमागमेऽभिहितं, तेनाप्राप्तत्वा- विशेषेऽपि परतो न पश्यति, आत्माङ्गुलोच्छ्याङ्गुलप्रमाणाङ्गुलभेदेनाङ्गुलं त्रिविधं ॥ तत्राद्यं “जेणं जया मणूसा, तेसि जे होइ माणरूवं तु ॥ तं भणियमिहायंगुल-मणिययमाणं पुण इमं तु ॥१॥" द्वितीयं तु “परमाणू तसरेणू , रहरेणू अग्गयं च वाल- स्स ।। लिक्खा जूया य जयो, अद्वगुणविवड्डिया कमसो॥२॥” इत्यादिग्रन्थोक्तम्, तृतीयं तु-"उस्सेहंगुलमेगं, हवइ पमाणेगुलं सहस्सगुणं ॥तंचेव दुगुणियं खलु, वीरस्सायंगुलं भणियं ॥३॥आयंगुलेण वत्थु, उस्सेहपमाणओ मिणसु देह।।नग-पुढवि-विमाणाई, मिणसु पमाणंगुलेगति॥४॥ [ये यदा मनुष्यास्तेषां यद् भवति मानरूपं तु॥तद्भणितमिहात्माङ्गुल-मनियतमानं पुनरिदं तु॥परमाणु- खसरेणू, रथरेणुरग्रकं च वालस्या।लिक्षा युका च यवोऽष्टगुणविवर्धिताःक्रमशः।। उत्सेधाङ्गुलमेक,भवति प्रमाणागुलं सहस्रगुणम्।। तदेव द्विगुणितं खल, वीरस्यात्मामुलं भणितम्।। आत्मागुलेन वस्तु, उत्सेध(धागुल)प्रमाणतो मिनु देहम्।। नगपृथ्वीविमानानि, मिनु प्रमाणावगुलेनेति ।। ] उक्तोपपत्तिप्रदर्शिका च भाष्यगाथा यथा-"अप्पत्तकारि नयणं, मणो य, नयणस्स विसयपरिमाणं ।। आयंगुलेण · लक्ख, अइरित्तं जोयणाणं तु ॥ ३४०॥" [अप्राप्तकारि नयनं मनच, नयनस्य विषयपरिमाणम् । आत्मा- गुलेन लक्षमतिरिक्तं योजनानां तु ॥] इति ॥ ननु उस्सेहपमाणओ मिणे देह" इतिवचनादेहस्य तावदुच्छ्याइगुल- RECTRENA प्रमाणत्वं सिद्धमेव, देहग्रहणस्योपलक्षणत्वाचनस्थमिन्द्रियं वद्विपपश्च गृह्यत इति चक्षुपस्तद्विपयस्य चोच्छ्याइगुलप्रमाणमेयत्वे. नारमाशुलेन नयनविषयपरिमाणकथनमयुक्तमिति चेत्,न, देहग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वास्वीकारेण देहस्यैवोच्छ्याशुलप्रमाणमेयत्वे. नेन्द्रियविषयपरिमाणस्यात्माङ्गुलेनैव मेयत्वात् तदुक्तं भाष्यकृता "नशु भणियमुस्सयंगुल-पमाणओ जीवदेहमाणाइ ।। देहप- माणं चिय तं, न उ इंदियविसपपरिमाणं ॥३४॥" [ननु भणितमुच्छ्या-गुलप्रमाणतो जीवदेहमानानि ॥ देहप्रमाणमेव वद्, नए विन्द्रियविषयपरिमाणम् ] इति, युज्यते चेन्द्रियविषयपरिमाणमारमाङ्गुलेनैव, न तु उच्छ्याङ्लेन, यतः पश्चार्धपश्चमधनु:- शतादिप्रमाणानां भरतादीनां चायोप्यादिनगर्यः स्कन्धावारथात्माशुलेन द्वादशयोजनायामतया सिद्धान्ते निर्णीताः, भरतच- कवण्यात्मागुलं च प्रमाणागुलं तद् उच्छ्याइगुलात्सहस्रगुणं " उस्सेहंगुलमेगं हवइ पमाणंगुलं सहस्सगुणं " इति वचः । नाव, ततश्चायोध्यादिनगर्यः स्कन्धावारव उत्सेधाङ्गुलेन पुनरनेकानि योजनसहस्राणि भवन्ति, एवश्वायुधशालादिषु ताडित- मर्यादिशब्दश्रवणं सर्वेपामिन्द्रयविषयस्योछ्याङ्गुलमेयत्वपक्षे न प्रामोति, यतः श्रोत्रं "पारसहिं जोअणेहि, सोयं अभिगिदए सई" इत्यादिवचनात् द्वादशम्य एव योजनेम्पा समागतं शन्दं शृणोति न परता, उक्तपक्षे च एतानि द्वादशयोजनानि । किलोच्छ्याइगुलेन मीयन्ते, अत उच्छ्यागुलनिप्पोम्योऽनेकयोजनसहस्रेभ्यः समागवं भेर्यादिशन्द कथं श्रोत्रं गृहीयाव, इम्यते च भरतादिनगरीस्कन्धावारेषु तच्छ्वणम् अत आत्माशुलेनैवेन्द्रियाणां विषयपरिमाणं नोत्सेधाशलेनेतिसिद्धम् , तदुक्तं भाप्यकृता "ज तेण पंचधणुसयनराइ-विसयववहारवोच्छेओ ॥ पावइ सहस्सगुणिय, जेण पमाणंगुलं तत्तो ॥ ३४२॥" [यतेन पञ्चधनुशतनरादिविषयव्यवहारव्यवच्छेदः ॥ प्रामोति सहस्रगुणितं, येन प्रमाणागुल ततः ॥] इति ।।
13 किञ्च देहस्यात्मभूतान्यपीन्द्रियाणि सर्वाणि नोच्छ्याङ्गुलेन मीयन्ते यदा तदा कैच कथा तद्विषयाणामुच्छ्याङ्गुलमेयत्वस्य, यतः स्पर्शनेन्द्रियमेकमुच्छ्याङ्गुलेन मीयते शेषाणि तु द्रव्येन्द्रियाण्यात्मागुलेनैव मीयन्ते, त्रिगव्यूतादिमानानां युगलधर्मिणां जिह्वन्द्रियादिमानस्योच्छ्याङ्गुलेन ग्रहणे क्षुरप्राकारतयोक्तस्य जिहन्द्रियस्य विशालदेहानुसारित्वेन विशालमुखगतत्वेन विशाल- स्याङ्गुलपृथक्त्वलक्षणो विस्तारो गृह्येत, एवञ्चात्यल्पतया सर्वामपि जिल्हा न व्याप्नुयात्, तदन्याप्तौ च सर्वया जिह्वया रसवेदन- लक्षणो व्यवहारो न घटेत, तस्मादात्माङ्गुलेनैव जिह्वादिमानं घटत इति, तदुक्तं भाष्यकृता "इंदियमाणेवितयं, भयणिज्ज तिगाउआईणः।जिभिदियाइमाण,संववहारे विरुज्झेज्जा।।३४३॥"[इन्द्रियमानेऽपि तद् भजनीयं यत् त्रिगव्यूतादीनाम् । जिलेन्द्रिया- दिमानं संम्यवहारे विरुध्येत॥]इति,चक्रवर्तिभरतनगर्यादिपु भेर्यादिशब्दश्रवणव्यवहारस्य युगलधर्मिणां रसवेदनव्यवहारस्य चाभा- वप्रसङ्गेनेन्द्रियविषयपरिमाणस्येन्द्रियपरिमाणस्य नोच्छ्याङ्गुलमेयत्वं किन्त्वात्माङ्गुलमेयत्वमेवेति व्यवस्थितौ "उस्सेहपमाणओ मिणे देह" इत्यत्र देहशब्देन देहमानमेव पारिशेष्याद् गृह्यते, किञ्च परस्येन्द्रियतद्विपयपरिमाणयोरुच्छ्याङ्गुलमितत्वेापत्तिरेव प्रमाणं न त्वागमवचनं, आगमे तु " इचेएणं उस्सेहंगुलप्पमाणेणं नरइअ-तिरिक्खजोणिय-मणुस्स-देवाणं सरीरोगाहणाओ मिजंति " [ इत्येतेनोच्छ्याङ्गुलप्रमाणेन नैरयिकतिर्यग्योनिकमनुष्यदेवानां शरीरावगाहना मीयन्ते ] इत्यस्मिन् शरी- रांवगाहनैवोच्छ्याङ्गुलमेयत्वेनोक्ता न विन्द्रियविषयपरिमाणं, ततस्तदात्माङ्गुलेनैवेति, . तदाह भाष्यकृत चिय तेणं, हविज भणिय सुए वि तं चेव ॥एएण देहमाणाई, नारयाईण मिजंति ॥ ३४४ ॥" [तनुमानमेव तेन, भवेद् भणितं श्रुतेऽपि तदेव ॥ एतेन देहमानानि,नारकादीनां मीयन्ते ॥ इति । ननु पुष्करवरद्वीपस्य मानुपोत्तरपर्वतद्विधाकृतस्य अग्भिागवर्ति- " तणुमाणं न्यधैं मानुषोत्तरसनिधारकाटे दिवसे कर्कटकसमान्त्यामुदयेऽस्तमये च सातिरेकैरेकविंशतिलआयोजनानां व्यवस्थितं स्यं मनु- प्याः पश्यन्ति, यदुक्तं "सीयालीससहस्सा, दो य सया जोयणाण तेवट्ठी । एगवीस सद्विभागा, कमाइम्मि ऐच्छ नरा " [ सप्तचत्वारिंशत्सहस्राणि दे पाते योजनानां त्रिपष्टिं । एकविंशति पष्टिभागान्कौदी प्रेक्षन्ते नराः] इति, यथाध तथा पुष्फरार्धेऽपि मानुपोत्तरसमीप प्रमाणागुलनिष्पकैः सातिरेकैकविंशनियोजनलक्षवस्थितमादित्यं तत्र दिने तमिवासिनो लोकार समपलोफयन्ति, तदुक्तम्-" एगवीसं सल लक्सा, चउतीसं घेय तह सहस्साई । वह पंच सया मणिया, सत्तामाए अइरिना ॥१॥ इति नयनविसयमरणं, पुक्खरदीपद्धवासिमणुआणं । पुष्पेण य अपरेण य, पिहं पिहं होइ नायव्यं ॥२॥" इति । [ एकविंशतिः राल लक्षाणि चतुर्विदेव तथा सहस्राणि ॥ तथा पर शतानि मणितानि सत. त्रिंशतातिरिक्तानि ॥ इति नयनविषयमानं पुष्करद्वीपार्धवासिमनुजानाम् ॥ पूर्वण चापरेण च पृथक् पृथर भाति ज्ञातव्यम् ॥] तस्मामयनेन्द्रियस्य सातिरकयोजनलशस्वरूपं विपपपरिमाणं यथा प्रज्ञापनाविस्प्रेऽभिहित तथाऽऽत्माङ्गुलोत्सेधाजुल- प्रमाणारगुलानामेकेनापि गृपमाणं न युक्त, प्रमाणाशुलनिष्पन्नस्यापि योजनलक्षस्य तनिष्पमसातिरेकैपिंशतियोजनलक्षेभ्य एकविंशतितममागवतित्वेन पृहदन्तरत्वात, तस्मादेका सातिरेकं लक्षम्, अन्यत्र तु सातिरेकैफर्विशतिलक्षाणि योजनानां नयन- स्य विषयप्रमाणं अवतः पुत्रस्य पूर्वापरविरोधा, तदाह भाष्यवृत्-"लक्सेहिं एककवीसाए, साइरेगेहि पुपपरमि ।। उदपे पेच्छन्ति नरा, सूर उक्शेमए दिवसे ॥३४५|| नयणिदियास तम्हा, विसयपमाणं जहा मुएमिहियं । आउस्सेहपमाण-गुलाण एकण दिन जुत्वं ॥ ३४६ ॥ [लभैरेकर्षिशत्या, सातिरेकैः पुष्कराधै ॥ उपये प्रेक्षले नराः, सूर्यप्रकारे
दिवसे ॥ नयनेन्द्रियस्य तस्मा-द्विपयप्रमाणं यथा श्रुते भणितम् ॥ आत्मोत्सेधप्रमाणा-डुलानामेकेनापि न युक्तम् ॥]
इतीति चेत्, न, सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणं प्रतिपादयतः सूत्रस्याभिप्रायापरिज्ञानात्, तथाहि-स्वयं तेजोरूपप्रकाशरहि-
तत्वात्परप्रकाशनीये पर्वतगर्तादिवस्तुन्येव सातिरेकयोजनलक्षं नयनविषयप्रमाणं, न तु स्वयमेव तेजोयुक्तलेन प्रकाश्ये चन्द्रार्का-
दिके प्रकाशके वस्तुनि, तत्र त्वनियम एव, "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न तु सन्देहादलक्षणम्" इति न्यायाद् व्याख्यानात्सूत्रं
विपयविभागेन धरणीयं न तूभयपक्षोक्तिमात्रभ्रमितैस्तद्विरोध उद्भावनीयः, तदुक्तं-" जं जह सुत्ते भणियं, तहेव जइ तं विया-
लणा नत्थि ।। किं कालियाणुओगो, दिट्ठी दिहिप्पहाणेहिं ॥१॥" [यद्यथा सूत्रे भणितं, तथैव यदि तद् विचारणा नास्ति ॥ किं का-
लिकानुयोगो, दृष्टो दृष्टिप्रधानः] ॥ इति, इदमेवात्र प्रतिविधानमुपाददे भाष्यकार:-"सुत्ताभिप्पाओऽयं, पयासणिज्जे तयं न
उ पयासे ॥ वक्खाणओ विसेसो, न हि संदेहादलक्खणआ॥३४७॥"[सूत्राभिप्रायोऽयं, प्रकाशनीये तन्न तु प्रकाशे ॥ व्याख्यान-
तो विशेपो, नहि सन्देहादलक्षणता ॥] इति । श्रोत्रं मेघगर्जितादिशब्दमुत्कृष्टतो द्वादशयोजनेभ्यः समायातं गृह्णाति, घ्राणरसस्पर्श-
नानीन्द्रियाणि तु गन्धरसस्पर्शलक्षणमर्थमुत्कर्पतो नवयोजनेभ्यः प्राप्तं गृह्णन्ति, अतः परतोऽप्यायातं शब्दादिकमेतानि न गृह्णन्ति,
यथा प्रथमप्रावृपि मेघगर्जितादिविषयश्शब्दः प्रथममेघवृष्टौ सत्यां मृत्तिकादिगन्धश्च दूरादप्यागतो गृह्यमाणः समनुभूयते
तथैव दूरादागतानां गन्धद्रव्याणां रसोऽपि रसनया सम्बन्धे सति केनचिद् गृह्यत एव, अत एव कटुकस्य तीक्ष्णादेर्वा वस्तुनः
सम्बन्धी अयं गन्ध इति वक्तारो भवन्ति, दूरादपि सरित्समुद्रादेमध्येनायातस्य वातादेः स्पर्शोऽपि शीतादिरनुभूयत एव,
तदाह भाष्यकार:-" वारसहिंता सोनं, सेसाई नवहिं जोयणेहिंतो ॥ गिण्हंति पत्तमत्थं, एत्तो परओ न गिण्डंति ॥३४८॥
[बादशम्या थोत्रं, शेपाणि नयम्यो योजनेम्या। गृह्णन्ति प्राप्तम-मित्तः परतो न गृह्णन्ति ।। इति मादश-नययोजनेभ्या परता समागतानि शन्दगन्धादिद्रष्याणि मन्दपरिणामभावन सस्वज्ञानानुकूलपरिणामानासादनतो न थोप्रमाणादिविज्ञानं जनयन्ति थोषादीन्द्रियाण्यपि तथाविधसामीभावान परता समागतानि शम्दादिष्याणि गृहीत्या स्वविक्षानं जनयन्ति, तदिदं विष- यपरिमाणमुरकृष्टत इन्द्रियाणा शेयं, जपन्येन तु नयनभिनेन्द्रियाणा असण्याततमादद्गुलासंख्येयभागादागतो विषयो प्रहणगो- पर, सर्फ भाष्पकता" दवाण मंदपरिणा-मयाए परओ न इंदिपपलंपि ।। अपरमसंखेज्जंगुल-भागाओ नयणवज्जाणं ॥ ३४९ ॥" [ द्रष्याणां मन्दपरिणामतया, परतो नेन्द्रियपलमपि ॥ अपरमसंख्येयांगुल-मागावू नयनयर्जानाम् ॥] नपनस्य त्वतिसनिकष्टाअनशलाकादेरग्राहकस्य जघन्येनाड्गुलसख्येयभागादिषयपरिमाणनियमा, मनसस्तु भूमूिर्तसम- । स्तविषयकस्सानियमेन दूरे आसने प प्रवर्तमानस्य पुद्गलमानिपधनियतस्याभावात्केवलमानवानास्त्येव विषयपरिमाणम्, पुद्ग- लमात्रनिरन्धनियतश्रोत्रादीन्द्रियप्रमवयोर्मतिश्रुतशानयोरपि विषयपरिमाणस्य सद्भावाम ताभ्यां व्यभिचार इति योध्यम्, तदुक्तं भाष्यकृता " संरोजाइमागाओ, नयणस्स, मणरस न विसयपमाणं ।। पोग्गलमिपनियन्धा-भावाओ फेयलस्सेय ।। ३५०॥" [संख्येयमागतो नयनस्य, मनसो न विषयप्रमाणम् ।। पुद्गलमायनिपन्धा-ऽभावात्केवलस्येया।] इति, श्रोत्रस्य प्राप्तफारित्वेऽयमपि विशेपो शेया, यदुत, भाषफस्यान्यस्य या भेद। रामणिव्यवस्थितः थोता भाषफर्यादिसम्पन्धिनं मापफोरमृष्टभन्दद्रष्याणि सदासितापान्तरालस्यद्रष्याणि नेत्येवं मिथं शम्दगुप्यराशि शृणोति न तु यासक यास्यमेर या फेवलम्, विश्रेणिगपस्थिता थोता तु भापकोत्सृष्टशब्दद्रष्यैः मर्यादिशम्दद्रव्यैर्ग पासितानि समुत्पभशम्दपरिणामानि द्रव्याण्येय शृणोति, न तु भाषकापुर त्सृष्टानि, तेषामनुश्रेणिगामित्वेन विदिग्गमनासम्भवात्, कुड्यादिप्रतिघाततोऽपि न तेषां विदिक्षु गमनमतिसूक्ष्मत्वात्, लेष्वादिवा- दरद्रव्याणामेव ततो विदिक्षु गमनात्, निसर्गसमयानन्तरच समयान्तरेषु तेषां भापापरिणामेनानवस्थानादेव न स्वतो विदिक्षु गमनसम्भवः "भाष्यमाणैव भाषा भाषा, भाषासमयानन्तरं भाषाऽभाषैव” इतिवचनाद, द्वितीयादिसमयेषु भाषाद्रव्यैर्वासितानि समुत्पन्नशब्दपरिणामानि द्रव्यान्तराण्येव भाषा तामुपादायैव " चउहि समयेहि लोगो भासाए निरंतरं तु होइ फुडो" इति वचनप्रवृत्तिरविरुद्धा, समश्रेणिव्यवस्थितः श्रोता वक्तृनिसृष्टं शब्दं शृणोति, विश्रेणिस्थः तद्वासितानि द्रव्याणि द्वितीयसमये विदिक्षु गतानि शब्दस्वभावमापन्नानि शृणोतीत्येवं समयभेदेऽपि तदनुपलक्षणमतिसौक्ष्म्यात् । घ्राणादीन्द्रियग्राह्याणां मिश्रस्वभा- वानां गन्धादिद्रव्याणां वादरत्वेनानुश्रेणिगमननियमो नास्तीति, तदुक्तं नियुक्तिकृता "भासासमसेढीओ, सई जं सुणइ मीसयं सुणइ ॥ वीसेढी पुण सई, सुणेइ नियमा पराघाए ॥ ३५१ ॥” इति, भासासमसेढीओ इति गाथार्थोपोद्वलकं भाष्यगाथात्रयं यथा "सेढी पएसपंती, वदतो सबस्स छदिसिं ताओ ॥ जासु विमुक्का धावइ, भासा समयम्मि पढमम्मि ॥ ३५२ ॥ भासा- समसेडिठिओ, तब्भासामीसियं सुणइ सदं । तदव्वभावियाई, अण्णाई सुणइ विदिसत्थो ॥ ३५३ ।। अणुसेढीगमणाओ, पडि- धायाभावओऽनिमित्ताओ ॥ समयंतरणवत्था-णओ य मुकाई न सुणेइ ॥३५४॥” [भाषासमश्रेणीतः, शब्दं यं शृणोति मिश्रकं शृणोति । विश्रेणिः पुनः शब्दं, शृणोति नियमात्पराधाते ॥ श्रेणिः प्रदेशपंक्तिर्वदतः सर्वस्य पसु दिक्षु ताः॥ यासु विमुक्तो धावति भाषासमये प्रथमस्मिन् ॥ भाषासमश्रेणिस्थितस्तभाषामिश्रितं शृणोति शब्दम् । तद्रव्यभावितान्यन्यानि, शृणोति निदिक्स्थः ॥ अनुश्रेणिगमनात्प्रतिघाताभावादनिमित्तात् ॥ समयान्तरानवस्थानाच मुक्तानि न शृणोति ॥ ] ॥ इति ॥ व्यक्तार्थमदः ॥
AIR वाग्द्रव्याणामादानोत्सर्गावेवम्, सर्व एव वक्ता कायिकेन योगेन शब्दद्रव्याणि गृह्णाति वाचिकेन च योगेन निसृजति, प्रतिसमयं गृहाति मुश्चति चेति, उक्तं च नियुक्तिकृता "गिण्हइ य काइएणं, निसिरह तह वाइएण जोएणं ।। एगंतरं च गिण्हइ, निसिरह एगंतरं चैव ॥ ३५५ ॥” इति, विवेचिता चेयं गाथात्रयेण भाष्यकृता, तद्यथा-"गिण्डिज काइएणं, किह निसिरह वाइएण जोएणं ॥ को वाऽयं बहजोगो, किं वाया, कायसरंभो ॥३५६॥ वाया न जीवजोगो, पोग्गलपरिणामओ रसाइन्न । न य ताए निसिरिजइ, स चिय निसिरिजए जम्हा॥३५७||अह सो तणुसरंभो, निसिरह तो काइएण वत्तव्यातणुजोगविसेस चिय, मण-पइजोगत्ति जमदोसो ॥३५८॥"[गृह्णाति च कायिकेन, निसृजति तथा वाचिकेन योगेन । एकान्तरं च गृह्णाति निसृजत्ये- कान्तरमेव ।। गृहीयात्कायिकेन कथं निसृजति वाचिकेन योगेन । को वाऽयं वागयोगः किं वाग्या कायसंरम्भः ।। वाग् न जीवयोगा, पुद्गलपरिणामतो रसादिरिव ।। न च तया निसृज्यते, सैव निसृज्यते यस्मात् ।। अथ स ननुसंरम्भो, निसृजति ततः कायिकेन वक्तव्यम् । तनुयोगविशेपावेव मनोगग्योगाविति यददोपः] अत्र सार्धगाथाद्वयं परप्रश्नरूपं तदनन्तरमुत्तरम्, अअ चेत्थं वृहद- वृत्तिः-"अत्र परः प्राह-ननु 'गिण्हइ यकाइएणं' इति यदुक्तं तन्मन्यामहे, यतो गृहीयात् कायिकेन योगेन वान्द्रव्याणि भापका, नेदमयुक्तं कायव्यापारमन्तरेण तद्ग्रहणायोगात्, यत्पुनरुक्तं 'निसिरइ तह वाइएण जोएणं' इति तदेतनापगच्छामः, यतः कथं नाम निसृजति याचिकेन योगेन, गृह्यमाणाया वाचो जीवव्यापाररूपयोगामावानैतद् घटत इत्यर्थः, इति संक्षेपेणोक्त्या विस्तरा- भिधित्सया पाह-को वाऽपमित्यादि, वेत्यथवा, किमनेन संक्षेपेण, विस्तरेणापि पृच्छामः, कोऽयं नाम वाग्योग, येन निमृजतीत्युक्तं, किं यायनि वागेव निमृज्यमाना भाषापुद्गलसमूहरूपो वाग्योगः १, किंवा कायसंरम्मः कायव्यापारस्त- निसर्गहेतुर्वाग्योगः २, इति विकल्पद्वयम्, तत्र प्रथमविकल्पपक्षं निराकुर्वनाह-वाया न जीवजोगो' इत्यादि, योगोऽत्र शरीरजीवव्यापारः प्रस्तुतः, स च वाग् न भवति, पुद्गलपरिणामत्वात्तस्याः, रसगन्धादिवत्, यस्तु जीवव्यापाररूपो योगः स पुद्गलपरिणामोऽपि न भवति, यथा जीवाधिष्ठितकायव्यापारः, अपि च न य ताएत्ति न च तया वाचा किञ्चिन्निसृज्यते, तस्या एव निसृज्यमानत्वात्, न च कर्मैव करणं भवति, अतो वागेव वाग्योग इति प्रथमविकल्पो न घटते, अथ द्वितीयमधि- कृत्याह-' अहेत्यादि ' अथासौ वाग्योगस्तनुसंरम्भः कायव्यापारः, ततः कायिकेन निसृजति इत्येवमेव वक्तव्यं स्यात, अतः किमुक्तं ' निसिरइ तह वाइएण जोएणं ' इति, अत्रोत्तरमाह 'तणुजोग' इत्यादि, ननु द्वितीयविकल्प एवात्राङ्गीक्रियते, केवलम- विशिष्टः काययोगो वाग्योगतया नास्माभिरिष्यते, किन्तु तनुयोगविशेषावेव कायव्यापारविशेपावेव मनोवाग्योगाविष्येते, यद् यस्मात्, ततोऽयमदोपः, न हि कायिको योगः कस्याञ्चिदप्यवस्थायां शरीरिणां जन्तूनां निवर्तते, अशरीरिणां सिद्धानामेव तन्निवृत्तेरिति, अतो वाग्निसर्गादिकालेऽपि सोऽस्त्येवेति भावः ॥ ३५६, ३५७, ३५८ ॥ परमार्थतस्सर्वत्र कायिकस्य योगस्य सद्भावेऽप्युपाधिभेदाद्योगत्रयविभजनं नानुपपन्नं, तथाहि, येन संरम्भेण मनोवाग्द्रव्याणामुपादानं करोति स कायिको योगः, येन तु संरम्भण वारद्रव्याणि मुञ्चति स वाग्योगः, येन च मनोद्रव्याणि चिन्तायां व्यापारयति स मानसिको योग इत्येवमु- पाधिभेदात्रिधा विभक्तः कायिको योगः,तदाह भाष्यकृत् "किं पुण तणुसंरम्भेण,जेण मुंचइ स वाइओ जोगो।।मण्णइ य स माणसिओ, तणुजोगो चेव य विभत्तो॥३५९॥"[किं पुनस्तनुसंरम्येण, येन मुञ्चति स वाचिको योगः। मन्यते च स मानसिक-स्तनुयोग एव च विभक्तः ॥] इति,अनुमानाच मनोवाग्योगोभयस्य तनुयोगरूपत्वं,प्रयोगश्च,मनोवाग्योगौ काययोगस्वरूपौ,कायेनैव तद्रव्यग्रहणाद प्राणापानवदिति,न च दृष्टान्तासिनि, प्राणापानण्यापारस्य तनुयोगत्वाभावे योगचतुष्टयप्रसङ्गाद,तदिदमाह भाप्यकृत् "तणुजोगो घिय मण-वइ-जोगा कारण दय्वगहणाओ || आणापाणब न चे, तओ विजोगवर होला ॥३६॥" [वनुयोग एप मनोपा- ग्योगौ कायिकेन द्रष्यग्रहणात् । आनप्राणवद् न घेत्सोऽपि योगान्तरं स्यात् ॥] इति,तुल्पेऽपि तनुयोगत्वे प्राणापानयोगस्य न पृथग्रहणं मनोवाग्योगयोच पृथग्रहणमित्या लोकलोकोत्तररूढतया व्यवहारप्रसिद्धिरेव नियामकं, लोके लोकोतरे च कायिक- वाचिकमानसिकयोगानामेव प्रयाणा घ्यवहारो न प्राणापानयोगस्य, तदिदमुक्तं भाप्यकता"तुले तणुजोगते, कीस व जोगंतरं । सओ न फओ। मण-बाजोगा व कया, भष्णइ पवहारसिदत्यं ॥३६१॥" [तुल्ये तनुपोगत्वे कस्माता योगान्तरं स न कृतः॥ मनोवाग्योगी वा कृतौ? भण्यते व्यवहारसिद्धर्थम् ।।] इति, कायक्रियातिरिक्तं स्वाध्यायविधान-परप्रत्यापनादिकं वाचः, धर्म- ध्यानादिकं मनसश्च विशिष्टं स्फुटं फलं यथोपलम्यते नैव प्राणापानयोरित्यस्मात् कारणात्माणापानयोगस्य न पृथग्व्यपहारः, किन्तु मनोवाग्योगयोरेव, जीवत्य सावितिप्रतीतिजननादिलक्षणं फलश्च प्राणापानयोगस्य न पृथग्योगत्वप्रपोजक, क्या सति धावति वलगतीत्यादिप्रतीतिफलजननादायनवल्गनादिव्यापारस्यापि पृथ-पोगत्वं प्रसज्येतेति, तदाह भाप्पकार: " फायकिरि- याइरितं,नाऽऽणापाणफलं जह वईए । दीसह मणसो य फुड,तणुजोगभतरो तो मो ॥३६२॥" [फायक्रियाव्यतिरिक्त, नाऽनप्राण । फलं यथा वाचः । दृश्यते मनसथ स्फुटं तनुयोगाभ्यन्तरस्ततः सः ॥] इति, तनुयोगान्तर्गतत्वेऽपि पाग्योगमनोयोगयोरुपाधि- भेदेन पृथगभिधानमित्येकः पक्षो व्यावर्णिता, अस्ति चार स्वतन्त्रावेव वाग्योगमनोयोगाविति तयोः पार्थक्येन विमजनमिति द्वितीयोऽपि पक्षः । स चैव-कायच्यापारगृहीतेन वाग्द्रव्यसम्हेन सहकारिणा वामिसर्गार्थ जीवस्य व्यापारो वाग्योगा, कायष्याः मनोद्रव्यसमूहजीवव्यापारः ।। स मनोयोगो मण्यते , मन्यते ज्ञेयं यतस्तेन ।। इति , प्रतिसमयं गृह्णाति मुञ्चतीत्येवमेकान्तरं गृह्णाति पारगृहीतेन मनोद्रव्यसमूहेन सहकारिणा वस्तुचिन्तनाय जीवस्य व्यापारो मनोयोगः, प्रथमेन परप्रत्यायनं द्वितीयेन जिन- मूर्त्यादिचिन्तनमित्येवं स्वतन्त्रावेव तो, यद्यपि प्राणापानद्रव्यसाचिव्याचन्मोचने जीवव्यापारः प्राणापानयोग इति सोऽपि स्वातन्त्र्येण पृथग् व्यपदेष्टुं शक्यस्तथापि लोकलोकोत्तररूढव्यवहारसिद्धयर्थ तयोरेव पार्थक्येनाभिधानं न तु स्वतन्त्रस्यापि प्राणापानयोगस्येति बोध्यम् , अत्रार्थे गाथाद्वयं भाष्यस्य यथा-" अहवा तणुजोगाहिअ-वइदवसमूहजीववावारो ॥सो वइजोगो मण्णइ, वाया निसिरिजए तेणं ॥३६३॥ तह तणुवावाराहिअ-मणदव्वसमूहजीववावारो सो मणजोगो भण्णइ,मण्णइ नेयं जओ तेणं ॥३६४॥"[अथवा तनुयोगाहृत-वाग्द्रव्यसमूहजीवव्यापारः॥स वाग्योगो भण्यते वाग निसृज्यते तेन ॥ तथा तनुव्यापाराहृत- मुञ्चतीत्येतत्स्वरूपं प्रायुक्तं तत्कथमित्यपेक्षायामुच्यते, यथैकस्माद् ग्रामादन्योऽनन्तरितोऽपि लोकरूढ्या ग्रामान्तरमुच्यते, पुरुषा- दाऽन्यः पुरुषोऽनन्तरोऽपि पुरुषान्तरमभिधीयते तथेहापि एकस्मात्समयादन्यः समयोऽनन्तरोपि समयान्तरमुच्यते तेनानुसमयमेव गृहाति मुश्चति चेति सिद्धं भवति, तदुक्तं भाष्यकृता-" जह.गामाओ गामो, गामंतरमेवमेग एगाओ। एगंतरंति समयादणंतरो समओ ॥ ३६५ ॥ " [-यथा ग्रामाद् ग्रामः, सामान्तरमेवमेक एकस्मात् ॥ एकान्तरमिति भण्यते, समयादनन्तरः समयः ॥ इति, ये तुमन्यन्ते ग्रहणं विसर्जनं च शब्दद्रव्याणामेकैकेन समये- नान्सरितमित्येकान्तरमिति, तेषामेवम्मननं.न युक्त तथा सति अन्तराऽन्तरा विच्छिमरत्नावलीरूपी ध्वनिः स्यात्, एवञ्चाविच्छेदेन शम्दग्रहणानुपपधिप्रसाना, प्रतिसमयग्रहणप्रतिपादकत्लेन प्रतिसमयनिसर्गप्रतिपचिवात्सर्यकस्य ".अणुसमयमनिरहि निरंतर भण्ण गिहा " इति सूत्रस्य विरोधश्च, तदाह भाष्यकार:-" कई एगंवरिय, मण्णन्वैगंतर ति तेसिं च ॥ विच्छिमावलिरुवा,होइ धणी, सुयविरोहो य ॥३६६।।" [केचिदेकान्तरितं मन्यन्ते, एकान्तरमिति तेषां च ॥ विच्छिमावलीरूपो, भवति ध्वनिः थुतविरोधय ॥] इति, ननु "संतरं निसिरह नो निरंतर निसिरह, एगेणं समएणं गिण्हइ, एगेणं समएणं निसिर" इत्यादि प्रज्ञापनोक्तमूत्रमस्म- स्पक्षसमर्थकमपि समस्तीति तत्त्कथमुच्यते अनुसमयं गृह्णाति मुञ्चति चेति चेत्, उच्यते, अनुसमयग्रहणेऽनुसमयनिसर्गोऽपि युक्त एवं गृहीतम्यावश्यमेवानन्तरसमये निसर्गात, न चैवं 'संतरं निसिरई' इत्यस्यासगतता, विषयविभागेन तदुपपत्तेः, निसगों हि ग्रहण- मपेक्ष्य भवति, यस्मिन् प्रथमादिसमये यानि मापाद्रव्याणि गृहीतानि न तानि तस्मिन्नेव ग्रहणसमये नैरन्तर्येण निसृजति, किन्तु ग्रहणसमयादनन्तरसमये निमृजति, यथा प्रथमसमयगृहीतानां न तस्मिन्नेव समये निसर्गः,किन्तु द्वितीयसमय एक, एवं द्वितीयसमय- गृहीतानां तृतीयसमये, तृतीयसमयगृहीतानां चतुर्थसमये इत्यादि, तदेवं ग्रहणापेक्षया निसर्गः सान्तर एव, द्वितीयादिषु सर्वेष्वपि समपेषु निरन्तरं तद्भावात्समयापेक्षया तु निसर्गो निरन्तर एघ,नागृहीतं कदापि निसृज्यत इति नियमाद् ग्रहणपरतन्त्रतया निसर्गस्ये. ति 'संतर तेणं ति प्रज्ञापनायां ग्रहणान्तरितत्वेन निसर्जनं सान्तरमुक्तं, नानिसृष्टं गृह्यत इति नियमस्य तु प्रथमसमये निसर्गभन्तरे- पापि ग्रहणसद्भायतोऽभावेन स्वतन्वं ग्रहणमिति विपविभागेन "संतरं निसिरह" इत्युपपद्यते, 'न निरंतरं' इत्यपि निरन्तरशम्दस्य समशन्दपर्यायवेन न ग्रहणसमकालं निसृजति किं तु पूर्व पूर्व गृहीतमुत्तरोत्तरसमयेषु निसृजतीत्येवंपरतयोपपद्यते " एगेणं समयेणं गिण्हइ, एगणं समयेणं निसिरइ " इत्यपि आयेनकेन समयेन गृह्णात्येव न निसृजति, द्वितीयादिसमयादारम्पैच नि- सर्गस्य भागद्, पर्यन्तवर्तिना त्वैकेन समयेन निसृजत्येव न तु गृह्णाति भाषाभिप्रायोपरमादित्येचं परतया एकेन पूर्वपूर्वसमपेन गृह्णाति, एकेनोत्तरोत्तरसमयेन निसृजतीत्येवम्परतया वोपपद्यत इति,' तमिममर्थ प्रतिपादयति भाष्यगाथाचतुष्टयं यथा- "आह, सुए चिय निसिरइ, संतरियं न उ निरंतर भणियं ॥ एगेण जओ गिण्हइ, समयेणेगेण सो मुयइ ॥३६७॥ अणुसमयमणं- तरियं, गहणं भणियंजओ विमुक्खो वि ॥ जुत्तो निरंतरो चिय, भणइ, कह संतरो भणिओ ॥३६८॥ गहणावेक्खाए तओ, निरंतर जम्मि जाई गहियाई ॥न वि तम्मि चेव निसिरइ, जह पढमे निसिरणं नत्थि ॥३६९॥ निसिरिजइ नागहियं, गहणंतरियंति संतरं तेणं ॥ न निरंतरंति न समयं, न जुगवमिह होति पजाया ॥ ३७० ॥" [ आह, श्रुत एव निसृजति, सान्तरितं न तु निरन्तरं भणितम् ॥ एकेन यतो गृह्णाति, समयेनैकेन स मुञ्चति ॥ अनुसमयमनन्तरितं, ग्रहणं भणितं यतो विमोक्षोऽपि ॥ युक्तो निरन्तर एव, भणति कथं सान्तरो भणितः १ ॥ ग्रहणापेक्षया तको, निरन्तरं यस्मिन्यानि गृहीतानि ॥ नापि तस्मिन्नेव निसृजति, यथा प्रथमे निसर्जनं नास्ति ॥ निसृज्यते नाऽगृहीतं, ग्रहणान्तरितमिति सान्तरं तेन ॥ न निरन्तरमिति न समयं, न युगपदिह भवन्ति पर्यायाः ॥]इति, ग्रहणादेर्जघन्यमुत्कृष्टश्च कालमानमेवं प्रतिपत्तव्यं, तथाहि-ग्रहणनिसर्गभाषा इत्येवं त्रीण्यपि प्रत्येक जघन्यत एकसमयानि भवन्ति, ग्रहणनिसर्गोभयन्तु प्रथमसमये ग्रहणं द्वितीयसमवे निसर्ग इति कृत्वा द्विसमयम्, निसर्गादभेदेऽपि भाषाया भाग्यमाणैव भाषा न तु गृह्यमाणेति निसर्गस्यैव मापात्वं न तु ग्रहणनिसर्गोमयस्येत्येतत्प्रतिपचये पृथगभिधानं, उभयस्य मापात्वे द्विसमयत्वापत्तिा, ग्रहणस्य तु भाषाव्युत्पत्तिनिमित्ताभावादेव न भाषात्वं, भाषायाः पृथगग्रहणे तु कश्चित्तदुभयस्यापि योग्यतया भाषात्वं प्रतिपद्येत, तत्र 'मासिजमाणा भासा' इत्यागमविरोधः, निसर्गभापयोरभेदेऽपि मन्दधियः निसर्गकालमानानुक्तिश्रमोन्मूलनार्थ निसर्गस्यापि पृथग्वचनम्, सर्वाण्यप्येतानि उत्कृष्टतः प्रत्येकमन्तर्मुहूर्तकालं KHASTRESS भवन्ति, अन्तमुहर्तमपि महाप्रयत्नस्य लघु मरति अल्पप्रपत्नस्य तु पात्प्रमाणं भरतीति, उतार्थसंवादिन्यो भाषपस्मे गाये- "गहणं मोक्यो मासा, समयं गह-निसिरण प दो समया | होवि जाणंतर, तंतस्सप बीयरामयस्मि ॥२७१॥ गहणं मोक्सो भासा, गहणविसग्गा य होंति उफोर्स ।। अंतोमहुसमेतं, पपत्तभेएण भयो सिं ॥३७९॥" [प्राणं मोयो भाषा समय, ग्रह-निसर्जन चौ समयौ ।। भवन्ति जघन्यान्तरतस्तत् तस्य द्वितीयसमपे । ग्रहणं मोक्षो मापा ग्रहणविरागीप भारयुक्तता। अन्तर्मुहर्तमा प्रयत्नभेदेन भेद एपाम् ।।] इति, प्रथमसमये ग्रहणमेव परमसमये निसर्ग एव, मापसमपे तशापि मरतः, एकस्मिन् समये कथं तदुभयं विरोधादिवि नाशनीयम्, यस्यैव यस्मिन् समये ग्रहणं सरपैय तस्मिदेव समपे निसर्ग इत्युपगमे स्पा. द्विगंधा, न पापगमः, किन्तु प्रथमसमपे यस्य ग्रहणं तस्प द्वितीयसमये निसर्गोऽन्यस्य प वदानी ग्रहणमित्येवापरोनरस- मयेऽभ्युपगमे विषय मेदेन विरोधामावाद, एकस्मिन् समये उपयोगदयस्यैवासम्मको न तु क्रियादयस्प " जग दो नत्यि उपओगा" इतिवचनावागमे उपयोगदयस्यैव योगपनिषेधो न त क्रियाश्यस्य, "भंगियमुपं गणतो, पर निरिह विमा. गम्मि" इत्यादिवपनेन पाश्मनाफायक्रियाणामेका समये प्रातिरभ्युपगर, अगुल्यादिगंपोगविभागक्रिपपो, संपावा. रिसाटक्रिययो, उत्पादव्ययक्रिययोथैका समपेऽनेकस्याने वागमेऽनुशा विहितप, तथाऽध्यक्षतोऽपि जिनप्रतिमामर्षपतः पुंसः एफस्मिन् समये फरणमैदेन पण्टियापलनधूपदानप्रतिमादिवीधणस्तुतिपठनादीनां महीनामपि फ्रिमाणा युगपत् प्रातिपत इति ॥ तदाह भाप्यकार: “महणविसग्गपयता, परोप्परविरोहिणो कई समए । समए दो उपओगा, न हो, किरियाण को दोसो ॥३७३ ॥" [प्रहणविसर्गप्रयत्नौ, परस्परविरोधिनी कथं समये १ ॥ समये सापयोगी न भयंता क्रियाणां यो दोपा] RECE इति, कायिकेन योगेन भाषापरिणमनयोग्यानि द्रव्याणि प्रथमसमये गृह्णातीति सामान्येनोपदर्शितं परमत्र औदारिकवैक्रियाहारकतै- जसकामणभेदेन पञ्चविधेषु कायेषु औदारिकवैक्रियाहारकशरीरेषु जीवप्रदेशाः भवन्ति नान्यत्र, तैर्जीवप्रदेशैर्जीवामिनर्भापणाभि- प्रायादिसामग्रीपरिणामे सति भाषापर्याप्तिमान् भापको वाग्द्रव्यनिकुरम्बं गृहीत्वा सत्यां सत्यामृपां मृपां असत्यामृपां चेत्यन्यतमां भाषां भापते निसृजति, तथा चौदारिकशरीरवान् वैक्रियशरीरवान् आहारकशरीरवान् वा जीवो गृह्णाति मुञ्चति चेति पर्यवसितम्, तदुक्तं नियुक्तिकृता “तिविहम्मि सरीरम्मि, जीव-पएसा हवंति जीवस्स ॥जेहि उगेण्हइ गहणं, तो भासइ भासओ भासं ॥३७४। ओरालिय वेउन्विय-आहारओ गेण्हइ मुयइ भासं ॥ सच सच्चामोसं, मोसं च असच्चमोसं च ॥३७५॥" [त्रिविधे शरीरे जीव-प्रदेशा भवन्ति जीवस्य ॥ यैस्तु गृह्णाति ग्रहणं,ततो भापते भापको भाषाम्।। औदारिको वैक्रियआहारकः गृह्णाति मुश्चति भापाम् । सत्यां सत्यामृषां मृपां चासत्यामृपां च ॥] इति, तत्र सद्भथा साधुभ्यो मुनिभ्यो हिता इहपरलोकाराधकत्वेन मुक्ति- प्रापिका अथवा सद्भयो मूलोत्तरगुणरूपेभ्यो गुणेभ्यो जीवादिपदार्थेभ्यो वाऽविपरीतयथावस्थितस्वरूपप्ररूपणेन हिता सत्या भाषा १, विपरीतस्वरूपा तु मृपाभाषा २, तदुभयस्वभावा सत्यामृपा ३, या तूक्तत्रितयलक्षणानन्तर्भाविनी आमन्त्रणाज्ञापना- दिविषयो व्यवहारपतितः शब्द एव केवलः साऽसत्यामृपा ४, एताश्चतस्रोऽपि भाषाः सभेदलक्षणोदाहरणा दशवैकालिकनियु- क्त्यादिकसूत्रतोऽवसेयाः, तथा चाह भाष्यकारः "सच्चा हिता सयामिह, संतो मुणओ गुणा पयत्था वा ।। तन्विवरीआ मोसा, मीसा जा तदुभयसहावा ॥ ३७६ ॥ अणहिगया जा तीसु वि, सदो च्चिय केवलो असचमुसा ॥ एया सभेयलक्खण-सोदाहरणा जहा सुत्ते॥३७७॥"[सत्या हिता सतामिह, सन्तो मुनयो गुणाः पदार्था वा ।। तद्विपरीता मृषा, मिश्रा या तदुभयस्वभावा ।। अनधि.
कठा या विस्वपि शब्द एवं केवलोऽमत्यमृपा ॥ एताः सभेदलक्षण-सोदाहरणा यथा यो ।। इति, औदारिकादिरीरवता जीवन भुक्ता भाषा समस्तमपि लोक व्यामोति, तेन द्वादशम्योऽपि योजनेम्पः परतो गतिरस्पेव गन्दद्रष्याणां, यथा स्वरिपपदादर योजनाम्यन्तरे नैरन्तर्येण तद्वासनासामध्ये, तथा रहिरपि देवाग्निच्छन्द्रव्याणी कृत्स्नलोकव्याप्तानां चतुर्दशरचारमका धेप्रलो- कचतुर्भिस्समरैः कस्यचित्सम्बन्धिन्या मापया पूर्यते, लोकस्य पर्यन्तवर्षांसपेपमागे प समस्तलोकप्यापिन्या मापापा अपि चरमान्तोऽसंख्येयमागो भवति, तदिदमाह प्रशासमाधानाम्यां नियुक्तिकार:-"कईहिंसमए लोगो, मासाए निरंतरं तु होइ फडो । लोगस्स य कइमाए, कइमाओ होइ मामाए ॥३७८|| पाहि समयेहि लोगो, मासाए निरंतर त होइ फुडो । लोगस्म य चरिमंते, चरिमंदो होइ भासाए ॥७९॥"[फतिमिः समयोको मापया निरन्तरं तु भवति स्फुटः, ॥ लोकस्य प फतिमागे कतिभागो माति मापायाचतुर्मिः समपैलोको,मापया निरन्तरं तु मवति स्फट: लोकस्य च परमान्ते परमान्तो माति मापापा] इति, सर्वस्यापि वक्तुर्मापा न लोकं व्यामोति किन्तु कस्यचिदेव, त्या हि-वक्ता द्विविधस्तत्रैका उम्धतापुपेतत्वेन मन्दप्रपत्नो वक्ता सर्वाण्पपि मापाद्रध्यायमिन्नानि निसृजति, अन्यस्तु नीरोगतादिगुणस्तीवप्रयत्नो वक्ता माराव्याणि आदाननिमर्गप्रय. नाम्या सूक्ष्मराण्डीकृत्य मुञ्चति,अनन्तमापाद्रव्यस्कधाश्रयभूतक्षेत्रपिपरूपारगाहना वर्गणा असंख्पेया गत्वा ततो मन्दप्रयत्न: वक्तृनिसृष्टान्यभिमानि मायाद्रव्याणि मिपन्ने, संख्पपानि च पोजनानि गत्वा सन्ते, उक्त प्रज्ञापनायो भाषापदे 'जाई अमिन्नाई निसिरह, ताई असंखेजाओ औगाहणाओ गंता मेयमावअंति, संसिआई जोयणाई गंता विदंसमागम्ठीत " यानित महाप्रयत्नो वक्ता प्रथमत एव मिन्नानि निसृजति तानि मत्वात महत्वाधानन्तगुणादपा वर्षमानानि पमु दिक्षु लोकान्तमानु- . वन्ति, शेषन्तु तत्पराघातवासनाविशेषाद्वासितया भापयोत्पन्नभाषापरिणामद्रव्यसंहतिरूपया सर्व लोकं निरन्तरमापूरयन्ति, उक्तश्च जाई भिन्नाई निसिरइ ताई अणंतगुणपरिवड्डीए परिवड्डमाणाई लोयंत फुसन्ति" इति, तदाह भाष्यकार:-"कोई मंदपयचो, निसिरइ सयलाई सव्वदवाई ॥ अन्नो तिव्वपयत्तो, सो मुंचइ भिदिउं ताई ॥३८०॥ गंतुमसंखेजाओ, अवगाहणवग्गणा अभि- नाइ ॥'भिजति धंसंति य, संखिज्जे जोयणे गंतु ॥३८१॥ भिन्नाई सुहुमयाए, अणंतगुणवडिआई लोगंतं ॥ पावंति पूरयंति य, भासाए निरंतरं लोग॥३८२॥" [कोऽपि मन्दप्रयत्नो निसृजति सकलानि सर्वद्रव्याणि॥ अन्यस्तीवप्रयत्नः, स मुञ्चति भित्त्वा तानि॥ गत्वाऽसंख्यया अवगाहन-वर्गणा अभिन्नानि ॥ भिद्यन्ते ध्वसन्ते च संख्येयानि योजनानि गत्वा ॥ भिन्नानि सूक्ष्मतयाऽनन्तगुणव- धितानि लोकान्तम्।प्राप्नुवन्ति पूरयन्ति च,भाषया निरन्तरं लोकम्]॥ इति,दण्डं प्रथमे समये, कपाटमथ चोत्तरे तथा समये ॥ मन्था- नमथ तृतीये, लोकव्यापी चतुर्थे च।।१॥इत्यादिग्रन्थोक्तेन केवलिसमुद्यातक्रमेण चतुर्भिः समयैः सर्वोऽपि लोको भापाद्रव्यैरापूर्यत इति केचित्, प्रिभिः समयैः सर्वो लोकः पूर्यत इत्यन्ये,तत्रैवं क्रमः-लोकमध्यस्थितेन महाप्रयत्नभाषकेण मुक्तानि भाषाद्रव्याणि प्रथम- समय एव पट्सु दिक्षु लोकान्तमाप्नुवन्ति 'जीवसूक्ष्मपुद्गलानामनुश्रेणिगमनात्,' ततो द्वितीयसमये त एव पट् दण्डाश्चतुर्दिशमे- कैकशोऽनुश्रेण्या वासितद्रव्यैः प्रसरन्तः षट् मन्थानो भवन्ति, तृतीयसमये तु मन्थान्तरैः पूरितैः पूरितो भवति सर्वोऽपि लोका, स्वयम्भूरमणपरतटवर्तिनि लोकान्तेऽलोकस्यात्यन्तं निकटीभूय भापमाणस्य भाषकस्य त्रसनाड्या बहिर्वा चतसृणां दिशामन्यत- मस्यां दिशि भाषमाणस्य भाषकस्य चतुर्भिस्समौर्लोकः सर्वोऽपि पूर्यते। तदुक्तं भाष्यकृता "जइणसमुग्घायगईए,केई भासंति चउहिं समएहि ॥ पूरइ सयलो लोगो, अण्णे उण तीहि समएहिं ॥३८३॥ पढमसमए चिय जओ, मुकाई जति छदिसि ताई।
वितियसमयम्मि ने चिय, छ हंडा होति उम्मंया ।। ३८४ ॥ मंतरेहिं ईए, समये पुनहिं पूरिओ लोगो । चउहि समयहि
पूर, लोगते मासमाणस्स ।। ३८५ ॥" [ जैनसमुद्घातगत्या, केचिद् भाषन्ते चतुर्भिः समयैः ॥ पूर्यते सकलो लोकोऽये
पुनलिमिः समयैः ।। प्रथमसमय एव यतो मुक्तानि यान्ति पसु दिक्षु तानि ॥ द्वितीयसमये त एव, पदण्डा भवन्ति पड्-
मन्यानः ॥ मन्यान्तरैस्तृतीये समये पूर्णैः पूरितो लोकः ॥ चतुर्मिः समयैः पूर्यते लोकान्ते भाषमाणस्य॥] इति ।। अथ लोकान्त-
वर्विननसनाडीबहिर्व्यवस्थितस्य का मारकस्य भाषाद्रव्यैश्चतुर्मिः समयलोकपूरणं प्रतिपादितं वसनाडीबहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य
चपञ्चभिः समयैर्लोकापूरणं भवति तदेतत्सर्व कथं मिलतीति चेत्, अत्रार्थे सविवरणे भाष्यगाथे एव तत्स्वरूपप्रदर्शिके प्रदर्येते,
तथाहि-"दिसिवद्वियस्स पढमोऽतिगमे तेचेव सेसया विन्नि। विदिसि द्वियस्स समया, पंचातिगमम्मिजं दोणि ॥३८६।।"
व्याख्या-प्रसनाच्या पहिवतमृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य मापकस्य प्रथमः समयोऽतिगमे नाडीमध्यप्र-
वेशे भवति । शेपसमयत्रयमावना तुं 'होइ असंखेजइम भागे' इत्यादिवक्ष्यमाणगाथावृत्ती कथमिति चेदित्यादिना वक्ष्यते ।
लोकान्तेऽपि स्वयम्भूमणपरवटवर्तिनि चतसृणां दिशामन्यतमस्यां दिशि व्यवस्थितस्य भापकस्यो धोलोकस्खलितत्याद्भा-
पाद्रव्याणां प्रथमा समयोऽतिगमे लोकमध्यप्रवेशे, यस्तु समयाः शेषास्तथैव, असनाडीवहिर्विदिग्व्यवस्थितस्य तु भाषास्य
भाषाद्रव्यैः सर्वलोकापूरणे पञ्च समया लगन्तीति विशेषः कुतः इत्याह-'अतिगमम्मिदोणि त्ति' विदिशः सकाशाद्भापाद्रव्याणि
प्रसनाडीपहिरेव प्रथमे समये दिशि समागच्छन्ति, द्वितीये तु लोकनाडीमध्ये प्रविशन्ति इत्येवं यस्मादतिगमे नाडीमध्यप्रवेशे द्वौ
समयौ लगतः। शेपास्तु प्रपः समपावतासमयव्याप्तिवद् द्रष्टव्या, इत्येवं पश्चममया सर्वलोकापरणे प्राप्यन्त इति ॥३८६॥
अथ शेपसमयत्रयभावनार्थ होइ असंखेजइमे भागे' इत्यादि यदुक्तं तदाह-किञ्च नियुक्तिकृता 'लोगस्स य कइभाए कइ- भाओ होइ भासाए ' इति यत्प्रतिपादितं तद्वथाचिख्यासुभगवान् भाष्यकार आह- " होइ असंखेजइमे, भागे लोगस्स पढमविइएसु ॥ भासा असंखभागो, भयणा सेसेसु समयेसु ॥ ३९०॥" व्याख्या-चतुर्दशरज्जूच्छ्रितस्य लोकस्याऽसंख्याततमे भागे भाषाया अपि समस्तलोकव्यापिन्या असंख्याततम एव भागो भवति । कदा ?, इत्याह-प्रथमद्वितीयसमययोः। इदमुक्तं भवति-त्रिसमयव्याप्तौ, चतुःसमयव्याप्ती, पञ्चसमयव्याप्ती च प्रथमसमयद्वितीयसमययोस्तावद् नियमेन सर्वत्र लोकासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागलक्षण एव विकल्पः सम्भवति, नान्यः । त्रिसमयव्याप्तौ हि प्रथमसमये दण्डपट्कं भवति, द्वितीयसमये तु पड् मन्थानः सम्पद्यन्ते । एते च दण्डादयो दैर्येण यद्यपि लोकान्तस्पर्शिनो भवन्ति, तथापि वक्तृमुखविनिर्गतत्वात्तत्प्रमाणानुसारतो वाहुल्येन चतुरगुलादिमाना एव भवन्ति, चतुरादीनि चागुलानि लोकासंख्येयभागवर्तिन्येव । इति सिद्धस्त्रिसमयव्याप्तौ प्रथमद्वितीयसमययो.कासंख्येयभागे भाषाऽसंख्येयभागः । चतुःसमयव्याप्तावप्येतदित्थमवगम्यत एव, प्रथमसमये लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात्, द्वितीय- समये तु वक्ष्यमाणगत्या दण्डानामेव सद्भावादिति । पञ्चसमयव्याप्तिपक्षे तु सुबोधमेव, प्रथमसमये भाषाद्रव्याणां विदिशो दिश्येव गमनात् द्वितीयसमये तु लोकमध्यमात्र एव प्रवेशात् । तस्मात् व्यादिसमयव्याप्ती सर्वत्र प्रथम- द्वितीयसमययोर्लोकासंख्येयभागे भाषाया असंख्येयभाग एव भवति । ' भयणा सेसेसु समएसुत्ति' उक्तशेषेषु तृतीयं- चतुर्थपश्चमसमयेषु भजना विकल्परूपा बोद्धव्या, क्वापि लोकासंख्येयभागे स एव भाषाऽसंख्येयभाग एव भवति, रवित्पुनलोकस्य सम्प्पेपमागे भाषासंख्येयभागः, स्वापि समस्तलोकप्याति तथा हि-निरामपध्यालौ हत्तीपसमये भाषायाः समस्तलोकप्याशित, पतुःसमयष्पातितृतीयसमये तु लोकसंख्येयभागे भाषासंस्पेभागः । कथं १, इति पे उच्यते-स्वपम्भरमणपश्मिपरतदयसिनि लोकान्ने प्रसनाडीपहिर्या पविमदिशि स्थित्या मुक्तो मापकस्य प्रथमसमये पतुरगुला- दिवाल्यो रज्जुदीपों दईस्तिरधीनं गत्वा स्वयम्भ्रमणपूर्वपरतटतिनि लोकान्ते लगति, ततो द्वितीयसमथे तस्मादण्डाद- धिपतर्दशरज्जूचिता पूपिरवस्तिरधीनरज्जुविस्तृतः परापावयासितद्रष्याणां दण्डो निर्गछति, लोकमध्ये तु दक्षिणत उत्तरराम परापातरासितट्याणामेर चतुरष्गुलादिपाइप रज्जुधिस्तीण दण्यं विनिर्गस्य स्ययम्भूरमणदक्षिणोत्तरपतिगोर्लोका- तयोर्लंगति । एवं प सति चतुरगुलादिपाहत्यं सर्वोऽपि जुविस्तीर्ण लोकमध्ये प्रवच्छत्यरं सिद्धं भवति, नृतीपरामये तूर्ता- पोष्पपस्थितदण्डागर्दिश प्रमृतः परापालगासितव्यसमूह। मन्यानं साधयति, लोरमध्यच्यवस्थितः सर्वनारज्जुधिस्ती - एत्वरापाप्रस्तः पुनः स पर पमनानी समस्तामपि पूरपति, एवं पमति सर्वापि प्रानाडी उधिोपपस्थितदण्ड- मधिमावेन तदधिक लोकस्य पूरित भरति । एनपसापर नस्य संख्याततमो भागः । तथा च सति पतासामयिक्या पासवीपममये लोफस्प संख्यातसमे मागे मापाया अपि समस्तलोकस्यापिन्याः संपातवमो माग इति स्थितम् ॥ पश्चा गामपिक्याम्त प्यास्तृतीयसमये लोहासंख्येयभाग मापारिपेयभागः । पुसः, इति पद, उच्यते- तस्या नस्य दण्डसमय- लात, वा परोस्पेपमापतित्यस्य प्राय मावितस्यादिति । चतुर्थसमये पतामविपा प्यासी मन्यान्तरपूरणारामस्तलोक- ध्याति: पनापपिक्या तु याप्तौ चतुर्थपमये लोकसंख्येपमागे मापासंगपेयभागा, तस्या वस्प मथिसमयस्वाद कर - च संख्येयभागवर्तित्वस्य प्रागेव भावितत्वादिति।पञ्चमसमये तु पश्चसामयिक्यां व्याप्तौ मन्थान्तरालपूरणात्समस्तलोकव्याप्तिरिति॥ एवं तृतीयचतुर्थपञ्चमसमयेषु भाविता भजना, तद्भावने च ' व्याख्यातं मयणा सेसेसु समयेसु ' ' इति । एतच्च महाप्रयत्नवक्तृनिसृष्टद्रव्यापेक्षयैवोक्तं, मन्दप्रयत्नवक्तृनिसृष्टानि तु लोकासंख्येयभाग एव वर्तन्ते, दण्डादिक्रमेण तेषां लोक- पूरणाऽसम्भवादिति । अथ यद्युक्तप्रकारेण त्रिभिश्चतुर्भिः पञ्चभिश्च समयैर्वाग्द्रव्यैर्लोकः पूर्यते तर्हि चतुर्दशपूर्वविदा श्रुत- केवलिना नियुक्तिकारेण भगवता भद्रबाहुस्वामिना ' चउहिं समएहिं लोगो, भासाए निरंतरं तु होइ फुडो॥ इति किमिति निर्धार्य चतुःसमयग्रहणमेव कृतमिति चेत्, सत्यम्, तुलादण्डग्रहणन्यायेन चतुःसमयग्रहणात् त्रयाणां पञ्चानामपि समयानां ग्रहणस्य नियुक्तिकृता विहितत्वादेव ॥ व्यवहारे यथा तुलादण्डमध्यभागग्रहणेन तदाद्यन्तभागयोरपि ग्रहणं विहितमेव, एवमत्रापि विज्ञेयं, सूत्रेऽप्येवंविधो न्यायो दृश्यते, यतो भग]वतः सूत्रस्य विचित्रा प्रवृत्तिः ॥ उक्तञ्च-"कत्थइ देसग्गहणं, कत्थइ घेप्पन्ति णिरवसेसाई ।। उक्कमकमजुत्ताई, कारणवसओ णिउत्ताई ॥ ३८८ ॥" [ कुत्रचिद् देशग्रहणं, कुत्रापि गृह्यन्ते निरवशेषाणि ॥ उत्क्रमक्रमयुक्तानि, कारणवशतो नियुक्तानि॥] न चैतादृशदेशनिवन्धः श्रुते न दृष्टो भगवत्यामष्टमशते महाबन्धोद्देशके सत्यपि चतुःसामयिके विग्रहे त्रिसामयिकस्यैव तस्य निबन्धाद्, आह च-"चउसमयमज्झगहणे, तिपंचगहणं तुलाइमज्झस्स ।। जह गहणे पर्जत-ग्गहणं चित्ता य सुत्तगई ॥३८७॥" [चतुःसमयमध्यग्रहणे, त्रिपञ्चग्रहणं तुलादिमध्यस्य ।। यथा ग्रहणे. पर्यन्तग्रहणं चित्रा च सूत्रगतिः ॥] नझूर्वाधोगतदण्डादन्यद्रव्याणां पराधातो नास्ति ।। " चउसमयविग्गहे सति, महल्लबन्धमि तिसमयो जह वा ॥ मोतुं तिपंचसमए, तह.चउसमओ इह णिबद्धो ॥३८९॥" [चतु:समयविग्रहे सति महाबन्धे विसमयो यथा वा ।। मुक्त्वा त्रिपञ्चसमयांस्तथा चतुःसमय इह निबद्धः] यदि पुनरेवं व्याख्यायते चतुर्भिरपि समयैर्लोको निरन्तर स्पृष्टो व्याप्ती मवति, तुरप्यर्थ एवानुक्तत्रिपञ्चसमयसमुच्चये, तदेप्सितार्थलाभो न्यायाश्रयणादिप्रयास विनेति द्रष्टव्यं, तुरेवकारार्थ एव, तस्य च निरन्तरमित्यत्राव्यवहितान्वयो भापयेत्यस्य च कस्पचित्सम्बन्धिन्या भाषयेति विवक्षितमित्यप्याहुः, लोकस्य च चरमान्ते सर्वलोकव्याप्तिविशिष्टाया भापायावरमान्तो भवति यदाहुः॥ "आपरियम्मि लोगे दोण्ह, वि लोगस्स तह य भासाए । चरिमंते चरिमंतो, परिमे समयम्मि सञ्चत्य ॥ ३९१॥" [आपूरित लोके द्वयोरपि लोकस्य तथा च भाषायाः ॥ परमान्ने चरमान्तथरमे समये सर्वत्र ॥ ] अत्र विवक्षयादेप्यन्तत्वाञ्चरमग्रहणमिति तु पक्षद्वयेऽपि सम्मुखम् ॥ २९ ॥ अथ जैनसमुद्घातगत्या चतुर्मिी समर्मापाद्रव्यैलोका परिपूर्यत इत्यादेशस्यानादेशत्वं ख्यापयितुमाह- सर्ववेदिसमुद्घात गतिरत्र न युज्यते ॥ एकदा पइदिशा व्याप्तिः, पराघातेन तन्त्र यत् ।। ३०॥ जैनसमुद्घातगत्या हि भापाद्रव्याणां लोकच्यासावगीक्रियमाणायां प्रथमसमये ऊर्ध्वाधोगाम्येव दण्डः स्यान्न तु पद्दिक इति पूर्वपश्चिमदक्षिणोत्तरदिक्षु विदिष्विव वक्तृनिमृष्टद्रव्याणामगमनेन पराघातासितद्रव्याणामेव श्रवणानिमशब्दश्रवणं न स्यात् ।। श्रूयते च-"भासासमसेढीओ, सदैव सुणइ मीसयं सुणइ॥३५१॥"मापासमश्रेणीत शब्दं यच्छृणोति मिश्रकं शृणोति] इत्यादावविशेषेण सर्वासु दिक्षु मिश्रशब्दश्रवणमेवेति ॥ अथ विदिक्षु नियमेन परापावकासितशब्दश्रवणाभिधानाहित्यनियमेन तत्पर्यवस्थतीत्यनिपभोपपादनाय मिश्रशन्दश्रवणं समभिधीयत इत्यूर्वाधोदिशोर्मिश्रश्रवणमन्यासु च दिक्षु पराघातवासितश्रवण: मिति व्याख्यानतो विशेष प्रतिपद्यत इति चेत्, न, यो धूमवान् सोनिमानित्यव भाषासमश्रेणीतो यं शन्दं शृणोति तं मित्रं SH शृणोतीत्यत्र यत्तच्छब्दाभ्यां नियमाभिधानादनियमानुपपत्तेः, अपि चोर्ध्वाधोगमनसमय एव भाषा चतुर्दिशमप्यविशेषण शब्दप्रायोग्यद्रव्याणि पराहत्य द्वितीयसमये मन्थानं साधयतीति त्रिभिरेव समयैस्तस्या लोकव्याप्तिः सम्भवति, न च जीवप्रदे- शानामिव भाषाद्रव्याणामपि लोकव्याप्तौ प्रथमसमये दण्डो द्वितीयसमये कपाटं तृतीयसमये मन्थाचतुर्थसमये चान्तरालपूरणमिति वाच्यम् ॥ भापाद्रव्याणां पराघातसम्भवेनोधिोगमनोत्तरं द्वितीयसमये चतुर्दिक्ष्वनुश्रेणिगमनसमये सर्वतः पराघातवासित- द्रव्याणां मथिभावेन कपाटव्याघातात् ॥ न चैतेषां लोकव्याप्तौ चतुर्दिक्ष्वनुश्रेणिगमनपराघातस्वभावेभ्योऽधिकं नियामकमस्ति, कवली तु द्वितीयसमये केवलज्ञानरूपयेच्छया गुणदोषपर्यालोचनाद् भवोपग्राहिकर्मवशात्स्वभावाद् वा द्वितीयसमये मन्थानं न करोति किन्तु कपाटमेवेति तस्य चतुःसामयिकी लोकव्याप्तिः, अचित्तमहास्कन्धस्तु विस्रसापरिणामेनैव लोकमापूरयतीति द्विती- यसमये तस्य कपाटमात्रभावाच्चतुःसामयिकी व्याप्तिर्विसंसापरिणामस्य पर्यनुयोगानहत्वाद्, अथवाऽसौ निजपुद्गलैरेव लोकमा- पूरयति, नतु पराघातेनान्यद्रव्याणामात्मपरिणामं जनयतीति तस्य चतुःसामयिक्येव व्याप्तिर्निजपुद्गलजन्ये मथि निजपुद्गल- जन्यकपाटस्य हेतुत्वात्तं विना तदभावाद्, आह च "न समुग्धायगईए, मीसयसवर्ण मयं च दंडमि ॥ जइ तो वि तीहि पूरइ, समएहिं जओ पराघाओ॥३९२||जइणे ण पराघाओ, स जीवजोगो य तेण चउसमओ॥ हेऊ होज्जाहि तहि, इच्छा कम्मं सहावो वा ॥३९३॥ खंधों वि वीससाए, ण पराघाओ अ तेण चउसमओ॥ अह होज पराधाओ, हविज तो सो वि तिसमइओ ॥३९४॥" [न समुद्घातगत्या, मिश्रकश्रवणं मतं च दण्डे ॥ यदि ततोऽपि त्रिभिः पूर्यते समयैर्यतः पराघातः॥ जैने न पराघाता, स जीव- योगश्च तेन चतुःसमयः ॥ हेतुर्भवेत्तत्रेच्छा कर्म स्वभावो वा ॥ स्कन्धोऽपि विश्रसया न पराघातश्च तेन चतुःसमयः॥ अथ भवेत्पराघातो
भवेपतः सोऽपि त्रिसामयिका] स्यादेतत्-मधिमात्र एव कपाटं कारणमिति कपाटं विना मयोऽभावाचतुःसामपिपपेव भाषाया लोक-
च्याप्तिर्युज्यते, मैवं, मध्यनुकूलविस्तारे कपाटस्येव पराघातस्यापि शक्तत्वादुमयोरप्येकशक्तिमत्वेन मधिहेतुत्वाद् अत एवापराघातस्य
स्कन्धस्य लोकव्याप्ती कपाटापेक्षेति सिद्धान्तः, अथ जातस्यैव दण्डस्यैव विस्तारे परापात: क्षमो नतत्पद्यमानस्य तस्य न घोदासी-
नद्रप्पमात्रस्यान्यथा द्वितीयसमय एव लोकव्याप्तिप्रसङ्गात्, न प स्वभावमात्रं समपविलम्वनियामकमविप्रसङ्गादिति चेत्, वर्हि
प्रथमसमये भापाद्रव्याणां पदण्डास्त एव प्रसृमरा द्वितीयसमये पण्मन्यानस्तृतीयसमये चान्तरालपूरणमिति प्रागुक्ता वस्तु
स्थितिरभ्युपगम्यता, अपराधातद्रव्याव्याप्तायेर दण्डकपाटमन्थानहेतुत्वादिति दिक् ॥ ३० ॥ प्रसङ्गादनादेशान्तरं दप्यवि--
दण्डमेफदिशं कृत्या, चतुर्मिी समयैः परे ॥ लोकपूरणमिच्छन्ति, न च युक्त्यागमक्षमम् ॥ २२॥
परे प्रत्युत मापाद्रव्याणां चतुभिः समयैर्लोकपूरण इमा प्रक्रियामाहुः, प्रथमसमपे ताव दिशि दण्डो मयति, द्वितीयस-
मये पता मन्या, अघोदिशि पुनर्दण्ड, तृतीयसमये चोर्ध्वदिश्यन्तरालपूरणमधोदिशि तु मन्या,चतुर्थसमये तु तत्राप्यन्तरालपूरणा-
लोकव्याप्तिरिति, तन्मत न युक्ति क्षमते, अनुश्रेणिगमनस्वभावानां पुगलानामेकयैव दिशा गमन नान्पप्रेत्यत्र नियामकामावाद,
न च वक्तृसतात्वादिव्यापाराभिमुख्यमेव नियामकं विश्रेण्यभिमुख भापक विश्रेणावपि गमनप्रसगाव, पटहादिशब्दपुद्गलानो
वक्तृभराव्यापारनिरपेक्षतया चतु:समपानियमप्रसगाञ्च, न मात्र कश्चिदागमोऽप्यस्ति यदलाताव्याप्तिस्वभावः कल्पयितुं
शक्येत।। आह घ-"एगदिसमाइसमए, दंड काऊण चउहिं पूरेइ । अमे भणन्ति,तंपिय, नागमजुत्तिरकर्म होइ ॥३९५॥" [एक-
१ दिवमादिसमये, दण्डं कृत्वा चतुर्भिः पूरयति । अन्ये मणन्ति तदपि प नागमयुक्तिक्षम भवति ॥ ॥ ३२ ॥
तदेवं सप्रसङ्गं व्याख्यातं भेदतो मतिज्ञानं, अथ तत्पर्यायाननिधित्सुराह- ईहापोहौ च मीमांसा, मार्गणा च गवेषणा ॥ संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, सर्वमाभिनिवोधिकम् ॥ ३३ ॥ ईहाज्वयव्यतिरेकधर्मगवेपणा, अपोहो निश्चयो, मीमांसा विमर्शोऽपायात्पूर्व ईहायाश्चोत्तरः सम्भवसम्प्रत्ययः, मार्गणम- न्वयधर्मान्वेषणं,गवेषणं व्यतिरेकधर्मालोचनं,संज्ञाऽवग्रहोत्तरभावी मतिविशेष एव,स्मृतिः पूर्वानुभूतार्थानुसन्धानम्,मतिका श्चिदर्थपरिच्छित्तावपि सूक्ष्मधर्मालोचनरूपा बुद्धिः, प्रज्ञा विशिष्टक्षयोपशमजन्या प्रभूतवस्तुयथातत्त्वालोचनं, सर्वामिदं कथ- श्चिद्भदेऽप्याभिनियोधिकमेव मन्तव्यम् । यदाह परममुनिः नियुक्तिगाथा] "इहा अपोह वीमंसा, मग्गणा गवसणा। सण्णा सई. मई पण्णा, सव्वमाभिणियोहियं ॥३९॥" [ईहापोहो विमर्शो, मार्गणा च गवेषणा।। संज्ञा स्मृतिर्मतिः प्रज्ञा, निबोधिकम् ॥ ] भाष्यकृदप्याह-" होइ अपोहोऽचाओ, सई धिई सव्वमेव महपन्ना। ईहा सेसा, सन्वं, इदमाभिणिबोहियं जाण ॥३९७ ॥ [ भवत्यपोहोपायः स्मृतिधृतिः सर्वमेव मतिप्रज्ञे ॥ ईहा शेपाणि सर्वमिदमामिनियोधिकम् ] अत्र मतिप्रज्ञाऽभिनियोधिकवुद्धिलक्षणाश्चत्वारः शब्दा वचनपर्यायास्तैर्मतिज्ञानसामान्याभिधानाद्, अवग्रहादिशब्दाथार्थपर्यायास्त- देकदेशाभिधानाद्, अथवा सर्वेषामपि वस्तूनामभिलापवाचकाः शब्दा वचनपर्यायाः, तदभिधेयार्थस्यात्मभूता भेदास्त्वर्थपर्याया; यथा कनकस्य कटककेयूरादयः, तदाह-" मइपन्नाभिणिमोहिय-बुद्धीओ होन्ति वयणपजाआ ॥ जा ओग्गहाइसन्ना, ते सम्ये अस्थपजाया ॥ ३९८ ॥" [मतिप्रज्ञाभिनियोधिकयुद्धयो भवन्ति वचनपर्यायाः ॥ या अवग्रहादिसंज्ञा ते सर्वे अर्थपर्यायाः ॥] नन्वर्थपर्यायास्तावद् भेदा एव तन्निरूपणं चानाप्रकृतं शब्दभेदादर्थभेदभ्रमनिरासाय मतिपर्यायज्ञानशब्दाभिधानस्यैवात्र सर्वमाभि- प्रस्तत्वात् , यथान्यापनये "बुदिपलन्धिानमित्यनान्तरम् " इति सांख्याभिमतस्य शब्दभेदादर्थभेदस्य निरा. साय शानपर्यायाभिधानम्, एकरूपेणकार्थबोधक शन्दद्वयं च पर्याया, अन्यथा पृधिषीयटशब्दयोरपि पर्यापत्त्वव्यवहारप्रस- मादिति, तथा च कथाहापोहादीनां पतिज्ञानपर्यायत्वमिति चेत्, सत्यं-अवग्रहणादियोगार्थभेदेऽप्यवग्रहादिशब्दाना मविसामान्यप्रवृत्तिकत्वेन पर्यायत्वात् योगार्थमेदस्यापि पर्यायत्वप्रतिपन्थित्वे घटकलशादिपदानामपि तवं न स्यात् , न चैवमवग्रहेहादिसरप्रसादगा, अवग्रहादीनां सामान्या दिग्राहियेऽप्यव्यक्तव्यक्तनुपदवमासविशेषेण विशेषाद , नहि यथा- भूतभवनहे सरमन्यमानार्थस्यावग्रहणं तथाभूतमेवेहायां, किन्तु विशिष्ट, विशिष्टतरं विशिष्टतम चापायधारणपो, यथाभूता घेहाया मतिचेष्टा ततो विशिष्टता विशिष्टतया चापायधारणयो, अविशिष्टतरा चावनई, अर्थावगमनमपफाफनिशिष्टं धारणायो, अविशिष्टमविशिष्टता चेहावग्रहयो, अर्थधारणमप्यवग्रहापापेभ्यः सर्वप्रकृष्ट धारणायामिति ॥ तदिदमाह-xxx पानवोपलम्धोयं ग्रन्थः, अग्रेतना समाप्ति पावत्प्रभातमो ग्रन्थमा खण्डित इति तत्सना किनिदिक्सूचकमायं प्रदर्यते सव्यं वाभिणियोहिय-मिहोन्गहाइक्रोम संगहियो केवलमत्यविसेस,पइ मिन्ना उग्गहाईपा।३९९।। (सर्व वाऽभिनियोधिक- मिवावग्रहादिपचनेन सहीतम् ।। केवलमर्थविशेष प्रति मिन्ना अवग्रहादयः अथावग्रहापायधारणानामविशिष्टविशिष्टविशिष्टतर- विशिष्टतमार्थप्रतिपादकत्वेन कथं वषच्छम्देनामिनियोधिक सद्गृह्यत इति चेत्, अत्राह-अविशिष्टयौगिकाश्रिपणेन सर्वेपामप्येक- वाचकत्वेनामिनितोषिकत्वेऽविरोधाद । इदमुक्तं भवति, अवग्रहणमाह इलिपुत्पतिमाश्रित्य सर्वमप्यामिनिबोधिवासवाहा यथा हि, कमप्यर्थमवमोऽवगृङ्गाति,तयेहापि कमप्यर्थमवगृहात्यैव, एवमपायधारणे अपि कमप्यर्थमवगृहीव इति सर्वमप्यामिनियोधिक SSIS सामान्येनावग्रह उच्यते । एवमीहनमीहा मतिचेष्टेतीहाया व्युत्पत्ति, अवगमनमवायोावगम इत्यवायस्य, धरणं धारणा अर्थस्या- विच्युत्यादिस्वरूपमिति धारणायाच व्युत्पत्तिमवलम्ब्यापंग्रहापायधारणानामपि मतिचेष्टाविशेषरूपत्वात्सामान्यत ईहात्वे अवग्र- हेहाघारणानामप्यर्था वगमात्मकत्वात्सामान्यतोऽपायत्वे अवग्रहेहापायानां सामान्यतोऽर्थधरणस्वरूपत्वाद्धारणात्वे न कश्चिद्विरोधः, यथतेषामवग्रहादीनां सङ्करप्रसङ्गो न भवति तथा प्रागेवोपपादितं पूज्यरित्यलमतिपल्लवितेन। तदिदमाह भाष्यकारः॥ "उग्गहण- मोग्गहो ति य, अविसिट्ठमवग्गहो तयं सव्वं ॥ ईहा जं मइचेट्ठा, मइवावारो तयं सव्व।।४००॥अवगमणमवाओत्ति य, अत्थाव- गमो तयं हवइ सव्वं ॥ धरणं च धारणत्ति य, तं सव्वं धरणमत्थस्स।।४०१॥" [अवग्रहणमवग्रह इति, चाविशिष्टमवग्रहस्तत्सर्वम् ।। ईहा यद् मतिचेष्टा,मतिव्यापारस्तत्सर्वम्।।अवगमनमवाय इति चार्थावगमस्तद् भवति सर्वम् ॥ धरणं च धारणेति च तत्सर्व धरणम- थस्य]अथैवं तत्त्वभेदपर्यायैर्व्याख्यातस्वरूपस्यास्याभिनिवोधिकज्ञानस्य समासतो ज्ञेयभेदेन चातुर्विध्य,यन्नन्दिसूत्रं "तं समासओ चउन्विहं पन्नत्तं, तंजहा-दव्वओ, खित्तओ, कालओ, भावओ। तत्थ दव्वओ णं आभिणिचोहियनाणी आएसेणं सव्वदन्चाई जाणइ न पासई" इत्यादि [तत्समासतश्चतुर्विधं प्रज्ञप्तं तद्यथा-द्रव्यतः,क्षेत्रतः, कालतो, भावतः। तत्र द्रव्यत आभिनियोधिकज्ञानी आदेशेन सर्नद्रव्याणि जानाति न पश्यति] अथास्तु पदार्थानां द्रव्यक्षेत्रकालभावभिन्नत्वेन चतुर्विधत्वाज्ज्ञेयचातुर्विध्यं ततो ज्ञान स्य चतुर्विधत्वे किमायातमिति चेत्, उच्यते, ज्ञानन्तावद्विषयाधीनसत्ताकं विषयमवगच्छदेव ज्ञानं ज्ञानत्वमृच्छति, तथा चाभिनिवो- धिकमादेशेन द्रव्यादिभेदेन चतुर्विधमपि विषयमवगृह्णातीति विषयभेदेन ज्ञानस्यापि चतुर्विधत्वं सिद्धम् । तदाह-"तं पुण चउविहं ने-य भेयओ तेण जं तदुवउत्तो॥ आदेसेणं सव्वं,दव्वाइ चउव्विहं मुणइ ॥४०२॥" [तत्पुनश्चतुर्विधं ज्ञेय-भेदतस्तेन यत्तदुपयुक्तः।
CECare आदेशेन सर्व द्रव्यादि चतुर्विधं जानाति ॥ ननु द्रव्यादिचतुर्विधमामिनियोधिकज्ञानी जामातीत्युक्तं तत्केन सरूपेण, नप किं- शानस्य ज्ञातव्यप्रकारभेदोऽस्तीति स्वरूप पृच्छसीति वाच्यं, ज्ञातव्यप्रकारस्य वैविध्यात् , तथाहि,ओपादेशो विभागादेशश्व सामा- न्यप्रकारो विशेषप्रकारचेति तदर्थः,अत: वेनस्वरूपेणेति प्रश्ना, अनोत्तर, ओषादेशन सामान्यप्रकारेण, तथाहि, द्रव्यसामान्येन असं- स्पेयप्रदेशात्मको लोकव्यापकोऽभूतः प्राणिनां पुद्गलानां च गत्युपष्टम्मनहेतुर्धर्मास्तिकाय इत्यादिना सामान्यप्रकारेण कियस्प- पपिविशिष्टानि पडपि धर्मास्तिकायादीनि सर्वच्याणि सामान्येनाभिनिवोधिकधानी जानातीति तयम्।विभागादेशेन विशेष प्रकारेण पुनः सर्वैः पर्यायैः केवलिष्टरवच्छिन्नानि मद्रव्याणि न जानाति केरलशानायसेपत्वात्सर्वपर्यापाणामिति, एवं क्षेत्रमपि सर्व सामा. न्यतः क्रियत्पर्यापारिछनं सामान्यादेशेन जानातिन विशेषादेशेन सर्वपापविशिष्ट, कालमपि साद्धारूर अतीतानागतवर्तमानभे- दनसिविधं वेत्यादिरूपेण, भावतस्तु मामान्येन सर्वमावानामनन्तमार्ग, औदायिकक्षायिकौरमिकक्षायोपशनिपारिणामिकान्वा पश्चभावान्सामान्यादेशेन जानाति न परतः। एतावत एवाभिनियोधिकरिषयत्वात् ॥ इह क्षेत्रकालयोः सामान्येन द्रव्यान्तर्गतत्वे- ऽपि भेदेन रूढत्यात्पृथगुपाद कृता। स्वार्थत्वे वाऽदेशस्य पादेशतः श्रुतोपलब्धेष्वर्येषु सर्वद्रव्यादिविषयं मतिज्ञान प्रस्तते । नच श्रुतोपलम्धेयर्थेषु ग्राहकत्वेन प्रसस्य मानस्य थुतज्ञानत्वमेव न्याय्यं न मविज्ञानत्यमिति माम्प्रतम्, इह पूर्व श्रुतपरिकर्मिवमते- रपि साम्भवमाभिनिवोधिकज्ञानस्य श्रुतोपयोगमृते तदुपलम्धेष्वर्थेषु तवासनामात्रेणैव प्रवृत्तत्वात, पदयादि, "पुलिंब सुयपरिकम्मि य-मदस्मजं संपर्य सुयाईय" इत्यादि,मईमप्येवमाप्पकारोऽध्याह-"आएसोति पगारो, ओहादेसेण सम्बदया। धम्मस्थि- राश्याई, जाणइन उ सबमेएणं ॥४०३|| खेस लोगालोग, कालं सम्बदमहत तिविहं तिपिंपोदश्याईए, मावे जं नेयमेवइयं ॥४०४॥ आएसोत्ति व सुत्तं, सुओबलढेसु तस्स मइनाणं । पसरइ तब्मावणया, विणा वि सुत्तानुसारेण ॥४०५॥" [आदेश इति- प्रकार ओघादेशेन सर्वद्रव्याणि ॥ धर्मास्तिकायिकादीनि जानाति न तु सर्वभेदेन ॥ क्षेत्रं लोकालोकं कालं सर्वाद्धामथवा त्रिविध- मिति ॥ पञ्चौदयिकादीन्भावान्यज्ज्ञेयमियद् ॥ आदेश इति वा सूत्रं श्रुतोपलब्धेषु तस्य मतिज्ञानं ॥ प्रसरति तद्भावनया विनापि सूत्रानुसारेण।।] तदेवं मतिज्ञानस्य तत्वभेदपर्यायनिरूपणं द्रव्यादिविषयप्ररूपणं च प्रदर्शितम् ॥ अथ सत्पदप्ररूपणतादिभिर्नव- भिरनुयोगद्वारैर्मतिज्ञानं विचार्यते, अनुयोगद्वाराणि च गत्यादिमार्गणाभेदेपु विधीयन्ते, अतः पूर्व द्वाराणि मार्गणाभेदाचोच्यन्ते तत्र सत्पदप्ररूपणता, द्रव्यप्रमाण, क्षेत्रं, स्पर्शना, कालः, अन्तरं, भागः, भावः, अल्पवहुत्वं चेति नवानुयोगद्वाराणि, अनुयोगो व्याख्यानं तस्य द्वाराणीव द्वाराणि व्याख्यानपुरप्रवेशमार्गाः, मार्गणाश्च ‘गइ इंदिय काये' इत्यादिगाथोक्ताः, सत्पदाद्यनुयोग- द्वारावतारस्थानानि, एतेषां स्वरूपं प्रतिपद्यमानप्रतिपन्नजीवानां मार्गणाविचारोऽनुयोगद्वारविचारश्च महाभाष्यतवृत्त्यादि- भ्यो विशेषजिज्ञासुनाऽवधेयः ॥ तत्र महाभाष्ये पडुत्तरचतुःशततमगाथात आरभ्य त्रिचत्वारिंशदधिकचतुःशततमी यावदष्टा- त्रिंशता गाथाभिस्सत्पदप्ररूपणतादिभिरनुयोगद्वारैतिज्ञानं चिन्तितम्॥ ततः पट्पष्टयुत्तरपञ्चशततमी गाथां यावत्रयोविंशत्यऽ- धिकशतसंख्यगाथाभिः श्रुतज्ञानं निरूपितम् ॥ ततोऽष्टोत्तराष्टशततमी गाथां यावद्विचत्वारिंशदधिकद्विशतप्रमाणाभिर्गा- थाभिरवधिज्ञानं प्ररूपितम् ॥ ततो द्वाविंशत्युत्तराष्टशततमी गाथां यावच्चतुर्दशभिर्गाथाभिर्मनःपर्यायज्ञानप्ररूपणा कृता ॥ ततः पट्त्रिंशदुत्तराष्टशततमी गाथां यावच्चतुर्दशभिर्गाथाभिः केवलज्ञानं निरूपितम् ॥ ] । न्यायविशारद-ज्यागाचार्य-महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिप्रणीतं त्रुटितावस्थोपलब्धं श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं समाप्तम्॥
॥ यता हामार्णवप्रायविभागेन मतिज्ञामपणमध्यवशिादमिति तादीनां तस्वभुत्मापरणाय पृश्यप्रणीतमेय तदीप- विपदापमानामा शारिरणमायर पूर्व विधा मुप्रितमप्येत संलमतासत्यापनायेह प्रकाश्यते ॥ ॥ अथ श्रीज्ञानविन्दुप्रकरणम् ॥ पेन्द्रस्तोमनतं नया, पीरं तस्यादेशिनम् ॥ ज्ञानपिन्दुः श्रुताम्भोधेः, सम्यगुध्रियते मया ॥१॥ सत्र शानं तायदात्मनः स्वपराधमासको साधारणो गुणः, स घाघ्रपटल विनिर्मुक्तस्य भास्वत इस निरस्तसमस्तावरणस्य जीवस्य स्वभारभूतः येवलशानय्यपदेशं लभते । तदाराचार्या:-" फेवलनाणमणत, जीवसरूपं तयं निरापरणं ॥" इति । परवभावं यद्यपि सर्वपातिफेक्रमानावरण कारनवायरीतुं व्याप्रियते, तथापि तस्यानन्ततमो भागो नित्यानात एघावतिष्ठते, उपायाभाव्यात् ।। (नन्दीपत्र) सम्वजीवाणे पि य ग अपसरस्स अणंततमो भागो णिचुग्याडिओ चिट्ठइ, सो वि अ जह आवरिया, तेणं जीवो अजीवत्तणं पापिला" इति पार्षमामापयात् । अयं प समायः फेलशानावरणातस्य जीवस्य पनपटलच्छमस्प पेरिख भन्दप्रयाग इत्युच्यते । तत्र हेतु केवलझानावरणमेव । फेवलज्ञानव्यावृत्तज्ञानत्यव्याप्यजातिविशे- पायरियने तदेतत्वस्य शास्त्रार्थस्यात् । अत एव न मतिज्ञानावरणक्षयादिनापि मनिशानाद्युत्पादनप्रसदगा । अत एव धास्य विभावगुणत्यमिति प्रसिद्धिः । सयप्रकाशप्रतिवन्धके मन्दप्रकाशजनफरवमनुस्कटे चक्षुराधावरणे वखादायेय दृष्टं, न तूत्कटे बुध्यादाविति कथमश्रेयमिति चेत्, न, अभ्राधावरणे उत्कटे उभयस्य दर्शनात्, अत एकात्र (नन्दी) "मुटु दि मेघरामदए, होति पभा संदधागं । इत्येव शान्तितं पारम, अत्यामृतेऽपि चन्द्ररर्यादौ दिनरजनीविभागदेवत्पप्रकाशपीयेऽप्यन्यथ्यावर्तकचे.
ACCORRESS 'तन्यमात्राविर्भाव आवश्यक इति परमार्थः । एकत्र कथमावृतानावृतत्वमिति त्वर्पितद्रव्यपर्यायात्मना भेदाभेदवादेन निर्लो- ठनीयम् । ये तु चिन्मात्राश्रयविषयमज्ञानमिति विवरणाचार्यमताश्रीयणो वेदान्तिनस्तेषामेकान्तवादिनां महत्यनुपपत्तिरेव, अज्ञानाश्रयत्वेनानावृतं चैतन्यं यत्तदेव तद्विषयतयाऽऽवृतमिति विरोधात् । न चाऽखण्डत्वाद्यज्ञानविषयः, चैतन्यं त्वाश्रय इत्यवि- रोधः, अखण्डत्वादेश्विद्रूपत्वे भासमानस्यावृतत्वायोगात्, अचिद्रूपत्वे च जडे आवरणायोगात् । कल्पितभेदेनाखण्डत्वादि विषय इति चेत्, न, भिन्नावरणे चैतन्यानावरणात् । परमार्थतो नास्त्येवावरणं चैतन्ये, कल्पितं तु शुक्तौ रजतमिव तत्तत्राविरुद्धं, तेनैव च चित्त्वाखण्डत्वादिभेदकल्पना 'चैतन्यं स्फुरति नाखण्डत्वाद्'इत्येवंरूपाऽऽधीयमाना न विरुद्धति चेत्, न, कल्पितेन रज- तेन रजतकार्यवत्कल्पितेनावरणेनावरणकार्यायोगात् । 'अहं मां न जानामि' इत्यनुभव एव कर्मत्वांशे आवरणविषयकः कल्पि- तस्यापि तस्य कार्यकारित्वमाचष्टे, अज्ञानरूपक्रियाजन्यस्यातिशयस्यावरणरूपस्यैव प्रकृते कर्मत्वात्मकत्वात्, अत एवास्य सा. क्षिप्रत्यक्षत्वेन स्वगोचरप्रमाणापेक्षया न निवृत्तिप्रसङ्ग इति चेत्, न, 'मां न जानामि' इत्यस्य विशेषज्ञानाभावविषयत्वात्, अन्यथा मां जानामात्यनेन विरोधात, दृष्टश्चैत्थं 'न किमपि जानामि इत्यादिमध्यस्थानां प्रयोगः । किञ्च विशिष्टाविशिष्टयोमैदा- भेदाभ्युपगमं विनाऽखण्डत्वादिविशिष्टचैतन्यज्ञानेन विशिष्टावरणनिवृत्तावपि शुद्धचैतन्याप्रकाशप्रसङ्गः, विशिष्टस्य कल्पित- त्वादविशिष्टस्य चाननुभवाद, महावाक्यस्य निर्धर्मकब्रह्मविषयत्वं चाग्रे निर्लोठयिष्यामः । एतेन 'जीवाश्रयं ब्रह्मविषयं चाज्ञानम्' इति वाचस्पतिमिश्राभ्युपगमोऽपि निरस्तः । जीवब्रह्मणोरपि कल्पितभेदत्वात्, व्यावहारिकभेदेऽपि जीवनिष्ठाविद्यया तत्रैव "प्रपश्चोत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाहकारादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तत्रेष्टैव, आकाशादिप्रपञ्चोत्पत्तिस्तु विषयपक्षपातिन्या अविद्याया ईश्वरे स- । वेन तत्रैव युक्त्यपि साम्प्रतम्, अज्ञातब्रह्मण एवैतन्मते ईश्वरत्वेऽप्यज्ञातयुक्त रजतोपादानत्ववत्तस्याकाशादिप्रपञ्चोपादान- त्वाभिधानासम्भवात, रजतस्थले हीदमंशावच्छेदेन रजताभावाशानम्, इदमंशावच्छेदेन रजतोत्पादकामिति त्वया क्लास शुक्त्यज्ञानं त्वदूरविप्रकर्षण तथा, प्रकृते तु ब्रह्मण्यवच्छेदासम्भवान किश्चिदेतत्, अवच्छेदानियमेन हेतुत्वे चाहकारादेरपीश्वरे उत्पचिप्रसङ्गादिति किमतिप्रसङ्गेन, तस्मादनेकान्तवादाश्रयादेव केवलज्ञानावरणेनावृतोऽप्यनन्सतमभागावशिष्टोऽनापत एव शानस्वभावः सामान्यत एकोऽप्यनन्तपर्यापकीर्मीरितमूर्तिमन्दप्रकाशनामधेयो नानुपपना, स चापान्तरालावस्थितमतिज्ञाना- घावरणक्षयोपशमभेदसम्पादित नानात्वं भजते, घनपटलाच्छन्नरयेमन्दप्रकाश इवान्तरालस्थकटल्याचावरणविवरप्रवेशात् ॥ इत्यं च जन्मादिपर्यायवदात्मस्वमारत्वेऽपि मतिज्ञानादिरूपमन्दप्रकाशस्योपाधिमेदसम्पादितसत्ताकत्येनोपाधिविगमे तद्वि- गमसम्भवान्न कैवल्यस्वभावानुपपत्तिरिति महाभाष्यकारः, अत एव द्वितीयापूर्वकरणे ताचिकधर्मसन्यासलाभे क्षायो. पशामिकाः क्षमादिधर्मा अप्यपगच्छन्तीति तत्र ता ( योगदृष्टिसमुद्ययादौ) हरिभद्राचार्यनिरूपितम् । निरूपितं च योगय- नकर्मनिर्जरणहेतुफलसम्पन्धनियतसत्ताकस्य क्षायिकस्यापि चारित्रधर्मस्य मुक्तायनास्थानम् । न च पक्तव्यं केवलज्ञानाव- रणेन पलीपसाररीतुमसक्यस्यानन्ततमभागस्प दुर्वलेन मतिज्ञानावरणादिना नावरणसम्भव इति, फर्मणः स्वापार्यावारक- तापां सर्वपातिरसस्पर्धयोदयस्यैव पलत्वात्, सस्य चमतिलानापरणादिप्रकृतिप्वप्यविशिष्टत्वात् । कथं तर्हि क्षयोपशम इतिचेत्, .अप्रेयमहन्मतोपनिषद्वेदिनां मफिया-दह हि कर्मणां प्रत्येकमनन्तानन्तानि रसस्पर्घकानि भवन्ति, तत्र केवलशा- नावरण-फलदर्शनावरणा-ऽऽधदिशपाय-मिथ्यात्व-निद्रीलक्षणानां विंशतः प्राताना सर्वपातिनीनां सपिपि रसस्पर्धकानि सर्वघातीन्येव भवन्ति, उक्तशेषाणां पञ्चविंशतिघातिप्रकृतीनां देशघातिनीनां रसस्पर्धकानि यानि चतु:स्थानकाान पा च त्रिस्थानकानि तानि सर्वघातीन्येव, द्विस्थानकानि तु कानिचित् सर्वघातीनि कानिचिच्च देशघातीनि, . एकस्थानकानि तु सर्वाण्यपि देशघातीन्येव । तत्र ज्ञानावरणचतुष्कदर्शनावरणत्रयसञ्चलनचतुष्कान्तरायपञ्चपुत्रदलक्षणानां सप्तदशप्र- कृतीनामेकद्वित्रिचतुःस्थानकरसा वन्धमाभित्य प्राप्यन्ते, श्रेणिप्रतिपत्तेर्वांगासां द्विस्थानकस्य त्रिस्थानकस्य चतुःस्थानकस्य वा रसस्य बन्धात् । श्रेणिप्रतिपत्तौ त्वनिवृत्तिवादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वत्यन्तविशुद्धाध्यवसायेनाशुभत्वादासा- मेकस्थानकरसस्यैव बन्धात्, शेपास्तु शुभा अशुभा वा. वन्धमधिकृत्य द्विस्थानकरसानिस्थानकरसाश्चतुःस्थानकरसाश्च प्राप्यन्ते, न कदाचनाप्येकस्थानकरसाः । यत उक्तसप्तदशव्यतिरिक्तानां हास्याद्यानामशुभप्रकृतीनामेकस्थानकरसब- न्धयोग्या शुद्धिरपूर्वकरणप्रमत्ताप्रमत्तानां भवत्येव न, यदा त्वेकस्थानकरसबन्धयोग्या परमप्रकर्पप्राप्ता शुद्धिरनिवृत्तिवाद- राद्धायाः संख्येयेभ्यो भागेभ्यः परतो जायते, तदा वन्धमेव न ता आयान्तीति ॥ न च यथा श्रेण्यारोहेऽनिवृतिवाद राद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेषु परतोऽतिविशुद्धत्वान्मतिज्ञानावरणादीनामेकस्थानकरसवन्धा, तथा क्षपकश्रेण्यारोहे सू- क्ष्मसम्परायस्य चरमद्विचरमादिसमयेषु वर्तमानस्यातीवविशुद्धत्वात् केवलद्विकस्य सम्भवगन्धस्यैकस्थानरसबन्धः कथं न भवतीति शङ्कनीयम् १ । स्वल्पस्यापि केवलद्विकरसस्य सर्वघातित्वात् , सर्वघातिनां च जघन्यपदेऽपि द्विस्थानकरसस्यैव सम्भवात, शुभानामपि प्रकृतीनामत्यन्तशुद्धौ वर्तमानश्चतुःस्थानकमेव रसं बध्नाति, ततो मन्दमन्दतरविशुद्धौ तु त्रिस्था- नक द्विस्थानकं वा; सक्लेशाद्धायां वर्तमानस्तु शुभप्रकृतीरेव न बध्नातीति कुतस्तद्गतरसस्थानकषिन्ता । यास्त्वतिसशक्लिष्टे HASE - मध्यादौ नरकगतिप्रायोग्या वैप्रियतेजसाचा शुभप्रकृतयो पन्धमायान्ति, तासामपि तथास्वाभाष्याज्जपन्यतोऽपि विस्था- म एव रसो पन्धमायाति नैकस्थानक इति ध्येयम् । ननत्कृष्टस्थितिमा सक्लेशोत्कर्षेण भवति, ततो येरेवाऽम्यवसायैः शुभ- प्रकृतीनासकटा स्थिति पति तरकाथानकोऽपि रसः किं न स्यादिति चेत्, उच्यते-इह हि प्रथमस्थितेरारभ्य समयसमयादया संस्पेयाः स्थितिविशेषा भवन्ति, एवैपायां च स्थितावसंख्येया रसस्पर्धकसमातविशेषा, तत उत्कृष्टस्थिती पध्यमानायो प्रतिस्थितिविशेषमसंख्यया ये रसस्पर्धक सङ्घात विशेपास्ते तावन्तो द्विस्थानकरसस्यैव घटन्ते नैकस्थानकस्येति न शुभप्रक- नामुस्कृष्टस्थितिमन्धेऽप्येवस्थानवरसपन्धः। उक्तं च-(पंचसंग्रह)उकोसटिईअज्झव-साणेहिं एगठाणिओ होइ।। सुमिाणतं न जंलिई, असंसगुणिआ उ अणुमागा॥३-६४ ॥ इति" । एवं स्थिते देशघातिनामवधिज्ञानावरणादीनां सर्वपातिरसस्पर्धकेषु विशुद्धाप्यवसायतो देशपातितया परिणमनेन निहतेषु, देशघातिरसस्पर्धकेषु घातिस्निग्धेष्वल्परसीकतेपु, तदन्तर्गतकतिप- परसापकभागस्यौदपावलिकाप्रविष्टस्य थये, शेषस्य च विपाकोदयविष्फम्मलक्षणे उपशमे, जीवस्यावधिमनापर्यायशानचक्षु दर्शनादयो गुण क्षायोपचमिफा प्रादुर्भवन्ति । सतुक्तम्-"णिहएम सव्वयाई-रसेसु फडेस देसपाईण ॥ जीवस्स गुणा जा. 4- ओहीमणपरकुमाई।।।३-३०॥" निहतेपु देशपातितया परिणमितेषु॥ तदावधिज्ञानावरणादीनां कतिपयदेशवातिरस- स्पर्धक्क्षयोपशमा कतिपयदेशपातिरसस्पर्धकानां चोदयात् श्योपशमानुविध औदायको भावः प्रवर्तते, अत एवोदीयमाना- अषयोपशमस्या षर्धमानायधिज्ञानोपपति यदा चावधिशानाऽऽवरणादीनां सर्वपातीनि रसस्पर्धकानि पियाकोदयमाग- तानि भवन्ति तदा तद्विषय और पिको भावा पेयला प्रवर्तते । फेवलमपपिज्ञानावरणीयसपातिरसस्पर्धकाना देशपातितया SE परिणामः कदाचिद्विशिष्टगुणप्रतिपत्त्या कदाचिच तामन्तरेणैव स्यात्, भवप्रत्ययगुणप्रत्ययभेदेन तस्य द्वैविध्योपदर्शनात् । मनःपर्यायज्ञानावरणीयस्य तु विशिष्टसंयमाप्रमादादिप्रतिपचावेव तथास्वभावानामेव बन्धकाले तेषां बन्धनाद, चक्षुर्दर्श- नावरणादेरपि तत्तदिन्द्रियपर्याप्त्यादिघटितसामग्र्या तथापरिणामः । मतिश्रुतावरणाचक्षुर्दर्शनावरणान्तरायप्रकृतीनां तु सदैव देशघातिनामेव रसस्पर्धकानामुदयो न सर्वघातिना, ततः सदैव तासामौदयिकक्षायोपशमिको भावौ सम्मिश्री प्राप्येते, न केवल औदयिक इति उक्तं पञ्चसन्ग्रहमूलटीकायाम् । एतच्च तासां सर्वघातिरसस्पर्घकानि येन तेनाध्यवसायेन देशघातीनि कर्तुं शक्यन्ते इत्यभ्युपगमे सति उपपद्यते, अन्यथा बन्धोपनीतानां मतिज्ञानावरणादिदेशघातिरसस्पर्धकानामनिवृत्ति- बादराद्धायाः संख्येयेषु भागेषु गतेष्वेव सम्भवाचदाग् मतिज्ञानाद्यभावप्रसङ्गः, तदभावे च तद्रललम्यतदवस्थालामानु- पपत्तिरित्यन्योऽन्याश्रयापातेन मतिज्ञानादीनां मूलत एवाभावप्रसङ्गात् । एवं मतिश्रुताज्ञानाचक्षुर्दर्शनादीनामपि क्षायो- पशमिकत्वेन मणनात्सर्वघातिरसस्पर्धकोदये तदलाभाद्देशघातिरसस्पर्धकानां चार्वागवन्धादध्यवसायमात्रेण सर्वघातिनो देशघातित्वपरिणामानभ्युपगमे सर्वजीवानां तल्लाभानुपपत्तिरिति भावनीयम् । ननु यदि येन वेनाध्यवसायेनोक्तरसस्पर्ध- कानां सर्वघातिनां देशघतितया परिणामस्तदाग्दिशायां तद्वन्ध एव किं प्रयोजनमिति चेत्, तत्कि प्रयोजनक्षतिभिया सा- मग्री कार्य नार्जयंतीति वक्तुमध्यवसितोऽसि ? । एवं हि पूर्णे प्रयोजने दृढदण्डनुन्नं चक्रं न प्राम्येत्, तस्मात्प्रकृते हेतुस- माजादेव सर्वघातिरसस्पर्धकान्धौपयिकाध्यवसायेन तद्धन्धे तत्तदध्यवसायेन सर्वदा तदेशयातित्वपरिणामे च बाघकाभा- । तदेवं ज्ञानावरणदर्शनावरणान्तरायाणां विपाकोदयेऽपि क्षयोपशमोऽविरुद्ध इति स्वितम् । मोहनीयस्य तु मिथ्या- - स्वानन्तानुवन्ध्यादिप्रकृतीनां प्रदेशोदये हायोपसमिको मावोऽविरुदो, न पिाकोदये, सास सर्वपाविनीखेन तद्रसस्पर्ष- कस्य तथाविधाभ्यवसायेनापि देशघातितया परिणमपितृमशफ्पत्वाद, रसस्य देशघातितया परिणामे तादात्म्पेन देशपानिन्या हेतुत्वकल्पनात् । विपाकोदयविष्कम्मणं तु तासु सर्वघातिरसस्पर्धकानां धायोपशमिकमम्यक्त्वादिलण्यभिषायकसिदान्त- पलेन क्षयोपशमान्यथानुपपत्त्यैव तथाविधाभ्यवमायेन कल्पनीयम् । केवलज्ञानकेवलदर्शनावरणयोस्तु विपाकोदयविष्कम्मा योग्यत्वे स्वभाव एव शरणमिति भावः। हेत्वमागदेव नदभारस्तदेतत्वेन फल्प्यमानेऽज्यवसाये तत्क्षयहेतृत्वकल्पनाया एवौचित्यादिति तु युक्तं, तस्मान्मिथ्यात्वादिप्रकृतीनां विपामोदये न श्योपचमसम्भवः, किंतु प्रदेशोदये । न च सर्वपाति. रसस्पर्धकप्रदेशा अपि सर्वस्वघात्यगुणयातनस्वभावा इति उत्प्रेदेशोदपेऽपि कथं पायोपामिकमावसम्भव इति वाच्यम्, वेषां सर्वपातिरसस्पर्धकप्रदेशानामध्यवसायविशेषेण मनाग्मन्दानुभागीकृतविरलवेपमानदेशपातिरसस्पर्धकेप्यन्तःप्रवेशितानां यथास्थितस्वबलप्रकटनासमर्थत्वात् । मिथ्यात्वायद्वादशकपापरहिताना शेषमोहनीयप्रकृतीनां तु प्रदेशोदये विपाकोदपे वा क्षयोपशमोऽविरुद्धः, नासा देशपाविनीत्वात्, तदीयसपातिरसस्प देशपातित्वपरिणामे हेतधारित्रानुगतोऽध्परसायविशेष एवं द्रष्टव्या, परंताः प्रकृतयोऽध्रुवोदया इति तद्विपाकोदयाभावे धायोपशमिक मावे विनृम्ममाणे प्रदेशोदयवत्योऽपि न ता मना- गपि देशघातिन्यः । विपाकोदये तु वर्तमाने पायोपशमिकमावसम्भवे मनाम्मालिन्यकारित्वादेशयाविन्यस्ता भवन्तीति मक्षेपः॥ विस्तरार्थिना तु मत्कृतकर्मप्रकृतिचिवरणादिविशेषग्रन्था अवलोकनीपा उक्ता धयोपशमप्रक्रिया ॥ इत्यं च सर्वधा- तिरसस्पर्धकवम्मतिज्ञानावरणादिक्षयोपशमजनितं मतिश्रुतापधिमनःपपोयमेदाचतुर्विध धायोपशमिक शान, पचमं च धायिक केवलज्ञानमितिं पञ्च प्रकारा ज्ञानस्य ॥ तत्र मतिज्ञानत्वं श्रृंताननुसार्यनतिशयितज्ञानत्वं, अवग्रहादिक्रमवदुपयोगजन्यज्ञानत्व वा, अवध्यादिकमतिशयितमेव, श्रुतं तु श्रुतानुसार्यवेति न तयोरतिव्याप्तिः । श्रुतानुसारित्वं च धारणात्मकपदपदार्थसम्बन्धप्रतिस- न्धानजन्यज्ञानत्वं, तेन न सविकल्पकज्ञानसामग्रीमात्रप्रयोज्यपदविषयताशालिनीहापायधारणात्मके मतिज्ञानेऽव्याप्तिः । ईहादि- मतिज्ञानभेदस्य श्रुतज्ञानस्य च साक्षरत्वाविशेपेऽप्ययं घट इत्यपायोत्तरमयं घटनामको न वेति संशयादर्शनात्, तत्तन्नाम्नोऽप्य- पायेन ग्रहणात्, तद्धारणोपयोगे 'इदं पदमस्य वाचकं, अयमर्थ एतत्पदस्य वाच्य' इति पदपदार्थसम्बन्धग्रहस्यापि धौव्येण तज- नितश्रुतज्ञानस्यैव श्रुतानुसारित्वव्यवस्थितेः । अत एव धारणात्वेन श्रुतहेतुत्वात् " मइपुव्वं सुअं” इत्यनेन श्रुतत्वावच्छेदेन मतिपूर्वत्वविधिः, “न मई सुअपुब्विया" इत्यनेन च मतित्वसामानाधिकरण्येन श्रुतपूर्वत्वनिषेधोऽभिहितः सङ्गच्छते । कथं तर्हि श्रुतनिश्रिताश्रुतनिश्रितभेदेन मतिज्ञानद्वैविध्याभिधानमिति चेद्, उच्यते-स्वसमानाकारश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रबोधसमानकालीनत्वे सति श्रुतोपयोगाभावकालीनं श्रुतनिश्रितमवग्रहादिचतुर्भेद, उक्तवासनाप्रबोधो धारणादाायोपयुज्यते, श्रुतोपयोगाभावश्च मति- ज्ञानसामग्रीसम्पादनाय, उक्तवासनाप्रयोधकाले श्रुतज्ञानोपयोगवलाच्छुतज्ञानस्यैवापत्तेः, मतिज्ञानसामग्र्याः श्रुतज्ञानोत्पत्तिप्रति- बन्धकत्वेऽपि शाब्दच्छास्थानीयस्य तस्योत्तेजकत्वात् । मतिज्ञानजन्यस्मरणस्य मतिज्ञानत्वयत् श्रुतज्ञानजन्यस्मरणमापि च श्रुतज्ञान- मध्य एवं परिगणनीयम् । उक्तवासनाप्रबोधासमानकालीनं च मतिज्ञानमौत्पत्तिक्यादिचतुर्भेदमश्रुतनिश्रितमित्यभिप्रायेण द्विधा- विभागे दोपाभावः । तदिदमाह महाभाष्यकार:-"पुचि सुअपरिकम्मिय-मइस्स जं संपर्य सुआई॥ तं निस्मियमियरं पुण, आणस्सिों मइचउकं तं ॥ १६९ ॥ (ज्ञानार्णव पत्र २५) इति"। अपूर्वचैत्रादिव्यक्तियुद्धौ त्वौत्पत्तिकीत्वमेवाश्रयणीयम् ।
ऐन्द्रियकश्रुतज्ञानसामान्य धारणात्वेन तदिन्दिपजन्यथुते वदिन्द्रियजन्यधारणात्येनैव वा हेतुत्वात् । प्रागनुपलन्धेर्थे ध्रुवज्ञानाहितवासनाप्रपोधाभावेन श्रुतनिधितवानासम्मवान, धारणापाः भुतहेतुत्व एव च मविश्रुतयोधियोगपपेऽप्यूपयोगक्रमः सङ्गच्छते, प्रगुपलब्धार्थस्य चोपलम्भे धारणाहितश्रुतज्ञानाहितवासनाप्रपोषान्वयाछुतनिधितत्वमावश्पकम्, घारणादिरहिवाना- मेकेन्द्रियादीनां त्वाहारादिसंज्ञान्यथानुपपस्यान्तर्जल्याकारविवाश्वेतार्थवाचकं शन्दसंघष्टार्थशानरूपं श्रुतशानं धयोपशममाप्रजनितं जात्यन्तरमेव, आलोकस्य शब्दस्योहाख्यप्रमाणेन पदपदार्थशक्तिमहानन्तरमाकाहाज्ञानादिसाचिष्पेन जायमानं तु प्रानं स्पष्टपा- रणामायमेव, शान्दयोधपरिकरीभूतव यावान प्रमाणान्तरोत्यापितोऽपि योषा सोऽपि सर्वः श्रुतमेव । अव एव " पदार्थवाक्पार्थ- महावाक्याथैदम्पर्याभेदेन चतुर्विधवाक्यार्थाने ऐदम्पर्थिनिश्पपर्यन्तं श्रुतोपयोगण्यापारात सर्वत्र युतत्वमेव" इत्पभियुक्त रुक्तमुपदेशपदावी ।ता "सच्चे पाणा सय्वेभ्या सवे जीवा सव्वे सचाणहंतव्वा" इत्यादौ यथाश्रुतमात्रप्रतीति पदार्थयोधः । एवं सति हिंसात्वावच्छेदेनानिष्टसाधनत्वमतीवराहारविहारदेवार्चनादिकमपि प्राणोपपातहेतुलेन हिंसाल्पत्यादकर्तन्यं स्यादिति वाक्यार्थबोधः । यतनया क्रियमाणा आहारविहारादिक्रिया न पापसाधनानि, चित्तशुदिफलत्वाव, अपवनयर क्रियमाणं तु सर्वे हिंसान्तर्भावात् पापसाधनमेवेति महावाक्याबोधी । 'आजैव धर्म सार' इत्यपवादस्थलेपि गीतार्थयतनाकृतयोगिकारणप- दैनिषिद्धस्याप्यदुष्टत्वं, विहितक्रियामात्रे च स्वरूपहिंसासम्भवेऽप्यनुबन्धहिंसापा अभागान दोपलेशस्याप्पयफाश इत्यैदम्पर्धि- बोधः। एतेषु सर्वेष्वेकदीर्थोपयोगव्यापाराभ श्रुतान्यज्ञानशा, ऐदम्पर्यनोपलक्षणफलव्याप्यत्तपेय श्रुतस्य लोकोतप्रामाण्यप्पय. स्थितेर्वाक्येऽपि क्रमिकतावद्धोधजनके यात्वव्युत्पत्तिप्रतिसन्धानवति व्युत्पत्तिमति पुरुषे न विरम्पव्यापारादिपणावाशः । - सोऽयमिपोरिख दीर्घदीर्वतरो व्यापारो, 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ' इति नयाश्रयणात् । एतेन 'न हिंस्यादित्यादीनपेघविधौ विशेषविधिबाधपर्यालोचनयाऽनुमितौ व्यापकतानवच्छेदकेनापि विशेषरूपेण व्यापकस्येव शाब्दबोधे तत्ताद्वहितेतरहिंसात्वेन वृत्त्यनवच्छेदकरूपेणापि निषेध्यस्य प्रवेश' इति निरस्तम् । उक्तवाधपर्यालोचनस्य प्रकृतोपयोगान्तर्भावेऽस्मदुक्तप्रकारस्यैव साम्राज्यात्, तदनन्तर्भावे च तस्य सामान्यवाक्यार्थबोधेन सह मिलनाभावेन विशेषपर्यवसायकत्वासम्भवात् । अव्यवहितद्वित्र- क्षणमध्ये एकविशेषबाधप्रतिसन्धानमेव सामान्यवाक्यार्थस्य तदितरविशेषपर्यवसायकमिति कल्पनायां न दोष इति चेत्, न, द्विवक्षणाननुगमात्, पटुसंस्कारस्य पञ्चपक्षणव्यवधानेऽपि फलोत्पत्तेश्व, संस्कारपाटवस्यैवानुगतस्यानुसरणौचित्यात्, तच्च गृहीतेऽर्थे मतिश्रुतसाधारणविचारणोपयोग एवोपयुज्यते, अत एव सामान्यनिषेधज्ञाने विरोधसम्बन्धेन विशेपविधिस्मृतावपि विचारणया तदितरविशेषपर्यवसानम् । अपि च 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यत्र यथा परेषां प्रथमं स्वर्गत्वसामानाधिकरण्येनैव यागकार्यताग्रहोऽनन्तरं चानुगतानतिप्रसक्तकार्यगतजातिविशेषकल्पनं, तथा प्रकृतेऽपि हिंसात्वसामानाधिकरण्येन पापजनकत्व- बोधेऽनन्तरं तद्गतहेतुतावच्छेदकानुगतानतिप्रसक्तरूपकल्पने किं वाधकं, सर्वशब्दबलेन हिंसासामान्योपस्थितावपि तद्गतहेतुस्व- रूपानुबन्धकृतविशेषस्य कल्पनीयत्वात् । सैव च कल्पना वाक्यार्थबोधात्मिकेति न तदुच्छेदः॥ किञ्च पदार्थबोधाद्धिसासामान्येऽनिष्टसाधनत्वग्रहे आहारविहारादिक्रियास्वनिष्टसाधनत्वव्याप्यहिंसात्वारोपेणानिष्टसाधनत्वा- रोपलक्षणतर्कात्मक एव वाक्यार्थवोधः, तस्य युक्त्या विपर्ययपर्यवसानात्मको महावाक्यार्थबोधा, ततो हेतुस्वरूपानुबन्ध- त्रयविषय एव हिंसापदार्थ इत्यैदम्पयार्थबोधः, इत्येते बोधा अनुभवसिद्धत्वादेव दुराः । श्रुतज्ञानमूलोहादेश्व श्रुतत्वं TERRESTER । मतिज्ञानमूलोहादेर्मतिज्ञानत्ववदेवान्युपेयम् । अत एव श्रुतज्ञानाभ्यन्तरीभूतमतिविशेषैरेव पदस्थानपतितत्वं चतुर्दशपूर्व विदा मप्याचक्षते सम्प्रदायवृद्धाः । तथा चोक्तं कल्पभाष्ये-" अरकरलभेण समा, ऊणहिया इंति मइविससहिं । ते वि य मईविसेसा, सुअनाणभंतरे जाण ॥१॥" (विशे. गा. १४३ ज्ञानार्ण०प०१८) यदि च सामान्पश्रुतज्ञानस्य विशेषपर्यवसायकत्व- मेव मतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानाम्यन्तरीभूतत्वमुपयोगविच्छेदेऽप्येकोपयोगव्यवहारश्च फलप्राधान्यादेवेति विमान्यते, तदा पदार्थ बोधयित्वा विरतं वाक्यं वाक्यार्थयोधादिरूपविचारसहकृतमाच्या विशेपं बोधयदैदम्पर्थिकत्वव्यपदेशं लमत इति मन्तव्यम् । परं शब्दसंसृष्टार्थग्रहणव्यायुतत्त्वे पदपदार्थसम्बन्धग्राहकोहादिवत्तस्य कथं न श्रुतत्वम् ?, "शब्दसंसृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलन्धिविशेषः (त्रिकाल सा )धारणसमानपरिणामः श्रुतम् ” इति नन्दीत्यादी दर्शनात् ॥ [ नन्दीवृत्तावर्य पूर्णपाठ:-तथा श्रागं श्रुत वाच्यवाचकभावपुरस्सरीकारेण शन्दसंस्पृष्टार्थग्रहणहेतुरुपलब्धिविशेषः, एवमाकारं वस्तु जलधारणाद्यर्थक्रियासमर्थ घट. शब्दवाच्यम् "" इत्यादिरूपतया प्रधानीकृतत्रिकालसाधारणसमानपरिणामः शब्दार्थपर्यालोचनानुसारीन्द्रियमनोनिमित्तोऽ वगमविशेष इत्यर्थः] "सोइदिओग्लद्धी, होइ सुझं सेसयं तु मइनाणं ॥ मोत्तणं दब्बसु, अस्करलंभो अ सेसेसु ॥११७॥ (ज्ञानार्ण०५०१२)इति पूर्वगतगाधायामप्पपमेव स्वरसो लभ्यते। तथा चास्या अर्थः-श्रीन्द्रियेणोपलब्धिरेव ध्रुतमित्यवधारणं, न तु श्रोत्रेन्द्रियेणोपलब्धिः श्रुतमेति । अत्रग्रहेहादिरूपायाः श्रोत्रेन्द्रियोपलधेरपि मतिज्ञानरूपत्वात् । यद्भाप्यकार:- "सोइंदिओवलद्धी,चव सुअंन उतई सुअंचेव। सोइदिओवलद्धी,वि कार्ड जम्हामइनाणं ॥१२२॥"(ज्ञाना०प० १३) शेष तु यच्चक्षुरा- दीन्द्रियोपलब्धिरूपं तन्मविज्ञानं, तुमन्दोऽनुक्तसमुच्चयार्थी, स चावग्रहेहादिरूपा श्रोत्रेन्द्रियोपलन्धिमपि समुचिनोति, यद्भाः HERE ष्यकार:-"तु समुच्चयवयणाओ, काई सोइंदिओवलद्धी वि। मई एवं सइ सोउ-गहादिओ होति मईभेया॥१२३॥"(ज्ञानाना०प० १३) अपवादमाह-मुक्त्वा द्रव्यश्रुतं पुस्तकपत्रादिन्यस्ताक्षररूपं,तदाहितायाः शब्दार्थपोलोचनात्मिकायाः शेपेन्द्रियोपलब्धेरपि श्रुतत्वात् । अक्षरलाभश्च यः शेपेष्वपीन्द्रियेपु शब्दार्थपर्यालोचनात्मकः, न तु केवलः, तस्येहेहादिरूपत्वात्, तमपि मुक्त्येति सोपस्कार व्याख्येयम् । नन्वेवं शेपेन्द्रियेष्वप्यक्षरलाभस्य श्रुतत्वोक्तेः श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिरेव श्रुतमिति प्रतिज्ञा विशीर्यंत, मैवम्, तस्यापि श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिकल्पत्वादिति बह्वः। श्रोत्रेन्द्रियोपलब्धिपदेन श्रोत्रेन्द्रियजन्यव्यञ्जनाक्षरज्ञानाहिता शाब्दी बुद्धिः, द्रव्यश्रुत- पदेन च चक्षुरादीन्द्रियजन्यसंज्ञाक्षरज्ञानाहिता सा, अक्षरलाभपदेन च तदतिरिक्तश्रुतज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमजनिता बुद्धिर्गृह्यत इति सर्वसाधारणो धारणाप्रायज्ञानवृत्तिः शब्दसंसृष्टार्थाकारविशेप एवानुगतलक्षणम् । त्रिविधाक्षरश्रुताभिधानप्रस्तावेऽपि संज्ञाव्यजनयोर्द्रव्यश्रुतत्वेन, लब्धिपदस्य चोपयोगार्थत्वेन व्याख्यानात् । तत्र चानुगतमुक्तमेव लक्षणमिति । इह गोवृपन्यायेन त्रिविधोपलब्धिरूपभावश्रुतग्रहणमिति त्वस्माकमाभाति। अवग्रहादिक्रमवदुपयोगत्वेनापि च मतिज्ञान एव जनकता,न शुतज्ञाने तत्र शाब्दोपयोगत्वेनैव हेतुत्वात्, मतिज्ञाने च-"नानवगृहीतमीह्यते, नानीहितमपेयते, नानपेतं च धार्यते,"इति क्रमनिवन्धनमन्त्र- यव्यतिरेकनियममामनन्ति मनीषिणः। तत्रावग्रहस्येहायां धर्मिज्ञानत्वेन, तदवान्तरधर्माकारेहायां तत्सामान्यज्ञानत्वेन वा। ईहा- याच तद्धर्मप्रकारतानिरूपिततद्धर्मिनिष्ठसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्ने तद्धर्मप्रकारतानिरूपिततद्वमिनिष्ठसाध्यत्वाख्यविप- यतावदीहात्वेन,घटाकारावच्छिन्नसिद्धत्वाख्यविषयतावदपायत्वावच्छिन्ने तादृशसाध्यत्वाख्यविषयतावदीहात्वेन वा,धारणायां चा- पायस्य समानप्रकारकानुभवत्वेन विशिष्टभेदे समानविषयकानुभवत्वेन वा कार्यकारणभाव। तत्रावग्रहो द्विविधो व्यञ्जनावग्रहार्थावग्र.
हमेदान्। तत्र व्यअनेन शन्दादिपरिणतद्रव्यनिकरम्बेण व्यअनस्य श्रोत्रेन्द्रियादेरवग्रहः सम्बन्धो व्यअनावग्रहासघ मल्लकाविवोध- कष्टान्ताभ्यां सूग्रोक्ताभ्यामसङ्ख्ययसमयमावी । तस्यामप्यवस्थायामव्यक्ता ज्ञानमात्रा, प्रथमसमयेऽशेनामवतश्चरमसमये भवनान्यथानुपपल्या भाष्यकृता प्रतिपादिता । युक्तं चैतत्, निधयतोऽविकलकारणस्यैव कार्योत्पत्तिव्याप्यत्वाद्, अविकलं च कारणं ज्ञाने उपयोगेन्द्रियमेव, दप ध्यञ्जनावग्रहकाले सम्घसत्ताक कथं न स्वकार्य ज्ञानं जनयेदिति, अयमुपयोगस्य कारणांशः । न व्यअनावग्रहा प्राप्यकारिणामेवेन्द्रियाणामुक्तो नाप्राप्यकारिणोश्चक्षुर्मनसोरिति तत्र का कारणांशे वाच्यः १, यद्यर्थावग्रहस्तहि सर्वत्र स एवारित्वति चेत्, न, तत्राप्यर्थावग्रहात्प्राग् लब्धीन्द्रियस्य ग्रहणोन्मुखपरिणाम एवोपयोगस्य कारणांश इत्यभ्युपगमात् । न च सर्वश्रेकस्यैवाश्रयणमिति युक्तम्, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्यव्यवस्थाप्रयुक्तस्य इस्वदीर्घ- पारणांशभेदस्योगमयुक्त्युपपनत्वेन प्रतिबन्दिपर्यनुयोगानवकाशात् । अर्थावग्रहः सामान्यमात्र ग्रहः, यतः किश्चिदृष्टं मयान तु परिमावितमिति व्यवहार, स चैकसामयिका, तत होपयोग आन्ताहाका प्रवर्तते, स च सद्भूताऽसद्भूतविशेषोपादानत्या- गाभिमुखबहुविचारणात्मका पर्यन्ते तत्तत्प्रकारेण धर्मिणि साध्यत्वारुपविषयताफलवान् भवति । अत एव "फलप्रवृत्ती ज्ञानप्रामा- ण्यसंशयवत्वरणप्रवृत्तावपीन्द्रियादिगतगुणदोषसंशयेन विषयसंशयादिन्द्रियसाद्गुष्यविचारणमपीहयैव जन्यते, केवलमभ्यास- दशाया तन्झटितिजायमानत्वात् कालसौष्येण नोपरक्ष्यते, अनभ्यासदशाया त परीत्येन स्फुटमुपलक्ष्यत" इति मलयगिरि प्रभृतयो ववन्ति । एवं सति स्वजन्यापाये सर्वत्रार्थयाथारम्यनिषयस्येहयैव जन्यमानत्वात् "तदुभयमुत्पत्तो परत एव, शसौ तु स्वतः परतश्च" इत्याकर (प.१.२०) सूत्रंविरुध्येत तदुभयं प्रामाण्यमप्रामाण्यं च,परतएपेति कारणगतगुणदोपापेक्षयेत्या स्वतः CAREE परतश्चेति, संवादकबाधकज्ञानानपेक्षयाजायमानत्वं स्वतस्त्वं, तच्चाभ्यासदशायां, केवलक्षयोपशमस्यैव तत्र घ्यापारात् , तदपेक्षया जायमानत्वं च परतस्त्वं, तच्चानभ्यासदशायां, अयं च विभागो विषयापेक्षया, स्वरूपे तु सर्वत्र स्वत एव प्रामाण्यनिश्चय इत्यक्षरार्थ इति । " ईहयैव हि सर्वत्र प्रामाण्यनिश्चयाभ्युपगमे किं संवादकप्रत्ययापेक्षया ?, न खल्वेकं गमकमपेक्षितमिति गमकान्तरमप्यपेक्षणीयम् । न चेहाया बहुविधत्वायत्र न करणसाद्गुण्यासाद्गुण्यविचारस्तत्रैवोक्तस्वतस्त्वपरतस्त्वव्यवस्थेति वाच्यम् , ईहायां क्वचिदुक्तविचारव्यभिचारोपगमे आभ्यासिकापायपूर्वेहायामनुपलक्ष्यमाणस्यापि तद्विचारस्य नियमकल्पनानु- पपत्तेः । न चोक्तविचार ईहायां प्रमाजनकताक्च्छेदको न तु तज्ज्ञप्तिजनकतावच्छेदक इत्यपि युक्तम् , करणगुणादेव प्रमोत्पत्ती तस्यातथात्वात् । न च भाविज्ञानस्यासिद्धत्वादुक्तविचारवत्यापीहया तद्गतप्रामाण्याग्रह इत्यपि साम्प्रतम्, विचारेण करण- साद्गुण्यग्रहे भाविज्ञानप्रामाण्यग्रहस्यापि सम्भृतसामग्रीकत्वादित्यादिविचारणीयम्। ननु भवतां सैद्धान्तिकमते उपयोगेड- वग्रहादिवृत्तिचतुष्टयव्याप्यत्वं, एकत्र वस्तुनि प्राधान्येन सामान्यविशेषोभयावगाहित्वपर्याप्त्याधारत्वं वा, तार्किकमते च प्रमेयाव्यभिचारित्वं प्रामाण्यायोग्यत्वादभ्यासेनापि दुर्घहं, समर्थप्रवृत्त्यनौपयिकत्वेनानुपादेयं च । पौद्गलिकसम्यक्त्ववता सम्यक्त्वदलिकान्वितोऽपायांशः प्रमाणं, क्षायिकसम्यक्त्ववतां च केवलोऽपायांश इति तत्त्वार्थवृत्त्यादिवचनतात्पर्यपर्यालोचनायां तु सम्यक्त्वसमानाधिकरणापायत्वं ज्ञानस्य प्रामाण्यं पर्यवस्यति,अन्यथाऽननुगमात्,तत्र च विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहः। ज्ञानं प्रमाणमितिवचनं विनिगमकमिति चेत्, तदपि समर्थप्रवृत्त्यौपयिकेन रूपेण विनिगमयेत् न तु विशिष्टापायत्वेनानीदृशेन, 'सम्यक्त्वानुगतत्वेन ज्ञानस्य ज्ञानत्वं, अन्यथा त्वज्ञानत्वं' इति व्यवस्था तु नापायमात्रप्रामाण्यसाक्षिणी, सम्यग्दृष्टिंसम्बन्धिनां ARRECG संशयादीनामपि ज्ञानत्वप महाभाष्यकृता परिमापितत्वात् । न च सम्यक्त्वसाहित्येन ज्ञानस्य रुचिरूपत्वं सम्पयते, रुचिरूपं च ज्ञानं प्रमाणमिति सम्यक्त्वविशेषण्मेपादानं फलवदित्यपि साम्प्रतम्, एतस्य व्यवहारोपयोगित्वेऽपि प्रवृत्यनुपयोगत्वात् । न च घटायपायरूपा रुचिरपि सम्यक्त्वमिति व्यवहरन्ति सैद्धान्तिका, जीवाजीरादिपदार्थनषाविषयकममूहालम्बनज्ञान- विशेषस्यैव रुचिरूपतयाम्नातत्वात् , कालं ' सत्संख्यादिमागणास्थानस्तनिर्गयो भावसम्यक्त्वं, ' 'सामान्यतस्तु द्रव्यसम्यक्त्व म्'इति विशेष इति । न च पटापपायेऽपि रुचिरूपत्वमिष्टमेव, सदसद्विशेपणाविशेषणादिना सर्वत्र ज्ञानाज्ञानव्यवस्थाकथना , तदेव च प्रामाण्यमप्रत्यूहमिति वाच्यं, अनेकान्तव्यापकत्वादिप्रतिसन्धानाहितवासनावतामेव तादृशयोधसम्मवात् तदन्येषां तु द्रव्यसम्य- क्वेनैव मानसद्भायव्यवस्थिते । अत एव "चरणकरणप्रधानानामपि स्खसमयपरसमपमुक्तव्यापाराणां द्रव्यसम्यक्त्वेन चारित- व्यवस्थितावपि मावसम्यक्त्वाभाव प्रतिपादितः सम्मतौ महावादिना । द्रव्यसम्यक्त्वं च, "तदेव सत्यं निःशंक यजिनेन्द्रः प्रवेदितमिति"ज्ञानाहितवासनारूपं,मापतुपाचनुरोधाद् 'गुरुपारतंत्र्यरूपं वा इत्यन्यदेतत् । तस्मान्नैते प्रामाण्यप्रकाराः प्रत्यौप- यौगिकाः । तद्वति वत्प्रकारकत्वरूपं ज्ञानप्रामाण्यं तु प्रवृत्योपपिकमवशिष्यते, तस्य च स्वतो ग्राह्यत्यमेवोचितम् । न्यापनयेऽपि शाने पुरोवर्तिविशेष्यताकत्वस्य रजतत्त्वादिप्रकारकत्यस्य चानुव्यवसापग्राह्यतापामविवादाद, इमं रजतत्वेन जानामीति प्रत्य- याद, तत्र विशेष्यत्वप्रकारत्वयोरेव द्वितीयानीपार्थत्वात् , तत्र पुरोरति इदन्त्वेन रजतत्यादिनापि चोपनपयशादासताम् । न घेदन्त्वपैशिष्टयं पुरोवर्तिनि न मासत इति वाच्यम् , विशेष्यतायो पुरोवर्तिनः स्वरूपतो मानानुपपत्त। तादृशाविशेषणशानाभावात् , अन्यथा प्रमेयत्वादिना रजतादिज्ञानेऽपि तथाज्ञानापतेः, जात्यतिरिक्तस्य किनिर्मप्रकारेणैव माननियमाच । किश्व ग्रामाण्य • FROCESS । संशयोत्तरमिदं रजतं न वेत्येव संशयो, न तु रजतमिदं न वा, द्रव्यं रजतं न वेत्यादिरूप इति, यद्विशेष्यकयत्प्रकारकज्ञानत्वावच्छेदेन प्रामाण्यसंशयस्तद्धर्मविशिष्टे तत्प्रकारकसंशय इति नियमादिदन्त्वेन धर्मिभानमावश्यकं,इदन्त्वरजतत्वादिना पुरोवर्तिन उपनयसत्त्वाच तथाभानमनुव्यवसाये दुर्वारमिति किमपरमवशिष्यते प्रामाण्ये ज्ञातुम् । न चैकसम्बन्धेन तद्वति सम्बन्धान्तरेण तत्प्रकारकज्ञान- व्यावृत्तं, तेन सम्वन्धेन तत्प्रकारकत्वमेव प्रामाण्यं, तच दुग्रहमिति वाच्यं, व्यवसाये येन सम्बन्धन रजतत्वादिकं प्रकारस्तेन तद्वतोऽनुव्यवसाये भानात्, संसर्गस्य तु तत्वेनैव । तत्प्रकारकत्वं च वस्तुगत्या तत्सम्बन्धावच्छिन्नप्रकारताकत्वमिति भानात् प्रकारताकत्वकुक्षिप्रवेशेनैव वा तद्भानम् । अत एवेदं रजतमिति तादात्म्यारोपव्यावृत्तये मुख्य विशेष्यता प्रामाण्ये निवेशनीयेति मुख्यत्वस्य दुर्ग्रहत्वमित्युक्तेरप्यनवकाशो, वस्तुगत्या मुख्यविशेष्यताया एव निवेशात् , तादात्म्यारोपे आरोप्यांशे समवायेन प्रामा- ण्यसत्त्वेऽप्यक्षतेश्च । एतेन तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकत्वमात्रं न प्रामाण्यं, 'इमे रङ्गरजते 'नेमे रङ्गरजते' इति विपरीतचतुष्क- भ्रमसाधारण्यात् , किं तु तद्वद्विशेष्यकत्वावच्छिन्नतत्प्रकारकत्वं, तच्च प्रथमानुव्यवसाये दुहम्' इत्यपि निरस्तम् ।। वस्तुगत्या तादृशप्रकारताकत्वस्य सुग्रहत्वादेव तद्हेऽनुव्यवसायसामग्रथाऽसामर्थ्यस्य व्यवसायप्रतिबन्धकत्वस्य वा कल्प- नमभिनिवेशेन स्वबुद्धिविडम्बनामात्रं,तथाकल्पनायामप्रामाणिकगौरवात् । एतेन 'विधेयतयाऽनुव्यवसाये स्वातन्त्र्येण प्रामाण्यभाने व्यवसायप्रतिवन्धकत्वकल्पनापि' परास्ता। तत्र तद्वद्विशेष्यकतोपस्थितितदभाववद्विशेष्यकत्वाभावोपस्थित्यादीनामुत्तेजकत्वा- दिकल्पने महागौरवात् । यदि च विशेष्यत्वादिकमनुपस्थितं न प्रकारः, तदा विशेष्यतासम्बन्धेन रजतादिमचे सति प्रकारि- तथा रजतत्वादिमत्त्वमेव प्रामाण्यमस्तु । एतज्ज्ञानमेव लाघवात्प्रवृत्यौपयिकं । तस्माज्ज्ञप्तौ प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमेव युक्तम् ।
अप्रामाण्यं तु नानुव्यवसायग्रासं, रजतत्वाभाववत्वेन पुरोवर्तिनोऽग्रहणे तथोपनीतभानायोगात्, रजतत्वादिमत्तया भुक्त्यादिधी. विशेष्यकत्वं रजतत्वप्रकारकत्वं च तत्र गृसते, अत एप, ' अप्रमापि प्रमत्येव गृह्यते' इति चिन्तामणिग्रन्या 'प्रमेतीत्येव व्याख्यातस्तांत्रिक इत्यप्रामाण्यस्य परतस्त्वमेव । न प प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वे झानप्रामाण्यसंशयानुपपपित, शानप्रहे प्रामाण्यग्रहाचदग्रहे धर्मिग्रहाभावादिति वाच्यं, दोपात् तरसंशयादीन्द्रिय समिकर्षस्यैव संशयहेतृत्वात् । प्राक् प्रामाण्यामावो. पस्थितौ धर्मिशानात्मक एवं वास्तु प्रामाण्यसंशय इति स्वतस्त्वपरतस्त्वानेकान्तः प्रामाण्याप्रामाण्ययोजनानां न युक्त इति चेत्, अन्न मा। रजतस्ववद्विशेष्यफरवावरिटमरजतस्वकारताकरवरूपस्य रजवमानप्रामाण्यस्य वस्तुतोऽनुव्यवसापेन ग्रहणाद, स्वतस्त्वाम्युपगमेऽप्रामाण्यस्यापि स्वतस्त्वापाता, रजतश्रमानुष्यवसायेनापि वस्तुतो रजतत्वाभाववद्विशेष्पकत्वावच्छिमाजतत्व. प्रकारताकत्वस्यैव प्रहात, तत्र चास्माभिरनेकान्तवादिभिरिष्टापति पतं शक्यते, द्रष्यार्थतः प्रत्यक्षस्य योग्यव्यप्रत्यक्षीकर- पावेलायां तद्गताना योग्यायोग्यानां धर्माणां सर्वेषामभ्युपगमात्, 'स्वपरपर्यायापेक्षयाऽनन्तधर्मारमकं तत्वम् ' इति वासनायव एकावे सर्वज्ञत्वधौय्याम्युपगमाघ, (आधाराङ्ग) “जे एग जाणा से सम्बं जाणइ, जे सव्वं जाणइ से एगं जाणइ चि" पारम- पस्पत्यमेव स्वारस्यव्याख्यानात् । अवोधाम बाध्यात्मसारप्रकरणे-(प्रवन्ध २) "आसपिपाटवाभ्यास-स्वकार्यादिमिरा- भयन् ।। पर्यायमेकमप्यर्थ, पेचि भावात् मुधोऽसिलम् वै. भेदप्र. ३०॥" इति। न घेयं रीतिरेकान्तवादिनो भवत इवि प्रतीच्छ अतिरन्दिदण्डप्रहारम् । ननु रजतत्ववदिशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारत्वयोरेव झानोपरि मानं, अच्छिमत्वं तु तयोरेव मिभा संसर्गः, एका भासमानयोर्दयोधमयोः परस्परमपि सामानाधिकरण्येनैवावच्छिमत्वेनाप्यन्वयसम्भवादित्येवं प्रामाण्यस्य स्वतस्त्वं, अप्रामाण्यस्य तु न तथात्वं, रजतत्वाभावस्य व्यवसापेऽस्फुरणेन तद्वद्विशेष्यकत्वस्य ग्रहीतुमशक्यत्वात्, ज्ञानग्राहकसामग्र्या- स्तूपंस्थितविशेष्यत्वादिग्राहकत्व एव व्यापारादित्येवमदोष इति चेत्, न, प्रामाण्यशरीरघटकस्यावच्छिन्नत्वस्य संसर्गतया भानोपगमे कात्स्न्येन प्रामाण्यस्य प्रकारत्वासिद्धी, अंशतः प्रकारतया भानं च स्वाश्रयविशेष्यकत्वावच्छिन्नप्रकारतासम्बन्धेन रजतत्वस्य ज्ञानोपरि भानेऽपि सम्भवतीति तावदेव प्रामाण्यं स्याद् ॥ अस्त्वेवं ज्ञानग्राहकसामग्र्यास्तथाप्रामाण्यग्रह एव सामर्थ्यात्, अत एव नाप्रामाण्यस्य स्वतस्त्वमिति चेत्, न, एवमभ्युपगमे अप्रमापि प्रमेतीत्येव गृह्यते इत्यस्य व्याघातात्तत्र रजतत्वस्य ज्ञानो- पर्युक्तसम्बन्धासम्भवात्, कम्युग्रीवादिमानास्ति वाच्यं नास्तीत्यादावन्वयितावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताया इव प्रकृते उक्त- सम्बन्धस्य तत्तदवगाहितानिरूपितावगाहितारूपा विलक्षणैव खण्डशः सांसर्गिकविषयतेति न दोपइति चेत्, न, तत्रापि लक्षणादि- नैव बोधः, उक्तप्रतियोगितायास्तु घटो नास्तीत्यादावेव स्वरूपतः संसर्गत्वं, उक्तं च मित्रैः-" अर्थापत्तौ नेह देवदत्त इत्यत्र प्रतियोगित्वं स्वरूपत एव भासत इत्येवं समर्थनात् " वस्तुतोऽस्माकं सर्वापि विषयता द्रव्यार्थतोऽखण्डा, पर्यायार्थतश्च सखण्डेति सम्पूर्णप्रामाण्यविषयताशालिवोधो न संवादकप्रत्ययं विना, न वा ताडशाप्रामाण्यविषयताकनोधो बाधकप्रत्ययं विना,इत्युभयोरनभ्यासदशायां परतस्त्वमेव, अभ्यासदशायां तु क्षयोपशमविशेषसधीचीनया तादृशतादृशेहया तथा तथोभयग्रहणे स्वतस्त्वमेव, अत एव प्रामाण्यान्तरस्यापि न हत्वं, स्वोपयोगाप्पथग्भूतहापुनीतप्रकारस्यैवापायेन ग्रहणाव, तादृशी च प्रामा- ण्यविषयता नावग्रहमात्रप्रयोज्यत्वेन लौकिकी, नापि पृथगुपयोगप्रयोज्यत्वेनालौकिकी, किन्तु विलक्षणैवेति न किञ्चिदनुपपन्नम- नन्तधर्मात्मकवस्त्वभ्युपगमे।अत एव 'वस्तुसदृशो ज्ञाने ज्ञेयाकारपरिणाम' इति विलक्षणप्रामाण्याकारवादेऽपि न क्षतिः । एवञ्च अमेरजतनिमित्तो रजताकारा, संवृतशुक्त्याकारायाः समुपाचरजताकाराया। शुक्तरेव तत्रालम्पनत्वात, प्रमायां तु रजतनिमित्त इत्याकारवथात्वस्य, परतास्वतोग्रहाम्या 'प्रामाण्याप्रामाण्ययोस्तदनेकान्त इति प्राचां वाचामपि पिमीः कान्त एवेति द्रष्टव्यम् । न्यायाभियुक्ता अपि "यथाऽमावलौकिकप्रत्ययस्तद्धर्मस्य प्रतियोगितावच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य प्रतियोगित्व. मवगाहते, तथा ज्ञानलौकिकसाक्षात्कारोऽपि तद्धर्मस्य विशेष्यतायवच्छेदकत्वमवगाहमान एव तद्धर्मविशिष्टस्य विशेष्यतादि- कमवगाहत इति इदन्त्वविशिष्टस्यैव विशेष्यत्वमवगाहेत, इदन्त्वस्य विशेष्यतावच्छेदकत्वात्, न तु रजतत्वादिविशिष्टस्य, रजवत्यादैरतथात्वाद, इत्थं नियमस्तु लौकिके। तेनोपनयवशादलौकिस्तादृशसाक्षात्कारेऽपि न क्षति" इति वदन्तो विनोपनपं प्राथमिकानुव्यवसायस्य प्रामाण्याग्राहकत्वमेवाहुः । यदेव च तेषामुपनयस्याकत्यं तदेवास्माकमीहाया साध्यामिति कृतं प्रसङ्गेन। प्रकृतमनुसरामः । एतावयग्रहेहाख्यौ च्यापारांशी, ईहानन्तरमपाया प्रवर्तते 'अयं घट एपेति,' अत्र चासत्यादिननित- क्षयोपशमयशेन यावानीहितो धर्मस्तावान् प्रकारीमाति, तेनैकत्रैव 'देवदत्तोऽपमायणोय' 'पाचकोऽय' इत्यादिप्रत्ययभेदोपप. त्तिा इत्यं च रूपाविशेषान्मणिः पराग इत्युपदेशोचरमपि तदाहितवासनावतो रूपविशेषाद् 'अनेन पररागेण भवितव्यम्' इतीहो- चरमेव 'अयं पद्मराग' इत्यपायो युज्यते, उक्तोपदेशः पमरागपदवाच्यत्वोपमितावेवोपयुज्यते । अयं पराग इति तु सामान्यावग्रहे- हाक्रमेणैवेति नैयायिकानुयायिनः । घट इत्यपायोत्तरमपि यदा किमयं घटा सौवर्णो मात्चों चेत्यादिविशेषजिज्ञासा प्रवर्तते, तदा पाश्चात्यापायस्याचरविशेषायगमापेक्षया सामान्यालम्बनत्वाद्वयावहारिकाचमहत्व, ततः सौवर्ण एवायमित्यादिरपाया, तत्राप्युत्तरोघरविशेषजिज्ञासायां पाचारपस्य पाश्चात्यस्य व्यावहारिकापमहत्वं द्रष्टव्यम् । जिज्ञासानिनौ त्वन्त्यविशेषज्ञानमवाप एवोच्यते नाऽवग्रहः, उपचारकारणामापात् । अयं फलांशः ॥ कालमानं त्वस्यान्तमुहूर्तमेव, सौदामिनीसम्पातजनितप्रत्यक्षस्य चिरमननुवृत्तेयभिचार इति चेत्, न, अन्तर्मुहूर्तस्यासङ्ख्यभेदत्वात् । अन्त्यविशेषावगमरूपापायोत्तरमाविच्युतिरूपा धारणा प्रवर्तते, साप्यान्तर्मोहूर्तिकी । अयं परिपाकांशः ॥ वासनास्मृती तु सर्वत्र विशेषावगमे द्रष्टव्ये । तदाह जिनभद्रगाणिक्षमा- श्रमणः, सामनमित्तगहणं, णेच्छइओ समयमोग्गहो पढंमो॥ ततोगतरमीहिय-वत्थुविसेसस्स जोवाओ।।२८२॥सो पुणहिावाया- चरकाए ओग्गहोत्ति उवयरिओ ॥ एस विसेसावरकं, सामनं गिण्हए जेणं ॥२८३॥ तचोणतरमीहा, तो अवाओ अतव्विसे- सस्स ॥ इह सामन्नविसेसा-वेरका जावंतिमो भेओ ॥ २८४॥ सन्चत्येहावाया, णिच्छयओ मोत्तुमाइसामन्नं ॥ संववहारत्थं पुण, सव्वत्थावग्गहोवाओ ॥ २८५॥ तरवमजोगाभावे-वाओ-चिय धारणा तदंतमि ॥ सव्वत्थ वासणा पुण, भणिया कालन्तरे सई 'य ॥२८६॥ (ज्ञानार्णवप.५८-५९)त्ति॥ न चाविच्युतेरपायावस्थानात्पार्थक्ये मानाभावः, विशेषजिज्ञासानिवृत्त्यवाच्छिमस्वरू- पस्य कथाञ्चिद्भिन्नत्वाद्, अवगृह्णामि, ईहे, अवैमि, स्थिरीकरोमीतिप्रत्यया एव च प्रतिप्राण्यनुभवसिद्धा अवग्रहादिभेदे प्रमाणं, स्मृतिजनकतावच्छेदकत्वेनैव वाऽविच्युतित्वं धर्मविशेषः कल्प्यते, तत्तदुपेक्षान्यत्वस्य "स्मृतिजनकतावच्छेदककोटिप्रवेश गौरवादिति धर्मविशेषसिद्धौ धर्मिविशेषसिद्धिरित्यधिक मत्कृतज्ञानार्णवादवसेयम् ॥ तदेवं निरूपितं मतिज्ञानं ॥ तन्निरूपणेन च श्रुतज्ञानमपि निरूपितमेवाद्वयोरन्योऽन्यानुगतत्वात्तथैवं व्यवस्थापितत्वाच। अन्ये वङ्गोपाङ्गादिपरिज्ञान- मेष श्रुतज्ञानमन्यच मंतिज्ञानमित्यनयोरपि भजनैव, यदुवाच वाचकचक्रवर्ती "एकादीन्येकस्मिन्माज्यानि त्वाचतुर्य इति" विचार्थ अ०१-३१)। शन्दसंसृष्टार्थमात्रग्राहितेन श्रुतले लवग्रहमात्रमेव मतिबानं प्रसज्येत,धारंगोचरं स्वसमानाकारश्रुतावश्य म्भावकल्पनं तु स्ववासनामात्रविजृम्भित, शन्दसमृष्टायां मेरेवं श्रृंतवपरिमापणं तु न पृषगुंपयोगन्यापार्मिति शादमानमेर भुवमानं नवपरोधमिन्द्रियजन्यमपीत्याहु नव्यास्तु "भुतोपयोगो मत्युपयोगान पृपक, मत्युपयोगेनैव तत्कायोपचौ तत्वार्य स्यकल्पनाया न्यर्थत्वात् । अत एव शब्दजन्यसामान्यज्ञानोदरं विशेषविज्ञासापां वन्मूलम्मत्यापांसमवृत्तौ न एगरप्रकल्पना गौरख, सान्दसामान्यमानस्यैव तत्रापमहत्वात् । न चाशन्दे मादाय उत्सामप्या वा प्रतिबन्धकत्वधौम्यामेयं कल्पना पुक्तति वाच्यम्, अशान्दत्वस्य प्रतिवध्यतावच्छेदकले प्रतियोगिकोटौ सन्दमूलमतिनानस्यापि प्रवेशा अन्यया युवाम्यन्तरीभूतमविज्ञा- नोच्छेदप्रसगाद । किन शान्दमानरूपभूतस्यावहादिक्रमवतो मविज्ञानाद्भिमत्वोपगमेनुमानस्मृवित प्रत्यभिधानादीनामपि क्यात्वं स्यादित्यतिप्रसा, सान्यवहारिकपत्यधत्वानावस्यापि तेषु तुल्यत्वात् । यदि पावप्रहादिभेदाः सान्यगारिकप्रत्यक्ष रूपस्यैव मविज्ञानस्य सूत्रे प्रोक्ता अनुमानादिकं तु परोक्षमविधानमर्षतः सिमितीप्पते, तहिं अवशन्दव्यपदेयं शादशानमपि परोक्षमतिज्ञानमेवाइनीक्रियतां,किमर्धजरतीयन्यापानपणेन । मत्वा जानामि श्रुत्वा जानामीत्पनुभव एवानयो/दोपपादक इति चेत् न, अनुभाष जानामि स्मृत्वा जानामीत्यनुभवेनानुमानस्मृत्यादीनामपि मेदाप । अनुमिवित्वादिकं मतित्वव्याप्यमेति यदीप्यते,शान्दतमपि किन तयामत्वा न जानामीति प्रीतिस्तत्र साधिकेति चेत्, न,वैशेषिकाणां नानुमिनोभीति प्रतीरिव शान्देतस्या विशेषविषयत्वात् ।नच निसर्गाधिगमसम्यक्त्वरूपकार्यभेदान्मतिश्रुतज्ञानरूपकारणभेद इत्यपि साम्प्रतम् ता निसर्ग- पदेन स्वभावस्यैव ग्रहणात् । यद्वाचका-(प्रशमरति)"शिवागमोपदेश-श्रवणान्येकाधिकान्यधिगमस्य। एकार्थः परिणामो,मति निसर्गः समाव।।२२३ ।। इति" यत्रापि मतेः श्रुतभिमत्वेन ग्रहणं तत्र गौरलीवर्दन्याय एवापणीयः। तदिदमभिप्रेत्याद महा.
१ वादी सिद्धसेन (निश्चयद्वात्रिंशिका)"वैयोतिप्रसङ्गाभ्यां ,न मत्यभ्यधिकं श्रुतम्।।१२॥इति।" इत्याहुः।।इतिश्रुतज्ञानम्।। "अवधिज्ञानत्वं रूपिसमव्याप्यविषयताशालिज्ञानवृत्तिज्ञानत्वव्याप्यजातिमत्त्वम्॥" रूपिसमव्याप्यविषयताशालिज्ञान पर- मावधिज्ञानं "रूवगयं लहइ सव्वं" (गा.६८५) इतिवचनाद ,तद्वृत्तिर्ज्ञानत्वव्याप्याजातिरवधित्वमवधिज्ञानमात्र इति लक्षणसम- न्वयः समव्याप्यत्वमपहाय व्यापकत्वमात्रदाने जगद्व्यापकविषयताकस्य केवलस्य रूपिव्यापकविषयताकत्लनियमात् तवृत्तिकेव- लत्वमादाय केवलज्ञानेऽतिव्याप्तिः, समन्याप्यत्वदाने त्वरूपिणि व्यभिचारात्केवलज्ञानविषयताया रूप्यव्याप्यत्वाचनियुचिः।न च परमावधिज्ञानेऽप्यलोके लोकप्रमाणासङ्ख्यारूप्याकाशखण्डविषयतोपदर्शनादसम्भवः । यदि तावत्सु खण्डेषु रूपिद्रव्यं स्यात्तदा पश्येदिति प्रसङ्गापादन एव तदुपदर्शनतात्पर्यात् । न च तदंशे विषयमाधेन सूत्राप्रामाण्यं, स्वरूपराधेऽपि शक्तिविशेषज्ञापनेन फलाबाधात् । एतेनासद्भावस्थापना व्याख्याता बहिर्विषयताप्रसञ्जिका तारतम्येन शक्तिवृद्धिश्च लोकमध्य एव सूक्ष्म- क्ष्मतरस्कन्धावगाहनफलंवतीति न प्रसङ्गापादनवैयर्थ्यम् । यद्भाष्यं-"वटुंतो पुण बाहि, लोगत्थं चेव पासई दब्बं ॥ सुहुमयर सुहुमयरं, परमोही जाव परमाणुं ॥ ६०६ ॥” इति । अलोके लोकप्रमाणासयेयखण्डविषयतावधेरिति वचने विषयतापदं तर्कितरुप्यधिकरणताप्रसञ्जितावदधिकरणकरूपिविषयतापरमिति न स्वरूपवाघोऽपीति तत्त्वम् । जातौ ज्ञानत्वव्याप्यत्व- विशेषणं ज्ञानत्वमादाय मत्यादावतिव्याप्तिवारणार्थम् । न च संयमप्रत्ययावधिज्ञानमन:पर्यायज्ञानसाधारणंजातिविशेषमा- दाय मनःपर्यायज्ञानेऽतिव्याप्तिः,अवधित्वेन साङ्कर्येण तादृशजात्यसिद्धेः। न च 'पुद्गला रूपिण' इति शाब्दबोधे रूपिसमव्याप्य- विषयताकेऽतिव्याप्तिः, विषयतापदेन स्पष्टविशेषाकारग्रहणादिति सझेपः ॥ इत्यवधिज्ञानप्ररूपणम् ॥
"मनोमात्रसाक्षात्कारि मनापायज्ञानम्। नच ताशावधिशानेऽतिव्याप्ति,मनासाक्षात्कारिणोऽवधेस्कन्धान्तर- स्यापि साक्षात्कारित्वेन वारशारधियानासिद्धः। न च मनस्त्वपरिणवस्कन्धालोचितं पासमप्यर्थ मनापर्यायज्ञानं साक्षात्करोतीति तस्य मनोमाप्रमावारमारित्वमसिमिति वाच्यम्, मनोद्रव्पमात्रालम्पनतयैव तस्य धर्भिग्राहकमानसिद्धत्वात् , पाशार्थानां तु मनोद्रप्पाणामेव तपारूपपरिणामान्यथानुपपत्तिप्रमतानुमानत एव ग्रहणाभ्युपगमा! आ६ घ भाष्यकार:-" जाणइ पन्ने शुमाणेणे ति"(गा.८१४)पामार्थानुमाननिमित्तकमेव हि तत्र मानसमचक्षुर्दर्शनमङ्गीक्रियते यत्पुरस्कारेण स्प्रे मनोद्रव्याणि जानाति पश्यति चैतदिति व्यवड़ियते । एयरूपेऽपि माने द्रव्यापपेपक्षयोपशमवैचित्र्येण सामान्यरूपमनोद्रव्याकारपरिच्छेदापेक्षया पपतीति, विशिष्टतरमनोद्रव्याकारपरिच्छेदापेक्षया घ जानातीत्येवं या व्याचक्षते । आपेक्षिकसामान्यज्ञानस्यापि व्यावहारि- कारप्रत्यापेन पावहारिकदर्शनरूपत्वान् । नियपतस्तु सर्वमपि तज्ज्ञानमेय, मनःपर्यायदर्शनानुपदेशादिति द्रष्टव्यम् । नव्यास्तु पायाकारानुमापकमनोद्रव्याकारग्राहकं धानमाधिविशेष एर, अप्रमतसंपमविशेषजन्यतावच्छेदफजातेपधित्वव्याप्याया एव फरपनामि(कल्पनात)इति न्यायाना इत्यहिजानाति पश्पतीत्यत्र शेरपधिदर्शनविषयत्वेनैवोपपत्तौ लक्षणाकरपनगौरवमपि परि- इतं माति । एषे भेदाभिधानं च धर्मभेदामिप्रायम् । यदि सङ्कल्पविकल्पपरिणतद्रष्यमात्रयायमेदाताहकं ज्ञानमतिरिक्तमित्यत्र निर्मधस्तदा दीरियादीनामपीप्टानिष्टप्रतिनिवृनिदर्शनाचअनकपल्मसइल्पजननपारणतद्रव्याविषयमपि मनापर्यायज्ञानमम्पु- पगन्तप्पं स्थान पेप्टाहतोरेप मनमस्तव्यासत्वाना न प तेन द्वीन्द्रियादीनां समनस्कतापतिः, कपर्दिकासत्तया धनित्यस्येव,एकया गदा गोमवस्येव(पा), यक्ष्मेण मनसा ममनस्कत्व स्पापादयितुमकपवाद नदिदमभिप्रेयोनिमयद्वात्रिशिकायो मदाबा- दिना-"प्रार्थनाप्रतिघाताभ्यां, चेष्टन्ते द्वीन्द्रियादयः॥ मनःपर्यायविज्ञानं, युक्तं तेषु न चान्यथा ॥१॥" इति । न चैवं ज्ञानस्य पञ्चविधत्वविभागोच्छेदादुत्सूत्रापत्तिा, व्यवहारतश्चतुर्विधत्वेनोक्ताया अपि भापाया निश्चयतो द्वैविध्याभिधानवनय- विवेकेनोत्सूत्राभावादिति दिक् (इत्याहुः) ॥ इतिमनःपर्यायज्ञानप्ररूपणम् ॥ "सर्वविषयं केवलज्ञानम् ॥"सर्वविषयत्वं च सामान्यधर्मानवच्छिन्ननिखिलधर्मप्रकारकत्वे सति निखिलधर्मिविषयत्वम् । प्रमेयवदिति ज्ञाने प्रमेयत्वेन निखिलधर्मप्रकारकेऽतिव्याप्तिवारणायानवच्छिन्नान्तं, केवलदर्शनेविव्याप्तिवारणाय सत्यन्तं, विशेष्य- भागस्तु पर्यायवाद्यभिमतप्रतीत्यसमुत्पादरूपसन्तानविषयकनिखिलधर्मप्रकारकज्ञाननिरासार्थः । वस्तुतो " निखिलज्ञेयाकारवचं केवलज्ञानत्वं" । केवलदर्शनाभ्युपगमे तु"तत्र निखिलदृश्याकारवत्वमेव",न तु निखिलज्ञेयाकारवचमिति नातिव्याप्तिः। न च प्रतिस्वं केवलज्ञाने केवलज्ञानान्तरवृत्तिस्वप्राकालविनष्टवस्तुसम्बन्धिवर्तमानत्वाद्याकाराभावादसम्भवः, स्वसमानकालीननिखिलज्ञेयाकारव- वस्यं विवक्षणात् । न च तथापि केवलज्ञानग्राह्ये आद्यक्षणवृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यताया द्वितीयक्षणे नाशो, द्वितीयक्षण- वृत्तित्वप्रकारकत्वावच्छिन्नविशेष्यतायाश्चोत्पादः, इत्थमेव ग्राह्यसामान्यविशेष्यताधौव्यसम्भेदेन केवलज्ञाने त्रैलक्षण्यमुपंपादित- मित्येकदा निखिलज्ञेयाकारवत्यासम्भव एवेति शङ्कनीयम् , समानकालीनत्वस्य क्षणगर्भत्वे दोपाभावाद , अस्तु वा निखिलझेया- कारसङ्कमयोग्यतावत्वमेव लक्षणं,प्रमाणं च तत्र'ज्ञानत्वमत्यन्तोत्कर्षववृत्ति, अत्यन्तापकर्पववृत्तित्वात् परिमाणत्ववद्'इत्याद्यनु मानमेव । न.चाप्रयोजकत्वं ज्ञानतारतम्यस्य सर्वानुभवसिद्धत्वेन तद्विश्रान्तेरत्यन्तापकर्पोत्कर्षाभ्यां विनाऽसम्भवात् । न चेन्द्रियाश्रित- ज्ञानस्यैव तरतमभावदर्शनात्तत्रैवान्त्यप्रकर्षों युक्त इत्यपि शक्कनीय, अतीन्द्रियेऽपि मनोज्ञाने शास्त्रार्थावधारणरूपे शास्त्रभावना- प्रकर्षजन्ये शाखाविकान्तविषयीन्द्रियविषयसामर्थ्ययोगप्रषिसाधनेऽध्यात्मशास्त्रप्रसिद्धप्रातिभनामधेये व तरवमभाव. दर्शनात् । नन्वेवं भावनाजन्यमेव प्रातिभवत्केवलं प्राम, तथा चाप्रमाणे स्याद् कामातुरस्य सर्वदा कामिनी मावयतो व्यवहिवकामि- नीसाक्षात्कारखभावनाजन्यज्ञानस्थाप्रमाणवव्यवस्थित, अपन भावनाजन्यत्वं स्वाप्रामाण्यप्रयोजक, किंतु बाधितविषपत्त, भावनानपेक्षेऽपि शुक्तिरजतादिनमे बाधादेवाप्रामाण्यस्वीकारात्, प्रकृते च न विषयबाध इति नाप्रामाण्यं, न च व्यवहितकामिनीवि. अमादौ दोपत्वेन भावनायाः फ्लुसत्याचबन्यत्वेनास्याप्रामाण्यं, बाधित्तविषयत्ववदोपजन्यत्त्वस्यापि भ्रमत्वप्रयोजकत्वाद, वया चोक्तं मीमांसाभाष्यकारेण-'यस्य(त्रोच दुष्टं कारणं यत्रच मिथ्येत्यादिप्रत्ययास एवाऽसमीचीनो नान्याइविवातिककारे- णाप्युक्तम-"वस्मादोधात्मकत्वेन प्राप्ता बुद्धे प्रमाणवा अन्यिथात्वहेतूत्थ-दोपज्ञानादपोध।।१॥इति"अत्र हि तुल्ययदेवापा- माष्पप्रयोजकद्वयमुक्तं, तस्माद्वाधाभावेऽपि दोपजन्यत्वादप्रामाण्यमिति वाच्यं, मावनाया क्वचिदोषत्वेऽपि सर्वत्र दोषत्वानि- श्यान, अन्यथा शङ्खपीतत्वभ्रमकारणीभूतस्य पीतद्रव्यस्प स्वविषयकवानेऽप्यप्रामाण्यप्रयोजकत्वं स्यादिति न किश्चिदेवव, कत्र- चिदेव कशिदोपइत्येवाङ्गीकाराद, विषयमावेनैव दोपजन्यत्वकल्पनाध, दुटकारणजन्यस्याप्यनुमानादेविपयाराधेन प्रामाण्याम्युप- गमात्, अन्यथा परिमापामात्राप। मीमांसाभाष्यवार्तिककाराभ्यामपि बाधितविपपत्यव्याप्यत्वेनैव दुष्टकारणजन्यत्वस्या- प्रामाण्यप्रयोजकत्वमुक्तं न स्वावन्त्र्येणेति चेत्,मैवम्, तथापि परोक्षज्ञानजन्यभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वासम्मवाद । नादि वहथ- नुमितिज्ञानं महसकत्व आपतमपि वहिसाक्षात्काराय कल्पतेान चाम्यापमानं ज्ञानं परमप्रकास तथा भविष्यतीत्यपि शहनीयं, लहनोदकतापार्दिवदम्यस्यमानस्यापि परमप्रकर्षायोगात् । न च लङ्घनस्पैकस्सावस्थितस्याभावादपरापरप्रयत्नस्य पूर्वपूतिशयि- तलवनोत्पादन एवं व्यापाराधावल्लधयितव्यं तावनादावेव श्लेष्मादिना जाड्यात्कायो लक्ष्यायितुं शक्नोत्यभ्यासासादितश्लेष्म- क्षयपटुभावोत्तरकालं शक्नोतीति तत्र व्यवस्थितोत्कर्षता, उदकतापे त्वतिशयेन क्रियमाणे तदाश्रयस्यैव क्षयान्न तत्राप्यग्निरूपताप- तिरूपोऽन्त्योत्कर्षः, विज्ञानं तु संस्काररूपं शास्त्रपरावर्तनाद्यन्यथानुपपत्योत्तरत्राप्यनुवर्तत इति तत्रापरापरयत्नानां सर्वेषामुपयो- गादत्यन्तोत्को युक्त इति तद्वता भावनाज्ञानेनापरोक्षं केवलज्ञानं जन्यत इति टीकाकृदुक्तमपि विचारसहं, तस्य प्रमाणान्तरत्वा- पत्तेः, 'मनो यदसाधारणमिति' न्यायात्,अन्यथा चक्षुरादिव्याप्तिज्ञानादिसहकृतस्य मनस एव सर्वत्र प्रामाण्यसम्भवे प्रमाणान्तरो- च्छेदापत्तेः । चक्षुरादीनामेव(वा)साधारण्यात्प्रामाण्यमित्यभ्युपगमे भावनायामपि तथा वक्तुं शक्यत्वात् । एवञ्च परोक्षभावनाया अपरोक्षज्ञानजनकत्वं तस्याः प्रमाणान्तरत्वं चान्यत्रादृष्टचरं कल्पनीयमिति महागौरवमिति चेद्,अनुक्तोपालम्भ एषः, प्रकृष्टभावना- जन्यत्वस्य केवलज्ञानेऽभ्युपगमवादेनैव दीकाकृतोक्तत्वात् । वस्तुतस्तु तज्जन्यात्प्रकृष्टादावरणक्षयादेव केवलज्ञानोत्पत्तिरित्येव सिद्धान्ताव(न्तः)। यैरपि योगजधर्मस्यातीन्द्रियज्ञानजनकत्वमभ्युपगम्यते,तैरपि प्रतिबन्धकपापक्षयस्य द्वारत्वमवश्यमाश्रयणीयम्, सति प्रतिबन्धके कारणस्याकिश्चित्करत्वात् ,केवलं तैर्योगजधर्मस्य मनःप्रत्यासत्तित्वं,तेन सन्निकर्षण निखिलजात्यंशे निरवच्छिन्न- प्रकारताकज्ञाने पोडशपदार्थविषयकविलक्षणमानसज्ञाने वा तत्त्वज्ञाननामधेये मनसः करणत्वं, चाक्षुपादिसामग्रीकाल इव लौकिकमा- नससामग्रीकालेऽपि तादृशतत्त्वज्ञानानुपपत्तेस्तत्त्वज्ञानांख्यमानसे तदितरमानससामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वं, तत्त्वज्ञानरूपमानससाम- य्याश्च प्रणिधानरूपविजातीयमनःसंयोगघटितत्वं कल्पनीयमित्यनन्तमप्रामाणिककल्पनागौरवम् । अस्माकं तु दुरितक्षयमात्र तत्र कारणमिति लाघवम् । अत एव 'इन्द्रियनोइन्द्रियज्ञानासाचिव्येन केवलमसहायमिति प्राचो व्याचक्षते । स चावरणाख्यदुरित- प्रकर्षजन्ये शाखातिक्रान्तविपर्यतीन्द्रियविपयसामर्थ्ययोगप्रचिसाधनेऽध्यात्मशास्त्रप्रसिद्धमातिभनामधेये च वरदममाव- दर्शनात् । नन्वेवं मावनाजन्यमेव प्रातिभवत्केवलं प्राप्त, तथा चाप्रमाणं स्यात् , कामातुरस्य सर्वदा कामिनी भावयतो व्यवहितकामि- नीसाक्षात्कारवद्भावनाजन्यज्ञानस्याप्रमाणत्वव्यवस्थितः, अथ न भावनाजन्यत्वं तत्राप्रामाण्यप्रयोजकं, किंतु बाधितविषयत्वं, { भावनानपेक्षेऽपि शुक्तिरजतादिनमे वाघादेवाप्रामाण्यस्वीकारात्, प्रकृते च न विषयवाध इति नाप्रामाण्यं, न च व्यवहितकामिनीवि- प्रमादौ दोपत्वेन भावनाया फ्लप्तत्वाचजन्यत्वेनास्याप्रामाण्यं, नाषितविषयत्ववदोपजन्यत्वस्यापि भ्रमत्वप्रयोजकत्यात्, तथा पोक्तंमीमांसामाष्यकारेण-पस्य(त्र) च दुष्ट कारणं यत्र चमिध्येत्यादिप्रत्ययः स एवाऽसमीचीनो नान्य इति। वार्तिककारे- णाप्युक्तम-"तस्मादोधात्मकत्वेन,प्राप्ता बुद्धी प्रमाणता। अन्यथात्वहेतूत्थ-दोपज्ञानादपोद्यते॥१॥इति"अब हि तुल्यपदेवाप्रा. माण्यप्रयोजकद्धयमुक्तं, तस्माताधाभावेऽपि दोपजन्यत्वादप्रामाण्यमिति वाच्यं, भावनाया: क्वचिदोपत्वेऽपि सर्वत्र दोपत्वानि. श्रयात् , अन्यथा शङ्कपीतत्वप्रमकारणीभूतस्प पीतद्रव्यस्य स्वविषयकज्ञानेऽप्यप्रामाण्यप्रयोजकत्वं स्यादितिन किश्चिदेवत्, व चिदेव कथिोप इत्येवाङ्गीकारान् , विषयवानैव दोपजन्यत्वकल्पनाच, दुष्टकारणजन्यस्याप्यनुमानादेविषयावाधेन प्रामाण्याम्पुर- गमात्, अन्यथा परिभाषामात्रापत्तेः। मीमांसाभाष्यवातिककाराभ्यामपि पाधितविषयत्वव्याप्यत्वेनैव दुःकारणजन्यत्वस्या- प्रामाण्यप्रयोजकत्वमुक्तं न स्वातन्त्र्येणेति चेत्,मैवम्, तथापि परोक्षज्ञानजन्यभावनाया अपरोक्षशानजनकत्वासम्भवात् । न हि वायः नुमितिज्ञानं सहस्रकत्व आइपमपि वहिसाझाकाराय कल्पनियाभ्यस्यमानं ज्ञानं परमप्रकर्षप्रास तथा भविष्यतीत्यपि शहनीयं, लानोदकतापादिवदम्पस्यमानस्यापि परमप्रकर्षायोगात् । न च लहनस्यैकस्यावस्थितस्याभावादपरापरप्रयत्नस्य पूर्वपूर्वातिशयि- इति वाच्यम्, तदवान्तरबैजात्यावच्छिन्नहेतुगवेषणायामपि कर्मण्येव विश्रामा । किं चाभ्यासजनितप्रसरत्वात्प्रतिसंख्याननिवर्तनी- यत्वाच न कफादिहेतुकत्वं रागादीनाम् । एतेन 'शुक्रोपचयहेतुक एव रागो नान्यहेतुक इत्यायपि' विरस्तम्, अत्यन्तस्त्रीसेवा- परस्य क्षीणशुक्रस्यापि रागोद्रेकदर्शनात् , शुक्रोपचयंस्य सर्वस्वीसाधारणाभिलापजनकत्वेन कस्यचित् कस्याश्चिदेव रागोद्रेक इत्य- स्यानुपत्तश्चेप। न चासाधारण्ये रूपमेव हेतुः, तद्रहितायामपि कस्यचिद्रागदर्शनात् । न च तत्रोपचार एव हेतुः, द्वयेनापि विमुक्तायां रागदर्शनात् । तस्मादभ्यासदर्शनजनितोपचयपरिपाकं कर्मैव विचित्रस्वभावतया तदा तदा तत्तत्कारणापेक्षं तत्र तत्र रागादिहेतुरिति प्रतिपत्तव्यम् । एतेन 'पृथिव्यम्बुभ्यस्त्वे रागः, तेजोवायुभ्यस्त्वे द्वेषा, जलवायुभूयस्त्वे मोह इत्यादयोऽपि प्रलापा निरस्ताः, तस्य विषयविशेपापक्षपातित्वादिति दिक् । कर्मभूतानां रागादीनां सम्यग्ज्ञानक्रियाभ्यां क्षयेण वीतरागत्वं सर्वज्ञत्वं चानावलमेवा शौद्धो- दनीयास्तु-"नैरात्म्यादिभावनैव रागादिक्लेशहानिहेतुः, नैरात्म्यावगतावेवात्मात्मीयाभिनिवेशाभावेन रागद्वेपोच्छेदात् संसार- मूलनिवृत्तिसम्भवात्,आत्मावगतौ चतस्य नित्यत्वेन तत्र स्नेहात्तन्मूलतृष्णादिना क्लेशानिवृत्तेः। तदुक्तम्-"य:पश्यत्यात्मानं,तत्रा- स्याहमिति शाश्वतः स्नेहः।। स्नेहात्सुखेषु तृष्यति,तृष्णा दोषांस्तिरस्कुरुते ॥१॥ गुगदर्शी परितृप्य-त्यात्मनि तत्साधनान्युपादत्त ।। तेनात्माभिनिवेशो, यावत्तायच्च संसारः ॥२॥ इति । ननु यद्येवमात्मा न विद्यते, किंतु पूर्वापरक्षणवाटतानुसन्धानाः पूर्वहेतु- प्रतिबद्धा ज्ञानक्षणा एव तथा तथोत्पद्यन्त इत्यभ्युपगमस्तदा परमार्थतो न कश्चिदुपकार्योपकारकस्वभाव इति कथमुच्यते "भगवान सुगतः करुणया सकलसत्त्वोपकाराय देशनां कृतवान्" इति,क्षणिकत्वमपि ययेकान्तेन, तर्हि तत्ववेदी क्षणोऽनन्तरं विनष्टः सन्न कदा- जनाप्यहं भूयो भविष्यामीतिजानानः किमर्थ मोक्षाय यतत इति ?,अत्रोच्यते-"भगवान् हि प्राचीनावस्थायां सकलमपि जगदुःखितं st - क्षयोऽपि नावनानारतम्यात्तारतम्येनोपजायमानस्तदत्यन्तप्रकदित्यन्तप्रकर्ममनुमवतीति किमनुपपमम् । तदाहालकोऽपि-"दो. पावरणयोनि-निशेपास्त्पतिशापनात् ॥ चियथा स्वहेतुम्पो, पहिरन्तर्मलशप इति ॥१॥" न च निम्नायौपषोपयोगापरवम- भावापचीयमानस्यामि श्लेष्मणो नात्यन्तिकक्षय इति व्यभिचार, ता निम्मायौपयोपयोगोत्करनिष्ठाया पापादापितुमय यत्यान, तदुपयोगेऽपि श्लेष्मपुष्टिकारणानामपि तदैवासेपनात् , अन्यौपापयोगाधारस्यैव विनाशरसगाव, चिकित्साशास्त्रं मुद्रितधातु दोपसाम्यमुद्दिश्य प्रवर्तते, न तु तस्य निर्मूलनाशं, अन्यतरदोपात्यन्तक्षयस्य मरणाऽपिनामारित्वादिवि द्रष्टव्यम् । रागापारणापाये सर्वज्ञज्ञानं वैशयभाग्भवतीत्यत्र च न विवादो रजोनीहाराधापरणापापे पृक्षादिमाने तथा दर्शनान् । न च रागादीना कपमापर- पत्वं, कुष्यादीनामेव पौद्गलिकानां वयात्वदर्शनादिति वाच्यम् , कुड्यादीनामपि प्रातिमादारनावारकन्याव , शानविशेष नेपामारर- णत्ववच्चातीन्द्रियज्ञाने रागादीनामपि तथात्वमन्यपव्यतिरेकाम्यामेव सिद्धम् । रागापपचपे पोगिनामतीन्द्रियानुमरसम्ममात्रौद- लिस्त्वमपि द्रव्यकर्मागमेन तेषां नासिद्धम् । स्वविषयग्रहणक्षमस्य शानस्प तदग्राइकताया विशिष्टद्रव्यसम्बन्धसकत्वानियमारपी- तत्पूरपुरुपज्ञाने तथादर्शनादिति ध्येयापाईस्पत्यास्तु-"रागादयो न लोमादिकर्मोदयनिरन्धनाः, किंतु फसादिशकात तुका। तथाहि, कफहेतुको रागः, पिचहेतुको देपा, पातहेतुकच मोहः । कफादयश्व सदैव समिहिता, शरीरस्य तदात्मकस्यात् , ततो न सार्वज्ञमूलवीतरागत्वसम्मा" इत्याहुः । तदपुक्तम्, रागादीनो पभिचारेण कमादिहेतुम्त्यायोगाव , पजे हि वातप्रकृते: रपि रागद्वेषौ, कफप्रकरपि द्वेषमाहौ, पित्तप्रकवरपि मोहरागाविति । एकैकस्पा प्रते पक सर्वदोपजननायुपगमे च सपा समरागादिमचप्रसन्नात् । न च स्वस्चयोग्यक्रमिकरागादिदोषजनाकापवान्तरपरिणतिविशेषस्य प्रतिमाणि कल्पनाबार्य दोष इति वाच्यम्, तदवान्तरवैजात्यावच्छिन्नहेतुगवेषणायामपि कर्मण्येव विश्रामात् । किं चाभ्यासजनितप्रसरत्वात्मतिसंख्याननिवर्तनी- यत्वाच न कफादिहेतुकत्वं रागादीनाम् । एतेन 'शुक्रोपचयहेतुक एव रागो नान्यहेतुक इत्याद्यपि' विरस्तम् , अत्यन्तस्त्रीसेवा- परस्य क्षीणशुक्रस्यापि रागोद्रेकदर्शनात् , शुक्रोपचयंस्य सर्वस्त्रीसाधारणाभिलाषजनकत्वेन कस्यचित् कस्याश्चिदेव रागोद्रेक इत्य- स्यानुपत्तश्चेप। न चासाधारण्ये रूपमेव हेतुः, तद्रहितायामपि कस्यचिद्रागदर्शनात् । न च तत्रोपचार एव हेतुः, द्वयेनापि विमुक्तायां रागदर्शनात् । तस्मादभ्यासदर्शनजनितोपचयपरिपाकं कर्मैव विचित्र स्वभावतया तदा तदा तत्तत्कारणापेक्षं तत्र तत्र रागादिहेतुरिति प्रतिपत्तव्यम् । एतेन 'पृथिव्यम्बुभूयस्त्वे रागः, तेजोवायुभूयस्त्वे द्वेषः, जलवायुभ्यस्त्वे मोह इत्यादयोऽपि प्रलापा निरस्ताः, तस्य विषयविशेपापक्षपातित्वादिति दिक् । कर्मभूतानांरागादीनां सम्यग्ज्ञानाक्रियाभ्यां क्षयेण वीतरागत्वं सर्वज्ञत्वं चानाविलमेव। शौद्धो- दनीयास्तु-"नैरात्म्यादिभावनैव रागादिक्लेशहानिहेतुः, नैरात्म्यावगतावेवात्मात्मीयाभिनिवेशाभावेन रागद्वेपोच्छेदात् संसार मूलनिवृत्तिसम्भवात्,आत्मावगतौ च तस्य नित्यत्वेन तत्रस्नेहात्तन्मूलतृष्णादिना क्लेशानिवृत्तेः।। तदुक्तम्-"य:पश्यत्यात्मानं,तत्रा- स्याहमिति शाश्वतः स्नेहः।। स्नेहात्सुखेषु तृष्यति,तृष्णा दोषांस्तिरस्कुरुते ॥१॥ गुणदर्शी परितृप्य-त्यात्मनि तत्साधनान्युपादत्ते ।। तेनात्माभिनिवेशो, यावत्तावच संसारः ॥२॥ इति"। ननु यद्येवमात्मा न विद्यते, किं तु पूर्वापरक्षणवाटतानुसन्धान : पूर्वहेतु- प्रतिबद्धा ज्ञानक्षणा एव तथा तथोत्पद्यन्त इत्यभ्युपगमस्तदा परमार्थतो न कश्चिदुपकार्योपकारकस्वभाव इति कथमुच्यते "भगवान् सुगतः करुणया सकलसत्त्वोपकाराय देशनां कृतवान् इति,क्षणिकत्वमपि यद्येकान्तेन, तर्हि तत्त्ववेदी क्षणोऽनन्तरं विनष्टः सन्न कदा- चनाप्यह भूयो भविष्यामीति जानानः किमर्थ मोक्षाय यतत इति ?,अत्रोच्यते-"भगवान् हि प्राचीनावस्थायां सकलमपि जगदुःखितं पायंस्तदुन्धिीर्षया नरात्म्पक्षणिकत्वादिकमवगच्छपि तेषामुपकार्यसञ्चाना निलेशक्षणोत्पादनाय प्रयतते, तसो बावसकल- जगत्साक्षात्कारः समुत्पमकेवलज्ञाना पूर्वाहितकपाविशेषसंस्कारात् कृतार्थोऽपि देशनायो प्रवर्तते, अधिगततचात्पर्याप स्व- न्सतिगतविशिष्टक्षणोत्पत्तये अमुक्षवा प्रवर्तन्ते," इति न किमप्यनुपरममित्याहु तदखिलमज्ञानविलसितम् ।आत्माभावे पन्धमोक्षा- घकाधिकरणत्वायोगादान च सन्तानापेक्षया समाधिा,तस्यापि क्षणानतिरेके एकत्वासिद्धा, एफत्वे पद्रव्यस्यैव नामान्तरत्वाद, स. जातीपक्षणप्रपन्धरूपे सन्ताने पन कारकव्यापार इति समीचीनं शुमधुप्रवृत्युपपादनम् । अथालिष्टक्षणेऽक्लिष्टक्षणत्वेनोपादानत्वमिति सजातीयक्षणप्रबन्धोपपतिः, पद्धदेशितमार्गे तु तत्प्रयोजकत्वन्नामादेव प्रवृत्तिरिति चेत् न, एकान्तवादेऽनेन रूपेण निमित्तत्वमनेन रूपेण घोपादानत्वमिति विभागस्यैव दुर्वचत्वात् । अक्लिष्टक्षणेऽक्लिष्टक्षणत्वेनैवोपादानत्वे आयाक्लिष्टक्षणस्यानुत्पत्तिप्रसङ्गादन्त्य- लिटणसाधारणस्य हेततावच्छेदकस्य कल्पने च क्लिष्टक्षणजन्यतावच्छेदकेन सार्याअन्यजनकक्षणप्रबन्धकोटाकैकक्षणप्रवे- सपरित्यागोविनिगमकामावाच । एतेन 'इतरव्यावृत्त्या शक्तिविशेषेण वा जनकत्वम् इत्यप्यपास्तम् । न चैतदनन्तरमहमुत्पा- मेतस्प चाई जनकमित्यवगच्छति धणरूपं शानमिति न भवन्मते कार्यकारणमाया, नापि तदवगमा, ततो याचितकमण्डनमेतदे- फसन्ततिपतितस्वादेकाधिकरणं पन्धमोक्षादिकमिति । एतेन उपादेयोपादानक्षणानां परस्परं वास्थवासकमावादुत्तरोत्तरविशिष्टवि- शिष्टतरक्षणोत्पः मुक्तिसम्मव' इत्यप्यपास्तम्, युगपदाविनापेव तिलकसमादीनां वास्पवासकमावदर्शनात् । उक्तल-"वास्य. रासायोथैव-मसाहित्यामवासना। पूर्वक्षणैरनुत्पमो, वास्यते नोत्तरक्षण शाति" करिपतशुद्धधणैकसन्तानास्तिथैव मोक्षो। पाये सौगतानां प्रधिा, उदवप सुगतदेशनेत्यम्युपगमे च तेषां मिध्याष्टिक तत्कल्पितमोषस्य व मिथ्यात्वं फुटमेव, अधिक लतायाम् । एतेन ' असण्डाद्वयानन्दैकरसत्रमझानमेव केवलज्ञानं, तत एव चाविद्यानिवृचिरूपमोक्षापिगम' इति वेवानितम- तमपि निरस्तम्, तादृशविषयाभावेन तज्ज्ञानस्य मिथ्यात्वाद, कीदृशं च ब्राह्मज्ञानमज्ञाननिवर्तकमभ्युपेयं देवानांप्रियेण, न केवलचैतन्यं,तस्य सर्वदा सत्वेनाविद्याया नित्यनिषिप्रसारमात ततश्च तन्मूलसंसारोपलभ्यसम्भवात्सर्वशास्त्रानारम्भप्रसङ्गाद- नुभवविरोधाच, नापि वृधिरूपं, वृत्तेः सत्यत्वे तत्कारणान्ताकरणाविद्यादेरपि सचस्यावश्यकत्वेन तया तमिवृत्तेरशक्यतया सर्व वेदान्तार्थविष्ठवापः, मिथ्यात्वे च कथमज्ञाननिवर्तकता । न हि मिथ्याज्ञानमज्ञाननिवर्तकं दृष्टम्, स्वमज्ञानस्यापि तत्त्वप्र- सङ्गात् । न च "सत्यस्यैव चैतन्यस्य प्रमाणजन्यापरोक्षान्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तस्याज्ञाननिवर्तकत्वावृत्तेश्च कारणतावच्छेदकत्वेन दण्डत्वादिवदन्यथासिद्धत्वेन कारणत्वानगीकाराव , अवच्छेदकस्य कल्पितत्वेऽप्यवच्छेद्यस्य वास्तवत्वं न विहन्यते, यद्रजतत्वेन मातं तच्छुक्तिद्रव्यमितिवत्, तार्किकैरप्याकाशस्य शन्दग्राहकत्वे कर्णशष्कुलीसम्बन्धस्य कल्पितस्यैवावच्छेदकत्वाङ्गीकाराव, संयो- गमात्रस्य निरवयवे नमसि सर्वात्मना सत्वेनातिप्रसञ्जकत्वात् । मीमांसकैश्च कल्पितइस्वत्वदीर्घत्वादिसंसर्गावच्छिन्नानामेव वर्णानां यथार्थज्ञानजनकत्वोपगमावनिधर्माणां ध्वनिगतत्वेनैव भानाद, वर्णानां च विभूनामानुपूर्वीविशेषाज्ञानादतिप्रसङ्गाद, वर्णनिष्ठत्वेन इस्वत्वादिकल्पनस्य तेषामावश्यकत्वात् , तद्वदस्माकमपि कल्पितावच्छेदकोपगमे को दोष" इति मधुसूदनतपस्वि. नोऽपि वचनं विचारसई, मिथ्याग्दृष्टान्तस्य सम्यग्दृशां ग्रहणानौचित्यान, नैयायिकमीमांसकोक्तस्थलेऽपि अनन्तधर्मात्मकै- कवस्तुस्वीकारे कल्पितावच्छेदककृतविडम्बनाया अग्रसराव,विस्तरेणोपपादितं चैतत्सम्मतिवृत्तौ।नचोक्तरीत्या वृत्तेरवच्छेदकत्व- मपि युक्तं,प्रतियोगितयाज्ञाननिवृत्तौ सामानाधिकरण्येन समानविशेष्यकसमानप्रकारकवृत्तेरेव त्वन्मते हेतुत्वस्य युक्तत्वात्। अत एव सपमुक्तं तपस्पिना मिद्धान्तयिन्दी-'द्विविधमापरणं, एकममचापादकमन्तःकरणावच्छिन्नसाक्षिनिष्ठ, अन्यदभानापादकं विष- पारधिनत्रवचैतन्पनिष्ठं, घटमह न जानामीत्युमयावच्छेदानुभवाद, आय परीक्षापरोक्षसाधारणप्रमामात्रेण निवर्तते, अनुमितेऽपि नास्तीति प्रतीत्यनुदयात् , द्वितीयं तु माक्षात्कारणे निरर्तत, यदाश्रयं यदाकारंशानं तदाश्रयं तदाकारमज्ञानं नाशयतीति पयादौ निपमात्' इत्यादि, तरिकमिदानी क्षुधामकृयः सघ एव विस्मृतं ? येनोक्ताचेरपच्छेदकत्येनान्यथासिद्धिमाह, एवं हि पटादावपि दपरिशिष्टामामत्वेनय हेतुता बदतो वदनं का पिदच्या १, अनयैव मिया "चैतन्यनिष्ठाया प्रमाणजन्यापरोधान्तःकरणपत्रेवा. पाननाशरुरयागीकारेऽपि न दोप, पारमार्थिकमचामाऽपि व्यावहारिकसवाद्गीकारात्। न च स्वमादिवन्मिध्यात्वापनि, स्व. तो मिप्यारवस्याप्रयोजकत्यात, विषयतो मिथ्यारयस्य च पापामावादसिद्धा, धूमप्रमजन्यययनुमिवेरप्पमाधितविषयतयाः- प्रामाम्पानगीकाराम,फरिपतेनापि प्रविपिग्मेन वास्तपपिवानुमानप्रामाण्याच, स्वमार्थस्याप्यरिष्टादिश्पकत्वाच,कचित्तदुपलब्ध मन्वादेगिरेऽप्यनुवृधेरपाधायेति" तपस्विनोसमिति चेत् एतदप्यविचाररमणीयम् त्वमते स्त्रमागरयोर्व्यवहारविशेषस्यापि पतमत्रपपरवान्, गांधाभावेन ममण इस घटादेरपि परमार्थसचस्याप्रत्यूहत्याम, प्रपञ्चासत्यत्वेपन्धमोक्षादेरपि तथात्वेन व्यवहार मन एव पुटारदानात् । एतेन 'अवाननिष्ठा परमार्थव्यवहारप्रतिमाससत्प्रतीत्यनुकूलास्तिस्रः पतया कल्प्यन्ते, आपया प्रपत्र पारमार्थिक सम्वतीतिः, अत एवं नेपापिकादीनां वयाम्युपगमा, सा च श्रवणापन्यासपरिपाकेन निवर्तते, ततो द्वितीपया पक्पा प्यावहारिकमचं प्रपञ्चस्प प्रतीपते, पेदान्तयवणादम्यासान्तो हि ने प्रपञ्च पारमार्षिक पश्यन्ति, किंतु पावहारिक- मितिमा पनपमाधारकारेण नियतते, ततस्तृतीपपा सपा प्रातिमासिकमपानीतिः क्रियते,सा धान्तिमत्वोधेन सदनिक- तते,पूर्वपूर्वशक्तरुत्तरोत्तरशंक्तिकार्यप्रतिबन्धकत्वाच्च न युगपत्कार्यत्रयप्रसङ्गा,तथा चैतदभिप्राया श्रुतिः-"तस्याभिध्यानाद् यो- जनात्तत्त्वभावाद्भ्यश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिरिति"।अस्या अयमयः-"तस्य परमात्मनः,अभिमुखादयानाच्यणाभ्यासपरि- पांकादिति यावत्, विश्वमायाया विश्वारम्भकाविद्याया निवृत्तिः, आद्यशक्ति नाशेन विशिष्टनाशात्, युज्यतेऽनेनेति योजनं तत्त्व-.. ज्ञानं तस्मादपि विश्वमायानिवृत्तिः, द्वितीयशक्तिनाशेन विशिष्टनाशात्, तत्त्वभावो विदेहकैवल्यमन्तिमः साक्षात्कार इति यावद, तस्मादन्ते प्रारब्धक्षये सह तृतीयशक्त्या विश्वमायानिवृत्तिः,अभिध्यानयोजनाभ्यां शक्तिद्वयनाशेन विशिष्टनाशापेक्षया. भृया- शब्दोऽभ्यासार्थक इति इत्यादि"निरस्तम्,अभिध्यानादेःप्रागपरमार्थसदादौ परमार्थसत्त्वादिप्रतीत्यभ्युपगमेञ्यथाख्यात्यापातात् । न च तत्तच्छक्तिविशिष्टाज्ञानेन परमार्थसचादि जनयित्वैव प्रत्याय्यत इति नायं दोष इति वाच्यम्, साक्षात्कृततत्त्वस्य न किमपि वस्त्वज्ञातमिति प्रातिभासिकसचोत्पादनस्थानाभावात्, ब्रह्माकारवृत्या ब्रह्मविषयतेवाज्ञानस्य नाशिता, तृतीयशक्तिविशिष्टं त्वज्ञानं यावत्प्रारब्धमनुवर्तत एवेति ब्रह्मातिरिक्तविषये प्रातिमासिकसचोत्पादनादविरोध इति चेत्, न, धर्मसिद्धथसिद्धिभ्यां व्याघातात्, विशेपोपरागेणाज्ञाते तदुपगमे च ब्रह्मण्यपि प्रातिमासिकमेव सचं स्यात्, तत्वज्ञे कस्यचिदज्ञानस्य स्थितौ विदेह- कैवल्येऽपि तदवस्थितिशङ्कया सर्वाज्ञानानिवृत्तौ मुक्तावनामासप्रसङ्गाच । अथ दृष्टिसृष्टिवादे नेयमनुपपत्तिा,तन्मते हि वस्तु. सद् ब्रह्मैव, प्रपञ्चश्व प्रातिभासिक एव, तस्य चामिध्यानादेः प्राक् पारमार्थिकसचादिना प्रतिभासः पारमार्थिकसदायाकारज्ञाना म्युपगमादेव सपपाद इति चेत्, न, तस्य प्राचीनोपगतस्य सौगतमतप्रायत्वेन नव्यरुपेक्षितत्वाव., व्यवहारवादस्यैव तैराहतत्वाद व्यवहारवादे च व्यावहारिक प्रपञ्च प्रातिभासिकत्वेन प्रतीयतां तत्वज्ञानिनामत्यन्तभ्रान्तत्वं दुर्निवारमेव । अथ व्यावहारकस्याप प्रपत्रस्य तत्वज्ञानेन राषितस्यापि प्रारधवशेन बाधितानुवृत्या प्रतिमासा तृतीयस्याः शक्तः कार्यम्, तेन बाधितानुवृत्त्या प्रति. मासानुइला तृतीया शक्ति प्रातिमासिकसवसम्पादनपटरीयसी शतिरुच्यते, सा चान्तिमतचवोधेन निवर्वत इत्येवमदोष इति पत्, न, गाधितं हि त्वामते नाशितं, तस्यानुवनिरिति वदलो व्यापाता बाधितत्वेन पापितत्वावच्छिासत्तया का प्रतिमासस्तत्त्व- हप्रारम्पयामिति चेत् तृतीया शक्तिर्या, यावदिषाणां बाधितत्वे तेषां तथाप्रविमासस्य सार्वज्ञाभ्युपगमं विनानुपपसेवा द्वितीय- अतिविशिष्टाचाननाशाव सवितफर्म तत्काय च नश्यति, ततस्तृतीयशच्या प्रारम्पकायें दग्धरज्जुस्थानीया बाधितावस्था जन्यते, इसमेव बाधितानुवृधिरिति पेन,न,एवं सति घटपटादौ तपझस्य न शघितसत्त्वधी, न वा व्यावहारिकपारमार्थिकसलीरिति तत्र किचिदन्यदेव कल्पनीयं स्यात् तथा च लोकशास्त्रविरोध इति मुक्तं हरिभद्राचार्यः-(पोडशक १६) "अग्निजलभूमयो यत,परि- सापकरा मवेऽनुमवसिद्धाः ॥ रागादयप रौद्रा, असत्प्रवृत्यास्पदं लोके ॥८॥ परिकल्पिता यदि ततो, न सन्ति तत्वेन कथममी स्यु: रिति । परिकल्पिते पठत्त्वे, मवमवविगमो कथं युक्तौ ॥९॥ इत्यादि । तस्माद्यावहारिकसत्यापि न निस्ताराप्रपञ्चे परमार्थाएथे घ्यवहारराष्ट्यापि सचान्तरानवगाहनादिति स्मर्तव्यम्। किं च "सप्रकारं निष्प्रकार वा ब्रह्मशानमज्ञाननिवर्तकमिति वक्कय्यं, आये निष्प्रकारे प्रमणि सप्रकारकज्ञानस्यायथार्थत्वाभाशाननिवर्तकता, तस्य यथार्थत्वे वा नावैतसिद्धि, द्वितीयपक्षस्तु निप्रकारकज्ञानस्य अत्राप्यमानीनवर्तकत्वादर्शनादेवानुभावनाई।चिनिप्रकारकज्ञानस्य कुत्राप्यज्ञाननिवर्तकत्वं न दृष्टमिति शुदनमानमात्रात्कथमज्ञाननिवृतिा, न प सामान्यधर्ममात्राप्रकारकसमानविषयप्रमात्वमन्नाननिवृतो प्रयोजक, अर प्रमे- यमिति शने तिय्याशिवारणाय सामान्येति, प्रमेयो घट इत्पादावस्याप्तिवारणाय मात्रेति, तेनेदं विशेषप्रकारे निप्रकारे CSC चानुगतमिति निष्प्रकारकनमज्ञानस्यापि ब्रह्माज्ञाननिवर्तकत्वं लक्षणान्वयात् । न च सामान्यधर्ममात्रप्रकारकज्ञानेऽव्यातिः, इदमनिदं वा, प्रमेयमप्रमेयं वेत्यादिसंशयादर्शनेन ( संशयाद्यदर्शनात्सामान्यमात्रप्रकारकाऽज्ञानानङ्गीकारेण ) तदनिवर्तकस्य तस्यासग्रहादिति वाच्यम्, निष्प्रकारकसंशयाभावेन निष्प्रकारकाज्ञानासिद्धया निष्प्रकारकब्रह्मज्ञानस्यापि तन्निवर्तकत्वायो- गाव, एकत्र धामणि प्रकाराणामनन्तत्वे प्रकारनिष्ठतया निखच्छिन्नप्रकारतासम्बन्धेनाधिष्ठानप्रमात्वेन तया तदज्ञाननिवर्त- कत्वौचित्यात् । अधिष्ठानत्वं च भ्रमजनकाज्ञानविषयत्वं वाऽज्ञानविषयत्वं वाऽखण्डोपाधिर्वा ?, न च विषयतयैव तत्त्वं युक्तम्, प्रमेयत्वस्य च केवलान्वयिनोऽनङ्गीकारान्न प्रमेयमिति ज्ञानाद् घटायाकाराज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, द्रव्यमिति ज्ञानात्तदापत्तरवारणात् । न च तस्य द्रव्यत्वविशिष्टविषयत्वेऽपि घटत्वविशिष्टाविषयत्वात्तद्वारणं, द्रव्यत्वविशिष्ट- स्यैव घटावच्छेदेन घटत्वविशिष्टत्वाद, सच्चविशिष्टब्रह्मवत्, विशिष्टविषयज्ञानेन विशिष्टविषयाज्ञाननिवृत्यभ्युपगमेऽपि च : सचिदानन्दत्वादिधर्मवैशिष्टयप्रसङ्गः । एतेन " अन्यत्र घटाज्ञानत्वघटत्वप्रकारकप्रमात्वादिना नाश्यनाशकभावेऽपि प्रकृते ब्रह्माज्ञाननिवृत्तित्वेन ब्रह्मप्रमात्वेनैव कार्यकारणभावः, न तु ब्रह्मत्वप्रकारकेतिविशेषणमुपादेयं गौरवादनुपयोगाद्विरोधाच" इत्यपि निरस्तम्, विशिष्टब्रह्मण एव संशयेन विशिष्टाज्ञाननिवृत्त्यर्थ विशेषोपरागेणैव ब्रह्मज्ञानस्यान्वेषणीयत्वात् शुक्तिरजतादिस्थलेs- पि विशिष्टाज्ञानविषयस्यैवाधिष्ठानत्वं वलप्तमित्यत्राप्ययं न्यायोऽनुसर्वव्या । किं च ब्रह्मणो निर्धर्मकत्वे तत्र विषयवाया अप्यनुप- पन्नत्वात्तीद्वषयज्ञानत्वमंपि तत्र दुर्लभं, विषयता हि कर्मतेति तदङ्गीकारे तस्य क्रियाफलशालित्वेन घटादिवजडत्वापत्तेः, तद्वि- षयज्ञानाजनकत्वे च तत्र वेदान्तानां प्रामाण्यानुपपत्तिः । न च तदज्ञाननिवर्तकतामात्रेण वद्विषयत्वोपचारः, अन्योन्याश्रयात् । ब्रह्मणः न च करिपता विषयत्ता कर्मत्वाप्रयोजिका, वास्तविपरवाया कुरप्पनङ्गीकाराश्यापहावियाय तुल्पलात् । न च प्रमणि शानः विपयताऽसम्भवेऽपि ज्ञान ब्रह्मविषयता तद्विम्बग्राहकवरूपान्या या काचिदचिनीया सम्मातीति नानुचि, शिषपतेगाकारा प्रतिविषयं विलक्षणः, अत एप प्रमाकारापरोक्षत्रमाया एवाज्ञाननिर्तिकावं, अजानकाराराक्ष प्रमात्वस्य सर्वप्रानुग. तत्त्वात् । न चेदमित्याकारं घटाकारमिति शक्किनुमरि शश्य, आकारमदेश्य स्तरमाविषय शामिद स्वादिति वाच्यम्, ज्ञान- निष्ठापा अपि ब्रह्मविषयताया ब्रह्मनिरूपितत्वस्पायकत्वेन ब्रह्माणि तनिरूपान्वधर्मसाधे निर्धर्मरत्वग्यापातान्, उभपनिरूप- स्य विषयविपयिभारस्पैकधर्मत्वेन निहायोगान् । न च अन्नमपि कहितविपपतोपरमे कर्मलेन न जडलापात:, ससमा• नसत्ताकविषयताया एव कर्मत्यापादकवान्, घटादौ हि विपना सममानपताका, योगी भावहारिकवाद, नणि तु परमार्थसति व्यावहारिकी पिपपता न पेति स्फुटमेर पम्यादिति वाच्यम्, मताया इस विषफ्ताया अपि वक्षणि पारमाधि- कस्योक्तायपि बाधकामावात्, परमार्थनिरूपितधर्मस्य व्यावहारिके व्यावहारिकत्यादयावहारिकनिरूपितस्य धर्मस्य पारमार्षिक पारमार्थिकदापा अपि न्यायप्राप्तत्वात् । सत्ताधुपलक्षगमेदेऽप्पुपलक्ष्यमेकमेति न दीप इति चेत्, विषयवायामप्येपएव न्यायः । एवं चानन्तधर्मात्यकयर्पभेदेऽपि ब्रह्मणि कौटस्थ्यं द्रव्यार्थादेशादव्याहतमेव । तया चान्यूनानतिरिक्तधर्मात्मध्यस्यमाव- | लाभलक्षणमोक्षगुणेन भगवन्तं तुष्टाय स्तुतिकारः(सिद्धसेनद्वात्रिंशिका ४) "मचीजपनन्तान्झितं, विमलझानमनन्तमति॥ न च हीनलोऽसि नाधिका, समता चाप्पतिवरप वर्तसे ॥ २९ ॥ इति । एतेन ॥ चैतन्यविषयतेव जडत्यापादिका, नतु निविषयतापि, “यतो याचो निवर्तन्ते, "नचक्षुषा गमते, नापि पाचा" वोपनिषदं पुरुर पछामि" "नावेदन्मिनुवे तं वृहन्तं वेदेनैव यद्वेदितव्यम्" इत्याधुभयविधश्रुत्यनुसारेणेत्थंकल्पनात् “फलव्याप्यत्वमेवास्य, शास्त्रवद्भिर्निवारितम्।। "ब्रह्मण्यज्ञा- ननाशाय, पृत्तिव्याप्तिरपेक्षिता ॥ १॥” इति कारिकायामपि फलपदं चैतन्यमात्रपरमेव द्रष्टव्यं, प्रमाणजन्यान्तःकरणवृत्यभि- व्यक्तचैतन्यस्य शास्त्रे फलत्वेन व्यवाहियमाणस्य ग्रहणे तद्वथाप्यताया अन्वयव्यतिरेकाभ्यां जडत्वापादकत्वे ब्रह्मण इव साक्षिभा- स्पानामपिजडत्वानापत्तेः, चैतन्यकर्मता तु चिद्भिन्नत्वावच्छेदेन सर्वत्रैवेति सैव जडत्वप्रयोजिका, न च वृत्तिविषयत्वेऽपि चैतन्य- विषयत्वं नियतं वृत्तेविदाकारगर्भिण्या एवोत्पत्तेः, तदुक्तम्-"वियद्वस्तुस्वभावानु-रोधादेव न कारणात् ।। वियत्सम्पूर्णतोत्पत्ती कुम्भस्यैवं द(ड)शा धियाम् ॥१॥ घटदुःखादिहेतुत्वं, धियो धर्मादिहेतुतः ॥ स्वतः सिद्धार्थसम्बोध-व्याप्तिर्वस्त्वनुरोधतः ॥२॥ इति," तथा च जडत्वं दुर्निवारमिति वाच्यम्, वृत्युपरक्तचैतन्यस्य स्वत एव चैतन्यरूपत्वेन तद्वथाप्यत्वाभावात् , फले फलान्तरा- नुत्पत्तस्तद्भिन्नानां तु स्वतो भानरहितानां तद्वयाप्तेरवश्याश्रयणीयत्वाद् इत्यादि" मधुसूदनाक्तमप्यपास्तम्, वृत्तिविषयताया अपि निधर्मके ब्रह्मण्यसम्भवात्, कल्पितविषयतायाः स्वीकारे च कल्पितप्रकारताया अपि स्वीकारापत्तेः, उभयोरपि ज्ञानभासकसाक्षि- भास्यत्वेन चैतन्यानुपरजकत्वाविशेषात्, ज्ञानस्य स्वविपयानिवर्तकत्वेन प्रकारानिवृतिप्रसङ्गमयस्य च विषयताद्यानिवृत्तिपक्ष इव धर्मधर्मिणोर्जात्यन्तरात्मकभेदाभेदसम्बन्धाश्रयणेनैव सुपरिदरत्वात्, कृतान्तकोपस्त्वेकान्तवादिनामुपरि.कदापि न निवर्तत इति तत्र का प्रतिकारः । यदि च दृग्विषयत्वं ब्रह्माणि न वास्तवं, तदा सकृदर्शनमात्रेणात्मनि घटादाविव हगपगमेऽपि द्रष्ट्रत्वं कदापि नापै- तीत्यु(त्याधु)क्तं न युज्यते । तथा च "सकृत्प्रत्ययमात्रेण,घटद्भासते तदा।स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं,घटवच न भासते॥१॥स्वप्रका- शतया किं ते,तबुद्धिस्तत्त्ववेदनम् ॥ बुद्धिश्च क्षणनाश्येति, चोयं तुल्यं घटादिषु ॥२॥ घटादौ निश्चिते बुद्धिनश्यत्येव यदा घटः॥
(ोटी नेतु सदाक्य, इति चेत्सममात्मनि ॥३॥ निहित्य सकदात्मानं, यदापेक्षा तदेव तम् ।। यक्तुं मन्तुं तथा प्यात, कोत्यैव हि तत्वविवााउपासक सध्याय-लौकिकं विस्मोधदिविस्मरत्येय साध्याना-द्विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥५॥ इत्यादि ध्यानदीप- वन विशवतेति विमतिविस्तरेणातरमाइविषया ब्रह्माकारावा वृत्तिरविवचितसाव । कथञ्चास्या निवृत्तिरिति वक्तव्यं, स्वकार शाशाननाशदिति चेत् , अमाननाशक्षण इवावस्थितस्य विनश्यदवस्थाशानजनितस्य वा दृश्यस्य चिरमप्यनुवृत्तौ मुक्तावनाश्वासः । उक्तप्रमाविपत्वेन निवर्तय वा इश्यत्वेन च निवतेति श्यत्वेन रूपेणाविधया सह स्वनिवर्त्यत्वेऽपि नदोष, निवर्यतानिवर्तकत- योरवछेदकैपय एव क्षणभएगापचेरिति चेत्, प्रमाया अप्रमा प्रत्येय निवर्तकत्वदर्शनेन श्यत्वस्य निवयताऽनपच्छेदकत्वात् । न च मानस्याशाननाशकतापि प्रमाणसिद्धा, अन्यथा स्वमापन्यासकारणीभूतस्याशानस्य जागरादिप्रमाणशानेन निवृत्तौ पुना स्वमायाः सानुपपचिा, सानेपाशानस्वीकारे स्वात्मन्यपि तथासम्भवेन मुक्तायनाश्वासा, मूलाज्ञानस्यैव विचित्रानेकशक्तिस्वीकारादेकशक्ति- नाशेऽपि शत्पन्तरेण स्वमान्तरादीनां पुनरावृत्तिः सम्भवति, सर्वशक्तिमतो मूलाधानस्यैव निवृतौ तु कारणान्तरासम्भवात् द्वितीयस्य प तारयानीकाराम प्रपश्चस्प पुनरुत्पत्तिरिति तु स्पवासनामात्र, परमधानं वा मूलाशाननाशर्फ क्षणविशेषो येत्या विनिगमकामावादनन्तोषरोत्तरशक्तिफावनन्तपूर्वपूर्वशक्तीना प्रतिबन्धकत्वस्य, घरमशक्तिकार्य घरमशक्ता, तमाशे प परमज्ञानस्यतित्वकल्पने महागौरवात, पूर्वशक्तिनाश इव परमशक्तिनाशेऽपि पण्डमूलासानानुसत्यापरपनुद्वारामेतिन किश्चिदेवत्। एतेन "जागरादिग्रमेण स्वमादिप्रमतिरोधानमात्र क्रियते, सर्पप्रमेण रज्ज्वा धाराप्रमावरोधानवत, अज्ञाननिवृतिस्तु प्रमात्मा पपरिधानादेव" स्यपि निरस्तम्।एवं सति ज्ञानस्याशाननिवर्तकताया प्रमाणानुपलब्धेस्तभिवृषिमूलमोक्षानाथासात् मा दाह- रणोपलम्मा,श्रुतिः श्रुतार्थापत्तिश्चैतदर्थे प्रमाणवामवगाहेते एव । तत्र श्रुतिस्तावत्-"तमेव विदित्वातिमृत्युमेति"मृत्युरविद्येति शाने प्रसिद्धं,तथा "तत्वमावाद्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः"स्मृतिश्च-(गीता अ०७) दैवी ह्येषा गुणमयी,मम माया दुरत्यया॥ मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां तरन्ति वे॥१४॥ (अ०५) ज्ञानेन तु तदज्ञान, येषां नाशितमात्मनः॥ तेषामादित्यवज्ज्ञानं, प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥” इत्यादि । एवं "ब्रह्मविद्बह्मैव भवति" "तरति शोकमात्मवित्," "तरत्यविद्या वितता हृदि यस्मिन्निवेशिते । योगी मायाममेयाय,तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥१॥"इति "अविद्यायाः परं पारं तारयसि" इत्यादिः श्रुतार्थापत्तिश्च-"ब्रह्मज्ञानाद् ब्रह्मभावः श्रूयमाणस्तद्वयवधायकाज्ञाननिवृत्तिमन्तरेण नोपपद्यत इति ज्ञानादज्ञाननिवृत्तिं गमयति" । " अनृतेन हि प्रत्यूढाः "नीहारेण प्रावृताः," "अन्ययुष्माकमन्तर," (गीताअ०५) "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं,तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥"इत्यादिश्रुतिस्मृ. तिशतेभ्योऽज्ञानमेव मोक्षव्यवधायकत्वेनावगतम्, एकस्यैव तत्त्वज्ञानेनाज्ञाननिवृत्त्यभ्युपगमाच, नान्यत्र व्यभिचारदर्शनेन ज्ञान- स्याज्ञानीनवर्तकत्ववाधोऽपीति चेत्, न, एतस्यैकजीवमुक्तिवादस्य श्रद्धामात्रशरणत्वात्, अन्यथा जीवान्तरप्रातभासस्य स्वाभिक- जी वान्तरप्रीतभासवीद्वभ्रमत्वे जीवप्रतिभासमात्रस्यैव तथात्वं स्यादिति चार्वाकमतसाम्राज्यमेव वेदान्तिना प्राप्तं स्यात् । उक्तश्रु- कर्मण एवं व्यवधायकत्वं क्षीणकर्मात्मन एव च ब्रह्मभूयं प्रतिपादयितुमुत्सहन्त इति किं शशशृङ्गसहोदराज्ञानादिकल्पनया तदभिप्रायविडम्बनेन । निर्विकल्पकब्रह्मबोधोऽपि शुद्धद्रव्यनयादेशतामेवावलम्बताम्, सर्वपर्यायनयविषयव्युत्क्रम एव तत्प्रवृत्तेः, न तु सर्वथा जगदभावपक्षपीततामिति सम्यग्दृशांवचनोद्दारः॥ शान्द एव स इत्यत्र तु नाग्रहः, यावत्पर्यायोपरागासम्भववि- चारसहकृतेन मनसैव तद्ग्रहसम्भवाद, न केवलमात्मनि, किं तु सर्वत्रैव द्रव्ये पर्यायोपरागानुपपत्तिप्रसूतविचारे मनसा निर्विकल्पक तयस्तु एप प्ररपयोऽनुभूपने उपाय मम्मती-"पञ्जयणपयुकतं यत्त्य दववियस्स यसप्वं ॥जार दविप्रोवोगो अपच्छिमरियप्पनिव- पणो ॥१-८॥ इति" । पर्यापनपन व्युत्मान्तं गृहीत्या विचारेण मुक्तं, पस्तुद्रव्यापिकस्य पक्तव्यं, यथा पटो द्रव्यमित्यत्र पटरयविशिष्टस्प परिधिष्मस्प द्रष्य विशिष्टेनापरिच्छिनेन महामेदान्वयासम्भा इति मृदेव द्रष्पमिति द्रव्याधिकप्रत्तिः, तत्रापि पक्ष्मेधिकापामपरापरद्रपार्थिरुप्रतिनिद्रव्योपयोगा, न विद्यतेपथिमे उत्तरे विकल्पनिर्वचने सविकल्पकधीप्यवदारी पत्र म क्या उद्गमहापमान इति यारन्, ततः परं विफलपवचनाप्रते।इस्पेतस्था अर्थः॥ "तच्चमासि" इस्पादायप्पात्मनस्त- सदस्पद्रप्यपर्यायोपरागासम्मपरिवारशतप्रयमावेष शुद्धद्रव्यविषयं निर्षिकरपकमिति शुष्टौ पटज्ञानाद्रमशानस्प को भेदः । एकत्र सदैतमपरय प शानात विपप इत्येतापति भेद स्यौतरकालिक सविकरपकमेव साक्षीति सविरुषपकारिकल्पफाययोर- प्पनेकान्त एप श्रेयान् । सदुक्तम्-" परिअप्पणिविअप्प, श्य परिसं जो भगन्न अपि ॥ गरियप्पमेर या गि-हाण ग मनिन्छिो ममए ॥१-३५।। इति न प निसिपको द्रव्योपयोगोऽग्रह प्रतिमा विचारमहरुतमनौजन्यरपानुपपाती, विपारस्पेदारममत्वेने राजन्यस्य पुपरसाकायस्प मस्प नैयपिकापायरूपस्पैयाम्पगमाव, अपाये नामजात्यादियोजनानि पमस्तु शुद्रप्पादेशरूपयुतनिधितानिरिक्त एवेति रिमायनीयं स्वसमपनिष्णात मनाकारयोयस्य मानसरये "नावेदषि- न्मनु तं पृरत पेदेनेय तटेदितथ्य" " स्यौपनिषदं पुरुष पछामि" इत्यादिश्रुतितिरोप इति पेत् शास्वेऽपि "यवापानम्: दिन," "न पापा गृमते, नापि पाया, "पतो पायो निरन्।" इत्यादिश्रुतिविरोधस्तर पर। अब पारगम्पस्यनिरोधकवीनां मुष्पपरिपपत्यागादित्वेनोपपनिर्मादायगय मणि महापापगपातिपादनाव, मनसि गपापमदामापात् " RECEN यन्मनसा न मनुते " इत्यादिविरोध एव ॥ " सर्वे वेदा यत्रैकं भवन्ति स मानसीन आत्मा मनसैवानुद्रष्टव्यः इत्यादि- श्रुती मानसीनत्वं तु मनस्युपाधावुपलभ्यमानत्वं, न तु मनोजन्यसाक्षात्कारत्वं, मनसैवेति तु कर्तरि तृतीया आत्मनोऽकर्तृत्व- प्रतिपादनार्था मनसो दर्शनकर्तृत्वमाह, न करणतां, औपनिषदसमाख्याविरोधात् । कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरकृतिहीं िरित्येतत्सर्व मन एवं" इति श्रुतौ मृघट इतिवदुपादानकारणत्वेन मनःसामानाधिकरण्यप्रतिपादनात् , तस्य निमित्तकारणत्वविरोधाचेति चेत्, न, कामादीनां मनोधर्मत्वप्रतिपादिकायाः श्रुतेर्मनःपरिणतात्मलक्षणभावमनोविषयताया एव न्याय्यत्वात्, “मनसा ह्येव पश्यति, मनसा शृणोति" इत्यादौ मनःकरणस्यापि श्रुतेदर्दीर्घकालिकसंज्ञानरूपदर्शनग्रहणेन चक्षुरा- दिकरणसत्त्वेऽपि तत्रैवकारार्थान्वयोपपत्तेः, त्वन्मतेऽपि ब्रह्मणि मानसत्वविधिनिषेधयोवृत्तिविपयत्वतदुपरक्तचैतन्याविषयत्वा- भ्यामुपपत्तेश्च । शब्दस्य त्वपरोक्षज्ञानजनकत्वे स्वभावभङ्गप्रसङ्ग एव स्पष्टं दूपणम् । न च प्रथमं परोक्षज्ञानं जनयतोऽपि शब्द- स्य विचारसहकारेण पश्चादपरोक्षज्ञानजनकत्वमिति न दोष इति वाच्यम्, अर्धजरतीयन्यायापातात् । न खलु शब्दस्य परोक्षज्ञा. नजननस्वाभाव्यं सहकारिसहस्रेणाप्यन्यथाकर्तुं शक्यं, आगन्तुकस्य स्वभावत्वानुपपत्तेः। न च संस्कारसहकारेण चक्षुपा प्रत्यभि- ज्ञानात्मकप्रत्यक्षजननवदुपपत्तिा, यदंशे संस्कारसापेक्षत्वं तदंशे स्मृतित्वापातो यदंशे च चक्षुःसापेक्षत्वं तदंशे प्रत्यक्षापात इति भियैव प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरत्वमिति जैनैः स्वीकारान् । “स्वे स्वे विषये युगपज्ज्ञानं जनयतोश्चक्षुःसंस्कारयोरार्थसमाजे- नैकज्ञानजनकत्वमेव पर्यवस्यति, अन्यथा रजतसंस्कारसहकारेणासनिकृष्टेऽपि रजते चाक्षुपज्ञानापत्तेरन्यथाख्यात्यस्वीकारभङ्गप्र- सङ्ग" इति वदस्तपस्वी तूभयात्मकैकज्ञानाननुव्यवसायादेव निराकर्तव्या,अन्यथा रजतप्रमेऽप्युभयात्मकतापत्ते,पर्वतो वद्धिमा- नित्यनुमितावपि उभयसमाजादशे प्रत्यक्षानुीमत्यात्मकतापत्तेय । अथ मनस इव शब्दस्य परोक्षापरोक्षशानजननस्वभावागी. कागददोषः, मनस्त्वेन परोक्षशानजनकता, इन्द्रियत्वेन चापरोक्षज्ञानजनकतेत्यस्ति मनस्यवच्छेदकभेद इति चेत्, शब्दस्यापि विषयाजन्यज्ञानजनकत्वेन वा ज्ञानजनकत्वेन वा परोक्षज्ञानजनकता योग्यपदार्थनिरूपितत्वम्पदार्थाभेदपरशन्दत्वेन पापरोक्षशान• जनकतेति पथ नारच्छेदफभेदः । धार्मियस्त्वमसीत्यादौ व्यभिचारवारणाय निरूपितान्तं विशेषणं, इतरण्यावत्यं तु स्पष्टमेव । एतच दशमस्त्वमसि ' 'राजा त्वमसि' इत्यादिवाक्यादशमोऽहमस्मि राजाहमस्मीत्यादिसाक्षात्कारदर्शनात्कल्प्यते, नाई दशम इत्यादिअमीनवृतरत इत्यमेव सम्भवात् । साक्षात्कारिनमे साक्षात्कारिविरोधिज्ञानत्वेनैव विरोधित्वकल्पनात् । न च वत्र वारपात्पदार्थमायोपस्थिती मानसः ससर्गपोध इति वाच्यम्, सर्वत्र वाक्ये तथा वक्तुं शक्यत्वेन शब्दप्रमाणमात्रोच्छेदप्र. सद्गादिति चेत्, मैवम्, दशमत्त्वमसीत्यादौ वाक्यात्परोक्षशानानन्तरं मानसशानान्तरस्यय भ्रमनियर्तकत्वकल्पनात, धार्मिकस्त्व- मसीत्यादौ रिशेप्याशस्य योग्यत्वादेव योग्यपदार्थनिरूपितेत्यत्र योग्यपदार्थवावच्छेदकविशिष्टत्यस्यावश्यवाच्यत्वेन महावा. पपादपि सत्पदार्यतावच्छेदकस्यायोग्यत्वेनापरोधानासम्भवाय, अयोग्यरित्यागयोग्यांशोपादानाभिमुखलक्षणायचमेय योग्य पदार्थत्वमित्युक्तोष पार्मिकस्त्वमसीत्पादावपि शुद्धापरोक्षविषयत्वे तायावर्तकविशेषणदानानुपपत्तिा तथा च योग्यलक्ष्यपरत्वग्रहे उदारणस्थानदौलम्यं । अपंप विषयोऽस्माकं पर्यापरिनिर्माण शुद्धद्रव्यविषयतापर्यवसायकस्य द्रव्यनयस्येत्यलं प्रभवादेन॥ कित त्वम्पदार्यामेदपाशमतेनापरोषशानजनकत्वोक्तो 'यूपं राजान' इत्यतोऽखिलसम्बोपविशेष्पकराजत्वप्रकारकापरोक्ष- शाम्दापचिा, वा वाशमानसाम्पुपगमे चान्यत्र कोपराधः । एतेन" एकवचनान्तत्वम्पदार्थग्रहणेऽपि न निस्तारण,"एकस्मिभेष यूयमिति प्रयोगेऽगतेय,एकाभिप्रायकत्वम्पदग्रहणे च तदमिप्रायकशम्दत्वेन तपच्छाब्दयोघहेतुत्वमेव युक्तम् । अत एव 'वाक्यादपि द्रव्यादेशावखण्डः,पदादपि च पर्यायार्थादेशात् सखण्ड: शाब्दबोध इतिजैनी शास्त्रव्यवस्था । तस्मान भन्दस्यापरोक्ष- ज्ञानजनकत्वम् । एतेन "अपरोक्षपदार्थाभेदपरश्चन्दत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वं,अत एव शुकिरियमिति वाक्यादाहत्य रजतश्रमनिवृत्तिः, एवंच चैतन्यस्य वास्तवापरोक्षत्वादपरोक्षज्ञानजनकत्वं महावाक्यस्य इत्यपि निरस्तम्, वास्तवापरोक्षस्वरूपविषयत्वस्य त्वनीत्या तत्त्वमस्यादिवाक्ये सम्मवेऽपि 'दशमस्त्वमसि'इत्यादावसम्भवाद, निवृत्ताज्ञानविषयत्वस्य च शान्दनोधात्पूर्वममावात् यदा कदाचि- भिवृसाज्ञानत्वग्रहणे पर्वतो वहिमानित्यादिवाक्यानामप्यपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वप्रसगाव " यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' "सत्यं ज्ञानमनन्तं" इत्यादिवाक्यानामपरोक्षस्वरूपविषयतयाऽपरोक्षज्ञानजनकत्वे महावाक्यवैयापातान ।। किन घटोऽस्तीतिशाब्दे चाक्षुषत्वमप्यापतेत,अपरोक्षपदार्थामेदंपरशब्दादिवापरोक्षपक्षसाध्यकानुमितिसामग्रीतोऽपरोक्षानुमिविरपि च प्रसज्येत । एवं च भिन्नविषयत्वाद्यप्रवेशेनैवानुमितिसामय्या लाघवादलवत्वमिति विशेषदर्शनकालीनभ्रमसंशयोत्तरप्रत्यक्षमा- बोच्छेद इति बहुतरं दुर्घटम् । एतेन प्रमात्रभेदविषयत्वेनापरोक्षज्ञानजनकत्वम्" इत्यपि निरस्तम्, 'सर्वत्रत्वादिविशिष्टोऽसि'इत्यादि- वाक्यादपि तथाप्रसगाव, ईश्वरो मदभिन्नः, चेतनत्वान, मद्वद्, इत्यनुमानादपि तथाप्रसङ्गाचेति । "महावास्यजन्यमपरोक्षं शुद्धब्रह्मविषयमेव केवलज्ञानम्” इति वेदान्तिनां महानेव मिथ्यात्वामिनिवेश इति विभावनीय सूरि(सुधी)भिः॥ इदमिदानी निरूप्यते-'केवलज्ञानं स्वसमानाधिकरणकेवलदर्शनसमानकालीनं न वा,' 'केवलज्ञानक्षणत्वं स्वसमानाधि- करणदर्शनक्षणाव्यवहितोचरत्वव्याप्यं न वा ? ' एवमाद्याः क्रमोपयोगवादिनां जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणपूज्यपादानां, पुगपदुपयोगवादिनां च मलयादिप्रकृतीनां, 'यदेव केवलज्ञानं तदेव केवलदर्शनम्' इतिवादिनां च महावादिश्रीसिद्धसे- नदियाकराणां मापारण्यो विप्रतिपत्तयः ।। यत्तु युगपदुपयोगवादित्वं सिद्धसेनाचार्याणां नन्दिवृत्तायुक्तं तदम्युपग- मवादाभिप्रायेण, न तु स्वतन्त्रसिद्धान्तामिप्रायेण, क्रमाक्रमोपयोगद्वयपर्यनुयोगानन्तरमेव स्वपक्षस्य सम्मतावृद्भावितत्वा- दिवि द्रष्टयम् । एतच तत्वं सयुक्तिकं सम्मतिगाथाभिरेव प्रदर्शयाम:-"मणपन्नवनाणंवो, नाणस्स य दरिसणस्स य विसेमो।।कालनाणं पुणद-सर्गति नाणति य समागाकाण्डर-३॥"युगपदुपयोगद्वपाभ्युपगमवादोऽयम्-मनापर्यापज्ञानमन्ता पर्यवसानं यस्य म तथा, ज्ञानस्प दर्शनस्य च विशेषः पृथग्भाव इति साध्या च छद्मस्थोपयोगत्वं हेतुटव्या, तथा घ प्रयोगः-पतुरचक्षुरपधिनानानि चतुरचक्षुरवधिदर्शनेम्पा पृथकालानि, छपस्योपयोगात्मकवानरयातू, श्रुतमना- पपिज्ञानयत् । पाक्यार्थविषये श्रुतधाने, मनोद्रव्यविक्षेपालम्बने मनापर्यायाने चादर्शनस्वमारे मत्यधिजाइनोपयोगा- दिनकालत्वं प्रसिदमेवेति टीकाकृता । दर्शनापथकालत्वस्य कुत्राप्येकस्मिन्मसिसाघयिषितत्वात् । स्वदर्शनपृथकाल त्वस्य च सिसाधपिपितरयोकरशान्तयोरमावासावरणत्वं हेता, व्यतिरेकी च प्रयोगः, तजन्यवं या हेता, 'यपअन्यं तपतः पृथकालम्' इति सामान्यव्याप्तौ यथा दण्डा पट इति च दृष्टान्त इति तु युक, केवलज्ञानं पुर्नर्दर्शन दर्शनोपयोग इति पा ज्ञानं ज्ञानो पयोग इति का समान तुस्पकाले तुल्पकालीनोपपोगदपारमामित्यर्थः, प्रयोगश्च-केवलिनो ज्ञानदर्शनोपयोगावेककालीनौ, युगपदावि तस्वमारत्वान, यावेवं दावेद, यथा प्रकाशतापी । अयमभिप्राय आगमविरोधीवि केपाभिमतं, तानविक्षिपनाह (सम्मति)-"केई मगति जदया, आप या पासद जिलो ति मुत्तमपलंगमाणा, तित्यपरासायगामीरू ॥२-४११" केचिन्जिनभद्रानुयायिनो भणन्ति-'यदाजानाति तदान पश्यति जिन' इति। सूत्रं-"केवली गं मते इमं रयणप्पमं पुढवि आयोरहिं पमाणेहि हेऊहिं संठाणेहिं परिवारहिं जं समयं जाणइ णो तं समयं पासइ ?, हंता गोयमा! केवली णे" इत्यादिकं अवलम्बमानाः। अस्य च सूत्रस्य किलायमर्थस्तेपामभिमता-'केवली सम्पूर्णवोधः, णमिति वाक्यालकारे । मते इति भगवन् इमारत्नप्रभामवर्धाभिधानां पृथ्वीमाकारैः समनिम्नोन्ननादिभिः,प्रमाणे यादिभिः, हेतुभिरनन्तानन्तप्रदेशिकैः स्कन्ध,संस्थानः परिमण्डलादिभिः, परिवारैर्धनोदधिवलयादिभिः । जं समयं णो तं समयमिति च 'कालाधनारेत्यन्तसंयोगे' (पा.२-३-५.) इति द्वितीया सप्तमीचाधिका,तेन यदा जानाति न तदा पश्यतीति भावः । विशेषोपयोगः सामान्योपयोगान्तरितः, सामान्योपयोगय विशे- पोपयोगान्तरितः,तत्स्वाभाव्यादिति प्रश्नार्थः ।उत्तरं पुनः हंता गोयमा!'इत्यादिकं प्रश्नानुमोदकं इंतेत्येतन्निगमनप्रकारण, गौतमीत गोत्रेणामंत्रणं प्रश्नानुमोदनाथ पुनस्तदेव सूत्रमुच्चारणीयं हेतुप्रश्नस्य चात्र सूत्रे उत्तरं। "सागारे से नाणे हवइ, अणागारे से दंसणे" इति,साकारं विशेषावलम्बि अस्य केवलिनो ज्ञानं भवति, अनाकारमतिकान्तविशेष सामान्यावलम्बि दर्शनं । न चानेकप्रत्ययोत्प- तिरेकदा निरावरणस्यापि तत्स्वाभाच्यात् । न हि चक्षुर्शनकाले श्रोत्रज्ञानोत्पत्तिरुपलभ्यते । न चावृतत्वात्तदा तदनुत्पत्तिः, स्वसमयेऽप्यनुत्पत्तिप्रसङ्गात् । न चाणुना मनसा यदा यदिन्द्रियसंयोगस्तदा तज्ज्ञानमिति क्रमः परवाद्यभिमतोऽपि युक्तिमान्?, सर्वाङ्गीणसुखोपलम्भायुपपत्तये मनोवर्गणापुद्गलानां शरीरव्यापकत्वस्यैव कल्पनाद सुपुप्तौ ज्ञानानुत्पत्तये त्वङ्मनोयोगस्य ज्ञान- सामान्ये हेतुत्वेन रासनकाले त्याचरासनोभयोत्पतिवारणस्येत्यमप्यसम्भवाच । ततो युगपदनेकप्रत्ययानुत्पत्तों स्वभाव एव कारणं नान्यत्, सन्निहितऽपि च द्वयात्मके विपये सर्वविशेषानेव केवलज्ञानं गृह्णाति, सर्वसामान्यानि च केवलदर्शन मिति स्वभाव एवानपोरिति । एते च व्याख्यानास्तीकराशातनाया अभारवा तीर्थकरमाशातयन्तो न विभ्यतीति यावत् । एवं हि नि:- मामान्यस्य निर्विशेषस्य वा वस्तुनोभावेन न किनिनानाति केवली न किश्चित्पश्यतीत्यधिक्षपस्यैव पर्यवसानात् । न चान्य- हामुरूपापसर्जनविषयतामपेक्ष्योभयग्राहित्वेऽप्युपयोगक्रमाविरोधा, मुस्योपसर्जनभावेनोभयग्रहणस्य श्योपशमविशेषप्रयोज्प- त्वात् , केवलशने उपस्पशनीययावद्विषयतोपगमेऽवग्रहादिसङ्कीर्णरूपप्रसद्गाद्, उक्तसूत्रस्य तु न भवदुक्त एवार्थः, किं त्वयं, 'जालीमा रत्नप्रमा पृथिवी वैराकारादिभिः समकं तुल्यं जानाति, न तैराकारादिमिस्तुल्यं पश्यतीति किमेव ग्राय , हंता-एवमिः स्पनुमोदना, तो हेतौ पृष्टे सति तत्प्रतिवचनं मिनालम्बनप्रदर्शकं वज्ञानं साकारं भवति यतो दर्शनं पुनरनाकारमित्यतो मियाटम्पनावती प्रत्ययाविति' टीकाकृतः । अत्र यद्यपि समय इत्यत्र जं इति अम्भावः प्राकृतलक्षणात् , यत्कृतमित्यत्र ज फपमिति प्रपोगस्य लोफेपि दर्शनादिति वक्तुं शक्यते, तथापि तृतीयान्तपदवाच्यैराकारादिभिर्लप्ततीयान्तसमासस्थयत्पदार्थस्य समपदार्यस्प मान्यूनानतिरिक्तधर्मविशिष्टस्य रत्नप्रभायां मिमलिङ्गत्वादनन्यय इति यत् समकमित्यादिक्रियाविशेषणत्वेन म्यास्येपम् । रमप्रभाकर्मकामादिनिरूपितयावदन्यूनानतिरिक्तपियताकज्ञानवान् न नाशवावदन्यूनानतिरिक्तविषयताकदर्श नवान् फेवलीति फलितीर्थः । यदि च तारमस्य विशिष्टदर्शनस्य निपेभ्यस्याप्रसिद्ध तधिपधः "असतो णस्थि णिमहो" (विशे, १५७४) इत्यादिवचनादिति यत्ममीक्ष्यते, उदा कियाधानमाख्यातम्' इति वैयाकरणनयाश्रयणेन रतप्रभाकर्मकाकारा- दिनिरूपित्यापदन्यूनानतिरित्तविषयता मान, न तार केवलिकर्डक दर्शनमित्येव बोधा, सर्वनयात्मके भगवत्प्रवचने यथो. पपभान्यतरनपारणे दोषामावादिति तु वयमालोपयामः । इतयोगपपादपि बलेनोपयोगपोगपपमापवतीत्याह-"केवलनाणा• वरण-क्खयजायं केवलं जहा नाणं । तह दूसणं पि जुज्जइ,णियआवरणक्खयस्सते ॥२-५॥" स्पष्टा,नवरं निजावरणक्षयस्यान्त इति दर्शनावरणक्षयस्यानन्तरक्षण इत्यर्थः । न चैकदोमयावरणक्षयेऽपि स्वभावहेतुक एवोपयोगक्रम इत्युक्तमपि साम्प्रतं, एवं सति स्वभावेनैव सर्वत्र निर्वाह कारणान्तरोच्छेदप्रसङ्गाव, कार्योत्पत्तिस्वभावस्य कारणेनैव तत्क्रमस्वभावस्य तत्क्रमणैव निर्वा- ह्यत्वाच । एतेन " सर्वव्यक्तिविषयकत्वसर्वजातिविषयकत्वयोः पृथगेवावरणक्षयकार्यतावच्छेदकत्वादर्थतस्तदवच्छिन्नोपयोगद्वय- सिद्धिः" इत्यप्यपास्तम् । तत्सिद्धावपि तत्क्रमासिद्धेरावरणद्वयक्षयकार्ययोः समप्राधान्यनार्थगतरप्रसराच । न च मतिश्रुतज्ञाना- वरणयोरेकदा क्षयोपशमेऽपि यथा तदुपयोगक्रमस्तथा ज्ञानदर्शनावरणयोर्युगपत्क्षयेऽपि केवलिनामुपयोगक्रमः स्यादिति शङ्कनीयं, तत्र श्रुतोपयोगे मतिज्ञानस्य हेतुत्वेन शाब्दादौ प्रत्यक्षादिसामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वेन च तत्सम्भवात् । अत्र तु क्षीणावरणत्वेन परस्परकार्यकारणभावप्रतिवध्यप्रतिवन्धकभावाद्यभावेन विशेषात् । एतदेवाह-"भण्णइ खीणावरणे, जह मइनाणं जिणे ण संभवइ ॥ तह खीणावरणिज्जे, विसेसओ देसणं णत्थि ॥२-६॥" भण्यते निश्चित्योच्यते, क्षीणावरणे जिने यथा मतिज्ञानं मत्यादिज्ञानं अवग्रहादिचतुष्टयरूपंवा ज्ञानं न सम्भवति, तथा क्षीणावरणीये विश्लेपतो ज्ञानोपयोगकालान्य- काले दर्शनं नास्ति क्रमोपयोगत्वस्य मत्याद्यात्मकत्वव्याप्यत्वात्सामान्यविशेषोभयालम्बनक्रमोपयोगत्वस्य चावग्रहाद्यात्मक- त्वव्याप्यत्वात्केवलयोः क्रमोपयोगत्वे तत्त्वापत्चिरित्यापादनपरोऽयं ग्रन्थः । प्रमाणं तु-"केवलदर्शनं केवलज्ञानतुल्यकालोत्पत्तिकं, तदेककालीनसामग्रीकत्वात् , तादृशकार्यान्तरवत्", इत्युक्ततर्कानुगृहीतमनुमानमेवेति द्रष्टव्यम् । न केवलं क्रमवादिनोऽनुमान- विरोधः, अपि त्वागमविरोधोऽपीत्याह-"सुत्तमि चेव साइ-अपज्जवसियं वि केवलं कुत्तं । सुत्तासायणमीर-हि तं च दद्वन्वयं - -wom होइ ॥२-७॥" साद्यपर्य रमिते केवलज्ञानदर्शने सूत्रे प्रोक्त, क्रमोपयोग तु द्वितीयसमये तयोः पर्यवसानमिति तोपर्यवसितवा ! तेन मुबाशातनाभीरभिःक्रमोपयोगवादिमिस्तदपि द्रष्टव्यं । चोऽप्यर्थः । न केलं "केवली गं भंते इमं रयणप्पमं पुढर्षि' इत्याद्युक्तसूत्रयथाश्रुतार्थानुपपत्तिमात्रमिति भावः । न च द्रव्यापेक्षयाऽपर्यवसितत्वं समाधेयं, पविषयप्रश्नाचरा श्रुतेः । न च 'अर्पितानर्पितसिद्ध इति तत्वार्थ (५६०३१) सूत्रानुरोधेन द्रव्यार्पणयाऽश्रुतयोरपि तयोः करपन युक्तं, अन्यया पर्यापाणामृत्पाद निगमात्मकत्वाद् भक्तोऽपि कथ तयोरपर्यवसानतेति पर्यनुयोज्यम्!, पद्धविच्छिन्ने क्रमिकत्वामिदिः तदपिच्छिन्नेऽपर्यवसि तत्वान्वयस्थ निराकाक्षत्वात् , अन्यथा ऋजुत्यवक्रत्ये अपर्यवमिते इति प्रयोगस्यापि प्रसाद, मम तु रूपरसात्मकद्रव्यदक्रम- भाविभिन्नोपाधिकोत्पादरिंगमात्मकत्येऽपि केवलिद्रव्यादन्यतिरेकतस्तयोरपर्ययमितत्वं नानुपएवम् । अथ पर्यापत्वारच्छेदकधर्म: विनिमोकेण शुद्धद्रव्यार्थादेशप्रवृत्तः क्रमकान्तेऽपि केरलयोरपर्यवमितत्यमुपपत्स्यते, अत एव पर्यायद्रव्पपौरादिष्टद्रव्यपर्यापन सिद्धान्ते गीयते । तत्तदवच्छेदकविनिमोकस्य विवक्षाधीनत्वादिति चेत्, किमयमुक्तधर्मविनिर्मोकस्तसत्पदार्यतावच्छेदकविशिष्टयो- रभेदान्वयानुपपच्या शुद्धद्रव्यलक्षणया, उत उक्तधर्मस्य विशेषणत्वपरित्यागेनोपलक्षणत्वमात्र विवक्षया ! आये आयपद एवं लक्षणायां शुद्रव्यं शुद्धात्मद्रव्यं वाऽपर्ययसितमित्येव शोधः स्यात्, सादित्यस्पापि तत्रान्वयप्रवेशे तु केवलिद्रव्यं साधपर्य- वमितमित्याकारक एष, उभयपदलक्षणायां तु शुद्धद्रव्यविषयको निर्विकल्पक एस बोध इति केवलज्ञानदर्शने सापपर्यवसिते इति चोधस्य कथमप्यनुपपचिः । अन्त्ये घ केवलत्वोपलक्षितात्मद्रव्यमारग्रहणे तत्र सादित्यान्चयानुपपत्तिा, केवलिपर्यायग्रहणे च नवरिधोपचारमध्ये 'पर्याये पर्यायोपचार' एवाश्रयणीया स्यादिति समीचीनं द्रम्पार्यादेशसमर्थन । नियतोपलक्ष्यतावच्छेदकरूपा- - भावेऽपि सम्मुग्धोपलक्ष्यविषयकतादृशवोधस्वीकारे च 'पर्यायोऽपर्यवसित' इत्यादेरपि प्रसक्तिद्रव्यार्थतया केवळज्ञानकेवलदर्शन- योरपर्यवसितत्वाभ्युपगमे द्वितीयक्षणेऽपि तयोः सद्भावप्रसक्तिः, अन्यथा द्रव्यार्थत्वायोगात् । तदेवं क्रमाभ्युपगमे तयोरागमविरोध इत्युपसंहरन्नाह-"संतमि केवले दं-सणम्मि नाणस्स संभवो णत्थि । केवलनाणम्मि य दं-सणस्स तम्हा अनिहणाई ॥२-८॥" स्वरूपतो द्वयोः क्रमिकत्वेऽन्यतरकालेऽन्यतराभावप्रसङ्गः, तथा चोक्तवक्ष्यमाणदूषणगणोपनिपात तस्माद् द्वावप्युपयोगो केनलिनः स्वरूपतोऽनिधनावित्यर्थः । इत्थं ग्रन्थकदक्रमोपयोगद्वयाभ्युपगमेन क्रमोपयोगवादिनं पर्यनुयुज्य स्वपक्षं दर्शयितुमाह- "दसणनाणावरण-क्खए समाणम्मि कस्स पुन्बयरो(रं) ॥ होज व समओप्पाओ, हंदि दुवे णस्थि उवओगा ॥ २-९॥ सामान्यविशेषपरिच्छेदावरणापगमे कस्य प्रथमतरमुत्पादो भवेत् ? अन्य तरोत्पादे तदितरस्याप्युत्पादप्रसङ्गात् , अन्यतरसामय्या अन्यतरप्रतिवन्धकत्ये चोभयोरप्यभावप्रसङ्गात् “ सव्याओ लद्धीओ सागारोवओगोवउत्तस्सेति” वचनप्रामाण्यात्प्रथमं केवल ज्ञानस्य पश्चात्केवलदर्शनस्योत्पाद इति चेत् , न, एतद्वचनस्य लब्धियोगपद्य एव साक्षित्वादुपयोगक्रमाक्रमयोरौदासीन्यात् । योगपद्येनापि निर्वाहेऽर्थादर्शनेऽनन्तरोत्पत्यासिद्धेः एकक्षणोत्पत्तिककेवलज्ञानयोरेकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोः केवलिनोः क्रमिको- पयोगद्वयधाराया निर्वाहयितुमशक्यत्वाच । अथ ज्ञानोपयोगसामान्ये दर्शनोपयोगत्वेन हेतुतेति निर्विकल्पकसमाधिरूपच्छमस्थ- कालीनदर्शनात् प्रथमं केवलज्ञानोत्पत्तिः केवलदर्शने केवलज्ञानत्वेन विशिष्य हेतुत्वाच द्वितीयक्षणे केबलदर्शनोत्पत्तिः, ततश्च ऋमिकसामग्रीद्वयसम्पत्त्या क्रमिकोपयोगद्वयधारानिर्वाह इति, एकक्षणन्यूनाधिकायुष्कयोस्त्वेकक्षणे केवलज्ञानोत्पत्यस्त्रीकार एव गतिरिति चेत् ,न, "दसणपुव्वं नाणं (२-२२)" इत्यादिना तथाहेतुत्वस्य प्रमाणाभावेन निरसनीयत्वात् , उत्पन्नस्य केवलज्ञानस्य धायिकमावत्वेन नाशारोगाम । न च मुक्तिसमये क्षायिकचारित्रनाशवदुपपचिः क्षायिकत्वेऽपि तस्य योगस्यर्यनिमित्वकत्वेन निमिचनाशनाश्यत्वात् , केवलज्ञानस्य चानमित्तिकत्वादुत्पत्तौ ज्ञप्तौ चाधरणक्षयातिरिक्तनिमित्तानपेक्षत्वेनैव तस्य स्वतन्त्रप्रमाण । त्वव्यवस्थिता, अन्यथा ' सापेक्षमसमर्थम्' इति न्यायात्तत्राप्रामाण्यप्रसङ्गात् । एतेन 'केवलदर्शनसामग्रीत्वेन स्वस्पैव स्वना- शकत्वमिति केवलज्ञानक्षणिकत्वम्' इत्यप्यपास्तम्, अनैमित्तिक क्षणिकत्वायोगाद, अन्यथा तरक्षण एव तत्क्षणचिकायें नाशक इति सर्वव सूक्ष्म सूत्र नयसाम्राज्यस्य दुर्निवारत्वादिति किमविपल्लवितेन ? । नन्वियमनुपपचिः क्रमोपयोगपक्ष एवे- त्यक्रमौ द्वाचुपयोगौ स्तामित्याशङ्कते मल्लवादी, "भवेद्वा समयमेककालमुत्पादस्तयोरिति" तत्रैकोपयोगवादी ग्रन्यकृत् सिद्धा न्तयति, हंदि ज्ञायता, द्वावुपयोगी नैकदेति, सामान्य विशेषपरिच्छदात्मकत्वात्केवलज्ञानस्य, यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनमित्य- त्रैव निर्भर, उभयहेतुसमाजे समूहालम्बनोत्पादस्यैवान्यत्र दृष्टत्वान्नात्रापरिदृष्टकल्पनालेश इति भावः । अस्मिन्नेव वादे केवलिना सर्वज्ञतासम्भव इत्याह-"जइ मव्वं सायार, जाणइ एकसमएण सध्यण्णूाजुन्नइ सपा वि एतं, अहवा सव्वं न जाणाइ।।२-१०॥" यदि सर्व सामान्यविशेषात्मक जगत्, साकार तत्तजातिव्यक्तिवृत्तिधर्मविशिष्टं। साकामिति क्रियाविशेषणं वा । निरवञ्छि- अवचजातिप्रकारतानिरूपिततत्तद्वयक्ति विशेष्यतासहितं परस्परं यावद्रव्यपर्यायनिरूपितविपयतासहितं वा यथा स्याचथेत्यर्थः । जानात्येशसमयेन सर्वज्ञः पश्यति चेति शेषः, तदासदापि सर्वकालंयुज्यते,एव सर्वज्ञत्वं सर्वदर्शित्वं चेत्यर्थः । अथवेत्येतद्वप रीत्ये, सर्व न जानाति स न जानीयादेकदेशोपयोगवर्चित्वान्मतिज्ञानादित्यर्थः । तथा च कैलज्ञानमेव केवलदर्शनमिति स्थितम्। अव्यक्तत्वादपि प्रथमदर्शनं केवलिनि न सम्भवतीत्याह-"परिसुद्धं सायार, अविअ दसणं अणायारं ।। ण य सीणा- वरणिज्जे, जुजइ स(सु)वियत्तमविअत्तं ॥२-११॥” ज्ञानस्य हि व्यक्ततारूपं, दर्शनस्य पुनरव्यक्तता । न च क्षीणावरणेऽर्हति व्यक्तताऽव्यक्तते युज्यते,नतः सामान्यविशेषज्ञेयसंस्पर्युभयकस्वभाव एवायं केवलिप्रत्यय', न च ग्राह्यद्वित्वाद्ब्राकद्वित्वमिति सम्भावनापि युक्ता, केवलज्ञानस्य ग्राह्यानन्त्येनानन्ततापत्तेः, विषयभेदकृतो न ज्ञानभेद इत्यभ्युपगमे तु दर्शनपार्थक्ये का प्रत्या- शा, आवरणद्वयूक्षयानुभयैकस्वभावस्यैव कार्यस्य सम्भवात् । न चैकस्वभावप्रत्ययस्य शीतोष्णस्पर्शवत्परस्पर विभिन्न स्वभावद्वयवि- रोधः, दर्शनस्पर्शनशक्तिद्वयात्मकैकदेवदत्तवत्स्वभावद्वयात्मकैकप्रत्ययस्य केवलिन्याविरोधात् । ज्ञानत्वदर्शनत्वधर्माभ्यां ज्ञानदर्शन- योर्भेदः, न तु धर्मिभेदेनेति परमार्थः । अत एव तदावरणभेदेऽपि स्याद्वाद एव, तदुक्तं स्तुती ग्रन्थकृतैव (निश्चयद्वात्रिंशिका) "चक्षुर्दर्शनविज्ञानं, परमाणावौष्ण्यरौक्ष्यवत् । तदावरणमप्येकं, न वा कार्यविशेषतः ॥ ८ ॥" इति । परमाणावुष्णरूक्षस्पर्शद्व- यसमावेशवचाक्षुष ज्ञानत्वदर्शनत्वयोः समावेश इत्यर्थः ॥ इत्थं च चाक्षुपज्ञानदर्शनावरणकर्मापि परमार्थत एकं, कार्यविशेषत उपाधिभेदतो वा नैकमिति सिद्धम् । एवमवधिकेवलस्थलेऽपि द्रष्टव्यम् । तदाह-"चक्षुवद्विपयाख्याति-रवधिज्ञानकेवले ॥शेषवृत्ति- विशेषात्तु, ते मते ज्ञानदर्शने ॥३०॥ इति" । चक्षुर्वचाक्षुपवद्विषयाख्यातिः स्पृष्टज्ञानाभावः अस्पृष्टज्ञाने इति यावत्, भावाभाव- रूपे वस्तुन्यभावत्वाभिधानमपि दोषानावहं, शेषा वृत्तयोऽस्पृष्टज्ञानानि ताभ्यो विशेषः, स्पृष्टताविशेषेण वक्ष्यमाणरीत्या स्पृष्टा- विषयवृत्तित्वव्यङ्गयेन, तस्मात्ते अवधिकेवले ज्ञानपदेन दर्शनपदेन च वाच्ये इत्येतदर्थः ॥ क्रमाक्रमोपयोगद्वयपक्षे भगवतो यदापद्यते तदाह-" अद्दिढ अण्णायं, च केवली एव भासइ सया वि॥ एगसमयम्मि हंदी, वयणविगप्पो ण संभवइ।।२-१२॥" आद्यपक्षे ज्ञानकालेऽदृष्टं,दर्शनकाले चाज्ञातं, द्वितीयपक्षे च सामान्यांशेऽज्ञातं विशेषांश चादृष्टं,एवमुक्तप्रकारेण केवली सदा | भापते तत "एकस्मिन् समपे ज्ञावं दृष्टं च भगवान् भापते," इत्येष वचनस्य विकल्पो विशेषो मवाने न मक्तीति गृपता । न घान्यतरकालेऽन्यतरोपलक्षणादुपर्जनतया विषयान्तरग्रहणायोक्तापन विकल्पोपपत्तिः, एवं सति प्रान्तच्छपस्थेऽपि तथाप्रपो- गप्रमशात् । यदा कदाचित् शृङ्गग्राहिकया ज्ञानदर्शनविषयस्या पदार्थस्य तयुद्धापनुप्ररेशादिति स्मर्तव्यम् । तथा च सर्वशत्यं न सम्भरतीत्याह-"अण्णापं पासतो, अदिलु घ अरहा पिणतो॥कि जाण कि पाम, कह मपण्णू चि वा होइ॥२-१३॥" अज्ञातं पश्यन्नदष्टं च जानानः किं जानानि किंवा पश्यति न किश्चिदित्यर्थः । कथं या तस्य सर्पज्ञता भवेत् । न फथमपीत्यर्थः । ज्ञानदर्शनयोपियविधयेशसंख्याशालित्यादप्येकत्समित्याह- केवलनाणमणतं, जहेक तह दंगणं पि पण्णा ।। सागारगणाहि य,णियमपरितं अणागारं ।।२-१४॥" योकत्वं शानदर्शनपोर्न स्यातदानाविषयतादर्शनमनन्त न स्यादिति " अणते केवलनाणे अशते फेवलदमणे" इत्यागमविरोधः प्रसन्येत, दर्शनस्य हि शानादे सामारग्रहणादनन्तविशेषयक्ति- शानादनाकार सामान्यमानावलम्बि कालदर्शन, यतो नियमेनकान्त परीतमल मातीवि कुतो पिपाभावादनन्तता । न च उमपोस्तुल्पविषपत्याविशेषेऽपि मुख्योपसर्जनभाको विशेष इति याच्य, विशेषणविष्यमावेन तत्तभाजनिमानिकसम्मन्धा. वच्छिन्नविपपतया या सत्र कामचारान् । आधिकस्य च तस्यास्मदादियुद्धायाधिरोहात् । एतय निरूपितं तस्य "जज जे जे मारे" इत्यादि आवश्यक)नियुक्ति(२८२)गायाया न्यभेदेन व्याख्याद्वयेऽनेकान्तव्यपस्थायामस्मामिा(पपदपू) अक्रोपोग- दयरादी तुमचतगाथापा साकारे यग्राण दर्शन तस्प नियमोश्यम्भावोयान्तो विशेपास्तावस्याण्डसखण्डोपाधिरूपाणि जाति- रूपाणि या सापान्यानीति हेतोस्तनापरीतमनन्तमित्पकारप्रश्लेपेण व्यापटे, मयादेशानदर्शनयोरपर्यवसिवत्यादिकं नोपपयव इति -3GP यदुक्तं तत्राक्षेपमुट्टतय समाधत्ते-" भण्णइ जह चउनाणी, जुज्जइ णियमा तहेव एवं पि । भण्णइ ण पंचनाणी, जहेव अरहा तहेयं पि ॥२-१५ ॥" भण्यते आक्षिप्यते यथा क्रमोपयोगप्रवृत्तोऽपि मत्यादिचतुर्ज्ञानी तच्छक्तिसमन्वयादपर्यवसितचतुर्ज्ञानो ज्ञातदृष्टभापी ज्ञाता द्रष्टा च नियमेन युज्यते । तथैतदप्येकत्ववादिना यदपर्यवसितत्वादिक्रमोपयोगे केवलिनि प्रेर्यते, तदपि सावं- दिककेवलज्ञानदर्शनशक्तिसमन्वयादुपपद्यत इत्यर्थः । भण्यतेत्रोत्तरं दीयते-यथैवाहन्न पञ्चज्ञानी, तथैवैतदपि क्रमवादिना यदुच्यते, 'भेदतो ज्ञानवान् दर्शनवांश्च,' तदपि न भवतीत्यर्थः । मत्याद्यावरणक्षयेऽप्येकदेशग्राहिणो मतिज्ञानादेरिव, दर्शनावरण- क्षयेऽपि तादृशदर्शनस्य केवलिनि भेदेनानुपपत्तेरिति भावः । इयांस्तु विशेपा-यदभेदेनापि केवलज्ञाने दर्शनसंज्ञा सिद्धान्तसम्मता, न तु मतिज्ञानादिसंज्ञेति, तत्र हेतू अन्वर्थोपपत्यनुपपत्ती एव द्रष्टव्ये । अयं च प्रौढिवादा, वस्तुतः क्रमवादे यदा जानाति तदा पश्यतीत्यादेरनुपपत्तिरेव, आश्रयत्वस्यैवाख्यातार्थत्वात् । लब्धेस्तदर्थत्वे तु घटादर्शनवेलायामपि घटं पश्यतीतिप्रयोगप्रसङ्गाद , घटदर्शनलब्धेस्तदानीमपि विद्यमानत्वात् । चक्षुष्मान् सर्वं पश्यति, न त्वन्ध' इत्यादौ त्वगत्या लब्धेर्योग्यताया वाऽऽल्या- तार्थत्वमभ्युपगम्यत एव, न तु सर्वत्राप्ययं न्यायः, अतिप्रसङ्गात् । न च सिद्धान्ते विना निक्षेपविशेपमप्रसिद्धार्थे पदवृत्ति रवधार्यते, पट्पष्टिसागरोपमस्थितिकत्वादिकमपि मतिज्ञानादेलध्यपेक्षयैवेति दुर्वचं, एकस्या एव क्षयोपशमरूपलब्धेस्ताव- "त्कालमनवस्थानाव, द्रव्याद्यपेक्षया विचित्रापरापरक्षयोपशमसन्तानस्यैव प्रवृत्त्युपगमात् । किं त्वेकजीवावच्छेदेनाज्ञानातिरि क्तविरोधिसामग्रयसमवहितपट्पष्टिसागरोपमक्षणत्वव्याप्यस्वसजातीयोत्पत्तिकत्वे सति तदधिकक्षणानुत्पत्तिकस्वसजातीयत्वरूपं तत्पारिभाषिकमेव वक्तव्यं, एवमन्यदप्यूह्यम् । क्रमेण युगपद्वा परस्परनिरपेक्षस्वविषयपर्यवसितज्ञानदर्शनोपयोगी केवलिन्यसा- चत्वान्मत्यादिमानचतुष्टयवन्न स्त इति दृष्टान्तभाश्नापूर्वमाह-"पणपणिज्जा भावा, समत्तसुअनाणदंमणाविसओ । ओहिमणपन्ज- चाण प, अण्णोष्णविलक्राणाविसओ ॥२-१६॥ तम्हा चउविभागो, जुज्जर ण उ नाणदसण जिणाण । सयलमणावरणमणं- तमत्तयं केवल उन्हा॥२-१७॥"प्रज्ञापनीया शब्दाभिन्दाप्या भावा द्रव्यादयः समस्तश्रुतज्ञानस्य द्वादशाङ्गवाक्यात्मास्य दर्शनायादर्शनप्रयोजिकापास्तदुपजाताया बुदः विषय आलम्पनं, मतेरपि त एव शब्दावसिता विषया द्रष्टच्याः, शब्दपरिक मणाहितधपोपशमजनितस्य शानस्य पथोक्तभावविषयस्य मतित्यान्मतिश्रुतयोरसर्वपर्यायसर्वद्रव्यविषयतया तुल्यार्थत्वप्रतिपाद-15 नाग,अवधिमनापर्याययोः पुनरन्योन्यविलक्षणा मावा विपया, अवधे रूपिद्रव्यमानं, मनापापस्य च मन्यमानानि ट्रम्पमनामीत्यसर्वार्थान्येतानि ।। तस्माचतुर्णा मत्यादीनां विभागो युज्यते तत्त्क्षयोपशमप्रत्यगभेदात्, न तु जिनानां शानदर्शनयो। 'नाणदसण चि' अविभक्तिको निर्देशा सूत्रत्वात् । कुतः पुनरेतदित्यत आह, यस्मात् केवल सकलं परिपूर्ण । तदपि कुन:१ यतोऽनावरणं,न अनादृतमसकलविषयं भवति। न च प्रदीपेन व्यभिचारा, यतोऽनन्तमनन्तार्थग्रहणप्रवृत्तं । वदपि मतपतोऽक्षप,थयो दि विरोधिमजातीयेन गुणेन स्यात्चदभावे तस्याश्यत्वं ततवानन्तवमनवमिति मारा। तस्मादकमोपयो. नपामा एक एक केवलोपयोगः । तत्रैकरवं व्यापा, द्वयात्मकत्वं च नृसिंहस्वादाशिफजात्यन्तररूपत्वमित्येके । मापे स्नि । घोप्णत्वपश्चाप्यवृचिजातिदयरूपमित्यपरे । केबलत्वमावरणक्षयात्, शानत्वं जातिविशेषो, दर्शनत्ये च विषयताविशेगो, दोप- पपबन्यतावच्छेदक इति तु ययम् । ननु भवदुत्त पथै 'फेवली णं' इत्यादिम 'जं समयं' इत्यादौ परसममित्यायों न सस्तरससिदा,तारवयोगान्तरे वयाविवरणामावान तथा (भगवतीशतक १८ उद्देश १०) माणसणच्याए दुर अहं' इत्याचा.
गमविरोधोऽपि, यद्धर्मविशिष्टविषयावच्छेदेन भेदनयार्पणं तद्धर्मविशिष्टापेक्षयैव द्वित्वादेः साकांक्षत्वात्, अन्यथाऽतिप्रसङ्गादि- त्याशङ्कथ युक्तिसिद्धः सुत्रार्थो ग्राह्यस्तेषां स्वसमयपरसमयादिविषयभेदेन विचित्रत्वादित्यभिप्रायवानाह-" परवत्तव्ययपक्खा, अविसुद्धा तेसु तेसु अत्थेसु । अत्थगइओ अ तेसि, विअंजणं जाणओ कुणइ ॥२-१८ ॥” परेषां वैशेपिकादीनां यानि वक्तव्यानि तेषां पक्षा अविशुद्धास्तेपुतेष्वर्थेषु सूत्रे तत्तभयपरिकर्मणादिहेतोर्निबद्धाः। अर्थगत्यैव सामर्थ्य नैव तेषामर्थानां व्यक्ति सर्वप्रवादमूलद्वादशाङ्गाविरोधेन ज्ञको ज्ञाता करोति । तथा च 'जं समयं' इत्यादेर्यथाश्रुतार्थे केवली श्रुतावधिमनःपर्याय- केवल्यन्यतरो ग्राह्यः, परमावधिकाधोवधिकच्छमस्थातिरिक्तविषये स्नातकादिविषये वा तादृशसूत्रप्रवृत्तौ तत्र परतीथिकवक्तव्य- ताप्रतिबद्धत्वं वाच्यमेवमन्यत्रापीति दिक् । ' केवलनाणे केवलदसणे' इत्यादिभेदेन सूत्रनिर्देशस्यैकार्थिकपरतेवेत्यभिप्रायेणो- पक्रमते-" जेण मणोविसयगया-ण दंसणं णत्थि दबजादाणं ॥ तो मणपजवनाणं, नियमा नाणं तु णिदिलु ॥२-१९ ॥ यतो मनःपर्यायज्ञानविषयगतानां तद्विपयसमूहानुप्रविष्टानां परमनोद्रव्यविशेषाणां वाह्यचिन्त्यमानार्थगमकतापयिकविशेष- रूपस्यैव सद्भावाद् दर्शनं सामान्यरूपं नास्ति, तस्मान्मनःपर्यायज्ञानं ज्ञानमेवागमे निर्दिष्टं,ग्राह्यसामान्याभावे मुख्यतया तद्रहणोन्मुखदर्शनाभावात् । केवलं तु सामान्यविशेषोभयोपयोगरूपत्वादुभयरूपकमेवेति भावः। सूत्रे उभयरूपत्वेन परिपठितत्वाद- प्युभयरूपं केवलं, न तु क्रमयोगादित्याह(द्विषयभेदाढेत्यभिप्रायवानाह)-" चक्खुअचक्सुअवधिके-वलाण समयम्मि दंसणवि- अप्पा ॥ परिपठिआ केवलना-णदसणा तेण विय(ते) अण्णा ॥२-२०॥" स्पष्टा । चक्षुरादिज्ञानवदेव केवलं ज्ञानमध्ये पाठाद ज्ञानमपि, दर्शनमध्ये पाठाच दर्शनमपीति परिभाषामात्रमेतदितीति ग्रन्थकृतस्तात्पर्यम् । मतिज्ञानादेः क्रम इव केवलस्याकमेऽपि सामान्परिशपाउहपृयोपयोगरूपतया ज्ञानदर्शनत्वमित्येकदेशिमतमुपन्यस्यति-"दसणमुग्गहमेचं,घडोति नियन्त्रणा हवाइ नाम् ।। जब इत्य केरलाण पि,रिमेमण इत्तियं चे॥२-२१॥" अयग्रहमानं मतिरूपे घोघे दर्शनं,इदं तदित्यव्यपदेश्य,घद इति नियन वर्णना सकारामिलाप इतियारन् कारणे कार्योपचाराच घटाकाराभिलापजनक घटे मतिज्ञानमित्यर्थः । यथाऽव(क) तथा केरलयोरप्येतावन्माण विशेषः एकमेव केवलं सामान्यांशे दर्शन विशेषांश धज्ञानमित्यर्थः। एकदेव ऋमिकमेदपक्ष दापति- दमणपुष्वं नाणं, नाणानिमित्तं तु दसणं णस्थि ।। तेण सुपिणिच्छयामो, सणनाणा | अण्णत्तं ॥२-२२।" दर्शनपूर्व ज्ञानमिति छयस्थोपयोगदशाया प्रसिद्धम् । सामान्यमुपलभ्य हि पवारसा विशेषमुपलभत इति, ज्ञाननिमित्तं तु दर्शनं नास्ति वापि, सपा प्रसिद्धः । तेन मुविनिश्चिनुमा 'दसणनाणा' इति दर्शनझाने नान्पत्यं न क्रमापादितभेदं केवलिनि मानव इति शेषः। क्रमाम्युपगमे हि कालिनि नियमाज्ञानोत्तरं दर्शनं वाध्य. सर्वासा लम्धीनां साकारोपयोगमाप्त(प्य) लेन पूर्व मानोत्पन्युपगमौचित्यात् । तथा च धानहेतुकमेव केवलिनि दर्शनमभ्युपगन्तव्यं, तच्चात्यन्तादर्शनव्याइतमिति मावायतु धोपनमनिनन्धनकमस्य केलियमारेऽपि पूर्व अभदर्शनातज्जातीयतया ज्ञानदर्शनयोरन्यत्त्वमिति टीकाकृद्वयाख्यान, वत्स्व- मावभेदवारण मम्मपदपि दर्शने माननिमित्तत्वनिषेधानतिप्रयोजनतया कथं शोमत इति विचारणीयम् । ननु यथा परेप कलितः नमो वर्णनिष्ठो पुदिविशेषजनस्तावकोऽस्माकं च भिन्नाभिन्नपर्यायविशेषरूपा, वधा केवलिज्ञानदर्शननिष्ठस्वादशा कम एवावरणक्षयजन्यतावच्छेदका स्पादिति भोक्तानुपपचिरिति चेत्, न, वर्णक्रमस्य क्रमवत्प्रयत्नप्रयोज्यस्य सुवचत्वेऽपि भिकारमध्यप्रपोज्यस्य देवत्पुपयोगम्भस्प दुचल्याइनन्यगत्या प्रमिकादप्यावरणपथयात् क्रमपदुपयोगोत्पश्यम्भुपगमे च तन्नाशकारणामावादपिकलकारणात्तादृशोपयोगान्तरधाराया अविच्छेदाच "सव्वस्स वि केवलिणंजुग दो णस्थि उनओगा" (आव०नि०गाथा ९७९)इति वचनानुपपत्तिः । न च ज्ञानस्य दर्शनमेवार्थान्तरपरिणामलक्षणो धंस इत्युपयोगाऽयोगपचं साम्प्रतम्, साधनन्तपर्यायविशेषरूपध्वंसस्यैवावस्थितिविरोधित्वादर्थान्तरपरिणामलक्षण,सस्यातथात्वात् । अन्यथा तत्तत्संयोगविभागादि मात्रेणानुभूयमानघटावस्थित्युच्छेदापत्तेः । न च " जुगवं दो णस्थि उपशोगा" इत्यस्योपयोगयोर्युगपदुत्पत्तिनिषेध एव तात्पर्य, न तु युगपदवस्थानेऽपीत्युपयोगद्वयधाराणां नाशकारणाभावेन राहायस्थानेऽपि न दोष इति साम्प्रतं, अकमवादिनाप्येवं क्रमा- वच्छिन्नोपयोगद्वययोगपद्यनिषेधपरत्वस्य वक्तुं शक्यत्वात् , मूत्रासोचस्वारस्यादरे “यदेव ज्ञानं तदेव दर्शनम्" इत्यस्मदुक्तः स्यैव युक्तत्वादिति दिक् ॥ मतिज्ञानमेवावग्रहात्मना दर्शनं, अपायात्मना च ज्ञानमिति ययुक्तं दृष्टान्तायष्टम्भार्थमकदेशिना तगयनाह-" जड़ उग्ग- हमिनं दं-सणंति मण्णसि विसेसिया नाणं ॥मइनाणमेव दंसण-मेवं मड़ होइ णिप्फनं ॥ २-२३॥" यदि मतिरेवावग्रहरूपा दर्शनं विशेपिता ज्ञानमिति मन्यसे, तदा मतिज्ञानमेव दर्शनमित्येवं सति प्राप्त । न चैतयुक्तं, “स द्विविधोऽष्ट. चतुर्भेद" इति ( तत्वार्थ अध्याय २ सूत्र ९ ) मुत्रविरोधान्मनिज्ञानस्याटाविंशतिभेदोक्तिविरोधान-"एवं सेसिदियदं-समि णियमेण होइ ण य जुतं ।। आ तत्थ नाणमित्तं, घेप्पड़ चक्लुमि वि तहेव ॥२-२४ ॥ एवं शेषेन्द्रियदर्शनेष्वप्यवग्रह एव दर्शनमित्यभ्युपगमेन ( गमे नियमेन ) मतिज्ञानमेव तदिति स्यात् , तग न युक्तं, पूर्वोत्तदोषाननिस्तेः। अथ तेषु श्रोत्रादिविन्द्रियेपु दर्शनमपि भवज्ञानमेव गृह्यते, मात्रशन्दस्य दर्शनम्पपच्छेदकत्वात् : नयाच्छेदय नधान्यवहारामाषान् ।
थाप्रज्ञान प्राणज्ञानमित्यादिव्यपदेश एव हि तमोपलभ्यते, न तु श्रोत्रदर्शनं प्राणदर्शनमित्यादिव्यपदेशः क्वचिदागमे प्रसिदः, वहिं पक्षुप्यपि तथैव गृह्यतां चक्षुनिमिति नतु चक्षुर्दर्शन मिति । अथ तत्र दर्शनम्, इतरत्रापि तथैव गृहता, युक्तेस्तुल्यत्वात् । कथं नहिं शान चक्षुर्दर्शनादिप्रवाद इत्यत आह-" नाणमपुढे जो अघिसए अ अत्यमि दसणं होई । मुतण लिंगओ जं, अणागया- ईपत्रिसएमु ॥२-२५॥" अस्पृष्टेऽर्थ चक्षुपा य उदेति प्रत्ययः स ज्ञानमेव सच्चक्षुर्दर्शनमिन्युच्पत, इन्द्रियाणामविषये च परमाणादायथै मनसा य उदेति प्रत्ययः म ज्ञानमेव सदचक्षुर्दर्शनामित्युच्यते । अनुमित्यादिम्पे मनोजन्यशानेतिप्रसनमा शयाऽह, अनागतातीतविषपेपु यधिसतो ज्ञानमुदेखि अयं काल आसमभविष्यदृष्टिकस्तधाविधमेघोन्नतिमच्चात,' 'अयं प्रदेश आसनपृष्टमेघः पूरविशेषचाद्' इत्यादिरूपं तन्मुफ्त्याइदमुपलक्षणं, भायनाजन्यज्ञानातिरिक्तपरोक्षहानमात्रस्य तस्यास्पृष्टाविषयार्थस्यापि दर्शनत्वेनाव्यवहारात् । यपस्पृष्टापपयार्थज्ञानं दर्शनमभिमतं, तर्हि मन पर्यायशानेऽतिप्रसङ्ग इत्या. शश्य समाधत्ते-" मणअपनाणंद-सर्गति तेणेह होइ ण य जुत्तं ।। भन्नइ नाणं गाई-दियंमि ण घडादओ जम्हा ॥२-२६॥" एतेन लक्षणेन मनःपर्यापज्ञानमपि दर्शन प्राप्त, परकीयमनोगतानां घटादीनामालम्न्यानां वारापनास्पृष्टेऽविपये घ घटादावर्षे तस्य भाना(या)व, न तशुक्तं, आगमे तस्य दर्शनत्वेनापाठात् । भण्यतेस्रोचरम्-नोइन्द्रिये मनोवर्गणारुपे मनविशेष प्रवर्तमानं मनःपर्यापनोधरूपं शानमेव, न दर्शने, यस्मादस्पृष्टा घटादयो नास्य विषय इति शेषा, नित्यं पा लिङ्गानुमेपत्वात् । तथा चागमः (विशेषावश्यक गाथा ८१४)-" जाणइ पझे णुमाणाओ ति" मनोवर्गणास्तु परात्मगता अपि स्वाथयात्मस्पृष्टजातीया एपेवि न वदंशऽपि दर्शनत्वप्रसङ्गः । परकीयमनोगतार्थीकारविरुप एवास्प ग्राह्या, तस्य चोभ-६ । यरूपत्वेऽपि छामस्थिकोपयोगस्यापरिपूर्णार्थग्राहित्वान मनःपर्यायज्ञाने दर्शनसम्भव इत्यप्याहुः। किंच-" महसुअनाणणिमित्तो, छउमत्थे होइ अत्थउवलंभो॥ एगयरंमि वि तेसिं, ण दंसणं दसणू कत्तो ।। २-२७॥ मतिश्रुतज्ञाननिमित्ताछनस्था. नामर्थोपलम्भ उक्त आगमे । तयोरेकतरस्मिन्नपि न दर्शनं सम्भवति । न चावग्रहो दर्शनं तस्य ज्ञानात्मकत्वात्, ततः कुतो दर्शनं १, नास्तीत्यर्थः । ननु श्रुतमस्पृष्टेऽर्थे किमिति दर्शनं न भवेत्तत्राह-"ज पचक्खग्गहणं, ण इंति सुअनाणसंमिया अत्था । तम्हा दंसणसदो, ण होइ सयले वि सुअनाणे ॥२-२८॥" यस्माच्छ्रुतज्ञानप्रमिता अर्थाः प्रत्यक्षग्रहणं न यान्ति, अक्षजस्यैव व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वात् । तस्मात्सकलेऽपि श्रुतज्ञाने दर्शनशब्दो न भवति । तथा च ' व्यञ्जनावग्रहा- विषयार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वम्'इति पर्यवसन्नम् । प्रत्यक्षपदादेव श्रुतज्ञानवदनुमित्यादेात्तौ परोक्षभिन्नत्वे सतीति विशेषणं न देयम् “ मुत्तूण लिंगओ जं" इत्युक्तस्याप्यत्रैव तात्पर्य द्रष्टव्यम् । इत्थं चाचक्षुर्दर्शनमित्यत्र नञः पर्युदासार्थकत्वादचक्षु दर्शनपदेन मानसदर्शनमेव ग्राज़, अप्राप्यकारित्वेन मनस एव चक्षुःसदृशत्यान्न घ्राणदर्शनादीति सर्वमुपपद्यते । तथाचावधि दर्शनमपि कथं सङ्गच्छते, तस्य व्यञ्जनावग्रहविषयार्थग्राहित्वेऽपि व्यवहारतः प्रत्यक्षत्वाभावादित्याशङ्कायाः प्रत्यक्षपदस्य व्यवहारनिश्चयसाधारणप्रत्यक्षार्थत्वात् , अवधिज्ञानस्य च नैश्चयिकप्रत्यक्षत्वाव्याहतेः परिहारमभिप्रयन्नाह-"जं अप्पुट्ठा भावा, ओहिन्नाणस्स होति पञ्चक्खा ॥ तम्हा ओहिन्नाणे,दसणसदो वि उवउत्तो॥२-२९ ।। स्पटा।। उपयुक्तः लब्धनिमित्तावकाशः॥ केवलज्ञानेऽपीदं लक्षणमव्याहतमित्याह-"जं अप्पुढे भावे, जाणइ पासइ य केवली णियमा ॥ तम्हा तं नाणं दं-सणं च अविसेसओ सिद्धं ॥२-३०॥” यतोऽस्पृष्टान् भावानियमेनावश्यन्तया केवली चक्षुष्मानिव पुरःस्थितं जानाति पश्यति चोमयप्राधान्येन, तस्मात्तत्केवलज्ञानं दर्शनं चाविशेषत उभयाभिधानानिमित्तस्यापिशेपासिद्धं । मनःपर्याय पानस्य तु पन्जनापग्रहारिपपार्थप्रत्यक्षवेपि याद्यपिपये व्यभिचारेण सग्राह्यतापच्छेदकावच्छेदेन प्रत्यक्षत्वाभावान्न दर्शन त्वमिति निष्कर्षः । अत्र यहीकाकृता "प्रमाणप्रमेयपोः सामान्यविशेषात्मकत्येऽप्यपनीतापरणे युगपदुमयस्वभावो बोधः, एमस्यास्याया बनपगतापरणवन दर्शनोपयोगसमये ज्ञानोपयोगाभागादप्राप्पकारिनयनमनःप्रमवार्थावग्रहादिमतिज्ञानो- पपोगमामाले चक्षुरचक्षुर्दर्शने, अधिशानोपयोगप्राकाले चावधिदर्शनमानिर्भवति" इति व्याख्यातं तदर्धजरतीयन्यायमनुहरति, प्राचीनप्रणयमात्रानुरोध श्रोत्रादिज्ञानात् प्रागपि दर्शनाभ्युपगमस्यार्जनीयत्वात् , व्यञ्जनापग्रहार्थापग्रहान्तराले दर्शनानुपलम्मा चदनिर्देशाप, अमरयेयमामयिकव्यञ्जनापग्रहान्त्यक्षणे “ताहे दुति करेइ" इत्यागमेनार्थापग्रहोत्पत्तरेव भणनात्, व्यञ्जना यग्रहप्रासले दर्शनपरिकल्पनस्य चात्यन्तानुचितत्वात् ॥ तथा सति तपेन्द्रियार्थसन्निादपि निकृष्टत्वेनानुपयोगप्रमणाच, प्राप्यकारीन्द्रियजमानस्थले दर्शनानुपगमे चान्यत्रापि भिन्नतत्कल्पने न किश्चित्प्रमाणं, 'नागमपुढे' इत्यादिना ज्ञानादभेदेनैव दश- नस्वमापप्रतिपादनात्, "चक्षुईद्विपयाख्याति (द्वा-१०-३०)इत्यादिस्तुतिग्रन्थैकाक्यतयापि तथैव स्वारस्याच । छद्मम्थज्ञानो- पयोगे दर्शनोपयोगत्वेन हेतुत्ते तु चक्षुप्पय दर्शनं नान्योति कथं श्रद्धयं १ तस्माजीसिद्धसेनोपज्ञनब्धमते न कुत्रापि ज्ञाना- दर्शनस्य कालमेदः, किं तु स्त्रयायतापच्छेदकापच्छेदेन व्यञ्जनानग्रहाविषयीकृतार्थप्रत्यक्षत्वमेव दर्शनत्वमिति फलितम् । यदि प.चानुपादापि मानमामग्रीमामर्थ्यग्रासतमानमालायश मितिमात्राय च न दर्शनसव्यवहारस्तदा विषयताविशेष एप दनत्वं, म पचिदी योग्यताविशेषजन्यतावच्छेदकः, कविध मापनाविशेषजन्पतापच्छेदका, केवले च मोशे आवरण- क्षयजन्यतावच्छेदक इति प्रतिपत्तन्यं । न च 'अनैव धियां निशेप' इति न्यायादानिशेपे माने पिताविशेषासिद्धिति शङ्कनीयं, अर्थेऽपि ज्ञानानुरूपस्वभावपरिकल्पनाद , अर्थाविशेोऽपि परैः समूहालम्पनाविशिष्टतानस्य ग्यालये प्रकारिता- विशेपस्याभ्युपगमाच । न हि तस्य तत्र भासमानवैशिष्टयप्रतियोगितानत्वमेव निरूपकविशिष्टशान या शर्य, दण्डपुर- संयोगा इति समूहालम्बनेऽतिप्रसङ्गात् । न च भासमानं यद्वैशिष्टयप्रतियोगित्वं तद्वत् शानत्यमेर नथा, दण्डपुरुषसंयोगपनि- योगित्वानुयोगित्वानीति ज्ञाने दण्डविशिष्टज्ञानत्यापत्तेः । न च स्वरूपतो भासमानमित्यायुक्तावपि निस्तार!, प्रतियोगितादेर- तिरिक्तत्वे प्रकारित्वादेाननिष्ठस्य कल्पनाया एव लघुत्वात् । अनतिरेके तु दण्डदण्डत्यादिनिर्विकल्पकेऽपि दण्डादिमिशिष्टगान- त्वापत्तेः । एतेन 'स्वरूपतो भासमानेन वैशिष्टयेन गर्मितलक्षणमपि'अपास्तम् , संयुक्तसमगायादेः नम्वन्धत्य सम्पन इत्यस्य दुर्वचत्वाच । तस्मात्पराभ्युपगतप्रकारिताविरोपवदाकारविरोपः स्याद्वादमुद्रयार्थानुरुदस्तदननुरुदो पा जाने दुर्गनगन्दव्य- पदेशहेतुरनाविलस्तत्समय एवार्थज्ञानयोरविनिगमेनाकाराकास्भिावस्वभावाविमांगादित्येप पुनरस्माकं मनीपोन्मेपः ।। तस्माद्वयात्मक एक एव केवलावबोध इति फलितं स्वमनमुपदर्शयति-"साईयपतसिग, नि दोषि ने ससमग इपड़ गन परनि. त्थियवत्तव्यं, च एगसमयंतरुप्पाओ ॥ २-३१॥" सागपर्यचमितं केवलमिनि इनोई अपि मानाने ने उभगमन्दसायं तदिति यावत् । अयं च स्वसमयः स्वसिद्धान्तः । यस्त्वेकसमयान्तरोत्पादत्तयोभन्यने, ताप्नीशिकगागं, नाननं, नयाभिप्रायेण प्रवृत्तत्वादिति भावः । 'एवम्भूतवस्तुतचश्रद्धानरूप' सम्पन्दर्शनमपि गम्यमानविगेप एन, सम्पन्दनन्यस्यापि सम्यग्ज्ञानत्वव्याप्यजातिविशेषरूपत्याद्विपयताविशेषरूपत्वावत्याद-"एवं भिणपणने, गहमागस्य भाषमो मारे । पुगिना.
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मिणिय, सणसरोवर जुत्तो ॥२-३२॥" जिनप्रज्ञप्तमावविषयं समृहालम्पनं रूचिरूपं ज्ञानं मुख्यं सम्यग्दर्शनं द्वासनो
पनानाविषयं घटादिमानमपि भातं तदिति तात्पर्याः । ननु सम्यग्ज्ञाने सम्यग्दर्शननियमपदर्शनेऽपि सम्पाननियमा
नयादित्यग्राह-"सम्मन्नाणेणियमे-ण दंसर्ग दंसण उ भयणिन्नं ।। सम्ममाण पइम, नि अत्था होइ उपरणं ॥२-३३॥
सम्परज्ञाने नियमन सम्यग्दर्शनं, दर्शने पुनर्भजनीयं विकल्पनीयं, सम्यग्ज्ञान एकान्तरुचौ न सम्भवति,
अनेकान्तरुचौ तु समस्तीति । अतः सम्यमानं चेदं सम्यग्दर्शनं पेत्यर्थः, अर्थतः सामध्येनै (र्यादे)कर्मयोपपर्म भवति ।
तथा प गम्यक्त्वमिव दर्शनं मानविशेषरूपमेवेति निर्गुदम् । (अथ ग्रन्धकृत्प्रशस्तिः)
पापा पागा यिमुसविषयो-न्मेपसूक्ष्मक्षिकापां, येण्यानी-भयमधिगता नव्यमार्गानभिज्ञाः ॥
तेषामेपा ममपपणिनां सम्मतिग्रन्यगाथा, विश्वासाय स्वनयविपणिमान्ययाणिज्यपीथी । १ ॥
भेदग्राही(हि) व्पपद्धतिनयं संश्रितो मलयादी, पूज्या प्रापः करणफलयोः सीम्नि शुद्ध सूत्रम् ॥
भेदावोन्मुरामधिगतः सग्रहं सिद्धसेन-स्तस्मादे न पाठ थिपमा रिपक्षानपोऽपि (मी) ॥२॥
गिरमामान्यं पुगपपदमाक्षेपलारण्ये विशेष, सदूपेण स्फुटमभिहितं सायनन्तं यदेष ॥
पूष्मरंशः प्रमपदियमप्युच्यमानं न दुष्टं, तत्सूरीणामियममिमता नुरुपगौणव्ययस्था ॥ ३ ॥
तमोगमरिजनुक्षणभिदानिदानोदया, श्रुता पहुतराः श्रुते नपयिषादपक्षा पथा ।
सा काय विस्मयो भवतु मूरिपक्षप्रपे, प्रधानपदधी घियां कनु पीपसी रयते ॥ ४ ॥
प्रसह्य सदसत्त्वयाने हि विरोधनिर्णायकं, विशेषणविशेष्ययोरपि नियामकं यत्र न । गुणागुणविभेदतो मतिरपेक्षया स्यात्पदा, किमत्र भजनोजिते स्वसमये न सङ्गच्छते ॥५॥ प्रमाणनयसङ्गता स्वसमयेऽप्यनेकान्तधी-नयस्मयतटस्थतोल्लसदुपाधिकिर्मीरिता कदाचन न बाधते सुगुरुसम्प्रदायक्रम, समञ्जसपदं वदन्त्युरुधियो हि सद्दर्शनम् ॥६॥ रहस्यं जानन्ते किमपि न नयानां हतधियो, विरोधं भाषन्ते विविधवुधपक्षे यत खलाः ॥ अमी चन्द्रादित्यप्रभृ(कृ)तिविकृतिव्यत्ययगिरा(रो), निरातङ्काः कुत्राप्यहह न गुणान्वेषणपराः ॥७.! स्याद्वादस्य ज्ञानविन्दोरमन्दा-न्मन्दारद्रोः कः फलास्वादगर्वः ॥ द्राक्षासाक्षात्कारपीयूषधारा-दारादीनां को विलासश्च रम्यः॥ ८॥ गच्छे श्रीविजयादिदेवसुगुरोः स्वच्छे गुणानां गणैः, प्रौढिं प्रौढिमधानि जीतविजयाः प्राज्ञाः परामैयः॥ तत्सातीर्थ्यभृतां नयादिविजयप्राज्ञोत्तमानां शिशु-स्तत्त्वं किञ्चिदिदं यशोविजय इत्याख्याभृदाख्यातवान ९ ॥ इति श्रीज्ञानबिन्दुप्रकरणं समाप्तम् ।। प्रभूतावधानधारि-कूर्चालसरस्वती-न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्यायश्रीयशोविजयग- णिप्रणीते अपूर्णावस्थं सविवरणं १ श्रीज्ञानार्णवप्रकरणं २ पूर्ण श्रीज्ञानपिन्दुप्रकरणं च सम्पूर्णे ।। RE ।। सूचना-पत्यका चतुर्दशसंख्या यावत् प्रथमपृष्ठस्य तदुपरितनी च संख्या द्वितीयपृष्ठस्य ।। ॥ श्री ज्ञानार्णव-ज्ञानविन्दु ग्रन्यद्वय शुद्धिपत्रकम् ।। पत्रं पति- बन्धन १ निश्चित ६८ २० शुभम पत्र पति अशुद्ध शुदम् स्थाशपेण भ्यविशेषण २२३ निरूपणोपाय निरुपणोपयि १७ २२ घन्य बोधक स्वस्थ बोधिवक्ष्य पद्मिासो२१ निधित पृति वादार वृतिमानस्थ एतस्यो धनत्ये तस्यो होनवृत्ति म्यदेवत, মুরি यदिति रेयष ३२ भ्युतम भ्युपगम रेयस्थापित, श्य५७ २० युका विपरीत विपरीत सानु मार्यानुए रेन्द्रिय १७ १९ ज्ञान ज्ञानी ज्ञानाहानी ९२८ पनि काम फपिसान द्रादेपारणाम हरिणाम घतितया घातिला पोन्धि चोरधिः भवनादेरस १२२ भवनोदरस ३९ मद मधारयाद गम्यमान पर यागन ३९ २६ नयस्याहर नयस्य मृत्य हात्तिर्यु ४१ ९ नुपत्ता जिमायल तीद्वपय जरिय १६१४ासन मेन ५१ १७ अरष. अनुपयु १६२. विशेष विशेषता ६० २५ न्योन २५ २१ २२ । तथास्पद १२२८ योगेन १३ ५ स्पायु गुप्तच ४ १०४ १३ मीन: म्यद्येन
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