Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mohan-mohini

Chaturvedi,pt.kanhaiya Lal · 2011/01

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- "प्रथम गुन्या मोहन-मोहिनी बालविवाह कुरीति विषयक उपदेशमद मनोरंजक ३ अङ्की नाटक । kaaron लेखक और प्रकाशक:- पं० चतुर्वेदी कन्हैयालातात्मज लक्ष्मीनारायण का0 चतुर्वेदी (रामपुग हो. स्टेट गियासी) देडमास्टर - श्री गोदापन स्कूल हिन्दा अध्यापक "श्रा गादारत जै7 गुरुकुख- पोष्ट-छोटी सादडी (मेवार) नयमावृत्ति १००० } १८८६ वि० } मुल्य cil (सर्वाधिकार रशिरा) --

पडित---चूगमणि चतुर्वेदी का प्रबन्ध से
"माहन प्रेस" इटावा में छ
"

मेरे मित्रापडित लक्ष्मीनारायण चतुर्वदोजी ने यह एक
भूमिका लिवा कलिय भेजा था। में इम थाग्य नहीं है कि
कुछ लिन सके । किंतु यह धारक वडा ही गवक है । भारता
का पार पनन याला पार वृद्धधिराह द्वारा ही हुआ है और उस
का उदगाग भा इग दारों दुर्गुणोंर नाश हात ही दा सफता है ।।
'नतुर्वदा जाने वाला और वृद्धावादक चित्र बडे हा स्पष्ट
दिग्वलाये है और नेता हृदयस्पर्शी है कि मारक के पढने
वाना वा घालाकाहदय एक ओर तो अयश्याही दाना
उठेगा याद यह गाटर खेला जायगा सा यह पहा दो परिणाम
कारक होगा।
थाशा है कि पतफा नरुगापीढी क लोग इस पटक को
श्रप करक सतुवदी जी का उत्साहित करक, उनस इस स
मी अधिक उपयागा कार्य ममाता साहित्यकारा लगे।
उज्जैन
दिनभर गगाधर गारे
१६-२६ ई०
या०प०
नट

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श्रीहरि * "मेरा वक्तव्य" निग पाउमा आजम कु घप पहिले गाएक मामाजिक 'कमल-भा' नामक IT IIT प्रारम्भ गिया था किंतु पद का शिवाय कारणा में प्रण हा पहा है । यह किसे चिादन था कि उमर प्रकाशाहा1 प्रभग ही काइ अन्य पुम्ना पापक भर-भरता में पहुँचेगा। प्रस्तु- गातुन पुस्तक निता गह पागा वस्थित हुया कि 'गि माघमण मागम्या स०१६८४ ना०२२ जावरा सन १६२८ वर्प३ गख्या २५ फ तत्ममय काम काशित प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र 'भामा-मन्दश' में (माम्प्रत समय म उक्त पत्र काशी सप्रकाशित हाता है) "Ta17 उपहार" TIम शीर्षकम एक सूना श्री राजनगरला जा पत्री क हस्ताक्षर युक्त इस प्राशय गा उगी कि 'बाल विवाह से हा1ि' इस विषय पर एक सुन्दर पकारक जिम्मा पाने महाशय का वर्ष गर ' श्रीमदेश' तथा कुत्र पुम्न उप- हारस्वरूप दी जायगा । सर्वोत्तम तापकीर है इसका निर्य 'भाषण सन्देश' का सम्पादक मण्डल पग शादि। - .

उस समय मैंग भा शाधना मे उपर्युक्त विषय पर 'मान'
मोहनी' नामक एकांकी नाटक लिनार बायत भेज दिया।
कुछ माह या पश्चात् भामान् जवाहरलाल जी का एक
'पत्र प्राप्त हुआ उमा उन्धो लिया कि 'याधियाहसे हानि'
इस विषय पर जिन नाटक प्राये म मा में आग सति'
पसन्द की गई है, निश्चित पुरस्कार श्रापमा मिल जायगा
(यादि।
মথ্যা ভণক মানুষ যা নিয়া যা যা সংবা
चही तीन प्रकी कर दिया है, कुछ स्यांगों पर गाया आदि भी
नूतग रख दिये गये हैं। इमम आशा है कि श्राप लागों की
अभिरुचि का वृद्धि के साथ ही गाटक की सौन्दर्य वृद्धि मी'
होगी।
नारमके गायक "माग" और गायिका "मोहितीमा पसार
पियाहघाल्याव में हाजाता है। विवाह प्रथम ता:
हष्ट पुए बलिष्ठ, मेधावी और महत्वपक्षी मोहा, विवाह
के कुछ वर्ष बाद दा अशक, गागा और प्रतिमाहाग हाजार के।
कारण दाम्पत्य प्रेम में न्यूनता पाजाती है। ससार सुन्न स्थान
नुत्य हो जाता है। मांहिता के हार्दिक भाय गिज बगीचे में
जा यह प्रपर पिनाक घर डाक्टगे की मम्मति स भेज दा
लानी है उस समय सहलिया का सम्मुख प्रकट होने हैं। एक
समय पहिले दु शाल युमका के कपटगाश म फैमर्ग का अवसर
से हा सतीत्य रक्षा तो प्रश्श्य होजाता है किंतु
।
41
।

- नाक बाजा तथा कुल कला के भय स अात्म हत्या कर लेती हे घामारा श्रमाभ्य हो जाा में मोहग मी प्राण त्याग करता है। मताव रक्षा के महत्व का दृष्टि में रखने के कारण इस प्रकार का दुम्नन्द और गीपण घटा घटानी पड़ी है। साम्प्रन समय में ता इस प्रकार की दुखिनी अपनायें कुरीतियों बाग सताइ जाकर कुछ को छोड अधिक सख्या में 1- यन्त्रणायें गोग जीयाा करता है। वावा विवाह से क्या हागियों हाता है ये थोडे शब्दा में इस प्रकार है इमफे-द्वारा मानक बालिकायें गिस्तज, निर्णय अशक हो जाती है। कई प्रकार क असाध्य रोग के शगर में प्रवेश कर उन्हें इतधीर्य कर उस का सर्पगाश कर देते है। पालिका पनियां शाम ही विधवायें. होजाती है। ऐमा गति में ये बात हत्या, भ्रूणहत्या पारें, मुमतमार, इमाइ विधर्मी धन प्रापो दागों कुनों को कला लगाव, लाखों का सम्या में वेश्याय बनें और शहरा में पाठो को श्राराद कर देशानियों का नतमस्तक होतको वायकर,, पुरीतियों के मोपण परिगाम का दृष्टांत प्रतावे ता इमर कार्ड' शाधर्य की बात नहीं उगका विशेष दम्प नहीं ! पूर्ण दोष ता है उ7 37 पासको का जो कि विवेक शून्य हो गित प्रयोध पालिकाओं को कुगति की पनि बदी पर प्राप्त भूनकर यनि- दाम पर देते हैं। हा गोक! शाक! महाशाम!! प्राय हम निफित अंक इमलिये जिने देन हैं भारत की सामाजिक दशा पान्य देशों के . मुफारिले में फैली है?

भाशा है कि सितम्बरवाचक । साम्प्रत समय की परिस्थिति का मनायागपूर्वक मना करेंगे। हमारे देश भारतवर्ष में सन् १९२१ ई०.की मनुष्यगणना के अनुसार पुरुषों की पुल, सख्या १६३४४५५५४ और स्त्रियों ही सरया फुल १५४६४६६२६, दागों मिना कर पुन ३१८८४२४८० है। . वर्ष आयु . सन् १९११ की मनुष्य गणना ( All India census report 1011) के अनुमार बाल प्रतियां और बात विध.. चाये उनकी आयु सहित इस प्रकार थीं। बाल पती बाल विधवाये से १ वर्ष तक १३२१२ २०१४ १ से २ १७७५३ २से३ ४६७७ ३ से ४ ७५०६ ४७५३ ४से ५ १३४१०५ ६२७३ २२१६७७७ १४२७ १०से१५ ६५५५४२४ २०३०४२ ५६. " " ५ से १०॥ नोट-इस सन् में सय मिखो पर सय प्रायु की कुल विधयाय २६४२१२६२ थीं। मनुष्यों की प्रोसत श्रायु अग- रेजों की ४० वर्ष और भारतायों की २३ वर्ष थी। १००० मेंस ३३३ प १३पनी शायु में ही मर जाते थे। . ܝܫܙ LET - १० हजार में म सन् १६२१ का गण के अनुसार विष वाय स५ यतका, ७५ म १० प तक पी४. १० म १५ वर्ष तहका १६ = T12-ग्लेगड र वेल्स । २० वपनाका श्रायु या काइ विधा नहीं है। वहा २१स ६५ घर्ष या इमम कार का विधवाओं की श्रीनन (कुता) हजार गाछ ७३० और हमारे यहा १७५ है। पुरुष का सोमत श्रायु २४ % और खियाका २४७ है। पाला विवाह शादि कुगतियों में यच्चे पिता अधिक मरते हैं इस पर कुछ ज्या जये। मर १६२१ वी मनुष्यगण शनुमार जिता याचे प्रनिपं मरत है उनमें स सैकहा ४०५ लगभग ता जन्म प्रथम में मप्ताहम और रहा ६० प्रशम माम अन्दर ही मर जाते अन्य दशों के मुकागिल में हमारे यहा क बातों की मृत्यु समा क्ति अधिक है। दम्लिय - पहलेण्ड में हरसाल जिना बच्चे पैदा होने हैं उ7 में मैकाडा सात, फान्म में सैकडा, कामगा में १० उरला में १६ का सदा, जागा में १६ फा सदा और यहाँ (माग्न में)२० फासदी मर जात है। मनुष्य भी या एक हजार की नागदा में ३८ पैदा हो हैं और ३५ अगल माल गाल में समा जाते है। इमागता यहा निश्चय है किम गाषण होस पुल भन्य । । - पी सद - ag है

[ १०. ]
पारण होने हुये भा मुख्य कारगा यह गाशमारी "बालविवाह
हा है। बाल विगह की गच्छंना कर सम्मानि विहाग इसके
विषय में क्या करते हैं वह मा जग लोकग कग्यि।
1१) "पशु जगत में कार पशु चिना मङ्ग पुष्ट हुये चञ्चा
नहीं देता। मनुष्य जगत क अङ्गों की पुठीक लिये २५
घर्ष म अधिकाममंय चाहिये। अनपर इन अवस्था का
पूर्व हा गर्माधान करना पशुश्राम मी हीन कार्य करना है।
ऐमा मग्गा फेवा मिदनीय है कि प्रति हानिकारक
गा है । ('Indu madhay mallieki AI A.BL
द० द०)
(२) इतिहासकार 'टासपाईस हालर' लिखते हैं कि जब तक
भारतधामा छारी २ यात्राओं का विवाह लाटे २
चालमा म कग्न रहेंगे, न त आफ्री मन्तात छोटे वहां-
म अधिक अच्छा दशा म कमी न पहुँच सकी। स्वाधा-
नना और स्वराज्य शान्दासाग में वे निस्तेज और यताही
मिदमाग और गजका उन्नति मा आयोग फरक
लिये रे फिमा मा प्रकार का शिक्षा स समर्थ नहीं हो
सफेंग । Rमें मन्दह नहीं मि शिक्षा प्रभाव से उसको
बुद्धि में गम्गांगना आ जायगा और वे किमी गम्भीरन था
प्रोढ मनुष्या समान पातं करने लगेंगे पान्तु मम कुछ
हाने ये गा मा श्रावण अपाय घानको हाक
समाग घगा रहेगा।" (द०.६०)
प

(३)xxxx-"वान वियाह की कुप्रथा नधान भारत के
लिय अत्यन्त लजास्पद है इसका निर्मूल फग्ना भारत
सन्ताग का सब स प्रगम और महाग पातव्य है।"
(Wake.up Indin by Dr Annie Besant द०३०)
(४) प्राफेपर काम-कौनज हिस्ट्री श्राफ रिव्या मिल्द ।
पृष्ठ : स १०६ में अन्य यद वाताव माय यह मी नि
ग्लन है कि-"ऋग्यद म एस म अधिक पनियों का उल्लव
नहीं । पाल यियार का भी मार वर्णन नहीं। घर और
क या दो पा इच्छा म विवाद पर सरते थे।'
(५) यूगा पलनी मृगनीज 1 (ancient India ) मे
ऐसा निना है कि-"हागजा "द्रगुप्त मौर्य सम्राट् क
समय में घालावाद नहीं हाते थ"
अब हाम चिपय मा धार्मिक प्रशमा हग मम्मृत
साहित्य एय धार्मिफ विपये क का उभट विद्वान fiel
आप पुनकायना और विद्या ममगस अनुगर
आ है उस परम पुन प्रसाश डाना प्रतापरेंगे। rn
एमय प्रथम यह साचत कर दे।। श्रावश्यक समत हैं कि
वैयक्तिक रूपमn RITEग्लम्या है इस धर्म पर
उनगाह उससट प्रम है जित सच्च प्रास्ता मगा.
माधर्मो का हा चाहिये। किन्तु इम माथ हा माग गर
गापिक्षात है त्यो गनुप्य का अपने मात्र हार्दिक
विचार प्राटगा जगासद्ध अधिकार है।"
,
सम्प

. है कि निम्नाङ्कित युति वियाह अनुमादक' सस्कृत धार्मिक ग्रन्धों को चमक मान्य माग धागा भ्रम मूतकहा । यदि सिमा कार मम्झना महानुभाय' काका का कर चाधिन करेंगे ताहम मुमुक्षभाव म उनकी शुभ समाति का मादरम्बागत करग हेतु हृदय स धन हंग नशा पुस्तक की हिनियावृत्ति में-यदि हागा ता-उसमा उल्जयभा महर्प कर देंगे। प्रस्तु- हमार एक विद्वान् मित्र म एक बार कहा था कि हिन्द धर्म शास्त्र सरपवृक्ष और कामधेनु कसमार है जिग मकि प्रानुकल तथा प्रतिकून दा हो गत रूपी फल श्रमायास ही उपलटर हो पाते हैं. हम नहीं कह सात कि यह अतिश- याति है अथवा मत्र है। हां विषयान्तर क हेतु क्षमा ) देत्रिये अपांग हदय कर्ता श्रा याग भ्या कहते है कि- (१) लाक--"पूर्ण पाहप वर्षा सा पूण विशेन सगना । शुद्ध गाशये मागे र शुक्रगला हदि । वायवनम् मृत सते तताम्यूहिया पुर। गगाल्पायु ग्धान्यावा गो गान ग्वा " लामा-अर्णत् १६ वर्ष की स्त्री हा प पूर्ण २० थप मा पनि हा, 37 शुद्धगम स शुद्धीय का सम्बन्ध में वार्यान् पुत्र का जन्म हामा । समयम में मम्मोग करने मनीय पाल्पायु य निर्धन पुत्राा जन्मगा अगवा गमहाग रहेगा। (• finit पासि पृष्ठा या देमाम 1 -

प्रवेश कर
-
[१३]
जुररुपहव्यमान प्रजों ददिदिहि ॥ गजुचंद ३४ १०॥
श्रय -अर्थात् हे कुमारिया! तुम ब्रह्मनय प्रत या पूर्णतया
पानग करय माग उपयोगी विद्याओंका सीन करपीच्चा-
नुमार श्रार अपनी पक्षा में उत्तम वर्ग का अपना पति चुों
और उ माथ २ श्राद पूर्व गृस्थाश्रम में
उत्तम प्रजा को उतारा। (२० मा० दे०६०)
(३) "ब्रह्मचर्येण न्यायुगगन विन्दते पनिम् ।
। श्राइन नह्मचर्यणाचा घाम जिगीषति ॥
(अयववेद कांड ११-१८ सूत्र ५)
अर्थात्-जप यह कन्या वलचर्याश्रम म पूण विद्या पद
चुर तब अागा युमायगा में पूर्ण युवा पुरुष का प्रपा पति
परे, इमा प्रकार पुरुषमा मुशाल धमात्मा पना क साथ स.
शना म विवाह करक दात परस्पर सुख दुख में महायशाग
हो। क्योंकि भाड्यान् शत् पशु भी जो पूर्ग जामा पर्यन्त
नामवयं अर्थात् मुनिगमग रमाना जाय ता अत्यन्त
मोरति जायों का जीन सना है।
(४) "नुसतार गरिंगका नौ प्रगच्छेत्र गतिम् ।
[गृह मनहे ना १७]
पर्व-प्रातुमती पन्या अगांगमा है गौर ऋतुश्यों में पश्चात
घिमाद करें।
(1) "पिता ऋतून् म्म पुयाश्च गणये दादित सुधी ।
(सकार काँतुमे पृष्ठ २११)
यनयान

[ १४ ॥
रे
अर्थ-युदिमाग गाना गिना म्वन्या क तुओं का गिने.
च मियाद यिधि तककन्या का घर में रखे।
(६) "विशाहन चतुर्था, गत्री 'गर्मायाग माह।
दक्षिा पासा उधमभिभृगेगाभिने
अर्ध-विधाहान्तर चतुर्थ विग घर दक्षिण हस्त स कन्या
गुह्य श्रग का गर्भाधान करे।
() एचनिशतता वर्षे पुगामातु, पोडशे ।
(धन्नार छन सुधु ते),
अर्थयुसर २४ घ फया १२ वर्ष म विवाह करे ।
(2) "पाशानद वन प्राप्त संशायास्तत् पिता सुनी।
(गविष्य पुषण)
अर्थ:-१६ वर्ष सक्षा का विवाद उसके
पूर्वक किया।
(b) "णि वर्षापयु दीक्षेत कुगायं ऋतुमता मनी । मनु० ।'
अर्थ कुमारी तुम्ती हान फे ३ घप पश्चात् यिह करे
इस समय तक पीछे जो अवतरण दिये गयेोहे "वात.
विवाह'ग करने के पक्ष में हैं।म प्रकार पर बचाधार्मिक
गरे पडे है। इस सियाय कह पौराणिक तथा ऐति-
धासिकपालो से भी बाल विवाह सिद्ध नहीं हाता।
(सक विरुद्ध यस्मृति, सवत स्मृति, सवत संहिता,
स्मति (कुल्लूम RA) शादि में नाम विवाद का समर्थन
है शिनु-सापानुपार हा स्मृतियों को रचना हुआ
पिता ने सुन
.

लजमें
करता है, और प्राज्ञाय भा उसा साल में याय होकर माना
जाता हैं उपक पश्चात् उनका उना महत्व ही रहता प्राज
मान स्मृनियों के अनुमार कार्य कहां किया जाता है। यदि
या महाता ता साम्प्रत समय तक स्मृतिया का सख्या १४
तक न पहुंच जाती।
भारत प्रमिद्ध वक्ता तगा बिहान शासी सन्यानी-
जिन्हों। कि अमेरिका तक में पदान्त की धाक जमात स्वामी
गमताथ जा मारत का भविष्य नामक अपर पक
अपने देश भाइयों को सम्बाधन करने इस प्रकार स्मृतियों क
विपय में लिगाते है।
"गिय देश माइयो ! याद रखिये, ये स्मृतिया और शामग
के लिये हैं आग लिय नहीं। सपत्र
नित्य ध्रुति का प्रचार काजिये किंतु स्मृति पो समय की श्रा.
वश्यक्ता के अनुसार पना लीजिये।म्मृति पर तुम्हारा पैतृक
श्राधिकार ( Heritage ) दाग कि स्मृति का तुम पर
श्रादि श्रादि ॥ अस्तु । (श्रा रामतार्थ प्रन्यायनी घर्ष ३ पड३
सदुपदश भाग १४)
इम छाटी सी गाटक की पुस्तक में इतना लम्बा वक्तव्य
प्रिय पाठकों को गीरस तथा रुचिकर प्रतीत
मित्र इमै मेरी श्राधिकार चेष्टा मोसमझे।
किन्तु यह जिस विषय का नाटक है उस विषय में कुछ
श्राप
।
.
हुधा होगा
सम्मय है कि

A । है प्रकाश डालने का नाम सवारण कर सना ही इम का मुख्य कारण है। इम वक्तव्य के लियो में Indian rear book 1929, मेमस रिपोर्ट, देश दर्शन, पुस्तक, मानयिक पत्र ट्रेक्ट आदि ममहायता ली गई है इसके लिय हम उनक प्रकाशमा पत्र ঘ্রার্থী জনগ্ন हिन्दी के सुप्रसिद्ध माप्ताहिक 'पीकपण मन्देश' के ता. फत्त के लम्पादक मराजको जिमा कि मेग यह तुच कृति पसन्द कर तथा निश्क्रिय पुरस्कार प्रदाग कर मेग उत्साह पढ़ाया। (२) तत्समय क. 'भा मन्देश' के तमाही प्र- बन्धक पय लेखकथा वाव जवाहिरलाल जी बत्रा जिन्होंने कि "प्रस्तुन गाटक को मूल कापी कष्ट उठाकर सम्पादक आफिम मे ढूंढ कर भेजा तथा समग समय पर मेरे पत्रों का उत्तर देते रहे को। (३) धायुत् दिनकर गङ्गाधर भी मारे बी० ए० उज्जैन जिन्ही कि मेग प्राथ।। स्वीकार कर इस नाटक को भूमिश लिखने की कृपा का को। (४) 'मोहग-प्रेस' हटाया के गयम्यापक मेरे जातीय धु-श्री चूडामणि जी नतुर्वदा सिहोर किफ दखकर मनायाग पूर्वक पुस्तक का छापकर "अला सयय में हो इस बा में देने का पष्ट उठाया को पव चे मित्र जो कि मेगस कृति का देख प्रकाशित करा का मुझे उत्माहित करते रहे, इसमय सज्जनों का का कृमनाके लिये हादिक धन्यवाद देना है नया नाश हूँ। . १

नाटक पात्रों के विषय में इारा सूचित घर दे। उचित
ममझता हूँ कि पात्रा का नागकरण सम्झार किमी का दिल
दुम्बा का नियत स किसा को लक्ष्यकर नहीं किया गया है
और घेराज मगज्य क अतिरित फिमी गज्य के
धामा हैं। यदि किसी का नाम पात्रों के गामा में म ही कोई
हाती व निज धारणा कर निरम न कर लें ।
"चोरे मामा-जता" '-फा यह प्रथम गुच्छ है। यह मेग
पहिलो कृति है और सब म पदिगा यह उस जगतपालक
जादाधार परम पिता परमेश्वर का सप्रेम-सादर अपंण
करता हूँ पर उस क हम प्रमाद को प्रेमा पाठक पाठिकानों
का मा ग्रहण करने की प्रार्थना करता हैं । "ज्या पाराक कद
तातरि याता, सुगिमन मुदित हादि पितु माता।" गोम्यागाजा
का इस उक्ति का अनुमार अच्छा बुग जैसा कुछ कृति है-श्राप
के कर कमलों में अर्पित है। यदि प्रेमाश्रय रूपी जन क द्वाग
आप सहदय सजाने इम लता का पाय रक्खा तो शान
ही इसमें कमा प्रमा (५श्रका नाटक पृ० स० बगैप १५०)
गायक द्वितीय गुच्छ के लगने की मम्गाया है। उस समय
श्रापक दर्शा को उलट उत्कठा है।
इस पुस्तक का सगधिकार रक्षित है, का महाशय छापो
थादि पाया। पूछ माहस ग घर।
ईश्वर समाइया का ऐसा सद्गुद्धि प्रदान करे जिम म
कि नाशकारा प्रचलित कुरीतियों का समूनाच्छदाक हेतु

. १८
कटिबद्ध हा सफलता प्राप्त पर पेपी सान्तरिक प्रा है।
यदि मर इस बाटे R नाटक म किमी का कुछ भी हित हुआ
मैं अपन परिश्रम का महल समझंगा। पुग मिलने का
प्राशा तिय विदा हाना हूँ।'मगलमय भगवान् मय का मगर
करें। शुभम् भूगाव।
.
| गाय-मातृ भाषा हिन्दी का एक तुच्च मेवर
..
लक्ष्मीनारायण क० चतुर्वेदी
मिन माह शुश्री ५
(शमतपनमा) चन्द्रयार
(गमपुग हो स्टेट नियामा
म्न०१६६६ ता० ३.२ ३.
हेडमास्टर 'श्री गादायत स्कूल'
हिन्दी अध्यापक 'श्रीगोदावत जैन गुरुकुल'
लक्षीमदग पोष्ट छोटा सादड़ी (मेवाड)
(Via Neemuck Cantt B. B &C. I RT )
.
.
-

इस नाटक के एक्टर्स (पात्र)
--
4
और माता
.
पुरुषः पात्र ( एक्टस
[१] माधवप्रसाद-जाधपुर का एक साताधिपति प्रसिद्धासेड
माहा का पिता
[२] माहा-माघरप्रमाद करापुत्र)
[३] गासयण वाद-लयपुर का प्रसिद्ध धनी: सठनमोहिनी
का पिना।
[४]सुरेशचन्द्र पा~मलमाधव प्रसाद का मित्रा
५] सुशातामगावात
१६] सुर्मातताना गुप्ता
[७] मज-डाटगामी प्रति उचाशना Mत एक अगरंज,
[0] छाटा डास्टर-मजासत्र (मातहम) एक देशी.डा.
[8] atm-R: गयण चन्द्र काकानामा
110]ीरालाल-सठ ारायणनन्द्र क मुगका पुत्र।।
स्त्री पात्र ( एक्टर्स)
[१] गाली 1-सठमाधगलादगी पनी।
[२] लगा-सठ नारायणचन्द्र की त्रा।
[३]माहिती-
" पुनी।
[४] धम्मा-माहितीसी सद्देनी ।।
[५] चमेलो-
मठ

मोहन-मोहिनी।

.
*धारि.
मोहन-मोहिनी।
अंक पहला दृश्य (परदा) पहला
स्थान नाटकको रगभूमि, ममय राति ८ बजे
( मगल कामनार्थ-नान्दी प्रार्थना )
(गाग-तज 27-)
तू मर्ता ! जगमता । दुम्बहत्ता दानार !
भारत दश नशा लग्न कांग्य आमर शान सुधार टेका
(अन्तग)-गाागे-फुगति, अति दु व दे रहीं।
द्रव्य, युद्ध, शक्ति शौर्य, हणार रहीं ।
पतग-द-उग्ररूप धार जन
सद्गुगा का हम कर का खा रहा ||
वरुणागार ! सुयश अपार ! 7 पाय पार !!
दयादष्टिकर शान द्रविन श्रा प्रभु ! शीघ्र सुधार ।'तूक्त्ताक
(सूत्रधार का प्रवेश)-सूत्रधार. -शहाप्राइम सम्य
नमाज का नारा हा मया की कोई.२ शिक्षामद
इप देवा का कट उलठा देख मेरा भी हृदय भागद की

* मोहन-मोहिनी
तरहों में सरदिन हो रहा है। हा ताई कौनमा प्रय
दिवाना चाहिये। [कुछ मोचर]i, air मष में प्रथम
प्यारी ठीको
बुला उपकी मीना शुग सम्मनि पूज। (गण्य,
की ओर देखकर)री'! या प्यागटी! जरा यहां मार का
भी तो कष्ट उठानी।
नर्स:-श्राइ प्राणनाथ पाई मेधा में उगमगन हुई (शुग वेषम
उपस्थित होहाथ जोड) दामी का क्या श्राज्ञा है!
सूत्रधार प्यारी ! (हाथ म-दिखाकर ) श्रागन्तुर महा
शासी भात काई उत्तम उपदश जनक दृश्य दमन सी
शशिताया है तुम्हारी सम्मान में इन्हें सोतसा दृश्य
बताना चाहिय १०
पाटी-गार्यपुन 'प्राणाधार ! मेरी इच्छा है कि ग्राज इन मो
दयों का “वात वाह फुगान विषयक माह मोहिनी"
नाटक का दृश्य बनलागा ही श्रेष्ठ है और यही समुचित
मा है क्योंकि माम्न ममय गइस दुष्टा कराति म देव
पा अधिक अक्षित भी हो रहा है।
सूत्रधार-[ स्मा1. प्रागावलमे ! अत्युत्तम-बान
टीक, वही करक बनता। विन्तु नाम इस सजग
মাঞ্জা খুজ শায্য নষ্মা বা নিথাখা ।
उसकी तैयारी कगमा शीघ्र ही तुम्हारी
उपमिगत होता है।
मटी- बाप माड, मस्तक मु] जो प्राज्ञा है।
प

* मोहा-मांदिनी गायम-मिज-म्ह कार जाम माया गांव का रम माय) राग उदयपुर मेवाड की गरया-धामा ठे। [याध ५ कार नृता सहित] तू सोच गाग्न! बाल श्रान्त ! दिगं मिज तोल । (बुद्धि में रिज ताल रे तू बुद्धि निज ताता) सुरीति सुधा पाकर, कुति-पिप ग घोल तू सोच० अन्तरा-दादा-देश, म्वजाति, ममात का, दोरहा हाल 17 जटिल समस्या हारही, हो कैने उरगाग ॥ सुधार को पसार, मजा समुभति ढाल ॥ तू सोचतात॥१॥ अन्तरा-(दादा) मी प्रेम हे सघटा, गहिं गिज तापलया। 'सदमी' मा है तन चनी, श्या हागा पवमा॥ तू शाम-दापयाल, जगदीशक्ती जय योना ॥ तू सोन ताळ ।। (नृत्य करते हुये धार धीर प्रस्थान) सूत्रगार-(सबों की श्रार दखबर ) ॥ गायन । श्रद्ग्दर्शी हैं, जा कर खोद फेरते। यशों का व्याद करते, शुगा शुभ ग देखते ॥ वे जिल्लते उठाते फंस, कुगनि पक में। दैनिय पाठक ! बही इस गाने के कग। (लग्यानुसार गाठस की जगह दर्शत का प्रयोग भी पिया जा साता है।) . ।

मांग-मोहिनी
.
(सूत्रधार का तानी यजानायकायक पदो बदन
मागे का दृश्य दिग्वाद देना, सुमधार का
भी गायब हाना।
(दृश्य पहला पूर्ण)
4
F
"मोहन-मोहिनी"
अंक पहला-दृश्य ( परद) दूसरा।
स्थान--जोधपुर में सठ माधवप्रसाद का अपती स्त्री
मालती पुत्र माहग के सहित अन्त पुर
फोन पर बैठे दिखाई देना।
मानाती--( मोहन को गांद में सो प्यार करते हुये ) माधव से-
प्रियतम पुत्र मोहन की अवम्या ७ वर्ष की हाग ।
অথ দু মিয়া স্কা প্লাৎ । যথা
अंग्ला दा।
माधव-प्यारी? माहाता आमी गिग बच्चा है अमी ने उसे
मिाह पनडे में डालने से हागि के अतिरिक्त नाम
-
धग्दता
कुर गा नहीं है।
-
मालना-लाम, लाभ प्रापका क्या चाहिये ? धन है दौलत है,
मौका है चापर हैं, दुकान है।होता है. बाग है जमाना
है, जाहा ई जाहा है, मोटर वाटर ग जाग क्या क्या
.
.

मोहा-मोदिजी *
प
मन का है। फिर भी आप नाम नाम फरमाते है
लापका स्या चाहिये? का किम पाती है।
माधर-अर्ग मुझे यह मय कुछ मालूग है, मम मा
क्या ? माहाका शमा व्याह की श्रावश्यकता नहीं है।
मालता-तो, म किम यान का पारश्यकता है।
माघर-मका इस समय विद्यारम्भ कगना, खुष पढामा,
लिवा, सदाचार पिम्बा, व्यायाम का शोक
दिनागा, ब्रह्मचर्या मरस्य यतलामा, पुष्ट यलिए बनाया
শীলা রাম কান্না ও গাঘ ভয় নাসা।
मानाती-(हनकर ) शर याह ! या मा श्रागन एम हा पहा !
पया उन पहा जिवावर नोकग कशामा है, मग्न
लिम्बा क्या खाडे में गाडवागा १ ब्रह्मचर्य मिाया
फ्या माधु मायाग ' मा प्याग पुत्र यदि यिगा ढे
हा दा दाया म धा लुटाया पर तो भी मा नादा
तक धाम यात! र चाकर जहां उपका पमा
गिर खूा गिरा तैयार रहते हैं। ऐसा स्थिति में
आप उमक शरीरको चिना गी 7 मा नाहिये।
'माधष-परे तुम अाज कैमा यात पाहा ? देश का दशा
तुम्हें मालूम नहीं । अाज हमाग कमजोग र कारण
“(गुहाँ हाग) हमारा यह घटिया उहाई जाता है,
कूर हाना है। धर्मग्राण देशनों का हाय हाना
शताओं का अपगार हाता है। फिर सप्तार igद्धि
1
.

-१ * मोहन-मोहिनी है यघन गार, विद्वान् शार बन्नग्राग का ही पदर दानी है। मूर्ष और গৃহান शाने मनुष्य और धग मी ही क्या वय पुन 'पाही रक्षा नहीं कर सकना । लक्ष्मीनो चञ्चला है उसका फणा ठिकागा' श्राज है पता नहीं ! क्या तुम धनगागों + मुले शालकों का दुर्दशा हाने नहीं देम्बी है, ऐमी यात क्यों मालती -I को 7 पानों में क्या करता है? वे सब जगके दुर्भाग्य की पान राघव-श्यों नहीं करना है? क्या तुम्हारे पुत्र मे भाग्य हो का ठेका ले रम्ना है? इमका का सुजूम है कि उनका भी दुर्दिनम पाला दी ग पढेगा किक व्यवहार भा तो देशमा चाहिये। पर यानोका साचा चाहिय । पारा पहिले पान बाधना चाहिय । किमी कवि हा भा है कि.. दोहा--जिन 7 पढाया पुरामो पितु महो अभाग । 'माहत वैठा बुध ममा ज्या हमा में काग और नि म मा कहा है कि-जिा माना गिताान प्रयो पुत्र का विद्वान नहीं पाया वे उमा शत्रु है”। मानी -दृश्य दैस उसका रक्षा करेगा। विद्वान और बला- घातपयका वही रक्षा करता माम-सुग, “अपर बात नहा जा हाना, उममी गदद करने गगनान् । परमुन्नाऽपेक्षा : गद्दी हाना ऐमा पाहते हैं

मादी-मागिी
छ
.
-
"
गिद्वान् ॥ १॥ var गा उमी की सहायता मरना है
जा अपना रक्षा करन की स्वय शक्ति गवना है। प्रशता
का यह गा माायक नहीं है। ससार में उनको ही
जीवित रहम का अधिकार है जा बलवान है। अशकों
माना इम ममार में जाधिन रहो तक का अधिकार
मही है। इसमें ममय रहन तुम्हें फिर चेनामा दमा
है कि अपने पुत्र पा र धनाये हुय पय मद्गुणों में
विभूपिन का का पूण प्रया का और
भविष्यत्
में काम दम वाग्ह यप सफनो उसके विचाहमा
गाम त मन मा । गहीं ना एक दिन पूर्ण पश्चानार
मा पडेगा। हाय मत छनामा रडगा पर फिर
गरनाय हान कहा जय चिपियाँ चुा गइ खन' कटायन
चरितार्थ होगा। ( उठ। चाहगा-मानता को हाथ
पाड पैठा)
मालनी-(प्रेम युक्त उम्र काटावकर, गले में हाथ डालाओं में
अश्रु भरपुर फहा) प्रिगतम ! मेरमा विवाह
पलिये पर छाटासा प्राथाकीतु श्रापान जारी
पहास का ऊटपटाग' यातला खीं। प्यार पाप
का मेरी यह प्राथमा ता स्वीकार जामा पहना।
चाहे भी ययों न हाजाय । कांग्य
प्यारे स्वापार
करिये। [रुदाकरगा:

८ * मादा-माहिगी - ध-आउछा! पहले यह ना बनलाया कि तुम्हें यह कुबुद्धि कम प्रोर क्यों न हुई! गलनी-एक ता अपनी जाति और गाल पहोम प्रेम विवाह दबकर मेरी भी इच्छा हुई कि उगर ममा मर प्यारे, श्राखो नारे, गामक भी एक छाटा मा रुमझुम मारना ध पाजाय ता उम सुन्दर जाडोका देख आँखें ठहा करू मिरे (चुप)। माधव-क्या ! चुप क्यों होगह १ कहा, दम क्या? मालती-दम ढलती उमर में, पर जनर, मनर तमा देवी-- देयता, प्रोझे-स्या7. दवा-दारू ताजिय-मजार, गार- पैगम्बर मुल्ना-मुर्शद गगय श्रगार, और यश-हुबग श्रादि श्रादि मत-सवा मागता लाल पाया है। मैने इपक लिये क्या २ नहीं किया? श्रापम अप क्या छिपाक ! मैंग सर लिये धर्म छाडा धर्म छाहा भोर बडग का विचार भी छाडा, पडा टाइम इम उम्र में एक पुत्र मिला, यदि विवाह क पाहले मैं मर गइ या श्राप ही का कुछ दागया-(जपान चबाकर -हार श्रागफ दुशमगा का- ना गा झाक करती घाटी मी यह देवन मरे मामी गम ह। में रह जायगा। भरत पर मेगान गाग होगा। इमाम पुग. विषय करता हूँ कि जरुर २ . पूजा-पाठ करकापक का स १ 7

* मोहा-mहिजो
पक पनका
.
स्थाबार परें। १२ वर्ष कितने देखे है !
गाग्वबर नहीं है।
माधय-बानता कि मेरा तुम्हारी पात मिल फुन्न मजूर ग की ता!।
मालता-(गल स हाथ हटा काध से 7 तर पर) ताता
मुझ अगा पार (नाक घर भेज दो और अगर
लाडकको लकर रहा । मेरे भाग्य में श्रा, ताजाय,
जहर जा कुल दागा-होकर रहेगा, तुम्हारा पता स!
श्रापको मुझम यया ! अाज स तुम 7 मरे और न म
तुम्हारी! [ उठना जान चाहा]
माधव-(दाप परड अप तरफ खींचकर प्यार स)-अरे
कहाँ घी ? जग पैडा ! सुतो! मग तुम्हारे पार
तुम्हारे पुत्र माफ लिया ही जननी यान कहीं उगम
अज्ञातावश तुम्हें एक नरुत्री । अस्तु । तुम्हाग
'इन्शनुमार का स इस विषय का प्रयत्न "ता है,
प्रय ध में लगता हूँ। जयपुर में मरे मिन एक सजाक
यदा एक यहुन ही सुन्दर पन्या है जितु वात कम
उमर में श्रमा उमका विवाह करने का उद्यत होगे या
नहीं इसका नाशका, हा तानमा सगाई
(मैंग71) हसदा । वियाह कुत्रदा याद होजायगा
मेगापिचार ता २४, २५ यप स कम की आयु में हम
का विवाह करने काही था पर जिस हालत में तुम
जिद, कलश और प्रशाति पर दी नारुहारही हात
-

मोहम-माहिती मुझ नी अनिच्छापूर्वत गजल स्वीकार करना पड़ता है। पर याद ग्शावा-इममा फला बुरा होगा। उसममय पाश्चात्ताप.कगंगा और मग बात याद फगगी। सैर तुम्हाग और माहाका भाग्य ? मालता-(प्रमादा त्राबाटाक्षा) अहाहा! प्या? पाजा प्रापन इम दामा काबिनता भोकार की भागका धन्यः है। माधव का कुछ उत्तर न दे. उदासाठ) ( पटाक्षेप) (( अङ्क पहला, दृश्य दूभरा पूर्ण.), -- "मोहन-मोहिनी ११. (पङ्क पहला, दृश्यः तीसरा) स्थान में माधवचन्द्र का बैठता-धीच म मेश उसक आसपाम कुर्सियां स्त्री हैं सटजी माहग केलहित बैंठ है, दि। क ५ बजे। माघच-(म्ला भायम स्वगत) हाय ! क्या फल और क्या माका ! उधर साफ हठ का विचार और इधर पुत्र फे मायय-सीमा सुशारएका ध्यान । "मर गति सांग उदर कम हे प्रमु! बल दा ! कत्र्तव्य पर दृढ रहना की कि प्रदायावर समय-

* मादा-गाहित
हाता है ?
मादा-(पार म) पयोगिता की। व्याह क्या
क्यों करते ( करत) हैं। मेला व्याह के लिये माता जो
कल क्या नातायी। यह क्या होना है। जिसकाइन
से लोह। औल आप क्या याद नहे थ पढगा, बुद्धि
कलत' [काळ, सकाछ]
माधय-( चौंककर ), दुखि हा नेत्रों में अथ भर-क्या
माहन क्या पूछा
मोहन-( देवकर कुछन्डर कर ) अता- पिता जाग मेगा बाबू जा।
श्राप तालाते है। नानाज हागय ? श्रम मा नहीं
पूछ गा पाबूजी। [प्यार स निपट जाना]
माधव-गही सल्ला । मेर प्यारे मुन्न । में तुझस नाराज पयों
दारा लगा? तरे प्रशॉ.का उत्तर थाहा टर में मेरे
inो द्वारा मिलगा। पडित जी आयगे। पहलवान
पायगे। तुम्हारे मामा जो प्रायगे । सय अभी पान
हा हांग।
मोहा-मामा जी मेले लिये। क्या नायगे ? मतमात्रा माजी
क्या लायगे?
माधा-जा कुछ व नायगे सो देख लेगा, तू ले लेना।
माहा-क्यों
मायू जी ! श्राजभा सा छरको मिथाइ खिला-
आगे? क्या गाय () है? प्रसन्न का।
गाउय-क्या तुम गा मिठा खानागे पेटा तुमः मिठाई,
मिठाइ सागा पसन्द करते दा?
-

।
-
हे
J
* मोह-मोहिनी
मोहन-नहीं पिता जा। मिठाइ प्याने ना लोग होता है ?
तुमा ता उन्म दिा कहते थे न १ में मिठाइ नहीं खामगा
माधव-थाहा खाने स तो नहीं हाता घंटा बहुत बहुत माने
दाता
गोहा-(कदकर हमकर ) अच्छा अच्छा 'थोली धोनी
(पहिन सुरेशचन्द्र पाठक, सुशीलासा पहलवान,
सुमनिलाल गुप्त या प्रवेश)
मा प्रागन्तुक (हाय पठा मस्तक नया ) सेठ साहेन।
अभियादा ।
सठ माधo-(नष्ठे हो, फरजाड प्रेमा मुख से) श्राइये।
श्राऽये । पधारिये। इधर बैठिये । (कुर्मियों को भार
इशारा करना) [बघता गथा रूगा बैठा]
'पडितजी-कहिये सेठ माहम भागका
स्वास्थ्य तो हाफ है।
श्रज स्मरण करा का कैसे कशा की?
सुशील से०-( हँसकर ) अरे भाइ यु मिठाई विठाई वा
। सम्राम दागे वाला दागा।
मुमतिजाल-अरे गा तुम्हें कार किसी कारण से ही क्यों न
। ।बुलाये, तुम तो उसके गहा मिठाई.सागका गिश्चय
करम ही जागा रा [ हास्य ],
सेठमाघन+प्राग लागास क्या मिठाइ दुर है। मगाऊ ?
नौकर को पुकारगा]
मोहा-(हमार) मिलाई प्राा छ तो लोग (रोग) होता है
।
-

*मोहा-मांदिगी
-
--
.
म चाप! क्या छ [स] है ग-गाम जा!
(मागा)
सुमतिलान-( हमार) अयश्य होगा दे माग ।
माइग-सा ये गिधाई मगरको क्या करना है मामजी?
सुमतिनाला ये ता रागी हागा चाहते हैं माहग । तुम गी
बहुत
मत माया फगे, में भी नहीं खाए।
मादन-बागा होगा चाहते है, अल बाम खाम | अन्धा में भी
नहीं खामगा।
५० सुरेशचन्द्र -अर. गाई, सेठ जी मेरे रश या तो उत्तर
दोहानहीं पाये औरतुगधीच में ही 'दाना भात में
मुपपचन्द' हागर द गडे । हां, सठ साहब पर.
गाये। अाज हीनता पात ..
सेठ माधo-सुनिय माइक । नाप मेरे अन्तरग मिनई सुमति-
नाम जी मेरे लाले शेन दुधे गी एक सच्चे हितैषी
दास्त स कम नहीं है। पदयात साहेब ता मेरे भाई
के समाग दी है। जब कमी कोइ जटिल समस्या पा
पहता है, उस माय श्राप सजगी की गुग सम्मति
। आवश्यक हो जाया करती है। ऐमा स्थिति में ही
पाप-नोगों का कष्ट देना पडा है। का स सुमन
ताजा जाय। दिन मोदाका विवाह अभी कर दे।
का ६४ पक रहा है। मेज गतिनुसार इस यदुत
छ सगझा चुक्ता पर गहीं मारती, आप सरला
?
1

३४
* मोहा-मोहिनी
4
-
अच्छी तरह सोच समझकर भाई ऐमा यात्र का
माग दूद निजातिय कि जिसस नातो 'माप मरेनौर
लाठा हा दृटे'।
सुशांतसेन पहलवान-श्राप तो मोहन का गुरकुना' या 'ऋषि
कुत' में प्रवेश करवा द जय ताकि आपका
उद्देश्य अनायामाही सिद्ध हा जार।
सुगतिलान-इ.1 तुम मेरी बहिन क्त स्वभाव नहीं जानत हो,
इस कारण ऐना रहते हो।चद माझा का अपना
पाम सफदापि अलग न होने देगा।
सुरेशबद्र पाठक-गाइ ! तब ता मेरी मम्मत यह है-कि-
'उनको हट का कारण सगाई (वाक्दान) की
रस्म ता अछ माह पश्चात् ही- पूरी फारवादी
साव और घिमाह साडी वाले को समझा
बुझाकर जितने वर्ष-रुकता सम्भव हो हावा'
दिया जाये, इस कार्य म सुमतिचन्द्र जी भी
पूर्ण प्रयत कर अपना बहिग को समझाते
बुझाने रहें और विवाद की राम
का लक्ष्य
भ्यान में रख को शांत करते रहे। सारांश:
समय समयपर कार्यशाघ्र ग्मेसे घर पन्छा
नहीं मिलता । नादि शोक कारणा का दिग्द
शाका मतुष्ट रखें। इस अवधि में अपना
गिलकर 'मोहन' को जित भी योग्य
.
सब

** मोह-माहिना *
उनस
4 सके उस या शीघ्र ही शुरू करदें।
प्राग इश्वर मामिक है।
सुमतिलाल अापका मानि उत्तम है। इसका अतिरिक मुझे
मा अन्य कोई माग दृष्टिगाचर नहीं होता। में भी
आपका नव प्रकार की सम्मति मागग वा उद्यत है।।
माहा-पावूजा !'मला ग्राना ना आफ्ग औत पिछा 7भा
कुछ उत्तलाहीं दिया।
माधर-firयपुत्र कला स मेरे मित्र ये पंडिना जा तुम्हें विद्या
पढ़ासा प्रारम्भ कगवेग । तुम्हें पेम होगमों का उत्तर
भी ता माना है |इम कारगाम हा पा
मा अच्छे २ उपदश और यातं र तुम्हें बतलायेंगे खूया
भ्याग स सीखामाखागांग।
माहेमामागे 71 (उच्चारण ) क्या नागा।
सुशालसग में तुम्हें मब प्रकार का व्यायाम मिवातको तैयार
हूँ सीगोग 7 मादा (हाथ वगैरह स डड बैठक
मा नकजना)
माहा व्यायाम क्या ! पचरत ? (खुश हार), जलर
छाकूगा । मैं भी पहना यनूगा पहलाया?
गधिव-ौर मुझम तथा आपने मामा जी से क्या सीमागे
tiệt ?
-माइग-प्रापम छींकूगा पये गिनमा धनायायाहगा (मयों
मन्दार)

* मोहन-मादिनी *
माग
-
अच्छी तरह सोच साझा कर माइ मा बीच का
निकालिये कि जिसस नातो सांग मरे और
लाठा हा हर।
सुशानसेन पहलवान-श्राप तो मोहन का 'गुरुकना' या "ऋषि
कुल' में प्रवेशा करवा दीजिय ताकि श्रापका
उहश्या अनायामाही सिद्ध हो जाय ।
सुगतिलान-गई, तुम मेरी यहिन क्त स्वभाव नहीं जानत हो,
इस कारण ऐना कहते हा वह माहग कार अग
पाम संपादापि अलग न होने दगा।
सुरेशचन्द्र पाठक-गा! तब तो मेरी मम्माश
'उसके हठ का कारण लगाई (वाक्दान) की
रस्म ता कुछ माह पश्चात् ही- पूरी करवादी
शाचे शोर विवाह लड़की वाले को समझा
बुमा कर जितने वर्ष-रुकता सम्भव हो साया
दिया जाये, इस कार्य में सुमतिचन्द्र जी भी
पूण प्रयत कर अपना वहिग को समझाने
बुझाते रहें और विधाद की रोक का साक्षय
ज्यान में रग्ब उनको शांत करत रह। सारांश
समय
समयपर कार्यशाघ्राफरमे घर पच्छा
नहीं मिलता। शादिशा कारणों का दिग्द
शी का सतुष्ट रखें। इस अवधि में अपना
सब मिलकर 'मोहन' को जितना भी योग्य
t
..

समीक्षा-माहि
.
.
पना मर्के उमका या शीघ्र ही शुरू करदें।।
शागा वा मालिक है।
सुगतिमान-पापा समाति उत्तम है । इसके अतिरिक्त मुझे
मा श्रम्प मोर माग दृष्टिगाचर नहीं ह। में मी
आपपा मव प्रकार की समाति गागग पा उद्यत ।।
मादा-पाबूजी 'मला रातो का तापापग श्रोत कि छा नभा
कुछ उत्तल नहीं दिया।
मायय-मियपुर ! म मेर मित्र ये पंडित जी तुम्हें विद्या
पढामा प्रारम्ग करायेंगे। तुम्हें एम हा प्रश्नों का उत्तर
गीता मात्रा 11म काग्गा वैम हा या उनसे
मा अच्छ२ उपदश श्रीरयातं न तुम्हें बततायेंगे खूमा
भ्याग स मानगामाखानीगा
नाहायोगे गा (उच्चारण ) क्या नागा ।।
सुशालसा में तुम्हें सब प्रकार का व्यायाम मिवानको दैयार
हूँ सीस्योग 1 माह हाय वगैह स डड बैठक
मानकलापमा)
माहत व्यायाम क्या! पचग्न ?' (खुशोर, जकर
छामगा। मैं गा पहावा यनगा पहलयात?
गांधय-शोर मुझमे तथा अपने मामा जी स. क्या सीमागे.
गावा?
माहग-अ
-श्रापमाछीगा कपये मिगणा-यन पायन हपगा (मयों
मन्हास्थ)
,
t
1

* मोहन-माहिती * ? r माधव-अच्छा वही साम्बराय तुम्हें नीर मा धर दबाग को वहा २ बात समझाया मोहन-मे वों का पमा मारा छे छोगा बाजी ? . सुरेशचन्द्र-प्रेटा तुम्हें मब धार २ पफ एक बात ही अचड़ी तरह समझाकर मिनायग । तुम्हे कुल गान अल- रगा। तुम खुद ही शोकनमीबाग। फिर तुम पहुन पटुन अच्छवा जापागे। मोदन-(प्रसर हा फूटता हुना) नब ता बहुत अच्छा पडिर जी खूप पढ़ गा लिल गालीग ( माधव का सर्वा का कुछ जलपा'T III-IIT सुगार्ग से सम्मान करना और माँ का धन्यवाद दे। नमा पर प्रस्थान) [पक्षा] (अङ्क पहला, दृश्य तीमरा, पूर्ण ) 1 - ܝܐ 2 'मोहन-मोहिनी' . [ प्र क दूसरा, दृश्ण पहला ] स्थान-जयपुर-मट गयणचन्द्र पोर या पीका [ना अलपुर में 3 दिखा देना! मोहगी-(प्रवेश पर)-al प्रमा! भारती मेली गुदिया का गर्दा तूतर म या गला गई, उसे {शवाद। A 1 1 re 1% माह-माहित Viti तू जा 1 " . । लगी-ता, देजा बेटा ? में उसका गर्दा जाहार उस जिला गुदिया ये रमाया। माहगा-अन्ना जाता है। 32 लिय मा माछाइ पगातो हूँ फिल उछे बिताता है। गयगाचद्र-पया मुनी, विदृ हमें नहीं विलायेगी? माहिना-पाबूजी। घाग्छा. ता गुद्द गुदा १ लिये योगी। उच्छे श्रापमा पेन गात हा भला । अचछा जाती है। टना आता है । ( नका हमारा माहिता का प्रयाग) गाग०-प्रिय श्राज जाधपुर न मेरे मित्र माधवप्रसाद का पत्र माया है। साट मा-या के घर पर प्रपा नी ? कुंअर जी की पढाई श्रादि का कुल मध पिया है या नहीं। নাoি-যন্ত গাছ তাঁ7 বৰ দুৰু বিয়া ৫ ফির কী स्खा पुत्र का वियाह शाघ्र ही परमो की अगी स मिद मारहा । इसम अनुगा हाता है कि उनके वे शुभ वि. चार और यहा प्रामाक्षाय पूण गह। पायगी। उगो मगा उगका धर्मरामा यदि मममदार हाती तो पिता अच्छा ािता । सादगा-माना और सुगन्ध होता। प्रियनम! मोहिंगों का मा पढा निया नया गृपये में निपुण कर प्रादर्भ र पाम्य पादेश चाहियो नारा० मे पहिलो सहोस पिचार अब उसमीन ३ . । - --

मोहन-माहिती
--
ही कार्य रूपम नाम गा, पूर्ण प्रगम का गा देना
उगा यह पत्र है। गा1 स सुगे।
*श्रीहरि *
मु०साधन
ता० १२-६-२३ ई०
श्रीयुत् मागीय सफा गुणालान सम्माहेछ ।
नारायणचन्द्र ना मा० जयपुर की पवित्र नवा में
परम जिधर ! मनेम साटर जुहार-अभिवादन
से यहा पर उस जगत्गालक जगदाधार पर गिता पर.
मेश्वरक कृपा कटाक्षापब शाफ अनुग्रह म साट्रम्न मागग्द
#। স্বাহাই স্কি ॥ মা মুলা । অৰুণা ও গদম্বনা
पूर्वक होंगे। पारो ममाचार यह कि "से चि० मोहा
फा माता अपने प्रयाध पुत्र का अशी विवाह का दगे की
मुखतावश हठ कर रही है। घार मनश को नकर उतारू
हा रही हैं। मेरे विचार ता शाप सागनती है। मेग नाविक
इच्छा यह है कि मोहन का विद्या सपा युगवस्था में हाये
मैं उमका साझाने में कोई मान उठान ग्खा किन्तु यह
अपनी पान पर पडी हुई है। उसका मार भी उनमा
समझाने का पूर्ण प्रयत पर गहा है। श्राएका सूचित करता हूँ
कि यदि किमी प्रकार की असुविधा होता जि17 शाघ्र ही
सा पाप सगाई की रस्म अदा करदें और faar क लिय
जिनगा विलम्ब पागा माघE करत रh-IIIE को भी
योग्य बनाने की चेष्टा परे । पिलम्बी यह बाल अधिा दिन
-
-
।

*मोहन गोहिगो*
.
म चोगी ता भी मुझे विश्वास है कि जिता फुध पिसम्म
धागा, गाहग के हक में हितकर ही होगा।
गत् गुरुगर द्वितीया पुल गक्षत्र के दिन मे गोहा या
विद्यारम ससार परा दिया है। व्यायाम आदि का भी
समुचित प्रध शिया गया है। नागे इश्वर मालिक है।
सदै कृपा ध प्रेम गाय रहिये । कुशल पत्र दे वाधित करते
-रहिये। शेष शुभम् ।
गवदीय-प्राति गाजा-
माधवप्रसाद
लादमी-दा ! देखिये, पर मे कैसी परवशता झाकती है ? घर,
यहप्पा और नोकिक व्यापार स भा ता डरना
पड़ता है।
ना० च०-इस विषय में तुम्हारी क्या राय है?
जद-जय श्रागा माहिती का सम्बन्ध मोदन के साथ दी
करना निश्चित कर लिया है ई-जाना जा कि आपमें
Inी है-अचग मी दे दिया है तब वे चाहे जय
विधाद पयों करें। फिलहाल की गय के अतुमार
६. सगाई कर दो मंगामाई दाग नहीं है। उसी
पात मी रह जायगा और तमुका मार जायगा।
गा०च०-अरे इस उमर में! मोहिगा तो अगी ६साली
ही है?
साक्ष्मी-अशी विधाइ थोडे ही कर रहे हैं। और यह६ सालयो

मौ7-गाहिती
और मिना श्रादि बीगङ्गामा क समाा सन्ता
उत्पन्न ह7 1 स्वांग देवगा ता मागा पालाश
पुसुम (नारे) नाडाका समाग अपराव है। क्यों
जदगी-माझा मायाय सममी। ( उदामा) अशक्त
मूख मन्ताग ना गारन-भू-वी मार होगा । जय यह
यह रक्षा र मकगीता अपनी यह वेरिया और
बाम गरिजनों की क्या खाक रक्षा करगा। हे इश्वर !
(निजाम)
गा० ०-शार में प्राथना है कि वह हम मया को सबुद्धि
प्रदान करे। अन्धविश्व मका शीघ्र नाश।
लक्षाको क्या उन गय गानगे? सगाई की रस्म इसीमाद
में गका करेंगे।
गा० च०-हो, पत उन लिये पर और मनुष्य भेगा।
गजग
(पटाक्ष)
(भक दूना दृश्य पहना पूर्ण)
.
.

*मोह-माहिती * .
४३
१
प्रशमा कामगा
मोहन-मोहिनी.
भ या इमरा-दृश्य दूभरा। .
[स्थाग माधवप्रसाद का सजा बैठखाना माधवप्रमाद,
माहग, 'सुग्शचत, सुशासन, सुमतिलाना वा बेठ
दिखाई देगा] मगय दिन ४ गजे
रिद्यायपं याद ।
गाधर-(सुशचन्द्रमा पार देखकर ) पडिन जी महाराज !
माग भी द. व्यायाम उपदेश शादि का क्या हाल है
पाहतजी-माहिष ? माइन मग शिष्य है। नीति .
मार मी पम्मुम्ब नमाकी
है। किंतु जय मापने पूछा है ना कहना हा
"माहा फर लडकों में एक हाई पढोग लिम्ब7 म,
यि में व्यायाम म साम्य पयं मद्गुणा म युन है।
। 'वार्य क प्रभार माशगर की कान्ति मा मदा' लुल्य
पाय है। यदि मा प्रार मान पर प्रापमा पुग
साक्ष्य रहा, ना माहग प्रतिभाशाला मार और पाहताय
व्याक्त होगा। दाम गियु करें।"
गाना-पंडित जमा श्रेग श्राप पर मनाया
जिम कारंगा मान समयानों में मात हा का है।
सुशीममा मठजा सानिय ! पपा मचा श्रेय ना En
प्रापमा दना चाहिये शिजा पांच २ वर्ष स घर मम
पाना है

माहरा-मोदिनी
-
याद गाइने ह ना जागिंदा को माये गृहकलह गार है।'
दास पार स तं प्रारहा है। पता करन में ही गत्यनर
है। जो भाग्या गामा देखा जायमा
सुमारलत-जब ऐसा ही है तो कर दीजियगा । झमट मिटेगी
पेलाही ता मुलाया (द्विगमी, गोगा ) दा चार
साल बाद पड़ेंगे। और गोडनकी शिक्षा-सुधारादि कार
कार्य इमा गकार शुरू ग्खेंगे।
'सुरेशचन्हां, सह विचार उनगा उपयुक्त तानहीं है जित
कि हा चाहिय किन्तु इम- परिस्थितः में किसी पदर
उस है।
साधन-ठाक दो या ना भाइ गरता क्यानबरता।'
गौपार का प्रवेश) -
नौकर-सेठ साहेब ? जयपुर स एक गाई और एकार ब्राह्मण
पेन दा समाये ।
माधव-अजा, यहा पर ही उन्हें लिया जायो।
नोकर बहुत अच्छा हुजूर, (नीकर का प्रस्था)
माधा-हा जिस्म बात की श्रमाचर्चा हो रहा था और जिस
को श्राशायी चही बात मामने आई।
(इतने में दीका नौकर के साथ प्रश).
ब्राह्मण-सठ जी ? भाशा गोइ-जय राम की शाब?'
(ब्राह्मण वा सहर्जी का पनादेश),
माधव-(दानी काशादा स रकार)तया गारोपण
२
।

* मोहन-नाहिनी
।
चन्द्र की पुशलमाल पूछकुयात वरमका पश्चात् ।
(मोकर मा) य दामादुर स श्राय है । था हुये हैं । इसक
लिये ठहरा, माजग आदि का समुचित प्रबन्ध परा।
(नौर का दोगों क साथ जागा)
(माँ को ना कर) नोभाई १ जिमची पाशका थी
घटा हुश्रा ।तगुग श्रागई है। व-माघ शुमा ५ का हा विवाह
निश्चित कर चुर है । अथ कापस का यात नहीं।
सय- कुछ उदास हा) सह-माहेय क्या किया जाय । हमें
इस बात का हार्दिक म्वेद है। शव ता 'हा है, वही जा
गम रवि नगला, पो पर तर्क बढानही शाबा'। पर ही
निभर होना पड़ता है। भारताधेय धारण कर विवाह
पर हाडानिये । ईश्वर-सयकुछ अच्छा ही करेगा। अच्छा
शाज्ञा
माघर-सपको प्रणाम कर कि पधारिया
(.समों का प्रस्थान)
( द्वापीन)
।
।.

है
* माहा-माहिनी
"मोहन-मोहिनी". ।।
X
--
(अङ्क दूसरा, दृश्य
तीमरा)
स्था7-जोधपुर == (मट माधनप्रसादक जनामा मरे
में माधम, मामाता दागों का परसार पाते
भारत दिसा दगा )
गोधध-प्रिये । श्रर ता तुम्हारे गाहम का घियाद होगया।
तुन्हाग इच्छा प अनुमार छुमछुम करता घट मोग क
लिय मोदि। भागद ! अब ता तुम्हें सन्ताप, शांति और
অনিৰ নিৰ।।
art-(मन कटाक्ष पर ममा हा गले मेहाराद्वाता') 'हम
घर-हा, वामिन् ! आपन एक मेग हादिक इच्छा को पूरी
की अप तो एक दमरा इच्छा जा इश्वर पूलरदाता मुख
सभर । यह इमरी इच्छा है माहा फ पुत्र का मुह
देणा।
साधध- हमकर ] तुम्हारी यह इच्छा भी इश्वर पूर्ण करेगा
ही। [ता स] 1हीं ता तुमता सुमना 'पुत्र प्राप्त करा
६ पद माधनों में गा पारगत हो चुकी हो। ईश्वर की
'सहायता पा सम्भवत श्रावश्यक्ता ग पडेगी।
मारता-(एछ झगकर) यान पदा-गो, रुपा कर विवाद का
पुछ दाज ता सुयाय (पत्ति के मुह का भार देख कर
३
।

मोदग-मोहिनी *
प्राधय स) अरे! पाए प्रदान क्या हैं? शरीर ता ठाक
शुरू से ही
.
.
माघ-शुगर को क्या होता है ? विवाह
अमगखों का मामगा फग्गा पडा है। मेग हदय तभी से
धक्या कर रहा है। उग अशवगों का विकार कर चिस
सदैव सशकिन रहता है । भद्रप्ट में और भीग जाने क्या
क्या दाबा यदा है। (गि.श्वास डालगा)
'मामती-(मचिन्त हो ) वे प्रमहल और अपशकुग कौर कोर
म है? कृपया कुछ तो सुसाश्य ।
माघ-सा, एकता जय यहा स रात रवामा हुर, गार्ग में
की भयकर कृष्ण सप पाहा फिर रास्ता काद गया,
'हमर जयपुर में घुसते ही सूनी वाडयां सामने आइ ।
तीमर दरवाजे में घुमते हा राम नाम सत्य है व चाप के
i, महित एक मनुष्य पर मिला, चौथे विवाह श्रा-
मरमान व मम्नक गर मोर' पाँधते समय सामा
' को छीक हुइ । पीर पाचधे म्यण, वस्तुयें गुम हुइ !
माननी 1-हा ये बाते अश्य ही मग का पेक्षित करने वाली
गेगवान् रक्षक है। हाँ, स्वर्ण का चार्ज कैम गुम टुइ.
माध्य-गोहा ये हागम एता पांच हजार की हारा जडी
अंगूठी कहीं गिर गई। दूपरे १० हजार की
गा 'गोहा' से कार ठगल गया । इमस अतिरिक्त यिनाद
.
-
।
-
पग पराठा

** माहन-मोहिनी *
-
1
निद्रा
मैं लगभग १० दनार रुपय खर्च हुये ला प्रता। व्यापार
में भा फल गडबडी नपर आती है।
मालता-माहान दोनों चीज कैम वादी।
गाधर-अगूठा क विषय म ता में पहिल ही
बच्चाहता है, गुनी स गित कर कहीं गिर
फराठा काई मनुष्य नेर नाम से मांगकर कि तुम्हारे पिता
जा मगबात है, लेगया। मोदन श्रद्ध निद्रित अरस्था गं.
हाने का कारण उसठीक २न , पहिचान सा मादा
पहता है कि यह मनुष्य उनका मामा वा भण्ठाल गयाहै
था सा उस अच्छी तरह नहीं पहचाग सका।
नागा जाता नहीं मालूम हात थे पर वह गनुष्य उगक
समाग हा अवश्य था। उमनी पानी मा कुछ मामा जा
सही मिलता जुग्नता था।
मालती- सिर पाट गेकर ) हाय । यद्द का बहुत बड़ा हाग'
हुइ । उनका नाश हा । मेर भाई-का यह काम हर्गिज नहीं
घा सकता। यह ता जयपुर का पिता गुण्डे
काम है। जयपुर क ठरा प्रसिद्ध हात ई।
माधव-गुडे का क्या काम है, यह सब हमारे भाग्य का फेर
र दिन का प्रारमा है।
माताना-क्या उसका मरकार ने भी कुछ पता नहीं लगाया।
गाव-परमार में इत्तिना करीम जाग
भजन विगहता, श्राफत शाती ला
भागदी। इस
1
शिम विस की
--

महा-माहिनी
मिया चार गना लगाया लिय भाडे ही नारी करता है।
इ7 मापातामा साना विचार मनमार दिल मसात रइ
गया।
१
मालनी-( बात'पदमा निश्वामा डात ) खेर, निनाद फेरे,
गान-पान, भादर-सतार आदि का हाल भा तो
फामाये.
माधय-दा-सामना यणालि अच्छा ही हुशाशनी
जातिगातारवाजा गागाल ता प्रसिद्ध दा है। काई
विरोपमा नहीं था, हा फे( भावर)। कुछ दृश्य भरण
-
गावाना--हा हा फरमाया। मुझे मी. सुा की इच्छा है ।।
(प्रम दाना ),
माघ-जिलासमयापुरोहिताजा विवाह का श्रय विधियां
सपटहे थे, म माय मादा-गादि की जाह। श्रार
सन्द स निद्रा देना का गोद में विश्राम ल, उसक भूत में।
भृग रहा था। उन्हें क्या मालुस था fr"श्रास हमारा
पारस्परिक निरजावाका सम्बन्ध स्थिर हा रहा है। एक
दुमरे सुम्न-दु प.फ चिरम्यादया रहे हैं। पुरातिमा
गाना दल्दा दुलदिन, उपक माता पिता सय प्रति-
निधि सजा पडम 1जाचिदिक मन्त्र, दुल्हा, दुजागि,
उर माता पिता मायाजा-उरा अवसर पर प्रत्या-
श्या है, गत पुष शास्फुद शुद्ध पाठ ये सयादा पर

પૂર * महामालिनी স্ত্রী ও মা মম’ হল স্কা ওয়ায কথা । पत्तव्य का इतिश्री' कार रहे थ। गाण उनक हत्ता, पत्त विधाता सब कुछ हो। गावाती-हा फेरा माहात हिय ? माधव-पुगहित जीन जिम ममय 'माहग-माहिती' का मबा धग पर कहा कि "उठा सप्तादा' क लिय तयार पाश्रा उस समय माहिती तो घयगर गिर गई। दोगा चौंक पड़े। फिर श्रद्धमिदिन शवम्याम ही माग न पाडन it से पाहा, 'महाराज! 'मतपदा'! सान पान चाली की तैयार कैसा हमें उमस क्या है ?) पुहित जी हमर यहाजी पर माइ। मतपदा का अर्थ सात पर बाली बी तयारी की। मप्तपदीप अर्ध 'फेग है फंग) मोहन न उसी धित मैं फिर कहा-हीं महागज में 'पेरा' की तैयारी नहीं चाहना मुझे पेग खाने का शोक बिनकुल नहीं है यह प्रात्तर सुा हँमा लागे । नाराय- राष्ट्र विधि भी पुगंहित जी ने शिमी कदर (Par ) पूर्ण - गाजता-( खूर हसर) माह ! यह ना ग्बूव हार रही। माधव-(उदामा (प्याग गह यहार और हमाका विपय नहीं है। यह कपल इम पवित्र देश भारत में गारे अपना और होगा भूमिका का एक थाहा (लाटा का

*मोहग-माहिमो
५३
-
ITT
।
३
मा भगाया.(दृश्य ) है। यान-विवाह में
ऐमा हा स्वाभाविक है। हमारे पना की यह चाम
सदा शोर युगनि कामागाक-दृश्य है। देखें
भागे क्या क्या दग्ना शेष है। हा, (तिभ्यास ) अस्तु
प्रय गात्र अधिक गह माहिय।
मालती-जा आज्ञा
(पराग) ड्रागसी।
( मज दूमरा, दृश्य तीमरी पूर्ण )
"मोहन-मोहिनी"
'पक तीनरा-दृश्य पहला)
रूप-जयपुर में सठ नारायणचन्द्र का जीपाग,
उमा सुन्दर २० वर्ष की महिला श्रेष्ठ यन्त्र
भूषण पग्धिा दिय अपनी धूम रहा है।
समय विवाह ५ वर्ष य पश्चात् ।
सायनान ५ बज फ
खगमग
माहिगा-( म्रगर श्रम्फुट अधक्षिका कलियों पर बैठ डा
था गमपान र पुन र म उहत ये
देख उसको
सदर का) अरे, स्वार्थी ! तू पिता गीच है."
शिप
पला का रस चन्न कर तुरता उसका त्याग कर देता
१

y४
* मोहन-मोहिनी
पर तू
है। बाथम पित्तना अघि हारहा है। कार्य सिद्ध का चुम्म
उसे फटी अग्विस भी नहीं दग्वता। 'प्रेग मिम
कहते हैं ? या नातू जागता ही नहीं। माह में फॅप रहा
ক্ষমা जाने ? हा, तू मा है तो पुरुप जानिसान?
फिर लग गौर तुमग अम्मर क्यों होगा 'हा, पुरुष
तो प्राय मय हा ऐमहान है। (यह सारी यह एक
श्रान वृक्ष र सुन्दर पुलियत एक माधया साना का दख
[लिपटा हुइ। उसके पास जा उमर ) प्याग दिय
जनिक! मुझमे तू लाम्य दर्जे श्रेष्ठ है जा धृष, धपा शान
पब माय भागे यारे-प्रिय गति ६ गत में गाय हिया
डाल मुदिन मा सटैग में खड़ी रहता है। साथ ही
तेरे हृदय धन प्यारेका प्रेम भी गरम पशमनीय है
श्रपा प्यार में पवित्र श्रम में अनिश श्राद्ध रहन है।
चिलग होना तो माना जानते ही नहीं। अE ! म तय
प्रेम को धन्य है। मेग विवाह हुये पाँच वर्ष होगये-एक
तो माग पारस्परिक व्यवारिक प्रेम मसन्ध्र है योग
एक गफा ! मेरी समझ में हम मनुष्यों मता का नी,
धन हो सकता है । हे ईश्वर । यदि तू इसा यानि में जन्म
देना ना मेग फैमा श्रमामाग्य होता। हे शुग जोडा!
तुझे धन्य है । ( नत्रों म अश्च पात होना) [इन में -
गधुर राठ से गाया का श्रगे लिखा था शाह
। देगा।
जा
।
.
.

*महा-मोहिनी * नव्याalोला चाहेन योला, दिन म फिदा है'टेका अन्तरा--में तरी गली में पाया तो सताया। घदम होचुका है । योता हे न बोलो माहिमा हातिमा मधुर पास है । सय में कितनी खना है। मार में हित गम्भीरता और हमनी समान यों के चित्त को महादेवी हक है। शन्द श्रा के ढग मेना का इधर ही नाता दिखाई देता है। (भाग पुरा सुनाई देना) तोश में जो प्यारी, कफी रगाइ काली। जागी तो धाधुका है चाना चाहे मानो ॥२॥ मोदिनी-(यात) हाइस अंगारिक गागका पिता श्रधा भाव है। (पुर पुछ पास सुरा देगा) तरे गले पा हरया, गूगा हमार फूलों। गतहार पन चुता हूँ यानी चाह माना (मोहिमी ) खुद-शायाम-अपनी प्यारी अच्छे गनहार यो। (मोहिगी या और कुछ आगे थदा प्राय स बहुत पास सुमाद) तरे का कटानी, मेरेर बजे मार्ग जखमी तो हा चुका हूँ सानो चाहे ग मानो ren (मोक्षिणी का पागे पढ़ा और साग । पीपाचा धान करीम का अनचेस्ता चा से मात दिसाई दे।) मादिनी-(सन) दो ! ये मिट श्रेणा मनुष्य गीतों

* मोहम-गोहिती
प्राप
सुना है। जिला पाया. उसी ग मन्ताप मान भागन्द
उठाया। सुन्दर भी है पुष्ट भी है, मन्तुष्ट भी है और
पति भी है । (गम का नाम देव प्राट ) क्या करी
मिया, स्याह हैकौनसा मनिया गा रहे थे और
बादाम पा रहे थे।
फरीग-(मानों माहिरा देखा ही नहीं ऐमा माघ यता और
इधर उधर देख) नरे, कोग गोहिगोचार, श्राहा,
जी साहिया श्राप है। मैं ता शापका देखा ही ना!
पैग, बाद जी मापने वा ठीक ही समभा, "मरसिया'
ग्न के गाल को ही रहते हैं। इस गाने मी हजरते
आशिक साहिय, अपणी माशूका क रज में गा रहे हैं।
मोहिना-हो, यदता कहा कि कहा से भा रहे दा?
करीम-मे तो जूर की हवेली ही म श्री रहा हूँ। घोडे की
जाही जात हवेली गया था, मोना था कि अगर
हुस्माता कुबसर कर लाऊ क्याधिोडी या भी।
चंधेर पन दिन हो गये है, नकिन यहा गालुम
प्रथा कि श्राप पीग में तशरीफ ले गई है। मैं भी हुजूर
स पूजन की नियत स यहा चना लायी।
मोहिनी-अन्ना किया। मगर मियाँ गमाज तो तवि
'यन कुछ हीफ नहीं है। हमी से शाज कहीं भी घूमर
जात का दिन नहीं है। तुम जाया घाडा का खान
1
T

*
माहिती
पगम-(पछ चिन्तन ) हुशूगाया 'दुगा श्री गित
गाणादा । ( १६ जIT बजाय माहितका
मार देगा)
माहिना-मयों क्या जाना नहीं चाहत! अगर TET जाग
नातिना यह गामापक यक्त फिर उमा सगम गाकर
समाथा
फरीम-हुता । ह यार २ नहीं गागा जाना। याशिमामी
जुदा में दिन घागरा जाता है ना दुग्नी दिल की
पुग श्राशज पाप आग शिला पहमा है।
माहिगा-(मकर)ता क्या 'तुम मा शिक्षा की जुदाई में गर
-
रहे
4
.
4
.
काग-( हपकर) हुजूर ! इमा जाय ता मेग चायना
दिल हा दे सकता है। जो नहीं द पानी।
माहि-किमो घायन लिया हे
पगाम-गाफ पिये। उमा नालुफ जग भी जी हिलारुनी
कई श्राफत उठास, श्रमालाइ जात पाय ना मुह
महा छिग और सई होने का गा की जगह नक
नपाक...
माहि-तुम एक बार जरूर पगार करे।
पगम-फज कग कि (प) यह अगर खुद पापा
ता गज तागदागी।।
माहिगी-(हमफर) गाइ राम " तुम हमार पुसेगी गौचर
.

१०
*मांग-मोहिणी
जारमटा मार का दाउमा गिरगा परगर
भी बार लगा मभर फटा म्यून का बनना रहाश
हा] माह का पुकारगा अर का है।
मंगग-[ उनी दशा में बडबडागा ] प्यारी मुझे यह गा मंजूर
है। चाहे मार डाल पर अपना हाथ ता मर
मी गर रख उन्हें न हटा।
दिना-हे भगवान्, यह क्या हुश्रा, (दगा म चिन हा.
। उमे उठाने का मुका, इनन म-मठ के मुतम का
तह हायात का श्रागा)
होगदान-[आश्चर्य म] क्या है? माहिनी वा फ्या? क्या
अभी पापने ही किवा मा पुराग था। यह कान
गडा है ? यह सून केमा?
माहिना-हों, कगग कही म झमना झामता इधर
REET, वाहा ठोकर खाकर गिर पड़ा माथ में चार
श्रा
.
.
हातात-[धार नन17 मार-पार की चाट लगी या
और विमीमा' [गम पाम जा] उसे हिला
कर, गरीम प्रोफगम?
वर्गम-गम या हाश मा हागवाल को देव भाँचधा
थाrको कुर जी !
द्वmara-श्रर यह क्यों रहा है। यहां फैमे प्राया? गाड़ी
पर कार नहीं। यह खाला चहां छूटो पहा है।

* मोक्षग मादिगी
-
--
,
t
माथापका
धाहे अलग गडम हे हैं। अगी २ एर मासा
नाट भी आइ है। आप यहां बाप कम गई है
पांगत सदी का।
घर-[अाश्चर्य म घटाकर ] है सम्पार । मैं गहा पर या
माहिया कामर करने जा17 जाट यो पूरा पाया
गा यहा चार स्वापर गिर पडा, यह घलाह-[मलाम
घर माहिए। एक चार मतृपा दृष्टिसे देस प्रस्थाग]
मादिगी-बारावाल की श्रार दस ] कुंवर साहेश, मर पुकारने
ट पहुचा, इसकी क्षमा चाहती हैं।
दीरालाल-गट नहीं कस पान फा१, और क्षमायाचा
की क्या मागण्यता ? मैना शापरी ननमा
-धनाम मदेव पट महाका तैयार है। पितु प्राप
पष्ट दादा उद्यत हो तब 11 हमारा ऐपा भाग्य
ari आग ता-पापाशी पर मुमतमा कोचा
गुलाम का कर दे। पसन्द करना है उसका कोई
क्या करे। श्रग २ भाग्य, इस पाचवाग का घय
'जो मार प्रेम का पात्र बग!
मोहिनी--श्राज आप य फैमा वात कर रहे हैं ? इस नारे
यांचधात की और मुफ का व्यय हा नांगा लागाग
काइ'सुगा ता क्या कहगा ! श्राप सभ्य है, शाप मुह
म ऐषो धान शोमा गहीनों में उसका साथ का पुत्र
पिया-एक माजिक काममा गरि फसाथ इस प्रकार

मांग-मोहिनी
-
.
या स्थित में शा कुछ करना चाहिय, यही क्या, उप पर
मा यह तादात हे गमवानः।।
दागताल-ताछग | श्राश्चर्य ! अच्छा यत्तव्य दिया। (नाग
म) एक 7 सदा (तुच्छ) गुलाम समायाजों क
गायन सुगाकी प्राग्जू मिन्नत (प्रार्थता खुशागद ) करना
हमर घात फग्गा । मुक भर कर छाती म लगाग का
यम बगा, यदि मालिकहा तो पाप हा.सा दयालु हा ।
(दाम्य:)
माहिनी-हसते क्या है। गोरगी पुल पाना होता कह डालिये
वाका गरखिया मालुम हाता है
आज ता-यापन मुझे
'वाडा' यदना मग का बाडा ही उठाया है।
ही-'पदनाम गरे गह क्या पती हा माघदशाम करना
श्रीराप।। पर क्या प्रांखा म देना और फागोस सुरा
हो सकता है यदि ऐमा ही होता. हाता में
अयश्य झूठा हूँ। मग ही मासमझ सो. देव । खोर मुझे
इस बाता म क्या करता है।
मोहिमा-(कुछ सजितासी हा सोचकर म्वगत') इम दुष्ट
भी शापिस प्रकार छुटकाग हा एक विपत्ति जाता
श्री कुल दर गहु और यह दुमरी शाइ। कुस निकाल
श्रय स्वाद में पकने का तैयाराहोना है। मेरा यह रूप
श्री योया खुद मरा हा शत्रु हो रहा है। घर के चिराग
से घर पर ही भाग जम रहा है। हे ईसर रक्षा कर।
भी पाया
S

न सब प्रकार स - - प योग्य प्रमी युवक का त्याग, एक मात्र गुम्नामुममा गर्मूल हे। हां, यजयत्ता पहिले पका भाजपा *मोहग-माहिती [AT] अच्छा गा7 लीजिये कि में हो दापा हुँ श्रम प्रापका क्या इच्छा है १ साफर फरमाय । हा-क्या फरगाऊ ! में आप इस 'प्रेम-नाटक में 'दाना भात में मूमरचन्द हा श्राधमका और रंग में गह' पिया. इस अपराध का क्षमा । और जाने की प्राशा ? अच्छा ? [जानाचागा] माहगा-[भाग वढ हाथ परडार मुस्कराकर अंजी, जरा ठहरिये ? सुतिय ता महा पाप ता रुष्ट दागये। ६०-[ कुछ श्रावश ] रष्ट ! रुट क्या नादात ? आप प्रेम के पनि दा का अपन सागा दी उस स्थित में दस गा साट फ्यों पदा, श्राप जागता हुई मा भनजाग कमी या रहा है श्रापस मेर-माकी कौनसा वात दिसागही है - शाप लिये मान भर स मरा जा रहा । इतियाहार बगद हुइ मेरी प्रशिक्षा की प्राथाय पापा मारा की प्रेम पात्रकाय पैगतले कुचल INमाग. या भेट में मनौर नजर य भेला हुइ. मेरी यनुनी , अपना तिरस्कार किया ! और पफ सुन्दर ARIA, PRIMENT माग को दिल दिया । पर आपा २ मा मांदिया-प्यारे! श्रापका स्पान गजत , . मेरा । है। उस

1
* मोहन-माहिनी.
गुगाम
है-मग्ल भाव स ही उपहास कर
छेडा, उसी से उसका माइम बढ़ा और मे। इस घाटी
सा भूनने हा वह फाड नडा पर दिया जा दख चुक है
मुझे देख मेग अन्य हिना का इस बात की शिक्षा
लगा चाहिये। मैं इश्वर को माक्षा देकर कहती हूँ कि
मे पूर्णतया निर्दोष हूँ। और यदि आप भी न्याय पूर्वक
इश्वर सडर, करना चाहेंगे तो यहा पहेंगे जा कि इस
समय में कह रही हूँ। अस्तु-“वाता ताहि बिमारि दे,
श्राग का सुधि लय । मेरा पिछला अपगध क्षमा कर
अव म अापकी सवा में हर तरह स तैयार हूँ। at
व्यवहार का डर स पापक विपय का पतनी घटना
घटी थीं।
"हाराखाल-(उत्कठिन हो) ताप्याग, शान मेरी इच्छा पूरी
-करराषिता हा दिई क प्यास, इम चातक 4
तुम अपन प्रेम रंगी स्वाँति जल का दादा (R
'लिंगाक लिये वढना, माहिनी का पाछे हटता)
मोहिनी-हे, हैं, भाप अवसर कुअरसर का भी ध्यान छोड दे
* है, इस समय यदि कोई अकस्मात् प्रा निकल ताप
थी और मेरा रजत का क्या हाल हा? जब प्रेम :
हो गया है ता यहुन अकमर है।
होरीलाल-हाँप्यारा, यह है ता ठीक । पक वात और 4
चाहता है यह यह है कि "आग ससुगत का।
4
.
.
1.
4

*मोहा-माहिती*,
।
-
-
उस
ना आप जानना हा है
आप य पति कैम है यदमा
fमा मछिा गहीं है। ऐसा स्थिति में यदि अपग दागों
हा खूप द्रव्य सा दर देशमें चले चलें ता इस जिन्दगी और
योत्रा की कैसा यहारदा? इस विषय में आपसी क्या
गय है।
मादि-प्यारे में भी यही पात पहिन ही से सोच रही थी।
'मैं प्रयम हा चुकी है कि 'श्राप की सेवा के लिये हर
नगद नैयार हूँ, आरसर मिलते ही तिचा चलगा।
के मतो उद्धार हागा । किंतु यह भी साथ दी प्राथा
है कि अाज की उप उपदासको घरमा गुप्त रग्नियेगा।'
होगना-प्यारी, विचार प्रत्युत्तम है। पर साथ ही तुम्हें
यह चेताव। गा दिय देता हूँ कि 'अगर तुमा दगाय जा
को यो प्रेम विवादामें प्रामाज्ञानीकी या श्रगाव यमाया ता
में तुम्हारा सब मण्डाफाड कर दूंगा । मुझे याजमा घटा
के अतिरिक तुम्हारा १५ गुमयात विदित है, ध्याग रखा।
माहिनी-(स्वगत कुछ संचिकर मर्ग और गुम पाते ! झठा
कहीं का पत्र को चकमा दगी पूर्व पाता है चना
प्रेम रस ) [प्रदी नहीं प्यारे, पैसा पदापि ग दोगा।
आप पूर्ण विश्याम ।।
दाराठ-(वगत-"मय पिग छोदिन प्रीति" प प्राइगापर)
(प्रिस्ट) सा विश्वान ६ लिये मुझे प्राचिन म्यanim
कामसागुमर,की गुहा और पा चुस्वा प्रदाग फरिय
-

६६
मोहन-माहिती*
चढ
श्रीर मेग य गूठी श्राप धारण करिय। इस माय में और
कुछ नहीं चाहता। (माहिती या उत्तर क. पहिने आगे
उससे
गूठ। ने अपना गुनी में दिन अपनी
गूठा
उमका कोमल श्रगुती में पहिगाना और चुम्बा
47 की तेयार्ग परगा इनग ही में पाहीं पास ही म मधुर
घण्ठ स निचले इस गद्याश श्रार पायजेत्र का शब्द सुगाई
दगा-
पद्याश-पथिक, नावधान! सावधाग! पांव मा धगे।
अात्तिपूर्ण मार्ग है,
फुलाच मा फसा॥
दीरालाल-(घबराकर आश्चर्य स ) [म्बात क्या पिसागे
मुझे हा चेतावनी दी पमा हमाग मापण-भेद का जान
गया।) प्रपाट-प्यारागरण रखना जाता है। (शीघ्रता
स प्रस्था)
(ड्रापमीन ) पटाक्षेप
-
"मोहन-मोहिनी
( अङ्क तीसरा, दृश्य दूसरा)
(म्याग जाधपुर- सठ माधवप्रसाद का पमरा मोहन
वाए शग्या पर पड़ा है पात हो माधय मानता बैठे हैं।
समय शिशा ५ वष बाद, दिम बजे ।
:-

17-हिती है
माता-(श र फर प्यार स) रा! कैसा
तपियन है?
गोदा-(मन्द बर) पृय माता जी " मेरे सारे शरीर में
दर्द ा ा है जांमी जरा चल रही है, श्याम
जहा कचरा शिममIRAT में भयाTE
पष्ट होता है। मुं- में कफ साथ ही पार २ सूरा भी
पाता है क्या करू पोर क्या गापरू. कुछ सr
मम में शाता।
साधन-सात ! गम है वन जना शम्छा हो जायगा, नामा
दस वैद्यराज पा इलाज चन्द कग, अाज पडे
हास्टर सा० का इलाज शुरू नायरो । सरजर
साइम का युना7 भमा हे, व वडे , दयातु,
परापमाग और सजा हैं। उहाथ हजारा.
अमाध्य सी अच्च हुये। अभी प्रात दी
हांगे।
माइन-पूज्य पिता जी और माता जी ! अब मुझे जीवन पी
दुधमा प्राशा नहीं है। डाक्टरों का चुनार का कुछ
मा भायश्यकता रहा । यह केजज विहानना मात्र है।
श्रात:मुझे गीता का पठसुगाइयं । मशार मागोंकी
धिनमा तर नवाही पर मका, यह मेग
अभाग्य है । इश्वर म माथा है कि यह म जगांतर
पापक समानदा माता पिता दाँत कर पिता जी
--
-

मान-मांदि।। + उन १ . परवट एदलमाय । श्राहा, बड़ा दर्द है। गाधर-( श्रावों में भासू भर) यदलवाता हूँ घटा। (हाय का नहारे मार्ग पार लिटा) मोहन-(सुधि की दशा म) पिना प्रा inी अरे, ने मेग अगुठा निकाला । गौमा फळी मागत है। अरं, मतपदी में फग-पेग पुछ ग ताक मा। गरे मेग पुस्तक, गाहिनी अरे या डाइन ! पया छेडनी है? श्रो नहीं नहीं। हाय गम! मंगप्याग गया कहा मुझम तुझे सुम्ब नहीं, मैं छाटा हूँ-दुबला है-प्रभात माहूँ। दो थाना क्षमा 'हाय गम!, दद है, (गोकर का प्रवेश) नौकर-नमाय । दागा डाक्टर माहेर माटर स बाहिर पचार है। यहा कि "ससाई का हमाग मलाग दा। गारे श्राने का चानो। माधनल-अरे, कहां हैचल में चलता है। बाहिर जाकर हाथ जाद) अधयकर जे गापामा जी की शाम, पधारिय, आप बेटे की हाम्वये उस देखने की कृपा धारिये। अंग्रजम्नजन-त, मठमाझेय, हमाग बेदी याममाया' [-पाश्चर्य न ] हग जय थाहर पिता यह मान दामिठा का कुल सापका दिन "हा छोटेदशी हाफ्टर का माग का , । 1 . - - . -

माहा-नाहिती
६.
.
महा। उIT गतिश में समगr]
मरता-गश हेगगुड,शा मठ मारेन हम मरीज को
दम्बना मांगटा है। नला।
सठ गाधा-पाग्य, धाग्यि । [गाहारे पाप जा]
सगजT-TIET डा दम्यगा, फिर छोड पनि जाम
दम्बा पश्चात् 'स्टयाम्काप' ग्वामी गत्ताधिशेष]
मछाना या जांच करा अच्छा तगच कराक
पश्चात् उदार कुर्मी पर बैठा] (छाटे डाक्टर स)
fner, व्हेग डेजर्म, यू०मा०
छारे 10-[पुल जान पर गम मर।
सजा-[ मठ म] पेठ जी. इसका दो माला म 'गाईमीप
सराफाई' है [क्षय गग विशेष ] उसी में यक्षा
तिमाया हो गया है। पर टुम क्या नाटा है ?
सठ माधय-[मर्जा माहेश पापक मो का पार द एजर,
मग यया मिरद यचे ऐमी कृपा हो । मैं
के लिये एP PHP रुपये दावा तैयार हैं।
जा-प्रा मठ माहेब, टुगा हम यहाट सेर से या दिया
है। अब गग यद गगा अच्छा हा गा मुमाग है।
माधय-सदा कैग्गा जा।
7-धर! हम टुगा दामात पेटर योना फि माहा
पाटमा पकाशमा उमर में
पर डेगा पहाट घुगमा है। यह भी स श्री

* मोहा-गाहिती
है। इसकी मेममाहेब औरट काम पाम हा श्रीर
बुग है। उनका हाडेगा मुगामिल है। 17 3
वस्ट ( वक्त) हमारी घाट नहीं मागा, उसका हीर
सब गटाना है। इस चक्र इमका भोगट यहाँ है?
सेठ गाधर-हुजूर, गीभर है।
सजंग-(छाटे डाक्टर से ) द्वाज दिगीभर डाक्टर
साहित
डाक्टर-मर, उसके चार क घर ।
सजा-एस, मेठो, विना गत मे
से माधव०-हुजूर, तीन माहन ।
सज-दो साल पेश्टर हमारे काही ने उसे क्या नहीं आया।
माधव प्र०-हुजूर ! इधर इमका गटाना नहीं चाहताया और
उधर उपशीमा रममा मी नाहती थी।
बजे7-(प्राश्चर्य म अस्फुट वर मे) श्रा, उमफन पार डो
इण्डियम महरन (गोट दम्बार ) श्री सठ जी । हड
रूपात । मोजाय हम नहीं चाहटा । गिरी मपटी
पीज भान्जा-सिफ मोला हाये हा डा.पाच रुपये,
हमाग छाटा मार डा।
सेठ माधव-हुजूर मेंग य पुशी म दिय हैं मजूर फरमाय ।
सर्जर-हम रिम्बट नहीं चाष्टा, फील नाहटा है। (घडीख,
एर ) गाडा रगे देर बारहा है । (51)
भाधन प्र०- १६ २० सर्जको भौर,५ रु. छोटे डाक्टरका दे]

*मोहा-मोदिनी
गम्रता से-हजूर, बच्चे का नाम ।
सर्जग-(खडे खड) मिसा पड (वैद्य) हनीम का बोलो।
मागाटा साहब का पाला, हम इरताज करना नहीं
मागटा।
गाधन-हुजा, मयका इलाज करा चुके । हजागा गाया गमा
चुक । अब तो पापही का भराला हे। (सदा करना
हाथ जाड़ना)
सजा-( चलाते हुये ही ) सेटमा हम झूठ योजगा हीं चाहटा
ढाबा (धारा) दगा नहीं मांगटा । अब हमारे मार को
बाट नहीं डया काग्गर हे। सादा नहीं । मजबूरी है। सेट
जी, प्रान्छा गुडिविनिंग । (टोप नागा मोटर के पास
पहुँचा)
माध०-( हाथ जोड पुरा शौजीजी से ) सठ साहेब का त्रिों
में सासू गरे कद्दा हुजूर । अब पानी राय में यह कब
नक जिन्दा रह सकता है। कुछ समय के लिये दाश गा
शानगा या नहीं?
सर्जर (मोटर में बैठ) सिफ प्राधा घरा जिंडा रह सकता है।
डोशार मिट पोहाश था मो माया है और दिगा।
अच्छा गुडयिगि?
(ड्राइवर का इशाग परगा, मोटर का गम्धा7)
गटा
। ...(भक तीसरा, दृश्य"दूमा, पूर्ण )
प

*मांग-मोहिनी - इमस रक्षा का उपाय ! (श माच प्रमन्न दो) रती भातरी जेय म हाथ डाला ) है है अवश्य है। (फाटा साशाशी निकाल उम प्यारम चुम्या दे) मेरी सच्चा प्याग चिम्मगिनी-चिरशातिदया गदा है। (शीशी का जेम गलना। फिर निकाम-क्या ना घर राय इमान्य गरमृतरा पूर्णरूप मे पाग करू ? (नात्र ) नहीं नहीं अभी समय नहीं है पहल नाप्रधान र चाले का पता लगा ब्राहिये। [फिर जेब में रखा) याग में घूग, दढा, 7 मिलने पर क्या मक-चलू. उस frma होजक किनारे बैठ चित्त का कुछ शान्त करू । हौज म किनारे जा कुछ दर बैठ. मिस्तम एक कागज पर कुछ सिम्स नापेट जेब म ग्रना) मा पया धा चाहिय ? याद में उस मारधान 17 याल मा पता ग तगा मका ता मेगाnt का शान्ति गति (मग में खप शानन्द और माहस का अनुगध कर ) श्ररे श्राहार रू। 'हे माय गार पाले। [बानी] "तुम पाया प्यारे, शका शीन दा शान्ति दाम दुम्ब मेग श्राप घटाया । ( साता दी श्रोटय-नाटके खेत में गय.स), प्यारी तुम चित में नं नहीं घबराया। छग भाव । तुम मुख चन्द्रकान्त दिरामोगा। उस का , घटाना 1 1

* मोहा-हिना #
2
[ हाम्ग और नूपुर पनि ]
मोदिती-(शब्द न IT पर शान मजा नामगे नीम
दो सुन्दर प्राभूगगा गुक्त सहारा मारकर हमत हुये
दा-युनिया का श्रा)
दोनों गुपिया (हपकर ) लोया माहित । तुगएक
का पाद्वारा किया और हम दा गा गय । रए AIT
दोनागा [ माहिगा का यकायक फाराम और हाराat
या स्मरण
माहिना-दाता का पाहवाम दौडकर गले मिग या भाग्वा म
श्रांसू का धाग पहा ] अर, तुम दान कर पाई !
मेरी चम्मा चमेली जा?
चम्पा-तुमा द्वारा किया और सभा पाई ।
चमेना -[ हेमसर पर घडे ११ दुम्न जायात है कि एक प्यार
माया शोर दा प्यारिया श्राइ ।
माहिती-हमार] और गामा पर नाटा मागेर इशाग कर
तुग भय मा टसट हा या दा, मुझे य म तग कर
हीहा सत्र !
चम्मा-हमार बैर [लिपटकर ) प्यारी नवा मागिना,
यहून बर्मा म गितमा हुणा ! काह। गममा हा?
चमेती-शरला, यात्रा पिता अपों में मिला हुआ ! और
श्राद में
माहिती-माता पात्र वर्ष में मुशा ! और वरून और
-
।
--

* मा-मोहिनी
श्रादि के विषय म मुझे क्या हाय? यहि पाउना
तुम दाम 17 ससुगल म कर गाइ भागा कुरामा
मादा प्रपशना मतान!
चम्गा--वाहन इना वो तक वहा क्या रही क्या तुम्हारे
पिना जान तुम्ह वाव में नहीं बुलाया। इसका क्या
पारण है।
माहिना - ना विवाह व बाद महापुबारका मीना
है। दमरे माम पदैग ।। अपर पाम रखा पमन्द
परना है तानर गति पाय न है अब गाँ
पामा समनहा रहना है। पडना है।
चमेना-जामा दशा में तुम्हारे पिता जी तुम्ह लिया फैमे
बार और मसुगल गान है। कैम भज दिया?
माहि-सुगमा हूँ कि डायगे के काम उनी मुझे
यहां भेज दिया है। कहने हैं कि मेरे रहने म बीमार
पर रहते हैं।
चम्पा-(हसकर ) ये निगाडे डाकटर भा कैम है।
भना देखा नाही कहीं पुरुषों व पाम स्त्री व गहन
मा पुरुष यागार हा माना है।
गोहना- हमपर घात टानगर ) गरे । नुमा मा की
वान ना शुरुषग्दी और यह अब तक न बताया कि
बाम्ध्य ईमाई १ था !
चम्गा-(हमार ) म्वास्थ्य तापदम्तूर है । (चमेली बाबत
+

- *मान -माहिती ७७ . - . जाया ) यता त गत का श्राद में प्रामा पाइ है। सुगा किमाना मा यही दे गा में श्रापाशमनि माझा भी ४, ५ मर्प । श्राद हे नागावी भट का याग गाग्य सही प्राप्त हुश्रा है, आप प्यारी सम्बि ६ चला मिल श्राय। : पहिल ध्यता गद ता मालुम हुआ कि तुम यहा हाती म यहा हा ची पाई । माहिगा-(हमार और प्रेग म गद्गद ) चलो अन्या किया पहिता, तुम दोगमा दम्न में बड़ा मा हुट । माना मगमगा पहिरोही आमिती दी । सविगा, मग दुर्भाग्य समरे,मगी यहित ता नदी में नो तुम दागों काहा सगा पहिलीम मा यढकर प्यार करना यह बडा अच्छा । हुप्रति श्रााता गित गह 7 तानी सम्मि लित मामाने मदा घडणानन्द बहार म गुजरेंगे। चमेना-(हप पर यदि तुग याच में ही यहीं नैर सपाटे पाची गई ता? गोदिता-(चर) है, मैर सप टा, निमा माध?' चमेगा-(हम)छानामत बातें बनाया मत । हमो सय सुगा और दवा है। मोहिता-क्या सुरा और देखा है। चमेजा-यहा अ गठी का शादाग गदा और मांदिरा-और क्या! 1 . r 1 "

* मोशा-माहिती
.
चमेला-पोर चुम्यगालिंगन क श्रामण का मामी और
माहि-और क्या
चमेना-शोर नाजधावाल गायन में उससाबार।
মা ঃ নাঘ। গাঁয় যায় মন খা।
यम्पा-( हमार ) वह गायक, जिम्मका पता लगान का तू
ढूढ टूटकर परशान हो चुकी। पता नपामा दुम्नित हा
जिम्मको प्यार सब्द न सम्यान क्यिा वह तग गायक
प्यागतरे सामन खडा है श्रोत तरे ग म भ दिया
उस लिय क्षमा मांग रहा है।
चमेगा- हमारवह ता प्यार नहीं प्यारा है। (दोका का
हमना)
भोहिता-[ दुनिता हा ] क्या सच (नातिहा कुत्राघवगर)
यदि मच ? ता, है ? हैं ? हाय भगवन्,१ घार अगथं ।
चम्पा-अर्ग पगला, प्रल्हढ कहीं का क्या पत्यका समर्थ ।
घवगा मत वाहग ! सबहा क घर मिट्टा चोक चूल्हे हैं ।
धैर्य धग ! मन्च बात कहो। तुम्हारा बात गुप्त रसग की.
इम प्रतिज्ञा करता है । तुम्हारी पोर हमारी बातें जबकि
अपने परस्पर हिनती मयों की
वात पक्षही है।
तुम्हारी उस समय की बाते भा पुछ अर्थ रखता है।
ऐसा मुझ मालुम हाता है।
माहिगी-ठाक है। कहती हूँ सुनो ! ये हजरत मुझे वाती में
फैपा, हग, धमकाकर मैगसना नष्ट करना चाहते थे
।

A गोहा-हिंगो ७६ " . में भाव का उसा र अनुमार वालों में फमा वह मज बाग दिलाया कि यह भी याद परगा। स्मरण रोगा । प्रा गुठा शयश्य लद गया। और चुम्या सर्ग पाप कार्य स इश्वर तुम्हारे द्वाग मग रक्षा करवाई इसा तिय उम और तुम्हें धन्यवाद है। जैमी उसक साथ धाम पी थार व्यवहार या याद वैसा कर चिलप " करता नाइजन पर प्रा यनता । ( गूठी का दख) उस । पुत्त का यह अगूठा। [ गुल सITकान पैरों तले गेर धत्तरे फुत्ते की कह (फैरता है) चम्गा-ठाक है दिल यह पुरुष समाज, हगसे पेमा ही पुण्यसा और हम पर अत्याचार करता है। और समय समय पर दापा भी हमहीं गिना जाती है उसकी भारवाई गुना तक उठा वाला नहीं। खेट ! महारद ।। खैर- अपनी ससुगत का मी पुछ मशी यान सुगओ। दिन यहवाना। यह मा यतलाया-कि पतिदय कैस है वहार कैमा प्रेम का क्या हाल है श्रादि । मादि।यदि तुम दागों भी अपो २ पोती यात सये दिल सबद स्वापार को ता क्या मुझे पहा हामाता है। पदापि नहीं। मैं गा तैयार है। चमेगा-[ हमारा हा ता पहले ही पहाया तैयार है। मोहगा-तापाइले तुम्हीं शुरू किंग। चमे ता-ईसकर] गही पहिले चमा कहे। कहा पहिला मकाज STY *मांET-माहिती गायन। चम्मा ( उदान हा अच्चा यहिन यहा सहा । मे। माथा SAIT स सुनो। चम्पा- जो न सखियों। मैं न अपनी दुख का बतलाकगी। तो यहाँ? फिर कह व्यथा, शान्ति मनमें पाकगी ॥२॥ हैं मेरे पतिदेव के, सुन्दर अनेका नारियाँ । तो हमारी पूल केस, हो सके सुषमारिया ॥२॥ प्रचार करनी है सभी, छल, वल, कपट व्यापार का । पति अ य प भाशक हो, याज़ार है व्यभिचार का ॥३॥ (नेत्र में श्रथु) हा, देव ने कैसा बनाया, प्रवलाया पागाग्य है । . सती श्रमको यात्रणाय, नर्क सा दुर्भाग्य है ॥ ४ ॥ (रोकर) इस दुर्दशा दयनीय को प्रभु, या तो जल्दी मेट दो। श्रथया सवों के प्राण पुणों की चरण में भेद ला PM [ निश्वान डालग] मादिनी-ग्यारी चमेली ! तुम्हें तो आपने पति का पूर्ण सौख्य हैम कुछ कहा। चमेली-(दुखित हो) का सु। गायन-हमला मिले हैं वृद्ध यालम, बाकी सुना लगू कुछ वान गन पूछी मसी, कहन हुय लजा मरू ॥१॥ वृद्ध, पतिस जो सुख मिल सकता है सीमा सीमैं .

मोदग-माहिती - पर लेरा ही गयाप्त है, साम्बयो मेरी यही क्या है । शाकाषेग से और अधिक करने में पूर्णतया अनगथ हूँ। ।, श्राशा है क्षमा फगगा। (शाखा मगच भर सदा मा) चम्पा-rt, मादिगी ! अप तुम पहा ? तुम्हें तो हान मिलाम गग रह पति सुखोपभोग में गूर हा आगन्द गाता दागा ? सुमगता में नुमने ता मा डेग हा डाला ग्यता है ? पाच वर्ष! पारे वापर या! इनगा या समय। गादि-प्यारा पदिनों सुा । हृदय मज्यकर पुगे। -- गाय71 स्वभाव "जय कमी में छहती थी, माद म पारहास स । फुद्ध है। ये झिडरते थे, रहिन दा विश्वास सं ॥२॥ घम्पा-अर! इमस क्या यह तो पिना पुरुप ा कन्ना ही होता है। प्रेम चाहिये, प्रेम ! मोहिंमी-प्रेम तो था दर वालों, थे यात परत लान स । कदने, 'डायन श्रागड' गुजरेगी कैम रात स?". In चमेली-श्री गली ! यतावान् पानी सब शक्ति खिया पर ही तो आजमाते है । हे वा बलवान् । माहिगी-बल पा हा सुगा । गायन-“दश कदम चल । हुना ता. हाफा ताम भरा। बाते श्रोका है. बड़ा, मैंो सुगर है जरा ॥३॥ चम्पा-प्यारी | धा, दौलत, ऐश्चय ता खूप है! . . .

*RIET-मादिमी *
!
.
गाद्विनी-नालकर क्या हम बाट सुनो।
गायग-" बय सुन्ना गाकर बार पति-पनि नहीं!
गगा महार वह पहुँचे जा जामुन्न तर ai hen
{जोर नगेगा, गेत • कहा)
पस सुपा में मृत्यु प्रभु हा कृपा तग धिन ।
मक जीवन नानी, हाय हम हाय धिम् ॥५॥"
(कदा)
प्यारी मस्त्रिया! मैंने अाज पहिले पहिल तुम म ।
यह दुग्न शाकही है । और 7 विना अन्य महारा
का नगर है मुझ पर अनुग्रह करना । गुत रखा यथा
माय लियागा।
सम्ग-21 मा ता अपना दुरस तुम मे ही मदर इलाका किरा
है, किमका वान कौन कहे, ६ पकी ।
चमला-सजिन में कमा का इमरात पर विचार कर रही
हूँ कि विधि का विराग तो देखो, कि हम सब एमा
ग्राम भार मारले में पैदा हुई । एक साथ ही सेवा कृती
पढा तिनी। विवाह मा फरी २ नाथ ही था। इमा
'पश्चात् मोनारिक गुण हुन्छ मी नवगा समार हा रहा ।
अप पति सम्बन्धी नुम दुग्न मातीना ही फा 'चगवर है।
चा-और यह यगवर्ग 7 जारी कय तक नाग देगा?
हे इश्वर नगतीला अपरमार है। नेग इकना!
माहि-याग्यिो।इसमें इश्वर क्या करे उना भनों को
चुदि दी है, परका माया ममका का सागमार विचार
शक्ति प्रदान की है। हम उसफा हुपयोग कराई।
.
1

मान-मोदिती देश में फैली अजानना, रुढिगां नर्गनियाँ याताया -विषय पुस्ताकीदामाता उपेक्षा, माता पिता । लापवाही प्राद ये हा नर Fमें कागि में झोरती है। बार उन सब प्रतिकार का प्रयत नहीं ! मिपा मनिया गारीमातागों का ठता और मा गमय ढा रहा है। पर दयालु और न्गाई है । मना १ मा दाप नहीं। यह मा हमार पालर और ममान सादोप। चम्या-मन्ग है याहा सत्य है। पर सय का सवृद्धि पहाग गरे। माहिती-'याग या भाजग तुमे रस्मात् मिल रहा माग यह अन्तिम इच्छा भाषण प्राशा पामार शोर ताग मिना ल, न जाफर nिawar या न PRER HIT जाया में शिक्षा की गण चुकी हैं। मेग नित्त 7 जाना हो गया। प्रेमी गिनि म अाइमा याग में का दा ताग पदाणे यावर 'ऐना या नदी है नि स म मा मुह किमी पापा मित्रानो, प्राशन झाग ल गया मला तामा डर है, इस मारमा में पा ( यात कापर) आशा!! पारगीर मिलने (दावाखोला गाश्चय ये - पु या मrnt- १५ पनि हो । दोहपर कि नारा दागी N 117 मोदन-मोहिनी 1 . नमल इस पहिले हा पाल रा की एक तरल पदार्थ की डाटा शाशा मिशाल उनकी दाचार बूट पांगा कुछ दरमें बेसुम गा) दाता-(घपहार हाग पकड ) अगे पगती ! यह क्या प्रार्थ पिया! अन्त में तग यह दशा ! हाय ! वाम ! (होना कागना) माहिती-सुव दशा में बम, पमान ने नाण! समाफमय यता मवार म मुक्तिः! हे श्वर | श्रा एग प्रयाध पुत्री की हार्दिक कंगजारी थी क्षमा करना। या पति हमारे प्राणाधार ! प्यारी सम्वियां माता, पिता, माम मसुर, मप ही परिजा मुझे हुनय से क्षमा दुा । इश्वर ! आप जानते हैं फि में हदय म दिौर हैं। परम पिता । नाप ता अरश्य दी क्षमा करगे ऐमी आशा है। प्यारी सप्रिया । यह टेश प तानों, पञ्चा से की गई गीतका पन उन तक, [कहते कहते गिगा। नेहाशी बढ़ा-गला सूमना-पा ,(हिची) घरमा-प्यारी चमेनी ! मालूम होता है कि हम उन विष का पास किया है। क्या करें! हम दोनों माहिती से किसधात में सुप्या है यह शाशा हमारे भी दु ग्वा का मन करने के नाय मागमा आवाग का रहा है। एक न एक दिग गपग यो भी इसा गार्गमा पशिल बनता पडेगा। तो शाज़ हो या बणयाग क्यों जाद। प्यारी सखिका साथ क्या बाद शीशी हाना) , । - । -- * मोह-माहिती . - बमेनी-(गेर) घहिन ! मग्न ही म क्या होगा?' चा-[गत ] अगमा गता है। मिस नि शांति मिलेगा। नेताओं और युवकों में फर्गति गिधागा और सुधार काय अबला भार यात्राको दशा सुगा. पका मान बढेगी। कुगनि दवा दी बलि वेदा पर पवित्र युगप-युवनियों का पालेदान ही फना देता है व्यथ नहीं भाना । ( मालिक पत्रको गढ कुछ ठीकर मही फग्ना) गया, मैं ना चal [वह हाय छुड़ा शाशी का पदार्थ पास कामा-हे इश्वर । भूगी भटमा पुना का क्षमा] (ोश होग) चमेली- नाम भी गाग नल । पीछे क्या है। [1] पर हस्ताक्षर कर पदाथ पान परमा, दमा क्षण भरमें बदाश ना] [जापमान] (सक तीमरा दृश्य तीमरा पूर्ण) . - 1 मोहन-मोहिनी. मक तीमरा-दृश्य चौथा। लग-जाधपुर, स४ माधयामाद का जगा | मौन का शय्या पर पड़ा है। स मैं माधन, मातो सुशिनाद पट' सुशीलमा पहलवान, सुतिगासा आदि धे है। माँ' मु. उदाम हो गई है। मोहा-(25) an! सग शरीर और परदादा - * मोहन-मोहिनी घम . सम्भल इसके पहले ही पाले रग की एक तरल पदार्थ की छाटी शाशा निकाल उलझी दाचार बूढ़े पांगा कुछ देर सुभ हाना) दाना-(यहाभर हाग गड ) अग गगती ! यह क्या प्रार्थ पिया! अन्त में तरा यह दशा हाय ! भगवान ! (दो। कागा)- माहिती-[सुप दशा में ] वाम, निर्क से ताण ॥ म साकमय ना समार म मुक्तिः । हे श्वर ! अशा एवं शवाध पुत्रा की हार्दिक कमजोरी की क्षमा मगा। शारे पति हमारे प्राणाधार ! प्यारी सम्बियो । माता, गिना, लाम मसुर, नप ही परिजा मुझे हुनय मे क्षमा दना । इश्वर आप जानते हैं कि में हत्यम दोर हूँ। परम पिता । नाप ना अरश्य दी क्षमा करगे पेमा आशा है। प्यारी लिया । यह देश के नेताओं, गया ने भी गह अपील का पत्र उन तक [कहते रहते गिया रेहाशी घढ़गा--गलासूमना-पा मी. ( हिची) चा-प्यासी चमेती । मालूम होता है कि मगे म विष गार किया है। क्या करें । हम दोनों माहिती से विममात में सुयी है या शाशा हमारे भी दुपा का प्रत करने के लिय प्रमाग मा श्रावाना कर रहा है। पकन एक दिन पर्ग पो भी इसा गार्ग मा पशिन बनना पडेगा । तो शाजा ग्रा.पणशंग क्यों जा। पारी सषि का साप क्या काहे ? ( शीशी हाना.) . . - 1

मोह-माहिगी
.
ममेली-(गर) यतिमाही म क्या होगा?
पापा- गर्व से ] IT गता है। किमान स नि
शांति मिलेगी। गनापों और युनयों में फरानि मागी
और सुधार 7 अवताश्री भार कन्याको दशा सुगर
ग को साच पदेगी। कुरीति-देशा दी यति वेदा पर पवित्र
युग-युवनियों का बलिदा ही फा देना है व्यथ नारी
जाना । ( माxि पत्रको गढ़ कुठीबार माी करा)
नगा, मे ना चाळी 1 [वह हाछुडा शीशी का पदार्थ
. : 4m 471-. श्वर । भूगी गरमा पुत्रा का क्षमा]
(शहा)
स्यमेसी-7 साल में भी या 7 नातू । पीछे क्या रहूँ। [गम
पर हस्ताक्षर कर पदार्थ पाग बग्गा, दानी का क्षगा भरण
यहाश माना]
[छापमान]
(संक तीमरा दृश्य तीमरा पूर्ण')
.
-
1
.मोहन-मोहिनी.
म का तीसरा-दृश्य चौया ।
-সাধg, ৭ মাঘণনা বা চা বা মানুষ
का शय्या पर पडा है। समाधन, मालतो, सुशिनाद्र
पटिया, सुसमग पईसाधार, संगति नानादि पैठे
है।मयों के म उदाम हो रहे हैं !
मोहम-(६) हाय ! मांग शरीर श्री विदर्द
F

मांग-मोहिमा
--
है। गता मूल रहा है। जगविनी जा रही है।
मठ गावर० [पानी पिलाकर माहन ! प्यार माहर्ज
पहें साग तुम्ह देव गय है. मेवगना मन ।
माग-[पंधागा दी हत] क्या कहा? की त्या ?
या माहिती मागई। यहाँ है! प्यारी चतो क्या तू मा
माग चना मना हैं गदि चाहा ता जल्दार।
श्राणार्ग! प्रा॥
सेठ माधग-बेटा। [शगर पर हाथ फेयर ] लोको जगपुर
शादमी भेजा है। शान ही जाने वाली है।
सुरेशच: पाठ-सेठ साहे। अब मोडकी नलियत पनी हे !
सजा साहेव ।। युनामा श्राप मदत थेत्या दग्न गये।
सेठ माधव-तवियत का दशा का श्राप दसकी गहे है नर्जर
नाहेर भी देख गये हैं। उनकी गय मता घटे साध घटे
कामेडगा और है ! भागे इश्वर मालिक है । (ग)
सुरे० पाटर सलाहे धैर्य धारण । शाग से काम ना।
ईश्वर सपका रक्षा है
सुशीलमा-प्रापत प्रापणे परव्य का पालाम पिया, खेद फग्गा
व्यथ है।
सेठमाध३०-अगर मैं, पोफत ग का पूर्ण पाला परवाना--
मेग हादिक इनानमार कार्य होता ता माहा का यह
दशा ही हाना । मावानी 'दख पानादन का यचएर
में
विनाद कराने गौर गीत का शान हा मुह देमार की
१ . भूना इसी प्यारा दुवामा 'द पार कियादा
!
-
-

मोहीमोहिगीर
दुपरिणाम मनमाय का पा लुगी या गदी!
[मोहबी गार मारत]
माता-यूल गा उत्तर द जोर न गया।
[गौर का प्रयेश]
नर-मेड माहेर । जयपुर गया हुश्रा श्रोदमा पत्र खे फार
FE भाया है।
.
मठ माधव-पया उसक साथ दुलवित नहीं भाइ !
मोरहीं।
मा ३०-(विन्मिता) प्रासा। नत्र त श्रा। (नौकर
या मतावर वेगा) पत्र पढ़कर वेशश ।
सुरेशचन्द्र-( सेठ जा' मुह पर गुजार जात छिम्मा हवा
गा, या द्वाश में पाना ) मठ माहेब, धैय धारण
फरो।पत्र पहना ऐगा पगा!
सेट जी-मसार हाये तथा ठ में फंस गढ़ रहता तों
मेगा यह दशा लहान (सर पा)
सुमनिताल-(पाश्चर्य ने ) पम में क्या है ?
सठत्री-[ रा ] गया वहा डटहानी कोमल मलिस की
सुन्दर कतिया पर भयावज्रगत होगया और यहाँ
मा गन्ना के 11 के परावृत र पमगाय पागल-पुसुम
पर शान मारता है । (रुस)
गावा-गामा जा। (पुछ ठार फर ) मुझे म्य पाया है कि
मादिगा मेरे गहिसा होम्यग में पहुँगा और यह यहास
"मुझे एक पत्र मा-विटा रही है और नो पास चुत
3
.
.

* मोहन-माहिमी T . मा पत्र की फला रहा है। कोई पत्र नदि पाया हो तो मुझे देकर मेग श्रातम इच्छा पूर्ण करा!लायो। माधव०-( पुत्र पत्र आया है पत्र द) को पुत्र पढ़ो, किमा पकार दीपा मगन नाat, गाहन-पिता ला शव 'मुझे अंग गिये संहारे बैठा दीजिये इम पमय मेग मित्त बहुन शान्दित है। माना में चहुन जल्ला प्राधा हा जाऊंगा। परे शर्गर में धन और माइन भाता मालुम देता है । (तरिये क.महार चैडगा ) अच्छा तापत्र पढ़ ? आपसमा सुनगे ? (पत्र जार से पढगा) (त्रिदाप का सचार उपक जाश में ) मु० जयपुर। त०१-३-२५ ई०॥ थायुत् मे४ साहेव माधवप्रसाद जी, जोधपुर की सेश में । मान्यवर सपा नादुर अभियादन ! पारञ्च ममाचार यह है कि वान श्रपणा मनुष्य पत्र दे माहिगा' का लिश ले जाने के हितार्थ भेजा। किन्तु पडे ही खेद नसाय लिखा पहता है कि मेग प्यारी, दुनाग, आँखों की पुनली माहि ॥ परमों सायमाल के समय दुद्ध काखा का ग्राम पर गदा हमें गिलगते छाई ची गइ । इस मृत्यु बगीचे क भन्दा हु है और आश्चर्य यह है कि उनकी दो बचपनकी साधी सखियां ला दिदा चार दिन पहिले वा अपने २ सामुगल से। पापित साईशी-प्र भी उसा हालत में पाई गई है। तीनों परस्पर , m M गोदन-मोहि . - , गलतियां डाले गही गौं, मामी लायकी कही जा रही घटा आश्चय HTक शोर मृत्यु का कारण शशात है। पुलिप बडो गरम से जान कर रही है। जाफा में है। यदि सरकार द्वारा ग्राम बाधा पडा तो हम दागी शान ही फुगर साहेब पा देखो शावगे मायामार्ग का दान गढ़ चिस घड़ा हो चञ्चता ओर गाशात हो रहा है। कुयर साईच का थामास पा र क्या -हाल है सूचित । पत्र लिख -ताशा के पास ही पार न मिला है जिममै कि कुछ पद्यमा स्नान लिया है। उनके गीचे तीif की मही है वह भी भेजा जाता है। उम्भव हे मृत्यु के साथ उम फा समन्ध हो। शायद नाप उनका कुछ और भी गहग प्रार्थ निकाय नम का गह भी मया में भेजा जाता है। भानदायमागयाचरम गुप्त। सुगलिया! मी 7 7 लिया गच्छा पर तानोंकी पापिनी भी सुगिये। पिता मां पुर्जा दाजिये। (मायामाद का पुजा देगा) गंग मा में पढ़ for( प्रफट) इमग ती नाप चाते है । र-युग का मन्दश, -ताशा स विनय, ३ - प्रभु प्रायगा । (कर) भाडा गा। पिता-माता का prit (पला ) पाना पीर याद-जार स । "युश्यों को मन्देश "द तीमा अराध प्रारशिदोर युतियों का एप मा ही पुरीति दी का जयदीप निदानहाते दस नपण दश पी दशा सुधाग -- - . द । .

- - S . *मान-मोहिनी में + नेतागो से विनय (त्रिदोष कुपित होने के कारण गाकर जार से पढगा) * गायन * मान्यवर गेता गिय सुगो, मान्यजन नेता विगय सु०॥टेकर महाराष्ट्र, पायी, जी, मारवाडी, वगाला । गुनगती कुछ अन्य प्रान्तक तज रहे व्यर्थ कुचाली ! इ है लाग्न फगे, कार्य सुनो। मान्यवर गेता विनय सुगा ॥१॥ बदला और दहेज प्रथा पुगि भान वृद्ध का व्याह । इगरी मिल मम चौपट कर दिया हाये कहो निबाह ? याग्य हो बात उसही चुना। मान्यपरनता विनय सुगॉ० ॥२॥ श्राय जाति की समुचित उन्नति, सुधार। इग वाता पै नाक्ष्य दीजिये, दो, कुछ येहा पार ॥ कदा यद करोग निय असुगौं ! गायबर गता विगय सुषमा भाषा, भेष, गाय भर होघे निज मत, ही मेम। ६ ..भूले देगा. मातना इसको निश्चय करले नेग । इसका यत्त हृदय । गुतों। मान्यवर नेता! विगय सु० ॥ मिट अनिधा-रात्रि, सूर्य का हावे ज्ञान प्रकाश। होने 'मा' तबही अपनी देशोन्नति की प्राश। उच्चादश सवा के यों, मान्यवर नेता ! विनय सुगो० ॥५॥ श्ररे । थंडा पानी पिनरा गला सूम्ब रहा है। कुछ नाइने सौर है। प्रार्थना है। हारे और --- , . , 4 " 4. A 1. . - माती फुगात ताप में॥ 1 . * माह-गदिनो -६१ गापग--", गिय पर जाइ यांगता था की आप में। उन्मत्त या पधम्रा साझा, मरती हुई का हाल करना ग प्यारा ' अगसुगी। मेटगा कर यरा उमा हमी यचं उम पाएमां हे प्रमा! जग कगिता ! फरगा क्षमा कमजारिया। पप आत्महत्या पार मे जो हम मर्ग सुकुमारियां ॥5॥ मादा-पिताजी ! खूप काय जात पडता है । जरा ओर पागी (पागा) हे गम! हे प्यागें गोहिमी ' तुझे धन्य है जो मेरे पहिस हो मेर वागतार्थ स्वर्ग में पहुच चुलगा मैं तुझे यहाँ मन्तुष्ट म फर पका अस्तु अव यहाँ भाकर अवश्य करू गा। वहाँ यहाँ ८ समान युगतियों का नश मा नहीं है। पाit-11-11 {पाणीपी) श्री Er! तानो दश से कुगतियों का मिटाने क लिपे, युवकों, गनाओं और देशरासियाम प्राधा फार गर है-गर्मस्पर्शी विती सुना गई ६ कुराति दयी या पनियादी पर सादाग होगद हैं। मैं भी हो का तैयार है। यदि आप सब उप- मियत सजग, हम चार प्राणिया का निदाा देन, शिक्षा प्रहण परें, देश में कुरीतियों के मेटा का हून्द्रय से आश्वासन दे ता में सुग्न से प्राण विमजी कर और हम चागे की प्रारमा को भी स्वर्ग में शांति मिले। पडित सुरेशचन्द्र पावक-[मय उपस्थित मज्जों स सलाह पर समाँ का और से ] गिय गाहा हम सब इश्वर को साक्षी दे धर्मपूर्वक हत्य, से प्रतिज्ञा करत हैं कि . 1 -- १२ मोग-गोदिती TE - - "तुम मचा की गन्तिम इच्छानुसार ही हम पंघ दुर्ग. तियों का मूलीच्छद कांगे शीर नग, गा, धन म दश. जाति शोर समाज की मघा करन क हेतु पाटिबद्ध है। पाप हदय में शांति धारण गरिये। माननी-(गर) पुत्र में भी प्रतिज्ञा करती है कि श्रीजही म मेरे नमा7 बा, इठा माताओं, यदिगोका “दाना विवा" तथा अन्य फुगतिया की हानियां घनमा समा को पेस मार्यो म सदैव गंगनी हुँगी। - मोहग-(पानी पाप्रमन हा) बन च्छा। पिताजा, गाता । जी गुरु मित्र, सम्बाधा शादि मय ही क्षमा इंग्यि। रिम प्रार्थना है कि म सादात या संघ मा- णियों मा घशा ही भारत का गपुर जा दे ताकि हम भी उनका संशज कर सके। पम प्रणाम में व' । 4. 'दु चु" द्धि ६ व । ('इरि प्रां३म् कणगाविचीय साग ही जागान्त'). ही में टेलीग्राम की 'ri उस रुहदी साठी 2 गज- गार में ६० ६जार भी हाल मापद वसुध हाना होश म श्रीने गर विक्षिप्त होने सण दिखाई देगा ] ना- (A) (गह। मूखंता' दुग्रह कारगा 'यायचाई" म या घर, [धा 6 पूर्ण ] या ) हे प्रभु " (PETE) - - दश्वर . 1 A 1 १

Mohan-mohini

Author
Chaturvedi,pt.kanhaiya Lal
Title
Mohan-mohini
File name
Mohan-mohini
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2011/01
Publisher
Mohan Press Itava
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546509
Barcode
4990010024977.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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MdsHPn3p41T
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