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Hindi Pathshala

Ishaar,pt.chandradhar · 2011/01

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हिन्दी-प संस्कृत प्रथमा परीक्षार्थियों के लिए संयुक्त प्रान्तीय संस्कृत शिक्षानोर्ड के द्वारा स्वीकृत। EvenindPUTRA सपादक- १० चन्द्रधर इस्सर एम.ए., एल एल्. बी प्रकाशक- नन्दकिशोर एण्ड ब्रदर्स पुस्तक प्रकाशक एवं विक्रेता चौक, यनारम। समाधि ५...) ( मूलप ) प्रकाशक- नन्दकिशोर भार्गव प्रोप्राइटर नन्दकिशोर एण्ड ब्रदर्स चौक, बनारस। " 1 २५३a . मुद्रक- कृ०१० पावगी हितचिन्तक प्रेस, रामघाट, बनारस सिटी।

विषय-सूची ५ .. ८ . . विषय पृष्ठ ईश-वन्दना सकलित २ शिष्टाचार श्री श्रीराम वाजपेयी ३ ऋतु-वर्णन श्री गोस्वामी तुलसीदास ५ स्वामी शकराचार्य श्री शम्भूदयाल सक्सेना ५ भीष्म प्रतिज्ञा श्री १० महावीर प्रसाद द्विवेदी ६ भ्रातृ भक्त भरत श्री प• हरिशकर शर्मा "कविरन" १६ ७ महाराज शिवाजी श्री शम्भूदयाल सक्सेना २२ ८ शरद्-वर्णन श्री गोस्वामी तुलसीदास २७ ९ महाकवि कालिदास १०स्वास्थ्य रक्षा श्री लेफ्टिनेन्ट सतानन्द शर्मा ११ परीक्षा श्री प्रेमचन्द जी ४१ १२ गोस्वामी तुलसीदास श्री बा० श्यामसुन्दर दास वी०ए०४८ १३ पुरपार्य श्री सकलित ५६ १४ हमारा देश श्री नरोत्तमदास स्वामी ५९ १५ महाराणा प्रताप और मानसिंह ६८ १६ प्रह्मचर्य १७ वाराणसी श्री पं० आशुकरण गोस्वामी १८ भगवान् युद्ध श्री प० रक्षपाल शर्मा ८६ १९ सदाचार श्री५० विद्याधर शास्त्री २. प्राचीन भारत की एक झलक ७४ . ९४ १०० - 1

हिन्दी- पाठमाला
१-ईश-चन्दना
-
(१)
हे नाथ । हे प्रभु । महा महिमा तुम्हारी,
वाणी नहीं कह सुना सकती हमारी ।
सौ वर्ष भी यदि सदा तव कीर्ति गावें,
तो भी कभी न उसके हम पार जावें ॥
।
(२),
समुद्र सारे,
,
है
पृथ्वी, पहाड़, नद, पेड,
हैं ये समस्त जगदीश । दिये तुम्हारे ।
हे ईश । आप यदि सूर्य हमें न देते,
तो जीव-जन्तु जग में न कदापि जीते ।।
-
(-३)
ये जो अनेक फल हैं जग में दिसाते,
साते नहीं हम कभी जिनको अघाते।
देते न जो तुम हमे जगदीश प्राँस,
पाते उन्हें न, करते यदि यत्न लास ॥

[ २ ] (४) हे हे दयामय प्रभो, कर जोड़ते हैं, सारी कुयाल अब से हम छोड़ते हैं। जो भूल-चूक परमेश्वर हो हमारी, कीजे उमा शरण में हम हैं तुम्हारी ॥ प्रश्न 1- अपनी भाषा में ईश्वर की महिमा का वर्णन करो। २-शिष्टाचार - सच पूछो तो किसी मनुष्य की विद्या, बुद्धि और योग्यता का पता उसकी बातचीत से ही चल जाता है, इसलिये हमें बड़ी सावधानी से बातचीत करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त जीवन की सफलता और असफलता बहुत कुछ बातचीत के दंग पर भी निर्भर है। एक मीठा बोलनेवाले मनुष्य से लोग बिना कारण ही प्रेम और कडवा बोलनेवाले से घृणा करने लगते हैं । अतः हमें ब्रिष्टाचार की छोटी-छोटी बातों पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। किसी मनुष्य की सब से अच्छी पहचान उम व्यवहार से हो सकती है जो वह अपने नौकर-चाकरों, अधीनों और दीन- [ ३ ] दूसरों से असभ्य व्यवहार किया करते हैं। उत्कृष्ट विचारों के मनुष्य छोटे-से-छोटे मनुष्य के साथ भी नम्रता का व्यवहार करते हैं । यही कारण है कि लोगों की दृष्टि में उनका मान दिन- दिन बढने लगता है। इसके विपरीत जो मनुष्य विना कारण ही दूसरों से असभ्य व्यवहार करते हैं उन्हें दूसरे लोग असभ्य और फूहर के नाम से पुकारने लगते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि शिष्टाचार से ससार के कामों में एक निराला सौन्दर्य और सर. लता आ जाती है, मनुष्य अधिक उपयोगी धन जाता है और यही शिष्टाचार मनुष्य के गुणों में सोने में सुगन्ध' का सा काम देता है। इसलिये शिष्टाचार-सम्बन्धी कुछ मोटी मोटी बातों का लिस देना उपयुक्त सिद्ध होगा। बातचीत करते समय 'श्रीमान्', 'आप' और 'तुम' शब्द का उचित प्रयोग करने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये । पदवी तथा योग्यता में अपने से बहुत बडे आदमी के लिये 'श्रीमान् और साधारणतया हर एक बड़े आदमी और घराबरवालों के लिये 'आप', बराबरवाले बडे ही घनिष्ठ मित्रों और छोटे लोगों और बालकों के लिये 'तुम शब्दों का प्रयोग करना शिष्टाचार के अनुकूल है। किसी प्रश्न का उत्तर देते समय केवल हॉ' या 'नहीं कहना शिष्टाचार के विरुद्ध है। हमेशा 'जी हाँ' या 'जी नहीं फहकर उत्तर देना चाहिये । यदि किसी आदमी का नाम या रहने का स्थान पूछना हो तो 'आपका शुभ नाम,' 'आपका शुभ स्थान' वाक्याशों का प्रयोग करना चाहिये। यातचीत करते समय मनुष्य को अपनी ही बातो . 4 . , नं लगा देनी चाहिये, वरम् दूसरे लोगों को भी बोलने का अव- सर देना चाहिये। ऐसा न करने से दूसरे लोग उकताकर पिण्ड छुडाने का प्रयत्न करने लगते हैं। इसके अतिरिक्त बातचीत में दूसरे का वेतन, पश-व्यवसाय इत्यादि ऐसी बातें जिनके बताने में किसी मनुष्य को हिचकिचाहट हो सकती है, पूछने का आग्रह भी न करना चाहिये। जहाँ कुछ लोगों का जमघट हो वहाँ व्यर्थ में अपनी योग्यता दिसाने का उद्योग करना अभिमान समझा जाता है। हमने यहाँ तक देखा है कि बहुत से लोग केवल अपनी योग्यता दिखाने के लिये ही अशुद्ध शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं। उनकी इस अनूठी योग्यता पर बैठे हुए लोग मन-ही-मन हॅसते हैं और कभी-कभी तो ऐसे मनुष्य को मूर्ख जताने का उद्योग फरने लगते हैं। यदि लोग बहुत ही आग्रह करें तो अपनी योग्यता के अनुसार कुछ कहने में लज्जा भी न करनी चाहिये, परन्तु ऐसे अवसर पर बातचीत का विषय चुनने में बड़ी साप- धानी से काम लेने की आवश्यकता है । बालकों और नवयुवको के सामने सेल और , वीरता की बातों को छोडकर चैराग्य की वातें करना और बूढों के सम्मुस शृगार की बातें करनी मूर्सता नहीं तो क्या बुद्धिमानी है ? दो मनुष्यो की बात काटकर बीच ही में बोल उठना, रास्ते में दूसरे मनुष्य के हाथ में हाथ डालकर या कधे पर हाथ रख कर चलना, किसी मनुष्यासे चलते चलते पीछे से बातें करना, यड़ों के सम्मुस पान चबाकर, सुले बटन 'या कपडे सॅभालकर .

[ ५ ]
न जाना, ढीले-ढाले खडे होना, पॉव पसारकर बैठना अथवा
किये गये प्रश्न का उत्तर न देकर चुपचाप खडे रहना आदि सभी
बातें शिष्टाचार के विरुद्ध हैं।
चालकों को बचपन से ही शिष्टाचार-सम्बन्धी वातों पर
विशेष ध्यान देना चाहिये, जिससे वे वचपन में सदाचारी बालक
और यौवन में सुयोग्य नागरिक बन सके।
प्रश्न
१
-शिष्टाचार से क्या सात्पर्य है?
२-अपने से बड़े आदमी के लिये फैसे शब्दों का प्रयोग करना
चाहिये?
३-दो आदमियों के बीच म योरना क्या अच्छा नहीं समझा जाता ?
३-ऋतु-वर्णन
(रामायण से)
१ वर्षा
वर्षाकाल मेघ नभ छाये,
गरजत लागत परम सुहाये।
दामिनि दमक रही धन माहीं,
सल की प्रीति यया धिरनाहों।
।

वर्षहिं जलद भूमि नियराये;
यथा नवहिं बुध विद्या पाये।
बूंद अघात सहैं गिरि कैसे,
खल के बचन सन्त सह जैसे ॥
क्षुद्र नदी भरि चलि उतराई, ',
जस थोरे धन खल चौराई ।
भूमि परत मा डावर पानी,
जिमि जीवहि माया लपटानी ।।
1
सिमिट सिमिट जलभरे तलावा,
जिमि सद्गुण सज्जन पहें आवा ।
सरिता-जल जलनिधि महँ जाई,
होइ अचल जिमि जन हरि पाई
दादुर धुनि पहुँओर सुहाई,
वेद पढ़ें जिमि बटु-समुदाई।
नव पल्लर मे पिटप अनेका,
साधु के मन जस होय विवेका।
N
अर्क, जवास पात विनु भयका
जिमि सुराज्य सल-उद्यम गयऊ ।
सोजत 'पन्थ मिलै नहि धूरी,
कर क्रोध जिमि धर्महि दूरी ।।

[ ७ ]
सस-सम्पन्न सोह महि कैसी,
उपकारी की सम्पति जैसी ।
निशि-तम धन सद्योत विराजा
जनु दम्भिन कर जुरा समाजा॥
.
कृषी निरावहिं चतुर किसाना,
जिमि बुध तजहिं मोहम्मद-माना।
विविध-जन्तु-सहल महि भ्राजा,
वढे प्रजा जिमि पाय सुराजा ॥X
काहुँ दिवस महँ निविड तम, कबहुँक प्रगट पतन
उपजे विनसै ज्ञान जिमि, पाइ सुसन कुसग ॥
प्रश्न
~
1-अपनी सरल भाषा में वर्षा मन्तु पर एक निदध लिखो।
२-"यथा नाहि मुध विद्या पाये"-इस आशय का सस्कृत का कोई
श्लोका पताओ।
३-क्रोध से धर्म कैसे दूर हो जाता है ? -
.
-
-

-- h [ ८ ] ४-स्वामी शंकराचार्य कई सौ वर्प हुए दक्षिण देश में एक ब्राह्मण रहते थे। वे घड़े पडित और ज्ञानी थे। उनको स्त्री का नाम कामाक्षी था कामाक्षी भी पति की तरह पडिता थी। दोनों का जीवन वडे सुस से बीत रहा था। बहुत दिन बीत जाने पर भी उन्हें कोई सन्तान न हुई सतान के लिये दोनो शिव का व्रत करने लगे। व्रत का फल मिला, एक लडका पैदा हुआ । भगवान शकर की दया से उत्पन्न होने के कारण लडके का नाम शकर रखा गया । शकर की बुद्धि बड़ी तेज थी। उन्होंने आठ साल की ही अवस्था में बडे-बडे विपयों पर विचार करना सीख लिया । इसी समय इनके पिता का देहान्त हो गया। पिता के मरने से बालक शकर के चित्त पर बडी चोट लगी। वे ससार से सिन्न रहने लगे। कभी-कभी घरगॉव के बाहर चले जाते और घंटों ससार पर मन-ही-मन विचार किया करते थे। वे अपने विचारों में ऐसे भूल जाते कि अपने शरीर, तक का ध्यान नहीं रह जाता था। इससे कामाक्षी को बड़ी चिंता हुई। वे शकर को भोग- विलास में फंसाने का यल करने लगी, पर शकर के चित्त पर कुछ भी असर न हुआ। फिर भी वे माता की आज्ञा के बिना घर न छोड़ना चाहते थे। एक दिन शकर को माता के साथ एक दूसरे गाँव में जाना

[ ९ ]
पड़ा। रास्ते में एक नदी मिली। नदी में पानी कम था। माँ-
बेटे नदी में उतर पडे, पर जब बीच में पहुंचे तो नदी का पानी
बढ आया। दोनों डूबने लगे। इसी समय शकर ने यह देववाणी
सुनी—'यदि शकर सन्यासी हो जाय तो नदी का पानी घट
सकता है। शकर ने देववाणी माता को सुना दी। माता रोने
लगी। सामने मौत के सिवाय कोई उपाय न देखकर माता ने
उन्हें सन्यास लेने की आज्ञा दे दी।
शकर घर से अलग होकर गोविंदपाद के अनाम में गये ।
आश्रम में रखने से पहले गोविंदपाद ने उनसे कई प्रश्न पूछे ।
शंकर ने उनके प्रश्नों का जवाब देकर उन्हें अचभे में डाल दिया।
गोविंदपाद ने उन्हें अपने पास रस लिया। उनके आश्रम में
रहकर वे योग और कर्म की शिक्षा पाने लगे।
थोडे ही दिनो मे शकर पूरे पडित हो गये । इनकी
पडिताई को देखकर इनके गुरु को भी आश्चर्य होने लगा।
इनका योग ध्यान भी बढ़ा चढा था। जब ये ध्यान लगाकर
बैठते तो इन्हें किसी की सुध न रह जाती थी।
विद्या और योग के पूरे पडित वनकर शकर ने सन्यास
लिया और स्वामी शकराचार्य कहलाने लगे। उस समय सारे
भारत में वौद्ध धर्म की तूती बोल रही थी। इनके गुरु ने इन्हे
आज्ञा दी कि देश में घूम-घूमकर अपने ज्ञान का प्रचार करो और
बौद्ध धर्म की जगह पर सनातन वैदिक धर्म की धूम मचा दो।
गुरु की आज्ञा मानकर स्वामी शकराचार्य निकल पड़े ।
उन्होंने सारे देश में वैदिक धर्म का डंका यजा दिया । यौद्ध
.
।
-
raat

1 [ १० ] पंडित घबडाये। जगह-जगह उनसे बौद्ध पंडितों का वादविवाद (शाखार्थ) हुआ। पर कोई इनके सामने न टिका । ये जहाँ जहाँ जाते, सब को मुंह की खानी पड़ती.। सारे देश में इनके नाम का डका बजने लगा। सारे भारतवर्ष में सनातन धर्म का झडा फहराते हुए माहिष्मती नगरी में पहुंचे। इस नगरी में मडन मिन्न नाम के एक बडे पडित रहते थे। जब शकराचार्य उनके पास पहुंचे तो वे इनके मुख के तेज को देखकर अचरज में पड गये । फिर दोनों में शास्त्रार्थ होना निश्चित हुआ । यह तै हुआ कि जो हारे वह जीतनेवाले का चेला बन जाय । निर्णय करने के लिये मडन मिश्र की स्त्री भारती पच वनी । यह भी वडी पडिता थी। इसी से पता चलता है कि भारत में उस समय स्त्री-शिक्षा का कैसा प्रचार था। “शास्त्रार्थ होने लगा । मडन मिश्र हार गये। तब भारती ने स्वामी शकर से कहा-"जव तक आप मुझे न हरा लें तबतक आपकी जीत नहीं मानी जा सकती, क्योंकि स्त्री पति का अर्धाग होती है" शकराचार्य शास्त्रार्थ करने लगे। पर भारती के प्रश्नों का उत्तर उस समय न दे सके। उन्होंने एक वर्ष का समय मांगा और एक वर्ष के बाद उसके प्रश्नो का उत्तर दिया। फिर क्या था, मडन और मडन, की स्त्री दोनों इनके चेले बन गये। स्वामी शकराचार्य ने थोडे ही दिनों में चारों ओर भारत में वैदिक धर्म का झडा सड़ा कर दिया। इससे वाम-मार्गी और चौद्ध धर्मवाले इनके विरोधी हो गये । शकराचार्य ने इनका . -

में जोशीमठ, जगन्नाथपुरी मगर,
दक्षिण में शृङ्गरीमठ और beta
वे स्वय रहे। ये मठ आज भी
रहे हैं । इन मठों का देश में 3 Mrway
अधीश्वर जगद्गुरु शकराचाय का
शकर स्वामी बदरिकाश्रमाया
-अपनी भाषा में स्वामी प्रार
२. स्वामी शकराचार्य को वैराग्य ?
-होंने कौन से ऐसे पई शाickrivart
-दिक सनात-धर्म फिसका।
एक दिन राजा शान्तनु यमुनान
अचानक एक अद्भुत सुगन्ध श्रामगन्य
पहले भी नहीं पायी थी। माया कि यह मनोहर
कहाँ से आ रही है। सोज भने।
उत्तर देने और वैदिक धर्म meri angure
किये। इनके चारों मठ समान हैyp
में ही उनका देहान्त हो गया।
.
है
17
५- भीष्म प्रतिका
-
धूम
में

[ १२ ] देवरूप-धारिणी एक धीवर की कन्या के बदन की सुगन्ध है। इस पर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ ।' उन्होंने उस मल्लाह की कन्या से पूछा- हे सुन्दरी । तुम कौन हो ? किस लिये तुम यहाँ आयी हो, यहाँ पर तुम क्या करती हो ? कन्या ने उत्तर दिया- महाराज। मैं एक धीनर की कन्या हूँ। मेरा नाम सत्य- वती है। मैं पिता की आज्ञा से इस घाट पर नाव चलाया - करती हूँ। इस कन्या के अद्भुत रूप और आश्चर्यकारक सुवास पर राजा शान्तनु मोहित हो गये । उसके साथ विवाह करने की उन्हे प्रवल इच्छा हुई । इससे वे उसके पिता के पास गये और अपने मन की बात उससे कही। थीवर बोला, हे नरनाथ । हे महाराज | कन्या हुई है तो उसका विवाह करना ही पडेगा । आप राजा होकर भी उसके पाने की इच्छा रखते हैं, यह मेरे लिये बडे आनन्द की बात है । इससे अधिक सन्तोप और सुख की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है ? परन्तु मेरे मन में एक अभिलापा है, उसे पूरा करने के लिये आपको 'हाँ' करना होगा । इस कन्या का विवाह आपके साथ होने पर इसके गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा उसी को राज्य का अधिकारी आपको बनाना होगा । आपको यह प्रण करना होगा कि आपके पीछे आपका राज्य सत्यवती के ही पुत्र को मिलेगा और किसी को नहीं । ' १ - -- [ १३ ] राजा शान्तनु अपने पुत्र देवव्रत को इतना प्यार करते थे कि धीवर की इस बात को स्वीकार करने मे समर्थ न हुए । बहुत दुखित होकर वे अपनी राजधानी हस्तिनापुर को लौट आये, परन्तु सत्यवती उन्हे नहीं भूली । उसके लिये वे यहुत उदास रहा करते थे। पिता की यह दशा देखकर महात्मा देवव्रत को घडी चिन्ता हुई । मन्त्री से पिता के दु ख का सारा हाल सुनकर देवव्रत ने उनकी इच्छा पूर्ण करने का दृढ सकल्प किया और उसी क्षण वे धीवर के पास पहुंचे। धीवर ने राजकुमार देवव्रत से आने का कारण पूछा। उन्होंने सब बातें उसे कह सुनायीं । धीवर ने कुमार को बडे आदर से आसन पर बैठाया और उनके साथ जितने राज- पुरुप पाये थे सव के सामने इस प्रकार कहना आरम्भ किया- हे राजकुलदीपक । आप शस्त्र धारण करनेवालों में सब से श्रेष्ठ और राजा शान्तनु के इकलौते पुत्र हैं । सब बातें आप के ही हाथ में हैं । इससे में सारी कथा आपसे कहता हूँ, सुनिये । देखिये, आपके साथ सम्बन्ध छोडने की इच्छा मैं तो क्या, स्वय इन्द्र भी नहीं कर सकते । महर्षि पराशर ने इस कन्या के साथ विवाह करने की इच्छा बार-बार मुझ पर प्रस्ट की है। परन्तु राजा के साथ सम्बन्ध करना हो मैंने इसके लिये अच्छा समझा। इससे मैंने महर्षि पराशर की बात नहीं मानी। परन्तु हे राजकुमार । इसके साथ विवाह करने से इसकी सन्तान के कारण आपके राज्य में घोर शनुता और विद्रोह होने का डर

[ १४ ]
है। जिसके आप सौतेले भाई होगे-जिसके साथ आपक
वैरभाव होगा-उसकी क्या कभी रक्षा हो सकती है ? उसक
कभी कल्याण नहीं हो सकता । इस विवाह में यही एक दोप है
और कुछ नहीं। इस दशा में मैं कन्यादान कर सकता हूँ या नहीं
इसका विचार आप ही कर दीजिये।
महात्मा देवव्रत धीवर का मतलब समझ गये। उन्हें
अपने सुख की अपेक्षा पिता के ही सुख का अधिक ध्यान था
अतएव अपने स्वार्थ की-अपने सुस की-उन्होंने कुछ भी
परवा न की। वे उसे छोड़ने के लिये तत्काल तैयार हो गये।
उन्होंने कहा-
.
हे धीवर-श्रेष्ठ । डर का कोई कारण नहीं । तुम बिल्कुल
न डरो, हमने तुम्हारे मन की बात जान ली है। हमे तुम्हारी
इच्छा पूर्ण करना सब तरह स्वीकार है। तुहारी कन्या के जो पुत्र
होगा वही इस राज्य का स्वामी होगा, उसीको वह राज्य मिलेगा।
यह सुनकर धीवर बहुत प्रसन्न हुया और बोला-
हे शत्रुओ
नाश करनेवाले । यदि आप मुम पर क्रोधन
करें तो मैं और भी एक बात आप से कहूँ। संसार में सब
लोग इस बात को जानते है कि श्राप सत्यवादी हैं, आप सदा
सत्य ही बोलते हैं। जब आपने सत्यवती के पुत्र को राज्य देने
की प्रतिज्ञा की है तब उस विषय में किसी को कुछ भी सन्देह
नहीं हो सकता। किन्तु यदि आगे किसी समय आपका कोई
वशज आपकी प्रतिज्ञा को न माने और उसके विपरीत काम
करे तो उसफा क्या उपाय होगा?

[ १५ ] तव महात्मा देवव्रत ने पिता के सुख को सर्वोपरि समझ, वहाँ पर जितने क्षत्रिय उपस्थित थे सब को सुनाकर ये वचन कहे- हे धीवर-राज । हमारी सत्य प्रतिज्ञा सुनो । हम जो सत्य- व्रत करने जाते हैं, उसे श्रवण करो। हम पहले ही राज्य के अधिकार से हाथ सींच चुके हैं। हमने पहले ही कह दिया है कि हम सत्यवती के पुत्र को राजा बनावेंगे । अब हम यह प्रतिज्ञा करते हैं कि हम विवाह भी न करेंगे। आज से जन्म भर हम ब्रह्मचर्य धारण करेंगे। इससे सत्यवती के पुत्र को राज्याधिकार मे हटाने का कुछ भी डर न रह जायगा। उसे राज्य प्राप्त करने में कोई वाधा न आ सकेगी। देवव्रत ने अपने स्वार्थ पर इस तरह पानी फेर दिया। उन्होंने उदारता की हद कर दी। उन्होंने राज-पाट भी छोड़ दिया और जन्म भर अविवाहित रहने का प्रण भी किया । उनकी इस विकट प्रतिज्ञा को सुनकर सन लोग धन्य कहने लगे और स्वर्ग से देवता फूल बरसाने लगे। ऐसा भीष्म प्रण करने के कारण उस समय से सर लोग देवव्रत को 'भीम' कहने लगे । तभी से उनका नाम भीष्म पडा । उस धीवर का अभिलाष पूर्ण हुआ । जो वात वह चाहता था, वह हो गयी। इससे उसे बड़ा आनन्द हुआ । शान्तनु के साथ अपनी कन्या का विवाह करना उसने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। इसके बाद राजा शान्तनु के साथ सत्यवती का विवाह हो घन्य

[ १६ ]
गया और उन्होंने अपने सत्यवादी पुत्र देवव्रत की भीषण
प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर.पुत्र को यह वरदान दिया कि तुम्हे इच्छा
मृत्यु प्राप्त हो-इच्छा से ही तुम्हारी मृत्यु हो, अर्थात् यदि तुम
अपने मन से न भरना चाहो तो मृत्यु का तुम पर कुछ भी जोर
न चले । अन्त मे ऐसा ही हुश्रा । धर्मात्माओं की बातें व्यर्थ नहीं
होती । भीष्म ने अपना प्रण निभाया और महाभारत के बाद
अपनी इच्छा से शरीर छोडा ।
--महावीरप्रसाद द्विवेदी
प्रश्न
१-भीम के जीवन से क्या शिक्षा मिलती है ?
२-इच्छा मृत्यु किसको कहते हैं ?
३-देववत का नाम भीम क्यों पड़ा ? उनको प्रतिज्ञा में क्या उदारता थी?
४-मीष्म का जीवन सक्षेप में लिखो।
.
N
-
६-भ्रातृम्भत भरत
रामादपि हि तं मन्ये धर्मातोबलवत्तरम्
भरत रामचन्द्रजी से अत्यन्त प्रेम करते थे। वह उन्हे
भाई नहीं, बल्कि पिता के समान पूज्य मानते और वैसा हो
उनके साथ बर्ताव भी करते थे। महाराज दशरथ का स्वर्गवास
होने पर गुरु वसिष्ठजी तथा मन्त्रियों ने भरतजी को 'ननिहाल

, मरत दूत [ १७ ] से बुलाया । जव से अयोध्या में अनों और उत्पाती का आरम्भ हुआ तब से ननिहाल मे भरतजी भी नित्य बुरे-बुरे स्वप्न देखते थे । दिन में भी उन्हे अनेक अमगल-सूचक अशुभ शकुन दिवायी देते, जिनके कारण भरतजी अत्यधिक चिन्तित रहते थे । इन दु स्वप्नों की शान्ति के लिये भरत ने अनेक दान-पुण्य और पूजा-पाठ की व्यवस्था की, परन्तु फिर भी उनके चित्त को सन्तोष न हुआ। भरतजी इन्हीं चिन्ताओ में निमग्न बैठे थे कि अयोध्या से गुरु वसिष्ठजी का हुभा दूत उनके पास आ पहुंचा। ने से अनेक बातें पूछी, परन्तु उसने केवल इतना ही कहा कि आपको गुरुजी ने शोघ्र बुलाया है । गुरुजी का सन्देश पाते ही भरतजी तुरन्त अयोध्या को चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने पुरी तथा पुरजनों की जो अवस्था देसी, उससे उन्हें किसी भारी अमगल की आशका होने लगी। ज्यो-त्यों कर भरत राजमहल में पहुँचे । वहाँ सर्व प्रथम उनकी कैकेयी से मेंट हुई । फैकेयी ने अपने पीहर के पुशल समाचार पूछे, जिनका भरतजी ने उचित उत्तर दिया । फिर भरतजी ने अपने परिवार का कुशल- क्षेम पृरते हुए प्रश्न किया कि महाराज और रामचन्द्रजी कहाँ हैं? अपने प्रभ के उत्तर में भरजी ने सीता और लक्ष्मण सहित राम के बन जाने और उनके वियोग से महाराज के प्राण त्यागने फी यात सुनी तो वह एक साथ भौचो से रह गये । उस समय उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानों आकाश से भूमि पर आ गिरे हों। यह संवाद मुनकर भरतजी के दुस और शोक का ठिकाना न । [ २० ] पालन करो। हे वत्स, मैं जानती हूँ, रामजी तुम्हे प्राणों से भी अधिक प्यारे हैं। राम भी तुम से बडा स्नेह करते हैं। चाहे चन्द्रमा विष बरसाने लगे और मेघमाला से अगारे गिरने लगे, पर तुम कभी राम के प्रतिकूल नहीं हो सकते है। इसी समय वसिष्ठ आदि मुनि तथा मत्री लोग भी भरनजी के पास आये और उन्होंने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया। फिर भरतजी ने पिता की विधिपूर्वक अन्त्येष्टि क्रिया को । सब कामों से निवृत्त हो जाने पर वसिष्ठजी, मन्त्रियों और दूसरे वृद्धजनों ने भरतजी से राजसिंहासन पर बैठकर राजकाज करने का आग्रह किया, परन्तु भरतजी उसके लिये तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा-"यह सिंहासन रामचन्द्रजी का है, उनका एक तुच्छ सेवक होकर मैं इस पर कैसे बैठ सकता हूँ। मेरा तो विचार है कि आप सब लोगो सहित मैं रामचन्द्रजी को मनाने और लौटाने चले हम लोगों की प्रार्थना पर यदि वे लौट आये तो वडा अच्छा होगा, नहीं तो मैं भी चौदह वर्ष तक वन ही में रहूँगा । सीताजी और राम लक्ष्मण तो वल्कल वस्त्र धारण करें, कन्द-मूल फल सायें, वन-बन विचरे और मैं राजसुख भोगू, यह कैसे हो सकता है।" दूसरे ही दिन भरतजी पुरजन तथा परिजनों सहित राम- चन्द्रजी को मनाने के लिये चल दिये। भरतजी ने प्रण किया कि जब तक रामचन्द्रजी के दर्शन न कर लेगा, अन्न-जल ग्रहण नहीं करूंगा। साथ ही उन्होंने राजोचित वस्त्र उतार रामचन्द्र के से वल्कल-वसन धारण कर लिये । इस प्रकार नगे पैरों पैदल [ २१ ] चलकर भरतजी चित्रकूट पहुँचे । वहाँ जब लक्ष्मण ने सेना सहित भरतजी के आने की बात सुनी तो उन्हें बड़ा सन्देह होने लगा। परन्तु रामचन्द्र ने लक्ष्मण को समझाया कि भले ही सूर्य पूर्व के बदले पश्चिम से उदय होने लगे, परन्तु हमारे साथ भरत का दुर्भाव कदापि नहीं हो सकता । रामचन्द्रजी लक्ष्मण को समझा ही रहे थे कि इतने में ही भरतजी आ पहुंचे और आते ही रामचन्द्रजी के पैरो पर गिर पडे । राम ने भरत को हृदय से लगा लिया। भरतजी ने रोते- रोते पिता के स्वर्गवास की बात सुनायी, जिसे सुनकर रामचन्द्र को भी अत्यन्त दुस हुआ। परन्तु फिर उन्होंने भरतजी तथा माताओं और अन्य पुरवासियों को समझा-बुझाकर शान्त किया। रामचन्द्र से अयोध्या लौट चलने की प्रार्थना की, परन्तु इसे उन्होंने स्वीकार न किया । जब भरतजी राम को लोटा ले जाने में सर्वथा असमर्थ हुए तब उन्होने भूखों रहकर वहीं प्रारण दे देने का निश्चय किया। अन तो राम वडी दुविधा में पडे । यदि अयोध्या लौटते हैं तो पिता की आज्ञा भंग होती है और नहीं लौटते तो भाई के प्राण-नाश का भय है। करे तो क्या करें । अन्त में बहुत सोच विचार के बाद रामचन्द्रजी ने निश्चित किया कि मैं तो चौदह वर्ष की अवधि पूर्ण हुए विना लौट नहीं सकता। हाँ, आप मेरी सडाऊँ ले जाकर राजसिंहासन पर स्थापित कर लें। भरत रामचन्द्रजी की इस बात से सहमत हो गये और श्रादरपूर्वक रामजी की पादुका सिर पर रख अयोध्या लौट आये। भरत ने

[ २४ ]
से
शिवाजी जब बड़े हुए तो वे पहाडी लोगों का दल जु
कर इधर-उधर लूट-मार करने लगे। कोण्डदेव उन्हें रोकने ।
कोशिश करते थे, पर वे मानते न थे। धीरे-धीरे उनका साहस
चढता गया। वे बीजापुर राज्य की सीमा पर भी उत्पात में
लगे। एक बार उन्होंने बीजापुर के सुलतान की मालगुजारी तक
लूट ली थी। सुलतान बहुत डरा। उसने इनके पिता शाहजी को
कैद कर लिया। पर शिवाजी ने वाहशाह शाहजहाँ की मदद
अपने पिता को छुड़ा लिया।
इसके बाद शिवाजी ने जावली के राजा पर चढाई कर
दी। जावली का राजा बीजापुर के बादशाह का साथी था । इस
लिये बीजापुर के बादशाह ने एक ,बडी भारी सेना अफजलसाँ
के माथ सहायता के लिये भेजी। अफजलखॉ ने धोखा देकर
शिवाजी को मारना चाहा । पर शिवाजी की चालाकी के सामने
उसकी एक न चली । वह खुद मारा गया। शिवाजी ने बीजापुर
के वादशाह को हराकर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया।
उन दिनों दिल्ली के सिंहासन पर औरंगजेब राज्य कर रहा
था। वह शिवाजी की इस जीत से बहुत ऋद्व हुआ। उसने
अपने सेनापति शाइस्ताखॉ को शिवाजी को दबाने के लिये
भेजा। पर पूना के किले में शिवाजी ने उसे घेर लिया। शाइस्ता
साँ बडी कठिनता से जान बचाकर खिडकियों की राह से भागा ।
लेकिन फिर भी शिवाजी ने उसके हाथ की दो उंगलियाँ काट
ली। औरगजेब इससे बहुत डरा । उसने दूसरी बार जयसिंह
को शिवाजी के मुकाबिले में भेजा।
-

चीर शिवाजी

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[ २५ ]
राजा जयसिंह और शिवाजी में अच्छी मुठभेड हुई। अन्त
दोनो में सधि हो गयी । राजा जयसिंह ने प्रयत्न करके शिवाजी
आगरे के दरबार मे भेजा । वहाँ शिवाजी का अपमान किया
या। शिवाजी इस अपमान को न सह सके और
घादशाह
को
बुरी तरह फटकार सुनाकर दरवार से लौट आये।
परन्तु आगरे की राजधानी के बाहर निकलना कठिन
काम था । उन पर चारो ओर से पहरा पड़ रहा था। वे कैदी
की तरह किले में रखे जाते थे। अत में मिठाई की टोकरी में
छिपकर बड़ी चतुराई से शिनाजी वहाँ से भाग निकले। नौ
महीने के बाद शिवाजी जब अपने देश को आये तो उनका
इदय फिर उत्साह से भर गया।
आगरे से लौटकर शिवाजी ने फिर लड़ाई का डका बजा
दिया। औरगजेब भी कर चुप रहकर बैठनेवाला था । उसने
शिवाजी को दबाने के लिये एक वडी भारी सेना भेजी। लेकिन
इस बार मुगलों की हार हुई। वे कई जगह बडी बुरी तरह से
लूटे-ससोटे गये । इसी समय शिवाजी का राजतिलक हुआ
और उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की।
मरहठो में इस समय वल भी अधिक था। मुगल बार मार
चढाई करते थे, पर हार जाते थे। शिवाजी का तेज सारे देश
में फैल गया। बीजापुर और गोलकुडा आदि मुसलमानी राज्यो
को बुरी तरह नीचा देसना पडा । शिवाजी कई मुसलमान
हाकिमों से कर भी वसूल करने लगे। सारे दक्सिन में उनके
नाम की तूती बोलने लगी।

-
[ २ ]
अत में ६० वर्ष की अवस्था में महाराज शिवाजी इस
दुनिया से चल बसे। वे गौ और ब्राहाणों के बडे सेवक,थे
दूसरे की स्त्रियों को माता की तरह मानते थे। उनके ये गुण है
उन्हें आज समस्त संसार में अमर वनाये हुए हैं।
"वेद रासे विदित, पुरान रासे सारयुत,
राम नाम राख्यो अति रसना सुघर में।
हिन्दुन की चोटी रोटी राखी है सिपाहिन की,
कॉधे मे जनेऊ राख्यो माला राखी गर में ।
मीडि राखे मुगल मरोरि रासे पातसाह,
बैरी पीसि राखे बरदान राख्यो कर में।
राजन की हद्द रासी तेगवल सिवराज,
देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर में।"
-भूपण
प्रश्न
१-शिवाजी की जीवनी अपनी भाषा में लिखो।
२-इनकी माता ने इन्हें क्या शिक्षा दी थी और उसका इन पर क्य
प्रभाव पड़ा?
३-इनमें क्या विशेष गुण थे, जिससे लोग इनको इतना मानते हैं ?
.

[ २७ ]
८-शरद
-वर्णन
-
वर्षा
विगत शरद ऋतु आई,
लक्ष्मण देखहु परम सुहाई ।
फुले कॉस
सकल महि छाई,
जनु वर्पाकृत प्रगट बुढाई ।
उदित अगस्त
पन्थ जल सोसा,
जिमि लोभहि सोसे सतोपा।
मरिता सर निर्मल जल सोहा,
सन्त ह्रदय जस गत मद मोहा ॥
रस-रस सूस सरित सर पानी,
ममता त्याग करहिं जिमि ज्ञानी।
जानि शरद ऋतु खञ्जन आये,
पाय समय जिमि सुकृत सुहाये ।।
--
पङ्क न रेणु सोह अस धरनी,
नीति निपुण नृप की जस करनी ।
जल सङ्कोच विकल भये मीना,
विविध फुटुम्बी जिमि धनहीना ।।
विन घन निर्मल सोह अकाशा,
जिमि हरिजन परिहरि सव आशा
।

[ २८ ]
फहुँ-कहुँ वृष्टि
वृष्टि शारदी थोरी,
कोउ एक पाव भक्ति जिमि मोरी॥
भले हरपि तजि नगर नृप, तापस चणिक भिखारि ।
जिमि हरिभकहि पाइ जन, तजहि आश्रमी चारि ।।
सुखी मीन जहँ नीर अगाधा,
जिमि हरि-शरण न एको वाधा ।
फूले कमल सोह सर कैसे,
निर्गुन ब्रह्म सगुन भये जैसे ॥
गुञ्जत मधुकर-निकर अनूपा,
सुन्दर-खग रव नाना
रूपा।
चक्रयाक मन दुख । निशि पेखी,
जिमि । दुर्जन पर-सम्पति देसी ।।
-
घातक रटत. तृषा अति ओही,
जिमि सुख लहै न शङ्कर-द्रोही ।
'.. शरद तापः निशि शशि अपहरई,
सन्त दरश जिमि पातक टरई ।।
11
देसहिं विधु चकोर समुदाई,
चितवर्हि जिमि हरिजन हरि पाई।
मशकदश
बीते
हिम-त्रासा, ।।
जिमि द्विज-द्रोह किये ! कुल। नासा ।।
-

[ २९ ]
भूमि जीव सकुल रहे, गये शरद ऋतु पाय ।
सतगुरु मिले ते जाहि जिमि, सशय भ्रम समुदाय ॥
"
प्रश्न
१
-दूसरे की सम्पत्ति देखकर दुर्जन क्या करता है ?
२-अपने शब्दों में शरवर्णन करो।
३-भारतवर्ष म शरद् ऋतु कब होती है ?
४-तुमको वर्षा ऋतु अच्छी लगती है या शरद् ऋतु और क्यों अच्छी
लगती है? अपने विचारों को सक्षेप म लिखो।
d
९-महाकवि कालिदास
पुष्पेषु चम्पा, नगरीपु काञ्ची
नदीपु गङ्गा, नृवरेपु राम ।
रामासु रम्भा, पुरुपेषु विष्णु
काव्येपुमाघ ,कवि कालिदास ॥
मालवा के राजा विक्रमादित्य बड़े प्रतापशाली राजा थे।
वे बड़े शूर-बीर, गुणज्ञ और निद्वानो का आदर करनेवाले थे
उनकी राजधानी उज्जैन नगरी थी। उनकी सभा में धन्वन्तरि
आदि नवरन थे। उन में फालिदाम सब से उत्तम गिने जाते
ये । फालिदास प्राह्मण थे । इनकी जन्मभूमि काश्मीर थी, परन्तु
३
।

[ ३० ] वहुधा ये उज्जैन में रहते थे। कहते हैं कि उन्होंने बचपन में कुछ भी न पढ़ा था । अपनी स्त्री के कारण उन्हें अमूल्य विद्याधन हाथ लगा । इसकी कथा इस प्रकार प्रचलित है कि राजा शारदानन्द की पुत्री विद्वरमा महागुणरती और बडी पडिता थी। उसने प्रण कर रखा था कि जो कोई मुझे शास्त्रार्थ में हरा देगा उसी के माय मैं अपना विवाह करूंगी। उस चिदुपी राजकुमारी की विद्वत्ता एवं रूप, यौवन और गुणों को प्रशसा सुनकर दूर-दूर से पण्डित आते थे, पर उसमे शास्त्रार्य में हारकर लौट जाते थे । निदान पडितों ने एकमत होकर यह विचार निश्चय किया कि इस राजकुमारी का विवाह किसी ऐसे मूर्स से कराना चाहिये, जिससे इसको जन्म भर रोते ही चीते । यह सोच- कर वे एक मुर्ख की खोज में निकले । थोडी दूर जाकर क्या देखते हैं कि एक मनुष्य जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है । उसे महा मूर्ख समझकर पडितो ने उसे बडे आदर से नीचे बुलाया और कहा कि हमारे साथ चलो, हम तुम्हारा विवाह राजा की पुत्री के साथ करा दें। परन्तु वहाँ जाकर तुम मुँह से न बोलना। जो कुछ बातचीत करनी हो सब सस्तो द्वारा करना । इस प्रकार पट्टी पढकर वे समा में ले गये । पडितों ने उसका बड़ा श्रादर किया और उसे उन्होंने सब से ऊँचे आसन पर बैठाया । जब, वह बैठ गया तब राजकुमारी से निवेदन किया कि ये बृहरपति के समान बुद्धिमान और विद्वान् हमारे गुरु महाराज आपके साथ विवाह करने आये हैं, परन्तु आजकल ये मौनव्रत धारण किये हुए हैं ।

[ ३१ ] जो कुछ शास्त्रार्थ करना हो सब सकेतो द्वारा कीजिये। राजकुमारी ने इस अभिप्राय से कि ईश्वर एक है, एक उँगली उठायी। उस मूर्य ने समझा फि राजकुमारी एक उँगली उठाकर मेरी आँस फोडना चाहती है। अत उसने एस विचार से कि मैं तेरी दोनी ऑसें फोड दूंगा अपनी दो उँगलियाँ दिखलायी । परन्तु पण्डितों ने उन दोनों उँगलियों से ऐसे ऐसे अर्थ निकाले, ऐसे ऐसे गूढ भार प्रकट किये कि राजकुमारी को हार माननी पडी। फिर क्या था, दोनों का विवाह हो गया। रात को राजभवन में जन दोनी सो रहे थे तर एक उँट चिल्ला उठा राजकुमारी ने पूछा कि यह क्या हल्ला है ? वह मूर्स तो किसी शब्द का भी यथार्थ उच्चारण कर नहीं सकता था । उसने कहा“उट्र" चिल्लाता है। राजकुमारी ने फिर पूछा, तब भी उस मूर्स के मुँह से "उष्ट्र" शन्द शुद्ध न निकला। बार-यार "उद्र-उद्र" वकता रहा । तव तो पडितों का छल राजकुमारी पर सुल गया और वह फूट-फूटकर रोने लगी। फिर क्रोध में आकर उस मूर्स को घर से बाहर निकलवा दिया। मूर्स भी अपने मन में बडा लजित हुआ। पहले तो उसे इतना दुस हुश्रा कि आत्मघात करने पर सन्नद्व हो गया । फिर सोच-समझकर काली देवी की आराधना करने लगा। देवी की कृपा से उसे विद्या की सिद्धि हुई और वह कालिदास के नाम से प्रसिद्ध हुमा । जब वह पडित होकर घर लौटा तव द्वार के किनाड बन्द पाये । किवाड खुलवाने के लिये उसने अपनी स्त्री मे अनावृतकपाट द्वारं देहि ।" अर्थात् किवाड - कहा - , [ ३२ ] विद्वत्तमा ने पति की योली पहचानी और कहा-"अस्ति कश्चि- द्वाग्यिशेष. १" अर्थात् क्या कुछ बोलने में विशेपता है ? कालि दास ने अपनी स्त्री का प्रश्न सुनकर उसका एक-एक पद ग्रहण फरके तीन काव्य बनाये | "अस्ति" पद को ग्रहण करके "अस्त्युत्तरस्या" इत्यादि कुमारसम्भव नामक महाकाव्य का निर्माण किया, दूसरे "कश्चित्" पद को ग्रहण करके "कश्चित् कान्ताविरहगुरुणा" इत्यादि मेघदूत की रचना की और तीसरे पद “वाग्" को ग्रहण करके उन्होंने “ वागर्थाविव सक्ती" इत्यादि रघुवश नामक महाकाव्य रचा । कालिदास को धुरन्धर विद्वान् देखकर विद्वत्तमा को जितना प्रानन्द हुआ होगा, वह लिखने में नहीं आ सकता । कालिदास कौन थे और वे किस समय में हुए, यह अभी तक ठीक-ठीक निश्चय नहीं हुआ । परम्परा से यहा सुनने में आता है कि वे राजा विक्रमादित्य के समय में उनकी सभा नवरत्नों के मुखिया थे। कालिदास की रचनाओं में तीन नाटक और चार काव्य प्रसिद्ध है । नाटकों के नाम अभिज्ञानशाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय और मालविकाग्निमित्र हैं तथा काव्यो के नाम रघुवंश, कुमार. सभय, मेघदूत और ऋतुसंहार हैं। इनके अतिरिक्त नलोदय, ज्योतिर्विदाभरण आदि कुछ और भी प्रथ , उनके बनाये हुए बताये जाते हैं, पर बहुत सभव है कि वे किसी दूसरे कालिदास को रचनाएँ हो। कालिदास सस्कृत के सब से बडे कवि माने जाते हैं। - -

[ ३३ ]
उनकी कीर्ति भारतवर्ष के बाहर भी दूर-दूर तक फैल चुकी है।
उनके शकुन्तला नाटक को पढकर दुनिया चकित है। एक बडे
विद्वान् करि का कहना है कि कालिदास ने इस नाटक में पृथ्वी
पर स्वर्ग उतार दिया ।
प्रश्न
१-कालिदाने विद्योपार्जन कैसे किया ?
२-उनका कोन सा प्रय तुमने पढ़ा है ? उसके दो श्लोक लिखो।
३-सक्षेप में कालिदास की जीवनी अपनी भाषा में लिखो
H
.
१०-स्वास्थ्य-रक्षा
भगवान ने हमारे शरीर को स्वस्थ बनाया है। हमारा
स्वास्थ्य उसी समय निगड़ता है जब हम प्राकृतिक नियमो का
उल्लघन करते हैं। शरीर को पूर्णतया स्वच्छ रखना, शुद्ध वायु
सेवन फरना, स्वच्छ एवं शुद्ध जल तथा भोजन का प्रयोग
करना, समय से सोना, उठना, स्नान, भोजन और व्यायाम
करना, सब के साथ प्रेमभाव रसना, अपने आचार-विचार
उत्तम रसना, इर्ष्या, द्वेप, क्रोध श्रादि चुरे भावों से दूर रहना
म्वास्थ्य के लिये हितकर है। निरोग रहने के लिये यह परमा
न्यश्यक है कि पूज्य पृपियों के बनाये हुए धर्म-पथ पर चले
और स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का पालन करें।
,

[ ३४ ] रात को जल्द सोना और प्रात काल जल्द उठना स्वास्थ्य के लिये बहुत हितकारी है। सूर्योदय के बाद तक सोते रहना दरिद्रता का चिह्न है और शरीर के लिये बहुत हानिकारक है । -- कहा भी है- कुचैलिन दन्तमलोपधारिणम् चह्नाशिन निष्ठुरभाषिर्ण च । सूर्योदये चास्तमिते शयानम् विमुञ्चति श्रीर्यदि चक्रपाणिः ॥ निरोग रहने के लिये शरीर को स्वच्छ रखना बहुत आव- श्यक है। इसलिये इसका वरावर ध्यान रखना चाहिये । मल- त्याग की क्रिया नियमित समय पर होनी चाहिये । मलमूत्रादि के वेगो को कभी नहीं रोकना चाहिये। शरीर को स्वच्छ रसने से चित्त प्रसन्न रहता है और उत्साह बढ़ता है । पढने मे मन लगता है और स्मरण शक्ति बढती है। स्वास्थ्य ठीक रहता है और शरीर में बल बढता है । शौच के बाद दन्तधावन करना चाहिये । जो लोग दॉत साफ नहीं करते उनके मुँह से दुर्गन्ध आती रहती है एव उनके दांतों पर मैल जम जाता है और कुछ समय के बाद कीडे लग जाते हैं, जिससे दॉत सोसले होकर टूटने लगते हैं। दांतों को स्वच्छ रखना बहुत महज है, किन्तु नित्य साफ करना चाहिये । बबूल या नीम की दतवन सर्वश्रेष्ठ है । यदि यह न मिल सके तो किसो अच्छे मञ्जन को काम में लाना चाहिये।

[ ३५ ] शरीर को स्वच्छ करने की सब से उत्तम रीति स्नान है। स्नान का यह प्रयोजन नहीं कि शरीर पर लोटा दो लोटा जल डाल दिया, किन्तु उचित ढग और नियमित समय का स्नान ही लाभकारी और स्वास्थ्य-वर्धक होता है। स्नान नित्य करना चाहिये । यह आवश्यक नित्य कर्म है। स्नान करने का सब से उत्तम समय शोच आदि से निवृत्त होने के बाद प्रात काल का है । उस समय के स्नान से दिन और रात का जमा हुआ मैल शरीर से दूर हो जाता है और चित्त में उत्साह आ जाता हे । शुद्ध और खुली घायु में स्नान करना विशेष लाभदायक होता है। स्नान का जल शुद्ध होना चाहिये । स्वच्छ ठण्डे जल से स्नान करने से बहुत लाभ होता है । जहाँ नदी हो वहाँ नदी की धारा में स्नान करना चाहिये । गगाजल में विशेप गुण हैं । गगा- स्नान से बहुत लाभ होते हैं । इससे रोगी मनुष्य भी निरोग हो जाते हैं। धार्मिकदृष्टि से भी इसका बडा महत्व है। स्नान से पहले शरीर पर तेल की मालिश करना उत्तम है। नहाते समय सारे शरीर को भलीभाति मलना चाहिये । जाडे में कम से कम महीने में दो बार तो तेल की मालिश होनी ही चाहिये । इससे चर्म में रक्त का प्रवाह बढ जाता है और भीतर की विपली वस्तुएँ बाहर आ जाती हैं। स्नान के बाद साफ तौलिये से सारे शरीर को अच्छी तरह पोंछना श्रावश्यक है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, नासून आदि की सफाई के लिये आजक्ल साबुन का प्रयोग बहुत बढ रहा है, किन्तु यह बड़ी अपवित्र और हानिकारक वस्तु है। इससे बालो की हानि होती है और वे - [ ३६ ] जल्द सफेट हो जाते हैं। शरीर पर लगाने से त्वचा में भी रूखापन आ जाता है। सिर धोने के लिये ऑवला सर्वोपरि है। इससे बाल मुलायम और लम्बे हो जाते हैं। ऑवले के अभाव में रीठा, बेसन, वेल, मुल्तानी मिट्टी आदि का प्रयोग भी अच्छा है। स्नान के बाद देवाराधन करना चाहिये । इसे नित्य-कर्म में माना गया है । सन्ध्योपासन से शरीर निरोग रहता है, चित्त प्रसन्न और मन में अद्भुत स्फूर्ति बनी रहती है। इससे चित्त को एकाग्र करने की शक्ति का संचार होता है। प्राणायाम से मन की शुद्धि होती है और प्रायु की वृद्धि होती है । धर्मबुद्धि का विकास होता है और बुरी वासनाएँ दब जाती हैं। चित्त को शान्ति मिलती है और सद्भाव का सचार होता है । स्मरणशक्ति वढ जाती है और विद्योपार्जन में बड़ी सहायता मिलती है। इसलिये प्रत्येक मनुष्य को देवाराधन अवश्य करना चाहिये । इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य-रक्षा के लिये पॉच बातो पर ध्यान देना आवश्यक है, अर्थात् घर, वख, भोजन, व्यायाम और रहन- सन का ढंग । घर-यथासभव घनी बस्ती से हटकर होना चाहिये, जहाँ शुद्ध हवा अच्छी तरह मिल सके। आसपास खुली जमीन हो तो और भी अच्छा है। पर इस बात का ध्यान रहे कि आसपास की धरती में पानी न समाता हो और न इकट्ठा होता हो। घर में ऐसी सिडकियाँ और दरवाजे अवश्य हो जिनसे साफ हवा घर के प्रत्येक भाग में पहुँच सके । जिस मकान में केवल एक ही [ ३७ ] दरवाजा होता है, उसकी हवा साफ नहीं हो सकती । इसके साथ-ही-साथ घर ऐसा बना हुआ होना चाहिये कि सूरज फी धूप भी अच्छी तरह पहुँच सके । अँधेरे मकानों में रहनेवाले मनुष्य कभी निरोग नही रह सकते । घर के कमरे यथासभव ऊँचे बनवाने चाहिये । सारे घर को बुहारी आदि से प्रति दिन साफ फरना चाहिये और माल में एक बार अवश्य पोत देना चाहिये । रोटी बनाने की जगह अलग और बिल्कुल साफ- सुथरी तथा लिपी पुती रहनी चाहिये । पाखाना और पेशाय- साना घर के ऐसे भाग में होना चाहिये जो रमोई से दूर हो । नालियाँ फाफी ढाल की हों, जिनसे पानी फहीं रुकने न पाये और तुरन्त वह जाय । जिस घर में सील रहती हो वह रहने योग्य नहीं होता । अपने घर को कभी गदा मत यनाओ। घर में जगह-जगह थूकना, पल छीलकर छिलके फर्श पर पड़े रहने देना, साग-भाजी काटकर उसको छीलन घर में ही डाल देना, रदी फाराज फाडकर या पूडी मिठाई साकर उसके पत्ते या दोने प्रॉगन में फेंक देना आदि वडी गन्दी आदते हैं । कूडे को बटोरकर ऐसी जगह डाल देना चाहिये जो वैठने-उठने की जगह से हो । पासाने के घर की सफाई पर पूरा ध्यान रखना चाहिये । वह उतना ही साफ होना चाहिये, जितना कोई कमरा । सोने का कमरा खून हवादार होना चाहिये। उसमें सन्दूके आदि बहुत सा सामान नहीं रखना चाहिये । वस्त्र-ऋतु के अनुकूल पहनना चाहिये । उनके बहुमूल्य होने की कोई आवश्यकता नही, हॉ सफाई अवश्य हो । यथा [ ३८ ] समव कम-से कम वस्रो का उपयोग करना चाहिये । तग वखों को पहनना अच्छा नहीं । वन ऐसे हों जिनमे अगों के परि चालन में कठिनता न पडे और त्वचा तक हवा पहुंचती रहे। नीचे पहनने के वस्त्र को प्रतिदिन धोकर साफ करना चाहिये। सिर का वस्त्र यथासभव हल्का होना चाहिये । ठण्डे देशों में तथा जाडे के दिनो में ऊन के कपडे पहनना आवश्यक हे, जिसमें शरीर को ठण्ड न लगने पावे। गर्मी में हल्के वस्त्र पहिनने पड़ते हैं । मैले वस्त्र पहिनना बहुत बुरा है। इससे रोग उत्पन्न होता है। वस्त्र स्वच्छ रखने के लिये धन की आवश्यकता नहीं, किन्तु दृढ सकरप चाहिये । वस्त्रो को स्वय धो डालने में कोई शर्म नहीं, किन्तु अपनी चीजों को ठीक रखने के लिये अपने ही ऊपर निर्भर रहना गर्व की बात है । वनो का फटा होना भी बहुत बुरा है । इससे लाप- रवाही सुचित होती है । वन की मरम्मत कर लेना या करा लेना वडा आवश्यक है। भोजन-स्वास्य उत्तम भोजन पर निर्भर है और उसी से शरीर में वल आता है। उत्तम भोजन वही है जिससे किसी प्रकार का रोग उत्पन्न न हो और जो काम करने के लिये शक्ति उत्पन्न करे। बाजार का बना भोजन हानिकारक होता है। इस लिये यथासभव घर का वा पवित्र भोजन ही स्वास्थ्यकर है। एक कहावत है कि साने के लिये न जियो, किन्तु जीने के लिये साओ । भोजन सदा नियमित और सादा होना चाहिये। यह ठीक नहीं कि एक दिन दस बजे भोजन हो और दूसरे दिन दो .

। . [ ३९ ] बजे। वैद्यक शास्त्र में कहा गया है " याम-मध्ये, न भोक्तव्य याम-युग्म न लघयेत् " अर्थात् सूर्योदय से एक पहर के भीतर भोजन न करे और दूसरे पहर के भीतर अवश्य कर ले । साय- काल का भोजन सोने के तीन घटे पूर्व कर लेना चाहिये । व्यायाम के पीछे तुरन्त भोजन करना ठीक नहीं। भोजन के पश्चात् कुछ देर आराम अवश्य करे और सायकाल के भोजन के पश्चात् शत पद चलना चाहिये। भोजन खूब भूस लगने पर ही करना चाहिये । भोजन करते समय भी ठूसकर खाना अच्छा नहीं। कहा गया है कि पेट को आधा भोजन से, चौथाई पानी से और वाकी हवा से भरे । भोजन जल्ली-जल्दी नहीं करना चाहिये । प्रत्येक ग्रास को अच्छी तरह चनाकर साना चाहिये । भोजन वदल-बदल करना उचित है । सदा एक-सा भोजन अच्छा नहीं लगता। मास भोजन की अपेक्षा वनस्पति भोजन कहीं अधिक अच्छा है । दूध अवश्य पीना चाहिये । भोजन में हरे साग और फलों की आवश्यकता अधिक रहनीचाहिये। बहुत उम स्वाद की चीजे स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होती हैं।दूध बहुत उत्तम भोजन है। व्यायाम-मनुष्य के लिये अत्यन्त आवश्यक है। शास्त्र में कहा है- शरीरोपचय कान्तिर्गायाणा सुविभक्तता। दीसामित्वमनालस्य स्थिरत्व लाघव मृजा।। नाम कम पिपासोण शीतादीना सहिष्णुता । श्रारोग्यश्चादि परम व्यायामादुपजायते॥ , [ ४० ] खेद है कि हमारे भारतीय विद्यार्थी पश्चिमी शिक्षा के फेर मे पडकर इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। शरीर-यात्रा के लिये व्यायाम अनिवार्य है। व्यायाम सदा निश्चित समय पर नियमित रूप से किया जाना चाहिये। अनियमित व्यायाम से लाभ नहीं होता। व्यायाम के अनेक भेद हैं उनमें से कोई-न-कोई अपनी रुचि और बल के अनुसार प्रतिदिन करना चाहिये। चलना और तैरना बहुत अच्छे व्यायाम हैं। चलने के व्यायाम के लिये सबसे उपयुक्त समय प्रात काल का है। युवा पुरुषों को प्रतिदिन आठ दस मील चलना चाहिये । टौडना, घुडसवारी, दड-बैठक, मुद्गर आदि व्यायाम प्रात काल करे और सन्ध्या समय फुटवाल आदि मिल-जुलकर खेले जानेवाले सेल सेले । रहन-सहन-चलते समय, वेठते समय, पढ़ते समय तथा लिखते समय शरीर को सदा सीधा रखे । कमर झुकाकर चलना बैठना ठीक नही। थोडी रोशनी में पढ़ने-लिखने का काम कभी मत करो । पढते समय पुस्तक को कम-से-कम फुट डेढ़ फुट दूर रसो । मिट्टी के तैल की रोशनी बहुत हानि पहुँचाती है। स्वास्थ्य-प्राप्ति के लिये तमासू, चाय, शराव आदि के नशो से सदा बचना चाहिये । ब्रह्मचर्य का पालन स्वास्थ्य और शक्ति के लिये सब से अधिक आवश्यक है । मानसिक विचारों का भी स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पडता है । इसलिये अनुत्साह, निराशा, चिन्ता आदि भावों को पाम न फटफने दो। 'वीती ताहि विसारि दे, आगे की सुधि लेय- यह सिद्धान्त सदा ध्यान में रसे। 1

शा
[ ४१ ]
मनुष्य का शरीर परमात्मा की दी हुई एक धरोहर है।
उसके साथ मनमानी करके उसका नाश करने का मनुष्यों को
कोई अधिकार नहीं । अत. सदैव अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना
चाहिये, क्योंकि इसी के द्वारा लोक-परलोक दोनों का साधन
होता है। 'शरीरमाद्य सलु धर्मसाधनम् ।
ना
प्रश्न
-स्वास्थ्य ठीक किस प्रकार रह सकता है, संक्षेप में कहो।
-यदि हम अपने शरीर को स्वच्छ न रखें तो क्या हानि होगी?
१३-रहने का घर कहाँ और कैसा होना चाहिये ?
४-चाय, धमाखू पीने से, कमर मुकाकर चलने या बैठने से तया
व्यायाम न करने से क्या क्या हानि हो सकती है ?
५-भोजन कितना और कैसे करना चाहिये ?
न
.
११-परीक्षा
--
བ་
यथा चतुर्भि कनक परीक्ष्यते
निघर्पणच्छेदनतापताडने
तथा चतुर्भि पुरुष परीक्ष्यते
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा ।।
जब रियासत देवगढ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े
--
>

[ ४२ ]
हुए तब परमात्मा की याद आयी। जाकर महाराज से विना
की--"दीनवन्धु ! गुलाम ने हुज़र की खिदमत चालीस साल
तक की, अव कुछ दिन परमात्मा की सेवा करने की आज्ञा चाहता
हूँ। और फिर मेरी अवस्था भी हीन हुई, राज-काज सँभालने की
शक्ति नहीं रही । कहीं भूल-चूक हो जाय तो बुढापे में दाग लगे।
सारी जिन्दगी की नेकनामी मिट्टी मे मिल जाय ।"
राजा साहब अपने अनुभवशील, नीति-कुशल दीवान का
वडा आदर करते थे । वहुत समझाया, लेकिन जब दीवान साहय
ने न माना तब हारकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । हाँ
शर्त यह लगा दी कि रियासत के लिये नया दीवान आप को ही
चुनना पड़ेगा।
दूसरे दिन देश के नामी-नामी पत्रों में यह विज्ञापन निकला
कि देवगढ के लिये एक सुयोग्य दीवान की जरूरत है। जो
सजन अपने को इस पद के योग्य समझें चे वर्तमान दीवान
सरदार सुजानसिंह की सेवा में हाजिर हों । यह जरूरी नहीं कि
वे ग्रेजुएट हो, मगर हृष्ट-पुष्ट होना आवश्यक है । मन्दामि के
मरीजों को यहाँ तक कष्ट उठाने की जरूरत नहीं। एक महीने
तक उम्मेदवारों के रहन-सहन, आचार-विचार की देसम्भाल की
जायगी । विद्या का कम, परन्तु कर्तव्य का अधिक विचार किया
जागा । जो महाशय इस परीक्षा में पूरे उतरेगे ये इस पद पर
सुशोभित होंगे।
x
x
x
इस विज्ञापन ने सारे देश में हलचल मचा दी। ऐसा

JIA [ ४३ ] ऊंचा ओहदा, और किसी प्रकार की सनद की कैट नहीं । केवल नसीब का खेल है । सैकडों आदमी अपना-अपना नसीब अज- माने के लिये चल सडे हुए । देवगढ में नये-नये और रङ्ग-बिरङ्ग के मनुष्य दिसायी देने लगे । प्रत्येक रेलगाडी से उम्मेदवारों का एक मेला-सा उतरता । कोई पञ्जाव से चला आता था, कोई मद्राम से, कोई नये फैशन का प्रेमी, कोई पुरानी सादगी पर मिटा हुआ । रगीन ऐमामे और घुगे, और नाना प्रकार के अद्ग- रसे और कटोप देवगढ में अपनी सजवज दिसाने लगे। सरदार सुजानसिंह ने इन महानुभावों के आदर-सत्कार का अच्छा प्रबन्ध कर दिया था। लोग अपने-अपने कमरों में बैठे हुए महीने के दिन गिना करते थे। हर एक मनुष्य अपने जीवन को अपनी बुद्धि के अनुसार अच्छे रूप में दिखाने की कोशिश करता था । मिस्टर "अ" नौ बजे तक सोया करते थे, आजकल वे वगीचे में टहलते हुए उपा का दर्शन करते थे। मिस्टर "ब" को हुछा पीने की लत थी, मगर आजकल बहुत रात गये किनाड वन्द करके अन्धेरे में सिगार पीते थे। मिस्टर "द","स" और "ज" से उनके घरो पर नौकरों का नाक में दम था, लेकिन ये सजन आजकल "आप" और "जना" के वगेर नौकर से वात- चीत नहीं करते थे। महाशय "क" नास्तिक ये। आजकल उनकी धर्मनिष्ठता देसकर मन्दिर के पुजारी को पढन्युत हो जाने की शङ्का लगी रहती थी। मिस्टर "ल" को कितानी से घृणा थी, परन्तु आजरुल वे बडे-बडे अन्य सोले हुए पढने में इवे रहते थे । जिसमे बातें कीजिये, वह नम्रता और सदाचार का देवता बन .

--
--
[ ४८ ]
आत्मपल और उदारता का सचार है। ऐसा आदमी गरीबों को
कभी न सतायेगा | उसका सकल्प दृढ़ है, जो उसके। चित्त को
स्थिर रसेगा । वह चाहे धोसा खा जाय, परन्तु दया और
धर्म के मार्ग से कभी न हटेगा। इसलिये दीवान के पद पर
इन्हे नियुक्त करके मैं निश्चिन्त हो जाता हूँ। इनके हाथ
से
प्रजा को सदा लाभ ही पहुंचेगा।"
प्रश्न
१-सरदार सुजान सिंह ने पं० जानकीनाथ को क्यो दीवान बनाया।
उन में कौन विशेष गुण थे ?
२-इस कथा से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है ?
१२-गोस्वामी तुलसीदास
10-
साधारणतया भारतवर्ष भर में और विशेपकर उत्तर भारत
में ऐसा कोई मनुष्य न होगा जिसने 'तुलसी-रामचरितमानस'
का नाम न सुना हो । राजा से लेकर रङ्क तक और 'महलो से
लेकर भोपडों तक सब कहीं इसका प्रचार है। बड़े-बडे विद्वानों
से लेकर-निरक्षर भिट्टाचार्य तक रामचरितमानस' से अपने
मानस की तृप्ति करते और अपनी-अपनी विद्या-बुद्धि के अनुसार
उसका रसास्वादन कर अपने को कृतकृत्य मानते हैं । इस ग्रन्थ

तुलसीदास

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[ ४९ ] ने हिन्दू-जाति का बडा उपकार किया है। रीति, नीति, आहार, व्यवहार सब बातों में मानो 'रामचरितमानस' ही हिन्दु-मात्र के लिये एक-मान पथदर्शक है। प्रत्येक विपय में उसकी चौपाइयाँ उद्धृत की जाती है और जनसाधारण के लिये धर्मशास्त्र का काम देती हैं। न जाने इस अन्य ने कितनों को डूबने से बचाया, कितनों को फुमार्ग पर जाने से रोका, कितनों के निराशामय जीवन में आशा का सञ्चार किया, कितनों को घोर पाप से बचाकर पुण्य के सञ्चय करने में लगाया और कितनों को धर्मपथ पर डगमगाते हुए चलने में सहारा देकर सँभाला। रामायण के विशद चरित्र-चित्रण एव मानवीय मनोविकारो के स्पष्टीकरण ने इमे अत्यन्त लोकप्रिय बना दिया है । ऐसे अन्थरत्न के वनानेवाले 'गोस्वामी तुलसी- दास' का जीवन-चरित सुनने की सभी को उत्कण्ठा रहती है। किन्तु शोक है कि इनके जीवन-वृत्तान्त के विषय में बहुत कम वाते ज्ञात हैं। साधारण फवि प्राय लोभवश अपना और अपने आश्रय- दाता का वृत्तान्त अपने ग्रन्थ में लिखा करते हैं। परन्तु गोस्वा- मीजी ने मनुष्यों का चरित न लिखने का प्रण किया था, वे केवल भगवान का गुण-गान किया करते थे, इसलिये उन्होंने अपना कुछ भी वृत्तान्त नहीं लिसा । कहीं-कहीं उनकी रचनाओं से उनके चरित्र का आभास-मान मिलता है, किन्तु यह केवल अपनी दीनता और हीनता दिखलाने के लिये दिया गया है। किसी किसी अन्य का समय भी उन्होंने लिस दिया है। इस

[ ५० ]
प्रकार उनका चरित्र-वर्णन करने के लिये हमें अधिकतर दूस
अन्यों एव किंवदन्तियों का सहारा लेना वडा आवश्यक है ।
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म-समय किसी प्रामाणिक अन्य
मै लिसा नहीं मिलता, कुछ विद्वानों का मत है कि उनका जन
विक्रमी संवत् १५८९ मे हुआ । हम तो दृढतापूर्वक केवल इतन
ही कह सकते हैं कि गोस्वामीजी का जन्म सोलहवीं शताब्दी
उत्तरार्द्ध में हुआ और वे बडी आयु भोगकर परमधाम सिधारे
इनकी मृत्यु काशी में सेग के कारण हुई । इनकी मृत्यु के सम्बन
में यह दोहा प्रसिद्ध है-
-
.
दोहा-सक्त सोरह सौ असी, असी गग के तीर ।
सावन सुक्छा सप्तमी, तुलसी तज्यो सरीर ।
इनका जन्मस्थान राजापुर है, वही पर गोस्वामीजी 4
कुटी, मन्दिर आदि आज भी विद्यमान हैं।
कोई इन्हें कान्यकुञ्ज, कोई सरयूपारी और' कोई पराश
गोत्र द्विवेदी ब्राह्मण कहते हैं। इसके लिये भी कोई विशेष प्रमाण
नहीं जिससे कि हम निश्चयपूर्वक कुछ कह सकें। हॉ, इतन
अवश्य है कि थे वे ब्राह्मण और बहुत सम्भव है कि सरयू
पारी हो।
लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि इनके पिता का नाम आत्मा
राम दुवे और माता का नाम हुलसी था। यह कथन भी केवल
अनुमान-मात्र है, इसकी पुष्टि विशेषरूप से कहीं नहीं मिलती।
तुलसी-चरित में लिसा है कि तुलसीदास ने स्वय कहा है कि

, + [ ५१ ] इनके प्रपितामह परशुराम मिश्न थे जिनके पुत्र का नाम शङ्कर मिश्र था। उनके सन्त मिश्र और रुद्रनाथ मिश्र हुए। रुद्रनाथ मिश्र के गणपति, महेश, तुलाराम और मद्गल चार पुत्र और वाणी एवं विद्या नाम की दो कन्याएँ हुई। तृतीय पुत्र तुलाराम ही गोस्वामीजी थे। इनके गुर नरहरिदास ने इनका नाम राम योला रखा था, किन्तु यह अपनी दीनता दिसाने के लिये अपने आपको तुलसीदास कहने लगे। कहते हैं कि अमुक्त मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण माता-पिता ने इन्हें त्याग दिया था। यागने के सम्बन्ध में तो तुलसीदास ने विनयपत्रिका में स्पष्ट कहा है, पर उसका कारण नहीं बतलाया। इधर तुलसी चरित में विवाह तक तुलसीदास का माता-पिता के साथ रहना स्पष्ट कहा है । सम्भव है कि किसी कारणवश वालकपन से माता. पिता के जीवित रहते ही अपने गुरु नरहरिदास के यहाँ वे रहते रहे हों। यह प्रसिद्ध है कि इनका विवाह दीनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ था, जिससे तारक नामक एक पुत्र भी पैदा हुआ जो बचपन में ही मर गया था। तुलसी चरित में इनके तीन विवाह लिसे हैं-तीसरा विवाह कञ्चनपुर ग्राम के उपा. ध्याय लक्ष्मण की कन्या बुद्धिमती से हुआ था । इसी के उपदेश से गोस्वामीजी विरक्त हुए । कहते हैं कि तीसरे विवाह की आसक्त रहा करते थे। एक दिन घर चली गयी। गोस्वामीजी । v rr -

[ ५२ ]
जाफर चे स्त्री से मिले । वहाँ स्त्री के बुरा-भला कहने से चे
ऐसे विरक्त हुए कि उसके बार-बार विनती करने पर भी सीधे
काशी चले गये और भगवद्भजन में मग्न रहने लगे। वहाँ
गङ्गा
के तट पर, अस्सी घाट के समीप, उनका मठ अब तक
बना हुआ है । वहाँ एक जोडी खडाऊँ रक्खी हुई है। लोग
कहते हैं वे तुलसीदास की ही हैं। वे कभी-कभी तीर्थ यात्रा
के लिये भी जाया करते थे। इनमें अयोध्या, चित्रकूट और
मथुरा मुख्य हैं।
गोस्वामीजी स्मात वैष्णव थे । स्मार्त सव देवताओ का
पूजन तथा जप करते हैं, वे किसी से विरोध नहीं रखते । यही
सिद्वान्त तुलसीदास का भी था, क्योकि उन्होंने अपने
प्रत्येक ग्रन्थ में सभी देवी-देवताओं से प्रार्थना की है और
सभी को राम-मय बतलाया है। रामायण में गोस्वामीजी
ने अपनी नम्रता बहुत ही दिखलायी है, यहाँ तक लिस
दिया है कि-
कवि न होउँ नहिं चतुर प्रवीनू । सकल कला सव विद्या हीनू ॥
कवित विवेक एक नहिं मोरे । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ।।
-
ऐसी कहावत है कि गोस्वामीजी शोच के लिये नित्य गङ्गा-
पार जाया करते थे और लौटते समय लोटे का बचा हुआ
जल आम के पेड की जड में डाल देते थे। एक दिन उस पेड
पर रहनेवाले प्रेत ने उस जल से तृप्त हो गोस्वामीजी से घर
माँगने के लिये कहा । गोस्वामीजी ने रामचन्द्रजी के दर्शन का

[ ५३ ] वर माँगा । उस पर अपनी अशक्तता बताते हुए प्रत ने कहा कि अमुक मन्दिर में रामायण की कथा सुनने के लिये मैले- कुचले कोटी का रूप धारण किये हुए हनुमानजी प्रतिदिन आते हैं, उन्हीं की कृपा से तुम्हारा मनोरथ सफल हो सकेगा। निदान, ऐसा ही हुआ। बहुत कुछ अाग्रह करने पर हनुमानजी ने गोस्वामीजी से कहा कि चित्रकूट में जाओ। वहीं दर्शन होगा। तुलसीदासजी ने ऐसा ही किया। उनके सम्बन्ध मे और भी कई एक विचित्र कथानक प्रच- लित हैं जैसे मुर्दे का जिलाना, हत्या छुडाना आदि आदि । तुलसीदासजी जैसे पारदर्शी तथा वामिद्ध महात्माओं के विषय में इनका संघटित होना सहज है, किन्तु इनकी यथार्थता के विषय में निश्चितरूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। यद्यपि तुलसीदासजी ने कवीर आदि की तरह अन्य कोई अलग मत नहीं चलाया, परन्तु चाहे किसी भी मत या धार्मिक विश्वास का हिन्दू क्यों न हो यह गोस्वामीजी के दिसाये मार्ग फा अवश्य कुछ-न-कुछ अनुसरण करता है । उन्होंने रामायण में धर्मनीति, समाजनीति और राजनीति आर्य-अन्थो के अनुसार इस प्रकार सीधी सादी भाषा में उदाहरण साथ समझायी है कि शैव, शाक, स्मार्त, वैष्णव किसी भी सिद्धान्त से विरोध नहीं पडता, और सब मतानुयायी उनकी रामायण का सन्मान फरते हैं तथा साधारण लोगों की समझ में तो वह पॉचयाँ घेद है। तुलसीदास ने जो कुछ लिसा है, हिन्दी भाषा में ही लिसा

[ ५४ ]
है। उनके अन्थों के देखने से विदित होता है कि वे सस्कृत
भी पढे थे। रामायण के प्रत्येक काण्ड के आदि में उन्होने जो
श्लोक लिसे हैं वे इस बात के प्रमाण हैं। उन श्लोकों में उन्होंने
यह भी लिखा है कि अनेक पुराणो को देखकर उनका निचोद
रामायण में रखा गया है। पुराण और उपनिषद् आदि अन्य
सस्कृत में ही हैं। इससे भी यह विदित होता है कि वे संस्कृत
जानते थे। वे फारसी भी जानते थे । फारसी मे लिखे हुए उनके
कागज-पत्र मिले हैं। साराश यह है कि वे एक, विद्वान
पुरुप थे।
तुलसीदास ने छोटे-वडे १२ अन्थो का निर्माण किया है
उनमें रामायण, विनयपत्रिका, गीतावली, दोहावली, कवित्त
रामायण और रामाज्ञा अधिक प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जितनी कवित
की है, मब में श्रीरामचन्द्रजी का गुणगान किया है।, उनमें
मन्थो में रामायण सब से बडा और सब से उत्तम है । उसक
नाम तुलसीदास ने रामचरितमानस रखा था, परन्तु अब
मव कोई उसे रामायण ही के नाम से पुकारते हैं । किसी
किसी का यह मत है कि यह काव्य सस्कृत के आदि-कार
वाल्मीकि रामायण के आधार पर लिखा गया है। परन्तु यह
कथन ठीक नहीं प्रतीत होता । दोनों ग्रन्थों की कथाओं में बड
अन्तर है। वाल्मीकि रामायण की अपेक्षा तो अध्यात्म-रामायण
से तुलसीदासजी को रामायण की कथा अधिक मिलती है।
तुलसीदासजी बडे महात्मा और बहुत वडे कवि थे
रामायण में उन्होंने जिस,जिस विपय का वर्णन किया है।
।

+
F
[ ५५ ]
उसका रूप-सा खडा कर दिया है। उनकी रामायण में अयोध्या
काण्ड सब से उत्तम है। उममें भी श्रीरामचन्द्र के साथ चलने
के लिये सीता की प्रार्थना लक्ष्मण का अपनी माता से वन
जाने की आज्ञा मांगना और राजगद्दी न स्वीकार करने के विपय
में यसिष्ठ को भरत का उत्तर अन्यान्य स्थानों की अपेक्षा विशेष
मनोहर हैं । प्रज, बुन्देलखण्ड, बिहार, बैसवाडा इत्यादि कई
प्रान्तों की बोलियों में तुलसीदासजी ने रामायण लिखी है।
उनके अन्य प्रन्थों में भी यही मिश्रित भाषा पायी जाती है
तुलसीदास के अन्थो में विनयपत्रिका का द्वितीय स्थान है।
उसमें उन्होंने श्रीरामचन्द्र-सम्बन्धी नाना प्रकार की विनयभरी
कविताएँ की हैं।
सुनते हैं, राजापुर में तुलसीदास के हाथ की लिसी हुई
रामायण की एक पुस्तक थी। उसे कोई चुरा ले गया । जब
वह पकडा गया तब उसने उस पुस्तक को यमुना की धारा में
प्रवाहित कर दिया, इससे वह बिगड गयी । अयोध्याकाण्ड बीच
में था, इस कारण केवल वही पढने योग्य रह गया । वह
अब तक राजापुर में रखा है।
प्रश्न
-पोस्यामी तुलसीदास के विषय म तुम क्या जानते हो?
२-उन्होंने कौन-कौन मे प्रन्थ लिसे हैं ?
३--तुलसीदास की रामायण में क्या विशेषता है ?
1

[ ५६ ]
१३-पुरुपार्थ
पुरुप क्या, पुरुषार्थ हुश्रा न जो,
हृदय की सब दुर्वलता तजो ।
प्रवल जो तुम में पुरुपार्थ हो-
सुलभ कौन तुम्हें न पदार्थ हो।
प्रगति के पथ में विचरो उठो,
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो ॥१॥
।
.
न पुरुषार्थ बिना कुछ स्वार्थ है,
न पुरुपार्थ विना परमार्थ है।
समझ लो, यह बात यथार्थ है-
कि पुरुषार्थ वही पुरुषार्थ है।
भुवन में सुख-शान्ति भरो, उठो,
पुरुप हो, पुरुषार्थ करो, उठो ॥२॥
न पुरुषार्थ विना वह स्वर्ग है,
न पुरुपार्थ बिना अपवर्ग है।
न पुरुपार्थ बिना क्रियता कहीं,
न पुरुषार्थ विना प्रियता कहीं।
सफलता वर तुल्य बरो, उठो,
पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो ॥३॥

[ ५७ ] न जिसमें कुछ पौरुप हो यहाँ, सफलता वह पा सकता कहाँ ? अपुरुपार्थ भयङ्कर न उसमें यश है, न प्रताप है। न कृमि-कीट समान मरो, उठो, पुरुप हो, पुस्पार्थ करो, उठो ।।४।। पाप है, - मनुज-जीवन में जय के लिये- प्रथम ही दृढ पौरुप चाहिये । विजय तो पुरुषार्थ विना कहाँ, कठिन है चिरजीवन भी यहाँ। भय नहीं, भव-सिंधु तरो, उठो, पुरुप हो, पुरुषार्थ करो, उठो ॥५॥ , यदि अनिष्ट अडे, अड़ते रहे, विपुल विन पड़े, पडते रहे। हृदय में पुरुषार्थ रहे भरा- जलधि क्या,नमक्या,फिर क्याधरा। हद रहो, ध्रुव धैर्य धरो, उठो । पुरुप हो, पुस्पार्थ फरो, उठो ॥६॥ यदि अभीष्ट तुम्हे निज सत्य है, प्रिय तुम्हे यदि मान-महत्व है।

[ ५८ ] यदि तुम्हें रखना निज नाम हे, जगत में करना कुछ काम है। मनुज । तो श्रम से न डरो, उठो, पुरुप हो, पुरुपार्थ करो, उठो ॥ ७ ॥ - 4 प्रकट नित्य करो पुरुषार्थ को, हृदय से तज दो सब स्वार्थ को। यदि कहीं तुमसे परमार्थ हो- यह विनश्वर देह कृतार्थ हो। सदय हो, पर-दुख हरो, उठो! पुरुप हो, पुरुपार्थ करो, उठो ॥ ८ ॥ - मश्न 1-पुरपार्थ क्यों करना चाहिये ? इससे क्या क्या राम है ? अपनी भाषा में रिखो। - 11-- २-इस कविता को कण्ठस्थ कर लो। m ।

[ ५९ ]
१४- हमारा देश
गायन्ति देवा किल गीतकानि
धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे।
स्वर्गापवर्गास्पद हेतुभूते
भनन्ति भूय पुरुपा सुरत्वात् ॥
-
-
हमारे देश का नाम भारतवर्प है। इसका एक पुराना नाम
आर्यावर्त भी है । अनेक महापुरुषों ने इस देश मे जन्म लिया,
जिनकी कीर्ति अव तक ससार में जगमगा रही है । यही जन्म
लेकर भगवान् रामचन्द्र ने मर्यादापुरुषोत्तम का श्रादर्श ससार में
पड़ा किया। यहीं जन्म लेकर भगवान् कृष्णचन्द्र ने कर्मयोग का
महान् सदेश सुनाया। दया की पावन धारा से समस्त ससार को
प्राप्लावित करनेवाले महात्मा बुद्ध ने भी यहीं जन्म धारण
किया था । भरत के समान मिहों से सेलनेवाले और अभिमन्यु
ममान निर्भीक एव पीर बालक इसी भूमि के लाल थे।
इसी पवित्र भूमि ने ससार को सत्र से पहले ज्ञान ओर सभ्यता
की शिक्षा दी थी।
इस देश के उत्तर में विशाल हिमालय की शैलमाला पूर्व से
'पश्चिम तक फैली हुई है। इसी शैलराज में गौरीशकर और
धवलागिरि जैसी संसार की सब से ऊँची चोटियाँ हैं। यहीं पर
मानसरोवर नामक ताल है। यहीं से गगा यमुना तथा सिन्धु,
ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ निकलकर भारत भूमि को अपनी निर्मल
के

[ ५८ ]
यदि तुम्हें रखना निज नाम है,
जगत में करना कुछ काम है।
मनुज । तो श्रम से न डरो, उठो,
पुरुष हो, पुरुपार्थ करो, उठो ।। ७
.
प्रकट नित्य करो पुरुपार्थ को,
हृदय से तज दो सब स्वार्थ को ।
यदि कहीं तुमसे परमार्थ हो-
यह विनश्वर देह कृतार्थ हो ।
सदय हो, पर-दु स हरो, उठो ।
- पुरुप हो, पुरुपार्थ करो, उठो ॥८
,
-
भश्न
1-पुरपार्थ क्यों करना चाहिये ? इससे क्या-क्या राम है ? अपनी सरल
भाषा में लिखो।
२-इस कविता को कण्ठस्थ कर लो।
।

-
-
घरलागिरि जैसी मसार की सब से ऊँची चोटियाँ है। यहीं पर
मामगेवर नामक ताल है। यहीं से गगा-यमुना तथा मिन्यु,
मापुन आदि नदियाँ निफलफर भारत-भूमि को अपनी निर्मल
[ ५९ ]
१४- हमारा देश
गायन्ति देवा किल गीतकानि
धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे ।
स्वर्गापवर्गास्पद-हेतुभूते
भवन्ति भूय पुरुपा सुरत्नात् ।।
हमारे देश का नाम भारतवर्प है। इसका एक पुराना नाम
आर्यावर्त भी है । अनेक महापुरुषों ने इस देश में जन्म लिया,
जिनकी कीर्ति अव तक समार में जगमगा रही है । यही जन्म
लेकर भगवान् रामचन्द्र ने मर्यादापुरुषोत्तम का श्रादर्श संसार में
पड़ा किया। यहीं जन्म लेकर भगवान कृष्णचन्द्र ने फर्मयोग का
महान् सदेश सुनाया। दया की पावन धारा से समस्त ससार को
श्राप्लावित करनेवाले महात्मा बुद्ध ने भी यही जन्म धारण
किया था। भरत के समान सिंहाँ से सेलनेवाले और अभिमन्यु
के समान निर्भीक एव वीर चालक इसी भूमि के लाल थे।
इमा पवित्र भूमि ने ससार को सन से पहले ज्ञान और सभ्यता
इस देश के उत्तर में विशाल हिमालय की शैलमाला पूर्व मे
फैली हुई है। इसी शेलराज में गौरीशकर और
की शिक्षा दी थी।
पश्चिम
mpat

1 [ ६० ] जलधारा से सींचती हैं। इसी के अंचल में वह काश्मीर प्रान्त है, जो काव्य और केशर का देश कहा गया है और जिसके सौंदर्य को देखकर किसी कवि ने कहा है कि यदि इस पृथ्वीतल पर कोई स्वर्ग है तो वह यही है। इसकी राजधानी श्रीनगर की स्थापना सम्राट अशोक ने की थी । भाष्यकार पतंजलि, साहित्य के आचार्य मम्मट, वैयाकरणशिरोमणि कैयट तथा महाकवि कल्हण ने इसी भूमि में जन्म-ग्रहण किया था। काश्मीर के बीच से सिंधु नद बहता है। सिंधु के उस पार केकय और गान्धार प्राचीन देश हैं। यहीं प्रतापी मौर्य सम्राट ने यवन-सेनापति सेल्यूकस को हराया था। सिंधु के समीप ही तक्षशिला नगरी है, जहाँ प्राचीन भारत का सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय था और जहाँ पर व्याकरण के महान् आचार्य पाणिनि, कूटनीतिज्ञ चाणक्य, महावैद्य जीवक और 'चरक ने शिक्षा पायी थी। काश्मीर के दक्षिण में पजाब पञ्चनद-प्रान्त है, जहाँ हिमालय की पॉच पुत्रियाँ सतलज, रावी, चिनाब, व्यास और झेलम निरन्तर क्रोडा करती हैं। मेलम के किनारे महाराज पुरु ने १. जगद्विजयी यवन-सम्राट सिकदर का अकेले सामना किया था। के तीर पर गुप्त-सम्राट् स्कन्दगुप्त ने दुर्दान्त हूणों को हार दी थी। यहीं पवित्र धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र है,जहॉ भगवान् ने अर्जुन को गीता सुनायी थी। यहीं मालव और क्षुद्रक के प्रजातत्र-राज्य थे, जिन्होंने यूनानी सेना को परास्त सिकंदर तक को सधि करने के लिये वाध्य किया था। धर्म और देश की रक्षा के लिये सिस जाति के असंख्य चीरों । . N 7 - अपना बलिदान दिया है। महात्मा नानक और गुरु गोविंदसिंह की क्रीडास्थली यही भूमि है। यहॉ अमृतसर सिखो का तीर्थस्थान गुरुद्वारा है। इसकी राजधानी लाहोर या लवपुर है, जिसे श्रीराम के द्वितीय पुत्र लव ने बसाया था। इसी के पास देहली का महानगर है, जो अनेक सम्राटों की राजधानी रही और इस समय भी भारतवर्ष की राजधानी है । सम्राट के प्रतिनिधि वाइसराय महोदय यहीं निवास करते हैं। यमुना नदी के तट पर सडे होकर देखने से दाहिने हाथ की ओर विशाल राजस्थान है और पाँयी ओर सयुक्तप्रान्त ! ऐसा जान पडता है मानो सूर्य की यह दुहिता क्षात्रधर्म और भ्राह्मणधर्म के बीच सड़ी हुई है । असंस्य वीरों को जन्म देने वाली वीरभूमि राजस्थान की महिमा कौन गा सकता है । अत्यन्त प्राचीन काल में जव सरस्वती नदी समुद्र तक बहती थी, यह भूमि समुद्र के तल में छिपी हुई थी। विधाना के विशेष प्रमाद से वीररस ने अपने नियास के लिये यह भू-सड, समुद्र से प्राप्त किया । यहाँ कोई स्थान ऐसा नहीं जो किसी न किसी वीर की कीर्चि गाथा से सनद्ध न हो । यहाँ की वीर नारियों ने अपने देश और अपने सम्मान को रक्षा के लिये हँसते-हँसते अपने प्राण अग्नि को समर्पित कर दिये थे। महारानी पमिनी ने यही आत्मपलि दी थी । यहाँ के आहारला (अद) पहाड़ की दुर्गम घाटियों ने कई बार राजपूतों की मर्यादा की रक्षा की है। हिन्दू-जाति को स्वतंत्रता का पाठ पढानेवाले और उसका सिर ॐचा एपनेवाले महाराणा प्रताप और राठोर दुर्गादास ने यही माघ जैसे महान कवि की जन्म-भूमि है । राजपूत-आन [ ६२ ] अपने जन्म से इसी भूमि को पवित्र किया था । भक्त-शिरोमणि मीराबाई ने जिनके भजन आज भारतवर्ष के घर-घर में गारे जाते हैं, यहीं जन्मग्रहण किया था। यहीं पर वारह वर्ष के थालक बादल ने अलाउद्दीन जैसे प्रतापी सम्राट् को छकाया था टूटते हुए आशा-ततु को बचानेवाले, अपनी कविता में दा हजार हाथियों का बल रखनेवाले महाकवि पृथ्वीराज ने यहीं जन्म लिया था। इसी भूमि में सुप्रसिद्ध पुष्कर तीर्थ है भगवान् कपिल का आश्रम यहीं कोलायत (कपिलायतन ) में है, जहाँ प्रतिवर्प सहस्रों यात्री तीर्थ करने के लिये आते हैं। इस समय इस ;प्रान्त में राजपूत जाति के अनेक राज्य हैं, जिनमें मेवाड़, मारवाड, जयपुर ओर बीकानेर प्रमुख हैं। यमुना के वायें तट पर सयुक्तप्रान्त है, जहाँ प्राचीन ब्रह्मर्पिदेश है। यहाँ जगत्पावनीभागीरथी गगा हैं। यहीं तीर्थराज प्रयाग है जहाँ गगा, यमुना और सरस्वती का सुप्रसिद्ध त्रिवेणी सगम है । यही अयोध्या और मथुरा के नगर हैं, जहाँ भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था। यहीं माया और काशी की पवित्र पुरियाँ हैं। इसी काशी में ज्ञानसूर्य का सनसे पहले प्रकाश हुआ। भगवान् शफर यहाँ विश्वनाथ के नाम से सदा निवास करते आये हैं । भगवान् शकर की कृपा से यहीं पर शकराचार्य के ज्ञान-चक्षु उन्मिपित हुए। यहीं पर वैयाकरण- शिरोमणि भट्टोजी दीक्षित ने सिद्धान्त-कीमुदी की रचना की आधुनिक काल में यहीं पर बापूदेव शास्त्री और शिवकुमार - [ ६३ ] शास्त्री की कीर्ति देशदेशातरों तक फैली ! इसी पवित्र पुरी में महामना मदनमोहन मालवीयजी ने आर्य सस्कृति और साहित्य की शिक्षा के लिये हिन्दू-विश्वविद्यालय की स्थापना की है । यही से थोडी दुर पर सारनाथ में भगवान बुद्ध ने बौद्ध धर्म का प्रथम उपदेश दिया था। इसी पावन प्रान्त में अमर कवि तुलसी- दास ने जन्म लिया था, जिनका रामचरित मानस आज हिन्दु जनता के हृदय का हार हो रहा है । इसी के अन्तर्गत हिमालय शैलमाला के अचल में बदरीनाथ और केदारनाथ नामक पवित्र धाम हैं। सयुक्तप्रान्त के पूर्व मे विहारप्रान्त है, जहाँ जनक जैसे कर्मयोगी राजा और याज्ञवल्क्य जैसे ब्रह्मानिष्ठ महर्पि हुए। भगवती सीता ने यहीं जन्म लिया था। यहीं पर जैन-धर्म के तीर्थकर भगवान महावीर अवतरित हुए थे । अजातशत्रु और चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे प्रतापी सम्राट् यहाँ पर हुए । यही पर प्रियदर्शी महाराज अशोक ने राज्य किया जो ससार के सबसे बडे आदर्श सम्राट माने जाते हैं। उन्होंने लौकिक विजय की अपेक्षा धर्म- विजय को ही महत्त्व दिया और ल्का, यूनान तथा मिश्र जैसे सुदूर देशों में करुणपूर्ण बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिये चौद्ध भिक्षुओ को भेजा था। यहीं पर हिन्दू-सस्कृति के उद्धारक समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य जैसे परम प्रतापी सम्राट हुए, जिनका राज्यकाल भारतवर्ष का स्वर्णयुग समझा जाता है। यहीं पर आर्यभट, महाकवि वाण और मैथिलकोफिल विद्यापति ने जन्म लिया था। पाटलिपुर नगर इन समस्त सम्राटों फी [ ६४ ] राजधानी रही और इस समय भी पटना नाम से बिहार का मुख्य नगर है । गया हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ है, जहाँ पिंडदान. करने से मुक्ति प्राप्त होती है। राजगृह में जैनों का तीर्थ पार्श्वनाथ है । विहार के दक्षिण में कलिंगप्रान्त है, जहाँ जगन्नाथपुरी का पवित्र धाम है। बिहार के पूर्व में वंग देश है जो अपनी प्राकृतिक शोभा के लिये प्रसिद्ध है । इसी भूमि में भगवान् चैतन्य ने अवतार लेकर भक्ति का विस्तार किया था । चंडीदाम और कृत्तिवास जैसे महा- कवि और जीमूतवाहन रघुनन्दन जैसे धर्मशास्त्रकार यही उत्पन्न हुए थे । भारत का राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' पहले-पहल यहीं गाया गया। यही विश्वावि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की जन्मभूमि है। वग के पूर्व में कामरूप (आसाम) प्रान्त है, जहाँ कामाक्षा देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। यहीं महानगर कलकत्ता है जो अग्रेजी राज्य में लंदन के पश्चात् सब से बडा नगर है। यहीं गगा और ब्रह्मपुत्र का सगम समुद्र के साथ होता है। गगा-सागर-सगम पवित्र तीर्थस्थान है। मध्यमारत में मालव देश है। यहाँ की प्रसिद्ध नगरी उज्जयिती है,जहाँ सवत् चलानेवाले महादानी महाराज विक्रमादित्य हुए । पन्हीं महाराज के दरबार में सस्कृत-भाषा के सब से घडे महाकवि कालिदास रहते थे, जिनकी कीर्ति आज देशदेशान्तरो में गूंज रही है। यहीं पर हूणों के नाशकर्ता महाराज यशोधर्मा हुए थे। यहाँ पर महाकालेश्वर का महान् वीर्थ है । यही धारा नगरी है, जहाँ सरस्वती के अवतार महाराज भोज राज्य करते थे । मालव - के पूर्व में दशार्ण देश है, जो वीर आल्हा उदल और छत्रमाल की क्रीडा-भूमि था। आजफल यहाँ पर इदोर, ग्वालियर, रीवॉ आदि कई एक देशी राज्य हैं। मध्यभारत के दक्षिण में मध्यप्रदेश है। यहाँ विन्ध्याचल और पारियान (सतपुडा ) पर्वतों के बीच मेकलकुमारी नर्मदा यहती है, जिसके तट पर ओंकारेश्वर का तीर्थ है । मध्यप्रदेश के पक्षिण में विदर्भ (वरार) देश है, जहाँ दमयन्ती और रुक्मिणी ने जन्म लिया था। यहीं पर महाकवि भवभूति का जन्मस्थान है, महाकवि भारवि और दडी की जन्मभूमि भी यही है । नागपुर, जवलपुर आदि इस प्रान्त के प्रमुख नगर हैं। मध्यभारत के पश्चिम में गुजरात का महान् प्रान्त है। इसी के सौराष्ट्र नामक संड में भगवान् श्रीकृष्ण की द्वारिका है, जो हिन्दूधर्म के चार धामों में से एक है। यहीं प्रभास का प्रसिद्ध तीर्थ है। यही जैनों के गिरनार और शव जय तीर्थ हैं । इसी ५ गुर्जर भूमि में फलिकाल के सर्वज्ञ महान् आचार्य हेमचन्द्र ने जन्म लिया था। यही पर मोरवी और पोरयदर हैं, जहाँ आदर्श बालब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द और विश्ववद्य महात्मा गांधी का जन्म हुआ था।आजकल इस प्रान्त का मुख्य नगर अहमदाबाद है, जो साबरमती नदी के किनारे बसा है। गुजरात के में सिन्धु देश है, जहाँ के राजा जयद्रय ने कुरक्षेत्र के युद्ध में भाग लिया था। यहीं पर कराँची नामक भारत का एक प्रमुख वदरगाह है, जो व्यापार का बड़ा भारी केन्द्र है। गुजरात के दक्षिण में पश्चिमीघाट अथवा सह्याद्रि पर्वत के दोनों G [६६ ] ओर बसा हुआ महाराष्ट्रप्रान्त है जहाँ नामदेव, एकनाथ, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास जैसे अनेकों सन्त महात्मा उत्पन्न हुए । हिन्दू-धर्म और हिन्दू-साम्राज्य के उद्धारक महाराज छत्रपति शिवाजी को कौन नहीं जानता । वे इसी भूमि के सपूत थे। वाजीराव और नाना फडनवीस जैसे राज्य-संस्थापक और कुशल राजनीतिज्ञों को इस भूमि ने जन्म दिया है । पचवटी पढरपुर जैसे अनेक तीर्थ यहाँ स्थित हैं। इसी में बबई का सुन्दर बदरगाह है, जो आधुनिक भारत का कलकत्ते के बाद सब से बडा शहर है। पूना इस प्रान्त का प्रमुख नगर है । महाराष्ट्र के दक्षिण-पूर्व में गोदावरी और कृष्णा नदियों के बीच में विशाल आन्ध्र देश है, जहाँ के प्रतापी शालिवाहन राजाओं की विजयपताका मगध तक फहरा चुकी थी । श्रीशैल, द्राक्षाराम और कालेश्वर के महालिंग इसी देश में हैं। इसी प्रान्त में हैदराबाद का राज्य है। महाराष्ट्र के दक्षिण में कर्णाट का प्रान्त है, जहाँ मल्लिनाथ के समान अद्वितीय टीकाकार ने जन्म लिया था । कर्णाट के दक्षिण में रिल प्रान्त है, जो भगवान् शकराचार्य की जन्मभूमि है। आन्ध्र के दक्षिण में द्रविड देश x है, जहाँ कावेरी नदी बहती है। यही काची और रामेश्वरम् के पवित्र तीर्थ हैं। इसी भूमि में भगवान् रामानुजाचार्य ने जन्म लेकर वैष्णर-धर्म की ध्वजा 19 इस समय गुजरात, महाराष्ट्र और कर्णाट मिलकर एक हो पाई नामक प्रान्त बनाते है * इस समय माध, द्रविड, येरेल एक ही मद्रासप्रान्त में शामिल है। । ।

F स । [६७ ] फहरायी थी। यहीं तिरुवल्लुवर सदृश अमर कवि हुआ, जिसकी वाणी ने सहस्रों मनुष्यों को शान्ति और नीति की शिक्षा दी है। इसी में मद्रास का सुप्रसिद्ध नगर और बन्दरगाह है। असख्य महान् विद्वानों, अमर कवियो, सच्चे पराक्रमी 1वीरों, सिद्ध महात्माओं और पतिवन धर्म की आदर्श मती- साध्वी पीरागनाओं को जन्म देनेवाली इस महान भारतभूमि को धन्य है । किसका मस्तक इसके सामने श्रादर के साथ नहीं मुक जायगा ? देवता तक इसके गीत गाते हैं और इसमें जन्म लेने की इच्छा करते हैं। इसका बाह्य रूप भी कितना सुन्दर है । प्रकृति के जितने विविध रूप यहाँ देखने को मिलते हैं उतने किस देश में मिलेगे ? गगनचुबी विशाल हिमाच्छादित हिमालय इसका शुभ्र मुकुट है, रत्नाकर इसके चरण पसारकर अपने को धन्य समझता है । धन्य है यह पावन भूमि और धन्य हैं वे लोग जो इस जननी की गोदी में क्रीडा करते हैं। १-भारतवर्ष में कौन कौन सी मुख्य नदियों है ? उनके विषय में तुम क्या जानते हो? २-- इसम कितने प्राव हैं ? यहाँ के किा-किन स्थानों की प्रसिद्धि है? ३. इस देश में कौन-कौन लोग प्रसिद्ध हो गये हैं, जिनसे देश का नाम हुमा? -पावअलि, भरत, अभिमन्यु, माय, विक्रमादित्य के विषय में तुम क्या जान हो । संक्षेप में लिन्यो। १

[ ६८ ]
१५-महाराणा प्रताप और मानसिंह
'मनस्वी कार्यार्थी गणयति न दुःखं न च सुखं'
र स्थान-प्रताप की फुटी
[मती वेश में राणा प्रताप और कुमार श्रमरसिह ]
प्रताप-आश्चर्य है, अमर राजा मान आज यकायक
इधर रास्ता कैसे भूल गए । (कुछ सोचकर) हूँ। इसमें
अवश्य कोई गूढ़ रहस्य है । वे कहाँ से आ रहे हैं, कुछ
मालूम हुआ
अमर-चे शोलापुर-सग्राम में विजय पाकर मेवाड़ में
महाराणा के दर्शन करने इधर चले आए हैं। भला, इसमें कौन
सा रहस्य हो सकता है, पिताजी ?
प्रताप-अभी तुम भोले हो, अमर । पददलित चित्तौड़ के
हत-भाग्य राणा को अपना विजय वैभव दिखाकर प्रभावित,
करना क्या रहस्य नहीं है ? मेवाड़ का आतिथ्य स्वीकार कर,
पवित्र सीसौदिया-यश से भोजन-व्यवहार कर, दासता के कलंक
को धोने की चेष्टा कर, सारी राजपूत-जाति के समुस अपने को
लुज्ज्वल प्रमाणित करने में क्या मानसिंह की
-
१
नहीं है?
श्रमर-तो क्या उनका सत्कार न होगा?
प्रताप-क्यों न होगा ? जिस प्रकार वे हमारे अतिथि हुए

[१]
हैं, उसी प्रकार उनका सत्कार भी अवश्य होगा और वह तुम्ही
को करना होगा।
-
।
-
कर
1
अमर-जो आज्ञा ! ( जाने को उद्यत होता है)
प्रताप-ठहरो । पहले उनके सत्कार की विधि तो
सीख जाओ। (कान में कुछ देर तक कुछ कहकर प्रस्थान)
अमर-द्वारपाल ।
(द्वारपाल का प्रवेश)
द्वारपाल -क्या आज्ञा है, पृथ्वीनाथ ।
अमर-हमारी फुटी के सामनेवाले मैदान में तबू तनवा-
खूब
राजसी ठाटवाट और भडकीली सजावट करवा रक्सो।
सोने के बरतनों में बादशाही भोजन भरवा रक्खो जाओ,
जरदी करो, वहीं हम राजा मानसिंह को लेकर अभी श्राते हैं।
(द्वारपाल चलने लगता है)
अमर-हॉ, एक बात और । जन राजा मान भोजन करके
चल दे तो सारी सामान उदयसागर के अतल जल में विसर्जित
कर देना ' गगाजल से धुलयाकर वहाँ की सारी भूमि पवित्र
परवा देना। समझे। पिताजी की यही श्राज्ञा है। भारत को
गुलामी की जंजीरो से जकडनेवाले विदेशियों की नूठन साने-
वाले देगद्रोही के स्पर्श का एक भी कण न रहने पाप । नहीं तो
पिताजी नाराज होंगे।
द्वारपाल--जो आज्ञा अन्नदाता ।
मान
+

1- [ ७० ] (दूत का प्रवेश) दूत-महाराजकुमार की जय हो । राजा मानसिंह पधारते हैं। अमर-उन्हे सादर लिवा लाओ और हमारे सभासदों को भी सवाद दो। (प्रणाम करके दूत का प्रस्थान) अमर--(स्वगत) पिताजी ने न आने का कारण क्या बताया था ? (याद करके) हॉ-ऑ-ऑ-ठीक । (एक ओर से मानसिंह का अपने साथियो सहित प्रवेश और दूसरी ओर से प्रताप के सभासदों का अमर के पार्श्व में आकर खडे होना । अमर का मानसिंह की अगवानी करना) अमर-अवर के महाराज । स्वागत है, आपने हीन मेवाड पर बड़ी कृपा की। मान-पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप , के दर्शनों की तीन । ही यहाँ तक सींच लाई है कुमार । अमर-महाराज, गरीबों की इस कुटी में आपके योग्य मी का सर्वथा अभाव है। चलिए, आपके लिए डेरो किया गया है। (सहसा जगल का परदा हटकर सामने राजसी' तबू देता है) अमर-पधारिए महाराज। इस दीन- .

[ ७१ ]
(मानसिंह चकित होते हैं, अमर उन्हे सोने की थाल के
स ले जाते हैं)
अमर-गरीबों के घर की रूसी-सूली ग्रहण कीजिए।
मान(ठढी साँस लेकर) हाय, यदि मुझे मचमुच स्पी
सी ही मिलती तो मैं धन्य हो जाता कुमार । (वात का नम्ब
दिलकर ) सैर, यह तो बताओ, महाराणा ने अभी तक दर्शन
क्यों नहीं दिये १
अमर-वे जरा अस्वस्थ है, महाराज !
मान-(व्यग्य से) श्राज ही अस्वस्थ हो गए है या पहले
ही से ये महाराणा के इस आकस्मिक अस्वास्थ्य का रहस्य
पुछ-कुछ समझा जा सकता है । महाराणा ने क्या मुझे बिलकुल
भूर्ख समझ रस्सा है, कुमार !
श्रमर-उनके मुँह से तो मैंने यह कमी नहीं मुना ।
मानतो क्या महाराणा मेरे साथ भोजन नहीं करेंगे।
अमर-वे विवश है, महाराज !
मान-तो मैं भी विवहा हूँ कुमार । महलों के पकनानों से
ऊबकर मैं राणा की रूखी-सूसी याने आग था। मंमार के
मान-समान से धनडापर मैं राणा का प्रेम पाने श्राया था
राणा ने मुझे इतना धूपित समझा। मेरा मुँह देखना
समझा । क्या मैं फुत्ता हूँ कुमार, जो राणा दूर ही
टुकडे फेंक रहे हैं. १ में कोई सामान्य बन नहीं
के बड़े-से-बडे संग्रामों में मैंने विजय
-
.
3
U

। --- - 1 - [ ७० ] (दूत का प्रवेश) दूत-महाराजकुमार की जय हो । राजा मानसिंह पधारते हैं। अमर-उन्हें सादर लिवा लाओ और हमारे सभासदो को भी सवाद दो। ( प्रणाम करके दूत का प्रस्थान) अमर--(स्वगत) पिताजी ने न आने का कारण क्या बताया था ? (याद करके) हॉ-आँ-ऑ-ठीक। (एक ओर से मानसिंह का अपने साथियों सहित प्रवेश और दूसरी ओर से प्रताप के सभासदो का अमर के पार्श्व में आकर सडे होना । अमर का मानसिंह की अगवानी करना) अमर-अवर के महाराज । स्वागत है, आपने इस दीन- हीन मेवाड पर बडी कृपा की। मान-पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप के दर्शनों की तीव्र लालसा ही यहाँ तक सींच लाई, है कुमार । अमर-महाराज, गरीबों को इस कुटी, में आपके योग्य स्वागत-सामग्री का,सर्वथा अभाव है। चलिए, आपके लिए टेरों में प्रबंध किया गया है। , -:' (सहसा जगल का परदा हटकर सामने राजेसी तबू दिखाई देता है) (1 अमर-पधारिए महाराज! - + 1 - - ।

.
क्यों नहीं दिये ?
गानन्ममान से घबडाकर में राणा का प्रेम पाने आया था।
समझा। क्या मैं पुत्ता हूँ कुमार, जो राणा दूर ही से मेरे लिए
के बड़े-से-बड़े संमामो में मैंने विजय पाई है। भारतमम्राट् फो
(मानसिंह चकित होते हैं, अमर उन्हें सोने की थाल के
पास ले जाते हैं)
अमर-गरीबों के घर की रूसी-सूसो ग्रहण कीजिए।
मान-(ठढी सॉस लेकर) हाय, यदि मुझे सचमुच रूग्नी-
सूसी ही मिलती तो मैं धन्य हो जाता कुमार । (वात का रुस
बदलकर) सैर, यह तो बताओ, महाराणा ने अभी तक दर्शन
अमर-वे जरा अस्वस्थ हैं,महाराज ।
मान-(व्यग्य से ) आज ही अस्वस्थ हो गए हैं या पहले
ही से थे | महाराणा के इस आकस्मिक अस्वास्थ्य का रहस्य
कुछ-कुछ समझा जा सकता है । महाराणा ने क्या मुझे बिलकुल
मूर्स समझ रक्सा है, कुमार ।
श्रमर-उनके मुँह से तो मैंने यह कभी नहीं मुना।
मान-तो क्या महाराणा मेरे साथ भोजन नहीं करेंगे?
अमर-वे विवश हैं, महाराज ।
मान-तो मैं भी विवश हूँ कुमार । महलो के पकयानों से
मकर मैं राणा की रूखी-सूखी साने आया था। समार के
इतना घृणित समझा। मेरा मुँह देखना भी पाप
टुकड़े फेंक रहे हैं ? मैं कोई सामान्य राजपूत नही हूँ । भारत
1
राणा ने मुगे
?

T । । 1 - - - [ ७० ] (दूत का प्रवेश) दूत--महाराजकुमार की जय हो । राजा मानसिंह पधारते हैं। अमर-उन्हे सादर लिवा लाओ और हमारे सभासदों को भी सवाद दो। (प्रणाम करके दूत का प्रस्थान) अमर-(स्नगत) पिताजी ने न आने का कारण क्या बताया था ? (याद करके) हॉ-ऑ-ऑ-ठीक । (एक श्रोर से मानसिंह का अपने साथियो सहित प्रवेश और दूसरी ओर से प्रताप के सभासदो का अमर के पार्श्व में आकर खडे होना । अमर का मानसिह की अगवानी करना) अमर-अबर के महाराज । स्वागत है, आपने इस दीन- हीन मेवाड पर बडी कृपा की । मान-पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप के दर्शनों की तीव्र लालसा ही यहाँ तक सींच लाई है कुमार । अमर-महाराज, गरीवो की इस कुटी में आपके योग्य स्वागत-सामग्री का सर्वथा अभाव है। चलिए, आपके लिए टेरों में प्रध किया गया है। ( सहसा जगल का परदा हटकर सामने राजसी तबू दिसाई देता है) अमर-पधारिए महाराज! . - .

- - - T , मान-(व्यग्य से) आज हो अस्वस्थ हो गए या पर मान-तो मैं भी विवश हूँ कुमार । महलों के पफ़पानी से मान-समान से घबडाकर मैं राणा का प्रेम पाने याया था। राणा ने मुझे इतना घृणित समझा। मेरा मुंह देसना भी पाप । फुत्ता हूँ कुमार, जो राणा दूर ही से मेरे खिया । ७१ । (मानसिंह चकित होते हैं, अमर उन्हें मोने की बात स ले जाते हैं) अमरारीयो के घर की रूसी-सूम्बी ग्रहण पीजिए ! मान-(ठढी सॉस लेकर) हाय, यदि मुझे सपना सी ही मिलती तो मैं धन्य हो जाता कुमार । (पान मास दलकर ) सैर, यह तो बताओ, महाराणा ने अभी साफ यों नहीं दिये ? अमर-वे जरा अस्वस्थ हैं,महाराज । ही से थे। महाराणा के इस आकस्मिक अस्वास्थ्य का TANT कुछ-कुछ समझा जा सकता है। महाराणा ने क्या मुगे विमान मुर्ख समझ रक्खा है, कुमार । अमर-उनके मुँह से तो मैंने यह कभी नहीं सुगा । मान-तो क्या महाराणा मेरे साथ भोजन नहीं करा : अमर-वे विवश हैं, महाराज । ऊमकर मैं राणा की रूखी-सूसी साने आया था। समार समझा। फ्या टुकडे फेंक रहे हैं ? मैं कोई सामान्य राजपूत नहीं हूँ। के बड़े-से-बडे संप्रामों में मैंने विजय पाई है। । 4 । [ ७० ] (दूत का प्रवेश) दूत-महाराजकुमार की जय हो । राजा मानसिंह पधारते हैं। अमर-उन्हे सादर लिवा लाओ और हमारे सभासदों को भी सवाद दो। (प्रणाम करके दूत का प्रस्थान) अमर-(स्वगत) पिताजी ने न आने का कारण क्या बताया था ? (याद करके) हॉ-ऑ-ऑ-ठीक । (एक ओर से मानसिंह का अपने साथियो सहित प्रवेश और दूसरी ओर से प्रताप के सभासदों का अमर के पार्श्व में आकर खडे होना । अमर का मानसिंह की अगवानी करना) अमर-अवर के महाराज । स्वागत है, आपने इस दीन- हीन मेवाड पर बडी कृपा की । मान-पुण्यश्लोक महाराणा प्रताप के दर्शनो की तीन लालसा ही यहाँ तक सींच लाई है कुमार । अमर-महाराज, गरीबों की इस कुटी में आपके योग्य, स्वागत-सामग्री का सर्वथा अभाव है। चलिए, आपके लिए डेरों में प्रबंध किया गया है। (सहसा जगल का परदा हटकर सामने राजसी तंदू दिसाई देता है) अमर--पधारिए महाराज , - - 1 , । ।

-
[ ७१ ]
(मानसिंह चकित होते हैं, अमर उन्हे सोने की थाल के
पास ले जाते हैं)
अमर-गरीबो के घर की रूसी-सूसी ग्रहण कीजिए ।
मान-(वढी सॉस लेकर) हाय, यदि मुझे सचमुच रूग्वी-
सूसी ही मिलती तो मैं धन्य हो जाता कुमार (बात का रुस
बदलकर ) सैर, यह तो बताओ, महाराणा ने अभी तक दर्शन
क्यों नहीं दिये ?
अमर-वे जरा अस्वस्थ हैं,महाराज ।
मान-(व्यग्य से) आज ही अस्वस्थ हो गए हैं या पहले
ही से थे
महाराणा
के इस आकस्मिक अस्वास्थ्य का रहस्य
पुछ-कुछ समझा जा सकता है। महाराणा ने क्या मुझे बिलकुल
मूर्स समझ रस्सा है, कुमार ।
अमर-उनके मुँह से तो मैंने यह कभी नहीं सुना।
मान-तो क्या महाराणा मेरे साथ भोजन नहीं करेंगे?
अमर-वे विवश हैं, महाराज।
मान-तो मैं भी विवश हूँ फुमार । महलों के पकवानों में
करपर मैं राणा की रूखी-सूसी खाने आया था। ससार के
मान-मंमान से घयापर मैं राणा का प्रेम पाने आया था।
राणा ने मुझे इतना घृणित समझा। मेरा मुँह देसना मी,
समझा । क्या मैं पुत्ता , फुमार, जो राणा दूर ही से
दुपट्टे फेंफ रहे हैं ? मैं फोई मामान्य राजपूत नहीं
के बड़े-मे-बड़े संप्रामों में मैंने विजय पाई है। न.

भारत-सम्राट के दाहिने हाथ मानसिंह का अपमान । सावधान
को जलाकर राख कर देने की शक्ति अक्ले, इस मानसिंह के
प्रताप-(तलवार तानकर) और मानसिंह के
[ ७२ ]
रण नौका का मैं सर्वोत्तम खिवैया है। आज सारा भारत जिस
इगित पर नाच रहा है, उसी का मैं सर्वोच्च सेनापति हूँ-सर्वे
श्रेष्ठ सखा हूँ। इन भुजाओ से मैंने बडे-बड़े गर्वोन्नत मस्त
झुका दिए हैं। मेरे साथ राणा का यह व्यवहार | इतनी घृणा
इतनी उपेक्षा | क्या उदार मेवाड़ का परपरागत अतिथि-सत्का
यही है ?
अमर-अप्रसन्न न हों महाराज, इस सारी स्वागत-सामा
को आपके योग्य बनाने में हम लोगों ने बहुत श्रम किया है
इसे विफल न कीजिए । विलम्ब हो रहा है, भोजन कीजिए ।
मान-भोजन ! तुम्हे लाज नहीं आती, अमरसिंह । क्य
मानसिंह ऐसे भोजन के लिए तरस रहा था ? इस भोजन
हृदय नहीं है, कुमार। इसके कण-कण से घृणा टपक रही है
मैं भोजन न करूंगा । कहाँ है राणा प्रताप ? मैं उनसे एक बा-
अवश्य मिलूंगा। बस कह चुका, विना मिले न जाऊँगा । राण
की इतनी स्पर्धा । मेवाड के छोटे-से शासक का इतना साहस
सरदारो । सावधान । जाकर प्रताप से कह दो, समूचे,
इगित में है।
सम्राट अकबर को ना -
मेना
(प्रताप का प्रवेश
।
10
पतिमीसौदिया-

१-महाराणा प्रताप कौन थे ? ये भकयर से क्या शवमा 11
२-मानसिंह के साय इहोंने भोजन क्यों नहीं दिया।
तुम्हारे चरणों में
[ ७३ ]
रक्सा था कि मेवाड की ध्वजा तुम्हारे वेभव पर मोहित होकर
जायगी। क्या तुमने समझ रक्सामा कि
पवित्र सीसोदिया-यश अपना गोरव मुगलो की जूठन गानेवालो
देशद्रोही के चरणो तले विछा देगा | प्रताप के साथ भोजन पर
की तुम्हारी कुटिल अभिलापा । तुम्हारा कितना यना भ्रम था,
मानसिह कुछ समझे ?
मान-सून समझ रहा हूँ -सव समझ रहा हूँ, प्रताप!
क्या समझ रहा हूँ इसका उत्तर समय देगा और देगा मेया
मन्त खेडहरो का हाहाकार ।
य
(प्रस्थानोगा)
.
-
प्रताप---जा, जा । यकवादी । देशद्रोही । सुगली की पर
रज मस्तक पर लगाकर राजस्थान के तिलक मेपाल को
दिखाने आया है।
-
-
[पटाक्षेप]
.
प्रश्न
-

[ ७८ ]
बोलना और जुआ खेलना बड़े ही निन्द्य कर्म है, इनसे बचन
चाहिये । ब्रह्मचारी को सत्यवादी और दयाशील होना चाहिये
'अच्छे विद्वान् और सचरित्र पुरुषो का सत्सग करना चाहिये
जिससे चरित्रबल और विद्याभ्यास में उन्नति हो । व्यर्थ ॥
गपाष्टक पोर कुसगति में समय नष्ट नहीं करना चाहिये।
इन नियमो का पालन करने से प्रत्येक पुरुप का कल्या
हो सकता है । क्योंकि ब्रह्मचर्य व्रत सव के लिये हितकर है, किन्न
विद्यार्थियो के लिये इनका पालन करना आवश्यक है औ
विशेप लाभदायक है।
प्रश्न
१
१-भगवान् धन्वन्तरि महाराज ने अपने शिष्यों के करयाण के लि
कौन सा उपाय बताया ?
२-भीम पितामह ने प्रशाचर्य के विषय म क्या कहा ?
३-अपने पूर्वजो की भाँति हम भी ज्ञान और भतुल शक्ति कैसे प्रा
कर सकते है।
४--प्रात काल से सायकाल तक समय कैसे बिताना चाहिये ?
५-विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य के लिये शासोत किन नियमों का पाल
परता आवश्यक है?
६-सध्योपासन से क्या लाभ होता है ?
.

[ ७९ ] २७-चाराणसी । " भारतवर्ष में वाराणसी नगरी बहुत प्राचीन है । आजकला हमको बनारस फहते हैं और सयुक्तप्रान्त के बड़े-बड़े नगरी में इसकी गिनती । काशी भी इसी का नाम है । इसकी प्राचीनत के अनेक प्रमाण पुराणादि प्रन्यों में मिलते हैं और कहा जाता कि परम धामिक राजा दिवोदास से भगवान शंकर ने यह नगरी प्राप्त की थी और अपने पुटुम्बियो को ही इस नगरी को रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया । इसलिये भगवान शकर का तो इम नगरी पर पूर्ण आधिपत्य है और भगवती अन्नपूर्णा, जग- माता दुर्गा, कालभैरव, दुढिराज गणेश इस नगरी के प्रधान देवता एव रक्षक है। धार्मिक दृष्टि से तो इस नगरी का महत्व अपरिमित हो, परन्तु विद्या की दृष्टि से भी वाराणसो प्राचीन काल से ही बहुत प्रसिद्ध रही है। भारतवर्ष के बड़े-बड़े विद्यापीठों में वाराणमी का महत्व सब से ऊपर रहा है । मिथिला, नालन्द, उज्जयिनी, काश्मीर, कान्यकुब्ज पडे विद्यापीठ थे, परन्तु इन सब से अधिक मान काशी का या । बडे-बडे राजा, विद्वान्, योगी, धार्मिक नेता, प्राचार्य आदि सब काशी में आकर दीक्षा लेते थे और तब उन का ज्ञान पूर्ण परिपक समझा जाता था। सारे शास्त्रों के ज्ञान का भाण्डार काशी समझी जाती थी और यदि कोई विद्वान् शास्त्रार्थ में काशी के पडितों को परास्त कर लेता था तो उसको पनि पद प्राप्त हो जाता था। कोई ऐसा शास्त्र नहीं थ' - - बनारस के घाटों का एक दृश्य।

[ ७९ ] ७-वाराणमी भारतवर्ष में वाराणसी नगरी बहुत प्राचीन है । आजकला इमको ननारस कहते हैं और सयुक्तप्रान्त के बडे-बड़े नगरो में इसकी गिनती है । काशी भी इसी का नाम है । इसकी प्राचीनत के अनेक प्रमाण पुराणादि प्रन्यों में मिलते हैं और कहा जाता है कि परम धामिक राजा दिवोदास से भगवान् शकर ने यह नगरी प्राप्त की थी और अपने युटुम्नियों को ही, इस नगरी को रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया । इसलिये भगवान् शकर का तो इस नगरी पर पूर्ण आधिपत्य है और भगवती अन्नपूर्णा, जग- माता दुर्गा, कालभैरव, दुढिराज गणेश इस नगरी के प्रधान देनता एव रक्षक हैं। - धार्मिक दृष्टि मे तो इस नगरी का महत्व अपरिमित है ही, परन्तु विद्या की दृष्टि से भी वाराणसी प्राचीन काल से ही बहुत प्रसिद्ध रही है। भारतवर्ष के बड़े बड़े विद्यापीठों में वाराणसी का महत्व सय से ऊपर रहा है । मिथिला, नालन्द, उज्जयिनी, काश्मीर, कान्यकुब्ज बडे विद्यापीठ थे, परन्तु इन सब से अधिक मान काशी का या । बडे-बडे राजा, विद्वान, योगी, धार्मिक नेता, प्राचार्य श्रादि सन काशी में आकर दीक्षा लेते थे और तव उन का ज्ञान पूर्ण परिपक्क समझा जाता था। सारे शास्त्रों के ना भाण्डार काशी समझी जाती थी और यदि कोई विद्वान में काशी के पडितों को परास्त कर लेता था तो पद प्राप्त हो जाता था। कोई ऐसा शास्त्र नहीं [ ८०] गत विद्वान् काशी में वर्तमान न हो और जिसके अध्ययन के लिये से छात्र काशी में आकर जमा न होते हों। काशी की यह मर्यादा परम्परा से चली आती है और इसका निर्वाह अब तक होता चला आ रहा है । यह प्राय. सन को विदित है कि राजा हरिश्चन्द्र की धर्म- परीक्षा काशी में ही हुई थी और यहीं उनको मोक्ष हुआ था। अठारह पुराणों के कर्ता भगवान् वेदव्यास भी काशी में ही उत्पन्न हुए थे। योगशास्त्र के प्रवर्तक महामुनि पतञ्जलि काशी- वासी थे। विष्णु के अवतार आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान् धन्व- न्तरि ने काशी में ही अपनी विद्या का वितरण किया था । बौद्ध सम्प्रदाय के प्रवर्तक एव विष्णु के अवतार भगवान् बुद्ध ने काशी में श्राकर उपदेश किया था और वह स्थान अन सारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। जैन-मप्रदाय का भी काशी एक धार्मिक केन्द्र है। कबीर सम्प्रदाय का भी काशी आदितीर्थ है। इस दृष्टि से काशी हिन्दू, बौद्ध, जैनधर्म तथा अन्य छोटे- मोटे मम्प्रदायों का मुरन धार्मिक तीर्थ भी है। सनातनधर्म के शेय, येणर आदि अवातर सम्प्रदायाँ फे आचार्यों में भी फाशी में आफर अपने सिद्धान्तो फा प्रतिपादन किया और अपने सम्प्रनय का प्रचार किया। भगवान शंकर को त्यो काशी में ही हुआ था। महाप्रमु यादमाग काशी में चिरफाल सफा नियाम पिया और -- का प्रतिपादन करते रहे। भक्तिमार्ग का उपदेश देते रहे ।। 1 [ ८१ ] मुसलमानों को राजसत्ता के समय मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं के मन्दिरों पर काशी में अनेक आक्रमण हुए। विश्व- नाथजी के मन्दिर को कई बार तोड़ा गया और वहाँ मसजिद चनायी गयी । परन्तु मुसलमानी राजसत्ता कमजोर होने पर कई धर्मप्राण मनुष्यों के प्रयत्न से मन्दिर का पुनरुद्धार हुआ और विश्वनाथ महादेव की मूर्ति का संस्थापन किया गया । आजकल विश्वनाथजी का जो मन्दिर है वह इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का बनवाया हुआ है और सोने का शिखर सिक्खों के राजा महाराजा रणजीतसिंह का बनवाया हुआ है। ८ प्राय सारे शास्त्रों के पारंगत विद्वान् काशी में हो चुके हैं। व्याकरण के प्राचार्य पतञ्जलि के अतिरिक्त काशिकावृत्ति के की वामन व जयादित्य काशी में कुछ काल तक निवास करते रहे हैं। महावैयाकरण शेपकृष्ण, सिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजीदीक्षित, नागेशमट्ट काशी में ही रहते थे। अलंकार शास्त्र के प्राचार्य व अनुपम प्रतिभासम्पन्न कविवर जगन्नाथ पंडितराज काशीनिवासी थे और फाशी में "गैवी" नामक कुँआ उनके नाम से विशेष रूप से सम्बन्धित है। वेदान्त शाल के धुरंधर आचार्यों में मधुसूदन सरस्वती, नृसिंहाश्रम स्वामी व काष्ठजिह्वा स्वामी काशीनिवासी थे। ज्योति शास्त्र के आचार्य फमलाकर, रगनाथ, नीलकण्ठ देवान प्रादि फाशीनिवासी थे।

[ ८० ] गत विद्वान् काशी में वर्तमान न हो और जिसके अध्ययन के लिये दूर-दूर से छात्र काशी मे आकर जमा न होते हों। काशी की यह मर्यादा परम्परा से चली आती है और इसका निर्वाह अव तक होता चला आ रहा है। यह प्राय सव को विदित है कि राजा हरिश्चन्द्र को धर्म- परीक्षा काशी में ही हुई थी और यहीं उनको मोक्ष हुआ था। अठारह पुराणो के कर्त्ता भगवान् वेदव्यास भी काशी में ही उत्पन्न हुए थे। योगशास्त्र के प्रवर्तक महामुनि पतञ्जलि काशी- वासी थे। विष्णु के अवतार आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान् धन्व- न्तरि ने काशी में ही अपनी विद्या का वितरण किया था । बौद्ध सम्प्रदाय के प्रवर्तक एव विष्णु के अवतार भगवान् बुद्ध ने काशी में श्राकर उपदेश किया था और वह स्थान अब सारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है । जैन-सप्रदाय का भी काशी एक धार्मिक केन्द्र है। कबीर सम्प्रदाय का भी काशी आदितीर्थ है। इस दृष्टि से काशी हिन्दू, बौद्ध, जैनधर्म तथा अन्य छोटे- छोटे सम्प्रदायों का मुख्य धार्मिक तीर्थ भी है । सनातनधर्म के शैव, वैष्णव आदि अवातर सम्प्रदायो के आचार्यों ने भी काशी में आकर अपने सिद्धान्तो का प्रतिपादन किया और अपने सम्प्रदाय का प्रचार किया । भगवान् शकर को तत्वबोध काशी में ही हुआ था। महाप्रमु वल्लभाचार्य ने आकर काशी में चिरकाल तक निवास किया और अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते रहे। चैतन्य महाप्रभु भी काशी में आकर भकिमार्ग का उपदेश देते रहे।

[८१ ] मुसलमानो की राजसत्ता के समय मुसलमानो की तरफ से हिन्दुओं के मन्दिरो पर काशो में अनेक आक्रमण हुए। विश्व- नाथजी के मन्दिर को कई बार तोड़ा गया और वहाँ मसजिद बनायी गयी । परन्तु मुसलमानी राजसत्ता कमजोर होने पर कई धर्मप्राण मनुष्यो के प्रयत्न से मन्दिर का पुनरुद्धार हुआ और विश्वनाथ महादेव की मूर्ति का संस्थापन किया गया। आजकल विश्वनाथजी का जो मन्दिर है वह इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर का बनवाया हुआ है और सोने का शिसर सिक्खों के राजा महाराजा रणजीतसिंह का बनवाया प्राय सारे शास्त्रों के पारंगत विद्वान् काशी में हो चुके हैं। व्याकरण के आचार्य पतञ्जलि के अतिरिक्त काशिकावृत्ति के कर्ता बामन व जयादित्य काशी में फुछ काल तक निवास करते रहे हैं। महावैयाकरण शेपकृष्ण, सिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजीदीक्षित, नागेशभट्ट फाशी में ही रहते थे । अलंकार शास्त्र के प्राचार्य व 'अनुपम प्रतिभासम्पन्न कविवर जगन्नाथ पंडितराज फाशीनिवासी थे और काशी में "गैवी' नामक कुँआ उनके नाम से विशेष रूप से सम्बन्धित है। वेदान्त शास्त्र के धुरंधर आचार्यों में मधुसूदन सरस्वती, नृसिंहायम स्वामी व काष्ठजिहा स्वामी फाशीनिवासी थे। च्योति शास्त्र के आचार्य फमलाकर, रमनाय, नीलकण्ठ देषज्ञ आदि काशीनिवासी थे। ६ 1 [ ८०] गत विद्वान् काशी में वर्तमान न हो और जिसके अध्ययन के लिये दूर-दूर से छात्र काशी में आकर जमा न होते हो। काशी की यह मर्यादा परम्परा से चली आती है और इसका निर्वाह अब तक होता चला आ रहा है। यह प्राय सव को विदित है कि राजा हरिश्चन्द्र की धर्म- परीक्षा काशी में ही हुई थी और यही उनको मोक्ष हुआ था अठारह पुराणो के कर्ता भगवान् वेदव्यास भी काशी में है उत्पन्न हुए थे। योगशास्त्र के प्रवर्तक महामुनि पतञ्जलि काशी वासी थे। विष्णु के अवतार आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान् धन्व न्तरि ने काशी में ही अपनी विद्या का वितरण किया था । बौद्ध सम्प्रदाय के प्रवर्तक एव विष्णु के अवतार भगवा बुद्ध ने काशी मे आकर उपदेश किया था और वह स्थान श्र सारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है । जैन-सप्रदाय का भी काशी ! धार्मिक केन्द्र है। कबीर सम्प्रदाय का भी काशी आदितीर्थ है इस दृष्टि से काशी हिन्दू, बौद्ध, जैनधर्म तथा अन्य छो छोटे सम्प्रदायों का मुख्य धार्मिक तीर्थ भी है । सनातनधर्म के शैव, वैष्णा आदि अवातर सम्प्रदायो आचार्यों ने भी काशी में आकर अपने सिद्धान्तो का प्रतिपा- किया और अपने सम्प्रदाय का प्रचार किया । भगवान् शंकर तत्त्ववोध काशी में ही हुआ था। महाप्रमु वल्लभाचार्य ने आ काशी में चिरकाल तक निवास किया और अपने सिद्धा का प्रतिपादन करते रहे। चैतन्य महाप्रभु भी काशी में अ भक्तिमार्ग का उपदेश देते रहे।

[ ८३ ] स्वामी भास्करानन्द व स्वामी विशुद्धानन्द भी काशी के हो निवासी थे। -- * आजकल भी काशी अपनी मर्यादा का पूर्ववत् पालन कर रही है। फाशी हिन्दु-विश्वविद्यालय जैसा उत्तम विद्यापीठ, जिसकी कृति में महामना मदनमोहन मालवीयजी जैसे तपस्वी देशसेवक ने अपना तन मन-धन अर्पण कर दिया, काशी को ही सुशोभित कर रहा है । गवर्नमेण्ट का भी एक कालेज व एक उत्तम पुस्तकालय 'सरस्वती-भवन' काशी में है । अन्य' छोटे- मोटे स्कूलों एव पाठशालाओ की तो कोई गिनती ही नहीं है। देश की राजनीतिक शिक्षा के लिये भी प्रसिद्ध दानवीर विद्याप्रेमी सेठ शिवप्रसाद गुप्त की ओर से सोला हुआ एक बडा विद्यालय 'काशीविद्यापीठ' भी काशी में वर्तमान है। काशी की प्राकृतिक स्थिति भी बहुत उत्तम है । भगवती जाह्नवी के किनारे अर्द्ध-चक्राकार काशी बसी हुई है और नगरो के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बहुत सुन्दर मजबूत पत्थर के विशाल घाट बने हुए हैं । पचगगाघाट, मणिकर्णिका, दशाश्वमेध, केदार एन तुलसीघाट प्रमिद्ध घाट हैं और इनपर, स्नानार्थ यात्रियों तथा नगरनिवासियों की भीड लगी रहती है। पचगगाघाट पर एक मसजिद बनी हुई है जिसके अन्दर पत्थर की बहुत ऊँची अगियों बनी हुई है जो बहुत दूर तक दृष्टिगोचर होती है। उनको "माधवराव का धरहरा" कहते हैं। राजपाट के पाम एक विशाल रेलवे का पुल बना हुआ है जिसको डफरिनमिज कहो -- . शकर मिश्न " [ ८२ ] धर्मशास्त्र में नारायण, कमलाकर, शकर, नीलकठ, दिन कर आदि भट्टवशीय विद्वान् काशीनिवासी थे। मोमासा में मंडन व शम्भुभट्ट, पुराण में नीलकण्ठ चतुर्धर आदि, साख्य मे विज्ञानभिक्षु, भावेश व गणेश दीक्षित, न्याय । मे भवानन्द सिद्धान्तवागीश, विश्वनाथ पचानन, विद्यानिवाम भट्टाचार्य, महादेव, दिनकर भारद्वाज, महानैयायिक आदि विद्वान् काशी के ही थे। आधुनिक काल में भी काशी में चमत्कारी पण्डितो की कमी नहीं रही है । प्राय सारे शास्त्रो के प्रकाण्ड पंडित यहॉ वर्तमान रहे हैं और उनमें से सुधाकर द्विवेदी, गगाधर शास्त्री, बापूदेव शास्त्री, वेताल विनायक शास्त्री, महादेव शास्त्री घाटे, शिवकुमार शास्त्री, दामोदर शास्त्री, रत्नगोपाल शास्त्री, गोस्वामी दामोदर- लालजी शास्त्री, वाल सरस्वती, वामाचरण भट्टाचार्य, नित्यानन्द पर्वतीय, तात्या शास्त्री इत्यादि गौरवान्वित पंडित मुख्य हो - गये हैं। विद्वानों के अतिरिक्त कई महात्माओं ने भी काशी में रहकर मोक्ष प्राप्त किया है। महात्मा कवीर काशी में पैदा हुए थे और इनका स्थान यहाँ कबीरचौरा के नाम से प्रसिद्ध है। भक्तशिरोमणि तुलसीदामजीने अपने जीवन का अधिक भाग काशी मे विताया । तुलसीघाट पर वह कोठरी जहाँ' उन्होंने 'विनयपत्रिका जमे रन को उत्पन्न किया, काशी में अब भी सुरक्षित है और इनकी पवित्र स्मृति की द्योतक है । परमहस तैलग म्वामी, [ ८३ ] स्वामी भास्करानन्द व स्वामी विशुद्धानन्द भीः काशी के ही निवासी थे। -- । t • आजकल भी काशी अपनी मर्यादा का पूर्ववत् पालन कर रही है। काशी हिन्दू-विश्वविद्यालय जैसा उत्तम विद्यापीठ, जिसकी कृति मे महामना मदनमोहन मालवीयजी जैसे, तपखी देशसेवक ने अपना तन मन-वन अर्पण कर दिया, काशी को ही सुशोभित कर रहा है । गवर्नमेण्ट का भी एक कालेज व एक उत्तम पुस्तकालय 'सरस्मतो-भवन' काशी में है। अन्य छोटे- मोटे स्कूलों ण्व पाठशालाओं की तो कोई गिनती ही नहीं है। देश की राजनीतिक शिक्षा के लिये भी प्रसिद्ध दानवीर विद्याप्रेमी संठ शिवप्रसाद गुप्त की ओर से सोला हुआ एक वडा विद्यालय 'काशीविद्यापीठ' भी काशी में वर्तमान है। काशी की प्राकृतिक स्थिति भी बहुत उत्तम है। भगवती जाहवी के किनारे अर्द्ध-चक्राकार काशी बसी हुई है और नगरी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक बहुत सुन्दर मजबूत पत्थर के विशाल घाट घने हुए हैं। पचगगाघाट, मणिकर्णिका, दशाश्वमेय, केदार एन तुल्सीघाट प्रसिद्ध घाट हैं और इनपर स्नानार्थ यात्रियों तथा नगरनिवामियों की भीड़ लगी रहती है। पचगगाघाट पर एक मसजिद बनी हुई है जिसके अन्दर पत्थर की बहुत ऊंची एशियाँ बनी हुई हैं जो बहुत दूर तक दृष्टिगोचर होती है इनको माधवराव का धरारा" कहते हैं। राजघाट के पास एक निशाल रेलवे का पुल बना हुआ है जिसको डफरिनविन कहने, - - । . - । amera [ ८४ ] हैं और यह पुल हिन्दुस्तान के रेलवे पुलों में एक मुख्य पुल है । मानमन्दिरघाट के पास एक विशाल ज्योतिर्वीक्षण-भवन भी बना हुआ है, जिसको "मानमन्दिर" कहते हैं। जयपुर राज्या धिपति महाराजा जयसिंह ने भारतवर्ष में चार स्थानों पर ऐसे मन्दिर बनवाये थे-यथा, काशी, उञ्जयिनी, दिल्ली और जयपुर इनकी निर्माणकला बड़ी विलक्षण है। आजकल तो इन मन्दिरं में बने हुए यज्ञों का पूर्णतया समझना भी दुरूह है ।' सारनाथ में सम्राट अशोक का वनवाया हुआ एक बब भारी स्तूप है जो भी देखने योग्य है। इन सब के अतिरिक्त काशी व्यापार का भी केन्द्र है। प्राचीन काल में गगाजी में नावों के द्वारा यहाँ वणिज का आवागमन होता था और आजकल भी यहाँ रेशमी वस्त्रों का भारी व्यापार होता है। हिन्दी-साहित्य के अनेक लब्धप्रतिष्ट कवि एवं लेखकों के भी काशी ने जन्म दिया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को कौन नहीं जानता । उन जैसे अद्वितीय कवि को उत्पन्न करने की सामथ्य काशी के सिवा और किसमें हो सकती है। बदरीनारायण चौधरी, किशोरीलाल गोस्वामी, रामकृष्णवर्मा, लाला भगवानदीन राय बहादुर श्यामसुन्दरदास आदि काशी की गोद में ही पलक कीर्तिमान् हुए हैं । मुशी प्रेमचन्द जैसा उपन्यास-लेखक भी का का ही पुत्र था। --

[ ८५ ]
सच है काशी की महिमा अतुल एव अटल है। क्या आश्चर्य
है कि काशी में रहकर मुक्ति प्राप्त हो जाय-नि सन्देह इसके
दर्शन-मात्र से संसारतरण हो सकता है । भगवान् शंकर भी तो
कैलास जैसे सुरम्य एव स्वर्गस्पर्धी स्थान का परित्याग कर सकुटुम्ब
काशी में आ डटे हैं, सो निरर्थक ही नहीं है । इसका रहस्य
समझनेवाले समझते ही हैं । काशी 1, वाराणसी । तुझको भनेक
प्रणाम |-तू "बनारस" है, तेरे यहाँ 'रस' सदैव 'पना'
रहता है।
प्रश्न
1-अपनी भाषा में काशी नगरी का वर्णन करो।
२-काशी में कौन कौन से प्रसिद्ध विद्वान हुए हैं?
३-काशी के प्रसिद्ध विद्वानों के विषय म तुम क्या जानते हो?

[ ८६ ]
१८ - भगवान बुद्ध
आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व कौशल राज्य की
राजधानी कपिलवस्तु मे शाक्यवंशीय महाप्रतापी महाराज
शुद्धोदन राज्य करते थे। राजप्रासाद सर्वसुससम्पन्न होते हुए
भी महाराज को सूना दिखलायी पडता था।
क्योकि महाराज के
कोई पुत्र न था, उनके विशाल सुख वैभव का.कोई उत्तराधिकारी
न था । पुत्र लाभ की मनोकामना से महाराज तथा ।
महारानी
ने आचार्यों के परामर्श से निराहार रहकर तप किया, जिससे
उनका मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण हुआ। शुद्धोदन के पुत्रजन्म की
कथा बडी रोचक है।
महारानी मायादेवी जब अपने पितृगृह जाने लगी तब
मार्ग मे लुम्बिनी के विशाल उद्यान मे विश्रामार्थ ठहरी । इसी
पवित्र उद्यान में महारानी माया देवी के गर्भ से हमारे चिर
विश्रुत भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ। मायादेवी अपने अद्वितीय
पुत्र के भावी अनुपम विकास की चिन्तना भी न कर पायी
थीं कि देवदुर्विपाक से एक सप्ताह बाद ही उनका देहावसान
हो गया । मातृवियोगी लाडले पुत्र के मनोरजन तथा शिक्षा के
लिये महाराज ने कुछ उठा न रसा । विमाता गोतमी ने तो
उसका ऐमा लालन-पालन किया जैसे वह उसका अपना ही पुत्र
था । गोतमी सचमुच अपने को भूल-सी गयी थी।
युवराज का रागिनाम भगवान बुद्ध न था । यह तो उन्हें
बडे-बडे कायाकष्ट तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति पर मिला । युव'
-

F । मामना करना पड़ेगा । यह सभी के लिये अनश्यम्भावी है, [ ८७ ] राज का जन्म-नाम सिद्धार्थ था। सिद्वार्थ ने अल्पकाल में ही तत्कालीन युवराजोपयोगी समस्त विद्याएँ सीस ली। सर्वगुण- सम्पन्न होते हुए भी युवराज का मन उनमें लिप्त न था। एक दिन राजाज्ञा प्राप्त कर अपने 'सारथी छटक के साथ युवराज राजनगर देखने गये । इससे पहले उन्होंने नगर के विभिन्न दृश्य कभी न देखे थे । उनके लिये यह सब कुतूहल था। अचानक सामने की एक गली से किसी वृद्ध को लाठी के सहारे मुके हुए आते देस युवराज ने आश्चर्यचक्ति होकर सारथी से पूछ-"छदक, यह कौन जीव है ?" छदक वोला-"युवराज, यह कोई वृद्ध है जिसकी कमर द्वावस्था के कारण झुक गयी है और शरीर जर्जर हो गया है । विशेप अवस्था प्राप्त कर मनुष्य इसी प्रकार मुक "तो क्या यह अवश्यम्भावी है, टल नहीं सकती ?" युवराज ने पूछा । "हॉ हम सभी को एक दिन इस अवस्था का युवराज"-छंटक ने गम्भीरता से कहा । भय से युवराज का विचारचक्र चलने लगा। "तो क्या मेरी सुन्दरी गोपा इसी प्रकार रूपहीना, शगाता सया जर्जरवदना हो जायेगी।" पदय के अभ्यन्नर-प्रदेश मे कोई जोर देकर बोला- "अवश्य"। जाता है।" । -

[ ८८ ]
रथ कुछ ही आगे बढ पाया था कि क्रमश एक रोगी तथा
एक अरथी को देख युवराज ने बड़े कुतूहल से पूछा-"छदक,
और यह क्या है, इसके अंग-अग से रक्त क्यों बह रहा है।
कधों पर यह चार व्यक्ति क्या लिये जा रहे हैं तथा उसके पीछे
यह रुदन क्यों किया जा रहा है ?"
"युवराज, यह तो शरीर के भोग हैं जो सव शरीरधारियों को
भोगने ही पढते हैं" छदक ने वियोगभाव से कहते हुए' फिर
मृतक को ओर सकेत कर कहा-"और यह अरथी किसी मृतक
व्यक्ति की है जिसकी आत्मा इस असार शरीर को छोड
कर चली गयी है । अब इसे दहन के लिये ले जा रहे हैं। प्रियजन
उसके वियोग में रुदन कर रहे हैं । ससार का दृश्य बड़ा करुण
है, युवराज । हम सब भी इसी प्रकार किसी दिन अपने प्रियजनों
फो रुदन करते हुए छोड़कर चले जायेंगे।"
"यह भी अवश्यम्भावी है, छेदक "-युवराज ने पूछा ।
छदक वोला-"अवश्य, युवराज । अवश्य । जो जन्मा है,
उसे तो मरना ही है।"
चौराहे से राजमहल की ओर रथ मोडते समय किसी
सन्यासी को जिसके अग-अग से कान्ति निकल रही थी एक वृक्ष
के नीचे ध्यानावस्थित देखकर रथ ठहराने का सकेत कर युवराज
ने पूछा-"छदक, यह तो कोई विचित्र पुरुप देस पड़ता है।
इस प्रकार एकान्त स्थान में आँखें बन्द कर बैठने का क्या
.
प्रयोजन है?"

।
-*
.
भगवान बुद्ध

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[ ८९ ] छंदक ने उत्तर दिया-"यह एक सन्यासी है जो इस क्षण- भगुर संसार की विपयवासनाओं को त्याग इन्द्रियदमन तथा गम्भीर चिन्तन द्वारा असण्ड आनन्द को प्राप्त कर चुका है। इस ससार की कोई भी आकर्षक वस्तु अव उसे वापस नहीं ला सकती । फष्ट और चिन्ताओं से वह मुक्त हो गया है। यही एक मार्ग है, युवराज । जिसके द्वारा मनुष्य सांसारिक व्याधियों से निकलकर परमानन्द में मिल सकता है।" ससार-चित्रपट के ये चित्र तथा छंदक की यातें युवर के कोमल हृदय पर प्रक्षुण्ण रूप से बैठ गयीं। + + तब से आत्मचिन्तन में इसी प्रकार कितने ही वर्ष बीत गये । उसने एक ही हुकार में माया के सव बन्धन तोड डाले । आधी से ज्यादा रात चीत चुकी थी। युवराज ने गोपा के विलास- भवन में प्रवेश किया । रत्नाभा में एक बडे पर्यक पर दो मन. मोही मुख देखकर युवराज सब कुछ हार गये । इतने दिनों का संचित ज्ञान माया की एक ही झलक में काफूर हो गया। युवराज को इस प्रकार सब कुछ सो वैठे देस हृदय के अन्तरतम प्रान्त से कोई बोला-"हे, हैं, युवराज। यह सुन्दर मुसाकृतियाँ ही तो तुम्हारे बन्धन और पतन के कारण हैं। युवराज जागे । उन्हीं पैरों उलटे मुड़े । स्थूल आँखों में से होकर एक चित्रपट हदय पर प्रतिनिम्बित हुआ । युवराज ने देखा गोपा कह रही है-"मुझे छोड कहाँ जा रहे हो, युवराज ।

[ ९० ] अभागे राहुल और गोपा को भी ले चलो नाथ । हा, भेवर प्रकार न छोड़ो . नाविक - 1 युवराज बलात् उस माया-प्रकोष्ठ से पुग्वराज की धवल सीढियों द्वारा नीचे उतर आये। आकाश तारों से भरा था । युवराज के ललाट पर भी प्रस्वेदमण दमक रहे थे । शीतल वायु के एक झोंके से युवराज होश मे आये। युवराज और कुछ न बोले । पास के ही एक प्रकोष्ठ-पृष्ठ पर सोये व्यक्ति को जाग्रत कर बोले-"अश्व शीघ्र तैयार करो, छंदक । मुझे इसी समय किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना होगा। देसो, व्यर्थ कोई शब्द न होने पावे।" वस्तु से , प्रभात होने ही वाला था। युवराज ओर छन्दक कपिल- दूर महाराज शुद्धोदन की राज्य-सीमा के बाहर जा पहुँचे । अश्व ठहराकर युवराज बोले-"छंदक । जाओ, भवन लौट जाओ। देखो अब समय नहीं है । लो, यह वस्त्राभूपण भी लेते जाओ। छन्दक कॉप उठा। हृदय नेत्रों द्वारा वहने लगा। उसने युवराज को उपा के धुंधले प्रकाश-में मिलमिले नेत्रो से देखकर कहा-"और श्राप, युवराज "मैं, हॉ, मैं भी भवन लौटूंगा परन्तु अभी नहीं सत्या- ज्वेपण करने के बाद । तुम अभी लौट जाओ । मैं उस वस्तु सोज में जा रहा हूँ, छन्दक जिससे जीव को सच्ची शान्ति तथा

[ ९१ ]
सासारिक दुसों से मुक्ति मिल सकती है, और उसे प्राप्त कर
ही लौटूंगा, ऐमे नही ।"
यह कहते-कहते युवराज सामने के एक घने कुज में
अदृश्य
हो गये।
..
वैशाली तथा राजगृह के तत्कालीन दर्शन एव योग के
प्रकाण्ड पण्डितों से अध्ययन करने पर भी जब इस राजवशीय
तरण तपस्वी को शान्ति न मिली तब इसने विहारप्रान्त के
एक भयकर वन में कठोर तपश्चर्या आरम्भ कर दी। शरीर सूर
गया। प्राण केवल नेत्रों में ही अटके रहे । युवक तपस्वी की यह
दशा देसकर वनवासिनी बालाएँ दृध तथा, फलों से
युवराज
का शरीर सीचने लगी। एक बार फिर युवराज तपस्वी की
ऑखों में राजप्रासाद का सुस-वैभव नाचने लगा। पर वेन
डिगे । अपने गुरु को पनवालाओं के हाथ से पृय.-पान करते
देस युवराज के शिष्यों ने उन्हे त्याग दिया। युवराज ने भी
यह स्वागत भिक्षा श्रेयस्कर न समझी पर करते ही क्या । शरीर
में कोई भी शक्ति तो अवशेप रह नहीं गयी थी । लोकलाज की
रक्षा के लिये उन्हे वस्र आवश्यक प्रतीत हुआ। वहाँ वस्त्र कहाँ
था। किसी प्रकार रंगते हुए पास के एक श्मशान में जा
पहुँचे । सयोगवश किसी मृतक का एक फफन मिल गया।
युवराज इसी कफन से अग टॉककर मिक्षा माँगन
करते थे।
-
जाया

[ ९२ 1
-
जिसकी खोज में युवराज वर्षों से लगे थे, जिसके लिये
विशाल राजप्रासाद तथा सुस-वैभव को ठोकर मार दी थी और
जिसके लिये कष्ट सहते-सहते शरीर सुसा दिया था-वह एक
दिन अचानक युवराज को एक वटवृक्ष के नीचे मिल गया ।
युवराज का कपाल नवाभा से दमक उठा । उन्हें शांति मिल
गयी। तब से युवराज का नाम बुद्र तथा जिस वृक्ष के नीचे
उन्हे शान्ति मिली थी उस वृक्ष का नाम बौद्धि-वृक्ष पडा। गया
से थोडी दूर पर यह वृक्ष अब भी वर्तमान है। हजारो यात्री
प्रति वर्ष दर्शन करने आते हैं।
भगवान बुद्ध ने अब पर्यटन प्रारम्भ किया। "अहिंसा
परमो धर्म" का उपदेश देते हुए वे बडे-बड़े नगरो तथा सम्पूर्ण
देश में पर्यटन कर आये। उस समय देश में धार्मिक अशान्ति
थी, इसलिये कुछ ही काल में भगवान बुद्ध के सहस्रो अनुयायी
हो गये । मगध के महाराज अशोक ने तो दूसरे-दूसरे देशों में
भी धर्मप्रचारक मण्डलियाँ भेजकर बौद्ध धर्म का खून ही
प्रचार किया।
महाराज शुद्धोदन ने युद्ध को निमन्त्रण भेजा और स्वय
उन्हें भी यह प्रेरणा हुई कि वे एक बार कपिलवस्तु जायें । पति-
वियोगिनी महासती गोपा की मानसिक तपश्चर्या ने भगवान बुद्ध
फा पासन डिगा दिया। वे कपिलनस्तु जा पहुँचे। महाराज
शुद्धोदन ने राजवधू गोपा को पति-दर्शन कर आने की बात
कही । पर वह न डिगी । उसे विश्वास था कि उसका तप उन्हें
अवश्य यहीं स्वींच लायेगा । हुआ भी ऐसा ही। जब भगवान्
।

mom [ ९३ ] बुद्ध भवन पधारे, गोपा ने अपने लाडले लाल राहुल को उनके चरणों पर रसकर अभय वरदान प्राप्त किया। सारा राजपरिवार युवराज का अनुयायी हो गया। इस प्रकार ४५ वर्ष तक लगातार धर्मप्रचार कर ८० वर्ष की अवस्था में (ईसा से ५३४ वर्ष पूर्व ) काशी और पटना के बीच कुशीनगर ग्राम में एक साल वृक्ष के नीचे भगवान् बुद्ध ने देह विसर्जन किया। समाधिस्थ होने के पूर्व वे महाराज शुद्धोदन का अन्तिम-सस्कार करने राजप्रासाद में गये । महाराज उनसे धर्मोपदेश सुनते-सुनते परलोक सिधारे। उस ममय भगवान् ने अपने अनुयायियों तथा श्रमणको को चार बातों का उपदेश दिया। वे ये हैं। (१) इन्द्रियों का निरोध करने से निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त होता है (२) आत्मशोधन करते हुए पापों से बचना और पुण्य करना चाहिये। (३) जल से कीचड होता है और जल से ही यह धोया जाता है। इसी तरह मनसे पाप होने पर मन के द्वारा ही पाप घोया भी जाता है। (४) छाया जिस प्रकार मनुष्य का त्याग नहीं करती उसी प्रकार जिससे विचार, वाणी और फर्म पवित्र है उसकी मुस- शाति अटल रहती है।

[ ९४ ] भगवान् बुद्ध जन्मान्तर और मुक्ति को मानते थे और अहिंसा, अस्तेय, सूनृत, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह-इन पाँच साधनो को मुक्ति का उपाय बताते थे। प्रश्न । १-गौतम बुद्ध ने अपना घर क्यों छोडा ? २-उनकी क्या शिक्षा भी? -~ -ससार में उनके धर्म का प्रचार हुआ ३ 2 १९-सदाचार स्मृति-प्रन्थों में यद्यपि आचार शब्द का प्रयोग विशेषतय खान-पान की शुद्धि एवं वल्कल आदि के वारण में किया गया है परन्तु आजक्ल यह शब्द परम व्यापक हो गया है । शोल औ- सदाचार में अब विशेप भेद नहीं है। शील की व्याख्या कर हुए हारीत---मृदुता, मैत्रता, प्रियवादित्य, कृतज्ञता, शरण्यता कारुण्य, प्रशान्ति आदि को शील का स्वरूप मानते हैं । गोविन्द राजराग और द्वेप के परित्याग को ही शील मानते हैं । सदाचा में शोल के इन गुणो की वृद्धि के साथ शारीरिक एव मानसिक शुद्धि पर विशेप ध्यान दिया जाता है। जिस रहन-सहन और व्यवहार के फरने से एक व्यति- मानव-समाज में सजन के शब्द से अलकृत होता है, संक्षिप्त

[ ९५ ]
रूप में उसका नाम ही सदाचार है। जो सदाचारी होता है
मानवजीवन में उसकी सब तरह से उन्नति होती है और यह
सन लोगों का पूजनीय एवं श्रद्धा का पात्र यन जाता है।
दुराचारी पुरुषों से सन घृणा करते हैं और न कोई उनका
विश्वास करता है।
सदाचारी पुरुप अपने कामी से किसी को भी हानि नही
पहुँचाता और जहाँ तक हो सके यहाँ तक वह सब की सहायता
करता है । जिस जाति एव देश में ऐसे पुरुषों की अधिकता
होती है वे जातियाँ एव देश जगत में समुन्नत और सभ्य
के नाम से प्रसिद्ध होते हैं । विशेप ज्ञान अथवा प्रचुर मात्रा में
वन के कमाने से ही एक मनुष्य सदाचारी नहीं कहला सकता।
सदाचारी वह होता है जो अपनी उत्कृष्ट विद्या और अतुलित
धन का सदुपयोग करता है । दुराचारियों की प्रत्येक शक्ति
दूसरों को सताने में काम आती है और अन्त में वे स्वय भी
उससे विनष्ट हो जाते हैं । परन्तु सदाचारी अपनी सामर्थ्य को
सदा भले कामों में ही लगाते हैं और अपनी सुस एव शान्ति
के साथ दूसरो को भी आनन्द देते हैं।
आजकल निक्षा का विशेप प्रचार होने पर भी जो अभी
मानर-समाज में विश खलता है, उसका प्रधान कारण यही है
कि काम के समय मन अपनी अच्छी शिक्षाओं को भूल
जाते हैं। परन्तु सदाचारी ऐसा नहीं करते । वे कमी
भी ऐसा काम नहीं करते जिससे उनके नाम या उनके फुल
पर किसी तरह का फलक लग सके और ये काम के समय ही

[ ९६ ] अपने सद्गुणो का परिचय दिया करते है। वे अपने काम को नाम कमाने के लिये नहीं करते, परन्तु यह उनका एक स्वाभाविक गुण होता है कि वे परोपकारी एव सर्वजन प्रिय होते हैं। अपने कर्तव्य को समझकर बुरी सगति एव बुरे व्यसनों को छोडकर प्रत्येक मनुष्य सदाचारी हो सकता है। यह मनुष्य की कमजोरी है कि वह यह समझता है कि बुरी बातों का सहारा पाये बिना अथवा झूठ की सहायता लिये विना उसका काम सिद्ध नहीं होगा । जो सत्यव्यवहार मे दृढ भक्ति रसते हैं उनके कामों को प्रकृति अपने आप सिद्ध कर देती है । सदाचारी के विनय से सब प्रसन्न रहते हैं और शत्रु भी उसके मित्र बन जाते हैं । आवश्यकता यही है कि हम सदाचारी बनने का प्रयत्न करे और अपने कर्तव्य एव अकर्तव्य को समझे। आहिक सदाचार-पालन की तरह आह्निक कर्म भी जीवन में एक परम आवश्यक अग है। जीवन दैनिक घटनाओं के आधार पर ही उन्नत अथवा अवनत होता है । जो पुरुप अपने पाहिक कर्मों पर ध्यान नहीं देते, वे अन्त में बहुत पछताते हैं । हमारे तत्ववेत्ता पूर्वजो ने हमारे आद्धिक कर्मों की ऐसी व्यवस्था की है कि प्रतिदिन उनका पालन करने के बाद प्रतिक्षण जटिल होते हुए जीवन की यात्रो में फिर विशेप असुविधा नहीं होती। आज कल जो हमारे समाज में चित्त की अशान्ति, रोग एव तामसिक . [ ९७ ] विचारों का परम प्रानल्य हो रहा है, और मृर्पता का साम्राज्य प्राय प्रतिदिन बढता जा रहा है उसमें प्रधान हेतु यही है कि हम अपने आह्निक कर्मों की भयंकर उपेक्षा कर रहे हैं। आह्निक कर्मों का पूर्ण विवरण अत्यन्त विस्तृत है, पर साधारणतया इतना समझ लेना ही पर्याप्त होगा कि नाम मुहूर्त उठना, स्नान-संध्या, हवन, स्वाध्याय, वलिवैश्वदेव, अतिथि- सत्कार आदि दैनिक कर्मों की उपेक्षा से हमारी जितनी तति हो रही है, वह किसी भी अन्य कार्य से पूर्ण नहीं हो सकती। ब्राह्म मुहूर्त में उठने के लाभों पर विशेष लिखना अना वश्यक है । उस समय की वायु के सेवन से जो स्कृति आती है, शान्त मस्तिष्क में जिन विचारों का अभ्य- दय होता है, उससे शरीर की जो शुद्धि होती है और जीवन के जिस अमूल्य समय की, जो तन्द्रा में व्यर्थ नष्ट होता, प्राप्ति होती है-यह संसार में अद्वितीय है। इसी तरह स्नान-सध्या के द्वारा प्राणायामादि से जिस आयु की वृद्धि होती है, वह लाम तरह के अन्य सिग्रेट, चाय, सिनेमा और सावुन या पाउडरों के उपयोग से एक क्षण के लिये भी नही हो सकती। प्रतिक्षण दौड़ता हुआ आजकल का जीवन एक क्षण के लिये भी समाधि-सुख का अनुभव न करने को कारण ही परम विचलित हो रहा है। इसी तरह निरर्थफ साहित्य को पढ़ने की अपेक्षा [ ९८ ] यदि प्रतिदिन शास्त्रों का स्वाध्याय होता तो जीवन मे छिछलापन नहीं आता। - यह अतिथिसत्कार की उपेक्षा आदि का ही कुपरिणाम है कि हम में जातीयता, राष्ट्रीयता अथवा अन्तर-राष्ट्रीयता का अभाव हो रहा है। यदि हम प्रत्येक भाई का सत्कार करते तो हम में भ्रातृभाव की वृद्धि होती । इत्यादि एक-दो नहीं, हजारों ऐसे गुण हैं जिनकी रक्षा के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम अपने प्राचीन स्मृति-प्रथों का अध्ययन कर अपने कर्तव्य कर्म का ज्ञान प्राप्त करें और अपने जीवन के सुसी बनावें। " देवार्चन सदाचार तथा आह्निक कर्म के साथ तीसरा हमारा यह कर्तन है कि हम अपना कुछ समय देवार्चन में भी अवश्य व्यतीत किय करे। देवार्चन हमारा प्रधान कर्तव्य है। मनुष्य का जहाँ य कर्तव्य है कि वह अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखे और अप दद अध्यवसाय एव सत्कर्मों से अपनी उन्नति करे, यहाँ उस साथ ही यह भी उसका धर्म है कि वह इस बात को कभी भूले कि उमकी शक्तियो को विकसित करने में उसके परम पि का ही मुख्य हाथ है। भगवत्कृपा का ही यह फल है कि E इस सुन्दर सृष्टि में इस अनुपम सौन्दर्य का अनुभव कर रहे। वह प्रमु यद्यपि हमारी पूजा की अपेक्षा नहीं रखता, पर

-
एक अनुपम माहित्यम अची में मध्य का अपरेट
देप मे विपन सम्बन्ध नजारा है और पिर परसर
[ ९९ ]
हमारा कर्तव्य है कि हम अपने उस विधाता से अपने सम्बन्ध
को विच्छिन्न न करें। हमारा उससे जितना ही अधिक सम्बन्ध
होगा, हमारा उतना ही अधिक फल्याण है । यह निश्चित है कि
वह सर्वव्यापक है और हमारा उससे एक अनवच्छिन्न सम्बन्ध
है, पर स्मरण, ध्यान एव अर्चन आदि के विना यह सम्बन्ध
सूट नहीं होता। विकास के लिये किसी-न-किसी क्रिया की
आवश्यकता अवश्य है और यह क्रिया देवार्चन में अत्यन्त
प्राचीन काल से विशेप सफल और आनन्दमय प्रकटित
होती रही है । देवार्चन में जिस प्रेम, श्रद्धा, संलग्नता और
शान्ति का अनुभव होता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है । विभिन्न
देवी के उपासक यसकर परस्पर कलह करना देवार्चन नहीं है।
सम देवो में उस एक प्रमु की ज्योति को मानकर और उसके
ही विभिन्न स्वरूपों को देवरूप समझकर भगवान् शकर,
विष्णु, माता भगवती आदि की जो पूजा करते हैं, वह सन से
अधिफ सुन्दर पूजा है । पूजा में नाना.उपहारों की अपेक्षा भाव
और भक्ति प्रधान है।
देयार्पन से हृदय एवं मस्तिष्क में जो एफ उन्लास पौर
विश्वास उत्पन्न होता है यह विद्या, मुद्धि और शशि के उपार्जन
में परम सहायक होता है। भारत में हम देवाचा फे प्राम
जिन मधुर मनोनों पी रपना हुई है, पद जगत के माहित्य
मेमापन के अधिकारी जागे

[१०० ]
छाशी को चाहिये कि वे इन बातो पर अपने गुरुजनो
से पूर्ण शिक्षा को प्राप्त अवश्य करें और व्यवहार रूप में इनका
पालन कर इनके आनन्द का अनुभव करे । पठन की अपेक्षा
यह विषय विशेषतया पाचरण के द्वारा अनुभव करने
योग्य है।
you
Anas
प्राचीन भारत की एक झलक
,
अदान हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव ।
घात आजकल की नहीं, सौ दो सौ की भी नहीं । उसे हुए
हजारों वर्ष बीत गये। उस समय राजा रघु का राज्य था । वे
ससागरा पृथ्वी के पति थे। सारेत नगरी (प्राचीन अयोध्या)
उनकी राजधानी थी। सत्पात्रां को दे डालने ही के लिये वे धनो
पार्जन करते थे, प्रजा के काम में लगा देने ही के लिए वे कर
लेते थे, निर्वलो को प्रवलो के उत्पीडन से बचाने के लिए ही वे
धनुर्वाण धारण करते थे। विद्वानों का प्यार वे अपने प्राणों से
भी अधिक करते थे, उन्हे वे देवता समझते थे, उनके पैर तक
अपने हाथो से धोते थे। यह मजाल न थी कि अरण्यवासी
विद्वानों के लगाये हुए छोटे से पौधे की एक टहनी भी
कोई तोड़ ले-उनके खेती से साँवा की एक वाल भी कोई
चुरा ले
जाय।

ma- [ १०१ ] बड़े बडे ब्रह्मज्ञानी विद्वान् पड़ी बड़ी बस्तियों में, उस समय, न रहते थे । यस्ती के कुछ दूर, जंगल में, वे अपनी पर्ण शालायें चनाते थे । साँवॉ, कोदो और कैंगनी की वे खेती करते थे। गाय भी वे पालते थे। उनके पास सैकडों नहीं, हजारो विद्यार्थी रहते थे। वे उन्हें विद्या का भी दान देते थे और भोजन-वन का भी। अन्याय, उत्पीडन और चौर-फर्म का कहीं नाम न था। यज्ञ के पावन धूम से आसपास का प्रदेश सुरमित रहता था । वेद-घोष से दिशायें गुञ्जायमान रहती थीं। आचार्यों की आज्ञा पालन करने में चक्रवर्वी राजा तक अपनी कृतार्थता मानते थे । ऐसे समय के भारत की एक मुलक.देसिए । राजा रघु ने अपनी सारी सम्पत्ति, विश्वजित् नामक यज्ञ में, दे डाली है । पास कुछ भी नहीं रक्खा। पानी पीने के लिए पीतल का लोटा भी नहीं रह गया । रह क्या गया है १ मिट्टी ही का सफोरा, मिट्टी ही की हाँडी, मिट्टी ही की थाली । इस प्रकार सर्वस्व-दान देकर आप रिक्त-हस्त हो गये हैं। इसी समय, वरतन्तु नाम के एक बडे तपस्वी और बडे विद्वान् महात्मा राजा रघु के राज में तपश्चर्या और अध्यापन का काम करते हैं। प्राधम उनका जगल में है। सेत पात भी उनने वहीं है । अनेफ ब्रह्मचारी आपके आश्रम में रहते और अध्ययन करते हैं । घरतन्तु ऋपि फी विद्वत्ता का यह हाल है कि ये पौदही विधाओं के निधान हैं। तप उनका इतना यदा पदा है कि उनके डर से इल का आसन दिग रहा है। कहीं इतना घोर तप करके मेरा इन्द्रत्व सो नहीं धीर लेना चाहते । म डर से सुरेन्द्र शम्नी

[ १०२ ]
को अप्सराओं की शरण लेनी पड़ी । पर वरतन्तु जी के मामन
उनकी एक भी न चली । वे अपना सा मुंह लेकर लौट गई
इन्द्र का वह भय सर्वथा निर्मूल था । इन्द्रासन पाने के
इच्छा अल्प-पुण्यात्माओं ही को हुआ करती है । वरतन्तु जी
ऐसे नहीं।
वरतन्तु के आश्रम मे कौत्स नाम का एक विद्यार्थी है । जन
उसका अध्ययन समाप्त हो गया और वह पूर्ण विद्वान होकर
गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य हुआ तव वरतन्तु ने उसे घर
जाने की आज्ञा दी। कौत्स ने भक्तिभाव के उन्मेप मे आकर
प्रार्थना की-
"आचार्य । मुझसे कुछ गुरु-दक्षिणा लीजिए। आपकी कृपा
से मैं मूर्स से पंडित हो गया। अतएव मेरो हार्दिक इच्छा है कि
मै
पत्र-पुष्परूपी थोडी सी पूजा आपकी करूँ।"
वरतन्तु-"वत्म । तुमने मेरे आश्रम में इतने दिन तक रह
कर मेरी जो सेवा-शुश्रूषा की है उसी को मैं सबसे बड़ी गुरु-
दक्षिणा समझता है । वही क्या कम है ?"
कौत्स"नही आचार्य । कुछ आज्ञा तो अवश्य ही दीजिए,
कृपा कीजिए । मेरा जी नहीं मानता।"
वरतन्तु-"कौत्स । दक्षिणा की अपेक्षा शिष्य की भक्ति मुझे
विशेष सन्तोपदायिनी है । उसके मुकाबले में दक्षिणा कोई चीज
नहीं । तुमसे में कुछ नहीं चाहता।"
कौत्स-"महाराज | आपको मेरा अनुरोध मानना ही

[ १०३ ]
डेगा । मुझे अपना सेवफ समझ कर कुछ मुंह से जरूर कहिए।"
शिष्य की इस हठ को देखकर आचार्य का महासागर
सदृश शान्त चित्त भी क्षुब्ध हो उठा-
उन्हें रोप हो पाया। उन्हें कौत्स को गरीबी का घुछ भी
जयाल न रहा । वे योले-"अच्छी बात है। तू गुरु-दक्षिणा दिये
निना जो घर नहीं जाना चाहता तो अब देकर ही जाना । मैंने
तुझे चौदह विद्यायें पढाई हैं। अतएव एक एक विद्या के बदले
एक एक करोड़ रुपया मुझे ला दे।"
कौत्स इस श्राज्ञा को सुनकर जरा भी नहीं घबराया । उसने
"जो आज्ञा" कहकर गुरु को प्रणाम किया और वहाँ से चल
दिया। जिस भ्राह्मण कुमार के पास कौपीन, कमण्डलु और
पलाशदण्ड के सिवा और कुछ नहीं था उसने चौदह करोड़ रुपये
अपने विद्या-गुरु को देने की दृढ प्रतिज्ञा की।
जरा इस घटना पर ध्यान दीजिए । वरतन्तु ने कौत्स को
बरसो पढाया-कौन जाने पीस पर्प पढाया, या पञ्चीस वर्ष
॥ इससे भी अधिक-पढाया ही नहीं, अपने घर रक्सा,
भोजन वस्त्र भी दिया और बीमार होने पर सुताधिक स्नेह से
उसकी रक्षा भी की और इसके बदले में आपने पाया क्या?
केवल शिष्य-भक्ति । उसीको आपने फीस सममा, उसीको बोर्डिंग
का सर्च, उसी को सर पुछ ।- यह तो हुआ आचार्य
का हाल ! अब शिष्य को देखिए। वह भक्तिदान से सन्तुष्ट
नहीं। वह यथा-शक्ति पुछ और भी देना चाहता है । विना
रक्षिणा के प्राचार्य के आश्रम से घर जाने के लिए उसका पैर

धनो से बढकर समझा । चक्रवर्ती राजा होने पर भी रघु को
अभ्यागत के आदरातिथ्य की क्रिया अच्छी तरह मालूम थी।
अपने इस क्रिया ज्ञान का यथेष्ट उपयोग करके रघु ने कौत्स
को प्रसन्न किया । जब वह स्वस्थ होकर प्रासन
बैठ गया तब रघु ने नम्रतापूर्वक भृकुटी या हाथ के इशारे
से नही, किन्तु वाणी द्वारा, कुशल-समाचार पूछना प्रारम्भ
किया । इतना ही नहीं, राजा ने हाथ भी जोडने की जरूरत
समझी । विद्वान् और तपस्वी की महिमा तो देखिए।
हे कुशाग्रबुद्धे । कहिए, आपके गुरु तो मजे में हैं ? आपके
विद्या-गुरु महर्षि वरतन्तु की तपस्या का क्या हाल है १ उनके
तपश्चरण के बाधक कोई विघ्न तो उपस्थित नहीं होता।
आपके आश्रम के पेड-पोधे तो हरे भरे है ? सूखे तो
नहीं ? आँधी और तूफान आदि से उन्हें हानि तो नहीं
पहुँची?
आपके तीर्थ-जली की क्या हालत है ? उनमें कोई
खराबी तो नहीं ? चे सूस तो नहीं गये ? पशु उन्हे गॅदला तो
नहीं करते ? इन तीर्थ-जलों को इन तडागों और थावलियों,
को-मैं आपके वडे काम का समझता हूं। पन्हीं का जल
आपके स्नानादि के नित्य काम आता है। पितरों का तर्पण
भी आप एसी से करते हैं। इन्हों के किनारे रेत पर श्राप
अपने खेतों की उपज का पष्ठाश, राजा के लिए, रम
छोड़ते हैं। यह वह समय था जब न कोई तहसीलदार
था, न रेविन्यू मनीआर्डर थे, न लगान वसूल करने के

[ १०७ ]
लिए कोई कानून था । न किसी पर नालिशे होती थी,
न वेदखली थी, न कुर्की । राज-कर, उपज के रूप में, दिया
जाता था सो भी छ मन पीछे एक मन । झूठ, धोखेबाजी
और चौरकर्म का कही नाम न था। जिसे जितना कर देना
होता था वह उतना किसी पास के कुएँ, तालाब या बावली के
किनारे चुपचाप रख देता था । समय पर राज कर्मचारी उसे
उठा ले जाते थे। भारत का यह प्राचीन दृश्य किसी सहृदय के
कण्ठ को गद्गद् और नेत्रों को सानु न करेगा?
इन ऋपियों के उदरनिर्वाह की साधन-सामग्री को तो
देखिए । वे खाते क्या थे-मका, कॅगनी और सॉवॉ। पर विद्वत्ता
उनकी ऐसी थी कि साक्त के चक्रवर्ती राजा उनके पैर अपने
हाथ से धोते थे। उनकी तपस्या का यह हाल था कि सुरराज
इन्द्र भी उसे देख कर कम्पित होते थे !! सादा जीवन और
उच्च विचार का ऐसा उत्कृष्ट नमूना क्या कभी किसी देश की
किसी जाति में और कहीं पाया जा सकता है ?
आप हमारे परम पूज्य हैं । हाँ, भला यह तो कहिए, कि
आपने जो मुझ पर यह कृपा की हे वह आपने अपने ही मन
से की है या गुर की आज्ञा मे, वन से इतनी दूर मेरे
पास आने का कारण क्या ?
इस विस्तृत
घुशल-प्रश्नावली के समाप्त होने पर
कौत्स ने कहा-
"राजन् । हमारे आश्रम में मव प्रकार कुशल है । हमारे
तपश्चरण में कोई विन्न नहीं, आश्रम-पादप सूत्र अच्छी दशा
-
2

[ १०८ ]
मे हैं, जल की कमी नहीं, अन्न काफी है, पश्चादिको का कोई
उपद्रव नहीं । आपके राजा होते, भला, हम लोगो को
कभी स्वप्न में भी कष्ट हो सकता है । सूर्य के मध्य आकाश में
स्थित रहते, मजाल है जो रात्रिसम्भूत अन्धकार अपना मुँह
दिखाने का हौसला करे ? रहा मेरे आने का कारण, सो मैं गुरु
के लिए आप से कुछ मॉगने आया था । परन्तु मैं देर से आया।
आपसे मॉगने का समय जाता रहा । आपके ये मिट्टी के पात्र
इसके प्रमाण हैं । आप प्रसन्न रहे । अव मैं आप से इस विषय
में कुछ नहीं कहना चाहता । मैं तो मनुष्य हूँ। गुरु की
कृपा से चार अक्षर मैंने पढे भी हैं । अतएव ऐसे समय में
याचना मुझे मुनासिब नहीं । सारे संसार को जल-पृष्टि से
आप्लावित करके शरत्काल को प्राप्त होने वाले रिक्त मेघों को
पतंग-योनि में उत्पन्न चातक भी, अपनी याचनाओं से तर
नहीं करते।"
राजा ने उत्तर दिया-"अच्छा, बतलाइए तो, कौनर्स
चीज आप अपने गुरु को देना चाहते हैं और कितनी देन
चाहते हैं ?
इस पर कौत्स ने सब हाल कहा । सुनकर राजा बोला-
कुछ चिन्ता नही । आप दो तीन दिन मेरी अग्निहोत्रशाल
मे ठहरिये । मैं आपकी अर्थ-सिद्धि के लिये चेष्टा करूँगा
मेरे पास से आपका विफल-मनोरथ जाना मेरे लिए बड़े ।
कलक की बात होगी। यह मैं नहीं चाहता-यह मुझे अस
होगा।"
"

[१०९] रघु के खजाने में कौड़ी न थी। चौदह करोड़ रुपया कहाँ से आवे १ राजा धर्मसकट में पड़ा । अन्त में उसने कुबेर पर चढाई करके उतना द्रव्य प्राप्त करने का निश्चय किया । उसने अपना शस्त्रास्त्र-पूर्ण रथ सजाया। प्रात काल यात्रा करने के के इरादे से रात को वह उसी रथ पर सोया । पर उसे प्रस्थान करने की जरूरत नहीं पड़ी। रात ही को उसका खजाना अशर्पियो से अकस्मात् भर गया । अतएव उसने वह सब धन कौत्स के सामने लाकर हाजिर कर दिया। वह चौदह करोड से कहीं अधिक था । सवाल था सिर्फ चौदह करोड के लिए, परन्तु उतना ही देना रघु के लिए कोई विशेप उदारता की बात न थी। इससे राजा वह सारा का सारा धन कौत्स को देने लगा । परन्तु वह मतलर से अधिक क्यो लेता । उसने गिन- कर चौदह करोड ले लिया । बाकी सन वही पडा रहा । अब बतलाइए उन दोनों में से किसे अधिक प्रशसा का पात्र समझना चाहिए--दाता रघु को या याचक कौत्स को ? रघु की राजधानी साकेत नगरी के निवासियो ने तो उन दोनो को वरावर एक ही सा अभिनन्दनीय समझा- जनस्य साकेतनिवासिनस्ती द्वावप्यभूतामभिनन्द्यसत्त्वी । गुरुपदेयाधिकनि स्पृहोऽर्थी नृपोऽर्थिकामादधिकप्रदश्च ।।

[११०]
प्रश्न
१ कौत्स और वरतन्तु के विषय में तुम क्या जानते हो?
२ रघु ने कौल्म को धन क्यों दिया ?
३ इस कशा से क्या शिक्षा मिरती है ?
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Hindi Pathshala

Author
Ishaar,pt.chandradhar
Title
Hindi Pathshala
File name
Hindi Pathshala
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2011/01
Publisher
Hit Chintan Press Kashi
Language
Sanskrit
Pages
124
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546720
Barcode
4990010025167.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
MbP2T9H1LZh
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