Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Siddhantsaradisangrah

Soni, Pandit Pannalal · 2011/09

PDF Proofread

Front matter

प्रका
मापूपम प्रेमी,
हिन्दी-प्रम्प-एमाकर कार्यालय,
रापाप पो मिरर बाई।
मिन्टर मगशराम रुकी
कर्नाटकस्टीम प्रेस
१५ ठामवार मन

an निवेदन । । दिवगत दानवीर सेठ माणिकचन्दके नामको चिरस्मरणीय बनानेवाली पन्यमालाका यह २१ वाँ अन्य प्रकाशित हो रहा है। यह एक अन्य नहीं, केन्तु छोटे वडे २५ ग्रन्योंका गुच्छक है। अब तक मालामें इस प्रकारके ६ गुच्छक प्रकाशित हो चुके हैं, यह सातवा गुच्छक आगे भी इस प्रकारके अनेक ग्रन्थगुच्छ प्रकाशित करनेकी हमारी इच्छा है । क्योकि हमारे दिगम्ब- राचार्यों और विद्वानोंके बनाये हुए इस तरहके छोटे छोटे किन्तु महत्त्वपूर्ण ग्रन्थोंकी सख्या बहुत अधिक है और उनके प्रकाशित होनेकी भी बहुत आवश्यकता है। इस गुच्छक, सब मिलाकर २५ ग्रन्थ हैं जिनमें ६ प्राकृत तथा अपभ्रशके और शेप १९ सस्कृतके हैं। इनमें दो टीकासहित और शेष सव मूल मात्र हैं। प्राकृत ग्रन्योमें सिद्धान्तसार और निजात्माकप्टके अतिरिक्त शेप चारो अन्योंकी सस्कृतच्छाया नई बनवाई गई है और उसके कर्ता श्रीयुक्त प० पन्ना- लालजी सोनी हैं। इस सग्रहके अधिकांश ग्रन्थ अलभ्य नहीं तो दुर्लभ्य अवश्य हैं। बहुत कम सरस्वती-मडारों में इनकी प्रतियाँ हैं। जिन जिन सजनोंकी हस्तलिखित प्रतियोंकी सहायतासे यह गुच्छक तयार हुआ है, उन सबका उल्लेख एक जुदा पृष्ठमें कर दिया गया है। यहाँ हम उनके प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकाशित करके अनेकानेक साधुवाद दिये बिना नहीं रह सकते । ग्रन्थमालाके लिए उनकी इस कृपाको हम बहुत वही सहा- यता समझते हैं। जैनधर्मभूपण श्रीयुत ग्रह्मचारी शीतलप्रसादके भी हम बहुत ही कृतज्ञ हैं जिनकी इस ग्रन्यमालाके प्रति हार्दिक सहानुभूति है और जिनके परिश्रम और प्रयत्नसे मन्थमालाको लगभग दस हजार रुपयोंकी सहायता प्राप्त हो चुकी है।

हमारे ममेड मिमोन और विज्ञामी सिमपत प्रमाणाम
सम्पारण मौर संगोपन सन्तोपासनहीनता है। भगवदीपा विधवट
निर्मदी मममा इस योपो हम सीमर प्रवेमौर बा
बमारी परसे बाहर मी नहीं है, परन्तु इसमे पर मनेम यो कठिनाइमा ।
मी साधारणही है।
एक तो मारा समाज इस विषय, पाप ग्यासीन है। सापारम
मेगो बात तो जाने वीविप, बड़े को पण्डितों और विद्वानों का इस
पास मोह विशेप मनुरामा नहीं और पही कारण है कि प्रथम
परवेपर मी मोकी जितनी चाहिए तभी हस्तलिखित प्रतिमा में प्राप्त
महोती है और इसका पतामहम ममेक प्रकार एक
ही एक परी मी प्रतिक मानरसे मुमित व्यना पड़ते है और इससे ऐसा
चाहिए पैसा संयोधन नही सकता है।
दूसरे प्रत्यसपोपम और सम्पादन ममी मी पर णो मोर इस
साराममेवाणे तपाबी बोस पूरा पूरा परिणाम समेष मुला
शिान हमारे समाबमें मामा समाव।
तीसरे माणा म बात ही पोदारे और इसलिए इस काम
दिखना चाहिए रवा दी बिलाचा समता (बब सकिए मो
चार कि बिहार सस्पसे बरसे बायें और ग्नेम्पाप-सोपा
मम मम्मामापा जाप स्पनीलविचित मन्यौकी प्रतिमा मास
कायम सर्वसाधारण सबनो वा पिशामोशे सहायता प्रसवो उन सक
इस वोपम सर्पका दूर हो बाबा कमि। ति मी मार सकता
इस विषष प्रचलनमम मा जाता है।
पाम भोजीपाते कि संचत मालत मॉकी बिगुवती
मोदी होती, मातम मास बीमबोगोंकी भपिशापवायकी
पोर एपी और पापी धर्माम्मानोराम प्रयोग सौ सौ पो दो सौ
मणिचा विवान मलिए रोग बाती रोगी। एस एम सर
मोने मारी इस माया पूर्व भी मिा पात मच वो सारा ममाहीस
मोरसे बासीय रिज्म देखा है। सम्ममै नही मा मिधर्मी
गति और प्रभावना परवाले इस शासनामकी मारमामेम सममे।

अन्तमें इस गुच्छकके एक नोटके सम्बन्धमे थोड़ीसी सूचना देकर हम इस निवेदनको समाप्त करेंगे। इस गुच्छकके पार्श्वनाथस्तोत्रके नीचे श्रीयुक्त पं० पन्नालालजी सोनीने इस प्रकारका नोट दिया है-"अस्य स्तोत्रस्य दशरामशरारूपा एकैव प्रेसपुस्तिका सप्राप्ता सातु बाबू जुगलकिशोरजी' इत्येतैः सशोधिताप्यतीवाशुद्धा । अर्थात् इस स्तोत्रकी एक ही प्रेसकापी प्राप्त हुई, जो कि वाबू जुगलकिशो- रजीके द्वारा संशोधित होनेपर भी अतिशय अशुद्ध थी। इस पर श्रीयुक्त बाबू जुगलकिशोरजी अपने पत्रमें लिखते हैं कि “उक्त नोटको पढकर मुझे बहुत दुख हुआ। क्योंकि उसमें पुस्तककी प्रेसकापीका मेरे द्वारा सशोधन होना लिखा है, जो बिल्कुल मिथ्या है। मैंने कभी आपको यह नहीं लिखा कि इसका संशोधन मेरे द्वारा हुआ है। इसकी कापी आराके एक पुजारीसे कराई थी और फिर प० शान्तिराज आदिने 'कापी टु कापी' मिलान मात्र किया था। सशोधन दूसरी वस्तु है। मालूम नहीं सोनीजीने यह नोट किस आधार पर दिया है।" हमको भी आश्चर्य है कि पण्डितजीने ऐसा नोट क्यों दिया, विशेष कर यह वात बहुत ही खटकनेवाली है कि 'वावू जुगलकिशो- रजीके द्वारा सशोधित होनेपर भी बहुत अशुद्ध थी।' यदि यह वात बाबू साहवको नीचा दिखानेके खयालसे लिखी गई है, तो बहुत ही अनुचित है - विनीत- नाथूराम-प्रेमी। .

प्रार्थना।
यह ग्रन्यमाला प्राचीन जैनग्रन्मोंका जीर्णो
दार करनेके लिए निकाली गई है। इसमें प्रका
शित हुए अन्य मिना किसी मुनाफरक, लागतक
मूल्य पर घेथे आते हैं । इसकी सहायता करना
प्रत्येक मैनीका फर्तम्य है। इसके फ्णमें चन्दा
देने और इसके अन्योंको खरीदने क्या बोटनेसे
इसकी यथेष्ट सहायता हो सकती है।
—मंत्री।
La

ग्रन्थकर्ताओंका परिचय । जन १-श्रीजिनचन्द्राचार्य । इस सग्रहके प्रथम प्रन्थ 'सिद्धान्तसार के मूलकर्ता जिनचन्द्र नामके आचार्य हैं जैसा कि उक्त प्रन्थकी ७८ वी गाथासे और उसकी टीकासे भी मालूम होता है। प्रारभमें 'जिनेन्द्राचार्य' नाम संशोधककी भूलसे मुद्रित हो गया है। इस नामके कई आचार्य और भट्टारक हो गये हैं, परन्तु ग्रन्थमें प्रशस्ति आदिका अभाव होनेके कारण निश्चयपूर्वक यह नहीं कहा जा सकता कि इसके कर्ता कौन हैं और इसकी रचना किस समयमें हुई है । आश्चर्य नहीं जो इसके कर्ती भास्करनन्दिके गुरु वे जिनचन्द्र हों जिनका कि उल्लेख श्रवणबेल्गुलके ५५ वें शिलालेखमें किया गया है। मद्रासकी ओरियण्टल लायब्रेरीमें तत्त्वार्थकी सुखवोधिका टीका (न० ५१६५) की एक प्रति है, उसकी प्रशस्तिमें लिखा है, तस्यासीत्सुविशुद्धदृष्टिविभवः सिद्धान्तपारंगतः शिष्यः श्री जिनचन्द्रनामकलितश्चारित्रचूडामणिः । शिष्यो भास्करनन्दिनामविबुधस्तस्याभवत्तत्त्ववित् तेनाकारि सुखादिवोधविषया तत्त्वार्थवृत्तिः स्फुटम् ॥ इससे मालूम होता है कि यह टीका भास्करनन्दिकी बनाई हुई है और उनके गुरु जिनचन्द्र सिद्धान्तशास्त्रोंके पारंगत थे । जिनचन्द्र नाम के एक और आचार्य हो गये हैं जो धर्मसग्रहश्रावकाचारके कर्ता प० मेधावीके गुरु थे और शुभचन्द्राचार्यके शिष्य थे। ये शुभचन्द्राचार्य पद्मनन्दि आचार्यके पट्टधर थे और पाण्डवपुराण आदि प्रन्थोंके कर्ता शुभच- न्द्रसे पहले हो गये हैं। ५० मेधावीने त्रैलोक्यप्रज्ञप्ति प्रन्यकी दानप्रशस्तिमें* उनका परिचय इस प्रकार दिया है * देखो पिटर्सनसाहवकी चौथी रिपोर्ट और जैनहितैषी भाग १५, अक ३-४ ।

८ मय भीमूससस्मिपन्धिसमाजनि। बलात्कारगणस्ता गम्मा सारस्वतस्वमूत् ॥ ११॥ तबामनि प्रभाचम्द्रा सरिचन्द्राजितागजा। दर्शनवानवारिणतपोषीर्यसमपिता ॥१२॥ भीमाम्पमूष मार्तण्डस्तत्पशेवयमूपर । पग्रनन्दी बुपानम्दी समग्छेदी मुनिप्रमुः ॥१३॥ तत्पशम्भुमिसपम्नः शुममम्द सतां पर। पंगासवनदावानि कपायस्मापयशनिः ॥१४॥ सदीयपशम्बरमानुमाळी समाविनानागुपरस्मशाली । मशरकमीधिनचन्द्रामा सैदान्तिकामा मुषिपोस्ति सीमा १५ इससे मामम होता है बिनचा मी शान्तिक बिहान बेमौर इस ए च विद्यन्तसारन इनके द्वारा भी निर्मित होना सब प्रचारसे संभव। 4 मेपालीकी गा प्रशस्ति वि संपत् १५१९ में लिखी मा की और उस समय बिनयन महारक मौत बतएव सिम्तमारा स्वामी इसी म्पभम मागमा सम्वा है। मिशनवसारक संतवटामभर पापमपान सम्म सा मागे निश्चय लगा मानी संगत् १५१४१ सभाता है मतएप पर वाप इस सम्बकी प्रकियामा पचास मत है। बल्कि इन योगोंकी समयसमीपवाको रेपन मारावा. म अबषयको गरम मपी पहने-माग समामेक-दो चिमचना प्रबासी टोल चिनेन त्वामा होगा और इससे मारना मैं मास्परमम्बिके गुर बिसयमको अपेक्षा 4 मेवाणी गुर बिरयानी सिमान्तसार को होने दिवसमें विशेष संभावना है। इस सिसन्दधारको एककनी गैन मी प्रमापनकी ना tt भौर पारा मस्ती मपदमें मौसमपत्री बनी जज, मापही मागम हो सभा २,३-म० भीझानभूपण और शुमचंद्र । सेमामे मम्मानमा सिससार माय मौर म प्रम- A मंगपति या मामयत्ति मामा र प्रचपित एऔर पिके - प्रथके कता भ० शुभचद्र ज्ञानभूषण के प्रशिष्य थे, अतएव इन दोनोंका परिचय पाठकोंको एक साथ कराया जाता है। सिद्धान्तसारके भाष्यमें यद्यपि भाग्यकारने अपना कोई स्पष्ट परिचय नहीं दिया है और न उसमें कोई प्रशस्ति ही है, परतु मगलाचरणके नीचे लिखे लोकसे मालूम होता है कि वह भ० ज्ञानभूपणका ही बनाया हुआ है श्रीसर्वशं प्रणम्यादी लक्ष्मीवीरेन्दुसेवितम् । भाष्यं सिद्धान्तसारस्य वक्ष्ये ज्ञानसुभूपणम् ।। इसमें सर्वज्ञको जो ज्ञानभूपण विशेषण दिया है, वह निश्चय ही भाष्यकर्ताका नाम है। और भी कई ग्रन्यकर्ताओंने मगलाचरणोमें इसी तरह अपने नाम प्रकट लिये है।। उक्त मगलाचरणके 'लक्ष्मीवीरेन्दुसेवितम्' पदसे यह भी मालूम होता है कि लक्ष्मीचन्द्र और वीरचन्द्र नामके उनके (ज्ञानभूपणके ) कोई शिष्य या प्रशिष्यादि होंगे जिनके पढनेके लिए उक्त भाष्य बनाया गया होगा। ज्ञानभूषणके प्रशिष्य शुभचन्द्राचार्यकी वनाई हुई स्वामिकार्तिकेयानुपेक्षा-टीकाकी प्रशस्तिके १०-११वें श्लोकमें जो कि आगे उद्धृत की गई है-इन लक्ष्मीचन्द्र और वीरच- न्द्रका उल्लेख है और उस उल्लेखसे हम कह सकते हैं कि भाष्यके मगलाचरणका 'लक्ष्मीवीरेन्दुसे वितम्' पद उन्हींको लक्ष्य करके लिखा गया भट्टारक ज्ञानभूषण मूलसघ, सरस्वतीगच्छ और वलात्कारगणके आचार्य थे। उनकी गुरुपरम्पराका प्रारंभ भ० पद्मनन्दिसे होता है। पद्मनन्दिसे पहलेकी परंपराका अभी तक ठीक ठीक पता नहीं लगा है। १ पद्मनन्दि-२ सकल- कीर्ति-३ भुवनकीर्ति और ४ ज्ञानभूपण। यह ज्ञानभूषणकी गुरुपरंपराका क्रम है। ज्ञानभूषणके वाद ५ विजयकीर्ति और फिर उनके शिष्य ६ शुभचन्द्र हुए हैं और इस तरह शुभचन्द्र ज्ञानभूषणके प्रशिष्य हैं । यहाँ यह कहनेकी आव- श्यकता नहीं कि प्रत्येक भट्टारकके अनेकानेक शिष्य होते थे, परतु उपर्युक यथा सोमदेवकृत नीतिवाक्यामृतमें-" सोमदेवं मुनि नत्वा नीतिवाक्या- मृत ब्रुवे।" और अनन्तवीर्यकी लघीयस्त्रयत्तिमें-" अनन्तवीर्यमानौमि स्याद्वादन्यायनायकम्" इत्यादि । aho विपकममें समान नाम दिया गया है जो एक बार सरे ममरको पर या मी अधिषरी होते गये। उ सिमामको सामने किए हम मागे स्वामिप्रतिमामुप्रधा-टोचकी प्रथस्ति न्वत श्रीसूससंघेजमि मन्दिसंपाबरोपणाकारगप्पप्रसिया। मीकम्पकुम्दो परत्रिवर्गो विमावि मामूपणमूपिताहर सदापये भीमुमिपसनदी ततोऽभषीसकलाविकीति।। व्यम्पये मीमुषनादिकीती मीशानमयो परतिस्पा ॥३॥ तपम्पये भीविजयाविकीर्तिस्तत्परमारी शुभचन्द्ररेषा। तेनेयमाकारि विशुदका मीमत्सुमस्यादिसुकीतिम।४॥ सरिमीशुमचन्द्रण पाविपर्वतषमिणा। विधिपेनानप्रेमाया परिभिरविता पण ५॥ भीमविकममूपयो परिमिते बर्षे ते पोरशे मापे मासि यशाप्रवादिसहिते पाते दशा सिपी । मीमधीमहिसारसारनगरे त्पालये भौगुरो मीमग्रीशुभमयदेवविदिता ठीका सवा नंबतु ।। पपिभीसमचम्रेण थिमपेग मार्यमा (१)। शुमचन्द्रगुरो स्वामिन् करटीको ममोह ७० वन भीशुभचन्द्रमविपेन गणशिना । कार्वियानुसाया पत्सिपिरपिता पपnca तप्प सापुसमस्यादिकीविना रुवमार्थना। साहिता समन शुभपण परिणाम मशरकपदापीशा मूमसंपे पिदा भरा। एमाधीवामपगुरषो दिगणेशिनः । १० मम्मीचगुरस्वामी शिप्पस्वस्य सुपीयधाः । प्रधिविस्तारिता रोम मीशुभेम्खुमसावता । १५ इति भीस्पामिकाकियालुमेसापां मिविपरिचाप-परम्पाकवि- पश्यतिमौथुमचाविपिता मां *प्रो पिरसरका पोत सन् १८५४ कोपी है।

आगे शुभचन्द्राचार्यकी शिष्यपरम्पराका क्रम इस प्रकार निश्चित होता है.- ७-सुमतिकीर्ति-८ गुणकीर्ति-९वादिभूपण-१० रामकीर्ति-११ यशः कीर्ति और १२ पझनन्दि आदि । इनमेंसे वादिभूषण तकको परम्पराका उल्लेख अध्यात्मतरगिणीकी उस प्रतिके लिखनेवालेकी प्रशस्तिमे मिलता है जो स्व- गीय दानवीर सेठ माणिकचन्दजीके सरस्वतीभण्डारमें मौजूद है और वादिभूपणके वादके भट्टारकों का उल्लेख बलात्कारगणकी गुवावलीमें है जो भ० नेमिचन्द्रकी वनाई हुई है और हमारे पास मौजूद है। जैनसिद्धान्तभास्करकी प्रथम किरणमें (पृ० ४५-४६ ) प्रकाशित शुभच- न्द्रकी पट्टावलीसे भी यही क्रम निश्चित होता है। श्रीज्ञानभूषण मागबाडे (बागड़) की गद्दीके भट्टारक पदपर आसीन थे । भास्करकी चौथी किरण ( प० ४३-४५) में जो पट्टावली प्रकाशित हुई है उससे मालूम होता है कि "वे गुजरातके रहनेवाले थे। गुजरातमें उन्होंने सागार- धर्म धारण किया, अहीर (2) देशमें ग्यारह प्रतिमा धारण की और वाग्वर या बागड़ देशमें दुर्धर महाव्रत ग्रहण किये । तौलव देशके यतियों में उनकी बडी प्रतिष्ठा हुई, तैलग देशके उत्तम उत्तम पुरुषोंने उनके चरणोंकी वन्दना की, द्रविड देशके विद्वानोंने उनका स्तवन किया, महाराष्ट्र देशमे उन्हें बहुत यश मिला, सौराष्ट्रदेशके धनी श्रावकोंने उनके लिए महामहोत्सव किया, रायदेशके निवा- सियोंने उनके वचनोको अतिशय प्रमाण माना, मेदपाठ ( मेवाड़) के मूर्ख लो- गोंको उन्होंने प्रतिबोधित किया, मालवदेशके भव्य जनोंके हृदयकमलको विकसित किया, मेवात देशमें उनके अध्यात्मरहस्यपूर्ण व्याख्यानसे विविध विद्वान् श्रावक प्रसन्न हुए, कुरुजागल देशके लोगोंका अज्ञान रोग दूर किया, तूरव (१) के षट्दर्शन और तर्कके जाननेवालों पर विजय प्राप्त किया, विराट् देशके * “सवत् १६५२ वर्षे ज्येष्ठद्वितीयकृष्णदशम्यां शुक्रे मूलसंघे सरस्वती- गच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दकुन्दान्वये भ० श्रीपद्मनन्दि देवास्तत्प? भ. सक- लकीर्तिदेवास्तत्प? भ० भुवनकीर्तिदेवास्तत्पट्टे भ० ज्ञानभूषणदेवास्तत्प? भ. श्रीविजयकीर्तिदेवास्तत्प? भ. शुभचन्द्रदेवास्तत्प? भ. श्रीसुमतिकीर्तिदेवा- स्तत्पढे भ० श्रीगुणकीर्तिदेवास्तत्प? भ० श्रीवादिभूषणगुरुस्तच्छिष्य प० देवजी पठनार्थ।"

गोपांग्मय माम (सापार भनमार ! ) विवहा ममियात (निमालपमें चैनपर्मी प्रमावना की टय राटाबटी मापा मार (1) माल धनपर्गेमें प्रतियोप विमित्त विहार किया मैरव मामा रामाने रसकी मधि की रा बाने पर पूर्व राजाधिराम देवरामचरणोंकी बाराधमाकी मिममममारा पल मुनितियार रामरावरान पोम्मरसराय बम्पराम पामराव मावि राणा बोने पर पूर्व मैर नोंने भनेक तीनको मात्रा दी। मारम-द- पचार-साहित्य-वा-मामम-अम्माम माद साखरूपी मगेपर बिहार परने लिए वे रागस पे वीर सप्पामायतपारी उ मासा दी। इस कपिलपून पर्मनसे पाबमएप मारपती महत्पका बहुत स पता समक्षा बसमै सम्रा महोवेभपने समय बहुत ही प्रशित प्रविपित बौर विधान - भाबमूगम पत्यारवरपिपी मोर नियन्तसार-मापदो मेब सुविध हो पुरे । परमापिरेप पीघ्र ही प्रचशित हो । यो विभाग मिनिया बसपको परिकारीषा पचास्तिकावरीन सयपोधापन भादौतर-कम महामरोपाप और परसतीपूषा - इन प्रोम मीशानम्पम नामसे योग मिया 21 संभव नौ ममीशानभूपये प्रम मी सामिक हो। - • 'गौम्मठसारी को मी 5 मोगोंमे शावमएमत मान रमवा परंतु पास है । १६ नपस्त १९१५मिनमे इस गचाकीको प्रस्ति प्रमा पितो उससे मबम होवाइस पाप मैमिषमनिहोरेगाव भूपप से दीक्षा की मारक प्रभावन बिमाबापर पर विसमा पा बक्षिच देखणे अतिर भाचार्य मुनिष पास बिनोने सिखाम्त पो में पोनि चिये नगरपना पहायता दीपी और को समाप्रपारीके भामरण गुरावसे मार प्रिन्ट (तिौर ) में विनरामपार बगवे हुए पाक्षमाव-मन्दिरमे रो। बहरीनपारनियम बत् ११.. मैं समाप्त हा है। मोम्ममवार तक मासे ११ मलिम संगर (10-11 १५.+14). • पता भवरष क मैमिषन गुरू जसपर मी बोईसरेदीमाबमूगमबोसिससार भारतात सौ पानी बार।

१३ " सिद्धान्तसार भाष्यकी रचना किस समय हुई, यह जाननेका कोई साधन नहीं है, परन्तु तत्वज्ञानतरगिणी विक्रम संवत् १५६० में बनी है । यथा- यदैव विक्रमातीताः शतपञ्चदशाधिकाः। पष्ठिसंवत्सरा जातास्तदेयं निर्मिता कृतिः ॥५३॥ जैननिद्धान्तभास्कर (किरण ४ पृ. ९६ ) में उसके सम्पादक महाशयने लिखा है कि ज्ञानभूषण वि० स० १५७५ तक भट्टारक पद पर आसीन रहे है, परन्तु यह उन्होंने किस प्रमाणके आधार पर लिखा है यह मालूम नहीं हो सका। वीसनगर (गुजरात) के शान्तिनाथके श्वेताम्बर मन्दिरको एक दिगम्बर प्रतिमा पर इस प्रकारका लेख है -“सं०१५५७ वर्षे माधवदि५गुरौश्री मूलसंधे सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दकुन्दाचार्यान्वये भ० सकल- कीर्तिस्तत्पट्टे भ० श्रीभुवनकीर्तिस्तत्पट्टे भ० श्रीज्ञानभूषणस्तत्प? म० श्रीविजयकीर्तिगुरूपदेशात् हूंवडज्ञातीय . . एते श्रीशा- न्तिनाथं नित्यं प्रणमन्ति । इसी तरह पेथापुरके श्वेताम्बर मन्दिरकी भी एक दिगम्बर प्रतिमापर लेख -"सं० १५६१ चैत्रवदि ८ शुक्र मूलसंघे भ० शानभूषण भट्टारक श्रीविजयकीर्ति उपदेशात् हुम्बड़ कडुआ श्रीनेमिनाथविम्बं । इन दोनों लेखोंसे मालूम होता है कि वि० स० १५५७ और १५६१ में ज्ञानभूषणजी भट्टारक पदपर नहीं थे किन्तु उनके शिष्य विजयकीर्ति थे। इससे यह मानना भ्रम है कि वे वि० स० १५७५ तक भट्टारक पदपर थे । वास्तव में वे १५५७ के पहले ही इस पदको छोड़ चुके थे और इस लिए तत्त्वज्ञानतरगिणीकी रचना उन्होंने उस समय की है जब भट्टारकपद विजयकीर्तिको मिल चुका था । पूर्वोक्त 'जैनधातुप्रतिमा लेखसग्रह' नामक ग्रन्थमें विक्रम संवत् १५३४- ३५ और १५३६ के तीन प्रतिमालेखx और हैं जिनसे मालूम होता है कि उक्त सवतोंमें ज्ञानभूषण भट्टारक पदपर थे । अतएव उन्होंने १५५७ के पहले ही * देखो श्रीवुद्धिसागरसूरिसम्पादित 'जैनधातुप्रतिमालेखसग्रह,' प्रथम भाग, पृष्ठ ८७ और १२३ । ४ देखो न० ६७२, १५०९ और ५६७ के लेख ।

बमबमी प्रमापया की छापा मम माग (सागार मनमार 1 ) दिसमय नमिसाइ (लिमस) रेप प रागावटी नागर बास (1)बार बनपमि प्रतिगोप निमित्त विहार या मैरप माम रामाने समकी मचिकी नारा माने पर पूर्व समाभिरामदेवरायने परपोषी मारापना की नियम भाप मा मुविभिन्मार राममाषराम पोम्परसराम पर पापुराय माद राजा मोने पाप पूर्व भौर रनोने भनेक तीमोदी यात्रा की। मार-म- बगर-सारिप-रामायम-बम्परम बार साखरूपी कमपर विर करने के लिए रामसरे भीर र भामामृतपानकी मासा दी। इस नित्वपूर्ण मनसे शाम्पस मारली मावा पता पवा है। इधर्म सन्ग नहीपने समय गत ही प्रभिर प्रतिष्ठित मौर विद्वान् म चारमूरप पावरगिनी और सिन्धार माप मेरो प्रेम मुदित से पुरे । परमापदेश पीनही प्रमशितोष्ण । इन सिवाम नेमिनिषा ममम्मी पनिटीका पचास्तपाठीका राममोपापन भादासर सम्प मधामरोपापन और सरस्वतीपून पन्नों मोहाबपको नामसे गोर मलता है । सेम इनमें बम हमी यमपम प्रप भी बामिल हैं। - 'योम्मटसापटीप दो मी सोयो शानभएमा मान परत गामह । गत १९१५ ममिव में सभी को मस्ति पत्र मित इससे माहम होता सकता मैमिषम विनोहान भूपन से दोधा की मार प्रमावबने बिनभावार्मपर पर नियया पा पमिन रेप सनिय भाषाय मुमिचो पास विनि विसरात परे. विधाकानि बिर्ग रोमापनाम पावतारी गोभीर बोमनामधारोके मापन रातसे मार विमान (तार ) में निगरापार प्रमाणे हुए पासमार समिरमा पदम पीरनियाप संपत् ..में समाप्त हर है। मोम्माचार कता मनसे 1. में वियर (210-11 १५ १+१५). • पवारे पाप र मेमिधरो गुरबाण मो कोई मोदीनगन। शिसार भापयपि सो वा मीरा मार है।

उद्यापनमदीपिष्ट पल्योपमविधेश्च यः। चारित्रशुद्धितपसश्चतुस्त्रिद्वादशात्मनः ॥ ७६ संशयिवदनविदारणमपशब्दसुखण्डनं परं तर्क । सत्तत्त्वनिर्णयं वरस्वरूपसबोधिनी वृत्तिम् ॥ ७७ अध्यात्मपद्यवृत्ति सर्वार्थापूर्वसर्वतोभद्रम् । योऽकृतसयाकरणं चिन्तामणिनामधेयं च ॥ ७८ कृत येनागप्रज्ञप्तिः सर्वाङ्गार्याग्ररूपिका । स्तोत्राणि च पवित्राणि पड्वादाः श्रीजिनेशिनां ॥ ७९ तेन श्रीशुभचन्द्रदेवविदुपा सत्पाण्डवाना परम् । पुष्यत्पुण्यपुराणमत्र सुकरं चाकारि प्रीत्या महत् ॥ ८० श्रीमद्विक्रमभूपतर्द्धिकहते स्पष्टाष्टसंख्ये शते रम्येऽष्टाधिकवत्सरे सुखकरे भाद्रे द्वितीयातिथौ । श्रीमद्वाग्वरनिर्वृतीदमतुले श्रीशाकवाटे पुरे श्रीमच्छीपुरुषाभिधे विरचितं स्थेयात्पुराणं चिरम् ॥ ८६ अर्थात् पाण्डवपुराणके कर्ता शुभचन्द्राचार्य के बनाये हुए नीचे लिखे प्रन्थ पर १ चन्द्रप्रभचरित, २ पद्मनाभचरित, ३ जीवधरचरित, ४ चन्दनाकथा, ५ नन्दीश्वरकथा, ६ आशाधरकृत अर्चा (नित्यमहोद्योत) को टीका, ७ त्रिशच- तुर्विंशतिपूजापाठ, ८ सिद्धचक्रवतपूजा, ९ सरस्वतीपूजा, १० चिन्तामणियंत्र- पूजा, ११ कर्मदहन विधान, १२ गणधरवलयपूजा, १३ (वादिराजकृत) पार्श्व. नाथकाव्यकी पजिका टीका,* १४ पल्यव्रतोद्यापन, १५ चतुस्त्रिंशदधिकद्वादश शतोद्यापन ( १२३४ व्रतका उद्यापन ), १६ सशयिवदनविदारण ( श्वेताम्बर- भतखण्डन), १७ अपशब्दखण्डन, १८ तत्त्वनिर्णय, १९ स्वरूपसम्बोधन- ( अकलकदेवकृत ?) की वृत्ति, २० अध्यात्मपद्यटीका, २१ सर्वतोभद्र, २२ चिन्तामणि नामक प्राकृतव्याकरण, २३ अगप्रज्ञप्ति, २४ अनेकस्तोत्र, २५ षड्वाद और पाण्डवपुराण । * यह ग्रन्थ स्वर्गीय सेठ माणिकचन्दजीके ग्रन्थभाण्डारमें मौजूद है। x यह प्रन्थ माणिकचन्दग्रन्थमालामे प्रकाशित होनेवाला है।

मेसी समय या पद छोम। पर यह निश्चय कि मशरक परोनेके
बार भी पा समयता बीवित रहे हैं।
माधम बम भी बहुत बड़े विद्वान् ए है। विनिमविषावर (पपागम
मुखमापम भौर परमागम शाता ) मौर पदमापाकनिषापा पे सनकी पदनियों
दी। मातरमें प्रशस्ति पारटीम का प्रमाणपरीक्षा पत्रपरीक्षा
पुष्पपरीक्षा(), परीक्षामुर प्रमाननिय म्मायमरर माकुसरचनोदम न्या
गविनिश्चय योपातिक राबवातिक प्रमेयम्ममावण भाप्तमीमांसा माप
हमी चिन्तामणिमीमांसाविबरण पाचस्पतिवरबकोठरी मारिसकायो
बनेन पायमन ऐन पापिनि गप भारि मातरमप्रन्यों ठोक्न
पार गोम्मटसार अम्बिसार सपपासार निठोग्यप्ति इनिप्ति (!) मचा
स्मासासी (1) और महामार मावि साखममुकि पारपामी पे। ग्नाने
बनेश रेशमि प्रहार लिमा बा बनेपाको पामरते समय
समामे बने विदयन राते में पौर गित तौम पूर्व गुमर
मासण मान देशोंके पारपाको उनि पराचित या पा और अपने तमा
पम्प वर्मो से भारी वा पे ।
म उभरमगार बनाये हुए भनेक प्रत और प्राय उन सभीषी मन्तः
प्रपस्तियों में ग्नान भएनी गुरुपरम्परान परिषम गोस्वामिभर्तिकेगा
मुक्षातीकापी प्रवस्ति हम इसी बम पामे उरत र पुर। पागपुरा
नकी प्राप्ति मी नारे पास है। पाम्त नहीं हम उसके गवमे ही भसको प्रभा
मित मरे जिसमें उनकी माम अन्वरचनामोका नोखा-
चम्मनायपरितं चरितार्थ पमनामपरित शुभवम् ।
मम्मचस्प महिमानमतन्मो जीपफस्प चरित च पकार ७२
चम्दनाया कथा पेन मा मान्दीश्वरी तथा।
माशापररताचाार्षाियाति समत्तिशालिमी - ७२
पितुर्विशतिपूजनं च सत्तसिवानमम्पपत्त ।
सारम्मतीपार्थनमा शुर्य चिन्तामभीयानमुपरिष्णा ॥४
भीकर्मवादपिचिपापुसिरासेयों नामागुणोपगणनापसमर्थन छ ।
श्रीपानापपरकाम्पसुपसिका पयासंबफार शुमचायतीम
-

उद्यापनमदीपिष्ट पल्योपमविधेश्च यः। चारित्रशुद्धितपसश्चतुस्त्रिद्वादशात्मनः ॥ ७६ संशयिवदनविदारणमपशब्दसुखण्डनं परं तर्क । सत्तत्त्वनिर्णयं वरस्वरूपसंबोधिनी वृत्तिम् ॥ ७७ अध्यात्मपद्यवृत्तिं सर्वार्थापूर्वसर्वतोभद्रम् । योऽकृतसयाकरणं चिन्तामणिनामधेय च ॥ ७८ कृत येनागप्रज्ञप्तिः सर्वावार्याप्ररूपिका । स्तोत्राणि च पवित्राणि पड्वादाः श्रीजिनेशिनां ॥ ७९ तेन श्रीशुभचन्द्रदेवविदुपा सत्पाण्डवाना परम् । पुष्यत्पुण्यपुराणमत्र सुकरं चाकारि प्रीत्या महत् ॥ ८० श्रीमद्विक्रमभूपतर्द्विकहते स्पष्टाष्टसंख्ये शते रम्येऽष्टाधिकवत्सरे सुखकरे भाद्रे द्वितीयातिथौ; श्रीमद्वाग्वरनिर्वृतीदमतुले श्रीशाकवाटे पुरे श्रीमच्छीपुरुषाभिधे विरचितं स्थेयात्पुराणं चिरम् ॥ ८६ अर्थात् पाण्डवपुराणके कर्ता शुभचन्द्राचार्य के बनाये हुए नीचे लिखे प्रन्थ १ चन्द्रप्रभचरित, २ पद्मनाभचरित, ३ जीवधरचरित, ४ चन्दनाकथा, ५ नन्दीश्वरकथा, ६ आशाधरकृत अर्चा (नित्यमहोद्योत) को टीका, ७ त्रिंशच- तुर्विंशतिपूजापाठ, ८ सिद्धचक्रव्रतपूजा, ९ सरस्वतीपूजा, १० चिन्तामणियत्र- पूजा, ११ कर्मदहन विधान, १२ गणधरवलयपूजा, १३ (वादिराजकृत) पार्व- नाथकाव्य की पजिका टीका,* १४ पल्यव्रतोद्यापन, १५ चतुस्त्रिंशदधिकद्वादश शतोद्यापन ( १२३४ व्रतका उद्यापन ), १६ सशयिवदनविदारण ( श्वेताम्बर- मतखण्डन ), १७ अपशब्दखण्डन, १८ तत्त्वनिर्णय, १९ स्वरूपसम्बोधन- ( अकलकदेवकृत ?) की वृत्ति, २० अध्यात्मपद्यटीका, २१ सर्वतोभद्र, २२ चिन्तामणि नामक प्राकृतव्याकरण, २३ अगप्रज्ञप्ति, २४ अनेकस्तोत्र, २५ षड्वाद और पाण्डवपुराण । * यह ग्रन्थ स्वर्गीय सेठ माणिकचन्दजीके ग्रन्थभाण्डारमें मौजूद है। ४ यह ग्रन्थ माणिकचन्दग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाला है।

- पापमपुरानति संवत् ।। · में समाप्त बा। एप इस पाये हुए परिही माम इस प्रमस्तिसे मासूम हो सकते हैं। पापपरामके पाव मी उनोंने मनेक प्रम्पोषी रचना की होगी और इसके प्रमाण हम पो प्रयोको पेपर सच है-एक तो स्वामिचार्तिदेयायपेषाटीका बो संबर 1991 में समाप्त होरमौर मरा प्रमणमात्र यो संवत् 161 में बना है। वमन करनेसे इस तरा और भी कई अम्बान पता सपना संभव। ४-श्रीयोगीन्द्रदेव । इस महले मोगसार, निझारमाएक भार ममृताशीति मामलमम्मोर त्य भाचार्य पोगाबर। इनमेंसे पाम अपनसमें मरा प्रातम और प्रोपरा संसाव है। परमात्मा की मीगी गोमामाल है। वीप सार बौर परमात्मप्रपाको मा म्पमय एकीपीमि प्राणा रोग भरम उपयोम या ना मोर मगधचरण रोगोभ ममम एकसा है। परममममम मयनरम देखिए- से जाया सापमिपए, कम्मरहेदि । मिथपिरंपपाणमप त परमप्प पपि.१ गोफ्तारमें भी इसीकी - जिम्ममधाणपरिदिया, पम्मकर्षक रहेषि। मप्पा घर जेम पक्ष ते परमप्प पवामि ॥२ इससे इधर्म तो कोई मी सन्दरमही के पकवान दोनोकरी एक गोपीमा विमास्मार और जवानीतिकर्ता मोही बाब पम्वे है। हम दोनों विषय भी गोपौन सा पारा योग मा पास्म है। अपात्मसन्दोह मामन अन्न मी नीम बनाया हमामा बाधा परन्तु ममी तपापी मेमे नहीबाबा। भोपप्रममावासाकी नियमसार-रोध (१५) में तपाचोर भीपागीमदेवा मार मुश्मंगनासिमपुमर्मवसीम भार पप गाय याबो ममवापी में नहीं है। संभव है। पाँच अपामसवारमा उनकममती मम्बनो।

. आचार्य योगीन्द्रदेव कव हुए हैं, और वे फिस सपके आचार्य थे, इसका अभी तक कुछ भी पता नहीं लगा है। परमात्मप्रकाश प्रभाकरमहके सम्बोधनके लिए उसीकी प्रार्थनासे बनाया गया है, ऐसा उक्त प्रन्थमें कई जगह उल्लेख है भार्वि पणविवि पंचगुरु सिरिजोइंदुजिणाऊ । भट्टपहायरि विण्णयउ, विमलकरविणु भाउ ॥ ८ पुण पुण पणविवि पचगुरु, भाविं चित्त धरेवि। भट्टपहायर णिसुणि तुहुं, अप्पा तिहुवि कहवि ॥११ इत्थु ण लिव्वउ पंडियहि, गुणदोसुवि पुणुरत्तु । भट्ट पभायरकारणई, मइ पुणु पुणु वि पउत्तु ॥ ३४२ मालूम नहीं ये भदृप्रभाकर कौन हैं। विद्यानन्दिस्वामीने अपने ग्रन्थोंमें प्रभाकरके और भट्टके सिद्धान्तोंका खण्डन किया है और वे दोनों वडे भारी दार्शनिक हो गये हैं। 'भट्ट' कुमारिलभट्टका सक्षिप्त नाम है। क्या उनके हितके लिए योगीन्द्रदेवने परमात्मप्रकाशकी रचना की थी? परमात्मप्रकाशके सम्बोधनोंको और उसमें प्रभाकर भट्टकी विनीत प्रार्थनाओंको पढकर तो ऐसा नहीं जान पडता है कि वह कोई जैनेतर दर्शनका श्रद्धाल है। वह एक जगह कहता है-'सिरिगुरु अक्खहि मोक्ख महु'-हे श्रीगुरु मुझे मोक्ष बतला- इए। दूसरी जगह वह परमेष्ठीको नमस्कार करता है-'भावि पणविव पंचगुरु । योगीन्द्रदेव भी उसे जगह जगह ' योगिन्' अर्थात् 'हे योगी कहकर सम्बोधन करते हैं। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि वह कोई योगीन्द्रदेवका ही जैन शिष्य है जिसे शुद्ध निश्चयका स्वरूप समझानेका प्रयत्न किया गया है। अमृताशीति (पृ० ९६ ) में विद्यानन्द स्वामीका 'अभिमतफलसिद्ध आदि श्लोक उद्धृत किया गया है और प्रभाकर तथा भट्ट विद्यानन्द स्वामीसे पहले हुए हैं अतएव उनका और योगीन्द्र देवका समसामयिक होना संभव नहीं है। अकलकदेवने भी प्रभाकर और भट्टका खण्डन किया है और अकलकदेव विद्यानन्द स्वामीसे भी पहलेके हैं। समयसारकी तात्पर्यवृत्तिमें जयसेनसूरिने योगीन्द्रदेवका निम्नलिखित दोहा उधृत किया है

पामगपुराव से संवत् १ ८ में समाप्त हमा। भवएप इस गाने
रए प्रोतमाम इस प्रमस्तिसे माघम हो सकते है। पासपुरानो
बाद मी समोंने बने मम्मों षरा की होगी और इसके प्रमाप म
दो अन्धोंभे पेपर सकते है वो स्वामित्रासिमानुपवाटीका को
संवत् १११ में प्रमाप्त मौर मरा पवारण यो संवत् 11
में बमा है। तमापनेसे इस तरह भौर भी को प्रन्योष पवा का
समय।
४-श्रीयोगीन्द्रदेव।
इस संसार मोगसार, निजारमाएक और ममताशीति नामक मन
चा भाचा योगीन है। इनमें से पाम अपप्रमै प प्रातमें और
वासरा संततमे है। परमात्मप्रमहा मी सही गोमीमगी। गोष
मार और परमात्मप्रसपको रसमा ममा एक ही रेपको पामि माया दोष
पभोपलमा ममा और मंगाधरण पौरोध मममम एक
परमारमप्रभाष पमपरम देविए।--
ले जाया सामगिपए, कम्मककरोमि।
मिणिरंजषणापमय वे परमप्प पनि
गोमागरम मी इसीको भना-
पिम्ममसाप्पपरिदिया कम्मकलंकरोपि।
मप्पा उयर जब पते परमप्प पचोमि: २
इस इसमें वो कोई मी सम्पनही हो सन्तान पोगों का एक
गोपावरनिगाया और ममता कता मी ही बाब परवे
है। योगोपलिपप भी मोमोन सम पारा योग वा ममाम है।
भपरमसम्बोर बाम मन्द मी मात्र बनागा मा पा मापा
पर ममी काकादेखने में मही भागा।
भोपपप्रममपारदेशको नियममा-टॉप (1 ५५) में वपापोट
भोपोगीमा पर मुख्यानामिमममेक्सीपमूर्य बार
पप समामो ममता में नहर मोर
अप्पास्वान्दोमा बाबई महसी प्रबन हो।

-- आचार्य योगीन्द्रदेव कव हुए हैं, और वे किस सपके आचार्य थे, इसका अभी तक कुछ भी पता नहीं लगा हे । परमात्मप्रकाश प्रभाकरभटके सम्बोधनके लिए उसीकी प्रार्थनासे बनाया गया है, ऐसा उक्त ग्रन्थमें कई जगह उल्लेस है भावि पणविवि पचगुरु सिरिजोइंदुजिणाऊ । भट्टपहायरि विष्णयउ, विमलकरविणु भाउ ॥ ८ पुण पुण पणविवि पंचगुरु, भावि चित्त धरेवि । भट्टपहायर णिसुणि तुहुं, अप्पा तिहुवि कहेवि ॥११ इत्थु ण लिव्वउ पंडियहि, गुणदोसुवि पुणुरत्तु । भट्ट पभायरकारणई, मइ पुणु पुणु वि पउत्तु ॥ ३४२ मालूम नहीं ये भदृप्रभाकर कौन है। विद्यानन्दिस्वामीने अपने ग्रन्थोंमें प्रभाकरके और भट्टके सिद्धान्तोंका खण्डन किया है और वे दोनों वढे भारी दार्शनिक हो गये हैं। 'भट्ट' कुमारिलभट्टका सक्षिप्त नाम है। क्या उनके हितके लिए योगीन्द्रदेवने परमात्मप्रकाशकी रचना की थी? परमात्मप्रकाशके सम्बोधनोंको और उसमे प्रभाकर भटकी विनीत प्रार्थनाओंको पढकर तो ऐसा नहीं जान पडता है कि वह कोई जैनेतर दर्शनका श्रद्धाल है । वह एक जगह कहता है-'सिरिगुरु अक्खहि मोक्ख महु'-हे श्रीगुरु मुझे मोक्ष बतला- इए। दूसरी जगह वह परमेष्ठीको नमस्कार करता है-'भाविं पणविव पंचगुरु । योगीन्द्रदेव भी उसे जगह जगह ' योगिन्' अर्थात् 'हे योगी कहकर सम्बोधन करते हैं। इससे तो यही स्पष्ट होता है कि वह कोई योगीन्द्रदेवका ही जैन शिष्य है जिसे शुद्ध निश्वयका स्वरूप समझानेका प्रयत्न किया गया है। अमृताशीति (पृ. ९६ ) में विद्यानन्द स्वामीका 'अभिमतफलसिद्धेः' आदि श्लोक उद्धृत किया गया है और प्रभाकर तथा भट्ट विद्यानन्द स्वामीसे पहले हुए हैं अतएव उनका और योगीन्द्र देवका समसामयिक होना समव नहीं है। अकलंकदेवने भी प्रभाकर और भट्टका खण्डन किया है और अफलकदेव विद्यानन्द स्वामीसे भी पहलेके हैं। समयसारकी तात्पर्यवृत्तिमें जयसेनसूरिने योगीन्द्रदेवका निम्नलिखित दोहा - उधृत किया है "योगीन्द्रदेवरप्युर्क- पवि पप्पसा पनि मय, पंधण मोक्तपणे। जिर परमरये मोरपा विणपर पर भर। पपपि बरसेगरिब निश्चित समन माम नहो, परम्त सीपबारे को पंचास्तिकामानि एक प्रति विम पंवत् १५६५ की गियो । परिमापी प्रम्प पपने मसेकम सौ वर्ष पो मौलिखी योगीवी बरसेनाचार्यो लिकमी ठेगा पाप मारना चाहिए भीर तय गोपामा चयप समय वेरापी पताम्बरे पहरेप निषित होता है। नियमसारकी श्रीपपप्रममयरदेशात गेनमें मौ योगोखलेश पप बत से मवेबससे मातम दोवा परप्रमरपसे पासे परे भौर पपप्रमने पाँचपायको पैनके नवम भीपीरममि मुरिणे नम स्थर याद:- पस्प प्रतिकमजमेव सदा मुमुसो- मास्यतिकमप्यमप्यमानमुपा। तस्मै ममा सकससंयमपणाप भीपीरनम्विमुनिनामपपप नित्यं । इससे माइम वा पीवीरवन्दि मुनि पप्रप्रमोगो कोई समसामयिक भावान भीर गरे पूमपीसे रेखते हैं। भाप सोना रोमो प्रारंभ मी सोने तरिचारप पीरमन्दि प्रतीयम् पर माया मारे। परि ये वीरमरिमापारसारकता वीरगति भीर हमारा भनुम्पन ही होंगे तो इससे पप्रममा समय निकम संवत् ११पमा नबित हो पाया है।कोर पोरनन्दिने माघार सार सापडी माम्मानमै इसकी बान समय न १६ लिखा है- स्वस्तिमीमम्मेपपपिपदेषर श्रीपादमसाशसारितारमम भाषसमस्तरियाममापसपरिवर्तिीविश्रामग्रीनम्सियाति कपकपलिंगानु शकपर्ष १० भीमुगनामसंपरसरे ज्योट- । - शुक्ल १ सोमवार दंदु तावु माडिदाचारसारफ्के कर्णाटवृत्तिय माडिदपर" यदि प्रमप्रमका यह समय ठीक है, तो योगोन्द्रदेव वि० संवत् १२११ के भी पइलेके विद्वान् हैं। 'अमृताशीति के ७८ और ७९ वे नम्बरके दो पद्य भर्तृहरिके पैराग्यशतकके हैं। जान पडता है कि प्रत्यकर्ताने इन्हें "ठक च ' रूप में दिया होगा, परन्तु लेस. कोंकी कृपासे ' उक्त च' उद गया है और ये मूल प्रन्यके ही पद्य बन गये हैं। वैराग्यशतकमें भी ये इसी रूपमें मिलते हैं, केवल इतना अन्तर है कि पहले पद्यके पहले दो चरण आगे पीछे है। शतकमें इस प्रकार है.- प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं दत्तं पदं शिरसि विद्विपता ततः किं । इस प्रन्यकी अन्य प्रतियोंमें 'उक्त च' पद अवश्य लिखा मिलेगा। योगसार और परमात्मप्रकाशकी भापाके सम्बन्धमे हम इतना और कह देना चाहते हैं कि जसा बहुत लोगोंने समझ रक्खा है, वह प्राकृत नहीं है किन्तु अप. भ्रश है जो एक समय लोकभाषा या बोलचाल की भाषा रह चुकी है और दिगम्बर विद्वानोंने जिसमें सैकड़ों प्रन्योंकी रचना की है । इसके प्रयोग प्राकृत व्याकरण के नियमोंसे सिद्ध नहीं होते हैं। जर्मनीके सुप्रसिद्ध विद्वान् डा. हर्मन जेकोबीने अभी कुछ ही समय पहले दिगम्बर कवि पंडित धनपालके 'पचमी-कहा' (पञ्चमीकथा ) नामक प्रन्यको प्रकाशित करके इस मापाके सम्बन्धमे बहुत गहरा प्रकाश डाला है । इस भापाका साहित्य सभवत चौथी पाँचवीं शताब्दिसे प्रारंभ होता है। जैनसमाजके पण्डितोंका ध्यान हम इस भाषाकी ओर खास तौरसे अकर्पित करते हैं। अभी अभी हमारी नजरसे इस भाषाके कई अच्छे. अच्छे प्रन्थ गुजर चुके हैं ५-अजित ब्रह्मचारी। कल्याणालोयणा' या कल्याणालोचना नामक प्राकृत प्रन्यके की भ- जितब्रह्म या अजित ब्रह्मचारी हैं जैसा कि इस प्रन्यको अन्तिम गाथासे मालूम होता है । ये सभवत वे ही हैं जिन्होंने 'हनुमच्चरित्र' नामका एक सस्कृत अन्थ रचा है । सुहृदर बाबू जुगल किशोरजीने उक्त ग्रन्थको देखा है। उससे १८ योगीन्द्ररप्युर- पषि उपजा पवि मण, बंध प मोक्तुकये। सिर परमरये मोरया, सिषपर पर मा। बपपि बरसेनसरिन मषित समन माहम बही, परम्त की पर हो पंचास्तिगापि एक प्रति हम संगत् ११९ मी है। पति या प्रति प्रब बनने मम सौ बी पी मी बी पोहोपो तो बगनापाको भिमकी देरणा पतहिम भाषना चाहिए भौर पर योगीता पारंप मम देवी सतादिके पहले लिषित रोताहै। मिस्मसारकी पीपचममममावत टोय मी मोपीमरे पर गत पमे है। इससे मातम होतापपामरेसे पार हो गये। मोर पमप्रमने परिपायको टोकाके मम्वमैं पापोरननि विको मम पस्म प्रविक्रमवमेव सरा मुमुमो- मास्यतिक्रमणमप्पणमानमुब। तस्मै ममा समसंयमभूषणाय भीवीरनाम्बिमुनिनामपराय निस्प। बससे मातम होवा भीगारबन्दि पुन पचममममो समसामयिक थापा मोर ग पूस पीसे देखते हमारे सबके गुण रोमो प्रारममे मी ग्नान वनिचार वीरनन्दि दूतीन्द्रम् गर ममापासागारबीरबमिमापारमा गौरवदिती में भोर मारा मदम्पनरोगे तो इससे पद्मममम सम्स निका संवत् भामम निषित हो भावासो पोरनभिने नापार सारसम्मको मासालमै उसी पवा समय पाए १.६ "स्वस्तिमीमग्मेपचन्द्रमियदेपर मौपापमसादासारिवारमम भापसमस्तरियाममावसकारिग्पतिकीर्तिमीमतीनदिममास्ति पषतिगल शहपर्व १ भौमुलनामसंपरसरे ज्येष्ठ - - शुक्ल १ सोमवार दंदु तावु माडिदाचारसारक्के कर्णाटवृत्तिय माडिदपर॥" यदि प्रद्मप्रभका यह समय ठीक है, तो योगीन्द्रदेव वि० संवत् १२११ के भी पहलेके विद्वान् है। अमृताशीति के ७८ और ७९ वे नम्बरके दो पद्य भर्तृहरिके वैराग्यशतकके है। जान पडता है कि प्रन्यकर्ताने इन्हें 'उक्त च' रूप में दिया होगा, परन्तु लेख- कोंकी कृपासे 'उक्त च ' उड़ गया है और ये मूल ग्रन्यके ही पद्य वन गये हैं। वैराग्यशतकमें भी ये इसी रूपमें मिलते हैं, केवल इतना अन्तर है कि पहले पद्यके पहले दो चरण आगे पीछे हैं । शतकमें इस प्रकार है: प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं दत्तं पदं शिरसि विद्विपतां ततः किं । इस ग्रन्थकी अन्य प्रतियोंमें 'उक्त च' पद अवश्य लिखा मिलेगा। योगसार और परमात्मप्रकाशकी भापाके सम्बन्धमें हम इतना और कह देना चाहते हैं कि जैसा वहुत लोगोंने समझ रक्खा है, वह प्राकृत नहीं है किन्तु अप- भ्रश है जो एक समय लोकभाषा या वोलचाल की भाषा रह चुकी है और दिगम्बर विद्वानोंने जिसमें सैकड़ों ग्रन्योंकी रचना की है । इसके प्रयोग प्राकृत व्याकरण के नियमोंसे सिद्ध नहीं होते हैं । जर्मनीके सुप्रसिद्ध विद्वान् डा. हर्मन जेकोबीने अभी कुछ ही समय पहले दिगम्बर कवि पंडित धनपाल के 'पचमी-कहा' (पञ्चमीकथा ) नामक ग्रन्थको प्रकाशित करके इस भाषाके सम्बन्धमें बहुत गहरा प्रकाश डाला है । इस भाषाका साहित्य सभवत चौथी पांचवीं शताब्दिसे प्रारंभ होता है। जैनममाजके पण्डितोंका ध्यान हम इस भाषाकी ओर खास तौरसे अकर्षित करते हैं। अभी अभी हमारी नजरसे इस भाषाके कई अच्छे अच्छे प्रन्थ गुजर चुके हैं। ५-अजित ब्रह्मचारी। कल्याणालोयणा' या कल्याणालोचना नामक प्राकृत प्रन्थके का अ- जितब्रह्म या अजित ब्रह्मचारी हैं जैसा कि इस प्रन्यकी अन्तिम गाथासे मालूम होता है । ये सभवत वे ही हैं जिन्होंने 'हनुमच्चरित्र' नामका एक सस्कृत अन्थ रचा है । सुहृदर वावू जुगलकिशोरजीने उक्त प्रन्थको देखा है। उससे . ।

१८ 'योगीन्द्रदेवैरप्युष- पषि उप्पसा पबि मरा पंप प मोक्स परो । जिउ परमस्ये मोश्या सिणषर एस मणे । सपपि बरसरित्र निश्चित पमय माहम गई, परतु गम्हारी बनी दो पंचास्तिपतिको एक प्रति निकम संपत् यो हो । परियाप्रति सम्म बनेके कमसे कम सौ व पीछे मी मिची मोपी वो अपसेवाचार्यको निशानी देवी शशिम भावमा चाहिए भौर पर मोमीना बाप समय देवी भवामि पारेन लिरिवत होता है। सिमसारी भीपचममचारवान दीप्रम मी शोपीवर पा ग्य मम माइम होतापप्रमदेवसे पारो परे और पपामने पाँबरेंजपा मेमोमवम मावीरनन्दि मुनिको बम स्परया पस्प प्रतिक्रमणमेव सदा मुमुमो- मास्मतिक्रमणमपणुम्ममुरी। उस्मै नमः सफछसयममूपणाप भीषीरमम्मिमुनिनामपपय निरम् । इससे मातम सेवा प्रौधीमम्मि मुनि पप्रममयो पमरामयिक भावार्यभार गगे पूरण रिसे देखते। भारवर्ग महागो गुर हो।रीमो मारममें मी नोंने परिपारप पीरमादि पतीत्रम् काम नमरमर बारे। पर मे मीरवभिभापारवार ताबीरभि से से मार हमारा भनुमा सेतेंगे तो इससे पप्रप्रम र विम गत समय मषितभावापरबारममिये मापार पारस सोप्पाम्मानमें रखी बाम समय पर पर रिया- 'स्थतिमीमम्मेषचम्दयिपदेयर भीपारपसारासारिवारमा मावसमस्तरियाममापसकपरिणतिकीर्तिभामडीरगर्मियाम्ति पषकपलिंगसु शपपर्ष १.५ मौमुरानामसंपरमरे स्पेश .

शुक्ल १ सोमवार दंदु तावु माडिदाचारसारपके कर्णाटवृत्तिय माडिदपर ॥" यदि प्रमप्रमका यह समय ठीक है, तो योगीन्द्ररेच वि० संवत् १२११ के भी पहलेके विद्वान् हैं। 'अमृताशीति'फे ७८ और ७९ वे नम्बरके दो पद्य भतृहरिके चराग्यशतक है। जान पडता है कि प्रन्यकर्ताने इन्हें 'उफ च ' रूपमें दिया होगा, परन्तु लेस. कोंको कृपासे 'उक्त च ' उप गया है और ये मूल ग्रन्यके ही पद्य बन गये हैं। वैराग्यशतकमें भी ये इसी रूपमें मिलते हैं, केवल इतना अन्तर है कि पहले पद्यके पहले दो चरण आगे पीछे है । शतकमें इस प्रकार है:- प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुधास्तत. कि दत्तं पद शिरसि विद्विपता ततः किं । इस प्रन्यकी अन्य प्रतियोंमें 'उक्त च' पद अवश्य लिखा मिलेगा। योगसार और परमात्मप्रकाशकी भापाके सम्बन्धमें हम इतना और कह देना चाहते हैं कि जसा बहुत लोगोंने समक्ष रक्खा है, वह प्राकृत नहीं है किन्तु अप- भ्रश है जो एक समय लोकभाषा या वोलचाल की भाषा रह चुकी है और दिगम्बर विद्वानोंने जिसमें सैकडों प्रन्योंकी रचना की है । इसके प्रयोग प्राकृत व्याकरण के नियमोसे सिद्ध नहीं होते हैं । जर्मनीके सुप्रसिद्ध विद्वान् डा. हर्मन जेकोबीने अभी कुछ ही समय पहले दिगम्बर कवि पंडित धनपालके 'पचमी-कहा' (पञ्चमीकया ) नामक ग्रन्थको प्रकाशित करके इस भाषाके सम्पन्धमें बहुत गहरा प्रकाश डाला है । इस भापाका साहित्य सभवत चौथी पाँचवीं शताब्दिसे प्रारभ होता है। जैनममाजके पण्डितोंका ध्यान हम इस भापाकी ओर खास तौरसे अर्पित करते हैं। अभी अभी हमारी नजरसे इस भाषाके कई अच्छे. अच्छे प्रन्थ गुजर चुके हैं। ५-अजित ब्रह्मचारी। 'कल्याणालोयणा' या कल्याणालोचना नामक प्राकृत प्रन्थके कत्ती अ- जितब्रह्म या अजित ब्रह्मचारी हैं जैसा कि इस प्रन्यकी अन्तिम गाथासे मालूम होता है । ये संभवत वे ही हैं जिन्होंने 'हनुमच्चरित्र' नामका एक संस्कृत अन्य रचा है । सुहद्वर वाबू जुगल किशोरजोने उक्त प्रन्यको देखा है। उससे ।

२०
माहम होती मावि ए है। ये देनेनीतिक पाये।
बके पिताका माम बीरसिंह, माता दीपा गा पृपा और बस पोजगार
(पोश सिंपारे)। म रिसायनिो मायेसे होने का मयर
(मरों) में तुमबारको बना कोबी । स पापा दुखोचनीको प्रय
नाममाम उत्समपरति मामा एक और प्रग्यापन पनामामामतम्या
पया।
६-आचार्य श्री शिषकोटि।
बाचार्य लिमोरि विगम्बरसम्प्रदायमें एक पहुत ही प्रविय भाचार्य हो पये
है। सपनामा मा भगषती मापपना' मम्मच प्रान्त प्रब गठ
प्राचीन है। इसकी रचना और इसकी भाषा मी एकी प्राचीनताकी
साथी देती है।
इस सम्बकी प्रतस्विकी माये किसी गापाय पदिए:-
मा मिणविगपि सम्पगुच्चयोण भव मिचदी।
मषगमिम पापमुझे सम्म सुत्तं च मर्या.
पुम्षापरियपिवदा उपजीविता इमा स सत्तीए ।
मारपणा सिपण पाविदसमोयिणा रावा । १२ ।
मायषणा भगवदी एर्ष मचीप पबिया संवी।
संपस्म सिपनसप समाभिवरमुचर्म देउ १४॥
भत्-माय बिनमनि पषि गुप्त पनि भौर मार्ग मित्रममिरेपर
पनि निष्प सूत्र मौर महोबणी तय समसन पानिवम्मोबी (पाधिपात्र)
भिवानी गाभाराषना रबी। यह यमपती बारापना इस पर मधिपूर्वक
बर्षित को भौर शिवारको रकम समाधि देने।
इससे मबम होता है इस मन्त्र का नाम शिपाया।मपमे मी
पुसमा नाम साम हमोंने बालोषमया है। इससे पान पक्वा:
उसके बाम पापो मार्य सम, बा मी पण हो मोर इस किए
मका माम पिपमि विषगुप्त या ऐसा होगा हो बिसे, मधेपमै बि
मपबिबसेमाचार्यने मपने भारिपुरायो प्रारम विसरि बाबाप
स्मामा-

शीतीभूतं जगद्यस्य वाचाराध्यचतुष्टयं । मोक्षमार्ग स पायान्नः शिवकोटिमुनीश्वरः ॥ ४२ इस श्लोकके 'आराध्यचतुष्टय' पदसे भगवती आराधनाका ही वोध होता है और इससे मालूम होता है कि उनका पूरा नाम आर्य शिवकोटि था । भग- वती आराधनामें इसी नामको सक्षिप्तरूपसे 'आर्य शिव' या 'शिवाय' लिखा है। आराधनाकथाकोशमें समन्तभद्र स्वामीकी जो कथा मिलती है उसमें लिखा है कि शिवकोटि वाराणसीके राजा थे और वे शैव थे। समन्तभद्र स्वामीने उनके समक्ष 'शिवलिङ्ग' को अपने स्तोत्रके प्रभावसे फोडकर उसमेंसे 'चन्द्रप्रभ' की प्रतिमा प्रकट की थी। इससे उक्त राजा उनका शिष्य बन गया था और उसीने मुनि अवस्थामें भगवती आराधनाकी रचना की थी। परन्तु इस वातपर विश्वास नहीं होता कि भगवती आराधनाके कर्ता वही शिवकोटि राजा होंगे जो समन्त. भद्रके शिष्य हो गये थे । यदि ये वही होते तो यह कदापि सभव नहीं था कि चे अपने इतने बड़े प्रन्यमें अपने परमगुरु समन्तभद्रका कहीं उल्लेख भी नहीं करते । कमसे कम उनका स्मरण तो अवश्य ही करते। उन्होंने अपने जिन तीन गुरुओंका स्मरण किया है और जिनके चरणोंके निकट बैठकर उन्होंने अपने अन्यके पदार्थको समझा है, उनमें भी समन्तभद्रका नाम नहीं है । अतएव उक्त कथाको छोड़कर जब तक कोई दूसरा प्रवल प्रमाण न मिले, तब तक कमसे कम यह बात सन्देहास्पद अवश्य है। हमारी निजकी राय तो यह है कि भगवती आराधना समन्तभद्र स्वामीसे भी पहलेकी रचना है। बहुतसे लोगोंका खयाल है कि शिवकोटिका ही दूसरा नाम शिवायन है, परन्तु विक्रान्त कौरवीय नाटकमें शिवकोटि और शिवायनको जुदा जुदा बतलाया है और लिखा है कि ये दोनों ही समन्तभद्रके शिष्य थे -" शिष्यौ तदीयौ शिवकोटिनामा, शिवायन. शास्त्रविदां वरिष्ठौ ।" अभी तक भगवती आराधनाको छोड़कर शिवकोटि आचार्यका और कोई भी अन्य नहीं सुना गया है और न कहीं किसीने उसका उल्लेख ही किया है। परन्तु अभी हाल ही यह रत्नमाला' नामक छोटासा प्रन्थ उपलब्ध हुआ है जिसके अन्तमें इसके कर्ताका नाम शिवकोटि प्रकट किया गया है और प्रन्यके अ ।

२० मास्म होताtatी सवाम्पिमें पर।मौर्तिक मपये। इसके पिताच पाम पौरधि माता बीमा या पृपी और पोजगार (पोड सिधारे)पा। म विधाननिक मारेससे इमोने गुरु नपर (मरोंच) में पमपरिणत्री रपया की पी।स पापा बन्दबाकी प्रश्न बाममाम उत्सवपति नाम एक और प्रमाननगमाया हुमावतममा पबारे। ६-आचार्य श्री शिवकोटि । भाचार्य पिरकोरि दिगम्बरसम्प्रभागमें एक मात ही प्रसिद्ध माना हो यो है। उनका पनामा मा भगवती भारापमा मामा शव प्रश्न मातही अधीन है। पी पाती और इसकी माता भी इस प्राचीनता सावी येती। इस मन्त्रकी प्रस्तिकी मीबिरं याचा पदिए-- मन जिणदिगणि सम्पगुचगोप मम मितवीर्ण । मबगमिय पादमूझे सम्म मुचमत्या पुग्वापरिपणिषमा सषजीमित्ता इमा स सत्तीए । मारपणा सिवमेण पाणिनसम्प्रेपिणा रापा । १२. मारापणा मगवदी पर्व मत्तीए पम्पिदा मंत्री। मंपस्स सिवबत प समाधिवरमुत्तम पर॥६॥ मांद-भाव बिनवनि पनि सगुप्त पनि और मार्ग मित्रनमिले पर बाँकन सूत्र और मको भव्ही वर समर पाविदम्मोगी (पाधिपात्र) भिमानी पर माराया ली। गमगपती भाप्रपना इस नए भर्णिक पनिटो मौर भिवानको उत्तम समाधि देने। इस माघम होणास प्रवर्गान माम शिवारपासपने दोनों गायक नाम साप समोने नाम निक्षेपम दिया है। इस बाम पता है- प्रमोबाम साप मो मान सम्म पहमी लिपप और इसलिए अमन बाम चिमन्नि पिरगुप्त या ऐसासोमा जिसे मरमें 'शिव' काबा पाता। मपबिरसेनापार्यने अपने बारिपुरालके प्रारममें निकोनि भाषाभ स्पर Aया- २१ शीतीभूतं जगद्यस्य वाचाराध्यचतुष्टयं । मोक्षमार्ग स पायान्नः शिवकोटिमुनीश्वरः ॥ ४९ इस श्लोकके 'आराध्यचतुष्टय' पदसे भगवती आराधनाका ही बोध होता है और इससे मालूम होता है कि उनका पूरा नाम आर्य शिवकोटि था । भग. वती आराधनामें इसी नामको सक्षिप्तरूपसे 'आर्य शिव' या 'शिवाय' लिखा आराधनाकथाकोशमें समन्तभद्र स्वामीकी जो कथा मिलती है उसमें लिखा है कि शिवकोटि वाराणसीके राजा थे और वे शैव थे। समन्तभद्र स्वामीने उनके समक्ष 'शिवलिङ्ग' को अपने स्तोत्रके प्रभावसे फोड़कर उसमेंसे 'चन्द्रप्रभ' की प्रतिमा प्रकट की थी। इससे उक्क राजा उनका शिष्य बन गया था और उसीने मुनि अवस्थामें भगवती आराधनाकी रचना की थी। परन्तु इस वातपर विश्वास नहीं होता कि भगवती आराधनाके का वही शिवकोटि राजा होंगे जो समन्त भद्रके शिष्य हो गये थे। यदि ये वही होते तो यह कदापि सभव नहीं था कि वे अपने इतने बड़े ग्रन्थमें अपने परमगुरु समन्तभद्रका कहीं उल्लेख भी नहीं करते । कमसे कम उनका स्मरण तो अवश्य ही करते। उन्होंने अपने जिन तीन गुरुओंका स्मरण किया है और जिनके चरणोंके निकट वैठकर उन्होंने अपने प्रन्थके पदार्थको समझा है, उनमें भी समन्तभद्रका नाम नहीं है। अतएव उक्त कथाको छोड़कर जब तक कोई दूसरा प्रवल प्रमाण न मिले, तब तक कमसे कम यह बात सन्देहास्पद अवश्य है । हमारी निजकी राय तो यह है कि भगवती आराधना समन्तभद्र स्वामीसे भी पहलेकी रचना है। बहुतसे लोगोंका खयाल है कि शिवकोटिका ही दूसरा नाम शिवायन है, परन्तु विक्रान्त कौरवीय नाटकमें शिवकोटि और शिवायनको जुदा जुदा बतलाया है और लिखा है कि ये दोनों ही समन्तभद्रके शिष्य थे शिष्यौ तदीयौ शिवकोटिनामा, शिवायन शास्त्रविदा वरिष्ठौ ।" अभी तक भगवती आराधनाको छोड़कर शिवकोटि आचार्यका और कोई भी प्रन्थ नहीं सुना गया है और न कहीं किसीने उसका उल्लेख ही किया है। परन्तु अभी हाल ही यह 'रत्नमाला' नामक छोटासा प्रन्थ उपलब्ध हुआ है जिसके अन्तमें इसके कर्ताका नाम शिवकोटि प्रकट किया गया है और प्रन्यके अन्तकी । - २२ । पाच तो सनं स्वामिसमम्तमधिप्य' RAया मया। हमारा मी पायबापा माउन बिरिषद प्रम्पवित्र स्मरण भारपुपन पत्ताने वाले मौर इस सम्बन्ध में हमने परिपाम एक जोमसा नोट मौभियपा, परन्त प्रन्यही बी पर पड़ने पर हमे इस मिमप गुपन्दो पना।हमारी समयमै सह प्रब दवया प्राचीन यही हो सकता ! यह पेसात माधुनिक है और बा तो इसके मन्तिम कोषक शिवीटस्थमानुपात परसे सीने इसके पयरे मामकी कम्पमा परी और बाद इस पर पत्तनि भपमा माम मामपित पारे पोको परे ही पिपति। इस प्रम्बन मोहिमामा भोक रेगिए-- कमी कापने पासा पल्प मुनिसत्तमः । स्पीयते रजिनागारे प्रामाविषु विशेषतः। २२ बाद इस सीमाम मुनियोंको सबमें , या पारिए । भनिगाने इसको पर्षित बममा समय बिमदिरों में विशेष मामा किमि खरना चाहिए। पिसे बासा पर वायरस सम्म पापम्बर सम्पवाबमें वैवपास पी तर बम पम पा और सपने मनुवानी स्वये प्रबो पये समानि बमि पमा बर्षित पतभावापा। मन्दिरोंमें मोर प्राममि बनेको नसी तरानावर मराभवा परी बायोमौर बनाम राना पारिए बम वही पारासरी पाव। पालवी बारामनाम लामार मनबाबन इस वापरबपीवर विचारसत्तमपने इस प्ररे प्रम्बमें स्वाइप तयच विवाय पर पहै मेरमा यमपयोमर पापा निमिव बसपाही रते। भापकोस प्रामामा प्रबाही गोमय भाता है। पर इसमें इस निय मोहिमशिवा- -पलपाती और मनमध्ये सामिपम बस्तिपी मान र ४५NR न पिए । - २३ पाषाणोत्स्फुटितं तोयं घटीयंत्रेण ताडितं । सद्यः सन्तप्तवापीनां प्रासुकं जलमुच्यते ॥ ६३ ॥ देवर्षीणा प्रशौचाय स्नानाय च गृहार्थिनां । अप्रासुकं परं वारि महातीर्थजमप्यदः ॥ ६४॥ इस विधानसे भी हम यही अनुमान करते हैं कि यह प्रन्य आधुनिक है और भगवती आराधनाके कताका तो कदापि नहीं है। इस ग्रन्थको विचारपूर्वक पढनेसे इस तरहकी और भी अनेक बातें मालूम हो सकती है। इस ग्रन्थका ६५ वाँ श्लोक यशस्तिलक चम्पूके उपासकाध्ययनके एक लोकसे बिलकुल मिलता जुलता हुआ है और ऐसा मालूम होता है कि उसी परसे लिया गया है। चम्पूका वह श्लोक इस प्रकार है सर्वमेव हि नाना प्रमाणं लौकिको विधिः। यत्र सम्यक्त्वहानिर्न यत्र न व्रतदूपणम् यशस्तिलक शक संवत् ८८१ ( वि० सवत् १०१६ ) में समाप्त हुआ है इस प्रन्थमें कोई खास विशेषता नहीं है । मामूली उपदेशरूप प्रन्थ है जिसमें श्रावकाचारसम्बन्धी प्रकीर्णक वातें लिखी गई हैं । एक महान् आचार्यकी कृतिके योग्य इसमें कुछ भी नहीं है। ७-श्रीमाधनन्दि योगीन्द्र । ये 'शास्त्रसारसमुच्चय' नामक सूत्रग्रन्थके कर्ता हैं । इस नामके भी कई आचार्य हो गये है, इस कारण नहीं कहा जा सकता कि इसके कर्ता कौनसे माघ- नन्दि हैं। कनाटक-कवि-चरित्रके अनुसार एक माघनन्दिका समय ईस्वी सन् १२६० (वि० सवत् १३१७ ) है और उन्होंने इस शास्त्रसारसमुच्चयपर एक कनडी टीका लिखी है तथा माघनन्दि-श्रावकाचारके कर्ता भी यही हैं। इससे मालूम होता है कि शास्त्रसारसमुच्चय (मूल) के कर्ता इनसे पहले हुए हैं और उनका समय भी विक्रमकी चौदहवीं शताब्दिसे पहले समझना चाहिए। मद्रासकी ओरियण्टल लायब्रेरीमें 'प्रतिष्ठाकल्पटिप्पण' या जिनसंहिता' ना. मका एक प्रन्य है । उसके प्रारंभमें लिखा है - - २२ पधिमे तो उसे स्वामिसमन्तमद्राशिप्म' बदला यया है। हमारा मी पापडीमारामा म बिरिषद प्राथमिक स्मरप बारिपुराम ताने मारे और इस समय में हमने गरिपाम एक मेयमा मोट भी किया था, परन्तु अब पफी पर पड़ने पर हम इस दिगम बाप का सन्दरोगा। हमारी समाप या प्रम्मतमा प्रधान नहीं हो सकता । पर मपेशात भावनिकमार या तो इसके मन्तिम कोने शिवकोरित्वमाप्नुयात् परसे कमाने इसके पत्ता नामकी पवार मौर पर इस परम सत्तमि मपग पर मी बनित ना! वो फोरेसरे सिवन। बस अब मारिया मा गोषदेखिए- कमी कामे वम चासो बम्पते मुनिसत्तमः । स्थीयतेच शिनागारे प्रामादिषु विशेषतः ॥ २२ मांत इस काम मुनियोंको बनये म पम पाहिए। भेगमुनियोने इसको पति पतब्यमा समय म्मममन्दिरोम विपकरणे प्रमा बम बरमा चाहिए। इससे मापार प्रन्ट होचावास समयको रखमाबादपार सम्पदावमें प्रैवपास पी वर पापा बामौर इसके भनुपानी स्वने प्रमहोपडे मे नौमि पमिरामा पर्मित तक पतम विना पा मदिरोम और मामोम बनेको भनी तरह बाबर मतममा प्रगत और नीम बना पारिए परमे नही बहसरी बात है। मययतीबाराधयाम लाम्पारनेवाले समम इस पाठपर पोतरा Aधार रमा परेप पारे प्रम्बमस्या इस यम विमान कर पाते है। बैमसाधु बमबम पौना निमित्त बाहर ही मते। भारी प्राप्त जामा प्रारबाही ग्बके प्रम भाता है। परन्तु इसमें इस मिय महिमडिया th- -सपासी और परमाणे सामोर विपरम परितपी माप 144 ४५भविष पिए।

२३ पाषाणोत्स्फुटितं तोयं घटीयंत्रेण ताडितं । सद्यः सन्तप्तवापीनां प्रासुकं जलमुच्यते ॥ ६३ ॥ देवर्षीणां प्रशौचाय स्नानाय च गृहार्थिनां । अप्रासुकं परं वारि महातीर्थजमप्यदः ॥ ६४॥ इस विधानसे भी हम यही अनुमान करते हैं कि यह प्रन्य आधुनिक है और भगवती आराधनाके कर्ताका तो कदापि नहीं है। इस ग्रन्थको विचारपूर्वक पढनेसे इस तरहकी और भी अनेक वातें मालूम हो सकती हैं। इस ग्रन्थका ६५ वाँ श्लोक यशस्तिलक चम्पूके उपासकाध्ययनके एक लोकसे बिलकुल मिलता जुलता हुआ है और ऐसा मालूम होता है कि उसी परसे लिया गया है। चम्पूका वह श्लोक इस प्रकार है सर्वमेव हि नानां प्रमाणं लौकिको विधिः। यत्र सम्यक्त्वहानिने यत्र न व्रतदूषणम् यशस्तिलक शक संवत् ८८१ ( वि० सवत् १०१६ ) में समाप्त हुआ इस प्रन्यमें कोई खास विशेषता नहीं है । मामूली उपदेशरूप प्रन्थ है जिसमें श्रावकाचारसम्बन्धी प्रकीर्णक वातें लिखी गई है। एक महान् आचार्यकी कृतिके योग्य इसमें कुछ भी नहीं है। ७-श्रीमाधनन्दि योगीन्द्र । ये 'शास्त्रसारसमुच्चय' नामक सूत्रग्रन्थके कर्ता हैं। इस नामके भी कई आचार्य हो गये हैं, इस कारण नहीं कहा जा सकता कि इसके कता कौनसे माघ- नन्दि हैं । कनाटक-कवि-चरित्रके अनुसार एक माघनन्दिका समय ईस्वी सन् १२६० ( वि० सवत् १३१७ ) है और उन्होंने इस शास्त्रसारसमुच्चयपर एक कनडी टीका लिखी है तथा माघनन्दि-श्रावकाचारके कर्ता भी यही हैं। इससे मालूम होता है कि शास्त्रसारसमुच्चय (मूल) के कर्ता इनसे पहले हुए हैं और उनका समय भी विक्रमकी चौदहवीं शताब्दिसे पहले समझना चाहिए । मद्रासकी ओरियण्टल लायब्रेरीमें 'प्रतिष्ठाकल्पटिप्पण' या 'जिनसहिता' ना- मका एक अन्य है । उसके प्रारंभमें लिखा है है २४ त 'श्रीमाभनन्दिसिशाम्तमक्रपार्तितन्मषः । कुमुदेउरई पग्मि प्रतिष्ठाकापटिप्पणम् । भीर मन्तम मिसा- इति श्रीमाभनन्दिसियाम्तयकपर्तिवनमषवतुर्विधपापित्यप पर्तिमीषाविमुबचन्द्रमुनीन्द्रपिरपिते जिनसहिवाटिप्पणे पूम्प पूजकपूजकाचार्यपूजाफसमविपादन समाप्तम् । इससे मावस होता है प्रतिमापरिप्पन कर्ता सम्बेम या समर बन माणनिधिदावनापक (पिप)ये। मानिमामबार और पसारसमुपवाटीकाघर मापन मने कारक कपिरिमो धनुसार अमरेनको सपना गुर बताया है। मपनिय पसारसमुपदे ता मापननि (पा) केही शिप्प पे सरेन हो बिनध र प्रतिपरिप्पन मामा प्रन्यी और ग्नी पिम भारपणा वर्ष सरे माषयमिते। पर वो सामसारसमुचयो समय ५ भौर पहरे पर्यात विक्रमबत् ११.२ म्पमप मावना पाहिए। ८-भीवादिराज फपि। मनमोषरस्तोत्र के सत्ता भीपारिराम । इगोन पागमठाम्रपर कविनिय+ मामी एक पुनर रिस्पटीन विकी। उसकी प्रास्विसे - मादम दोवा वर्गहषासमे ग्तम हए 4 भौर के पिताम मम्म पोमराम बावामगरी रागा रामसिह संभवत मंत्री पे मौर रामसेमारी हुए लोने इस रीचौरपानी पी। रामा रामसिंह मीम रेस पुष । तिमिमी समाप्ति धनि निम्म संषत् 1-18 की पीप मालियाको पीपी। बात बा मिहान् पे।ौन तय होगा कि इस समय में पर्ममप मापार भीर माम्मा पर पार करवा अपंत में समय बोरन मिशन मार जिस तर सच वीना विद्वान् पास में माँ । + पिचामा रोग की एक प्रति बराक मंगहीवारे मगिरमें भौर लरी पारीरोगी मन्दिरमा पदवीप्री। • प्रप्तस्ति नदिवरी माप । म १९ में पूरी प्रमणि दी।

धनंजयाशाधरवाग्भटानां धत्ते पदं सम्प्रति वादिराजः। खाण्डिल्यवंशोद्भवपोमसूनुः जिनोक्तिपीयूषसुतृप्तगात्रः ॥ प्रशस्तिके एक और श्लोकमें उन्होंने अपनी और वाग्भट्टकी समानता बड़ी खूबसूरतीसे दिखलाई है। श्रीराजसिंहनृपतिर्जयसिंह एव श्रीतक्षकाख्यनगरी अणहिल्लतुल्या। श्रीवादिराजविवुधोऽपरवाग्भटोऽयं श्रीसूत्रवृत्तिरिह नन्दतु चार्कचन्द्रम् ॥ अर्थात् हमारे राजा राजसिंह जयसिंह ( वाग्भटकवि जिस राजाके मंत्री थे) ही हैं और यह तक्षक नगरी अणहिल्लवाड़े ( जयसिंहकी राजधानी) के तुल्य है और वादिराज दूसरा वाग्भट है । इनके बनाये हुए और किसी अन्यका हमें पता नहीं है। ९-श्री जयानन्दसूरि । 'सर्वज्ञस्तवन' और उसकी टीका इन दोनोंके कत्ता जयानन्दसूरि श्वेताम्बर आचार्य मालूम होते हैं। श्वेताम्बर-जैनकान्फरेन्स द्वारा प्रकाशित जैनप्रन्था- वली (पृष्ठ २८०) के अनुसार इसका नाम 'देवा प्रभो स्तोत्र' भी है। क्योंकि इसका प्रारंभ इन्हीं शब्दोंसे होता है। पाटणके श्वेताम्बर-भडारमें भी इसकी एक प्रति है। ये सोमतिलकसूरिके शिष्य थे और विक्रमकी १५ वीं शताब्दिमें हुए हैं। इनके बनाये हुए और भी कई प्रन्थ हैं। हेमचन्द्र के व्याकरणपर इनकी एक वृत्ति भी है। इस स्तोत्र-टीकामें जो 'व्याकरणसूत्र' जगह जगह आते हैं, वे भी हेमचन्द्र (श्वेताम्बराचार्य) के ही मालूम होते हैं। १०-श्री गुणभद्र। चित्रवन्धस्तोत्रके का गुणभद्र या गुणभद्रकीर्ति नामके कोई आचार्य मालूम होते हैं । परन्तु यह निश्चय है कि ये भगवजिनसेनके शिष्य गुणभद्राचार्य के अतिरिक्त कोई दूसरे ही हैं। इस स्तोत्रके २७ वें श्लोकमें इस स्तुतिको 'मेधाविना । ।

"भीमापमाधिसिदाम्तयकवर्तितनूमषा ।
कुमुदेन्दुरई पनि प्रविष्ठाकल्पटिप्पणम् ॥
मौर बन्तम हिना
पति भीमापनदिसिम्तचापर्तितन्मपपतुर्विधपापिस्पष
क्रवर्तिभीवाविकमुवचम्ममुमीम्द्रविरचिते जिनसहितारिप्पणे पूम्म
पूजकपूजापायपूजाफळप्रतिपावन समातम् ।"
इससे माबम होता है प्रतिमारपटिममा सम्वेनगा मुर
बा मावनन्दिसिमान्तपाठक (पिम्प) पे।
मायान्विभावधाबार मौर पसारसमुप मेरार मापनदिमे नाटक
श्रीचरित्र गनुसार अमुण्मुको अपना पुरतमया है। हेमनविरा
मासारसमुषो कत्ता मापनन्दि (पा) केही गिप्प ये समसौ
चिनाउ प्रतिहारपरिप्पन मामा प्रवीभौर ग्नी पिय भाषामा
खेसो मापननिते। मरमा मेरो नामसारसमुचके या
समग ५ प और पाले भत् विमसेबत् ११. समय मानमा
चाहिए।
८-भीवादिराज फपि।
प्रमोचनस्वात्रोपा भौगाविराब है। नोमि दाम्भारपर
कपिपनिष+ बाम एक मनर स्पटीच बिसी। उसकी प्रास्तिसे
* माधम सेवा सम्मामेसमें स्पन र पे और इनके पितान
माम पोमराज बा । वामपरी रामा रामसिंह पमपता मंत्री और
राबसेषा करते हुए ही एहनि इस टीमवीरचना की थी। राप राबसि भीम
सके पुत्र थे। परिवभिडी समाप्ति बनौने विषम संवत् १.१९ की पीप
मानिसको की दी। ये गत बरे विद्वान् ।लोने सोमा
समय में पर्यवर मार और पाभरच पर पार करता है । मर्मत में
पी बोरम मिलान है और जिस तरह वीना मान राम ने में मी
।
+ प्रविधिका गैप की एक प्रत जयपुरके मैनहोगा यनिबरम और
सरी पारोबार मन्दिराम है। पारी प्रति भएप है।
• पस्ति महिदपी माम मरी प्रमपित होगी।

२७ पढनेवाला बड़ी उलझनमें पड़ जाता है । अस्तु। हमारा खयाल है कि पद्मनन्दि मुनि उनके कोई गुरुस्थानीय व्यक्ति हैं और इसी लिए उन्होंने उनका स्मरण किया है। नियमसारकी तात्पर्यवृत्तिके कत्ताका नाम श्रीपद्मप्रभमलधारिदेव है। मालूम नहीं कि इस स्तोत्रके कर्ता वे ही हैं, अथवा अन्य कोई दूसरे । पद्मनन्दिनामके भी अनेक विद्वान् हुए हैं, इस लिए उनके विषयमें भी कुछ नहीं कहा जा सकता। काशीकी यशोविजयजैनग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित जैनस्तोत्रसंग्रह (द्वितीय भाग) में अवसे कोई १६-१७ वर्ष पहले यह स्तोत्र मुद्रित हो चुका है। उसके साथ जो टीका छपी है वह राजशेखरसूरिके शिष्य मुनिशेखरसूरिकृत है, परन्तु हम जो यह टीका छाप रहे हैं यह किसी अन्य विद्वान्की है जो कि अपना नाम प्रकट नहीं करते हैं उक्त मुद्रितप्रतिमें और खभातके जैनपुस्तकालयकी प्रतिमें-जिसका जिकर पिटर्सनकी १८८४-८६ की रिपोर्ट (पृ० २१२ न० २८) में किया गया है- इस स्तोत्रका अन्तिम ग्लोक इसी रूपमें मिलता है, अतएव इसके कर्ता पद्मप्रभ- देव ही मालूम होते हैं। इस स्तोत्रका दूसरा नाम 'लक्ष्मीस्तोत्र' है। क्योंकि इसका प्रारंभ 'लक्ष्मी' शब्दसे शुरू होता है और भकामर, कल्याणमन्दिर आदि अनेक स्तोत्रोंके नाम इसी तरह प्रसिद्ध हुए हैं। १२-श्री अमितगतिसूरि ।* सामायिकपाठके फती अमितगतिसूरि वे ही जान पड़ते हैं जिनके बनाये हुए धर्मपरीक्षा, सुभाषितरत्नसन्दोह, अमितगतिश्रावकाचार, योगसारप्रामृत, और भावनाद्वात्रिंशतिका नामक ग्रन्थ+ मुद्रित हो चुके हैं और जो विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दिके आचार्य थे। * इनका विस्तृत परिचय पानेके लिए मेरी लिखी हुई 'विद्वदरत्नमाला' का 'श्रीअमितगतिसूरि' नामक लेख पढिए । । यह भी 'सामायिक पाठ' के नामसे छपा है, परन्तु वास्तवमें इसका नाम भावना द्वात्रिंशतिका है। + अमि- तगतिका ‘पचसग्रह' नामक ग्रन्थ इसी ग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाला है।

। संस्कर' (मेषागार वारा संस्मर की) विशेषन दिया है। ममता नही 4 मेपाली रेबो धर्मसमामामधार कता । और मिमोर 'मूमबारकी मानन्दिाति विशेष्यति मात्र प्रयोगमन्वमें उप प्रयोकपान करने मागेकी पदोही प्रशस्तियाँ मोदी है। विमारा भनुमान ठीको पर स्तोत्र १६ पी पवामिन पनामामोडपं मेषालीने उप प्रय स्तियाँ, १५और १५९ मची। मेवानी समपमें एक गुपमा मामरे पापाय मी इसका पता गति सन्चमपर मारा माना नाम प्रम्ब-पस्विसे ममता है। सपा- संबर १५२१ प मापा मुविसोमबासरे भीगोपाचणदुर्ग वोमरशे पनापिरामभीकीसिसिरकम्पमवर्तमाने भीमस मापुरम्वषे पुपरगणे भ० भौगुणकीर्तिदेषास्तत्पभ मीयश:- कीर्तिदेपास्वत्पम भीमठमतिदेवास्तत्प भ भीगुणमन देवास्तवामापे गर्गगोत्रे इस माम रोपा. १५५१ में माहियरमें गुषमाभारा चार्य को समर्थनमा राम्पब और पुलापनकी पहोपर माम। गत समासम्बत्तोत्रो पत्ता पदों और स्माकी रचनामे उसी सम रमें होनेवा मेवातीने संसाया हो। ११-भी पचप्रमदेव। पानावस्वोमी मन्तिम धिम पपि मै आपमनम्पियविनिरनि दिया, परन्तु मन्तिम भोको भीपप्रप्रमदेषनिर्मितमिव स्तोत्रं जप- मंगाई परसे यह सास का औपप्रमोद तिमि पप बनिसरिन बेगम मेर मात्र मानौर मारता मामम पार, और मोष सात । परन्तु सम्म महामाबम होता है समोरयों या पया पौर मनसे नगमनमा समम्म पा। इसे *देचो मस्तिषी माप १५,41-4 भेषावाप्रपमानामा पम्पबाकायर बामन मात्र मीची संपत १५ समाप्त सका । इसी तरह आप्तस्वरूप, पार्श्वनाथसमस्यास्तोत्र, महर्षिस्तोत्र, नेमिनाथ- स्तोत्र और शलाकानिक्षे०के विषयमें यह भी नहीं मालूम हो सका कि इनके रचयिता कौन हैं। जिन प्रतियोंपर से ये छपाये गये हैं, उनमें ग्रन्थकर्ताओंके नाम नहीं हैं। इस लिए इनके विषयमें भी कुछ नहीं लिखा जा सका। इस परिचयके लिखनेमें सुहृद्धर बाबू जुगलकिशोरजीके कई नोटोंसे और उनकी सूचनाओंसे बहुत कुछ सहायता मिली है, अतएव हम उनके बहुत ही कृतज्ञ हैं। बम्बई, अगहन सुदी १४ ॥ वि० संवत् १९७९ । । नाथूराम प्रेमी। हस्तलिखित प्रतियोंकी सहायता । १ श्रीयुक्त ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी, जैनधर्मभूषण-१ धम्मर- सायण, २ सारसमुच्चय (ख ) और ३सामायिक पाठ । इनमेंसे पहले दो प्रन्योंकी प्रतिया आपने देहलीके पुस्तक भाण्डारसे नकल कराकर मिजवाई थीं और उन्हें पालमनिवासी श्रीयुत छाजूरामजीने लिखा है। तीसरे प्रन्धकी प्रेसकापी आपने स्वय ही एक प्राचीन प्रतिसे करके मेजी थी। २ श्रीयुक्त बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार, सरसावा-१ सिद्धान्त- सार मूल, २ अमृताशीति, ३ रत्नमाला, ४ शास्त्रसारसमुच्चय, ५ पार्श्वनाथस्तोत्र, ६ नेमिनाथस्तोत्र, ७ निजात्माष्टक और ८ आप्तस्व- रूप । इनमेंसे अधिकांश ग्रन्थोंकी कापी आपने जैनसिद्धान्तभवन आराकी प्रतियोंके आधारसे कराके भेजी थी। शास्त्रसारसमुच्चयके सूत्रपाठका सशोधन भी आपने उक्त ग्रन्थकी कनडी टीकाके आधारसे कर दिया था। पिछले प्रन्थकी प्रेस कापी अपने स्वय अपने हाथसे करके भेजी थी। ३ श्रीयुक्त पं० रामलाल कंचनलालजी,मरसेना-१ सिद्धान्तसार- टीका, २ अंगप्रज्ञप्ति । इन दोनों ग्रन्थोंकी प्रतियाँ श्रीयुक्त वावू जुगलकिशो- रजीने उक्त महाशयसे प्राप्त करके मेजनेकी कृपा की थी। ४ श्रीयुक्त पं० इन्द्रलालजी साहित्यशास्त्री जयपुर-१ ज्ञानलोचन- स्तोत्र, २ समवसरणस्तोत्र, ३ सर्वज्ञस्तवन, ४ पार्श्वनाथसमस्या- स्तोत्र, ५चित्रवन्धस्तात्रे, ६महर्पिस्तोत्र, ७ शखदेवाष्टक। जयपुरके ।

२८
१४)
इस प्रपन माम में सामायिपाट नही माहय होता धाम हो या पूर्व
मी मही मायम होता मोडेमन्त में लिया इति द्वितीयमानमा
समाप्ता। मयस्स ही इसके पहले प्रथम मावमा हो होपी । मन्तिम मोम्से
संभइसन नाम 'तापमाबमा महो।
इसकी अपी पमपम प्रचारी पीपीतलप्रसादगी मपने प्रयासमें प्राप्त
कोलसीस्पानसरस्पतीमगार प्रतिपरमेस्सर परपरे पे भार सपी
परसे गा मुपित कराई गई है। बवएर पब तक इसकी कार मरी प्रति प्राप्त
महो तब तक इसके मामा और पूर्वधा मपूर्णवाम नियमही से सस्वा ।
१३-१० भी आसाधर ।
परमानमाम्म नापं मानावर प्रसिस विद्वान् है । उनके बनाये
पए प्रब सागारबमारत ( २)गार बनयारपमापक (में
अम्ममाधमे मदित हो पुरे और उसमें उबन्न परपर भी रमा वा उन
है। निम्मी ५ वी वाबिन्त र मानद थे।
अपरिचित अन्यको ।
भावमा प्रमाचन्द्र' संचवारोता मानुकीर्ति' मेर
सापन क पपनदि समुधरके कर्ता
कुखमय और
पर्ता पिवुध भीपर विषममें हमें कोई सोचयोग्न परिषद प्राप्त नही हो
--प्रभाषन पामबहभाचार्य और मशरको पु-याविषय
मंत्रमाण समिरी सम्मि पाठ र मिस मम्मम होवोनि
Rनामक पतपर परदेष या देशर पानाव नामदारमानम
मही इस समय पायागी। संभवता मा पधिन मकड़ी भोर
रोय। ३-मानुपीर्ति को पये है। एक गया मुचदेवले पिमरासिक
गुम्माई और पो 10 सवामिम इए है-एक गुनमा सरिक पापा और
परे पपातिक पापर होमेमा बिशिम भीमगरv-पत्रण
दिपंचविसतिभा सम्मोपणप्तिके सत्ता भाषि में पपनभितो वे
है।५ एकदुग मोर मारपतपरत ए है। मरी
भुताबारके

२९ - सका । इसी तरह आप्तस्वरूप, पार्श्वनाथसमस्यास्तोत्र, महर्षिस्तोत्र, नेमिनाथ- स्तोत्र और शलाकानिक्षे०के विषयमें यह भी नहीं मालूम हो सका कि इनके रचयिता कौन हैं। जिन प्रतियोंपर से ये छपाये गये हैं, उनमें ग्रन्थकर्ताओंके नाम नहीं हैं । इस लिए इनके विषयमें भी कुछ नहीं लिखा जा सका। इस परिचयके लिखनेमें सुहद्धर बाबू जुगलकिशोरजीके कई नोटोंसे और उनकी सूचनाओंसे बहुत कुछ सहायता मिली है, अतएव हम उनके बहुत ही कृतज्ञ हैं। बम्बई, अगहन सुदी १४ । वि० संवत् १९७९ । । नाथूराम प्रेमी। हस्तलिखित प्रतियोंकी सहायता । १ श्रीयुक्त ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी, जैनधर्मभूषण-१ धम्मर- सायण, २ सारसमुच्चय (ख ) और ३सामायिक पाठ । इनमेंसे पहले दो अन्योंकी प्रतियाँ आपने देहलीके पुस्तक भाण्डारसे नकल कराकर मिजवाई थीं और उन्हें पालमनिवासी श्रीयुत छाजूरामजीने लिखा है। तीसरे ग्रन्थकी प्रेसकापी आपने स्वय ही एक प्राचीन प्रतिसे करके मेजी थी। २ श्रीयुक्त बाबू जुगलकिशोरजी मुख्तार, सरसावा-१ सिद्धान्त- सार मूल, २ अमृताशीति, ३ रत्नमाला, ४ शास्त्रसारसमुच्चय, ५ पार्श्वनाथस्तोत्र, ६ नेमिनाथस्तोत्र, ७ निजात्माष्टक और ८ आप्तस्व- रूप । इनमेंसे अधिकांश ग्रन्थोंकी कापी आपने जैनसिद्धान्तभवन आराकी प्रतियोंके आधारसे कराके भेजी थी। शास्त्रसारसमुच्चयके सूत्रपाठका सशोधन भी आपने उक्त ग्रन्थकी कनडी टीकाके आधारसे कर दिया था। पिछले प्रन्थकी प्रेस कापी अपने स्वय अपने हाथसे करके भेजी थी। ३ श्रीयुक्त प० रामलाल कंचनलालजी, मरसेना-१ सिद्धान्तसार- टीका, २ अगप्रज्ञप्ति । इन दोनों ग्रन्थोंकी प्रतियॉ श्रीयुक्त वावू जुगलकिशो- रजीने उक्त महाशयसे प्राप्त करके मेजनेकी कृपा की थी। ४ श्रीयुक्त पं० इन्द्रलालजी साहित्यशास्त्री जयपुर-१ ज्ञानलोचन- स्तोत्र, २ समवसरणस्तोत्र, ३ सर्वशस्तवन, ४ पार्श्वनाथसमस्या- स्तोत्र, ५ चित्रवन्धस्तात्रे, ६महर्षिस्तोत्र, ७ शखदेवाष्टक। जयपुरके -

प्राचीन पुस्तक-मजायेगी प्रतियोपरसे बापने इस सब स्टोप्रोडी प्रेसमपी पके
मेवानी।
५ स्पीय प.गणेशमम्मी गोपा पमपुर-१ पोगसार• भौर २
कल्पापायोचना।
६भीयुक प०पमालाण्जीवाभावा-भुतापता, २शक्षाका
मिसेपण मारल्याणमाम । कोई. पहले अपने बयपुरस हनं
बारे मेगावा।
७मीयुत माग मफ्लमठालजी गांची बोगी स्टूस मेरठ
अपनी-सारसमुख्य (0) की एक प्राचीन प्रति विसपर माने
का पर बाद महा।
८सरस्वतीमार-रसम्परनमन्दिर भोमल, मम्मी-माईस्म
९भीपुक पं० मामा रामचन्द्र भाग मोग-स्लमाणी बापमै
मी एकरसपी नसियाम्तमपदमागकी प्रति परसेकर मेगीपी।
-सभाको एक और पुपनी मविसे सपयवा माठ बमपर मि
मेला संप मापौर मी मावमलसे सबनमे गये भेगाना।

ग्रन्थ-सूची। ... . . ११४ . १४० . पृष्ठांक. १ सिद्धान्तसार:-श्रीजिनचन्द्राचार्यकृत , श्रीज्ञानभूषणकृतभाष्योपेतः १ २ योगसार:-श्रीयोगीन्द्र देवकृत ५५ ३ कल्याणालोयणा ( कल्याणालोचना)-श्रीअजितब्रह्मकृता ४ अमृताशीतिः-श्रीयोगीन्द्रदेवकृता ८५ ५ रत्नमाला-श्रीशिवकोटिकृता १०२ ६ शास्त्रसारसमुच्चयः-श्रोमाघनन्दिकृत १०९ ७ अर्हत्प्रवचनम्-श्रीप्रभाचन्द्रविरचित ८ आप्तस्वरूपम्- ११७ ९ ज्ञानलोचनस्तोत्रम्-श्रीवादिराजप्रणीतम् १२४ १० समवशरणस्तोत्रम् -श्राविष्णुसेनरचितम् १३३ ११ सर्वशस्तवनम् सटीकम्-श्राजयानन्दसूरिकृतम् १२ पार्श्वनाथसमस्यास्तोत्रम्- १४८ १३ चित्रवन्धस्तोत्रम्-श्रागुणभद्ररचितम्... १५१ १४ महर्षिस्तोत्रम्- १५६ १५ पार्श्वनाथस्तोत्रम्-श्रीपद्मप्रभदेवकृतम् १५८ १६ नेमिनाथस्तोत्रम्- १६४ १७ शंखदेवाष्टकम्-श्रीभानुकीर्तिकृतम् १६६ १८ निजात्माष्टकम्-श्रीयोगीन्द्रदेवकृतम् १६८ १९ सामायिकपाठः--श्रीअमितगतिकृत २. धम्मरसायण-श्रीपद्मनन्दिरचित १९२ २१ सारसमुच्चय:-श्रीकुलभदकृत २२६ २२ अंगपण्णत्ती ( अङ्गप्रज्ञप्ति ) श्रीशुभचन्द्रकृता २३ श्रुतावतार:-वित्रुधश्रीधरकृत ३१६ २४ शलाकानिक्षेपणनिष्काशनविवरणं २५ कल्याणमाला--प० आशाधरकृता ... - ... ... . ... . ... ... ... ... . ...

No text on this page.

ॐ श्रीनगुरो नमो नमः । सिद्धान्तसारादिसंग्रहः । श्रीजिनन्द्राचार्य-प्रणीतः सिद्धान्तसारः। (भाप्योपतः ।। श्रीसंग प्रणम्यानी लक्ष्मीवीरेन्दुगचितम् । माप्य मिलान्तमारस्य वध्ये माननुभूषणम् ॥ १ ॥ जीवगुणठाणगण्णापन्नतीपाणमगणणवृणे । सिद्रुतमारमिणमो भणामि सिद्धे णमंसित्ता ।। १ ।। जीवगुणस्थानमंगपर्याप्तिप्राणमार्गणाननोनान् । मिद्धान्तमारमिदानी भणामि सिजान् नमस्कृत्य ।। एतदायार्थ –इणमो--इदानीं । सिद्धन्तमार-इति, सिद्धान्तसार- नामपन्थं । भणामीति-~-मणिप्यामि कथयिष्यामि । यावत् किं कृत्वा ? पूर्व सिद्धे णमसित्ता-सिद्धान् नमस्कृत्य । कथभूतान् सिद्धान् । जीव- गुणठाणसण्णापज्जतीपाणमग्गणणवूणे-जीवगुणस्थानसज्ञापर्याप्तिप्रा- णमार्गणानवकोनान् । जीव इति-चतुर्दशजीयसमासाः । गुणठाण-चतु-

No text on this page.

सिद्धान्तसार । । जीवगुणे तह जोए सपञ्चए मग्गणासु उवओगे। जीवगुणेसु वि जोगे उवओगे पच्चए वुच्छं ॥३॥ जीवगुणान् तथा योगान् सप्रत्ययान् मार्गणासु उपयोगान् । जीवगुणेष्वपि योगान् उपयोगान् प्रत्ययान् वक्ष्ये ॥ सकलग्रन्थार्यसूचनद्वाररूपेय गाथा। वुच्छ इति-वक्ष्ये, कान् ? मग्ग- गासु-चतुर्दशमार्गणासु जीवगुणान् , जीवाश्चतुर्दशभेदा गुणाश्चतुर्दश- गुणस्थानानि । जीवाश्च गुणाश्च जीवगुणास्तान् जीवगुणान् चतुर्दश- मार्गणासु वक्ष्ये । मार्गणा. काश्चेत् । तदाह-गई, इत्यादि गायोक्ता- श्चतुर्दशमार्गणाः । तह जोए-तथा तेनैव प्रकारेण चतुर्दशमार्गणासु प- चदशयोगान् वक्ष्ये । सपच्चए-मार्गणासु सप्तपचाशत्प्रत्ययान् आत्र- वान् वक्ष्ये । तथा मार्गणासु द्वादशोपयोगान् वक्ष्ये । तथा जीवगुणेसु वि-जीवगुणेष्वपि वक्ष्ये। कान् । जोगे-योगान, चतुर्दशजीवसमासेपु योगान् पचदश वक्ष्ये । चतुर्दशगुणस्थानेष्वपि पचदश योगान् वक्ष्ये । उवओगे पच्चए बुच्छ-पुन जीवसमासेषु गुणस्थानेषु च द्वादशोपयोगान् सप्तपचाशत्प्रत्ययांश्च वक्ष्ये । मार्गणासु जीवान् गुणान् तथा योगान् सप्रत्ययान् उपयोगान् वक्ष्ये । अर्नु च जीवेषु गुणेसु च योगान् उप- योगान् प्रत्ययान् वक्ष्ये इति स्पष्टार्थः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्दशमार्गणासु चतुर्दशजीवसमासान् कथयन्नाह, तिगईसु सण्णिजुयलं चउदस तिरिएसु दोणि वियलेसु । एयपणक्खे वि य चदु पुढवीपणए य चत्तारि ॥४॥ १ गइ इदिये च काए जोगे वेए कसायणाणे य । सजमदसणलेस्सामवियासम्मत्तसण्णिमाहारे ॥ १ ॥ २ 'जोए' इति पाठ टीकायो । ३ पश्चात् ।

सिद्धान्तसारादिसग्रहे- । दशगुणस्पानानि | सप्णा-पतन संबा । पबत्ती-पपर्याप्तय पाण-दशदम्पप्राणा । मग्गपणव इति-नवसम्योपेता मार्गणा । एते ठणे-उमान् रहिवानिमर्प ॥१॥ सिद्धार्म सिदगई दसम गाणं च फेवल सायं । सम्मचमणाहारे सेसा संसारिए जीवे ॥२॥ सियाना सिद्गति दर्शनशान प फेवळ खायिक। सम्परत्वमनाहार शेषा संसारिणि जीवे ॥ ममस्कारगाथार्या प्रोक मार्गणानवरहितान् सिद्धान् नत्ला, ताई सि देषु पंच का सम्वीत्याकापामाह-सिवाण सिखगई इस्यादि । सिमाना सिद्गति स्यात् । सिद्धगतिरिति कोऽर्थः । सिद्धपर्यायप्रा- सिरित्पर्य । इत्येका मार्गणा सिदेषु बति । तथा, देसण जाणे केवळ साप-केवळाद प्रत्येकममिसम्मपते, सिमाना केवल दर्शममिति सिरपु द्वितीया मार्गणा मर्तते । केवलानमिति वचीया मार्गणा सिद्धेषु स्यात् । सम्ममणाहारे-सिदाना क्षायिक सम्पपल चतुर्थी मार्गणा सियु वियते । सिमानामनाहरकर पंचमी मार्गणा सिप भवति । तापर्यमाह-स्पकपचमार्गणासहितान् नवमार्गणा रविवान् सिवान् मलेस्यर्थः । सेसा संसारिए गौवे-गोपा उसरिता मार्गणा संसारिपु पर्तते । मपया मसेसा संसारिए भाषे-2 के संसा रिणो जीवा वर्तम् तेषु मोषाचतुर्दशमार्गणा स्युरिपर्थ ॥२॥ मप प्रपमसूत्रपातमिकामा- 1 व स्वम्पत्र। सहि स्वाति पुस्तके पास। इसम्म पनि मण्यम्मा पाटा पुस्त सिद्धान्तसार । जीवगुणे तह जोए सपच्चए मग्गणासु उवओगे। जीवगुणेसु वि जोगे उवओगे पच्चए वुच्छं ॥३॥ जीवगुणान् तथा योगान् सप्रत्ययान् मार्गणासु उपयोगान् । जीवगुणेष्वपि योगान् उपयोगान् प्रत्ययान् वक्ष्ये ॥ सकलग्रन्थार्थसूचनद्वाररूपेय गाथा । वुच्छ इति-वक्ष्ये, कान ? मग्ग- 'णासु–चतुर्दशमार्गणासु जीवगुणान्, जीवाश्चतुर्दशभेदा गुणाश्चतुर्दश- गुणस्थानानि । जीवाश्च गुणाश्च जीवगुणास्तान् जीवगुणान् चतुर्दश- मार्गणासु वक्ष्ये । मार्गणाः काश्चेत् ? तदाह-गई, इत्यादि गाथोक्ता- श्चतुर्दशमार्गणाः । तह जोए-तथा तेनैव प्रकारेण चतुर्दशमार्गणासु प- चदशयोगान् वक्ष्ये । सपञ्चए-मार्गणासु सप्तपचाशत्प्रत्ययान् आत्र- वान् वक्ष्ये । तथा मार्गणासु द्वादशोपयोगान् वक्ष्ये । तथा जीवगुणेसु वि-जीवगुणेष्वपि वक्ष्ये। कान् ? जोगे-योगान्, चतुर्दशजीवसमासेपु योगान् पचदश वक्ष्ये । चतुर्दशगुणस्थानेष्वपि पचदश योगान् वक्ष्ये । उवओगे पञ्चए वुच्छ-पुन जीवसमासेषु गुणस्थानेषु च द्वादशोपयोगान् सप्तपंचाशत्प्रत्ययाश्च वक्ष्ये । मार्गणासु जीवान् गुणान् तथा योगान् सप्रत्ययान् उपयोगान् वक्ष्ये । अनु च जीवेषु गुणेसु च योगान् उप- योगान् प्रत्ययान् वक्ष्ये इति स्पष्टार्थः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्दशमार्गणासु चतुर्दशजीवसमासान् कथयन्नाह, तिगईसु सण्णिजुयलं चउदस तिरिएसु दोण्णि वियलेसु । एयपणक्खे वि य चदु पुढवीपणए य चत्तारि ॥४॥ १ गइ इदिये च काए जोगे वेए फसायणाणे य। संजमदसणलेस्सामवियासम्मत्तसण्णिाहारे ॥१॥ २'जोए' इति पाठ टीकायां । ३ पश्चात् ।

१ सिवान्तसम्रादिसमहे- - त्रिगति' सहियुग पतुर्दश तिर्यक्षु हौ विकलेयु । एकपचाऽपि च चत्वार पृथिवीपंचके च चत्वारः ।। 'तिग' इस्पादि । ठिस्पु गतिषु मरकमनुप्पदेमगतिपु जीवसमा सायं भवति । तत् कि । सणिजुयलं--पंचेन्द्रिपसपिनो युग्ममिति । कोऽर्थ ! मरगया पचेन्द्रियसविपर्याप्तापर्याप्तौ जीवसमासो भपत । तया मनुष्यगत्या देवगस्पा च संझिपर्याप्तापातबीबसमासर्य मवति । पठदस तिरिएस-तिर्यक्षु सिर्यमगती सर्दशनीवसमासा भवन्ति । बाररसहमगिदियविविधरिदिपमसग्णिसप्पी य। पमचापमता एवं तबोरसा जीवा ॥१॥ एवं गायोक्तपर्दशनीवसमासा भवन्ति । दोष्णि रियम-दि प्रिपतरिन्द्रियेषु, दोष्णि-दो पर्याप्तापर्याप्ती जीवसमासौ मनत । एय पणसे पि प पहु-एकेन्द्रियेषु पंचेन्द्रियेषु च चत्वारो जीवसमासा । तत्रैकेन्द्रियेषु एकेन्द्रियसूमपादरपर्याप्तापाता इति चत्वारो गीवस मासा सन्ति । पंचेद्रियेषु पंचेन्द्रियसपसचिन पर्याप्तापर्याप्ता इति सारो गीपसमासा भवन्ति । पुठनीपणए य पचारि-पूपीपलकेच बालार पृष्योगोपायुवनस्पति पवारो जीवसमासा मन्ति। ते के। धूम्मवादरपर्याप्तापर्याप्ता इति पत्ताः । पृथ्वी सूक्ष्मा बादरा पर्याता भपाता च । एषमवादिपु योम्पम् ॥१॥ दस ससकाए सम्णी सचममाईसु सत्तजोगेमु । पेइठियादिपुप्या पणमटे सच ओराले ॥ ५॥ १ बारासूरमश्रिीनिवारिधिवाशिमणिमात्र । पक्षापाता तुरंश मोबार ॥ १ परधि इति पार पुस्तके मास्ति। 1 अपांता रवि पाठः पुस्तके मास्ति।

सिद्धान्तसारः । दश त्रसकाये सज्ञी सत्यमनआदिषु सप्तयोगेषु । द्वीन्द्रियादिपूर्णाः पचाष्टमे सप्त ओराले ।। दस तसकाए-त्रसकायेषु द्वित्रिचतुरिन्द्रियपचेन्द्रियेषु दश जीव- समासा भवन्ति । ते के ? द्वित्रिचतुरिन्द्रियाः पर्याप्तापर्याप्ता इति षट् । पचेन्द्रियसझ्यसंज्ञिन पर्याप्तापर्याप्ता इति चत्वार एवं दश । सण्णी सञ्चमणाईसु सत्तजोगेसु-सत्यमनःप्रभृतिषु सत्यासत्यो- भयानुभयमनोयोगेषु सत्यासत्योभयवचनयोगेषु सप्तसु योगेषु प्रत्येक एकः सज्ञिपर्याप्तको जीवसमासो भवति । वेइंदियादिपुण्णा पण- महे-अष्टमेऽनुभयवचनयोगे द्वीन्द्रियादयः पर्याप्ताः पंच जीवसमासा भवन्ति । तानाह-द्वित्रिचतुरिन्द्रियपंचेन्द्रियसझ्यसंज्ञिनः पर्याप्ता इति पच । सत्त ओराले-औदारिकशरीरे सप्तजीवसमासा भवति । एकेन्द्रि- यसूक्ष्मबादरपर्याप्ता इति द्वयं द्वित्रिचतुरिन्द्रियपचेन्द्रियसइयसंज्ञिनः प- र्याप्ता इति पच, एव सप्तजीवसमासा औदारिककाययोगे भवन्ती- त्यर्थः ॥ ५॥ मिस्से अपुण्णसग इगिसण्णी वेउब्वियादिचउसु च । कम्मइए अह त्थी-पुंसे पंचक्खगयचउरो ॥६॥ मिश्रे अपूर्णसप्त एकसज्ञी विगूर्विकादिचतुर्षु च । कार्मणे अष्टौ स्त्रीपुसोः पचाक्षगतचत्वारः ॥ मिस्से अपुण्णसग इगिसण्णी-औदारिकमिश्रकाययोगे अपर्याप्ताः सप्त, इगिसण्णी-एक संज्ञिपर्याप्तक एवमष्टौ जीवसमासा. । ते के ? एकेन्द्रियसूक्ष्मवादरद्वित्रिचतुरिन्द्रियपचेन्द्रियसंझ्यसशिनोऽपर्याप्ताः सप्त, एकः पर्याप्त. सज्ञी स च केवलिसमुद्धातापेक्षया ग्राह्यः, एवमष्टौ जीव- समासा औदारिकमिश्रकाययोगे भवन्तीति विज्ञेय । वेठब्वियादिचउसु च वैक्रियिकादिचतुर्पु काययोगेषु चकारादेकः सज्ञी । अत्र भेद । - सिदान्तसारादिस महे- पेफ्रियिककापयोगे पंचेन्द्रियसंक्षिपर्याप्स इस्पेको भवति । क्रिपिकमि- प्रकाययोगे पंचेन्द्रियसंस्यपर्याप्तको मर्षति । माहारफकापयोगे पंचेन्द्रि पसंझिपर्याप्तको मवति । माहारकमिप्रकापयोगे पंचेन्द्रियसंम्पपर्याप्तको भवसि । कम्मइए बह-कामणकाययोगे भौदारिकमिश्रकायोक्ता पर बीमसमासा भवन्ति । त्यीपुसे पंचायगय क्रो-बीवेद पंचेन्द्रियस विपपाप्तापर्याप्तपंचेन्द्रियासधिपर्याप्तापर्याप्ता एते चत्वार | पुवेदेसी वेदोकामत्यारो जीवसमासा मवन्ति ॥ ६ ॥ संट कोहे मापे मायालोहे य इमाईमे य । पोरस इगि पेमगे मामाजवहीसु सण्णिदुर्ग ॥ ७ ॥ पंठे क्रोधे माने मापाठोमयो प कुमतिकुग्रुतयोः च । चतुर्दश एको विभंगे मतिश्रुतावषिषु सपिदिक ॥ संदे-मसकवेदे चतुर्वश बीवसमासा मनन्ति । तया कोहे माणे मायाछोरे य-क्रोभे माने मापाया सोमे व चतुर्दश जीबसमासा भवन्ति । तथा कुमाकुईये—पुमतौ कुमुतौ च चतुर्दश जीवस मासा मवन्ति । इगि देभंगे-विमंगे कपषिशाने एक पंचेन्द्रियसंधि पर्याप्तक एव । मइमामवहीस सण्णिदुर्ग मतिश्रुमेपषितामेषु त्रिषु प्रत्येक सष्णिदुर्ग-पंचेन्द्रियसविपर्याप्तापर्याप्तौ दो नीषसमासौ स्त पर्य ॥७॥ मणकेशलेस सग्णी पुष्णो सामाश्यादिमु वह य । पउदस असंयमे पुप लोयमअवलोयमे छपकं ॥८॥ मन केवल्यो सनी पूर्ण सामापिकाविषट्स तया । चतुर्दश मसपमे पुन ठोचनावलोकने पटक ॥ १ मविभुवाचिकानेषु इति भादि।

सिद्धान्तसारः ।
-
क
मणकेवलेसु सण्णी पुण्णो—मन.पर्ययकेवलज्ञानयोः द्वयो. पचेन्द्रिय-
सज्ञिपर्याप्त एव एकजीवसमासो भवति । सामाइयादिछसु तह य-तथा ते-
नैव प्रकारेण च देशसंयम-सामायिक-च्छेदोपस्थापना-परिहारविशुद्धि-
सूक्ष्मसॉम्यराय-यथाख्यातसयतेषु षट्सु सयमेषु प्रत्येक संज्ञिपर्याप्त एक
एव स्यात् । चउदस असजमे-असयमनाम्नि सप्तमे संयमे चतुर्दशजीव-
समासा भवन्ति । पुण लोयणअवलोयणे छक्क-पुनः लोचनावलोकने
चक्षुर्दर्शने जीवसमासषट् भवति । चतुरेन्द्रियपर्याप्तापर्याप्तौ द्वौ, पचे.
न्द्रियासंज्ञिपर्याप्तापर्याप्तौ द्वौ, पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्तापर्याप्तौ उभौ इति
षटूजीवसमासाश्चक्षुर्दर्शने भवन्तीत्यर्थः ॥ ८॥
चउदस अचक्खुलोए दो एकं अवहिकेवलालोए ।
किण्हादितिए चउदस तेजाइसु सण्णियदुगं च ॥ ९॥
चतुर्दश अचक्षुरालोके द्वौ एकोऽवधिकेवलालोके ।
कृष्णादित्रिके चतुर्दश तेजआदिषु संज्ञिद्विक च ॥
चउदस अचक्खुलोए---अचक्षुर्दर्शने चतुर्दशजीवसमासा भवन्ति ।
दो एक्क अवहिकेवलालोए-अत्र यथासख्येन व्याख्या, अवधिज्ञाने
पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्तापर्याप्तौ द्वौ जीवसमासौ भवतः, केवलदर्शने प-
चेन्द्रियसज्ञिपर्याप्तक एक एव जीवसमासः स्यात् । किण्हादितिए
चउदस-कृष्णादित्रिके कृष्णनीलकापोतासु लेश्यासु तिसृषु चतुर्दश-
जीवसमासा ज्ञेयाः । तेजाइसु सणियदुग च-तेजआदिपु पीतपद्म-
शुक्ललेझ्यात्रिके पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्तापर्याप्तजीवसमासद्विकं भवति ॥९॥
चउदस भव्वाभच्चे दुण्णेगं खाइयादितिसु मिस्से ।
अपुण्णा सग पुण्णा सण्णी इगि चउदस य दोसु कमे ॥१०॥

सिद्धान्तसारादिसमहे- चतुर्दश भम्यामम्पयो छौ एकः बायिकादित्रिषु मिझे। मपूर्णा सप्त पूर्ण सही एक चतुर्दश च यो क्रमेण ॥ मम्पनीवेऽभम्पयीये च चतुर्दश नीवसमासा मपन्ति । दुणे साइयादिमि मिस्स-अत्र ययासम्म व्यास्त्सेय, क्षायिकादित्रिप पा- मिकोपशामवेदकसम्पत्वेषु पंचेन्द्रियसंधिपर्याप्तापर्याप्तमीवसमासौ हो मवत, मिस्र सम्पावे परन्द्रियसंक्षिपर्याप्तक एक एप गोषसमासो म- पति | मिमे मरणासमपादपर्याप्तवं तु म समबति । मपुण्णा सग पुष्मा सप्णी इति पठदस य दोमु कमे-कमे इति-क्रमेण, दो- प्पो सासावनमिप्यालेसम्पपलयो , मपुष्णा सग-अपर्याप्ता सप्त, सणी इगि-पर्याप्तसको एक , चतुर्दश घ,। भप म्पेफि-सासाद नसम्पावे एकेन्द्रिपसूक्ष्मवादरवित्रिचतुरेन्द्रियपंचेन्द्रियसपसंक्षिन एते सप्त अपर्याप्ता पंचेन्द्रिपसविपर्याप्त एक एष एवं भयौ बीपसमासाः (सासादनसम्परत्वे) मषन्तीति भावः । मिथ्यात्वसम्याने एकेन्द्रियाद पमतुर्दश जीपसमासा भवन्तीति सूधार्प ॥१०॥ सप्णिमसण्मिसु दोणि म भाारमणाहारएस पिण्णेया। बीवसमासा पउदस बोम जिणेहि णिरिहा ॥ ११ ॥ संस्यसपिनो शेप माहारामहारक्योः बिहेमा । जीपसमासामतुर्दश महामेव मिन मिर्दिा ॥ सण्णिमसण्णिसु दोणि प-संधिनीचे पंधेन्द्रियसहिपर्याप्ताप पर्याप्ती बीपसमाती ममता । मसझियाने भसंधिपर्याप्तापर्याप्ती वीर वाधार मिपाले सासारामम्पावते समारो मोति मगर मतियासारन पुस्तके पाहा। । एप्पोम रिपोवा को मिरिपोप्रमामि।

सिद्धान्तसारः । vN- समासौ स्याताम् । आहारानाहरकेपु ज्ञेया जीवसमासाश्चतुर्दश अष्टा- चेव । को भावः ? आहारकमार्गणाया चतुर्दशजीवसमासा विज्ञेयाः । अनाहरकमार्गणायामष्टावेव जीवसमासा बोद्धव्याः । ते के इति चेदु- च्यते-एकेन्द्रियसूक्ष्मवादरद्वित्रिचतुरिन्द्रियपचेन्द्रियसइयसज्ञिन एते सप्त अपर्याप्ताः, एकः सज्ञिपचेन्द्रियपर्याप्तक इत्यष्टौ जीवसमासाः । अनाहारे एतेऽष्टौ कथ सभवतीत्याशकायामाह-कचिद्विग्रहगत्यपेक्षया कचित्के- बलिसमुद्धातापेक्षया। तथा चोक्तः चिग्गहगइमावण्णा समुग्धाइयकेवलिअजोगिजिणा। सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारिया जीवा ॥१॥ जिणेहिं णिहिट्ठा-जिनैः कथिता मार्गणासु यथासभव जीवसमासा जिनर्भणिता इत्युक्तिलेशः ॥ ११ ॥ इति चतुर्दशमार्गणासु जीवसमासाश्चतुर्दश सक्षेपेण कथिता । अथ चतुर्दशमार्गणासु चतुर्दशगुणस्थानान्यवतारयन्नाह ग्रन्थकर्ता ( मार्गणासु गुणस्थाननिरूपणार्थ गाथामाह)- णारयतिरियणरामरगईसु चउपंचचउदसचयारि । इगिदुतिचउरक्खेसु य मिच्छं विदियं च उववादे ॥१२॥ नारकतिर्यड्नरामरगतिषु चतुःपचचतुर्दशचत्वारि । एकद्वित्रिचतुरक्षेषु च मिथ्यात्व द्वितीय चोपपादे ॥ इय गाथा यथासख्य व्याख्येया। नारकतिर्यङ्नरामरगतिषु चतु:- पंचचतुर्दशचत्वारि गुणस्थानानि यथासख्य भवन्ति । इति गतिमार्गणा १ विग्रहगतिमापना समुद्घातकेवल्पयोगिजिना । सिद्धाश्चानाहारका शेषा आहारका जीवा ॥

सिदान्तसारादिसमहे- समाप्ता । इगिद्धतिषतरम्सेसु म मिल्छ विदिय च उपवादे-एकदि त्रिचतुरक्षेषु च एकेन्द्रियेषु डीन्द्रियेषु श्रीन्द्रियेषु परिन्द्रियेषु चैक मि थ्यात्वं । च पुन एरोम्वेव दितीय सासादनगुणस्याम, उपपादे-उत्प- विका अपर्याप्तसम्ये स्पात् । एकेन्द्रियादिषु चतुई मिप्पात्वसासा दनगुणस्थानद्वयं भवतीत्पर्य ॥ १२॥ घउदस पंचरखतसे धरादितिस दुगिगि वेयपषधे । सवाणुमये तेरस भगवयमे वारसग्णेसु ॥ १३ ॥ पतुर्दश पंचामप्रसयो भरादित्रिषु एक सेब पवनयो । सस्पानुमययो प्रयोदय मनोववनयो द्वादशान्येषु ॥ पटदसेत्यादि । पंचम्सतसे--पंचाक्षेषु पंचेन्द्रियेषु मिप्पास्मादि- चतुर्दशगुणस्पानामि मवन्ति । इन्द्रियमार्गणा समाप्ता! 'तसे' प्रारम्य कायमार्गणा निहायत--तसे-ति, प्रसकायेषु व मिथ्यात्वादि पतुर्दशगुणस्थानानि स्यु । धरादितिम दुगि-घरादिषु त्रिपु पृषि प्पम्वनस्पतिकायेड, दुगि-मिप्यावसासादमगुणस्मानाप ममति । इगि वेमपवणेसु-रोग पपनकायेषु एक मिष्यात्वगुणस्थानं भवति । इति कार्यमार्गणा समाप्ता । सबाणुमय वेरस मणपणे सत्मानुभयमनोयोगे मिप्पाचादिप्रयोदश, सस्पानुभयवचनपोगे प्रयोदश । मारसण्णेम-भ म्येषु मसत्पमनोयोगोमयममोयोगासस्पषचनपोगोममबचनयोगेषु पतुर्प प्रत्येक वारस-(शश) मिप्यालादीनि क्षीणकपायान्तानि स्य ॥१३॥ मोरालिए य वेरम मिस्से कम्मे य मिस्सनियमोगी। उम्पियद्ग पदुतिय पमत्तमाहारगे य ॥ १४ ॥ । पारस पाम्पे गाम पुस्तके।

सिद्धान्तसारः। ११ औदारिके च त्रयोदश मिश्रे कार्मणे च मिश्रत्रिकयोगिन । वैगूर्धिकद्विके चतु:त्रिक प्रमत्तमाहारकाहिके च ।। औदारिककाययोगे मिथ्यात्वादिसयोगकेवलिपर्यन्तानि त्रयोदश गुण- स्थानानि भवन्ति । मिस्से कम्मे य मिस्सतियजोगी-मिस्से इति औदारिकमिश्रकाययोगे, कम्मे य-इति, कार्मणकाययोगे -इति, कार्मणकाययोगे च, मिस्सतिय- जोगी---मिश्रत्रिक सयोगिगुणस्थान च भवति । मिश्रत्रिकमिति कोऽर्थ ? मिथ्यात्वसासादनाविरतानीति मिश्रत्रय भण्यते । औदारिकमिश्रकाययोगे कार्मणकाययोगे च मिथ्यात्वसासादनाविरतसयोगकेवलीनि नामानि च- त्वारि गुणस्थानानि भवन्तीत्यर्थ । मिश्रकार्मणकाययोर्मिश्रगुणस्थान कुतो न सभवति ? मरणाभावात् । तथा चोक्त,- 'मिश्रे क्षीणे सयोगे च मरण नास्ति देहिनाम्' इति वचनात् । वेउव्वियदुग चदुतिय-चैक्रियिकद्विके चत्वारि त्रीणि यथासख्य । वैक्रियिककाययोगे मिथ्यात्वसासादनमिश्राविरतगुण- स्थानचतुष्टय भवति । वैक्रियिकमिश्रकाययोगे मिथ्यात्वससादनाविरत-- गुणस्थानत्रिक भवति । पमत्तमाहारदुगे य-आहारकद्विके आहारक- काययोगे आहारकमिश्रकाययोगे च प्रमत्ताख्य एक पष्ठ भवति । इति योगमार्गणा समाप्ता ॥ १४ ॥ वेदतिए कोहतिए णवगुणठाणाणि दसय तह लोहे । अण्णाणतिए दो मइतिए चउत्थादिणव चेव ॥ १५ ॥ वेदत्रिके क्रोधत्रिके नवगुणस्थानानि दशक तथा लोभे । अज्ञानत्रिके वे मतित्रिके चतुर्थादिनव चैव ।। वेदतिए-वेदात्रके स्त्रीवेदपुवेदनपुंसकवेदेषु त्रिषु मिथ्यात्वादीन्य निवृत्तिकरणपर्यन्तानि नवगुणस्थानानि भवन्ति । इति वेदमार्गणा ।

१२ सिद्वान्तसारादिसंग्रहे- । फोहतिए गव-झोपत्रिक क्रोपमानमापास मिम्पावादीम्यनितिकरण पयन्तानि गुणस्थामानि भवन्ति । दसप तह लोहे-सपा मे मिष्या- स्वप्रमातिसूरमसाम्परायपयन्त गुणस्थानदशक मपति । इति कपापमार्गमा पूर्णा । अण्णाणतिए दो-महानत्रिक गुणस्याने, फुमतिकुलक पविपु मिषु प्रत्येकं मिथ्यात्वसासादनगुणस्पाने दे भगत । मइतिए पटत्यादिणव घेष-मतिरिके मसिधुताबभिशानेषु चतुर्यादिमन चैन अविरतादिक्षीणकपापपर्यन्तानि नवगुणस्थानानि मपन्ति ॥ १५॥ सग मणपजे फेपलणामे जोगगुर्ग पमतादी। घद् सामाइयजुपले पमचमुपल ध परिहार ॥ १६ ॥ सप्त मन पर्यय केपणाने योगिद्रिक प्रमचादीनि । पत्पार सामायिकसुगठे प्रमण्युगलं च परिहारे । सगमणप-मणपति,मन पपडाने,सगति,सप्त गुणस्ता नानि स्यु । वानि कानि पेदुप्पते प्रमादिमीणकपासपर्मन्तानि सप्त मान्ति । केरमाणे गोगदुर्ग-फेक्टवाने योगरि सयोगापोगकेष टिगुणस्थानस्य मति । इति झाममार्गणा । पमत्तारी पा सामाइपरा पछे-सामायिक गठे सामापिफोटोपस्थापनायो प्रमवापानिधि भरणगुणस्थामपर्यन्वनि प्रस्तारि मस्ति । पमचनपळे व परिहार-- परिकारविनिमयमै तृतीय प्रमवाप्रमत्तगुणरपानार्य भवति ॥ १६॥ गुदम गुदम अंतिमगसारि ति जाहवाद। परिपापरिण र पंगमय यसबमे पउरो ॥१७॥ गुरमे मुरम अन्तिम पारि भान्ति पम्पसे । परतावरित पंपम मसपमे मी" सिद्धान्तसारः । . सुहमे-इति, सूक्ष्मसाम्पराये चतुर्थे सयमे, सुहम-इति,सूक्ष्मसाम्प- रायनाम दशम एकं गुणस्थान भवति । अतिमचत्तारि जहखादे----इति, ययाल्याते पचमसयमे अन्तिमचत्वारि गुणस्थानानि भवन्ति । तानि कानि किन्नामानि चेत् ? उपशान्तकपायक्षीणकपायसयोगायोगकेवलि- नामानि ज्ञेयानि । चरियाचरिए इक्क पचमय-चरिताचरिते सयता- सयते पष्ठे सयमे, इक्क पचमय-इति, पचम देशविरताख्य भवति । असजमे चटरो-असयते सप्तमे मिथ्यात्वादिचतुर्थगुणस्थानानि चत्वारि भवन्ति । इति सयममार्गणा पूर्णा ॥ १७ ॥ बारस चक्खुदुगे णव अवहीए दुण्णि केवलालोए । किण्हादितिए चउरो तेजापउमासु सत्तगुणा ॥१८॥ द्वादश चक्षुर्द्विके नव अवधौ द्वे केवलालोके । कृष्णादित्रिके चत्वारि तेज.पद्मयो सप्तगुणाः ।। बारस चवखुदुर्ग-इति, चक्षुईये चक्षुर्दर्शनेऽचक्षुर्दर्शने च मिथ्यात्वादीनि क्षीणकषायपर्यन्तानि द्वादश गुणस्थानानि स्युः । णव अवहीए-अवधिदर्शने अविरतप्रभृतिक्षीणकषायावसानानि नवगु- स्थानानि भवन्ति । दुण्णि केवलालोए-केवलालोके केवलदर्शने, दुण्णि- सयोगायोगकेवलिगुणस्थानद्वय स्यात् । इति दर्शनमार्गणा । किण्हादि- तिए चउरो-कृष्णादित्रिके चउरो-मिथ्यात्वसासादनमिश्राविरत्यभि- धानानि गुणस्थानानि चत्वारि भवन्ति । तेजापउमासु-पीतपालेश्य- योर्द्वयोः, सत्तगुणा-मिथ्यात्वादीन्यप्रमत्तान्तानि सप्त भवन्ति ॥१८॥ सियलेस्साए तेरस मव्वे सव्वे अभव्वए मिच्छं । इगिदह चदु अड खाइयतिए तहण्णेसु णियइक्कं ॥१९॥ १-२ 'एक्क' इति पुस्तके पाठ ।

११ सिदान्तसारादिसप्रहे- सितोश्यार्या प्रयोदश मम्मे सर्वाणि ममम्मे मिष्यात्त । एकादश प्रत्यारि अप्सौ वापिकाये तधान्येषु निकम् ।। सियलेस्साए तेरस-सितश्यायो शुभलेश्यायो मिथ्यात्वप्रभृतित्रयो- दागुणस्थानानि भवन्ति । इति श्यामार्गणा। भो सम्बे-इति, भम्य नीये, सम्वे-इति, मिप्याबापयोगकेसिपर्यम्तानि चतुर्दशगुणस्पानानि सर्वाणि भवन्ति । भमन्मएति, भभम्यमीने एक मिथ्यात्वगुणस्पान मबति । इति मध्यमार्गणा । इगिदह पदु भर साइपविए-क्षायिकत्रिके मन्त्र यथासम्सेन म्याम्पा वर्तते तयाहि-सायिकसम्यम्पे एकादश चतुर्षादिसिनपर्यन्ताम्पकादशगुणस्थानानि विपन्ते । मेदकसम्यक्त्वे, पहुअविरताचप्रमत्तान्तानि वस्वारि गुणस्थानानि प्रतिपत्तम्पानि । उपशमसम्परत्वे, मर-मपिरतापुपशाम्तक्यायान्तामि मध्य रेयानि । वाऽण्णेमु-समाम्येषु मिथ्यावसासादनमिभेष, णिपकनिक मिति । कोऽर्थ : मिथ्यात्वसम्यक्त्वे मिथ्याचमेक भवति । सासादन- सम्पाको निर्व सासा'नगुणस्पानमस्ति । मिन्ननानि सम्पावे सकीम मिश्रमामगुणस्थान मवेत् । इति सम्पपलमार्गणा ॥ १९ ॥ सम्मियसम्णिसु पारस दो पदमादिविदस पण गुमा कमसो । आहारममाहारे एम इदि मम्गणठामएस गुणा ॥ २० ॥ संस्पसबिपु दशो प्रथमादित्रयोदश च गुणाः कमश । भाहारकानाहरके एतेषु इति मार्गणस्थामेषु गुणा ॥ सप्णिमसण्णिम पारस दो-- पपासमपाकार । संहिनावे प्रपमादिक्षीणक्यापपर्यन्तानि नादशगुणमामि स्म । मसण्णिम-मर्स निमीषु शै गुणी मिप्पावसासादने भवत इस्पर्ष । इति संधिमार्गणा । परमादितिदसपणगुणा कमसी माहारमणातारे--कमसोमति, मनु सिद्धान्तसार । १५ तया क्रमेण यथासख्यतया, आहारके प्रथममिथ्यात्वादिसयोगान्तानि त्रयोदा- गुणस्थानानि सन्ति । अनाहारके पण गुणा–पचगुणस्थानानि भवन्ति मिथ्यात्वसासादनाविरतिसयोगकेवल्ययोगकेवलिनामानि पचगुणस्थानानि स्युः । अनाहारके एतानि पचगुणस्थानानि कंथ सभवतीत्यारेकाया- माह-मिथ्यात्वसासादनाविरतेषु त्रिषु जीवाना विग्रहगत्या सत्या अ- नाहरकत्व सभवति । सयोगकेवलिनि समुद्धातापेक्षया ज्ञेयं । चाक्त विग्गहगइमावण्णा समुग्घयकेवलिअजोगिजिणा । सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारिया जीवा ॥१॥ अयोगकेवलिनि तु स्वभावतोऽनाहरकत्वमस्ति । एसु इदि मग्गण- ठाणएसु गुणा-इत्यमुना प्रकारेण एतेषु मार्गणास्थानेषु गुणा गुण- स्थानानि ज्ञेयाः ॥ २० ॥ इति मार्गणासु गुणा भणिता । अथ चतुर्दशमार्गणासु पंचदशयोगान् प्रकटयन्नाह सूरि• आहारयओरालियदुगेहि हीणा हवंति णिरयसुरे । आहारयवेउव्वियदुगजोगे इगिदस तिरियक्खे ॥ २१ ॥ आहारकौदारिकद्विकैः हीना भवन्ति नारकसुरेषु । आहारकवैक्रियिकद्विकयोगेन एकादश तिरश्चि ।। आहारय इत्यादि । णिरयसुरे----नरकगतौ देवगतौ च आहारका- हारकमिश्रकाययोगे इति द्वय, औदारिकौदारिकमिश्रकाययोगद्वय इति चतु- योगैहींना अन्ये उद्धरिता , इगिदस-एकादशयोगा भवन्ति । ते के इति चेत् १ मनोयोगचत्वारि वचनयोगचत्वारि चैक्रियिककाययोग- मम्पे १६ सिदान्तसारादिसंग्रहे- वैक्रियिकमिश्रकाययोगकामणकापयोगा एवं एकादशयागा नरका देवगत्यां मवम्तीति शेप । माहारपयेउम्मियदुगनोगे इगिदस विरिपक्से- तिर्यम्गतौ भाहारकाहारकमिप्रवैक्रियिकतन्मिनकापपोगैहीना एकादशपोगा ममन्ति । से के! माटो मनोबचमयोगा सौदारिकतन्मि- घफार्मणफाययोगामेति अप एष एकादश योगाः स्यु ॥ २१ ॥ वेगुख्यिमद्गरहिया मणए सेरस एमक्खकायेषु । पंचसु ओरालदुर्ग कम्मइयं तिष्णि वियलेसु ॥ २२ ॥ किरिकरहिसा मनुजे प्रपोदश एकासकापेषु । पंचसु औदारिकरिक कार्मर्ण प्रयो पिकलेषु ॥ वेगुम्भियरहिया मणुए रस-ति, मनुष्यगती पैकिपिकक्रिपिकमि- प्रकापयोगइपरहिता भम्पे प्रयोदश योगा मवन्ति । इति गतिमार्गणा। एपक्सकापेसु पंचसु भोरान्दुर्ग कम्मइये विणि इति, एकेन्द्रिये, का- येम पंचसुपति, पिम्पप्रेगोवायुवनस्पतिकायेषु च बौदारिकोलारिक मिमकम्पपोगदर्य, कम्मइय-कार्मण कापयोग इति प्रयो योगा भवन्ति । पियछेमु इति पदस्प म्पाम्मानमुत्तरगापायो वर्तते ॥२२॥ तपया- अणुमयपरषेण शुभा पदु पंचक्खे दु पंचदस जोगा। तसकाए विण्णेया पणदा जोगेसु मिया ॥ २३ ॥ भनुमयवचनेन पुवाः चत्वार पंचाक्षे तु पंचदश पोगा । समये विद्यया पंचदश योगेपु निबैक ।। विपळेम मणुभयपणेण शुमा पदु-ति, पिकलेखियेषु रित्रिचतुरिन्द्रियेषु मनुभयवचनेन पुतयः चत्वारो योगा भवन्ति । ते के भौदारिकौगरिकमिप्रकार्मणानुभयवचननामान एते चबाये योगाः । पचासे पंचवस मोगा-- पुम पंचाक्षे पेन्द्रियेषु सिद्धान्तसारः। १७ - पचदश योगा भवन्ति । पचेन्द्रियेषु नानाजीवापेक्षया यथासभव- मुत्प्रेक्षणीयाः । तसकाए विण्णेया पणदह-इति, त्रसकायेषु सामान्यत्वेन पचदशयोगाः सन्ति । इतीन्द्रियमार्गणाकायमार्गणाद्वयं जात । जोगेसु णियइक्क-इति, पचदशयोगेषु निजैकः स्वकीयः स्वकीयो योगो भवति । को भाव १ सत्यमनोयोगे सत्यमनोयोगः, असत्यमनो- योगेऽसत्यमनोयोगः । एव सर्वत्र ज्ञेय । इति योगमार्गणा ॥ २३ ॥ आहारयदुगरहिया तेरस इत्थीणउसए पुंसे । कोहचउक्के सव्वे अण्णाणदुगे तिदह हुंति ॥ २४ ॥ आहारकद्विकरहिता. त्रयोदश स्त्रीनपुसकयो. पुसि । क्रोधचतुष्के सर्वे अज्ञानद्विके त्रयोदश भवन्ति ।। आहारय इत्यादि । स्त्रीवेदे नपुसकवेदे च आहारकतन्मिश्रकाययोग- द्वयरहिता अन्येऽवशिष्टास्त्रयोदश योगा भवन्ति । पुसे-----पुंवेदे, सव्वे- सर्वे पचदश योगाः स्युः । इति वेदमार्गणा । कोहच उक्के सवे-क्रोध- चतुष्के क्रोधमानमायालोभचतुष्टये सर्वे योगा भवन्ति । इति कषाय- मार्गणा । अण्णाणदुगे—अज्ञानद्विके कुमतिकुश्रुतज्ञाने आहारकद्वय- योगवास्त्रयोदश योगा भवन्ति ॥ २४ ॥ मिस्सदुगाहारदुर्गकम्मइयविहीण हुति वेभंगे । दस सव्वे णाणतिए मणपज्जे पढमणवजोगा ॥ २५ ॥ मिश्रद्विकाहारद्विककार्मणविहीना भवन्ति विभगे। दश सर्वे ज्ञानत्रिके मन पर्यये प्रथमनवयोगा ॥ मिस्सेत्यादि । विभगज्ञाने कवधिज्ञाने, मिस्सेत्यादि-औदारिकमि- श्रवैक्रियिकमिश्रकाययोगद्वयाहारकतन्मिश्रकाययोगद्वयकार्मणकाययोगवि- हीना उद्धरिता दशयोगा भवन्ति । ते के ? अष्टौ मनोवचनयोगा औ- दारिकवैक्रियिककाययोगी एव दश योगा कवधिज्ञाने भवन्तीत्यथः ।

सिदान्तसारादिसप्रहे- सम्चे गाणविए-पानत्रिके मतियुसावधिज्ञानप्रये सर्वे पंचदशयोगा मपन्ति । मणपने पठमणपनोगा -मन-पर्यपहाने प्रथमे 'मस्पादे' प्रयमा नवपोगा भवन्ति । ते के भयो मनौवचनयोगा एफ मौदा- रिपोग एवं नवयोगा ॥ २५॥ मोरालिप वम्मिस कम्मइम सबभणमया छ । मणषपणाण चउरम केवलमाणे सगिगिदसम् ॥ २६ ॥ मौदारिक पन्मिम कार्मर्ण सत्यानुभयान च। मनोवचमाना चतुफ केवलाने सप्त एकादशकं ।। काठणाणे-केवलाने, सग–सप्तयोगा भवन्ति । कितना- माम । मोराठिये तम्मिस्स -मोरगरिककाययोग, तम्मिन मौवारिक मिकम्ययोग , कार्मणकापयोग एते भयो योगा । सधेपादि- सत्यानुमयमनोरचनामा चतुक सस्पमनोयोगानुमयमनोयोगी, सत्प पचनयोगानुमपबचनयोगौ इति चत्वारो योगा एवं एकत्रीहता सप्त- पोगा केवमाने मवन्तीपर्य । मन्त्र वटस्पेनोग्यत-औदारिकापयोग मोगारिकमिनकापयोग कार्मणकाफ्योगपैसे प्रम केवगामे कर्प सम- पम्तीति चेत् , तदुप्यते-समुदातापेक्षया समावनीया | तथा चोक भागममन्ये- दुगे मोराम कवारजगमे प पपरसंबरपे । मिस्मोरापिप मणिय सेसटिएमाण कम्माप ॥१॥ मस्पा मर्य-दरकपाठमुग्मे भौदारिककाफ्योगो मपति । कगार- युगले य-प पुन कपाटपतरपुम्मे भौदारिफकायोगो मपति । पपरस- 1 एपिदपर्स पुस्तके म्मान गनपानीऽपि । मोरा बना १ रंगी मोबारिक सम्पर प्रतरसपरने। मिपारिक मनिटानीहिमन। पाठः।

सिद्धान्तसारः। १९ वरणे मिस्सोरालिय भणिय-~-प्रतरसवरणे प्रतरसमुद्धातसकोचने औदा- रिकमिश्रकाययोगो भणितः । शेप त्रिक प्रतरलोकपूरणसवरणत्रये का- मणकाययोग जानीहि । इति ज्ञानमार्गणा । 'इगिढसय' इति पदस्य उत्तरगायाया सम्बन्धः ॥ २६ ॥ कम्मइयदुवेगुचियमिस्सोरालूण पढमजमजुयले । परिहारदुगे णवयं देसजमे चेव जहखादे ॥ २७ ॥ कार्मणद्विवैक्रियिकमिश्रौदारिकोना. प्रथमयमयुगले । परिहारद्विके नवक देशयमे चैव यथाख्याते ॥ इगिदसयमिति पूर्वगाथास्थित पद, एकादशयोगा प्रथमसयमयुगले सामायिकच्छेदोपस्थापनाद्वये भवन्ति । ते के ? कम्मइय इत्यादि कार्मण- काययोगवैक्रियिकतन्मिश्रकाययोगद्वयौदारिकमिश्रकाययोगैरूना हीना अन्ये एकादशयोगा । ते के ? अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिककाय- योग आहारकद्वयमित्येकादशयोगाः । परिहारदुगे णवय-परिहारविशु- द्विसूक्ष्मसापरायसंयमद्वये नवयोगा भवन्ति । ते के ? अष्टौ मनोवचन- योगा एक औदारिककाययोग इति नव । देसजमे चेव-~च पुन. देश- संयमे एते पूर्वोक्ता मनवचनानामष्टौ, एक औदारिकयोग एव नवयोगा भवन्ति । जहखादे-—इति, उत्तर गाथाया सम्बन्धोऽस्ति ॥ २७ ॥ वेउव्वियदुगहारयदुग्ण इगिदस असंजमे जोगा। तेरस आहारयदुगरहिया चक्खुम्मि मिस्सूणा ॥ २८ ॥ वैक्रियिकद्विकाहरकद्विकोना एकादश असयमे योगाः । त्रयोदश आहारकद्विकरहिता चक्षुषि मिश्रोनाः ।। १ 'मिस्सा' अन्यत्र । २ जुम्मे अन्यत्र । ।

२० सिदान्तसारादिसमहे- जासावे-~-ययाच्यावचारित्रे, पेटम्पियेत्यादि-बैक्रियिकौकिपि- कमिनाहारकाहारफमिनोना एकादश भवन्ति । ते के! मी मनो- पधनयोगा बौदारिकतमिश्रकार्मणकापयोगा एवं एकादशमोगा यपा स्पातसयमे मवन्तीत्यर्प । असबमे जोगा तेरस आहारपदुगररिया- मसंयमे आहारकयोगदपरहिता मन्ये प्रयोदशयोगा मपन्ति । इति सैप- ममार्गणा । पामुम्मि मिस्सूणा-इति पदस्पोखरगापायो सम्बन्ध ॥२८॥ पारस अधक्सुअवडिस सव्वे सचेव करलालोए । किण्हादितिए तेरस पणदा जादियघउके ॥ २९ ॥ दश मचक्षुरमप्पी सर्वे सप्तष केवळाडोके। कृष्णारित्रिक प्रयोदश पंपदश स्मादिकचतुष्क ॥ पसम्मि मिस्सूणा-इति पक्षुर्दर्शने मिश्रोना मौदारिकमिश्नपैनिमि- कमिधामणकायहीमा., बारस-बादशयोगा भवन्ति । भवासना- रिस सम्बे-मचक्षुर्दनिऽवधिदर्शने व सर्वे पंचदशयोगा सः । सत्तेष फेवाठोए---केवदर्शने सप्तैब केवमानोक्का भवन्ति । इति दर्शममार्गणा । किप्पादिसिए वेरस-कष्णादित्रिके कृष्णनीकापोत- मासु माहारकाप मिमा प्रयोदा योगा मवन्ति । पमदा तबादिय- घठक्के-पीसफ्पभुमेश्याम भम्पे प इति चतुष्के, पणदा---पंच- दश योगा मपन्ति ॥२९॥ तिदसामम्वे सखे साइयजुम्मे सु उपसमे सम्मे । सासणमिच्छे तेरस अतिमिस्साहारकम्माया ॥ ३ ॥ प्रयोदशामम्ये समापिक्युग्मे सब उपशमै सम्यक्त्वे । सासादनमिष्यात्वयो त्रयोदश भनिमिमाहारकर्मणा ॥ ममम्पाये भाहारसूर्य मिना मन्ये प्रयोदश पोगा मपन्ति । इति श्यामार्गणा-मम्पमार्गणा:य | समे साइमहम्मे बु- मुन्ट, सिद्धान्तसारः । २१ क्षायिकयुग्मे क्षायिकवेदकसम्यक्त्वे च सर्वे पचदशयोगाः सन्ति । उवसमे सम्मे सासणमिच्छे तेरस-इति, उपशमसम्यक्त्वे सासादनसम्य- क्त्वे मिथ्यात्वसम्यक्त्वे आहारकाहारकमिश्रकाययोगद्वय विना, तेरस- त्रयोदश योगा भवन्ति । अतिमिस्साहारकम्मइया--इति पदस्य उत्तर- गाथाया सम्बन्ध. ॥३०॥ मिस्से दस सण्णीए सव्वे चउरो असण्णिए जोगा। गयकम्मइयाहारे अणाहारे कम्मणो इक्को ॥३१॥ मिश्रे दश सज्ञिनि सर्वे चत्वारोऽसज्ञिनि योगाः । गतकार्माणा आहारके अनाहारके कार्मण एकः ॥ अतिमिस्साहारकम्मइया मिस्से दस इति क्रियाकारकसम्बन्धः। मिस्से- इति, मिश्रे सम्यक्त्वे दशयोगा भवन्ति । अतिमिस्सेति--त्रिमिश्राश्च औ- दारिकमिश्रवैक्रियिकमिश्राहारकमिश्रा आहारकश्च कार्मणकश्च त्रिमिश्राहा- रकार्मणका न विद्यन्ते येषु योगेषु ते तथोक्ता । कोऽर्थः १ मिश्रसम्यक्त्वे एते पचवर्जा अन्ये अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिककाययोग-वैकियिकका- ययोगो द्वौ एव दश योगा भवन्तीत्यर्थः । इति सम्यक्त्वमार्गणा। सण्णीए सव्वेसज्ञिजीवे सर्वे योगा भवन्ति । चठरो असण्णिए जोगा--असज्ञि- जीवे औदारिकौदारिकमिश्रकार्मणकाययोगानुभयभाषा एते चत्वारो योगाः स्यु. । इति सज्ञिमार्गणा । गयकम्मइयाहारे -आहारके जीवे गतकार्मणाः कार्मणकाययोगवर्जा अन्ये चतुर्दशयोगाः सन्ति । अणाहारे कम्मणो इक्को-अनाहारके जीवे कार्मणकाख्य एको योग. । कदा यदा जीवो विग्रहगतिं करोति तदा सभवतीत्यर्थः । इति आहारकमार्गणा ॥३१॥ इति मार्गणा पंचदशयोगा समाप्ता ।

२२ सिदान्तसारादिसमहे- भय चतुर्दशमार्गणास्थानेषु शदशोपयोगा फप्पन्ते,- जय भव पारस पव गावठक्कर तिमि इगिवितियमसे। पठरखे उवओगा घउ वारस हुँति पंचक्खे ॥ ३२॥ नव नब दश नव गतिचतुष्के प्रय एकतिपक्षे । परछे उपयोगाचत्वारो शादश भवन्ति पंचाक्षे ।। णस्यादि । गतिचतुष्के, णब जम बारस णप-नव नवादा मव | मप्र यथासस्पाकार । तपपा । नरकगती नवोपपोगा | ते के' कुमति-कुभुत-कमधि-सम्यज्ञानप्रीणि चक्षुरचक्षुरपषिदर्शमानि श्रोणि, एवं उपयोगा व नरकगतो नारकाणा या । तिर्यमावापि एते एवं उपमोगा नव भवन्ति | मनुष्यगती द्वादशोपमोगा भवन्ति । ते ' महिकश्रुत-वधि-मुमति-मश्रुता-धि-मन पर्यप- देगलझानारपणे पारपक्षुरमषिकेवरदर्शनानि बत्वारि एवं द्वादशो- पपागा मनुष्पगवो मनुष्याणां बासम्या इसर्पः । देवगती नव ये मारक गावाबुकास्त एवोपमोगा मव भवन्ति । इति गतिमार्गणा। सिणि घागेवितियक्वे-एकेन्द्रिये हन्दिये श्रीन्द्रिये प, तिष्णि-क्युपपयोग प्रम भवति । फुमति-अनुवधानसूर्य मचक्षुर्दर्शनमेकमिति अयं । पठ रस्से उपभोगा-पतुरिन्द्रिय उपयोगायत्वार । के। फुमति-कुसुव बानोपयोगी पारभक्षुदर्शनोपपोगो द्वौ एवं पलार । बारस इति पंच-पंचाक्षे पंचेम्निये शाशोपपोगा भवन्ति मनुप्पापेक्षया । इसीम्पिमार्गणा ॥ ३२ ॥ इई सुप अयप तिप्णि वि माउतेउवाउपपे । मारम वसेसु मणवधिसवाणमएम बारस पि ॥ १२ ॥ कुमति युवे मषा प्रपाऽपि ममोपायुषनस्पति । द्वारा प्रसे मनोरयमसस्पानुमयेषु पदशायि ॥

सिद्धान्तसारः । २३ कुमइ इत्यादि । कुमतिज्ञान कुश्रुतज्ञानमचक्षुर्दर्शनमते त्रयोपयोगा., भू इति पृथिवीकाये अप्काये तेजःकाये वायुकाये वनस्पतिकाये च भवन्ति । वारस तसेसु--इति, त्रसकायेषु द्वादशोपयोगा भवन्ति । इति कायमार्गणा। मणवचिसच्चाणुभएसु वारस वि-~-इति, सत्यमनोयोगेऽनु- भयमनोयोगे सत्यवचनयोगेऽनुभयवचनयोगे एतेपु चतुर्प योगेषु द्वादशैव उपयोगा भवन्ति ॥ ३३ ॥ दस केवलदुग वज्जिय जोगचउक्के दुदसय ओराले । केवलदुगमणपज्जवहीणा णव होति वेउव्वे ॥ ३४ ॥ दश केवलद्विक वर्जयित्वा योगचतुष्के द्वादश औदारिके । केवलद्विकमनःपर्ययहीना नव भवन्ति वैक्रियिके । दस केवलदुग वन्जिय जोगवउक्के-इति, असत्यमनोयोगोभयमनो- योगासत्यवचनयोगोभयवचनयोगा इति योगचतुष्के केवलद्विकवर्जिताः केवलज्ञानकेवलदर्शनद्वयरहिता अन्ये दशोपयोगाः सन्ति । दुदसय ओ- राले- इति, औदारिककाययोगे द्वादशोपयोगा विद्यन्ते । केवलदुगमणप- जवहीणा गव होंति वेउव्वे-इति, वैक्रियिककाययोगे केवलज्ञानकेवल- दर्शनद्वयमनःपर्ययज्ञानहीना अन्ये नव उपयोगा भवन्ति ॥ ३४॥ चक्षु विभंगूणा सग मिस्से आहारजुम्मए पढमं । दसणतियणाणतियं कम्मे ओरालमिस्से य ॥३५॥ चक्षुर्विभगोना. सप्त मिश्रे आहारकयुग्मे प्रथम । दर्शनत्रिकाज्ञानत्रिक कार्मणे औदारिकमिश्रे व ॥ चक्खुविभगूणा सग मिस्से----इति, वैक्रियिकमिश्रकाययोगे चक्षुर्दर्श- नविभंगज्ञानोना• सप्त भवन्ति । के ते ? कुमतिकुश्रुतसुमतिश्रुतावधिज्ञा- नानि पच अचक्षुर्दर्शनावधिदर्शनद्वयमिति सप्तोपयोगा स्यु । आहार- २१ सिदान्तसारारिसमहे- हम्मए पढम दसणतिय णाणतिय-माहारकयुग्मे घ, पदम णामति- प्रथम भानत्रिक प्रथम दर्शनशिक मबति । कोऽर्थ ! मतिनुतापनि पानोपयोगात्रप , चक्षुरचक्षुरपधिदर्शनोपयोगामप., एवं पापपोगा माहारकयुग्मे मपन्तीति स्पयर्थ । कम्मे मोराछमिस्से 4--इति, परस्य म्यास्पान उत्तरगायायो सेयं ॥ ३५॥ मंगचासुदसममणपज्जयहीण मय वधूढेि । मणकेबलदुगहीणा मष दम पुंसे कमाएम् ।। ३६ ।। विभगचक्षुर्दर्शनमन पर्यपहीना मत्र वधूफ्नयो । मम कादिकहीना नब दश मि कपायषु ।। कम्मे मोराखमिस्से म-झार्मणकाययोगे औदारिकनिकाययोगे, बेमगत्यक्षुदसणममपनयहीण गव-विभगशानचक्षुर्शनमन पर्पप बानरहिता मन्ये नोपयोगा सन्ति । इति योगमार्गणा । पसंदे- गोमेदे नपुंसकोदे प, मणकेवलदुगहीणा भव-मन पर्यप केवस्थाम- कालदर्शनरोमिनिमिहीमा इवरे नमोपयोगा स। दस पुस- इति, पुषेये समानकेवदर्शनाम्या विना मध्ये दश उपयोगा मबन्ति । इति बेरमाणा । कसाएम-कोपमानमायागेमा केवबामदर्शमवर्ग रम एप भवन्ति । इति कपापमार्गणा ।। २२ ॥ अण्णाणतिए ताणि म वि पक्जुर्म च पंच सग पउम् । पठ तिमि पाम दंसप पंचमणामतिमा दुम्णि ॥ २७॥ सानात्रिके वाम्पेष प्रीमि चक्षुर्मुग्म व पंच सप्त गई। चत्वारि त्रीणि पानानि दर्शनानि पंचम्पानेऽस्तिमौ शे॥ मण्णाणेत्यादि । बानारिके कुमतिकभुतकमिशानात्रिके, ताणि य ति-तामि महानानि प्राणि । बसम्म व पंच--- पुन सुर्यम सिद्धान्तसारः। २५ एव पच । कुमतिज्ञाने कुश्रुतज्ञाने कवधिज्ञाने च कुमतिकुश्रुतविमग- ज्ञानानि त्रीणि चक्षुरचक्षुदर्शने द्वे एते उपयोगाः पच स्युः। सग चउसु चठ तिण्णि णाण दंसण-इति, चतुर्षु मतिश्रुतावधिमन.पर्ययज्ञानेषु स- प्तोपयोगा भवन्ति । ते के 2 चत्वारि ज्ञानानि त्रीणि दर्शनानि एव स- प्तोपयोगा स्यु.। पचमणाणतिमा दुणि-इति, पचमे केवलज्ञाने अ- न्तिमौ केवलज्ञानदर्शनोपयोगौ द्वौ भवतः । इति ज्ञानमार्गणा ॥ ३७॥ सामाझ्यजुम्मे तह सुहमे सग छप्पि तुरियणाणणा। परिहारे देसजई छन्भणिय असंजमे णविति ॥ ३८ ॥ सामायिकयुग्मे तथा सूक्ष्मे सप्त पडपि तुरीयज्ञानोनाः । परिहारे देशयतौ षट् भणिता असयमे नवेति ॥ सामाइयजुम्मे तह सुहमे सग–सामायिकयुग्मे सामायिकच्छेदोप- स्थापनासयमद्विके तथा मुहमे—सूक्ष्मसाम्परायसयमे सप्तोपयोगा भवन्ति । ते के 2 मतिश्रुतावधिमन.पर्ययज्ञानोपयोगाश्चत्वारः चक्षुरच- क्षुरवधिदर्शनोपयोगास्त्रय एव सप्त । छप्पि तुरियणाणूणा परिहारे- इति, परिहारविशुद्धिसयमे पडप्युपयोगास्तुरीयमनःपर्ययज्ञानोना मति- ज्ञानादित्रय चक्षुर्दर्शनादित्रय चेति पट सभवन्ति । देसजई-दशसयमे सयमासयमे, छब्भीणय--पडुपयोगा ये परिहारसयमोक्तास्त एवोपयोगा भवन्ति । असजमे णविति-असयमे नवोपयोगा । ते के 2 कुमत्या- दित्रय सुमत्यादित्रय एव षट् चक्षुरचक्षुरवविदर्शनोपयोगात्रय एव नव भवन्ति ॥ ३८॥ पणणाण दंसणचउ जहखादे चक्खुदंसणजुगेसु । गयकेवलदुग दंसणगदणाणुत्ता हि अवहिदुगे ॥ ३९ ॥ पंचज्ञानानि दर्शनचतुष्क यथाख्याते चक्षुर्दर्शनयुग्मेषु । गतकेवलद्विक दर्शनगतज्ञानोक्ता हि अवधिदिके ।।

सिमान्तसारादिसमहे- पणणाण देसणषठ नहसादे- यथास्यातसयमे मतितामादिपंचा नोफ्पोगा , चक्षुरादिदर्शनोपयोगाचत्वार एवमुपयोगा ना भवन्ति । इति संयममार्गणा । चाखुर्दसणगेसु-चक्षुरचक्षुदर्शनइये, गपकेतक- हुग-केवळशानदर्शनदयरहिता मन्ये दशोपयोगा स्सु । दसणेन्यादि, भपहिशुगे-अपषिदर्शने फेवदर्शने च दर्शनावितहानोका भयधि- केवस्यानोक्ता । तत् कर्य ! येऽषधिलाने कपितास्ते सप्त मतिभुता- पषिमन पर्पयशामोपयोगाभवारचक्षुरचक्षुरसविदर्शनोपयोगामयोऽनषिद् र्शने मवन्तीत्यर्थ । यो कमयाने केवळमानदर्शनोपयोगी प्रोक्तो तो फेवदर्शने भवत । इति दर्शनमार्गणा ॥ ३९॥ मणपजयकेवलदुगहीवोगा एवंवि किणदिए । गष दस वेजाजुमले भन्ने वि य दुदस सुकाए ॥ ४ ॥ मन पर्ययकेवादिकहीनोपयोगा मवन्ति रुष्णत्रिके। मव दश तेनोयुगले भम्पेऽपि च द्वादश शुकापी ॥ मण इत्यादि । किम्हविए-कष्णनीयकापोतसेश्यात्रिके मन पर्पप- केरमानकेवदर्शनलिमिहीना भन्ये मवोपयोगा भवेमु । दस तेमाल यो पतिपयलेश्पयोईपो केवम्झानदर्शनपर्न भन्ये दशोपपोगा.. सन्ति । मम्वे म य दुइस सुस्काए-शुशलेश्यायां शादशोपयोगा! स्यु । इति श्यामागमा। मम्पनीबेऽपि च शदशोपयोगा सम्ति ॥१०॥ पंच असुह अमम्मे साइमतिदए य णय सग छेप । मिस्सा मिस्स सामण मिग्छे छप्पंय पणय च ॥४१॥ पच मामा भभम्ये क्षापिकत्रिके च मन सप्त पडेव । मिधा मिम सासन मिप्यार पट पंच पच ॥ पंचेन्पादि । ममम्पनीवे पुमतिकुमुतविमंगहाम पारषभुर्दर्शनो पयोगा पंच मामा भवन्ति । इति मम्पमार्गणा । साइपतिदए गप । 1 सिद्धान्तसारः। २७ सग छेय-क्षायिकत्रिके नव सप्त षडेव । अत्र यथासख्याल कारः। क्षा- यिकसम्यक्त्वे कुज्ञानत्रयवर्जा अन्ये नवोपयोगा भवन्ति । वेदकसम्यक्त्वे कुज्ञानत्रयकेवलज्ञानदर्शनद्वयरहिता अपरे सप्तोपयोगा सन्ति । उपशम- सम्यक्त्वे सुमत्यादित्रयचक्षुरादित्रय एव पडुपयोगा स्यु । मिस्सा मिस्से- मिश्रे सम्यक्त्वे मिश्राः षट् भवन्ति । ते के ? मतिश्रुतावधिज्ञानोपयोगा- स्त्रयो मिश्ररूपा । मिश्रा इति कोऽर्थः १ किंचित्किंचित्कुज्ञान किंचि- त्किचित्सुज्ञान चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनोपयोगात्रय एव पडुपयोगा। सास- ण-इति, सासादनसम्यक्त्वे कुज्ञानत्रय चक्षुरचक्षुर्दर्शनद्वयं एव पचोप- योगा. स्युः । मिच्छे-मिथ्यात्वसम्यक्त्वे सासादनोक्तानामुपयोगाना पचक भवति । इति सम्यक्त्वमार्गणा ॥ ४१ ॥ दस सण्णि असण्णीए चदु पढमाहारए य बारसयं । मणचक्खुविभंगूणा णव अणाहारेय उवओगा ॥ ४२ ॥ दश सज्ञिनि असज्ञिनि चत्वारः प्रथमे आहारके च द्वादशकं । मनश्चक्षुर्विभगोना नव अनाहारे च उपयोगा ।। दस सणि इति । केवलज्ञानदर्शनद्वयरहिता अपरे दशोपयोगा संज्ञि- जीवे भवन्ति । असण्णीए चदु पढमा-असशिजीवे प्रथमाश्चत्वार उप- योगा भवन्ति । ते के ? कुमतिद्वय चक्षुरचक्षुर्दर्शनद्वयमेव चत्वारः । इति सज्ञिमार्गणा । आहारए बारसय- आहारए बारसय-आहारकजीवे उपयोगानां द्वादशक भवेत् । मणचक्खुविभगूणा णव अणाहारे उवओगा-अना- हरकजीवे मन पर्ययज्ञानचक्षुर्दर्शनविभगज्ञानरूना रहिता अन्ये नवो- पयोगा भवन्ति ॥ ४२ ॥ इति चतुर्दशमार्गणासु द्वादशोपयोगा निरूपिता ।

२८ सिमान्तसारादिसंग्रहे- भय चतुर्दशमीवसमासेपु पंचदशयोगा कम्यते-- पवसु पठक्के इक्के जोगा इगि दो हर्वति पारसया । तम्भषगईस पदे भवसरगईम फम्मइयो ।। ४३ ॥ सचमु पुग्योस हवे ओरालिय मिस्सय अपुग्यो । इगिइगिमोग विहीणा जीवसमासेमु ते पेमा ॥ ४४ ॥ मषम् चतुफे एकस्मिन् योगा एको दो मपन्ति शादश । सवगतिषु एते मवान्तर्गसिषु कार्मण ॥ सप्तम पूर्णेषु भवेत् मौदारिक मिश्रक मपूर्णेषु । एफैकयोग विहीना बीपसमासेषु ते हेया ॥ गापादयेन सम्बन्म । जीवसमासेस ते णेया-जीवसमासेषु ते योगा या बातम्या मनन्ति । कथमिस्पाह-वसु 'पउम्के एस्के बोगा इगि दो पति बारसया–पपासस्पेन म्यारूपेर्य, मबस मीक- समासस्थानेषु इगिएको योगो शेय । धक्के बसमास स्थानेषु, दो-दो पोगो ज्ञातव्यौ। सके-एकस्मिन् गोवसमासस्थाने, बारसया-द्वादशयोगा भवन्ति । नबसु जीवसमासेषु एको पोग इयुक्त सहि नवसमासा के, तत्र एको योगो क इति दुष्यते--एकेन्द्रिम- सूक्ष्मापर्याप्त भौदारिकमियकाययोग एक: स्पात् । एकेन्द्रियसूक्ष्मपर्याप्त मौदारिफकायपोग एको भपत्ति । एकेम्बियबादरापयप्ति मौदारिकमिम काययोगोऽस्ति । एकेन्द्रियबादरपपप्ति मौवारिककापयोग एको वर्तते । दीन्द्रियापर्यातका भौचारिकमिप्रकाफ्योग एक संभवति । त्रीमिया- पर्यासकाले मौदारिकमिप्रकापयोग एक स्यात् । चारित्रियापर्यातका मौवारिकमिभकाफ्योग एक प्रवर्तते । पंचेम्प्रियासहिनीवापर्याप्त मौदा रिकमिप्रकापयोग एक स्पात् । पंचेन्द्रियसंधिगीवापर्याप्तका सिद्धान्तसार । २९ औदारिकमिश्रंकाययोग एको भवति । एव नवसु जीवसमासस्थानेषु. योग एको भवति । एव चतुर्षु-जीवसमासेषु द्वौ योगौ भवत इति प्रोक्त तर्हि चत्वारो जीवसमासा के तत्र द्वौ योगो को इत्याशकायामाह-द्वीन्द्रिय- पर्याप्ते औदारिककाययोगानुभयवचनयोगौ भवतः। त्रीन्द्रियपर्याप्तकाले औदारिककाययोगानुभयवचनयोगौ स्तः । चतुरिन्द्रियपर्याप्ते औदारिक-- काययोगानुभयवचनयोगौ वर्तेते । पचेन्द्रियासज्ञिपर्याप्ते औदारिककाय- योगानुभयवचनयोगौ सभवतः । इति चतुर्दा जीवसमासेषु द्वौ द्वौ योगी प्ररूपितो। एकस्मिन् जीवसमासे द्वादशयोगा भवन्तीति पूर्वगाथाया सूचितं तर्हि एको जीवसमासः कः तत्र द्वादशयोगाः के इत्याह-पंचे-.. न्द्रियसंज्ञिपर्याप्तजीवसमासे अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिककाययोग- वक्रियिककाययोगाहारककाययोगाहारकमिश्रकाययोगाश्चत्वारः,एव द्वादश- योगाः पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्तकाले सभवन्तीत्यर्थ । इत्येकास्मन् जीवस- मासे द्वादशयोगा निरूपिताः। तब्भवगईसु एदे-इति, तेपामेके- न्द्रियसूक्ष्मापर्याप्तादीनां जीवाना भवप्राप्तेषु, ऐदे-इति, एते एको द्वौ द्वादश योगा भवन्ति । भवतरगईसु कम्मइओ-कार्मणको योगः स भवान्तरगतिषु । प्रकृताद्भवादन्यो भवो भवान्तर तत्र गतयो गमनानि भवान्तरगतिषु भवान्तरगमनेषु कार्मणकाययोगो भवतीत्यर्थ । सत्तसु पुण्णेसु हवे औरालिय–सप्तसु जीवसमासेषु पर्याप्तेषु औदारिककोय- योगो भवति । मिस्सय अपुण्णेसु -इति, अपर्याप्तेषु सप्तसु एकेन्द्रियसू- क्ष्मवादरद्वित्रिचतु पचेन्द्रियसश्यसज्ञिजीवेषु अपर्याप्तकालेषु सप्तस्थानेषु, मिस्सय-औदारिकमिश्रकायो भवेत् । इगि इगि जोग-इति,द्वीन्द्रियत्री- १ यदा मनुष्यतियग्गता जीवा प्राप्नुवान्त तदा औदारिकमिश्र सभवति । यदा नरकदेवगती प्राप्नुवन्ति तदा वैक्रियिकमिश्रकाय सभवति । २ देवनारका- पेक्षया वैक्रियिकयोगोऽपि । ३ भत्रापि पचेन्द्रियसज्ञिपु पूर्ववदव्यवस्था ।

२० सिमान्ससारादिसमहे- न्द्रियवतरिन्द्रियपचीन्द्रपासशिपर्याप्तष चतुःस्पानेषु एफैकस्प योगस्य पुनरप्यन्यस्यैकस्य पोगस्य संयोग झिपसे एवं दर्य स्पात् । कोऽर्थ ! न्दिपादिपर्याप्तिषु घत स्थानेषु बौतारिककापयोगानुमक्यचनमोगौ हो मवत इत्पर्य । विहीणा-पंचेन्द्रिमपत्तिषु हादशयोगा भवन्तीति कपित सत्कर्ष योगास्तु पंचदश पर्वन्ते ! ते योगा , विहीणानाम्या- मौदारिक मिनायक्रिीयकमिप्रकायाम्पा होना क्रियन्ते । भवतिरगाम कम्मइलो इति वचनात् कार्मणकायेन विना मन्ये प्रदशयोगा पंचे- न्द्रियसंक्षिपर्याप्तके भगन्तीस्पर्ष ॥ १३ ॥ १४ इति बीपसमासेषु योन्म उपम्पस्ताः । भप पतर्दशनीवसमासेषु पपासमवमुपपोगा विरूपन्से;- स्मद्गा अषासु तिय दसमु टुगे चदु एवंवि पराजुदा । सम्णियपुग्ये पुण्ये सग दस भीवेस उक्लोगा ॥ ४५ ॥ कुमतितिको मचक्षु ऋय दशम रिके पस्वारो मपन्ति । घधुर्मुता सम्पपनि पर्याप्ते सप्त दश बीयेषु उपयोगा । इमझुगा पचासु तिप दसम- दसम-इति, दशम भीवसमासेषु कुमति- कुश्रुतबामोपयोगी हौ मधमुर्दर्शनोपयोगबैक एते प्रय उपपोगा भवन्ति। ते दामीवसमासाः के पेप्येते प्रम उपयोगा गायन्ते तदाा-एकेन्द्रियर क्मापर्याप्त , एकेन्द्रियसूक्ष्मपर्याप्त , एकेन्द्रियबादरापर्याप्तः एकेनिपका- वरपर्याप्त हौनियापास दीन्द्रिपपर्याप्त , प्रीन्द्रियापर्याप्त , प्रोम्नियप प्ति, चतुरिन्द्रिमापर्याप्त, पपेन्द्रिपासहिनीवापाप्त । एवेष दशम बीवसमासेषु कुमविकुभुतबानोपयोगी ही मचक्षुर्दर्शनोपयोगौते प्रमो १पनिमाविवाविपर्याप्त इति पाठा पुस्तके। .

सिद्धान्तसार ३१ भवन्तीति स्पष्टार्थ । दुगे चटु हबति चक्खु जुदा-इति, द्वयोर्जीवसमा- मयोः चतुरिन्द्रियपर्याप्तपचेन्द्रियासज्ञिजीवपर्याप्तयोश्चत्वार उपयोगा भ- -वन्ति । ते के पूर्वोक्ता कुमतिकुश्रुताचमुर्दर्शनोपयोगात्रयः, चक्खु जुदा-इति, चक्षुर्दर्शनोपयोगसहिता एवं चत्वार उपयोगाः स्युः । सणि अण्णे पुण्णे सग दस-अत्र यथासख्यालकार , पचेन्द्रियसंध्यपर्याप्ते सग---इति, सप्तोपयोगा भवन्ति । ते के ? कुमतिश्रुतसुमतिश्रुतावधि- ज्ञानोपयोगा. पच अचक्षुर्दर्शनावधिदर्शनोपयोगी द्वौ एव सप्त । पुण्णे दस-पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्त उपयोगा दश भवन्ति । के ते दश ? केवल- ज्ञानदर्शनवा अन्ये दशोपयोगा• स्यु.। जीवेसु उवओगा-जीवस- मासेषु द्वादशोपयोगा यथाप्राप्ति प्ररूपिताः ॥ ४५ ॥ इति जीवसमासेपूपयोगा न्यस्ता. । अथ चतुर्दशगुणस्थानेषु यथासभव योगा निरुप्यन्ते,- मिच्छदुगे अयदे तह तेरस मिस्से पमत्तए जोगा। दस इगिदस सत्तसु णव सत्त सयोगे अयोगी य ॥ ४६॥ मिथ्यात्वद्विके अयते तया त्रयोदश मिश्रे प्रमत्तके योगा. । दशैकादश सप्तसु नव सप्त सयोगे अयोगिनि च ॥ मिच्छेत्यादि । मिथ्यात्वप्रथमगुणस्थाने सासाटनगुणस्थाने च तथा अयदे-चतुर्यगुणस्थाने, तेरस-इति, आहारकाहारकमिश्रयोगाम्या विना अन्ये त्रयोदश योगा भवन्ति। मिस्से पमत्तए जोगा दस इगिदस-अत्र यथासख्यत्वेन भाव्य, मिस्से-तृतीये मिश्रगुणस्थाने दश योगा भवन्ति । ते के ? अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिककायवैक्रियिकाययोगौ द्वौ एवं दश । पमत्तए जोगा इगिदस-षष्ठे प्रमत्तगुणस्थाने योगा एकादश सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- मवन्ति । ते के भष्टौ मनोवपनयोगा औदारिकाययोग माहारक कापयोगस्तन्मियकापयोगधेति प्रय एए एकदश योगा । सचम पत्र- सप्तम गुणस्थानेषु पंचमे देशविरते सप्तमेऽप्रमते अष्ठमेलकरणे नवमेऽनिवृत्तिकरणे दशमे सूक्ष्मसाम्पराये एकादशे उपशान्तकाये - दरो क्षीणकपापे एवं एतेषु कथितेषु सप्तगुणस्पानेषु नप योगा स्थ। ते के! मध्यै मनोरधनपोगा भौदारिककापयागपैक एवं नव सरा सयोगे---सयोगकेतलिनि सप्त योगा मपन्ति । ते के! सत्पमनोयो- गोऽनुमयमनोयोग सस्पषधनयोगोऽनुभयबधनयोग मौदारिफकापयो- गस्तन्मियकाफ्योग कार्मणकाययोग इति सप्त योगाः। अयोगिनि बत- दशगुणस्पाने शून्य योगाभाव n १६॥ पति गुपत्ताये मोघ विपिता । मप चतुर्दशगुणस्थानेषु हादशोपयोगा वर्ण्यन्ते, परमदुगे पण पपय मिस्सा मिस्से सदो दुगे छक्क । सक्योमा सचमु दो जोगि बजोगिगुणठापे ॥४७॥ प्रयमद्रिके पंच पंचक मिश्रा मिधे ततो दिके पटक । सप्तोपयोगा सप्तस दौ पोम्ययोगिगुणस्पाने । पदमदुगे-प्रयमादके मिप्यावसासादनगुप्मस्थाने पणपण-पंच पंच उपयोगा मपन्ति । ते के कुमतिकभुतविमझानोपयोगासाप पर- चक्षुदर्शनोपयागौ सौ एवं पंच । मिस्सा मिस्से तदो दुगे एक- मिमगुणस्पाने पुतीये, तदो-ति ततो मिमगुणस्थानात, दुगे-नात, मपिरते चतुर्पगुणस्याने देशपिरतगुणस्था पंचमे पर्वपपयोगा मपन्ति । के है ! मतिश्रुतापधिज्ञानोपयोगाबय चारच खरिदर्श- ।

सिद्धान्तसार ३३ - नोपयोगास्त्रयः । अत्र एतावान् विशेप. ये मिश्रगुणस्थानगा उपयोगास्ते मिश्रा भवन्ति । सत्तुवजोगा सत्तसु-सप्तसु गुणस्थानेषु प्रमत्ताप्र- मत्तापूर्वकरणानिवृत्तिकरणसूक्ष्मसाम्परायययाख्यातोपशान्तकपायक्षीणक- पायाभिधानेपु उपयोगाः सप्त भवन्ति । ते के ? सुमतिश्रुतावधिमनः- पर्ययज्ञानोपयोगाश्चत्वारः चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनोपयोगात्रय एते सप्त स्युः। दो जोगिअजोगिगुणठाणे-सयोगिनि त्रयोदशगुणस्थाने अयोगिनि च द्वौ उपयोगौ स्तः । तौ को ? केवलज्ञानदर्शनोपयोगी द्वौ ॥ ४७ ॥ इति चतुर्दशगुणस्थानेपूपयोगा जाता । अथ चतुर्दशमार्गणासु सप्तपचाशत्प्रत्यया यथासभव कथ्यन्ते । अथ बालबोधनार्थ तेपा प्रत्ययाना पूर्व नामानि निगद्यन्ते,- मिच्छत्तमविरदी तह कसाय जोगा य पच्चयामेया। पण दुदस बंधहेदू पणवीसं पण्णरसा हुंति ।। ४८ ।। मिथ्यात्वमविरतयस्तया कपाया योगाश्च प्रत्ययभेदाः । पच द्वादश बन्धहेतव. पचविंशति पचदश भवन्ति ॥ मिच्छत्त-मिथ्यात्वपचक एकान्तविपरीतविनयसशयाज्ञानोद्भवामिति पचभेद । तथा चोक्त,- मिच्छोदपण मिच्छत्तमसदहणं च तच्चअत्थाणं । एयतं विवरीयं विणयं ससयिमण्णाणं ॥१॥ अविरदी ( अविरतय. ) द्वादश । कास्ताः । उक्त च- छस्सिदिएसु विरदी छजीवे तह य अविरदी चेव । इंदियपाणासंजम दुदस होदित्ति णिदिलु ॥ १॥ १ मिथ्यात्वोदयेन मिथ्यास्व अश्रद्धान च तत्वार्थानां । एकान्त विपरीत विनय सशयितमज्ञानमिति ॥ २ पविन्द्रियेपु अविरति पट्जीचे तथा चाविरतिश्चैव । इन्द्रियमाणासयमा द्वादश भवन्तीति निर्दिष्ट ॥ - ३. सिद्धान्तसारादिसप्रई- तह फसाय-पति, तथा फषाया पंचविंशति । 'अनन्तान म्यप्रस्पाल्पानप्रत्याख्यानसम्बनविकस्पा क्रोषमानमायामा इति पोरस, हास्यरस्परविशोकमपशुगुप्सास्त्रीपुनपुंसकमेदा एवं पिप्पीकता पंचविंशति स्यु । पोगा इति पंचदश । ते के सस्पासस्योभयानु- भयममोमवनविकल्पा माश्य योगा मौदारिकौदारिकमिप्रकियिकरक्रि- पिकमिनाहारकाहारकमिश्रकर्मिणकाययोगा सप्त, एवमेकत्रीकता पम- दापोगा । पचयामेया-प्रत्ययभेदा मानवप्रकारा । पण इदस-मन्त्र फ्यासस्यै, पण-मिप्यावं पंचमकार । दुदस-अविरवयो वादश | पणवीस-पाया पंचविंशति । पण्णरसा योगा पंचदश । ईति- मवन्ति । कर्पभूता एत ! बघहेवू-कर्मबन्योतन फर्ममन्मकारणानी स्पर्य ॥ १८॥ आहारोरालिपगित्वीपुसोहीण गिर इगिवर्ण । आहारपवेउविपदुग्ण यष्ण तिरियक्से ॥ ४९ ॥ भाहारीदारिफरिफलीपुरीमा मरके एकपंचाशत् । भाहारकवि पिकतिकोना त्रिपंचाशत् विरमि ।। भाहारस्पादि । णिय-मरकगतो बाहारकाहरकमियश्य भौगरि कोदारिकमिनर्प सीवेदवेदाय एकै पदिमहीना , इगिवण-भन्ये उमरिचा एकपंचाम्पत्यया भवन्ति । माहारपेतादि-तिरियस्ले- तियमावी माहारकतन्मिय पैझिपिकतम्मिमय एतेभवमिदना अपरे वेषण्ण-विपंचायत् मात्रमा मबन्ति ॥ १९॥ पणवर्ण पेउम्निपदुग्ण मणएमु हुति पावणं । संरादारोरासियदुरोहिं हीमा सुरगईए ॥ ५० ॥ प्रमनकामन ति पाउ पुस्तके।

सिद्धान्तसार. । ३५ पचपचाशत् क्रियिकतिकोना मनुजेपु भवन्ति- द्विपचागत् । पढाहारीदारिकहिहीना. मुरगत्याम् ।। मणुएम--मनुजेपु मनुष्यगती, वेटव्यियद्गृण-क्रियिकतन्मिश्र- द्विकोनाः, पणवण्ण-पचपचाशत्प्रत्यया , हति-~लभवन्ति । बावण्ण सढाहारोरालियदुगेहिं हीणा मुरगईए-मुरगती नपुसकवेदश्वाहारकतन्मि- श्रद्वय च औदारिकोदारिकमिश्रद्वय च ते: पचभिहीनाः, बावण्ण-द्वाप- चागदावा स्युः । इति गतिमार्गणासु प्रत्यया निरूपिता ॥५०॥ मणरसणचउक्कित्थीपुरिसाहारयवेउब्वियजुगेहिं । एयक्खे मणवचिअडजोगेहिं हीण अडतीसं ।। ५१ ॥ मनोरसनचतुष्कस्त्रीपुरुपाहारकवैक्रियिकयुगे । एकाक्षे मनोवागष्टयोगैहींना अष्टात्रिंगत् ॥ एयक्खे-~-एकेन्द्रियजीवेषु, मणरसेत्यादि -मनश्च रसनचतुष्फमिति रसनघ्राणचक्षु श्रोत्रचतुष्क च स्त्रीवेदश्च पुवेदश्च आहारकाहारकमिश्रद्वय च वैक्रियिकतन्मिश्रयुग्म चैतैरेकादशाभहींना पुन मणवचिअडजोगेहिं -सत्यासत्योभयानुभयमनोवचनयोगैरप्टभिहींना अन्येभ्य एकोनविंशति- प्रत्ययेभ्य उद्धरिता अन्ये, अटतीस-~-अष्टात्रिंशत्प्रत्यया भवन्ति ॥५१॥ एदे य अंतभासारसणजुया घाणचक्खुसंजुत्ता । चालं इगिवेयालं कमेण वियलेसु विण्णेया ।। ५२ ।। एते च अन्तभापारसनायुक्ता घ्राणचक्षु सयुक्ता । चत्वारिंशत् एकद्विचत्वारिंशत् क्रमेण विकलेषु विज्ञेयाः ॥ कमेण-~-अनुक्रमेण, वियलेसु-विकलत्रयेषु द्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु, विण्णेया-प्रत्यया ज्ञातव्या स्यु । कथ ? एदे य-एकेन्द्रियोक्ता अष्टात्रिंशत्प्रत्यया अन्तभापारसनायुक्ता अतुभयवचनजिव्हासाहिता ।

। सिद्धान्तसारादिसमहे- पाठ-चवारिंशत्पत्पपा दीन्द्रियनीवे मवन्तास्यर्थ । पुमरेते पूर्वोका मापत्रिंशत् मनुमपबचनरसनघ्राणसहिता , इगिया एकचत्वारिंशदा- स्रपात्रीन्द्रिये स्यु । तथा पूर्वोक्य अध्यात्रिंशत् मनुमयपधननिन्द्रिय- घाणघा संयुक्ता , पाठ-द्विचत्वारिंशत् चतुरिन्द्रये बातम्या इस्पर्य ।। ५२ ॥ पदिए उसे वह सब्वे एपक्खउच अरतीसा । यावरपणए गणिया गणणाहे िपचया पियमा ॥ ५३॥ पंचेन्द्रिये से तथा समें एकालोका मात्रिंशत् । स्थापरपंचके गणिता गणमाथै प्रत्यया नियमात् ।। पंचेस्पादि। पंचन्द्रिये पीये नानागीवापेक्षया सर्षे प्रत्यया भवन्ति । इन्द्रियमार्गणामु प्रत्पया । तसे तह सम्बे-तया प्रसे प्रसकापे समें सपिचाशमानाजीबापेक्षया भात्रवा मपन्ति । पावरपणए स्थाव रपंचके पृथिम्पप्तबावायुपनस्पतिकायेषु पंचमु, एपक्सठच भासासा- एकेन्द्रिये पे उका भरात्रिंशय्पस्पया एष से ममन्तीत्यर्थ गणिया गण- णात पचया णिपमा–नियमामिधयात् गणनाचणभरै प्रस्पया गणिता पपासभन सच्या नीता | इति कापमार्गमास्वाममा ॥५२॥ आहारगं हिचा अण्णमु मोएमु णिय गिपं घिचा। जोग त सेदारा णापम्या अण्णजोगमा || ५४ ॥ भागारकी या भम्पा पोगेनु नि नि गता। पाव निवत्वारिंशत् सातम्या भम्पपागोमा:॥ माहारदुर्ग हिता-माहारदिक या नर्मपिया । मण्णम गोरम गिपणि पिता भार्ग-मम्पेतु प्रपाशपोगेमप्प मिनिसकीय

सिद्धान्तसारः ।
स्वकीय योग धृत्वा पुनः, अण्णजोगूणा-अन्यदिशभिर्योगैरूनास्ते,
तेदाला णायव्वा----इति, ते प्रत्ययाः स्वकीयस्वकीययोगयुक्ताः त्रिचत्वारिं-
शदास्रवा ज्ञातव्याः । अथ स्पष्टतयोच्यते--सत्यमनोयोगे मिथ्यात्वपंच
(क) अविरतयो द्वादश कपायाः पचविंशतिः स्वकीयमनोयोगश्चैक
एव त्रिचत्वारिंशत् आस्रवा भवन्ति । एवं असत्यमनोयोगे ४३, उभय-
मनोयोग ४३, अनुभयमनोयोगे ४३, सत्यवचनयोगे ४३, असत्यवच-
नयोगे ४३, उभयवचनयोगे ४३, अनुभयवचनयोगे ४३, औदारिक-
काययोग ४३, तन्मिश्रे ४३, वैक्रियिककाययोगे ४३, तन्मिश्रकाययोगे
४३, कार्मणकाययोगे ४३, ॥ १४ ॥
संजालासंढित्थी हवंति तह णोकसायणियजोया ।
वारस आहारजुगे आहारयउहयपरिहीणा ॥ ५५ ॥
सज्वलना अषण्ढस्त्रियो भवन्ति तथा नोकषायनिजयोगाः ।
द्वादश आहारकयुगे आहारकोभयपरिहीनाः ॥
आहारजुगे---आहारककाययोगे तन्मिश्रकाययोगे च, बारस-द्वादश
प्रत्यया भवन्ति । ते के 2 सजाला इत्यादि । सज्वलनक्रोधमानमायालो
भाश्चत्वार तह-तथा, असंदित्थी-~-बढस्त्रीवेदद्वयवर्जिता अन्ये
हास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्साघुवेदा इति नोकषाया सप्त । णियजोया-
स्वकीयस्वकीययोगश्चैकैक | आहारके आहारककाययोग , आहारकमिश्रे
आहारकमिश्रकाययोग इत्यर्थ. । इति योगमार्गणाया योगा (आस्रवाः)
निरूपिता । 'आहारयठहयपरिहीणा' इति पदस्य व्याख्यानं उत्तर-
गाथायां ॥ ५५ ॥
तथा हि,-
इत्थिणउंसयवेदे सव्वे पुरिसे य कोहपमुहेसु ।
णियरहियइयरवारसकसायहीणा हु पणदाला ॥ ५ ॥

३६ सिद्धान्तसारादिसमहे- पाल-चत्वारिंशत्प्रत्यया दीन्द्रियजीये भवन्तात्पर्य । पुनरेते पूर्वोच्च भष्टात्रिंशत् अनुमयवचनरसनप्राणसहिता , इगिया-एकचत्वारिंशदा- सपानीन्द्रिये स्सु । सथा पूर्वोका मष्टात्रिंशत् मनुभयवचनधिमेन्द्रिय- घाणचा संयुका , वेयाल—विचत्वारिंशत् चतुरिन्द्रिये बातम्या इस्पर्ध ॥ ५२ ॥ प.दिए तसे वह सम्बे एयरवठच अडतीसा । पावरपणए गणिया गणणाहेहिं पचया णियमा ॥ ५३ ॥ पंचेन्द्रिये प्रसे तपा सर्व एकाक्षोका मात्रिंशत् । स्पावरपंधके गणिवा गणनाथै प्रत्यया नियमात् ।। पचेस्पादि । पंचेन्द्रिये चीपे नानाभीवापेक्षया सर्वे प्रस्पया मपन्ति । इन्द्रियमार्गणाम प्रस्पपा । तसे वा सम्बे--तथा असे प्रसकाये सर्वे सप्तपघाशमानामावापेक्षया भासपा भवन्ति । पामरपणए-स्पाय रपंचके पृथिम्यप्तेगावायुवनस्पतिकापेषु पंचप्नु, एपक्सठत भरतीसा- एकेन्द्रिये ये ठक्ता अध्यात्रिंशात्पपा एष ते भवम्तीस्पर्य गणिया गण- गाहेर पचया णियमा–मियमानिधयात् गणनाचणभर प्रत्यपा गणिता ययासंभव सम्या नीता । इति कापमार्गणास्वासमा ॥५॥ आहारदुर्ग दिपा अण्णमु जोएमु णिय णिय पिता । सोग व सदाला णायम्वा अण्णमोगणा ॥५४॥ भाहारकरिक वा मन्पषु योगेनु नि नि भूता। पोर्ग ते विषबारमात् बातम्या मन्पपोगोना । भास्तु हिना-माहादिक या पपिचा । भण्णमु पोएम गिय णि चिवा बर्ग-मम्पेर प्रयादरायोगेषु मप्पे नि नि सकी सिद्धान्तसारः। ३९ कुमइदुगे-कुमतिज्ञाने कुश्रुतज्ञाने च, पणवण्ण आहारदुगूण- आहारकाहारकमिश्रद्विकोना अन्ये, पणवण्ण-पंचपचाशत्प्रत्यया भवन्ति । कम्मामिस्सूणा वावण्णा वेभगे-विभगे कवधिज्ञाने आहारकाहारकमिश्र- कार्मणवैक्रियिकमिश्रौदारिकमित्रै. पचभिहींना अन्ये , बावण्णा द्वापचा- शदावा स्युः । 'मिच्छअणपचचउहीणा' पदव्याख्यानगाथाया ॥५७|| णाणतिए अडदालासंढित्थीणोकसाय मणपज्जे । वीसं चउसंजाला णवादिजोगा सगंतिल्ले ॥ ५८ ॥ ज्ञानत्रिके अष्टचत्वारिंशत् अपण्डस्त्रीनोकपाया मन पर्यये । विंशतिः चतुःसज्वलनाः नवादियोगा सप्तान्तिमे ॥ मिच्छअणपचचउहीणा णाणतिए अडदाला-णाणतिए-ज्ञानत्रिके सुमतिश्रुतावधिज्ञानेषु मिथ्यात्वपचकानन्तानुबविचतुष्कहींना अन्ये अष्टा- चत्वारिंशत्प्रत्यया स्युः । असढीत्यादि-मणपज्जे-मन.पर्ययज्ञाने, वीस -विंशतिः प्रत्यया भवन्ति । के ते ? असढिीणोकसाय--पढस्त्री- वेदद्वयवा अन्ये पुवेदहास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सानामानः सप्त नोक- षयाः, चउसजाला-चत्वार सज्वलनक्रोधमानमायालोमा ,णवादिजोगा -अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिक एक इति नव ते सर्वे पिण्डीकृता विशतिरास्त्रवाः । सगतिले अतिल्ले–अन्तज्ञाने केवलज्ञाने, सग--- सप्त प्रत्यया भवन्ति । के ते ? सत्यमनोयोगानुभयमनोयोगसत्यवचनयो- गानुभयवचनयोगाश्चत्वार औदारिकौदारिकमिश्रकार्मणकाययोगात्रय एवं सप्त । इति ज्ञानमार्गणायामास्त्रवाः ॥ ५८ ॥ वेउव्विदुगुरालियमिस्सयकम्मूण एयदसजोया । संजालणोकसाया चउवीसा पढमजमजुम्मे ॥ ५९ ॥ वैगूर्विकद्विकौदारिकमिश्रकार्मणोना एकादशयोगाः । सज्वलननोकषायाः चतुर्विंशति प्रथमयमयुग्मे ॥ ।

३८ सिमान्तसारादिसमहे- - - खीमपुंसकवेदे स पुरुप ध क्रोषप्रभविषु । निवरहितवरवादशकयायहीना हि पंचचत्वारिंशात् ॥ पाहारठहयपरिशीणा इत्पिणठेसफ्वेदे-पीयेदे नपुंसकरदे च मारकदपपरिहाना । तथा प्रीपेदे निसप्पमाणे खोदो मवति, नए सकद निसप्पमाणे नपुंसकोदो भवेत् , पुवेदे निहप्पमाणे पुवेदोऽ- स्ति । एवं एकस्मिन् पद निरुप्पमाणे सकीयः स्पात् । भन्यवेद दूर्य न भवति । कोऽर्थ । ब्रीदे नपुंसकोद च मिप्पास्व ५ मषि- रति १२ फयाय २३ योग १३ एवं त्रिपंचाशत् असवा स्युरित्यर्थ । सम्ब पुरिसे प-वि, पुवेदत्रीपदमपुंसकवेदइयरहिता मम्ये पंचपंपाश व्यम्यया भवन्ति । कोहपमुहेम-कोपमानमायाटोभेषु धतुप, हु--- स्फुट, पणदाठा-पंधपचारिशप्पत्पया मस्ति । कपमिति पत्। णि यदियइपरयारसमसायहीणा-सकीयस्वकीयकपायचतुष्करहिया इतर- शाशकपापहीना । मोपपतुप्के पदा सकीय मोपचतुप्फ गृयते तदा इवरे वादश कपाया न मपन्ति । पदा मानचतुके समीपमानपतुक गृपते ता परे शाशकपापा न स्यु । एवं मायाछाममोर्योजनीय । मनु प स्पसा पंचत्वारिंशयायपा गप्पन्से, कि मामान । तथा दि-अनन्तानुपप्पादियोधयतुके मिम्पास्य ५ मविरति १२ जन- मतानुपरप्पादिकापबनुष्कं पाग १५ दास्पादि० २ १५। मर्प प्रम मानपतुप मापाचा के साभयतुम्के सभाषमाप । इति पपापमागणार्या कपापा । ॥१६॥ सुमाग पणयण पाहारगृण कम्ममिम्म्णा । पापप्णा समग मिअणपंचमीणा ॥ ५७।। गुमविदके पपपपाशत् मारकरिकाना फर्ममिश्रीना । पापा मग मिप्यावान परशुरुना ।

सिद्धान्तसारः । कुमइदुगे----कुमतिज्ञाने कुश्रुतज्ञाने च, पणवण्ण आहारदुगुण- आहारकाहारकमिश्राद्विकोना अन्ये, पणवणं-पचपचाशत्प्रत्यया भवन्ति । कम्मामिस्सूणा बावण्णा वेभगे—विभगे कवधिज्ञाने आहारकाहारकमिश्र- कार्मणवैक्रियिकमिश्रौदारिकमित्रै पचभि-ना अन्ये , बावण्णा द्वापचा- शदास्त्रवा स्युः । 'मिच्छअणपचचउहींणा' पदव्याख्याप्रगाथाया ॥५७|| णाणतिए अडदालासंढित्थीणोकसाय मणपज्जे । वीसं चउसंजाला णवादिजोगा सगंतिल्ले ॥ ५८ ॥ ज्ञानत्रिके अष्टचत्वारिंशत् अपण्ढस्त्रीनोकपाया मन पर्यये विंशतिः चतुःसज्वलनाः नवादियोगा सप्तान्तिमे ॥ मिच्छअणपचचउहीणा णाणतिए अडदाला-णाणतिए-ज्ञानत्रिके सुमतिश्रुतावधिज्ञानेषु मिथ्यात्वपचकानन्तानुबविचतुष्कहींना अन्ये अष्टा- चत्वारिंशप्रत्ययाः स्यु । असढीत्यादि-मणपज्जे -~मन पर्ययज्ञाने, वीस --विंशतिः प्रत्यया भवन्ति । के ते ? असढिीणोकसाय-~-पढस्त्री- वेदद्वयवा अन्ये पुवेदहास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्सानामान, सप्त नोक- षयाः, चउसजाला-~चत्वार सज्वलनक्रोधमानमायालोभाः,णवादिजोगा -अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिक एक इति नव ते सर्वे पिण्डीकृता विंशतिरास्त्रवा । सगतिल्ले. -अतिल्ले-~~-अन्तज्ञाने केवलज्ञाने, सग- सप्त प्रत्यया भवन्ति । के ते ? सत्यमनोयोगानुभयमनोयोगसत्यवचनयो- गानुभयवचनयोगाश्चत्वार औदारिकौदारिकमिश्रकामणकाययोगात्रय एवं सप्त । इति ज्ञानमार्गणायामास्रवा ॥ ५८ ।। वेउन्विदुगालियमिस्सयकम्मूण एयदसजोया । संजालणोकसाया चउवीसा पढमजमजुम्मे ॥ ५९ ।। वैगूर्विकद्विकौदारिकमिश्रकार्मणोना एकादशयोगाः । सज्वलननोकपायाः चतुर्विशतिः प्रथमयमयुग्मे ॥

। सिदान्तसदिसमहे- पटमनमजम्मे-अपमयमयुग्मे सामायिकसयमे छेदोपस्थापनासंयमे प, घठवीसा-पतुर्विशतिप्रत्यया भवन्ति । के ते! ठगि-कि पिकमिद्वपादारिकमिधकामणकैच पतमिहाना मन्ये, एपदसबोया -भष्टौ मनोबधनयोगा मौदारिककाययोगाहारकाहारकमिप्रकापयोगा- भेवि त्रय समुदिता एकादशयोगा | संबास-संज्यमनफ्रोधमानमापा छोमा पवार । गोकसापा-दास्पादिनवनोकयाया एवं चतुविशाति ॥ ५९॥ परिहारे आहारपद्गरहिया से इवति बावीस । संजलणलोहमादिमणमजोगा दसय हुँति सुहमे य ॥६० ॥ परिहारे पाहारकादिकरहितास्से भवन्ति दाविशति । संग्वलनष्ठोम भादिममवयोगा दश मम्ति सूक्मे ।। परिहारेस्पादि। परिहारविमुदिसंयमे, माहारमदुगरहिया-आहारकाहार कमियरहितास्ते पूर्वोक्ता सामायिक छेदोपस्पापनयो कथिता शर्षि पाति प्रस्पया मपन्ति । भय म्पक्ति-अपमनोरचनयोगोदारिकसंगमन- पतुकास्पारिनोति द्वाविंशति प्रस्पया परिहारसपमे भवन्तीत्पर्य । संरउणेरपालि। मुहमे य-प पुन सूक्ष्मसाम्परापसपमे, इसप इति- पश मायया स्यु । फे। पक संघसनछोम मादिमनवयोगा मे दश ॥६on ओगतमिम्मकम्मश्यसंचया सोहीण नहयाद । णवजोय णोफमाया आंतकमाय दसमम ॥ ६१ ॥ भौगरिकमिश्रकाणसपुता मोभदाना पपाम्पाते । नवपोगा नोकपापा भातापाशपमे ।। गा---पपाप्यातसपमे गुआममापरायोक्ता ये दरात, भोराक मिसाया--भोगकिमिप्रकापधर्मणापाम्पराम्पा संपुसा सा ।

सिद्धान्तसार । ४१ भवन्ति, एते द्वादश लोहहीणा-सज्वलनलोभरहिताः क्रियन्ते तदा एकादश भवन्ति । के ते १ अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिकौदारिकमि- श्रकार्मणकायास्त्रय एते एकादश यथाख्यातसयमिना भवन्तीत्यर्थः । 'णवजोय णोकसाया अहतकसाय देसजमे' इयमर्धगाथा तस्याः परि- पूर्णसम्बन्ध उत्तरगाथाया ज्ञेयः ॥ ६१ ।। तसऽसंजमहीणऽजमा सव्वे सगतीस संजमविहीणे । आहारजुगुणा पणवणं सव्वे य चक्खुजुगे ॥ ६२ ॥ त्रसासयमहीना अयमाः सर्वे सप्तत्रिंशत् संयमविहीने । आहारकयुगोना पचपचाशत् सर्वे च चक्षुर्युगे ॥ णवजोय णोकसाया अकृतकसाय देसजमे तसऽसजमहीणऽजमा सव्वे सगतीस---देसजमे—सयमासयमे सप्तत्रिंशत्प्रत्यया भवन्ति । ते के १ णवजोयेत्यादि । मनोवचनयोरष्टौ औदरिककायस्यैक एव नव, तथा णोकसाया-~-हास्यादयो नवनोकषाया., अकृत कसाय---अष्टौ अन्त्या. प्रत्याख्यानसंज्वलनक्रोधमानमायालोभाः कषायाः, तसऽसजम- हीणऽजमा सव्वे-सवधरहिता अन्येऽसयमा अविरतयः सर्वे एका- दश एकत्रीकृताः सप्तत्रिंशत् । सजमविहीणे आहारजुगुणा पणवण्णं- मसयमे आहारजुगूणा-~आहारकयुगोना आहारकाहारकमिश्रद्वयोनाः, पणवण-पचपचाशत् प्रत्यया भवन्ति । इति सयममार्गणाया प्रत्ययाः। सव्वे य चक्खुजुगे-~-च पुनः चक्षुर्युगे चक्षुरचक्षुर्दर्शनद्वये नानाजीवा- पेक्षया सर्व सप्तपचाशप्रत्यया भवन्ति ॥ ६२ ॥ अवहीए अडदालं णाणतिउत्ता हि केवलालोए । सग गयदोआहारय पणवणं हुंति किण्हतिए ॥ ६३ ॥ अवधौ अष्टचत्वारिंशत् ज्ञानत्रिकोक्ता हि केवलालोके । सप्त गतद्विकाहारका पचपंचाशत् भवन्ति कृष्णत्रिके ।। ।

१२ सिदान्तसारादिसंग्रहे- - । । मयहीए-अबघिदर्शन, णाणविठचा हि निषित पानत्रिक य उकास्स एष, मरदाति, भष्टचत्वारिंशत्प्रत्यया भवन्ति।से के इति चेतुर्यते मनन्तानुपन्धिधतष्क मिप्पास्वपंचक पर्नपिता मपरे मामय- वारिंशदानवा । केबसाए सग-केवलयीन सप्त । के से सया- नुभयमनोवचनपोगौदारिकादारिफमिनकामणकाययोगा एवं सप्त प्रयया भवन्ति । इति दर्शममार्गणायामालवा । गपदोआहारय किणतिए- कष्णनालकापोतलेश्यात्रिक माहारकतम्मिश्रदयरहिता अन्येऽवशिष्य, पणषण-पंचपंचाशत्प्रत्यया., इंदि-ममन्सि || ६३ ॥ वनादितिए मव्वे सम्बे माहारजुम्ममाऽमष्ये । पणवणं ते मिच्छाअमृण छादाल उवसमए ॥ ६४ ॥ तेनमानि त्रिके मम्मे सर्ने मनाहारकयुग्मका भमभ्ये । पअपंचाशत् ते मिप्पास्वानोना पट्चत्वारिंशत् सपशमे ।। तेमादिविए-पीवपमनुश्यारिके तथा भम्पनी, सम्पे-स सप्तपंचाशयस्यमा नामामीवापेक्षया भवन्ति । णाहारजुम्मयाऽमम्मे पणपण--ममध्यजीवे माहारकवाग्मिधवा मम्ये पंचपंचाशदानमा स्प । इति नेपामध्यमार्गणयो प्रत्ययाः | वे मिष्ममण्ण छादार उपसमए--उपशमकसम्परतले सेनाति, मभन्योफा पंचपारामस्पया मिष्यात्वपंचकानवानुपन्विचतुष्कोना अपरे पद्धबारिमाध्यत्यया भवन्ति । ते के पश्यते-अविरतप १२ कपया २१ माहारकार्य विना योगा १३ एवं पद्दत्वारिंशत् ।। ३ ।। भाहारमषमुचा खाइयदुगे म ए मि बरवाला । मिस्से तदाठा ते तिमिस्साहारपद्रमा ।। ६५ ।। इम्मये पार ।

सिद्धान्तसारः ।
आहारकयुगयुक्ताः क्षायिकद्विके च तेऽपि अष्टचत्वारिंशत् ।
मिश्रे त्रिचत्वारिंशत् ते त्रिमिश्राहारकद्विकोना. ॥
खाइयदुगे य-च पुन. क्षायिकयुग्मे क्षायिकवेदकसम्यक्त्वे च
आहारयजुवजुत्ता--आहारकद्वयसहिताः, ए वि-इति, तेऽपि उपशम-
सम्यक्त्वोक्ताः पट्चत्वारिंशत् , अडदाला-अष्टचत्वारिंशत् भवन्ति । ते
के ? अविरतयः १२ कपाया २१ योगा. १५ एव ४८ । मिस्से-
मिश्रसम्यक्त्वे, तेदाला-त्रिचत्वारिंशत्प्रत्यया भवन्ति । ते-पूर्वोक्ताः
क्षायिकवेदकोक्ता अष्टचत्वारिंशद्वर्तन्ते तेभ्यः पच निष्काश्यते। ते के ?
तिमिस्साहारयदुगुणा-त्रिमिश्रा औदारिकमिश्रवैक्रियिकामिश्रकामणकाहा-
रकाहारकमिश्रमेव पचहीनास्त्रिचत्वारिंशत् । के ते इति चेदुच्यते-अवि-
रतय. १२ कपाया २१ अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिकवैक्रियिक-
काययोगौ द्वौ एव ४३ मिश्रसम्यक्त्वे भवन्तीत्यर्थ. ॥ ६५ ॥
विदिए मिच्छपणूणा पण्णं मिच्छे य हुंति पणवणं ।
आहारयजुयविजुया पञ्चेया सयल सण्णीए ॥ ६६ ॥
द्वितीये मिथ्यात्वपचकोना पचाशत् मिथ्यात्वे च भवन्ति ।
पचपचाशत् आहरकयुगवियुक्ता प्रत्ययाः सकलाः सज्ञिनि ॥
विदिए-सासादनसम्यक्त्वे, मिच्छपणूणा-मिथ्यात्वपचकोना आहा-
रकयुग्मवर्जिता अन्ये, पण्ण-पचाशत्प्रत्यया स्यु । मिच्छे य हुति पण-
वण्ण आहारयजुयविजुया-पुन. मिथ्यात्वसम्यक्त्वे आहारकयुगवि-
युक्ता अन्ये, पणवण्ण-पचपंचाशत्प्रत्यया भवन्ति । इति सम्यक्त्व-
मार्गणाया प्रत्यया । पच्चया सयल सण्णीए-सशिजीवे प्रत्ययाः-
सकला सर्वे सप्तपचाशन्नानाजीवापेक्षया भवन्ति ।। ६६ ॥
कम्मयओरालियदुगअसञ्चमोसूंणजोगमणहीणा।
पणदालाऽसण्णीए सयलाहारे अकम्मइया ॥ ६७॥

सिमान्ससारादिसणा- कार्मणीदारिकटिकासस्यमपानयोगमनोहीना । पंचचत्वारिंशदसशिनि सकला माहारके मकार्मणका ॥ असण्णीए-समिनीवे,पणदाला--पंचचत्वारिंशव्यत्पया भवन्ति । मायमूता ! कम्मयेस्पादि-कामणकर मौदारिकति च मसत्प मृपा स्पनुमयमचम्योग एतैबतुमिहना होना मन्पे एकादशयोगाम मनच तेहाना । भय बागपयोषनार्य स्परतयोपते--असंदिनी मिप्यास्वपंच मनोवर्मिता एकादशाविरतय फपाया २५ कार्मण औदारिकव्ययोगस्य, भसन्यभूषा सस्य॑ च मृषा सत्प्रसूपे न किये सत्यासत्ये यत्र पोग सोऽसत्यपषो योगोऽनुभयवचमयोग इत्पर्य एवं १५ प्रस्पमा भवन्ति । इति सहिमार्गणापो प्रस्पया । सफ्छाहारे बक- माया-माहारे माहारकनावे कार्मणकायपोगपमिता भम्पे सकसा सबै पट्पधाशयस्पया मम्ति ॥१७॥ सेदालामाहारे कम्मेपरजोयहीणया हुति । तित्वप्पाहुणा गणिया इति मम्गणपक्षया मणिया ॥६॥ विषस्वारिंशदनाहरके कौतरजोगनिका मषन्ति । तीर्थप्रमुणा गणिता इति मार्गणाप्रस्पया मणिताः ।। वेदाणाहारे-मनाहारके बोये कम्मेयरजोयहीणया--कार्मण कापयोगादिसरे ये चतुर्दशयोगास्तेहाना मम्मे, तेदाता-पिचत्वारिंश- प्रत्यया मपन्ति । ते के। मिथ्यात्वं ५ अविरतय १२ कपापा २५ कर्मणफाययोग १ ए त्रिचत्वारिंशयास्पया ईति-भवन्ति । ति त्यप्पामा-ममुभा प्रकारेण पूर्व तीर्थकरप्रमुणा तीर्थकरदेवेम मार्गणाम प्रत्पया इति गणिता इति, पभाषणघरदेवादिभि शम्दसपेण गापादि कीन मार्गणामु प्रपया मणिवा इति शेप ।। ६८ ॥ परी मार्गबाट प्रवपा मारा।

सिद्धान्तसारः। अथ चतुर्दशजीवसमासेषु यथासभव सप्तपचाशत्प्रत्यया कथ्यन्ते; इगिदुतिचउरक्खेसु य सण्णीसु भासिया जे ते । अडतीसादी सयला, पणदाला कम्ममिस्सूणा ॥ ६९ ॥ सत्तसु पुण्णेसु हवे ओरिलिय मिस्सयं अपुण्णेसु । इगिइगिजोगविहीणा जीवसमासेसु ते णेया ॥ ७० ॥ एकद्वित्रिचतुरक्षेषु च सज्ञिपु भापिता ये ते । अष्टात्रिंशदादयः सकला: पंचचत्वारिंशत् कर्ममिश्रोनाः ।। सप्तसु पूर्णेपु भवेत् औदारिक मिश्रक अपूर्णेषु । एकैकयोगविहीना जीवसमासेषु ते ज्ञेयाः ।। गायाद्वयेन सम्बन्ध । जीवसमासेसु ते णेया-ते प्रत्ययाश्चतुर्दश- जीवसमासेषु ज्ञेया ज्ञातव्या भवन्ति इत्याह---इगिदुतिचउरक्खेत्यादि- एकद्वित्रिचतुरिन्द्रियेषु च पुन सइयसज्ञिजीवेषु ये अष्टात्रिंशदादयः सकला. प्रत्यया पूर्व भाषिता । ते प्रत्ययाः पचचत्वारिंशत् कथ भ- वन्ति एकेन्द्रियादिराश्यपेक्षया अष्टात्रिंशत्प्रत्ययाः, द्वीन्द्रियस्य राश्यपेक्षया रसनेन्द्रियानुभयभाषयोरधिकत्वाञ्चत्वारिंशत्प्रत्यया ,त्रीन्द्रियस्य राश्यपेक्षया घ्राणेन्द्रियाधिकत्वादेकचत्वारिंशत्प्रत्ययाः, चतुरिन्द्रियस्य चक्षुरधिकत्वा- वाचत्वारिंशत्प्रत्ययाः, असज्ञिपचेन्द्रियस्य स्त्रीवेदपुवेदश्रोत्राणामधिक- त्वाद्राश्यपेक्षया पचचत्वारिंशत्प्रत्यया । कथभूताः पचचत्वारिंशत् ? क- म्ममिस्सूणा-~-कार्मणकायौदारिकमिश्रवैक्रियिकमिश्रोनाः । सत्तमु पुण्णेसु हवे ओरालिय—सप्तसु पर्याप्तेसु जीवसमासेषु यथासभव पूर्वोक्ता: प्रत्यया , ओरालिय-औदारिककाययोगश्च भवेत्। मिस्सय अपुण्णेमु- इति, अपर्याप्तेषु सप्तसु जीवसमासेषु, मिस्सय-औदारिकमिश्रः वैकि- यिकमिश्रो वा यथासभव भवति । इगिइगिजोगविहीणा-~सप्तसु पर्या- , प्रस्पया २३ भौगरिकमि सिदान्तसारादिसमहे- वेषु सससु भपप्तिषु एकैकयोगविहीना प्रत्यया भवन्ति । कोऽर्य । सप्तसु पर्याप्तसु यदा भौगरिककाययोगो मवति तता भौदारिकमिम योगो न भमति या अपर्याप्तधु सप्तम भौदारिकमिश्कायो भवति तदा मौदारिककाययोगो न मवतीस्पर्प | भयात्पनुदीना सम्पपरिया नाय चतुर्दशनीवसमासेषु प्रत्येके पपासेमवे एवापन्ठ समवन्तीत्याह-एकेन्द्रियसूक्ष्मापयप्ति मिथ्यात्वपंचक पड्लीपनिझायाना विराधना स्पर्शनेन्द्रियस्यैकस्यानिरोध एवं सप्तापिरतय ७ श्रीवे द(वेदास्यवो मन्ये कयायानयोविंशति अकर्मणकाययोगो द्वौ २ एवं सप्तत्रिंशत् ३७ प्रस्मया भवन्ति । एकेन्द्रियसूक्ष्मपयप्ति मिप्यावं ५ भविरतय ७ श्रीवेदए॒वेद पा कषायालयोषिशप्ति मौदारिककाययोग एक एव एवं पद्मिशम स्पया स्यु । एकेन्द्रियपादरापयत्ति मि० ५ षषि०५ पा० २३ भौदारिकमिश्रकार्मणयोगी हो एवं सप्तविंश्पत्यया भवेयु ३७। एके न्दिपथावरपर्याप्त पंचमिप्यात्वं मपिरस्य सप्त मोक्ता २३ कपाया मौदारिक्शापयोग एक एवं पत्रिंशदानमा स्यु । शीन्द्रियापर्याप्त बी पसमासे मिथ्यात्वं ५ षट्कायानां विराधना स्पर्शरसमपोरनिरोध स्प रितयोथै पूर्ववत्कृपायालयोनिशति औदारिकमिधामणकापयोगी हौ ए मत्रिंशव्यस्पया मपन्ति । दम्बियपति मीवसमासे मि० ५ भवि० ८ कपापा २३ औदारिककाययोगानुमयमापायोगी हो एष मविशव्यस्पपा संभवन्ति । प्रीन्द्रिमापयप्ति जीवसमासे मि० ५ पटकापपिराधना स्पर्शनरसमप्राणानामनिरोप एमममितरपा ना पूर्ण मत्स्यापा २५ मौदारिफमिमकार्मणकापयोगी दी एकता एकोनप- । १पपिविपर्याप्त विविधाका भरमा मोदारकाया पासमारम् ।

सिद्धान्तसारः । ४७ त्वारिंशत्प्रत्ययाः सन्ति । त्रीन्द्रियपर्याप्ते जीवसमासेऽपि मि० ५ पट्का- यविराधना पट्स्पर्शनरसनघ्राणाना विपयानुभवन तिस्र एवमविरतयो नव कपाया २३ औदारिककायानुभयवचनयोगौ द्वौ एवमेकोनचत्वा- रिंशत्प्रत्यया ३९ स्यु । चतुरिन्द्रियापर्याप्ते जीवसमासे मि० ५ पड्जीव- निकायविराधना स्पर्शनरसनबाणचक्षुपामनिरोध एवमविरतयो १० पूर्व- वत्कपाया औदारिकमिश्रकार्मणकाययोगो द्वौ एव चत्वारिंशत्प्रत्ययाः सन्ति । चतुरिन्द्रियपर्याप्ते मि० पच ५ पूर्वोक्ता दशाविरतय १० कपाया २३ औदारिककायानुभयभाषायोगौ द्वौ २ एव चत्वारिंशदा- स्रवाः प्रवर्तन्ते । पंचेन्द्रियास शिजीवापर्याप्ते मि० ५ मनोवा अन्या एकादशाविरतय ११ कपाया सर्वे २५ औदारिकमिश्रकार्मणकाययोगौ द्वौ २ एव त्रिचत्वारिंशदास्रवाः ४३ स्यु । असज्ञिपचेन्द्रियपर्याप्ते मि० ५ मनइन्द्रिय विना अन्या एकादशाविरतय ११ कषाया. २५ औ- दारिकायानुभयवचनयोगौ द्वौ २ एव त्रिचत्वारिंशत्प्रत्ययाः ४३ स्युः । पंचेन्द्रियसज्ञिजीवापर्याप्ते मनइन्द्रिय विना एकादशाविरतयः ११ क- षाया २५ औदारिकमिश्रवैक्रियिकमिश्रकाणकाययोगात्रय एकीकृता ४४ प्रत्यया भवन्ति । पचेन्द्रियसज्ञिपर्याप्ते जीवसमासे मि० ५ अ- विरतय. १२ कषाया २५ मिश्रकार्मणकाययोगद्वय विना अन्ये त्रयो- दशयोगा १३ एव पचपचाशत्प्रत्यया भवन्ति ॥ ६९-७०॥ इति चतुर्दशजीवसमासेषु प्रत्येक यथासभव प्रत्यया कथिता व्यक्तिरूपेण वालबोधनार्थम् । अथ चतुर्दशगुणस्थानेषु प्रत्यया. कथ्यन्ते, मिच्छे चउपच्चइओ बंधो सासणदुगे तिपच्चइओ। ते विरइजुआ अविरइदेसगुणे उपरिमदुगं च ।। ७१ ॥

१८ सिवान्तसारादिसंग्रहे- दोण्मि सदो पंचसु तिमुपाययो बोगपबई इक्को । सामण्णपषमा इदि बहप हॉति कम्माणं ॥ ७२ ॥ मिष्यात्वे चतु प्रत्ययो बन्ध सासनरिके त्रिप्रत्यय । से पिरतिमुवा भपिरतदेशगुणे उपरिमादिकं च ॥ झो तत पंचम् त्रिपातम्यो योगप्रत्यय एक । सामान्यप्रत्पया इपि मष्ठाना भवन्ति कर्मणां ।। गापास्येन सम्बन्धः । मिच्छे चठपचइओ बन्धो-पत-मस्यपयो बन्ध , कोय ! मिप्यास्वगुणस्याने मिप्यास्त्राविरतिकपाययोगाना चतु- णी प्रत्फ्याना बन्यो भवतीस्पर्य । सासणगे--दितीयसासादनगुप्म स्पान तृतीयमित्रगुणस्पाने च,सिपबामो-त्रिप्रमयबो मन्द । कोऽर्थ : सासादनमिश्रगुणस्पामपारविरतिकमाययोगाना बन्ध स्पादिस्पः । तेऽनिराहपादि । भमियदेसगुणे-चतुऽपिरसिगुणस्पाने पंचमे देश पिरतिगुणस्थाने घ, वे-इति, ते प्रत्यया भवन्ति । कति मबन्तीपाशा- यामार---परिमार्ग-उपरिमार्य क्षाययोगयुग्म । कम्त । भवि रतियुक्त एवं प्रप प्रस्पपा भवन्ति, कोऽर्थ । भपिरतिदेशविरातिगुण- स्पानपोर्दयोरपिरतिक्षापयोगामा प्रयाणा प्रस्पयामा मधो भगतास्यप । दोमि तदो पंचम-वि ततो दशपिरतिगुणस्थानात ,पंचम-ति,पंचगु णस्पानेषु प्रमताप्रमचाकरणानिचिकरणसूक्ष्मसाम्पण्यामिधानेपु दो- णि-को प्रत्ययौ बातम्यो को माव । प्रमत्तादिपंचम गुणस्यानेषु कपापयोगयोईयोष इति माव | TO , तिम-ति, त्रिपु गुणस्पानपु पोगप्रस्यस्पैकस्य बन्ध इत्पर्य । इदि-इति भमुना प्रकारेण, माप परमाणामावरणादानामयना कर्मणा, सामण्णपचया–सामाम्पेन मिप्पालादिप्रस्पया बन्यकारणानि मबन्ति ॥७१-७२ ॥

सिद्धान्तसारः । ४९ पूर्व सामान्येन प्रत्ययबन्धः कथितः, अधुना विशेपेण प्रत्ययबन्धाः कथ्यन्ते- पढमगुणे पणवणं विदिए पण्णं च कम्मणअणूणा । मिस्सोरालिविउन्वियमिस्सूण तिदालया मिस्से ।। ७३ ॥ प्रथमगुणे पंचपचाशत् द्वितीये पचाशत् च कार्मणानोना । मिश्रौदारिकवैक्रियिकमिश्रोनाः त्रिचत्वारिंशन्मिश्रे ॥ पढमगुणे-प्रथममिथ्यात्वगुणस्थाने आहारकतन्मिश्रद्वयवा अन्ये पणवण्ण-पचपचाशत्प्रत्यया भवन्ति । विदिए पण्ण च-पुनः सासा- दनगुणस्थाने मिथ्यात्वपचकाहारकद्वयरहिता अन्ये पचाशत्प्रत्यया भवन्ति। कम्मणेत्यादि,मिस्से-तृतीयमिश्रगुणस्थाने ये सासादने कथिताः पचाश- प्रत्यया । ते कथभूताः १ कर्मणेत्यादि, १ कर्मणेत्यादि, कार्मणकाययोगानन्तानुबन्धि- क्रोधमानमायालोभचतुष्कोना औदारिकमिश्रकायोनो वैक्रियिकमिश्रका- योन एतैः सप्तभिहींना अन्ये,तिदाला-त्रिचत्वारिंशत्प्रत्यया भवन्ति ॥७३॥ हुति छयालीसं खलु अयदे कम्मइयमिस्सदुगजुत्ता। विदियकसायतसाजमदुमिस्सवेउव्वियकम्मूणा ।। ७४ ।। भवन्ति षट्चत्वारिंशत् खलु अयते कार्मणमिश्राद्विकयुक्ताः । द्वितीयकषायत्रसायमद्विमिश्रवैक्रियिककार्मणोनाः ॥ सगतीस देसे १ खलु-निश्चित, अयदे-चतुर्थेऽविरतगुणस्थाने मिश्रगु- णस्थानोक्तास्त्रिचत्वारिंशत्प्रत्यया ,कम्मइयभिस्सदुगजुत्ता-इति,कार्मणौ- दारिकमिश्रवैक्रियिकमिश्रत्रययुक्ताः सन्त., छयालीस-षट्चत्वारिंशत्प्र- त्यया भवन्ति। सगतीस देसे--इति,उत्तरगाथाया सम्बन्ध । देसे-इति, पंचमे देशविरतगुणस्थाने सप्तत्रिंशत्प्रत्यया भवन्ति । के ते 2 विदियक-

५०
सिद्धान्तसारादिसमो-
साफ्तसाप्रम(मिस्सषेठम्पियकम्मणा -द्वितीयकपायोऽप्रत्याख्यानकोष-
मानमायामाचतुष्क, वसायम---इति, प्रसवध , दुमिस्स-भौदारि
कमिप्रवैझियिकमियदर्य, पेठम्पिय-इति, वैक्रिपिककाययोग., कम्म--
इति, धर्मणकायपोग एतैर्नवमिहना । कोऽर्थ ! यऽविरतगुणस्पा
नोकाः पट्चत्वारिकादर्तन्ते से एतैर्नबभिहाला सन्त सप्तत्रिंशदा-
सबा भवन्ति-से सप्तत्रिंशःप्रत्यया पंचमे गुणस्पाने मपम्तीति
स्पधर्प ॥ ७ ॥
सगतीर्स देसे वह पठवीस पचया पमचे य ।
बाबारदुगे पारस अविरदिचउपचयाश्म ॥ ७५ ॥
सप्तत्रिशदेशे तया चतुर्विशतिप्रस्पया प्रम च ।
आहारकतिको एकादशानिरतिमतु प्रत्ययन्यूनाः ॥
सगतीस देसे इति पदं पूर्षगायायो म्याख्यातं । वह पठसि प
चपा पमचे य–प पुन तया, पमत्ते-ति, षष्ठ प्रमत्तगुणस्थाने मत
विशति प्रत्यया भवन्ति । कथं ! देशविरतगुणस्थानोकसप्तत्रिशमस्प-
पमध्ये माहारदगे-माहारकाहारकमिप्रदयं यदा क्षिप्यते तदा एकोनप-
सारिशयस्यया भवन्ति । ते एकोनचत्वारिंशयत्पपा ,एपारसमपिरविधत
पपयाण्ण-ति एकादशविरतय चत्वार प्रत्याख्यानकोपमाममाया-
योमा एते पंषदशमिमाचतुर्विकातिप्रत्ययाः स्यु से पष्टगुणस्थाने
समवन्तास्पर्प । ते चतुर्विशति फिनामामधेनुप्यते--सम्बग्नपाक
हास्पादिनबनोकयामा भयै मनीषचनयोगा भौगरिकाहाराहारकमित्र
पोगामाप एवं चतुविशति ॥७५ ॥
माहारसुगमा दुसु मावीस हासछपक संरिस्थी-1
पुंफोहारविहीणा कमेण नवमं दस माण ॥ ७६ ॥

सिद्धान्तसारः । ५१ - आहारकद्विकोना द्विपु द्वाविंशतिः हास्यपट्रेन पंढस्त्री- पुक्रोधादिविहीनाः क्रमेण नवमं दशम जानीहि ॥ आहारदुगुणा दुसु बावीसं-दुसु-इति, अप्रमत्तापूर्वकरणयोईयोर्गु- 'णस्थानयो. प्रेमत्तोक्ताश्चतुर्विंशतिप्रत्यया ये ते आहारदुगुण-आहारकाहार- कमिश्रद्वयोनाः, बावीस-द्वाविंशतिप्रत्यया स्युः। ते के चेदुच्यते संज्व- लन ४ नोकपाया ९ मनोवचनयोगाः ८ औदारिकाययोग. १ एवं २२ द्वाविंशति । हे शिष्य | नवमं गुणस्थान जानीहि । हासेत्यादि हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्साषट्केन हीन । कोऽर्थ. १ नवमेऽनिवृत्तिक- रणगुणस्थाने पूर्वोक्ता द्वाविंशतिप्रत्यंया हास्यादिपट्कहीनाः सन्तः षोडश आस्रवा भवन्ति । ते किनामान १ वेदत्रय ३ सज्वलनचतुष्क ४ मनोवचनयोगा अष्टौ औदारिककाययोगश्चैक एव षोडश आस्रवा अ- निवृत्तिकरणस्थाने भवन्तीत्यर्थ । हे विनेय ! क्रमेण अनुक्रमेण, दस जाण-दशमगुणस्थान विद्धि। हे स्वामिन् ! दशमं गुणस्थान कीदृक्ष वेनि तत्र कति प्रत्यया सभवन्तीति शिष्यप्रश्नाद्गुरुराह-दस सुहुमे इत्युत्तर- गायापदेन सम्बन्ध । ते दश के ? अनिवृत्तिकरणोक्ता षोडश, सढि- त्थीपुकोहाइविहीणा-इति, षढस्त्रीपुवेदत्रयसज्वलनक्रोधमानमायात्रिक- हीना सन्त· दश। अथ च व्यक्तिः—सूक्ष्मसाम्परायदशमे अष्टौ मनोवचनयोगा औदारिककाययोगसज्वलनलोभौ द्वाविति दश ॥७६॥ दस सुहुमे वि य दुसु णव सत्त सजोगिम्मि पच्चया हुंति । पच्चयहीणमणूणं अजोगिठाणं सया वंदे ॥ ७७ ॥ दश सूक्ष्मेऽपि च द्वयोः नव सप्त सयोगे प्रत्यया भवन्ति । प्रत्ययहीनमन्यून अयोगिस्थान सदा वन्दे ।। दस सुहुमे इति पदस्य व्याख्यान पूर्वगाथाया कृत, अवि य- अपि च, दुसु-द्वयोः एकादशे उपशान्तकषाये द्वादशे क्षीणकपायगुण- ५२ सिमान्तसारादिसमहे- । स्थाने च, णव-नव प्रस्पया संभवन्ति । मह मनोवधमयोगा मौदा रिककाफ्योग एक एवं ९। सत्त सगोगिम्मि पचया ईति--सयोगकेव लिमि सप्त प्रस्पया., ईति—मपन्ति । ते के सत्यानुभयमनोषवन पोगा औदारिकता मञकार्मणकाययोगा एवं सप्त | पचयहीणमणम भनोगिठाणे सया देति, नमस्कुर्षे सदा, किं तत् । कर्मतापम भयो- गिकेसलिगुणस्सान । किं विशेपणाधिट पचयहीण-सप्तपत्राशयस्य- यहीन रहित । पुन किंविशिष्ट ! अण्ण-मन्यून परिपूर्ण ||७७॥ इति चतुरंसगुणस्थानेषु प्रत्ययाः प्रोचा। पवपणपमामलक्सपर्छदालकाररहियहियएण । जिणाईदण पठच इसमागममचिजुचेण ॥ ७ ॥ प्रवचनप्रमाणरक्षणमान्दोऽभाररहितदपेन । मिनचन्द्रेण प्रोक्त इद भागममक्तियुक्तेन ॥ इर्ण-सिद्धान्तसारशार्म, पठत्त-प्रोक । केन कळ ! निणादेण जिनचन्द्रनाम्ना सिद्धान्तमन्पदिना । कर्यवेन मिनपद्रेण परपणे स्पादि-प्रवचनप्रमाणरक्षणपन्दोछाररहितादयेन | पुनरपि कर्यम् सन । आगममचिजतेण-मिमसूत्रस्प भफि सेवा तया युक्तम ||७८11 सिदतसारं यरसुसगेहा, सोईतु साहू मपमोहचवा । परंतु हीर्ण जिणणाहमचा, विरायचित्ता मिपमम्गजुचा ।।७।। सिदान्तसारे बरसूत्रगहा , शोषयन्तु साधको मदमोहत्पाता । पूरपन्तु होम मिननाथभका चिरागपिता शिवमार्गपुक्ताः ।। कवि फपपति, साहू-इति मा सापन !इम सिमान्तसार प्रम्, साहंतु-मुखीग्तु भपशम्ररित पुर्षण। पुनरपि भो सापत्र !पूत प्रारंभ कि जिनेवाचाय इति स्पार मिगतीप्रमानिरसम्मतपुस्ताल .

सिद्धान्तसारः। ५३ हीण-अस्मिन् ग्रन्थे मया यत्किचिद्धीनं प्रतिपादित भवति तद्भवन्तः, पूरंतु-पूरयन्तु पूर्ण कृत्वा प्रतिपादयन्तु। कथभूताः साधव. १ वरसुत्त- गेहा-वराणि च तानि सूत्राणि जिनवचनानि तेपा गेहा मन्दिरमाया । 'पुनरपि कथभूताः १ मयमोहचत्ता----मदमोहैस्त्यक्ताः । पुनरपि कथ- भूताः ? जिणणाहभत्ता-जिननाथभक्ता । पुनरपि कथभूताः ? विराय- चित्ता-विगतो रागो यस्मात् तत्, विराग चित्त मानस येपा ते विराग- चित्ताः । अनु च किंविशेषणाचिता: 2 सिवमग्गजुत्ता-इति, शिवमार्गो, मोक्षमार्ग. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रलक्षण तेन युक्ताः शिवमार्गयुक्ता.॥७९॥ इति सिद्धान्तसारभाष्यम् । *अस्मादने पाठोऽयं-स्वस्तिश्री शके १६९३ खरनाम संवत्सरे आश्विनमासे शुक्लपक्षे विदियायां (द्वितीयाया) तिथौ गुरुवासरे श्रीसदलगी श्री-अनन्त- तीर्थकरचैत्यालये श्रीसुमतिचन्द्रस्वामिना तच्छिध्यसावतापडित श्रीरत्नत्रयज्ञापनार्थ लिखित।

-- । ५२ सिमान्तसारादिसमहे- स्पाने च, णव-नब प्रत्यया समवन्ति । मध्यै मनोवचनमोगा मौदा रिककासयोग एक एवं ९ । सत्त सबोगिम्मि पञ्चमा ईति--सपोगकेर अिनि सप्त प्रस्पया , इति-भवन्ति । ते क ! सत्पानुमयमनोवयन योगा प्रौदारिकतन्मिनकार्मणकाययोगा एवं सप्त । पञ्चयहीममण अनोगिठाणे सपा मंदे-पति, नमस्कु सदा, किंतत् । कर्मतापम भयो- गिकेसलिगुणस्मान । किं विशेपणाधित । पञ्चयहीण-सप्तपचारात्मत्य- महीन रहि । पुन किषिशिष्ट । मणूण-भम्यून परिपूर्ण |७७॥ इति चतुदशगुमलाने प्रत्ययाः प्रोचाः । पवयपपमाणलक्सपर्छदालंकाररहियहियएम । धिमईदेम पठचं इसमागममपि चेम ।। ७८ ॥ प्रयवनप्रमाणशक्षणपन्दोऽमहाररहितदपेम । जिनपरदेण प्रोक्तं दे मागमभक्तियुक्तेन ॥ इण-सियाम्वसारशाख, पठा-प्रोक्त । केन कळ : बिण देण जिनधन्द्रनाम्ना सिद्धान्तमन्पवेदिना । कर्यम्तेन बिनधम्त्रेण ! पत्रपणे स्यादि-प्रबचनप्रमाणलक्षणछन्दोबदाररहितदयेम । पुनरपि कपम् तेम । भागममन्त्रिण—मिनसूत्रस्य मकि सेवा तया युकेम ७८ सिदंससारं परमुचगेहा, सोहत साह मपमोहचता । तही जिणणाहमचा, विरामचिचा सिवमम्गनुचा ॥७२॥ सिमान्तसार बरसूत्रगेहा , शोषयन्त साक्ष्यो मदमोहत्यका । पूरयस्त हीन बिममापमक्का , मिरगचित्ता शिवमार्गपुकाः ॥ कवि कपपति, सा-ति भो साघव ! इम सिमाम्तसार प्रन्ये, सोईतु-शुद्धीकुम्त भपशम्दरहितं कुर्वन्तु। पुनरपि मो साप ! पूत १ प्रारमे दिमिनेवाचार इति लिस्पब भियतोनमामिानन्मस्वरी सोर।-है ।

श्रीयोगीन्द्रचन्द्राचार्यकृतः योगसारः। णिम्मलझाण परिहिया कम्मकलंक डहेवि । अप्पा लद्धउ जेण परु ते परमप्प णवेवि ॥१॥ निर्मलध्याने परिस्थाय, कर्मकलक दग्ध्वा । आत्मा लब्धो येन पर त परमात्मान नत्वा ।। घाइचउक्कह किउविलउ अणंतचउक्कपदिङ् । तहिं जिणइंदहं पयणविवि अक्खमि कन्चु सुइहु ॥२॥ घातिचतुष्कस्य कृतविलयोऽनन्तचतुष्टयप्रतिष्ठितः। त जिनेन्द्र प्रणम्य करोमि काव्य सुष्टु ॥ संसारह भयभीयाहं मोक्खह लालसियाह । अप्पासंवोहणकयह.दोहा एकमणाहं ॥३॥ ससारस्य भयभीताना मोक्षस्य लालसिताना । आत्मसम्बोधनार्थे दोहकान् एकमनसा ।। कालु अणाइ अणाइ जीउ भवसायरु जि अणंतु । मिच्छादसणमोहियउ ण वि सुह दुक्ख जि पत्तु ॥ ४ ॥ कालोऽनादिः अनादि वो भवसागरोऽपि अनन्तः । मिथ्यादर्शनमोहित. नापि सुखं दुःखमेव प्राप्त । जइ वीहउ चउगइगमणु तउ परभाव चएवि । अप्पा झायहि णिम्मलउ जिम सिवसुक्ख लहेवि ॥ ५ ॥ १ अन्स्यदोहकेन योगचन्द्रति नामाभाति । परमात्मप्रकाशे तु योगीन्द्रेति नामास्ति ।

समाप्तीय सिदत्वसारा।

योगसार। ५७ देहादयो ये परे कथिता. ते आत्मा न भवन्ति । इति ज्ञात्वा जीव ! त्व आत्मना आत्मान मन्यस्व ॥ अप्पा अप्पउ जइ मुणहि तउ णिन्वाणु लहेहि । पर अप्पा जउ मुणिहि तुहुं तहु संसार भमेहि ॥ १२ ॥ आत्मना आत्मान यदि मन्यसे ततः निर्वाण लभसे । पैर आत्मान यदि मनुपे त्व तर्हि ससार भ्रमसि ॥ इच्छारहिउ तव करहि अप्पा अप्प मुणेहि । तउ लहुःपावइ परमगई पुण संसार ण एहि ॥ १३ ॥ इच्छारहितस्तपः करोषि आत्मना आत्मान मनुषे । ततो लघु प्रप्नोसि परमगतिं पुनः ससारे नायासि || परिणामइ बंधु जि कहिउ मोक्ख जि तह जि वीयाण । इउ जाणेविण जीव तुहुँ तह भावहि परियाणि ॥ १४ ॥ परिणामैर्बन्धोऽपि कथितः मोक्षोपि तैरेव विजानीहि । इति ज्ञात्वा जीव ! त्व तान् भावान् परिजानीहि ॥ अह पुण अप्पा ण वि मुणहिं पुण्ण वि करइ असेसु । तउ वि णु पावइ सिद्धसुहु पुणु संसार भमेसु ॥ १५ ॥ अथ पुनरात्मान न मनुषे पुण्यमपि करोषि अशेषम् । तथापि न प्राप्नोषि सिद्धसुख पुन. ससारे भ्रमसि ॥ अप्पादंसण इक्क परु अण्णु ण कि पि वियाणि । मोक्खह कारण जोईया णिच्छह एहउ जाणि ॥ १६ ॥ आत्मदर्शन एक पर अन्यत् न किंचिदपि विजानीहि । मोक्षस्य कारण योगिन् । निश्चयनैतत् जानीहि ॥ १ परद्रव्य । २ लहु ससार मुएहि-लघु ससार मुचसि पाठान्तरं ।

सिमावसारादिसमहे-
-
पदि विम्यति पदर्गतिगमनात् तत परमात्र स्पन ।
बास्मान प्याप निर्म येन शिपमुस लमसे
विपयारो अप्पा मुणहि पर अंतर पहिरप ।
पर मामहि अवरसहित माहिर चयहि णिमंतु ॥६॥
निप्रकार मास्मान मन्यस्त परमम्तो पहिरारमानम् ।
परं ध्याय मन्त सहि बाई स्यब निर्मान्तम् ॥
मिच्छादसणमोहिमउ परु अप्पा ण मुणेइ ।
सो पहिरप्पा मिणमपिउ पुण संसाफ ममेह ॥७॥
मिप्पा निमोहित परमामानं म मनुले ।
स वहिरामा बिनममित पुन संसारे भमति ।
खो परियामा अप्प पर जो परमाव चएर।
सो परिउ अप्पा मुमहि सो संसार मुर॥८॥
म परिनानाति मारमार्म पर य परमा स्यजति ।
स परित भात्माने मनुते स संसार मुम्पति ॥
मिम्मल णिन्छ सुद मिणु फिड पुदु सिव संतु ।
मो परमप्पा मिणमणिठ एट जाणि णिमतु ॥ ९ ॥
निर्मठो निष्कल शुद्ध जिम कृष्ण मुर शिष शान्तः ।
स परमारमा मिनमणित में बानीहि निभातम् ।।
देहादिउ जे पर कहिया ते अप्पाण मुणे।।
सो बहिरप्पा मिणमणि पुण संमार भमर॥१०॥
देहान्यो प परे कथिता तान् मारमान मनुते ।
सबगिरमा जिममणित पुनः समारो ममति ।
देहादिक ज पर कहिया ते अप्पागम होई ।
इउ माणविण जीव सुद अप्पा मप्प मुप्पा ॥ ११ ॥

योगसारः। ५७ um- देहादयो ये परे कथिता. ते आत्मा न भवन्ति । इति ज्ञात्वा जीव ! त्व आत्मना आत्मान मन्यस्व ॥ अप्पा अप्पउ जइ मुणहि तर णिव्वाणु लहेहि । पर अप्पा जउ मुणिहि तुहुं तहु संसार भमेहि ।। १२ ।। आत्मना आत्मान यदि मन्यसे ततः निर्वाण लभसे । पैर आत्मान यदि मनुपे त्व तर्हि ससार भ्रमसि || इच्छारहिउ तव करहि अप्पा अप्प मुणेहि । तउ लहुःपावइ परमगई पुण संसार ण एहि ॥ १३ ॥ इच्छारहितस्तपः करोपि आत्मना आत्मान मनुषे । ततो लघु प्रप्नोसि परमगतिं पुनः ससारे नायासि ॥ परिणामइ बंधु जि कहिउ मोक्ख जि तह जि वीयाण । इउ जाणेविण जीव तुहुं तह भावहि परियाणि ॥ १४ ॥ परिणामबन्धोऽपि कथित• मोक्षोपि तैरेव विजानीहि । इति ज्ञात्वा जीव ! त्व तान् भावान् परिजानीहि ॥ अह पुण अप्पा ण वि मुणहिं पुण्ण वि करइ असेसु । तउ वि णु पावइ सिद्धसुहु पुणु संसार भमेसु ॥ १५ ॥ अथ पुनरात्मान न मनुषे पुण्यमपि करोषि अशेपम् । तथापि न प्राप्नोषि सिद्धसुख पुन ससारे नमसि ।। अप्पाईसण इक्क परु अण्णु ण किं पि वियाणि । मोक्खह कारण जोईया णिच्छह एहउ जाणि ॥ १६॥ आत्मदर्शन एक पर अन्यत् न किंचिदपि विजानीहि । मोक्षस्य कारण योगिन् । निश्चयनैतत् जानीहि ॥ १ परद्रव्य । २ लहु ससार मुएहि-लघु ससार मुचसि पाठान्तरं ।

५८ सिमान्तसारादिसग्रहे- मगमगुणठाणइ करिया परहारेण वि विहि। मिच्छामा अप्या भुषहु निम पाबा परमेहि ॥ १७ ॥ मार्गणागुणस्थानानि कपितानि म्पबहारनपेन अपि-। निश्चयनपेन भारमान मन्यस्त मेन प्रामापि परमठिन ॥ गिहियावार परहिआ हमाइट पुर्णति । वादिण झामहि देउ जिणु लहु णिम्वाण तहति ॥ १८॥ गृहम्यापारे परिस्थिता हेयमय मन्यन्ते । अनुदिन भ्यायन्ति देव बिन मछु निर्वाण मन्ते । मिण मुमिए जिण चिंतवा जिण शायह सुमणेम । सो माईता परमपउ सम्मइ इक्सणेम ॥ १९॥ निन स्मर बि पिम्तय बिर्न भ्पायस्व मममसा । d म्यापमान परमपदं समते एकक्षणेम ।। सुप्पा अरु जिमघर मेउ म किमपि वियाणि । मोरखा कारण बोईया मिया एट पिमाणि ॥२०॥ शुबरमनि ध जिनवरे मद मा किमपि विमानादि। मोक्षस्य कारण योगिन् । निधयेन एतत् विगानीहि । यो मिणु सो अप्पा समहु इस सिता सार । इठ बाषेविण बोयाट छ मायापार ॥ २१ ॥ यो जिन त भारमान मम्यस्थ एप सिदान्तस्य सार । इति हावा योगिन्। त्पब मायापारम् ।। वो परमप्पा सो मिट जो इउँ सो परम । इठ जाणेविण मोइसा अण्ण म करहु वियम् ।। २२॥ प परमारमा स एव म यो स परमारमा । इति मा योगिन् ! अम्पम्मा कापी बिकापम् ॥

योगसारः । ५९. सुद्धपएसह पूरियउ लोयायासपमाणु । सो अप्पा अणुदिण मुणहु पावहु लहु णिव्वाणु ॥२३॥ शुद्धप्रदेशै. पूरित लोकाकाशप्रमाण । त आत्मान अनुदिन मन्यस्व प्राप्नोषि लघु निर्वाण ॥ णिच्छइ लोयपमाण मुणि ववहारइ सुसरीरु । एहउ अप्पसहाउ मुणि लहु पावहु भवतीरु ॥२४॥ निश्चयेन लोकप्रमाण मन्यस्व व्यवहारेण स्वशरीरस्य । इम आत्मस्वभाव मन्यस्व लघु प्राप्नोषि भवतीरम् ।। चउरासीलक्खह फिरिउ काल अणाइ अणंतु । पर सम्मत्त ण लद्बु जिउ एहउ जाणि णिभंतु ॥ २५ ॥ चतुरशीतिलक्षे भ्रमित• कालमनाद्यनन्त । पर सम्यक्त्व न लब्ध जीव ! एतज्जानीहि निर्धान्तम् ॥ सुद्ध सचेयण बुद्ध जिणु केवलणाणसहाउ । सो अप्पा अणुदिण मुणहु जइ चाहउ सिवलाहु ॥२६॥ शुद्ध सचेतन. बुद्धः जिन केवलज्ञानस्वभावं. ॥ तं आत्मान अनुदिनं मन्यस्व यदीच्छसि शिवलाभ ॥ जाम ण भावहु जीव तुहुँ णिम्मलअप्पसहाउ । ताम ण लब्भइ सिवगमणु जहिं भावहु तहिँ जाउ ॥२७॥ यावन्न भावयसि जीव ! त्व निर्मलात्मस्वभावम् । तावन्न लभसे शिवगमन यत्र भाति तत्र याहि ।। जो तइलोयह झेउ जिणु सो अप्पा णिरु वुत्तु । णिच्छयणइ एमइ भणिउ एहउ जाणि णिभंतु ॥ २८ ॥ यत्रिलोकस्य ध्येयो जिन स आत्मा निज उक्त । निश्चयनयेन एव भणितः एतज्जानीहि निर्धान्तम् ॥

सिदान्तसारादिसमहे-
वयवयसंजममूलगुण महर मोक्ख पिवतु ।
बाम म बापा इक परु मुखठमावपषितु ॥२९॥
असतप संयममूलगुणे मूर्मोझो निशक्त ।'
पावन जानाति पर शुदस्वमावपवित्रं ॥
यो जिम्मल अप्पा मुणा यमसेजमुसंडतु ।
व लहु पाया सिख सुरु इठ जिणणार पून॥३०॥
यो निर्मात्माम मनुते व्रतसंयमसमुक्तम् ।
स यु प्राप्नोति सिसुस इति सिमनापरकम् ॥
पपवयसंगमसील जिप ए सम्बे बकाए ।
बाम ण आणइ इक पर मुदउमावपवितु ॥३१॥
मततप संयमशीठानि जीव 1 एतानि सवाणि म्पनि ।
पारम बानाति एक पर शुदस्समावपवित्रम् ॥
शणि पावर सम्ग जिय पावर परमणिवासु ।
छरिमि अप्पा मणइ बउ उम्मा सिपपासु ॥३२॥
पुण्येन प्राप्नोति स्वर्ग गीष पापेन नरकनिभासम् ।
उप त्यक्त्वा भारमाने मनुते सेन म्यते शिवनास ॥
पतसंभमसीत बिया इस सम्पद ववहारु ।
भोगस कारण एफ मुवी मो छालोया साह ॥३॥
प्रततप संपमशीयानि गीव ] पतानि सर्माणि म्पयहारेण ।
मोक्षस्म फारण एक मन्यस्त प त्रिभकरप सार ॥
अप्पा अप्पर जो मुण जो परमाव पण।
सो पावर सिपपुरगमणु निणवर पठ मणेर ॥ ३४ ॥

योगसारः ।
जिनवर एव
भणति ॥
आत्मना आत्मान यो मनुते यः परभाव त्यजति ।
स प्राप्नोति शिवपुरगमन
छहदबह जे जिणकहिआ णव पयत्थ जे तत्त ।
ववहारें जिणउत्तिया ते जाणियहि पयत्त ॥ ३५ ॥
षद्रव्याणि यानि जिनकथितानि नव पदार्थाः ये तत्वानि ।
व्यवहारेण जिनोक्तानि तानि जानीहि प्रयत्नेन ।
सव्व अचेयण जाणि जिय एक सचेयण सार ।
जो जाणेविण परममुणी लहु पावइ भवपार ॥ ३६॥
सर्वान् अचेतनान् जानीहि जीव एक सचेतन सारम् ।
य ज्ञात्वा परममुनि. लघु प्राप्नोति भवपारम् ।।
जो णिम्मल अप्पा मुणहि छंडवि सहुववहारु ।
जिणसामी एहउ भणइ लहु पावहु भवपारु ॥ ३७॥
य. निर्मल आत्मान मनुते त्यक्त्वा सर्वव्यवहारम् ।
जिनस्वामी एव भणति लघु प्राप्नोति भवपारम् ।।
सोरठा।
जीवाजीवह भेउ जो जाणइ ते जाणियउ ।
मोक्खह कारण एउ भणइ जोइ जोइहि भणि ॥३८॥
जीवाजीवयोर्मेद यो जानाति तेन ज्ञात ।
मोक्षस्य कारण एप भणति योगिन् ! योगिना भणितः ॥ १
चौपाई।
कासु समाहि करउ को अंचउ ।
छोपुअछोपु करिवि को वंचउ ॥
१ अस्मादग्रे इदमपि दोहक-
केवलगाणुमहार सो अप्पा मुणि जीव तुहु ।
जइ चाहहि सिवलाहु जोइ जोइहि भणिड ॥१॥

सिदान्तसारादिसाहे- हल सह कलाहि फेम सम्माणउ । बरि दिजोवउ तह अप्पाणठ ॥ ३९ ॥ केषु समाधि करोमि कान् मर्चयामि । पैरमर कला कान् घयामि ॥ . यत्र पत्र पश्यामि तत्र मा'मा ।। दोश। साम कृतित्या परिममा धुचिम ताम करे। गुरुहु पसाए बाम ण वि देहा देव मुणेद ॥४०॥ पामत्कुतीपरिममति तस्व तारस्करोति । गुरो प्रसाद पापम देहमेब देने मनुते । तिस्पति देवलि दउ म वि इम मुइफेवलि पतु । दहादपलि देउ जिणु पाठ जाणि णिमेतु ।। ४१॥ तीर्धामि दवाठम देषो नापि । सफेवलिनाक्तम् । देहेवाटये देवा जिन एवं मानादि निर्मान्वम् ॥ देहावपलि देउ मिणु जणु दवलिहि मियः । हासउ मह परि होर बहु सिदामिन्स ममेह ।। १२ ।। देह पाठये यो जिन दवाख्य मास्ति ।। हास्प मुमत्प परि भरती सिदभिक्षा भ्रमति ।। ! मूढा दवलि दउ म वि ण पि सलि लिप्पर चिति । दहादवलि दउ मिणु सो पुग्म समचिचि ।। ४३ ॥ मूद ! देवानप या मारि मापि शिष्टापा पे चित्र। दपाये देयो दिन दुप्पस समरेतसि ॥

योगसारः। ६३ तित्थहु देउलि देउ जिणु सव्व वि कोई भणेइ । देहादेउलि जो मुणइ सो वुह को वि हवेइ ॥४४॥ तीर्थे देवालये देवो जिन सर्वोऽपि कश्चित् भणति । देहदेवालये यो मनुते स बुधः कोऽपि भवेत् ॥ जइ जरमरणकरालियउ तउ जिणधम्म करेहि । 'धम्मरसायण पियहि तुहूं जिम अजरामर होहि ॥४५॥ यदि जरामरणकरालितः तर्हि जिनवम कुरु । धर्मरसायन पिब व येन अजरामरो भव ॥ धम्मु ण पढिया होइ धम्म ण पोच्छापिच्छयइ । धम्मु ण मढियपयेसि धम्मु ण मुच्छालुचियइ ॥४६॥ धर्मो न पठनेन भवेत् धर्मो न पुस्तकदर्शने । धर्मो न मठप्रदेशे धर्मो न कूर्चलंचने ॥ ४६ ॥ रायरोस वे परिहरइ जो अप्पा णिवसेइ । सो धम्मु वि जिणुउत्तियउ जो पंचम गइ देइ ॥ ४७॥ रागद्वेषौ द्वौ परिहरति य आत्मनि निवसति । स धर्मो जिनोक्त य. पचमगति ददाति ।। आउ गलइ ण वि मणु गलइ ण वि आसाहु गलेइ । मोह फुरइ ण वि अप्पहिउ इम संसार भमेइ ॥४८॥ आयुर्गलति न मनो गलति नाथ्याशा गलति । मोह स्फुरति नापि आत्महित एव ससार भ्रमति ॥ जेहउ मणु विसयह रमइ तिम जे अप्प मुणेइ । जोइड भणइ रे जोइहु लहु णिवाण लहेइ ॥४९॥ यथा मनो विषयेषु रमते तथा यदि आत्मान मनुते । योगी भणति रे योगिन् ! लघु निर्वाण लभते ॥

सिद्वान्तसारादिसमहे- जाउ बजर परयपर तेल युग्मि सरीर । अप्पा मावर पिम्मलहु लहु पावर भवतीर ॥५०॥ पया मर्जर नरकगई तथा पुष्यस्व शरीरम् । भारमाने मामय निर्मई छघु प्राप्नोषि मनवीरम् ॥ पंघय परियो सपठजगि प वि अप्पाहु मुमति । विद फारम ए जीव फागणियाण लहति ॥५१॥ षोमे पतितं सकम्यगत् मापि भारमान मनुते। सेन कारणेनेमे जीवा स्फुट न हि निर्वाण छमते ॥ सस्य परसा से वि जर अप्पा जे प पूर्णति । तिह कारण ऐ जीव फाम पिप्वाण लहेति ।। ५२॥ पास पठन्ति तऽपि बरा अरमान ये न जानन्ति । तेन कारणेनेमे नीषा सुट म हि निर्वाण छभन्ते ।। मणु इदिहि विच्छोइया पर पच्छियह म बोस् । रापह पसर मियारियह सहज उपमह सोइ ॥५३ ॥ मन इन्द्रियै वि. रागप्रसार निवारय सहज उत्पयते स ॥ पुग्गल अण्णु मि मण्णु जिउ अण्णु वि सहुविवाहार । चयहि वि पुग्गल गहदि जिऊ लहु पावहु मषपाक ॥५॥ पुनसोज्य मन्पो जीन अन्य सर्वम्पबहार । स्या पुदर्ल ग्रहाण मी आयु प्रामापि मवपारम् ।। जे ण वि मण्णा जीप फ्रा जण पि जीव मुणति । से जिमणार उचिया पट संमार मुर्यति ॥ ५५॥ ये नापि मम्पन्वे बीय स्मट मापि मी मन्पता। ते त्रिननायेन टक्का न संसार मुञ्चम्ति ॥ ..

योगसार.। ६५ रयण दीउ दिणयर दहिउ दूध घीउ पाहाणु । सुण्ण रूउ फलियउ अगिणि णव दिंडता जाणु ॥५६॥ रत्न दीप: दिनकरः दधि दुग्धं घृतं पापाण । सुवर्ण रौप्य स्फटिक अग्निः नव दृष्टान्तान् जानीहि ? || देहादिक जो पर मुणइ जेहउ सुणहुआयासु । सो लहु पावहि बंभु परु केवल करइ पयासु ।। ५७॥ देहादिक य पर मनुते यथा शून्याकाश । स लघु प्राप्नोति ब्रह्म पर केवल करोति प्रकाशम् ॥ जेहउ सुद्ध आयासु जिय तेहउ अप्पा उत्तु । आयासु वि जड जाणि जिय अप्पा चेयणुवंतु ॥ ५८ ॥ यथा शुद्ध आकाशं जीव ! तया आत्मा उक्तः । आकाशमपि जड जानीहि जीव ! आत्मान चैतन्यवन्त ॥ णासगि अभितरहं जे जोवहि असरीरु । वाहुडि जम्म ण संभवहि पिवहि ण जणणीखीरु ॥५९।। नासाग्रेण अभ्यन्तरे यः पश्यति अशरीर । व्याधुव्य जन्म न सम्भवति पिबति न जननीक्षीरम् ।। असरीरु वि सुसरीरु मुणी इहु सरीर जड जाणि । मिच्छामोह परिचयहि मुत्ति णियं णिणिमाणि ॥६०॥ अशरीरोऽपि सशैरीरो मुनिः ईद शरीर जड जानीहि । मिथ्यामोह परित्यज... .... १ शरीराद्भिनम् सिद्धस्वरूप । २ व्याधुटय जन्म धृत्वा जननीक्षीरं न पिवति इत्यर्थ । ३ चैतन्यशरीरवान् । ४ पौगलिकम् ।

सिमान्तसारादिसमहे- मप्पप अप सुर्णतया किप्पेहा फल हो । फेवलणाम विपरिमवा सासप मुफ्खु लो॥३१॥ मारमना भारमान मन्वानस्य फिमेह फळे भवति । केपलमान विपरिणमति शाश्वत सुख मते ॥ बे परमाप चपवि मणी अप्पा अप्प समति । केपलणाणसरूप लिपद वे संसारु मर्चति ॥ १२॥ ये परमार्ष त्यक्त्वा मुनय भात्ममरमान मन्बते । फेवमानस्वरूप पवा ते संसार मुञ्चति ॥ पणा ते मपर्वस मुहले परभाव पयति । छोयालोपपयासपर अप्पा विमल मुणति ।। ६३ ॥ घग्यास्ते भाग्यन्त दुषा पे परमा स्पबन्ति । छोकाशेकप्रकाशकरं मारमान पिम मानम्ति ॥ सागार वि भागारहु विवो वप्पाणि पसेई । सो पावइ सहु सिमुह जिमवरु एम म ।। ६४ ॥ सागारोऽप्यनगारोऽपि य मारमनि मसति । स प्राप्नोति ठभु सिरसर मिनवर एवं भणति ।। विरला बाणहि वसपा पिरता मिसुमहि मातु । विरला भापहि व जिप विरला पारहिवतु ॥६५॥ विरा बानम्ति तत सुधा विरक्षा भृष्णन्ति तलम् । बिरका ध्यायम्ति तत्वं मीत्र ! बिरठा धारयन्ति तस्वम् ।। इस परियण ण हु महवपट ए सदुपखा हेउ । इम चिंसंवा फि फरह लहु संसार छेउ ॥ ६६ ।।

योगसारः। ६७ अय परिजनः न महान् पुनः अयं सुखदुःखस्य हेतुः। एव चिन्तयन् किं करोति लघु ससारस्य छेदम् ॥ इंदफणिंदणरिंदय वि जीवह सरण ण हुंति । असरणु जाणिवि मुणिधवला अप्पा अप्प मुणंति ॥ ६७ ॥ इन्द्रफणीन्द्रनरेन्द्रा अपि जीवस्य शरण न भवन्ति ।। अशरण ज्ञात्वा मुनिधवला आत्मनात्मान मन्वते ॥ इक्क उपजइ मरइकुवि दुहु सुहु भुंजइ इक्कु । णरयह जाइवि इक्क जिय तह णिव्वाणह इक्कु ॥ ६८॥ एक उत्पद्यते म्रियते एक दुःख सुखं भुक्ते एक । नरक याति एक जीव ! तथा निर्वाण एकः॥ इक्कलउ जइ जाइसहि तो परभाव चएहि । अप्पा झायहि णाणमउ लहु सिवसुक्ख लहेहि ॥ ६९ ॥ एक यदि जायसे तर्हि परभाव त्यज । आत्मन ध्यायस्व ज्ञानमय लघु शिवसुख लभस्व ॥ जो पाउ वि सो पाउ मुणि सबु वि को वि मुणेइ । जो पुण्ण वि पाउ विभणइ सो बुह को वि हवेइ ॥ ७० ॥ य• पापमपि तत्पाप मनुते सर्व कोऽपि मनुते । य पुण्यमपि पाप भणति स बुध कोऽपि भवेत् ।। जह लोयम्मिय णियडहा तह सुणम्मिय जाणि । जे सुह असुह परिचयहि ते वि हवंति हु णाणि ॥ ७१ ॥ यया लोहमय निगल तथा सुवर्णमय जानीहि । ये शुभ अशुभ परित्यजन्ति ते भवन्ति हि ज्ञानिन ॥ १ करोति इति सम्बन्ध ।

सिदान्तसारादिसमडे--
माया मणिगय जिस तइया तुह णिग्गए।
आया 8 मिर्गय जिय वो उम्मद सिवपंधु ॥ ७२ ॥
यावत् मनोनिम्म्य गीच! ताबत निर्मग्य ।
पापस निर्मन्य मीवतत भिसे शिवपर्य ।।
संबडममा बीज का पीयह पर विहु बानु ।
से दो देठ विमुपदि जो पालोप पहाशु ॥७३॥
पथा घटमप्ये बीमे स्फुट बीने मटमपि जानीहि ।
तपा देहे देव मम्यस्व य त्रिलोके प्रधान ॥
मो जिम सो एउ सो मि इस पाठ माउ णिमंतु ।
मोक्खा कारण मोइया मणु म संतुण मंतु ॥७४॥
यो मिन सोऽ सोऽप्यई एतत् भाषय निन्तिम् ।
मोक्षस्प कारर्ण पोगिन् । भन्यो म त्र न मैत्र ।
वेतेपउपचविणवहंसचाछापंचार-
चउगुणसहियउ जो मपहि एहउ लपसम जाह ।।७५ ।।
द्विविधा पंचहिनवसप्तफ्टपच-
बतर्गुणसहित य मनुते एवलमणं यस्मिन् ॥
वे छरषि गुणसहित जो अप्पाणि बसेर ।
जिणसामिठ एवं मणइ लहु गिम्याण लगा ॥ ७६ ॥
सौ स्यात्वा निगुणसहित प मारमनि बसति ।
गिनस्वामी एवं मणति पु निर्माण समते॥
तिहरहिट तिहगुणसहित मो मप्पाणि वसे।।
सो सासयमुहमायण वि मिमपर एम मह ॥ ७७ ॥

योगसारः। or त्रिरहितः त्रिगुणसहितः य आत्मनि वसति । स शाश्वतसुखभाजन अपि जिनवरः एवं भणति ।। चउकसायसण्णारहिउ चउगुणसहिउ वुत्तु । सो अप्पा मुणि जीव तुहूं जिम परु होहि पवित्तु ॥७८॥ चतुःकषायसंज्ञारहितः चतुर्गुणसहितः उक्त. । त आत्मान मनुस्व जीव | त्व येन परः भवास पवित्रः ॥ वेपंचविरहियउ मुणहि वेपंचहसंजुत्त । वेपंचह जो गुण सहियो सो अप्पा णिरु उत्त ॥ ७९ ॥ द्विपचरहित जानीहि द्विपचसंयुक्त । द्विपंचभिः यो गुणे सहित स आत्मा निज उक्तः ॥ अप्पा दसणु णाण मुणी अप्पा चरणु वियाणि । अप्पा संजम सील तउ अप्पा पच्चक्खाणि ॥ ८० ॥ आत्मान दर्शन ज्ञान मन्यस्व, आत्मानं चरण जानीहि । आत्मा संयम शील तपः आत्मा प्रत्याख्यानम् ॥ जो परियाणइ अप्प परु सो परिचयहि णिभंतु | सो सण्णास(ण) मुणेहि तुहुं केवलणाणिं वुत्तु ।। ८१ ॥ यः परिजानाति आत्मान पर स परित्यजति निर्धात । तत्सज्ञान मनुस्व त्वं केवलज्ञानिना उक्तम् दसण जहिं पिच्छयइ वुह अप्पा विमल मुणतु । पुण पुण अप्पा भावियइ सो चारित्त पवित्तु ।। ८२ ॥ दर्शन येन पश्यति बोध आत्मान विमल मनुते । पुनः पुनः आत्मानं भावयति तत् चारित्र पवित्रम् ॥ १ परदन्यं । २ ऐहु णिभतु इत्यपि पाठ । ३ झाइयइ इत्यपि पाठ ।

सिमान्तसारादिसंग्रहे- रयमतपसमुच बिउ उत्चमतित्य पवितु । मोक्खह कारण जोईया अण्णु ण ततु ण मंतु ॥ ८३॥ रत्नप्रयसंयुक्तो जीव उत्तमतीर्थ पवित्रम् । मोजस्प कारणं योगिन् ! मन्पो न तंत्र न मत्र ॥ महि अप्पा तहि सयलगुण केवलि एम भगति । तिहि कारण ए जीव का अप्पा विमल मुणति ॥ ८४॥ यत्र भारमा वत्र सकलगुणा केवलिन एवं मणेति । सेन कारणेन इमे जीना स्फु भात्माम बिमल आनन्ति ।। श्कलउ ईदियरहिउ ममययकायतिसुद्धि । अप्पा अप्य मुणेर तुहु बहु पावह सिवमिति ।। ८५॥ एकाकी दिपरहित मनोवास्कामग्रिनुर । भारमना मारमार्न मनुस्व वं प्राप्नोसि शिवसिदिम् ।। या पधठ मुकठ मुणहि तो मंघियहि णिमसु । सहजमरूवि जा रमा यो पावर सिप संतु ॥ ८६ ।। यदि बड़े मुक्त मन्यसे वाह मप्मासि निर्धान्तम् । सामस्वरूप पनि रमस सहि प्रामासि शिर्ष शाम्तम् ॥ सम्माइटीजीवर दुग्गगमणु ण होस् । जर बाद वि सो दोस वि पुम्वमिउ सपणे ॥ ८७॥ सम्पाटिभीषप दुर्गतिगमन न भवति । पदि यारपपि ताई दोरा माप सिप क्षपपति ॥ अप्पमरूवह जो रमइ छरवि महुववहार । सो सम्मादी वा साहु पापर मवपाठ ॥८८ योगसारः । ७१ आत्मस्वरूपे यो रमते त्यक्त्वा सर्वव्यवहारम् । स सम्यग्दृष्टि भवति लघु प्राप्नोति भवपारम् ॥ अजर अमरु गुणगणणिलउ जहिं अप्पा थिर थाइ । सो कम्महि ण वि बंधयउ संचियपुव विलाइ ।। ८९ ।। अजरोमरो गुणगणनिलयः यत्र आत्मा स्थिर• तिष्ठति । स कर्माणि नैव बध्नाति सचितपूर्वाणि विलीयते ॥ जो सम्मत्तपहाणु वुहु सो तयलोय पहाणु । केवलणाण वि सह लहई सासयसुक्खणिहाणु ॥ ९० ॥ य सम्यक्त्वप्रधान बुध. स त्रैलोक्ये प्रधान. । केवलज्ञानमपि स लभते, शाश्वतसुखनिवान ॥ जह सलिलेण ण लिप्पियइ कमलणिपत्त कया वि। तह कम्मेण ण लिप्पियह जइ रइ अप्पसहावि ।। ९१॥ यथा सलिलेन न लिप्यते कमलिनीपत्र कदापि । तथा कर्मणा न लिप्यते यदि रमते आत्मस्वभावे ।। जो समसुक्खणिलीण वुहु पुण पुण अप्प मुणेइ । कम्मक्खउ करि सो वि फुड लहु णिव्वाण लहेइ ॥ ९२॥ य. समसुखनिलीन बुध पुनः पुन आत्मान मनुते । कर्मक्षय कृत्वा सोऽपि स्फुट लघु निर्वाण लभते ॥ पुरुसायारपमाणु जिय अप्पा एहु पवित्तु । जोइज्जइ गुणणिम्मलउ णिम्मलतेय फुरंतु ॥ ९३ ॥ पुरुषाकारप्रमाण जीव आत्मानं इम पवित्र । पश्यति गुणनिर्मल निर्मलतेजसा स्फुरन्त ।।

सिद्धान्तसदिसमहे- खो बप्पा मुद् नि समई असुइसरीरविमिष्णु । सो मामइ सच्छ सयल सासपमुक्खहलीषु ॥ ९४ ॥ य भास्मान पुर्द मपि मनुते भशुचिशरीरबिभिन्न । समानाति शार्म सकई शायरामुलसीम ॥ जो म वि वाणा अप्प पर म वि परभाव चएपि । सो बामठ सम्छर सपल महु सिषमुक्ख सहेवि ॥ ९५॥ या नापि सामाति भारमान पर नापि परमा स्यति । स वानन् शामाणि सकगनि न हि शिवार मते ॥ पजिम समरवियप्पयह परमसमाहि लांति । में वेददि सामंद फड सो सिक्सक्ख मणेति ॥ ९६ ॥ वर्ष सकषिफस्पै परमसमापि मम्ते । पत् विदन्ति सामन्द स्फुटं तत् शिममुर्म भणम्ति ।। मो पिटत्यु पपरप पह रूपस्य वि जिमठतु । रूपातीत अपे लहु विम पर होहि पवितु ॥ ९७ ॥ 4 पिंटस पदस्थ धुध रुपस्थमपि बिनोकम् । सपासीते मन्यते मु येम पर भवति पवित्र ॥ सम्ये मीया पाणमया मो सममाव मुह । सो सामाइट आणि फड मिणवर एम मणे।। ९८॥ समें मीमा हानमया प सममा मनुते । तत् सामायिक मामीहि सर्व जिनवर एवं भणति ॥ रापरोस पे परिहरवि जो समभाव मुड़ । सो सामाइप माणि फुट फेलनि एम म ॥ ९९ ।।

योगसारः। ७३ रागद्वेषौ द्वौ परिहृत्य यः समभाव मनुते । तत्सामायिक जानीहि स्फुट केवली एव भणति ।। हिंसादिउ परिहार करि जो अप्पाहु ठवेइ । सो वीअउ चारित्त मुणि जो पंचमगइ णेइ ॥ १०० ।। हिंसादीना परिहार कृत्वा य. आत्मान स्थापयति । तद्वितीय चारित्र मनुस्व यत्पचमगति नयति ॥ मिच्छादिउ जो परिहरणु सम्मइंसणसुद्धि । सो परिहारविसुद्ध मुणि लहु पावहि सिवसुद्धि ॥ १०१ ।। मिथ्यात्वादिक यः परित्यज्य सम्यग्दर्शनशुद्धिम् । तत्परिहारविशुद्धं मनुस्व लघु प्राप्नोसि शिवशुद्धिम् ।। सुहमह लोहह जो विलउ सुहमु हवे परिणामु । सो सुहमहचारित्त मुणि सो सासयसुहधामु ।। १०२ ॥ सूक्ष्मस्य लोभस्य यः विलय सूक्ष्म. भवेत्परिणाम. । तत्सूक्ष्मचारित्र मनुस्व तत् शाश्वतसुखधाम ॥ अरिहंतु वि सो सिद्ध फुड सो आयरिउ वियाणि । सो उज्झावो सो जि मुणि णिच्छय अप्पा जाणि ॥१०३ ॥ अर्हन्तमपि त सिद्ध स्फुट त आचार्य जानीहि । त उपाध्याय तमेव मुनि निश्चयेन आत्मान जानीहि ॥ सो सिव संकर विण्हु सो सो रुद्द वि सो बुद्ध । सो जिण ईसर वंभु सो सो अणंत फुड सिद्ध ॥ १०४ ॥ स शिवः शकर• विष्णु. स स रुद्रः अपि स बुद्ध स जिन• ईश्वरः ब्रह्मा स अनत. स्फुट सिद्धः ॥ १ छेदोपस्थापनसज्ञक । २ धारयतीति शेप ।

सिद्धान्तसारादिसमहे-
बो अप्पा सुद वि मुई वसुइसरीरविमिष्णु ।
सो बाणा सा सपल सासममुक्खालीण ॥ ९४ ॥
प मारमान शुई मपि मनुते मनुधिशरीररिभिर्म ।
स बानाति शाम सकळ शाश्वतमुसलीन ॥
बोण पि माणइ अप्प परुण वि परभाष परवि ।
सो बामउ सहा सपछ महु सिवमुफ्ष लहेपि ॥ ९५॥
य नापि मानाति भास्माम पर नापि परभान त्यजति ।
स चानन् शास्त्राणि सकलानि न हि शिवसुत मते ।।
पन्जिय सयलवियप्पया परमसमाहि लांति ।
बं पेदादि सामद कर सो सिपमुक्ख मणेति ॥ ९६ ॥
बर्षित सकविकस्पै परमसमाधि भन्ते ।
फत् विदन्ति सानन्द फर्ट तत शिममुस भणन्ति ।।
मो पिंडरपु पयस्य सह रूपत्य वि निमउत्तु ।
रूवातीत सणे सहु जिम पर होरि पवितु ॥ ९७ ॥
य पिरस परस्प मुध रुपस्थमपि मिनोकम् ।
सपाती मम्पो
पषु
पेम पर भवति पवित्र ॥
सम्बे जीवा माणमया जो सममाव मुपेड़ ।
सो सामाइट आणि फा जिणपर एम मणेह।। ९८ ॥
सब बीमा हानमया 4 मममा मनुते ।
तत् सामापिकं मानीहि स्फु निमार एवं भणति ||
रापरोस पे परिहरवि जो सममाष सह ।
सो सामाइम बागि फा फेवति एम ममेरे ॥ ९९ ॥

. कल्लाणालोयणा। K परमप्पय वड्डमई परमेट्टीणं करोमि णवकारं । सगपरसिद्धिणिमित्तं कल्लाणालोयणा वोच्छे ॥१॥ परमात्मान वर्द्धितमति परमेष्ठिन करोमि नमस्कारम् । स्वकपरसिद्धिनिमित्त कल्याणालोचना वक्ष्ये ।। रे जीवाणंतभवे संसारे संसरंत बहुवार । पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्तवियंभपयडीहिं ॥ २॥ रे जीव ! अनन्तभवे ससारे ससरता बहुवारम् । प्राप्तो न बोधिलाभो मिथ्यात्वविजभितप्रकृतिभि ।। संसारभमणगमणं कुणंत आराहिऊ ण जिगधम्मो । तेणेविण वर दुक्खं पत्तोसि अणंतवाराई ॥३॥ ससारभ्रमणगमन कुर्वन् आराधितो न जिनधर्म । तेन विना वर दुक्ख प्राप्तोऽसि अनन्तवारम् ॥ संसारे णिवसंता अणंतमरणाई पाविओसि तुमं । केवलि विणा ण(य) तेसिं संखापज्जत्ति णो हवह ॥ ४ ॥ ससारे निवसन् अनन्तमरणानि प्राप्तोऽसि त्व केवलिना विना तेपा सख्यापर्याप्तिन भवति ॥ तिण्णि सया छत्तीसा छावहिसहस्सवारमरणाई । अंतोमुहुत्तमझे पत्तोसि णिगोयमज्झम्मि ॥५॥ त्रीणि शतानि पत्रिंशानि पट्पष्ठिसहस्रवारमरणानि । अन्तर्मुहूर्तमध्ये प्राप्तोऽसि निगोटमध्ये ॥

७४ सिदान्तसारादिसमहे- एहियलक्खषसक्खियट बो पर णिकल देउ । देहा ममा सो पसइ वासु ण पीजइमेठ ॥ १५ ॥ एवलक्षणलक्षित य पर निष्कलो देव । देहस्प मम्मे स वसति तस्मिन् नाम्यमेद ॥ जे सिद्धाने सिमासिहि जे सिसहि जिम उत्त। अप्पाईसण से विफर उ माणि णिमंतु ॥ १०६॥ ये सिवा ये सेत्स्पन्ति य सिप्पन्ति मिनोक। मात्मदर्शनेन तेऽपि स्फु एतत् जानीहि निम्तम् । संसार मयमीप बोगिचंदमणिएणं । अप्पासंवोहण कई दोहा एकमपेण ॥ १०७॥ संसारस्प भयभीतानां योगिचंद्रमुमिना। भारमसंबोषनाप रुतानि दोहकानि एफमनसा ।। इति भायोमियो भोमसारसंपूर्णभूत् । समाप्तीर्य पोगसारा।

. कल्लाणालोयणा । * परमप्पय वडमई परमेटीणं करोमि णवकारं । सगपरसिद्धिणिमित्तं कल्लाणालोयणा वोच्छे ॥१॥ परमात्मान वर्द्धितमतिं परमेष्ठिन करोमि नमस्कारम् । स्वकपरसिद्धिनिमित्त कल्याणालोचना वक्ष्ये ।। रे जीवाणंतभवे संसारे संसरंत बहुवारं । पत्तो ण बोहिलाहो मिच्छत्तवियंभपयडीहिं ॥ २ ॥ रे जीव ! अनन्तभवे ससारे संसरता बहुवारम् । प्राप्तो न बोधिलाभो मिथ्यात्वविजभितप्रकृतिभि ।। संसारभमणगमणं कुणंत आराहिऊ ण जिणधम्मो । तेणेविण वर दुक्खं पत्तोसि अणंतवाराई ॥३॥ ससारभ्रमणगमन कुर्वन् आराधितो न जिनवर्म । तेन विना वर दुक्ख प्राप्तोऽसि अनन्तवारम् ॥ संसारे णिवसंता अणंतमरणाई पाविओसि तुमं । केवलि विणा ण(य) तेसिं संखापज्जत्ति णो हवइ ॥ ४ ॥ ससारे निवसन् अनन्तमरणानि प्राप्तोऽसि त्व । केवलिना विना तेपा सख्यापर्याप्तिन भवति ॥ तिणि सया छत्तीसा छावहिसहस्सवारमरणाई । अंतोमुहुत्तमझे पत्तोसि णिगोयमज्झम्मि ॥५॥ त्रीणि शतानि पत्रिंशानि पट्पष्ठिसहस्रवारमरणानि । अन्तर्मुहूर्तमध्ये प्राप्तोऽसि निगोदमध्ये ||

सिद्वान्तसारादिसप्रहे-
पिपलिदिए असीदी सही चालीसमेव जाणेहि ।
पंचेंदिय घउवींस सुदमवतोमुत्तस्स ॥ ६॥
विकलेन्द्रियेऽशाति पष्टि चत्वारिंशदेव जानीहि ।
पंचेन्द्रिये चतुर्विशाति क्षुद्रभवान् भम्तमुहर्ते ।
अण्णोण सज्जता जीवा पावति दारुणं दुपखं ।
म पर्सि पज्जती फह पाया घम्ममामुष्णो ॥७॥
भन्योऽन्य कुम्पन्तो गीपा प्राप्नुवन्ति दारुणं दुःसम् ।
न साल वेपी पर्याप्ती कर्य प्रामोति धर्ममविशून्य ।।
माया पियर फुटयो मपणजमो को वि णावर सत्ये ।
एगागी ममा सया महिषीमो अस्थि संसारे ॥८॥
माता पिता कुटुम्ब स्पयनमन कोऽपि नायाति सह ।
एकाकी भ्रमति सदा न हि दितीयोऽस्ति संसारे ।
बाउक्खए पि पचे ण समस्यो को पि आउदाणे य ।
देवेंदो म मरेंदो मणियोसहमतालाई ॥९॥
मायु क्षयेऽपि प्राप्ते न समर्थ कोऽपि मायुदर्शन च।
देवेन्द्रो न मरेन्द्र मण्पोपमंत्रबालानि ॥
समरि निणवरधम्मो खदोसि तुम पिसुखोएण ।
खाममु बीया सव्वे पचे ममए पपचेण ॥ १ ॥
सम्प्रति निम्बरधर्म हम्धोऽसि व विशुद्धयोगेम ।
क्षमस्व चीमान् सर्वान् प्रत्येक सम्पै प्रयत्नेन ।
तिमि सया तेसही मिपाचा सणस्स परिपक्सा ।
अण्णाणे सदाहिया मिछा मे दुकर हुज ॥११॥

कल्लाणालोयणा । ७७ त्रीणि शतानि त्रिषष्टि मिथ्यात्वानि दर्शनस्य प्रतिपक्षाणि । अज्ञानेन अद्धितानि मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ महुमज्जमंसजूवापभिदी वसणाई सत्तभेयाई । णियम ण कयं च तेसिं मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ १२ ॥ मधुमद्यमांसद्यूतप्रभृतीनि व्यसनानि सप्तभेदानि । नियमो न कृतः च तेषा मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ अणुवयमहव्वया जे जमणियमाशील साहुगुरुदिण्णा । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज ॥ १३ ॥ अणुव्रतमहाव्रतानि यानि यमनियमशीलानि सावुगुरुदत्तानि । यानि यानि विराधितानि खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ णिच्चिदरधादुसत्तय तरुदह वियलिंदिएसु छच्चेव । सुरणरयतिरिय चदुरो चउदस मणुए सदसहस्सा ॥.१४ ॥ नित्येतरधातुसप्त, तरुदश, विकलेन्द्रियेषु षट् चैव । सुरनारकतिर्यक्षु चत्वार. चतुर्दश मनुष्ये शतसहस्राणि ।। एदे सव्वे जीवा चउरासीलक्खजोणिवसि पत्ता । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ १५ ॥ एते सर्वे जीवाश्चतुरशीतिलक्षयोनिवशे प्राप्ताः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ पुढवीजलग्गिवाओतेओविवणस्सई य वियलतया। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज ॥ १६॥ पृथ्वीजलाग्निवायुतेजोवनस्पतयश्च विकलत्रयाः । ये ये विराधिताः खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥

सिदान्तसारारिसप्रहे-
मलसचरा जिणुचा पयषिसए मा विराहणा विविहा ।
सामाखमझ्या खत मिच्छा मे दुकट हुज ॥ १७ ॥
मससप्ततिमिनोफा प्रतविपये या निराधना विनिधा।
सामायिकक्षमादिका मिप्या मे दुपात भयत ।।
फलफलछल्लिषष्ठी अणगलणार्ण च धोषणाईहिं ।
जे जे विराहिमा खल मिच्छा मे दुक हुज्ज ॥१८॥
फरपुष्पस्वग्बी अगाविसस्नान प्रक्षालमादिमि ।
ये ये पिराधिता सल मिष्या मे दुप्फत भवतु ।
पो सील पेय समा विणको तवो म संअमोवासा ।
ण कपा ण मावियकमा मिच्छा मे दुपट हुज्ज ॥१९॥
न शीठ नै क्षमा बिनपस्तपा न सममोपबासा ।
न कता न मावनीता मिथ्या मे दुक्तं भवतु ॥
कैदफलमूलषीया सचिचरयणीयमोयपाहारा ।
वमाये जे नि कया मिच्छा मे दुक्कर हुज ॥ २० ॥
फन्दफम्म्यागानि सपित्तरबनीभोजनाहारा ।
महामेन येऽपि रुसा मिप्या मे दुफत मत ।
णो पूया जिपचलणे ण पचदाम प हमागमणं ।
म फया ण माविम मह मिष्ठा मे दुकर हुज्ज ॥ २१ ॥
मो पूजा भिनघरमे न पाप्रदान न चेर्यागमनम् ।
न कता म माविता मया मिप्या मे दुफरी भवतु ॥
मारंमपरिग्गासावजा पटु पमाददोसेप ।
मीवा विराहिमा मुछ मिच्छा मे एक दुज ॥ २२ ॥

कल्लाणालोयणा। AMAV- ब्रह्मारभपरित्रहसावद्यानि बहूनि प्रमाढदोपेण । जीवा विराधिता• खलु मिश्या में दुष्कृतं भवतु ॥ सत्तस्सिउखित्तभवाऽतीदाणागयसुवडमाणजिणा । जे जे विराहिया खलु मिन्छा मे दुक्कडं हुज ॥ २३ ॥ सप्ततिशतक्षेत्रभवा ? अतीतानागतवर्तमानजिना । ये ये विराधिता. खलु मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ अरुहासिद्धाइरिया उवझाया साहु पंचपरमेही। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। २४ ।। अर्हत्सिद्धाचार्या उपाध्याया साधवः पचपरमेष्ठिनः । ये ये विराधिता. खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ जिणवयण धम्म चेइय जिणपडिमा किट्टिमा अकिहिमया । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज ॥२५॥ जिनवचन धर्म चैत्य जिनप्रतिमा कृत्रिमा अकृत्रिमाः । ये ये विराविता खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ।। दसणणाणचरित्ते दोसा अहपंचमेयाई । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ २६ ॥ दर्शनज्ञानचारित्रे दोपा अष्टाष्टपचभेदा । ये ये विराधिता खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ।। मइ सुइ ओही मणपजयं तहा केवलं च पंचमयं । जे जे विराहिया खलु मिन्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ २७ ।। मति श्रुत अववि मन पर्यय तथा केवल च पचमकम् । ये ये विराधिता खलु मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ।।

सिद्धान्तसारादिसंग्राहे-
वापारादी अंगा पुम्मपामा जिभेहि पप्पचा ।
जे जे विराहिमा बल मिच्छा मे दुफ हुज ॥२८॥
भाचारादीन्पङ्गानि पूर्वप्रकार्णकानि निनै प्रणीतानि ।
ये ये विराधिता सल मिष्या मे दुष्कः भवतु ॥
पंचमहवपमुचा अहारससहस्ससीलफपसोहा ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुकरे हुज्ज ॥ २९ ॥
पंचमहातयुका मष्टादशसहस्रशोलकतंशामाः ।
ये ये पिराधिता सह मिप्या मे दुष्कृत मवत ॥
छोए पियरसमाणा रिदिपवण्णा महागणवइया ।
चे जे पिराहिया खल मिच्छा मे दुक्क हुज्ज ॥ २० ॥
छोके पितृसमाना नाविपचा महागणपठय ।
में पे बिराधिता सह मिथ्या मे दुप्फतं भवतु ।।
णिम्गय अजियाओ सट्टा सड़ी य चउपिहो संपो।
से जे विराहिया खड मिच्छा मे दुमकडं हुज्ज ॥ ३१॥
निर्गन्या भाबिका धाषका प्राविकाः च चतुर्विधो संपा।
ये ५ पिराधिता सल मिप्पा मे दुष्फत मवतु ।।
देवामुरा मणुस्मा परश्या तिरियजोणिगयजीवा ।
मे से विरारिया खल मिच्छा मे दुफ्फर हुज्ज ॥ ३२॥
देवा ममुरा मनुष्या मारफा विर्यम्पोनिगतमीषा ।
ये ये पिराधिता सह मिप्या मे तुफत मत ।।
कोहो मामो माया लोहो एत्यम्म रायदोसाइ ।
अण्णाणे मे वि फया मिअ मे दुपका हुज ॥ ३२ ॥

कल्लाणालोयणा । ८१ क्रोधो मान माया लोभः एते रागदोषाः । अज्ञानेन येऽपि कृता मिथ्या मे दुष्कृतं भवतु ॥ परवत्थं परमहिला पमादजोएण अज्जियं पावं । अण्णावि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥ ३४॥ परवस्त्र परमहिला प्रमादयोगेनार्जित पापम् । अन्येऽपि अकरणीया मिथ्या मे दुष्कृत भवतु ॥ इक्को सहावसिद्धो सोह अप्पा वियप्पपरिमुक्को । अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥३५॥ एकः स्वभावसिद्धः स आत्मा विकल्पपरिमुक्तः । अन्यो न मम शरण शरणं स एकः परमात्मा ॥ अरस अरुव अगंधो अव्वावाहो अणतणाणमओ। अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥३६॥ अरसः अरूपः अगन्धः अव्याबाधः अनन्तज्ञानमयः। अन्यो न मम शरण शरण स एक. परमात्मा। णेयपमाणं गाणं समए इक्केण हुंति ससहावे । अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥३७॥ ज्ञेयप्रमाण ज्ञान समयेन एकेन भवति स्वस्वभावे । अन्यो न मम शरण शरण स एकः परमात्मा ॥ एयाणेयवियप्पप्पसाहणे सयसहावसुद्धगई । अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक परमप्पा ॥३८॥ एकानेकविकल्पप्रसाधने स्वकस्वभावशुद्धगतिः । अन्यो न मम शरण शरण स एक परमात्मा ॥ ६

सिद्धान्तसारादिसप्रहे-
देहपमाणो गियो लोयपमाणो पि पम्मदो होदि।
मणो ण मम सरणं सरण सो एक परमप्पा ॥ ३९॥
देहप्रमाण निस्य गोकप्रमाण अपि धर्मवो भवति ।
भन्यो न मम शरण शरणं स एक परमरमा ।
फेवलदंसपणाणं समए इक्केण दुणि उपउम्पा ।
अम्णो ण मम्म सरणं सरण सो एक्क परमप्पा ॥४०॥
फेरम्दर्शनवाने समयेनकम दो उपयोगी।
मम्पो न मम शरण शरणं स एकः परमात्मा ।।
सगरूवसहनसिदो विहावगुणमुक्ककम्मवावारो।
मण्णो ण मन्म सरणं सरम सो एपक परमप्पा ॥११॥
स्वफरूपसाबसिदो विमावगुणमुक्तकर्मम्यापार ।
भम्पो म मम शरण शरणं स एक परमारमा ॥
सुग्गो पेय अमुष्णो णोकम्मोकम्मपजिओ पाणं ।
अण्णो ण मना सरणं सरणं सो एक परमप्पा ॥ ४२ ॥
शूम्यो मेबाशूम्मो ! नोकर्मकर्मवनित बानम् ।
भन्यो न मम शरण शरण स एक परमात्मा ।।
णाणाउ मो ण मिष्णो वियप्पमिष्णो सहापमुक्समो ।
अण्णो ण मम्म सरणं सरणं सो एक परमप्पा ॥ ४३ ।।
चानतो यो न मिम विकम्पमिम स्वभावसुसमपः ।
मम्पो न मम शरण शरण स एक परमात्मा ।।
अच्छिमोषच्छिमो पमेयरूपच गुरुखह थेष ।
अष्णो म मन्म मरण सरमं सो एक परमप्पा ॥४४॥

कल्लाणालोयणा । ८३ AAA- . अच्छिन्नोऽवच्छिन्न. प्रमेयरूपत्व अगुरुलघुत्व चैव अन्यो न मम शरण शरण स एकः परमात्मा ।। सुहअसुहभावविगओ सुद्धसहावेण तम्मयं पत्तो। अण्णो ण मज्झ सरण सरणं सो एक परमप्पा ॥४५॥ शुभाशुभभावविगत. शुद्धस्वभावेन तन्मय प्राप्त । अन्यो न मम शरण शरण स एकः परमात्मा ॥ णो इत्थी ण णउंसो णो पुंसो णेव पुण्णयावमओ। अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४६॥ न स्त्री न नपुसको न पुमान्... अन्यो न मम शरण शरणं स एक परमात्मा ।। ते को ण होदि सुयणो तं कस्स ण बंधवो ण सुयणो वा। अप्पा हवेह अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो ॥४७॥ तव को न भवति स्वजन त्व कस्य न बन्धुः सुजनो वा। आत्मा भवेत् आत्मा एकाकी ज्ञायकः शुद्धः ।। जिणदेवो होउ सया मई सुजिणसासणे सया होउ । सण्णासेण य मरणं भवे भवे मज्झ संपदओ ॥४८॥ जिनदेवो भवतु सदा मति. सुजिनशासने सदा भवतु । सन्यासेन च मरण भवे भवे मम सम्पत् ।। जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणो जिणो । दया धम्मो दया धम्मो देया धम्मो दया सया ॥४९॥ जिनो देवो जिनो देवो जिनो देवो जिनो जिनः । दया धर्मो दया धर्मो दया धर्मो दया सदा ॥ -- सिदान्तसारादिसमहे- महासाइ महासाहू महासाहू दिर्यपरा । एवं सब सदा हुन्ज भाव णो मत्तिसंगमो ॥५०॥ महासापय महासाषष महासाधषो दिगम्बरा । एवं तत्वं सदा भवतु यावम मुक्तिसंगमः ।। एषमेव गो कालो अर्मतो दुस्खसंगमे । जिणोगदिइसप्पासे ण पत्तारोहणा कया ॥५१॥ एवमेव गतः काठमेऽनम्तो हु ससङ्गमे । जिनोपदिष्ठसन्यासे म यत्नारोहणा हवा ।। संपई एव संपचाराहणा विणदेसिया । किं कि ण जापदे मम सिदिसंदोहसंपई ।।५२॥ सम्प्रति एक सम्प्राप्तारापना दिनदेशिता । का का न जायते मम सिद्रिसदोहसम्पति ॥ बहो धम्ममहो धर्म बहो मे लदि पिम्मला । संबादा संपमा सारा बेम मुस्खमहुप्पय ॥५३॥ भहो धर्म भहो धर्म महो मे सम्मिमिर्मछा। सनाता सम्पत् सारा येन सुस भनुपमम् ॥ एवं पाराईतो बालोरणदणापरिक्रमण । पावर फलं च तेसि पिरिह बजियमेण ॥५४॥ एबमाराषफ्न् भाछोधनापन्नाप्रतिक्रमणानि मामोति फर पतेषा निदिएमनितामणा ॥ विकासाचामेचना । । योगसारा मालामेष प्रबर्व मितिदम्पेन सम्मारिर्वप्रेषण स्त गप्पा मास्तम् ।

श्रीयोगीन्द्रदेव-विरचिता । अमृताशीतिः । विश्वप्रकाशिमहिमानममानमेक- मोमक्षराद्यखिलवामायहेतुभूतं । यं शंकरं सुगतमाधवमीशमाहु- रहन्तमूर्जितमहन्तमहं नमामि ॥ १ ॥ अर्थोपार्जनप्रयास । भ्रातः ! प्रभातसमये त्वरितः किमर्थ- मर्थाय चेत्स च सुखाय ततः स सार्थः । यद्येवमाशु कुरु पुण्यमतोर्थसिद्धिः पुण्यैर्विना न हि भवन्ति समीहितार्थाः ॥ २ ॥ धर्मादयो हि हितहेतुतया प्रसिद्धा धर्माद्धनं धनत ईहितवस्तुसिद्धिः । बुद्ध्वेति मुग्ध ! हितकारि विधेहि पुण्यं पुण्यैर्विना न हि भवन्ति समीहितार्थाः ॥३॥ वार्तादिभिर्यदि धनं नियतं जनानां निस्वः कथं भवति कोऽपि कृपीवलादिः । ज्ञात्वेति रे मम वचश्चतुराः स्वपुण्यैः पुण्यैर्विना न हि भवन्ति समीहितार्थाः ॥ ४ ॥ प्रारभ्यते भुवि वुधेन धियाधिगम्य तत्कर्म येन जगतोऽपि सुखोदयः स्यात् ।

सिद्धान्तसारादिसपहे- कृप्यादिक पुनरिद विदयासि पस्त्यं स्वस्यापि रे विपुलदु'सफल न किं सत् ॥ ५॥ एमेहि याहि सर निस्सर वारितोसि मा मन्दिरं नरपतेविश रे विशहम् । इत्यादिसेवनफल प्रथम लभन्ते लम्ध्वापि सा यदि पता सफला कर्य श्रीः॥६॥ वार्चापि किन सब फर्णमुपागतेये पात्रे रसिं स्पिरसया न गवा कदापिन् । पापल्पतोऽपि जितसर्वनिसम्मिनीभी- स्वस्सा कयं पत कती विवभाति सङ्गम् ॥७॥ प्रणमत्पुमतिहेतोजीवितहेनोविमुञ्चति प्रामान् । दुम्सी यदि सुखोसो को मूर्खस्सेवकादपर ॥८॥ रस्नापिनी यदि कर्म अलपि विमुम्वेद रूपापिनी यदि च पंचरं कर्य वा । दिव्योपमोगनिरता यदि नैष शक ऊष्माया गवगवा न गुमार्थिनी श्रीः॥९॥ सम्बाधिकोऽपि मुमहानपि शीवलोपि मुक्तः भिया चपलया बठपिर्यवेह । तस्पाः कते कपममी कतिनोऽपि लोकार केशम्मतपसनमाशु विक्षन्ति केचित् ॥१०॥ सत्यं समस्तमुखमसमिहिता- रीहापि से न तव सेपु सदेवि पेनि | -

-
अमृताशीतिः ।
तेषां यदर्जनवियोगजदुःखजाल
तस्यावधिं बहुधियापि न हन्त वेमि ॥ ११ ॥
निर्वादमादिरहितं विधुताघसंघ
यद्यस्ति नापरमपारममारसौख्यम् ।
एवंविधेऽपि मतिमान्नपि शर्मणीत्थं
बुद्धिकरो तु पुरुषो वद कोत्र दोषः ॥ १२
आस्तां समस्तमुनिसंस्तुतमस्तमोहं
सौख्यं सखे ! विगतखेदमसंख्यमेतत् ।
निस्सङ्गिनां प्रशमनं यदिहापि जातं
तस्यांशतोऽपि सदृशं स्मरजं न जातु ॥ १३ ॥
अनन्तसुखविन्न ।
अज्ञाननामतिमिरप्रसरोयमन्तः
सन्दर्शिताखिलपदार्थविपर्ययात्मा ।
मंत्री स मोहनृपतेः स्फुरतीह याव-
त्तावत्कुतस्तव शिवं तदुपायता वा ॥ १४ ॥
शरीरं ।
किञ्चाशुचौ शुचिसुगन्धिरसादिवस्तु
यस्मिन् गतं नरकतां समुपैति सद्यः ।
रंरम्यते तदपि मोहवशाच्छरीरं
सर्वैरहो विजयते महिमा परोऽस्य ॥ १५
अज्ञानघोरसरिदम्बुनिपातमूर्ति-
दुर्मोचमोहगुरुकदर्मदुरमग्नं ।
जन्मान्तकादिमकरैरुरुगृह्यमाणं
विश्वं निरीशमवशं सहतेऽतिदुःखम् ॥ १६ ॥

८८
सिम्तसारादिसमहे-
-
भवानी।
बहानमोहमदिरा परिपीय मुग्ध !
दहन्त हन्ति परिषगति मसवीएम् ।
पश्येश बगदिद पतित पुरस्ते
किन्तूचेसे स्वमपि पालिस ! वासोऽपि ॥ १७॥
पक्टुं सदसण सम सारो सप्पडि दोसपरिहारीम् ।
चक्र होइ णिरन्दो दहममिलयरीस १ ॥ १८ ॥
वैरी ममापमहमस्म कसोपकार
इस्पादिदुःखपनपावकपच्यमानं ।
लोकं विलोक्य न मनागपि फम्पसे त्वं
कन्द कुरुप्प पद सारश ! कुर्वसे किम् ॥ १९ ॥
नो मीयते बगति फेनषिदेप मोह
इस्याकुलः किमसि सम्प्रति रे षपस्म ।।
एकोऽपि कोऽपि पुरत स्पितमनुसैन्य
सत्याधिको नयति शोषसि किं मुषा स्वम् ॥२०॥
सपतालसत्वमधिसत्वपलोपपमः
भुस्वा पराश समां कलदेवता स्वम् ।
संघानचक्रमिदमङ्ग! गृहाम पूर्ण-
मझानमन्त्रियुतमोहरिप्पमादि ॥ २१ ॥
सत्वं हि केसलमलं फसतीष्टसिदि
मुक्त सया समवया पदिक परस्ते ।
एफरमेन सहितं यदि पोपरन-
मेकस्स्वमेव पतिरा! पराघरानाम् ॥ २२ ॥

अमृताशीतिः ।
मल्लो न यस्य भुवनेऽपि समोस्ति सोऽयं
कामः करोति विकृति तव तावदेव ।
यावन यासि शरणं चरणं समन्तात्
सोपानतामुपगतां शिवसौधभूमेः ॥ २३ ॥
कालत्रयेऽपि भुवनत्रयवर्त्तमान-
सत्वप्रमाथिमदनादिमहारयोऽमी ।
पश्याशु नाशमुपयान्ति दृशैव यस्याः
सा सम्मता ननु सतां समतैव देवी ॥ २४ ॥
चारित्रम् ।
वाञ्छा सुखे यदि सखे ! तदवैमि नाहं
धर्माद्धृते भवति सोऽपि न यावदेते ।
रागादयस्तदसनं समता त एव
तस्माद्विधेहि हृदि तां सततं सुखाय ॥२५॥
समतामृत ।
ज्वालायमानमदनानलपुञ्जमध्ये
विश्वं कथं कथति कोऽपि कुतूहलेन ।
कस्मिन्नपीह समसौख्यमया हिमानी-
मध्यासते यतिवराः समताप्रसादात् ॥ २६ ॥
मैत्री कृपा प्रमुदिता सुभगाङ्गनानां
शुभ्राभ्रसनिभमनःसदने निवासम् ।
त्वं देहि ता हि समताभिमताः समीत्वा-
देवं न कोपि भुवनेऽपि तवास्ति शत्रुः ॥२७॥

९०
सिदाम्तसारादिसमहे-
सस्साम्पमाषगिरिगहरमध्यमेस्स
पचासनादिफमदोपमिद च मया ।
भास्मानमात्मनि सखे! परमात्मरूपं
त्वं ध्यास वेत्सि ननु येन मुख समाधेः ॥२८॥
मात्मारापा।
आराध्य पीर ! परणा सततं गुरुणां
लम्या ततो दशममार्गषरोपदेश ।
सस्मिभिषेहि मनसः स्थिरता प्रयत्नास्
सोपं प्रयाति तव मेन मवापगेयम् ।। २९॥
नित्यं निरामममनन्तमनादिमध्य-
मन्तिर्जितमन स्मरतो वीचम् ।
नाई न याति यदि जातिवरादिक ते
सर्हि श्रमः कयमय न मदा सनीनाम् ॥ ३ ॥
श्रीरामुराशिसरांशु यदीपलप-
माराम्पसिदिसपयान्ति तपोधनास्त्वं ।
हो स्पसारिपिटरसभिलिए-
मन्तिमघरमिद स्मर फर्ममुक्यै ॥ ३१॥
परस्सा।
से निकल सफलमधयकेपट या
सन्त स्तुवन्ति सतत सममावभाजः ।
पाम्पस तस्स परवाचकमन्त्रएको
हे पान्य ! शामवपुरी विश निर्विवाहः ॥१२॥

अमृताशीति । यन्न्यासतः स्फुरति कोऽपि हृदि प्रकाशो वाग्देवता च वदने पदमादधाति । लब्ध्वाःतदक्षरवर गुरुसेवया त्वं मा मा कृथाः कथमपीह विराममस्मात् ।। ३३ ।। यावत् समस्ततिरियं सरतीह तावत् तावच रे चरसि ही रजसि त्वमेव । यावत्स्वशर्मनिकरामृतवारिव न हहिमांशुरुदयं न करोति तेऽन्तः ॥ ३४ । हमन्त्रसारमतिभास्वरधामपुंज सम्पूज्य पूजिततम जपसंयमस्थः। नित्याभिराममविराममपारसारं यद्यस्ति ते शिवसुखं प्रति सम्प्रतीच्छा ।। ३५॥ द्वैकाक्षरं निगदितं ननु पिण्डरूपं तस्यापि मूलमपरं परमं रहस्यम् । वक्ष्यामि ते गुरुपरम्परया प्रयातं यन्नाहतं ध्वनति त[व]त्तढनाहताख्यम् ॥ ३६॥ अस्मिन्ननाहतविले विलपेन मुक्ते नित्ये निरामयपदे स्वमनो निधाय । त्वं याहि योगशयनीयतलं सुखाय श्रान्तोऽसि चेद्भवपथभ्रमणेन गाढम् ॥ ३७॥ लोकालोकविलोकनैकनयनं यद्वामयं तस्य या मूलं बालमृणालनालसदृशीमात्रां सदा तां सतीं।

१२ सिदान्तसारादिसमहे- स्मारं स्मारममन्दमन्दमनसा स्फारप्रमामासुरां संसारार्णवपारमेहि वरसाव किं त्वं प्रथा वाम्पसि ॥३८ अमपान । मन्मामोषिनिपातमीवमनसां शश्वस्सुखं पाम्छता धर्मध्यानमवादि साधरमिदं फिश्चित् कयंचिन्मया। समं किविदतस्तदेव विधिना नालम्पनं कप्पते मङ्गादिकदेशसङ्गतमृते देशैः परैः किबन ॥३९॥ प्रमसि मनसि मोह पत्रलं तापदेवं पहुगुणगणगप्पं मन्यसेऽन्यत्र देखें । गुरुवचननियोगामेषसे यावदेवं समघरफरगौर किन्दुदेवं स्फरन्तम् ॥४०॥ चिनुरेश भाराबनाफरम् । सटिति करमयोगादीषते सयुगान्ते प्रति यदि मनस्ते पिन्दुदवे स्थिरत्वम् । फुटति निमिरपन्यो यश्यतामेति भक्तिः सदसममलशीले योगनिद्रा मवस्य ।। ४१ ।। सरलविमलनालीदारमले मनस्त्वं इरु सरति यतोऽय प्रमर प्रेणवायुः । परिसपरनालीयुम्ममार्गप्रयायः दसितमसदसौपः केवलझानहेतुः ॥ ४२ ।। पिलसदलमवावस्तीवकर्मोदयादा सरठविमतनालीर ध्रमप्राप्तलोकः । पबन-बबमूगमाइतम् । मूबामाहवरामना।

अमृताशीतिः।
९३
अहह कथमसह्यं दुःखजालं विशालं
सहति महति नैवाचार्यमज्ञस्तदर्थम् ॥ ४३ ॥
अनाहताराधना ।
1
रसरुधिरपलास्थिस्नायुशुक्रप्रमेद-
प्रचुरतरसमीरश्लेष्मपित्तादिपूर्णे ।
तनुनरककुटीरे वासतस्ते धृणां चेद्
हृदयकमलगर्भे चिन्तय स्वं परोऽसि ॥४४॥
व्यकानन ।
अजममरममेयं ज्ञानहग्वीर्यशर्मा-
स्पदमविपदमिष्टं स्वस्वरूपं यदि त्वं ।
कुरु हृदयनभोन्तानसं निर्विकल्पं
वपुषि विषमरोगे नश्वरे मा रमस्व ॥४५॥
.
अपरानाहता।
अपरमपि विधानं दामकामादिकानां
दुतविदुरविधानं धर्मता लभ्यते यत् ।
तदहमिह समस्तादंहसां मुक्तये ते
हितपथपथिकेदं क्षिप्रमावेदयामि ।। ४६॥
नादानाहताराधनातत्फलम् ।
श्रवणयुगलमूलाकाशमासाद्य सद्यः
स्वपिहि पिहितमुक्तस्वान्तसद्वारसारे ।
विमलसदलयोगानल्पतल्पे ततस्त्वं
स्फुरितसकलतत्वं श्रोष्यसि स्वस्य नादम् ॥४७॥

९१ सिशन्ससारादिसंग्रह मावोत्पचिकामनावमेवनिरूपणम् । शक्षघरहुवमोजिद्वादशाईदिपक प्रमितविदितमासै म्यस्वरूपदर्शी । मदफलपरपुष्टांम्मोदनधम्पुराशि- ध्वनिसयरवत्वाज्जायते सा पतुर्या ॥४८॥ बादोत्पत्तित्यानम् । भवणयुगलमध्ये मस्तके पक्षसि स्वे मपति भवनमेयां मापितानां प्रयामा। विपुलफलमिदनोत्पयते पश्यतेम्प स्तदपि भृण मया स्वं कप्पमानं हि तप्यम् ॥१९॥ अमरसायके मस्त रष्टि पपुरजरमरोग मूलनादप्रसिदे। अणुलघुमहिमापाः सिदयः स्युर्वितीयात् सुरनरखघरेशा सम्पदश्चान्यमेदात् ।। ५० ॥ घमुरषोपोत्पत्तिा। करशिरसि नितम्मे नामिपि च कर्मे प्रमयति धनषोपाम्मोगिनिर्घोपतुरमा । विपटयति पार इन्द्रमान्तसिद्धा स्पदपरिसमापध्वंसकोयं चतुर्प ॥५१॥ प्रकरिसनिजरूप पोपमाकम्प रम्यं परिहरत नितान्त विस्मयं हो पतीक्षा !।

अमृताशीतिः।
९५
कुरुत कुरुत यूयं योगयुक्तं स्वचित्तं
तृणजललवतुल्यैः किमफलैः क्षौद्रसिद्धचै ॥५२॥
फलम् ।
सकलगयमेकः केवलज्ञानरूपो
विदधति पदमस्मिन्साधवः सिद्धिसिद्धयै ।
तदलममुमनूनं नादमाराध्य सम्यक
त्वमपि भव शुभात्मा सिद्धिसीमन्तिनीशः॥५३॥
ज्योतिरनाहतम् ।
बहिरबहिरुदारज्योतिरुद्भासदीपः
स्फुरति यदि तवायं नाभिपझे स्थितस्य ।
अपसरति तदानीं मोहघोरान्धकार-
श्चरणकरणदक्षो मोक्षलक्ष्मीदिदृक्षोः ॥ ५४ ॥
धर्मध्यानोपसहार ।
इति निगदितमेतद्देशमाश्रित्य किञ्चित्
गुरुसमयनियोगात्प्रत्ययस्यापि हेतोः ।
परमपरमुदारज्ञानमानन्दतानं
विमलसकलमेकं सम्यगो(गे) कः समस्ति ।। ५५ ॥
गुरुपरम्परोपदेश ।
प्रथममुदितमुक्तनादिदेवेन दिव्यं
तदनु गणधरायः साधुभिर्यद्धतं च ।
कथितमपि कथञ्चिन्नादिगम्यं समोहै-
रधिगतमपि नश्यत्याशु सिध्या विनेह ॥५६॥

सिदान्तसारादिसंप्रहे- हिमोपवेष । खरनिफरविसर्गम्पसनापपरैर्य द्रहितमहितीन साश्वतं मुक्तसंख्यम् । अरसतिमिररूपस्पर्श्वगन्धाम्मुवायु शिसिपषनसखाणुस्पृलदिकुचपालम् ॥५४॥ परमननमरामा वेदना पत्र नास्ति परिमवति न मुस्प गतिर्नो गविर्षा । सदातिविशदचिर्दम्पतेनेऽपि सर्व गुणगुरुगुरुपादामोषसेवाप्रसादात् ॥ ५८॥ गुरूपदेपर। गिरिगहनगुहापारम्पशून्यप्रदेश स्वितिकरणनिरोषध्यानतीर्योपसेवा। अपटनबपहोमर्मपणो नास्ति सिद्धि मंगम तदपरस्वं मोः प्रकारं गुरुभ्प ॥ ५९॥ गपगमनलक्ष्म स्पस्य तस्वं समन्ता द्तमपि निमदेहे दहिमि पलक्ष्यम् । तदपि गुरुखचोमिर्योध्यवे तेन देवो गुरुरपिगतवस्वस्तस्पत' पूजनीय ॥ ६ ॥ विपानन्द अमितफलसिद्दे दरबार बिपानम्हस्वामिमिरच्म् । ममिमवफलसिदेरभ्युपाय मुगोष प्रमपति स प शाबाचस्य धोत्पत्सिराप्ताद । स भवति स प्र पस्तस्ममादास्प्रमुढे न हि स्वमुपफार मापयो विमरन्ति ।। ६१ ॥

अमृताशीतिः । स्वस्मिन् सदभिलापत्वादभीष्टज्ञापकत्वतः स्वयं हि तत्प्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ॥६२ ॥ मोक्षमार्ग । दृगवगमनवृत्तस्वस्वरूपप्रविष्टो व्रजति जलधिकल्पं ब्रह्मगम्भीरभावं । त्वमपि सुनयमत्वान्मद्वचस्सारमस्मिन् भवसि भव भवान्तस्थायिधामाधिपस्त्वम् ॥ ६३॥ यदि चलति कथञ्चिन्मानसं स्वस्वरूपा- द्वमति बहिरतस्ते सर्वदोषप्रसङ्गः। तदनवरतमन्तर्मग्नसंविग्नचित्तो भव भवसि भवान्तस्थायिधामाधिपस्त्वम् ॥ ६४॥ उकम्। अहिंसाभूतानामित्यादिसमन्तभद्रवचनम् । शरीरनिर्मोह । बहिरबहिरसारे दुःखभारे शरीरे क्षयिणि बत रमन्ते मोहिनोऽस्मिन् वराकाः। इति यदि तव बुद्धिनिर्विकल्पस्वरूपे भव भवसि भवान्तस्थायिधामाधिपस्त्वम् ।। ६५ ॥ अजनमजङ्गमयो रागाद्युत्पत्तिहेतु । इदमिदमतिरम्यं नेदमित्यादिभेदा- द्विदधति पदमेते रागरोषादयस्ते । .

९ सिदान्ससारादिसंग्रहे- सदलममलमेकं निष्कलं निष्क्रियस्सन् मज मजसि समाः सत्फलं पेन नित्यम् ॥ ६६ ॥ समसिंहनन्यापारम् । वापस्क्रिया प्रवर्तन्ते यावदतिस्प गोचरं । अद्ये निष्फले प्राप्त निमिस्स फुतः क्रिया ॥ ६७॥ बन्पमोधी। अहमहमिह मावानावना यावदन्त मेषति भवति पन्धस्वायदेपोऽपि नित्य । क्षणिकमिदमपं विश्वमालोक्य सस्मा- द्रज शरणमवन्ध शान्तये त्वं समाये ॥६॥ नकम्मोपात्तम् । साईकारे मनसि न सम याति जन्मप्रबन्धो नाहकारमलति दयादात्मरष्टा(प्या) प सत्यां । अन्य झालो चगति च यसो नास्ति नरात्मवादी नान्यस्तस्मादुपनमयिपेस्सन्मतादस्ति मार्ग ॥६९॥ रपिरयमयषि(मि)न्दुर्योतयन्ती पदार्यान् वितमति सति यस्मिमासती मोतु ! माव । बदपि पत ! हवात्मा मानपुलेऽपि तस्मिन् ग्रजति महति मोई सुना फेन फधित् ॥७॥ मरामावाप्पमियाय । ये लोक मलत्पनन्पमदिमा मोप्पेप सजोनिधि- प्पम्मिन मत्सपमावि नामति पुनदेयोशुमाली स्पप ।

अमृताशीतिः । - तस्मिन् बोधमयप्रकाशविशदे मोहान्धकारापहे येऽन्तर्यामिनि पूरुषे प्रतिहताः संशेरते ते हताः॥७१॥ आत्मपरिज्ञानम् । करणजनितबुद्धिर्नेक्षते मूर्तिमुक्तं श्रुतजनितमतिर्यास्पष्टमेयावभासा । उभयमतिनिरोधे स्पष्टमत्यक्षमक्ष समदिवसनिवासं शाश्वतं लप्स्यसे त्वम् ॥७२॥ प्राणापानप्रयाणः कफपवनभवव्याद(ध)यस्तावदेते- स्पन्ददृष्टेश्च तावत्तव चपलतया न स्थिराणीन्द्रियाणि । मोगा ये (ए) ते च भोक्ता त्वमपि भवसि हे हेलया यावदन्तः साधो! साधूपदेशाद्विशसि न परमब्रह्मणो निष्कलस्य।।७३॥ ब्रह्मांडं यस्य मध्ये महदपि सदृशं दृश्यते रेणुनेदं तस्मिन्नाकाशरन्ध्रे निरवधिनि मनो दूरमायोज्य सम्यक् । तेजोराशौ परेऽस्मिन्परिहृतसदसवृत्तितो लन्धलक्ष्यां हे दक्षाध्यक्षरूपे भव भवसि भवाम्भोधिपारावलोकी॥७४॥ संसारसारकर्मप्रचुरतरमरुत्प्रेक्षणाद्धाम्य भ्रात- ब्रह्मांडखण्डे नवनवकुवपुर्गृह्णता मुञ्चता च । कस्कः कौतस्कुतः कचिदपि विषयो न भुक्तो यो न मुक्तो जातेदानी विरक्तिस्तव यदि विश रे ब्रह्मगम्भीर- सिन्धुम् ॥७५॥ वहिरात्मस्वरूपम् । पारावारोऽतिपारः सुगिरिरुरुरयं रे वरं तीर्थमेतत् रेवारङ्गत्तरगसुरसरिदपरा रेवतीशो हरिर्वा । निर्विकल्पसमाधिः।

१००
सिद्धान्तसारादिसंग्रहे-
इत्यवान्तान्तरास्मा भ्रमति बहुरं तावदात्मात्मसक्दै
माषदोपि देो हितविहितहितममञ्चद न पश्येत् ।।७६॥
संसारमुबहेवमनिरपम् ।
विश्वे विश्वम्मरेशाः शिरसि मम पदाम्मोमयुम्म दफन्वे
पश्या मावस लक्ष्मीर्षपुरपि निरपं विमहेतुः सो मे ।
इस्पादौ शर्महतो निपवति निखिले कि वो सगरोज्यम्
तसाचपाय किशि स्पिरतरमनसा सितोपत्र नास्ता
रचं पदं शिरसि विधिपतो ततः किं
माता भियः सकलकामदुधास्ततः किम् ।
सन्सर्पिता प्रणयिनो विमवैस्वत किं
करपस्पिति वनुमृता सनुमितत. किम् ।।७८॥
परमोपवेस।।
वमादनन्तममरं परमप्रका
वधिच! चिन्तय किमेमिरसद्विकरी ।
यसानुपणिय इमे गमनाधिपस्प-
मोगादया पणजन्तुमा मपन्ति ॥७९॥
उपभमफलादिधावीमा फस परमिच्छता।
मवति विपुलो पदमायासस्तदा किमतम् ॥८०॥
न नियतफलाः सर्वे मावा फलान्तरमिप्यते ।
धनपति सल मीसिमाम मासु पवारम् ॥८१॥

अमृताशीतिः ।
१०१
उपसंहार ।
चश्चच्चन्द्रोरुरोचिरुचिरतरवचःक्षीरनीरप्रवाहे
मज्जन्तोऽपि प्रमोदं परमपरनरा संगिनोगुर्यदीये
योगज्वालायमानज्वलदनलशिखाक्लेशवल्लीविहोता
योगीन्द्रो वः सचन्द्रप्रभविभुरविभुर्मङ्गलं सर्वकालम्||८२॥
इति योगीन्द्रदेवकृतामृताशीतिः समाप्ता ।
भद्रम्भूयात् ।

श्रीशिषकोट्याचार्यविरचिता रत्नमाला। k सर्वई सर्ववागी पीरं मारमदापहं । प्रणमामि महामोहशान्तये मुकवाप्तये ॥१॥ सारै यस्सर्वसारेषु वन्य यान्दितेप्यपि । अनेकान्तमय वन्दे तवचनं सदा ॥२॥ सदाक्दातमहिमा सदा ध्यानपरायण । सिद्सनमुनि याद्वारकपदेश्वरः ॥२॥ स्वामी समन्तमद्रो मेपनि मानसेज्नयः । विष्ठवाजिनराजोपच्छासनाम्युमिचन्द्रमा ॥४॥ पर्दमानजिनामावादारत मम्मवन्वय । रुतेन येन राजन्ते तदा कथयामि च ॥५॥ सम्पर्य सर्पबन्तूना मेंया श्रेयःपदार्थिनां । विना वेन व्रत सर्वोप्पकरप्यो मुक्तिदेववे ॥६॥ निर्विकल्परिपदानन्द परमेष्ठी सनातनः। दोपातीतो जिनो दवस्तदुपम भुतिः परा ॥७॥ निरम्परो निरारम्मो नित्यानन्दपदार्थन । धर्मदिरकर्मपिर साघुर्गुरुरिस्युच्यत पुप ! ॥८॥ अमीपा पुण्याहतूना भदान वभिगपते । सदव परम तत्वं तदव परमं पदम् ।।९।।

रत्नमाला।
१०३
विरत्या संयमेनापि हीनः सम्यक्त्ववान्नरः।
स देवं याति कर्माणि शीर्णयत्येव सर्वदा ॥१०॥
अबद्धायुष्कपक्षे तु नोत्पत्तिः सप्तभूमिषु ।
मिथ्योपपादत्रितये सर्वस्त्रीपु च नान्यथा ॥११॥
महाव्रताणुव्रतयोरुपलब्धिनिरीक्षते ।
स्वर्गेऽन्यत्र न सम्भाव्यो व्रतलेशोऽपि धीधनैः ॥१२॥
संवेगादिपरः शान्तस्तत्वनिश्चयवान्नर ।
जन्तुर्जन्मजरातीतः पदवीमवगाहते ॥१३॥
अणुव्रतानि पञ्चैव त्रिप्रकारं गुणवतं ।
शिक्षाव्रतानि चत्वारीत्येवं द्वादशधा व्रतम् ॥१४॥
हिंसातोऽसत्यतश्चौर्यात् परनार्याः परिग्रहात् ।
विमतेविरतिः पञ्चाणुव्रतानि गृहशिनाम् ॥१५॥
गुणवतानामाचं स्याद्दिग्व्रतं तद्वितीयकम् ।
अनर्थदण्डविरतिस्तृतीयं प्रणिगद्यते ॥१६॥
भोगोपभोगसंख्यानं शिक्षात्रतमिदं भवेत् ।
सामायिक प्रोषधोपवासोतिथिषु पूजनम् ॥१७॥
मारणान्तिकसल्लेख इत्येवं तच्चतुष्टयं ।
देहिनः स्वर्गमोक्षैकसाधनं निश्चितक्रमम् ॥१८॥
मद्यमांसमधुत्यागसंयुक्ताणुव्रतानि नुः ।
अष्टौ मूलगुणाः पञ्चोदुम्बेरैश्चार्भकेष्वपि ॥१९॥
वस्त्रपूतं जलं पेयमन्यथा पापकारणं ।
स्नानेऽपि शोधनं वारः करणीयं दयापरैः ॥२०॥

भीशिवकोट्याचार्यविरचिवा रत्नमाला। सर्पक्ष सर्ववागीशं वीरं मारमदापहं । प्रममामि महामोहन्यान्तये मुक्तताप्तये ॥१॥ सारै यस्सर्वसारेषु धन्ध पन्दितेप्यपि । अनेकान्तमय बन्दे साधनं सदा ॥२॥ सदावदातमहिमा सदा ध्यानपरायण । सिद्सेनमुनिर्जीयानगरकपदेश्वर ॥२॥ स्वामी समन्तभद्रो मेर्निर्ष मानसेऽनपः। विष्टवाजिनरामोपच्छासनाम्मुषिचन्द्रमाः ||४|| पर्दमानबिनामावासारत भष्यजन्तषः । रुतन येन राबन्से सदई कपयामि ॥ ॥५॥ सम्परा सर्वजन्तूनां मेंया भेय पदायिना । विना तन मत सोप्पकरप्पो मुक्तिोतये ॥६॥ निर्विकल्पश्चिदानन्दः परमेष्ठी सनातन । दोपातीसो जिनो दपस्तदुपम झुतिः परा ||७|| निरम्परो निरारम्मो नित्यानन्दपदार्थनः । धर्मदिक्कमधिरु साधुर्मुरुरिस्युच्यत बुधैः ॥८॥ अमीपा पुण्याहतूना मदान चभिगपने । सदव परम सत्यं वदेव परमं पदम् ।।९।।

रत्नमाला । १०५ मनोवचनकायैर्यो न जिघांसति देहिनः । स स्याद्गजादियुद्धेपु जयलक्ष्मीनिकेतनम् ।।३२॥ सुस्वरस्पटवागीष्टमतव्याख्यानदक्षिणः। क्षणार्द्धनिर्जितारातिरसत्यविरतेर्भवेत् ॥३३॥ चतुःसागरसीमाया भुवः स्यादधिपो नरः । परद्रव्यपरावृत्तः सुवृत्तोपार्जितस्वकः ॥३४॥ मातृपुत्रीभगिन्यादिसंकल्पं परयोपिति । तन्वानः कामदेवः स्यान्मोक्षस्यापि च भाजनम् ॥३५।। जायाः समग्रशोभाद्याः सम्पदो जगतीतले । तास्तत्सर्वा अपि प्रायः परकान्ताविवर्जनात् ॥३६॥ अतिकांक्षा हता येन ततस्तेन भवस्थिति। हस्विता निश्चिता वास्य कैवल्यसुखसङ्गतिः ॥३७॥ मद्यमांसमधुत्यागफलं केनानुवर्ण्यते । काकमांसनिवृत्याभूत्स्वर्गे खदिरसागरः॥३८॥ मद्यस्यावद्यमूलस्य सेवनं पापकारणं । परत्रास्तामिहाप्युच्चैर्जननीं वांछयेदरम् ॥३९॥ गीतोऽशुचिवस्तूनामप्यादाय रसान्तरम् । मधूयन्ति कथं तन्नापविपत्रं पुण्यकर्मसु ॥४०॥ व्यसनानि प्रवानि नरेण सुधियान्वहं । सेवितान्याहतानि स्युनरकायाश्रियेऽपि च ॥४१॥ छत्रचामरवाजीभरथपादातिसंयुतः। विराजन्ते नरा यत्र ते रात्र्याहारवर्जिनः ॥४२॥ १ 'मदयन्ति' ऐसा पाठ पुस्तकमें दिया है

सिमान्ससारादिसमहे-
प्रतिमाः पालनीया पुरेफादश गृहेशिनां ।
अपवर्गापिरोहाय सोपानन्तीह ताः परा ॥२१॥
कालो फाले वने चासो वय॑ते मुनिसत्तमै ।
स्मीयते च जिनागारे प्रामादिपु विशेपतः ॥२२॥
तेषां नैध्यप्वानां मूलोचरगुपार्थिनां ।
नानामतिनिकायानां छपस्थझानराजिनाम् ।।२२॥
मानसपमशौचादितना प्रासुकारमना ।
प्रस्वपिम्छकमरम्पाना दान दातुर्विमुक्तये ॥२४॥
येनायफाले यतीनां वैय्यामं से मदा।
तेनैव शासनं बन प्रोक्त शर्मकारणम् ।।२५।।
उतुंगवोरणोपेतं त्यागारमपक्षम।
कम्मं भावकै धक्यामरादिकमपि स्फुटम् ॥२५॥
पेन भीमजिनेशस चैस्यागारमनिन्दितं ।
कारित सेन मम्मेन स्थापित जिनशासनम् ॥२७॥
गोभूमिम्वर्णकछादिदानं बसवयेऽहो ।
कम्यं बीत्यादिसमदूरणमप्यद ॥२८॥
सिद्धान्तानारशासप पाध्यमानेषु मक्तिवः।
फनप्पयो पलो नृणां यापतेत्र महईये ॥२९॥
दमादत्यादिमिर्न धर्मसन्तानमवरेत् ।
रीनानापामपि प्राप्तान्यिमुसाभव कल्पयेत् ॥३०॥
प्रतभीसानि यान्पेय रक्षणीयानि सर्वदा ।
एनसेन मायन्से देहिनां दिम्पसिदय ॥३१॥

रत्नमाला। १०५ मनोवचनकायैर्यो न जिघांसति देहिनः । स साद्गजादियुद्धेषु जयलक्ष्मीनिकेतनम् ॥३२॥ सुस्वरस्पष्टवागीष्टमतव्याख्यानदक्षिणः । क्षणार्द्धनिर्जितारातिरसत्यविरतेर्भवेत् ॥३३॥ चतुःसागरसीमाया भुव. स्यादधिपो नरः । परद्रव्यपरावृत्तः सुवृत्तोपार्जितस्वकः ॥३४॥ मातृपुत्रीभगिन्यादिसंकल्पं परयोपिति । तन्वानः कामदेवः स्यान्मोक्षस्यापि च भाजनम् ॥३५।। जायाः समग्रशोभाद्याः सम्पदो जगतीतले। तास्तत्सर्वा अपि प्रायः परकान्ताविवर्जनात् ॥ ३६॥ अतिकांक्षा हता येन ततस्तेन भवस्थिति। हस्विता निश्चिता वास्य कैवल्यसुखसङ्गतिः ॥३७॥ मद्यमांसमधुत्यागफलं केनानुवर्ण्यते । काकमांसनिवृत्याभूत्स्वर्गे खदिरसागरः॥३८॥ मद्यस्यावद्यमूलस्य सेवनं पापकारणं । परत्रास्तामिहाप्युच्चैर्जननीं वांछयेदरम् ॥३९॥ गीतोऽशुचिवस्तूनामप्यादाय रसान्तरम् । मधूयन्ति कथं तन्नापविपत्रं पुण्यकर्मसु ॥४०॥ व्यसनानि प्रवानि नरेण सुधियान्वहं । सेवितान्याहतानि स्युनरकायाश्रियेपि च ॥४१॥ छत्रचामरवाजीभरथपादातिसंयुतः। विराजन्ते नरा यत्र ते रात्र्याहारवर्जिनः ॥४२॥ १ 'मदयन्ति' ऐसा पाठ पुस्तकमें दिया है।

१०६
सिदान्तसारादिसपहे-
दन्ति न नागागा न असन्ति च राक्षमा ।
न रोगाश्चापि जायन्ते य सरन्मंत्रमध्ययम् ॥१३॥
राम्रो स्मृवनमस्फार सुप्त स्वमान् शुमाशुमान् ।
सत्यानेव समाप्नोति पुम्प च पिनुते परम् ॥४४॥
नित्यनैमितिका कार्या क्रिया योपिना मुदा ।
वामिडमनस्को यस्पुण्मपम्पसमामय ॥४५||
अष्टम्पा सिमस्यामा भुवचारित्रशान्तय ।
मपन्ति भक्तपो नूनं साध्नामपि सम्मति ॥४६॥
पाधिक्य सिदारित्रशान्तम शान्सिकारण ।
त्रिकालवंदनायुक्ता पाक्षिक्यपि सो मता ॥४७॥
चतुर्दश्यां सिपी सिचैत्यभुतसमन्विते ।
गुरुवान्तिनुते निस्प चैत्यपश्चगुरू अपि ॥१८॥
नन्दीश्वरदिने सिखनन्दीश्वरगुरुचिता ।
शान्तिमक्तिः प्रकर्षम्या पलिपुप्पसमन्विता ॥४९॥
क्रियास्वन्पासु शासोक्तमार्गेम करम मता।
हर्षवं क्रियां मेनो गृहस्थाचार्य उम्पवे ॥५०॥
चिदानन्दं पर ज्योति फेवलझानलधर्म ।
बास्मानं सर्वरा ध्यामेदेवचस्वोपमं नृणाम् ॥५१॥
गाईस्म्यं वापरूपेण पालममन्तरात्मसत् ।
सम्यते न पुनर्दुःखयोनागवति निश्चितम् ।।५२||
कवेन येन जीवस्य पुम्पान्य प्रजायते ।
सत्कर्षम्यं सदान्पत्र न इव्दविकस्पितम् ॥५३॥

रत्नमाला ।
१०७.
बौद्धचा कसांख्यादिमिथ्यानयकुवादिनां ।
पोषणं माननं वापि दातुः पुण्याय नो भवेत् ॥५४॥
स्वकीया परकीया वा मर्यादालोपिनो नराः ।
न माननीयाः किं तेषां तपो वा श्रुतमेव च ॥५५॥
सुव्रतानि सुसंरक्षन्नित्यादिमहमुद्धरन् ।
सागारः पूज्यते देवैर्मान्यते च महात्मभिः ॥५६॥
अतीचारे व्रतायेषु प्रायश्चित्तं गुरूदितं ।
आचरेजातिलोपं च न कुर्य्यादतियत्नतः ॥५७॥
श्रावकाध्ययनमोक्तकर्मणा गृहमेधिता।
सम्मता सर्वजनानां सा त्वन्या परिपन्थनात् ॥५८॥
पंचमूनाकृतं पापं यदेकत्र गृहाश्रमे ।
तत्सर्वमतये (ए?) वासौ दाता दानेन लुम्पति ॥५९ ॥
आहारभयभैषज्यशास्त्रदानादिभेदतः ।
चतुर्धा दानमानातं जिनदेवेन योगिना ॥६०॥
मुहूर्ताद्वालितं तोयं प्रासुकं प्रहरद्वयं ।
उष्णोदकमहोरात्रं ततः सम्मूञ्छितो भवेत् ॥६१॥
तिलतण्डुलतोयं च प्रासुकं भ्रामरीगृहे ।
न पानाय मतं तस्मान्मुखशुद्धिर्न जायते ॥२॥
पाषाणोत्स्फुटितं तोयं घटीयंत्रेण ताडितं ।
सद्यः सन्तप्तवापीनां प्रासुकं जलमुच्यते ॥ ६३ ।।
देवर्षीणां प्रशौचाय स्नानाय च गृहार्थिनां ।
अप्रासुकं परं वारि महातीर्थजमप्यदः ॥ ६४ ॥

२०८ सिद्धान्तसारादिसप्रहे- सर्वमेव विपिजेर्न प्रमाण लौकिक सां। पत्र न प्रतहानि स्मात्सम्यक्वस्य पखेरन ॥६५॥ धर्मपात्रगत तोयं धृवतैलं घ वर्जयेत् । नमनीवं प्रसूनादिशाफ नापात् कदाचन ॥६६॥ यो नित्यं पठति भीमान् रस्नमालामिमा परी । म युद्धमावनो नून शिवकोटिस्वमाप्नुयात् ॥६७|| इति भीसमम्तमवस्वामिशिप्पशिवाटपाचार्मपिरचिता रममासा समाप्ता। भयतावित रतमाम चेति प्रबार बचिदम्पेन सम्पावत भयो। प्रेस पुस्तिमा एन प्राप्ता सा च बहरा-भरास्मा बतीपमएस मोविये बाबासा संमाता मपन्ति ताप विष पन्तम्मोन।

श्रीमाघनन्दियोगीन्द्र-विरचितः शास्त्रसारसमुच्चयः । श्रीमन्नम्रामरस्तामं प्राप्तानन्तचतुष्टयम् । नत्वा जिनाधिपं वक्ष्ये शास्त्रसारसमुच्चयम् ॥१॥ अथ त्रिविधः कालो द्विविधः षड्विधो वा ॥१॥ दशविधाः कल्पद्रुमाः ॥ २ ॥ चतुर्दश कुलङ्करा इति ॥ ३ ॥ षोडशभावनाः ॥ ४ ॥ चतुर्विंशतितीर्थकराः ॥ ५ ॥ चतु- स्त्रिंशदतिशयाः ॥ ६॥ पंच महाकल्याणानि ॥ ७॥ घाति- चतुष्टयम् ॥ ८ ॥ अष्टादश दोषाः ॥ ९ ॥ समवशरणैकाद- शभूमयः ।। १० ।। द्वादशगणाः ।।११।। अष्टमहाप्रातिहार्याणि ॥१२॥ अनन्तचतुष्टयमिति ॥ १३॥ द्वादशचक्रवर्तिनः ॥१४॥ सप्ताङ्गानि ॥ १५॥ चतुर्दशरत्नानि ॥१६॥ नवनिधयः ॥११॥ दशागभोगा इति ॥ १८ ॥ नवबलदेववासुदेवनारदाश्चेति ॥ १९ ॥ एकादशरुद्राः ॥ २० ॥ इति शास्त्रसारसमुच्चये प्रथमोऽध्याय ॥१॥ अथ त्रिविधो लोकः ॥ १॥ सप्तनरकाः ॥२॥ एकान्न- पंचाशत्पटलानि ॥ ३ ॥ इन्द्रकाणि च ॥ ४॥ चतुरुत्तरपट्च्छ- तनवसहस्रं श्रेणिवद्धानि ॥ ५ ॥ सप्तचत्वारिंशदुत्तरत्रिंशताधिक- नवतिसहस्रालंकृतत्र्यशीतिलक्ष विलानि प्रकीर्णकानि ॥६॥ एवं चतुरशीतिलक्षविलानि।।७|चतुर्विधं दुःखमिति ॥८॥ जम्बूद्वीप- ११० सिद्धा तसारादिर्सग्रहे- लवणसमछादयोऽसंख्यातीपसमाधाप्रार्घवृतीयद्वीपसमद्रो मनुप्पक्षेत्रम्।।१०॥पग्णयतिङमोगभूमय ॥११॥ पंचमन्दरगिरयः ।।१२।जिम्मक्षा ॥१॥शास्मलपम॥१४॥ विंशविर्यमकगिरमम ॥१५॥सतं सरांसि ॥१६॥ सहस्र कनकापलाः॥राचस्वारि भदिग्गमनगा ॥ १८॥ शतं वक्षारक्ष्माघरा ॥ १९ ॥ पष्ठि विमगनपः ॥ २० ॥ पछपचरमर्स विदेोबनपदा ॥ २१ ॥ पंचदशकर्मयममः ॥ २२ ॥ त्रिसमोगभूमय ॥ २३ ॥ चतु सिंधर्षपरपर्वता ॥ २४ ॥ प्रिंशस्सरोवरा ॥ २५ ॥ सप्तवि महानय ॥ २६ ॥ विंशतिर्नामिभूधरा ॥ २७ ॥ समत्यधिक शर्स विमयार्धपर्वताः ॥२८॥ पमगिरपयेति ॥२९॥ देवामा र्णिकायाः ॥३०॥ मयनयासिनो दधविधा ॥३१॥ अष्टमिषा पन्तरा ॥३२॥ पचविधा ज्योतिप्का' ॥ ३३ ॥ द्वादशविषा वैमानिका ॥३४॥ पोरमस्वर्गा ॥३५॥ नयौवेयकाः ॥३६॥ नषानुदिशा ॥३७॥ पंचानुचरा ॥३८॥ विपठिपटलानि||३९॥ इन्द्रकाणि च ॥४०॥ पोरशोचराष्टशवान्वितसप्तसहसं भेमिम दानि ॥४१॥ पट्चस्वारिंशदुत्तरैकश्मसानीतनवपक्षीतिसहसा सदसपरनीतिलध प्रकीर्णकानि ॥४२॥ प्रयोविंधस्पतरसप्त नपतिसहस्रान्वितचतुरशीविलक्षम विमानानि ॥४॥प्रमतो काठयामसिसिलाकान्तिकाः॥४४॥अणिमापटगुणाः॥४५॥ पहिसाबसारसमुचो द्वितीयोऽपाया ॥२॥ अय पंचसम्धय ॥१॥ करणं विषिषं ॥२॥ सम्परत्व हि विघम् ॥३॥ प्रिपिपम् ।।४॥ विषं वा ।।५।। सत्र दफस शास्त्रसार-समुच्चयः। १११ अष्टौ म्यक्त्वस्य पंचविशतिर्मलानि ॥६॥ अष्टाङ्गानि ॥७॥ अष्टगुणाः ॥८॥ पंचातिचारा इति ॥९॥ एकादशनिलयाः॥१०॥ त्रिविधो निर्वगः ॥११॥ सप्त व्यसनानि ॥ १२॥ शल्यत्रयम् ।। १३ ।। मूलगुणाः ॥१४॥ पंचाणुव्रतानि॥१५॥ त्रीणि गुणव्रतानि ॥१६॥ शिक्षाव्रतानि चत्वारि॥१७॥व्रतशीलेषु पंच पंचातीचाराः ॥१८॥मौनसमयाः सप्त।।१९।।अन्तरायाणि च॥२०॥श्रावकधर्म- चतुर्विधः ॥२१॥ जैनाश्रमश्च ॥ २२ ॥ तत्र ब्रह्मचारिणः पंच- विधाः ॥ २३ ॥ आर्यकर्माणि षट् ॥ २४ ॥ इज्या दशविधाः ॥२५॥ अर्थोपार्जनकर्माणि षट् ॥२६॥ दत्तिश्चतुर्विधा ॥२७॥ क्षत्रियो द्विविधः ॥२८॥ भिक्षुर्चतुर्विधः ॥२९॥ मुनयस्त्रिविधाः ॥३०॥ ऋषयश्चतुर्विधाः ॥ ३१ ॥ राजर्षयो द्विविधाः ॥३२॥ ब्रह्मर्षयश्च ॥३३॥ मरणं द्वित्रिचतुःपंचविधं वा ॥ ३४ ॥ तस्य पंचातिचारा इति ॥ ३५ ॥ द्वादशानुप्रेक्षाः ॥ ३६॥ यतिधर्मों दशविधः ॥३७॥ अष्टाविंशतिर्मूलगुणाः ॥ ३८ ॥ पंचमहाव्रत- स्थैयार्थ भावनाः पंच पंच ॥ ३९ ॥ तिस्रो गुप्तयः ॥ ४० ॥ अष्टौ प्रवचनमातृकाः ॥४१॥ द्वाविंशतिपरीपहाः ॥४२॥ द्वाद- शविधं तपः ॥४३॥ दशविधानि प्रायश्चित्तानि ॥४४॥ आलो- चैनं च ॥ ४५ ॥ चतुर्विधो विनयः ॥ ४६॥ दशविधानि वैयावृत्यानि ॥ ४७ ॥ पंचविधः स्वाध्यायः ॥ ४८ ॥ द्विविधो व्युत्सर्गः ॥ ४९ ॥ ध्यानं चतुर्विधम् ॥ ५० ॥ आत- १ मौन सप्तस्थानमिति पाठान्तर क्वचित् । २ अन्तराया’त्यपि क्वचित्पाठ । ३-४ सूत्रद्वय कर्णाटवृत्तावेव । ५-६ इमो शव्दी कीटटीकाया न स्त । ७ गुप्तित्रयमितिसूत्र टीकाया । ८-९ सूत्रद्वय टीकायामेव ।

सिदान्तसारादिसप्र- रांद्रघमाल घ ॥५१॥ धर्मा दसविघं या ॥५२॥ अष्टईय' ॥५३॥ पुदिरष्टादसविघा ॥ ५४ ॥ क्रिया दिविधा ।।५५ ॥ विक्रियकादशविधा ।। ५६ ।। सप' सप्तविधम् ॥ ५७ ॥ पतं त्रिविध ।। ५८॥ मेपजमष्टविघं ॥५९॥ रस पपिघः ॥६॥ अर्याणदिदि विषधेति ॥ ६१ || पतुसिंगदुघरगुणा ॥ ६२ ॥ पपविघा निग्रन्या ॥६३ ॥ आमारथ ॥६॥ सामाचार दाविधं ॥६५॥ सप्त परमस्यानानि ॥ ६६ ॥ पनि पाबनारसमुपये तृतीयोपायः ॥१॥ पद्न्याणि ॥ १ ॥ पचास्तिकाया ॥२॥ मप्त सत्वानि ॥३॥ नए पदार्या ॥ ४॥ चतुर्षियो न्याम ॥५॥ दिविर्ष प्रमाण ॥ ६ ॥ पंम संमानानि ॥७॥ ग्रीम्पसानोनि ॥८॥ मतिमान पटपिंगदारपिशवमेदम् ॥९॥ विविध भुवनानम् ॥ १०॥ दादभागानि ॥ ११ ॥ मतदाप्रकीर्णकानि ॥ १२ ॥ विविधमवधिमानम् ॥ १३॥ विविध मन पर्यपमानम् ॥ १४॥ स्थलमरममहापम् ॥ १५॥ नव नपा ॥ १६ ।। गत महा इनि ॥१७॥पा मावा १८॥ ऑपरमिको द्विविप ॥१९॥ धापिका नपविध ॥२०॥ प्रादमपिप धापोपभमिक ॥२१॥ आदपिरमार्षिीविषम् ॥ २०॥ पारिणामिर पिरिपम् ॥ २३॥ गुपचापमार्गणाम्यानानि प्रपां गदा ॥ २४ ॥ पट पंपामय ॥२५॥म प्राणा ॥२॥ पनस संमा TET Ansaris time Trirom गाtretin . प far शास्त्रसार-समुच्चयः। ११३ ॥२७॥ द्विविधमेकेन्द्रियम् ॥२८॥ त्रीणि विकलेन्द्रियाणि ॥२९॥ पंचेन्द्रियं द्विविधम् ॥ ३० ॥ गतिश्चतुर्विधा ॥३१॥ पंचेन्द्रियाणि ॥ ३२ ॥ पड्डीवनिकायाः ॥३३॥ त्रिविधो योगः ॥३४॥ पंचदशविधो वा ॥ ३५ ॥ नवविधो वा ॥३६॥ चत्वारः कपाया. ॥३७॥ अष्टौ ज्ञानानि ॥३८॥ सप्त संयमाः ॥ ३९ ॥ चत्वारि दर्शनानि ॥४०॥ पड्डेश्या ॥४१॥ द्विविधं भव्यत्त्वं ॥४२॥ पड्डिया सम्यक्त्वमार्गणा ॥४३॥ द्विविधं संज्ञित्वम् ॥ ४४ ॥ आहार्युपयोगश्चेति ॥ ४५ ॥ पुद्गलाकाश- कालास्रवाश्च प्रत्येकं द्विविधम् ॥ ४६ ॥ बन्धहेतव पंचविधाः ॥४७॥ बन्धश्चतुर्विधः ॥ ४८ ॥ अष्टौ कर्माणि ॥४९॥ ज्ञानावरणीयं पंचविधम् ॥ ५० ॥ * दर्शनावरणीयं नवविधम् ॥५१ ॥ वेदनीयं द्विविधम् ।। ५२॥ मोहनीयमष्टाविंशतिवि- धम् ॥ ५३ ॥ आयुश्चतुर्विधम् ॥ ५४॥ द्विचत्वारिंशद्विधं नाम ॥५५॥ द्विविधं गोत्रम् ॥५६॥ पंचविधमंतरायम् ॥५७॥ पुण्यं द्विविध॥५८॥* पापं च ॥५९।। संवरश्च ॥६०॥ एकादश निर्जराः ॥६१॥ त्रिविधो मोक्षहेतुः॥६२।। द्विविधो मोक्षः॥६३॥ द्वादश सिद्धस्थानद्वाराणि ॥६४॥ अष्टौ सिद्धगुणाः ॥६५॥ इति शास्त्रसारसमुचये चतुर्थोऽध्याय ॥४॥ श्रीमाघनन्दियोगीन्द्रः सिद्धाम्बोधिचन्द्रमाः । अचीकरद्विचित्रार्थ शास्त्रसारसमुच्चयम् ॥१॥ इति शास्त्रसारसमुच्चय । *एतचिन्हमध्यगत पाठ टीकायामधिकरतेन मूले एव भवितव्यम् । १ सिद्ध स्यानुयोगद्वाराणीति टीकापाठ । २इय प्रशस्तिका दौर्य लिजिनद मशास्त्रिणः पुस्तके।

भीप्रमाचन्द्रविरचित
अईत्मवचनम् ।
परंपराचरं पेन पेपरवानयनुपा।
मप्रणम्य महापीर बेवफात प्रचस्यता ||
बबायोप्रवचन सूत्रं म्पास्मात्मामा । तपा-
तत्रेमे पट्टीवनिकायाः ॥१॥ पंच महाग्रतानि ॥२॥ पपाषु
प्रतानि ॥३॥ श्रीणि गुणवतानि ॥४॥ चत्वारि शिक्षामतानि
॥५॥ तिस्रो गुप्तयः ॥६॥ पच समितयः ॥७दश धर्मानुमा
पना ॥८॥पोउशमावनाः॥९॥ द्वादशनुप्रेक्षा ॥१०॥ हर्षि
शतिपरीपहाः ॥११॥
स्वस्पिचने प्रपमोऽपायः ॥ १॥
तत्र नव पदार्या ॥१॥ सप्त तत्वानि ॥२॥ चतुर्विधो
न्यासः ॥३॥ सप्त नयाः ॥ ४॥ चत्वारि प्रमाणानि ॥५॥
पर द्रम्पाणि ॥६॥ पंचास्तिमाया ॥७॥ द्विविधो गुणः ॥८॥
पंच मानानि ॥९॥ श्रीण्यज्ञानानि ॥१०॥ चत्वारि दर्श
नानि ॥११॥ द्वादशाङ्गानि ॥१२॥ चतुर्दश पूर्वाणि ॥ १३ ॥
विविधं सप ॥१४॥ द्वादश प्रायमित्तानि ॥१५॥ चतुर्पियो
विनय ॥१५॥ दश घेया त्यानि ॥१७॥५चविष स्वाध्यायः
॥ १८॥ चत्वारि ध्यानानि ॥१०॥ द्विविधो पुत्सर्ग ॥२०॥
इस्मात्प्रवचने दिवीरोगप्पाला ॥१॥

अर्हत्प्रवचनम् । ११५ त्रिविधः कालः ॥१॥ षड्विधः कालसमयः ॥२॥ त्रिविधो लोकः ॥३॥ अर्धतृतीया द्वीपसमुद्राः ॥ ४ ॥ पंचदश क्षेत्राणि ॥५॥ चतुस्त्रिंशद्वर्षधरपर्वताः ॥६॥ पंचदश कर्मभूमयः ॥७॥ त्रिंशद्भोगभूमयः ॥८॥ सप्ताऽधोभूमयः ॥९॥ सप्तेव महानरकाः ॥१०॥ चतुर्दश कुलकराः ॥११॥ चतुर्विंशतितीर्थकराः॥१२॥ नव बलदेवाः ॥१३॥ नव वासुदेवाः ॥१४॥ नव प्रतिवासुदेवाः ॥१५॥ एकादश रुद्राः ॥१६॥ द्वादश चक्रवर्तिनः ॥ १७॥ नव निधयः ॥१८॥ चतुर्दश रत्नानि ॥१९॥ द्विविधाः पुद्गलाः॥२०॥ इत्यहत्प्रवचने तृतीयोऽध्याय ॥ ३ ॥ देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥ भवनवासिनो दशविधाः॥२॥ व्यन्तरा अष्टविधाः ॥३॥ ज्योतिष्काः पंचविधा ॥४॥ द्विविधा वैमा- निका. ॥५॥ द्विविधा कल्पस्थिति ॥६॥ अहमिन्द्राश्चेति ॥७॥पंच जीवगतय ॥८॥ षट् पुद्गलगतय ॥९॥ अष्टविध आत्मसद्भावः ॥१०॥ पंचविधं शरीरम् ॥१५॥ अष्टगुणा ऋद्धिः ॥१२॥ पंचे- न्द्रियाणि ॥ १३ ।। षड्तेश्या. ॥ १४ ॥ द्विविधं शीलम् ॥ १५ ॥ इत्यहत्प्रवचने चतुर्थोऽध्याय ॥ ४ ॥ त्रिविधो योग ॥१॥ चत्वारः कपाया ॥२॥ त्रयो दोषाः ॥३॥ पंचास्रवा ॥४॥ त्रिविध संवर ॥५॥ द्विविधा निर्जरा ॥६॥ पंच लब्धयः ॥७॥ चतुर्विधो बन्ध ॥८॥ पंचविधा बन्धहेतवः

सिमान्तसारादिसंग्रहे-
॥९॥ अष्टौ कर्माणि ॥१०॥ द्विविधो मोष ॥११॥ चत्वारो
मोक्षदेवव ॥१२॥ विविधो मोक्षमार्ग ॥१३॥ पंचविधा नि
प्रन्या ॥१४॥ द्वादश सिइस्मानुयोगद्वारामि ॥ १५ ॥ अष्टौ
सिदगुणा ॥१६॥ दिविषा सिदा ॥१७॥ पैराग्यं घेति
१८॥
एपनिबबने पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥

आप्तस्वरूपम् । आप्तागमः प्रमाणं स्याद्यथावद्वस्तुसूचकः । यस्तु दोषैर्विनिर्मुक्तः सोऽयमाप्तो निरञ्जनः ॥१॥ दोपावरणमुक्तात्मा कृत्वं वेत्ति यथास्थितम् । सोऽहंस्तत्वागमं वक्तुं यो मुक्तोऽनृतकारणैः ।।२।। आगमो ह्याप्तवचनमाप्तं दोषक्षयं विदुः । त्यक्तदोषोऽनृतं वाक्यं न ब्रूयादित्यसम्भवात् ॥३॥ रागाद्वा द्वेपमोहाद्वा वाक्यमुच्यते ह्यनृतम् । यस्य तु नैव च दोषास्तस्यानृतकारणं नास्ति ? ॥४॥ पूर्वापरविरुद्धादेयंपेतो दोपसंहतेः । द्योतकः सर्वभावानामाप्तव्याहृतिरागमः ॥५॥ ध्यानानलप्रतापेन दग्धे मोहेन्धने सति । शेषदोपास्ततो ध्वस्ता योगी निष्कल्मषायते ॥६॥ मोहकर्मरिपौ नष्टे सर्वे दोषाश्च विद्रुताः । छिन्नमूलतरोर्यद्वद् व्वस्तं सैन्यमराजवत् ॥७॥ नष्टं छद्मस्थविज्ञानं नष्टं केशादिवर्धनम् । नष्टं देहमलं कृत्यं नष्टे घातिचतुष्टये ॥८॥ नष्टं मर्यादविज्ञानं नष्टं मानसगोचरम् । नष्टं कर्ममलं दुष्टं नष्टो वर्णात्मको ध्वनिः ॥९॥ १ द्वेषाद्वा मोहाद्वा पुस्तके-पाठः ।

११८
सिदा तसारादिसमहे-
नष्टा सुमृड्मयस्वेदा नष्टं प्रत्येकयोधनम् ।
नएं भूमिगसस्पाई नष्टै पेन्द्रिय सुषम् ॥१०॥
नष्टा सदहचा छाया नष्टा पेन्द्रियबा प्रमा।
नया मूर्मग्रमा तत्र स्तनन्तचतुष्टये ॥११॥
सदा सरिकसंकाश मोर्तिममं पपु ।
जामते श्रीमदोपस्स सप्तधातुविवर्जितम् ॥१२॥
मफलग्राहक शान युगपदर्शनं तदा ।
मध्यावापसुख वीर्य एतदाप्तस्य लक्षण ॥१२॥
प्रैलोक्यक्षोमका मेस जन्ममृत्युजरादय ।
ध्यस्ता ध्यानामिना येन स आप्त परिपपते ॥१४॥
सुधा सुपा मय पो रागो मोहम पिन्सनम् ।
बरा जा च मृत्युप स्वेद खेदो मदो रति ॥१५॥
विस्मयो जननं निद्रा विपादोश्टादश भुषा ।
मिजगत्सर्वभूतानां दोपा' माघारणा इमे ॥१६॥
पुम्मम् ।
एर्दोपविनिर्मक्त सोअमाप्तो निरम्जन ।
विपन्ते येषु ते निरर्म सेज्य संसारिण स्मृता ॥१७॥
संसारो मोहनीयस्तु प्रोग्यतेन मनीपिमि ।
संसारिभ्यः परो भास्मा परमाग्मेति मापित ॥१८॥
सर्वनः मतो भद्र सम्बदनो विस ।
सर्पमाप सदा पन्यः सर्वसांस्पात्मको जिन ॥१०॥
अहन् ठोक्यसामाग्य अहन् पूर्जा मुरैसिनाम् ।
इत्यान् कर्मसम्म महमामा तत म्भूत ॥२०॥

आप्तस्वरूपम् । ११९ रागद्वेपाढयो येन जिताः कर्ममहाभटाः । कालचक्रविनिर्मुक्तः स जिनः परिकीर्तितः ॥२१॥ स स्वयम्भूः स्वयं भूतं सज्ज्ञानं यस्य केवलं । विश्वस्य ग्राहकं नित्यं युगपद्दशन तदा ॥ २२ ॥ येनाप्तं परमैश्वयं परानन्दसुखास्पदम् । वोधरूपं कृतार्थोऽसावीश्वरः पटुमिः स्मृतः ॥२३॥ शिवं परमकल्याणं निर्वाणं शान्तमक्षयं । प्राप्तं मुक्तिपद येन स शिवः परिकीर्तितः ॥२४॥ जन्ममृत्युजराख्यानि पुराणि ध्यानवन्हिना । दग्धानि येन देवेन तं नौमि त्रिपुरान्तकम् ।। २५॥ महामोहादयो दोपा ध्वस्ता येन यदृच्छया । महाभवार्णवोत्तीर्णे महादेवः स कीर्तितः ॥ २६ ॥ महत्वादीश्वरत्वाच यो महेश्वरतां गतः । त्रैधातुकविनिर्मुक्तस्तं वन्दे परमेश्वरम् ॥ २७ ॥ तृतीयज्ञाननेत्रेण त्रैलोक्यं दर्पणायते । यस्यानवद्यचेष्टायां से त्रिलोचन उच्यते ॥ २८ ॥ येन दुःखार्णवे घोरे मनानां प्राणिनां दया- । सौख्यमूलः कृतो धर्मः शकरः परिकीर्तितः ॥ २९ ॥ रौद्राणि कर्मजालानि शुक्लध्यानोग्रवन्हिना । दग्धानि येन रुद्रेण तं तु रुद्रं नमाम्यहम् ॥ ३० ॥ विश्वं हि द्रव्यपर्यायं विश्वं त्रैलोक्यगोचरम् । व्याप्तं ज्ञानविपा येन स विष्णुापको जगत् ॥३१॥ १ 'संत्रिलोचनर चेत ' पाठोऽय पुस्तके ।

१२०
सिद्धान्तसदिसंग्रहे-
वासपाय सुरैः सबै पोर्मत मेरुमस्तके ।
प्राप्तवान् पंचकल्याणे वासुदेवस्ततो हि स ॥३२॥
अनन्तदर्शनं मान फर्मारिक्षयकारणम् ।
यस्सानन्तसुखं वीर्य सोऽनन्तोनन्तसद्गुण' ॥३३॥
सर्वोचमगुणैर्युक्त प्राप्त सर्वोचमं पदम् ।
सर्वमूतहितो यमाचेनासो पुरुपोचम' ॥३४॥
मामिना हितवेदोकं ? नैष्ठिक सत्त्वर्जितः ।
सर्वमापमसुर्पयो प्रमासो कामवर्जितः ॥३५॥
पस्प वाक्यामृत पीस्था मन्या मुक्तिमुपागताः ।
दर मेनाम दान सत्वाना स पितामहः ॥३६॥
यस्य पण्णवमासानि रस्लाटि प्रवार्पिता ।
शक्रेण मक्तियुक्तेन रस्नगमस्ततो हि स ॥३७॥
मविभुतारविज्ञानं सहजं यस पोधनम् ।
मोषमार्गे स्वयं पुस्तेनासा पुदसहितः ॥३८॥
केवलशानबोधेन दुमान् स भगत्रयम् ।
अनन्तमानसंकीर्ण संतु पुर्व नमाम्यहम् ॥३९॥
सवाईमापया सम्पर सर्पलेशप्रपातिनाम् ।
सस्वाना गोषको यस्तु बोपिसत्वस्वतो हित ॥४०॥
सर्वइ विनित सानमारमस्वमाषजम् ।
प्राप्तं परमनियाणं पेनासो सुगत स्मृतः ॥४१॥
सुप्रमा सदा यस्स फेललझानरश्मिना ।
लोकासोकप्रकाशेन सोऽस्तु मम्पदिवाकरः ॥४२॥

आप्तस्वरूपम् ।
१२१
जन्ममृत्युजरारोगाः प्रदग्धा ध्यानवन्हिना ।
यस्यात्मज्योतिपांराशेः सोऽस्तु वैश्वानरः स्फुटम् ।।४।।
एवमन्वर्थनामानि सर्वज्ञ सर्वलोचनम् ।
ईडितेनैव ? नामानि वेधोऽन्यत्र विचक्षणः ॥४४॥
अर्हन् प्रजापतिर्बुद्धः परमेष्ठी जिनो जितः ।
लक्ष्मीभा चतुर्वक्त्रो केवलज्ञानलोचनः ॥४५॥
अम्भोजनिलयो ब्रह्मा विष्णुरीशो वृपध्वजः ।
आतपत्रत्रयोद्भासी शंकरो नरकान्तकः ॥ ४६ ।।
निर्मलो निष्कलचव विधाता धर्म एव च ।
परमपापनाशश्च परमज्योतिरव्ययम् ॥ ४७॥
योगीश्वरो महायोगी लोकनाथो भवान्तकः ।
विश्वचक्षुर्विभुः शम्भुर्जगच्छिखरिशेखरः ॥४८॥
लोकाग्रशिखरावासी सर्वलोकशरण्यकः ।
सर्वदेवाधिको देवो ह्यप्टमूर्तिर्दयाध्वजः ॥ ४९ ॥
सद्यो जातो महादेवो देवदेवः सनातनः ।
हिरण्यगभः मर्वात्मा पूतः पुण्यः पुनर्भवः ॥ ५० ॥
रत्नसिंहासनाध्यासी नैकचामरवीजितः ।
महामतिर्महातेजोऽकर्मा जन्मदवान्तकः ॥ ५१ ॥
अच्युतः सुगतो ब्रह्मा लोकान्तो लोकभूषणः ।
देवदुन्दुभिनिर्घोपः सर्वज्ञः सर्वलोचनः ॥५२॥
अच्छेद्योऽनवभेद्यश्च सूक्ष्मो नित्यो निरञ्जनः
अजरो घमरश्चैव शुद्धसिद्धो निरामयः ॥ ५३॥

१२२ सिझन्ससारादिसंग्रहे- - अक्षयो मध्ययः शान्त शान्सिकल्याणकारक। म्वयंमूर्षियध्या च असल पुरुपोचम ॥५४॥ नामाष्टकसहस्रेण युक्त मोषपुरेवरं । ध्यायेत परमात्मानं मोक्षसौख्यप्रदायकम् ॥ ५५ ॥ शुवस्फटिकसंकाश स्फुरन्त ज्ञानतजसा । गणेदशमियुक्तं भ्यायदहन्तमक्षयम् ॥ ५६ ॥ सिंहासनसितच्छत्रचामरादिविभूतिमि । युक्त मोधपुरं देवं ध्यायेभित्पमनाकुलम् ।। ५७ ॥ कल्पाणातिसमैराडपो नवकेवललम्धिमान् । समस्पिठो निनो देषः प्राविहामेपति स्मृत ॥५८t मर्षक सर्वररु सार्यो निर्मलो निफलोऽध्यमः। वीतराग पराध्येयो योगिनां योगगोचर ॥ ५९॥ सर्पलक्षणसम्पूर्ण निर्मले मणिदर्पणे । संझान्तविम्बसारभ्य शान्तं संचेतयेऽसुसम् ॥ १० ॥ येन जितं मवकारणसर्व मोहमसे फलिफाममलं च। येन त मवमोषसुतीर्थ सोऽस्तु सुखाकरतीर्यमुकः ॥ ६१ ॥ सीणचिरन्तनकर्मसमूहो निष्ठितयोगसमस्तकलाप । कोमलदिष्पशरीरममाम सिदिगुणाकरसौम्पनिधिय ।। ६२ ॥

आप्तस्वरूपम् । . १२३ निष्कलबोधविशुद्धसुदृष्टिः पश्यति लोकविभावस्वभावम् । सूक्ष्मनिरजनजीवपुनोऽसौ तं प्रणमामि सदा परमाप्तम् ॥ ६३ ॥ क्षपितदुरितपक्षक्षीणनिःशेषदोषो भवमरणविमुक्तः केवलज्ञानभानुः । परहृदयमतार्थग्राहकज्ञानकर्ता ह्यमलवचनवक्ता भव्यबन्धुर्जिनाप्तः ॥ ६४ ॥ : इतिश्री-आप्तस्वरूप समाप्तम ।

-
श्रीपोमरानसुतभीवादिराजप्रणीत
ज्ञानलोचनस्तोत्रम् ।
मानस्य विभाम्पति तारतम्प
परप्रकपादतिशायनाब।
यस्मिन दोपावरणे तुलाव
रऐएशिष्टोकनयप्रकाशे ॥१॥
ध्यात्वा च यं ध्यायसि नौसि नुत्त्वा
नला नमत्यत्र परं न तोफ ।
भुस्वाऽऽयमान् यस्म मृणोति नान्याम्
भीपार्श्वनायं तमई स्तषीमि ॥ २ ॥
युग्मम् ।
तृणाय मत्वाखिललोकराज्यं
निर्वेदमाप्तोपस विशुद्धमा ।
ध्यानकवानेन च घेतसाम्
कैपस्पमासाप जिनेश । मुक्तः ॥३॥
पर यमेट नपुतेऽत्र पर्याs
मिपूस राजन्यकमानु विश्वम् ।
गुरं च पुर्द कपिलं हरादी
स्तया शिवभी सततं मर्पतम् ॥ ४ ॥
पर प्रणीतानि शासनानि
दुरंससंसारनियमनानि ।
स्वया तु सान्पेय कवानि संति
तीक्ष्णानि मर्मामि यथा प्रयोगात् ॥५॥

ज्ञानलोचनस्तोत्रम् । १२५ दाता न पाता न च धामधाता का न ही जगतो न भर्ती । दृश्यो न वश्यो न गुणागुणज्ञो ध्येयः कथं केन स लक्ष्मणा त्वम्॥ ६ ॥ दत्से कथं चेगिनस्त्वमिष्टं चिंतामणि भविनां सुभावात् । मतं यदीत्थं तव सेवया कि स्वभाववादो ह्यवितर्का एव ॥ ७ ॥ संसारकूपं पतितान् सुजंतून यो धर्मरज्जडुरणेन मुक्तिम् । नयत्यनंतावगमादिरूप- स्तस्मै स्वभावाय नमो नमस्तात् ॥ ८॥ रणत्यमोघं सकलो जनस्त्वां विव्वोकवृंदैरजितं सदा हि । पद्मालयापूजितपादयुग्म चित्तानवस्थाहरणं पराय॑म् ॥ ९॥ णमो सम्वोसहिपत्ताण । भणत्यमोघं सकलक्रियौघ- मबोधतो देहिगणो न सिद्धथै । तथा जिनोक्तेरमला गुणास्ते प्रीति भव्यानिह पंचभाद्रैः ॥१०॥ णमो सन्वोसहिजिणाण । 3 १२६ सिद्धान्तसारादिसमहे- स्थितोऽममात्मा पपुपि स्थितोऽच्छा स्पात्कवर कर्मफलकपके । हेमाश्मयस्त्वद्गदितस्तपोमि निक्ति तं स्वं जिन ! मक्किदोऽतः ॥ ११ ॥ अमित्रमित्रावषिषमान देपानुरागा परमात्मा । हिंसापकारान्यकलवसका ध्यामोहमाष न कर्य लमते ॥ १२ ॥ तव स्तुतेरीश ! रस रमझा जानाति या सरवणापति सा। तदुत्तमांग पदयोर्न वे पद ध्यामेष पीस्स्वां मनु मनस्तत् ॥ १५ ॥ छमोऽजिनेनाप्रसवोऽस्थिमजो मेर्गवो दिमिहाशतायैः। वात्मा हिमच्छिसरऽस्य अल्पे स्वगोत्रमंत्र न तदाऽस मद्रम् ॥ १४ ॥ प्रापी विव_तुरत सुखीह किमन्यचिंतामिरितीय राष्ट्रा । इम्यं च नि'स्वं मरज सोनं मन समाधयमवस्त्यदुल्या ॥ १५॥ हित्यांगनापतिमप शाखी फ सदेश ममतोऽस्त्पशोक ।

ज्ञानलोचनस्तोत्रम् । १२७ निरीक्ष्य निर्विण्णमिनं विरागोऽ- भवत्स्वयं भृत्यगतिर्हि सैपा ॥ १६ ॥ खांदापती सुमनस्ततिः प्रा- गस्यै जिनं यष्टुमसूययेव । त्वया जितेनावपुपेव हीना निजेपु पंक्तिर्भवतः सभायाम् ॥१७॥ ध्वनिर्धनत्यक्रमवर्णरूपो नानास्वभावो भुवि वृष्टिवत्ते । त्वत्तो न देवैरयमक्षरात्मा जयत्ययं मेचकवज्जगत्याम् ॥ १८ ।। प्रकीर्णकौघा मुनिराजहंसा जिनं नमंतीव मुहुर्मुहुस्त्वाम् । वलक्षलेश्यातनया इवामी बोधाब्धिफेनाः शिवभीरुहासाः ॥ १९ ॥ पीठत्रयं ते व्यवहारनाम छत्रत्रयं निश्चयनामधेयम् । रत्नत्रयं दर्शयतीव मार्ग मुक्तस्त्वदधीक्षणतः क्षणेन ॥ २० ॥ भामंडले मारकतोपलामे निमग्नकायाश्च चतुर्णिकायाः । स्वांतीव तीर्थे परमागमाख्ये देदीप्यमाने स्वदयारसेन ॥ २१ ॥ १ दिवः पतती इत्यपि पाठ २ पुरस्तात् इत्यापे पाठ ३ स्वदयागुणेनेत्यपि पाठ ।-सम्पादक' ।

१२८
सिदाम्तसारादिसमहे-
पासीनि कर्माणि जितान्यनेन
काल समागप्छति नो समीपम् ।
इथं मार्मापयतीव लोकान्
दम्पन्पते दुंदुमिरंतरिक्षे ॥ २२ ॥
क्षुदादयोऽनंतमुखोदयाचे-
किंचित्करा पातिविपावनाच ।
सत्तोदयाभ्यामविघातिना कि
सोलुपतेऽगं विषिपाहियचे ॥ २३ ॥
नानासि पश्यन् जिन ! नारफादीन
इवान ताप हनिप्पमाणान् ।
चारित्रमंगात् खगतप्रसंगात्
कल्पानि चात्रातिशयो हि फमित् ॥ २४ ॥
ठोकांतिकानो त्रिदिवातिगाना
पुंस्त्वोदये सत्यपि नांगनाति ।
सुया घमासोदयतो न पीग
सामग्यमावान फलोदयस्ते ॥ २५ ॥
योऽत्तीह त सप सदोपो
मासमवे हि विपीवतीय।।
इस्परमष्टादश संति दोपा
यस्मिमसो मूरिमषाम्पिमारः ॥ २६ ॥
असवादापनिपेधकारी
पकांवविश्वामविलासहारी ।
मीमांसफरत्व मुगवो गुरुप
दिरम्पगर्म पितो जिनोऽपि ॥ २७ ॥

ज्ञानलोचनस्तोत्रम् । १२९ हठेन दुष्टेन शठेन वैरा- दुपद्रुतस्त्वं कमठेन येन । नीलाचलो वा चलितो न योगात् स एव पद्मापतिनात्तगर्वः ॥२८॥ श्रुत्वाऽनुकंपांकनिधिं शरण्यं विज्ञापयाम्येष भवार्दितस्त्वाम् । अशक्यतायास्तव सद्गुणानां स्तुतिं विधातुं गणनातिगानाम् ॥ २९ ॥ कुदेववेशंतकदाप्तदास- कुतत्वजाले भ्रमतो निपत्य । मिथ्यामिषं ग्लस्तमिदं भवाब्धा- वुरो धृतं कौलिशगोलकं वा ॥ ३० ॥ अनाद्यविद्यामयमूञ्छितांग कामोदरक्रोधहुताशतप्तम् । स्याद्वादपीयूषमहौषधेन त्रायस्व मां मोहमहाहिदष्टम् ॥३१॥ हिंसाऽक्षमादिव्यसनप्रमाद- कषायमिथ्यात्वकुबुद्धिपात्रम् । व्रतच्युतं मां गुणदर्शनोनं पातुं क्षमः को भुवने विना त्वाम् ॥ ३२॥ पुरांचितं नो तव पादयुग्मं मया त्रिशुद्धयाऽखिलसौख्यदायि ।

२५० सिद्धान्तसारादिसेमहे- परालयातिथ्यपरैषिवत्य- पान हि गात्रं वरिषति मेऽप ॥३३॥ क्रोधाम्म्यहर्यलगृहीतकठो इयोस्मि मानाद्रिविचूर्णियांगा । मायाकुजायाचमुकेतपालो लोमाहपंकोषनिमग्नमतिः ॥ ३४ ॥ वारुप्पबास्पात्पदशाम किंधि कतं मया नो मरुतं कदापि । जानमपीयं तु सयैव पर्ने बम्पच्छयालु' करवाणि किं पा॥ १५ ॥ दानं न तीर्थ न तपो अपम नामारमपिता न च पूज्यपूजा । भुवं भुत न स्वपरोपकारि हारिवं नाम ! मनुर्निरमम् ॥ ३६ ॥ मोगागमा भ्रांतमल हरया धराधिपभ्यानपरेण घाभ्याम् । अपास्प समर्म मयकारकटै गृहीतमज्ञानवशादधीश। ॥३७॥ पंचास्पनागीपसिंधुदावा रम्पम्वराज्यादिमवं भयं द्राक् । त्वद्गोत्रमंत्रस्मरमप्रमावा मित्रोदयावावमिष प्रणश्येत् ॥३८॥ यवोऽरुपि संमतिदेहमोगा दनार मिश्रकसगर्गात् ।

ज्ञानलोचनस्तोत्रम् । १३१ आकृष्य चित्तं स्मरणात्त्वदीया- नयंति कर्माणि पदं तदेव ॥३९ ।। नाटचं कृतं भूरिभवरनंत कालं मया नाथ ! विचित्रवेपैः । हृष्टोऽसि दृष्ट्वा यदि देहि देयं तदन्यथा चेदिह तद्धि वार्यम् ॥ ४० ॥ श्रद्धालुता मे यदनंगरंगे कृपालुताऽभून्मम पापवर्गे। निद्रालुता शान्तरसप्रसंगे तंद्रालुताध्यात्मविचारमार्गे ॥४१॥ भ्रांत्वा चिरं दैववशेन विन्ना त्वदुक्तिपूः साधुपदार्थगर्भा। परैरगम्या नयरत्नशाला तस्यां कुतो दुःखमहो स्थितानाम् ॥४२॥ हिताहितेऽर्थेऽथ हेतिहिता च ? चिदात्मनो धर्मविचारहीना। अजात्तपीणीय १ मिवोद्वहंती मतिर्मदीया जिननाथ ! नष्टा ॥४३॥ यद्यस्त्यनंतं त्वयि दर्शनं मे तदेव दत्तादणुमात्रमा। ज्ञानं सुखं वीर्यमतोऽधिकं चे- द्दद्यात्तदा को जिन ! दूरवर्ती ॥४४॥ . यमिवोति ममानि।

१२२ सिद्धान्तसारादिसंग्रह हिल्क मुपहिरिद्रिय न हि मवेभमस्सादिकं पृथक पदम नो पो न वमते सदर्यागमः । इति प्रतिदिनं विमो! चरणवीक्षणं कामये तत कुरु कपानिधे ! सपदि लोधनानंदनम् ॥१५॥ स्तोत्रं कृतं परमदेवगुरुप्रसादा- छीपोमरानवनयेन सुवादिराजा । सम्मानलोयनमिद पठवां मुदे स्वाद ग्दोपहारि जगत परमोपकारि ॥४६|| पति भीपोमरामतनपयादिपजयिधित मानसोधनस्तोत्रम् ममामिमगमत।

विष्णुसेनविरचितं समवशरणस्तोत्रम्। भार्या । वृषभाद्यानभिवंद्यान् वंदित्वा वीरपश्चिमजिनेंद्रान् । भक्त्या नतोत्तमांगः स्तोष्ये तत्समवशरणानि ॥१॥ भूम्या पंचसहस्रान् दंडानुत्क्रम्य समवशरणानाम् । जायंते गगनगताः सद्त्तकेन्द्रनीलशिलाः ॥२॥ द्वादशयोजनतस्ताः क्रमेण चाभ योजनन्यूनाः । तावद्यावन्नेमिश्चतुर्थभागोनिताः परतः ॥३॥ अवसर्पिण्यामेवं क्रमोऽन्यथोत्सर्पिणीक्रमो ज्ञेयः। आद्या विदेहजानां मतांतराद्विश्वतीर्थेशाम् ॥४॥ दिक्षु चतसृष्वपि भुजप्रमाणविंशतिसहस्रसोपानाः । एकादशभूमीकाः शीलचतुष्काश्च पंचवेदीकाः ॥५॥ प्रासादचैत्यखातीवल्ल्युपवनकेतवश्व कल्पतरुः । भवनं गणस्त्रिपीठान्याद्यादीन्यवनिनामानि ॥६॥ एकैकं जिनभवनं प्रासादान् पंच पंच चोल्लंघ्य । व्यस्राद्याः स्युर्वाप्यो वनखंडान्याद्यभूमितले ॥७॥ स्वच्छजलेनापूर्ण नानाविधजलचरैश्च संकीर्णम् । सोपानशोभिततटं प्रोत्फुल्लाब्जावृताखातम् ॥ ८॥ पुंनागनागकुञ्जकवरशतपत्रातिमुक्तकाकलितो। सामरमिथुनलतालययुता तृतीयाऽवनी रम्या ॥९॥ उक्त च,- - १२१ सिदान्तसारादिसप्रहे- मावा। उषवणवाविरसोण सिता पिछवि पथमषज्ञादि । वस्स णिरिक्षणमेत्ते सत्चममातीपभाषिशादामो Lat पनमूरझोकसप्तवचपकघूतसदनर्माति । फ्रीराद्रिस्पसम्युकप्रदक्षिणस्पैचतुर्दिसु ॥१०॥ सिंहगजापमबर्हिममालांवररसपपचक्राकार। गयेमाप दसवेत्येकैकेप्पटवसरमा ॥११॥ एतैयतार्दधास्पैमतर्गस्यकेतुमिर्माति । सारनवेनामिहर्मपा द्रध्वजपान्यै ॥१२॥ भार्दिक्षु मुख्यमजसंख्या १३२० । परिवारप्पमसम्मा १५ ६५६० । सर्वमगर्सया १७०८८० । सर्वेपी स्तंभाना कंद्रत्वमशीतिरंगुलान्यष्टौ । इप्यासनपंचकतिस्वंतरमायो तु निरपरेप ॥१५॥ मुस्मयजस्तैमाना स्वस्वर्मगुणनि ८८ मुस्मणमस्तमौन धनु २५॥ हमांदालम्पसर्दशविकल्पैम सिद्समिमः। सरपरनिकरसनाथमकास्ति कल्पद्रुमा बसुधा ॥ १४ ॥ समाएर मृदंगमुंगरस्नांगा पानभोजनपुप्पदा । ज्योतिरालयपनांगा दीपनिर्दशधा दुमा ॥१५॥ सासत्रयमपस्थितपीठश्रमपर्तिपस्यसिद्धारू । जिनसिप्रविषिरप स्पिवनिपप्णर्मातः ॥१६॥ भावाम्म्।

समवशरणस्तोत्रम्।
१३५
नृत्यद्भिर्गायद्भिर्जिनाभिषकोद्यतैरशेषसुरैः।
बहुधेद्धप्रासादा भवंति भवनावनौ रम्याः ॥१७॥
स्फाटिकशालस्यांतर्लक्ष्मीवरमंडपे गणमायाम् ।
द्वादश कोष्ठाः स्फाटिकषोडशगुरुमित्तिमि र्भान्ति ॥१८॥
ऋषिकल्पजवनितार्याज्योतिर्वनभवनयुवतिभावनजाः ।
ज्योतिष्ककल्पदेवा नरतियंचो वसंति तेष्वनुपूर्वम् ॥ १९ ॥
वैडूर्योत्तमकांचनविलसद्वरसकलरत्नवर्णानि ।
अष्टचतुश्चतुरिष्वासोन्नतिमंति त्रिपीठानि ।। २० ॥
प्रस्फुरितधर्मचक्रर्यक्षपतिभिरुद्धतैर्महाभक्त्या ।
चतुराशासु विराजति कृतार्चनं प्रथमपीठतलम् ॥ २१ ॥
अरिंगजवृपहरिकमलांबरध्वजखगपतिपुष्पमालाख्यैः ।
विलसत्केतुमिरष्टभिरनुपमपूज्यं द्वितीयपीठतलम् ॥ २२ ॥
षट्शतरुंद्रायामा साधिकनवशतधनुःसमुत्तुंगा।
प्रथमे शेपेषूना गंधकुटी स्यात्तृतीयपीठतले ॥२३॥
रुद्रत्व ६०० । उदयं ९०० ।
तन्मध्यस्थितसिंहासनमध्ये शोणमंबुजं रमणीयम् ।
दशशतदलसंयुक्त तन्मध्ये कनककर्णिकायामुपरि ॥२४॥
चतुरंगुलगगनतले निविष्टवान् विमलकेवलज्ञानी ।
लोकालोकविलोकी धर्माधर्मो जिनो वक्ति ॥२५॥
प्रहतघनघातिदोषश्चतुरधिकत्रिंशदतिशयैश्वर्ययुतः ।
सोऽनंतचतुष्टयभाकोट्यादित्यप्रकाशसंकाशवपुः ॥२६॥
क्षुत्तृड्भात्क्रुभ्रागप्रमोहचिंता जरा रुजा मृत्युः ।
स्वेदः खेदमदोरतिविस्मयनिद्राजनूद्वेगः ॥२७॥

सिमान्तसारादिसमहे-
छत्रयसिंहासनमुरदुंदुमिपुप्पाष्टिमापाशीका ।
मावलयचामरापीत्यष्टमहापाविहार्यविमवसमेतः ॥२८॥
उर्फ च,-
पुष्पके मन्स मवरो मम्मिमाय रचीए ।
छपपरियाणिमायरिषमुण्णी कहा मुत्तस्ये ॥१॥
सावित्रारिताम्।
गंमीरं मधुरं मनोहरतरं दौपैरपेतं हितं
कंठौष्ठादिवचोनिमित्तरदिवं नो वासरोधोद्गतम् ।
स्परं सत्सदमीटवस्तुकपर्क नि शेपमापात्मक
दूरासनसमं समं निरुपम जैन पधः पातु नः ॥२९॥
मत्सर्वात्महित न वर्गसहितं न स्पंदितोदय
नो पांछाकलिस न दोपमलिनं न शसक्रमम् ।
शम्सामर्प विपै समं पश्चगणैराकर्णितं कर्णिमि-
स्तमा सर्पविद प्रमशमिपदः पायादपूर्व पचः॥३०॥
खस्वचतुर्विष्ठाशो श्योमतप विताडिताई च।
अई त्रिवियष्टममागाः पंचसु सबा परे च ॥३१॥
सालो वेदी वेदी मालो वेदी प सालो।
पेदीस्पतर्मति सर्वे पहिर्मागात् ॥३२॥
इंद्रप मे दे मुरतौमे प हैमकार्जुनके ।
देमी पार्कमयी मालो बेदी यथायोग्यम् ॥३३॥
पनुप शतानि पंचायो पंपाशव पंचोनाः ।
अएम पंचखष्टमु करम्प नव सप्स पार्श्वसन्मस्योः ॥३४॥

समशरणस्तोत्रम् ।
१३७
.
तीर्थकरोत्सेधो यथा ५००, ४५०, ४००,३५०, ३००, २५०,
२००, १५०, १००, ९०, ८०, ७०, ६०, ५०, ४५, ४०,
३५, ३०, २५, २०, १५, १०, रत्नय ९, ७ ।
चतुराहतजिनदैर्ध्य वेदीसालेषु मानमान्मातं ।
किंचित्साभ्यधिकं तत्तोरणतुंगत्वमुद्गतम् ॥३५॥
चर्याहालकभवन. केतुभिराभांति वेदिकाः सालाः।
मूला मूलात्क्रमपरिहान्या रहितेतरमूर्तयः क्रमशः ॥३६
हन्नो ? रजतस्य महाहरिन्मणिगणस्य गोपुरद्वारम् ।
एकं पट् च स्युट्टै नानामाणिक्यरचितानि ।। ३७ ॥
ध्वजमानस्तंभाचलचैत्यग्रासादगोपुरस्तूपाः ।
द्वादशगुणजिनदैर्ध्या मंडपसिद्धार्थचैत्यसदशोकाः ॥३८
क्रोशव्यासाः प्रथमे न्यूनाश्चावीरतश्चतुर्वीथ्याः ।
बहिरंतः सालांतरदैोभयदिन ? स्फाटिका साला॥३९॥
द्वारेषु त्रिषु दंडान् ज्योतिष्कान् विभ्रति द्वयोर्यक्षाः।
नागास्तद्वितयस्था द्वयोश्च कल्पामराः प्रवराः॥४०॥
मध्ये गोपुरमंतर्वीथ्याः स्तंभो नभो द्विराभाति ।
नर्तनसालो शून्यं सालास्तूपा नभश्चरमम् ॥ ४१ ॥
मानस्तंभाश्वोपरि सालत्रयमध्यगत्रिपीठानाम् ।
कुंडाप्टकसंयुक्ताश्चतुर्हदाः संति चतुराशम् ॥ ४२ ॥
अस्रविमिश्रा मूलादुपरिष्टाद्वर्तुलाश्चतुर्दिकम् ।
मूर्जिस्थितजिनविंवा हृदाभिधानान्यतो वक्ष्ये ॥ ४३ ॥
नदोत्तरा च नंदा नंदवती नंदघोपनामा च ।
विजया च वैजयंती जयंतसंज्ञाऽपराजिताख्या च ॥४४॥

१२८
सिमान्तसारादिसप्रहे-
शोका सुप्रतिमुद्रा समदान्या पुंररीकनामा प।
दयानदा प महानंदाम्पा सुप्रपरनामा च ॥ ४५ ॥
पोटश पूर्णा वापी प्रमेकनामा तत परमरम्मा।
आसां संपदमसिला स्तोतुं शक्रो न शक्नोति ॥ ४६॥
पवलो गतिमिसाले नृत्यस्प राजवे दे।
पीथ्या पाश्वेद्वितये धूपघटौ झौ च चतुरात्रौ ॥ ४७ ॥
द्वात्रिंशस्प्रेषणिकान्फैकस्या मर्ववि प्रयुभूम्याम् ।
एफैकप्रेक्षणिके द्वात्रिंशदेवकन्या स्युः ॥ ४८ ॥
मास्पतिमाकीर्णा स्तूपा नव नव मति चाभ्याः ।
अंतरिताः शवसंख्य रस्नानां वोरमैरमले ॥ ४९।।
पापाम्पसरदेचे पदात्रिंशद्गोपुरात्मना संति ।
रोमयमागस्था मंगलनिघय समस्वास्तु ॥ ५० ॥
संपारकमृगारच्छपान्दव्यजनश्रुतिधामरकलया।
मंगलमटविष स्यादेकेकस्साष्टमतसंग्मा ॥५१॥
प्रत्पर्क साएशते ना कालमहाकालपाइमाणपशंसा ।
नैसर्पपपिंगसनानारत्नाम नम निषयः ॥५२॥
ऋतुरोग्मवस्तुमाजनपान्पायुपत्यहम्मेषनाणि ।
आमरणरस्ननिकगन् क्रमेण निषप प्रयच्छति ॥५३॥
सतमकरवोगमाया घलीसालस्य पापमागा' स्म ।
अंतर्मागा' सर्वे प्रत्येक रस्नवोरणवास्तु ||५||
प्राप्मा दिशि विषयारम्य द्वारमपाणां च षयतापमा
प्रयकृमि जयंत सादपराधितमपोदीप्याम् ॥५५॥
पपप्यतरम्पगुणितक्षेत्रफलाम्तय मम्पजीवा स्थः ।
मिनमक्ते स्पिवयंवस्तथापि नि पतः मर्वे ॥५६॥

समवशरणस्तोत्रम् । १३९ संख्यातयोजनेऽपि प्रवेशनिर्गमयुजोत्र भन्याः स्युः । अंतर्मुहूर्त्तमात्रा जिनमाहात्म्येन वृद्धाद्याः ॥५७।। मिथ्यादृष्टिरभव्योऽसंज्ञी जीवोऽत्र विद्यते नैव । पैश्वानध्यवसायो यः संदिग्धो विपर्यस्तः ॥५८॥ तत्र न मृत्युर्जन्म च विद्वपो न च मन्मथोन्मादः । रागांतकबुभुक्षाः पीडा च न विद्यते कापि ॥५९॥ अनुष्टुपत्तम् । अंधाः पश्यति रूपाणि शृण्वंति वधिराः श्रुतिम् । मृकाः स्पष्टं विभाषते चंक्रम्यते च पंगवः ॥६०॥ आर्यारत्तम् । यः स्तुत्त्वैवं ध्यायति समरसभावाजिनेश्वरं देवम् । तस्यैप भवति विभवः कतिपयदिवसैन संदेहः ॥६॥ चत्वारिंशद्भवने द्वात्रिंशद्व्यंतरविमानेषु । चतुरधिकविंशतिश्चंद्राकौं सिंहोऽथ चक्रवर्तीन्द्राः॥६२॥ कर्तु प्रशस्ति । शक्राज्ञया स्वभक्त्या धनदेवविनिर्मितं समवशरणम् । व्यावर्णितं त्रिविद्याधिगणिना विष्णुसेनेन ॥६३॥ इति श्रीविष्णुसेनविरचितं समवशरणस्तोत्रं समाप्तम्। १'यधानध्यसायो' इति पाठ घेयानवभाति ।

जयानगरिविरगिस सर्वज्ञस्तवनम् । गरी। दवा प्रमो! य विधिनात्मशुद्धप मस्त्या मुमरी शिसरऽभ्यपिनन् । सम्तूयस व स मया समोद- समीत्यव मानहा यया म ॥१॥ टीमा-या इति-जीपाणमाश्यार्थीमारणमन्ययस्तमामय वामारस्यो भठापटम्यम्याम्पानामसर फयति म मा कम्यते--पया प्रभो ! वारका विभिनाग्मगुस्प भक्त्या शक्तिसफाशात् मुमेरो शिख म्यपिंघमस्नपपन् जन्मोन्सवमा स त्वं ममा ममा सहप यथा स्पा- स्था संस्तूयस यथा मे मानसोन्मीत्यत इत्यापप । ममिपूर्वपित्री सरण “अस्तनी" अन् देश 'मुबादिसमगुफेसि नाऽन्त मम्पार्पियन् इस वर्णयुक्ति । ममपूर्वक शुतो "प सो" इति स्तुनिमित्तस्य पस्या भावानमित्तिकस्य टस्याप्यभाव "निमिप्पामा नमितिकस्पाप्यभाष" इति न्यापात् । “सत्साप्यानाप्येति कर्मणि वर्तमानात् ममत्पपः । “ीमपडिति गरि संस्त्यसे इस कमम्युक्ति । उक- मील निमेपणे भावे भारत्मनेपदं रोष पूर्वमत् इयं भागे उतिः । भत्र काम्पे सप्त सिमक्तमस्विन उरूप समोधन प्रियाविशेषण प कथितानि । मेधारेऽर्य टक्क्यस्ता अपि भविकासत् कम्यते । यपान पककर्मा हिकमा चाका करीरिकर्मणि । धर्मकीरि मायेच उपयोऽधिपार स्मृता॥

सर्वज्ञस्तवनम् । १४१ अस्य व्याख्या यथा श्राद्धा देवान् पूजयति इय एककर्मा १ मित्रोऽजा प्राम नयति इय द्विकर्मा २ देवदत्त शेते इयमकर्मा ३ एतत् प्रकारत्रय कर्तरि । अथ प्रकारत्रय कर्मणि, यथा श्राद्वैर्देवाः पूज्यते ४ मित्रेण अजा ग्राम नीयते ५ देवदत्तेन शय्यते ६ आरोहते हस्तिन हस्तिपका- स्तानारोहतो हस्ती प्रयुक्ते आरोह(हय)ते हस्तिन हस्तिपकान् ७ वर्पासु मेघो गर्जति मयूरो नृत्यति ८ इत्यष्टप्रकारा उक्तयो ज्ञेयाः ॥१॥ ध्यानानुकंपाधृतयः प्रधानो- ल्लासिस्थिराः ज्ञानसुखक्षमं च। सुनाथ ! संति त्वयि सिद्धिसौधा- धिरूढ ! कर्मोज्झित ! विश्वरुच्य ! ॥२॥ टीका-हे सुनाथ ! हे सिद्धिसौधाधिरूढ | हे कर्मोज्झित ! हे विश्व- रुच्य ! त्वयि प्रधानोल्लासिस्थिराः ध्यानानुकपाधृतयः सति वर्तते, च पुनः ज्ञानसुखक्षम अस्ति इत्यन्वय ! ध्यान च अनुकपा च धृतिश्च ध्यानानुकपाधृतयः, अत्र केवलविशेष्यरितरेतरद्वद्वः कथितः । प्रधान च उल्लासिनी च स्थिरा च प्रधानोल्लासिस्थिराः अय केवलविशेपणैः स एव प्रधानादीनि ध्यानादीना विशेपणानि । ज्ञान च सुख च क्षमा च ज्ञानसु- खक्षम अय समाहारद्वद्व , पूर्वार्द्धन द्वद्वः कथितः। शोभनश्चासौ नाथश्च सुनाथ. सबुद्धौ सुनाथ | अत्र प्रथमातत्पुरुषः कथितः । सौधमधिरूढः सौधाधिरूढ सिद्धिरेव सौधाधिरूढ सिद्धिसौधाधिरूढः, अत्र द्वितीया- तत्पुरुषः । कर्मभिरुज्झितः, अत्र तृतीयातत्पुरुषः। विश्वस्मै रुच्य , अत्रा 'चतुर्थीतत्पुरुषः कथितः । पचमीतत्पुरुषषष्ठीतत्पुरुषसमासौ वक्ष्यमाणश्लो- कपूर्वाद्धन ज्ञेयौ ॥ २॥ , -- ११२ सिद्धान्तसारादिसमहे- संसारमीतं जगदीश ! दीन मां रक्ष रक्षाक्षम ! रमणीयम् । पारप्रसादं कुरु सौम्पटटपा विलोकय स्वीयवथप देहि ॥ ३ ॥ टीका-संसारागीत: संसारमीत , अन पंचमीसमास , जगतामीशी अगदीश., अन पष्ठीतत्पुरुषसमासः । एवं तत्पुरुषसमास संपूर्ण । पौर भासौ प्रसादन प्रौदप्रसारस्त प्रौढप्रसाद, मत्र पुसि कर्मधारय , सौ. म्पा चासौ स्थिति सौम्पष्टिस्तयेति स्त्रियां कर्मधारय., स्वार्य च सश्चति स्वीयवच , इत्यत्र हीये कर्मधारयसमासः, एवं कर्मधारपसमास संपूर्ण । हे जगदीश ! हे रक्षाक्षम ! संसारमीठ दोन रक्षणीय मात्र रक्ष प्रौढप्रसाद स्वं कुरु सौम्यसभा मा निछोकम, घ पुनर्मम सीयरचो देहि इति ॥३॥ पस्पमाणलोकेन ममारिसमासे प्रतिपादपमार- नवेंद्र ! विद्रावितदोप ! दच दाना दखिा अपि वीवदौस्या । स्वया या भूरिघना बनस- झान! हिपान सक्षम ! मन मासान् ॥ टीका- नाद !विद्रापितोष ! हे मनलाम ! हे सक्षम ! स्या दरिद्रा लपि का इत्यप्पाहार्य दरवाना बीसौरप्पा भूरि धना द्विपान् दादश मासान् यावत् इत्यस्याहार्य मैक्षु शीघ्र यया स्पात्या बायोपमो बादमा तस्समोरयापम ! नि सामी तपसोड- पिया-पोषक सर्वज्ञस्तवनम् । १४३ कृता इत्यन्वयः। हे नतेंद्र । नता इद्रा य इति नतेंद्र इति द्वितीयाबहु- श्रीहिः १ विद्राविता दोपा येन स विद्रावितदोषस्तत्सबुद्धवित्यत्र तृतीया- बहुव्रीहिः २ दत्त दान येभ्यस्ते दत्तदाना इत्यत्र चतुर्थीबहुव्रीहिः ३ वीत दौःस्थ्य येभ्यस्ते वीतदौःस्थ्या इत्यत्र पचमीबहुव्रीहिः ४ भूरि धनं यषा ते भूरिधना इत्यत्र पष्ठीबहुव्रीहिः ५ अनत ज्ञान यस्मिन्नय अनतज्ञा- नस्तत्सबुद्धाावत्यत्र सप्तमीबहुव्रीहिः ६ सह क्षमया वर्तते यः स सक्षम इत्यत्र सह पूर्वेण बहुव्रीहि ७ । द्वि षट् द्विपा “ प्रमाणीसख्याड्डः" इति सूत्रेण डप्रत्यय इति “सुज्वार्थे सख्या सख्यया सख्येये बहुव्रीहिः" समासो भवति इति सूत्रेण द्वादशार्थे बहुव्रीहिरष्टमो भेद. ८ इति ॥४॥ वक्ष्यमाणपद्येन अवशिष्टबहुव्रीहिं द्विगु च प्रतिपादयन्नाह,- द्विवैभवैमुक्तिमना द्विपाद्या- स्तव त्रिपूजां विदधत् त्रिसंध्यम् ।। कल्याणकानां जिन ! पंचपर्वी- माराध्य भव्यः क्षिपतेऽष्टकर्म ॥५॥ टीका-द्वौ वा त्रयो वा द्वित्राः, “प्रमाणीसख्याड.” इति अय नवमो भेदः सुज्वार्थेति सूत्रेण विकल्पार्थः समासः ९ । प्रधानपद- योरपि यच्छब्देन बहुव्रीहिः समासो भवति यथा मुक्तौ मनो यस्य स मुक्तिमना इति दशमो भेदः बहुव्रीहि. १० । अथ द्विगुसमास. हे जिन | तव द्विपाद्यास्त्रिपूजा विदधत् कल्याणकाना पचप-माराध्य द्वित्रै- भवैर्मुक्तिमना भव्यो अष्टकर्म क्षिपते इत्यन्वय. । द्वयोः पादयोः समाहारः द्विपाटी तस्या द्विपाद्या. द्विपादीति “द्विगोरिरकारातत्त्वान्नित्य डी स्यात् । त्रिपूजा त्रिसध्यमित्यादौ पचपर्वी अष्टकर्म इत्यादौ "द्विगौ अन्नतावताभ्या" विकल्पेन डी. अन्यस्तु सर्वो नपुसक इति वचनाच्छेप सर्व स्वरात १११ सिद्धान्तसारादिसमहे- म्यननाच नसकेर्य । क्षिपत इत्यत्र प्रेरणफलपति फर्यास्मनेपद तुदादेश, भष्टकर्मक्षयान्मुक्तिमाप्तिफल। विदधदित्यत्र विसपार घात, शहामत्यये दिवे नोंते च मसो नो लगिति नलोपे विषदिति सिमम् ॥ ५॥ साम्पेन पश्मसिजगदियेकी भयन् प्रमो! पंचममित्युपैति ।। अपारस सप्तम्पधिसिदिमध्ये सिई जवेनोपमयादुपेक्षम् ॥ ६ ॥ टीका हे प्रभो ! साम्येन त्रिजगत् पश्यन्, एवं पंचसमिति भपन् सप्तमि मपास्प मियेकी नर उपभवान् (त्) अधिसिदिमध्ये सिद उपेश यया स्पाच्या जवेन मंगेन उपैति गमतात्पर्य श्यन्वय । शेष स- रात म्पमनात हाय सेयमिति बचनात् प्रयाणां सगा समाहारसिजगत् पंधाना समितीना समाहार पंचसमिति, सप्ताना मीना समाहार सप्तमि इत्यादौ सर्वश्रीवत्वं तत हमे इस्व । मनतो भुवाति द्वितीया- म्योप सिद्ध । मधिसिदिमध्ये ईशस्प समीपं उपेश वीतरागसमीप इत्पर्य मन्त्र 'पिभक्तिसमीपसपदि इत्यागिसूत्रेणाम्पमीमात्र । सिमाना मम्मे मध्येसिद्धिरित्यत्र पारे मध्यंत पाटी पेति पष्टीसमास । उदाहरणप्रयेऽपि क्रियाविशेषणात् । मथवा विवक्षात काराणीति न्यायादुदाहरणश्ये सप्तमी फर्म वा सम्पयादिवि विभीनो कोपमाका- रतिाम्ययीभामरपास पचमीवविभकिनामम् स्पात् तद्वदाहरण सपेरी इति पंचमीपर्मनादुपभवानि (दिति) प्रत्युदाहरण घेति ॥ ६॥ मोमायोपमवधयेप्टे, भये सनायोऽस्मि नमोऽस दोपा । दरे प्रमामय गुरु सुख मे विपाप! धीमीरुदपद्विपादे ।। ७॥

सर्वज्ञस्तवनम् । १४५ टीका—हे विश्वाच॑धीश्रीकृदुपद्विपाटे ! भवतः समीपमुपभवत् शुभाय भवेत् १ उपभवद्यथेष्टं श्रये २ उपभवदह सनाथोऽस्मि भवत्स- मीपेनाह स्वामिवान्नहमस्मीत्यर्थः ३ उपभवन्नमोस्तु ४ उपभवद्दोपा दूरे सतु ५ उपभवत्प्रभावो गुरुरस्ति ६ च पुनरुपभवद्भवत्समीपे सुखमस्ती- त्यन्वय ७ अत्र अन्यस्वरातव्यजनातेभ्यः सप्तविभक्तीनामनुक्रमेण लोप- स्योदाहरणानि ज्ञातव्यानि । भवतः समीप उपभवत् इत्यव्ययीभावः सर्वविभक्तिषु दर्शितः । एव पट्समासोदाहरणानि। अथ सक्षेपतः पट् समासानाह,—विश्वाच॑धीश्रीकृदुपद्विपादे इति पढे धीच श्रीश्च धीथियौ अय द्वंद्वः, विश्वेन अर्ये विश्वार्ये इति तत्पुरुप., विश्वार्थे च ते धीश्रियौ चाय कर्मधारय , विश्वाच॑धीश्रियौ करोतीति विश्वाच॑धीश्रीकृत्, द्वयोः पादयो समाहारः द्विपादीति द्विगु, द्विपाद्या समीपमुपद्विपादि क्लीचे हस्व अय अव्ययीभाव विश्वाच॑धीश्रीकृदुपद्विपादि यस्य स वि- श्वाय॑धीश्रीकृदुपद्विपादि इति बहुव्रीहि । एते सक्षेपत षट् समासाः कथिता ॥७॥ मुक्त्वा भवं सौख्यमवाप्तुमंगी धीमॉस्त्यजन् मोहमघस्य हंता। यो मुच्यमानस्तमसा शिवीयेत् त्वत्सेविताकाम्यतु सोऽत्र नेतः। ॥८॥ टीका-भव मुक्त्वा सौख्यमवाप्तु मोह त्यजन् अघस्य हता तमसा मुच्यमान• यो धीमान् शिवीयेत् हे नेत । अत्र भुवि स पुरुपः त्वत्सेविताकाम्यतु इत्यन्वय । प्राक्काले क्त्वाप्रत्ययः मुक्त्वा । अवाप्तये अवाप्तु " क्रियाया क्रियाया तुम्" अगमस्यास्तीत्यगी यथानेकस्व- १० १०९ सिदान्तसारादिसमहे- रादिन् दीर्घम मंगी प्राणी । पीमिफ्ते यस्यासौ धौमान् "तपस्यास्प- स्मिन्" इति मतुप्रत्यय "कदुदितनोते पदस्य इति तठोपे दी च धी- मान् । स्पन हानो स्पजतीति स्पनन् शतप्रत्यम असतात तसोपे । मोई मोहनी कम । हन हिंसातत्योहतीवि हत्य ण चीठ (1) स्मघम्य पापस्प, "इस फर्मणीति" पष्ठी । मुभ्यमान इत्यत्र मुपायोग- नए क्य अवोऽम् मोमतिमुपमादिन् (१) केन तमसा । शिब इमेत शिवीयेत् अमाम्ययात् "स्पधेवि " पनपत्पय स्यनि दोर्षे प, खो सेवते इत्पेष शोलस्वस्सेरी अजाते शी णिन् खमोप्रत्ययोचरपद इति माताषयवस्य युपादस्त्वादेशे त्वत्सेविनो भावस्वरसेविता " माने वल्ली " भनन तलप्रपय तादाए लसैनितामित वस्से तितकाम्पत “दिसीयायो काम्प । इति काम्य । पंचमीमत्वातम् इन्मनुवचमानशुम्पनमिन्वरकाम्पातीनामुगहरणानि झेपानि ॥ ८॥ क्षेमेए पुषस पनायमानो हित पितेषामृतवराप । मम प्रमो! मम्मतरे स्वमृत्यी भाव जपानंदमय ! प्रदेया ॥९॥ टीका-हेमभो। बयानरमय समरस समेधु मंगरेषु किंविधि- ऐपु पनापमान पितब दिन भपतषगप मम्यवर समत्यांमार मम प्रदेया इत्पम्पप । रक्षा इबाभरवि प्रश्नति कल कि" पति होने शावश्यप तप स्म । क्षेमेषु किविशिष्टषु मन इमामरति पनापते इति पनापमान | आन मति ध! दुसेनाप्यते इति दुरापः गप्पापर्षे सश् प्रत्यय " । न समय मस्समस्प भसमस्पस्य

No text on this page.

श्रीपार्थनाथसमस्यास्तोत्रम् । भीपार्शनार्थ तमई स्तषीमि रैलोक्यलोक प्रमिधामधाम । सामोदसमासि यदीपकीर्ति रामामु झुपप्ति कार्तिकेया ॥१॥ सरपपयोगेन विवेकसेक सक्कास्ति या साप जिनावतंस ।। मिसोकिते कोतिफलस्थदास्य घम्द्रोदये मुस्पति चक्रवाकी २॥ पुरः प्रकीर्णानि कपोलपाली सले तवाग्छे प्रतिविम्मितानि । निभास्प संदेग्षि पुषो जन किं पग्रस्प मध्य करसीफसानि ।। पेनिर्मित ५चरण पक्रे कठ ठार कमठे उकार । अकीर्तिनाट्यस्य च वादियोऽर्स साम्मे क्य सपा पुसा त्पपास्तु ॥४॥ ममम्पदामपतपाङ्गमाजों येपो स्वदास्ये मुमगपि रहे। संतापसंपति नेपा मय शशी पदिकमान प्रस्ने ५५

श्रीपार्श्वनाथसमस्यास्तोत्रम् ।
१४९
त्वद्दानलीलादलितप्रतापो
देव! धुकुंभस्तव शक्तिमाप्तुम् ।
भृगोः पतन्नादमिमं तनोति
ठंठं ठठं ठंठ ठठं ठठं ठः ॥६॥
जनिमहे जिन! ते सवनोदकैः
प्रसमरैरमरेश्वरभूधरे।
विदलितेषु नगेषु किलाभवत्
उपरि मूलमधस्तरुपल्लवाः ॥७॥
रसना स्तवने नयनं वदने
श्रवण वचने च करौ महने ।
तव देव ! विशां कृतिनां सततं
रमते रमते रमते रमते ॥ ८॥
विश्वैकनायक! कला न हि या त्वदर्हा
कार्ये न या च कविता भवत स्तवाय ।
लग्नो न यस्त्वयि भवो विभवश्व सा कि
सा किं स किं स किमिति प्रवदन्ति धीराः॥९॥
अहीशेऽधस्तावमुपनमति जेतुं दितिसुतं
समादाय क्रोधान्मणिमधुपकांतं किल धनुः ।
अधोऽधो मैनाक चरति जगतीनाथ ! समभूत
धनुःकोटौ भृगस्तदुपरि गिरिस्तत्र जलाधिः॥१०॥
जगचक्रं चक्रे चरणपरिचयकरुचिना-
मुना त्वद्दासेन स्वमनसि समंतानिगमनम् ।
तदान्यो देवस्त्वां तुलयति विभो ! चेद्भुवि भवेत्
धनुःकोटौ भंगस्तदुपरि गीस्तित्र जलधिः ॥१२॥

१५० सिमान्तसमाप्रिहे- प्रीया रूपवती मवीं जिनपतलिमिलीलानती हिस्खा रूपरसोग्मितो रमपसे यमुक्तिसीमंतिनीम् । वन्नन मवताऽपि तीर्थपतिना स्वेतत्स्फर्ट निर्ममे पुकायुकपिधारमा परि भयास्नदाप र अलम् ॥१॥ इत्थं योगींद्रपेत कमलकमलसंक्तिकामारईस कल्पाणांपरकद मममहिमरमामंजरीवल्लरीभीः। मंत्रद्न्मेपपी मुवनजनवनोल्लासलीलावतंस भोपाइर्च स्यात्ममस्पास्तवकुसुमकताम्पर्धनोऽमी- एलमध्ये ॥१३॥ इति पार्सवापतमस्वास्तोत्रम् ।

श्रीगुणभद्रविरचितं
चित्रबंधस्तोत्रम् ।
ये तीर्थरथनेतारः संत्यत्र वृषभादयः ।
चित्रबंधेन तान् स्तौमि हारिणा चित्रकारिणा ॥१॥
वृषभो वः सतां कांतां वृद्धि देयादनिंदिताम् ।
भावयामास यः स्वीयां भासं दमितदुर्नयाम् ॥ २ ॥
छत्रम् ।
न जितस्त्वं जिनाधीश ! कौंधैरजितो वरः।
रसरक्तैरसारं मां रक्ष रक्षरतेऽरतः ॥ ३ ॥
चमरं ।
संभवो वोऽस्तु सौख्याय शंभवैधानलोऽभयः ।
सद्धर्म कर्ममोक्षाय समवीवददत्र यः॥४॥
वीजपूर.।
नक्षरश्रीश वादीननदीवार्द्धभिनंदन ।
नंद नंद धनादाननदानाद्रक्ष रक्ष नः ॥५॥
चतुरारचक्र।
सुमते मतिमन्नाम त्वमकाम यमद्रुम ।
नमस्याम इमं धाम शमस्य महमक्रमं ॥६॥

१५२ सिमान्तसारादिसमहे- पोरसम्म। पयामेन पृतो येन समयो नपपावन । खर्लोफेन हवामान प्रमाग्जिन' स नो मनः ॥७॥ भारमर्स। मुपार्यो मम नि काम सुमतिं ददां प्रस । सुखायानु शुम मेन मुप्रोक्तममतं जने ॥८॥ स्वस्ति। सतः चलयानंद रष्ट्या विविधोरिव । मेय चंद्राम प्राए के मतं न शुमौकसः ॥९॥ पुप्याट्रीपुष्पदतोऽयं मोक्ता मुकेरनेकन'। शंखदेवरक्कामो यमध्यानाप नो वपुः ॥१०॥ मुघीं। भीडयामस्तु सभीक ईरितो पलिमिर्धनै । शीतल सीसा नेपाकामपनि मम प्र॥११॥ भीका योधिनाससामान भेयसे सुररंचन । व बानापनानस वा सिदं पर रसम् ॥ १२ ॥ नाकिया।

चित्रबन्धस्तोत्रम् ।
१५३
वासुपूज्यः सुरैः स्नात्वा मेरौ जन्मनि यो नुतः ।
तं जिनं न जितं वंदे देवतर्पिततार्पतम् ॥ १३ ॥
त्रिशूल।
विमल त्वामहं चायेऽनंतसन्मतये जिनं ।
नवानंदद विख्यात तथ्यं तव वचोधनं ॥ १४ ॥
श्रीकरी।
अनंतज्ञानसंयुक्त त्यक्तमंडन पावन ।
नमाम्यनंतनामानं त्वां जिनं जन्मभंजनं ॥ १५ ॥
धर्मनाथ कुवादीश सर्वपक्षक्षयंकर ।
रसं पीत्वात्र ते वाचः प्राप मोक्षक्षितिं बुधः १६ ॥
वज्र।
नयशक्त्योद्धतो येन नरकाज्जनकोज्नयः ।
शमास्पदः स वः शांतिः शांतिं कुर्याद्यमाशयः ॥१७॥
शक्ति ।
कुंथुनाथ कुरूद्भूत कुंथुमुख्यदयास्पद ।
ददस्व धर्मचक्रेश शं नित्यं मम सद्यशः ॥ १८ ॥
भाल ।
त्वयार रविसंकाशतपसा साधितः स्मरः ।
तथारिचक्रं चक्रेण मां त्रायस्व यतीश्वर ॥ १९ ॥

१५. सियाम्तसारादिसंग्रहे- कंदर्पदर्पकालीन मठ स्व मलजिपि । विवेकदावियां न संप्रपच्छ प्रमाषिकाम् ॥ २० ॥ हिस्वा मोरे य यास्मन वरमा बमार सम् । जिन सुबतक नौमि वर्णसाररमार्गवम् ।। २१ ॥ कमलांक फलानेककलितः कंकरो यक । के नमिका करोस्पेके कस्सास्माकं कल सका ॥२२॥ कम। पापान्मुक्काव मां देव मादेशस्थिर पीवर । पपीर जिन मेने नेमे त्वां शंखकरम् ॥ २३ ।। पादसेवनया तापार्भािवास्तव भूमिपा । पार्वाई न कर्य फष्टाममस्तुभ्यं तु का स्तुतः ॥ २४ ॥ सामुति।। पाहि मां भवतो पीर ग्वीवोषिकसम्म । मणति सन्मतित्वेन नस्पेति मात्र सच पा ॥२५॥ द्वाम्मा यमबा चित्रबन्धस्तोत्रम्। १५५ पाहि मां भवतो वीर रवीतोऽधिकसत्प्रभ । भणति सन्मतित्वेन नत्वेति नाऽत्र सत्त पाः ॥२६॥ मुरजबधोऽपि । छत्रौपाकृतिभिर्मदंगनिधनैश्चित्रविचित्रार्थनीं श्रीमन्मगलकारिणां सुवृषभादीनां जिनानां स्तुति । यो नाधीत इमां स्तुतिं विनयतो मेधाविना संस्कृतां पुनागः कवितां स याति नृपतिः स्वर्गश्रियं चाश्नुते २७ पंचमंगलयुक्तानां पदान् वंदे जिनेशिनाम् । भागं देवादिबंधानां भालजित्यवृतेशिनाम् ॥१॥ छत्रबध. । सर्वसद्गुणसंवासः सदाचारस्त्वनालसः । सद्धर्मो गुणभद्रः स संपायाद्वो महीनसः ॥२॥ चमरं । मतिमंतं नमस्यामः मलेनास्पृष्टमुत्तमम् । मंगलाप मुनि चेमं महामित्रद्विषोः समम् ॥ ३ ॥ चमरं। तांद्यर्थविशेषसार्थगणने दक्षः सतामग्रणीः नंद्याच्छीगुणभद्रकीर्तिरमदो मोहांधकारोप्लगौः । बालत्वेऽप्यजडं कविं यतिगुणश्रीशं जगुर्य बुधाः शुंभत्कीर्तिममुष्य कामदमिनं बौद्धादिमिथ्याहरं ॥४॥ कलश । इति चित्रमधस्तोत्र समाप्तिमगात् ।

महर्षिस्तोत्रम् ।
निर्वेदसौष्ठवतपठपुरात्ममेद
संवितिकस्वरमदोसृतदिम्पशक्तीन् ।
पुद्रपापधीमलतपोरसविक्रिमादि
क्षेत्रक्रियफिलितान् स्तुमहे महीन् ॥ १॥
ये फेवलावधिमन पर्ययिणो पीसकोठडदियुन
संमिमभोरतया मांवम पदानुसारितया ॥२॥
प्रस्पर्शनरसनघाणभषमापलोकनसमर्था ।
सदक्षचतुर्दशपूर्याष्टांगमहानिमित्तमा ॥ ३ ॥
प्रत्येकमुवादिप्रनाभवनाय दिशादिपतीन् ।
तीव्रतपोऽस्तविपधानप्टावक्षपाप सानीटे ॥४॥
रोगाः सर्वे पिण्मलाममाछ-
क्ष्वेस सर्वेपापि शाम्पति पो
सिदा पटपास्पविपत्वेन ये व
प्रामवां नम्वेषाप्यौपधीशा' ॥५॥
माध्याय पसिलभूवार्थममलं येऽतमा भमा-
चाकस्स्नमपीपसे भुवमपिच्छिम पठतोऽपि ।
उमान्ति न पानिमसिल लोक रमंसपतोड़-
प्पगुस्या न्यसितुं पलाय पसिननेपापि ते संत न ॥६॥
परति पोरमहादीप्त उप्त तपो घोरगुणं त्रिगुप्ताः ।
प्रमापि ये भोरपराक्रमाप ते सघाऽप्युचपसस्तपंतु ॥७॥

महर्पिस्तोत्रम् । १५७. : वाग्दृष्टी कुरुतोऽगिनां लघुविषावेशेन मृत्यु क्रुधा यैर्युक्ते घृतदुग्धमध्वमृतवद्यत्पाणिपात्रार्पितम् । स्यादुर्भोजनमप्युतस्विदुदिता वाचानुगृहंति ये तद्वत्तान् कृपयास्यद्दग्विषघृताद्यास्राविणः स्तौमि तान्॥८॥ वंदेणिममहिमलघिमगरिमैश्याप्तिवशिताप्रतीपातैः । प्राकाम्यकामरूपित्वांतर्धाद्यैश्च विक्रियर्द्धिगतान् ॥ ९ ॥ न क्षीयते चक्रिवलेऽपि भोजिते यद्वत्तसेखत ? दहः सुरादयः । वसंति यद्धाम्नि चतुःकरेऽपि ते भांतूभयेऽक्षीणमहानसालयाः ॥ १० ॥ जंघाश्रेण्यग्निशिखाजलदलफलपुष्पवीजतंतुगतैः । चरणनाम्नः स्वैरं चरतश्च दिवाऽस्तु विक्रियर्द्धिगतान् ॥११॥ इत्यन्यतद्भवतपोमहिमोदितद्धी- नाचार्यपाठकयतीन् जगदेकभर्तृन् । वंदारुदाश्रयति कामपि भावशुद्धिं क्षिप्रं यया दुरितपाकमपाकरोति ॥ १२ ॥ इति महर्षिस्तुति संपूर्णा ।

श्रीपार्श्वनाथस्तोत्रम् । लक्ष्मीस्तोत्रापरनाम । (सरीकम् ।) लक्ष्मीर्महस्तस्पससी सती सती प्रादकालो विरतो तो रतो। जराम्माजन्महवा हवा हता पार्श्व फपे रामगिरी गिरा गिरी। टीका ट इति निधन हे साधो ! स्वं पार्स फणे पार्षनाथसमीपे गम स्वति कुरु।कपा । गिरा बाण्या कृत्वा रामगिरी नामप्पेयपर्यटग कोशे पार्षे समीमहस्वल्पसती कोष सदाकाले वर्षमाने स्त । पुन कपभूते! सती शोममाने । पुन को पावें । सती शाश्यते । अत भीपापनापाद प्रवृद्धकालो विरस को प्रपुरकालो गत रखो पेन महता पान जरास्नापदता, किविशिय मास्वापत् । इता को फेनापि न हवा भी पार्पमाघस्प जिनेंद्रस्प तथानिक गृहीत्वा मिना न केनापि रामापत् हसा ॥१॥ अपमाप सुमना मनामना य सपदेशो भूपि नापिना विना। समस्तविज्ञानमयो मयोमयो पार्श्व फापे रामगिग गिरी मिरौ।।२।। टीका-मई माप प्रथम पार्भ मषेप पुम्पामि, 'तपा रामगिरी पति पूर्वोक्तप्रकोण । कयमूतोई सुमना कोय आरोदावहितममा तष्ठोमनचित । पुन क्यभूतोई मनामना कोर्य मनान् यत् (ये समान न मन्यते ते मनामना तान् मह समामि वान् पंपनिमिष्यात्वान् त्पधि- वा (त्यक्त्वा) श्रीपाच जिन लयामि य पार्श्वनाथ सर्वेषु देशेषु पठसे इति सर्वदेश पुन कीश श्रीपार्थनाय । अविना कोर्य स्वामिना पिना पस्म पार्श्वनाथस्य स्वामि (मी) मास्ति, पुन कीश पार्भ ! मुनि पुषिम्यां विषये - .

पार्श्वनाथस्तोत्रम् । १५९ ना पुरुष प्रधानीकपुरुपः । पुन. कीदृश पार्श्व. ? समस्तविज्ञानमयः कोऽर्थः विशेपेण समस्तनवपदार्थाना जीवाजीवादिकरूपारूपि- स्त्वादिषु केवलज्ञानेन कृत्वा परमानन्दै कृत्वा जानति पश्यति। पुन कीदृशः ? मया कोऽर्थ बाह्याभ्यन्तरलक्ष्म्या कृत्वा शोभित । पुनः कीदृश. १ उमया कोर्थ अत्यतलावण्यकातिसौभाग्यादिभि. शोभया कृत्वा उपलक्षित. मण्डितः ॥ २॥ विनेष्ट जंतोः शरणं रणं रणं क्षमादितो यः कमळं मठं मठं । नरामरारामक्रम क्रमं क्रमं पाच फणे रामगिरौ गिरौ गिरौ ॥३॥ टीका-य पार्श्वनाथ कमठ विनेष्ट शिक्षयामास । किंविशिष्ट कमठं ? मठ कोर्थ मठयति कुतापसाना स्वामीत्यर्थ । पुन. कीदृश कमठ १ मठ कोर्थः सगद अष्टमदसहित । कथंभूत पार्श्व 2 क्षमादितो गुणत जतो. शरण कोर्थः क्षमादिगुणसयुक्ताना प्राणिना शरणीभूत । पुन कीदृश पार्श्व ? रण कोर्थ तत्वार्थभाषिण । कीदृशं कमठ ? रण कोर्थ सणामकारक। पुन कीदृश पाश्व ? नरामरारामक्रम कोर्थ मनुष्यदेवाना क्रीडास्थानी- यचरणयुगल । पुन कीदृश पार्श्वनाथ ? क्रम कोर्थ उप्रवशे उत्पन्न इक्ष्वाकुवश इत्यर्थ । पुन कीदृश पार्श्व ? क्रम क्रामत्यागत्या कामति भव्याना हृदयानि कोर्थः आसन्नभव्याना हृदयानि उल्लसति ॥ ३ ॥ अज्ञानसत्कामलतालतालता यदीयसद्भावनता नता नता। निर्वाणसौख्यं सुगता गतागता पार्श्व फणे रामगिरौ गिरौ गिरौ । टीका-अज्ञाने सति सत विद्यमाना ये मनोरथा कामाः शब्दादयो देहादिकभोगा पुत्रकलत्रगृहधनादिका. तेषा भोगाना लता वल्ली स वल्लीमे- (ए) व आल अनर्थ तस्य अनर्थस्य योऽसौ ताल: कोर्थ ताडन स्यात् स क श्रीपार्श्वनाथ तेन साशनेन कृत्वा ता लक्षमीर्येपा नराणा प्रवर्तते अज्ञान- ?

१६० सिमान्तसारादिसमहे- सत्कामलतालताता कम्यते । यस्प पार्धनायस्य संबंधिनी भक्तपुरमा शुदमावेन नता नीम्ता सन्त रोपां नता कामते । काशा मा पुरुया । नता कोर्य सरपि नमस्कता सम्बैकै नमस्कृता । पुन कीरशा भक्ता मुछ अविशयेन निर्माणसौरम्य गता | पुन कशा मक्का पुरया गितागसा कोर्ष गरी मान भगत मनर येते गताम्ता हानसहिता इस्पर्य, अपवा अगसा कोप ! गतं नष्ट भगत महान पेप ते मगता झानसहिता पुरुपा' इत्यर्प', पापवा भागता कार्य गर्द नरे भगत यान येपो से भागता सानरहिता पुरुया इस्पर्य । पार्ध फमे राम मोक्त अर्थ इति ॥१॥ विवादिताक्षेपविपिविधिभिघिर्षभूव सर्पावहरी हरी हरी। बिहानसशानहरोहरोहरो पार्य फणे रामगिरौ गिरी गिरौ । टीका पुन कीरश पार्श्वनाथ विवादिपाशेषविधि को विवादिन या विषैव यमीस्तस्या सम्या य शेप अस्पीकरण तत्र मत्स- करणे पिपि म्यापारो पस्य स म्यापारो मवति कोर्थ यस्प पार्धनायस्प परत्रादीनां विपाया विपये सा पिया तुपकरणाय म्यापारा मसिशक्तिरस्ति। पुन कीश पार्म । विधि कोर्ष निज माघारत् सत्पर ( निगाभा- रावत्पर ) भाचारनप । पुन करिश पार्च 'विधि कोर्थ पविभ- संघस्प बिमघमणोयोता गात । पुन कोश पार्श्व । सर्पागारी कोर्य सर्पाणां विन श्रीपानायस्य नामस्मरणेन क्षयं पातीतिमाह। पुन फी श पार्थ हार इंच (क) ममी ।पुन हरि सूर्प, किमा, पुन हरि वायु एते सई गतौ पाती प्रयोगात पान्ति गति सेति () 4 पार्थनाएं स सव्वादरीहरीहरी । पुन कीरन पार्षनाथ ! शिान कोर्ष प पार्श्वनायो गर्भावनारसमये गर्भमध्ये मतिभुतावधि इति शिानक्षण | पुम कोश पार्श्वनाथ । सहानेन विगम्ति

पाश्वेनाथस्तोत्रम् ।
१६१
सज्ञान कोर्थः केवलज्ञानेन कृत्वा भव्याना चित्त हरतीति त्रिज्ञानसज्ञानहरः
पुन कीदृशः पार्श्वनाथ. ? अह· कोर्थः सुष्टु केवलज्ञानप्रकाशकः ॥५॥
यद्विश्वलोकैकगुरुं गुरुं गुरुं विराजिता येन वरं वरं वरं ।
तमालनीलांगभरं भर भरं पाव फणे रामगिरौ गिरौ गिरी।
टीका-कथभूत पार्श्व ? यत् सचरणशीलो विनाशीय ईदृशो विश्वलोकः
समस्तलोक. तस्य लोकस्य एकोऽद्वितीयो ज्ञानप्रकाशक. गुरु श्रीपार्श्वनाथः
त पार्श्वनाथं । पुनः कीदृश पार्श्वनाथ गुरु गुरुतर गरिष्ठ । पुनः कीदृश पार्श्व-
नार्थ गुरु वाचस्पति वागीश । पुनकिंविशिष्ट पार्श्वनाथं ? भर कोर्थ पोषक
जगत्पोषकं । पुनः कीदृशं पार्श्वनाथ ? भर कोर्थ भातीति भर. वन्हिरूपः तं
भर कातितेजवान् इत्यर्थ । पुनः किविशिट तमालनीलागभर तमालनील
अंग तमालवन्नील अग बिभर्ति धारयतीति तमालनीलागभर त। पुनः
कीदृश पार्श्व ? विराजित (त)। पुन कीदृश पार्श्व 2 वरं मुक्तिलक्ष्म्या वर
शील स्वभावं । पुन कीदृश पार्श्व ? वर निजोपार्जिततत्वज्ञानस्य विभाग
स्वभक्तेषु ददातीति वर, पर तु मूककेवलिना तत्वज्ञान न ददाति, मूककेवली
कोर्थ ? यावत् ध्वनि न उच्छलति तावन्मूककेवली कथ्यते ॥६॥
संरक्षितो दिग्भुवनं वनं वनं विराजिता येषु दिवै दिवै दिवः ।
पादद्वये नूतसुगसुराः सुराः पार्श्व फणे रामगिरी गिरौ गिरौ ॥७॥
टीका-यस्य पार्श्वनाथस्य दिग्भुवन दिशा एव भुवन आस्ति, पुन. वन ज-
लकाय, पुन वन बनस्पतिकाय एषा त्रयाणा श्रीपार्श्वनाथ. सरक्षति रक्षा
करोति। पुन यस्य पार्श्वनाथस्य पादद्वये नूता स्तुतिकार पुरुषा सुराऽ-
सुरा वर्तते, पुन सुरा सुष्ठु विराजते येषु नूतसुरासुरेषु, विराजिता
क? श्रीपार्श्वनाथचरणविपिये शोभमाना बभूव ये के दिवा स्वर्गे नरातु आग-
च्छत् यस्य पार्श्वनाथस्य पादद्वये ई काम वो वरुण आ विष्णु ई
लक्ष्मीश्च वर्तते पुन. रा उत्कृष्टो दिवा प्रकाशं ब्रुवन्ति ॥ ७ ॥

१६२ सिदान्तसारादिसमहे- राप नित्य सफलाकला कला ममारप्णो जिनो जिनो जिनो। संहारपूज्यं पमासमा समापार्थ फसे रामगिरी गिरौ गिरी॥८॥ टीका-पत्र पार्धनाथे में प्रम राबसे शोमरी । पुन यत्र पार्थनापे सकळाकला झानादिककला ररावे शोमते । पुन कला कीशी शोमते ! शासप्तसिमनोहकसा शोमते, कर्यमूत पार्थनाय ! अमारवण को नि- फाम कामरहित । पुन कमूत पार्थ भनिन नि-पाप । पुन क थैमूत पार्भ निनो कोर्य कर्मजीशनसमर्प विषारत्नपै । पुन करश पार्भ ! जिन जिनान् गणघरादान् देवादीन्य पार्थ स भवतीति [भारापर्यतीति] स जिन [ पुन फीश पार्थनाय ! समा कोर्प यस्य पार्य- माघस्प समा पश्या पम्प के सहारा देवा आमरणे सह पिते देखें। से देखें पूज्य यस्य पार्भस्म सभा, सा समा पुन कीरशी ! समा [एपमा] कोः अमरदेवानाममरेन्द्राणां मुकुटरमतेनसा कमा च पुना रस्नमयौसम- बशरणस्य कात्या वा शोमिसा सभा सा सभा ।। ८ ।। पारिवयः । सर्के व्याकरणे च नाटफचये काम्पाइसे फौशले विरम्पातो सपि पपनदिमनिपस्तस्वस्प कोप निधि । गमिर यमकाटकं पठति य संस्स्यसा लम्पत श्रीपपप्रमदेवनिर्मितमिद स्तोत्रं जगन्मंगले ॥९॥ टीका-प पुमान् इ पार्धमापस्य स्तोत्र परति य पुस्प संस्तुपसा हरमा संस्तमेन ला सबस्य कार्य निमि सम्यते । सयभूत हो भापप्रमभयमुनिना निर्मित निप्पारित । पुन फौशस्त जगभगई प्रेमपमंगलापर्फ । पुन फी स्तोत्र ! यमकारक गंभीर कार्य सत्यादिवन स्परमापरसमपेण मतिता अप्रय मुपि पिन्नीप पार्श्वनाथस्तोत्रम् । १६३ अनंदिमुनिपो विख्यातो बभुव। क तर्कशास्त्रे न केवल तर्के चान्यत् व्या- करणेऽपि विख्यातोऽभूत्। पुनः नाटकचये समूहे नाटकशास्त्रसमूहे, पुनः कान्याकुले कौशले कोर्य. महतनवरसै सह काव्यै समूहै. कौशले प्रवीण- चतुरे अतः कारणात् पद्मनदिमुनिः मुवि पृथिव्या विख्यातोऽभूत् ॥९॥ इति श्रीपद्मनंदिमुनिविरचित धीपार्श्वनाथस्तोत्र टीकासहित सपूर्णम् । 1 * अस्य स्तोत्रस्य दशरा-मशरारूपा एकैव प्रेस-पुस्तिका संप्राप्ता सा तु 'बाबू जुगलकिशोरजी' इत्येतैः संशोधिताप्यतीवाशुद्धा । टीकापि विलक्षणा भाषासाहित्यदृष्टयाप्यशुद्धा ज्ञायते, शब्दानामर्थमपि पूर्णतया न प्रकाशयति । स्तोत्रमिद पद्मप्रभदेवनिर्मितमवभाति । अस्य सशोधने यो मम प्रमाद स क्षन्तव्य पाठकै ।-संशोधकः ।

नेमिनाथस्तोत्रम् ।
for Oct
(मधरी नेमिबिनस्तुतिः ।)
मनोनान् नमोनेन नुमममामिमाननं ।
नेमनामानमनम मुनिनामिनमानुम ॥१॥
नमामानामनिम्नान मामानानामनामिना ।
नामिने नामिनामोमे नमिनमे नमे नम ॥२॥
मने नानामिन नाम नानानिम्नमभानने ।
ननुमेमिममोनेना मोमानामानमभिमा ॥३॥
मिममन्मनमामानिमानिनीमाननोन्मना ।
नानानामीमननेमी मनोमनिममानिना ॥ ४ ॥
मनोसभिनने नूने सममन्माननोनने ।
नुममे नोपनानेमि ननाम्नोननमामनु ॥ ५॥
नोनमुन्मानमानेन मनीनेनममाननं ।
मीनानमिनमभेमी मनूनां नामिमीमा ॥ ६ ॥
मनिनमे नेमि नाना निमाने नेमिमानिना ।
नेमिनामा नमानाना मनोमान मर्म नुम ॥७॥
नेमीनमनन नेमि नमन नेमिनाननं ।
नेमि नाम्नो नमामान मानान्न नमीमम ॥८॥

नेमिनाथस्तोत्रम् । १६५ इति स्तुतिघे ( १ ) पुरतः पटते नेमे निजव्यंजनयुग्मसिद्धि । श्रीवर्द्धमानोदयशालिनस्ते स्युः सिद्धिलब्धापरिभोगयेप्पा ॥९॥ इति नेमिनाथस्तोत्र सपूर्णम् ।* * भस्य संशोधन कापी-टूकापीरूप ।

श्रीमानुकीर्सिविरचित्र शंखदेवाष्टकम् । अवमवधवषन्पो मोक्षकान्ताभिनन्यो दलितमदनधाप प्राप्सकैवल्यरूपः । कमतवनठार शंसरत्नावतारः विसवननुतदेव पातु मां शंखदेवा ॥१॥ यमिमठफलरूपो विश्वलोकप्रदीप स्तुहिनगगनमूर्तिः स्फारफस्पारफीर्सिः । सुसजनसवासो मोक्षलक्ष्मीविलास त्रिभुवननुवदेव' पातु मां संसदेवः ॥२॥ अगणितमहिमेशो मानहोघोपदेशः सहमपरमकापः प्राप्तनिर्माणगेह । मधिगतपरमास्यों भानममानतीर्यः मिसुवननुतदेय पातु मां शंखदेवः ॥३॥ गुणमणिगणधारो मम्पमाग्यावारो विपपवनवसन्तो मोसलक्ष्मीसुकान्तः । स्पवतमलकरको घांतसंसारपंक प्रिसवननुतदय पातु मी सदय ॥४॥ दिविनमनुअग्यस्स्यक्तमामाग्पराग्यो इमिननिकारनाश सतस्पप्रकाना।

शंखदेवाष्टकम् । १६७ परिणतसुखरूपो निर्जितः कालकूप- स्त्रिभुवननुतदेवः पातु मां शंखदेवः ॥ ५ ॥ विगतजननदोपः सर्वभापाविभूपः समवशरणनाथो जैनमार्गे सुतीर्थः । गणधरनुतराजः कोटिबालार्कतेज- स्त्रिभुवन नुतदेवः पातु मां शंखदेवः ॥६॥ जितमनसिजरूपः कर्मनिर्मूलकोपः विनयवनजभानुः वांछितः कामधेनुः । कुवलयवनमित्रो भारतीलोलनेत्र- त्रिभुवन नुतदेवः पातु मां शंखदेवः ॥७॥ जिनपदकमलालिजेंनभूते पिकालि- मुनिपतिमुनिचन्द्रो शिष्यराजेन्द्रचन्द्रः । सकलविमलमूक्तिर्भानुकीर्तिप्रयुक्ति- स्त्रिभुवननुतदेवः मातु मां शंखदेवः ॥ ८॥ इति शखदेवाष्टकम् ।

भीयोगीन्द्रदेव विरचित निजात्माष्टकम् । णिय लोपचकादिवसपपमिया जे जिमिंदा म सिदा बण्ये गंपत्यसस्था गमगमियमणा उपमापभिसाह । सम्वे सदष्णियादं अणुसरणगुणा मोक्खसंपतितम्मा सोई सामि णि परमपपगमओ णिम्बियप्पो णियप्पो ॥१॥ मिस्सो लिम्वाणमंगो गिरुपि गिरुपमो मिकलो मिकसको वष्याबाहो अणेतो भगुरुगलघुगो जामिमन्त्रावसापो। सम्मावत्यो सयंम् गपपपरिमलो सासको सम्बकाल सोह मायेमि मि परमपयगो णिवियप्पो मियप्पो|२|| एको सम्यानपिमो विमलणइणिो उड़गामीसहामो मिचो पाएपबो परसरसमिहो मिताप्पमालो। सिदो मुदं सस्तो पिदुपरमगुणो अपखओ बो भिरक्तो सोई सामि पिवं परमपयगो मिविपप्पो मियप्पो ॥३॥ ओईण सामगम्मो परमसुहमरो कम्मणोकम्मरको कापाकारो अश्वमो फसिकससमसालेपचचो पविचो। समचाईगुणाडो गतिमापरासापुरपी विसुरो सोई मायेमि मिर्च परमपयगओ मिम्बियप्पो मिमप्पो ॥णा पोरियपुष्णपुंसो मिरयिसयसुहालोयमामो समाणी पिसो णिम्पिसागो मणवयणसमारंमसंमंघको ।

निजात्माष्टकम् । १६२. लोयालोयप्पयासो अविलयणिलयो णिव्विसेसो णिरीसो सोऽहं झायेमि मिचं परमपयगओ णिधियप्पो णियप्पो ॥५॥ नादासंखप्पएसो समयमुवगओ पंतसोक्खावठाणा छुत्तिहातीदभावो भवभयणभयो बंधमुत्तो अमुत्तो। अन्वत्तो णाणगेजो जरमरणचुदो जो परं ब्रह्मरूओ सोहं झायेमि णिचं परमपयगओ णिवियप्पो णियप्पो॥६॥ सव्वण्णवण्णगंधाइयरविरहियो णिम्ममो णिविआरो रूवातीदस्सरूओ सयलविमलसद्दस्सणण्णाणवीओ। इहाणिप्पयोया सुहअसुहवियप्पा सया भावभूओ सोहं झायेमि णिचं परमपयगओ णिन्वियप्पो णियप्पो॥७॥ रुवे पिंडे पयत्थे ण कलपरिचये जोयिविदेण णादे अत्थे गंथे ण सत्थे ण करणकिरिया णावरे मंगचारे । साणंदाणंदरूओ अणुमहसुसुसंवेयणाभावपुग्यो सोहं झायेमि णिचं परमपयगओ णिव्यिप्पो णियप्पो।। इति योगीन्द्र देवविरचित निजात्माष्टक समाप्तम् । ।

अमितिगत्यापार्यकता सामायिकपाठ । एकदिविपीकप्रमुखयो ये पंचपावस्पिता बीवा संघरवा मया दशदिशपिचप्रमादारमना ।। ते ध्वस्वा मदि लोटिता विपटिता' संमहिता मोटिता मागोलोचनमोमिना जिन! तदामिप्पाऽस्तु मे दुकवं ॥१॥ मिक्तिपरायपस्म विशद बैन चोग्भ्मस्पतो निर्विहस्प परापयादबदने सक्तस्य मरकीर्घने । पारिनोधतषेवस' पयत कोपादि विटेपिणो। देवाध्यात्मसमादितस्य सकला सर्पत मे मासरा ॥२॥ मालस्वालिवेन महमनसा सन्मार्गनिर्नाशिना लोमकोषमदप्रमादमदनपादिदिग्पास्मना । यदेखापरिवं विष्वमधिया पारियशुदेर्मया मिथ्यानुप्फतमस्तु मो मिनपते ! तवत्प्रसादेन मे ॥३॥ बीवामीवपदार्यतस्वविदुपो पंघाभवी संमत समविरनिर्जरे विदपवो सक्तिभिय कोपव। देहादेः परमात्मवस्वममले में पश्यतस्तस्यतो धर्मभ्यानसमापिशुदमनस काठ प्रपातु प्रमो! ॥४॥ कपायमदनिजय सकलसंगनिर्मकता परिप्रपरमोममो मनन वो मीस्ता ।

सामायिकपाठ ।
मुनीन्द्रपदसेवना जिनवचोरुचिस्त्यागिता
हपीकहरिनिग्रहो निकटनिवृतेर्जायते ॥ ५ ॥
विद्विष्टे वा प्रशमवति वा बांधवे वा रिपौवा
मूखौधे वा वुधसदसि वा पत्तने वा बने वा ।
संपत्तौ वा मम विपदि वा जीविते वा मृतौ वा
काली देव ! ब्रजतु सकलः कुर्वतस्तुल्यवृत्तिं ।। ६॥
सुखे वा दुःखे वा व्यसनजनके वा सुहृदि वा
गृहे वाऽरण्ये वा कनकनिकरे वा दृषदि वा।
प्रिये वानिटे वा मम समधियो यांतु दिवसा
दधानस्य स्वांते तव जिनपते ! वाक्यमनघं ॥ ७॥
ये कार्य रचयंति निंद्यमधमास्ते यांति निद्यां गति
ये वंद्य रचयन्ति वंद्यमतयस्ते यांति वंद्यां पुनः ।
ऊर्ध्व यांति सुधागृहं विदधतः कूपं खनंतस्त्वधः
कुर्वन्तीति विबुध्य पापविमुखा धर्म सदा कोविदाः ॥८॥
चेष्टाश्चित्तशरीरबाधनकरीः कुर्वति चित्तेऽधमाः
सौख्यं यस्य चिकीर्पवोऽक्षवशगा लोकद्वयध्वंसिनीः।
कायो यत्र विशीर्यते सशतधा मेघो यथा शारद-
स्तत्रामी बत! कुर्वते किमधियः पापोद्यमं सर्वदा ॥९॥
कांतेयं तनुभूरयं सुहृदयं मातेयमेषा खसा
जानोऽयं रिपुरेष पत्तनमिदं सझेदमेतद्वनं ।
एषा यावदुदेति बुद्धिरधमा संसारसंवर्द्धिनी
ताबद्गच्छति निवितिं वत! कुतो दुःखदुमच्छेदिनीं ॥१०॥

१७२ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- नाई कस्यचिदस्मि कपन न मे मावः परो वियते मुस्वात्मानमपास्तकर्मसमिति झानेक्षनाउँकरिं । यस्पैपा मतिरस्ति घेतसि सदा झावास्मवत्तस्पिवे घस्वस्थ न पत्रिवसिमवन सांसारिकर्मघनै ॥११॥ चित्रोपायविरक्तिोऽपि न निजो देहोऽपि पत्रात्मनो भागा पुत्रफलमित्रतनया जामामृतावादय । तत्र स्वं निजपूळकर्मवनगा केपा मवि स्फुट विधायेति मनीपिमा निबमति कार्या सदात्मस्थिता ॥१२ दुर्मदोमितकर्मशैलदलने रो दार्निधार पवि पोतो दुस्तरभन्मसिंधुतरणे यः सर्वसाधारम । यो नि शेपशरीरिरक्षणविषौ सम्वस्पितेपास्त' सर्पदेन निवेदितः स मषतो धर्म सदा पातु न ॥१३ सन्माषापदवाफ्यवाप्पविकलं किंचन्मया मापिस साज्यालासफपापदर्प विपयष्यामोइसक्कास्मन' । वाग्देवी जिनपक्रपपनिलया सन्मे पमिस्वाखिल दया भानविष्ठरिमार्जिवसमा दयादनियंपदं ॥ १४ ॥ नि सारा मयदापिनोमुखारा मोगाः सदा नभरा निपस्यानमयार्षिमाषबनका विधाविदा निदिवा'। ने पिवयतोऽपि मे पत ! मसिम्पोषचवे मोगतः * पृच्छामि कमाभयामि कमल मुरः प्रपये विधि ॥१५ मोहमतिमनेकदोपबन मे मत्सितु दीपका शुस्फीविय कीरिवामिन इदि स्यूताविवेन्द्रापिती

सामायिक पाठ. ।
१७३
१
आश्लिष्टाविव विविताविव सदा पादौ निखाताविव
स्थेयास्तां लिखिताविवाघदहनौ बद्धाविवाहस्तव ॥१६॥
संयोगेन दुरंतकल्मषभुवा दुःखं न किं प्रापितो
येन त्वं भवकानने मृतिजराव्याघ्रबजाध्याप्तिते ।
संगस्तेन न जायते तव यथा स्वप्नेपि दुष्टात्मना
किंचित्कर्म तथा कुरुष्व हृदये कृत्वा मनो निश्चलं ॥१७॥
दुर्गधेन मलीमसेन वपुषा स्वर्गापवर्गश्रियः
साध्यंते सुखकारणा यदि तदा संपद्यते का क्षतिः ।
निर्माल्येन विगर्हितेन सुखदं रत्नं यदि प्राप्यते
लाभः केन न मन्यते बत! तदा लोकस्थिति जानता ॥१८॥
मृत्युत्पत्तिवियोगसंगमभयव्याध्याधिशोकादयः
सूद्यते जिनशासनेन सहसा संसारविच्छेदिना ।
सूर्येणेव समस्तलोचनपथप्रध्वंसबद्धोदया
हन्यते तिमिरोत्कराः सुखहरा नक्षत्रविक्षेपिणा ॥ १९ ॥
चित्रारंभप्रचयनपरा सर्वदा लोकयात्रा
यस्य खाते स्फुरति न मुनेर्मुष्णाती मुक्तियात्रां ।
कृत्वात्मानं स्थिरतरमसावात्मतत्त्वप्रचारे
क्षिप्त्वाशेष कलिलनिचयं ब्रह्मसम प्रयाति ॥ २० ॥
नो वृद्धा न विचक्षणा न मुनयो न ज्ञानिनो नाऽधमा
नो सूरा न विभीरवो न पशवो न स्वर्गिणो नांडजाः।
त्यज्यंते शमवर्तिनेव सकला लोकत्रयव्यापिना
दुर्वारेण मनोभवेन नयता हत्त्वांगिनो वश्यतां ॥ २१ ॥

१७१ सिमान्तसारादिसमहे- शधर सहदाखदानचतुरो बैरी मनोभूर्य प्मानेनेष नियम्पते न तपसा संगेन न मानिना । देात्मव्यतिरेफसोपचनिस सामाविक निपल मेरम्य परमं विहाय पमिना निर्याणदानधर्म ॥ २२ ॥ का कालो मम कोऽधुना मवमहं पर्चे फय सांप किं फम्मात्र दिवं परम मम किं किं मे निजं कि पर। इत्यं सर्यविचारणाविरहिता दीझवात्मफिया बन्मामोषिविवार्षिपावनपराः इमेति सम्वा क्रियागार॥ येपो काननमालमं पशघरो दीपस्तमाछेदको मैक्ष्य मोमनमुचम वसुमती शय्या दिशसस्त्वांपरं। सेतोपामृतपानपुष्टवपुपो निर्णय कर्माणि ते धन्या मावि निवासमस्तविपदं दीनैर्दुरापं परै ॥२४॥ मावा मे मम गेदिनी मम गृह मे मांषा मेंज्गजा- स्वासो में मम संपदो मम सुख मे सज्जना मे जना' । इत्यं घोरममावतामसमशम्पस्तावोधस्पिति शर्मापानविपानत स्खदितत प्रापी सनीभसते ॥२५।। विरम्पाती महचारिसापरिगतामाजन्मनो यो स्थिरी पत्रावार्यरयौ परस्परमिमौ विलिप्यतोगागिनौ। सेवस्ता मनीपिमा ननु कयं पापे विमुके सति सास्तीह पिमुप्यतामनुदिनं विपक्षोफम्पयर्या ॥२६॥ विर्यपस्तुणपर्णलम्पपृसय सृष्टा स्थटीशायिन भिवानवरसम्पमोगपिमया देवा' समं मोगिमि ।

सामायिकपाठः।
१७५
मानां विधिना विरुद्धमनसा वृत्तिः कृता सा पुनः
कष्टं धर्मयशःसुखानि सहसा या सूदते चिंतिता ॥२७॥
भजसि दिविजयोषा यासि पातालमंगं
भृमसि धरणि पृष्टं लिप्स्यसे खांवलक्ष्मीः।
अभिलषसि विशुद्धां व्यापिनी कीर्तिकांतां
प्रशममुखसुखाब्धि गाहसे त्वं न जातु ॥२८॥
भोक्तं भोगिनितंबिनी सुखमधश्चिंतां पनीपत्स्यसे
प्राप्तुं राज्यमनन्यलभ्यविभवं क्षोणी चनीकस्यसे ।
लन्धु मन्मथमथराः सुरवधूनीकं चनीस्कद्यसे
रे भ्रांत्या ह्यमृतोपमं जिनवचस्त्वं नापनीपद्यसे ॥२९॥
मीमे मन्मथलुब्धके बहुविधव्याध्याधिदीर्घद्रुमे
रौद्रारंभहपीकपासिकगणे मृजद्धतैणद्विपि ।
मा त्वं चित्तकुरंगजन्मगहने जातु भ्रमी ईश्वर ?
प्राप्तं ब्रह्मपदं दुरापमपरैर्यद्यस्ति वांछा तव ॥३०॥
व्यसननिहतिर्ज्ञानोद्युक्तिर्गुणोज्वलसंगतः
करणविजितिर्जन्मत्रस्तिः कपायनिराकृतिः ।
जेनमतरतिः संगत्यकिस्तपश्चरणाध्वनि
तरितुमननो जन्मांभोधि भवंतु जिनेन्द्र ! मे ॥३१॥
वित्रव्याघातवृक्षे विषयसुखतृणास्वादनाशक्तचित्ता
निस्शरारसता जनहरिणगणाः सर्वतः संचरद्भिः ।
खाद्यते यत्र सद्यो भवमरगजरास्वापदैर्भीमरूपै-
स्तरउम्या करनों भवरततो
दाखदावाग्नितप्ते ॥३२॥

सिदान्तसारादिसपहे. 1 न वैया न पुया न विप्रा न शका न कौता न माता न मृत्या न भूपाः । पमालिंगिसं रधितुं संसि शता विचिम्पेसि कार्य निजं कार्यमा ॥३३॥ विपिनरुपायैः : सदा पात्ममान स्वकीयो न देह समं मत्र याति । कामे पामभूतानि वित्तानि तत्र प्रदपेनि कसो न कुत्रापि मोर ॥ ३४ ॥ शिष्टे दुऐ सदमि विपिने कांचने म्लोष्ठवर्गे सौरम्पे दुःखे अनि नरवर संगमे यो वियोगे। अपीरो मवति सलो देवरागम्पोर प्रौरा सीप पयितमहसस्तप्तसिद्धि करस्पा ॥ ३५ ॥ अभ्यस्ताधकपायवैरिविजया विध्यस्तलोकक्रिया बामाभ्यंतरसंगमाचविमुखा इत्यास्मषश्म मनः । ये भेष्ठ मषमोगदेहविपय वैराम्पमम्पासते वेगछति शिवालय विकलिला लगवा समापिं मुमाः ॥३६॥ संघस्तस्स न साधन न गुरषो नो लोकप्तापरा नो योम्पैस्हणकाप्ठलघरमीएछे छत संस्वर' । कस्मैिव विमुद्धपतामयमठस्तस्पास्मतास्वस्पिरो जानानो जल्दुग्धयोरिवमिदा देहात्मनो सर्वदा ॥ ३७॥ मिगस्तिविपय म्प प्रस्थित मुध्यते यः पथिकमिव शरीरे नित्यमारमानमात्मा।

सामायिकपाठः। १७७ ANNA विषमभवपयोधि लीलया लंघयित्वा पशुपदमिव सद्यो यात्यसौ मोक्षलक्ष्मीं ॥ ३८॥ बाह्य सौख्यं विषयजनितं मुच्यते यो दुरंत स्थेयं स्वस्थं निरुपममसौ सौख्यमाप्नोति पूतं । योऽन्यैर्जन्यश्रुतिविरतये कर्णयुग्मं पिघत्ते तस्य च्छन्नो भवति नियतः कर्णमध्येपि घोषः॥३९॥ संयोगेन विचित्रदुःखकरणे दक्षेण संपादिता- मात्मीयां सकलत्रपुत्रसुहृदं यो मन्यते संपदं । नानापायसमृद्धिवर्द्धनपरां मन्ये ऋणोपार्जितां लक्ष्मीमेष निराकृतामितिगतित्त्विा निजां तुष्यति ॥४०॥ यत्पश्यामि कलेवरं बहुविधव्यापारजल्पोद्यत तन्मे किंचिदचेतनं न कुरुते मित्रस्य वा विद्विषः । आत्मा यः सुखदुःखकर्मजनको नाऽसौ मया दृश्यते कस्याहं बत! सर्वसंगविकलस्तुष्यामि रुष्यामि च ॥४१॥ क्रोधाबद्धधिया शरीरकमिदं यन्नाश्यते शत्रुणा साधु तेन विचेतनेन मम नो काप्यस्ति संबंधता । संबंधो मम येन शश्वदचलो नात्मा स विध्वंसते न कापीति विधीयते मतिमता विद्वेपरागोदयः ॥४२॥ एकत्रापि कलेवरे स्थितिधिया कर्माणि संकुर्वता गुर्वी दुःखपरंपरानुपरता यत्रात्मना लभ्यते। तत्र स्थापयता विनष्टममता विस्तारिणी संपदं का शक्रेण नृपेश्वरेण हरिणा न प्राप्यते कथ्यतां ॥४३॥ १२ १७८ सिमान्तसारादिसंग्रह- ये भाषा परिवर्षिता विदघते कायोपफार पुन- स्ते संसारपयोधिमजनपरा जीवापकारं सदा । जीवानुप्रयकारिणो विदधते कायापकार पुन निमित्येति विमुपतेज्नपधिया कायोपफारि विधा ॥४॥ आत्मा झानी परमममलं मानमासेष्यमान कायोज्ञानी वितरति पुनर्पोरमनानमेव । सर्वश्रेदं मगति विदित दीयते विधमान कपित्यागी न हि खासुम कापि फस्यापि दवे ॥ ४५ ॥ कक्षित मुखमात्मनोऽनवसित हिंसापरैर्ममि दुःस्रोद्रेकमपास्तसंगधिपगा' कुर्ववि पिकामिन । बार्पा किं न विबईवि विविधै कहमने कुटिन' सांगावययोपमर्दनपरै सकपाकाक्षिण ॥४६॥ म्यापार परिमुष्प सर्चमपरं रत्नत्रय निर्मल गाणो मृशमात्मनः मुदसावारमप्रात्तोऽन्यथा । वैरी दासाबन्मगुप्तिमपने क्षिप्स्वा सदा याम त्यालोम्येति स तत्र बन्मथकिते कार्यः स्थिर कोविरे १७ मूड संपदाधिष्ठितो न विपद संपपिषिपंनिनी दुरािं बनमर्दनीमुपपतीमात्मास्मन' पश्यति प्रधम्मानंतरभुपमगमगम्माघादिमि संकल कक्ष षगा हुवाशनशिखा प्रप्लोप्य वीमिव ॥४८॥ मात्मात्मानमरूपमापविक म्पालोकपमात्मना दुप्पापां परमात्मतामनुपमामापयते निषितं । AU पन्दिर। पोखति।

सामायिक पाठः।
आत्मानं घनरूढकीचकचयः किं घर्षयनात्मना
वन्हित्वं प्रतिपद्यते न तरसा दुर्वारतेजोमयं ॥४९॥
व्यासक्तो निजकायकार्यकरणे यः सर्वदा यायते
मूढ़ात्मा स कदाचनापि कुरुते नात्मीयकार्योद्यमं ।
दुर्वारेण नरेश्वरेण महति खार्थे हठायोजिते
मीतात्मा न कथंचनापि तनुते कार्य स्वकीयं जनः ॥५०॥
लक्ष्मीकीर्तिकलाकलापललनासौभाग्यभोग्योदया-
स्त्यज्यन्ते स्फुटमात्मनेह सकला एतैः सतामर्जितैः ।
जन्मांभोधिनिमजिकर्मजनकैः किं साध्यते कांक्षितं
यत्कृत्वा परिमुच्यते न सुधियस्तत्रादरं कुर्वते ॥५१॥
हेया पा] देयविचारणाऽस्ति न यतो न श्रेयसामागमो
वैराग्यं न न कर्मपर्वतभिदा नाप्यात्मतत्त्वस्थितिः ।
तत्कार्य न कदाचनापि सुधियः स्वार्थोद्यताः कुर्वते
शीतं जातु नुनुत्सवो न शिखिनं विध्यापयंते बुधाः॥५२॥
कामक्रोधविषादमत्सरमदद्वेषप्रमादादिभिः
शुद्धध्यानविवृद्धिकारिमनसः स्थैर्य यतः क्षिप्यते ।
काठिन्यं परितापदानचतुरैहेमो हुताशैरिव
त्याज्या ध्यानविधायिभिस्तत इमे कामादयो दूरतः ॥५३॥
च्यावृत्त्येन्द्रियगोचरोरुगहने लोलं चरिष्णुं चिरं
दुर्वार हृदयोदरे स्थिरतरं कृत्त्वा मनोमर्कट
ध्यानं ध्यायति मुक्तये श्रममतेर्निर्मुक्तभोगस्पृहो
नोपायेन विना कृता हि विधयः सिद्धिं लभते ध्रुवं ॥५४॥

१८० सिदाससारादिसमो- अंदाग्रहतारकाप्रभृतयो यस्य म्पपायेऽखिला मायते सुवनप्रकाससला ध्यांतप्रतानोपमा । मविज्ञानमयप्रकाशविर पचायते योगिमि- स्तचत्वं परिषिवनीयममल देहस्थित निधिलं ॥५५॥ मज्यंतेत्यशरीरमंदिरमिद ? मृत्युदिपेन्द्र क्षणा- दित्यप्यासमिपम मानसपहिनिंग्गत्य निर्गत्य किं । पम्पतं न निरीक्षसेऽतिचकि तस्सागति तनों बैनामरषेटितानि रुपे निर्घर्मकर्मोघम ॥५६॥ करियामीद उत्तमिदमिद उस्यमघुना करोमीति व्यग्र नमसि सफल कालमफल । सदा रागद्वेषप्रययनपरं स्वार्थविमुख न बेनेपिकस्वे वचसि रमस निसिकरे ॥ ५७ ॥ वायोपि निरंतरामनुदिनं पाचां विरुक्रिया पारोपिवमानसेन रघिमिर्पोपपते कसन । मम्मापोषियः परस्परमिम निसि निफारम यचर्ममपास्प नास्ति सुवने रक्षाकरं देहिनः ॥ ५८॥ नानारमपरायणैनरपरैरम्वर्य्य यस्त्यग्मत दु प्राप्योऽपि परिग्रहस्तममिव प्रामप्रयाप्पे पुन' । आदावेव विच दु खजनर्फ तस्वं विघा दत तो मस्करिमोदकम्मतिकरं हास्यास्पद मा म्पधा ॥१९॥ खामिप्रायक्शादिमिमगतयो ये मारपत्रादय सांस्त्वं मीलपि रोपि सततं विचम्पासं प्रया

सामायिकपाठ ।
१८१
गच्छंतः परमाणवो दश दिगः कल्पांतवातरिताः
शक्यंते न कढाचनापि पुरुपरेकत्र कतुं ध्रुवं ॥ ६० ॥
भोजभोजमपाकृता हृदय ! ये भोगास्त्वयाऽनेकथा
तांस्त्वं कांक्षमि कि पुनः पुनरहो तत्राऽग्निनिक्षेपिणः ।
वृप्तिस्तेषु कदाचिटस्ति तव नो तृप्णोदयं विभ्रतो
देशे चित्रमरीचिसंचयचिते वल्ली कुतो जायते ॥ ६१ ॥
शूरोऽहं शुभधीरहं पटुरहं सर्वाधिकश्रीरह
मान्योऽहं गुणवानहं विभुरहं पुंसामहमग्रणीः ।
इत्यात्मन्नपहाय दुष्कृतकरी त्वं सर्वथा कल्पना
गश्वद्ध्याय तदात्मतत्त्वममलं नैःश्रेयसी श्रीर्यतः ॥६२॥
धृतविविधकपायग्रंथालिंगव्यवस्थं
यदि यतिनिकुरुवं जायते कर्मरिक्तं ।
भवति ननु तदानीं सिंहपोताऽविदार्य ?
शशकनलकरंध्रे हस्तियूथं प्रविष्टं ॥ ६३ ॥
कष्टं वंचनकारिणीष्वपि सदा नारीपु तृष्णा पराः
शर्माशां न कदाचनापि कुधियो मा विपाशया ।
मुंचते मृगतृष्णिकाष्विव मृगाः पानीयकांक्षा यतो
धिक्तं मोहमनर्थदानकुशलं पुंसामवार्योदयं ॥ ६४ ॥
पापाऽनोकुहसंकुले भववने दुःखादिमिर्दुर्गमे
यैरज्ञानवशः कषायविषयैस्त्वं पीडितोऽनेकधा ।
रे तान् ज्ञानमुपेत्त्य पूतमधुना विध्वंसयाऽशेषतो
विद्वांसो न परित्यजति समये शत्रूनहत्वा स्फुटं ॥६५॥

१८२ सिदान्तसारादिसमहे- असिमसिमपिविधाशिल्पिवाणिग्ययोगे स्तनुघनसुतहेसो फर्म यारोपि । सकदपि पटि साइ सयमार्य विषस्से मुखममलमनं किं तदा नाममुपेल ॥ ६६ ॥ मुखजननपटूनों पापनानां गुणानां मवति सपदि फर्श सर्वलोकोपरिस्य । प्रिदशिखरिधाऽविष्ठितस्पेह पुंसः स्वयमचनिरपस्वाज्जायते नाखिला किं॥६॥ दिनकरकरजाले शश्यपुष्णचमिदो मुरशिसरिणि जातु प्राप्यते बंगमर्थ । न पुनरिह कदाचिद् पोरसंसारचक्र स्फममुखनिधाने ग्राम्यता शर्मा पुमा ।।६८॥ कार्य कर्मविनिर्मिसंबहुविध स्मृलामुदीर्घादिमि त्मा यासि कदापनापि विकृति संरध्यमानः स्फुर्ट। रकारक्तमिवामितादिवसनरावटमानोऽपि किं रत्तारक्तसिनामिवादिगुणितामापयत विग्रह ॥६॥ गोरो रुपयगे रख परित स्पल कम कर्वशो गीपाणो मनुज पशुनरफम् पदः पुमानंगना । मिथ्या चं विदधामि कसनमिट मूठोवियुध्यात्मनो नित्यं मानमपम्बमावममलं सर्वम्पपापप्पुत 11७०।। सम्बारंभपापसंगरहितं गुदोपयोगोपत नपं परमात्मना विकलितं मायम्पपेधातिगं ।

सामायिकपाठ ।
१८३
तन्निःश्रेयसकारणाय हृदये कार्य सदा नापरं
कृत्यं कापि चिकीर्पयो न सुधियः कुर्वति तद्ध्वंसकं ॥७१॥
यो जागर्ति शरीरकार्यकरणे वृत्ती विधत्ते यतो
हेयादेयविचारशून्यहृदये नात्मक्रियायामसौ ।
खार्थ लन्धुमना विमुंचतु ततः शश्वच्छरीरादरं
कार्यस्य प्रतिबंधके न यतते निष्पत्तिकामः सुधीः ॥७२॥
भीतं मुंचति नांतको गतघृणो भैपीद्वथा मा ततः
सौख्यं जातु न लभ्यतेऽभिलपितं त्वं मामिलापीरिदं ।
प्रत्यागच्छति शोचितं न विगतं शोकं कृथा मा वृथा
प्रेक्षापूर्व विधायिनो विदधते कृत्यं निरर्थ कथं ॥७३॥
स्वस्थ कर्मणि शाश्वते विकलिले विद्वज्जनप्रार्थिते
संप्राप्ये रहसात्मना स्थिरधिया त्वं विद्यमाने सति ।
बाह्यं सौख्यमवाप्तुमंतविरसं किं खिद्यसे नश्वरं ।
रे सिद्धे शिवमंदिरे सति चरौ मा मूढ ! भिक्षां भ्रमः ॥७४॥
अभिलपति पवित्र स्थावरं शर्म लब्धु--
धनपरिजनलक्ष्मी यः स्थिरीकृत्य मूढः ।
जिगमिषति पयोधेरेप पारं दुरापं
प्रलयसमयवीची निश्चलीकृत्य शंके ॥ ७५ ॥
ये दुःखं वितरंति घोरमनिशं लोकद्वये पोषिता
दुर्वारा विषयारयो विकरुणाः सर्वांगशाश्रथाः ।
प्रोच्यते शिवकांक्षिभिः कथममी जन्मावलीवर्द्धिनो
दुःखोद्रेकविवर्धनं न सुधियः कुर्वति शार्थिनः ॥६॥

सिसान्तसारादिसणार- दूर्वाण परिणाममेति पिमल स्वर्गापवर्गभिपं प्राणीकस्मलमुमदुःखदनिका शुमादिरीति यत । गृहणाना ? परिणाममाधमपरं मुसि संतखत कुर्वतीद कस कदापिदहित हित्वा हिसं धीपनाः ॥७॥ नरकगमिमन्द मुदर स्वर्गवास शिवपदमनवयं यावि भुर्दग्कमा । फटमित परिणामभेवन पोप्यमान- रिति शिवपदकामेस्त विधेमा विश्वदा ॥ ७८ ॥ बभ्राणामविसमर्मतरहिवं दुसमन्योन्यज दाहाछेदविमेदनादिजनित दुख विरमों पर । नृणां रोगवियोगजन्ममरण स्वर्गोका मानसं । विश्व वीक्ष्य सदति कष्टकलित कार्यामतिर्मतये ॥ ७ ॥ कार्य रूपमिव धपेन सलिले सांसारिक सर्षया सर्म नम्पति पस्नतेऽपि रचित करवाश्रम दुफरें । पचप्रापि पिपीयवे बस इतो मूर! प्रतिस्त्वया कृत्ये कापि हि फेवलपमकरे न व्याप्रियते पुषा ॥ ८०॥ चित्रोपद्रवसंकलामुरुमलो नि स्वस्पा संरति भक्ति निस्पनिरंवोमससुखामापचिमिर्वजितो। प्रादी फोपि कपायमोदितमवि! तस्वसो पुघ्पते सरस्वा मतिमनुत्तमामपरया किं संस्तो रव्यते ॥८॥ रे दुखादयकारणं गुरुवरं पम्नति पापं बनाः हर्वाणा परकायया माहविषा हिंसापराः पक्रियाः ।

सामायिकपाठः ।
१८५
नीरोगत्वचिकीर्षया विदधतो नापथ्ययुक्तीरमी
सर्वांगीणमहो व्यथादयकरं किं यांति रोगोदयं ॥ ८२ ॥
रौद्रैः कर्म महारित्तिर्तव ? वने योगिन ! विचित्रश्चिरं
नायं नायमवापितस्त्वमसुखं यैरुचकैर्दुःसहं ।
तान् रत्नत्रयभावनासिलतया न्यकृत्य निर्मूलतो
राज्यं सिद्धिमहापुरेऽनघसुखं निष्कंटकं निर्विश ॥ ८३॥
यो वाह्यार्थ तपसि यतते बाह्यमापद्यतेऽसौ
यस्त्वात्मार्थ लघु स लभते पूतमात्मानमेव ।
न प्राप्यन्ते वचन कलमाः कोद्रवै रोप्यमाणै-
र्विज्ञायेत्थं कुशलमतयः कुर्वते स्वार्थमेव ।।८४॥
कांतासमशरीरजप्रभृतयो ये सर्वथाऽप्यात्मनो
मिन्नाः कर्मभवाः समीरणचला भावाबहिर्भाविनः ।
तैः संपत्तिमिहात्मनो गतधियो जानंति ये शर्मदां
स्वं संकल्पवसेन ते विदधते नाकीशलक्ष्मीः स्फुटं ॥८५॥
यद्रक्तानां भवति भुवने कर्मबंधाय पुंसां
नीरागाणां कलिमलमुखे तद्धि मोक्षाय वस्तु ।
यन्मृत्यर्थ दधिगुडघृतं संनिपाताकुलाना
नीरोगाणां वितरति परां तद्वि पुष्टिं प्रकृष्टां ॥८६॥
सम्यग्दर्शनबोधसंयमतपःशीलादिभाजोपि नो
संक्लेशो विनिवर्त्तते भवभृतो लोभानलं विभ्रतः।
विभ्राणस्य विचित्ररत्ननिचितं दुष्प्राप पारंपयः
संतापं किमदन्यतो न कुरुते मध्यस्थितो वाडवः ॥८७॥

१८६ सिदान्तसारादिसंप्रहे-- मोहांधाना स्फरति इये पासमात्मीयमुश्पा निर्मोहानो म्पपगवमल शायदात्मय नित्य' । पचमेदं यदि विविदिपा ते स्वकीय स्वकीय म्मोहे चित्त ! धपपसि सदा किं न दुष्टं धपेन ।। ८८॥ खात्मारोपितशीलसपमभरास्त्पत्कान्पसाहायका कायेनापि विलक्षमाणदया साहायफ मुन्वते । तप्यते परदुष्कर गुरुवपस्तत्रापि ये निस्पृहा मन्मारप्पमसीय भूरिमयद गच्छति ते निर्वाति ॥८९॥ पूर्ण कर्म करोति दुस्समम सौम्यं शुमं निर्मित विदायेयधुर्म निहंतुमनसो मे पोपर्यते तप । जाते समसंयमैकनिधयस्ते दुर्मीमा योगिनो ये त्वनोमयकर्मनाशनपरास्तेपी किमत्रोच्यते ॥९० ॥ पिच्छेयं यहुदीय्ये फर्मरमसा ससारविस्तार साधूनामदयाग स्वयमदं विच्छेदन का भम' । यो गस्था विजिगीपुणा बलवसा वैरी ठान्यते नाहत्या गामागत' स्वयमसौ संस्पज्यते कोविदः॥९॥ अबति पृष्ठमपस्वाद्गममाऽर्थवासे मतभरमपरिष्टाचत्र संत्सम्यमाने । इक्कादयवान ! यसलाम अतिहि दुरिता तेन संगै त्रिपापि ॥ ९२ ॥ सपो वि दुरंतसंस्कृतिकरे यत्नके पातक मुदपये विमत विभाप मलिनं सत्सेवते यस्तप ।

सामायिकपाठः । १८७ शुद्धिं याति कदाचनापि गतधी सावद्यावर्जक ? एकीकृत्य जलं मलाचिततनुः स्नातः कुतः शुद्धति ॥९३॥ लब्ध्वा दुर्लभभेदयोः सपदि ये देहात्मनोरतरं दग्ध्वा ध्यानहुताशनेन मुनयः शुद्धेन कमधनं । लोकालोकविलोकिलोकनयना भूत्त्वाद्विलोकार्चिताः पंथानं कथयंति सिद्धिवसतेस्ते संतु नः शुद्धये ॥ ९४ ॥ येपां ज्ञानकृशानुरुज्वलतरः सम्यक्त्ववातेरितो विस्पष्टीकृतस-तत्त्वसमितिर्दग्धे विपापैधसि । दत्तोत्तप्तिमनस्तमस्ततिहतिर्देदीप्यते सर्वदा नाश्चर्य रचयंति चित्रचरिताश्चारित्रिणः कस्य ते ॥९५॥ यावच्चेतसि बाह्यवस्तुविषयः स्नेहः स्थिरो वर्तते तावनश्यति दुःखदानकुशलः कर्मप्रपंचः कथं । आर्द्रत्वे वसुधातलस्य सजटाः शुष्यति कि पादपा भृत्वत्तापनिपातरोधनपराः शाखोपशाखान्विताः ॥९६॥. चक्री चक्रमपाकरोति तपसे यत्तन्न चित्रं सतां सूरीणां यदनश्वरीमनुपमां दत्ते तपः संपदं तचित्रं परमं यदत्र विषयं गृह्णाति हित्त्वा तपो दत्तेऽसौ यदनेकदुःखमवरे भीमे भवांभोनिधौ ॥१७॥ रामाः पापा विरामास्तनयपरिजना निमिता वहना गात्रं व्याध्याधिपात्रं जितपवनजवा मूढलक्ष्मीरशेषा किं रे दृष्टं त्वयात्मन् ! भवगहनवने भ्राम्यता सौख्यहेतु- येन त्वं स्वार्थनिष्टो भवसि न सततं वाह्यमत्यस्य सर्वं ॥९८.

१८८ सिदाम्पसासिमरे- सम्यक्त्वज्ञानाचयमनपमृत झानमात्रेम मृहा लंपिया जन्मदुर्ग निरुपमितमुखां ये पिसासंति सिहं । से सिभीपति नूनं निवपुरमदर्षि पाहुयुग्मेन वीस्यो कल्पांतोत्सूतवानक्षुमिसजलचरासारफीणान्तराल ।। ९९ ॥ ये बाचा मवमुक्तिकारणगर्म मुचा सदा शुरुधा कत्वा घेतसि मुक्तिकारणगणं प्रेधा विमुच्यापरं । मन्मारम्पनिम्दनक्षममरं जैन सप' इनसे वेपो जन्म च नीवित पसकले पुम्पात्मनो योगिनां॥१०॥ यो नि भेयसशर्मदानकुशल संत्यम्प रत्नत्र मीम दुर्गमदनोत्यकर भोग मिथ सेवते मन्ये प्रायविपर्ययादिजनक हालाहल परमते सयो मन्मपतिपक्षयकर पीयपमत्यस्य स' ॥१०॥ मपति मविन' सौसम्म दुवं पुराकसकर्मम' स्फरति इदये रागो देप कदाचन मे कयं । मनसि समतां विधायेत्यं वमोर्षिदघातिय क्षपपति सुपी पूर्व पार्प पिनोति न नतनं ॥ १०२॥ क्षपयितुमना कर्मनिष्ठ तपोमिरनिंदित नयति रममा पदि नीच' पायपरायणः । पुषजनमते कि मैपग्यनिमुदितमुपत प्रयपति गर्द तं नापथ्यात् कदर्षितनिग्रहं ॥१०३॥ सदस्नत्रयपोपणाप वपुपस्ताम्यस्म रया परा दर्शयेशनमात्र गक्षमतं धम्मोकिंमिरमिः ।

सामायिकपाठ । १८९ लज्जते परिगृह्य मुक्तिविपये बद्धस्पृहा निस्पृहा- स्ते गृह्णन्ति परिगृहं दमधराः किं संयमध्वंसकं ॥१०४॥ ये लोकोत्तरते च दर्शनपरां दूतीं विमुक्तिश्रिये रोचंते जिनभारतीमनुपमा जल्पंति शृण्वंति च लोके भूरिकपायदोषमलिने ते सज्जना दुर्लभा ये कुचंति तदर्थमुत्तमधियस्तेपां किमत्रोच्यते ॥१०५॥ ये स्तूयां जन्मसिंधोरसुखमितिततेलीलया तारयित्त्वा नित्यं निर्वाणलक्ष्मी बुधसमितिमतां निर्मलामप्यते । स्वाधीनास्तेऽपि यत्तदव्यपगतमतिभिर्ज्ञानसम्यक्त्वपूर्जाः पोष्यंते नान्यपेक्षां मम परममुभौ विद्यते नात्र चित्रं ॥१०६॥ ध्रुवापायः कायः परिभवभवाः सर्वविभवाः सदानार्या भार्याः स्वजनतनयाः कार्यविनयाः असारे संसारे विगतशरणे दत्तमरणे दुराराधे गाधे किमपि सुखदं नापदपदं ॥ १०७ ।। असुरसुरविभूनां हंति कालः श्रियं यो भवति न मनुजानां विघ्नतस्तस्य खेदः विचलयति गिरीणां चूलिकां यः समीरो गृहशिखरपताका कंपते किं न तेन ॥ १०८ ॥ सकललोकमनोहरणक्षमाः करणयौवनजीवितसंपदः कमलपत्रपयोलवचंचलाः किमपि न स्थिरमस्ति जगत्त्रये ॥ १०९ ॥ बलवतो महिपाधिपवाहनो निरूनिलिंपपतीनपहंति यः सिदान्तसारादिसमहे- अपरमानववगविमर्दने, भवति तस्स कदाचन न भमः ॥११०॥ स्वजनसंगविरेव विवाविनी भवति योमनिका बरसा रसा विपदवैति सखी बच संपद किमपि शर्मविधायि न भ्यते ॥११॥ सचिषमंत्रिपदासिपुरोहिसा भिदाखेघरदैस्यपुरंदराः। मममटेन पुरस्कृतमातुरं मयमृत प्रमपि न रक्षितु ॥ ११२॥ पतरुतोऽयनतोपि विपयते पदि जनो न दापरयः कर्य । यदि निहति शिटु बननी हिता न परमस्ति तदा शरम वर्ष ॥ ११३ ।। विविधसंग्रहकल्मपर्मगिनो विदषगकुष्टचकहतये। अनुमवत्यमुख पुनरेकका नरफनासमपेस्प सुदस्सा ॥ ११४ ॥ वसनपाइनमोमनमंदिर सुखकरभिरपासमपासि । मनति या सम न कलेवर किमपरं पत! तम गमिप्पति ।।११५॥ सप नागमदो दमपति ये फपममी विपपा न परं नरें ।

सामायिकपाठः । १९१ समददंतिमदं दलयंति ये न हरिणं हरयो रहयंति ते ॥११६॥ मरणमेति विनश्यति जीवित द्युतिरटौति जरा परिवर्द्धते प्रचुरमोहपिशाचवशीकृत- स्तदपि नात्महिते रमते जनः ॥११७॥ जननमृत्युजरा नलदीपितं जगदिदं सकलोऽपि विलोकते। तदपि धर्ममतिं विदधाति नो रममना विषयाकुलिनो जनः ॥११८॥ कचन भजति धर्म काप्यधर्म दुरंतं कचिदुभयमने शुबोधोऽपि गेही कथमिति गृहवामः शुद्विकारी मलाना- मिति विमलमनस्कैस्त्यज्यते स त्रिधापि ॥११९॥ सर्वज्ञः सर्वदर्शी भवमरणजरातकशोकव्यतीतो लब्धात्मीयस्वभावः क्षतसकलमलः शश्वदात्मानपायः। दक्षैः संकोचिताक्षर्भवमृतिचकितेोकयात्रानपेक्ष- नष्टावाधात्मनीनस्थिरविशदसुखप्राप्तये चिंतनीयः ॥१२०॥ वृत्तविंशशतेनेति कुर्वता तत्त्वभावनां । सद्यो मितगतेरिष्टा निर्वृतिः क्रियते करे॥१२१ ॥ इति द्वितीयभावना समाप्ता । * * अस्यायेकेत्र 'प्रेसफापा' संप्राप्ता सापि प्रायोऽशुद्वा एव ।

सिरिपउमपंडिमुणिमा राम
धम्म-रसायण ।
पमिळण देवदर्ष परणिदणरिंदांदपुपचलणं ।
पार्थ बस्स अमंत लोयालोय पपासेद ॥ १॥
नवा टेयदे धरणेमनरेन्वेन्द्रस्तरापरणे ।
भाने यस्पानन्त छोकाको प्रकाशपति ।।
हजमममोरिराम जाइजरामरणदुक्खणासयर ।
सहपरलोपहिब (द)स्थ घम्भरसारमं वोच्छं ॥२॥
मुफ्बनमनोऽमिराम जातिमरामरणदु सनाशकरे ।
इहपरलोकहितार्थ से धर्मरसायनं वक्ष्ये ।।
धम्मो विलोपा धम्मो सरणं हवे तिपणस्स ।
घम्मेण पूमणीओ होइ परो सबठोयस्स ॥ ३ ॥
धर्म त्रिलोकसन्धु धर्म शरणं ममेत् त्रिभुवनस्य ।
धर्मेण पूजनीय भवति नर सर्मछोकस्य ।।
धम्मेण कृल पिठलं घम्मेण य दिध्यस्वमारोग ।
पम्मेण वए फिची पम्मेण होर मोहगं ॥४॥
धर्मेण फुल पिपुर धर्मेण पदम्परूपमारोग्यं ।
धर्मेण जगति कीर्ति धर्मेण भवति सामाम् ।।
परमवणमाणमाइमसपणासणयाणमोयणाम ।
परजुवनस्पुभूमज संपती होइ धम्मेण ॥५॥

धम्म-रसायण। वरभवनयानवाहनशयनासनयानभोजनाना च। वरयुवतिवस्त्रभूपणाना सप्राप्ति भवति धर्मेण ॥ तं णत्थि ज ण लब्भइ धम्मेण करण तिहुयणे सयले । जो पुण धम्मदरिदो सो पावइ सव्वदुक्खाई ॥ ६ ॥ तन्नास्ति यन्न लभते वर्मेण कृतेन त्रिभुवने सकले । यः पुन: धर्मदरिद्र स प्राप्नोति सर्वदुःखानि ॥ जो धम्म ण करंतो इच्छइ सुक्खाई कोइ णिब्बुद्धी । सो पीलऊण सिकयं इच्छइ तिल्लं णरो मूढो ॥७॥ यो धर्ममकुर्वन् इच्छति मुखानि कश्चित् निर्बुद्धि । स पीलयित्वा सिकतामिच्छति तैल नरो मूढ सव्वो वि जणो धम्मं घोसई ण य कोइ जाणइ अहम्मं । धम्माधम्मविसेसं णाऊण णरेण घेतव्वं ॥८॥ सर्वोऽपि जन वर्म घोषयति न च कश्चिजानाति अधर्म । धर्माधर्मविशेष ज्ञात्वा नरेण गृहीतव्यं । खीराई जहा लोए सरिसाइं हवंति वण्णणामेण । रसभेएण य ताई वि णाणागुणदोसजुत्ताई ॥९॥ क्षीराणि यथा लोके सदृशानि भवन्ति वर्णनामभ्या । रसभेदेन च तान्यपि नानागुणदोषयुक्तानि ॥ काई वि खीराई जए हवंति दुक्खावहाणि जीवाणं । काई वि तुहि पुहिं करंति वरवण्णमारोग्गं ॥१०॥ कान्यपि क्षीराणि जगति भवन्ति दु खप्रदानि जीवाना। कान्यपि तुष्टि पुष्टिं कुर्वन्ति वरवर्णमारोग्यम् ॥ १ घोसय णड पुस्तके पाठ । • धम्मधम्म पुस्तके पाठ ।

सिमान्तसारादिसप्रह- धम्मा य वहा छोए अणेय मेया हवंति णापम्या । गामेण समा सम्धे गुणेण पुण उचमा फेई ॥ ११ ।। भर्माच तया छोक अनेफभेदा मपन्ति बातम्पा । माम्ना समा सर्ये गुणेन पुनरुत्तमा फेचित् ।। पार्वति येइ दुषवं पारयतिरियरमाणुस्सबोणीस । पार्षति पुणो दुनखं कई पुणु हीणदेवः ॥ १२ ॥ प्राप्नुवन्ति केचिर म्न नारकतिर्यामानुषयोनिषु । प्राप्नुवन्ति पुमर्द से कषित् पुन हीन्देपत्त ॥ पार्यति फेह धम्मादो माणुमसोक्खाइ देवसोपखाई । अब्वायाहमणोषमअगतसोरख च पार्वति ॥ १३ ॥ प्राप्नुवन्ति फेषिदर्मत मानुपसौस्यानि देवसोमपानि । अम्पावाधमनुपमानन्तसारस्य च प्राप्नुवन्ति ॥ सम्हा हु सम्बधम्मा पक्खियम्या गरेण इसलेण मो धम्मो गहियम्मो नो दोसेहिं विवजिओ विमलो॥१४॥ तस्मादि सर्वधर्मा परीक्षिसम्पा नरेण कुशछेन । स धर्मो गृहीसम्यो यो दोपैर्विवमितो बिमछ । जत्व हो जीवामं मासिजा बस्य अलिपपरमं च । अस्प परदम्बार सेविजद अत्य परयाम ॥ १५ ॥ पत्र वधो नीवाना भाम्पते मत्रालीकवचन च । यत्र परद्रम्पारण सेम्पत पत्र पाङ्गना। पहुआरंमपरिम्गागहम संवोसपश्रियं वस्य । पंशुबरमहुमांसं मक्खिमा बस्य पम्मम्मि ॥ १६ ॥ बहारंभपरिमहमहर्ण सन्तोपर्मित यत्र । पंचोदुम्मरमधुमासानि मापने यत्र धर्मे ॥

धम्म-रसायण । १९५ डंभिजइ जत्थ जणो पिजइ मज्ज च जत्थ बहुदोसं । इच्छंति सो वि धम्मो केइ य अण्णाणिणो पुरिसा ॥१७॥ दम्भ्यते यत्र जन पीयते मद्य च यत्र बहुदोष । इच्छान्त तमपि वर्म केरिन्च अज्ञानिन· पुरुपाः ।। जइ एरिसो वि धम्मो तो पुण सो केरिसो हवे पावो। जइ एरिसेण सग्गो तो णरयं गम्मए केण ॥ १८॥ यद्येतादृशोऽपि धर्मस्तर्हि पुनः तत्त्कीदृश भवेत्पापं । यद्येतादृशेन स्वर्गः तर्हि नरके गम्यते केन । जो एरिसियं धम्म किजइ इच्छेइ सोक्ख भुंजेउं । वावित्ता णिवतरं सो इच्छइ अवफल्लाई ॥ १९ ॥ • य एतादृश धर्म करोति इच्छति सौख्य भोक्तु । उप्त्वा निम्बतरु स इच्छति आम्रफलानि ।। धम्मोत्ति मण्णमाणो करेइ जो एरिसं महापावं । सो उप्पज्जइ णरए अणेयदुक्खावहे मीमे ॥२०॥ धर्म इति मन्यमान करोति य एतादृश महापाप । स उत्पद्यते नरके अनेकदुःखपथे भीमे ॥ तत्थुप्पण्णं संतं सहसा तं पक्खिऊण णेरइया । सरिऊण पुचवहरं धावंति समंतदो भीमा ॥ २१ ॥ तत्रोत्पन्न सन्त सहसा त प्रेक्ष्य नारका । स्मृत्वा पूर्ववैर वावन्ति समन्ततो भीमा ॥ असिसुफरसमोग्गरसत्तितिमूलेहिं सेल्लकोंतेहिं । कोहेण पजलंता पहरंति सरीरयं तस्स ॥ २२ ॥ असिसुफरशमुद्गरशक्तित्रिशूलै. शेलकुन्तैः । क्रोधेन प्रज्वलन्त प्रहरन्ति शरीरक तस्य ।।

सिदान्तसारादिसंप्रह- गापहारविद्धो मुच्छ गंवण महियल पहा । आइकर एहिं तस्य विमिजा तिक्षेहि सव्यंग ॥२३॥ गदाप्रहारमिद मी गत्वा महीतले पतति । मतिकटक तत्र विमियत तीण साय।। सद्ग पेपपाए पुमरवि चिंतेइ फि इमे सम्बे । पहरेति मन्म देई अपंता कायवयणाई ॥२४॥ टम्प्या पेतना पुनरपि चिन्तयति किं इमे सर्वे । प्रहरन्ति मम बसन्त कटुवचनानि ॥ देवपपियरणिमित्तं मसोसहिजागभयणिमित्तेण । में मारिया पराया भणेय जीवा मए आसि ॥२५॥ देवतापितमिमित्त मंत्रोपभियागमयनिमित्तेन । पे मारिता वगका भमेक्त्रीवा मया भासन् ॥ वं परिमाणविरहिया परिग्गहा गिणिया मए बासि । में खाघ महुमंस पंईवर जिबरेण ॥२६॥ मस् परिमाणविरहिता परिमहा गृहीता मया भासन् । पत् सादित मधुमास पंचोदुबराणि निम्हालम्भेन । भासिम असर्व तेणिकर्ज मए कर आसि । सं विलमेचमुहरवं परटार सेपियं मासि ॥२७॥ पदापित असस्पै स्तेनहाप मपा हतं भासीत् । पतिस्मात्रमुसा परदारा सविता भासन् । से पीय सुरमार्य मंच वणो रेमिमो मए सब्यो। वस्स हु पावस्स फर्स वं मार्य परिर्स दुक्ख ॥२८॥ यत्पीता मुरा पप जमो दमिठो मया सर्व । तम्प हि पापस्प फळे यग्नात एतादरी दुमम् ।।

चम्म-रसायण' । १९७ णाऊण एव सव्वं पुन्वभवे जं कर्य महापावं । अइतिव्ववेयणाओ असहतो णासए सिघं ॥ २९ ॥ ज्ञात्वैव सर्व पूर्वभवे यत्कृत महापाप । अतितीव्रवेदना असहमान नश्यति शीघ्र सो एवं णासंतो णरड्यभयेण असरणो संतो। पड्सइ असिपत्तवणे अणेयदुक्खावहे भीमे ।। ३० ।। स एव नश्यन् नारकभयेन अगरण सन् । प्रविशति असिपत्रवने अनेकदु.खपथे भीमे ॥ तत्थ वि पडंति उवरिं फलाई जहाई असहणिज्जाई । लग्गति जत्थ गत्ते सइ चुण्णं तत्थ कुव्वंति ॥ ३१ ॥ तत्रापि पतन्ति उपरि फलानि जटानि असहनीयानि । लगति यत्र गात्रे सकृच्चूर्ण तत्र कुर्वन्ति ।। पत्ताई पडंति तहा खंडयधारन्य सुहु तिक्खाई । ताई वि छिदंति पुणो अंगोवंगाई सव्वाई ॥ ३२ ॥ पत्राणि पतन्ति तथा खड्गधारावत् सुष्ठु तीक्ष्णानि । तान्यपि छिन्दन्ति पुन अङ्गोपाङ्गानि सर्वाणि ॥ णीसरिकं सो तत्थ वि असहंतो एरिसाइं दुक्खाई। वेएण धावमाणो पव्वयसिहरं समारुहइ ।। ३३ ॥ नि सृत्य स ततोऽपि असहमान एतादृशानि दुखानि वेगेन वानन् पर्वतशिखर समारोहति ॥ तत्थ वि पव्वयसिहरे णाणाविहसावया परमभीमा । तिक्खणहकुडिलदाढा खादंति मरीरयं तस्स ॥ ३४ ॥ नत्रापि पर्वतशिखरे नानाविधशावका परमभीमाः । तीक्ष्णनखकुटिलदाढा खादन्ति गरीर तस्य ।।

सिद्धान्तसारादिसमह- सेसि मएण पुमो भावतो उत्तर भूमीए । गच्छा परणीए विण्हाए पीडिभो संतो।। ३५ ।। तेषां भयेन पुन घाबन् उच्चरति भूमौ । गम्छति पैतरण्या सृष्णया पारित सन् ॥ सुरको विजिन्सकठो तस्य जलं गेडिळण पिषमाणो । उहेम तेण उज्मद हत्पम्मि मुहम्मि ओठम्मि ॥ ३६ ॥ शुष्क विप्यकाठ तत्र जर्छ गृहीत्वा पिजन । उष्णेन तेन दपते हस्तेषु मुम ओष्ठ । सक्खाए संतचो अलावो किंचि अण्णमाहारं । पेपरपीए फूले गिहिल्या मष्ट्रिय भाइ ॥ ३७ ।। घुमाया संरत भलभमान फिदिममाहारे । वैतरण्पा का गृहीत्वा मृत्तिका नादति ॥ गाए पुणो वि रज्या लोहंगारेहिं पचलंताए । पोराए कहपाइअश्यमयसाणगेषाए ॥३८॥ तया पुनरपि दपते लोहाहारै प्रग्वलन्स्पा । घोरपा कटुकतिमयश्वगन्धया ।। सो एवं अच्छतो गइछले पिच्छिम पारश्मा । काम पमाणा पुणरषि पार्षसि पाविष्ठा ॥२९॥ तमेवं विप्ठन्न नीपुळे दृष्ट्वा नामका । कटुकानि यस्पात पुनरपि धाबन्ति पापिष्ठा ॥ एप पडताए पतचलम पजतताए । बैमरणीए मम्मे पप्पति अगप्पपसिया हु॥४०॥ बेगैन पहनस्या प्रक्ततपत् प्रम्पमस्या । पतरण्या मध्ये प्रविशति मनारमपशिक हि॥

वम्म-रसायण। १९९ तत्थ वि पावह दुक्खं डझंतो पज्जलंतसलिलेण । छोडीजंतसरीरो तिक्खाहि सिलाहि घोराहि ॥४१॥ तत्रापि प्राप्नोति दुःख दहन प्रज्वलितसलिलेन । स्पृष्टशरीर तीक्ष्णाभि, शिलाभि. घोराभि. ॥ सो एवं बुईतो कह वि किलेसेहि तत्थ णीसरए । णीसरिओ वि हु संतो धरंति बंधति ोरइया ॥ ४२ ॥ स एवं ब्रुडन् कथमपि क्लेशै ततो निःसरति । निःसृतमपि हि सन्त धरन्ति बध्नन्ति नारका ॥ जस्स रडंतस्स पुणो उपहाए णिक्खंति सिगदाए । उद्धरिऊण सदेहं णासह तं दुक्खमसहंतो ॥ ४३ ॥ ते रुदन्तं पुन• उष्णाया निखनन्ति सिकताया । उत्थाय स्वदेह नाशयति त दु.खमसहमान । पुणरवि धरंति भीमा णेरड्या तस्स पावयम्मस्स । मस्सउमछियं ? करति हु छुहंति तह खारयंक्रम्मि ॥४४॥ पुनरपि धरन्ति भीमा नारकास्त पापकमार्ण । ॥ . णीसरिऊण बराओ णासंतो खारयंकमड्डओ ? । पुव्वुत्तकमेण पुणो धरति ते तस्स णारडया ॥४५॥ नि सृत्य बराक नश्यन् पूर्वोक्तक्रमेण पुन' बरन्ति ते त नारका ॥ मरणभयमीख्याणं जीवाणं जो हु जीवियं हरइ । गरयम्मि पावयम्मो पावइ तह बहुविहं दुक्खं ।। ४६ ॥ मरणभयभीरूणा जीवाना यो हि जीवित हरति । नरके पापकर्मा प्राप्नोति तथा बहुविध दुःख ॥

सिद्धान्तसारादिसंबई- पीलंति बहा इसम्म् जन छुदिऊण नस्म अवसस्स । उम्पति भुणं (ण) चुर्ण सम्पमरीरं मुसंटीहिं ।। १७॥ पेरुपन्ति यया इसून यंत्रे निधाय वमम । मन्ति धूर्णणे मर्मधरी मुशलः । चक्केहि करकयेहि य अंग फाति गेवमाणस्म । सिंघवि पापपम्मा पुणरवि सारण सलिलेग ॥५८|| चा झपय सह मिटारयन्ति म्दन । मिचन्ति पापकर्माण पुनरपि क्षारेण मलिटेन ॥ अति सम्पदई तिरससलाएहि अग्गिवण्याहि । णासपिपएसेसु य मिठति जलंवि मूईहि ॥४९॥ छिति सपा माणशलाकाभि भग्निवर्णाभि । नम्बसन्धिप्रदेशषु च मिदन्ति भ्यामि सूचीभि ।। पारिघा भूमीए पाएहि मलति पानयम्मस्प । सिंमारयाण उपरि अंगे पेरण लोदति ॥५०॥ पातयित्वा भूमा पनि मलम्ति पापकर्माण । सिंघाटफानामुपरि मंगे वगेन टोदन्ति । । भलिपस्म फलेण पुणो गीयाए पंपिम पापहि । तस्स य समति जीहा समूला मायमा ।। ५१ ।। अधीकस्य फोन पुन पित्वा परे। तस्प प मनन्ति मिम्हा सम्ला हि नारका || रवि दो वि हत्था टेणिकफलेम दिग्ससीए । सुसम्मि पुति पुषो जारहया सुदु तिक्सेहि ॥५२॥ वग्यन्ति दामपि इस्वी स्फम्यछेन तीक्ष्णश्या । शू? स्पयन्ति पुन नारका सुष्ठ सीणे ॥

चम्म-रसायण । २०१ परदारस्स फलेण य आलिंगावंति लोहपडिमाओ । ताओ डहंति अंग तत्ताओ अग्गिवण्णाओ ॥५३ ।। परदाराणा फलेन च आलिङ्गयन्ति लोहप्रतिमा ॥ ता दहन्ति अग तप्ताः अग्निवर्णा ॥ तत्ताइं भूसणाई चित्ते परिहावंति अग्गिवण्याई । ताइ वि डहंति अंगं परमहिला (हि) सेण फलेण ॥ ५४ ॥ तप्तानि भूपणानि चित्ते परिवारयन्ति अग्निवर्णानि । तान्यपि दहन्ति अग परमहिलामिलापण फलेन ॥ तस्स चडावंति पुणो णारड्या कूडसम्मलीयाओ। तत्थ वि पावइ दुक्खं फाडिज्जंतम्मि देहम्मि ॥ ५५ ॥ ने आरोहयन्ति पुन नारका कूटशाल्मलिषु । नत्रापि प्राप्नोति दु ख विदारिते देहे ॥ जे परिमाणविरहिया परिग्गहा गेण्हिया भवे अण्णे । तेसिं फलेण गरुयं सिलिं चडावंति खंधम्मि ॥ ५६ ॥ ये परिमाणविरहिता परिग्रहा गृहीता भवे अन्यस्मिन् । तेषा फलेन गुरुका गिला वरन्ति स्कन्धे । पायंति पज्जलंतं महुमज्जफलेण कलयं ? घोरं । पंचुंबरफलभक्खणफलेण खावंति अंगार ॥ ५७ ॥ पाययन्ति प्रज्वलन्तं मधुमद्यफलेन लोहरस घोर । पचोदुम्बरफलभक्षणफलेन खादयन्ति अङ्गाराणि ।। मांसाहारफलेण य सव्वंग सुदृउव्व पोलंति ॥ वल्लूरम्मि पित्तया वा ? कप्पंति अणप्पवसियस्स ॥ ५८ ॥ मासाहारफलेन च सर्वाङ्ग कम्पयन्तिअनात्मवशस्य ॥

२०२ मिदान्ससारानि सेग्रह- ऊमीपागेसु पुणो देह पचति पावसम्मस्म । पीसंवि पुणो पावा जं संघ को वि भोगच्छी ।। ५९ ॥ कुंमीपाकेषु पुन दे पाचमति पापकर्मण । पेपयति पुन पापा परकम् कोऽपि भागली ! ॥ भूमीप्तम देह अल्लय धम्म च मस्स सिल्लिया। पार्वति दुहहियया तिरखतिम्लेहिं पेरण्या ।। ६० ॥ पावन्ति दुपाट्यास्तीक्ष्णत्रिशूलै नारका ॥ खासंति साणसीहावयवग्मा अपमाहिदहिं। अहावया सियाला मज्जारा फिमसप्पा य ।। ६१ ॥ सादन्ति वसिंहकम्याघ्रा भष्ठापदा शुगाला माजरा कृष्णसर्पाच ।। पापस्सगिदकका पिपीलिया वहा उंमा । मसगा य महुपरीओ जलमाओ तिरखतुंगओ ।। ६२ ।। पापसगुषकका पिपीलिका मकुणास्वथा देशा । मशकाय मधुर्य जकास्तीष्णतुणा ॥ दंवि एक्कपथ्ये बहुदठया हिणारया ।। पुम्यकपपावसम्मा मासेवा कासवपणाओ ॥ १३ ॥ दंग्यन्ति एकपर्व पादरका हि नारका । पूषकतपापकर्माणो भापमाणा कदुकपचमानि ॥ पारायाण वरं हेचसहावेम हो पाया । मजारम्सयाण बारे उल्लसप्पामं ॥ ६४ ॥ मारकाणा र क्षेत्रस्यभामेन भवति पापाना। मा रम्पकार्मा यथा र नकुलसीणा ।।

चम्म-रसायण । २०३ सब्वे वि य णेरड्या णपुंसया होति हुंडसंठाणा । सव्वे वि भीमरुवा दुल्लेसा दव्यभावेण ॥ ६५ ॥ सर्वेऽपि च नारका नपुंसका भवन्ति हुडकसस्थाना । सर्वेऽपि भीमरूपा दुर्लेश्या द्रव्यभावेन ।। णिरए सहाव दुक्खं होइ सहावेण सीयउण्हं च । तह हुंति दुस्सहाओ घोराओ मुक्खतण्हाओ ॥ ६६ ॥ नरके स्वभावेन दु ख भवति स्वभावेन शीतोष्णे च । तथा भवत दु सहे घोरे क्षुत्तष्णे ॥ जइ वि खिविज्जे कोई णरए गिरिरायमेत्तलोहुंडं । धरणियलमपावेतो उण्हेण विलिज्जए सव्वो ॥ ६७ ॥ यद्यपि क्षिपेत् कश्चित् नरके गिरिराजमात्रलोहखड । धरणीतलमप्राप्नुवन् उष्णेन विलीयते सर्व ॥ तित्तियमेत्तो लोहो पज्जलिओ सीयणरयमज्झम्मि । जइ पिक्खिविजे कोई सडिज भूमिमपातो ॥ ६८ ॥ तावन्मात्र लोह प्रज्वलित गीतनरकमन्ये यदि प्रक्षिपेत् कश्चित् घनीभवति भूमिमप्राप्नुवन् ।। णेरयाणं तण्हा तारसिया होइ पावयम्माणं । जा सव्वसमुद्देहि य पीएहिं ण उवसमं जाइ ॥ ६९ ॥ नारकाणां तृष्णा तादृशी भवति पापकर्मणा । या सर्वसमुद्रेषु च पीतेषु न उपशम याति ॥ तारिसिया होइ छुहा णरयम्मि अणोवमा परमघोरा। जा तिहुयणे वि सयले खद्धम्मि ण उवसमं जाइ ॥ ७० ॥ तादृशी भवति क्षुत् नरके अनुपमा परमघोरा । या त्रिभुवनेऽपि सकले खादिते न उपशम याति ॥ १ द्रवीभवति । २ द्रवीभूत ।

२०१ सिदान्ससारारिसमहे- सुग्णीको वि हो सक्खणमेण होर संपुष्णो । नेमि अतण्णयार मिच्न ण होइ पाषाण ||७१ ॥ पूर्णाहसाऽपि दहस्तक्षणमात्रेण मवसि सम्पूर्ण । मपामपूर्णकाल मृत्युन भवति पापाना ।। उप्पण्णममयपदी आमरणत महति दुपखाइ। अच्छिणिमीलयमे मोम्स लहति गराया ॥७२॥ गम्पमसमयप्रमयामरणात महेने दम्मानि । मक्षिनिमीलनमा साम्य न भन्ने मारका ॥ एवं णरयगईग पडुप्पयागई हॉति दुक्खाई। पड्कालेण पि ताई ण म सक्किमसि पोउ ।। ७३ ॥ एवं नरकगता बहुप्रफारणि भवन्ति दुखानि । याकापनापि तानि न च शकुन्ति वर्णयितु । दी गरपगा सम्मत्तानति नरकगतिः समाप । उम्परिकण य जीवो णरपगईटो फलण पापस्स । पुपरवि तिरियगईए पापेर अपेयदुक्खाई ॥ ७ ॥ दर्पच जीयो नरकगनिस फम्न पापस्प । पुनरपि तिर्यमगत्यां प्राप्नोति भनेका खानि ॥ व (वा) हिजा गुरुमारं पेल्छतो पिहिम लोएहि । पुम्मकयम्मो पापयछोरिखतीए पुतीए ॥५॥ पाचते गुरुभारे नेपन तापिरवा छोके । पूर्णरुतकर्मा पृष्ठपा। तारमवासमदुक्ख बघण साणामविपण दमणे । मापदणदुक्खं रछण मिल्छ पेय ॥७५ ।।

चम्म-रसायण । २०५ min ताडनत्रासनदु ख बन्धन तथा नासावेधनं दमन । कर्णच्छेदनदु.ख लाच्छन निलाछन चैव ॥ सीउण्हं जलवरिसं चउमहिमारुवं छुहा तण्हा । णाणाविहवाहीओ सहह तहा दंसमसया य ॥ ७७ ॥ गीतोष्णे जलवा .क्षुधा तृष्णा । नानाविधव्याधीश्च सहते तथा दशमगकाश्च ।। एइंदिएसु पंचसु अणेयजोणीसु वीरियविहूणो । मुंजंतो पावफलं चिरकालं हिंडए जीवो ॥ ७८ ॥ एकेन्द्रियेषु पचसु अनेकयोनिषु वीर्यविहीन । भुजान पापफल चिरकाल हिण्डते जीव ॥ खणणुत्तावणवालणवीहणविच्छेयणाई दुक्खाई । पुवकयपावयम्मो सहइ बराओ अणप्पवसो ॥ ७९ ॥ खननोत्तापनज्वालनव्यजनविच्छेदनादिदु खानि । पूर्वकृतपापकर्मा सहते वराक अनात्मवा ॥ एवं तिरियगइ सम्मत्ता-एव तिर्यग्गति समाप्ता । बहुवेयणाउलाए तिरियगईए भमित्तु चिरकालं । माणुसहवे वि पावइ पावस्स फलाई दुक्खाई ।। ८० ॥ बहुवेदनाकुलाया तिर्यगतौ भ्रमित्वा चिरकालं । मानुषभवेऽपि प्राप्नोति पापस्य फलानि दु खानि ।। पारसियमिल्लवव्वरचंडालकुलेसु पावयम्मेसु । उप्पन्जिऊण जीवो झुंजइ णिरओवमं दुक्खं ॥ ८१ ॥ पारसीकभिल्लववरचडालकुलेषु पापकर्मसु । उत्पद्य जीवो भुक्ते नरकोपम दु ख ॥

२०६ सिद्धान्तसारादिसमो- बइ पावर उपच चिरफालं पाविऊण णीयम् । ठणिविगम्मपदिय ? पावेई अणेय दुक्खाई ॥ ८२ ॥ पनि प्राप्नोति रपव चिरकास प्राप्य मीचस्दै। तप्रापि गभमवानि प्राप्नोति मनकद सानि ।। सम्मंघम्यवहिरो उप्पजह सो फ्लेण पावस्म । उप्पणदिवसपहुई पीडिजइ पोषाहीहि ॥ ८३ ।। समाभम्फपधिर उत्पपते स फलन पारम्प | गपनविसप्रभृतित पाच्यते घारम्यानिमि ॥ गपजोवणं पि पचो इरिथ्यसुगम ण पावए किंपि । गच्छा चोवणकालो सखो विणिरछभो तस्म ॥ ८ ॥ नाविनमपि प्राम पिटतमुर्म म प्रामाति किमपि । गायन योजनान मर्कोऽपि निरभफलस्प ।। पशुपपिप्पाहीणो मिषय ममिऊग मुजए णि । पुष्यफपपावसम्मो मुपणो वि ण प प मोखं ॥ ८५ ॥ पनबाघपरिग्रहीना भिक्षा भ्रमिया मा निम्प। पूनानपापमा, मुगनाऽपि न परममि सोम्य ॥ पमुमणविगई ण्य हिमालियगेरियापदोसदि। मालपगहि वगमो पिरफातं पाप जीभो ॥ ८६ ॥ पशुमनुष्यगना एम सिापभायादिना । पारगानि पगमा पिरफार प्रमानि श्री ॥ पर मागुमर्गा मम्मनागपं पुमानुग्गतिः ममाप । - नुनमा चम्म-रसायण । २०७ सो पावेइ वर ॥ सव्व (ण्हु) क्यणवन्जिय बालतवं कुणइ णरो मूढो । उपरलोण्हीदेवत्तं ॥ ८७ ॥ सर्वज्ञवचन वर्जयित्वा वालतपः करोति नरो मूढः । स प्राप्नोति दहण अण्णदेवे महिड्डिए दिव्ववण्णमारोगं । होऊण माणभंगो चित्ते उप्पज्जए दुक्खं ॥ ८८ ।। दृष्टा अन्यदेवेषु महर्विकेषु दिव्यवर्ण आरोग्य । भूत्वा मानभग चित्ते उत्पद्यते दुःख ॥ तिलोयसव्वसरणं धम्मो सव्वण्हु भाविओ विमलो । तइयामएण गहिओ तेण महंतारिओ एहिं ॥ ८९ ॥ त्रिलोकसर्वशरण धर्म. सर्वज्ञभावितो विमलः । तस्यागमेन गृहीतस्तेन महत्तारक छम्मासाउगसेसे विलाइ माला विणस्सए छाए । कंपति कप्परुक्खा होइ विरागो य भोयाणं ॥ ९० ॥ पण्मासायुष्कशेपे विलीयते माला विनश्यति छाया । कम्पन्ते कल्पवृक्षा भवति विरागश्च भोगेभ्यः ॥ बहुणगीयसाला णाणाविहकप्पतरुवराइण्णे । भो सुरलोयपहाणा णक्खयपडतयं विसमं ॥ ९१ ॥ बहुनृत्यगीतसाला नानाविधकल्पतरुवराकीर्णा । भो सुरलोकप्रधानाः वसियव्वं कुच्छीए कुणिमाए किमिकुलेहि भरियाए । यीयव्वं कुणिमपयं जणणीए मे अहम्मेण ॥ ९२ ॥ वस्तव्य कुत्साया कुणपाया क्रमिकुलै भृताया । पातव्य कुणपपय जनन्या मया अधर्मेण ॥ ॥ . विषम ॥ .

२०८ सियान्तसारादिसंमह- सो एवं मिलवंतो पुण्णमसामम्मि असरणो संतो। मूलच्छिन्गो वि दुमो गिवरा हामहो दीणो ॥ ९३ ॥ म एवं निम्पन् पुण्यावसानऽारण सन् । मूसपिठमोऽपि युम निपतति अधोमुखो दीन ॥ एवं देपर्गा सम्मचा-पदेषगतिः समाप्ता । एवं अमाइकाले जीजो संसारसापर घोरे । परिहिए बलातो धम्म सम्मणुपण ॥९॥ एवमनारिकाले बीव: संसारसागर घोरे । परिहिस्त भलभमानो धर्म समप्रणीत ।। परियारण इसम्म वहा मव्वण्डमासिओ पम्मो । संसाररुचरण गहियम्यो पुद्धिर्मवेहिं ॥९५।। परित्यय कुधर्म तस्मात् सर्पसमापिता धर्म संसारतरणार्थ गृहीतम्पो बुदिमनि ।। सवम् पि य णेया लोए पमाणाशिराईया । तमा परिपिखयष्या मम्वेण परण इसलेम ॥२६॥ सर्वना अपि च या लोके प्रमहरिहरारिका तस्मात् परीक्षितम्या मवें नर कुशले ॥ सहगकपालहरो रमरुप वर्जव भीममायारो। णमा पिसायसहिओ रपीए पिठवण मीमे ॥१७॥ सदागकपामा रमरक पादयन् भीषणाकार । सुस्पति पिशापसहित रमन्या पिवयने भीमे । जो तिवसदादमीसगपिंगलणसपेहि दारिममुडेण । मरम्पेर मम्मजीवे सोप

धम्म-रसायणं ।
२०९
.
..
यः तीक्ष्णदाढाभीपणपिंगलनयनैः ..मुखेन ।
भक्षयति सर्वजीवान् स परमात्मा कथ भवति ॥
अहवा सो परमप्पो जइ होइ जयम्मि दोसजुत्तो वि ।
ता भीसणरूओ (पुण ) णिसायरो केरिसो होइ ।। ९९ ॥
अथवा स, परमात्मा यदि भवति जगति दोपयुक्तोऽपि, ।
तर्हि भीषणरूपः पुनः निशाचर कीदृशो भवति ॥
जो वहइ सिरे गंगा गिरिवधू वहइ अद्धदेहेण ।
णिचं भारक्कंतो कावडिवाहो जहा पुरिसो ॥ १०० ॥
यो वहति शिरसि गगा गिरिवधू वहति अर्धदेहेन ।
नित्य-भाराकान्तः कावटिकावाहो यथा पुरुष. ॥
जइ एरिसो वि लोए कामुम्मत्तो वि होइ परमप्पो।
तो कामुम्मत्तमणा घरे घरे किं ण परमप्पा ॥ १०१ ।।
यदि एतादृशोऽपि लोके कामोन्मत्तोऽपि भवति परमात्मा ।
तर्हि कामोन्मत्तमनसः गृहे गृहे किं न परमात्मान ॥
जो दहइ एयगामं वुच्चइ लोयम्मि सो वि पाविहो।
दर्दू पि जेण तिउरं परमप्पत्तं कहं तस्स ॥ १०२ ॥
यो दहति एकप्रामं उच्यते लोके सोऽपि पापिष्ठ. ।
दग्धमपि येन त्रिपुर परमात्मत्व कथ तस्य ॥
रणे तवं करंतो ददृण तिलोत्तमाए लावणं ।
बम्मह सरेहिं विद्धो तवभहो चउमुहो जाओ ॥१०३ ॥
अरण्ये तप• कुर्वन् दृष्ट
तिलोत्तमाया लावण्य ।
ब्रह्मा शरै विद्ध तपोभ्रष्टः चतुर्मुखो जातः ।
कामग्गितत्तचित्तो इच्छयमाणो तिलोवणारूवं ।
जो रिच्छीभत्तारो जादो सो कि होइ परमप्पो ॥ १०४॥

सिदान्तसारारिसमहे-
कामाग्मितसचित पसन् तिलापमारूप ।
यक्षिमा जात सकिं भवति परमात्मा ।।
जा एरिसो वि म्हो परमप्पा पुचए एवं ।
यो सरपोराईमा सम्वे विय होति परमप्पा ॥ १०५ ॥
यदि एतारशोऽपि मृत परमरमा उभ्यत एवं ।
सर्दि सावादिका सर्मेऽपि च भवन्ति परमारमान ॥
जलपलआयासयले सम्बेसु वि पम्पएस खेसु ।
तिणखलमकहपाहण परिपसर महुमरणो ॥१०॥
नमस्सगकाश सपु भपि पर्वतषु वक्षेप ।
तृणम्पम्नकाष्ठपापाण
परिवसति मधुमद ॥
होठण परमदेवो कण्हो परिवसइ बए सम्मे।
तो छेमणाइयो सो पावर सध्ये किरियानो॥१०॥
मला परमोष कण परिमसति जगति सस्मिन् ।
स
स प्राप्नोति समे
क्रियात ॥
संसारम्मि पसंतो परमप्पो मा बए इवे कहो।
संसाररपा नीषा सम्बे से फिल्म परमप्पा ॥१०८॥
संसार वसन् परमरमा पदि चगसि भवेत् कष्म ।
संसारमा जीवा सर्वे ते किं न परमारमाम' ।।
हरिहरपमणो वि य महायता सम्बलोयविक्खाया ।
तिमि पि एसरीरा तिष्णि विलोए वि परमप्या॥१०९॥
हरिहरप्रमाणोऽपि १ महावहा सर्वछोकरिस्माता ।
प्रयोऽपि एकशरीरा प्रयापि छोफऽपि परमात्मान ।
ना होरि एपमुची पमाम विलोपणाम महुमहणो।
तो बमामस्स सिरै हरेण किं कारणं छिप्पं ॥१०॥

चम्म-रसायण। २११ यदि भवति एकमूर्तिः ब्रह्मा त्रिलोकनाथ मधुमदः । तर्हि ब्रह्मणः शिरो हरेण किं कारणेन छिन्न ।। णेच्छइ थावरजीव जंगमजीवेसु संसओ जस्स । मंसं जस्स अदोसं कह बुद्धो होइ परमप्पा ॥१११॥ नेच्छति स्थावरजीव जगमजीवेषु सशयो यस्य । मास यस्यादोष कथ बुद्धो भवति परमात्मा ॥ णियंजणणीएं पेट्ट जो फाडिऊण णिग्गओ बहिरं । अण्णेसिं जीवाणं कह होइ दयावरो बुद्धो ॥११२॥ निजजनन्या उदर यो विदार्य निर्गतो बहिः । अन्येषा जीवाना कथ भवति दयापरो बुद्धः ।। जो अप्पणो सरीरे ण समत्थो वाहिवेयणा छेउं । अण्णेसि जीवाणं कह वाहिं णासए मुरो ॥ ११३ ॥ य आत्मनः शरीरे न समर्थो व्याधिवेदना छेतु । अन्येषा जीवाना कथ व्याधि नाशयति सूर ॥ ण समत्थो रक्खेउं सयमवि खे राहुणा गसिज्जंतो। कह सो होइ समत्थो रक्खेउं अण्णजीवाणं ॥११४॥ न समर्थो रक्षितु स्वयमपि खे राहुना असमान । कथ स भवति समर्थो रक्षितु अन्यजीवान् ॥ जइ ते हवंति देवा एए सव्वे वि हरिहराईया। तो तिक्खपहरणाई गिण्हंति करेण णिकजं॥११५॥ यदि ते भवन्ति देवा एते सर्वेऽपि हरिहरादिका । तर्हि तीक्ष्णप्रहरणानि गृह्णन्ति करेण किमर्थ ॥ १ निय पुस्तके ।२ पोठ पुस्तके ।३ वह पुस्तके ।४ सूर्य ।

२१२ सिमान्ससारादिसमहे- अस्स त्यि मय वि(वि)च सो गिहा पाउई करग्गेण । जस्स पुमो पत्पि मर्य तस्साठाकारणं णत्यि ॥११६॥ यस्पास्ति भयं वि स गवाति मायुध करामेण । पस्य पुनर्नास्ति मयं तस्यायुधकारणं नास्ति ।। महतनवाहियेयमचिसामयसोयपीरिमसरीरा। संसारे हिंसा ते समण कई होति ।। ११७ ॥ क्षुषातृष्णाम्पादिनाचिन्तामयशोकपीरितशरीरा । संसरे रमाना ते सर्पका कप मषन्ति यह सम्हा मय दोसो राघो मोहो म तिम पाही। वर मरण जम्म णि खेदो सेदो विसादो प||१९८१ मुभा वमा भर्य दोषो रागो मोहय चिन्ता म्पाधि । का माण मन्म निदा सेद स्पेदो विषादप॥ र मित्रो पदप्पो एए दोसा तिलोयसचाम् । सम्मेसि सामष्णा संसारे परिममताणं ॥ ११९ ।। रतिईमा घ दर्प एते दोषा त्रिलोकसत्वाना । सर्वेका सामान्या संसारे परिमम पए सम्वे दोसा जस्स न विचसि छुइतिसाईमा । सो होइ परमवेयी पिस्तदेहेण पतम्यो ।॥ १२ ॥ पसे सर्षे दोपा यस्म न विपन्त भुषानुपादिका । समबति परमवो निःसन्देहेम गहीवम्य ॥ सिंहासणछत्तचयदिवोधुमिपुष्फविहिपमराई । मार्मरसढुंदुहियो वरता परमेष्टिषिन्दर्य ॥ १२॥ सिहासमाचप्रमरिम्पमनिपुप्पपस्चिामराणि । भामर भी बरतन परमेष्ठिपिनहोत्पानि ।।

धम्म-रसायणं । २१३ संपुण्णचंदवयणो जडमउंडविवन्जिओ णिराहरणो । पहरणजुवइविमुक्को संतियरो होइ परमप्पा ॥ १२२ ।। सम्पूर्णचन्द्रवदन. जटामुकुटविवर्जितो निराभरण । प्रहरणयुवतिविमुक्तः शान्तिकरो भवति परमात्मा । णिभूसणो वि सोहह कोहोराप्रभओमणो णत्थि ! जमा वियाररहिओ णिरंबरो मणोहरो तमा ॥१२३ ।। निर्भूपणोऽपि शोभते यस्माद्विकाररहितो निरम्बरो मनोहरस्तस्मात् ॥ जमा सो परमसुही परमसिवो वुच्चए जिणो तह्मा । देविंदाण वि देओ तमा णाम महादेओ ॥ १२४ ।। यस्मात् स परमसुखी परमशिव उच्यते जिनस्तस्मात् । देवेन्द्राणामपि देवस्तस्मान्नाम्ना महादेव ॥ अन्वावाहमणतं जमा सोक्खं करेइ जीवाणं । तमा संकरणामो होइ जिणो णत्थि संदेहो ॥ १२५ ॥ अव्याबाधमनन्त यस्मात् मुख करोति जीवाना । तस्माच्छकरनामा भवति जिनो नास्ति सन्देह ॥ लोयालोयविदण्हू तह्मा णामं जिणस्स विण्हूत्ति । जमा सीयलवयणो तमा सो वुच्चए चंदो ॥१२६ ।। लोकालोकवित् तस्मात् नाम जिनस्य विष्णुरिति । यस्माच्छीतलवचनस्तस्मात् स उच्यते चन्द्र ॥ अण्णाणाण विणासो विमलाण कम्मासुर णिड्डहणो तेण जिणो वुच्चए मूरो ॥१२७॥ अज्ञानाना विनाशक विमलाना बोधकर । कर्मा, बोहयरो। निर्दहन तेन जिन उच्यते सूरः ।। .

२१. सिसाम्तसारादिसंग्रहे- मग्णाणमोहिएहि य पदियलोलरहिं परिसेहि। निणणामाई परेसिं कमाई गुणवजमाण पि ॥ १२८ ॥ भयानमाहितेम पंचेन्द्रियगासपै पुख्यै । जिननामानि परेषां सतानि गुणवर्जितानामपि ।। वा ईसरमाम परो मिरखं ममिऊण अजए को वि। ईसरस्स गुणविमो कि सब ईसरो होइ॥ १२९ ।। यदि इयरनामा नर मिधा भमित्वा मुंके कोऽपि । ईश्वरस्प गुणविहीन कि सत्य ईश्वरो मवति ।। सम्भहमाम हरी तह लोए हरिहराइया सम्मे। सवण्डगुणविरहिया कि सम्बे होवि सया ॥ १३० ।। सजनामा हरि क्या छोके हरिरादिका सर्वे । सर्वगुणविरहिता कि सर्वे भवम्ति सर्गमा ॥ बहरख्य परमपम अवावाई अमोवम सोपसे । तिवणयंदिराचलम ममह जिर्णदं पपचम ॥१३१ ॥ यथिति परमपद मम्यानपं अनुपम सौन्य। त्रिभुवनवदिवपरणं नमत मिनेन्द्र प्रयत्नेन । समा अरित इयर णिराउहो णिम्मयो हपे तमा वमा अर्णतमुमो इच्छीविरहियो हवे समा ॥१६२ ।। पस्मात् भईन् भवसि निरायुष निर्भयो मषेत् तस्मात् । पस्मादि अनन्तमुसे भीविरहितो मवेत् तस्मात् ।। बमा हरसहामो वस्स प पीरसि परमपोरात्री। समा असणं पार्ण तिसोपणाहोण सेवेह ।।१३३ ।। यस्मात् मुतणे त म पीडयस परमपारे । तस्मासन पाम प्रिफनाया न सेबते।

धम्म-रसायण । २१५ पूजारिहो दु जला धरणिंदणरिंदसुरवरिंदाणं । अरिरयरहस्समहणो अरहंतो वुच्चए तमा ॥ १३४ ॥ पूजार्हस्तु यस्मात् धरणेन्द्रनरेन्द्रसुरवरेन्द्राणा । अरिरजरहस्यमथन अर्हन् उच्यते तस्मात् ।। जियकोहो जियमाणो जियमायालोहमोह जियमयओ। जियमच्छरो य जमा तम्हा णामं जिणो उत्तो ॥ १३५॥ जितक्रोधो जितमानो जितमायालोभमोहः जितमद। जितमत्सरश्च यस्मात्तस्मान्नाम जिनः उक्तः ॥ जम्मजरमरणतिदयं जम्हा दड़े जिणेण णिस्सेसं । तम्हा तिउरविणासो होइ जिणे णत्थि संदेहो ॥१३६ ।। जन्मजरामरणत्रितय यस्माइग्ध जिनेन निःशेष । तस्मात्रिपुरविनाशो भवति जिने नास्ति सन्देहः ।। अरहंतपरमदेवं जो वंदइ परमभत्तिसंजुत्तो। तेलोयवंदणीओ अइरेण य सो णरो होइ ।। १३७॥ अर्हत्परमदेव यो वन्दते परमभक्तिसयुक्त. । त्रिलोकवन्दनीयोऽचिरेण च स नरो भवति । जो जिणवरिंदपूअं कुणइ ससत्तीइ सो महापुरिसो। तेलोयपूअणीओ अरेण य सो णरो होइ ॥ १३८ ॥ यो जिनवेरन्द्रपूजा करोति स्वशक्त्या स महापुरुपः । त्रिलोकपूजितोऽचिरेण च स नरो भवति । सवण्हूपरिक्खा सम्मत्ता-सर्वशपरीक्षा समाता।

२२६ सिदान्तसारादिसमहे- धम्मो जिणेहिं मणिो सायारो पर ये अणापारो। एएसि दोहं पिहुसार खल र सम्म ॥ १९ ॥ धर्मों जिन मणित सागारस्तया भटनगार । एतयोईयोरपि हि सारे सह भवति सम्म । सम्मतसलिलपरहो णि दिययम्मि पट्टए मस्स । कर्म पालयवरण तस्स पंधो पिय ण प ॥ १४ ॥ सम्पावसलिलप्रवाहो निस्पं दिये प्रपर्वते पस्प । कर्म वालावरण ताप पन्धमेव मैति।। सम्मचरपणनम्मे परयतिरिक्खेसु भत्थि उपवायो । ज्याण मजद सम्म अव म पाउसो पुर्व ॥ ११ ॥ सम्यक्त्वरनकम्मे नरकतिर्यक्षु नाखि उपपाद । पदि न मुमबति सम्यक्त्वं मक्या न बेघमायुप ।। पंचपनमुम्बमाई गुणमयाई ति तिप्प्येव । पचारि य सिखापययाई सामारो परिसो पम्मो ॥१२॥ पंचागुणवानि गुणस्तानि भवन्ति श्रीप्येष । मत्वारि च शिक्षामतानि सागार एतादृशो धर्म ॥ देवपपियरमिमिचं मतोसहवतमयभिमिचेम जीवा म मारिपन्या परमं तु मणुष्वप हो॥१४३ ॥ देवतापिवनिमित मौषममंत्रमयनिमितेन । जीवा न मयितम्या प्रथम तु भणुमत भवति । वागावीहि नस परपीस्परं तु सधपणं पि। मर्जवस्स परस्स हु विदिय तु माम्बर्ग होर ।। १४४ ॥ पुषिजनासए वस्स पति रमप्रापते पानवम्तरम् ।

धम्म-रसायणं।
२१७
वागादिभिरसत्य परपीडाकर तु सत्यवचनमपि ।
वर्जतो नरस्य हि द्वितीय तु अणुव्रत भवति ॥
गामे णयरे रणे वट्टै पडियं च अहव विस्सरियं ।
णादाणं परदव्वं तिदियं तु अणुव्वयं होइ ।। १४५ ॥
ग्रामे नगरे अरण्ये वृत्ते पतित चाथवा विस्मृत ।
नादान परद्रव्य तृतीय तु अणुव्रतं भवति ॥
मायावहिणिसमाओ दवाओ परस्स महिलाओ।
सयदारे संतोसो अणुव्वयं तं चउत्थं तु ॥ १४६ ।।
मातृस्वसृसमाना दृष्टव्या परस्य महिला 1
स्वदारे सन्तोषोऽणुव्रत तच्चतुर्थे तु ॥
धणधण्णदुपयचउप्पयखेत्तण्णछादियाण दव्वाणं ।
जं किजइ परिमाणं पंचमयं अणुव्वयं होइ ॥ १४७॥
वनधान्यद्विपदचतुष्पदक्षेत्रान्याच्छादनाना द्रव्याणा ।
यत्क्रियते परिमाण पचमक अणुव्रतं भवति ॥
जं तु दिसावेरमणं गमणस्स दुजं च परिमाणं ।
तं च गुणव्चय पढम भणियं जियरायदोसेहिं ॥ १४८ ॥
यत्तु दिग्विरमण गमनस्य तु यच्च परिमाण ।
तच्च गुणव्रत प्रथम भणित जितरागदोषै. ॥
मज्जारसाणरज्जु वंड लोहो य अग्गिविससत्थं ।
सपरस्त धादहेर्नु अण्णेसिं व दादव्वं ॥ १४९ ॥
मार्जारश्वरज्जु लोहश्च अग्निविषशस्त्राणि ।
स्वपरस्य घातहेतूनि अन्येषा नैव दातव्यानि ॥
वहवंधपासछेदो तह गुरुभाराधिरोहणं चेव ।
ण वि कुणइ जो परोसि विदियं तु गुणव्वयं होइ ॥१५० ॥

२१८ सिसन्ससारादिसमहे- बधन्धपाशछैदानि सया गुरुमाराधिरोहण चैव । नापि करोति य परेपा द्वितीर्य गुणातं भवति ॥ वउच्छम्सणाण मोलाहरणगंपुप्फार्म । जं किन्जर परिमाण विठियं तु गुणम्पर्म हो ॥१५१ ॥ बलासभूपणानो ताम्बूडामरणगंधपुप्पाणा । यस्क्रिपसे परिमाणे तृतीय तु गुणस्त भगठि।। पंचममोक्कारपर्य मंगल लोगुधर्म सहा सरणं । गि पाएसर्व उमए सम्माहि दिसमम्मि ।। १५२ ॥ पंचनमस्कारपद मंगछे छोकाचम तथा शरण । नित्ये प्याययं उमयो सम्पयो दये।। काहविषजम पि समदा सम्बेसु येव भूदेसु । संगममुहमावणा पि सिरखा सा पधए परमा ॥ १५३ ॥ समाविपर्जनमीप समता सर्भेषु चैव मतेप। संयमशुमभावना अपि शिक्षा सा उप्यते प्रथमा ।। उपवासो कापम्बो मासे मासे घउस्सु पम्बेसु । षदि प विदिया सिक्ला सा कहिया सिमपरिंदेहि ॥१५४।। उपमास कम्मो मासे मासे चतुई पर्वम्। भवति च द्वितीपा शिक्षा सा मथिता जिनेन्द्र ।। मसमापउवियप्पो आहारो समयाण दादन्यो । परमाए मचीए तिदिया सा पुपए सिरमा ॥ १५५ ॥ भशनारिचर्षिफम्प माहR संपताना दात्म्य । परमपा भम्पा तृतीया सा उप्पते शिक्षा ।। पाऊग सम्बसैगे गहिजणं वह माम्पए पंछ । परिमते मण्णार्स ज पिप्पा सा पठत्यिया सिरसा ॥१५६ ।।

धम्म-रसायण।
२१९
त्यक्त्वा सर्वसङ्गान् गृहीत्वा तथा महाव्रतानि पच ।
चरमान्ते सन्यास यत् गृह्णति सा चतुर्थी शिक्षा ॥
एयाई वयाई णरो जो पालइ जइ सुद्धसम्मत्तो।
उप्पजिऊण सग्गे सो भुंजइ इच्छियं सोक्खं ॥ १५७ ॥
एतानि व्रतानि नरो यः पालयति यदि शुद्धसम्यक्त्वः ।
उत्पद्य स्वर्गे स भुक्ते इच्छित सौख्य ।।
दिव्वाणि विमाणाणि य सुरलोए होंति पंचवण्णाई ।
दित्तीए आयव्वं जिणंति चंदस्स कंतीए ॥ १५८ ॥
दिव्यानि विमानानि च सुरलोके भवन्ति पचवर्णानि ।
दीप्या आदित्य जीयन्ते चन्द्र कान्त्या ॥
सोहं ति ताई णिचं पलंबवरहेमदामघंटाहिं ।
बहुविहकूडेहि तहा णाणाविहधयवएहि ॥ १५९ ॥
शोभन्ते तानि नित्य प्रलंबवरहेमदामघटाभिः।
बहुविधकूटै तथा नानाविधध्वजापताकाभिः ।।
तेसिं होंति समीवे बहुमेयजलासया परमरम्मा ।
सोहंति सव्वकालं फलपुष्फपवालपत्तेहिं ।। १६० ।।
तेषा होति समीपे बहुभेदजलाशया परमरम्याः ।
शोभन्ते सर्वकाल फलपुष्पप्रवालपत्रै ॥
दण य उप्पत्तिं केई विजंति सेयचमरेहिं ।
केई जयजयसद्दे कुव्वंति सुरा सउच्छाहा ॥१६१ ॥
दृष्ट्वा
चात्पत्ति केचित् वीजयन्ति श्वेतचमरैः ।
केचित् जयजयशब्दान् कुर्वन्ति सुरा सोत्साहाः ।।
वरमुरवदुंदुहिरओ भेरीओ संखवेणुवीणाओ।
पटुपडहझल्लरिओ वायति सुरा सलीलाए ॥ १६२ ॥

२२० सिमान्तसदिसमहे- बरमुरजवन्दुमिरवानि मेर्य शसवेणुमीणा | पदुपटहप्सलये मादपन्ति सुरा समण्या ॥ गायति अछराम्रो कामओ वि ममोहरामो गीयावो। कामोवि वरंगीयो जति विलासवेसाप्रो ॥१६३ ॥ गायन्ति अप्सरस का अपि मनोहराणि गीवानि । का भपि वराशा तृस्पन्ति विकासषेपा ।। को मम्म इमो अम्मो रमणीयो आसमो इमो को वा । कस्स इमो परिवारो एवं चिंतेइ सो देखो ॥१६४ ॥ किं मम इद जम रमणीय मासीदय को मा। कस्याय परिवार एवं चिन्तपति स देवः ।। माऊम देवलोम पुणरवि उप्पत्तिकारणं देओ। सम्बंगमायमासो विमसियषयपो य बितेइ ॥१५॥ ज्ञात्वा देवगे पुनरपि उत्पत्तिकारण देर । सादगातमास विकसितबदनच चिन्तयति ।। कि दच परदा को 4 मए सोरणो वपो चिनो। जेण बरं सुरलोए उवषाणो मदरसपीए ॥ १६६ ॥ कि दत्त परदान किं मा मया शोमने तप चित । पैनाई मुरमेके ठपपम शुस णाम पिरयसेसे पुम्पमये य मिणपुज्जया राया। वो कुणा पमोकार मधीए जिणपरिदाण ॥१६७॥ पात्वा मिरवशेष वमवे व बिनमा रचिता। तत करोति नमस्कार भास्या बिनबरेन्द्राणां ॥ पुणरवि पममियमत्यो ममा सरो बजर्सि सिरे किया। घम्मापरियस्म ममो झणाई गाहिमो पम्मो ॥ १२८॥ ॥

धम्म-रसायणः। २२१ पुनरपि प्रणतमस्तकः भणति सुरः अजलि शिरसि कृत्वा । वर्माचार्याय नमः येनाहं ग्राहितः धर्मः॥ सो मज्झ वंदणीओ अहिगमणीओ य पूअणीओ य । जस्स पसाएणाहं उप्पण्णो देवलोयम्मि ॥१६९ ॥ स मम वन्दनीय अभिगमनीयश्च पूजनीयश्च । यस्य प्रसादेनाह उत्पन्नो देवलोके ॥ अहिसेहगिहं देवा णाऊण करंति तस्स अहिसेहं । पुणरवि अरुहं गेहं आणंति मणोहरं रम्मं ॥ १७० ॥ अभिषेकगृह देवा नीत्वा कुर्वन्ति तस्याभिषेक । पुनरपि अर्हगृह आनयन्ति मनोहरं रम्य ॥ बहुभूसणेहि देहं भूसंता तस्स दि (व्व) मंतेहिं । अहिसिंचिऊण पुणरवि देवा बंधंति वरपर्ट ।। १७१ ।। बहुभूषणैः देह भूषयन् तस्य दिव्यमत्रै । अभिषिच्य पुनरपि देवा बघ्नन्ति वरपट्टम् ॥ सिंहासणट्टियस्स हु सुहगेहेसु सुटु रमणीए । उवगम केइ देवा जोगाई कहंति कम्माई ॥१७२ ॥ सिंहासनस्थितस्य हि शुभगृहेषु सुष्ठु रमणीयेषु । उपगम्य केचिद्देवा योग्यानि कथयन्ति कर्माणि ॥2 पढमं जिणंदपूयं अवि चलवरलोयणं पुणो पेच्छा। वरणाडयस्स पिच्छा तह माणिय दिव्यबहुआउ ॥ १७३ ॥ प्रथम जिनेन्द्रपूजा अपि चलवरलोचन पुन पश्चात् । वरनाटक पश्चात् तथा पडिबोहिओ हु संतो अण्णेहि सुरेहिं सुरवरो एवं । तो कणड महापूअं भत्तीए जिणवरिंदाणं ॥ १७४ ॥ ॥ .

२२२ सिद्धान्तसारादिसमहे- प्रतियोक्तिो हि सन् भन्यै सुरैः सुरवर एवं । तत करोति महापूर्व मस्या मिनवरेन्द्राणां ॥ रुपा पुमो वि य तहो अडलालोपर्ण घ सो देखो। परमार्य स पच्छा कृपा पुणो पुष्यायचि ॥ १७५ ।। करोति पुनरपि च तुष्ट मष्टगोचन ! प स देव । परनाटक स रष्ट्या करोति पुन पूर्वकर्म इति ॥' दिम्बरछराहि म सम उसंगपउहाराहि चिरकाल । अणहया काममोए अहगुमरिदिसंपप्णो ॥ १७६ ॥ दिम्याप्सोमम सम उत्तंगप्र हामि चिरकाले। मनुमवसि काममोगान् भष्टगुणदिसम्पमः ।। अणिम महिम लहिर्म पची पायम्म कामरूपिच । ईसचं च वसिच अहगुणा होंति णापम्या ।। १७७ ॥ मणिमा महिमा छधिमा प्राप्ति प्राकाम्प कामरूपित्त । ईशिव च बशिवं भरगुणा मवम्ति पातम्मा ॥ इस अठगुणो देमो मरवाहिविवज्जियो चिरं कालं । जिणधम्मस्स फलेण य दिम्पसुई मंजए जीपो ॥१७८॥ इति अप्ठगुणो देवो जराम्माधिनिर्मितधिरं का। जिनधर्मस्प फलेन च दिम्पमुख मुंफ जीव ॥ इति देवसुगइसम्माचा इति देपसुगतिः समाता । संमित्ता चिरकासं दिम्ब हियाछिये सुई सग्गे । माणुसतोपम्मि पुणो उप्पलए उनमे से ॥ १७९ ।। मुस्ता चिरफाठ दिम्प पेप्सिव मुखर्गे । मानुपाकि पुम उत्पयते उत्तमे शे॥

धम्म-रसायणं । २२३ सुम.. अँजित्ता मणुलोए सव्वे हियइच्छियं अविग्घेण । होऊण भोयविरओ जिणदिक्खं गिण्हए परमं ॥ १८०॥ भुक्त्वा मनुजलोके सर्वान् हृदयेप्सितान् अविघ्नेन । भूत्वा भोगविरतो जिनदीक्षा गृह्णाति परमा । डहिऊण य कम्मवणं उग्गेण तवाणलेण णिस्सेसं । आपुण्णभवं अणंतं सिद्धिसुहं पावए जीओ ॥ १८१ ॥ दग्ध्वा च कर्मवन उप्रेण तपोऽनलेन निशेष । आपूर्णभवमनन्त सिद्धिसुख प्राप्नोति जीवः ।। सुमणुसहिए वल्लहमणाइसिद्धं तओ समासेण । अणयारपरमधम्मं वोच्छामि समासओ पत्तो ॥ १८३ ॥ वल्लभ अनादिसिद्ध तत समासेन । अनगारपरमधर्म वक्ष्ये समासतः प्राप्त ॥ अहदस पंच पंच य मूलगुणा सव्वतो सदाणयाराणं । उत्तरगुणा अणेया अणयारो एरिसो धम्मो ॥ १८३ ॥ अष्टादश पच पच च मूलगुणा सर्वत सदानगाराणा । उत्तरगुणा अनेके अनगार एतादृशो धर्मः ॥ जे सुद्धवीरपुरिमा जाइजरामरणदुक्खणिविण्णा । पालंति सुसुद्धभावा ते मूलगुणा य परिसेसा ॥ १८४ ॥ ये शुद्धवीरपुरुषा जातिजरामरणदु खनिर्विग्ना । पालयन्ति सुशुद्धभावास्ते मूलगुणान् च परिशेपान् ॥ इच्चेयावि सव्वे पालंति सविरियं अगृहंता । उचलुद्धयावधीरा संसारदुक्खक्खयंहाए ॥ १८५॥ इत्यादिकानपि सर्वान् पालयन्ति स्ववीर्य अगूहमानाः । अपलुब्धका ? धीरा ससारदु खक्षयेच्छया ॥

२२२ सिद्धान्तसागदिसमहे- प्रतियोधितो र सन् मन्यै सुरे. सुरवर एवं । तत करोति महापूनो मस्या निनवरेन्द्राणां ॥ ममइ पुणो पि य तहो अरवेलालोपर्म च सो देओ। परमारयं स पच्छा झमा पुणो पुष्पकपउचि ॥ १७ ॥ करोति पुनरपि च तुर. अष्टमेछालोचने च स देव । परनाटक स ष्ट्या करोति पुन पूर्वकर्म इति ।। दिवछराहि म सम उचंगपठाराहि पिरफालं । अणरषद काममोए अहगुणरिदिसंपण्यो । १७६ ॥ हिम्पाप्सरोमिय सम उत्तंगम हारामि चिरकाले। मनुमति कामभोगान् मश्गुणदिसम्पन ॥ अगिर्म महिम सहिर्म पची पायम्म कामरूवितं । ईस प पसि महगुणा होति मायया ॥ १७७ ॥ अणिमा महिमा छधिमा प्राप्ति प्राकाम्ये कामरूपिले इशिता बशिव आएगुणा भवन्ति बातम्या ॥ इस अडगुणो देखो अरनाहिविवजिओ पिरै फाले । विणधम्मस्म फलेण य दिम्बई संजए जीमो ॥ १७८॥ इति भरगुणो देपो जराम्पापिविनितमिरे का। मिनधर्मस्प फछेन प दिम्पमुस मुक्त जीग ॥ रति देयसुगासम्मत्तानवि देवसुगतिः समाप । मजिचा पिरकाल दिम्म हियपिछय सुदं सगे। माणुसलोपम्मि पुपो उप्पजए उनमे से ॥ १७९ ॥ मुम्वा पिरफा दिम्य इयेप्सित मुस सगें। मानुपडाक पुम उत्पयत उपमे शे॥

धम्म-रसायणं । २२३ सुम... सुजित्ता मणुलोए सव्वे हियइच्छियं अविग्घेण । होऊण भोयविरओ जिणदिक्खं गिहए परमं ।। १८० ॥ मुक्त्वा मनुजलोके सर्वान् हृदयेप्सितान् अविघ्नेन । भूत्वा भोगविरतो जिनदीक्षा गृह्णाति परमा डहिऊण य कम्मवणं उग्गेण तवाणलेण णिस्सेसं । आपुण्णभवं अणंतं सिद्धिसुहं पावए जीओ ॥ १८१ ॥ दग्ध्वा च कर्मवन उप्रेण तपोऽनलेन नि शेप । आपूर्णभवमनन्त सिद्धिसुख प्राप्नोति जीवः ॥ सुमणुसहिए वल्लहमणाइसिद्धं तओ समासेण । अणयारपरमधम्मं वोच्छामि समासओ पत्तो ॥ १८३ ।। वल्लभ अनादिसिद्ध तत समासेन । अनगारपरमधर्म वक्ष्ये समासतः प्राप्त ॥ अदृदस पंच पंच य मूलगुणा सव्वतो सदाणयाराणं । उत्तरगुणा अणेया अणयारो एरिसो धम्मो ॥ १८३ ॥ अष्टादश पच पच च मूलगुणाः सर्वत सदानगाराणा । उत्तरगुणा अनेके अनगार एतादृशो धर्म. जे सुद्धवीरपुरिसा जाइजरामरणदुक्खणिविण्णा । पालंति सुसुद्धभावा ते मूलगुणा य परिसेसा ॥ १८४ ।। ये शुद्धवीरपुरुपा जातिजरामरणदु खनिर्विग्ना । पालयन्ति सुशुद्धभावास्ते मूलगुणान् च परिशेपान् ।। इच्चेयावि सव्वे पालंति सविरियं अगृहंता । उवलुद्धयावधीरा संसारदुक्खक्खयंहाए ॥१८५॥ इत्यादिकानपि सर्वान् पालयन्ति स्वीर्य अगृहमानाः । अपलुब्धका ? वीरा ससारदुःखक्षयेच्छया ॥ ॥

२२० सिद्धान्तसातादिसमहे- हेमंते विदिमंसा पलिणिदलपिमासिर्य महासीर्य । संसारदुरखमीए विसति परति य सीयं ॥ १८६ ।। हमन्ते भूतिमन्तो नछिनीदछविनाशिते महाशावे। संसारदु समयानपि सान्से चामिति घशीते ॥ मलमलमालिगा पावमलविषज्जिया महामणिणो। आश्वस्साहिस करति आदापर्ण धीरा ॥ १८७॥ मामलमणिनिताशा पापमछपियर्विता महामुमपः । आदित्पस्पाभिमुस पुर्षम्सि मातापन धीरा ॥ पारंपसारगहिले कापुरीममयागरे परममीमे । मणिणो वसंसि रण्ये तरुमले परिसयासम्मि ॥ १८८।। घारान्धकारगाने कापुस्यमयको परममामे । मुनयो वसन्ति अरण्ये तस्मले बर्पाकाले || भणयारपरमपम्म पीरा कारण मुझसम्ममा । गछति मेई सम्गे फेई सिकासि दफम्मा ॥ १८९ ।। भनगारपरधर्म धीरा त्वा शुदसम्पक्वा । गणन्ति फेषित् खर्गे केचित् सिदन्ति पुसकर्माणः || गवि अत्यि माणुसाणं मादसमस्ये चिप विषयातीदे। अम्बुरिछणं च सुई अणोषम बं च मिदाणं ॥ १९० ।। नाप्परित मनुशाा मारमसमुत्य पय विषयासी । मम्मुटिम प मुस भनुपमै पच सिमाना। महविस्फम्मवियग (सा) सीदीदा गिरजणा णिचा। अवगुणा सिक्पिा लोयग्गणिवासिमो मिदा ॥ १९१ ॥ मविपफर्मविकाला शांतामूना निरंजना नित्या । भरगुणा तिरुत्पा ठोकाप्रनिवासिना सिम् ॥

धम्म-रसायण । २२५ सम्मत्त णाण दसण वीरिय सुहमं तहेव अवगहणं । अगुरुलघुमव्वावाहं अहगुणा होति सिद्धाणं ॥ १९२ ॥ सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन वीर्य सूक्ष्म तथैवावगाहनं । अगुरुलघु अव्याबाध अष्टगुणा भवन्ति सिद्धानाम् ॥ भवियाण बोहणत्थं इय धम्मरसायणं समासेण । वरपउमणदिमुणिणा रइयं जमणियमजुत्तेण ॥ १९३ ॥ भव्याना बोधनार्थ इद धर्मरसायन समासेन । वरपद्मनन्दिमुनिना रचितं यमनियमयुक्तेन ॥ इदि सिरिधम्मरसायणं सम्मत्तं ।

भीमहलमविरचित सारसमुच्चयः। देवदेव जिन नत्वा भयोझवविनाशनम् । यत्येवं देशना कांपिन्मतिहीनोऽपि मक्तिस ॥१॥ संसार पर्यटन् जैतुबहुमोनिसमाकुले । शारीर मानसं दुखं प्राप्नोति मत ! दारणं ॥२॥ मार्सम्मानरतो मूढो न करोत्पात्मनो हित । तेनासो सुमहस्क्लेखं परोह च गच्छति ॥३॥ ज्ञानमावनपा जीयो लेमते हितमात्मन । विनयाघारसम्पमो विपयेषु पराग्रस ॥४॥ आत्मानं माषमेभित्म ज्ञानेन पिनमेन च । मा पुननियमाणम्प पयाचापो मनिष्पति ॥५॥ तथापि सवपः कार्य ज्ञानसनावमास्ति । पमा विमला याति घेतोरस्न मुदस्सरम् ॥६॥ नृजन्मन फल सारं यदेवम्झानसेपनम् । अनिहितवीयस्प संयमस्प प पारमम् ॥७॥ मानभ्यानोपयासप परीपाजयस्तया । वीलसंयमयोगध स्वास्मान भावयेत् सदा ॥८॥ १ मे सिमामना क-पुस्तके। भावुमा बिमानस इस पुस्तके होषितपासपुर-पुस्तरे।

सार-समुच्चयः । २२७ ज्ञानाभ्यासः सदा कार्यो ध्याने चाध्ययने तथा। तपसो रक्षणं चैव यदीच्छेद्धितमात्मनः ॥ ९ ॥ ज्ञानादित्यो हदिर्यस्य नित्यमुद्योतकारकः । तस्य निर्मलतां याति पंचेन्द्रियदिगगना ॥ १० ॥ एतज्ज्ञानफलं नाम यचारित्रोद्यमः सदा । क्रियते पापनिर्मुक्तेः साधुसेवापरायणैः ॥ ११ ॥ सर्वद्वन्द्वं परित्यज्य निभृतेनान्तरात्मना । ज्ञानामृतं सदापेयं चित्ताल्हादनमुत्तमम् ॥ १२ ॥ ज्ञानं नाम महारत्नं यन्न प्राप्तं कदाचन । संसारे भ्रमता भीमे नानादुःखविधायिनि ॥ १३ ॥ अधुना तत्त्वया प्राप्तं सम्यग्दर्शनसंयुत्तम् । प्रमादं मा पुनः कार्षीविषयास्वादलालसः ॥ १४ ॥ आत्मानं सततं रक्षेज्ज्ञानध्यानतपोवलैः । प्रमादिनोऽस्य जीवस्य शीलरत्नं विलुप्यति ॥ १५ ॥ शीलरत्नं हतं यस्य मोहध्वान्तमुपेयुषः । नानादुःखशताकीर्णे नरके पतनं ध्रुवम् ॥ १६ ॥ यावत् स्वास्थं (स्थ्यं) शरीरस्य यावच्चेन्द्रियसम्मदः । तावद्युक्तं तपः कर्तु वाक्ये केवलं श्रमः ॥ १७ ॥ शुद्धे तपसि सद्वीयं ज्ञानं कर्मपरिक्षये । उपयोगिधनं पात्रे यस्य याति स पंडितः ॥ १८ ॥ गुरुशुश्रूपया जन्म चित्तं सद्ध्यानचिन्तया । श्रुतं यस्य समे याति विनियोग स पुण्यभाक् ॥ १९ ॥ १ तप संरक्षण ख-पुस्तके । • 'विलुम्मते ' ख-पुस्तके । ३ 'सम्पद ख-पुस्तके । ४ उपयोग धन प्राप्ते ख-पुस्तके ।

२२८ सिद्धान्तसारादिसमहे- छिस्था स्नेहमयान् पाशान् मिस्या मोदमहार्गलाम् । सचारित्रसमायुक्तः शूरो मोक्षपणे स्थित ॥२०॥ अहो मोहस्य माहात्म्य विधांसो येऽपि मानवा' । समन्ते तेअपि संसारे कामार्थरवितत्पराः ॥२१॥ फाम कोषस्तथा लोमो रागो पम मस्सर । मदो मारा तथा मोह फन्दो दप एव च ॥ २२ ॥ एते हि रिपयो धौरा धर्मसर्वस्वाारिण । एतैर्षम्रम्पले जीवः संसारे महुदुःखदे ॥ २३ ॥ रागडेपमयो जीव कामक्रोष यतः । लोममोहमठाविएः संसार संसरस्पसौ ॥ २४ ॥ सम्पक्त्वज्ञानसम्पमो बैनमक्त मितेन्द्रिय । लोममोहमदैस्त्पत्तो मोक्षमागी न संश्चयः ॥२५॥ कामक्रोषस्तया मोसयोऽप्येत महाद्विपः । एतेन निर्जिता पावसावत्सौल्प असो नृणाम् ॥ २६ ॥ नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिप। नास्ति फ्रोपसमो पनिर्नास्ति शानसमं सुखम् ॥२७॥ कपायविपयार्थानां देहिनां नास्ति नितिः । तेपा च विरमे सौस्य बापते परमाससम् ॥ २८॥ कपायविपयोरगैात्मा च पीरित सदा। पिफिस्स्सता प्रयमेन मिनवाक्सारमैपजे ॥२९॥ पस्मारसे अवस्वन मोफोऽपिक -पुस्तके । कर्मणा मोहमीपेम मोहित सकस जगत् । पम्या मोद समुस्सार्य तपस्पन्ति महाधिपाः । २ विषयोपोधारमा पुस्तके। विरोरामा मुत्तक ।

सार-समुच्चयः । २२९ विपयोरगदष्टस्य कपायविपमोहितः । संयमो हि महामंत्रखाता सर्वत्र देहिनाम् ॥ ३० ॥ कपायकलुपो जीवो गगरजितमानसः'। चतुर्गतिभवाम्बोधौ भिन्ना नौरिव सीदति ।। ३१ ।। कपायवशगो जीवो कर्म बध्नाति दारुणम् । तेनासो क्लेशमाप्नोति भवकोटिपु दारुणम् ।। ३२॥ कपायविपयश्चित्तं मिथ्यात्वेन च संयुतम् । संसारवीजतां याति विमुक्त मोक्षवीजताम् ॥ ३३॥ कपायविपयं सौख्यं इन्द्रियाणां च संग्रहः । जायते परमोत्कृष्टमात्मनो भवभेदि यत् ।। ३४॥ पायान् शत्रुवत् पश्येद्विषयान् विपवत्तथा । मोहं च परम व्याधिमेवे मर्यो विचक्षणः ॥ ३५ ॥ कपायविपयैश्चौरैर्धर्मरत्नं विलुप्यति ( ते )। वैराग्यखड्गधाराभिः शूराः कुर्वन्ति रक्षणम् ॥३६॥ कपायकपणं कृत्वा विषयाणामसेवूनम् । एतद्भो मानवाः ! पथ्यं सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ।। ३७॥ कपायातपतप्तानां विषयामयमोहिनाम् । संयोगायोगखिन्नानां सम्यक्त्वं परमं हितम् ॥ ३८ ॥ वरं नरकवासोऽपि सम्यक्त्वेन समायुतः । न तु सम्यक्त्वहीनस्य निवासो दिवि राजते ॥ ३९ ॥ सम्यक्त्वं परमं रत्नं शंकादिमलवर्जितम् । संसारदुःखदारिद्य नाशयेत्सुविनिश्चितम् ।।४०॥ सम्यक्त्वेन हि युक्तस्य धवं निर्वाणसंगमः । मिथ्यादृशोऽस्य जीवस्य संसारे भ्रमणं सदा ॥४१॥ १ 'मेवमूचुर्विचक्षणा ख-पुस्तके । २ ‘देवे गति सुनिश्चित क-पम्नके २३० सिदान्तसारादिसंमोहे- परितोऽसौ मिनीतोऽसौ धर्मश प्रियदर्शन । य सदाचारसम्पम सम्परत्वाद्धमानस ॥४२॥ जरामरणरोगाना सम्पपत्वज्ञानमेपर्छ । शमैन कुरुते यस्तु स च वैयो विधीयते ॥४॥ बन्मान्तरार्जित कर्म सम्पपस्वज्ञानर्सयमैः । निराकर्तु मदा युक्तमपूर्व च निरोधनम् ॥४॥ सम्पपस्वं भावयेक्षिा सम्मान परणं तया । कछात्सुचरित प्राप्त नृत्वं याति निरयकम् ॥४५।। अतीतेनापि कालेन पभ प्राप्त कदाचन । वदिदानीं त्वमा प्राप्त सम्पदर्शनमुत्तमम् ॥४६॥ उधम बन्मनि प्राप्ते चारित्रं कुरु यत्नत । सद्धर्मे च परां भक्तिं सम प परमा रसिम् ॥४७॥ अनादिकालजीपेन प्राप्त दुसं पुन' पुन । मिध्यामोहपरीतन कपायवक्षपसिना ॥४८॥ सम्परत्वादिस्पसम्पमं फर्मध्यान्त विनम्पति । आसममम्पसत्वानां काललम्यादिसमिषौ ॥४९॥ सम्परत्वमाषश्चरेन विपयासाचति । फपायपिरतनेष मयदु सं विहन्यते ॥५॥ संसारध्यसनं प्राप्य सम्पपत्वं नाशयन्ति ये । वमन्ति तामृत पीत्वा सम्म्याभिार पुन ॥५१॥ मिथ्यास्त्र परम पी4 संसारस्प दुरात्मन । तस्माचदेव मोरवयं मोक्षसोगर्य मिभुणा ॥५२॥ समरपुलका नवनिरोधनाम् प-पुस्तके।। मभिन व पुस्तके सार-समुच्चयः । २३१ आत्मतत्वं न जानन्ति मिथ्यामोहेन मोहिताः । मनुजा येन मानस्था विप्रलुब्धाः कुशासनैः ॥५३॥ दुःखस्य भीरवोऽप्येते सद्धर्म न हि कुर्वते । कर्मणा मोहनीयेन मोहिता बहवो जनाः ॥५४॥ कथं न रमते चित्तं धर्म चैकसुखप्रदे । देवानां दुःखमीरूणां प्रायो मिथ्यादृशो यतः ॥५५॥ दुःखं न शक्यते सोढुं पूर्वकर्मार्जितं नरैः । तस्मात् कुरुत सद्धर्म येन तत्कर्म नश्यति ॥५६॥ सुकृतं तु भवेद्यस्य तेन यान्ति परिक्षयम् । दुःखोत्पादनभूतानि दुष्कर्माणि समन्ततः ॥५७॥ धर्म एव सदा कार्यो मुक्त्वा व्यापारमन्यतः। यः करोति परं सौख्यं यावनिर्वाणसंगमः ॥ ५८ ॥ क्षणेऽपि समतिक्रान्ते सद्धर्मपरिवर्जिते । आत्मानं मुपितं मन्ये कषायेन्द्रियतस्करैः ॥५९ ॥ धर्मकार्ये मतिस्तांवद्यावदायुदृढं तव । आयुःकर्मणि संक्षीणे पश्चात्त्वं किं करिष्यसि ॥६०॥ धर्ममाचर यत्नेन मा भवस्त्वं मृतोपमः। सद्धर्म चेतसां पुसां जीवितं सफलं भवेत् ॥ ६१ ॥ मृता नैव मृतास्ते तु ये नरा धर्मकारिणः । जीवंतोऽपि मृतास्ते वै ये नराः पापकारिणः ॥१२॥ धर्मामृतं सदा पेयं दुःखातङ्कविनाशनम् । यस्मिन् पीते परं सौख्यं जीवानां जायते सदा ॥६३ ।। १ तत्व स्व-पुस्तके । २ आयुषि कर्मसक्षीणे क-पुस्तके। ३ जीविना ---स्तके।

२३२ सिमान्तसारादिसमहे- स धर्मो यो मायुक्तः मर्वप्राणिहितप्रदः । स एपोपारणे शक्तो भवाम्मोधी सुदस्तरे ॥६४॥ यदा कंठगतप्राणो जीवोऽसौ परिषदेते । नान्म कमित्तदा त्राता मुस्था धर्म जिनोदितम् ॥६५॥ असायुपा नरेपेह धर्मकर्मविजानता । न झायवे फदा मृत्युर्मविप्पति न संशयः ॥१६॥ आयुर्यस्यापि देषझै परिमाते दिवान्तके। तस्यापि धीयते सयो निर्मलोचरयोगव ॥१७॥ जिनैनिगदित धर्म सर्वसौरपमहानिधिम् । ये न त प्रतिपयन्ते तेषां जन्मनिरर्थकम् ॥ ६८ ॥ हितं कर्म परित्यज्य पापफर्ममु रम्यते । सेन थे दमते घेत सोपनीयो मविप्पति ॥ ६९॥ यदि नामाप्रिम दास मुख वा यदि वा प्रियम् । वत' कुरव सदर्भ मिनाना जितजन्मनाम् ॥ ७० ॥ विश्वलादेव संकल्पास्सम समिरुपार्यते । स्वत्पेनैव प्रयासन पित्रमपदो परम् ॥७१॥ धर्म एव सदा धावा जीवाना दुःखसंकटात् । सस्मास्कृरुव मो पत्न मानन्वसुखप्रद ॥७२॥ बस्पा माषप्रारतस्यै पाषा बर्वते । सीपपिमुदो मपभो मणमुगे पदार मसपमो। मषभो मोयममुना लारतरियम्मि पलसपमा १० १तस्प -पुस्तः । निमित्तोतलोतः -पुस्तके। प्रपपता५पाए ।

सार-समुच्चय । २३३ यत्त्वया न कृतो धर्मः सदा मोक्षसुखावहः । प्रसन्नमनसा येन तेन दुःखी भवानिह ॥७३॥ यत्त्वया क्रियते कर्म विषयान्धेन दारुणम् । उदये तस्य सम्प्राप्ते कस्ते त्राता भविष्यति ॥७४|| भुक्त्वाप्यनन्तरं भोगान् देवलोके यथेप्सितान् । यो हि तृप्ति न सम्प्राप्तः स किं प्राप्स्यति सम्प्रति ॥७५॥ वरं हालाहलं भुक्तं विषं तद्भवनाशनम् । न तु भोगविषं भुक्तमनन्तभवदुःखदम् ।।७६।। इन्द्रियप्रभवं सौख्यं सुखाभासं न तत्सुखम् । तच कर्मविबन्धाय दुःखदानैकपण्डितम् ॥७७।। अक्षाश्वान्निश्चलं धत्स्व विषयोत्पथगामिनः । वैराग्यप्रग्रहाकृष्टान् सन्मार्गे विनियोजयेत् ॥७॥ अक्षाण्येव स्वकीयानि शत्रवो दुःखहेतवः। विषयेषु प्रवृत्तानि कषायवशवर्तिनः ॥ ७९ ॥ इन्द्रियाणां यदा छंदे वर्तते मोहसंगतः । तदात्मैव तव शत्रुगत्मनो दुःखबन्धनः ॥ ८० ॥ इन्द्रियाणि प्रवृत्तानि विषयेषु निरन्तरम् । सज्ज्ञानभावनाशक्त्या वारयन्तीह ते रताः ।। ८१ ॥ इन्द्रियेच्छारुजामज्ञः ? कुरुते यो ह्युपक्रमम् । तमेव मन्यते सौख्यं किं तु कष्टमतः परम् ।। ८२ ॥ आत्माभिलाषरागाणां यः समः क्रियते बुधैः । तदेव परमं तत्वमित्यूचुर्ब्रह्मवेदिन ।। ८३ ॥ १ वारयन्ति हिते रता ख । २ मन्य ।

२३१ सिद्धान्तसारारिसमह- इन्द्रियामा समे लामं रागडेपजयेन च । आत्मान योजयेत्सम्पक संरतिच्छेदकारणम् ॥ ८४ ॥ इन्द्रियाणि वशे यस्स यस्म दुष्टं न मानसम् । आत्मा धर्मरतो यस्य सफलं तस्प जीवितम् ॥ ८५॥ परनिन्दासु ये मका निजसाध्यपराम्मुखा । ईदशैर्य गुणैर्युक्तो प्रग्या सर्वत्र विएपे ॥८६॥ प्राणान्तिपि सम्प्राप्ते पर्जनीयानि साधुना । पर लोकषिरुदानि येनात्मा सुसमश्नुते ॥ ८७ ॥ स मानमति सूतानि यः सदा विनयान्वितः । स प्रियः सर्वलोकेऽस्मिभापमान समश्नुते ॥ ८८॥ किम्पाकस्प फलं मदम कदाचिदपि भीमसा । विपपास्त न मोक्तम्मा पपपि स्य सुपेशला' ॥ ८९॥ सीसम्पर्कसम सौरमं वर्णपन्त्यमुधा बना । विधार्यमाणमेतलि दुखाना पीजसत्तमम् ॥ ९० ॥ स्मरामिना प्रदग्पानि शरीराणि शरीरिणाम् । क्षमाम्मसा हि सितानि निधि नैव मेजिर ॥ ९॥ अमिना तु प्रदधाना स(स)मोस्तीति यवोज्य वै । स्मरवनिप्रदग्धानां स(श)मो नास्ति मवेष्वपि ॥९२ ॥ मदनोऽस्ति महाष्याभिईपिकिस्स्पा मदा पुपै । संसारवर्षनेत्यय दुखोत्पादनतस्परः ॥ ९३ ॥ मापदस्प रिकामामिहदये प्रम्पलत्पलम् । आभयन्ति हि कर्माणि वापदेस्म निरन्सरम् ॥ ९४ ॥ १ पुजास्ते पूग्या सर्वनिरपे । । ९ परोक । भामूगन्ति - सार-समुच्चयः । २३५ कामाहिदृढदष्टस्य तीव्रा भवति वेदना । यया सुमोहितो जन्तुः संसारे परिवर्तते ॥ ९५ ॥ दुःखानामाकरो यस्तु संसारस्य च वर्धनम् । स एव मदनो नाम नराणां स्मृतिसूदनः ॥ ९६ ॥ संकल्पाच समुद्भूत कामसर्पोतिदारुणः । रागद्वेषद्विजिव्होऽसौ वशीकर्तुं न शक्यते ॥ ९७ ॥ दुष्टा येयमनङ्गेच्छा सेयं संसारवर्धिनी । दुःखस्योत्पादने शक्ता शक्ता वित्तस्य नाशने ॥ ९८ ॥ अहो ते धिषणाहीना ये स्मरस्य वशं गताः । कृत्वा कल्मषमात्मानं पातयन्ति भवार्णवे ॥ ९९ ।। स्मरेणातीवरौद्रेण नरकावर्तपातिना । अहो खलीकृतो लोको धर्मामृतपराङ्मुखः ॥ १० ॥ सरेण स्मरणादेव वैरं देवनियोगतः। हृदये निहितं शल्यं प्राणिनां तापकारकम् ॥ १०१॥ तस्मात्कुरुत सद्वृत्तं जिनमार्गरताः सदा। ये सत्खंडितां याति स्मरशल्यं सुदुर्धरम् ॥ १०२ ॥ चित्तसंदूषकः कामस्तथा सद्गतिनाशनः । सवृत्तध्वंसनश्वासौ कामोऽनर्थपरम्परा ॥१०३ ॥ दोषाणामाकर' कामो गुणानां च विनाशकृत् । पापस्य च निजो बन्धु परापदां चैव संगमः ॥१०४॥ पिशाचेनैव कामेन छिद्रितं सकलं जगत् । बंभ्रमेति परायत्तं भवाब्धौ स निरन्तरम् ॥१०५॥ १ तीव्रभावातिवेदना क । २ यस्याप्तिमोहितो क । ३ बन्दन ख.। ४ संदूषण ख । ५ निरन्तर क ।

६ सिद्धान्तसारादिसग्रहे- वैरम्पमावनामप्रैस्तनिवार्य महापलं । स्वच्छन्दायो धीराः सिदिसौम्यं प्रपेदिरे ॥ १०६ ॥ कामी त्यजति सदृष गुरोर्वागी हिसं तया । गुणानां समुदाय प घेतः स्वास्थ्य तथैव च ॥१०७॥ वस्मास्कामः सदा हेयो मोक्षसौम्म जिपक्षुमि । संमारं च परित्यक्सु पाछप्रियतिसत्तमैः ॥ १०८॥ फामार्थी वैरिमो नित्यं विभुरध्यानरोधनौ । संत्यग्यता महाकौ सुर्ख संजायते नृणाम् ॥ १०९ ॥ कामदादो पर मोई न तु पीलस्स खण्ठनम् । शीलखग्नशीलाना नरके पतनं सुव ॥ ११० ॥ कामदाहः सदा नैव म्वल्पकालेन शाम्पति । सेवनाथ महापापं नरकावर्सपावनम् ॥ १११।। सुतीवेमापि फामेन स्वरसकालं तु घेदना । खंडनेन शीलस मवकोटिपु वेदना ॥११२॥ नियत प्रशम याति कामदार सुदाणः । झानोपयोगसामाद्विय मंत्रपदैर्यया ।। ११३ ।। असेवनमनस्य क्षमाप परमं स्मृतम् । सेवनाथ परा आदि समस्तु न कदाचन ॥ ११४ ॥ उपवासोऽवमोदर्य रसाना स्पजन वया । अनानसेपनं चव ताम्म्लस प पर्जनम् ॥११५|| असेवेच्छानिरोषस्तु निरनुम्मरणं मया । एसे हि निरोपाया मदनस्प महारिपो ॥ १६ ॥ मारतापप।

सार-समुच्चयः। २३७ - काममिच्छानिरोधेन क्रोधं च क्षमया भृशं । जयेन्मानं मृदुत्वेन मोहं संज्ञानसेवया ॥ ११७ ।। तस्मिन्नुपशमे प्राप्ते युक्तं सद्त्तधारणं । तृष्णां सुदूरतस्त्यक्त्वा विषानमिव भोजनं ॥ ११८ ॥ कर्मणां शोधनं श्रेष्ठं ब्रह्मचर्यसुरक्षितं । सारभूतं चरित्रस्य देवैरपि सुपूजितम् ॥ ११९ ।। या चैषा प्रमदा भाति लावण्यजलवाहिनी । सैषा वैतरणी घोरं दुःखोर्मिशतसंकुलो ॥ १२० ॥ संसारस्य च वीजानि दुःखानां राशयः पराः । पापस्य च निधानानि निर्मिता केन योषितः ॥ १२१॥ इयं सा मदनज्वाला वन्हेरिव समुद्भुता । मनुष्यैर्यत्र हूयंते यौवनानि धनानि च ॥ १२२ ॥ नरकावर्तपातिन्यः स्वर्गमार्गदृढार्गलाः । अनर्थानां विधायिन्यो योपितः केन निर्मिताः ॥१२३।। कृमिजालशताकीर्णे दुर्गन्धमलपूरिते । विण्त्रसंवृते स्त्रीणां का काये रमणीयता ॥ १२४ ।। अहो ते सुर्खितां प्राप्ता ये कामानलवर्जिताः । सद्वृत्तं विधिनापाल्य यास्यन्ति पदमुत्तमं ॥ १२५ ।। १ घोरा ख । २ अस्मादने श्लोकोऽय ख-पुस्तके- दर्शने हरते चित्त स्पर्शने हरते धनम् संयोगे हरते प्राण नारी प्रत्यक्षराक्षसी ॥१॥ ३ नराणा ख । ४ वयात्रसवृते ख ।

२३८ सिदान्ससदिसमहे- मोगार्थी य करोत्यसो निदानं मोइसंगत । पूर्णीकरोत्यसौ रस्नं अनर्यसूसहेतुना ॥ १२६ ॥ मवमोगहरीरेषु मावनीय सदा पुपै । निर्वेद परया पुचा कारातिजियामि ॥ १२७ ॥ गायम मृत्युषप्रेण देवसलो निपात्यत । नियुश्यन मनस्तापत्कर्मारातिपरिषये ॥ १२८ ॥ स्मज कामार्पयो संग धर्मध्यानं सदा मज । छिदि नेहमपान् पाशान् मानुष्य प्राप दुर्लभम् ॥१२९॥ कथ से भ्रष्टसदाच ? विपयानुपसेवसे । पधा हरसा सेप नरके तीमबेदना ।। १३० ॥ साइचमष्टपिताना विपयासंगसंगिनाम् । सपामिष दु सानि भवन्ति नरकेपु ष ॥ १३१ ॥ विपयास्वादलग्न रागद्वेपवशास्मना । बारमा प चितस्तेन यः शम नापि सेक्से ॥१३२ ।। आत्मनो यस्कस फर्म मोक्तन्य सदनेकपा । तस्मात् कर्मासवं समा स्वेन्द्रियाणि पश्यं नपेत्॥१३॥ इन्द्रियप्रमरं सध्या स्वात्मानं वनमानपेत् । येन निर्वाणसौम्पस्प भाजन स्वं प्रपत्ससे ॥ १३४ ॥ सम्पन्नेप्वपि मोगपु महतां नास्ति गृदया। अन्येपो गृद्विमास्ति समस्तु न कदाचन ॥ १३५॥ पदनराधिपतिपकी परित्यग्य वसुन्धराम् । वमपत् मर्षमोगाम दीक्षा दैगम्मरी स्थिता ॥१६॥ ८ परमामोपाप्मनी।

सार-समुच्चयः । २३९ कृमितुल्यैः किमस्माभिः भोक्तव्यं वस्तु दुस्तरं । तेनात्र गृहपंकेषु सीदामः किमनर्थकम् ।। १३७॥ येन ते जनितं दुःखं भवाम्भोधौ सुदुस्तरम् । कारांतिमतीवोनं विजेतुं किं न वाञ्छसि ॥ १३८ ॥ अब्रह्मचारिणो नित्यं मांसभक्षणतत्पराः । शुचित्वं तेऽपि मन्यन्ते किन्तु चिन्त्यमतःपरम् ॥१३९।। येन संक्षीयते कर्म संचयश्च न जायते । तदेवात्मविदा कार्य मोक्षसौख्याभिलाषिणा ।। १४० ॥ अनेकशस्न्वया प्राप्ता विविधा भोगसम्पदः । अप्सरोगणसंकीर्णे दिवि देवविराजिते ॥ १४१॥ पुनश्च नरके रौद्रे रारवेऽत्यन्तमीतिदे । नानाप्रकारदुःखोपैः संस्थितोऽसि विधेर्वशात् ॥ १४२ ॥ तप्ततैलिकभल्लीषु पच्यमानेन यत्त्वया । संप्राप्तं परमं दुःख तद्वक्तुं नैव पार्यते ॥ १४३ ॥ नानायंत्रेषु रौद्रेषु पीडयमानेन वन्हिना । दुःसहा वेदना प्राप्ता पूर्वकर्मनियोगतः ॥१४४॥ विण्मूत्रपूरिते भीमे पूति श्लेष्मावसाकुले । भूयो गर्भगृहे मातुर्दैवाद्यातोऽसि संस्थितिम् ॥ १४५ ॥ तिर्यग्गतौ च यदुःखं प्राप्तं छेदनभेदनैः । न शक्तस्तत् पुमान् वक्तुं जिव्हाकोटिशतैरपि ॥ १४६॥ संसृतौ नास्ति तत्सौख्यं यन प्राप्तमनेकधा । देवमानवतिर्यक्षु भ्रमता जन्तुनानिशं ॥ १४७ ॥ १ मोकव्य वस्तु सुदर ख । २ त कारातिमत्युग्र ख । ३ चित्र ख.।

२०० सिद्धान्तसारादिसंप्रहे-- चतुर्गतिनिषन्धेऽस्मिन् संसारेत्य चमीतिदे । सुखदुःखान्पयाप्तानि ममता विधियोगवः ॥१४८॥ एवंविघमिदं कष्ट झात्यास्पन्दविनश्वरम् । फर्य न यासि वैराग्य धिगस्तु तव जीवितम् ॥१४९॥ जीवितं विगुवा सुल्प संयोगाः म्वप्नसभिमा । सन्ध्यारागसमः स्नेह भरीरं समपिन्दुषत् ॥ १५० ॥ शुक्रचापसमा भोगा' सम्पदो बलदोपमाः। यौपनं अलरेखेव सर्वमेतदशाश्वतम् ॥ १५१ ॥ समानवेयसो रट्या मृत्युना ववसीमताः । फर्य घेता ममो नास्ति मनागपि हिवात्मन' ॥१५२ ॥ सर्वाधिमये फाये नश्वरे व्याधिपीरिते। को हि विद्वान् रतिं गच्छेपसास्ति भुवसंगमः ॥१५॥ धिर मुयोपितः कामो मोमनाच्छादनादिमि । विकसि माति मोऽप्यन्ते फास्पा बाप वस्तुप ॥१५४॥ नापातो धुमि सा न गयो पन्धुमि सम । वि स्वनने स्नेहो नराणां मुडपेतसाम् ॥ १५५ ॥ बातनावपमर्सम्य प्रामिना प्राणमारिमा । बत कुरुत मा शोक मृत मधुबने पुधाः ॥ १५ ॥ यात्मकार्य परित्यग्य परकार्येषु यो रत । ममस्वरसपेवक म्वहिसं अंशमेप्पति ॥ १५७ ॥ स्वहित ह मग्नानं पारि दर्शनं सथा । उप संरक्षण चैव मर्वविद्भिस्तदुपते ॥ १५८ ॥ बरसा का स्वामयेन बायैन भामाशय पुस्तदे। रखा पुरवपदये । ५ वस्त्र - स्वहिवारपनपति प.।

सार-समुच्चय। २४१ सुखसंभोगसंमूढा विषयास्वादलम्पटा. । स्वहिताद्भशमागत्य गृहवास सिषेविरे ॥ १५९॥ वियोगा बहवो दृष्टा द्रव्याणां च परिक्षयात् । तथापि निघृण चेत सुखास्वादनलम्पटः ॥ १६० ॥ यथा च जायते चेतः सम्यक्छुद्धिं सुनिर्मलाम् । तथा ज्ञानविदा कार्य प्रयत्नेनापि भूरिणा ।। १६१ ॥ विशुद्धं मानसं यस्य रागादिमलवर्जितम् । संसारायं फलं तस्य सकलं समुपस्थितम् ॥ १६२॥ संसारध्वंसने हीष्टं धृतिमिन्द्रियनिग्रहे । कषायविजये यत्नं नाभव्यो लब्धुमर्हति ॥ १६३ ॥ एतदेव परं ब्रह्म न विन्दन्तीह मोहिनः । यदेतचित्तनैमल्यं रागद्वेषादिवर्जितम् ॥ १६४ ॥ तथानुष्ठेयमेतद्धि पंडितेन हितैषिणा। यथा न विक्रियां याति मनोऽत्यय विपत्स्वपि ॥१६५॥ धन्यास्ते मानवा लोके ये च प्राप्यापदां पराम् । विकृतिं नैव गच्छन्ति यतस्ते साधुमानसाः ॥१६६ ॥ संक्लेशो न हि कर्तव्यः संक्लेशो बन्धकारणं । संक्लेशपरिणामेन जीवो दुःखस्य भाजनं ॥ १६७॥ संक्लेशपरिणामेन जीवः प्राप्नोति भूरिशः । सुमहत्कर्म सम्बन्धं भवकोटिषु दुःखदम् ॥ १६८ ॥ चित्तरत्नमसंक्लिष्टं महतामुत्तमं धनम् । येन सम्प्राप्यते स्थानं जरामरणवर्जितम् ॥ १६९ ॥ सम्पत्तौ विस्मिता नैव विपत्तौ नैव दुःखिताः । महतां लक्षणं ह्येतन्न तु द्रव्यसमागमः ॥१७०॥ १६ २०२ सिदान्तसारादिसंग्रहे- आपत्सु सम्पतन्तीपु पूर्वकर्मनियोगस । शौर्यमेव परं प्राणे न युतमनुशोधनम् ॥ १७१॥ विशुदपरिणामेन शान्तिर्मवति सर्वत । संलिप्टेन तु पिचन नास्ति शान्तिर्मषेष्वपि ॥ १७२ ॥ संक्लिष्टषेता पुंसां माया संसारवर्षिनी । विदेषेतसो धिा सम्पतिविचदायिनी ॥ १७३ ॥ यदा घिचविनुवः म्पादापद' सम्पदस्तयों। समस्तस्वविदा पुंसां सर्व हि महतां महत् ॥ १७४ ।। परोऽप्युत्पयमापमो निपेनु युक्त एव सः । किं पुन स्वमनोत्यर्प विषयोत्पथयामिवत् ॥ १७५ ॥ अज्ञानापदि मोहापत्कृतं कर्म सुरुत्सितम् । व्यावर्तन्मनस्तस्मात् पुनस्तम समाचरेत् ।। १७६ ॥ अपिरेपेष फालेन फल प्राप्स्पसि दुर्मते !! विपारेटीव तिक्तस्य कर्मणो यत्त्वया रूतम् ॥१७॥ वर्षमान वि कर्म संज्ञानापो न शोषयेत् । मप्रभूवार्णवसंग्रस्तः स पक्षात्परितप्पते ॥१७॥ सुखमाषकते मा किं न कुर्वन्ति मानवाः । बेन सन्तापमामान्ति जन्मकोटिससेप्पपि ॥१७२।। परं च पयामीति यो हि मायां प्रयुम्यते । मिरि ।। ।। तलविदा पुसा । ४ यताक ५ लम्साल और भस्मादमे -पुस्तके औरोऽर्म सम्पनव फासेन फर्म माप्स्पसि पतलं । शापवरमकर्मम्पा गोपयत्सुमनागपि ॥ -प्रभवभूवर्सप्रस्व र वा।

सार-समुच्चयः । २४३ इहामुत्र च लोके वै तैरात्मा वंचितः सदा ॥१८॥ पंचतासन्नतां प्राप्तं न कृतं सुकृतार्जनं । स मानुपेऽपि संप्राप्ते हा! गतं जन्म निष्फलम् ॥१८१॥ कर्मपाशविमोक्षाय यत्नं यस्य न देहिनः । संसारे च महागुप्तौ बद्धः संतिष्ठते सदा ॥१८२॥ गृहाचारकवासेऽस्मिन् विपयामिपलोभिनः । सीदंति नरशार्दूला बद्धा बान्धवबन्धनैः ॥१८३॥ गर्भवासेऽपि यद्दुःक्खं प्राप्तमत्रैव जन्मनि । अधुना विस्मृतं केन येनात्मानं न बुध्यसे ॥१८४॥ चतुरशीतिलक्षेषु योनीनां भ्रमता त्वया । प्राप्तानि दुःखशल्यानि नानाकाराणि मोहिना ॥१८५॥ कथं नोद्विजसे मूढ ! दुःखात् संसृतिसंभवात् । येन त्वं विषयासक्तो लोभेनास्मिन् वशीकृतः ॥१८६॥ यत्त्वयोपार्जितं कर्म भवकोटिषु पुष्कलं । तच्छेत्तुं चेन्न शक्तोऽसि गतं ते जन्म निष्फलम् ॥१८॥ अज्ञानी क्षिपयेत्कर्म यज्जन्मशतकोट्रिभिः । तज्ज्ञानी तु त्रिगुप्तात्मा निहन्त्यन्तर्मुहूर्ततः ॥१८८॥ जीवितेनापि कि तेन कृता न निर्जरा तदा । कर्मणां संवरो वापि संसारासारकारिणाम् ॥१८९।। स जातो येन जातेन स्वकृता पक्कपाचना । कर्मणां पाकघोराणां विविधेन महात्मनाम् ॥१९०॥ रोषे रोपं परं कृत्वा माने मानं विधाय च । सङ्गे सङ्गं परित्यज्य स्वात्माधीनसुखं कुरु ॥१९१॥ १ अधुना किं विस्मृत तेन ख । २ कर्मणां क । ३ तेन ख । ४ निबुखेन ख ।

२१९ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- परिग्रहे महादेपो मुक्ती व रतिरुचमा । सपाने चिचमेफागं रौद्राचे नैव सस्थितम् ॥१९२ ॥ धर्मस्य संचये यत्नं कर्मणां च परिक्षये । साधूनां येष्टितं चिचं सर्वपापप्रणाशनम् ॥१९॥ मानस्सम छ मक्त्वा लोमानि च विदार्य थे। मायावती समुत्पाव्य कोषश निहन्य च ॥१९४॥ पपाख्यातं हितं प्राप्य चारित्र प्यानवत्पर । कर्मणां प्रथम त्या प्राप्नोति परमं पदम् ॥१९५॥ संगादिरहिता घीरा रागादिमलपर्षिता । शा-सा दान्तास्वपोस्पा मुक्तिकांक्षमतत्परा ॥१९॥ मनोषाकाययोगेषु प्रणिपानपरायमाः। चाव्या पानसम्पमास्त पात्रं करमापराः ॥ १९७॥ प्रतिमाषनया युक्ता सुममाषनयान्विता । तस्वाहितसस्कास्ते पाय वरचमाः ॥१९८॥ पृतिमावनमा दुरसं सस्वमापनया भवम् । झानमावनया फर्म नाशयन्ति न संशय ॥१९९ ॥ अग्रहो हि मे येपी विग्रह कर्मशत्रुमि । विषयेषु निरासङ्गास्ते पात्रं पतिसत्तमाः॥२०॥ नि संगिनोऽपि पचामा निस्नेहाः सुभूतिप्रिया । अमूपा पि वपोभूपास्त पात्रं योगिनः सदा ॥२०१॥ ममत्व सदा त्यक्त सकायेऽपि मनीपिमिः । तु पात्रं संपवात्मान सर्वसत्वहिते रता' ।। २०२॥ १भप्राय हि सम ।

सार-समुच्चय । २४५ परीपहजये शक्तं शक्तं कर्मपरिक्षये । ज्ञानध्यानतपोभूपं शुद्धाचारपरायणं ।। २०३।। प्राशान्तमानसं सौख्यं प्रशान्तकरणं शुभं । प्रशान्तारिमहामोहकामक्रोधनिस्सूदनम् ॥ २०४ ।। निन्दास्तुतिसमं धीर शरीरेऽपि च निस्पृहं । जितेन्द्रियं जितक्रोधं जितलोभमहाभटं ।। २०५॥ रागद्वेषविनिर्मुक्त सिद्धिसंगमनोत्सुकम् । ज्ञानभ्यांसरतं नित्यं नित्यं च प्रशमे स्थितम् ॥२०६॥ एवं विधं हि यो दृष्ट्वा स्वगृहाङ्गणमागतम् । मात्सर्य कुरुते मोहात् क्रिया तस्य न विद्यते ॥ २०७॥ चतुर्भि कुलकम् । मायां निरासिकां कृत्वा तृष्णां च परमौजसः । रागद्वेषौ समुत्सार्य प्रयाता पदमक्षयम् ॥२०८।। धीराणामपि ते धीरा ये निराकुलचेतसः। कर्मशत्रुमहासैन्यं ये जयन्ति तपोबलात् ॥ २०९ ।। परीषहजये शूराः शूराश्चेन्द्रियनिग्रहे । कषायविजये शूरास्ते शूरा गदिता बुधैः ।। २१० ।। नादत्तेऽभिनवं कर्म सच्चारित्रनिविष्टधीः । पुराणं निर्जयेद्बाढं विशुद्धध्यानसंगतः ॥२११॥ संसारावासनिर्वृत्ताः शिवसौख्यसमुत्सुकाः । सद्भिस्ते गदिताः प्राज्ञाः शेषाः शास्त्रस्य वंचकाः।।२१२॥ समता सर्वभूतेषु यः करोति सुमानसः । समत्वभावनिमुक्तो यात्यमौ पदमव्ययम् ॥ २१३ ॥ १ ज्ञानभ्यासरतो का २ स्वार्थस्य ख ।

२०१ सिद्धान्तसारादिसपहे-- इन्द्रियाणां बये भूराः कर्मसन्धे च फावराः । तत्वार्याहितचेतस्का स्वशरीरेपपि निस्सहा ॥२१४ ॥ परीपहमहारासिवननिर्दलनक्षमाः । कपापविनये शूराः स शूर इति कथ्यते ॥२१॥ संसारपंसिनी पर्या ये कति सदा नराः । राग पहतिं कृत्वा ते यान्ति परेम पदम् ॥ २१६ ॥ मलैस्तु रहिता पीरा मलदग्पांजपष्टय । सहमपारियो निरय झानाम्मासं सिपेविर ॥२१७॥ शानभावनया शक्तो निमृतेना॑न्तरात्मनः । अप्रमचं गुणं प्राप्य लभन्ते हितमात्मन ॥२१८॥ संसारावासमीरमा त्यस्ता पसंगिनाम् । विपरेभ्यो निशाना साध्य पाहि जीविवा२१९) सम शत्रौ च मित्र व समो मानापमानयो । लामालामे समो निस्पं लोष्ठकांचनमोस्तया ।। २२०॥ सम्पक्स्वमावनाशुद्ध ज्ञानसेवापरायण । चारित्रापरणासमक्षीणमुखकाक्षिणम् ॥२२१॥ ई भमणं रदषा मो न मन्पेव दुएषी । नृजन्मनिष्फलं सारं संहारपति सर्पया ॥२२२॥ रागादिवर्जनं सङ्ग परित्पग्य बनता । धीरा निर्मलबेवस्का तर्पस्पन्ति महाधियः ।।२२।। ससारोदिनषिचानां नि भेयससुखपिणाम् । मर्यसंगनिाचाना भन्य नेपा हि नीपिसम् ।।२२४॥ १ परमा पनि य । दिपा । सिंध प. मिरम्तरा भब तपस्चराप्रपस्वस्तिमापिया।

सार-समुच्चय । २४७ सप्तभीस्थानमुक्तानां यत्रास्तमितशायिनाम् । त्रिकालयोगयुक्तानां जीवितं सफलं भवेत् ॥२२५॥ आतरौद्रपरित्यागाद् धर्मशुक्लसमाश्रयात् । जीवः प्राप्नोति निर्वाणमनन्तसुखमच्युतं ॥२२६॥ आत्मानं विनयोम्याशु विपयेषु पराङ्मुखः । साधयेत्स्वहितं प्राज्ञो ज्ञानाभ्यासरतो यति. ॥२२७॥ यथा संगपरित्यागस्तथा कर्मविमोचनम् । यथा च कर्मणां छेदस्तथासन्नं परं पदम् ॥२२८॥ यत्परित्यज्य गन्तव्यं तत्स्वकीयं कथं भवेत् । इत्यालोच्य शरीरेऽपि विद्वान् तां च परित्यजेत् ॥२२९॥ नूनं नात्मा प्रियस्तेषां ये रता संगसंग्रहे । समासीनाः प्रकृतिस्थाः स्वीकर्तुं नैवशक्यते ॥२३०॥ शरीरमात्रसंगेन भवेदारंभवर्धनम् । तदशाश्वतमत्राणं तस्मिन् विद्वान् रतिं त्यजेत् ॥२३१॥ संगात्संजायते गृद्धिगुद्धौ वाञ्छति संचयम् । संचयाद्वर्धते लोभो लोभादु खपरंपरा ॥२३२॥ ममत्वाज्जायते लोभो लोभाद्रागश्च जायते । रागाच्च जायते द्वेषो द्वेषाद्दु खपरंपरा ॥२३३॥ निर्ममत्वं परं तत्वं निर्ममत्वं परं सुखं । निर्ममत्वं परं वीजं मोक्षस्य कथितं बुधैः ॥२३४॥ निर्ममत्वे सदा सौख्यं संसारस्थितिच्छेदनम् । जायते परमोत्कृष्टमात्मन संस्थिते सति ॥२३५॥ १ विनयाभ्यासे ख । २ विद्वानाशा परित्यजेत् ख । ३ मत्राणा क, मात्राणां ख.। ४ भेदन क ।

२१८ सिद्धान्तसारादिसपहे- अर्थो मूलमननामों निहतिनाशनम् । कपायोत्पादकमार्यो दु'सानां च विघापक ॥२३९ ॥ प्राप्तोनिमसानि विधानि त्वया सर्वाणि समता। पुनस्सेप रति कष्टो मुक्तवान्त पौदने ॥ २३७ ॥ को वा विच समादाय परलोकं गत' पुमान् । येन तृष्णामिसंतप्त फर्म पनाति दारुणम् ॥ २३८॥ कृष्णा घा नैप पश्यन्ति हितं वा यदि वाहितम् । सन्तोपासनमासाच पश्यन्ति सुधियो जना ।। २३९ ।। सन्तोपसारसद्रस्न समादाय विपक्षमा । मवन्ति सुखिनो नित्य मोक्षसन्मार्गवर्तिन ॥२४० ॥ सृष्णानलप्रदीप्तानां मुसोस्थ्य सु सो नृणाम् । दुःखमेव सदा वेपो ये रता धनसंचये ॥ २४१ ॥ सन्तुष्टा' मुखिनो नित्यमसन्तुष्टाः मुखिया । उमयोरन्तरं शात्वा सन्तोपे क्रिया रति ॥२४२ ॥ द्रम्पाशा दूरवस्स्पफ्स्वा सन्तोर्प पुरु सन्मते ।। मा पुनर्पिसंसारे पर्यटिप्पमि निपिसम् ॥ २४३ ।। ईश्वरो नाम सन्तोपी यो प्रार्थयते परम् । प्रार्थना महवामत्र पर दारियकारणम् ।। २४४॥ दमे दमवेत्यर्थ कृप्यामिपरितापिस । न शमयं शमनं कर्तुं विना सन्तोपवारिमा ॥२४५।। मैः सन्तोपामृत पीतं निर्ममस्पेन बासितं । त्यस तैर्मानसं दुख दुखेनेनेव सौरवं ॥ २४६ ।। पियवेक सन्तोपोरका पुनमगा। - सार-समुच्चय। २४९ यैः सन्तोपामृत पीतं तृष्णातृप्रणाशनं । तैश्च निर्वाणसौख्यस्य कारणं समुपार्जितम् ॥ २४७॥ सन्तोष लोभनाशाय रतिं च सुखशान्तये । ज्ञानं च तपसां वृद्धौ धारयन्ति दिगम्बराः ॥ २४८ ॥ ज्ञानदर्शनसम्पन्न आत्मा चैको ध्रुवो मम । शेषा भावाश्च मे बाह्या सर्वे संयोगलक्षणाः ॥ २४९॥ सयोगमूलजीवेन प्राप्ता दुःखपरपरा । तस्मात्संयोगसम्बन्धं त्रिविधेन परित्यजेत् ॥२५०॥ ये हि जीवादयो भावाः सर्वज्ञैर्भापिताः पुराः। अन्यथा च क्रियास्तेपां चिंततार्थनिरर्थकाः ॥२५१ ॥ यथा च कुरुते जन्तुर्ममत्वं विपरीतधीः । तथा हि बन्धमायाति कर्मणस्तु समन्ततः ॥२५२ ।। अज्ञानावृतचित्तानां रागद्वेषरतात्मनाम् । आरंभेषु प्रवृत्तानां हितं तस्य न भीतवत् ॥ २५३ ॥ परिग्रहपरिष्वगाद्रागद्वेषश्च जायते । रागद्वेषौ महाबन्धः कर्मणां भवकारणम् ॥ २५४ ॥ सर्वसॉन् पशून् ? कृत्वा ध्यानाग्निनाहुतिं क्षिपेत् । कर्माणि समिधश्चैव योगोऽयं सुमहाफलम् ॥ २५५ ॥ राजस्यसहस्राणि अश्वमेधशतानि च । अनन्तभागतुल्यानि न स्युस्तेन कदाचन ॥२५६॥ सा प्रज्ञा या शमे याति विनियोगपुराहिता । शेषा च निर्दया प्रज्ञा कर्मोपार्जनकारिणी ॥२५७॥ १ सतोषो क। २ धृति ख । ३ चिन्तात्र निरर्थका ख । ४ सर्वसगात् " ? पसून् कृत्वा ख २५० सिदाम्ससदिसमहे- प्रनागना सदा सेव्या पुरुपण सुखावा । हयोपादयतत्वज्ञा या रता सर्वकर्मणि ॥ २५८ ॥ दयाङ्गना सदा सेन्या सर्वकोसफलप्रदा । सेविवासौ करोत्याशु मानस करगांत्मनम् ॥ २५९॥ मैश्यङ्गना सदोपास्या इदयानन्दकारिणी। या विषचे रुतोपास्तिभिर्व विपवर्जितं ॥२६॥ सबसत्वे दया मैत्री य करोति मुमानसः । बसत्यसावरीन सर्पान् पामाभ्यन्तरसंस्थितान् ॥२६॥ शम नमन्ति भूतानि ये शका देशनाविधौ । कालादिलम्धियुक्तानि प्रस्यां वस्स निर्मरा ॥२६२ ॥ शमो हि न भषेप ते नरा पचसमिमाः । समृदा अपि तच्छास कामार्थरति सङ्गिन ॥२१॥ षित (प्रे) नरफतिर्यच प्रमतोपि निरन्सरं । यसोऽमो विद्यते नैव समो दुरितपघिने ॥२६॥ मनसाल्हादिनी सम्मा सर्पकालमुखप्रया । उपसेव्या त्वया मद्र ! धमा नाम छलाङ्गना ॥ २९५ ।। धमया थीयते कर्म दुखदं पूर्वमषित । वि व जायते शुद्धि विपमपवर्जितम् ॥२६॥ प्रज्ञा तया च मैत्री प ममता कुरुमा धमा । मम्यक्त्वमरिता सम्या सिदिसौरम्पमुखपदा ॥२६७|| १ म रमन का मास्म।एचस्व । समावे । सन्तो विपत। ६मस्मात् होकात्पूर्षमोकब-पुस्तके। कर्मपा प्वंसने बित्तं पर्ग मोहारिनाशने । मेष कषायपर्म बनायोम्पो समहति । १॥ कर्म । “ प्रयासूगा।

सार-समुच्चयः। २५१ भयं याहि भवानीमात् प्रीतिं च जिनशासने । शोकं पूर्वकृतात्पापाद्यदीच्छेद्धितमात्मनः ॥२६८॥ कुसंसर्गः सदा त्याज्यो दोषाणां प्रविधायकः । सगुणोऽपि जनस्तेन लघुतां याति तत्क्षणात् ॥२६९॥ सत्सङ्गो हि बुधैः कार्यः सर्वकालसुखप्रदः । तेनैव गुरुतां याति गुणहीनोऽपि मानवः ॥२७०॥ साधूनां खलसंगेन चेष्टितं मलिनं भवेत् । सैंहिकेयसमाशक्या भाव्यं भावोरपि क्षयः ? ॥२७१॥ रागादयो महादोषाः खलास्ते गदिता बुधैः । तेषां समाश्रयस्ताज्यस्तत्वद्विद्भिः सदा नरैः ॥२७२॥ गुणाः सुपूजिता लोके गुणाः कल्याणकारकाः । गुणहीना हि लोकेऽस्मिन् महान्तोऽपि मलीमसा.॥२७३॥ सद्गुणै गुरुतां याति कुलहीनोऽपि मानवः । निर्गुणः सकुलाढयोऽपि लघुतां याति तत्क्षणात् ॥२७४॥ सद्वृत्तः पूज्यते देवैराखण्डलपुरःसरैः । असद्वृत्तस्तु लोकेऽस्मिन्निन्द्यतेऽसौ सुरैरपि ॥२७५॥ चारित्रं तु समादाय ये पुनर्भोगमागताः । ते साम्राज्यं परित्यज्य दास्यभावं अपेदिरे ॥२७६॥ शीलसंधारिणां पुसां मनुष्येषु सुरेषु च । आत्मा गौरवमायाति परत्रेह च संततं ॥२७७॥ आपदो हि महाघोराः सत्वसाधनसंगतैः । निस्तीर्यानं महोत्साहैः शीलरक्षणतत्परैः ॥२७८॥ १ सैहिकेयात्समासक्त्या भत्याभागोऽपि क्षया ख । २ निस्तीर्यते ख.।

२५२ सिदान्तसारादिसप्रदे- परं वत्क्षणतो मृत्यु शीलसपमघारिणाम् । न तु सम्छीलमंगेन साम्रोग्यमपि जीमितम् ॥२७९॥ धनहीनोऽपि सीलाम पूज्यः सर्वत्र विष्टपे । शीलहीनो धनाढयोअप न पूज्य स्पजनेप्यपि ॥२८॥ वरं शत्रुगृहे मिक्षा मापना शीलधारिणां । न सध्छीलमंगेन साम्राज्यमपि जीवितम् ॥ २८१ ॥ परं मदेव दारिप शीलैपर्यसमन्वितम् । न तु शीलविहीनानां विमवायकपर्तिनः ॥२८२॥ धनहीनोऽपि समुत्तो याति निर्वाणनाया । चक्रवर्पप्पसदृत्तो यासि दु खपरम्पराम् ॥२८॥ सुखरात्रिर्मवेपो येपो झील मुनिमलम् । न मच्छीलविहीनानां दिवमोऽपि सुखावह ॥२८४॥ दे दहति कायामिस्तरक्षणं समुदीरितम् । पर्धमान ममामम्म चिरकालसमापितम् ।।२८५॥ क्रोधन बघते कम दारण मवषर्धनम् । शिक्षा च क्षीयत सपस्तपसा समपार्जिवम् ॥२८६॥ सुदृष्एमनमा पूर्व पस्फर्मममपार्जितम् । सम्मिन् फलप्रदयाम्ने कोऽयेपो झोपमुदत् ॥२८७।। विधमान ग्ण यद्वक्षेतमो जायते इति । कमणा माध्यमानन किं विमुक्तिर्न जायते ॥२८८॥ म्वहित म परियय मयत्न पापमारिन् । धमा न यत्कगम्यम्म म कवनो न मियते ॥२८९।। सम्पान्नमपि । फ्सप्रग्यास्ति। भामाऽय ग-पुस्तके मास्ति। दरसोर सार-समुच्चय । २५३ १ वै शत्रुभावस्थितान् यस्तु करोति वशवर्तिनः। प्रज्ञाप्रयोगसामर्थ्यात् स शूरः स च पंडितः ॥२९०॥ विवादो हि मनुष्याणां धर्मकामार्थनाशकृत् । वैरान् वन्धुजनो नित्यं वाहितुं कर्मणा जनाः॥२९१॥ धन्यास्ते मानवा नित्यं ये सदा क्षमया युताः । वंचमाना स लुब्धा विवादं नैवकुर्वते ॥२९२॥ वादेन बहवो नष्टा येऽपि द्रव्यमहोत्कटाः । वरमर्थपरित्यागो न विवादः खलैः सह ॥२९३॥ अहंकारो हि लोकाना विनाशाय न वृद्धये । यथा विनाशकाले स्थात् प्रदीपस्य शिखोज्वला ॥२९४॥ हीनयोनिषु बंभ्रम्य चिरकालमनेकधा । उच्चगोत्रे सकृत्प्राप्ते कोऽन्यो मान समुद्वहेत् ।। २९५।। रागद्वेषौ महाशत्रू मोक्षमार्गमलिम्लुचौ । ज्ञानध्यानतपोरत्नं हरतः सुचिरार्जितम् ॥ २९६ ॥ चिरं गतस्य संसारे बहुयोनिसमाकुले। प्राप्ता सुदुर्लभा बोधिः शासने जिनभापिते ॥ २९७॥ अधुना तां समासाद्य संसारच्छेदकारिणीम् । प्रमादो नोचितः कर्तुं निमेषमपि धीमता ॥ २९८ ॥ प्रमादं ये तु कुर्वन्ति मूढा विषयलालसाः । नरकादिपु तिर्यक्षु ते भवन्ति चिर नराः ॥२९९ ॥ आत्मा यस्य वशे नास्ति कुतस्तस्य परे जनाः। आत्माधीनस्य शान्तस्य त्रैलोक्यं वशवर्तिनः ॥३००। १ वन्धजन नोपि नित्य वाहितकर्मणां ख । २ वर्तिन ख ।

२५१ सियाम्तसारादिसनारे- आत्मामीनं तु यत्सीस्म्यं सत्साम्म पर्णितं पुष । पराधीनं तु यत्सौग्य दुःसमेव न सत्सुख ॥३०१॥ पराधीन मुखं फष्ट रानामपि महौजर्मा। सस्मारेवत् समालोच्य आत्मायच मुखं फरु ॥३२॥ आत्मापर्व सुख लोके परायचे न तस्मुख । एतत् सम्पम्विजानन्तो संपन्ते मानुपा कथम् ॥३०॥ नो संगाज्जायते साम्य मोक्षसाधनमुचमम् । संगाप आयते दुःखं ससारस्य नियन्धनम् ॥३०४॥ पूर्वकर्मविपाकेन पापायां यच शोधनम् । तदिद तु म्बदष्टस्प अरगहिवाउनम् ॥ ३०५ ॥ अन्पो हि माघते दुःखं मानस न विषक्षये । पपनैनीपते तूले मेरो शृङ्ग न बासुचित् ॥ ३.६॥ परज्ञानफलं पर्च न वित्तिर्गरीपसी। तथा हि पपवे फर्म सदाचन विमप्यते ॥३ ७॥ मवेग परम फार्य भुवस्य गदितं पुषैः। तस्मापे घनमिच्छन्ति ते विच्छंस्यमृगशिपम् ॥ ३०८॥ भुत इस समो पे धनं परमदुर्लमम् । त नग धनिन प्रोक्ता शेषा निर्षनिनः सदा ॥ ९॥ को वा हप्तिं ममायावो मोगैईरितमन्मने । दयो या दवराजो या पकांको वा नराधिपः ॥१०॥ आस्मा ये सुमातीर्य यदामो प्रश्नम स्थितः । यंदामो प्रशमो नास्ति तवस्तीर्थनिरर्यकम् ॥३११॥ सुषम्तक । बरत् अम्माहिवारा पवार ।

सारसमुच्चय। २५५ शीलवतजले स्नातुं शुद्धिरस्य शरीरिणः । न तु स्नातस्य तीर्थेषु सर्वेष्वपि महीतले ॥३१२॥ रागादिवर्जितं स्नानं ये कुर्वन्ति दयापराः । तेषां निर्मलता योगेन च स्नातस्य वारिणा ॥३१३॥ आत्मानं स्नापयेन्नित्यं ज्ञाननीरेण चारुणा । येन निर्मलतां याति जीवो जन्मान्तरेष्वपि ॥३१४॥ सर्वाशुचिमये काये शुक्रशोणितसंभवे । शुचित्वं येऽभिवाञ्छन्ति नष्टास्ते जडचेतसः ॥३१५॥ औदारिकशरीरेऽस्मिन् सप्तधातुमयेशुचौ । शुचित्वं येऽभिमन्यन्ते पशवस्तेन मानव ॥३१६॥ सत्येन शुद्धयते वाणी मनो ज्ञानेन शुद्धयति । गुमशुश्रूषया काय शुद्धिरेप सनातन ॥३१७॥ स्वर्गमोक्षोचितं नृत्व मूढैर्विपयलालसै । कृतं स्वल्पसुखस्यार्थ तिर्यड्नरकभाजनम् ॥३१८॥ सामग्री प्राप्य सम्पूर्णा यो विजेतुं निरुद्यम । विषयारिमहासैन्यं तस्य जन्मनिरर्थकम् ॥३१०॥ निरवयं वदेद्वाक्यं मधुरं हितमर्थवत् । प्राणिना चेतसोऽल्हादि मिथ्यावादेवहिष्कृतम् ॥३२०॥ प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तव । तस्मात्तदेव वक्तव्यं किं वाक्येऽपि दरिद्रता ॥३२१॥ व्रतं शीलतपोदानं संयमोऽईत्पूजनम् । दुखविच्छित्तये सर्व प्रोक्तमतन्न संशय ॥३२२॥ १ योगे क योग्ये ख । २ वादि क ख ।

२५६ सिदान्तसारादिसंग्रहे- वणतुल्प परद्रव्यं परं च स्वारीवत् । पररामा समा मातु पश्मन् गावि परे पदम् ॥३२३॥ सम्परत्वसमतायोगे ने संग्म क्षमा तथा । कपापविषयासंगः कर्मणां निर्जरा परा ॥३२४॥ अप सुकुलमद्रेम मवविच्छिसिकारणम् । हम्रो मालस्वमावेन ग्रन्थ सारसमुन्धयः ॥२५॥ मे मस्या भावयिप्पन्ति मवकारणनाशनम् । तेविरेणैव कालेन प्राश्व ? प्राप्स्पति शाश्वतम् ॥३२६ मारसम्पयमवयं पठन्ति समाहिसा । से स्वल्पेनैव कालेन पदं यास्पन्त्पनामय ।।३२७॥ नम परमसहपानविप्ननाशनहेतवे । महाफल्माणसम्पत्तिकारिपेरिएनेममे ॥३२८॥ इति "भीकलमद्रापिरपि 'सारसमुचमचारि समासम्। १ परच गरीरबन् । नसर्गा३ समतार। पुपम मगत पाठ पुस्तकमयेऽपि मास्ति। इस सम्ममममममा पनि स-पुस्तक पाठ ।

सिरिसुहचंदाइरियविरइया
अंगपण्णत्ती।
द्वादशाङ्गप्रज्ञप्तिः।
सिद्धं बुद्धं णिचं णाणाभूसं णमीय सुहयंदं ।
वोच्छे पुन्वपमाणमेगारहअंगसंजुत्तं ॥१॥
सिद्ध बुद्ध नित्य ज्ञानभूषण नत्वा शुभचन्द्रम् ।
वक्ष्ये पूर्वप्रमाणमेकादशाङ्गसंयुक्तम् ।।
तिविहं पयं जिणेहिमत्थपयं खलु पमाणपयमुत्तं ।
तदियं मज्झपयं हु तत्थत्थपयं परवेमो ॥२॥
त्रिविध पद जिनरर्थपद खलु प्रमाणपदमुक्तम् ।
तृतीय मध्यमपद हि तत्रार्थपद प्ररूपयामः ॥
जाणदि अत्थं सत्यं अक्खरबूहेण जेत्तियेणेव ।
अत्थपयं तं जाणह घडमाणय सिग्घमिच्चादि ॥३॥
जानाति अर्थ साथै अक्षरव्यूहेन यावतैव ।
अर्थपद तज्जानीहि घटमानय शीघ्रमित्यादि ।
छंदपमाणपबद्धं पमाणपयमेत्थ मुणह जं तं खु ।
मज्झपयं जं आगमभणियं तं सुणह भवियजणा॥४॥
छन्द प्रमाणप्रबद्ध प्रमाणपदमत्र जानीहि यत्तत् खलु ।
मध्यमपद यदागमभणित तच्छृणुत भव्यजनाः ! ॥
सोलससयचोत्तीसा कोडी तियसीदिलक्खयं जत्थ ।
सत्तसहस्सदृसयाडसीदऽपुणरुत्तपदवण्णा ॥५॥

૨૫૮ सिदान्तसारादिसम:- पोशिशसधनुखिशस्फाच प्रशीतिलमाणि पत्र । सप्तमहस्राणि अष्टशवान्पयशीतिरपुनरुफपदपर्णा १६३५, ८३,७,८,८८ मध्यमपाक्षरमम्या । सखसरस्मपयेहि सघादसुद णिरूविय जाण । इगिदरगदीण रम्म त संखेजेहिं परिवधी ॥ ६॥ सम्यावसहस्रपदै संघातधुत निरुपितं जानाहि । एकतरगतीनो रम्य तर्सम्न्यात प्रतिपत्ति ॥ पउगइसरूपरूवयपठिसखदहिं अगियोगं । पोरसमग्गणमण्णामेपविसेसेहि संनुवं ॥ ७॥ चतुर्गतिस्यरूपम्पकपतिपतिसरूपावरसुयोगम् । चतुर्दशमार्गणासहाभेदविशेष संयुक्त । पउरादीप्रणियोगे पाहुटपाटसुद सपा होदि । चपीसे तमि हवे पाय पस्युपहियारे ॥ ८॥ चतुराश्नुयोगे प्राभतमाभूतधुर्व सदा भवति । चतुर्विशतौ तस्मिन् ममेत् प्राभत वस्तुरमविकारे । वीसं वीस पासअहिसार एकवत्यु अहियारो। सहिदम चोदम अहहारसय पार पारं च ॥९॥ मिशती विशता प्राभताधिकार एकवस्त्वविकार | नत्र दश लुश भए अयश शुश द्वादश । मोस च धीम तीस पम्मारमयं च चउसु दस वरपु। पदहि वरधुषहि उदयपुम्या हवति पुणो ॥१॥ पोषण च त्रिशति निन् पंचश च चतुर्प दश बस्तनि । एसै वस्तुभि चतु"पूर्वाणि भवन्ति पुन || अगपण्णत्ती। २५९ पणणउदिसया वत्थू णवयसया तिसहस्सपाहुडया । चउदस पुव्वे सव्वे हवंति मिलिदा य ते तम्हि ॥ ११ ॥ पचनवतिगतानि वस्तूनि नवकशतानि त्रिसहस्रप्राभृतानि । चतुर्दश पूर्वाणि सर्वाणि भवन्ति मिलितानि च तानि तत्र ॥ वत्थू १९५ वत्थू एकं प्रति पाहुड २० । पाहुडसख्या ३९००, पाहुड एकं प्रति पाहुड, ( पाहुड) २४ जात अनुयोगसख्या २२, ४६, ४०० अनुयोगे पाहुडसख्या । सयकोडी वारुत्तर तेसीदीलक्खमंगगंथाणं । अढावण्णसहस्सा पयाणि पंचव जिणदिदं ॥ १२ ॥ शतकोटि द्वादशोत्तरा व्यगीतिलक्षाण्यङ्गग्रंथाना । अष्टापचाशत्सहस्राणि पदानि पचैव जिनदृष्टानि ॥ द्वादशागश्रुतपदाना सख्या ११२, ८३, ५८,००,५ । पण्णत्तरि वण्णाणं सयं सहस्साणि होदि अहेव । इगिलक्खमहकोडि पइण्णयाणं पमाणं हु ॥ १३ ॥ पंचसप्तति वर्णानां शत सहस्राणि भवति यष्टैव । एकलक्ष अष्टकोट्य प्रकीर्णकाना प्रमाण हि ॥ अङ्गबाह्यश्रुताक्षरसख्या ८, ०१, ०१, १७५ । पणदस सोलस पण पण णव णभ सग तिणि चेव संगं । सुण्णं चउचउसगछचउचउअडेक्कसव्वसुदवण्णा ॥१४॥ पचदश पोडश पच पच नव नभ सप्त त्रीणि चैव सप्त । शून्य चतु चतु.सप्तषट्चतु चतुरष्टैकसर्वश्रुतवर्णाः ॥ १ तिणि पुस्तके पाठ । २ सग इति पाठ पुस्तके । ३ सुण पुस्तके पाठ । ४ सव इति पाठ पुस्तके ।

२६० मिदान्तसारादिसमहे- सर्व साक्षराणि- १८११६७११०७३७०९५५१६१५। आयार पदमंग तस्यहारससहस्सपयमेव । पत्यायरति मन्वा मोक्सपरतण तमाम ॥ १५ ॥ माचार प्रथमांग प्रायदशसहस्रपदमा । यत्रापरन्ति भम्या माझप तन तमाम | कर चरे कई विहे कहमासे कह सये । कर मासे कह सजे कह पावं ग संघा ॥ १६ ॥ कर्य परेत् कर्य तिष्ठत् कथमासीत कर्य शयीत । कार्य भाषेत पर्य मुंगीत कप पापं न पश्यते । अद चर जद विहे बदमासे जदं सये। जद मासे जद संजे एवं पावं म बघा ॥ १७ ॥ यत घरेस् यन तिठेत् यते मासीस यत शयीत । यन भाषेत यतं मुंजीत एवं पापं न बप्पते । महब्बमाणि पंव समिदीओरखरोहण । लोओ आवमयाछपमवच्छमहमूसया ॥१८॥ महाप्रतानि पंवैष समिसयोऽक्षरोषने । लोच आवश्यकपटू अवलनानम्शयनानि ।। अदनयणमेगमती ठिडिमोपणमेव हि। पठीण प समायारं वित्थरव परुपए ॥ १९ ॥ मान्तमनैकमक्ते स्थितिभाषनमेव हि। यतीना र्य समाचार विस्तारेणैव प्रापयेत् ॥

अगपण्णत्ती । २६१ आचारागस्य पदानि १८००० । आचारागस्य श्लोकसख्या, ९१९- ५९२३११८७००० । आचारागस्य अक्षरसख्या २९९२६९५४- १९८४००० इति । आयाराग गद-इत्याचारान गत । सूदयडं विदियंगं छत्तीससहस्सपयपमाणं खु । सूचयदि सुत्तत्थं संखेवा तस्स करणं तं ॥ २० ॥ मूत्रकृत् द्वितीयाङ्ग पट्रिंशत्सहस्रपदप्रमाण खलु । सूचयति सूत्रार्थ सक्षेपण तस्य करण तत् ॥ णाणविणयादिविग्धातीदाझयणादिसव्वसक्किरिया । पण्णायणा (य) सुकथा कप्पं ववहारविसकिरिया ॥ २१ ॥ ज्ञानविनयादिविश्नातीतस्वाध्यायादिसर्वसक्रिया । प्रज्ञापना च सुकथा कल्प्य व्यवहारवृपक्रिया ॥ छेदोवहावणं जइण समयं यं परूवदि । परस्स समयं जत्थ किरियाभेया अणेयसे ॥ २२ ॥ छेदोपस्थापन यतीना समय यत् प्ररूपयति । परस्य समय यत्र क्रियाभेदान् अनेकशः।। पयपमाण ३६००० श्लोकप्रमाणं १८३९१८४६ ३७४००० अक्षरप्रमाण ५८८५३९०८३९६८०००। इदि सूदयह विदियग गद-इति सूत्रकृद् द्वितीयाग गत । वादालसहस्सपदं ठाणंगं ठाणभेयसंजुत्तं । चिति ठाणभेया एयादी जत्थ जिणदिहा ।। २३ ॥ १ तस्य सूत्रस्य कृत करण । २ स्वसमय जनसमय ।

६२ सिद्धान्तसारादिसमहे- दाचवारिंशत्सहस्रपद स्याना स्थानभेदसंयुके । विप्रन्सि स्थानभेदा एकादयो यत्र बिनध्य ॥ सगहणयेण जीवो एको पवहारदो दु संसारिओ मुचो । सो तिविहो पुणुप्पादष्वयघोष्वसनुचो ।। २४ ॥ संग्रहनयेन जीव एको म्पनहारतस्तु संसारी मुक्तः । स त्रिविध पुनरुत्पादम्पयधौम्पसंयुक ॥ चउगइसंकमणमुदो पपयिहो पंचमाषमेएण । पुष्वपरदरिषणुचरउडाघोगमणदो छदा ॥ २५ ॥ चतुर्गविसंक्रमणयुक्त पंचविष पंचभावभेदेन । पूर्वापरटक्षिणोत्तरोधिोगमनत पोढा ।। सिय अत्यि परिय ठहर्य सिय वसम्म च अत्विपत्तव्यं । सिय ववर्य णत्यि उमहो यचष्वमिदि सत्त ॥ २६ ॥ म्यादम्ति, नास्ति ठमय , स्यादवकम्य., मत्परकम्प, स्यादवकम्पो नास्ति, ठभयोऽवकम्प इति सप्त । महषिहफम्मजुसो अयि णयप्छ णवत्यगो जीयो । पुढषिमलनेउबाउपदेपाणिगोपविविचपगा ॥ २७॥ अष्टविधर्मयुक्त अस्ति नषघा नवर्यको गीष । पृष्षीनळजोवायुप्रस्पेकनिगादविभिनत पंचेन्द्रिया ॥ दहमया पुण जीवा पषमजीवं सु पुग्गलो एपको । अणुसंपादो दुविहो एवं सयप णायम्यं ।। २८ ॥ टशभेदा पुन ग्रीवा एकोमीव तु पुछरु एक । भणुस्कन्यता दिपिध एवं मर्यन ज्ञातम्यं ॥

अगपण्णत्ती। २६३ ठाणागस्स पयप्पमाण ४२०००। श्लोक२१४५७१५४१०३००० अक्षरप्रमाण ६८६६२८९३१२९६०००। इदि ठाणाग तिदिय गद-इति स्थानाम तृतीय गतम् । समवायंगं अडकदिसहस्समिगिलक्खमाणुपयमेत्तं । संगहणयेण दव्वं खेत्तं कालं पडुच्च भवं ॥ २९ ॥ समवायाङ्ग अष्टकृतिसहस्र एकलक्षमानपदमात्र । सग्रहनयेन द्रव्य क्षेत्र काल प्रतीत्य भाव ॥ दीवादी अवियंति अत्था णज्जंति सरित्थसामण्णा । दव्वा धम्माधम्माजीवपदेसा तिलोयसमा ॥ ३० ॥ द्वीपादयो अवेयन्ते अर्था ज्ञायन्ते सदृशसामान्येन । द्रव्येण वर्माधर्मजीवप्रदेशाः त्रिलोकसमाः ॥ सीमंतणरय माणुसखेत्तं उड्डुइंदयं च सिद्धिसिलं । सिद्धहाणं सरिसं खेत्तासयदो मुणेयध्वं ॥ ३१ ॥ सीमन्तनरक मानुषक्षेत्र ऋत्विन्द्रक च सिद्धिशिला । सिद्धस्थान सदृश क्षेत्राश्रयतो मतव्य ॥ ओहिहाणं जंबुदीवं सव्वत्थसिद्धि सम्माण । गंदीसरवावीओ वाणिंदपुराणि सरिसाणि ॥ ३२ ॥ अवधिस्थान जम्बूद्वीप सर्वार्थसिद्धिः समान । नन्दीश्वरवाप्य वानेन्द्रपुराणि सदृशॉनि ॥ समओ समएण समो आवलिएणं समा हु आवलिया । कालेण पढमपुढवीणारय भोमाण वी (वा) णाणं ॥ ३३ ॥ १ स्थानामस्य पदप्रमाण । २ द्रव्यापेक्षया इत्यर्थ । ३ एते पच पचचत्वारिं- शलक्षप्रमिता । ४ व्यन्तरेन्द्राणा पुराणि । ५ एतानि सर्वाणि स्थानानि एकल- नयोजनप्रमितानि।

२६०
सिद्धान्तसारागिसंग्रहे--
समय समयेन सम मावलिया समा हि भावलिका।
कान प्रथमपृष्पीनारफाणा भोमाना बाना ॥
सरिस बहण्णमाऊ सचमखिदिणारयाण उकसं ।
मबहाणं माऊ मरिसं उस्मप्पिणीपमुई ॥ ३४ ॥
सरर्श बम्पायुः सप्तमक्षिठिनारकाणामुस्कृष्ट ।
मर्यस्थानी मायुः सदश उत्सर्पिणीप्रमुस ।
मावे केवलपाणं फवलदसणसमाणर्य दिह ।
एवं मत्य सरित्वं वेति मिणा सय्यअस्थाण ॥ ३५॥
भावेन फेवल्याने केवदर्शनसमान दिए ।
एवं पत्र सारी जानन्ति बिना सर्वार्थान् ॥
ममयाोगपद १६०००० । लोफ ८३७८५०७७९२६० ०।
अक्षर २६८११२२५९३६३२००० ।
इति समशमार्ग पर पद-ति समपापान पर्व पर्व ।
दुगदुगबरतियसुष्णं विवापपण्णपिअंगपरिमाण ।
जामाविसेसकाण वेति धिणा अत्य गणिपणा ।। ३६ ॥
रिकतिकविकशून्य विपाकप्राप्स्यापरिमाण ।
नानाविशेफ्कयने मुवन्ति मिमा पत्र गणिप्रभान् ॥
किं भत्पि णत्यि जीवो णिपोमिचोशवाह किं एगो।
पचल्यो किमयानब्यो हि किं मिष्णो ॥ ३७॥
किमस्ति नास्ति जीवो निस्योऽनिस्योऽप्याप फिमेक ।
वक्तम्प किमबक्तम्पो हि कि भिम ॥
गुणपज्जयादमियो सहिमहस्सा गणिस्म परे ।
यत्पत्यि वियाणपण्णचिमंग सु ॥३८॥

अगपण्णत्ती। २६५ गुणपर्यायाभ्यामभिन्न. पष्टिसहस्रणि गणिनः प्रश्ना. । यत्र सन्ति तद्विपाकप्रज्ञप्त्यग खलु ॥ विवायपण्णतिअगपद २२८० । श्लोक ११६४८१६९३७०२०- ०० । वर्ण ३७२७४१४१९८४६४००० । इदि विवागपण्णत्तिअग गद-इति विपाकप्रज्ञप्त्यङ्ग गत । णाणकहाछटगं पयाइं पंचेव जत्थत्थि । छप्पण्णं च सहस्सा णाहकहाकहणसंजुत्तं ॥ ३९ ॥ ज्ञातृकथापष्ठाङ्ग पदानि पचैव यत्र सन्ति । षट्पचाशच्च सहस्राणि नाथकथाकथनसयुक्त ।। णाहो तिलोयसामी धम्मकहा तस्स तच्चसंकहणं । घाइकम्मखयादो केवलणाणेण रम्मस्स ॥ ४०॥ नाथ त्रिलोकस्वामी धर्मकथा तस्य तत्वसकथन । घातिकर्मक्षयात् केवलज्ञानेन रम्यस्य ।। तित्थयरस्स तिसंज्झे णाहस्स सुमज्झिमाय रत्तीए। बारहसहासु मज्झे छग्घडियादिव्वझुणीकालो ॥४१॥ तीर्थकरस्य त्रिसध्याया नाथस्य सुमध्यमाया रात्रौ । द्वादशसभामु मध्ये पघटिका दिव्यध्वनिकालः ॥ होदि गणिचक्किमहवपण्हादो अण्णदावि दिव्वझुणि । सो दहलक्खणधम्मं कहेदि खलु भवियवरजीवे ॥४२॥ भवति गणिचक्रिमघवप्रश्नत अन्यदापि दिव्यध्वनि । स दशलक्षणधर्म कथयति खलु भव्यवरजीवे ॥ णादारस्स य पण्हा गणहरदेवस्स णायमाणस्स । उत्तरवयणं तस्स वि जीवादी वत्थुकहणे सा ॥४३॥ १ जीवादिवस्तुस्वभावकथन ।

२६६ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- हातुध प्रश्ना गणघग्देवस्य मित्रासमानस्प । उतरवचन तस्यापि जीवादिवस्तुकयने सा ।। आवा भादारा धम्माकाहादिफहममेर्व सा । विस्यगणिपक्कामरवरसपकाईण च पाहकहा ॥ ४४ ॥ अयषा मातॄणां धर्मानुफ्याकियनम सा । तीर्यगणिचक्रिनवरशक्रादीनां च नाथकया । शस्तृधर्मकोगस्य पदानि ५५६०००। सोक २८१०५१८९९५- ५१००० । वर्ण ९८९६५९१८५७२८००० । इति पापापम्ममापाम ममम मई-इति अतृपमेवानाम पामा परी । मत्तरिसहस्म लफ्सा एपार जरयुवासपम्मयपे। उत् पयप्पमा जिपेण तं णमह मविपजणा ॥४५॥ सप्ततिसहन सक्षाणि एकादश यत्रोपासकाप्पयने । उस पर प्रमाण निनन तं ममत भम्पसमा ।।। दमणवयमामाश्यपोमदसचिचरायमचे म । पंमारंमपरिग्गहअणुमणमुहि देसविरदेदे ॥४६॥ रशेनप्रतसामायिकमोषधसचित्तरात्रिभक्तप्रम । प्रमाभपरिग्रहानुमतोटिय देशविरवा एते । प्रत्ये यारहमदा दाण पूर्व च सहसेयं च । वयगुणर्माल किरिया नाम मंसा वि पुति ॥७॥ पत्रकारदा ने बाघमघमेवा । अनगुणागनि क्रिया तो मैत्रा भपि उप्पम् ॥ गगामका ययनभ्य पनि १७०० श्लाका ५०७७३५०० २०५२०२२८९६००००। मामय पत्र सनम प्र गा पाममपर्न पप्तम पतम् । | अर न अगपण्णत्ती। २६७ अंतयडं वरमंगं पयाणि तेवीसलक्स सुसहस्सा । अहावीसं जत्थ हि वणिज्जइ अंतकयणाहो ॥४८॥ अन्तकृद्वरमग पदानि त्रयोविंशतिलक्षाणि सहस्राणि । अष्टाविंशति यत्र हि वर्ण्यते अन्तकृन्नाथः ।। पडितित्थं वरमुणिणो दह दह सहिऊण तिव्यमुवसग्गं । इंदादिरइयपूयं लद्धा मुंचंति संसारं ॥४९।। प्रतितीर्थ वरमुनयो दश ढा सोड्दा तीव्रमुपसर्ग । इन्द्रादिरचितपूजा लब्ध्वा मुञ्चन्ति ससार ।। माहप्पं वरचरणं तेसिं वणिज्जए सया रम्मं । जह वड्डमाणतित्थे दहावि अंतयडकेवलिओ ॥५०॥ माहात्म्य वरचरण तेपा वर्ण्यते सदा रम्य । यथा वर्धमानतीर्थे दशापि अन्तकृत्केवलिनः ॥ मायंग रामपुत्तो सोमिल जमलीकणाम किक्कंवी । सुदंसणो वलीको य णमी अलंबद्ध पुत्तलया ॥५१॥ मतगो रामपुत्र सोमिल यमलीकनाम किष्कविल । सुदर्शन वलिकश्च नमि पालवष्टः पुत्रा ॥ अन्तकृद्दशाङ्गस्य पदानि २३२८००० । श्लोका• ११८९३३९३- ९८८५२००० । अक्षराणि ३८०५८८६०७६३२३४०००। इदि अतयड दसागमठ्ठम गद-इत्यन्तकृद्दशाजमष्टम गतम् । तिणहंचउचउदुगणवपयाणि चाणुत्तरोववाददसे । विजयादिसु पंचसु य उववायिका विमाणेसु ॥५२॥ त्रिनभश्चतुश्चतुर्दिकनवपदानि चानुत्तरोपपाददशके । विजयादिषु पचसु च औपपादिका विमानेषु ॥

२६८ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- परिसित्पं सहिसम्म हु दावसग्गोपलममाहप्पा । दह दह मगिणो विरिणा पाणे मोतण भाममया ॥५३॥ प्रतितीर्थ सोनुषा हि दारुगोपसर्ग उपन्यमाहात्म्या । दश दश मुनयो विधिना प्राणान् मुक्त्वा प्यानमया ॥ विजयादिसु उक्वाणा वणिज्जते मुहावमुपहला से जमा वीरतित्पे उजुदासो सालिमक्खो ॥५४॥ विज्पादिष्पपना वर्ण्यन्ते समावसुस्मा । तान् नमस पीरतीचे माजुदास शालिमदाय ॥ समक्खचो अमयो वि य पप्णो परवारिसेणणंदणया । मंदो चिलायपुचो फचइयो बह वह अण्णे ॥५५॥ मुनक्षत्रोऽभयोऽपि च धन्य बरवारिपेणनन्दनौ । मन पिलातपुत्र कार्तिकेयो यथा तयाँ अन्येषु । अनुपपाङ्गस्य पदानि ९२११००० । कोका १७२२६१ ७१२१५६ ०० । अक्षराणि १५११२३७५८११६६७०००। इतिवणुत्तरोषना गरम ममे गई-स्वमुचरोपसाद नवौ बाप । पण्हाण पायरणं अंग पपाणि तियमुष्णसोलसिम् । सेणवग्लिक्ससंवा जय मिणा यति सुणा जणा ॥५६॥ प्रश्नाना व्याकरणमा पनि त्रिशूभ्यपोग्श | त्रिनवतिरक्षमस्या या निना मुगन्ति गृणुत सनाः ।। पण्यस्म दयपणणहपसुष्मिणुस्थयमस्वस्म । धादणरमलजम्म वि अत्यो तियकालगोचरयो॥५०॥ प्रनम्य वचननाप्रमुष्टिमन म्यम्यगपत्य । गातुनगमूल नाम्पाप में पधिमाम्गार ॥ १ पपा बरमानना पत तमाम्मे सीट बम्प रण ।

अगपण्णत्ती। २६९ धणधण्णजयपराजयलाहालाहादिसुहदुहं णेयं । जीवियमरणत्यो वि य जत्थ कहिज्जइ सहावेण ॥ ५८॥ धन्यधान्यजयपराजयलाभालाभादिमुखदुःख । जीवितमरणार्थोऽपि च यत्र कथ्यते स्वभावेन ॥ आक्खेवणी कहाए कहिजइ पण्हढो सुभव्वस्स । परमदसंकारहिदं तित्थयरपुराणवत्तंतं ॥ ५९ ॥ अवक्षेपणी कथा कथ्यते प्रश्नत सुभव्यस्य । परमतगकारहित तीर्थकरपुराणवृत्तान्त ॥ पढमाणुयोगकरणाणुयोगवरचरणदव्वअणुयोग । संठाणं लोयस्स य यदिसावयधम्मवित्थारं ॥६० ॥ प्रथमानुयोगकरणानुयोगवरचरणद्रव्यानुयोगानि । सस्थान लोकस्य च यतिश्रावकधर्मविस्तार ॥ पंचत्थिकायकहणं वक्खाणिज्जइ सहावदो जत्थ । विक्खेवणी वि य कहा कहिजइ जत्थ भव्वाणं ॥ ६१॥ पचास्तिकायकथन व्याख्यायते स्वभावतो यत्र । विक्षेपणी अपि च कथा कथ्यते यत्र भव्याना ॥ पञ्चक्खं च परोक्खं माणं दुविहं गया परे दुविहा । परसमयवादखेवो करिज्जई वित्थरा जत्थ ॥ ६२॥ प्रत्यक्ष च परोक्ष मान द्विविध नया परे द्विविधा । परसमयवादक्षेप क्रियते विस्तारेण यत्र ॥ दसणणाणचरित्तं धम्मो तित्थयरदेवदेवस्स । तम्हा पभावतेओवीरियवम(र)णाणसुहआदि ॥६३॥ दर्शनज्ञानचरित्राणि वर्मः तीर्थकरदेवदेवस्य । तस्मात् प्रभावतेजोवीर्यवरज्ञानसुखादय ॥

२७० सिद्धान्तसारादिसंग्रह संघेजणीकहाए मणिजह सपलमवयोहत्य । णिवेजणीकहाए मणिज्जा परम बेरग्गं ॥ ६४ ॥ संवेजनीकायमा भव्यते सकसमम्यवोपनार्थ । निननीकथया भम्पते परमवैराम्मे ॥ संसारदेशमोगा रागो जीवस्स बायदे तमा। अमुहाण कम्माण बघो पचो हषे दुरखं ॥६५॥ संसारदेहभोगा रागो जीवस्प बायसे स्मात् । मशुभाना कर्मणां बन्ध सतो भवे से ॥ असुइकल उप्पची पिस्वदालिदरोपमाडर्छ । भवमा परलोए परफम्मफरो महापावो ॥६६॥ अशुभफुले उत्पति विवपदारिखरोगमार्क्स । अपमान नरहाके परकर्मकरी महापाप ॥ पवविह कहाणं वापरणं वेन्च पम्वापरणे । ठहमे अंग पिच करिज्जमाण सपा सुणह ॥६७॥ एवविध क्याना व्यास्तर्ण वेद प्रभम्याकरण । दमागे नित्य नियमाण सा शृणुत ॥ प्रश्नन्याकाणाहम्म पनि १३१६०००। सोफा १७५९९० । अभगणि १५२३००८३६२८०१०८०.०1 वि परायाम काम भाग पनि प्रभम्पाप रपम भर्म पतम् । मुलारित्वप कारी पपाणि णि मियागमुसे य । पम्माम बाममी मुहामुहाण, मम्मिमया ॥६८|| चतुर fif पण है पानि निस्य पिपासूझे प। न शुभाशुभाना हि मप्यमा । मणा अगपण्णत्ती। २७१ तिव्वमंदाणुभावा दव्वे खेत्तेसु काल भावे य । उदयो विवायरूवो भणिज्जइ जत्थ वित्थारा ॥६९॥ तीव्रमन्दानुभावा द्रव्ये क्षेत्र काले भावे च । उदयो विपाकरूपो भण्यते यत्र विस्तारेण ।। विपाकसूत्रागस्य पदानि १८४००००० । श्लोका ९४००२७ ७०३५६००००० । वर्णाः ३००८०८८६५१३९२००००० । इदि विवागसुत्तग एकादस गद-इति विपाकसूनाग एकादशं गत । एयारंगपयाणि य कोडीचउपंचदहसुलक्खाई । वि सहस्सादो वोच्छे पुन्यपमाणं समासेण ॥ ७० ॥ एकादशाङ्गपदानि च कोटिचतुष्कपचदशलक्षाणि । अपि सहस्र द्वे वक्ष्ये पूर्वप्रमाण समासेण ॥ एकादशानामगना पदानि ४१५०२००० । श्लोका. २१२०२७- ३३५६१४९३००० । अक्षराणि ६७८४८७४७३९६७७७६००० इदि एकादसागानि गदानि-इत्येकादशाङ्गानि गतानि । दिहिप्पवादमंगं परियम्म सुत्त पुव्वगं चेव । पढमाणुओग चूलिय पंचपयारं णमंसामि ॥ ७१ ॥ दृष्टिप्रवादमङ्ग परिकर्म सूत्र पूर्वाङ्ग चैव । प्रथमानुयोग चूलिका पचप्रकार नमामि ॥ तत्थ पयाणि पंच य णभ णभ छ पंच अह छड सुण्णं । अंक कमेण य णेयाणि जिणागमे णिचं ॥७२॥ तत्र पर्दानि पच नभो नभ षट् पच अष्ट षट् अष्ट शून्य । अक क्रमेण च ज्ञेयानि जिनागमे नित्य ॥

२७२ सिद्धान्तसारादिसग्रहे- - राष्टिवादाङ्गपदसंख्या १०८६८५६००५। लोका ५५५२५८- ०१८७३९९२७१०७। पर्णसंख्या १७७६८२५६५९९६६१६ ६७११०। दिहीण विणि सया तेसहीण वि मिळवाया। अत्प णिराकरण खत सणाम दिहिषादंग ॥ ७३ ॥ पश्यना त्रिशतानि त्रिपाठे मिथ्यावादानो । पत्र निराकारण राल तमाम इष्टिवादाङ्गम् । तंगहा-सच्या- फिरिपावायविहीणं कोक्कम-कठेविशि-कोसिप-हरिमसु-- भाषिय-रोमस-मुंर-मस्सष्ठायणावीणं मसीविस (१८०) क्रियावादिना कौत्कल कठेविधि-कौशिक-हरिश्मश्रु-माधपिक-रो- मश-मुर-आश्वलायनातीना अशीतिशत (१८०)। भकिरियापापविडीवं मरीचि-कषिस-पलूप-गमा-पम्पमूर- पलि-माठर-मोगसायणादी चठरासीवि (21) अफियावारीना मगचि-कपिस उलमा-गार्ग-व्यापमूति-बार- बलि-माटर-माद्रणयनादीना चतुरशीति (८०)। मन्माणविहीणं माया-पर-वामि-सपमुगि-मापयप्प- उ-मविण-भाय-पप्पलायन-पापयपण-सियिक-देविकायण- पा-ममणिपमुदाणं मगमती (७)। भागानगीना गाक्य-याबर-मि-सम्पमुनि मारायण-क:- मा पग्नि-भान-पाप गयन-पाटगयण-स्पिष्टिक-दपकायम-बमु- समिनियमबाग मप्नपति पणश्यविदीर्ण पमिह पागमर-जउफण-पम्मीक-रोमदस्मणि- मपान याम-परापुन-उयमणप-पवन-मयछिपमुदाण, नीमा (३ ।

अगपण्णत्ती। २७३ वैनयिकदृष्टीना वशिष्ठ-पारागर-जतुकर्ण-वाल्मीकि-रोमहर्पणि सत्यदत्त-व्यास-एलापुत्र-औपमन्यव-ऐन्द्रदत्त-आगस्त्यादीना द्वात्रि- शत् (३२)। इदि मिलिदूण तिसहिउत्तरतिसदीकुवायनिरायरण प्ररूवय। इति मिलित्वा त्रिषष्टयत्तरत्रिशतकुवादनिराकरण प्ररूपित । इदि बारहअंगाणं समरणमिह भावदो मया णिचं । सुभचंदेण हु रइयं जो भावइ सो सुहं पावइ ॥७४॥ इति द्वादशाङ्गाना स्मरणमिह भावतो मया नित्यं । शुभचन्द्रेण हि रचित यो भावयति स सुख प्राप्नोति ।। एयारसुदसमुद्दे जो दिव्वदि दिव्वभावेण । सो संसारदवाणलजालालीणो ण संपज्जइ ॥७५॥ एकादशश्रुतसमुद्रे यो दीव्यति दिव्यभावेन । स ससारदावानलज्वालालीनो न सम्पद्यते ॥ दसणणाणचरित्तं तवे य पावंति सासणे भणियं । जो भाविऊण मोक्खं तं जाणह सुदह माहप्पं ॥७६॥ दर्शनज्ञानचारित्रण तपसा च प्राप्नुवन्ति शासने भणित । यो भावयित्वा मोक्ष तजानीहि श्रुतस्य माहात्म्य ॥ एयारसंगपयकयपखवणं मए पमाददोसेण । भणियं किं पि विरुद्धं सोहंतु सुयोगिणो णिचं ।। ७७।। एकादशाङ्गपदकृतप्ररूपण मया प्रमाददोपण । भणित किमपि विरुद्ध शोधयन्तु सुयोगिनो नित्यं ॥ इदि सिद्धतसमुच्चये बारहमगसमरणावरामिहाणे अगपण्णत्तीए अगणिरूवणाणाम पढमो अहियारो सम्मत्तो ॥१॥ १ क्रीडति।

चतुर्दशपूर्वाङ्गमज्ञप्ति । परियमं पंचविह परिये फम्माणि गणिदमुचाणि । जत्य सदो मणिय सुणह पपारे हु तस्माधि ।।१।। परिकर्म पंचविध परिस कर्माणि गणितसूत्राणि । पप्र नवस्ताणितं शृणुत प्रकारान् हि तस्यापि ॥ चंदम्मायु विमाणे परिया रिदी च अपण गमण छ । मपलदपायगइर्ण घण्णेदि वि चंदपणती ॥२॥ पन्द्रम्पायु विमानानि परिपारमादि च अपन गमन च। मफरादपार ग्रहण पणपस्पपिच प्रति ॥ एनीमलपम्पममहम्मपयवाण घदपण्णपी । पर गिर पपमहम्पाना चामनमि । । गोपा १८११७३००६०५०७५०० । ३६२२, ०००। महम्पनिय पणनमा पयाणि पण्णनियारम्म ॥३॥ न जान प्रवासमाप || मुम्माय रिमाप्त पग्यिा ग्दिीय प्रयणपरिमाण । नगानिमगा गणपणामी ॥४॥ Hal. पनाग्मिा। मामि ॥ . .७१.६१९१९..। प ३ गग + अगपण्णत्ती। २७५ जंबूदीवे मेरू एक्को कुलसेलछक्क वणसंडा । छब्बीसं वीसं च दहा वि य वीसं वक्खारणग वस्सा ? ॥५॥ जम्बूद्वीपे मेस्रेक कुलशैलपट्क वनखडाः । पड्विंशतिः विंशतिश्च द्रहा अपि च विंशतिः वक्षारनगा वर्ग. ॥ चोत्तीसं भोगधरा छक्कं वेंतरसुराणमावासा । जंबूसालमलिरुक्खा विदेउ चारि णाहिगिरी ॥६॥ चतुस्त्रिंशत् भोगधराः पट्क वेंतरसुराणमावासाः । जवूशाल्मलिवृक्षा विदेहा चत्वारो नाभिगिरयः ।। सुण्णणवसुण्णदुगणवसत्तरअंककमेण णईसंखा। १७९२०९० । चण्णेदि जंबुदीवापण्णत्ती पयाणि जत्थरिथ ॥ ७ ॥ शून्यनवशून्यद्विकनवसप्तदशाङ्कक्रमेण नदीसख्याः । वर्ण्यन्ते जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तौ पदानि यत्र सन्ति । तियसुणपणवग्गतियलक्खा, दीवजलहिपण्णत्ती । अढाइ (जा) उधारसायरमिद दीवजलहिस्स ॥८॥ त्रिकशून्यपचवर्गात्रिकलक्षाणि, द्वीपजलधिप्रज्ञप्तौ । सार्धद्वयोद्धारसागरमित द्विपजलधीना ॥ पदानि ३२५००० । श्लोक १६६०३७५०१९-८७५००। वर्ण ५३१३२०००६३६०००००। वित्थारं सहाणं तत्थठियजोइसाण ठाणाणं । भोमाणं तत्थाऽकिहिमजिणाणं च ॥९॥ विस्तार संस्थान तत्रस्थितज्योतिपा स्थानाना । भोमाना तत्राकृत्रिमजिनाना च॥

૨૭૬
सिद्धान्तसविसंप्रदे-
पासादवासतोरणमरवाहमख्वादिमाला ।
दिवसापरपरिपम्मे करेदि पित्यार पम्मणयं ॥१०॥
प्रासादम्यासवोरणमरपमुखमरमादिमालाना ।
दीपसागरपरिकर्मणि क्रियते विस्तारेण वर्णनं ॥
पावणं छत्तीस लक्ससहर्स पयस्स परिमाण । ५२३६०००।
विपंचाशत् पशिष्टमसहस्र पदाना परिमाण ।
पाखापण्णचीए तियमुष्णछतिपरका ॥११।। ८१३६०००।
म्पाख्याप्राप्तौ त्रिफशून्यपट्टिकचसुरम्यादा ॥
जोविरूविजीवाजीवाईण च दम्पमिवहार्ण ।
भय्यामम्याणं पि य मे परिमाण लक्षणम् ॥१२॥
या ममपिरपिमीवाजीमानो चम्पनिबहाना ।
मष्यामन्यानामपि च भद परिमाण लक्षण ।
सिद्धार्थ खलु मपंतरपरंपरासिदिठाणपचामं ।
अण्णामि वच्छणं वित्यारं करेदि पाणची ॥१३॥
मिखाना स्वल अनन्तरपरंपरासिद्रिस्थानप्राताना ।
अन्येपा विस्तीर्ण विस्तार करोति प्राप्ति ॥
पणपणचिपयाणि प णहाणि तिय पंचसुग्णइगिबह-
इगिफोरिजुदाणि पुणो एप परियम्म मम्मचं ॥१४॥
पंचप्रतिपानि च नमामि प्रीणि पंचशून्यकाष्टक-
कारियुतानि पुनरेचे परिर्म ममात ॥
पयारे १८१०
०1
अरसीवीलपम्वपमं सुभ मुवेदि मिच्छदिठीणं ।
याए इदि स्खलु जीवो अपओ पंपो वामि ॥१५॥

अगपण्णत्ती । २७५ अष्टाशीतिलक्षपद सूत्र सूचयति मिथ्यादृष्टीना । वादे इति खलु जीवोऽबन्धको बन्धको वापि ।। पयाणि ८८००००० । णिक्कत्ता णिग्गुणओ अभोजओ सप्पयासओ णिच्चो । परप्पयासकरणो जीवो अत्थेव वा णत्थि ॥१६॥ निष्कर्ता निर्गुणोऽभोजक' स्वप्रकाशको नित्यः । परप्रकाशकरणो जीवोऽस्त्येव वा नास्ति । एवं किरियाणाणादिविणयकुदिहिवायाणं । वित्थारं जं वोच्छदि तस्स पयारं णिसामेह ॥ १७॥ एव क्रियाज्ञानादिविनयकुदृष्टिवादाना । विस्तार यब्रुवति तस्य प्रकार निशाम्यत ।। अस्थि सदो परदो वि य णिचाणिच्चत्तणेण णवअहा। कालीसरप्पणियदि सहावदो होति तन्मेया ॥१८॥ अस्ति स्वत. परतोऽपि च नित्यानित्यत्वेन नवार्थाः । कालेश्वरात्मनियतिस्वभावत भवन्ति तद्भेदाः।। सव्वं कालो जणयदि भूदं सव्वं विणासदे कालो। जागत्ति हि सुत्तेसु वि ण सक्कदे वंचिदु कालो ॥ १९ ॥ सर्व कालो जनयति भूत सर्व विनाशयति काल । जागर्ति हि सुप्तेष्वपि न शक्यते वचितु कालः ॥ इदि कालवादो-इति कालवाद । जीवो अण्णाणी खलु असमत्थो तस्स जं सुहं दुक्खं । संग्गं णिरयं गमणं सव्वं ईसरकयं होदि ॥२०॥ णाय गमण सव्व ईसरकय होदि' पाठ पस्तके । आगमान गाति ।

૨૭૮ सिद्धान्तसारादिसंग्रहे- - जीबोशानी बछ असमर्थस्तस्य परसुख दुख । स्वर्गे नरके गमन सर्प ईश्वरकृत मवति ॥ भिवादो-सरवाद। देवो पुरिसो एको सम्बवावी परो मापा य । सम्बंगविग्दो वि य सधेयणो पिग्गुमोऽकता ।। २१॥ देव पुरुप एक सर्वम्यापी पो महारमा च । सर्वाङ्गविगूढोऽपि च सचेतनो निर्गुणोऽकर्ता । भप्पवादो-चारमवाया। जेम सदा बंतु बहा गिरमेण य जस्स होइ तु तदा। तस्स तहा तेष हवे इदि पादो णियरिवादो दु ॥२२॥ येन यदा यत्तु यथा नियमेन च यस्य भपति सत्तु सदा । तस्य तथा तेन भरिति मागे नियतिवादस्तु॥ पिपरिवारो-पियतिवाद । मच सहावदो खत विक्खत्त कट्याण को करई। विवि मरमियपमुविहंगमाणं सहामो य ॥२॥ म स्वभावत मलु मीक्ष्णत्वं कटकाना क करोति । विविधत्वं नरमृगपशुमिहगाना स्वभावश्च ।। सहायपादो-बमाबार । एवं पदुणवपणयार्ण रयष कारणं मसीदिसदकिरियावाबा मंगा । तं जहा । कालादा जीवो सपो मरिच कामामोसीयो परखो मस्यि कालादो जीपा णिचा मत्यि कामदो सीषा मणिको परिय ४ शामिजीवापिसु मास मंगा पादेया मासिण भंगा मसाविस १८ वर्षति ।

अंगपण्णत्ती। २७९ एव चतुर्नवपचाना रचना कृत्वा अशीतिशतक्रियावादाना भगा. । तद्यथा-कालतो जीव स्वतोऽस्ति १ कालतो जीव परतोऽस्ति २ कालतो जीवो नित्योऽस्ति ३ कालतो जीवोऽनित्योऽस्ति ४ इति अजीवादिषु अष्टसु भगा ज्ञातव्या आश्रित्य भगा अगीतिगतं १८० भवन्ति । १ काल ईश्वर आत्मा नियति स्वभाव जीव अजीव पुण्य पाप आस्त्रव सवर निर्जरा घन्ध मोक्ष स्वत परत नित्य अनित्य अस्ति अह अकिरियावाईणो वियप्पा-अथ अक्रियावादिना विकल्पा. सत्तपयत्था वि सदो परदो णस्थिति पंतिचदुजादा। कालादिया वि भंगा सत्तरि अक्किरियवाईणं ॥२४॥ सप्तपदार्था अपि स्वत परतो नास्तीति पक्तिचतुष्कजाता. । कालादिका अपि भगा सप्ततिः अक्रियावादिना ॥ णियडीदो कालादो सत्तपदत्थाण पंतितियजादा । चउदसभंगा होंति हु एवं चुलसीदि विण्णेया ॥२५॥ १ कालभेद ३६ ईश्वरभेद ३६ आत्मभेद ३६ नियतिभेद ३६ स्वभाभेद ३६ एव १८०।

२८०
सिमान्तसारादिसग्रहे-
नियतित: कामत सप्तपदार्यानो पफिप्रिजाताः ।
चतुर्दशमगा भवन्ति हि एवं चतुरशीतिविपा ॥
काखामोसीयो सयो परियर फालयो जीयो परयो पत्थिरए
सत्तरिस मंगा। पियडीवो जीपो परिय पाछादो जीषो वरिय २
एवं बोरसमंगा सम्ये मिमिदा पुलीसीबी ८४ ।
कालता जीव स्वतो नास्ति १ काढतो चीव परतो नास्ति २
एवं सप्तति भंगा । निपतितो जीवो नास्ति १ करतो जीवो नास्ति २
एवं चतुर्दशभंगा । सर्वे मिलिरवा चतुरशीति ८१ ।
मात्मा
नियति
स्वमाष
पीप
अधीष
संबर
निबरा
स्वता
परता
नास्ति
निमति
काम
भामब
सेपर
निर्य
मोध
नास्ति

- अगपण्णत्ती। २८१ को नाणइ णव अत्थे सत्तमसत्तुभयमवच्चमेव इदि । अवयणजुद सत्तत्तयं इदि भगा होंति तेसही ॥२६॥ को जानाति नवार्थान् सत्वमसत्वमुभयमवक्तव्यमेवेति । अवचनयुत सप्ततय इति भगा भवति त्रिपष्टि ॥ अस्ति नास्ति | उभय | अवक्तव्य अ० अ० ना० अ० अ० ना० अ०। जीव अजीव पुण्य पाप आस्त्रव बन्ध सवर । नि० मोक्ष अण्णाणवाइभेया जीवादण्णाणभावसजुत्ता । तेसही जिणभणिया मिच्छाभावेण सतत्ता ॥२७॥ अज्ञानवादिभेदा जीवादज्ञानभावसयुक्ता• ? । त्रिषष्टि. जिनभणिता मिथ्यात्वभावेन सतप्ता ॥ मणवयणदेहदाणगविणओ णिवदेवणाणिजदिउठे । वाले मादरपियरे कायन्वो चेदि अट्ट चदु ॥२८॥ मनोवचनदेहदानगविनयो नृपदेवज्ञानियतिवृद्धेषु । बाले मातापित्रोः कर्तव्यश्चेति अष्ट चतु ॥ एवं विणयवादो बत्तीसा ३२-एव वैनयिकवाद द्वात्रिंशत् ३२ । एव सच्छंददिहीणं वादाउलकारण ? । तिसहितिसया णेया सव्वससारकारण ॥२९॥ एव स्वच्छददृष्टीना त्रिषष्टि त्रिशतानि ज्ञेयानि सर्वससारकारणानि ॥ १ को जाणइ सत्तचऊ भावं सुद्धं खु दोणिपंत्तिभवा । चत्तारि होति एवं अण्णाणीणं तु सत्तही ॥१॥ को जानाति सत्वचतुष्क भाव शुद्ध खल्ल द्विपक्तिभवा । चत्वारो भवन्त्येव अज्ञानिनां तु सप्तषष्टि. ॥ ।

२८२ सिद्धान्तसारादिसपहे- पठरसेण पिणा पस्ति यणरखीराइसेवण । बालसट्टो मिरुस्साहो फलं किंचिं प संबई ॥३०॥ पौरुषेण विना नास्ति स्तनक्षीरादिसेभन । मालस्पाढपो निरुत्साह फर्स मिचिम मुके ।। पुरिसबादा-पोसवाद। दावा सिग्मदि अस्थो पोरिसं पिफल हवे । एसो सालममांगो फण्णो हम्मा संगरे ॥११॥ वात् सिरपति मर्य पौरुष निम्फल भवेत् । एष सालसमुहग कर्ण हन्यते संगरे ॥ परमादो-देवगावः । एकण चकेम रहो ण यादि संजोगमेवेति पदंति तण्मा । बंधो य पर य वर्ण पविटा से संपजुषा पपर परिहा ॥३२॥ एकन चक्रेण ग्यो न याति संयोगमेवेति पदन्ति सजा । अन्धभ पंगुभ वन प्रविष्यै सौ सम्प्रयुक्ती नगरे प्रविष्यै ।। संगोमपादो-भयोगमारा। लोयपमिदी मया पंचाली पंचपरवत्पी दी। माउहिया ण रुग्मइ मिलिदहिं सुरहिं दुबारा ॥३३॥ ठाकयामदि माथा पंचागरी पचपाडवनी है। मार्दा पता न म्हपत मिरिन मुरे दुग ॥ मोबनादो मोबार ।

अंगपण्णत्ती। २८३ वयणवहा जावदिया णयवादा होंति चेव तावदिया । णयवादा जावदिया तावदिया होंति परसमया ॥३४॥ वचनपथा यावन्तो नयवादा भवन्ति चैव तावन्तः । नयवादा यावन्तो तावन्तो भवन्ति परसमयाः ॥ इदि सुत्त गद-इति सूत्र गतं । पढम मिच्छादिहिं अव्वदिक आसिदूण पडिवज्ज अणुयोगो अहियारो वुत्तो पढमाणुयोगो सो ॥३५॥ प्रथम मिथ्यादृष्टिं अव्युत्पन्न आश्रित्य प्रतिपाद्य । अनुयोगोऽधिकार उक्त प्रथमानुयोग स ॥ चउवीस तित्थयरा वइणो ? बारह छखंडभरहस्स । णवबलदेवा किण्हा णव पडिसत्तू पुराणाइ ॥३६ ॥ चतुर्विंशतिस्तीर्थकरान् जयिनो द्वादश षट्खडभरतस्य । नव बलदेवान् कृष्णान् नव प्रतिशत्रून् पुराणानि ॥ तेसिं वण्णति पिया माई णयराणि चिण्ह पुवभवे । पचसहस्सपयाणि य जत्थ हु सो होदि अहियारो ॥३७॥ तेषा वर्णयन्ति पितॄन् मातृ नगराणि चिह्नानि पूर्वभवान् । पचसहस्रपदानि च यत्र हि स भवति अधिकार ॥ पयाणि ५००० । कोडिपय उप्पाद पुव्व जीवादिदव्वणियरस्स । उप्पादव्वयधुन्वादणेयधम्माण पूरणय ॥३८॥ कोटिपद उत्पाद पूर्व जीवादिद्रव्यनिकरस्य । उत्पादव्ययध्रौव्याद्यनेकधर्माणा पूरणक ॥

सिद्वान्ससारादिसमहे- - २८. पयाणि १०००००००। ते जहा- पग्वाम पाणापयुवाप्पमगोयरकमयोगबसमापिटुप्पावष्ण मधुम्बानि वियागोयण पव पम्मा हवंति। तपरिण पम्पमामि पबहा। उप्पम्पमुप्पनमाणमुपस्समाणे, पापस्समार्ण, पबमाचे, ठि तिहमा विम्सतमिति पवार्ण तं पम्मानमुपण्यादीप पचे पषषितपसमषादो पयासीदिवियप्पधम्मपरिणववयपपर्ण * कोवि समुप्पादपुर्य । दम्पाणो नानानयोपभयगोधरक्रमपोगफ्यसभषितोत्पादष्पपीन्याणि शिकागोचा नवधर्म भवन्ति । परिणय द्रम्पमपि नवधा । उत्पमै उत्पपमान उत्पत्स्पमान नष्ट नश्यत् नंम्पत्, स्थिर्स विष्ट स्पास्यत् इति मषाना तेपा घर्माणां उत्पमादीनां प्रत्येक नवविधत्वसमवात् एका- शीसिविकल्पधभपरिणतदम्पवर्णनं यत्करोति सदुत्पादापूर्वम् ।। प्रमगम्म पत्युणो पि हि पहाणभूदस्म जाणमगमतं । मुअम्गायणीयपुम्ने अम्गायणसमव विहिर्म ॥३९॥ भसम्म वस्तुनोऽपि हि प्रधानमूसस्प ज्ञान अयने । स्प्रायणीयपूर्व अमायणसेभर्व दितीय ॥ मत्तमाम यमुणयदुमपंचस्थिमुकायछपकरयामं । समाण मत्तई पण्णदित अस्वमियराणं ॥४॥ मनशरमनयदर्णयपचास्तिकापपदम्याणा । नन्याना मप्ताना वणयति निकरणो॥ मण लपवमणिमर एण्मनदीलक्सपयपमाणमिण । वैति जिणा ममय गणमह परा सुमावेण ॥ ४१ ।। भान क्षनिफगन, पण्णबतिसक्षपदप्रमाणमि । मानन्ति जिना मत्थाय नमम्पत मराः मुभामेन ॥

अंगपण्णत्ती। २८५ पुवंत अवरंतं धुवाधुवचवणलद्धिणामाणि । अद्भुव संपण हि च अत्थ भोमावयज्ज च ॥ ४२ ॥ पूर्वान्त अवरात ध्रुवाध्रुवच्यवन लब्धिनामानि । ॥ सम्वत्थकप्पणीयं णाणमदीदं अणागदं कालं । सिद्धिमुवजं वंदे चउदहवत्थूणि विदियस्स ॥४३॥ सर्वार्थकल्पनीय ज्ञानमतीत मनागत कालः । सिद्धि प्राप्त वन्दे चतुर्दश वस्तूनि द्वितियस्य ॥ पचमवत्थुचउत्थपाहुडयस्साणुयोगणामाणि । कियवेयणे तहेव फसण कम्मपयडिक तह ॥४४॥ पचमवस्तुचतुर्थप्राभतस्यानुयोगनामानि । तथैव स्पर्शन कर्म प्रकृतिक तथा । वधणणिवधणपाकमाणुक्कममहन्भुदयमोक्खा सकम लेस्सा च तहा लेस्साए कम्म परिणामा ॥४५॥ वधननिवधनोपक्रमानुपक्रमाभ्युदय मोक्षा । सक्रम लेश्या च तथा लेश्याया कर्म परिणामाः ॥ सादमसाद दि (वि ) ग्घ हस्स भव धारणीयसण्ण च । पुरुपोग्गलप्पणाम णिहत्तअहिहत्तणामाणि ॥ ४६॥ सातमसात विघ्न हास्य भय धारणीयस च । पुरुपुद्गलप्रमाण निधत्यनिधत्यनामानि ॥ सणकाचिदमणकाचिदमहकम्महिदिपच्छिमखधा । अप्पबहुत्तं च तहा तदाराणं च चउवीसं ॥४७ सकाचितानकाचितमथकर्मस्थितिपश्चिमस्कन्धा । अल्पबहुत्व च तथा तवाराणा च चतुर्विंशति. ॥

२८६
सिसान्तसारादिसंग्रहे-
अमेसि पत्यूण पाहुत्यस्सावणुयोगयाण च ।
णामाण उपसो कालविसेसेण हो ॥४८॥
मन्पेपो वस्तूना प्राभूतस्पानुयागाना छ ।
नाम्नामुपदेश काउविशेषेण नये हि ॥
पयाणि ९६०००००।
भरमारपौयपुर्म गई-मप्रायासपूर्ण पर्व।
विज्ञानुवादपु पर्ज जीवादिषत्युमामत्य ।
अणुवादो अवष्णणमिह सस्स हवेति भणमा ॥४९॥
पार्यानुवादपूर्व पार्य मीत्राग्विस्तुसाम ।
अनुवाऽनुवर्णनमिह तस्य भोति नभम्यत ।।
सवण्णादि अप्पपलं परविम उहयविज्जमवि णि ।
खेसबलं कालरल माषपलं सवलं पुणं ॥५०॥
नर्णयसि आरमपळ परवीर्य टभपवीर्यमपि नित्यं ।
क्षेत्रवल कालवरी भाववले तपोबले पूर्ण ॥
दम्यबलं गुणपजपषिज विजापलं च सम्याल ।
मचरिलक्सपयहि पुष्णं पुम्ब तदीयं तु ॥५१॥
द्रव्यमान गुणपर्ययषीर्य विद्यालम च सर्पक्छ ।
मप्ततियक्षपदण पूर्व दतीय बन्छ ।
पयाणि ७
म बिमानुपारपुर्म गई- पोर्मानुवारपूर्व मई।
सिपअत्पिणयिपमहा तमि यह रूपणं पवादोधि ।
बत्यि पदो मो वम्मा अत्पिणत्पिपवादपुर्व प॥५२॥

अगपण्णत्ती। २८७ स्यादस्तिनास्तिप्रमुखास्तेपा इह रूपण प्रवाद इति । अस्ति अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व च ॥ णियदव्यखेत्तकालभावे सिय अत्थि वत्थुणिवहं च । परदव्यखेत्तकाले भावे सिय णत्थि आसित्ता ॥५३॥ निजद्रव्यक्षेत्रकालभावान् स्यादस्ति वस्तुनिवह च । परद्रव्यक्षेत्रकालभावान् स्यान्नास्ति आश्रित्य ।। सियअत्थिणत्थि कमसो सपरदव्वादिचउजुदं जुगवं । सियऽवत्तव्वं सेयरदव्वं खेत्तं च भावे च ॥५४॥ स्यादस्तिनास्ति क्रमशः स्वपरद्रव्यादिचतुर्युत युगपत् । स्यादवक्तव्य स्वपरदव्य क्षेत्र च भाव च ॥ सिय आसिदण अत्थि चावत्तव्वं सदव्वदो जुगवं । सपरदव्वादीदो सिय णत्थि अव्वच्चमिदि जाणे ॥५५॥ स्यादाश्रित्य अस्ति चावक्तव्य स्वद्रव्यतो युगपत् । स्वपरद्रव्यादित , स्यान्नास्ति अवक्तव्यमिति जानीहि ॥ परदव्वखेत्तकालं भावं पडिवज्ज जुगव दव्वादो। सिय अस्थि णत्थि अवरं कमेण णेयं च सपरं च ॥५६॥ परद्रव्यक्षेत्रकालान् भाव प्रतिपद्य युगपत् द्रव्यतः । स्यादस्ति नास्ति अपर क्रमेण ज्ञेय च स्वपर च ॥ दव्वं खेतं कालं भावं जुगवं समासिदूणा व । एवं णिचादीणं धम्माणं सत्तभंगविही ॥५७ ॥ द्रव्य क्षेत्र काल भाव युगपत् समाश्रित्य च । एव नित्यादीना धर्माणा सप्तभगविधि ॥ १ अग्रेण सह सबन्ध ।

૨૮૮
सिद्धान्तसारादिसमहे-
मिहिणिसेहायतप्यमंगाणं पतेयसंमोयविसंगोपजादा तिपिण
तिणि एगसमोयाण मेमण सवमंगी पणपसातु एफम्मि वत्पुम्मि
मविपरेण सहपति पापाणयमुफ्तगोणमायेष प्रभवदि ।
पिधिनिपेषावकम्यमेगान प्रत्येकदिर्सयोगप्रिसंयोगमाताना त्रिपेकस
स्मानो मेलन सप्तमंगी प्रश्नषशात् एकस्मिन् वस्तुनि भनिरोधेन समाये
नानानपमुख्यगौणमाषेन यत्प्ररूपयति ।
सत्यपयाणि परेण य पर्यते सहिलमखमाणाणि ।
जाणाणयणिरूवणपराणि सचस्स मंगस्स ॥ ५७॥
तत्र पदानि मुधैव शायन्से पण्ठिसमानानि ।
नानानपनिम्पणपराणि सप्तानो भगानी ॥
पयाणि ६००००००।
हरि परिवनविपापपुन-पपस्विास्तिप्रवावपूर्ण पत।
णामप्पपादपुष्य मदिसुदकोही सणापणामापे ।
मणपजपस्स मयं केवलणाणस्स रूप ॥ ५९॥
भानप्रषापूर्व मतिश्रुतावधिसमानाबानाना ।
मन-पर्ययम्य मेदान् विमानस्य रूपं च ॥
पहदि पयप्पमार्ण फोडी रूठणगा हि मदिणार्म ।
अवगह हावायापारणगा हॉवि सम्मेया ।। ६०॥
कथयति परप्रमाणे काहिं सपोन हि मरियाने ।
मममहहावायघारणा भवन्ति तदा ॥
विमयाण विईणं संजोग दमर्म विपप्पवदं ।
अवगहमाणं तचो विसमसा हवे ईहा ॥६१ ॥

अंगपण्णत्ती। २८९ विषयाणा विषयिणा सयोगे दर्शन, विकल्पवत् । अवग्रहज्ञान ततो विशेपाकाक्षा भवेदीहा ॥ तत्तो सुणिण्णओ खलु होदि अवाओ दु वत्थुजादस्स । कालंतरे वि णिण्णिदसमरणहेऊ तुरीयं तु ॥ ६२॥ ततः सुनिर्णयः खलु भवति अवायस्तु वस्तुजातस्य । कालान्तरेऽपि निर्णीतस्मरणहेतुस्तुर्य तु ॥ इंदियअणिदियुत्थं वेजणअत्थादवग्गहो दुविहो। चक्खुस्स माणसस्स य पढमो ण वऽवग्गहो कमसो ॥६३॥ इन्द्रियानिन्द्रियोत्थ व्यञ्जनार्थाभ्यामवग्रहो द्विविधः । चक्षुष मनसश्च प्रथमो न चावग्रहः क्रमशः ॥ बहु बहुविहं च खिप्पाणिस्सिदणुत्तं धुवं च इदरं च । पडि एकेके जादे तिसयं छत्तीसभेयं च ॥६४ ॥ बहु बहुविध च क्षिप्र अनिसृत अनुक्त ध्रुवं इतरच । प्रति एकैकस्मिन् जाते त्रिशतं षट्रिशद्भेद च ॥ मदिणाण-मतिज्ञानम् । सुदणाणं अत्थादो अत्यंतरगहणमेव मदिपुव्वं । दव्वसुदं भावसुदं णियमेणिह सद्दजं पमुहं ॥६५॥ श्रुतज्ञानमर्थात् अर्थान्तरग्रहणमेव मतिपूर्वे । द्रव्यश्रुत भावश्रुतं नियमेनेह शब्दज प्रमुख ॥ पज्जायक्खरपदसंघायं पडिवत्तियाणियोगं च। पाहुड पाहुडपाहुड वत्थू पुवं समासेहिं ॥६६॥ पर्यायाक्षरपदसघात प्रतिपत्ति अनुयोग च । प्राभृत प्राभृतप्राभृत वस्तु पूर्व समासै ॥ २९ ૨૮૮ सिदान्तसारादिसंग्रहे- विहिणिसेहाषतम्बमंगाणं पतेयसंजोयसिसोपवावार्ण तिष्णि विणि पगसमोपाणं मेठप सवमंगी पगवसातु पम्मि षल्युम्मि मपिपेहेण सहपाति पाणापयमुक्मगोणमाषण में प्रस्पेदि । विधिनिषेधावफष्यभगाना प्रत्येकदिसंयोगसिपोगमताना त्रिभ्येकस- स्पाना मन सप्तमंगी प्रश्नवशात् एकस्मिन् मस्तनि मविरोधेन समाती मानामयमुस्पगौणभावेन यत्प्ररूपपति । तस्थपपाणि युदण य पर्यवे सहिलक्समामाणि । णामाणमणिरूवषपराणि सचस्स मंगस्स ॥ ५७॥ तर पानि पुषैम बापन्से पछिलझमानानि । नानानयनिरूपणपरामि सप्ताना भंगाना ।। पयाणि ६००००००। इदि भविपत्निपारपुम पर-मस्तिनास्तिप्रभारपूर्व पतं । णामप्पवादपुच्च मदिसुदमोही मुमापणाप्माण । मणपजयम्म मेय केवलणामस्स रूप ॥ ५९॥ वानप्रपा पूर्व मनिमुतावविमुपानापानानां । मन पर्ययम्प भेटान् केवमानस्य च ॥ काठि , परप्पमाण कोडी रूळणगा हि मदिमागें। अपगईहावायाधारणगा होति सम्मेया ॥६॥ स्थान परप्रमाण मोटि मपाना हि मतितार्न । अवग्राषायवारणा भवन्ति सदा ॥ विमयाण विमार्ण मंजोग दम वियप्पवद । अयगहणाणं ममो विसेमर्कम्मा हमे ईहा ॥६१।।

अंगपण्णत्ती। २८९ विषयाणा विषयिणा सयोगे दर्शनं, विकल्पवत् । अवग्रहज्ञानं ततो विशेषाकाक्षा भवेदीहा ॥ तत्तो सुणिण्णओ खलु होदि अवाओ दु वत्थुजादस्स । कालंतरे वि णिण्णिदसमरणहेऊ तुरीयं तु ॥ ६२॥ ततः सुनिर्णयः खलु भवति अवायस्तु वस्तुजातस्य । कालान्तरेऽपि निर्णीतस्मरणहेतुस्तुर्य तु ।। इंदियअणिदियुत्त्थं वेंजणअत्थादवग्गहो दुविहो । चक्खुस्स माणसस्स य पढमो ण वऽवग्गहो कमसो ।। ६३॥ इन्द्रियानिन्द्रियोत्थ व्यञ्जनार्थाभ्यामवग्रहो द्विविधः । चक्षुष मनसश्च प्रथमो न चावग्रहः क्रमशः ॥ बहु बहुविहं च खिप्पाणिस्सिदणुत्तं धुवं च इदरं च । पडि एकेके जादे तिसयं छत्तीसभेयं च ॥ ६४ ॥ बहु बहुविध च क्षिप्र अनिसृत अनुक्त ध्रुव इतरच्च । प्रति एकैकस्मिन् जाते त्रिशतं घटिशद्भेद च ॥ मदिणाण-मतिज्ञानम् । सुदणाणं अत्थादो अत्यंतरगहणमेव मदिपुव्वं । दव्वसुदं भावसुदं णियमेणिह सद्दजं पमुहं ॥६५॥ श्रुतज्ञानमर्थात् अर्थान्तरग्रहणमेव मतिपूर्व । द्रव्यश्रुत भावश्रुत नियमेनेह शब्दज प्रमुख ॥ पजायक्खरपदसंघायं पडिवत्तियाणियोगं च। पाहुड पाहुडपाहुड वत्थू पुव्वं समासेहिं ॥६६॥ पर्यायाक्षरपदसघात प्रतिपति अनुयोग च । प्रामृत प्राभृतप्राभृत वस्तु पूर्व समासै ॥

२९०
सिदान्तसारादिसंग्रह-
वीसविर सिं आवरणविमेयतो हि णिपमेण ।
सहमणिगोदस्स हवे अपुमस्स पदमसमयमिह ॥ ६७ ॥
विशतिविष सचेपी मावरणनिभेदतो हि नियमन ।
सूक्ष्मनिगोदस्य भषेत् मपूर्णस्य प्रथमसमये ॥
लखरपवार्य गिरम्पार लहुं गिरावरणं ।
उपस्वरिषडिजुरी घीसचियर्प मुदणाम् ।।६८॥
सम्यक्षरपर्याय नित्योद्घार्ट ग्घु निरावरणे ।
उपयुपरिसिक विशतिविकल्प हि गुलान ।
पति मदमान-वि मुवाने।
मवगुमपचयविहिप बोहीमाणं तु वहिर्ग समये।
सीमामाण रूपीपदत्यसंपादपदरखं ॥१९॥
मषगुणवत्पपपिहित मनाकिसान तु मषधिग सममे ।
सीमामान सपिपदार्पसंघासप्रत्पक्ष ।
दमोही परमोही सन्चोही होदि सत्य विविहं ।
गुमपषयगो णिपमा देसोही परतिरक्खाणं ॥७॥
देशावधि परमावधि सर्वाधिर्मवति तत्र विविधस्त ।
गुणप्रत्ययको नियमात् दशावधि नरतिरथो ।
अवरं दमाहिस्स य णरतिरिए पदि संजदमि पर ।
भवपषयगो ओही सुरमिरयाण च विस्थाण ॥७॥
भवर दंगावधेश नरप्तिर्यक्षु मबति सैयसे पर।
भवप्रन्यहकोऽमधि मुरनारकाणां च तीर्थकराणा ॥
णाणामेय परम एपषियप्प तु विदियमोही खु ।
परमाही मनाही परमसरीरिस्स पिरदस्स ॥७२॥

अगपण्णत्ती। २९१. नानाभेद प्रथम एकविकल्पस्तु द्वितीयोऽवधिः खलु । परमावधिः सर्वावधिः चरमशरीरिण. विरतस्य ॥ अणुगामी देसादिसु तमणणुगामी य हीयमाणो वि। चटुंतो वि अवत्थिद अणवत्थिद होति छन्मेया ॥७३॥ अनुगामी देशादिपु तेष्वननुगामी च हीयमानोऽपि । वर्धमानोऽपि अवस्थितोऽनवस्थितो भवन्ति षड्भेर्दाः ॥ इदि ओहिणाणं-इत्यवधिज्ञान । मणपज्जयं तु दुविहं रिजुमदि पढमं तु तत्थ विउलमदी । संजमजुत्तस्स हवे ज जाणइ तं खु णरलोए ॥७४॥ मन पर्ययस्तु द्विविध ऋजुमति. प्रथमस्तु तत्र विपुलमतिः । सयमयुक्तस्य भवेत् यज्जानाति तत् खलु नरलोके ॥ इदि मणपज्जय-इति मन पर्यय । सव्वावरणविमुक्कं लोयालोयप्पयासगं णिचं । इंदियकमपरिमुक्कं केवलणाण णिरावाहं ॥७५ ॥ सर्वावरणविमुक्त लोकालोकप्रकाशक नित्य । इन्द्रियक्रमपरिमुक्त केवलज्ञान निराबाध ॥ इदि केवलणाण-इति केवलज्ञान । कुमदि कुसुदं विभंगं अण्णाणतिय वि मिच्छअणपुव्वं । सञ्चादिभावमुक्कं भवहेदुं सम्मभावचुदं ॥७६ ॥ कुमतिः कुश्रुत विभग अज्ञानत्रयमपि मिथ्यानपूर्व । सत्यादिभावविमुक्त भवहेतु सम्यक्त्वभावच्युत ॥

२९२ सिद्धान्तसाएदिसंग्रह- रुऊणकोतिपय णाणपवाई अयणाणार्ण । णाणामेयपरूषणपर गर्मसामि मावजुदो ॥७७॥ रूपोनकोटिपद ज्ञानप्रपाद बनेक्वानाना । नानाभेदामपणपरं नमामि भावयुक्तः । पयाणि ९९९९९९९ । इति भावपमा पहनति हामप्रपार गर्व । सपपवाद छई वाम्गुदि चापि पयणसकारो। षयणपओगे पारहमासा सर यस्पर्मेये ।। ७८॥ सत्यप्रकारे पष्ठे बाग्गुठिचापि पचनसंस्कार । पचनप्रपोगो शादशमापा सा बदनहुदा ॥ बहुविहमिमामिहार्ण दसविहसच मया परूषेदि । जीवाण बोहणस्यं पयाणि छसुतरा कोडी ॥७९॥ बहुविधमृपाभिधान दशविक्सस्य मपा प्रमप्यते | नौवाना माधनार्थ पदानि पशुमा फोटि । नंगा । पसपिम्पची मोण पाषाणूची पपणसाकार परमा उरकलीमगिम्भामूलतणामिकतालुभोपामाणि महापाणि पिटवाई मिपिावाषिविदवाईसिपिविदवासविविसमा पंचपपचा बयणसरकारकारणाणि सिम्पो षपणपभोगो तापसत्य सरकायाषायरण । बारह मासा-णमण कियमिषिमपाका प्पमम्ममार्ण णाम १ परोप्यरविरोहहरे कछवाया २ पियो दो- मस्पप्प पमुण्णपापा । पम्मरथकाममोनमाम्सपरपयमसंबना झामो दियपिमपम गप्पाचा पाया रविवाया ५ तेसु मर विउप्याधिपा पाया भरविषाया परिम्गवासपसरस्मपारभासपि ६षु पयप्पमुषादिषयण ७ पषदारे पंचणारे पयर्ण पियरिणय ८ ववणाणाविस मणिपषपणमणविषपर्ण पेपरेनुपपणे मुषार

अंगपण्णत्ती।
२९३
चयणं १० सम्मग्गोवदेसकं वयणं सम्मदंसणवयणं ११ मिच्छाम-
गोवदेसकं वयण मिच्छादसणवयणमिदि १२ ।
तद्यथा । असत्यनिवृत्तिर्मोनं वा वाग्गुप्ति । वचनसस्कारकारणानि
उरःकठशिरोजिव्हामूलदन्तनासिकाताल्चोष्ठनामानि अप्टस्थानानि, स्पृष्टते-
पस्पृष्टताविवृततेपद्विवृततासविवृततारूपाः पचप्रयत्ना वचनसस्कारणानि ।
शिष्टदुष्टरूपो वचनप्रयोग तल्लक्षणशास्त्र सस्कृतादिव्याकरण । द्वादश-
भाषा इदमनेनकृतमिति अनिष्टकथनमभ्याख्यान नाम १ परस्परविरोध-
हेतु.
कलहवाक् २ पृष्ठतो दोपसूचन पैशून्यवाक् ३ धर्मार्थकाममोक्षास-
म्बद्धवचनमसबद्धालाप. ४ इन्द्रियविपयेषु रत्युत्पादिका या वाक् रतिवाक्
५ तेष्वरत्युत्पादिका या वाक् अरतीवाक् ६ परिग्रहार्जनसरक्षणाद्यासक्ति-
हेतु वचन उपाधिवचन ७ व्यवहारे वचनाहेतु निकृतिवचन ८ तपो-
ज्ञानादिषु अविनयवचन अप्रणतिवचन ९ स्तेयहेतु वचन मृपावचनं
१० सन्मार्गोपदशक वचन सम्यग्दर्शनवचन ! २१ मिथ्यामार्गोपदेशक
वचन मिथ्यादर्शनवचनमिति १२ ॥
वत्तारा बहुभेया वींदियपमुहा हवंति मूसवयो ।
बहुविहमसच्चवयणं दव्वादिसमासियं णेयं ॥८॥
वक्तारो बहुभेदा द्वीन्द्रियप्रमुखा भवन्ति मृषावाक् ।
बहुविधमसत्यवचन द्रव्यादिसमाश्रित ज्ञेय ॥
दसविहसचं जणवद सम्मिदि ठवणा य णाम सवे य ।
संभावणे य भावे पडुच्च ववहार.उवमाए ॥८॥
दशविधसत्य जनपद सम्मतिः स्थापना च नाम रूप ।
संभावना च भावः प्रतीत्य व्यवहारं उपमा ॥
भत्तं राया सम्मदि पडिमा तह होदि एस सुरदत्तो।
किण्हो जंबूदीवं पल्लट्टदि पाववज्जवयो ॥२॥

२९१ सिमान्तसारादिममहे- मक राना सम्मति प्रतिमा तथा मवत्पेष सुरदत्त । कृष्ण जम्बूद्वीप परिवर्तपति पापपर्यवचन ॥ हस्सो रन्मदि को पष्ठोषममेषमादिया सथा। आमतणि आणवणी पुरछणि आचपी य पणवग्णी ।।८३॥ इस्य रम्पति मून पत्योपममेवमादिकानि सत्पानि । आमंत्रणी माशापनी पृथानी याचनी प्रहापनी ॥ पपरसाणी संसपवयणी इच्छाणुलोमिया तब । णमी अणरखरमुदा एवं मासा परूचेदि ॥८४॥ प्रत्याख्यानी संशयवचनी इच्छानुमोमिका सच । नवमी अनक्षरगता एवं मापा प्रसपपति ।। पयाणि १०००० ०६। इन सबपनारपुमं गई-पति सत्यप्रवाहपूर्ण गत। अप्पपवाद मणिम् अप्पमरूपप्परूवर्य पुर्व । मथ्वीसफोडिपयगयमेवं जाणंति सुपयत्या ॥८५|| मामप्रषा' भणित आत्मस्वरूपप्रहपके पूर्व । पविशतिकोरिपटगतमेष नानन्ति सुपस्या ।। जीवो कप्ता य बचा य पाणी मोचा य पोग्गलो। बेदी विण मममू मरीरी तह माणयो ॥८६॥ मचो जतू य माणी म माई जोगी य संकरो। असंगे य खेचण अतरप्पा तहेव य ॥८॥ जीप का घमा च प्राणी मोफा व पुनछ । वर विष्णु स्वयम् शारीरी सपा मानव ॥

अगपण्णत्ती। २९५ सक्ता जन्तुश्च मानी च मायी योगी च सकुचित । असकुचित क्षेत्रज्ञ अन्तरात्मा तथैव च ॥ ववहारेण जीवदि दसपाणेहिं, णिच्छयणएण य केवलणाणदं- सणसम्मत्तरूपपाणेहि, जीविहिदि जीविहपुचो जीवदित्ति जीवो। ववहारेण सुहासुहं कम्मं णिच्छयणयेण चिप्पजयं च करेदित्ति कत्ता । नो कमिवि करेदि इाद अकत्ता। सञ्चमसच्चं च वत्तित्ति वत्ता। णिच्छयदो अवत्ता। णयदुगुत्तपाणा अस्स अस्थि इदि पाणी । कम्मफलं सस्सरूव च भुजदि इदि भोत्ता । कम्मपोग्गलं पूरेदि गालेदि य पोग्गलो । णिच्छयदो अपोग्गलो। सव वेइ इदि वेदो । वावणसीलो विण्ह । सयभुवणसीलो सयंभू । सरीरमस्त- स्थित्ति सरीरी । णिच्छयदो असरीरी। माणवादिपजयजुत्तो मा- णवो। णिच्छएण अमाणवो । एवं सुरो असुरो तिरिच्छो अति- रिच्छो णारयो अणारयो च इदि णादव्वं । परिग्गहेसु सजदित्ति सत्ता। णिच्छयदो असत्ता । णाणाजोणिसु जायइत्ति जंतू । णिच्छ- येण अजतू । माणो अहकारो अस्सस्थित्ति माणी । णिच्छयदो अ- माणी। मायास्सस्थित्ति मायी। णिच्छयदो अमायी । जोगो मण- वयणकायलक्खणो अस्सस्थित्ति जोगी। णिच्छयदो अजोगी। जह- ण्णेण संकुइदपदेसो संकुडो। समुग्घादे लोय वाप्पइत्ति असंकुडो। खेत्तं लोयालोयं सस्सरूवं च जाणदित्ति खेत्तण्हू । अट्ठकम्माभंत- रवत्तीसभावदो चेदणाभंतरवत्तीसभावदो च अंतरप्पा । एवं मुत्तो अमुत्तो । एवमादि वपणेदि सत्तमपुवं । व्यवहारेण जीवति दशप्राणै , निश्चयनयेन च केवलज्ञानदर्शनसम्य- क्त्वरूपप्राणै । जीविष्यति जीवितपूर्वो जीवतीति जीव । व्यवहारेण शुभाशुभ कर्म निश्चयनयेन चित्पर्याय च करोतीति कर्ता । न किमपि करोतीत्यकर्ता । सत्यमसत्य च वक्तीति वक्ता । निश्चयतोऽवक्ता । नय- द्विकोक्तप्राणा यस्य सन्तीति प्राणी । कर्मफल स्वस्वरूप च भुक्ते इति २९६ सिमान्तसारादिसंग्रहे- , मोक्का । कर्मपागत् श्यति गाम्यति व पुनस । निमपतोऽपाल । सर्व पेचीति वेद । म्पापनशीलो विष्णु । सबैमषनशाणे स्वय॑म् । शरीरमस्यास्तीति शरीरी | निघयतोशारीरीमानषादिपर्याययुक्तो मानव । निधयेनामाना । एवं सुरोऽमुर , तियचोऽतिर्यंच , नारकोऽनारकम इति पातम्पः । परिमाहेषु समतीति सक्ता । निययतोऽसक्ता । नानायो- निपु गायते इति जन्तु । निभयेनामत | मानोऽहकारोस्पास्तीति मानी। निश्चयतोऽमानी । मायास्यास्तीति मायी । निश्चयतोऽमापी । मोगो मन- बचनकायलक्षणोऽस्यास्तीति योग निमयतोऽयोगी । परन्येन संकुधि- तपदेश संकुचित । समुदाते छोक म्यामोतीत्यसंकुचित क्षेत्र डोकामे स्वस्थवर्ष ब बानासीति क्षेत्र । मरकर्माभ्यन्तरवर्तिस्वभावतधे- तनाम्यन्तरपतिस्तभावसमास्तरारमा । एवं मोऽर्व । एवमादिक वण- यति सप्तम पूर्व । पयाणि २६ ००००००। परिपप्पपपाई पद-स्वात्मप्रवाई म । कम्मपवाटपरूपण फम्मपपादं सया णमसामि । इगिकोडीअरसीसीलपखपर्य महर्म पुम्ब ॥ ८८॥ फर्मप्रचारप्रसपर्ण कमप्राबर सटा नमामि । एफकाव्यगीतिपक्षप' अधर्म पूर्व । मावरणम्म विमय घेयणीर्य मोरणायु णाम प। गानं प अंतगप अहवियप्पं च कम्ममिण ।। ८९॥ भावरणम्य विभर वर्माय माहनीपमायु नाम च । गाव घान्लगर्य भाविकर्म करें।

अगपण्णत्ती । २९७ अडदालसयं उत्तरपयडीदो असंखलोयमेयं च । वंधुदयुदीरणावि य सत्तं तेसिं परूवेदि ॥९० ॥ अष्टचत्वारिंशच्छत उत्तरप्रकृतित. असख्यलोकभेद च । बधोदयोदीरणा अपि च सत्व तेषा प्ररूपयति ।। पयडि.हिदि अणुभागो पदेसबंधो हु चउविहो बंधो। तेसिं च ठिदि ोया जहण्णइदरप्पमेयेण ॥९१॥ प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशवन्धो हि चतुर्विधो बन्धः । तेपा च स्थितिः ज्ञेया जघन्येतरप्रभेदेन ॥ अणुभागो पयडीणं सुहासुहाणं च चउविहो होदि । गुडखंडसक्करामिदसरिसो य रसो सुहाणं पि ॥१२॥ अनुभाग प्रकृतीना शुभाशुभाना च चतुर्विधो भवति । गुडखडशकरामृतसदृशश्च रस. शुभानामपि । णिवकंजीरविसरहालाहलसरिसचउविहो यो । अणुभायो असुहाणं पदेसबंधो वि बहुभेयो ॥९३॥ निंबकजीरविषहालाहलसदृशश्चतुर्विधो ज्ञेयः । अनुभागोऽशुभाना प्रदेशबन्धोऽपि बहुभेदः ॥ लयदारहसिलासमभेया ते विल्लिदारणं तस्स । इगिभागो बहुभागाहिसिला देसघादिघादीणं ॥९४॥ लतादावस्थिशिलासमभेदास्ते वल्लीदार्वनन्तस्य । एकभागो बहुभागा अस्थिशिला देशघातिघातिना ॥ पयाणि १८०००००० । इदि कम्मपवादपुष्व गद-इति कर्मप्रवादपूर्व गत ।

२९८ सिद्धान्तसारादिसप्रहे- पचरखाण मयमं चउसीदिलक्खपयप्पमाणं तु । तत्य वि पुरिसविसेसा परिमिदकालं च इदरे च ॥१५॥ प्रत्याख्याने नवम चतुरशीतिलक्षपदप्रमाणे तु । सप्रापि पुरुषविशेषान् परिमितकार प इतरच ॥ णाम हवणा दवे खेतं काल पहप मान च । पवाखाम कियइ सायजाम प बहुलाण ॥ ९६ ॥ नाम स्थापना द्रम्प क्षेत्र का प्रतीय भाष च । फ्स्पाच्यानं क्रियते सावधानां च याहुलाना ।। उपवासमिहि तस्प वि मावणमेय च पचसमिर्दि च । गुत्तितिय तह वाणदि उपवासकलं विसुखस्म ॥१७॥ उपवासविधि तस्यापि भावनाभेद च पंक्समिति च । गुमिप्रये तथा वणपति उपवासफर्ड विशुदस्य ।। अपागदमदिक्कत कोठिमुदमखरिदं । मायारं च णिरायारं परिमाण देवरं ॥९८॥ अनागतमतिक्रान्स कादियुतमर्वरित । माकार च निराकार परिमाण तपेतरत् ।। वहा च पत्तणीयान मोद्गमिदि ठिई । पक्षपाणे जिणहि दरमे पफित्तिद ।। ९९ ॥ मासुकमिति स्थितं । प्रग्याम्यान बिना भाप्रकीर्तित ॥ पउन्विर न हि विणयमुदं अणुपादमुदामिदि जाप्पे । प्रणपारणमु चिय मापविमुदं गहीदम्ब ॥१०॥ तथा अगपण्णत्ती। २९९- चतुर्विध तद्धि विनयशुद्ध अनुवादशुद्धमिति जानीहि । अनुपालनशुद्ध चैव भावविशुद्ध गृहीतव्य ॥ पयाणि ८४००००० । इदि पचक्खाणपुव्व गदं-इति प्रत्याख्यानपूर्व गत । विजाणुवादपुव्वं पयाणि इगिकोडि होति दसलक्खा । अंगुटपसेणादी लहुविजा सत्तसयमेत्थ ॥१०१॥ विद्यानुवादपूर्व पदानि एककोटि. भवन्ति दशलक्षाणि । अगुष्टप्रसेनादी लघुविद्या सप्तशतान्यत्र ॥ पंचसया महविज्जा रोहिणिपमुहा पकासये चावि । तेसिं सरूवसत्तिं साहणपूयं च मंतादि ॥१०२॥ पचशतानि महाविद्या रोहिणीप्रमुखा प्रकाशयति चापि । तासा स्वरूपशाक्तं साधनपूजा च मत्रादिक ।। सिद्धाणं फललाहे भोमंगयणंगसद्दछिण्णाणि । सुमिणंलक्खणविजणअदृणिमित्ताणि जं कहइ ॥१०३॥ सिद्धाना फललाभान् भौमगगनाङ्गशब्दच्छिन्नानि । स्वप्नलक्षणव्यजनानि अष्टौ निमित्तानि यत्कथयति ॥ पयाणि ११०००००० । इदि विज्जाणुवादपुव्व-इति विद्यानुवादपूर्व । - कल्लाणवादपुव्वं छब्बीससुकोडिपयप्पमाणं तु । तित्थहरचक्कवट्टीबलदेउसमद्धचक्कीणं ॥ १०४ ॥ कल्याणवादपूर्व षडिशतिसुकाटिपदप्रमाण तु । तीर्थकरचक्रवर्तिबलदेवसमर्द्धचक्रिणा ॥

सिमान्वयादिसंप्रदे- गम्भाषदरणउछन तित्यपरादीम पुण्णहे च । सोलहमारमकिरिया सवाणि पण्पेदि (स)पिसेर्स ।।१०५|| गर्मावतरोत्सवानि वीर्यकरदिप पुण्यहेतूच । पोरशमाषनामिया तपोसि वर्णयति सविशेष ॥ परपदमरगामगाणखत्वादिधारसउगाई। सिप फलाई पुणो पण्पेदि मुहाई मत्य ॥१०॥ परचन्द्रसूर्यग्रहणमइनयात्रादिनापशकुनादि। वेपो च फलादि पुन वर्णपसि शुमाधुम यत्र ।। पपाई २६०००००००। इदिभावपुर्म-ति प्रमाणावपूर्ण । पापावामं पुष्य तेराकोरीपर्य पमंसामि । बत्व वि कायचिकिच्छापमहंगायुये च ॥१०॥ प्राणाचार्य पूर्व प्रमोदशकोरिपद नमामि । यत्रापि कायचिकित्साप्रमुगाराने मयुर्वेद च ॥ मुर्दाकम्मंचंगुलिपत्रमाणामाहया परे मेया । ईगपिंगलादिपाणा पुडवीत्राउग्गिवायण ॥ १०८॥ मूनिकर्मजागुपिग्रक्रमसावक्र परे भेना । इछापिंगलादिप्रापणा पृषिभ्यसमियामूना ।।। तचाणं पहुमय दरपाणपसषणं पदम्बाणि । उपयारयाषयाश्यरूपाणि य सिमेव सु ।। १०९ ।। मायाना बहुमेर टयप्राणप्रतपर्ण पदम्याणि । टपकारापारम्पाणि च तेषामेव सस॥

अंगपण्णत्ती ।
३०१
वणिज्जइ गइभेया जिणवरदेवेहि सव्वभासाहि ।
वर्ण्यते गतिभेदैः जिनवरदेवैः सर्वभाषाभि ।
पयाणि १३००००००० ।
पाणावाय गद-प्राणावायं गत ।
किरियाविसालपुव्वं णवकोडिपयेहिं संजुत्तं ॥ ११० ॥
क्रियाविशालपूर्व नवकोटिपदै सयुक्त ॥
संगीदसत्थछेदालंकारादी कला बहत्तरी य ।
चउसही इच्छिगुणा चउसीदी जत्थ सिल्लाणं ॥११॥
संगीतशास्त्रच्छदोलङ्कारादि यः कला द्वासप्ततिः ।
चतुःषष्टिः स्त्रीगुणाः चतुरशीति यत्र शिल्पाना ।।
विण्णाणाणि सुगब्भाधाणादी अडसय च पणवग्गं ।
सम्मइंसणकिरिया वणिज्जंते जिणिदेहिं ॥११२॥
विज्ञानानि सुगर्भाधानादय अष्टशत च पचवर्ग ।
सम्यग्दर्शनक्रिया वर्ण्यते जिनेन्द्रैः ॥
णिच्चणिमित्ताकिरिया वंदणसम्मादिया मुणिंदाणं ।
लोगिगलोगुत्तरभवकिरिया णेया सहावेण ॥११३।।
नित्यनिमित्तक्रिया वदनासाम्यादिका मुनीन्द्राणा ।
लौकिकलोकोत्तरभवक्रिया ज्ञेया स्वभावेन ॥
पयाणि ९००००००० ।
इदि किरियाविसाल-इति क्रियाविशाल ।
तिल्लोयविंदसारं कोडीबारह दसग्धपणलक्खं ।
जत्थ पयाणि तिलोयं छत्तीसं गुणिदपरियम्मं ॥११४॥

सिदान्तसारादिसपहे-
प्रिलोफबिन्दुसार फोव्यो द्वादश दशमपंचक्षाणि ।
पत्र पदानि ठिा पत्रिंशत् गणितपरिफर्म ॥
अउपयहारात्यि पुमो कविपासादि चारि पीजाई ।
मोक्खसरूपग्गममकारणसुहषम्मकिरियाओ ।।११५||
मम्पयहारान् पुन अझमिपासादीनि पत्यारि मीनानि ।
मोवस्वरुपगमनकारणसुसधर्मक्रिया ॥
लोयस्स मिंदवयवा पम्मित च एत्य सारं च ।
से लोपविंदुसार बोइसपुम्च ममसामि ॥११६।।
लोकस्य बिन्दयोऽमयमा पत या सारे च ।
सलोकविन्दुसार धतुर्दशवं नमामि ॥
पयाणि १२५००००००।
सिखोगविहुसार पई-निगरिनुसार पतं ।
इदि णामयूमपट्टे सरि सिरिविवकिषिपामगुरु ।
णमिळण मूरिसक्खो कहा पूर्ण सुवसाचंदो ॥ ११ ॥
इमि बानपणपो सूनि श्रीनिम्यकीर्तिनामगर ।
नत्वा मूग्मुिन्य कथयति इमा सुरशुमचंद्र ।।
पति भंगपणचीप सिठसमुपये पायमंगसमरपावपमि-
हाणे विदिया भाहियारो॥२॥

चूलिकाप्रकीर्णकप्रज्ञप्तिः।
तच्चूलियासुभेया पंच वि तह जलगया हवे पढमा ।
जलथभण जलगमणं वण्णदि विहिस्स भक्खं जं ॥१॥
तचूलिकासु भेदाः पचापि तथा जलगता भवेत्प्रथमा ।
जलस्थभन जलगमन वर्णयति वन्हे भक्षण यत् ।।
वेसणसेवणमंतंतंतंतवचरणपमुहविहिभए ।
णहणहदुगणवअडणवणहदुण्णि पयाणि अंककमे ॥२॥
प्रवेशनसेवनमत्रतत्रतपश्चरणप्रमुखविविभेदान् ।
नभोनभोद्विकनवाष्टनवनभोद्विकानि पदानि अकक्रमेण ॥
पयाणि २०९८९२००।
जलगदचूलिया-जलगतचूलिका ।
मेरुकुलसेलभूमीपमुहेसु पवेससिग्धगमणादि-
कारणमंतंतंतंतवचरणणिरूवया रम्मा ॥३॥
मेरुकुलशैलभूमिप्रमुखेषु प्रवेशशीघ्रगमनादि-।
कारणमत्रतत्रतपश्चरणनिरूपिका रम्या ॥
तित्तियपयमेत्ता हु थलगयसण्णामचूलिया भणिया ।
मायागया च तेत्तियपयमेत्ता चूलिया णेया ॥४॥
तावत्पदमात्रा हि स्थलगतसन्नामचूलिका भणिता ।
मायागता च तावत्पदमात्रा चूलिका ज्ञेया ॥
मायारूवमहेंदजालविकिरियादिकारणगणस्स ।
मंततवतंतयस्स य णिरूवग्ग कोदुयाकलिदा ॥५॥

३०० सिद्धान्तसारादिसमो- मायारूपेन्द्रनाराविक्रियादिफमणगणानां । मंत्रसपस्तंत्राणां च निरूपिका कळिता ॥ स्वगया पुण हरिकरिसुरंगकरुणरतरमियवसहार्ण । ससवम्पादीम पि य रूपपरावसहदुस्स ॥६॥ रुपगता पुन हरिकरितापनरतस्मगपभागा । शशम्याप्रादीनामपि च रूपपरावर्तनहेतूना ।। सबपरणमंतवतयंतस्स परूषगा य पपपसिला-- चितकहलेप्नुवरखणमादिसु लक्खणं कहदि ॥७॥ सपथरणमंत्रतंत्रयंत्राणो प्रसपका प शिलम- चित्रकाष्टक्षेप्योत्सननादिसुरक्षण कयते ॥ पारदपरिपट्टणय रसवायं घावायफ्षणं प । मा पूलिया कहेदि णामाजीषाण मुहहेतु ॥८॥ पारदपरिवर्तन रसवार धातुवादास्यान च । पा धूलिका कयौ नानाजीवानां मुखहेतो ।। आपामगया पुण गयणे गमणस्स मुमंतांचवाई। हेदणि कहदि तवमपि तेत्तिपपयमचसंपदा ॥९॥ आकागगता पुन गगने गमनस्य मुमत्रमंत्राणि । हनि क यति पाऽपि तावत्परमाप्रसम्पदा ॥ इदि परमारभूमिमा सरिममा गदा-पात पंचप्रारमिण साया गया। चउरम परणया खलु मामइपमूहा हि अंगपाहिरिया। न वारा अग्पिाद हि सुभबजीवस्म ॥१०॥ पाणया मयू मामापिकप्रमुखा हि भगवाया । हि मुभम्मगावस्प ॥ T न। य अंगपण्णत्ती। ३०५ एयत्तणेण अप्पे गमणं परदव्वदो दु णिव्वत्ती। उवयोगस्स पइत्ती स समायोऽदो उच्चदे समये ॥११॥ एकत्वेन आत्मनि गमन परद्रव्यतस्तु निवृत्तिः । उपयोगस्य प्रवृत्तिः स समाय आत्मोच्यते समये ॥ णादा चेदा दिहाहमेव इदि अप्पगोचरं झाणं । अह सं मज्झत्थे गदि अप्पे आयो दु सो भणिओ ॥१२॥ ज्ञाता चेतयिता दृष्टाहमेव इत्यात्मगोचर ध्यान । अथ स सध्यस्थे गतिरात्मनि आयस्तु स भणितः ।। तत्थ भवं सामइयं सत्थं अवि तप्परूवगं छविहं । णाम हवणा दव्वं खेत्तं कालं च भाव तं ॥१३॥ तत्र भवं सामायिक शास्त्रमपि तत्प्ररूपक पड्विध । नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र कालश्च भावस्तत् ।। तत्थ इट्ठाणिढणामेसु रायदोषणिन्वात्त सामाइयमिदि अहिहाणं वा णाम सामाइय ॥१॥ तत्रेष्टानिष्टनामसु रागद्वेषनिवृत्ति सामायिकमिति अभिधान वा नाम सामायिकम् ॥१॥ मणुण्णमणुण्णासु इत्थिपुरिसाइआयारठावणासु कट्ठलेवचित्ता- दिपडिमासु रायदोसणियट्टी इणं सामाइयमिदिवाइजमाणयं किंचि वत्थू वा ठावणा सामाइयं ॥२॥ मनोज्ञामनोज्ञासु स्त्रीपुरुषाद्याकारस्थापनासु काष्ठलेपचित्रादिप्रतिमासु रागद्वषनिवृत्तिः इद सामायिकमिति वा स्थाप्यमान किंचिद्वस्तु वा स्था- पना सामायिक ॥२॥ इट्ठाणिहेसु चेदणादणदव्वेसुरायदोसणियट्टी सामाइयसत्थाणु- वजुत्तणायगो तस्सरीरादि वा व्वसामाइयं ॥३॥ २०

सिद्धान्ससारादिसग्रहे-
इध्यनिटेषु पेतनातनद्रष्येषु रागोपनिति सामायिकशामान-
पयुकबापक सरीरादिपा द्रष्यसामायिक ॥३॥
पामगामपपरपणादिमेस हामिसु रायदोसपियही क्षेत्र
सामाश्र्य
नाममामनगरवनादिक्षेत्रेषु इयनिटेषु रम्गदेषनिति
क्षेत्रसामा-
यिक॥१॥
बसंतास उडम मुक्ककिनार्ण पक्वाण विणवारणायचास
मतेम कामपिसेसेस पियही काससामापं ॥५॥
मसत्तादिषु ऋतु शुक्रष्णयो पक्षया दिनमारनक्षत्रादिषु च तेषु
कालविशेपेषु समिति फालसामायिक ॥ ५॥
णाममावस्स जीयादितपषिसयुवयोगमपस्स पखापस्स मि-
पासपकसायाधिसकिसणियही सामारपसापयुत्तप्पामगो
तप्पयायपरिष सामार्य पा मावसामार्म ॥६॥
नामभावस्प जीवादितस्वविषयोपयोगरूपस्प पर्यायस्य मिप्यादर्शक
पायारिसशनिवृत्ति सामायिकशामोपयुक्तमायक' तत्पर्यापपरिणत
सामायिक या भावसामायिक ॥६॥
सामाइम पद-सामायिकगते ।
घउपिमजिणाण मामठवणदखसेवकालमाहिं।
कालगणपउत्तीमारिसमारपारिराणं ॥१४॥
चतुविशति जिनाना नामस्थापनादम्पक्षेत्रकाठभागे ।
कपाणचतुर्विशतिशयास्पातिहार्याणां ॥
परमोगलियवहमम्मोमरणाय धम्मदेसस्स ।
मण्ममिह त पवण तपरिपई घसम्म च ॥१५॥

अंगपण्णत्ती। ३०७ परमौदारिकदेहसमवशरणाना वर्मदेशस्य । वर्णनमिह तत्स्तवन तत्प्रतिबद्ध च शास्त्र च ॥ थव गद-स्तव गत । मा वंदणा जिणुत्ता वंदिजह जिणवराणमिण एक्क । चेत्तचेत्तालयादिथई च दव्वादिबहुभेया ॥ १६ ॥ सा वन्दना जिनोक्ता वन्द्यते जिनवराणा एकः । चैत्यचैत्यालयादिस्तुतिश्च द्रव्यादिवहुभेदा ॥ एव वदणा-एव वदना । पडिकमणं कयदोसणिरायरणं होदि तं च सत्तविहं । देवसियराइक्खियचउमासियमेववच्छरियं ॥१७॥ प्रतिक्रमण कृतदोषनिराकरण भवति तच्च सप्तविध । दैवसिकरात्रिकपाक्षिकचातुर्मासिकसावत्सरिक ॥ इज्जावहियं उत्तमअत्थं इदि भरहखेत्तादि । दुस्समकालं च तहा छहसंहणणऽड्डपुरिसमासिज्ज ॥१८॥ ईर्यापथिक उत्तमार्थमिति भरतक्षेत्रादि । दु.षमकाल च तथा षट्संहननाढ्यपुरुषमाश्रित्य ॥ दव्वादिभेदभिण्णं सत्थं अवि तप्परूवयं तं (तु)। यदिवग्गेहि सदावि य णादव्वं दोसपरिहरणं ॥ १९॥ द्रव्यादिभेदभिन्न शास्त्रमपि तत्प्ररूपक तत्तु । यतिवगै. सदापि च ज्ञातव्य दोषपरिहरण ॥ इदि पडिक्कमण-इति प्रतिक्रमण ।

सिदाम्पसारादिसमहे- वेणार्य जादव पंचविहो जाणदसमाण प। पारिचतषुषधारह पिणो अस्य परूविज ॥२०॥ पैनपिक पातम पंचविष शानदर्शनयोश्च । चारित्रतफ्ठपचारामा विनयः पत्र प्ररुप्यते ॥ विणयो सासणधम्मो विषयो संसारवारओ विमओ । मोक्खपहो वि य विणो कायव्यो सम्मदिटीम् ॥२१॥ विनय शासनपर्म विनय संसारतारक विनय । मोक्षपयोऽपि च विनय कर्तम्प सम्यग्दधिमि ॥ नियमो पदो-बिनयोक्त। किदिकम जिणवयणपम्मजिणालयाण षेचस्स । पंचगुरुण मवहा पंदमहेदं परूवेदि ॥ २२ ॥ इतिकर्म जिनवधनधर्मनिनाख्याना त्यस्य । पंचगुणा नवधा वन्दना प्रस्पयति ।। साधीमतियपदिक्सपतियमदिउसरसुवारसावचे । गिवणिमिताकिरिमाविहिं प पत्तीस दोसारं ।। २३ ।। स्वाधीनतिकमा क्षिण्यप्रिनतिषतु शिरोशदशामर्ताः । निस्यनैमित्तिकक्रियाविधि चारिशदोपहर ।। इपिरिमनधि हविष्म। बदिगोचारस्म विहिं पिरविमुदिप पस्पेदि । दसषयालिपसुन दह फाठा अत्य संकुचा ।। २४॥

अगपण्णत्ती।
३०९
यतिगोचरस्य विधि पिंडविशुद्धिं च यत् प्ररूपयति ।
दशवैकालिकसूत्रं दश काला यत्र समुक्ताः ॥
इदि दहवेकालिय-इति दशवैकालिक ।
उत्तराणि अहिज्जति उत्तरऽझयणं मदं जिणिदेहिं ।
वावीसपरीसहाणं उवसग्गाणं च सहणविहिं ॥ २५ ॥
उत्तराणि अधीयन्ते उत्तराध्ययन मत जिनेन्द्रैः ।
द्वाविंशतिपरीपहाना उपसर्गाणा च सहनविधि ॥
वण्णेदि तप्फलमवि एवं पण्हे च उत्तरं एवं ।
कहदि गुरु सीसयाणं पइण्णिय अट्टम त खु ॥२६॥
वर्णयति तत्फलमपि एव प्रश्ने च उत्तर एव ।
कथयति गुरुः शिष्येभ्य प्रकीर्णक अष्टम तत्खलु ॥
इदि उत्तराज्झयण-इत्युत्तराध्ययन ।
कप्पव्ववहारो जहिं ववहिज्जइ जोग कप्पमाजोगा।
सत्थं अवि इसिजोग्गं आयरणं कहदि सव्वत्थ ॥ २७॥
कल्पव्यवहार• यत्र व्यवह्रियते योग्य कल्प्य अयोग्य ।
शास्त्रमपि ऋषियोग्य आचरणं कथयति सर्वत्र ॥
एव कप्पववहारो गदो-एव कल्पव्यवहारो गत ।
कप्पाकप्पं तं चिय साहूणं जत्थ कप्पमाकप्पं ।
बणिज्जइ आसिचा दव्वं खेत्तं भवं कालं ॥ २८ ॥

सिद्धान्तसारादिसमहे-
कम्पाकस्य तदेव सानो पत्र फस्यमफस्प।
बमेत मानिस्प दम्य क्षेत्र भवं कार॥
रिमाप्प-तिस्पाय।
महकप्र्प मापव्यं विणकप्पाणं च सव्वसाहम् ।
उत्पमसंहरणाण दम्पपखेचादिवत्तीर्ण ॥ २९ ॥
महाकल्प शासम्म जिनकस्पानां च सर्वसाधूनां ।
उत्तमसहनमाना दम्पक्षेत्रादिवर्तिनां ।।
ठियकालयोगकप्पं पविरसप्पाण वत्म पणिज्जा।
दिस्सासिक्खापोसणसोपअप्पसकारं ॥ ३० ॥
त्रिकाल्योगकाम्प्य स्थविरकस्पानां यत्र वर्ण्यो ।
दीक्षाशिक्षापोपणसरलेसनारमसंस्काराणि ।।
उचमठामगदाण उकिटाराहणाविसेसं च ।
नतमस्पानगसाना उत्कृष्ठरापनाविशेष।
महाक गद-ति महासागत ।
पुररिपणामसत्पं ममामि णि सुमावेण ॥ ३१ ॥
पुररीकनामशा नमामि मिस्र्प सुभावेन ।
मावणर्षितरजोरमकप्पपिमाणेसु नस्व पश्यिया ।
उप्पचीकारण खल दाम पूरन तक्यरण ॥ ३२ ॥
भाषनम्यन्तरम्पोतिम्माकल्पविमानेषु यत्र मयते ।
उत्पनिकम्ण सम दान पूजा प तपधरण ॥
सम्मत्तसेजमादि अामपिज्जरणमेव अस्प पुनो।
सम्पावतापवेषमुहसंपची बीमागं ॥ ३३ ॥

अंगपण्णत्ती। ३६ सम्यक्त्वसयमादि अकामनिर्जरा एव यत्र पुनः । तदुत्पादस्थानवैभवमुखसपत्तिश्च जीवाना || इदि महंपुढरीय-इति महापुडरीक । गीसेहियं हि सत्यं पमाददोसस्स दूरपरिहरण । पायच्छित्तविहाण कहेदि कालादिभावेण ॥ ३४ ॥ निपेधिका हि शास्त्र प्रमाददोपस्य दूरपरिहरणं । प्रायश्चितविधान कथयति कालादिभावेन ॥ आलोयण पडिकमणं उभयं च विवेयमेव वोसग्ग । तव छेय परिहारो उवठावण मूलमिदि णेया ॥ ३५ ॥ अलोचन प्रतिक्रमणं उभय च विवेक एच व्युत्सर्गः । तपश्छेदः परिहार• उपस्थापना मूलमिति ज्ञेय ।। दहभेया वि य छेदे दोसा आकंपियं दस एदे। अणुमाणिय जं दिहं चादर सुहमं च छिण्ण च ॥३६॥ दशभेदा अपि च छेदे दोषा आकपित दश एते । अनुमानित यदृष्ट बादर सूक्ष्म च छिन्न च ।। सड्ढावुलियं बहुजणमव्वत्तं चावि होदि तस्सेवी । दोसणिसेयविमुत्तं इदि पायच्छित्तं गहीदव्वं ॥ ३७॥ १ महपुडरीय अस्य स्थाने पुडरीय इत्येव भाग्य । महापुढरीकस्य लक्षण पुस्तकाम्ध्युत भस्मदृष्टिदोषाद्वा गतमिति न जानीम । लिखितपुस्तक त्वधुन अस्मत्समीपे नास्ति। २१-७-२२ । तल्लक्षण हि-महाच तत्पुडरीक च महापुडरीव शास्त्र तच महर्धिकेषु इन्द्रप्रतीन्द्रादिषु उत्पत्तिकारणतपोविशेषाद्याचरण वर्णयति महपुडरिय सत्य वणिज्जइ जत्य महड्डिदेवेसु । तमपर्मिटाईमपत्तीकारणातनोनि

सिदान्तसदिसमहे-
शरदकुलित माननमम्पकं चापि भवति सत्सेवी।
दोपनिषेकयिमुक्त इति प्रापमित्तं गृहीसम्मे ||
एवं दबछेया वि य सरोसा सहषिरा वि सम्मेया ।
वग्मिज्जते स अत्य वि मिसीदिकाएस विस्थारा ॥३८॥
एवं दशमेटा अपि च तदोपा सथामिषा मपि प तदा ।
वर्ण्यन्ते सपत्रापि निसीतिकासु विस्तारेण ॥
पनि भिदिपारपर्व-पति विधिमप्रकीर।
एवं पाप्पयाणि य पोइस परिदाणि एस्य संखेषा ।
साहदि बो दि जीवो सो पाया परमणिष्वाण ॥ ३९ ।।
एवं प्रफीणकानि * चतुर्दश प्रवीसानि मत्र संक्षेपात् ।
प्रदधाति यापि जीव स प्राप्नोति परमनिर्माण ॥
एवं बोरसपानगा-एर्ष चतुरन्सप्रवीति ।
सुदणाण फेवलमपि दोमि वि सरिसाणि रोति मोहादो।
पक्षमस्व केवलमवि सुदं परोक्खं सया माये ॥४०॥
घुतमान कवलमपि दे भपि सहशे भक्तो बाघस ।
प्रत्यक्ष कवष्मपि ध्रुवं परोक्ष सदा पानीहि ।।
इदि उमाण वि मणिय पणादो उसासेमजोइस्स |
सेमावि जिणवग्दिा सगपिं परिता समरखसि ॥४१॥
इति तृपमेणापि भणित प्रश्नतः वृषमसेनयोगिन ।
शेषा भपि जिमबरेन्द्रा स्वगणिन प्रति तथा समासान्ति ।।
मिरिषडमाणमाकपमिमिम्गय पारहंगमुदणाण ।
मिग्गिोयमेण रायं अविरुदं समा मषियममा ॥ ४२ ॥

अंगपण्णत्ती । ३१३ श्रीवर्धमानमुखकजविनिर्गत द्वादशाङ्गश्रुतज्ञान | श्रीगौतमेन रचित अविरुद्ध शृणुत भव्यजना ! ॥ सिरिगोदमेण दिण्णं सुहम्मणाहस्स तेण जंबुस्स । विण्ह गंदीमित्तो तत्तो य पराजिदो य(त)त्तो ॥४३॥ श्रीगौतमेन दत्त सुधर्मनाथस्य तेन जम्बूनाम्न । विष्णु नन्टिमित्र ततश्चऽपराजितः तत ॥ गोवद्धणो य तत्तो भद्दभुओ अंतकेवली कहिओ। बारहअंगविदण्हू पचेदे कलियुगे जादा ॥ ४४ ।। गोवर्धनश्च तत भद्रबाहु अन्तकेवली कथित । द्वादशाङ्गविद पचैते कलियुगे जाता ॥ दसपुव्वाणं वेढा विसाहसिरिपोढिलो तदो सूरी । खत्तिय जयसो विजयो बुद्धिल्लसुगंगदेवा य ॥४५॥ दशपूर्वाणा वेत्तारौ विशाखश्रीप्रौष्टिलौ ततः सूरी । क्षत्रिय जयस विजय बुद्धिलमुगगदेवौ च ॥ सिरिधम्मसेणसुगंणी तत्तो एगादसंगवेत्तारा । णक्खत्तो जयपालो पंडू धुयसेण कंसगणी ॥४६॥ श्रीधर्मसेनसुगणी तत एकादशाङ्गवेत्तार । नक्षत्र जयपाल पाडु ध्रुवसेन कशगणी ॥ अग्गमअंगि सुभद्दो जसभद्दो भद्दबाहु परमगणी । आइरियपरंपराइ एवं सुदणाणमावहदि ॥४७॥ अग्रिमाङ्गी सुभद्र यशोभद्र भद्रबाहु परमर्गणी आचार्यपरपरया एव श्रुतज्ञान आवहति ॥ १ नागसेनसिद्धार्थधृतिषेणेति त्रीणि नामानि पुस्तकाद्तानीत्यवभाति। • प्रथ- मानवेत्तार । ३ लोहायश्चेति ।

सिझन्ससारादिसंप्रो- कालविसेसा यह मुदणाणं अप्पमुद्धिपरमादो । तं असे संघहदि धम्मपदेसस्स सदु ॥४८॥ कालविशेषात नई श्रुतमार्न मस्पभुद्धिधरणत । तदर्श संवहति धर्मोपदेशस्म प्रदानेन तु॥ वापरिपपरंपराई मागदोंगोवदेसणं पर। सो घय मोफ्ससह मम्मो मोहप्पाहावेण ॥४९॥ माचार्यपरपरया भागवानोपदेशन पठति । सपटति मोक्षसाच मम्पो मोभप्रभावेन ॥ सिरिसपलकित्तिपो पासेसी सपणकितिपरमगुरु । वप्पहकमलमाण महारओ मोहम्समभो ॥ ५० ॥ श्रीसकसकीर्तिपढे आसीत् मुवनकीर्तिपरमगुरु । तत्परकमलभानु महारक बोधभूषण ॥ सिरिविजकिविदेओ माणासस्पप्पयासओ धीरो । पुरसेपियपपजुपलो सप्पयवरफलमसलो म॥५१॥ श्रीविग्यकीतियो नानाशासप्रकाशको पीर | बुधसेषितपदयुगल तत्पदयरफलम सुप्पयसवणमनो तेवेखो उहयमासपरिवेई । सुरवंदो नेण इण गर्य मत्वं ममासेम ॥५२॥ सत्पदमवनसत त्रैविध उभयभाषापरिसेगी । गुभचन्द्रस्नने गधितं शास्र समासेन ।। मथविन्दं कि पिम मोई सुदारा मम्बा । परउवयागणिविहा परफजमरा महापट्ठा ।। ५३ ॥

अगपण्णत्ती। ३१५ शास्त्रविरुद्ध 'किमपि च यत्तत् शोधयन्तु श्रुतधरा भव्याः । परोपकारनिविष्टाः परकार्यकरा सुभावाढ्याः ।। जो णाणहरो भन्यो भावइ जिणसासणं परं दिव्वं । अचलपयं सो पावइ सुदणाणुवदेसियं सुद्धं ॥ ५४ ॥ यो ज्ञानधरो भन्यो भावयति जिनशासन परं दिव्य । अचलपद स प्राप्नोति श्रुतज्ञानोपदेशित शुद्ध । इदि अंगपण्णत्तीए सिद्धंतसमुच्चये वारहअंगसमराणावराभिहाणे. तइओ परिच्छेदो सम्मत्तो ॥३॥ इदि अगपण्णत्ती सम्मत्ता । . स. १८६४ पूषवदी १५ सुरतवदरे चन्द्रप्रभचैत्यालये लिखित पडितरूपच- न्द्रेण स्वज्ञानावरणीयकर्मक्षयार्थ । शुभ भवतु, कल्याणमस्तु ।

अथ श्रुतावतार । मत्र भरतमेवं पामिवेशे वसुंभरानामनगरी भविष्यति । तम मरवाहनो राजा तस्प सुरूपा रात्री तस्यां पुषमछममानो पमा रदिनेदं करिष्यति। मत्र प्रस्ताचे सुपुरिनामा भेटी तस्म नप- स्पोपदेश दास्पति । यवि देव ! पद्मावतीपावाविंदपूनां करिष्यति । तवा पुष व मानोपि मत एप मेष्टिमा मोर्क व राजा करिष्यति सता पुषो मविप्पति। तस्य पुनस्म पम इति नाम विभास्पति राजा ततमेस्यालयं करिष्यति सहमर दशसामस्वमोर पशाई प व मात्र करिप्पति ।पर्सतमासे भेटपपि राजमसावात्परे परे जिनमदिरमरिता महीं करिष्यति । मतिरे मपी प्रासे समस्तोपि संपस्तत्रागमिष्यति। यज्ञा भेष्ठिना सहजिनस्तवन विधाप पूजा मगरीमध्ये महामहोत्सवेन र नामपित्या तठो सिमांग स्थाप- मिप्यति । निजमिमगधस्वामिन मुनीएमा पम्पभावनामाथिको नगपादनापि पष्टिना सुबुदिनाना सहजीबी फरिप्यति। मना तर कपिळसवादा ममा गमिप्पवि । जिनान् प्रणम्य मुनीनी पंधर्ना हत्या परसनगुरोर्वदा प्रतिपाय लग समर्पपिप्पति । तत्रापास्ते मुनपस पृटीस्था याचा फरिप्यति। तराया।गिरिमगरसमीपे गुर पामी धामनमुनीराऽप्रापणीयपूर्पस्य या पंचमवस्तुकस्तस्य मुर्गामाभूतम्प शासम्पम्पाम्यानमारंभ करिप्यति । भरसेनमार कतिपयदिन ग्यारमसपिनानाः पठनाकर्णनधितक्रिया कुतो- ग्पारावतीदिन मात्र परिममानि पास्पति एकस्य भूता पनी पलिपिधि करिप्पति भम्पस्य दत्तपातुःसंदर।मूठपतिप्रमाबाट पसिनामा नरपाहमा मुनिर्भपियान ममतचतुएपमभायात् मा सि पुष्पानमामा मुनिर्भविप्यनि। मारमना निकरमरण पारवा पर मन पनामा दशा मषतु इति मन्या सम्मुनिषिसर्सनपरिप्पति ।

श्रुतावतारः। ३१७ तन्मुनिद्वयं अंकुलेसुरपुरे गत्वा मत्वा षडंगरचनां कृत्वा शास्त्रेषु लिखाप्य लेखकान् संतोष्य प्रचुरदानेन ज्येष्ठस्य श्रुक्लपंचम्यां तानि शास्त्राणि संघसहितानि नरवाहनः पूजयिष्यति षडंगनामानं दत्वा निजपालितं पुष्पदंतसमीपं नरवाहनस्तं पुस्तकसहितं प्रेषयिष्यति निजपालितदर्शितपुस्तकं तं षडंगनामानं दृष्ट्वा पुष्पदंतः स्वहृदि तोषं करिष्यति नानापुस्तकसमूहं लिखाप्य सोपिपंचमीतिथ्यंगमालो- कमानो मुनिभिः समंततः स्थास्यति । अत्रांतरे ग्रीष्मकाले प्राप्ते पुष्प- दंतो विचित्रमडंपरचनां करिष्यति । पुस्तकपूजानिमित्तं सिद्धांत- पुस्तकं धृत्वा समस्तानन्यान्पट्टकोपरिवरपट्टैः पिधाय क्रियां कृत्वा ततः श्रुतस्तोत्रं करिष्यति । व्रतसमितिगुप्तिमुनिव्रतभाषणं आचारां- गमष्टादशसहनपदैर्भक्त्याभिवदे इत्यादिस्तोत्र विधाय यावत्पुष्पदं- ताचार्यः स्थास्यति तावद्भव्यजनैः पृष्टः सम्यगुपवासफलं भव्या- नामग्रे भणिष्यति। ये केचित्प्राणिनः शुक्लपंचमीदिने उपवास श्रुतार्थ कुवति ते खेचरोरगसुरासुरसुखानि भुक्त्वा तृतीये भवे निर्वाणं व्रजति तद्वचः श्रुत्वा श्रावकाः श्राविकाश्च तं विधिलास्यंति। अत्रां- तरे सूर्योस्तंगमिष्याति चद्रोदयो भविष्यति प्रभाते जाते भूयोपि भ- व्यश्रावकाः श्रुतपूजां कृत्वा गृहं गत्वा साधुभ्यो भोजनं वितीर्य स्वयं भोजनं करिष्यति अमुना प्रकारेण दिनत्रयं श्रुतपूजा कृत्वा ततः पुष्पदंतो मुनिः पुस्तकान्पुस्तकस्थाने स्थापयिष्यति । सिद्धांत- पुस्तकमृष्टिं कृत्वा नरवाहनमुनि. पुष्पदंत. पापानि विधूय वीतरागं वीरं स्मृत्वा स्वर्ग यास्यति यथा षट्खंडागमरचनाकारको भूतव- लिभट्टारकस्तथा पुष्पदंतोपि विंशतिप्ररूपणाना कर्ता । पुनरिंद्रभूति- गणिना निगदितं भो. श्रेणिक ! षट्खंडागमसूत्रोत्पत्ति विमुच्येदांनी प्राभृतसूत्रोत्पत्तिं कथयामिश्रूयता-ज्ञानप्रवादपूर्वस्य नामत्रयोदशमो वस्तुकस्तदीयतृतीयप्राभृतवेत्ता गुणधरनामगणी मुनिर्भविष्यति सोपि नागहस्तिमुनेः पुरतस्तेषा सूत्राणामन्प्रतिपादयिष्यति तयो- गुणधरनागहस्तिनामभट्टारकयोरुपकंठे पठित्वा तानि सूत्राणि यति- नायकाभिधो मुनिस्तेपा गाथासूत्राणा वृत्तिरूपेण पट्सहस्रप्रमाणं चूर्णिनामशास्त्र करिष्यति।तेपाचूर्णिशास्त्राणा समुद्धरणनामा मुनि- सिमान्तसारादिसप्रह- गोवशसहसममित तरीका रचयिप्पति निखनामाउंहत इति त्रि परंपरया मिविपसिवातो मजन मुनीन्द्रवपाचार्पसमीपे सिवात पात्वा वकीविनामा पत्राना मध्ये प्रथमत्वे पंगांशावासह मममितं परिफर्म नाम शार्स करिप्पति पदोन पिना रोपांगता साखभापामिः परतिमाम दावशसासममितं श्यामपनामा मसरकाकरिप्पतिवपापपरस्प सप्तसहसममिता पमिकांचा विविसितिस्प प्रजता समुदरमे सर्मवभद्रनामा मुनीन्द्रो मपि प्पति सोपि पुना पदारपंधानां संस्कृतभापपाएपपिसहम- प्रमिता टीका करिप्यति द्वितीपसिांतीको शाने मिखापयन् सुप म्ममामा मुनिर्वामिप्यति ब्रम्पाविशुद्धौषात् इति निवि सियांत मतं शुमर्मविमाधारकपा भुत्या शास्त्वा कपप्रदेवनामा मुनीन्त्रा मालमापया भएसाममिवां दीको करिप्पति। पावरे पला- चार्यमारकपा सियांहार्य पीरसेननामा मुनिः पठित्वाऽ पराण्पपि भावशाभिकाराणि माप्य पंचबरे पर सरप्प संम्तमाठमाषया सत्कर्मनामटीका मासप्ततिसालममिर्गा अपळनामाकितो लिसाप्य पिंशतिसहकर्मप्राभूतं विचार्य धीर मेनो मुनिः स्वमें यास्पति। तस्प शिप्पो जिनसेनो भविप्पवि सोफि- पत्वारिंशसहस्रः कर्मप्राभूत समाप्ति नेप्पति ममुना प्रकारेण पशिसहसममिता जयपवसनामांकित्ता टीच भविष्यति। पति भीपचारिभरममता बिनुषधीपरपिरनिवे तापवारप्रापर्व नाम तुर्व परिपत्र ।

अथ शलाकानिक्षेपणनिष्काशनविवरणं । ema अर्हतं तत्पुराण जिनमुनिचरणान् देवतां क्षेत्रपालं छायासूनोर्निशायामभिपवनविधैः पूजयित्वा जलाद्यैः । जातां हेम्नः शलाका कुशकुसुममयीं कन्यया दापयित्वा तत्प्रातः पूजयित्वा पुनरथ शकुनं वीक्ष्यते तत्पुराणं ॥१॥ अत्युग्रशुभकार्यार्थ शनिवारो न याति चेत् अन्यस्मिन्वासरे सौम्ये पुराणं प्रार्चयेत्सुधीः ॥२॥ दुव॑चः श्रवणे चैव दुनिमित्तावलोकने क्षुत्ते प्रदीपनिर्वाणे पुराण नार्चयेत्ततः ॥३॥ अष्टान्दा वा दशाब्दामजनितरजसं कन्यकां वा नवोढा- मभ्यंगस्नानभूपां मलयजवसनालंकृतां पूजयित्वा । मंत्रैर्वागदेवतायास्त्रिगुणितनवक मंत्रयित्वा शलाकां तद्दोभ्या दापयित्वा तदनु च दलयोः कार्यमालोच्य मध्ये ॥४॥ कन्या न लभते यत्र न प्रौढा लभते यदा शलाका श्रावक शुद्धः पुराणे प्रक्षिपेत्तदा ॥५॥ प्राक्पत्रे पूर्वपंक्तौ वा पद्ये पूर्वाक्षराणि च सप्त हित्वा पठेच्छलोकमिति केषां मतं मतं ॥६॥ १रों को श्रीं ह्रीं क्लीं ब्लें झाँ झों श्रीसरस्वति मरालवाहने वीणापुस्त- कमालापद्ममडितचतुर्भुजे मौक्तिकहारावलिराजितोरोजसरोजकुड्मलयुगले वद वद वाग्वादिनि सर्वजनसशयापहारिणि श्रीमद्भारति देवि ! तुभ्य नमोस्तु, इति श्री सरस्वतीमत्र ।

No text on this page.

श्रीमत्पंडिताशाधरविरचिता कल्याण-माला। : पुरुदेवादिवीरान्तजिनेन्द्राणां ददातु नः । श्रीमद्गर्भादिकल्याणश्रेणी निश्रेयसः श्रियम् ॥१॥ शुचौ कृष्णे द्वितीयायां वृषभो गर्भमाविशत् । वासुपूज्यस्तथा षष्ठयामष्टम्यां विमलः शिवम् ॥२॥ दशम्यां जन्मतपसी नमेः शुक्ले तु सन्मतेः । षष्ठयां गर्भो भवनेमेः सप्तम्यां मोक्षमाविशत् ॥३॥ सुव्रतः श्रावणे कृष्णे द्वितीयायां दिवच्युतः । कुन्थुर्दशम्यां शुक्ले तु द्वितीये सुमतिस्थितौ ॥४॥ जन्मनिष्क्रमणे षष्ठयां नेमेः पार्श्वः सुनिवृतः । सप्तम्यां पूर्णिमायां तु श्रेयानिःश्रेयसं गतः ॥५॥ भाद्रे कृष्णस्य सप्तम्यां गर्भ शान्तिरवातरत् । गर्भावतरणं षष्ठयां सुपार्श्वस्य सितेऽभवत् ॥६॥ पुष्पदन्तस्य निर्वाण शुक्लाष्टम्यामजायत । श्रितः शुक्लचतुर्दश्यां वासुपूज्यः परं पदम् ॥७॥ आश्विनेऽभूद्वितीयायां कृष्णे गर्भो नमेः सिते । नेमे प्रतिपद्विज्ञानं सिद्धोष्टम्यां च शीतलः ॥८॥ अनन्तः कार्तिक कृष्णे गर्भेऽभूत्प्रतिपदिने । चतुर्थ्यां शंभवाधीशः केवलज्ञानमापिवान् ॥९॥ .

३२२ सिदान्तसारादिसंग्रहे- पमप्रमखयोदश्यां प्राप्तो बन्मयते शिवम् । दर्श पीरो द्वितीया कंवन्य मुषिधि स्पित ॥१०॥ पष्ठयां गर्मोऽभवमेमेदश्यां केवलोद्भव । अरनाथस्स पधान्ते संमवेशस्य बन च ॥११॥ मार्गे दशम्पां कृष्णेऽगाडीरो दीक्षा ननियते । सुषिघे पक्षान्ते शुक्ले दशम्यां त्वरदीषणम् ॥१२॥ एकादश्यां जनुर्दी मल्ले न नमेस्तया । अरजन्म चतुर्दश्यां पक्षान्ते मम्भव प्रसम् ॥१३॥ पौपणे द्वितीयामां मल्लि कैवस्पमासदत् । चन्द्रप्रमम्वया पाच एकादश्या बनिव्रते ॥१४॥ शीतलम्तु चतुरश्या कैवल्यमदमी मिलत् । शान्तिनायो दशम्यान्तु शुक्ले कैवल्पमापिवान् ॥१५|| एकादभ्यान्तु कैवल्यमजितशोऽमिनन्दन । चतुर्दश्यां पूर्णिमामा धर्मभ लमत स्म वत् ॥१६॥ माष पपप्रम कृपणे पष्ठपो गर्भमवातरम् । नीतलम्प जनुर्वीक्षे द्वादश्यां अपमस्प तु ॥१७|| मोधो भवतुदश्यां दर्श भेयांसफेवलम् । शुक्रपक्षे द्वितीयायां वासुपथ्यस्य केवलम् ॥१८॥ घतथ्या विमला जन्मदीक्ष पष्ठपो च फेवलम् । नवम्बामजिठो दीभी टम्यो बन्म घामदत ॥१९॥ अमिननननाथम्य द्वादश्या मन्मनिष्क्रमौ । मर्मम्प जन्मनपमी प्रयोदश्यां पमवतु ॥२०॥ चतुथ्या फाल्गुने कप्ण मार्क पपप्रमो गत ।

कल्याण-माला।
३२३
पष्ठयां सुपार्श्वः कैवल्यं सप्तम्यां चाप निर्वृतिम् ॥२१॥
सप्तम्यामेव कैवल्यमोक्षौ चन्द्रप्रभोऽभजत् ।
नवम्यां सुविधिर्भमेकादश्यां तु केवलम् ॥२२॥
वृपो जन्मवते तद्वच्छ्यान्मुक्तिं तु सुवृतः।
द्वादश्यां वासुपूज्यस्तु चतुर्दश्यां जनिव्रते ॥२३॥
अरः शुक्ले तृतीयायां गर्भ मल्लिस्तु निर्वृतिम् ।
पंचम्यां प्रापदष्टम्यां गर्भ श्रीसंभवोऽपि च ॥२४॥
चैत्रे चतुर्थी कृष्णेऽभूत्पार्श्वनाथस्य केवलम् ।
पंचम्यां चन्द्रभो गर्भमष्टम्यां शीतलोऽश्रयत् ॥२५॥
नवम्यां जन्मतपसी वृपभस्य बभूवतुः।
कैवल्यमप्यमावास्यां मोक्षोऽनन्तस्य चाभवत् ॥२६॥
शुक्लप्रतिपदा गर्भे मल्लिः कुन्थुस्तृतीयया ।
ज्ञाने जिनोऽभूत्पंचम्यां मोक्षे षष्ठयां च सम्भवः ॥२७॥
एकादश्यां जनिनिमोक्षान्सुमतिरुद्भवम् ।
वीरः प्राप्तस्त्रयोदश्यां पद्माभोंत्येन्हि केवलम् ॥२८॥
पार्श्वः कृष्णे द्वितीयायां वैशाखे गर्भमाविशत् ।
नवम्यां सुव्रतो ज्ञानं दशम्यां च जनिव्रते ॥२९॥
धर्मो गर्भ त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां नमिः शिवम् ।
शुक्ल प्रतिपदि प्राप कुन्थुर्जन्मतपः शिवम् ॥३०॥
प्राप्तोऽभिनन्दनः षष्ठयां शुक्लायां गर्भमोक्षणम् ।
नवम्यां सुमतिवीरो दशम्यां ज्ञानमक्षयम् ॥३१॥
श्रेयान् ज्येष्ठे सिते षष्ठयां दशम्यां विमलोऽपि च ।
गर्भ समाश्रितोऽनन्तो द्वादश्यां जन्मनिष्क्रमौ ॥३२॥

३२१ सिमान्तसारादिसंग्रह- शान्ति प्रितमतुर्दश्या जन्मदीयाशिवभिप । अमावास्या दिने गर्ममववीणों जिनपरः ॥३३॥ शुक्ले घतुयो निर्वाण प्राप्तो धर्मो जिनपर । सुपामनायो द्वादश्यां बनिप्रजिते स्थितः ॥३४ इतीमा पमदीनां पुप्पस्कल्याणमालिको । करोति पण्ठ अपां य स स्पादाशापरेरिवः ॥३५॥ इस्पाशापरथिमिताभल्याणमाखा प्रमाण । समाप्ताऽयं प्रन्या

No text on this page.

Siddhantsaradisangrah

Author
Soni, Pandit Pannalal
Title
Siddhantsaradisangrah
File name
Siddhantsaradisangrah
Text
OCR done
Citation
1932
Published
2011/09
Publisher
Bambai, Karnataka Steem Press
Language
Sanskrit
Pages
384
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314169
Barcode
99999990312309.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
MeAgBnZb6V8
Download PDF

Siddhantsaradisangrah